Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
Vishnu Puran (khand-i)
Front matter
- भूमिका पठारह महापुराणों में पद्यपि यह विष्णुपुराण' पाकार को दृष्टि से सबसे छोटा है, पर इसका महत्व प्राचीन समय से ही बहुत पधिक माना प्रया है । अन्यान्य पुराणो में जो पुराण-सूचियां मिलती हैं उन सभी मे इसको तृतीय स्थान दिया गया है । सस्कृत के विद्वानो की रष्टि मे इसकी भाषा ऊँचे दर्जे की साहित्यिक, काव्यगुण सम्पन्न मौर प्रमादगुणयुक्त मानी गई है । जहाँ तक अनुमान है भापा भौर वर्णनगनी की श्रेषता में भागवत के सिवाय किसी अन्य पथ पी तुलना इससे नहीं की जा सकती। भूमण्डल का स्वरूप, ज्योतिप, राजवगो का इतिहास, कृष्ण चरित्र मादि विषयों का इसम बडे बोध- गम्य ढ ग से वर्णन किया गया है । कई पुराणो मे जो साम्प्रदायिक खएउन- मराडन् अथवा विरोध की भावना पाई जाती है, उससे भी यह मुक्त है। 'धार्मिक तत्वो का इसमें जैसी सरल और मुबोध शैली मे वर्णन किया गया है उसकी जितनी प्रशसा की जाय कम है। 'विष्णुपुराण' की श्लोक सरया के विषय में बहा मतभेद है। अधिकार स्थानो मे २३ हशर श्लोक वनलाये गये हैं पर जो प्रय इस समय प्राप्त है उसमे केवल सात हजार श्लोक पाये जाते हैं। इस पर कई विद्वान कहते हैं कि 'विष्णु धर्मोत्तर पुराण' इसी का उत्तराध है। इसको मान लेने पर और विष्णु पर्योत्तर' के नौ हजार सोको को जोड देने पर भी सोलह हजार की सख्या प्राप्त होती है जो तेईस हजार मे सात हजार कम है । इस प्रकार यह एक ऐसी समस्या हो गई है जिसके सम्बन्ध में कोई निर्णयात्मक सम्मति दे सक्ना असम्भव है । यद्यपि डा. विलसन जैसे विदेशी विद्वान इसको बहुत बाद की कृत्रिम रचना कहकर छुटकारा पा जाते है, पर किसी हिन्दू धर्मानुपापी का इससे संतोष नहीं हो सका। हम तो इस विषय मे यही वह सस्ते हैं कि सभव है किसी कारणवश प्राचीन काल मे ही विष्णु पुराण का यह सक्षिप्त संस्करण किसी विद्वान ने पृथक कर दिया हो और मूल बडा अथ विदेशियो के प्राक्रमण के समय नष्ट हो गया हो। विष्णु-पुराण के वण्य-विषय-- विष्णु पुराण प्रशो मे चटा है, जिनमें १२६ प्रध्याय है। पहले अश मे काल का स्वरूप, सृष्टि की उत्पत्ति और ध्रुव, पृथु और प्रह्लाद का वृत्तान्त हैं। दूसरा प्रश लोको के स्वरूप के सम्बन्ध मे है। इसमे पृथ्वी के नौ खण्ड, सात पाताल लोक तथा सात ऊद्ध लोको का वर्णन है । ग्रह- नक्षत्र, ज्योतिफ चक्र, नवग्रह आदि का भी परिचय दिपा है। तीसरे मे मन- "वन्तर, वेदो की शाखाओं का विस्तार, गृहस्थ-धर्म और धार विर्षि पणित है। चौथे प्रश में सूर्य वश, चद्रवश प्रादि के राजाम्रो के चरित्र तथा उनकी क्शावली वर्णन की गई है। पचिना अश, जो पर्याप्त बडा श्रीकृष्ण चरित्र तथा उनको लोकोत्तर लीलामो से सम्बन्ध रखता है। यह बात उल्लेखनीय है कि जहाँ इसमै रामचरित दस बीस श्लोको मे ही दिया गया है कृष्ण- परित्र का विस्तार सो पृष्ठ मे है । अन्तिम प्रश छोटा है और उसमे प्रलय मोर मोक्ष मार्ग का वर्णन करके ग्रथ का उपसहार किया गया है। इस प्रकार शास्त्रों में पुराणो के जो पांचो लक्षण (१) सर्ग (तरको पति और महाभूतो की सृष्टि', २) प्रतिसर्ग (सृष्टि का प्रारम्भ और विविध प्रकार के प्रारिमयो की उत्पत्ति ) (३) वश (ब्रह्माजी द्वारा उतान मूल वशी का वर्णन), (४, मन्वन्तर (कार एवं समय के खएड और कल्प मादि का वर्णन) (५) वशानुचरित्र (ऐतिहासिक राजवशो के विशिष्ट महापुरुषो का परिचय), 'विष्णु पुराण' मे पाये जाते हैं। इसके अतिरिक्त बीच-बीच में प्रध्यारम विवेचन, सदाचार मौर पमं का निरूपण, कनिधर्म प्रादि उपयोगी विषयो वा भी समावग है । समस्त विपयो का सम्यक धनुगत पोर प्राकार में वर्णन परला म पुराण की विशेषता है । किसी विषय का इतना धना- [ ४ ] :- स्पर विस्तार नहीं दिया गया है कि पाठक को पढ़ते-पटने भारस्वरूप जान रहने लगे। पुराण का प्राविर्भाव- विष्णु पुराण के आविर्भाव की क्या भी एक विशेष महत्व रखती है। इसमें दया, क्षमा की वृत्ति का एक उतम उदाहरण मिलता है। महपि वशिष्ठ के पौत्र परामरजी को जब ज्ञात हुमा कि उनके पिता को विश्वामित्र जी मी प्रेरणा से रामय ने खा लिया था तो उन्हें वडा रोष पाया और उन्होंने राक्षसों के नाम के लिये एक यश प्रारम्भ किया, जिसमें सरडों राक्षस जलकर भस्म होने लगे। यह देख पितामह वमिट जी ने उनको समझाया कि तुम्हारे पिता की मृत्यु में राशमी का कोई विशेष दोप न या, घटना और भाग्यवश हो उनकी इस प्रकार मृत्यु हो गई । अब तुम इस प्रकार के क्रोष को त्याग दो, क्योंकि साघुप्रो का मुन्य लक्षण मा ही कहा गया है :- सवितस्यापि महता वत्स क्लेशेन मानवैः । यशस्तपपसश्च क्रोधोनाशकरः परः॥ स्वर्गापवर्ग ध्यासेय कारण परमर्षयः । पर्जयन्ति सदा क्रोध तात मा तद्वशो भव ।। (वि० १-१-१७-१८) "है वम । मनुष्य अत्यन्न कष्ट भोर थम से जिस या पौर तप का पचय करता है यह क्रोर उगका प्रत्यन्त नाश करने वाला है । इससे महर्षिगण स्त्र और मोक्ष को बिगाडने पाले इस कोर का सर्वश त्याग ही फरते आये हैं। प्रा तुम इसके वशीभूत होकर पाना अनहित मन परो।" पराशर जी ने वृद्धजनो की शिक्षा को स्वीकार करके जब राक्षसो का नष्ट करना बन्द कर दिया तो राक्षम वश के पूर्वज महर्षि पुलस्त्य जो बहुत सतुष्ट हुए और उन्होंने पराशर जी को पुराण संहिता की रचना कर सक्ने का वरदान दिया। उसो के फनपा प्रबार आने पर उहोने इसका प्रवचन मुनिवर मैत्रेय जी को प्रायना पर दिया ।
वाराह कल्प का वर्णन- जिरा फाल में हम सब रह रहे हैं उसका नाम शास्त्रों में वाराह पर कहा गया है । सतयुग, त्रेता, द्वापर मोर कलियुग मिसकर घतुयुग बहलाने है । ऐगे हजार 'चनुयुग या ब्रह्मा या एक दिन होता है। ऐसे ही तीन सौ माठ दिनो की ब्रह्मा की परमाय होती है। शास्त्री ये नुसार ब्रह्मा की पापी माय व्यतीत हो चुकी है और प्राधी प्राय में यह पन नामक महावल मारम्भ हुमा । जिसका प्रथम कल्प'वाराह' नाम का इस समय चल रहा है । इसका वर्णन करते हुए 'विष्णु पुराण' में कहा गया है fr जिस प्रकार अन्य वल्पो में नारायण ने मत्स्य.पूर्म प्रादि का रूप धारण करके पृथ्वी का उद्धार दिया था उसी प्रकार इम अल्प मे उन्होने जल मे डूबी हुई पृथ्वी को बाहर लाकर सृष्टि रचना के उपयुक्त बनाने के लिये 'वेदयज्ञमय वाराह' दारीर धारण दिया। जब वे इस रूप में पृथ्वी के सम्मुख प्रकट हुए तो वह उनकी स्तुति करते हुये पहने लगी- "हे वमलनयन भगवन् । पापको नमस्कार है, प्राज प्राप इस पाताल लोक से मेरा उद्धार कीजिये । पूर्वकाल में मैं आपसे ही उत्पन्न हुई थी। मेरे तथा अन्य महाभूतो के उपादान कारण पाप ही हैं। परमत्मा स्वरूप प्रापको नमस्कार है। प्रधान (कारण) और व्यक्त (कार्य) रूप । पापको नमस्कार है । काल स्वरूप । पापको नमस्कार है। प्रभो । जगत की सृष्टि, पालन सहार के लिये पाप ही ब्रह्मा विष्णु और रुद्र का रूप धारण करने वाले हैं। गोवि दा जगत के एवाएंव मे मग्न हो जाने पर सबको उदरस्थ करके अन्त मे पाप ही उस जल मे शयन करते हैं।" ( वि. पु. १-४) इसी प्रकार आगे चलार सनन्दन आदि योगीश्वरों ने वाराह भगवान की स्तुति करते हुए कहा-"जगत्पते । परमार्थ (सत्य वस्तु) तो एक मात्र पाप ही हैं, पापके अतिरिक्त और कोई भी नहीं है। यह आपकी ही महिमा है जिससे यह सम्पूर्ण चराचर जगत व्याप्त है । यह जो कुछ भी मूर्तिमान जगत दिवाणी देता है , वह ज्ञान स्वरूप प्रापका ही शरीर है । इस मम्पू -- ज्ञान स्वरूप जगत को प्रज्ञानी लोग अर्थ रूप (वास्तविक) समझते हैं, अत: के निरन्तर मोहमय ससार-सागर मे भटक्ते रहते हैं। परमेश्वर । जो लोग शुद्धचित्त और विज्ञानवेत्ता हैं, वे इस सम्पूर्ण संसार को प्रापका ज्ञानात्मक रूप ही देखते हैं।" (वि० पु. १-४) इस वर्णन से जगत के आदिकारण तथा उसके सत्य स्वरूप पर जो प्रकाश पड़ता है वही समस्त ज्ञान-विज्ञान का अन्तिम निष्कर्ष है। सृष्टि की -रचना भै चाह कितनी भी विविधता को न दिखलाई पडती हो, ससार मे कितना भी संघर्ष क्यो न अनुभव होता हो, जन्म और मरण, उत्पत्ति और नारा मे कितना ही अन्तर क्यो न जान पडता हो, पर शानी को स्पष्ट यह "दिसायो देता है कि इन समस्त विविधता, मित्रता के मूल मे एकता विद्यमान है । विश्व भरम जो कुछ भी दिखाई पड़ता है पा अनुभव मे पाता है उस सबका मूल उद्गम एक ही है । पुराएकार ने इस तथ्य को वाराह भगवान की कथा के रूप में प्रकट किया है । अन्य लोग वैज्ञानिक शब्दावली मे इसका निरूपण करते हैं पर वास्तविक तासयं सपा यही है कि समस्त जगत का भून कारण एक ही है । उसी से यह बार-बार उत्पन्न होता और वृति को प्राप्त होता है और अत में उसी में लीन हो जाता है । घव पाख्यान- विष्णुपुराण का प्रवास्पान बडा सुन्दर और शिक्षाप्रद है। ससार में मनुष्य यदि कोई महान कार्य करना चाहता है अपनी सामान्य स्थिति से उठकर मारमोद्धार का अभिलापी है तो उसका एक मात्र माधार तप- मनासपत भाव से कर्तव्य पालन ही है । अपने उदर पालन के लिये, स्त्री, बच्चे और परिवार के भरण-पोपण के लिये तो सभी को परिश्रम करना पडता है। इसके लिये मनुष्य अनुचित मार्ग का भी प्राश्रय लेते हैं, पर जो किसी प्रकार की महानता लोकोत्तर पदवी का इच्छुक है, उसको इस स्वाथमयो स्थिति ‘से अवश्य ही ऊँचा उठना होता है । उसे लोक, समाज, समार के हित की भावना ये श्रम करना पड़ता है, उसका प्रतिफर कैसा भी क्यो न मिले । जव [ ७ ] मनुष्य अपने को इस विशाल संसार मा एर मंग मात्र पमम लेता है पोर सबके हित मे अपना हित मानो लगता है तो उसकी शक्ति पनन्त गुनी बढ़ जाती है और यह बडे-बडे दुस्तर कार्यों का भी सरलता से पूरा पर सकता । ध्र य को यत्तित्व भी ऐसा ही था। वह अपने को एक राजा का पुत्र अथवा किसी एक माता का बेटा समभने के बजाय ध्यापक रूप में देखता था । इसीलिये उसे अपनी दिमाता अपवा सौतेले भाई से रिसी प्रकार का प नही हुमा, परन् उसने अपना उद्धार अपने पुरुषापं से करने का निश्चय किया । वह सासारिक सम्पदा और वैभव को नाशवान समझार पात्मिक उत्कर्ष का ही अभिलापी या मोर इसलिये उसने अपने पो ससार की सर्वव्यापक और नियामक शक्ति में मिला देने का प्रयत्न किया। यह इस तथ्य को कहाँ तक हृदयराम कर चुका था, यह उन शब्दो ने प्रकट होता है जो उसने भगवान के प्रकट होने पर उनकी स्तुति करते हुए पहे-- 'पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, मावास, मन, बुद्धि, महकार मोर भूल प्रकृति-ये सब जिनके रूप है उन भगवान को मैं नमस्कार करता हूँ। जो अति शुद्ध, सूक्ष्म, सर्व व्यापक हैं और प्रधान से भी परे जिनका रूप है उन गुण भोक्ता परम पुरुष को मैं नमस्कार करता । प्रभो पाप हजारों मस्तको वाले, हजारो नेत्र वाले, हजारो चरणो वाले परम पुरुष हैं, भाप सर्वत्र व्याप्त हैं । भूत और भविष्यत् जो कुछ पदार्थ हैं, सब माप ही हैं। विराट, स्वराट, सम्राट और मादि पुरुष (ब्रह्मा) प्रादि भी सब प्रापसे ही उत्पन्न हुए हैं । यह सम्पूर्ण जगत प्रापके स्वरूप भूत ब्रह्माण्ड के अन्तर्गत हैं। जिस प्रकार नन्हे से बीज मे बडा भारी वट वृक्ष रहता है उसी प्रकार प्रलय काल मे यह सम्पूर्ण जगत वीज स्वरूप माप मे ही लीन रहता है । जिस प्रकार बीज से अकुर रूप में प्रकट हुआ वटवृक्ष बढकर अत्यन्त विशाल, विस्तारयुक्त हो जाता है उसी प्रकार सृष्टि काल में यह जगत माप मे से ही प्रकट होकर फैल जाता है । (वि० पु०१-१२) मानव जाति की प्रगति के उन्नायक-महाराज पृथु- कहा गया है कि विष्णु भक्त ध्रुव के परा में ही कुछ पोहियों के परचाद वेन नाम का एक ऐमा राजा उत्पन हुआ जो मरयन्त निरकुश पा पौर स्वय को ही ईश्वर तलाकर सब प्रकार के धर्म-क्नव्यों पर प्रतिबंध लगाता था । उसने प्रजा को प्राशा दी कि कोई यश, दान, हवन मादि न फरे । जब देश के ज्ञानी जनो ने उसे ऐमें धर्म विरुद्ध और जनता को कर्तव्य प्रष्ट करन वाले कार्यों से रोक्ने का प्रयत्न किया तो वह और भी उहएता का परिचय देने लगा इस पर प्रजा के हित चिन्तक व्यक्तियो ने उसका मन्त पर दिया और उसके पुत्र पृथु को शासनाधिकारी बनाया। चेन के कुशासन के कारण जो पराबक्ता पैदा हो गई थी उसके कारण काफी समय तक देश में अव्यवस्पा फैनी रही पोर जीवन निर्वाह ये अधिकारा साधन नष्ट हो गये । उस समय तक जन साधारण वन मोर जगलो की प्राकृतिक उपज पर ही निर्वाह परते थे। पृषु ने देखा कि यह 'रोज कुप्रा खोदने' का तरीका बहा प्रस्थायी है और इससे नाहे जब जीवन निर्वाह की मामग्री का प्रभाव हो सकता है। पता उसने भूमि को समतल कराके से जोनने बोन का कम पारम्भ किया, जिससे पर्याप्त मात्रा में खाद्य सामग्री प्राप्त हो सके। इस स्थिति का वर्णन परते हुए परागर जी ने बतलाया है- "उस समय मन, गोपालन, कृषि और व्यापार का कोई म न था। यह सब देन पुत्र पृथु के समय से ही प्रारम्भ हुआ है । वहाँ-जहाँ भूमि समतल थी, वही-वही पर प्रजा ने निवास करना पसन्द क्यिा । उस समय तक प्रजा का माहार केवल फल मूलादि ही था, वह भी पैड-पौधो के नष्ट हो जाने से वहा दुर्लभ हो गया था। इस प्रकार भूसो मरती प्रजा को प्राणदान करने के कारण महाराज पृगु भूमि के पिता हुए और सर्वभूतवारिणे परा का 'पृथिवी' का नाम मिला।" (वि० पु०१-१३) मधर्म पर धर्म को विजय- इस समार में धर्म और प्रवर्म--सतोगुण और तमोगुण का सपर्प अनादि काल से चला पाया है। एक परमार्थ, परोपकार करुणा का मार्ग ग्रहण करके प्रात्मा को ऊंचा उठाने का प्रयत्न करता है और दूसरा अन्याय, अत्याचार करता के द्वारा भी अपने स्वार्थ साधन, वैभव विलास मे ही रत रहता है । इस प्रकार के दो मनुष्यों का टकरा जाना स्वाभाविक ही है । यद्यपि परमाणे मार्ग का पथिक किसी का प्रनहित नहीं चाहता, वह प्रत्या- चारी की भी कल्याण-कामना ही करता है, पर जो क र बुद्धि होता है, वह तो कभी सन्तुष्ट ही नही होता, वह अपने हितवर्ता के साथ भी बुराई करने को तैयार रहता है। इसी का एक परमोज्ज्वल उदाहरण विष्णु पुराण' के प्रह्लाद-प्राख्यान में मिलता है । प्रह्लाद का पिता हरिण्यकशिपु एक ऐसा ही दमन नीति में विश्वास रखने वाला सम्राट था। कहा जाता है कि उसने बहुत बडी शक्ति एकत्रित करके 'त्रिलोकी' को वशीभूत कर लिया था। उसके भय से 'देवता' (सज्जन पुरुष) इधर-उधर जान बचाते मारे-मारे फिरते थे। वह अपने को ही ससार का वर्ता-धर्ता, विधाता मानता था। जो कोई विश्व सचालक परमात्मा का नाम लेता था वहीं उसे अपना शत्रु जान पडता था। पर हरिण्यकशिप का बेटा प्रह्लाद ठीक इसके विपरीत स्वभाव का था। वह परम ईश्वर भक्त था और ससार के प्रत्येक प्राणी तथा पदार्य मे उसी के रूप का दर्शन करता था। इससे पिता पुत्र से प्रसन्तुष्ट रहता था और मन्त मे यह दुर्भाव यहाँ तक बढ गया कि वह उसको अपना परम शत्रु मानः कर नष्ट मरने पर उतारू हो गया। पर समदर्शी प्रहलाद ने कभी उसके प्रति द्वैप भाव अपने मन में न माने दिया और वह उसके सब भत्याचारो को उसी परमारम- दाक्ति पर भरोसा रखकर सहन करता गया। हरिण्यकशिपु ने प्रहलाद को हर तरह से अपने विचारो का अनुयायी बनाने का प्रयत्न किया पर वह सदा यही करता रहा- "विषयों का जितना-जितना संग्रह किया जाता है, उतना ही थे मनुष्य के चित्त मे दुःस बढ़ाते । जीव अपने मनको प्रिम लगने वाले बाघों को जितना ही बताता है, उतने हो उसके हृदय मे शोक स्पो शल्य टे) गहते जाते हैं। घर में जो घन, धान्यादि होते हैं, मनुष्य के हो भी रहते हुए, उसके चित्त मे बने रहते हैं, और उनके नाम का प्राशका ने दुस देती रहती है । इस प्रकार जीते जी तो वह यहां महान दुस पाता है, मरने पर भी यम पासनाप्रो और गर्म वास में उसे उग्र कष्ट भोगना डता है । सारा संसार इसी प्रकार दुःखमय है । इसलिये इस संसार समुद्र.. दुखों से बचाने वाले एक मात्र भगवान ही हैं।" "मनुष्य सोचता है कि 'अभी तो बालक हूँ, इच्छानुसार खेल कूद लू हुवावस्था गाने पर रल्याए यापन का प्रयत्न करूंगा। फिर युवा होने पर हिता है कि अभी तो में ससार-सुख भोग लू वुटापे में धर्मध्यान करूगा और अब वृद्ध हो जाता है तो अनुभव परता है पब तो मैं शक्तिहीन हो गया, मेरी इन्द्रियों कर्मों में प्रवृत्त ही नहीं होती शरीर के शिथिल हो जाने पर मैं क्या कर सकता हूं ? सामथं रहते तो मैंने कुछ किपा ही नहीं।' इस प्रकार वह कभी कल्याण पथ पर अग्रसर नहीं हो पाता मोर केवल भोग तृपया में ही व्याकुन रहता है । (वि. पु. १-१७) भोगवादी हरिणयकशिपु को प्रहाद वी यह त्याग-भावना विष तुल्य प्रतीत होती थी क्योंकि उसकी सचाई के कारण भनेक लोगो पर उसका प्रमाद पहना जाता था और उसके प्रजाजनो तथा नौकर-चाकरो मे से वह सख्यक भीतर ही भीतर उसके विरोधी बनते जाते थे। इससे उसने पिता-पुत्र के सम्बन्ध को भूनकर प्रसाद को अपने मार्ग से हटा देने का दृढ निश्चिम पर लिया और जो कुछ उसके वश में था उसे मारने के लिये सब कुछ किया। पर जो व्यक्ति मानव-शक्ति से ऊपर किमी महान शक्ति के सहारे अपने को 'होड देता है और वर्तव्य पालन के अतिरिक्त किसी अन्य दिशा मे दृष्टिपात करता वह एक प्रकार से ममर हो जाता है। उम अविनाशी तत्व को गोद मे अपने जो समर्पण कर देने वाला स्वम भी नष्ट होने के मय से युक्त हो जाता है। इसलिए हरिएपकशिपु के सब कुचक्र विफल सिद्ध हुए प्रौर [ ११ ] जैसा कहा गया है कि "तलवार का माश्रय लेने वाले तलवार से ही नष्ट हो रावे है" अपनी दे पाग्नि में वह स्वयं ही जल-भुन पर भस्म हो गया। अद्वैत सिद्धान्त का प्रतिपादन- यद्यपि यह भक्ति प्रधान पुराण है पर इसके रचियना ने पन्य मतो और सम्प्रदायों के साथ भी उदारता परिचय दिया है। भक्ति का सिद्धान्त द्वैतवाद के अन्तर्गत ही रह सकता है, क्योकि भक्त भी अपने को भगवान के तुल्य नही मान सकता भौर न जीव को परमात्मा से पृथक् समझे विना पूजा, उपासना, स्तुति, मजन आदि का कोई अर्थ हो सकता है। पर इसमे जह भरत के उपाख्यान में प्रदत सिद्धान्त का पूर्ण रूप से प्रतिपादन किया है। जब सौवीर नरेश ने जड भारत से सत्य धर्म का उपदेश देने की प्रार्थना की तो उसने कहा- "राजन् तुम श्रेय पूछना चाहते हो या परमार्थ ? हे भूपते ! श्रेय तो सब अपरमार्थिक ही हैं। जो पुरुप देवताओ की प्राराधना करके धन, सम्पति, प्रजा और राज्यादि की इच्छा करता है उसके लिये तो वै श्रय ही हैं । जिसका फल स्वर्ग लोक की प्राप्ति है, वह यज्ञात्मक कर्म भी श्रेय हैं, किन्तु प्रधान श्रेय तो उस पल की इच्छा न करने में ही है। प्रतः राजन योगयुक्त युक्त पुरुषो को, प्रकृति प्रादि से प्रतीत उस आत्मा का ही ध्यान करना चाहिये क्योंकि उस परमात्मा का सयोगरूप श्रेय ही वास्तविक श्रेय है। "इस प्रकार श्रेय तो सैकडो-हजारो प्रकार के हैं, किन्तु ये सब परमार्थ नहीं है। यदि घन परमार्थ हो तो धर्म के लिये उसका त्याग क्यों किया जाता है ? तथा इच्छित भोगो की प्राप्ति के लिये उसका व्यय क्यों किया जाता है ? प्रतः वह परमार्य नहीं है । यदि पुत्र को परमार्थ कहा जाय तो वह अपने पिता का परमार्थ है और उसका पिता भी अपने पिता का परमार्थ होगा। अत: इस चराचर जगत मे पिता का कार्य रूप पुत्र भी परमार्य नहीं है । यदि ससार मे राज्य मादि की प्राप्ति को परमार्थ कहा जाय, तो ये कभी रहते हैं और कभी [ १२ ] ही रहते । अत परमार्य भी आगमापायी हो जायगा । यदि देव त्रयो से सम्पन्न होने वाले यज्ञ कर्म को परमार्य मानते हो तो उस विषय में में जो कहता हूँ सो सुनो । नृप । जो वस्तु कारा पा मृतिका का कार्य होती है वह कारण की मनुगामिनी होने से मृत्तिका रूप ही जानी जाती है । अन.जो क्रिया समिधा, घृत और कुशा प्रादि नाशवान द्रव्यों से सम्पन्न होती है, वह भी नाशवान हो होगी। परमायं को तो प्रान पुरुप अविनाशी बनुलाते हैं, पर कर्म तो, वह कैसा भी हो, नाराबान द्रव्यों मे सम्पन होने के कारण नाशवान ही होगा, इममें सन्देश नहीं। "अन" राजन् । निस्सन्देह य सब श्रेय ही है, परमार्थ नहीं। अब जो परम्पर्य है वह मेरे द्वारा यक्षेप में सुनो । प्रात्मा एक, व्यापक, सम, शुल, निगुण और प्रकृति से परे है, वह जन्म, वृद्धि में रहित, सवव्यापी और अन्यय है । राजन्, वह परम ज्ञानमय है। नाम, प और जाति प्रादि से उसका सयोग न कभी हुमा है, न है और न होगा । वह प्रात्मा अपने और मत्य प्राणियों के परीर में विद्यमान रहत हुये भी एक ही है-इस प्रकार का पो विशेष ज्ञान है वही परमार्य है। जिस प्रकार अभिन्न मात्र से व्याप्त एक ही वायु घांसुरी के अलग अलग छिद्रो में होकर निकलने के कारण पड्ज प्रादि अनेक नेद हो जाते हैं, उसी प्रकार एक ही परमा मा के देवता, मनुष्य, पशु आदि अनेक भेद प्रतीत होते हैं । एक सप्रात्मा के जो नाना भेद है वे वाह्य देहादि को कम प्रवृत्ति कारण ही हुये हैं।" ( वि० पु० २-१४) पही वेदान्त पे महान मिद्धान्त का सार है। प्राधुनिक विज्ञान भी अब प्रगति करते-करते इमी निष्कर्ष पर पहुंचा है कि संसार में केवल एक ही तस्व है, उसे चाहे किसी नाम से पुकारो । पर यह सिद्धान्त चरितार्थ तभी हो सकता है जब हम उसके अनुसार व्यवहार भी करें। वर्तमान समय म हमारे देश के जो 'ब्रह्मनानी' रहलाने वाले व्यक्ति जगत को 'मिथ्या' ही बतलाते रहते हैं पर एक पैसे के लिय मी बेईम नो करने को तैयार हो जाते हैं, अपने को समर्प' बतलाकर हर तरह के दुराचार में प्रवृत्त रहते हैं, उनको 'वेदान्ती' रहना इस शुद को विडम्बना मात्र है । 'विष्णु पुराण' के उपरोक्त उपदेश के अनुसार तो [ १३ ] 'परमार्थी' प्रथया 'मात्म ज्ञानी' वही है, जो प्राणी मात्र को अपना ही एक प्रश समझे पोर जब पावश्यक्ता पहे धन, सम्पत्ति हो ही नही सरीर पो भी तिनके के समान त्यागदे। पारमज्ञान प्रयवा प्रापारमवाद की परीक्षा बातों से नही व्यवहार से ही की जा सकती है। भक्ति का सच्चा स्वरूप- पर ज्ञान और भक्ति था यह विवाद भी पेवल बाह्य विषयों को महत्व ने वाले व्यक्तियो द्वारा उठाया जाता है, नहीं तो तत्त्व दृष्टि रखने वालों के लिये दो ही मार्ग कल्याणकारी हैं। प्राचीन मनोपियों ने इनका प्रचार मनुष्यों की प्र में भेद को देखकर किया है क्योंकि ससार मे दृढ मोर कोमल प्रवृति का भेद पाया हो जाता है । पर इससे व्यवहार में कोई असर नहीं पड़ता । अपने विश्वास के अनुसार व्यवहार करने वाला व्यक्ति, दंत और अद्वत के विवाद मे बिना पडे हुये भी जीवन के सत्य-मार्ग को जान लेता है और उसी से उसका मात्म-कल्याण हो जाता है । जन्म भर सन्यासी रहकर ज्ञान-चर्चा करने वाले 'साधु' की अपेक्षा अपने कुकर्मों पर हृदय से पश्चात्ताप करने वाली वेश्या को मरणोपरान्त उच्चगति प्राप्त होने वाले प्राख्यान के अनुसार भगवान कथनी' के बजाय 'करनी' को ही अधिक महत्व देते हैं । विष्णु पुराणान्तरर्गत 'यम-गीता' मे यही तथ्य प्रतिपादित किया गया है । जब यमराज ने अपने एक दूत को यह आदेश दिया कि "भगवान मधु- सूदन के शरणागत व्यक्तियों को छोड़ देना।" तो उस दूत ने हरि भक्तो के लक्षण पूछे । उसके उत्तर मे यमराज ने कहा- "जो मनुष्य अपने वर्ण-धर्म पर स्थिर रहते हुये सहर और विपक्षियो के प्रति समान भाव रखता है, बलात्कार से किसी का द्रव्य हरण नहीं करता, न किमी जीव की हिंसा ही करता है, उस निर्मल चित्त व्यक्ति को भगवान का भक्त जानो। जिस पवित्र हृदय वाले का चित्त कलि-कल्मष रूप मल से भलिन महीं हुमा है और प्रिसने अपने अन्तः प्रदेश में सर्वदा श्री जनार्दन को बसा रखा है उसे भगवान का प्रतीव भक्त समझो । जो एकान्त मे पडे हुये दूसरे के सोने [ १४ ] को देखार भी उसे अपनी बुद्धि द्वारा तृण के समान समझता है, जो समस्त जोवों का प्रिय, हिनषादी तथा अभिमान और माया से रहित होता है, उसके हृदय में भगवान वासुदेव सदा विराजमान रहते हैं। "दूत । यम और नियम का पालन करने से बिनसरी पाप रासि दूर हो गई है जिनमें गर्व, अभिमान और मात्सर्य का लेश भी नहीं रहा है, उन मनुष्यों को तुम दूर से ही त्याग देना । जो पुरुष दूसरों का धन हरण करता है, जीवों को पोटा पहुंचाता है उपा मिथ्या और कटु भापण करता है, उस दुष्ट बुद्धि मनुप्य के हृदय में भगवान कभी टिक नहीं सकते। जो कुमति दूसरों का वनव देख नहीं मक्ता, दूसरों को निन्दा करता है, सज्जनों का भपकार सरता है, सम्पन्न होकर भी न तो भगवान की पूजा करता है न दीन जनों की सहायता करता है, उस मपम मनुष्य के हृदय में भगवान जनादन वा निवास कभी नहीं हो सत्ता।" (वि० पु० ३-७) सच्च भक्त का प्रथम लक्षण यही है कि वह प्राणी मात्र में भगवान का निवास समझार उनका क्मिी प्रकार का अपकार न करे और सेवा के लिये सदैव तत्पर, रह । यद्यपि भारत के कोरे शब्दों के पीछे दौडने वाले 'न' को निम्न स्थान देत हैं, पर वास्तविकता की दृष्टि से चित्र मुख से 'मात्मा को समानता, की बात कहने वालों की अपेक्षा न सिद्धान्त को व्यवहार रूप में पूरी कर दिखाने वाले अधिक नच्च माने जायेंगे। मानव-धर्म का परिचय- इस प्रकार का परोपकार और सहानुभूति पूर्ण सद्व्यवहार सायु और भत्तो का ही लक्षण नहीं, वरन् मनुष्य मात्र का तंव्य है। उसको उचित है कि वह जिस समाज में रहता है उसका सईद हित चिन्तन करता रहे और किसी पे साथ मप्रिय व्यवहार न करे । प्रत्येक मनुष्य समाज का एक प्रग होता है और उसकी भलाई बुराई का प्रभाव सभी पर पड़ता है । इसलिये मनुष्य का धर्म है कि स्वयम् श्रेष्ठ वन पार दूसरों को भी देता का मार्गदर्शन करे। विष्णु पुराण में चारो वणों के धर्मों का सामान्य निरूपण करते हुए कहा है - 1 [ १५ ] "जो मनुष्य दूगरो यो निन्दा, मुगलो पयवा मिथ्या भापण गही परता सया कभी ऐसा पचन नहीं योसता जिससे दूसरों यो रोद हो, उसे निश्चय ही भगवान पेशव प्रसन्न रहते हैं । जो पुष्प दूसरों को स्त्री, धन और हिंगा में रवि नहीं करता उससे सर्वदा ही भगवान सन्तुर रहते हैं । जो मनुष्य विसो प्राणी को मथवा वृक्षादि विसी देहधारी पो पीडित प्रयया नष्ट नहीं करता उसमे भगवान प्रसन्न रहते हैं । जो मनुष्य स्वयं अपने भौर अपने पुत्रों के समान ही समस्त प्राणियों का हितनिस्तक होता है यह सुगमता से श्रीहरि को प्रसन्न पर लेता है । जिसका चित राग-द्वेपादि से दूषित नहीं है उमसे भगवान सदा ही सन्तुष्ट रहते हैं । इसके अतिरिक्त समस्त प्रालियो पर दया, सहनशीलता, प्रमानिता, सत्य, अच, मगल-रामना, प्रियवादिता, मंत्री, निष्कामता,प्रकृपणता और किसी का दोष न देखना-ये सब वणों के सामान्य नियम है। (वि० पु० ३.८) इसी प्रकार गृहस्थों के सदानार का वर्णन करते हुये कहा है जो जितेन्द्रिय दोप के समस्त हेतुनों को त्याग देता है उसके धर्म, मोर काम की थोडी-सी भी हानि नहीं होती। जो विद्या विनय सम्पन्न, सदाचारी, प्रान मनुष्य पापी के प्रति भी पापमय व्यवहार नहीं करता तथा जिसका अन्तःकरण मैत्री-भावना से द्रवीभूत रहता है, मुक्ति उसकी मुट्ठी मे रहती है । जो वीत- राग महापुरुष कभी काम, क्रोध और लोभादि के वशीभूत नहीं होते तमा सदैव सदाचार में स्थित रहते हैं, उनके प्रभाव से ही पृथ्वी टिकी हुई है । अतः ज्ञानी मनुष्य को वही सत्य कहना चाहिये जो दूसरो के लिये हितकारी और प्रसन्नता दायक हो । यदि किसी सत्य बात के कहने से दूसरे को दुख होता हो तो मौन रहे। यदि प्रिय वाक्य को भी अहितकर समझे तो उसे न कहे, हितकर वाक्य ही कहना अच्छा है, भले ही वह अत्यन्त अप्रिय क्यो न लगे । जो कार्य इहलोक और परलोक में प्राणियो के हित का साधक हो महिमान पुस्प मन, वचन, कर्म से उसी का भाचरण करे।" (वि.पु० ३-१२) सत्ता से मदाय राजागरण- चौथे प्रश में प्राचीन काल के विविध राजवशो और राजानो का वृत्तान्त + निखत हुये अन्त में कलियुगो चामों का डोदन किया है, वह प्राचीन मौर का चीन नमी मानकों के लिये एक उपयोगी नावनी है। राजा का पर्म प्रजा का हित साधन पौर रक्षा करना ही है। निमको साइन के उच्च पद पर बैठा- कर सम्मानित किया वादा है उस पर एक बहन दड़े उत्तरदावि ग भार भी मा वाता है। जो टस उनरदायित्व को पूरा करने के लिये अपने मुख, स्वायं, लाम वी निन्ना न करके अपनी समस्त पनियों तथा साधनों को जनता में बल्याणार्थ लगा देता है, इस कार्य की पूजि के लिये प्राणों को देने में भी सरांच नहीं करता वही मुच्चा रात्रा या शासक नहा वा सादा है। दो इसके विपरीत पाचरण करता है, अपने दमद-विलाम की वृद्धि के लिये प्रया को त्रास देता है. पीडित करता है, वह अपने पद को कनक्ति करने वाला है। ऐसे राजाओं का वन करते हुये पुराणकार कहते हैं- "इन हेर भरीर के मोह से अन्धे हो हमस्या ऐ दिगरा हो गये हैं, जिन्होंने अपने राज्यनि से ही मनता की पी।" यह कृषिको डि प्रहार नाव में मंग, मेरे पुत्र की प्रपदा मेरे कम की होगी-इनो चिन्ता से व्याकुल हुने इन सब राजानों का अन्त हो गया। इस प्रकार अपने को जीतने के लिये राजाओं को अयर उद्योग करते देखकर वसुन्धरा नरकातीन पुनों के स्प में मानो हट रही है । वह कहती है- 'अहो ! बुद्धिमान होते हुये भी इन गायों को यह कसा मोह हो रहा है. जिसके कारण ये बुराने के समान क्षम्पायी होते हुवे भी अपनी दिरता में श्वना विश्वान रखते हैं। वे लोग पहले अपने घर को ही जोतते है, फिर मन्त्रियों को, इसके अनन्तर मग. अपने नृत्य,पटानी एवं रामों को जीतना चाहते है । इसी क्रम में हम अमृद्र पर्यन्न उम्परं पृथिवी को दीन नग, ऐसी वृद्धि से मोहित हुने से कोर अपही विटदिनो मृत्यु को नहीं देखते। यदि समुद्र से घिरा हा वह सम्पूर्ण मूग डन चीत कर अपने वश में कर लिया जाय तो भी मनोत्रय के सामने इसका का मूल्य है ? क्योंकि मान्मा का नजार सो मनोदय से ही हो सकता है । जिम छोडकर इन पूर्वत्र चले गये मोर दिसे साय मेकर इन पिडा मी नहीं गये, उनी मुनको (पृषियों को ) ये राजा [ १७ ] लोग परयन्त मूर्खता के पारण जीत लेना चाहते हैं। जिन चित्त में मोम समाया हुमा है, उन पिता, पुत्र भोर भाइयों में प्रत्यात मोहान्यता पारण पृथियो के लिये ही परस्पर कलह होता । जो-जो राग लोग यही हो चुर हैं, उन सभी को ऐसी बुबुद्धि रही है कि यह पृथ्वी मेरी है-यह मारी की सारी मेरी ही है भोर मेरे पीछे भी यह सदा मेरी सन्तान पी ही रहेगी। इस प्रकार राज्य पोर भूमि में ममता रखने वाले एक के पीछे एव राजापों को सब कुछ छोडकर मृत्यु के मुख में जाते हुये देखकर भी न जाने से उनके उत्तरा- धिकारी अपने हृदय मे फिर वैसी ही ममता को स्थान देते हैं ? जो राजा लोग दूतों के द्वारा अपने शत्रुपो से इस प्रकार कहलाते हैं कि "यह पृथिवी मेरी है, धुम लोग इसे तुरन्त छोडकर चले जामो, उन पर मुझे (पृथिवी को) बडी हँसो पाती है मौर फिर उन मूढो पर दया भी होती है।" जो मनोदशा पुराणकार ने छोटे बडे राजामों को लिखी है, वही पात्र भी अधिकाश शासकों को देखने में माती है । यद्यपि प्रव राजापों का नाम मिट चला है, सिंहासन पर बैठकर और मुकुट लगाकर भाट मौर वन्दीजनों के द्वारा अपनी प्रशसा सुनने की प्रथा भी बन्द हो गई है, तो भी उनका स्थान एक अन्य सत्ताधारी श्रेणी ने ले रखा है जो शासनाधिकार का अपनी बपौती समझते हैं और हर तरह के छल-बल, कपट द्वारा उस पर अपना अधिकार बनाये रखने का प्रपल करते हैं । ये लोग भूमि को तो नहीं, पर भूमि से प्राप्त होने वाले समस्त साधनों-सम्पत्ति को अपने ही अधिकार मे रखना चाहते हैं, और इ के लिये साधन-विहीन जनता पर तरह-तरह के मन्याय करने मे मागा-पीछा नहीं करते । यद्यपि वे यह भी जानते हैं और कहते हैं कि "यह लक्ष्मी चंचला है । माज तक भी किसी के पास चिरकाल तक नहीं ठहरी," तो भी इसकी ममता में वे ऐसे से रहते कि लोक-परलोक के विगडने का कुछ भी ध्यान नहीं रहता । ऐसे लोगों के लिये परलोक मे कोई प्राशा होती ही नहीं क्योकि जो 'माया' ( लक्ष्मी) के लिये अपना सर्वस्व-मात्मा तक अपंण कर देते हैं फिर उनमा 'राम' तक पहुंचना असम्भव ही होता है । वर्तमान पासकों में एक दोष पहले राजानों की अपेक्षा भी अधिक देखने [ १८ ] में माती है । राजाओ पर कुछ उत्तरदायित्व समझा जाता था और राज्य की हानि को निजी हानि सममने के कारण वे प्रजा को सातुष्ट रखने, उसको रक्षा करने की चिन्ता भी रखते थे। पर माज कल के शासक या नेता प्रस्थापी होने के कारण इस प्रकार की चिन्ता से भी मुक्त होते हैं मोर यदि वास्तव में वे धर्मनिष्ठ, कर्तव्यपरायण और निम्स्वार्यो नही हुये तो स्वार्थ साधन मे सलग्न होकर देश और समाज के पतन के कारण बन जाते हैं । श्रीकृष्ण-चरित्र को विशेषताएँ- पांचवे प्रश में प्रारम्भ से अन्त तक कृष्ण चरित्र का वर्णन है । यद्यपि भगवान कृष्ण के महान चरितो का वर्णन 'भागवत' और 'महाभारत' मे विस्तार से पाया जाता है, पर विष्णु पुराण मे भी उनके लोकोत्तर कमों का बडी उत्तमता से वर्णन किया गया है। कृष्णाजी के जन्म से पूर्व इस देश में संनिकवाद का दौर दौरा हो गया था और प्रत्येक राजा अपनी सेना को सख्या अधिक से अधिक बढाकर दूसरो के राज्य को जीत लेने के लिये पातुर हो रहा था। इसके फल से सामान्य जनता की बडी दुर्दशा हो रही थी। उसका शोपण और जीवन-निर्वाह के साधनो का अपहरण दिन पर दिन बढता जाता था। सेना और युद्धो के लिये एक तरफ तो प्रजा को राजा की प्राज्ञानुसार सब साधन जुटाने पड़ते थे और दूसरी तरफ युद्धो के कारण कृषि-व्यापार प्रादि के कार्यों में बाधा पडती थी और लोगो को इधर-पे-उधर भागते फिरना पड़ता था । इससे सर्व साधारण के कप्ट बहुत बढ गये थे । इन अन्याय पूर्ण कष्टो को सहन करते-करते जब जन-मानस अत्यन्त शुन्ध हो गया, तो उसकी सामूहिक भावना ही मानो पृथिवी का रूप धारण कर ब्रह्माजी की शरण मे उपस्थित हुई और उसने कहा- "इस समय काल नमि प्रादि शक्तिशाली दैत्यगण मत्र्य लोक पर प्रधि- कार जमा कर दिन-रात जनता को क्लेश पहुंचा रहे हैं। वह कालनेमि ही उग्र- सेन के पुत्र महान असुर कस के रूप मे उत्पन्न हुमा है । परिष्ट, धेनुक, केशी, प्रलम्ब, नरक, मुन्द, बलि का पुत्र प्रति भयकर वाणासुर मादि दैत्य उत्पन्न [ १६ ] हो गये हैं तथा अन्य भी जो महा बलवानं दुरात्मा राक्षस राजामो के पर में उत्पन्न हो गये हैं, मैं उनकी गणना नही कर सकती । दिव्य मूर्तिधारी । देव- गण । इस समय मेरे ऊपर परम शक्तिशाली और अहकारी दैत्यराजो की मनेक अक्षौहिणी सेनायें हैं। ममरेश्वरी 1 मे प्रापको बतसा देना चाहती हूँ कि अब उनके भार से प्रत्यन्त पीडित होने के कारण मुझमे अपने को धारण करने की शक्ति भी नही रह गयी है । अतः महाभागगण ! आप लोग मेरा भार उतारिये जिससे मैं भत्यात व्याकुल होकर रसातल को न चली जाऊ ।" उपरोक्त उद्धरण मे देश और समाज की स्थिति का जो चित्र खींचा गया है उसमे अस्वाभाविक और असम्भव कुछ भी नहीं है । अाज भी ससार ठीक ऐमा ही स्थिति मे होकर गुजर रहा है । प्राज एक देश मे ही नहीं, वरन् ससार भर में सैनिक वाद का इतना अधिक दौरदौरा है और राष्ट्रों की सहारक शक्ति इतनी बढ़ गई है कि ससार किसी भी समय नष्ट हो सकता है । इस समय जनता की कमाई का प्राधा भाग तो इसी सैनिक तैयारी मे खर्च हो जाता है और इसलिये सर्वत्र लोगो को प्रभाव जनित कष्ट सहन करना पडता है। आज भी जनता तरह तरह के करो के भार से उमी प्रकार कराह रही है जैसी कि कस के युग मे थी। उस समय यद्याप गौग्रो की सख्या हर जगह हजारो और लाखो थी और कहने के लिए दूध की नदियाँ बहती थी, पर तब भी अनेक बालकों को थोडे से दूध के लिए भी तरसना पड़ता था। कारण यही था कि राज्य के करो को अदा करने के लिये अधिकाश दूध का मक्खन और घी बनाकर बडे नगरो मे भेज दिया जाता था, जिससे सामान्य जनता को छाछ के अतिरिक्त दूध का एक छोटा प्रश भी मिलना कठिन हो गया था। भगवान कृष्ण ने जन्मकाल से ही ग्रामों में निवास करके इस तथ्य की वास्तविक्ता को भली प्रकार समझ लिया और कुछ बड़े होते ही जनता में इसके विरोधी भाव फैलाने मारम्भ कर दिये । वे सक्रिय रूप से भी और मक्खन को नगरों में भेजे जाने का प्रतिबन्द करते थे। इन्ही कारणों से [ २० ] - क्स और उसके अधिकारी गण कृष्ण जी से शत्रुता मानने लगे और उन्होंने छल-बत से अनेक बार उनकी हत्या के लिए प्रयल किये । पर अपनी लोको- तर प्रतिभा और शक्ति के द्वारा उन्होंने शत्रु के गुप्त और प्रक्ट सभी आक्रमरो को सहज में विफल कर दिया। उनके ये कार्य साधारण जनता मे चमत्कारों की तरह प्रसिद्ध हो गये और अन्त मे जव उन्होंने कस को मारकर उसके मन्यायी शासन या अन्त कर दिया और छोटे-बड़े सभी लोग दमन और प्रत्या- चारो से छुटकारा पा गये तो कृष्ण जो एक महान् देवी शक्ति के रूप में पूजे जाने लगे। श्री कृष्ण ने निरकुश तया सैनिक शक्ति में विश्वास रखने वाले शासको के अन्त करने का मानो बीडा उठा लिया था, इसलिए कस के पहचात् वे उसके श्वसुर जरासन्ध का, जो उस समय भारत में सबसे बड़ा सम्राट शासक था, मुकावला वरते रहे । यद्यपि जरासन्ध की सैन्य शक्ति । बहुत अधिक पी, विष्णुराण के अनुसार उसने पहली ही बार २३ अक्षौहिणी सेना लेकर मथुरा पर माक्रमण किया था, पर यो कृष्ण ने जनता में जागृति के माब फूककर उसके विरुद्ध एक ऐसा सुदृढ संगठन तैयार कर दिया कि उसकी सैन्य दाक्ति विशेष कारगर सिद्ध नहीं हुई और अन्त में श्री कृष्ण ने युक्ति पूर्वक उसको नष्ट कर दिया। कालिय दमन का उद्देश्य- विष्णु पुराण' में कालिय-दमन का जैसा वर्णन किया है, उससे भी भगवान कृष्ण की लोक कल्याण की भावना प्रक्ट होती है। कहा जाता है कि जब नन्द जी ने कस के पातक से बचने लिये गोकुल छोडकर वृन्दावन प्रपना निवासस्थान बनाया तो वहाँ यमुना जी के निकट ही कालिप नाग रहता था। वह अत्यन्त कर पा और उसके कारण वह स्पान सब प्रकार के जीवधारियों से शून्य हो गया था । श्री कृष्ण के साथी ग्वाल वालो पौर गौत्रो को भी उससे भय रहता था। जो कोई भूल से उसके पास पास जा निश्लता उसी को अपने प्राणो से हाथ धोना पड़ता। उसकी "विपाग्नि' [ २१ ] के फैलने से किनारे के वृक्ष भी जल गये थे । जव श्री कृष्ण ने यह सब देखा और कालिय के वहाँ रहने के कारण मनुष्यो मोर पशुप्रो वे कष्टों पर विचार किया तो उन्होने उसे वहाँ से हटाने का निश्चय कर लिया । इस उद्देश्य से जब वे कालिय के निवास स्थान के निकट पहुंचे तो उसका वर्णन पुराणकार के शब्दो मे ही सुनिये- "मृत्यु के दूसरे मुख के समान उस महाभयकर कुराध को देखकर भगवान मधुसूदन ने विचार किया, इसमे दुष्टारमा कालिय नाग रहता है. जिसका विष ही शास्त्र है। इसने समुद्रगामी की सम्पूण यमुना का जल दूषित कर दिया है, जिससे वह प्यासे मनुष्यों और पशुप्रो के भी काम नही माता । अतः इस नागराज का दमन अवश्य करना चाहिए जिससे ब्रजवासी लोग निर्भय होकर सुखपूर्वक रह सकें। ऐसा विचार कर वे पास के ही ऊंची शाखामो वाले एक कदम्ब के पेड़ पर चढकर अपनी कमर कसकर वेगपूर्वक मागराज पडे के एड में कूद । तव श्री कृष्ण ने नागराज के द्वार पर अपनी भुजानों को ठोका, उनका शब्द सुनते ही नागराज बाहर आ गया। उसके नेत्र क्रोध से कुछ ताम्र वण' हो रहे थे, मुखों मे अग्नि कि लपटें निकल रही थी और वह महाविषले अन्य वायु भक्षी सर्पो से घिरा हुमा था। उसके साथ मे मनोहर हारो से भूपिन और कुराहनों को कान्ति से सुशोभित सैक्डो नाग पत्नियां थी। तब सर्पो ने कुण्ड- लाकर होकर श्री कृष्ण को अपने शरीरो से बांध लिया और वे विपान प्वाला से व्याप्त अपने मुखो से उन्हे काटने लगे। "गोपगरण के मुख से कृष्ण जी के 'काली दह' में पुदने का समाचार सुनकर यशोदा, पोर अनेक गोपियां, नन्द जी भोर गोपगण तपा अद्भुत विक्रम पाली बलराम जी भी शीघ्र ही वहां प्रा पहुंचे । जब उन्होने कृष्ण जी को सर्प से घुगल में पसे देखा तो यशोदा मोर नन्द जीतना शून्य होने लगे। सभी गोप, गोपी भी घोषाकुल होकर रोने लगे। [ २२ ] 'उनकी पह दशा देखकर रोहिणी नन्दन बलराम जी ने संकेत से । कृष्ण से कहा-'देव देवेश्वर, क्या आप अपने मनन्त रूप को नहीं नि ? फिर किस लिये यह अत्यन्त मानव भाव व्यक्त कर रहे हैं।' बलराम को का मवेत समझकर, मधुर मुस्कान से अपने प्रोट सम्मुट खोलते हुए पण जी ने उनकर अपने को सर्प के बन्धन से छुड़ा लिया मोर फिर दोनो हायों से सर्प का मीच का फ्ण सुका कर उसी पर चढकर बडे वेग से नाचने गे। उनके चरणो को धमक से कालिय का प्राए मुख मे मा गया। वह पने जिस पण को उठाता उमी पर जूदकर भगवान उसे नुका देते । कृष्ण दो को भ्रान्ति, रेचक, दण्डपात नाम को नृत्य-गतियों द्वारा ताडन से यह नहासर्प मूचित हो गया भोर उसने बहुत सा रुधिर दमन किया। पन्त मे नाग पत्नियो के प्रार्थना करने पर श्रीकृष्ण ने उसे छोड़ा और मादेश दिया कि वह यमुना जी को छोडकर समुद्र में चला जाय । कई व्याख्याकारों ने इस काली नाग' की लीला का अर्थ मागव दारीर मे मूलाधार स्थित कुण्डलिनी शक्ति का साधन करने से लगाया है । जिस समय कुन्डलिनी को जाग्रत किया जाता है उस समय वह भी बड़े उग्र रूप में उरती है और साधक को हिलार रस देती है। यह भी सभव है कि 'कालिय' व स्तव नाम जाति का कोई बलशाली मुखिया हो । ये लोग उस समय प्रायों द्वारा हटाये जाकर वनो मौर भूगर्भ स्थित मावामों में रहते थे और वहीं से अवसर पार सूट-मार पाक्रमण की तैयारी करते रहते थे । ऐमी दशा म वृन्दावन म नई वस्ती स्थापित करने पर उसके मासन्यास के प्रदेश को निकरटव करना श्री कृष्ण के लिये लिपे मावश्यक ही था। लोक प्रिय नेता के रूप मे- श्रीकृष्ण के नरिव को अधिकांश घटनायें उनको एक लोकप्रिय नेता के रूप में हा प्रकट करती हैं। उनम निस्वार्थ सेवा भाव के साथ ही जनता को अपनी ओर प्रापित करने का स्वाभाविक गुण या । वे जहाँ कहीं भी रहे अथवा ग्सि किसी स्थान मे गये वहीं पर जन साधारण ने . [ २३ ] उनका सप्रेम स्वागत किया और सहयोग दिया । यदि ऐसा न होता तो वे गोकुल, वृन्दावन जैसे सामान्य ग्रामो मे गोप जाति के साथ रहते हुए पंस, जरामध, शिशुपाल के समान बडे-बडे सम्राटी का मुकाबला नहीं कर सकते थे । कस वध के अवसर पर मथुरा में एक विद्रोही की हैसियत से जाने पर भी उनको अधिकांश प्रजाजनों तथा फस ये अनेक पापंदो का सहयोग प्राप्त हुना। कस को भगवान कृष्ण ने जिस प्रकार अनायास ही मार दिया उससे यह भी प्रकट होता है कि उसके कठोर और अन्यायपूरा दासन से उसके प्रजाजन और बहुत से राज्याधिकारी भी विरक्त हो गये थे। उसने पपने पिता उग्रसेन को कैद करके राज्य सिंहासन हथिया लिया था, इससे उसके परिवार और वश के सदम्यो मे भी प्रस-तोप की भावना उत्पन्न हो गई थी। श्रीकृष्ण ने एक चतुर राजनीतिज्ञ की भांति इस परिस्थिति का लाभ उठाया और उसके निकटवर्ती सेधको और कर्मचारियो को भी अपना सहयोगी बना लिया। मथुरा मे कस के माली तथा दासी कुब्जा ने उनका जिस प्रकार स्वागत किया तथा नगर के नर नारी उनको देखकर जिस प्रकार प्रसन्न हुए, उससे यह ज्ञात होता है कि उनमे सबसे मैत्रीभाव स्थापित पर लेने तथा व्यवहार कुशलता का गुण पूर्ण मात्रा में विद्यमान था। पर इतना प्रभाव तथा सामथ्र्य होने पर भी उनमें स्वार्थपरता अथवा अनुचित महत्वाकाक्षा का दोप तनिक भी न था। इस प्रकार एक बडे राजा को पराभव कर देने पर यदि वे चाहते तो स्वय राज्य के मधि- कारी बन सकते थे, पर उन्होंने उसी समय राजा उग्रसेन को बन्धनमुक्त करके सिंहासन पर बैठाया और उनकी सब प्रकार से सहायता भौर रक्षा परने का माश्वासन दिया। इसका वर्णन करते हुए पुराणकर्ता ने लिखा है- "तदनन्तर श्री मधुसूदन ने जिनका पुत्र मारा गया है, उन राजा उग्रसेन को बन्धनमुक्त क्यिा मोर उन्हें अपने राज्य पर मभिषिक्त कर दिया। . . [ २४ ] पवाय राज्यनिपित होकर मदुध राजा सेन ने माने पुत्र पा र मी जो लोग वहां मारे गये जन सुद के प्राध्यदैहिक पनि। मौनं. इक कर्मों से निवृत्त होने पर सिंहाउनास्ट वजन से धीहरि दौले है दिनो! र योग्य वो सैदा हो उसके लिये हमें निशंक होकर माता दीजिए । पपाति शार होने से पति हमारा दंग रापा अधिकारी नहीं है पानि उप मुकदार के रहते हए, राजाओं को तो सा मार देतामों को भी माझा मन्टे हैं।" कृष्ण को रानीति- शोध ही ऐवा प्रबउर मा गया कि योवृष्य को देन की रक्षा के नए प्रयन्नगीन होना पडा । ऊस मगध के सम्राट अराध का जामाबापा । दरमुकी दिषवा मलो रोती-पीटतो प्रपने पिता के समीप गई तो दह कृपा और समस्त यदुशियों पर बड़ा क्रोधित हुमा भोर एक विशात मेना लेकर पुरा पर चढ़ दौडा । उसके चाय घौहप्य और वनराम के संग्रान का वरन करते हुये बसाया है- "ठद महाबली राम मौर बनाईन बदुशियों की घोही-सी सेना लेकर नगर के बाहर पाये और जरा को सेना से मिट्ट गये। उन्होंने अपने पुरा- उन मस्त्रों को स्मररा किया और उनके द्वारा गीत ही ममपरान को हराकर मयुरापुरी में पत्ते मारे । यदपि डराम प की सेना हार गई थी, तो भी वह वीवित लौट गये इसमे कृप्यजी ने अपनी विजयको मन रुमन्य । सोसार बरानंध ने अठारह बार मयुरा पर पारमण रिया पर से संदद हार कर वापस ही जाना पहा । न समय मचियों की सेना उसके नुवादिले में दहन पौड़ी पी, पर तो भी वह मै निरन्तर पराजित करती रही, इसका कारण- वान के सददारी का माहात्म्य ही था। दो महापुरप केवल ने संकल्प मात्र नशार तो नष्ट कर नबने हैं, उनके लिये नुसको सेना ना नार कर देना रोई पट्टी बात नहीं थी। पर उन्होंने मानव धर्म का पालन करने को रष्टि [- २५ ] से साम, दाम, दन्ड, भेद की नीति का सहारा लेकर अपने उद्देश्य की पूर्ति की। इतना ही नही भवसर देख कर वे भाग भी जाते थे।" (वि० ५-२२) जरासघ के साथी कालयवन के आक्रमण के समय उन्होंने इसी नीति का प्राथय लिया। उन्होने देखा कि इन लगातार युद्धो के कारण यदुवशियों की स्थिति सम्हल नहीं पाती और समस्त शक्ति इन भगडों में ही सचं हो जाती है । तब उन्होने मथुरा से हट कर बहुत दूर समुद्र के किनारे द्वारका को बसाकर वहां यादवो का राज्य स्थापित किया । इस प्रकार अपनी राजधानी को सुरक्षित बनाकर वे मथुरा चले पाये और कालयवन को युक्ति स पराजित करने की योजना करने लगे। वे मथुरा से वाहर बिना कोई शस्त्र लिये निकल पाये। कालयवन उनको इस प्रकार प्ररक्षित देखकर पकडने को दौडा तो वे भी भागने लगे और भागते-भागते उस गुफा में जा घुसे जिसमे प्राचीन समय का राज। मुचुकुन्द देवी निद्रा मे सोया था। वह स्वय गुफा मे छुप गये और जब कालयवन भीतर माया मुचुकुन्द को हो कृष्ण समझ कर लात से मार दिया । मुचुकुन्द कोपपूर्वक उठ बैठा और उसके द्वारा कालयवन मारा गया । श्रीकृष्ण की राजनीतिज्ञता का और निग्कुश शासको के प्रति विरोध भावना का चरम रूप महाभारत मे देखने मे पाता है। उसमे वे भारतवर्ष के सर्वधेट राजनीति विशारद और जनता के हित चिन्तक के रूप में प्रकट हुए हैं। उस काल में साम्राज्यवाद दिन पर दिन प्रबल होता जाता या पौर जिस प्रकार हम वतंतान समय मे ससार के राष्ट्रों को दो परस्पर विरोधी दलो मे बँटा देखते हैं उसी प्रकार उस जमाने में भी भारत के राजागण दो भागों में बँट गये थे जिनमे से एक का नेतृत्व पांचालपति पद मौर दूसरे का कुषसाम्राज्य का अधिपति दुर्योधन पर रहा था । भगवान कृष्ण इस साम्राज्यवाद के विरुद्ध थे पयोंकि इसके द्वारा जनता का प्रतिशप सोपए मोर उत्पीडन होता पा। लोग मरातुष्ट होते हुए भी राजामो को संनिर शक्ति के भय से उनके मन्यायो का प्रतिरोध न कर पाते थे। श्रीकृष्ण ने पाएडवों का पा कर इस राजनैतिक गुटबादी भी बहुन पुष तोडफोड को भोर पारडयो का समर्षय एक ऐसा दस [ २६ यार कर दिया जिससे दुर्योधन की बढती हुई साम्राज्यवादी महत्वकांक्षाएं र-चूर हो गई। अनेक प्रालोचको के मत से महाभारत का सग्राम भारतवर्ष की महा- वा को नष्ट करने वाला था और इसके लिए वे श्रीकृष्ण को दोषी ठहराते हैं। २ वास्तव में उनका उद्देश्य युवावस्या से दमनकारी सैनिकवाद के पान पर जनतत्रीय शासन की स्थापना करना था मोर महाभारत काल से मौद्ध के उदय तक हमको जो किसी वडे सम्राट या साम्राज्य का उल्लेख नहीं पलता उसका कारण भगवान कृष्ण की उपर्युक्त नीति ही थी। उस युग मै मिस्त देश व्यापी एक जनतन शासन स्थापित हो सकन की परिस्थितियों और सापन तो उत्पन नहीं हुये तो भी कुछ समय बाद बडे-बडे स्थानीय जन- [त्र अस्तित्व म प्राये और सेक्डो,हजारो वर्ष तक उनमे जनता स्वतत्रताकी सास नेती हुई निवास करती रही । भगवान कृष्ण का यह लोक नेता का रूप ही उनके वास्तविक महत्व का परिचायक है और उन्होने गीता के "यदा यदादि घमस्य ग्लानिर्भवति भारत बाने श्लोक म 'अघम' या नाश करके 'धर्म' की स्थारना की जो प्रतिज्ञा की है, उसको सार्थक बनाने वाला उनका यही कार्य है। विष्णु पुराण में श्रीकृष्ण चरित्र का उपयहार करते हुये व्यास जी ने भी उनका ऐसा ही महत्व बतलाया है । उन द्वारिकावासी प्रभु के स्वर्गारोहण के सपरा त जब अर्जुन उनकी सहस्रा आश्रितानो को लेकर हस्तिनापुर जा रहा था तो उसे सुटेरो ने लूट लिया और वह उनका कुछ भी प्रतिकार न कर सका। अपनी इस हीनता पर उसे बढी ग्लानि हुई और उसने अपनी मनोन्यथा व्यासजी को बतलायो । उसने कहा कि मैंने महाभारत सग्राम मे भीष्म, द्रोण, कर्ण जसे अद्वितीय महारथियों को हरा दिया, पर आज थोडे से लाठी लेकर लडने वाले अहीरों का भी सामना न कर सका। इससे विदित होता है कि श्रीकृष्ण ही मेरी सच्ची शक्ति थे और उन्ही के प्रभाव से हम इतनी बड़ी सफलता प्राप्त कर सके थे।" व्यासजी ने उसकी बात का समर्थन मोर थी कृष्ण का महत्व प्रकट करते हुए कहा- " 1 २७ "धन जय ' तुमनें श्रीकृष्ण चन्द्र का जैसा महात्म्य कहा वह सब सस्प ही है क्योकि कमलनयन श्रीकृष्ण साक्षात् काल स्वरूप ही थे। उन्होंने पृथ्वी का भार उतारने के लिये ही अवतार लिया था। जब पृथ्वी ने भारा कान्त होकर भगवान की प्रार्थना की तो श्री जनार्दन स्वयं ही यहाँ पाये। अब सम्पूर्ण दुष्टं राजा मारे जा चुके प्रत वह कार्य सम्पन्न हो गया। पार्थ ! प्रय शेप बचे वृष्णि और अन्धक आदि सम्पूर्ण यदुकुल का भी उपसहार हो गया । प्रत अपना कार्य समाप्त हो चुकने पर भगवान स्वेच्छानुपार चले गये । इसलिये तुम अपनी पराजय से दु खो न हो। यह सब उन भगवान की लीला का हो कौतुक है कि तुम अकेले ने कौरवों को नष्ट कर दिया और फिर स्वय अहोरो से पराजित हो गये।" (वि. पु. ५-३८) शूद्रो और स्त्रियो की श्रेष्ठता- षष्ठम प्रश के दूसरे अध्याय मे एक अद्भुत कथा है कि एक बार मुनियों में परस्पर पुण्य के विषय में यह वार्तालाप हुआ कि "किस समय मे थोडा पुण्य भी महान फ्ल देता है और कौन उसका सुखपूर्वक अनुष्ठान कर सकते हैं। वे मुनिगए जब स्वयं इसका निश्चय न कर सके तो सदेह को मिटाने के लिये महामुनि व्यास जी के पास गये- "उस समय व्यास जी गंगा मे स्नान कर रहे थे। उन्होंने एक बार जल से थोडा उठार उन मुनिजनो को सुनाते हुए---कलियुग ही श्रेष्ठ है- शूद्र ही थे हैं यह वचन कहा । यह कहकर उन्होंने फिर जल मे हुवको लगा ली। दूसरी धार खडे होकर फिर कहा-'स्त्रियाँ ही साधु हैं, वे ही धन्य है उनसे पधिक धन्य भौर कौन है ?' तदनन्तर जब व्यास जी स्नान-कर्म समाप्त रखे मुनियों के समीप पहुंचे मोर यथायोग्य अभिवादनादि के पश्चात् अपने मागनों पर यंठ गये तो उन्होंने पूछा-'माप लोग से पधारे हैं ?' "मुनियो ने कहा- भगवन् । पहले तो हमे यह पताइये वि मापने स्नान करते हुए को कई बार यह बहा कि 'पलियुग ही में है, यूद ही घर है, स्त्रिया ही साधु है सो क्या बात है ?" [ २ ] "व्यास जी ने कहा, द्विजगरण । जो कल सतयुग में. इस प तपस्या करने से मिलता है, उसे मनुष्य श्रेता मे एक वर्ष में, द्वापर मे एक मास मे मोर कलियुग में केवल एक दिन-रात मे ही प्राप्त कर सकता है। इसी कारण मैंने कलियुग को श्रेष्ठ कहा । द्विजातियों को पहने ब्रह्मचर्य आश्रम का पालन करते हुये वेदाध्ययन करना पड़ता है और फिर स्वधर्माचरण से उपार्जित धन द्वारा विधिपूर्वक यज्ञ करने पडते हैं । इस प्रकार वे अत्यन्त परिश्रम तथा पष्ट से पुण्य लोकों को प्राप्त करते हैं। किन्नु जिसे केवल मत्रहीन पाक-यज्ञ का ही अधिकार है वह मूद्र केवर सेवा-धर्म का पालन करके ही सद्गति प्राप्त कर लेता है इसलिए वह अन्य जातियों की अपेक्षा धन्यवर है। इसी प्रकार पुरुषों को अपने पर्मानुकूल प्राप्त किये धन से ही सर्वदा सुपात्र को दान पौर विधिपूर्वक यज्ञ करना चाहिए । इस द्रव्य के उपार्जन और रक्षण में महान दुख भोगना पडता है तब जाकर उनको प्राजापत्य मादि शुम लोकों की प्राप्ति होती है। परन्तृ स्त्रियों तो तन-मन वचन से पति की सेवा करने से ही उनकी हितकारिणी होकर पति के समान शुभ लोकों को. अनापास ही प्राप्त कर लेती हैं, इसीसे मैंने उनको 'साधु' कहा । (दि. पु० ६-२) पुराण रचयिता ने इस कथानक द्वारा उन लोगों का समाधान कर दिया है जो कलियुग, अपनी गतीय होनता अथवा साधनों की कमी का बहाना वतनाकर कर्तव्य पालन से विमुख रहते हैं । नन्होंने बतला दिया है कि न कोई जमाना बुरा होता है, कोई जाति छोटी होती है, न कोई दर्जा निकृष्ट होता है, यदि मनुष्य व्ययं के झगडों में न पडकर सच्चे मन से अपने कर्तव्य का पालन करता रह । भगवान धन, दौलत, प्रतिग, विद्वता, मान-गुम्मान के भूखे नहीं वे कैवल मावना को कदर करते हैं । यही कारण है कि किसी सम्राट के एक सास दान की अपेक्षा एक दीन होन का एक से का दान उनको प्रधिक वठा जान पहता है । इसी हादिक यता और प्रेम को देखकर उन्होंने राजसी व्यजनों के बजाय सबरी के बेरों और विदुर के साग का भोग प्रत्यधिक प्रेम में लगाया। इपी माघार पर वै बडे-बडे धर्मधनी विप्रो के दजाय नरसी और तुकाराम, कबीर और रंयास जैसे श्रमजीवो भक्तो के अधिक निकट पहुंच गए। [ २६ ] वर्तमान समय में भी उच-नीष की दूपित मनोवृति समात्र काग मनहित कर रही है। यद्यपि इस समय छोटी-बडी जाति या भेद मुशियित पर गया है पर उमसे भी अधिक पित-धनी गरीब के भेद ने उसका स्थान ले नि है । प्राज धन की हो पूजा प्रतिष्ठा और सम्मान हो रहा है । गरीव व्यक्ति पई जैसा सज्जन, सत्कर्म करने वाला, सेवा भावी यों न हो उसको पागे बदन का, ऊंचा उठने का प्रतिष्ठित पद पाने का अवसर नहीं मिलता जबकि पना दीप और दुर्गुणों के भडार धनपात्र व्यक्ति रुपये के जोर से ही समाज मुखिया और नेता बन बैठते हैं । यह प्रवृत्ति भगवान पोर धर्म के बादेशों विपरीत है और जब तक इसे बदला न जायगा ससार दिन पर दिन विपत्ति दलदल मे ही फंसता पला जाय । न स्त्रियों का महत्व भी स्पष्ट है । वे सच्चे अर्थों में समाज को निर्मात्र होती है। समाज के प्रत्येक व्यक्ति को अपना प्रारम्भिक जीवन उनकी गोद में ही बिताना पडता है पोर जैसा उनका स्वभाव, व्यवहार, प्राचार-विचार होता है उसका प्रभाव मनुष्यो पर अवश्य पडता है। वर्तमान समय के बाल-मनो विज्ञान के ज्ञाताप्रो के अनुसार तो बच्चा जन्म लेने के साथ ही सीखने लगत है और प्रारम्भिक दो-तीन वर्षों में उसके भावी जीवन का अधिकाश मे निर्माए हो जाता है। अर्थात् उस छोटी अवस्था मे उसके ऊपर जो सस्कार पडते है वे फिर पाजीधन कठिनता से बदलते है और उन्ही के अनुसार वह मचछी बुरी जीवन-धारामो को अपनाता है । मगर स्त्री अपने इमी एक कर्तव्य का वास्त विक रूप में पालन कर सके तो वह समाज का इतना बडा कार्य सिद्ध करत है. जिसका बदला किसी प्रकार नहीं दिया जा सकता। इसी को महटि व्यास ने पति को हितकारिणी' बनने का नाम दिया है, क्योकि भावी सता का सत्पात्र (सपूत) होना मनुष्य का सबसे बडा सौभाग्य है। पर इसके लिए स्त्री को सुयोग्य होना प्रावश्यक है । मूर्खा और प्रविकासित स्त्री तो सतान का निर्माण करने के बजाय उसका सत्यानाश कर देती है जिससे अनेक बार तो यही कहना गहता है कि ऐमै 'पुत्रवान' होने से ती "निपुत्रो' रहना है [ ३० ।
अच्छा । विष्णु पुराण के मतानुसार स्त्रियों धन्य अवश्य हैं क्योंकि वे समाज के लिये परम उपकारी हैं । यदि वे अपने कर्तव्य का समुचित पालन न करें तो मानव समार उजत और सुसाकृत बन ही नहीं सकता। मानव-जन्म को सार्थकता- 'विष्णु पुराण' के अन्तिम तीन प्रध्यायो मे प्राध्यात्मिक चर्चा करते हुए मनुष्य को प्राप्त होने वाले त्रिविध तार, परमार्थ-विद्या और ब्रह्मयोग का परिचय कराया गया है, जिससे मनुष्य सपार-चक्र और भव बन्धनो से छुट- कारा पाकर अपने सस्य स्वरूप में अवस्थित सकता है। मानव जीवन को सर वेद, शास्त्र तथा ज्ञानी जनो ने बहुत बडा लाभ रतलाया है, एक ऐसा लाभ जिसके लिये देवगण भी लालायित रहते हैं। पर यह लाभ प्राप्त तभी हो सकता है जब मनुष्य अपने स्वरूप और कर्तव्यों को समझे और माया-मोह के पन्दे से बचकर अपना वास्तविक कर्तव्य पालन करे। जो ऐसा नहीं करता, इसके विपरीत मार्ग पर चलता है, तो उसके लिये यह एक महान बन्धन, पतन का साधन भी बन सकता है । इस प्रकार इस मानव जीवन को स्वर्गीय या नारकीय बनाना हमारे अपने ही हाथ में है। जो व्यक्ति इस तत्व को जाने बिना अन्धे की तरह जीवन-क्षेत्र में प्रवेश करता है यह शारीरिक, मान- सिक, प्राध्यात्मिक तीनो तरह के तापी में ग्रसित होकर सुख की तुलना में पर ही अधिक उठता है । इन तीनो तरह के तापों का वएंन करते हुए पुराणकार कहते हैं- "सारीरिक ताप के कितने ही भेद है, वह सुनो । शिरोरोग, प्रतिश्याय (पीनस) घर, शूल, ममदर गुन्म, प्रर्श (घवासीर), शोथ, वास, नेत्ररोग, अतिसार, कुमादि शारीरिक कष्ट भेद से दैहिक ताप कितने ही प्रकार के हैं। पर मामि र तारों को मुनो-काम, क्रोध, भय, द्वेप, लोभ, मोह, विपाद, सोक, प्रसूया, अपमान, ईप्या, पौर मास मादि भेदो मानसिक ताप के भनेक भेद हैं। माध्यात्मिक वा के भी इसी प्रकार कितने ही भेद हैं। मनुष्यों को बो यह जगतो पशु पक्षी, पिसाप, 5, विच्छ, सक्षस भादि [ ३१ ] - से प्राप्त होता है, वह माधिभौतिक कहो पाता है। मोर शीत, उण, वायु, वर्षा, बाढ़, विद्यु सपात प्रादि से प्राप्त दुःख माधिदैविक रहे जाते हैं। "इस प्रकार जन्म से मृत्यु तक जीव अनेकों दुखो को भोगता है । मा रूप के मन्धकार से प्रावृत्त होकर मूढ़हृदय पुरुप यह नहीं जानता कि 'मैं वह से पाया हूँ? कौन हूँ ? कहाँ जाऊँगा? मेरा स्वरूप क्या है ? मैं किस वध से बंधा हुपा हूँ? इस बन्धन का क्या कारण है ? अथवा यह प्रकारण है प्राप्त हुपा है ? मुझे क्या करना चाहिए और क्या न करना चाहिए ? क्य कहना चाहिए और क्या न कहना चाहिए ? धर्म क्या है मधर्म क्या है ? किर भवस्था मे मुझे किस प्रकार रहना चाहिए ? मेरा कग क्तव्य है ? मथवा क्य गुण मोर क्या दोष है ? इस प्रकार पशु के समान, विवेक-शून्य, उदर मौर इन्द्रिय के भोगों मे प्रासक्त पुरुष मज्ञान-जनित महान दु.ख भोगते हैं ।" (वि. 7 इस प्रकार केवल स्वार्थ परायण जीवन व्यतीत करने वाला इस लोक और परलोक मे दुख ही पाता है । यदि वह कभी सुख का भी अनुभव करता है तो तह क्षणिक और भ्रम-युक्त होता है । जैसे शराब के नशे मे मनुष्य बडा 'मजा' समझता है पोर प्रारम्भ में बडी प्रसन्नता भी प्रकट करता है. पर उसका परिणाम बदहवास होकर इधर-उधर गिरना और अपमानित होना ही होता है । परलोक मे भी ऐसे पाप-परायण व्यक्तियो को अत्यन्त दुर्गति होती है क्योकि दूपित मनोवृत्तियो के कारण उनकी मात्मा मौर सूक्ष्मदेह वहाँ भी वैसे ही वष्ट अनुभव करती रहती है। इस प्रकार बार-बार मरना और जीना और गर्भावस्था, जरावस्था तथा मरणकाल के कष्ट सहना कभी मानव जन्म की सार्थ. बता नहीं मानी जा सकती । निष्काम कर्म और ज्ञान-मार्ग- इसलिये शास्त्रों का उपदेश यही है कि इस संसार के पदार्थों मे अधिक ममता रखने भोर स्त्री, पुत्र, सम्पत्ति, घर, भूमि मादि की प्राप्ति मौर रक्षा मे ही सलान रहने से मनुष्य को कभी सच्चा सुख नहीं मिल सकता। ये पदार्थ [ २ ] जितना सुख देते हैं उससे अधिक दु.साका कारण होते हैं। इस कारण प्रात्म कल्याण पाहने वाले व्यक्ति को इनमें कभी मासक्त नहीं होना चाहिए, वरन् इनका सम्बन्ध कर्तव्य न ही मानना चाहिए। इसके लिए पुराणकार ने दो मार्ग ही हितकारी बतलाये हैं, एक निष्काम कर्मयोग और दूसरा जान-योग, इसकी विवेचना करते हुये उन्होंने कहा है - "ज्ञान दो प्रकार का है-शास्त्रअन्य मोर विवेकजन्य । सन्दब्रह्म का ज्ञान शास्त्र-जन्य है और परब्रह्म का वोध विवेकजन्य । मज्ञान घोर अन्ध. फार के समान है । उसको ना करने के लिये इन्द्रियोद्भवज्ञान दीपकवत् और विवेकज-ज्ञान सूर्य के समान है। इस विषय मे भगवान मनु ने कहा है कि शब्द ब्रह्म (शास्त्र जन्म शान) में निपुण हो जाने पर जिज्ञासु विवेकजन्य ज्ञान के द्वारा परब्रह्म को प्राप्त कर लेता है । प्रपर्धवेद के अनुसार मी विद्या दो प्रकार -परा और अपरा। परा से भक्षर (मच्चिदानन्द) बहा की प्राप्ति होती है और पपरा वेदत्रयी म्या है । जो पन्यवर, अजर, अचिन्त्य, पत्र, मध्य, अनिदेश्य, अरूप, सर्वगत, नित्य, भूतों का प्रादिकारण, स्वय कारणहीन है, जिससे सम्पूर्ण व्याप्य मोर व्यापक प्रस्ट हुआ है, जिसे पहित-जन मान-नेनों से देखते हैं. यह परम पाम ही प्रक्षर ब्रह्म है । मुमुक्ष जनों को उसी का ध्यान रखना चाहिये । वही वेद वसनो से प्रतिपादित भगवान् विष्णु का प्रति सूक्ष्म परम पद है । इसका पान पोर सान्निध्य प्राप्त करने के दो साचन स्वाध्याय और योग हैं । स्वाध्याय से योग का और योग से स्वाध्याय का मात्रय करे, क्योंकि एक दूसरे के सहापक होने से ये दोनों परस्सर मन्योन्याश्रित हैं । इस प्रकार स्वाध्याय मोर योग रूप सम्पत्ति से परमात्मा जाने जाते हैं।" (वि० पु०६.५) उपरोक्त उद्धरण में पुराणकार ने मं पोर नान का जो समन्वय दिया है, यही पधिकाश बुद्धिवादी विद्वानों का मभिमत है । जो लोग इन दोनों मार्गों मेर उसन करने को बेटा मरते हैं और इस सम्बन्ध में शास्त्रार्य करने को उद्यत रहते हैं, उनकी विद्या को तोते के गुमान रटी हुई और पेट को भरने के सापन स्वरूप हो समझना चाहिए । मनुष्य का काम न तो रोरे ज्ञान से चल 1 सकता है और न विवेर शून्य पर्म से । पहली प्रकार से मनुष्य यदि होगी, उप और समाज पर भारस्वरूप होते हैं तो दूसरी श्रेणी में पशु-स्तर पायन बिता पर विकास मोर उत्थान ये अयोग्य बन जाते हैं। इसलिये लेखक का यह मत बिल्कुल ठीक है कि मनुष्य को अपने जीवन की सफलता के लिये कर और ज्ञान परा मौरमपरा विद्या का समन्वय बनाये रखना अनिवार्य है। एक तरफ जहा सांसारिक कर्तव्यों का पालन करके, समस्त सम्बन्धियों, इष्ट-मित्रों के साप यथायोग्य व्यवहार करके सुख, सफलता प्राप्त करना प्रशसनीय है, यहाँ दूसरी मोर मात्म-कल्याण का ध्यान रसबर शास्त्रों का चिन्तन, मनन, उपा. सना, त्याग, तप, सेवा के मार्ग में भी भग्रसर होते रहना मावश्पर है। . ऐसे धर्म-पालन के लिए यह मावश्यक नही कि मनुष्य सर्वस्व त्यागी बनकर और जङ्गलो मे जाकर रहने लगे मथवा छापा-तिलक लगाकर, भभूठ रमाकर, वस्त्रत्याग कर 'साधू' या जोगी' वन जाय । यह मार्ग तो इस समय घोर पतनकारी सिद्ध हो रहा है। ऐसे 'त्यागी बाबा' और 'तपसी महाराज' तो प्राय. साधारण गृहस्थी-जन के मोक्षा भी कही अधिक प्रपच मे फंसे और निकृष्ट कर्म करते दिखलाई पड़ते हैं। वे ससार का उपकार करने की बजाय अपकार ही अधिक करते हैं और इस प्रकार निष्पक्ष लोगो की निगाह मे 'धर्म' और 'ज्ञान' को उपहास तथा निन्दा का विषय बनाते हैं। इसलिये परमार्थ और मोक्ष का मार्ग भी लौकिक कर्तव्यो का पालन करते हुए ही अधिक सुग- मता भोर निश्चित रूप से प्राप्त किया जा सकता है । पुराणकार ने प्रागे चल कर खारिडक्य और केशिध्वजनी की कथा में यह स्पष्ट भी कर दिया है कि श्रेष्ठता अपने-अपने कर्तव्यो को पालन करते रहने और सत्य व्यवहार की हो है । ऐसा व्यक्ति चाहे घर मे रहे या वन मे, उसको भगवान की प्राप्नि निश्चित ही है । इसी तथ्य को दृष्टिगोचर रखकर इस पुराण मे भारतवर्ष को स्वर्ग से भी बढकर बतलाया है, क्योकि यह ऐसी कर्म भूमि है जहाँ मनुष्य निष्काम भाव से पतंव्य पालन करके स्वर्ग और अपवर्ग, स्वार्थ और परमार्थ दोनो की सिदि कर सकता है । पुराणलेखक अपनी ललित भाषा मे कहते हैं [ ३४ ] , x x गायन्ति देवा. किलगीतकानि धन्यास्तु ते भारतभूमि भागे । स्वर्गापवर्गास्पदमार्गभूते भवन्ति भूयः पुरुपाः सुरत्वात् ।। कर्माण्यसकल्पिततूत्फलानि सनस्य विष्णो परमात्मभूते। अवाप्य ता कर्म महीमनन्ते तास्मिल्लॅय ये त्वमला प्रयान्ति ।। (वि०६० २.३।२४-२५) मारतभूमि की महिमा पर मुग्ध होकर कवि कहता है कि यही एक ऐसा देश है जहा पर मनुष्य कर्म करते हुये भी उनके लिए 'अपनत्व' का मह- कार नहीं करते वरन् उसके फल को ईश्वरापित करके स्वय निर्लेप बने रहते हैं । यही कारण है कि स्वर्गके देवता भी यही गाते रहते हैं कि भारतभूमि बड़ी सौभाग्य शालिनी है जहा स्वर्ग मोर अपवर्ग दोनो का समन्वय किया जा सकता है । निस्तदेह उसमें जन्म लेने वाले धन्य हैं । x x 'विष्णु पुराण' वास्तव मे पुराण-साहित्य का एक अमूल्य रत्न है। विषय-निर्वाचन, तथ्यो वा निरुपण,व गंन शैली या सयत भोर स्वाभाविक होना, भाषा का सौरव और लालित्य मादि जितने गुण इस अपेक्षाकृत अल्प विस्तार वाले पुराण मे भर दिये गये हैं उन्हे देख कर 'गागर मे सागर' की उक्ति ही म्मरण हो पाती है। हमारा विश्वास है कि इस पुराण को पढ़कर पाठको के मन में से उन बहुत सी धारणायों का अन्त हो जायगा जिनको बहुत से स्वयम्भू मालोवर, जिन्होंने भी एक भी पुराए को पूरा न पढ़ा होगा, समय-समय पर पुराणों के विरुद्ध प्रकट पिया करते हैं। हम यह नहीं कहते कि मव पुराण या उनमे दिये गये सब विपश उच्च- कोटि के उपयोगी मोर निदर्शप हैं । सभी प्राचीन अन्यों की तरह पुराणों में भी समय-समम पापी मिलावट की गई है। विदेशी भाक्रमणो के समय उनम रो भनेक नष्ट हो गये भोर फिर उनको इधर-उपर से सामग्रो संग्रह करो पिर से प्रस्तुत किया गया । इमसे भनेर परिवर्तन, परिवन उनमें होते ही रहे।
भनेक स्वार्थीजनों ने उनमें से अपने लाभ की दृष्टि से तीर्थ,दान प्रादि की महिमा अप्रासगिक रूप से भर दी, कही थारो का विशाल विधि-विधान ही शामिल कर दिया गया । इस प्रकार बहुसख्यक अनावश्यक, अनुपयोगी मोर भनेक दूषित विषय भी पुराणो मे शामिल कर दिये गये हैं। पर इस माघार पर उनका सर्वथा बहिष्कार करना वुद्धिमानी की बात नहीं है। अनेको काम को महत्व की बातें भी हैं, अनेक प्राचीन तथ्यो का पता उनके द्वारा लगाया जा सकता है, इसलिये उनका सशोधन, परिमार्जन करके, उनकी उपयोगी बातो का सग्रह वरना, उनसे लाभान्वित होना ही सर्वथा उचित है। "विष्णु पुराण' का क्लेवर पहले से ही अल्प था और लोकप्रिय होने के कारण उसका सर्वोपयोगी रूस भी विकृत होने से बच गया, इसलिए उमे पूर्ण रूप मे यथातथ्य प्रवाशिक किया गया है । ---श्रीराम शर्मा, प्राचार्य
विषय सूची
प्रथम अंश
१. परामर मुनिना यज्ञ और पुराण ज्ञान की प्रालि
२ चौबीस तवी के माय जगन-उत्पत्ति का वर्णन और
विष्णु भगवान की महिमा
३ ब्रह्मा की यायु योर काल का स्वरूप
४ ब्रह्माजी की कमल से उत्पत्ति, वाराह अवतार द्वारा पृथ्वी
का उद्धार और लोक-रचना
५ देवपि, पितृ, दानव, मनुष्य, नियर प्रादि की नृष्टि ६६
६ चारो वर्ण और उनके क्तंच, पृथिवी के विनाग, प्रन की
उत्पत्ति
LE
प्रजापतिगण की उसत्ति, तामसी-अर्ग, स्वायम्भुव मनु
प्रोर मतन्पा वा वम वर्णन
रद-सर्ग का वर्णन, भगदान ठया लक्ष्मीजी का प्रभाव
इन्द्र को दुर्वाताजी का भाप, ममुद्र मन्यन द्वारा रला तथा
लक्ष्मी की उत्पति
मृगु, अग्नि प्रादि पितरो को मतनि का वर्णन ११७
११ ध्रुव का जन्म और उसकी घोर तपस्या
१२०
१२ नावान का प्रकट होकर घव को वरदान देना
१३ घर की सन्तान तथा राता वेन और पृयु का चरित्र १४३
१४ प्राचीन वहि और उनके पुत्र प्रचेतामो का वर्णन
३
३. ]
भगवद् भक्ति १५. दक्ष प्रजापति की उत्पत्ति और उनकी पाठ कन्याग्रो का वश वर्णन १६३ १६ प्रह्लाद की कथा और नृसिहावतार विषयक जिज्ञासा १८५ १७. हिरण्यकशिपु का निलोक विजय और प्रह्लाद की १८७ १८. प्रह्लाद को मारने के लिये तरह-तरह के घातक प्रयोगो का वर्णन २०२ १६. प्रह्लाद द्वारा भगवान का स्वरूप कथन और उसकी रक्षा को सुदर्शन चा का भेजा जाना २०६ २०. प्रह्लाद की भगवत् स्तुति और नृसिंह भगवान द्वारा हरिण्यकशिपु का वध २१. कश्यपजी की अन्य स्त्रियो की सन्तान का वर्णन २२७ २२. विष्णु भगवान के रूप मे समस्त सृष्टि की उत्पत्ति वर्णन २३३ २२१ द्वितीय अंश प्रियव्रत का वश वर्णन २४५ २. सागर, द्वीप, वर्ष, पर्वत, वन, नदियो नादि का वर्णन २५२ ३. भारतादि नौ खण्डो का विभाजन २६० ४. प्लक्ष, शाल्मालि मादि सप्तद्वीप वर्णन २६४ ५. सात पाताल लोगो का वर्णन २७७ ६. रौरव, प्रसिपत्र वन, पाल सूत्र आदि नरपो या वर्णन २८१ ७. उध्वं लोगो और ग्रहादि की स्थिति ८. मूर्य, नक्षत्र, राशि, काल चक्र और लोक पालो या वर्णन २६५ ६. मिशुमार चक्र और घ्र व वर्णन ३१३ १०. दादश मास पे द्वादश सूर्यो या वर्णन ३१७ ११. गूयं पा स्वरूप पौर वणवी शक्ति पा वर्णन ३२० [ ३८ ] २८८ ३२३ ३३१ ग्रह-नक्षनों का वर्णन और सवका भगवान का अंश स्प कथन राजा भरत का जड़ भरत के रूप में जन्म लेना और ब्रह्मज्ञान कथन जड़ भरत और सौवीर नरेश का सवाद ऋभु द्वारा निदाघ को अवंत सिद्धान्त का उपदेश राजा और हाथी के दृष्टान्त से अद्वैत ज्ञान कथन और सौवीर नरेश का समाधान ३५१ ३५६ तृतीय अंश पहले सात मन्वन्तरो के मनु, इन्द्र, देवता, सप्तपि आदि का कथन आगामी सात मन्वन्तरो का वर्णन ३६७ प्रत्येक चतुर्युगी में उत्पन्न होने वाले व्यासों का वर्णन ३७५ ऋगवेद और उसको शासाओं का विस्तार ३८० यजुर्वेद की सत्ताईस शाखानो का वर्णन सामवेद और उसकी शाखायें, अठारह पुराण और चौदह विद्याओं का वर्णन यमराज द्वारा हरिभक्त के लक्षण और महिमा का कथन ३६३ भगवान विष्णु की धाराधना और उसका महात्म्य, चारो बों के धर्म ब्राह्मण धर्म, गृहस्थ आदि प्राथमो के धर्म ४०६ जातकर्म, नामकरण और विवाह संस्कार वर्णन गृहस्थ-जीवन सम्बन्धी सदाचार गृहस्थो के विशेप धर्म आभ्युदयिक थाद्ध, प्रेत क्रिया औरथाद्ध ४००
१५.
१५
'.१४. श्राद्ध को महिमा और काल निर्णय
१५. श्राद्ध के उपयुक्त ब्राह्मण और अन्य विधान
१६. श्राद्ध विहित और त्याज्य वस्तुओं का वर्णन
१७. देवताओं के पराजित होने पर विष्णु द्वारा मायामो
(नग्न ) की उत्पत्ति
१८.
१८. मायामोह का असुरो को पतित करना और राजा
शतधनु तथा उसकी रानी को कथा
१६.
चतुर्थ अंश
२०.
१. वैवस्वत मनु के वश और राजामों का वर्णन
२. इक्षाकु के वश का वर्णन
[ ४० ]
श्रीविष्णुपुराण
प्रथम अंश
नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम् ।
देवी सरस्वती न्यासं ततो जयमुदीरयेत् ।।
पहला अध्याय
ॐ पराशरं मुनिवर वृतपौर्वाल्लिक कियम् ।
मैनेय परिपप्रच्छ प्रतिपस्याभिवाद्य च ११
त्वत्तो हि वेदाध्ययनमधीतमखिल गुरो ।
धर्मशास्त्राणि सर्वाणि तथाङ्गानि यथाक्रममा२।
त्वत्प्रमादान्मुनि। मामन्ये नाकृतथमम् ।
वक्ष्यन्ति सवशास्त्र पु प्रायशो येऽपि विद्विप ।।
साहमिच्छामि धमज्ञ श्रोतु त्वत्तीयथा जगत् ।
चभूव भूयश्च यथा महाभाग भविष्यति ।।।
यन्मय च जगद्ब्रह्मन्यतश्चतचराचरम् ।
लोनमासीद्यथा यम लयमेष्यति यत्र च ॥
थी मूतजी ने कहा-जब मुनि येष्ठ पाराशरजी पूर्वाहिक
। को रख अपने पारन पर विराजमान हुए हो मय अपि
४२ ] [ श्रीविष्णुपुराण ने उनको प्रणाम पभियादन परये पूछा- है गुरुदेव मा सर्म रहकर मैंने समस्त वेद-वेदाङ्ग एव धर्मशास्त्री का अध्ययन किया है ॥१३॥ पापके अनुग्रह से पशिडतजन भी यह नहीं वह स्ते कि "मने प्रारू ध्ययन मे श्रम नहीं किया है। मेरे विरोधी भी ऐसा नही यह स्व हैं ॥३॥ हे धर्मज्ञ । प्रव में प्रापये मुख से यह सुनना चाहता हूँ कि यह जगत जिससे उत्पन्न हुपा है, यह समात चराचर जिममे लीन था जिससे प्रकट हुपा है, जिसमे लय होगा, उसका है? ॥४-५॥ मूल स्वरूप यत्प्रमाणानि भूतानि देवादीना च सम्भवम् । समुद्रपर्वताना च सस्थान च यथा भुवः ।। सूर्यादीना च सस्थान प्रमाण मुनिसत्तम । देवादीना तथा वशान्मनू-मन्वन्तराणि च ।७। कल्पान कल्पविभागाश्च चातयुंगविकल्पितान् । कल्पान्तस्य स्वरूपश्च युगधर्माश्च कृत्स्नशः। देवषिपार्थिवाना च चरित यन्महामुने । वेदशाखाप्रणयन यथावयासकर्तृकम् ।। धर्माश्च ब्राहाणादीना तथा चाश्रमवासिनाम् । श्रोतुमिच्छाम्येह सर्वं त्वत्तो वासिष्ठनन्दन ॥१०॥ ब्रह्मन्प्रसाद प्रवरण कुरुष्व मयि मानसम् । येना तज्जानीय त्वत्प्रसादान्महामुने ।११। साधु मैत्रेय धर्मज्ञ स्मारितोऽस्मि पुरातनम् । पितु पिता मे भगवान् वसिष्ठो यदुवाच ह ।१२। विश्वामित्रप्रयुक्तेन रक्षसा भक्षिन पुरा । श्रुतस्तातस्ततः मोधो मैत्रेयाभून्ममातुल ॥१३॥ तताऽह रक्षसा सन विनाशाय समारभम् । भस्मीभूताच शतशस्तस्मिन्सने निशाचरा.१४॥
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१ पाप
प्रथम प्रश-अ० १ ]
[ ४३
माकाग मादि पञ्च महाभूतो को स्थिति, देवतामो की उत्पति,
ममुद्र, पर्वत और पृथ्वी की दशा, सूर्य प्रादि ग्रहो का सस्थान और परि-
माण दवतानो का वश, मनु और मन्वन्तरी का वर्णन, कल्लो और
युगो का स्वरूप, कल्पान्तर, सम्पूर्ण युगो के धर्म, देवपि और राजाम्रो
के चरित्र, मासजी द्वारा वेदो की विभिन्न शाखाप्रो का प्रणयन आदि
वा यन भी मैं सुनना चाहता हूँ ॥६-६।।
हे शक्तितनय ! ब्राह्मण प्रादि चारो वर्णों और ब्रह्मचर्य आदि
चारो प्रश्रमों के धर्म में मापसे जानना चाहता हूँ। है ब्रह्मन्
मुझ पर ऐसी पा सरें जिससे मैं इन समस्त विषयो का ज्ञान प्राप्त कर
सा ॥ १०-११ ॥ पाराशर जी बोले-हे धर्मज्ञ मंत्रेय । तुमने पुराने
विषयो की प्रग्छी याद दिलाई 1 पितामह वसिय ने जो कुछ कहा था
वह मय प्रब मुझे स्मरण हो रहा है।॥ १२॥ मैयजब मैंने यह
मुना पा कि विश्वामित्र द्वारा प्रेरित राक्षस न पिताजी को भक्षण कर
लिया, तो मुझे अत्यन्त ग्रोध हुपा था और मैंने राक्षमो के विनाशा
या प्रारम्भ कर दिया जिसमे सैडों हजारो राक्षम प्रतिदिन भम्म होने
लगे ।१३-१४॥
तत: सड क्षीयमाणेषु तेषु रक्षस्स्वशेषतः ।
मामुवाच महामागो वसियो मपितामह. ११५॥
मनम यन्तकोपेन तात मन्युमिम जहि
राक्षसा नापराध्यन्ति पितृस्त विहित हि तना१६॥
मूढानामेर भवति क्रोधो ज्ञानवता कुतः ।
हन्यते तात क फेन यत. स्वकृतभुक्पुमान ॥१७॥
सञ्चितस्य पि महता वत्स लेदोन मानव. ।
यशसस्तपसश्चव काधो नारकर. पर ॥१८॥
स्वर्गापवर्गव्यासेधकाररा परमर्षयः ।
वजयन्ति मदा क्रोध तात मा तद्वशो भव ॥१६॥
४] [श्राविधा प्रल निशाचरंदाधीन परिभि । सन ते विरमत्यतरक्षमामारा हि गाधर Bot एक साते । सेनात्मपता महारमना । उपसहतवासत्र गधरतद्वाक्यगौग्या २० जय इस प्रकार पाम्या राक्षम नष्ट हो गरा तय गर fort महाराज यसि जी मार बहा-वा-प्रपन्त बोध परना र नही होता, पत उसको पात परो । रामगों का कोई दोष नहीं है तुम्हारे पिता का प्रारब्ध ऐसा ही पा ॥ १५-१६ ॥ मून पक्ति हा पोध किया परत है, शानीजन एमा नही परत । ह प्रिय । कोई रिसी का वध नहीं परता है, क्यापि सब अपन - अपने कृतको वा पत्र भोग किया परते हैं ।। १७ ॥ यह भी रामभो रि मनुष्य पत्यान परियम कसे यश पोर तपस्या का सञ्चय करता है, पर क्रोध में यह सहन ही मे नष्ट हो जाते हैं । इसपिए ज्ञान के भएडार ऋपिगण स्वर्ग और मोक्ष मे बाधा स्वरूप क्रोध का परित्याग वर दत हैं । इसलिए है तुम भी क्रोध के वशीभूत मत हो ॥ १८-१६॥ विना विमा दोष के समस्त निशाचरो को भस्म करना निरथक है. इसलिए प्रव अपने इस यज्ञ से निवृत्त हो, क्योकि साधुप्रो का भूपण क्षमा ही है ॥ २० ॥ पितामह महोदय के इस प्रकार उपदेश करन पर मैंने उनका आदेश शिरोधार्य करके उसी समय यज्ञ का उपसहार कर दिया ॥२१॥ तत प्रीत स भगवान्वसिठो मुनिसत्तम । सम्प्राप्तश्च तदा तन पुलस्त्यो ब्रह्मण सुत ।२२। पित'महेन दत्ताय॑ कृतासनपरिग्रह । मामुवाच महाभागो मैनर पुल हाग्रज ॥२३॥ वैरे महति यद्वाक्याद् गुरोरद्याश्रिता क्षमा । त्वयातस्मात्समस्तानिभवाञ्च्छावारिग वेस्यति ।। सन्ततेनं ममोच्छेद ऋ द्वेनापि यतः कृत । त्वया तस्मान्महाभाग ददाम्पन्य महावरमा२५॥ - तात प्रथम प्रश-प्र.१] [ ४५ पुराणहिताकर्ता भवान्वत्स भविष्यति । देवतापारमायं च ययावत्स्यते भवान् ।२६। प्रवृत्ते च निवृत्ते च कर्मण्यस्तमला मतिः । म प्रसादादसन्दिग्धा तव वत्स भविष्यति ॥२७॥ ततश्च प्राह भगवान्वसिष्टो मे पितामह । पुलस्त्येन यदुक्त ते सर्वमेतद्भविष्यति ॥२८॥ इम पर महामुनि वसिष्ठ मुझ पर अत्यन्त प्रमन हुए पौर उसी बीच में ब्रह्मा जी के पुत्र पुनम्त्य जी वहाँ प्रा पहूंने ॥२२॥ पिताजी ने उनको मध्यंदान दिया और पुलस्त्य जी भासन पर बैठकर मुझ से रहने गे~ "प्रत्यन्त दरभाव होने पर भी तुमने जो गुरुजनो के वमन को स्वीकार करो क्षमा कर दिया इससे तुपको समस्त गानो का ज्ञान प्राम हो जायगा ॥ २३-२४ ।। पुलम्रय जो पाने कहने लगे - "क्रोध करने पर भी तुमने जो मेरे वश का मूलोच्छेद नहीं किया उसके लिए मैं तुमको पह विशेष घर प्रदान करता है कि तुम पुराए-महितानो के रचयिता दागे, देवना मौर परमार्य तत्व को यथावत् जान सकोगे और मेरे प्रसाद र प्रवृत्ति और निवृत्ति मूलक धर्म में तुम्हारी बुद्धि निर्मल पौर प्रम. दिग्ध रहेगी" ॥ २५-२६-२७ ।। सत्सवात् मेरे पितामह भगवान वसिष्ट महा-"पुषस्य नो ने तुम मे जो कहा है वह ममात सत्य होगा"।२८) इनि पूर्व वसिडेन पुतस्त्येन च धीमता । यदुक्त तस्मृति याति त्वत्प्रश्नादखिल मम ॥२६॥ सोऽह वदाम्ययेप तै मैाय परिपृच्छने । पुराणमाहिता सम्यना नियोध ययातयम् ॥३०॥ विष्णो मकासादुद्धत जगत्तरेव च म्यितम् । स्थितिमपमवर्तासौ जगतोऽस्य जगच म ३१ मेरेर । पूसात मे वसिष्ठी पोर बुद्धिमान पुलस्त्य जी ने लार जो रहा पा वह सब इस समय तुम्हार प्रश्न करने से मुझे मरण हो पाया ॥२६॥ प्रतएव पब मैं तुम्हारे द्वारा जिज्ञामित पुराण- ४६ ] [ श्रीविष्णुपुराण सहिता पूर्ण रूप से बत नाता हूँ, तुम सम्पाया उमे श्रवण करो ॥ ३ ॥ यह समस्त जान विष्णु से ही उसन्न हुमा है और उन्ही में स्थित है। इसको स्थिति और संयम के का वही हैं और वन वे हो जगन रूप हैं ॥३१॥ दूसरा अध्याय अविकाराय शुद्धाय नित्याय परमात्मने । सदकरूपरूपाय विष्णवे सर्वजिष्णवे ।। नमो हिरण्यगर्भाय हरये शङ्कराय च । वासुदेवाय ताराय सगस्थित्यन्तकारिणे ।२। एकानेवरूपाय स्थूलसूक्ष्मात्मने नमः । अव्यक्तव्यक्तरूपाव विष्णवे मुक्तिहेतवे ।३। सर्गस्थिविनाशाना जगतो यो जगन्मयः । मूलभूनो नमस्तमै विष्णवे परमात्मने ।४। प्राधारभून विश्वस्याप्योगोयासमरणीयसाम् । प्रराम्य सर्वभूतस्थमच्युत पुरुषोत्तमम् ॥५॥ ज्ञानस्वरूपमत्यन्त निमंल परमाथतः । तमेवार्थस्वरूपेग भ्रातिदर्शनतः स्थितम् ।। विष्णु प्रसिष्णु विश्वम्य स्थिती सर्गे तया प्रभुम्। प्रणम्य जगतामोशमजमक्षयमव्ययम् ।। वपयामि यथापूर्व दक्षाद्य मुनित्तमं । पृष्ट प्रोवाच भगवानब्जयोनिः पितामहः ।। पारासर जी कहने लगे-अविकार, शुद्ध तीनो पाल में परि मापी परमारमा, सर्वदा एक रूप, सर्वविजयो विष्णु ही हरि, हिरएय गर्भ पौर शकर के नाम से प्रसिद्ध हैं, उन सृष्टि-स्थिति-विनाश भरने पामे वासुदेव को नमस्कार है ।।१-२॥ एकानेक प्वरूप स्थूल-सम्ममय 1.01 प्रथम अग-१०२ ] कार्यकारणभूत, मुक्तिदाता विष्णु को नमस्कार है । इस जगत की उत्सति, स्थिति और लय के मूलभूत, जगतमय परमात्मा विष्णु को नम. कार है ॥३-४ ॥ विश्वाधार, सूक्ष्मातिसूक्ष्म, सन प्राणियो में स्थित प्रक्षर, पुरुषोतम, शान स्वरूप, वास्तव में अत्यन्त निर्मल किन्तु, भ्रांति- वा स्थूल रूप में श्यमान, बालस्वरूप, उपशुन्य, अच्युत जगदीश्वर विष्णु को प्रणाम करके मैं उस समस्त वयानका को कहता हूं जिसको पायोनि भगवान ब्रह्मा जी ने दशदि महामुनियो के प्रश्न फरने पर कहा था ।।५-८॥ तंश्योक्त पुरुयुत्साय भूभुजे नमंदातटे। सारस्वताय तेनापि मह्य सारस्वतेन च ।। परः पराणा परमः परमात्मात्मसस्थितः। रूपवादिनिर्देशविरोपण विजितः अपक्षयविनाशा-या परिणामधिजन्मभिः । यजितः शक्यते वक्त यः सदास्तीति केवलम्॥११॥ मर्षवासी समस्त च वसत्यत्रति वै यतः । तनः स यासुदैवेति विद्वद्भिः परिपठ्यते ॥१२॥ त्यहा परम नित्यमजमक्षयमव्ययम् । एमस्या तु सदा हेयाभावाञ्च निर्मलम् ॥१३॥ नदेव सबमेवंतद्वयक्ताव्यक्तस्वरूपवत् । तथा पुरुषरूपेण कालम्पेण च स्थितम् ।१४ दस पादि मुनिको ने नर्मदा तट पर पितामह का सपन राजा पुरपुरग यो मुनाया था, पुपुत्म ने उसे सारस्वत से पहा मोर सारस्वत में मने गुना । परात्पर सामसस्पित परमात्मा, जो कि रूस, वणं, निर्देश में रहित है, पपसय विनगा-रिणाम-वृद्धि-जन्म से रहित है, पौर बिसरे गम्बन्ध में इतना ही कहा जा सकता है कि यह "सदा है" वही इस जमत सर्वत्र व्याप्त है और समस्त जगत उसमें पास मरता है, इसीलिये या३२ महा माया है ।१०-१सा यह सहा जन्मगार, [ श्रीविष्णपुराण नित्य स्वरूप, अक्षय, अव्यय, सर्वदा एस रूप, माया तथा उगवे गुणों से रहित और निर्मल है ।। १३ ॥ व्यक्त (महदादि), अध्यक्त (माया) पुरुष और काल इन चारो रूपो मे वही स्थित है ॥१४॥ परस्म ब्रह्मणो रूप पुरुप. प्रथम द्विज । व्यक्ताव्यक्ते तथैवान्ये रूपे कालस्तथा परम् ॥१५॥ प्रधानपुरुषव्यक्तसालाना परम हि यत् । पश्यन्ति सूरय शुद्ध तद्विष्णो परम पदम् ॥१६॥ प्रधानपुरुषव्यक्तमालास्तु प्रविभागश । रूपाणि स्थितिसर्गातव्यक्तिसद्भावनव १४॥ व्यक्त विष्णुस्तथवयक्त पुरुप काल एव च । क्रीडतो बालकस्येव चेष्टा तस्य निशामय ११ मव्यक्त कारण यत्तत्प्रधानमृषिसत्तमै । प्रोच्यते प्रकृति सूक्ष्मा नित्य सदपदत्मकम् १९६६ अक्षय्य नान्यदाधारममेयमजर ध्र वम् । शब्दस्पर्शविहीन तद्रू पादिभिरसहितम् । २० । त्रिगुण तज्जगद्यानिरनादिप्रभवाप्ययम् । तेनाने सर्वमेवासीद्वयाप्त वै प्रलयादनु ॥२१॥ हे द्विज । परब्रह्म का प्रथम रूप पुरुप होता है दूसरा तय तीसरा व्यक्त मोर भव्यक्त है और चौथा रूप कान है । शानीजन इ. पारो मे जो शुद्ध पौर परम-सार वस्तु है उसी का अनुभव करते हैं और वह विष्णु का परम पद भथवा परमरूप है ।। १५-१६ ॥ पूर्वोक्न प्रधान मादि रूप ही विभागानुसार समस्त सृष्टि-स्थिति-प्रलय के उद्भव पौर प्रस्ट होने का कारण है ॥ १७॥ विष्णु भगवान जो पुरुष पादि स्पो में प्रकट होते हैं, उसको बालको खेत की तरह ही समझना चाहिए ॥ १८ ॥ ऋषिगण मध्यक्त कारण रूप प्रधान को ही गूक्ष्म प्रकृति के नाम से पुकारते हैं । यही भव्यक्त, प्रक्षय, प्रन याश्रय, पनान, पर, निश्चल, शम्द-स्पर्श विहीन, प रहित त्रिगुणमय ही प्रथम अंश-अ० २] 1 ४९ जगत का कारण है । यह म्बय अनादि है । मृष्टि के पहले और प्रलय के पश्चात् सर्वत्र वही एक ही बाब व्यास रहता है ॥१६-२१॥ वेदवादविदो विद्वन्नियता ब्रह्मवादिनः । पठन्ति चैतमेवार्थ प्रधानप्रतिपादकम् ।२२। नाहा न रानिन नभो न भूमि- सोत्तमोज्यातिरभूच्च नान्यत् । श्रोग्रादिसुद्ध-यानुपलभ्यमेक प्राधानिक ब्रह्म पुमास्तदामोत् ॥२३॥ वियो. स्वरुपात्परतो हि ते द्वे म्पे प्रधान पुरपश्च विप्र । तम्यंब तेन्येन घृते वियुक्ते म्पान्तर तद्विज कालसज्ञम् ॥२४॥ प्रकृती सस्थित व्यक्तमतीतप्रल्ये तु यन् । तस्मात्यायतसनोऽयमुच्यते प्रतिसश्चरः ॥२५॥ अनादिभगवान्दालो नान्ताम्य द्विज विद्यते । अन्युच्दिनाम्ततस्त्वेते मगस्थित्यन्तसंयमाः ।२६। गुणमाम्ये ततस्तस्मिन्पृथवपु सि व्यवस्थिते । पालस्वाद्विपणामय परिवर्तते ॥२७॥ ततस्तु तत्पर ब्रह्म परमात्मा जगन्मयः । सवंगः सर्वभूतेश. सर्वात्मा परमेश्वर. २८॥ प्रधानपुरपी चापि प्रविश्यात्मेच्छया हरिः । सोभयामास मम्प्राप्त मगंवाले व्ययाव्ययौ ॥२६॥ है विद्वान् । वेदों रे माता ब्रह्मज्ञानी व्यक्ति इम ही सस्य पर निम्नलिपित शोर द्वारा उमा वर्णन पिया परते मे दिन-रात्रि, या-म, अन्यकार-प्रवास पुष भी न पा । उस समय वेयर प्रधान, प्रह्म मोर पुप मात्र हो पा" ॥ २२-२३॥ है कि । प्रधान और पुरष से सोना पदाधि प्रधान को बार [ श्रीविष्णुपुराण रहित विष्णु पे स्वरूप से पृथक है । ये दोनों गृष्टि प्रारम्भ होने के रामय पृथय हो जाते है और प्रलय पास में एक प्रमयत रूप में सय हो जाते है ॥२४॥ महाप्रप ये समय समस्त विश्व प्रति म मन निहित रहता है इसलिए उरो प्राकृत-प्रलय पहने हैं ॥ २५ ॥ बालाप भगवान मनादि है, इनसा कोई प्रति नहीं है । इगलिा गृष्टि-ferति और प्रलय के क्रम का भी अभी मन्त नहीं होता, ये प्रवाह रूप से बरापर होते रहते हैं ।। २६ ।। है मैष । प्राय याल में साद- रज तम की निप्पिय अवस्था होकर गुणसाम्य हो जाता है और पुरुष प्रकृति से पृथक अवस्था मे रहो लगता है, तब भी भगवान विष्णु का वह पात स्वरूप बना रहता है ।। २७ ।। तदनन्तर सृष्टि पाल के माजाने पर ब्रह्म परमात्मा, जगत्मय सर्वगामी, सर्वभूतेश्वर, सर्वात्मा परमेश्वर ने म्वय की इच्छानुसार परिणामी प्रकृति और प्रारिणामी पुरप में प्रविष्ट होकर उनको सृष्टिकार्य के लिए क्षोभिन और प्रेरित किया ।२--२६।। यथा सन्निधिमात्रेण गध क्षोभाय जायो। मनसो नोपकर्तृत्वात्तथासौ परमेश्वरः ।३०। स एव क्षोभको ब्रह्मन् क्षोभ्यश्च पुरुषोत्तम । म सकोचविकासाम्या प्रधान वेऽपि च स्थित ३१॥ विकासाणुस्वरूपश्च ब्रह्मरूपादिभिस्तथा । व्यक्तस्वरूपश्च तथा विष्णु सर्वेश्वरश्वर १३२। गुणसाम्यात्ततस्तस्मात्ोत्रज्ञाधिष्ठितान्मुने । गृणव्यञ्जनसम्भूति सर्गकाले द्विजोत्तम ।३३। प्रधानतत्त्वमुद्भ त महान्त तत्समावृणोत् । सा त्त्वको राजसश्चव तामसश्च त्रिधा महान् ३४ प्रधानतत्त्वेन सम त्वचा वीजमिवावृतम् । वैकारिस्तजसश्च भूतादिश्चैव तामस ।३५ पर इस कार्य मे परमेश्वर की कोई क्रियाशीलता नहीं होती । जैसे गन्ध के समीप होने से मन में चञ्चलता उत्पन्न होती है, परमेश्वर प्रयन अंश-अ०२ 1 [ ५१ का यह क्षोभ ( जनकत्व ) मी प्रकार का होता है । वास्तव में ये परमेश्वर ही सष्टोव और विवास द्वारा झुमित होने वाले और दोन करने वाले हैं और वे ही प्रधान प्रति ये रप में रहते हैं ॥ ३०-३१॥ मागास प्रादि पञ्चभूत, ब्रह्मा यादि समस्त जीव और व्यक्त सृष्टि के रूप में भी वे परमेश्वर ही रहते हैं ॥ ३२ ॥ है विवोत्तम ! मृष्टिकाल उपस्पिन होने पर पुरुप द्वारा मरिगि उम गुणमाम्य से गुणयन्जन मर्यात महत्तत्य उत्पन्न प्रा । महत्तत्व तीन प्रकार का होता है- सास्विर, राजस और तापस! पि प्रकार वीज सिलवे से ढका रहता है उसी प्रकार यह महत्तत्व भी प्रधान तत्व से सबंग सास रहता त्रिविधोपमहझारो महत्तत्वादजयान । भूतेन्द्रियाणा हेतुः स विगुणत्वान्महामुने १३६ यथा प्रधानेन महान्महता म तथावृतः । भूतादिस्तु विकुर्वाणः पादतन्मात्रक ततः ।३७) ससजे बदतमात्रादाकारा शब्दलक्षणम् । शब्दमायं तथाका भूतादि स ममावृणोत् ॥१८॥ प्राकाशम्तु विकुर्वाण. स्पर्शमाग समज है। बलवान मवायुस्तस्य स्पर्शो गुरगो मत: ।३। माका शब्दमाग तु स्पर्शमात्र समावृणोत् । ततो वायुविकुर्वाणो रुपमा ममर्ज ह ४० ज्योतिरतवते वायोस्त पगुणमुच्यने । स्पसमा तु व वायू स्यमा समावृणोत् ।। ज्योतिश्चापि विपरिणं रसमा सम ह। सम्मपनि नतोम्भामि रसाधागगि तानिचा४२। रममामारिए चाम्मा म रमान ममावरणात् । विपूर्वाणानि चाम्नामि गपमान मर्माजी।।३।
ग्रहकार महत्तत्व से
५२ ]
[ श्रीविष्णुपुराण
महत्तत्व से वैकारिक अर्थात् सात्विक, तेजम ( राजस )
और भूतादि ( तामस ) इन तीन प्रकार के अहवार तत्व की उत्पति
हुई । अहङ्कार त्रिगुणात्मक होने के कारण हो भूत, इन्द्रिय और
देवताग्रो के उद्भव का कारण होता है ॥ ३६ ।। जिस प्रकार प्रधान
तत्व द्वारा महत्तस्व मावृत होता है उसी प्रकार
प्रावृत्त रहता है । तामस ग्रहवार ने भुभित-कायोन्मुख होकर शब्द
तन्मात्रा और शब्द तन्मात्रा से दाद गुण वाले प्राकाश की सृष्टि की
और दोनो को प्रावृत कर लिया । आकाश ने क्षुभित होकर स्पर्श
तन्मात्रा की सृष्टि की और उससे स्पर्श गुण विशिष्ट बलवान वायु को
उत्पत्ति हुई और प्राकाश ने वायु को प्रावृत कर लिया ।। ३७-३६॥
इसके पश्चात् वायु क्षुभित होने पर उसमे से रूपमात्र और ज्योति
उत्पन्न हुई ज्योति का गुण रूप है ज्योति वायु द्वारा प्रावृत हुई ।
ज्योति के क्षुभित होने पर रसमात्र उत्पन्न हुआ। उमसे रस विशिष्ट
जल का जन्म हुमा भौर वह ज्योति द्वारा प्रावृत हुप्रा । जल के
क्षुभित होने पर गन्ध मात्र को मृष्टि हुई, उसमे पृथ्वी की उत्पत्ति हुई
जिसका विशेष गुरा गन्ध है ।। ४०-४३ ॥
सङ्घातो जायते तस्मात्तस्य गन्धो गुणो मतः ।
तस्मिस्तस्मिस्तुतन्मातेनतन्मात्रतास्मृता ।४४
तन्मात्राण्यविशेपाणि अविशेषास्ततो हि ते ।
न शाता नापि घोरास्ते न मूढाश्चाविशेपिणः।४५
भूततन्मानसर्गोऽयमहङ्कारात्त तामसत् ।
तेजसानीन्द्रियाण्याहुर्देवा बैंकारिक ददा १४॥
एकादश मनश्चात्र देवा वैरारिका: स्मृताः ।
त्वक चक्षुर्नासिका जिह्वा श्रोत्रमय च पञ्चमम४७
दादादीनामवाप्ययं बुद्धियुक्तानि व द्विज ।
पापस्यौ करी पादौ वाय च मैत्रय पश्चमी।४
प्रथम अंश-अ० २] विसर्गशिल्पगन्युक्ति कर्म तेपा च पथ्यते। प्राकाशवायुतेजासि सलिल पृथिवी यथा । ४९ ॥ इन प्रानाश प्रादि भूतो में शब्द प्रादि की माग हीदी है, जसमे उमे तन्मात्रा कहा जाता है। राब तुम्मायामों की प्रक्रि' पाना जाता है। उनको शान्त, घोर या मूड आदि विषादी लगाये जाते। यह फेवल तामम अहवार से समस्त भूतों में वृष्टि होती है । दश इन्द्रियो को तंजस अथवा राजस ग्रहावार में पत्र काटा जाता है। और इन्द्रियो के दश देवत्तानो को वैवारिक प्रमंद fre मरद्वार में उत्पन्न माना गया है ॥४४-४५॥ मामी भर द्र जिसके देवता चन्द्र, ग्रह्म, न्द्र ग्रादि को कहा गया है ! र चर्म, चक्षु, जिह्वा और नामिया ये पान मानेन्दिन : * प्रहण करने की शक्ति और बुद्धि रखती हैं । गुटा, दाद, Tr, पौर जिह्वा पांच कन्द्रिपा है जिना स, गति और बोलना है।।४७-४६।।
[ श्रीविष्णुपुराण - हे ब्रह्मन् ! प्रानाश, वायु. तेज, जल और पृथ्वी एक से एक अधिक संख्या में शब्दादि गुगी से युक्त हैं। इनको शान्त घोर, मूढ होने के कारण 'विशेष' कहा जाता है। इन प च तत्वो में विभिन्न प्रकार की शक्तियाँ है, इसलिए वे परस्पर मे चिना मिले हुये समार की रचना नही कर सकते इसलिए वे एक दूसरे से स योग करने वाले होकर, एक ही लक्ष्य वाले महत्तत्व से लेकर विशेष पर्यन्त प्रकृति के सभी रूपों ने 'पुरप' से अधिष्ठित होकर प्रधान (प्रकृति) के अनुग्रह से ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति की। ।।५०-५३।। हे महाबुद्धिमान | वह जल के बुलबुल के समान गोलाकार तथा महान प्राकृत अण्ड पच भूतो की सहायता से क्रमशः बढता गया। भगक्त रूप जगतपति भगवान विष्णु व्यक्त रूप होकर इस ग्रएड में निवास करने लगे ॥५४-५६॥ मेरुस्त्वमभूत्तस्य जरायुश्च महोधरा' गर्भोदक समुद्राश्च तस्यासन्सुमहात्मनः ॥५॥ साद्रिद्वीपसमुद्राश्च एज्योतिर्लोकसग्रहः अस्मिन्नण्डेऽभवद्विष सदेवासुरमानुपः १५७ वारिवह्नयनिलाकास्तितो भूतादिना वहि.। वृतं दशगुणेनण्ड भूतादिमता तथा १५६॥ प्रव्यक्तेनावृतो यहाँ स्तः सर्वं. सहितो महान् । एभिरावरगो रण्ड सप्तभिः प्रावृतंर्वृतम् । नारिकलफलस्यान्तर्वीज वाह्यदरिव १६० जुपन् रजोगुण तत्र स्वय विश्वे. बरो हरिः । ब्रह्मा भूत्व स्य जगतो विसृष्टा सम्प्रवत्त ते ॥६॥ मृष्ट च पात्यनुयुग यावलल्पवित्पना । सत्यभृद्भगरानविष्णुरप्रमेयपराक्रमः ।६२ तमोया च अल्पान्त रुद्ररूपा जनार्दन । मंपासिराभूतानि भक्षयस्य निदारणाः १६३॥ ।
[ ५५ प्रथम अश-०२] सुमेर पर्वत इस गर्म व एड की उल्क (गर्भ-वेन), अन्यान्य पवंत जरायु और समस्त स्मुद्र उमके गर्भोदक हुए। हे विप्र ! इसी प्रएड से पर्वतो सहित समस्त द्वीप, समस्त समुद्र पर देव, असुर मनुष्य तथा अन्य समस्त प्राणी उत्पन्न हुए ॥५७ --५८।। उम अएड मे जल अग्नि, वायु, प्राकारा और भूतादि (तामस ग्रहकार पूर्व-पूर्व की अपेक्षा दश गुणा बाहर ग्रावृत्त पिये हुए था। ये मव भूतादि महत्तव से प्रावृत थे और सबके सहित महत्तत्व अव्यक्त से पावृत था। जने नारियल के भीतर की गिरी वाहर के खोर और छिलके से घिरी हुई होती है उनी प्रकार यह ब्रह्माड मात प्राकृत प्राररणो से प्रावृत रहता है ॥५६-६०॥ विश्वेश्वर भगवान रजोगुण का प्रवलम्बन करके स्वय ब्रह्मा होकर सृष्टि कार्य मे प्रवृत हुये। अनुलित पराकम से भगवान विष्णु सत्वगुण का अवलम्बन दरके कल्प-काल तक युग-युग मे मकल सृष्टि का पालन करते है । तत्पश्चात जब क्ल्प का अन्त होता है तब ही भगवान तमोगुण सम्पन होकर प्रति भीषण रूप में समस्त भूनो को भक्षण कर लेते हैं ॥११-६३३॥ भक्षयित्वा च भूतानि जगत्येवागवीकृते । नागपयङ्कशयने शेते च परमेश्वर: ६४॥ प्रवुद्धश्च पुनः सृष्टि करोति ब्रह्मस्पर्धक १६५। सृष्टिस्थित्यन्तकरणी ब्रह्मविष्णुशिवात्मिकाम् । स सज्ञा याति भगवानेक एव जनार्दनः १६६। स्रष्टा सृजति चात्मान विष्णु पाल्य च पाति च । उपद्दियते चा-ते सहर्ता च स्वय प्रभुः १६७ पृथिव्यापस्तथा तेजो वायुगकाश एव च। सर्वेन्द्रियान्तः करणं पुरुपाख्य हि यज्जगन् १६८१ स एव सर्वभूतात्मा विश्वरूपो यतोव्ययः । सर्गादिक तु तस्यैव भूतस्थमुपकारकम् ॥६॥ स एव सृज्यः स च सगकर्ता स एव पात्यत्ति च पाल्यां ब्रह्माद्यवस्था भिरदोपमूर्तिविष्णुवरिष्ठो वरदो वरेण्यः ।७०।
[ श्रीविष्णुपुराण
जब सब भूतो को उदरस्य कर लेते हैं और जगत एकार्णव हो
जाना है तब वे भगवान शेष शैया पर शयन करने लगते है। फिर जमने
पर ब्रम्हा का रूप धर पर नई सृष्टि करते हैं ये एक मात्र भगवान
जनार्दन ही सृष्टि-स्थिति और प्रलय में ब्रह्मा, विष्णु और शिव के
नामो को ग्रहण करते है ॥६४-६६॥ भगवान प्रह्मा होकर स्वय को
गृष्टि करते है, विष्णु होकर अपना ही पालन करते हैं। और अन्त में
रुद्र होकर अपना ही सहार करते है, क्योकि पृथ्वी, जल, तेज, वायु,
प्राकाश समस्त इन्द्रियो और पन करण युक्त जगत उस भगवान का ही
विस्तृत रूप है। जब वे अव्यय हरि ही सब भूतो के रूप मे है , वे ही
विश्व रूप है रब सृष्टि रचना प्रादि सब कुछ उन्ही के लिये है वे ही
मृजन किये जाते हैं. वे ही सृष्टि क्र्ता है, वे हो पालन और भक्षण करते
हैं, ये हो पाले जाते है और वे ही ब्रह्मा आदि की अवस्था मे सब रूपो
में व्याप्त होते हैं। प्रतएव भगवान विष्णु ही वरिष्ट, वरद मौर वरेण्य
हैं ॥६७-३०॥
तीसरा अध्याय
निगुंणस्याप्रमेयस्य शुद्धस्याप्यमल'त्मनः ।
पाथ सर्गादिकतृत्व ब्रह्मणोऽभ्युपगम्यते। १।
सतय. मर्यभाय नामचिन्त्यज्ञानगोचराः।
यतोऽतो ब्रह्मरणस्तास्तु सर्गाद्या भावशक्तयः ।।
भवन्ति तपता श्रेष्ठ पावरस्य यथोपाता।
सनिबोध यया सर्ग भगवानसम्प्रवर्तते ।३।
नारापरणाल्यो भगवान् ब्रह्मा लोपपितामहः ।
उत्पनः प्रोच्यत बिनित्यमेवोपचारतः ।।
निजन तस्य मानेन भापुर्वपंशत स्मृतम् ।
सरपरारय तगर्द प परामभिधीयते ॥५॥
प्रथम अंश-०३ ] [ ५७ कालस्वरूपं विष्णोच यन्मयोक्त तवानघ । तेन तस्य निवोध त्वं परिमारणोपपादनम् ।६। अन्येपा चंब जन्तूना चराणामचरान ये । भूभूमृत्सागरादीनामशेषाणां च सत्तम । काष्ठा पञ्चदशास्याता निमेषा मुनिसत्तम । काष्टानियकला शिकला मोहूतिको विधिः।। तावत्संख्यरहोरात्रं मुहूर्तेर्मानुपं स्मृतम् । अहारावाणि तावन्ति मास: पक्षद्वयात्मकः ।। मैत्रेय ने पूछा कि जो परमात्मा निर्गुण, मप्रमेय, शुद्ध मोर पमल है उनको मृष्टि का कर्ता कसे माना जाय ? ॥१॥ पाराशरजी ने उतर दिया कि जिस प्रकार ममम्न भाव रूप पदार्थों की पक्ति विना तर्क के मानली जानी है, जिन प्रसार प्रग्नि में उपता होना उगका म्वभाव मिद्ध गुण है, उसी प्रकार भगवान का नृष्टिवार्य में सम्मान है उसे मैं भली प्रकार ममभाना हूँ ॥२-३॥जमे यह कहा जाता है कि नारायण नाम वाले लोक पिनामह ब्रह्मा उत्पन्न हुये यह एक उपचार- र से है । ब्रह्मा की प्रायु ग्राह्य वर्ष में हिमाद ने सौ वर्ष की बनलाई गई है। इन सौ वर्षों का नाम 'पर' होना है और इनसे दूरे प्रति नाम पगदं कहा जाता है ।।४-शश है निष्पाप, मैंने तुमको विष्णु का जो कात म्वरूप दतलाया है उसके द्वारा ब्रह्मा, मन्य प्राणी, पृथ्वा तथा अन्य भूतो साग प्रादि रा परिमारण श्रवए करो। पन्दर निमेष की एक राक्षा होती है, तोम यात्रा की एक ससा होती है, नीन पला की एकात्री होती है . तो फष्ठी का एक महन होता है। तोम मुहूर्त वा मनुष्यों का एक दिन-रात्रि होता है । तीम दिन-रात्रि का महीना होता है जिनमे दो पखवारे होते हैं । त: पभिरयन वर्ष देध्यने दक्षिणोत्तर। पयन दक्षिण रात्रिदंगन मुतरं दिनन् ।१०। का [ श्री विष्णुपुराण दिव्यवसहनं स्तु वृतत्रतादिसज्ञितम् । चतुर्युग द्वादश भिस्त द्विभाग निवोध मे ११॥ चत्वारि वीणि द्वे चंक कृतादिषु यथाक्रमम् । दिव्याब्दाना सहस्राणि युगेष्वाहु पुराविद ।१२। तत्प्रमाणं शतं. सन्ध्या पूर्वा तत्राभिधीयते । सन्ध्याशश्वं च तत्त ल्यो युगस्यानन्तरो हि स ।१३। सन्ध्यासन्ध्याशयोरन्तर्य कालोमुनिसत्तम । युगाख्यः स तु विजय कृतनेतादिसज्ञित ।१४। कृत नेता द्वापरश्च कनिश्व व चतुर्युगम् । प्राच्यते तत्सहस्र च ब्रह्मणो दिवस मुन १५॥ छ महीनो का एक अयन और दो गयन का एक वय होता है। इनम स दक्षिण अयन म दवतामा की रात्रि और उत्तर उनका दिन होता है। देवताओ क परिमारण स बारह हजार वर्षों क सतयुग, त्रेता आदि चारो युग हात है । उनके विभागो का हिसाव है ॥१०-११॥ प्राचीन तत्व के ज्ञाना इन चार युगो के चार तीन, दा और एक सहस्र वर्मा त्य युग की सध्या का परिमारण क्रम स चार तीन दो और सा वप का हता है और सन्ध्याश (युग के समाप्त होने के पश्चात या समय) भी इतना ही होता है ॥१२-१३॥ सध्या से लेकर सन्ध्याश * बीच तक जितना समय व्यतीत होता है, उसी को सतयुग त्रेता प्रादि कहा जाता है। हे मुनिवर सतयुग, त्रता द्वापर, कलियुग इन सारा युगा व एक हजार वार बीत जान प्रयात चार हजार युगो का जितना ममय हाता है उसे एक दिन कहा जाता है ॥१४-१५॥ ब्रह्मणो दिवसे ब्रह्मन्मनवस्तु चतुर्दश । भवति परिमाण च तेषा कालकृत शृणु ॥१६॥ प्रयन में इस प्रकार मारण का क्रमश का बतलाते एक ब्रह्मा का ६० ] | श्री विष्णुपुराण ताप से व्यथित होकर जनलोक में चले जाते हैं । ॥२३॥ एकागवे तु त्रैलोक्ये ब्रह्मा नारापरणात्मकः । भोगिशय्या गतः शेते लोक्यग्रासहितः ।२४। जनस्थोगिभिर्देव श्चिन्त्यमानोऽब्जसम्भवः । तत्प्रमाणा हि ता रात्रि तदन्ते सृजते पुनः॥२५॥ एव तु ब्रह्मणो वर्षमेवं वर्षशत च यत् । शत हि तस्य वर्षाणा परमायुमहात्मनः ।२६। एकमस्य व्यतीतं तु पराद्धं ब्रह्मणोऽनघ । तस्पान्तेऽभून्महाकल्पः पाद्म इत्यभिविश्र तः।२७। द्वितीयस्य पराद्ध स्य वर्तमानस्य वै द्विज । वाराह इति कल्पोऽय प्रथमः पकिीर्तितः।२८। इसके पश्चात् तीनो लोक का एक रूप हो जाता है, नागयण स्वरप रहा तीनो लोको अगित कर शेपर्शया पर शयन करने लग जाते हैं ॥४॥ लोक निवासी योगियो द्वारा चिन्तमान ब्रह्माजी ग्रह्म-दिन के घरावर वर्षों तक ही रात व्यतीत करते हैं । इसके पश्चात फिर सृष्टि होती है। इसी प्रकार दिन रात्रि के परिमाण से पक्ष, मादि की गिनती से ब्रह्मा का एक वर्ष होता है । ऐसे सौ वर्षों की ब्रह्मा वी परमायु होती है । हैं निष्पाप द्विज । तव মমা पा एव परादं व्यतीत हो चुका है और उसके अन्त में पद्म नामक महाका पूर्ण हो चुना है। द्वितीय पराद्ध का यह प्रथम पल्प वराह के नाम रो पहा जाता है ॥२६-२८॥ तब जन मास इस समय [ श्रीविष्णुपुराण पूर्व प्रयन (निवासस्थान) होता है वे नारायण के नाम से प्रसिद्ध हैं । जगत को जलमय देखकर उन प्रभु ने पृथ्वी के जलान्तगत होने का अनुमान किया और उसके उद्धार की कामना की।॥ ७ ॥ अकरोत्स्वतनूमन्या कल्पादिपु यथा पुरा । मत्स्यकूर्मादिका तहद्वाराह वपुरास्थित. II वेदयज्ञमय रुपमशेपजगतः स्थिती। स्थित. स्थिरात्मा सर्वात्मा परमात्मा प्रजापतिः । जनलोकगतैस्सिद्ध स्सनकाय रभिष्टत. प्रविवेश तदा तोयमात्माधारो धराधरः ॥१०॥ निरीक्ष्य त तद देवी पातालतलमागतम् । तुष्टाव प्रणता भूत्वा भक्तिन म्रा वसुन्धरा ।११। नमस्ते पुण्डरीकाक्ष शङ्खचक्रगदाधर । मामुद्धरास्मादद्य त्व त्वत्तोऽह पूर्व मुत्थिता ।१२। स्वयाहगुवृता पूर्व त्वन्मयाह जनार्दन । तथान्यानि च भूतानि गगनादीन्यशेपत. ॥१३॥ नमस्ने परमारमात्मन्पुरुपात्मनमोऽस्तु ते । प्रधान व्यक्त भूताय कालभूनाय ते नम ॥१४॥ तय उन अरोप जगत के मूलभूत, स्थिरात्मा, सर्वात्मा, परमात्मा पारमाधार, धराधर, प्रजापति ने जिस प्रकार पूर्व रल्लो मे मत्स्य, कुम मादिकाप धारण पिया था उसी प्रकार वेद-पज्ञमय वराह का गरी पवलम्बन पर जन ला स्थित सिद्ध गणो द्वारा स्तुत होते हुए जल में भीतर प्रवेश लिया ॥८-१०।। उम ममय बमुन्धग देवी ने उनके पाताल में पाया हुपा देसार भक्तिपूर्वक प्रणाम पिया मोर उन स्तुति करो पगी ॥११॥ पृथ्वी ने कहा ह गर्वभूत । तुमयो नमबार हे सम-गदाधर ! तुमको नमस्कार । पापन पहने भी मरा उद्धार किया । पार भी हम पातात तर मे गुभे निशानिये । पाप तो पृथ्वी से प्राका सर गमरा भूनी रचयिता है। परमारमन् । पासो नमस्कार ।
प्रथम अश-०४ ] पुरपात्मन। प्रापको नमस्कार । भारपान, व्यक्त रूप एव कालका से नमस्कार ।।११.-१४ ॥ त्व कर्ता सर्वभूताना त्व पाता त्व विनाशकृन् । सर्गादिपु प्रभो ब्रह्मविष्णुरुद्रात्मरूपधुक १५॥ सम्भक्षयित्वा सकल जगत्येकार्णवोकृते । शेपेत्वमेव गोविन्द चिन्त्यमानो मनोपिभि. १६१ भवतो यहपर तस्य तन जानाति कश्चन । अवतारेपु यद् प तदन्ति दिवौकस. १७१ त्वामाराव्य पर ब्रह्म याता मुक्ति मुमुक्षवः । वासुदेवमनाराध्य का मोक्षं समवाप्स्यति ।१८। यत्किञ्चिन्मनसा ग्राह्य यद्ग्राह्य चक्षुरादिभिः । बुद्ध या च यसरिच्छेद्य तद्पमखिल तव (१६॥ वन्मयाह त्वदरघास त्वत्सृष्टा सत्समरश्रया। माधवीमिति लोकाऽयमभिधत्तं ततोहिमाम् ॥२०॥ हे प्रभो । मृष्टि प्रादि के लिए पाप ही ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र का स्वा धारण करत हो, तुम ही सर्व भूतो के का हो, तुम ही रखने वाले और तुम हो पिनास वरने वाले हो ॥१५॥ है गोविन्द । जगत जलमय होने पर मबको भक्षण करके तुम ही मनापियो द्वारा चिन्त्यमान होकर मयन बरन लगत हो ।।१६॥ पापके परम तत्व वो तो कोई जान नही साना, पत प्रपनार म मा प्रकट होता है उसी की देव-गण अर्चना करते है ॥ १७ ॥ है परब्रह्म । तुम्हारी ही पारापना परसे मोक्षगामी अक्ति मुक्ति प्राप्त करते है । वासुदेव को पाराधना रे बिना कोन मोक्ष की माता है ? 1१८ ।। मुख मन म ग्रहण किया जा सकता है। जो कुछ नेशे में ग्रहण किया जा राबता है और जो कुछ बुद्धि में जाना जा सरता है वह सा पाया हो म्ए है ॥१६॥ मैं भी पाप ही में प्रकट हूँ, आपके ही प्राधार पर है. प्रापुड़ी ही प्राश्रित हूँ मनिय नाग मुझे मारना रहता है।। २० ॥ पापको हो पनाई है।
६४ ] [ জীবিত जयाखिलज्ञानमय जय स्थूलमयाव्यय । जयानन्त जयाव्यक्त जय व्यक्तमय प्रभो ॥२१॥ परापरात्मविश्वात्मजय यज्ञपतेऽनघ । त्व यज्ञस्त्व वण्टकारस्त्वमोङ्कारस्त्वमग्नयः ॥२२॥ व वेदास्त्व तदङ्गानि त्व यज्ञपुरुषो हरे । सूर्यादयो ग्रहास्तारा नक्षत्राण्यखिल जगत् ।२३। मूर्तामूर्तमदृश्य च दृश्य च पुरुषोत्तम । यच्चोक्त यच्च नैवोक्त मयात्र परमेश्वर । तत्सर्व त्व नमस्तुभ्य भूयो भूयो नमो नम '२४ एव सस्तूमयानस्तु पृथिव्या धरणीधरः । सामस्वरध्वनिः श्रीमालगर्ज परिघर्घरम् ॥२५॥ ततः समुत्क्षिप्य धरा स्वदष्ट्रया महावराहः स्फुटपद्मलोचनः । रमारतानादुरपालनानिमः समुस्यितो त ल इन्वानलो महान (२६१ उत्तिष्ठता तेन मुखानिलाहृत तत्सम्भवाम्भो जनलोकसधयान् । प्रक्षालयामास हि तान्महाद्य तोन् सनन्दनादीनपकल्मपान मुनीन् ॥२५॥ प्रयान्ति तोयानि खुराग्रविक्षत रसातलेऽध कृतशब्दसन्तति । वासानिलास्ताः परित. प्रयान्ति सिद्धा जने ये नियता वसन्ति ।। हे अखिल भानमय । प्रापकी जय हो, हे स्थूलमय भव्यप । पाप को जय हो, जय मनन्त, जय मध्यरत , जय व्यक्तमय । प्रभा परमात्मन । विश्वात्मन ! माप जयपुक्त हो। है मनप यमाते । पाप ही यज्ञ हैं। मार ही वपटकार हैं, भार ही प्रोवार हैं, पाप हो भग्नि स्वरूप हैं ॥ २१.२२॥ है हरे। पाप हो ये हैं , माप ही वेदाङ्ग, पाप ही यज्ञ-पुरुष है । मूर्यादि प्रह, तारा , नक्षत्रादि युक्त समस्त जगत पाप ही हा ॥२३॥ है पुरषोत्तम । इस समय मैंने भूतं भमूत , मध्य पटिा जो कुछ कहा है पपता नहीं रहा है . वह मय तुम ही हो , तुमको नमबार। हे परमेश्वर ! है भूयो भूशे पापको नमसार ॥४॥ पाराशर जी कहने लगे पृथ्वी द्वारा इस प्रसार स्तुति दी जाने पर गाम स्वर पनि याने महाप्रभु - प्रथम अग-ग्र०४ ] [ ६५ धरणीधर घघर शद करक गन लग। तत्पश्चात कमल पत्रके ममान स्निग्व - म्याम प्रफुल पालोवन महापाराह पृथ्वी को दात पर उठाकर महान नीलाचल के समान रमातलन पर आये ।। २५-२६ ।। उपर उछो समय उनके मुह स जो वायु निकनी उमम ताडित होकर जल. राशि जन का यिर निष्पाप सनन्दन प्रादि मुनियों ता पहुंची और उना प्रमानित कर गि। नीचे की ओर उसु जनराशन शुग में पाटन की तरह रसातल म प्रा दिया। उ7 वायु वाम बनला म निवास करन वाने मिद्ध गगग इधर-उपर लिप्त होकर विचलित हा गये । २८। उत्तिष्ठतम्तम्य जलाई कुझेमहावरात्म्य महो विगृह्य । विघुन्नतो वेश्मय शरीर रोमानरस्या मुनय स्तुवन्ति ।। त तुष्टुवम्तोपपरीतचेतमा लाके जन ये निवसन्नि यानि । सनन्दनाद्या ह्यनिनम्रकन्वरा धराधर धोरतरोद्धने क्षग्गम् ॥३०॥ जयेश्वर गा परमेश केशव प्रभो गदाशवधरासिवक्रधृक् । प्रमूतिनाशस्थितिहेतुगेश्वर स्त्वमेव नान्यसरम च यत्पदम् 131 पादेषु वेदाग्नव यूपदष्ट्र दन्लेषु यशाश्चितयश्च वक्त्रे । हुनागजिहोऽसि तनूरुहागि दर्मा प्रभो यनयमाम्बमेर ॥३२॥ विलोचने राज्यहनी महात्मन्सधिय ब्रह्म पर शिरस्त । मूक्तान्योपाणि सटाकलापो ब्राण समम्तानि हबीपि देव ।।३। सक्तुण्ड सामस्वरधीरनाद प्राग्वलकायाविलसत्रमन्थे। पूर्तेधर्मश्रवणोऽसि देव सनातनात्मन्भगवन्प्रसीद ॥३४॥ पदक्रमाकान्तभुव भवन्त मादिम्बित चाक्षर विश्वमूनें। विश्यम्य विद्म. परमेश्वरोऽसि प्रसीद नायानि परापरप्य 1३।। पृथ्वी को धारण कर जनम भी। हुप अरि अगिन काय उन महावगह २ वरमय गरीर म मुनिया न पाश्रय ग्रहण दिया । ज लोग निवामी मन दादि मुनिगण प्रान, पूर मन्न रण में प्रयल नम्रता मा पर 31 उदार पवन परणीयर की स्तुति मग्न लग । - तर द [ श्रीविष्णुपुराण स्थिति - ॥ २६-३०॥ हे ब्रह्मा प्रादि ईश्वरो के परमेश | गदा-शास-प्रासि - चक्र के धारण करन वाल प्रभु । केगव । आपकी जय हो । प्राप सृष्टि , और प्रनय के कर्ता ईश्वर हो, परम पद प्रापसे भिन्न नहीं है ॥३१॥ है यूप-दष्ट्र यज्ञ-पुरप । प्रापरे चारो पैर ही वेद म्वरूप है , दान यज्ञ हैं। मुम्ब अग्नि कुण्ड है , अापकी जिह्वा हुताशन है , समस्त रोम दर्भ (कुश) हैं, महात्मन । अापके दोना नेत्र ही दिन रात्रि हैं , मस्तक सर्वाश्रय ब्रह्माद है , गर्दन पर की बशर अगेप मुक्त (पुरप-यूक्त प्रादि) और प्राण हवि है। । म तुरड है सामावर पीरनाटा यज्ञाग्नि । अखिल सम स धि । मापक दोनों पग इमापूर्त कम हैं । हे देव । सनातन भगवन प्रसन्न हो । ॥३२-३३ . ३४ ।। है प्रपर विश्वभूति । प्रापरे चरणो से पृथ्यो व्याप्त है। हम पापको विश्व वा प्रादि मौर स्थिति के स्प में जानते हैं दप्याविन्यम्तमशेपमेतद्ध मण्डल नाथ विभाध्यते ते । विगाहतः पावन विलग्न मरोजिनीपमिवाढपङ्कम ३६॥ द्यावायिल्पोरतुलप्रभाव यदन्तर प्यात जगद्व्याहिममयंदी हिताय विश्वस्य विभो भत्र त्वम् ॥३७॥ परमार्थस्त्वमेवा नान्योऽस्ति जगतः पते । तवैप महिमा येन व्याप्तमेतञ्चराचरम् ॥३॥ यदेतद् दृश्यते मू मतमान त्मनस्तय भान्तिमानेन पश्यन्ति जगद पमपोगन ॥३९ । भानम्बामगिल जगदेनदबुदयः । प्रयंम्पम्प परपन्नो नाम्यन्ते मोहसम्प्तये ॥४०॥ ये तु मानयि गुरचेतस्ततिर जगन् । मानारमा प्ररपनि वदप परमेश्वर ।। प्रमोद म मरिमन्यासाय जगतामिमाम् । उसीमेपासपना देयजलापन । तद्वपुपा तवैव ।
प्रथम प्रग-अ० ४ ]
[ ६७
युक्त कमलपत्र की तरह दिखाई दे रहा है ॥ ३६॥ हे अतुल प्रभाव ।
पृथ्वी और प्रकाश के बीच अन्तरिक्ष मे तुम्हारा शरीर ही व्याप्त है। हे जगद
ध्याति समथ दीप्ति ! आप विश्व के हित म निमित्त हो । है जगल्पत
पाप ही एक मात्र परमाथ हो और कोई नहीं है। यह चराचर जिसके
द्वरा व्याप्त हो रहा है व. आपकी हो महिमा है ॥३६-३ ।। पार
ज्ञानात्मा हो और जो आपकी मति दृष्टिगोचर होती है वह आपका ही
मानमय रूप ही है । पर ज्ञानरहित व्यक्ति जगत को भौतिक दृष्टि से हो
दवते हैं। जिसकी बुद्धि कच्ची है वही इरा ज्ञान स्वरूप अपिल जगत
वो म्यून रूप मे दखते है । और ससार सागर मे डूबते उतराते रहते है
।। ३६.४० ॥ हे परमेश्वर । जो ज्ञानवित् शुद्ध चेता हैं , वे समस्त जगत
को
तुम्हारा ज्ञानात्मक रूप ही मानते है ।। ४१ ।। हे सर्वात्मन । हे जग
तारमन । जगत के निजाम के लिये पृथ्वी का उद्धार परके हम सबको मुखी
बरो॥ ४२ ॥
सत्त्वोदिक्तोऽसि भगवन् गोविन्द पृथ्वोमिमाम् ।
समुद्धर भवायेश शन्नो देह्यजलोचन ।४३।
सर्गप्रवृतिर्भवतो जगतामुपकारिणा।
भरत्वेपा नमस्तेऽस्तु शन्नो देह्यब्जलोचन । ४४॥
एव सस्तूयमानस्तु परमात्मा महीधर ।
उज्जहार क्षिति क्षिप्र न्यस्तवाश्च महाम्भसि ।।५।
तस्योपरि जलोपस्य महती नोरिव स्थिता ।
विततत्वात देहस्य न मही याति सम्प्लवम् ॥४५॥
तत िित समा कृत्वा पृथिव्या साऽचिनोग्दरोन् ।
यथाविभाग भगवाननादि परमेश्वर 1691
प्राक्तगदग्धान खिला-पर्वतान्पृथ्वीतले ।
अमोघेन प्रभावेण सम माधवान्दिन
भूविभाग तत कृत्वा सप्तद्वीपान्यथातथम् ।
भूराद्याश्चतुरा सोपान्पूर्ववत्सगाल्पयन् ॥४६॥
६८ ] [ श्रीविष्णुपुराण है भगवन गोविद । आप सत्वयुक्त हुए हो, उद्भव के लिए पृथ्वी का उद्धार करो। है अज लोचन ईश्वर । हमारा कन्याण बरो । प्रापकी मृधि रचना जगत के लिए उपकारिणी हो ।। ४३-४४ ।। पारा भर जी न कहा- परमात्मा धरणीधर न इस प्रकार की स्तुति सुन का शीघ्रतापूर्वक भूमि को ऊंचा उठाया और महासमुद्र को हटाया ।।५।। अपने वृहत प्राकार को लेकर पृथ्वी जल के उपर एक बही नाव के समान तरने लगी ।। ४६ ।। तत्पश्चान अनादि परम वर ने पृथ्वी को समतल करके पवतो का यथास्थान ग्यापित किया ॥४७॥ उहोंन अपन प्रमोध प्रभाव में पूर्व पात्र में दम्ब हुए पवता का पृथ्वी तल पर फिर म मृष्टि की ।। ४ । फिर सानो द्वीपो व प म पृथ्वी को यथा तथा विभाजित करव ममम्न नाकी वल्पना की ।। ४६ ।। ब्रह्मस्पधरो देवस्ततोऽमो रजसा वृत । चकार मुष्टि भगवाश्चतुवस्त्रधरो हरि १५०। निमित्तमायमेवासी मृज्याना सगमणि । प्रधानकारणीभूता यतो वं मृज्यशक्तय ।५१३ निमित्तमात्र मुक्तवैव नान्यत्किञ्चिदपेक्षते । नीयत तपता श्रेष्ठ म्वशक्त्या वस्तु वस्तुताम् ॥५२॥ त पश्चात रजोगुण म पाउन भगभान चमुच ब्रह्माजी ने मृष्टि रचना प्रारम्भ की ॥५०॥ व इम मृप्टि वायं म निमित्त मान ही हुए ययारि गमम्न वस्तुप्रो की रचना म उनकी निजी शक्ति ही मुख्य पारण स्प हाती है ॥५॥ तपती धार। मृजन काय लिये और शिमी पाप को अपना नहीं जान पड़ती। ममस्त दस्नु अपनी शक्ति म उमर वा प्राप्त हानी ।। ५२ ।।
प्रयम ग्रंश-अ.५ ] पाँचवाँ अध्याय स्था सन्चर्ज देवोऽनी देवपिपितृदानवान् । मनुप्यनिरंवृक्षादोन्मूश्योनततितोकसः ।। यद्गुण यल्वभाव च यद्रप च जगद् द्विज । मर्गादौ नृष्टवान्ब्रह्मा तन्ममाचक्ष्व कृत्स्नस.।। मेरेय कथयाम्येतच्छरपष्व सुसमाहितः । यथा मसज देवोऽमो देवाज्ञीन खिलाविन. ३ मृष्टि चिन्यतस्तस्य क्लादिपु यथा पुरा। अबुद्धिपूर्वक सर्ग प्रादुर्भूतस्तमोमयः ।। तमो मोहो महामोहन्तामित्रो द्वन्धतंशित । अविद्या पञ्चपर्वैपा प्रादुर्भुता महात्मनः ।। पञ्चधावस्थित नगों ध्यायतोऽप्रतिबोधवान् । बहिरन्तोऽप्रकाराश्च सवृतात्मा नगात्मकः ।। मुख्या नगा यत प्रोक्ता मुरयमर्गस्ततस्त्वयम् । त दृष्ट्वासावक संगममन्यदपर पुनः ।। मैत्रेय ने प्रश्न किया- "ह द्विज श्रेष्ठ । ब्रह्माजी ने जिस प्रकार देवषि, पितृ, दानव, मनुष्य, तिर्यक, वृक्ष प्रादि तथा पृथ्वी, भाका तथा जल मे रह्ने पाले प्राणियो की रचना भोर भारम्भ मे जगत को जैस गुण का, जिस स्वरूप का, जिस स्वभाव का बनाया उसको समझा कर कहिय "।।१-२॥ पराशर ने कहा- 'प्रभु ने जिस प्रकार देवादि समस्त सृष्टि रचना की, मैं उसका वर्णन करता है, तुम सावधान- होकर सुनो ॥३॥ पूर्वान के कल्पो मे जिस प्रकार सृष्टि बनी थी उसपे विषय में सोचते-सोचते ब्रह्माजी अबुद्धि से तमोमयसर्ग को प्रादु. भूत किया ॥४॥ अर्थात् उससे तम., मोह महामोह, तामिश्र मौर अन्धतामिथ इस पञ्चपर्वा विद्या का प्रादुर्भाव हुमा । इस सृष्टि मे भर। निराम, बहिरात प्रकाश का रावृतात्मा (गूद 'वभा) और नगारमक - ७० ] [ श्रीविष्णुपुराण पांच प्रकार की गृष्टि प्रपट हुई । ब्रह्माजी की मृष्टि सव से प्रथम ना (स्थावर ) रचना ही हुई जिमसे उसका नाम मुन्य-सर्ग पह गया ।। ५-६ ।। पर उमे कार्य-साधन में असमर्थ देख कर उन्होन अन्य प्रकार की रचना का ध्यान दिया ॥७-८॥ तस्याभिध्यायत सर्गस्तियंक स्रोताभ्यवर्त्तत । यस्मातिर्यकप्रवृत्तिस्स तियफ्स्रोतास्तत' स्मृत पश्वादयस्ते विख्यातास्तम. प्राया ह्यवेदिनः । उत्पथग्राहिणश्च व तेऽज्ञाने ज्ञानमानिन ।१०। अकृता अहम्माना अष्टाविंशद्वधात्मका । अन्त. प्रकाशास्ते सर्वे प्रावृताश्च परस्परम् ।।१। तमप्य साधक मत्वा ध्यायतोऽन्यस्ततोऽभवत् ऊर्ध्वस्रोनास्तृतीयस्तु सात्विकोयमवर्तत ।१२। ते सुस्प्रोतिबहुला वहिर-तस्त्वनावृताः । प्रकाशा बहिरन्तश्च ऊध्वस्त्रोतोद्भवा. स्मृताः ।१३। तुष्टात्मनस्तृतीयस्तु देवसर्गस्तु स स्मृत । तस्मिन्सर्गेऽन्यत्तीनिनिष्पन्न ब्रह्मणस्तदा ११४॥ ततोऽन्य स तदा दध्यौ साधक सर्गमुत्तमम् । असाधकास्तु ताज्ञात्वा मुख्यसर्गादिसम्भवान् ॥१५॥ तथाभिध्यायतस्तस्य सत्याभिध्यायिनस्तत । प्रादुर्बभूव चाव्यक्तादक्स्रिोतास्तु साधक 1१६। तब उन्होन तिया जीवो की रचना की। इस रचना मे प्राण पाहार माह द्वारा जीवित रहते थे इसलिए इसका नाम तिर्यक ना "तिर्यक साता' पडा ॥६ये मब विकास में तमोमय, अनुसधान शून्य, उत्पथ ग्राही, अज्ञान को ही ज्ञान समझने व ले, प्रकृत, मह महाविशवधात्म, मौर परस्पर मे आवृत ।।१०-११॥ इम रचना को भी कायक्षम न देखकर तीसरी रचन की जो ऊद्धवासी, उसाता और गाविव ध । ब्रह्मा जी बाय मान, अन्त प्रकाश । ध्यान प्रथम अंग-प्र. ] जीउरा गं देव-सग है नाम से पुकारा गया । इसे ब्रह्मा जी को मुदोष हमा मोर ने उन्होंने पमन्द भी किया । रि उन्होंने पहनी रचनायो का कार्यक्षम न देवकर, कार्य करने योग्य रचना किया और अव्यक्त ( नाया ) प्रकिनाटा ( मनुष्यों ) को प्रादुभंत किया। जिउमा प्राय यह है हि ये नीचे की ओर दाने वाले माहार से दीदिन रहते थे ॥१२-१६॥ यस्माश्र्वाम्यवन्ति ततोऽश्चितसम्नु ते । ते च प्रकाराबहुला स्तमोदिक्ता रजोऽधिकाः ॥१७॥ तस्मात्ते दुःसवला भूयोभूपत्र कारिण. । प्रकाया बहिन्तश्च मनुप्याः सायकान्तु ते ॥१॥ इत्येते कथिताः सर्गाः पडय मुनिसत्तम । प्रथमो मतः नर्गों विजयो ब्रह्मण सः १९ तन्मात्राणां द्वितीयच भूतसो हि म स्मृतः । वैकारिप-तृतीयन्तु सर्ग ऐन्द्रियक: मृतः ॥२०॥ इत्येप: प्रातः सर्गः सम्भूतो बुद्धिपूर्वकः । मुपसर्गचतुर्थस्तु मुल्या वै स्थावराः स्मृताः ॥२१॥ तिर्वक्त्रोतास्तु य. प्रोक्तनयंग्योन्यः स उच्यते। तदूदतोतसा पष्टो देवर्गिस्तु सस्मृतः २९॥ यह सृष्टि अधिक प्रकास दाने, तोरिक्त और रजोविर है । इसी कारण मनुष्य विशेष दुःख अनुभव करने दान, विशेष कार्य कले वाले पहिरन्त: जादा और कार्य सापक हुए ॥ १८-१८॥ हे मनियट ! सगर यह यः प्रकार की सृष्टि कही गई। महत्तन बना की प्रथम सृष्टि कही जाती है । दूसरी नटि तन्मात्राओं की है विमको भूद-मर्ग कहा जाता है। तीसरा संग कारिन है दिमको एन्द्रियित भी कहा जाता है ॥ १९-२०॥ य । तीनों म्ग अविद्या नाम दानी प्रकृति से लग्न होते हैं । मुन्य प्यावर मचाया है, नियंर योनि वाला पत्रिका प्रौर उनता प्रयवा देव- सगा है ॥२१-२२॥ - ७२ ] [ श्रीविष्णुपुराण ततोऽपिस्रोतसा सगं सप्तम स तु मानुष. १२३॥ अष्टमोऽनुग्रह सगं सात्त्विकस्तामसभ स. । पञ्च ते वैकृत' सर्गा प्राकृतास्तु प्रयः स्मृता. १२४ प्राकृतो वैकृतश्च व कौमारो नवम स्मृन । इत्येते वै ममारयाता नव सर्गा प्रजापते. १२५॥ प्राकृता वैकृताश्चैव जगतो मूलहेनव । सृजता जगदीशस्य विमन्यच्छातुमिच्छसि ।२६। सक्षपाकथित सर्गो देवादोना मुने त्वया । विस्तराच्छ्रोतुमिच्छामि त्वत्तो मुनिवरोत्तम ।२७। कर्मभिर्भाविता पूर्व कुशलाकुशलस्तु ता. ! ख्यात्या तया ह्या मुक्ता. सहारे ह्य पसहृता ।२८। स्थायराना सुराद्य स्तु प्रजा ब्रह्म श्चतुर्विया । ब्रह्मणः कुर्वत. सृष्टिं जज्ञिरे मानसास्तु ता 1२६४ ततो देवासुरपितृ-मनुष्याश्च चतुष्टयम् । सिमृधुरम्भाम्येतानि स्वमात्मानमयूयुजन् ।६० तदन्तर अर्वात स्रोता नामक मनुष्य-सर्ग सातवां है। पाठवें सर्ग का नाम अनुग्रह है जो सात्विक और तामस होता है। ये पांच सर्ग वैकृत तथा पहल तीन प्रकृत कहे जाते हैं । इस प्रकार प्राकृत तथा वकृत सग पाठ प्रकार के होते हैं और सनत्कुमार आदि का सर्ग नवम है ॥ २३-२४ ॥ ये ही समस्त सर्ग जगत क मूल हतु हैं । प्रजापति की रचना के इन नौ सर्मों का विवरण तुमको सुना दिया गया, पर जगदीश्वर की मृष्टि के विषय मे तुम क्या सुनना चाहते हो ? मंत्रेय ने पहा- 'ह मुनिवर | प्रापन सक्षेप में देवादि की सृष्टि के विषय में बतलाया । मैं इस विषय को विस्तार पूरक प्रापसे सुनना चाहता है ॥ २५ ॥ पराशर ने कहा-'प्रलय के समय जब प्रजा का महार हाता है तब भी उमम भली दुरी बुद्धि का सञ्चार बना रहता है, उनकी गर्मानुसारिणी बुद्धि उनको एक दम नही त्याग देती है।
हे ब्रह्मन प्रथम अंश-अ° ५ ] [ ७३ ब्रह्म द्वारा नवीन सृष्टि किये जाने के समय देवता मादि पार स्थावर आदि चारों तरह की प्रजा बुद्धि के रोकार सहित उत्पन्न होती है। यह सब मानस प्रजा होती है, क्योंकि ब्रह्मा के ध्यान से ही उसकी रन्पत्ति होती है । इस्पश्चात् वह देव, असुर, पितृ मोर मनुप्य-इन नार प्रकार अन्त. सजक प्रना की रचना के लिए अपने शरीर की योजना करते हैं ॥२६-३०॥ युक्तात्मनस्तमोमाता ए द्रिक्ताभूत्प्रजापतेः । मिसृक्षोजघनात्पूर्वमसुरा जज्ञिरे ततः । ३१ । उत्सरार्ज ततस्ता तु तमोमात्रात्मिका तनुम् । सा तु त्यता तनुस्तेन मैनयाभूद्विभावरी ॥३२॥ सिसृभुरन्यदेहस्यः प्रीतिमाप ततः सुराः । सत्वोद्विक्ताः समुद्भता मुखतो ब्रह्मणो द्विज ॥३३॥ त्यक्ता सापि तनुस्तन सत्त्वप्रायमभूद्दिनम् । ततो हि वलिनो रानावसुरा देवता दिवा ॥३४॥ सत्वमानात्मिकामेव ततोऽन्या जगृहे तनुम् । पितृवन्मन्यमानस्य पितरस्नस्व जज्ञिरे ॥३५॥ उत्ससर्ज ततस्ता तु पितृन्दृष्ट्वापि स प्रमुः । सा चोत्सृष्टाभवत्मन्ध्या दिननक्तन्तरस्थिता ।३६॥ इस प्रकार सृष्टि दिये जाने वालो के प्रदृष्ट, से मिलकर प्रजा- युनात्मा हो गया। उसमें से तमोगुण की मात्रा बटने से जांधी सर्वप्रथम असुर गरसों की उत्पत्ति हुई ॥३१॥ तब उसने तमो- नात्मक तनु ( तमोमय भाव ) को त्याग दिया और उस त्यागे हुए मोगुण से रात्रि बन गई ॥ ३२ ॥ तत्पश्चात् ब्रह्मा मन्य देह (सान्विक वि) में स्थित हो अपने मुख से सत्य-गुण युक्त देवो की सृष्टि की ३३ ।। जव सन रस देह का त्याग कर दिया तो उसका दित बन पा। इसीलिए असुर गण रात्रि में और देवता दिन में बलवान होते ॥ ३४ ॥ फिर उस सत्वमात्रात्मक अन्य देह धारण करके बगल में से से [ श्रीविष्णुपुराण पितो को उत्पन्न किया । सब उसने उस देह को भी त्याग दिया भी उससे दिन तथा रात्रि के मध्य सध्या का आविर्भाव हुमा ।। ३५-३६॥ रजामानात्मिकामन्या जगृहे स तनु ततः । रजोमात्रोत्कटा जाता मनुष्या द्विजसत्तम । ३७ ! तामप्याशु स तत्याज तनु सद्यः प्रजापतिः । ज्योत्स्ना समभवत्सापि प्रावसन्ध्या याभिधीयते ॥३॥ ज्योत्स्नागमे तु बलिनो मनुष्याः पितरस्तथा । मैत्रेय सन्ध्यासमये तस्मादेते भवन्ति ।३६। ज्योत्स्ना रात्र्यहनी सध्या चत्वार्येतानि व प्रभोः। ब्रह्मणस्तु शरीराणि त्रिगुणोपाश्रयाणि तु 1४०। रजोमात्रारिमकामेव ततोऽन्या जगृहे तनुम् । सत. झुद् ब्रह्मणो जाता जो कामस्तया तत: १४१॥ क्षुत्क्षामानन्धकारेऽथ सोऽसृजद्भगवास्तत । विरूपा श्मश्र लाजातास्तेऽभ्यधाव स्तत.प्रभुम् ।।२। मैव भो रक्ष्यतामेष यरक्त राक्षसास्तु ते । ऊचुः खादाम इत्यन्ये ये ते यक्षास्तु जक्षणात् ।।३। अप्रियेण तु तान्दृष्ट वा केशाः शोर्यन्त वेधस. । हीनाश्च शिरसो भूय. समारोहन्त तच्छिर ॥४४॥ है द्विज सत्तम । तब उसने रजोगुण युक्त अन्य देह ग्रहण । पर उससे रजोगुण की अधिकता वाले मनुष्यो का आविर्भाव हुमा । ज प्रजापति ने उस देह का त्याग किया तो उसकी चांदनी बन पौर उसका प्रात काल हो ॥ ३७-३८ ॥ मय । इसीलिए तमाम मनुष्य प्रातःकाल में और पितृगण सध्य काल मे बलशाली रहते हैं ॥ ३९ ॥ तीन गुणो मे प्राश्रित ज्योत्स्न रात्रि, दिवस मोर सध्या --ये धारो प्रभु-ब्रह्मा के शरीर हैं ॥ ४० ॥ फिर रजोगुण समन्वित अन्य देह ग्रहण करके ब्रह्मा से भूख और को भी उत्पत्ति हुई ॥१॥ जब भगवान ने विरुप, बढे हुये दाढी नाम गया प्रथम अश-०५] [ ७५ वाले भूखे प्राणियो की सृष्टि की तो दे प्रभु को ही खाने को दोहे । उनमें से जिसने कहा कि "अरे ऐसा मत घरना, इरावी रक्षा करो- उनका नाम राक्षस हुप्रा और जिन्होंने पहा-साते है" उनका नाम पा हुा ।। ४२-४३ ॥ इन अप्रिय जीवो से प्रसतुष्ट होकर विधाता क शिर के मव बास गिर कर फिर से मस्तक पर चढ़ गये ॥४॥ सम्णात्तेऽभवन् सी होनत्वादयः स्मृताः। तन ऋ दो जगत्स्रष्टा क्रोधात्मनो विनिममे ।।५। वर्णन कपिशेनोग्रभतास्ते पिशिताशना । गायतोऽङ्गात्समुत्पमा गन्धर्वास्तस्य तत्क्षणात् ॥४६॥ पिवन्तो जजिरे वाच गन्धर्वास्ते न ते द्विज । एतानि सृष्ट्वा भगवान्द्रह्मा तच्छक्तिचोदितः ॥४७॥ तत स्वच्छन्दतोऽन्यानि वयासि वयसोऽसृजत् । अवयो वक्षसश्चक मुखतोऽजाः स सृष्टवान् ॥४॥ सृष्टयानुदराद्रन पाम्या च प्रजापति । पम्या चाश्वाद्रन्समातगावासभानावयान्मृगान् ॥४६॥ उष्ट्रानश्वतराश्च व न्यड कूनन्याश्च जातयः । प्रोपध्यः फलमूलिन्यो रोमभ्यस्तस्य जज्ञिरे १५० नेतायुगमुखे ब्रह्मा कल्पस्यादो द्विजोत्तम । सृष्ट्वा पश्वोषधो. सम्यग्युयोज स तदाध्वरे ।५।। इस प्रकार 'सर्पण' ( शिर पर चढने) की क्रिया से सर्प उत्पन्न हुए और हीनता के कारण उनका नाम अहि भी पड़ा और जगत् सृष्टा ने प्राधित होकर उनका स्वभान भी क्रोध युक्त बना दिया ॥४५॥ ये भूरे रग के, उग्र स्वभाव के और मांस खाने याते थे। फिर उसी समय उनके शरीर से गन्यवों की उत्पत्ति हुई ॥४६॥ ये प्राणी 'गो' ( वाक्य और गीत ) तया 'घयन' (उच्चारण व गात ) करते करते पैदा हुये इसलिए गन्धर्व क्लाये ॥४७॥ तब भगवान ब्रह्मा ने इस शक्ति से प्रेरित होकर स्वच्छन्दता पूर्वक 'वय.' भङ्ग से वया (पक्षी) (श्रीविष्णुपुराण वक्ष से भेड मोर मुख से बकरे को उत्पन्न किया। प्रजापति ने पेट मौर दोनो वगलो से गौ जाति, दोनो पैरो से घोहा, हाथी, शरम, गवर्ष हिरन, अंद, अश्वतर आदि अनेक प्राणिपो की सृष्टि यो। उनके रोमें से फल मूल वाली बनस्पतियाँ बन गई ॥४८-५०॥ है द्विज । उन्होने कल्प के मादि मे 'पशु पौषधि' यो उत्पत्ति परके नेता के प्रारम्भ में यज्ञ में उनकी योजना की ॥५॥ गौरजः पुरुषो मेपवावाश्वतरगदंभाः । एतान्ग्राम्यान्पशूनाहुरारण्यान निबोध मे १५२२ श्वापदा द्विखुरा हस्ती वानरा. पक्षिपञ्चमा: । औदकाः पशवः पठा. सप्तमास्तु सरीसृपाः १५३। गायत्रं च ऋचश्च व त्रिवृत्सोम रथन्तरम् । अग्निष्टोम च यज्ञाना निर्ममे प्रथमान्मुखात ।५४॥ यजू पि त्रष्टुभ छदः स्तोम पञ्चदश तथा। वृहत्साम तथोक्थ च दक्षिणादसृज-मुखात् ॥५५॥ सामानि जगतीछन्द स्तोम सप्तदश तथा । वरूपमतिरात्र च पश्चिमादसृजन्मुखात् १५६। एकविंशमषारणमातोर्यामागमेव अनुष्टुभ च वैराजमुत्तरादसृजन्मुखात् ॥५५, पक्षी उदक गाय, धरा, भेड, घोडा, खच्चर, गधा ये सब ग्राम्य पशु कह लाते हैं और वापद ( सिंह आदि), दो खुर वाले, हाथो, बन्दर, ( पछुपा पादि) मौर रेगन वाले ( सर्प आदि) जङ्गलो प्राणो कहे जाते हैं ॥ ५२-५३ ।। ब्रह्मानी ने अपने प्रथम मुखर गायत्री, ऋग्वेद, त्रिवत्तस्तोम, रपातर और अग्निप्टीम का निर्माण किया । दक्षिण मुस से यजुर्वेद, पञ्चदश, विष्ट प छन्दस्तोम, बृहत्सा मौर उक्य की मृष्टि की । पथिम मुख से समस्त सामवेद सत्तर जगती पादस्तीम, वरूप पोर यतिराज को रचा । उत्तर मुख ।
प्रथम प्रम-प्र० ५ ] [ ७७ इसीय मनुष्टच पदरमोम, मरेर मोम सस्या पर राज की गृष्टि को॥५४-१७ ॥ उचारचानि भूतानि गाभ्यम्नन्य नतिरे। देवामुरपितृन गया मनुष्यान प्रजापतिः ।। तत पुन समजादी समस्य पितामह । यक्षान पिशा चान्गत्यर्वाद तनाप्परमा गणाव (५६) नरसिमररक्षासि वय पशुमृगारगान् । प्रव्यय च व्यय चर यदिद म्यागुगलमम् ॥६॥ तत्सत तदा ब्रह्मा भगवानादियुरप्रभु । तेपा ये यानि कर्माणि प्रापमृष्टया प्रतिपेदिरे । तान्येय ते प्रपद्यन्ते मृज्यमानाः पुनः पुनः ॥६॥ हिनाहिने मृदुकरे धर्माधर्मावृतान्ने । तद्भाविताः प्रपद्यन्ते तस्मात्तत्तस्य रोचते ॥६॥ इन्द्रियापु भूतेषु शरीरेषु च स प्रभुः । नानात्व विनियोग च घातव व्यसृजत्म्वयम् ॥६३॥ नाम स्पच भूताना त्याना च प्रपञ्चनम् । वैदशब्देभ्य एवादी देवादीना चकार सः ।६।। पीरणा नानधेयानि यया वेदप तानि । तथा नियोगयोग्यानि ह्यन्येपामपि सोऽअरोत् ॥६५॥ ययतुंप्वृतुलिनानि नानारूपाणि पर्यये। दृश्यन्त तानि तान्येव तथा भावा युगादिषु ॥६६॥ परोत्येचविधा सृष्टि पल्लादो स पुनः पुनः । सिमृक्षाशक्तियुक्तोऽमो मृज्यशक्तित्रयोदित.1६७। पादित मगपान प्रजापति देव ने इस प्रकार अपने पर से ही समस्त छोटे-बडे जीवों को मृष्टि की । उन्होंने देव, मसुर, पितृ और मनुष्यों की रचना करके बल ने प्रादि में हो यम, पिसार, गन्धर्व, पप्सरा, नर, विनर, राक्षस, पशु, पक्षी, मृग, उरग मादि ।
७८ 1 [ श्रीविष्णुपुराण युक्त प्रवाह रूप, नित्य तथा अनित्य, स्थायर-जङ्गममय इस समस्त जगत की रचना की । इनमे से जिसके कर्म पुरानी सृष्टि में जिस प्रकार के थे, फिर से उत्पन्न किये जाने पर भी वे उसी को प्राप्त होने लगे। ॥५-६१॥ उन जीवो हिंसा-अहिंसा, कोमल-कठोर, धर्म-अधर्म, सत्य-असत्य प्रादि के भाव प्राप्त होने लगे और उन्ही में उनकी प्रमि- रुचि होने लगी १६३॥ इस प्रकार उस विधाता ने ही इन्द्रियार्थ (आहार सम्बन्धी) भूत (जीव ) और शरीर सम्बन्धी विभिन्न प्रकार की व्यवस्थायें पैदा कर दी ॥ ६४ ॥ उन्होंने वेदानुकूल देवादि प्राणियो के नाम पर कार्य विभाग का निरूपण दिया, समस्त ऋषियों को तथा नियोग और वेदों के निर्देशानुसार नाम दिया । जिस प्रकार ऋतुषों के बदलने पर पहले के समान ही ऋतुप्रो के चिह्न दिखलाई देते हैं, उसी प्रकार युग के मादि मे देव मादि की उत्पत्ति पूर्ववत् हुना करती है। कल्प के यादि मे ब्रह्मा जी सर्जन शक्ति से युक्त होकर इसी तरह जगत की रचना किया करते हैं ।। ६५-६७ ॥ छटवाँ अध्याय अविस्रोतास्तु कथितो भवता यस्तु मानुपः । ग्रान्विस्तरतो ब्रू हि ब्रह्मा तमसृजद्यथा ११ यथा च वर्णानसृजद्यद्गुणाश्च प्रजापतिः । यञ्च तेषा स्मृत कर्म विप्रादीना तदुच्यताम् ।। सत्याभिध्यायिनः पूर्व सिसृक्षोत्र ह्मणो जगत् । प्रजायन्त द्विश्रेष्ठ सत्त्वोदिक्ता मुखात्प्रजाः ॥३॥ वक्षसो रजसोद्विशास्तथा वै ब्रह्मणोऽभवन् । रजसा तमसा चैव समुद्रिक्तास्तथोरुतः ।।।
- प्रथम अश-अ०६ ] [ ७६ पद्भधामन्याः प्रणा ब्रह्मा ससर्ज दिजसत्तम । तम.प्रधानास्ताः सर्वाश्चातुर्वण्यमिदं ततः ।। ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्राश्च द्विजसत्तम । पादोरवक्षस्थलतो मुप्ततश्व समुद्गताः ।। यज्ञनिष्णतये सर्वमेतद् ब्रह्मा चकार । चातुर्वण्यं महाभाग यज्ञसाधनमुत्तमम् ७॥ यज्ञराप्यायिता देवा पृष्टय सर्गरण वे प्रजाः । प्राप्याययन्ते धर्मज्ञ यज्ञाः कल्याणहेतवः ।। मंगेय ने पूछा- है महामुने ! प्रापने ब्रह्माजी द्वारा प्राय सोत मनुष्यों की उत्पत्ति की बात कही , उसे विस्तार पूर्वक कहिये । उनको नि गुणों से युक्त करके समस्त वर्णों की रचना थी ! उन पणों के पो पराध्य कर्म है उनका भी धन कीजिये ।।१-२॥ पराशर जी ने कहा-है हिग. पष्ट ! सत्ययुक्त जगतकर्ता ब्रह्माजी के मुम से प्रथम मरय गुगायुक्त प्राणियों ने जन्म ग्रहण क्यिा घाती से रजोगुणयुक्त प्रभा उत्पन्न हुई और उस में रग तथा तम से युक्त प्राणी उत्पन्न हए ।।३-४॥ इनके साप ही परों गे हम प्रगन लोगों की उत्पत्ति हुई। ये ही सब मिलाकर चारों वर्ग बन गये । ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र क्रमशः मुत, यक्षस्थल, उर, परी उत्पन्न हुए ॥५-६॥ हे महाभाग ! ब्रह्माजी ने पल यो नली प्रकार साधित होने द सद्देश्य ही इन चारों वर्गों की रचना की । देय गण यस रो समुष्ट होकर समात प्रना का परयाण करते हैं, इससे यश कल्याण का मूल है ।।७.८ ।। निप्पाद्यन्ते नरस्तस्तु स्वधर्माभिरतम्मदा विशुद्धाचरणापतैः मद्भिः म... स्वर्गापवौं मानुष्यात्प्राप्नुवन्ति नरा मुने । यञ्चाभिषचित स्थानं तद्यान्ति मनुजा द्विज, प्रजास्ता ब्रह्मशा सृष्टाशातुर्मण्यव्यवस्थिताः । पन्यारवासमाचारप्रयणा मुनिसत्तम ॥१॥ यषेच्यावामनिरताः सर्गवाधाविजिता।। .
१५० जातकमाला। B खगुणातिशयोदितैर्यशोभि- जगदावर्जनदृष्टशक्तियोगः। रचनागुणमात्रसत्कृतेषु ज्वलयत्येव परेवमर्पवहिम् ॥ ४ ॥ प्रसह्य चैनं शास्त्र याखभिभवितुमशक्ता धर्मप्रसङ्गममृष्यमाणाश्च राज्ञस्तेन तेन क्रमेण राजानं बोधिसत्त्वं प्रति विप्राहयामामुः-नार्हति देवो योधिपरिवाजके विश्वासमुप- गन्तुम् । व्यक्रमयं देवस्य गुणप्रियतां धर्माभिमुखतां चोपलभ्य व्यसनप्रतारणशक्षणशर- मधुरवचनः प्रवृत्तिसंचारणहेतुभूतः कस्यापि प्रत्यर्थिनो राज्ञो निपुणः प्रणिधिप्रयोगः। तथा हि धर्मात्मको नाम भूत्वा देवमेकान्तेन कारुण्यप्रवृत्तौ हीदैन्यै च समनुशास्ति, अर्थकामो- 10 परोधिषु च क्षत्रधर्मयाहोष्वासन्नापनयेषु धर्मसमादानेषु दयानुवृत्त्या व नाम ते कृत्यपक्ष- माश्वासनविधिनोपैगृणीते प्रियसंस्तवश्चान्यराजदूतैः। न चायमविदितवृत्तान्तो राजशाखाणाम् । अतः साशङ्कान्यत्र नो हृदयानीति । अथ तस्य राज्ञः पुनः पुनर्भेदोपसहित हितमिव बहुभिरुच्यमानस्य बोधिसत्त्वं प्रति परिशङ्कासंकोचितस्नेहगौरवप्रसरमन्यादृशं चित्तमभवत् ।
- प्रयम अश-अ०६ ] [ ७६ पद्धचामन्याः प्रजा ब्रह्मा ससर्ज द्विजसत्तम । तम.प्रधानास्ताः सर्वाश्चातुर्वण्य मिदं ततः ॥५॥ ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः यूद्राश्च द्विजसत्तम । पादोरवक्षःस्थलतो मुम्वतश्च समुद्गताः ।। पानिप्पत्तये सर्वमेतद् ब्रह्मा चकार है। चातुर्वण्यं महाभाग यज्ञसाधनमुत्तमम् । यज्ञराप्यायिता देवा वृष्टय त्सर्गेण व प्रजाः । आप्याययन्तै धर्मज्ञ यज्ञाः कल्पारणहेतवः ।। मंप्रेय ने पूछा हे महामुने । मापने ब्रह्माजी द्वारा भार स्रोत मनुष्यों की उत्पत्ति की बात कही , उसे विस्तार पूर्वक कहिये । उनको किन गुरों से युक्त परके समस्त वयों की रचना की? उन पलों के जो पतंय पमं है उनका भी वगन कीजिये ॥१-२॥ पराशर जी ने कहा- हे द्विज. थेट ! सत्ययुक्त जगतक्ता ब्रह्माजी के मुख से प्रथम सत्व गुणयुक्त प्राणियों ने जन्म ग्रहण किया । छाती से रजोगुणयुक्त प्रजा उत्पन्न हुई मौर उस मे रज तपा तम से युक्त प्राणी उत्पन्न हुए ॥३-४१। इनके साप ही परों से तम प्रधान लोगों की उत्पत्ति हुई। ये ही मव मिलाकर चारों वर्ग बन गये। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वश्य और शूद्र क्रमश: मुख, वक्षस्मत, उरु, परों से उत्पन्न हए ॥५-६) हे महाभाग ! ब्रह्माजी ने यज्ञ के भली प्रकार साधित होने में उद्देश्य ही इन चारों वर्षों की रचना की। देव गए यज्ञ से सतुष्ट होकर समस्त प्रजा का कल्याण करते हैं, इससे या कल्याण का मूल है ।।७.८॥ निष्पायन्ते नरस्तस्तु स्वधर्माभिरतस्सदा। विशुद्धाचरणोपेतः सद्भिः सन्मागंगामिभिः । स्वापिवौं मानुप्यात्माप्नुवन्ति नरा मुने। पञ्चाभिरचित स्यानं तद्यान्ति मनुना द्विज 101 प्रजास्ता ब्रह्मणा सृष्टान्नातुर्वर्यव्यवस्थिताः । सम्परयुद्धासमाचारप्रवरा मुनिसत्तम || यपेच्छावासनिरताः सर्गवाधाविवजिताः। .
[थीविष्णुपुराण गमस्त युक्त प्रवाह रूप, नित्य तथा प्रनित्य, स्थावर-जगममय इस जगत की रचना की। इनमें से जिसके धर्म पुरानी गृष्टि में जिस प्रकार के थे, फिर से उत्पन्न किये जाने पर भी वे उसी को प्राप्त होने लगे। ॥१८-६१॥ उन जीयों हिंसा-प्रह्मिा, कोमल-बटोर, धर्म-अधर्म, सत्य-असत्य यादि के भाव प्राप्त होने सगे और उन्ही में उनकी अभि- रुचि होने लगी ॥६३।। इस प्रकार उस विधाता ने ही इन्द्रियार्थ (माहार सम्बन्धी) भूत ( जीव ) और शरीर सम्बन्धी विभिन्न प्रकार की व्यवस्थायें पैदा कर दी ॥ ६४ ॥ उन्होंने वेदानुकूल देवादि प्राणियो के नाम और कार्य विभाग का निरूपण किया, समस्त शपियों को तथा नियोग और वेदो के निर्देशानुसार नाम दिया । जिस प्रकार ऋतुप्रो के बदलने पर पहले के समान ही ऋतुओं के चिह्न दिखलाई देते हैं, उसी प्रकार युग के आदि में देव धादि की उत्पत्ति पूर्ववत् हुमा करती है। क्ल्प के प्रादि मे ब्रह्मा जी सर्जन शक्ति से मुक्त होकर इसी तरह जगत की रचना किया करते हैं ।। ६५-६७ ॥ - छटवाँ अध्याय अक्स्रिोतास्तु कथितो भवता यस्तु मानुषः । ब्रह्मन्विस्तरतरे ब्रू हि ब्रह्मा तमसृजद्यथा ।१। यथा च वर्णानसृजद्यद्गुणाश्च प्रजापतिः । यच्च तेषां स्मृत कर्म विप्रादीना तदुच्यताम् ।२। सत्याभिध्यायिनः पूर्व सिसृक्षोब्रह्मणो जगत् । प्रजायन्त द्विजश्रेष्ठ सत्त्वोद्विक्ता मुखात्प्रजाः ।। वक्षसो रजसौद्रिक्तास्तथा वै ब्रह्मणोऽभवन् । रजसा तमसा चैव समुद्रिक्तास्तथोरुतः ।।।
मंत्रेय ने पूछा प्रयम अश-अ०६ ] [ ७६ पद्भ्यामन्याः प्रजा ब्रह्मा ससर्ज द्विजसत्तम । तम.प्रवानास्ताः सर्वाश्चातुर्वण्यमिदं ततः ।। ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्राश्च द्विजसत्तम । पादोरुवक्षस्थलतो मुखतञ्च समुद्गताः॥६॥ यज्ञनिष्पत्तये सर्वमेतद् ब्रह्मा चकार वै । चातुर्वण्यं महाभाग यज्ञसाधनमुत्तमम् 10) यज्ञराप्यायिता देवा वृष्टय सर्गग वै प्रजाः । प्राप्यामपन्त धर्मज्ञ यज्ञाः कल्याणहेतवः ।। है महामुने ! मापने ब्रह्माजी द्वारा पर्वाक स्रोत मनुष्यों की उत्पत्ति की बात कही , उसे विस्तार पूर्वक कहिये । उनको किन गुणों से युक्त करके समस्त वणों को रचना की? उन वणों के जो कर्तव्य कर्म है उनका भी वर्णन कीजिये ॥१-२॥ पराशर जी ने कहा- हे द्विज- पेट सत्ययुक्त जगतकर्ता ब्रह्माजी के मुख से प्रथम सत्व गुणयुक्त प्राणियों ने जन्म ग्रहण किया । छाती से रजोगुणयुक्त प्रजा उत्पन्न हुई और उस मे रज तथा दम से युक्त प्राणी उत्पन्न हुए ॥३-४॥ इनके साथ ही परों से तम प्रणन लोगों की उत्पत्ति हुई। ये ही सब मिलाकर चारो वर्ण बन गये। ग्राहाणा , क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र क्रमशः मुख, वक्षस्थल, उरु, परों से उत्पन्न हुए ॥५-६॥ हे महाभाग ! ब्रह्माजी ने यज्ञ के भली प्रकार सापित होने के उद्देश्य ही इन चारों वणों की रचना को । देव गण यज्ञ से सतुष्ट होकर समस्त प्रजा का कल्याण करते हैं, इससे पज्ञ कल्याण का मूल है ॥७-८ ।। निप्पाद्यन्ते नरस्तस्तु स्वधर्माभिरतस्सदा। विशुद्धाचरणोपेतः सद्भिः सन्मार्गगामिभिः ।। स्वर्गापवर्गी मानुप्यात्प्राप्नुवन्ति नरा मुने। पचाभिरुचित स्थानं तद्यान्ति मनुजा विज।१०। प्रजास्ता ब्रह्मणा सृष्टाश्चातुर्वर्ण्यव्यवस्थिताः। सम्यक्छुद्धासमाचारप्रवणा मुनिसत्तम 1११॥ यथेच्छावासनिरताः सर्वाबाधाविवजिता।
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[ श्रीविष्णुपुराण
शुद्धान्त करणा शुद्धा कर्मानुष्ठाननिर्मला ।१२।
शुद्ध च तासा मनसि शुद्ध ऽन्त सस्थिते हरी।
शुद्धज्ञान प्रपश्यन्ति विष्ण्वास्य येन तत्पदम् ॥१३॥
तत कालात्मको योऽसौ स चाश पथितो हर ।
स पातयत्यघ घोरमल्पमल्पाल्पसारवत् ।१४।
प्रधमबीजमुद्भत तमोलोभसमुद्भवम् ।
प्रजासु तासु मैत्रेय रागादिकमसाधकम् ॥१५॥
अपने-अपने धम मे सलग्न विशुद्धाचरण वाने पोर समाग गामी
मनुष्यो द्वारा वास्तव मे या साधन होता है। यन रो मनुष्य रवग अपवर्ग प्राप्त
करते हैं और अभिलाषित स्थिति को पा सकते है ॥१०॥ ब्रह्मा ने चत
वर्ण की व्यवस्था के निमित्त हो श्रद्धाचार सम्पन , स्वेच्छापूब क काय करने
वाली और बाधामो से रहित प्रजा की सृष्टि की ॥११-१२, क्योकि मन
के शुद्ध होने और शुद्ध प्रत करण में भगवान के स्थित होने पर शुद्ध ज्ञान
पैदा होता है और उसके द्वारा वे विष्णु के पद को देखने में समर्थ होते है।
॥१३॥ हे मैत्रेय । इसके पश्चात् जो भगवान के कानात्मक प्रग की बात कही
गई है, तदनुसार इस प्रजा मे अधम से उत्पन्न तमोमय नोभ थोडा थोडा करके
पोर पाप का सचार कर देता है ॥१४-१५।।
तत सा सहजा सिद्धिस्तासा नातीव जायते ।
रसोझासादयश्चान्या सिद्धयोऽष्टी भवति या '१६॥
तासु क्षीणास्वशेषासु वर्द्धमाने पातके ।
द्वद्वाभिभवदू खास्तिा भवन्ति तत प्रजा 1१७१
ततो दुर्गाणि ताश्चक्रर्धान्व पावतमोदकम् ।
कृत्रिम च तथा दुर्ग पुरखटकादिकम् । १८)
गृहाणि च यथान्याय तेषु चक्र पुरादिपु।
शीतातपादिवाधाना प्रशमाय महामते ।१६।
प्रतीकारमिम कृत्वा शीतादेस्ता प्रजा पुन ।
वार्तोपाय ततश्चक हस्तसिद्धि च कर्मजाम् ॥२०॥
प्रथम अंश-ग्र०६] [ ८१ वीहवन यवान व गोबुमाश्चारणवस्तिला:। प्रियङ्गवो ह्य दाराश्च कोरदूपाः सतोनकाः ॥२॥ मापा मुद्गा मसुराश्च निप्पावाः सकुलत्यकाः । ग्राढक्यश्चरणकाश्च व शणाः सप्तदश स्मृताः ।२२। इसके फलस्वरूप उनमें कार्य को सहज सिदि और रसोल्लास आदि प्रष्ट सिदि सचित रूप में उत्पन्न नहीं होती है। इन सिद्धियों के क्षीण होने तथा पापों के बढ़ने से समस्त प्रजा तरह तरह के दुखो से व्यथित होती है । ॥१६-२७॥ तब उन्होंने वृक्षो मे, पवनो मे और जल के समीप स्वाभाविक रक्षा स्थान अथवा कृत्रिम दुर्ग, पुर, सवंटक स्थापित किये और शीत ताप आदि की बाधा से बचने के लिये वहां पर पर आदि बनाये ॥१८-१६। जब लोगो ने इस प्रकार शीत प्रादि मे अपनी रक्षा की व्यवस्था करली तो उन्होंने खेती हस्तकला की विधियां निकाली जिससे जीवन निर्वाह हो सके ॥२०॥ हे मुने ! धान, जी, गैहै, अनु, तिल, प्रियगु, उदार, कोरदुप, चीनक, उदं, मूग, मसूर निपाव कुलथी माढस्य चना मोर सन ये सत्तरह ग्राम्य औषधि हैं ॥२१-२२।। इत्येता प्रोपधीना तु ग्राभ्याना जातयो मुने । नोपध्यो यज्ञियाश्चैव ग्राम्यारण्याश्चतुर्दश ।२३॥ द्रोहयस्सयवा मापा गोधूमावाणवस्तिलाः । प्रियङ्ग सप्तमा ह्यते अष्टमास्तु कुलत्थकाः।२४॥ श्यामाकास्त्वय नोवारा जतिला सगवेधुकाः। तथा वेणुयवाः प्रोक्तास्तथा मकंटका मुने ।२। ग्राम्यारण्याः स्मृता ह्यता प्रोपध्यस्तु चतुर्दश । यज्ञनिप्पत्तये यज्ञस्तथासा हेतुरुत्तमः १२६॥ एताश्च सह यज्ञेन प्रजाना कारणं परम् । परावरविदः प्राज्ञास्ततो यज्ञान्वितन्वते ।२७। अहन्यहन्यनुष्ठान यज्ञानां मुनिसत्तम । उपकारकरं पुसा क्रियमाणाघशान्तिदम् ॥२८॥ या पोपपियां भी चौदह प्रकार की होती हैं जैसे पान, जौ, उदं, गेंहै, २ ] [ श्रीविष्णुपुराण अनु तिल, प्रिय गु, कुलत्थक, श्यामार, नीबार जतिल गवय, वेनुयर और मकटक इनका उपयोग यज्ञ में प्राहुति देने के लिये होता है ॥२३से २६॥ ये सब यज्ञ द्वारा समस्त प्रजा की उन्नति का परम साधन सिद्ध होती हैं, इस- लिये लोक-परलोक के ज्ञाता यज्ञो का प्रचार करने को कहते हैं। यज्ञ प्रत्येक छपक्ति द्वारा नित्य किया जाने योग्य अनुशन है, मनुष्यो का उपकार करने वाला है, और नित्य होने वाले पचमूना पापो को दूर करन वाला है ॥२७-२८।। येषा तु काल सृष्टोऽसौ पापविन्दुमहामुने । चेत सु ववृधे चक स्ते न यज्ञ पु मानसम् ।२६। वेदवादास्तथा वेदान्यज्ञकर्मादिक च यत् । तत्सर्वं निन्दयामासुर्यज्ञव्यामेधकारिणा ॥३०॥ प्रवृत्तिमार्गव्युच्छित्तिकारिणो वेदनिन्दका । दुरात्मानो दुराचारा बभूवु कुटिलाशया ॥३१॥ ससिद्धाया वार्ताया प्रजा सृष्ट्वा प्रजापति. । मर्यादा स्थापयामास यथास्थान यथागुणम् ॥३२॥ वर्णानामाश्रमाणा च धर्मान्धर्मभृता वर । लोकाश्च सववरणाना सम्यग्धर्मानुपालिनाम् ॥३३॥ प्राजापत्य ब्राह्मणाना स्मृत स्थान क्रियावताम् । स्थानमैन्द्र क्षत्रियाणा संग्रामेष्वनिवर्तिनाम् ३४। वैश्याना मारुत स्थान स्वधममनुवर्तिनाम् । गान्धवं शूद्रजातीना परिचर्यानुवर्तिनाम् ॥३५॥ है महामते । जिसके अन्त करण मे इस कालरूप पाप बिन्दुओ की वृद्धि होती है वे यज्ञ की तरफ रुचि नही रखते ॥२६॥ जो कोई वेदो, वैदिक सिद्धातो और यज्ञो को पूर्ति करने वाले अन्यान्य कर्मों की निंदा करते हैं वे सव यज्ञों मे व्याघात दालने वाले प्रवृति मार्ग के उपदेशक, वेदनिन्दक, दुरात्मा, दुराचारी पोर कुटिलाशय माने जाते हैं ॥ ३०-३१ ॥ प्रजा के उत्पन्न हो जाने और जीविका की व्यवस्था हो जाने पर प्रजापति ने सबको गरपान और यपामर्यादा स्थापित किया ॥३२॥ उन्होने समस्त वणों भौर प्रयम अश-अ.६ ] माधों के धर्मों का सम्या से पालन करने वाले लोगो का उचित यान निरूपण किवा ॥३३|| क्रियावान ब्राह्मणो के लिये प्रजातात्यलोक संग्राम टिक्ने वाले क्षत्रियों के लिये एन्द्र-लोक, स्वधर्मानुवर्ती वैश्यो के लिये देवलोक और परिचर्या परामण मूहों के लिये गन्यवं लोक निश्चित क्यिा ॥३४.३५] अष्टासीतिराहस्राणि मुनीन्गमूवरेतसाम् । स्मृतं तेपातु यस्यान तदेव गुरुवासिनाम् ॥३६॥ सप्तपणा तु यत्स्यानं स्मृत तद्वं वनोक्साम् । प्राजापत्यं गृहस्थाना न्यासिना वह्मसनितम् ॥३७॥ योगिनाममृत स्यानं वात्मसनापकारिणाम् ॥३८॥ एकान्तिनः सदाब्रह्मघ्यायिनो योगिनन्न ये । तेपातु परमं स्थान यत्तसश्यति म्रयः १३६१ गत्वा गत्वा निर्वत्तन्ते चन्द्रमूर्णदयो ग्रहाः । अद्यापि न निवर्तन्ते द्वादशाक्षरचिन्नका. १४० तामिन्नमन्धतामिन महारौरवरोरवो। प्रसिंपनबन घोर कालमूनमयोचिरम् ॥४॥ विनिन्दकाना वेदस्य यज्ञव्याघातकारिणाम् । स्थानमेतत्समाल्यान स्वधर्मत्यागिनश्न ये ॥४२॥ पट्टामी सहन ऊडरेता मुनियो लिये मस्त प्यान (जनलोक) बत- माया। गुरु के निकट रहने वाले ब्रह्मचारियों का भी यही स्थान है ॥३६॥ उसपि मंडल में जो तपोलोक है वह वानप्रस्थ वालों का और प्राजापरप-लोक रहस्यों का स्पान पहा गया। समातियों के स्थान का नाम 'ब्रह्म है ॥१७॥ सोगियों का स्थान 'अमृत' है जो कि विमा का परम पद है जो एकात में रहने वाले सदा ब्रह्म का ही ध्यान रखने वाले योगो हैं, इनका यही मुख्य स्थान है. नानीवन इसी का भपतोक्न मरते हैं । रि भी इन मावागमन होता रहता है, पर जो द्वादशासर स्त्र (ॐ नमो भगवते वासुदेशार ) का निन्ना करते रहते है, ये कभी लौट कर नहीं माने ॥३८-३६॥ तामिन,, मन्यता मिन्न., महाराष, रोख, प्रसिदन, पार, कार मूत्र पयोचित- ये सब नरक-सोक ८४ ] [ श्रीविष्णुपुराण हैं। वेदो की निंदा करने वाले, यज्ञो मे बाधा डालने वाले और अपने धर्म को त्याग का आचरण करने वालो का यही स्थान कहा गया है ।।४०-४२।। सातवाँ अध्याय ततोऽभिध्यायतस्तस्य जज्ञिरे मानसा प्रजा । तच्छरोरसमुत्पन्न कार्यस्ने करणे मह ।। क्षेतज्ञा समवर्तन्त गानेभ्यम्तस्य धोमत से सर्वे समवर्तन ये मया प्रागुदाहृता १२॥ देवाद्या स्थावरान्ताश्च गुण्यविषये स्थिता । एवभूतानि मृष्टानि चराणि स्थावराणि च १३॥ यदास्यता प्रजा सर्वान व्यवधन्त धीमत । अथान्यान्मानसा-पुत्रान्सशानात्मनोऽमृजत् ।।। भृगु पुलस्त्य पुलह कनुमङ्गिरस तथा । मरीचि दक्षमनिं च वसिष्ठ चव मानसान् ॥५॥ नव ग्रह्मागा इत्यते पुराणे निश्चय गता । स्याति भूतिं च सम्भूति क्षमा प्रोनि तथैव च ॥६॥ सम्मति च तथवोर्जामनसूया तथैव च । प्रसूतिं च तत सृष्ट्वा ददौ तेपा महात्मनाम् । श्री परावारीन रहा- इस रथात उन प्रजापति ने ध्यान शिया, जिम उनके देह को भूना से उद्भूत शरीर पोर इद्रियों युक्त मानसी प्रजा की उत्पति हुई ॥१॥ उप समय का मेधावी ब्रह्माजी के द्वारा हो चेतन प्राणी उनए। पूर्व में मैने देवतापो से स्थावर ता जिस त्रिगुणामिया परापर सृष्टि का वर्णन किया है, यह सब इसी प्रकार प्रादू त हुई ॥२-३॥ पद उन महामति प्रमापति की यह प्रजा पुत्र गोत्रादि के प्रम मे वृदिपो प्रास नहीं हुई, व उहाने प्रश्न ही प्रमान भृगु, पुलस्त्य, पुलह, मनु, पंगिरा, मरीचि, दसा पनि [ श्रीविष्णुपुराण था। उससे ब्रह्माजी ने कहाकि अपने शरीर को विभक्त कर हाल । यह कह कर वह वही अन्तर्धान हो गय ॥१३॥ ब्रह्माजी का प्रादेश सुनकर रुद्र ने अपने देह- गत स्त्री-पुरुष को पृथक् पृयक विभक्त किया और फिर उस पुरुष के भी ग्यारह भाग कर डाले ॥१४॥ सौम्यासौभ्यस्तदा शान्ताशान्तः स्त्रीत्व च स प्रभुः । विभेद बहुधा देव स्वरूपरसितं. सितैः ॥१५॥ ततो ब्रह्मात्मसम्भूत पूर्व स्वायम्भुव प्रभुः । श्रात्मानमेव कृतवान्प्रजापाल्ये मनु द्विज ।१६। शतरूपा च ता नारी तपोनि' तकल्मपाम् । स्वायम्भुवो मनुर्देव: पत्नीत्वे जगृहे प्रभु. ।१७। तस्मात्त, पुरुषाद्देपी शतरूपा व्यजायत । प्रियव्रतात्तानपादौ प्रसूत्याकूतिसज्ञितम् ॥१८॥ वन्याद्वय च धर्मज्ञ रुपौदार्यगुणान्वितम् । ददौ प्रसूति दक्षाय आकूति रुचये पुरा ॥१६॥ प्रजापति. स जग्राह तयोजज्ञ सदक्षिणः । पुत्रो यज्ञा महाभाग दम्पत्योमिथुन तत. ॥२०॥ यज्ञस्य दक्षिणाया तु पुत्रा द्वादश जज्ञिरे । यामा इति समाख्याता देवाः स्वायम्भुवे मनौ।२१। स्त्री-देह के भी उसने सौम्य, क्रूर, गान्त, प्रशान्त, श्याम, गौर मादि के भेद से अनेक विभाग कये ॥१५॥ फिर ब्रह्माजी ने अपने ही द्वारा उत्पन्न किये गये, मपने ही जैस रूा वाले स्वायभुव को प्रथम मनु बनाकर उन्हें प्रजा-पालन के काय में प्रयुक्त किया ॥१६॥ उन स्वायभुव के साथ ही शतरूपा नाम की मारी उत्पन्न हुई थी, उसे अपनी भार्या के रूप मे ग्रहण किया ॥१७॥ उस शत. रूपा ने स्वायभुव मनु से दो पुत्र उत्पन्न विये जिनके नाम प्रियव्रत और उत्तान- पाद हुए। इसी प्रकार प्रमूति और माकूति नाम की रूप, गुण सम्पन्न दो पन्याए भी उत्पन्न कीं। उनमे से प्रसुति का विवाह दक्ष प्रजापति तथा भाति मा रवि प्रजापति थे साप दिया गया ॥१८-१६॥ हे महाभाग रुचि प्रजापति .
4.] [ यौविष्णुपुराण बोधं बुद्धिस्तथा लज्जा विनय वपुरात्मजम् । व्यवसाय प्रजने ये क्षेम शान्तिरसूयत ।३०) सुख सिद्धियं शः कोतिरित्येते धर्मसूनवः । कामादतिः सुत हपं धर्मपोग्रमसूयत ३१॥ हिसा भार्या त्वधर्मस्य ततो जो तथागृतम् । कन्या च निकृतिस्ताम्या भयं नरकमेव च ॥३२॥ माया च वेदना चव मिथुन त्विदमेतयो । तयोजनेऽथ वै माया मृत्यु भूतापहारिणम् (३३१ वेदना स्वसुन चापि दुःस जज्ञऽथ रौरवात् । मृत्योाधिजराशोकतृपणाक्रोधाश्च जज्ञिरे ।३।। दु.खोत्तरा: स्मृता ह्य ते सर्वे चाधर्मलक्षणाः । नैषा पुत्रोऽस्ति व भार्या ते सर्वे ह्यरेतसः ॥३५॥ इसी प्रकार मेधा ने थुत, क्रिमा ने दएट नय और विनय, बुद्धि ने बोध, लज्जा ने विनय,वपु ने व्यवसाय शान्ति ने क्षेम, सिद्धि ने सुख और कोति ने यश को उत्सब किया, धर्म के यही सब पुत्र हैं। धर्म पुन काम ने रति से हपं को प्रकट किया ॥२६-३१॥ अधर्म की भार्या हिंसा हुई, उसने अनृत नामक पुत्र को पौर निकृति नाम की कन्या को जन्म दिया। उन दोनो के सयोग से भय और नरक नामक पुत्र तथा मापा मोर वेदना नामकी कन्याए उत्पन्न हुई, यह क्रमशः भय और नरक की भार्या हुईं। उनमे से माया ने सब जीवो का नाश करने में समर्थ मृत्यु नामक एक पुन का प्रसव किया ॥३२-३३।। रोरव के द्वारा वेदना ने दुख नामक एक पुत्र उत्पन्न किया तथा मृत्यु से व्याधि, जरा, शोक तृष्णा मोर कोष उत्पन्न हुए ॥३४॥ यह सभी अधर्म स्वरूप तथा दुःखोत्तर नाग से विख्यात हैं, इनफे ऊर्ध्वरेता होने के कारण कोई सन्तान अथवा पत्नी आदि नहीं हैं ।३५॥ रोद्राण्येतानि रूपाणि विष्णोमुनिवरात्मज । नित्यप्रलयहेतुत्व जगतोऽस्य प्रयान्ति वै ॥३६॥ दक्षो मरीचिरत्रिश्च भृग्वाद्याश्न प्रजेश्वराः । जगत्यय महाभाग नित्यसर्गस्य हेनवः ।३७ प्रथम ग्रंश-०७] [ ८९ मनवो मनुपुत्राश्च भूषा वीर्यधराश्च ये। सन्मार्गनिरताः शूरास्ते सर्वे स्थितिकारिणः ॥३॥ येयं नित्या स्थितिब्रह्मन्नित्यसर्गस्तथेरितः । नित्याभावश्च तेपांग स्वरूपं मम कथ्यताम् ।३९। सर्गस्थितिविनाशाश्च भगवान्मधुसूदनः । तस्तै रूबरचिन्त्यात्मा करोत्यव्याहतो विभुः ॥४०॥ मैमित्तिक: प्राकृतिकस्तयैवात्यन्तिको द्विज । नित्यश्च सर्वभूतानां प्रलयोऽय चतुर्विधः ।।११ ब्राह्मो नैमित्तिकस्तत्र शेतेऽयं जगतोपतिः । प्रयाति प्राकृते चैव ब्रह्माण्ड प्रकृती लयम् ।।२। हे मुनिवरात्मज ! भगवान् विष्णु के यह अत्यन्त भपहर स्वरूप हैं, क्योकि विश्व की नित्य प्रलय के कारण रूप भी यही हैं ॥३६॥ दक्ष, मरीचि, अत्रि भोर भृगु आदि जो प्रजापति हैं, उन्हें इस विश्व के सृष्टि-कारण समझो ॥३७॥ मनु तया उनके श्रेष्ठ मार्ग पर चलने वाले पराजमी और वीर पुत्र जो राजा हैं. वे सव इस जगत को नित्य-स्थिति के कारण रूप हैं ।।३।। यह सुन कर मैनेयजी ने कहा-है ब्रहान् ! आपने जिस नित्य स्थिति, नित्य सर्ग और नित्य प्रलए का मेरे प्रति वर्णन किया है, उनका स्वरूप अब मुझे बताने की कृपा करें ॥३६॥ श्री परादार जी ने कहा-~-जिन प्रचिन्त्यात्मा एवं सर्व व्यास भगवान् मधुसूदन को गति कही भी नहीं रुक पाती, वही मनु पादि रूपों से इस जगत् की सृष्टि स्थिति तथा संहार करते रहते हैं ॥४०॥ हे द्विज ! समस्त प्राणियो का प्रलय नमित्तिक, प्राकृतिक प्रात्यन्तिक और नित्य के भेद से चार प्रकार का है ।।४।।उनमे नैमित्तिक प्रलय ब्राहा प्रलय कही गई है, जिसमें ब्रह्माजी कल्पान्त मे शयन करते हैं और सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड प्राकृतिक प्रलय में, प्रकृति में लीन हो जाता है ॥४२॥ ज्ञानादात्यन्तिकः प्रोक्तो योगिनः परमात्मनि । नित्यः सदेव भूतानां यो विनाशो दिवानिशम् ॥४३॥ प्रसूतिः प्रकृतेर्यात मा सृष्टिः प्राकृता स्मृता । दनन्दिनी तथा प्रोक्ता यान्तरप्रलयदिनु ।।४।
.. ६.] श्री विष्णुपुराण भूतान्यनुदिन यत्र जायन्ते मुनिसत्तम । नित्यमर्गो हि स प्रोक्तः पुराणार्थविचक्षणः ॥४॥ एव सर्वशरीरेपु भगवान्भूतभावनः । सस्थितः पुरुत विष्णुस्त्तत्तिस्थितिरायमान ॥४६॥ सृष्टिस्थितिविनाशाना शक्तयः सर्वदेहिपु । वणव्य. परिवर्तन्ते मैयाहनिश समाः ।। गुणनयमय ह्य तद्ब्रह्मन् शक्तित्रय महन् । योऽतियाति रा यात्येव पर नावर्तते पुनः ।। प्रात्यन्तिक प्रलय वह है जिसमे ज्ञान वल से योगी परमारमा में लीन हो जाता है तथा दिन-रात प्राशियो का ५य ही नित्य प्रलय है ।।४।। महत्तत्वादि के क्रम से प्रकृति के द्वारा जा सृष्टि होती है, वहीं प्रारतिक मृष्टि है तथा अवान्तर प्रलय के पश्चात् होने वाली चराचर विश्व यी रचना ही दैनन्दिनी सृष्टि है ।।४४॥ है मुनिवर । प्रतिदिन प्रारिणयो थी जिसमे उत्पत्ति होती रहती है वह पुराण पारगती द्वारा नित्य सृष्टि कही गयी है ॥४| इस प्रकार सभी प्राणियो मे स्थित भगवान् विष्णु इस ससार की सृष्टि, स्थिति और प्रलय करते रहते है ॥४६॥ हे मंत्रेयजी 1 सृष्टि, स्थिति और सहार की इन चणवी शक्तियो का सभी देहो समान रूप से रात-दिन सञ्चार होता रहता है ।।४॥ हे ब्रह्मन् । यह तीनो शक्तियां त्रिगुणात्मिका हैं और जो मनुष्य इनका अतिक्रमण करता है वह परमपद को प्राप्त होकर जन्म मरणादि से मुक्त हो जाता 11४८11 श्राठवाँ अध्याय कथितस्तामसः सर्गो ब्रह्मणस्तै महागुने। रूद्रसगं प्रवक्ष्यामि तन्मे निगदत शृणु ।। कल्पादावात्मनस्तुल्य सुत प्रध्यायतस्तत.। प्रादुरासीत्प्रभोर कुमारो नीललोहिताः ।।
[ ६१, इन्दा से चिंतन प्रपम अंग-०८J रुरोद सुस्वर सोऽय प्राद्रवद् द्विजसत्तम । कि त्व रोदिपि त ब्रह्मा रुदन्तं प्रत्युवाच । नाम देहाति त सोऽय प्रत्युवाच प्रजापतिः । रुद्रस्त्व देव नाम्नाति मा रोदीधयमावह १४१ एवमुक्त. पुनः सोऽथ सप्तकृत्वो रुरोद वै । ततोऽन्यानि ददौ तस्मै सप्त नामानि वै प्रभुः ।। स्थानानि चपामष्टाना पत्नीः पुत्राश्च स प्रभुः। भव शर्वमथेशान तथा पशुपति द्विज ६! भीममुन महादेवमुवाच स पितामहः । चक नामान्यर्थतानि स्थानान्येपा चकार सः थी पराशरजी ने कहा-हे महामुने ! ब्रह्माजी वा तामम सर्व मैंने तुम्हारे प्रति कहा है, अब छ सगं के वर्णन को सुनो ॥१॥ कल्प के पारम्म में ब्रह्मा ने अपने समान पुनो को उत्पन करने किया तब उनकी गोद में ही एक नीललोहित वर्ण का पुत्र प्रकट हो गया ॥२॥ है द्विजयेष्ट ! जन्म होते ही वह तच स्वर में रोने और इधर-उधर होने लगा। यह देख कर ब्रह्माजी ने उससे उसके रोने रा कारण पूछा तो उसने कहा कि मेरा नामकरण करिये । वद ब्रह्माजी ने कहा-तेरा नाम र हुमा, पच तू रदन मत कर, धीरज रख ॥३-४॥ यह सुन कर भी वह सात बार और रोता रहा तब ब्रह्मारी ने उसके सात नाम भोर निर्दिष्ट किये तथा उन माटों ये स्त्री और पुत्रों की भी फ्ल्पना रो। प्रजापति ने उसके जो नाम से वह यह थे-मव, शर्व, ईशान, पशुपति, भीम, उन और महादेव । इस प्रकार गारकरण करके वनवे स्थान भी निश्चित किये ॥५-|| सूर्यो जल मही वायुर्वह्निराकासमेव च । दीक्षितो ब्राह्मणः सोम इत्येतास्तनवः क्रमाद ।। सुरचंता तथवोपा विकेशो चापरा शिवा। स्वाहा दिशस्तथा दीक्षा रोहिणी च यथाक्रमम् ।। सूर्यादीना हिजश्रेष्ट रद्राय मभिः सह । पल्यः स्मृता महाभाग तदपत्यानि मे शृणु ।।
[धीविष्णुपुराण
एपां सूतिप्रसूतिभ्यामिदमापूरितं जगत् ।
शनैश्चरस्तथा शुक्रो लोहिताङ्गो मनोजवः ।।
स्कन्दः सर्गोऽथ सन्तानो बुधश्चानुक्रमात्सुताः ।
एवं प्रकारा रुद्राऽसौ सती भार्याम निन्दिताम् ॥१२॥
उपयेमे दुहितर दक्षस्यैव प्रजापतेः।
दक्षकोपाच तत्याज सा सती स्वकलेवरम् ।१३।
हिमवद्,दुहिता साभून्मेनायां द्विजसत्तम ।
उपयेमे पुनश्चोमामनन्या भगवान्हरः ॥१४॥
हे द्विजोत्तम । सूर्य, जल, पृथिवी. वायु, अग्नि, आकाश, दीक्षित
ब्राह्मण और चन्द्रमा यह सब उनके रूप हैं, रुद्र आदि नामों के सहित उन सूर्य
आदि स्पो की सुवर्चला, ऊपा, विकेशी, अपरा, शिवा, स्वाहा, दिशा, दीक्षा
और रोहिणी नाम की भाएं हुई । अब तुम उनके पुत्रो के नामो को श्रवण
करो।।८-१०॥ उनके ही पुन, पौत्रादि से यह सम्पूर्ण विश्व परिपूर्ण हो रहा
है। उनके पुत्र शनैश्वर, शुक्र, लोहिताग, गनोजव, स्कर, सर्ग, सन्तान
और बुध नामक हुए । भगवान् रद्र ने दक्ष प्रजापति की निन्दा-रहित कन्या
सती को अपनी पत्नी बनाया, जिसने दक्ष से रुष्ट होकर उसी के यज्ञ मे अपने
देह का त्याग कर दिया था। वही दक्ष-सुता सती मेना के उदर से उत्पन्न
हिमाचल की कन्या पार्वती हुई। उन अनन्य-परायण पार्वतीजी का शिवजी ने
पुनः पाणिग्रहण किया ॥११-१४॥
देवी घातृविधातारौ भृगोः ख्यातिरसूयत ।
श्रिय च देवदेवस्य पत्नी नारायणस्य या ॥१५॥
क्षीराब्धौ श्रीः समुत्पन्ना श्रूयतेऽमृतमन्थने ।
भृगोःस्यात्या समुत्पन्नेत्येतदाह कथ भवान ॥१६॥
नित्यैवैण जगन्माता विष्णोः श्रीरनपायिनी।
यथा सवगतो दिप्णुस्तयवेय द्विजोत्तम ॥१७॥
प्रों विष्णुरिय वाणी नीतिरेपा नयो हरि. ।
वोधो विष्णुरिय बुद्धिधर्मोसो सस्क्रिया स्वियम् ॥१८॥
प्रथम ग्रंश-प्र० ] सक्ष विष्णुरियं सृधिः श्र भूमि बरो हरिः । सन्तोपो भगवाल्लमोस्तुष्टिम त्रेय शाश्वतो १३१ इच्छा श्रीभगवान्कामो यज्ञ ऽभौ दक्षिणा वियम् । ग्रान्याहुतिग्सौ देवो पुगेडाशो जनार्दनः १२० पलोशाला मुने लक्ष्मो:प्राग्यशो मधुसूदनः । वितिर्लक्ष्मोह युिप इध्मा श्रीभगवान्कुन. २१ दक्ष मुवी स्याति ने धाता और विधाता नामक दो देवतानो को उत्पन्न किया और लक्ष्मी नामक एक पुत्री को भी जन्म दिया। यही लक्ष्मीनी भगवान् विष्णु की भार्या हुई ॥१॥ मंगजी ने कहा-प्रभो ! लक्ष्मीजी की उत्पत्ति तो अमृत मन्यन के समय क्षीर सागर से हुई बताई जाती है, परंतु माप उन्हें भृगु के द्वारा रयाति के गर्भ से उत्पन्न हुई कैसे कहते हैं ?॥१॥ श्री रासरजी बोले- हे द्विजश्रेट! जिन जगन्माता लक्ष्मीशे का कमी तिरोभाव नही होता, वे तो नित्य ही हैं। भगवान् विष्णु के समान ही यह भी सर्व यापक हैं ॥१७॥ विष्णु अर्थ हैं तो इन्हें बारणो समझो, विष्णु न्याय हैं तो इन्हें नीति मानो, विष्णु बोत्र हैं तो इन्हें बुद्धि जानों, इसी प्रकार यदि विष्णु बुद्धि है तो यह धर्म है । हे मरजी ! दिग्गु इस विश्व के मृष्टा हैं, तो लक्ष्मीजी पृष्टते हैं, विष्णु भूधर हैं तो यह भूमि है, यदि वह सन्तोय हैं तो यह नित्य-नुष्टि १८-१९ यदि विष्णु कामदेर है तो लक्ष्मी जी इन्चा हैं, विषणु यज्ञ हैं तो रह दक्षिणा हैं, वह पुरोडारा हैं तो यह पूताहुति है ।।२०।। हे मुने ! भगवान अधुसूदन यदियजमानशाला हैं तो लक्ष्मीजी पत्नीशाला हैं, विष्णु यूप हैं, तो लक्ष्मी चिति है, यदि वह कुदा हैं तो यह इमा हैं ॥२१॥ सामस्वरूपी भगवानुन्दोतिः कमलालया। स्वाहा लक्ष्मोर्जगन्नायो वासुदेवो हुतादानः।२२। शङ्करो भगवान्छौरिगौरी लक्ष्मीद्विजोत्तम । मैत्रेय केशः सूर्यप्रभा कमलालया ॥२३॥ विष्णु पितृगणः पद्मा स्वधा शाश्वतपुष्टिना । द्या.श्रीः सर्वात्मको विष्णुरवकाशोऽतिविस्तर ॥२४ ६४ ] [ श्रीविष्णुपुराण शशाङ्क श्रीधर पान्ति श्रीस्तथैवानपायिनी। धृतिलक्ष्मीजगवेष्टा वायु रार्यप्रगो हरि १२॥ जलधिद्विज गोविन्दस्तवेला श्रीमहामुने । लक्ष्मीस्वरूपमिन्द्रारणी देवेन्द्रो मधुसूदनः ॥२६॥ यमश्चक्रधर साक्षाबूमोर्णा कमालया । ऋद्धि श्री श्रीघरो देव स्वयमेव धनेश्वर १२७१ गौरी लक्ष्मीमहाभागा केशवो वरुण स्वयम् । श्रीर्देवमेना विप्रेन्द्र देवसेनापतिहरि १२८) भगवार विष्णु साम हैं तो लक्ष्मी उद्गीति हैं, यह हुताशन हैं तो लक्ष्मी स्वाहा हैं । हे द्विजवर । यदि विष्णु शिव हैं तो लक्ष्मी पार्वती हैं, व सूर्य हैं तो यह उनकी प्रभा है ॥ २२-२३ ॥ यदि विष्णु पितरगण हैं तो लक्ष्मीजी नित्य पुष्टि प्रदान करने वाली स्वधा हैं यदि वह अत्यत विस्तृत सर्वा त्मक अवकाश हैं तो यह स्वगलोक हैं ॥२४॥ यदि भगवान् चन्द्रमा है तो लक्ष्मीजी उनको अक्षय क्राति हैं यदि विष्णु सवत्र गमन मे समर्य वायु हैं तो लक्ष्मीजी ममार की गति एव उसकी आश्रय रूपा है ।।२५॥ है महामुने । यदि गोविन्द समुद्र हैं तो लक्ष्मी उनकी तरग हैं यदि भगवान् इन्द्र हैं तो लक्ष्मी इन्द्राणी हैं । यदि विष्णु यम है तो रक्ष्मी यम-भार्या घूमोर्णा हैं, यदि वह कुवेर हैं तो लक्ष्मी साक्षात् ऋद्धि हैं ॥२७॥ भगवान् केशव वरुण हैं तो लक्ष्मी गौरी है । हे विप्रेद्र | श्री विष्णु देव सना के अधिनायक स्वामी काति केय हैं तो लक्ष्मीजी देवसेना है ॥२८॥ अवष्टम्भो गदापारिण शक्तिलक्ष्मोद्विजोत्तम । वाष्ठा लक्ष्मीनिमेपोऽसौ मुहर्तोऽसौ कलावियम् ॥२६॥ ज्योत्स्ना लक्ष्मी प्रदीपोऽमौ सर्व सर्वेश्वरोहरि.। लताभूता जग-माता थीविष्णुद्र मसजित ॥३०॥ विभावरी श्रीदिवसो देवश्चक्रगदाधर । वरप्रदो वरो विष्णुर्वधू पनवनालया ॥३१॥ नदस्वरूपी भगवाञ्छोनदीरूपसस्थिता ।
प्रथम ग्रंश-ग्रः] ध्वजच पुण्डरीकाक्षः पताका कमलालया ३२ तृपणा लक्ष्मोजगमायो लोभो नारायणः परः । रती रागश्च मैत्रेय लक्ष्मीर्णोविन्द एव च ॥३३॥ कि चातियनोक्त न सह क्षेपेरणेदमुच्यते ॥३४॥ देवतियटमनुष्यादौ पुरमा भगवान्हरिः । स्त्रीनाम्नो श्रीश्च विज्ञेया नानयोविद्यते परम् ॥३५॥ है द्विजष्ट 1 भगदान गदाधारी विष्णु मात्रय हैं तो लक्ष्मी जी पनि हैं, भगवान् निमेष है तो यह काटा है, वह मुहूर्त हैं तो यह कला हैं ॥२६॥ यदि सदेवर विष्णु दीपक हैं तो लक्ष्मी ज्योति है, विष्णु वृक्ष है तो नयीजी उगकी लता है।।३०दि बगदाधागे भगवान दिवस है तो लक्ष्मीजी निगा है। यदि वर देने वाले भगवान् विष्णु पर है तो लक्ष्मीजी उनकी वधु ॥३१भगवान् विष्णु नद है वो लक्ष्मीजी नदी हैं, वरललोचन विष्णु ध्वजा है तो कमला पताका हैं ॥३२॥ यदि बगत के स्वामी विपणु लोभ हैं सो समी तृप्ता है और है मैनेय । रवि लक्ष्मी हैं तो राग गोविन्द है ॥३३॥ अपिंक क्या हूं, इतना बना ही टोक है कि देवता, तिर्यक् योनि जीव तया मनुष्यादि में जितने भी पुरुष यज्ञक प्राणी हैं, वह सभी भगवान विष्णु के हा है तथा सभी स्त्री कहाने बाने जीव सक्ष्मीजी के स्वरूप है । इस प्रकार विष्णु और लक्ष्मी से परे कोई भी नहीं है ।।३४-३॥ नवाँ अध्याय इद च शृणु मैत्रेय यत्पृष्टोऽहमिह त्वया । थीसम्बन्धं मयाप्येतर तयासीन्मरीचितः ११ दुर्वासा शङ्करस्यासनचार पृथिवीमिमाम् । सददर्न खन दिवयामृषिविद्याघरोकरे ॥२॥ सन्तानकानामखिल यस्या गन्येन वासितम् ।
१६ ]
[ श्रीविष्णुपुराण
अतिसेव्यमभूब्रह्मन्, तद्वन वनचारिणाम् ।३।
उन्मत्तवतधुग्विप्रस्ता दृष्ट्वा शोभनां स्रजम् ।
ता ययाचे वरारोहा विद्याधरवधू ततः।४।
याचिता तेन तन्वगी माला विद्याधराङ्गना।
ददौ तस्मै विशालाक्षी सादर प्रणिपत्य तम् ।।
तामादायात्मनो मूनि स्रजमुन्मत्तरूपवृक् ।
कृत्वा स विप्रो मैत्रेय परिवभ्राम मेदिनीम् ।।
स ददर्श तमायान्तमुन्मत्तैरावते स्थितम् ।
त्रैलोक्याधिपति देव सह देवैः शचीपतिम् ।।
श्री पराशरजी ने कहा- हे मैनेय ! तुमने जो प्रश्न मुझमे किया,
उस लक्ष्मीजी विषयक इतिहास को मैंने महर्षि मरीचि से सुना था, वह मैं
तुम्हारे प्रति कहता हूँ, तुम उसे श्रवण करो ॥१॥ एक समय की बात है कि
भगवान् शिवजी के प्रशावतार महर्षि दुर्वासाजी भूतल पर विचरण कर रहे थे
तभी उन्हे एक विद्याधरी के हाथ मे सन्तानक पुष्पो की एक दिव्य माला
दिखाई दी । उसकी श्रेष्ठ गन्ध से सुरभित हुआ वह वन वहाँ के रहने वालो के
लिये अत्यन्त सेवनीय हो रहा था ॥२-
२-३|| उस समय उन उन्मत्त वृत्ति
वाले ऋषि श्रेष्ठ ने उस सुन्दर माला को देखकर विद्याधारी से उसकी याचना
पी ॥४॥ उनकी याचना स्वीकार करके उस विशालाक्षी विद्याधरी ने उन
अपि को सादर प्रणाम किया और वह माला उन्हे दे दी ॥५॥ हे मैत्रेय ।
उन्मत्त वेश वाले उन ब्राह्मण श्रेष्ठ ने उस माला को लेकर अपने मस्तक पर
धारण किया और पृथिवी पर विचरण करने लगे ॥६॥ इसी बीच उन्होने
मत्त ऐरायत पर मारूढ हुए तीनो लोकों के स्वामी शचिपति इन्द्र को देवतामों
के सहित उधर पाते
तामात्मनः स शिरस. नजमुन्मत्तपट,पदाम् ।
श्रादायामरराजाय चिक्षेपोन्मत्तवन्मुनिः ।।
गृहीत्वामरराजेन स्रगरावतमूर्द्ध नि ।
न्यस्ता रराज कैलासशिखरे जाह्नवी यथा ।।
देखा ॥७॥
प्रथम अंश-०६] [ ७ मदान्धकारिताक्षोऽसौ गधाकृप्टेन वारण । करेणाघाय चिक्षेप ता स्रज घरगीतले ।१०। ततश्चुकोध भगवान्दुर्वासा मुनिसत्तम । मैनेय देवराज त क द्धश्चैतदुवाच ह ॥११॥ ऐश्वर्य मददुष्टात्मन्नतिस्तब्योऽसि वामव । श्रियो घाम सज यस्व मद्दत्त नाभिनन्दसि ॥१२॥ प्रसाद इति मोक्त ते प्रणिपातपूर सरम् । होत्फुल्लकपोलेन न चापि शिरसा धुता ॥१३॥ मया दत्तामिमा माला यस्मान्न बहु मन्यसे । त्रैलोक्यधीरतो मूढ विनाशमुपयास्यति ।१४॥ मुनि श्रेष्ठ दुर्वासा ने जब उन्ह देखा तो मदमत्त भौंरो की गुजार से से पुक्त उस माला को अपने मरतक से उतार कर होने देवाधिपति इन्द्र के ऊपर फैकी ८॥ इद्र ने उस माला को अपने हाथी ऐरावत के मस्तक पर धारण परा दी, उस समय ऐसी शोभा हुई जैसे कलाश निखर पर पतित- पापनी गगाजी विराजमान हो ॥६॥ परतु वह मदीमत्त हाथी उसकी सुगधि से और भी उन्मत्त हो गया और उसने उसे अपने मस्तक से उतार कर सू घा तथा पृथिवी पर फेंक दिया ॥१०॥ हे मंत्रयजी । जव मुनिवर दुर्गसाजी ने उस माला की ऐसी दुर्दशा देखो तो वह अत्यत क्रोध मे भर कर इद्र से कहने लगे ॥११॥ दुर्वासा बोले- परे, ऐश्चयमा से दूपित हृदप पाले इन्द्र। तू अत्यन्त ढीठ है, तूने मेरे द्वारा प्रदत्त इस अत्यत शोभाधाम माला का किंचित् भी पादर नहीं किया ॥१२॥ तूने न तो प्रणाम ही किया और न यही पहा कि वही कृपा की और न तूने हर्षित मुख से उस माला को ही अपने मस्तक पर धारण किया । तूने मेरे द्वारा दी गई माला का कुछ भी मूल्य नही समझा, इस कारण तेरा तीनो लोको का ऐश्वर्य नष्ट हो जायगा ।।१३-१४॥ मा मन्यसे त्व सदृश नून शक्रतरद्विजे । अतोऽवमानमस्मासु मानिना भवता कृतम् ॥१५॥ गद्दत्ता भवता यस्माशिप्ता माला महीतले।
[ श्रीविष्णुपुराण तस्मात्प्रणष्टलक्ष्मीक त्रैलोक्यं ते भविष्यति ॥१६॥ यस्य सजातकोपस्य भयमेति चराचरम् । त त्वं मामतिगण देवराजावमन्यसे 1१७ महेन्द्रो वारणस्कन्वादवतीर्य पराचित । प्रसादयामास मुनि दुर्वाससमफल्मपम् ॥१८॥ प्रसाद्यमानः स तदा प्रणिपातपुरःसरम् । इत्युवाच सहस्राक्ष दुर्वासा मुनिमत्तमः ॥१६॥ नाह कृपलुहदयो न च मां भजते क्षमा। अन्ये ते मुनयः शक्र दुर्वाससमवेहि माम् ॥२०॥ गौतमादिभिग्न्यस्त्व गर्वमारोपितो मुधा । अशान्तिसारसर्वस्वं दुर्वाससमवेहि माम् ॥२१॥ मरे इन्द्र । तू अवश्य ही मुझे अन्य विप्रो जैसा ही समझता है, तभी तो तूने हमारा इस प्रकार निरादर किया है ॥१॥ तूने मेरे द्वारा दी हुई माला को भूम पर फेंक दिया, इसलिए तेरा यह निभुवन भी अब शीघ्र ही श्री- हीनता को प्राप्त होगा ॥१६॥ अरे देवराज । जिमके क्रोध से भयभीत हुमा यह सम्पूर्ण चराचरात्मक विश्व कम्पायमान होने लगता है, उसी का तूने अत्यन्त महकार पूर्वक इस प्रकार तिरस्कार किया है । ॥१७॥ श्री पराशर जो वोले- यह पुन हर इन्द्र तुरन हो ऐरावत से उतर पडे और अनुनय विप पूर्वक उन पाप-रहित मुनि को प्रसन्न करने लगे ॥१८॥ इन्द्र द्वारा इस प्रकार प्रणामादि किये जाने पर महर्षि दुर्वासा ने उनसे इस प्रकार कहा १६ दुर्वासाजी बोले-है इन्द्र ! मैं कृपालु चित्त वाला नहीं हूँ, मेरे अन्तःकरण मे क्षमा विचित् भी नही ठहर सकती। वह मुनि तो दूसरे ही हैं, मेरा नाम तो दुर्वासा है ॥२०॥ मरे, गौतम भादि पियो ने तुझे प्रसारण ही इतना मुष लगा लिया है, परन्तु याद रखना कि मैं तो सदा ही मसमासोल दुर्वाया हूँ ॥२१॥ वसिष्वाद्यदयासारस्तोत्रं दुवंशिरूयक । गर्व गतोऽसि येनैव मामप्यद्यावमन्यसे १२२॥
प्रथम अंश-ग्र०६ ज्वलज्जटाकलापस्य भृकुटीकुटिल मुखम् । निरीक्ष्य कत्रिभुवने मम यो न गता भयम् ।२३। नाह क्षमिप्ये बहुना किमुक्तेन शतक्रतो । क्टिम्बनामिमा भूय. करोप्यनुनयात्मिकाम् ।२४। इत्युक्त्वा प्रययो विप्रो देवराजाऽपित पुन. । पारुह्य रावन ब्रह्मन् प्रपयावमरावताम् ।२५। तत' प्रभृति नि.श्रीक सशक्र भुवनत्रयम् । मैनेयासीदाध्वस्त सडीणोपधिवीरुधम् ॥२६॥ न यज्ञाः समवर्तन्त न तस्यन्ति तापसाः । गच दानादिधर्मेपु मनश्चके तदा जनः । ७। नि-मत्त्वाः सकला लोका लोभायु ,पतेन्द्रिया.। स्वल्पेऽपि हि बभूवुस्ने मामिलापा द्विजात्तग १२८॥ दयावतार वरिटजी प्रादि ने तेरी बहून-बहुत प्रासा की है, इसलिए तू घोर अहकारी हो गया है, इमो वारण तूने मेरा इस प्रकार से अपमान दिया है ॥२२॥ इससार मे ऐना कोन है जो मेरी टेडी भृकुटि और प्रज्वलित जटा कलाप को देख कर मुभमे न डरता हो ॥२३॥ हे शतक्रतो । पर तू बारम्बार अनुनय विनय करने का टोग करने चला है, परन्तु मुझ पर उसका कोई प्रभाव नहीं है, मैं तुझे कदापि क्षमा नहीं करूंगा ॥२॥ श्री पराशर जी ने कहा-हे विप्र । वह ब्रह्मपि ऐसा कार चले गये और इन्द्र भी अपने ऐरावत पर बैठकर अमरावती को गये ।।०॥ मत्रपत्री । उमी समय से इन्द्र सहित तीनों लोक वृक्ष-लतादिव क्षीण हो जाने के कारण श्रीहीन तथा दम्न होने लगे ॥६।। तमो म यहो के अनुशन स्क गया, तास्त्रियो ने तप और दारियो ने दान करना छोड दिया |आ है विप्रवर ! सभी लो लोमादि के वरा म पड कर पत्त्वहीन हो गए नया तुच्छ पदार्थों को भी बामना करने लगे ॥२८॥ यतः सत्त्व ततो लक्ष्मीः सत्व भूत्यनुनारि च । नि.धीकाणाकुतः सत्त्वं विना तेन गुणा कुतः ।२६।
१०० ] [ श्रीविष्णुपुराण बलशौर्याद्यभावश्च पुरुपाणा गुणविना । लद्धनीय. समस्तस्य बलशौर्य विवजित ।३०। भवत्यपध्वस्तमतिलवित प्रथित पुमान् ।३१। एवमत्यन्तनि श्रीक लाक्ये सत्वजिते । देवान् प्रति बलोद्योग चक दैतेयदानवा ॥३२॥ लोभाभिभूता श्रिीरादत्या सत्त्वविवर्जिताः। थिया विहीनि सत्त्वैर्देवैश्चक स्ततो रणम् ।३३। विजितात्रिदशा दैत्यैरिन्द्राधा शरण ययु । पितामह महाभाग हुनाशनपुरोगमाः।३४। यथावत्कथितो देवव्रह्मा प्राह ततः सुरान् । परापरेश शरण प्रजध्यपसुरादनम् ।३५। उत्पत्तिस्थितिनाशानामहेतु हेतुमोश्चरम् । प्रजापतिपति विष्णुमनन्तमपराजितम् ।३६। कारण कार्यभतयो। प्रणतात्तिहर विष्णु स व श्रेयो विधास्यति ॥३७॥ सत्व लक्ष्मीजी का ही साथी है, इसलिये जहाँ वह होता है, वहीं लक्ष्मीजी का भी निवास रहता है। श्रीहीनो मे सत नही होता इसलिए गुणों की स्थिति ही कसे होगी ? जब गुण नही तो पुरप मे बल शोर्यादि भी नहीं रहता और जिसमे वल शौर्यादि नही, उसे कही भी प्रादर प्राप्त नहीं होता ॥३१॥ इस प्रकार जब तीनो लोक श्री हीन हो गये तब उन धीहत देवतानों पर देखों और दानवों ने प्राक्क्रमण कर दिया ॥३२॥ सत्व मोर वैभव मे रहित होने पर भी दैत्यो न लोभ वे वशीभूत होकर सत्यहीन मौर यौहीन देयतामो से मग्राम छेड दिया ॥३३॥ अन्त मे देवतापो की पराजय हुई, तब इन्द्रादि सब देवताग्री ने मन के नेतृत्व में पितामह ब्रह्माजी की शरण ली ॥३४॥ सब देवतामो की बात सुनकर पितामह ने उनसे पहा-है देवतायो । म दैत्यों का सहार करने वाले भगवान् विष्णु की धरण में नामी, जो विस्त की गृष्टि, पिति मौर प्रलय के कारण है। प्रधानपु सोरजयो प्रथम अंश-अ०६] १०१ किन्तु कारण ही नहीं चराचर के स्वामी, प्रजापतियो के अधिपति, सभी प्राणिपो मे व्याप्त, अन्त-रहित और कभी भी पराजित न होने व ले हैं एव अजन्मा होकर कार्य-रूप में परिवर्तित प्रकृति और पुरुप के भी कारण हैं । इसलिए वही शरणागत वत्सल तुम्हारा अवश्य ही कल्याण वरेंगे ॥३५ ३७॥ एवमुक्त्वा सुरान्सर्वान् ब्रह्मा लोकपितामहः । क्षीरोदस्योत्तरं तीरं तैरेव सहितो ययौ ३८) स गत्या त्रिदशै सर्वः समवेतः पितामहः । तुष्टाव वाभिरिशाभि परावरपति हरिम् ॥३६॥ नमामि सर्व सर्वेशमनन्तमजमव्ययम्। लोकवाम घराधारमप्रकासमभेदिनम् । नारायणमणीयासमशेपारणामणीयताम् । समस्तानां गरिष्ठं च भूरादीना गरीयसाम् ।४।। यत्र सर्व यतः सर्वमुतान्न मत्तुरःसरम । सर्वभूतश्च यो देवः पराणामपि यः परः । ४२। परस्मात्परुपात्परमात्मस्वरूपवुक । योगिभिनित्यते योऽसौमुक्तिहेतोमुमक्षुभिः ४३॥ सत्त्वादयो न सन्तीशे यत्र च प्राकृता गुणाः । रा शुद्धः सर्वशुद्ध भ्य.पुमानाद्यः प्रसीदतु ।४४| श्री पराशरजी ने कहा-हे मंत्रेय जी | सब देवतापो से ऐसा कहते हुए ब्रह्माजी भी उनके साथ उस क्षीर सागर के उत्तरीय किनारे पर पहुंचे, जहाँ भगवान् विष्णु का धाम है । वहां जाकर सभी देवतायो के साथ उन्हो-- उन भगवान को अत्यन्त मगलमय वाणी मे स्तुति की ॥३८-३६। ब्रह्मा, ने कहा-जो समस्त गणुप्रो से सूक्ष्म तथा पृथिवी आदि समम्न गुरु पदा से भी भारी है, उन अबित लोक के पानय, पृथिवी के मार र, अप्र- अभेद, सर्वरूप, सर्वेश्वर, अन्त-रहित, मजन्मा तथा अन्यय भगवान् नारा- को मैं नमस्कार करता हूं 11४०।। जिस परब्रह्म मे मेरे सहित यह पम्पुर विश्व स्थित है तथा जिमसे उत्पन्न हुआ है. पो सर्व भूवमय और परे से । --
१०२ ]
[श्रीविष्णूपुराण
परे है, जो पुरप से परे होने के कारण गुमुक्षुग्रो के द्वारा ध्यान में ही दृष्टि-
गोचर होते है, जिसमे सत्वादि गुणो का प्रभाव है, वह शुद्ध से भी शुद्ध
परमात्म स्प आदि पुरप भगवान् श्री हरि हमारे ऊपर प्रसन्न हो ॥४२-४४॥
कलाकाशमुहूर्तादिकालमूनस्य
गोचरे।
यस्य शत्तिर्न शुद्धस्य स नो विष्णुः प्रसीदतु ॥४॥
प्रोच्यते परमेशो हि यः शुद्धोऽप्युपचारतः ।
प्रसीदतु स नो विष्णुरात्मा यः सर्वदेनिाम् ॥४६॥
यः कारणं च कार्य च कारणस्यापि कारणम् ।
कार्यस्यापि च यः कार्य प्रसीदतु स नो हरिः।४७।
कार्य कार्यस्य यत्कायं तत्कार्यस्यापि यःस्नयम् ।
तत्कार्यकार्यभूतो यस्ततश्च प्रणताः स्म तम्।४८॥
कारणं कारणस्यापि तस्य कारणकारणम् ।
तत्कारणाना हेतु, तं प्रणताः स्म परेश्वरम् ।।
भोत्तार भोपभूत च सष्टार सृज्यमेव च ।
कार्यकर्तृ स्वरुप तं प्रणताः स्म परं पदम् ॥५०॥
प्रयम अश-०६]
विशुद्धबोधन्नित्यमजमक्षयमव्ययम
अव्यक्तमविकारं यत्तद्विष्णोः परमं पदम् ५११
ने स्थून न च सूक्ष्म यन्न विशेपरयगोचरम् ।
तत्पदं परम विष्पो. प्रणमामः सदामलम् ॥५२॥
यस्थायुतायुतामा विश्वशक्तिरिय स्थिता।
परब्रह्मस्वरूप यन्त्रणमामस्तमव्ययम् ॥५३॥
यद्योगिनः सदोद्युक्ता. पुण्यपापक्षयेऽक्षयम् ।
पश्यन्ति प्ररावे चिरय तद्विष्णो परम पदम् ॥५४॥
पन्न देवा न मुनयो न चाह न च शङ्करः ।
जानन्ति परमेशस्य तद्विष्णो. परम पदम् ॥५५॥
शक्तयो यस्य देवस्य ब्रह्मविष्णुशिवात्मिका ।
भवन्त्यभूतपूर्वस्य तद्विष्णोः परमं पदम् ॥५६॥
सर्वेश सर्वभूतात्मन्सर्व मश्रियाच्युत ।
प्रसीद विष्णो भक्तानावज नो दृष्टिगोचरम् ।५७।
जो विमृद्ध, वोप रप, नित्स, जन्म-रहित, मृत्यु-रहित, अयय, अन्यक्त
एव विधार रहित है, वही भगवान विष्णु का परम पद है ॥५१॥ जो न
स्कूल है, न सूक्ष्म हो है, न किसी विशेषण का विषय है, विष्णु भगवान
के उसी परम पद को हम प्रणाम करते हैं ॥५२॥ जिसके अयुताश के भी
अयुतारा में जगत की सृष्टि करने की सामर्थ्य है तथा जो परमहा स्वस्प है,
हम उन्ही मध्यम परमेश्वर को प्रणाम करते हैं ॥५३॥ नित्य एन योगीजन
अपने पुण्य-सापादि सीण होने पर प्रगद के द्वारा चिन्तन योग्य, जिग
अदिनाची पद वा दर्शन करते हैं, भगवान श्रीहरि वा परमपद वही है ॥५४।।
में देवता, कपि, शिवजी और में सभी जानने में असमर्थ है, वही भगवान
श्री हरि श परमपद है ॥५५॥ ब्रह्मा, विष्णु और शिव रूप में जिन पनूनपूर्व
देव को शक्तियां है, वही भगवान् श्री हरि का परमपद है ॥५६।। है मवेश्वर ।
हे सर्व भूतारमन् । है सर्वस्वरूप । है सर्वाधय । है अच्युत । हे भगवान
विष्णो! पाप हम भक्तो पर प्रसन्न होकर हम अपना दशन देन को
कृपा वरिये ॥५॥
१०४ ] [ श्री विष्णुपुराण इत्पुदीरितमाकण्यं ब्रह्मपत्रिदशास्तमः। प्रणम्योचु प्रसोदेति व्रज नो दृष्टिगोचरम् ॥५८। यन्नाय भगवान् ब्रह्मा जानाति परम पदम् । तन्नता. स्म जगद्धाम त्व सर्वगताच्युत ॥५६॥ इत्यन्ते पच परतेश देवाना ब्रह्मणस्तया । ऊचुर्देवर्षयस्सर्वे वृहस्पतिपुरोगमा : अाद्या यज्ञपुमानीडय पूर्वेपा यश्च पूर्वजः । तन्नता स्म जगत्स्रष्टु स्रष्टारमविशेपणम् ॥६॥ भगवन्भूतव्येश यज्ञमूत्तिधराव्यय । प्रसीद प्रणताना त्व सर्वेषा देहि दशनम् ।६२॥ एप ब्रह्मा सहास्माभि. सहरुद्र खिलोचनः । सर्वादिस्य सम पूषा पावकोऽय सहाग्निभिः ।६३। अश्विनी वमवश्वेमे मर्च ते मरद्रता । साध्या विश्वे तया देवा देवेन्द्रश्चायमीश्वरः ।६४। प्रगामप्रवणा नाथ दैत्यसैन्य. पराजिताः । शरण त्यामनुप्राप्ताः समस्ता देवतागणाः १६५॥ श्री पराशरजी ने कहा - ब्रह्माजी द्वारा की गई स्तुति को सुनकर देवतापो ने भी भगवान को प्रणाम किया और इस प्रकार कहने लगे-हे प्रभो! पाप हम पर प्रसन्न होकर हमे दर्शन दें। हे विश्व के प्राथय स्वरूप हे अच्युर! आपके जिस परमपद को यह पितामह ब्रह्माजी भी नहीं जानते, उसे हम नमस्कार करते हैं ॥५६॥ जब ब्रह्माजी और देवगण स्तुति कर चुचे तब वृहस्पति प्रादि देवपियो ने इस प्रकार स्तवन किया - जो परम स्तुतियों पे योग्य प्राद्य यज्ञ पुरुष तथा पूर्वजों में भी पूर्व पुरुप हैं, उन विश्व के रचने वाले परम पिता परमात्मा वो हम नमस्कार करते हैं ॥६०-६१॥ हे भूत भव्येश यज्ञ ग्वरूप प्रभो । हे अय्यय । हम शरणागतो पर प्रसन्न होकर हमें दर्शन दीजिये ॥६॥ हे स्वामिन् । हम सबके सहित यह ब्रह्माजी सब रुद्रो के सहित शिवजी, द्वादर प्रादित्यो ये सहित पूपा, अग्नियो के सहित
प्रथम अंश-अ० १]
पावक, दोनो अश्विनीकुमार, अष्टावसु, मरद्गरण, साध्यगण, विश्वेदेवता और
देवराज इन्द्र यह समस्त देवगरण दैत्य सेना से हारवर अत्यन्त प्रगत होते हुए
पापपी शरण को प्राप्त हुए हैं ॥६३-६५॥
एव सस्तूयमातस्तु भगवाञ्छसचक्रवृक।
जगाम टशन पा मेरेय परमेश्वर. १६६।
त दृष्ट्वा ते तदा देवा: शङ्खचक्रगदाधरम् ।
अपूर्वरूपसस्यान तेजसा राशिमूजितम् ।६७।
प्रणभ्य प्रगता सर्वे सक्षोभस्तिमितेक्षणा.।
पुण्डरीकाक्ष पितामहपुरोगमा १६८१
नमो नमोऽविशेपस्त्व त्व ब्रह्मा त्व पिनाकधूक,।
इन्द्रस्त्वमग्रिः पवनो वरुणः सविता यमः ।।
वसवो मरुत साध्या विश्वेदेवगणाः भवान् ।
योऽय तवाग्रता देव समीप देवतागरणः ।
स त्वमेव जगत्सधा यत. सवंगतो भवान् ।७०।
स्य यज्ञस्त्व वपट,कारस्त्यमोद्धारः प्रजापतिः ।
विद्या वेद्य च सर्वात्मस्त्वन्मय चाखिल जगत् ७१३
स्वामाताः शरण विष्णो प्रयाता दैत्यनिजिता ।
वय प्रसीद सर्वात्मस्तेजसाप्याययस्व न.७२
थी पराशरजी ने कहा-है मैनेयजी । इस प्रकार की स्तुतियो से
प्रसन्न होकर शख चक्र धारण करने वाले भगवान विष्णु उमी समय उनके
सामने प्रकट हो गये ॥६६॥ उस शख, चक्र और गदाघारी उत्कृष्ट तेजपुंज
युक्त पूर्य एव दिव्य स्वरूप के दर्शन कर ब्रह्माजी प्रादि सच देवता अत्यन्त
विनय पूर्वक प्रणाम कर विस्फारित नेनो से देखते हुए, उन पद्मलोचन
भगवान श्री हरि की स्तुति करने लगे ।।६६-६७॥ देवतानो ने कहा-हे नाथ !
पापको नमस्कार है, नमस्कार है। आप ब्रह्मा, शिव, इन्द्र अग्नि, पवन,
वरया, सूर्य, यसरार होते हुए भी निविशेए हैं ॥६६॥ हे प्रभो ! वसुगरण,
मरगाए, शाम्याण, पोर विश्वेदेवता भी माप हो हैं और यह सम्पूर्ण देव
१०६ ] [ श्रीविष्णूपुराण समाज माप ही जगद के रचियता की मूर्ति हैं, क्योकि भाप सवगत एवं परिपूर्ण हैं ॥७०॥ पाप ही यज्ञ, वषट्कार, भोगार एव प्रजापति हैं। है सर्वात्मन् । विद्या, वेद्य और सम्पूर्ण विश्व भी प्रापवा ही स्वरूप है ।।७१॥ हे विष्णो । हे प्रभो । हम दैत्यों से हारकर भातुरता पूर्व प्रापको कारण मे पाये हैं, आप हम पर प्रसन्न होकर अपने तेज से हमें शक्ति सम्पन्न कर दीजिये ॥७२॥ तावदात्तिस्तथा वाञ्छा तावन्मोहस्तथासुखम् । यावन्न याति शरण त्वामशेषाघनाशनम् ॥७३॥ व प्रसाद प्रसनात्मन् प्रपन्नाना कुरुष्व न । तेजसा नाथ सर्वेषा स्वशक्त्याप्यायन कुरु ।७४। एव सस्तूयमानस्तु प्रणतरमरहरि । प्रसन्नदृष्टिभंगवानिदमाह स विश्वकृत् १७५॥ तेजसो भवता देवा करिष्याम्यु-वृहतम् । वदाम्यह यत्क्रियता भवद्भिस्तदिद सुरा ७६' प्रानीय सहिता दैत्य क्षोराब्धी सकलौषधी. । प्रक्षिप्यात्रामृतार्थ ता सकला दैत्यदानवै ७७। मन्थान मन्दर करवा नेत्र कृत्वा च वासुकिम् । मथ्यताममृत देवा सहाये मय्यवस्थिते १७८ सामपूर्वं च दैतेयास्तत्र साहाय्यकर्मणि । सामान्यफलभोक्तारो यूय वाच्या भविष्यथ १७६। मध्यमाने च तत्राब्धौ यत्समुत्पत्स्यतेऽमृतम् । तत्पानादलिनो यूयममराश्च भविष्यथ 1401 तथा चाह करिष्यामि ते यथा विदशद्विष । न प्राप्स्यन्त्यमृत देवा केवल क्लेशभागिन | हे नाय । मापा जो मानय सभी प्राणियों के पापों को नष्ट कर देने में समर्थ है, उसको यह प्राणी जब तक प्राप्त नहीं करता, तब तक वह हीनता, इच्छा, मोह मोर दुखादि से मुक्त नहीं होता ॥७३॥ हे प्रसन्नात्मद !
प्रथम अश-अ०६]
[ १०७
हम शरणागतो पर प्रसन्न होकर हमारे नष्ट हुए तेज को अपनी शक्ति से पुनः
प्रवद्ध कीजिए l
यो पराशरजी ने वहा-विनम्र हुए देवगण द्वारा इस प्रकार स्तुत
होकर जगत्ला भगवान विष्णु ने प्रसन्न होकर कहा ॥७॥ हे देवताप्रो !
मैं तुम्हारे तेज की पुनः वृद्धि करूंगा, अब मैं जो कुछ कहूँ वही तुम करो
1॥७६।। तुम दैत्यों से मिलकर सभी प्रौपधियां लाकर अमृत प्राप्ति के निमित
उन्हें क्षीर सागर में डाल दो, मन्दराचल की रई और वासुकि नाग की नेती
बनायो फिर दैत्यो और दानवों के सहयोग से समुद्र मयन करो और सते
अमृत निकालो ।।७८-७८॥ इस समय तुम साम नोति के अवलम्बन पूर्वक
दैत्यो के पास जाकर उनसे कहो कि इस कार्य में हमारी सहायता करने के
कारण इसके समानाय पर पाप लोगो का भी अधिकार होगा ॥६॥ है
देवगण । समुद्र मयन से जिस अमृत की प्राप्ति होगी, उसे पीकर तुम बलवान
एव अमर हो जानोगे 1०॥ हे देवतामो! उस समय मैं ऐसी युक्ति निकालूगा,
जिससे तुम्हारे वैरी देत्यगण अमृत प्राप्त न कर सकेंगे और उनके भाग मे
"मुद्र मथन के परिश्रम से प्राप्त क्लेश हो रहेगा ।।८१॥
इत्युक्ता देवदेवेन सर्व एव तदा सुराः ।
सन्धानमसुरैः कृत्वा यत्नवन्तोऽमृतेऽभवन् ।रा
नानौपधो. समानाय देवदैतेयदानवाः ।
क्षिप्त्वा क्षीराविशयसि शरदभ्रामलत्विपि ।।
मन्यान मन्दरं कृत्वा नेन कृत्वा च वासुकिम् ।
ततो मथितमारपब्धा मैनेय तरसामृतम् ।४।
विबुधाः सहिताः सर्वे यतः पुच्छ ततः कृताः ।
कृष्णेन वासुकेर्दैत्याः पूर्णकाये निवेशिताः ।
ते तस्य मुखनि.श्वासवह्नितापहत विपः ।
निस्तेजसोऽसुराः सव वभूवुरमितौजसः ।।६।
तेनैव
मुखनिःश्वासवायुनास्तबलाहकः ।
पुच्छप्रदेशे वर्षभ्दिस्तदा त्राप्यायिताःसुराः ।।५।
१०८ ] [ श्रीविष्णुपुराए श्री पराशरजी ने कहा-देव देव भगवान् के ऐसे वचन सुनकर सभी देवतायो ने दैत्यो के पास जागर सधि कर ली और अमृत-प्राप्ति में प्रयत्नवान हुए ॥२॥ हे मंत्रेय जी। देवताग्रो दानवो और दैत्यो ने नाना प्रकार की औषधियो ला-ला कर एकत्र की और उन्हें सरदाकाश जैसी स्वच्छ कान्ति वाले क्षीर सागर के जल में डाल दिया। फिर मंदराचल की रई और पासुकि नाग की नेती बनाकर अत्यात वेग पूर्वक रागुद्र में अमृत का मन्थन करने लगे ॥८३ ८४।। जिस मोर वासुकि को पूछ थी, उस ओर भगवान ने देवताप्रो को तथा मख कीमोर दंत्यो को खडा विया ॥६५॥ अत्यन्त तेजस्वी वासुकि नाग के मस से निकलती हुई श्यास ज्याला मे जलते हुए दंत्यगण तेजहीन हो गये तथा उनी श्वासोच्छवास से क्षत-विक्षत हुए मेघो के पूछ की प्रोर बरसते रहने से देवताग्रो की शक्ति मे वृद्धि होती गई ॥१७॥ क्षीर दमध्ये भगवान्कूमरूपी स्वय हरि । मन्थनादरधिष्ठान भ्रमतोऽभून्महामुने । रूपेणान्येन देवाना मध्ये चक्रगदाधर । चर्ष नागगजान दैत्यमध्येऽपरेण च ।६। उपर्याक्रान्तबाच्छैल बृहद् पेण केशवः । तथापरेण मैत्रेययन्न दृष्ट सुरासुरै ।। तेजमा नामराजान तथाप्यायितवान्हरिः। अन्येन तेजसा देवानुपवृहितवान्प्रभुः ।६१। मध्यमाने ततस्तस्मिन्क्षाराब्धो देवदानवै. । हविर्धामाभवत्पूर्व सुरभिः सुरपूजिता १२॥ जग्मुमुद तता देवा दानवाश्च महामुने । व्याक्षिप्तचेतसश्चैव बभूवुः स्तिनितेक्षणा. 1६३। किमेतदिति सिद्धना दिदि चिन्तयता ततः। बभूव वारुणी देवी मदापूरिणतलोचना l हे महामुने ! भगवान् ने पूर्म रूप धारण कर क्षीर सागर मे नमते हुए मन्दराचल को पाश्रय रूप हो अपने ऊपर धारण किया 11८। वहीं यक मौर प्रथम अश-अ.] [ १११ गदा के धारण करने वाले भगवान एक अन्य रूप से देवताग्री में तपजो ने और रूप से दैत्यो मे मिलकर वासुकि रूम नेती को खीचने लगे और एक अन्पों अत्यन्त विशाल रूप से जो देवता या दैत्य किसी को दिखाई नहीं दे रहा था, उस रई रूपी मदराचल को ऊपर से दाव लिया था।द-01| अपने ही तेज से उन्होंने वासुकि मे बल का सचार किया और अपने ही तेज से देवतानो मे चल की वृद्धि की ॥४१॥ इस प्रभार देवतानो और दैत्यो द्वारा क्षीर सागर का मथन किय जाने पर सर्व प्रथम हवि की प्राश्रय म्पा कामधेनु निक्लो ॥३२॥ उम समय देवता और दैत्य सभी अत्यन्त प्रानन्दित हुए और उसकी पोर चित्त के प्रापित होने के कारण वे उसे एकटक देखने लगे ॥३३॥ फिर यह क्या है ? इसे जानने के इच्छक सिद्धो के सामने मद से फिरते हुए नेगो वाली वारणी देवी रत्पन्न हुई ॥१४॥ कृतावर्तात्ततस्तस्मात्क्षीरोदाहासयञ्जगत् । गन्धेन पारिजातोऽभूवनीनन्दनस्तरु १९५१ रूपौदार्यगुणोपेतस्तथा चाप्सरसा गणः । क्षीरोदधे. समुत्पन्नो मैत्रेय परमाम्दुतः ।। तत. शीताशुरभवञ्जगृहे त महेश्वरः । जगृहुश्च विष नागा क्षीरोदाधिसमुत्थितम् ।। ततो धन्वन्तरिकः श्वेताम्बरधरास्वयम् । विभ्रकमण्डलुपूर्णममृतस्य समुत्थितः ।। तत. स्वस्थमनस्कास्ते सवतेयदानवाः। वभूवुर्मुदिता सर्वे मैत्रेय मुनिभि सह ।। ततः स्फुरत्कान्ति विककसिामले स्थिता। धीर्देवी पयसस्तस्मादुम्दता घृतपङ्कजा ।१००। ता तुष्टुवुर्मुदा युक्ता. श्रीसूक्तन महर्पयः विश्वावसुमुखास्तस्या गन्धर्वा पुरतो जगुः १०११ धृताचीप्रमुखास्तन ननृतुश्वाप्सरोगण ! गङ्गायाः सरितस्तोयैः स्नानार्थमुपस्थिरे ।१०२॥
॥ १०५ [ भीविष्णुपुराण इसके पश्चात् पुनः गथन प्रारम्भ हुघा और अपनी गध रो त्रैलोक्य । सुगधित करने वाला और देवतारियो वे प्रानन्द को बढाने वाला बल्पवृष "उससे प्रकट हुअा ॥६५॥ फिर रूप एवं उदारता आदि गुणो से परिपूर्ण अत्यन्त प्रभुत अप्सरायें उस क्षीर सागर से निकली ॥१६॥ तत्पश्चात् चन्द्रमा उत्पन्न हुआ, जिसे शिवजी ने ले लिया और फिर जो विष निकले उन्हें नागो ने ग्रहण किया ॥६७। इसके बाद श्वेत वस्त्र धारण किये हुए भगवान धन्वन्तरिजी प्रकट हुए, उनके हाथ मे अमृत से परिपूण कमण्डर था ॥९८ हे मैत्रेय जी । उरा रामय मुनियो के सहित सभी दैत्य-दानर अत्यन्त स्वस्थ चित्त और हर्षित हो उठे ॥६॥ फिर खिले हुए कमल प वैठी हुई अत्यन्त नान्तिमयी लक्ष्मी जी हाथो मे बमल का पुष्प लिए हुए क्षार सागर में निकली ॥१००॥ उसके समय महपियों ने श्री सूक्त सेउनकी स्तुति प्रारम्भ को और विश्वावसु आदि गन्धव उनके सामने गाने लगे ॥१०॥(पौर घृताची प्रादि अप्सराय नाचने लगी तथा लक्ष्मी जी का अपने जल से अभिषेक कराने के लिए गगा प्रादि सरिताएं स्वय वहां उपस्थित हुई ।।१०।।) दिग्गजा हेमपात्रस्थमादाय विमल जलम् । स्नापमाञ्चक्रिरे देवीं सर्वलोक महेश्वरीम् ।१०३। क्षीरोदो रूपधृक्तस्यै मालामम्लानपङ्कजाम् । ददौ विभूपणान्यङ्ग विश्वकर्मा चकार ह ।१०४। दि यमाल्याम्बरधरा स्नाता भूपणभूपित्ता। पश्यता सर्वदेवाना ययौ वक्ष स्यल हरे ।१०५॥ तया विल किता देवा हरिवक्ष स्यलस्यया। लक्ष्म्या मैत्रय सहसा परौ नि तिमागता. ।१०६। उद्वेग परम जग्मुदत्या विष्णुपराड,मुखा । स्यता लक्ष्म्पा महाभाग विप्रचितिपुरोगमा ।१०। ततस्ते जगृहुदैत्या धरुन्तरिकरस्थितम् । वमण्डल, महावोर्या पत्रास्तेऽमृतमुत्तमम् ॥१०॥ मायया मोहयित्वा ताविष्णु स्रीरूपसस्थित. । दानवेभ्यस्तपादाय देवेभ्यः प्रददौ प्रभु ।१०।
प्रथम अंश-अ.]
[ १११
स्वर क्लगों में भरे हुए उन गगादि के पविभ जल से दिग्गो ने
लक्ष्मीजी को स्नान कराया पौर घोर सागर ने मूर्तिमान होकर कमल-पुषों
पी माला उन्हें भेंट को तथा स्वयं विश्वकर्मा ने उनके मगों मे भाभूपए
धारण कराये ॥१०३-१०४॥ इस प्रकार दिप वस्त्राभूपरा धारण करके
श्री लक्ष्मी जी देवगण के सामने ही भगवान विष्णु के प्रशस्पल में प्रति.
टित हो गई ॥१०॥ है मैप जी! मगवान के वक्षस्थल में विराजमान
लक्ष्मी जी के पात से देवगण परम प्रसन्न हुए ॥१०६।। उस समय भी
लक्ष्मी जी के परित्यक्त होने से विचित्ति ग्रादि देवों को अत्यन्त उद्विग्नवा
हुई ॥१०॥ तब उन मयन्त पलो दैयो ने परिजी के हाथ से से
हुए कमण्डलु को छीन लिपा । इसलिए स्त्री रूप धारण कर भगवान
विष्य ने दानवो को अपनी माया से मोहित कर उनसे कमरा लेकर
देवतानो कोदे दिया ॥१०८-१०६।।
तत. पपुः सुरगणाः शकाद्यास्तत्तदामृतम् ।
उद्यत्तायुपनिनिशा दैत्यास्ताच समभ्ययः ११०॥
पीतेऽमृते च बलिभिर्देवदैत्यचमूस्तदा ।
बध्यमाना दिसो भेजे पाताल च विवेश वै ११११
ततो देवा मुदा युक्ता. शङ्खचक्रगदामृतम् ।
प्रणिपत्य ययापूर्वमाशासत्तत्तिविष्टपम् ।११२॥
ततः प्रसनभा. सूर्यः प्रययौ स्वेन वत्मना ।
ज्योतीपि च यथामार्ग प्रययुर्मुनिसत्तम ।११३।
जज्वाल भगवानोच्दैवारदीप्तिविभावसुः ।
धर्मेच सर्वभूताना तदा मतिरजायत ।११४॥
नैलोक्य च धिया जुष्टं बभूव द्विजसत्तम ।
शक्रश्च रिदशः पुनः श्रीमानजायत ।११५१
सिंहासनगतः शकस्सम्प्राप्य त्रिदिदा पुनः।
देवराज्ये स्थितो देवी तुष्टावाजकरा तत ११
तब इन्द्रादि देवतापो ने उस मनृत का पान कर लिया, इनमे कोधित
हुए दैत्यगण ने तीक्ष्ण खङ्गादि शन लेकर देवतायो पर माक्रमण कर दिया
११२ ] [ श्रीविष्णुपुराण ॥११०॥ परन्तु, अमृत पीपर बयान होने के कारण दैत्यो की सव सेरा देवताओं द्वारा परास्त हो गई और मरती-बटनी हुई इधर-उपर भाग गई उनमे से कुछ दंत्य पाताल लोक मे चले गये ॥१११।। इसके पश्चात् शख चक्र गदाधारी भगवान् विष्णु को प्रणाम कर सब देवगण वहाँ से प्रसन्न होते हुए चल दिए और पूबवर स्वर्ग का शामन करन लगे ॥११२॥ है मुनिसत्तम । उसी समय से अत्यन्त तेजोमय भगवान भास्कर ने अपन मार्ग पर तथा तारागरण ने अपने मार्ग पर चलना प्रारम्भ किया ॥११॥ श्रेष्ठ दीप्तिमय अग्नि देवता अत्यन्त प्रज्वनित होने लगे और प्राणिया मे धम की भी प्रवृत्ति होने लगी ॥११४॥ हे द्विज थष्ठ । लोक्य श्री सम्पन्न हो गया और देवश्रेष्ठ इन्द्र भी श्री से युक्त होगये ।।११।। इद्र ने स्वर्ग में पहुंचकर पुन वहाँ का गज्य प्राप्त किया और राज्यापद पर अभिषिक्त होकर पद्म हस्ता श्री लक्ष्मी जी की स्तुति करने लगे ।।११।। नमस्ये सर्वलोकाना जननोमब्जसम्भवाम् । नियमुनिद्रपद्माक्षी विष्णुवक्ष स्थलस्थिताम् ।११७॥ पद्मालया पमकरा पद्मपत्रनिभेक्षणाम् । वन्दे पद्ममुखी देवी पद्मनाभप्रियामहम् ।११८॥ त्व सिद्धिस्त्व स्वधा स्वाहा सुधा त्व लोकपाती। सन्ध्या रात्रि प्रभा भूतिर्मेधा श्रद्धा सरस्वती ।११६। यज्ञविद्या महाविद्या गुह्यविद्या च शोभने । प्रात्मविद्या च देवि त्व विमुक्तिफलदायिनी ।१२०॥ श्रान्वीक्षिकी त्रयीवार्ता दण्डनीतिस्त्वमेव च । सौम्यासौम्यजंगद्र पस्त्व येत वि पूरितम्।१२१॥ फा त्वन्या त्वामृते देवि सर्वयज्ञमय वपु । अध्यास्टे देवदेवस्य योगिचिन्त्य गदाभृत ।१२२। त्वया देवि परित्यक्त सपल भुवननयम् । विनष्टप्रायमभवत्त्वयेदानी समेधितम् । १२३। हद ने पहा-सम्पूर्ण लोगो की माता, सिते हुए कमल जैसे नेत्र यानी, भगवान श्रीहरि पे वक्ष स्यल मे प्रतिष्ठित, कमल से प्राविर्भूत हुई प्रथम अंश-ग्रह [ ११३ श्री लक्ष्मी जी को मेरा नमस्कार है ॥११॥ कमल ही जिनका प्राश्रय स्थान तथा कमल ही जिनके हायो में मुशोभित है और मन दल के समान हो जिनके लोचन हैं, उन पद्ममुखी और पानाग प्रिया श्री लक्ष्मीजी का में वन्दन करता हूँ॥१९८॥ है देवि ! तुम मिदि, स्वधा, म्दाहा, स्वचा रूप तथा तीनो लोकों को पवित्र करने वाली हो, तुम ही सध्या, रात्रि, प्रभा, विभूति, मेघा, श्रद्धा एवं सरस्वती हो । हे शोभने ' तुम हो यन विद्या और महाविद्या हो तथा तुम हो मक्ति फल के देने वाली पात्मविद्या हो ॥१२०॥ हे देवि ! तुम ही तर्क विद्या, वेदनयो, वार्ता एव दण्ड नौनि हो, तुम हो ने इस समस्त मसार को अपने शान्त और उप स्पों से ब्यान कर रखा है ॥१२॥ हे देवि ! तुम्हारे अतिरिकत ऐमो कोई अन्य नारी नहीं है जो देवाधिदेव भगवान् विष्णु के योगो जनो द्वारा चिन्तनीय सर्वपक्षमय देह का मायय प्राप्त कर सके ।।१२२॥ हे देवि ! तुम्हारे द्वारा त्यानी जाने पर पह त्रिलोकी नष्ट प्राय हो चली थी, अब तुमने ही उसे पुनर्जीवन प्रदान किया है।।१२३॥ दारा पुत्रास्तयागारसुहद्धान्य घनादिकम् । भवत्येतन्महाभागे नित्य त्वद्वीक्षणान्नृणाम् ॥१४॥ शरीरारोग्यमश्वर्यमरिपक्षक्षय सुखम् देवित्त्वदृष्टिदृष्टानो पुस्पारणा न दुर्लभम् ॥१२॥ त्व माता सर्वलोकाना देवदेवो हरिः पिता । स्वयतद्विष्णुना चाम्ब जगद्व्यात चराचरम् ॥१२६॥ मा न कोश' तथा गोष्ठ मा गृह मा परिच्छदम् । मा शरीर मलन च त्यजेथा. सर्वपावनि १२७। मा पुत्रान्मा सुहृद्वर्ग मा पशून्मा विभूपणम् । त्यजेथा मम देवस्य विष्णोक्ष स्यलालये (१२८ सत्त्वेन सत्यशौचाम्या तथा शोलादिभिर्गुण। त्यज्यन्त ते नरा. सद्य सन्त्यक्ता ये त्वयामले ॥१२॥ त्वया विलाकिता सद्य. शीलायरग्विलगुरणः । सुलश्वर्यञ्च युज्यन्ते पुरुषा निगुणा अपि ११३०॥
११४ ] [ श्रीविष्णुपुराण है महाभागे । स्त्री, पुत्र, घर, धन, धान्य और गुहृदों की प्राप्ति भी तुम्हारी कृपा दृष्टि से ही होती है। हे देवि ! जो पुरुष प्रापवे कृपापात्र है, उन्हे सदैव शारीरिक आरोग्य, ऐश्वयं, शत्रुओं का नाश तथा सुखादि कुछ भी अलभ्य नही है ॥१२४-१२५ ॥ तुम सर्व लोको की जननी हो धौर देवदेव भगवान् विष्णु जगत्पिता हैं। तुम दोनो से ही यह चराचरात्मक सम्पूर्ण विश्व व्याप्त है ।।१२६॥ हे सर्व पावनि । हे जननी । हमारे कोश, गोष्ठ, घर, भोग्य वस्तु, देह तथा स्त्री प्रादि का तुम कभी भी त्याग न करना ॥१२॥ हे विष्णु भगवान् के वक्षस्थल में निवास करने वाली मातेश्वरी । हमारे पुत्र, सुहृद, पशु और अलकारादि भी कभी आप से रहित न हो ॥१२॥ हे अमले । तुम जिनका त्याग कर देती हो, उनका सत्य, शौच और शीलादि गुण भी शीघ्र ही त्याग कर देते हैं ॥१२६॥ किन्तु तुम्हारे कृपा दृष्टि प्राप्त होने पर गुणहीन भी शीलादि गुणो से शीघ्र ही सम्पन्न होकर कुलीनता और ऐश्वर्यादि से परिपूर्ण हो जाता है ।।१२६-१३०।। स श्लाघ्य. स गुणी धन्यः स कुलीनः स बुद्धिमान् । स शुरः स च विक्रान्तो यस्त्वया देवि वीक्षितः ।१३१॥ सद्यो वे गुण्यमायान्ति शीलाद्या सकला गुणा. । पराड, मुखी जगद्धात्री यस्य त्वा विष्णु वल्लभे ।१३२। न ते वर्णयितु शक्ता गुणाजिह्वापि वेधसः । प्रसीद देवि पद्माक्षि मास्मस्त्यि क्षी. कदाचन ।१३३। एव श्रीः सस्तुता सम्यक् प्राह देवो शतक्रतुम् । शृण्वतां सर्वदेवाना सर्वभूतस्थिता द्विज ॥१३४] परितुष्टास्मि देवेश स्तोत्रेणानेन ते हरे । वर वृणीष्व यस्त्विष्टो वरदाह नवागता ।१३५॥ वरदा यदि मे देवि वगहों यदि वाप्यहम् । त्रैलोक्य न त्वया त्याज्यमेप मेऽस्तु वर पर. १३६। स्तोत्रेण यस्तथतेन त्वा स्तोप्यत्यब्धिसम्भवे । स त्वया न परित्याज्यो द्वितीयोऽस्तु वरो मम ।१३७१ हे देवि ! जिस पर तुम्हारी कृपा-दृष्टि रहती है, यह मनुष्य अवश्य ही प्रथम अग म०६] [ ११५ प्रशंसा के योग्य है, वह गुरग, कुलीन, तूर, पराक्रमी, बुद्धिमान एवं धन्यमान्य है ।।१३१॥ हे विष्णुदनने ! हे बगदात्री नुम निगवे विमुच होती हो, उनके गोल प्रादि सनी गुरा अवगुरा वन वाले हैं ॥१३॥हे देवि ! तुम्हारे गुणों के दर्शन में ब्रह्मा जी की जिह्वा मो असमय है । इसरिर हे पमनोरने ! अब तुम मुन्न पर प्रसन्न होमो और कभी भी मेरा त्याग न करो ॥१॥यी परागर जी ने कहा-हे ब्रह्म ! इस प्रकार स्तुत होती हुई बंभूतस्यिता श्रीलक्ष्मीजी सब देवतानों की सम्थिति में इन्द्र से दोलीं ॥३४॥ श्री लक्ष्मीजी ने कहा है देदेश ! मैं तेरे स्तोत्र में अन्न उन हुई है, तुम्हें दिम वस्तु की कामना हो, वही मुम्नै मांगों। तुम्हें वर प्रदान करने के लिये ते में यहाँ माई हूँ ॥१३॥ इस पर इन्द्र ने कहा- देवि! यदि तुम मुझे वर-शति के योग्य समन् कर वर देना ही चाहनी हो तो प्रपन तो मुझे यही वर दो कि तप कनी त्रिलोकी का लाग न करोगी ।।१३६॥ हे समुद्रोमूत्रे ! मुझे द्वितीय वर यह दो कि मेरे इस स्तोत्र से जो मनुष्य तुम्हारी स्तुति करे, उसका तुम सभी भी त्याग न करोगी ॥१३॥ त्रैलोक्यं त्रिदा श्रेष्ठ न सन्त्यक्ष्यामि वासव । दत्तो वरो मया यस्ते स्तोत्रागवन तुष्टया ॥१३॥ यच सायं तथा प्रातः स्तोत्रेणानेन मानवः । मां स्तोप्यति न तस्याहं मविप्यामि पराड मुखी ॥१३॥ एवंदी दर देवो देवराजाय वै पुरा । मंच श्रीमहामागा ताबाराधनतोपिता ११४०। भृगोः स्यात्यां समुत्पन्ना प्रोः पूर्वमुदघेः पुनः। देवदानवयत्नेन प्रभूतामृतमन्यने ।१४१॥ एवं यदा जगत्स्वामी देवदेवो जनार्दनः । अवतारं करोत्येषा तदा श्रीस्तत्सहायिनी ।१४२। पुनन्त्र पद्मादुत्पन्ना आदित्योऽभूद्यदा हरिः। यदा तु मार्गवा रामस्नदानदरणी त्वियम् ।१४३। राघवत्वेन्नवत्मोता रुक्मिणों कृष्णजन्मनि । अन्पु चावतारेषु विप्योरेपानसायिनी ।१४४।
का ११६ ] | श्रीविष्णुपुराण श्री लक्ष्मीजी ने वहा है देवताओ मे श्रेष्ठ इन्द्र ! मैं अब इस भैलोक्य का कभी त्याग न करूंगी, मैं तेरे स्तोत्र से प्रसन्न होकर तुझे यह वर प्रदान करती हूँ ॥१३८।। जो मनुष्य प्रातः साय तेरे इस स्तोत्र में मेरा स्तव करेगा मैं उससे विमुख कभी न हूँगी ॥१३६॥ श्री पराशरजी ने कहा-हे मवेयजी । पूर्वकाल मे इस प्रकार देवराज इन्द्र की स्तुति से रातुष्ट हुई श्रीलक्ष्मीजी ने उन्हें उक्त वर प्रदान किये ॥१४०॥ पहिले वै लक्ष्मीजी भृगु के द्वारा उनकी ख्याति नामक स्त्री के गर्म से उद्भूत हुई थी, फिर वह समुद्र मथन के समय देवतागो और दानवो के प्रयत्न से क्षीर मागर से प्रकट हुई थी ॥१४१।। इस प्रकार जगतानि देवाधि देव भगवान थीहरि जब-जब अवतार लेते हैं, तब-तब लक्ष्मीजी भी उनके साथ इस भूतल पर पाती हैं ॥१४२।। जब भगवान् विष्णु श्रादित्य रूप हुए तब वे कमल से उत्पन्न हुई और जब उन्होने परशुराम अवतार धारण किया तब लक्ष्मी जी ही पृथिवी हुई ॥१४३। जब उन्होंने रामावतार लिया तब यह सीताजी हुई और कुष्णावतार मे रक्मिणी हुई। इसी प्रकार भगवान ने जो अन्य अनेक अवतार धारण किये, उनमे रो किमी में भी भगवान् रो अलग नहीं रहतीं ॥१४४।। देवत्वे देवदेहेऽय मनुष्यत्वे च मानुपी । विष्णोदेहानुरूमा वै करोत्येपात्मनस्तनुम् ॥१४५। यश्चतच्छणुयाज्जन्म लक्षम्या यश्च पठेन्नरः । थियो न विच्युतिस्तस्य गृहे यावत्कुल वयम् ॥१४६। पाठयते येपु चैवेय गृहेषु श्रीस्तुतिमुने । अल्क्ष्मीः कलहाचारा न तेप्यास्ते कदाचन ।१४७। एतत्ते कथित ब्रहान्यन्मा त्व परिपृच्छसि । क्षाराब्धौ श्रीयंया जाता पूर्व भृगुसुता सती । १४८६ इति सकलविभूत्यवाप्तिहेतुः । स्तुतिरियमिन्द्रमुखोद्रता हि लक्षम्याः । अनुदिनमिह पठ्यते नृभिय- राति न तेषु कदाचिदप्यलक्ष्मीः ।१४६१) जप भगवान् देव रूप होत हैं, तव लक्ष्मीजी दिव्य रूप धारण करती प्रथम ग्रंश-प्र.१०] [ ११७ है और वव वह मनुष्य में अवतार लेते हैं दददद भी मानवी हो गयी है । भगवान के दानुन्त ही यह भी माना देह पाती हैं घोलनोत्री के उन्म की इन क्या को जो कोई पदेना का यत्रा करेला नमक सह के तीनों बुनों लोदाकनी भी नाम नहीं होना ॥१४६॥ गुने ! सनीली रेस्तांना जिन परों में पास होता रहना है, पने कलह की प्रायर बम्बा दरिद्रता कमी भी नहीं टिकी ॥१४॥ हे द्रा । तुमने यह प्रटन शिका या पिउन सक्नौजी गुवी की पुत्री यों तो फिर इनकी पत्ति और नागर में विकार हुई, का समाधान मैंने इस वृतान्त के द्वारा कर दिया है ॥१४॥ इन प्रकार इन्द्र-मुब ई टसन ने यह स्तुति मुनी विभूतिों को शान कराने वाली है. इसका बी नित्य नियमित रूप में पाठ र उनके यहां निनावी न रहेगी ॥१४॥ दशवाँ अध्याय कथितं मे त्या सर्व यत्पृष्टो-सि नया मुने। गुमलनृत्येष सर्गो मे कथ्यता पुनः ।। मृगाः स्यात्यां समुत्पन्ना लक्ष्मीविष्णुपरित्रहः। तया पानृविधाज्ञारो स्यात्या जाती नुतो नृगाः ॥२॥ प्रारतिनियतिचंच मेरो: कन्ये महात्मनः । भार्वे धातृविवात्रोते तयोर्माता मुनाबुनी ।। प्राणश्च व मृकाटुन मार्कण्डेयो मृकण्युतः । ततो वेदभिरा जने प्राणत्यापि मुतं शृणु।। प्राणस्य चुतिमान्युयो राजवान ततोऽभवत् । ततो व शो महाभाग विस्तर मार्गबा गतः ॥ पली मरीः सन्भूतिः पौर्णमाउमनुरत । रिजाः पर्वतश्च व तस्य पुत्रौ महात्मनः ।।
११८ ]- [ श्रीविष्णुपुराण श्री मैत्रेय जी ने कहा- हे मुने ! मापसे मैने जो प्रश्न किया था, वह सब कुछ आपने बता दिया, अब पृपा करके भृगु-सतति से लेकर, सम्पूर्ण सृष्टि का सुझसे वार्णन करिये ॥१॥ श्री पराशरजी बोले-भृगुजी द्वारा रयाति के गर्भ से विष्णुभार्या लक्ष्मीजी तथा धाता और विधाता नामक दो पुत्रों की उत्पत्ति हुई ।।२।। उन धाता, विधाता का विवाह महात्मा मेरु वी मायति और नियति नाम की पुत्रियों से सम्पन्न हुआ, जिनसे प्राण पोर मृकण्ड नामक दो पुत्र उत्पन्न हुए। मृकण्डु के पुत्र मार्कण्डेय हुए, जिनसे वेदशिरा का जाम हुमा । अब प्राण की रातति कहता हूं, उसे सुनो ॥३-४|| प्रारए का पुत्र द्युतिमान् हुमा, धुतिमान का पुत्र राजवान और उस राजवान से ही भृगुवंश का अत्यत विस्तार हुआ ।।५।। मरीचि की पत्नी सम्भूति से पौर्णमास हुमा, उसके विरजा और पर्वत नाम के दो पुत्र हुए ॥३।। वशसकीर्तने पुत्रान्वदिष्येऽह ततो द्विज । रमृतिश्चाङ्गिरसः पत्नी प्रसूता कन्यकास्तथा 101 सिनीवाली कुहूश्च व राका चानुमतिस्तथा। अनसूया तथवावेजज्ञे निष्कल्मषान सुतान् ।। सोम दुर्वासस चव दत्तात्रेय च योगिनम् । प्रोत्या पुलस्त्यभ र्याया दतोलिस्तत्सुनोऽभवत् ।। पूर्व जन्मनि योऽगस्त्यः स्मृतः स्वायम्भुवेऽन्तरे । कर्दमश्चोव रोयाश्च सहिष्णश्च सुतास्थ्य. 1१०1 क्षमा तु सुपुवे भार्या पुलहस्य प्रजापतेः । तोन सन्ततिर्भार्या वालखिल्यानसूयत ।११। पष्टिपुत्रसहस्राणि मुनीनामूल रेतसाम् । अङ्ग पर्व मात्राणा ज्वलद्भास्करतेजसाम् ॥१२॥ ऊर्जाया तु वशिष्ठस्य सप्ताजायन्त यं सुताः। रजो गोत्रोद्ध्वं बाहुश्च सवनश्चानघस्तथा ॥१३॥ सुतपाः शुक इत्येते सर्वे सप्तपंयोऽमलाः। योऽसावान्यभिमानी स्याद् ब्रह्मणस्तनयोऽग्रजः ।१४।
प्रथम अंश-H०१०] [ ११६ तस्मात्स्वाहा सुताल्लेभे नौनुदारोजसो द्विज । पावकं पवमान तु शुचिं चापि जलाशिनम् ॥१५॥ है द्विज । जब उनको वशावलि कहूँ। तब उन दोनों की गति को बागा । अगिरा की भार्या स्मृति में विनोदाली, कुहू, राका और अनुमति नाम दी वन्वाघों ने जन्म लिया । प्रवि-पत्नी अनन्या ने चन्द्रमा, टवाना और दत्तात्रेय को उत्पन्न किया । पुलम्य की पली प्रोति से दलोनि की उत्पनि हुई जो स्यायम्मुव मन्वन्तर में अपने जन्म में प्रगस्त्य नाम से प्रसिद्ध था प्रजापति पुलह की भार्या क्षमा से कदम, उदरीयान् वया सहिष्णु नाम में तीन पुत्र उत्पन्न हुए । तु की सन्तति नाम की पत्नी ने अगले के पोरों के समान देह वारे तथा प्रखर मूर्य के समान प्रत्यत तेज वाले वालखिल्मादि साठ सहर -रेता पुत्र उत्पन्त दिये ।।१०-१२॥ वसिजी की जर्जा नाम की पत्नी से रज, गोत्र, जवाह, सपन, अनप, नुतपा और शुक्र नाम के सात पुत्र हुए, पह, सनी स्वच्छ स्वभाव वाले सप्तपि हुए। ब्रह्माजी का ज्पेट पुन जो अग्निी का अनिमानी देवता है. उसकी स्वाहा नाम को भार्या ने प्रस्थत तेजस्वी पावकः पदमान और जल भक्षक गुचि, इन तीन पुत्रों को जन्म दिया ।।१३-१५॥ तेपा सु सन्ततावन्ये चत्वारिंगच्च पञ्च च । वथ्यन्ने वह्नयश्चंते पिता पुत्रत्रय य यत् ॥१६॥ एवमेकोनपञ्चाशद्वह्नयः परिकीतिता। पितरो ब्रह्मणा नृप्टा व्याख्याता ये मया द्विज ॥१७॥ अग्निप्वात्ता बहिषदोऽनग्नय. साग्नयन ये। तेभ्यः स्वधा सुते जने मैना व धारिणी तथा ॥१|| ते उभे ब्रह्मवादिन्यो योगिन्यावप्ने द्विज । उत्तमनानमम्पन्ने सर्वेः समुदितYणे. ॥१॥ इत्येपा दक्षकन्याना कयितापत्यसन्तति । श्रद्धावान्सस्मरल्नेतामनपरयो न जायते ॥२०॥ टन तीनों के पैतालोस पुत्र हुए । अग्नि और उनके तीन पुत्रों को मिल यह सब उनचास अग्नि कहे जाते हैं। हे दिन ! दहाजी द्वारा रचित जिा १२० ] [ श्रीविष्णुपुराण अनग्निक अग्निष्वात्ता और साग्निक वहिपद प्रादि पितरो के विषय में जो तुम्हें बताया था, उनके द्वारा स्वधा के गभ से मेना और धारिणी नाम्नी दो पुश्रिया उत्पन्न हुई ॥१६-१८॥ यह दोनो ही श्रष्ठ ज्ञान चाली सवगुण सम्पमा तथा योगिनी थी ॥१६॥ इस प्रकार यह दक्ष-सुतायो की वश परम्परा कही गई, इसे जो व्यक्ति श्रद्धा पूवक स्मरण करता है, वह पुत्रवान होता है ॥२०॥ ग्यारवाँ अध्याय प्रियव्रतोत्तानपादौ मनो स्वायभुवस्य तु। द्वौ पुनी तु मह वायौं धमज्ञौ कथितौ तव ॥१॥ तयोरुतानपादस्य सुरुच्यामुतम सूत । अभीष्टायामभद्रह्मपितुरत्य तवल्लभ ॥२॥ सुनीति म या राशस्तस्यासी-महिपो द्विज । सनातिप्रीतिमास्तस्यामभूद्यस्याघ्र व सुत ।।३।। राजासन स्थितस्याङ्क पितुतिरमाश्रितम् । दृष्ट्वोत्तम ध्र वश्वक्रे तमारानु मनोरथम् ॥४॥ प्रत्यक्ष भूपतिस्तस्या सुरुच्या नाभ्यनन्दत । प्रएयेनागत पुत्रमुत्सङ्गारोहणोत्सुकम् ॥५॥ सपत्नीताय दृष्ट्वा तमद्वारोहणात्सुकम् । स्वपुत्रं च तथारढ सुरचिक्यिमब्रवीत् ॥६॥ क्रियते पिवृथा यस महानेष मनोरथ । अन्यत्रीगमजातेग ह्यसम्भूय ममोदरे ॥७॥ श्री पराशर जी न पहा-हे मंत्रेय जी । मैं तुम्हें स्वायभुव मनु में प्रियाप्त पार उत्तानपाद नामक दो अत्यत यली पौर धर्मश पुत्री से विषय में पहा हूँ। उनमे उत्तानपाद की पत्नी मुरुचि ने उत्तम नामप एष पुत्र उत्पन्न पिपापौर उम्रकी मुनीति नाम की राजमहिषी न घ. नाम पुत्र को जन्म प्रथम प्रश-०११ । । १२१ दिया, इस राज महिपी में राजा का विशेष प्रेम नहीं था ॥१-३॥ एक दिन जब राज्यामन पर पास्ट पिता की गोद मे उत्तम वैठा था, उस समय ध्रव की इच्छा भी राजा की गोद में बैठने को हुई । परतु अपनी प्रेयसी सुरुचि के सामने राजा ने अपने उस पुन को गोद मे न लिया और सुरुचि ने अपनी सौत के पुत्र को गोद मे चढने को उत्सु क और अपने पुत्र को गोद में बैठा देख पर उससे कहा कि तू मेरे उदर के अतिरिक्त किसी अन्य स्त्री का पुत्र होकर भी ऐसी महान् इदा कर रहा है ? ॥४-७॥ उत्तमोत्तममप्राप्यमविवेको हि वाञ्छसि । मत्य सुतस्त्वमप्यस्य किन्तु न त्व मया धृतः ।।८।! एतद्राजासन सर्वभूभृत्सश्रय कोतनम् । योग्य ममैव पुनस्य किमारमा क्लिश्यते त्वया ॥६॥ उच्चमनोरथस्तऽय मत्पुनस्यैव किं वृया। सुनीत्यामात्मनो जन्म कि त्वण नावगम्यते ।।१०।। उत्सृज्य पितर बालस्तच्छ त्वा मातृभापितम् । जागम कुपितो मातुनिजाया द्विज मन्दिरम् ॥११॥ त दृष्ट्वा कुषित पुतमीपत्प्रस्फुरिताधरम् । सुनीतिरङ्कमारोप्य मैत्रेयेदमभापत ॥१२॥ वत्स क: कापहेतुस्के कश्च त्वा नाभिनन्दति । कोऽवजानाति पितर वत्स यस्तेऽपराध्यति ।।१३।। इत्युक्त सकल मात्र कथयामाम तद्यथा । सुरुचि प्राह भूपालप्रत्यक्षमतिविता ॥१४॥ विनि.श्वस्येति कथिते तस्मिन्पुरेण दुर्मना । श्वासक्षामेक्षणा दोना सुनीतिक्यिमब्रवीत् ॥१५॥ तु विवेक हीन है, इसीलिए अलभ्य और श्रेय वस्तु का मनोरथ करता है। यद्यपि तू भी इन्ती महाराज से उत्पन है, परतु मेरे गर्म से जन्म नहीं लिया है। सभी चक्रवर्ती नरेगों का श्राश्रय स्प यह राज्य सिंहासन मेरे ही पुत्र के बैठने योग्य है, इसकी इच्छा कर तू व्यय ही क्यों अपने चित्त को १२२ ] [ श्रीविष्णुपुराण सन्तप्त करता है ? ॥८६॥ तू मेरे पुत्र के समान ही ऐसी उच्च मावामा को क्यों धारण किये हुए है ? क्या तुझे ज्ञात नही है कि तू सुनीति का पुत्र है ? ||१०|| श्री पराशरजी ने कहा-हे ब्रह्मन् ! विमाता की बात सुन कर बालक प्रव को क्रोध प्रागया और वह पिता के पाससे हट कर अपनी माता के भवन में पहुंचा उस समय उसके ओंठ कांप रहे थे। सुनीति ने अपने पुत्र को इस प्रकार प्राता हुमा देखा तो उसने उसे गोद मे बिठाते हुए पूछा-हँ बेटा ! क्रोधित क्यो हो रहा है, किसने तेरा अपमान किया है ? तेरा अपराध करके कौन तेरे पिता को अपमानित करने जारहा है ? ॥११-१३॥ श्री पराशरजी ने कहा- इस प्रकार का प्रश्न सुन कर ध्रुव ने पिता के सामने ही सुरुचि द्वारा कही गई सब बातें सुनाई । पुत्र जब सिसकते हुए इस बात को कह रहा था तब सुनते- सुनते राजमहिपो सुनौति खिन्न चित्त से दीर्घ निःश्वास छोडते हुए कहने लगी ॥१४-१५॥ सुरुचिः सत्यमाहेद मन्दभाग्योति पुत्रक । न हि पुण्यवतां वत्स सपलरेवमुच्यते ॥१६॥ नो गस्तात कर्त्तव्य. कृत यद्भवता पुरा । तत्कोऽपहत्त शक्रोति दातुकश्चाकृत त्वया ॥१७॥ तत्त्वया नात्र कर्त्तव्य दुःख तद्वावयसम्भवम् ।। राजासन राजच्छत्र वराश्ववरवारणाः। यस्य पुण्यानि तस्यैते मत्वंतच्छाम्य पुत्रक ।१९। अन्यजन्मकृतं. पुण्य सुरुच्या सुरुचिर्नृपः। भार्योति प्रोच्यते चान्या मद्विधा पुण्यजिता ॥२०॥ पुण्योपचयसम्पर स्तस्याः पत्रस्तथोत्तमः। मम पुत्रस्तथा जातः स्वल्पपुण्यो ध्र वो भवान् ।२।। तथापि दुःख न भवान् कर्त्त महंति पुत्रक । यस्य यावत्स तेनंव स्वेन तुष्यति मानवः ॥२५॥ सुनीति योली-हे पुत्र ! सुरुचि का पहना यथार्थ है, तू मन्द भाग्य है इगीलिये उसने ऐसा कहा है, क्यो कि पुण्यवान के सामने ऐसा कहने' 1 १९४ ] [ श्री विष्णुपुराण स्वय ढलता हुमा पाजाता है, वैसे ही सत्पात्र पुस्पो पे पास समस्त वैभव अपने पाप हो पा पहुंचता है ॥२४॥ ध्रव ने कहा-हे माता । मेरे चित्त की शान्ति के लिये तुमने जो कुछ कहा है, वह उसके कठोर वचनो रो विभे हुए मेरे हृदय मे ठहर नही पाता । इसलिये अब मैं वही करुगा, जिसके द्वारा सब लोको में सम्मानित सर्व-श्रेष्ठ पद को प्रात हो सकू ॥२६॥ यद्यपि राजा की प्रेयसी सुरुचि अवश्य ही भाग्य वाली है और मैं उसके उदर से उत्पन्न नही हुआ है, फिर भी अपने गर्भ द्वारा प्रवृद्ध किये गय इस बालक के प्रभाव को भी देख लेना । जिस उत्तम को सुरचि ने जन्म दिया, वह भी मेरा भाई ही तो है । पिता का दिया हुआ राजपद उसी को मिले। क्योंकि किसी दूसरे के द्वारा दिये हुए पद की अभिलापा नहीं करता, मैं तो अपने पुरुषार्थ से ही उस पद को पाना चाहता हूँ जिसे पिताजी भी न प्राप्त कर राके हैं ।।२७-२६॥ निजगाम गृहान्मातुरित्युक्त्वा मातर ध्र वः । पुराञ्च निगम्य ततस्तद्वाह्योपवन ययौ ।३०। स ददर्श मुनीस्तत्र सप्त पूर्वागतान्ध्र वः । कृष्णाजिनोत्तरीयेषु विष्टरेपु समास्थितान् ।३१॥ रा राजपुत्रस्तान्रान्प्रिणिपत्याभ्यभाषत । प्रश्रयावनतः सम्यगभिवादनपूर्मकम् ॥३२॥ उत्तानपादतनय मा निवोधत सत्तमाः। जात सुनील्या निवदाद्य उमाक' प्राप्तमन्तिकम् ।३३। चतु पञ्चाब्दसम्भूतो बालस्त्व नृपनन्दन । निर्वेदकारण किञ्चित्तव नाद्यापि वर्तते ३४॥ न चिन्त्य भवत. किञ्चिध्रियते भूपतिः पिताः । न चंवेवियोगादि तव पश्याम बालक।३५॥ शरोरे न च ते व्याधिरस्माभिरूपलक्ष्यते । निर्वेदः विनिमित्तस्ते कथ्यता यदि विद्यते ।३६॥ श्री परारजी ने कहा-माता के प्रति यह कह कर ध्र व उसके भवन से १२६ ] [ श्रीविष्णुपुराण माह दे पार फिर यह भी पता कि हम तेरी क्या सहायता पर साते हैं. हमें प्रतीत होता है कि तू हममे कुछ कहने की इच्छा करता है ॥३९-४01 प्रय बोले-है द्विजसत्तम । मैं पन या राज्य नहीं पाहता, में तो देवल वही पर प्राप्त करना चाहता हूँ जिसका भोग पहिले कभी किसी ने न रिया हो । हे मुनि- कर ! यदि भाप यह बताने की कृपा करें कि मुझे सबसे परगण्य पह स्थान किस कम से उपलब्ध हो सकता है तो यह बहुत वही सहायता होगी ।।४१-४२स अनाराधितगोविन्दै रैः स्थान नृपात्मज न हि सम्प्राप्यते तस्मादाराधयाच्युतम् ।४३॥ परः पराणा पुरुपो यस्य तुष्टो जनादनः । स प्राप्नोत्यक्षय स्यानमेतत्सत्यं मयोदितम् ।४४॥ यस्यान्तः सतमेवेदमच्युतस्याव्ययात्मनः । तमाराधय गोविन्द स्थानमग्र यदीच्छसि ।।५। परं ब्रह्म पर घाम योऽसौ ब्रह्म तथा परम् । तमाराध्य हरिं याति मुक्तिमप्यतिदुर्लभाम् ।४६। ऐन्द्रमिन्द्रः परं स्थान यमाराध्य जगत्पतिम् । प्राप यज्ञपति विष्णु समाराधय सुव्रत 1४७॥ यो यज्ञपुरुषो यज्ञो योगेशः परमः तस्मिस्तुष्टे यदप्राप्य किं तदस्ति जनार्दने 1४1 प्राप्नोष्याराधिते विष्णो मनसा यद्यदिन्छसि । त्रैलोक्यान्तर्गतं स्थान किमु वत्सोत्तमोत्तमम् ॥४६॥ मरीचि ने कहा-हे नृपात्मज | भगवान गोविन्द की आराधना के बिना मनुष्य को वैसे स्थान की प्राप्ति नहीं हो सकती, इसलिये तू उन्ही अच्युत नारायण की आराधना कर ॥४३॥ अत्रि ने कहा-जो परम पुरुष जनार्दन परा प्रकृति से भी परे हैं, वह जिस से प्रसन्न होते हैं, वही उस प्रक्षयपद को प्राप्त होता है। मेरा यह वचन अक्षरशः सत्य है ॥४४॥ अगिरा ने कहा-यदि तू अग्र-स्थान की फामना करता है तो जो अव्ययतात्मा अच्युत इस सम्पूर्ण विश्व मे व्याप्त हैं, सन्ही की भाकापना कर १४५।। पुलस्त्य ने कहा-परस्वरूप, पर ब्रह्म मौर पुमान् ।
प्रथम प्रश-० ११ ] ! १२७ परमधाम म्प भगवान् श्री हरि की उगमना से मनुष्य को प्रत्यत दुलंम मोक्ष भी प्राप्त हो जाती है 1॥४६॥ पुलह ने कहा- इन्द्र ने भी जिन जगनाय विष्णु का भारापन करके इन्द्रपद को प्राप्त दिया था, उन्ही यशपति भगवान की प्राराधना तू भी कर ॥४७॥ क्रतु ने कहा-जो भगवान् जनादन परम-पुरुष, यज्ञ पुरूष तपा योगश्वर हैं, उनके प्रसन्न होने पर ऐसी कौन-सी वस्तु है, जो अलभ्य हो? ॥४॥ वसिय ने कहा-भगवान् विष्णु की प्राराधना करके तू जो भी इच्छा करेगा उसी को तुझे प्राप्ति जायगी, लोक्य के यत्र से बेष्ठ स्थान का तो कहना ही क्या 7॥४६॥ पाराध्यः कथितो देवो भवद्भिप्रगतस्य मे। मया तत्परितापाय यक्षप्तन्य तदुच्यताम् ।५०१ यथा चाराधन तस्य मया कार्य महात्मनः । प्रसादमुमुग्वाम्तन्मे कथयन्तु महर्पय. ५१ राजपुत्र यथा विष्णोगराधनपरनरः। कार्यमाराधन तन्नो ययावन्योतुमर्हसि ॥५२॥ वाह्यादखिलाचित त्याजयेत्यम नर । तस्मिन्नेव जगद्धाम्नि तत कुर्वीत निश्चलम् ॥१३॥ एवमेकाग्रचिलेन तन्मयेत घृतात्मना। जलव्यं यनिवोधनत्तन पार्थिवनन्दन ।५४) हिरण्यगर्भपुरुपप्रधानाव्यक्तरूपिणे ॐ नमो वासुदेवाय शुद्धज्ञानस्वरूपिणे ॥५॥ एतअजाप भगवान् जप्य स्वायम्भुवो मनु । पितामहस्तव पुग तस्य तुष्टी जनार्दन ॥५६॥ ददौ ययाभिनपिता सिद्धि त्रैलोक्यदुलं माम् । तया त्वमपि गोविन्द तोषयतत्सदा जपन् ।५७। घ्र व बोले-हे महपियो मापने मुझे माराव्य का उपदेश दो कर दिया, परतु अब मुझे यह भी बताने की कृपा करें कि उनको प्रसन्न करने के लिया जादरला पाहिये। जन महसुल्प की पारशला को मिली १२८ ] [ श्रीविष्णुपुराण - मुझे सहर्ष बताइये ॥५०-५१॥ ऋपियो ने कहा है राजपुत्र भगवान् विष्णु की प्राराधना मे लगे हुए पुरुपो को जिस प्रकार उनकी उपासना करतो चाहिये, वह हममे सुन ॥५२॥ सर्व प्रथम मभी वाह्य विषयो से मन को हटा कर उन जगद्धाम मे स्थिर करे। इस प्रकार एकाग्र चित्त से तन्मयता पूर्वक जिम प्रकार जा-विधान वह श्रवण कर ॥५४॥ हिरण्यगर्भ पुरुष, प्रधान, अव्यक्त तथा शुद्ध ज्ञान रूप भगवान वासुदेव को नमस्कार है ॥५५॥ इस ॐ नमो भगवते वासु-देवाय मत्र का जाप पहिले तेरे पितामह स्वायभुव मनु ने किया था, तब उन पर प्रसन होकर भगवान ने उन्हे अभिलाषित मिद्धि प्रदान की थी। उहीं के समान तू भी इसका निरन्तर जप करके भगवान गोविद की प्रसनता प्राप्त कर ॥५६-५७॥ यत । वारहवाँ अध्याय निशम्यतदशेपेण मैत्रेय नृपतेः सुत । निर्जगाम बनातस्गात्परिणपत्य स तानुपीन ११॥ कृतकृत्यमिवात्मान मन्यमानस्ततो द्विज । मधुसन महापुण्य जगाम यमुनातटम् ॥२॥ पुनश्च मधुसज्ञन दैत्येनाधिष्ठित ततो मधुवन नाम्ना ख्यातमन महीतले ।। हत्वा च लवण रक्षो मधुपुत्र महावलम् । शत्रुघ्नो मधुरा नाम पुरी या चकार वै।४ यन व देवदेवस्य सानिध्य हरिमेघस । सर्वपापहरे तस्मिस्तपस्तीर्थे चवार रा'।५। मरीचिमुग्यमुनिभिर्य याद्दिष्टमभूत्तथा प्रात्मन्यशपदेवेश स्थित विष्णुममन्यत ।६। अनन्यचेतसस्तस्य घ्यायतो भगवान्हरि. । सर्वभूतगतो पिप्र सर्वभावगतोऽभवत् ।
प्रयन ग्रंश-०१२॥ [ १२६ श्री पराशरजो ने कहा है मंत्रेयजी । ऋपियों को दान सुन कर राजमार राव ने उन्हें प्रणाम किया और वह उस उपवन से चल दिया ॥१॥ फिर वह अपने सो अत्यन वृत-पत्य मानना हा यमुना तट पर स्थित मधु नामक वन में पाया । उम वन में मनु नामक देल रहने लगा या, इस कारण उमा नाम मधुवन हुआ था ॥२-३।। वहीं उन मयु के पुत्र लवण का वध करके गाल ने मधुरा नामक एक नमर की स्थापना की ॥४॥ जिस पधुवन में देवाधि- देव नगवान् विष्णु को सदैव सन्निधि रहती है, उसी में जाकर ध्रुव ने घोर तप किया ॥५४॥ मरीपि ग्रादि महपियों के उपदेशानुसार ही उसने अग्ने हृदय में नितिन देवेश्वर भगवान् श्रीहरि के ध्यान का प्रन्याम किया और हे विष । इस प्रकार अनन्य चित से ध्यान मग्ने रहने से उसके हृदय में सब भूतो में निवास करने वाले भगवान् विष्णु सर्व भाव मे प्रकट हुए ॥६-311 मन्स्यवस्थित तस्मिविषाण) मैत्रेय योगिनः । न शशाक घगभारमुद्रोडु भूतधारिणो 11 वामपादस्यिले तस्मिनामार्द्धन मेदिनी । द्वितीय च ननामा क्षिते क्षिणतः स्थिते ।। पादाङ्ग प्लेन सम्पीड्य यदा स वसुधा स्थितः । तदा समस्ता वसुधा चचाल सह पर्वत ।१० नद्यो नदा: समुद्राश्च सङ क्षौम परम ययुः। तत्क्षोभादमराः क्षोम परं जग्मुमहामुने ।११॥ यामा नाम तदा देवा मैनेय परमाकुला । इन्द्रय सह सम्मन्न्य ध्यानमग प्रचक्रमु १२॥ कूष्माएडा विविध रूपमहेन्द्र स महामुने । समाधिभङ्गमत्यन्नमारब्धाः क मातरा ॥१३॥ सुनोति म तन्माता साता तत्तुरत म्यिता। पुत्रेति करुणा वाचमाह मायामयी तदा ॥१४॥ पुनकास्मानिवर्तम्ब शरीरात्ययदारुणान् । निर्बन्धतो मया लब्धो बहुभिस्व मनोरथ.श
१३० ]
[ श्रीविष्णुपुराण
हे मंत्रेयजी । जब योगी ध्रव के चित्त मे भगवान् विष्णु स्थित हो
गये, तब सब भूनो की धरियो पृथिवी उसका बोझ वहन करने में असमर्थ हो
गई । उसके बाए घरण के बल खड़े होने के कारण पृथिवी का भो बामा
आधा भाग नीचे को झुक गया तथा दाएं चरण से खडे होने पर दांया भाग
झुक गया जब वह पाव वे अगूठे से पृथिवी को मध्य में से दबा कर स्थित
हुआ तब पर्वतो सहित सम्पूर्ण भूमण्डल चलायमान हो उदा ।१०। हे महामुने । उस
समय नद, नदी भौर समुद्र मादि भी प्रत्यत क्षुब्ध प्रतीत होने लगे तथा देवतामों
में भी इससे घोर हलचल होने लगी ॥११॥ हे मैत्रेयजी | उस समय काम
नामक देवतामों ने इन्द्र के साथ मत्रणा की और ध्रव का ध्यान मग करने का
उपाय करने लगे ॥१२॥ फिर इन्द्र के साथ मिल कर अत्यन्त मातुर
दुष्माएड नामक देवगए विभिन्न रूप धारण करके उसरी समाधि भग करने मे
तत्पर हुए ॥१३।। उम समय माया मे निर्मित हुई उसकी माता सुनीति समत
नेत्र मये समक्ष प्रकट हावर वरुण स्वर मे, हे पूत्र, हे पुत्र । पुकारने लगी
पौर बोली कि देह को नष्ट मरने वाले इस भयकर तप को त्याग दे, क्योकि
मैंने बड़ी-बडी मनौतियाँ गना पर तुझे प्रास दिया था ॥१४.१५॥
दीनामेवा परित्यक्तुमनाया न त्वमर्हसि ।
सपत्नावचनाद्वरस अगतेस्व गतिमम ।६।
कप त्व पञ्चवर्षीयः क चतद्दारण तप ।
निवर्तता मनः कष्टानिय पारफलवजितात् ॥१७॥
पाल मोहनपानान्ते तदन्तेऽध्ययनस्य ते ।
तत: समस्तभागाना तदन्ते चेष्यते तप १८॥
पात:नोडनसाना यस्तष यालस्य पुनर ।
सम्मिस्त्वमिच्छसि तपःविनासायात्मनो रतः ॥१६॥
मरणीति परमा धर्मो वयोऽवस्पानियानमम् ।
अनुवान मा मोहानिवरिमादधर्मतः ॥२०॥
पशियजति वरसाध पतन भवानप।
पश्याम्यमित वापरततो ये पत्यास्तव ॥२१॥
प्रयम अम-प्र. १२ ]
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हे पुत्र । सौत के कठोर वचनों के कारण मुझ दुखिया का मी त्याग कर
देना तेरे लिये नित नहीं है । मुम्द प्राप्रय होना का पात्रप तो एक मात्र तू ही
१६॥ कहाँ तो तेरी पांच वर्ष की अवस्या और कहां यह प्रत्युत्र तपस्या ?मरे
बेटा ! इस निष्फल और क्लेशयुन आग्रह ने विमुख हो१७ क्योंकि ममी तो तेरी
आयु खेलने कूदने की ही है, फिर अध्ययन करने योग्य होगी, उसके बाद भोगों
को भोगने का समय होगा और मन में तप करने की अवस्था प्रान होगी ।१८।
हे पुत्र । तुल मुकुमार की जो बाल्यावस्या है, इस सेतने की अदम्या में तू
उपस्सा का अभिलापी हुआ है, अरे, तू क्या इससे अपना सर्वनाम करने को
तत्पर है ? १३) मुझे प्रसन्न करना हो तेरा परम धर्म है, इसलिये तू अपनी
मायु अनुकूल ही कर्मों को कर, मोह का अनुवर्तन और इयु तपस्या रूपी
अधर्म से अव विमुक्त होता ॥२०॥ हे पुत्र । यदि तू पाज अपने इस तप रूप
हठ का त्याग न करेगा तो मैं तेरे ही समक्ष अपने प्राण विसर्जन कर
दूंगी ॥२१॥
ता प्रलापबनीमेवं वाप्पाकुलविलोचनाम् ।
समाहितमना विष्णो पश्यन्नपि न दृष्टवान् ।२२।
वत्स वन्म सुधारारिए रक्षाम्येतानि भीपणे ।
दनेऽभ्युद्यतालागि समायान्त्यपगम्यताम् ॥२२॥
इत्युक्त्वा प्रययौ साथ रक्षाम्याविर्वमुनतः ।
अभ्युद्यतौग्रासारिण ज्वालामालाकुलमुसः।२४
ततो नादानतीवोगावाजपुत्रस्य ते पुरः ।
मुमुदीशस्त्राणि भ्रामयन्नो निशाचरा:
शिवाश्च शतशो नेदुः सज्वालार बलमुंबः ।
त्रासाय तस्य वालम्य योगयुक्तस्य सर्वदा ॥२३॥
हन्यता हन्यतामेप छिचना छिद्यतामयम् ।
भक्ष्यता भक्ष्यता चातमित्यूचुम्ते निशाचरा. २७)
ततो नानाविधान्नादान् सिहोष्ट्रमकराननाः ।
त्रासाय राजपुषस्थ नेदुस्ते रजनीचराः ॥२०॥
१३२ ] [धीविष्णुपुराण थी पराशरजी ने यहा - हे मैत्रेयजी । ध्र व का चित्त भगवान् यीर्ति मे तन्मयता पूवर लगा हुना था, इसलिय उसन अपनी माता हरिणी माया ! प्रभूपात पूवर विलाप करते देख पर भी नही देखा ॥२२॥ यह देस पर वह माया 'अरे पुत्र उठ, यहाँ स शीघ्र ही भाग निकन दस इस घार वन मे यह भयकार राक्षस कैसे शम्श्राम्य ग्रहण किये हुए प्रारह हैं ऐसा यहती हुई वहाँ से चल दी और तभी एसे अनेक राक्षस वहां प्रकट होगय जिन हाथो मे शस्नाम्न थ और मुख से अग्नि की लपटें निकल रही या ॥२३२४॥ उन राक्षसा ने अपने प्रत्यत चमचमाते हुऐ शस्त्रो दो उडाता और प्रव के सामने भीषण कोलाहल किया ॥२५॥ उस नित्य योगयुक्त वातव प्र.व को डराने के उद्देश्य से मुग्व से अग्नि की चिंगारियां छोडती हुई संकटा गदडियाँ वहाँ घोर शब्द करने लगी ॥२६॥ और ये राक्षस भी मारो, काटा, भक्षण करो इस प्रकार चीखने लगे तथा सिंह, ऊँट, मकर आदि जैसे मुख वाले भपकार राक्षस भी उस राजकुमार को गस्त करने पे लिये अनेक प्रकार से गजना करने लगे ॥२८॥ रक्षासि तानि ते नादा शिवास्तान्यायुधानि च । गोविन्दासक्तचित्तस्य ययुर्ने'न्द्रयगोचरम् ।२६ एकाग्रचेता सतत विष्णुमेवात्मसश्रयम् । दृटवा-पृथिवीनाथपुरो नान्य कयञ्चन ।३०। तत सर्वासु मायासु विलोनासु पुन सुरा । सक्षोभ परम जग्मुस्तत्पराभवशङ्किता ॥३१॥ ते समेत्य जगद्यानिमनादिनिधन हरिम् । शरण्य शरण यातास्तपसा तस्य तापिता ॥३२॥ जगन्नाथ परेश पुरुपोत्तभ । ध्र वस्य तपसा ततास्त्वा वय शरण गता ॥३३॥ दिने दिने कलालेश शशाइ पूयते यथा । तथाय तपसा दव प्रयात्युद्धिमहर्निशम् ॥३४॥ दवदव प्रमय अंश-प्र०१२ ] [ १६३ प्रोत्तानयादितपसा यमित्य जनार्दन । भीतास्त्वां शरणं यातास्तपसस्टं निवर्तय 1३५ परंतु भगवान में प्रासक्त चित वाले उस बालक को स्थारियां और उनके शब्द तया राक्षस और उनको गर्जन तण शस्त्रास्त्र कुछ भी दिखाई न पहे ॥२६॥ वह राजकुमार एकाग्र चिंत्त से अपने प्राथय स्वरूप भगवान विष्णु को हो देसना रहा, उनके अतिरिक्त उसने किसी अन्य को नहीं देखा ॥३०॥ इस प्रकार उस सम्पुर्ण माया के विपीन होने से देवगण उमरे हारने की प्राशया करते हुए मत्यंत भयभीत हुए ॥३१॥ इसलिए उमके तप से व्याकुल हुए वे परस्पर मिल कर ससार के मादि कारण, सरणागत वल्लल, प्रादि-रहित तथा पन्त-विहीन भगवान विष्णु की शरण में पहुंचे । ३२॥ देवतापो ने पहा - हे देव- देव ! है जगनाप ! हे परब्रह्म, हे पुरुषोतम ध्रव के तप को देख कर हन ध्याकुल हो रहे हैं, इसलिये पापपी शरण को प्राप्त हुए हैं ॥३३॥ देव ! जैसे चन्द्रमा प्रपनी कलानी के द्वारा नित्य वृद्धि को प्राप्त होता है, वैसे ही अपने तप के प्रभार से वह दिन-राधि निरनर वृद्धि को प्राप्त हो रहा है ।।:४॥ हे बनार्दन ! हम उत्तानपाद सुत ध्रुव के तप से दर कर प्रापकी शरण में उपस्थित हुए हैं, माप उसे तपस्या से निवृत परिये ॥३५॥ म विद्यः किस शत्रत्व मूर्यवं किमभीप्सति । वित्तपाम्बुपसोमानो सामिलापः पदेपु किम् ॥३६॥ तदस्माक प्रसीदेश हृदयाच्छन्यमुद्धर। उत्तानपादतनयं तपसः नेन्द्रस्य न च सूपत्वं नेवाभ्युपधनेशताम् । प्रार्थयत्येप य कामंत करोम्बखिलं सुराः ।। पान देवा पयाकाम स्वस्थान विगतज्वराः। निवर्तायाम्पह वाले तपस्यारतमानसम् ॥३६॥ दत्पुरता देवदेवेन प्रसम्म तिः प्रययुः स्वानि घियानि पातमतुपुरोगमा. ४०। सन्निवत्तय ।३१ १३४ ] [श्री विष्णुपुराण भगवानपि सर्वात्मा तन्मयत्वेन तोपितः । गत्वा ध्र वमुवाचेद चतुर्भुजवपुर्हरि ॥४॥ औत्तानपादे भद्र ते तपसा परितोपितः। वरदोऽहमनुप्राप्तो वर बरय सुव्रतः ।४२॥ बाह्यार्थनिरपेक्ष ते मयि चित्त यदाहितम् । तुष्टोऽह भवतस्तेन तवृणीष्व वर परम् 1४३। वह इन्द्रत्व की कामना करता है अथवा सूर्यत्व प्राप्त करना चाहता है या यह कुबेर, वरुण, चन्द्रमा में से किसी के पद की प्राप्ति- अभिलापा करता है यह हमें ज्ञात नहीं है ॥३६॥ हे प्रभो । पाप हम पर प्रसन्न हूजिये और उत्तानपाद सुत को तपस्या से निवृत्त करके हमारे हृदय-कटक को दूर कीजिये ॥३७॥ यह सुन कर श्री भगवान ने कहा-हे देवगण । तुम चिन्ता को त्याग कर अपने-अपने स्थान को जानो । स इद्र, वरुण या कुबेर पाद के पक्ष की कामना नहीं करता, मैं उसकी अभिलाषा पूर्ण करूंगा और उगे तप से भी निवृत्त कर दूंगा ।।३८-३६।। श्री पराशर जी ने कहा -- देवदेव भगवान् विष्णु द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर सभी देवता उन्हें प्रणाम करके अपने अपने धाम को गये और सर्वात्मा भगवान् ने भी ध्रव के तप से सन्तुष्ट होकर उसे चतुभुज रूप में दर्शन देकर कहा ।।४०-४१॥ भगवान बोले है उत्तानपाद के पुष है ध्र व तेरा कल्याण हो । तेरे तप से प्रसत्र होकर तुझे वर देने के निमित्त मैं यहाँ प्राया हूँ, हे श्रेष्ठ व्रत वाले ध्रप अब तू इच्छित वर मांगले ॥४२॥ तू ने सभी बाह्य विषयो को त्याग कर मुझ मे ही अपने चित्त को लगाया है, इसलिये मे तुझ पर अत्यत प्रसन्न हूं। अब तू अपना अभिलापित वर मांग।४३। श्र त्वेत्थ गदित तस्य देवदेवस्य बालक: उम्मीलिताक्षो ददृशे ध्यानदृष्ट हरिं पुर. १४४। शङ्खचक्रगदाशाङ्गवरासिधरमच्युनम किरोटिग समालोक्य जगाम शिरसा महीम् ॥४५॥ रोमाञ्चिताङ्गः सहसा साध्वस परम गतः। स्तवाय देवदेवस्य स चक्र मानस ध्र वः ।४६॥
प्रथम अंश-अ०१२ ] [ १२५ किं वदामि स्तृतावस्य केनोक्त नात्य संन्तुतिः । इत्याकुलमतिदेव तमेव शरण ययो । भगवन्यदि मे तोप तपसा परमं गतः। स्तोतु तदहमिच्छामि वरमेन प्रयच्छ मे ४१ ब्रह्माययस्य वेदज्ञायते यत्य नो गतिः । त त्वा कयमह देव स्तोतु शाश्नामि बालकः १४६ त्वद्भक्तिप्रवणं ह्य तत्परमेश्वर मे मन । स्तोतुं प्रवृत्त त्वत्पादौ तन प्रज्ञा प्रयच्छ मे ॥५०॥ शतप्रान्तेन गोविन्दस्त पस्पर्ग वृताञ्जलिम् . उत्तानपादतनय हिजवयं जगत्पतिः १५॥ अथ प्रमलवदनः स क्षणान्नृपनन्दन.! तुष्टाव प्रणतो भून्या भूतधातारमच्युतम् ॥५२॥ श्री पराशररी ने कहा- मगवान विष्णु के वचन मुन र वात प्रव ने अपने ने सोले मोर ध्यानावस्या के जिनके दर्शन दिये थे, न्न भगवान् को साक्षात् रूप में अपने सामने सडे पाया ॥४१॥ वे भगवान् विरोट, मुकुट, शख चक्र, गदा, पाङ्ग धनु क्या खड्ग धारण किये हुए थे। उन्हें देख कर प्र व ने पृथिवी पर भयना पप्तक रस कर प्रणाम क्यिा मोर सहा रोमाचित हाठे हुए उसने भगवान की स्तुति करनी चाही। परन्तु स्तुति में क्या नहूँ यह उसकी समझ में नहीं माया जिससे वह प्रत्यत व्यानुन हुमा भोर मन्त में उसने भगवान की ही शरण नी ॥४-४॥ ध्रुव बोला--हे प्रभो । यदि पाप मेरे वप से प्रसन्न हुए हैं तो मैं पापकी स्तुति करने को इच्छुक हूं प्रथम वर यही प्रधान करिये जिससे मैं पायश स्तव करने में समर्थ हो सकू' है देवा ब्रह्मा मादि वेदों जादा भी जिकरी गति का ज्ञान नहीं कमरे, उनका स्वत में परोष वाला किस प्रकार कर सकता हूँ ? Ill हे परमतर मापको भक्ति में द्रविन हुमा मेरा चित मापरे चरणों की स्तुति करने को उपठित है, इसलिये पाप मुझे यसो हो बुद्धि दीजिये । यो परामरती ने कहा है कि प्रे ! भगवान श्री गोविन्द ने अपने सामने करबट घरे हुए प्रधनी भरने 4.
प्रथम अंध-अ०१२] [ १७ मित रहने हैं ॥५६॥ भूत, भविष्यत् प्रादि आप ही हैं और विराइ, सराइ, सनाद एवं अधिनुरूप आदि बी उत्सनि भी प्राव हुई है ॥५॥ अत्तरिच्यत सोऽधन नियंगूयं च वै भुवः ! खत्तो विश्वमिद जान त्वत्तो भूतभविष्यती ।६०॥ वरूपवारिणश्चान्तत शनिद नगर । त्वतो यनः सर्वहुतः पृपदाचं पदिया ।। त्वत्तः ऋचोऽय सामानि स्वतःचन्दांमि बज्ञिरे । त्वत्तो याप्पजायन्न खत्तोचाना दनः ।६२१ गावस्त्वत्तः समुदुमतास्त्वत्तोमा अवयों मृगाः । लन्मुन्बाब्राह्मणास्त्वत्तो वाहोः क्षनमजायत । वैश्यास्तदोरजाः मुद्रास्तव पद्भयां समुन्दताः। अपणोः सूर्योऽनिल. प्राणाचन्द्रमा मनतस्तत्र १६४१ प्राणोऽन्त नुपिराज्जातो मुम्दादग्निरजायत । नानितो नगन द्योच्च निरस: समर्वत । दिशः प्रोनास्तितिः पद्भावतः सदादिदम् ।। न्यग्रोधः सुमहानरूपे यया वीज व्यवस्थितः । नयमे विश्वमखिल बोजभूत तया त्वपि ॥६६॥ प्राप भी निशानों में प्रवृद्ध है, यह सम्पूरी विद प्रापर्व ही प्रकरमा है, क्या नून-मविष्यत् नी पाप ही हुए है ॥३०॥ यह सम्पूर्ण विश्व माप दम्ब भूत ब्रह्माण्ड में है, मनी पुरोहागों वाला यक्ष, पाय और दो प्रकार : पगु, यह सब माप से ही हुए हैं 1॥ प्राग्ने र, बः मान और गात्री पादि मंदों की उत्पत्ति हुई है तथा मारडे ही प्रद और एक दाँत वाले मैंडा प्रादि जीव हुए हैं ॥६पापडे ही गौ, दरी, मेड, मृगदए हैं और छापक ही मुख से ब्राह्मण सन हुए हैं । आपकी मुनामों के क्षत्रिय, आँपोरी वर और चरणों में मूद्रों की पत्ति हुई है। मारे ही नेत्रों ने मूर्व, पारा, से वायु, मन से चन्द्रमा, नासिकार में प्राण, मुद्ध में अग्नि, नानि ते पाकाग मस्तक में स्वर्ग, यांत्र में दिशाएं स्पा चरणों में पिनी मादि की दारि [ श्रीविष्णुपुराण शख वे अग्र भाग से स्पर्श किया तभी वह राजपन क्षए भर में ही हापित मुख से अत्यंत विनीत होकर भगवान् की स्तुति में प्रवृत्त हुमा १५१-५२।। भूमिरापोऽनलो वायुःख मनो बुद्विरेव च । भूतादिरादिप्रकृतियस्य रूप नतोऽस्मि तम् १५३। शुद्ध सूक्ष्मोऽखिलव्यापी प्रधानात्पत पुमान् । यस्य रूप नमस्तस्मै पुरुषाय गुणाशिने ॥५४॥ भूरार्द ना समस्ताना गन्धादीना च शाश्वत । बुध्यादीना प्रधानस्य पुरुपस्य च य पर ।५५॥ त ब्रह्मभूतमात्मानमशेषजगत पतिम् । प्रपद्ये शरण शुद्ध त्वद् प परमेश्वर ।५ । बृहत्त्वाद् बृहणत्वाच्च यद् प ब्रह्मसज्ञितम् । तस्मै नमस्ते सर्वात्मन्योगिचिन्त्याविकारिणे । ७१ सहस्रशोर्षा पुरुष. सहस्राक्ष. सहस्रपात् । सर्वव्यापी भुव स्पर्शादत्यतिष्ठद्दशाङ्ग लम् ।५८ यद्भूत यय व भव्य पुरुषोत्तम तद्भवान् । स्वत्तो विराट् स्वराट् सम्राट् त्वत्तश्चाप्यधिपूरुप ।। ध्रव ने कहा-पृथिवी, जल, अग्नि,वायु, प्राकाश, मन, बुद्धि, महबार पौर मूल प्रकृति जिन भगवान् के स्वरूप हैं, मैं उन्हे नमस्कार करता हूँ ॥५३॥ जो परमात्म देव अत्यत शुद्ध, सूक्ष्म, सर्व व्याप्त तथा प्रधान से भी परे है और वह पुरुष जिनका स्वरूप है, मैं उन गुण भोक्ता को गमस्कार करता हूँ ॥५४॥ है प्रभो ! पृथिव्यादि सब भूत और गधादि उनके गुण, बुद्धि प्रादि करण एवं प्रधान और पुरुप से भी परे सनातर पुरूप प्राप ही है, मैं श्राप निखिल ब्रह्माण्ड नायव में ब्रह्मभूत स्वरूप को शरण मे हूँ ॥५५ ५६॥ ह योगियों के लिये चितन के योग्य हे सर्वात्मन् । व्यापक मोर बढने वाला होने स प्रापका जो रूप ब्रह्म कहा गया है, म उसी निविकार रप को नमस्कार करता हूँ ॥५७॥ हे नाप । पाप सहर शिर सहरा नेत्र और सहन पद पाले परम् पुरूप मयत्र व्याप्त है तथा सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को व्याप्त परखे दश गुल प्रमाण से पाप प्रयम अंश-०:२] [ १२३ म्पित रहले है ।।५८॥ भूत, भविष्यत् प्रादि प्राप ही हैं मोर दिराद, सर, सम्राट् एव अधिम्य आदि की उत्पत्ति भी प्रापर्व हुई है ॥५६॥ प्रत्यरिच्यत सोपत्र नियंगूष्यं च वै नुवः । त्वत्तो विश्वमिद जान दत्तो भूतभविष्यती 1६०॥ त्वस्यवारिणवान्तत नवंमिद जगत् । त्वत्तो यज्ञः सर्वहृतः पृपदान्य पशुदिया ।६११ त्वत्त. चोऽय सामानि त्यत्तरददामि निरे । त्वत्तो पप्पजायन्त त्वत्तोऽन्वादचकना दन. ६२। गावस्त्वत्तः समुनतास्त्वताजा अवयों मृगाः । स्वन्मुवाब्राह्मणास्त्रत्तो वाहोः धनमजायत ।। वश्यास्तदारुजाः शुद्रानव पद्धयां समुन्दनाः। अक्षणो. सूर्योऽनिल. प्राणाचन्द्रमा मनसस्तव ॥६॥ प्राणोऽन्त गुपिरागतो मुपादग्निरजायत । नानितो गगन द्योत्र गिरम. ममवर्तत । दिम: योगारिक्षतिः पद्यावतः सयमभूमिदम् ॥५॥ न्यग्रोधः महानल्प यया बीजे व्यवस्थितः । मयमै विश्वमखिल वीजभूने तया त्वपि ।६६। माप सभी दिशामो मे प्रवृर है, यह सम्पूरा दिन माने ही प्राट हुमा है, तया चूत -मविष्यत् भी मापन ही हुए हैं ॥ ६॥ यह म पूरा दिन भापक स्वपन स्वागत में है. ममी पुरोडायों वारा यन, पदाम्प मौर दो प्रकार पशु, यह गर पार से ही हर है ॥६॥ पारने श, यजुः मास और गायो मादिषदों को लति हुई है तथा मासे हो पन मोर एक दौर वाले ना पादि जीप हए ॥६॥ मापने ही गो, कसरी, मेड, मृगा पौर मारे ही मुग में बाह्मण टान हर है । मासी भुवामों में परिप, नामों से पल र परली गे मूटो को पति हुई है। मानो हो नेत्रों में मू. प्रारा, से नामिवार से प्राण, मुम में अग्नि, नानि मे मासा 01 में वर्ग, शान में हिमाणे टचा परतों में वृदिषो पाद से गति वामन में १३८ । [ श्रीविष्णुपुराण हुई है, इस प्रकार यह सम्पूर्ण विश्व ही प्रापसे उत्पन्न हुमा है ॥६३-६५॥ जैसे छोटे से बीज में विशाल वट वृक्ष रहता है, वैसे ही ग्राप बीज रूप मे यह विश्व प्रलयकालः मे लीन रहता है ।।६६|| बीजादव, रसम्भूतो न्यग्रोधस्तु समुत्थितः । विस्तारं च यथा याति त्वत्तः सृष्टी तथा जगत् ।६७) यथा हि कदली नान्या त्वक्पनादपि दृश्यते । एवं विश्वस्य नान्यस्त्व त्वत्स्थायीश्वर दृश्यते ॥६॥ ह्लादिनी सन्धिनी सवित्त्वय्येका सर्वसस्थिती। ह्लादतापकरी मिश्रा त्वयि नो गुणजिते ।६६ । पृथग्भूतकभूताय भूतभूताय ते नमः। प्रभूतभूतभूताय तुम्य भूतात्मने नमः ७० व्यक्त प्रधानपुरुषो विराट् सम्राट् स्वराट तथा। विभाव्यतेऽन्तःकरणे पुरुपेष्वक्षयो भवान् ७१। सर्वस्मिन्सर्वभूतस्त्व सर्वः सर्वस्वरूपधृक् । सर्व त्वत्तस्ततश्च त्वं नमः सर्वात्मने स्तु ते १७२। मर्यात्मकोऽसि सर्वेग सर्वभूतस्थितो यतः । कथयामि ततः किं ते सर्व वेत्सि हदि स्थितम् ।७३। हे प्रभो ! जैसे बीज से अकुर हुमा वट वृक्ष वृद्धि को प्राप्त होकर बहुत विस्तार वाला हो जाता है, वैसे ही यह विश्व सृष्टि काल मे पाप से उत्पन्न होकर अत्यत विस्तीर्ण हो जाता है ।।६७॥ हे प्रभो ! कदली क्षुप छिलके पौर पत्ते से पृथक् प्रतीत नही होता, वैसे ही यह विश्व से पृथक् नही देखा जाता, क्योंकि वह अप मे ही स्थित है ॥६॥ आपसर्वाश्रय में लादिनी और सन्धिनी विद्या प्रभिन्न रूप से निवास करती है । पाप निगुए हैं इसलिये कोई भी मालादिनी, संतप्त करने वाली या दोनों गुणो से मिली हुई सवित् पाप मे नही रहती ॥६६॥ माप हो पृषक गए तथा एक रूप भी हैं पाप ही सूक्ष्म भूत तथा भनेक जीव हैं, पाप ही सब भूतों ने भन्तर में निवास करते हैं, ऐसे भापको मैं नमस्कार करता हूँ 1७०॥ arnी भन्सःकरण में महत्तरव, प्रधान, पुरुष, विराट् सम्राट् प्रौर खराट प्रथम अंश-अ० १२] पादि रूपों से ध्यान दिये जाते हैं तथा पुरुषों में मार निस्य एवं क्षम रहित हैं ॥७९॥ सब मे पापही सर्व भूत हैं, सब रूपो के भारक होने से माप हो सब कुछ हैं, सम्पूर्ण पदार्य मापसे ही हुए हैं, इसलिये पाप सर्वात्मा यो नमस्कार करता हूं ॥७२।। हे सर्वेश्वर ! हे सर्वात्मक माप सब भूतों में प्रयास है. मैं मापसे या निरंदन करू, क्योकि माप तो घट-घट करें पानते है ॥७३॥ सर्वात्मन्सर्वभूतेश सर्वसत्त्वसमुद्भव। सर्वभूतो भवान्वेत्ति सर्वसत्त्वमनोरथम १७४१ यो मे मनोरणेनाथ सफलः स स्त्रया कृतः। तपश्च तप्तं सफलं यदृष्टोऽसि जगत्पते । तपसस्तरपालं प्राप्तं यदृष्टोऽहं त्वया ध्रव । मद्दर्शन हि विफल राजपुत्र न जायते १७६५ चरं घरय तस्मात्त्वं यथाभिमतमात्मनः। सर्व सम्पद्यते पुसा मयि दृष्टिपथं गते ।। भगवाभूतभव्येश सर्वस्यास्ते भवान् हदि । किमज्ञातं तव ग्रह्मन्मनसा यन्मय तिम् ॥७॥ तथापि तुम्य देवेश कथयिष्यामि मया । प्राप्यते दुविनीतेन हृदयेनातिदुतंभ म ७६ किया सर्वजगत्सरः प्रसन्ने त्वयि दुलंभम् । त्वत्प्रसादफलं भृडक्त त्रैलोक्य मघयानपि ।। नेत जासन योग्यगजातस्य ममोदरात् । इतिगर्वादवोचमा सपनी मातुरुचकः ।। भाधारभूत जगतः सर्वेषामुत्तमोत्तमम् । प्रार्थयामि प्रभो स्थान स्वरप्रसादादतोऽव्ययम् ।। है सब भूनेसर! हे सर्वामिन् ! हे सर्व भूतो के मादि स्थान, पाप भूत समपित होने पारण, सभी के मनोरों ने मानने वाले है 1७४। रीको इमा पो, वह तो मापने पूर्ण र दी और मेरा सप भी परम हो गया १४० ] [ श्रीविष्णुपुराण क्योकि मैंने पापका साक्षात् दर्शन प्राप्त कर लिया है ।.७।। श्री भगवान ने कहा - हे ध्रुव ! तुझे मेरा दर्शन मिल गया, इससे सेरा तप तो सफल हो गया, परतु मेरा साक्षात्कार भी तो कभी फल-रहित नहीं होता ॥५६॥ इसलिये पद तू अपना इच्छित वर मांग, क्यो मेरा दर्शन प्राप्त करने वाले को अप्राप्य कुछ भी नही रहता ॥७॥घव ने कहा-हे भगवन् ! माप सब के अन्तः करण मे स्थित हैं, इसलिये मन की कोई भी इच्छा आप से छिपी हुई नही रह सक्ती ७८।। फिर भी हे प्रभो । मैं जिस अत्यत दुर्लभ वस्तु की अभिलाषा परता हूँ, उसे मापकी प्राज्ञानुसार निवेदन करूंगा ॥७॥ हे विश्व रचयिता प्रभो । पाप प्रसन्न हो गये हैं तो अब क्या दुर्लभ रह गया है । देवराज इन्द्र भी मापकी कृपा दृष्टि प्राप्त करके ही तीनो लोकों का भोग करते हैं ॥८॥ हे प्रभो । मेरो विमाता ने प्रत्यत महकार पूर्वक कहा था कि जिसने मेरे उदर से जन्म नहीं लिया, वह इस राज्य सिंहासन के योग्य नहीं हो सकता ॥१॥ इसलिये, मैं मापकी कृपा से उस सर्वश्रेष्ठ प्रत्यय स्थान की इच्छा मरता हूँ जो सम्पूरणं जगत् का प्राथय भूत हो ॥२॥ यत्वया प्राध्यंते स्थानमेतत्प्राप्स्यति वै भवान् । त्वयाह तोपितः पूर्वमन्यजन्मनि बालक । स्वमासी ह्मण. पूर्व मय्येकानमति सदा। मातापिनोश्न शुश्र पुनिजधमानुपालकः । पालेन गच्छता मित्र रागपूषस्तवाभवत् । यौयनेऽपिलभोगाढयो दर्शनीयोज्ज्वलाकृतिः ।८५। तत्स गानस्य तामृद्धिमवलोक्यातिदुर्लभाम् । भवेय राजयुमोऽहमिति वाघ्या त्यया मृता ।६। ततो ययाभिलपिता प्राहा ते राजपुत्रता । उसानपास्य गृहे जातोऽसि ध्र व दुर्लभे ।८। मन्येषा दुखन स्थान युले स्वायम्भुवस्य यत् । तरयतदार यारा येनाह परितोपितः ।।
प्रथम अंश-प्र. १२ } [ १४१ मामाराव्य नरो मुक्तिमवाप्नोत्यविलम्बिताम् । मपितमना बाल किमु स्वर्गादिकं पदम् ।। थो भगवान ने कहा-है वारक ! तू ने अपने पूर्व जन्म में भी मुझे पान किया था, इमलिये तेरे इच्दिन यान की तुने अवश्य प्राप्ति होगी ॥३॥ उस जन्म में तू ब्राह्मण कुन में उत्पन्न, माता-पिता की सेवा करने वाला, स्वधर्म परायण गौर मुझ में तन्मय भाव वाला या ॥८४|| कालान्तर में तेरी भित्रना एक राजकुमार से होगई, जो कि अपनी तरणावम्या मे मर्व भोग सम्पन्न पौर रूप साबण्य में भी देखने योग्य था ॥८६॥ उमा मंगति में रहते हुए उसके दुर्लभ वैभव को देखकर राज पुत्र होने की तेगे भी इच्छा हुई ।1८६) इसीलिये सुझे इस जन्म में राजपुत की प्राप्ति हुई है और जिन स्वायनुव मनु तुल में किसी का जन्म लेगा दुर्लभ है, उन्ही के पुत्र उत्तानपाद नै यहां तू उत्पन्न हुप्रा है, परंतु, हे बालक ! जिसने मुझे प्रसन्न किया है, उसके लिये तो यह स्थान नगण्य ही है ।।८७-८८॥ मेरे माराधन में मोक्ष भी तुरंत मिल जाता है, तो जिगमा चित्त निरतर ही मुभ में तन्मय हुमा है, उसके लिये स्वर्गादि लोक तो तुच्य ही है ॥६ वलोक्यादपिके स्याने सवंताराग्रहाययः। भदिप्यति न सन्देही मत्प्रसादाद्वान्न बाली सूर्यायोमात्तथा भौमात्मीमपुत्राबृहस्पतेः । सितार्थतनयादीनां सर्वक्षारणा तथा ध्रुव सप्तपणामशेणगा ये च वैमानिकाः मुगः। सर्वेषामुपरि स्यान तव दत्त मया प्र.व २! केचिञ्चतुर्युग यावत्केचिन्मन्वन्तरं सुराः । तिष्ठन्ति भवतो दत्ता मया व कल्पसस्थितिः ।। सुनीति रवि ते माता त्वदासन्नातिनिर्मला। विमाने तारपा भूत्वा तावत्काल निवस्यति ।९४! ये व स्वां मानवाः प्रातः साय छ मुसमाहिताः । कोतयिष्यन्ति तेषां च महत्पुण्य भविष्यति ।।५।
- १४२ ] [ श्रीविष्णुपुराण हे ध्रव ! तू विलोकी मे सर्वोच्च स्थान को निश्चय ही प्राप्त करेगा और सब ग्रहों तथा नक्षत्रो का माश्रय रूप होगा ॥१०॥ हे ध्रव ! मैं तुझे वह प्रव स्थान प्रदान करता हूं जो सूर्य, चन्द्रगा, मंगल, बुध, वृहस्पति, शुक्र और शनि ग्रहो,नक्षत्रों, सप्तपियो और विमान मे विचरण करने वाले सब देवतापो से भी उच्च है ।।६१-६२॥ कोई देवता चार युग तक और कोई एक मन्वन्तर तक ही स्थित रहते है, परतु मैं तुझे एक क्ल्प तक के लिए स्थित करता हूँ ॥१३॥ तेरी माता सुनीति भी अत्यत उज्जवल तारिका रूप से एक विमान में स्थित रह वर उतने ही समय तक तेरे पास रहेगी ६४॥ जो मनुष्य तेरे इस चरिय का प्रात. साय कीर्तन करेंगे, उन्हें महान पुण्य फल की प्राप्ति होगी 180 एवं पूर्व जगन्नाथाद्देवदेवाज्जनार्दनात् । वर प्राप्य ध्र वः स्थानमध्यास्ते स महागते ।६६) स्वय शुश्र पणाद्धन्मिातापित्रोश्च वै तथा । द्वादशाक्षरमाहात्म्यात्तपसश्च प्रभावतः ।६७ तस्याभिमानमृद्धिं च महिमान निरीक्ष्य हि । देवासुराणामाचार्यः श्लोकमत्रोशना जगौ ६८1 अहोऽस्य तपसो वीर्यमहोऽस्य तपस.फलम् । यदेन पुरत कृत्वा ध्रुव सप्तर्षय. स्थिताः ।। ध्रुवस्य जननी चेय सुनीति म सूनृता । अस्याश्च महिमान कः शक्तो वर्णयितु भुवि ।१०० प्रैलोक्याश्रयता प्राप्त पर स्थान स्थिरायति । स्थान प्राप्ता पर धृत्वा या कुक्षिविवरे ध्रुवम् ॥१०१॥ याच तत्कीर्तयेग्नित्यं ध्र वस्यारोहण दिदि। सर्वपापविनिमुक्तः स्वर्गलोके महीयते ॥१०२॥ स्थानभ्रंशन चाप्नोति दिवि वा यदि वा भुवि । सर्व कल्याणसंयुक्तो दीर्घकालं स जीवति ।१०३। श्री पराशरजी ने कहा-हे महामते । देवदेव जनार्दन भगवान् से ऐसा घर प्राप्त पर प्र व उस प्रत्यत श्रेष्ठ स्थान मे प्रतिटित हो गये ॥६६॥ धर्म प्रथम अंश-प्र० १३ ] [१४३ परायणता पूर्वक अपने माता-पिता की सेवा, द्वादशाक्षर मंत्र के माहात्म्य और अपस्या के प्रभाव से उनके मान वैभव और प्रभाव को बढता हुआ देख कर देवतामो और असुरी के प्राचार्य श्री शुक्राचार्य जी ने उनकी प्रशस्ति में कहा है कि महा, इस प्रव की तपस्या का हा प्रभाव और कितना अद्भुत पल है. जिससे सप्तपिंगण इस ध्रुव को अग्रगण्य करके स्थित है ॥६८-६६॥ इस की माता सुनीति भी सत्य और हितकारी वचन कहने वाली हुई है, उसकी महिमा के वर्णन की सामभ्यं किस में है ? जिगने ध्रव को अपने उदर मे धारण करके ही तीनो लोको का माय भूत सर्वश्रेष्ठ स्थान को पा लिया, यह स्पान चिरस्थायी रहेगा ॥१००-१०१॥ ध्रुव के इस दिव्य लोक प्राति वाले प्रसंग का कीर्तन करने वाला मनुष्य सभी पापो से छूट कर स्वर्ग में पूजा जाता है ।।१०२।। फिर वह स्वर्ग अथवा पृथिवी पर कही भी रहे अपने स्थान से नहीं गिरता तथा सभी मगलो से सम्पन्न रहता हुआ, दीर्घकाल तक जीवन पारण मावा है ॥१०॥ तेरहवाँ अध्याय ध्र वादिष्टिं च भव्यं च भव्याच्छम्भुळजायत । शिप्टेरापत्त सुच्छाया पञ्चपुत्रानकल्मपान् ।। रिपुरिपुक्षयं विप्न वृकल वृकतेजसम् । रिपोरापत्त वृहती चाशुपं सर्वतेजसम् । मजीजनत्पुकारण्या वारुण्या चाशुपो मनुः प्रजापतेरारमजायां धोरणस्य महात्मनः।३ मनोरजायन्त दश नड्वलाया महौजसः । कन्यापा तपता श्रेष्ठ वैराजस्य प्रजापतेः।। कुरुः पुरुः शतयुम्नस्तपस्वी सत्यवाचिः प्रग्निष्टोमोऽतिराप्रश्न सुयु म्नश्चेति ते नव
[ श्रीविष्णुपुराण
से
उनी मनु
-
अभिमन्युश्च दशमो नड्वलाया महौजस ।
कुरोरजनयत्पुत्रान् पडाग्नेको महाप्रभान् ।६।
अन सुमनस ख्याति ऋतुमङ्गिरस शिबिम् ।
अङ्गासुनोथापत्य वै वेनमेकमजायत ७१
श्री पराशरजी ने कहा-हे मरेपजी । भ्रूव मे शिष्टि और भव्य का
जन्म हुप्रा । भव्य का पुत्र शम्भु हुना और शिष्टि को भार्या ने रिस, रिपुञ्जय,
विप्र, वृकल और वृ+तेजा नामक पांच पुत्रों को जन्म पिया । उनमे से रिपु ने
अपनी बहती नाम की भार्या से महातेजस्वी चाक्षुप नामक पुत्र उत्पन्न किया
॥१२॥ चाक्षुष का विवाह वरूण कुलोत्पन्न महात्मा वीरण प्रजापति की पुत्री
हुमा, की उत्पत्ति हुई ॥३॥ नपस्वीवर मनु ने वैराज प्रजापति को
पुत्री नड्वना से दश प्रत्यत तेजस्वी पुत्री को उत्पन्न किया ||४| उनके कुरु,
पुर, शत म्न, तपस्वी, सत्यवान्, शुचि, अग्निष्टोम, अतिरा, सुद्यम्न एव
मभिमन्यू नाम हए । कुरु ने अपनी भार्या आग्नेयो से अग, सुमना, ख्याति कतु,
अगिरा और शिवि नामक छ अत्यत प्रतापी पुत्र उत्पन किये । मग ने सुनीया
के गर्भ से वैन नामक पुत्र उत्पन्न किया ॥५-७॥
प्रजार्थमृपयस्तस्य ममन्युदक्षिण करम् ।
वेनस्य पाणी मथिते सम्बभूव महामुने ।।
यग्यो नाम महीपालो य पृथुः परिकीत्तितः ।
येन दुग्धा मही पूर्व प्रजाना हितकारणात् ।।
विगथं गथित पाणिनस्य परमपिभि. ।
या जज्ञे महावीर्य स पृथुमुनिसत्तम ।
सुनीथा नाम या कन्यामृत्यो प्रथमतोऽभवत् ।
अङ्गस्य भार्या सा दत्ता तस्या वेनो व्यजायत ।११॥
स मातामहदोषेण तेन मृत्यो सुतात्मज ।
निसगदिप मैत्रेय दृष्ट एव पजायत ।१21
मभिषिक्तो यदा राज्ये स वेनः परमपिभि।
पोषयामास स तदा पृथिव्या पृथिवीपतिः ॥१३॥
प्रथम अश-ग्र० १२ ]
न यष्टव्यं न दातव्य न ह तव्य कयन्नन ।
मोक्ता यज्ञस्य कस्त्वन्यो ह्यह यज्ञपति. प्रमु ।१४।
ततस्तमृपय पूर्वं सम्पूज्य पृथिवीपतिम् ।
कत्रु: सामकल वाक्य मैत्रेय समुपस्थिताः ॥१५॥
उसी वैन के दक्षिण हाय का ऋपियो ने सन्तान के निमित्त मन्यन
किया निसने वैध नामा एक पुत्र की उत्पत्ति हुए. यही राजा पृथु ने नाम
से प्रसिद्ध हुए, जिन्होंने प्रवा-पालन के निमित्त पृयित्री का दोहन किया था
1-81 थी मैत्रेयत्री न त-हे मुनिसत्तम । उन महपियो ने वन के हाथ
का मयन क्यों किया था तया पराक्रमी पृयु का जन्म मे हुआ?॥१०॥ श्री
परादारजी ने कहा-मृत्यु की मुनीया नाम की प्रथम पुत्री प्रग को याही गई
यो । उसो स राजा वेन उत्सन हुए ये ।११ हे मंत्रात्री । मयुमुता का यह पुत्र
पाने नाना के स्वभाव - दोष के कारण ही दूषित म्यभाव का हुया ॥१२॥ जय
दह वन राजपद पर अनिपिक्त हुप्रा पा तभी उसने विश्व भर में यह घोषित कर
दिग या कि मैं मगवान् है, या पुग्प और पन का मोक्ता एवं स्वामी में ही
है, इसलिये प्रब कभी बोई भी मनुष्य दान और यज्ञादि न करे ॥१३-१४॥ हे
मैगी । उस समय वे महापाए उस राजा वेन के समक्ष उपस्थित हुए और
उन्होंने उनकी प्रासा करने सान्चनामयी मोठीवाणी से नहा ॥१५॥
भो भो राजन् शृणुप्त त्व यद्वदाम महीपते।
राज्यदेहोपकाराय प्रजाना च हित परम् ॥१॥
दीर्घमरा देवेग सवयज्ञश्वर हरिम् ।
पूजयिप्पाम भद्र ते तम्यागम्ने भविप्पति ।१७॥
यनेन यज्ञरपो विष्णुः सम्प्रीणिना नृप ।
सम्माभिमवत कामान्सवानव प्रदास्यनि ।।
यनशेवरो येपा राष्ट्र सम्पूज्यते हरिः ।
तपा सप्पितावाति ददाति नृप भूभृताम् ॥१६॥
मत्त.कोऽभ्यधिकोऽन्योऽस्ति कश्चाराध्यो ममापर ।
कोऽय हरिरिति स्याता यो वा यनेश्वरो मत. ॥२०॥
१४६ ] [ श्रीविष्णुपुराण अह्मा जनार्दन शम्भुरिन्द्रो वायुर्यमो रविः । हुतभुग्वरुणो धाता पूपा भूमिनिशाकरः ॥२१॥ एते चान्ये च ये देवाः शापानुग्रहकारिणः । नृपस्यैते शरीरस्था सर्वदेवमयो नृपः ॥२२॥ ऋपियों ने कहा-हे राजन् । हे महीपते । हम तुम्हारे राज्य, प्रमा तथा शरीर के हितार्थ जो कहते हैं, उसे श्रवण करो ॥१६॥ तुम्हारा कल्याण हो, हम यज्ञेश्वर देवदेव भगवान् विष्णु का पूजन करेंगे, उमके फल के छ' अश का भाग तुम्हे भी प्राप्त होगा ॥१७॥ हे राजन् ! यज्ञो के द्वारा भगवान यज्ञ पुरुष सन्नुष्ट होकर हमारे साथ ही तुम्हारी भी अभिलापाएं पूरी करेंगे। जिन राजामो के राज्यकाल मे यज्ञेश्वर भगवान का यज्ञानुष्ठानों द्वारा पूजन होता है, उनकी सभी कामनाएं पूर्ण होती हैं ॥१९॥ यह सुन कर पेन ने कहा- मुझसे अधिक ऐसा फोन है जो मेरे द्वारा भी पूजा के योग्य हो, तुम जिसे यज्ञेश्वर एव भगवान् कहते हो, वह कौन है ? ॥२०॥ ब्रह्मा, विष्णु, शम्भु इन्द्र वायु, यम, सूर्य,अग्नि, वरुण, पाता, पूपा, पृथिवी मोर चन्द्रमा अथवा अन्य जो भी देवता शाप, या वर देने में समर्थ है, उन सभी का निवास राजा मे होने से राजा ही सर्वदेवमय होता है ॥२१-२२॥ एव ज्ञात्वा मयाज्ञ यद्यथा क्रियता तथा। न दातव्य न यष्टव्य न होतव्य च भो द्विजा ॥२३॥ भर्तृ शुश्रू पण धर्मों यथा स्त्रीणा परो मत । ममाज्ञापलन धर्मो भवता च तथा द्विजाः२४॥ देहानुज्ञा महाराज मा धर्मो यातु स क्षयम् । हविपा परिणामोऽय यदेतदखिल जगत् ।२५। इति विज्ञाप्यमानोऽपि स वेन. परमपिभि । यदा ददाति नानुज्ञा प्रोक्त प्रोक्त पुन पुनः ॥२६॥ ततस्ते मुनय सर्वे घोपामर्षसमन्विता । हन्यता हन्यता पाप इत्युचुस्ते परस्परम् ॥२७॥ यो यज्ञपुरुष विष्णुमनादिनिधन प्रभुम् । विनिन्दत्यघमाचारो न स योग्यो सुव पति.।२८॥ ?
। प्रथम अश-अ० १३ ] [ १४७ इत्युक्त्वा मन्त्रपूर्तस्तैः कुशमुनिगणा नृपम् । निजध्नुनिहतं पूर्व भगवनिन्दनादिना ।। हे द्विजगण ! यह जान कर मेरे नादेश का पालन करो, किसी को भी दान, यज्ञ, हवनादि नहीं करना चाहिये । हे ब्राह्मणो ! जैसे स्त्री या परमधर्म पति सेवा है, वैसे ही आपका परमधर्म मेरी माज्ञा का पालग है ॥२३-२४॥ ऋपियो ने कहा-है राजन् ! आपका आदेश ऐसा होना चाहिए, गिमसे धर्म का नाश न हो । देखिये, यह सम्पूर्ण विश्व हवि से ही उत्पन्न हुमा है ॥२५॥ श्री पराशरजी ने कहा -- जव महपियो के यारयार रामभाने पर भी येन ग गाना तो वे अत्यंत क्रोध पूर्वक परस्पर में बहने लगे कि इस पापारमा पो मार डालो। मार डालो ।।२६-२७॥ जो अनादि एव अनन्त यशेयर विष्णु पा निन्दया है, वह पाचरणहीन पुरप राजा होने के योग्य नहीं है ॥२८॥ यह मह पर र महपियों ने प्रभु-निन्दा से पहिले से ही मृत हुए उम राजा या मंत्रपूत पुगों के पापात से वध कर दिया ॥२६॥ यतश्च मुनयो रेणु ददृशुः सर्वतो द्विज । किमेतदिति चामन्नान्पप्रच्छम्ते जनास्तदा ।३०। प्रात्यातं च जनस्तेषा चोरीभूतैरराज के। राष्ट्रे तु लोकरारव्यं परम्वादानमातुरः ॥३१॥ तेपामुदोणवेगाना चोराशा मुनिमत्तमाः । सुमहान् दृश्यते रेणुः परवितापहारिणाम । ततः सम्मन्य ते म मुनयम्तम्य भूभृतः । ममन्युमर पुत्रार्थमनसत्यम्य यरनमः ।। मय्यमानात्समुत्तम्यो तम्यारोः पुरुषः पिना दग्यस्थगाप्रतीकामवाटायोनियमन१1 कि करोमीति तान्मुगि विना माना निषोदेवि तमूवुम्ने निघाटानेन ty तनुम्नुमानया गाना fairfastest निपादा मुनिगाईप meditater :
१४८ ] [श्री विष्णुपुराण 1 तेन द्वारेण नत्पापं निष्कान्तं तस्त्र भुपतेः। निपादास्ते ततो जाना वेनकल्मपनाशनाः ३७। हे ब्रह्मन् । फिर महपियों ने सर्वत्र वडी धून उठती हुई देय पर अपने पास खड़े हुए लोगो से पूा कि यह क्या है ? तब उन्होंने उत्तर दिया कि इस समय राष्ट्र राजा रहित होगया है, इसलिये दीन दु.खी मनुष्यों ने धनवानों को लूटना प्रारम्भ कर दिया है । ३०-३१॥ हे मुनिवरो । उन अत्यत वगवान् लुटेरो के उत्पात से ही यह धूल उड रही है ॥३२॥ तन उन महपियो ने परस्पर मे परामर्श करके उस पुत्रहीन राजा येन को ज्ञाप को पुत्र प्राप्ति के लिये यथा । ३३॥ उस के मथे जान से उसमे जले हुए टूठ के समान पाले वर्ग का प्रत्यत नाटा और छोटे मुख का एक पुरप प्रक्ट हुमा ॥३४॥ उसने प्रत्या आतुरता पूर्वक उन ऋपियो से पूछा कि मैं क्या करू? तब उन ऋषिपों ने "निपीद' अर्थात् बैठजा कहा, इसलिए वह प्रागे चल कर नियाद कहा गया ॥३५॥ इसलिए हे मुने ! उसके वशज विंध्याचल पर रहने वाले पाप कर्मो मे रत निपाद हुए ॥३६।। उसी निपाद रूप द्वार के मार्ग से राजा वेन का सभी पार निस्त गया, इस प्रकार निषादगण राजा वेन के पापो को नष्ट करने वाले होगए ।३७॥ तस्यैव दक्षिणं हस्त ममाथुस्ते ततो द्विजा १३८। मथ्यमाने च तत्राभूत्पृयुर्वेन्यः प्रतापवान् । दोप्यमानः स्ववपुपा साक्षादग्निरिव ज्वलन् ।३६। प्राधमाजगव नाम खात्पपात ततो धनुः। शराश्व दिध्या नभस. कवन च पपात ह ४० तस्मिन् जाते तु भूतानि सन्प्रहृष्टानि सर्वशः। सत्पुत्रेणव जातेन वेनोऽपि त्रिदिव ययौ ।४१॥ पुन्नाम्नो नरकात् प्रातः सुतेन सुमहात्मना । तं समुद्राश्च नद्यश्च रत्नान्यादाय सर्वश. ४२॥ तोयानि चाभिषेकार्थं सर्वाण्येवोपतस्थिरे । पितामहश्न भगवान्देवैरागिरसे सह ४३ प्रयन ग्रंश-अ०१३] [१४६ स्थावराणि च भूतानि जङ्गमानि च सर्वशः । समागम्य तदा वन्यमभ्यपिश्चनराधिपम् ॥४४॥ फिर उन ऋषियो ने वेन के दाए हाय को मया, जिससे वेनपुत्र प्यु सम्पन्न हुए, जिनका देह प्रज्वलित अग्नि के समान देदीप्यमान या ॥३८.३६॥ इसी अवसर पर प्राजगव नामक शिव धनुष, दिब्य बाण और कवच आराम से गिरले लगे ॥४०॥ उनके प्रक्ट होने से मव प्राणियों को अत्यत प्रसन्नता हु तथा सन सत्पुत्र की उत्पत्ति से वेन को भी स्वर्ग प्राप्त हुना ॥४१॥ इस प्रकार महात्मा पुत्र के जन्म लेने से वह नरक में जाने से बच गया । उन राजा पृथु का अभिषेक करने के लिए सव समुद्र और नदिया मूर्तिमान होकर सब प्रकार के रल और पवित्र जल लेकर वहां पाये और तब प्रागिरस दैवत ओं के महित सभी प्राणियों ने राजा वैन के राज्यामिक महोत्सव में भाग निमा ।।४२-४४॥ हस्ते तु दक्षिणे चक्र दृष्ट्वा तस्य पितामहः । विप्लोररा पृथु मत्वा परितोप पर ययौ ।४५॥ विप्णुचर करे चिह्न सर्वेपा चक्रवर्तिनाम् । भवत्यव्याहतो यस्य प्रभावविदर्शरपि।४६॥ महता रामराज्येन पृथुन्यः प्रतापवान् । सोऽभिषिक्तो महातेजा विधिवद्धनंकोविद. ४७॥ पित्रापरखितास्तस्य प्रजास्तेनानुरञ्जिताः । अनुरागात्ततस्तस्य नाम राजेत्यजायन 11 प्रापस्तस्तम्भिरे चास्य समुद्रममियास्यतः । पवंताश्च ददुर्मार्ग ध्वजमगन नामवत् ॥४६॥ अष्टपच्या पृथिवी सिद्धयन्त्यनानि चिन्तया । सर्वकामदुधा गाव: पुटके पुटके मघु ५० उनके दाए हाय को शक्ति देख कर उन्हें भगवान विगु, का मग हुए ब्रह्माजी पत्यंत प्रसन्नता को प्राप्त हुए UI भगवान के चक्र वा यह वह सभी राजापों के हाथ में पड़ा होता है, जिसके प्रभाव को कुण्टिन १५० ] [ श्रीविष्णुपुराण कारना देवताप्रो भी यश का नही है ॥४६॥ हा प्रकार अत्यंत सेजस्वी एवं प्रतापी धेन पुत्र धर्मवान् व्यक्तियो द्वारा विधि पूर्वक राजाधिराजपद पर मभिषिक्त हुए ॥४७॥ उनके पिता ने जिस प्रजा को अप्रसन्न किया था, उसी प्रजा को उन्होने प्रसन्न पिया, इस प्रकार प्रजा को प्रसन्न करने के कारण ही वह वास्तविक रूप से राजा हुए ॥४॥ उनके समुद्र में चलने पर जल स्थिर हो जाता और पर्वत भा उन्हे मागं दे देते थे इससे उनको ध्वजा का कभी पतन नही हुआ ॥४६॥ पृथिवी गोते-बोये बिना ही धान्य उत्पन्न करती और पवाती जी, चिन्तन मात्र से ही भन्न पक जाता था, गौए कामधेनु के समान सर्व काम- प्रद थी तथा पुटके-पुटके मे मधु भरा रहता था ॥५॥ तस्य वै जातमात्रस्य यशे पैतामहे शुभे । सूतःसूत्या समुत्पन्नःसौत्येऽहनि महामतिः ॥५॥ तस्मिन्नेव महायज्ञे जज्ञे प्राज्ञोऽय मागधः । प्रोक्तो तदा मुनिवरस्तावुभौ सूतमागधी १५२ स्तूयतामेप नृपतिः पृथुर्वेन्यः प्रतापवान् । कर्मेतदनुरूप वा पात्र स्तोत्रस्य चापरम् ॥५३॥ ततस्तावुचतुर्विप्रान्सर्वातेव कृताञ्जली। अद्य जातस्प नो कर्म ज्ञायतेऽस्य महीपतेः ॥५४॥ गुणा न चास्य ज्ञायन्ते न चास्य प्रथित यशः। स्तोत्र किमाथय त्वस्य कार्यमस्माभिरुच्यताम् ॥१५॥ करिष्यत्येप यत्कर्म चक्रवर्ती महाबलः । गुणा भविष्या ये चास्य तरय स्तूयता नृपः ५६' उन राजा ने उत्पन्न होते हो जो पैतामह यज्ञ किया, उससे सोमाभिपर के दिन ही अभिपय वाली भूमि से मूतजी उत्पन्न हुए ॥५१॥ उसी यज्ञ में मागध भी प्रकट हुए । उन सूत मौर मागध से ऋपियो ने कहा इन प्रत्यत प्रतापी येन पुत्र पृथु की तुम स्तुति करो। राजा स्तुति के योग्य है और तुम भी स्तुति पले में योग्य ही हो ॥५२-५३॥ सब उन सूत-मागध ने उन ऋषियों से पर निवेदन लिया कि हम इनके कर्मों को नहीं जानते, क्योकि यह भाग ही १५२ ] [ थीविष्णुपुराण चयार हृदि ताहन च कर्मणा कृतवानसौ। ततस्तु पृथिवीपालः पालय पृथिवीमिमाम् ।६४ इयाज विविधैर्यशैमहद्भिरिदक्षिणः। त प्रजा पृथिवीनाथमुपतस्थुः क्षुधादिताः ॥६५॥ ओषधीपु प्रण टासु तस्मिाकाले ह्यगजके । तमूस्ने नता. पृष्टास्तग्रागमनकारगम् ॥६६॥ अराजके नृपर्थप धरिठ्या सकलोपधीः । ग्रस्तास्तत क्षय यान्ति प्रजाः सी. प्रजेश्वर ६७ त्वन्नो वृत्तित्रदो धात्रा प्रजापालो नि इपित. । देहि न क्षुत्परताना प्रजाना जोवनौषधीः ।२०) यह धर्मज्ञ, कृतज्ञ, दयालु, मिष्टभापो, मान योग्य पुरषो को मान दे वाले, यज्ञ प्रोर ब्रह्म परायग्ग, सन्तजनो मे सम्मानित और शत्रु-मित्र के समा. व्यवहार करने वाले है । सूत-मागध द्वारा वणित इन गुणो को अपने चित्त में धारण करके उन्होने उसी के अनुसार कर्म किये और पृथियी के पालन पूर्वक महती दक्षिणा वाले अनेक बडे यज्ञो को उन्होने किया । जब अराजकता फनी थी तब प्रोपधादि के न रहने से क्षुधादर हुई पृथिवीपति पृथु की शरण में उपस्थित हुई और राजा के पूछने पर उसने अपनी उपस्थिति का कारण उन्हें बताया ॥६२-६६॥ प्रजा ने कहा-हे प्रजागलक महाराज ! अराजकना फैलने पर सब प्रौषधियां पृथिवी में समा गई, इससे आपकी प्रजा क्षीण हो रही है ॥६॥ विधाता ने प्रापको हमारा जीवन दाता तथा प्रजापति किया है. इस. लिये भूख रूपी म्हारोग से सन्तप्त हुए हम प्रजाजनो को आप जीवन रूपी प्रौषधि प्रदान कीजिए॥६८) ततस्तु नृपतिदिव्यमा दायाजगवं धनुः । शराश्च दिव्यान्कुपितः सोऽन्धधावद्वसुन्धराम् ॥६६॥ ततो ननाश त्वरिता गौर्भूत्वा च वसुन्धरा । सा लोका-ब्रह्मनोकादीन्सन्त्रासादगमन्मही 1001 प्रथम अंश-अ० १३] [ १५३ यत्र यत्र ययौ देवी सा तदा भूतधारिणी। तत्र तत्र तु सा वैन्य ददृशेऽभ्युद्यतायुधम् ॥७११ ततस्त प्राह वसुधा पृथुपृथुपराक्रमम् । प्रवेपमाना तद्वारणपन्त्रिाणपरायणा १७२। स्त्रीवघे त्व महापाप कि नरेन्द्र न पश्यसि । येन मा हन्तुमत्यर्थं प्रकरोषि नृपोद्यमम् ।७३। श्रा पराशरजी बोले-हे ब्रह्मन् । प्रजा की पुकार सुन कर राजा पृथु ने अपना पाजगब नामक दिव्य धनुष और दिव्य वाण ग्रहण किया तथा कोष पूर्वक पृथिवी को मारने के लिये चले ॥६६॥ तब अत्यत भयभीत हुई पृथिवी गौ का रूप धारण करके वहाँ से भागती हुई ब्रह्मलोक प्रादि लौको में गई 11७०।। सभी भूतो को धारण करने वाली वह धरित्री वहाँ जहाँ भी गई, वही वही उसने राजा पृथु को शर-मंधान किये हुए अपने पीछे-पीछे प्राते हुए देखा ॥७१॥ तब उन अत्यत पराक्रम वाले राजा पृथु मे उनके बारा-प्रहार के भय से कम्पित हुई पृथिवी ने इस प्रकार कहा ॥७२॥ पृथिवी बोली-हे राजेन्द्र । तुम मेरी हत्या करने को एसे उत्तावले प्रयो हो रहे हो ? क्या माप इसमें स्त्री-हत्या श पाप नही देखते है ? ॥७३॥ एकस्मिन यत्र निधन प्रापिते दुष्टकारिणि । बहुना भवति क्षेम तस्य पुण्यप्रदो वधः 1७४) प्रजानामुपकाराय यदि मा त्व हनिष्यसि । आधारः क. प्रजाना ते नृपश्रेष्ठ भविष्यति ७५॥ त्या हत्वा वसुधे बाणैर्मच्छोसनपराड मुखीम् । आत्मयोगबलेनेमा धारयिष्याम्यहं प्रजा: ।७६। ततः प्रणम्य वसुधा त भूयः प्राह पार्थिवम् । प्रवेपिताङ्गी परम साध्वस समुपागता 1७७१ उपायत समारब्धाः सर्वे सिद्धयन्युपक्रमाः तस्माद्वदाम्युपाय ते त कुरुष्व यदीच्छसि ।
१५४ ] [ श्रीविष्णुपुराण समस्ता या मया जीर्णा नरनाथ महौषधीः । यदीच्छसि प्रदास्यामि ताः क्षीरपरिणामिनीः 1७६१ तस्मात्प्रजाहितार्थाय मम धर्मभृता वर । त तु वत्स कुरुष्व त्व क्षरेय येन वत्सला 11 समा च कुरु सवत्र येन क्षीर समन्ततः। वरौपधावीजभूत बीज सर्वत्र भावये ६११ राजा पृथु ने कहा-जहां एक अनर्थ करनेवाले के वध से अनेक व्यक्तियो को सुख प्राप्त होता हो, वहां उसका वध ही श्रेयस्कर है ॥७४।। पृथिवी ने कहा- हे राजन् । यदि आप मुझे प्रजा के हितार्य मारने की इच्छा करते हैं तो मेरे मरने पर आपकी उस प्रजा का आधार क्या होगा ? १७५।। पृथु बोले --मैं अपनी प्राज्ञा को न मानने वाली तुझे मार कर अपने योग-बल से स्वय ही माधार बन कर प्रजा को धारण करूंगा ॥७॥ इस पर श्री पराशरगी ने कहा - यह सुन कर मय से अत्यत काँपती हुई उस पृथिवी ने राजा को प्रणाम करके कहा ॥७॥ पृथिवी योलो-हे राजन् । जो कार्य योजना बद्ध होते हैं, वह अवश्य ही सिद्ध होते हैं। इसलिये मैं भापको एक उपाय बताना चाहती हूँ, आप चाहे तो उसके अनुसार करें ॥७॥ हे नरेन्द्र । मैंने जिन औपधियो को अपने मे लीन कर लिया है, यदि भाप चाहें तो मैं उन्हे दूध के रूप में पुनः दे सकती हूँ ७६॥ इसलिये हे घमात्मामों मे श्रेष्ठ ! अाप अपनी प्रजा का हित करने के लिये कोई ऐसा बछडा कल्पित कीजिये, जिसके स्नेह वश में उन प्रौशधियो को दूध रूप में निकाल दू100 भाप मुझे सव और समतल कर दीजिये, जिससे पेट पौषधियो के बीज रूप दूध का उत्पादन सर्वत्र हो सके।॥१॥ तत उत्सारयामास शैलान् शतसहस्रशः । धनुष्कोट्या तदा वैन्यस्तेन शेला विवद्धिताः पश न हि पूर्वविसर्गे वै विषमे पृथिवीतले । प्रविभागः पुराणा वा ग्रामारणा वा पुराभवत् ।। न सस्यानि न गोरक्ष्य न पिर्न वणिक पथः । वन्यात्प्रभृति मैत्रेय सर्वस्यतस्य सम्भवः ।४।
प्रथम प्रश-अ० १३ ]
[ १५५
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या यन सम त्वस्या भूमेरासीद्विजोत्तम ।
तन तत्र प्रजा सर्वा निवास समरोचयन् ।।
आहार फलमूलानि प्रजानामभवत्तदा।
कृच्छण महता सोऽपि प्रणष्टास्वोषधीपु वै ।।
स क्ल्पयित्वा वत्स तु मनु स्वायम्भुव प्रमुम् ।
स्वपाणो पृथिवीनाथा दुवोह पृथिवी पृथुः १८७।
सस्यजातानि सर्वाणि प्रजाना हितकाम्यया ।
तेनान्नेन प्रजास्तात वतन्तेऽद्यापि नित्यश 11८1
श्री पराशरजी न कहा- यह सुन कर राजा नृयु ने अपने घनुप की
दि स हजारों पवतों की उखाड-उखाड कर एक ही स्थान पर एकत्र कर दिया
१८२॥ इससे पहिल पृथिवी समतल नहीं थी तथा पुर, ग्राम प्रादि का विभाग
भी नहीं था शाह मेश्यजी । उस समय अन्न, कृषि, व्यापार प्रादि का
कोई नियमित क्रम नहीं था, इसका प्रारभ वेनपुन पृथु के शासन काल में ही
आ 11 है द्विज घेत । जहाँ जहाँ पृथिवी समतल हुई, वही वही प्रजा जा बसी
उस समय तक केवल फल मूलादि का प्राहार किया जाता था, परतु पोपधियों
है नष्ट होने पर वह भी अत्यत दुलभ हो गया 11८६. उस समय राजा पृथु ने
स्वायमुवमनु को बढ़ा बनाया और अपने हाथ से पृथिवी रूपी गौ से सब
रान्यो का दोहन किया । उसी अन्न यो आधार पर अब प्रता जीवन यापन
करती है 100 ll
प्राणप्रदाता स पृयुयस्मादमेरभूत्पिता !
ततस्तु पृथिवीसज्ञामवापाखिलधारिणी 148)
ततश्च देवमुनिभिदैत्य रक्षोभिरद्रिभिः।
गन्धर्वरुरगर्यौ पितृभिस्तरुभिस्तथा ६०
ततत्यानमुपादाय तत्तदुग्ध मुने पय ।
वत्सदोग्वृतिशेपाश्च तेपा तद्योनमोऽभवन् ।
सपा धामी विधात्री च घारिणी पोपणी तया ।
सर्वस्य तु तर पृथ्वी विष्णुपादवलोद्भवा ।।
१५६ ] [ श्रीविष्णुपुराण एवंप्रभावस्स पृथुः पुत्रो वेनस्य वीर्यवान् जज्ञे महीपतिः पूर्वो राजाभूलनरसनात् ।। य इद जन्म वैन्यस्य पृथोः सकीर्तयेन्नरः । न तस्य दुष्कृतं किञ्चित्फ नदायि प्रजायते ॥६४! दुस्स्वप्नोपशम नृणा शृण्वतामेतदुत्तमम् । पृथोर्जन्म प्रभावश्च करोति सतत नृणाम् ।९५१ पृथिवी को प्राण दान करने के कारण राजा पृथु उसके पिता हुए, इसलिये उस परित्री का नाम पृथिवी हा ॥८६॥ हे मुने ! इसके पश्चात् देवता,मुनि, दैत्य, राक्षस, पर्वत, सर्प, यक्ष प्रोर पितर प्रादि ने अपने-अपने पात्रो मे दूध का दोहन किया और दोहनकर्तामो के अनुसार ही दोग्धा और बछडा आदि नियुक्त हुए ॥६०-६१॥ इसीलिये भगवान् विष्णु के चरणो से उद्भूत हुई यह पृथिवी सब की जन्मदात्री, रचयित्री तथा धारण-पोषण करने वाली है ॥२॥ इस प्रकार प्राचीन काल मे वह वनपुत्र राजा पृथु इतने प्रभाव और पराक्रम पाले हुए तथा प्रजा की रक्षा करने के कारण ही उन्हें राजा कहा गया ॥६३॥ महाराज पृथु के नरिय का जो कोई कीर्तन करता है उसके दुष्कर्म का फल नष्ट हो जाता है ॥६॥ राजा पृथु की उत्पति का यह वृत्तान्त और उनका प्रभाव श्रोता के दु.स्वप्नो का शमन करता है ॥४॥ चौदहवाँ अध्याय पृथोः पुनो तु धर्मज्ञो जज्ञातेऽन्तद्धिवादिनी । शिखण्डिनो हविर्धानमन्तर्धानाद्वयजायत ।। हविर्धानात् पडाग्नेयो धिषणाजनयरसुतान् । प्रचीनबर्हिप शुक्र गय कृष्ण वृजाजिनौ ।२। प्राचीनयहिभगवान्महानासीत्प्रजापतिः । हविर्षानान्महाभाग येन सर्धिताः प्रजाः ।।
[ १५७
प्रथम अंग-प्र०१४ ]
पाचीनानाः कुशास्तस्य पृथिव्यां विघ ता मुने।
प्राचीन हिरमवस्यातो भुवि महावलः ।।
समुद्रतनयायां तु कृतदारो महीपतिः ।
महतत्तपसः पारे सवर्णाया महामते 1५॥
सवर्णापत्त सामुद्रो ददा प्राचीन हपः ।
सर्वे प्रचेतसो नाम धनुर्वेदस्य पारगाः ।।
अपृथग्घमंचरणास्तेऽनप्यन्त महत्तपः।
दशवपंसहवाणि समुद्रसनिलेशयाः
थी पराशरजी ने कहा है मैनेयजी ! उन राजा पृथ के अन्तर्धान और
वादी नामक दो पुत्र उत्पन्न हुए । अन्नर्धान ने शिक्षण्डिनी नाम की अपनी पली
उ हविर्षान नामक पुत्र उत्पन्न रिया!! हविर्घान से घिपणा ने प्राचीनवर्हि, शुक्र,
गय, कृष्ण, वृज और अजिन नामक छः पुत्र उत्पन्न हुए । हविर्धान के पुन
प्राचीनहि एक महान् प्रजापति हुए और उन्होंने यज्ञ के द्वारा अपनी प्रजा की
प्रत्यत वृद्धि की ।। हे मुने ! उनके शासन काल में समस्त पृथिवी में कुश ही कुग
दिखाई देते थे, इसीलिये वे प्राचीनहि के नाम से प्रसिद्ध हुए ॥४॥ हे महामते !
उन राजा ने तप के पश्चात् समुद्र की पुत्री सवर्णा का पाणिग्रहण पिया ॥५॥
टस सवर्णा के गर्भ से प्राचीनवहि ने दस पुत्र उत्पन्न किये । वे प्रचेवा नामक
सभी पुत्र धनुर्विद्या में पारगत हुए ॥६॥ उन्होंने समुद्र के जल में दस हजार
वर्ष तक रह कर समान धर्म के प्राचरण पूर्वक घोर तप किया था ॥७॥
यदर्थं ते महात्मानस्तपस्ते पुर्महामुने।
प्रचेतसः
समुद्राम्भस्येतदाख्यातुमहमि ।।
पित्रा प्रचेतस प्रोक्ताः प्रजार्थममितात्मना।
प्रजापतिनियुक्तन वहुमानपुरस्सरम् ।
ब्रह्मणा देवदेवेन समादिष्टोऽस्म्यहं सुताः ।
प्रजाः संवद्धनीयास्ते मया चोक्त तथेति तन् ।१०।
तन्मम प्रतीय पुत्राःप्रजावृद्धिमतन्द्रिताः।
कुरुद माननीया व. सम्यगाज्ञा प्रजापतेः॥१॥
१५८ ] [ श्री विष्णुपुराण ततस्ते तत्पितु. श्रुत्वा वचन नृपनन्दनाः । तथेत्युक्त्वा च त भूयः पप्रच्छु. पितरं मुने ।१२। येन तात प्रजावृद्धौ सतर्थाः कर्मणा वयम् । भवेम तत् समस्त न. कर्म व्याख्यातुमर्हसि ॥१३॥ श्री मैनेयजी ने कहा-हे महामुने ! उन महात्मा प्रथेनागण ने रानुः मे रह कर किसलिये ऐसा तप किया था यह बताने की कृपा करिये ॥८॥ श्री पराशरजी ने कहा-हे मैत्रेयजा । एक समय उन प्रचेतानो के पिता महात्मा प्रानीनवहिं ने प्रजापति को प्रेरणा से उनसे सन्तानोत्पत्ति के लिये कहा पाnt प्राचीनहि बोले- हे पुत्रो । देवदेव ब्रह्माजी ने मुझे प्रजा की वृद्धि का प्रादेश दिया और मैंने भी उसे स्वीकार कर लिया ॥१०॥ इमलिये हे पुत्रो । मेरो प्रसन्नता के लिये प्रजा-वृद्धि का कार्य करो, क्योकि प्रजापति को पाता तो माननी ही होगी ॥११॥ श्री पराशरजो ने कहा - हे मुने ! उन गन कुमारों ने पिता की याज्ञा स्वीकार करके उनसे पूछा ॥१२॥ प्रचेता बोले-हे पिताओ ! हम जिस प्रकार प्रजावृद्धि कर सके नह हमे भले प्रकार बताइये ॥१३॥ आराध्य वरद विष्णुमिष्टप्राप्तिममशयम् । समेति नान्यथा मयं किम यत्कथयामि व ॥१४॥ तस्मात्प्रजाविवृद्धयर्थ सर्वभूनप्रभु हरिम् । पाराधयत गोविन्द यदि सिद्धिमभीप्पथ ॥१॥ धर्ममथं च काम च मोक्ष चान्विच्छता सदा । श्राराधनोया भगवाननादिपुरुषोत्तमः।१६। यस्मिन्नाराधिते सर्ग चकारादौ प्रजापतिः । तमाराध्याच्युत वृद्धिः प्रजाना वो भविष्यति ।१७। इत्येवमुक्तास्ते पित्रा पुत्राः प्रचेतसो दश । मन्ना पयोधिसलिने तपस्तेपुः समाहिता १८ दशवर्षसहस्राणि न्यस्नचित्ता जगत्पतो। नारायणे मुनिष्ठ सर्वलोकपरायणे ।१९॥ तवावस्थिता देयमेकाग्रमनसो हरिम् । तुष्टुवुर्यस्स्तुत. कामान् स्तातुरिधान्प्रयच्छति ।२०।
प्रयम अंश-अ० १४ ] पिता बोले-मावान् विष्णु वर देने वाले हैं, उनकी पारावना करते से अवश्य ही इच्छित वनु प्राप्त होती है । इसके अतिरिक्त और क्या कहूँ ? ११४॥ यदि तुम सफलता की कामना करले हो तो प्रजा की वृद्धि के निमित्त सर्वभूतेश्वर श्री गोविन्द को पाराधना करो ॥१५॥ धर्म, अर्थ, काम, मोस को चाहना वाले पुरुषो को भगवान् विष्णु को सदैव पाराधना करनी चाहिये ।१६॥ जिनको नल्यारम में उपासना करके प्रजापति ने इस विश्व की रचना की है, उन्हीं की पारावना करने से प्रजा की वृद्धि होगी ।।१७॥ पराशरजी ने कहा- पिता की इस प्रकार प्राज्ञा पाकर दम्रो प्रचेतागण समुद्र के जल मे निमग्न रह पर यन्न पूर्वक तपस्या करने लगे ॥१८॥ हे मुनिवर । वे लोकाश्रय भगवान् विष्णु मै ध्यान लगाये हुए वहाँ दस हजार वर्ष तक रहार, उन्हीं की स्तुति करते रहे। वे भगवान् अपने स्तोता को सब प्रभिलाषित प्रदान करते हैं ।।१६-२०॥ स्तव प्रचेतसो विष्णोः समुद्राम्भगि सस्थिताः । चक्र स्तन्मे मुनिश्रेष्ठ सुपुण्य वक्तुमर्हसि ॥२१॥ शृणु मैत्रेय गोविन्द ययापूर्व प्रचेतसः । तुष्टुवुस्तन्मयोभूताः समुद्रसलिलेशया: ॥२२॥ मता: स्म सर्ववचसा प्रतिक्ष यशाश्वतो। तमाद्यन्तमश पस्य जगत : परम प्रभुम् ॥२३॥ ज्योतिराद्यमनौपम्यमरवनन्तमपारवत् । योनिभूतमशेपस्य स्थावरस्य चरस्य च ।२४) यस्याहः प्रथम रूपमरूपस्य तथा निशा । सध्याः च परमेशस्य तस्मै कालात्मने नमः॥२५॥ भुज्यतेऽनुदिन देवः पितृभिश्च सुधात्मकः । जीवभूतः समस्तस्य तस्मै सोमात्मने नमः ॥२६॥ यस्तमास्यत्ति तीव्रात्मा प्रभाभिर्भासयन्नमः। धर्मशीताम्भसा योनिस्तस्मै सूर्यात्मने नमः ॥२७॥ काछियवान यो वित्ति अगदेवदशेपतः । शब्दादिसश्रयो व्यापी तस्मै भूम्यात्मने नमः।२८॥ ..
समुद्र स्थित १६० ] [ श्रीविष्णुपुराण श्री मैत्रेयजी ने कहा है मुनिवर । समुद्र के जल मे स्थित रह कर प्रचेतानो ने जिस प्रकार भगवान् का स्तव किया, वह मुझे बताने की का करिये ॥२१॥ श्री पराशरजी ने कहा- हे मंत्रेयजी । पूर्व काल मे प्रघेतानो ने भगवान गोविद की जो स्तुति त मयता पूर्वक की थी, उस सुनो ॥२२॥ प्रचेतामो ने कहा - सभी वाक्यो की जिनमै नित्य स्थिति है और जो ससार की उत्पत्ति तथा प्रलय के कारण हैं, उन परम प्रभु को हमारा नमस्कार है ।।२३।। जो ज्योति स्वरूप, उपमा रहित, अणु, अनन्त, अपार भोर चराचरा रमक विश्व के कारण है तथा जिन रूपहीन के दिवस रात्रि और सध्या ही प्रथम रूप हैं, उन कालरूप भगवान् को नमस्कार करते हैं ।।२४-२५।। जो सभी प्रणियो के जीवन स्वरूप हैं, तथा जिनवे अमृतमय रूप का पान देवता और पितर नित्य-प्रति करते हैं, उन सोम म्वरूप परमात्मा को नमस्कार है ॥२६॥ जो अपने तीक्ष्ण रूप से प्रकाश को प्रकाशित करते मोर मधकार का भाण पर लेते हैं, तथा जो धूप, शोत मोर जल के उद्गम स्थल हैं, उन भास्कर रूप भगवान् को नमस्कार है ॥२७॥ जा इस विश्व के धारणकर्ता, हान्दादि विषयों ये मात्रय रूप तथा सव व्यापय उन पृथिवो रूप प्रमु को नमस्कार है ॥२॥ यद्योनिभूत जगतो बीज यत्सर्वदेहिनाम् । तत्तोयरूपमोशस्य नमामो हरिमेधसः ॥२६॥ यो मुख सर्वदेवाना हव्यभुक्त्यभुक तथा । पितृगा च नमस्तस्मै विष्णवे पायकात्मने ।३०। पञ्चधावस्थितो देहे यश्चेष्टा पुरुलेऽनिशम् । पायाशयोनिभंगवास्तस्मै वाय्वान्मने नम 1३१॥ प्रवकाशमशपायां भूनाना यः प्रयच्छति । अनन्तमूर्तिमायुद्धस्तस्मै ध्यामात्मने नम ॥३२॥ समस्तेन्द्रियसर्गस्य यः गदा स्यानमुत्तमम् । तस्मै शमादिरूपाय नम. वृष्णाय येयसे ।३३३
प्रथम अंश-० १४ ]
[ १६१
रूप भगवान्
गृह्णाति विपयानियिमिन्द्रियारमा क्षराक्षरः ।
यस्तस्मै ज्ञानमूलाय नता स्म हरिमेधसे १३४॥
गृहीतानिन्द्रियरानात्मने यः प्रयच्छति ।
अन्तःकरणरूमाग तस्मै विश्वात्मने नम ॥३५॥
यस्मिन्ननन्ते सकल विश्व यस्मात्तथोद्रतम् ।
लयस्थान च यस्तस्मै नम प्रकृतिमिरणे ॥३६॥
जो विश्व की याति रूप तया सब प्रणियो का बीज रूप है, उस जल
को हम नमस्कार करते हैं ।।२६। जो सब देवताश्रो का हव्य और
पितरो का कव्य भक्षण करने वाले है, उन अग्नि रूप ईश्वर को नमकार है
॥३०॥ जो प्राणापान आदि पच वायु रूप में शरीर में स्थित होकर उसे
चेष्टादान करता रहता है तथा जो पापारा योनि है, उस यायु रूप परमेश्वर
मो नमस्कार है ॥३१॥ जो सब भूतों को अवकाश प्रदान करता है, उन अनन्त
मूर्ति एव प्राकाश रूप भगवान् को नमस्कार है ॥३२॥ जो सब इन्द्रिय सृष्टि के
श्रेष्ठ स्थान हैं, उन शब्दादि गुण रूप विधाता थी कृष्ण को नमस्कार है ।।३३।।
जो क्षर अक्षर और इन्द्रिय रूप से विषयो को ग्रहण करते रहते है, उन ज्ञान के
मूल भगवान् विष्णु को नमस्कार है ॥३४॥ जो अन्त करण रूप से इन्द्रियो के
विषयो को आत्मा के समक्ष प्रेपित करते हैं, उन विश्वात्मा प्रभु को नमस्कार
है ॥३५॥ जिनमे सम्पूर्ण ससार स्थित है, जिनसे उत्पन्न होकर वह उन्ही मे
लीन हो जाता है, उा प्रकृति स्वरूप परमेश्वर को नमस्कार है ॥३६।।
शुद्ध. सैल्लक्ष्यते भ्रान्त्या गुणवानिवयोऽगुरणः ।
तमात्मरूपिण देव नता स्म पुरुषोत्तमम् ॥३७॥
अविकारमज शुद्ध निर्गुण यनिरञ्जनम् ।
नता स्म तत्पर ब्रह्म विष्णोर्यत्रम पदम् ॥३८॥
प्रदीर्घहस्वमस्थूलमनण्वश्यामलोहितम् ।
अस्नेहच्छायमतनुमसक्तमशरोरिणम् ॥३६॥
अनाकाशमसस्पर्शमगन्धमरस च यत् ।
अचस्योरमचलमवापारिणममानसम् ॥४०॥
तेजति মাৰি १६२ ] [ श्रीविष्णुपुराण अनामगोनमसुखमतेजस्व महेतुकम् । अभय भ्रान्तिरहितमनिद्रमजरामरम् ।४१॥ परजोऽशब्दममृतमप्लुत यदसवृतम् । पूर्वापरे न वै यस्मिस्तद्विष्णोः परम पदम् ॥४२॥ परमेशत्वगुणवत्सर्वभूतमसश्रयम् । नताः स्म तत्पद विष्णोजिह्वाग्गोचर न यत् ।४३॥ जो निर्गुण होते हुए भी प्रारोप से गुणयुक्त दिखाई देते हैं उन प्रात्मरूप पुरुपत्रेठ को नमस्कार है ।।३७। जो विकार जन्म, रहित रहित, गुण रहित, पुर, निर्मल पौर विष्णु का परमपद रूप है, उस ब्रह्म को नमस्कार है ॥३८॥ जो लम्बा, स्थूल, लघु, काला, लाल, स्नेह, क्रान्ति तथा देह पाला नहीं है तपा पासक्ति रहित मौर जीव से भिन्न है और प्रवाश, स्पर्श, गध, रस से रहित, नेत्र, जिह्वा, हाय और मन से भी हीन है ॥३६-४०॥जो नाम,गोत्र, सुख से रहित, पारण- हीन और भय, भ्रान्ति, निद्रा, जरा चौर मरण अवस्थामा से परे है ॥४१॥ जो रजोगुण- रहित, शब्द रहित, मृत्यु-रहित गति रहित तया भाच्छादन- रहित है और जिसमें पूर्वापर व्यवहार भी नहीं है, वही भगवान् श्रीहरि या परमपद है ॥४२॥ जिसका परम गुण शासन है, जो सर्व रूप एव पाधार रहित है तथा जिह्वा मोर दृष्टि मा भी विपय नहीं है, ऐरो भगवान् पे उस परमपद को हमारा नमस्कार है ॥४३॥ एव प्रचेतसो विष्णु स्तुवन्तस्तत्समाधयः । दशवसहस्राणि तपश्चेरुमहाएंवे ।४४। तत. प्रसनो भगवास्तेषामन्तजले हरिः । ददी दसंगमुनिद्रनीलोत्पलदलच्छवि 1४५॥ पतस्विराजमाम्ढवमलोक्य प्रचेतस । प्रणिपेतुः शिरोभिस्त भक्तिमारायनामितः ।४६॥ ततरताना मगयान्क्रियतामीसितो वरः। प्रमादरमुमोष्ट यो परदः सगूपस्थितः 111 सतस्तमूपुरद प्रणिपरय प्रचेतसः । पया पिना समादिष्ट प्रजानां वृद्धिपारणम् ।।
प्रथम अदा-प्र.१५ ] [ १६३ स चापि देवस्त दत्त्वा यथाभिलपित वरम् । अन्तर्वान जगामाशु ते च निश्चकमुर्जलात् ।४६ श्री परासरजी ने कहा-इस प्रकार समुद्र में रहते हुए प्रचेताओं ने समाधिस्य होकर भगवान् विष्णु की स्तुति पूर्वक दस हजार वर्ष तक तप किया ॥४४॥ इससे भगवान् रन पर प्रत्यत प्रसन्न हुए और उन्हें प्रफुल्लित नील कपल जैसे पाना वाले दिव्य स्वरूप से जल मे ही दर्शन दिया ॥४५॥ जब उन प्रचेताओं ने गरडाल्ड भगवान के दर्शन दिये तव उन्होन भक्ति के भार से झुके हुए अपन शिरो को और नी मुत्रा पर भगवान् को प्रणाम किया ॥४६॥ यह देख कर भगवान उनके प्रति दोन-ने तुम पर अत्यत प्रसन्न हुपा हूं पोर तुम्हें वर प्रदान करने के लिये यहां पाया हूँ अपना इच्छित पर माँगो ॥४७॥ यह सुन कर प्रतायो ने वरदाता भगवान विष्णु को पुनः प्रणाम दिया और उनमें पिता ने उन्हें प्रजावृति यो जो प्राज्ञा दी थी, यह सब वृत्तान्त उनसे निवेदन दिया !xe0 इस पर भगवान ने उन्हें उनका इच्छित वर प्रदान किया पोर वहीं अन्तर्धान हो गये प्रौर तर प्रचेतागण भी समुद्र के जल से वा निकन माये ॥४॥ पन्द्रहवाँ अध्याय तपश्चरत्सु पृथिवी प्रचेत्र सु महीरुहाः। अरक्ष्यगणामावर्वभूवाथ प्रजाक्षय. ।। नाशकन्मरुतो वातु पृत यमभवद् मैः । दशवर्यसहस्राणि न गेकुरचेप्टिनु प्रजा. १२। तान्दृष्ट्वा जलनिष्क्रान्ता सर्वक्र द्धा प्रचेतसः । मुखेभ्यो वायुमग्नि च तेऽसृजन जातमन्यवः ।। उन्मूलानय तान्वृक्षाकृत्वा वायु रक्षोपणदर तानग्निरदहधोरस्तनाभू मसक्षयः xि।
१६४ ]
[ श्री विष्णुपुराण
क्रोध पूर्वक
मक्षयमथो दृष्ट्वा किञ्चिच्छिष्टेपु शाखिपु ।
उपगम्याब्रवीदेतानाजा सोम प्रजापतीन् ।।
कोप यच्छत राजान शृणुध्व च वचो मम ।
सन्धान व करिष्यामि सह क्षितिरुहैरहम् ।६।
रत्नभूता च कन्येय वार्भेयी वरवरिणनी।
भविष्यजानता पूर्व मया गोभिविवद्धिता ७।
श्री पराशरजी ने कहा-जब प्रचेतागण तपस्या में लगे हुए थे, तब
विसी प्रकार से पृथिवी की रक्षा व्यवस्था न होने के कारण यह वृक्षो से
पाच्छादित हो गई और बहुत-मी प्रजा क्षीण होगई ॥१॥ माकाश तक ऊचे
उठे वृक्षों के कारण दश हजार वर्ष तक वायु का चलना ही रका रहा और प्रजा
चेप्टा- रहित हो गई ॥२॥ जब प्रचेतागण जल से बाहर पाये तो
उन वृक्षो का ऐसा विस्तार देखकर उन्होंने
अपने मुख से वायु और अग्नि को छोडा ॥३॥ उस वायु ने वृक्षों को
उखा नर शुष्क किया पोर प्रनएड भग्नि ने उन्हें भस्म कर दिया। इस प्रकार
वृक्ष नष्ट होने लगे ॥४॥ उस भयानक वृक्ष- प्रलय के कारण पन्द्रमा ने प्रचेतामो
के पास जापर कहा ॥१॥ हे प्रचेतागण । माप अपने क्रोध का शमन करने
मेरी बात मुनिये। वृक्षों के साथ में प्रापकी सधि करा देना चाहता हूँ ॥६॥ यह
रत्न रूपा एव श्रेष्ठ वर्ण वाती पन्या वृक्षो से उत्पन्न हुई है, भविष्य की बात
जान कर मैंने अपनी पिरणों से इसका पोषण किया है ॥७॥
मारिपानाम नाम्नपा वृक्षाणामिति निमिता ।
भार्या योऽस्तु महाभागा घ्रयं वराविद्धिनी ।।
युप्माव तेजसो न मम चाद्धन तेजसः ।
प्रस्यामुत्पत्स्यते विद्वान्दक्षो नाम प्रजापतिः ।।
मम चागेन रायुत्तो युष्मत्तेजोमयेन थे।
तेगसाग्निममा भूप प्रजा संवद पिप्यति ।१०।
मांग मुनि पूर्वमासीदविदां पर।
गुराये गोमतीतीरे स तेरो परम तपः ॥११॥
[ श्रीविष्णुपुराण इसके पश्चात् एक दिन उस अप्सरा ने उन महर्षि से कहा- हे ब्रह्मन् । अब मैं स्वर्ग लोक को प्रस्थान करूंगी, आप प्रसन्न होकर मुझे जाने की अनुमति दीजिये ॥१४॥ उसकी बात सुन कर उसमे आसक्तिवान् ऋषि ने कहा कि अमी कुछ दिन और ठहरो ॥१५॥ उनके अनुरोध पर वह अ-सरा सो वर्ष तक और उनके साथ रहती हुई विविध भोगो को भोगतो रही ॥१६॥ तब उसने पुनः उनसे कहा कि अब मुझे स्वर्ग जाने की अनुमति दीजिये । इस पर ऋपि ने उससे कहा कि अभी कुछ दिन और ठहरो ॥१७॥ इस प्रकार फिर सौ वर्ष व्यतीत होगए तब उसने मुसका कर मुनि से कहा- भगवन् ! अब मैं स्वर्ग लोक को जारही हूँ ॥१८॥ यह सुन कर गुनि ने उसे अपने हृदय से लगा लिया और बोले कि वहाँ तो तुम्हें बहुत समय लगेगा, इसलिए अभी क्षण भर तो रुको ॥१६॥ तब वह श्रेष्ठ कटि वाली अप्सरा उन ऋपि के साथ दो सौ वर्ष से कुछ कम समय तक मोर क्रीडा करती रही ॥२०॥ गमनाय महाभाग देवराजनिवेशनम् । प्रोक्तःप्रोक्तस्तया तन्व्या स्थीयतामित्यभापत १२१॥ तस्य शापभयाद्भीता दाक्षिण्येन च दक्षिणा । प्रोक्ता प्रणयभङ्गात्तिवेदिनी न जहाँ मुनिम् ।२२। तया च रमतस्तस्य परमरहर्निशम् । नव नवमभूत्प्रेम मन्मथाविश्वेतस. ।२३। एकदातु त्वरायुक्तो निश्चक्रामोटजान्मुनि । निष्कामन्त च कुत्रेति गम्यते प्राह सा शुभा ।२४। इत्युक्त स तया प्राह परिवृतमह. शुभे। सन्ध्योपास्ति करिष्यामि क्रियालोपोऽन्यथा भवेत् ॥२५॥ ततः प्रहस्य सुदती त सा प्राह महामुनिम् । किमद्य सर्वधर्मज्ञ परिवृत्तमहस्तव ॥२६॥ यहूना विप्र वाणा परिवृत्तमहस्तव । गतमेतन पुरते विस्मय कस्य कथ्यताम् ॥२७॥ महाभाग ! वह मारा जब-जब पिरो स्वर्गलोक को जाने की १६८ ] [ श्रीविष्णुपुराण अपने आश्रम मे घुसते हुए देखा है ॥२८॥ अब दिन के छिपने पर यह सच्या. काल उपस्थित हुआ है, फिर तुम इस प्रकार से उपहास क्यो कर रही हो' ॥१६॥ प्रम्लोचा ने कहा-ह ब्रह्मन् । प्रापने मेरे प्रात काल पाने की जो बात कही, वह तो ठीक है परंतु उस प्रात काल को आज रोकडो वर्ष व्यतीत हो चुके हैं ॥३०॥ चन्द्रमा बोले- यह सुन कर वह विप्रश्रेष्ठ चिन्ता मे पड गये मौर उन्होंने पातुरता पूर्वक उस विशाल नेत्र वाली सुन्दरी से पूछा-~-परी भीरु । मुझे सत्य बता कि तरे साथ विषयासक्त रहते हुये मेरा कितना समय व्यतीत हो चुका है ? ॥३१॥ प्रम्लोचा ने कहा-अब तक नौ सौ सात वर्ष, छ मास मोर तीन विस व्यतीत हो चुके हैं ॥३२॥ ऋषि ने कहा-क्या तू यह सत्य कह रही है या मेरा उपहास करती है ? मुझे तो ऐसा लग रहा है कि यहाँ मैं तेरे साथ एक दिन ही रहा हूँ ॥३६॥ मम्लाचा ने कहा है ब्रह्मन् ! मैं मापके समक्ष मिष्या कैसे यह सवती हूँ' इस पर भी प्रापने अपने धर्म मार्ग मे तत्पर होकर मुझसे पूया है, तो प्रमत्य यहने की बात हो नहीं है ॥३४॥ निशम्य तद्वचः सत्य स मुनि पनन्दनाः । घिधिड मामित्यतीवेत्थ निनिन्दात्मानमात्मना ॥३॥ तपासि मम नष्टानि हत ब्रह्मविदा धनम् । हतो विवेक केनापि योपिन्मोहाय निमिता १३६। अमिपटवातिग ग्रह्म शेयमात्मजयन मे । मतिरेपा हुता येन धिक् त काम महाग्रहम् ॥३७ प्रतानि वेदवेद्याप्तिवारणान्य खिलानि च । नरखनाममार्गेण सनापहृतानि मे ॥३०॥ विनिन्यस्य स धर्मश. स्वयमात्मानमात्मना। तामप्मरसमासीनामिद वचनमययोत् १३६॥ गच्छ पापे यथायाम यताय तरत स्वया। देयराजस्य मरक्षोभ युवरया भावचेष्टित.. न वा परोग्यद भरम मोपत्तीण वलिना । संत रामद मैत्रगुपिताद यया सह ।।
प्रथम ग्रंश-अ० १५ ] १६६ चन्द्रमा बोले -है राजपुत्रो । प्रम्लोचा की सस्य वाणी मुन कर महर्षि अपने को धिक्कारने लगे। मपि ने कहा-परे, मेरी ठपस्या नष्ट हो गई, ब्रह्मवेत्तानों का जो धन मेरे पास था वह मविवेक के कारण लुट गया। महो। स्त्री की रचना तो मोह जाल डालने दे लिये ही हुई है ॥३५-३६।। मुझे अपने मन को वदा में करके रहो मियो वा ज्ञान प्राप्त करना चाहिये, मेरी बुद्धि को नष्ट कर देने वाले नाम रूपी महाग्रह को बारदार घिसार है॥३७॥ नरक ग्राम के मागं स्पो इस नारी के समर्ग दोष से ब्रह्म प्राप्ति के कारण प सभी ब्रतों पा नारा हो गया ॥३८॥ न घमंत मुनि ने इस प्रकार अपनी ही निन्दा को पौर फिर उस प्रप्सरा से पहले लगे ॥३॥ है पिनि ! मब तू जहाँ चाहे चली बा, तू ने अपने रूप से मुझे मोहित करके इन्द्र का कार्य पूर्ण कर दिया है ॥१०॥ माने क्रोध रूपी प्रज्वलित अग्नि से मैं तुझे इसलिये भस्म नहीं करना चाहता रि सजन मनुष्य सात पग साय रहने से ही मित्र बन जाते हैं, परतु मैं तो तेरे साथ इतने दोघं समय तक रहा हूँ ॥४॥ प्रयवा तव को दोपः कि वा कुप्याम्यह तव । ममैव दोपो निद्रा येनाहमजितेन्द्रियः ।।२। यया पाकप्रियायिन्या कृतो मे तपसो व्ययः । त्वया धिक्ता महामोहमञ्जूपा सुजुगुनिताम् ॥४॥ यावदित्य स विप्रपिस्ता ब्रवीति सुमध्यमाम् । तावद्गलस्वेदजला सा बभूवातिवेपयुः ।। प्रवेपमाना सततं विनगारलता सतीम् । गच्च गन्देति सक्रोयमुवाच मुनिसतमः ॥४५॥ सा तु नित्सिता तेन विनिष्कम्य उदाथमान् । यारागामिनी स्वेद ममा तसल्लवः ।। निर्माजमाना गात्राणि गतल्वेदजलानि । वृक्षादा ययौ वाला तदप्रारुपल्लवः ऋपिरणा यस्तदा गर्भस्तस्या देहे समाहितः । निजंगाम स रोमारास्वेदस्पो तरजनः ।।
१७० ] [ श्रीविष्णुपुराण इसमे तेरा कुछ दोष भी नहीं है, जिससे मैं तुझ से सृष्ट हो जा। सभी दोष मेरा है, क्योकि मैं अपनी इद्रियो को नहीं जीत सका ॥४२॥ इन्द्र के स्वार्थ के लिये जिस तूने मुझे तप-भ्रष्ट कर दिया, ऐसी तुझ महामोह मया को अत्यत धिक्कार है ॥४३॥ चन्द्रमा वोले- जब तक वह वापि उससे इस प्रकार कहते रहे, तब तक वह घबराहट के कारण पसीने से लथपथ होकर कालो रही ॥४४॥ इस प्रकार पसीने से भीगी और भय से काँपती हुई उस अप्सरा से मुनि ने प्रत्यन क्रोधित होव र कहा-जा, तू यहाँ से तुरंत चली जा ॥४॥ इस प्रकार बारबार तिरस्कार करने पर वह पाश्रम से निकली और पाकाच मार्ग से गमन करते हुए उसने अपने पसीने को वृक्षो के पत्तों से पौछ नि और यह एक वृक्ष से दूसरे वृक्ष पर चढती हुई चलती चली गई ॥४६॥ महर्षि कराड ने उसके जो गर्भ स्थापित किया था, वह भी रोमाच के का पसीने के रूप में उसके देह से निकल पाया ॥४८|| त वृक्षा जगृहममेक चक्रे तु मारुतः । मया चाप्यायितो गोभिः स तदा ववृधे शनैः ४६। वृक्षानगर्भसम्भूना मारिपाख्या वरानना। ता प्रदास्यन्ति वो वृक्षाः काप एष प्रशाम्यताम् ॥५०॥ कण्डोरपत्यमेव सा वृक्षेभ्यश्च समुद्गता। ममापत्य तथा वायो. प्रम्लोचातनया च सा ।५११ स चापि भगवान् कण्डुः क्षीणे तपसि सत्तमः । पुरुषोत्तममास्यातं विष्णोरायतन ययौ ॥५२॥ तकाग्रमतिर्भूत्वा चकाराराधन हरेः । ब्रह्मपारमय कुर्वपमेकानमानसः । ऊध्र्ववाहुमहायोगी स्थित्वासी भूपनन्दना: ५३। ब्रह्मपार मुनेः श्रोतुमिच्छामः परम स्तवम् । जपता कण्डुना देवो येनाराध्यत केशवः ॥५४॥ हे राजपुत्रो ! उस गर्भ को वृक्षो ने ग्रहण किया और वायु ने उसे पत्नपूर्वक पदा कर दिया, तब मैं अपनी किरणो से उसका पोषण करने लगा।
प्रथम अश-अ०१५ ] [ १७१ इससे वह वृद्धि को प्राप्त हुना ॥४६इस प्रकार वह भारिपा नाम की कन्या वृक्षार से उत्पन्न हुई, जिस वृक्षगण तुम्हारे लिये समर्पित करने, इसलिये अपने क्रोध को भद शात कीजिये ॥५०॥ वृक्षोकी वह कन्या उसी प्रम्लोचा की सुता है, इस प्रकार वह कराडु ऋषि की, वायु की तथा मेरी भी पुत्री है ॥५॥ फिर वह सन्त श्रेष्ठ कएडु क्षीणता हुए पुरुषोत्तम क्षेत्र नामक स्थान को गये, जो भगवान विष्णु की निवारा भूमि है । वहीं उन्होंने एकान चित्त से ब्रह्मपार गत्र का जप और ऊध्वबाहु रह कर भगवान् विष्णु की उपासका को ।।५२ ५३।। यह सुन कर प्रचताम्रो ने कहा-कराड मुनि का वह ब्रह्मपार नामक महान् स्तोत्र हम सुनना चाहते है जिसका जप करते हुए उन्होने भगवान् का माराधन किया था ॥५४॥ पार पर विष्णुरपारपार पर परेभ्य परमार्थरूपी। स ब्रह्मपार परपारभूत पर पराणामपि पारपार ॥५५॥ सा कारण कारणतस्ततोऽपि तस्यापि हेतु परहेतुहेतु । कार्येषु चैव राह कर्मकर्तृ रूपरशेषरवतोह सर्वम् ॥५६॥ ब्रह्म प्रभुब्रह्म स सवभूतो ब्रह्म प्रजाना पतिरच्युतोऽसौ । ब्रह्माव्यय नित्यमज स विष्णुरपक्षयाय रखिलरसङ्गि १५७१ ब्रह्माक्षरमज नित्य यथासो पुरुषोत्तम । तथा रागादयो दोपा प्रयान्तु प्रशम मम 1५८) एतद्ब्रह्मपराख्य वै सस्तव परम जपन् । अवाप परमा सिद्धि स तमाराध्य केशवम् ॥५६॥ [इम स्तवय पठति शृणुयाद्वापि नित्यश । स कामदोपरखिलमुक्त प्राप्तोति वाच्छितम् ।।] इस च मारिपा पूर्वमासीद्या ता ब्रवीमि व । कार्यगौरवमेतस्या कथने फलदायि व १६०॥ चन्द्रमा ने कहा-भगवान विष्णु विश्वपथ के अन्तिम लक्ष्य हैं, जिनका पार नहीं पाया जा सकता । वह पर से भी परे मोर सत्य स्वरूप हैं । वह तपोनिष्ठो को ही प्रप्त होते हैं, क्योकि वे पर से परे तथा इन्द्रियो मगोचर, भक्तो के १७२ ] [ श्रीविष्णुपुराण पालक और अभीष्ट पूरक है ॥५२॥ कारण के कारण, उसके भी कारण के कारण होने से परम कारण है इस प्रकार कर्म, कर्ता प्रादि के सहित सम्पूर्ण प्रपच के पालक हैं ॥५६॥ वह ब्रह्म ही प्रभु , सर्वरूप और सम्पूर्ण प्रा का स्वामी और अविनाशी है। वही अव्यय,नित्य, अजन्मा तथा क्षयादि विकारों रहित विष्णु है ॥५७। उन पुरुषोत्तम भगवान् विष्णु के अक्षर, अजर, भर तथा नित्य ब्रह्म होने से मेरे भी रागादि दोष शान्ति को प्राप्त हो ॥५॥ ब्रह्मपार नामक स्तोत्र के जप पूर्वक भगवान् केशव की आराधना करने से उन महर्षि को परम सिद्धि की प्राप्ति हुई ॥५६) (इस स्तोत्र का जो नित्य पार या श्रवण करता है यह कामादि विकारो से छूट कर इच्छित फल प्राप्त करता है। अब मैं उस मारिपा वा पूर्व वृत्तान्त कहता हूँ । वह पहले जन्म मे क्या थी ? म लेने पर तुम्हारे गौरव को सफलता होगी ॥६॥ अपुना प्रागिय विष्णुगृते भर्तरि सत्तमाः। भूपपत्नी महाभागा ताषयामास भक्तितः।६१। प्राराधितस्तया विष्णुः प्राह प्रत्यक्षता गतः । वर वृणीष्वेति शुभे सा च प्राहात्मवाञ्छितम् १६२। भगवन्बालवैधव्याद् वृथाजन्माहमीदृशी। मन्दभाग्या समुद्भता विफला च जगत्पते ।६३। भवन्तु पतय. श्लाघ्या मम जन्मनि जन्मनि । त्वत्प्रसादात्तथा पुत्रः प्रजापतिसमोऽस्तु मे १६४॥ कुल शीलं वय, सत्य दाक्षिण्य क्षिप्रकारिता। प्रविसवादिता सत्त्व वृद्धसेवा कृतज्ञता १६५॥ रूपराम्पत्समायुक्ता सर्वस्य प्रियदर्शना । मयोनिजा च जायेय त्वत्प्रसादादधोक्षज १६६॥ तयैवमुत्तो देवेशो हपोकेश उवाच ताम् । प्रणामनग्नामुत्याप्य वरद, परमेश्वरः १६७) यह पपन पूर्व जन्म में एक राज-गहिषी थी। उसके पति दुई पवस्था में ही मृत्यु को प्राप्त हो गये थे। तब इस महाभागा ने भगवान् विए
१७४ ]
श्रीविष्णुपुराण
भगवान अन्तर्धान हो गये । तुम्हारी पत्नी मारिपा के रूप में यह वही
राज-महिपी है ।।७२॥
तत सोमस्य वचनाञ्जगृहुस्ने प्रचेतस ।
सहृत्य कोपं वृक्षेभ्य पत्नीधर्मेण मारिपाम् ।७३
दशभ्यस्तु प्रचेतोम्यो मारिपाया प्रजापति ।
जज्ञे दक्षो महाभागो य पूर्व ब्रह्मणोऽभवत् ।७४
स तु दक्षो महाभागस्सृष्टयथं सुमहामते ।
पुत्रानुत्पादयामास प्रजासष्टयर्थमात्मन ७५॥
प्रवराश्च वराश्चैव द्विपदोऽथ चतुष्पदान् ।
प्रादेश ब्रह्मणः कुर्वन् सृष्टययं समुपस्थितः ७६।
स सष्ठा मनसा दक्ष पश्चादसृजत स्त्रिय ।
ददी स दश धर्माय कश्यपाय त्रयोदश ७७
कालस्य नयने युक्ताः साविंशतिमिन्दवे ।
तासु देवास्तथा दैत्या नागा गावस्तथा खगा. १७८)
गन्धर्वाप्सरसश्चैय दानवाद्याश्च जज्ञिरे ।
तत प्रभृति मैत्रेय प्रजा मैथुनसम्भवा 1७६।
सङ्कल्पाहर्शनास्पर्शात्पूर्वेषामभवन प्रजाः ।
तपोविशेष सिद्धाना तदात्यन्ततपस्विनाम् ८०)
श्रीपराशरजी ने कहा-चन्द्रमा के इस प्रकार कहने से प्रचेतागण शान्त हुए
पौर उन्होने मारिपा को भार्या रूप में ग्रहण किया ॥७३॥ उन दसों प्रचेतामो
से उस मारिपा ने दक्ष प्रजापति को जन्म दिया, जो पूर्वकाल में ब्रह्माजी से
उत्पन्न हुए थे ।।७४॥ हे महामते । ब्रह्माजी की प्राज्ञा से उस दक्ष प्रजापति
ने सगं रचना की इच्छा करके नीचे ऊँचे तथा विभिन्न प्रकार के देह धारियो
को पुत्र रूप से उत्पन्न विपा ॥७५-७६॥ पहिले उन्होंने मानसी सृष्टि रची,
फिर स्त्रियों उत्पन्न करके मथुनी सृष्टि की रचना की । उन्होंने अपनी इस
कन्याएं धर्म के पोर तेरह कश्यप के साथ ब्याह दी ॥७७॥ फिर काल परिवर्तन
नियुक्त हुई मश्विनी प्रादि सत्ताईस पन्याएं चन्द्रमा को दी। इनसे देवता,
[श्रीविष्णुपुराण पदा प्रजाः राजेति व्यादिष्ट पूर्व वक्षः स्वयम्भुवा। यथा ससर्ज भूतानि तथा शृणु महामुने ।८७१ मानसान्येव भूतानि पूर्व दक्षोऽसृजत्तदा । देवानृपीन्सगन्धर्वानसुरान्पन्नगास्तथा यदास्य सृजमानस्य न व्यवर्धन्त ताः प्रजाः । ततः सञ्चिन्त्य स पूनः सृष्टि हेतो. प्रजापतिः ।। मैथुनेनैव धर्मेगा सिंसृभुर्विविधाः प्रजाः । असिन्कोमावहत्कन्या वीरएस्य प्रजापतेः। सुता सुतपसा युक्ता महती लोकधारिणीम् IRol अथ पुनसहस्राणि वैरुण्या पञ्च वीर्यवान् । असिक्न्या जनयामास सर्गहेतोः प्रजापतिः ।।१। तान्दृष्ट्वा नारदो विप्र सविवर्द्ध यिपून्प्रजाः। सङ्गम्य प्रियसवादो देवपिरिदमब्रवीत् ।। हे हर्यश्वा महावीर्याः प्रजा यूयं करिष्यथ । ईदृशो दृश्यते यत्नो भवता श्रूयतामिदम् ।।३। बालिशा बत यूय वै नास्या जानीत वै भुवः । अन्तरूवमधश्च व कथ सृक्ष्यथ वै प्रजाः ।।४। ऊध्वं तिर्यगधश्च व यदाप्रतिहता गतिः । तदा कस्माद्भवो नान्त सर्वे द्रक्ष्यथ बालिशा: ।९५॥ ते तु तद्वचन श्रुत्वा प्रयाता सर्वतो दिशम् । अद्यापि नो निवर्तन्ते समुद्रभ्य इवापगाः ॥६६॥ थो पराशरजी ने कहा-है महामुने । स्वयभू भगवान ब्रह्माजी द्वारा प्रजा उत्पन्न करने की प्रामा प्राप्त कर दक्ष ने पहिले जिस प्रकार प्राणियों को रचा, उसे सुनो ॥७॥ उस समय क्रम से ऋषि, गधवं, असुर, सर्प मादि मानसी सृष्टि की ही दक्ष ने रचना की ll परतु जब इस प्रकार प्रजा को वृद्धि नहीं हुई तो उन्होने मैथुनी सृष्टि के विचार से वीरण प्रजापति को प्रत्यत तपस्विनी कन्या असिक्नी वा पाणिग्रहण किया ६.६oll इसके पश्चात् प्रथम अंश-प० १५ 1 [ १७७ उन्होंने अपनी भार्या प्रसिग्नी के गर्भ से पाच हजार पुत्र टायपिये || उन सब को प्रजोत्पत्ति की इच्छा वाला देखकर नारदजी ने ननो पाग पावर इस प्रकार पहा-हे हर्षश्वगण । मुझे लगता है frपाप प्रजा उत्पन्न करने इच्छुर हैं, इसलिये मेरी यात गुनो ।।६२-६३॥ तुम अभी पिया ना मय, ऊवं प्रौर तल भाग पो ही नहीं जानते तो प्रजोत्पत्ति लिग प्रकार पगंगे? 1६1 जब तुम इम ब्रह्माण्ड मे ऊपर, नीचे, इधर, उघर पर अयोधन वाले हो, तो तुम्हे इम पृथिवी का अन्त क्यो नहीं दिखाई देना || नारदजी की बात सुन कर वे सब विभिन्न दिशाणी पोपणे गप सपा समुद्र में मिली हुई नदियो का पुनरावर्तन नहीं होता यगे ही ये भी भी नहीं लौटे ॥६॥ हाश्व प्वय नप्टेपु दक्ष, प्राचेत ग. पुनः। वैरण्यामष पुदाणा सहनमगृजन विवढे यिपवस्ते तु सबलावा:13.. पूर्वोक्त वचन ब्रह्मनारदेनय 2221 अन्योऽन्यमूचुस्ते सर्वे मम्यगाह , . भान पदवी चव सन्ताFreratta
१७९ ]
[ স্বীবিয়ে
भाइयो या अनुसरण करना चाहिये Inte-tell हम भी पृथिवी वा परिमाण
जान कर ही प्रजोत्पत्ति मे लगेंगे । ऐसा विचार पर यह भी विभिन्न दिशाओं
में जाकर हर्यश्वो के समान ही लौट कर नहीं प्राये ॥१००। इसलिये, तभी से
भाई की खोज में जाने वाला भाई नाश को प्राप्त हो जाता है और कोई ऐमा
न करे, यह सिद्धान्त निश्चित हुग्रा ॥१०१।। जब दक्ष प्रजापति को यह ज्ञात
हमा कि यह पुत्र भी नारदजी के उपदेश से चले गये तब उन्होंने प्रत्यत क्रोध
पूर्वक मारदजी को शाप दे डाला ।।१०२॥
सर्गकामस्ततो विद्वान्स मैत्रेय प्रजापतिः ।
पष्टि दक्षोऽसृजत्कन्या वरुण्यामिति न. श्रु तम् ॥१०३।
ददी स दश धर्माय कश्यपाय त्रयोदश ।
सप्तविंशति सोमाय चतस्रोऽरिष्टनेमिने ।१०४।
द्वे चैव बहुपुत्राय द्वे चैवाङ्गिरसे तथा ।
कृशाश्वाय विदुषे तासा नामानि मे शृणु ।१०५।
अरुन्धती वसुर्यामिर्लम्बा भानुमरुत्वतो ।
सङ्कल्पा च मुहुर्ता च साध्याविश्वा च तादृशी ।१०६।
धर्मपल्यो दश त्वेतास्तास्वपत्यानि मे शृणु ।
विश्व देवास्तु विश्वाया साध्या साध्यान जायत ।१०७'
महत्वत्या मरुत्वन्तो वसोश्च वसव स्मृता
भानोस्तु भानवः पुत्रा मुहूर्तावा मुहूर्तजा ।१०८
लम्बायाश्चैव घोषोऽथ नागवीथी तु यामिजा।
पृथिवीविपय सर्वमरुन्धत्यामजायत ।
सङ्कल्पायास्तु सर्वात्मा जज्ञे सङ्कल्प एव हि ।१०६।
हे मंप्रेयजी ! सुना जाता है कि फिर दक्ष प्रजापति ने साठ कन्याएँ
उत्पात की, उनमें से दस धर्म को, तेरह कश्यप को, सत्ताईस चन्द्रमा को और
घार परिष्टनेमि को ब्याह दी ॥१०३-१०४॥ तथा दो कन्यानो का विवाह
बहुपुत्र से, दो का अगिरा से और दो का कृशाश्व के साथ हुमा, अब उनके
म कहता हूँ ।१०५॥ भरुधन्ती, वसु, यामि, लम्बा, भानु, मरुत्वती, सकल्पा,
प्रथम अंश-प्र०१५] [ १७९ मुहूती, साध्या पौर विश्वा, यह दलों पर्म गी भार्या हुई। पर इनके पुओं के विषय में सुनो-विश्वा से विश्वेदेश और साध्या से साध्यगए हुए ॥१०६-१.७॥ मरवती से मरत्वान्, वमुगे वसुगए, मानु मे भानु मोर मुहर्वा से मूहूर्वाभिमानी देवता उत्पन्न हुए ॥१०॥ लम्बा से पोप, यामि से नागवीपि, परन्पती से पृयिवो विषपक मभी जीव तथा संपल्या से सब प्राणियों में रहने वाले संकल को उत्पत्ति हुई ।।१०।। ये त्वनेकवसुप्राणदेवा ज्योतिः पुरोगमाः । वसवोऽटो समास्यातास्तेषां वक्ष्यामि विस्तरम् ॥११०। पापो ध्रुवश्च सोमन धर्मश्चवानितोऽनलः । प्रत्यूपश्च प्रभासच वसवो नामभिः स्मृताः ॥११॥ प्रापस्य पुत्रो वतण्डः श्रमः शान्तो स्वनिस्तया । घु वस्य पुत्रो भगवाकालो लोकप्रकालनः ॥११॥ सोमस्य भगवान्वर्चा वर्चस्वी येन जायते । धर्मस्य पुयो द्रविणो हुतहन्यवहस्तथा ।११३॥ मनोहरायां शिशिरःप्राणोऽथ वरणस्तथा । अनिलस्य शिवा भार्या तस्याः पुत्रो मनोजवः ॥११४ अविज्ञातगतिश्चैव दो पुत्रावनिलस्य तु । अग्निपुत्रः कुमारस्तु शरस्तम्वे व्यजायत ११५१ तस्य शाखो विशाम्बन नगमेयन पृरजाः । अपत्यं कृत्तिकानां तु कार्तिकेय इति स्मृतः ॥११६ प्रत्यूपस्य विदुः पुत्रमृपि नाम्नाय देवलम् । द्वी पुत्री देवलस्यापि क्षमावन्तो मनोपिणी ।११७। विभिन्न प्रकार का दम ही दिनका जीवन है, ऐसे पाठ वसु प्रसिद्ध है, अब मैं उनकी वंशावलि बहता हूँ ॥११०॥ वै पाप, प्रव, सौम, धर्म, अनिल, मनल, प्रत्यूप और प्रमाप्त नाम से विख्यात हैं ॥११॥ मापके चार पुष हुए चिल्लो माप पैसएट, अप, शान्त और चलिये,पुर के पुत्र लोगो का संहार करने वाला काल हुमा ॥११२॥ सौम के पुत्र वर्चा जिनसे वर्चस्व की प्राप्ति १८० ] [ श्री विष्णुपुराण होती है । धर्म ने अपनी पत्नी मनोहरा से द्रषिण, हत, हव्यवह, शिशिर, प्राण पोर यरुण नामक पुत्र उत्पन्न दिये । अनिल री पत्नी गिया के मनोजव और अविज्ञातगति नामक दो पुत्र हुए अग्नि या कुमार नामक पुत्र मरकरडे में उत्पन्न हुप्रा ॥११३-११॥ शास, विशाख और नंगमेय उससे छोटे भ्राता हुए। कृत्तिकायो का पुत्र कार्तिक हुप्रा ॥११६॥ प्रत्यूप के पुत्र देवल नामक ऋषि दुए गिनके दो क्षमाशील एवं विद्वान पुत्र उत्पन्न हुए ये ॥११७। बृहस्पतेस्तु भगिनी वरम्बी ब्रह्मचारिणी। योगसिद्धा जगत्कृत्स्नमसक्ता विचरत्युत ।११८) प्रभासस्य तु सा भार्या वसूनामष्टमस्य तु । विश्वकर्मा महाभागस्तस्यां जज्ञे प्रजापतिः ।११६॥ कर्ता शिल्पसहस्राणा त्रिदशानां च वर्द्धको । भूपणाना च सर्वेपा कर्ता शिल्पवता वरः ॥१२०॥ यः सर्वेषा विमानानि देवताना चकार ह । मनुष्याश्चोपजीवन्ति यस्य शिल्प महात्मनः ।१२११ तत्य पुत्रास्तु चत्वारस्तेषा नामानि मे शृणु। अजैकपादहिर्बुध्न्यस्त्वष्टा रुद्रश्च वीर्यवान् ।१२२। त्वष्टुश्वाप्यात्मज. पुत्रो विश्वरूपो महातपाः । हरश्च बहुरूपश्च त्र्यम्बकश्वापराजितः ।१२३। वृपाक पिश्च शम्भुश्च कपर्दी रेवतः स्मृतः। मृगव्याधश्च शवश्च कपाली च महामुने । १२४॥ एकादर्शते कथिता रुद्रास्भुिपनेश्वराः । शत त्वेक समाख्यात रुद्राणाममितौजसाम् ।१२५१ अष्टम वसु प्रभास का विवाह बृहस्पतिजी को ब्रह्मचारिणी और सिद्ध योगिनी बहिन वरस्त्री से हुया, वह प्रनासक्त भाव से पृथिको पर भ्रमण करती फिरती थी। उसके द्वारा प्रभास दसु ने प्रजापति विश्वकर्मा को उत्पन्न किया जो सहस्रों शिल्पी के निर्माता, शिल्पियो मे श्रेष्ठ देवशिल्पी हुए ॥११८-१२०।। उन्हीं ने देवतामो के सब विमानो की रचना की। इनकी शिल्प विद्या के मात्रय प्रयम प्रग-०१५ ] से अनेकानेक मनुष्य भरने जीवन का निर्वाह वादे हैं ।।१२१॥ उन विश्व कर्मा के कपाट, पढुिंध्य त्वष्टा मौर म्प नाम के चार पुष हुए। ।।१२२।। उनमें से स्वधा ३ पुष का नाम दिसम्म हुप्रा । हे महामने ! हर, बहुरूप. पत्रक मारारित, वृषाप, गम्नु, काहीं, रक्त, मृगन्नार, ग और पानी नानक यह स्मारह रद तीनों लोकों के पपीवर हुए । ऐसे सकहो ही अन्यत देरम्बी एकादश र दिव्यात हैं।१२३-१२॥ कश्यपस्य तु मायां यास्तासां नामानि मे शृणु । अदितिदितिदनुस्वारिया च सुरसा समा ।१२६॥ सुरनिविनता पंव ताम्रा लोधवशा इरा । क्दमुनिन्न धर्मन तदपत्यानि मे गृणु (१२७॥ पूर्वमन्वन्तरे श्रेया द्वादशासन्युरोतमाः। तुपिता नाम तेन्योरमूचुवैवस्वतेऽन्तरे ११२८॥ पत्यितेतियशसमानुपम्यान्तरे मनोः । समवायीकृताः सर्वे समागम्य परस्परम् ॥१२॥ प्रागच्छन द्रुतं देवा अदिति सम्प्रविश्य वै। मन्वन्तरे प्रभूयामस्तनः श्रेयो भवेदिति 1१३० एवमुक्त्वा तु ते सर्वे चाशुषस्यानरे मनोः । मारीचालवपागजाता अदित्या दक्षकन्यया ।१३:। तत्र दिप्शुन्न याकन जज्ञाते पुनरेव हि । प्रयंमा चैव धाता च त्वा पूपा तव च ॥१२३॥ विवस्वान्सविता व मित्रो वरण एव च। अंगुर्भगन्नातितेजा आदित्या द्वादन स्मृताः ।१३३।। चाशुपस्यान्तरे पूर्वनामन्ये तुपिताः सुराः। वैवस्वतंऽन्तर ते 4 आदित्या द्वादश स्मृताः ।१३४१ अब उनी की बो नार्याएं हुई उनके नाम मदिति, दिति, दनु अरिया, सुरसा, ससा, मुनि, दिनठा, ताना, क्रोश्वशा, , का, और मुनि प। मद स्नी मनति सुनो ॥१२६-१२०चानुष मन्वन्तर में तुपित नामक १८२ ] [ श्रीविष्णुपुराण बारह देवता थे। वे उस मन्वन्तर के समाप्त होने मौर वैवस्वत मन्वन्तर के माने पर परम्पर बोले ॥१२८-१२६।। हे देवतायो ! चलो, अदिति के गर्भ मे प्रविष्ट होकर हम शीघ्र ही वैवस्वत मन्वन्तर मे उत्पन्न हो, हमारे लिये यही हितकर होगा ॥१३०॥ इस प्रकार निश्चय कर उन्होने कश्यप परनी दक्षजा अदिति के उदर से जन्म लिया और तब वे विष्णु, इन्द्र, प्रर्यमा, धाता, त्वष्टा, था विवस्वान्, सविता, मैत्र, वरुण, पशु और भय नामक द्वादश भादित्य हुए ॥१३१-१३३॥ इस प्रकार चाक्षुष मन्वन्तर के तुपित नामक देवता ही वैवस्वत मन्वन्तर में द्वादश मादित्य होगये ॥१३॥ याः सप्तविंशतिः प्रोक्ताः सोमपन्योऽय सुव्रताः । सर्वा नक्षत्रयोगिन्यस्तन्नाम्न्यश्च व ताः स्मृताः ११३५॥ तासामपत्यान्यभवन्दीप्तान्यमिततेजसाम् । अरिष्टनेमिपत्नीनामपत्यानीह षोडश ।१३६। बहुपुत्रस्य विदुषश्चतस्रो विद्यु तः स्मृताः । प्रत्यङ्गिरसजाः श्रेष्ठा ऋचो ब्रह्मर्षियकृताः ।१३७॥ कृशाश्वस्य तु देवदेवप्रहरणाः स्मृताः। एते युगसहस्रान्ते जायन्ते पुनरेव हि ॥१३८। सर्वे देवगणास्तात त्रयस्त्रिंशत्त छन्दजाः । तेपामपीह सतत निरोधोत्पत्तिरुच्यते ।१३९। यथा सूर्यस्य मैत्रेय उदयास्तमनाविह । एवं देवनिकायास्ते सम्भवन्ति युगे युगे 1१४०। चन्द्रमा की जिन सत्ताईस भार्यानो के विषय में कहा जा चुका है, वे सब नक्षत्र योगिनियां अपने उन्ही नामो से प्रसिद्ध हैं ।१३। उन भत्यत तेजस्विनियों ने भनेक पुत्र उत्पन्न किये । मरिष्टनेमि की पलियों के सोलह पुत्र उत्पत्र हुए .॥१३६॥ बहुपुत्र की भार्या विद्यु त चार रूप वाली है । ऋचामो के अभिमान देवता प्रत्यगिरा से उत्पत्र हुए और देवप्रहरण नामक देवता देवपि कृशाश्व रे उत्पन्न हुए। यह एक हजार युगो के बाद पुनः उत्पन्न होते हैं ॥१३७-१३८ यह सेनीयों देवता स्वेच्या से जन्म लेने में समर्थ है, कहा जाता है कि इन प्रथम अंश-प्र०१५ 1 हात्ति और निरोध इस लोक में निरंतर होती रहती है ।।१३सा है मैत्रेपनी ! जने संसार में सूर्य का उदयास्त निरन्तर होता है वैसे ही इन देवतामों को सत्ति युग-युग में होती है ॥१४॥ दित्या पुत्रद्वयं जज्ञे कश्यपादिति नः श्रुतम् । हिरप्रकशिपुञ्च व हिरण्याक्ष दुर्जयः १४१॥ सिंहिका चामवत्कन्या विप्रचितः परिग्रहः । हिरण्यकशिपोः पुत्रानत्वारः प्रथितौजसः ।१२। अनुल्लादरचव हादश्च प्रह्लादश्च वुद्धिमान् । संहारश्च महावीयर्या दैत्यवंधविवर्द्धनाः ॥१४३। तेषां मध्ये महामाग सर्वत्र समग्वशी । प्रह्लादः परमां भक्ति य उवाच जनार्दने ।१४४॥ दत्येन्द्रदीपिठो वह्निः सर्वाङ्गोपचितो द्विज । न ददाह च यं विप्र वासुदेव हृदि स्थिते १४५॥ महागवान्तःमलिले स्थितस्य चलतो मही। चचाल सकला यस्य पारावद्धस्य घोमतः।१४६। न भिन्न दिविधः स्वयंच दैत्येन्द्रपातितः। शरीरमद्रिकठिन सर्वत्राच्युतचेतसः ॥१४॥ मुना जाता है कि कश्यपत्री ने दिनि के गर्भ में अन्यत दुप हिरण्यक. शिप मोर हिनण्याक्ष नामक दो पुत्र एवं विहिका नाम की एक पुत्री उत्पन्न को, जिसका विवाह विप्रचिति से प्रा। हिरण्यकशिपु के चार पुत्र मनुसन, हार, प्रहार, और संहाः नामक हुए, इन्हीं में दस्य वंश की वृद्धि हुई ॥१४१-१४३।। हे महाभाग टन चारों में प्रसाद सब को समान भाव से देखने वाले मोर जिडेन्द्रिय हुए. उन्होंने भगवान की परम भक्ति का वर्णन किया ॥१४॥ जिन्हें दैत्यरात्र हिरएपशिपु द्वारा जलाई गई भनि ने उन्हें सद मोर से पनाना चाहा, परंतु हृदय में नगवान का निरास होने के कारण उनको दाग्य नहीं किया जा सका॥१४॥॥ जो पान में बंधकर समुद्र के उत में पड़े हुए इधर-उपर डोले ठो सम्पूर्ण पृपिदी कांपने लगी पी ॥१४॥ पिता परीर पर्दन के समान कठोर १८४ [ श्रीविष्णुपुराण था और भगवान मे चित्त रहने पे पारण दैत्यराज पे पास्त्रास्त्र से भी वह छिन्न भिन्न न हो सका ।।१४७।। विधानलोज्ज्वलमुखा यस्य दैत्यप्रचोदिताः । नान्ताय सर्वपतयो बभूवुरुरतेजसः ॥१४॥ शैलराक्रान्तदेहोऽपि यः स्मरन्पुरुषोत्तमम् । तत्याज नात्मनः प्राणान् विष्णुस्मरणदशितः ॥१४॥ पतन्तमुच्चादवनिर्यमुपेत्य महामतिम् । दधार दंत्यपतिना क्षिप्तं स्वर्गनिवासिना 1१५० यस्य संशोपको वायुदेहे दैत्येन्द्रयोजितः । अवाप सक्षय सद्यश्चित्तस्थे मधुसूदने ।१५१॥ विषाणभङ्गमुन्मत्ता मदहानि च दिग्गजाः । यस्य वक्षःस्थले प्राप्ता दैत्येन्द्रपरिणामिता :१५२। यस्य चोत्पादिता कृत्या दैत्यराजपुरोहितः । बभूव नान्ताय पुरा गोविन्दासक्तचेतसः ।१५३१ शम्वरस्य च मायाना सहस्रमतिमायिनः । यस्मिन्प्रयुक्त चक्रण कृष्णस्य वितथीकृतम् ।१५४। दैत्येन्द्रसूदोपहृत यस्य हालाहलं विषम् । जरयामास मतिमानविकारममत्सरी ॥१५॥ समचेता जगत्यस्मिन्यः सर्वेष्वेव जन्तुषु । ययात्मनि तथान्येषां परं मंत्रगुणान्वितः ॥१५६॥ धर्मात्मा सत्यशो र्यादिगुणानामाकरः परः । उपमानमशेषाणां सोधूनां यः सदाभवत् ।१५७। दैत्यपति के द्वारा प्रेपित विपाग्नि छोडते हुए सपं भी जिस भक्त र अन्त न कर सके । जिन भक्तराज के हृदय पर भगवत्स्मरण रूपी कवच स्थित था, जिसमे प्रत्यरो की भीषण मार भी उनका कुछ नहीं बिगाइ सको ॥१४८-१४६। दैत्यराज द्वारा जिसे स्वर्ग से नीचे गिराये जाने पर मी उटवर मध्य में ही अपने प्रक में ले लिया ॥१५०॥ भगवान् के चित पृथिवी ने प्रथम अंश-०१६ ] [ १८५ :स्थित रहने के कारण सर्व शोपर यायु भी जिनके शरीर का स्पर्श करते । शान्त हो गया ॥१५॥ जिनके पक्ष.स्पल में सग पर दिग्गजो वे दाँत भी ट गये और सम्पूर्ण मद नष्ट हो गया ॥१५२।। दैत्य-पुरोहितो द्वारा प्रेषित त्या भी जिन मावदासक्त भक्तराज का पन्त परने में समथ न हो सकी ।।१५३।। पाम्बरासुर कोहजारो मायाएँ भी जिनका बुधन विगाट राकी पौर गवान के चन्द्र से नष्ट होगरें ।।१४।। जिन मत्सर हीन मतिमान नेरमोइये द्वारा ये हुए विष को भी विकार रहित माव से पी निया ॥१५५॥ जो इस विश्व को भी प्राणियो के प्रति समान भाव वाले तथा दूसरों से अपने समान ही दवि साले थे ।।१५६॥ तथा जो परम धर्मामा, सत्य और शौर्य प्रादि गुणो से रिपूर्ण पोर सायुजन के लिये उपमा साये ॥१५७॥ सोलहवाँ अध्याय कायतो भवता यशो मानवाना महात्मनाम् । कारण चास्य जगतो विष्णुरेव सनातनः ।। यत्वेतद् भगवानाह प्रहदा दैत्यसत्तमम् । ददाह नाग्निस्तैिश्च क्षुण्णस्तत्याज जीवितम् ।। जगाम वसुधा क्षोम यमाधिसलिले स्थिते । पार्शबंद्ध विचलति विक्षिप्ताङ्गो समाहता ॥३॥ शैलराकान्तदेहोऽपि न ममार च यः पुरा । खया चातीव माहात्म्य कथित यस्य धीमतः।४। तस्य प्रभावमतुल विष्णोभक्तिमतो मुने । श्रोतुमिच्छामि यस्यैतच्चरित दीप्ततेजस. 1५। किनिमित्तमसौ शस्नैविक्षिप्तो दितिजमुने। किमर्थं चाधिसलिले विक्षिप्तो धर्मतत्पर. ६॥
[ श्रीविष्णुपुराण
प्राकान्तः पर्वतैः कस्मादृष्टश्चैव महोरग. ।
क्षिप्त किमद्रिशिपरारिक वा पापकसञ्चये ७१
दिग्दन्तिना दन्तभूमि स च कस्मानिरूपित.।
सशोपकोऽनिलश्चास्य प्रयुक्तः कि महासुरैः ।
श्री मयजी ने कहा-ह भगवन् । प्रापने महात्मा मनुषुत्री का
वृत्तान्त कहा मोर इस जगन के सनातन कारण भगवान विष्णु को बताया ॥१॥
परतु, आपने दैत्यवर प्रह्लाद के अग्नि द्वारा भस्म न होने और शास्त्रों के
माघात से भी न मरने की जो बात कही ॥२॥ तथा यह भी कहा कि उनके
पाश मे बंधकर समुद्र के जल मे पड़े हुए हुए हिलने डुलने से पृथिवी भी हिनने
लगी थी तथा पत्थरों की बौछार से भी उनका प्राणान्त नही हुमा । इस प्रकार
पापने उनकी बहुत ही महिमा का वपन किया ॥३॥ जिन अत्यत तेजस्वी के
ऐसे अद्भुत परित्र प्रापने कहे है, मैं उन विष्णुभक्त महास्मा के प्रभाव को सुनने
का इच्छुक हूँ ॥५॥ इ मुनिश्रेष्ठ । ऐसे प्रत्यत धर्म परायण का दैत्यो ने शस्त्रार
से क्यो सतप्त किया और समुद्र के जल मे क्यो डाला ? ॥३॥ पर्वतो से किम
लिये दबाया, सर्पो से क्यो डसवाया 7 पवत शिखर से क्यो गिराया और पनि
मे क्यों जलाया ? || दिग्गजो के दातो से क्यो वाया और सब शोषक
वायु को भी उनके अहित के लिये क्यो नियुक्त किया ?
कृत्या च दैत्यगुरवो युयुजुस्तत्र कि मुने ।
शम्बरश्चापि मायाना सहन कि प्रयुक्तवान् ।।
हालाहल विषमहो दैत्यसूदैर्महात्मन. ।
स्मादत्त विनाशाय यज्जीयां तेन धीमता Atol
एतत्सर्व महाभाग प्रल्लादस्य महात्मनः।
चरित श्रोतुमिच्छामि महामाहात्म्यसूचकम् ॥१॥
न हि कौतूहल तम यह त्यन हतो हि स.।
अनन्यमनसो विष्णो क. समर्थों निपातने ।१२
तस्मिन्धर्मपरे नित्य केशवाराधनोद्यते ।
स्ववशप्रमवत्यः वृतो पोऽतिदुप्कर. ॥१३॥
प्रथम प्रश-य०१७ ] [१८१ धर्मात्मनि महाभागे विष्णुभक्त विमत्सरे। दैतेय. प्रहत फस्मात्तन्ममाख्यातुमर्हसि ॥१४॥ प्रहरन्ति महात्मानो विपक्षा अपि ने। गुणस्समन्विते साधौ किं पुनर्य. स्वपक्षजः ॥१५॥ तदेतत्कथ्यता सर्व विस्तरान्मुनिपुङ्गव । दैत्येश्वरस्य चरित श्रोतुमिच्छाम्यशेषतः 1१६) हे मुने । दैत्य गुरुयो ने उन पर कृत्या क्यो चलाई ? शम्बरासुर ने भारी मायानो को क्यो प्रयुक्त किया ? ॥६॥ दैत्यराज के रसोइयो ने उन्हे मारने को पोर विप क्यो दिया, जिसे दे पचा गये थे ॥१०॥ हे महाभाग महान् माहात्म्य पो सूचक उस प्रह्लाद चरित्र को मैं पूर्ण रूप से सुनना चाहता हूं ॥११॥ दैत्य उन्हें मारने में असमर्थ रहे, यह तो पाश्चर्य का विषय नहीं है, क्योकि जिसका मन भगवान् मे अनन्य भाव से लगा है उसे मारने में समर्थ कौन हो सकता है ? ॥१२॥ नित्य धर्म परायण तथा भगवदाराधक भक्त से उन्ही के कुल वालो ने ऐसा भीषण द्वेप किया और उन धर्मात्मा, महाभाय, अमत्सर विष्णु भक्त को दैत्यो ने इतना घोर दुख दिया, इसका कारए मेरे प्रति कहिये ।।१३-१४१ साघुजन तो ऐसे गुणी पुरषो के विपक्षी होने पर भी उन पर इस प्रकार प्रहार नही करते, जिसमे वह तो अपने ही पक्ष के थे ॥१५॥ इसलिये हे मुनिवर । इस सम्पूर्ण वृतान्त को विस्तार से कहिये, क्योकि मैं उन दत्य- राब के चरित्र श्रवण का प्रत्यत इच्छुक हूं ॥१६॥ सत्रहवाँ अध्याय मैत्रेय श्रूयता सम्यक् चरित तस्य धीमत । प्रह्लादस्य सदोदारचरितस्य महात्मनः ।।। दितेः पुत्रो महावीर्यो हिरण्यकशिपु पुरा। त्रैलोक्य वशमानिन्ये ब्रह्मणो वरदर्पित ।।
१८८ ] [ श्रीविष्णुपुराण इन्द्रत्वमकरोई त्य स चासोत्सविता स्वयम् । वायुरग्रिपा नाथ. सोमश्चाभून्महासुरः।३। धनानामधिपः सोऽभूत्स एवासीत्स्वय यमः । यज्ञभागानशेपास्तु स स्वय बुभुजेऽसुरः ।४। देवा स्वर्ग परित्यज्य तत्त्रासान्मुनिसत्तम । विचेरुरवनी सर्वे विभ्राणा मानुषी तनुम् ॥५॥ जित्वा त्रिभुवन सर्व त्रैलोक्यैश्वर्यदर्पितः । उपगीयमानो गन्धर्बु भुजे विषयान्प्रियान् ।। पानासक्त महात्मान हिरण्यकशिपु तदा। उपासाञ्चकिरे सर्वे सिद्धगन्धर्वपनगाः ।। श्री पराशरणी ने कहा-ह मैनेयजी । अब तुम उन मेघावी मोर उदार चेता महात्मा प्रह्लाद के चरित्र को ध्यान से सुनो ||१|| प्राचीन का की बात है कि दिति-पुत्र हिरण्यकशिपु ने ब्रह्माजी से वर पाकर मयत गर्व पूर्वव तीनो लोको यो विजय दिया था ॥२॥ वह इत्य इन्द्र पद पर बैठ स्वप ही सूर्य, वायु, अग्नि, वरण पोर चन्द्रमा बना हुआ या ॥३॥ वहीं कुछ। भौर यमराज बन बैठा तपा यही सम्पूर्ण यज्ञों या भोक्ता हो गया ॥४॥ हे मुनि दे। उसफे भय के कारण समस्त देवता स्वर्ग का त्याग कर मनुष्य देश' पृथिवी पर पूमने लगे ।।५।। इस प्रकार उसने तीनो लोगो को वश में कर 'सर पौर इस गर्व से गवित होकर गपा से अपनी स्तुति कराता और इच्छित भोग पा उपभोग परवा पा ॥६॥ उ समय सभी सिद्ध, गवं, माग इत्यारि उम मरान शादिम मागत हिरण्यकशिपु की पूजा करने लगे थे ॥७॥ प्रवादयन् जगुश्चान्ये जपाब्द तथापरे। दरयराजस्य पुरतश्चक: सिदा मुदान्दिताः। तत्र प्रनृत्ताप्सरसि स्फाटियाघ्रमपैऽमुरः। पपो पान मुदा युक्त प्रासादे सुगनोहरे ।। सम्य पुत्रो महाभागःप्रलादो नाग नामतः । पाय बासपाट्यामि गुरुगेहगतोऽमंक: Rol प्रथम ग्रंश-०१७ ] [ १८६ एकदा तु स धर्मात्मा जगाम गुरुणा सह । पानासक्तस्य पुरतः पितुर्दैत्यस्तेस्तदा ।। पादप्रणामावनत तमुत्याप्य पिता युतम् । हिरण्यकशिपु प्राह प्रह्लादम मतौजसम् ।१२। पठ्यतां भवता वा सारभूतं सुभापितम् । कालेनंतावता यत्ते सदोद्युक्त शिक्षितम् ॥१३॥ उस दैत्यराज हिरण्यकशिपु के समक्ष कोई सिद्ध वाने बजाने और कोई सद्ध उसका जयजयकार करते थे और वह असुर स्फटिक मोर अभ्रसिता-निर्मित (रम्य भवन में पहा हा प्रद्यपान करता रहता था -EI उसी हिरएयाशि वह प्रह्लाद नामक अत्यत भाग्यशाली पुर हुप्रा और वह गुर के यहां जाकर लोचित शिक्षा ग्रहण करने लगा ॥१०॥ एक दिन वह धर्मात्मा वानक अपने रता देवराज के पास प्राने गुरु के साथ गया जहां वह मयमान कर रहा था १११॥ उस समय उसका पुत्र उसके चरणों में सुना गया, जिसे उठाते हुए हरएपकशिपु ने कहा ॥१२॥ हिरण्यकशिपु बोला -हे पत्र ! तुमने प्रायन लगे रहकर अब तक जो कुद शिक्षा प्राप्त की है, उसे सार हा में मुझे ताप्रो ॥१३॥ थूयतां तात वक्ष्यामि सारभूतं तवाज्ञया । समाहितमना भूत्वा यन्मे चेतस्यवस्थितम् ॥१४॥ अनादिमध्यान्तमजमवृद्धिक्षयमच्युतम् । प्रणतोऽस्म्यन्तसन्तान सर्वकारणकारणम् ॥१५॥ एतनिशम्य दैत्येन्द्रः सकोपो रक्तलोचनः । विलोक्य तद्गुरुं प्राह स्फुरिताधरपल्लवः '१६॥ ब्रह्मबन्यो किमेतत्ते विपक्षस्तुतिसंहितम् असारं ग्राहिनो वालो मामवज्ञाय दुर्मुते १७ दैत्येश्वर न कोपस्य वशमागलुमहमि । ममोपदेशाजनित नारा वदति ते मन ना
१६. ]
[ श्रीविष्णुपुराण
अनुशिष्टोऽसि केनेहग्वत्स प्रह्लाद कथ्यताम् ।
मयोपदिष्टं नेत्येष प्रवीति गुरस्तव ॥१९॥
शास्ता विष्णुरशेपस्य जगतो यो हृदि स्थितः।
तमृते परमात्मान तात कः केन शास्यते ॥२०॥
प्रलाद ने कहा है पिताजी | मेरे मन में जो सार रूप से हैं, उसे मैं
आपकी माज्ञा से सुनाता हूँ, आप ध्यान से सुनें ॥१४॥ प्रादि,मध्य पौर मन्त से
रहित, वृद्धि और क्षय से परे, जन्महीन, अच्युत, सभी कारणो के कारण तथा
ससार की सृष्टि, स्थिति और प्रलयकर्ता भगवान् विष्णु को मैं प्रणाम करता
हूँ ॥१५।। श्री पराशरजी बोले - प्रह्लाद की बात सुन कर दैत्यराज के नेत्र कोष
सं लाल हो गये और वह उसके गुरु को प्रोर देखता हुमा कपित मोठों से
कहने लगा ॥१६॥ हिरण्यकशिपु ने कहा-परे मतिहीन विप्र । तूने मेरी प्राज्ञा
की अवहेलना और तिरस्कार कर मेरे विपक्षी की स्तुति सहित सारहीन शिक्षा
दी है ॥१७॥ गुरु ने कहा-हे दैत्यराज ! आप क्रोधित न हो अापके इस पुत्र
ने मेरे द्वारा सिखायी हुई वात प्रापसे नही कही है ॥१८॥ इस पर हिरण्यकशि
ने कहा- हे पुत्र प्रह्लाद | तुमको यह शिक्षा किसने दी है, तुम्हारे गुरुजी कह
रहे हैं कि यह शिक्षा मेरी नहीं है ॥१६॥ प्रह्लाद ने कहा-हे पिताजी । वही
भगवान सब हृदय में रह कर ससार को उपदेश देते हैं । उनके अतिरिक्त प्रय
बोन किसी को कोई सीख दे मकता है ? ॥२०॥
कोऽय विष्णुः सुदुवुद्ध य वीपि पुनः पुनः ।
जगतामीश्वरस्येह पुरतः
प्रसम मम ॥२१॥
न शब्दगोचर यस्य योगिध्येयं पर पदम् ।
यतो यश्च स्त्रय विश्वं स विष्णुः परमेश्वरः ॥२२॥
परमेश्वरसज्ञोऽज्ञ किमन्यो मय्यवस्थिते ।
तथापि मकामस्त्वं प्रब्रवीपि पुनः पुनः ॥२३॥
न केवल तात मम प्रजाना
स ब्रह्मभूतो भवतश्च विप्णुः ।
धाता विधाता परमेश्वरच
प्रसीद कोप कुरूपे किमर्थम् ॥२४॥
प्रथम अंश-०१७ ] [ १६१ प्रविप्रः कोऽम्य हृदये दुर्बुद्धरतिपापन् । येनेदृशान्यसाधूनि वदत्याविष्टमानस ।२ न केवल मवृदयं स विष्णु- राक्रम्य लोकानखिलानवस्थितः । स माँ स्वदादीच पितत्समस्ता- न्समस्तचेष्टासु युनक्ति सर्गगः ॥२६॥ निष्कास्यतामय पापः शास्यता च गुरोगृहे । योजितो दुर्मतिः केन विपक्षविषयस्तुनी ॥२७॥ हिरण्यकशिपु ने कहा- रे मूर्ख ' तू जिस विष्णु का मुझ संसार के ईश्वर के समक्षा पृष्टता पूर्वक वर्णन कर रहा है, वह कोन है, यह मुझे बता ? ॥२१॥ प्रह्लाद ने कहा--जिसका परमपद योगियो द्वारा चितन योग्य है और वाणी से जिसका वर्णन समद नही है तथा जिसमे मसार उत्पन्न हुना है पौर जो स्वम विश्व रूप है, वह भगवान विष्णु ही परमेश्वर है ॥२२॥ हिरण्यकशिपु ने कहा-घरे मुर्ख ! मेरे अतिरिक्त प्रौर कौन परमेश्वर हो सकता है ? परंतुत चारबार किसी अन्य का गुण गाकर मौत के मुख मे जाना चाहता है ॥२३॥ प्रह्लाद ने कहा है पिताजी । वह ब्रह्म भूत विष्णु मेरा ही नहीं सम्परा प्रजा का और पापका भी स्रष्टा, नियन्ता और ईश्वर है । ऐसा बान कर ग्राप प्रसन्न हो. निरर्थक क्रोध न करें ॥२४॥ हिरण्यकशिपु ने कहा-इस युखि बालक के हृदय में पौन पापी प्रविष्ट हो गया है, जो इसे दवा कर इसके ऐसे कुवाक्य कहला रहा है ।।२शा प्रह्लाद ने कहा-हे पिताजी ! वह विष्णु भगवान ही मेरे हृदय क्या, समी लोको में प्रारम रूप से स्थित है, वहीं सर्वगामो मुझको, आपको और ससार के सभी जीवों को सचेष्ट करते हैं ॥२६॥ हिरण्यकशिपु ने कहा- इस पापी को तुरंत यहाँ से ले जाकर गुरु के शासन मे मले प्रकार रखो । न जाने किसने इस खोडी बुद्धि वाले को मेरे विपक्षी कौवा मे लगा दिया है ।२७१ इत्युक्तोऽसो तदा दैत्यैर्नीतो गुरुगृह पुनः । जग्राह विद्यामनिश गुरुशुश्रपणोद्यत.॥२८॥ मे
यत
१९२]
[ श्री विष्णुपुराण
कालेऽतीतेऽति महति प्रहादमसुरेश्वरः ।
सगाहूयाब्रवीद्गाथा काचित्पुत्रक गीयताम् ॥२६॥
प्रधानपुरुपौ यतश्चतच्चराचरम् ।
कारण सकलस्यास्य स नो विष्णुः प्रसीदतु ॥३०॥
दुरात्मा वध्यतामेष नानेनार्थोऽस्ति जीवता।
स्वपक्षहानिकर्तृत्वाद्यः कुलाङ्गारतां गतः ॥३१
इत्याज्ञप्तास्ततस्तेन प्रगृहीतमहायुधाः।
उद्यतास्तस्य नाशाय दैत्या. शतसहस्रश ::३२ ।
विष्णुःशस्त्रेषु युष्मासु मयि चासो व्यवस्थितः।
दैतेयास्तेन सत्येन माक्रमन्त्वायुधानि मे ॥३३॥
ततस्तैश्शतशो दैत्य शहौधेराहतोऽपि सन् ।
नावाप वेदनामल्पामभूच्चव पुनर्नवः ।३।।
श्रीपराशरजी ने कहा-दैत्यराज के प्रादेश से दैत्यों ने उन्हे पुनः गुरुजी
के यहां पहुंचा दिया, जहाँ वह दिन-रात गुरुजी की सेवा-सुश्रूषा करते हुए
विद्या पडने लगे ॥२८॥ बहुत दिन बीतने पर हिरण्यकशिपु ने उन्हें फिर अपने
पास बुलाकर कहा है पुत्र ! आज कोई गाथा कहो ॥२६॥ प्रह्लाद
बोले-
जिनसे प्रधान, पुरुष और इस सम्पूर्ण जगत् की उत्पत्ति हुई है, उस सकल
प्रपच के कारण रूप भगवान् विष्णु हम पर प्रसन्न हो ॥३०॥ हिरण्यकशिपु
ने कहा - अरे, यह बालक तो अ यन्त दुरात्मा प्रतीत होता है । इसके जीवित
रहने से कोई लाभ नहीं है इसलिये इसका वध कर दो क्योकि यह अपने पक्ष
के लिए हानिकारक और कुल के लिए मंगार रूप॥३१॥ श्रीपराशरजी ने कहा-
दैत्यराज की प्राशा सुनकर सैकडो हजारो दैत्य प्रभावशाली शस्त्रास्त्रो से उन्हें
मारने लगे ॥३२॥ तब प्रह्लाद ने कहा - हे दैत्यगण ! भगवान्
गुम
में पोर इन पास्त्रास्त्रो मे भी विद्यमान हैं, इस सत्य के कारण इन
शस्त्रास्त्रों का प्रभाव मुझ पर नहीं हो सकता ॥३३॥ श्रीपराशरजी ने कहा-
फिर तो उन प्रसस्य दैत्यो ने गस्त्र-समूह से उन पर माधान किये, परंतु
उन्हें विचित् भी वेदना न हुई और ये जैसे ये तेरो बल रो परिपूर्ण रहे
तो तुम
पाये ॥३४॥
रयम ग्रंश-प०१.] दुर्बुद्ध विनिवर्तम्ब वरिपक्षस्तवादतः । अभय ते प्रयच्छामि मातिम्ढमतिभंव ३५१ भय भयानामपहारिरिग स्थिते मनस्यतन्ते मम कुन तिष्ठति। यस्मिन्ममृते जन्मजरान्तकादि भयानि सण्यिपयान्ति तात ६६) भो भो सर्पाः दुराचारमेनमत्यन्तदुर्मतिम् । विपज्वा नाकुलर्वक: सद्यो नयत सटक्षयम् ॥३७॥ इत्युक्तास्ते तत सो कुहकास्तक्षादयः । अदान्त समस्तेपु गायतिविपोल्वरणाः ॥३॥ स त्यामक्तमतिः कृपणे दश्यमानो महोरगः। न दिवेदात्मनो गात्र तत्स्मृत्यालादमुस्थितः ॥३६॥ दष्ट्रा विशी मणय. स्फुटन्ति पणेपु तापो हृदयेषु काप । नास्थ त्वच. स्वल्लमपोह भिन्न प्रमाधि देत्येवर कायं मन्यन ४o! हे दिग्गजा.नइटदन्तमिधा घ्नतैनमस्मद्रिपुपक्षभिग्नम्। तज्जा विनाशाय भवन्ति तस्य यधारणे. प्रज्वलितो हुताशः ४१॥ हिरण्यकशिपु ने कहा है सोटी मति पाले पुत्र ! अब त् विपसी को तुति करना छोड दे, इस समय मैं तुझे प्रमय प्रदान करना हूं, नदिर में सो मूर्खता न करना ॥३॥ प्रह्लाद ने कहा- पिताजी। जिनके स्मरण पत्र से जन्म, जरा और मृयु के ममी भय भाग खडे होते हैं, उन मबहारी गवान् के हृदय में विराजरान होते हुए, मेरे लिए, भय कहाँ हेगा? ॥३६॥ हिरएपकमि न कहा--हे मरौं ! यह बाचक अनि खोटी द्धि वाला मोर दुराचारी है, तुम इस दिलि युन्ज मुखों से चीन ही दम्म १६४ ] [ श्रीविष्णुपुराण पर डालो ॥३७॥ श्रीपराशरजी ने वहा-माना मिलते ही प्रत्यन्त कर पौर विपाग्नि युक तशाादिसरों ने प्रहाद वे सत्र शरीर को दशित यिा। परन्तु भगवान् मे प्रासक्त चित होने के कारण उन्हें उन महासौ के कारने का कुछ भी प्राभास नही हुमा ॥३८-३६॥ सर्पो ने कहा- हे दैत्यराज ! इसे काटने से हमारी दाढे विशीणं होगई । मरिणों में दरार पड गई, पों में दद होने लगा और हृदय कम्पायमान हो उठा, फिर भी इस बालक की लचा कही से किंचित् भी न कट सकी । इसलिये सब पाप हमे कोई पोर पाना दीजिये ॥४०॥ हिरण्यकशिपु ने कहा है दिग्गजो । मेसे शत्रुमो द्वारा बहकाये हुए इस बालक को अपने सकीर्ण दातो वो मिलारर उनके प्रहार द्वारा मार डालो। जैसे अरणी से उत्पन्न अग्नि परणी को ही भस्म कर देता है, वैसे ही कोई कोई जिससे उत्पन होते हैं, उसी के नाशक हो जाते हैं ॥४१॥ तत स दिग्गजालो भूभृच्छि'वरसन्निभ । पातितो धरणीपृष्ठे विपारणविपीडित ॥४२॥ स्मरतस्तस्य गोविन्दमिभदन्ता. सहस्रर । शीर्णा वक्ष स्थल प्राप्य स प्राह पितर तत ॥४३॥ दन्तागजानाकुलिशाग्रनिष्ठुरा शीर्णा यदेते न बल ममैतत् । महाविपत्तापविनाशनोऽय जनार्दनानुस्मरणानुभाव ।४४। ज्वाल्यतामसुरा वह्निरपसर्पत दिग्गजा. । वायो समेघयाग्नि त्व दह्यतामेष पापकृत् ।४५॥ महाकाष्ठचयस्थ तमसुरेन्द्रसुत तत । प्रज्याल्य दानवा वह्नि ददहु स्वामिनोदिता ।४६॥ सातैप वह्नि पवनेरितोऽपि न मा दहत्यत्र समन्ततोऽहम् । पश्यामि पद्मास्तरणास्तृतानि शीतानि सर्वाणि दिशाम्मुखानि ।।७॥
प्रथम अंश-प्र. १७ ] श्री परागरजी ने कहा-यह सुन कर पर्वत की शिखर के समान विशाल देह पाते दिगजों ने उस बालक को पृथियो पर डात कर अपने दांतो ने रोदने की बहुत चैप्टा को ॥४२॥ परन्तु भगवान् का स्मरण करते रहने के कारण उनकी देह से टकरा-टकरा कर दिग्गजो के दांत टूट गये। तब उन हाथियों को हतप्रम देखकर प्रसाद ने अपने पिता से कहा लि दिग्गजों के वच बसे दांतो के टूटने में मेरा कोई बल नहीं है, यह केवल भगवान के विपत्ति पौर क्लेश नाशक स्मरण का प्रभाव ही है ।।४३-४॥ हिरण्यकशि ने कहा मरे दिग्गजो ! अब तुम हट नाप्रो । हे दैत्यो! तुम पग्नि जलामो भौर हे वायो ! तुम उस अग्नि को तोम्ए वेग वाला एवं प्रज्वलित करो, जिससे यह पापी मौन ही भम्म हो सके ॥४शा थी पराशरजी बोले- प्राने स्वामी के प्रादेशानुसार उन दानवो ने कार का एक विशाल टेर लगाया और उसमे अग्नि प्रचलित करके प्रहाद को भस्म करने की चेष्टा करने लगे ॥४६॥ प्रह्लाद ने कहा हे पिताजी । वायु के प्रयत्न करने पर भी पह पग्नि भस्म करते में समयं नहीं हो रही है । मुझे सभी दिशायें ऐसी पीतल और सुहावनी मग रही हैं, जैसे मेरे चारों और कमल के पुटप विद रहे हो ॥४॥ प्रय दैत्येश्वरं प्रोचुर्भागवस्यात्मजा द्विजाः । पुरोहिता महात्मानःसाम्ना संस्तुय वग्मिनः ।। राजनियम्यतां कोपो वालेऽपि तनये निजे। कोपो देवनिकायेषु तेषु ते सफलो पतः ४६॥ तयातर्थन बाल ते शासितारो वय नृप । पथा विपक्षनाशाय विनोतस्ते भविष्यति ॥५० वालत्व सर्वदोषारणा देत्यराजास्पद यतः । ततोऽर कोपमत्यर्थ योक्तुमहमि नामंके १५॥ न त्यक्ष्यति हरेः पक्षमस्माकं रचनादि । सत करयां वधायास्य करिप्यामोऽनिवत्तिनीम् ॥१२॥ एवमभ्यपिस्तंस्तु दैत्यराजः पुरोहित । दैत्यनिवासयामास पुत्र पावरसञ्चयात् ५२ [ श्रीविष्णुपुराण ततो गुरुगृहे बाल स वसन्वालदानवान् । प्रध्यापयामान मुहुरुपदेशान्तरे गुरो १५४॥ थी पराशरजी ने कहा-इसके पश्चात् मुकाचार्य जी के पुत्र वाग्मी महात्मा और पुरोहितगण दैत्यराज को सान्त्वना देते और उनकी प्रामा करते हुए बोले ॥४८॥ पुरोहितो ने कहा-हे राजन् । पाप अपने इप बालक पुन पर क्रोष मत कीजिये, पापको तो उन देवतानो पर ही क्रोध करना उचित है ॥४६॥ हम आपके इस बालक को नापके विपदा का नाशक पौर आपके प्रति विनम्र होने की सीख देंगे ॥५०॥ हे दैत्येन्द्र । बाल्यावस्था तो सभी दोपों की पाश्रय स्थली है, इसलिये इस वालक पर क्रोध न करिये ।।५।। यदि यह हमारे कहने से भी विपक्षी के पक्ष का त्याग न करेगा, तो हम इसे नष्ट करने के लिये किसी प्रकार भी व्यर्थ न होने वाली कृत्या का प्रयोग करेंगे ॥५२॥ श्रीपराशरजी ने कहा-पुरोहितो के ऐसे आश्वासन पर दैत्यराज ने प्रह्लाद को अग्नि से बाहर निकालने की प्राज्ञा दी ॥५३॥ इसके पश्चात् उन्हें गुरुजी के यहाँ भेगा गया, जहां वे दैत्य बालको को घारम्बार उपदेश करने लगे। ५४॥ थ यता परमार्थो मे देतेया दितिजात्मजा । न चान्यधैतन्मन्तव्य नान लोभादिकारणम् ॥५॥ जन्म बाल्य तत सर्वो जन्तु प्राप्नोति यौवनम् । अश्याहतैव भवति ततोऽनुदिवस जरा ।५६। ततश्च मृत्युमभ्येति जन्तुर्दैत्येश्वरा मजा । प्रत्यक्ष दृश्यते चैतदस्म. भवता तथा ।५७/ मृतस्य च पुनर्जन्म भवत्येतच्च नान्यया । प्रागमोऽय तथा यच्च नोपादान दिनोद्भव ॥५ गर्भवासादि यावत्त पुनर्जन्मोपपादनम् । समस्तावस्थक तावदु खमेवावगम्यताम् ।५६। क्षुत्त प्णोपशम तद्वच्छीताद्य पशम सुखम् । मन्यते बालबुद्धिस्वाद खमेव हि तत्पुन ।६०।
सुख समझते हैं, प्रथम अश-अ० १७ ] अत्यन्तस्तिमिताङ्गानां व्यायामेन सुसपिरणाम् । भ्रान्तिज्ञानावृताक्षाणा दु.खमेव सुखायते ।६१॥ प्रह्लाद ने कहा है दैत्य वालको । मैं तुम्हे परमार्य की सीख देता है। तुम इमे मिय्या न जानना, क्योंकि इस उपदेश में मेरा कोई लोभादि स्वार्थ नहीं है ॥५॥ सभी प्राणी जन्म लेकर वाल्यावस्था और यौवनावस्था प्राप्त करते हैं, फिर धीरे-धीरे वुढापे की प्राप्ति भी अनिवार्य ही है ।।५६।। इसके वाद यह प्रापो मृत्यु मुख में चला जाता है। ऐसा होते हुए हम सभी प्रत्यक्ष देखते हैं ॥५७॥ मर पर फिर जन्म लेना पडता है, यह नियम भी अटल है। मागम भी यही कहते हैं कि उपादान के बिना कोई वस्तु उत्पन्न नहीं हो सकती ॥५८॥ पुनर्जन्म को प्राप्त कराने वाली गर्भ में रहने आदि को जितनी भी अवस्थायें हैं, वह सभी दुःख सही सममनी चाहिये ॥५६॥ मूर्खता के वश मे पड़े हुए मनुष्य भूख, प्यास और सीतादि को शान्ति परन्तु यथार्य मे वह दुःख मात्र ही हैं ॥६॥ जिनके देहादि शिथिल हो जाते हैं। उन्हें जैसे व्यायाम गुखदायक लगता है, वमे जिनकी दृष्टि प्रान्ति से प्राच्या- दित हो चुकी है, उन्हें दुख ही सुप प्रतीत होता है ॥६१॥ क शरीरमशेपाणा इलेप्मादीना महाचयः । या बान्तिशोभासौन्दर्यरमणीयादयो गुणा ॥६२।। मासासूकपूर्यावमूत्रस्नायुमज्जास्थिसंहतो। देहे चेत्प्रीतिपान मूढो भविता नरकेऽप्यसौ १६३१ अग्ने.शोतेन तोयस्य तृपा भक्तस्य च भुवा । मिन्यते सुख तत्व तद्विलोमस्य चेतरः ।६।। करोति है दंत्यसुता यावन्मान परिग्रहम् । तावन्मास एवास्य दु.खचेतसि यच्छति ॥६५॥ यावतःकुरुले जन्तुःसम्वन्धान्मनसः रियान् । तावन्तोऽस्य निसन्यन्ते हृदये शोकशङ्कवः ॥६६॥ यद्यद्गृहे तन्मनसि पर तमावतिष्ठतः। नाशदाहोपकरणं तस्य तव तिष्ठति ।६७ ।
१९८ ] [श्रीविष्णुपुराण जामन्यात महदुःखं नियमाणस्य चापि तव । यातनासु यमस्योग गभराड कमणेषु च ।। देखो, कहा तो कफ यादि अत्यन्त घृणित पदार्थ रूप यह देह और कहो कान्ति, शोभा, सौन्दर्य एवं रमणीयतादि गुण ? ॥६२॥ यदि कोई मूत इरा मास, रक्त, पीव, विटा, मूत्र, ग्नायु, मज्जा भौर हविडियो के ढांचे रूपी इस देह से प्रीति कर सकता है तो वह नरक से भी प्रेम कर सकता है ॥६॥ शीत के शमनार्थ अग्नि, पिपासा की शान्ति के लिये जल और क्षुधा की शान्ति के लिये भात सुख देने वाला होता है तथा इनके प्रतिपक्षी बलादि भी अपने विलोम अग्नि मादि के कारण ही सुख देने वाले होते हैं ॥६४॥ विषयो का जितना सचय किया चित्त को दुःखदायी होता है ॥६५॥ मनुष्य अपने को अच्छे लगने वाले जितने सम्बन्धो की वृद्धि करता है, वह उसके लिये उतने ही अधिक हृदय-कटक सिद्ध होते हैं ॥६६ । पर को सभी सामग्री परदेश में कही रहने पर भी चित्त मे स्थिर रहती है तथा उसी में उन्हें नष्ट करने और भस्म करने के साधन भी स्थित रहते हैं ।।६७॥ इस प्रकार अपने जीवन में तो घोर दुख की प्राप्ति होती ही है, भरणोपरान्त भी यम-यातनायें मौर गर्भवास की यत्रणाएँ भोगनी पटती हैं ॥६६|| जाय, उतना मनुष्य के गर्भेषु सुखलेशोऽपि भवद्भिरतुमीयते । यदि तत्कथ्यतामेव सर्व दुःखमय जगत् ।। तदेवमतिदुःखानामास्पदेऽत्र भवार्णवे। भवता कथ्यते सत्य विष्णुरेकः परायणः ।७०। माजानीत वय वाला देही देहेषु शाश्वतः । जरायौवनजन्माद्या धर्मा देहस्य नात्मनः ।७१ वालोऽहं तावदिच्छातो यतिष्ये श्रेयसे युवा । युवाह वाद्ध के प्राप्ते करिष्याम्यात्मनो हितम् ॥७२॥ वृद्धोऽह मम कार्याणि समस्तानि न गोचरे। कि करिष्यामि मन्दारमा समर्थन न यत्कृतम् १७३।
प्रथम अंश-प्र०१७] एवं दुराशया क्षिप्तमानसः पुरुपः सदा। श्रेयसोऽभिमुख याति न कदाचिलिपासितः 1७४। वाल्पे क्रीडनकासक्ता यौवने विपयोन्मुखा. । प्रज्ञा नयन्त्यशक्त्या च वार्द्धक समुपस्थितम् ।७५॥ तस्माद्धाल्ये विवेकात्मा यतेत श्रेयगे सदा। वाल्ययोनिवृदायेदहमावरसंयुतः १७६। गर्भ में रहने के समय क्या तुम्हें सुखाभास हो सकता है ? सम्पूर्ण विश्व इसी प्रकार दुखी रहता है ॥६६॥ इसलिये दुःखों के परमवार इस भद- सागर में देवल एक भगवान् विष्णु ही सव की परमगति है, मेरा यह वचन नितान्त सत्य है ॥७०॥ यदि तुम कहो कि अभी तो हम बालक ही हैं तो प्रातमा सभी भवस्थानो मे समान रहता है, वृद्धावस्या, युवावस्या भया जन्मादि तो शरीर के घमं हैं, प्रात्मा के नहीं हैं ॥७१|| जो मनुष्य इन दुराशाओं में मत्त रहता है कि सभी मैं वालक हूँ मेरे खेलने के दिन हैं, यौवनवस्था प्राप्त होने पर कल्याण-साधन कहंगा, फिर सोचता है कि अभी तो मेरी युवावस्था ही है, बुढापा पाने पर बुध रहेंगा पोर जब बुढापा मा जाता है तब सोचता है कि मेरी पर्मेद्रिया शिपिल हो चुरी है, इन्द्रिया ममों में प्रवृत्त हो नहीं होती, तो क्या करूं? पहिले हो ससक्त रहने पर कुछ किया जा मरता था। इस प्रकार वह अपने कल्पाए मार्ग पर कभी नहीं रहता, पेवल भोग की तृष्णा में ही लगा रहता है 11७२-७४। मूर्ख मनुष्य बाल्यावस्था में खेलते-कूदते, मौवनावस्या में विपयों में फंसे रहते और वृद्धावस्था मे असमर्थ हो जाते हैं। इमलिये विवेकी मनुष्य को बाल, युवा या वृद्धावस्था का विचार न करके, बाल्यावस्था से ही अपने कल्याण कार्य में लग जाना चाहियै ।।७५-७६।। तदेतहो मयाख्यातं यदि जानीत नानृतम् । तदस्मत्प्रीतये विष्णुः म्मयंता बन्यमुवितवः ।। प्रयासः स्मरणे कोऽस्य स्मृतो यच्छति शोमनम् । पापक्षयन भवति स्मरता समहर्निशमन २०० ] [ श्रीविष्णुपुराण सर्वभूतस्थिते तस्मिन्मतिमंत्री दिवानिशम् । भवतो जायतामेव सर्वघलेशान्प्रहास्यथ १७६ तापत्रयेणाभिहत यदेतदखिल जगत् । तदा शोच्येषु भूतेषु द्वेष प्राज्ञ करोति कः ।। अथ भद्राणिभूतानि हीनशक्ति रह परम् । मुद तदापि कुर्वीत हानि पफल यत ।। बद्धवैराणि भूतानि द्वेष कुर्वन्ति चेत्ततः । सुशोच्यान्यतिमोरेन व्याप्तानीति मनीषिणाम् १८२। एते भिन्नहशा दैत्या विवल्पा कथिता मया । कृत्वाभ्युपगम तत्र सक्षेप श्रू यता मम ।। यदि तुम मेरी बात को मिथ्या ही समझते तो मेरी सन्तुष्टि के लिये ही मोक्षदायक भगवान् विष्णु का स्मरण करो ॥७७॥ उस कार्य मे कोई परिश्रम भी नहीं है तथा स्मरणमाय से ही वे अत्यन्त शुभ फल प्रदान करते हैं और जो उनका दिन-रात स्मरण करते हैं, उनके पापो का भी क्षय हो जाता है 11७८॥ सव भूतो में स्थित उन भगवान् मे तुम्हारी बुद्धि दिन-रात लगी रहे और उनमे निरन्तर प्रेम-वृद्धि हो तो इससे सभी क्षेश दूर हो जाएंगे ॥७९॥ जब यह सम्पूर्ण विवर पिताप से जल रहा है तो इन शोचनीय प्राणियो से कौन द्वेष परना चाहेगा? 101 यह सोच कर कि दूसरे तो मानन्द में हैं, मैं ही प्रशक्त है, दुख न माने, क्योंकि ट्रेप का परिणाम भी दुख ही है ॥२१॥ यदि कोई वर भाव पे कारण वेप करता ही हो, तो यह महामोह मे फंसा हा प्राणी विचारवानों की दृष्टि म शोचनीय हो है ॥५२॥ हे दैत्य बालको ! मैंने विभिन्न दृष्टिकोण सुम्हार सामने रखे हैं, पब उनका शक्षिप्त राम पर गुनो | विस्तार सर्वभूतस्य विष्णोः सर्वामिद जगा। द्रष्टव्यमात्मवनस्मादगेदेन विचक्षणः ॥१४॥ समुत्मज्यासुर माव तस्मा य तथा वयम् । तपा पलवरिप्पामोयया प्राप्स्याग नियंतिम् ।।
प्रयम अश-अ०१७ ]
[ २०१
या नाग्निना न चारण नेन्दुना च न वायुना।
पर्जन्यवरुणाभ्या वा न मिदन च राक्षसः ।।
न यक्षन च दैत्येन्द्रनारंगनं च किन्नरः ।
न मनुप्यनं पशुभिदोपर्नवात्मसम्भवः ।।
ज्वराक्षिरोगातीतारप्लोहगुल्मादिकंस्तथा ।
देपेामत्सराद्य वी रागलोभादिभिः क्षयम् ।
मचान्यायते कन्निनित्या यात्यन्तनिमला।
तामाप्नोत्यमले न्यस्य केशव हृदय नरः ।
असारलसारविवर्तनेषु मा यात तोप प्रतम ब्रवीमि ।
सर्वन दैत्यास्समतामुपेत समत्वमाराधनमच्युतस्य Icot
तस्मिन्प्रसन्ने किमिहास्त्य नभ्य धर्मार्थकामेरलमल्पकास्ते ।
समाथिताग्रतरोरनन्तानिःसंशय प्राप्स्यथ व महाकलमा!
इस विदव को सब भूतात्पर गवान् का विस्तार हो समझो । कोकि
विचक्षण पुरस इसमें अभेद मानते हुए भान्म प ही देखते हैं ॥४॥ इसलिये
हम-तुम को भी देर-भाव का त्याग कर शान्ति लाम बरने का मन करना
पाहिले ५ योगिनो शान्ति मग्नि, सूर्य, चन्द्र, वायु, मेप, परम, सिख,पक्षस,
पक्ष, देवेन्द्र, वरण, किन्नर, मनुष्यों मोर पशुप्रो के अपने मन ते पन दोपों
से, ज्वर, नेत्ररोग, मतिसार, लोहा मोर मुन्मादि रोगो से तया देष, इा,
मत्सर, राग,
सोम पौर दिसी भी धन्य भाव से नष्ट नहीं हो सस्ती, वह
भरवत निर्मल परम शान्ति भगवान् केशव में मन लगाने से ही प्राम हो सकती
है।६.८६॥ है दैत्यत्रो ! मेरा पारह है कि इन सासारिक विषयों से कभी
प्रमान मत होमो, तुम सबके प्रति समान हरि रखो, क्योंकि सर्व समानता हो
मावान् पच्युत मी परम पाराषना है 16|| उन पच्चुत के प्रमम होने पर
भूप भी दुलंन नहीं है, धर्म, अर्थ मोर काम तो प्रयत ही तुन्द है,
उस ब्रह्म रुप महावृक्ष प्रायर से तो पास हो तुम महान को प्राप्त
समारमे
करोtu
२०२ । [ श्रीविष्णुपुगण अठारहवाँ थध्याय तस्यता दानवाश्चेष्टा दृष्ट्वा दैत्यपतेर्भयात् । प्राचचक्षु स चोवाच सूदानाहूय सत्वरः ११ है सूदा मम पुत्रोऽसावन्यपामपि दुर्मति । कुमार्गदेशिको दुष्टो हन्यतामविलम्बितम् ।। हालाहल विप तस्य सर्वभक्षपु दीयताम् । अविज्ञातमसो पापो हन्यता मा विचार्यताम् ।३१ ते तथव ततश्चक्र प्रह्लादाय मह त्मने । विषदान यथाज्ञप्त पित्रा तस्य महात्मन ॥४॥ हालाहल विष घोरमनन्तोच्चारणेन सः। अभिमन्व्य महान्नेन मैत्रेय बुभुजे तदा १५) अविकार सतद्भक्त्वा प्रह्लादः स्वस्थमानस । अनन्तख्यातिनिय जरयामास तद्विषम् ।। तत सूदा भयत्रस्ता जीणं दृष्ट्वा महद्विषम् । दैत्येश्वरमुपागम्य प्रणिपत्येदमब्रुवन् १७) थी पराशरजी ने कहा - त्यो ने प्रह्लाद की ऐसा चेष्टा देख कर देत राज के भय के कारण उन्होंने वहां जाकर सब बातें उससे कही भोर तब हिरण्यकशिपु ने अपने रसोइयो को बुला कर उनसे कहा ॥१॥ हिरण्यकशिपु बोला--हे रमोइयो । मेरा यह पुत्र इतना दुष्ट मौर दुमति है कि दूसरों को भी मागं का उपदेश करता है इसलिये तुम इसका शीघ्र ही विनाश करो ॥२॥ तुम उमे विना सताय उसके मर खाद्य पदार्थों में हलाहल विप डाल कर उसे विना कुछ सोचे विचारे भक्षण करा दो, जिससे वह पापी मर जाय ॥३॥ श्री परामरजी ने रहा--देत्यराज की भाशानुसार उन रसोइयो ने महात्मा प्रहार पो विप दे दिया ॥४॥ हे मंत्रपती । वह उस घोर विप को भगवान का नाम लेबर भरा पर गय ॥५॥ जो विय भगवन्नाम ये प्रभाव से तेजहीन होगमा पा. ससे वह बिना विकार के पचा गये पौर स्वाप चित्त रहे ॥६॥ उस महाद २०४ ] [ श्री विष्णुपुरार पिता च मम सर्वस्मिगत्युत्कृष्टचेष्टितः । एतदप्यमाच्छामि सत्यापि नानृतम् ॥१५॥ गुरूणामपि सर्वेपा पिता परमको गुरुः । यदुक्त भ्रान्तिस्तत्रापि स्वल्पापि हि न विद्यते ॥१६॥ पिता गुरन सन्देहः पूजनीयः प्रयत्नतः। तत्रापि नापराध्यागोत्येव मनसि मे स्थितम् ॥१७॥ यत्वेत्किममन्तेनेत्युक्त युष्माभिरीदृशम् । को प्रवीति यथान्यायं कि तु नेतद्वचोऽर्थवत् ॥१८॥ इत्युक्त्वा सोऽभवन्मौनी तेपा गौरवयन्त्रितः। प्रहस्य च पुतः प्राह किमनन्तेन साध्विति ॥१९॥ साधु भो किमनन्तेन साधु भो गुरवो मम । श्रूयता यदनन्तेन यदि सेदन यास्यथ १२० प्रह्लाद ने कहा- हे महाभागो! आपका कथन यथार्ष है । भगवाः मरीचि का यह कुल सम्पूर्ण विश्व में प्रसिद्ध है, इसमे अन्यथा नहीं है ।।४। कुन यह भी ज्ञात है कि मेरे पिताजी भी सम्पूर्ण विश्व में भत्यत पराकमा इरामे में पिता ही परम गुरु है. अापके इस वचन मे भी मुझे शा नही है ।।१६।। पिताजो परम गुरु एव पूजनीय है. यह भी निःसदेह सत्य है तथा में भी उनके प्रति क्सिी अपराध में प्रवृत्त नहीं हूं ॥१७॥ परतु, पापका महान वि अनन्त से क्या प्रयोजन है, क्या कभी न्यायोचित माना जा सकता है । में ठीक नही मानता men यह कह कर उन पुरोहितो का मान रखने के नि पहिले ता वह चुप हो गये और फिर हंसते हुए बोले-अनन्त से क्या प्रयोजन पाके दरा विचार यो साधुवाद है ॥१॥ है गुरो ! मुझे अनन्त है। प्रपोजन ? अापके इस विचार को धन्यवाद । यदि प्रापपुरा न मानें तो प्रमा से जो प्रयोजन है, इसे पहता है, कृपया मुनिये ॥२०॥ धर्मार्थकाममोक्षाश्च पुरुषार्था उदाहताः । चतुष्टय मिद यस्मात्तस्माकि विपद वन.२१॥ कुछ सदेह सभी गुरु २०६ ] [ श्रीविष्णुपुराण सबके अन्त करण में स्थित हैं ॥२७॥ वे ही मोक्ता तथा भोज्य हैं, वही जगदी श्वर हैं । हे गुरुदेवो ! यदि बाल्यस्वभाव वश मैंने कुछ अनुचित कह दिया हो तो पाप कृपया क्षमा करें ॥२८॥ दह्यमानस्त्वमस्माभिरग्निना वाल रक्षित.। भूयो न वक्ष्यसीत्येव नैव ज्ञातोऽस्यबुद्धिमान् ।२६। यदास्मद्वचनान्मोहग्राह न त्यक्ष्यते भवान् । ततः कृत्या विनाशाय तव सृक्ष्याम दुर्मते ॥३०॥ कः केन हन्यते जन्तुजन्तुः कः केन रक्ष्यते । हन्ति रक्षति चैवात्मा ह्यसत्साधु समाचरन् ।३१॥ कर्मणा जायते सर्व कर्मव गतिसाधनम् । तस्मात्सर्वप्रयत्नेन साधुकर्म समाचरेत् ॥३२॥ इत्युक्तास्तेन ते ऋद्धा दैत्यराजपुरोहिताः । कृत्यामुत्पादयामासुज्र्वालामालोज्ज्वलाकृतिम् ॥३३॥ अतिभीमा समागम्य पादन्यासक्षतक्षिति.। शूलेन साधुसङ द्धा त जघानाशु वक्षसि ॥३४॥ तत्तस्य हृदय प्राप्य शूल वालस्य दीप्तिमत् । जगाम खण्डित भूमौ तनापि शतधा गतम् ॥३५॥ पुराहितो ने कहा है बालक । हम तो समझते थे कि तू हमारी बाल गान कर ऐसी बात ग कहेगा, इसीलिये तुझे भस्म होने बचाया था । ह मा मानुम था कि तू ऐसा मतिहीन है ? ॥२९॥ अरे खोटी बुद्धि वाले ! यदि तू अपने इस मोहमय दुराग्रह का त्याग न करेगा तो हम तुझे मारने के लिये कृत्या उत्पन्न वरेंगे ॥३०॥ प्रह्लाद ने कहा- कौन किसके द्वारा मारा जाता या रक्षित होता है ? शुभाशुभ प्रावरणो से यह आत्मा स्वय अपनी रक्षा मयंदा विनाश में समर्थ है ॥३१॥ों कारण ही सब का जन्म तथा शुभाग गतियों होती हैं, इसलिये सदा सुम कर्म करने परना उचित है ॥३२॥ श्री जी ने मी यात मुन पर दैत्यराज के पे पुरोहित प्रोध मे भर पर्व का ही प्रयत्न कहा-प्रहार पराशर
२०८ ]
[ श्रीविप्युपुराण
प्राप्त करें ॥४०॥ यदि मैं उन सर्वगत भगवान को अपने विपदियो में भी स्थित
देखता हूँ तो यह पुरोहितगण अवश्य ही जीवन को प्राप्त हो॥४१॥
ये हन्तुमागता दत्त यविप यहुंताशन ।
यैदिग्गजरह घण्णो दष्ट सर्पश्च यैरपि ।४२।
तेष्वह पिनभावेन सम.पपोऽस्मि न कचित् ।
यथा तेनाद्य सत्येन जीवन्त्वसुरयाजकाः।४३॥
इत्युक्तास्तेन ते सर्वे सस्पृष्टाश्च निरामया ।
समुत्तस्थुद्विजा भूयस्तमूचुः प्रश्रयान्वितम् ॥४४॥
दीर्घायुरप्रतिहतो बलवीर्यसमन्वित ।
पुनपौत्रघनश्वर्यैर्युक्तो वत्स भवोत्तम' १४५॥
इत्युक्त्वा त ततो गत्वा यथावृत्त पुरोहिता ।
दैत्यराजाय सकलमाचचक्षुर्महामुने ।४६॥
जो मेरी हत्या के लिये माये, जिन्होने मुझे विष भक्षण कराया,
जिन्होंने मुझे अग्नि में दग्ध किया, जिन्होंने दिग्गजो से रुधवाया अथवा जिन्होंने
सपों से दशित कराया, मैं उन सब के प्रति समान मंत्री और सदा निष्पाप बुद्धि
से रहा हूँ तो मेरे उस सत्य के कारण इन दैत्य-पुरोहितो को जीवन प्राप्त हो
।।४२-४३॥ श्री पराशरजी ने कहा- ऐसा कहते हुए उन्होने पुरोहितों को
स्पर्श किया, जिससे वे सब तुरत ही स्वस्थ होकर उठ बैठे और विनय से झुकते
हुए उस वालक से बोले ॥५४॥ पुरोहितों ने कहा-हे परस । तू परम श्रेष्ठ है।
तू दीर्घायुष्य, द्वन्द्व रहित, वल-वीय युक्त एव पुत्र, पौत्र, घन वैभव से सम्पन्न
होगा ॥४५॥ श्री पराशरजी बोले -हे महामुने । यह कह कर वे पुरोहित दैत्य
राज हिरण्यकशिपु के पास गये और उसे सब समाचार यथावत् गुना
दिया ॥४६॥
अपने अनुचर दैत्यो से वहा ॥१०॥ हिरण्यकशिपु ने पहा-इस भत्यन्त दुरात्मा को सौ योजन ऊचे भवन से नीचे गिरामो, जिससे पर्यंत शिलामों पर गिर कर इसका शरीर चूर-चूर हो जाय ।।११॥ यह सुनकर उन दानों २१० ] [ थीविष्णुपुराण को स्थित मान कर किसी की बुराई न तो सोचता, न कहता और न करता हूँ ॥७॥ शारीरं मानसं दुःखं देव भूतभवं तथा । सर्वत्र शुभचित्तस्य तस्य मे जायते कुतः ।। एवं सर्वेषु भूतेषु भक्तिरव्यभिचारिणी। कर्तव्या पण्डितत्विा सर्वभूतमयं हरिम् ।। इति श्रुत्वा स दैत्येन्द्रः प्रसादशिखरे स्थितिः। कोधान्धकारितमुखः प्राह दैतेयकिङ्करान् ॥१०॥ दुरात्मा क्षिप्यतामस्मात्प्रासादाच्छतयोजनात् । गिरिपृष्ठे पतत्वस्मिन् शिलामिनाङ्गसंहतिः।११। ततस्त चिक्षिपुः सर्वे बालं दैतेयदानवाः । पपात सोऽप्यधः क्षिप्तो हृदयेनोद्वहन्हरिम् ।१२। पतमान जगद्धात्री जगद्धातरि केशवे । भक्तियुक्त दधारैनमुपसङ्गम्य मेदिनी ॥१३॥ ततो विलोक्य त स्वस्थमविशीर्णास्थिपञ्जरम् । हरिण्यकशिपुः प्राह शम्बरं मायिनां वरम् ॥१४॥ इस प्रकार श्रेष्ठ चित्त वाला होने से मुझे दैहिक, दैविक, मानसिक अथवा भौतिक दुःख कैसे मिल सकता है ? ॥८॥ इस प्रकार भगवान सर्वभूतात्मक जानकर सभी प्राणियों में विचलित न होने वाली प्रीति करती चाहिये ।। श्रीपराशरजी ने वहा- अपने भवन की उच्च अट्टालिका पर स्थित उस दैत्यराज ने प्रसाद पो पात सुनी तो क्रोधान्ध हो उठा और को ने प्रह्लाद को कैचे भवन से गिराया, उस समय वह हरि-स्मरण करते हुए गिरे ॥१२॥ भगवद्भात प्रसाद के गिरते समय संसार को धारण करने वाले ध्वी ने ऊँचे उठार उन्हें मानी गोद में ले लिया ||१३|| उन्हें इस प्रा प्रथम अंश-०१६ ] [ २११ विना क्सिी चोट के स्वम्य देखकर हिरण्यकशिपु ने घोर मायादी शम्बरासुर से कहा ॥१४॥ नास्माभिः शक्यते हन्तुमसी दुर्बुदिवालकः । मायां वेत्ति भवान्तस्मान्माययैनं निषूदय ।१५। सूदयाम्येव दैत्येन्द्र पश्य मायारल मम । तहन्नमन मायानां पश्य कोटिगतं तया ।१६। ततः स ससृजे मायां प्रहाद दाम्बरोऽभुरः । विनाशमिच्छन्दुर्बुद्धिः सर्वत्र समदसिनि ॥१७॥ समाहितमतिला शम्बरेऽपि विमत्सरः। मैत्रेय सोऽपि प्रह्लादः सस्मार मधुसूदनम् । १८॥ ततो नगवता तस्य रक्षार्थ चक्रमुत्तमम् । पाजगाम समाज्ञप्तं ज्वालामालि सुदर्शनम् ।१४ तेन मायासहनं तच्छम्बरस्यानुगामिना। बालस्य रक्षता देहमेकं च विद्योधितम् ॥२०॥ संशोपकं तथा वायु दत्वेन्द्रस्त्विदमनवीन् । शौनमेप ममादेशाद् दुरात्मा नीयतां क्षयम् ॥२१॥ तयेत्युक्त्वा तु सोऽप्येन विवेश पवनो लघु । शीतोऽतिस्मः गोपाय तद्देहत्यातिदुःवहः ।२२ दिएपगि ने कहा-यह रोटी बुद्धि वाला बालक हमारे द्वारा नहीं मारा जा मका, मार माया के शाता है, पन: मपनी मापा से ही इमा सहार कर दालौ ॥१५॥ गम्बरासुर ने कहा-है दंत्वराज इस बातरू को मैं मनी समाप्त किये देता है, तुम मेरा प्रभाव देसना, मैं आपको सो पत्र हजारों बरोही पासाएं दिखाऊंगा ॥१६॥ यो पराशरी ने कहा-दव उम मुहमति सादर ने सबको समान भाव से देखने वाले प्रहार को नष्ट करने के लिये मनेा मायामों की रचना की आपरनु, हे मस्ती ! प्रसाद उस सन्दरानुर के प्रति भी निबर नाव से रहते हुए दिन भगवान का हो स्मरण करते रहे हैं। उन समर मनु-माना से जान-मातामों में दात पर गिर परमारीर पूर-पूर हो जाय ॥११॥ यह गुनार उन दानों इस प्रकार श्रेष्ठ चित वाला होने से मुझे दैहिक, दविप, मानसिक सर्वभूतारमर जानकर सभी प्राणियो मे विचलित न होने वाली प्रीति करनी स्थित उस दैत्यराम ने प्रह्लाद वो बात मुनी तोक्रोधान्य हो उठाण दुरारमा पो गौ योजन ऊ भवन से नीचे गिरामो, जिरासे पर्वत पिपा गिरे ॥१२॥ भगवत प्रसाद गिरने समय ससारो पारण सरने बानी पषी ने उप उर उन्हें पानी गोद में से रिया ॥१॥ उन्हेंबर २१० ] [ श्रीविष्णुपुराण को स्थित मान कर किसी की बुराई न तो सोचता, न कहता और न करता हूं ॥७॥ शारीर मानस दु ख देव भूतभव तथा । सर्वन शुभचित्तस्य तस्य मे जायते कुत । एव सर्वेषु भूतेषु भक्तिरव्यभिचारिणी। कर्तव्या पण्डितैत्विा सर्वभूतमय हरिम् ।। इति श्रुत्वा स दैत्येन्द्र प्रसादशिखरे स्थिति । क्रोधान्धकारितमुख प्राह देतेयकिङ्करान् ।१०। दुरात्मा क्षिप्यतामस्मात्प्रासादाच्छतयोजनात् । गिरिपृष्ठे पतत्वस्मिन् शिलाभित्राङ्गराहति ।११॥ ततस्त चिक्षिपु सर्वे बाल देतेयदानवा । पपात सोऽप्यघ. क्षिप्तो हृदयेनोद्वहन्हरिम् ।१२। पतमान जगदायी जगद्धातरि केशवे । भक्तियुक्त दपारेनमुपसङ्गम्य मेदिनी ॥१३॥ सतो विनोक्य त स्वस्यमविशीर्णास्थिपन्जरम् । हरिण्यकशिपु प्राह शम्बर मायिना वरम् ॥१४॥ अथवा भौतिय दुस से मिल सकता है । इस प्रकार भगवान पाहिये ॥ श्रीपराशरजी ने कहा- अपने भवन की उच्च अट्टालिस पर मान मनपर देरयो स पहा ॥१०॥ हिरण्यकशिपु ने पहा- इस पावन शे ने प्रसार को पं भवन गिराया, उस समय यह हरि-स्मरण करते प्रथम अंश-०१६] [ २११ विना किसी चोट के स्वस्थ देखकर हिरण्यकशिपु ने घोर मायावी शम्बरासुर से कहा ॥१४॥ नास्माभिः शक्यते हन्तुमती दुवुद्धिवालकः । माया वेत्ति भवास्तस्मान्माययनं निपूर्दय ॥१५॥ सूदयाम्येव दैत्येन्द्र पश्य मायावल मम । सहस्रमत्र मायाना पश्य कोटिशतं तथा ।१६। ततः स ससृजे मायां प्रह्लादे शभ्वरोऽसुरः। विनाशमिच्छन्दुवुद्धिः सर्वत्र समदशिनि ।१७॥ समाहितमतिर्भूत्वा शम्बरेऽपि विमत्सरः। मैत्रेय सोऽपि प्रह्लादः सस्मार मधुसूदनम् । १८॥ ततो भगवता तस्य रक्षार्थं चक्रमुत्तमम् । पाजाम समाजप्तं स्वरलामालि सुदर्शनम् ॥१६॥ तेन मायासहस्र' तच्छम्बरस्याशुगामिना । वालस्य रक्षता देहमेककं च विशोधितम् ।२०। सशोपकं तथा वायु दैत्येन्द्रस्त्विदमब्रवीत् । शीघ्रमेप ममादेशाद् दुरात्मा नीयता क्षयम् ॥२१॥ तथेत्युक्त्वा तु सोऽप्येन विवेश पवनो लघु। शीतोऽतिरुक्षः शोपाय उद्देहस्यातिदुःसह. ॥२२॥ हिरण्यकशिपु ने कहा-यह खोटी बुद्धि वाला यालक हमारे द्वारा नहीं मारा जा सका, पाप माया के ज्ञाता है, अतः अपनी माया से ही इसका सहार कर हालो ॥१५॥ राम्बरासुर ने कहा - हे दैत्यराज इस बालक को मैं मभी समाप्त किये देता हूँ, तुम मेरा प्रभाव देखना, में प्रापको कैसी अद्भुत हजारों-करोडो मायाएं दिखाऊंगा ॥१६॥ यो पराशरजी ने कहा-तब उस मूडमति शम्बर ने सबको समान भाव से देखने वाले प्रसाद को नष्ट करने के लिये अनेक मायानो की रचना की ॥१७॥ परन्तु, हे मंत्र यजी 1 प्रह्लाद उस सम्बरासुर के प्रति भी निर्वर भाव से रहते हुए केवल भगवान् का ही स्मरण करते रहे ॥१८) उस समय प्रभु-प्राज्ञा से ज्वार-मालामों से मुक्त ११२ ] [ श्रीविष्णुपुरारा सुदर्शन चक्र उनकी रक्षा के लिये या उपस्थित हुआ ॥१६। उस दीघ्र गति वाले चक्र नै बालक की रक्षा करते हुए, मसुर वो हजारों मायानों को दिन भिन्न कर दिया ॥२०॥ यह देखकर दैत्यराज ने सवंशोपर वायु को उस बालक को शीघ्र ही नष्ट कर देने की प्राज्ञा दी । इसलिये उस अत्यन्त शीतल रक्ष प्रह्लाद के देह को सुखाने के लिये उसमें प्रवेश असहनीय वायु ने किया ॥२१-२२॥ तेनाविष्टमथात्मान स बुद्ध्वा दैत्यबालक । हृदयेन महात्मानं दधार धरणीधरम् ।२३। हृदयस्थस्ततस्तस्य त वायुमतिभीषणम् । पपी जनार्दनः क द स ययौ पवनः क्षयम् ॥२४॥ क्षीरणासु सर्वमायासु पवने च क्षय गते । जगाम सोऽपि भवन गुरोरेव महामति ॥२५॥ अहन्यहन्यथाचार्यो नीति राज्यफलप्रदाम् । ग्राहयामास त बाल राज्ञामुशनसा कृताम् ।२६। गृहीतनीतिशास्त्र त विनीत च यदा गुरु । मेने तदैन तत्पिने कथयामास शिक्षितम् ।२७। गृहीतनीतिशास्रस्ते पुत्रो दैत्यपते कृत । प्रह्लादस्तत्वतो वेत्ति भार्गवेण यदीरितम् ॥२८॥ जव प्रह्लाद ने अपने देह में वायु को प्रविष्ट हुअा जाना, तब उ होने उही भगवान् को हृदय ग धारण विमा ॥२३॥ उनो हृदय स्थित भगवान् ने कोष पूर्व उस भीषण वायु का पान परके उसे क्षीण कर दिया ॥२४॥ इस प्रकार सब मायामो पौर ये नष्ट होने पर युद्धिमान प्रह्लाद अपने गुर गृह गये ॥२५॥ फिर गुरजी ने उन्हें गुनाचार्य प्रणीत राज्यफल देने वाली एक नीति या पध्ययन प्रारम्भ परागा ॥२६॥ भोर जब उन्हें नीतिशास्त्र । पारगत तथा विनय युक्त हमा देसा तब उनके पिता दैत्यराज के पास आप गुरुत्री ने परा-भय यह गुशिक्षित हो गया है ॥२७॥ माचार्य ने कहा- को वायु प्रथम ग्रंश-प्र.१९] [ २१३ दत्यपदे । तुम्हारे पुन को हमने दर्शना नोति-निपुरा कर दिया है, अब वह मुद्रारार्थी के श्यना तत्वपूर्वक जाता है ॥२६॥ मित्रपु वर्तेत कथमरिवर्गेषु भूपतिः । प्रल्हाद त्रिपु लोपु मध्यस्येपु कय चरेन् ।। क्य मन्त्रिावमात्येपु वाह्य प्वाभ्यन्तरेण च । चारेषु पौरवर्गपु गनिवितरपु च ॥३०॥ कृत्याकृत्यविधानञ्च दुगटविकसावनम् । प्रह्लाद कय्यता सम्यक् तथा पटकशोवनम् ॥ एतच्चान्यच्च सकलमचोत मबना यया । तथा मे कय्यता ज्ञानु तवैच्यामि मनोगतम् ॥३२॥ प्ररिगपत्य पितुः पादौ तदा प्रश्रयभूपणः । प्रह्लादः प्राह दंत्येन्द्र कृताञ्जलिपुटत्तया ॥३३॥ ममोपदिष्ट मक्सं गुरुणा नात्र संशयः। गृहीतनु मया विन्तु न सदेतन्मतम्मम ॥३४॥ साम चौपनदानं च भेददण्डी तथापरी । उपाया: कयिताः सर्वमित्रादीनां च साधने १३॥ हिरण्यकशिपु ने कहा है पुत्र प्रहाद । रात्रा को अपने मित्रों के प्रा बमा बदहार करना चाहिए और शत्रुओं के प्रति ? नया तीनों लोग में जो मध्यस्थ हों, उन गा प्रादर करता उचित है ? ॥२२॥ मन्तिः अमानों ने मा व्यवहार मरे, बाहो वक, अन्तः है नृत्यों, गुप्तन, नागरिकों, मस्तिों प्रपत्रा अन्यान्य व्यक्तियों में प्री मिस-किस प्रकार का ध्यहार करे100 करने योग्य और न करने पोर कार्यों का विधान से हो? दुर्ग पोर पानि प्रादि को पैसे दाम में तया गुप्तगत १ कटक को विम प्रकार दूर परे? ॥३१॥ यह सब तय इनो पहिरित की जो तूने मोखा है, यह मुले गुना, क्योंकि देरे मनोगत ना को में जानना चाहता हूँ ॥३२॥ श्रीपरामरको ने कहा-यह मुनार विना १ माभूपए दाले प्रह्लाद ने माने मित्रा को प्रणाम कर हाय बोडे २१४ ] [ श्रीविष्णुपुराए कहा ॥३३॥ प्रह्लाद बोले-हे पिताजी ! गुरुजी ने मुझे सभी विषयों की शिक्षा दी है और मैंने उन्हें हृदयगत भी कर लिया है, परन्तु मैं उन नीतियों को ठीक नहीं समझता ॥३४॥ साम, दान, दण्ड, भेद, यह चार उपाय मित्रादि को वश में करने के लिये कहे गये है ॥३शा तानेवाह न पश्यामि मित्रादीस्तात मा अध. । साध्याभावे महावाहो साधनैः किं प्रयोजनम् ॥३६॥ सर्वभूतात्मके तात जगन्नाथे जगन्मये। परमात्मनि गोविन्दे मित्रामित्रकथा कुतः ॥३७॥ स्वय्यस्ति भगवान विष्णुर्म यि चान्यत्र चास्ति सः। यतस्ततोऽय मित्र मे शत्र श्चेति पृथक्कुनः १३८। तदेभिर लमत्यर्थं दुष्टारम्भोक्तिविस्तरैः । अविद्यान्तर्गतर्यलः कर्त्तव्यस्तात शोभने ३६1 विद्याबुद्धिरविद्यायामशानात्तात जायते । बालोऽप्रिं किं न खद्योतमसुरेश्वर मन्यते ।४।। तत्कम यन्न बन्धाय सा विद्या या विमुक्तये । प्रायासायापर कर्म विद्यान्या शिल्पन पुणम् ।।१। तदेतदवगम्याहमसार सारमुत्तमम् । निशामय महाभाग प्रणिपत्य ब्रवीमि ते १४२॥ परन्तु हे पिताजी ! पाप क्रोधित न हों, मुझे न कोई शन. दिखाई देता है न मिनादि ही दिखाई देते हैं । हे महायाहो ! साध्य के प्रभाव में इन साधनों से साभ ही क्या है ? ॥३६॥ जो सर्वभूतात्मक, जगन्मय एवं जगताप हैं, उन परमात्मा गोविन्द में पत्र-मित्र का भेद ही वहाँ है ? ॥३७]] वह भगवान तो माप मे, मुझमें, सब मे तथा सर्वत्र स्थिति हैं, फिर मित्र शत्रु के भेद को स्पान ही यही होगा? ॥३८॥ इसलिए मविद्या से उत्पन्न इस निरम पाजाल को त्याग कर अपने भले के लिये ही यत्नशीस होना पाहिले ॥३६॥ ममानवा ही मनुष्य की युद्धि पविया मे लगती है, क्या मशान के पशीभूत हुमा बाराक सचोत को हो पग्नि नहीं मान पेता? VEI पन प्रथम अंश-०१६] 1 २१५ का कारण न हो, वही कम है और मोक्ष को निद करल बाती हो वही विद्या है। इसके मिन कर्म ध्वयं परियम स्प और निम विद्याये केवल कलाकौल रूप ही हैं ।।४१॥ है महानाग ! इस प्रकार में इन द को कार समन्ता हूँ मौर अब पापको प्रणाम करके पेट मात्र का वशंन करता हूँ. उसे मुनिये ॥२॥ नचिन्दयति को राज्यं धनं नामिवाञ्चति। तयापि नावमेवंतनयं प्राप्यते नरः।। सर्व एव महाभाग महत्त्वं प्रति सोचमाः। त्यापि पुंसां भाग्यानि नौद्यमा मूर्तिहतवः ४४ जडानामविवेकानाममूसलामपि प्रनो। भाग्यमोज्यानि राज्यानि सन्त्वनीतिमतामपि ।।। तस्मादन पुरावयु य इच्छेन्महता घियम् । यतितव्य समत्वे च निर्वाणपि चेन्यता ४॥ देवा मनुप्याः पशवः पक्षिवृक्षारोमृगः । त्पमेतदनन्तस्य वियोनिन्नमिव स्थिमा) एतद्विजानडा सर्व जगल्यावरजङ्गमम् । द्रष्टव्यमात्मवाद्विप्रायंतोऽयं विश्वना ।। एवं मातेन नगवाननादि: परमेश्वरः। प्रमीत्यच्युतस्तस्मिन्प्रसन्न क्लेगसंक्षयः । कौन राज्य प्राप्त करना नहीं चाहता ? किसे धन प्रापि को इन्धा नहीं होती? निर भी इनकी प्राप्ति उन्हीं की होती है, जिन्हें यह प्राम होने दाते है। हैं ! महत्व को उनी प्राप्त करना चाहते है, परन्तु वैभव प्राप्त कराने वाला दम नहीं, नाम ही होता है । हे प्रनो! घर, विवरहीन, दलहीन, नौनिमान-नन्द को भी नाग्य 3 विविध प्रकार के नोग 'मौर रामादि की प्रान्ति महना हो जाती है ॥४५॥ इनिर जो महान् देव का प्राप्ती हो, उन पुगवों का संचय करना चाहिये तथा जो मोश से 'कामना करता हो के समय नाम में लगना चाहिये IM६देवता, मनुष्य २१६ ] [ श्रीविष्णुपुराण पशु, पक्षी, वृक्ष, सरीसृपादि भगवान् से भिन्न होते हुए भी ययार्य मे उन्ही अनन्त भगवान् रवरूप हैं ॥४७॥ इस बात के ज्ञाता पुस्प को सम्पूर्ण विश्व प्रात्मान देखना चाहिये, क्यो यह सब विश्व रूप धारण किये हुए भगवान् स्वय ही है ॥४८॥ ऐसा ज्ञान हो जाने पर भगवान प्रसन्न होते हैं और उनके प्रसन्न होने पर सभी क्लेशो का नाश होता है ॥४६॥ एतच्छ्रुत्वा तु कोपेन समुत्थाय वरासनात् । हिरण्यकशिपुः पुन पदा वक्षस्यताडयत् ।५।। उवाच च स कोपेन सामष. प्रज्वलनिय । निष्पिष्य पाणिना पाणि हन्तु कामो जगद्यथा ॥५१॥ हे विप्रचित्त हे राहो हे वलैप महार्णवे। नागपास बद्ध्वा क्षिप्यता मा विलम्ब्यताम् ॥५२॥ अन्यथा सकला लोकास्तथा देतेयदानवाः । अनुयास्यन्ति मूढस्य मतमस्य दुरात्मनः ॥५३॥ वहुशो वारितोऽस्माभिरय पापस्तथाप्यरेः । स्तुति करोति दुष्टाना वध एवोपकारकः १५४१ ततस्ते सत्वरा दैत्या बद्ध्वा त नागबन्धनः । भर्तु राज्ञा पुरस्कृत्य चिक्षिपुः सलिलार्णवे ॥५५॥ ततश्चचाल चलता प्रह्लादेन महार्णवः । उलोऽभूत्पर क्षोभमुपेत्य च समततः ॥५६॥ श्रीपराशरजी ने कहा- इतना सुनते ही हिरण्यकशिपु अपने सिंहासन से छ पौर उरान अपने पुत्र के हृदय पर पदापात किया ॥५०॥ तथा क्रोप और ममा से दग्ध होता हुआ, जैसे सम्पूर्ण विश्व को नष्ट कर देगा, वैसे हाथ मलता हा परने सगा ॥५१॥ हिरण्यवशिपु बोला--हे विप्रचित्त । हे राहो ! हे पर तुम इरो नागपाच मे भने प्रकार बाँध कर महासागर मे हुया दो, इस कार्य पिसाव मत करो ॥५२॥ ऐसा न करने से सभी लोग तया देय-दानव भादि इस अविवेका दुरात्मा पे मत का अनुसरण घरने लगेंगे ॥५३॥ हमारे हुए पार-धार निषेप करने पर भी यह दुष्ट हमारे सत्र को ही प्रासा पर महामते ॥५॥ जयम अझ-अ०१६ [२१७ हता है। इसलिये ऐसे टुष्टों का वध कर देना हो उचित है ॥१४॥ पोरारजी | कहा-शिर उन देवा नै प्राने स्वामी की बात है अनुसार प्रहाद को यो समय नागपाग में बांधकर महासागर में चल दिया ॥५५॥ उडे महा. र में मुगवनी मच गर्दै मौर पन्त सौर के काम उनमें बरीची र उन लगी men मूर्लोक्मबिल दृष्ट्वः प्लान्धमान महान्नमा । हिरपतिपदेलानिदमाह दया. सकन गंग्व वनगासवे । निरिद्रः सर्वश सर्वधोनामप टमति १५८ नाग्निदहति नत्राय मन्त्रंटिनो न चोमः। क्षय नीतो न वादेन न विपेण न वृत्त्या ।५। नमा पारित ज्ञातानिनो न न दिनरा। वाला निटुटचित्तोय नानार्थोऽन्धि जीवता ! तप तोरमध्ये तु ममाकान्तो महीधर। तिचन्दनवाल प्राणान्हाचति दुर्मतिः । ततो दवा दानवान्न पर्वतप्त महोदया। आक्रम्य चयन चॉजनानि नह्मा १६२१ स चितः पर्वनरन्तः समुद्रस्य महामतिः। तुप्टावाह्रिस्वेलागामेवानतिरपुनम् ॥६॥ हे महामते । महानगर में मन दर का में अमृतं पृथिवी को दी हुई देवकर दनों में हिपाविह्न लगा 18 हिरल्याग्नुि -हैदै यो । नुम इस उदंदि को समुद्र के भीतर भी कहीं में भी बुला I रहने दो और मद मोर ने पद से दवा डाली ॥५॥ अहो. यह न तो नि में बना, न पात्रों में कान सणे ३ दश मे मरा, न यापु, दिए या वा से ही ना, न कार fराने, गिों के चोडने प्रता मापामा द्वारा ही इनका कुद दिगा, परनु म नष्ट हद्दर बालक के जीवन में कोई म नही है ।।१६-511 इमतिय यह पता ने भार में चा हा महन्द्रों वर्ड 1 २१८ ] [ श्रीविष्णुपुराण तय समुद्र के जल मे ही पड़ा रह पर भी तो अपने प्रारस या त्याग करेगा ॥६१।। ऐसी माझा पार दैत्यो ने उन बालब ये ऊपर पर्वतो या हजारों योजन विस्तृत ढेर कर दिया ॥६२॥ परवह महामप्ति पर्वतों से सने हर समुद्र में पड़े रह कर केवल एका मन से भगान् की स्तु हो करते रहे ॥६॥ नमस्त पुण्डगेवाक्ष नमस्ते पुश्पोत्तम । नमस्ते सवलोपात्मन्नमस्ते तिग्मचक्रिणे ।६४। नमो ब्रह्मण्य देवाय गोब्राह्मणहिताय च । जगद्धिताय कृष्णाय गोविन्दाय नमो नमः १६॥ ब्रह्मत्वे सृजते विश्व स्थितौ पालयते पुनः । रुद्ररूपाय कलान्ते नमस्तुभ्य निमूर्तये ।६६। देवा यक्षासुरा. सिद्धा नागा गन्धर्वविन्नरा। पिशाचा राक्षमाश्चैव मनुष्या. पशवस्तथा १६७/ पक्षिण स्थावराश्चैव पिपीलिकरारोमृपा । भूम्यापोऽग्निर्नभो वायुः शब्द स्पर्शस्तथा रसः ।। रूप गन्धो मनो बुद्धिरात्मा कालस्तथा गुणा । एतेपा परमार्थश्च सर्वमेतत्वमच्युन ।६६। विद्याविद्ये भवान्सत्यमसत्य त्व विषामृते। प्रवृत्त च निवृत्त च कर्म वेदोदित भवान् ॥७०। प्रल्लाद ने कहा - हे पुण्डरीकाक्ष ' हे पुरुषोत्तम । हे सर्व लोकारमन् ' है तीक्ष्ण चक्रधर प्रापको नमस्कार है, नमस्कार है ॥६४॥ गो-ब्राह्मण के हितपो ब्रह्मएयदेव भगवान् श्रीकृष्ण को नमस्कार है, जगत् का हिन करने वाले भगवान् गोविन्द को नमस्कार है ॥६५॥ ब्रह्मा रूप विश्व के स्रया, विष्णु रूप से पालक और रुद्र रूप से सहारक त्रिमूर्तिधारी भगवान को नमस्कार है ॥६६॥ है अच्युत । पाप ही देवता, यक्ष, असुर सिद्ध, नाग, गन्धर्व, विनर, पिशाच, राक्षस, मनुष्य, पशु, पक्षी, स्थावा चीटी, सरीसृप, पृथिवी, जल, अग्नि, नभ, वायु, शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध, मन, बुद्धि, पारमा, काल और गुण प्रथम प्रश-०१६J [ २१६ में परमापित स्वरूप है, यथार्थ में यह सब प्राप ही है ॥६७-६॥ पापी किया, विद्या, सत्य, असत्य, विप, अमृत तथा वेदों में बड़े गये प्रवृत्त मौर निकृत कम हैं ॥७॥ गमस्तकमभोक्ता च यमापकरणानि च । स्वमेव विष्णो सर्वाणि सर्वकर्मफलं च यत् ।७१३ मय्ययन्त्र तथान्येषु भूतेषु भुवनेषु च । तवैव व्याप्तिरेश्वयं गुरणसमूचिको प्रभो १७२१ त्वां योगिनतन्तयन्ति त्वां यजन्ति च याजकाः। हघ्याव्यमुगवस्त्वं पितृदेवस्वयघक ।७३। रूपं महत्ते स्थितमन विश्व ततन सूक्ष्म जगदेतदोश। सपरिए सर्वाणि च भूतभेदा- स्तेप्वन्तरात्मास्यमतीव मूमम् ।७४। समाच सूक्ष्मादिविपरण'नामगोचरे यतारमात्मरूपम् । विमप्यचित्य तय रुपमस्ति तस्मै नमम्ने पुरुषोत्तमाय ।। मव भूपु सर्वात्मन्या शक्तिरपरा तव । गुरगाश्रया नमस्तस्यै शाश्वताय मुरेश्वर 1७३॥ यातीतगोनरा वानां मनसां चाविशेपणा । मानितानपरिच्छेया तां यादे स्वेश्वरों पराम 101 है विशे! मार ही सब कर्मों के भोक्ता तया भोग है पीर पव पाँ पे जितने भी पम है, यह मभी माप 110१॥ मृम मरिन भी प्राणियों और मोरी में पाया ही गुण तपा ऐश्वर्य पाप्त है ।।। योगीजन माया होपान परने और यानि भासा हो यान करते हैं. पाही निरों पर और देवनामारे समेहर भोता है ht है प्रभो! यह हमारी पारा स्थल र उमरे मूहम यह नमार मोर गंगर मे मी माम र प्रिया माशों से भी परवन नाम उनमा Is उमा भी परे जो मुद्रमादिपिरोपणों से रहा पाना
२२० ।
[ श्रीविष्णुपुराण
अचिन्त्य रूप है, उस पुरुषोत्तम रूप प्राप प्रभु को नमस्कार है ॥७॥ हे सर्वा.
स्मन् ! गब भूतो मे स्थित प्रापये गुण की माथिता जो पराशक्ति है, उस
नित्यरूपिणी इक्ति को भी नमस्कार है ॥७६॥ जो मन, वाणी और विद्रोपों
से परे तथा शानियों के ज्ञान से परिछिन है, उस परम स्वतन्त्रा पराशक्ति
की मैं वन्दना करता हूँ ॥७७।।
ॐ नमो वासुदेवाय तस्मै भगवते सदा ।
व्यतिरिक्त न यस्त्रास्ति व्यतिरिक्तोऽखिलस्य यः ७१
नमस्तस्मै नमस्तस्मै नमस्तस्मै महात्मने ।
नाम रूप न यस्यैको योऽस्तित्वेनोपलभ्यते ७६।
यस्थावताररूपाणि समर्चन्ति दिवौकसः।
अ.पश्यन्तः पर रूपं नमस्तस्मै महात्मने .Gol
योऽन्तस्तिष्ठन्नशेषस्य पश्यतीश शुभाशुभम् ।
त सर्वसाक्षिणं विश्व नमस्ये परमेश्वरम् ।
नमोऽस्तु विष्णवे तस्मै यस्याभिन्नमिद जगत् ।
ध्येय. स जगतामायः स प्रसोदतु मेऽव्ययः ।।
यत्रोतमेतप्रोत च विश्वमक्षरमव्ययम् ।
आधारभूत सर्वस्य स प्रसीदतु मे हरिः ।।
ॐ नमो विष्णवे तस्मै नमस्तस्मै पुनः पुनः ।
यत्र सर्वं यत' सर्व य. सवं सर्वसश्रयः [८४।
सर्वगत्वादनन्तस्य स एवाहमवस्थित.।
मत्तः सर्वमह सर्व मयि सर्व सनातने 1८५)
अहमेवाक्षयो नित्यः परमात्मात्मसश्रयः ।
ब्रह्मसंज्ञोऽहमेवाने तथान्ते च पराः पुमान् १८६।
उन दासुदेव भगवान को सदा नमस्कार है, जिनके बिना कोई वस्तु नहीं
है, तया नो सभी से परे हैं ॥७॥ जिनका न कोई रूप है, न नाम है, केवल
अपनी ही सत्ता से उपलब्ध होते हैं उन महात्मा को बारम्बार नमस्कार है
७n जिन पर स्वरूप का ज्ञान न होने से हो देवगण उनके प्रवतरित
प्रथम अश-प्र०२० ]
[ २२१
देही का भले प्रकार पूजन करो हैं, उन महान् प्रात्मा को नमस्कार है ।।२०।।
जो सभी के प्रत.करण में रह कर सभी के शुभाशुभ कर्मों के द्रष्टा हैं, उन सर्व
साक्षी विश्वरूप को मैं प्रणाम करता हूँ॥५१॥ जिनमे यह विश्व सर्वथा अभिन्न
है. उा विष्णु को नमःमार है । यह योगियों के ध्यान योग्य, विश्व के आदि
पारण तथा मन्यय भगवान् मुझ पर प्रसन्न हों 11 जिनमे यह जगत् प्रोत्-
प्रोन है और जो प्रक्षर, मध्यय मोर सर्वाधार है यह श्रीहरि मुझ पर प्रसन्न
हो ॥३॥ जितम सर्व प्रपंच स्थित है, जिनसे सब कुछ प्रकट हुपा है तया
जो सर्वाश्रय हैं. उन भगवान् विष्णु को नमम्मार है ॥५४॥ वै सवंगत भगवान
मनात है, मेरे कप में भी वही स्थित हैं, इसलिए इस सम्पूर्ण विश्व की उत्पत्ति
मुझ से होने के कारण में हो सर पुष हूँ पोर यह सर मुझ सनातन मे हो
स्थित है ॥ में ही प्रक्षय, नित्य और पारमाथय रूप परमेश्वर
है तथा मैं ही विश्व के पारि अन्त में स्पिन ग्रह्म नाम से विरयात परम
पुग्प
वीसवाँ अध्याय
एव सचिन्तयत्विष्णुमभेदेनात्मनो द्विग।
तन्मयत्वमवाप्ययं मेने चात्मानमच्युतम् ।।
विसस्मार तयात्मानं नान्यत्किञ्चिदजानत।
परमेयाम्ययोजन्तः परमात्मेत्यचिन्तयत् ।।
तस्य तद्भावनयोगात्तीपापस्य वै समान ।
गुद्ध ऽन्तःकारण विष्णुस्तस्यो मानमयोऽन्यतः १३॥
योगप्रमापारयतादे जाते विष्णुमयेऽमुरे ।
पापुरगवन्धत मन प मटित क्षणात् ।।
प्रान्तमागणः सोपियंयौ सोनं महाएंय. ।
२२२ ] [ श्रीविष्णुपुराण चचाल च मही सर्वा सरौलवनकानना ५॥ स च त शैलसवात दैत्यन्यस्तमथोपरि। उत्क्षिप्य तस्मात्सलिलानिश्चक्राम महामति.।६। दृष्ट्वा च स जगद्भयो गगनाद्युपलक्षणम् । प्रहादोऽम्मीति सस्मार पुनरात्मानमात्मनि ।। तुष्टाव च पुन(माननादि पुरोपत्तमम् । एकाग्रमतिरव्यग्रो यतवाक्कायमानस ।। श्रीपराशरजी ने कहा-हे ब्रह्मण । इस प्रकार भगवान् को अपने से अभिन्न चिन्तन करते रहने और पूर्ण तन्मयता प्राप्त होने से न लाद ने अपने को ही अच्युत स्वरूप माना ॥१॥ उस समय वे स्वयं को भून गये और न्हे भगवान् के अतिरिक्त और किसी को भी अनुभूति न होती थी, वे दल में ही प्राय अनन्त परमेश्वर हूँ यही भावना उनके मन में भर गई ॥२॥ उसी भावना के कारण वह पाप-रहित हो गये और उनके मन्त रण में ज्ञान रूप भगवान् साक्षात् रूप से प्रतिषित हो गये ॥३॥ हे मैत्रेयजी । योगवल से जब वह विष्णु पय हो गये तब नागपाश टूट गई ।।४। उनके विध- लित होने से भ्रमणशील ग्राहो और तरल-तरगो से महासागर क्षुब्ध हो गया, इससे वनोपवन रक्त एव पर्वतमयी सम्पूर्ण पृथिवी डोर उठी ॥५॥ तब दैत्यों द्वारा लादे गये सब पर्यतो को दूर फैक पर प्रह्लाद समुद्र से बाहर निकले ॥६॥ पौर माकासादि युक्त ससार को देख कर उन्हें पुन यह प्राभास हुआ कि मैं दैत्यमृत प्रहार हूँ ॥७) तब उन्होंने मन, वाणी और शरीर को सपमित परदे धेयं और एषाग्न धारण परखे मनादि पुरष भगवान विष्णु वी स्तुति दी। ॐ नमः परमार्थार्थ स्थूलसूक्ष्म क्षराक्षर । ध्यक्ताव्यक्त पलातीत सक्लेश निरज्जन ।। गुणाजन गुणाधार निर्गुणात्मन् गुरपस्थित । मूर्तीमूर्ततहामूर्ते सूक्ष्ममूर्त स्फुटास्पुट ।१०। परालसौम्यरूपारमन्विद्याविद्यामयाच्युत । इस प्रकार के प्रथम प्रश-ग्र. २० ] [ २२३ । - सदसद् पसद्भाव सदमदावभावन ।११ नित्यानित्यप्रपन्चात्मनिष्प्रपञ्चामलाधिन। एकानेर नमस्तुभ्य वासुदेवादिकारण ।१२। य म्यूसम्म प्रकटप्रकाशो यः सर्वभूतो न च सहभूत । विश्व यतश्चंदविश्वहेतो-नमोऽस्तु तस्मै पुरुषोत्तमाय ॥१३॥ तस्य नच्चेतप्तो देव स्तुतिमित्य प्रकुर्वत । प्राविवभूत्र भगवान् पीताम्बरघरो हरि ११४॥ प्रल्हाद ने कहा हे परमार्थ । ह अयं । हे स्थूल-सूक्ष्म । हे क्षराक्षर *प 1 हे व्यक्ताव्यक्त । है वाल से परे परमेश्वर हे निरजन 14 मापको नमस्कार करता है 10 हे गए जिन । गुणाधार । निगुणात्मन् । गुणचित मूर्तामृत स महामर्ने । सूक्ष्मभूर्ते । प्रमाशाप्रकाश स्प । विकराल और सौम्य रूप । विद्या अरिधामय अच्युत । सदसत ए 1 जगत के उत्पत्तिस्थान , सदस विश्व म पालनकर्ता नित्य अनित्य प्रपनात्मन् । प्रपन से पर एव ज्ञानियो के माश्रय । एकानेक र प्रादि वारण वासुदेव 111०-१२॥ जो स्थूल-सूक्ष्म रुस, स्कर प्रमागमय, अधिशन से सर्वभूत रूप परन्तु सभी मतो से परे, कारण रहित होने पर भी जिनसे इम विश्व को -त्पत्ति हुई है, उन भगवान् श्री पुरषोत्तम को नमस्वार है ॥१३॥ थोपराशर जी ने कहा-इस प्रकार तन्मयतापूर्वक स्तव करने पर देव देव भगवान श्रीहरि साक्षात् रूप में प्रकट हुए ।।१४।। ससम्भ्रमस्तमालोक्य समुत्थायाकुलासरम् । नमोऽस्तु विष्णवेत्येतद् व्याजहारासद् द्विज ॥१५॥ देव प्रपनातिहर प्रसाद कुरु केशव । अवलोवनदानेन भूयो मा पाबयाच्युत १६ कुर्वतस्ते प्रसनोऽह भक्तिमयभिचारिणीम् । यथाशिलपितो मत प्रह्लाद प्रियता बर १७१ नाथ योनिसहस्रपु येपु मेषु प्रजाम्यहम् । तेषु तेप्यच्युता भक्तिरच्युतास्तु सदा त्वयि ॥१८॥ या प्रीतिरविवाना विपयेवनपायिनी। , २२४ ] [ श्रीविष्णुपुराण त्वामनुस्मरत सा मे हृदयान्मापसपंतु ११६॥ मयि भक्तिस्तवास्त्येव भूयोऽप्येव भविष्यति । वस्तु मत्तः प्रह्लाद प्रियता यस्तवेप्सितः ।२.। हे विम भगवान् को इस प्रकार प्रकट हुए देखकर प्रसाद खडे हो गये और उन्होंने गद्गद कठ से बारम्बार कहा-भगवान् विष्णु को नमस्कार है ॥१५।। प्रह्लाद ने कहा-हे शरणागत का दुःख हरण करने वाले श्री पेशव ! प्रसन्न हूजिये । मुझे अपने पुएप दर्शनो से पुनः पुनः पवित्र करते रहिये ॥१६॥ श्रीभगवान बोले-हे प्रह्लाद । तेरी अनन्य भक्ति से मैं प्रत्यन्त प्रसन्न हुया हूँ, तू अपना इच्छित वर मांगले ॥१७॥ प्रह्लाद ने कहा-हे नाय । हजारो योनियो मे से मैं जिस-जिस योनि को प्राप्त होऊ, उस-उम मे ही मेरी भक्ति भापमे सदैव अक्षुण्ण रूप से बनी रहे ॥१८॥ जैसे अविवेकी जन विषयो मे अविचल प्रीति रखते हैं, वैसे ही पाप मेरे हृदय रो कभी भ पृथक् न हो ॥१६॥ श्री भगवान् ने कहा- हे प्रह्लाद । मेरे प्रति तो तेरी अटूट भक्ति है ही तथा भविष्य मे भी रहेगी। इसके अतिरिक्त भी तुझे जिस वर की मभि लापा हो, वह मुझसे मांग ले ॥२०॥ मयि द्वेपानुबन्धोऽभूत्सस्तुतावुद्यते तव । मपितुस्तकृत पाप देव तस्य प्रणश्यतु ॥२१॥ शस्राणि पातितान्य क्षितो यचाग्निसहती। दशितश्चोरगर्दन यद्विप मम भोजने ।२२। बद्ध्वा समुद्र यत्क्षिप्तो यच्चितोऽस्मि शिलोच्चयः । अन्यानि चाप्यपाधूनि यानि पित्रा कृतानि मे ।२३। स्वयि भक्तिमतोद्वपादपं तत्सम्भव च यत् । त्वत्प्रसादात्प्रभो सद्यस्तेन मुच्येत मे पिता ।२४। प्रह्लाद सर्वमेतत्ते मत्प्रसादाद्भविष्यति । अन्यच्च ते वरं दनि वियतामसुरात्मज ।२५। कृतकृत्योऽस्मि भगवन्वरेणानन यत्त्वयि । भवित्री त्वत्प्रसादेन भक्तिरव्यभिचारिणी ।२६।
प्रथम अंश-अ०२० ]
[ २२५
धर्मार्थकामः किं तस्य मुक्तिस्तम्य करे स्थिता ।
समस्तजगता मूले यस्य भक्ति स्थिरा त्वयि १२७।
प्रह्लाद ने कहा है देव । अापकी स्तुनि करने के कारण जो मेरे
पिता के चित मे द्वेप उत्पन्न हुमा और उससे जो पाप उन्हे लगा है, वह दूर
हो जाय ॥२१॥ तथा मेरे देह पर शस्त्राधात करने, अग्नि में जलाने, गों
से क्टवाने, भोजन में विष देने, पाराबद्ध कर समुद्र में डालने, शिलामो से दवाने
तथा अन्यान्य दुव्यवहार मेरे साथ करने के कारण जो पाप मरे पिता को
लगा है, उस पाप से मेरे पिता शीघ्र ही छूट जायें ।।२२-२४।। भगवान् बोने
है प्रह्लाद । तेरी यह सभी कामनाएं मेरी कृपा से पूर्ण होंगी। मैं तुझे एक
वर भोर देना चाहता हूं, तेरी जो इच्छा हो, वही माँग ले ॥२५॥ प्रलाद ने
कहा-हे प्रभो । मैं तो आपने इसी वर से पत्य हो गया कि पाप में मेरी
निरन्तर भक्ति रहेगी ॥२६॥ ज्व पाप सम्पूर्ण विश्व के कारण रूप में
जिसकी मविचल भक्ति है तो मोक्ष उसके हाथ मे ही स्थित रहेगी, फिर उसे
धर्म, अयं पौर वाम से प्रयोजन हो क्या है ? ॥२७॥
यथा ते निश्चल चेतो मपि भक्तिममन्वितम् ।
तथा व मत्प्रसादेन निवारणम्परमाम्यसि ।२८।
इत्युक्त्वा तदधे विष्णुस्तस्यमय पश्यत ।
स चापि पुनरागम्य वादे चरणो पितुः ॥२६॥
तं पिता मून्यु पाधाय परिष्वज्य च पीडितम् ।
जीवसीत्याह वत्सेति बाप्पादनयतो द्विज ॥३०॥
प्रीतिमानाभवत्तस्मिन्ननुतापी महासुरः ।
गुरुपित्रोशकार शुधपा साऽपि धर्मवित् ॥३॥
पितयुपरति नीते नरसिंहस्यापिणा।
विष्णुना सोऽपि दैत्यानां मंयाभूत्पतिस्ततः ।३२॥
ततो राज्याति प्राप्य कर्मशुद्धिकरी द्विज ।
पुत्रपौवान मुबहूनवाप्यश्वयमेव च ॥३३॥
२२६ ] [ श्री विष्णुपुराण क्षीणाधिकार स यदा पुण्यपापविजित । तदा स भगद्ध यानात्पर निर्वाणमाप्तवान् ॥३४॥ भगवान ने कहा-हे प्रहाद । तरा चित मेरी भक्ति में अविचन हाने के कारण तुझे मेरी कृपा से परमनिर्वाग्ग पद की प्राप्ति होगी ॥२८॥ धोपरा- शरजी ने कहा-हे मंत्रपजी । यह वह कर भगवान् तत्काल भतर्धान गये और प्रह्लाद ने भी अपने पिता के पास जाकर उनके चरणो में प्रणाम किया ॥२६॥ तव दंगराज ने अपन जिम पुत्र को विभिन्न प्रकार से सन्तप्त किया था, उसका मस्तक सूघ कर प्रथुपूर्ण नत्रा से कहा- हे पुत्र ! तू जीवित तो है ? ॥३०॥ वह महासुर अपने कर्म पर पश्चात्ताप करना हुमा प्रह्लाद से स्नेह वरन गा और धमज्ञ प्रह्लाद भी अपने गुरु तथा माता पिता की सेवा सुश्रूया म लग गये ॥३॥ है मैत्रेयजी ! फिर नृसिंह रूपधारी भगवान् विष्णु द्वारा हिरण्यकशिपु का वध किये जाने पर वही दैत्यो के अधीश्वर हुए ॥३२॥ तब प्रारब्ध वा क्षय करने वाली राज्यथी, अनेक पुत्र- पीमादि तया परमश्वय को प्राप्त होकर वर्माधिकार की क्षीणता से पाप पुण्य यूय होकर प्रभु स्मरण पर उन्होंने परम निर्वाणपद पाया । ३३ २४॥ एव प्रभाव दत्योऽसौ मैत्रेयासोन्महामति । प्रहादो भगवद्भक्तो य त्व मामनुपृच्छसि ॥३५॥ यस्त्वेतच्चरित तस्य प्रहादस्य महात्मन । शृणोति तस्य पापानि सधो गच्छन्ति सइक्षगम् ॥३६॥ ग्रहोरायकृत पाप प्रल्हादचरित नर । शृण्वन पठश्च मैत्रय व्यपोहति न संशयः ॥३७॥ पौर्णमास्याममावास्यामष्टम्यामथ वा पठन् । द्वादश्या तदाप्नोति गोप्रदानफल द्विग ॥२८॥ प्रलाद सबलापरसु यथा रक्षित वान्हरि । तथा रक्षति यस्तस्य शृणोति चरित सदा ३६। मंत्र यनी । तुपने जिनो विपरम प्रन रिया पा, यह भायात मसाद ऐये प्रभावशाली हुए । उनके परिम को सुनने वाले के सब पापों प्रथम अंश-ग्र० २१ ] [ २२७ का शीघ्र ही क्षय हो जाता है ॥३५-३६॥ हे मैत्रयजी ! इस प्रह्लाद चरित्र के श्रवण या पाठ करने से दिन-रात किये गये पापो से भी मुत्रित होती है ॥३७॥ हे द्विज ! जो कोई इसे पूणिमा, अमावस्या अष्टमी अथवा द्वादशी को पढता है, वह गोदान का फल पाता है ॥३८॥ जसे भगवान् ने प्रह्वाद की सब सक्टो से रक्षा की थी, वैसे ही वह उनके चरित्र मुनने वाले की मी रक्षा करते ॥३६॥ इक्कीसवाँ अध्याय सहादपुत्र प्रायुज्माञ्छिपिष्किल एव च । विरोचनस्तु प्राङ्गादिवलियंज्ञे विरोचनात् ।। बलेः पुनशत स्वासीहाणज्येष्ठ महामुने । हिरण्याक्षसुनाश्वासन्सवं एव महाबलाः ।स उत्कुरः शकुनिश्चर भूसन्तापनस्तथा । महानाभो महाबाहुः कालनाभस्तथापरः ॥३॥ नभवन्दनुपुनाश्च द्विमूद्ध शम्बरस्तथा । अयोमुखः शङ्क, शिराः कपिलः शङ्करस्तथा ।।। एकचक्रो महावाहुस्तारकश्च महाबलः । स्वर्भानु पपर्वा च पुलोमच महाबलः ।। एते दनो सुताः स्याता विप्रचितिश्च वीर्यवान् । स्वर्भानोस्तु प्रभा कन्या शर्मिष्ठा वापर्वणी ॥६॥ उपदानो हयशिरा: प्रख्याता वरकन्यकाः । वैश्वानरसुते चोभे पुलोमा कालका तया 191 श्रीपराशरजी ने कहा-सहार पुत्र मायुष्मान, Fiवि भौर वाप्पल हर तपा प्रहाद के पुत्र विरोचन हुए, उस विरोचना का पुत्र बोल के २२८ ] [ श्रीविष्णुपुराण हे महामुने ! बलि के सौ पुत्र हुए, जिनमे सबसे बड़ा बाणासुर था। हिर- एयाक्ष के उत्कुर, पाकुनि, भून सन्तापन, महानाभ, महाबाहु तथा कालनाम मादि पुष हुए, वे सब अत्यन्त बलवान थे ।।२-३कश्यप-पत्नी द्विमुर्दा, शम्बर, अयोमुख शकुशिरा, कपिल, शंकर, एकचक्र, महाबाहु, तारक, महाबल, स्वर्भानु, वृषपर्वा पुलोम और विप्रचित्ति नामक विख्यात पुत्र हुए। स्वर्भानु की कन्या प्रभा हुई और वृषपर्वा को अत्यन्त सुन्दरी कन्याएं शमिया, उपदानी और हयशिरा अत्यन्त प्रसिद्ध हुई । वैश्वानर की दो वन्माएं पुलोमा और कालका हुई ॥४-७॥ उभे सुते महाभागे मारोचेस्तु परिग्रहः । ताभ्या पुत्रसहस्राणि पष्टिनिवसत्तमाः ।। पौलोमाः कालकेयाश्च मारीचतनयाः स्मृताः । ततोऽपरे महावीर्या दारुणास्त्वतिनिधूणा: ।। सिंहिकायापयोत्पन्ना विप्रचित्तः सुतास्तथा । व्यश. शल्यश्च बलवान् नभश्च व महाबलः ॥१०॥ वातापो नमुचिश्चैव इल्वल. खसृमस्तथा। अन्धको नरकरचंव कालनाभस्तथैव च ॥११॥ स्वर्भानुश्च महावीर्यो वक्त्रयोधी महासुरः । एते में दानवा श्रेष्ठा दनुवाविवर्द्धनाः ।१२। एतेषां पुत्रपौत्राश्च शतशोऽथ सहस्रश । प्रह्लादश्च तु दैत्यस्य निवातकवचाः कुले ।१३। समुत्पन्नाः सुमहता तपप्ता भावितात्मनः । पट् सुताः सुमहासत्त्वासानाया परिकीत्तिता. ॥१४॥ शुको श्येनी च भासी च सुग्रीवोशुचिगृद्धिकाः । शुको शुकानजनयदुलर प्रत्युलुकिमान १५॥ है महाभाग ! वैश्वानर को वे दोनो कन्याएं' मरीचिपुष वश्यपजो को पत्नियां हुई, जिनके साठ हमार पुत्र हुए ॥६॥ मरीचिमुत कश्यपजी के सभी पुत्र दो शो मे पौलोम प्रोर वालवेय नाम से प्रसिद्ध हुए। इनके अतिरिक्त प्रथम प्रश-अ०२१ [ २२६ विप्रवित्ति ने सिंहिका के गर्भ से अन्य अनेक महावली, प्रत्यत भयकर पौर कर पुत्र काम किये। वे व्यर, , पलवार, नम, वापी, नमुचि, इन्वल, खगम, अन्यर, नरा, बाल नाम, स्पर्मानु और पयोषो नाम से प्रसिद्ध थे। यह सभी दानव दनु भो वा वृद्धि करने वाले हुए 18-१गा इनके अत्यान्य से संबडो हजारों पुत्र-पौयादि उत्पन्न हुए थे। महा तप पे द्वारा प्रात्मज्ञान से युक्त प्रल्हाद के वश में निवासस्वच नामक एक दंत्य हुए । अश्यप-पानी ताना रेगुसरी श्येनी, माती, सुग्रीनी, गुचि, धिया यह छनो कन्याएँ अत्यत प्रभार वाली हुई। शुवी से गुव, ठतृक और उजूको ये प्रतिपक्षी पाक भादि हए। १३.१५॥ दयेनी श्येनास्तथा भामो भाषागृद्धाश्च गृध्रयपि । शुच्योदयापक्षिगरणा सुनायी तु व्यजायत ।१६। अश्वानुमानगदभाश्च तानावश प्रीतित । विनतायाग्तु द्वौ पुत्रो विम्याती गरुडारुणौ ॥१७॥ सुपर्ण पतता श्रेष्ठो दारुण. पन्नगासन । सुरमाया सा तु माणाममितीजम् । । अनेक सिरसा ब्रह्मन् सेवराणा महात्मनाम् । कादयास्तु बलिन. सहसममितौजस. १६ सुपएं वशमा ब्रह्मा जमिरे नकमस्ता । तेषा प्रथानभूतास्तु दोपवायुक्तिक्षराः ॥२०॥ शहरयेतो मापन करताश्वतरी तथा । एतापुमस्तथा नाग पॉटरपनक्षयो।२१॥ एते चान्ये च बहवो दन्दगूपा दिपोत्वरणा । पण ग्रोधवश विद्धि तम्या. सर्वे च दष्ट्रिण १२२॥ स्थलजाः पक्षिणोऽन्जान दाहा.मिनिताशना । शोधा तु जनयामाम पिशाचा महारलान् ॥२३॥ स्पेनी रे ग (शा) हमा, मामी से माण तपा द्धिवा मे मी सी उपनि हुदै । धि मे चपरे हुए या गुपौधी से यौ', ट मौर
२३० ]
[ श्रीविष्णुपुराण
गए हुए,
गधे उत्पन्न हुए । इस प्रकार ताम्रा का वश हुमा । विनता के दो पुत्र गरड
और अरुण नाम से प्रसिद्ध हुए ॥१६-१७। इनमें पक्षी श्रेष्ट गरड सों के
भक्षक तथा अत्यत प्रभावशाली आकाशचारी, अनेक शीश और विशालकाय
वाले हजारो सर्प उत्पन्न हुए और कद्र
के भी अनेक सिर वाले अत्यंत तेजस्वी
हजारो ही सपं उत्पन्न हुए जो गरुड के प्रागन थे । उनमे से शेप, वासुकि,
तक्षक, शखश्वेत, महापद्म, कम्बल, अश्वतर.एलापुत्र, नाग, कर्को-टक, धनञ्जय
एवं शान्य अनेक उग्र विष वाले सर्व प्रधान कहे गये हैं । क्रोधवशा के क्रोधवश-
वे सब विकराल दाढ वाले, भयर, कच्चे मांस का पाहार करने
वाले जलचर, थलचर और नभचर हैं । क्रोधा से ही महाबली पिशाचो की
उत्पत्ति हुई है। ॥१८-५३॥
गास्तु वे जनयामास सुरभिमहिपास्तथा ।
इरावृक्षलतावल्लीस्तृणजातीश्च सर्वशः ।२४।
खसा तु यक्षरक्षासि मुनिरप्सरसस्तथा ।
अरिष्टा तु महासत्त्वान् गन्धर्वान्समजोजन ॥२५॥
एते कश्यपदायादा. कीत्तिता स्थाणुजङ्गमाः।
तेषा पुत्राश्च पौत्राश्च शतशोऽथ सहस्रगः ॥२६॥
एप मन्वन्तरे सों ब्रह्मस्वारोचिपे स्मृतः ।
वैवस्वते च महति वारुणे वितते कृतौ ।२७)
जुह्वानस्य ब्रह्मणो वै प्रजासर्ग होच्यते ।
पूर्व यत्र तु सप्तर्षीनुत्पन्नान्सप्तमानसान् ।२८।
पितृत्वे वल्पयामास स्वयमेव पितामह ।
गन्धर्वभौषिदेवाना दानवाना च सत्तम ।२६।
दितिविनष्टपुत्रा व तापयामास कश्यपम् ।
तया धाराधिन सम्यकाश्यपस्तपता वरः३०॥
वरेगच्छन्दयामास ता व वने ततो घरम् ।
पुअमि द्रवधार्याय समर्थममितौजसम् ॥३१॥
प्रथम प्रश-०-१ [ २३१ देल तथा सुरभि से गो, भैस प्रादि उत्पन्न हुई और इरा से वृक्ष, लता, ममो प्रकार के तृणादि उत्पन्न हुए ॥२४॥ खसा से यक्ष और राक्षस हुए, मुनि से अप्सराएँ हुई ग्रौर अरिष्टा से गधवं हुए ॥२५॥ यह सभी स्थावर जगम देहधारी कश्यपनी से उत्पन्न हुए है । इनके अन्यान्य हजारो पुत्र-पौनादि हुए ॥२६ । है ब्रह्मन् ! यह वर्णन स्वारोचिप-मन्वन्तर की सृष्टि का है वैवस्वत मावन्तर के प्रारम मे पारण नामक महायज्ञ हुमा, उस मे ब्रह्माजी होता थे, अब मैं प्रजा के विषय में कहता हूं । पहिले के मन्वन्तर में ब्रह्माजी के मानस पुत्र रूप से जो सप्तपि हुए थे, ब्रह्माजी इस कल्प मे उन्हे गधर्व, नाग, देवता और दानवादि के पितृ रूप से कल्पित किया ॥२७-२६॥ पुत्रो के नष्ट होने पर विति ने वश्यपजी को प्ररन दिया, तब सन्तुष्ट हुए । कश्यपनी ने उस पर प्रदान द्वारा प्रसन्न किया। उस समय उसने इन्द्र को मारने में समर्थ एक अत्यत तेजस्वी पुत्र की याचना की ॥३०.३१॥ रा च तस्मै बरं प्रादाद्धार्याय मुनिसत्तमः। दत्वा च वरमत्युग्र कश्पपस्तामुवाच ह ३२० शक यो निहन्ता ते यदि गर्भ शरच्छतम् । समाहितातिप्रयता शौचिनो धारयिष्यसि ॥३३॥ इत्येवमुक्त्वा तां देवी सङ्गतः कश्यपो मुनि. । दघार सा च तं गर्भ सम्यक्छौचसमन्विता ।३४. गर्भमात्मवधार्थाय ज्ञात्वा तमघवानपि । शुध पुस्तामथ गच्छद्विनयादमराधिपः ।३५॥ तस्याश्चवान्तरप्रेप्सुरतिश्पाक् शासनः ऊने वर्षशते चास्या ददन्तिरमात्मना ।३६॥ अकृत्वा पादयोः शौच दितिः शयनमाविशत् । निद्रा च हारयामास तस्या कुक्षि प्रविश्य सः १३७॥ वज्रपाणिमहागर्भ चिच्छेदाथ स सतपा। सम्म ड्यमानो वच्चरण स रुसैदातिदारुणम् ॥३८॥ मा रोदी रति ते शक. पुनः पुनरभापत ।
रहते हुए २३२ ] [श्रीविष्णुपुराण सोऽभवत्सप्तधा गर्भस्तमिन्द्र, कुपितः पुनः ३६। एकक सप्तधा चक्र बढणारि वदारिणा ! मरुतो नाम देवास्ते बभूवुरतिवेगिनः १४०। यदुक्त बै भगवता तेनैव मरुतोऽभवन् । देवा एकोनपञ्चाशत्सहाया वज्रपाणिनः १४११ हे मुनिवर । कश्यपजी ने अपनी पत्नी दिति को प्रत्युय बर देते हुए उससे कहा ||३२|| यदि तुम भगवान् के ध्यान में लगी रह कर अपने गर्म को शौच एव समय पूर्वक सौ वर्ष तक धारण कर लोगी तो तुम्हे इन्द्र के नाशक पुत्र की प्राति होगी ॥३३॥ यह वह कर कश्यपजी ने उससे भी सगति की और उसने अत्यत पवित्रता से उस गर्भ को धारण किया ॥३४॥ जव देवराज इन्द्र को अपने वध के कारण रूप उस गर्भ के विषय मे ज्ञात हुआ तो वह भी उसको सेवा के लिये वहाँ प्रा उपस्थित हुए ॥३५॥ उसके शौचादि में कभी कुछ गडबडी हो, यह देखने की इच्छा से इन्द्र वहां निरतर उपस्थित रहते थे । अन्त मे सौ वर्ष पूरे हने में कुछ ही शेष था, तव उन्होने एक गडबडी देखी ॥३६।। एक दिन दिति पर धोये बिना ही शय्या पर लेट गयी और उसे प्रगाढ निद्रा ने घेर लिया, तभी इन्द्र अपना वज़ लेकर उसकी कुक्षि में प्रविष्ट होगये और गर्भ के सात खण्ड कर डाले । नब वन की पीडा से व्याकुल हुमा गर्भ चीत्कार कर रोने लगा ॥३७-३८॥ इन्द्र ने गर्भ से बार- बार कहा कि मत रो, मत रो और जब वह सात भाग मे विभक्त होकर भी चुप न हुआ तो इन्द्र ने प्रत्यत क्रोष पूर्वक एका-एक खण्ड के श्री सात-गात खण्ड कर दियै । वे अत्यत वेगवान् मरत् नामक देवता हुए ॥३६-४०॥ इन्द्र ने उस गर्भ से कहा- मा रोदी अर्थात् न रो, इसीलिये वे माद कहे गये । यह उन- चास मरुद्गण इन्द्र के ही सहायक देवता हुए थे ॥४॥ समय
प्रथम अंश-न०२२ ]
[ २३३
वाईसवाँ अध्याय
यदाभिषिक्तः स पृथुः पूर्वं राज्य महर्षिभिः।
तत क्रमेण राज्यानि ददौ लोकपितामहः ।।
नक्षत्रग्रहविप्राणां वीरुधां चाप्यशेपतः ।
सोमं राज्ये दधद्ब्रह्मा यज्ञानां तपसामपि ।।
राज्ञा वैश्रवण राज्ये जलानां वरुणं तथा ।
प्रादित्यानां पति विष्णु वसूनामथ पावकम् ॥३॥
प्रजापतीनां दक्ष तु वारावं मस्तामपि ।
दैत्यानां दानवानां च प्रह्लादमधिपं ददौ ।।।
पितृणां धर्मराज तं यमं राज्येऽभ्यपेचयत् ।
ऐरावतं गजेन्द्राणामशेषाणां पतिं ददौ ॥५॥
पतत्रिणां तु गरुडं देवानमपि वासवम् ।
उच्चःयवसमश्वानां वृपमं तु गवामपि ।।
मृगारणा चैव सर्वेषां राज्ये सिंह ददौ प्रभुः ।
शेपं तु दन्दशकानामनरोत्पतिमभ्ययः 1७1
श्री पराशरजी ने कहा-प्राचीन काल में जब यहपियों ने पृथु को
राग्यावन अभिषिक्त दिया तब लोमपितामह ब्रह्मा ने क्रम पूर्वक राज्यों या
विभाजन पर किया । १। उन्होंने नक्षत्र, ग्रह, ब्राहाण, वनस्पति, मन और तपादि
के राज्य पर सोम को नियुक्त क्यिा ।।२।। राजापो का राजा विधवापुत्र कुवेर
को बनाया, जलो का वरण को, पादिस्यो का विष्णु को और पसुगयो वा
अग्नि को बनायाश प्रजापतियो का दक्ष को, मरम्दए का इन्द्र को तथा दैत्य
दानवों का
राजा प्रह्लाद को नियुक्त किया 1४॥
पितरों का
अधिपति यम को और हापियो का रावा ऐरावत को बनाया |श पक्षियों
के गरुड, देवतामो के इन्द्र, प्रश्नों के उच्च प्रवा तया गोमो के अधिपति वृषभ
हए ॥६॥ मत्र मृगो का मिह राजा हा, सपो के स्वामी शेष हुए ॥७॥
२३४ ] | श्रीविष्णुपुराण हिमालय स्थावराणा गुनीना कपिल मुनिम् । मखिना दष्ट्रिणा चैव मृगाणा व्याघ्रमीश्वरम् ।। वनस्पतीना राजान प्लममेवाभ्यपेचयत् । एवमेवान्यजातीना प्राधान्येनारोत्प्रभुन् । एव विभज्य राज्यानि दिशा पालाननन्तरम् । प्रजापतिपतिमा स्थापयामास सर्वत. 1101 पूर्वस्या दिशि राजान वैराजस्य प्रजापतैः । दिशापाल सुपायान सुत व सोऽभ्यपेचयत् ॥११॥ दक्षिणस्यादिशि तथा कदमस्य प्रजापते. । पुत्र शतपद नाम राजान सोऽभ्यपेक्यत् ॥१२॥ पश्चिमस्या दिशि तथा रजस पुत्रमच्युतम् । केतुमन्त महात्मान राजान सोऽभ्यपेचयत् ॥१३॥ तथा हिरण्यरोसारण पर्जन्यस्य प्रजापते । उदोध्या दिशि दुध राजानमभ्यपेचयत् ११४॥ तरिय पृथिवी सर्वा सप्तद्वीपा सपत्तना। यथाप्रदेशमद्यापि धर्मत. परिपात्यते ॥१५॥ स्थावरो का स्वामित्व हिमालय को मिला, मुनियो का कपिल को तथा नख-दाद वाले मृगो का अधिकार व्याघ्र को दिया गया ।।८॥ वनस्पत्तियों धा स्वामी लक्ष हुआ । इसी प्रकार भन्य-अन्य जीव-जातियो के स्वामित्व की भी ब्रह्माजी ने कहपना की 181 इस प्रकार राज्य-विभाग करके उन्होने सब दिशाओं में दिवालो को नियुक्त किया ॥१०॥ पूर्व में वैराज प्रजापति के पुत्र राजा सुधन्या को दिसान बनाया ॥११ । दक्षिण में पदम प्रजापति के पुर राजा शखपद, दिपाल नियुक्त हुए ॥१२॥ पश्चिम में रजस-पुन पहात्मा केतुमान को निश्चित किया ॥१३॥ तथा उत्तर मे पर्जन्म प्रजापति के पुष राजा हिरएयरोमा को दिप न पद पर अभिपित किया ॥१४॥ यह दिक्पाल सातों दीप मोर अनेक नगरो वाली इस सम्पूर्ण पृथिवी का अपने- प्राो अधिवार पे अनुसार थाज तक धर्मपूर्वक पालन करते चले मारहे है ॥१५॥ ।
प्रथम ग्रंश-प्र. २२]
। २३५
एते सर्वे प्रवृत्तस्य स्थिती विष्णोमहात्मनः ।
विभूतिभूता राजानो ये चान्ये मुनिसत्तम ११६॥
ये भविष्यन्ति ये भूनाः सर्वे भूतेश्वरा द्विज ।
ते सर्वेसर्वभूतस्य विष्णोरंसा द्विजोत्तम ॥१७॥
ये तु देवाधिपतयो ये च दैत्याधिपास्तथा ।
दानवानां च ये नाया ये नाथाः पिगिताशिनाम् ॥१८॥
पशूनां ये च पतयः पतयो ये च पक्षिणाम् ।
मनुष्याणां च सारणां नामानामविपाश्य ये ।१९।
वृक्षाणां पर्वतानां च ग्रहाणां चापि येऽधिपाः ।
अतीता वर्तमानान ये भविष्यन्ति चापरे।
ते सर्वे मवंभूतस्य विष्णोरंशसमुद्भवाः '२०
न हि पालनसामर्थ्यमृते सर्वेश्वरं हरिम् ।
स्थितं स्थिती महाप्राज्ञ भवत्यन्यस्य कस्यचित् ॥२॥
सृजत्येप जगत्सृप्टी स्थिती पाति सनातनः।
हन्ति चैधान्तकत्वेन रजःसत्त्वादिसधयः ।२२।
हे मुनिय? | यह तथा भौर सभी राजागश संमार पालक भगवान्
गु की ही विभूति है ॥१६॥ जो-जो राजा पूर्वकाल में हो चुके हैं अपवा
जो-जो भविष्य में होंग, वे सब उन नगवान के ही प्रग रूप हैं ॥१॥ देवता,
दैत्य, दानव तथा अन्य सब आमिष मोजियो के म्दामी, पशु, पक्षी, मनुष्य,
सर्प और नागादि के प्रधिनायर, वृक्ष, पर्वत और ग्रहों के अधिपति तण मन्य
पुन बत, भविष्यत् और वर्तमान के भूताधिपति हैं, वे सभी सर्वभूतात्मक
भगवान् के अम ने ही उत्पन्न हुए हैं ॥१८-२०।। मृष्टि के पालन कार्य में
प्रवृत भगवान् श्री हरि ही पावन-कार्य में समर्थ है, और किसी में ऐसी शक्ति
नहीं है ॥२१॥ रजादि गुणों के आश्रय दे ही सनातन पृदय विश्व फेसग काल
में मृष्टि रचते हैं, स्थिति काल में जलन करते तथा अन्त में स्वयं ही काल
स्वरप होपर उसे नष्ट कर डार हैं ॥२०॥
[ श्रीविष्णुपुराण पविभागः समृष्टी चतुर्या सस्थितः स्थिती। प्रलय च फरोस्यन्ते पतुभदी जनार्दनः ॥२३॥ एकनाशेन ब्रह्मासौ भवस्यव्यक्तमूत्तिमान । मरीचिमिधा: पतय, प्रजाना चाग्यभागशः॥२४॥ पालस्तृतीयस्तस्याश. सर्वभूतानि चापरः । इत्थ चतुर्धा समृष्टी वर्ततेऽसौ रजोगुणः ॥२५॥ एकाशेनास्थितो विष्णुः करोति प्रतिपालनम् । म.वादिरूपश्चान्येन कालरूपोऽपरेण न ।२६॥ सर्वभूतेश चाम्येन सस्थित पुरुते स्थितिम् । सत्व गुण समाश्रित्य जगतः पुरपोतमः ॥२७॥ पाश्रित्य तमसो वृत्तिमन्तकाले तथा पुनः । रुदस्वरूपो भगवानेकाशेन भवत्यजः ॥२८॥ अग्न्यन्तकादिरूपेण भागेनान्येन वर्तते । का स्वरूपो भागो यस्सर्वभूतानि चापरः ॥२६॥ ये भगवान् सृष्टि के समय चार विभाग से, स्थिति के समय भी पार विभाग से तथा प्रलय काल मे भी चार विभाग से ही स्थित रहते हैं ।।२३।। वह अपने ही एक प्रश से ब्रह्मा तथा दूसरे से मरीच्यादि प्रजापति होते हैं, उनका तीसरा अश काल तथा चौथा अंश समस्त जीव हैं । इस प्रकार रजोगुण विशिष्ट होकर वह अपने चार रूप धारण करते हैं ॥२४-२५॥ फिर वे सत्वगुण के प्राथय से विश्व की स्थिति करते हैं । उस समय एक अश से विष्णु रूप होकर पृथिवी का पालन करते और दूसरे पश से मनु मादि एक तीसरे से काल होते हैं तथा चौथे से सभी भूतो मे स्थित होते हैं ॥२६-२७॥ अन्त काल मे वे तमोगुण के पाश्रय मे एक प्रश से रुद्र, दूसरे से अग्नि और अन्तकादि, तीसरे से काल तथा चौथे से समस्त भूत रूप होते हैं ॥२८-२६॥ विनाश कुर्वतस्तस्य चतुर्द्धय महात्मनः । विभागकल्पना ब्रह्मन् कथ्यते सार्वकालिको।३०।
प्रथम अश-अ० २२ ]
[ २३७
ब्रह्मा दक्षादयः कालस्तथैवाखिलजन्तवः ।
विभूतयो हरेरेता जगतः सृष्टिहेतवः ॥३॥
विष्णुमन्दादयः कालः सर्वभूतानि च द्विज ।
स्थितेनिमित्त तस्य विष्णोरेता विभूत्तयः १३२१
रुदः कालान्तकाद्याश्च समन्ताश्चैव जलवः ।
चतुर्घा प्रलयायंता जनार्दनविभूतयः ।३३।
जगदादौ तथा मध्ये सृष्टिराप्रलयाद् द्विज ।
धावा मरोचिमिश्र क्रियते जन्नुमिस्तथा ॥३४॥
ब्रह्मा सृजत्यादिकाले मरीचिप्रमुग्यास्ततः ।
उत्पादयन्त्यपत्यानि जन्तवच प्रतिक्षररोम १३५॥
कालेन न विना ब्रह्मा सृष्टिनिष्पादको द्विज ।
न प्रजापतय: गर्वे न चैवाखिलजन्तयः।३
हे ब्रह्मद ! विनाश करने के हेतु उनकी इस प्रकार चार रूपों में सार्व-
कालिक विभाग पल्पना कही गई है । ६॥ ब्रह्मा, दसादि प्रजापति, काल
एव मर्व भूतगण, यह मभी भगवान की विभूतियां विश्व मृष्टि में कारण स्पा
हैं ॥३१ ह द्विज । विष्णु मनु आदि, बाल और सभी बोर, स्पिति के
कारण रूप भगवान की ही विभूति है । ३२॥ रुद्र, कान, अन्तराति और सब
जीव-ये भगवान् जनार्दन को चार विभूतियां प्रनय की कारण रूपा कही गई हैं
॥३३॥ हे विष । विश्व के प्रादि, मध्य तया प्रम तक ब्रह्मा, मरीचि प्रादि
विभिन प्राणियों से ही कृष्टि होती रहती है ॥३४॥ समारम्न में श्यम ब्रह्माजी
मृजन करते हैं फिर मीचि प्रादि प्रजापति और उनके पश्चात् सब प्राणी
धरण-क्षण में प्रजोत्सादन करते रहते हैं ॥३शा काल के विना न तो ब्रह्मा हो
मुद कर सरते हैं और न प्रजापति या अन्य मोर ही प्रजोत्पत्ति में समर्थ हो
सकते हैं ॥३६॥
एवमेव विभागोऽय स्थिवावप्युपदिश्यते ।
चतुर्धा तस्य देवस्य मंत्रेप प्रलये तया ॥३७॥
यत्किञ्चित्सृज्यते येन सत्त्व जातेन वै द्विज
तस्य सृज्यस्य सम्भूती तत्सर्व वे हरेस्तनुः ॥३८॥
२३८ ] [ श्रीविष्णुपुराण हन्ति यावच्च यत्किञ्चित्मत्त्व स्थावरजङ्गमम् । जनार्दनस्य तद्रौद्र मैत्रेयान्तकर वपु ।३६। एवमेप जगत्स्रष्टा जगत्पाता तथा जगत् । जगद्भक्षयिता देवः समस्तस्य जनार्दन. १४० सृष्टिस्थित्यन्तकालेषु निधैवं सम्प्रवर्तते । गुरणप्रवृत्त्या परम पद नस्यागुण महद् ४१॥ तच्च ज्ञानमय व्यापि स्वसंवेद्यमनोपमम् । चतुष्प्रकार तदपि स्वरूप परमात्मन: ४२ हे मैत्रेयजी । विश्व की स्थिति और प्रलय में भी उन भगवान् के पार-चार विभाग कहे जाते हैं ॥३७॥ जिरा जीव द्वारा जो कुछ भी उत्पत्ति होती है, उस सब मे भगवान् विष्णु का देह ही एक मात्र कारण है ॥३८।। इसी प्रकार स्थावर-जगम प्रारिणयों मे से यदि कोई किसी का अन्त करता है, तो वह अन्त करने वाला भी भगवान का अन्त करने वाला रौद्र रूप होता है ॥३६॥ इह प्रकार वह भगवान ही समस्त विश्व के सृजन, पालन भौर सहार- कर्ता हैं तथा वे स्वयं ही जगद् प हैं ।।४०॥ उत्पत्ति, स्थिति और विनाश काल मै वे सी प्रकार तीनो गुणो के द्वारा प्रवृत होते हैं, तो भी उनका परमपद सर्वथा गुण रहित है ॥४१॥ उनका वह स्वरूप ज्ञानमय, व्यापक, स्वसवेद्य, पनुपम एवं चार प्रकार का है ॥४२॥ चतुःप्रकारता तस्य ब्रह्मभूतस्य हे मुने। ममाचक्ष्व यथान्याय यदुक्त परमं पदम् ।४३॥ मैत्रेय कारण प्रोक्त साधन सयवस्तुषु । साध्य च वस्त्वभिमत यत्साधयितुमात्मनः ॥४४॥ योगिनो मुक्तिकामस्य प्राणायामादिसाधनम् । साध्यं च परम ब्रह्म पुन वर्तते यतः १४५॥ साधनालम्बनं ज्ञान मुक्तये योगिना हि यत् । स भेदः प्रथमस्तस्य ब्रह्मभूतस्य वं मुने ।४६। युशत यलेसमुक्त्यर्थ साध्य यह ब्रह्मयोगिनः । तदालम्वन विज्ञान हितीयोऽशो महामुने ।७।
प्रथम अंश-०२२ । [ २३६ उभयोस्त्वविभागेन साध्यसाधनयोहि यत् । विज्ञानमतमयं तद्भागोऽन्यो योदितः ॥४८ श्री मैत्रेयजी ने कहा-हे मुने ! पापने भगवान के परमपद को चार प्रकार का कहा है, वह किस प्रकार है । यह आप मुझे विस्तार सहित बताने की कृपा करिये ॥४३॥ श्री पराशरजी ने कहा-है मैयेयजी सभी वस्तुओं का जो कारण है, वही उनका साधन कहा जाता है । अपनी जिस अमिमित वस्तु की सिद्धि करते हैं, वही माध्य होती है ॥४४॥ मोक्षामिलापो योगियों के लिये प्राणायाम प्रादि साधन तथा परब्रह्म ही साध्य है, जहां से कभी पुनरागमन नहीं होता ॥४५॥ योगी को मोश कारण साधनालम्बन ज्ञान ही उस ब्रह्मगुस परमपद का प्रथम भेद समभो ॥४६॥ क्लेश से मुक्त होने के लिये योगाभ्यास परने वाले योगी के माध्प रूप ब्रह्म का ज्ञान प्रालम्बन विज्ञान कहा गया है, यह उपका द्वितीय भेद है ।।१७॥ साध्य तथा साधनों अभेद वाले प्रत मुक्त ज्ञान को ही मैं उसका तृतीय भेद करता हूँ ॥४॥ ज्ञप्नत्रयस्य 4 तस्य विशेपो यो महामुने । तनिराकरणद्वारा दसिंतात्मस्वरूपवत् ।। निर्व्यापारमनाख्येयं व्यातिमात्रमनुपमम् । प्रात्मसम्वोचविषयं सत्तामात्रमलक्षणम् ॥५०॥ प्रशान्तमभयं शुद्ध दुविभाव्यमसंश्रयम् । विष्णोनिमयस्योक्त तज्ज्ञानं ब्रह्मसंज्ञितम् १५१५ तत्र ज्ञाननिरोधेन योगिनो यान्ति ये लयम् । ससारकपणोतो ते यान्ति निर्वाजतां विज एवंप्रकारममलं नित्यं व्यापकमक्षयम् । समस्तहेयरहितं विष्ण्वाल परमं पदम् 151 तदवदा परमं योगी यतोनामनने परः।
२४० ] [ श्रीविष्णुपुराण सज्ञक अनारव्येय, अनुपम, व्याप्तिमात्र, सत्तामात्र मात्मबोधरूप, अलक्षण, अग्य, शान्त, शुद्ध, भावना से परे तथा प्राधय से भी परे है, वही 'ब्रह्म' नामक ज्ञान है ॥४६- ५१॥ जो योगिजन जक्त अन्य ज्ञानों को छोड कर इम चतुर्य ज्ञान मे ही लीन हो जाते हैं, वे इस समार रूपी खेत मे बीजारोपण रूप कर्म के लिये निर्बीज होते हैं ।।५।। इम प्रकार का अमल नित्य, व्यापक, अक्षय और सब हेय गुणो से परे वह विष्णु परमपद है ॥५३॥ पुण्य-पाप के निर्मूल और क्लेशो को निवृत्ति से मत्यत निर्मल हुमा योगी ही उस परब्रह्म के आश्रय मे जाकर पुनरावर्तन चक में नहीं पड़ता ॥५४॥ रूपे ब्रह्मणस्तस्य मूर्त चामूर्तमेव च । क्षराक्षरस्वरूपे ते सर्वभूतेष्ववस्थिते १५५ प्रधार तत्पर ब्रह्म क्षर सर्वमिद जगत् । एकदेशस्थितस्याग्नेर्योत्स्ना विस्तारिग्गी यथा । परस्य ब्रह्मणःशक्तिस्तथेदमखिल जगत् ॥५६॥ तत्राप्यासन्नदूरत्वादहुत्वस्वल्पतामयः ज्योत्स्नाभेदोऽस्ति तच्छक्त स्त-मैत्रेय विद्यते ।५७। ब्रह्मविष्णुशिवा ब्रह्मन्प्रधाना ब्रह्मशक्तयः। ततश्च देवा मैत्रेय न्यूना दक्षादयस्ततः १५८॥ ततो मनुष्याः पशवो मृगपक्षिसरीसृपाः । নানা वृक्षगुल्मादयस्तथा ॥५६॥ तदेतदक्षर नित्य जगन्मुनिवराखिलम् । प्राविर्भावतिरोभावजम्मनायिकल्पवत् १६०| उस ब्रह्म ये दो रूप हैं मूर्त मौर प्रमूर्त, दे ही दार तया मभर रूप से सभी प्राणियों में स्थित रहते हैं ॥५५॥ क्षर रूप यह विश्व है तथा प्रक्षर रूप यह परब्रह्म है । जैसे एक स्थान पर प्रज्वलित हुए पग्नि का प्रारा सयंत्र रहना है. वैसे ही यह सम्पूर्ण विश्व एष परबहा पीही शक्ति है ॥५६॥ हे मतपत्री ! से अग्नि से समीपस्य पौर दूरप भेद से प्रभाव में पिसता मोर म्यूनता हो ।
प्रथम प्रश-प्रः २२ ] 1 २४१ जाती है वैसे ही ब्रह्म की शक्ति मे समभो ॥१७॥ है ब्रह्मन् ब्रह्मा, विष्णु, शिव यह तीनो, ब्रह्म को प्रधान शक्तियां हैं, उनमे न्यून देवता और उनसे भी न्यून दक्ष प्रादि प्रजाति है ।।५८॥ उनमे भी न्यू क्रमम मनु य पमुपक्षी, मृग एव सरीसृगादि तथा उनसे भी न्यून वृक्ष, गुल्म, लता प्रादि हैं ॥५६॥ इसलिये है मुनि र । प्राविवि, तिरोभाव, जन्म, नाश ग्रादि विकल्प वाला यह विश्व यथार्य में तो नित्य और प्रक्षर ही है ।।६०॥ सर्वशक्तिमयो विष्णु स्वरूप ब्रह्मणः परम् । मूतं यद्योगिभि. पूर्व योगारम्भेपु चिन्त्यते ।६१॥ सालम्वनो महायोग. सोजो यन सस्थितः । मनस्यव्याहृते सभ्यग्युचता जायते मुने ।६२। स पर. परशक्तीना ब्रह्मरणः समनन्तरम् । मूतं ब्रह्म महाभाग सर्वब्रह्ममयो हरिः ।६ । तत्र सर्वमिद प्रोतमोत चैवाखिल जगन् । वतो जगजगत्तस्मिन्स जगच्चाखिल मुने ।६।। क्षराक्षरमयो विष्णुविभत्यंखि नमीश्वर. । पुरुपा-याकृतमयं भूपणानस्वरूपवत् १६५।। सर्व शक्तिमय भगवान् विष्णु ही ब्रह्म के परम स्वरूप एव मूर्त रूप हैं, योगारम्भ के पूर्व योगिजन उन्ही का चिन्तन किया करते हैं ॥६॥ है मुने । जित भगवान् मे मन को गले प्रकार तन्मय करने वालो को मालम्बन युक्त सबीज महायोग की सिद्धि होती है, वे सवब्रह्ममय विष्णु ही सब पर शक्तियों में प्रधान तथा ब्रह्म के समीपतम मूतं ब्रह्म स्वरूप हैं ॥६२-६३।। हे मुने । यह सम्पूर्ण विश्व उन्ही में प्रोत प्रोत, उन्ही से उत्पन और उन्ही में स्थित है तथा वे स्वयं ही सम्पूर्ण विश्व है ॥१४॥ क्षर अक्षरमय विष्णु ही इस प्रकृति-पुरुषात्मक विश्व को अपने आभूपए तया आयुध के रूप मे धारण करते हैं ।।६५। भूपणास्त्रम्वरूपस्थ यचं तदखिल जगत् । विभर्ति भगवान्विष्णुस्नन्ममास्वातुमर्हसि !६६।
[ श्री विषापुराण नमस्कृत्याप्रमेयाप विष्णवे प्रभविताये। पथयामि यथाख्यात वसिडेन ममामयत् ।६७। प्रात्मानमस्प जगतो मिलेगमगुणामसम् । विभक्ति कौस्तुभमणिस्याहत भगवान्हरि १६८९ श्रीवत्सास्थानधरमनन्तन समाथितम् । प्रधान बुद्धिरप्यास्ते गालोण माधये ॥६॥ भूतादिमिन्द्रियादिं च द्विधाहद्वारमीश्वरः । वित्ति शासरूपेण साजरूपेण च स्थितम् 1७०l चलस्वरूपमत्यन्त जनान्तरितानिनम् । चक्रस्वरूप च मनो धत्ते विष्णुकरे स्थितम् १७१। पञ्चपा तु या माला वैजयन्ती गदाभृत । सा भूतहेतुसद्धाता भूतमाला च वै द्विज ।७२। श्री मंत्रेयजी बोले -- भगवान् विष्णु दस सापूर्ण विश्व को प्राभूपण पौर प्रायुध के रूप मे कैसे धारण करते हैं, पड़ मुझे बताने की कृपा करिये ॥६६॥ श्री पराभरजी ने कहा-सन विश्व पालक अप्रमेय भगवान् विष्णु फो नमस्कार करके अब मैं तुम्हे वह सब सुनाता हूँ जो निजी मुझे सुनाया था ।।६७॥ इरा विश्व के निलेप, निर्गुण और निर्मल ग्रात्मा को भगवान् विष्णु कौस्तुभ मरिण के रूप मे धारण करते हैं ॥६८। उन प्रात भगवान् ने प्रधान को श्रीवत्स रूप से तथा बुद्धि को गदा रूप से धारण किया है ॥६६॥ भूतो के कारण रूप तामस महकार और इदियो के कारण रूप राजस पहकार को उहोंने शव और शाङ्ग धनुष के रूप मे धारण किया हुआ है ॥७०॥ पवन को भी अपने देग से हराने वाला प्रत्यत चावल और सात्विक महकार रूपो मन भगवान विष्णु के कर कमलो मे चक रूप से स्थित है १७१॥ है द्विज । भगवाद गदापर मच रूपात्मिका जयन्ती माला पञ्चतन्मात्रो और पचभूतों का सघात है ॥3॥ पानीन्द्रियाण्यशेपाणि बुद्धिवर्मात्मकानि वै । शररूपाण्यरोपारित तानि धत्त जनार्दन. ७३1 प्रथम अश-ग्र०२२] [ २४३ विभत्ति यचातिरत्ननच्युतोऽत्यन्तनि म तम् । विद्यामय तु तज्मानम विद्याकोशसस्थितम् १७४। इत्य पुमाप्रपान च बुद्धयहवारमेव च । भूतानि च हृषीकेशे मन सर्वेन्द्रियाणि च । विद्याविद्य च मैप सर्वमेतत्समाश्रितम ७५॥ अखभूपणसस्यानस्वरूप रूपवजित.1 विभति मायारूपोऽसौ श्रेयमे प्राणिना हरि ७६। सदिकार प्रधान च पुमासमखिल जगत् । विर्भात पुण्डरीकाक्षस्तदेव परमेश्वर ७७। या विद्या या तथाविद्या यत्सद्यच्च सदव्ययम । तत्सर्वं सर्वभूतेशे मैत्रेय मधुसूदने ७॥ कलाकाष्ठानिमेपादिदिनत्वयनहायन:। कालस्वरूपो भगवानपापा हरिरव्यय ७६। समस्त ज्ञान कर्मात्मिका इद्रियो को भगवान् जनार्दन बाण रूप मे धारण करते हैं ॥७३॥ भगवान अभ्युन का निर्मर खड्ग हो अविद्यात्मक कोश से ढका हुप्रा विद्यामय ज्ञान है ।।७४॥ हे मैपजी । इस प्रकार पुरुष, प्रधान, बुदि, महकार पचमूत, मन, इद्रियां और विद्या प्रविद्या सव उही हृषीकेरा मे माथित हैं ।।७।। भगवान् श्रीहरि रूप-रहित होते हुए भी माया मय रूप से भीनों के कल्याणार्य इन सब वस्तुमो को प्रस्त्राभूपए के रूप मे धारण करते हैं ।।७६।। इस प्रकार वै पुण्डरीकाक्ष परमेश्वर सविकार प्रधान, पुरष और सम्पूर्ण विश्व को धारण करते हैं ॥७॥ है मैगजी ! विद्या प्रविद्या, सदसव और अव्यय स्वरूप जो कुछ भी हैं, वह सब सर्व भूतेश्वर भगवान में ही स्थित है ११७८१) कसा, काष्ठा, निमेष, दिन, ऋतु, अपन तथा वर्ष प्रादि काल के रूप में अपार, अव्यय श्रीहरि ही स्थित हैं ॥७॥ भूर्लोकोऽय भुवर्लोकः स्वर्लोको मुनिसत्तम । महर्जनस्तप सत्य सप्त लोका इमे विभुः ।। लोकात्ममूर्ति. सर्वेषा पूर्वेपामपि पूर्वज । प्राधार सर्वविद्याना स्वयमेव हरिः स्थित 10
[श्रीविष्णु पुराण
देवमानुपपश्वादिस्वरूपर्वहुभि
स्थितः ।
ततः सर्वेश्वरोऽनन्तो भूतमूर्तिरमूर्तिमान् ।।२।
ऋचो यजूपि सामानि तथैवाथर्वणानि वै ।
इतिहासोपवेदाश्च वेदान्तेषु तयोक्तयः 1३।
वेद ङ्गानि समस्त नि मन्वादिगदितानि च ।
शास्त्राण्यशेपाण्याख्यानान्यनुवाकाश्च ये कचित् १८४/
काव्यालापाश्च ये केचिग्दीतकान्यखिलानि च ।
शब्दमूर्तिधरस्यंत विष्णोर्महात्मनः ५॥
यानि मूर्तान्यमूत्तानि यान्यनान्यत्र वा कचित् ।
सन्ति वै वस्तु जाता न तानि सर्वाणि तद्वपुः ।।
हे मुनि सत्तम । भूनोंक, भुवर्लोक, स्वर्लोक, मह जन, तप और सत्य
ग्रादि सप्तलोक भी स्वय सर्वव्यापक प्रभु ही हैं ॥५०॥ सब पूर्वजो के पूर्वज
और सभी विद्याप्रो के माथय भगवान् श्रीहरि लोकमय रूप से स्वयं ही स्थिर
हैं ।।८१॥ देवता, मनुष्य और पशु प्रादि विभिन्न भूत रूपो मे निराकार श्री अनन्त
ही स्थित हैं ॥२॥ ऋक्, यजुः साम, अपर्व-यह चारो वेद, इतिहास, उपवेद
वेदान्त, वेदाङ्ग मनु प्रादि धर्मशात्य पुराणादि, पाख्यान अनुवाक, काव्यचर्चा
पौर रागरागिनी मादि सब उन विष्णु का ही देह समझो ।८३-८५। इस लोक में
अथवा सर्वत्र जितने भी मूत, प्रसूतं पदार्थ हैं, वह सभी उन भगवान् के
पारीर ही हैं ।।६॥
अहं हरिः सर्वमिद जनार्दनो नान्यततः कारणकार्यजातम् ।
ईदृट्मनो यस्य न तस्य भूयो भवोद्भवा द्वन्द्वगदा भवन्ति ।८७
इत्येप तेंऽशः प्रथमः पुराणस्यास्य वै द्विज ।
यथावत्कथितो यस्मिञ्छ्र ते पापः प्रमुच्यते ।
कातियां पुष्करस्नाने द्वादशब्देन यरफलम् ।
तदस्य श्रवणात्सवं मैनेयाप्नोति मानवः 1८६।
देवपिपितगन्धर्व यक्षादीनां च सम्भवम् ।
भवन्ति शृण्वत. पुसो देवाचा वरदामुने ।१०।
प्रथम ग्रंश-प्र० २२ ] [२४५ मैं और यह सम्म विश्व भी जनार्दन हरि ही हैं, उनमें भिन्न कोई भी कार्य-कारण प्रादि नही है, जिसके चित्त में इस प्रकार की मावना है, उसे शरीर से सपन्न रोग तथा गा, देपादि नहीं रह आहे द्विज ! इस प्रकार मैंने इस पुराण के प्रयमा का जैसा या दमा वर्णन किया है, इसे सुन कर मनुष्य सभी पापों से टूट जाता है आपका है मैयजी ! बारह वर्ष तक कार्तिक के महीने में पुष्कर मे स्नान करने से जिस पल प्राप्ति होती है, वह फल इसके सुनने मात्र से प्राप्त हो जाता है ॥६६हे मुने ! देव, ऋषि, गवं, पितृ तथा यक्षादि की उत्पत्ति के सुनने वाले पुरुप को वे देवादि वर देने वाले होते हैं ।।६।। ए द्वितीय अंश पहला अध्याय भगवन्सम्यगाख्यात गमतदखिल त्वया । जगत सर्वसम्बन्धि यत्पृष्टोऽसि गुरो मया ॥१॥ योऽयमशो जगत्सृष्टिसम्बन्धी गदितस्त्वया । तत्राह श्रोतुमिच्छामि भूयोऽपि मुनिसत्तम ।। प्रियव्रतोत्तानपादौ सुती स्वायम्भुवस्य यौ। तयोरुत्तानपादस्य ध्र वः पुत्रस्त्वयोदितः ।। प्रियव्रतस्य न वोक्ता भवता द्विज सन्ततिः । तामह श्रोतुमिच्छामि प्रसन्नो वक्तुमहंसि ।। कर्दमस्यात्मजा कन्यामुपयेमे प्रियदनः । सम्राट कुक्षिश्च तलन्ये दशपुत्रास्तथापरे ।। महाप्रज्ञा महावीर्या विनीता दयिताः पितुः । प्रियव्रतसुताः ख्यातास्तेषा नामानि मे शृणु।६। श्राग्नीध्रश्वाग्निबाहुश्च वपुष्मान्धु तिमास्तथा । मेधा मेधातिभिव्यः सवनः पुत्र एव च । ज्योतिष्मान्दशमस्तेपा सत्यनामा सुतोऽभवन् । प्रियव्रतस्य पुत्रास्ते प्रख्याता वलवीर्यतः ।। श्री मरेपजी ने कहा-हे गुरो ! हे भगवन् ! सृष्टि विषयक मेरे प्रश्न को मापने मुझे भले प्रकार बता दिया ।।१।। है मुनिवर ! मापने जो विश्व. रचना विषयक प्रथम मा पहा है, उसमे एक बात और जानने की मेरी इच्छा है ॥२॥ स्वायमुव मनु के प्रियव्रत और उत्तानपाद नामक दो पुत्रो में से उत्तानपाद के पुत्र घ व पा वृत्तात पापने वहा ।।३। परन्तु, प्रिया को संतान
[ २४७
हिनीय अय-प्र.१]
जिसने सनद
नै विषय में मारने कुछ भी नहीं बनाया, इसलिये उनके दिपक में मेरी
जिज्ञासा का समान प्राप हविक करिये ॥गा श्रीररावरती ने कहा-
निपत का दिवार पदमजी की पुत्री से हुमा,
और कुक्षि नाम्नी
पुनियां तया दव पुत्र उदान हुए ॥५॥ प्रियदा के पुत्र अत्यन्त मरावी, वती,
दिनदी दया माता-पिता के असन्त प्रिय हुए, अब उनके नामों को मुनो ॥६॥
माग्नीप्र, अग्निबाहु, पम्माद, निनाद, मेवा, मेगातिपि, मध, सवन, पुत्र
मोर दा ज्योतिष्मा नामक हुए । प्रिपा के सभी पुत्र माने वर मोर
पराम से विख्यात ये॥७-८||
मेघाग्निवाहपुत्रास्तु वयो योगपरायणाः ।
जाति-मरा महाभागा न राज्याय मनो दधुः ।।
निमंताः सर्वकालन्नु समन्तार्थेषु वै मुने।
चकः क्रियां ययान्यायमफलाकाहि क्षण हिते ॥१०॥
प्रियव्रतो ददौ तेपा सप्नानां मुनिसत्तम ।
सतद्वीपानि मंत्रय विभज्य सुमहात्मनाम् ॥११॥
जम्बूद्वीपं महाभाग साग्नोप्राय ददो पिता ।
मेधातिये नया प्रादाप्लक्षद्वीपं नयापरम् ।१२।
शाल्मले च वपुष्नन्त नरेन्द्रमभिषिक्तवान् ।
ज्योतिष्मन्त कुगद्वीपे राजानं कृतवान्त्रभुः ।१३।
धु तिमन्तं राजानं क्रौचद्रोपे समादिशन् ।
माद्वीपश्वर चापि भव्यं चक्रे प्रियतः १४
उनमें मेश, प्रमिष्ट्र मौर पुत्र नामा तीन पुत्र टो योग परापरा
मोर पूर्व जन्म रा हान जानने वाले हुए, ये गरमादि भोगों में विरक रहे ।
पौषि निर्मल चित्त और कर्मकर की कामना गे परे होने के कारा मव
विपरों में सदैव पायानुकूल रहने पे ॥१॥ मुनि सतम ! राजा प्रियदत
ने इनके प्रतिरिक र साउ पुत्रों को सात दोर दिये ॥११॥ यानीघ्र को
जम्बृद्वीप तथा नेपातिपिप्पा नाम दीप प्रदान किया । पुमान
को वापर दोर मोर मोतिष्मान् को कुरा दोरा पिानि बनाया ॥१॥
२४८ ] [ श्रीविष्णुपुराए घर्तिमान को क्रोच ढोप और भव्य को शाक द्वीप पा राजा नियुक्त विया ॥१४॥ पुष्कराधिपति चक्र रावनं च पि स प्रगु । जम्बूद्वीपेश्वरी यस्तु प्राग्नीघ्रो मुनिसत्तम । १५॥ तस्य पुत्रा बभूवुस्ते प्रजापतिसमा नव । नाभि किमुपश्चव हरिपर्प इलाकृत ।१६॥ रम्यो हिरएवान्पष्ठश्च कुरुभंद्राश्व एव च । केतुमालस्तथवान्य साधुचेष्टोऽभवन्नृपः ।१७। जम्बूद्वीपविभागाश्च तेपा विप्र निशामय । पिना दत्त हिमाह्न तु वर्ष नाभेस्तु दक्षिणाम् ॥१८॥ हेमकूट तथा वर्ष ददौ किम्पुरुपाय सः । तृतीय नैषध वर्ष हरिवय दत्ततान् ।१६। इलावृताय प्रर्ददौ मेरुयंत्र तु मध्यम । नीलाचलाश्रित वर्ष रम्याय प्रददौ पिता ॥२०॥ श्वेत तदुत्तर वष पित्रा दत हिरण्वते । यदुत्तर शृङ्गवतो वप तत्कुरवे ददौ २१॥ मेरो पूर्वेण तद्वर्ष भद्राश्वाय प्रदत्तवान् । गन्धमादनवर्ष तु वे तुमालाय दत्तवान् ।२२। सवन को पुष्कर द्वीप का राजा बनायो । इनमे जम्मू द्वीप के राजा माग्नीध्र के प्रजापति तुन्य नौ पुत्र हुए । उनके नाम नाभि, पिम्पुरुष, हरिवर्ष, इलावृत्त रम्य, हिरण्यवान्, कुरु, भद्राश्व और सत्कर्मा राजा केतुमाल थे ॥१५-१७।। हे ब्रह्मत् । अव जम्बू द्वीप के जो विभाग हुए, उन्हे सुनो-प्राग्नीध्र ने दक्षिण की मोर का हिमवर्ष नाभि को प्रदान किया ॥१८] किम्पुम्प को हेमकूट वर्ष और हरिवर्प को नैषधवर्ष दिया ॥१६॥ मध्य मे मेरुपवत युक्त इलावृतवर्ष इलावृत को तथा नीलाचल का समीपस्थ वर्ष रम्य को दिया ॥२०॥ उसका उत्तर वर्ती श्वेत वर्ष हिरएवान् को और भृगवान् पर्वत के उत्तर वाला द्वितीय अश-अ०१] [ २४६ . . वर्ष कुर को दिया ||२१॥ मेर के पूर्व वाला वर्ष भद्रारद को और गधपादन वर्ष केतुमाल को प्रदान किया ॥२२॥ इत्यतानि ददौ तेभ्य पुरेश्य स नरेश्वरः । वप्वेतेपु तान्पुत्रानभिपिच्य स भूमिप ।२३। शालग्राम महापुण्य मैत्रेय तपसे यगी । यानि किम्पुरुपादोनि वरियष्टी महामुने १२४१ तेपा स्वाभाविकी सिद्धि सुषप्राया ह्ययन्नत । विपर्ययो न तेप्वस्ति जरोमृत्युभय न च ।२५॥ धर्मावमौ न लेवास्ता नोत्तमाघममध्यमाः । न तेप्यस्ति युगावस्या क्षेत्रप्वष्टसु सर्वदा ।२६। हिमाह्वय तु वै वर्ष नाभेरासोन्महात्मनः । तस्यर्पभोऽभवत्पुनो मेरदेच्या महाद्य नि. २७१ ऋपभादरतो जज्ञ ज्येष्ठ पुत्रशतस्य स । कृत्वा राज्य स्वधर्मेण तथेष्ट्वा विविधान्मधान ।२८। अमिपिच्य सुत वीर भरत पृथिवीपति । तपसे स महाभागः पुलहस्याश्रम ययो । हे मंत्र यजी । राजा प्राग्नीघ्र ने अपने पुनो को इस प्रकार इन वर्षों का राज्य दिया स्वय तप करने के लिये गालनाम नामक प्रत्य त पनीत क्षेत्र पो चले गये । किम्पुरुषादि जो पाठ वर्ष हैं, उनमे मुख की इतनी अधिकता है कि बिना किसी प्रकार का यत्न किये, स्वभाव से ही सब भोग-सिद्धिशा की प्राप्ति होती है । उनमें किसी प्रकार के विपर्यय प्रथवा वृद्धावस्या या मृत्यु प्रादि का हर पस्थित नहीं होता ॥२३-२शा वहां धर्म, अधर्म, श्रेष्ठ, मध्यम या प्रथम वा भी भेद नहीं है तथा उनमे कमी युग-परिवर्तनादि भी नहीं होता २६॥ महात्मा नामि हिम नामक वर्ष के स्वामी ये, उनी पलो मेरदेती से अत्यन्त दान्ति वाला नपम नामक एक पुर हुमा ॥२७॥ श्पम के सौ "पुष हुए, विममा रसासरे, यहे ये महामा, राग, पमदेव यमपूर्वक सम्प
२५० ].
[ श्रीविष्णुपुराण
चलाते हुए अनेक यशो के अनुष्ठान परके अन्त में भारत को राज्य देवर र
करने के लिये पुलहाश्रम को गये ॥२५-२६)
वानप्रस्थविधानेन तत्रापि कृतनिश्चयः ।
तपस्तेपे यथान्यायमियाज स महीपतिः ॥३०॥
तपसा कपितोऽत्यथं कृशो धमनिसन्ततः।
नानो वीटा मुरो कृत्वा वीराध्वान ततो गतः ॥३१॥
ततश्च भारत वर्षमेतल्लोवेपु गीयते ।
भरताय यतः पित्रा दत्तं प्रातिष्ठता वनम् ॥३२॥
सुमतिर्भरतस्याभूत्पुत्रः परमधार्मिकः ।
कृत्वा सम्यग्ददौ तस्मै राज्य मिष्टमख: पिता ॥३३
पुत्रसड कामितश्रीस्तु भरतः स महीपतिः ।
योगाम्यासरत. प्राणाशालग्रामेऽत्यजन्मुने ।३४)
अजायत च विप्रोऽसौ योगिना प्रयरे कुले।
मैत्रेय तस्य चरित कथयिष्यामि ते पुनः १३५॥
पुलहाश्रम मे रहकर ऋषभदेव ने वानप्रस्थ पालनपूर्वक दृढ तपस्या
और यज्ञो के अनुष्ठान किये ॥३०॥ वे घोर तप के कारण अत्यन्त सूख गये
और उनकी रक्त वाहिनी नाडियां स्पष्ट दिखाई देने लगीं। अन्त मे नानावस्था
में अपने मुख मे पत्थर की एक वटिका रख कर जीवन त्याग दिया ॥३०-३१॥
ऋषभदेव ने बनगमन करते समय अपना राज्य भरत को दिया, तभी से यह
हिमवर्ष भारतवर्ष कहा जाने लगा ॥३२॥ राजा भरत के सुमति नामक एक
अत्यन्त धार्मिक पुत्र हुआ। इन्होने यज्ञो केन करते हुए जब अनुष्ठा तक इच्छा
रही, राज्य,सुख भोगा और फिर अपने पुत्र सुमति को राज्य दे दिया ॥३३॥
हे मुने ! राजा भरत अपने पुत्र को राज्य देकर योगाभ्यास-परायण हुए और
अन्त में उन्होंने शालग्राम क्षेत्र में अपने प्राण त्याग दिये ॥३४॥
अगले जन्म में यह योगियों के पवित्र कुल में उत्पन्न हुए । हे मंत्र यजी ! इनके
उस चरित्र वो तुम्हे फिर सुनाऊंगा ॥३॥
द्वितीय अंश-०१] [ २५१ सुमतेस्तेजपस्तस्मादिन्द्रय म्नो व्यजायत । परमेटी ततस्तस्मात्प्रतिहारस्तदन्वयः ।३६। प्रतितति विश्यात उत्तानस्वस्य चात्मजः । भवस्तस्मादयोद्गीयः प्रस्तावस्तत्तुतो विभुः ॥३॥ पृथुस्ततस्ततो नतो नास्यापि गयः सुतः । नरो गयस्य तनयस्तत्पुत्रोऽभूद्विराट् ततः ॥३८॥ तस्य पुत्रो महावीर्यो धीमांस्तस्मादजायत । महान्तस्तत्तश्चाभून्मनस्युस्तस्य चात्मजः ३६। त्वष्टा त्वदश्च विरजो रजस्तस्याप्यभूत्युतः । शजिद्रजसस्तस्य जा पुत्रशतं मुने ४० विष्यग्ज्योतिः प्रधानास्ते यरिमा वद्धिताः प्रजाः । तैरिदं भारतं वर्ष नवभेदमलङ कम् ॥४१॥ तेषां वंशप्रसूतश्च मुक्त यं भारती पुरा । वृतरेतादिसर्गेण युगाड्यामेकसप्ततिम् ।।२। एप स्वायम्भुव: सों येनेद पूरित जगत् । वाराहे तु मुने क्ल्प पूर्वमन्वन्तराधिपः ।४३॥
२५२ ] [ श्रीविष्णुपुराण मनु का यहीं वश है, जिसने उस समय सम्पूर्ण विश्व को व्याप्त कर लिया था ॥४३॥ दूसरा अध्याय कथितो भवता ब्रह्मन्सर्ग स्वायम्भुवश्च मे। श्रोतुमिच्छाम्यह त्वत्त. सकल मण्डल भुव ११॥ यावन्त: सागरा द्वीपास्तथा वर्षाणि पर्वताः। वनानि सरित पुर्यो देवादीना तथा मुने ।२। यत्प्रमाणमिद सर्व यदाधार यदात्मकम् । सस्थानमस्य च मुने यथावद्वक्त मर्हसि ॥३॥ मैन य थू यतामेतत्सड क्षेपाद्गदतो मम । नास्य वर्षशतेनापि वक्त शक्यो हि विस्तर: १४१ जम्बूप्लक्षाह्वयौ द्वीपो शाल्मलश्चापरो द्विज । कुश क्रौश्वस्तथा शाकः पुष्करश्चैव सप्तमः ।५। एते द्वीपा. रामुद्रस्तु राप्त सप्तभिरावृता । लवणे सुगसपिदधिदुग्धजले. समम् ।६। श्री मैने यजी ने कहा-हे ब्रह्मन् ! मापने स्वायंभुव मनु के वा का वृत्तान्त मुभमे वहा है। अब मुझे भूमडल का विवरण सुनने की अत्यन्त इच्छा है ॥१॥ है मुने । सागर, दीप, वर्ष, पर्वत, वन, नालियां, देवादि भी पुरिया मादि जो भी हैं, उनका परिगाण, प्राधार, उपादान, मागर पादि पा यथावत् वर्णन परिये ॥२-३॥ श्री पराशर जी ने कहा-हे मंत्र यजी ! इन सपो में सक्षेप म बहे देता हूँ, क्योरि ना पूरा वर्णन तो सो वर्ष में भी पूर्ण नहीं होगा ॥४॥ हे दिन जम्मू, प्ला, शाल्मल, दुरा, कोष, शाम मोर पुप्पर यह सातों द्वीप राय भोर से सारो जल, ईख-रस, मदिरा, पी, दही, दूध और मीठे जस के पा समुद्रों से पिर ए हैं।५.६]
द्वितीय प्रश-ग्र० २]
1 २५३
जम्बूद्वीपः समस्तानामेतेषां मध्यसंस्तियः ।
तस्यापि मेरम य मध्ये कनकपर्वतः ।
चतुराशीतिसाहस्रो योजनरस्य चोच्छ्रयः।
प्रविष्टः पोडशाधस्ताद्वात्रिंशन्मूनि विस्तृतः ।
मूले पोडशसाहस्रो विस्तारस्तस्य सर्वशः।
भूपास्यास्य लोऽसौ करिणकाकारसंस्थितः ।।
हिमवान्हेमकूटश्च निण्यश्चास्य दक्षिणे।
नोतः श्वेतश्च शृङ्गी च उत्तरे वर्षपर्वताः ॥१०॥
लक्षप्रमाणो द्वी मध्यौ दशहोनास्तथापरे ।
सहस्रद्वितयोच्छ्यास्तावद्विस्तारिणश्च ते १०
भारतं प्रथम वर्ष ततः किम्पुरुपं स्मृतम् ।
हरिव तथैवान्यन्मेरोदक्षिणतो द्विज ।१२।
रम्यक चोतरं वर्ष तस्यवानु हिरएमयम् ।
उत्तराः कुरवश्चय यया वे भारतं तथा ॥१३॥
हे मैत्र पजी ! जम्बूद्वीप सब होपो के मध्य में है और उसके ठीक मध्य
में मुमेरु पर्वत है Msti यह पर्वत चौरासी हजार योजन ऊँचा तथा सोलह हजार
योरन पृरियो में धंसा दुप्रा है। इसका कारी विस्तार दत्तीस हजार
योजन है । नसा भूमि पर विस्तार सोलह हमार योजन है । इस
प्रकार यह पवंत इस पृथ्विी रपी कमल को करिएका तुल्प समभो ॥ इसके
दक्षिण में हिमवान, हेमकूद और निषय, उत्तर में नीन, दवत और गी
नामक वर्ष पवंत हे ॥१॥ उनके मध्य के दो पवंत एक एक लास पोजन
विस्तार वाले हैं, उनसे दूसरे-दूमरे पर्वत दस-दस हजार योजन कम है वे सभी
दो-दो योजन ऊधे तया उतने ही विस्तृत हैं ॥११॥ मेघ पर्वत के दक्षिण
मोर प्रथम भारत, द्वितीय शिरप पोर तृतीय हरि नामक वर्ष है ॥१२॥
उत्तर में कमा: रम्या, हिरण्यमय और उत्तर कुरु हैं, जो भारतवर्ष के समान
ही हूँ ॥१३॥
२५४ ।
[ श्रीविष्णुपुराण
नवसाहस्रमेककमेतेपां
द्विजसत्तम।
इलावृत च तन्मध्ये सौवणों मेरुरुच्छ्रितः ॥१४॥
मेरोश्चतुर्दिश तत्त नवसाहस्रविस्तृतम् ।
इलावृत महाभाग चत्वारश्चाय पर्वताः ॥१५॥
विष्कम्भा रचिता मेरोर्योजनायुतमुच्छिताः ।
पूर्वेण मन्दरो नाम दक्षिणे गन्धमादन ॥१६॥
विपुलः पश्चिमे पायें सुपार्श्वश्चोत्तरे स्मृतः ।
कदम्बस्तेपु जम्बुश्च पिप्पलो वट एव च ॥१७॥
एकादशशतायामाः पादपा गिरिकेतवः ।
जम्बूद्वीपस्य सा जम्वूर्नामहेतुर्महामुने ।१८।
महागजप्रमाणानि जम्व्वास्तस्या फलानि वै।
पतन्ति भभृतः पृष्ठे शोर्यमाणानि सर्वत: ।१६।
रसेन तेपा प्रख्याता तत्र जाम्बूनदीति वै।
सरित्प्रवर्तते चापि पीयते तन्निवामिभिः ॥२०॥
हे द्विजवर । इनमें से प्रत्येक नौ-नौ हजार योजन विस्तार वाला है,
इन सब के मध्य मे इलावृत वर्ष है, जिसमे स्वर्णमय सुमेरु पर्वत स्थित है
॥१४॥ यह इलावृत वर्ष सुमेरु के सब ओर नौ नौ हजार योजन तक विस्तृत
है, इसके चारो ओर चार पर्वत स्थित हैं ॥१५॥ यह चारो पर्वत सुमेरु को
धारण करने वाली कीलिया- सी प्रतीत होती हैं । इनमे से मैंदराचल पूर्व मे,
गन्धमादन दक्षिण मे, विपुल पश्चिम में और सुपात्र उत्तर मे है । इनकी
ऊँचाई दस हजार योजन है । इन पर ग्यारह ग्यारह सौ योजन ऊचे कदम्ब,
जामुन, पीपल और वट के वृक्ष ध्वजारो के समान खडे है। इनमे जामुन के
वृक्ष से जम्बूद्वीप नाम पडा ॥१६-१८॥ उसके फल गजराज के समान महान
होते है और जब वे पर्वत पर गिरते है तो फ्ट कर सर्वत्र फैल जाते है ॥१६॥
उनके रस के एकत्र होने से जम्वु माम की प्रसिद्ध नदी प्रवाहित होती है, वहाँ
के निवासी उसी नदी का जल पोते हैं ॥२०॥
द्वितीय अश-१०२ ]
[ २५५
न स्वेदो न च दौगन्ध्य न जरा नेन्द्रियक्षयः।
तपानात्स्वच्छमनसा जनाना तन जायते ॥२१॥
तीरमृत्तद्रस प्राप्य सुखवायु विशोपिता।
जाम्बूनदास्यं भवति सुवर्ण सिद्धभूपणम् ।२२।
भद्राश्व पूर्वतो मेरो केतुमाल च पश्चिमे।
वर्षे द्वे तु मुनि तयोर्मध्यमिलावृतः ॥२३॥
वनं चतरथ पूर्वे दक्षिणे गन्धमादनम् ।
वैधाजं पश्चिमे तदुत्तरे नन्दनं स्मृतम् ॥२४॥
अरुणोद महामद्रमसितोद समानसम् ।
सरास्येतानि चत्वारि देवभोग्यानि सर्वदा ॥२५॥
शोतरम्भश्च कुमुन्दश्न कुररी माल्यवास्तथा।
वैपक्षप्रमुखा मेरो. पूर्वत केसराचला; २६)
त्रिकूट: शिशिरश्चैव पतङ्गो रुचकस्तथा।
निपदाद्या दक्षिणतरतम्य केसरपर्वताः ॥२७॥
उस जन के पीने में वहां से शुद्ध पित्त याने मनुष्यों में स्वेद, दुर्गन्ध,
वृद्धावस्था अपवा इन्द्रियक्षय नही होता ॥२१॥ उस नदी के तट पी मिट्टो उस
ररा से मिल पर जय वायु से शुष्क हो जाती है, तब वह जाम्बूनद नामक
स्पएं हो जाती है, जिसे सिद्ध पुरुष धारण करते हैं ।।२२। मुमैफ ने पूर्व में
महारव दयं मोर पश्चिम में केतुमाल वपं है, इन दोनों के मध्य में सावृत
नामर वर्ष स्थित है ।।२३।। इसी प्रार उसने पूर्व में चपरप, दक्षिण में
गन्यमादन पश्चिम में नाम मोर उत्तर मे नन्दनरानन है ॥२४॥ देवतामों
द्वारा सदय रोवनीय, पणोद, महाभद्र, मसिनौर और मानस नाम के चार
घरोघर भी यहाँ स्थित हैं ॥२॥ हे मंयत्री ! शीताम्भ, कुमुन्द, पुररी,
माल्यवान मोर पर मादि पवंत मेर के पूर्व में केसराचल है ॥२६॥ वियूट,
शिशिर, पा, रुचा, मोर निपाद नामक वे सरावल उसने देशिए में हैं ॥२७॥
शिसिवासाः सर्वपं: कपिलो गन्धमादन ।
जारधिप्रमुखास्तरपश्चिमे
पेमराचला:॥२८॥
२५६ ] [ श्रीविष्णुपुराण मेरोरनन्तराङ्ग जठरादिप्यवस्थिताः। शङ्खकूटोऽथ ऋपभो हसो नागस्तथापरः। कालाद्याश्च तथा उत्तरे देसराचला. १२६॥ चतुर्दशसहस्त्राणि योजनाना महापुरी । मेरोरुपरि मैत्रेय ब्रह्मण प्रथिता दिवि ३०१ तस्यास्समन्ततश्चाष्टी दिशासु विदिशासु च । इन्द्रादिलो पालाना प्रख्याता. प्रवरा पुर ।३११ विष्णुपादविनिष्क्रान्ता प्लावयित्वेन्दुमण्डलम् । समन्ताद् ब्रह्मरण. पुर्या गङ्गा पतति वै दिव. ॥३२॥ सा तन पतिता दिक्षु चतुर्द्धा प्रतिपद्यते । सीता चालकनन्दा च चक्षुर्भद्रा च वै क्रमान् ।३३। पूर्वेण शैलात्सता तु शैल यात्यन्तरिक्षगा। ततश्च पूर्ववर्पण भद्राश्वेनैति सार्णवम् ॥३४॥ तथैवालकनन्दापि दक्षिणेनत्य भारतम् । प्रयाति सागर भूत्वा सप्तभेदा महामुने ।३५॥ सुमेरु के पश्चिम मे शिखिवासा, वैडूर्य, कपिल, गन्धमादन, और जारुधि आदि पेराराचल हैं ॥२६॥ मेरु के नियाटवर्ती इलाकृत वर्ष मे और जठारादि देशो मे स्थित शखकूट, ऋपभ, हस, नाग और कालजादि पर्वत उत्तर के केसराचल है ।।२६॥ हे मैत्रेयजी । उसी सुमेरु के ऊपर अन्तरिक्ष मे ग्रह्माजी की महापुरी है, जिसका विस्तार चौदह हजार योजन है ॥३०॥ उसके सब धौर इन्द्रादि लोकपालो के प्रत्यत रमणीक और प्रसिद्ध नगर दिशा विदि- मामो मे स्थित हैं ॥३१॥ विष्णु भगवान के चरणो से उद्दत हुई गगाजी मण्डल वो सब ओर से प्राप्लावित करती हुई स्वर्ग से ब्रह्मपुरी मे गिरती ॥३२॥॥ वहा गिर कर वह चार भागो में विभक्त होती हुई सीता, अलकन दा, पच मोर भद्रा नाम से चारो दिशामो मे प्रवाहित होती हैं ॥३३]] उनमे से सीता नदी पूर्वीय प्राकारा के मार्ग से एव पर्वत से दूसरे पर्वत को पार करती हुई समुद्र में जाकर मिल जाती है ॥३४॥ मलानन्दा दक्षिण की पोर भारतवर्ष चट्र-
द्वितीय अश-प्र० २ ]
[ २५७
में पाकर सात भागो में विभक्त होती हुई समुद्र में मिलती है ।।३।।
चक्षुश्च पश्चिमगिरीनतीत्य सकलास्ततः ।
पश्चिमं केतुमालाख्यं वर्ष गत्वै ति सागरम् ॥३६॥
भद्रा तथोत्तरगिरीनुत्तराश्च तथा कुरुन् ।
प्रतीत्योत्तरमम्भोधि समभ्येति महामुने ।३७॥
पानीलनिपधायामौ माल्यवन्द्गन्धमादनौ ।
तयोर्मध्यगतो मेरुः कणिकाकारसस्थितः ॥३८॥
भारताः केतुमालाश्च भद्राश्वाः कुरवस्तथा ।
पाणि लोकपास्य मर्यादाशैलबाह्यतः ॥३६॥
जठरो देवकूटश्च मर्यादापवंतावुभौ ।
तो दक्षिणोत्तरायामावानीपधायतौ।४।।
पश्चिम दिशा के पर्वती को पार करती हुई चक्षु केतुमाल वर्ष में
प्रवाहित होती हुई समुद्र में मिल जाती है ॥३६॥ हे महामुने ! उत्तर के पर्वतो
को पार करके भट्टा उत्तर कुरु वर्ष में बहती हुई समुद्र में जा गिरती है ॥३॥
माल्यवान मोर गनमादन पर्वत उत्तर और दक्षिण की ओर नील तया निपध
पर्वा न फैले हैं • उन दोनो के मध्य में मणिकणिका के प्राकार में मेरुपर्वतखका
है ।३८ हे मैत्रेयजी ! मर्यादा पवंतो के बाहरी भाग भारत, वे तुमाल, भद्राश्व
मोर कुरु नामक वर्ष लोक रूपी कमल के पत्तो के समान लगते हैं ॥३६॥
जठर भोर देवकूट-यह दोनो मर्यादा पर्वत कहे गये हैं, यह उत्तर और दक्षिण
में नीलाचल और निपधपर्वत तक फैले हैं॥४०॥
गन्धमादनकैलासो पूर्वपश्चायतायुभो।
अशीतियोजनायामावर्ण वास्तव्यवस्थिती ४१॥
निपधः पारियानश्च मर्यादापर्वतावुभो।
मेरो: पश्विमदिग्भागे यथा पूर्वे तथा स्थितो ।।२।
निशुङ्गो जारुधिश्चव उत्तरी वर्षपर्वतो।
पूर्वपश्चायतावेतावरणवान्तव्यवस्थितो ।४३।
इत्येते मुनिवर्योक्ता मर्यादापर्वतास्तय ।
जठराद्याः स्थिता मेरोस्तेपा हो द्रौ चतुर्दिशम् ॥४४॥
समान ही २५८ ] [ श्रीविष्णुपुराण मेरोश्चतुर्दिश ये तु प्रोक्ताः केसरपर्वताः । शीतान्ताद्या मुने तेपामतोव हि मनोरमाः ।४५॥ शैलानामन्तरे द्रोण्यः सिद्धचारणसेविता.1 सुरम्यारिण तथा तामु काननानि पुराणि च ।४६। लक्ष्मीविष्ण्वस्तिसूर्यादिवाना मुनिसत्तम । तास्वायतनवर्याणि जुष्टानि वरकिन्नरः ।४७१ गन्धर्वयक्षरक्षासि तथा दैतेयदातवा. । कीडन्ति तासु रम्यासु शैलद्राणीष्वहनिशम् ।४। भौमा ह्यते स्मृता. स्वगी धमिणामानया मुने । नैतेषु पापकर्माणो यान्ति जन्मशतैरपि ।४६। पूर्व और पश्चिम की ओर जो गधमादन पार कैलास है, उनका विस्तार अस्सी योजन है और यह समुद्र के भीतर स्थित हैं ॥४१॥ पूर्व के मेरु के पश्चिम में भी निषय और परियान नामक दो मर्यादा पर्वत हैं ॥४२॥ उत्तर में त्रिशृग और जारुधि नाम के दो वर्षपर्वत है और यह दोनो ही पूर्व पौर पश्चिम के समुद्र- गर्भ में स्थित है ॥४३॥ इस प्रकार हे मुनिश्रेष्ठ । तुम्हारे प्रति जठरादि मर्यादा पर्वतो के विषय में कहा गया, जिनमे से दो-दो पर्वत मेर की चारो दिशात्रों में स्थित है ॥४४॥ हे मुने । मेरु के पारो भोर स्थित जिन येसराचलो के विषय मे तुमसे कहा गया, उनके मध्य सिद्ध-चारण प्रादि द्वारा सेवन की गई प्रति रम्य कन्दराएँ है, उनमे सुरम्य उपवन तथा नगर तक यसे हुए हैं ॥४५.४६॥ तथा लक्ष्मी विष्णु, अग्नि, सूर्यादि देवताओं के प्रति सुन्दर मन्दिर हैं, जो सदा किन्नरो द्वारा पूजित होते हैं ॥४७॥ उन अत्यत सुन्दर गिरि- गुफामो में गधर्व, यक्ष, राक्षस और दैत्य-दानव प्रादि दिन-रात क्रीडा करते रहते हैं ॥४८॥ हे मुनि इन सब स्थानो को पृथिवी का स्वर्ग कहा गया है, इनमे धार्मिक पुरुप रहते हैं, पाप करने वाले तो यहाँ सौ वर्ष में भी नहीं पहुँच सरते l भद्राश्वे भगवान्विष्णुरास्ते हशिरा द्विज । वराहः केतुमाले तु भारते कूर्मरूपधृक् ।५०।
द्वितीय ग्रंग-५०२] [ રહ मत्स्यरूपश्च गोविन्दः कुरुष्वास्तै जनार्दनः । विश्वम्पेण सर्वत्र सर्वः सर्वगो हरिः 1५२॥ सर्वस्याधारभूतोऽमों मैत्रेयास्तेऽखिलात्मकः ।५२॥ यानि किम्मुरपादीनि वर्षाण्यष्टौ महामुने । न तेषु शोको नायासो नोगः शुद्भयादिकम् ॥५॥ स्वस्थाः प्रजा निरातङ्कास्सर्वदुः सविवजिताः । दशद्वादशवर्षारणा सहयारिण स्थिरायुपः।।४। न तेपु वर्षते देवो भौमान्यम्भासि तेषु । कृतत्रेतादिक नैव तेषु स्यानेपु कल्पना ।५५॥ सर्वप्वैतेपु वपु सप्त सप्त कुलाचलाः । नद्यश्च सतरास्तेभ्यः प्रसूता या द्विजोत्तम १५६॥ है द्विज ! भद्राश्व वर्ष मे ह्यग्रीव रूप से, केतुमाल वर्ष में वराह रूप से और भारत वर्ष में कूर्म रूप से भगवान् विष्णु का निवास रहला है ॥५०॥ और वे भत्तो का पालन करने वाले भगवान कुरवपं मे मरस्म स्प से रहते हैं । इस प्रकार वे एन्मिक एव सवंगत श्री हरि विश्व रूप से सर्वन निवास करते हैं ।।१५।। है मवेयजी । वे भगवान विष्णु सब प्राणियो के मापारभूत तथा सर्व जीव मय हैं ॥५२॥ विमुस्पादि जो पाठ वर्ष हैं उनमें शोक, श्रम, उद्वेग एव सुधादि का विचित् भय नही होता1३ वहाँ की प्रजा स्वस्थ, निराना सताप रहित होती है, वहाँ सब को प्रायु दम-दारह हजार वर्षों से कम नहीं होती ॥५४॥ उनमे वर्षा न होकर पायिव उल हो बहुत होता है. तथा वहां सत्ययुगादि की कल्पना भी नहीं की जाती ।।५५॥ है द्विज. वर ! इन सभी वर्षों में सात-सात बुलाचल है, बिनने सैकहो नदियां उसन हुई हैं ।।५६॥
२६० ] [ श्रीविष्णुपुराण तीसरा अध्याय उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम् । वर्ष तद्धारत नाम भारती यत्र सन्ततिः ।। नवयोजनसाहस्रो विस्तारोऽस्य महामुने । कर्मभूमिरय स्वर्गमपवर्गं च गच्छताम् ।२१ महेन्द्रो मलय सह्य शुक्तिमानृक्षपर्वतः । विन्ध्यश्च पारियात्रश्च सप्तात्र कुलपर्वताः ॥३॥ प्रत. सम्प्राप्यते स्वर्गो मुक्तिमस्मात्प्रयान्ति वै । तिर्यक्त्व नरकं चापि यान्त्यतः पुरुषा मुने ।४। इतः स्वर्गश्च मोक्षश्च मध्य चान्तश्च गम्यते । न खल्वभ्यत्र मानां कर्म धूमौ विधीयते ।। श्री पराशरजी ने कहा- मैत्रेयजी । समुद्र के उत्तर और हिमालय के दक्षिण भूभाग मे स्थित देश भारतवर्ष कहा गया है। उसमे भरतवशियो का निवास है ॥१॥ हे महामुने । यह नौ हजार योजन विस्तार पाली स्वर्ग अथवा मोक्ष की कामना करने वाले सतो की यर्म भूमि है ॥२॥ इसमे महेन्द्र, मलय, सह्य, शुक्तिमान, ऋक्ष, विध्य पारिनयात्र नामक पर्वत हैं ॥३॥ हे मुने! मनुष्य नो इसी देश मे शुभ कर्मों के द्वारा स्वर्ग अथवा मोक्ष मिल सकता है तथा यही से वे नरक या तिर्यग्योनि को प्राप्त हो सकते हैं ॥४॥ यही से स्वर्ग, गोक्ष अन्तरिक्ष या पातालादि लोको को पाया जा सकता है। इस देश के अतिरिक्त पृथिवी के किसी भी अन्य देश मे कम वा विधान नहीं है ।शा भारतस्यास्य वर्षस्य नवभेदान्निशामय । इन्द्रद्वीपः क्सेरश्च ताम्रपर्णो गस्तिमा ६ नागद्वीपस्तथा सौम्यो गन्धर्वस्त्वथ वारुणः । भय तु नवमस्तेपा द्वीपः सागरसंवृतः ७१ योग् नाना सहानंतु द्वीपोऽयं दक्षिणोत्तरात् । पूर्वे किराता यस्यान्ते पश्चिमे यवनाः स्थिताः ।। ,
द्वितीय अरा-०३ ।
ब्राह्मणाः क्षत्रिया वश्या मध्ये गूदान नागशः।
इज्यायुपणिज्यायवंतंपन्तो व्यवस्थिताः ।
शहद चन्द्रभागाद्या हिमवत्पादनिगताः ।
येदस्मृतिमुखाद्यान्न पारियात्रोद्भवा गुने ११०।
नर्मदा सुरसाद्याश्च नद्यो विन्च्याद्रि निर्गताः ।
ताप.पयोप्णीनिविध्याप्रमुखा ऋक्षसम्भवाः ।११।
गोदावरी नीमरथी कृपरावेण्यादिकास्तथा ।
सह्यपादोद्भवा नद्यः स्मृताः पापभयापहाः ।।
कृतमाला ताम्रपर्णाप्रमुखा मलयोद्भवाः ।
निसामा चार्यकुल्याद्या महेन्द्रप्रभवाः स्मृताः ।१३।
पिकुल्याकुमाराद्याः शुक्तिमत्पादसम्भवाः ।
प्रासां नद्यपनद्यश्च मन्यन्याश्च सहयगः १४॥
म भारत वर्ष के इन्द्रद्वीप, कसेह, वात्राए, गतिमात्, नागद्वीप, सौम्य,
गर्न धौर बारण नाम के पाठ विभाग हैं तया ना माग यह समुद्र
से घिरा द्वीप है॥६-७! इस द्वीप का विस्तार
उत्तर से दक्षिण पर्यंत हजार पोरन है । इसकी पूर्वीय प्रदेश
में किरन मोर पश्चिमीय प्रदेश में यवन रहते हैं ॥६मह, शत्र अपना
पार मादि में अपने-अपने कर्मानुवार लगे हुए ब्राह्मण, सपिय, यस्य और
गृह मध्य में निवास करते हैं | इसकी शतदू और चन्द्रमागा मादि नदियों
हिमालय से, वेद मोर स्मृति आदि पारिया पन ने, नर्मदा पौर सुरनाहि
विन्ध्यान में भोर ताग, पयोगी एवं निर्विघ्यादि मागिरि से नियंत हुई
हैं ॥१०-११॥ गोशबरी, नीमरपी और कृष्णवेशो मादि पापों को न करने
पाली नदिया सहा पर्वत से निकली बताई जाती हैं It तमाला पौर
सानपणी मादि मनपाचन से, त्रिसामा मार माल्या मादि महेन्द्र पर्वत
से तथा पिया मोर कुमारी मादि नदियों का निशान गुनिमान पर्वत में
हमा है । इनकी पन्य हहारों शासाय नदियों और उपनदियों के रूप में प्रा.
हित है ॥१३.१॥
२६२ ]
| श्रीविष्णुपुराण
तास्विमे कुस्पाञ्चाला मध्यदेशादयो जनाः ।
पूर्व देशादि श्चय कामरूपनिवासिनः ॥१५॥
पुण्ड्रा कलिजा मगधा दक्षिणाद्याश्च सर्वशः।
तथा परान्ता सौर.प्ट्रा शूराभीरास्तथाgदाः ॥१६॥
कारूपा मालवायचंव पारिया निवासिन ।
सौपीरा सैन्धवा हूणा साल्वा. कोशलवासिनः ।
मादागमास्तथाम्बष्ठा पारसीकादयस्तथा ।१७।
आसा पिवन्ति सलिल वसन्ति सहिता सदा ।
समीपतो महाभाग हृष्टपुष्टजनाकुलाः ॥१८॥
चत्वारि भारते वर्षे युगान्यत्र महामुने ।
कृत श्रेता द्वापरञ्च कलिश्चान्यत्र न क्वचित् ।१९।
तपस्तप्यन्ति मुनयो जुह्वते चान यज्विनः ।
दानानि चान दीयन्ते परलोकार्थमादरात् ।२०।
पुरुषैर्यज्ञपुरुषो जम्बूद्वीपे सदेज्यते ।
यज्ञ यज्ञमयो विष्णुरन्यद्वीपेषु चान्यथा ।२१।
इन नदियो के किनारे कुरु, पाञ्चाल और मध्य देशादि के निवासी,
पूर्व देश और काम रूप में रहने वाले, पुण्ड, कलिंग, मगघ या दक्षिण के अयवा
उपरान्त देश के लोग, सौराष्ट्रगण, शूर, आभीर, अर्बुदगण, का रूप, मालव पारिया
पर रहने वाले, सौवीर, सैधव, हूण, साल्व और कोशल देश के लोग, माद्र, पाराम,
अबठ और पारसी निवास करते हैं ।।१५-१७।। हे महामाग | यह परस्पर
मेल से रहते और इन्ही नदियो का जल पीते हैं, इन नदियो को निकटता से वह
सदा हृष्ट-पुष्ट रहते हैं ॥१८॥ हे मुने । भारतवर्ष मे ही सत्युग, प्रेता, द्वापर
कलियुग हा करते हैं, इन चारों मे से कोई भी युग कही अन्यत्र नहीं होता
।।१९।। इसी देश मे मुनिगण परलोक प्राप्ति के लिये तप करते हैं, याज्ञिको के
अनुष्ठान भी इमी लोक मे होते हैं तथा यही दानी पुरुप दान करते हैं ॥२०॥
जम्बूद्वीप मे यज्ञमय एव यज्ञपुरप भगवान् विष्णु का सदा भजन किया जाता है
तथा अन्यान्य दीपो मे उनकी उपासना भी भिन्न भिन्न प्रकार से होती
है ॥२१॥
द्वितीय अंश-अ०३] [ २६३ प्रवापि भारतं श्रेष्ठ जम्बूद्वीपे महामुने । यतो हि व मंभूरेपा ह्यतोऽन्या भोगभूमयः ॥२२॥ अन जन्मसहस्रारणा सहस्ररपि सत्तम। पदाचिल्लभते जन्तुर्मानुष्य पुण्यसञ्चयात् ॥२३॥ गायन्ति देवाः किल गीतकानि पन्यास्तु ते भारतभूमिभागे । स्वर्गापवर्गास्पदमागंभूते भवन्ति भूय. पुरुषा सुरत्यात २४॥ कमण्यिस इल्पिततरफलानि सन्यस्य विष्णो परमात्मभूते । अवाप्य ता कर्ममहीमनन्ते तस्मिल्लय ये त्वमला: प्रयान्ति ॥२५ जानीम तत्वव वयं विलीने स्वर्गप्रदे कमरिण देहवन्धम् । प्राप्स्याम धन्याः खलु ते मनुष्या ये भारते नेन्द्रिपवित्रहीनाः ॥२६॥ नवयपतु मैन य जम्बूद्वीपमिद मया। लक्षयोजनविस्तारं सडपाकथित तव ।२७। जम्बूद्वीपं समावृत्य लक्षयोजनविस्तरः । मैत्रेय वलयाकारः स्थितः क्षारोदधिर्वहिः।२। है महामुने ! जम्बूद्वीप में भी यह भारत वर्ष वर्मभूमि होने के कारण श्रेष्ठ हैं, क्योकि अन्यान्य देश तो भोग भूमि मात्र है ।।२२।। हजारो जन्मो की पंत्रणा भोग लेने के पश्चात कभी महार पुण्य फल का उदय हो तो ही इस देश में मनुष्य देह को प्राप्ति होती है ।।२३।। देरता भी यही कहते रहते हैं कि को स्वगं पोर मोक्ष पे मार्गभूत भारत वर्ष में उत्पन्न हुए हैं तथा जिन्होने इस पर्म भूमि में उत्पय होर पर प्राप्ति की कामना से रहित अपने धर्मों को परमात्म प भगवान विष्णु को मर्पण कर दिया है तथा इसमें मल-रहित होकर पल में उन्ही मनन्त भगवान् मे लीन हो जाते हैं, वे मनुष्य हम देवतापो से भी पधिक भाग्यवान् है ।।२४-२५।। अपने स्वर्ग प्राप्त कराने वाले पुएय को पोण होने पर हम कहो नाप र उत्पा होंगे, यह हम नहीं जानते । वे मनुष्य स्या है जिन्होंने भारतपर्णोपा पर खासोर पर की गरी को २६४ ] [ श्रीविष्णुपुराण नहीं छोडा है ॥२६॥ हे मैयजी । इस प्रकार मैंने लाख योजन विस्तृत इस जम्बूद्वीप का वणन सक्षिप्त रूप से किया है ॥२७॥ है मैयजी । यह जम्बू द्वीप बाहर से लाख योजन विस्तार वाले खारी जल के वलयाकार समुद्र से घिरा हुमा है ॥२८॥ Pagespre चौथा अध्याय क्षारोदेन यथा द्वीपो जम्बूमज्ञोऽभिवेष्टित । सवेष्टय क्षारमूदधिं प्लक्षद्वीपस्तथा स्थित ।१। जम्बूद्वीपस्य विस्तार शतसाहस्रसम्मित । स एव द्विगुणो ब्रह्मन् प्लक्षद्वीप उदाहृत ।२। सप्न मेधातिथे पुना प्लक्षद्वीपेश्वरस्य । ज्येष्ठ शान्तहयो न म शिशिरस्तदनन्तर ।३। सुग्वोदयस्तथान द शिव क्षेमक एव च । ध्र वश्च सप्तमस्तेषा प्लक्षद्वीपेश्वरा हि ते ।४। पूर्व शान्तहय व शिशिर न सुख तथा । पानाद च शिव चव क्षमक ध्र वमेव च ।। मर्यादाकारकास्तेपा तथान्ये वर्ष पवता । सप्तव तेषा नामानि शृणुष्व मुनिसत्तम ।६। गामेदश्चैव चन्द्रश्च नारदो दु दुभिस्तथा । सोमक गुमनाश्चैव वैभ्राजश्चैव सप्तम १७॥ श्रीपरागरजी ने कहा-जैसे जम्बूद्वीप खारे जा वे समुद्र से घिरा हुमा है, वैसे ही उस खारे जल वाले समुद्र को प्लक्ष द्वीप ने घेर रखा है ॥१॥ जम्बू द्वीप का विस्तार एक लाख योजन है और प्लक्ष द्वीप का विस्तार उससे दुगुना बतलाते हैं ॥२॥ प्लक्षद्वीपेश्वर मेधातिथि के सात पुत्र हुए थे उनम ज्येष्ठ पुत्र शाहय मोर उससे छोटा शिशिर हुया ! उन दोगोपे पश्चात् द्वितीय अश-प्र०४ ] [ २६५ क्षेमक . . सुखोदय, प्रानन्द, शिव, क्षेमक और प्रच क्रमशः हुए ॥४॥ पहला शान्तय सपं. दूसरा शिशिर वर्ष, फिर सुखोदय वर्प, आनन्द वर्ष, शिव वर्ष, वर्ष पार ध्रव वर्ष हुए ॥५॥ उनकी मर्यादा बनाने वाले सात अन्य पर्वत हैं, उनके नाम गोमद, चन्द्र, नारद, दुन्दुभि, सोमक, सुमना पोर बभ्राज धर्माचलेषु रम्येषु वप्वेतेपु चानधाः । वसन्ति देवगन्धर्वसहिताः सततं प्रजाः ॥८॥ तेपु पुरया जनपदाधिराच नियते जनः । नाधयो च्याधयो वापिसर्वकालसुसं हि तन् । तेपां नद्यस्तु सप्तव वारणा च समुद्रगाः । नामतस्ताः प्रवक्ष्यामि श्रुताः पापं हरन्ति याः ।१०। अनुतप्ता शिवी चैव विपाशा निदिबाक्लमा । अमृता सुकृता चैव मप्तास्तत्र निम्नगाः ।१११ एते शैलास्तथा नद्य. प्रधानाः कथितास्तव । क्ष द्रशलास्था नद्य स्तन सन्ति सहस्रशः ॥१२॥ ताः पिबन्ति सदा हृष्टा नदीजनपदास्तु ते । अपसपिणी न तेषा वैन चवोत्सपिणी द्विज ॥१३॥ न त्वेवास्ति युगावस्था तेषु स्यानेषु सप्तसु । भेतायुगसमः कालः सर्वदेव महामते ।१४! नक्षदोपादिपु ब्राञ्ठाद्वीपान्तिकेप वै। पञ्च वर्णसहस्राणि जना जीवन्त्यनामयाः ॥१५॥ इन प्रत्यन्त रमणीक वर्ष पर्वतो तथा वर्षों में देवतापो और गधा हैन पाप रहित प्रजा रहती है ॥ ॥ वहाँ के रहने वाले पुण्यवान् प्रौर चिरायु ने हैं, उन्हें किसी प्रकार के रोमादि में पमिनु मही होता होता थे सदा सुखी हुने हैं 18 उन घरों में सात ही नदियां हैं, जो समुद्र में पिरती हैं। मैं के नाम तुमसे कहता हूँ, जिनके सुनने ताप से हो ये नदिया पापो से छुटा जो है ॥ अनुतप्ता, शिसी, विपागा, विदिदा, प्रश्नमा, प्रमना और [ श्री विष्णुपुराण सुकता-यह उन सातो के नाम हैं ।।११॥ प्रमुख प्रमुख नदियो भौर पवतों का मैंने तुगरी यह वर्णन किया है वैसे छोटे-छोटे पर्वत और नदियां तो वहाँ हजारों ही होगी ॥१२॥ उस देश में हृष्ट पृष्ट मनुष्य सदैव बन मदियों का ही जल पीते हैं, इसलिये उनमे ह्रास अथवा वृद्धि का प्रभाव रहता है ॥१॥ उन सात वर्षो मे युग की भी अवस्था नहीं है। हे ब्रह्मन ! प्लक्ष द्वीप से शाक द्वीप पयत चहो द्वीपों म सदैव प्रेता युग जैसा समय रहता है । इन द्वीपो के निवासी रोग रहित रहते हुए पाच हजार वर्ष तक जीवित रहते धर्मा पञ्च तथैतेषु वर्णाश्रमविभागश । वर्णाश्च तल चत्वारस्तान्निबोध बदामि ते ॥१६॥ आर्यका कुरराश्चैव विदिश्या भाविनश्च ते । विप्रक्षत्रियवैश्यास्ते शूद्राश्व मुनिसत्तम ॥१७॥ जम्बूवृक्षप्रमाणस्तु तन्मध्ये सुमहास्तरु । प्लक्षस्तनामसशोऽय प्लक्षद्वीपो द्विजोत्तम ॥१८॥ इज्यते तन भगवास्तैर्वरार्यकादिभि । सोमपी जगत्वष्टा सर्व सर्वेश्वरो हरि १६ प्लक्षद्वीपप्रमारणेन प्लक्षद्वीप समातृत । तथैवेक्ष रसोदेन परिवेपानुकारिणा ॥२०॥ इत्येव तव मैत्रेय प्लक्षद्वीप उदाहत । सहक्ष पेण मया भूय शाल्मल मे निशामय ॥२१॥ वर्णाश्रम वे विभागानुसार इनमे पांचों पम पी विद्यमानता रहती है। अव यहाँ के चार वर्णों का तुमसे वर्णन करता हूँ॥१६॥ है मुनिश्रेष्ठ उस द्वीप मे भायंक, कुरर, विदिश्य और भावी सज्ञव जातियां हैं, वही क्रम से ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र समभो ॥१७॥ उसी द्वीप में जम्बू वृक्ष के समान ही प्लक्ष का एक वृक्ष है, उसी ये नाम पर वह पक्षद्वीप पहा गया है ॥१८॥ यहाँ मायर ग्रादि जातियाँ ही जनरलष्टा, सर्भगत, सर्भेश्वर श्रीहरि का पोम रूप से यजन करती हैं ॥१९॥ यह वक्ष दीप अपने सुल्प परिमाण 1 द्वितीय अंश-अ०४] [ २६७ के वलयाकार ईसरस के समुद्र से घिरा है ॥२०॥हे मंत्रेयी ! इस प्रकार मेंने प्लक्षद्वीप का सक्षिप्त वर्णन किया, पर शान्यल द्वीप का वृतान्त सुनो ॥२१॥ शाल्मलस्येश्वरो वोरो वयुप्मोस्तत्सुनाञ्छणु । तेया तु नामसज्ञानि ससवर्षाणि तानि वै ।२१ श्वेतोय हरितश्चर जीमूता रोहितत्तया। बंध तो मानसश्चव सुप्रभश्च महामुने ।२३॥ शाल्मलेन समुद्रोऽमो द्वोपेनेचरसोदक । विस्तारद्विगुणेनाथ सर्वस संवृतः स्थिर- १२४१ तत्रापि पर्वताः सम विज्ञेया रत्नयोनयः। वाभिव्यक्षका ये तु तथा सप्त व निम्नगाः ॥२५॥ कुमुदश्वोन्नतश्चैव तृतीयञ्च वलाहक। द्राणो यन महापघ्य' स चतुर्थो महीधरः ॥२६॥ कवस्तु पञ्चमः पाठौ महिप. समस्तया। ककुद्यान्पर्वतवर सरिनामानि मे शृणु ।२७। यानिस्तोया वितृष्णा च चन्द्रामुक्ता विमोचनी । निवृत्ति सप्तमी तासा स्मृतास्ता पापशान्तिदा.11 श्वेतञ्च हरित चव वैद्युत मानस तदा। जोमूत रोहित चैव सुप्रभ चापि शोभनम् । सप्ततानि ते वरिण चातुर्वर्ण्ययुतानि वै (२६। शाल्मल द्वीप के प्रधिरति पयुष्मान् थे। अब उनके पुत्रो के नाम श्रवण फरो-श्वेत, हरित, जीमत, वंद्य त, मानस और सुप्रम यह सात पुन ये, इन्ही के नाम पर उनके सात वर्ष हुए ॥२२-२३॥ वह ईखरस का समुद्र अपने से द्विगुण विस्तार वाल शात्मल द्वीप से घिरा है ॥२४॥ वहाँ भी रनो को उत्पन्न करने वाले सात पर्वत उन सातो वप का विभाग करते हैं और सात नदियाँ भी हैं ॥२५॥ पवतो मे प्रथम कुमुद, द्वितीय उग्नत, तृतीय बलाहक तथा चतुर्ष द्रोण है, जिसमे विभिन प्रकार की प्रौपधियां उत्पन्न होती हैं ॥२॥ पचम [ श्रीविष्णुपुराण पर्वत कंक, पष्ठ महिप एव सम कबुमान है, प्रब नदियों के नाम सुनो ॥२७॥ वे योनि, तोया, वितृष्णा, पन्द्रा, मुक्ता, विमोचनी पौर निवृत्ति नाम की है मोर स्मरण करते ही सब पापो का शमन करने वाली है ॥२८॥ श्वेत, हरित, वैधत, मानस जीमूत, रोहित पौर सुप्रन, उसके यह सात वर्ष धारो घणों से युक्त हैं ॥२६॥ शाल्मले ये तु वश्चि वसन्त्येते महामुने। कपिलाश्चारुणाः पीताः कृष्णाश्चैव पृथक पृथक् ॥३०॥ ग्राहाणा: क्षत्रिया वैश्याः शूद्राश्चैव यजन्ति तम् । भगवन्तं समस्तस्म विष्णुमात्मानमव्ययम् ॥३१॥ वायुभूतं मखर्भ प्ठयज्वानो यशरास्थितिम् । देवानामत्र सानिध्यमतीव सुमनोहरे ॥३२॥ शाल्मलिः सुमहान्वृक्षो नाम्ना निवंतिकारक । एप द्वीपः समुद्रण सुरोदेन समावृतः ।३३। विस्ताराच्छाल्मलस्यैव समेन तु समन्ततः। सुरोदकः परिवृतः कुशद्वीपन सर्वतः ॥३४॥ शाल्मलस्य तु विस्ताराद् द्विगुणेन समन्ततः । ज्योतिष्मत: कुशद्वीपे सह पुनाणुष्व तान् ॥३५॥ उद्भिदो वेणुमरिचय रथो लम्बनो तिः । प्रभाकरोऽय कपिलस्तप्तामा वर्पपवतिः।३६॥ हे महामुने ! उस समल द्वीप में पिस, मरण, पौत पोर पण यह जातियाँ रहती है जो कमा: ब्राहाण, क्षत्रिय, वैश्य पौर शूद्र है । यह या करने से यति समा, मयय पौर गाय या विष्णु का पोरी यजन गूजन करते है तथा यहा देवतापी । सदा निवारा रहता है ॥३.-३२॥ीर में गास्मस का महार वृक्ष होगे से ही इस दीपा मह माम पा है। यह मोर पपने पो परिमाए पाले मदिरा के समुद्र से घिरा है कपा मदिरापहमद शास्मान टीगुण विस्तार पाने दुमदीप वारों भोर से पिए हुपा है । उस दुशदीप प्रधिपति ज्योतिमान हात
द्वितोय प्रश-०४ ।
[ २६६
ते ३
पुत्र थे, उनके नाम कहता है, सुनो ॥३३-३५॥ उभिद, मेणुपाद, वरप,
सम्बन, धृति, प्रभाकर मोर कपिल नामक इन परमो के नाम पर हो वहाँ
येषों के नाम पड गये ॥३॥
तम्मिन्वसन्ति मनुजाः सह देतेपदानवैः ।
तथैव देवगन्धर्वयक्षम्पुिरुपादयः ।३७॥
वस्तित्रापि चत्वारो निजानुष्ठानतत्पराः।
दमिन शुष्मिणः स्नेहा मन्देहान्न महामुने ।३।
ग्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्या शूद्राश्चानुक्रमोदिता।
यथोक्तकर्मकर्तृवात्मवाधिकारक्षयाय
तव त कुशद्वीपे ब्रह्मरूप जनादनम् ।
यजन्तः क्षपयन्त्युग्रमधिकारफलप्रदम् ।।
विद मो हेमलन तिमान् पुष्पवास्तथा ।
कुशेयो हरिश्चंव सनमो मन्दराचलः ।।११
वर्षाचलास्तु सप्नते तत्र द्वीपे महामुने ।
नद्यश्च सप्त तासा तु शृणु नामान्यनुक्रमात् १४२१
धूतपापा शिवा व पवित्रा सम्मनिस्तया ।
विद्युदम्भा मही चान्या सर्वपापहरास्विमाः ।।
उस द्वीप में दैत्य-दानवों सहित मनुष्य, देवता, गर्व, पम और किन्नर
पादि रहते हैं ॥३७॥ प्राने अपने कर्मों में लगी हुई चार जातियाँ दम्मी, शुष्मी,
स्नेह पोर मन्देह सशक हैं ॥३८|| जो क्रमश ब्राह्मण, क्षत्रिय, वश्य, पाद हैं।
अपने प्रारब्ध यो क्षीण करने के निमित शान सम्मत कर्म करते हुए पहल रूप
जनार्दन की उपासना से अपने प्रारब्ध फल के दाता उस प्रत्यत उप महतार
को क्षीण करते हैं १३६-४०॥ हे महामुने ! उस द्वीप में सात वर्ष पवत है,
जिनके नाम विद्र म, हेमर्शल, ध्रुतिमा पुष्पवाद, कुशेश्य, हरि मोर मैदरा-
चल हुए। वहाँ सात नदियाँ हैं, उनके भी नाम श्रवण करो ॥४१-४२॥ पूत-
पापा, शिका, पवित्रा, सम्मति, विद्युत मम्मा और महौ नाम को यह सातों
नदियाँ सब पापो को नष्ट करने वाली हैं ॥४३॥
२७० ] [ श्रीविष्णुपुराण अन्याः सहस्रशस्तन क्षुद्रनद्यस्नथाचला । कुशद्रीपे कुशस्तम्व सज्ञया तस्य तत्स्मृतम् ॥४४) तत्प्रमाणेन स द्वीपो घृतोदेन समावृत. । घृतोदश्च समुद्रो वै क्रोञ्चद्वीपेन सवृत ॥४५॥ क्रौश्चद्वीपो महाभाग श्रूयताञ्चापरो महान् । कुशद्वीपस्य विस्ताराद् द्विगुणो यस्य विस्तर ४६। क्रौञ्चद्वीपे द्युतिमत' पुत्रास्तस्य महात्मन । तन्नामानि च वर्षाणि तेपा चक्र महीपतिः।४७) कुशलो मन्दगश्योष्ण पीवरोऽयान्धकारकः । मुनिश्च दुन्दुभिश्चैव सप्तैते तत्सुता मुने ।४८ तत्रापि देवगन्धर्वरोविता. सुमनोहरा । वर्षाचला महाबुद्वे तेपा नामानि मे शृणु ४६। क्रौञ्चश्च वामनश्चैव तृतीयश्चान्धकारक.। चतुर्थो रत्नशैलश्च स्वाहिनी हयसन्निभ 101 दिवावृत्पञ्चमश्चात्र तथान्य. पुण्डरीकवान् । दुन्दभिश्च महाशैलो द्विगुणास्ते परस्परम् ॥५॥ इस द्वीप मे छोटी-छोटी नदियों और क्षुद्र पर्वन हो हजारों ही हैं। यहाँ कुश का एक महान् झाड है, उसी के कारण उसका नाम कुशद्वीप हुप्रा ॥४४॥ यह अपने ही जैसे परिमाण वाले घृत के समुद्र से सब मोर से घिरा है और वह घी का समुद्र कोच द्वीप से घिरा हुआ है ॥४५॥ हे महाभाग ! भय इससे भागे के क्रौंच नामक महाद्वीप के विषय में कहता है, उसे सुनो । यह पुरा द्वीप से द्विगुण विस्तार वाला है ॥४६॥ उस क्रौच द्वीप मे महाराज धतिमान् के सात पुत्रों के नाम पर ही उनके पं नियत दिये गये ॥४७॥ है मुने । युगल, मन्दंग उष्ण पोवर, अन्धकारक मुनि और दु दुभि यह उनके नाम थेnel वहाँ भी देवतामों भौर गधों से सेवित मात वर्ष पर्वत अत्यंत मुरम्य है, यब उनके भी नाम सुनो ॥४६॥ उनम प्रथम कौंव, द्वितीय वामन, तृतीय अपवारप, चतुर्य पोती के मुख सा रत्नमय स्वाहिनी पर्वत, मपम दिवावृत्, पष्ठ पुएटरी क्यान् पोर सप्तम दुन्दुभि नामा महापर्वत हैं ॥५०-५१" द्वितीय अंश-म० ४ ] [२७१ द्वीपा द्वीपेषु ये शेला यथा द्वीपेपुते तथा। वर्षेप्येतेषु रम्येषु तथा शैलवरेषु च। निवसन्ति निरातङ्काः सह देवगणे. प्रजाः ।।२। पुष्करा: पुपला धन्यास्तिप्याख्याश्च महामुने । ब्राह्मणा. क्षनिया वश्या' शूद्राश्चानुक्रमोदिताः १५३३ नदीमत्रेय ते तत्र याः पिदन्ति शृणुष्व ताः। सम्प्रधानाः शरशस्तनान्या क्षुद्रनिम्नगाः ॥५४॥ गौरी कुमुदती चैव सन्च्या रात्रिमनोजवा । क्षान्तश्च पुण्डरीका च सप्तता वर्पनिम्नगा. ५५॥ तत्रापि विष्णुर्भगवान्पुष्कराद्यैर्जनार्दनः । यागै रुदस्वरूपश्च इज्यते यज्ञसन्निधौ ।५६॥ क्रौञ्चद्वीप समुद्रण दधिमण्डोदकेन च । आवृन' सर्वतः क्रौञ्चद्वीपतुल्येन मानतः५५) दधिमएडोदकश्चापि शाकद्वीपेन सवृतः । क्रौञ्चद्वीपस्य विस्ताराद् द्विगुणेन महामुने ।५८। उन्ही के ममान उनके पर्वतो का उत्तरोतर दुगुना परिमाण है । इन सभी वर्षों और धेन पर्वतो मे देवताप्रो के सहित सय प्रजा भय-रहित होकर निवास करती है ॥५२॥ वहां के पुष्कर, पुक्ल, धन्य और सिप्य सज्ञर वर्ण ही फ्रमा ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और झुद्र है ॥५३॥ हे मैत्रेयजी । वहाँ जिन दियो सा जर पिया जाता है, उन नदियो का वर्णन सुनो । उस द्वीप में सात प्रधान नदियों और छोटी नदियां है ।।५४॥ उन यात वर्ष नदियों के नाम गौरी कुमुद्धती, मध्या, राधि, मनोजवा, शान्ति तथा पुर हरीका हैं ॥५५॥ वे पुष्करादि वर्ण वहाँ ष्ट्र रूपी भगवान विष्णु का यज्ञादि से पूजन करते हैं ॥५E!! यह नोंच की। चारों प्रोर से अपने ही वरावर परिमारण के मट्ठा से घिरा है ।।५७॥ हे महामुने । मट्वा का यह समुद्र भी चारों ओर से शाकद्वीप से घिरा है । वह शाकद्वीप कांबद्वीप रो द्विगुण परिमाण वाला है ।।५८11 के ममुद्र - २७२ ] [ थीविष्णुपुराण शाकद्वीपेश्वरस्यापि भव्यस्य सुमहात्मन । सप्तव तनयास्तेपा ददी वरिण सप्त स ॥५६॥ जलदश्च सुकुमारश्च सुकुमारो मरीचक । कुसुमोदश्व मौदाकि सप्तमश्च महाद्र म 1६०॥ तत्समान्येव तत्रापि सप्त वर्षारयनुक्रमाद । तत्रापि पर्वता सप्त वपविच्छेदकारिण ।६१॥ पूवस्तरोदयगिरिजलाधारस्तथापर । तथा रैवतक श्यामस्तथवास्तगिरिद्विज ।६। याम्बिकेयस्तथा रम्य केसरी पवतोत्तम । शाकस्तत्र महावृक्ष सिद्धगन्धर्वसेवित ॥३॥ यत्रत्यवातसस्पर्शादालादो जायते पर । तत्र पुण्या जनपदाश्चातुर्वरयंसमन्विता ।६४। शाकद्वीप के जो राजा भव्य थे, उनके भी सात पुत्र हुए थे । उनको भी अलग अलग सात वर्ष दिये गये ॥५६॥ जलद, कुमार, सुक्मार, मरीचय, कुमुमोद, मौदाकि पौर महाट म उनके नाम थे। उन्हीं के नाम पर उनके पप हुए । उन वर्षों घे विभाजक सात ही पर्वत हैं ॥६०-६१।। हे द्विज । उनमें पहला पर्वत उदयाचल दूसरा जलाधार मौर इसी प्रकार रैवतक,श्याम, मस्ता• पल,माम्बिोय, तथा सातवा पेसरी है । यहाँ सिट-ग पो से सेवित एक विशाल शाक वृक्ष है ॥६२-६३॥ उसक स्पश से आने वाली यायु मत्यात भादाद को उत्पन्न परती है । वहाँ भी चारों वर्षों से युक्त भत्यत पवित्र देश है ।।६।। नधश्चान महापुण्या सर्वपापभयापहा । सुषुमारी कुमारी च नलिनी धेनुका च या ।६५। इक्षुश्च वेणुगा चैव गभस्ती सप्तमी तथा। अन्याश्च शतशस्तत्र क्षुद्रनद्यो महामुने ।६६) महापरास्तथा सतिशतशोऽय सहस्रश । ता पिवन्ति मुदा युक्ता जलदादिपु ये स्थिता ।६७॥ यपुरो जनपदा. स्वर्गादभ्येत्य मेदिनीम् । पमहानिनं तेष्वस्ति न रावपं. परस्परम् ।६८१ द्वितीय अश-प. ४ ] [ २७३ मर्यादाव्युत्क्रमो नापि तेषु देशेषु समम् । वङ्गाश्च मागधारचव मानसा मन्दगास्तथा ।। वगा ब्राह्मणभूयिया मागधा क्षत्रियास्तथा। वैश्वास्तु मानसास्तेपा शूद्रास्तेषा तु मन्दगाः ७०। शाकद्वापे तु विष्णुः सूर्यरूपधरो मुने । यथाक्त रिज्यते सम्यक्कमभिनियतात्मभिः ७१। वहाँ सात अत्यत पुनीत नदियां हैं । उनके नाम सुकुमारी, धुपारी, नलिनी, पेनुका. इछु, वेणुका पोर गभाती हैं, वे नदियाँ सब पापो और भयो को नष्ट करती हैं। इन नदियों के प्रतिरिक्त यहाँ धन्य सेंकडों ही छोटी-छोटी नदियां तया हजारों शुद्र पर्वत हैं । स्वर्ग के भोगों का भोग करने के पश्चात् जिन्होंने भूतल पर पाकर जलद प्रादि वर्षों में जन्म लिया है, वे प्रसमजा पूर्वक उन नदियों का जल पीते हैं। उन सातो वर्षों में कही भी धर्म का क्षय, पार- सरिक कलह अथवा मर्यादा का नाश कभी नहीं होता। वहाँ पग, मागम, मानस मार मग नाम चार दणं कमशः बाह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और पूर हैं ॥६५-७०॥ हे मुने । उस शाकद्वीप में शास्त्र-सम्मत मं क्ले वाले उन चतुर्वणं द्वारा सूर्य रूपी भगवान् विष्णु की आराधना की जाती है ॥१॥ शाकद्वीपस्तु मैनेय क्षीरोदेन समावृत । शाकद्वीपप्रमारोन वलयेनेव वैष्टिन ७२० क्षीराव्यिः सर्वतो ब्रह्मन्पुष्कराख्येन वेष्टितः । दीपेन शाकद्वीपात्त द्विगुणेन समन्ततः १७३। पुष्करे सवनस्यापि महायोरोऽभवत्सुतः । घातविश्व तयोस्तत्र व नामचिह्निते 1७४। महावीर तर्थवान्यातकोखण्डमज्ञितम् । एकश्शान महाभाग प्रख्यातो वर्षपवंतः ७५॥ मानसोत्तरसज्ञो वं मध्यतो वलयाकृतिः। योजनाना सहस्राणि ऊध्वं पञ्चारादूच्छितः ७६॥
२७४ ] | श्रीविष्णुपुराण तावदेव च विस्तीर्णः सर्वतः परिमगडलः । पुष्करद्वोपवलय मध्येन विभन्निव 1991 स्थितोऽसौ तेन यिच्छिन्न जात तपाद्वयम् । घलयाकारमेककं तयोपं तथा गिरिः ॥७॥ दशवपसहस्राणि तत्र जीवन्ति मानवाः । निरामया विशोकाश्च रागद्वेपादिवजिता: १७६॥ अधमोत्तमो न तेष्वास्तां न वध्यवधको द्विज । नेष्यसूिया भय द्वेपो दोपो लोभादिको न च 101 हे मैत्रेयजी । वह शाकद्वीप अपने ही समान परिमाण वाले वलयाकार दूघ (क्षार) के समुद्र से घिरा है । वह क्षीर सागर शाकद्वीप से दुगने परिमाण पुष्कर द्वीप से चारो भोर स घिरा हुमा है ॥७३॥ पृष्कर द्वीप के राजा सवन के दो पुत्र हुए, जिनके नाम महावीर. और धाताकि थे । इन्ही दोनो के नाम पर महावीर-खएड और पातकि खण्ड नामक वर्ण हए । इसमे मानसोत्तर नामक एक ही वर्षे पर्वत मध्य में स्थित है वह पचास हजार योजन ऊँचा और उतना ही सब प्रोर से फैला हुया है। इससे ऐसा लगता है जैसे यह पर्वत पुष्कर द्वीप रूपी को मध्य में से विभाजित कर रहा है तथा इसके विभाग से ही दो वर्ष हो गये हैं। उनमें से प्रत्येक वर्ष तावह पर्वत गोलाकार के ही हैं ।।७४ ७८॥ वहाँ के निवासी रोग शोक, राग-द्वेपादि से परे रह कर दस हमार वर्ष तक जीवन धारण करते हैं ।।३९। उनमें ऊँच-नीच, मरने-मारने प्रादि जैसे भाव नहीं हैं मोर ईयां, असूया, भय, द्वेप तथा लोभादि का भी प्रभाव है ।1८०॥ महावीर बहिर्व धातकीखएडमन्ततः । मानसोत्तरशैलस्य देवदैत्यादिसेवितम् ॥१॥ सत्यानृते न तत्रास्तां द्वीपे पुष्करसज्ञिते । न तत्र नद्यः शैना व द्वीपे वर्षद्वयान्विते ।।२। तुल्यवेपास्तु मनुजा देवास्तकरूपिणः । वर्णाश्रमाचारहीन धर्माचरणजितम् ।।
द्वितीय अंश-०८] [ २७५ प्रयी वार्ता दण्डनीतिशुश्रू पारहितञ्च यद । वर्षद्वय तु मैत्रेय भीमः स्वर्गोऽयमुत्तमः ।।४। सर्वतु सुखद. कालो जरारोगादिवजितः । घातकोखाउसंज्ञेश्य महावीरे च वै मुने।। न्यग्रोधः पुष्करद्वीपे ब्रह्मणः स्थानमुत्तमम् । तस्मिन्निवसति ब्रह्मा पूज्यमानः सुरासुरै १८६॥ स्वादकेनोदधिना पुष्करः परिवेष्वितः। समेन पुष्करस्य॑व विस्तारान्मण्डलं तया ।७। पर्वत के बाहर को प्रोर महावीर खराड तथा भीतर की मोर धात की खएड है । इनमें देवता पोर दैत्य रहते हैं। दो सरडो वाले उस पुष्कर द्वीप मे सत्य अथवा असत्य कुछ भी नहीं है और न वहां पर्वत और नदी हो हैं ।।८।। वहाँ के मनुष्य और देवता समान रूप तथा समान वेश-भूषा वाले हैं । हे मैत्रेय जी ! वहां न तो वर्णाश्रम व्यवस्था है, न काम्प कर्म हैं और न वेदत्रयी, कृपि, दण्डनीति या सुश्रू पादि हो हैं । इस प्रकार वे दोनो पृथिवी के अतिथे स्वर्ग ही हैं ।।८३-८४॥ हे मुने । उन दोनो वपों में स्थित काल सब ऋतुपो मे ममान सुख देने वाला तथा बुडापे और रोगादि से ग्रून्य रहता है १८५|| उस द्वीप में ब्रह्माजी के पेट स्थान रूप एक पट वृक्ष है, जहाँ देव- दानवी द्वारा पूजित हुए श्री ब्रह्माजी विराजमान रहते हैं ॥८६।। यह पुष्कर द्वीप अपने ही बरावर परिमारण-विस्तार वाले मीठे पानी के समुद्र से चारो मोर से वलयाकार घिरा हुआ है ।१८७|| एव द्वीपाः समुद्रश्च सप्त रातमिरावृताः । द्विपश्चैव समुद्रश्न समानो द्विगुणो परौ . पयासि सर्वदा सर्वममुद्रपु समानि वै । न्यूनातिरिक्तता तेषा कदाचिन व जायते ।। स्थालीस्थमग्निर्सयोगादुद्र कि सलिलं यया । तथेन्दुवृद्धो सलिलमम्भोधो मुनिसत्तम ।' अन्यूनानतिरिक्ताच वर्षन्त्यापो हसन्ति च । उदयास्तमनमिन्दो पक्षयो। शुक्लकृष्णयो। - १ २७६ ] [ श्रीविष्णुपुराण दशोत्तराणि पञ्च व ह्यङ्ग लानां शतानि । अपा वृद्धिक्षयो दृष्टौ सामुद्रोणा महामुने ।।२। भोजन पुष्करद्वीपे तत्र स्वयमुपस्थितम् । पड्स भुजते विप्र प्रजाः सर्वाः सदैव हि ।। इस प्रकार सातों द्वीप सात समुद्रो से घिरे हैं। वे द्वीप और समुद्र परस्पर समान परिमाण वाले तथा उत्तरोत्तर दिगुण होते चले गये हैं ।।८८ सभी समुद्रो मे जल सदैव एक-सा रहता है, कभी अधिक अथवा न्यून नहीं होता ॥६॥ हे मुने ! अग्नि पर चढ़े हुए पात्र का जल जिस प्रकार उष्णता प्राप्त कर उबलने लगता है, वैसे ही चन्दमा की कला वृद्धि के साथ समुद्र के जल मे भी वृद्धि होने लगती है ॥१०॥ शुक्लपक्ष और कृष्णपक्ष मे चन्द्रमा के उदय और अस्त की सीमा से न्यून या अधिक न होते हुए ही जल में बड़ाव या उतराव होता है ।।६१॥ हे महामुने । समुद्र का जल पांच सौ दश मंगुल तक बढता अथवा इतने ही परिमाण तक घटता हुमा देखा जाता है ॥१२॥ हे विप्र ! उस पुष्कर द्वीप मे सम्पूर्ण प्रजा को बिना प्रयास ही प्राप्त हुमा पड्रस भोजन सदा प्राप्त होता रहता है ॥१३॥ स्वादूदस्य परितो दृश्यतेऽलोकसस्थिति । द्विगुणा काञ्चनी भूमि. सर्वजन्तुविवजिता ।१४। लोकालोकस्ततश्शलो योजनायुतविस्तृतः। उच्छ्रायेणापि तावन्ति सहस्राण्यचलो हि स. १६५ ततस्तमः समावृत्य त शैल सर्वत. स्थितम् । तमश्चाण्डकटाहेन समन्तात्परिवेष्टितम् ।६६। पञ्चाशत्कोटिविस्तारा सेयमुर्वी महामुने । सहैवाण्डकटाहेन मदीपाब्धिमहोधरा ।। सेय धायी विधात्री च सर्वभूतगुणाधिका । प्राधारभूता सर्वेपा मैत्रेय जगतामिति ।। मोठे पानी के समुद्र के चारो मोर लोगो के प्रावास से रहित तपा सभी जीवों से शून्य उससे द्विगुण परिमाण वासी स्वणिम पृथिवी दिखाई देती द्वितीय अश-प०५] [ २७३ है 11६४॥ वहाँ दन हबार योजन विस्तार दाला लोकालोक पर्वत है, जिसकी ऊँचाई भी दस हजार योजन की ही है । टसरे मागे उस पदंत को यद भोर से प्रकार घेरे हुए है तथा उन प्रचार को ब्रह्माण्ड-काह ने सत्र पोर से घेर रखा है ||९६॥ हे महामुने ! अएडकटाह के सहित द्वीप, समुद्र मोर पर्वतादि युक्त इस सम्पूर्ण पृथिवी मएडल का विस्तार पचास करोड योजन है ॥आ है मैयनी ! याकामद समी भूतो से विशिष्ट गुण वाली यह पृथिवी सम्पूर्ण विश्व की प्राथया ठया का पालन और उत्पत्ति करने वाली है ॥६॥ पाँचवाँ अध्याय विस्तार एप कपितः पृथिव्या भवतो मया । सप्ततिस्तु सहस्राणि द्विजोच्छायोऽपि कम्यते ॥१॥ दशसाहस्रमेकक पाताल मुनिसत्तम । प्रतल वितलं चैव नितल च गस्तिमत् । महाख्य सुतल चाग्य पाताल चापि सप्तमम ॥२॥ शुक्लकृप्यारणा: मोता. शकरः शनकाञ्चनाः । भूमयो यत्र मैत्रेय वरप्रासादमण्डिताः ।। तेपु दानवदैतेया यक्षाव गतस्तथा । निवसन्ति महानागमानयन महामुने ।। थी परारारजी ने कहा है द्विज! इस पृपित्री का विस्तार मैंने तुम्हें बताया है। पहरे हैं कि इमरी अचाई सत्तर हबार योजन ॥ हे मुनि! मतन, वितल, नितम, गस्तिमान, महाउस, मुास पोर पातान इन सातों पातालों की पारम्परिक दूरी दस-दस बार योनन है ॥२॥ हे मंत्री! अषवनों से मुगोभित वहां के परातल गुस्त, प्रा. प्ररए, २७८ ] [श्रीविष्णुपुराण पोत, शरामयी, शैली अथवा स्वणिम हैं ||३॥ दानर, देव्य, यक्ष मोर महा- नाग मादि को संकडो जातियां उनमे रहती हैं ॥४॥ स्वर्लोकादपि रम्याणि पातालानोति नारद.। प्राह स्वगता मध्ये पातालेभ्य। गतो दिवि ।। प्राह्लादकारिण. शुभ्रा मणयो यत्र सुप्रभा. । नागाभरणभूपासु पाताल केन तत्समम् ।६। दैत्यदानवकन्याभिरितश्चेतश्च शोभिते । पाताले पस्य न प्रीतिविमुक्तस्यापि जायते ७' दिवाकरमयो यत्र प्रभा तन्वन्ति नातपम् । रिश्मिन शात य निशि द्योताय कवलम् । भक्ष्यभाज्यमहापानमुदितराप भोगिभि । यत्र न ज्ञायत पालो गतोऽपि दनुजा दभिः ।। यनानि मधो रम्यातिसराप्ति कमलाकरा.। पु स्वापिलाभिलापाश्च मनाज्ञान्यम्पाणि ।१०। भूपणा यतिनुप्राणि गन्धाय चानुलेपनम् । वीणावेणुमृदलाना स्वनास्तूर्याणि च दिन ।११॥ एतान्यन्यानि पादारभाग्यभोग्यानि दानयः। दत्यारा भग्यन्ते पातालान्तरगापरं ।१२।
द्वितीय अंश-०५J [ २७६ हुमा मालुम नही होता iHel जहां सुरम्य वन, सरिताए, सरोवर और वमलो के उपवन हैं तया जहाँ नर कोकिलो को सुमधुर ध्वनि गूंजती है, जहां का प्राकारा भी गन को हरण कर लेने वाला है ॥ ॥ हे द्विज ! जिस पाताल में रहने वाले दैत्य, दानव और नाग मत्यत स्वच्छ प्राभूषण, सुगन्यमय लेपन, पीणा, वेणु, मृदङ्ग, तूयं प्रादि के मपुर स्वर से युक्त हुए भाग्यवानो के भोगने योग्ण अन्य अनेक मोग भोगे जाते हैं ।।११-१२॥ पातालानामपश्चास्ते विष्णोर्या ताममो तनुः । शेपास्या यद्गुणान्वक्त न शक्ता दैत्यदानवाः ॥१३॥ योऽनन्त. पठ्यते सिद्ध दवो देवपिपूजितः । स सहसशिरा व्यक्तस्वस्तिकामलभूपणः ।।४। फणामणिसहस्रण यः स विद्योतयन्दिशः । सर्वाकरोति निर्यान हिताय जगतोऽसुरान् ॥१॥ मदापूरिणतने योऽसौ यः सदेचेककुण्डलः । किरीटी स्रग्धरो भाति साग्निः श्वेत इवाचल: १६ नीलवासा मदोत्सितः श्वेतहारोपशामिनः । साभ्रगङ्गाप्रमहोऽसौ कलासाद्रिरिवापर १७) लाङ्गलासक्तहस्ताना विभन्मुसलमुत्तमम् । उपास्यते स्वयं कान्त्या यो वारुण्या च मूतं या १८॥ कल्पान्ते यस्म वक्ग्रेभ्यो विधानस सिखोज्वलः1 सङ्कपणारमको रुद्रो निष्क्रम्याति जगत्त्रयम् । स विभाछेवरोभूतमशेष क्षितिमण्डलम् । प्रास्ते पातालमूलस्थ. शेपोऽरोपसुराचितः ॥२०॥ उन पातालो के नीचे भगवान विष्णु का दोष नामवः समोमप विग्रह है, उसमा गुण-गान दरप-दानवादि भी नहीं कर रावते ॥१३॥ देवपियो से पूजित जिन भगवान को सिखारा मनन्त पहरे हैं, वे मस्पन निमंत, स्वस्तिर चिन्हों रो भूपित तपा हगार गीर वाले हैं ॥१४॥ जो अपने पणों की हजार मपियों से सब दिशाम्रो यो प्रसाधित करते हुए सोर पापा सर पमरों २०० ] [ श्रीविष्णुपुराण को निस्तेज करते रहते हैं ॥१॥ मद से पण नयन, एव कुएमन, मफूट एवं माला प्रादि धारण किये हुए अग्निमय श्वेत पवत ये समान शोभायमान हैं ॥१६॥ मद मे उन्मत्त होकर नीलाम्बर और वेन हारा ये धारण से शोभाय- मान होरर मेघमाला और ये प्रवाह वाले द्वितीय तारा के समान स्थित हैं ॥१७॥ जो अपने हाथो मे हर-मूगल धारण किये हुए हैं तथा शोभा और वाणो देवी स्वय मूर्तिमती होकर जिनका स्तव परतो हैं । १८॥ कल्प के अन्त मे शिनवे मुखो से विषाग्नि की ज्वाला के समान प्रकाशित सपण नामक र निकलता और तीनो लोको को उदरम्य कर लेता है ।।१६। वे सष देवतामो से नमस्कृत भगवान् शेष अशेष पृथिवी मण्डल को के समान धारण किये हुए पातालमूल में विराज रहे हैं ॥२०॥ तस्य वीर्य प्रभावश्च स्वरूप रूपमेव च । न हि वर्णयितु शक्य ज्ञातु च त्रिदशैरपि ।२१॥ यस्यपा सकला पृथ्वी फरणामणिशिखारुणा। प्रास्ते कुसुममालेव कस्त द्वोयं वदिष्यति ।२२। यदा विजृम्भतेऽनन्तो मदापूर्णितलोचन । तदा चलति भूरेषा साधितोया सकानना ॥२३॥ गन्धर्वाप्सरस सिद्धा किन्नरोरगचारणा । नान्त गुणानां गच्छन्ति तेनानन्नोऽयमव्यय ।२४ यस्य नागवधूहस्तलेपित हरिचन्दनम् । मुद् श्वासानिलापास्त याति दिर्दवासताम् ॥२५॥ यमाराध्य पुराणपिगंर्गो ज्योतोपि तत्त्वत । ज्ञातवान्सकल चैव निमित्तपठित फलम् ॥२६॥ तेनेय नागवर्येण शिरसा विवृता मही । विभति माला लोकाना सदेवासुरमानुपाम् ॥२७॥ जिन शेप भगवान् का बल बीय, प्रभाव, स्वरूप, माकार मादि देवगण भी नहीं जान सकते और न वर्णन कर सकते हैं ॥२१॥ जिनके पलो मे स्थित मणियों को प्राभा से पक्षण वणं हुई यह मम्पूर्ण पृषिधी पुष्प माला में समान द्वितीय अंश-म०६ [ २८१ रखी है, उनके पल-वीर्य का धरान पारने में कौन समयं हो सकता है ? ॥२२॥ जब मद से मत्त हुए भगवान् शेष जम्हाई लेते हैं तब समुद्रो पोर यनों से युक्त यह सम्पूर्ण पृथिवी डोल उठती है ॥२३॥ गन्यवं, अप्सरा, सिद्ध किन्नर, नाग, धारए पादि कोई भी इनके गुणों का अन्त पाने में समर्थ नहीं है, इसी से यह अविनाशी देव मनन्त बहे जाते हैं ॥२४॥ जिनके देह पर नागो द्वारा सेपा गया चन्दन श्वांस लेने से सूट-सूट कर सब दिशामो को सुगन्धमय बनाता रहता है ।।२५।। पूर्वकाल में महर्षि गर्ग ने जिनको मारापना करके ज्योतिर्मराक्षस पौर पानादि के नैमित्तिक फलो का तत्व ज्ञान प्राप्त किया था ॥२६।। उन्ही नागवर शेष ने इस पृथिवी को अपने सीमा पर धारण कर रखा है, जो स्वयं भी देवता, अनुर, गनुप्यादि के सहित सम्पूर्ण लोकमाला को धारे हुए हैं ॥२७॥ Page छठा अध्याय ततश्च नरका विप्र भुवोऽघः सलिलस्य च । पापिनो येषु पात्यन्ते तान्च्छाप्य महामुने ।। रोरयः सूकरो रोधस्तातो विशमनस्तथा । महाज्वालस्तसकुम्भो लवणोऽय विलोहितः ।। रुधिराम्भो बतरणिः कृमोशः कृमिमोजनः। प्रसिपश्यनं वृणो लालाभक्षश्च दारणः । तथा पूययहः पापो वहिमालो हप:शिराः। सन्दश: कालमूत्रन तमश्चायोचिरेव च ।। श्वमोजनोज्याप्रतिवाप्रचिन तथा पर। इस्येवमादयभाये मरका भृशदारणाः ।। यमस्य विषये पोरा: शास्त्राग्निभयदापितः । पन्ति येषु पुरुषा: पापकर्मरतास्तु ये का ९८२ ] [ श्रीविष्णुपुराण फूटसाक्षी तथा सम्यक्पक्षपातेन यो वदेत् । यश्चान्यदनृत वक्ति स नरो याति रोरवम् । धो पराशरजो ने कहा-हे विष ! पृथिवी और अल के नीचे नरक स्थित हैं, उन्ही मे पापियो को गिराया जाता है, अब उनका वर्णन सुनो ।।१।। रौरव, सूकर, रोध, ताल, विरासन,, महाज्वाल, तप्तकुम्भ, लवण, विलोहित, रुधिराम्भ, वैतरणि, कृमीश, वृमि भोजन, प्रसि-पत्रवन, कृष्ण, लालाभक्ष, दारुण, पूरावह, पाप, वह्निज्वाल, अधःशिरा, सदश, कालसुत्र, तमस्. भावीचि, श्वभोजन, अप्रति और प्रप्रचि तथा इनके अतिरिक्त अन्य अनेको घोर नरक हैं, जिनका शासन यमराज करते हैं। यह नरक अत्यत दारण दास्त्र मौर अग्नि का भय देने वाले हैं, इनमे पापी पुरुष ही गिराये जाते हैं ।।२६॥ फूट साक्षी अर्थात् मिथ्या गवाही देने वाला या यथार्य न बताने वाला मनुष्य रौरव नरक को प्राप्त होता है ॥७॥ भ्र राहा पुरहन्ता च गोध्नश्च मुनिसत्तम । यान्ति ते नरक रोध यश्वोच्छासनिरोधकः ।। सुरापो ग्राहा हर्ता सुवर्णस्य च सकरे। प्रयान्ति नरके यश्च तः ससर्गमुपति ये ।। राजन्यवैश्यहा ताले तथैव गुस्तल्पगः । तमकुण्डे स्वमृगामी हन्ति राजभटाश्च यः ॥१०॥ साध्वीविक्रयकृदन्धपालः केसरिविक्कयो। सप्तनोहे पतन्त्येते गश्व भक्त परित्यजेत् ११३ स्नुपा सुतां चापि गरवा महाज्वाले निपात्यते। प्रयमन्ता गुरुणा यो पश्चाकोष्टा नराधम.१२। वेददूपपिता यध वेदविफपियन यः । प्रगम्यगामी यश्च स्यारो यान्ति लवरण द्विज १३॥ भूण हत्यारे, ग्राम वो नहरने वाले पोर गो वधियो रांप नामर महा प्राप्त होता है. यह नए शिमोग्दवास पो शेषता है मद्यपायी, पानी, स्य-चोर पपा की गति करन वाला पुरप गुपर मर गामी . द्वितीय अंश-अ०६] [ २८३ होता है | छनिय या वैश्य का हत्यारा साल नरक में जाता है, गुरुपली. भोगी, भगिननीगामी और राजदूतो के हत्यारो को तप्तकुण्ड नरक मिलता है ॥१०॥ सती नारी वा विक्रेता, कारागार का रक्षा, घोडो के बचने वाला मौर मक्त पुरष का साग करने वाला मनुष्य तत नोह नरक में मिरामा जाता है ।।११।। पुत्रवधू या पुत्रो का धर्म नष्ट करने वाला महाजाल नरक में गिरता है और गुरुगनो या तिरस्कार करने वाला, युरे वचन बोलने वाला, वेद निन्दा, वेद वा विक्रेता अयमा प्रगम्या से समागम करने वाला सवरा करक पो प्राप्त होता है ।।१२-१३॥ चोरो विलोहे पतति मर्यादादपकस्तथा । देवद्विज पितृद्धष्ट रलदूपयिता च यः॥१४॥ म याति कृमि भले व कृमीशे च दुरिटकन् । पितृदेवातिथीस्त्यक्त्वा पर्यनाति नराधमः ॥१५॥ लालाभक्षे स यात्युप्रेशरकर्ता च वेधके । करोति परिएनो यश्च यश्च सज्ञादि कृतारः।१६। प्रयान्त्येते विशमने नरके भृशदारणे। असत् प्रतिगृहीता तु नरके यात्ययोमुमे ।१७। अयाज्ययाज चव तथा नक्षत्रमूचकः। वैगी पूयवहे को यानि मिष्टानभुड नरः।१८। लाक्षामासरनाना च तिलाना लवणम्य च। विकता ब्राह्मणो याति तमेव नरम द्विग ॥१३॥ भााग्युपाटच्छागश्चवराहविहनमान् । पोषयनरक याति तमेर द्विजमत्तम 101 पोर तपा मयांदा ना करने वाले को विलोहित नरा मिलता है। देवना, औरतिरों रादेशी तया रख को दूर करने वाला वृमिमा परक में जाता है तथा पनिट या मनुषन गरने वाले यो नीगर नरम पिनता है। पितर, देवता, प्रतिधि का पान न कर उनो पहिल ही मोबन र ने बारे को मार सागरा नरारी पण भोसी होती है. वा- २८४ ] 1 श्रीविष्णुपुराण निर्माता वेध नरक में जाता है। कर्णी नाम बाण तथा सङ्गादि शस्त्र के बनाने वाले लोग अत्यन्त दारुण विशसन नरक को प्राप्त होते हैं। प्रसत. प्रनिग्रह से ग्रहण करने वाला, मयज्ञ का याजका, नक्षत्र विद्या से जीविका पलाने वाला प्रपोमुख नरक मे गिरता है । साहम (कर) वर्म वाले मनुष्य को पूयवह नरक मिलता है। अकेले ही सुस्वादु भोजन को खा लेने वाला या लाख, मौस, रस, तिल या लवण वेधने वाला ग्राह्मण भी उसी नरक में जाता है ॥१४.१९॥ बिलाव, कुक्कुट, धाग, अश्व, शूकर या पक्षियों को पालने घासा भी उसी पूयवह नरक को प्राप्त होता है ।।२०।। रङ्गोपजीवी कैवतः कुण्डाशी गरदस्तथा । सूची माहिपाश्चैव पर्वकारी च यो द्विज ॥२१॥ प्रागारदाही मित्रघ्नः शाकुनि मयाजकः। रुधिरान्धे पतन्त्येते सोम विक्रीणते च ये ।२२। मखहा ग्रामहन्ता न याति वैतरणी नरः। रेत.पातादिकारो मर्यादाभेदिनो हि ये ॥२३॥ ते कृष्णे यान्त्यशौचाश्च कुहकाजीविनश्च ये। असिपत्रवन याति वनच्छेदी वृथैव यः ।२४। औरभ्रिको मृगव्याधो वह्निज्वाले पतन्ति वै । यान्त्येते द्विज तत्रैव ये चापाकेषु वह्निदा. ॥२५॥ व्रताना लोपको यश्च स्वाश्रमाद्विच्युतश्च य' । सन्दशयातनामध्ये पततस्तावुभावपि ॥२६॥ दिवा स्वप्ने च स्कन्दन्ते ये नरा ब्रह्मचारिणः । पुर्वरध्यापिता ये च ते पतन्ति श्वभोजने ॥२७॥ नट या मल्ल वृत्ति वाला, धीवर कर्म करने वाला, कुण्ड का पान खाने पाला, विष खिलाने वाला, चुगली करने वाला, स्त्री की वृत्ति से जीविकोपार्जन करने वाला, धनादि के लोभ वश पर्व के बिना ही पूर्वकाल में होने वाले कार्य पा कराने वाला ब्राह्मण, पर मे मग्नि लगाने वाला, शकुन बताने वाला, मित्र हत्यारा, ग्राम-पुरोहित भौर सोम का विक्रेता-इन सब को सपिरान्य द्वितीय अंश-प्र. ६] [ २८५ नरम की प्राप्ति होती है ।।२१-२२॥ यश या ग्राम रो नष्ट करने वाले मनुष्य को दैतरणी नामक नर की प्राप्ति होती है. रेतपातादि करने वाले, खेत की में तोहने वाले, पपदिल और छत्रवृत्ति से जीविका चलाने वाले कृपए नरक मे मोर रपयं ही दनो के काउने शरे प्रमिपत्र वानरत में गिरले हैं ।।२३-२४॥ भेहादि से जीवनोपान करने वाले मोर शिक्षारो वह्निवाल नरक को प्रात होने है तथा वरचे पहों और इंटों प्रादि को पकाने के लिये उनमे जो पनि हालते हैं, उन्हें भी यही मरक मिलता है ॥२॥ वृतो के नागा पौर अपने थायम से पतित हुए मनुष्य सन्द नरक मे जाते हैं ॥२६॥ जो ब्रह्मचारी दिन में मा मोने समर में वीर्यपात करते हैं पपवा जो मनुष्य अपने पुत्रों से शिक्षापपन करते हैं. उन्हें श्वभोजन नापक नर में जाना होता है ॥२०॥ एते चान्ये च नरकाः दातशोऽय महनशः । येषु दुष्कृतवर्माणः पच्यने यातनागताः । यव पापान्येतानि तयान्यानि सहस्रशः। भुज्यन्ते तानि पुरपनरवान्तरगोचरः ।२६। वत्रिमविरुद्ध' च कर्म कुर्वन्ति ये नराः । कर्मणा मनमा दाना निरयेषु पतन्ति ते ॥३०॥ मध शिरोमिदृश्यने नारकंदिवि देवताः । देवाश्चापोमुग्वान् सर्वानघ. पश्यन्ति नारका ॥३॥ म्यावराः कृपयोन्जाश्व पक्षिणः पशवो नरा। घामिशनशास्तन्मोक्षिणश्व यथाक्रमम् ॥३२॥ सहनमागप्रयमा द्वितीयानुक्रमास्तथा। सर्वे हा ते महाभाग यावन्गुक्तिनमाश्रयाः ॥३३॥ यावन्तो जन्तव. स्वर्ग सावन्तो नरवोसः । पारराति नरवं प्रायश्वित्तपरा मुखः ।३।। • इस प्रार यह दया पन्य सहयों ही मर हैं. जिनमें पडरर दुष्कर्म करने वाले प्राणी विभिन्न प्रकार की यात्राएं भोगते हैं ।।२०।। उपरोक्त पापों प्रमान पन्य पर हारों पाए कम है, उनके फर मिल-मिट नरों में
२८६ ]
[ श्री विष्णुपुराण
जाकर भोगने होते हैं ॥२६॥ मरने वर्णाश्रम धर्म के विरत जो मनुष्य मन,
वारणी या कम से कोई कार्य करते हैं, उन्हे भी नरक की प्राप्ति होती है ॥३०॥
अधोमुख नरक वो प्राप्त हुए प्राणियों को स्वर्गलोक में देवगण दिखाई देते हैं
और वह देवाण भी नीचे के लोको मे पडे उन नारकी प्राणियों को देखते
रहते हैं ॥३१॥ नरफ की यन्त्रणा भोगने के पश्चात् पापियों को क्रमश
स्थावर, कृमि, जलचर, पक्षी, पशु, मनुष्य धामिर, देवता और मुमुक्ष के रूप
मे उत्पन्न होते है ॥३२॥ हे महाभाग I मुमुक्ष तक इन सब प्राणियों मे दूसरे
से पहले जन्म वाले प्राणियो की सख्या हमार गुनी अधिक है ॥३३॥ स्वर्ग मे
जितने प्राणी हैं, नरक मे भी उतने ही हैं, जो व्यक्ति अपने पारी का प्रायश्चित
नहीं करते उन्हे नरक की ही प्राप्ति होती है ।।३४।।
पापानामगुरूपाणि प्रायश्चित्तानि यद्यथा।
तथा तथैव सस्मृन्य प्रोक्तानि परमर्षिभिः ।३५॥
पापे गुरुरिण गुरुरिण स्वल्पान्यल्प च तद्विदः ।
प्रायश्चित्तानि मैत्रेय जगुः स्वायम्भुवादय (३६॥
प्रायश्चित्तान्यशेषारिण तपः कर्मात्मकानि वै।
यानि तेषामशेषारणा कृष्णानुस्मरणम्परम् ॥३७॥
कृते पापेऽनुतापो वे यस्य पुसः प्रजायते ।
प्रायश्चित तु तस्यकं हरिसस्मरण परम् ॥३३॥
प्रातनिशि तथा सन्ध्यामध्याह्नादिषु संस्मरन् ।
नारायणमवाप्नोति सद्यः पापक्षयान्नरः ।३६
विष्णुसस्मरणात्क्षीणसमस्तक्लेशसञ्चयः ।
मुक्ति प्रयाति स्वर्गाप्तिस्तस्य विघ्नोऽनुमीयते ॥४०॥
वासुदेवे मनो यस्य जपहोमार्चनादिपु ।
तस्यान्तरायो मैत्रेय देवेन्द्रत्वादिकं फलम् ।४1.
नाकपृष्ठगमनं पुनरावृत्तिलक्षणम्।
फ जपो वासुदेवेति मुक्तिबीजमनुत्तमम् ॥४२॥
- द्वितीय अश-५०६ [ २८७ विभित्र पापो के अनुरूप विभिन्न प्रायश्चित हैं, जिहे महपियो ने वेदाथ के स्मरण पूवक कहा है ॥३५॥ ह मंत्रेयजी ! स्थायभुव मनु भादि स्मृतिकारो ने पापा की अधिकतापूरता की दृष्टि से महान् या अल्प प्रायश्चित कलित किये हैं ॥३६॥ परतु तात्मक और कस्मिक प्रायश्चित्ती में भगवान श्रीकृष्ण का स्मरगा मरता मवर प्रायश्चित्त है !!३७॥ पाप करने के पश्चात् जो पुरुप उस लिये पश्चात्ताप करता है उसके लिये तो एक मात्र हरि स्मरण हो परम प्रायश्चित्त है ।।३ ।। प्रात , रात्रि, सायकाल या मध्याह्रादि में भगवान् यो हरि के म्मरण से पापो का क्षय हो जाता है और भगवान की प्राप्ति होती है ॥३६॥ भगवान के स्मरण से सभी पापो का समूह भस्म हो जाता है, जिससे मनुष्य को मोक्ष पद की प्राप्ति होती है । उसकलिये स्वर्ग को प्रासि तो विघ्न स्वरूप समभी जाती है ।।४०॥ हे मैयजी । जिस मनुष्य का चित जप, हवन, पूजनादि करते रहने से निरन्सर भगवान में लगा रहता है, उसके लिये इद्रपद जैसे फल तो तुच्च एव विघ्न हो हैं ॥४१॥ कहां तो प्राणी को पुन- जन्म रे चक्र में गिराने पालो स्वग-नाप्ति और यहाँ मुक्ति का सर्वश्रेष्ट बौर भगवान् वासुदेव के नाम का जप ॥४२॥ तस्मादनिश विषण सस्मरम्पुरपो मुने । न याति नरव मर्त्य सक्षीणाखिलपातक १४३१ मन प्रीतिकर स्वर्गो नरफस्तद्विपर्यय । गरर स्वर्गसझे वे पररपुण्ये द्विजोत्तम १४४१ यस्त्वेकमेव दुपाय सुखायेगिमाय च । कोपाय च यतस्तस्माद्वस्तु वस्त्वात्मक चुत ४ि॥ तदेव प्रीतये भूत्वा पुनढुं माय जायते । तदेव गोपाय यत प्रसादाय जायते ॥४६॥ तस्माद्दु खात्मक नास्ति न च विनित्सुखात्मकम् । मनस परिणामोऽय सुखदु खादिलक्षण १४७ शानमेव पर ब्रह्मा ज्ञान वन्धाय चेष्यते। ज्ञानात्मकमिद विश्व न ज्ञानाद्विद्यते परम् ।
२८८ [ श्रीविष्णुपुराण विद्याविति मैत्रेय ज्ञानमेवोपचारय ।४।। एवमेतन्मयाख्यात भवतो मण्डल भुव. । पातालानि च सर्वाणि तथैव नरका द्विज ॥५०॥ समुद्रा पर्वताश्चैव द्वोपा वरिण निम्नगा। सक्ष पात्सर्वमाख्यात किं भूय. श्रोतुमिच्छसि ॥५१॥ इसीलिये भगवान विष्णु के रात-दिन स्मरण से मनुष्य के सभी पापा का क्षय हो जाता है और उसे नरक की प्राप्ति नहीं होती ॥४३॥ स्वर्ग मन को प्रिय लगता है और नरक उसके विपरीत है। हे विप्रथेष्ट । पाप ही नरक और पुण्य ही स्वर्ग है ॥४४॥ जव एक ही वस्तु से सुख, दु.ख, ईर्ष्या, दोष पादि की प्राप्ति होती है, तव वह वस्तु निय स्वभाव वाली कहाँ हुई ? ॥४॥ क्योकि एक वस्तु ही भी प्रिय लगने वाली होती है और यही वस्तु कभी दुख देने वाली हो जाती है, वह कभी क्रोध पौर कभी प्रसन्नता प्रदान परती है ॥४६॥ इसलिये कोई भी पदार्थ दुखमय अथवा सुखमय नहीं है । इन सुम्प दुख को तो केवल मन पा ही विकार समभो ॥४७॥ ज्ञान ही परब्रह्म है पर मविचा की उपाधि से यही बन्धनकारी हो जाता है । यह सम्पूर्ण जगत् शान- भय है, शान से विमान कोई भी पदार्थ नहीं है । इसलिये हे मंडेयजी, तुम्हें भी विद्या पौर विधा दोनो को ज्ञान ही समझना चाहिये ॥४-४६॥ हे दिन । इस प्रकार समस्त पृथिवी महल, सम्पूर्ण पाताल-लोक मौर सभी गरको । वर्णन मैंने सुम्मे पर दिया है ॥५०॥ समुद्र, पर्वत, दोप, वर्ष पोर नदियों की भी सक्षिप्त रूप में व्याख्या कर चुका हूँ पर तुम्हें पौर का सुनने कोहदा है सो मुझे यतापो ॥५१॥ सातवाँ अध्याय पथिन भूतल ब्रह्मन्ममतदखिलं त्वया । नुवर्भाशदिवारलोकामोतुमिच्छाम्यह मुने।।
द्वितोय अंश-प०७] [ २८९ तथव ग्रहमस्थानं प्रमाणानि यथा तथा । समाचदव महाभाग तन्मह्य परिपृच्छते ।। रविचन्द्रमसोयर्यावन्मयूरवरवनाम्यते । ससमुद्रसरिच्छेला नावती पृथिवी स्मृता ।। यावत्प्रमारणा पृथिवो विस्तारपमिण्डतात् । नभस्तावत्प्रमाण वं व्यासमण्डलतो द्विज 11 भूमेर्योजनलक्षे तु सोरं मैत्रेय मण्डलम् । लक्षाद्दियाकरस्यापि मण्डलं शमिनः स्थितम् ।। पूर्णे तनहतं तु योजनानां निशाकरान् । नक्षत्रमण्डलं कृत्स्नमुपरिष्द्वात्प्रकाराते ६॥ द्वे लक्षे चोत्तरे ब्रह्मन बुदो नक्षनमण्डलान् । तावत्प्रमाणभागे तु बुधस्याप्युसनाः स्थितः ।। श्री मंत्री ने कहा-हे यान ! पापने समम्न पृथिवी मडल के विषय में मुझे बताया । अब में वर्लोक प्रादि सब लोगों का वर्णन सुनना चाहता हूँ ॥१॥ और उन ग्रहो की जो-जो स्थिति तया परिमाए हैं, उन सभी को भाप मरे प्रति कहने की कृपा वरिये ॥२॥ श्री पराशरजो ने कहा-मूर्य और चन्द्रमा की फिरलो रा प्रकार जितनी दूर तक पहुंचता है, उतना परा मण्डल समुना नदी पौर पर्वतादि से युक्त 'पृयियों' कहा जाता है है द्विज ! पिरी का जितना विस्तार ग्रोर बलय है, उतना ही विस्तार दमा रा मुबलों का है ॥४॥ हे मंत्रयजी ! पृथिवी से एक लाख योरन की दूरी पर मूर्य महल स्पिन है और उस मूर्य महल से भी एक लाख योजन दूर पर चन्द्र- महन है ॥५॥ तया चन्द्रमा से भी एक साख योजन उपर सम्पूर्ण नक्षत्र महल प्रगनान है ॥६॥ उम नक्षत्र महल से दो लाख योजन कार बुध है और चुप से दो लास योउन पर शुक्र भी स्थिति है । अङ्गारकोऽपि शुकस्य तत्प्रमाणे व्यवस्थित.। साहये तु भोमस्य सियतो देवपुरोहितः ।
२६० ]
[ श्रीविष्णुपुराण
शोरिवृहस्पतेश्वोत्वं द्विलक्षे समयस्थितः ।
मपिमण्डल तस्माल्लक्षमेक द्विजोत्तम है।
ऋपिभ्यस्तु सहस्राणा शतादूचं व्यवस्थित.।
मेढीभूत समस्तस्य ज्योतिश्चक्रस्य वै ध्र वः ॥१०॥
प्रैलोक्यमेतकथितमुत्सेधेन महामुने ।
इज्याफलस्य भूरेपा इज्या चात्र प्रतिष्ठिता ॥११॥
ध्र वादूध्वं मर्लोको यत्र ते कल्पवासिन ।
एक्योजनकोटिस्नु यत्र ते कल्पवासिन. ॥१२॥
द्वे फोटो तु जनो लोको यत्र ते ब्रह्मण सुता.।
सनन्दनाद्याः प्रथिता मैत्रेयामलचेतस. ११३।
चतुर्गुणोत्तरे चोध्वं जनलोकात्तप स्थितम् ।
वैराजा यत्र ते देवा. स्थिता दाहविजिता ॥१४॥
रो दो लास योजन दूर मगल मौर मगल से भी दो लास योजन
कार बृहस्पति हैं ॥८॥ वहम्पति से दो लास योजन यो चाई पर पानि मौर
पानि से एक सास योजन ऊंचा सप्तपि मडल है ॥ उस स्तपिमडल से एर
सारा गोजन उपर सम्पूर्ण ज्योति चक्र यो नाभि पे समान भ व मण्डल है ।।
हे महामुने ! मैंन तुम्हे तीनों लोगो की उंचाई का परिमाण बता दिया । यह
सीनों लोग यशपनको भोग भूमि कहे है परतु यज्ञानुमान की भूमि यह भारत
पपं ही है ॥१॥ध्रय से एप परोह योजन चा महलो है, जहाँ वरूप के
मत तप रहने वाले भृगु मादि गिडगण नियाम परते है ॥ हे मंत्रयमी !
उगगे भी दो करोड़ योजन उचाई पर जन मोर है, जिसमें प्रत्याशी के प्रतिर
पुत्र गनरादिपा निवारा जनसो से भाट रोड योजन ऊपर तप.
गौर रिपादनही दार-विवजित राज नाम देवता यारा परते हैं ॥१४॥
रितोय अश-१० ७ ]
[ २६१
भूमिसूर्यान्तरं यच्च सिद्धादिमुनिसेवितम् ।
भुवोक्स्तु सोऽप्युक्तो द्वितीयो मुनिसत्तम ।७।
ध्र बसूर्यान्तर यच्च नियुतानि चतुर्दश।
स्वर्लोक. सोऽपि गदित्तो लोक्सस्थानचिन्नकः १८
त्रैलोक्यमेतत्कृतकं मैनेय परिपठ्यते ।
जनस्तपस्तथा सत्यमिति गकृतक यम् ॥१॥
कृतकाकृतयोमध्ये महर्लोक इति स्मृतः।
शुन्यो भवति कल्पान्ते योऽत्यन्त न विनश्यति ॥२०॥
तपलोक से बारह करोड योजन ऊपर सत्यलोक है, उसी को प्रहालोक
कहते हैं. इस लोक मे पुनः मृत्यु को प्राप्त न होने वाले अमरगण रहते हैं ॥१५।।
पातु, पग संचार ये योग्य पार्थिव वस्तु भूर्लोक ही है उमका विस्तार में पहिले
ही यह चुका हूं।।१६।। पृथिवी और सूर्य के बीच में सिद्धो और मुनियो द्वारा
सेवित स्थान ही भुवर्लोक है ।।१७॥ सूर्य और ध्रव के मध्य में चौदह लाग्न
योजन की दूरी है, उसे लोकस्थित ने विचारको ने स्वीक कहा है ॥१८॥ हे
मैपनी ! यहो भूः, मुवः, स्व:, 'कृतक' त्रैलोक्य कहे गये हैं तथा जर्न, सप,
पौर सत्य 'प्रकृतक' तीन लोक हैं ॥१६॥ इन कृतक और प्रकृतक लोपयो के
बोन में महर्लोक बताया जाता है, जो कल्प के अन्त में ही जन-शून्य होता है,
उसका प्रत्यन्त नादा नहीं होता ।।२०।।
एने सप्त मया लोहा मैनेय कथितास्तव ।
पातालानि च सप्तव ब्रह्माण्डस्यैप विस्तरः ॥२१॥
एतदण्डकटाहेन तिर्यक् चोर्यमधस्तथा ।
कपित्यस्य यथा बीज सर्वतो वै समावृतम् ॥२२॥
दशोतरेण पयसा मैत्रेयाण्ड च तद्वतम् ।
सर्वोऽभ्युपरिधानोऽमो वह्निमा वेष्टितो बहिः ।२३।
वह्निश्च वायुना वायुम श्रेय नभसा वृतः ।
भूतादिना नभः सोऽपि महता परिवेष्टित ॥२४॥
दशोत्तरायोपारिए मयतानि सप्त वं।
महान्त च समावृत्य प्रधान समयस्थितम् ॥२॥
[ श्रीविष्णुपुराण
२६२ ]
अनन्तस्य न तस्यान्न. सख्यान चापि विद्यते।
तदनन्तमसरयातप्रमाण चापि वै यत ।२६।
हेतुभूतमशेषस्य प्रकृति सा परा मुने ।
अण्डाना तु सहस्राणा सहस्राण्ययुनानि च ।२७।
हे मैत्रेयजी । इस प्रकार तुम्हारे प्रति इन सात लोको और सात
पातालो का वर्णन मैंने तुमसे किया है । यह ब्रह्माण्ड इतने ही विस्तार वाला
है ॥२१॥ तथा वह कपित्थ बीज के समान ऊपर, नीचे और सभी पोर से
मराहकटाह-द्वारा घिरा है ॥२२॥ हे मैत्रेयजी । यह ब्रह्माण्ड अपने से दश गुने
जल से ढका है और वह जलावरण अग्नि से घिरा हुआ है ॥२३॥ अग्नि वायु
से और वायु आकाश से घिरा है। वह आकाश भूतो के कारण स्प तामस
यहकर से और महकार महत्तत्व से परिवेष्टित है ॥२४॥ हे मंडेयजी ! यह
सातों उत्तरोत्तर एक दूसरे से दस गुने होते गये है । महत्तत्व को प्रधान ने
प्रावृत्त किया हुआ है ।२५॥ उस मनन्त का न कभी अन्त होता है और न उममी
कोई गणना ही है । क्योकि, है मुने । यह अनन्त,
भसख्येय अपरिमेय मोर
सापूर्ण विश्व का कारण तथा परा प्रकृति है । उसमें ऐसे ऐसे सहस्रो, लाखो,
परोडो ब्रह्माण्ड हैं। ॥२६-२७॥
ईशाना तथा तत्र कोटिकोटिशतानि च ।
दारुण्यग्नियथा तैल तिले तद्वत्पुमानपि ॥२८॥
प्रधानेऽवस्थितो व्यापी चेतनारमात्मवेदनः ।
प्रधान च पुमाश्चैव सर्वभूतात्मभूतया ॥२६॥
विप्णुशक्त्या महायुद्ध तो सश्रयमिणी ।
तयोः संव पृयग्भावकारण सश्रयस्य च ॥३०॥
क्षोभकारणभूता च सर्गकाले महामते ।
पपा सत्त जले यातोविभति पारिएकाशतम् ॥३१॥
पक्ति सापि तथा विष्णो. प्रधानपुरपात्मपम् ।
यया च पादपो मूलस्वाधशासादिसयुत. ॥३२॥
द्वितीय अश-०७ ] | २६३ पादिवीजात्प्रभवति वीजान्यायानि व ततः । प्रभवन्ति ततम्तेभ्य. सम्भवत्यपरे द्र मा. ३३। तेऽपि तल्लक्षणद्रव्यकारणानुगता मुने । एवमव्याकृतात्पूर्व जाय त मदादय १३४॥ विशेषान्तास्ततस्तभ्य सम्भवन्त्यसुरादय । तेभ्यश्च पुत्रास्तपा च पुत्राणामपरे सुता ॥३५॥ जैसे काट मे अग्नि और तिल मे तेल रहता है, वैसे ही अपने प्रकारा के हो प्रकाशित, चेतनारमा व्यापक पुरुष को प्रधान मे स्थिति है । ये परस्पर मिल हुए प्रधान पोर पुरुप सब भूतों की स्वरूप भूता विष्णु शक्ति युक्त हैं । यही विष्णु शक्ति उन्हे पृथक करने वाली भोर वही मिसाने वाली है । सग का प्रारभ होने के समय वही उनको शुरप करती है । जैसे जल के ससग से वायु सैकडो गल कणो का पारण करने घासा होता है, वैसे ही विष्णु शक्ति प्रधान पुरुषारमक विश्व को धारण करती है । है मुझे [ जैसे प्रादि बीज के ही दारा जह, स्फध, शाखा प्रादि से परिपूरण वृक्ष की उत्पत्ति होती है भार उम बीजो से दूसरे-दूसरे वृक्ष उत्पन्न हो जाते हैं 1॥२८-३३॥ तथा ये भी उन्ही लक्षणो, द्रव्यो पौर कारणो वाले होते हैं । मे हो प्रधान के द्वारा महत्तस्व से पचभूत तक की उत्पत्ति होती है तथा उनसे ही देवता, ममुर मादि उत्पन्न होते हैं और फिर उनके पुत्र अथवा पुत्रो के भी पुत्रादि होते हैं ॥३४-३।। वाजाद् च क्षमरोहेण यथा नापचयस्तरो। भूताना भूतसर्गेण वास्त्यपचयस्तथा ॥३६॥ सन्निधानाद्ययाकाशकालाद्या कारण तरो। तथयापरिणामेन विश्वस्य भगवान्हरि ३७५ बीविीने यथा मूल नाल पमा रो तथा। काण्ड कोशस्तु पुष्प च क्षीर तद्वच तण्डुला. ॥३॥ तुषा- करणाश्च सन्तो वं यान्त्याविर्भावमात्मन । प्ररोहहेतुसामग्रीमासाय मुनिसत्तम ।
२६४ ] [ श्रीविष्णुपुराण तथा कर्मस्वनेोपु देवद्याः समवस्थिताः । विष्णुशक्ति समासाद्या प्ररोहमुपयान्ति वै ॥४०॥ स च विष्णुपर ब्रह्म यत सर्वमिद जगत् । जगच्च यो यन चेद यस्मिश्च लयमेष्यति ।।११ तद्ब्रह्म तत्पर धाम सदसत्परम पदम् । यस्य सवमभेदेन यतश्चैतच्चराचरम् ।४२१ स एव मूलप्रकृतिर्व्यक्तरूपी जगच्च स । तस्मिन्नेव लय सर्व याति तत्र च तिष्ठति ॥४३॥ क्र्ता क्रियाणा स च इज्यते कनु स एव तत्कमफल च तस्य । स्न गादि यत्साधनमप्यशेष हरेनं किञ्चिद्व्यतिरिक्तमस्ति ।४४। जिस वृक्ष के बीज से अन्य वृक्षो के उत्पन्न होने पर भी जिसका बीज था, उस वृक्ष को कोई हानि नहीं पहुंचती वैसे ही अन्य प्राणियो की उत्पत्ति से उनके जन्म के कारण वीर्यदाता प्राणियो को भी क्षति नहीं पहुंचती ॥३६॥ जैसे आकाश और कालादि निकटता से ही वृक्षादि के कारण होते हैं, वैसे ही भगवान् श्रीहरि भी बिना परिणाम के हो जगत् के कारण होते हैं ॥३७॥ हे गुनिवर । जैसे धान के बीज मे मूल, नाल, पत्र अकुर, काण्ड,कोश पुष्प क्षीर तण्डुल, तुप और करण स्थित रहते हैं और अकुर को उत्पन करने मे हेतु पाती सामग्री को पाकर वे सब प्रक्ट हो जाते हैं ॥३८-३६॥ वैसे ही अपने भनेक पूर्व कर्मो मे स्थित देवगण प्रादि विष्णु-शक्ति का प्राश्रय प्राप्त करके उत्पन्न हो जाते है ॥४०॥ जिस परब्रह्म से यह विश्व प्रक्ट हुअा है तथा जो स्वयं ही विश्व रूप से स्थित है और जिसमे इस विश्व को लीन होना है, वह विष्णु ही हैं ॥४१॥ वही ब्रह्म हैं, वही परमधाम हैं, वह पद मत् मोर असत् दोनो से ही अद्भुत प्रकार का है । उससे मभिन्न यह सम्पूर्ण चराचरात्मक विश्व उसी से उत्पन्न हुआ है ।४२। तुम उसी को अध्यक्त मूल प्रकृति और उसी को व्यक्त स्वरूप विश्व रामभो । यह सम्पूर्ण विश्व उसी के प्राश्रय में स्थित है और उसी मे लीन हो जायगा ॥४३॥ यही यज्ञादि का कर्ता है, यही य-रूप भौर यजन किया द्वितीय अंश-म..] जाने वाला है तथा वही यज्ञादि का फल स्वरूप और वही यज्ञ के साधन है। उन भगवान् के अतिरिक्त कही कुछ भी नही है ।।४४|| पाठवाँ अध्याय व्याख्यातमेतद्ब्रह्माण्डमस्यानं तव मुद्रत । ततः प्रमारणमस्याने मूर्यादीनां शृणुष्व मे ।। योजनानां सहस्राणि भास्करस्य रथो नव । ईपादण्डस्तथैवास्य द्विगुणो मुनिसत्तम ।। साघकोटिस्तथा सप्त नियुतान्यधिकानि वै। योजनानां तु तस्याक्षप्तन चक प्रतिहितम् ।। । निनाभिमति पञ्चारे पण्नेमिन्यक्षयात्मके। सवत्सरमये कृत्स्न कालचक्र प्रतिष्ठितम् ॥४॥ हयाश्च सप्तच्छन्दासि तैपा नामानि मे शृणु । गायपि च बृहत्युणिग्जगती विष्टुयेव च ५। अनुष्टुप्पड क्तिरित्युक्ता छन्दासि हरयो रवेः । चत्वारिंशसहस्राणि द्वितीयोऽक्षो विवस्वतः ।। पञ्चान्यानि तु सार्धानि भ्यन्दनस्य महामते । प्रक्षप्रमाणमुभयोः प्रमाण तय गाई योः । हस्वोऽक्षस्तद्य गान प्रवाधारो रथस्य । द्वितीय से तु तच्च सस्थित मानसाचले 1८ यो पराशरजी ने पहा-हे मुरत ! मैंने तुम्हारे प्रति ब्रह्माण्ड का यर्णन किया है. अब मूर्यादि को स्थिति पर उनके परिसाए को गुनो ॥१॥ हे गुनिए ! सूपदेव का रम नो रोमन विस्तार वाला है तथा उसमे द्विगुण परि- माए बाला उसका ईया-दएड है ॥२॥ उसका धुरा डेढ बरोड़ सात सास २६६ ] | श्रीविष्णुपुराण योजन का है जिसमे उसस पहिया लगा हुआ है । उस तीन नाभि, पार भरे और छ, नेमि वाले सवत्सरात्मय प्रक्षय चक्र में सम्पूर्ण कालचक्र विद्यमान है ॥४1f गायत्री, वृहती, उरिक जगती, विष्टुप, अनुष्टुप् और पक्ति यह बात छन्द ही उस रथ मे जोडे जाने वाले प्रश्न हैं । उनके रथ पा दसरा पुरा साउँ पैनालीस हजार योजन लम्बा है तथा दोनो घुरो के समान हो उसके जुओं का परिमाण है ।।५-७। एक जुए के सहित के उस रथ का छोटा धुरा धव पर और दूसरे पुरे का पहिया मानसोत्तर पवन पर स्थित है ॥८॥ मानसोत्तरशैलस्य पूर्वतो वासवी पुरी । दक्षिणे तु यमस्यान्या प्रतीच्यां वरुणस्य च ।। उत्तरे। च सोमस्य तासा नामानि मे शृण । यस्वौकसाग शक्रस्य याम्या सयमनी तथा ।१०' पुरी सुखा जलेशस्य सोमस्य च विभावरी । माष्ठा गतो दक्षिणत क्षिप्रोपुरिव सति ।। मैत्रेय भगवान्भानुयोतिषा चक्रसयुत.। अहोरात्रव्यवस्थानकारण भगवानविः ॥१२॥ देवयान. पर. पन्या योगिता क्लेसड क्षये । दिवरस्य रविर्मध्ये सर्वकाल व्यवस्थित. ११३॥ सर्वद्वोपेषु मैत्रेय निशार्द्धस्य च सम्मुखः । उदयास्तमने चंव सर्वकाल तु मम्मुखे ॥१४॥ मानसोतर पर्वत के पूर्व गे इन्द्र की, दक्षिण में यम की, पश्चिम में परुण को तथा उत्तर में चन्द्रमा को पुरी है, उनके नाम सुनो । इन्द्र की पुरी मा नाम वस्वोक्सारा है यम की पुरी को सयमनी रहते है।।१-१०॥ घरण की पुरी मुखा और चन्द्रमा की विभावरी है । हे मंत्रयजी ! ज्योतिश्चक के सहित भगवान् सूर्य दक्षिण दिशा में प्रविष्ट होकर धनुष से छोडे हुए तोर पे समान तीव्र धेग से गमन करते हैं । यही भगवान् गूर्य दिन और रात्रि पा रिमाग करते हैं ।।११-१२।। सथा रागादिपलेशों का शवम होने पर वे ही ] द्वितीय श्रृंग-ग्र०८ [ २९७ मोक्ष मायो योगियों के लिये देश्यान नामक मर्वश्रेठ मार्ग हैं। हे मैत्रेपनी ! सभी द्वीपों में सदा मध्याहार टपा रा. मघ में वे मध्य-मावास में सामने की भोर स्थित रहते हैं। बस ही उदय और प्रस्त नो परस्पर सामने ही होते हैं ॥१३.१४॥ विदिशासु त्वशेषासु तथा ब्रह्मन् दिगासु च । यर्यत्र दृश्यते भास्वान्स तेपामुदयः स्मृतः ।। तिरोभाव चयन ति तवास्तमन रवेः । नेवास्तमनमर्कस्य नोदयः सर्वदा सत. ॥१६॥ उदयास्तमनारच हि दर्शनादर्शन रखेः। शकादीना पुरे तिष्ठन् स्पृशत्येष पुरनयम् ॥१७॥ विकोणी द्वौ विकोणस्यत्रीत् कोणान्द्रे' पुरे तया । उदितो वर्तमानाभिरामध्याह्वात्तपचविः ॥१८॥ ततः पर हसन्तीभिगोंमिरस्तं नियति । उदयास्तमनाभ्या च स्मृतै पूर्वापरे दिशौ ॥१६॥ यावत्पुरस्तात्तपति तावत्यूप्ठे च पार्वयोः । ऋतेश्मरगिरेमरोरपरि ब्रह्मण. सभाम् ।२०) ये ये मरीचयोऽस्य प्रयान्ति प्रहारण: सभाम् । ते ते निरस्तास्तद्भासा प्रतीपमुपयान्ति वै ॥२१॥ ह ब्रह्मन् । सब दिमा-विदिशामों में जहाँ के निवासी जिस स्थान पर सूर्य को देखते हैं, उनके लिये यहीं सूर्योदय होता है ॥ १५॥ दिन की समाप्ति पर जहाँ मयं छिपता है वहाँ उराका अस्त होना कहा जाता है। सदा एक ही रूप में स्थित रहने वाले सूर्य का भी उदय, पम्त नहीं होता ॥ १६ ॥ उनका दिखाई देना या न देना ही उनका उदय या मस्त होना है। मध्याह्न समय में इन्दादि में से किसी की पुरी के ऊपर प्रकाशित होने हुए सूर्य तीन पुरियों मार दो कोणों को प्रकाशित करते हैं। इमो र अग्नि मादि किसी कोण मैं प्रकाशित होकर वे तीन कोणों और दो पुरियों को प्राशित करते हैं। उदय होने के बार मध्याह्न काल तक अपनी प्रदृद्ध होती हुई रिसों २६८ ] [श्रीविष्णुपुराण स्वय तपते हैं ॥ १७-१८ ।। इसके पश्चात् क्षीण होती हुई किरणों से ही धीरे-धीरे अस्त हो जाते हैं। उनके उदय और मस्त से ही पूर्व, पश्चिम आदि दिशाएँ कल्पित हुई ॥ १६॥ यथार्थ मे तो वे जैसा पूर्व मे प्रकाश करते हैं, वैसा ही पश्चिम या उसके इधर-उघर को दिशामो मे करते हैं । वे देवगिरि सुमेरु पर स्थित ब्रह्माजी की सभा को छोडकर अन्य सभी स्थानों को प्रकाशित करते हैं ।॥ २० ॥ उनकी जो रश्मियां ब्रह्माजी की सभा में पहुंचती हैं, वह उस सभा से निस्तेज होकर उल्टी लौटती हैं ।। २१ ॥ तस्माद्दिश्युत्तरस्या वै दिवारात्रि. सदैव हि । सर्वपा द्वीपवर्षारणा मेरुरुत्तरतो यतः १२२॥ प्रभा विवस्वतो रात्रावस्त गच्छति भास्करे। विशत्यग्निमतो रात्री वह्निदंरात्प्रकाशते ।२३॥ वहः प्रभा तथा भानुदिनेष्वाविशति द्विज । अतीव बलिरायोगादत. सूर्यः प्रकाशते ।२४। तेजसी भास्कराग्नेये प्रकाशोष्णस्वरूपिणी । परस्परानुप्रवेशादाप्यायेते दिवानिशम् ॥२५॥ दक्षिणोत्तरभूम्यद्ध समुत्तिष्ठति भास्करे। अहोरायविशत्यम्भस्तम. प्राकाश्यशीलवत् ॥२६॥ आताम्रा हि भवन्त्यापो दिवा नक्तप्रवेशनाद । दिनं विशति चैवाम्भो भास्करेऽस्तमुपेयुपि ।२७। तस्माच्छुक्ला भवन्त्यापो नक्तमह्नः प्रवेशनात् । एवं पुष्करमध्येन यदा याति दिवाकरः।२८। त्रिशद्भागन्तु मेदिन्यास्तदा मोहूतिकी गतिः । दुलालचक्रपर्यन्तो भ्रमन्नेप दिवाकरः।२९। करोत्यहस्तथा रानि विमुञ्चन्मेदिनी द्विज । प्रयनस्योत्तरस्यादौ मकर याति भास्करः ॥३०॥ गुमेरु पर्वत सभी दीपो पौर वर्षों के उत्तर में है, इसीलिये सदा उपर from में ही दिन और रात्रि रहते हैं ॥ २२ ॥ सूर्य के मस्त होने पर राति द्वितीय प्रश-०८ [ २९६ में उनका वैन अग्नि में चला जाता है, इसीलिये अग्नि दूर से ही प्रकाशमान हो उठता है ।। २३ ।। हे द्विज ! दिन के समय अग्नि का तेज सूर्य मे प्रविष्ट हो जाता है तब अग्नि का सयोग होने से सूर्य में भी प्रखरता पा जाती है ॥२४॥ इस प्रकार सूर्य और अग्नि के प्रवाया और तेज दोनों ही परस्पर संयुक्त होकर दिवम-रात्रि में बढ़ते रहते हैं ।। २५ ।। सुमेरु के दक्षिणोत्तर भूम्यर्द्ध में जब सूर्य प्रकाशित होते हैं तब भन्धकार वाली रात्रि प्रकाशमान दिवस दोनो ही जल मे प्रविष्ट हो जाते हैं ॥ २६ ॥ दिन के समय रात्रि के जल-प्रवेश से ही जल में कुछ ताम्रवर्णत्व दिखाई पड़ता है और जब सूर्यास्त हो जाता है, तब दिवस रामे प्रविष्ट होता है ।। २७ ।। तब रात्रिकाल में दिन के जल मे प्रविष्ट होने के कारण उसका शुक्लवर्ण प्रतीत होता है। इस प्रकार सूर्य जप पुटकर द्वीप के बीच मे पहुँच कर पृथिवी के तीसवें भाग को साध जाता है तब उसकी गति एव' मुहूर्त की हो जाती है । हे टिंज । कुम्हार के चाक के पिर पर घूमते हुए समान भ्रमण परता हुअा यह सूर्य पृथ्वी के तीसों भागो को पार करके एक दिन-रागिरता है। उत्तरायण के प्रारम्भ मे वह सर्व प्रपम मकर राशि में पहुंचता है ।। २८-३०॥ तत कुम्भ च मीन च राशे राश्यन्तर द्विज । विवेतेप्यय भुक्तेषु ततो वैपुवती गतिम् ॥३१॥ प्रयाति सविता कुर्वनहोरात्र तत समम् । ततो रात्रि क्षय याति वद्धतेऽनुदिन दिनम् ॥३२॥ ततश्च मिथुनस्यान्ते परा काष्ठामुपागत । राशि कर्कटक प्राप्य कुरुते दक्षिणायनम् ।३३। कुलालचक्रपर्यन्तो यथा शीघ्न प्रवर्तते । दक्षिणप्रक्मे सूर्यस्तथा शीघ्र प्रवर्तते ॥३४॥ प्रतिवेगितया काल वायुवेगवलाच्चरन् । तस्मात्मष्टा भूमिं तु बालेनाल्पेन गच्छति ॥३ फिर वह कुम्म मोर मीन रागियों में एक से दूसरी में जाता है। इन ग्रीन नियों को भोगकर राशि और दिन को इमान फरarg सूर्य एयदी ३०० ] [ श्रीविष्णुपुराण गति का आश्रय लेता है । फिर दिनो दिन रात्रि का क्षय होने लगता है और दिन की वृद्धि होने लगती है ॥ ३१.३२ ॥ फिर वह मिथुन राशि से निकलकर उत्तरायण की अन्तिम सीमा पर पहुंचता है और कक राशि में प्रविष्ट होकर दक्षिणायन का प्रारम्भ कर देता है ॥३३॥ जैसे कुम्हार के चाक के सिरे पर स्थित वस्तु प्रत्य त द्रुत वेग से घूमती है वैसे ही सूय दक्षिणायन को पार करने की दिशा मे द्रुतगति से गमन करता है ॥ ३४ ॥ इस प्रकार शीघ्र गति और वायु जैसे वेग से चलने के कारण वह अपने उत्कृष्ट मागं को मल्प समय मे ही पार कर लेता है॥३५ ।। सूर्यो द्वादशभि शैघ्रयान्मुहूर्तेर्दक्षिणायने। त्रयोदशार्द्ध मृक्षाणामह्ना तु चरति द्विज (३६॥ मुहूर्तेस्तावदृक्षाणि नक्तमष्टादशश्चरन् । कुलालचमध्यस्थो यथा मन्द प्रसपंति ॥३७॥ तथोदगयने सूर्य सर्पते मन्द विक्रम । तस्माद्दीघेण कालेन भूमिमल्पा तु गच्छति ॥३८॥ अष्टादशमुहूर्त यदुत्तरायणपश्चिमम् । अहर्भवति तच्चापि चरते मन्दविक्रम ३६॥ प्रयोदशार्द्ध मह्ना तु मृक्षाणा चरते रवि । मुहूर्तेस्तावहक्षाणि रानी द्वादशभिश्चरन् ।४०। अतो मन्दतर नाम्या चक भ्रमति वै यथा । मृत्पिण्ड इव मध्यस्थो ध्रु वो भ्रमति वै तथा ।४१३ फुलालचकनाभिस्तु यथा तव वर्तते । ध्र वस्तथा हि मैत्रेय तरं व परिवर्तते ।४२। हे द्विज । दक्षिणायन मे दिन समय सूर्य इतनी शीघ्रता से चलता है कि उस समय ये साढ़े तेरह नक्षत्रों को बारह गुहूतौ म ही पार पर सेता है ॥३६॥ परन्तु रात्रि काल में उसपी गति इतनी मन्द हो जाती है कि उतने ही नक्षत्रों को मठारह मुहूसों में पार कर पाता है। जैसे कुम्हार के पत्र के मध्य में स्थित वातु धीरे-धीरे पसती है, वैसे ही उत्तरायण समय मे गृय मन्दगामी [३.१ द्वितीय अंश-अ.] होता है पौर योडा-मा मागं मी अत्यन्त दीर्थ समय में पार कर पाना है ॥३७-३८॥ इसलिये उत्तरायण का अन्तिम दिवस अठारह मुहूतं का होता है, क्योंकि उस दिन भूयं की गति अत्यन्त मन्द होती है ॥३६॥ ज्योतिश्चक्राद के साढ़े तेरह नक्षत्रों को यह एक दिन में पूरा करता है, परन्तु रात्रि के समय वह उतने ही नक्षत्रो को बारह महूतों में पूरा कर लेता है ॥ ४० ॥ इसलिए ने नाभि देश में चाक धीरे-धीरे घूमता है, जिससे वहाँ का मृत्पिड नो मन्द गति से घूमता है, वो ही ज्योतिश्चक्र के बीप मे स्थित प्रव भी अत्यन्त धीमी गति से घूमता है ॥४१॥ हे मंत्र यजी ! जैसे कुम्हार के पार की नाभि अपने ही स्थान पर घूमती रहती है, वैसे ही घ्र व भी अपने ही स्थान पर घूमता रहता है ।।४२॥ उभयोः काष्ठयोर्मध्ये भ्रमतो मण्डलानि तु । दिवा नक्तं च सूर्यस्य मन्दा शोना च वै गतिः ।४३! मन्दाह्नि यस्मिन्नयने शीघ्रा नक्तं तदा गति.। पौघ्रा निशियदा चास्य तदा मन्दा दिवा गति. ॥४४॥ एक्प्रमारणमेवप मार्ग याति दिवाकरः। अहोरायेण यो मुड क्ते समस्ता रागयो द्विज ।।५। पडेव रागीन् यो भुडवते रानावन्याञ्च पड्दिवा । राशिप्रमाणुजनिता दीपंहस्वात्मता दिने ।४६॥ तथा निगाया रागोना प्रमाणेलघुदीर्घता। दिनादेर्दोघह्वस्वत्व तद्भोगेनैव जायते ।। उत्तरे प्रनमे गोध्रा निशि मन्दा गति दिवा । दक्षिणे त्वयने चैव विपरीता विवस्वतः ।४।. इस प्रकार उत्तर दक्षिण की सीमामों के बीच में पगडलाकार पूमने से मूर्य को गति दिन या रात के समय मन्द या दूत हो जाती है ।३॥ तिरे समय मूर्य वी गति जिस प्रयन में धीमी होती है, त मयत मे रात्रि के समय इत हो जाती है और जब रात्रि के समय बोध गति होती है तव दिन में धीमी हो जाती है । हे जि ! मूर्य को सरंच एक समान मागं ही पूरा करना ३०२ ] [ श्रीविप्पगुपुराण होता है, एक दिन रात्रि में ही यह सभी राशियो का भोग करता है ॥४५॥ वह छ राशियो को रात्रि-काल मे छः को दिन के समय भोगता है । राशियों के परिमाण से ही दिन की वृद्धि अथवा हास होता है ॥४६॥ रात्रि का छोटा पा वडा होना भी राशियो के परिमाण के अनुसार होता है। राशियो के भोग के अनुसार ही दिन या रात्रि का लघुत्व या दीघत्व होता है ॥४७॥ उत्तरायण में रात्रि के समय सूर्य की गति में शीत्रता और दिन के समय मन्दता होती है । परन्तु दक्षिणायन में उसकी गति इससे नितान्त विपरीत होती है ।।४।। उपा रामि. समाख्याता व्युष्टिश्वाप्युच्यते दिनम् । प्रोच्यते च तथा सन्ध्या उपाव्युष्टयोर्यदन्तरम् ।४६। सन्ध्याकाले च सम्प्राप्ते रौद्र परमदारुणे। मन्देहा राक्षसा घोरा सूर्यमिच्छन्ति खादितुम् ॥५०॥ प्रजापतिकृत शापस्तेषा मैत्रेय रक्षसाम् । अक्षयत्व शरीराणा मरण च दिने दिने ।५११ तत सूर्यस्य तैयुद्ध भवत्यत्यन्तदारुणम् । नतो द्विजोत्तमास्तोम सडि क्षपन्ति महामुने ।५२॥ पारब्रह्मसयुक्त गायत्र्या चाभिमन्वितम् । तेन दह्यन्ति ते पापा वजीभूतेन वारिणा ॥५३॥ अग्निहोत्रे हूयते या समन्या प्रथमाहुतिः । सूर्यो ज्योति. सहस्राशुस्तया दीप्यति भास्करः ।५४] बोकारो भगवान्विष्णुस्त्रिधामा वचसा पतिः । तदुच्चारणतस्ते तु विनाश यान्ति राक्षसाः ।५५१ रामि पो उपा भौर दिन को युष्टि महा गमा है । इन उपा और पुष्टि * मध्य बाल को ही समय पर है ।। ४६ ॥ जब यह अत्यन्त दारण मौर भयंकर सन्ध्या पास उपस्थित होता है तब मन्देहा संशन पोर राक्षस गण सूर्य पा भगण करने की इच्छा परते है ॥ ५० ॥ है भंयजी ! उन राक्षसों को मनापति का यह पाप लगा हुमा है कि उनये चारोरो मे पायरव होते हुए भी प्रति दिन उनकी मृत्यु हो ॥१॥लिये सन्ध्यावाल उपस्थित होने पर उनका द्वितीय अंग-प्र०८] [ ३०३ सूर्य से अत्यन्त दारुण संग्राम होता है, उस समय श्रेष्ठ प्राहों द्वारा जो ब्रह्म रूप प्रणव एवं गायत्री से अभिमत्रित जल छोड़ा बाता है, वह बल वयस्प होकर उन दुष्ट राक्षसों को भस्म कर देता है ॥५२-५३॥ पीनहोत्र में 'सूर्यो ज्योतिः' इत्यादि मन्त्र से दी जाने वाली प्रपमाहुति से सहझरदिम भगदान भास्वर देदीप्यमान होते हैं ॥५॥ ओंकार हो जाद, स्वप्न पा सुपति रूप तीन घामों से परिपूर्ण भगवान् विष्णु और सभी वाणियो का मधीवर है, रमका उच्चारण होने से ही राक्षसों का नाश हो जाता है ।।५।। वैष्णोऽशः परः सूर्यो योन्तज्योतिरसम्भवम् । अमिधायक कारस्तस्य तत्प्रेरकः परः ॥५६॥ तेन सम्प्रेरितं ज्योतिरोङ्कारेणाय दीप्तिमद । दहत्यशेषरक्षांसि मन्देहास्यान्यपानि वै ।५७ तस्मानोल्लङ्घनं कार्य सन्ध्योपासनकर्मणः । स हन्ति सूर्य सन्व्याया नोपास्ति कुरुते तु यः १५८ ततः प्रवाति भगवान्नाागरभिरक्षितः । वालखिल्यादिभिश्चैव जगतः पालनोचतः १५६। काष्ठा निमेपा दश पश्च चव त्रिशन्च काटा गएयेकलां च । विशकलरचव भवेन्मुहर्त स्तत्रिशता राज्यहनी समेते ।६०१ ह्रासवृद्धी त्वहर्भागदिवसानां यथाक्रमम् । सन्ध्यामुहूर्तमात्रा ये हासवृद्धयोः समर स्मृता १६१ रेखामभृत्यपादित्य त्रिमुहूर्तगते रखी। प्रातःस्मृतस्ततः कालो भागश्वाह्नः स पञ्चमः १६२१ तस्मात्प्रातत्तानाकालात्त्रिमुहूर्तस्तु सङ्गवः । मध्याह्नत्रिमुहूर्तस्तु तस्मात्कालात सङ्गवात् ।६३१ तस्मात्माध्यालिकाकालादपराह इति स्मृतः । प्रय एव मुहूर्तास्तु कालमागः स्मृतो बुधः १६४॥ अपराह व्यतीते तु काल: सायाह्न एव च । दशपञ्चमुहूर्ता व मुहूर्तालय एव च ६॥
३०४ ] [ श्रीविष्णुपुराण सूर्य भगवान् विष्णु का प्रश तथा विकार होन अन्तयोंति है । प्रणव उसका वाचक होने से वह उसे उन राक्षमो के विनाशार्थ प्रत्यत प्रेरण परता है ॥५६।। उसी प्रणव की प्रेरणा से वह ज्योति अत्यत प्रदीप्त होकर उन मन्देहा सजक सभी राक्षसों को भस्म करन में समर्थ होती है ॥५७। इसीलिये सन्ध्योपासन कर्म का कभी भी उल्लघन करना अनुनित है । सघ्योपासन न करने वाला पुरुप सूर्यघाती माना गया है ॥५॥ फिर भगवान् सूर्य बाल्य- खिल्यादि ऋपियो से रक्षित होते हुए जगत का पालन मे प्रवृत्त होकर जाते हैं ॥५६॥ पद्रह निमेष की एक काश और तीस काष्टा की एक कला होती है। तीस कलानों का एक मुहूर्त और तीस मुहूत्तों की दिन-रात्रि होती है ॥६॥ दिनो का क्षय और वृद्धि ग्रामश प्रात , मध्याह्न प्रादि दिन के प्रशो के क्षय अथवा वृद्धि के कारण है । परतु दिनो के घटने-बढने पर सन्ध्या सदा एक समान एक मुहूर्त की ही होती है ॥३१॥ उदय होने के पश्चात् सूर्य के तीन मुहूर्त गमन करने को प्रात काल कहते हैं । यह पूरे दिन का पांचवा भाग होता है ॥६२|| इस प्रात काल के व्यतीत होने पर तीन मुहूर्त के रामम को राङ्गव कहा जाता है, और सङ्गव के समाप्त होने पर तीन मुहूर्त तक का समय मध्याह्न होता है ॥६॥ मध्याह्न के पश्चात् अपराह्न काल होता है, ज्ञानियो ने इसे भी तीन मुहूर्त का ही बताया है ॥६४॥ जब अपराह्न बीत जाता है तब सायाह्न उपस्थित होता है । इस प्रकार पद्रह मुहूर्त का दिन तथा तीन मुहूर्त का दिवसाश होता है ॥६५॥ दशपञ्चमुहूर्त वै ग्रहपुवत स्मृतम् । वर्द्ध ते ह्रसते चैवाप्ययने दक्षिणोत्तरे ।६६। अहस्तु प्रसते रात्रि राम्रिसति वासरम् । शरदसन्तयोर्मध्ये विषुव तु विभाव्यते ।६७) तुनामेपगते भानो समरात्रिदिन तु तत् । - पर्वटावस्थिते भानौ दक्षिणायनमुच्यते ॥६८) उत्तरायणमप्युक्त मकरस्थे दिवारे। निंगन्मुहून कथितमहोरान तु यन्मया ।६६।
द्वितीय यग-अ०८
तानि पञ्चदश ब्रह्मान् पक्ष इत्यभिधीयते ।
मास पक्षद्वयेनोक्तो द्वौ मासौ चार्कजावृतु १७०४
ऋतुनय चाप्ययन द्वेऽयने वर्पस जिते ।
सवत्सरादय पञ्च चतुर्मासविकल्पिता १७११
निश्चय सर्वकालस्य युगमित्यभिधीयते ।
सवत्सरस्तु प्रथमो द्वितीय परिवत्सर ७२॥
इद्वत्सरस्तृतीयस्तु चतुर्थश्चानुवत्सर ।
वत्सर पञ्चमश्चात कालोऽय युगसजित. १७३]
वपुक्त दिन पद्रह मुहर्त का कहा है. परतु उरारायण में उसकी वृद्धि
और दक्षिणायन मे ह्रास होता है ।।६-।। इस प्रकार उत्तरायण म दिन, रात्रि
को ग्रसने लगता है और दक्षिणायन म रानि, दिन को ग्रसने लगती है। शरद्
और वसन्त ऋतु के बीच मे जब सूर्य तुला या मेष राशि पर जाता है तब
दिन रात्रि के समान होने से विषुव होता है । जब सूर्य रं राशि में पहुंचता है
तक दक्षिणायन पहा जाता है ॥६७ ६८॥ तथा मकर राशि में पहुंचना है तब
उरी उत्तरायण कहते हैं। हे ब्रह्मन् । मैंने तीस मुहूत्र का जो अहोरात्र वहा है,
वैसे पद्रह अहोरात्र के समय को पा कहते हैं। दो पक्ष का एक माम और दो
मास पी एव ऋतु होती है । तीन ऋतुनो का एक अयन और दो अयन वा
पहा जाता है । चार प्रकार के मास कल्पना तथा पाँच प्रकार के
सवत्सरादि वर्ष कहे गये हैं ।।६९-७१। यही युग सब प्रकार के कालो वा
निर्णपिक है । प्रथम सवत्सर, द्वितीय परिवसर तृतीय इवत्सर, चतुर्थ
मनुवरसर प्रोर परम वत्सा कहा है । यह रामय हो युग के नाम से
1
।
एक वर्ष
प्रसिद्ध है ।।७२-७३॥
म श्वेतस्योत्तर शंल शृद्गवानिति विधुत.।
श्रीणि तस्य तु शृङ्गाणि यरय शृङ्गवान्स्मृत, 1७४
दक्षिण चोत्तर चैव मध्य पुवत तथा।
गरद्वसन्तयोमंस तद्भानु प्रतिपद्यते ॥७॥
[ श्रीविष्णुपुराण
मेपादौ च तुलादौ च मैनेय विपुवस्थित ।
तदा तुल्यमहोरात्र करोति तिमिरापह ७६।
दशपञ्चमुहूर्त वै तदेतदुभय स्मृतम् ।
प्रथमे कृत्तिकाभागे यदा भास्वास्तदा शशी ७७॥
विशाखाना चतुर्थेऽशे मुने तिष्ठत्यसशयम् ।
विशाखाना यदा सूर्यश्चरत्यश तृतीयकम् ।७८
तदा चन्द्र विजानीयात्कृत्तिका शिरसि स्थितम् ।
तदैव विषुवाख्योऽय काल पुण्योऽभिधीयते 1७६
श्वेतवर्ष के उत्तर मे तीन शृङ्ग याला एक पर्वत है जो उन शृङ्गों
के कारण ही शृङ्गवान् नाम से विरयात है ।।७४। उसका एक शृङ्ग उत्तर को
पोर, एक दक्षिण की पोर तथा एक बीच मे है । वह बीच वाला शृङ्ग हो
'वैपुवत' है । शरद् और वसन्त ऋतु के बीच मे सूप इसी वैपुवत शृङ्ग पर
स्थित होते हैं ।७५। इसलिये हे मैत्रयजी | मेप या तुला राशि के भारभ मे पन्धन
फार न करने वाले सूय विषुवत पर पाकर दिन और रात को एक जैसे परिमाण
का कर देते हैं ।।७६॥ उस समय दिन और रात दो ही पद्रह पद्रह दिन के
होते हैं । है मुनै । जब सूर्य कृत्तिका नक्षत्र के प्रथम भाग में और चन्द्रमा
विशाखा नक्षत्र के चौथे भाग मे हो अथवा जब सूय विशाखा में तीसरे भाग
का पौर चन्द्रमा कृत्तिका में प्रथम भाग का भोग करते हो, सब यह विषुव
नामक पत्य त पुनीत समय होता है ।।७७ ७६।।
तदा दानानि देयानि देवेभ्य प्रयतात्मभि ।
ब्राह्मणेभ्य पितृभ्यश्च मुखमेतत्त, दानजम् ।८०
दत्तदानस्तु विपुवे कृतकृत्योऽभिजायते।
अहोराबादं मासास्तु कला काष्ठा क्षणास्तथा ।८१
पौर्णमासी तथा ज्ञेया अमावास्या तथैव च ।
सिनीवाली पुहूरनंय रावा चानुमतिस्तथा ।१२।
तपस्तपस्यो मधुमाधवी च शुक्र शुचिश्चायनमुत्तर स्यात् ।
नमोनभस्यो च पस्तपोज स्मह सहस्याविति दक्षिण तत् ।
द्वितीय अंश-प्र०८] [ ३०७ लोकालोकच यशैलः प्रागुक्तो भवतो मया । लोकपालास्तु चत्वारस्तव तिन्ति सुव्रताः ।४। सुधामा गहपाच्चैव कर्दमस्यात्मजो द्विज । हिरण्यरोमा चैवान्यश्चतुर्थः पोतुमानपि 1८५ निन्दा निरभिमाना निस्तन्द्रा निप्परिग्रहाः। लोकपालाः स्थिता ह्यते लोकालोके चतुर्दिगम् ।। इस समय देवता, ब्राह्मण, पितर आदि के निमित्त मयत चित्त से दानादि कर्म परे । दान ग्रहण करने के लिये यह काल देवतानो के बुले हुए मुख के तुल्य है ।1८०॥ इसलिये विपद काल में जो दान करता है, वह अन्य हो जाता है। यज्ञादि का समय निश्चित करने के लिये दिन, रात, पर, रना, माया मोर क्षण प्रादि बालो के विषय में भले मगर जान करना चाहिये । १॥ पूर्णमासी के दो भेद हैं :- राका पोर अनुमति और अमावस भी सिनीवाली और के भेद मे दो प्रकार की ही है । ' उत्तरायण के माघ, फाल्गुन, चैत्र, वैशाख, पेट और पापाढ-यह छः मास होते हैं तथा पावण, भाशे, क्वार, कानिक, अमहन, पोप~यह छः मास दक्षिणायन के कहे गये हैं ॥८३|| पहिले मैं तुममें जिग नौलोक पर्वत के विषय में कह चुका है. उम पर चार व्रत परापण लोपाल रहते हैं ॥४॥ मुघामा, कर्दम- पुर खपाद. हिरण्यरोमा और केतुमान् नामक यह वारा लोकपाल द्वन्द, अभिमान, प्रालस्य पोर परिप्रहमादि से दूर रह कर चोकालोक पवंत को चारों विधापी में निवास स्पेि हुए हैं ॥१५-६॥ उत्तरं यदगम्त्यस्य अजवीध्यान दक्षिणम् । पितृयानः स वै पन्या वैवानरपयावहिः तत्रासते महात्मान ऋषयो येऽग्निहोत्रिण.। भूतारम्भकृत ब्रह्म दासन्तो ऋत्विगुद्यताः। प्रारमन्ते तु ये लोकास्तेपा पन्या: स दक्षिणः ।। चलितं ते पुनव्रह्म स्यापयन्ति युगे युगे। सन्तत्या तपमा व मर्यादाभिः थुतेन च II
३०८ ]
[ श्री विष्णुपुराण
जायमानास्तु पूर्वे च पश्चिमाना गृहेषु वै ।
पश्चिमाश्चैव पूर्वेपा जायन्ते निधनेप्विह 101
एवमावर्तमानास्ते तिष्ठन्ति नियतव्रता ।
सवितुर्दक्षिण मार्ग श्रिता ह्याचन्द्रतारकम् ।।१।
अगस्त्य के उत्तर और अजवीथि के दक्षिण में जो वैश्वानर मार्ग
से भिन्न मार्ग है, वही पितृयान मार्ग कहा गया है ।।८७॥ उस मार्ग मे ऋषि-
महात्मा निवास करते है । जो अग्निहोत्र करने वाले होकर प्राणियो के सर्ग
का प्रारम्भ करने वाले ब्रह्म की स्तुति सहित यजन करते हैं वह पितृयान
उनका दक्षिण मार्ग है ।।८८॥ वे युगयुगान्तर मे सन्तान, तप, वर्णाश्रम तथा
विविध शास्त्रो और श्रुतियो के द्वारा पुनःस्थापन कार्य करते है ॥६॥ पूर्व
देह ये धर्म प्रवर्तक अपनी सन्तान के यहाँ जनम लेते और वे धर्म प्रचारक
गरण अपने हो सन्तान रूप से उत्पन्न हुए उन पितरो के पुलों
में उत्पन्न होते हैं ॥१०॥ इस प्रकार मै व्रत-परायण ऋषिगण जब तक सोम
और तारे स्थित रहते हैं, तब तक सूर्य के दक्षिण मार्ग में बारबार मावागमन
पले रहते हैं ।।२१॥
नागवीय्युत्तर यच्च सप्तर्षिभ्यश्च दक्षिणम् ।
उत्तर सविनु पन्था देवयानश्च स स्मृत ।६२।
तय ते वशिन सिक्षा विमला ब्रह्मचारिणः ।
सन्तति ते जुगुप्सन्ति तस्मान्मृत्युजितश्च ते ।।३।
अष्टमी तिसहस्राणि मुनोनामूर्ध्वरेतसाम् ।
उदयपन्धानमर्यण स्थितान्याभूतसम्प्लवम् ।।४।
तेऽगम्प्रयोगाल्लोभस्य मैयुगस्य च वर्जनात् ।
इच्छाद पाप्रवृत्या च भूतारम्भविवर्जनाद ।९५॥
पुनश्च यामासयोगाच्छन्दादेर्दोपदर्शनात् ।
इत्येभि पारण. मुद्धास्तेऽमृतत्व हि भेजिरे ।६।
पाभूतमम्सव स्थानममृतत्व विभाव्यते ।
प्रैलोक्यस्थितिवालोऽयमपुनार उच्यते ।।
द्वितीय अंश-०८] [ ३०६ ब्रह्महत्याश्वमेधाभ्या पापपुण्यकृतो विधि। आभूतसम्प्लवान्तन्तु फलमुक्त तयोहिज It जो नागवीयि के उतर और सप्तपियो के दक्षिण में सूर्य का उत्तरीय पथ है, वहीं देवयान मार्ग कहा जाता है | उसमें जिन स्वच्च स्वभाव वाले जितेन्द्रिय ब्रह्मचारियों का निवाम है, वे कभी सन्तान की कामना नहीं करते, इस प्रकार उन्होंने मृत्यु पर विजय प्राप्त करली है ॥६॥ सूर्य के उस उत्तरीय मार्ग में भस्सी हजार ध्वरेता ऋषियो का निवास है । उन्होने लोम, मैयुत, इच्छा, द्वेष, कर्मानुष्ठान,वासना तथा शब्दादि विषयो के दोष-दर्शन आदि का पूर्णतया त्याग क्या हुमा है । इसीलिये उन्होने अमरत्व को प्राप्त कर लिया है ।।६५-६६॥ प्राणियों का प्रनय काल तक स्थिर रहना ही अमरव कहा गया है । तीनो लोकों के स्थित रहने तक के इस समय को अपुनरि महते हैं 18 हे द्विज ! ब्रह्म हत्या और अश्वमेष-यज्ञ में करने से जो पाप- पुण्य हो जाते हैं, उनका पल भी प्रलय काल की उपस्थिति तक हो कहा गया है। यावन्माने प्रदेशे तु मंत्रेयावस्थितो ध्रुव । क्षयमायाति तावत्तु भूमेराभूतसम्प्लवात् ।। ऊर्वोत्तरमृपिभ्यस्तु ध्रवो यत्र व्यवस्थित । एतद्विप्णुपद दिव्य तृतीय व्योम्नि भासुरम् ।१००। निर्धूतदोषपड्वाना यनीना मयतात्मनाम् । स्थान तत्परम विष पुण्यपापपरिक्षाये ११०११ अपुण्यपुष्योपरमे क्षीणाशेपामिहेतव । यन गत्वा न शोचन्ति तद्विष्णो परम पदम् ।१०२। धर्म वाद्यास्तिष्ठन्ति यन ते लोकसाक्षिण । तत्साष्टोत्पन्नयोगेद्धास्तद्विगा. परम पदम् ।१०३१ पभोतमेतत्त्रोत च यद्भूत सचराचरम् । भान्य च विश्व मंत्रेय तद्विपणा परम पदम् ।१०४१ ३१० ] [ श्री विष्णुपुराण दिवीव चक्षुराततयोगिना तन्मयात्मनाम् । विवेकज्ञानदृष्ट च तद्विष्णो परम पदम् ॥१०॥ हे मैत्रेयजी ! जितने प्रदेश मे ध्रव की स्थिति है, पृथिवी से लेकर वह प्रदेश तक सब प्रलय काल में विलीन हो जाता है | वह ध्रुव सप्तर्षियों के उत्तर ओर तथा ऊपर अत्यन्त तेजोमय स्थान है, उसे आकाश में भगवान विष्णु का तीसरा दिव्यधाम समझो ।।१००। पुण्य पाप तथा दोष पक के नष्ट होने से सयतारमा हुए ऋपियो का परम स्थान यही है ॥१०१॥ पुण्य पाप के नष्ट होने तथा देह-प्राप्ति के सब कारणो के क्षीण हो जाने पर जहाँ जाकर प्राणियो को शोक नहीं रहता, वही भगवान् विष्णु का परम पद है ॥१०! जहाँ विष्णु के समान ऐश्वर्यवान् हुए और योग से तेजस्विता को प्राप्त हुए धर्म पौर ध्रव लोक के साक्षि रूप से रहते हैं, वही जन गगवान का परमपद है ॥१०३॥ है मैत्रेयजी | जिसमे भूत, भविष्यत् वर्तमान मय यह चराघर विश्व प्रोत-प्रोत है, वही भगवान् विष्णु का परमपद है ।। १०४ ॥ जो त मय हुए योगियो को आकाश म प्रकाशित सूर्य के समान सबका प्रकाश करने वाला प्रतीत होता है, तथा जो विवक द्वारा ही प्रत्यक्ष हो सकता है, वह भगवान विष्णु का परमपद की है ॥१०५।। यस्मिन्प्रतिष्ठितो भास्वान्मेढीभूत स्वय ध्रुव । ध्रुवे च सर्वज्योतीपि ज्योति प्वम्भोमुचो द्विज ।१०६। मेघेषु सङ्गता वृष्टिवृष्ट सृष्टेश्च पोष्णम् । आप्यायन च सर्वेषा देवादीना महामुने ।१०७ ततश्चाज्याहुतिद्वारा पोपितास्ते हविर्भुज । वृष्ट कारणता यान्ति भूताना स्थितये पुन १०८ एवमेतत्पद विप्रपोस्तृतीयममलात्मकम् । आधारभूत लोकाना अयारणा वृष्टिवारणम् ।१०६। तत प्रभवति ग्रहान्सर्वपापहरा सरित् । गङ्गा देवाङ्गनाङ्गानामनुलेपनपिञ्जरा ।११०॥ वामपादाम्बुजाङ्ग उनसस्रोतोविनिर्गताम् । विष्णोविमति या भयत्या शिरसार्निश ध्रुव १११॥
द्वितीय अश-अ०८ ] [ ३११ -- हे दिज ! उसी विष्णु पद में सबके प्राश्रयभूत अत्यन्त तेजस्वी ध्रुव की स्थिति है और घ्र व में सब नक्षत्र स्थित हैं । नक्षत्रो में मेव तथा मेघो मे वृष्टि पाश्रय लिये हुए हैं । उसी वृष्टि के द्वारा सृष्टि का पोपण होता है तथा. । वही सब देवता, मनुप्पादि प्राणियो को पुष्ट करती है ।। १०६-१०७ ।। फिर गवादि प्राणियो से उत्पन्न दूध, घी प्रादि की आहुतियो से तृप्त हुए अग्नि हो 'प्राणियो का पालन करने के लिये पुन: वृष्टिकारक होते हैं ।।१०८। इस प्रकार भगवान् विष्णु का यह तोपरा लोक ही तीनो लोको का प्राधार भूत तया वर्षा पादि का करने वाला है ।। १०६॥ हे ब्रह्मन् । इसी विष्णुपद से देवागनाओं के नगराग के मिश्रण से पाण्डु पणं की सी होकर सब पापो को नष्ट करने बाली सरिता योगमाजी प्रकट हुई हैं ॥ ११॥ भगवान् विप्रा के बाए चरण कमल प्रमुए नख रूपी स्रोत से निर्गत नन गंगानी को प्रष महनिशि मपन शिर पर धारण किये रहता है ॥१११॥ ततः समर्पयो यस्याः प्राणायामपरायणाः । तिवन्ति वीचिमालाभिरुह्यमानजटा जले १११२१ वार्योधै सन्ततर्यस्या प्लावित शशिमण्डलम् । भूयोऽधिकतरा कान्ति यहत्येतदुह क्षये ॥११३। मेरपृष्ठे पतत्युच्चनिष्क्रान्ता शशिमण्डलाद । जगतः पावनायर्याय प्रयाति च चतुर्दिशम् ॥११४१ सीता चालकनन्दा च चक्षुर्भद्रा च सस्थिता । एकव या चतुभदा दिग्भेदगतिलक्षणा ॥११॥ भेद चालकनन्दाख्य यस्याः सर्वोऽपि दक्षिणम् । दधार शिरसा प्रोत्या वर्षाणामधिक शतम् ।११६॥ शम्भोजटाफलापाच विनिएकान्तास्थिशर्करा। प्लावपित्या दिव निन्ये या पापान्सगरारमजान् ।११७॥ फिर जिनके जल में स्थित हुए प्राणायाम परायण सपि उनकी सरगों से स्टाफ के कृमिल होते हुए भी प्राप्त मर्दन करने वाले मनको रहते हैं और जिनकी गहन जल-राशि से भाप्लावित हुभा चन्द्र मण्टन क्षीरा
३१२ ]
[ श्रीविष्णुपुराण
होने के पश्चात् अधिक कान्तिवान हो जाता है, वे गगाजी उस चन्द्रमण्डल से
निकलकर मेरु पवत पर गिरती हुई जगत् को पवित्र करने के लिये चारों
दिशामों को गमन करती है ॥११२-११४॥ चार दिशामो में जाती हुई एक ही
गङ्गाजी चार धाराप्रो के रूप मे होकर सीता, अलकनन्दा, चक्ष और भद्रा कही
जाती हैं ।।११।। जिनकी अलकनन्दा नामक दक्षिणीय धारा को शिवजी ने
सौ वर्ष से भी अधिक समय तक अपने मस्तक पर प्रीति सहित धारण किया
था तथा जिसने उन शिवजी की जटाग्रा से निकलकर पाप कर्मा सगर पुत्रो की
हड्डियो के चूरे को आप्लावित कर उन्ह स्वर्ग प्राप्त करा दिया था
॥ ११६-११७॥
स्नातस्य सलिले यस्या सद्य पाप प्रणश्यति ।
अपूर्वपुण्यप्राप्तिश्च सद्यो मैत्रेय जायते ।११।
दत्ता पितृभ्यो यतापस्तनयै श्रद्धयान्वित ।
समाशत प्रयच्छन्ति तृप्ति मैत्रेय दुर्लभाम् ।११९।
यस्यामिष्ट्वा महायज्ञ यज्ञश पुरुषोत्तमम् ।
द्विज भूपा परा सिद्धिमवापुर्दिवि चेह च ।१२०॥
स्नानाद्विधूतपापाश्च यजलैर्यतयस्तथा ।
पेशवासक्तमनस प्राप्ता निर्वाणमुत्तमम् ।१२११
श्रुताभिलपिता दृष्टा स्पृष्टापीतावगाहिता ।
या पावयति भूतानि कीर्तिता च दिने दिने ।१२२।
गङ्गा गङ्गति य म योजनाना शतेष्वपि ।
स्थितरचारित हन्ति पाप जन्मत्रयाजितम् ।१२३।
यत सा पावनायाल प्रयारणा जगतामपि ।
समुद्भूता पर तत्तु तृतीय भगवत्पदम् ॥१२४।
हे मरेमजी । जिसके जल मे स्नान करने मात्र से पापों का शीघ्र ही
पाय हो जाता है, तथा भभूत पूर्व पुण्य प्राप्त होता है ।। ११८ ॥ पुत्रो के द्वारा
भपने पितरों के लिये जिसके प्रवाह में एक दिन श्रद्धा पूर्वक किया गया तर्पण
जा गौ वर्ष दुलर्भ तृप्ति प्राप्त कराता है ॥११॥ है द्विज ! राजामो ने जिसके
द्वितीय अग-अ०६] [ ३१३ विनारे पर यशेश्वर भगवान् का महायज्ञो के द्वारा पजन करके इहलोह और परलोक दोनो को सिद्ध कर लिया ॥ १२० ।। जिसम स्नान करके निप्पाप हुए, यतियो ने भगवान् श्रीक्शव मे प्रासक्त चित्त रहकर श्रेष्ठ निर्वाण पद को प्राप्त दिया ।।१२१।। जो श्रवण, दमन, इच्छा, स्परां, जलपान, स्नान पोर कीर्तन से ही प्राणियो को नित्य पवित्र करती रहती है ॥१२२॥ जितके 'गगा' नाम को सौ योजन दूर से भी उच्चारण करने पर वह उसके तीन जन्म के एकत्र पापो को भी निमूल कर देता है ।। १२३ ॥ तीनो लोक को पवित्र करने वाली वह गङ्गा, जिससे पाविर्भूत हुई, वह भगवान् विष्णु का तृतीय परमपद ही है ॥१२४॥ नयाँ अध्याय तारामय भगवत शिमुमाराकृति प्रभो । दिवि स्प हरेर्यत्तु तस्य पुच्छे स्थितो ध्रुव ।। संप भ्रमन् भ्रामयति चन्द्रादित्यादिकान् ग्रहान् । भ्रमन्तमनु त यान्ति नक्षत्राणि च चक्रवत् ।। सूर्याचन्द्रमसौ तारा नक्षनारिण ग्रहै सह। वातानीकमयर्वन्धवे बद्धानि तानि वै ।। शिशुमाराकृति प्रोक्त पद्रूप ज्योतिपा दिदि । नारायणोऽयन पाम्ना तस्याघार स्वय हृदि ।४। उत्तानपादपुनस्तु तमाराध्य जगत्पतिम् । स ताराशिशुमारस्य ध्रुव पुच्छे व्यवस्थित ।। आधार शिगुमारस्य सर्वाध्यक्षो जनार्दन । ध्रुवस्य शिशुमारस्तु ध्रुवे भानुभ्यवस्थित ।। तदाधार जगच्चेद सदेवासुरमानुपम् । येन विप्र विधानेन तन्ममकमना मृणु।७।
३१४ ]
[ श्रीविष्णुपुराण
+
श्री परामरजी ने कहा-शिशुमार की प्राकृति वाला भगवान् विष्णु का
जो तारामय स्वरूप धाकाश मे देखने में माता है, उसी की पूछ में प्रव
है ॥१॥ यह ध्र व स्वय घूमता रहार चन्द्रमा तथा सूर्यादि ग्रहों को घुमाता
रहता है । उस घूमने वाले ध्रव के साथ ही नक्षत्रगरण भी चक्र के समान
घूमते हैं ।।२।। सूर्य, चन्द्र, तारे, नक्षत्र तथा अन्य सभी ग्रह वायुमण्डल रूपी
उस डोर से ध्र व के साथ बंधे हैं ॥३॥ ग्रहो का जो शिशुमार स्वरूप मैंने तुम्हें
बताया है, उसके हृदय स्थित आश्रय अनन्त तेज वाले भगवान् विष्णु ही हैं
॥४॥ उत्तानपाद के पुत्र प्रव ने ही उन जगत्पति भगवान विष्णु की पारा
घना करके उस तारामय शिशुमार को पूछ मे स्थान प्राप्त किया है ।।५।।
शिशुमार के प्राधार स्वय सर्वेश्वर जनादन हैं, वह शिशुमार ध्रुव का भाश्रय
है पौर भव सूर्य का प्राथय है ॥६॥ तपा हे द्विज । देव, असुर, मनुष्यादि
युक्त यह सम्पूर्ण विश्य सूर्य का प्राश्रित है, उसका वृत्ता त सावधान क्ति से
सुनो ॥७॥
विवस्वानष्टभिर्मासरादायापो रसात्मिका ।
वर्पत्यम्बु ततश्चान्नमन्नादप्यखिल जगत् ।।
विवस्वानशुभिस्तीक्षौरादाय जगतो जलम् ।
सोम पुष्णात्यथेन्दुश्च वायुनाडीमदिवि ।।
नालविक्षिपतेऽश्रेषु धूमाग्न्यनिलमूर्तिषु ।
न भ्रश्यन्ति यतस्तेभ्यो जलान्यभ्राणि तान्यत ।१०
अभ्रस्था प्रपतन्त्यापो वायुना समुदीरिता ।
सस्कार कालजनित मैत्रेयासाद्य निर्मला ॥१॥
सरित्समुद्रभीमास्तु तथाप प्राणिसम्भवा ।
चतुष्प्रकारा भगवानादत्ते सविता मुने ।१२।
श्रानाशगङ्गासलिल तथादाय गभस्तिमान् ।
अनघ्रगतमेवोव्यां सद्य क्षिपति रश्मिभि १३
सस्य सस्पर्शनिधूतपापपड़ो द्विजोत्तम ।
न याति नरव मयों दिव्य स्नान हि तत्स्मृतम् ॥१४॥
द्वितीय प्रश-अ०६]
[ ३१५,
सूर्य पाठ महीने तक अपनी किरणो के द्वारा रस रूप जल को ग्रहण
करता और चार महीने उसे बरसाता है । उस जल वृष्टि से अन्न उत्पन्न होता
है, जिस पर सम्पूर्ण विश्व का पोषण निर्भर है।॥ ८ ॥ सूर्य अपनी तीक्ष्ण
किरणो के द्वारा विश्व से जल खीचकर उससे चद्रमा का पोपण करता है और
घद्रमा वायुमयी नाडियों से उसे घूम, अग्नि प्रौर मघ मे पहुंचाता है। चद्रमा
द्वारा प्राप्त यह जल मेपो से दीघ्र ही भ्रष्ट होने के कारण, मेघ 'प्रन' कहे
जाते हैं ।। ६१०॥ हे मंत्र यजी । काल जनित सस्कार से यह मेघो म स्थित
जल निर्मल होकर वायु द्वारा प्रेरित किय जाने पर पृथिवी पर बरसता है ।।११।।
है मुने । नदी, समुद्र, पृथिवी तथा प्राणियो से उत्पन्न इन चार प्रकार के जलो
को भगवान सूर्य अपनी ओर खीचते हैं ।। १२ ।। वे आकाशगगा के जल को
लेकर मेघादि के बिना, केवल अपनी किरणो के ही द्वारा पृथिवी पर बरसाते
हैं ।।१३।। है विप्र श्रेष्ठ । उसके स्पर्श मात्र स पाप रूपी कीचड घुल जाती है,
जिसस मनुष्य नरक प्राप्ति से बच जाता है । इसीलिये इसे दिव्य स्नान कहा
है।॥१४॥
दृष्टसूर्य हि यद्वारि पतत्यौविना दिव ।
आकाशगङ्गासलिल तट्रोभि क्षिप्यते रवे ११५५
कृतिकादिषु रक्षपु विपमेषु च यद्दिव ।
दृष्टापतित ज्ञेय तद्गाङ्ग दिग्गजोज्झितम् ॥१६॥
युग्मर्केषु च यत्तीय पतत्यर्कोन्भित दिव ।
तत्सूर्यरश्मिभि सर्वं समादाय निरस्यते ॥१७॥
उभय पुण्यमत्यर्थं नृणा पापभयापहम् ।
आकाशगङ्गासलिल दिव्य स्नान महामुने ११
यत्तु मेध समुत्सृष्ट वारि तत्प्राणिना द्विज ।
पुष्णात्योषधय सर्वा जीवनायामृत हि तत् ।१८।
तेन वृद्धि परा नीत सकलनौषधीगण ।
साधक फलपाकान्त प्रजाना द्विज जायते ।२०॥
तेन यज्ञान्यथाप्रोक्तान्मानवा शास्त्रचक्षुप ।,
कुर्वन्त्यहरहस्तश्च देवानाप्यायन्ति ते ॥२॥
[ श्रीविष्णुपुराण
सूर्य के दिखाई देते हुए मैघो के बिना ही जो जल दृष्टि होती है, वह
आकाशगगा का जल सूर्य की किरणों द्वारा ही बरसाया हुअा होता है ॥१५॥
कृत्तिकादि विषम नक्षत्रो मे विना मेघो के तथा सूर्य के दिखाई देते हुए बरसने
बाला जल भी आकाशगङ्गा का ही होता है, उसे दिग्गजो द्वारा बरसाया हुमा
समझो ॥ १६ ॥ सम सख्यक नक्षत्रो मे सूर्य द्वारा बरसाया गने वाला जल
सूय की किरणो द्वारा ग्रहण करके ही पृथिवी पर बरसाया जाता है ॥१७॥
हे महामुने । आकाश गङ्गा के यह दो प्रकार के जलमय दिव्य स्नान हैं, जिनसे
मनुष्यो के पापादि भयो का उन्मूलन होता है ॥१८॥ द्विज 1 मेघो के द्वारा
बरसाया जाने वाला जल प्राणियों के जीवन के लिये अमृत तुल्य तथा प्रौषधियों
का पोपक है ॥१६॥ उस वृष्टि जल से सब औषधियां परम वृद्धि को प्राप्त होती
पौर पककर सूखने वाले तथा प्रजानो के पापक होते हैं ॥ २० ॥ उनसे शास्त्रो
के ज्ञाता विज्ञजन प्रति दिन विधिवत् यज्ञो के द्वारा देवताप्रो को प्रसन करते
हैं ॥ २१ ॥
एव यज्ञाश्च वेदाश्च वर्णाश्च वृष्टिपूर्वका ।
सर्वे देवनिकायाश्च सव भूतगणाश्च ये ।२२।
वृष्टया धृतमिद सर्वमन्न निप्पाद्यते यया।
सापि निप्पाद्यते वृष्टि सवित्रा मुनिसत्तम ।२३।
अाधारभूत सवितुर्धवो मुनिवरोत्तम ।
ध्र वस्य शिशुमारोऽसौ सोऽपि नारायणात्मक ॥२४॥
हृदि नारायणस्तस्य शिशुमारस्य सस्थित ।
विभर्ता सर्वभूतानामादिभूत सनातन ।२।
इस प्रकार सव यज्ञ, वेद, ब्राह्मणादि चतुवरां, समस्त देवता तथा
अन्यान्य प्राणी वर्षा पे ही ग्राश्रित हैं ॥२२॥ अन्न को उत्पन्न करने वाली
वर्षा ही इन सबका धारण करने वाली है और यह वर्षा मूर्य से उत्पन्न होती
है ॥२३॥ हे मुनिवरों में श्रेष्ट । सूर्य का प्राधार ध्र व है, प्रव या पाधार
विशुमार है गौर उस शिशुमार ने भी माधार भगवार श्री नारायण हैं ॥२४॥
उस शिशुमार के हृदय मे श्रीनारायण का निवास है, जो राब प्राणियों के
तर, मादिभूत एव सनातन है ॥२५॥
[ ३१७ द्वितीय अंश-अ० १०] दसवाँ अध्याय साशीतिमण्डलगत काष्ठयोरन्तर द्वयोः । आरोहणावरोहाम्या भानोरब्देन या गतिः ।। स रथोऽधिष्ठितो देवरादित्य पिभिस्तथा । गन्धर्वरप्सरोभिश्च ग्रामणोसर्पराक्षसः ।। याता ऋतुस्थला चव पुलस्त्यो वासुकिस्तथा । रथभृद्ग्रामणी तिस्तुम्बुरुश्चैव सप्तमः ।। एते वसन्ति वै चैत्रे मधुमासे सदैव हि । मैत्रेय स्यन्दने भानोः सप्त मासाधिकारिणः । अर्यमा पुलहश्चैव रयौजाः पुञ्जिकस्थला। प्रहेतिः कच्छवीरश्च नारद रथे रवेः १५५ माधव निवसन्त्येते शुचिसजे निवोध मे !६! मित्रोऽनिस्तक्षको रक्षः पौरुषेयोऽय मेनका। हाहा रथस्वानश्चव मैत्रैयते वसन्ति । श्री परारजी ने कहा-ग्रारोह अवरोह से एक वर्ष में सूर्य के रथ को जितनी गति है, उस पूरे मार्ग की दोनों काठामो का अन्तर एक सो अस्सो मण्डल होता है ॥ १॥ सूर्य का वह रथ ऋपि, गर्व, अप्सरा, यक्ष, सर्प और राक्षसो से अधिष्ठित होता है ॥२॥ मधुमास पंत्र मे धाता, क्रतुस्यला, अप्सरा, पुलस्त्य, वासुकि, रयभृत् यक्ष, हेति राक्षस और तुम्बरु नामक गधर्व- यह सात मरसाधिकारी सूर्य के रय मे निवास करते हैं ।। ३.४ ॥ वैशाख मास थे अयमा, पुलह, रयोजा, पुजिवस्थला, प्रहेति, कच्छवीर और नारद सूर्य के रथ में रहते हैं । अव ज्येष्ठ मास में निवास करने वालों के नाम पड़ता है, सुनो ॥५-६ ॥ मित्र, अत्रि, तक्षक, पौरपेय, मैनवा, हाहा और रपस्वन यक्ष उस रप में रहले हैं ॥७॥ वरणो वसिष्ठो नागश्च सहजन्या हुहू रथः । स्थचित्रस्तथा शुक्र यमन्त्यापाहमज्ञो।।
३१८ ]
[ श्रीविष्णुपुराण
इन्द्रो विश्वावसु स्रोत एलापुत्रस्तथाङ्गिरा ।
प्रम्लोचा च गभस्येते रापिश्चात वरान्ति ये ।।
विवस्वानुग्रसेनश्च भृगुरापूरगस्तथा।
अनुम्लोचा राहपालो व्याघ्रो भाद्रपदे तथा ११०
पूपा वसुरचिर्वातो गौतमोऽय धनञ्जय ।
सुपेणोऽन्यो घृताची च वसन्त्याश्वयुजे रवौ ॥१॥
विश्वावसुर्भरद्वाज पर्जन्यरावती तथा ।
विश्वाची सेनजिच्चाप वाति च वसन्ति वै ॥१२॥
अंशयाश्यपताक्ष्यास्तु महापग्रस्तथोर्वशी।
चित्रसेनस्तया विद्युन्मार्गगीऽधिवारिण ।१३।
अनुभंगस्तथोरगापु स्पूर्ण पर्योटपस्तथा।
अरिष्टनेमियान्या पूर्वनित्तिवरारारा ।१४॥
पोपमासे घसन्त्येते सप्त भासरमण्डले ।
सोरप्रसारानार्थाय विप्रवर्याधिकारिण ॥१५॥
द्वितीय प्रश-५०१०] त्वष्टाय जमदग्निन स्वलोऽय तिलोत्तमा । ग्रह्मोपेतोऽय शतजिद् धृतराष्ट्रोऽय सप्तम १६ माघमासे वसन्त्येते सप्त मैनेय भासरे। थूयता चापरे मूर्य फाल्गुने निवसन्ति ये ॥१७॥ विप्गुरश्वतरो रम्भा मूययश्च सत्यजिन् । विश्वामित्रस्तया रक्षो यज्ञोपेतो महामुने ११८॥ मासेवेतेषु मैत्रेय वमन्त्येते तु ससका । मवितुर्मण्डले ब्रह्मन्विष्णुगवत्युपवृहिता ॥१६॥ स्तुवन्ति मुनय सूर्य गन्धर्वर्गीयते पुर । नृत्यन्त्यासरतो यान्ति मूर्यस्यानु निशाचरा. १२० वहन्ति पनगा यक्ष क्रियतेऽभीपुसड ग्रह । बालसिल्यास्तथैवन परिवार्य समासते ॥२१॥ सोध्य सप्तगण सूर्यमण्डले मुनिसत्तम । हिमोग्णवारिवृष्टीना हेतु स्वसमय गत ।२२१ माप में त्वष्टा, जमदाग्नि, रम्बल नामक सपं. दिलोत्तमा पामरा, भागात राक्षस, ऋतजिन पक्ष मोर धृतराष्ट्र गंपवं सूर्य के रप में रहते है । पय पाल्गुन माम में सूर्य-रप पर निवास करने वाले पायाधिकारियों के नाम मुनो ॥१६-१७॥ विष्णु नामक प्रादित्य, प्रयतर सर्प, रम्मा, सूर्यवर्धा गघर्ष, मत्यजित या, विश्वामित्र गौर यसोचत नाम राक्षस दसमे रहते है ॥१८॥ (हे ब्रह्मन मार भगवान विष्णु की गति से देजस्विता प्राम पर यह पात-मात गण एक-एक महीने में मयं मे रप में रहते है ॥१॥ नम समय मुनिपण स्तुति करते, गपवं गण पूर्व हा गुण-गान बरते, अप्सराएं नृत्य परतो, रामपण त्य से पौधे पीछे पलने, गपंगाप उस रस हो वहन योग्य गगाने, दारा की बागडोर म्हणले पोर सनसियादि उने गर पोर रो पेरेले हैं ।।२०-२१॥ हे मुनिष । म मएडल रे हो जात-गाव मा भने पास में गीर, नएता पौर दृष्ट मादिरे तु होते हैं ।।२२।।)
३२० ] [ श्रीविष्णुपुराण ग्यारहवाँ अध्याय यदेत भगवानाह गणः सप्तवियो रवेः । मण्डले हिमतापादे: कारण तन्मया श्रुतम् ।। व्यापारश्चापि कथितो गन्धर्वोरगरक्षसाम् । यापीणा वाल गिल्याना तथंवाप्सरसां गुरो ।। यक्षाणां च रथे भानोविष्णुगक्तिधृतात्मनाम् । कि पादित्यस्य यत्तम तानानोक्त त्वया मुने ।। यदि सागरगो वारि हिममुष्णं च वर्षति । तस्यिमा रवैयेन वृष्टि मूर्यादितीयते ॥४॥ विवस्वानुदितो मध्ये यात्यस्तमिति यि जनः । यवीयेतन्मगं गर्म यदि मातगणस्य तत् ।। भैप श्रूयतामेतपद्यान्परिपृच्छति । यथा गमगर प्राधान्येनाधितो रविः ।। गगति पग विगोरगाण गामगशिता। मंगा यी नपरयही जगता हितस्ति पा ।
द्वितीय अग-अ०११]
[ ३२१
है ॥३॥ भगवान् विष्णु की ऋक, यजु, माम नाम की गु गनिमयी जो
पराशक्ति है, वही वेदनयो स्य को ताप दती है और यही जंगत ३ मब पारों
पानास करती है।
संप विष्णु स्थित स्थित्या जगत पाननोद्यत ।
मृग्यजु सामभूतोऽन्त सवितुर्दिन तिष्ठनि ।
मासि मासि रवियों यस्ता तय हि मा पग।
यमयी विष्णुगतिरवस्थान करानि ।
च स्तुवन्ति पूवाह मध्याह्नय यतृपि ।
वृहदयन्तरादीनि सामान्यह्न क्षय रविम् 1101
अङ्गमेपा नयी विष्णोरग्यजु माममनिता।
विष्णुगक्तिरवस्थान मदादिय गति मा।।
न चिन रवे शक्तिर्वष्णवी मा यी।
ब्रह्माय पुरुपो रद्रख्यमनत्यत्रीमन 17
मर्गादी इ मया ब्रह्मा म्यिता 1ि
रद्ध साममयाऽन्नाय तम्मान-2
३२२ ] [ श्रीविष्णुपुराण तया चाधिष्टित सोऽपि जाज्वलीति स्वश्मिभि । तम समस्त जगता नाश नयति चाखिलम् ॥१५॥ स्तुवन्ति चैन मुनयो गन्धर्वर्गीयते पुर । नृत्यन्तोऽप्सरसो यान्ति तस्य चानु निशाचरा ॥१६॥ वहन्ति पन्नगा यक्ष क्रियतेऽभीषुसड ग्रह । बालखिल्यास्तथैवैन परिवार्य समासते ।१७। नोदेता नास्तमेता च कादचिच्छक्तिरूपधृक् । विष्णुर्विष्णो पृथक् तस्य गणस्सप्तविधोऽप्ययम् ॥१८॥ स्तम्भस्थदर्पणस्येव योऽयमासन्नता गत । छायादर्शनसयोग स त प्राप्नोत्यथात्मन ।१६। एव सा वैष्णवी शक्ति वापति ततो द्विज । मासानुमास भास्वन्तमध्यास्ते तत्र सस्थितम् ।२०। इस प्रकार वह त्रयीमयी सात्विको वैष्णवी शक्ति अपने सात गणों में स्थित सूर्य मे ही अवस्थान करती है ॥१४॥ उमसे अधिष्ठित हुए सूर्य भी अपनी रश्मियो से और भी प्रखर होते हुए जगत के अधार को मिटा देते हैं ॥१५॥ (ऐरो उन सूर्य को मुनि स्तुति करते, गधव यश कीतन परते, अप्सराएं नृत्य परती, रासस पीछे चलते, सप रथ को सजाते, यक्ष पोडो वो बागडोर पडते धौर बाल्यखिल्यादि उस रथ यो सब मोर से धेरै हुए चलते हैं ॥१६-१७ उन त्रयीमयी शक्ति वाले भगवान् विष्णु कापभी उदयास्त नहीं होता मोर यह सात प्रकार ये गण नवे अलग ही हैं ॥१८॥ जरो स्तम्भस्थ दपण पे पास जाने वाले को सदा उसकी छाया दिखाई देती है वैसे ही विष्णु की वह शक्ति मूर्य थे रप में सदा रहती है तथा प्रत्येक मास म सूय में पृथक् पृथक् रूप में स्थित होने वह वही सम्ति उनकी मधिष्ठात्री होती है ॥२०॥ पितृदेवमनुप्यादीन्स रादाप्याययन्प्रभु । परियतस्यहोरात्रपारण सविता द्विज ॥२१॥ गूर्यरश्मि सुषुम्ना यस्तपितस्तेन चन्द्रमा । गृष्णपक्षेमरं शश्वत्पीयते वै सुधामय ।२२।
द्वितीय अंश-अ० १२] [ ३२३ पोत तं द्विपलं सोमं वृष्णपक्षक्षये द्विज । पिवन्ति पितरस्तेषा भास्करात्तपण तथा ॥२३॥ पादत्ते रश्मिभिर्यन्तु क्षितिसस्य रस रवि. । तमुत्सृजति भूतानां पुष्टचर्थ सस्यवृद्धये (२४॥ सेन प्रोणास्यशेपाणि भूतानि भगवान वि.। पितृदेवमनुप्यादीनेवमाप्याययत्यसौ ॥२५॥ पक्षतृप्ति तु देवाना पितृणा चैव मासिकीम् । शश्वत्तृप्तिं च मयाना मैत्रेया. प्रयच्छति ॥२६॥ हे द्विज । दिन और रानि को उत्पन करने वाले सूर्य पितर, देवता और मनुष्यादि को सदा तृप्त करते हुए भ्रमण करते हैं ।।२१।। सूर्य की सुषुम्ना नाम्नी किरण शुक्लपक्ष मे चन्द्रमा को पुष्ट करती है और कृपए पक्ष में देवगण। उस अमृतमय चन्द्रमा बी एव एक क्ला को पीते रहते हैं ॥२२॥ कुप्रापक्ष के क्षीण होने पर पितरगण दो कत्रा वाले चन्द्रमा का पान करते रहते हैं । इस प्रकार मर्य के द्वारा पितरो का तर्पण किया जाता है ॥२३॥ अपनी किरणों के द्वारा सूर्य पृथिवी गितने गन को प्रापित करता है, उसको प्राणियो के पोपण और मान की वृद्धि के लिये पृधियो पर ही बरसा देता है ॥२४॥। इस प्रकार सूर्य समस्त प्राणियो को प्रसन्न करते हुए देवगण, मनुष्य गण मौर पितरगण आदि सभी को तृप्त करते हैं ।।२५। है मंत्रेयजी । इस प्रकार से भगवान सूर्य देवताप्रो की पाक्षिक, पितरो की मासिक और मनुष्यो की दैनिक तृप्ति के कारण हैं ६॥ यारहवाँ अध्याय रयषिचा सोमस्य कुन्दाभास्तस्य वाजिन. । वामदक्षिणतो युक्ता दश तेन चरत्यसोश
३२४ ]
[श्रीविष्णुपुराण
वीथ्याश्रयागि क्षाणि ध्र वाधारेण वेगिना।
हासवृद्धि कमस्तस्य रश्मीना सवितुर्यया ।२।
अर्कस्येव हि तस्याश्वा सकृद्युक्ता वहन्ति ते ।
कल्पमेक मुनिश्रष्ठ वारिगर्भसमुद्भवा ।३।
क्षीण पीत सुरै सोममाप्याययति दीप्तिमान् ।
मैत्रेयककल सन्त रश्मिनकेन भास्कर ।४।
क्रमेण येन पीतोऽसौ देवस्तेन निशाकरम् ।
आप्याययत्यनुदिन भास्करो वारितस्कर १५॥
सम्भृत चार्धमासन तत्सोमस्थ सुधामृतम् ।
पित देवा मैनेय सुधाहारा यतोऽमरा ।।
नयस्त्रिंशत्सहस्राणि नयस्त्रिंशच्छतानि च ।
प्रयस्त्रिंशत्तथा देवा पिवन्ति क्षरणदाकरम् ।७।
थी परागरजी ने कहा-च द्रमा के रथ म नीन पहिये हैं उसके बाए
भौर दाल और कु द पुष्प के समान राफेद रग के दस घोडे जुते हुए है । वह
रथ ध्रुव वे आधार पर स्थित है । चन्द्रमा उसी वेगवान रथ पर चढकर भ्रमण
करते हैं तया नागवीथि पर ग्राभित मावनी प्रादि नक्षया को भोगते हैं । सूर्य
के समान इनकी विरण भी यूनता और वृद्धि को प्राप्त होती रहती हैं ॥१२॥
हे मुनिवर । सूय वे समान उनके पोड भ समुद्र के गर्भ से उत्पन्न होकर एक
यार मोते जान पर एक कल्प तव रथ यो खीचते रहते है ॥३॥ हे मैत्रेयजी !
देवतामो द्वारा पान किये जान से मारण क्षीण हुए मा मात्र चन्द्रमा को सूर्य
अपनी frरणों रो पुन पुष्ट करते हैं ॥४॥ जिस प्रम स देवता उनका पान
करते हैं उसी प्रम से शुक्ल पक्ष पो प्रतिपदा स जल पा अपहरण करने वाले
गूय उन्हें रिय प्रति पोपित करते हैं । इस प्रकार मधमास म सपित
हुए पदमा पे उस पमृत पा दवगरण पुन पान परने लगते हैं क्योपि उन
यतामों का पाहार वही प्रमृत है ॥६॥ ततीरा रास्र, तीस सौ सनौरा
या पद्धमा थे उस पगृत पो पीते रहत है ॥७॥
द्वितीय अश-०१२ ] [ ३२५ क्लाद्वयावशिष्टस्तु प्रविष्ट सूर्यमण्डलम् । अमाख्यरसमोवसति अमावास्या तत स्मृता !! अप्सु तस्मिन्नहोराने पूर्व विशति चन्द्रमा । ततो वीरुत्सु वसति प्रयात्यकं तत कमात् ।। छिनति वीरुधो यस्तु वीरुत्सस्ये निशाकरे। पन या पातयत्येक ब्रह्महत्या स विन्दति ॥१०॥ सोम पञ्चदशे भागे निश्चिच्छिप्टे क्लात्मके। अपराले पितृगणा जघन्य पर्युपासते ।११। पिवन्ति द्विवलाकार शिष्टा तस्य कला तु या। सुधामृतमयी पुण्या तामिन्दो पितरो मुने ।१२। निस्सृत तदमावास्या गभस्तिम्य सुधामृतम् । मास वृमिमवाप्यग्रया पितर सन्ति निर्वता । सौम्या वहिपदश्चव अग्निप्वात्ताश्च ते विधा ॥१३॥ एव देवान् सिते पक्षे वृणपक्ष तथा पितृन् । योरुघश्चामृतमयं. शीतरप्परमाणुभि ११४। वीरुधोपधिनिष्पत्या मनुष्यपशुकीटवान् । प्राप्याययति शीतागु प्राकाश्याह्नादनेन तु ॥१५॥ जब चन्द्रमा फला-मार रह जाता है और सूर्य मण्डल में प्रविष्ट होकर उसकी ममा नाम की किरण में रहता है, तब उस दिन को प्रमावस्या कहते हैं ॥८॥ उस दिन यह रात्रि काल में प्रथम जल में प्रविष होता, पिर वृक्ष- मतादि में रहता और गिर क्रम से मूर्फ मे पहुँच जाता है। जब चन्द्रमा यस भौर पतादि में रहता है तब उस ममावम तिथि यो यदि योई उसका एक पता भी तोडना है तो उसे ब्रह्म हत्या का भागी होना होता है ॥१०॥ येवल पन्नहीं वसा के पच रहने पर उम सारणकाप चन्द्रमा को अध्याह्नोतर बालम पितरणण सय पोर मे मा घेरते हैं।॥ १॥ उस समय उस चन्द्रमा पीए मशिष्ट सुधामयी बा को ये पितरगण पीते हैं ॥१२॥ ममावस में दिन पद्रमा को रिण से निवले हुए उस प्रमृत पो पौतर तृा हुए थे सौम्य, [ श्रीविष्णुपुराण वहिपद् और अग्निष्वात्त पितरगण एक महीने तक तृप्त रहते हैं ॥१३॥ इस प्रकार च द्रमा से शुक्ल पक्ष मे देवतायो की और कृष्ण पक्ष मे पितरो की पुष्टि होती है तथा वह चन्द्रमा अपने शीतल जल-करणो से लता, वृक्ष प्रोपघि मादि को उत्पन्न और अपनी चन्द्रिका द्वारा प्रासादित करके मनुष्य, पशु, कोटादि प्राणियो को परिपुष्ट करते हैं ॥ १४-१५ ॥ वाय्वग्निद्रव्यसम्भूतो रथश्चन्द्रसुतस्य च । पिशङ्ग स्तुरंगयुक्त सोऽष्टाभिर्वायुवेगिभि ।१६। सवरूथ सानुवर्षों युक्तो भूसम्भवैर्हयै । सोपासङ्गपताकस्तु शुनस्यापि रथो महान् ।१७। अष्टाश्व काञ्चन श्रीमान्भौमस्यापि रथो महान् । पद्मरागारुणरश्ौ सयुक्तो वह्निसम्भवै ॥१८॥ अष्टाभि पाण्डुरैर्युक्तो वाजिभि काञ्चनो रथ । तस्मिस्तिष्ठति वर्षान्ते राशौ राशौ बृहस्पति ।१६। पावाशसम्भवैरव शवले स्यन्दन युतम् । तमारुह्य शनैर्याति मन्दगामी शनैश्वर ।२०। चन्द्रमा का पुत्र बुध है । उसका रथ वायु मौरमग्नि से बना है. वायु- वेग वाले पिसग वर्ण पाठ अश्व उसमे जुते हैं ।।१६।। लौह भावरण, रथ का निघला भाग, पास्त्र-स्थान, पताका तथा पृथिवी से उत्पन्न हए मश्वो के सहित शुट का रय भी बहुत बड़ा है ॥१७॥ मगल का रथ माठ घोडो से पत्यन्त शोभामान, स्वणं से बना हुमा है, उसमे मग्नि से उत्पन्न हुए पराग मणि जैसे परण वणं ये घोडे जुत हैं ॥१८॥ पाण्डुरवणं ये माठ भयो बाते स्वणं रथ में वर्ष के अन्तिम पाल मे प्रत्येय राशि मे वृहस्पतिजी बैटते हैं l जिस रथ में प्रापारा से उत्पन्न हुए पद्भुत यण वाले पदव जुड़े हैं, उस पर पदपर निश्परजी मन्दगति से चलते हैं ॥२०॥ स्वर्भानोस्तुग्गा ह्यष्टौ भृङ्गाभा धूमर रथम् । सच तास्तु मैत्रेय वन्यविरत सदा ॥२१॥ पुक्त द्वितोयप्रश-०१२ ] [ ३२७ आदित्यानिस्सृतो राहु सोम गच्छति पर्वसु । आदित्यमेति सोमाच पुन सौरेषु पर्वसु ॥२२॥ तथा केतुरयस्याश्वा अप्यष्टौ वात रहम । पलालघूमवर्णाभा लाक्षारसनिभारुणा ॥२३॥ एते मया ग्रहारण वे तवाख्याता रथा नद । सर्वे वे महाभाग प्रवद्धा वायुरश्मिभि १२४१ ग्रहक्ष ताराधिष्ण्यानि ध्रुवे बद्धान्यशेषत । भ्रमन्त्युचितचारेण मैत्रयानिलरश्मिभि १२५॥ यावन्त्यश्चय तारास्तास्तावन्तो वातरश्मय । सर्वे ध्र वे निवद्धास्ते भ्रमन्तो भ्रामयन्ति तम् ॥२६॥ तैलपोडा यथा चक्र भ्रमन्तो भ्रामयन्ति । तथा भ्रमन्ति ज्योतीपि वातविद्धानि सर्वश ॥२७॥ अलातचक्रवद्यान्ति वातच रितानि तु । यस्माज्ज्योतीपि वहति प्रवहस्तेन स स्मृत ॥२८॥ राहु का रथ पूमर वर्ष वाला है । उसम भौरी के समान काले रंग के पाठ पश्व जुते हैं । उन घोडों को एक बार जोर दिया जाय तो वे निरन्तर प्रयाय गति से चलते रहते हैं ॥२१॥ चन्द्रमा के परों पर यह राहु से निस्त- र चन्द्रमा मे जाता मोर सूर्य के पर्चा पर चन्द्रमा से निलर मूर्य में स्थित होता है ॥२२॥ ऐसे ही रथ म जुड़े हुऐ वायुवेग वाले माठ घोडे पलान धूप वर्ष जैसी मामा मौर लाह जमे लाल वशं के हैं ॥२३॥ है महाभाग । यह नवाह से रयो घा वएन मैंने तुम से दिया है यह सभी मह वायुमग्री रस्सी के साप प्रध स ये है ॥२४॥ है मैनेयसी । सभी गृह, नक्षत्र और वारे वायुमयी और में ध्रव के साथ बंधकर भ्रमण करते रहते है।रश रतने तारे हैं, उतनी ही वायुममी रस्सिया हैं, उनसे बंधकर यह पूमते हुए मद को भी घुमाते रहते हैं ॥२६॥ जैसे तेली स्यर घूमने ये बोन्ह को पुमाते रहते हैं, पंस ही सद प्रह वायु के वचन में घूमते रहते है ॥२॥ इस पातमय एक के प्रेरण से समस्त ग्रह परातु एक ले समान घूमने पे कारण 'प्रयह कहा गया है ।।
३२८ ] [ श्रीविष्णुपुरास शिशुमारस्तु य प्रोक्त स ध्र वो यत्र तिष्ठति । सनिवेश च तस्यापि शृणुप्व मुनिसत्तम ।२६। यदह्ना कुरुते पाप त दृष्ट्वा निशि मुच्यते । यावन्त्यश्चैव तारास्ता शिशुमाराश्रिता दिवि ॥३०॥ तावन्त्येव तु वर्षाणि जीवत्यम्यधिकानि च । उत्तानपादस्तस्याथो विज्ञेयो ह्य त्तरो हनु ॥३१॥ यज्ञोऽधरश्च विज्ञेयो धर्मो मूर्द्धानमाश्रित । हृदि नारायणश्चास्ते अश्विनौ पूर्वपादयो ।३२। वरणश्चार्यमा चैव पश्चिमे तस्य सक्थिनी। शिश्न सवत्सरस्तस्य मियोऽपान समाधित ॥३३॥ पुच्छेऽग्निश्च महेन्द्रश्च पश्यपोऽथ ततो ध्रुव । तारका शिशुमारस्य नास्तमेति चतुष्टयम् ।३४। इत्यपनिवेशोऽय पृथिव्या ज्योतिपा तथा। द्वीपानामुदधीना च पर्वताना च कीर्तित ॥३५॥ वारणा च नदीना च ये च तेषु वसन्ति वै। तेषा स्वरुपमाख्यात सक्षेप श्रूयता पुन १३६। पहले जिस frjमार घर का वणन किया जा चुका है मौर जहाँ प्रव स्थित है, पब उसकी स्थिति व विण्य म पता है, मुनो ॥२६॥ दिन मशिग मनुष्य स पाप व होगय हों, वह मनुष्य रात्रि पार उनका परन सा पापा मर जाता है तथा पाका मएडा म जितन ताराण इस पारे माथित है, उता गरया अधिप या तब बीवित रहता है उत्तापाद उसकी पर पो टो। गगनी जाती है ॥३० ३१॥ या उगीचे की ही है पम उम माता पर पिन ! नारायण उग एदया है तथा पानी मार उमदपूपि परणों ॥३॥ पापा में पर धोरमा, FOTRगपरमर तथा प्रपा दम मित्र ||गुरण भाग माःपर और पप है। यह पनि मानि पारा तार की मात मी ही साग र पृथिवी, रीप, सगु, गपत, वर्ष और मरी परी हितीय अग-अ० १२ ] [३२६ पन्या य जो भी वहां हैं, उन सबका रदस्प मैने तुम से कह दिया । इन भव सक्षिप्त स्पस पिर मुनला ॥३५२६॥ यदम्बु वयव कायस्ततो विप्र वसुन्धरा। पद्माकारा समुद्भूता पर्वता यादिलघुता Int ज्योतीपि विप्गुर्भुवनानि विगुवनानि विष्णुरियो दिगश्च । नद्य ममुद्राश्च स एव सर्वं यदम्ति यनास्ति च विप्रवर्य । ज्ञानम्वरूपो भगवान्यतोश्नावगेपमूतिर्न तु वस्तुभूत । ततो हि दोलाविपरादिभेदाज्ञानोहि विनानविजृम्नितानि यदा तु शुद्ध निज-पि सर्व क्मक्षये नानमपान्नदोपम् । तदा हि सङ्कल्पतरो फ्लानि भवन्ति नो वस्तुपु वस्तुभेदा १४० वस्त्वस्ति किं कुचिदादिमन्यपर्यन्तहीन सततवम्पम् । यच्चान्यथाल द्विज याति भूयो न ततया तन कुतो हि तत्त्वम् ॥४॥ मही घटत्व घटन कपालिका वपालिका चूर्णरजस्ततोगु । जन स्वमस्तिमितात्मनिश्चयरालक्ष्यते वहि क्मिन वस्तु । तस्मान विज्ञानमृतेऽन्ति विञ्चित्वचित्वदाचिद्विज वस्तुजातम् । विनानमेर निजवर्मभेदविभिनचितधान्युपेतम् ॥४३॥ ज्ञान विगुद्ध विमल विशोक्मोपलोभादिनिरन्तसङ्गम् । एक मदेव परम परेग स वासुदेवो न पत्तोऽन्यदन्ति ॥४॥ है विप्र । भगवान् विष्णु के दह चपन से परत और समुद्रादि ते मुक्त पार वाली यह पृथिवी सम्पन्न हुई है ॥३५॥ हे विश् । ठारे, भुवन, वन, पवत, दिशा, नदी पौर समुद्र यह सभी भगवान् विष्णु हैं तथा प्रयाप जो कुछ भी है, पयवा नहीं है वह भी सब केवल नादान ही है ८ भगवान् विष्णु मानस होन से सर्वाद हैं, परिन्छिल पदार समान नहीं है। इसलिए इन पदन, समुद्र, पृथिवी भादिभेदों को वन विज्ञान पा दिलाए ही समभोप मानसान पार निदोर हुमा प्रारी सभी काँका यहा जान पर अपने पद स्वरूप को धारण कर लेता है, सर पाप दनु में साल दर के पनरवरप पदाद दिखाई नहीं देवा ॥४०॥ कोई ३३० ] [ श्रीविष्णुपुराण भी वस्तु कहाँ है ? प्रादि, मध्य प्रौर मन्त से परे, एकप, नित्य एव चिन् स्वरूप हो तो सर्वव्याप्त है । जो वस्तु बारम्बार परियतित होती रहती है वह यथार्थ रूप घाली यहाँ रही ? ॥४।। मिट्टी ही घट हो जाती है, घट से कपाल, कपाल से चूरा, पूरे से रज और रज से प्रणु रूप होकर पुन मिट्टी बन जाती है, तो फिर अपने धर्म-बन्धन के माश्रित हुए मनुष्य प्रात्म स्वरूप को भूनकर किस सत्य वस्तु का दर्शन करते हैं ? ॥४२॥ विज्ञान के सिवाय माही कुछ नही है। वही एक विज्ञान अपने-अपने वमों के भेद से विभिन्न वितों द्वारा मनेव भेद वाला मान लिया है ॥४३॥ परन्नु वह विज्ञान अत्यात शुद्ध, मल रहित, तथा शोक लोभादि सभी दोपो से शून्य वेयल एक सास्वरूप, बामु. देव, परमेश्वर है, उससे पृथक् कुछ नहीं है ॥४४।। सद्भाव एव भवतो मयोक्तो ज्ञान यथा सत्यमसत्यमन्यत् । एतत्तु यत्सव्यवहारभूत तनापि चोक्त भुवनाश्रित ते ॥५॥ यज्ञ पशुर्वह्निरशेष ऋत्विवसोम सुरा स्वर्गमयश्च काम । इत्यादिकर्माश्रितमार्गदृष्ट भूरादिभोगाश्च फलानि तेपाम् ।४६। यच्चतद्भुवनगत मया तवोक्त सर्वत्र व्रजति हि तन कर्मवश्य । ज्ञात्वैव ध्रुवमचल सदैकरूप तत्कुर्याद्विशति हि येन वासुदेवम् ॥४७॥ इस प्रकार तुम्हारे प्रति यह परमार्थ-विषय मेने कहा ही सत्य और उससे भिन्न जो कुछ है, वह सब असत्य समझो । जो केवल व्यवहार भूत है, उस भुवन विषयक वृतान को भी तुमसे कह चुका हूँ॥४५।। यज्ञ, पशु, पग्नि, ऋत्विक, सोम, देवगण और स्वर्गमय अभिलापा प्रादि विषय भी बता दिया । पृथिवी प्रादि लोको के सब भोग इन कर्मों के हो प्राधित हैं ॥४६॥ यह जो भुवनगत लोको के विषय गे मैंने कहा है, उन्ही मे यह प्राणी अपने कर्म के वशीभूत हुआ घूमता रहता है, यह जानकर वही करना उचित है जिससे प्रव, अचल और सदैव एक रूप वाले भगवान वासुदेव की प्राप्ति हो सवे ॥४७॥ एकमान ज्ञान द्वितीय अंश-अ०१३ ] तेरहवाँ अध्याय भगवन्सम्यगाख्यातं यत्पृष्टोऽसि मा किल । भूसमुद्रादिरारिता संस्थानं ग्रहसं स्थितिः ।१५ विप्ण्वाधारं यया चैतत्त्रैलोक्य समवस्थितम् । परमार्थस्तु ते प्रोक्तो यथा ज्ञानं प्रधानतः ।। यत्त्वेतद्भगवानाह भरतस्य महीपतेः । श्रोतुमिच्छामि चरित तन्ममाख्यातुमर्हसि ॥३॥ भरतः स महीपालः शालग्रामेऽवसत्किल । योगयुक्तः समाधाय वासुदेवे सदा मनः ।। पुग्यदेशप्रभावेन ध्यायतश्च सदा हरिम् । कथं तु नाभवन्मुक्तिर्यदभूत्स द्विजः पुनः १५५ विप्रत्वे च कृत तेन यद्भ्यः सुमहात्मना। भरतेन मुनिश्रेष्ठ तत्सर्वं वक्तुमर्हसि ।। श्री मैत्रेपनी ने कहा- हे भगवन् ! पृथिवी, समुद्र, नदी, पह स्पिति प्रादि विषयक मेरे सब प्रश्नो को मापने कह दिया था यह त्रैलोक्य भगवान् विष्णु के किस प्रकार प्राश्रित है और परमार्थ रूप ज्ञान ही किस प्रकार प्रधान है, यह सब भी आपने कह दिया ॥२॥ परन्तु, भगवन् ! अापने बिस राजा भरत के विषय मे पहले कहा था, उनके चरित्र को सुनने को मेरी इच्छा है, उरो कृपा पूर्वक कहिये ।।३।। कहा जाता है कि वह राजा भरत निरन्तर योग- मग्न रहकर भगवान् मै ध्यान लगाये शालग्राम क्षेत्र में निवास करते रहते थे 1॥४॥ परन्तु, पुण्य देव के पास और हरि-चिन्तन से भी यह मोक्ष को प्राप्त नहीं हुए, उन्हे ब्राह्मण रूप मे पुनः जन्म ग्रहण करना पड़ा ।। हे मुनिवर ! उन महात्मा भरत ने ब्राह्मण होकर क्या-क्या किया पह सब कृपा-पूर्वक बताइये ॥६॥ शालग्रामे महाभागो भगवन्यस्तमानसः । स उवास चिरं कालं मैत्रेय पृथिवीपतिः ७।
३३२] [ श्रीविष्णुपुराण अहिंसादिप्वोपेपु गुणेपु गुणिना वरः। अवाप परमा काष्ठा मनराश्चापि सयमे ।। यज्ञेशाच्युत गोविन्द माधवानन्त केशव । कृपण विप्पो हृषीकेश वासुदेव नमोऽस्तुते ।। इति राजाह भरतो हरेर्नामानि केवलम् । नान्यञ्जगाद मैत्रेय किश्चित्स्वप्नान्तरेऽपि च । एतत्पदन्तदर्थ च विना नान्यदचिन्तयत् ॥१०॥ समित्पुप्पकुशादान चक्र देवक्रियावृते। नान्यानि चक्र कर्माणि निस्सगो योगतापस. ११॥ जगाम सोऽभिषेकायमेक्दा तु महानदीम् । सस्नो तय तदा चक स्नानस्यानन्तरक्रिया. ॥१२॥ प्रथाजगाम तत्तीर जल पातु पिपासिता । पासनप्रसवा ब्रह्मन्नेव हरिणी वनात् ॥१३॥ ततः समभवत्ता पीतप्राये जले तथा। सिंहस्य नादः सुमहान्सर्वप्राणिभयङ्करः ॥१४॥ थी परामारजी ने कहा-हे मैत्रेयजी ! उन महामाग राजा भरत ने मगपार पा प्यान परते हुए चिर पाल तर शासग्राम क्षेत्र में निकाय नित 1910 गुणियों में ये? उन भरत ने महिसादि गुणो के पासन पूर्व मन से मपम रखार परम घेता कोहे मोश ! प्रत ! गोविन्द ! भाषण ! पनन्त ! पेशव ! कृपा ! विष्णो ! हपौवेश ! वासुदेव ! मासो मगरकार है । इस प्रसर रामा मरत येवल यौहरि नामों का उत्पारण परले एथे। स्वप्न में भी वह रंगी परी पासे रहते धौर इस पारित एप भी चिन्तन न बरले ॥१॥वर पग-रहित, योगी पोर तपस्वी राग प्रम-गरन के निमित मणिप, पुष्प पोर मात्र करते रहे पहिरिन्द्र पार मर्म नही ले ॥१॥र दिन की बात है उन्होंने मी र पारन पिया घोर रिमान वे पार गिरको।१२॥ ही उस मीटर पर प्यायीहरिकी पल पीरि माई, द्वितीय अंश-अ०१३ ] [ ३३३ वह हरिशी प्रासन्न प्रसवा घी ॥१३॥ वह जैसे ही जल पो पुगी, वैसे ही सब जीवों को भयभीत करने वाला भपका सिंहनाद सुनाई दिया ॥१॥ ततः सा सहमा नासादाप्लुता निम्नगातटम् । अत्युचारोहणेनास्या नद्या गर्भः पपात ह ॥१५॥ तमूह्यमान वेगेन बीचिमालापरिप्लुतम् । जग्राह स नृपो गर्मात्पतितं मृगपोतकम् ॥१६॥ गर्भप्रच्युतिदोपेण प्रोत्तुङ्गाक्रमणेन च । मैनेय सापि हरिणी पपात च ममार च ॥१७॥ हरिणी ता विलोक्याय विपन्ना नृपतापस.। गुगपोत ममादाय निजमाश्रममागतः १११ चकारानुदिन चासो मृगपोतम्य चे नृपः । पोपण पुप्यमाणश्च स तेन ववृधे मुने ११६॥ चचाराथमपर्यन्ते तृणानि गहनेषु स. । दूरं गत्वा च भार्दूलनासादम्याययो पुनः ॥२०॥ प्रातर्गत्वातिदूर च मायमायात्यथाश्रमम् । पुनश्च भरतस्याभूदाश्रमत्योटजाजिरे ॥२॥ वह मायन्त भयभीत हुई और उघन र नदी तट पर प्रागई। पे स्थान पर उछलने के कारण उसका गर्भ नदी के जल मे जा गिरा॥ भोको तरंगो में बहते हुये उस गर्भ से गिरे मृगशावक को राजा भरल ने पर निया हे पपजी ! गर्भपात होने पर बहुत के दो माम मारने के कारण वह हरिणी भी पृथिवी पर गिर गई ॥१७॥ उस हरिणी को मरी देसर तपस्वी भरत उग मृग वाला को लेकर अपने प्राधम पर भागये ॥१ है मुने ! राजा भरत उस मृगशावर रा पासन पोपण करने लगे, जिससे वह उनसे पोषित हमा नित्य प्रनि वृद्धिको प्राप्त होने लगा ॥१६॥ यह बालक कभी उनके भायम के निस्टपर्यो प्रदेश मे चरा परता और कभी मुदूर जान में पता माता और फिर सिंहादि देर सौर माता ॥२०॥ प्राय पान ३३४ । [ श्रीविष्णुपुराण होने पर यदि दूर चला जाता तो भी सायकाल होने पर आश्रम में स्टकर पर- शाला के मांगन में लेट जाता ॥२१॥ तस्य तस्मिन्मृगे दूरसमीपपरिवतिनि । आसीच्चेत समासक्त न ययावन्यतो द्विज ।२२स विमुक्तराज्यतनय प्रोमिताशेपवान्धव । ममत्व स चकारोच्चस्तस्मिन्हरिणवालके ।२३॥ किं वृकर्भ क्षितो व्याघ्र कि सिंहेन निपातित । चिरायमाणे निप्कान्ते तस्यासीदिति मानसम् २४॥ एपा वसुमती तस्य खुराग्रक्षतवरा। प्रीतये मम जातोऽसौ क ममणकबालक २५ विपारणागरण महाहु कण्डयनपरो हि स । समेणाभ्यागतोऽरण्यादपि मा सुखयिष्यति ।२६॥ एते नून शिवास्तस्य दशनरचिरोद्त । कुशा बाशा विराजन्ते पटव सामगा इव ॥२७॥ त्य चिरगते तस्मिन्स को मानरा मुनि । प्रीतिप्रसन्नवदन पार्श्व स्थे चाभवन्मृगे । ममाधिभगस्तस्यासीतन्मयत्वाहतारमा । सन्त्यक्तराज्यभोगद्धिस्वजनस्यापि भूपते ॥२६॥ चपन चपने तस्मिन्दूरग दूरगामिति। मृगपो भवचित्त स्पंयंवत्तस्य भूपते ॥३०॥ मालागसता सोज्य पान पर महीपति । पिनय गाय पुत्रेण मृगपातेन योशित ३॥ मृगमय सदामाशोत्यजन्प्राणानगावपि । सन्मयरन मैत्रेय नान्यतिचिवचिन्तयत् । पसार feौरभी दर पागोवा उस मृग राणा RTE या पार यह पाम विषयोग वित हो ॥२॥ भामा , भव, पुत्र रमन, पुरापत मा ना, मी 7 मुख द्वितीय अंग-अ०१३ ] [ ३३५ भरत उस मृग-शावक के मोह में भर गये ॥२३।। जब वह बाहर जाकर देर से लौटता, तब उन्हें चिन्ता होती कि कही उसे कोई भेडिया तो नहीं खा गया पिसी सिंह ने तो नहीं पर दबाया ? ॥२४॥ महा, उसके खुरो के चिह्न बनने से यह भूमि कैसी चितकबरी लगती है । मेरा प्रसन्नता के लिये ही प्रकट हुआ वह मृग-शावक पाज न जाने किधर चला गया ॥२५॥ क्या वह दन से सकुशल लौटेगा और अपने सींगो के अग्र भाग से मेरे बाहुमो को खुजाकर मुझे देगा ? ॥२६।। उसके प्रभी उत्पन्न हुए दांतो से जिसकी शिखाएं क्ट गई हैं, ऐसे यह कुरा शिखा रहित ब्रह्मचारियो के समान कसे विराज रहे हैं ॥२७॥ उस मृग शावक को गये हुए अधिक देर होने पर भरत इस प्रकार चिन्ता किया करते और जब वह लौटकर उनके पास पा जाता, तव उसे देख- कर स्नेह बरा उनका मुख खिल उठना था ॥२८॥ इस प्रकार उसी में ऐसी पासक्ति रहने से राज्य, भोग, ऋद्धि और रवजनो को भी छोडकर भाने वाले राजा भरत की समाधि में विघ्न उपस्थित हो गया ॥२६॥ मृग के चचल होने पर राजा का स्थिर चित्त भी तन्मय हो उठता और जब वह दूर चला जाता, तब उनका चित्त भी उनके पास नहीं रहता था ॥३०॥ कालान्तर मे जय राजा भरत ने अपने प्राण का त्याग किया, तब वह मृग बालक, पिता को पुत्र सजल नयनो से देखता है, वैगे ही उन्हें देखता रहा ॥३१॥ हे मेरे यजी ! प्राण त्याग करते समय राजा भी उस मृग यो हो रनेह पूर्वक देखते रहे और उसी में तन्मय चित्त रहने के कारण, उससे कुछ अन्य चिन्तन नहीं हो सा ।।३२॥ ततश्च तत्कालवृता भावना प्राप्य तादृशीम् । जम्बूमार्गे महारण्ये जातो जातिस्मरो मृग. ॥३३॥ जातिस्मरत्वादुद्विग्न ससारस्य द्विजोत्तम । विहाय मातरं भूय शालग्राममुपाययो ।३४॥ शुप्स्तृणस्तया पर्ण. स युर्वन्नात्मपोपणम् । मृगत्वहेतुभूतस्य वर्गगो निप्कृति ययो ।३५॥ तत्र चोत्सृष्टदेहोऽमौ जज्ञे जातिस्परो द्विज.। सदाचारवता गुर् योगिना प्रवरे कुले ।३६। जैसे गरते हुए ३३६ ] [ यौविष्णुपुराण सर्वविज्ञानसम्पन्नः सर्वशास्त्रार्यतत्त्ववित् । अपश्यत्स च मैत्रेय प्रात्मान प्रकृतेः परम् ॥३७) आत्मनोऽधिगतज्ञानो देवादीनि महामुने । सर्वभूतान्यभेदेन स ददर्श तदात्मनः ॥३८॥ उस समय उनकी जो भावना थी, उससे वह जम्बू द्वीप के एक महादन मे जाकर मृग रूप में जन्मे । इस जन्म में भी उन्हें पूर्व जाम की याद बनी रही ॥३३।। उस पूर्व स्मृति के बने होने से वह ससार से विरक्त हो रहे और अपनी माता का त्यागकर शालग्राम क्षेत्र में निवास करने लगे ॥३४॥ वहां शुष्क तृश- पत्रादि के भक्षण द्वारा अपना जीवन निर्वाह करते हुए वह अपने मृग-योनि प्राप्ति करने के कारण भून कर्मों का क्षय करने लगे ॥३५॥ फिर अपने उस देह को त्यागकर उन्होने सदा चाररत योगियो के पावन वश में ब्राह्मण रूप में जन्म लिया ॥३६॥ है मैगजी | उस समय वह सर्व विज्ञानो के ज्ञाता और सभी शास्त्रो के मर्मज हुए और अपने मामा को प्रवृति से सर्वया परे देखने लगे ॥३७॥ हे महामुने । वह पात्मज्ञानी होने के कारण देवतादि सब जीवो को अपने से भिन्न नहीं देखते थे ॥३८॥ न पपाठ गुरुप्रोक्त कृतोपनयन श्रुतिम् । न ददर्श च कर्माणि शास्त्राणि जगृहे न च ॥३६॥ उक्तोऽपि बहुश. किञ्चिज्जडवाक्यमभाषत । तदप्यसस्कारगुण ग्राम्यवाक्योक्तिमश्रितम् ॥४०॥ अपध्वस्तवपु. सोऽपि मलिनाम्बरधृग्विज. । क्लिन्नदन्तान्तर सर्व परिभुत. स नागरः १४१॥ सम्मानना परा हानि योगद्ध. कुरुते यत । जनेनावमतो योगी योगसिद्धिच विन्दति ॥४२॥ तस्माचरेत वै योगी सता धर्ममदूपयन् । जना यथावमन्येरन्गच्छेयु व सङ्गतिम् ॥४३॥ हिरण्यगर्भवचन विचिन्त्येत्य महामतिः । ग्रात्मान दर्शयामास जडोन्मत्ताकृति जने ।४४। - द्वितीय अश-प्र०१३ ] [:३७ 1 भुड क्ते कुल्मापत्रीह्यादिशाय वन्य फल कणान् । यद्यदाप्नोति सुवहु तदत्ते कालसयमम् ।४५॥ जय उपनयन सम्बार हो गया, तव गुर ने पढाने पर भी वेद अथवा प्रय पास्त्रो को नहीं पढ़ता और न किमी को ही दखना था ||३९। जव उसमे कोई कुछ प्रश्न वरता, तब वह सस्कारहीन, सारहीन अथवा ग्रामीण वाक्य वित्र हुने प्रस्फुट वचन कहता था ॥४०॥ अस्वच्छ शरीर, मैने वान और मलीन दातों वाले उन ब्राह्मण को नागरितो से सदा अपमानित होना पड़ता था ॥४१॥ हे मंत्रेयणी । योग सिद्धि म सबस बडी दाथा सम्मान है, सदा अपमानित होने वाला योगो शीघ्र ही सिद्धि को प्राप्त होता है ।।१२।। इमलियै स मार्ग को निर्दोप हुमा योगी ऐगा पाचरण करता रहे, जिसके कारण लोग उसका अपमान करें पोर मगति से वचन रहे ।।४।। हिरण्यगर्ग के इन पचना का स्मरण परते हुए वह महामति वाहारण लोगों के सामत जड और उन्मत्त जमे रहते थे ॥४४॥ कुल्माप, व्रीहि प्रादि, शाक, वन व पल या प्रमाण मादि जो भी मिल जाता, यदि वह थोडा भी होता तो उसे अधिक मानकर पाहार करते हा पपना समय व्यतीत करन लग ॥४५॥ रम्वना पितर्यपरते सोऽय भ्रातृभाष्यवान्धवै । पारित क्षेत्रकर्मादि पदनाहारपोपित ।४.! स तूक्षपीनावयवो जडवारी च वर्मणि । सर्वलोरोपवरण बभूवाहारचेतन 1831 त ताहगममस्वार विप्रावृतिविचेष्टितम् । क्षत्ता पृपतराजस्य काल्य पशुमकल्पयत् ।। रात्रौ त समलड कृत्य वैगसस्य विधानत । अधिष्ठित महाकाली मात्वा योगेश्वर तया ४६। तत सद्ग समादाय निशित निशि सा तथा । क्षतार प्रसारणमच्छिनत्वष्टमूरत । स्वपापंदयुता देवी पपो रधिरमुखएम् ५०) ३३८ ] तीक्ष्ण खड्ग [ श्रीविष्णुपुराण जब उनके पिता की मृत्यु हो गई, तब उनके भाई, भतीजे और दाधव. गण निकृष्ट अन्न से उनका पोपण करते हुए, उनसे कृषि कार्य कराने लगे 1॥४६॥ यह भी बैल के समान पुष्ट देह वाले और कम मे जड के समान वेग- रहित होने के कारण पाहार मात्र प्राप्त कर सबका कार्य यत्र के समान करते थे ।।४७॥ पृपतराज के सेवको ने उन्हें ब्राह्मण वेश के विरद्ध पाचरण वाला तथा सस्कारहीन देखकर महाकाली की बलि के लिये विधिवत सजाया परतु एक परम योगी को बलि रूप मे उपस्थित देखकर स्वयं महाकाली ने अपने उस कर कम वाले राजसेवक का एठ मूल सहित काटकर अपने पार्पदो सहित उसका रक्त पी लिया ।।४८-२०॥ ततस्सौवीर राजस्य प्रयातस्य महात्मन । विष्टिक्तथि मन्येत विष्टियोग्योऽयमित्यपि ॥५॥ त तादृश महात्मान भस्मच्छन्नमिवानलम् । क्षत्ता सौवीरराजस्य विष्टियोग्यममन्यत १५२। स राजा शिविकारूढो गन्तु कृतमतिद्विज । वभूवेक्षुमतीतीरे कपिलर्वराश्रमम् ॥५३। श्रय विमय ससारे दु खप्राये नृणामिति । प्रष्टु त मोक्षधर्मज्ञ कपिलास्य महामुनिम् ॥५४॥ उवाह शिविका तस्य क्षत्तुर्वचनचोदित । नृणा विष्टिगृहीतानामन्येपा सोऽपि मध्यग ॥५५॥ गृहीतो विष्टिना विप्र सर्वज्ञानकभाजन । जातिस्मरोऽसौ पापस्य क्षयकाम उवाह ताम् ॥५६॥ ययौ जहमति सोऽथ युगमानावलोक्नम् । कुवन्मतिमता श्रेष्टस्तदन्ये त्वरित ययु १५७ फिर एक दिन सौवीर नरेश कहीं जा रहे थे, उनपे बेगारियो ने उन्हें येगार ये योग्य समझा ॥५१॥ राख मे घिरे हुए अग्नि के समान उनी माइति भादि देश पर राम सेवकों ने भी उन्हे येगार करने के लिये उपयुक्त समझनिया ॥५२॥ उस मौवीर नरेश मोक्ष धर्म में जानने वाले महपि कपिल से 'दु समय द्वितीय अग-अ० १३ ] [ ३३६ ससार मे ग्रेग कहां है' इस जिज्ञासा के समाधान पाने के विचार से, पालकी पर चदपर उन महपि के आश्रम पर इक्षुमसी नदी के तट पर जाने का निश्चय पिया था ॥५३-५४। उस समय राजसेवक के कहने से अन्य वगारियो के साथ लग कर वह ब्रह्माण भी ननकी पालकी को उठा कर चर ॥५५॥ अपने पूर्व जन्म की याद रखने वाले, सम्पूर्ण विज्ञान के एक ही भाजन वह ब्राह्मण इस प्रकार वेकार द्वारा अपन पापमय प्रारब्ध का क्षय करने के लिये उस पालकी वे वहन-चार्य म लगे ॥५६॥ वह जडमति ब्राह्मण तो चार हाथ पृथिवी देखत धीमी गति स चरते थे, परतु उनके अन्य सव साथी कौघ्रता पूर्वक चल रहे थे ।।५७॥ विलोक्य नृपति सोऽय विमा शिविकागतिम् । किमेतदित्याह सम गम्यता गिनिकावहा ५८ पुनस्तथैव शिविका विलोक्य विपमा हि स । नृप किमेतदित्याह भवद्भिर्गम्यतेऽन्यथा ॥५६ भूपतेर्वदतस्तस्य श्रुत्वेत्य बहुशो वच । शिविकावारका प्रोचुरव यातीत्यसत्वरम् । ६० कि श्रान्तोऽम्यल्पमध्यान त्वयोढा शिविका मम । किमायासमहो न त्व पीवानमि निरीक्ष्यसे ।। नाह पोवान चंयोटा शिविका भवतो मया। न श्रान्तोऽस्मि न चायामो मोढव्योऽस्ति महीपते 101 प्रत्यक्ष दृश्यसे पीवानद्यापि गिविया त्वयि । श्रमच भारोहहन भवत्येव हि देरिनाम् ॥६॥ इस प्रगर उस पानी की समान गति न देख कर राजा बोले-परे पाली पनान वालो। यह क्या कर रहे हा, एक-मो चान से चलो ॥५॥ उसके बाद भी उसी वमी ही विषम गति देसार राजा ने कहा-परे क्या परते होम प्रशर विपम भाव में क्यों पा रहे हो? ॥५६॥ इस प्रार सरावारा बारबार टोरे जाने पर पानी चलाने वाले ने कहा- हममे यर एर मति बहुत मदराति से पता है ।:६॥ रामा बोले-भर, नूने तो इस तो ३४० ] [ श्रीविष्णुपुराण पालको को अभी योडी दूर ही ढोया है, क्या इतने मे ही श्रान्त हो गया ? देखने मे तो तू इतना मोटा ताजा है, फिर क्या तू इतना परिधम भी नहीं कर सकता? ॥६१।। तब उन ब्राह्मण ने कहा- हे राजन् ! मैं न तो मोटा ताया हूँ और न मैंने मापकी पालको ही उठाई हुई है, न मैं यका हूँ मौर न मुझे परिश्रम करने की ही प्रावश्यक्ता है ॥६२॥ राजा ने कहा-भरे, प्रत्यक्ष ही मोटा-ताजा दिख रहा है, इस समय भी यह पालकी तेरे कधे पर रखी है, भौर भार वहन करने से परिश्रम भी होता ही है ॥६३॥ प्रत्यक्ष भवता भूप यदृष्ट मम तदद। बलवानवलश्चेति वाच्य पश्चाद्विशेषणम् ।६४। त्वयोढा शिविका चेति त्वय्यद्यापि च संस्थिता । मिथ्यतदा तु भयाञ्णोतु वचनं मम ॥६५॥ भूमौ पादयुग त्वास्ते जव पादद्वये स्थिते । उर्वोजवाद्वयावस्थौ तदाधारं तथोदरम् ।६६॥ वक्ष स्थल तथा वाहू स्वन्धी चोदरसस्थिती। स्कन्धाथितेय शिविका मम भारोत्र कि कृतः ।६७) गिविवाया स्थित चेद यपुस्त्वदुपलक्षितम् । तत्र त्वमहमप्यत्र प्रोच्यते चेदमन्यथा ।६। यह त्व च तथान्ये च भूतैरह्याम पार्थिव । गुणप्रयापतितो भूतवर्गोऽपि यात्ययम् ॥६६॥ पर्मवस्या गृगाश्ते सत्त्वाद्याः पृथिवीपते । माविद्यामचित फर्म तजारोपे जन्तुपु ।७० इस पर ब्राह्मण ने पहा- राजन् । तुम प्ररपा या देख रहे थे। पही मुझे बतायो । उमरे सपान या नियंन विशेषणों की बात तो पिरला ॥१४॥ तुम्हारा यह पहला मिप्यार में पासपी उसाची १. त गमप भी पर तेरे गधे पर रती है। तुम मेरा ययन गुनो ॥६५॥ धित पर रोगी काया काप, बापों पर चोरों पर ET IS P६९उदर पर सरदार, बापौर पे है पोर उग वषों पर पापी द्वितीय अश-अ० १३ ] [३४१ रखी है तो इसका भार मेरे ऊपर कहां है ? ॥६७ । इस पालकी मै तुम्हारा बताया जाने वाला देह रखा है । यथार्थ मे तो तुम वहां हो और मैं यहाँ हूँ। ॥६॥ हे राजन् । तुम अथवा अन्यान्य सब प्राणी पचभूतो द्वारा ही वहन किये जाते हैं और यह भूतवग भी गुणो के द्वारा प्रवाहित हो रहा है ।६६ ह भूपते । यह सत्यादि गुरण कर्मों के प्राधीन है और सब प्राणियो मे कम की उत्पत्ति अविद्या से हुई है ।।७०॥ प्रात्मा शुद्धोऽक्षर शान्तो निगुरण प्रकृते पर । प्रवृद्धद्यपचयौ नास्य एक्स्याखिलजन्तुषु ॥७॥ यदा नोपचयस्तस्य न वापचयो नृप । तदा पीवानसीतीत्थ क्या युक्त्या त्वयरितम् ।७२। भूपादजवाकटच रुजठरादिपु सस्थिते । शिविकेय यथा स्कन्धे तथा भार समस्त्वया ७३ तथान्यजन्तुभिभूप शिविकोढा न केवलम् । शैलद्र मगृहोत्थोऽपि पृथिवी सम्भवोऽपि वा 1७४। यदा पुस पृथग्भाव प्राकृत कारगर्नृप। सोढव्यस्तु तदायास कथ वा नृपते मया ।७५। यद्रव्या शिविका चेय तद्रव्यो भूतसग्रह । भवतो मेऽखिलस्यास्य ममत्वेनोपवृहित १७६। एवमुक्त्वाभवन्मौनी स वहञ्छिविका द्विज । सोऽपि राजावतीर्योव्यों तत्पादौ जगृहे त्वरन् ।७७। परतु पात्मा शुद्ध, प्रथर, शान्त, गुण रहित तथा प्रवृति से परे है तथा सब प्राणियो म एक ही वह प्रोत प्रोत है, इसलिये उसका न कभी वृद्धि है और न शय है ॥७१॥ हे राजन् । जव उसके उपचय या अपचय ही नही होते तो तुमने यह किस प्राधार पर कहा कि तू तो मोटा ताजा है ॥७२॥ यदि भूपि, पाव, जांघ, कटि, ऊर और उदर पर स्थित कधो पर रखी हुई यह पालको मेरे बोम रूप हो सकती है तो यह तुम्हारे लिये भी उसी प्रकार हो सक्ती है ।।१३।। इसी युक्ति से अन्य सभी प्राणियों ने वैवल यह पालको ही ३४२ ] [ श्रीविष्णुपुराण नही, सम्पूर्ण पर्वत, वृक्ष, पर और भूमि प्रादि का वोझ उठा रखा है ॥४॥ है नृप । जब प्रकृति द्वारा उत्पन्न होने वाले कारणो से पुस्प का पृथक् भाव है, तो मुझे उसमे थकान भी कैसे हो सकती है ? ॥७॥ जिस जिम द्रव्य से यह पालकी बनी है, उसी-उसी से तुम्हारा, मेरा और अन्य सभी का शरीर बना है, जिसमे ममता का प्रारोप माय है । ७६।। श्री पराशरजी न कहा-यह कह कर वह ब्राह्मण उस पालकी को वधे पर रखे हुए ही मौन हो गये और राजा तत्काल भूमि पर उतर प्राय और उन्होने ब्राह्मण के चरण पकड लिये 11७७॥ भो भो विसृज्य शिविका प्रसाद कुरु मे द्विज । वथ्यता को भवानन जाल्मरूपधर स्थित ७८| यो भवान्यन्निमित्त वा यदागमनकारणम् । तत्सर्व कथ्यता विद्वन्मह्य शुश्रूपवे त्वया ७६। श्रूयता सोऽहमित्येतद्वक्त भूप न शक्यते । उपभोगनिमित्त च सर्वत्रागमनक्यिा ।८०। सुखदु खोपभोगौ तु तो देहाय पपादको। धर्माधर्मोद्भवौ भोक्त जन्तुर्देहादिमृच्छति ।।१। सर्वत्यैव हि भूपाल जन्तो सर्वत्र कारणम् । धर्माधमौं यत स्मात्कारण पृच्छयते त्वया ।। धर्माधमौं न सन्देहस्सर्वकार्येषु कारणम् । उपभोगनिमित्त च देहाद्देहान्तरागम ।८३॥ यस्त्वेतद्भवता प्रोक्त सोऽहमित्येतदात्मन । वक्त न शक्यते श्रोतु तन्ममेच्छा प्रवर्तते ।।४। योऽस्ति सोऽहमिति ब्रह्मन्क्थ वक्तु न शक्यते । श्रात्मन्येप न दोपाय शब्दोऽहमिति यो द्विज ।५। राजा ने कहा-हे ब्रह्मन् । पाप इस पालकी पो छोड़ने की कृपा वरिये । हे भगवन् । माप इस छप्रवेश मे कौन हैं, यह मुझे बताइये ॥७॥ है विद्वन् । बताइये पाप कौन है ? यहाँ किस कारण पाये हैं ? मुझे पापके विषय में जानने की बड़ी इच्छा हो रही है VEI ब्राह्मण ने कहा- हे राजन् !
द्वितीय अश-प्र० १३] [३४३ मैं कौन हूँ यह कह नहीं सकता। इसके अतिरिक्त मेरे यहाँ आने का कारण पूछा, तो पावागमनादि क्रियाएँ कम-फल नोग के लिये होती ही है ॥८॥ सुख-दय का भोग शरीरादि को प्राप्त कराता है और धर्म-अधर्म से उत्पन्न सुपरस का भोग करन के लिय ही प्राणी को देहादि ग्रहण करने होते हैं 1१है राजन् । यह घम अपग हो गव नोवो की ममत्त प्रवाधानो के कारण हैं, फिर मेरे ही आने के कारण वो पूछने में क्या विशेषता है ? VIE२॥ राजा ने कहा-सत्र कार्यों म धर्म-अधर्म ही कारण है तया कर्मफ्ल का भोग करने के निमित्त ही जीव का देहान्नर होता है, इसमे संदेह नहीं है ।।३।। परन्तु आपने कहा कि कान हूं यह नहीं कह सकता, मी को सुनने की मेरी इच्छा है ।।४।। हे ब्राह्मन् ! जो है वहीं में हूं. यह क्यो नहीं कह सकते? यह अहं शद तो प्रात्मा को दूपित करने का कारण नहीं है ।।५।। शब्दोऽहमिति दोपाय नात्मन्येप तथैव तत् । अनात्मन्यात्मविज्ञान शब्दो वा भ्रान्तिलक्षण १८६) जिह्वा ब्रवीत्यहमिति दन्तोष्ठी तालुके नृप । एते नाह यत सर्वे वा निष्पादनहेतव १७॥ कि हेतुभिर्वदत्येया वागेवाहमिति स्वयम् । अन पीवानसीत्येतद्वनुमित्व न युज्यते ।। पिण्ड पृथग्यत पुस गिर पाण्यादिलक्षण । ततोऽहमिनि कुता सज्ञा राजन्वरोम्यहम् ।। यद्यन्योऽस्ति पर कोऽपि मत्त पार्थिवसत्तम । तदेपोहमय चान्यो वक्नुमेवमणीप्यते 180) यदा समस्तदेहेषु पुमानेको व्यवस्थित । तदा हि को भवान्सोऽहमित्येतद्विपत वच ९१ ब्राह्मण ने कहा-हे राजन् । प्रह गन्द से प्रात्मा में दोप नही पाता, यह कहना तो यथार्य है, परतु मह मन्द मनाम में प्रात्मत्व की प्राति कराने वाला होने से दोप कासारण हो जाता है ॥६॥ हे राजन् मह पाद जिह्वा, दांत, मोठ मोर सानु से उच्चारण किया जाता है परतु पह सब उसो उच्चारण
३४४ ]
[ श्रीविष्णुपुराण
के कारण तो हैं, परतु स्वयं ही ग्रहं नहीं हैं ॥८७॥ तो क्या जिह्वादि भारणों
के द्वारा वाणी ही अपने प्राप को अह कहती है ? यदि नहीं तो फिर 'तू मोटा.
ताजा है' ऐसा कहना भी ठीक नहीं है ।।८८॥ मस्तक, हाय, पाव प्रादि रूप
वाला यह देह भी प्रात्मा से भिन्न ही है । इसलिए इस प्रहं शब्द को प्रयुक्त
किया जाय ? ॥८६॥ हे राजारों में श्रेष्ठ ! यदि मुझ से भिन्न कोई अन्य
सजातोय ही प्रात्मा होता तो भी 'यह मैं हूँ' यह भिन्न है ऐसा कह सकते थे
॥१०॥ परतु जब समस्त देहो मे एक हो ग्रात्मा स्थित है, तब तुम कौन और
मैं कौन यह सब निःप्रयोजन ही है ||१||
त्वं राजा शिविका चेयमिमे वाहा पुरः रारा.!
अय च भवतो लोको न सदेतन्नृपोच्यते ।।
वृक्षाद्दारु ततश्चेय शिविका त्वदधिष्ठिता।
कि वृक्षसज्ञा वास्या स्याद्दारुसज्ञाथ वा नृप ।३।
वृक्षारूढो महाराजो नाय वदति ते जन. ।
न च दारुणि सर्वस्त्वा ब्रवीति शिविकागतम् ।।४।
शिविका दारुसवातो रचनास्थितिसस्थितः ।
अन्विप्यता नृपश्रेष्ठ तद्भ दे शिविका त्वया ।६५।
एव छप्रशलाकाना पृथग्भावे विमृश्यताम् ।
क यात छनमित्येप न्यायरत्वयि तथा मयि ।।६।
पुमान् स्त्री गौरजो वाजी कुञ्जरो विहगस्तरु. ।
देहेपु लोक्सज्ञेय विज्ञेया कर्महेतुपु ९७।
पुमान्न देवो न नरो न पशुनं च पादप. ।
शरीराकृतिदास्तु भूपैते वर्मयोनय.।।
तुम राजा हो, यह पालकी तुम्हारी है, यह पालकी ढोने वाले हैं, यह
सब तुम्हारी प्रजा है-इन सब वाक्यों में से यथार्थ रूप में तो कोई भी सरय
नहीं हैं 18 हे राजन् ! वृक्ष से पाष्ठ हमा और पाठ से तेरी पालवी बनी
सो इस पालवी को काष्ट यह प्रथया वृक्ष ? ॥३॥ परतु महाराज वृक्ष पर
बैठे हैं, ऐसा कोई नहीं कहता और न माठ पर ही बैठे हुए बताता है, सभी पालवी
द्वितीय अश-अ० १३] [ ३४२ मे बैठे हुए कहते हैं ।।१४।। हे नृपोत्तम ! रचना विशेष से एकत्रित हा कार्य- समूह ही तो यह पालकी है। यदि यह वाठ से भिन्न है तो पाठ को इससे पृथक करके उसकी खोज करो।।१५।। इसी प्रकार छनशलाकामो को पृथक रख कर सोचो कि पिर वह छत्र कहाँ रहता है? यही न्याय अपने घऔर मेरे देह के प्रति रखो ।।९।। पुरुप, स्त्री, गौ, बकरा, घोडा, हाथी, पक्षी और वृक्षादि लोक सज्ञाएं कर्म हेतु वाले देह में माननी चाहिये ॥७॥ हे भूपते ! मात्मा तो देवत्ता, मनुष्य, पशु, वृक्ष प्रादि कुछ भी नहीं है । यह सब तो फर्म स उत्पन्न दहो के प्राकृति-भेद ही हैं ॥१८॥ वस्तु राजेति यल्लोके यच्च राजभटात्मकम् । थतान्यच्च नृपेत्य तत सत्सङ्कल्पनामयम् ६६। यत्तु कालान्तरेणापि नान्या सज्ञामुपैति वै । परिणामादिसम्भूता तद्वस्तु नृप तच्च किम् ।१००। त्व राजा सर्वलोकस्य पितु पुत्रो रिपो रिपु । पन्या पति पिता सूनो किं त्वा भूप वदाम्यहम् ॥१०॥ त्व क्मेितन्धिर विनु ग्रीवा तव तथोदरम् । विमु पादादिक त्वा वा तवंतत्कि महीपते ११०२। समस्तावयवेभ्यस्त्व पृथग्भूय व्यवस्थित । वोहमित्यत्र निपुणो भूत्वा चिन्तय पार्थिव ११०३१ एन व्यवस्थिते तत्वे मयामिति भापितुम् । पृथक्करणनिप्पाद्य गक्यते नृपते क्यम् ।१०४१ मे राजा, राजा ये वीर सैनिक त्या मान्य सभी वस्तुएं पपापं में सत्य नहीं है, यह सो निरी कल्पना है HREL परमापं वस्तु तो वही है, जिसरे परिमाणादि के कारण से होने वाली समा जालान्तर से उपस्थित होने पर भी नहीं होती ? हे नृप । वह वस्तु क्या है ॥१०॥ सद प्रजाजनों लिये तुम राजा हो, पिना के लिये पुत्र हो, पलो के लिये पति हो, पुत्र के लिये पिता हो तया शत्रु के लिये शत्रु हो । जव हे भूपते । तुम्हीं बतायो कि मैं तुम्हें क्या कहूँ ॥१०सा है राजन् । तुम सिर, ग्रीवा, उदर पयवा पौर में से ससार [ श्रीविष्णुपुराण कुछ हो ? और क्या यह शिर आदि भी तुम्हारे अपने हैं ? ॥१०२॥ तुम इन सब अवयवो से भिन्न हो इसलिये यल पूर्वक सोचो कि मैं कौन हूँ ॥१०३॥ हे राजन् । इस प्रकार व्यवस्थित पात्म तत्व को सबसे पृथक् करके ही उसका प्रतिपादन किया जा सकता है, तो मैं उसे अह शब्द द्वारा किस प्रकार हैं . सकता हूँ? ||१०४॥ चौदहवाँ अध्याय निशम्य तस्येति वच परमार्थसमन्वितम् । प्रश्रयावनतो भूत्वा तमाह नृपतिद्विजम् ॥१॥ भगवन्यत्वया प्रोक्त परमार्थमय वच । श्रुते तस्मिन्भ्रमन्तीव मनसो मम वृत्तय १२१ एतद्विवेकविज्ञान यदशेषपु जन्तुषु । भवता दर्शित विप्र तत्पर प्रकृतेर्महत् ।३६ नाह पहामि शिविका शिविका न मयि स्थिता। शरीरमन्यदस्मत्तो येनेय शिविका धृता ।४। गुरामवृत्त्या भूताना प्रवृत्ति कर्मचोदिता। प्रवर्तन्ते गुणा ह्यते वि ममेति त्वयोदितम् ॥५॥ एतस्मिन्परमार्थज्ञ मम श्रोषपथ गते । मनो विह्वलतामेति परमार्थाथिता गतम् ।।
द्वितीय अश-अ० १४ ] [६४७ कहै हुए परमार्थमय वचनो को सुन कर मेरी मनोवृत्तियो मे भ्राति मागई है ॥२॥ हे ब्रह्म । सम्पूर्ण प्राणियों में व्याप्त जिस असम विज्ञान का मापने मुझे दिग्दर्शन कराया है, वह अवश्य हो प्रकृति से परे ब्रह्म है ॥३॥ परतु, आपने जो यह कहा कि मैं पालवी को नहीं ढोरहा हूँ, पालकी मेरे ऊपर नहीं है अथवा मिम देह ने इसे उठाया हुआ है, वह मुझसे भिन्न है । मुणो की प्रेरणा से प्राणियो की प्रवृत्ति होती है और गुण कर्मों के द्वारा प्रेरित होते हैं तो इसमे मेरा कर्तत्व कैसे माना जायगा ॥४-५॥ हे परमार्थ के ज्ञाता ! यह सुनठे ही मेरा चित्त परमाय को जानने के लिये अत्यन्त उत्कठित हो रहा है ॥६॥ हे द्विज । 'ससार स्थित मनुष्यो का श्रय' पूछने के लिये ही मैं महाभाग महर्षि कपिल के पास गाने को तत्पर हूँ|100 परन्तु मागं म ही आपके वचन सुन कर परमाय को जानने की अभिलापा से मेरा चित्त प्रापये प्रति झुक गया है ।।८।। कपिलपि गवत सर्वभूतस्य वै द्विज । विष्णोरशो जगन्मोहनाशायो-मुपागत । स एव भगवान्नूनमस्माक हितकाम्यया। प्रत्यक्षतामात गतो यर्थतद्भवतोच्यते ॥१०॥ तन्मय प्रगताय त्व यच्छय परम द्विज। तद्वदाखिलविज्ञानजलवीच्युदधिर्भवान् ॥११॥ भूप पृच्छसि वि श्रेय परमार्थ नु पृच्छसि । श्रेयास्यपरमार्याति अशेपाणि च भूपते ॥१२॥ देवताराघन करवा धनसम्पमिच्छति । पुत्रानिच्छति राज्य च श्रेयस्तस्यैव तन्नृप ११३३ कर्म यज्ञात्मक श्रेय फल स्वर्गासिलक्षणम् । श्रेय प्रधान च फले तदेवानभिसहिते ॥१४॥ प्रात्मा ध्येय सदा भूप योगयुक्तस्तथा परम् । श्रेयस्तस्यैव सयोग थेयो य. परमात्मन ॥१५॥ है द्विज मपि कपिल सर्वात्मक भगवान विष्णु के ही प्रश है, वह बाव के मोह को नष्ट करने के लिये हो षिवी पर अवतरित हुए है से ३४८ ] [ श्रीविष्णुपुराण परन्तु, प्रापकी इस प्रकार की वाणी सुन कर मुझे निश्चय हो रहा है कि वही भगवान कपिल मेरा हित करने की इच्छा से यहां आपके रूप में प्रकट हुए हैं ॥१०इस लिये हे द्विन । जिसमे परम श्रेष्ठ हो, वह पाप मुझे प्रसरता बताइते । माप तो सम्पूर्ण विज्ञान तरगो से सम्पन्न समुद्र के समान हैं ॥११॥ ब्राह्मण ने कहा-हे भूपते । तुम श्रेय जानना चाहते हो अथवा परमार्थ । क्योकि श्रेय तो सभी अपरमार्थिक हैं ।।१२।। हे राजन् । देवतामों को माराधना के द्वारा जो मनुष्य धम, सम्पत्ति, पुत्र, राज्यादि की कामना करता है, उसके लिये तो उनको प्राप्ति ही परम श्रेय है ॥१३॥ स्वर्ग प्राप्ति रूप फल पाले यसादिक कर्म भी श्रेय हैं, परन्तु प्रमुख श्रेय तो कम के फल की कामना न करने में है ।।१४। इसलिये है राजन् । योगी पुरुषों को तो प्रकृति भादि से परे उस मात्मा का ही चिन्तन करना चाहिये, क्योकि उसी का सयोग रूप पेय यथार्थ थेय हैं॥12॥ श्रेयास्येवमनेकानि शतशोऽथ सहवश । सन्त्यय परमार्थस्तु न त्वेते श्रूयता च मे १६) धर्माय त्यज्यते विन्नु परमार्थों धन यदि । व्ययश्च त्रियते यस्मात्यामप्राप्युपलक्षण 1१७॥ पुषश्वेत्परमार्थ स्यात्सोऽप्यन्यस्य नरेश्वर । परमायंभूत सोऽन्यस्य परमार्थो हि तत्पिता ॥१८॥ एव न परमार्थोऽस्ति जगत्यस्मिञ्चराचरे । परमार्थो हि कार्याणि वारणानामशेपत ॥१६॥ राज्यादिप्राप्तिरलोक्ता परमार्थतया मदि। परमार्या भवन्त्यत्र न भयन्ति च ये तत ॥२०॥ म्यज गामनिपाद्य यापमं मत तय। परमायंभून तत्रापि यता गदतो मम ॥२॥ पशु पिप्पाधते पायं मृदा वारणभूतया । तपारणातुगमनारमायते गृप मृण्मयय २२॥
द्वितीय अंग-अ० १४ [ ३४६ एवं विनामिभिद्र व्यः समिदाज्यकुदादिभिः । निप्पाद्यते क्रिया या तु सा भवित्री विनागिनी ॥२॥ इस प्रकार धेय संक्डो सहयों भांति के हैं, परन्तु यह सब परमार्मिक नहीं हैं, अब में परमार्थ नहता हूँ उसे सुनो ॥१मा यदि धन को परमार्य समम ठो धर्म के लिये उसका त्याग क्यों नरें? और इच्छित भोगों को प्राप्ति के निये उमका ध्यय क्यों करें? ॥१॥ यदि पुत्र को परमार्थ कहें तो यह अन्य का परमार्थ मूत है और उसका पिता भी अन्य का पुत्र होने से इसका परमार्य हुमा ।।१८। इसलिये इस चयचर विस मे पिता का कार्य हा पुत्र भी परमार्थ सिद्ध नहीं होता। यदि ऐगा हो जाय तो रामी कारणों के कार्य परमानं ही न बन चोय ! ॥१६॥ यदि राज्यादि की प्राप्ति को परमार्य क्हें तो यह सदैव पाय नहीं रहते. इमलिये यह भी परमार्य नहीं हो सकते ॥२०॥ यदि ऋा, यजुः साम रूप वेदत्रयो से सम्मन्न होने वाले यज्ञ को परमार्य सम तो उसके विषय में भी मेरी बात सुनो ।।२१) हे राजन् ! वो वस्तु कारण Eा मिट्टी का कार्य होती है ।बसे पहा इत्यादि], वह वस्तु कारण की अनुगामिनी होने से मिट्टी ही रामभी जाती है ।।२२। इसलिये जो कर्म समिधा, पूत भोर कुशादि नष्ट होने वाले पदायों से सम्पन्न होती है वह भी न होने वाली ही होगी ॥२३॥ अनाशी परमार्य प्रारभ्युपगम्यते । तत्तु नागिन सन्देही नागिद्रव्योपपादितम् ॥२४॥ तदेवाफलदं कर्म परमार्यो मतस्तव । मुत्तिसाधनभूतत्वात्परमार्थो न साधनम् ॥२५॥ ध्यान चंवात्मनो भूप परमार्थादितम् । भेदकारि परेभ्यस्तु परमार्यों न भेदवान् ॥२६॥ परमात्मात्मनोयोगः परमायं इतीप्यते । मियतदन्पव्व्वं हि नैति तद्रश्यतां यतः १२३॥ तस्माच्छयास्थोपारिक नपंतानि न संशयः। परमार्यस्तु भूपाल सह क्षेपाच्च यता मम ।।
३५० ] [ श्रीविष्णुपुराण एको व्यापी समः शुद्धो निर्गुणः प्रकृतें परः । जन्मवृद्धयादिर हित पात्मा सर्वगतोऽव्ययः ॥२६॥ परज्ञानमयोऽसद्भिर्नामजात्यादिभिर्विभुः । न योगवान युक्तोऽभूलव पार्थिव योक्ष्यते ॥३०॥ ज्ञानीजन परमार्थ को अविनाशी कहते हैं और नाशवान द्रव्यो से सम्पन्न होने के कारण कर्म नाशवान हैं, उसमे सदेह नहीं है ॥२४॥ यदि फ्ल की प्राशा से रहित निष्काम कर्म को परमार्थ कहे तो वह मोक्ष रूप फल का साधक होने से ही है, परणथं नही हो सकता ॥२५॥ यदि शरीरादि से प्रात्मा की भिन्नता विचार कर उसके चिंतन वो परमार्थ कहे तो वह मनात्मा से आत्मा का भेद करने वाला है और परमार्थ भेद-रहित है ॥२६॥ यदि परमात्मा और जीवात्मा के संयोग को परमार्य आहे तो अन्य द्रव्य से अन्य द्रव्य का सयोग नहीं हो सकता, इसलिये वैसा कथन भी मिथ्या है ॥२७॥ इसलिये हे राजन् । यह सभी श्रेय हैं. अब जो परमार्थ है, उसे सक्षिप्त रूप से सुनो ॥२८॥ प्रात्मा एक है, वह सर्वव्यापी, सम, शुद्ध, निमुण, प्रकृति से परे तथा जन्म-वृद्धि आदि से रहित, सर्वगामी और अव्यय है ॥२६॥ हे राजन् ! वह परम ज्ञानमय है, असन नाम तथा जाति मादि से वह कभी भी सयुक्त होने वाला नही है ॥३०॥ तस्यात्मपरदेहेपु सतोऽप्येकमय हि यत् । विज्ञान परमार्थोऽसौ व तिनोऽतथ्यदर्शिन ॥३१॥ वेणुरन्ध्रप्रभेदेन भेद पड जादिसजितः। अभेदव्यापिनो वायोस्तथास्य परमात्मनः ॥३२॥ एकस्वरूपभेदश्च वाह्यकर्मप्रवृत्तिजः। देवादिभेदेऽपध्वस्ते नास्त्येवावरणे हि सः ॥३३॥ वह प्रात्मा अपने तथा अन्यान्य प्राणियो ने देहों मे स्थित रहता हुमा भी एक है-- इस प्रकार का विशेष ज्ञान ही परमार्थ है जो लोग हैत भावना पाले है वे प्रपरमार्थ का दर्शन करते हैं ॥३१॥ जैसे प्रभिन भाव वाले एक ये दारा वाँसुरी के छेदो के भेद से पड्ज ग्रादि विभिन्न भेद हो जाते होवायु द्वितीय अंग-अ० १५ ] है वैसे ही एक ही परमात्मा के अनेक भेद बान पहने हैं ॥३२॥ एक रूप प्रारमा वे पनेक भेद बास गरीरादि की वर्ष प्रवृनि से हुए हैं । देवादि पारीरों के भेद को जान लेने पर वह भेद ज्ञान नष्ट हो जाता है, प्रयोकि जब तक भविद्या का प्रावरण रहता है तभी तक वह स्थित रहता है ॥३३॥ पंद्रहवाँ अध्याय इत्युक्त मौनिनं भूयश्चिन्तयानं महीपतिम् । प्रत्युवाचाथ विप्रोमावंद तान्तर्गता कथा ।। श्रूयतां नृपगार्दूल यहीतमृभुणा पुरा । प्रववोघं जनयता निदाघस्य महात्मनः ।। मुर्नामाभवत्पुनो ब्रह्मरणः परमेहिनः । विज्ञाततत्त्वसद्भावो निसादेव भूपते १३॥ तस्य गिप्यो निदायोऽभूत्पुलस्त्यतनयः पुरा । प्रादादोपविज्ञानं स तस्मै परया मुदा ४० प्रवासनानतन्यस्य न तस्याद्वैतवासना । मममुस्तकंयामाम निदाघस्य नरेश्वर ॥५॥ देविकामारतट चीरनगरं नाम व पुरम् । ममृद्धिमतिरम्यं च पुलम्स्येन निवेशितम् ।। रम्योपवनपर्यन्ते स तस्मिन्पायिवोतम । निदापो नाम योगश समुगियोऽवमत्पुरा 151 थी परागरजी ने पहा-है मंत्रो! यह मुन र राजा मोन हुए पन ही मन सोचने सगे। यह दंग पर उन साह्मण ने रागापो परत विषपा, पर वृत्तान्त मुनापा ॥१ब्राह्मण ने कहा-हे नृग्गाम! पूर्वान की बात ६-महर्षि ने महातमा निराको जो उपदेश दिया था, उगे श्रवण ३५२ ] [ श्रीविष्णुपुराण करो ॥२॥ हे राजम् । परमेष्टी ब्रह्माजी का जो ऋभु नामक पुत्र था, वह स्वभाव से ही परमार्थ तत्व का ज्ञाता था ॥३॥ महर्षि पुलस्त्य का पुत्र निदाय उनका शिष्य था। उसे अत्यन्त प्रसन्न होकर महपि ऋभु ने तत्वोपदेश दिया ॥४॥ हे नरेश्वर ! उस समय ऋभु को प्रतीत हुआ कि सम्पूण शास्त्रो का शान होने पर भी निदाघ अद्वैत के प्रति निष्टावान नहीं हैं ॥५॥ देविका-नदी के किनारे पुलस्त्यजी ने वीर नगर नामक एक प्रति सुरम्य और समृद नमर की स्थापना की थी ॥६॥ वह नार उपवनादि से सुशोभित था, जिसमे योग देता ऋभुशिष्य निदाप निवारा करता था । ७) दिव्ये वर्षसहस्र तु समतीतेऽस्य तत्पुरम् । जगाम स ऋभु शिप्य निदाघमवलोक्व ।। स तस्य वैश्वदेवान्ते द्वारालोकनगोचरे । स्थितस्तेन गृहीतार्यो निजवेश्म प्रवेशित ।। प्रक्षालिताड निपाणि च कृतारानपरिग्रहम् । उवाच स द्विजथष्ठो भुज्यतामिति सादरम् ॥१०॥ भो विप्रवर्य भोक्तव्य यदन्न भवतो गृहे। तत्वध्यता रदन्नेपुन प्रीति सतत मम ॥१॥ सक्तुयावव वाटयानामपूपाना च मे गृहे । यद्रोचते द्विजयष्ठ तत्त्व भुड क्ष्य यथेच्छया ।१२। पदन्नानि द्विजंतानि मृष्टमन्न प्रयच्छ मे। सयावपायसादीनि द्रप्सपाणितवन्ति च ॥१३॥ है हे गारिनि गद्रोह गविश्विदतिशोभनम् । भक्ष्योपसाधन मृप्ट तेनास्यान्न प्रसाधय ॥१४॥ एक हजार दिव्य पप व्यतीत होने पर महाप ऋभु प्रपो शिष्य निदाप दो देशोरीभास उगु नगर में मय ॥॥ जव निदाप बलियस्वदेश पापा परोहार पर पतिथियों की प्रतीपा में समा गा, तभी ये महर्षि उधे दिसा दिप पौर यह उन्हें प्राय पार पो पर मम गया ॥ उठने उनोहापाय धुतारर उ मागा पर उदासा पर विटामा पौर मार द्वितीय प्रश-अ० १५ ] [ ३५३ सहित मोला- भोजन परिये ।।१०। ऋभु ने कहा-हे विन श्रेष्ठ । पापवे यहाँ जिस मान का भोजन करता है, यह मुझे वतामो। पीरि बुमिन अन्न के प्रति मुझे मरुचि है ॥१२॥ निदाध बोला- है हिजोत्तम । मेरे यहाँ सत्त बो की लप्सी, बाटी और पूए बनाये गये हैं, इनम से जो भार साना चाह, वही मोउन परें ॥१२॥ ऋभु ने महा-ह द्विज । यह सभी कुत्सित भन्न हैं, मुझे तो हलुपा, सीर, मट्ठा, मिशानादि स्वादिष्ट मामा भोजन करायो । ॥१३निदाय ने अपनी पत्नी से कहा है गालिनि । मेरे पर म जो श्रेय गे पष्ट पदार्थ हो, उसी से इनके लिये पनि सुम्वादु भोजन तयार करो ॥१४॥ इत्युक्ता तेन सा पत्नी मृष्टमन्न द्विजस्य यत् । प्रमाधितयती सर्व भतुर्वचनगौरवात् ॥१५॥ त मुक्तयन्तमिच्यातो मृष्टमन्न महामुनिम् । निदाघ प्राह भूपार प्रणयावनत स्थित ११६ अपि ते परमा तृप्तिरत्पना तुष्टिरेव च । अपि ते मानस स्वग्यमाहारेण वृत द्विज ॥१७॥ प निवासो भवान्वित फच गन्तु ममुद्यत । प्रागम्यते च भवता यतस्तच द्विजोच्यताम् ॥१८॥ शुद्यस्य तस्य भुक्तेऽन्ने तृप्तिाह्मण जायते । न में शुम्नामवतप्ति यम्मान्मा परिपृच्चमि ॥१६॥ यहिना पार्थिवे घाती क्षपिते शुत्गमुजय । भवत्यम्भमि पक्षीण नृग्गा तृपि जामते 1001 छुतपणे देहधर्माये न ममैते यतो जि। तत भुत्सम्भवाभायात रिम्स्येय गे मदा २१॥
॥२३॥ मारमा प्रावास में समान व्यापक होने से सर्वगत है, इसलिये यहाँ ३५४ ] [ श्रीविष्णुपुराण सन्तुष्ट हो गये ? ॥१७॥ हे भगवन् ! आप कहाँ के निवासी हैं ? कहाँ जा रहे हैं और कहाँ से प्रारहे हैं ? ॥१८॥ ऋभु ने कहा-हे विप्र ! भूखे को ही तृप्ति होती है । परन्तु, मुगे तो सभी भूख ही नहीं लगती, फिर तृप्ति विषयक प्रश्न ही कैसा ? ॥१६॥ जव जठराग्नि ठोस धातुनो को क्षीण कर देती है तब भूख जल को शुष्क कर देती है तब प्यास लगती है ॥२०॥ है द्विज ! यह भूख और प्यास दोनो लगती है ॥२०॥ हे द्विज ! यह भूख भौर प्यास दोनों ही देह के धर्म हैं मेरे नही । इसलिये मैं कभी भूखा न होकर सदा ही तृप्त रहता हूँ ॥२१॥ मनस. स्वस्थता तुष्टिश्वितधर्माविमौ द्विज । चेतसो यस्य तत्पृच्छ पुमानेभिनं युज्यते ॥२२॥ कनिवासस्तवेत्युक्त फ गन्तासि च यत्वया । कुतश्चागम्यते तत्र नितयेऽपि निवोध मे ।२३। पुमान्सर्वगनो व्यापी आकाशवदय यतः । कुत कुत्र क गन्तासीत्येतदप्यर्थवत्कथम् ॥२४॥ सोऽह गन्ता न चागन्ता नैकदेशनिकेतनः । त्व चान्ये च न च त्व च नान्ये नैवाहमप्यहम् ॥२५॥ मृष्ट न मृष्टमप्येषा जिज्ञासा मे कृता तव । किं वक्ष्यसीति तत्रापि श्रूयता द्विजसत्तम ।२६। किमस्वाद्वथ वा मृष्ट भुञ्जतोऽस्ति द्विजोत्तम । मृष्टसेव यदामृष्ट तदेवोद गकारकम् ॥२७॥ अमृष्ट जायते मृष्टं मृष्टादुद्विजते जन. । आदिमध्यावसानेषु किमन्न रुचिकारकम् ॥२८॥ स्वस्थता मोर सतुष्टि यह भी मन के धर्म हैं, प्रात्मा से इनका कुछ भी सम्बन्ध नहीं है । इसलिये हे विप्र ! जिसके यह धर्म हैं, उसी से इनके विषय में प्रश्न करो ॥२२॥ तथा तुमने मेरे विषय में यह पूछा कि कहां का निवासी हूँ, कहाँ जा रहा हूँ और कहाँ से माया हूँ, सो इसके विषय मे मेरे विनार सुनो द्वितीय अंश-प०१५] [३५५ रहते, कहाँ से आये, कहाँ जाते हो यह प्रश्न भी निरर्थक ही है ॥२४॥ क्योकि मैं तो न कही जाता है, न कही पाता हूँ और न कही रहने का मेरा स्थान है । यथार्थ में तो न तू तू है, न में मैं हूं और न अन्य ग्रन्य है ॥२॥ वास्तव मे मधुर मयुर नहीं है । मैंने तुमसे जो मधुर अन्न मांगा था उससे भी तुम्हारे विचार ही सुनना चाहता था ॥२६॥ हे विनोत्तम ! खाने वाले के लिये सुस्वादु और अस्वादु का विचार ही कैसा ? पोकि जव पालान्तर में स्वादिष्ट पदार्थ हो स्वादरहित हो जाता हैं तो वही उद्वेग उत्पन्न करने वाला हो जाता हैं ॥२७॥ इसी प्रकार जो अरुचिकर पदार्थ है वह कभी रचित्रर प्रतीत होने लगते हैं और रुचिकर पदार्थ कमी उद्विग्न करने वाले हो जाते हैं । बताओ एसा पदार्थ कौन-सा है जो प्रादि, मध्य और अन्त तीनों समय ही रविकर प्रतीत हो? ॥२८॥ मृण्मय हि गृह यद्वन्मृदा लिप्त स्थिर भवेत् । पार्थिवोज्य तथा देहः पार्थिवैः परमाणुभिः ।२६। यवगोधूममुद्रादि घृत तैल पयो दधि । गुडं फलादीनि तथा पार्थिवाः परमाणवः ।३०। तदेतद्भवता ज्ञात्वा मृष्टामृष्टविचारि यत् । तन्मनस्समतालम्बि कार्य साम्य हि मुक्तये ।३१॥ इत्याफवं वचस्तस्य परमार्थाथित नृप । प्रणिपत्य महाभागो निदाघो वाक्यमब्रवीत् ॥३२॥ प्रसीद मतितार्थाय कथ्यता यत्त्वमागतः । नष्टो मोहस्तवाकयं वचास्येतानि मे द्विज १३३॥ ऋभुरस्मि तवाचार्यः प्रज्ञादानाय ते द्विज । इहागतोऽह यास्यामि परमार्थस्तवोदितः ।३४॥ एवमैकमिद विद्धि न भैदि सकल जगत् । वासुदेवाभिधेयस्य स्वरूप परमातमनः ।३५१ तथेत्युक्त्वा निदान प्रणिपातपुरारम् । पूजितः परया भरत्या इच्छानः प्रयपावभुः ।।
३५६ ]
[श्रोविष्णुपुराण
जैसे मिट्टी का घर मिट्टी से लिप पुत कर दृढ होता है, वैसे ही यह
पार्थिव शरीर पापिय अन्न वणो से परिपुष्ट होता है ॥२९॥ जौ, गेंहू, मूंग,'
घी, तेल, दूध, दही, गुड और फलादि सभी पदार्थ पार्थिव परमाणु ही हैं ।
॥३०॥ ऐसा जानकर तुम अपने सुस्वादु-अस्वादु की चिन्ता करने वाले अपने
चित्त को समदर्शी बनामो, क्योकि समत्व ही मोक्ष का एकमात्र उपाय है ।
॥३१।। ब्राह्मण ने कहा-हे राजन् ! ऋभु के यह परमार्यमय वचन सुन कर
महाभाग निदाघ ने उन्हें प्रणाम किया और ऋषि से कहने लगा ॥३२॥ हे प्रभो ।
आप प्रसन्न हो । मेरे कल्याण- साधन की इच्छा से पाने वाले प्राप पौन हैं,
आपकी वाणी से मेरा सब मोह दूर हो गया है ॥३३॥ ऋभु बोले- हे विप्र !
मैं तेरा गुरु ऋभु हूँ। तुझे सत्-असत् का विवेक वराने वाली बुद्धि देने की
इच्छा से ही मैं यहा प्राया था। जो परमार्थ है, वह मैं तुझे बता चुका । अब
मैं जा रहा हूँ॥३४॥ इस परमार्थ तत्व का विचार करके तू इस सम्पूर्ण विश्व
को एक परमात्मा भगवान् वासुदेव का रूप ही समझ । इसमे किंचित् भी
भेद नहीं हैं ॥३५॥ ब्राह्मण ने कहा- इसके पश्चात् निदाघ ने उनका बचन
स्वीकार करके उन्हे प्रणाम किया और उसके द्वारा परम भक्ति पूर्वक पादर
को प्राप्त हुए ऋभु स्वेच्या पूर्वक नहाँ से चले गये ॥३६।।
सोलहवाँ अध्याय
ऋभुर्वर्षसहस्र तु समतीते नरेश्वर ।
निदाघज्ञानदानाय तदेव नगरं ययौ।१।
नगरस्य वहिः सोऽथ निदाघं ददृशे मुनिः ।
महावलपरीवारे पुर पिशति पार्थिवे ।२।
दूरे स्थितं महाभाग जनसम्मर्दवर्जकम् ।
सुरक्षामकण्ठमायान्तमरण्यात्ससमित्कुशम् ॥३॥
द्वितीय अंश-अ०१६ ]
[ ३५७
दृष्ट्वा निदामं स मुरुपगम्याभिवाद्य च ।
उवाच वस्मादेकान्ते स्थीयते भवता द्विज ।
मो विप्र जनसम्मो महानेश नरेश्वरः ।
प्रविविशुः पुरं रम्यं तेनात्र स्यीयते मया ॥
नराधिपोऽन कतमः कतमश्चेतरो जनः।
कथ्यतां मे द्विजश्रेष्ठ त्वममिक्षो मतो मम ।।
योऽयं गजेन्द्रभुन्मत्तमद्विशृङ्गसमुच्छितम् ।
अधिस्टो नरेन्द्रोऽयं परिलोकस्तथेतरः 1७1
ब्राहाण ने कहा है राजन् ! फिर एक हजार वर्ष बीत जाने पर महर्षि
मुनिदाप को जानोपदेश पारने के लिये पुनः उसो नगर पहुंचे ॥१॥ वहाँ
पार उन्होंने देखा कि उस देश का राजा बहुत सी सेनादि के हित घूम-पाम
सहित नगर में प्रविष्ट हो रहा है तथा वन से बुरा और समिष
लेकर माथा
हुमा निदाप भीड से दूर हटकर भूषा-प्यासा एक मोर खड़ा है ॥२-३॥ यह
देखकर महर्षि ऋमु उग निदाप के पास गये पौर मभिवादन पूर्वक बोले-है
द्विज ! तुम यहां एकान्त में क्यों खडे हो? ॥४॥ निदाघ ने कहा-पाज इस
अत्यन्त रमणीक नगर में राजा प्रवेश कर रहा है, इसलिये मार्ग में बहुत भीड़
होने के कारण मैं यहाँ खडा हूँ ॥५॥1 ऋभु ने कहा-है विप्रथेट ! तुम यहाँ
वो सब बातें जानते प्रतीत होते हो । इसलिये बतामो कि इनमें राजा कौन-मा
है या पन्य पुरुष कौन है ? ॥६॥ निदाय ने कहा-पर्वत जो की इस हामी
पर जो बढा हुमा है, वहीं रारा है तथा अन्य पुरुष इसके परिवार के हैं |
एतो हि गजराजानो युगपद्दर्शिती मम ।
भवता न विशेरैण पृथचिह्नोपलक्षणो ।
तत्कम्यतां महामाग विशेषो भवतानयोः ।
ज्ञातुमिच्छाम्यहं कोऽय गजः को वानराधिपः ।।
गजो योऽयमपो ब्रहान्नुपर्यस्यप नूपतिः ।
वाहवाहरुसम्बन्धं को न जानाति वै हिज 1१०
। ३५८ ] [ श्रीविष्णुपुराण जानाम्यह यथा ब्रह्म स्तथा मामवबोधय । अध शब्दनिगद्य हि किं चोर्ध्वमभिधीयते ।११ इत्युक्त सहसारुह्य निदाघ प्राह तमृभुम् । श्रूयता क्थयाम्येप यन्मा त्व परिपृच्छसि ।१२। उपर्यह यथा राजा त्वमध कुञ्जरो यथा । अवबोधाय ते ब्रह्मन्दृष्टान्तो शितो मया ॥१३॥ त्व राजेव द्विजश्रेष्ठ स्थितोऽह गजवद्यदि । तदेतत्त्व समाचक्ष्व क्तमस्त्वमह तथा ।१४। ऋभु ने कहा--तुमने मुझे राजा और हाथी दोनो एक साथ दिखाये परन्तु इन दोनों के पृथक्-पृथक् लक्षण नही बताये । इसलिये हे महाभाग इन दोनों को पृथक्-पृथक विशेषताएं मुझे बताभो, जिससे मैं यह जान मम् कि इनमै यौन राजा पोर कौन हाथी है ? ॥६॥ निदाघ ने कहा- इनमे से नीचे वाला हाथी गौर उसने ऊपर वाला राजा है । हे द्विज 1 इन दोनो के वाय- पाहा सम्बन्ध को कौन नहीं जानता? 26॥ ऋभु ने वहा है ब्रह्मन् । मुझे तो इस प्रकार समभामो जिसमे मैं नीचे' और 'पर' शादी के बाध्यापं ममझ सवू ॥११॥ ब्राह्मण मे पहा-ऋभु की बात सुनबर निदाप ने सहसा उनके पर पकर कहा-पापने जो था है, उसे रहता है, सुनिये ॥१२॥ इस समय मैं तो राजा थे ममा ऊपर है पोर पाप हाथी के समान नीपे है । है ब्रह्मन् । पापको गभाने पे लिये ही मुझे यह रात दिलाना पडा है ॥१५॥ नाभु ने महा-है रियर । यदि तुम राजा के समान हो तो में हाथी के समान है, तो तुम कौन हो और मैं बी१४॥ 7 पहतामोनि द्वितोय अश-अ०१६ ] [ ३५६ तदेतदुपदिष्ट ते सङ क्षेपेण महामते । परमार्थसारभूत यत्तदद्वत्तमशेषत ११८ एवमुक्त्वा ययौ विद्वानिदाघ स भुगुरु । निदाघोऽप्युपदेशेन तेनाहतपरोऽभवद १६! सर्वभूतान्यभेदेन ददृशे स तदात्मन । यथा ब्रह्मपरो मुक्तिमवाप परमा द्विज १२० तथा त्वमपि धर्मज्ञ तुल्यात्मरिपुवान्धव । भव सर्वगत जागन्नात्मानमवनीपते ।२११ मितनीलादिभेदेन यथक दृश्यते नभ । भ्रान्तिदृष्टिभिरात्मापि तर्थक सन्पृथक्पृथक् ।२२। एक समस्त यदिहास्ति किञ्चित्तदच्युतो नास्ति पर ततोऽन्यत् । सोऽह स च स्व स च सर्वमेतदात्मस्वरूप त्यज भेदमोहम् ।२३॥ इतीरितस्तेन स राजवर्यस्तत्याज भेद परमादृष्टि । स चापि जातिस्मरणाप्तबोधस्तव जन्मन्यपवगमाप ॥२४॥ इति भरतनरेन्द्रसारवृत्त कथयति यश्च शृणोति भक्तियुक्त । स विमलमतिरेति नाममोह भवति च मसरणपु मुक्तियोग्य ॥२५॥ की बात सुनते ही निदाघ ने उनके चरण पाद लिय और बोला नि अवश्य ही पाप प्राचाय श्रेण मपि भु हैं ॥१५॥ पाfr हमार माचार्यजी व समान प्रदंत चित्त वाला नप कोई नहीं है, इसलिए मैं समझता हूँ कि पाप मरे गुरूजी हो यहाँ पधार है १६) महर्षि श्रभु ने कहा- हे निदाय । तुम पहले मरी बहुत सेवा-मुश्रूषा कर चुके हो, इसलिये तुम्हारे लेह वे बनीभूत होकर ही में तुम्हारा ऋभु नामक गुरू तुम्हें उपदेश देने में लिय ही यहां भाया हूँ ॥१७॥ह महामते 1 सब पदार्थो म प्रदत एवं प्रारम- बुद्धि रखना, परमाय वा मही सार है, जो मैंने तुम्हारे प्रति सोप म रह दिया है ।।१८}प्राह्मण ने कहा--निदाघ को ऐसा उपदेश देकर गुरवर न चले गय और तब निशप भी देत-चिनान मसग गया ॥१६॥पिर यह सीखें मोमपने मति देयने लगा। हे रापन् । से उस ग्रह परायण को मोदर- ब्राह्मण बोने
३६० ]
[श्रीविष्णुपुराण
पद की प्राप्ति हुई, वैसे ही तू भी अपने प्रान्मा, शत्रु तथा मित्रादि मे अभेद
रखकर स्वय को ही सर्वगन मानता हुअा मोक्ष को प्राप्त हो ॥२०-२१॥ जैसे
एक ही आकाश श्वेत-नील प्रादि अनेक रूप दिखाई देता है, वैसे ही भ्रान्त
दशियो को एक ही प्रात्मा अलग-अलग दिखाई देता है ॥२२॥ इस संसार में
सब कुछ एक प्रात्मा ही है, वही अविनाशी है, उससे भिन्न कुछ भी नहीं। मैं
और तू यह सब भी प्रात्म रूप है. इसलिये भेद वाले ज्ञान रूपी मोह का त्याग
कर ।।२३॥ थी पराशरजी ने कहा--उनका उपदेश सुनकर सौवीरराज ने
• परमाणं दृष्टि के प्राश्रय से भेद-बुद्धि का त्याग किया और वह पूर्व जन्म के स्म.
रण वाले ब्राह्मण श्रेष्ठ भी ज्ञानमय होने से उसी जन्म मे मोक्ष को प्राप्त हुए
॥२४॥ राजेन्द्र भरत के इतिहास के इस सारभूत वृत्तान्त को कहने या सुनने
वाली की बुद्धि स्वच्छ हो जाती है, उसे कभी प्रात्म दिस्मृति नही होती मौर
वह जन्म-जन्मान्तर सदा मोक्ष के योग्य रहता है ॥२॥
तृतीय अंश पहला अध्याय कथिता गुरणा मम्यग्भूसमुद्रादिसस्थिति.। सूर्यादीना च सरथान ज्योतिया पातिविस्तरात् ।। देवादीना तथा सृष्टिस पीणा चापि परिणता। चातुर्वर्ण्यस्य चोत्पत्तिस्तिर्यम्योनिगतस्य च ।२१ ध्रुवप्रह्लादचरित विस्तराव त्वयोदितम् । मन्वन्तराग्यशेपाणि थोतुमिच्छाम्यनुक्रमात् ।। मन्वन्तराधिपाश्चंव दानदेवपुरोगमान् । भवता कथितानेतान्योतुमिच्छाम्यहं गुरो।। अतीतानागतानोह यानि मन्वन्तराणि । तान्यह भवतः सम्यकथयामि यथाक्रमम् ।। स्वायम्भुवो मनुः पूर्व पर स्वारोचिषस्तथा । उत्तमस्तामसइचव रक्तवाशुपस्तथा ॥६॥ पडेते मनवोनीतास्साम्प्रत तु रदेस्सुतः । वैवस्वतोऽय यस्यतत्मातम वर्ततेऽन्तरम् 191 , श्री मंगेश्जी ने कहा-है गुरो! पृथिवी, समुद्र पौर सूर्यादि की स्थिति का मापने विस्तार सहित मुभमे वर्णन किया ॥१॥ मापने देवतापी पार शपियों आदि की उत्पत्ति, चारों वर्ष और विपंच योनि में प्राणियों की रचना का भी मने प्रार वर्णन क्यिा ॥२॥ मध पार प्रहाद में परिप मी पापने विस्तृत रूप से सुनाए । मब में मारे मुरा मल मे सभी मन्वन्तरो और देवता. एमाले सहित मन्वन्तराषिपति मनुष्यों का वृत्तान मुनने की ज्या करता ॥३॥धी पराशरत्री ने कहा-मय तर तिने मन्वन्तर हो पुरे तप .
३६२ ] [ श्रीविष्णुपुराण भविष्य में जो भी होगे, उन सभी का क्रम पूर्वक वर्णन करता हूँ ॥५।। पहिले मनु स्वायभुव हुए, उनके पश्चात् स्वारोचिप, उत्तम, तामस, रवत, और चाप हुए ॥६॥ यह छः मनु पहिले हो चुके हैं । यह सातवां मन्वन्तर वर्तमान है, जिसके मनु सूय-पुत्र वैवस्वत हैं ॥३॥ स्वायम्भुव तु कथित कल्पादावन्तरं मया । देवास्सप्तर्षयश्चैव यथावत्कथिता मया । अत ऊर्ध्व प्रवक्ष्यामि मनोस्स्वारोचिपस्य तु । मन्वन्तराधिपान्सम्यग्देवीस्तत्सुतांस्तथा ! पारावतास्सतुपिता देवास्स्वारोचिपेऽन्तरे । विपश्चित्तत्र देवेन्द्रो मैत्रेयासीन्महाबलः ।१०। ऊर्ज. स्तम्भस्तथा प्राणो वातोऽथ पृपभस्तथा । निरयश्च परीवाश्च तत्र रातर्पयोऽभवन् ।११ चैत्रकिम्पुरुपाद्याश्च सुतास्स्वारोचिपस्य तु। द्वितीयमेतद्वयाख्यातमन्तर शृणु चोत्तमम् ।१२। तृतीयेऽप्यन्तरे ब्रह्मन्नुतमो नाम यो मनुः । सुशान्तिर्नाम देवेन्द्रो मैत्रेयासीत्सुरेश्वरः ॥१३॥ सुधामानस्तथा सत्या जपाश्वाथ प्रतर्दनाः । वशवर्तिनश्च पन्चैते गणा द्वादशवास्स्मृताः ।१४। वसिहतनया ह्यते सप्त सप्तर्पयोऽभवन् । अजः परशुदीप्ताद्यास्तथोत्तममनोस्सुताः ॥१५॥ पल्प के आदि मे हुए जिस स्वायंभुव-मन्वन्तर के विषय में मैंने कहा था, उराव देवता पौर सप्तपियों को भी पहिले ही बता चुना हूँ ! अब मैं स्यारोधिप मन्यन्तर में अधिकारी देवता, मपि भोर मनु-गुत्रो या वर्णन करूगा TER मंत्रयजी । यारोधिप मन्वन्तर में पारावत और तुपितगण देवता पौर महावली विपश्चित् इन्द्र थे ॥१०॥ उस समय जो रामपि थे उनके नाम सज्ज स्तम्भ, प्राणे, पात, फुपम, निरय मौर परीयान् थे ॥११॥ पत्र चौररिष मारिएन स्पारोचिप गनु के पुत्र हए । इस प्रकार भो यर्शन दिया गया वह तृतीय अंश-अ०१] [ ३६३ दूसरे मन्वन्तर का है, अब तीसरे उत्तम नामक मन्वन्तर का विवरण श्रवण करो ॥१२॥ हे ब्रह्मद् ! उस मन्वन्तर में उत्तम नामक मनु उसके अधिपति और सुशान्ति नामक देवेन्द्र हुए ॥१३|| उस काल में सुधाम, सत्य, जप, प्रतर्दन और पशवी इन पाँच पणो मे बारह-बारह देवता थे ॥१४॥ वसिष्ठजी के सात पुत्र सारि तथा अन, परशु, दीप्त आदि नाम वाले उसम मनु के पुत्र थे॥१५॥ तामसस्यान्तरे देवास्सुपारा हरयस्तथा । सत्याश्च सुधियश्चैव सप्तविंशतिका गणाः ॥१६॥ शिविरिन्द्रस्तथा चासोच्छतयज्ञोपलक्षणः । सप्तपंयश्च ये तेषां तेषां नामानि मे शृणु ।१७। ज्योतिर्धामा पृथुः काव्यश्चत्रोऽग्निर्चनकस्तथा । पीवरश्चर्षयो ह्यते सप्त तत्रापि नान्तरे ।१८॥ नरः स्याति: केतुरूपो जानुजङ्घादयस्तथा। पुत्रास्तु तामसस्थासत्राजानस्सुमहावला. १९] पञ्चमे वापि मैत्रेय रेवतो नाम नामतः । मनुविभुश्च तपेन्द्रो देवाश्चानान्तरे शृणु ॥२०॥ अमितामा भूतरया यैकुण्ठास्ससुमेधस. । एते देवगरणास्तत्र चतुर्दश चतुर्दश ।२११ हिरण्यरोमा वेदश्रीवास्तथापरः । वेदवाहुस्सुधामा च पर्जन्यश्च महामुनिः। एते रार्पयो विप्र तत्रास वतेऽन्तरे ।२स वलवन्धुश्च सम्भाव्यस्सत्यकाद्याश्च तत्सुताः। नरेन्द्राश्न महावीर्या दभूवुर्मुनिसत्तम ।२३५ तामस मन्वन्तर मे सुपार, हरि सत्य और सुधि-इन चार देव-गणों में - से प्रत्येक वर्ग में सत्ताईस गए पे ॥१६॥ सौ मश्वमेध यज्ञ का रा राजा शिवि उस समय का इन्द्र था और जो सहपि थे उनके भी नाम मुनो- ज्योति- धांमा, पृयु, काव्य, चंय, अग्नि, वनके पार पीवर ॥१८॥ तथा नेरे, स्याति, पेतुरुप मोर जानुजप मादि उन तामए मनु के महावसवान पुत्र राज्य के [ श्रीविणाराग मधिधारी थे ॥१९॥ है मंत्र पसी । बघिय मन्वन्तर मन रंका पे । दिनु गागा हम मोर जो-गो देवगण ए उसे मामों को मनो ॥२०॥म मन्वनर मे ममिताभ, भूतरप, युएट पौर गुमेपा नामव देवतायों के वर्ग पर वर्ग में मौदह गण पे ॥२१॥ हिरणपरोमा, वैदश्री, उपाहु, यंदबाद, मुथामा, पर्जन्य भोर महामुनि-यह उठ गावातर गपि पे ॥२२॥ हे मुनिश्रेष्ठ । उम समय रेषत मनु ये मत्यन्त पराक्रमी पुत्र बलबन्धु, सम्मान पौर सपा माद राग्य में मधिकारी हुए ॥२३॥ स्वारोचिपश्वोत्तमश्च तामसो रक्तस्तथा। प्रियव्रतान्यया ह्यते चत्वारो मनवस्मृता ॥२४॥ विष्णुमाराध्य तपसा स राजपि. प्रियव्रत. । मन्यन्तराधिपानेताल्लव्धवानात्मवशजान् ॥२५॥ पप्ठे मन्वन्तरे चासोच्चाक्षुपाख्यस्तथा मनु । मनोजवस्तथैवेन्द्रो देवानपि निवोध मे ।२६॥ प्राप्या प्रसूता भव्याश्च पृयुवाश्च दिवौरस । महानुभावा लेखाश्च पञ्च ते ह्यष्टका गणा. २७॥ सुमेधा विरजाश्चैव हविप्मानुत्तमो मधु । अतिनामा सहिष्णुश्च सप्तासन्निति चर्पय. ॥२८॥ ऊरु पूरुशता म्नप्रमुखास्सुमहाग्ला । चाशुपस्य मनो पुत्रा पृथिवीपतयोऽभवन् ।२६] हे मैत्रे यजी । स्वारोचिप, उत्तम,तामस और रेवत-यह चार मनु राजा प्रियव्रत के कुल मे उत्पन्न हुए बताय जाते हैं । २४॥ राजपि प्रियव्रत ने तप के 'द्वारा भगवान् विष्णु को प्रसन्न करके अपने वश मे उद्भूत हुए इन चार मनुष्यो को पाया था ॥२५॥ छटवें मन्वन्तर मे चाक्षुप नामक मनु हुए । उस समय के इन्द्र का नाम मनोजव था। अब उस मन्वन्तर के देवतामो के नाम सुनो ॥२६॥ पाप्य, प्रसूत, भव्य, पृथुक् और लेख यह पांच प्रकार के देवता थे । इनके प्रत्येक गण मे पाठ देवता हुए ॥२७॥ उस समय सुमेघा, विरजा, हविष्मान, उत्तम, तृतीय अग-अ० १] [ ३६५ मधु, प्रतिमामा और सहिष्णु नामक सापि ये । १८11 नासुप मनु के अत्यन्त दलो पुत्र प्ररू, पूछ प्रौर शतनादि राज्य के अधिकारी हुए ॥२६] विवस्वतस्सुतो विन श्राद्धदेवो महायु ति । मनुस्मवर्तते धीमान् साम्प्रत सममेऽन्तरे ३० आदित्यवसुरुदाद्या देवाचान महामुनें। पुरन्दरस्वथवान मैनेय निदशेश्वर १३११ वसिष्ठ काश्यपोऽयात्रिर्जमदग्निस्सगौतम । विश्वामितभरद्वाजो सात समर्पयोऽभवन् ।३२१ इक्ष्वाकुश्व नृगश्चैव घृष्ट गर्यातिरेव च । नरिप्यन्तन विरयातो नामागोऽरिष्ट एव च ।३३। वरपञ्च पधश्व सुमहाँल्लोकविश्रत । मनोबैवस्वतस्यते नव पुना सुधार्मिका. १३४॥ हे द्विज 1 इस समय यह सात मन्वन्तर है। इसमे महा तेजस्वी मोर धीमाद सूर्य पुर श्राददेव मनु हैं ॥३०॥ आदित्य, यमु और स्वादि देवता तथा पुरन्दर नामर इन्द्र इम मन्वन्तर के हैं ॥३१॥ वसिष्ठ पाश्यप, पनि जमनानि, गोतम, विश्वामित्र, पौर भरद्वाज नामक सप्तपि हैं ॥३२॥ वैवस्वत मनु के नौ पुष हुए, मिनरे नाम स्वायु, मृग, घर, गर्यानि, नरिमन्त, नाभाग, परिए, ररूप धौर पुषन हुए। यह सभी धर्मात्मा और समार प्रसिद्ध थे ॥३३-१४॥ विष्णुशक्तिरनौपम्या सत्वोद्रिक्ता स्थितो स्थिता। मन्वन्तरप्परोयेपु देवत्वेनाधितिष्ठति ।३५१ ग्रोन वस्या जज्ञेऽमो यस्स्वायम्भुवेऽन्तरे। आवृत्या मानसो देव उत्पन्न प्रथमेऽन्नरे। तत पुन. स वै देव प्राप्ने स्यारोचिन्तिरे । सुपिताया समुत्सनो जितस्तुपितं मह ॥३७॥ प्रोतमेऽप्यन्तरे देवस्तुपितस्तु पुनम्स है। सत्यायामभवत्सत्य सत्यस्मह सुरोत्तम १६८९ [ श्रीविष्णुपुराण तामसस्यान्तरे चैव सम्प्राप्ते पुनरेव हि। हर्याया हरिभिस्साध हरिरेव वभूव ह ॥३६॥ रेवतेऽप्यन्तरे देवस्सम्भूत्या मानसो हरिः । सम्भूतो रैवतैस्सार्धं देवर्देववरो हरिः ॥४०॥ चाक्षुषे चान्तरे देवो वैकुण्ठः पुरुषोत्तमः । विकुण्ठायामसौ जज्ञे वैकुण्ठेर्दैवतै. सह ॥४१॥ सभी मन्वन्तरो मे देव रूप से प्रधिष्ठित भगवान् विष्णु की अनुपम एवं सत्वगुण प्रधान वाली शक्ति ही विश्व की स्थिति में अधिष्टान करने वाली होती "है ॥३५।। सबसे पहिले मन्वन्तर मे मानस देव यज्ञ पुरष उसी विष्णु शक्ति के अश से प्राकृति के उदर से प्रकट हुए थे ॥३६॥ फिर स्वारोचिप मन्वन्तर मा गया तब वही मानस देव माजंत तुपिता के गर्भ से राब तुपित नामक देवताओं के सहित उत्पन्न हुए ॥३७॥ फिर वही तुपित देव उत्तम मन्वन्तर मे सत्या के गर्भ से सत्य नामक देवताप्रो के साथ उत्पन्न हुए ॥३८॥ जय तामस मन्वन्तर माया तब वह हरि रूप से र्या के उदर से हरि नामक देवतामों के साथ प्रकट हुए ॥३६॥ रवत मन्वन्तर मे वही देवश्रेष्ठ हरि, सम्भूति के गर्भ से उस समय के देवतामो के साथ मानस नाम से प्रकट हुए ॥४०॥ फिर चाधुष मन्वन्तर में विकुण्ठा के गर्भ से तत्कालीन देवताम्रो के साथ उत्पन्न होकर वैकुण्ठ नाम से प्रसिद्ध हुए ॥४१॥ मन्वन्तरेऽय सम्प्राप्ते तथा वैवस्वते द्विज । वामन. कश्यपाद्विप्णुरदित्या सम्बभूव ह ।४२॥ निभिः क्रमैरिमाल्लोकाञ्जित्वा येन महात्मना । पुरन्दराय नोक्य दत्त निहतकण्टकम् ॥४३॥ इत्येतास्तनवस्तस्य सप्तमन्वन्तरेपु वै । सरस्वेवाभयन्विप्रयाभिः सद्धिता. प्रजाः ।।४।। यस्माद्विष्टमिद विश्वतस्य शरत्या महात्मनः। तस्मात्सा प्रोच्यते विष्णुविशेर्धातोः प्रवेशनात् ।४५) [ ३६७ तृतीय ग्रंश-अ०२] सर्वे च देवा मनवस्समस्तास्सप्तर्पयो ये मनुसूनवश्च । इन्द्रश्च योऽय निदोगभूतो विष्णोरगेपास्तु विभूतयस्ता.॥४६॥ है द्विज ! अब इस वैवस्वत मन्वन्तर के प्राने पर भगवान् विष्णु काश्यप ने द्वारा अदिति के उदर से वामन रूप में अवतरित हुए ॥४२॥ उन्ही वामन- देव ने तीनों लोको को अपने तीन पदों में नापकर जीत लिया और उन्हे कण्टक- हीन करके इन्द्र को सौर दिया था ॥४३॥ इस प्रकार सातो मन्वन्तरी में भग- वान् विष्णु की यह सात मूर्तियां अवतरित हुई, जिनसे इस सम्पूर्ण प्रजा की वृद्धि हुई है ॥४४॥ यह सम्पूर्ण जगत उन्ही परमेश्वर की शक्ति से व्यास है, इसीरिये वह विगु नाम से प्रसिद्ध है, क्योंकि 'विश' धातु का तात्पर्य प्रवेश करने से है ॥४५॥ सब देवता, मनु, सप्तपि, मनु पुत्र और इन्द्र-यह सब उन्ही भगवान् विष्णु की विभूतियां है ।।४६।। दूसरा अध्याय प्रोक्तान्येतानि भवता मातमन्वन्तराणि वै । भविप्यायपि विप्र ममाख्यातु त्वमहंसि ।। मूर्यस्य पत्नी सज्ञाभूत्तनया विश्वकर्मण. । मनुर्यमो यमो चैव तदपत्यानि वै मुने ।। असहन्ती तु सा भर्तुस्तेजरछाया युपोज । भनुं गुथूपरणेऽरण्य स्वय च तपसे ययौ ।। सोयमित्यथान छायायामात्मजनयम् । शनैश्चर मनु चान्य तपती चाप्यजीजतत् ।४। छायामशा ददो शाप यमाय कृपिता यदा। तदान्येयममौ वुद्धिरित्यासीद्यममूर्ययो ॥५॥ ततो विवस्वानारयाते तयवारण्यमस्यिताम् । समाघिदृष्टया दही तामचा तपसि स्थिताम् ।।
३६८ ] [ श्रीविष्णुपुराण वाजिरुपधर सोऽथ तस्या देवावथाश्विनी। जनयामास रेवन्त रेतसोऽन्ते च भास्वर । श्री मैत्रेयजी ने कहा-है ब्रह्मएँ । आपने बीते हुए सात मन्वन्तरों का वर्णन किया, अब पाप भागे होने वाले मावातरो के विषय मे कहिये ॥१॥ श्री पराशरजी ने कहा-है मुने । विश्वकर्मा की पुत्री सज्ञा सूर्य की पत्नी हुई। उसने मनु और यम दो पुत्र तथा यमी नाम की पुत्री को जन्म दिया ॥२॥ सज्ञा अपने पति का तेज सहन न कर सकने के कारण अपने समान छाया उत्पन्न कर और उसे अपने पति की सेवा सौप कर, स्वय तपस्विनी बनकर चली गई ॥३॥ सूर्य ने छाया को सज्ञा समझा और उससे शनैश्चर, एक दूसरा मनु मौर तपती- इन तीन सन्तानो को जन्म दिया ॥४॥ एक दिन की बात है-उस छाया सशा ने क्रोध करके यम को शाप दिया, तब सूर्य और यम को सदेह हुआ कि यह सज्ञा नहीं ॥५॥ तब छाया के द्वारा रहस्य का उद्घाटन हुमा मौर सूय ने समाधि लगाकर यह जान लिया कि सज्ञा घोडी का रूप धारण किये हुए वन मे तप कर रही है ।।६। इससे उन्होने भी घोडे का रूप धारण कर घोडी रूपिणी सज्ञा से दो अश्विनीकुमार और रेत साव ने पश्चात् रेवन्त को उत्पन्न किया ॥७॥ पानिन्ये च पुन सज्ञा स्वस्थान भगवानवि । तेजसरशमन चास्य विश्वकर्मा चकार ह ।। भ्रममारोप्य सूर्य तु तस्य तेजोनिशातनम् । कृतवानष्टम भाग स ध्यशातयदव्ययम् ।। यत्तस्माद्वप्णव तेजश्शातित विश्ववर्मणा । जाज्वल्यमानमपतत्तद्ध्मो मुनिसत्तम् ।१०। त्वष्टंव तेजसा तेन विगोश्चमपल्पयत् । पिन चंव शर्यस्य शिविया धनदस्य च ॥११॥ भक्ति गुहस्य देवानामन्येषा च यदायुधम् । तत्सर्व तेजसा तेन विश्वपर्मा व्यवर्धयत् ।१२।
। तृतीय अश-ग्र०२] [३६६ छायासज्ञासुतो यो.सौ द्वितीय कथितो मनु । पूर्वजस्य सवर्णोऽसौ साणिस्तेन कथ्यते ।१३। तस्य मन्वन्तर ह्य तत्सावणिकमथाष्टमम् । तच्छृणुष्व महाभाग भविष्यत्कथयामि ते ॥१४॥ इसके बाद भगवान सूय सज्ञा को अपने यहां लाये और विश्वकर्मा ने भी उनका तेज न्यून कर दिया | उन्होने सूर्य को सान पर चढाकर उनके तेज को छीलना प्रारम्भ किया, परन्तु वह उसका पाठवां प्रश ही कम कर सके ॥६॥ हे मुनिश्रेष्ठ । सूर्य के जिस अत्यन्त प्रकाशमान बराव तेन को छीला, वह तेज पृथिवी पर आ गिरा। उसी गिरे हुये तेग से विश्वकर्मा ने भगवान विष्णु का चक्र, शिवजी का त्रिशूल, कुबेर का विमान तथा कातिकेय की शक्ति का निर्माए किया और अन्यान्य देवताग्रो के जो शस्त्रास्त्र थे, वे भी उस तेज से किये ।।११-१२॥ पहिले जिस छाया सज्ञा के पुत्र द्वितीय मनु के विषय मे कह चुके हैं वह अपने पूर्वज मनु का सवए होने के कारण सावणि कहा गया ११३॥ है महाभाग 1 में ही सावणि के सावणिक मारतर का वरान करता है। यह अएम मन्वन्तर मागे होने वाला है ।१४॥ सावणिस्तु मनुर्योऽसौ मैरेय भविता तत । सुतपाश्चाभिताभाश्च मुरपाश्चापि तथा सुरा ११५॥ तेपा गरगश्च देवानामेको विशव स्मृत । सप्तपीनपि वक्ष्यामि भविप्यान्मुनिमत्तम ॥१६॥ दीप्तिमान् गालवो राम कृपो द्रौरिगस्तथा पर । मत्पुनश्च तथा व्यास सप्यङ्गश्च सप्तम ११७१ विष्णुप्रसादादतघ पातालान्तरगोचर । विरोचनसुतस्तेपा बलिरिन्द्रो भविष्यति ।१८ विरजानोर्वरोवाश्च निर्मोवाधास्तथापरे । सावरणेस्तु मनो पुरा भविष्यन्ति नरेश्वरा ॥१९॥ नयमो दधमारिगर्भविष्यति मुने मनु । पारा मरीचिगर्भाश्च सुधारणस्तथा विधा ।२०॥
३७० ]
[धीविषणुपुराण
भविष्यन्ति तथा देवा ह्यनो द्वादशो गरण. ।
तेपामिन्द्रो महावीर्यो भविष्यत्यद्भुतो द्विज ॥२॥
सवनो द्युतिमान् भव्यो वसुर्मेधातिथिस्तथा ।
ज्योतिष्मान् सप्तम सत्यस्तते च महपंय ॥२२॥
धृतकेतुर्दीतिकेतु पञ्चहस्तनिरामयौ।
पृथुथवाद्याश्च तथा दक्षसावणिकात्मजा ॥२३॥
हे मैत्रेयजी । यही सावरिण उस मन्वन्तर मे मनु एव सुतप, पमिताभ
पोर मुम्यगण देवता होगे ॥१५॥ उन देवतायो के प्रत्येक गण में बोस देवता
होगे । अब मैं उस मन्वन्तर के सप्तपियो के विषय मे कहता हूँ॥१६॥ दीप्ति-
मान् गालव, राम, कृर, अश्वत्थामा, मेरे पुत्र व्यास और सातवें ऋपि शृङ्ग
होगे ॥१७॥ उम समय पाताल लोकवाती विरोचन-पुत्र बलि भगवान् विषा
की कृपा से इन्द्र होगे तथा विरजा, कवरीवान् और निर्मोक प्रादि सावणि मनु-
पुत्र उस मन्व तर के राजा होगे ॥१८-१६॥ हे गुने । नौवें मन्वन्तर के मनु
दक्ष सावणि होगे । उनले समय मे पार, मरीचि गर्म और सुधर्मा नामक देव-
ताप्रो का निवर्ग होगा, जिन तीनो मे से प्रत्येक वग में वारह देवता होगे और
उनका प्रधिपति अद्भुत नामक अत्यन्त पराक्रमी इन्द्र होगा ॥२००२१॥ सवन,
धु तिमान्, भव्य वसु, मेधातिथि, ज्योतिष्मान् और सत्य नामक सप्तपि होगे
॥२२॥ तथा दक्ष सावणि मनु के पुत्र घृतकेतु, दीप्तिकेतु, निरामय, पृथवा
मादि उस समय के राजा होगे ॥२३॥
दशमो ब्रह्मसारिणभविष्यति मुने मनु ।
सुधामानो विशुद्धाश्च शतसस्यास्तया सुरा ॥२४॥
तेपामिन्द्रश्च भविता शान्ति म महावल ।
सप्तपंयो भविष्यन्ति ये तथा तान्छृणुष्व ह ।२५॥
हविष्मानसुकृतरसत्यस्तपोमूर्तिस्तथापर ।
नाभागोप्रतिमौजाश्च सत्यवेतुस्तथैव च ।२६॥
सुक्षेत्रश्चोत्तमौजाश्च भूरिपेरणादयो दश ।
ब्रह्मसावरिणपुप्रास्तु रक्षिप्यन्ति वसुन्धराम ॥२७॥
तृतीय अश-अ० २]
[ ३७१
एकादशश्च भविता धर्मसावरिणको मनु ।
विहङ्गमा कामगमा निर्वाणरतयस्तथा ॥२८॥
गरणास्त्वेते तदा मुस्या देवाना च भविष्यताम् ।
एक्कत्रिशरस्तेपा गणचेन्द्रश्च वै वृप ।२६।
नि स्वरश्चाग्नितेजाश्च वपुष्मान्धुरिणगाणि ।
हविष्माननपश्चैव भाव्या सार्पयस्तथा ॥३०॥
सर्वनगस्सुधर्मा च देवानीकादयस्तथा ।
भविष्यन्ति मनोस्तम्य तनया पृथिवीश्वरा ॥३१॥
हे मुने । दसवें मन्वन्तर के अधिपति ब्रह्म सावलि हाग। उस समय
सुधामा और विशुद्ध नामक दो गण सौ सौ देवतामा के होग ॥२४॥ महावली
शाति उनका इद्र होगा, अब उस समय के सप्तपिया के नाम सुनो ॥२५॥
हविष्मान्, सुकृत, सत्य, तपोमूर्ति, नामाग, अप्रतिमोजा और सत्यकेतु-यह
सप्तपि ये ॥२६॥ उस समय ब्रह्म सावणि मनु के मुगेन, उत्तमोजा और भूरि.
पेण यादि दस पुत्र पृथिवी के रक्षक होग ॥२७॥ ग्यारहवां मनु धमसावणि
होगा तथा बिहगम, कामगम और निर्वाण रति नामा तीस-मास देवतामा के
गण होंगे और वृप नाममा इन्द्र होगा ॥२८-२९॥ नि म्बर, अग्नितेजा, वपुष्मान,
घृणि प्रारगि, हविष्मान् और अनघ नामक सप्तपि हांगे ॥३०॥ धर्मसावरिण
मनु के सवत्रग, सुधर्मा मौर दवनीकादि पुत्र उस समय षिवी पालक
होंग ॥३॥
दपुनस्तु सावणिर्भविता द्वादशो मनु ।
मृतुघामा च तनेन्द्रो भवति शृणु मै सुरान् ॥३२॥
हरिता रोहिता देवास्तथा सुमनसो द्विज ।
सुक्मणि सुरापाश्च दशका पञ्च व गणा ॥३॥
तपस्वी सुतपाश्चैव तपोमूनिस्तपोरति ।
तपोवृतिय तिश्चान्य सप्तमस्तु तपोधन ॥३४॥
समर्पयस्त्विमे तस्य पुत्रानपि निबोध मे।
देववानुपदेवश्च दवधष्ठादयस्तथा ॥३॥
[ श्रीविष्णुपुराण मनोस्तस्य महावीर्या भविष्यन्ति महानृपा । नयोदशो रचिर्नामा भविष्यति मुने मनु ।३६। सुनामाण सुकर्माण सुधर्माणस्तथामरा । नयस्त्रिंशद्विभेदारते देवाना यत्र वै गणा ।३७॥ दिवस्पतिर्महावीर्यस्तेपामिन्द्रो भविष्यति । निर्मोहस्तत्त्वदर्शी च निष्प्रकम्प्यो निरुत्सुक ॥३८॥ धृतिमानव्ययश्वान्यस्सप्तमस्सुतपा मुनि । सप्तर्पयस्त्वमी तस्य पुनानपि निवोध मे ॥३॥ बारहवें मनु रुद्र सावरिण होगे । उम समय के इन्द्र का नाम ऋतुघामा होगा। अब देवनाग्रो के नाम सुनो ॥३२॥ हरित, रोहित, सुमना, सुकर्मा और सुराप नामक देवतागो के पांच ग्ण होगे। प्रत्येक गण मे दस देवता होंगे ॥३३।। तपस्वी, सुतपा, तपोमूर्ति, तपोरति, तपोधुति, तपोद्य ति और नपोषन उस समय के सप्तपि होगे । रुद्र सावणि मनु के देववान्, उपदेव और देवश्रेष्ठ आदि महावीयवान् पुत्र उस समय के राज्याधिकारी होगे । तेरहवां मनु रुपि होगा और सुत्रामा, सुकर्मा और सुधर्मा नामक देवताओ के गण होगे । प्रत्येक गरण में तैतीस देवता होगे तथा अत्यन्त बली दिवस्पति नामक उनका इद्र होगा । निर्मोह, तत्त्वदर्शी, निष्प्रकम्प, निरुत्सुक, धृतिमान्, अन्यय पौर मुतपा नामक सप्तपि होगे । अब मनु पुत्रो के नाम बताता हूँ ॥३७-३६॥ चित्रसेनविचिनाद्या भविष्यन्ति महीक्षित । भौमश्चतुर्दशश्चात्र मैत्रेय भविता मनु ।४०१ शुचिरिन्द्र सुरगणास्तत्र पञ्च शृणुप्त तान् । चाक्षुपाश्च पवित्राश्च कनिष्ठा भ्राजिकास्तथा ॥४१॥ वाचावृद्धाश्च वै दवास्सप्तीनपि मे शृणु । अग्निवाहु शुचि शुक्रो मागधोऽग्निध्र एव च ।।२। युक्तस्तथा जितश्चान्यो मनुपुत्रानत शृणु। उरगम्भीरबुद्धचाद्या मनोस्तस्य सुता नृपा ॥४३॥ यथिता मुनिशार्दूल पालयिष्यन्ति ये महीम् ।४।।
तृतीय अश-अ०२ [ ३३३ उन रचि नामक मनु के चित्रसेन पौर विचित्रादि पुन राज्याधिकारी होंग ! चौदहवें मनु भौम हॉग ॥४०॥ उस मन्वन्तर में शुचि नामक इन्द्र और चाप.प, पवित्र, कनिष्ट, भ्राजिव और वाचावृद्ध नामक पांच देवगण हो। अव सप्तर्पियो के नाम सुनो-- अग्निवाहू शुचि, शुक्र, मागध, अग्निम्र, युक्त और रित नामक सप्तपि होंगे। प्रब मनु पुत्रों के नाम नुनो। है मुनिश्रेष्ठ । भौम नामक उन मनु ने अप और गम्भोर युद्धि प्रादि पुन पृथिवी का पालन करने दाले होंगे ।।४१-४४॥ चतुर्युगान्ते वैदाना जायते क्लि विप्लव । प्रवर्तयन्ति तानेत्य भुव सप्तर्पयो दिव १४५॥ कृते कृते स्मृतेविप्र प्रगना जायते मनु । देवा यज्ञभुजस्ते तु यावन्मन्वन्तर तु तत् ॥४॥ भवन्ति ये मनो पुना यावन्मन्वन्तरतु त तदन्वयोद्भवंश्चैव तावद्भू परिपाल्यते ।। मनुस्ससर्पयो देवा भूपालाश्च मनो सुता मन्वन्तरे भवन्त्येते गनदवाधिकारिण १४ चतुर्दगभिरेतैस्तु गतैर्मन्वन्तरद्विज । सवयुगपर्यन्त क्ल्पो निश्शेष उच्यते ॥४॥ तावत्प्रमाणा च निमा ततो भवति सत्तम । ब्रह्मम्पधरोते रोपाहावम्युसम्पनवे ॥५०॥ बैलोक्यमखिल ग्रस्त्वा भगवानादिकृद्विभु । स्वमायामस्थितो विप्र सर्वभूतो जनार्दन १५ तत प्रबुद्धो भगवान् यया पूर्व तया पुन । सृष्टिं करोत्यब्ययात्मा क्ल्पे को रजोगुण ॥५॥ मनको भूभुजस्नेन्द्रा देवागमयम्नना। माविरोग यिनिकरो जगनो द्विजगतम ५१ प्रस चतुगी के अवसर वेद गुप्त हो जाते है, बसपि ही वर्गम पिी पर दान होकर उनका प्रमाण करते हैं प्रये हायुग तृतीय ग्रंश-अ० ३] [६७५ मन्वन्तराग्यपाणि कथितानि मया तव । मन्वन्तराधिपारचंव किमन्यत्कथयामि ते ॥६॥ हे मय जी ! विश्व की स्थिति करने वाले भगवान् विष्णु जिप्स प्रसार चारों युग में व्यवस्या करते है, उमे मुनो ॥५४॥ सभी जीवों के कल्याण में तत्पर हुए वे मर्वभूतारमा भगवान् सत्ययुग में कपिल प्रादि के रूप में परम जानोपदेश करते हैं ॥१५॥ नेता में चक्रवनि सम्राट् होकर दुष्टो का निग्रह करते हुए वही तीनो लोगों की रक्षा करते हैं ॥५६॥ द्वापर में वैद या स्प से एक वेद को चार भागों में विभक्त करके, उमे संक्डो शाखामों में वोट कर उसका अत्यन्त प्रसार कर देते हैं । ५७। इस प्रकार द्वापर युग में देवी का विस्तार करने के पश्चात् कलियुग के अन्त में बलि रूप धारण परके दुराचरण में प्रदत्त हुए लोगों को स्मार्ग की मोर प्रवृत करते हैं । Int1 इसी प्रकार वह सर्वामा भगदान निर तर इस विश्व को उत्पत्ति, पालन और सहार करते रहते हैं । संसार की कोई भी वस्तु उनसे भिन्न नही है ॥५६॥ हे विन । इहलोक और परलोक में अतीत में हुए, प्राणे होने वाले तपाभव जो स्थित, वे सम्पूर्ण पदार्य भगवान् विष्णु से ही प्रकट हुए हैं, इस विषय में सब कुछ तुम्हारे प्रति कह चुका हूं ।।६२॥ सभी मन्वन्तरो तथा उनवे अधिकारियों का वृत्तान्त भी मैं तुम्हें सुना चुरा हूँ। मब तुम्हें मोर क्या मुनाऊँ ? यह मुममे कही ॥१॥ तीसरा अध्याय मातमेतन्मया त्वत्तो यया सर्वमिद जगत् । विष्णुविष्णो विष्णुता न पर विद्यते तत. ११ एतत्तु प्रोतुमिच्छामि व्यस्ता वेदा महात्मना। वेदव्यासस्वरूपेण तया तेन युगे युगे ।
३७४ ] [ थीविष्णुपुराण के प्रारम्भ मे स्मृतिकार मनु की उत्पत्ति होती है और उस मन्व तर वे समाप्त होने तक उस काल के देवता यज्ञ-भागो को ग्रहण करते हैं ॥३६॥ मनु के पुत्र तथा उनके वशधर मन्वन्तर की समाप्ति पर्यंत पृथिवी का परिपालन परते रहते है ।।४७ । इस प्रकार मनु सप्तपि, देवता, इन्द्र और मनु-पुत्र नृपतिगण यह सभी उस मन्वन्तर के अधिकारी माने जाते हैं ॥४८॥ हे विप्र । इन चौदह मावातरो के व्यतीत होने पर एक हजार युगो तक का कल्प समाप्त हुमा बताया जाता है ॥४६॥ इसके पश्चात् इतने ही समय की रात्रि होती है । उस समय ब्रह्मरूपी विष्णु प्रलयकाल के उस जल के ऊपर स्थित शेप शय्या पर सोते हैं ।।५० तब प्रादि कर्ता सयभूत भगवान् जनाईन अखिल त्रैलोक्य का ग्रास करके अपनी ही माया मे स्थित हो जाते हैं ॥५१॥ प्रत्येक कल के प्रारम्भ में वह अव्ययात्मा भगवान् जाग्रत होकर रजोगुण के माधय से गृष्टि को रचते हैं ॥५२॥ हे द्विज सत्तम । मनु, उनके पुत्र नृपगण, इन्द्र, देवगण और सप्तर्षि गण - यह सभी विश्व पालक भगवान् श्रीहरि के सात्त्विक अश हैं ॥५३।। चतुर्युगेऽप्यसौ विष्णु स्थितिव्यापारलक्षण । युगव्यवस्था कुरुते यथा मैत्रेय तच्छणु १५४। कृते युगे पर ज्ञान कपिलादिस्वरूपधृक् । ददाति सर्वभूतात्मा सर्वभूतहिते रत ।५५। चक्रवर्तिस्वरूपेण त्रेतायामपि स प्रभु । दुष्टाना निग्रह कुर्वन्परिपाति जगत्नयम् ॥५६। वेदमेक चतुर्भेद कृत्वा शाखाशतविभु । करोति वहुल भूयो वेदव्यासस्वरूपधृत् ॥५७। वेदास्ते द्वापरे व्यस्य क्लेरन्ते पुनहरि । वरिवस्वरूपी दुर्वृत्तान्मार्गे स्थापयति प्रभु ॥५८। एवमेतजगत्सर्वं शश्वत्पाति करोति च । हन्ति नान्तप्वनन्तात्मा नास्त्यस्माद्व्यतिरेगि यत् ॥५६॥ भूत भव्य भविप्य च सर्वभूतान्महात्मन । तदनान्यत्र वा विप्र सद्भाव वाषितस्तव ।६०) तृतीय ग्रंश-प्र० ३ ] [ ३७५ मन्वन्तराण्यपागि कथितानि मया तव । मन्वन्तराधिपाश्चैव किमन्यत्कथयामि ते ॥६॥ हे मैत्रेय जी ! विश्व की स्थिति के करने वाले भगवान् विष्णु जिस प्रकार चारों मुग पे व्यवस्था करते हैं, उसे सुनो ॥५४ । सभी जीवो के कल्याण मे ततार हुए वे सर्वभूतात्मा भगवान् सत्ययुग मे कपिल प्रादि के रूप में परम मानोपदेश करते हैं ।।।शा वैता में चक्रपति सम्राट् होकर दुष्टो वा निग्रह परते हुए यही तीनो लोको की रक्षा करते हैं ॥३६॥ द्वापर में वेद प्याम रूप से एक वैद को चार भागो में विभक्त करके, बमे सैकहो पाहायों ये बोट कर उसका प्रत्यन्त प्रसार कर देते है । ५७॥ इस प्रकार द्वापर युग में वैदों का विस्तार करने के पश्चात् पलियुग के अन्त मे वलि रूप धारण करके दुराचरण मे प्रवंत लोगो को स्मार्ग की मोर प्रवृत्त करते हैं । १५८11 इसी प्रकार यह सर्वात्मा भगवान् निरन्तर इस विश्व की उत्पति, पालन और संहार करते रहते हैं । संसार की कोई भी वस्तु उनसे मिन्न नहीं है ॥५६॥ हे विप्र ! इहलोक और परलोक के अतीत में हुए, प्रागे होने वाले तपा मद जो स्थित है, वे सम्पूरा पदार्य भगवान् विष्णु से ही प्रार हुए हैं, इस विषय मे सब कुछ तुम्हारे प्रति वह चुका हूँ॥६२॥ सभी मन्वन्तरी तथा उनले प्रधिकारियों का वृतान्त भी मैं तुम्हें सुना चुका है। अब तुम्हें और यया मुना ? यह मुग हो ।।६१॥ तीसरा अध्याय ज्ञातमेतन्मया त्वत्तो यथा सर्वमिदं जगत् । विपणुविष्णो विप्रगुतश्च न परं पिद्यते तत. ११ एतत्तु श्रोतुमिच्छामि व्यस्ता येदा महात्मना । वेदव्यासस्वरपेण तया तेन युगे युगे ।२।
३७६ ] [श्रीविष्णुपुराण यस्मिन्यस्मिन्युगे व्यासो यो य ासीन्महामुने । त तमाचक्ष्व भगवञ्छाखाभेदाश्च मे वद ॥३॥ वेदद्रु मस्य मैत्रेय शाखाभेदास्सहस्रश । न शक्तो विस्तराद्वक्तु सक्षेपण शृणुष्व तम् ।४। द्वापरे द्वापरे विष्णुासरूपी महामुने। वेदमेक सुबहुधा कुरुते जगतो हित. ॥५॥ वीर्य तेजो बल चाल्प मनुष्याणामवेक्ष्य च । हिताय सर्वभूताना वेदभेदान्करोति सः ।। ययासौ कुरुते तन्वा वेदमेक पृथक् प्रभु. । वेदव्यासाभिधाना तु सा च मूतिर्मधुद्विप.७॥ श्री मैत्रेयजी ने कहा-मापवे कहने से मैंने यह जान लिया कि यह विश्व विष्णुरूप, विष्णु मे स्थित तथा उन्ही से उत्पन्न हुया है । उन भगवान् विष्णु के अतिरिक्त कही कुछ भी नहीं है ॥१॥ अव मुझे यह सुनने पो जिज्ञासा है कि उन्होंने वेदव्यास रूप से युग-युग मे प्रकट होकर वेदो का विभाग किस प्रकार किया ? ॥२॥ हे महामुने | जिस-जिस युग में जो-जो वेदव्यारा हुए, उन सबका तथा वेदो के सब शाखा भेदो को माप मेरे प्रति कहिये ॥३॥ थी परा• पारजी ने कहा-हे मैत्रेयजी | वेद रूपी वृक्ष के हजारो शाखा-भेद हैं, उनका विस्तृत वर्णन करने में तो कोई भी शवय नहीं है, इसलिये उसे सक्षेप मे श्रवण परी ॥४॥ हे महामुने ! जब-जब द्वापर युग माता है, तभी-सभी भगवान विष्णु वेद प्यारा ये रूप में अवतीर्ण होकर विश्व-कल्याणार्य एव वेद में मनेर पर देते हैं ॥५॥ वे उस समय पे मनुष्यो पे यल, धीयं, तेग को पटता हमा देख पर ये सय जीयो पा हित मरने की इच्छा से वेदो को विभक्त करते है ॥६॥ जिरा देह से एक वेद से भने भेद परते हैं, भगवान् की उम मृत्ति को घदव्यारा पहने हैं ॥७॥ गस्मिन्मन्यन्तरे. व्यासा ये ये स्युस्तानियोध मे। यथा च भेदानापाना प्यागेन मियते मुने ।
तृतीय ग्रंश-अ०३] { ওও अष्टाविंशतिकृत्वो व वेदो व्यस्तो महर्षिभिः । वैवस्वतेऽन्तरे तस्मिन्द्रापरेषु पुनः पुनः ।। वेदव्यासा व्यतीता ये ह्यष्टाविंशति सत्तम । चतुर्धा ये. कृतो वेदो द्वापरेषु पुनः पुनः ११०१ द्वापरे प्रथमे व्यस्तस्स्वय वेदः स्वयम्भुवा । द्वितीये द्वापरे चैव वेदव्यास: प्रजापतिः १११ तृतीये चोशना व्यासश्चतुर्थे च बृहस्पतिः । सविता पञ्चमेः व्यासः पठे मृत्युस्स्मृत. प्रभुः।१२। सप्तमे च तथवेन्द्रो वशिष्ठश्चाष्टमे स्मृतः । सारस्वतन नवमे निधामा दशमे स्मृतः ॥१३॥ एकादशे तु निशिखो भरद्वाजस्ततः परः । प्रयोदशे चान्तरिक्षो वर्णो चापि चतुर्दशे ।१४१ है मुने । जिस-जिस मन्वन्तर मे जो-जो ध्यास होते हैं और वह जिस- जिस प्रकार से बेदी का विभाग करते हैं, वह सब मुभगे श्रवण करो ॥८॥ इसी वैवस्वत मन्वन्तर फे प्रत्येक द्वापर युग में व्यास ऋपियो ने भर तक पट्टाईम र वेदो को विभक्त किया है। अब उन अट्ठाईस व्यासो का वृत्तान्त सुनों, जिन्होंने द्वापर युग में दो फे वारवार चार-चार विभाग किये है ॥१०॥ अपम द्वापर मे स्वय ब्रह्माजी ने वेदो का विभाग दिया और दूसरे द्वापर मे प्रजापति वेदव्यास हुए ॥१॥ तीसरे द्वापर में शुक्राचार्य वेदव्यास हुए, चौथे मे पृहस्पतिजी, पांच में सूर्य और छठे में मृत्यु वेद व्यास यने ॥१२॥ सातवें में इन्द्र, प्राठवें में वसिए, नौवें में सारस्वत और दसवें में विधामा वेदव्यास कहलाये ॥१३॥ ग्यारहवें मे त्रिशिल, बारहवें में भारद्वाज, तेरहवें में प्रत्तरिक्ष और चौदहवें में वर्णी वेद व्यास हुए ॥१४॥ अय्यारणः पञ्चदशे पोडशे तु धनश्चयः । फतुश्चय. सप्तदशे तवं च जयस्स्मृतः ॥१५॥ ततो व्यासो भरद्वाजो भरद्वाजाच्च गौतमः । गीतमादुत्तरी व्यासो हात्मा योभिधीयते ।।
३७८ ] [ श्रीविष्णुपुराण यथ र्यात्मनोऽन्ते च स्मृतो वाजथवा मुनि । सोमशुष्मायणस्तस्मात्तृणविन्दुरिति स्मृत ॥१७॥ शक्षोऽभूनागवस्तस्माद्वाल्मीकियोंऽभिधीयते। तस्मादस्मपिता शक्तिप्रास्तस्मादह मुने ११८) जातुकर्णोऽभवन्मत्त कृष्णद्वैपायनस्तत । अष्टाविशतिरित्येते वेदव्यासा पुरातना ।१६। एको वेदश्चतुर्धा तु तै कृतो द्वापरादिपु २०० भविष्ये द्वापरे चापि द्रौणिव्यासो भविष्यति । व्यतीते मम पुत्रेऽस्मिन् कृष्णवं पायने मुने ।२१। पद्रहवें द्वापर मे अग्यारण सोना में धनञ्जय साहवें मे रतअप और अठारह मे जय नामक वेदव्यास हुए ॥१५॥ उनीम द्वापर में भरदान धीसवें मे गौतम और गौतम के बाद इक्कीसवें द्वापर में हरिमा नामय प्यास हर ।।१६॥ वाईसवें मवतर मे वाजथया मुनी वेद व्याग हुए, घोर उनके हा" सोम शुष्म वश ये तृणबिदु नामक तेईसवें द्वापर में व्यास हुए ॥१७॥ उनके पचात् भृगुवंश वे ऋक्ष चौबीसो व्यास हुए , बनाये, उनने पश्चात् मरे पिता शक्ति हुए और फिर मैं सब्बीसा पास हुमा ॥१८॥ मेरे बाद जातुरण और पिर वृष्ण द्वैपायन व्यास हुए । इस पर वह पट्ठाईस व्यास प्राचीन यह हैं । ६ होने सय द्वापरोम एन एप मरे पार पार विभाग विय १६ २०॥ हे गुन ! मेरे पुत्र कृष्ण पायन में परचार पागागी द्वापर युग में द्रोणाचार जी के पुत्र प्रश्यत्यामा होगे ॥२१॥ 5 यमयाक्षर ब्रह्म प्रोमित्येव व्यवस्थितम् । वृहत्त्वावृहणत्याच तद्ब्रह्मत्यभिधीयत २२ प्रणयास्थित नित्य भू यस्स्वरितीर्यते । ऋग्यजुस्गामापर्यापणा यत्तस्मै ग्रह्मणे नम ॥२३॥ जगत प्रायोत्सत्यार्यतारणराशितम् । महत परम गुह्य स्मै गुमायण | २४॥ यही कालान्तर म वामीकि । [ ३७६ ऋग्यजुम्माममागगमायागमा गरिर तृतीय अंश-अ० ३] अगायापारमक्षय्य जगत्सम्मोहनालयम् । स्वप्रकाशप्रवृत्तिम्या पुरुषार्थप्रयोजनम् ॥२५॥ सास्यज्ञानवता निष्ठा गतिश्शमदमात्मनाम् । यत्तदव्यक्तममृत प्रवृत्तिब्रह्म शाश्वतम् ।२६। प्रधानमात्मयोनिश्च गृहासस्थ च शब्द्यते । अविभाग तथा शुक्रमक्षय बहुधात्मकम् ।२७। परमब्रह्मणे तस्मै नित्यमेव नमो नमः । यद् प वासुदेवस्य परमात्मस्वरुपिण 1२८॥ यह अविनाशी ॐ रूप एकाक्षर ही ब्रह्म है । यह यक्ष एवं छात्र होने के कारण 'ब्रह्म' कहा जाता है ।।२२।। भूलोक, मृवी, दर्गेट-17 तीनों ही प्रणव रूप ब्रह्म मे स्थित है तथा प्रणय ही ऋय, पः, मान और पायव रूप चारी वेद हैं, इसलिये उस प्रणव रूप ब्रह्म वो नमा जो ब्रह्म विश्व की उत्पत्ति और प्रलय वा कारण पा गया। या RA तत्व से भी परम गुह्य है, उस प्रणव रूप को नमस्का गाय, अपार और अक्षय तया जगत् को मोहित बग्न थाम ना प्राधार स्वप्रयास युक्त सत्वगुण और प्रवृत्ति प रजोगुण या मो पुस्पार्य का पारण है ॥२५॥ जो साम्य मारा और मग वालो वा गन्तव्य स्थान है तथा जो अमन, अविगी गरिय प्रह होकर सदा स्थित है ॥२६॥ ना स्वयमू, प्रधान retaryा गया है वया जो पविभाग, अक्षय और वानमा पानी परमक स्वरूप वासुदेव भगवान् का हा रूप, माया को बार ममसार है ॥२८॥ एदब्रह्म विधा दमदमाग प्रमृ । सर्वभेदेप्वभेदोमानित किन्नदान 10 सम्बड भयम्गामन्त्र. गोमा म यजुर्म . ।
३८० ] [ श्री विष्णुपुराण स भिद्यते वेदमयस्ववेद करोति भेदैर्वहुभिस्सशाखम् । शाखाप्रणेता स समस्तशाखाज्ञानस्वरूपो भगवानसङ्ग ।३१॥ यह प्रणव रूप ब्रह्म अभेद होकर भी तीन भेद वाला और सभी भेदों मे अभिन्न रूप से स्थित है, परन्तु भेद बुद्धि वालो को पृथक् पृथक प्रतीत होता है ॥२६॥ वह सर्वात्मा ऋड मय, सागमय और यजुर्मय है तथा ऋक, यजु , साम का सार रूप वह प्रणव ही सब देहधारियो को प्रात्मा है ॥३०॥ वह वैदमय है, वही ऋग्वेदादि रूप से भिन्न भिन्न होता और अपन वेद रूप को विभिन्न शाखो मे विश्वत परता है। वही सग-रहित ज्ञान स्वरूप परमात्मा सब शाखो का रचने वाला है ॥३१॥ चौथा अध्याय माद्यो वेदश्चतुष्पाद शतसाहस्रसम्मित । ततो दशगुण कृत्स्नो यज्ञोऽय सर्वकामधुक् ।। ततोऽत्र मत्सुतो व्यासो अष्टाविंशतिमेऽन्तरे । वेदमेव चतुष्पाद चतुर्धा व्यभजत्प्रभु ।। यथा च तेन वै व्यस्ता वेदव्यासेन धीमता। दास्तथा समस्तस्तैयस्ता व्यस्तैस्तथा मया।३। तदनेनैव वेदाना शाखाभेदान्द्विजोत्तम। चतुर्युगेपु पठितान्रामस्तेप्वयधारय । वृष्णद्वैपायन व्यास यिदि नारायण प्रभुम् । पो बन्यो भुवि मैत्रेय महाभारतद्भवेत् ।। तेन व्यम्ता यथा वेदा मत्युवरण महात्मना । द्वापरे घन मैत्रेय तस्मिा पृणु यथातथम् ॥६॥ ग्रह्मरणा चोदितो व्यासो वेदान्यस्तु प्रचामे । प्रथ सिध्यान्प्रजयात् चतुरो वेदपारगान १७।
तृतोय अश-३०४ ] यो पराशरजी ने कहा- सृष्टि के आदि में वेद चार पदो से युक्त तपा एक लास मन्त्रो का था, जिससे समस्त कामना प्रद अग्निहोत्रादि दस प्रकार के यज्ञो का प्रचार हुआ ॥१॥ फिर अढाईसवे द्वापर में मेरे पुत्र कृपा द्वैपायन ने इस बार पाद दाले एक वेद के चाद विभाग किये ॥२॥ परम मेधावी मैदव्यास ने जैसे उनका विभाग किया, जैसे ही मैंने तथा अन्यान्य भेद- प्यासी ने भी किया था ॥३॥ इसलिगे हे द्विजश्रेष्ठ ! सब चतुयुगियो में इन्हीं शाला-कोदों वाले वेद का पाठ होता हुप्रा समभो ॥४भगवान् कृष्ण द्वैपायन को साझाद नारायण ही मानो क्योकि भगवान नारायण के अतिरिक्त क्सि में महाभारत रचने की सामथ्र्य हो सकती है ?॥५॥ हे मैत्रेयजी ! द्वापर में पेरे महात्मा पुत्र कृष्ण पायन वैदी को जिस प्रकार विभत किया था, उसे अब यपातय्य सुनो ।।६। ब्रह्माजी की प्रेरणा से जब उन्होंने वेदो का विभाग फरना चाहा, तब उन्होंने वेदाध्ययन में समर्थ चार सियों को इस कार्य में नियुक्त किया ॥७॥ ऋग्वेदपाठक पलं जग्राह स महामुनि । चशम्पायननामान यजुर्वेदस्य चाग्रहीत् ।। जैमिनि सामवेदस्य तथैवाथर्ववेदवित् । सुमन्तुल्तस्य शिप्पोभूद्वेदव्यासस्य धीमतः ।। रोमहर्षरनामान महायुद्धि महामुनि. सूत जग्राह गिप्यं स इतिहासपुराणयोः ११०१ एक आसोद्यजुर्वेदस्त चतुर्वा व्यक्ल्पयत् । चातु)तमभूत्तस्मिस्तेन यशमपाकरोत् ॥११॥ प्राध्वयंवं यज भिस्तु सम्भिोय तया मुनिः । आदान सामभिश्चक ब्रह्मत्वं चाम्ययर्वभिः ११२।। ततस्स ऋच उद्धृत्य ऋग्वेद कृतवान्मुनिः । यपि च यजुर्वेद सामवेदं च सामभिः ॥१३॥ उन चार शिष्यों में से पंस नामक शिस्य को वन महामुनि ने ऋग्वेद पर धपाय गोषवारेजीमामले सामय पर मध्यम
३८२ ]
[ श्रीविष्णुपुराण
कराया । उन्होने अपने सुगन्तु नामक शिष्य को प्रथर्ववेद में पारगत पिया
||८-६॥ इनके अतिरिक्त सूत जाति मे उत्पन्न रोमहर्पण नाम महा मेधावी
को व्यासजी ने इतिहास-पुराण के विद्यार्थी के रूप मे शिष्य बनाया ॥१॥
पहिले यजुर्वेद एव ही था। उन्होने उसके चार विभाग किये, इसलिये उसमें
चातुर्होत्र की प्रवृत्ति हुई और इसी विधि से उन्होने यज्ञो के अनुशनों को
व्यवस्थित किया ॥११॥ व्यासजी ने यजुर्जेद से प्रध्वयु का कर्म निश्चय किया,
ऋग्वेद से होता का कर्म कल्पित किया, सामवेद से उदाता के कर्म की पौर
अथर्ववेद से ब्रह्मा के कर्म की स्थापना की ॥१२॥ फिर उन्होंने ऋग्वेद और
यजुर्वेद की थ तियो का उद्धार करके ऋग्यजु साम को श्रुतियों से सामवेद की
रचना की।॥१३॥
राज्ञा चाथर्ववेदेन सर्वकर्माणि च प्रभु ।
कारयामास मैनेय ब्रह्मत्व च ययास्थिति ।१४।
सोऽयमेको यथा वेदस्तरुस्तेन पृथक्वृत्त ।
चतुर्धाथ ततो जात वेदपादपकाननम् ॥१५॥
विभेद प्रथम विप्र पैलो ग्वेदपादपम् ।
इन्द्रप्रमितये प्रादाद्वाष्कलाय च सहिते ।१६।
चतुर्धा स विभेदाथ बाष्कलोऽपि च सहिताम् ।
बोध्यादिभ्यो ददौ ताश्च शिष्येभ्यस्स महामुनि ।१७)
बोध्याग्निमाढकी तद्वद्याज्ञवल्क्यपराशरौ।
प्रतिशाखास्तु शाखायास्तस्यास्ते जगृहुर्मुने ।१८१
इन्द्रप्रमितिरेका तु सहिता स्वसुत तत ।
माण्डुकेय महात्मान मैयाध्यापयत्तदा ।१६।
तस्य शिष्यप्रशिष्येम्य पुराशिष्यमाद्ययौ।
वेदमित्रस्तु शावल्य सहिता तामधीतवान् ।२०।
हे मंडेयजी ! मथववेद के द्वारा उन वेदव्यास ने समस्त राजकर्म की
ब्रह्मत्व को व्यवस्था की ॥१४॥ इस प्रकार उन्होंने एक वेदरूप वृक्ष के पार
भाग दिपे और उन पारो भागों से वैद रूपी वृक्षों का वन ही लग गया ॥१॥
[ ३८३ तृतीय अग-अ०४ ] प्रथम पल ने ऋग्वेद रूपी वृथ को दो भागो म बांटा और अपने शिष्य इन्द्र- प्रमिति और वाकल को उनका अध्ययन कराया ॥१६॥ वाकन ने भी अपनी शाखा के चार भाग करके उह अपने बोध्य प्रादि शिष्या को पद्धाया ॥१७॥ ह मुने । बाप्कल की शाखा की जो चार प्रनिशासाएं हुई, उह उनके शिष्य ध्य, अग्निमाढक, याज्ञवल्क्य और पराशर ने यहण किया ॥१८॥ है यजी। इन प्रमिति ने अपनी प्रति शाखा का अध्ययन प्रपने पुत्र माण्डुनेय से कराया ॥१६॥ इस प्रकार शिष्य और गिय के भी शिष्य के क्रम से उस गाखा को उनके पुत्र और गिप्यों न वृद्धि की । इसी गिप्य-परम्परा से शामल्य वेदमिन ने उस सहिता का अध्ययन रिया ॥२०॥ चकार सहिता पञ्च शिष्येभ्य प्रददौ च ता । तस्य शिप्यास्तु ये पञ्च तेपा नामानि मे शृणु १२११ मुगलो गोमुखश्चैव वात्स्यश्शालोय एव च । शरीर पञ्चमवासीन्मैनेय सुमहामति ।२२॥ सहितारितय चक्रे शाक्पूर्णस्तथेतर । निरुक्तमकरोत्तद्वन्चतुर्थ मुनिसत्तम ।२३॥ क्रौञ्चो वैतालिपस्तबलावश्च महामुनि । निरुक्तच्चतुर्थोऽभूढ दवेदाङ्गपारग १२४॥ इत्येता प्रतिशावाम्यो ह्यनुशासा द्विजोत्तम । वाप्प लश्चापरास्तिबस्सहिता कृतवान्द्विज ॥२५॥ गिप्प कालायनिर्णायंस्तृतीयश्च पयाजव । इत्येते वहचा प्रोक्ता सहिता ये प्रतिता १२६॥ इसके पश्चात् शान्य वेदमित्र ने उस पासा की पांच अनुगासाए पौर अपने पांच शिष्या को उनका अध्ययन कराया। अब उन नाम सुनो।२।। मुदगल, गोमुस, वालस्य, शासीय और पांचवें पत्यंत बुद्धिमान शरीर थे ।२२। है उनके एर माय शिष्य मारपूर्ण ने तोन वेद सहितामों तपा एर निस्कत प्रप को रचा था ॥२३॥ महामुनि कोच, तारिक और बलाक नामय उनके गियों ने तीनों सहिदापों का मध्ययन रिया तथा उना एव चनुयं शिष्य ने ३८४ ] [ श्रीविष्णुपुराण द-दाग मे पारगता प्राप्त की और निरक्ति की रचना की ॥२४॥ इस प्रकार गेद-वृक्ष की शाखायो से प्रति शासाए और उनसे भी अनुशासाएं उत्पन हुई। हे द्विजोतम । बाप्पल ने अन्य तीन सहितामों की भी रचना की थी ।।२।। पालायनि, गाग्यं और क्या जव उनके शिष्य थे। जिन्होंने इन सहिताओं का प्रसार क्यिा, वे वह वृच कह कर विम्यात हुए ॥२६॥ पाँचवाँ अध्याय यजुर्वेदतरोश्शाखास्सप्तविंशन्महामुनि । वैशम्पायननामासौ व्यासशिप्यश्चकार वै । शिष्येभ्य प्रददौ ताश्व जगृहुस्तेऽप्यनुक्रमात् । याज्ञवल्क्यस्तु तनाभूद्ब्रह्मरातसुतो द्विज ॥२॥ शिष्य परमधर्मज्ञो गुरुवृत्तिपरस्सदा। ऋषिोऽद्य महामेरो समाजे नागमिष्यति ।३। तस्य वै सप्तरानात्तु ब्रह्महत्या भविष्यति । पूर्णमेव मुनीगणस्समयो य कृतो द्विज ।४। वैशम्पायन एकस्तु त व्यतिक्रान्दवास्तदा । स्वस्रीय बालक सोऽय पदा स्पृष्टमघातयत् ।। शिष्यानाह स भो शिष्या ब्रह्महत्यापह व्रतम् । घरध्व मत्कृते सर्वे न विचार्यमिद तथा ।। अथाह याज्ञवल्क्यस्तु किमेभिर्भगवन्द्विजे । क्लेशितरल्पतेजोभिश्चरिष्येऽहमिद व्रतम् ।७) है महामुने । व्यास-शिष्य वैशम्पायन जी ने यजुर्वेद रूपी वृक्ष की सत्ताईस शाखामो को रचा ॥१॥ वे शाखाएं उन्होने अपने शिष्यो को पढ़ाई तथा शिष्यो ने भी उन्हे क्रमशः ग्रहण किया। हे विप्र । उनका एक परमधार्मिक तृतीय अग-अ०५] [ ३८५ शिष्य ब्रह्मरात-पुत्र याज्ञवल्क्य था । जो सदा ही गुस् सेवा में तत्पर रहता था। जो महामेरु स्थित हमारे समाज मे मम्मिलित न होगा, उसे सात रातो में ब्रह्महत्या लगेगी । इस प्रकार मुनियों ने पहले निश्चित किया था, परन्तु उनके उस नियम का सर्व प्रथम शम्मायन ने ही उल्लपन दिया था। इसके पश्चात् उसका चरण छू जाने मात्र से उसके भानजे की मृत्यु हो गई ॥२-३।। तब वह अपने शिष्यों से दोले-हे शिष्यो । तुम पिसी प्रकार का विचार न करते हुए मेरी ब्रह्म हत्या को दूर करने के निमित्त व्रत करो ॥६इम पर याज्ञवल्क्य जी ने पहा हे भगवन् ! यह ब्राह्मण अल्प तेज वाले हैं, इन्हें कष्ट देने से क्या लाम है ? मैं हो अकेला व्रत का अनुदान करूंगा 111 ततः ऋद्धो गुरः प्राह याज्ञवल्क्यं महामुनिम् । मुच्यतां यत्त्वयाधीतं मत्तो विप्रावमानक 141 निस्तेजसो वदस्येनान्यत्व ब्राह्मणपुङ्गवान् । तेन शिष्येण नार्थोऽस्ति ममाज्ञाभङ्गकारिणा ।। याज्ञवल्क्यस्ततः प्राह भक्त्यतत्ते मयोदितम् । ममाप्यल त्वयाधीतं यन्मया तदिद द्विज ११० इत्युक्तो रुधिराक्तानि मम्पाणि यपि मः । छर्दयित्वा ददो तस्मै ययौ स स्वेच्छया मुनि. ११॥ यजूप्यय विसृष्टानि याज्ञवल्क्येन वै द्विज । जगृहुम्तित्तिरा भूत्वा तैत्तिरीयास्तु ते ततः ।१२। ब्रह्माहत्यादतं चीर्ण गुरुणा चोदितैस्तु ये.। चरकाध्वयंवस्ते तु चरणान्मुनिमत्तम ।१६। याज्ञवल्क्योऽपि मैत्रेय प्राणायामपरायणः । तुधव प्रयतस्सूर्य यजूंप्यभिलपस्तत: १४॥ याज्ञवल्क्य की दात से नारायन जी कोधित हो गये मोर उन्होंने उन महामुनि यानवल्क्य जी से कहा-प्ररे ब्राह्मणों का भरमान करने वाले मूर्य ! सूने मुझसे जो कुछ भी पटा है, उस सब का त्याग वरदे l तुम इन सब विप पुगवों को निस्तेज बहता है, इसलिये तेरे जैसे माता भग करने वाले ३८६ ] [श्रीविष्णुपुराण शिष्य से मैं कोई प्रयोजन नही रसता ॥६॥ याज्ञवल्क्य बोर-ब्रह्मन् । मैंने तो अापकी भक्ति के वश ही यह बात कही थी, अब मुझे भी मापसे कुछ प्रयोजन नहीं है, मापसे जो कुछ मैंने पढ़ा था, वह सब यह नरस्थित है ॥१०॥ श्री पराशर जी ने कहा-यह कह कर महामुनि याज्ञवल्लयजी रघिर से लथपथ यजुर्वेद मूर्तिमान रूप मे वमन करके उन्हे दिया और अपनी इच्छानुसार यहाँ से चले गये ॥११॥ हे द्विज I यानवल्क्यजी के द्वारा वमन की हुई उन यजुर्वेद की श्रुतियो को अन्य शिष्यो ने तीतर का रूप धारण कर ग्रहण किया, इमीलिये वे मब शिष्य तैत्तिरीय मज्ञक हुए ॥१२॥ हे मुनिवर । गुरु की प्रेरणा मे जिन ब्राह्मणो ने ब्रह्म हत्या को नष्ट करने वाले व्रत का अनुमान किया था, वे द्रत करने के कारण चरकाध्वयु कहे गये ॥१३॥ फिर याज्ञवल्क्यजी ने भी यजुर्वेद की कामना से प्राणायाम परायण रह कर सूश का स्तवन किया ॥१४॥ नमस्सवित्रे द्वाराय मुक्तेरमिततेजसे । ऋग्यजुस्सामभूताय नयीधाम्ने च ते नम ॥१५॥ नमोऽग्नीषोमभूताय जगत कारणात्मने। भास्कराय पर तेजस्सौषुम्नरुचिबिभ्रते ।१६। कलाकाष्ठानिमेपादिकालज्ञानात्मरूपिणे । ध्येयाय विष्णुरूपाय परमाक्षररूपिणे ।१७। वित्ति यस्सुरगणानाप्यायेन्दु स्वरश्मिभि । स्वधामृतेन च पितृ स्तस्मै तृप्त्यात्मने नम ॥१८॥ हिमाम्बुधर्मवृष्टीना कर्ता भर्ता च य प्रभु । तस्मै निकालरूपाय नमस्सूर्याय वेधसे ।१६॥ अपहन्ति तमो यश्च जगतोऽस्य जगत्पति । सत्त्वधामधरो देवो नमस्तस्मै विवस्वते १२० सत्कर्मयोग्यो न जनो नवाप शुद्धिकारणम् । यस्मिननुदिते तस्मै नमो देवाय भास्वते ।२१! याज्ञवल्क्यजी ने कहा-अमित तेजोमय, मोक्ष द्वार रूपी तेज से सम्पन्न तया ऋर, यजु और साम के साक्षात् रूप सूर्य भगवान स्वरूप, घेदत्रयी
तृतीय अश-ग्र०५]
[ ३८७
को नमस्कार है ॥१५॥ अग्नि और चन्द्रमा रूपी, विश्व के कारण और
पुम्त नामक परम तेज के धारक भगवान भास्कर को नमस्कार है ॥१६॥
बना, काना, निमेपादि काल ज्ञान के कारण रूप और चिन्तनीय परब
विष्णु पय यी सूर्यदेव को नमस्कार है ॥१७॥ जो अपनी किरणो द्वारा चन्द्रमा
को पुष्ट कर सुधा से देवतायो को तथा स्वधा से पितरो को तृप्त करते हैं, उन
तृप्ति रूप भगवान सूर्य को नमस्कार है ।१८। जो जीत, वर्षा, ग्रीष्म प्रादि के कर्ता
तथा विश्व के पापक हैं, उन त्रिकाल मूर्ति भगवान सूर्य को नमस्कार है ॥१९॥
जो पगलति इस सम्पूर्ण ससार के अन्धकार को नष्ट करते हैं, उन सत्वघामधर
विवस्वान् को नमस्कार है ॥२०॥ जिन उदय होने पर हो मनुष्यगण सत्कर्मों
में
प्रवृत्त होते हैं तथा जल भी उनके उदय हुए बिना सुद्धि करने वाला नही
होता, उन भास्वान् को नमस्कार है ॥२॥
स्पृष्टो यदशुभिर्लोक क्रियायोग्यो हि जायते ।
पवित्रताकारणाय तस्मै शुद्धात्मने नम ॥२२॥
नम सविने सूर्याय भास्कराय विवस्वते ।
आदित्यायादिभूताय देवादीना नमो नम ॥२३॥
हिरण्मय रथ यस्य केतवोऽमृतवाजिन ।
वहन्ति भुवनालोकिचक्षुप त नमाम्यहम् ॥२४॥
इत्येवमादिभिस्तेन स्तूयमानस्य वै रवि ।
वाजिरूपधर प्राह प्रियतामिति वाञ्छितम् ॥२५॥
याज्ञवल्क्यस्तदा प्राह परिगपत्य दिवाकरम् ।
यजू पि तानि मे देहि यानि सन्ति न मे गुरौ ।२६।
एवमुक्तो ददौ तस्मै यजू पि भगवानवि ।
अयातयामसज्ञानि यानि वेति न तद्गुरु ।२७।
यजू पि यरधीतानि तानि विप्रैर्द्विजोत्तम ।
वाजिनस्ते समारयाता सूर्योऽप्यश्वोऽभवद्यत ॥२८॥
शाखाभेदास्तु तेपा वै दश पञ्च च वाजिनाम् ।
काण्वाद्यास्सुमहाभाग याज्ञवल्क्या प्रकीर्तिता ॥२६॥
हो ३८८] [ श्रीविष्णुपुराण जिनयी विरणो पेपर्श होने पर ही ससार पो का अनुशान करने थे योग्य होता है, उन पयित्रता के कारण, गुर स्वरूप को नमस्कार है ॥२२॥ सवितादेय, सूर्य, भास्कर और विवस्वान को नमस्कार है. देवादि सब भूतों के पादिभूत भगवान् प्रादित्य को नमस्कार है ॥२३॥ जिनका हिरण्यमय रय और ध्वनाएं हैं, अमरत्व प्राप्त अश्व वहन परत हैं और पो त्रिभुवन प्रकाशित करने मे नेत्र स्वरूप हैं, उन सूर्य भगवान् को मैं नमस्कार करता हूँ ॥२४॥ श्री पराशर जी ने कहा-याज्ञवल्लयजी द्वारा इस प्रकार स्तुत होने पर भगवान सूर्य प्रश्व रूप से प्रकट हुए और उनसे बोले कि तुम अपना इच्छा वर मांगो ॥२५॥ यह देस पर याज्ञवल्क्यजी ने प्रणाम पूवक उनसे निवेदन किया-पाप मुझे वे यजुः श्रुतियां प्रदान करें, जिनरा ज्ञान मेरे गुरुजो को भी न हो ॥२६॥ याशवायजी के ऐसा कहने पर उन्होंने उहें प्रयातयाम नामक यजु. श्रुतियो का उपदेश दिया। उन तियो का उनके गुरु वैशम्पायनजी को भी ज्ञान नही था ॥२७॥ हे द्विज श्रेष्ठ । भगवान् सूय ने उन श्रुतियो का उपदश अश्व रूप मे प्रकट होकर दिया था इसलिये उन श्रतियो को पढने वाले ब्राह्मण वाजी सज्ञक हुए ॥२८॥ हे महाभाग । उन बाजि- श्रुतियो की काण्व ग्रादि पदह शाखाएं है, जो महपि याज्ञवल्क्यजी द्वारा प्रवृत की हुई बताई जाती हैं ॥२६॥ छठा अध्याय सामगेदतरोश्शाखा व्यासशिप्यस्स जैमिनि । क्रमेण येन मैनेय विभेद शृणु तन्मम ।। सुमन्तुम्तस्य पुनोऽभूत्सुवर्मास्याप्भूत्सुत । अधीतवन्तो चकका सहिता तो महामती ।। सहस्रसहिताभेद सुकर्मा तत्सुतस्तत । चकार त च तच्छिष्यो जगृहाते महाप्रती ।।
तृतीय अय-प्र०६] [ ३९ हिरण्यनाम. कोमल्य पौपिश्चिन द्विजोत्तम । उदोच्यास्सामगा. मिप्यास्तम्य पञ्चशत स्मृता ।। हिरण्यनामातावत्यस्महिता येद्विजोत्तम. । गृहीतास्तेऽपि चोच्यन्ते पण्डित. प्राच्यसामगाः ।। लोकाजिनाधमिश्चैव क्षीवालाङ्गलिस्तथा। पौप्पिञ्जिगिप्यास्तद्भदेस्सहिता बहुलीयता. १६॥ हिरण्यनाभगिप्यम्तु चतुर्विगतिमहिता । प्रोवाच कृतिनामासों मिप्येभ्यन महामुनि 101 तश्चापि सामवेदोऽमौ शाखाभिर्वहुली कृत । अथर्वणामथो वक्ष्ये सहिताना समुच्चयम् ।। श्री पराशरजी ने कहा-हे मश्रेय जी । जिस कम से च्याम शिष्य मिनिन सामवेद को शाखापो को विभक्त किया था यद उमे प्रवरण करो ॥१॥ जैमिनि या पुष नुमन्तु और उसका पुत्र मुकर्मा हमा। उन दोनों घेर बुद्धि वाले पुष-पौर ने सामवेद की एक-एक शाखा को पढा ॥२॥ पिर मुमन्तु- पुत्र सुर्मान मपनी सामवेद सहिता वे एक हजार शाखा-भेद किये, जिन्हें उमो कोमल्य, हिरण्यनाम और पौमिति नाम महारती दीप्यों ने प्रहरण पिया । हिरण्यनाम के जो पांच सो गिप्य हुए, वे सब उदीच्य सामग नाम से प्रसिद्ध हुए ॥३४॥ और जिन अन्य प्रेष्ट ब्राह्मणों ने हिररायनाम से इसनी हो महिनाए और प्रदा की थी, वे मब प्राध्यसामग नाम से विस्मात हुए। ॥शा पोस्पिक्षि के शिष्य लोराशि, नोपमि, पक्षीवान मोर भागलि विष्य तथा प्रतिष्पों में भी अपनी-अपनी सहिताप्रो की वाणा परवे नमा विम्वार पिया हिरवनाम के एक अन्य निष्प महामुनि ति ने अपने शिष्यों को सामवेद की चौवीम महिलामो का अध्ययन कराया । उन शिष्यों ने भी सामनेद को इन शासापों को बहुत वाया। अब मैं प्रददि सहिनामो समुच्चय को पता है । अथर्ववेद स मुनिस्शुमन्तुरमिता ति.। शिप्पमध्यापयामाग पन्ध सौपित द्विधा । वृत्वा तु देवदामि तथा पथ्याय दत्तवान् ।।
३६० ] [ श्रीविष्णुपुराण देवदर्शस्य शिष्यास्तु मेधो ब्रह्मवलिस्तथा । शौल्कानि पिप्पलादस्तथान्यो द्विजसत्तम ।१० पथ्यस्यापि त्रयश्शिष्या कृता यद्विज सहिता । जावालि कुमुदादिश्च तृतीयश्शौनको द्विज (११॥ शौनकस्तु द्विधा कृत्वा ददागेका तु वभ्रने । द्वितीया सहिता प्रादात्सैन्धवाय च सशिने ।१२। सैन्धवान्मुञ्जिकेशश्च द्वेधा भिन्नत्रिधा पुन । नक्षत्र कल्पो नेदाना सहिताना तथैव च ।१३। चतुर्थस्स्यादागिरसश्शान्तिकल्पश्च पञ्चम । श्रेष्ठास्त्वथर्वणामेते सहिताना विकल्पका ।१४। सुमन्तु मुनि ने अथववेद का अध्ययन सब से पहले अपने शिष्य पर यो परापा, जिसने उसके दो विभाग करने उन्हे अपने शिष्य देवदर्श और पम्प को दिया ॥६॥ हे द्विज श्रेष्ठ । देवदर्श के शिष्य मेघ, ब्रह्मबलि, पोल्कायान मौर पिपलाद हुए ॥१०॥ पथ्य के तीन विष्य जाबालि, कुमुदादि और शौनक हुए. जिन्होने सहिताओ को शाखा रूप मे विभक्त किया ॥११॥ शौनक ने भी अपनी सहिता के दो विभाग क्येि उनमे से एक बभ्रू को भौर दूसरी साधव को प्रदान यी ॥१२॥ सैन्धव से मुञ्जिनेश ने उपका अध्ययन किया और उसने प्रथम दो और फिर तीन विभाग किये । नक्षत्र कल्प, वेदकल्प, सहिता चौपा मागिरस कल्प पोर पांचवा शान्ति कल्प-- इन पांच लो की उन्होंने रचना को जो प्रथव-सहितायो मे सर्वोत्कृष्ठ मानी गई हैं ॥१३-१४॥ प्रास्यानैश्चाप्युपास्यानंर्गाथाभि क्ल्पशुद्धिभि । पुराणसहिता चक्र पुराणार्थविशारद ॥१५॥ प्रस्यातो व्यासशिप्योऽभूत्सूतो पै रोमहर्पण । पुराणसहिता तस्मं ददौ व्यासो महामति ।१६। सुमतिश्चाग्निवर्चाश्च मित्रायुश्वासपायन । अरतवासावर्णी पट् शिप्यास्तस्य चाभवन् ।१७॥
[ श्रीविपपृपुर रा
यदेतत्तव मैत्रेय पुराण कथ्यते मया ।
एतद्व पावस वे पायस्य समनन्तरम् ॥२६॥
सगे च प्रतिसगै च वागमन्वन्तरादिपु ।
कथ्यते भगवान्विप्रमुरोपेप्येव सत्तम ।२७१
इसी प्रकार पाठवां पुराण पाग्नप है। नौवा भविष्य पुराण,
ग्रह्मवैनत्त तथा ग्यारहवा लेग पुराण कहा जाता है ।।२२।। पारहृदां वाराह
तेरहयो स्वान्द, चौदहा वामन, पन्द्रहवा पोम, सोलहवां मारस्य, सत्रहृया
गारड और मठारहवां ब्रह्माण्ड पुराण है । हे महामुन । अठारह महापुराण
यही हैं ।।२३-२४॥ इनवे अतिरिक्त पोर बहुत-: उपपुराण मुनिजनों ने बताये
हैं । इन सबमै मृष्टि, प्रलय, देवादि के वशो का वर्णन, मन्वन्तर और विभिन्न
राज-वशो के वृतान्त हैं ॥२५॥ हे मग्रेमजी । मैं तुम्हें जो पुराण इस समय
सुना रहा हूँ वह पायपुराण के पश्चात् वहा गया वैष्णव नामक महापुराण है
॥२६॥ इसमे राग, प्रतिराग, वश और मन्वन्तरादि का वर्णन करत हुए सवत्र
केवल भगवान विष्णु का ही यश कीर्तन किया गया है ॥२७॥
अङ्गानि वेदाश्चत्वारो मीमासा न्यायविस्तर ।
पुराण धर्मशास्त्र च विद्या हताश्चतुर्दश ॥२८॥
आयुर्वेदो धनुर्वेदो गान्धर्वश्चैव ते तय ।
अर्थशास्त्र चतुर्थं तु विद्या ह्यष्टादशैव ता ॥२६॥
ज्ञेया ब्रह्मर्षय पूर्व तेभ्यो देवर्षय पुन ।
राजर्षय पुनस्तेभ्य पिप्रकृतयत्रय १३०॥
इति शाखास्समाख्यावाश्शाखाभेदास्तथैव च ।
करिश्चैव शाखाना भेदहेतुस्तथोदित ॥३१॥
सर्वमत्वन्तरेष्वेव शाखाभेदास्समा स्मृता ।
प्राजापत्या श्रुतिनित्या तद्विकल्पास्त्विमे द्विज ॥३२॥
एतत्ते कथित सर्वं यत्पृष्टोऽहमिह त्वया ।
मैनेय वेदसम्बन्ध क्मिन्यत्कथयामि ते ॥३३॥
३९४ ]
[ श्रीविष्णुपुराण
सोऽहमिच्छामि तच्छोतु यमस्य वशवत्तिन ।
न भवन्ति नरा येन तत्कर्म कथयस्व मे ७१
श्री मैत्रेयजी ने कहा-हे गुरो । मेरे समस्त प्रश्न का मापने यथावत्
उत्तर दिया है । अब एक बात और सुनने की इच्छा है उसे माप मेरे प्रति
कहिये ॥१॥ हे महामुने । इस ब्रह्माण्ड के अन्तगत जो सात द्वीप, सात पाताल
और सात लोक हैं वे सब स्थूल, सूक्ष्म, सूक्ष्मतर, सूक्ष्मातिसूक्ष्म तथा स्थूल और
स्थूलत्र प्राणियो से परिपूर्ण हैं ॥२-३।। एक अगुत का मष्टमाश भी ऐसा नहीं
है जहां कम क ब धन में बंधे हुए जीवों का निवास न हो ॥४॥ परन्तु हे
भगवन् ! जब आयु का अत होता है, तब ये सब यम के वश मे गडकर उही
के निर्देशन म नरकादि की विभिन यत्रणाएं भोगने हैं ॥५॥ फिर पाप भोग के
नि शेप होने पर उन्हे देवादि योनियो मे भ्रमण करना होता है -- सभी शास्त्र
ऐसा कहते हैं ॥६॥ इसलिये, पाप मुझे उस कर्ग को बताइये, जिसे करके
मनुष्य को यमराज के वश मे नही पडना होता, मुझे इसी के जानने की इच्छा
है ॥७॥
अयमेव मुने प्रश्नो नकुलेन महात्मना।
पृष्ट पितामह प्राह भीष्मो यत्तच्छरगुप्व मे ।।
पुरा ममागतो वत्स सखा कालिङ्गको द्विज ।
स मामुवाच पृष्टो नै मया जातिस्मरो मुनि ।।
तेनारयातमिद सर्वमित्य चैतद्भविष्यति ।
तथा च तदभूद्वत्स यथोक्त तेन धीमता १०
स पृष्टश्च मया भूय श्रद्दधानेन वै द्विज ।
यद्यदाह न तदृष्टमन्यथा हि मया फचिव ११॥
एपदा तु मया पृष्टमेतद्यद्भवतोदितम् ।
प्राह वालिङ्गयो विप्रस्स्मृत्वा तस्य मुनेर्वच ।१२।
जातिश्मरेण कथितो रहस्य परमो मम ।
यमरिङ्करयोर्योऽभूत्सवादस्त प्रवीमि ते ॥१३॥
नृतीन अंच-अ..] [३९५ यो परामरती ने कहा है मुनै ! ला ही प्रश्न विानह मीन से -दामा नल ने किया या 1 ल्हान मा बास्नर दिया, वह तुम्हें बताता में, गुनो 11 नीमनी ने कहा है दन्द्र ! पहिले को दान है-मेरे पास रलिग देश का एक द्वारा मारा। यह मेरा मित्र या। सनं मुन्ने रहा-रै प्रदन करने पर पूर्वदन्म के वृतान को वानने वारे एक मुनि ने मुळे दहादा या कि यह मद दाने अनुक-अमुक प्रकार होगीहे दन्न ! तर मरिमान ने पो दान त्रिम प्रकार दद्वाः, यह ना प्रकार हुदै ।।१०॥ इस तक प्रति मेरी यहा दहन और मैं ट द अन्य प्रान स्।ि उनका भी दो च्चर म दिपये? ने दिवा, वन सदरे दिपरीत की दुर होता ने नहीं देखा ॥११॥ जो दान नुमने मुन्न पूछी है, दही दान एक दिन मैंने स कनिन देशोष द्वारा पूठी, ठद स बाहर- म नुनि के वचनों का मरउ कर मुझे ददाया कि उस बारिमर मुनि ने यमराव और उनके दूनों रेवदर मवाद के प्रपन्न गट रहम्द को नु मुनापा । ॐ ही में बने का नंगा तुम्हें मुनाता हूँ ॥१२-१३।। स्वपुल्यमनिवाश्य पान्हात वदति यनः किन तब परमूले । परिहर मधुसूदनप्रपन्नाअनुरहमन्यामदादाना १४॥ अमरराचिन पाना यम इति लोकहिताहित नियुक्तः। हरिगुरुवमगोन्मिनन्दतन्त्र.प्रमदति नयनने ममापि विशुः ।। कटकमुकरितादिभेदः कन्दमदनपोप्यते ययकम् । नुरपगुमनुवादिक्त्सनानिहरिरबिलानिल्दीर्यन वयंरः।१। क्षितितलपरमारावो.निलान्त पुनरपपान्ति पर्वक्ता परियाः। सुरपगुमनुजगदयस्यान्त गुराक्नुपए ननाउनेन तैन । हरिमनदरार्चिताघ्रिपद्म प्ररामति यः परमार्यतो हि मर्यः। तमपगतसनस्तपापदन्दं वन परिकृत ययानिमायसिक्तन् का दति यमवचनं निगन्य पानी यमपुरुषस्तमुवाच पराजन् । क्ययमन विभौजमस्तथानुर्भवतिहटेबलु पामोऽस्प नळ १
[ श्रीविष्णुपुराण
न चलति निजवर्णधर्मतो यः सममतिरात्मसुहृद्विपक्षपक्षे।
नहरति न च हन्ति किञ्चिदुच्चैः सितमनस तमवेहि विष्णुभक्तम् २०
कलिकलुपमलेन यस्य नात्मा विमलमतेमलिनीकृतस्तमैनम् ।
मनसि कृतजनार्दनं मनुष्य सततमवेहि हरेरतीवभक्तम् ॥२१॥
फालिंग ने कहा- यमराज ने अपने अनुचर को हाय पाा धारण किये
देखकर, उसके कान मे कहा-हे अनुचर ! मैं भगवान विष्णु के प्रभत्तो का
ही स्वामी है, इसलिये भगवान के शरणागतो को मत पकडना ॥१४॥ देवतामो
के पूजनीय विधाता ने मुझे 'यम' नामक पद देकर लोको के पाप-पुण्य
विचारायं नियुक्त किया है । मैं अपने गुरु श्रीहरि के माधीन हूँ, स्वतन्त्र नही
है। वे भगवान् श्रीहरि मुझ पर भी शासन करने में समर्थ हैं ॥१५॥ जैसे एक
ही स्वर्ण पटका, मुकुट, परिणादि के भेद से भनेक रूप पाला दिखाई देता है,
वैसे ही एक ही थीहरि के देवता, मनुष्प भोर पशु मादि के रूप मे नाना भेद
पल्पित किये जाते हैं ॥१६॥ जैसे पायु के शान्त होने पर, उसरी उहते हुए
परमाणु भूमि में मिल जाते हैं. वो ही गुणो के योग से उत्पन्न हुए सम देश,
मनुष्य, पशुपाद पन्त में उसी सनातन ब्रह्म में लीन हो जाते हैं जो
मनुष्य देवतामो द्वारा यन्दित भगवान्
परण कमलो पी वन्दना परमा युधि
रोरता है, यह पृताहुनि से प्रदीत पग्नि के समान पाप-यापन से पूट जाता
है। तुम ऐगे पुरुष को दूर से देखकर ही वही शे पल देना १ मामी
वात गुनपर पापारी उस यमदून ने उन प्रधा-विभो ! सवये त्यागी
भगवान् धीहरि का भला किस प्रकार का होता है, यह मुझे मताने सोपा
पोरिम ॥१यमराज ने रहा-जो अपने बाथम यमं से रिपलिस मही
होता, पपने गुददों पोर वरियों में समान भाप सता है, मी नेपामा
हा नहीं पला तथा पिमो धीव की हिंगा में प्रा नहीं होता, उस स्वता
पित
मनुष्य भगवान विषणुरा मा गमो ॥२॥ स्वय बुद्धिा
विभागका मलिन नहीं था, जि प्रपो हदप पदेष भा.
पान धीमान को धारण कर रखा है, मनुष्य को भगवा धारिका
पनीरमा मानो ॥२॥
तृतीय अग-अ०७] [३९७ कनकमपि रम्यवेक्ष्य बुद्धया तृणमिव यन्नमवैति वै परस्वम् । भवति च भगवत्यनन्यचेताः पुरुपवर तमवेहि विष्णुमत्तम् ।२। स्पटिगिरिगिलामल क विष्णुर्मननि नृणा क च मलरादिदोपः। न हि तुह्निमयूवररिमपुञ्ज भवति हुताननदीतिज प्रताप. २६॥ विमलमतिरमलर प्रशान्तनुचिचरितोऽखिलमत्त्वमिनमून. । प्रिय हितवचनोऽस्तमानमायो वनति नदा हदि तम्य वासुदेव ॥२४॥ वमति हृदि मनातने च तस्मिन् भवति पुमागतोय मौम्यस्प । क्षितिरनमनिरम्यमात्मनोऽन्त क्ययति चास्तयंव शालपोत १२५॥ यमनियविधूतकल्मषारणामनुदिनमच्युतमक्तमानमानाम् । अपगतमदमानमलराणा त्यज भट दूरतरेण मानवानाम् ॥२६॥ हृदि यदि भगवाननादिराग्ने हरिरमिनढगदावरोऽव्ययात्मा। तदघमघविघातकर्तृभिन्न भवति य मति नान्यवारमर्वे ।२७ हरति परवन निहन्ति जन्तून् वदति तथानृतनिष्ठुराणि यश्च । अगुमजनितदुर्मदम्य पुम क्लुपमतेहं दि तम्य नास्त्यनन्न १२८॥ जो निर्जन स्थान में पराये स्वर्ग को भी पडा देखकर उसे तिनके के समान मानता है और भगवान् श्रीहरि का अनन्य भाव से निरन्तर चिन्तत करता है, उस मनुष्य पेट को भगवान् का मत समन्नों ॥२२॥ कहाँ तो स्फ- टिक गिला के तुल्य प्रत्यन्त प्रमा भगवान् श्रीहि और पहाँ मनुष्य के मन में सदा वसे रहने वाले राग द्वेषादि दीप चन्द्रमा के रश्मिजाल में अमि ने तेज जैसी गर्मी का रहना कभी भी गम्मद नहीं है ।।२३।। जो मनुष्य स्वच्च चित्त, मासरता-हीन, प्रशान्न, पुनीत चरिन, सब प्राणियों का प्रेमी, मुहृद त्या हित की बात करे वाला, निरभिमान और माया से अलग रहता है, उसके हृदय में भगवान् श्रीवासुदेव का मुदा निगट रहता है ॥२४॥ बद वे सनातन भगवान् हृदय में प्रतिष्टित होते हैं, तब वह मनुष्य ससार के लिये गान्त रूप हो जाता है, बसे नवीन मालिवृक्ष अपने सौन्दर्य से ही अपने में भरे हुए ग्रेट रन का भान करा देता है ।।२॥ हे दूत !जिनपे पाप-समूह यम नियम से नष्ट हो गये और जिनका हृदय निरन्तर नगवान अच्युत में रमा रहता है तया जिनमें मह ३९८] [ श्रीविष्णुपुराण और मात्सर्य नाम मात्र यो भी शेप नहीं है, उन मनुष्यो को दूर से छोड देना ॥२६॥ जिसके हृदय मे खङ्ग, शख, गदा पादि के धारण करने वाले अव्ययात्मा श्रीहरि निवास करते हैं, तो उनके निवास से उसके सम्पूर्ण पापो का क्षय हो जाता है । भला सूर्य के स्थित रहते हुए अंधेरा कैसे रह सकता है ? ॥२७॥ पर-धन का अपहरण करने वाले, प्राणियो के हिंसक, मिथ्या और क्टु भापी प्रथवा अशुभ कर्मों के करने वाले दुष्ट वुद्धि मनुष्य के हृदय मे धनन्त भगवान कभी भी निवास नहीं करते ॥२८॥ न सहति परसम्पद विनिन्दा कलुपमतिः कुरुले सतामसाधुः । न जयति न ददाति यश्च सन्त मनसि न तस्य जनार्दनोऽधमस्य (२६६ परमसुहृदि बान्धवे कल सुततनयापितृमातृभृत्यवर्गे। शठमतिरुपयाति योऽयंतृष्णा तमधमचेष्टमवेहि नास्य भक्तम् ।३०। अशुभमतिरसत्प्रवृत्तिसक्तस्सततमनार्यकुशीलसङ्गमत.। अनुदिनकृतपापबन्धयुक्त. पुरुषपशुर्न हि वासुदेवभक्त. १३१॥ सकलमिदमह च वासुदेव. परमपुमान्परमेश्वरस्स एकः । इति मतिरचला भवत्यनन्ते हृदयगते व्रज तान्विहाय दूरात् ।३२। कमलनयन वासुदेव विष्णो धरणिधराच्युत शङ्खचक्रपाणे । भव शरणमितीरयन्ति ये वै त्यज भट दूरतरेण तानपापान् ।३३। वसति मन सि यस्य सोऽव्ययात्मा पुरुषवरस्य न तस्य दृष्टिपाते। तव गतिरथ वा ममास्ति चक्रप्रतिहतवीर्यवलस्य सोऽन्यलोक्य ॥३४॥ जो मतिहीन मनुष्य पराये वैभव से ईर्या करता है, परायो निन्दा मे लगा रहता है, सन्तजनों का तिरस्कार करता है, भगवान् श्रीहरि का पूजन नही करता अथवा दान नहीं देता, उस अधम के में भगवान् श्रीजनार्दन कभी भी निवास नहीं करते ॥२६॥ जो दुष्ट मति मनुष्य अपने परम सुहृद, बन्धु-बाधव, स्त्री, पुत्र, पुत्री, माता, पिता, सेववादि के प्रति धन को तृष्णा दिखाता है, उस पाप का आचरण करने वाले को तुम कभी भी भगवद्भक्त मत समझना ॥३०॥ जो खोटी बुद्धि वाला मनुष्प मिथ्या क्मो मे तार रहता है, - व मनुष्यों के साथ रहता या उन जैसा पाचरण करता है तथा पाप युक्त द्वितीय अंश-अ०७ ] [ ३६६ कमों के बन्धन मे दिनो दिन चंपता जाता है उसे मनुष्य के रूप मे पशु ही समझो। ऐसा पुरुप कभी भी भगवान् का मक्त नहीं हो सकता ॥३१॥ तया भगवान के हृदय में स्थित होने के कारण, जिनकी एसी स्थिर बुद्धि हो गई है कि मैं और यह समस्त प्रपच एक मात्र वासुदेव ही हैं उन मनुष्यों को तुम दूर से हो त्याग देना ॥३२॥ जो मनुष्य हे पचास हे वासुदेव ! हे विष्णो ! हे धरणोपर ! हे अच्युत ! हे शख-चक पाणे । हमे शरण दीजिये' इस प्रकार भगवान् को पुकारते हो उन पाप-रहित मनुष्यों को तुम दूर से ही छोड देना। ॥३३॥ जिस पुरुपवर के अन्तःकरण में उन अपयात्मा भगवान् का निवास रहता है, वह जहां तक देखता है, वहां तक प्रमु-चक्र के प्रभाव से तुम या मैं अपने वत-वीर्य के क्षीण हो जाने के कारण नहीं पहुंच सरते, क्योकि यह तो अन्य लोको का अधिकारी है ॥३४॥ इति निजभटशासनाय देवो रवितनयस्स किलाह धर्मराजः । यम कथितमिद च तेन तुभ्य कुरुवर सम्यगिद मयापि चोक्तम् ननुलैतन्ममास्यात पूर्व तेन हिजन्मना। कलिङ्गदेशादभ्येत्य प्रीतेन सुमहात्मना ।३६। मयाप्येतद्यथान्याय सम्यग्वत्स तवोदितम् । यथा विष्णुमते नान्यत्नारण सनारसागरे ॥३॥ किङ्करा. पारदण्डाश्च न यमो न च यातना. । समस्तिस्थ यस्यात्मा केगवालम्बनस्मदा ३८ एतन्मुने समात्यात गीत वैवस्वतेन यत् । खत्मस्नानुगत सम्यक्किमत्यच्छोतुमिच्छसि ।। कालिंग ने कहा- हे कुर धेट । सूर्य पुत्र धर्मराज ने अपने दूत को इस प्रकार शिक्षामय प्रादेश दिया। उस जातिहमर मुनि ने मुझे यह प्रसग सुनाया था, जिथे मैंने यथावत तुमसे कहा है ॥३॥ भीष्मजी ने कहा है नमुस । बलिंग देश से आये हुए उस ब्रह्मरण ने प्रसन्नता सहित मुन से यह सरकपा रही थी ॥३६॥ हे वत्स ! जिस प्रकार, इस संसार सागर में केरल भगवान विष्णु के अतिरिक्त और कोई भी रखा जीव का नहीं हो सकता,
४०० ]
[ श्रीविष्णुपुराण
यह सब वृत्तान्त पथावत तुमसे कहा है ॥३७|| जिसमा हृदय निरतर श्री येशव
भगवान् मे लगा है उसया यमराज, उनसे दूत, उनको पाश, उनका दरड तथा
यातनाएं कुछ भी अनिष्ट करने में समर्थ नहीं हो सकते ॥३८॥ श्री पराशरजी
ने कहा-हे मुने ! तुमने जो कुछ पूछा था, उसके समाधान स्वरूप मैंने तुम्हे
स्वयं यमराज का कथन हो मले प्रकार सुना दिया है । प्रब पौर क्या मुनने
की इच्छा करते हो, सो कहो ॥३६॥
श्राठवाँ अध्याय
भगवन्भगवान्देव: ससारविजिगीषुभिः ।
समाख्याहि जगन्नायो विष्णुराराध्यते यथा ।११
आराधिताल गोविन्दादाराधनपरैर्नरैः।
यत्प्राप्यते फल श्रोतु तच्चेच्छामि महामुने ।।
यत्पृच्छति भवानेतत्सगरेण महात्मना ।
और्वः प्राह यथा पृष्टस्तन्मे निगदतश्शृणु ॥३॥
सगरः प्ररिणपत्यनमौर्व पप्रच्छ भार्गवम् ।
विष्णोराराधनोपायसम्बन्ध मुनिसत्तम ।४।
फल चाराधिते विष्णौ यत्पु सामभिजायते ।
स चाह पृष्टो यत्नेन तस्मै तन्मेऽखिलं शृणु ॥५॥
भौम मनोरथं स्वर्ग स्वगिवन्द्य च यत्पदम् ।
प्राप्नोत्याराधिते विष्णौ निर्वाणमपि चोत्तमम् ।।
यद्यदिच्छति यावच्च फलमाराधितेच्ऽयुते ।
तत्तदाप्नोति राजेन्द्र भूरि स्वल्पमथापि वा ।।
श्री मंत्रेयजी ने कहा-
भगवन् ! संसार को जीतने की इच्छा वाले
पुरुष भगवान् विष्णु की माराधना किस प्रकार वरते है, वह मुझे बताइये ॥१॥
८ ] . तृतीय अन-ग्र० [ ४०१ है मुहाउने ! उन भगवान् गोविन्द का प्रारावन करने पर, चन्द्र वि प्ल की प्रानि होती है, उसे नो सुनने को में इच्छा करताई ॥२॥ श्री परागरजी ने कहा-हे मरजी ! तुमने जो प्रश्न दिया है, वैसा ही महामा मगर न प्रोत्रं भूपि में किया था, तव उन ऋषि ने उन्हें वो उनर दिया था, दही में तुम्हें सुनाता हूँ, सुनो ॥३॥ र मुनिवर । सगर ने उन नृवती मौवं को प्रणाम किया और उनमे भगवान् श्री हरि को मारापना-विधि और उसमें प्राप्त होन वाले फल के विपय में प्रश्न पिया । उनले प्रश्न का शौर्य ऋषि ने जो उनर दिया, उस सब को सादवानी से सुनो ॥४-शा औदं न व्हा-मनवान् विष्णु की माराधन कसे मनुष्य पृयिवी त्रिपया सनी मनोरय, स्वर्ग, स्वर्ग में रहन वालों के लिये नी दन्दनीर ब्रह्माद तथा परम निराजद नी पा लेता है ।।६।। है राजेन्द्र । दह जिस-जिन पनकी ग्विनी अभिलाया करता है, वह थोडा हो प्रयया स्तिना भी अधिक हो, भगवान् श्री अमृत की आराधना स उते अवश्य ही सब मिल जाना है ॥७॥ यत्तु पृच्छनि भूपात क्यमाराम्यते हरि । तदह सरल तुन्य कययामि नियोष मे ।। वधिमाचारवना पुरण पर पुमान् । विष्णुरारायते पन्या नान्यस्तत्तोपकारख ।। यजन्यज्ञान्यजत्येन जपत्येन जपन्नृप। निघ्ननन्यान्हिनन्लेन सर्वभूतो यतो हर ॥१०॥ तन्मात्मदाचारवता पुरपेरण जनार्दन । ग्राराध्यते स्ववर्णोक्तपर्मानुष्ठानकारिणा ॥१॥ ब्राह्मण क्षत्रियो यंत्य द्रश्च पृथिवीपते । स्ववर्मतत्परो विप्गुनाराधयति नान्यथा ॥१॥ परापवाद पंशुन्यमन्त चन अन्योद्वेगार वापि तोप्यते तेन देशव ॥१६॥ परदारपरद्रव्यपरहिनासु यो रतिम् । न करोति पुमान्भूप तोप्यते तेन पेगव ।१४॥ भापते ।
तृतीय अंश-प्र०]
[४०३
हे मानवेन्द्र जो पुरुष किसी देहधारी को पयवा अन्य किसी जीव
को पीडित नहीं करता या उसकी हिमा नहीं करता उस पर श्री शिव भगवान
सदा प्रसन्न रहते हैं ॥१५॥ जो मनुष्य सदा ही देव, ब्राहाण और गुहवन को
सेवा में लगा रहता है, उसने भगवाद गोविन्द सदा प्रसन्न रहते है ।।१६।। जो
सभी प्राणियों वा हित चिन्दन अपनी सन्तान के समान करता है, वह भगवान्
श्रीहरि को सुख पूर्वक प्रसन्न कर लेता है ॥१७॥ जिसका मन रागादि दोषो
से मलिन नहीं हुअा है, उस गुद्धचेता पुरप पर नगवान विष्णु सदैव प्रसन्न
रहते हैं ॥१८) है नृपसत्तम । शास्त्री ने जिन जिन वर्णाश्रम घमों का वर्णन
रिया है, उन-उन के माचरण पूर्वक हो मनुष्य उन भगवान विष्णु की पारा-
धना कर सक्दा है, अन्य प्रकार ने नहीं । १६॥ सगर ने कहा है द्विअपर ।
अब मैं सभी वर्ण-वर्मो भौर मामम धर्मो को सुनने की इच्छा करता हूँ, आप
उन्हें रहने गरी वृपा परिये ॥२०॥
ब्राह्मणमनियविना नूदाणा च यथाक्रमम् ।
त्वमेकायमतिर्भूत्वा शृणु धर्मान्मयोदितान् ।२११
दान दद्याद्यजेद्देवान्यज्ञस्न्याच्यायतत्पर ।
नित्योदकी भवेद्विप्रः कुर्यान्चाग्निपरिग्रहम् ॥२२॥
वृत्यर्थ याजयच्चान्यानन्यानध्यापयेत्तथा।
पुर्यात्प्रतिग्रहादान शुक्लापन्नियायतो द्विज ॥२३॥
सवभूतहित कुर्यान्नाहि पस्यचिद् द्विज ।
मैत्री समस्तभूतेषु ग्राहाणस्योत्तम धनम् ॥२४॥
ग्राविण रत्ने च पारक्ये समबुद्धिर्भवेद् द्विजः ।
भूतावभिगम' पन्या गस्यते चास्य पार्थिव २५॥
दानानि दद्यादिच्छातो द्विजेन्य. क्षनियोऽपि वा।
बजेच्च विविधैर्यरघीयीत च पार्थिव. RAN
शस्त्राजीवो महीरक्षा प्रवरा तस्य जीविका।
तत्रापि प्रथम कल्प पृथिवीपरिपालनम् ॥२८॥
४०२ ]
[धीविष्णुपुराण
हे राजन् ! तुमो श्रीहरि को माराधना से की जाय, गा को प्रश्न दिया
है, यह सभी तुम्हें, यतलाता है. यान पूर्वक गुणो। यश्रिम धर्म का पालन
करने वाला पुरप ही भगवान् विष्णु पी माराधना या अधिकारी है, उसके
बिना उनकी प्रसन्नता प्राप्त नहीं हो सकती है रागन् । यजमा पूरप
उन्ही भगवान का यजन करता है. जापय उही का जप करता है तथा परायी
हिंसा करने वाला भी उनकी ही हिंसा करता है, पयोंकि भायान् परि सबै
भूतात्मक है ॥१०॥ नीलिये सदाचारी पुरष को प्रपन यग २ अनुपूल धर्म
का पाचरण करते हुए भगवान् जनादन वीही उपासना करनी चाहिय ॥१॥
है भूपते । ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र सभी अपने अपन वणं धर्म में पालन
पूर्वक विष्णु का पाराधन करते हैं, किसी और प्रकार से नहीं बरते ।१२।।
जो किसी की निन्दा, पैशुन्य पौर मिथ्या भापण नही घरता और किसी को
खेदजनक वचन नहीं कहता, उस पर भगवान् शव अवश्य ही प्रसन्न होते हैं
॥१३॥ हे राज । जो परनारी, पर-धन तथा पर हिंसा मे कभी भी मन को
नहीं लगाता, उससे भगवान् केशव सदा ही सतुष्ट रहते हैं ॥१४॥
न ताडयति नो हन्ति प्राणिनोऽन्याश्च देहिन ।
यो मनुष्यो मनुष्येन्द्र तोष्यते तेन केशव ॥१५॥
देवद्विजगुरूणा च शुश्रूषासु सदोद्यत ।
तोष्यते तेन गोविन्द पुरपेण नरेश्वर ।१६।
यथात्मनि च पुत्रे च सर्वभूतेषु यस्तथा।
हितकामो हरिस्तेन सर्वदा तोप्यते सुखम् ।१७।
यस्य रागादिदोषेण न दुष्ट नृप मानसम् ।
विशुद्धचेतसा विष्णुस्तोष्यते तेन सर्वदा ॥१८॥
वर्णाश्रमेषु ये धर्माश्शास्त्रोक्ता नृपसत्तम ।
तेषु तिष्टन्नरो विष्णुमाराधयति नान्यथा ।१६।
तदह श्रोतुमिच्छामि वर्णधर्मानशेषत ।
तथवाश्रमधर्माश्च द्विजवर्य ब्रवीहि तान् ॥२०॥
} तृतीय अंश-प्र०८ [४०३ हे मानवेन्द्र ! जो पुरुष किसी देह्यारी को प्रथवा अन्य किसी जोप को पीडित नही करता या उसकी हिंमा नहीं करता उस पर श्री केशव भगवान् सदा प्रसन्न रहते हैं ॥१५॥ जो मनुष्य सदा ही देव ब्राह्मण और गुरुजन की रोवा में लगा रहता है, उसमे भगवान् गोविन्द सदा प्रसन्न रहते है ॥१६॥ जो सभी प्राणियो का हित चिन्ता अपनो सन्तान के समान करता है, वह भगवान् श्रीहरि को सुन पूर्वक प्रमन्न कर लेता है ॥१७ जिसका मन रागादि दोषो से मलिन नहीं हुआ है, उस मुद्धचेता पुरप पर भगवान् विष्णु सदैव प्रसन्न रहते हैं ।।१८॥ हे नृपयत्तम ! शास्त्रों ने जिन-जिन वर्णाधम घमा का वर्णन दिया है, उन-उन के प्राचरण पूर्वक ही मनुष्य उन भगवान विष्णु की मारा- धना कर सकता है, अन्य प्रकार मे नहीं। १६॥ सगर ने कहा-हे द्विजवर ! प्रय मैं सभी वर्ण-धर्मों और पाश्रम धमों को सुनने की इच्छा परता प्राप उन्हें रहने की कृपा वरिये ॥२॥ ब्राह्मराक्षत्रिय विशा नूदाणा च यथाक्रमम् । त्वमेकानमतिभूत्वा शृणु पर्मान्मयोदितान् ॥२१॥ दान दद्याद्यजेद्दवान्यज्ञस्स्वाध्यायत्तत्पर.। नित्योदकी भवेद्विप्रः कुर्याचाग्निपरिग्रहम् ॥२२॥ वृत्यर्थ याजयेचान्यानन्यानध्यापयेत्तया। कुर्यात्मतिग्रहादान शुक्लार्यालयायतो द्विज. १२३॥ सवभूतहित कुर्यान्नाहित कस्यचिद् द्विज.। मैत्री समस्तभूतेपु ब्राह्मणस्योत्तम धनम् ।२४। ग्रामिण रले च पारक्ये समवुद्धिर्भवेद. द्विज.। भूताव भिगम. पल्या शस्यते चास्य पार्थिव १२५ दानानि दद्यादिच्छातो द्विजेभ्यः क्षत्रियोऽपि वा यजेच्च विविधयशेरधीयोत च पार्थिव.२६॥ शस्त्राजीवो महीरक्षा प्रवरा तस्य जीविका । तत्रापि प्रथम. कल्पः पृथिवीपरिपालनम् ।२७१ ४०४ ] [ श्रीविष्णुपुराण पौवं ने कहा-मैं जिन ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य पोर शूद्र वर्गों के धर्म को कहता हूं, उन्हें एकाग्र मन से सुनो ॥२०॥ ब्राह्मण को उचित है कि वह दान करे, यशो से देवतायो का यजन करे, स्वाध्याय करे, नित्य स्नान, तर्पण तथा अग्न्याधानादि वर्मों को करे, ॥२॥अपनी वृत्ति के लिये यज्ञ कराये, शिक्षा दे तथा न्याय से उपाजित धन मे से ही न्याय के अनुकूर द्रव्य का सचय करे ।२३। कभी किसी का अहित-चिन्तन न करे और सदा सब जीवो के हित मे तत्पर रहे । सब प्राणियो से मैत्रि-भाव रखना ब्राह्मण का परम धर्म कहा है ॥२४॥ पराये धन मे और पापाण मे समान बुद्धि रखे । पत्नी का ऋतु काल मे ही सेवन करे, यही ब्राह्मण के लिये उचित कम हैं ॥२५॥ क्षत्रियो का कर्तव्य है वि ब्राह्मणो को उनकी इच्छानुसार दान दे, नाना प्रकार के यज्ञो को करे मोर पध्ययन पोल रहे ॥२६॥ मात्र गररण पूवक पृथिवी की रमा करना ही क्षत्रिय की थष्ठ भाजीविका है, इनमे भी पृथिवी का परिपारन तो सर्वोत्कृष्ट ही है ॥२७॥ धरित्रीपालनेनैव कृतकृत्या नराधिपा । भवन्ति नृपतेरमा यतो यज्ञादिवर्मणाम् ॥२८॥ दुष्टाना शासनाद्राजा शिष्टाना परिपालनात् । प्राप्नोत्यभिमताल्लोकान्वर्णमस्था करोति य. १२६। पाशुपात्य च वाग्गिज्य वृपि च मनुजेश्वर । वैश्याय जीविया ब्रह्मा ददौ लोय पितामह ॥३०॥ तम्याप्यध्ययन यज्ञो दान धर्नश्च दास्यते । नित्यनैमित्तिकादीनामनुष्ठान च वर्मणाम् ॥३१॥ द्विजातिमश्रित यम तादयं तेन पोषणम् । प्रयविनयजेर्वापि धने याम्द्भयेन या ।३२। शूद्रम्य मन्नतिश्योच रोवा स्वामिन्यमायया। अमन्ययको हस्तेय रात्मङ्गो विप्ररक्षणम् १९३० पृथिवी का पालन परमेम हो राजागा पन्य हो जाने हैं, क्योरि पृथिवी पर जो यज्ञादि होते हैं. उनरा प्रा राजा को भी मिलता है ॥२८॥ पोरामा पप पर्णपने पति पारपायान होता है, पर दृष्टो को ए मोर तृतोय अश-अ०६ ] [ ४०५ साधुजन का पालन करन वाले अपने कम से प्रभाव से ही इच्छिन लोको को प्राप्त कर लेता है ॥२६॥ह नरवर | लोर पितामह ब्रह्माजी ने पैश्यों के कर्म पशु-पालन, वाणिज्य और कृषि-यह सब प्राजीविका के रूप दिये हैं। ॥३०॥ चश्य के लिय भी अध्ययन, यत, दान पौर नित्य नैमित्तिकादि कर्म करना मावश्यक है ॥३१॥ गुद को द्विजाविया के प्रयोजनानुकूल कम करना चाहिये, वही उसकी प्राजीविका है इसके अतिरिक्त वस्तुपा का क्रय विक्रय या कारीगरी के पास से जीवनयापन करे ॥३२॥ नम्रता, सोच, रेवा, स्वामि भक्ति, मन्चरहित यन, अस्तेय सत्मा, गौर वाह्मण की रक्षा, गूद के यह प्रमुख वर्तव्य हैं ॥३३॥ दान च दद्याच्द्रोऽपि पाक्यज्ञयजेत च । पित्र्यादिव च तत्सर्व शूद्र कुर्वोत तेन वै ॥३४॥ भृत्यादिभरणार्थाय सर्वेषा च परिग्रह । मतुकालेऽभिगमन स्वदारेपु महीपते १३५) दया समस्तभूतेषु तितिक्षा नातिमानिता। सत्य शौचमनायासो मञ्जल प्रियवादिता १३६। मैन्यस्पृहा तया तहदकापण्य नरेश्वर । अनसूया च सामान्यवरांना यथिता गुणा [३७ आश्रमारा च सर्वपामेते सामान्यलक्षणा । गुणास्तथापद्धश्चि विप्रादीनामिमाञ्छरा १३८१ क्षान कर्म द्विजम्योक्त वश्य कर्म तथापदि । राजन्यस्य च वैश्योक्त शूद्रकर्म न चतयो ।३। सामर्थ्य सति तत्त्याज्यमुमाभ्यामपि पार्थिव । तदेवापदि कर्तव्य न कुर्यात्कर्मसङ्करम् ॥४०॥ इत्येते कथिता राजन्वर्णधर्मा मया तव । धर्मानाश्रमिणा सम्यग् क्तो मे निशामय ४श हे राजन् । शूद्र के लिये भी दान देना बलिवैश्यदेव, नमस्कार और मल्प यक्षो का अनुपान करना, पितृ श्राद्धादि करना, अपन प्राश्रितो के परि ४०६ ] [ श्रीविप्णुपुराण पालनार्थ सब वणों रो धन ग्रहण करना और अपनी ही भार्या मे ऋतुगामी होना उचित कर्म है ॥३४-३५।। हे राजन् ! इनके अतिरिक्त सब जीवो पर दया, तितिक्षा, प्रमानिता, सत्य, शौच, भगलाचरण, प्रियवादिता, मित्रता, अकृपणता, परदोप दर्शन-शून्यता प्रादि गुण तो सभी वर्गों द्वारा समान रूप से पालनीय हैं ॥३६-३७॥ सब वर्गों के यह सामान्य लक्षण कहे गये, अब इन विप्रादि चारो वर्ण के प्रापद्धर्म और गुणों को सुनो ॥३८॥ आपत्ति काल मे ब्राह्मण को क्षत्रिय या पैश्य की वृत्ति का अवलम्बन करना उचित है और क्षत्रिय को केवल वैश्य वृत्त का पाश्रय लेना चाहिये। इनको शूद्र वृत्ति का माश्रय लेना कभी भी उचित नहीं है ||३६॥ जर पुनः समर्थ हो जाय तो इन उपरोक्त वृत्तियो को छोड दे, क्योकि यह तो मापदकाल मे ही अवलम्बन करने योग्य है, अन्यथा कर्म सकरत्व की प्राप्ति होगी ।।४०।। हे राजन् । इस प्रकार मैंने वर्ण धर्मों का वर्शन तुम्हे सुनाया, भव पाश्रम धर्मो का जो निरूपण करता हूँ उसे यत्न से सुनो ॥४१॥ नवा अध्याय वाल कृतोपनयनो वेदाहरणतत्परः। गुरुगेहे वसेद्भप ब्रह्मचारी समाहित ।१। शोचाचारव्रत तत्र कार्य शुश्रूपण गुरो । व्रतानि चरता ग्राह्यो वेदश्च कृतवुद्धिना ।। उभे सन्ध्ये रवि भूप तथैवाग्नि समाहितः। उपतिष्ठेत्तदा कुर्याद् गुरोरप्यभिवादनम् ।। स्थिते तिष्ठेद्बजेद्याते नीचरासीत चासति । शिष्यो गुरोर्नृपश्रेष्ठ प्रतिकूल न राञ्चरेत् ।४। तेनंयोक्त पठेद्वेद नान्यचित्तः पुरस्थित. । अनुशातश्व भिक्षानमनीयाद्रुणा तत. ॥
तृतीय अरा-अ०६]
[४०७
अवगाहेदप. पूर्वमाचार्यशावगाहिताः।
समिज्जलादिकं चात्य यल्य क्ल्यमुपानयेत् ।।
गृहीतग्राह्यवेदश्च ततोऽनुज्ञामवाप्य च ।
गार्हस्थ्यमाविशत्प्राज्ञो निप्पन गुरुनिप्कृतिः ॥७॥
मौऋपि ने कहा- वाला वो उपनयन सस्कार के पश्चात् वेशध्ययन
परायण होकर और ब्रह्मचर्य पालन पूर्वर गुर गृह में निवास करना चाहिये ।
॥१॥ वहां रह कर वह शौच और प्राचार-दत का पालन तया गुरु-सेवा पर
९नादि के पाउन पूर्व स्थिर चित्त स वेदाध्यमन करे ।।२।। ह राजन
दोनों सरन्यानों में एकाप्रमन ने सूर्य और अग्नि की उपासना करे तया गुरुदेव
का अभिवादन कर ॥३॥ जब गुरुजी सहे हो, तव खडा हो जाय, जब चलें
तर पोदै गोद चले और जब मै तब नीचे बैठ जाय । स प्रकार करते हुए
कभी मो गुरु के विरस कोई माचरण नहीं करना चाहिये । गुरजी हे
तभी उनके सामने बैठ कर वेद का अध्ययन करे और जब उनकी याज्ञा हो तर
भिक्षा से प्राप्त अन्न का भोजन करे ॥ जय प्राचार्य जल में स्नान करते
तब स्नान करें और नित्य प्रति उनके लिये ममिपा, जल, कुम, पुष्पादि लापर
एकत्र करे ॥६॥ इस प्रकार अपने वेदाध्ययन को पूरणं करके मतिमान शिव
गुरुजी की साक्षा प्राप्त कर उन्हें गुरु दक्षिणा दे और फिर गृहास्याश्रम में
प्रविष्ट हो ॥
विधिनावामदारस्तु धन प्राप्य स्वकर्मणा।
गृहस्थकार्यमखिल कुर्याद्भूपाल शक्तिन. ।।
निवापेन पितृनन्यझर्देवास्तथातिथीन् ।
अन्नमुनीश्च स्वाध्यायररत्येन प्रजापतिम् ।।
भूतानि बलिभिश्चैव वात्सल्येनाखिलं जगत् ।
प्राप्नोति लोगान्पुरुषो निजकर्मसमार्जितान् ॥१०॥
भिक्षाधुजश्व ये केचित्तरिवाद्बह्मचारिणः ।
तेप्यत्रैव प्रतिष्ठन्ते गार्हस्थ्य तेन वै परम् ॥११॥
४० ]
[ श्रीविष्णुपुराण
वेदाहरणकार्याय तीर्थस्नानाय च प्रभो।
अन्ति वसुधा विप्रा पृथिवीदर्शनाय च ।१२।
अनिकेता ह्यनाहारा यत्र सायगृहाश्च ये।
तेपा गृहस्थ सर्वेषा प्रतिष्ठा योनिरेव च ॥१३॥
तेषा स्वागतदानादि वक्त य मधुर नृप ।
गृहागताना दद्याच्च शयनासनभोनम् ।१४।
हे राजन् | उस समय विधिवत् किसी योग्य कन्या वा पाणिग्रहण
करके अपने वरण के अनुकूल वृत्ति पे द्रव्योपाजन करे तथा अपनी शक्ति के
अनुमार व्ययादि काय करे ॥८।। पितरो की पिण्डदानादि से, देवतानो की
यज्ञादि के अनुष्ठान से अतिथियो की भन्न दान से, ऋषियो की स्वाध्याय से,
प्रजापति को पुत्रोत्पादन से, भूतो की बलि से, भौर सम्पूर्ण विश्व की वात्सल्य
भाप से सन्तुष्टि करे । अपने इन कर्मों के द्वारा वह पुरुप धेष से श्रेष्ठ लोक को
प्राप्त कर लेता है ॥६-१०॥ भिक्षावृत्ति पर निर्भर रहने वाले परिव्राजको और
ब्रह्मचारियो प्रादि का माश्रय भी यह गृहस्थाथम ही है, इसीलिये इसे सवं-
थेष्ठ कहा गया है ॥११॥ हे राजन् । ब्राह्मणगण वेदाध्ययन, तीथ स्नान और
देव-दर्शन आदि के निमित्त पृथिवी पर भ्रमण करते रहते हैं ॥१२॥ उनमे से
जिनका कोई निश्चित घर और भोजनादि की व्यवस्था नहीं होती ये जहाँ
साय पाल हो जाता है, वही रात्रि विश्रमाथं ठहर जाते हैं । उनका भी पाश्रय
यह गृहस्थाश्रम ही है ।।१३।। हे राजन् । जव ऐसे व्यक्ति अपने घर पर पावें
सब उना मोठे यचनो पौर कुशलादि पूछने से स्वागत करना चाहिये । उन्हे
ठहरन को निवास, शय्या, मासन प्रौर भोजनादि भी अपने सामानुसार देना
पाहिय ॥१४॥
अतिथियस्य भग्नाशो गृहात्प्रतिनिवर्तते।
स दत्त्वा दुप्कृत तस्म पुण्यमादाय गच्छति ॥१५॥
प्रवज्ञानमहसारो दम्भरचंव गृहे सत ।
परितापोपधातौ च पारप्य च न शस्यते ॥१६॥
तृतीय अश-अ०६]
[ ४०६
यस्तु सम्यकरीत्येव गृहस्थ परम विधिम् ।
सर्ववन्यविनिर्मुक्तो लोकानाप्नोत्यनुत्तमान् ॥१७॥
वय.परिणतो राजन्कृतकृत्यो गृहाश्रमी।
पुनेपु भायां निक्षिप्य वन गऽत्सहैव वा १८
पर्गमूलफलाहार
पेशश्मथजटाधर ।
भूमिगायो भवेत्तत्र मुनिस्सर्वातिथिप १ ।
चर्मकाशकुन कुर्यात्सरितानोत्तरीयक।
तद्वस्लिपवरण स्नान दास्तमस्य नरेश्वर ।२०।
देवताम्यर्चन होमस्सर्वाभ्यागतपूजनम् ।
भिक्षा बलिप्रदान च शस्तमस्य नरेश्वर (२॥
जिसके घर पर पाया हुप्रा जो प्रतिथि निराश होकर लौटता है, यह अपने
• सब पाप कर्म उस गृहस्थ को देकर उसके सभी पुएयकमों को साथ लेजाता है
॥१५॥ अतिथि का प्रपमान, उगके प्रति गर्व और दम्भ का व्यवहार, उसे
कोई वस्तु देकर उसका पश्चात्ताप, कटु भाषण अथवा उस पर प्रहार करता
नितान्त अनुचित है ॥१६॥ इस प्रकार अपने वर्ण-धर्म का भले प्रकार पालन
करने वाला गृहप्य सभी व नो से छूट कर प्रयुत्तम लोको में जाता है ॥१७॥
हे राजन् । जब गृहस्थ धर्म का पालन करते-करते अवस्था ढल जाय, तब अपनी
स्त्री के पालन का भार पुरी को सौंप या उसे भी अपने साथ लेकर वन मो
प्रस्थान करे ।।१८।। यहाँ फन, पुष, पत्रादि आहार सरे, दाढी, मूंछ और
जटादि को धारण करे भूमि पर मोद और मुनिवृत्ति से रहता हुमा प्रतिथि की
सेवा मे तत्पर रहे ॥१९॥ चर्म, काश और कुशो स प्रोढने बिछाने के वस्त्र बनावे
मोर तीनो समय स्नान करे ॥२०॥ देवपूजन, हवन, अतिथि-सरकार, शिक्षा,
बलिवैश्व देव आदि सभी कर्म उसके लिये कर्तव्य हैं ॥२॥
वन्यस्नेहेन गानाणामभ्यङ्गश्चास्य शस्यते ।
तपश्च तस्य राजेन्द्र शोतोप्यादिराहिष्णुता ॥२२॥
यस्वेता नियतश्चयाँ वानप्रस्थाश्चरेन्मुनि ।
स दहत्यग्निवहोपाजयेल्लोकाश्च शाश्वतान् ॥२३॥
४१० ]
[ श्रीविष्णुपुराण
चतुर्थश्चाश्रमो भिक्षोः प्रोच्यते यो मनोपिभिः ।
तरय स्वरूप गदतो मम श्रोतु नृपाहंसि ॥२४॥
पुत्रद्रव्यकलपु त्यक्तस्नेहो नराधिप ।
चतुर्थमाश्रमस्थान गच्छेनि—तमत्सरः ॥२५॥
अंगिकास्त्यजेत्सर्वानारम्भानवनीपते ।
मित्रादिपु समो मैत्रस्समस्तप्वेव जन्तुपु ।२६।
जरायुजाण्डजादीना वाड भन.कायर मभिः।
युक्त. कुर्वीत न द्रोह मसगाश्च वर्जयेत् ।२७।
है नृपेन्द्र ! वन के तखो को शरीर म मलना और शीत-नाप सहना
यह उसकी तपस्या के ही अंग हैं ॥२२॥ जो वानप्रस्थो इन नियत कर्मों को
करता है, वह अपने सभी दोपो को भस्म कर डालता है और तब उसे नित्य
लोको की प्राप्ति होती है ।।२३।। अब मैं उस चतुथं पाश्रम का वर्णन करता हूं,
जिसे ज्ञानीजन भिक्षु-आश्रम कहते हैं, तुम उसे सावधान चित्त से श्रवण करो
॥२४॥ हे राजन् ! तीसरे पाश्रम के पश्चात् पुन, धन और स्त्री आदि गे
प्रीति को छोड कर और मात्सर्य-रहित होकर चौथे आश्रम में प्रवेश करना
चाहिये ।।२५।। हे अवनीपते ! भिक्षु को धर्म, अर्थ और काम रूपी त्रिवर्ग
विषयक सब कर्मों का नितान्त त्याग करना चाहिये । शत्रु-मित्रादि के प्रति
समता का भाव तथा सभी जीवो के मुद्ददता यह उसके आवश्यक कर्तव्य हैं।
॥२६॥ निरन्तर समाहित रहे । जरायुज, अएडुज, स्वेदज प्रादि सब प्राणियो
से वन, वचन, कर्म से द्वेष न करे और सब प्रकार की वासनामो का त्याग
करे ॥२७॥
एकरानस्थितिम पञ्चरानस्थिति. पुरे।
तथा तिष्ठेद्यथाप्रीतिट्ठपो वा नास्य जायते ॥२८॥
प्राणयानानिमित्त च व्यङ्गारे भुक्तवज्जने ।
काले प्रशस्तवना भिक्षार्थ पर्यटेद् गृहान् ।२६।
काम: क्रोधस्तथा दर्पमोहलोभादयश्च ये।
तास्तु सर्वान्परित्यज्य परिबाड् निर्ममो भवेत् ॥३०॥
तृतीय ग्रंश-अ०१]
[४११
अभयं सर्वभूतेभ्यो दत्त्वा यश्चरते मुनिः ।
तस्यापि सर्वभूतेभ्यो न भयं विद्यते कचित् ॥३॥
कृत्वाग्निहोत्रं स्वगरीरसंस्थं
शारीरग्नि स्यमुखे जुहोति ।
विप्रस्तु भक्ष्योपहितहविभि-
श्चिताग्निकानां ब्रजति स्म लोकान ।३२॥
मोक्षाश्रमं यश्चरते ययोक्तं
शुचिस्सुखं कल्पितवुद्धियुक्तः ।
अनित्यनं ज्योतिरिव प्रगान्तः
स ब्रह्मलोकं श्रयते द्विजातिः ॥३३॥
ग्राम में एक रात्रि तथा नगर में पांच रानि निवास करे और इतने
दिन भी इस प्रकार रहे, जिससे किसी से द्वेष अथवा प्रीति न हो सके ॥२८॥
जद परो मे चूल्हा उटा होजाय और घर के सब लोग भोजन कर चुऊँ तब
प्राण रक्षा के निमित्त ऊचे वर्गों में से किसी के यहां जाकर भिक्षा ले ॥२६॥
पारिद्वाजक को माम, क्रोध, दर्प, मोह, लोभ आदि का त्याग करके ममता-
रहित होना चाहिये ॥३०॥ सभी प्राणियों को समय प्रदान करता हो जो मुनि
पृथिवी पर विचरण करता है, उसे भी कभी विमो से भय प्राप्त नहीं होता ।
॥३॥ चतुर्थ प्राथम स्थित जो ब्राह्मण अपने देह में स्थित प्राणादि के उद्देश्य
से ही अपने मुस में भिक्षान्न स्त्री हृषि को जठराग्नि मे होमता है, उसके कारण
उसे अग्नि होनियों के लोकों की प्राति होती है ॥३२॥ जो ब्राह्मण बुद्धियोग
वाला होकर विधिवत प्राचरण करता हुया, मोक्षाप्रम का पालन करता मौर
बिना ईंधन की अग्नि के समान शान्त होता है, उठे अन्त में ब्रह्मलोक की
प्राप्ति होती है ॥३३॥
४१२ ] [ श्रीविष्णुपुराण दशवाँ अध्याय कथित चतुराथम्य चातुर्वर्ण्यक्रियास्तथा । पुस क्रियामह श्रोतुमि छामि हिजसत्तम ।। नित्यनैमित्तिका काम्या क्रिया पु सामशेपत । समाख्याहि भृगुश्रेष्ठ सर्वजो ह्यसि मे मत १२। यदेतदुक्त भवता नित्यनैमित्तिकाश्रयम् । तदह कथयिष्यामि शृणुप्वकमना मम ।। जातस्य जातकर्मादिनियाकाण्डमशेपत । पुनस्य कुर्वीत पिता श्राद्ध चाभ्युदयात्मकम् ।४। युग्मास्तु प्राड मुखान्विप्रान्भोजयेन्मनुजेश्वर। यथा वृत्तिस्तया कुर्याइँ व पित्र्य द्विजन्मनाम् ॥५॥ दना यवै सबदरैमिश्रान्पिण्डामुदा युत । नान्दीमुखेभ्यस्तीर्थेन दद्यादै वेन पार्थिव ।। प्राजापत्येन वा सर्वमुपचार प्रदक्षिणम् । कुर्वीत तत्तयाशेपवृद्धिवालेषु भूपते ॥७॥ सगर ने कहा-हे द्विजवर | प्रापने चारो प्राथम और चारो वर्णों के कर्म मेरे प्रति कहे, अब मैं आपके श्रीमुख से मनुष्यो के कर्मों को श्रवण करना चाहता हूं ॥१॥ हे भृगवर । पाप सवन हैं, इमलिये कृपया मनुष्यो के नित्य- नैमित्तिक और काम्यादि समस्त कर्मों को मुझसे कहिये ॥२॥ प्रोव ने कहा- पापने नित्य-नैमित्तिक आदि के विपय म प्रश्न किया, उसे सबको कहता हूँ, सावधान होकर सुनो ॥३॥ पिता को पुन का ज म होने पर उसके सब जाति कर्मादि सस्कार तथा प्राभ्यदयात्मक श्राद्ध वरना उचित है ॥४|| युग्म ब्राह्मणो पो पूव की ओर मुख परके बिठावे और भोजा करावे तथा द्विजातियो के अनुकूल व्यवहारानुसार देवता और पितरो की तृप्ति के लिये श्राद्ध करे ॥५॥ तथा देवतीथ द्वारा नादीमुख पितरो को दही, जो और बदरीफल के मिश्रित पिएड दे ॥६॥ अथवा पनिष्ठिका के मूल मे जो प्राजापत्यतीय पहा है, उससे
नृतीय अग-अ० १० ]
[४१३
उब उपचार द्रव्योरा दान करे। इसी प्रकार सब वृदिवालों मे करना
वाहिये ॥७॥
ततश्च नाम कुर्वोत पितव दगमेहनि ।
देवपूर्व नरात्य हि मर्मवर्मादिमयुतम् ।
शर्मेति ब्राह्मणस्योक्त वर्मेनि क्षनसश्रयम् ।
गुमदामात्मक नाम प्रसस्त वेश्यमूद्रयो ।
नार्थहीन न चाशन्त नापगब्दयुत तथा ।
नामङ्गल्य जुगुप्स्य वा नाम कुर्यात्ममाक्षरम् ॥१०॥
नातिदिध नातिह्वस्थ नातिगुर्वक्षरान्वितम् ।
सुवोच्चार्य तु तन्नाम कुर्याद्यत्प्रवणाक्षरम् ॥११॥
ततोऽनन्तरसस्कारमस्कृतो गरुवेश्मनि ।
ययोक्तविधिमाथित्य कुर्याद्विद्यापरिग्रहम् ॥१२॥
गृहीतविद्यो गुरखे दत्त्वा च गुरुदक्षिणाम् ।
गार्हस्थ्यमिच्छन्भूपाल कुर्याद्दारपरिग्रहम् ॥१३॥
ब्रह्मचर्येण वा काल कुर्यात्मक्ल्पपूर्वकम् ।
गुरोरनुश्रूण कुर्यात्तत्पुनादेरयापि या 1१४॥
वैखानसो वापि भवेत्परिवाडय वेच्छया ।
पूर्वसङ्कल्पित यादृक् तादृक्कुन्निराधिप ।१५।
जन्म के दसवें दिन पिता अपन पुत्र का नामकरण करे । नाम के पहिले
देव वाचक शब्द और फिर वर्ण सजक शर्मा, वर्मा आदि लगावे ||11 ब्राह्मण
के नाम म शमी, क्षत्रिय के नामान्त मे दमा और वैश्य के लिये गुप्त और शूद्र
के लिय दान शन्द वा प्रयोग वर ॥॥ जो नाम रखा जाय वह अर्थहीन,
अपशन्द माला अमागलिक अयवा दुसित नहीं हाना चाहिये और उसके प्रक्षरा
म ममानता होनी चाहिये ॥१०॥ बहुत बडा, बहुत छोटा अवा पठिन अवारों
से युक्त नाम भी नहीं रखना चाहिये । निमका उच्चारण सुगमता से हो सके
और जिसके पीछे के लघुवर्ण हो, ऐमा नामकरण करे ॥१शा फिर उपनयन
संस्कार होने पर गुरु ग्रह म निधाम पूर्वक विधिवत् विद्याध्ययन कराये ॥१२॥
४१४ ]
[ श्रीविष्णुपुराण
है राजन् ! जब यह शिष्य विद्याध्यपन कर चुये तब गुरुजी को दक्षिणा देकर
यदि गृहस्थाश्रम में प्रवेश करना चाहे तो विधि पूर्वक विवाह करे ॥१॥
गृहास्थाश्रम-प्रवेश की इच्छा न हो तो सन्यास ग्रहण परे । है राजन ! इसमें
विचार पूर्वक जैसा निश्चय किया गया हो, वही करना चाहिये ॥१४-१५।।
व रेकगुणा भार्यामुद्वहेलिगुणस्स्वयम् ।
नातिकेशामकेशा वा नातिकृष्णा न पिङ्गलाम् ॥१६॥
निसर्गतोऽधिकाङ्गी वा न्यूनाङ्गी मपि गोद्वहेत् ।
नाविशुद्धा सरोमा वाकुलजा वापि रोगिणीम् ॥१७॥
न दुष्टा दुष्टवाक्या वा व्यङ्गिनी पितृमातृत ।
न श्मश्रुव्यञ्जनवती न चैव पुस्पाकृतिम् ॥१८॥
न घर्धरस्वरा क्षामा तथा काकस्वरा न च ।
नानिबन्धेक्षणा तद्ववृत्ताक्षी नोदहेबुध 1१६।
यस्याश्च रोमशे जङ्घ गुल्फो यस्यास्तथोन्नती।
गण्डयो कूपरौ यस्या हसन्त्यास्ता न चाहेत् ।२०॥
नातिरूक्षच्छवि पाण्डुकरजामणेक्षणाम् ।
आपोनहस्तपादा च न कन्यामुद्वहेद् बुध ।२१॥
यदि विवाह की इच्छा हो तो तृतीयाश प्रायु की कन्या का पाणिग्रहण
करे । वह अधिक केश वाली अथवा अल्पकैश वानी भी न हो, अधिक सांवली
या पारडु पर्ण पाली स्त्री को ग्रहण न करे ॥१॥ दुष्ट स्वभावी, कडवे वचन
बोलने वाली अगहीता, मूछो वाली, पुरुष जैसी प्राकृति वाली, घर्धर शब्द
वाली, मत्यत भिंची हुई जुबान या यौए जैसे शब्द वाली, पक्षमन्या अथवा
वृत्ताकार नेत्र वालो स्त्री के साथ विवाह न करे ॥१८-१९॥ जांघो पर रोम
वाली, केचे टखने वाली और हंसते समय जिसवै कपोलो मैं गढे पड़ जाते हो,
उस स्त्री के साथ भी विवाह करना अनुचित है ।।२०। मलीन कान्ति बाली,
पीले नख वाली, लाल नेत्र वाली, भारी हाथ-पांव वानी कन्या भी विवाह के
लिये त्याज्य समझे ॥२१॥
४१६ ]
[ श्रीविष्णुपुराण
श्रूयता पृथिवीपाल सदाचारस्य लक्षणम् ।
सदाचारवता पुंसा जितो लोकावुभावपि ॥२॥
साधव क्षीणदोपास्तु सच्छब्द साधुवाच ।
तेपामाचरण यत्तु सदाचारस्म उच्यते ॥३॥
सप्तर्षयोऽथ मनव प्रजाना पतयस्तथा।
सदाचारस्य वार करिश्च महीपते ।४।
ब्राह्म मुहूर्ते चोत्थाय मनसा मतिमान्नृप ।
प्रबुद्धश्चिन्तयेद्धर्ममर्थ चाप्यविरोधिनम् ॥५॥
अपीडया तयो काममुभयोरपि चिन्तयेत् ।
दृष्टादृष्टविनाशाय निवर्गे समदर्शिता ।।
परित्यजेदर्थकामौ धर्मपीडाकरौ नृप ।
धर्ममप्यसुखोदकं लोकविद्विष्टमेव च ।।
सगर बोते-ह । अब मैं गृहस्थ के सदाचारों को सुनने की इच्छा
करता है, जिनका प्राचरण करने वाला मनुष्य इहलोक और परलोक से पतन
को प्राप्त नही होता ॥१॥ प्रोव ने कहा-हे राजन् ! अव अपने प्रश्न के अनुसार
१ सदाचार के लक्षण सुनो। उसका पालन करने वाला मनुष्य इहलोक परलोक
दोनो का जीतने वाला होता है ॥॥ सत् शब्द का अथ साधु होता है
और दोप-रहित को ही साधु कहते है । उस साधु पुरुष का प्राधरण ही सदा-
चार कहा गया है ॥३॥ हे पृथिवीपते । इस सदाचार के कहने वाले तथा इसका
पालन करने वाले सप्तर्षि, मनु तथा प्रजापति हैं ।।। है राजन् । मतिमान
पुरुष का स्वस्थ चित्त से ब्राह्म मुहूर्त म उठ कर अपने धम तथा घम काय मे
बाधक विषयो पर विचार करना चाहिये ॥शा और उस काय का भी विचार
करे जिससे धर्म और अर्थ को हानि न हो । इस प्रकार दृष्टादृष्ट अनिष्ट की
शान्ति के लिये धम, अर्थ और पाम-इन तीनो के प्रति समभावी हो ॥६॥
धर्म के विरुद्ध जो अर्थ और काम हैं उनका त्याग करे और ऐसे धर्म को छोड
दे जो आगे चल कर दुखमय होजाम अथवा समाज के विरुद्ध हो ॥७॥
तृतीय प्रश-अ०११ ]
[४९७
तत कल्य नमुन्याय कुन्मूिन नन्धर ।
दैत्यामिविक्षपमतीत्वाम्बधिर नुव ।।
दूरादावमयान्मून पुगेप च मिजयेत् ।
पादारनेजनोटिष्ट प्रधिपत गृहाण है।
पात्मन्दाया तान्टाया गोमूर्यान्यनितान्नया ।
गुगद्विजादीनु युनो नायिम पदाचन 1101
न वृप्टे गन्यमचे वा गोरजे जनगनदि।
न यमनि न नद्यादितीय पुरवयंन ।११॥
नाप्पु नवाम्भमस्तोरे मगाने न ममाचरेत् ।
उत्नग वै पुरीपम्य मूमन्य च विगर्जनम् ।।
उदट मुग्यो दिया मुत्र विपरीनमुमो निमि।
हातानापदि प्राना मूत्रामगं च पार्थिन ।१३
तृगराम्नीयं यमुधा वरुपातमम्नर ।
निष्ठमानिनिर तत्र नव निश्चिदीत १४
४१८ ] [ श्रीविष्णुपुराण वल्मीकमूपिकोद्भूता मृद नान्तर्जला तथा। शौचावशिष्टा गेहाच्च नादद्याल्लेपसम्भवाम् ॥१५॥ अगुप्राण्युपपन्ना च हलोत्खाता च पार्थिव । परित्यजेन्मृदो ह्य तास्सकनाश्शौचकर्मणि ।१६। एका लिङ्ग गुदे तिस्रो दश वामरे नृप । हस्तद्वये च सत स्युमुंदश्शौचोपपादिका ।१७। अच्छेनागन्धलेपेन जलेनावुवुदेन च । श्राचामेव मृद भूपस्तयादद्यात्समाहित ॥१८॥ निप्पादिताइ शिौचस्तु पादावन्युक्ष्य ते पुन । पि पिबेत्मलिल तेन तथा द्वि परिमार्जयेत् ॥१६॥ शीर्षण्यानि तत खानि मूर्द्धन च समालभेत् । वाहू नाभि च तोयेन हृदय चापि सस्पृशेत् ॥२०॥ स्वाचान्तस्तु तत कुर्यात्पुमान्वेदाप्रसाधनम् । पादनमागाय दूर्वाद्यालम्भनानि च ।२१। है राजन् । बाबी का मिट्टी, नूहो द्वारा वित्त से निकाली हुई, जल ये भीतर की, पर लीपन पी, पीटी भादि भीयो द्वारा निकाली हुई, हल द्वारा उसाडी हुई सपा पोय पम 1 वोट मिट्टी का शौच वर्म म काम न थे। ॥१५-१६॥हे रामन् । उपस्प मे एा बार, गुम म तीन बार, बाए हाए में दमबार पोरदोनो हापा म मान बार मिट्टी लगाने से डिहोती है ॥१७॥ पिर निगम और हीन जर पाचमा परे पोर पल पूर्वमपिर मिट्टी १८॥ उममे पावो को शुभपरे । पौर धोन के उपरान्त ती बार पुमा परे पोर पिर दो बार मतो थोष Imm पर जल ग्रहण परसे उगेपिराध, गूळ, बार, नानि मोर हृदय को परे ॥२०॥ पिर भोमार नान परगनारे पोर धारापरतागारण. प्रजम, दूर्गमा मासिका पिपि पूर्ण प्रयोग गरे ॥ ततरस्ययाग मृत्व प धनार्जनम् । पुर्वीत गलागम्पो पजेश दृषिषीपते ।२२।
[ ४१६ तृतीय अंश-ग्र० ११ ] सोमसंस्था हावस्संख्याः पाकसंस्थास्तु सस्थिताः । घने यतो मनुप्यारणा यतेतातो धनार्जने ॥२३॥ नदीनदतटाकेपु देवलातजलेपु च । नित्यक्रियार्थ स्नायीत गिरिप्रनवणेपु च ॥२४॥ कृपेपूद्धृततोयेन स्नानं कुर्वीत वा भुवि । गृहेपूद्धृततोयेन ह्यथवा भुव्यसम्भवे ॥२५॥ शुचिवस्त्रधरः स्नातो देवपिपितृतर्पणम् । तेपामेव हि तीर्येन कुर्वीत सुसमाहितः ।२६। घिरपः प्रीपनार्थाय देवानामपवर्जयेत् । पीणा च ययान्याय सञ्चापि प्रजापतेः ॥२७॥ पितृणां प्रीणनार्थाय निरप. पृथिवीपते । पितामहेभ्यश्व नसा प्रोणयेत्प्रपितामहान् ।२८। मातामहाय तत्पिने तपि च समाहितः । दद्यात्पनेण तीन कान्ध चान्यच्छरगुप्त मे ।२६। हे राजन् ! इसके पश्चात् अपने वर्ण-धर्म के अनुमार आजीविका करे पौर धनोपार्जन पूर्वक यज्ञादि का अनुशन करे ॥२२॥ सोम सम्था, हविमस्था और पाकसंस्था- इन सभी धर्मों का प्राय धन है, इमलिय मनुष्यो को पनोपार्जन करना भी प्रत्यन्त प्रावश्यक मं है ॥२३॥ नित्य कर्मों का सम्पादन • फरले के निमित्त पहिले स्नान करना मावस्या है। इसीलिये नदो. नद, तालाब वावही या पर्वत देकरने आदि में स्नान करना उचित है ।।२४। प्रयवा कुंए से जल लेकर समरे निपटवर्ती भूमि पर स्नान पर. यदि वहां न करे तो उस जल को अपने घर में लार ही उतसे स्नान कर ले ॥२५॥ स्नान के पम्चान् युद वस्त्र धारण कर देना सुपि पोर पितरों का उन-उन के तीयों से तपंग परे ॥२६॥ देवतामों पार ऋषियो के तरंग में तीननीन बार मोर प्रनानि के लिये एक ही बार पृथिवो में जल घोड़े।२७॥ रितरों और पितामहीं की तृप्ति के लिये भी तीन बार ही जल छोड़ना चाहिये, यो प्रसार प्रपिता-
४२० ]
[ श्री विष्णुपुराण
महों की तृप्ति करे, मातामह और उनके पिता और पितामह को यल पूर्वक
तीर्थ जल से प्रसन्न करे । अब मैं वाम्य तपए वहता हूं, उसे सुनो ॥२५-२६॥
माने प्रमाने तन्मात्रै गुरुपल्यै तथा नृप।
गुरूणा मातुलाना च स्निग्यमिनाय भूभुजे ॥३०॥
इद चापि जपेदम्बु दद्यादात्मेच्छया नृप ।
उपकाराय भूताना कृतदेवादितर्पणम् ।३१।
देवासुरास्तथा यक्षा नागगन्धर्व राक्षसा ।
पिशाचा गुह्यकास्सिद्धा कूष्माण्डा पशव सगा ।३२।
जलेचरा भूनिलया वाय्वाहाराश्च जन्तव ।
तृप्तिमेतेन यान्त्वाशु मद्दत्तेनाम्बुनाखिला ।३३।
नरकेषु समस्तेषु यातनासु च ये स्थिता ।
तेषामाप्यायनायैतद्दीयते सलिल मया ॥३४।
ये वान्धवाबान्धवा वा येऽन्य जन्मनि वान्धवा ।
ते तृप्तिमखिला यान्तु ये चास्मत्तोयकाडि क्षारण १३५॥
यन कचनसस्थाना क्षुत्तष्णोपहतात्मनाम् ।
इदमाप्यायनायास्तु मया दत्त तिलोदकम् ।३६।
हे राजन् । माताको प्रमाता को उसकी माता को, गुरु पत्नी को,
गुरु को, मामा को, प्रिय मित्र को अथवा राजा को मरा दिया हुआ यह जल प्रारा
हो इस प्रकार कहता हुया सब भूता के लिये देवादि का तपण करके अपने
इच्छित सम्बन्धी के जल दे ॥३०-३३।। दवता, असुर, यक्ष, नाग, गधव,
राक्षस, पिशाच, गुह्यक, सिद्ध, कमाण्ड, पशु, पक्षी, जलचर, भूमिचर, वायु
का पाहार करने वाले सव जीव मरे द्वारा दिये गये इस जल से तृप्त हो-ऐसा
देवादि के तर्पण मे कहे ।।३२-३३।। सम्पूण नरको म स्थित हुआ जो जो जीव
विभिन्न प्रकार की यन्त्रणाएं प्राप्त कर रहे हैं, उनकी तृप्ति के लिये जल देता
हूँ ॥३४॥ जो मेरे बन्धु है अथवा अब धु हैं या पहिले किसी जन्म बन्धु थे या
जो
मुभ से जन प्राप्ति की इच्छा रखते हैं, वे सभी मेरे द्वारा दिये गये इस जल
से तृप्त हों ॥३५॥ शुधा पिपासा मे व्यावुन कोई भी प्राणी जहाँ कही भी हो,
वे सब मेरे द्वारा दिय गय इस तिल जल से तृप्त हो जाय ॥३६॥
तृतीय अश-अ० ११] [४२१ काम्योदकप्रदान ते मयतत्कायत नृप । यहत्त्वा प्रोगयत्येतन्मनुष्यस्सकलं जगत् ॥३७॥ जगदाप्यायनोद्भूत पुण्यमाप्नोति चानघ । दत्त्वा काम्योदकं सम्यगेतेभ्यः श्रद्धयान्वितः १३८१ प्राचम्य च ततो दद्यात्सूर्याय सलिलाञ्जलिम् । नमो विवस्वते ब्रह्मभास्वते विषणुतेजसे ।३। जगत्सवित्रे शुचये सवित्रे कर्मसाक्षिणे । ततो गृहार्चन कुर्यादभीष्टसुरपूजनम् ।४०। जलाभिषेकः पुप्पश्च धूपाद्य व निवेदनम् । अपूर्वमग्निहोन च कुर्यात्प्रारब्रह्मणे नृप ।४१। प्रजापति समुद्दिश्य दद्यादाहुति मादरात् । गृह्याभ्य: काश्यपायाथ ततोऽनुमतये कमाव ।४२॥ तच्छेप मणिके पृथ्वीपर्जन्येभ्यः क्षिपेत्ततः । द्वारे धातुर्विधातुश्च मध्ये च ब्रह्मणे क्षिपेत् । गृहस्य पुरुपव्यान दिग्देवानपि मे शृगु ॥४३॥ है राजन् ! इस प्राकार मैंने तुम्हारे प्रति यह काम्य तर्पण रहा है, जिसे करके मनुष्य सम्पूर्ण विश्व को तृप्ति प्रदान कर सकता है, ॥३७॥ ौर है निष्पाप! इस उपरोक्त प्रगर से जीवो को थद्धा-भाव से काम्य जल देने के कारण उसे संमार को त ति से होने वाले पुण्य की प्रासि होती है ॥३८॥ इस प्रकार तर्पण करने के पश्चात् प्राचमन करे और भगवान भास्कर जलाअलि प्रदान करे । भगवान विवस्वान को नमसार है । वह वेद के ज्ञाता मोर विमा तेज के समान मत्पात तेजोमय है । वही विस के उत्पन्न बरले पाले, अत्यन्त पवित्र और कर्मों के देसने पाते हैं । यह रह कर जलाभिषेक परे मोर पुष. भूपादि देता हुमा गृह देवता और इष्ट देवता की पूजा परे । हे राजन् ! इसके परचान् पग्नि होय करना चाहिये, जिसमें प्रथम ब्रह्माजी को, फिर प्रजापति, गृह्य, काश्यप मोर मनुमति यो चमतः पादर भाव मे पाहुतियां प्रदान करें। ॥३९-४२॥ उममें शेष रई हव्य को पृथिवी पार पन्च के निमित्त उदक पात्र
४२२ ]
[ श्रीविष्णुपुराण
मे, धाता-विधाता ये निमित्त द्वार ये दोनो घोर तथा ब्रह्माजी के निमित्त घर
वे यीच मे छोडे । अव मैं तुम्ह दियपालो ये पूजन पी विपि पतलाता है, ध्यान
से सुनो ॥४३॥
इन्द्राय धर्मराजाय वरुणाय तयेन्दवे।
प्राच्यादिपु बुधो दद्याधुतशेपात्मय बलिम् ॥४४॥
प्रागुत्तरे च दिग्भागे धन्वन्तरिवलि बुध ।
निर्वपेद्वश्वदेव च कर्म कुर्यादत परम् ।४५।
वायव्या वायवे दिशु समस्तासु यथादिशम् ।
ब्रह्मणे चान्तरिक्षाय भानवे च क्षिपेद्वलिम् ॥४६॥
विश्वेदेवान्विश्वभूतानथ विश्वपतीपितृन् ।
यक्षाणा च समुद्दिश्य वलि दद्यान्नरेश्वर ।४७।
ततोऽन्यदन्नमादाय भूभिभागे शुचौ बुध ।
दद्यादशेषभूतेभ्यस्स्वेच्छया सुसमाहित ॥४८
देवा मनुष्या पशवो वयासि
सिद्धास्सयक्षोरगदैत्यसङ्घा ।
प्रेता पिशाचास्तरवस्समस्ता
ये चान्नमिच्छन्ति मयानदत्तम् ।४६।
पिपीलिका कीटपतङ्गकाद्या
बुभुक्षिता कर्मनिबन्धबद्धा ।
प्रयान्तु ते तृप्तिमिद मयान्न
तेभ्यो विसृष्ट सुखिनो भवन्तु ।५०।
पूर्व मे इन्द्र के उद्देश्य से, दक्षिण में यम के उद्देश्य से, पश्चिम में
घरण के तथा उत्तर मे चन्द्रमा के लिए बची हुई सामग्री से बलि दे ॥४॥
पूर्व और उत्तर मे धन्वन्तरि वे निये बलि देकर बलिवश्य देव धर्म बरे ॥५॥
तृतीय अंश-अ० ११] [४२३ विश्वपतिपो, पितरो और यशो के निमित्त वलि प्रदान करै ।।४॥ फिर मन लेकर पृथिवी पर समाहित मन से बैठे मोर सब प्राणियो के उद्देश्य से बात द ॥४॥ और कहें कि देवता, मनुष्य, पशु पक्षी, मिद यक्ष, सर्प दंत्य, प्रेम, पिगाच, वृक्ष, चोटी, कीट, पतगादि जो भी जीव अपने अपने कर्मवन्धन म वैध कर सुधातुर हुए मेरे अन्न की इच्छा करते हैं, उन सभी के लिये में अन्न प्रदान करता हूँ, वे इमस तृप्त और सुखी हो ॥४६-५०।। येपा न माता न पिता न बन्धु- नवान्ननिदिन तयान्नमस्ति । तत्तृमयेऽन भुवि दत्तमेतत् ते यान्तु तृप्ति मुदिता भवन्तु ॥५१॥ भूतानि सर्वाणि तयान्नमेत- दह च विष्णुनं ततोऽन्यदस्ति । तस्मादह भूतनिकायभूत- मल प्रयच्छामि भवाय तेपाम् ॥५२॥ चतुर्दशो भूतगणो य एप तत्र स्थिता येऽविलभूतसद्धा.। तृपयर्थमनन हि मया विमृष्ट तेपामिद ते मुदिता भवन्तु ॥५३। इत्युच्चार्य नरो दद्यादन्न श्रद्धानमन्वित । भुवि सर्वोपकाराय गृहो मश्रियो यत. ॥५४॥ श्वचाण्डालविहङ्गाना भुवि दद्यानरेश्वर । ये चान्ये पनिता. ये चिदपुत्रा मलि मानवा ॥५५॥ ततो गोदोहमान वे काल तिप्ठेद् गृहागणे। अनियिग्रहणार्याय तद्रूध्वं तु यथेच्छया ५६॥ गिनने माता, पिता, योगदादि नहीं है यया मिमी के पास मन- दामरा सापन पा भन्न नहीं है, मैंने उन्ह तप्त परने के लिये दूमि पर यह भन्न रम दिया है, वे गे ग्रहण कसे तृप्त तथा मुमी हो ॥५१॥ समात डीव, ४२४ ] [श्रीविप्रगुपुराण मैं तथा यह अन्न-सभी कुछ विष्णु हैं, क्योकि विष्णु से भिन्न कुछ भी कही नहीं है । इमलिये सब भूतो के देह रूप इस अन्न को मैं उनकी पुष्टि के निमित्त प्रदान करता हूँ ॥५२॥ इस चतुर्दश प्रकार के भूत समुदाय मे जितने भी जीव हैं उन सभी को तृस परन के लिये मैंन यह अन्न रखा है, इसलिये वे इससे प्रसन्न हो ।।१३।। इस प्रकार वहता हुप्रा गृहस्थ पुरुप श्रद्धा-भाय पूर्वव सब जीवों के हिताय पृथिवी मे अन्नदान परे, क्योपि गृहस्थ ही तो सब जीवो का पाश्रय स्वरूप है ॥५४॥ फिर हे राजन् । श्वान, चाण्डाल, खगगण अथवा अन्य जो-जो भी पतित या पुत्रहीन आदि पुरुष हो, उन सब की तृप्ति के निमित्त पृथिवी मे बलि भाग को रख दे ॥५५॥ फिर गो दोहन का समय होने तक या उसस भी कुछ देर तक अतिथि की प्रतीक्षा मे घर के आंगन में खडा रहे ॥५६॥ अतिथिं तत्र सम्प्राप्त पूजयेत्स्वागतादिना । तथासनप्रदानेन पादप्रक्षालनेन च १५७/ अद्धया चान्नदानेन प्रियप्रश्नोत्तरेण च । गच्छतश्चानुयानेन प्रीतिमुत्पादयेद् गृही ।५। अज्ञातकुलनामानमन्यदेशादुपागतम् । पूजयेदतिथिं सम्यड नैकग्रामनिवासिनम् ॥५६॥ अविञ्चनमसम्बन्धमज्ञातकुलशीलिनम् । असम्गूज्यातिथि भुक्त्वा भोक्तुकाम बजत्यध ।६०॥ स्वाध्यायगोनाचरणमपृष्ट्वा च तथा कुलम् । हिरण्यगर्भवुद्धधा त मन्यताभ्यागत गृही ।६११ पिनर्थ चापर विप्रमेकमप्याशयेन्नृप । तद्देश्य विदिताचारराम्भूति पाञ्चयज्ञिकम् ।६२॥ अन्नाग्रञ्च समुद्धृत्य हन्तवारोपकल्पितम् । निर्वापभूत भूपाल श्रोनियायोपपादयेत् ।६३॥ यदि अतिथि मिल जाय तो उसे स्वागत पूर्वक घासन दे और चरण धोवर सतार परे और असा पूर्वर उसे भोजन पराता हुमा मधुर वाणी से तृतीय अभ-अ०११ ] धातचीत करता हुमा उनके गमनाल में पीछे पोछे आर उसे प्रसन्न करना चाहिये ॥५७-५८॥ जिस व्यक्ति के नाम पौर निवाम स्थान मादि का पता न हो, मी मतिथि का सत्कार करें। अपने ही ग्राम में निवास करन वाला पुरुष प्रातिथ्य का पात्र नहीं होता ॥५६॥ जिसके पास कोई सामान नहे, जिससे कोई सम्बन्ध न हो, जिम वयादि का ज्ञान न हो और जो भोजन करने के लिये इच्छा हो, ऐमे मतिथि का सत्तार न करना या भोजन न कराना अधोगति को प्राप्त कराने वाला है ।। ६०॥ प्रागत अलिपि का अध्ययन, गोत्र, पाचरण, कुल भादि कुछ न पूछे पोर हिरण्यगर्भ दुद्धि से समका पूजन परे 11९१॥ राजन् ! अतिथि का सत्कार करने के पश्चात् अपने ही प्राम के एक अन्य पचयाहिक ब्राह्मण को जिसके कुल और भाचरण आदि की जानकारी हो बुनार पितर कार्य के लिए भोजन कराने ॥२॥ उस श्रोत्रिय ब्राह्मण को पहिने ही निकाल अलग रखे हुए हन्तवार सहर अन्न से भोजन कराना पाहिये ॥६॥ दत्वा च भिक्षावितय परिवाइब्रह्मचारिणाम् । इच्छया च बुधो दद्याद्विभरे मत्यवारितम् ।६।। इत्येते तिथय प्रोक्ता. प्रागुक्ता भिक्षवश्न ये । चतुर पूजयित्वतान्नृप पापात्प्रमुच्यते ॥६॥ अतिथियंस्य भग्नामो गृहात्प्रतिनिवर्तते । स तस्मै दुयन दत्त्वा पुण्यमादाय गच्छति ।६६। घाता प्रजापति शको वह्निवंमुगणोऽर्षमा । प्रविश्यातिथिमेते व मुश्चन्तन्न नरेश्वर ६७१ तम्मादतिषिपूगाया यतेन सतत नर.। स येवानमय भुइक्तयो मुक्त ह्यतिथि विना ।। तत. स्ववामिनीदु खिगमिणीवृद्धवालान् । मोजमस्कृतान्नेन प्रथम चरम गृही ६६! अमुक्त वन्मु चैतेपु मुअन्मुक्तेस दुप्पनम् । मृना गत्या नरम ग्लप्ममुग्जायने नर 1201 [ श्रीविरगुपुराण ग इस प्रकार तीन भिक्षायें देने के उपरान्त यदि शक्ति हो तो परि- अाजको और ब्रह्मचारियों को भी विमुख न करके, उन्हे भिक्षा दे ॥१४॥ -पहिले के तीन (देव, अतिथि, ब्राह्मण) तथा चौथे भिक्षुक मिलकर यह चारो अतिथि ही कहे जाते है । है नृप। इन चारो की पूजा करने से मनुष्य सभी पापो से छूट जाता है ।।६५।। जिसके घर से अतिथि विमुख लौटता है, उसे वह अपन समस्त पाप देकर उसके सभी शुभ कर्मों को साथ ले जाता है ॥६६॥ धाता, प्रजापति, इन्द्र, अग्नि, वसुगण और अयमा~यह सभी देवता अतिथि के शरीर में बैठकर उसके साथ भोजन करते हैं ॥६७। इसलिये अतिथि सत्कार के लिये गृहस्थ पुरुष को सदा यत्नशील रहना चाहिए । जो मनुष्य अतिथि को भोजा कराये बिना, स्वय ही भोजन कर लेता है वह तो केवल पाप का ही भक्षण करता है ॥६॥ इसके पश्चात् गृहस्थ अपने घर में रहने वाली विवाहिता पुत्री, रोगिरणी गमिणी, वृद्ध और बालको को पहिने उस शुद्ध सस्कृन अन्न से भोजन करावे और फिर स्वय भोजन करे ॥६६॥ जो गृहस्थ इन सबको खिलाये बिना, स्वय खा लेता है, वह पाप-भक्षक ही होता है और अन्त म नरक को प्राप्त होकर श्लेष्म भक्षी कीट होता है ॥७॥ अस्नाताशी मल भुड क्त ह्यजपी पूयशोणितम् । प्रसस्कृतान्नभुड मूत्र वालादिप्रथग शत् ।७१३ अहोमी च वृमीन्भुङ्क्ते अदत्त्वा विषमश्नुते । तस्माच्छणुप्व राजेन्द्र यथा भुञ्जीत वै गृही।७२। भुञ्जनश्च यथा पुस पापबन्धो न जायते । इह चारोग्यविपुल बलबुद्धिस्तथा नृप ।७३। भवत्यरिष्टशान्तिश्च वैरिपक्षाभिचारिया। स्नातो यथावत्कृत्वा च देवपिपितृतर्पणम् ७४। प्रशस्तरलपाणिस्तु भुञ्जीत प्रयतो गृही । वृते जपे हुते वह्रो शुद्धवस्त्रघरो नृप ७५॥ दत्त्वातिथिभ्यो विप्रेभ्यो गुरभ्यस्सश्रिताय च । पुण्यगन्धरशस्तमात्यधारी व नरेश्वर ७६॥
. 1 'तृतीय अश-अ०११] [[ ४२७ एकवउधरोऽया पारिणपादो महीपते । विशुद्धवदन प्रीतो भुञ्जीत न विदिड मुख खा जो मनुष्य स्नान के बिना ही भोजन पर लेता है, उसे मल भक्षरण परने वाला समझो। जप क्येि बिना भोजन कर लेना रुधिर पौर पूय पान करना है। प्रसम्वृत अन का भोजन करने वाना मूत्र पीता है, पथवा जो बालक वृद्धादि से पहित स्त्रय भोजन कर लेता है, उसे विष्टा का आहार करने वाला जानो ॥७१।। हवन किये बिना भोजन करने वाला कीडो का और बिना दान किये खा लेने वाला विप का भोजन करता है । इसलिये गृहस्थ जिस प्रकार भोजन करे उस विधि को श्रवण करो। स्नान के अनन्तर देवतामो, पियो और पितरो का तपण कर हाथ में श्रेष्ठ रल धारण पूर्वक पवित्रता से भोजन करे । जप और अग्नि होत्र के बाद शुद्ध वस्त्र पहिरे तथा प्रतिषि, ग्राह्मण, गुरुजन और अपने आश्रितो को भोजन कराने के पश्चात् थं पुष्पमालादि पारण पौर हाथ पाव प्रक्षालन प्रादि से शुद्ध होकर भाजन परे और भोजन करते समय म इधर-उधर दृष्टिपात न करे ॥७२-७७॥ गाड मुखोदड मुखो वापि न चैवान्यमना नर । प्रन्न प्रशस्त पथ्य च प्रोक्षित प्रोक्षरणोदक ७८ न कुत्सिताहृत नैव जुगुप्सावदसस्कृतम् ७६। दत्त्वा तु भक्त शिष्येभ्य क्षुधितेभ्यस्तथा गृही। प्रशस्तशुद्धपाने तु भुञ्जीतापुपितो नृप 1८०। नासन्दिस स्थित पान नादेशे च नरेश्वर । नासाले नातिसङ्कीर्णे दत्त्वाग्न च नरोऽग्नये ८११ गन्नाभिमन्त्रित शस्त न च पर्युपित नृप । अन्यत्र फलमूलेभ्यश्शुष्क्शाखादिकात्तथा ।८२ तद्वद्धारीतकेभ्यश्च गुडभक्ष्येभ्य एव च । भुञ्जीतोद्धृतसाराणि न कदापि नरेश्वर ।८३॥ नाशेप पुरुषोऽश्नीयादन्यन जगतीपते । मध्यम्बुदधिसपिम्यस्सक्त भ्यश्च विवेकवान् ।
४२८ ] [ श्रीविग्णपुराण मम्ममनाप भाव को त्याग र पूर्वाभिमुरा या उत्तराभिमृग घटार पुण्य मन यो मन्त्रपूत जल घोटे देकर उसका माहार र ७॥ रिमी दुराचारी पुरुष से प्राप्त, पृणोशा या गरि वदव प्रादि समारों प रहित मन को त्याग दे तथा पपने भोजन योग्य प्रम में गे पुष मप अपने शिष्य प्रयका अन्य भुपात व्यक्तियों को देर शुद्ध पात्र म मन रखार उसका भक्षण परे ७९-८० मिमी व मादि मासन पर स्थित पान में, अयोग्य या राधुचित स्थान म अपना असमय म भोजन म परे। प्रथम पग्नि की मान या अग्रभाग देवर ही मौजा घरे ॥१॥ मन्त्रपूत, प्रशस्त तथा ताजा पन्न का भोजन कर । परन्तु पल, मूत भोर मूखो शाखाम्रो पे मोर चटनी या गुट ये पदापों पे प्रति यह नियम लागू नहीं है । सारहीन पदापों का भोजन न करना ही इस कथन का उद्देश्य है ।1८२-८३॥ भूपत । मघु, जन पूठ, दही, सत्त मादि के अतिरिक्त अय किसी पदाथ से पूरा हो भक्षरण म बरे ॥२४॥ प्रश्नीयात्तन्मयो भूत्वा पूर्व तु मधुर रसम् । लवणाम्लो तथा मध्ये क्टुतिक्तादिकास्तत ५५ प्राग्द्रव पुरुषोऽश्नीयान्मध्ये कठिनभोजन । अन्ते पुन वाशी तु बलारोग्ये न मुञ्चति १८६। अनिन्द्य भक्षयेदित्य वाग्यतोऽन्नमकुत्सयन् । पञ्चग्रास महामौन प्राणाद्याप्यायन हि तव ।८७) भुक्त्वा सम्यगथाचम्य प्राड मुखोदड मुखोऽपि वा। यथावत्पुनराचामेत्पाणी प्रक्षाल्य मूलत ८८ स्वस्थ प्रशान्तचित्तस्तु कृतासनपरिग्रह । अभीष्टदेवताना तु कुर्वीत स्मरण नर ८६। अग्निराप्याययेद्धातु पार्थिव पवनेरित । दत्तावकाश नभसा जरयत्वस्तु मे सुखम् ।६०) अन्न बलाप मे भूमेरपामग्न्यनिलस्य च । भवत्येतत्परिणत ममास्त्वव्याहत सुखम् ।।११ एकाग्र मन से भोजन करना चाहिये । पहिले मीठे, फिर नमकीन, फिर खट्टी मीर अन्त मे क्ड तीक्ष्ण पदार्थों का भोजन करे ।।शा जो मनुष्य तृतीय अश-०११] प्रथम द्रष पदार्थ, मध्य में कठिन पदार्थ और मन में पुन: द्रव पदार्य भक्षण परता है, उसके बल पर पारीम्प ग सभी क्षय नहीं होता ।।६। इस प्रकार पनिषिद्ध पदार्श रा वारसी के संयम पूर्वर भोजन करे। अन्न का कभी तिर- सरि न करे। पहिले पाँचग्राम मौन रहकर साय, वह परमाणो की तृप्ति करने वाले हैं ॥२७॥ भोजन के पश्चात् भने प्रकार माचमन करे और पूर्व या उत्तर को मोर मुख परके हायो को उनके मून देश ता धोकर पुनः विधियत् माचमन करे ।।८८ फिर साय और दान्त मन से प्रासन पर स्थित हो और अपने इष्ट देवतापो का ध्यान करे ||६॥ प्राणवायु से प्रदीप्त हुमा जठराग्नि माकापा से आसमय अन्न का परिपाक करता हुआ मेरी देहगत पापिय पातुओं का पोपण करे जिससे में मुखी रहूं 1800 यह भन्न मेरे देह में स्थित पृथ्वी, जल, अग्नि और वायु के पल की वृद्धि करे तथा इन्ही नारों तत्त्वों के रूप में हम यह अन्न मुझे मुददायक हो ISM प्राणापानममानानामुदानव्यानयोस्तया । अल पुष्टिकर चास्तु ममाप्यव्याहत सुसम् ।।२। अगस्तिरग्निबंडवानल भुक्तं मयान्न जरयत्लशेपम् । सुख च मे तत्परिणामसम्भव पच्छन्वरोगो मम चास्तु देहे । विष्णुस्समस्तेन्द्रियदेहदेही प्रधानभूतो भगवान्ययक, । सत्येन तेनात्तमशेषमनमारोग्यद मे परिणाममेतु १६४ विष्णुरता तयवान्न परिणामश्व वै तया । सत्येन तेन मद्भक्तजीयंत्वन्नमिद तथा 1९५१ इत्युच्चार्य स्वहस्तेन परिमृज्य तयोदरम् । अनायासप्रदायीनि बुर्यात्वमण्यितन्द्रित. 181 सच्छाखादिविनोदेन सन्मार्गादविरोधिना। दिन नयेत्ततासन्ध्यामुपतिप्टेसमाहितः । यह अग्न मी प्राणापान, समान, उदान मोर ध्यान को पुष्ट घरे, जिप मुझे वापा रहित मुस मिल सो ।।६२१ मेरे मोदन दिये हुए सर्व पन्न पोमास्ति नामक पनि और बडवानल पाये, उसके परिणाम से नरलय
४३० ]
[ श्रीविष्णुपुराण
होने वाला सुख दें और उममै मेरे देह को प्रारोग्य पाम हो ।१३|| देह तथा
इन्द्रियादि के अधिष्ठाता केवल भगवान् श्रीहर ही प्रधान है, इम सत्य के प्रभाव
से मेरे भोजन का सत्र भन्न पककर मुझे प्रारोग्य लाम करावे 18 भोजन।
करने वाला, अन्न तथा उसका परिपाक-यह सब विष्णु ही हैं । इमी सत्य के
प्रभाव से मेरे भोजन दिये हुए इस अन्न का परिवार हो ॥६॥ इस प्रकार
कहकर अपने पेट पर हाथ फेरे और पान पूर्वक अधिक प्रम उत्पल न करने
वाले कार्यों को करने लगे ॥६- दिवस का शेप पाल सत् सास्को के देखने
तथा ष्ट मार्ग से विरोध करने वाले विनोदो में बितावे और सायकाल में
यत्नपूर्वक सध्योपासन करे ।।१७॥
दिनान्तसन्ध्या सूर्येण पूर्वमृक्षर्युता बुधः ।
उपतिष्ठेद्यथात्याय्य सम्यगाचम्य पार्थिव (६ct
सर्वकालगुपरथान सन्ध्ययो पाथिवेप्यते।
अन्यन सूतवाशौचविभ्रमातुरभीतित ६६
सूर्येणाम्युदितो यश्च त्यक्त सूर्येण व स्वपन् ।
अन्यनातुरभावात्तु प्रायश्चित्ती भवेतर १००
तस्मादनुदिते सूर्य समुत्याय महीपते ।
उपतिष्ठेसरस्सन्ध्यामस्वपश्च दिनान्तजाम् ।१०११
उपतिष्टन्ति व सन्ध्या ये न पूर्वा न पश्चिमाम् ।
व्रजन्ति ते दुरात्मानस्तामित्र नरक नृप ।१०२१
पुन पाकमुपादाय सायमप्यवनीपते ।
वैश्वदेवनिमित्त वै पल्यमन्त वलि हरेत् ।१०६१
तत्रापि श्वपचादिभ्यस्तथैवासविसर्जनम् ।
अतिथि चागत तत्र स्वशक्तया पूजयेद् बुध १०४
है राजन् । सायकाल मे सूर्यास्त से पहिले पोर प्रा. काल मे तारों के
अस्त न होने से पूर्व विधिवत् प्राचमनादि करके सन्ध्योपासन करना चाहिये
intel यदि मूतक, मशीन, उन्माद, रोग या मयादि, मे से किसी प्रकार की
माधान हो तो नित्य प्रति हो सन्ध्योपासन मरना चाहिये || रोग की
[४३१ मृतीय अंग-य०११] अवस्था रे अतिरिक्त प्रौर कभी भी जो मनुष्य ग्रूप के उदयास्त काल में सीता रहता है, उसे प्रायश्चित का भागी होना होता है ।।१००1। इसलिये हे राजन ! गृहम्प पुरुष को सूर्योदय होने से पहिले ही उठार प्रातः कालीन सध्या करनी सायि, सायकालीन सध्या के समय भी मध्योपामन करे, गयन न करे॥१०॥ है राजन् । जो मनुष्य प्रातः कालीन और सायलीन मध्यावदन से विरत रहते हैं, उन दुरात्मानों को अन्धतामिम नरव को प्राप्ति होती है ॥१०॥ फिर सायकाल म परिपत किर अन्न से गृहिणी मन्त्रहीन बलिवश्वदेव करे ॥१०३३॥ उम समय भी स्वपचादि तो मन्त दे और ग्रागत प्रतिथि का गी अपनी गति पर पूजन करे ।।१०४॥ पादशौचामनप्रह्वम्वागतोक्त्या च पूजनम् । ततश्चानप्रदानेन शयनेन च पार्थिव ।१०। दिवातिथी तु विमुखे गते यत्पातकं नृप । तदेवाष्टगुण पुसम्सूर्योढे विमुसे यते ।१०६। ' तस्मात्स्वयक्त्या राजेन्द्र सूर्योटमतिथि नर । पूजयेत्पूजिते तम्मिन्पूजितास्सर्वदेवता. १०७। । अन्नगाकाम्बुदानेन स्वशक्त्या पूजयेत्पुमान् । पयनप्रस्तरमहीप्रदानैरथवापि तम् ।१०८) मृतपादादिशौचस्तु भुक्त्वा साय ततो गृही। गच्छेच्टय्यामस्फुटितामपि दारुमयो नृप ।१०६॥ नादिगाना न भग्ना नासमा मलिना न च । न च जन्तुमयी शय्यामधितिप्टेदनाम्तृताम् ।११०॥ प्राच्या दिगि शिरदमस्त याम्यायामय वा नृप ।। सदैव स्वपसः पुसो विपरीत तु रोगदम् ॥११॥ हे गजन् । प्रनिधि सतार मै प्रपम पग-पक्षालन, मामन दान, स्वागत सूचर विनीत वचन, गोटन तपासण्या प्रादि की व्यवस्था परना उचित है है न जो पाप दिन में प्रायै हुए अनियि रे सौरने से होता है, उमगे मर गुण पार मूर्यास्त के समय भार हुए भनियि के विमुस चले जाने से होत है ।।१०६॥ श्चतिर मूर्यास्त कार मे माये हुए मतिथि रा पवश्य ही हि ४३२ ] [ श्रीविष्णुपुराण भर सत्कार करना चाहिये, पोवि उगवा पूषन होन। सभी देवरया बा पूजन निहित है Item जित प्रकार हो सके भोजन के लिये धन्न, IIT अपया जल ही दे, दायन के लिये शय्या न हो तो पाम पूम विधा दे ययया भूमि ही बता दे । तात्पर्य यह है rि ययाशक्ति उममा गरगर बरे ॥१॥ हे राजन ! फिर वह गृहस्य सायकालीन भोजन परे और हापसाव पोकर छिद्रादि से रहित काटमयी पापा पर शयन बरे १०६॥ ऐमी च्या पर पायन न करे जो बहुत बडी ऊँची-नीची, टूटी अथवा मैली हो या उसमें जीव भरे हों ॥११०।। शयन के समय पूर्व अथवा दक्षिण की और सिर रखें, अन्य दिशानी में सिर रखना रोग उत्पन्न करने पाला होता है ।।१११) भतायुपगमश्गस्तास्वपल्यामवनीपते । पुनामः शुभे वाले ज्येष्धायुग्मासु रामिषु ।११२। ना ना तु दिय गच्छेन्नातुरा न रजस्वलाम् । नानिष्ट न प्रकुपिता न अस्ता न च गभिणीम् ११३। नादक्षिणा नान्यकामा नाकामा नान्ययोपितम् । शुत्क्षामा नातिभुक्ता वा स्वय चभिर्गुगर्मुत १११४॥ स्नातस्नग्गन्धधृतप्रोतो नामात झुधितोऽपि वा । सवामस्सानुरागश्च व्यवाय पुरुषो व्रजेत् ॥११॥ चतुर्दश्यष्टमी चैव तथामा चाथ पूणिमा । पर्वाप्येतानि राजेन्द्र रविसमान्तिरेव च ।११६. तैलसीमाससम्भोगी सर्वेष्वेतेषु वै पुमान् । विभूत्रभोजन नाम प्रयाति नरक मृत १११७॥ अशेषपर्वस्वेतेषु तस्मात्सयमिभिर्बुध । भाव्य सञ्छाखदेदेज्याध्यानजप्यपरैर्नरै ११८ है राजन् । मृतुकाल को प्राप्त हुई अपनी ही भार्या से समागम करे। पुल्लिग नक्षत्र मे, युरम रात्रियो मे बहुत रात गये तथा भेट समय देख कर ही नारी से सगति करे ।।११२प्रसन्न मन वाली, रोगिणी, रजस्वला, मभिलाषा-हीन क्रोधमयो, दुखिनी या गर्भवती के साथ समति उचित नहीं तृतीय अंग-अ० ११ ] [ ४३३ है ।।११।। जो सरल स्वभाव की न हो, अभिलापा-हीन या दूसरे पुरष की कामना पाली हो, भूख से व्याकुल या अधिक भोजन किये हुए हो ऐसी पत्नी अथवा परस्त्री से गमन योग्य नहीं हैं । यदि अपने में भी इन दोपों की स्थिति हो तो उस दशा में भी सगति नहीं करनी चाहिये ॥११४॥ स्नान करके पुष्प- माला तथा गध लेपनादि से युक्त होकर काम और अनुराग के सहित स्त्री के पाय जाय और अतिभोजन करके अथवा भूखा रहने की अवस्था मे सगति न करे ॥११५॥ हे नृपेन्द्र ! चोदश, अष्टमी, अमावस, पूरिखमा तथा सूर्य की संक्रान्ति-यह मद पर्व-दिवम हैं ॥११॥ इनमे तल-मर्दन और नारी-संयोग मृत्यु के अनन्तर मन-मुत्र युक्त नरक की प्राप्ति कराने वाला है ॥११७।। विद्वान को पुरुषो इन सभी पर्व-दिनों में संयम पूर्वक सत्-शास्त्रो का अध्यन, देव- वदन, यज्ञानुशन, जप और ध्यानादि कार्य करने चाहिये ॥११॥ नान्ययोनावयोनौ वा नोपयुक्तोपवस्तथा । द्विजदेवगुरूणां च व्यवायी नाश्रमे भवेत् ॥११॥ चैत्यचत्वरतीर्थेपु नैव गोप्ठे चतुप्पथे । नव श्मशानोपवने सलिलेपु महीपते ।१२० प्रोक्तपर्वस्वशेपेषु नैव भूपाल सन्ध्ययोः । गच्छेद्वयवायं मतिमान्न मंत्रोच्चारपीडितः ।१२। पर्वस्वभिगमोऽधन्यो दिवा पापप्रदो नृप । भुवि रोगावहो नृणामप्रशस्तो जलाशये ।१२२॥ परदारान गच्छेच मनसापि कथञ्चन । किमु वाचास्थिवन्धोऽपि नास्ति तेषु व्यवायिनाम् ।१२३॥ मृतो नरकमभ्येति होयतेऽवापि चायुपः । परदाररतिः पुमामिह चामुत्र भीतिदा ।१२४॥ इति मत्वा स्वदारेषु ऋतुमत्सु बुधो व्रजेत् । यथोक्तदोपहीनेषु सकामेप्वनृतावपि ॥१२॥ गौ, वारी पादि मिष्य योनि मोर अयोनि से समागम न करे । भौधि प्रयोग द्वारा भी यह कार्य बनिन है तथा ब्राह्मण, देवता या गुरु के प्राधम भी ४३४ ] { श्रीविष्णुगुगरण भी संगति करो पा निषेष है ११ घरप वृक्ष पे नीचे, पाँगुन, तीर्थ, पशुशाला, चौराहा, इमशान उपवन और जल भी नारी-मग के लिये निपिद कहे है ।।१२०। पहिले कहे हुए सभी पर्व-दिवसो में, प्रातः प्रथवा गाय समय या मल-मूत्र का वेग होने की स्थिति में भी मपुर-कर्म गित है ॥१२॥ हे राजन् ! पर्व दिनो का नारी-सग धन को नए वरने वाला है, दिन का मधुन पाप फल का देने वाला है, पृथ्वी पर मधुन कर्म रोग-प्रद है तथा जल में किया गया प्रसग भमगल जनक है ।।१२२॥ पर-नारी से तो पाणी पा मग से भी सग न करे, क्योकि ऐसा मंधुन मस्थि-बधन विहीन अर्थात् अस्थिहीन शरीर- फोटादि की योनि प्राप्त कराने वाला होता है ॥१२३।। परनारी में पाक्ति इहलोक मोर परलोक दोनो स्थानो पर भयावह होती है । इहलोर मे पाय का हास और परलोक में नरक की प्राप्ति होती है ।।१२४॥ ऐसा समझ कर मति- मान पुस्प अपनी ही स्त्री से ऋतुकाल मे सग करे और यदि frसी समय विशेष मन हो तो विना ऋतुकाल के भा स्वनारी-पयोग में प्रवृत्त हो ॥१२५।। वारहवाँ अध्याय देवगोब्राह्मणान्सिद्धान्वृद्धाचार्यास्तथाचं येत् । द्विकाल च नमेसन्ध्यामग्नीनुपचरेत्तया ।११ सदानुपहते वस्त्रे प्रशस्ताश्च महौषधी । गारुडानि च रत्नानि विभृयात्प्रयतो नर ।। प्रस्निग्धामलकेशन सुगन्यश्चारुवेपवृक् । सितास्सुमनसो हृद्या विभृयाच नरस्सदा ॥३॥ विचित्परस्व ग हरेनाल्पमप्यप्रिय वदेत् । प्रिय च नानृत बयानान्यदोषानुदीरयेत् ।।। नान्यत्रिय तथा पर रोचयेत्सुरुषर्षभ । न दुष्ट यानमारोहेवलच्छाया न सश्रयेत् ॥
[ ४३५ तृतोय अश-अ० १२ ] विद्विष्टपतितोन्मतवहुवरादिकीटक। वन्धको बन्धकी भर्तु क्षुद्रानृतकथमह ।। तयातिव्ययशीलन परिवादरताठ । बुधो मैत्री न कुर्वीत नैक पन्यानमाधयेत् ।। मत्र ने कहा-गृहम्य मनुष्य प्रतिदिन देवता गो ब्राह्मण, सिद्धगण, गुरुज्न भोर माचार्य का पूजन करे त्या दोना ममय सध्योपासन और अग्निहोत्रादि कर ॥१॥ सयम पूर्वक रहे विद्रहीन दो वस्त्र, ग्रेट पोपपियाँ दया गारुड रत्न को धारण करे ॥२॥ अपने बालो को स्वच्छ और निक्ने रखे, मुगन्धमय वेशभूषा और मनोहर श्वेत-पुषों को धारण कर ||३|| किसी के विचिन् माय घन का भी अपहरण मा म्दप रूप में भी अप्रिय भाषण न करे। मिथ्या वचन प्रिय हो तो भी न बोले और परदोषों को किसी मे न पहे ।।४।। परतारी में प्रीति न करे, सिी क माय वैर घरन म रवि न रने, निदित मदारी में न बैठे और नदी तट की छाया ना कभी प्राधय न ल ॥५॥ बुद्धिमान पुरुष को उचित है कि वह लोकनिन्दित, पतित, उन्मत, बहुतों के वैरी या दूसरों को पौडिन वरनं याने पुरूषो से तथा कुलटा, कुलता के पति, मिथ्याभाषी मत्य व व्यय करने वाल, परनिन्दा म रचि रवन बात मौर दुष्टी य साय कभी मित्रता न करे। निर्जन मागम कभी प्रवेना न चन ॥६-७0- नावगाहेज्जलौघस्व वेगमने नरेश्वर । प्रदोन वेश्म न विरोनारोहेच्छिवर तरो ।। न कुर्याद्दन्तसङ्घर्ष कुण्णीयाच न नामिनाम् । नानवृतमुमो जम्भेच्छ्वामवासी विसर्जयेत् ।। नोच्च सेन्नगन्द च न मुन्नेत्पवन बुध । नपान मादयेच्छिन्द्यान तृण न मही लियेन् ।१० नम्मा मायेलोप्ट न मृदनीयाद्विचजण । ज्योतीप्यमेध्यगम्नानि नाभिपीक्षेन च प्रभो ॥११॥ नग्ना परखिय चंच मूर्य चास्तमयोदये । न हुइ.बुर्याच्छय गन्ध गवगन्धो हि सोमज.१२॥ 7 .
४३६ ] [ श्रीविष्णुपुराण चतुप्पथं चैत्यतरूमशानोपवनानि च । दुष्टस्त्रीसग्निपं च वर्जयेग्निशि सर्वदा ।१३॥ पूज्यदेवहिजज्योतिश्छाया नातिकमेवुध । नेवारशून्याटवी गच्येत्तथा शून्यगृहे वसेत् ॥१४॥ है नरेश्वर । जल प्रवाह के वैग के सामने से भी स्नान न परे, जलते हुए घर में कभी न घुमे तथा वृक्ष के शिखर पर भी न चढ़े दातो का मापस मे पण नवरे, नासिका वो न पुरेदे । बन्द मुह से जमुहाई सेना, खासना मा स्वास छोडना वर्जित है ।।६।। जोर से न हमे, प्रधोवायु का हाब्द सहित त्याग न करे, नखो को न चबावे, तिनका न तोडे तथा भूमि पर न लिखे ।।१०॥ भूध-दाढी के बालो को भी न चबावे, दो हेलो को परस्पर में न पिसे, तथा निन्दित और अशुद्ध नक्षयो का दर्शन न परे ॥११॥ नग्नावस्था वाली परनारी को न देखे, उदय या प्रस्त होते हुए सूर्य के दर्शन न करे, शब या शव की गन्ध से घृणा न करे, क्योकि शब-गन्ध चन्द्रमा का प्रश है ।।१२॥ चोराहा, अत्यवृक्ष, श्मशान, उपपन तथा दुष्टा स्त्री की निकटता- इन सब को रात्रिकाल मे त्याग दे ॥१३॥ अपने पूजनीय देवता, ब्राह्मण और ज्योतिपो की छाया को कभी भी न लांघे तथा सूने जगल या सूने घर मे भी प्रकेला न रहे ।।१४।। केशा स्थिकण्टकामेध्यबलिभस्मतुपास्तथा । स्नानाधरणी चैव दूरत. परिवर्जयेत् ॥१५॥ नानार्यानाश्रयेत्काश्चिन्न जिह्यं रोचयेद् बुध. । उपसर्पन व व्याल चिर तिष्ठेन्न वोस्थित ।१६। अतीव जागरस्वप्ने तद्वत्स्नानासने बुध । न सेवेत तथा शय्या व्यायाम च नरेश्वर ॥१७ दष्ट्रिणशृङ्गिणश्चैव प्राशो दूरेण वर्जयेत् । अवश्याय व राजेन्द्र पुरोवातातपो तथा ।१८। न स्नायान स्वपेनग्नो न चैवोपस्पृशे बुधः । मुक्तकेशश्च नाचामेद्दवाद्याची च वजयेद (१६१ [९० तृतीय अंग-अ० १२] होमदेवार्चनाचानु क्रियास्वाचमने तया। नकवन. प्रवतत द्विजवाचनिक जप १२० नासमक्षसशीलस्तु सहासोत क्यञ्चन। सद्वृत्तसन्निक्यों हि क्षणामपि शस्मते २० वेश, अम्थि, पाटे, प्रशुद्ध दस्तु, दलि, मम्म, तुप और स्वान से गीली हुई भूमि को दूर से ही साग दे ॥१५॥ अनार्य पुरप माग और पुटिन मनुष्य मे प्रासक्ति न करे, मां के समीप में न पाय और नौद सुलने पर देर वक न लेटे ॥१६॥ जागने, सोने, स्नान स्ने, बैठने, शम्या पर लेटने मोर व्यायाम करने में अधिक देर न लगा ॥१७॥ दांत और सींग वाले पामों को, मोस को, सामने की वायु को और धूप को सर्वथा छोड दे ॥१८॥ नगा होकर स्नान, शयन मोर माचमन न करे और बालो को खोल कर मारमन या देव- पूजन ही करे ॥१३॥ हवन, देव-पूजन, माचमन, पुण्याह्वाचन पोर जप मे एक वस्त्र धारण पूर्वक ही प्रवृत्त न हो ॥२०॥ सुसम हदप पुरुषों का कभी साप न करे । सदाचारी पुरुषो का सदा साय करे, क्योकि ऐसे मनुष्यों के साप तो माघे क्षण रहना भी प्रसनीय है ॥२१॥ विरोधं नोत्तमैर्गच्छेन्नाधमैश्च मदा दुधः। विवाहन्ध विवादश्च तुल्यगील पेप्यते ॥२२॥ नारभेत कलि प्राजस्मुक्वैर च वर्जयेत् । अप्पम्पहानिम्मोटव्या वरेणार्यागम त्यजेत् ॥२३॥ स्नातो नाङ्गानि सम्भास्नानगाझ्या न पाणिना। न च निधूनयेत्रमानाचामेव चोरियतः॥२४॥ पादेन नाकमेसाद न पूज्याभिमुख नयेत् । नोचासन गुरोर भजेताविनयान्वितः १२५॥ अपमन्यं न गच्छेदु देवागारचतुप्पयान् । माङ्गल्यपूज्याश्च तया विपरीतान दक्षिणम् १२६! सोमाग्न्यिम्बुवाचूना पूज्याना च न सम्मुखम् । दुनिष्ठीयविमूनममुमन च पण्डित १२ [ श्रीविष्णुपुराणा तिष्ठन मूलवेत्तरपथिप्यपि न भूपयेत् ।' इलेप्मविण्मूचरक्तानि सर्वदेव न लड़येत् ॥२८॥ श्रेष्ठ अथवा नाच पूरपो स कभा विराध न कर, क्योरि विवाद और विवाह - यह दानो ही कार्य समान पुरपा से करने उचित हैं ॥२२॥ सह की वृद्धि न पर, व्यथ का वर हो तो उसे भी छोड दे। यदि थोड़ी सी हानि उठाने पर भी वैर को समगि होती हो तो उसम पूपे नही ॥२३॥ स्नान करम स्नान से भीगी हुई धोती या हाय पे देह को न पोर खड़े खडे ही बाला योन झाडे पोर न प्राधमन ही कर ॥२४॥ पर पर पर न रख, गुरजनों के सामने पाय न पमारे तथा उनके सामने उनासन पर कभी न चंठे ॥२५।। देव मदिर, ४ चौराहा मगिलिक द्रध्य और पूज्य पुरुष इनको वाय रख कर न निकले तथा इनके विपरीतों को दीये पोर रख कर न चले ॥२६॥ च द्रमा, सूथ अनि जल, वायु और पूज्य व्यक्तियो के समक्ष न यूवे और न मल मूत्र विसजन परे ॥२॥ माग मे या खडे होकर मून यार न कर और कफ, मल, मूत्र तथा रुधिरं को न तापे ॥२८॥ श्लेष्मशिधारिणकोत्सर्गों नान्नकाले प्रशस्यते। बलिमङ्गलजप्यादौ न होमे न महाजने ।२६। योपितो नावमन्येत न चासा विश्वसेद् बुध । न चैवेर्ध्या भवेत्तासु न धिक्कुत्किदाचन ॥३०॥ गगल्यपुष्परलाज्यपूज्यानन भिवाय च । न निष्कमेद् गृहात्याज्ञस्सदाचारपरो नर ॥३१॥ चतुष्पथानमस्कुर्यात्वाले होमपरो भवेत् । दीनानभ्युद्धरेत्साधूनुपासीत वहुश्रुतात् ॥३२॥ देवर्तिपूजक्स्सम्यविपतृपिण्डोदकप्रद । सत्र्ता चातिथीना य स लोकानुत्तमान्द्रजेत् १३३१ हित मित प्रिय वाले वश्यात्मा योऽभिभापते। स याति लोकानाह्वादहेतुभूतान्नृपाक्षयान् १३४) धीमान्हीमान्क्षमायुक्तो ह्यास्तिको विनयान्वित । विद्याभिजन वृद्धाना याति लोबाननुत्तमान् ।३५१ तृतोय अश-अ० १२ ] [ ४३६ भोजन, देव-पूजन, मागनिक कार्य और जप होपादि के समय या पर पुरषों के समक्ष बना, धीरना प्रादि मन करे ॥२६॥ स्त्रियों का अपमान, उनमे ईपा, उनका विश्वास न करें और न उन्हें निन्दित ही करे ॥३०॥ मागरिक द्रव्य, पुष्प, रत्न, घृत तथा पूज्य पुरुषों का अभिवादन किय विना बुद्धिमान जन प्रपन २२ से बाहर नहीं जात ३ मार्ग चला म चौराहा को नमस्कार बरे, समय हान पर हवन करे, दीनी का उद्धार करे पोर बहुश्रुत माधुयों की सति में रहे ॥३२॥ जो युरुष दवताप्रो और हपियों का पूजन, पितरों को पिण्डोदा-दान तथा प्रविधि वा मत्वार परता है दह पुण्यसो को प्राप्त होता है ॥३३॥ जो पुरुष इन्द्रियों को जीत कर समय के अनुसार हितकारी, प्रत और पिय वचन कहता है, वह प्राहार के तुभून प्रक्षय नोों म जाता है ॥३४॥ जो पुरुप बुद्धिमान, सज्जाबान्, आमाशन मास्तिक मौर विनयशीत होता है, यह विद्वान और कुलीन पुरपा के याग्य थे लोका को प्राप्त होता है ॥३॥ अकालगजितादौ च पर्वम्वागौचकादिषु। अनध्याय वुध कुर्यादुपरागादिक तथा १३६॥ गम नयति य मद्धान्मर्वबन्धुरमन्परा । भीताश्वासनत्माघुरदर्गस्तम्याल्पर फलम् ॥२७॥ वतिपादिपु ल्छनी दण्डो रायटवोपु च । गरीरसागवामो द मोपानकम्मा व्रजेत् ॥३॥ नोज़ न तियंदूर वा न पश्यन्पर्यटेद् बुध । युगमात्र महीपृष्ठ नगे गच्छेद्विलोक्यन् 1३६॥ दोपहतूमोपात्र वश्यात्मा यो निरम्यति । तस्य धमायंवामाना हानिनाल्पापि जायते ॥४०॥ सदाचाररत प्राना विद्याविनयमिक्षित । पापपपाप परपेयभिधत्ते प्रियाणिय। मैत्रोद्रवान्त करणस्तस्य मुक्ति करे स्थिता ।४ ये कामोधलोभाना वीतरागा न गोचरे। पदाचार्गम्यताम्नेषामनुभावता महीना ४४०] [ श्रीविष्पगुमुराए प्रससय में मेघ गर्जन कर रहे हों, पर्व-दिन हो पशोचवाल था चन्द- सूर्यग्रहण का अवसर हो, ऐसे समय मे बुद्धिमान पुाप को अध्ययर नहीं करना चाहिये ॥३६॥ जो पुरुष क्रोव में भरे हुए के क्रोय को शान्त करने वाला, डरे हुए को सान्त्वना देने वाला, मत्सरता-रहित, मभी का बन्धु एवं साधु स्वभाव है, उसके लिये तो मत्यल्प फल समझो ॥३७॥ देह-रक्षा को सामना पाले पुरुष को वर्षा या धूप के समय छाता धारण करना चाहिये, रात्रिकाल मे मथवा वन मे जाय तो हाथ मे दण्ड लेले और जन जहाँ कही भी जाना हो तो सदा जूते पहिन कर जाय ॥३८॥ ऊपर की प्रोर, इधर-उपर अथवा दूरस्थ पदार्थों को देखता हुमाग चले, केवल चार हाथ तक पृथ्वी को देखते हुए चलना चाहिये ॥३६॥ जो पुरुष इन्द्रियो को वश में करके दोप-प्राप्ति के सभी साधनो का त्याग करता है, उसके धर्म, पर्थ और काम का किचित मात्र भी क्षाय नही होता ।।४०।। जो पापी के प्रति भी पारमय व्यवहार में करनेवाला पुरुष विद्या, विनय, सदाचार और ज्ञान से सम्पन्न है तथा अपना अन्त'करण मित्रता से द्रवीभून रहने के कारण जो कुटिल पुरुषो से भी प्रिय भाषण करता हैं, मोक्ष सदा उसके हाथ मे स्थित रहती है ॥४२॥ जो रागादि से विरक्त हुए महापुरुष, काम, क्रोध और लोभादि के वश मे कभी न पड़ कर सदैव सदाचार में तत्पर रहते हैं, उन्ही के प्रभाव से यह पृथ्वी टिकी हुई है ॥४२॥ तस्मात्सत्य नदेवप्राज्ञो यत्परप्रीतिकारणम् । सत्यं यत्परदुःखाय तदा मौनपरो भवेत् ।४३! प्रियमुक्त हित नैतदिति मत्वा न तद्वदेत् । श्रेयस्तथ हित वाच्यं यद्यप्यत्यन्तमप्रियम् ॥४४॥ प्राणिनामुपकाराय यथवेह परत्र च । कर्मणा मनसा वाचा तदेव मतिमान्भजेत् ।४। इस प्रकार सभी ज्ञानी पुरुषो का कर्तव्य है कि वह उसी प्रसार का सत्य वोलें, जिसपे दूसरों को सुस मिले । यदि किसी सत्य दाश्य से दूसरो का माहित होता हो तो मौन रहना ही उचित है ।।४३.। यदि प्रिय वाक्य भी हितकारी न हो तो उसे भी न कहे, केदल हित करने वाले वाक्य ही कहे, चाहे तृतीय अंग-अ० १३ ] [४४१ वह प्रत्यन्त प्रिय ही क्यों न हो ॥४॥ बुद्धिमान् पुरुष को इहलोक और पग्लो में जिससे प्राणियों का हित मावन होता दी, उसी कार्य को प्रन, पचन भौर नर्म में करना चाहिये ॥४॥ RECER तेरहवाँ अध्याय मचलस्य पितुः स्नानं जाते पुन विधीयते । जातकर्म तदा कुर्याच्द्राद्धमन्युदये च यत् ।। युग्मान्देवाश्च पित्र्याय सम्यक्सव्यस्माद् द्विजान् । पूजयेद्भोजयेन्चंव तन्मना नान्यमानसः ।। दध्यक्षतस्मवदरः प्राट मुसोदन मुखोऽपि वा। देवतीर्थेन व पिण्डान्दद्यात्वायेन वा नृप ।। नान्दीमुखः पितृगणस्तेन श्राद्धन पार्थिव । प्रीयते तत्तु वर्तव्यं पुरुषस्गर्ववृद्धिपु ।। पन्यापुन विवाहेषु प्रवेशेषु च वेश्मनः । नामकर्म रिण यालाना चूडाकर्मादिक तया ॥५॥ सीमन्नोनयने चैव पुनादिमुपदर्मने। नान्दीमुमं पितृगण पूजयेत्प्रयतो गृही ।। पितृपूजाममः प्रोक्तो वृद्धावप सनातनः । यतामवनीपाल प्रेतरमनियाविधिः ।। मो ने कहा-पुत्र का जन्म होने पर रिना वस्त्रों के सहित स्नान करे पौर फिर बात पर ममार और प्रान्सुपित याद परे ॥१॥हिर सम्मचिनु होर देशलामी मोर पितरो के निमित्त प्रम: दावी पौर वीपी पीर दीदी मामलों को शिर उनका पूजन बरं मोर फिर उन्हें भोजन पराये ॥२॥ पूर्या- मिनुग या दनराभिनुस होकर दही, पात पौर बहरीन में निर्मित निरोगी देदा या प्रजापति यं रो दे ॥३इस प्राम्पुरपिता धार द्वारा नामो- [धीविष्णुपुराण मुख नामक पितरों को प्रसन्नता प्राप्त की जाती है । इसलिए सब प्रकार अभिवृद्धि के निमित इसका अनुष्ठान वरना उचित है ॥४॥ पुत्री या पुत्र के विवाह मे, नामकरण सस्तार म, नूडाकर्म म, गृह प्रवेश में, सीमन्तोलमन में और पुत्रादि का मुख देखने के समय गृहस्थ को एवान मन से नान्दीमुख पितरो की पूजा करनी चाहिए ॥५-६।। हे राजम् । प्राम्युदयिक श्राद्ध मे पितर- पूजन का यह सनातन क्रम मैंने तुमसे कहा है, अब प्रेत क्रिया की विधि कहता हूँ, उसे श्रवण करो ॥७॥ प्रेतदेह शुभै स्नानस्स्नापित स्रग्विभूषितम् । दावा ग्रामावहि स्नात्वा सचैलस्सलिलाशये ।। यत्र तत्र स्थितायैतदमुकायेति वादिन । दक्षिणाभिमुखा दधु वन्धिवास्सलिलालीन् ।। प्रविष्टाश्च सम गोभिराम नक्षनदर्शने । कटकर्म तत कुर्युर्भूमौ प्रस्तरशायिन ॥१०॥ दातव्योऽनुदिन पिण्ड प्रेताय भुवि पार्थिव । दिवा च भक्त भोक्तव्यममास मनुजर्षभ ।११॥ दिनानि तानि चेच्छात कर्तव्य विप्रभोजनम् । प्रेता यान्ति तथा तृप्ति बन्धुवर्गेण भुञ्जता ।१२। प्रथमेऽह्नि तृतीये च सप्तमे नवमे तथा। वस्त्रत्यागबहिस्स्नाने कृत्वा दद्यात्तिलोदकम् ॥१३॥ राव को भले प्रकार स्नान कराने के पश्चात् पुष्प मालामों से विभू- पित शव को ग्राम से बाहर लेजाकर दाह-सरकार करना चाहिए । फिर जला काय म वस्त्र सहित स्नान करके दक्षिण की ओर मुख करके 'यत्र तत्र स्थिता यंतदमुवाय'-इस वाक्य का उच्चारण करते हुए जलाञ्जलि देनी चाहिये 1- पिर गोधूलि काल मे जब तारा मण्डल दिखाई देने लगे, तब ग्राम में प्रवेश कर षटफर्म पर घास-फूस की शय्या पर, भूमि पर ही शयन करे ॥१०॥ मृत पुरुष के निमित्त नित्य प्रति पृथ्वी पर पिण्डदान करे और फेवल दिन के समय एक बार मौरा-रहित भात का भोजन परे ॥११॥ यदि प्रशोच, तृतीय अंश-अ० १३ ] [४४३ पाल में ब्राह्मण भोजन करना चाहें तो उन्हें भोजन करावे, पयोरि उस समय ग्राह्मण और वपुजन रे भोजन करन से जीव तृप्त होता है ॥१२॥ गौर के प्रथम दिन, तृतीय दिन, पातवें और नौवें दिन वस्त्र त्यापार बहिर्दय में स्नान करने के पक्षान् जिन जल देना चाहिये ॥१ चतुऽह्नि च पर्तव्य तस्यास्थिचयन नृप । वदुब्दमद्गमस्पर्धस्सपिण्डानामपीप्यते १० योग्यास्सर्वनियाणा तु समानमलिलास्तथा। अनुलेपनपुप्पादिभोगादन्यन पायिव ११५॥ शम्यामनौपभोगश्च सपिण्डानामपीप्यते । भस्मास्थिचयनादूचे सयोगो न तु योपिताम् ॥१६॥ चाले देशान्तरस्थे च पतिते च मुनी मृते । सद्यश्शीच तयेच्छातो जलाग्न्युटनानादिपु ॥१७॥ मृतवन्धौदंगाहानि कुलन्यान्न न भुज्यते । दान प्रतिग्रहो होम स्वाध्यायश्च नियतते 1१1 विप्रस्य॑तद् द्वादगाह राजन्यस्याप्यगोचकम् । अर्घमाम तु वैश्यस्य मासं यूद्रस्य शुद्धये ॥१॥ अयुजो भोजयेन्काम द्विजानन्ते ततो दिने । दद्यापु पिपट च प्रेतायोच्छिमनियो ।२०॥ चार्यायुषप्रतोदास्तु दण्डन द्विजभोजनात् । स्पदव्योऽनन्तर वर्ण गुरन्ते तत' क्रमाद ।२१॥ हे राजन् पिशौच के चौये दिन मृतारी मस्य सपित करे, उसके बाद पपने सपिएर संघदों का मन स्पांवर १४॥ उस समय से सपिराड पुरष पन्दन मोर पुष धारण मादिरिया तो नहीं कर सरते, परन्तु पर सब कम कर मरते है ।।११ माम मौर स्थि- स्चयन रेपमान गरिएर रनों पोपप्या पार पामन में उपयोग की छूट है, परनु स्त्री-परित है ॥१९पालक, दूघरे देश में स्पिन, पति और सपावी की यु होने परका बम में इमर, न कर पा पासी पारि समार पामपात ने पर ४४४ ] [ श्रीविष्णुपुराण मशीच शीघ्र ही दूर हो जाता है ॥१७॥ जिस कुटुम्ब मे मृत्यु हुई हो, उसका पन्न दस दिन तक भोजन न करे और प्रशौच काल दान, परिग्रह हवन, स्वाध्याय मादि भी न करे ॥१८॥ यह दम दिन का भशौच ग्राह्मण का रहा है, क्षत्रिय का भगौच बारह दिन का और वैश्य का पन्द्रह दिन का होता है तथा शूद्र को भशौच से निवृत्ति एक मास मे हाती है ॥१६11 अशौच को समाप्ति पर मयुग्म अर्थात ऊना (नौ, ग्यारह, तेरह) मादि सस्यक ब्राह्मणो वो भोजन करावे और उनकी जूठन के पास है प्रेत को तृप्ति के लिये बुम के पासन पर पिएड दे ॥२०॥ शुद्धि हो जाने पर तथा श्राह्मण भोजन होन के परचान प्राह्मणादि पारो वम को पहिले जल का, फिर इस का, फिर मोहा ना मौर पिर स्वरे मन्त लाठी का स्पर्श करना चाहिए ॥ १॥ ततस्स्ववर्णधर्मा ये विप्रादीनामुदाहता । तान्कुर्वीत पुमाडीवे मिजधर्मार्जनस्तथा ॥२२॥ मृतानि च वर्तव्यमेोद्दिष्टमत परम् । माहानादिनियादवनियोगरहित ति तत् ॥२३॥ योग्यस्तष दातव्यस्तवैरपवित्रयम् । प्रेनाय पिण्डो दातव्यो भुक्तवत्सु द्विजातिषु ।२४। प्रानन्ध ताभिरतियंजमादिजन्मताम।
तृतीय अंग-प्र० १३ ] [-४४५ ॥२५॥ इस प्रकार यह एकोद्दिष्ट कर्म एक वर्ष तक करना चाहिये। वर्ष के रामात होने पर सपिण्डीकरण (वी) करे, उसका विधान सुनो ॥२६॥ एकोद्दिष्टविधानेन कायं तदपि पार्थिव । सवत्सरेऽय पण्ठे वा मासे वा द्वादशेऽह्नि तत् ॥२७ निलगन्धोदक्युक्त तन पानचतुष्टयम् । पान प्रतस्य तक पैन पाननय तथा ।२८। सेच येपितृपानेषु प्रेतपान ततत्रिषु । तत पितृत्वमापन्ने तस्मिन्प्रेते महीपते ॥२६॥ थाद्धधर्मेरदोषस्तु तत्पूनानत्रयेपितृन् । पुन पौत्र प्रपौनो वा भ्राता वा भ्रातृसन्तति १३०१ सपिण्डसन्ततिर्वापि क्रिया) नृप जायते । तेषामभावे सर्वेपा समानोदकसन्तति ॥३१॥ मातृपक्षसपिण्डेन सम्बद्धा ये जलेन वा। कुलद्वयेऽपि चोच्छिन्ने स्त्रीभि काया किया नृप ।३२१ राहातान्तर्गतैर्वापि वार्या प्रेतस्य च क्रिया । उत्सम पन्धुरिस्थाद्वा कारयेदवनीपति १३३॥ यह सपिण्डीकरण वम भी एकोद्दिन श्राद्ध की विधि से एक वर्ष, छ मास अथवा बारह दिन के पश्चात् ही दिया जा सकता है ॥२७॥ इसमे तिल, गन्ध और जर सहित चार पात्र रखने चाहिए। इनम से एक पान मृत व्यक्ति का तथा तीन पात्र पितरा के होते हैं ॥२. फिर मृत व्यक्ति के पात्र में स्थित बलादे रो पितरो के पात्रो को मोंचे। इस प्रकार मृत व्यक्ति को पिनृत्य की प्राप्ति हो जाय, तव सभी श्राद्ध धमों के द्वारा प्रथम मृत व्यक्ति का और पिर पितरी का पूजन करे। अपने सपिण्ड में उत्पन पुस्प-पुत्र, पोत्र, भतीजा, प्रादि हो थानादि कर्म करने का अधिकारी होता है। यदि इनम से कोई न हो तो समानोदक (सगोष) को मलान या मा पा के सपिगड या रामानोदा इस कर्म की बरसाता है। यदि मातृकुन या पिल दोनो में से कोई भी न हो तो वो ही इस क्रिया को का मानी है ।।२९-३२॥ प्रपौत्र, नादा, ४४४ ] [ श्रीविष्णुपुराण प्रशौच शीघ्र ही दूर हो जाता है ॥१७॥ जिस कुटुम्ब मे मृत्यु हुई हो, उसका भन्न दस दिन तक भोजन न करे और अशीच काल मे, दान, परिग्रह, हवन, स्वाध्याय प्रादि भी न करे ॥१८॥ यह दम दिन का अशीच ब्राह्मण का कहा है, क्षत्रिय का अशीच वारह दिन का और वैश्य का पन्द्रह दिन का होता है तथा शूद्र की प्रशौच मे निवृत्ति एक मास मे होती है ॥१६॥ अशीच की समाप्ति पर अयुग्म अर्थात् ऊना (नौ, ग्यारह, तेरह) आदि सहयक ब्राह्मणों को भोजन करावे और उनकी जूठन के पास ही प्रेत की तृप्ति के लिये बुश के आसन पर पिएड दे ॥२०॥ शुद्धि हो जाने पर तथा ब्राह्मण भोजन होने के पश्चात् ब्राहाणादि चारो वण को पहिने जल का, फिर शस्त्र का, फिर कोडा का और फिर सबके अन्त लाठी का स्पर्श करना चाहिए ॥ १॥ ततस्स्ववर्णधर्मा ये विप्रादीनामुदाहृता । तान्कुर्वीत पुमाञ्जीवेनिजधर्मार्जनस्तथा ॥२२॥ मृताहनि च कर्तव्यमेको द्दिष्टमत परम् । आह्वानादिबियादैवनियोगरहित ह्वि तत् ।२।। एकोऽध्यस्तन दातव्यस्तथैवैक्पवित्रकम् । प्रेताय पिण्डो दातव्यो भुक्तवत्सु द्विजातिषु ।२४॥ प्रस्नश्च तनाभिरतिर्यजमानद्विजन्मनाम् । अक्षय्यममुनस्येति वक्तव्य विरतौ तथा ।२५ एकोद्दिष्टमयो धर्म इत्थमावत्सरात्स्मृत । सपिण्डीकरण तस्मिन्काले राजेन्द्र तच्छणु।२६। फिर ब्राह्मणादि के जो-जो वर्ण धर्म कहे हैं, उन्ही का प्राचरण करते हुए अजीविका का उपार्जन करे ।।२२।। इसके पश्चात् प्रतिमास मृतक की मृत्यु तिथि के दिन एकोद्दिष्ट याद करे, जो कि प्रावाहनादि क्रिया पौर विश्वेदेव सम्बन्धी धर्म से रहित हो ॥२३॥ उम समय एक अध्यं और एक पवित्रक दे। यदि बहुत से ग्राह्मण भोजन करें तो भी मृतक के लिए एक ही पिएर दे ॥२४॥ पिर यजमान द्वारा पूछे जाने पर ग्राहए 'प्रभिरताः स्म' हे मोर पिए दान की समाप्ति पर प्रमुक्स्य प्रक्षय्यम इत्यादि वाक्य का उच्चारण करें .
तृतीय अग-प्र० १३ ] [-४४५ ॥२५॥ इस प्रकार यह एकोद्दिष्ट कर्म एक वर्ष तक करना चाहिये। वप के समात होन पर सपिण्डीकरण (वर्षी) करे, उसका विधान सुनो ॥२॥ एकोद्दिष्टविधानेन कार्य तदपि पार्थिव । सवत्सरेऽथ षष्ठे वा मासे वा द्वादशेऽह्नि तत् ।२७। तिलगन्धोदकर्युक्त तन पात्रचतुष्टयम् । पार प्रतस्य तक पत्र पाननय तथा ॥२॥ सेचयपितृपानेषु प्रेतपान ततत्रिपु । तत पितृत्वमापन्ने तस्मिन्प्रेते महीपते ।२६। श्राद्धधमरशेपैस्तु तत्पूनानचयत्पितॄन् । पुन पौन प्रपौनो वा भ्राता वा भ्रातृसन्तति ॥३०॥ सपिण्डसन्ततिर्वापि निया) नृप जायते । तेषामभावे सर्वेपा समानोदकसन्तति ॥३॥ मातृपक्षस पिण्डेन सम्बद्धा य जलेन वा। कुलद्वयेऽपि चोच्छिन्ने खीभि काया क्रिया नृप ।३२॥ सङ्घातान्तर्गतैर्वापि कार्या प्रेतस्य च क्रिया । उत्सन पन्धुरिक्याद्वा कारयेदवनीपति ।३३। यह सपिण्डीकरण यम भी एकोद्दिन याद की विधि से एक वर्ष, छ मास अथवा बारह दिन के पश्चात् ही किया जा सकता है ॥२७॥ इसमे तिन, गन्ध और जन सहित चार पात्र रखने चाहिए। इनमें से एक पात्र मृत व्यक्ति या तथा तीन पात्र पितरा के होते हैं ॥२॥ पिर मृत व्यक्ति के पात्र म स्थित जलाद रो पितरो के पात्रो को गीने। इस प्रकार मृत व्यक्ति को पितृत्व की प्राप्ति हो जाय तव सभी श्राद्ध धर्मों के द्वारा प्रथम मृत व्यक्ति का और फिर पितरा का पूजन करे । अपने सपिएट मे उत्पन पुरप--पुत्र, पौत्र, प्रपौत्र, भ्राता, नतीजा, आदि ही श्राद्धादि कर्म करने का अधिकारी होता है। यदि इनमें से कोई न हो तो समानोदक (सगोत्र) की सत्नान या मातृ पक्ष के सपिण्ड या समानोदर इस कम को कर सकता है। यदि मातृात या पितृकुल दोनों में स कोई भी न हो तो स्त्री हो इस क्रिया को कर सकती है ।।२६३२॥ -
[ श्रीविष्णुपुराण
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स्त्री के प्रभाव में मृतक का कोई साथी करै। यदि उसका भी प्रभाव
हो तो राजा को ही गृतक के द्रव्य से उसका सब प्रेत कर्म करना
पाहिये ॥३३॥
पूर्वा किया मध्यमाश्च तथा चैवोत्तरा क्रिया ।
विप्रकारा क्रिया सर्वास्तासा भेद शृणुष्व मे ॥३४॥
आदाहवार्यायुधादिस्पर्शाधन्तास्तु या. क्रिया ।
ता पूर्वा मध्यमा मासि मास्येकोदृिष्टसज्ञिता १३५१
प्रेते पितृत्वमापन्ले सपिण्डीकरणादनु ।
क्रियन्ते या क्रिया पित्र्या प्रोच्यन्ते ता नृपोत्तरा १३६।
पितृमातृसपिण्डैस्तु समानस लिलस्तथा ।
सङ्घातान्तर्गतैर्वापि राज्ञा तद्धनहारिणा ॥३७॥
पूर्वा क्रियाश्च कर्तव्या पुनाद्य रेव चोत्तरा ।
दौहित्रैर्वा नृपश्रेष्ठ कार्यास्तत्तनयस्तथा ।३८॥
मृताहति च कर्तव्या स्त्रीणामप्युत्तरा किया ।
प्रतिसवरसर राजन्नेकोद्दिष्टविधानत ॥३६॥
तस्मादुत्तरसज्ञाया क्रियास्ता शृणु पार्थिव ।
यथा यथा च वर्तव्या विधिना येन चानप ४०१
प्रेत कर्म के तीन प्रकार हैं--पूब पर्म, मध्यम कम और उत्तर कर्म ।
इन सबके लक्षण पर यक हैं, उहे भी सुनो ॥३४॥ दाह सकार रो जस-
शस्त्रादि के स्पश तक जितने भी सस्वार हैं, वे सब पूर्व कर्म कहे गये हैं सपा
प्रतिमास किया जाने वाला एकोद्दिष्ट श्राद्ध मध्यम कर्म है ॥३५॥ रापिण्डीकरण
के बाद जब मृतक पितृव्य को प्राप्त हो जाता है, तब उसके प्रति रिये जाने
पाते सब उत्तर बम पहे जाते हैं ॥३६॥ माता, पिता, सपिएम, समा-
नोदर, सापी प्रथया उसा पनाधिकारी राजा-यह सब उसके पूर्व गर्म
परने में अधिकारी हो सकते हैं, परन्तु उत्तर कर्म पुत्र, दौहित्र या उनकी
सतान ही पर सकती है ॥३६-१८॥ हे रामन! स्त्रियों का उत्सर फर्म भी
प्रतिवप मृत्यु-दिवस पर एशोदिए थाट विधि से ही प्रवश्य पतंय है ॥९॥
तृतीय अंश-भ०१४ ] [४४७ इसलिये है निष्पाप । वे उत्तर क्रियाएं जिस-जिस व्यक्ति के द्वारा जिमबम विधान से करनी चाहिये, उन्हें भी यह ध्यान से यवण करो ॥४॥ चौदहवाँ अध्याय ब्रह्मन्द्ररुद्रनासत्यसूर्याग्निवमुमारुतान् । विश्वेदेवान्पितृगणान्वयासि मनुजात्पभून् ।११ सरीसृपानृपिगरणान्यच्चान्यद्भूतसज्ञितम् । थार्द्ध श्रद्धान्वित कुर्वन्प्रीपयत्यखिल जगत् ।। मासि मास्यसिते पक्षे पञ्चदश्या नरेश्वर । तथाष्टकासु कुर्वीत काम्यान्कालाञ्चगुप्त मे ।। श्राद्धाहमागत द्रव्य विशिष्टमय वा द्विजम् । श्राद्धं कुर्वीत विज्ञाय व्यतीपातेध्यने तथा।। विपुवे चापि सम्प्राप्ते ग्रहो शशिमूर्ययो । समस्तेष्वेव भूपाल राशिप्वः च गच्छति ।। नक्षनग्रहपीडासु दुष्टम्वप्नावलोकने । इच्छाश्राद्धानि कुर्वीत नवमस्यागमे तथा ।। अमावास्या यदा मैत्रविशाखास्वातियोगिनी । श्राद्ध पितृगणस्तृप्ति तथाप्नोत्यष्टवापिकीम 1७1 पौर ने कहा-श्रद्धा भाव से याद कर्म करने वाला मनुष्य ब्रह्मा, इन्द्र रुद्र, मश्विनीकुमार, सूर्य, अग्नि, वसुगण, मरद्गरप, विश्वेदेवा, पितरगण, पशी, मनुष्य, पशु सरीसृप, ऋषिगण, पौर भूतपण, प्रादि सम्पूर्ण विश्व को प्रसन्न करने में समर्थ होता है ॥१-२॥ हे राजन् । प्रत्येक महीने की प्रमावस और प्रष्टका (हिमन्त मौर शिशिर ऋतुमों के शुक्ल पक्ष की अष्टमी) पर थान करे । अब काम्य पाद्ध का समय रहता है, उसे मुनो ॥३॥ नव प्राद के योग्य कोई पदार्य घर मे माचे मयदा किसी विशिष्ट ब्राह्मण का मागमन हो या उत्त- ४४८ ] [श्रीविष्णुपुराण रायण अथवा दक्षिणायन का प्रारम्भ हो या व्यतीपात हो तब काम्य श्राद्ध को करे ॥४॥ विषुव सकाति, सूय च द्रग्रहण सूय का प्रत्येक राशि में प्रवेश होते समय, नक्षत्र या ग्रह के पीडित होने पर, दुस्वप्न देखने पर अथवा घर म नया नन्न पावे तब काम्य श्राद्ध करना उचित है ॥५६॥ जिस प्रमावस मे अनुराधा, विशाखा या स्वाति नक्षत्र का योग हो, उसमे श्राद्ध करने से पितरो की पाठ वप के लिए तृप्ति हो जाती है ॥७॥ अमावास्या यदा पुष्ये रौद्रे चर्खे पुनर्वसौ । द्वादशाब्द तथा तृप्ति प्रयान्ति पितरोऽचिता II वासवाजकपादः पितृणा तृप्तिमिच्छताम् । वारणे वाप्यमावास्या देवानामपि दुर्लभा !! नवस्वृक्षप्वमावास्या यदेतेष्ववनीपते । तदा हि तृप्तिद श्राद्ध पितृरणा शृणु चापरम् ॥१०॥ गीत सनत्कुमारेण यथैलाय महात्मने । पृच्छते पितृभक्ताय प्रश्रयावनताय च ॥११॥ वशाखमासस्य च या तृतीया नवम्यसौ कातिपशुक्लपक्ष । नभस्यमासस्य च कृष्णपक्ष त्रयोदशी पञ्चदशी च माघे ।१२। एता युगाद्या वथिता पुराणेवनन्तपुण्यास्तिथयश्चतस्र । उपप्लवे चन्द्रमसा रवश्च निप्वष्टवास्वप्ययाद्वये च ।१३. पानीयमप्यत्र तिविमिथ दद्यारिपतृभ्य प्रयतो मनुष्य । श्राद्ध कृत तेन समासहन रहस्यमेतस्पितरो वति ।१४। जिम प्रमावस्य में पुष्प पार्दा या पुनवसु सत्र का योग हो उसमे पूजित हुए पितर बारह वा तप तृप्त रहते हैं ।1८11 परतु धनिश, पूरभाद्रपक्ष पातभिषा नक्षत्र वासी प्रमावस पितरों को तृप्त करने वालों के लिये प्रत्य त दुनम है | जय प्रमावग इस नौ नक्षत्रो ये योग से सम्पन्न होती है तब जो पादरिया जाता है यह पितरों प रिय प्रत्यत सृशि देने पाता होता तृतीय अश-अ० १४ ] [४४३ श्री मनत्कुमार जी ने -वंशाल मुबल पक्ष की तोज, कातिक शुक्ला नौगों, भादौं कृष्ण रम और भाष पाम को प्रभावम-यह भार तिथियां पुरायो में 'युगाद्या' कही गरी हैं, यह अन्न्त पुष फर के देने वानी । चन्द्रग्रहण या सूर्यग्रहण के समय, तीन अपरामो म, उत्तरायण के या दक्षिणायन के प्रारम्भ मे जो पुग्प पितरों के निमित्त एकाप चित्त से तिलोदक देना है, वह उन्ह एक हजार वर्ष के लिये तृप्त कर देता है - इस परम रहस्य को स्वय पितरा न ही रहा है ।।१२-१४१) माघेऽमिते पञ्चदशी कदाचिदुपति योग यदि वारुणेन । सक्षेण कालस्स पर पितृणा न ह्यल्पपुण्यैर्नृप लभ्यतेश्मी । वाले घनिष्टा यदि नाम तस्मिन्भवेत्तु भूपाल तदा पितृभ्य । दत्त जलान्न प्रददाति तृसि वर्षायुत तत्कुलजर्मनुप्यै ॥१६॥ तत्रैव चेद्भाद्रपदा नु पूर्वा वाले यथावत्तियते पितृभ्य । श्राद्ध परा तृप्तिमुपेत्य तेन युग सहस्र पितरस्स्वपन्ति ।१७। गङ्गा शतदू यमुना विपाशा सरस्वती नैमिपगोती का। तनावगाडाचनमादरेण कृत्वा पितृणा दुरितानि हन्ति ।१८) गायन्ति चैतत्सितर कदानु वर्षांमघातृमिमवाप्प भूय । मापासिवान्ते शुभतीर्थतौयर्यास्याम तृप्ति तनयादिदत्त ११६॥ वित्त च वित्त च नृणा दिशुद्ध भत्तश्व काल कथितो विधिचा . पान,यथोक्त परमा च भक्ति या प्रयच्छन्त्यभिवान्छितानि यदि कमा सतभियानन माथी अमावस के दिन हो तो उस दिन frया जाने वाला याद पितरा को तृप्ति के लिये परमोत्कृष्ट काल थाना कहा है । जो अल पुण्य वाले पुष्प हैं, उनको ऐसा सुयोग प्राप्त नहीं होता ॥१५॥ यदि उरा माघ की अमावस मेनिश नक्षत्र का योग हो जाय, तो अपने ही दशोपन पुरुष द्वारा दिये गये अन्न जल स पितरगए दस हजार वर्ष राक को 'तृप्त रहते हैं ॥१६॥ पदि उस प्रभाव के साथ पूर्व भाद्रपद का योग हो जाय तव श्राद्ध करने से पितरों को परम तृप्ति-लाम होता है और वे एक हजार गुण तक सोते रहते हैं ॥१७॥ गया दातदू, यमुना, विपासा, सरस्वती और ४५० ] [ श्रीविष्णुपुराण नैमिषारण्य में स्थित गोमती में स्नान करके पितरों का मादर सहित पूजन करे तो मनुष्य उनके सभी पापो का नाश कर देता है ॥१६॥ पितरगण सदा ही गाते रहते हैं कि वर्षाकाल के मघा नक्षत्र ग तृप्त होकर फिर माघ की अमावस के दिन अपने वशजी की पुण्यतीर्थों घाली जलाअलि से हम कब तृप्त होंगे। ॥१९॥ चित्त को शुद्धि, पवित्र धन, प्रशस्तकाल, उपरोक्त विधि, पोग्य पात्र पौर परम भक्ति-यह सभी, मनुष्य को वाछित फल प्रदान करने वाले हैं ॥२०॥ पितृगीतान्तथैवान श्लोकास्ताञ्छणु पार्थिव । श्रुत्वा तथैव भवता भाव्य तनादृतात्मना ।२१॥ अपि धन्य कुले जायादस्माक मतिमानर । अकुर्वन्वित्तशाठ्य य पिण्डान्नो निर्व पिष्यति ।२२। रल वस्न महायान सर्वभोगादिक वसु । विभवे सति विप्रेभ्यो योऽस्मानुद्दिश्य दास्यति ।२३। अन्नेन वा यथाशक्त्या कालेऽस्मिन्भक्तिनम्रधी । भोजयिष्यति विप्रानयास्तन्मात्रविभवो नर ॥२४॥ असमर्थोऽन्नदानस्य धान्यमाम स्वशक्तित । प्रदास्यति द्विजानयेभ्य स्वल्पाल्पा वापि दक्षिणाम् ॥२५॥ तत्राप्यसामर्थ्ययुत कराग्रामस्थितास्तिलान् । प्रणम्य द्विजमुख्याय स्मैचिद्भप दास्यति ।२६। तिलस्सप्तादभिर्वापि समवेत जलालिम् । भक्तिनम्रस्समुद्दिश्य भुव्यस्माक प्रदास्यति ।२७। यत कुतश्चित्सम्प्राप्य गोभ्यो वामि गवाह्निकम् । अभावे प्रीणयन्नस्माञ्च्छद्धायुक्त प्रदास्यति ।२८। सर्वाभावे वन गत्वा कक्षमूलप्रदर्शक । सूर्यादिलोकपालानामिदमुच्चर्वदिष्यति ।२६। न मेऽस्ति वित न धन च नात्यच्छ्राद्धोपयोग्यस्वपितृनतोऽस्मि । तृप्यन्तु भक्त्या पितरो मयैतौ कृती भुजी वर्मनि मारतस्या३०॥ इत्येतपितृभिर्गीत भावाभाषप्रयोजनम् । य परोति कृत तेन थाद्ध भवति पार्थिव ।३११ [४५१ तृतीय अंश-अ० १५ ] हे राजन् ! अब तुम पितरों द्वारा गाये हुए कुछ लोगों को सुनो, जिन्हें सुन लेने पर वैसा ही माचरण करना उचित है ॥२१॥पा हमारे पदा में मोई ऐसा वुद्धिमान पौर घन्य पुरुष होगा जो घन-लोलुपता को त्याग कर हमारे निमित्त पिएड देगा ॥२॥ जो धन होने पर हमारे लिये द्राह्मणों को रत्न, वस्त्र, महायान या सर्व भोग सामग्री प्रदान करेगा ॥२३॥ या यदि केवल मन वस्त्र वाला होने पर श्राद्ध के समय विनम्रता पूर्वक प्रेट ब्राह्मणों को हमारे निमित्त मन का ही मोजन करायेगा ॥२४॥ अयवा मन्न देने में भी समर्थ न होने पर ब्राह्मणों को कच्चा घान्य भौर स्वल्प दक्षिणा ही दे सकेगा ॥२५॥ कदाचित् ऐसा भी करने योग्य न होगा तो फिमो ब्राह्मण थेट को एक मुट्ठी प्रदान करेगा ।।२६॥ यदि इसमे भी असमर्थ हो तो हमारे निमित्त भक्ति भाव से मुक्त हुए केवल सात-पाठ निलों के सहित बलाअलि हो देगा ॥२७॥ यदि ऐसा भी न कर सके तो कहीं से चारा लाकर श्रद्धा और प्रेम के सहित गो को भक्षण करायेगा ॥८॥ यदि इसका मिलना भी सभव न हो तो वन में जाकर अपनी बगल को दिखाता हुआ सूर्यादि लोकपालो से उच्च. स्वर मे मा कहेगा कि श्राद्ध-कर्म के योग्य मेरे पास न वित्त है, न पन है,'न कोई अन्य सामग्री ही है, इसलिये, मैं अपने पितरों को नमस्कार करता हूँ वे मेरी भक्ति से ही तृप्त हो आय । मैंने अपनी दोनो भुत्राएं आकाग की मोर ऊनी कर रही हैं ॥३०॥ प्रौद ने कहा है पार्थिव ! धन के होने या उसके अमाव में पितरों ने जो बताया है, उसके अनुकूल प्रावरण करने पर भी विधिवत् याद ही हो जाता है ॥३१॥ तिल ही पन्द्रहवाँ अध्याय ब्राह्मणान्भोजयेच्छा यद्गुणास्तानिवोध मे। त्रिणाचिकेतनि मधुत्रिसुपर्णप्पडङ्गवित् ॥१॥ वेदविच्छोवियो योगी तथा व ज्येष्ठमामगः । ऋत्विक्स्वने यदौहित्रजामातृश्वगुरास्तथा ।२।
४५२ ]
[ श्रीविष्णुपुराण
मातुलोऽथ तपोनिष्ठ पञ्चाग्न्यभिरतस्तथा।
शिष्यास्सम्बन्धिनश्चैव मातापितृरतश्च यः ।।
एतानियोजयेच्छ्राद्ध पूर्वोक्तान्प्रथमे नृप ।
ब्राह्मणान्पितृतुष्ट्यर्थमनुकल्पेष्वनन्तरान् ।४।
मित्रघ्र कुनखी क्लीवश्श्यावदन्तस्तथा द्विज ।
कन्यादूपयिता वह्निवेदोग्झरोमविक्यो ।।
अभिशस्तस्तथा स्तेन पिशुनो ग्रामपाजकः ।
भृतकाध्यापकस्तद्वद्भुतकाध्यापितश्च य. १६॥
परपूर्वापतिश्चैव मातापित्रोस्तथोझकः ।
वृपलीसूतिपोष्टा च वृपलीपतिरेव च ।।
तथा देवलकरचव श्राद्ध नाहंति केतनम् ।
प्रौद ने कहा-हे राजन् ! श्राद्ध के समय जैसे-जैसे गुण वाले ग्राहाणों
को भोजन पराना उचित है, उसे रहता हूँ, सुनो । त्रिणाचित, निमधु,
घिसुपणं, पहाङ्गविद, वेदवेत्ता, श्रोत्रिय, योगी, ज्येय-सामग, ऋत्विक, भानजा,
दोहिन, जामात, स्वसुर, मामा, तपस्वी, पंचाग्नि-निष्ठ, शिष्य, सम्बन्धी तथा
माता-पिता के प्रियजन-इन प्राह्मणो को पार में निमन्त्रित करे। इनमे से
पहिते रहे हुमो को पूर्व वर्ग में पौर पीछे बहे हुमो यो पितरो की सृप्ति वाले
पर्म में नियुक्त कर भोजन करावे ॥१४॥ मित्रपाती, विधानसी, पुसस्वहीन,
मलीन दात पाला, न्यागामी, पनि पोर वेद से हीन सोम-विक्रता
पोपनिन्दित, पोर, पिगुन व मं वाला, प्राम पुरोहित, येवन-भोगी मध्यापर,
पुनर्विवाहिता का पति, माता-पिता को त्याग देने वाला, पद की सन्तान पा
पासव, प्रमापा पति और देवता से जीविका चलाने याला ब्राह्मण याद मे
युलाने को प्रयोग्य है ॥५.८||
प्रथमेहि युपास्तायोप्रियादीनिमन्त्र येत् ।
पय येव तवंगा नियोगाम्पितृदयिकान् ।।
सत. पोधप्पवायादीनायारा सद्विजगह ।
मनमानी न पुर्यात दोगस्ना महानपण ॥१०॥
तृतीय अश-अ० १५ ] [ ४५३ श्राद्ध नियुक्तो भुक्त्वा वा भोजयित्वा नियुज्य च । व्यवायी रेतसो गर्ते मञ्चयत्यात्मनः पितृन् ।१॥ तस्मात्प्रयममनोक्तं द्विजाग्रयाणा निमन्त्रणम् । अभिमन्व्य द्विजानेवमागतान्भोजयेद्यतीन् ।१२। पादगीचादिना गेहमागतान्पूजयेद् द्विजान् । पवित्रपाणिरावान्तानामनेपूपवेशयेत् ॥१३॥ पितृणामयुजो युग्मान्देवानामिच्दया द्विजान् । देवानामेक्मेक वा पितृणा च नियोजयेत् ।१४। याद से पहिले दिन ही योत्रिय आदि ब्राह्मणो को निमविन करके उन्हें बता दे कि मापनो पितृ-याद्ध म और प्रापको विश्वेदेव-धाद्ध में नियुक्त करना है ॥ याद करने पाला पुरप और वे निमन्त्रित ब्राह्मण भी उस दिन क्रोनादि, नारी-सग या परिश्रम का कोई कार्य न परे, क्योकि याद मर्म में इसका अत्यन्तु दोष कहा है ॥१०॥धाद्ध मे निमन्त्रित होकर अथवा भोजन करके या याद्ध का निमन्त्रण देकर या भोजन कराकर जो नारी सग करता है, वह यपने पितरों को ही बोय-कुण्डी मे हुदाता है ॥१॥ इसलिये श्राद्ध के पहिले दिन यत्न पूर्वक उपरोक्त विशिष्ट गुण समत ब्राह्मणों को निमन्त्रण दे और पाद्ध के दिन यदि कोई अनिमन्त्रित सदाह्मण घर पर आ गंय, तो उन्हें भी भोजन करा दे ॥१२॥ पहिले उन ब्राह्मणो के चरण घोवे, फिर हाथ धोकर प्राचमन कराने के दाद उन्हें प्रासन प्रदान करे ॥१३॥ अपने सामथ्यं अनुसार पितरों के लिये प्रयुग्म (पांच, सात, नौ मादि) तथा देवतामो के लिये युग्म (दो, चार, छ प्रादि) ब्राह्मण युलावे अथवा दोनों के लिये एक- एक ब्राह्मण ही नियुक्त परे ॥१४॥ तया मातामहश्राद्धं वैश्वदेवसमन्वितम् । कुर्वीत भक्तिसम्पन्नस्तन्न वा वैश्वदैविकम् ॥१५॥ प्राड मुखान्भोजयेद्विप्रान्देवानामुभयात्मकान् । पितृमातामहाना च भोजयेच्चाप्युदड मुखान् ।१६।
. ४५४ ] [ श्रीविष्णुपुराण पृथक्तयोः केचिदाहु श्राद्धस्य करणं नृप । एकत्रकेन पाकेन वदन्त्यन्ये महर्पयः ॥१७॥ विष्टरार्थ कुशं दत्त्वा सम्पूज्या विधानतः । कुर्यादावाहनं प्राज्ञो देवाना तदनुज्ञया ।१८। यवाम्बुना च देवानां दद्यादयं विधान वित् । नग्गन्धधूपदीपाश्च तेभ्यो दद्याद्यथाविधि 1१६] पितृणामपसव्यं तत्सर्वमेवोपवल्पयेत् । ग्रनुज्ञा च ततः प्राप्य दत्त्वा दर्भान्द्विधाकृतान् ।२०। मन्त्रपूर्वं पितृणा तु कुर्याचावाहनं बुध.। तिलाम्बुना चाप्यसव्य दद्यादादिक नृप ।२१। इसी प्रकार वैश्वदेव के सहित मातामह (नाना) का श्राद्ध करमा चाहिए । अथवा पितृ-पक्ष और मातामह पक्ष दोनों के निमित्त एक श्राद्ध ही कर सकता ॥१५॥ देवपक्ष के प्राह्मणों को पूर्व ओर मुख करके बैठावे और पौर पितृ तथा मातामह पक्ष के ब्राह्मणो के उत्तराभिमुख बैठकर भोजन करावे ॥१६॥ हे राजन ! कोई महधि तो पितृ-पक्ष और मातामह पक्ष के श्राद्धो को पृथक्-पृथक करने का विधान करते हैं और किसी ने एक साथ तथा एक ही पाक मे करना ठीक बताया है ॥१७॥ पहिले प्रामन्त्रित ब्राह्मणो के लिए कुशा विछाकर फिर उनका अर्घ्यदानादि से पुत्रम करे और उनकी अनुमति प्राप्त भरके देवतामो का पावाहन करे ॥१८॥ फिर श्राद्ध विधि का ज्ञाता पुरुप जो मिले हुए जल से देवतामों को मध्यं दे पोर फिर धूप, दीप, गन्ध मौर पुष्पमालादि समर्पित करे ॥१९पितरो के निमित्त किये जाने वाले सथ उप- चार अपसव्य-भाव (दयि बन्धे पर जनेहु करके) से करने चाहिए। फिर ब्राह्मणो की अनुमति प्राप्त कर दो भागो में विभक्त कुशो का दान कर मन्त्रो- ध्चारण पूर्वक पितरो का मावाहन करे और मपसव्य रहबर ही तिलोदक से मध्यादि प्रदान परे ।।२०-२१॥ काले तत्रातिपि प्राप्तमन्नवाम नृपाध्वगम् । ग्राह्मणरम्यनुज्ञातः कामं तमपि भोजयेत् ।२२ .
तृतीय अंश-अ० १५]
[ ४५५
योगिनो विविध स्पर्नराणामुपकारिणः ।
भ्रमन्ति पृथिवीमेतामविज्ञातस्वरूपिण: १२३॥
तस्मादम्यर्चयेत्प्राप्तं श्राद्धकातेऽतिथि बुधः ।
श्राद्धक्रियाफलं हन्ति नरेन्द्रापूजितोऽतिथि. ॥२४॥
जुहुयाद्वयञ्जनक्षारवर्जमन्नं ततोऽनले ।
अनुज्ञातो द्विजस्तैस्तु विकृत्वः पुरुषर्षभ ।२५॥
अग्नये कन्यवाहाय स्वाहेत्यादौ नृपाहुतिः ।
सोमाय वै पितृमते दातव्या तदनन्तरम् ॥२६॥
वैवस्ताय चैवान्या तृतीया दीयते ततः ।
हुतावशिष्टमल्पान्नं विप्रपात्रेषु निर्वपेत् ॥२७॥
हे राजन् ! यदि उस काल कोई क्ष धानं मागं चलता हुघा व्यक्ति
प्रतियि रूप से प्रा पहुंचे तो ब्राह्मणो की अनुमति लेकर उसे भी भोजन कराना
चाहिए ॥२२॥ योकि बहुन से अज्ञात योगिगण जन-कल्याण की भावना से
विविय रूप में भूतल पर विचरण करते रहते हैं ॥२३॥ इसलिये विद्वान् मनुष्य
को श्राद्ध काल में अपने घर पर प्राये हुए अतिथि का अवश्य पूजन करना
पाहिए । वैसा न करने से वह विमुख हुमा अनियि समस्त श्राद्ध क्रिया को
विफल कर देता है ॥२४॥ हे राजन् ! फिर उन ब्राह्मणों की आशा से नमक
-हीन तथा शाक-रहित अन्न से अग्नि मे तीन माहुतियां प्रदान करे ॥२॥ उनमे
से 'अग्नये कव्यवाहाय स्वाहा' कहकर प्रथम, 'सोमाय पितृमते स्वाहा' कहकर
द्वितीय और 'देवावताय स्वाहा' कहकर तीसरी माहुति देनी चाहिए । फिर
हुतावशिष्ट अन्न में से योहा-थोड़ा सब बाहाणों के पात्रों में परोसे ॥२६-२७॥
ततोऽन्नं मृष्टमत्यर्यमभीष्टमतिसंस्कृतम् ।
दत्त्वा जुपध्वमिच्छातो वाच्यमेतदनिप्ठुरम् ॥२८॥
भोक्तव्य तैश्च तच्चित्तमौनिभिस्सुगुसैः सुखम् ।
अऋद्धयता चात्वरता देय तेनापि भक्तित.॥२९॥
रक्षोनमन्त्रपठन भूमेरास्तरण तिलैः ।
कृत्वा ध्येयास्स्वपितरस्त एव द्विजसत्तमाः ॥३०॥
४५६ ] [ श्रीविष्णुपुराण पिता पितामहश्चव तथैव प्रपितामहः । मम तृप्ति प्रयान्त्वद्य विप्रदेहेषु सस्थिता: ॥३१॥ पिता पितामहश्चैव तथैव प्रपितामहः । मम तृप्ति प्रयान्त्वद्य होमाप्यायितमूर्तय. ॥३२॥ पिता पितामहश्चव तथैव प्रपितामह. । तृप्ति प्रयान्तु पिण्डेन मया दत्तेन भूतले ॥३३॥ पिता पितामहश्चंय तथैव प्रपितामहः । तृमि प्रयान्तु मे भक्त्या मयैतत्समुदाहृतम् ।३४। मतामहस्तृप्तिमुपेतु तस्य तथा पिता तस्य पिता ततोऽन्य । विश्वे च देवा. परमा प्रयान्तु तृप्ति प्रणश्यन्तु च यातुधाना. । यज्ञेश्वरो हव्यसमस्तकव्यभोक्ताव्ययात्मा हरिरीश्वरोऽत्र । तत्सग्निधानादपयान्तु सद्यो रक्षास्यशेपाण्यसुराश्च सर्वे ॥३६॥ फिर भले प्रबार सिर किये हुए मधुर अन्न को इच्छानुसार सब ब्राह्मणो को परोस कर अत्यन्त मीठी वाणी से भोजन करने वो बहे ॥२८॥ ब्राह्मण भी उस भोजन को मन लगावर मौन धारण पूर्वक मुख से भोजन करें तथा यजमान भी क्रोध और शीघ्रता को त्याग कर भक्ति सहित उनके भोजन करते में परोसता रहे ॥२६॥ फिर रक्षोघ्न मन्त्र का पाठ करके श्राद्ध के स्थान पर तिल छिडके मोर उन ग्राह्मणो का पित रूप से इस प्रकार ध्यान परे ॥३०॥ इन ग्राहाणो ये देहो में प्रतिष्ठित हुए और मेरे पिता, पितामह और प्रपितामह पादि तृप्ति को प्राप्त हों ॥३१॥ होम के द्वारा मेरे पिता पितामह पौर प्रपिता- मह बलवान होते हुए तति को प्रास हो ॥३२॥ पृथिवी पर मैंने जो पिण्ड दिये है, उससे मेरे पिता, पितामह पोर प्रपितामह तृप्त हो ॥३३॥ मैंने भक्ति- भाव रो इस समय जो बुध निवेदन किया है, उसी पे द्वारा मेरे पिता, पिता- मह पौर प्रपितामह तृप्त हो ॥३४॥ मेरे नाना, नाना के पिता और उनके भी पिता तथा विश्वेदेवगण परम तृप्ति को प्राप्त हो तथा सभी रास न हो जाय ॥३५॥ रामस्त हव्य पथ्य के भोपा पर प्राथयारमा श्री हरि यही विरा. बमान हैं, इगलिये उनसी सन्निधि से सभी रासगगण और पारगण यहाँ से इसी रामय सामनरें ॥३६ तृतीय अश-प्र० १५ ] [४५७ तृप्तेप्येतेषु विकिरदन्न विप्रेषु भूतले। दद्यादाचमनार्थाय तेम्यो वारि सकृत्सकृत् ॥३७१ सुतृप्तस्तैरनुज्ञातस्सर्वेणान्नेन भूतले। सतिलेन तत पिण्डान्सम्यग्दद्यात्समाहित ३८। पितृतीर्थन सतिलेन तथव सलिलाञ्जलिम् । मातामहेभ्यस्तेनैव पिण्डास्तीर्थेन निर्वपेत् ॥३६॥ दक्षिणापु दर्भेषु पुप्पधूपादिपूजितम् । स्वपिने प्रथम पिण्ड दद्यादृच्छिष्टसन्निधौ ।४०॥ पितामहाय चैवान्य तत्पिने च तथापरम् । दर्भभूले लेपभुज प्रोगयेल्लेपघपणे ४११ पिण्डर्मातामहाम्तद्वद्गन्धमाल्यादिसयुत । पूजयित्वा द्विजानवारणा दद्याचाचमन तत ।।२। पितृम्य प्रथम भक्त्या तन्मनस्को नरेश्वर । सुस्वधेत्या गिपा युक्ता दद्याच्छक्त्या च दक्षिणाम् । दत्त्वा च दक्षिणा तेभ्यो वाचयेद्वश्वदेविकान् । प्रीयन्तामिह ये विश्वेदेवास्तेन इतीरयेत् ॥४४॥ तथेति चोक्त तैविप्र प्रार्थनीयास्तथाशिप । पश्चाद्विसर्जयेद्देवान्पूर्व पिन्यान्महीपते ।४५॥ फिर जब ब्राह्मण भोजन करलें तव पोडा सा अन लेकर पृथ्वी पर हाने पोर पाचमन के लिये उहें और एक बार जल दे ||१८|| तदतर प्रच्यो प्रकार से सन्तुष्ट हुए उन ब्राह्मणो की अनुमति से पृथिवी परमात पोर पोर तिल के पिराह दे ॥३॥ फिर पितृतीयं से तिनोदव को जलाञ्जलि दे। नाना मादि के निमित्त भी उसी पितृतीय से पिण्डदान मादि करना चाहिए ॥३६॥ ब्राह्मणों की जूठन के पास ही दक्षिण दिशा को मोर अग्न भाग करके पो पुश विद्यायै हो, उन पर प्रथम अपने पिता के निमित्त पुष्प घूरादि से पषित पिएर दे ॥४०॥ फिर एक पिण्ड पितामह के निमित्त मोर पश्चात् एक पिएड प्रपितामह के लिए दान करे । फिर मुश मूल में सगे पल को पोछ ४५८ [ श्रीविष्णुपुराणा कर लेपभोजी पितरों को तृप्ति करे ।।४।। इसी प्रकार गन्ध पुष्पमाल प्रादि से पूजित पिएडो से नाना मादि को तृप्त करे और ब्राह्मणों को पाचमन परावे ॥४२॥ फिर भक्ति भाव पूर्वक खडे होकर प्रथम पितृपक्ष के ब्राह्मणो से 'सुस्वधा' कहलाता हुमा पार्शीवाद प्राम करे और शाक्त भर दक्षिणा दे ॥४३॥ विश्वेदेव पक्ष के प्राह्मणो के पास जाकर त हे दक्षिणा दे और निवेदन करे कि विश्वदेवता प्रसन्न हो ॥४४॥ जब वे ब्राह्मण 'ऐसा ही हो' कह तब उनसे मार्शीवाद मांगे और पितृपक्ष के ब्राह्मणो को पहिले और देवपक्ष के ब्राह्मणो को उनके पश्चात् विदा करे ।।४।। मातामहानामप्येव सह देवै क्रम स्मृत । भोजने च स्वशक्त्या च दाने तद्वद्विसर्जने १४६। आपादशौचनात्पूर्वं कुर्याद्दे वद्विजन्मसु । विसर्जन तु प्रथम पत्रमातामहेषु वै ।४७। विसर्जयेत्प्रीतिवचस्सम्मान्याभ्यथितास्तत । निवर्तेताभ्यनुज्ञात आद्वार ताननुव्रजेत् ॥४८॥ ततस्तु वैश्वदेवाख्य कुर्यानित्यनिया वुध । भुजाच्चैव सम पूज्यभृत्यवन्धुभिरात्मन १४६) एव श्राद्ध बुध कुर्थापित्र्य मातामह तथा । श्राद्धं राप्यायिता दद्यु स्सर्वान्कामान्पितामहा १५० त्रीणि श्राद्ध पवित्राणि दौहिन कुतपस्तिला । रजतस्य कथा दान तथासङ्घीर्तनादिकम् ॥५१॥ वानि कुर्वता श्राद्ध क्रोधोऽध्वगमन त्वरा । भोक्तरप्यत्र राजेन्द्र प्रयमेतन शस्यते ।५२। विश्वेदेवास्सपित रस्तथा मातामहा नृप । वुल चाप्यायते पुसा सर्व श्राद्ध प्रकुर्वताम् ॥५३॥ सोमाधार पितृगणो योगाधाश्च चन्द्रमा । श्राद्ध योगिनियोगस्तु तस्माद्भूपाल शस्यते ॥५४॥ सहस्रस्यापि विप्राणा योगी चेत्पुरत स्थित । सन्भिोक्त स्तारयति यजमान तथा नृप ।५५।
तृतीय अश-अ० १६]
[
विश्वदेवतामों के सहित नाना पादि के बाद में भी ब्राह्मण भोजन, दान,
विसर्जनादि का यही क्रम कहा गया है ।।६॥ पितृपक्ष तया न नाश-दोनों
प्रकार के पाद्धो में पग-प्रशासनादि समी कम प्रथम देवपक्षीय ब्राह्मणों के
परे। परन्तु पितृपक्षीय या नानापक्षीय वाह्मणो को पहिले विदा
करे ॥४७॥ प्रीतिमय वचनो सहित सम्मान करते हुये उन ब्राह्मणो को
दिदा करे तथा उनके पीछे पौधे द्वार तक जाकर उनकी पाना होने पर
घर में लौट पावे ॥४८।। इसके पश्चात् वैश्वदेव नामक नित्य फर्म
करके अपने पूजनीय व्यक्तियो, बन्युजनो और भृत्यगणों के सहित भोजन करे
irrel इस प्रकार बुद्धिमान पुरुष को पितृ श्राद्ध पौर मातामह याद्ध का
अनुगन करना चाहिए । धान रो तृप्त हुए पितरगए सभी मभिलापामों के
पूर्व करने वाले हैं ॥५०॥ श्राद्ध के समय पुती का पुत्र, दिन का अठया मुहूर्त,
तिल, चांदी का दान तया उसकी बात कहना--यह सब पवित्र समझे जाते
हैं ॥५१॥ याद करने वाले को कोर करना, कहीं जाना पौर श्राद्ध कर्म में
उतावलापन करना वनित माना गया है और बाद में भोजन करने वालों की
भी उक्त तीनों पा निषिद्ध है ॥५२॥ हे नृप ! थाट फर्ता पुरुष से विश्वेदेव-
गण, पितरगण, नाना और कुटुम्बीजन-सभी प्रसन्न रहते हैं ॥५३॥ पितरी
का माघार चन्द्रमा मौर चन्द्रमा का माधार योग हैं, इसीलिए थाद्ध मे योगियों
का नियुक्त किया जाना अत्यन्त श्रेष्ठ है ॥५४॥ हे नृप । बाडमे भोजन करने
वाले एक हजार बाह्मणो के सामने यदि एक योगी हो, वो यह एक ही योगी
यजमान के सहित उन सबका उद्धार करने में समर्थ है ॥५५॥
सोलहवाँ अध्याय
हविप्यमत्स्यमासंस्तु शशस्य नकुलस्य च ।
सौररच्छागलोयरोरवैगंवयेन च ॥
औरभ्रगव्यत्र तया मासवृद्धघा पितामहा ।
प्रयान्ति तृप्ति मासैस्तु नित्य वाीणसामिपः॥२॥
४६० ]
[ थीविष्णुपुराण
खड्गमासमतीवात्र कालशाक तथा मधु ।
शास्तानि पर्मण्यत्यन्ततृप्तिदानि नरेश्वर ॥३॥
गयामुपेत्य य श्राद्ध करोति पृथिवीपते।
सफल तस्य तमन्म जायते पितृतुष्टिदम् ।४।
प्रशान्तिकास्सनीवाराश्श्यामाका द्विविधास्तथा।
वन्यौपधीप्रधानास्तु थाहाहाँ पुरुपर्षभ ।५।
यचा प्रियङ्गवो मुद्गा गोधूमा ब्रीह्यस्तिला ।
निष्पावा कोविदाराश्च सर्पपाश्वान शोभना ।६।
मोव ने कहा-हविष्यादि का भोजन करने से पितरो की एक मास
तक तृप्ति रहती है । श्राद्ध कर्म में काल शाक और मधु अत्यन्त प्रशस्त तथा
अधिकाधिक तृप्ति के देने वाले हैं ॥१३॥
हे राजन् । मकर मे जाकर श्राद्ध करने से मनुष का पितरो को तृत
करने वाला वह जीवन सफल होता है ।।४। देवधान्य, नीवार तथा सफेद या
काले के समा और प्रमुख प्रमुख वनौषधि श्राद्ध के लिए उपयुक्त मानी
गई हैं ॥५॥ जो, प्रियगु, मूग, गेहूं धान, तिल, मटर, कचनार तथा सरसो को
श्राद्ध में श्रेष्ट माना गया है।।६।।
अकृताग्रयण यच्च धान्यजात नरेश्वर ।
राजमापानणू श्चैव मसूराश्च विसर्जयेत् ।७।
अलावु गृञ्जन चैव पलाण्टु पिण्डमूलकम् ।
मान्धारकारम्बादिलवरणान्यौपराणि च ।।
प्रारक्ताश्चैव निर्यासा प्रत्यक्षलवणानि च ।
वज्यन्येितानि वै श्राद्ध यच्च वाचा न रास्यते ।।
नक्ताहृतमनुच्छिन्न तृप्यते न च यत्र गौ ।
दुर्गन्धि फैनिल चाम्बु थायोग्य न पार्थिव ।१०।
क्षीरमेशफाना यदीष्ट्रमाविक मेव च ।
मार्ग च माहिप चव वर्जयेच्छाद्धकर्मणि ॥११॥
तृतीय प्रा-१९ [४६१ पण्टापविद्धचाण्डालपापिपापण्डिरोगिभि । कृक्वाकुश्वनग्नश्च वानरग्राममूकर. १२१ उदक्याभूतकागोचिमृतहारैश्च वीक्षिते । थाद्धे सुरा न पितरो भुचते पुस्पर्षभ ।१३॥ बिनस गवान यन न हुमा हो वह अन, वडे छोटे उरद, मनूर, कासी. फ्ल, गाजर, प्याज, शलजम, शालि, धान्य का घाटा, उमर भूमि म उत्पन्न नमा, हीग प्रादि वस्तुएं तथा व अन्य पदार्थ, जिनका शास्त्रों में विशान नहीं है, सब याद म पत्रित है || ह राजन् । रात्रि कार में लाया हुमा बल, क्षुद्र जलाशय का प्रथवा जिसमे गौ भी तृन न हो सकती हो ऐसे गडे का जल पा पेन और दुर्गन्नमय जल श्राद्ध मे त्याज्य है ।।१०।। एक सुर पाले पगु ना, भेर, ऊँटनी या मृगी का तथा भैस का दूध भी श्राद्ध में उपयुक्त नहीं है ॥११॥ हे पुग्ष श्रेय । नपु सक, समाज-वहिप्कृत, चारडार, पातकी, पाखडी, रोगी, मुकुट, कुत्ता, बन्दर, ग्राम्य भूफर, नग्न पुरुप, रजस्वला स्रो, बन्म मरण के सूता या प्रयोच वाले मनुष्य तया शव उठाने वाले पुरुष-इनमें से किसी की दृष्टि पड जाय तो देवता या पितर कोई भी अपना भागधार में ग्रहण नहीं करते ।।१२-१३॥ तम्मात्परिथिते कुर्याच्छाद्ध श्रद्धासमन्वित । उर्ध्या च तिलविक्षेपाद्यातुधानानिवारयेत् ॥१४॥ नखादिना चोपपन्न देशकीटादिमिनुप। न चैवाभिपर्वमिधमन्न पर्युपित तथा ॥१॥ श्रद्धासमन्वितदत्त पितृम्यो नामगोत्रत । यदाहारास्तु ते जातास्तदाहारत्वमेति तत् ॥१६॥ श्रूयते चापि पितृभिर्गीता गाया महीपते। इक्वानोर्मनुपुत्रस्य कलापोपवने पुरा ॥१७॥ अपि नस्ते भविष्यन्ति कुले सन्मार्गशीलिन । गयामुपेत्य ये पिण्डान्दास्यन्त्यम्मानमादराद १८॥
४६२ ] [ श्रीविष्णुपुराण अपि नस्स कुले जायाद्यो नो दद्यात्त्रयोदशीम् । पायस मधुसर्पिा वेर्पासु च मधासु च ।१६। गौरी वाप्युद्वहेत्कन्या नील वा वृपमुत्सृजेत् । यजेत वाश्वमेधेन विधिवद्दक्षिणावता ॥२०॥ इसलिये किसी घिरे हुए स्थान में (घर प्रादि मे) श्रद्धा सहित श्राद्ध करना चाहिये । राक्षसों की निवृत्ति के लिये पृथिवी मे तिल छिडके' ॥१४॥ जिस अन मे नख, केश, या कीटादि पडे हों अथवा जो निचोड कर निकाले हुऐ रस से युक्त या बासी हो, वह मन्न श्राद्ध मे वर्जित है ॥१५॥ श्रद्धा पूर्वक तथा नाम-गोत्र का उच्चारण करते हुए दिया जाने वाला अन्न पितरो के योग्य होकर उन्हें प्राप्त होता है ।।१६।। इस विषय मे सुना जाता है कि पूर्वकाल मे पितरों ने मनुपुत्र राजा इक्ष्वाकु के प्रति कहा था ॥१७॥ क्या हमारे वश में सन्मार्ग पर चलने वाले ऐसे पुरुष होगे जो गया मे जाकर हमारे निमित्त पिण्ड देंगे ॥१८॥ कश हमारे कुल मे कोई ऐमा भी होगा जो मधानक्षत्र वाली वर्षाकालीन त्रयोदशी को हमारे निमित्त मधु मौर वृत्त से युक्त खीर प्रदान करेगा? ॥१६॥ या गोरी कन्या का दान करेगा (मर्थात् दस वर्ष की मायु मे ही उसरा विवाह कर देगा) नीला सांड छोडेगा मथवा विधिपूर्वक दक्षिणा वाले प्रश्वमेध यज्ञ का अनुशन करेगा ? ॥२०॥ सत्रहवाँ अध्याय इत्याह भगवानौवंस्सगराय महात्मने । सदाचार पुरा सम्पड, मैत्रेय परिपृच्छते ।। मयाप्येतदशेपेरण कथित भवतो द्विज । समुनवय मदाचार पश्चिन्नाप्नोति शोभनम् ।। पण्टापविदप्रमुसा विदिता भगवन्मया । । उदक्याचाश्च मे सम्यड नग्नमिच्यामि वेदितुम् ।।
1 तृतीय अंग-प्र०१७ ] [४६३ को नग्नः किं ममाचारो नग्नसंज्ञा नरो लभेत् । नग्नम्वत्पमिच्छामि यथावत्कथितं त्वया । श्रोतुं धर्मभृतां श्रेष्ठ न हस्त्यविदित तव ।४। ऋग्यजुस्मामसंनेयं त्रयी वर्णावृतिद्विज । एतामुमति यो मोहात्स नग्नः पातकी द्विज ।। त्रयी समस्तवर्णाना द्विज सवरण यत. । नग्नो भवत्युज्झितायामतस्तस्या न मगयः ॥६॥ इदं च श्रूयतामन्यद्यद्धीप्माय महात्मने । कथयामास धर्मनो वसिष्ठोमपितामहः ।। पी पराभर बी ने कहा-हे मैगेय जी! मगवान् मौर्य ने महात्मा सगर के प्रत का नत्तर देते हो गृहस्य के सदाचार की इस प्रकार ब्याल्पा को पो।।१।। हे दिन ! मैंने भी इस विषय को तुम्हारे प्रति भले प्रकार कह दिया है। सदाचार का उल्लंघन करने वाले किसी भी पुरुष को सद्गति प्राप्त नहीं हो सकती श्री मंत्रेय जी ने कहा- हे भगवन् ! नसक, बहिष्कृत तया रजप्तलादि को तो में भले प्रकार समझता हूँ, परन्तु इस समय में 'नग्न' के विषय में जानने की इच्छा करता हूं ॥३॥ नग्न कौन है, कैसे माचरण वाने पुरुष को नग्न कहा है? मैं मापसे नान का स्वरूप हो सुनना चाहता है, क्योंकि मापो कोई भी विषय शिक्षा हुया नहीं है ॥४॥ श्री पराशर जी ने कहा-हे दिर ! ऋष, माम मोर यजुः यह वेदत्रयी वर्णो के भावरण रूप है । मोहवरा इसे त्याग देने वाला पापी पुरष ही 'नग्न' कहा जाता है ॥१॥ सब वर्णों का प्रावरण वेदत्रयी ही है, बसा त्याग कर देने पर ही पुष 'नग्न' सा होता है ॥६॥ हमारे पितामह वसिजी ने महात्मा भीम से इस विषय में पौरहा पा, उसे सुनौ ॥७॥ गयापि तस्य गदतश्श्रुतमेतन्महात्मनः । नानसम्बन्धि मैत्रेय यत्सृष्टोऽहमिह त्वया ।। देवासुरमभूय द्ध दिव्यमब्दगत पुरा। तस्मिन्पराजिता देवा दैत्यहादपुरोगमः ।।
४६४ ]
[ श्रीविष्णुपुराण
क्षीरोदस्योत्तरं कूलं गत्वातप्यन्त वै तपः।
विष्णोराराधनार्थाय जगुश्चमं स्तवं तदा ।१०।
पाराधनाय लोकानां विष्णोरीशस्य यां गिरम् ।
वक्ष्यामो भगवानाद्यस्तया विष्णु. प्रसीदतु ॥११॥
यतो भूतान्यशेपाणि प्रसूतानि महात्मनः ।
यस्मिश्च लयमेप्यन्ति कस्त स्तोतुमिहेश्वरः ॥१२॥
तथाप्यरातिविध्वस्तवोर्याभयार्थिनः ।
त्वां स्तोष्यामस्तवोक्तीना याथार्यनैवगोचरे ११३१
हे मैत्रेय जी ! तुमने जो नग्न विषयक प्रश्न किया है, उसी विषय में
मैंने भी महात्मा वशिष्ट जी ने भीष्म से कुछ कहा था, वह सब सुना था |||
प्राचीनकाल की बात है~सो दिव्य वर्षों तक देवतामों और दल्यो में परस्पर
संग्राम हुआ । उसमें हाद-प्रभृति दैत्यो ने देवताप्रो को हरा दिया । इसलिये
देवतामो ने क्षीर सागर के उत्तरी तट पर जाकर तप किया और भगवान
श्री हरि को प्रसन्न करने के लिए इस स्तोत्र को गाया॥१॥ देवताओं ने कहा-
लोकनायक भगवान् विष्णु की प्राराधना के हेतु हम जिस वाणी को कहते हैं,
उससे वे प्रादि पुरुष भगवान हम पर प्रसन्न हो ॥११॥ जिनसे सब भूतो की
चत्पत्ति हुई है और वे भूत उन्ही मे लीन हो जायेंगे, ऐसे उन परमात्मा की
स्तुति करने की सामर्थ्य किस मे है ? ॥१२॥ यद्यपि अापके यथार्य रूपमा
वाणी से वर्णन नहीं हो सकता, फिर भी हम शो द्वारा पराजित एवं पराक्रम
हीन होकर हम विजय पौर पराक्रम की प्राप्ति के लिए भापकी स्तुति
करते हैं ।१३॥
स्वमुर्वी सलिलं वह्निर्वायुराकाशमेव च ।
समस्तमन्तः करण प्रधानं तत्परः पुमान् ॥१४॥
एक तवतद्भूतात्मन्मू मूर्त्तमयं वपुः ।
प्राब्रह्मस्तम्बपर्यन्तं स्थानकालविभेदवत् ॥१५॥
तप्रेश तव यत्पूर्व त्वन्नाभिकमलोद्भवम् ।
रूपं विश्वोपकाराय तस्मै ब्रह्मात्मने नमः ॥१६॥
तृतीय अंश-अ० १७] [४६५ शक्रारद्रवस्वश्चिमरुत्सोमादिभेदवत् । वयमेक स्वरूप ते तस्मै देवात्मने नम.१७॥ दम्मप्रायमसम्बोधि तितिक्षादमवजितम् । यद् गं तव गोविन्द तस्मै दैत्यात्मने नम, १८ गातिज्ञानवहा यस्मिन्नाड्यः स्तिमिततेजसि । शब्दादिलोभि यत्तस्मै तुभ्य यक्षात्मने नम ।१९। कौर्यमायामयं घोरं यच्च स्प तवामितम् । निशाचरात्मने तस्मै नमस्ते पुरुषोत्तम ।२०) स्वर्गस्थमिसद्धर्मफलोपकर ग तव । धर्मास्य च तथा स्प नमस्तस्मै जनार्दन ।२१॥ हे प्रभो ! पृथिवी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, अन्तःकरण, मूल प्रवृति तया प्रकृति से परे-यह सब पाप ही है ॥१४॥ ब्रह्मा से तृण पर्यन्त जीव तया कालादि भेद वाले इन मूर्त और अमूर्त पदार्थों से मुक्त यह प्रपच माप ही का देह है ॥१५॥ उसमे आपके नाभि-पद्म से जगत् के हितायं उत्पन्न हुमा ची प्रापका प्रथम स्वरूप है. उस ब्रह्मात्मा को नमस्कार है ॥१६॥ इन्द्र, सूर्य, द्र, वसुगण, अश्विनीद्वय, मरदगण और चन्द्रमा मादि के भेद से उत्पन्न हुए हम भी प्रापरे ही रूप है, इसलिये प्रारके इस देव रप को नमस्कार है ॥१५॥ है गोविन्द ! पापकी जो मूर्ति दम्भ पौर प्रज्ञान से युक्त तथा तितिक्षा पौर दम से परे है, उस दैन्य रूप को नमस्कार है ।।१८। जिस मन्द-सम्व रूप में हृदयम्य नाहियो ज्ञान का प्रत्यन्त वह्न करने वाली नहीं होती तथा जो गम्दादि रिपो का पभिलापी होता है, आपके उस पक्ष रूप को नमस्कार है ॥१६॥ हे पुरुषोत्तम ! आपरा जो तमोमय स्वस क्रूरता पौर माया से सम्पन्न है, उस राक्षस रूप को नमस्कार है ॥२०॥ हे जनादन ! प्रापका जो रूप स्वर्गदासी धार्मिक के यज्ञादि धर्मों के फल की प्राति पराने वाला है उस धर्म रूप को नमसार है ॥२१॥ हर्पप्रायमसंसगि गतिमद्गमनादिपु । सिद्धान्यं तय यद पं तम्मै मिदात्मने गम 1
४६६ ]
[ श्रीविष्णुपुराण
अतितिक्षायन क्रू रमपमोगसह हरे ।
द्विजिह्व तव यद् प तस्मै नागात्मने नम ॥२३॥
अवबोधि च यच्छान्तमदोषमपकल्मपम् ।
ऋषिरूपात्मने तस्मै विष्णो रूपाय ते नम ॥२४॥
भक्षयत्यथ कल्पान्ते भूतानि यदवारितम् ।
स्वद्रूप पुण्डरीकाक्ष तस्मै कालात्मने नम ॥२५॥
सम्भक्ष्य सर्वभूतानि देवादीन्यविशेषत ।
नृत्यत्यन्ते च यद् प तस्मै रुद्रात्मने नम ।२६।
प्रवृत्त्या रजसो यच्च कर्मणा करणात्मकम् ।
जनार्दन नमस्तस्मै त्वद् पाय नरात्मने ।२७।
अष्टाविंशद्वधोपेत यद् प तामस तव ।
उन्मार्गगामि सर्वात्मस्तस्मै वश्यात्मने नम ॥२८॥
मापका जो रूप जल पग्नि प्रादि गमन योग्य स्थानो को प्राप्त होकर
भी सदा निलेप पोर प्रसन्न रहता है, पापवे उस सिट नामक स्वरूप को
नमस्कार है ॥२२॥ पापका जो स्वरूप प्रक्षमा का प्राधार, अत्यास कर तथा
भोग म अत्यन्त समर्थ है, उस दो जीम वाले नाग रूप को नमस्कार है ॥२३॥
हे विष्णो भाका जो रूप ज्ञान युक्त शाल, निर्दोष तथा पल्मप रहित है,
सस मुनि रूप को नमस्कार है ॥२४॥ मापा जो स्वरूप कल्प मन्त्र में सभी
भूतो का अनिवार्य रूप से मक्षण र लेता है, उस पास रूप को नमस्कार है
राप्रलयकाल मे देवादि सब प्राणियों को सामा य रूप से भक्षण करके
गृय पणे याले भापरे रद्र रूप को नमस्कार है ॥२६॥ भापका जो रूप रो.
गुण की प्रवृत्ति पारण कमौका परने वाला है, उस मनुप्प एप को नमस्कार
है ॥२॥ हे सर्वारमन् ! पो मट्ठाइस वप युक्त तमोमय तथा उन्मागंगामी रूप
है. उस पतुरूपानमसार है ।।२८||
पक्षाभूत यप जगत स्थितिमापनम् ।
वृक्षादिभेदप्पड्भेदि तस्मै मुरशारमने नम ॥२९॥
[४६७
तृतीय अंश-अ० १७ ]
तिर्यड मनुष्यदेवादि व्योमशब्दादिकं चयत् ।
स्पं तवादेः सर्वस्य तस्मै सर्वात्मने नम ।३०
प्रधानबुद्धधादिमयादशेपाद्यदन्यदस्मात्परम परात्मन् ।
रूपं तवाद्य यदनन्यतुल्य तस्मै नमः कारणकारणाय ॥३१॥
शुक्लादिदीर्घादिघनादिहीनमगोचर यच्च विदशेपणानाम् ।
शुद्धातिशुद्ध परमपिदृश्य स्पाय तस्मै भगवन्नताः स्मः ॥३२॥
यन्न शरीरेषु यदन्यदेहेप्वशेपवस्तुप्वजमक्षयं यत् ।
तस्माच नान्यस्यतिरिक्तमस्ति ब्रह्मस्वस्पाय नताः स्म तस्मै
सकल मिदमजस्य यस्य रूपं परमपदात्मयतस्सनातनस्य ।
तमनिधनमोपवीजभूतं प्रभुममल प्रणतास्स्म वासुदेवम् ॥३४॥
जो विश्व की स्थिति का साधन स्वरूप तथा यज्ञ वा प्रगभूत है और
बौ
वृक्ष, लता, गुल्म, वीरघ, तण और गिरि-इन छ भेदो वाला है, उस
मुख्यात्मक रूप को नमस्कार है ॥२६॥ तिरंक. मनुष्य-देवतादि जीव, प्राकाशादि
भूत और शब्दादि गुण-इन सभी प्रादि भूत भाप मर्वात्मा को नमस्कार है
॥३०॥ है परमात्मन् ! प्रधानादि जो सम्पूर्ण जगत् से परे पापका रूप सबका
प्रादि कारण और अनुपम है. पापके उस प्रकृति पादि के कारणों के भी पारण
मरूप को नमाकार है ॥३१॥ जो शुक्ल प्रादि रग मे, दीर्घता मादि परिमारण
से और धनता प्रादि गुणों से रहित होने के साए मव विशेपणो का प्रदिपप,
परमपियों के लिये दर्शनीय तया शुद्ध से भी गुम है पापके उस रूप को नमस्कार
है ॥३२॥ हमारे पा मन्य जीर्दो के देहों में और सभी पदार्थों में जो वर्तमान है
तपा जो प्रजन्मा और अविनाशी है, उससे पृथक् कोई भी नहीं है उस ब्रह्म
स्वरूपको
हमारा नमस्कार है ॥३३|| जिनका मात्मा परमपद ब्रह्म ही है, ऐसे
जिन सनातन, मजन्मा भगवान का रूप ही यह सम्पूर्ण प्राच है और जो सबके
बीज भूत, पविनाशी तथा मल-रहित हैं, उन भगवान् वासुदेव को नमस्कार
स्तोत्रस्य चावसाने ते ददृशुः परमेश्वरम् ।
शङ्खचक्रगदापाणि गरुडस्य सुरा हरिम् ॥३५॥
४६८ ] [पीविष्णुपुगण तगूनुस्गव ना देवा प्रणिपातपुरग्गरम् । प्रगीद नाय देत्येभ्यनाहि नगरपाधिन १६६॥ लोक्यपगभागाश्च देत्यर्हादपुरोगमै । हृता नो ग्रह्मग्गोऽप्यामामुरतड्य परमेश्वर ३ यद्यम्योपभूतस्य वय ते च तवांगना । तथाप्यविद्याभेदेन भिन्न पक्ष्यामहे जगत् ।। स्ववर्णधर्मामिरता वेदमार्गानुसारिण । न शक्यास्तेऽरयो हन्तुमस्माभिस्तपसावृता ॥३६॥ तमुपायमशेषात्म तस्मान दातुमर्हसि । येन तानसुरान्हन्तु भवेम भगवन्क्षमा १४०। इत्युक्तो भगवांस्तेभ्या मायामोह गरीरत । समुत्पाद्य ददौ विप्रणु प्राह चेद सुरोतमान् ॥४१॥ मायामोहोऽयमखिलान्दत्यास्तानगोहरिप्यति । ततो वघ्या भविष्यन्ति वेदमागंवहिपृता ॥४२॥ स्थितौ स्थितस्य मे चध्या यावन्त परिपन्थिन । ब्रह्मणो ाधिकारस्य देवदैत्यादिका सुरा १४॥ तद्गच्छत न भी कार्या मायामोहोऽयमग्रत । गच्छनयोपकाराय भक्ता भविता सुरा १४४॥ इत्युक्ता प्रणिपत्यन ययुर्देवा यथागतम् । मायामोहोऽपि तैस्साद्धं ययौ यन महासुरा ।४५॥ श्रीपराशर जी ने कहा-हे मैने यजी । स्तुति के पूण होते ही रन देवलानो ने शख, चक्र, गताधारी भगवान् श्रीहरि को गरुड पर चढ़े अपने सामने देखा ॥३५॥ 3 हे देखते ही सब देवतानो गे उहें प्रणाम करके कहा- हे नाथ । हम पर प्रसन्न होकर दैत्यो से हम शरणागतो को बचाइये ॥३६॥ हे परमेश्वर । ह्राद प्रभृति दैत्यो ने ब्रह्माजी की आज्ञा न मानकर हमारे और लोक्य के यज्ञ भागो का अपहरण किया है ॥३७॥ यद्यपि हम और वे श्राप वभूत के प्रा से उत्पन्न हुए हैं फिर भी हम अविद्या के वशीभूत होकर तृतीय अंग-अ०१८ ] [१६६ इस विश्व को पृथक्-पृथक् देखते हैं ॥३८॥ हमारे वैरी भी अपने वर्ण घमं के पालन, वेद मार्ग पर चलने वाले तथा तपोनिष्ठ, इस लिये हम उनका वध करते में समर्थ नहीं हैं ॥३६॥ इसलिये हे सर्वात्मन् ! हमे कोई ऐसा उपाय वताइये, जिमसे कि हम उनको मारने में समर्थ हो सकें ॥४०॥ श्री पराशरजी ने कहा- उनकी प्रार्थना सुनकर भगवान् विष्णु ने अपने देह से मायामोह की उत्पत्ति कर उसे देवताओं को देते हुए कहा ॥४१॥ यह माया-मोह उन सभी दैत्यो को मोहित कर देगा, तब वे वेद मार्ग को त्याग देंगे, जिससे तुम उनका वध करने मे समयं होगे ॥४२॥ है देवतायो । कोई भी देवता हो अथवा दैत्य, ब्रह्माजी के कार्य मै वाधक होने से मृष्टि की रक्षा के कारण मेरे द्वारा मारने योग्य होते हैं ॥४३॥ इसलिये हे देवताग्यो ! तुम अब जाप्रो । भय का त्याग करो। यह माया-मोह वहां बार तुम्हारे लिए उपकारी होगा ॥४४॥ श्री पराशरजी ने कहा-भगवान् की प्राज्ञा मुनकर देवतागण उन्हें प्रणाम कर अपने अपने स्थान को गये और माया-मोह भी असुरों के पास पहुंचा ॥४॥ अठारहवाँ अध्याय तपस्यभिरतान्सोऽथ मायामोहो महासुरान् । मैत्रेय ददृशे गत्वा नर्मदातीरसश्रितान् ।११ ततो दिगम्बरो मुण्डो बहिपिच्छघरो द्विज । मायामोहोऽसुरान् दलक्ष्णमिद वचनमब्रवीत् ।२। हे दैत्यपतयो ब्रूत यदर्थ तप्यते तप.। ऐहिक वाथ पारन्य तपस. फतमिच्छथ ।३। पारन्यफललाभाय तपश्चर्या महामते । अस्मागिरियमारव्या किंवा तेऽन विवक्षितम् ।४। कुरम्यं मम वाक्यानि यदि मुक्तिमभीप्मय । अहंचमेनं धर्म च मुक्तिद्वारममवृतम् ।।
४७० [थीविष्णुपुराण धर्मों विमुक्तेरझैऽय नेतस्मादपरो वर। अत्रैव सस्थिता स्वर्ग विमुक्ति वा गमिप्यथ ।६। श्री पराशरजी ने कहा- हे मैत्रेयजी। फिर मायामोह ने वहां पहुंच कर देखा कि वे महान असुर नर्मदा नदी के तौर पर तपस्या मे तत्पर हैं ॥१॥ तब उस मयूर पख धारण करने वाले नग्न एव मुडे हुए बाल वाले माया-मोह ने उन असुरो से प्रत्य-त मीठे वपनो मे कहा ॥२॥ माया मोह ने कहा-है देत्यपतियो । कहो, तुम यह तप किस हेतु कर रहे हो तुम विसी लौकिक फल की कामना करते हो अथवा कोई पारलौकिक फर पारा चाहते हो ॥३॥ मसुरो ने कहा-हे श्रेष्ठ वुद्धि वाले । पारलौकिक कामना की सिद्धि के लिये ही हमने यह तर प्रारम्भ किया है । इस विषय मे तुम हम से क्या कहना चाहते हो ॥४॥ माया-मोह ने कहा- यदि आप मोक्ष की कामना करते है तो मैं जो कहता हूँ वह करो । माप इस मोक्ष के खुनै वार रूप इस धर्म का पालन करो ॥५॥ यह धर्भ मोक्ष की सिद्धि में अत्यन्त उपयोगी है, इससे श्रेष्ठ धर्म कोई भी नही है । इसके अनुष्ठान से माप स्वर्ग अथवा मोक्ष-जो भी चाहेगे वही प्राप्त होगा ॥६॥ अहध्व धर्ममेत च सर्वे पूय महाबला. । एवप्रकारर्चहुभिर्युक्तिदर्शनचचित ।। मायामोहेन ते दैत्या वेदमार्गादपाकृता । धर्मायतदधर्माय सदेतन सदित्यपि ।। विमुक्तये विद नेतद्विमुक्ति सम्प्रयच्छति । परमार्थोऽयमत्यर्थं परमार्थो न चाप्ययम् ।। कार्यमेतदवायं च नैतदेव स्फुट त्विदम् । दिग्वाससामय धर्मो धर्मोऽय बहुवाससाम् 1१०1 इत्यनेवान्तवाद च मायामोहेन नवधा। तेन दर्शयता देत्यास्स्वधर्म त्याजिता द्विज ॥१॥ अहंतत महाधर्म मायामोहेन ते यत प्रोक्तास्तमाश्रिता धर्ममाहतास्तेन तेऽभवन् ।१२।
तृतीय अग-अ०१८ ]
[४७१
प्राप सब महावली हैं. इसलिये इस धर्म में घद्धा वरिपेयी पराशर
पी ने कहा- इन अनेक प्रकार की युक्तियों से परिपूरा दारों से माया-मोह ने
उन दैत्यों को वैदिक मार्ग से हटा दिया । यह धर्ममय है यह अधर्म युक्त है,
यह मन है, यह मसन है, यह मोशकारक है भयवा यह मोम-प्रामि मे वाधक
है. यह परमार्य है, यह परमार्थ के विपरीत है. यह पत्तंन्ध है, यह परने योग्य
नहीं है, यह ऐसा है, यह ऐसा नहीं है. यह वस हीनों का धर्म है तया यह दस-
पारियों का धर्म है ॥७-१०॥ इस प्रकार की अनेन युक्तियां देकर माया-मोह
ने उन दैत्यों को उनके धर्म से विमुख कर दिया ॥११॥ न माया-मोह ने दैत्यों
से
पहा
कि माप इसी महापमं का मादर करिये, इसलिये पे दैत्य उस धर्म के
मानने वाले होने से 'माहंत' कहे जाने लगे ॥१२॥
त्रयोधर्मसमुत्सर्ग मायामोहेन तेऽसुरः ।
कारितास्तन्मया ह्यासंस्ततोऽन्ये तत्प्रचोदिताः ॥१३॥
तैरप्यन्ये परे तैश्च तैरप्यन्ये परे च तः।
अल्परहोभिस्नन्त्यक्ता तदैत्यः प्रायगखयो ।१४॥
पुनश्च रक्ताम्बरघृडमायामोहो जितेन्द्रियः ।
अन्यानाहामुरान् गत्वा मृद्वल्पमधुराक्षरम् ॥१५॥
स्वयं यदि वो वान्छा निर्वाणार्थमयानुराः ।
तदलं पशुधातादिदुष्टयमनिवोधत ॥१६॥
विज्ञानमयमेवैतदशेपमवगच्छत।
वुध्यध्वं मे वनः सम्यग्वुधरेवमिहोदितम् ॥१७॥
जगदेतदनाधारं भ्रान्तिज्ञानार्यतत्परम् ।
रागादिदुष्टमत्यर्थ भ्राम्यते भवसङ्कटे ।१८।
एव वुध्यत बुध्यध्वं वृध्यतवमितीरयन् ।
मायामोहः स देतेयान्धर्ममत्याजयनिजम् ॥१९॥
नानाप्रभारवचनं स तेषां युक्तियोजितम् ।
तथा तथा अयोधर्म तत्यजुस्ते यथा यथा ॥२०॥
४७२ ]
श्रीविष्णुपुराण
तेऽप्यन्येपा तथैयोचुरन्यरन्ये तथोदिता. ।
मैत्रेय तत्यजुर्धर्म वेदस्मृत्युदित परम् ॥२१॥
माया मोह द्वारा असुरो को अयोधर्म से विमुख किया जाने से वे सभी
मोह में पड गये और फिर उन्होने अन्य सब दैत्यो को इसी धर्म में प्रवृत्त कर
लिया ।।१३। उन्होने दूसरो को, दूसरों ने तीसरो को, तीसरो ने फिर मन्यों
को, इसी प्रकार एक दूसरे को उस धर्म का अवलम्बन कराने लगे । इस प्रकार
कुछ काल मे ही सभी दत्य नवीधर्म से विमुख हो गये ।।१४।। इसके पश्चात्
माया-मोह ने रवत वस्त्र धारण किये और उन असुरो से कोमल, सक्षिप्त और
मीठे शब्दो में कहा ॥१५॥ हे असुरगण । यदि तुम स्वर्ग या मोक्ष को प्राप्त
करना चाहते हो तो पशु वधादि खोटे वर्षों को छोड़कर ज्ञान प्राप्त नरो ॥१६॥
इस सम्पूर्ण विश्व को विज्ञानमय समझो । मेरे वचनो पर यत्नपूर्वक ध्यान
दो । इस विषय मे ज्ञानीजन इस जगत् को व्यर्थ बताते हैं । उनका कहना है कि
यह विश्व भ्रम से उत्पन पदार्थों के विश्वास पर ही टिका हुआ है और रामादि
दोपो के कारण दूषित हो गया है । इरा भवसागर रूपी सकट मे प्राणी भटकता
हुमा घूमता है ।।१७-१८|| इस प्रकार जानो, समझो मादि बोधात्मक शब्दो के
प्रयोग द्वारा माया मोह ने बोपमय धर्म का उपदेश कर उनको अपने धर्म से
हटा दिया ॥१६॥ माया-मोह के युक्ति पूर्ण वाक्यो के जाल में फंस कर दैत्यो
ने त्रयोधर्म को छोड दिया ॥२०॥ उन दैत्यो ने दूसरे दैत्यो से और दूसरे दैत्यो
ने दूसरे-दूसरे दैत्यो से यही बात कही । इस प्रकार हे मैत्रे यजी ! उन सबने
ही श्रुति-स्मृति-सम्मत अपने परम धर्म का त्याग कर दिया ॥२१॥
अन्यानप्यन्यपापण्डप्रकारैर्वहुभिद्विज ।
देतेयान्मोहयामास मायामोहोऽतिमोहकृत् ।२२।
स्वल्पेनैव हि कालेन मायामोहेन तेऽसुराः ।
मोहितास्तत्यजुस्सर्वा प्रयोमार्गाश्रिता कथाम् ॥२३॥
केचिद्विनिन्दा वेदाना देवानामपरे द्विज ।
यज्ञकर्मकलापस्य तथान्ये च द्विजन्मनाम् ॥२४॥
तृतीय ग्रंश-अ०१८] [४७३ नेता क्तिसहं वाक्यं हिंसा धर्माय चेप्यते। हवींप्यनलदग्धानि फलायेत्यर्भकोदितम् ॥२५॥ यज्ञरनेवर्देवत्वमवाप्येन्द्रण भुज्यते । तम्यादि यदि चेत्काळं तद्वर पनभुक्पशुः ॥२६॥ निहतस्य पशोर्यज्ञे स्वर्गप्राप्तिर्यदीप्यते । स्वपिता यजमानेन किन्नु तस्मान हन्यते ।२७। तृप्तये जायते पुसो भुक्तमन्येन चेत्ततः । कुर्याच्छाद्ध श्रमायान्नं न वहेयुःप्रवासिनः १२८॥ जनश्रद्धयमित्येतदवगम्य ततो वः। उपेक्षा श्रेयसे वाक्य रोचता यन्मयेरितम् ॥२६॥ न ह्याप्तवादा नभसो निपतन्ति महासुरा । युक्तिमद्वचन ग्राह्य मयान्यैश्च भवद्विधः ॥३०॥ हे द्विज श्रेठ । मोह उत्पन्न करने वाले मायामोह नै भन्यान्य सभी दैत्यों को नाना प्रकार के अनेको पासण्डो से मोहित किया ।।२२।। इस प्रकार कुछ पाल मे ही मायामोह द्वारा मोहित हुए उन दैत्यों ने अयोधर्म की वार्ता का मी त्याग कर दिया ॥२३॥ अव उन दैत्यों में से कोई वेदो की, कोई यहानुन पादि को तपा कोई ब्राह्मणों को ही निन्दा करने लगे ॥२॥ उन्होंने परस्सा में कहा-हिंमा मे भी धर्म है- यह क्थन युक्ति समत नहीं है और पग्नि में ६वि भोंकने से फल की प्राप्ति होगी--पह भी मज्ञानियों को ही बात है ॥२५॥ अनेकों यतों के द्वारा देवाय को प्राप्त होकर यदि इन्द्र को समी मारि काय हो साना पड़ता है तो उससे पत्रमक्षी पशु हो उत्तम है ॥२६।। यदि यज्ञ मे बलि होने वाले को स्वर्ग मिलता है तो यजमान अपने पिता का बलिदान करके हो उसे स्वगं क्यों नहीं प्राप्त करा देता ॥२७॥ यदि विमी और के भोग्न करने से कोई तृप्त हो सकता है, तो विदेश जाने के समय भोजन नामनी साप से जाने स परियम ही क्यों किया जाय? फिर तो पुषगण घर पर धान करके हो उसै तृप्त कर दिया करे ॥२८॥ इसलिए इसे केवल पाय घसा समझार इसकी उपेक्षा करना उचित है, तया येय-सिद्धि के लिये मेरे वचनों में वित ४७४ ] -[ श्रीविष्णुपुराण लगाना चाहिये ॥२६॥ हे असुरो? प्राप्त वाक्यो के प्राकाश से वर्षा नहीं होती, हम, तुम या अन्यान्य सभी जो यथार्थ हो, उसे ही ग्रहण करलें ॥३०॥ मायामोहेन ते दैत्याः प्रकारैर्वहुमिस्तथा । व्युत्थापिता यथा नैपां नयी कश्चिदरोचयत् ॥३१॥ इत्थमुन्मार्गयातेपु तेषु दैत्येषु तेऽमराः । उद्योग परम कृत्वा युद्धाय समुपस्थिताः ॥३२॥ ततो देवासुरं युद्ध पुररेवाभवद् द्विज । हताश्च तेऽसुरा देवैः सन्मार्गपरिपन्थिन. १३३॥ स्वधर्मकवच तेषामभूद्यत्प्रथम द्विज । तेनं रक्षाभवत्पूर्वं नेशुनष्टे च तत्र ते ।३४। ततो मैत्रेय तन्मार्गवतिनो येऽभवञ्जना. । नग्नास्ते तैर्यतस्त्यक्त त्रयीसवरण तथा ॥३५॥ "ब्रह्मचारी गृहस्थश्च वानप्रस्थस्तथाश्रमी। परिवाड् वा चतुर्थोऽय पञ्चमो नोपपद्यते ।३६। यस्तु सन्त्यज्य गार्हस्थ्य वानप्रस्थो न जायते। परिवाट चापि मैत्रेय स नग्नः पापकृन्नरः १३७१ श्री पराशर जी ने कहा-ऐसी भनेर युक्तियों, से . मायामोह ने दैत्यो को स्वधर्म से विचलित विया, जिससे उस अयोधर्म में उनकी किंचित भी हर्षि 'न रही ॥३१॥ हा प्रकार जब देवगण पूर्णतया विपरीतमार्गों होगये, तम युद्ध के लिये सब प्रकार से तैयार हुए देवगण युद्ध की इच्छा से उनके पास पहुंथे । ३२॥ फिर तो देवतामों पर प्रारों में फिर घोर युद्ध होने लगा। उस युद्ध में सन्मार्ग-भ्रष्ट दैत्यों का भीपण सहार हुमा ।।३३॥ दैत्यो के पास का गो स्वधर्म रूपी पवन उनको रक्षा निये हए था, इस बार उसके नष्ट होने से पे दस्यगण भी ना को प्राप्त हुए ॥३४॥ हे मैत्रेय जी ! उस समय से मायामोह धारा प्रवतित मार्ग से अनुयायी हो पा रहे पाने सगे,क्योकि उन्होंने वेदमयी हमी यात्रा परित्याग कर दिया था ॥३५॥ ब्रह्मचारी• गृहस्थ, वानप्रस्य मोर यासी मही पार पाश्रम है, पाचया माश्रम कोई नहीं है ॥३६॥ हे मैत्रेयी'!
तृतीम अंश-०-१८ ] [ ४७५ नो पुरप गृहस्यायम को त्याग कर भी वानप्रस्य या सन्याप्त ग्रहण नहीं करता वह पाप कर्मी भी 'नान' संजक हो है । ३७॥ नित्यानां कर्मणां विप्र तस्य हानिरहनिशम् । अकुर्वन्विहित कर्म शक्तः पतति तद्दिने ॥३८॥ प्रायश्चित्तेन महता शुद्धमाप्नोत्यनापदि । पक्षं नित्यक्रियाहानेः कर्ता मैत्रेय मानवः ॥३६॥ सवत्सरं क्रियाहानिर्यस्य पुंसोऽभिजायते । तस्यावलोकनात्सूर्यो निरोक्ष्यसाधुभिस्सदा ।४।। स्मृप्टै स्नानं सचैलस्य शुद्धहेतुर्महामते । 'पुसो भवति तस्योक्ता न शुद्धिः पापकर्मणः ४१ देवपिपितृभूतानि यस्य निःश्वस्य वेरमनि । प्रयान्त्यनचितान्यत्र लोको तस्मान्न पापकृत् ।४२२, सम्भापणानुप्रश्नादि सहास्यां चैव कुर्वतः । जायते तुल्यता तस्य तेनैव द्विज वत्सरात् ।।३। देवादिनिःश्वासहतं शरीरं यस्य वेश्म च । न तेन सङ्करं कुर्याद् गृहासनपरिच्छदैः ४ा अथ भुङ्क्ते गृहे तस्य करोत्यास्यां तथासने । शेते चाप्येकशयने स सद्यस्तत्समो भवेत् ॥४५॥ हे ब्रह्मन् ! साक्त होकर भी जो विहित वर्म नहीं करता, वह उसी दिन अपने धर्म से गिर जाता है और एक दिन-रात्रि में ही उसके सब नित्यकर्म नष्ट हो जाते हैं ॥३८॥ है मैत्रेय जी ! आपत्तिमाल के अतिरिक्त कभी भी एक "पश तक जो नित्यकर्म नहीं करता, उसको गुद्धि महाप्रायश्चित्त के बिना नहीं हो सकती ॥३६॥ एक वर्ष तक नित्य क्रिया न करने वाले पुरप पर दृष्टि एंड जाने मेलो पाप होता है, उसकी निवृत्ति के लिये सूर्य भगवान् वा दर्शन करे Amol है महामते ! ऐसे पुरुष का स्प हो जाने पर शुद्धि के लिए वस्त्र सहित स्नान करना चाहिये । परन्तु उस पापात्मा को शुद्धि के लिये कोई विधान नहीं है ॥४१. जिसके घर से देवता, ऋषि, पितर, भूतादि पूजित न .
४७६ ] [ श्रीविष्णुपुराण न होने के कारण नि श्वास का त्याग करते हुए विमुख चले जाते हैं उस पुरुष से बढकर और कोई पापो ससार में नहीं है ॥४२॥ यदि ऐसे मनुष्य के साप कोई एक वर्ष तक सम्भापण या कुशल प्रश्न करता हुआ बडे उठे तो वह भी उसी के जैसा हो जाता है ।।४३॥ जिस पुरुष का शरीर या घर देवता मादि के नि श्वास से युक्त है, उसके पासन से अपने प्रासन का और उसके वस्त्र से अपने वस्त्र वा स्पश न करे । न उसके घर मे स्वय जाय और न उसे पाने दे ॥४४॥जो पुरुष वैमे पुरुष के घर में जाकर भोजन या प्रासन ग्रहण करता या उसके साथ एक शय्या पर सोता है, वह उसी के समान हो जाता है ॥४॥ देवतापितृभूतानि तथानभ्यर्च्य योऽतिथीन् । भुडक्त स पातक भुड ते निष्कृतिस्तस्य नेष्यते ॥४६॥ ब्राह्मणाद्यास्तु ये वर्णास्वधर्मादन्यतोमुखा. । यान्ति ते नग्नसशा तु हीनकर्मस्ववस्थिता ॥४७॥ चतुर्णा यत्र वर्णाना मैनेयात्यन्तसङ्कर । तत्रास्या साधुवृत्तीनामुपधाताय जायते ॥४॥ अनभ्यर्च्य नटपीन्देवान्पितृभूतातिथीस्तथा । यो भुउक्त तस्य सँल्लापात्पतन्ति नरके नरा १४६) तस्मादेतानरो नग्नानयोसन्त्यागपितान् । सर्वदा वर्जयेत्प्राज्ञ पालापस्पर्शनादिपु ५० श्रद्धावद्धि वृत यलाई वान्पितृपितामहान् । न प्रीपयति तच्छाद यद्येभिरवलोपितम् ॥५१॥ जो पुरष देव, पितर, भूत, भतिथि का पूजन किये बिना ही स्वयं भोजन कर लेता है,वह पापमय भोजन करने के पारण सुभ गति का अधिकारी नही होता ॥४६॥ जो प्राह्मणादि यणं मरने धर्म ना पाग पर अन्य यों के धर्म में प्रवृत्त होते या नीच वृत्ति वा पाथय लेते हैं, वे 'नग्न' कहे जाते हैं ॥७॥हे मंत्रेय जी ! जिस स्पान म पारों वर का मरय त सरक(मिश्रण) हो, यहाँ निवास परने वाले मनुष्य की सापुतिया भी नष्ट हो जाती है ॥४॥ षो पुरुष ऋपि, देवता, पिवर, भूत मोर प्रतिपि पा सवारन पर तृतीय अंश-प्र०१८] [४७७ भोजन करना है, उससे बातचीत करने वालों को भी नरक की प्राप्ति होती है ४ा इसलिये वेदत्रयी के छोड़ने से दूपित हुए इन नग्न पुरुषों के साथ सम्भाषण और स्पादि का भी त्याग करना चाहिए 1,५०॥ इनकी दृष्टि पड़ने मात्र से श्रद्धावान पुरषों का श्रद्धा सहित किया जाने वाला धाद देवतामों, पितरों या पितामहो की तृप्ति वाला नहीं होता ।।५.११॥ श्रूयते च पुरा ख्यातो राजा शतधनुर्भुवि । पत्नी च शव्या तस्याभूदतिधर्मपरायणा ॥५२॥ पतिव्रता महाभागा सत्यशौचदयान्विता। सर्वलक्षणसम्पन्ना विनयेन नयेन च ॥५३॥ स तु राजा तया साद्धं देवदेवं जनार्दनम् । आराधयामास विभुं परमेण समाधिना ५४ा होमै पैस्तथा दानरुपवासंश्च भक्तितः । पूजाभिश्चानुदिवसं तन्मना नान्यमानसः ।५५ एकदा तु समं स्नातो तो तु मार्यापती जले। भागीरथ्यास्समुत्तीणों कात्तिक्यां समुपोषितौ । पापण्डिनमपश्येतामायान्तं सम्मुखं द्विज ॥५६॥ चापाचार्यस्य तस्यासौ सखा राज्ञो महात्मनः । अतस्तद्गौरवात्तेन सखाभावमथाकरोत् ॥५४॥ न तु सा वाग्यता देवी तस्य पत्नी पतिव्रता। उपोपितास्मीति रवि तस्मिन्दृप्टे ददर्श च ५८ समागम्य यथान्यायं दम्पती तो यथाविधि। विष्णोः पूजादिकं सर्व कृतवन्तौ द्विजोत्तम ॥६ सुनते हैं कि प्राचीन काल में एक मातघनु नामक प्रसिद्ध राजा इस भूतल पर हुमा या । उसको धर्म परायणा पत्नी का नाम शैव्या पा॥५२॥ यह महामागा रानी पतिव्रत, शौच, सत्य, दया, विनय, नीति पादि सभी गुणों से सम्पान पी॥५३॥ उस रानी के साथ राजा शतनु ने परम समाधि साधन पारा देपदेव भगवान् जनार्दन समाराधन किया || वे नित्यपति तन्मयता तृतीय अंश-अ०१८] [४st स्मयंता तन्महाराज दाक्षियललितं त्वया । यत वयोनिर्मा पन्नो मम चाटुकरो भवान् १६८॥ पापण्डिन समाभाप्य तीर्थस्नानादनन्तरम् । प्राप्तोऽसि कुलिता योनि किन्न स्मरसि तत्प्रभो।। समय पाकर वह राजा उपनु मृत्यु को प्राप्त हुआ और रानी शंभ्या ने भी चितास्तु राजा के अनुगमन पूर्वक सतीयनं का पालन किया ॥६॥ उस राजा ने उपवास-काल में पाचएडी से सम्मापण किया था, इसलिये उसे सपने उस पाप के कारण श्वान योनि में काम लेना पडा ॥६॥ उधर उम गुमलाणा रानी ने वासीनरेसा के यहाँ जन्म लिया, वह सब प्रकार के विज्ञान को जानने वाली, सभी घेउ लक्षणों से युक तथा पूर्व जन्म को याद रखने वाली हुई ॥६२॥ काशीनरेश ने कर तमका विवाह करना चाहा, तब अपनी पन्या की पनिदा जानकर वह उस कार्य से उपरत हुए ।।६।। जब उस मन्या ने दिव्य दृष्टि से यह जान लिया कि उसके पति ने कुत्ते का जन्मधारण पिया है. तब उसने विदिशा नगर में जाकर उसे स्थान के रूप में देखा ॥६॥ उसने अपने महामाग पति को उन रूप में देवकर उसे सत्कार सहित भोजन कराया ॥६शा रानी के द्वारा प्राप्त हुए उम मुम्बादु, मधुर और इच्छित मल का सेवन कर वह अपनी जाति के अनुकूल विभिन्न प्रकार की चाटुकारिता दिखाने लगा ॥६६॥ परतु उस चाटुकारिता प्रदर्शन के कारण सकोच में पड़ी हुई वाला ने कुरिनत योनि को प्राप्त हुए अपने उस पति को प्रणाम करके कहा ॥६७॥ है महाराज माप अपनी उप उदारता को याद करिये, जिसके कारण माप इस कुत्ते की योनि को पार मेरो चाटुकारिता कर रहे हैं ॥१८॥ हैं प्रभो ! मा आपको याद नहीं है कि मापने तो स्नान के परमात उस पासएडी से सम्मापण क्यिा या, जिमके कारण मापको इस कुत्तिक योनि में प्राना पड़ा है l तयंव मारित तस्मिन्पूर्वजातिकृते तदा । दथ्यो त्रिरमयावाप निर्दमतिदुर्लमदा - ४७८ ] [ श्रीविष्णुपुराण पूर्वक होम, जय, दान, उपवास तथा पूजनादि के द्वारा भक्तिपूर्वक भगवान की आराधना करने लगे ॥५५॥ एक दिन जब कार्तिकी पूर्णिमा पाई तब उन, पति-पत्नी दोनो ने उपवास पूर्वक थी गगा जी में एक साथ सान किया और जब वे जल से बाहर निकले तब उन्होंने एक पाखण्डी को सामने से माता हा देवा ॥५६॥ उस महा मा राजा को जो धनुर्वेद सिखाने वाले प्राचार्य थे, उनका यह ब्राह्मण पित्र था, इसलिये प्राचार्य के गौरव के विचार से राजा ने उसके साथ मिट जैसा व्यवहार किया ॥५७) परन्तु उस पतिव्रता रानी ने उस ब्राह्मण को कोई पार नहीं किया, वह चुप रही और अपने को उपवास युक्त मानकर उसने सूर्य भगवान् का दर्शन किया ॥५४॥ फिर उन पति पली दोनो ने विधिपूर्वक भगवान श्रीहरि के पूजनादि कार्यों को सम्पन्न किया ॥५॥ कालेन गच्छता राजा ममारासौ सपल जित् । अन्वाररोह त देवी चिंतास्थ भूपति पतिम् ।६० स तु तेनापचारेण श्वा जज्ञे वसुधाधिप । उपोपितेन पापण्डसॅल्लापो यत्वृतोऽभवत् ॥६॥ सा तु जातिस्मरा जजे काशीराजसुता शुभा। सर्व विज्ञानसम्पूर्णा सर्वलक्षणपूजिता ।६२१ ता पिता दातुरामोऽद्वराय विनिवारित । तपंव तन्व्या पिरती विवाहारम्भतो नृप' १६३॥ तवस्गा दिव्यया दृष्ट्या दृष्ट्वा श्वान निज पतिम् । विदिशान्य पुरं गत्वा तदवस्य ददर्श सम् ।६४। स दृष्ट्वंद महाभाग श्वभूत तु पति तदा । ददौ तस्मै वराहार सलारप्रवण शुभा।६५॥ भुझन्दत तया सोममतिमृटमभीतितम् । स्वजातिलित मुबंन्यह पाटु चमार ये ।६६। प्रतीव प्रीडिता याला पुर्वता पाटु तेन सा। प्रणामपूर्वमाहेद दयित त पुयोनिगम् ॥६७।
तृतीय अंश-अ०१८ [ ४० स्मर्यतां तन्महाराज दानियललित लया। येत श्वयोनिर्मा पन्नो मम नाटुकरो भवान् ।६। पापण्डिन समाभाष्य तीर्थस्नानादनन्तरम् । प्राप्तोऽसि कुत्मिता योनि किन्न स्मरसि तत्प्रभो। समप पाकर वह राजा उपतु मृत्यु को प्राप्त हुआ और रानी संन्या ने भी चितारूट राजा के अनुगमन पूर्वक सतीधर्म का पालन किया ton उस राजा ने उपवास-काल में पारा हो से सम्भाषण किया था, इसलिये उसे अपने उस पाप के कारण श्वान योनि में जन्म लेना पड़ा ६१३॥ उपर उस गुमलसरणा रानी ने काशीनरेश के यहाँ जन्म लिया, वह सब प्रकार के विज्ञान को जानने वाली, सभी पेट लक्षणो से युक्त तथा पूर्व जन्म की याद रखने पाली हुई ॥६॥ कासीनरेश ने अगमा विवाह करना चाहा, तब अपनी कन्या की प्रनिदा जानकर वह उस कार्य से उपरत हुए ।।६३॥ जब उस कन्या ने दिव्य दृष्टि से यह जान लिया कि उसके पति ने कुत्ते का जन्मधारय किया है. तब उसने विदिशा नगर में जाकर उसे श्वान के रूप में देखा ॥६|| सने अपने महाभाग पति को उन रूप में देवकर उसे राकार सहित भोजन कराया ॥६५॥ रानी के द्वारा प्राप्त हुए उस सुम्वादु, मधुर और इच्छित मन्न पा सेवन कर वह मानी जाति के अनुक्न विभिन्न प्रकार की चाटुकारिता दिसाने लगा ॥६६॥ परलु उस चाटुकारिता प्रदर्शन के कारण सोच में पड़ी हुई बाला ने कुत्सित योनि को प्राप्त हुए अपने उस पति को प्रणाम करके कहा ।।६७॥ हे महाराज प्राप मपनी उस उदारता को पाद करिये, जिसके कारण मार इस कुत्ते की योनि को पाकर मेरी चाटुकारिता कर रहे हैं ।।६८] हे प्रभो ! क्या भापको याद नहीं है कि मापने वीर्य स्नान के पश्चात उस पाखण्डी से सम्मापण किया था, जिसके कारण मापको इस कुत्तिक, योनि में माना पड़ा है ॥६॥ तयैव स्मारित तस्मिन्पूर्वजातिकृते तदा । दयौ चिरमयावाप निवदमतिदुर्लभम् Isol ४८० ] [ श्रीविष्णुपुराण निविण्गचित्तस्स ततो निर्गम्य नगराहिः । मरुत्प्रपतनं कृत्वा शार्गाली योनिमागत: ७१। सापि द्वितीये सम्प्राप्ते वीक्ष्य दिव्येन चक्षुपा । ज्ञात्वा शृगालं तं द्रष्टु ययौ कोलाहलं गिरिम् ।७२। तत्रापि दृष्ट्वा तं प्राह शार्गाली योनिमागतम् । भरिमपि चार्वगी तनया पृथिवीक्षितः १७३॥ अपि स्मरसि राजेन्द्र श्वयोनिस्थस्य यन्मया । प्रोक्त ते पूर्वचरितं पापण्डालापसथयम् ७४१ पुनस्तयोक्त स ज्ञात्वा सत्य सत्यवतां वरः। कानने स निराहारस्तत्याज स्वं कलेवरम् १७५॥ भूयस्ततो वृको जज्ञे गत्वा तं निर्जने वने। स्मरयामास भर्तार पूर्ववृत्तमनिन्दिता ७६॥ न त्वं वृको महाभाग राजा शतधनुर्भवान् । श्वा भूत्वा त्वं शृगालोऽभूत्वत्वं साम्प्रत गतः ७७। थी पाराशर जी ने कहा-उम काशी नरेश की पुत्री ने जब इस प्रकार पाय दिनाई तब वह पान बहुत देर तक अपने पूर्व जन्म की याद करता रहाय उरो दुर्लभ निर्वद पति की प्राति हुई ॥७०॥ उमने मस्यन्त दु:खित वित्त रोगर के बाहर जार पाने प्राणो का त्याग लिया, तब उसे भगाल योनि की प्राति हुई पत्र कामिराज सुना ने दिम्य रष्टि से उमे गुगाल हमा जागा, तब वह उसे देखने के लिये उम कोलाहल पर्वत पर पहुंची ॥७२॥ जहां उसे गाल योनि में पड़ा हुमा देतार उगने उमगे नहा ॥२॥ हैरानेट ! पब मार दान-योनि मे थे, तर पूर्व जन्म मे उम पारारही से सम्भापारने पाली पटना की मैंने पार दिखाई पो, वह बात मागे पार है ? ७ गत्यासों में घट उस राधा शतपनु नै तिन पुत्री सरात गरम वृतान्त नान निपा पौरपाक्षर के परिवार पूर्व पाने लिया पिर उगने दिया जाम लिमा, पा समय भी पह पनितारापुरी निरनरी पर उसने अपने पति से पूर्व जाम तृतीय प्रश-अ०१८] [ ४१ की पाद दिलाई ॥७॥ हे महाभाग ! पाप मैडिया नहीं हैं, प्राप तो राजा सवपनु हैं। अापने क्रमश: कुता, शृपाल पौर प्रव भेडिया का जन्म लिया है । . स्मारितेन यदा त्यक्तस्तेनात्मा गृधता गत । अपापा सा पुनश्चन वोधयामास भामिनी ७८। नरेन्द्र स्मर्यतामात्मा डलं ते गृध्रवेष्टया । पापण्डालापजातोऽयं दोपो यत्गृनतां गत. १७६१ ततः काकत्वमापन्नं समनन्तरजन्मनि । उपाच तन्वी भर्तारमुपलभ्यात्मयोगतः 1101 अशेपभूभृत: पूर्व वश्या यस्मै वलिं ददुः । स त्व काकत्वमापन्नो जातोऽद्य बलिभुक् प्रभो।। एवमेव च काकत्वे स्मारितस्स पुरातनम् । तत्याज भूपतिः प्राणान्मयूरत्वमवाप च ।।२। उसके इस प्रकार याद दिलाने पर राजा ने भेडिया की योनि छोड दी। तब से गृध्र होना पड़ा। म मोनि में भी उसकी पाप-रहित पत्नी ने उसे पूर्व वृत्तान्त का स्मरण कराया ॥७॥हे रामन् ! माप अपने रूप की याद करिये । इन गृध्र पेप्टानों का त्याग कीजिये, क्योंकि पाखण्डी से सम्मापण करने के कारण ही प्रापको इस योनि की प्राप्ति हुई है ॥३६उस योनि का परित्याग करने पर नसे कौए वी योनि मिली । तव भी उस सुन्दरी ने योग बन से उसका वृत्तान्त जानकर और नसके पाप्त पहुंचकर उससे कहा ॥८॥ है प्रभो ! माप वही हैं, जिनकी मानता को प्रास हुए समस्त सामन्तगरण विभिन्न प्रकार की मेंट प्रस्तुत करते थे। प्राज पाप इस काक-योनि में प्राकर वलि का भोजन करने वाले हुए है।।८१॥ इस प्रकार पूर्व जन्म की याद दिलाये जाने पर राजा ने काव-योनि को त्यागवर मोर की योनि प्राप्त की ॥२॥ मयूरत्वे ततस्सा वै चकारानुगति गुमा । दत्तं प्रतिक्षणं भोज्याला सञ्चातिभोज का
४८२ ]
[ श्रीविपापराण
ततस्तु जनको राजा वाजिमेघ महामनुम् ।
चवार तस्यावभृथे स्नापयामास त तदा ।।
सरनौ स्वयं च तन्वङ्गी स्मारयामास चापि तम् ।
यथासौ श्वशृगालादियोनि जग्राह पार्थिवः ।।
स्मृतजन्मक्रमस्सोऽथ तत्याज स्ववलेवरम् ।
जज्ञे स जनकस्यैव पुनोऽसौ सुमहात्मन. १८६१
ततस्सा पितरं तन्वी विवाहाथमचोदयत् ।
स चापि कारयामास तस्या राजा स्वयपरम् ।।
स्वयवरे कृते सा त सम्प्राप्त पतिमात्मनः ।
वरयामास भूयोऽपि भर्तृ भावेन भामिनी 11
बुभुजे च तया साद्धं सम्भोगान्नृपनन्दन ।
तिपुपरते राज्या विहेषु पारस !
इयाज यशान्सुवहून्ददौ दानानि चापिनाम् ।
पुत्रानुत्पादयामास युयुधे च सहारिभि ।।५।
उस योनि मे भी काशिरामपुत्री ने उसे प्रतिक्षण मयूरोचित श्रष्ठ
पाहार देते हुए उसका सेवा की।1८३|| जिस समय राजा जनक ने प्रश्वमेध
का अनुशान किया । उस महायज्ञ मे अवभृय स्नान के पमय उस मोर को
स्नान कराया गया ॥८॥ फिर उप्त राजकन्या ने स्वय भी स्नान किया और
मपूर रूपी राजा को उसकी श्वान, शृगाल आदि योनियो का स्मरण कराया
१५॥ सब वृत्तान्त के याद माने पर उसने अपना मयूर-देह भी छोड दिया
पौर राजा जनक के ही घर मे पुत्र रूप से उत्पन्न हुआ ||८६।। फिर उस
राजकुमारी ने अपने विवाह के लिये अपने पिता को प्रेरित किया, तब राजा ने
उसका स्वयबर रचाया ॥७॥ स्वयवर का आयोजन होने पर स्वयवर मे पाये
अपने उस पनि का उस राजपुत्री ने पुनः पतिभाव से वरण किया। फिर
उरा राजकुमार ने काशिराज पुत्री के साथ अनेक भोगो को भोगते हुए अपने
पिता के मरणोपरान्त विदेह नगर का राजपद सम्भाला| उसने अनेकानेक
तृतीय प्रश-प०१८]
[४५३
यज्ञ किये, यानकों को इच्छित दान दिपे, अनेक पुत्रों की उत्पत्ति की और शत्रुओं
के साथ अनेको भीपण युद्ध पिये ||
राज्य भुक्त्वा ययान्याय पालयित्वा वसुन्धराम् ।
तत्याज स प्रियाप्राणान्मग्रामे धर्मतो नृप (श
ततश्वितास्थ त भूयो भर्तार सा शुभेक्षणा।
अन्याएरोह विधिवद्ययापूर्व मुदान्विता ।।
ततोऽवाप तया साई राजपुत्र्या स पार्थिव ।
ऐन्द्रानतीत्य व लोकांल्लोकान्प्राप तदाक्षयान् ।।
स्वर्गाक्षयत्वमतुल दाम्पत्यमतिदुर्लभम् ।
प्राप्त पुण्यफल प्राप्य सशुद्धि ता द्विजोत्तम ।।४।
एप पापण्डसम्भापाद्दोष प्रोक्तो मया द्विज ।
तयाश्वमेघावभृयस्नानमाहात्म्यमेव च ।।५।
तस्मात्पापण्डिभि पापरालापस्पर्शन यजेत् ।
विशेपत विपाकाले यज्ञादौ चापि दीक्षित ।१६।
क्रियाहानिगृहे यस्य मासमेक प्रजायते।
तस्यावलोक्नात्सूर्य पश्येत मतिमानर ६७
। इस प्रकार उसने प्रथिवी का न्यायपूर्वक पालन और राज्य-गुस्खों का
उपमोग किया तथा अन्त म घम युक्त युद्ध करते हुए ही अपने प्राणों का परि-
त्याग कर दिया II 11ब पहिले के समान ही उम सुन्दर नयन वाली रानी ने
मपने चिताल्ट पति के साथ परलोक गमन किया। इस प्रकार राजकुमारी
सहित नम्र राजाने इन्द्रलोक से भी बार अपय लोको को प्राप्त किया
॥३॥ हे द्विजदर । इस प्रकार शुद्धि को प्राप्त हुए उस राजा ने अतुलित एवं
अभय स्वर्ग, अत्यन्त दुर्लभ दाम्पत्य तया अपने पुरय के फल को प्राप्त किया
neyा है द्विज । इस प्रकार मैंन तुम्हारे प्रति पाखण्डी स वार्तालाप करने
का दोष मोर अश्वमेघ यज्ञ म अवभृथ स्नान करने का माहात्म्य कहा है MEIN
इसलिये पाखराहियों और पापकमियों से की सम्भापण या सनका पर नहीं
करना चाहिए। विशेषकर नित्य नैमित्तिक कर्मों के समय या पनादि क्रिपामों
४८४ ] [ श्री विष्णुपुराण मे दीक्षित होने पर तो उनके ससगं से बचना ही चाहिये ॥६॥ जिसके घर में एक महीने तक नित्यकर्म न हुए हो, उस पुरुष का दर्शन मात्र होने पर सूर्य का दर्शन करना चाहिए ॥६॥ किं पुनर्यस्तु सन्त्यक्ता त्रयी सर्वात्मना द्विज । पापण्डभोजिभि. पार्वेदवादविरोधिभि 18८ सहालापस्तु ससर्ग सहास्या चातिपापिनी । पापण्डिभिर्दुराचारस्तस्मात्तान्परिवर्जयेत् ।। पापण्डिनो विकर्मस्थान्वैडालवतिकाञ्छठान् । हैतुकान्वकवृत्तीश्च वाड भागेणापि नार्च येत् ।१००। दूरतस्तैस्तु सम्पर्कस्त्याज्यश्चाप्यतिपापिभि । पापण्डिभिर्दुराचारस्तस्मात्तापरिवर्जयेत् ॥१०१। एते नग्नास्तवाख्याता दृष्टा श्राद्धोपघातका । येषा सम्भाषणात्पुसा दिनपुण्य प्रणश्यति ।१०२। एते पापण्डिन पापा न ह तानालपेद् बुध । पुण्य नश्यति सम्भापादेतेपा तद्दिनोद्भवम् ।१०३। पुसा जटाधरणमौण्ड्यवता वृथव मोघाशिनामखिलशोचनिराकृतानाम् । तोयप्रदानपितृपिण्डवहिष्कृताना सम्भापणादपि नरा नरक प्रयान्ति ।१०४। वेदत्रयी धर्म के त्यागी, पाखएिडयो का मन भोजन परने वाले भोर वैदिक धर्म का विरोध करने वाले उन पापियों को देख लेने पर तो उपाय ही फा कहा जाय ? 164|| इन दुराचारियों पे साथ सम्भाषण करमा, सम्पर्क रखना या उटना बैठना भी पार है इसलिए उनवा स्याग परना ही उचित है neer पाखण्डी, पुरी, छिपार पाप करने वाले, दुष्ट, स्वार्थी तथा बगुसा वृत्ति वारे मनुष्यों वा वचनों से.भी सस्वार न करे॥१०॥ इन पाखएिडयो, दुरापारियों और पत्य त पापियो का रासगं दूर, से ही स्याग देना चाहिए । इसलिये इनसे सदा ही बचे ॥१.१|| इस प्रकार नानों के विषय में मंगे तुमसे [४८५ तृतीय अंश-म० १८ ] कहा है, जिनके देखने से ही प्राद्ध का क्षय हो जाता है तथा जिनसे वार्तालाप करने मात्र से एक दिन का पुण्य नष्ट हो जाता है ॥१०२॥ ऐसे यह पाखण्डी अत्यन्त पापी होते हैं, बुद्धिमानों को इनमे कभी भी वार्तालाप नहीं करना चाहिये । क्योकि वार्तालाप करने से ही उस दिन का पुण्य क्षीण हो जाना है ।।१०३॥ जो अकारण ही बटा धारण करते पौर सिर मुडा लेते हैं, जो देवता, अतिथि को भोजन कराये विना ही स्वय सा लेते हैं, तथा जो सद प्रकार से मशुद्ध और जलदान-पिण्डदान आदि से बहिष्कृत हैं, उन व्यक्तियों से दातचीत करने वालों को भी नरक की प्राप्ति होती है ।।१०४|| चतुर्थ अंश पहला अध्याय भगवन्यन्नरः कार्य साघुकर्मण्यवस्थितः । तन्मह्य गुरुणारयात नित्यनैमित्तिकात्मकम् । वर्णधर्मास्तथाख्याता धर्मा ये चाश्रमेषु च । श्रोतुमिच्छाम्यह वश राज्ञा तव हि मे गुरो ।। मैत्रेय श्रूयतामयमनेकयज्वशूरवीरधीरभूपालालड कृतो ब्रह्मादि- मानवो वंश ।३। तदस्य वशस्यानुपूर्वीमशेषवशपापप्रणाशनाय मैत्रेयता क्था शृणु।४। तद्यया सकलजगतामादिरनादिभूतस्स ऋग्यजुस्सामादिमयो भगवान् विष्णुस्तस्य ग्रह्मणो मूर्त रूप हिरण्यगर्भो ब्रह्माण्डभूतो ब्रह्मा भगवान् प्राग्वर्भूव ।। ब्रह्मणश्च दक्षिणाड गुष्ठजन्मा दक्षप्रजापति दक्षस्याप्यदितिरदितेविवस्वान् विवस्वतो मनु ।६। मनोरिक्ष्वाकुनृगधृष्ट- मर्यातिनरिप्यन्तप्रागुनाभागदिष्टकरूपपृषध्राख्या दश पुत्रा बभूवु. ७ श्री मं यजी ने कहा-हे भगवन् ! साघु क्मो मे पवस्थित पुरुषों के परने योग्य उन सभी नित्य-नमित्तिर वर्मा को मापने मुभमे कह दिया ॥१॥ हे गुरो ! मापने वर्ण-पो पौर प्राश्रय-धो की भी व्याख्या पर दी, भय में रावणों को सुनने की इच्छा परता है. इसलिये यह विषय मेरे प्रति बहिये ॥२॥ श्री पराशरत्री ने पहा-हे मैत्रेयी ! जिस वश मे मादि पता ब्रह्माण ६. उम पनेको यश पाले, पूर, वीर गौर धीरजवान राजापो मुशोभित मा. का का वर्णन गुनो ॥१॥ हे मंत्र यजी ! माने पसरे सब पापों से मिटाने लिप इस वश की परम्परा-गाया हो परन से गुमो ॥४॥ वह इस प्रकार है- मापूर्ण जगत मे भारिपारण भगवान् विष्णु हैं । ये मना !
[४८७ चतुर्थ अश-०१] थे।७॥ हैं । नन्हीं ब्रह्म स्वरूप भगवान् के मूर्त रूप में ब्रह्माण्डमय एव हिरण्यगर्भ ब्रह्माजी सर्व प्रथम उदान हुए ॥५॥ उन ब्रह्माजो के दाए अंगुठे से दक्ष प्रजा. पति की उत्पत्ति हुई, दश से अदिति वा जन्म हुआ और अदिति ने भगवान् विवस्वान को प्रकट किया। उन्ही विवस्वान् स मनु की उत्पत्ति हुई ॥६॥ मनु १ दस पुत्र हुए जिनके नाम इक्ष्वाकु, नृग, त्र, शनि, नरिष्यन्त, प्राशु, मामाग, दिष्ट, वरूप और पृपघ इष्टिं च मित्रावरुणयोर्मनु पुत्रकामश्चकार । तन तावदपढ़ते होतुरपचारादिला नाम कन्या बभूव हा सैव च मित्रावरुणयो प्रसादात्सुद्य म्नो नाम मनो पुत्रो मैनेय आमीत् ।१०। पुनश्चेश्वरको- पात्री सती सा तु सोममूनोर्बुधस्याश्रमसमीप वभ्राम ॥११॥ सानुरागश्न तस्या बुध पुरूरवसमात्मजमुत्पादयामास ।१२। जातेऽपि तस्मिनमित- तेनोभि परमपिभिरिष्टिमय ऋड भयो यजुर्मयस्सागमयोऽथर्वणम- यस्मर्ववेदमयो मनोमयो ज्ञानमयो न विञ्चिन्मयोऽनममो भगवान् यज्ञपुरुषस्वरूपी सुद्य म्नस्य पु स्त्वमभिलपद्भिर्ययावदिष्टस्तत्प्रसादादिला पुनरपि सुद्य म्नोऽभवत् ११३॥ तस्याप्युक्तलगयविनतात्रय पुना बभूवु ११४१ पुन को कामना से मनु ने मित्रावरण को प्रसन्नता के लिय यज्ञ किया ॥८॥ परन्तु, होगा के विपरीत सकल्प से उस यज्ञ में विपर्यय हो गया और उससे इला नाम की कन्या उत्पन्न हुई ॥६॥ हे मंत्र यजी । दाद म मित्रावरण की कृपा से वही इता नाम्नी कन्या मनु पुत्र सुधम्न हो गया ॥१०॥ शिवजी के क्रोध के कारण वह इला स्त्री बनी हुई चन्द्रमा के पुत्र वुध ने आश्रम के समोप भ्रमण करने लगी ॥११॥ तव बुध उस दसार प्रासक्तिमय होगये और उहाँने उससे पुरुरवा नामक एक पुत्र उत्पन्न क्यिा ॥१२॥ पुरुरवा के उत्पन्न होने के पश्चात् परम पियों न तुयुम्न को पुष्पत्य प्राप्ति कराने की इच्छा से सर्ववेदमय, मनोमय, ज्ञानमय, अन्नमय और परमाय वाले भगवान यज्ञ पुरप का विधिवत् यजन किया, तव उन यज पुरुष की कृपा से इला मुद्यन्न रूप में चतुर्थ अंश पहला अध्याय भगवन्यन्नर कार्य साधुकर्मण्यवस्थित सन्मह्य गुरुणास्पात नित्यनमित्तिकात्मकम् वर्णधर्मास्तयाख्याता धर्मा ये चाश्रमेषु च । श्रोतुमिच्छाम्यह वश राज्ञा तद् व हि मे गुरो ।२१ मैत्रेय श्रूयतामयमनेकयज्वशूरवीरधीरभूपालालड वृत्तो ब्रह्मादि- निवो वश ३। तदस्य वशस्यानुपूर्वीमशेषवशपापप्रणाशनाय मैत्रेयता स्था शृणु १४१ तद्यथा सकलजगतामादिरनादिभूतस्स ऋग्यजुस्सामादिमयो भगवान् विष्णुस्तस्य ब्रह्मणो मूर्त रूप हिरण्यगर्भो ब्रह्माण्डभूतो ब्रह्मा भगवान् प्रारबभूव ।५॥ ब्रह्मणश्च दक्षिणाइ गुष्ठजन्मा दक्षप्रजापति दक्षस्याप्यदितिरदितेविवस्वान् विवस्वतो मनु ।६। मनोरिक्ष्वाकुमृगधृष्ट- शर्यातिनरिप्यन्तप्राशुनाभागदिष्टकरूपपृषधारमा दश पुना बभूवु ७ श्री मंत्र यजी ने कहा है भगवन् । साधु कर्मों में अवस्थित पुरषों के करने योग्म उन सभी नित्य नैमित्तिक कमों को आपने मुझसे कह दिया ॥१॥ है गुरो मापने वरण धर्मों पोर पाश्रय धर्मों की भी व्याख्या कर दी, पब मैं राजवो को सुनने की इच्छा करता हूँ इसलिये वह विषय मेरे प्रति पहिये ॥२॥ श्री पराशरजी ने रहा है मैत्रेयनी । जिरा वदा के मादि वर्ता ब्रह्माजी हैं, उस भनेको यज्ञ वाले, पर, वीर और धीरजवान राजानी से मुशोभित मनु पर वा घणन सुनो ॥३॥ हे मैयजी । अपने वश वे सर पापों को मिटाने में लिये इस वा की परम्परा माथा को मन से सुनो। यह इस प्रकार है- पप्पूण जगत र मादि वारण भगवान् विष्णु हैं । ये अनार भौर निवेद का - [४८७ :चतुर्य अंश-अ०१] थे जा हैं। उन्हीं ब्रह्म स्वल भगवान् के मूत्तं रूस में ब्रह्माण्डमय एवं हिरण्यगर्भ ब्रह्माजी सर्व प्रथम उत्पन्न हुए शा उन ब्रह्माजी के दाए अंगूठे से दक्ष प्रजा- पति को उत्पत्ति हुई, दक्ष से अदिति का जन्म हुअा और अदिति ने भगवान् विवस्वान् को प्रकट किया। वन्ही विवस्वान् से मनु की उत्पत्ति हुई ॥६॥ मनु के दस पुत्र हुए. जिनके नाम इक्ष्वाकु, नृग, धुष्ट, रार्याति, नरिप्पन्त, प्राशु, माभाग, दिष्ट, वरूप और पृाघ्र इष्टिं च मित्रावरुणयोर्मनुः पुत्रकामश्चकार ८ तन तावदपढ़ते होनुरपंचारा दिला नाम कन्या बभूव । संव च मित्रावरुणयोः प्रसादाद्य म्नो नाम मनोः पुत्रो मैत्रेय आसीत् ।१०। पुनश्चेश्वरको- पात्त्री सतो सा तु सोमसूनोव॒धस्याश्रमसमीगे वभ्राम ।११। सानुरागश्व तस्या बुधः पुरुरवसमात्मजमुत्पादयामास ।१२। जातेऽपि तस्मिन्नमित- तेजोभिः परमपिभिरिष्टिमय ऋड भयो यजुर्मयस्साममयोऽथर्वणम- यस्सर्ववेदमयो मनोमयो ज्ञानमयो न किञ्चिन्मयोऽग्नमयो ' भगवान् यज्ञपुरुषस्वरुपी सुद्य म्नस्य पुस्त्वमभिलपद्भिर्ययावदिष्टस्तत्प्रसादादिला सुद्य म्नोऽभवत् ॥१३॥ तस्याप्युत्कलगपविनतात्रयः पुत्रा वभूवु. ११४॥ पुत्र की कामना से मनु ने मित्रावरण की प्रसन्नता के लिये यज्ञ किया 1 परन्तु, होता के विपरीत सकल्प से उस यज्ञ में विपर्यय हो गया और उससे इला नाम की कन्या उत्पन्न हुई ॥६है मैत्रेयी ! दाद में मित्रावरण की कृपा से वही इला नाम्नी कन्या मनु पुत्र सुध न हो गया ॥१०॥ शिवजी के क्रोध के कारण वह इला स्त्री बनी हुई चन्द्रमा के पुत्र बुध के आश्रम के समीप भ्रमण करने लगी ॥११॥ तब बुध उसे देखकर आसक्तिमय होगये और उन्होंने उससे पुरुरवा नामक एक पुत्र उत्पन्न किया ॥१२॥ पुरुरवा के उत्पन्न होने के पश्चात् परमं ऋषियों ने सुद्य म्न को पुरूपत्व-प्राप्ति कराने की इच्छा से सर्ववेदमय, मनोमय, ज्ञानमय, अन्नमय और परमार्थ वाले भगवान् यज्ञ पुरुप का विधिवत् यजन किया, तब उन या पुरुष की कृपा से इला सुद्यन्न रूप से पुनरपि .
४८८ ]
[श्रीविष्णुपुराण
परिवर्तित हुई ॥१३॥ तब उस सुध म्न के तीन पुत्र उत्तल, गय और विनत
मामक हुए ॥१४॥
सुद्य म्नस्तु स्त्रीपूर्वकत्वाद्राज्यभाग न लेभे ॥१५॥ तत्पिपा तु
वसिष्ठवचनात्प्रतिष्टानं नाम नगरं सुद्य म्नाय दत्तं तच्चासौ पुरूरवसे
प्रादाद ।१६। तदन्वयाश्च क्षत्रियास्सर्वे दिक्ष्वभवन् । पृषध्रस्तु मनुपुत्री
गुरुगोवधाच्छूद्रत्वमगमत् ।१७। मनोः पुत्रः करूप. करूपात्कारूपाः
क्षत्रिया महाबलपराक्रमा वभूवु १८ दिष्टपुत्रस्तु नाभागो वैश्यतामग-
मत्तस्माद्वलन्धनः पुत्रोऽभवत् ।१६। बलन्धनात्सप्रीतिरुदारकीर्तिः ।२०।
वत्सप्रीतेः प्राशुरभवत् ।२१। प्रजापतिश्च प्राशोरेकोऽभवत् ।२२।
पहिले स्त्री होने के कारण सुद्य म्न को राज्य का अधिकार नहीं मिला
था, परन्तु वसिष्ठजी की प्राज्ञा से पिता ने उसे प्रतिष्ठान नामक नगर का राजा
बनाया, वही नगर सुध म्न ने पुरुरवा को प्रदान कर दिया ॥१५-१६।। उसी
पुरुरवा की सन्तान सब दिशामों मे फैल गई । मनु का पुत्र पृषध्र अपने गुरू की
गो को मारने के कारण शूद्रत्व को प्राप्त हो गया ।।१७॥ मनु का जो पुत्र करूप
था, उसी की सन्तान कारूप नामक अत्यन्त बल और पराक्रम वाले क्षत्रियगरण
हुए ॥१८॥ दिष्ट का पुत्र नाभाग हुमा जो वैश्यत्व को प्राप्त हो गया, उसने
बलन्धन नामक पुत्र उत्पन्न किया ॥१६॥ वलन्धन से अत्यन्त यशस्यी वत्सप्रीति,
वत्सप्रीति से प्रांशु और प्राशु से प्रजापति नामक पुत्र की उत्पत्ति हुई ।।२०-२२।।
ततश्च खनित्र. १२३। तस्माचाक्षुपः ।२४। चाक्षुपाच्चातिबल-
पराक्रमो विशोऽभवत् ॥२५॥ ततो विविशकः ।२६। तस्माच्च खनिनेत्रः
१२७। ततश्चातिविभूतिः ।२८१ अतिविभूतेरतिवलपराक्रमः करन्धमः
पुमोऽमवत् ।२६॥ तस्मादप्यविक्षित् ॥३०अविक्षितोऽप्यतिवलपराक्रमः
पुत्रो मरुत्तो नामाभवतः यस्यमावद्यापिश्लोको गीयते ।३१॥
मरतस्य यया यशस्तथा कस्यामवद्भुवि ।
सर्व हिरण्मयं यस्य यज्ञवस्त्वतिशोभनम् ॥३२॥
अमाद्यदिन सोमेन दक्षिणाभिर्दिजातयः।
भरतः परिवेष्टारस्सदस्याश्च दिवौक्सः ॥३३॥
चतुर्थ मंश-अ० १] [४६ प्रजापति का पुत्र सनिघ हमा, खनित्र से च क्षुप पोर पाशुप से प्रत्यन्त चलो-पराक्रमी विर हुमा ।।२३-२५॥ विरा से विविधक की उत्पत्ति हुई । विविंशक से खनिनेष, सनिनत्र से प्रति-विभूति और प्रति विभूति से अत्यन्त चलवान् करन्यम हुप्रा १२५-२६॥ करग्यम से भविभिन् मोर प्रविसित से मस्त नामक महाधनी पुत्र हुमा, जिसके विषय में अब भी यह दो श्लोक प्रचालित है ||३०-३१।। मरत के जैसा यज्ञ पृथिवी पर अभी तक क्तिी मन्य का नहीं हुमा, कोरि उसकी सभी पाक्षिक यस्तुएं स्वर्ण युक्त और अत्यन्त सुन्दर थी ॥३२॥ न्म यत में इन्द्र को सोम-रस से और ब्राह्मणों को दक्षिणा से सृत दिया गया या । उधमे सद्गण परोमने वाले और देवगए सदस्य हुए थे ॥३३॥ स मरुत्तश्चक्रवर्ती नरिप्यन्तनामान पुत्रमवाप १३४॥ तस्माच्च दमः ॥३५॥ दमस्य पुनो राजवर्द्धनो जशे १३६ राजवर्द्धनात्सुवृद्धिः ।३७॥ मुवृद्धः केवलः ॥३८केवलात्सुतिरभूव ॥३६ततश्च नरः ।४० तस्माचन्द्रः ।४॥ ततः केवलोऽभूत् ।४२॥ देवलाद्वन्धुमान् ।४३बन्धुमतो वेगवान् ।४० वेगवतो वुध ४श ततश्च तृणविन्दु.॥४६॥ तस्याप्येका कन्या इलविला नाम ।४७1 ततवालम्वुसा नाम वराप्सरास्तृणविन्दु भेजे ।४। तस्यामप्यस्य विशालो जज्ञे यः पुरी विशाला निर्ममे ४६। उसी मस्त्त के नरियन्त नामर पुत्र म्पन्न हुप्रा । नरिप्यन्त से दम मोर दम से राजवर्द्धन हुमा ।।४-३६ राजबद्धन से सुवृद्धि, वृद्धि से केवल पौर केवल से मुति उत्पन्न हुमा ॥३७-३६॥ सुति से नर, नर से चन्द्र और चन्द्र से केवल का जन्म हुमा ॥४.४२॥ बेबल से दुधुमान्, चुन्धुमान से वेगमान्, वेगवान् से वुप बुध से तृणविन्दु और तृणविन्दु ने प्रपम मे वो इलविला नाम की एक परमा उत्पन्न को, फिर अलावुसा नाम की अप्सरा के मासक्त होने पर उमसे तृणबिन्दु ने विशाल नामक एक पुत्र उत्पन्न किया,' जिसने विशाला नाम से एक पुरी का निर्माण कराया ॥४३-४६॥ हेमचन्द्रश्च विशालरय पुत्रोऽभवत् 1101 ततश्चन्द्रः ॥५१॥ तत्तनयो धूम्राक्ष. ५२। तस्यापि सृञ्जयोऽभूत् ॥५३॥ सृञ्जयात्सहदेवः ॥५४॥ ततन कुशाश्वो नाम पुत्रोऽभवद १५५१ सोमदत्तः कृशाश्वाञ्जज्ञे योऽश्वमेधानो ४६०] [ श्रीविष्णुपुराण शतमाजहार ॥५६॥ तत्पुत्रो जनमेजयः ।५७॥ जनमेजयारसुमति: १५८॥ एते वैशालिका भूभृतः १५६ श्लोकोऽप्यत्र गीयते ।६०। तृणविन्दोः प्रसादेन सर्वे वैशालिका नृपाः । दीर्घायुपो महात्मानो वीर्यवन्तोऽतिधार्मिकाः ६१॥ शतिः कन्या सुकन्या नामाभवत् यामुपयेमे च्यवनः ॥६॥ प्रानर्तनामा परमधार्मिकरशर्यातिपुत्रोऽभवत् । ६३। पानतस्यापि रेवतनामा पुत्रो जज्ञे योऽसावानर्तविषयं बुभुजे पुरी च कुशस्थली- मध्युवास ६४१ विशाल का पुत्र हेमवन्द्र, हेमवन्द्र का पुत्र धूम्राक्ष हुआ। धूम्राक्ष के सृञ्जव, सृञ्जर के सहदेव और सहदेव के कुशाश्व की उत्पत्ति हुई ।।५०-५५।। कृशाश्व से सौ प्रश्वमेघो का कर्ता सोमदत्त हुआ। सोमदत्त से जनमेजय मोर जनमेजय से मुमति हुप्रा । यह सभी राजा विशाल के वाधर हुए । इनके विषय मे यह गाया जाता है ।।५६-६०॥ कि तृणबिन्दु के प्रसाद से विशाल वश के सभी राजा दीर्घायु, महात्मा, वीर्यवन्त तथा प्रत्यन्त धार्मिक हए ॥६१॥ मनु-पुत्र शर्याति के सुकन्या नाम की एक कन्या हुई जिसका पारिण प्रहण च्यवन ऋपि ने किया। ६२॥ शर्याति के एक प्रत्यन्त धर्मात्मा मानतं नामक पुत्र उत्पन्न हुमा । मानत मे रेवत हुमा, जिसने मुशस्थली नगरी मे निवास करते हुए पानत देश के राज्य को भोगा ॥६३.६।। रेवतस्यापि रैयतः पुत्रः ककुग्मिनामा धर्मात्मा भ्रातृशप्तस्य ज्येष्ठोऽभवत् १६५॥ तस्य रेवती नाम कन्याभवत् ।६६। स तामादाय कस्येयमहतीति भगवन्तमब्जयोनि प्रष्टुं ब्रह्मलोक जगाम ।६७। तावच्च ब्रह्मणोऽन्तिके हाहाहूहूसंज्ञाम्या गन्धर्वाभ्यामतितान नाम दिव्यं गान्धर्वमगीयत ।६८। तच्च विमार्गपरिवृत्तैरनेकयुगपरिवृत्ति तिष्ठन्नपि रंवतरशृण्वन्मुहूर्त्तमिव मेने ॥६६॥ गीतावसाने च भगवन्तमब्जयोनि प्रणम्य रेवतः कन्यायोग्य वरमपृच्छत् १७०। ततश्चासो भगवानकथयत् कयय योऽभिमतस्ते वर इति ७१। पुनश्च प्रणम्य भगवते तस्मै चतुर्थ अंश-अ०१] [ ४६१ यथाभिमतानात्मनस्स वरान् कथयामास । क एपा भगवतोऽभिमत इति यस्मै कन्यामिमा प्रयच्छामीति ।७२। रेवत का पुत्र रैवत ककुयी हुमा जो प्रत्यन्त धार्मिक और अपने सो भाइयों मे ज्येष्ठ था ॥६॥ उसके वो बन्या हुई उसका नाम रेवती हमा॥६६॥ उस पन्या को साप लेकर राजा रंदत ब्रह्माजी से वह कन्या किस वर के योग्य है-यह पूछने के लिये ब्रह्मलोक को गये ॥६७।। उस समय ब्रह्माजो के समक्ष हाहा मोर हूहू नामक दो गधर्व प्रतितान नामक दिम्य गोत मा रहे थे ॥६॥ वहाँ बिमार्ग परिवर्तन युक्त उप्स अद्भुत गीत को सुनते हुए राजा रेवत युगों के परिवर्तन काल तक वहाँ हरे रहे परन्तु उन्हें उतना समय रेवल एक मुहूर्त के समान ही व्यतीत हा सगा ॥६६॥ गीत के समाप्त होने पर महाराज रंवत ने कमलयानि भगवान् यो ब्रह्माजी को प्रणाम करके उनसे अपनी कन्या के योग्य वर के विषय मे प्रश्न रिया ७०॥ ब्रह्मा जी ने कहा-तुमने जो वर पसन्द किया हो उमे बताभो ॥६१॥ इस पर उन्होने ब्रह्माजी को पुनः प्रणाम किपा पोर जो-जो वर उनकी दृष्टि मे थे, वह यह सब उन्हें बताकर भश्न किया कि-इनमें से कौनसा वर प्रापको उचित प्रतीत होता है, जिसे मैं अपनी पह कन्या प्रदान कर दूं।७२॥ ततः किश्चिदवनतशिरास्सस्मित भगवानब्जयोनिराह १७३। य एते भवतोऽभिमता नेतेपा साम्प्रत पुनपौनापत्यापत्यसन्ततिरस्त्यव- नोतले ७४१ वहूनि तवाव गान्धर्वं शृप्वतश्चतुर्युगान्यतीतानि ७५॥ साम्प्रत महीतलेऽष्टाविंशतितममनोश्चतुर्युगमतीतप्राय वर्तते १७६। आसन्नो हि कलिः । ७७। अन्यस्मै कन्यारत्नमिद भवतका किनाभिमताय - देयम् 1७८। भवतोऽपि पुनमिनकलत्रमन्निभृत्यवन्यु बलकोशादयस्स- मस्ता कालेनतेनात्यन्तमतीताः ।७६। ततः पुनरप्युत्पन्नसाध्वसो राजा भगवन्त प्रणम्य पप्रच्छ 1401 भगवन्नेवमवस्थिते मयेयं कस्मै देयेति दश ततस्स भगवान् किञ्चिदवनम्रकन्धरः कृताञ्जलिर्भूत्वा सर्वलोक- गुरुरम्भोजयोनिराह ।।
४६२ [ श्रीविष्णुपुराण इम पर भगवान पायोनि ब्रह्माजी ने मस्तक झुकाकर कुछ मुमकाते हुए कहा-तुम्हे जो जो दर पमन्द हैं, उनमे से तो किसी की पुत्र-पौत्रादि रान्तान भी अब पृथिवी पर स्थित नहीं है ।।७४॥ क्योंकि यहाँ गंधों का गीत सुनते हुए कई चतुर्यु गियां व्यतीत हो चुकी है ।।७। इस समय पृथिवी पर अठ्ठाइसवें मनु की चतुर्युगी समाप्त होने को है और कलियुग का प्रारम्भ निकट है ।।७६ ७७॥ अब तुम एकाकी ही रह गरे हो, इसलिये इस कन्या-रत्न को किसी अन्य योग्य वर को प्रदान करो। इतने समय तुम्हारे पुत्र, मित्र, मलन, मत्रिगण, भृत्यगण, वधु-बाधव, सेना और कोपादि कुछ भी शेष नहीं रहा ।।७८.७६।। इस बात को सुनकर भयभीत हुए राजा रंक्त ने ब्रह्माजी को पुनः प्रणाम करके प्रश्न किया ।1८०॥ हे भगवन् । यदि ऐसा है तो अब मैं इम कन्या को किसे हूँ॥१॥ तब सब लोको के गुरू ब्रह्मा जी ने बुध मस्तक झुका कर हाथ जोडने हुए कहा ॥२॥ न ह्यादिमध्यान्तमजस्य यस्य विमो वय सर्वमयस्य धात' । न च स्वरूप न पर स्वभाव न चैव सार परमेश्वरस्य ।। पलामुहूर्तादिमयश्व कालो न यद्विभूते. परिणामहेतु.। अजन्मनाशस्य सर्दकमूर्तेरनामरूपस्य सनातनस्य ।।४। यस्य प्रसादादहमच्युतस्य भूत. प्रजासृष्टिवरोऽन्तकारी। सोधाच रद्र स्थितिहेतुभूतो यस्माच मध्ये पुरुप. परस्मात् ।५। मद्स्पमास्थाय सृजत्यजो य स्थितौ च योऽसो पुरषस्वरूपी। रद्रस्वरपेण च योऽत्ति विश्व पत्ते तथानन्तवपुस्समस्तम् १८६। पापाय मोऽग्नित्वमुपैति लोवान्विति पृथ्वीवपुरख्ययात्मा। शादिस्पी परिपाति विश्वमर्येन्दुरूपश्च तमो हिनस्ति ।१७। परोति चेष्टारवसनस्वरूपी लोकस्य तृप्ति प जलाग्नस्पी। ददाति विश्व स्थितिगस्थितस्तु सविकास व नभस्वरूपी 1 यस्मृज्यते मगंदात्मनंव य पाल्यते Trfrom rव । विश्वात्मवस्सहि यतेन्तयारी पृथक् ।
[ ४६३ चतुर्थ ग्रंश अ०१] यस्मिञ्जगद्यो जगदेतदाद्यो यत्राश्रितोऽस्मिञ्जगति स्वयम्भू । स सर्वभूतप्रभवो घरिश्या स्वाशेन विष्णुर्नु पतेऽवतीर्ण. 1801 श्रो ग्रह्माजी बोले-जिन वन्म-रहित, सर्वात्मक परमेश्वर के मादि, मध्य, अन्त को हम नहीं जानने और जिनके रूप, पेट स्वभाव और सार का ज्ञान भी हमको नहीं है ।।८३॥ जिनकी विमति के परिणाम का कारण कला मुहूर्तादि युक्त कार भी नहीं हो सकता तया जो जन्म-मरण स रहित, सनातन नाम-रूप से रहित एव सदाही एक रूप है ॥४॥गिन प्रगुत भगवान के प्रमाद से में प्रजोत्पत्ति का कर्ता हूँ और जिनके क्रोध स उत्पन्न होकर रुद्र सृष्टि का पन्त करने में समर्थ होते हैं तथा जिनसे विश्व की स्थिति करने वाले विष्णु सो पुरुष प्रकट इए हैं । जो प्रत्र-मा मेरे रूप में विश्व की रचना पुरुष रूप मे स्थिनि और रुद्रप मै सम्पूर्ण विश्व को प्रप लेता है तथा मनन्त रूप वै उमो विश्व को धारण करता है ॥६५जो प्र-गयात्मा परिपाक करन के लिए अग्नि रूप होता तथा पृथिवी रूप से सब लोको को धारण करता हैं, इन्द्रादि के का में जगत् का पालन करता तथा सूर्य, चन्द्रमा के रूप में राव पन्धकार का हरण कर लेता है ॥७॥ो श्वास-प्रश्वास रूप में प्राणिरों को चेष्ठावान करता है, अन्न, जल के रूप में ससार को तृति करता है पौर जगत् पी स्थिति के काय को करना हुप्रा जो सभी को प्राकार रूप से अवकाश प्रदान परदा है 14 जो अमात्मा सृष्टि का रचने वाला होका भी स्वय ही विश्व २प से उत्पन होता और विश्व का पालनरत होकर भी स्वय पालित होता है तथा सहारक्त होकर भी स्वयं ही नष्ट हो जाता है । जिसमें यह स सार स्थित है और जो प्रादि-पुरुष विश्व-रूप है और विश्व के ही पाधिन स्वयं तत्राप्त होने वाला है । हे राजन् । मभी भूतों का उद्भवस्यल वह विष्णु भगवान् पृथिवी पर अपने यश से उत्पन्न होता है ॥१०॥ कुशस्थली या तव भूप रम्या पुरी पुराभूदमरावतीव । सा द्वारका सम्प्रति तर चास्ते स केशवाशो बलदेवनामा ।। तस्मै त्वमेना तनया नरेन्द्र प्रयच्छ मायामनुजाय जायाम् । साध्यो वरोऽसौ तनया तवेय नीरत्नभूता मदृशो हि योग. 18 ६ । ४६४ [श्री विष्णुपुराण इतीरितोऽसौ कमलोद्भवेन भुवं समासाद्य पतिः प्रजानाम् । ददर्श ह्वस्वान् पुरुपान् विरूपानल्पोजसस्स्वल्पविवेकवीर्यान् ।। कुशस्थली तां च पुरीमुपेत्य दृष्ट्वान्यरूपां प्रददौ स कन्याम् । सीरायुधाय स्फटिकाचलाभवक्षः स्थलायातुलधीनरेन्द्रः ६४। उच्चप्रमाणामिति तामवेक्ष्य स्वलाङ्गलाग्नग च तालकेतुः । विनम्रयामास ततश्च सापि बभूव सद्यो वनिता यथान्या ।९५) तां रेवती रेवतभूपकन्यां सीरायुधोऽसौ विधिनोपयेमे । दत्त्वाथ कन्यां स नृपो जगाम हिमालयं वै तपसे धृतात्मा ६६) हे राजन् ! अमरावती के समान तुम्हारी कुशस्थली नाम की नगरी पद द्वारावती हो गई है। वहां भगवान विष्णु के मंश रूप बलदेवजी स्थित हैं HED तुम पानी इस कन्या को माया से मनुष्य बने बलदेवजी को ही भार्या रूप में प्रदान कर दो । वह बलदेवजी जगत् मे अत्यन्त प्रशसा के पात्र हैं और तुम्हारी यह पुत्री भी रत्न है, इसलिए इन दोनों का मिलन उपयुक्त रहेगा ॥२॥ श्री परादार जी ने कहा-श्री ब्रह्माजी द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर महाराज रंवत भूतल पर लौटे मोर उन्होंने देखा कि सब मनुष्य घोटे कद के, रूपहीन, म्यून तेज वाले, मल-वीर्य और मतिहीन हो गए हैं ॥३उन्होने अपनी कुश- स्थली नाम की नगरी को नितान्त परिवर्तित रूप में पाया और स्फटिकापल के समान वक्षस्थल वाले बरामजी को अपनी कन्या प्रदान कर दी ॥६४ाजा उन बलदेवजी ने उसे अत्यन्त ऊँचे शरीर को देखा तो अपने हल के मगले भाग मे दवा कर छोटे कद की पर दो। ऐना करने से वह रेवती भी उस समय को चतुथ ग्रंश-०२] [४९५ दूसरा अध्याय यावच्च ब्रह्मलोकाल क्कुग्री रेवतो नाभ्येति तावत्पुण्यजनसज्ञा राक्षसास्तामस्य पुरी कुगस्थली निजघ्नु ।१॥ तच्चास्य भ्रातृशत पुण्य- जननासाहिशो भेजे ।। तदन्वयाश्च क्षनियास्सर्वदिश्वभवन् ।। धृष्ट- स्यापि धाष्टक क्षत्रमभवत् ।। नाभागस्यात्मजो नाभागसज्ञोऽभवत् ।। तस्याप्यम्बरीप वा अम्बरीपस्यापि विरूपोऽभवत् ।। विस्पात्पृपदश्वो जज्ञे ।। ततश्च रयीतर । अनाय श्लोक एते क्षरप्रसूना वै पुनश्चा- हिरसा स्मृता । रथीतराणा प्रवरा क्षनोपेता द्विजातय ॥१०॥ यो पराशरजी ने कहा--जब तक रेवत बकुग्री ब्रह्मलोक मे नहीं लौटे, तमो पुण्यजन नामक गक्षमा ने उनकी कुदास्थली पुरी को नष्ट भ्रट कर दिया ॥१॥ उनके जो सौ भाई थे, वे सब उन पुग्यजन राससों के भय के कारण दसों दिशाओं म भाग गये ॥२॥ उन्ही सबक वापर क्षत्रियगए उन सब दिद्यानों में फैल गए ॥३॥ पुष्ट का वश घाटक नामर क्षत्रियों के रूप में हुमा नामाग का पुत्र भी नाभाग सनक हुमा, जिसका पुत्र मम्बरीप पर भम्बरोप वा पुत्र विरूप हुमा । विस्म का पुत्र पृपदव हुपा पौर पदश्व से रयोतर की उत्पत्ति हुई ॥५॥ उम रसोतर के विषय म यह श्लोक प्रनिट है- स्थीतर के वचपर क्षत्रिय होते हुए भी प्रागिरस कहला र क्षत्रोपेत प्राह्मण हुए ॥१०॥ इति श्रुतवतश्च मनोरिक्ष्वाकु पुमो जने प्राररात १० तस्य पुत्रशतप्रधाना विकुक्षिनिमिदण्डास्यास्त्रय पुत्रा बभूव ।१२गनि- प्रमुवा पञ्चारात्पुत्रा उत्तरापथरक्षितारो बभूवु १३॥ चत्वारिंदादष्टी च दक्षिणापयभूपाला ॥१४॥ स चेक्ष्वाकुरष्टकायाश्यादमुत्पाद्य पाढाई मासमानयेति विकुक्षिमामापयामास ॥१५॥ स तयेति गृहीताजो विधृत- गरासनो वनमभ्येत्यानेक्शो मृगान हत्या प्रान्तोऽतिशुत्परोनो विकुक्षि- रेक गगममक्षयत् । शेष घमासमानीय पिये निवेदयामास ॥१६॥ इक्ष्वाकुचुलाचार्यों वशिष्ठस्तत्प्रोक्षणाय चोदित प्राह । मलमनाम-
४८६ ]
[ श्रीविष्णुपुरगण
ध्येनामिपेण दुरात्मना तव पुत्रैतन्मांसमुपहत यतोऽनेन गमो भक्षितः
१७) ततश्चासो
विकुक्षिप्रणवमुत्तरमशादमंज्ञामवाप पित्राच
परित्यक्तः ।१८। पितर्युपरते चासावखिलामेतां पृथ्वी धर्मतश्शशाप्स
१३ शशादस्य तस्य पुरञ्जयो नाम पुत्रोऽभवत् ॥२०॥
छींकते समय मनु को नामिना से वाकु नामक पुत्र उदान हुप्रा.११॥
उनके सौ पुत्रों में विकृति, निमि पौर दराड पह तीन पुत्र प्रमुख हुए पोर
उनके शवुनि प्रादि पचास पुत्र उत्तरापथ के और भढतालीस पुत्र दक्षिणापथ के
अधिकारी १२-१४।। राजा इक्ष्वावु ने प्रष्टका प्राद्ध का प्रारम्भ किया
और अपने पुत्र विकुक्षि को थान-योग्य मन लाने की माज्ञा दी ॥१५॥ उसने
उनकी आज्ञा मान
कर पनुप-चाप ग्रहण किया और वन मे प्राकर मृगों को
मारने लगा। उस समय अत्यन्त धुपारी होने के कारण विकुक्षि ने उनमे से
एक खरगोश भक्षण कर लिया भोर शेष माम पिता के समक्ष लाकर रखा॥१६॥
उस मांस को धोने की प्रार्थना किए जाने पर राजा इक्ष्वाकु यो आचार्य
वसिष्ठजी ने कहा कि -तुम्हारे दुरात्मा पुत्र ने इस मास अपवित्र कर दिया
है, उसने इसमे से एक खरगोश का भक्षण किया है, इसलिए इस दूषित माग
की क्या प्रवश्यकता है ? ॥१७॥ उसी समय मे विकुक्षि का नाम शशाक हो
गया और गुरु के वचन सुन पर पिता ने उसका त्याग कर दिया ॥१८॥ परन्तु
पिता को मृत्यु हो जाने पर उसी ने इस गृयिवी पर धर्म पूर्वका राज्य किया
॥१६॥ उस शाद का पुत्र पुरश्चय हुआ ॥२०॥
तस्येद चान्यत् ।२श पुरा हि त्रेतायां देवासुरयुद्धमतिभीपणम -
भवत् १२१ तत्र चातियलिभिरसुरैरमराः पराजितास्ते भगवन्त विष्णु-
माराधयाञ्चक : २३ प्रसन्नश्च देवानामनादिनिधनोऽखिलजगत्परायणों
नारायणः माह 1२४॥ ज्ञातमेतन्मया युष्मामियदभिलपितं तदर्थमिद
श्रूयताम् १२५॥ पुरायो नाम राजश्शशादस्य तनयः क्षत्रियवरी
यस्तस्य शरोरेऽहमशेन स्वयमेवावतीर्य तानशेपानसुरानिहनिष्यामि
तद्भवद्भिः पुरखयोऽसुरवधार्थमुद्योग कार्यतामिति ॥२६॥
चतुर्य अश-०२] [४६७ पुरञ्जय का भी एक दूसरा नाम पड़ा ॥२१॥ पूर्व काल को वात है-प्रेता या मे एक बार अत्यन्त मयङ्कर देवासुर युद्ध हुप्रा ॥२२॥ उसमे अत्यन्त वली दैत्यो से देवगण पराजित हो गए और तब उन्होने भगवान् विष्णु को प्रराधना को ॥२३॥ उस समय प्रादि-अन्त से रहित, विश्व का परिपालन मरने वाले भगवान् श्री नारायण ने प्रसन्न होकर उन देवतानो से कहा ॥२४॥ आपकी जो कामना है, उस में जान गया हूँ, अब उसके विषय मे मेये बात सुनो ॥२५॥ राजपि शशाद के पुत्र पुर जय के देह मे स्वय मैं ही अपने भरा से मवतीणं होकर उन मब दंत्यो वा सहार करूंगा। इसलिए तुम उम पुर जय को दैत्यों से मारने के कार्य मे तत्पर करो ॥२६।। एतच्च श्रुत्वा प्रणम्य भगवन्त विष्णुममरा. पुरञ्जयसकाश- माजग्मुरूचुश्चनम् ।२७ भो भो क्षनियवस्मिाभिरयथितेन भवता- स्माकमरातिवधोद्यताना कर्तव्य साहाय्यमिच्छाम तद्भवतास्माक- मभ्यागताना प्रणयभङ्गो न कार्य इत्युक्त पुरञ्जय प्राह ।२८। त्रैलोक्य- नायो योऽय युष्माकमिन्द्र शतक्रतुरस्य यद्यय स्कन्धाधिरूढो युप्मा- कमरातिभिस्सह योत्स्ये तदह भवता सहाय स्याम् ॥२६॥ इत्यावर्ण्य समस्तदेवरिन्द्र ण च वाढमित्येव समन्वीप्सितम् ।३०। ततश्च शतक्रतो- परूपधारिण ककुदि स्थितोऽतिरोपसमन्वितो भगवतश्वरा चरगुरो- रच्युतस्य तेजसाप्यायितो देवासुरसङ,ग्रामे समस्तानेवासुरानिजघान 1३१॥ यतश्च वृपभककुदि स्थितेन राज्ञा देतेयवल निपूदितमतवासी ककुत्स्थसज्ञामवाप ।३२। यह सुन कर भगवान को प्रणाम करके देवगण वहां से चल दिए और पुरजप के पास पहुंच कर बोले ॥२॥हे क्षत्रियदर । अपने पापों को नष्ट परने मे तत्पर हुए हम अपनी सहायता के लिये यहाँ आये हैं। पाप हमारी याचना को मम्बीर न करें। इस पर पुर जय बोले ॥२८॥ इन तीक्यनाथ पतकतु इन्द्र के कन्धे पर माल्ट होकर यदि में युद्ध कर सकू तो अवश्य ही मापकी सहायता कर सकता हूँ॥२६॥ उनकी बात सुनकर सनी देवगण महित इन्द ने उसे स्वीकार कर लिग ॥३०॥ और दृरभ रूपधारी इद्र की पीठ पर ४९८ ] [ श्रीविष्णुपुराण पारूढ होकर भगवान विष्णु के तेज से परिपूर्ण हुए वह राजा युद्ध मे पहुंचे पौर उन्होंने शोधपूर्वक उन सब दैत्यो का वध कर दिया ॥३१॥ उन्होने इन्द्र रूपी बैल के ककुद (कधे) पर चढकर देत्य-सेना का सहार किया था, इसलिये वह ककुस्थ नाम से विख्यात हुए ॥३२॥ ककुत्स्थस्याप्यनेनाः पुत्रोऽभवत् ॥३३॥ पृथुरनेनसः ।३४। पृथो- विष्टराश्वः । तस्यापि चान्द्रो युवनाश्वः ।३६। चान्द्रस्य तस्य युवना- श्वस्य शावस्त: यः पुरी शावस्ती निवेशयामास ।३७) शावस्तस्य वृहदश्वः ।३८। तस्यापि कुवलयाश्वः ।३६। योऽसावुदस्य महर्षेर- पकारिणं धुन्धुनामानमसुरं वैष्णवेन तेजसाप्यायितः पुत्रसहस्र रेक- विशद्भिः परिवृतो जघान धुन्धुमारसंज्ञामवाप ।४०। तस्य च तनया- स्समस्ता एव धुन्धुमुखनिःश्वासाग्निना विप्लुष्टा विनेशुः ।४१। दृढाश्व- चन्द्राश्वकपिलाश्चाश्च अयः केवलं शेपिताः ।४२। ककुस्प का पत्र भनेना हुपा । ३२भने-1 का पुत्र पृथु, पृयु का विष्ट. राश्व का पान्द्र युवनाश्व और उसका पुत्र शावस्त हुमा, जिसने शावस्ती पुरी को बसाया ।३४.३७ पावस्त के वृहदश्व पोर बृहदश्वके वुनलगाव हुमा, जिसने भगवान् विष्णु के तेजसे परिपूर्ण होकर माने इसकीस हजार पुत्रोंको साथ लेकर महपि उदर का भपकार रन वाले धुन्धु नामक दैत्य का संहार किया था, इसलिए उसका नाम पुग्मुमार भी पड गया था। ॥३८.४०॥ उनके सब पुत्र पुन्यु के मुख से निर्गत हुई श्वासोच्छ्वास रूपी मग्नि में भस्म हो गये ॥४॥ उनमे मे हाय, चन्द्राय पोर पिलाय नामर तीन पुत्र ही दोष बपे पे ॥४२॥ हवाश्चाद्धर्यश्वः।४३॥ तस्माच नियुम्भः।४ा निकुम्भस्यामिताश्वः ।। ततश्च याश्वः ॥४६॥ तस्माच प्रसेनजित् 11७1 प्रसेनजितो युयनाश्चोभवत् ।४। तस्य पापुत्रस्यातिनिर्वेदान्मुनीनामाश्रममण्डले निवगतो पानुभिमुनिभिरपत्योत्पादनायेष्टिः पृता ४६। सरयां प मप्यरात्री निवृत्तायां गन्नपूतजसपूर्ण क्लागं वैदिगध्ये निवेश्य से मुनयः गुपुर ।५०। गुप्लेगु तेषु पतीय तृट्परीतस्स भूपालरतमाश्रमं वियेश चतुर्य प्रश-ग्र०२] [४९९ १५॥ सुप्तांश्च तानृपीनवोत्यापयामास १५२॥ तच्च क्लरामपरिमेय- माहात्म्यमन्त्रपूतं पपी ५३ प्रबुद्धाश्च ऋषयः पप्रच्छु. केनेतन्मन्त्रपूर्त वारि पीतम् ॥५४ा अन हि राज्ञो युवनाश्वस्य पली महावलपराक्रम पुत्रं जनयिष्यति । इत्यावर्ण्य स राजा अजानता मया पीतमित्याह १५५। गर्भश्च युवनाश्वस्योदरे अभवत् क्रमेण च ववृधे ।५६॥ प्राप्तसमयञ्च दक्षिणं कुक्षिमवनिपतेनिभिद्य निधकाम १५७॥ न चासो राजा ममार।५८ दृडादव से हश्वि, हर्पश्च से निकुम्भ, निकुम्भ ने भमिनाव, प्रमिताइव से कृशाश्व, कृशाश्व से प्रसेनजिम् और प्रमेनजित से युवनाश्व उत्पन्न हमा १४३.४८ वह युवनाश्व सन्नानहीन होने के कारण दुसित चित्त से महर्षियों के माधय में रहने लगा ॥४॥ प्राघो रात के गनय जब वह यज्ञ सम्पूर्ण हो गया, तब महर्षिगण मन्त्रपूत जन से परिपूर्ण स्ना को वेसे में रख कर सो गये ॥ ५० ॥ उनके सोने के पक्षाने राजा को अत्यन्त प्याम लगी पोर उसने का स्थान में प्रवेश किया और ऋषियों को शयन करते हर देखार उसने उन्हें नहीं जगापा ॥५१.५॥ पास को न रोक साने के कारण उसने उमी मानत पप का पान कर लिया ॥५३॥ जब ऋषिगण की निद्रा भग दुई तब उन्होंने क्ला को जल-रहित देखा तो उन्होंने पूछा कि इस मन्त्रत जल का मिलने पान किया है ? ॥५४॥' इमो उन को पीरर युवनाश्व की भार्या अत्यन्त बन. विक्रम युक्त पुत्र को जन्म देगी । तब राजा ने कहा-इस बात से बिना जाने मैंने हो इस जल को पी लिपा है ।।५।। इस प्रकार युवनाश्व के उदर में गर्भ स्थिति हो गई और वह गर्म क्रमशः वृद्धि को प्राप्त होने लगा ॥५६॥ समय मात कर राजा की दाहिनी कौत से फोहना यह गर्म बाहर निाल पापा ॥१६॥ परनु राजा उससे मरा नहीं ॥५॥ जातो नामैप क धास्यतीति ते मुनयः प्रोचु: ।५६। प्रयागत्य देवराजोऽब्रवीत् मामय धास्य तीति ।६० ततो मान्धातृनामा सोऽभवत् । वने चास्य प्रदेशिनी देवेन्द्र न्यस्ता ता पपो ६शता चामृत- साविणीमास्वाद्याहू व स व्यवद्धत ।। ततस्तु मान्पाता चक्रवर्ती जिससे वह ५०० । [ श्रीविष्णुपुराण सप्तद्वीपा मही बुभुजे ॥६॥ तमाय दलोव ६४। यावत्सूर्य उदेत्यस्त यावच्च प्रतितिष्ठति । सर्व तद्यौवनाश्वस्य मान्धातु क्षेत्रमुच्यते ॥६५॥ उम दाल के उत्पन्न होने पर ऋपिाण बोर-यह वाला क्या पीकर जीवित रहेगा ? 18 तभी देवरा इद्र ने वहाँ उपस्थित होकर रहा-यह मेरे माथय म जीवित रहेगा ॥६॥ इसलिए उसका मान्धाता नाम पहा । इन्द्र ने उसके मुष म अपनी तर्जनी पंगुली देकर अमृत-पान पराग, उसो दिन बढ़ गया ११६२।। उसी समय से मापाता सातों द्वीप पानी सम्पूर्ण पृथिवी का चक्रवर्ती राजा हुमा ॥६॥ इपवे विश्व म यह शोर प्रसिद्ध है - सूर्गेदय के स्थान स सूर्यास्त के स्थान पर्यंत सभी क्षेत्र युवनाव-पुत्र मान्याता के माधीन है ॥६४ ६५॥ मान्धाता शतविन्दोर्दुहितर विन्दुमतीमुपये मे।६६। पुरकुत्स- मम्बरीष मुचुकुन्द च तस्या पुत्रयमुत्पादयामास १६७। पञ्चाशद्द हि- तरस्तस्यामैव तस्य नृपतेर्वभूव ।६८। तस्मिन्नन्तरे वह वृचश्व सौभरि- र्नाम महपिरन्तजले द्वादशाब्द कालमुवास ।६६। तर चान्तर्जले सम्मदो नामातिवहुप्रजोऽतिमानप्रमाणो मीनाधिपतिरासीत् ७०। तस्य च पुत्रपौनदौहिना पृथ्तोऽग्रत पार्श्वयो पक्षनुच्छशिरसा चोपरि भ्रमन्त- स्तेनैव सदानिशमतिनिता रेमिरे ७१। स चापत्यस्पर्शोपचीयमान- प्रहर्षप्रकर्षो बहुप्रकार तस्य मृये पश्यतस्तैरात्मजपुत्रपौत्रोहिनादिभि सहानुदिन सुतरा रेमे १७२॥ अथान्तर्जलावस्थितस्सौभरिरेकाग्रतस्स- माधिमपहायानुदिन तस्य मत्स्यस्यात्मजपुत्रपौत्रदौहित्रादिभिस्सहाति रमणीयतामवेक्ष्याचिन्तयत् ।७३। अहो धन्योऽयमीदृशमनभिमत योन्य- न्तरमवाप्यभिरात्मजपुत्रपौनदौहिनादिभिस्सह रममाणोऽतीवास्माक स्पृहामुत्पादयति ७४१ वयमप्येव पुनादिभिस्सह ललित रस्यामहे इत्येवमभिकाइ क्षन् स तस्मादन्तर्जलानिष्क्रम्य सन्तानाय निवेष्टुनाम कन्या मान्धातार राजानमगच्छत् ॥७॥ शवविदु की पुत्री रिदुमती से उस मान्याता ने विवाह मिया, जिससे पुस्तुम, अम्बरीष और मुचुकुन्द नामक तीन पुत्र और पचास कन्याए उरान चतुर्प-अंध-प०२] [५०१ हुई. उसी कान की बात है कि दव-पुत्र सौगरि ऋषि ने बारह वर्षक बल में रहार ठा दिया l उसी इन में सम्मद नामा एक विधात देह वाला मन्परार रहना पा बितरे पटुत-नो सन्ताने om पुत्र, पौत्र, दौहिर मादि पर भारंगी, घर-घर तुपा मोर मस्त पर हपित होते हुए भूमदे हर माप क्रीडा-रउ रहने 20 पौर यह भी करने वालों में कोमन स से मपन्न प्रयत्न होकर उन मुनि के सामने ही दिन-रात खेलता रहता था 11 प्रकार जन में प्ले हुए सौर्माधिमानी तन्मयता युक्र म पि को स्वाम र मनिश उप मर- रार की उन बारकों के साथ होने वाली क्रीडा को दखा रहा और फिररहोंने सोचा क्षाप्रदो, यह कंडा ठार है को तो नि? योनि को भान हुमा भी करने पुत्र, पौत्र, दौहिमादि के साप निरन्तर कोदा करता हुप्रा हमारे हृदय में ईयां उन कर रहा है। इसी प्रकार हन मी माने आदि के माय प्रपन ललित बासकोडा करें। ऐलो कामना परत हुए भूमि रस बन से बाहर निकले भौर सन्तान के निमित्त महम्पायन में पवित्र होन को मिलापा कन्या-माप्ति के है। राजा मान्धाता के यहां पहुंचे ! प्रागमनथवानमनन्तर चोत्याय तेन राजा सम्यगादिना सम्पूजित. कृताननपरिग्रह नौनरिगच राजानन ॥३॥ निवेटुकामोऽस्मि नरेन्द्र पन्या प्रयच्छ मे मा प्रणय विभाइ मो. 1 न ह्यर्थिनः कार्यवसापता पन्यवगे विनुवाः प्रयान्ति 1351 अन्वेपि सन्त्येव नृपा पृषिमा माल्यानरेश तनपा. प्रसूता । विपिनापितदानदीक्षानद्रत दलाध्यमिद कुल ते 11 मतार्ययस्थानव मन्दि पन्यास्तासा ममा नपने प्रयच्छ । सायनामहमयादिमि नम्मादह राववरानि वात् ।। इति पिपचनमार य म राजा जरानजरितदेहषिमालोक्स प्रन्यान्यानकातरम्तन्माच गापनीतो विविधियोमबधिर दथ्यो जिससे वह ५०० ] [ श्रीविष्णुपुराण सप्तद्वीपा मही बुभुजे ।६३तत्राय दलोव 1६४। यावत्सूर्य उदेत्यस्त यावच्च प्रतितिष्ठति । सर्वं तद्यौवनाश्वस्य मान्धातु क्षेत्रमुच्यते ॥६॥ उम दालक के उत्पन्न होने पर पिण बोने-यह बालब क्या पीकर जीवित रहेगा ? ॥५६॥ तभी देवरार इन्द्र ने वहाँ उपस्थित होर कहा- यह मेरे माधय म जीवित रहेगा ॥६०। इसलिए उमका मान्याता नाम पडा । इन्द्र ने उसके मुख म अपनी तर्जनी मंगुली देकर अमृत-पान पराग, उसी दिन बढ गया ॥६१ ६२॥ उसी समय से मान्धाता सातो द्वीप बाली सम्पूर्ण पृथिवी का चक्रवर्ती राजा हुआ॥६॥ इसके विस म यह श्लोर प्रसिद्ध है- सूर्योदय के स्थान से सूर्यास्त के स्थान पर्यंत सभी क्षेत्र युवनाश्व-पुत्र मान्धाता के प्राधीन है ॥६४.६५।। मान्धाता शतविन्दोर्दुहितर विन्दुमतीमुपये मे १६६। पुरकुत्स- मम्बरीष मुचुकुन्द च तस्या पुत्रत्रयमुत्पादयामास १६७। पञ्चाशद्द हि- तरस्तस्यामेव तस्य नृपतेर्वभूवु ६८ तस्मिन्नन्तरे वह वृचश्च सौभरि- म महर्पिरन्तर्जले द्वादशाब्द कालमुवास ।६६। तत्र चान्तर्जले सम्मदो नामातिवहुप्रजोऽतिमानप्रमाणो मीनाधिपतिरासीत् १७०। तस्य च पूत्रपौत्रदौहिना पृष्टतोऽग्रत पायो पक्षपुच्छशिरसा चोपरि भ्रमन्त- स्तेनैव सदाहनिशमति निर्वृता रेमिरे १७१। स चापत्यस्पर्शोपचीयमान- प्रहर्षप्रकर्षो बहुप्रकार तस्य ऋपे पश्यतस्तरात्मजपुत्रपौत्रदौहित्रादिभिः सहानुदिन सुतरा रेमे १७२। अथान्तर्जलावस्थितस्सौभरिरेकाग्रतस्स- माधिमपहायानुदिन तस्य मत्स्यस्यात्मजपुत्रपौनदौहित्रादिभिस्सहाति रमणीयतामवेक्ष्याचिन्तयत् ७३१ ग्रहो धन्योऽयमीदृशमन भिमत योन्य- न्तरगयाप्य भिरात्मजपुत्रपौनदौहिनादिभिस्सह रममाणोऽतीवास्माक स्मृहामुत्पादयति ।७४। वयमप्येव पुत्रादिभिस्सह ललित रस्यामहे इत्येवमभिकाइ क्षन् स तस्मादन्तर्जलान्निष्क्रम्य सन्तानाय निवेष्टुवाम कन्याथं मान्धातार राजानमगच्छत् 1७५) शवविन्दु को पुत्री विन्दुमप्ती स उस मान्धाता ने विवाह किया, जिससे पुरुषुस, अम्बरीप और मुचुकुन्द नामक तीन पुत्र और पचास कन्याएं उत्पन्न चतुर्य-अंग-प्र०२] [५०१ हुई ६.६८रसो कान की दात है कि यहवृच-पुत्र सोमरि ऋषि ने बारह वर्ष जल में रहार कर रिया ॥६॥ सो उनमें सम्मद नामर एक विशाल देह वाला मत्स्परा रहता था जिसके बहुत भो मन्त्रानेच 3011 उसके पुत्र, पौत्र, दौहित्र प्रादि उनके मारे-गोधे, इधर-उधर पा धोर माता पर हपित होते हुए घूमचे हर उसके साथ क्रौड़ा-रहा ये ॥ पौर वह भी मरने वालों के वोमन सांसे मत्यन्त श्मन्न होकर टन मुनि के सामने ही दिन-रात बैलता रहना या III इस प्रकार व में रहते हुए सोमरि कृषि यानो तन्मयता मुक्त समापि को त्याग कर मनिशि उनमस्र- राज की उन सतरों के साथ होने वाली क्रीडा को देखते रहो मोर फिरउन्होंने सोवा महो, यह कैसा ताप है तो ऐमी नि योनि को प्राप्त हुना भी पपने पुत्र, पौत्र, दौहियादि के साप निरन्नर कीहा करता हुप्रा हमारे हृदय में ई उडान कर रहा है। इस प्रभार हर मोमाने वादि के मार अत्यन्त नलित बालक्रीम परें। ऐसी कामना करते हुए कृषि म जन से बाहर निकले और सन्तान के निमित्त महायान में प्रविष्ट होने की प्रमिलापा करते हुए कन्या प्राप्ति के हेनु राजा मान्धाता के यहां पहुंचे 31 J प्रागमनयवरणसमनन्तरं चोत्याय तेन राजा सम्बगादिना सम्पूजितः कृतासनपरित्रहः सौमरिस्वाच राजानम् ।। निवेष्टुकामोलि नरेन्द्र कन्या प्रपञ्च मे मा प्रणयं विभाड योः । नाधिनः कार्यवशायुपेताः ककुल्यवगे विमुवाः प्रवान्ति !381 अन्येऽपि सन्त्येव नृपाः पृपिव्या मान्धातरेषा तनयाः प्रभूताः । किं वथिनामर्थितदानदीक्षाकृतवत श्लाघ्यमिदं कुलं ते १७६१ सताघसंस्थास्तव नन्ति पन्यास्तानां ममैका नृपते प्रयच्छ। सत्रायनानगमयादिमि तस्मादहं राजवरातिदुःखात 131 इति पिवचनमावर्ग म राजा जराजर्जस्तिदेहमृपिमालोरय प्रत्यास्थानकातरस्तस्माच शापभीतो विन्यत्किञ्चित्यामुनधिरं दच्या 1201 ५०२ ] [ श्रीविष्णुपुराण नरेन्द्र कस्मात्समुपैपि चिन्ता मसह्यमुक्त न मया किञ्चित् । यावश्यदेया तनया तयैव कृतार्थता नो यदि कि न लब्धा ।१॥ अपि के आने की बात सुन कर राजा अपने सिंहासन से उठे और उन्होने पि को मध्य देकर उनका पूजनादि किया। तब श्रेष्ठ म सन को प्राप्त हुये सोमरि ऋषि राजा से बोले ॥७६॥ सौभरि ऋषि ने कहा-हे रामन् ! मैं कन्या प्राप्त करने का इच्छुक हूँ, इसलिए तुम मुझे एक कन्या प्रदान करो। मेरा प्रणय भङ्ग न हो, वह कार्य करो। क्योकि ककुस्य वचा में किसी प्रकार की काममा लेकर माया हुपा कोई भी याचक खाली हाथ कभी नहीं जाता ॥७॥ हे मान्धाता ! भूतल पर मन्य भनेक राजा है पोर उनके यहाँ कन्यायें है, परन्तु याचको की इच्छित वस्तु प्रदान करने में दृढ प्रतिज्ञ तो तुम्हारा यही वंश विख्यात है ॥७८॥ हे राजन् ! तुम अपनी पचास कन्यानो मे से मुझे केवल एक ही कन्या प्रदान कर दो, क्योकि मैं इस समय इम कष्ट से अस्मत भयभीत हूँ कि कहीं मेरी प्रार्थना भङ्ग न हो जाय ।।७।। श्री पराशरजी ने कहा-- ऋषि के वचन सुन कर उनके वृद्धावस्था से जोएं हुए देह को देखता हुमा राजा माप की पाशङ्का से भयभीत होकर अपने मुख को नीचा किए हुए मौन चिन्तन करने लगे 100|| सौभरि ने कहा-हे राजन् ! तुम क्या चिन्तन कर रहे हो ? मैंने कोई ऐसी बात तो कही नहीं, जो प्रसह्य समझी जा सके । तुम्हे अपनी जो कन्या एक दिन किसी को अवश्य देनी है. उसे प्राप्त कर यदि मैं ही कृतार्य हो सकू तो तुम्हें क्या उपलब्ध नही हो सकता ? ॥११॥ अथ तस्य भगवतश्शापभीतस्सप्रश्रयस्तमुवाचासौ राजा ।। भगवन् अस्मत्कुलस्थितिरिय य एव कन्याभिरुचितोऽभिजनवान्वरस्तस्मै कन्या प्रदीयते भगवद्याच्या चास्मन्मनोरथानामप्यतिगोचरत्तिनो कथम- प्येषा साता तदेवमुपस्थिते न विद्यः किं कुर्म इत्येतन्मया चिन्त्यत इत्यभिहिते च तेन भूभुजा मुनिरचिन्तयत् ६३। अयमन्योऽस्मत्प्रत्या- ख्यानोपायो वृद्धोऽयमनभिमतः खीरणा किमुत कन्यकानामित्यमुना सश्चिन्त्येतदभिहितमेवमस्तु तथा वरिष्यामीति सन्चिन्त्य मान्धातार- मुवाच ।।४। यद्य व तदादिश्यतामस्माकं प्रवेशात कन्यान्तःपुरवर्षवरो [ ५०३ चतुर्य अश-प्र०२] यदि कन्यव का चिन्माम भिलपति तदाह दारसग्रह करिष्यामि अन्यया चेत्तदलमस्माकमेतेनातीतकालारम्भरणेनेत्युक्त्वा पिरराम ।श श्री पराशरजी ने कहा-पिर महर्षि सौमरि के शाप को प्रसका से नपभीत हुए राजा मान्धाता विनम्रता पूर्वक उन ऋपि मे बोले ॥२॥ राजा ने कहा- हे भगवन् ! हमारे वश की यह परम्परा रही है 6 कन्या जिस सरकुलोत्पन्न वर को पसद करे उसी को वह प्रदान की जाती है। मापकी याचना हमारे सभीष्ट से भी परे हैं, और न जाने किस प्रकार इसकी उत्पत्ति हुई है ? इस अवम्या में मुझे क्या करना चाहिए, यह नहीं समझ पा रहा हूँ मौर इसी बात को मुझे चिन्ता है । गा मान्धाता वो यह बात सुनकर सौभरि कृषि विचार करने लगे ।।३।। मुझे टानने के लिए यह एक अन्य उपाय प्रयुक्त किया गया है । यह वृद्ध है, इसे प्रौढा निया भी पसन्द नहीं कर सकी, तो कन्यामों का रहना ही क्या है ? राजा ने यही सोचते हुए मुझे टालने की चेष्टा की है। यदि ऐसा है तो मैं भी इसका उपाय करूगा। ऐसा विचार करके उन्होंने राजा से कहा ।। यदि ऐसा है तो कन्यामों के अन्तःपुर रसक को मेरे प्रवेग की माज्ञा दो। फिर यदि कोई पन्या स्वय ही मुझे पसन्द करेगी, तभी मैं स्त्री-परिग्रह करूगा, प्रन्यया इम ढलती हुई मायु में आर्य के इस उद्यम से कोई प्रपोजन हो नहीं रखू गा । यह कहार वह चुप हो गए ॥८॥ ततश्च मान्याया मुनिशापराङ्कितेन क्न्यान्त पुरवर्षवरस्ममानतः १८६॥ तेन मह कन्यान्त पुर प्रविगनेव भगवानम्बिल सिद्धगन्धवेभ्यो:- तिशयेन वमनीय रूपमकरोत् ।८७ प्रवेश्य चतमृषिमन्तःपुरे वपंचरस्ताः कन्या:प्राहा। भवतीना जनयिता महाराजम्ममानापयतिा अयमस्मान् ब्रह्मपि. कम्यायं समन्यागत. 10 मया चास्य प्रतिनातं यद्यस्मत्वन्या या याचिद्भगवन्त वरयति तत्वन्यायाश्छन्दे नाह परिपन्यान परिप्या- मोत्याचं सर्वा एव ताः पन्याः सानुरागा. मप्रमदा. करेगव इवेभयू- पति तमृपिमहमहमिक्या वरयाम्बभूवरून ११ यह गुन र ऋषि के गाप-मय से भीत हर रामा ने वन्य पोरे पन्तः पुर राकमो उनके प्रदेश को माज्ञा दी ॥५६॥ रुद उसके प्राय पन्नापुर में ५०४ ] [ श्री विष्णुपुराण जाते हुए महपि सौभरि के अपने रूप को सभी सिद्धो भौर गन्धवों से भी प्रत्यत कमनीय बना लिया ॥७॥ इस प्रकार उन ऋपि श्रेष्ठ को कन्याग्रो के अन्त पुर में ले जाकर उसके रक्षक ने क याओं से कहा ॥८॥ तुम्हारे पिता महाराज मान्धाता ने प्राज्ञा दी है कि यह ब्रह्मपि हमारे यहा एक कन्या की इच्छा से भाये हैं और मैंने इनको वचन दिया है कि मेरा जो कन्या इन्हे स्वेच्छा से धरण करना चाहेगी, मैं उसकी स्वच्छ दता में वाधक नही बनू गा। उसकी यह बात सुन कर उन सब कन्यानो ने यूथपति हाथी का वरण करने वाली हथिनियो के से ममान अनुराग मोर माहाद सहित सहसा कहा कि मैं ही इनका वरण करती हूँ, मैं ही करती हूँ । इस प्रकार कहती हुई सभी कन्यानो ने उन ऋषि को वरण कर लिया । उस समय वे सब परस्पर कहने लगी ॥८६.६१॥ प्रल भगिन्योऽहमिम वृणोमि वृणोम्यह नैष तवानुरूप । ममैप भर्ता विधिनैव सृष्टस्सृष्टाहमस्योपशम प्रयाहि ।। वृतो मयाय प्रथम मयाय गृह पिरान्नेव विहन्यसे विम् । मया मयेति क्षितिपात्मजाना तदर्थमत्यर्थकलिर्बभूव ।।३। यदा मुनिस्ताभिरतीवहार्दाढतस्स कन्याभिरनिन्द्यकीति । तदा स कन्याधिकृतो नृपाय यथावदाचष्ट विनम्रमूर्ति. १६४। तदवमात्कितिमेतत्वयमेतत्कि कि करोमि कि मयाभिहित- मित्यावुलमतिरनिन्छन्नपि कथमपि राजानुमेने ६॥ कृतानुरूपविवा- हश्च महर्पिस्सक्ला एव ता पन्यास्स्वमाश्रममनयत् ।। महो बहिनो तुम सब क्यो व्यर्थ चेष्टा पर रही हो. पह नुम्हारे सो मनुरूप हो नहीं है, मैं ही इनका यरण करती हूँ । विधना ने ही इन्हे मेरा पति पौर मुझे इनको पम्नी निश्चित किया है, इसलिए तुम प्रपने प्रयत्न मे शान्त होमो 18२ इनो पन पुर में घुसते ही मैंने इन्हें वरण कर लिया पा, मय तुम क्यों इन पर न्यौछावर हो रही हो। इस प्रकार मैने इना वरण दिया, मैंने प्रपम ही बरण र लिया रहती हुई उन सभी राज-यामो में सह आरिचत हो गया। फिर भी पामो ने प्रत्यत अनुराग कशी. भूबहोर उन पनि चर वाले ऋषिश्रेष्ठरा वरपर लिया तब पत पुर रणव चतुर्थ अश-अ०२] [ ५०५ 7 कहा ने राजा के पास जाकर सब वृत्तान्त यावत निवेदन किया ४॥ धौ परागर. जो बोने-सव वृत्तान्त जानकर राग सोचने लगे कि यह क्या कह रहा है यह किस प्रकार सम्मव हुग्रा अब मुझे करा करना चाहिए ? मैन उहकों वैसा इस प्रकार व्याकुल होते हुए राजा ने प्रनिच्छा पूर्वक अपने वचन को निभाया तथा अपने अनुरूप विवाह-संस्कार के सम्मान होने पर उन सद कन्यामो यो माप लेकर महर्षि सौभरि अपने प्रायम को गये ॥५-६६॥ तन चाशेपशिल्पफ्ल्पप्रणेतार धातारमिवान्य विश्वकर्माणमा- हृय सक्लक्न्यानामेक्कस्या प्रोत्फुल्लपङ्कजा पूजत्कलहमवारण्डवा- दिविहङ्गमाभिरामजलाशयास्मोपघाना सावकाशास्नायुशय्यापरि- च्छदा प्रासादा क्यिन्तामित्यादिदेश ९७। तच्च तथैवानुष्ठिनमशेप- शिल्पविशेपाचायंस्त्वष्टा दगितवान् ।।८। तन परमपिणा सौभरिणा- ज्ञप्तस्तेषु गृहेप्वनिवार्यानन्दनामा महानिधिरागाञ्चक ।६। ततोलवर- तेन भक्ष्यभोज्यलेह्याद्य पभोगरागतानुगतभृत्यादीननिशमगेपगृहेषु ता क्षितीशदुहितरो भोजयामासु १००। वहां पहुंच कर उन्होंन शिल्पकला ने प्रणेता विश्वकर्मा को महूत पर उनसे पहा कि इन राव कन्याग्रा क लिए पृथर पृथा भवन बना दो, जिनम विकसित हुए कमल, पूजते हुये हस मोर वारएडवादि जल-पक्षियो से परिपूर जलापाय, सुन्दर उपधान दाम्या मोर परिच्छदादि हा तथा उनम गुला हुमा स्यान भी पर्याप्त रूप से हो ।।१७।। यह सुनकर सम्पूर्ण शिल्परला में विशेष पाचार्य विश्वकर्मा ने उनकी इच्छा के मनुमार ही सब निमित करके उन्हें दिखाया पिर महाप सोभरिकी पाज्ञा से उन भवना में 'मनिवार्य मानद' नाम की महानिधि विराजमान हो गई IEE 1 इममे पहा पनवरत लक्ष्य, भोज्य, लेह्य मादि सामग्रियों के द्वारा वे राजपुत्रियाँ भागत प्रतिषियों भोर पान मनुगत भृत्या को तृम करने म रात दिन समय हुई ॥१०॥ एकदा तु दुहुतृस्नेहाइष्टहृदयस्न महीपतिरनिदु वितान्ता उन सुसिना वा इति निचिन्त्य तम्य महराश्रमममीपमुपेत्य स्फुरदगुमा- [ श्रीविष्णुपुराण लाललामा स्फटिकमयप्रासादमालामतिरम्योपवनजलाशया ददश ।१०१ प्रविश्य चैक प्रासादमात्मजा परिप्वज्य कृतासनपरिग्रह प्रवृद्धस्नेहन- यनाम्वुगभनयनोऽब्रवीत् ॥१०२१ अप्यन वत्से भवत्या सुखमुत किञ्चि दसुग्वमपि ते महर्पिस्स्नेहवानुत न स्मयतेऽस्मद्गृहवास इत्युक्ता त तनया पितरमाह ।१०३। तातातिरमणीय प्रासादोऽत्रातिमनोज्ञमुपवन- मेते कलवाक्यविहङ्गमा भिरुता प्रोत्फुल्लपमाकरजलाशया मनोऽनुकू- लभक्ष्यभोज्यानुलेपनवस्त्रभूषणादिभोगो मुनि शयनासनानि सवसम्प त्समेत मे गाहस्थ्यम् ।१०४॥ तथापि केन वा जन्मभूमिन स्मयते ।१०५। त्वत्प्रसादादिदमशपमतिशोभनम् ॥१०६॥ किं (वेक ममतदु खकारण यदस्मद्गृहान्महपिरयम्नद्भर्ता न निष्कामति ममैव केवलमतिप्रीत्या समीपपरिवर्ती नान्यासामस्मद्भगिनीनाम् ।१०७। फिर किसी ए दिन राजा मा धाता अपनी व यामो के स्नेह से प्रावृष्ट हृदय सहित उनके मुखी या दुखी होने के विषय में जानने को उत्तठा से महर्षि के पाश्रम के समीप पहुंचे। तब उहे यहाँ मत्ात रमणीक उपरतो पोर जना दायों गे सुशोभित स्पटिक पय प्रासादों की पक्ति निखाई पड़ी, जो स्फुर पशु- मालामों से प्रत्यात नाम प्रतीत होती थी ॥१.१॥ फिर वह एव भवन मे जारर पपनी पुत्री को हृदय से लगाकर पारान पर बैठ गये मोर रोहसित नयनो म जल भरत हुप पहने लग ।।१०२॥ हे वत्से ! तुम सब यहाँ सुख- पूवर तो रह रही हो' सिी प्रकार का यष्ट तो नही पाती ? महर्षि गुमसे प्रेम तो परत है ? क्या तुम्हें अपने पितृगेह वो भी भी याद पाती है ? पिता की पात गुन पर रामकुमारी यानी- हे पिताजी । यह प्रामाद अस्पात रमणीय है यह उपवनाति भी प्रत्यात चित्तावप हैं विससित कममो वाले इन असायो म असतीमा होमपुर बोली पोसत है मप भोग्याला तथा पराग, पात्राभूपण, गुगामल दाम्पा, मृदु पासन सभी मागसद हैं । इग प्रसार हमारा गाहय जीवन पश्यत दमय मगत पौर गुमा है .रि भी भो पाग पानमा स्मरण भया रिग 1 होगा? ॥१५॥ पनि का प्रसाद सब पृप परत सोमामय है, शिर भी गुभ ए पश्यत दुख यह है कि हमारे चतुर्थ अश-अ.२] [५०७ पनि यह महर्षि मेरे भवन से कभी निकलने ही नहीं, मुझ पर भी अत्यधिक स्नेह रहने के कारण यह मेरे हो पा रहे आते हैं, मेरो मन्य बहिनो के पास कभी नहीं जाते ।।१०६.१०७॥ एव च मम सोदर्योऽतिदु खिता इत्येवमतिदु खकारणमित्यु- तस्वया द्वितीय प्रासादमुपेत्य स्वतनया परिप्वज्योपविष्टस्तथैव पृष्टवान् ।१०। तयापि च सर्वमेतत्तत्प्रासादायु पभोगसुख भृभमाख्यातं ममैव केवलमतिप्रीत्या पार्थपरिवर्ती, नान्यामामस्मद्भमिनीनामित्येवमादि श्रुत्ला समस्तप्रासादेषु राजा प्रविवेश तनया तनया तथैवापृच्छन् ।१०६॥ मभिश्व ताभिस्तथवाभिहितः परितोपविस्मयनिर्मरविवाहृदयो भगवन्त सोभरिमेकान्तावस्थितमुपेत्य कृतपूजोऽब्रवीत् ।११०। दृष्टस्तै भगवन् सुमहानेप सिद्धिप्रभायो नव विवमन्यस्य क्स्यचिदस्माभिविभू- तिभिविनसितमुपलक्षित यदेतद्भगवतस्तपसः फलमित्यमिपूज्य तमृपि तय तेन शपिवर्येण सह किश्चितालमभिमतोपभोगान् वुमुजे स्वपुर चजगाम ११११ इससे मेरी प्रत्य बहिर्ने प्रयन्त दुवित होगी । इसी मे में मयन्त दुखी है। इसके पश्चात् राजा दूसरे भवन में पहुंचे और अपनी कन्या का मालिंगन कर भासन पर बैठे और उसमे भी उन्होंने वही प्रश्न किया ||१०|| उस राज- कुमारी ने भी उमो के सपान भवनादि सब सुख भोगो का वर्णन करके उसी प्रकार कहा कि मुझ मे प्रत्यन्त प्रेम होने के कारण महपि केवल मेरे ही पास रहते हैं, मेरी पिमो अन्य वहिन के पास नहीं जाते। इस बात को सुन कर राजा एक-एक करके भी भवनों में पये और अपनी सभो न्यानो से वैमाही प्रश्न frपा १०६ तया उन सब ने भी उन्ह वैसा ही उत्तर दिया । सब को बात सुनने के अनन्तर राजा अपात मानदित और विस्मित हुए दया एकाच में स्थित महपि सोभरि का पूजन करके उन्होंने निवेदन किया ।।११०॥ हे भावन् यह सब प्रभाव मापकी ही योग-सिदि का दिखाई दे रहा है। इस प्रकार के ऐश्वर्य के सहित बितास करते हुए कभी किसी को नहीं देखा। पह सब भापरे ताना हो प्रभाव है । रारा ने इस प्रकार महरि का मभिवादन कर ५०८ ] [ श्रीविष्णुपुराण कुछ याल तक उनके साथ माननदोष भोग शिया और अन्त में अपने नगर को वापिस लौटे ॥११॥ कालेन गच्छता तस्य तासु राजतनयासु पुत्रशतं साधममवत् ।११२। अनुदिनानुरूढस्नेहासरश्च स तत्रातीय ममताकृष्टहृदयोऽभवत् ।११३॥ अप्यतेऽस्मत्युवा कलभापिण: पद्भया गच्छेयुः प्रप्येत यौवनिनो भवेयुः अपि कृतदारानेतान् पश्येयमप्येपा पुया भवेयुः अप्येतत्पुत्रान्पुत्र- समन्वितान्पश्यामीत्यादिमनोरथाननुदिन कालसम्पत्तिप्रवृद्धानुपेक्ष्यत- चितन्यामास ।११४॥ अहो मे मोहस्यातिविस्तारः ।११५॥ मनोरथाना न समातिरस्ति वर्षायुतेनापि तथा दलक्षः । पूर्णेपु पूर्णेपु मनोरयानामुत्पत्तयस्सन्ति पुनर्नवानाम् ॥११६॥ पझ्या गता यौवनिनश्च जाता दारश्च सयोगमिता. प्रसूताः । दृष्टाः सुतास्तत्तनयप्रसूति द्रष्टु पुनर्वाञ्छति मेऽन्तरारमा ।११७॥ द्रक्ष्यामि तेपामिति चेत्प्रसूति मनोरथो मे भविता ततोऽन्यः । पूर्णेपि तत्राप्यपरस्य जन्म निवार्यते केन मनोरथस्य ।११८। प्रामृत्युतो नैव मनोरथानामन्तोऽस्ति विज्ञातमिद मयाद्य। मनोरथासक्तिपरस्य चित्त न जायते वै परमार्थसङ्गि।११।। कालान्तर मे उन राजकुमारियो के द्वारा सोभरि मुनि ने डेढ सौ पुत्र उत्पन्न किए । इससे दिनो दिन वढ़ते हुए स्नेह के कारण उनका हृदय अत्यन्त ममता से भर गया । ११२-११३॥ उस समय वह गोचने लगे कि क्या मेरे यह पुत्र मधुर बोनी सुनायेंगे? अपने पैरो से चलेगे? युवावस्था को प्राप्त होगे? क्या मैं इन सब को पानी सहित देख सगा? फिर इनके भी पुत्र होगे तन क्या मैं अपने को पुत्र-पौत्रो से सम्पन्न देख पाऊगा? फिर इस प्राार दिन प्रतिदिन बढते हुये इन मनोरयो की उपेक्षा करते हुए उन्होने सोचा ॥११४॥ अरे, मेरा मोह क्तिना विस्तृत हो गया है ?॥११॥ यह मनोरथ तो हजारो- लाखो वर्ष में भी निवृत नही हो सकते । क्योकि उनमे से जितने मनोरथ पूर्ण होते हैं उनके स्थान पर अन्य नवीन मनोरथ उत्पन्न हो जाते हैं ॥११६॥ मेरे [ ५०६ चतुर्थ अंश अ० २] पुत्र अपन पांवो मे चनने लगे, फिर युदावस्या को प्रान हुवे,फिर उनका विवाह हो गया, यह सगी कुछ मैंने देख लिया है। प्रद मैं अपने पोगो की उत्पत्ति देसने की अभिलाषा करता हूं ॥११॥ जद में उनकी उत्ति देख लूगा तब मेरे मन में अन्य मनोरथ की उपति होगी और जब वह भी पूरी हो जायगा, तब किमी अन्य मनोरथ के भव को कौन रोक सकेगा? ॥११८।। मैं प्रय मा प्रकार समझ गया हूँ कि मरणशल तक भी मनोरथा का अन्त नहीं होगा पौर चित्र मनोरयो म प्रामुक्त है वह परमार्थ म तग ही नहीं मक्ता ।।११।। रा मे समाधिजलदासमिनमत्स्यस्य सङ्गात्मत्व नष्ट । परिग्रहम्मङ्गकृतो मयाय परिग्रहोत्या च ममातिलिप्सा ।१२०॥ दु स यदैवकारीरजन्म शताईसस्याकमिद प्रसूतम् । परिग्रहेण तितिपात्मजाना सुतरनेक्वंहुलीकृत तत् ॥१२१॥ सुतात्मजस्तत्तनयंश्च भूयो भूयश्न तेपा च परिग्रहेण । विस्तारमेप्यत्यतिदु सहेतु परिग्रहो वै ममताभिधान ।१२२॥ चौर्ण तपो यत्तु जलाश्रयेण तयदिरेषा तपसोऽतराय । मत्स्यस्य सहादमवच्च यो मे सुनादिरागो मुपितोऽस्मि तेन ।१०३ निस्मङ्गता मुक्तिपद यतीना सगादशेष प्रभवन्ति दोपा । प्रास्टयोनो विनिपात्रतेचम्मङ्गन योगी रिमुतान्यगिदि 1१२४१ अरे, मेरो वह मनाधि जल में पाय रहने वान मत्स्य मगति में महता मग हो गई। उसी से भ्रान्न किनहा मैंन स्त्री मोर धनादि का महाग रिया तया पर वह स्थी पनादि का परिग्रह दो पद मरी तृप्या वृद्धि का कारण या गया है ।।१२०॥ प्रथम तो दह धारण करना हो दुख है, फिर मैंन तो इन राजश्रियाने वाय विराह करक उमदुम को पवार मुना का निपा है और अब तो इन पनक पुत्रा वारण मी अयन वृद्धि हो गई है ।१२।। अब भविष्य में जब पुगों व पुत्र होंगे, तथा उनके भी पुत्रादि और दारगर विशद् मुम्बन होने से उसकी और भी वृद्धि होती जायगी । यह ममनाथ विवाह सम्बबादि घरत हो दुम का कारण हो रहा है ।।१२२॥ बताशय में निवास करते हुए मन को तया पा, उपरे फन से प्राप्त यह ५१० ] [ श्रीविष्णुपुराण वैभव भी तपस्या में बाधक हो रहा है । मत्स्य के संग दोप से मेरे मन में सन्तानादि का राग उत्पन हुअा था, उसी में मैं ठग गया हूँ ॥१२३।। हीनता हो यतियो के लिये मोक्षदायिनी है और सभी दोपो की प्राप्ति सग से है होती है । सग के कारण योगसिद्ध पुरुषो का भी पतन हो जाता है, तो म सिद्धि वालो का कहना ही क्या है ॥१२४॥ अह चरिष्यामि तदात्मनोऽर्थे परिग्रहग्राहगृहीतबुद्धि । यदा हि भूय परिहीनदोषो जनस्य दु खर्भविता न दुखी ।१२५। सर्वस्य धातारमचिन्त्यरूपमणोरणीयासमतिप्रमाणम् । सितासित चेश्वरमीश्वराणामाराधयिष्ये तपसैव विष्णुम् ।१२६। तस्मिन्नशेषौजसि सर्वरूपिण्यव्यक्तविस्पष्टतनावनन्ते । ममाचल चित्तमपेतदोप सदास्तु विप्णावभवाय भूय ।१२७। समस्तभूताद लादनन्तात्सर्वेश्वरादन्यदनादिमध्यात् । यस्मान किश्चित्तमह गुरूणा पर गुरु सश्रयमे मि विष्णुम् ।१२८ परिग्रह रूपी ग्राह ने मेरी मति को जाड लिया है, इस समय मैं ऐस यस कहंगा, जिपसे दोपो से छुटकारा पाकर फिर अपने कूटुम्बीजनो के दुर से दुख को प्राप्त न होऊ ॥१२५।। अव में सर्वधातार, अचि त्य रूप, अणु भी सूक्ष्म, सब स महान् सित और प्रसित रूप, ईश्वरो के भी ईश्वर भगवा श्रीहरि को तप के द्वारा प्राराधना करू गा ॥१२६॥ उन सवतजोमय, सवरूप अध्यक्त विम्पट तन, मनात रूम भगवान विष्णु में मेरा निर्दोष चित्त अविचा भाव से सदा ही लगा रहे, जिससे मुझे पुन पृथिवी पर ज मघारण न करन पडे । १२७॥ जिन सवरूप, निमल, मनन्त, सर्वेश्वर तथा मादि, मध्य से रहि से पतिरिक्त अन्य कुछ भी नहीं है में उन्ही गुरुमा पे परम गुरु भगवान् श्रीहा पी शरण लेता हूँ ॥१२॥ इत्यात्मानमात्मनवाभिधायासी सोभरिरपहाय पुत्रगृहासनपरि च्छादिकमशेपमर्थजात सनमायांसमन्वितो वन तापदिन वैसानसनिप्पाद्यमरोपनियाकलाप तिप्पाच क्षपितसवल पि परिपक्वमनोतिरात्मन्यग्नोरामारोप्य भिभुरभवत् ।१३० प्रविवेश १२६ भारतीय संस्कृति के श्रेष्टतम धर्मग्रन्थ हिन्दी अनुवाद सहित १. चारों वेद ८ जिल्दों में- ऋग्वेद ४ खण्ड २४) अथर्व वेद २ खण्ड १२) यजुर्वेद १ खण्ड ६) सामवेद १ खण्ड २. १०८ उपनिषदें (३ खण्डों में) ज्ञान खण्ड ब्रह्मविद्या सण्ड साधना खण्ड ३. पद दर्शन (६ जिल्दों में) वेदान्त दर्शन सारपदान योग दान वैशेषिक दर्शन न्याय दर्शन मीमांगा दर्शन ४. २० स्मृतियां २ खण्ड १४) ५. शिव पुराण १२.७५ १०) से अधिक पे भाईर पर १२: सन | पर्ष घलग। GO २६४ 系紧致祭 संस्कृति ... ... KEHEATRETRIOSISATESAVEENTS भारतीय संस्कृति के श्रेष्टतम धर्मग्रन्थ हिन्दी अनुवाद सहित १. चारों वेद जिल्दों में- ऋग्वेद ४ खण्ड अथर्ववेद २ खण्ड यजुर्वेद १ खण्ड सामवेद १ खण्ड २. १०८ उपनिषदें (३ खण्डों में) ज्ञान खण्ड ब्रह्मविद्या खण्ड साधना खण्ड ३. पट् दर्शन (६ जिल्दों में) वेदान्त दर्शन सांख्य दशन योग दशन वैशेषिक दर्शन न्याय दर्शन मोमासा दर्शन ४. २० स्मृतियां २ खण्ड १४) ५. शिव पुराण १२७५ १०) से अधिक के प्रार्डर पर १२३% कमीशन । साक पर्य अलग। ... KEXAKAKARKS ... प्रकाशक: संस्कृति संस्थान, खाजा कुतुर, बरेली (उ.प्र.) HEAVENSARIBANSURitehere