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मित्री मरजानी
कृष्णा सोवती की अन्य कृतियां
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यारों के यार तिन पहाड़
सूरजमुखी अंधेरे के
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जिन्दगीनामा
मित्रो
मरजानी
कृष्णा सोबती
राजकमल प्रकाशन
नयी दिल्ली
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मटमैले प्रकाश का छोटा-सा टुकड़ा रोशनदान से उतर चौकोर
शीशों पर आ झुका तो नींद में वेखवर सोये गुरुदास सहसा
अचकचाकर उठ बैठे। वाह बढ़ा खिड़की से चश्मा उठा आंखों
पर रखा और चौकन्ने हो कमरे की पहचान करने लगे। वह
रहा कोने में रखा अपना छाता, खूटी पर लटका लम्बा कोट,
अपना ही घर है।
घर में सब ठीक-ठिकाने है। भला-चंगा हूँ मैं भी। तनिक
दुपहरी सो ही तो लिया"सिरहाना दुहराकर ढासना लिया कि
एकाएक मसूढ़े की उठती पीर से वेवस हो फिर लेट गये । हाय
प्रो! "अभी उस दिन तो दूध के दांत निकले थे और आज एक
झटके से उखड़ भी गये। कई देर दाँतों के नीम-डाक्टर का
चेहरा आंखों के आगे ठिठका रहा, फिर बूंद-बूंद रिसते पानी में
अोझल हो गया। इतना लम्बा सफर इतनी जल्दी कट गया !
उसी दिन तो अम्मा को आगे का हिलता दांत दिखाया था।
अम्मा ने ठुड्डी छू समझाया था--मुन्ने वेटे, दांत गिरे-पीछे जिभा
से न छूना। बत्तीसी रूठ जायेगी !-अम्मा की हल्दी लगी
मित्रो मरजानी/५
अधमैली अोढ़नी में से झाँकता छोटे चूंघटवाला मुखड़ा "वह जीती-जागती साक्षात लक्ष्मी-सी माँ किन भूले-विसरे सपनों में जा लुकी! अरे, कहाँ चले गये वे सुहाने दिन और कहाँ गये अपने अम्मा और वापू ? सुरगों में जिनका वास, ऐसे अपने वापू को, हाय, इस अभागे ने कभी याद ही नहीं किया । एक-एक पल स्वास-स्वास जिन्होंने पाल-पोस वड़ा किया, उनके आँख मींचते ही उनकी मोह-ममता भी छूट गयी। न..'न' "गये वरस तो वापू के श्राद्ध पर ब्राह्मण जिमाये थे। कपड़े-लीड़े मंसाये थे। सब किया था, कायदे-करीने तो सव हुमा पर देवता-से उस बापू को घर में याद किसने किया? धनवन्ती चौके-चूल्हे में लगी रही। बहुएँ कन्नी काट अपने-अपने काम में रुझी रहीं और लड़की "उन्हें अपने वापू की नहीं तो वापू के वापू की क्या फिकर ? दिन-भर स्वारी वाहर और रात मौज- मस्त ! दरिया-सी जवानी इन्हें क्या अनोखी चढ़ी है ? इन किनारों में भी बाढ़ पायी थी पर पानी जैसे चढ़ा था वैसे ही उतर गया। धनवन्ती वेचारी इस कबीलदारी में ऐसी फंसी कि नासमझ को न सुध अपनी, न इस बूढ़े गुरुदास की। दुपहरी दाढ़ निकलवाकर पाया था पर साथिन घड़ी-भर को जो पास आ वैठी हो। कभी रौं थी तो इस विछोने के आस-पास दिन-रात एक कर देती थी । अव रौं है तो सब-कुछ भूल-भाल बहू-वेटों में रुझी पड़ी है। गुरुदास फिर लेटे-लेटे उठ बैठे और अवाजारी से घरवाली को आवाज़ दी बनवारी की माँ ! ६ /मित्रो मरजानी हाथ का काम वहीं-का-वहीं छोड़ धनवन्ती अन्दर उठायो। बत्ती जला पास आ पूछा-कुछ पीर कम हुई ? बूंट-भर गर्म- गर्म दूध लाऊँ? चुंधी-चुंधी प्रांखों गुरुदास पहले नाराजी से देखते रहे फिर हाथ हिला तीखे गले कहा-उसके विना मरा नहीं जाता हूँ! मन-ही-मन धनवन्ती घनी से डरी पर झूठ-मूठ के तेवर चढ़ा कहा-शुभ-शुभ बोलो ! लड़के वाले सुनेंगे तो क्या कहेंगे? गुरुदास ने झंझलाकर सिर हिलाया-लड़कों के होश-हवास ठिकाने हैं जो सुनेंगे? -ऊँचा बोल अपना सिर न थकायो । "लड़के तो बारी- बारी बापू का हाल पूछ गये हैं। -मेरे सामने उनकी गर्द न झाड़, धनवन्ती में भी उनका वापू हूँ! धनवन्ती ने पास झुक लिहाफ़ पर हाथ फेरा और निहोरकर कहा-मेरा इतना-सा कहा तो रख लो, गर्म दूध पीने से सिर को आराम मिलेगा। गुरुदास जवाब में कुछ बोले नहीं तो धनवन्ती ने वेफ़िकी की सांस ली। चौके में जा दूध प्रौटाया। भाग मारने लगी कि छोटी बहू दहलीज़ में आ खड़ी हुई । एक वार तेज-तरार नजर से सास की ओर देखा और मोठों पर मुस्कराहट ला बोली-अम्मा, दूध जमाने लगी हो तो सजरी जाग देना । कल का दही खट्टा था। मित्रो मरजानी/७ नवन्ती के दूध पीटाते हाथ थम गये। जी तो हुया पलट- छ कहे पर अपने को रोक दिया। इस प्रोछी के संग वह यों पोछी वने ? -बहू तुम्हारे वापू का जी अच्छा नहीं। दर्द के मारे निढाल हैं, उन्हीं के लिए दूध ले जाती हूँ। धनवन्ती की छोटी बहू फूलाँ की आँखें चमकने लगीं-अम्मा, पू तो दुखती दाढ़ निकलवा पाये हैं न! अव तो दर्द का प्राराम होगा। धनवन्ती ने विना कुछ कहे बहू के मुंह पर से आँखें लौटा लीं। आँचल के छोर से दूध का गिलास ढांपा और चीके से बाहर निकल गयी। धनी के पास पहुँचते-न-पहुँचते मन घिर आया। घर के मालिक के लिए इतने से दूध पर भी आँख ! दूध दे धनवन्ती गुरुदास के पैताने आ वैठी और धनी के पाँव दावते-दावते रो पड़ी। गुरुदास ने घरवाली को वार-बार आँखों से प्रोढ़नी लगाते देखा तो ऐसे भासा कि धनवन्ती उनकी सयानी उम्र का ध्यान कर रोती है। -धनवन्ती, तुम्हारे जेठे लड़के के वाल लशकारा देने लगे, अब मैं ही क्या बूढ़ा नहीं होऊँगा ? एक नहीं अनेक बीती पुरानी-मीठी वातें आँखों में धू गयीं। रह-रह धनवन्ती अपने सुख-दुःख के साथी के पाँव नानी
हाथ फेरती रही और रोती रही।
गुरुदास ने पांव फेला घरवाली की गोद में टिका दिये । फिर
लम्बे पल तक धनवन्ती की ओर देखते-देखते हंस दिये--
धनवन्ती, जमाने का रूप-रंग बदल गया पर तेरी रावली नाक
-
नहीं!
धनवन्ती ने रुंधे कण्ठ लम्बी सांस ली-आपका दिया-किया
वहुत-कुछ इस झोली में, पर अब पुरानी नाक ही वाकी नहीं।
गुरुदास यह न सुनना चाहते थे। मन-ही-मन सोचा-साथिन
भी बूढ़ी भयो। किस नाक की बात उन्होंने को और किस नाक
का रोना वह ले बैठी? खीझकर पांव खीचा तो घरवाली के
लिए ढेरों नेह उमड़ पाया। सिर हिला-हिला कहा-वन्ती,
जैसी तुमने निभाई कोई और क्या निभायेगा ? तेरे कमों में ही
मेहनत है, साथिन !
अपने मालिक से हमदर्दी पा धनवन्ती छोटी-सी दुलहनिया
बन पायी। हाथ से माथे का आँचरा ढीला कर धुपैले वाल
अन्दर कर लिये और लजाई-सी बोली में किस जोग? भला
हो अपनी सास प्यारी का, जब कभी उलटी राह चलती तो
आख्यान कर-कर समझाती, वेटी, इस देह से जितना जस-रस
ले लो वही खट्टी कमाई है। वे दिन याद कर कर्ता से इतना ही
मांगती हूँ कि जो इस कुल की बड़ी सरकार थी जिन्दा रहती
उसकी सीख निभा जाऊँ।
सुनकर गुरुदास धनवन्ती से ऐसे एक हुए कि दो हो ही न ।
मित्रो मरजानी/
जिस स्वर्गवासिनी अपनी माँ की याद कर वह रोये थे वही माँ धनवन्ती को भी याद पायी है । छन-भर को तो ऐसा लगा जैसे वे दोनों भाई-बहन हों और संग-संग अपनी विछुड़ गयी माँ को याद करते हों। -~~-वन्ती ! --गुरुदास घरवाली को कुछ कहने जाते थे कि मँझली बहू के कमरे से धौल-चप्पे की आवाज़ सुन सहम गये। धनवन्ती ने हाथ मल-मल लिये। फिर वही मार-पिटाई ! -~~-इन दोनों के हाथों बड़ी दुखी हूँ। यह तो पुराना जूड़ी का ताप है। आज नहीं तो कल, कल नहीं तो परसों। जैसा अभागा अपना सरदारीलाल, वैसी ही खपाने-कलपानेवाली बहूटी मिल गयी! धनवन्ती ने वाहर जा मॅझली वहू की दहलीज़ पर से झाँका तो फटे दूध-सी फटक गयी। साई सच्चे, इस मन किसी का बुरा नहीं चेता, फिर यह किन पापों का फल है ? उड़े-उड़े, विखरे वालों में सौदाई-सी मँझली बहू सरदारी लाल से हाथ छुड़वाती थी और तहवन्द कसे सरदारी पटाक- पटाक धौल जमाता था। पल-भर को हक्की-वक्को धनवन्ती देखती-की-देखती रह गयी। फिर जैसे, होश हुआ तो चीखकर कहा-सरदारीलाल ! सरदारी ने सुना नहीं। एक और जमाकर कहा-नज़र नीची करती है कि नहीं? मॅझली बहू ने ऐसा सव-कुछ नहीं किया। बड़ी-बड़ी भूरी १०/मित्रो मरजानी
।
---
प्रांखों घरवाले का सामना किये रही।
मुंडी हिलाते-हिलाते जैसे धनवन्ती के गले से मावाज न
निकलती हो-पराई लड़की पर हाथ, सरदारीलाल ? मेरे लिए
डूब मरना अच्छा ! मेरे लिए डूब मरना अच्छा !
माँ की ऐसी यर्राती-कौपती आवाज सुन सरदारी के कड़े-
कड़ेत चेहरे पर वेकसी पुत गयी। दोनो बौहें हवा में उछाल कड़वे
गले कहा- यह कूड़ा मेरे भाग था ! इससे तो कोई चूड़ी-चमारन
अच्छी थी।
धनवन्ती ने झपटकर हाथ से टोक दो-चुप, बुरे माथेवाले!
तेरी घरवाली न हुई कि बैरिन हो गयो छि-छि !
फिर पास प्रा बहू की पीठ पर हाथ रखा और पुचकारकर
कहा-सुमित्रावन्ती, इसे जिद चढी है तो तू ही प्रख नीची पर
ले । वेटी, मर्द मालिक का सामना हम वेचारियो को क्या सोहे ?
वहू ने विफरकर और सिर ऊंचा कर लिया और पहले की-
सी ढिठाई से सामना किये रही।
सास ने फिर बहू की मिन्नत की-बेटी ! मेरा बस चले तो
ऐसे नालायक वेटे के माथे न लगू। वेटो, अव तू ही योई राह
निकाल!
बहू की काजल-खिची भूरी आँखों में और चमक पा गयी।
हाथ पटका, पलकें झपका कहा-मां जी, बेटे की चिन्ता में तन
न सुखायो, इसकी करनी श्राप ही इसे काले पानियों भिज.
वायेगी!
।
मित्रो मरजानी/११
--
झपाटा मार सरदारी ने फिर कलाई पकड़ ली-पहले तो
तुझे उस दरगाह पहुँचाऊंगा न !
माँ ने बेटे को परे ठेल बहू की वाँह खींची और बाहर जाते-
जाते बोली--मरी माँ का मुख देखे, सरदारीलाल, जो तू यह
दहलीज़ लाँघ वाहर आया !-फिर बड़े बेटे को आवाज़ दी-
बनवारी बेटा, ज़रा बाहर तो निकल !
माँ के संग मँझली बहू को देख माथा ठनका-क्यों, माँ ?
~~बनवारी, तेरा भाई गुस्से में सौदाई हुआ बैठा है, चल
के उसे ठण्डा तो कर, वेटा..
जेठे बनवारीलाल ने एक नज़र भौजाई को देखा और
रौवीले गले घरवाली से कहा-सुहाग, मॅझली को ले अन्दर जा
बैठ, और आप सरदारी के कमरे की ओर बढ़ चला।
सुहाग ने सास को पलंग पर बैठा दो पीढ़ियाँ खींच ली और
देवरानी का हाथ पकड़ लाड़ से कहा-बहन मित्रो, संझा तक
तो तुम अच्छी-भली हँसती-खेलती थी"
धनवन्ती ने
हाथ वहू
को वर्ज दिया-वात कोई करने-
हिलाने की नहीं, वह अपने घर के भाँडे ही बुरे !
मॅझली ने एक बार खुली-उघड़ी आँखों नयी की ओर देखा
फिर चुटिया खोल बालों की सुइयां-क्लिप उतार-उतार नीचे
फेंकने लगी।
ताक पर से कंघा उठा सुहाग मित्रो के पीछे जा बैठी । कंघी
से गुंजल उतारे और वाल गूंथ दिये।
१२ / मित्रो मरजानी
..
से
धनवन्ती की छाती पर से अंगुल-भर का बोझ सरक गया, दिल की भली वनवारी की बहू सच में अकल वाली है। उठ वाहर पायी और दरवाजे में से दोनों भाइयों को एक संग देख प्रांखें झुका लीं। राम-राम ! ऐसी कलह में भी निगोड़ी ये अाँखें अपने बेटों के ऊँचे-लम्बे कद देख अघाती नहीं ! -बनवारीलाल, तू पाप सयाना है। यह भले घरों की चालं नहीं । सामने खड़ा है, साफ-साफ पूछ ले इससे, यह रोज़ की जूत-पाजारी अच्छी नहीं। सरदारी ने प्रांख उठा माँ की ओर नहीं देखा। छत की ओर तकते-तकते अोठ भींचे रहा। -वरखुरदार, मैंने भी एक नहीं दो-दो व्याही हैं पर कभी ऐसी नौबत नहीं पायी। तेरी ही घरवाली आये दिन क्यों विफरती है। सरदारी ने इस बार वेवसी से हाथ हिला दिये-क्या बताऊँ, भाऊ, इसके मिरासियों-से यह चलन... -धनवारीलाल, यह उलटी बुद्धवाला क्या बकता है ? मेरी बहू को तुलना जात-कमजात से? सरदारी ने अपनी कौड़ियों-सी अांखे मां की ओर फिराई --अम्मा, मेरी बात पल्ले बांध ले, यह नूरमहलन इस घर का नाम-धाम सब ले डूबेगी या फिर मुझे ही काले पानियों भिज- वायेगी। जेठा भाई क्या समझा, वही जाने । माथे की नसें फड़कने मित्रो मरजानी/१३
लगीं। रूखे कण्ठ माँ से कहा-मां, तुम बापू के पास या बैठो।
आज्ञाकारी वनी धनवन्ती तुरत ऐसे उठी कि माँ नहीं बेटे
की वेटी हो । द्वार तक जाकर पलटी और मिन्नत-जैसे स्वर में
कहा-छोटे भाई को कोई अच्छी मत देना, वेटा।
धनवन्ती अन्दर आयी तो
गुरुदास
की आँख लग गयी थीं।
हाथ लगा पिण्डा छुआ। फिर बत्ती वुझा
विछौने पर वैठी-बैठी
फिकरों में गोते खाने लगी, इस पकी देह का क्या भरोसा!
आज है कल नहीं। पीछे चिल्लाती-झीखती यह गृहस्थी छोड़
जायेगी । जहान हँसेगा इस धनवन्ती पर और देवता-से सीधे मेरे
धनी पर!
बैठे-बैठे ऊँघने लगी कि आँख खोल देखा, सुहाग
पैताने बैठी
है--खैर तो है, सुहागवन्ती!
सास के निकट ही सुहाग फुसफुसाई-आपके बड़े बेटे ने
वहन मित्रो को बुला मुझे बाहर कर दिया। मालिक अच्छी
करे!
-~~वहू, बड़ा वेटा मेरा इतना पारखी है पर यह तत्ती मित्रो
उसका भी डर नहीं मानती।
सुहाग
बैठी-बैठी
सास के पाँव दावने लगी तो धनवन्ती ने
सिर हिलाया-~शाबाश बेटी, तेरी शावाश! वनवारी की ओर
से तो बड़ी सुरखरू हूँ। धन्य है तेरी माँ जन्मनेवाली जिसने
तुम्हें जन्म दे इस घर के लिए ऐसा धर्म कमाया ।-फिर वहू
का हाथ छूकर कहा-सुहागवन्ती! मझली की तो वात एक
१४ / मित्रो मरजानी
-
ओर पर तेरी छोटी देवरानी के क्या रंग-ढंग ? मन-ही-मन
अरती हूँ। सारा लोक-जहान छोड़ कहाँ माथा लगा बैठी ?
सगे-सम्बन्धी दवे-दवे कहते थे, इस देश-दिशा का पानी अच्छा
नहीं पर मैं ही घर की दात देख भरम गयो।
नयी उठ घड़ी-भर को बाहर गयी । लौटकर सास से कहा-
अन्दर मंझली के हंसने की आवाज़ पाती है, माँ जी ।
धनवन्ती ने आगे सुना नहीं। बहू का हाथ झटक धनी को
झकझोरकर जगाया-उठो, जी ! आज इन लड़कों के हाथों
बहू की खैर नहीं!
गुरुदास हड़बड़ा उठे-अरे, आधी रात क्या झमेला है ?
कुछ बतानो तो।
धनवन्ती ने सहारा दे बिछौने से उठाया और सरदारी को
दरवाजे पर ले प्रायी।
--प्ररे धनवन्ती के पुत्रो ! लोक-जहान सो गया, तुम
किन
टंटों में?
भिड़ा किवाड़ खुला तो गुरुदास देखते के देखते रह गये ।
मंझली बहू नंगे सिर बैठी चारपाई पर हिन-हिन हँसती थी
और बड़ा लड़का बनवारी छाती पर हाथ कसे खड़ा-खड़ा दांत
पीसता था।
गुरुदास गरजे-सरदारीलाल, तेरे होश ठिकाने हैं ? बहू से
से कह कपड़ा करे!
वाघ की झपट से सरदारीलाल घरवाली की ओर झपटा
मित्रो मरजानी/१५
- - ? कि कड़ी मूठ से वनवारी ने बीच ही में रोक दिया। गुस्से के मारे गुरुदास थर-थर काँपने लगे तेरे नालायकों को तो वाद में समझूगा, धनवन्तो, पर यह कह कि उघड़े माथे इन जल्लादों में बैठी तुम्हारी बहू क्या करती है ? बड़े वेटे ने बड़ी आजिजी से माँ की ओर देखा और हाथ से रोककर कहा-कुछ न कहलवाओ, अम्मा, इससे, कुछ न कहलवानो ! इसके बोल का एक वन्द भी वापू ने सुन लिया तो इस घर में सवेरा न होगा! -हरे राम ! हरे राम, बनवारीलाल, ऐसा भी क्या अन्धेर ? सुनने को जो तुम्हारे बापू नहीं सुन सकते, उसे सुनने को मैं अभागिन ही क्या जिन्दा हूँ ? बड़ी बहू ने सास की मिन्नत की--अम्मा, बापू को कमरे में लौटा ले चलो। यह नहले-दहले उनके वस के नहीं ! धनवन्ती ने पति की वाँह थाम ली तो गुरुदास ने सिर हिला- हिला कहा-यह कलजुग है, कलजुग ! आँख का पानी उतर गया तो फिर क्या घर-घराने की इज्जत और क्या लोक- मरजाद? सास-ससुर को समझा-बुझा सुहाग बाहर आयो तो किवाड़ में से दोनों भाइयों को गुमसुम खड़े देख सहम गयी । अन्दर जा मित्रो से कहा-मित्रो बहन, काहे का झंझट- बखेड़ा है ? देवर जो कहता है वह मान । मँझली ने पहले सरदारी की ओर देखा फिर बनवारी की १६ / मित्रो मरजानी
मोर प्रांखें चमका दी-परो मेरी सयानी जिठानी, तुम क्या
जानो ये किस्से प्रीति-प्यार के !
बनवारी से सुना नहीं गया। भाई का हाथ पकड़ बाहर
खींचते हुए कहा-मंझली को अपने कमरे में सुलाले, सुहाग ।
दोनों भाइयों ने जा साथवाले कमरे का किवाड़ भिड़ाया तो
मझलो माये पर हाथ मार हंसी-बुरे माथेवाले ! मर्द जन
होते तो या चटखारे ले-ले मुझे चाटते या फिर शेर की तरह
कच्चा चवा डालते !
सुहाग ने देवरानी की अोर ताका नहीं। खटिया खींच
विछाई और लिहाफ़ डालकर बोली-वहन मित्रो, घनी रात
गयी । अव चिन्ता-जंजाल छोड़ तनिक पाराम कर लो।
मित्रो ने पोठ विचकाये-चिन्ता-जंजाल किसको? मैं तो
चिन्ता करनेवाली के पेट ही नहीं पड़ी।
छि:-छि: ! सुनकर सुहाग के कान जलने लगे। मित्रो उठ
खटिया के पास आयी। पहले लिहाफ़ उठाया, सेस टटोला, फिर
उलट-पलट सिरहाना टटोल बोली-जिठानी, तुम्हारे देवर-सा
बगलोल कोई और दूजा न होगा। न दुःख-सुख, न प्रीति-प्यार
न जलन-प्यास"वस आये दिन धौल-धप्पा"लानत-मलामत !
एकाएक आंखों में कोई मद उतर आया। सोच गले की
श्रोढ़नी उतारी। कुरता, फिर सलवार उतार परे फेंक दी और
हँस-हँस बोली-वनवारी कहता है, मित्रो, तेरी देह क्या निरा
शीरा है शी-रा! उस नास होने से कहती हूं."
मित्रो मरजानी/१७
1
-अरे, इसी शीरे में तेरी जान को डंक मारते सों की
फौजें पलती हैं!
नयी बहू का चेहरा काला-स्याह पड़ गया। कानों पर हाथ
रख कहा-हाथ जोड़ती हूँ, देवरानी, मेरे सिर पाप न चढ़ा !
मॅझली फटाक विछौने पर सीधी लेट गयी। ऊपर कुछ अोढ़ा
नहीं । देख सुहाग के बदन सुइयाँ चुभने लगीं। इस कुलवोरन
की तरह जनानी को हया न हो तो नित-नित जूठी होती औरत
की देह निरे पाप का घट है।
रजाई खींच मुंह-सिर लपेट लिया।
मित्रो ने आवाज़ दी-टुक अाँखें खोल, इधर तो निरख,
जिठानी!
नयी ने मुंह ढंके-ढंके झिड़की दी-इन भाइयों के कान बड़े
पतले हैं, री! सुन लेंगे तो..
मित्रो लेटी-लेटी इतराई-सुन लें, इससे क्या डरती हूँ ?---
फिर जिठानी से कहा-वहनेली, इतनी-सी बात मेरी रख लो।
बस!
सुहाग ने खीजकर एक वार आँख खोल दी।
सिर उठाया-क्या है, री?
मॅझली लेटी-लेटी उठ बैठी। हाथों से छातियाँ ढंक मग्न हो
कहा-सच कहना, जिठानी सुहागवन्ती, क्या ऐसी छातियाँ
किसी और की भी हैं ?..
सुहाग का तन-बदन फुकने लगा । बिछौना छोड़ पास पायी
१८ / मित्रो मरजानी
और अपने माथे पर दोहत्थी मार बोली-फिटक जोगी, मरे पोछे पता भी न पायेगी कि कभी तू जीती भी थी! दिन-रात घुलती इस औरत की देह पर तुझे इतना गुमान ? अरी, लानत तुझ पर ! घर-घर तेरे जैसी काली-मकाली औरतें हैं। उनके भी तुझ-जैसे ही दो-दो हाथ हैं, पाँव हैं, अाँखें हैं और यही तुझ- जैसी दो छातियां ! क्या तू ही अनोखी इस जून पड़ी है ? मॅझलो ने निर्लज्जता से वाहें फैला दीं-मैं सदके-बलिहारी! अपने जेठ की सती-साधवी नार पर! जिठानी मेरे जेठ से कह रखना जब तक मित्रो के पास यह इलाही ताकत है मित्रो मरती नहीं ! भले स्वभाववाली बनवारी की बहू एकाएक रणचण्डी बन आयी। कड़ककर कहा-चुप, री धर्म-पिट्टी! उठकर कपड़े पहन, नही तो मुझसे बुरा कोई न होगा ! जिठानी का गुस्सा देख मित्रो ने हँसते-हंसते लोड़े पहर लिये तो सिर हिला-हिला सुहाग जैसे अपने से ही कहती चली-ऐसा पाप-वरत गया कि डोले मे लायी, परणायी बहू के ये हालहीले ! हे जोतोंवाली देवी ! इस घर की इज्जत-पत्त रसना ! फिर अांखें फैला मित्रो से कहा-देवरानी, तेरी किस्मत चुरी थी जो तू प्राज इन भाइयों के हाथों बच निकली । मर-खप जाती तो तू इस जंजाल से छूटती और वे भी सुरखरू हो जाते । फिर ठुड्डी पर हाथ रख बुरे मुंह पूछा-सच-सच कह, देवरानी, तू इस राह-कुराह कैसे पड़ी? मित्रो मरजानी/१६
-
मित्रो झिझकी-हिचकिचाई नहीं। पड़े-पड़े कहा-सात
नदियों की तारू, तवे-सी काली मेरी माँ, और मैं गोरी-चिट्टी
उसकी कोख पड़ी। कहती है इलाके के बड़भागी तहसीलदार
की मुंहादरा है मित्रो । अव तुम्हीं बताओ, जिठानी, तुम-जैसा
सत-बल कहाँ से पाऊँ-लाऊँ ? देवर तुम्हारा मेरा रोग नहीं
पहचानता।"वहुत हुआ हफ्ते-पखवारे और मेरी इस देह में
इतनी प्यास है, इतनी प्यास कि मछली-सी तड़पती हूँ !
सुहाग फटी-फटी आँखों देवरानी को ऐसे तकती रही कि
पहली बार देखा हो, कि नाक-नक्शा ध्यान में न पाता हो, सिर
हिला फीके गले कहा-देवरानी, इन भले लोकों को भुलावा
दे तुम्हारी मां ने अच्छा नहीं किया, तब एकाएक मुंह तमतमा
आया-देवरानी, वहू-बेटियों के लिए तो घर-गृहस्थी की रीति
ही लच्छमन की लीक । जाने-अनजाने फलाँगी नहीं कि...
मित्रो ने कानों पर हाथ दे अाँखें नचाई-ठोंक-पीट मुझे
अपने सबक दोगी तो मैं भी मुंडी हिला लूंगी, जिठानी, पर जो
हौंस इस तन व्यापी है...
सुहाग से सुना नहीं गया तो हाथ से टोक दिया-वस,
देवरानी!
मित्रो ने सिरहाने पर सिर रखा और आँखें मींच अपने को
समझाया-मित्रो रानी! चिन्ता-फिकर तेरे वैरियों को ! जिस
घड़नेवाले ने तुझे घड़ दुनिया का सुख लूटने को भेजा है, वही
जहान का वाली तेरी फिकर भी करेगा!
२०/मित्रो मरजानी
बन्द आँखों में बनारसी का यार नियामत थानेदार दीख पड़ा। ऊँचा-लम्बा, मुच्छल। पहले पास खड़ा-खड़ा हँसता रहा फिर कड़ककर कहा-अरी प्रो सुभान कोर ! उठकर बैठ ! देखती नही कौन आया है ! -मेरी तरफ से काला चोर पाया है। जरा जर के नियामत राय, यह तेरा थाना नहीं, मेरी चौकी है ! नियामत ने बांह वढ़ा मोढ़नी खींच ली। -वस"बस.. "बहुत हुआ ! पड़ी रहेगी और चौकी लुट जायेगी! मित्रो ने सुश हो वाहें फैला दी–वाह रे कमजात विल्ले, मलाई देख मुंह मारने पाया है ! रजाई परे जा गिरी तो सुहाग ने घुड़की दो-ख्याली घोड़े न दौड़ा, देवरानी, सीधी तरह सो जा। प्रवकी हिलते देलूँगी तो.. मित्रो कुलबुलाई। जी तो हुअा, जिठानी से कहे, जिस भड़वे की सूरत-मूरत मेरे तन-मन बसी है उस पर तेरा क्या जोर? पर सोचा, जिठानी मेरी जरूर धर्म-सतवाली है। नहीं तो क्यों- कर जान लेती कि मैं पड़ी-पड़ी नियामत से जवाव-सवाल करती मियो ने भिनसरे आंख खोली तो जिठानी के बदले सास को पास बैठे देख रात की सारी कथा-वार्ता याद हो पायी। चमक- कर बाँहें फैलाई, अलसाई-सी अंगड़ाई ली और सास को ऐसे मित्रो मरजानी/२१ . घूरा जैसे आँख-ही-ग्राँख में हँस-हँस कहती हो, सासु जी, जवानी कहीं से माँगकर तो नहीं लायी। आँखें मटका ढिठाई से कहा-~~-मुंह अँधेरे यहाँ कैसे, माँ जी? मित्रो विचारी अगले जहान तो नहीं चली कि उसका दीवा-बत्ती करवाने आयी हो ? धनवन्ती कई छिन बहू की अोर तकती रही, फिर सिर हिला बोली-बेटी, मुझ कर्म-जली के ऐसे भाग कहाँ ? इज्जतमान से तेरा साई तुझे भू पर उतारता तो मैं भी अपनी सुमित्रारानी को दिल खोलकर रोती, पर फूटी किस्मत मेरी, वह दिहाड़ा मुझे देखना न बँधा था। --दिन-दहाड़े अभी बहुतेरे पायेंगे, माँ जी, सारी चिन्ता- सोग आज ही न निपटा लो। चौके से सुहाग की हाँक सुन धनवन्ती उठ बैठी और जाते- जाते माथे पर हाथ मार बोली-लख लानत है, बीवी, मुझे, जिसने तुम्हारी माँ से माथा लगाया ! मित्रो कुछ कहने जाती थी कि द्वार पर जेठ की ऊँची पर- छाई देख ठिठक गयी। कल रात की वात याद कर मसखरी से छोटा-सा चूंघट निकाल वोली-जेठ जी, अपनी जिठानी के तुल तो मैं कहाँ पर एक नज़र इधर भी... सुना-अनसुना कर वनवारीलाल परत गये कि सुहाग ने प्रा देवरानी से कहा-तावली-तावली नहा-धो आयी, मँझली। छोटी का जी अच्छा नहीं। मैं घर-अंगना बुहार लेती हूँ, तुम २२ / मित्रो मरजानी
चौके की संभाल लो।
-मैं मर गयी, जिठानी ! यह पापडगिरों की फूलां माये
दिन स्वाँग रचती है। खाने को दिन में चार दोने मिठाई और
रात प्राधा सेर पक्के दूध में जलेवियां !
सुहाग ने सिर हिलाया-न"न"देवरानी, उसे झूठा दोप
न दे, उसका तन ठीक नहीं !
मंझली ने आँखें नचाई -अाज हड्डी टूटती है, आज माथा
फटता है, अाज कमर दुखती है, प्राज दिल छिपता है...
सुहाग ने टोका । फूलावन्ती को आज सच ही दन्दल पड़ी
है, देवरानी । देह उसको काठ-सी अकड़ी पड़ी है।
-लाडो को क्या दिन चढ़े हैं ! फूलावन्ती का तन ठीक
रहे तो, बहन मेरी, वह पापड़गिरों की लड़की कैसी ? मुटियार
तो पक्की, ऐसे-ऐसे पापड़ वेल ले कि मर्द को पता न पाने दे कर
कपड़ों से होती है।
सुहाग का जी तो हुआ खुलकर हंस ले, पर गम्भीर बनी
रही । पुचकारकर कहा-उठ, मेरी बहना, जल्दी नहा-धो पा ।
मित्रो ऐसे उत्साह से उठी कि सोलहवां लगा हो । आँगन में
घरवाले को देखा तो और भी इतराई।
—मैं अभी मरी नही हूँ, चन्न जी, जिन्दा हूँ।
जवाब में सरदारी ने कसे-कसाये तेवर दिखा दिये तो
लापरवाही से बांह हिला, मुंह चिढ़ा कहा-मेरी भी बोलेगी
बला!
.
मित्रो मरजानी
और नहान-घर में जा घुसी। नहा-धो पायी तो जिठानी चौके में बैठी पराँठे सेंकती थी। सासरानी लड़कों के संग वाबू के कमरे में बैठी कोई खिचड़ी पकाती थी। उमंग में चलती-डोलती मित्रो फूलावन्ती के कमरे में पायी तो देवरानी की बेहोशी टूट चुकी थी। पास बैठा देवर गुलजारी- लाल फूला के हाथों की तालियाँ झसता था। मँझली दिल में हँसी। ऊपर से देवरानी को चुमकारकर कहा-हाय-प्राय ! फूलावन्ती, इस कच्ची उम्र तू कैसे-कैसे रोग लगा बैठी ? यह बेहोशी नास-होनी तो देह का सारा रक्त चूस लेती है ! फूलाँ ने उलाहने से गुलजारी की ओर देखा और निढाल- सी बाँह फैला कहा-बहन कोई सुने भी! कह-कह हार गयी। मुझमें हिम्मत-ऑगस नहीं, पर घरवाले तो समझे मैं मचल मार लेटी हूँ। कैसे बताऊँ कि मेरी जान को धड़की का रोग लगा - nic ----धड़की ? .."क्या कहती हो, देवरानी? यह तो नामुराद राज-रोग है ! -फिर देवर की ओर देखा-गुलजारीलाल, काम-धन्धा छोड़ मेरी देवरानी की दवा-दारू करा, नहीं तो वाँकी नार हाथ से गँवा लेगा! भौजाई सीख देती है कि वोली मारती है गुलजारीलाल कुछ समझा नहीं। विट-बिट तकता चला। २४ / मित्रो मरजानी फूलां ने लेटे-लेटे गवरू पर तीर फेंका-मेरे मरने-जीने की किसी को क्या परवाह ? मित्रो ने पास आ फूलों की छाती पर हाथ रखा और सिर हिला बोली--गजब है, देवर, गजव ! वेचारी का कलेजा क्या घड़कता है आसमानी उछलता है ! फड़क "फड़क" गुलजारी का चेहरा 'फक्क' रह गया। घिघियाते-से पूछा- डरवाली बात तो नही, भौजाई ? -डरवाली? गुलजारीलाल इस धड़कन से कोई वचता है। यह जानलेवा बीमारी तो प्राण लेकर ही रहती है ! फूला- रानी को मोती मुरब्वे खिला, देवर, और इलाज करवा इसका हकीम नादिरशाह से। गुलजारी ने हाथ बड़ा फूलां को वाह छूई कि वेचारी हुड़क- हुड़क रोने लगी-इस रोग से मैं नहीं वचतो ! अरे, कोई वैद्य- हकीम वुलाप्रो! मित्रो पहले खड़ी-खड़ी देखती रही, फिर देवर को आंख मार हाथ से ताली वजा दी-मान गयी, फूलारानी, मान गयी ! गुलजारी देवर तेरी इस वन्नो को न धड़की है, न कोई दर्द, न कमजोरी । यह तो गले-गले गहरे चरित्र हैं । गुलजारी देवर, तुम मिट्टी के माधो बने रहे तो एक दिन तुम्हारी अकल-बुद्धि सव चुरा ले जायेगी यह चोट्टी! घायल शेरनी-सी फूला गला फाड़-फाड़ दहाड़ने लगी-जो मेरे रोग-चीमारी झूठ माने उसके अपने नैन-प्राण दुखें ! दर्द- मित्रो मरजानी/२५
पीर से कालजा फटे!
मँझली ने घुड़की दो-चुप, री फूलाँ! यह झूठ-मूठ के रोग
छोड़, मर्द का बच्चा जन !
नहले-दहले खत्म होते न देख धनवन्ती अन्दर आयी। तेवर
चढ़ा बहुओं को घूरा और लड़के को उलाहना दे बोली-बेटा,
पास बैठाल इन दोनों की कलह-कलत्र सुन रहा है ? मॅझली तो
जवान-छुट है, तू ही अपनी को समझा !
गुलजारी ने वेबसो से सिर हिला तत्ते-जले कहा-फूलों का
दोष हो तो उसे कुछ कहूँ। जव भौजाई आप ही मुंह लगे, पाप
ही गले पड़े तो..
मंझली अोठों को मरोर दे हँस दी।
-~वाह रे निन्दक ! गुलजारीलाल, मैं तो समझी थी औरत
के साथ लग तू अव मर्द बन गया होगा...
धनवन्ती ने बीच में ही डपट दिया, चुप कर, बहू, कंजरों-
वाले फक्कड़ न तोल ! जवान काबू में रख !
मँझली ने आँखों-ही-आँखों में देवर को वेपर्द कर दिया और
सिर हिला वोली-काका गुलजारी, माँ की इतनी-सी घुड़की से
। डर गया? तू तो चोखा गवरू जवान है, फूलावन्ती क्या तेरे
संग...
छि... छि:... धनवन्ती के बदन पर कांटे उग आये।
-~~-मेरी आँखों से दूर हो, बहू ! ---और धनवन्ती ने आँखों
पर हाथ रख लिया।
२६ / मित्रो मरजानी
मित्रो अंगुल-भर और ऊंची हो पायो । सास को प्रांखें न
खोलते देख कहा-खोल लो, मां जी, अांखें खोल लो! घुड़की
सुन क्या मैं यहाँ से टल जाऊँगी?
धनवन्ती ने फूलों की अोर मुंह फेरा-फूलावन्ती, जी कुछ
ठिकाने हुमा ? कुछ खाया-पिया ?
--मैं तो भली-चंगी हूँ, मां जी । मुझे कोई दुख-रोग नहीं...
मैं तो लेटी-लेटी स्वाँग रचती हूँ !
धनवन्ती समझ गयी, छोटी बहू मित्रो के बोल दोहराती है ।
--फूलावन्ती, जिसे बोली-ठोली का अमल हो, बोल-कुवोल
का परहेज न हो, उसके कहे का तू भरम करेगी ?
फूलावन्ती गुस्से से चमककर उठ बैठी-मेरी जिठानी को
किसने सिर चढा रखा है, सो मै जानती हूँ, मां जी ! मुंह में जो
प्राता है वोलती है, किसी की शह पर ही न !
मैंझली ने देवरानी से और ठठा-मजाक किया-फूलारानी,
अपनी गऊ-सी सास के आगे जहर-भरे फुकारे न मार । रात तो
तू मारे मौजें और दिन में छेड़े महाभारत !
धनवन्ती ने फूलों को समझाया -बेटी, जिठानी के मुंह न
लग । कुछ खा-पी, आराम कर ।
फूलावन्ती विना डंक तड़प उठी-यह मीठी-मीठी बातें रहने
दो, मां जी! जिस दिन से इस घर पांव रखा है, मेरी जान को
वन प्रायी है। मुझसे सब जलते-भुनते हैं। मेरे वावुल-भाई
धनवान साहूकार हैं तो
मिनी मरजानी/२७
मित्रो ने देवर को आँख मारी-नो-हो ! धनी-साहूकार
क्यों, फूलारानी, यह क्यों नहीं कहती कि राजे-महाराजे हैं ?
फिर दाँत निकाल, सिर हिलाया, मुंह विचकाया-देवरानी !
चार छाज बढ़ियाँ और चार छाज पापड़, यही है न तेरे पीहर
साहूकारा
फूलावन्ती पटाक चारपाई से नीचे उतर गयी। एक बार
जलती निगाह घरवाले को देखा, फिर चारपाई की बाँही पर
माथा पटक-पटक ऊँचा-ऊँचा रोने लगी-मैं सब जानती हूँ,
वैरी मुझे इस घर वसने नहीं देते ! मेरे गहने-गट्टे पर जो आँख
का
?
है
अपमान-गुस्से से धनवन्ती थर-थर काँपने लगी-बहू, तेरी
अक्ल-बुद्ध तो ठिकाने हैं ?
फूलाँ ने गुलजारी के दरवार में फरियाद की-अव अपनी
आँखों देख लो, तुम्हारी माँ-भौजाई मुझे कैसे फाड़-फाड़ खाती
हैं ! मैंने आज तक बड़ा सन्न रखा है पर कान खोल सुन लो, मैं
अपनी सिंगार-पट्टी न छोड़ गी!
धनवन्ती के अोठों में बोल अटकने लगे-बहू, तेरे मन ऐसी
वेऐतबारी? मेरा तो जीते-जी मरन! घर सवका साँझा पर
यह तेर-मेर क्या? फूलावन्ती ! मैं क्या तुम्हारी पराई हूँ ?
-~-अपने-पराये की बात नहीं, माँ जी, मेरे गहने की कहो ।
धनवन्ती ने बेवसी से इमदाद के लिए बेटे की ओर देखा-
चेटा, तेरे सामने यह चौढ़ ? इसे समझायेगा नहीं ?
२८/मित्रो मरजानी
,
गुलजारी ने मां मे नज़र नहीं मिलाई और बिना कुछ कहे- सुने उठ बाहर चला गया। वेटे का रुख देख धनवन्ती मन-ही-मन कच्ची हो आयी। गुस्सा संभाल सयाने कण्ठ कहा-बेटी, बनवारी की पहली बहू की पाऊँचियां तेरी वरी में ढोयी थीं, फिर तेरी सिंगार-पट्टी सुहाग को देकर मैंने कौन जुल्म कर लिया ? फूलावन्ती, घर- गृहस्थी के तो सभी जोड़ वन्द है। ऐसी बैर-विरोध की बातें बहुओं को नहीं सोहती। फूलावन्ती तेज-तरार लड़ने को विल्कुल तैयार-मेरी मां के दिये गहने-कपड़े कोई क्यों ले ? क्यों वांटे? कोई लूट के हैं ? धनवन्ती सन्नाटे में आ गयी। सिर हिला-हिला कहा-बहू, कुछ तो लाज-लिहाज़ रख । देखते-सुनते क्या कहेंगे ? -मेरी ओर से पूरा जहान सुने ! जिस अभागी का गहना- बट्टा लुटता हो वह मुंह पर ताला लगा ले? मंझली ने सिर हिला-हिला खूब मजा लिया। फूलावन्ती की पीठ पर थापी दे कहा-शावाश, देवरानी, शावाश! इस चिट्ट सिरवाली की तुमने अच्छी वाव की है ! पर इतना जान ले, देवरानी, मैं जो तेरे मर्द की मां होती तो, रानी, तेरे इस पिदके- से सिर पर एक बाल न रहने देती ! फूलों के मन उवाल तो ऐसा पाया कि जिठानी का झोंटा नोच ले पर जाने क्या सोच ग़म खा गयी। धम्म-से अपनी चारपाई पर बैठकर कहा-जिसे अपनी इज्जत-पत्त प्यारी हो मित्रो मरजानी / २६
वह सीधे-सीधे अपनी राह पकड़े। न मैं किसी से अडंगा लगाऊँ
न कोई मेरे संग अड़फड़ करे ।
मैंझली तमाशबीन बनी बारी-बारी से सास-बहू की प्रोर
देख हँस दी-फूलाँरानी, मैं बुरों-की-बुरी मशहूर थी, पर, लाडो,
तू
भी चोखा नाम कमायेगी !
धनवन्ती का जी भर आया। सदा जिसे कोसती-फटकारती
हूँ उसने सास का साथ तो दिया। सिर हिला बोली-बहूटियो,
मेरे कहे-सुने की मुझे माफ़ी दो। मैं न जानती थी कि मैं इस
घर की माँ नहीं"टहलन हूँ"टहलन
मैंझली को सचमुच सास पर तरस हो आया पर ऊपर से
ठुनका लगाकर कहा-माँ जी, माँएँ तो आदि-अनन्त से बच्चों
की टहलनें रहीं, पर अपनी इस छुटकी बहू की पूजा किस नाम
से करोगी? मेरा बस चले तो, देवरानी, वाँके बिहारी की जगह
फूला प्यारी के मन्दिर की थापना कर दूं !
सुहाग जो दूर बैठी-बैठी वाक्-युद्ध देखती थी, हारकर पास
आयी और गुस्सा कर सास से कहा-माँ जी, यह टके-टके की
बातें सुनने के बिना क्या जन्म विरथा चला जायेगा ?
जिठानी के संग सास को जाते देख फूलाँ ने पीछे से आवाज़
दी-भले लिवा ले जामो सासू जी को, जिठानी, सव माल-पत्ता
जो तुम्हें ही मिलना है ! पर मेरे सिर के गहने तो दया करके
मुझे लौटा दो !
सुहाग पलटकर देवरानी के पास चली आयी और गम्भीर
३०/मित्रो मरजानी
स्वर में बोली-~देवरानी, ताने-तेवर एक तरफ, पर क्या सौंह खाकर बैठी हो कि घर में किसी का परदा न रखोगी? फूलावन्तो थिरको नहीं-जिनकी नीयत बुरी उनका परदा मैं क्या रखू ? मेरे दहेज के निकाले तोन जोड़े, भारी बनारसी ओढ़नी, सिंगार-पट्टी और माथे का टीका मुझे दिलवा दो तो किसी के साथ न मेरा कोई वैरन विरोध। ---फूलावन्ती ! वैर-विरोध तो अपने मन का। तुम्हारे जोड़े-छल्ले रख मैं राजपाटवाली न हो जाऊंगी, देवरानी ! यह तो कुटुम्ब-कवोले का व्यवहार समझो। फूलों ने कसकर बोली मारो-खूब कही, जिठानी ! जो बैठे-बैठे दूसरों के माल हथिया ले उसके लिए तो यह हुआ व्यवहार और जो वेचारा खो बैठे उसके लिए लूटमार ! सुहाग की सचमुच दुःख लगा। हाथ से मनाकर कहा-न- न, छोटी बहू, चटाक-पटाक तुम्हारे वाजिव नहीं ! -वाजिव-नावाजिब की भली पूछी है, जिठानी ! कौन धर्म-लकोर खिची है? जो माल-मत्ता मेरी मां का दिया है, वह कायदे-कानून से किसका है, यह भी तो कहती जानी ! नयी रुको नहो। गयो और हाथ में दोनों गहने लिये लौटी और देवरानी के आगे कर कहा-लो फूलावन्ती, अपनी वस्त समालो! फूला ने दिल की खुशी दिल में ही छिपा ली। टीका और सिंगार-पट्टो हाथ में उलट-पलट देखा। और जिठानी से कहा- मित्रो मरजानी/३१
वहना, जव इतनी ऊंच-नीच हो ही गयी है तो मेरे लीढ़े और
दिलवा दो! टंटा ही खत्म हो।
मॅझली ने फूल बरसाये-फूलावन्ती, तेरी इस बगीची का
टंटा क्या कभी खत्म होनेवाला है ? अरी, जान रख, जब तक
दिल यह तेरा कैंगला तब तक झगड़े-फिसादों में ही झीखती-
कलपती रहेगी, रानी!
सुहाग जिन पैरों आयी थी उन्हीं पैरों वापस चली गयी तो
मँझली ने आँख मार देवरानी से कहा-फूलावन्ती, बधाइयाँ !
वधाइयाँ ! आज तो रण का सेहरा तेरे माथे ! अव छुटकी ज़रा
ढोल वजवा और हाथ से हल्वा-पूरी कर ।
फूलावन्ती मँझली की बोली-ठोली सव घोल-घाल के पी गयी
और पास लगाये
सुहाग
के लौटने की
राह
तकने लगी।
सुहाग की बाँह पर रखे अपने जोड़े देख फूलावन्ती का ऐसा
जी तृप्त हुआ कि सात तीर्थ नहा लिये हों।
मित्रो ने
सुहाग को बीच ही में रोक जिठानी के हाथ
से
कपड़े छीन लिये-जिठानी, अब इन कपड़ों का हिसाब-किताव
मेरे और छुटकी के वीच !
सुहाग ने झिड़का-चुकने दे झगड़ा, मँझली, अब क्या युद्ध
छेड़ेगी?
मॅझली ने सिर हिलाया-एक बार छोड़ हजार वार ! इस
भुख्खी का माथा धूम गया है, जिठानी, जैसे इन जोड़ों के विना
इसके पित्तर न तिरते हों!
३२ / मित्रो मरजानी
तव आंखें नचा फूलावन्ती से कहा-हाथ धो डाल, देवरानी
इनसे ! अव अगले जहान लेना!
फूलावन्ती ने तेवर चढ़ा आंखों-ही-आंखों में मैमली को
भभकी दी-लोटाती कैसे नहीं ?
आँखों-ही-प्रांखों में मंझली ने भी कह दिया-नहीं"नही...
कभी नहीं!
फूलों ने मॅझली को परखा-तोला, फिर मिन्नत मोहताजी से
कहा-बहना, जब लौटानेवाली लौटाती है तो बीच में कूदने-
वाली तुम कौन ?
मॅझली ने हाथ फैलाया--मैं तेरी जमदूती, वस! तूने सास
से टक्कर ली मैंने माना, पर जिसको तू जूती वरावर भी नहीं
अब उसकी इजत-पत्त उतारने चली है ? भरी, चुपचाप यह
गहने अन्दर डाल ले नहीं तो उनसे भी जायेगी।
फूलावन्ती जवाब में कुछ कहने जाती थी कि जिठानी की
टंकार सुन थिर हो गयी और चुपचाप सिंगार-पट्टी और टीका
ओढ़नी के छोर बांध सटिया पर जा बैठी।
मंझली ने कपड़े जिठानी की झोली में डाल दिये-तुम्हें
सौंह गुरुओं की, जिठानी, जो तुम फूलों को लौटानो! इस
नामुरादन से तो किसी कगले को दे डालना।
लड़ाई-झगड़े से सुरखरू हो मंझली अपने कमरे में आयी तो
सरदारीलाल का उधड़ा पड़ा बिस्तर देख देर तक दोचिती-सी
मित्रो मरजानी / ३३
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मित्रो ने सिर हिलाया-हुया, जिठानी, हुया ! मेरे जेठ को दूसरी जगह व्याही हो तो क्या इसी से मेरी मां बन मुझे सीख देती जामोगी? खड़े हो फिर से दर्पण में चेहरा देखा और सुहाग को गल- वाही दे कहा-चल, मेरे जेठ की टेरन, अब हो जाये पेशी अपने बुढ़ऊ ससुर के दरवार! दोनों देवरानी-जिठानी ससुर के कमरे में पायो तो धनवन्ती दोनों बेटों-समेत धनी के कमरे में विराजमान थी। सुहाग सास से ढुक वैठी तो अोठों-ही-पोठों में मुस्करा मित्रो ठसक से घरवाले के पास जा बैठी। धनवन्ती ने बारी-बारी सबकी भोर ताका और बात हिलाने को कहा-सुमित्रारानी, माथे का कपड़ा तनिक नीवा कर ले, वेटी ! तेरे ससुर-जेठ बैठे हैं ! मॅझली ने नयी व्याही के से नखरे से ओढ़नी माथे के नीचे कर ली और चूंघट की आँख वना इतराती-सी चहकने लगी। गुरुदास कुछ कहने की कोशिश में रहकर खेखारने लगे, जैसे गले में कुछ अटका हो। बड़े बेटे ने उठ पानी का गिलास पागे किया तो धूंट भर गुरुदास संभले । पहले धनवन्ती की पोर देखा फिर बनवारीलाल की ओर सिर हिला बेबसी से बोले-न लो, बड़ी उम्र इस बूढ़े का इम्तहान न लो। मैं बूढ़ा ठहरा, मुझे छुट्टी दो इन लड़ाई-झगड़ों से। जवान बेटे की जवान सीझ से बनवारीलाल पहले चुपचाप यापू की ओर देखता रहा, फिर वापू को वाह छू हिम्मत बंधाई- मित्रो मरजानी/३५
वापू, सरदारी को अपनी घरवाली से बैर नहीं जो उस पर झूठी
तोहमत लगायेगा।
गुरुदास ने बेटे का हाथ छिटक दिया-ऐसी खुराफ़ात !
कुछ तो सोच-समझकर उच्चरो! आप ही उघाड़ोगे और आप
ही कहोगे नंगे हो?
गुरुदास
ने मझली
बहू
की ओर ताका तो वह उन्हें छोटे-से
धूंघटवाली कोई छोटी गुड़िया दीखी !
सिर हिला बोले-~~वरखुरदार, जवानी के जोश में बात का
बतंगड़ न बनाओ।
सरदारी ने जलती निगाह वापू
को
कुछ कहना चाहा तो
बापू ने हाथ से रोक दिया-न'न''सरदारीलाल, मैं अन्धा
नहीं जो देख नहीं पाऊँगा?
वात विगड़ते देख बनवारीलाल उठ वापू के पास आ झुका
-दिल-दिमाग कायम रखो, बापू, यह समय हेर-फेर करने का
नहीं। जिसे समझाना हो समझायो, जिसे ताड़ना हो ताड़ो।
गुरुदास बेटे की झिड़की से हाँफने लगे और हाँफते-हाँफते
लेंट गये।
धनवन्ती के मन बड़ा अरमान लगा। जो घर का माथा है
वही घर की इज़्ज़त-पत रखने को न कहेगा तो दूसरा भला
कौन इसे सिर पर उठाये-उठाये फिरेगा? धनवन्ती सयाने गले
समझाकर बोली-वेटा, तुम्हारे वापू का जी राजी नहीं, इनके
कहे का भरम न करना । बनवारीलाल, तू भाइयों में सबसे
३६ / मित्रो मरजानी
वड़ा है। तू ही पूछ ले अपने भाई-भौजाई से !
सरदारी का कहा-सुना याद कर बनवारी को नज़र नीची
हो गयी। पूछ-ताछ करने को मन-ही-मन कई मुहावरे दोहराये,
फिर भारी-रोवीली आवाज में कहा-सरदारी की बहू, मालिक
को हाज़र-नाज़र जान के कह दो कि जो तुम्हारे घरवाले ने देखा.
मुना है वह झूठ है।
मित्रो पूंघट में से देख-देख इतराती रही।
बनवारीलाल ने फिर झूठ-सच का निस्तारा करने को भाई
से पूछा-सरदारीलाल, यह तेरी व्याही-परणायी है, तुम ही जी
पर हाथ रख कह दो कि यह सब झूठ है।
सरदारीलाल ने सिर झुका लिया। जीते-जी कौन भडुवा
कहेगा कि बहूटी उसकी नाक-तले चार मांड़ों में मुंह मारती
वेटे को चुपका देख धनवन्ती ने टीडा दिया-बनवारीलाल,
तेरा भाई क्या कहे ? हे कोई मर्द-मर्दान जो अपनी व्याही के
ऐसे कुलच्छन देख सके?
बनवारीलाल ने आवाज में टंकार भर इस वार मंझली बहू
से पूछा-सुमित्रावन्ती, सरदारीलाल जिसे सच करके कहता है
तुम अपने मुंह से कह दो कि वह झूठ है।
मित्रो ने छनकार करती बांह से पूंघट माथे के ऊपर सरका
लिया। आँख उठा जेठ की ओर देखा, फिर पलटकर जिठानी
की ओर प्रांखें मटका मिजाज से बोली-सज्जनो! यह सच भी
.
मित्रो मरजानी / ३७
! और झूठ भी। सुनकर गुरुदास को मानो लकवा मार गया। वनवारी ने आँखें झुका लीं। सरदारी ने बँधी मूठ छाती पर धर ली। सिर हिला-हिला सास ने बहू को लानत भेजी-हैयी शावाश! हैयी शाबाश ! सुमित्रावन्ती ! दीन-दुनिया की आँखों में और धूल झोंक । अरी ठगनिया, झूठ और सच तेरा एक, और आशनाई आँखें तेरी दो ! अरी बड़-बोली, यह क्यों नहीं कहती कि माँ जन्मनेवाली ने तुझे एक थन से सच्चा दूध पिलाया और दूसरे से झूठा? सुहागवन्ती ने सुन दाँत-तले जवान दे ली-ग़म खाने को तो मित्रो दूसरी बार जन्मेगी ! मित्रो ने रुक-रुककर सबकी ओर देखा, फिर जिठानी को बोली मारी-अरी सास की कुछ लगती! मुझे तो तोतेवाली रटन रटाकर लायी थी। अव कह कि वह बोलूं या माँ के दूध- वाली पोथी बाँचूं । सुहाग ने मझली के कान में कहा-बहन मेरी, इस घड़ी सुलह-सफाई होने दो। कल की रही कल के साथ, इन बड़े- सयानों को और न जला-कलपा। छन-भर मित्रो के माथे तेवर चढ़े और उतर गये। चेहरे पर अपनी दिलदारिन माँ बालो वाली कुटिल मुस्कान फैल गयी। निःशंक हो नज़र फेंकी और गला ऊँचा कर कहा-जिसे जो पूछना हो, बेधड़क हो पूछे । सात गुनाह मित्रो के पर झूठ की ३८/मित्रो मरजानी ।
उसे सौह।
बनवारी ने एक और छोड़ो-जो सच भी है और झूठ भी,
सरदारी की वहू, कचहरी के मुकदमेवाली यह तेरी कसी
मिसल?
सरदारी की बहू को मुंह-मांगी मुराद मिल गयो । कटोरी-सी
दो आंखें नचाकर कहा-सोने-सो अपनी देह झुर-झुरकर जला
लूं या गुजलारी देवर की घरवाली की न्याई सुई-सिलाई के पीछे
जान खपा लूँ ? सच तो यूं, जेठ जी, कि दीन-दुनिया विसरा मैं
मनुक्ख को जात से हंस-खेल लेती हूँ। झूठ यूं कि खसम का दिया
राजपाट छोड़ में कोठे पर तो नहीं जा बैठी ?
गुरुदास लेटे-लेटे उठ बैठे। बहू की जगह लड़कों को डांटकर
कहा-बोधे जवान कहीं के ! तिल का ताड़ बना तरीमत के मुंह
लगते हो? कभी दम-खम आजमाना हो तो गली-गलियारे में
जूत पैजार कर लिया करो!
नाक से छूकार करता सरदारी उठ खड़ा हुना और चौखकर
बोला-तू छिनालों की भी छिनाल ! अाज न माने बापू, पर एक
दिन इसके यार और याराने"
मित्रो ने कमर पर हाथ टिका उलाहने से ससुर को पोर
ताका और मनुहार से कहा-सुन लिया न, बापू? कोई मां-जाई
ऐसी गालियां सुन चुप रहेगी?
गुरुदास लड़के पर बरसने लगे लानत है, सरदारीलाल,
लानत है ! तरीमत को सधाने का ढंग-प्रकल नहीं और ऊपर से
मित्रो मरजानी/३६
यह गुनहगारी!
जानकर कि बाजी उसके हाथ रही, मॅझली ने शुका ससुर के
पांव छू लिये शीर लाड़ से कहा-पाँव पड़ती हूँ, बापू जी ! भाज
जो भोट पापसे पायी है वह मित्रो के लिए सुरगों से बढ़कर
--चूढ़े रासुर की प्रांखों में धूल झोंक हरमन प्यारी वालो की
लड़की मन-ही-मन हँसी। फिर सास-जिठानी, जेठ और घरवाले
पर नैनों की तिरछी कटारियां चला कमरे से बाहर हो गयी।
दिन-भर मण्डी में भटका-भटका बनवारीलाल घर आया तो
रकावी लिये सुहाग ससुर को दाल-दलिया खिलाने जाती थी।
माथे का कपड़ा प्रांखों पर खींच लिया और पास खड़े हो बापू
को खिलाया-पिलाया। बर्तन उठा, कुल्ला करवाया। फिर पल्ले
के छोर से किशमिरा-मुनपके के दाने निकाल ससुर के श्रागे कर
दिये।
?
गुरुदारा ने असीस दिया- जीती रहो, बेटी, सुखी रहो !
बहू दहलीज तक पहुँची तो फिर से टेरकर कहा-सुहागवन्ती
बेटी, तेरी सयाना का क्या मूल्य ? तेरे सास-ससुर ने तुझे पाने
को जरूर पिछले जन्म कोई अच्छा कर्म किया होगा।
ससुर की वड़ाई से हल्की फूल सुहागवन्ती चौके की ओर
निकल गयी तो भी गुरुदास पड़े-पड़े सोचते रहे। घर-गृहस्थी के
जंजाल में भी मनुक्ख घाटे में नहीं रहता। इस माया में लाख
४० मित्रो मरजानी
दुःख-सोग पर फिर इसी की खट्टी कमाई वुढ़ापे में काम आती
है । बहू को ही देखो, कहाँ को वेटौं, कहां जन्मी-पली और व्याह
कर किन बूढ़ों की सेवा में जुटी है !
सहसा वेटो जनको की सूरत प्रांखों में घूम गयो। कल इस
अंगना डोलती-फिरती थी, अाज किसी दूजे घर का चिराग वनी
बैठी है । गुरुदास का दिल ऐसा उमड़ा कि उड़कर जायें और
अपनी लाड़ली की घर-गृहस्थी देख जायें । गये साल सयाले के
वाद तो बेटी को बुलावा ही नहीं गया। समधी क्या सोचते
होंगे?
धनवन्ती अन्दर पायी तो कहा-भागवान, बहू-बेटों में तुम
ऐसी डूवो हो कि लड़की वैचारी की सुध-बुध ही नहीं।
धनवन्ती किवाड़ भिड़ा चारपाई पर लेट गयी और थकी-
सी बोली-जनको को चिट्ठी आयी है, वैसाख में लड़के के भुण्डन
सुनकर गुरुदास मानो अपनी प्यारी वेटी को ही पा गये
हों। लाड़ से कहा-धनवन्ती, भगवान की दया से उनके घर
का पहला पोता जनको की गोद पड़ा है। जरा ढंग का सामान
जुटाना।
सोच में डूबी धनवन्ती लेटी-लेटी उठ बैठी-बनवारीलाल
बड़ी फिकरों में है । मण्डी का देना चार-छ: दिन में न चुकाया
तो...
गुरुदास के मुख पर से चाव-भरी हंसी पल-छिन में गायव
मित्रो मरजानी/
हो गयी। सहमी-सहमी आँखों घरवाली को देखते रहे। फिर मानो अपने को तसल्ली देने को कहा-छोटी-सी बात को बड़ी बनाकर कहने की तेरी पुरानी पादत । जो मण्डी का व्यापार करेगा, उसी के सिर देना भी चढ़ेगा और उसी की हथेली के ज़ोर से उतरेगा भी। धनवन्ती ने सिर हिलाया-न-न, लड़के का मुंह-माथा देख यह न कह सकोगे। मारे फिकर के उसकी तो भूख-प्यास सूखी गुरुदास खाँसते-खांसते उठ बैठे-बूढ़े वाप ने चारपाई क्या पकड़ी, नालायकों ने सब चौपट कर दिया। धनवन्ती ने हाथ से रोक दिया--शुभ-शुभ बोलो, ऐसी वाक- वाणियाँ न करो ! दुनिया क्या कभी देनदार नहीं होती ? गुरुदास झंझलाये-सीख न दे, भलीमानस, लड़के को आवाज़ दे । इस बूढ़े बाप से उन्हें अव क्या पूछना-तांछना ? धनवन्ती बनवारी को बुलाने गयी तो धण्टे-भर नहीं लौटी। गुरुदास पड़े-पड़े राह तकते रहे और तकते-तकते आँखों में नींद उतर आयी। सुहाग के बुलाये वनवारीलाल चौके में पाया तो पाटिये पर बैठी धनवन्ती रोटी सेंकती थी। हल्की आंच फूल डाल खुला घी लगाया और बहू से कहा-बेटे को कुछ खाण्ड-शक्कर दे। -~-न-न, अम्मा, आज घी-शक्कर पर दिल नहीं। -अरे बेटा, इन छोटे-मोटे फिकरों से क्या फाका करने - ४२ / मित्रो मरजानी लगे? उठ, बहू घो-शक्करवाला लुकमा तोड़ वनवारी ने मुंह में डाला तो मीठी-सौंधी गन्ध से भूख चमक उठी । माथे के तेवर ढीले पड़े और मुंह-ही-मुंह स्वाद ले कहा-सुहाग ! मोठी रोटियां तो बस अपनी मां की! सास को प्रोर देख सुहाग मुस्कराई- -सच ही तो है, जो छुटके-से बच्चे को खिला-पिला पूरा जना वना दे उस मां की रोटी की क्या कोई कम महिमा? धनवन्ती जी भर-भर खुश हुई पर झूठ-मूठ का गुस्सा जता बनवारी की ओर ताका वलिहारी तेरी अक्ल पर,सुहागवन्ती। मेरे ही बेटे को नजर लगाने चली ! बनवारी ने भीनी आंख घरवाली पर डाली और उठते-उठते कहा-सुहाग, टुक सरदारी को तो हांक देना। सुहाग देवर के दरवाजे पर पहुंची तो देवरानी को सजते- वनते देख ठिठक गयी। काशनी फूल-पत्तोंवाला शोख गुलाबी जोड़ा पहने मझली वालों में कंघा घुमाती थी। मित्रो ने पलट नयी की ओर देखा और घूरकर कहा- लड़का-चाला अभी तुम्हारी झोली नहीं, पर हो गयी हो सास से भी प्रबल ! वित्ते-भर का यह तेरा वजूद, जिठानी, पर अकल- आँख ऐसी चौकस कि मजाल कुछ भी चूक जाये ! फिर नाक चढ़ा कहा-सज-संवर पोतम को मिलने जाती थी कि बीच में महारानी प्रान पहुंची ! मित्रो मरजानी/४३ --वहना, मैं तो तेरे जेठ के कहे सरदारीलाल को बुलाने पायी थी। देवर क्या अभी लौटा नहीं ? मैंझली ने कलेजे पर हाथ रख लिया। -रात उतरते देवर तुम्हारा घर पान पहुँचा तो जान लो, जिठानी, उस दिन पासमानी गोला उगा पश्चिम से। तुम क्या समझी थीं देवर तुम्हारा इस झोली में लुका बैठा होगा? परी, मेरी सयानी जिठानी, वह तो भागता-फिरता होगा वैद्य-हकीमों के यहाँ ! सुहाग ने झिड़की दिया-चुप री! मैंझली ने खड़े-खड़े मांग निकाली, दोनों ओर चिड़ियाँ-तोते विठाये, चुटिया गूंथ परदा डाला, फिर पिटारी से इत्र-फुलेल की शीशी निकाली-कुछ नर्म-गर्म हो तो कहो, जिठानी। तुम्हें भी फोहे का टोटका दे दूं? सुहाग ने माथे पर हाथ रख धिक्कारा-हर घड़ी की मस- खरी अच्छी नहीं, मॅझली । तेरे जेठ ने पूरी बात तो नहीं बतायी, पर इतना जान ले, इन भाइयों के सिर मण्डी का चोखा देना चढ़ा है। मँझली मुड़ी नहीं। लापरवाही से हाथ हिलाया-मेरे चहेते जेठ की महारानी! जिस पर जो चढ़ा है चढ़ा रहे, मुझ पर तो सींगोंवाला भूत चढ़ा है। जाते-जाते सुहाग ने सिर हिला कहा-तुम्हारे कहे का बुरा नहीं मानती, पर जी में बड़ा दुःख पाती हूँ। देनेवाले ने कैसा ४४ / मित्रो मरजानी तो रूप दिया और कैसी दे दी मत। मॅझली ने जिठानी का पल्ला पकड़ लिया। मित्रो ने हाथ जोड़ दिये-बस, अब खुलासा कहो, मर्दो पर क्या वन पायी है ? सुहाग ने जाते-जाते कहा-जितना जानती थी, कह चुको,. वाकी पूछना सरदारी से ! जिठानी के बाहर गये पोछे मित्रो खड़ी-खड़ी कुछ सोचती रही । फिर दर्पण में मुखड़ा देखा । सिर को ओढ़नी उतार बांहें फैला मुस्करा दी । अनोखी रीत इस देह-तन की ! बूंद पड़े तो थोड़ी, न पड़े तो थोड़ी! आज भड़वा बनवारी ही जो बनाव- सिंगार देखता ! जाने किन कार-करतूतों में पड़ा शहर को धूल फांकता है ! साध लिये मन में मित्रो जोड़ा उतारने को हुई कि जैसे किसी ने हाथ रोक लिया। बनी-ठनी हूँ तो क्या किसी को चोरी है ? नखरे से दुवारा प्रोढ़नी प्रोढ़ ली और सासु से मुठभेड़ करने चौके की मोर चली। फूलावन्ती के दरवाजे के आगे निकली तो छेड़खानी सूझी । झांककर आवाज दी-आज तो, फूलावन्ती, तू बड़े रंगो में ! तेरी तो ताजी-ताजी इलायची दानेवाली माला घढ़कर पायी - । A फूलावन्ती ने दांत-तले जीभ दवा ली। बैरिन कहाँ से पता पा गयो ? हाथ का कसीदा छोड़ दहलीज पर आन खड़ी हुई- तुम्हारा ही मुंह मुबारक हो, जिठानी ! इलायचीदाने को कौन- मित्रो मरजानी / ४५
कहे, इस घर तो फूटा छल्ला भी दवाल नहीं !
मँझली कूल्हे मटका हँस दी-वाह
री
बहन फरेबवन्ती!
इस कलजुग में तो पूजा ही गौड़-गड़न्त की तो तू ही क्यों सच
बोले । छुटकी माला तो तेरी चोर पिटारी में और सास-जिठानी
को यह चकमा ! तू हजार तोतेचश्म देवरानी, पर औरत की
जून पड़ गहना-गट्टा सँभालने की विद्या किसे नहीं पाती? अरी,
जादू के जोर तू भाला कलेजे में भी छिपा ले तो भी उसे देख
लेने का मन्त्र मित्रो के पास ।
सुनकर फूलाँ को जग-जहान भूल गया। फिर इस डर से कि
जिठानी सचमुच ही न समझ ले कि पछाड़ खा गयी हूं बाहर
निकल पायी और मित्रो के पीछे-पीछे रसोईघर की ओर चली।
मित्रो चौके में जा बैठी और सास को सुनाकर वोली-मां
जी, बेचारी फूलावन्ती पर बुरी बन पायी है । चाव-चाव गहना-
गट्टा घढ़वा जो अभागिन दुश्मनों के डर से अंग न छुपा
सके...
धनवन्ती जो पहले ही गुलजारी और उसकी घरवाली से
जली-भुनी वैठी थी, चूल्हे में फूंक मार रुखाई से बोली-मॅझली
बहू, मैं गहने-गट्टे को नहीं हिलाती हूँ पर जो घरवाले को बैरी
समझने लगे उस भागमरी के गहने भी क्या फले-फूलेंगे ?
फूलावन्ती मुंहजोर जिठानी से डरती थी पर सास की बात
सुनकर न रह सकी। त्योरी चढ़ा बोली-फूलें-फलें वे जिनका
इस घर में हुक्म हासल है ! जिन हम-जैसों के भाग ही खोटे हों,
४६ / मित्रो मरजानी
जो अभागे सबसे छोटे हों, उनका तो प्रभु ही वाली ! दिन भर चूल्हा-चौका झोंक शाम को वची-खुची रोटियां इतना ही न ! धनवन्ती ने हाथ मल-मल लिये-डर कर वहू, कोई पर भी देखनेवाला है ! फिर मित्रो की ओर मुड़कर कहा-मंझली बहू ! मैं तो नाते से ही बुरी इसकी सास ठहरी परतू मेरी सौंह खाकर कह दे, इस नाजो को इस रसोई-घर को राह-डगर भी पता है ? मझली ने टिटकारी भरी-पलंग पर बैठे-बिठाये जिसे चंगा-चौसा मिल जाये, मां जी, वह निगोड़ी चौके में क्यों मुंह मारने पायेगी? फलावन्ती सर मार-मार उछली-ठीक कहती हो, मां जी, ठोक हो ! इस चौके में मेरी क्या पूछ ? पूछ है उनकी जिनके खसम मेहनत से कमाते हैं, महीने में दस वार गफ्फे लाते हैं ! सास की कच्चो होते देख मंझली का दिल पिघला । वांह से खींच फूलावन्तो को पास विठला लिया और ठुड्डी छू बोली- मेरी वेलगामो देवरानी ! काहे झूठ बोलती है, री? मैं क्या वेलो सुनार को नहीं जानती? उससे गहने घढ़ा-चढ़ा तूने उसकी दूकान प्राधो कर दी, पर यह तो कह, भोली फरेवन, तेरा सैयां कहां से इतना कमाता-लाता है ? गालो सुन फूलों को ग्रांखों में अंगारे वरसने लगे। कहा- देवर तुम्हारा कही सेंध लगाता हो, डाके डालता हो, सो जाने उसके मां-बाप और भाई-भौजाई... मित्रो मरजानी/७
फिर चढ़े माथेवाली सास की ओर ध्यान गया तो आगे
जोड़ा-जेवर-गहने की जो पूछो तो जो-जो पीहर से पाती हूँ,
जोड़-बन्ध कर उसी से कुछ-न-कुछ घढ़वा लेती हूँ।
मँझली कुछ कहने जाती थी कि चौके के बाहर घरवाले को
खड़ा देख मुस्कराई और फूलावन्ती के सिर का बूंघट नीचे खींच
बोली-अरी देवरानी, कुछ होश कर! जेठ खड़ा है। लाख
तुझसे गोरी-चिट्टी हूँ पर तेरे इस सुरमेदानी दिल की क्या खवर,
अपने जेठ से ही लगा बैठे !
सरदारी ने सुना-अनसुना कर तीखे गले कहा-अम्मा,
गुलजारी ने जो गुल खिलाया है."
फूलों के कान खड़े हुए।
मँझली ने शरारत-भरी चितवन से सरदारी की ओर देखा
और हँसकर कहा--जब तक मेरी फूलावन्ती को फूल नहीं पड़ता
तब तक क्यों न देवर गुलजारी ही गुल खिलाये ?
धनवन्ती ने मानो बहू की बात ही न सुनी हो । सहमी-सी
। बेटे से पूछा-बेटा, मुझे पहेलियाँ न बुझा, ठीक-ठीक कह !
-अम्मा, तुम्हारा छोटा वेटा बनवारी के नाम मण्डी से
रुपया उगराता रहा है और एक फूटी कौड़ी दूकान में जमा नहीं
करवाई।
सुनकर धनवन्ती की आंखें फैल गयीं।
मँझली फूला को कोई करारी वोली मारने को थी कि
उसकी सिसकी सुन अचरज में आ गयी-क्या हुआ, लाड़ो ?
४८ / मित्रो मरजानी
1
फूलायन्ती माथे पर हाथ मार-मार रोने लगी हम ! किसी को नहीं सुहाते ! इस घर हमारा कोई हिस्सा हक न. तो हमारी छप्परी अलग कर दो ! बन पायेगी तो कमाकर रूखी-सूखी खा लेंगे। न होगा तो मसानों में जा सोयेंगे। मंझली ने पुचकारा- रो, फूलावन्ती, न रो! भरी, यह कोई थाना-मुन्सिफ नही, तेरा जेठ है, जेठ ! फूलावन्ती तड़प उठी-थाने-मुन्सिफ गले पड़ें उनके जिन्होंने किसी की कमाई मारी हो, कोई गुनाह किया हो! पाढ़त में जो हक एक भाई का, सो ही दूजे का और वही तीजे का। धनवन्ती से सहा नहीं गया-चुप बहू ! छोटा मुंह बड़ी वात! किसका क्या हक है, क्या देना-पावना है, यही सिखा-पढ़ा उन पापडगिरों ने यह कूडा मेरे माथे मढ़ दिया। जानकर कि बड़े जेठ-जिठानी भी पास आ खड़े हैं, फूलावन्ती ने गले की आवाज़ बदल ली और हिचकियां ले-ले बोली-मुझ- पर लाख जुल्म ढाओ, जो-जो मन हो कहो, पर उन राजानों का नाम न लो! धनवन्ती ने सिर हिलाया-हां, री, हाँ ! जिन अपने सगे वावुल-भाई को राजा करके पुकारती हो उनसे भिस्ती अच्छे, वहूरानी! , बनवारी ने मां को आगे बोलने नहीं दिया। आगे बढ़ वाह से घेर लिया-चलो, अम्मा, इस कलह-फिसाद में अपना माथा न खपालो। जो भीड़ हम पर वन प्रायी है उसके लिए कोई मित्रो मरजानी /XE.
빴 자 १८ की मजबूत वाह छूते ही धनवन्ती को बेटा, इस बुरी मत वाली के मुंह लग मेरी गयी है। वेटे माँ को लिवा ले गये तो सुहाग ने चूल्हे पर से भाजी की कड़ाही उतार तवा रख दिया और छोटी देवरानी से कहा- उठ, फूलावन्ती, हाथ-मुंह धो, कुछ खा-पी । फिर मित्रो से कहा-देवर की थाली परस ले जा, वहना। देवर ने सुबह से मुंह जूठा नहीं किया। पड़छत्ती से वर्तन उतार मित्रो ने सुहाग के आगे रखे, पर फूलों को कुछ कहे विना जी न माना । आँखों पर से देवरानी का हाथ हटा उसे बहनापे से गले लगा लिया और लाड़ जताकर कहा-स्वांग तो मेरा भी अच्छा रहा, फूलावन्ती, पर सास तुझे भिश्तीवाली चोट करारी लगा गयी है.' सुहाग ने एक संग हाथ-आँख से भिड़क दिया-बस-बस, मँझली! जा, देवर को खिला-पिला ! मित्रो ने मुंह-ही-मुंह हँस जिठानी की ओर ताका और इठ- लाती, कमर मटकाती घरवाले को खाना खिलाने चली। चारपाई पर बैठे सरदारी को चौंकाने के लिए मित्रो ने पांव से पाहट की, वाँहों से छनकार किया, तो भी फिक्रों में डूबा सास का बेटा हिला-डुला नहीं तो मित्रो के जी ढेरों प्यार उमड़ पाया। हथेली पर थाली टिका, पाँव चारपाई की. वाँही पर ५०/मित्रो मरजानी रखा और ग्रांखें नचाकर कहा-लो, महाराज, वन्दी हाजर ! चाहो तो मेरी यह चिकनी-चुपड़ी सौत निगल लो, न हो तो मुझे . ही चबा लो! सरदारी ने अपनी कठोर आँखों से एक नज़र उठाई और लोटा ली। मित्रो शरारत से और मसकी । कानों के झुमके हिलाये। तब हाथ से निवाला तोड़ सज्जन के मुंह में डाला और चंचल आंखों घरवाले को तरेरकर कहा-मौला जी, मैं नहीं तो यह प्राग-सिंकी सौतिया ही सही ! मित्रों के हाथों गस्से ले-ले सरदारी चुपचाप चवाता रहा तो प्रांखों में अनोखी अदा भर शोखी से कहा-हुक्म की वाँदी हूँ, चन्न जी, इतनी रुखाई क्यों? सरदारीलाल ने इस बार ताका भर और एक निवाला निगल लिया। मित्रो ने भूरी आँखें नचाईं-मैं किस्मत जली क्या करूं? मेरा ढोल तो मुझसे वेमुख ! छन-भर को सरदारी की आँख मित्रो की ओढ़नी पर टिकी कि मित्रो इमरती बन गयी। घरवाले के घुटने पर कोहनी टेको और प्रांखों में आँखें डाल- कर कहा-रिसालदार जी! सदा न रहेंगे यह रिसाले ! सरदारी ने चाहा हाथ से परे ठेल दे पर भूरी आंखों पर वालों के छल्ले देख बदन में फुरैरी-सी उठ पायी। ठुड्डी से छू
..--
कहा-नाटक-लीला में तो तू पुतली जान से भी बढ़कर !
वनी-ठनी, आँख के इशारों से मर्दो को नचाती पुतली जान
की पदवी पा मित्रो मन-ही-मन फूली न समाई। पर ऊपर से
गुस्सा जताकर वोली-भोले जानी, उस पान-चवाऊ भटियारिन
से मेरी तुलना ? उस फत्तो के ध्यान में मेरी अनारों की लड़ियाँ
ही भूल गये?-हिन-हिन करती मॅझली ने घरवाले का मुंह चूम
लिया और मटककर कहा-सस्सी के पुन्न, याद रख, खाण्ड का
वताशा और नून का डला घुलकर ही रहेगा!
सरदारीलाल के अोठों पर हँसी दिखी और प्रोझल हो
गयी। माथे के तेवर फिर उभर आये, तो भाँप मित्रो ने आँखें
झपकाई-महरम, मन-ही-मन कोई रोग लगा रखा है, फिक
पाल रखा है तो बताओ, यह वन्दी भी वाट ले।
सरदारी ने मन-ही-मन अपने को चेताया, पूरी फरेबन है,
पर ऊपर से कहा-क्यों सिर खपाने वैठी है ? मर्दो के फिकर
मर्दो के लिए।
सुनकर एक बार तो जी हुआ घरवाले को एक करारी सुना
चित कर दे, पर जबान पर काबू पा मित्रो वोली-महाराज जी,
न थाली बाँटते हो"न नींद वाँटते हो, दिल के दुखड़े ही बाँट
लो।
सरदारी ने सिर हिला हाथ छिटका-तेरे बस का नहीं।
मित्रो ने त्योरियाँ चढ़ा लीं-मेरे बस में मेरा बाँका ढोल
नहीं और सब-कुछ है !
५२ / मित्रो मरजानी
सरदारी ने सिर पर हाथ फेरा और लम्बी सांस भरकर
कहा--गुलजारी का कपट-फरेव और सिर पर चढ़ा देना, उसी
का फिक्र है, मित्रो।
मित्रो खिलखिलाकर हँस दी-लो मर गयी मित्रो ! महाराज
जी गोता मारा पाताल और निकला थोथा घोंघा! यह तो कहो
सैयां, है कितना?
सरदारीलाल चुप बना रहा कि जवाब की जरूरत न हो?
मित्रो ने इजारवन्द से बंधी ताली निकाली और हाथ से
उछालकर कहा-अपने साहब जी के लिए जो इतना भी न कर
सके वह मित्रो न हुई कि कंगली हुई !
सरदारी ने नर्म हो कहा-भली लोग, यह तेरे बस का नहीं।
सौ-सैकड़ों की बात नहीं । यहाँ तो हजारों का तोड़ा है।
मित्रो ने आंखों से भसकी की-एक ?
सरदारी ने सिर हिलाया-नहीं ।
नहीं।
-तीन?
मित्रो ने एडियां उठा पड़छत्ती पर से टीन को सन्दूकची
उतारी। ताली लगा लाल पट्ट की थैली निकाली और घरवाले
के भागे रख बोली-यह दमड़ी दात परवान करो, लाल जो!
कौन इस नांवे के बिना मित्रो की बेटी कंवारी रह जायेगी ?
मित्रो मरजानी/५३
घरवाले को हक्का-बक्का देख, प्रोढ़नी मुंह में डाल मित्रो पहले हँसती रही, फिर सरदारी के गले में बाँहें डाल दी। -मित्रो के सिर की सौंह, महाराज जी, जो यह गुत्यी न परवानो! जी में बड़ा पछतावा लगा। चलन तो इसके बुरे, पर इस पर हाथ उठाना सोहता नहीं। सरदारीलाल ने कई बार मित्रो को तक रुखाई से पूछा- सच-सच कहेगी? मित्रो ने आँखें झपकाई-पहले मेरी सौंह ! मित्रो ने मुंह विचकाया-न-न मुझे अपनी सौंह अपनी माँ की सौंह 'कालें चोर की सौंह पर, लाल जी, मैं अपने वेली सैयाँ की सौंह क्यों उठाऊँ ?--फिर छाती पर हाथ रखकर कहा-वह तो स्वास-स्वास इस बन्द बटुए में रहता है ! सरदारी ने जैसे सुना नहीं। कड़ी नज़र मित्रो के चेहरे पर गड़ाकर कहा-जहाँ-तहाँ क्यों ? मित्रो ने नैन मटकाये--नहीं जी' 'कभी नहीं ! तो यह नाँवा कहाँ से समेटा है ? डरकर मन-ही-मन कहा, जल्लाद कहीं का ! ऊपर से ठग- नियों-सी हँसी-अम्मा के भोले भुलक्कड़, भूल गये ? आपकी धन्नो सास की मैं इकलौती विटिया हूँ। सरदारीलाल कुछ कहने को हुआ कि मित्रो ने बढ़ शरवती अोठों से मुंह पर साँकल लगा दी। और चुप्पे से कहा-~-ग़म की ५४ / मित्रो मरजानी
गुत्थी सुलझ गयी, दिलवर संयो, अब अपनी लैला की सुध लो!
भाइयों की लाडली बहन पीहर क्या पायी कि घर-प्रांगन में
खुशी का सूरज निकल पाया।
बच्ची के सिर पर प्यार का हाथ फेर गुरुदास ने नाती को
गोद में ले लिया और निरख-परख नये पाहुन का सिर हिलाते
चले । जनको मां के गले लगी। इस ओर-उस प्रो। लाड़-प्यार
से धनवन्ती की आंखें छलछला पायी। लम्बे छन तक बेटी को
बाँहों में लिपटाये रखा तो मंझली हँसी-थोड़ा-सा प्रेम-प्यार
हम बहुओं के लिए भी बचा रखो, माँ जी !
खिल-खिल हंसती जनको खुली वाहों भाभियों की ओर बढ़
प्रायी। छोटी भाभी को न देख पूछा-सुख तो है, अम्मा, न
छोटी भाभी दिखो, न गुलजारी भैया !
धनवन्तो ने छोटी बहू को प्रावाज दो-फूलारानी, बाहर
तो निकल, बेटी, तेरी नन्दिया पायी है !
सुहाग ने जनको की पीठ पर हाथ फेरा-अरी मुनिया,
अपने पुराने घर का आँगन ही भूल गयी?
चारपाई पर बैठ जनको ने चारों ओर नजर मारी और
हँसकर कहा~-जहां तुम-सी भाभी-भौजाइयां, ऐसा पीहर क्या
भूला जाता होगा?
मियो ने जनको की आँखों में झांका और झूठी तरेर से
पूछा-अरी, हर रोज घरवाले के दिव...
मित्रो मरजानी/ ५५
जनको पहले समझी नहीं। फिर समझी तो हथेलियों में
अाँखें छिपा लीं।
फूलावन्ती अन्दर से आयी तो बाल विखरे थे और आँखें
रो-रो लाल । जनको उठ गले मिली । खुशी-खुशी पूछा- छुटकी
भाभी, मैं तो अच्छी खबर की राह तकती रही !
मंझली खिलखिलाकर हँस दी। इसकी भली पूछी, नन्दिया !
राम का नाम ले, यह झगड़े-फिसाद की पिटारी कहाँ से लायेगी
अच्छी खवर?
जनको कुछ कहने जाती थी कि फूलावन्ती धड़धड़ाती अपने
कमरे में जा घुसी।
असमंजस में जनको ने बड़ी भाभी की ओर देखा कि नाती
को झोली में डाले धनवन्ती बाहर आयी और बनवारी की बहू
से बोली-सुहागवन्ती, लड़की को कुछ खिला-पिला, सफर से
पायी है।
मॅझली ने ननद को आँख मारी-अरी, अव थकन काहे
की? तेरा ज़ालिम तो कोसों दूर !
झोली में मुन्ने को झुलाती धनवन्ती फिर से जवान हो गयी।
सिर हिला मित्रो की ओर देखा और हँसकर कहा-जनको, तेरी
भाभी सच कहती है। जमाई के जुल्म की निशानी तो यह रही !
सभी हँस-हँस दोहरी हुई। आवाज़ सुन अन्दर से गुरुदास
निकले। खिले-खिले चेहरे पास पान खड़े हुए तो दोनों वहुओं
ने माथे तक कपड़े खींच लिये। गुरुदास ने एक बार फिर वेटी के
.
५६ / मित्रो मरजानी
सिर पर प्यार फेरा और धनवन्ती से ले नाती को हाथ में मुलाने लगे। झुरियों-पड़े मुंह पर जाने कहाँ से चमक पा गयी। पकी- पुरानी मूछों से ढके अोठों पर कुछ ऐसी हंसी विखरती चली, मानो दूर-दूर कोई चिन्ता-फिकर न हो। --जनको, खा-पी जल्दी पा, वेटो। तेरे सास-ससुर और उनके छैले लड़कों के हाल-चाल तो पूछे नहीं। गोद में नाती को उठाये बापू और पास मुकी अम्मा सुहाग को ऐसे दीख पड़े कि अंगना में कोई जीती-जागती तस्वीर मढ़ी हो। ससुर के आगे तनिक-सी प्रोट कर सासु से कहा-मां जी, वापू से कहें, घड़ी-भर को चौके में ही आ बैठे। रौनक लगेगी। धनवन्ती हंसी-मली कही, सयानी बहू ! तेरे बूढ़े सास- ससुर की क्या रोनक ? रौनक तो लाया है यह दादी का पोता? वर्तन-भाँड़ों से भरे पोहर के पुराने चौके में बैठ जनको का मन हिरस से भर आया। जहां जन्मी-पली, वही घर अब पराया हो गया। बेटी का गुलाबी चेहरा देख धनवन्ती सुखी हुई-जनको, यह तो कह, मेरी समधिन सरकार के क्या रंग हैं ? अव भी सिर में फूल-पत्ते और प्रोखों का काजल-सुरमा ? जनको ने मां को निहारा । काला पड़ता रंग और झुरियों- पड़ता चेहरा देख दिल में हाँस पड़ी। कहां सेव-सा भखता सास का मुख कहाँ चिन्ता में डूबी अम्मा? मित्रो मरजानी/५७ -- ----अम्मा, सासू जी को तो जैसी तुमने व्याह में देखा था ठीक वैसी ही अव भी दीखती हैं। धनवन्ती ने ठिठोली की- इस उमर भी जिसे खान-पान, साज-सिंगार की लटक हो उसे रूप की क्या कमी ? गुरुदास हँसे । समधिन के पोते के सिर पर हाथ फेरते-फेरते समधिन पर भी मोह हो पाया। -वन-ठन के रहना कोई गुनाह है, साथिन ? दुनिया सारी तुम-जैसी तो नहीं। मालिक का दिया सब-कुछ है, पर जहान- भर का जंजाल और मलाल तेरे कपड़ों पर ! धनवन्ती ने बुरा नहीं माना। झूठ-मूठ की तरेर से धनी की ओर देखा और बहुत्रों से कहा-लो, सुन लो ! अव मैं क्यों किसी को भाने लगी ? तुम्हारे ससुर का तो मन ही आया है अपनी समधिन पर! वहुएँ बापू की नज़र वचा मुंह-ही-मुंह हँसती रहीं। आँगन में पाँव की आहट सुन जनको उठी और बनवारी के गले जा लगी। भाई ने वहन को चुमकारा-पुचकारा और चीके की दहलीज़ पर खड़े हो कहा- इस पगली को अकेले घर में पाँव क्यों रखने दिया, अम्मा ? पूरे साल-भर वाद शक्ल दिखायी और बन्ने को घर की रखवाली छोड़ आयी! बनवारीलाल, यह लाहने-उलाहने तुम वहन-भाइयों के, पर, बेटा, अपने इस नये पुरोहित-पाँदे को भी तो देखो। वनवारी ने बहन को छोड़ भांजे को उठा लिया और हाथों - ५८/मित्रो मरजानी
में झुलाकर कहा-बरखुरदार, दामाद का तू वेटा ठहरा! तू
भी हमारे सिर-माथे पर!
एकाएक धनवन्ती का ध्यान भटका। सरदारी से पूछा-
वेटा, गुलजारीलाल माज भी लौटा कि.नहीं ?
सरदारी ने मां से नजर नहीं मिलाई । सिर भर हिला दिया
नही।
गुरुदास मानो इस घड़ी घर की सब चिन्ता-फिकर भूल जाना
चाहते थे।
-बनवारीलाल, वहन तुम्हारी सबसे छोटी है पर सबसे
पहले गृहस्थिन बन गयी है।
धनवन्ती ने जाने कैसी नजरों बहुओं को देखा । अच्छी-मली
सूरत-सेहत है पर अब तक एक के लाल नही पड़ा।
दुपहरी जनको सामान खोल बैठी। भाई-भाभियों के लिए
छोटी-मोटी सौगाते निकाली तो धनवन्ती वेटी पर बोलने लगी-
लो, देखो नासमझी ! वेटी तेरे बड़े भाई-भौजाई तेरे घर की
वस्त रखेंगे?
जनको ने हल्की-फुल्को पाँखें मां की ओर देखा और बड़प्पन
से कहा-अम्मा, सासू जी तो बार-चार कहती रही, बहू, साली
हाथ न भेजूंगी। तेरे भतीजे-भतीजियां होते तो सौ लाड़ चाव
करती।
गुरुदास मुन्ने को अपने पास लिटाये बैठे थे। कोहनी टेके.
टेके कहा-धनवन्ती, ननद-भाभियों को खुशी करने दे । बेटी,
मित्रो मरजानी/५."
जब जाये तो रुपया थमा देना। इतना ही न ? आँगन में बैठे सुहाग और मित्रो जनको की ससुराल के हाल- चाल, दुःख-सुख पूछती रहीं। मित्रो भाभी जितनी बार कुछ कहती जनको उतनी वार. हँसती, उतनी बार लजाती। -~~-अरी, तेरा सिद्ध जोगी सीधे तेरे सिरहाने,प्रा धूमी रमाता है जनको ने सिर हिला हामी भरी। -फिर तुझ पर जादू की छड़ फिराता है । चंचल आँखों जनको ने सिर हिला दिया-हाँ । -फिर छल-कपट से नींद का मन्त्र पढ़ देता है ! जनको ने लजा-शरमा मुंह बड़ी भाभी की ओर मोड़ लिया। अपनी गोरी-चिट्टी सोहती ननद को लजाते-शरमाते देख सुहाग पहले मुस्कराई फिर सहसा देवरानी की ओर देखा तो शोखी से फड़कती आँखें देख तन-बदन दहकने लगा। एक ही आँख मॅझली ने जिठानी का दिल पढ़ लिया और आँखें चढ़ाकर कहा-इस भोली सूरत पर मैं ही फिदा तो उस आदम के बेटे की कौन कहे ? सुहाग ने जनको को हुक्म दिया-बहुत हुआ हँसी-ठट्ठा, जनको जा, माँ के पास जा बैठ। रुपांसी-सी जनको माँ के पास जा बैठी तो भभकती आँखों मित्रो ने जिठानी का भार-तौल किया और सिर हिलाकर ६० / मित्रो मरजानी कहा-मैं इसीलिए नही सुहाती न कि अंग-संग में पूरी हूँ? -तुम सोलह कला परिपूर्ण हो, वहना, पर हाथ जोड़ मेरी इतनी ही विनती है कि गऊ-सी सोधो इस पराये घर को बहू को अपने उलटे सबक न दो! -भली कही, जिठानी ! यह गऊ-सी नन्दिया मेरे सवकों के विना ही, लड़का जन लायी है ! परी जिठानी, जिस राह लड़की पेट पड़ती है, उसी राह सब-कुछ सीख भी आती है। सुहाग ने कानों पर हाथ रख लिया-कहनेवाली में ही गुनाहगार, वहना, मुझे माफी दे ! जिठानी के जाते ही मझली ने पीठ मोड़ मुंह फूलां के दर- वाजे की ओर कर लिया और खड़काकर कहा-बहुत हुआ गुस्सा-गिला, फूलावन्ती, अव कोप-भवन से निकला। एकाएक बाहर गली में नजर पड़ी तो देवर के संग फूलावन्ती के भाइयों को देख मित्रो चहक उठी। -कुण्डी खोल दे, फूलॉ प्यारी! गुलजारीलाल तेरे भाइयों का लश्कर लेकर पाया है ! पटाक से किवाड़ खुला और मैले-कुचले कपड़ों में फूलावन्ती बाहर पान खड़ी हुई। मंझली ने छेड़ा-अरी पटरानी, क्या सौत-जाये को राजपाट मिलना है जो कैकई बनो वैठी थी? अपने भाइयों को देख फूलों का हौसला बढ़ा। त्योरियां चढ़ाकर कहा-खवरदार, जिठानी, जो मेरे साथ के भाइयों को मित्रो मरजानी/६१
--
'लश्कर' कहकर बुलाया
मित्रो ने हिन-हिन कर सिर हिलाया-सहारा रख, देवरानी
तेरी मां ने तो पांच-पाँच जन रखे हैं !
फूलों के कुछ कहते-न-कहते किशना, विशना, सत्ती और
पीछे-पीछे सिर झुकाये गुलजारीलाल पान पहुँचे। मॅझली ने
सब खट्टा-मिट्ठा घोल पाहुनों पर छिड़का-पापड़-वड़ियों के
साह सौदागरो जुग-जुग पधारो ! बहन के घर क्या खातिर हो
तुम्हारी, लाला?
फूलों ने तावली से आँखों पर बूंघट खींच लिया और रो-रो
कहा-मुझे इस नरक से निकालो, मेरे भाइयो ! तुम्हारी अभागी
बहन इन जुल्मियों के हाथों डाडी दुःखी है !
सत्ती ने हाथ की कसी मूठ हवा में उछाल दी हमारी वहन
की यह हालत करनेवाला कौन जन्मा है ?
मित्रो ने आँखों से तीर फेंके~-अनोखी वहनिया के भाइयो !
यह मैं क्या जानूं ? यह तो जानें गली-मुहल्ले की दाई या जाने
फिर...
विशना ने शोहदी नज़र एक बार मित्रो को तरेरा, फिर
लापरवाही से कहा-तुझसे तो, वहन मित्रो, बाद में निवदूंगा,
पहले अपने वुढ़ऊ ससुर को तो बुला !
मित्रो ने कमर पर हाथ टिकाया और सिर हिलाया-इतना
घमण्ड न करो, लाला! बाप तुम्हारा बाल रंग-रंग भले जवान
रुस्तम वने, पर याद रख लो मित्रो का कहना, एक दिन वह भी
६२ / मित्रो मरजानी
-
पापड़ बनर जागा!
पूनावन्ती निर पीट-पोट दहाड़ने लगो-कोड़े पड़ें जो
मेरे माई-बाबुन को को !
गुलजारी ने एक बार परवाती को मोर देसा, पात सड़े
सालों की ओर और सिर हिला कुछ कहते-कहीं रह गया।
मित्रो ने देवर के पास मागेला दिया-देवर गुलजारीलाल,
तू मर्द से तरीमत बन गया और भौजाई तेरी को सबर नही!
शोर-गुन सुन गुरुदास-धनवन्ती बाहर निरने और समभि-
याने का नोड्-भड़का देख सहम गये। रूसे गले गुरुदास ने पूरी
-चरखुरदार, सैर तो है ?
सबसे बडा किशना पास चला माया और तीरो गले से कहा
---फूलों के मां-बाप, भाई-भौजाई सभी जिन्दा है, मैं यही कहने
चला पाया हूँ, लाला जी !
धनवन्ती ने सिर हिलाया-शुभ-शुभ योलो, बेटा, उारे
मानो!
विशने ने धनवन्ती को तरेर मारी-बह्न हमारी गम में मुरा-
घुलकर आधी रह गयो है !
धनवन्ती ने इस एक ही पल सब-घुछ भोप लिया। हाप से
बरजकर कहा-विशनलाल, मैं तुमसे नहीं मपने येटे से यारा
करूँगी-फिर गुलजारी को प्रोर मुड़कर यहा-साफ-साफ मन्द,
गुलजारीलाल! तू इन सलाहकारों को किरा मतलय से साप
लाया है ?
मित्रो मरजानी/३
फूलाँ ने वीच में ही गला उठा घरवाले की इमदाद की-
हम अभागों के संग वेइन्साफी हो तो क्या कूक-फरियाद भी न
करें?
धनवन्ती ने कड़ी आवाज़ में वहू को झिड़क दिया-~-अपनी
रार-बरार बन्द कर, वहू ! गुलजारीलाल जो तुम्हें कहना है
अपने वापू से कह !
गुलजारी ने गला खंखारा । वोलने का जतन किया पर
आँखें ऊपर न उठीं।
धनवन्ती ने थोड़ी-सी पास वाकी जान वेटे को हौसला
दिया--बेटा, जब पराये वीच में कूद पड़ें फिर अपनों से कैसा
परदा?
गुलजारी ने सिर और नीचा कर लिया।
लड़के की वेवसी देख धनवन्ती को एकाएक ऐसा जान पड़ा
कि
वह माँ न हो कोई जल्लाद हो, जो हाथ में युद्ध की तेग लिये
रह-रह बेटे को ललकारती हो । अपने सवसे लाड़ले वेटे के लिए
दुःख-दर्द से जी भर पाया । भरा कण्ठ पुचकारकर कहा-गुल
वेटा, इस बूढ़ी की सोच न कर! जिससे तेरी घरवाली को ठण्ड
पड़े, तू वही कर!
माँ का रुधा उलाहना सुन गुलजारी की आँखें भर पायीं।
लम्बी साँस ले सिर डाले-डाले कहा-अम्मा, तुम्हारी बहू का
गुजारा अव इस घर में नहीं।
धनवन्ती को न कुछ कहने को सूझा, न पूछने को। चोट
६४ / मित्रो मरजानी
खायी प्रांखों से इमदाद के लिए घनी को ओर देखा तो क्रोध और अपमान से गुरुदास कई छन सिर हिलाते रह गये। फिर कांपती अावाज़ में बोले-धनवन्ती, कचहरी में कोई और नहीं, हम दोनों ही मुजरिम हैं। कमरे को झाड़-पोंछकर फूलावन्ती ने विछौने पर फूलोंवाला पलंगपोश विछाया, घरवाले का तहबन्द-कुर्ता खूटी पर लटकाया और तालियों का गुच्छा पल्ले से उतार मोतियोंवाली पड़छत्ती पर ठुका दिया। चिलमन से अन्दर प्राती धूप देख जी में कुछ ऐसी ठण्ड पड़ो कि विना कहे न बनता हो । ससुराल की कैद से निकल जैसे फिर से नयी दुनिया में प्रायी हो । पहनने को 'हरी छाल' का जोड़ा निकाला और सावुन की टिकिया ले धनवन्ती की सबसे छोटी बहू पीहर के नहान-घर में खुशी-खुशी नहाने चली। मल-मल सावुन से हाथ-पांव घोये। गुरु-मन्त्र दोहराया और पहन-पचर घूप में प्रान खड़ी हुई। वालों में कंघा घुमा चुटिया गूंथो और हल्की-फुल्की हो चारपाई पर पसर गयी। जय बंसीवाले की, जिसने गले से वह फांस निकाल दी । अव देखे न पाकर सास ! छाती पर भड़भच्चा न जल उठे तो नाम ! मायावन्ती अपनी लाडो के पास आ बैठी और खुशी-खुशी बोली-क्यों री, अब माया कान्ह तेरा राह पर? फूलों ने प्रांखें मटकाई-भावो, जमाई तुम्हारा तो पूरा सिद्ध गणेश है ! न किसी की अच्छी, न बुरी। झगड़े की जड़ मित्रो मरजानी/६५
-
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तो कोई दूजी ही थी!
मायावती के माथे पर दो भेद-भरे तेवर उभर पाये-
मुनिया, पाती बार तेरी सास ने तो ज़रूर बखेड़ा डाला होगा?
फूलों ने इतराकर माँ की ओर देखा-कुछ कहने-सुनने का
मुंह भी था? अपने घरवालों की करतूतें बेटा भी जानता है
मायावन्ती लड़की से पूरा लेखा-जोखा चाहती थी-फूला,
तेरी सास इतनी सीधी-सिधाड़ तो नहीं...
फूलाँ ने नमक-मिर्च लगाया-रो-रो हाल वेहाल करती रही,
पर यह समझो, अम्मा, कि जमाई तुम्हारा अटल रहा!
-~-और, री, वह बुढ़ऊ तुम्हारा ससुर ?
फूलावन्ती ने मन-ही-मन उस रात का पूरा नाटक दोहराया
तो श्रोठों पर तिरछी-पाड़ी कमान चढ़ गयी।
-~-भावो, उस वेचारे की कौन सुनता? बड़बड़ाता रहा और
खाँसता रहा, खाँसता रहा और हाँफता रहा ।
मायावन्ती को
सचमुच बेटी पर लाड़ हो श्राया, गले में
चिन्ता-फिकर भर कहा-फूलाँ, कुछ सोचा है, री? नाते-रिश्ते,
शरीक-भाई सी बात करेंगे, सौ मीन-मेख निकालेंगे
फूलाँ ने मतलब भाँप ढाढस दिया--भावो, उसकी चिन्ता
तो तव हो न जव ऊँची-नीची अपनी ओर से हुई हो ।
मायावती ने मन-ही-मन पूरी वही लिखकर तैयार कर ली
और घुड़ककर कहा-हैं री, उन नास-होनों ने तुझ पर जुल्मों के
पहाड़ ढा दिये और तू छेकड़ ऊँच-नीच की ही बात करती है ?
६६ / मित्रो मरजानी
फूला मां की सूझ-बूझ पर सचमुच न्योछावर हो आयी।
चौकन्नी नजरों से भाभियों के चबूतरों पर नजर मारी और
धीरे से मां के कान में कहा-भावो ! इन दोनों कनकुतरियों से
तुम्ही निबटो"इनसे पार पाना मेरे वस का नहीं !
दुपहरी खा-पी मां-बेटी घूप सेंकने बैठी तो मायावती ने
बहुओं को आवाज दी लड़कियो ! बहूटियो ! इघर मा बैठो।
कुछ कह-सुन ननद का जी ही लगानो। यह माथाफिरी तो कल
से रो-रो पागल हुई जाती है !
महीनों बाद यह सास की चाह-मरी अावाज सुन बहुएँ पोठों.
ही-अोठों में मुस्कराई और एक-दूसरे को संनत मार अपनी-अपनी
पीढ़ी उठा पास आ बैठी।
मायावती ने बड़ी बहू पर ढोली नजर डाली और लाड़ से
कहा-देख, री सोमा, लड़की का रंग पीला-जद पड़ गया है !
-फिर बेटी की पोर मुड़कर पूछा-क्यों री मुन्नी ! वहाँ कुछ
खाती-पीती नहीं थी?
फूला ने निरीह-मासूम ग्रांखों से भौजाइयो को सोर देस
लम्बी सांस ले अांखें झुका ली।
मायावन्तो ने तेवर चढ़ा वेटी को झकझोरा--मुन्नी !
वोलती क्यों नहीं ?
फूलों ने इस बार जो आँखें ऊपर उठाई कि टपटप मांसू
गिरने लगे।
सोमा और रानी यह स्वांग देख मन-ही-मन हंसी और प्रासों
मिनी मरजानी,
में झूठ-मूठ का विस्मय घोल बिटर-बिटर सास की ओर ताकती
चलीं।
ओढ़नी के छोर से मायावती ने लड़की की आँखें पोंछी और
दिलासा देकर कहा-बेटी, उन कंजरों पर तू लाख परदे डालती
रहे पर बैरियों ने जो-जो जुल्म तुझ पर ढाये हैं, वह तेरी माँ ही
नहीं, गुरु की सारी नगरी जानती है।
छोटी रानी ने पलकें झपका संकेत से जिठानी की मौन
सहमति ली और सिर हिलाकर पूछा-भाबो जी, हमारी फूला-
वन्ती-सी सीधी तो कहीं ढूंढने पर न मिले, पर ग़र्क-गये इसके
सासरे क्यों इसके बैर पड़े ?
मायावन्ती के कान खड़े हुए। पैंतरा वदलने से पहले बहू को
देखा-परखा। चालाको कहीं की ! फिर नरम गले कहा-बहू,
लालच का क्या इलाज ? सास लड़ाकी शाम-सुबह लड़की को
खींचती रहे, पीहर से यह ला, वह ला, तो भले घर की लड़की
वेचारी, क्या फाँसी लगा वैठे !
देवरानी का तीर निशाने बैठा देख सोमा पूरे जी खुश हुई।
धूरकर रानी की ओर ताका और सास की हाँ-में-हाँ मिलाकर
बोली-सच कहती हो, भावो, जिनकी आँख देन-दात पर हो
उन्हें इस गुणिया लड़की की क्या परख ?
रानी मानो अपनी गलती पर पछताई हो। आँखें फैला
बोली-हाय-हाय, फूला वीबी ! उनके लच्छनों की हमें क्या
खबर ? ऐसे खोटे निकलेंगे इसका तो सपने में भी चित्त-चेता
६८/मित्रो मरजानी
म था। मायावन्ती ने अपनी इस तेज-तरार वहू को घूरकर देखा तो रानी ने झट पेंतरा बदल लिया। आँसों से हमदर्दी टपका ननद से पूछा-वीवी, अपना गहना-गट्टा तो संभाल से ले आयी हो न? मायावन्ती जो गली-मुहल्ले, भाई-विरादरी से पहले अपनी बहुओं को जीत लेना चाहती थी, ऐसो मुंहफट वात सुन जलने- वलने लगी। घुड़की में चुटको भर दर्द मिलाकर कहा-गहने की वात ने हिला, बहू । वेटो सही-सलामत आन पहुंची है, यही क्या कम है ? इसके भाई वहाँ न पहुंचते तो जाने कंगले राकस लड़की का क्या हाल कर डालते। रानी ने सास की चुनौती का जवाब दिया-मैं मर जाऊँ, भावो ! बीवी अपने कंगन-हार, छाप-बल्ले वहीं छोड़ पायी और भाई भोले बहन को खाली हाथ लिया ले पाये ! सोमा ने मैदान संभाला चोवी, कुछ तो समझ की होती । और नहीं तो पीहर के हो, दो-चार गोखरू-चूड़े वचा लाती। मायावन्ती ने खूखार नजरों से दोनों बहुओं को तरेरा और हाथ फैला समधियों पर लानत-पाटकार भेजी-जिन गर्क-जानों ने मेरी बेटी को वस्त रखी है, भगवान करे वे नकर्म विन मौत मरें! छोटी बहू ने भरपूर सास की आँखों में प्रांखें डाल देया और भोली-भाली प्राज्ञाकारिणी बहू की तरह पोले मुंह से कहा- मित्रो मस्तानी
,
क्यों नहीं, भावो? जो धोखा-धड़ी करेगा वही मरेगा, कोई और
नहीं।
चोट करारी जान बड़ी बहू ने सेंक दिया-शुक्र मनाओ,
भावो ! उन कसाइयों के हाथों वीवी हमारी जीती-जागती लौट
आयी! गहने-गट्टे की क्या ? जिन्द है तो जहान है, और वन
जायेंगे।
माँ के सब पाँसे उलटे पड़ते देख फूलाँ ने बड़ी भौजाई की
झोली में मुंह छिपा लिया और हुड़क-हुड़क ऊंची सिसकारियाँ
भरने लगी।
धनवन्ती जो एक सुबह सोकर उठी तो एक मीठी खबर से मन
के सब चिन्ता-कलेश धुल गये । नहा-धो, तुलसी सींच चौके में
आयी तो सुहाग की जगह मित्रो को चूल्हा सुलगाते देख अचरज
में आ गयी। दहलीज़ पर खड़े-खड़े पूछा-सुमित्रावन्ती बेटी !
आज नयी की जगह तुम्हें देखती हूँ। जिठानी तुम्हारी राजी तो
है ?
माथे पर वल डाल सास की अोर कनखियों से देखा-अम्मा,
तुम्हारी लाडली फूला पीहर क्या जा बैठी कि उसकी उदासी में
तुमने घर-बाहर की चौकसी ही छोड़ दी !
-तड़के-तड़के पहेलियाँ न बुझा, मित्रो! जिठानी तेरी
बीमार तो नहीं?
मित्रो ने आड़ी-तिरछी नज़रों से सास की ओर देखा-
७० / मित्रो मरजानी
-
-
-
इतनी भोली न बनो, मां जी! बहू-बेटियोंवाले घर और क्या
होगा? कोई कन्त से पानन्द पा नौ महीने पछतायेगी, और
कोई दादी के लिए पोता जन जायेगी !
-अरी सच?'
सास के मुंह पर लाली फिरते देख मित्रो ने छेड़खानी की-
अम्मा, तनिक हौसला तो रखो। यह कोई तुरत-पुरत का मामला
नहीं कि रात-की-रात में जिन्द वोलने लगे।
धनवन्ती की आँखें निगोड़ी ऐसीचमकी कि कहीं से दो मोती
ही ढुलक पाये-तेरा ही मुंह मुबारक हो, सुमित्रावन्ती ! तेरे
मुंह घी-दशरकर!
चाव-चाव में अम्मा जो वापू को खवर देने चली तो मित्रो
अोठों में आप-ही-पाप हँसती रही। जिन्द-जान का यह कैसा
व्यापार ? अपने लड़के बीज डालें तो पुण्य, दूजे डालें तो कुकर्म !
गुरुदास की आँख लगी देव धनवन्ती उलटे पायों लोट पायी
और पाटिया खीच बहू के पाम या बैठी।
कड़ाही में दूध छानती मंमली को सुस-सन्तोप से देसकर
कहा-सुमित्रारानी, मेरी तो अक्ल-युद्धि ठिकाने नहीं। पाल
दिन-भर सुहाग में माइ-बुहार करयाती रही। हाय-हाय !
तुम्हारी जिठानी क्या सोचती होगी?
-यह क्या सोचेगी, अम्मा, यह तो ठहरी पिछले जन्म को
तुम्हारी चेरी ! कहोगी बैठ जा तो बैठ जायेगी, कहोगी उठ सड़ी
हो तो उठ सही होगी !
सोनी
धनवन्ती को सुहाग पर ढेरों लाड़ उमड़ पाया--जीती रहे, सतपुत्री हो सुमित्रावन्ती ! शुक्र है उस दाते का जिसकी दरगाह में देर है, अन्धेर नहीं! मित्रो ने सास से मसखरी की-अम्मा जिस दाते का नाम लेती हो उसे आँख से किसने देखा है ? असल पैगम्बर तो तुम्हारे बेटे ठहरे, जव चाहे पौदे रोप दें! धनवन्ती ने कानों पर हाथ रख लिया-हरे राम ! 'मेरे सिर पाप न चढ़ा, बहू ! मैं गरीवनी तो उसकी दया की बड़ी भूखी हूँ ! मॅझली ने हँसते-हँसते पाटिये पर से ही बाँह वढ़ा परात उठाई तो बहू के तन पर पहली बार ढीला-झबला कुरता देख सास के जी अटक पड़ा ! ..'अच्छी-भली, कसी-कसाई, गदराई देह थी बहू की, एकाएक इतनी दुबली हो गयी ! कई छन अपलक बहू की ओर तकती रही। मुंह श्रागे कर कुछ कहना चाहा पर निगाह मित्रो को बड़ी-बड़ी कटोरी आँखों पर ठिठक गयी। देख मित्रो से रहा नहीं गया । भभककर पड़ी-नज़र तो ऐसी गड़ाती कि झपाटा मार किसी को दवोचना हो! कुछ पूछना हो तो पूछ लो न सीधी तरह ! बहू की ताड़ से धनवन्ती कच्ची पड़ी। सिर हिला, रुक- रुककर कहा-सास का कहा बुरा न मानना, मॅझली, पर वेटी, तू दुवली क्यों हुई जाती है ? सुमित्रावन्ती ने त्यौरियाँ चढ़ा अपनी दनदनाती आँखों से ७२/ मित्रो मरजानी , धनवन्ती को घूरा और कड़ाही के उबलते दूध पर पानी का छींटा दे मारा। मोढ़नी-तले सांस ऐसी गिरती-पड़ती रही कि कहीं कोई धौंकनी चलती हो। बहू को अब भी चुप देख धनवन्ती हैरत में आ गयी। छेड़- छाड़, चटाक-पटाक, बोली-ताने में निपुण सुमित्रो इतनी सिदक वाली कब से हो गयी? मॅझली ने अव भी मुंह न खोला तो धनवन्ती ने मिन्नत कर पुकारा-बहू ! मित्रो ने प्रोठों को मरोर दे सास की भोर ताका। फिर सिर को झटक चूल्हे में फूंक मारने लगी। नद-नदिया-सी खुली-डुली बहू आज अंधेरी कोठरी-सी गुम. सुम क्यों? धनवन्ती का ध्यान सरदारी की और भटका तो सहसा सत्र- कुछ समझ में आ गया। जरूर कुछ-न-कुछ कह-सुन लड़के ने इसे सताया है। जवाव-सवाल न हुए कि वेचारी के लिए पाये दिन का आजाद हो गया ! नर्म-नर्म पोले कण्ठ से कहा-बेटी, मैं जान गयी हूँ, सारा कसूर इस वेअक्ल लड़के का हो है ! छोटी-मोटी बात पर भिड़ बैठा होगा। सुनकर मंझली ने सिर क्या उठाया कि खूख्वार शेरनी-सी झपट पड़ी–जले पर नमक छिड़कने से नहीं होगा, अम्मा ! मां-बेटे मिल, छील-छाल मित्रो का प्रचार क्यों नहीं डाल लेते ? मित्रो मरजानी/७३ हक्की-बक्की धनवन्ती की एक साँस ऊपर, एक नीचे । सास के मुंह पर कालिख पोतने को फूला ही क्या एक कम थी जो अव दूसरी भी उसी राह पान पड़ी ! समझा-बुझाकर कहा-बहू ! मेरा सरदारी स्वभाव का कडुवा है पर जी का बुरा नहीं। मालिक करे तेरी गोद भी बाल-बच्चे पड़ें तो पाप ही गबरू ढंग पर पा जायेगा। मित्रो ने सास की ओर देखा तो देखती ही चली । आँखों में मानो कोई आग लपलपाती हो और कण्ठ ऐसा कि तेज धार वाली दराँती हो-सुरखरू हो बैठो, अम्मा ! तुम्हारे इस बेटे के यहाँ कुछ होगा तो मित्रो चूहड़ी के पैरों का धोवन पी अपना जन्म सुफल कर लेगी! सास की छाती पर विना हथौड़ा मारे ही बहू ने कील ठोंक दी। छटपटाती छाती हुड़क-हुड़क हाहाकार करने लगी। एक बार तो धनवन्ती का जी हुआ, कहनेवाली का मुंह ही नोच ले, पर पेट में सिकुड़ती-सिसकती अंतड़ियों के मरोर से चेत गयी कि अभागिन बहू जो मुंह फाड़ कहती है क्या पता सच ही हो। धनवन्ती का न कण्ठ फूटा, न आँखें रिसीं। सोच में ऐसी डूबी कि न दिन-घड़ी का ध्यान रहा, न देश-दिशा का भान ! जैसे वैठी थी बैठी रही। --अम्मा ! मुंह उठा देखा, सामने सुमित्रा नहीं सुहाग थी, सकुचाई- ७४ / मित्रो मरजानी - सी, पछताई-सी। -पिछले पहर ऐसी प्रांख लगी कि नित-नियम से ही चूक गयो । मुझे आवाज ही दी होती, अम्मा ! धनवन्ती कुछ बोली नहीं। फोकी-बुझी नजर से जाने कहाँ देखती रही। फिर अचानक वहिं वड़ा सुहाग से जा लगी-मेरे जीने का कोई हीला नहीं 1 मुझे तो प्रव मरना ही सोहता है । सोचकर कि अम्मा का ध्यान फिर फूलां पोर गुलजारी की कृतघ्नता पर अटका-भटका है, सुहाग ने मोठी झिड़की दो- सुमित्रावन्ती झूठ नहीं कहती कि, अम्मा, तुम फूला और गुल- जारी के तुल किसी और को नहीं गिनती। धनवन्ती ने सिर हिलाया-न-न, वहू, यह बात नहीं। सुहाग ने उलाहना दिया-यही बात है, अम्मा ! नहीं तो तुम-सी सयानी को कौन समझाये कि जो भोला घरवाली के कहे समुराल जा बैठा है वह एक-न-एक दिन जरूर लोटकर मां के पास पायेगा। सास के माथे पर असमंजस देस सुहाग ने मिन्नत-मनौती की-अम्मा ! मेरी सौगन्ध है जो उन वेप्रकलों के लिए अपने को और जलाया-कलपाया ! धनवन्ती के रिसते घाव पर मानो मरहम लग गयी हो। पाखें पोंछ बहू की आँखों मे देख लाड़ से हंसी। -सुहागवन्ती, तेरी देवरानी जो कहती है क्या वह सच मित्रो मरजानी।
•-- ! . हक्की-बक्की धनवन्ती की एक साँस ऊपर, एक नीचे । सास के मुंह पर कालिख पोतने को फूला ही क्या एक कम थी जो अव दूसरी भी उसी राह मान पड़ी ! समझा-बुझाकर कहा-बहू मेरा सरदारी स्वभाव का कडुवा है पर जी का बुरा नहीं। मालिक करे तेरी गोद भी बाल-बच्चे पड़ें तो आप ही गबरू ढंग पर पा जायेगा। मित्रो ने सास की ओर देखा तो देखती ही चली । आँखों में मानो कोई भाग लपलपाती हो और कण्ठ ऐसा कि तेज धार वाली दराँती हो-सुरखरू हो बैठो, अम्मा ! तुम्हारे इस बेटे के यहाँ कुछ होगा तो मित्रो चूहड़ी के पैरों का धोवन पी अपना जन्म सुफल कर लेगी! सास की छाती पर बिना हथौड़ा मारे ही बहू ने कील ठोंक दी। छटपटाती छाती हुड़क-हुड़क हाहाकार करने लगी। एक बार तो धनवन्ती का जी हुआ, कहनेवाली का मुंह ही नोच ले, पर पेट में सिकुड़ती-सिसकती अंतड़ियों के मरोर से चेत गयी कि अभागिन बहू जो मुंह फाड़ कहती है क्या पता सच ही हो। धनवन्ती का न कण्ठ फूटा, न अांखें रिसीं। सोच में ऐसी डूबी कि न दिन-घड़ी का ध्यान रहा, न देश-दिशा का भान ! जैसे वैठी थी बैठी रही। -अम्मा! मुंह उठा देखा, सामने सुमित्रा नहीं सुहाग थी, सकुचाई- ७४ / मिनो मरजानी सी, पछताईन्सी। --पिछले पहर ऐसी ग्रांस लगी कि नित-नियम से ही चूक गयी। मुझे अावाज ही दी होती, अम्मा ! धनवन्ती कुछ बोली नहीं। फीकी-बुझी नजर से जाने कहाँ देखती रही। फिर अचानक वाहे बढ़ा सुहाग से जा लगी-मेरे जीने का कोई होला नही । मुझे तो प्रव मरना ही सोहता है । सोचकर कि अम्मा का ध्यान फिर फूला और गुलजारी की कृतघ्नता पर अटका-भटका है, सुहाग ने मोठी झिड़को दो- सुमित्रावन्ती झूठ नहीं कहती कि, अम्मा, तुम फूलां और गुल- जारी के तुल किसी और को नहीं गिनती। धनवन्ती ने सिर हिलाया-न-न, बहू, यह वात नही। सुहाग ने उलाहना दिया-यही बात है, अम्मा ! नहीं तो तुम-सी सयानी को कौन समझाये कि जो भोला घरवाली के कहे ससुराल जा बैठा है वह एक-न-एक दिन जरूर लौटकर मां के पास आयेगा। सास के माथे पर असमंजस देख सुहाग ने मिन्नत-मनौती की-अम्मा ! मेरी सौगन्ध है जो उन वेनकलों के लिए अपने को और जलाया-कलपाया ! धनवन्ती के रिसते घाव पर मानो मरहम लग गयी हो । अखेिं पोंछ बहू की आँखों में देख लाड़ से हंसी। -सुहागवन्ती, तेरी देवरानी जो कहती है क्या वह सच मित्रो मरजानी
सुहाग ने समझ नज़र नीची कर ली।
-अच्छी-भली हूँ, अम्मा ! 'अभी से ही उसकी क्या
चिन्ता?
धनवन्ती ने आँखें पोंछ मन-ही-मन कहा-सिरजनहार,
तेरी ही दया है, नहीं तो मुझ ऐसी कर्म-जली के भाग कहाँ जो
सुहाग
-सी सयानी
बहू
पाती!
सुहाग ने सास के आगे चाय रखी और तवे पर पराँठा डाल
बड़ी सयानियों-सा समझाकर कहा-अम्मा, दिल यूं छोटा किया
जाता होगा?
-न-न, बहू, पहले अपने बापू को खिला-पिला आ, मुझे
रत्ती-भर भूख नहीं।
सुहाग ने पराँठा उतार रकाबी में डाल दिया और गुस्सा कर
कहा-बापू तो अभी दातुन-कुल्ले में हैं, अम्मा, तुम न खायोगी
तो मैं भी व्रती रह लूंगी!
धनवन्ती ने लुकमा तोड़ा तो आँखों में सावन-भादों घिर
'आये । पराई लड़की इस अभागिन का इतना ध्यान रखती है !
सुहाग ने सास का ध्यान पलटने को संकोच से कहा-
वापू से कुछ मत कहना।
धनवन्ती के तन-मन नया उछाह हो पाया। हँसी-खुशी
कहा-लो, सुनो, लड़की की बातें ! सुहागवन्ती, ससुर तुम्हारा
तो इस दिन को सहक गया है। उनसे तो यह खुशी झेले न
बनेगी, बेटी!
'अम्मा, अभी
७६ / मित्रो मरजानी
- मझली बहू के तीखे-कड़वे बोल विसरा धनवन्ती धनो के पास पायी तो पांव जैसे धरती पर न पड़ते हों। लिहाफ में सिकुड़े पड़े गुरुदास ने खाँसकर धनवन्ती को जता दिया कि वह नितनेम से फारिग़ हो चुके । बेसब्री से पूछा--- चाय-पानी क्या दुपहरी होगा? धनवन्ती ने चारपाई पर बैठ बहू को आवाज़ दी-सुहाग- वन्ती बेटी ! बापू के लिए कलेवा लेती प्रा। गुरुदास उठ बैठे और घरवाली को खबरदार कर बोले- देख साथिन, मेरी बात पल्ले बांध ले! बैठी-बैठी हुकम चलाती रही तो यह वह भी अलग हो जायेगी। धनवन्ती झुंझलाई-फूलावन्ती क्या गयी कि मैं बुढरी ही दागी हो गयी । बनवारी के बापू, इस उम्र कम-से-कम तुम तो मेरा साथ दिया करो। गुरुदास हंसे-कहीं तुम्हें मेरी जो शह मिल जाती तो, भाग- वान अब तक घर में दो चूल्हे और होते । धनी के इस व्यंग से धनवन्ती तिलमिलाई। तेवर चढ़ा बोली-बहाने-बहाने मुझे कसूरवार ठहराना है तो साफ क्यों नहीं कहते कि फूलावन्तो वेचारी तो दूध की धुली बिल्कुल निराई थी और मैं हाय में फरसा लिये, पूरी जल्लाद । गुरुदास और हँसे-मुझे क्यो सुनाती हो, वन्तो? मैंने तो भांवरों के बाद तेरे अवगुण कभी चित्त ही नहीं घरे। धनवन्ती समझ गयी, लड़कों के बापू ने अच्छी गहरी नींद ले मित्रो मरजानी/७७
?
आराम पाया है जभी यह मसखरी सूझी है।
सुहाग ने प्रा चाय का गिलास और पराँठा ससुर के आगे
रखा तो धनवन्ती ने छेड़-छाड़ की-सुहाग वेटी ! सास का
लिहाज न कर, निधड़क हो अपने वापू से कहती जा कि अम्मा
तेरी कितनी बड़ी जालिम है।
सुहाग मुंह-ही-मुँह हँस, छोटे से चूंघट में से त्यौरियाँ दिखा
बाहर चली गयी तो धनवन्ती ने हँस दिया-बहू की चितवन में
कोई नालिश-उलाहना दीखा, महाराज ? ~~फिर एकाएक
गम्भीर हो गयी-मन में कोई भली खवर सुनने की हिरस हो
तो कहूँ?
चाय का चूंट भरते-भरते गुरुदास रुकेधनवन्ती, बुढ़ापे में
मनुक्ख किस भली खबर की आस लगायेगा? पड़े-पड़े जो पहाड़-
सा दिहाड़ा निकल जाये सो ही अपना ।
धनी की बात सुन वन्ती का अपना जी उदास हो पाया।
पर मीठी घुड़की देकर कहा-इतना ज्ञान न बघारो, महात्मन् !
| खबर सुनाऊँगी तो फिर गृहस्थी हो जाओगे।
चुंधी-चुंधी आँखों से गुरुदास ने घरवाली की ओर ताका तो
आप ही सब समझ गये। धनवन्ती सदा ऐसी ही सुच्ची-मिट्ठी
नज़र से बाल-गोपाल के आगमन के सन्देसे देती रही है।
-बहू के लिए झुमके वनवाने हैं, बेटा।
माँ ने जितनी आजिजी से कहा बेटे ने उतने ही अचरज से
७८ / मित्रो मरजानी
देखा।
--बनवारीलाल, इस घड़ी तुम्हें हाट-बाजार की प्रोकड़
मुश्किल हो तो भी, बेटा, ना न करना।
मां के स्वर में ऐसी लाचारी भांप बनवारीलाल मन-ही-मन
हँसा। सुहाग के दिन क्या चढ़े है कि आये दिन अम्मा नयी-
से-नयी शह मंगवाती है। हंसकर कहा--अम्मा ! सुहाग भले
तुम्हारी आँख-चढ़ी बहू हो, पर मैं तो इसे विगाड़ने से रहा।
धनवन्ती खिल पायी-वेटा, वहू तो मेरी लाखों में एक है।
इसे विगाड़नेवाले हम माँ-बेटे कौन ? सच पूछो तो ऐसी हीरा
लड़की को सोने-चांदी की झलक क्या? इसको शोभा तो किसी
हार-कंगन को गुलाम नहीं।
बनवारीलाल ने लेटे-लेटे मां की ओर देखा और गर्वीले
कण्ठ से कहा-अम्मा ! मन में जो हो सो खुलासा कह दो।
तुम्हारे हुक्म में देर कसो ?
वेटे के मान से धनवन्ती की देह-प्रात्मा सभी तृप्त हो गये।
-बनवारीलाल, जिस अम्बड़ी के तुम दोनों-से बहू-बेटा
हों, वह तो विना राजपाट ही मलका महारानी!-फिर गला
तनिक धीमा कर कहा-वेटा, झुमके तो सरदारी की बहू के
लिए घढ़वाती हूँ।
वनवारीलाल मां की ओर देखते रहे कि अभी कुछ और
-
सुनना है।
धनवन्ती बेटे के पास आ बैठी और फुसफुसाकर बोली-
-
मित्रो मरजानो/७६
?
वेटा! उस दिन जो मँझली ने बड़ी बहू की खुशी की खवर मुझे
दी तो चंगी-भली थी, हँस-हँस जिठानी की बात करती रही
और खुश होती रही। फिर एकाएक जाने क्या हुआ कि सिर
पर भूत सवार हो पाया। झल्लाती-फुकारती गुस्से में तड़पने
लगी। वेटा, क्या कहूँ ? इस लड़की का पार किसी ने नहीं
पाया। अच्छी हो तो अच्छों से अच्छी और बुरी हो तो बुरों से
भी बुरी । रौ आये तो सखी हो अपना वचा-बचाया हाज़र करा
दे, रौ आये तो ऐसी बेगैरती कि घरवाले पर थू-थू ! -धनवन्ती
ने आँखें नीची कर लीं-क्या कहूँ, बनवारीलाल, इस मुंह बोल
नहीं जुड़ते।
फिर रुक-रुक कहा-वहू तो तुम्हारे भाई को गाली निका-
लती है । तुमसे पूछती हूँ, बेटा, भाई तुम्हारा संग-सेहत में तो
पूरा है ?
बनवारी ने माँ से आँखें नहीं मिलाई। गला खंखारकर
कहा-सरदारी में कोई दोष नहीं, अम्मा। यह जरनैली नार
छोटे-मोटे मर्द के बस की नहीं !
धनवन्ती घड़ी-भर चुप बनी रही, फिर ठुड्डी पर हाथ रख
कहा-वेटा ! अपने-पराये जो
वहू
की बातें करते फिरते हैं, है
कोई सार उनमें ?
- सच-झूठ का निस्तार करनेवाला तो, अम्मा, कोई और
ही है, पर सरदारी की
बहू के ढंग अच्छे नहीं।
धनवन्ती की साँस गले में अटक गयी-बेटा..
८० / मित्रो मरजानी
--अम्मा, इकबालो बुआ के लड़के निहाले को जानती हो
न? भरी मण्डी में दुकान से बैठे-बैठे आवाजें कसता है, भाऊ
बनारसी यार, भाभी के पास बैठा हो तो कहना निहाला याद
करता था।
धनवन्ती से सुना नही गया । कान पर हाथ धर लिये--
न, बनवारी वेटा! इस बात को कोई पाँव-पंख नहीं ! सोह
ठाकुरों को ! मेरे रहते मेरे घर पराये मर्द की परछाई भो
नहीं।
वनवारी के माथे के तेवर और ऊपर जा चढ़े। कई देर जैसे
मन-ही-मन दलीलें करता रहा, फिर भारी गले कहा--अम्मा !
धूल झोंकने के हज़ार ढंग।
धनवन्ती का चेहरा 'फाक' हो गया। मुश्किल से इतना-भर
कहा-भरी-पूरी गृहस्थी है बेटा, कोई अन्धेर पड़ा है ?
बनवारी ने लम्बी सांस ले सिर पर हाथ फेरा क्या कहूँ,
अम्मा, तुम्हारे मन का ही भरम-भुलावा है। सच पूछो तो इस
घर को कोई इज्जत-प्रावरू अव वाको नहीं। बारी-बारी हाथ
की उँगलियां चटखा मां को मर्म की बात समझाई-दस-बीस
आँखें मझली बहू के बहाने इस घर पर लगी रहैं, अम्मा, यह
अच्छा नहीं। कुछ ऐसा साधो, प्यार-मनुहार से कि दो-चार
महीने अपनी मां के यहां लगा पाये।
धनवन्ती की आंखों के आगे अपनी समधिन वालो का चेहरा
घूम गया--उस अफ़राऊ मां के पास तो नीर चौड़े चानन होंगी,
नियोमानाती
. बेटा। प्रारब्ध को बात समझो, बनवारीलाल, हमारे भाग पड़नी थी, नहीं तो मां-बेटी के कसवों का हमें भी कोई सुराग मिल जाता, पर तकदीर के आगे किसका जोर ? -अम्मा! दहलीज़ पर से सुहाग ने पूछा-अम्मा, दूध को जाग लगा दूं न? अनमनी-सी धनवन्ती ने सिर हिलाया-हाँ, बहू फिर सुहाग के पीठ मोड़ लेने पर कहा-बेटा, सिर पर जो श्रा बनी है निभानी ही होगी। पर वहू से कोई चिन्ता-फिकर की वात न करना । हाँ, रे, सरदारी अाज परता नहीं ? -~-खेड़े में हिसाब-किताब निवटाना था, अम्मा, वह शाम से पहले तो क्या लौटेगा। दहलीज़ तक जा धनवन्ती एक बार और मुड़ी-वेटा, गुल- जारी से तो टाकरा न हुआ होगा? माँ की ओर देख बनवारी हँस दिया-अभी गुलजारी को ससुराल की चंगी-चौसी खाने दो, अम्मा । आप ही लाला राह पर पायेगा। धनवन्ती उठ वाहर आयी। मैंझली बहू का वन्द किवाड़ देख पाँव रुक गये। हाथ से खटकाकर आवाज़ दी-सुमित्रावन्ती, बेटी, श्राज इतनी जल्दी सो गयी ? मित्रो ने द्वार खोलने से पहले ही सास का सत्कार किया- सुमित्रावन्ती-सुमित्रावन्ती ! सोयी पड़ी को भी चैन नहीं। मित्रो १२ / मित्रो मरजानी , न हुई कि घर को ड्योढ़ी में लगी कोई मोतियों की झालर हो गयी ! उसे अभी चोर पड़े कि अभी डाकू पड़े ! कपाट खुलने तक धनवन्ती ने जाने क्या-क्या सोच मारा। सौ बार तो जियरा घड़का । सरदारी आज घर नही, कहीं प्रौर ही गुल तो नहीं खिला बैठी? सांकल उतरी, किवाड़ खुला और भूरी आंखें मंझली ने घूरकर धनवन्ती की पोर देखा-सासु जी, मेरे अगोचर, ऐसी क्या प्रान पड़ी कि सोयी पड़ी को जगा दिया?--फिर प्रांखों को चढ़ा-झमका पूछा-क्या दूध-मलाई खिलाने पायो हो, माजी? धनवन्ती अन्दर पान खड़ी हुई-बेटी, तुमसे क्या दूध- मताई अच्छी है ? चाहो तो रोज हाजर करूं ?~-कह धनवन्ती हँस दी--अपनी बुढ़िया सास को वोलो-ठोली मार ले, वेटी, में क्या बुरा मनाऊंगी? मित्रो ने सास को अरखा-परसा और भौहें चढ़ाकर कहा-- अम्मा ! यह सेखन-दिखावे मेरे किस काम के ? जिस गर्न से आयी हो, वही कहो- धनवन्ती जैसे बहु के लिए पहली बार सास बनी हो-सौ-सौ भाग लगे तुझे, वेटी! मैं तो तेरे जेठ को तेरे लिए झुमके घढ़वाने को कहने पायी थी। मित्रो के पोठो पर कोई भीनी मुस्कान घिर पानी । ठुमक- कर कहा- मुझ पर ऐसी मेहर क्यों, मां जी! कौन मियो तुम्हारे पोते जनने बैठी है । झुमके तो दिलवानो अपनी उस भाग-भरी मियो मरजानी/३ --
को जिसकी कोख खुलनेवाली है !
धनवन्ती गुस्सा नहीं हुई। उलटें समझाकर कहा-बिसर
गयी बातें, सुमित्रावन्ती। अरी, तेरी जिठानी को क्या अनोखा
पेट रहा है ? तू खुलेगी तो एक नहीं, इस आंगन सात-सात
खेलेंगे।
-
मित्रो पहले सास को घूरती रही। फिर पलत्थी मार नीचे
बैठ गयी । और मुंडी हिला-हिला बोली-भिगो-भिगोकर और
मारो, अम्मा! पाँच-सात क्या मेरे तो सौ-पच्चास होंगे !
फिर अोठों पर आड़ी-तिरछी कुटिल मुस्कान फैल गयी। आँखें
मटकाकर कहा-मेरा बस चले तो गिनकर सौ कौरव जन
डालूं, पर, अम्मा, अपने लाडले वेटे का भी तो प्राड़तोड़
जुटानो! निगोड़े उस पत्थर के बुत में भी कोई हरकत तो हो !
धनवन्ती के बदन पर काँटे उग जाये।
-छि:-छिः बहू ! ऐसे वोल-कुबोल नहीं उच्चारे जाते !
फिर वनवारीलाल की बात का ध्यान कर समझाया-बेटी,
ऐसे दिल छोड़ने की क्या वात ? सौ जन्तर-मन्तर, टेर-टोटके,
फिर जब मेरी बहू ही साकखयात शक्ति
मित्रो हि-हि हँसने लगी--अम्मा, मैं तो ऐसी देवी कि छूने
से पहले ही प्रासन विराज जाऊँ, पर भक्त वेचारा तो...
धनवन्ती ने बहू के मुंह पर हाथ रख दिया-वस, वह
फिर एक ही साँस में गुस्सा पा वहू
को
लाड़ से कहा---एक कहा
मेरा भी मान के देख लो, सुमित्रारानी।
८४ / मित्रो मरजानी
मित्रो को सच ही में मुंह उठाये, पास लगाये देस धनवन्ती ने पासा फेंका चेटी, तू मेरा कहा करे तो महीना-दो मां के यहाँ रह व्रत-उपवास कर। इस बीच यहां को मैं संभाल लूंगी। बहू- रानी वहां से प्रायेगी तो सव मनचाहा पायेगी। मित्रो को बिना मांगे मन की मुराद मिल गयी । मन-ही-मन जाने पीहर के किन-किन मित्र-प्यारों को याद किया और उछाह से सास के आगे माथा टेक इठलाकर कहा--बड़ी सरकार! तुम्हारा कहा सिर-माथे ! जो कहोगी, जैसा कहोगी, वैसा ही करूंगी। अपने कन्त से प्रानन्द पाने को महीना-दो क्या, मैं पूरे चौबीस पक्ख व्रती रह लूंगी ! मां ने लड़की की ओर ताका, लड़की ने भाइयों की ओर। कोई कुछ कहे-कहे कि गुलजारीलाल ऊपर की सीढियां चढ़ पाया। मायावन्ती ने घूरकर फूलों की ओर देखा और हाथ मल- मल कहा-देख तीन अनोखी अदा अपने गवरू की। तडके का गया-गया लाढ़ा अब लौटा है और घरवालों से न कलाम न सलाम । इस चुप्पे को सोधा न समझ, पूरा घुन्ना है, घुन्ना ! पाटिये पर से उठते-उठते सत्ती ने डकार ली और हाय झिनकाकर कहा-अम्मा, खरी-खरी कह दो, यहां सदावर्त नहीं खुला कि लाला बैठा-बैठा रोटियां तोड़ता रहे और कौड़ी-भर फा काम कहें तो गुप्त काशी जा लुके। मायावती ने चौकन्नी हो इधर-उधर देखा और लड़की को मित्रो मरजानी/८५
हाथ से विराम दे वहू को आवाज दीवेटी, गुलजारीलाल
थका-माँदा पाया है, उसकी थाली तो परस ।
गुस्से में जलती-वलती फूला सीधी ऊपर चढ़ गयी। चिक
उठा अन्दर आयी और गुलजारी को चारपाई पर लेटे देख
जवाव-सवाल को तैयार हो गयी।
-आज सवारियाँ कहाँ जा विराजी थीं ? मैं भी तो सुनूं ?
गुलजारी ने न आँख परतकर देखा, न कुछ कहा ही ।
फूलों और तड़पी-भावो विचारी कव से रोटी लेकर वैठी
है ! खा-पी आओ, फिर जो मन आये करना।
गुलजारीलाल अब भी हिला नहीं। खाली आँख मूंद, मुंह
पर धुस्सा खींच लिया।
घरवाले से ऐसी नियादरी होते देख फूलों की छाती जलने
लगी। पाँव उठा पास आयी और हाथ बढ़ा घरवाले के मुंह पर
से लोई उघाड़ दी-मैं बुरी लगने लगी हूँ तो मुझे चुटकी-भर
। संखिया ला दो! मेरे घरवालों के सामने तो मेरी इज्जत-पत
--
रहने दो!
--
गुलजारी ने खिंची-खिंची एक नज़र फूलाँ पर फेंकी और
दुवारा मुंह ढाँप लिया।
फूलावन्ती सकते में आ गयी-सच कहती है भावो, सच
कहती है। जरूर अपनी अम्मा-द्वारे माथा टेककर आये हैं !
फूलावन्ती ने झट पल्लू से नाक पोंछी, पट आँखों से पानी गिरने
लगा। दो-चार पल बीते-न-बीते कि हिचकियों का तार बँध
८६/मित्रो मरजानी
गया।
देख गुलजारी ने दीवार की मोर फरपट रो सी गो फरसोगे
माया पोट लिया-न रहें नदीदे वे जो जादू-टोने पर गुगारो
तुम्हारा मन फिराते हैं ! न रहे, जो तुम्हें उराटी पहिया पगारो
अावाज सुन मायावन्ती बोच-चपाय को जार माग पगी।
हाथ में थाली ले दहलीज पर से लड़की को झिरका-पुछ गगगः
कर री फूला ! लड़का काम-धन्धे से थककर लौटा है, पारोही
वक-झक करने लगी! वेटा गुलजारीलात, पुछ नापी
जूठा कर!
गुलजारी ने जैसे उठती-गिरती सास भी साध ली।
-बेटी, तुम-दोनों के गुस्से-गिले तो प्रेग-प्यार ! उटगार
रोटी खा लो तो यह बुढ़िया भी चौके-चूल्हे से निपटे ।
सास का प्रिया-हठ जान गुलजारी ने मुंह उपादा और हाय
हिला-हिला कहा- मुझे भूख नहीं, भायो जी, प्राण पोका गया
समेट लो।
फूलावन्ती ने जहान सिर पर उठा लिया-भूगफैग हांगी,
बड़े सौदागर को? निन्दाव्याज का सौदा जी मासर प्राय
अम्मा के घर से!
मायावती ने भूट-मूठ लड़की को धमकाया-पी
मुन्नी! फिर दामाद की ओर मुड़कर कहा-घटा सावारी,
इस भोली की बात का ध्यान न करना । मच पूछो मां तुम्हारी
धुन में तो लड़की पगली हुई रहती है। संझा से तुम्हारी राह तकते गले से एक बूंद पानी भी नहीं उतरा । तुम मुंह जूठा करो तो यह भी कुछ खानेवाली वने ! गुलजारी कुछ कहे, करे कि फूलावन्ती को 'दंदल' पड़ गयी। खड़ी-खड़ी उसकी आँखें पथराई और गर्दन लटक दीवार से जा लगी। -हाय-हाय री, मैं मर गयी! अरे कोई पानी लामो, अरे कोई... मायावन्ती ने लपक लड़की को गोद में लिटा लिया और आँखें चढ़ा जमाई से कहा-पत्थर का कलेजा तो न कर ले, गुलजारीलाल ! उठकर सँभाल अपनी फूलों को। सास का उलाहना सुन भी जमाई चुपचाप लेटा रहा तो मायावन्ती का तन-मन फुक गया। गला फाड़ आवाज़ दी- सत्ती. "किशना 'वेटा, ऊपर आयो ! में अपनी-अपनी घरवालियों से तुरत वयानी ले सत्ती-किशना दनदनाते ऊपर आये तो मायावती ने रो-रो माथा पीट लिया। -बेटा, बहनोई की करतूतें देखना पीछे, पहले बहन की - सुध लो! छुरी-सी दो आँखें, सत्ती ने गुलजारी को घूरा और वहन के मुंह पर पानी के छोटे दे मारे। मायावती ने चम्मच से मुंह में पानी डाला तो अोठों पर बह आया। एकाएक लड़की का पाँव झटका और अोठ फुस- ८८/मित्रो मरजानी
पुसाया--भावो, कोई गोरो-चिट्टी अपन मेरा कातना फाशी
मायावती ने मथुने फुना गुलजारीलाल को मोर देखा,
फिर लड़की के सिर पर हाथ फेर-फेर कहा-ज्ञापन मुंहमोसी
अपना रक्त आप पोयेगो, मुनिया, तू होश में मा! देरा सो सही,
फूला, यह रही तेरी भावो !
मुनिया की प्रॉस जरा-सी सुली भोर मुंद गयी। सड़की
फिर वेहोशी मे बोलने लगी-हरि के पत्तन जाकर जोगन हो
जाऊंगी ""मेरे सिर सतियों का शाप है मेरा साई मुझसे येमुरा
होगा...
दोनों आँखो से आंसुओं की लड़ियाँ बहने लगी।
मायावती ने वार-चार अांचल से बेटी की मौतें पोंछों पौर
कान के पास मुंह ले जाकर कहा-श्राप लगे तेरे वैरियों को !
टुक अाँखें तो खोल, मेरी बेटी!
जवाब में फूलों फिर बुड़बुड़ाने लगी-गायो, मैं मर गयी
तो अपने जमाई को कुछ न कहना 'तेरे जमाई को मालपुए बड़े
भाते है."
मायावती ने आँख से जमाई को फटकारा-कान सोल में
सुन लो जो मुनिया कहती है !
गुलजारी के सिर तो जैसे इसी की सोह चढ़ी हो किन
कुछ बोलना है, न कहना है । सास, साले पूछ-पूछ, फहराह हार
गये, पर गुलजारी ने फिर भी मुंह न सोला तो भाइयों ने बहन
मित्रो मरजानी/
धुन में तो लड़की पगली हुई रहती है। संझा से तुम्हारी राह तकते गले से एक बूंद पानी भी नहीं उतरा । तुम मुंह जूठा करो तो यह भी कुछ खानेवाली बने ! गुलजारी कुछ कहे, करे कि फूलावन्ती को 'दंदल' पड़ गयी। खड़ी-खड़ी उसकी अाँखें पथराईं और गर्दन लटक दीवार से जा लगी। - --हाय-हाय री, मैं मर गयी ! अरे कोई पानी लामो, अरे कोई... मायावती ने लपक लड़की को गोद में लिटा लिया और आँखें चढ़ा जमाई से कहा-पत्थर का कलेजा तो न कर ले, गुलजारीलाल ! उठकर सँभाल अपनी फूलों को। सास का उलाहना सुन भी जमाई चुपचाप लेटा रहा तो मायावन्ती का तन-मन फुक गया। गला फाड़ आवाज़ दी- सत्ती किशना 'वेटा, ऊपर आओ! अपनी-अपनी घरवालियों से तुरत वयानी ले सत्ती-किशना दनदनाते ऊपर आये तो मायावती ने रो-रो माथा पीट लिया। -~-बेटा, बहनोई की करतूतें देखना पीछे, पहले बहन की सुध लो! छुरी-सी दो आँखें, सत्ती ने गुलजारी को घूरा और बहन के मुंह पर पानी के छोटे दे मारे। मायावती ने चम्मच से मुंह में पानी डाला तो अोठों पर वह आया। एकाएक लड़की का पाँव झटका और ओठ फुस- ८८/ मित्रो मरजानी
फुसाया-भावो, कोई गोरी-चिट्टी डायन मेरा कालजा फाड़ती
मायावती ने नथुने फुला गुलजारीलाल की ओर देखा,
फिर लड़की के सिर पर हाथ फेर-फेर कहा-डायन मुंहझौसी
अपना रक्त प्राप पोयेगी, मुनिया, तू होश में आ ! देख तो सही,
फूला, यह रही तेरी भावो!
मुनिया की प्राँख जरा-सी खुली और मुंद गयी। लड़की
फिर वेहोशी मे बोलने लगी-हरि के पत्तन जाकर जोगन हो
जाऊँगी मेरे सिर सतियों का शाप है। मेरा साई मुझसे बेमुख
होगा..
दोनों प्रांखों से आंसुओं की लड़ियाँ वहने लगीं।
मायावती ने बार-बार आँचल से बेटी की आँखें पोंछों और
कान के पास मुंह ले जाकर कहा-श्राप लगे तेरे वैरियों को !
टुक अाँखें तो खोल, मेरी बेटी !
जवाव में फूला फिर वुड़वुड़ाने लगी-भावो, मैं मर गयी
तो अपने जमाई को कुछ न कहना 'तेरे जमाई को मालपुए बड़े
भाते हैं."
मायावती ने आँख से जमाई को फटकारा-कान खोल के
सुन लो जो मुनिया कहती है !
गुलजारी के सिर तो जैसे इसी की सौह चढ़ी हो कि न
कुछ बोलना है, न कहना है । सास, साले पूछ-पूछ, कह-कह हार
गये, पर गुलजारी ने फिर भी मुंह न खोला तो भाइयों ने वहन
मित्रो मरजानी/६९
।
को हाथों में उठा माँ के पलंग पर जा लिटाया।
नन्दिया के लिए दूध-बादाम-रोगन की दौड़-धूप में फूलो
की छोटी भाभी ने चार-छः चक्कर ऊपर-नीचे लगाये। मौका
देख अन्दर झाँका और गुलजारीलाल को अब भी चारपाई पर
विराजमान देख छोटे-छोटे अोठों पर बड़ी-सी मुस्कराहट फैल
गयी। मोहनी छलका, आँखें नचा हौले से पास जाकर कहा-
मान गयी, ननदोई जी, मान गयी। इन माँ-बेटियों के स्याह-सफेद
तुम एक दिन जरूर पहचान लोगे, यह मैंने पहले दिन ही जान
लिया था।
मॅझली बहू पीहर क्या चली कि जनको की विदाई के बाद एक
बार फिर घर में गहमागहमी मची। धनवन्ती ने बहू के लिए
नया जोड़ा मँगवाया। वनवारी ने माँ के कहे मुताविक भौजाई
। के लिए झुमके घढ़वा दिये । सुहाग ने देवरानी के लिए दुरंगी
ओढ़नी रंगकर गोटे की गोट टाँक दी।
खुशी में झूमती-इतराती मित्रो जिठानी पर खुश हो पायी
-उलटी चाल, जिठानी ! लोग तो गौना कर पाते हैं सासरे
और मैं मकलावा लेकर जाती हूँ पीहर !
सुहाग हँसी-देवरानी, अम्मा तो भेजने को इसलिए राजी
हुई कि लौटती वार तुम खुशियों की पोटली संग वाँध लायो।
मित्रो चमकी-भली कही, जिठानी ! मेरे पीहर क्या
खुशियों की पनीरी लगती है ?
६०/ मित्रो मरजानी
सुहाग ने हंसकर देवरानी की ओर देखा-सो तो सच कहा,
देवरानो ! खुशियां कहीं उगती-विकती होंगी ! अरी, ये तो
मनुक्ख के मन में उपजती हैं।
-लो और सुनो! मन के ज्ञान-ध्यान की चर्चा कर एक
दिन मेरी जिठानी जरूर सन्तनी हो जायेगी ! अरी, खा, पी,
मौज करो ! इस बुलबुले का क्या भरोसा? अाज है, कल
नहीं!
सुहाग ने वात वदलो-वहना! तुम्हें कब तक को
छुट्टी...
मित्रो ने आँखें मटकाई-आते-जाते दो महीने, वस !
सुहाग हँसी--सरदारी देवर को भी तूने सन्त-महात्मा समझ
लिया, देवरानी? जिस घड़ी तेरी याद आयी उसी पल अपनी
सोहनी-मोहनी को लिवा ले जायेगे !
मियो ने जिठानी की प्रांखों में आँखें डाल पूछा-न पाऊँ
तो?
-ग्रामोगी कैसे नहीं, बहना? जहाँ विराजें शिवजी वहाँ
उनकी पार्वती!
मित्रो जिठानी पर रीझ गयी । सुहाग की छुट्टी छु, कहा-
हुमा कोल-करार, जिठानी ! जिस दिन पाऊँगी तुम्हारा और
तुम्हारे महादेव का हल्वा-पूरी अपने हाथों कहेंगी!
सुहाग को मन्द-मन्द मुस्कराते देख मित्रों ने छेड़खानी की-
सच-सच कहना, जिठानी, तुम जो जेठ को छोड़कर जाना नो
मित्रो मरजानी /११
कितने दिनों में परतो? सुहाग तनिक-सा लजाई, फिर मुस्कराकर कहा-एक नहीं तो दो, दो नहीं तो चार, चार नहीं तो छ: "छः, नहीं तो हफ्ता दस-दिन और कितने ? जिठानी के मुंह से ऐसा हिसाव सुन मित्रो को जैसे अंग-अंग रस आ गया । चटखारे ले-ले अोठों पर जवान घुमाई और आँखें नचाकर कहा- कलजुग, जिठानी, घोर कलजुग ! तुम-सी सीधी नार के मन ऐसे हुलेरे ? सुहाग कई पल देवरानी की ओर देखती रही, फिर हौले से पूछा-मित्रो वहन, अम्मा ने जाने को कह दिया सो ठीक, पर 'क्या देवर की रजामन्दी से जाती हो ? मित्रो की आँखों में पारे की-सी चमक आयी और श्रोझल हो गयी। मुंह विचकाकर कहा-ऐसे ही मर्द-जने की हुक्मवन्द लौंडी हूँ न ! मिलाने को तो रातों मुझसे नज़र न मिलाये, मैं उसके तहबन्द के पल्लू खींचती रहूँ । खवरदारी की उँगली दिखा सुहाग ने बड़ी कड़वी अाँख से तरेरा-सरदारी देवर देवता पुरुख है, देवरानी! ऐसे मालिक से तू झूठ-मूठ का व्यौहार कव तक करेगी? यह राह-कुराह छोड़ दे, बहना । एक दिन सबको उस न्यायी के दरबार में हाज़र होना है! मित्रो ने की तरह आँखें नचाई-काहे का डर ? जिस बड़े दरवारवाले का दरबार लगा होगा वह इन्साफी क्या मर्द- ६२ / मित्रो मरजानी सदा जना न होगा? तुम्हारी देवरानी को भी हाँक पड़ गयी तो जग-जहान का अलवेला गुमानी एक नजर तो मित्रो पर भी डाल लेगा! मित्रो को बत्तीसी निकालते देख सुहाग ने टोहका दे देवरानी का सिर नीचे झुका दिया हरिहर हरि-हर! मुन्टनी जिस पापन ने इन बातों को मुना वह भी गुनाहगार ! वहना, नाक रगड़, नसीहत निकाल! मियो ने ऐसा सव कुछ नहीं किया। हनती-हंसती उठ खड़ी हुई । फिर जिठानी को चिढ़ाने को कमान से दो तेवर माये पर चढ़ा लिये और ठेंगा दिखाकर बोली-बस-वस, जिठानी मुहाग- वन्ती ! अपने भय-भूत, डर-धमकावे अपने ही पास रहने दो ! वह जन्म-मरण का हिसावी सयाना पादशाह तुम्हारा ही सगा- सम्बन्धी नही, मित्रो का भी कुछ लगता है। धनवन्ती ने चूल्हा-चौका संभाल बहू के लिए दूध मोरया। झाग मार नियोंवाला गिलास भरा और पांच में हिम- वन्ती के कमरे की पोर चली। किदाड़ों की दिन्नों में उनका आता बहू-बेटे के कमरे का उजियाला दन ही इंदिर सुखों हुलस गयीं । भिड़ा किवाड़ टला। अन्दरमा पर लेटी बहू को देख देह-की-देह तृत होगी। इंसुलेटर में चिट्टी गीली चेहरे की लुनाई निन्दन्दन सीधी नजर हो प्रभु की ! दोन टट की कि कोई रानी-महारानी हो ! --सुहागवन्ती! सास का धना-मीठा स्वर सुन अलसाई-सी सुहाग उठ बैठी और संकोच से बोली-अम्मा, मुझे ही जो आवाज़ दी होती। धनवन्ती ने प्रोढ़नी का खूट खोल पाँवलों की फक्की बहू की तली पर डाल दी-फाँक ले, वेटा। ऊपर से तत्ते-तत्ते दो बूंट भरेगी तो अन्दर हरा हो जायेगा। दूध पी सुहाग ने गिलास नीचे रख दिया तो धनवन्ती ने हाथ बड़ा बहू को सीधे लिटाया और हौले-हौले बाँहें, कन्धे सह- लाने-दावने लगी। सुहाग पहले झिझकी-सकुचाई, फिर आराम पा चुपचाप पड़ी सास की अोर तकती रही। -~-अम्मा, मॅझली की पहुँच की कोई खबर नहीं। देवर को तो संझा तक लौट आना था। -दो-एक दिन समधिन ने रोक लिया होगा, वेटी। कौन तुम्हारा देवर आये दिन ससुराल चढ़ा रहता है ? घड़ी-भर को धनवन्ती दिल-ही-दिल कुछ भार-तौल करती रही। फिर सुहाग से पूछा-सुहागवन्ती बेटी, तुमने भी एक-दो साल देवरानी को देखा-परखा है, सच-सच कहना, दुनिया जो अलाय-बलाय बहू के सिर भिड़ाती है वह क्या तुम्हें सच भासता है ? सुहागवन्ती उठ बैठी। लम्बी साँस भर सास की ओर देखा और धीमे से कहा- हम विचके जन अपनी छोटी बुद्धि से दूसरों ६४ / मित्रो मरजानी - के छल-छिद्र, दोप-विचार क्या पड़तालें, अम्मा ? खुली-डुली देवरानी एक घड़ी स्याह, दूसरी घड़ी सफेद। उसके मन में क्या है, वही जाने, पर तन उसके तो ऐसी प्यास व्यापतो है कि सौ घट भी थोड़े। -बहू ! तेरे देवर को जो-जो कहती-सुनती है. सोच-सोच मेरी देह फुकने लगती है। सब समझ सुहाग ने सास को ढाढ़स बंधाया-अम्मा, तुम्हारे आगे अब मुंह क्या खोलूं? यह तो इस मुंहफट के कस्वी-दिल के छिलके-छिल्लड़. धनवन्ती का चेहरा पहले तमतमाया फिर लम्बी सांस ले बोली-बेटी, उठते-चठते मालिक से यही माँगती हूँ कि, है सिर- जनहार ! इसकी अच्छी-बुरी सहने को मेरे बेटे को सिदक दे और इस नक्कछिकनी के जी मे भी कोई ऐसा मन्त्र फूंक कि बहू वन-पुरखों के कुल-कवीले की इज्जत-पत नो रख ले ! बहू को उबासी लेते देख धनवन्ती उठ खड़ी हुई। अच्छी तरह कपड़ा प्रोढ़ाया और फिर जाते-जाते कहा-चिन्ता-फिकर छोड़ निश्चिन्त हो सो, सुहागवन्ती! चलकर बनवारी को पठाती हूँ, जाने तेरे वापू के सग किन किस्से-कहानियों में उलझा बैठा धनवन्तो दहलोज़ तक गयो कि पोछे से बहू ने पुकारा-- अम्मा! धनवन्ती मुड़ी, फिर वह के पास प्रा पूछा-बेटो, कुछ मित्रो मरजानी
चाहिए था?
सुहाग ने सिर हिलाया-न-न, माँ जी,-फिर रुक-रुककर
कहा-कहने को तो कह बैठी हूँ पर एक बात मेरे चित्त पाती
है, अम्मा, कि मंझली को तौलने-परखनेवाली मैं कौन ?
धनवन्ती खड़ी-खड़ी अपनी भले जीवाली बहू को तकती
रही। तकते-तकते ऐसा प्यार उमड़ा कि आँखें छलछला आयीं।
हाथ वढ़ा सिर पर प्यार फेरा-तेरे मन में कोई द्वैत-मैल नहीं
सुहागवन्ती, मालिक तुझे बड़े-बड़े भाग लगाये।
बाहर आ धनवन्ती ने आँगन से ही हाँक दी-बनवारी
लाल ! 'बेटा, कोई राह-ढंग । जहान-भर की अच्छी-बुरी क्या
सब आज ही निवड़ जायेगी ? तेरे बापू को तो कोई देर-सबेर
नहीं, पर उधर मेरी बहू तो सोने-सी वैठी है ।
वनवारी को उठते देख गुरुदास हँस दिये। खिचड़ी मूंछों-
तले जाने कैसी चुहल उभर आयी-जग-जहान वदले, बनवारी-
लाल, पर तेरी अम्मा के तीर-तरकस,न वदले !
वाह फैला बनवारी ने धुस्सा प्रोढ़ा और जाते-जाते माँ को
हँसती नज़र देख कहा-बापू ! इन तीरों की वौछार जो तगड़ा
झेल ले फिर अम्मा के छाज-जितने दिल-से उसके लिए सोना-
ही-सोना!
धनवन्ती मन-ही-मन बेटे पर खुश हुई। लाड़ से पीठ पर
धौल दे बोली-हुया-हुया ! वाप-बेटे को मुझीसे मसखरी सूझी
?
६६/ मित्रो मरजानी
। बनवारीलाल लम्बे-लम्बे डग भर अपने कमरे की भोर चला तो दहलीज में खड़ी-खड़ी धनवन्ती ऐसे निहारती रही, जैसे प्रांगन पार करता उसका अपना वेटा न हो, कोई राजकुमार हो । बेटे को द्वार भिड़ाते देखा तो प्रांतों में कोई भूला-विसरा सपना झिलमिला गया! उसी दिन तो लाल मेरे पेट पड़ा था, याद कर लाखों पर से नन्ही-नन्ही फुहार वरसने लगी। धनवन्ती मुस्कराई। घेता तो ऐसे पाया कि अभी कल की ही बात हो। और भाग-भरे धीच के तीस साल ऐसे निकल गये कि वे गये और वे गये! कैसी बालड़ी उम्र थी ! न उठने-बैठने की समझ, न जग-जहान का होश। एक तडके जो खाया-पीया, इस गले के नीचे न उतरा तो दूल्हा मेरे ने घर-भर सिर पर उठा लिया। -जरूर कोई भारी-सकोल बम्त खायो है, वन्ती, तूने ! जा, अम्मा से ले कोई चूर्ण अजवायन खा। अम्मा ने पास बुला खोज-खबर को तो हंसकर कहा-वस- वस ! गुरुदास अव अपनी हिकमत अपने पास रहने दे। तेरी जितनी चलनी थी चल गयी। दहलीज़ पर बुत-सी बनी धनवन्ती को देख गुरुदास ने आवाज दो-कब तक खड़ी-खड़ी घर-आंगन ताका करेगी? सच पूछ इस घर की रौनक तो मंझली बहू ! भले बोली-ठोली में तेज-तर्रार, पर उठते-बैठते चहकती-कुहकती तो है ! मित्रो मरजानो/७
धनवन्ती ने मन-ही-मन बहू की बड़ाई मन के एक ओर
सरका कपाट लगा दिया।
बत्ती.
वुझा
खटिया पर लेटी तो उदास गले बोली -बहुओं
की एक तरफ, घर में वेरोनकी न होगी ? ले दे के तीन बेटे और
उनमें से भी एक न्यारा हो बैठा ।
गुरुदास गुलजारी की बात न छेड़ना चाहते थे। एक बार
जो वन्ती ने यह महाभारत छेड़ा तो फिर अगली-पिछलियों की
भोर हो जायेगी।
बात बदलकर कहा-नींद न आती हो तो, साथिन, घड़ी भर
मेरे ही पास आ बैठ।
धनवन्ती उठ धनी के पास आ बैठी और लिहाफ़ के छोर
से हाथ बढ़ा सहज-सहज पाँव दाबने लगी।
एकाएक हल्की-फुल्की हो कहा-याद है न, जी! तुम्हारे
बनवारी के जन्मते अम्मा ने मन-भर लड्डू करवाये थे !
पुरखिन का ध्यान बदला देख गुरुदास हँस दिये-समझ
गया, धनवन्ती, समझ गया ! ये तेरी चालें-तरकीवें तेरे अपने
पोते के लिए ही तो! ''भागवान, जो तेरे मन इसी की साध है
तो तू दो मन करवा लेना!
सुनकर धनवन्ती का रोम-रोम पुलकित हो पाया। ऐसी
सुखी हुई कि जैसे जन्म ही सुफल हो पाया हो। देवता-स्वरूप
मेरे साई सच्चे के मुंह से जो सीधे स्वभाव निकल गया वह ज़रूर
सच होकर रहेगा।
६८/मित्रो मरजानी
फिर एकाएक अपने को चेताकर रोक दी सब से धनवन्ती
सब से ! इतना हुलास पचायेगी कैसे ?
पलक गिरा कुछ कहने को हुई कि लड़कों के बापू को मांस
झपक गयो । अडोल हाथ सोच ऊपर का कपड़ा समेटा, उठने को
हुई कि गुरुदास प्रांखें खोल ऐसे तकने लगे कि सोये हो न हों।
पिछली बात का तार छू बोले-धनवन्ती ! यह घर-गृहस्थी
तो मोह-माया की फुलवाड़ी! एक बार खिली नहीं कि मनुक्स
नाशुका वेर-बेर हाथ पसारे दाते से कुछ-न-कुछ मांगता हो जाता
है। छोटी-सी वात मेरी पल्ले बाँध ले, साथिन ! जो थोड़ा-बहुत
दान-पुण्य, धर्म-कर्म इस चलते भण्डारे से निकल जाये सो ही
सुफल ।
।
कुसुम्भी जोड़े पर लहरिये की प्रोढ़नी प्रोढ़ मित्रो सरदारीलाल
के संग ताँगे से उतरी तो नूर महल के अड्डे पर कोई अनोसी
अचरज-भरी हलचल मच गयी । तिमजिलेवाली बालो की गोरी
जाई हँसती-इतराती अपने व्याह-परणाय खसम के साथ पीहर
पायो है ! बाजार के दाये-बायें हटवानियों के तोल-तराजू हाथों
में ही रह गये । किसी का दिल मसका, किसी ने माह भरी !
किसी का कलेजा मचला और किसी की कसक्ती प्रौख वालो
के धी-जमाई पर अटकी रह गयो । प्रोत्तार ने माप का गज हाय
में लिये-लिये रवेल सिंह को आवाज दी-यार रवेल सिंह, प्रायो
वसन्त और पाला उड़न्त
मित्रो मरजानी/
- ? रवेल सिंह ने आँख मार फटकारा-फिटक, ओ श्रीत्तार- चन्द ! मुझे पाला-कक्कर पहले ही मार गया ! मेरे यार, चूल्हा जला सेंक ले अपने हाँड-हड्डियाँ, नहीं तो कल अखाड़े कैसे उतरेगा? मित्रो से हाथ-भर ऊँचे सरदारीलाल ने कान खोल-खोल सुना, दाँत पीस-पीस पचाया और नज़र नीची कर ससुराल की गलियाँ लाँघता चला। बेली हलवाई ने जलेवियों का ताजा पूर निकालते-निकालते बोली कसी-सौ झरोखीवाली एक बैठक और तूर महल में, यारो! पर वेलीराम को क्या ग़म ? उसकी कड़ाही से तो दोने वन-बन जायेंगे। नुक्कड़ परं लक्खी सुनार ने फूंक मार शोहदे मद्दी को आवाज दी-पो मद्दी पो, अपने कल-पुर्जे सही कर ले ! बड़ा जवर मैदान है! चुपके-चुपके मुंह में हँसती मित्रो सैयाँ के संग-संग ऐसे कदम मिलाती रही कि पाँव-तले कोई गन्दी विछरी गली न हो, ऊँची अटारी की बारहादरी हो। घर की ड्योढ़ी पर पसरे मुच्छल पहलवान को धी-जमाई की जय-सत्कार बुलाते मित्रो की जग-जानी बोवो पैड़ियों से उत्तर नीचे आयी तो आगे बढ़ मित्रो ने कसकर माँ को गलवाँही दे भींच लिया। इस ओर, उस ओर फिर माँ की ठुड्डी पर हाथ डाल हँस-हँस कहा-अह-हय ? सोने की हँसुलीवाली मेरी वजी- १००/ मित्रो मरजानी ?
रनी माँ ! तस्त-ताजवाली कव से वन गयी?
मर्द-सी ऊंची होंठीवाली ने लड़की का माथा ऐसे चूमा कि
मिश्री का कूजा हो-मैं वारी-वलिहारी, मेरी मक्सनी! -फिर
जमाई को देख लड़की को थापी दी-अरी, जादूगरनी ! मुझे
मेरे बेटे से भी भेंटने दे!
-सरदारीलाल ने सास के पांव छूए तो वालो ने असोस
बरसाये-सौ-सौ जवानियाँ मानो, सरदारीलाल !
चुहल करती मां-बेटी पैड़ियां चढ़ने लगी तो वालो की हवेली
में मानो वहार की कोयलिया कूकने लगी। कभी हिन-हिनकर
माँ हँसती, कभी खिल-खिलकर वेटी।
वाहें फैला मित्रो ने अल्हड़ अंगड़ाई ली और मां को ऐसे
निहारा जैसे कोई वचपन की सहेली हो और हँस-हँसकर कहा-
अपने कबूतर से दिल को किस कैद में रखोगी वोवो, यह तो नित
नया चुग्गा मांगेगा!
वालो ने लड़की की ओढ़नी-तले उभरे दो जोवन देखे और
मोठों पर फोकी मुस्कान विखेरकर वोली-तेरी यही शीरों बातें
सुनने को मैं तरस गयी थी, मित्रो!
जमाई की खातिर में रात वालो के घर ऐसे-ऐसे पकवान पके
कि मोठी-नोनी मुश्के हवा में लहराती-फहराती पड़ोसियों के यहाँ
भी जा पहुंची।
शोख धानी जोड़े पर बोस्की की चिट्टी चादर ओढ़ वालो
मित्रो मरजानी/१०१
।
जमाई को परसने बैठी तो सरदारीलाल को मित्रो की माँ अपनी
सास-सी नहीं दिखी। ऐसा लगा, कोई कारोवारन धन्धेवाली
व्यापारिन हो। काली-सी मजबूत बाँहों में कुलफोंवाले चूड़े और
कानों में झूलते बड़े-बड़े लम्वे बुन्दे।
जमाई से सटकर बैठी अपनी जाई को देख तन पर एक वार
तो कोई सँपीली सरसराहट लहरा गयी। एक नहीं, वालो ने
सौ-सौ मर्द नचाये अपने इशारों पर, बस एक खसम का सुख न
वदा था इस अभागी के भाग!
मन का खोट छिपा लड़की से कहा-अरी मित्रो, तू कव से
पण्डित की पाँत ? अपने साईं के संग थाली में न खायेगी तो
क्या"
मित्रो ने जैसे माँ के दिल का पूरा-पूरा वरक पढ़ लिया।
भौंहें चढ़ाकर छेड़ा-तुम्हारे जमाई से अच्छा-बुरा वाँटने का
मेरा तो ठेका ही ठहरा, बोबो, पर आज तू ही खुशी कर ले !
सुन सरदारीलाल शर्म से पानी-पानी हो गया । एक-दूजे को
उखाड़ती-पछाड़ती ये कैसी माँ-बेटियाँ !
खा-पी सरदारी ने थाली से हाथ खींचा तो मित्रो अपनी
भूरी आँखें मटकाती दूध-मलाई वन बोली-हुकम, अव आप
विराजो सेज-विछौने और मित्रो इस पापी पेट को अरचा-परचा
अभी हुई हाजिर!
वाहर जाते सरदारीलाल का बाँका लाचा देख वालो के
मन जो मरोर उठी तो मित्रो ने अाँखों से ही समेट ली। हाथ
१०२ / मित्रो मरजानी
से निवाला तोड़-तोड़ नखरे से मां के मुंह में डाला और गेंदे के
फूल-सी घटी-धुटी वोली-बोयो, मुझ गरीवनी से क्या होड़?
तुम्हें तो नित नये रास-रंग और मित्रो बेचारी हर दिन अपने
इसी एक निठल्ले के संग !
खसम पर घमण्ड करनेवाली की वात से वालो के पपोटे
जलने लगे, पर ऊपर से लाड़ का फन फैलाकर बोली- मेरी
भोली मित्रो, मुझे तो तू अंग-अंग में प्यासी-तिरहाई जापती है !
-फिर पुराने तमाशाई खिलाड़ियों की तरह अाँखें घुमा पासा
फेंका~प्ररी लहर हो तो बुलाऊँ तेरी बगीची के लिए कोई
माली?
मित्रो के मुंह पानी भर आया। घरवाले का मान-गुमान
सब उड़न-छू हो गये । सजरी पास-पास से आँखें चमकने लगीं।
मोढ़नी-तले दो पंछी मचलने लगे। माँ पर आँखें गड़ा होले से
कहा-ग्रह-हय, बोवो ! तुम्हारे मुंह गुलाव । पर घोड़े-से लद्धड़
तुम्हारे इस जमाई का क्या करूं?
वालो ने हमजोलियों की नाई लड़की को चकोटी काटी-
यह झमेला तू छोड़ मुझ पर । अरी, तेरी माँ खिलाडिन ने बड़े-
बड़े वाप छका डाले!
पहले पहर बन-उन मित्रो प्याजी रंग की प्रोढ़नी ओढ़ घरवाले
के हुजूर में हाजिर हुई तो सिंगार देख एक बार तो अचरज के
मारे सरदारीलाल की टिकटिकी बंध गयी।
मित्रो मरजानी १०३
ठुमक ठुमक, हाथ में पीतल की सुराही ले अन्दर आयी तो सरदारी को लगा कोई बसरे की हूर हो। कमर लचका-झुका, हाथ की सुराही चौकी पर रखी, फिर खड़े-खड़े खुमार-भरी आँखों से घरवाले को घूर शरारत से छेड़छाड़ की-भोले बलमा, विटर-बिटर क्या तकते हो, अपनी मित्रो को ही नहीं पहचाना? सरदारी ने नाक से इत्र-फुलैल की तीखी गन्ध खींची और तेवर चढ़ा तने-तने पूछा-यह कंजरियोंवाला तेरा कैसा वेश ? मित्रो हँस दी कि घण्टियाँ टनटनाई हों। फिर गुस्सा जता- कर बोली-यह अपना घर नहीं, ढोलजानी! तुम्हारी टटल- बटल कहीं मेरी माँ के कानों जा पहुँची तो... सरदारीलाल आँखें चढ़ा कई देर रोबीला गबरू बना-बना मित्रो को घूरता रहा, फिर टोहकर कहा-माँ तुम्हारी ठहरी नम्बरी कसबन, उससे कैसा डर ? मित्रो ने घरवाले की तीखी-तेज़ नव्ज़ पहचान सरदारीलाल की छाती पर कान लगा दिया-पता पा गयी हूँ, पता पा गयी हूँ ! मेरे मरहम का दिल कहता है, लाल शरवत ला लाल पानी ला ! -फिर फुर्र उठ चौकी से सुराही उठाई, प्याला भरा और अोठों से लगा निहोरा किया-साहिब जी! आज तो मित्रो के हाथों परसादी लेनी पड़ेगी, लेनी पड़ेगी ! सरदारी के मन लड्डू घुलने लगे, पर डपटकर पूछा-वह क्यों, री? १०४ / मित्रो मरजानी
मित्रो ने दुगनी शोसी से कहा-गगुगरा का पोता गया
चार-बार, माहिया? आज की रात विसरा दे, होरान कियो
तुम्हारी व्याही-परणायी है ! फिर मारों नपा परमाणे गाय
से नाक छुपा ली-वस, प्राज तो यह रामको शिलगिनो संगार
वाली लाली बाई है !
मित्रो की इस वेशर्म अनोसी अदा पर सरदारीलाल का
तन-मन रीझ गया। पास बैठी मित्रो को ऐसा ताका कि मित्रो
को ही गले से नीचे उतार लेना हो। बांहें फैलाकर कहा-तो
फिर इघर पा, लाली वाई, तुम्हें भी देखें !
मित्रो के मोठों पर हंसी थिरकने लगी। ओढ़नी कन्धे पर
झुला, प्रांखें बार-बार नचा मित्रो ने घरवाले के गले में वाहों
का हार डाल दिया और प्याला मुंह से लगाकर कहा-ढोल
जानी ! इस चढ़ी नदिया तो बड़े-बड़े तारू डूबते पाये !
सरदारी ने सांस ले ले चूंट भरे "एक दो तीन और
"फिर गट्ट-गट्ट प्याला खाली कर दिया।
-~~और दे, लाली वाई, और"
फुम्मन-सी फुदक मित्रो ने और उडेली। सरदारी ने लम्बे-
लम्बे चूंट भर और गटकी, फिर नजर टिका मित्रो के मुख पर,
सरूर से हंसा-पिलानेवाली तो सचमुच की लाली बाई पर यह
भी तो दता, गुलपातो, मैं पीनेवाला कौन !
मित्रो ने सरदारी के ससखसी वालों पर चूड़ियों और छल्लों-
वाला हाय फेरा-मेरे मोहने रोमन ! जब मैं भई लाली वाई
..
मित्रो मरजानी/१०५
तो तुम लाली वाई के कुंवर कन्हाई ! सिर हिला-हिला सरदारी कुछ कहने को हुआ कि हँफ-हफ गला जलने लगा। हाथ से इशारा किया और दे, और मित्रो ने और दी और दीफिर सुराही खाली कर आखिरी प्याला मुंह से लगाकर कहा-अब और नहीं यह पीके सो जा मेरे छौने-मौने ! सरदारीलाल घुटती-घुटती आँखों वुडबुड़ाता-शरवत में तूने कोई आग घोल दी है. 'पाग ! --निढाल हो सरदारी विछौने में लुढ़कने गया तो मित्रो ने सुख की लम्वी साँस ले अंग- ड़ाई ली और बड़े प्रेम से अपने गवरू की ओर ताककर कहा- वेली ओ, तू ठहरा सच्चा-सुच्चा मर्द पर आग तो लगी है इस भटकैया के मन ! पाँव उठा, दरवाजे की ओर बढ़ी कि पास ही कहीं लुकी- छिपी वालो अन्दर आयी। एक आँख वेसुध जमाई पर डाली और लड़की के गाल पर टिमका दे पूछा-क्यों री, हो गया न चित तेरा गलेला ? त्योरियाँ चढ़ा मित्रो ने अोठों को मरोर दी और भभककर कहा-~गलेला नहीं, सिंह कहो, गुरुयानी, सिंह ! ऐसा अहंकार ! कचोट सह मन-ही-मन कहा-दो-चार रातों की मार तू भी डाकरी। फिर कौन तो भडुआ तेरा खसम और किसकी तु तरीमत ! जहरीली आँखों वालो ने लाड़ वरसाया और हाथ से संभाल - १०६ / मित्रो मरजानी
,
लड़क को बाहर ले चलो-तेरा मिह तो, वाह-वाह, मांद में
सोया पड़ा है। अव चलकर जरा शेर बब्बर से भी टाकरा कर
ले।
हुलक-पुलक मित्रो ने बड़ी-बड़ी पनीरी आँखों माँ को तरेरा
और टिटकारी भरकर कहा-चोवो, यह डिप्टी वग्धा तो तूने
भी टोह-टाह के देखा ही होगा?
मुंहजोर लड़की की नज़र चुरा वालो हंस दी तेरी मां के
जाने तो एहलकार जोड़-वन्द का पूरा ही है।
मां-बेटी प्रोसारा पार कर पाहुन-घर की पंड़ियों-तले
पहुंची तो मस्ती में मित्रो के पांव ऐसे पड़े कि वासन्ती बयार
हलके पात फरफराये हों।
ललक से उमड़ते हिया पर हाथ दे एक नज़र सोड़ियों को
देखा, एक प्रांख पलट सरदारीलाल वाले कपाट की ओर और
मां को ठोल दिया-चोवो, तेरा जमाई उठ बैठा तो मित्रो को
खर नही
वालो का जी तो हुअा, कहे-री! तेरा खसम ऐसा जवां मर्द
नहीं। पर सहारा दिया-वह तो गहरा गुडुच्च, मेरी गुड्डो !
फिर भी कहे तो सिरहाने बैठ पहरा देती रहूँ?
मियो हंसी कि तान गमक गयी। मां को गुदगुदाकर कहा-
ऐसा गजव न करना, बोवो, मैं हाथ से अपना गबरू गवां
वैलूंगी!
-चुप री लकड़बग्यो ! मां के संग ऐसी मसखरी ?
..
मित्रो मरजानी / १०७
।
मित्रो माँ पर निहाल हो-हो गयी-जमाई के उठने से पहले
अपनी इस बच्छी बछेरी को जगा दोगी न ?
वालो ने लड़की के कान में कुछ कह दुलार दिया-सो भला
री! जापानन्द मना, मौज कर!
माँ को नाक-मुंह चढ़ा, मित्रो छज्जेवाली पैड़ियों में पाहुन
को मिलने चली तो नीचे खड़ी वालो के दिल पर सुहागा चला
गया । ऐसी हूक उठी, ऐसी टीस जगी कि देह-की-देह भखने
लगी। अरी खप्पनी वालो! एक दिन जो डिप्टी सौ-सौ चाव
कर तेरी शरणी प्राता था, आज वही इस लौंडिया से गैंगरलियाँ
'मनायेगा
थू,
री वालो, तेरी ज़िन्दगी पर?
दिल का ऐसा टाँका उधड़ा कि आँखों के अँधेरे से पानी
रिसने लगा। सह न सकने से भर्राये कण्ठ लड़की को आवाज़
दी-मित्रो ! ...मित्रो ! .."री मित्रो !
पाहुन के अधभिड़े किवाड़ की चिलमन पर पड़ा मित्रो का
हाथ नीचे लटक गया।
अन्दर जाने की थिरकन से भीजा पाँव थर्रा गया। कोई
काँपती लहरें छाती पर आ गुथीं। वैरिन माँ ने इस घड़ी क्यों
हाँक दी?
-लौट पा, मित्ती, परत आ!-वालो ने जैसे रोते-रोते
चीख मारी हो!
पाहुन के किवाड़ पर पीठ दे हड़बड़ाई मित्रो ने पाँव उठा
'पहली पैड़ी पर रखा.
१०८ / मित्रो मरजानी
- यो रे मित्रो के गोसयाँ ! तूने इस माटी को देह रस को तलया क्यों ढरका दी? उतर नीचे प्रोसारे में पायी। कारिख-पुते अंधियारे घर में घूरती माँ की चद्दर के सिवाय पोर कुछ न दिखा। पास मा फोके गले पूछा-वोवो, खर तो है ? धुर-दहलीज से बुला लिया? ओढ़नी में मुंह-सिर लपेटे मित्रो को मां बैठी-बैठी सिस- कारियां भरती रही। कुछ तो कह, बोवो... हिचकियाँ ले-ले बालो का गला घरघरा माया तो लड़की के जो बड़ा भरम लगा। आँचरा खीच-खीच मिन्नत की कुछ तो वता, बोयो । 'अभी-अभी तो अपनी मित्रो को हंसते-खेलते ऊपर पठाया और... कुछ कहने को वालो ने मुंह खोला पर रुलाई से प्रोठ फड़- फड़ाकर रह गये। बांह से घेर मित्रो ने दिलजोई कीबोवो, अपर पीढ़ता डिप्टी तेरा इतना ही मित्र-प्यारा है तो इस घुग्घुचिया को क्यों उससे मेल-ठेल करने भेजा? वालो ने सिर हिला-हिला लड़की को कुछ कहना चाहा, फिर एकाएक कसकर मित्रो को बांहों में भींच लिया और हिड़क- हिड़ककर कहा-तेरी माँ के जमाने लद गये, री मित्ती! अब कौन तो इसका मित्र-प्यारा और कोन इसका सगी-साथी! -योवो!... मित्रो मरगानी/१०६
भौंचक्की मित्रो से कुछ कह वन न पाया। माँ के कन्धे थाम
उसकी काली-भौंरी आँखियों से बहते परनाले देख रुक-रुक
कहा-तेरे दिलगीरों की गिनती तो सौ-सैकड़ों में थी, वोवो !
लड़की की बात सुन बालो हाहाकार कर उठी। मित्रो का
हाथ पकड़ रो-रो कहती चली-न-न, री, अव इस ठठरी ठण्डी
भट्टी का कोई बाली-वारस नहीं! कोई मरे मनुक्ख का नाम भी
नहीं"
दुखियारी माँ को गलवाँही दे मित्रो ने ढांढ़स बंधाया-मेरी
सौंह, वोवो, जो
तुम
इतना दुःख
मनायो!
बालो ने वास्ते ले-ले कहा-तेरी अकेली माँ को अब यह
घर काटने को दौड़ता है, री।
एकाएक जाने क्या हुआ कि भय के मारे मित्रो का कलेजा
दहल गया। अँधेरे में मुँह बाये सूने किवाड़ों को देखा तो आँखों
में कोई विजुरिया कौंध गयी । मसान-सा सूना भाय-भाय करता
घर भूतों के डेरे-सा दिखा और कलपती माँ कोई भूखी-प्यासी
डाकिन-सी!
वालो लड़की को अपनी ओर खींच बोली-वेटी ! मुझे
अव अकेले छोड़कर न जाना ! मैं सरदारीलाल को मना लूंगी।
अंधेरे में दमदमाते नीले पपोटोंवाले माँ के काले चेहरे पर दो
चील की-सी आँखें देखों तो चीख मार मित्रो परे जा छिटकी।
-क्यों री''क्यों?
लम्बा गहरा फुकार भर माँ को अपनी ओर बढ़ते देख पहले
११०/ मित्रो मरजानी
मित्रो की घिग्घी बंध गयी। फिर जाने किस जोर-जोम से समली और तड़पकर चीखी-तू सिद्ध भैरों की चेली, अब अपनी साली कड़ाही में मेरी और मेरे खसम की मछली तलेगी? सो न होगा, बोबो, कहे देती हूँ! -फिर तोर की-सी छलांग मार प्रोसारे से देहरी कुलाची और मां के ठेलते-लते सरदारीलाल वालो बैठक की कुण्डी चढ़ा ली। दिन चढे सरदारी ने जो देह को तोर-मरोर प्रसि सोली तो पास लेटी मित्रो ने अपने सैयां के मुंह पर चुम्मे जड़ दिये। फिर आँखें नचा-फिरा पूछा--गिरदोर जी, पिछली रात कहां-कहाँ के हुए दौरे और कहाँ-कहाँ पड़े पड़ाव ? मैं भी तो सुनूं ! नींद से निथरी आँखों सरदारी ने घरवाली को पूरा और सिर पर छोटी-सी चपत दे कहा-रात तो न कहीं ढका हुग्रा, न पड़ा पड़ाव । बस, बैठ हवा के घोड़े, वांटें कहां की कहाँ निकल गयीं। मित्रो ने घरवाले की छाती मे मुंह छिपा लिया-मेरे हरमन मौला! यही किस्सा वीता तुम्हारी मित्रो के साथ ! फिर बांहों से अंगड़ाई ली, हाथो को चटखा-मुरका उठ बैठी । सयाँ के हाथ दावे, पांव दावे, सिर-हथेली प्रोठों से लगा झूठ-मूठ की धू कर बोली-कहो मेरे साहिब जी को नजर न लग जाये इस मित्रो मरजानी की!