Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
Prakrit Praveshika
Front matter
आदरणीय नन्दकिशोर जो
को
सादर
समर्पित
जिनको कृपा के लिए
आजन्म ऋणी बना रहूंगा
-कोमलचन्द्र जैन
विषय-सूची 18-x प्राकथन (Foren ord) भूमिका --xV व्याकरण पहला अध्याय स्वर-परिवर्तन दूसरा अध्याय सरलव्यान-परिवर्तन ६-२० तीसरा अध्याय ... ... संयुक्तव्यजन परिवर्तन २१-२६ ... ... चौथा अध्याय सन्धि प्रवरण पाँचवा अध्याय ३०-३५ ... अध्यय ... छठमा अध्याय ... ... ... ... ५१-५७ ... ५८ सातवॉ अध्याय धातुरूप आठौँ अध्याय पारक नयाँ अध्याय समास दशौँ अध्याय वृत्प्रत्यय ... ... ... ६१-६४ ( vi" ... ... ६५-६७ ग्यारहवाँ अध्याय तद्धितप्रत्यय चारहवाँ अध्याय स्वीप्रत्यय तेरहयाँ अध्याय लिङ्गानुशासन ... ... ६८-६६ .... ७०-७१ संकलन महाराष्ट्री प्राकृत ... ... ७५ ... ... ७७ १. गापावली २. वानरप्रोत्साहन ३. सुभाषितानि ४. सज्जनदुर्जनचर्चा ५. दोलालीला ६. रजकस्य औद्धत्यम् ... ७६ ... .. शौरसेनी प्राकृत ... .... ... ८ ८६ ... प्रमुख विशेषताएँ ७. चक्रवत्परिवर्तन्ते ८. अभिशापमपंणम् ६. अभिसार १०. समराङ्गणम् ११. परिहासविजल्पितम् १२. कपटप्रतिस्पर्ध ६३ .. .. मागधी प्राकृत ... प्रमुख विशेषताएं १३. प्रत्यभिज्ञानकम १४. भट्टकुट्यां प्रभातम १५. दुवृत्तवृत्तम् ... ..
(vii) ... १०७ १६. कापटिकप्रलापः १७. शोणित-पिपासा १८. योग्यं योग्येन ... ... अर्धमागधी प्राकृत ... ११२-११३ प्रमुख विशेषताएं १६. श्रेणिकराजस्य प्राणत्यागः २०. कूणिकचेटकयोयुद्धोद्योग. २१. कामध्वजा गणिका २२. कम-विपाकः ... ... ११७ ११६ १२१ जैनशौरसेनी प्राकृत ... ... प्रमुख विशेषताएं ... ... २३. द्वादश-अनुप्रेक्षा २४. अनित्यानुप्रेक्षा २५. धर्म-माहात्म्यम् १२२-१२३ १२५-१२७ १२६ ... ... जैनमहाराष्ट्री प्राकृत ... प्रमुख विशेषताएँ १३२-१३३ २६. पतिविरहिता राजदुहिता २७. समावासिता राजदुहिता २८. ब्राह्मणलक्षणम् २६. दुर्गप्रति मुनरुपदेशः ... १३७ १३६ १४१-१४३ .. परिशिष्ट १. पारिभाषिक शब्द (ब) अंग्रेजी-हिन्दी (२) हिन्दी-अंग्रेजी २. देशी शब्द FOREWORD An Introduction to Prakrit is a desideratum The sources of Indian culture are to be traced as much to Sanskrit as to Pali and Prakrit In spite of all contributions by modern scholars, the need for going back to the ongmal will remain for ever From narrower point of view, 1 student of Sanskrit has to face, for example in Sanskrit dramıs, a lot of Prakrit Through Sanskrit rendering of the sime, he cannot enjoy the finoui of original Prahrit He has to have access to the original In due recognition of this fact, the Banaras Hindu University has assigned a place to the study of Palu and Prakrit in the Post Graduate curriculum for Sanskrit But here the University is confronted by the paucity of suitable reading material Woolner s Introduction to Prakrit has long disappeared from the market The University has therefore to fall back upon the Karpura mafijure by Raja sekbara But it gives only a partial picture-Śrurasenī Prakrit How to provide for a full picture that does adequate justice to all the major streams-Vaharastrı, Šurnseni, Vag adhi, Ardbamāgadbi, Jaina sauraseni and Jaina maliarāstri ? The Department of Sanskrit indl Puzlı had to do some thing about it I therefore requested Sub C Jain, Prakrti. Acary?, Jaina duśina Acarya, il å of the Department to set bis hand to it and I am delighted that he has not spared himself to rise up to the occasion The result is the Prakrta pratesika now being presented b-fore the Public The motive behind the work is to introduce the Post Gradunte students of Sanskrit to Prakrit language An attempt has bøen made to strike ? balance between the immediate need of such students and provision for a bandy apparatus for entering thic rcalms of Prakrit literaturc wluch in magnitude is only next to Sanskrit In consonance with the original motive, Prahrit is sought to be cyplnined in the light of Sanskrit a stand which Prakrit grammarians lihc Vararuchi have taken The work in its modest form is brordis divided into elementary grammar and collection Regardig grammar Mabārāstri Prohrit, as in Vunruclu, is taken as the mould Individual variations in other Prakrits basc been notcd before the specimens of evcıy other Prahrit Tlic rules of grammar have been nutlienticated by relevant rules from traditional grammarians, together with tlıcır meanings in Hindi at tlic footnotec Woolner has been improved upon by incorporatig additional topics, and latest publications on Prakrit linic been taken notice of as far as the limited spice permits The approach has therefore been grammatical and to some extent philological Collections are intended for providing specimens of different types of Prakrit as they grew through the ages They are literary rather than teclinical They should there fore read pleasant Every piece again is attended with its Sanskrit rendering so that the correspondence between the two may be thoroughly establtshed I shall be very glad indeed if this venture satisfies a long felt want I wish the work all success Banaras Hindu University Noy 12, 1964 S BHATTACHARYA भूमिका संस्कृत-साहित्य भारत की अमूल्य सम्पदा रही है। प्राचीन काल से आज तक काशी, नवद्वीप, मथुरा, काश्मीर आदि नगरों की प्रतिष्ठा केवल सस्कृत साहित्य के अध्ययन और अध्यापन के लिए बनी हुई है। सच तो यह है कि भारत का गौरव इन्हीं नगरों में विकसित होकर पल्लवित होता रहा है। विदेशी शासनसल मे निस्सन्देह इस दिशा में कुछ अपनति हुई थी, किन्तु स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात् पुन इस दिशा में विशेष ध्यान दिया गया। इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण वाराणसेय सस्कृत विश्य- विद्यालय है। सन्तोप का विषय है कि लोगो को रुचि सस्कृत- साहित्य की ओर बढ रही है। यहा यह स्म ण रसना होगा कि सरकृत साहित्य के ज्ञान के लिए पालि एय प्राकृत का मौलिक ज्ञान होना आवश्यक है, क्योंकि संस्कृत के साथ इन भाषाओं का चोली दामन सा सम्बन्ध है। यही कारण है कि भारत के अधिकांश विश्वविद्यालयों के, जहां सस्कृत फी एम. ए. कक्षाएँ हैं, पाठ्यक्रमों मे पालि प्राकृत को आंशिक रूप से स्थान दिया गया है। वास्तविक्ता यह है कि पालि प्राकृत के मोलिक ज्ञान के विना संस्कृत साहित्य का आनन्द एव ज्ञान प्राप्त नहीं किया जा सकता है। सन् १९६३ मे काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के एम० ए० (सस्कृन) पाठ्यक्रम में निर्धारित प्राकृत का अध्यापन भार मुझे सौंपा गया। निर्धारित पाठ्यक्रम में 'कर्परमजरी' एवं प्राकृत व्याकरण (प्रारम्भिक ज्ञान ) था। कर्परमजरी पढाते समय मैंने यह अनुभव किया कि छात्रों को प्राकृत के व्यारण को जान लेने के प्रति उत्सुकता है। अधिकांश दानों ने मुझसे इस सम्बन्ध में सुझाव मागे कि इस विषय के अध्ययन के लिए कौन सी पुस्तक उपयोगी होगी? मैंने कुछ पुस्तकों के नाम बताये। मिन्नु प्राय सभी छात्रों ने यह शिकायत की (xii ) कि ये पुस्तकें हमारे लिए अनुपयोगी है। हमे तो विभिन्न प्राकृतों का मौलिक ज्ञान प्राप्त करना है। अन्त मे मैंने 'ए० सी० वुल्नर कृत 'इण्ट्रोडक्शन टु प्रारत' नामक पुस्तक पढने को दी जिसके प्रति छात्रों ने विशेष आग्रह दिखाया। खेद है कि उक्त पुस्तक अब अप्राप्य है। दूसरी ओर कर्पूरमअरी जो मुख्यरूप से पाठ्य पुस्तक है को पढाते समय यह अनुभव किया कि शृगार प्रधान पुस्तक होने के कारण छान छानाएँ उसके प्रति ठीक ध्यान नहीं देते थे। इसके अतिरिक्त उक्त पुस्तक केवल शौरसेनी प्राकृत (जिसके पद्याश को स्टेनफोनो ने बाद में महाराष्ट्री प्राकृत मे परिवर्तित कर दिया है ) मे ही लिखी गयी है जव कि सस्त छात्रों से अन्य प्राकृतों के ज्ञान को भी अपेक्षा की जाती है। ये सब ऐसी समस्याए थीं जिसके कारण मैं फिचित चिन्तित हो उठा। इसकी चर्चा मैंने अपने विभागाध्यक्ष श्रद्धेय डा. सिद्धेश्वर भट्टाचार्य से की तो उन्होने सुझाव दिया कि क्यों न मैं 'इण्ट्रोडक्शन टु प्राकृत' के आधार पर एक पुस्तक तैयार कर हू जिससे इन समस्याओं का हल निकल आये। प्रस्तुत पुस्तक उक्त सुझाव का ही परिणाम है। प्राकृत शब्द की व्युत्पत्ति के विषय में हम मत दिसलाई पड़ते हैं। प्रथम मत के अनुसार 'प्रकृत्या स्वभावेन सिद्ध प्राकृतम्' या 'प्रकृतीना जनसाधारणमिदं प्राकृतम्' अर्थात् स्वभान सिद्ध या जन साधारण की भाषा को प्राकृत कहते हैं। द्वितीय मत के अनुसार 'प्रकृति सस्कृत तन भव तत श्रागत या प्राकृतम्' अर्थात सस्कृत निस भाषा की प्रकृति हो या जो भापा सस्कृत से उत्पन्न हुई हो उसे प्राकृत कहते हैं। प्रथम व्यापत्ति ऐतिहासिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है एव द्वितीय प्राकृत भाषा का ज्ञान प्राप्त करने की दृष्टि से। प्रस्तुत पुस्तक सस्कृत छानों के लिए विशेष रूप से लिया गया है। अत इसमे द्वितीय व्युत्पत्ति को महत्त्व दिया गया है। इसमे सस्कृत पदों को प्रकृति रूप में पहले लिया गया है, तत्पश्चात् उससे यनने याले प्राकृत पदों को दिया गया है। प्रायत येयाकरणों में भी दो सम्प्रदाय थे। प्रथम सम्प्रदाय के प्रमुख हेमचन्द्र थे तथा द्वितीय परमचि । प्रस्तुत पुस्तक में दोनो सम्प्रदायों का समन्वयात्मक ढग प्रस्तुा दिया गया है।
(xii ) प्रस्तुत ग्रन्थ दो भागों में विभक्त है। प्रथम भाग में व्याकरण तथा द्वितीय भाग में प्रमुख प्राकृतों के विशिष्ट गद्यपद्यांशों का संकलन है। प्रथम भाग में व्याकरग-सम्बन्धी मोलिक नियमों को सरल एवं आधुनिक ढंग से प्रस्तुत किया गया है। ट्रिप्पणी में प्राचीन-परम्परा में रुचि रखने वाले छात्रों के लिए हेमचन्द्रकृत-प्राकृतव्याकरण एवं वररुचिकृत-प्राकृत-प्रकाश से सूत्र (अर्थ सहित ) दिये गये है। कहीं कहीं उपयोगी शब्दों को प्राथमिकता देने के लिए सूत्रोक्त शब्दों के क्रम का मूल में परिवर्तन करना पड़ा है। जहां कहीं हेमचन्द्र कृत संस्कृत-व्याकरण से पाणिनिकृत संस्कृत-व्याकरण में भिन्नता है, वहीं पाणिनि सम्मत तथ्य को कोष्टक में दिया है। जैसे प्रथमा विभक्ति एकवचन संस्कृत प्रत्यय-सि (सु) आदि । द्वितीय भाग में ६ प्रमुख प्राकृतों के विशिष्ट अंशों का संकलन किया गया है। गद्यपद्यांशों को ऐतिहासिक दृष्टि से क्रमबद्ध किया गया है। इससे छात्र विभिन्न प्राकृनों की विभिन्नकालीन धाराओं को सहज ही समझ सकेंगे। प्रत्येक प्राकृत के संकलन के पूर्व उसकी विशिष्टताएँ भी दी गयी है। तुलनात्मक रुचि की वृद्धि के लिए साथ में संस्कृत छाया भी दी गयी है। जहां कहीं मुझे व्याकरण से असम्मत पाठ मिले वहां व्याकरणसम्मत पाठों को कोष्टकों की सहायता से दिखाया है। संकलन करते समय मैंने इस बात में पूरी सर्तकता रखी है, कि संकलित गद्य-पद्यांश सरल, आधुनिक एवं पठन- पाठन के योग्य हों। इस बात का उल्लेस कर चुका हूं कि प्रस्तुत पुस्तक 'ए० सी० वुल्नर' रचित 'इण्ट्रोडक्शन टु प्राकृत' के आधार पर लिखी गयी है, किन्तु इसकी कुछ निजी विशेषताएं भी हैं। इण्ट्रोडक्शन टु प्राकृत' फे कुछ तथ्यों को मैंने नहीं लिया है। उदाहरण के लिए अपभ्रंश भापा तथा प्राकृत साहित्य का विवेचन प्रस्तुत ग्रन्थ में नहीं है क्योंकि यह पुस्तक संस्कृत विद्याथियों को प्राकृत सिसाने की दृष्टि से लिसी गयी है। यहां एक यात और स्पष्ट कर दूं कि प्रस्तुत पुस्तक में पालि भापा को स्थान नहीं दिया गया है, क्योंकि इस विषय पर अलग से एक पुस्तक तैयार की जा रही है।
(xiv ) दूसरी ओर इस पुस्तक में लिग परिवर्तन, कारक, अव्यय, समास, तद्धितप्रत्यय, कृत्प्रत्यय एवं स्त्रीप्रत्यय नामक अध्याय अधिक है। अध्यायों में विषयवस्तु की प्रामाणिकता को स्पष्ट करने के लिए आवश्यक मन्थों से यथास्थान उद्धरण भी दिये गये हैं। साथ ही विभिन्न स्थलों पर भाषाविज्ञान सम्बन्धी आवश्यक नियमों की प्रामाणिक चर्चा की गयी है। प्रत्येक गद्य पद्यांशों की संस्कृतच्छाया भी दी गयी है। अन्त में एक बात की चर्चा पुनः कर देना आवश्यक समझता हूं कि प्रस्तुत पुस्तक तैयार करने का उद्देश्य प्राकृत भाषा का व्यापक ज्ञान फराना नहीं है अपितु संस्कृत छात्रों के लिए प्राकृत का मौलिक ज्ञान कराना है। इस विषय पर व्यापक रूप से अध्ययन करने के लिए अन्य ग्रन्थों का अध्ययन करना आवश्यक होगा। मेरी यह कृति यदि संस्कृत के छात्रों के लिए उपयोगी सिद्ध हो सके तो में अपना परिश्रम सफल सममूंगा। प्रस्तुत पुस्तक तैयार करने में मुझे जिन पादरणीय गुरुजनों के सुझाव तथा आशीर्वाद प्राप्त हुए हैं, उनके प्रति कृतज्ञता प्रकट करना अपना कर्तव्य समझता हूँ। सर्वप्रथम में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के संस्कृत एवं पालि विभाग के अध्यक्ष श्रद्धेय डा. सिद्धेश्वर भट्टाचार्य का विशेष रूप से आभारी हूँ जिनके सुझाव से ही मुझे यह पुस्तक लिसने की प्रेरणा प्राप्त हुई। उन्हीं के निर्देशन से यह पुस्तक पूर्ण रूप से तैयार हुई है। जबलपुर विश्वविद्यालय के संस्कृत, पालियं प्राकृत विभाग के अध्यक्ष श्रद्धेय डा. हीरालाल जैन का भी आभारी हूँ जिन्होंने मेरे हस्तलेखों को देसार समय समय पर निर्देश दिये। भण्डार ओरियण्टल रिसर्च इन्स्टिच्युट, पूना के प्रधान सम्पादक आदरणीय डाक्टर पी० एल० वैद्य जी के प्रति कृतज्ञता प्रस्ट करता हूँ क्योंकि उन्होंने पाण्डुलिपि को आधुनिक रूप में तैयार करने में परामर्श तथा सन्दर्भ पुस्तकें देकर मेरे पार्य को सरल यनाया है। श्रीयुत भाई विश्वनाथ मुखर्जी की समय समय पर सहायता प्राप्त की अतः उनके प्रति भी अपनी नाता प्रस्ट करता हूँ। अगर इन विद्वानों या अमूल्य सहयोग प्राप्त न हुआ होता तो शायद में इसे इतना उपयोगी न मना पाता।
(xv )
मैं अपने विद्वान-पाठकों तथा छात्रों से एक बात और कहना
आवश्यक समझता हूँ कि अगर वे इस पुस्तक में और कोई कमी या
त्रुटि पाएँ तो लेखक को कृपया सूचित कर दें ताकि अगले संस्करण में
उन सबकी पूर्ति कर, उन समस्त कमियों को दूर किया जा सके ।
भारती महाविद्यालय,
काशी हिन्दू विश्वविद्यालय,
वाराणसी।
नवम्बर १९६४
-कोमलचन्द्र जैन
शुद्धिपत्र पृष्ठ पंक्ति २ १२ अशुद्ध शेपस्तु माल हस् ५९ ७३ ११ २१ ९ २६ ६ २३ २ १२ १३ २ शेषस्तु मालं' हस व्य व्य रिद्धि भणन्तो द्रष्टव्य लोठनि वृत्वा गत्ता श्रेणिकराजस्य ज्ञात्वा वृत्ता यम्हचेर रुपदेश इव ऋद्धि भणेन्तो दृष्टव्य लोट्टणि कृत्त्या गया श्रेणीरराजस्य ज्ञात्वा वृत्त्वा बह्मचेर रूपदेश. ९६ ११३ ११३ २१५ १२३ १२७ १४१ २४ २१ २ सङ्घत-विवरण क्रमदीश्वरकृत प्रायनव्यारण प्रायन भाषाओं का व्यापरण (मूललेसम्-पिशल ) मार्यण्डेय पृन प्रापतसर्यस्य पररचित प्राप्तप्रकाश हेमचन्द्रयन प्रायव्यापरण नमः पि० प्रा०% मा. यर० . D
पहला अध्याय
स्वर-परिवर्तन
.
२
,
अ>श्रा, समृद्धि = सामिद्धी, समिद्धी ; प्रकटम्पाअडं, पअडं ।'
इ, व्यजनम् - विअणं ; मृदङ्ग:- मुइंगो।
ई, हर - हीरो, हरो।
उ, प्रथमम् = पुटुमं, पढुमं, पुढम, पढौ ।
ऊ, अभिज्ञः अहिएणू; भागमज्ञः आगमएणू ।"
१. आ समृद्धयादिपु वा ॥१॥रावर०॥
समृद्ध आदि शब्दो के आदि अ को विकल्प से आ हो जाता है।
(उपसर्ग का पहला स्वर विकल्प से दीर्घ हो जाता है। - देखिए पि प्रा.
पारा नं. ७७)
२. इदीपत्यकास्वप्नवेतसव्यजनमृदङ्गाङ्गारेषु ॥१३॥वर०॥
सूत्रपठित शब्दो के आदि कार को इकार हो जाता है।
(जिस शब्द में प्रथम पक्षर की धनि पर चल पडता हो वहाँ प्रथम या
द्वितीय अक्षर में स्थित म को इ हो जाता है। देखिए पि. प्रा.नं. १०१)
३. ईहरे वा ॥८१५१।हे०॥
हर शब्द के आदि अ को विकल से ई हो जाता है।
४. प्रपमे प-यो ।८।१५५॥हे०॥
प्रथम शब्द के प एवं य वर्ती म को विकल से उ होता है।
(प्राय. मोठवर्ण के बाद माने वाले म को विकल से उ होता है। -तुलना
पोजिए कि प्रा. पारा नं १०४)
जो णवेभिशादी 14101५६३०॥
अभिज बादि शब्दो के श को ग होने पर जस्थित ब को उ हो जाता है।
(प्रथमापिकि ये एषपचन में उपो हो जाता है।)
५
२ प्राकृत प्रवेशिका ६ ए, शय्या = सेज्जा, पर्यन्तम् = पेरन्त ।' श्री, पद्मम् = पोम्म, पउम , नमस्कार = णमोकारो। अइ, जलमयम् = जलमइ, जलमभ। श्राइन पुन --ण उणाइ, ण उणो, ण उण।' लुक, अरण्यमूरण । श्रा>, यथा=जह, जहा, 'आस्यम् = अरस। १. ए शय्यादिपु ॥१५॥वर०॥ शय्या मादि शब्दो के आदि प्रकार को एकार हो जाता है । शय्या मादि शब्द- शय्यात्रयोदशाच्यं पर्यन्तोसरवलय । सौन्दयं चेति शय्यादिगण शेपस्तु पूर्ववत् ॥ २. (अ) भोपद्म ॥१६१।३०॥ पद्म शब्द के मादि प्र को प्रो होता है। (ब) नमस्कार परसरे द्वितीयस्य ॥१६२राहे ।। सूत्रपठित शब्दो के द्वितोय म को भी हो जाता है। (प्रोष्ठयण के अनन्तर आन वाले रायुक्त व्यसन के पूर्व के अको उचारण सौम्य के लिए ओ होता है।) मयट्या ॥१॥५०हे०॥ सस्कृत मय प्रत्यय के म मे स्थित अकार यो विकला से अइ होता है। ४ नात्पुनर्यादाइ वा ॥१६॥हे०।। न के बाद पाने वाले पुनर् शन के अ को विश्ला से आई होना है। लोपोऽरण्ये ॥१४पर०॥ भरण्य शब्द ये मादि म मा लोप होता है । मदातो यपादिपु वा ॥ पर पया आदि शब्दों में आ को विकल्प से ष होता है। (क्रियाविशेषण ये मतिम मस्पति मा यो प्राय म हो जाता है। देखिए पिप्रा. पारा न ११२) हस्व योगे ॥1ximom रापुरम्यगन के पूर्ववर्ती दीर्घ स्वर को हस्प हो जाता है। ३ ५ ६ स्वर-परिवर्तन इ. सदा = सइ, सआ; यदा-बइ, आ।' ई, स्त्यानम् = थीणं, सल्वाट:- पल्लोटो। 3, साना = मुण्डा, या - उल्ले, पोल्लं ज, पासार:=असारो, आसारो।' ए, द्वारम् - देरं, दुआरं; माह्यम् = गेम ओ, आलो- ओली १> अ, पथि:=पहो, इति विकसितयुगुमसरः = इस यिअसिअ-कुसुम- सरो। ३, शशु = उच्च, पृश्चिक: विच्छओ।'
प्राकृत-प्रवेशिका ई, सिंहः = सीहो, जिह्वा = जीहा। ए, पिण्डम् = पेण्ड, पिण्डं ; सिन्दूरम् = सेन्दुरं, सिंदूरं । ओ, द्विधाकृतम् दोहाइअं, दुहाइयं ।' ई> अ, हरीतकी = हरडई। श्रा, काश्मीराः = कम्हारा। इ, पानीयम् = पाणिों, अलीकम् =अलिअं उ, जीर्णम् = जुण्णं, जिष्णं । ज, हीनः = हूणो, हीणो ; विहीनः = विहूणो, विहीणो। ए, पीयूपम् = पेऊसं, कीदृशः = केरिसो, ईदृशः = एरिसो। १. ईसिहजिह्वयोश्च ॥१३१४वर०॥ सिंह तथा जिह्वा शब्द के आदि इ को ई होता है । २. इत एपिण्डसमेषु ॥११॥वर०॥ पिण्ड आदि शब्दो के इकार को एकार होता है। (सयुक्त व्यञ्जन के पूर्व के इकार को एकार होता है -देखिए पि प्रा. पारा नं. ११८) ३. ओ च द्विधावः ।।१।१६।वर॥ कृत् धातु के साथ द्विधा शब्द के इकार को ओकार होता है। (चकारदुत्वं च, सूत्रवृत्ति।) ४. हरीतक्यामोतीत् ॥८१४९९।०॥ हरीतको शब्द में आदि ई को अ होता है। ५. आवश्मीरे ॥१०॥हे.॥ कश्मीर शब्द के ई को प्रा होता है। ६. दोतः पानीयादिपु ।।१।१र०॥ पानीय आदि पन्दो के आदि ईकार को इकार हो जाता है। ७. उज्जी ॥११०२ आहे०॥ जीर्ण शब्द के ईकार को विकल्प से उबार होता है। ८. होम-विहोने या ॥८।११०३।०॥ हीन और पिहोन शब्द के सार को विकल्प से जार होता है। .. एत्पीयूपापोड विभीतक कोहरोहरो ॥८॥१५॥ पीयूष मादि शन्दों के ई को ए होता है।
स्वर-परिवर्तन ५ उ>अ, मुकुल:= मउलो, गुरुकम् = गुरूग्रं।' इ, पुरुषः = पुरिसो, भृकुटिः = भिउडी।' ई, क्षुतम् = छी। ऊ, दुर्भगः = दुहवो, दुइओ।" ओ, पुष्करम् - पोक्खरो, तुण्डम् - तोण्डं ।' ऊ>श्र, दुकूलम् - दुअल्लं, दुऊलं । इ, नूपुरम् = निउर, नेउरं, नूउर।" ई, उद्व्यूढम् = उव्वीढ, उन्बूढं । १. उतो मुकुलादिष्वत् ।।४।१।१०७॥हे ॥ भुकुल आदि शब्दो के आदि उकार को अकार होता है। (एक पाब्द में दो उकार होने पर प्रथम उकार को अकार होता है।- देखिए पि प्रा. पारा नं. १२२) २. इत्पुरुपे रो ॥१॥२३॥वर०॥ पुरुष शब्द के रु में स्थित उ को इ होता है। भ्रुकुटौ ॥८।१।११०॥ भृकुटि शब्द के आदि उ को इ होता है। ३. ईक्षुते ॥११११२ हे०॥ क्षुत शन्द के आदि उकार को ईकार होता है। १. लुकि दुरो वा ॥११॥११५।६०॥ दुर् उपसर्ग के रेफ का लोप होने पर उ को विकल्प से ऊ होता है। उत ओतुण्डरूपेषु ॥१॥२०॥वर०॥ तुण्ड आदि शब्दों के मार को ओकार होता है। (प्राय. सयुक्त व्यधन के पूर्व के उ को ओ होता है। देखिए पि.प्रा. पारा नं १२४) १. अदुकूले पा लस्य विश्वम् ॥१२वर०॥ दुबूत शन्द ये 3 को विकल से अ होता है तपाल को द्विस्व होता है। ७. इदेती नूपुरे वा ॥८११२३॥हे०॥ नूपुर गुन्दरेज को पिरल्प से इ तपा ए होते हैं। ८. बोन्यू: १२०हे ॥ उन्यू राम को रिसस्प से होता है। ५.
- - १ प्राकृत-प्रवेशिका उ, हनूमान् - हणुमन्तो, मधूकम् = महुअं, मही ए, नूपुरम् = नेउरं, नूउरं। श्रो, कर्पूरम् = कोप्पर, ताम्बूलम् = तंबोल। ऋ>अ, तृणम् = तणं, मृतम् -म, कृतम् = फ।३ इ, ऋषिः = इसी, मृगांकः = मिअंको।' उ, ऋतु = उऊ, परभृतः = परहुओ।" ऊ, मृपा = मूसा, मोसा, मुसा। ए, वृन्तम् = वेण्ट, विण्टं, वोण्टं।" ओ, मृपा मोसा, मुसा। (अ) उघूहनूमत्कण्डूय-वानूले ।।८।१२।६।। सूत्रोक्त शब्दो के ऊ को उ होता है । (ब) मधूके वा।।।१।१२०॥ मधूक शब्द के क को विकल्प से उ होता है। २ ओत्यूष्माण्डो-तूणोर कूपर-स्थूल-नाम्बूल-गुडूची-मूल्ये।।८।१।१२४ाहे ॥ सूत्रोक्त शब्दो के ऊ को ओ होता है । (उ की तरह से भी सयुक्त व्यजन से पूर्व आने पर ओ हो जाता है।- देखिए पि प्रा पारा नं. १२६) ऋतोत् ।।८१११२६॥ आदि कार को अ होता है। ४. दृष्यादिषु ॥१२८र०॥ मृपि आदि शब्दों के यादि प्रवार को इकार होता है। ५. उहत्वादिपु ॥२९॥वर०॥ पातु आदि शब्दों के प्रवार को उकार होता है। (ौप्य के बाद क्र या त्रा के बाद उ माने पर प्रकार यो वार' हो जाता है।-- सुलना कीजिए पि. प्रा. पारा न. ११) ६ उद्दोन्मुपि ॥१॥३६॥ मृपा राद ये को उ, म तथा ओ होता है। ७. इदेदोवृन्ते ।।१।१३६है। पुन्त पद के दो इ, ए तथा ओ होता है। ३ ८ ४ प्राकृत-प्रवेशिका ए, शैल = सेलो, शैत्यम्-सेचं । श्रो श्र, अन्योन्यम् = अन्नन्नं, अन्नुन्नं ; प्रकोष्ठ = पवट्ठो, पठट्ठो। ज, सोच्छ्वासो- सूसासो। अउ, गोक' = गउओ, गौः = गऊ श्रा, गोगाअ गाओ (पुं०) गाई (स्त्री)। नौ> अउ, पौरः = पउरो, कौरव = कउरवो।" गारवं, गउरवं। उ, सौन्दर्यम् = सुन्देरं, सुन्दरिअ ; शौण्डः सुण्डो। श्रो, कौमुदी कोमुई, यौवनम् = जोपणं । नावा। श्रा, गौरवम् - . पाव, नौः ४ १. ऐत एत ॥३५॥वर॥ आदि ऎकार का एकार होता है। २. ओतोद्वान्योन्य-प्रकोष्ठातोद्य-शिरोवेदना-मनोहर सरोकहे तोश्च वः ॥८1१- ११५६।हे०॥ सूत्रोक्त शब्दो के मओ को विकल्प मे अ तथा यथासम्भव ककार तथा तकार वो व आदेश होता है। ३. ऊसोच्छवामे ॥११॥१५॥हे.॥ सोच्छास पाद के ओ फोऊ होता है। गव्यउ आअ. १८१११५८हे.॥ गो चन्द ओ यो अउ आम आदेश होते हैं। अउ पौरादीप ॥१॥१६॥हे.॥ पौरादि तथा यौटोपक शब्द के औ को मत होता है। ६. आप गौरव १३॥ गौरव पद के मी को या सपा अउ होता है। ७. उसौदर्यादी ।।१।१६० ६॥ सौन्दर्य आदियों में श्रीको उ होता है। ८. बीत ओत 11t९हे.॥ आदिौर को भोर हो जाता है। माप्यार: ॥८॥१॥१६॥ नौपदरेमी को बार बार होता है। है.
प्राकृत प्रवेशिका साहा। य, तीर्थकर = तित्थयरो शकटम् - सयढ ।' व, प्रकोष्ठ = पवछो, पउट्ठो । ह, निरुप = निहसो, स्फटिक = फलिहो।' ख>क, शृङ्खलम् - सकल शृङ्खला = सफला । ह, मुखम् = मुह मेखला = मेहला, शाखा = ग> लोप, अनुराग = अणुराओ, नगरम् = ण पर । क, नगरम् = नकर, गगनम् = गफन (पैशाची)। १. अवों यश्रुति ॥८५१११८०।हे ।। अवर्ण से पर क, ग आदि के लोप होने से यदि अ या आ शेष रहे तो यति होती है। (जिन व्यन्जनो को विच्युति हो जाती है उनके स्थान पर लघुप्रयत्नतर यकार अर्थात् हल्की ध्वनि से उच्चारित य बोला जाता है। हेमचन्द्र के अनुसार यह केवल अपौर आ के बीच में आता है। मार्कण्डेय के अनुसार यति तब होती है जब एक स्वर प्रयाइ हो ।- देखिए पि प्रा पारा न १७९) निकष-स्फटिक चिकुरे ह ॥८॥१।१८।हे ॥ सूत्रोक्त शब्दो के क को ह होता है। ३ शृङ्खले ख क ॥ ११ • हे ॥ शृङ्खल शब्द के ख को क होता है। (कुछ हकारयुक्त वर्णों से हकार समाप्त हो जाता है । तुलना कोजिए-- पि प्रा पारा न २०१) खप प ध भाम् ॥८१११८७ है स्वर से परे असयुत अनादि स प प ध भ (हकारयुक्त वर्णो को) को प्राय ह होता है। (शन्द के आरम्भ में होने पर इनका दो चार स्थान पर ही ह रूप होता है।-देखिए पि प्रा पारा न.१८०) १. यर्माणां तृतीयचतुर्थयोरयुजोरनाद्योराद्यो ॥१०३वर०॥ पैशाची प्राकृत में च। ये अनादि असंयुक्त तुतीय एवं चतुर्थ व्यपनों को क्रमश प्रथम और द्वितीय हो जाते हैं। (सुसना रोजिए-पि.प्रा पारा न १.३) २ " सरलव्यजन-परिवर्तन ४ -- म, 'नागानि-पुंनामाई, भागिनी-भामिणी।' ल, छागः = छालो, छागी=छाली। व, दुर्भगः- दूहवो, सुभग = सूहवो।' घ>स, मेघ' =मेसो, व्यात्र = वक्सो (पैशाची)। ह, मेघ. मेहो, जघनम् = जहणं । च> लोप, नाराच = गाराओ, प्रचुरम = पउरं । ज, पिशाची-पिसाजी। ल, पिशाचः पिसल्लो, पिसाओ। स, सचितः = ससिओ, खइओ। छ (अपरिवर्तित), छेदः-छेओ।" ज> लोप, रजतम्रअर्द, गजः = गओ। च, राजाराचा (पै०), जर्जरम् = चच्चरं (घू० । ज्ज, ऋजुः = उजू। १. पुन्नाग-मागिन्योर्गो मः ॥८॥११.००॥ सूत्रोक्त शब्दों के ग को म होता है । धागे ल. ॥८।१।१९शहे.॥ छाग शब्द के ग को ल होता है। ऊत्वे दुभंग सुभगे व. ॥८११९२ हे०॥ दुभंग, मुमग शब्दों के उ को दोघं होने पर ग को व होता है। खचित-पिशाचयोच. स ल्लो वा ॥८११.३॥हे ॥ खचित और पिशाच शब्द के चको विकल्प से क्रमश स तथा ल्ल होते हैं। .. (शब्द के आरम्भ में छ अपरिवर्तित बना रहता है। शब्द के मध्य में यह संस्कृत के समान हो च्छ रूप ग्रहण कर लेता है। देखिए पि. प्रा. पारा नं २२६) ६. नीडादिपु ॥३५॥वर०॥ नीड आदि शब्द के अनादि वर्तमान व्यञ्जन को द्वित्व होता है। नीडादिगण के शब्द- नीडव्याहृतमण्डूक्स्रोतासि प्रेमयौवने । ऋजु. स्यूल तथा तैले मैलोक्यं च गणो यथा ॥ --कल्पलतिका २ ३ ५ - , ६ ठ>ढ, मठ:- %3D , प्राकृत-प्रवेशिका झ, जटिल = झडिलो, जडिलो।' र, व्यवसृजति = वोसिरामि। ट>ड, घट'- घडो, नट = नडो, भट - भडो ढ, कैटभ = केढवो, शकट = सयढो, सटा = सढा । ल, स्फटिक.= फलिहो, चपेटा = चविला, चविडा, पाटयति= फालेइ, फाडे।" = मढो, कुठार = कुढारो, पठति -पढइ । ल्ल, अकोठ अंकोल्लो, अोठतैलम् = अकोल्लतल्ल । ड>ट, तडाग 3 तटाको ( पैशाची)। ल, गरुडः- गरुलो, यहवामुखम् वलयामुहं तडागम् - तलायं। १. जटिले जो भो वा ॥८।१।१९।०॥ जटिल शब्द के ज को विकल्प से घ होता है। २. (सज् धातु के ज को र हो जाता है। देखिए पि प्रा पारा नं २२७) ३. टो॥११९५हे। स्वर से परे अनादि असयुक्त ट को ह होता है। (टवर्ग के असयुक्त अनादि प्रथम तथा द्वितीय वर्ण क्रमश तृतीय तथा चतुर्थ वर्ण हो जाते हैं । --देखिए पि प्रा पारा न. १९०) सटा शकट-कैटभे ढ॥१९६०॥ सूत्रोक्त शब्दो के ट को ढ होता है। (म) स्फटिके ल ॥८॥११९७हे०॥ स्फटिक शब्द के ट को ल होता है। (ब) पे-पाटौ या 11१।१९८हे.॥ पपेटा शन्द तथा प्यन्त पाटि धातु के ट को विकल्प से स होता है। ६. ठोढे ॥११९९०॥ स्वर से परे असंयुक्त मनादि ठ को ढ होता है। .. अनोठे ॥१॥२०००॥ मोठ शब्द के ठ कोल होता है। ८. बोल ॥८१२०३ हे ॥ सर से परे यापुष भाादिको प्रायास होता है। ४ ६ सरलव्यजन-परिवर्तन ६ २ ढ (अपरिवतित), गाढम् = गाढं, सोढुम् = सोढुं । गठन, गुणेण = गुनेन, विषाणम् - विसानं (पैशाची)। ल, वेणुः वेलू. वेणू । त> लोप, कृतम् कसं, रसावलम् = रसायलं । द, ऋतुः- उदू, रजतम्रअदं, संयतः- संजदो।' च, छ, तुच्छम् = चुच्छं, छुच्छं । ट, तगरः = टगरो, तबरः-टूबरो, बसरः = टसरो। ड, प्रतिसारः = पडिसारो, प्राभृतम् = पाहुई। १. (सभी प्राकृत बोलियों में ढ अपरिवर्तित रहता है। देखिये पि.प्रा पारा नं २३४) यो नः ॥८॥४॥३०६ ०६।हे॥ पेशाचो में कार को न होता है। ३. वेणौ णो वा ॥१॥२०३॥हे ॥ वेणु दान्द के ण को विकल्प से ल होता है । ४. प्रात्वादिपु तो दः॥शवर०॥ ऋत्वादि शब्द के त को द होता है। (वररचि, मदीश्वर तथा मार्कण्डेय के अनुसार महाराष्ट्री के भो अनेक पन्दों के त को द होता है। वे सभी शब्द स्वादिगण में एकत्र क्पेि हैं। हेमचन्द्र ने सूत्र नं. ८११।२०९ में इस मत को आलोचना को है। पात यह है कि यह ध्वनि परिवर्तन शौरसेनो तथा मागधी में होता है, महाराष्ट्रो में नहीं। देखिए पि प्रा. पारा में. १६६ ।) .. तुच्छ तप-छो वा ॥८॥१२०४ाहे.॥ तुच्छ शब्द के त को घ तथा छ होता है। ( बाद में आने वाले तालव्यवणं को समानता के लिये तो तालव्य घया छ होता है।) सगर-वसर तूबरे ट ११०५०॥ मूत्रोक शब्दों के त को ट होता है। (संस्कृत के दस्पवर्ग प्राकृत में बहुपा मूर्धन्य बन जाते हैं। देखिए पि. प्रा. पा. पारा. नं २१.) ५. प्रत्यादौर:॥१॥ प्रति आदि सन्द रे मोर होता है।
प्राकृत-प्रवेशिका गा, गर्भित = गम्भिणो, अतिमुक्तकम् = अगिउँतयं ।' र, सप्तति = सत्तरी ल, अतसी - अलसी, सातवाहन = साल पाहणो। पलितम् = पलिल, पलिअ ।' व, पीतलम-पीवल, पीपल ह, वितस्ति = विहत्थी, वसति = वसही।' थ>ढ, मेथि = मेढी, शिथिर = सिढिलो, प्रथम = पढमो। ध, कथयति = कधेदि, कहेदि, नाथ = णाधो, णाहो । ह, मिथुनम् = मिहुण, कथयति = कहेइ । द>लोप, वदनम् -यअण, मदनम् = मअण, नदी - नई। ड, दशनम् = उसण, दसणं, दोरा डोला, दोला। १. गभितातिमुक्तके ण ॥८1१।२०८ाहे ॥ सूत्रोक्त शब्दों के त को ए होता है। २. सप्तता र ॥८१२१०हे। सप्तति के त कोर होता है। ३. (अ) अतसी सातवाहन ल. ॥१॥२१॥हे॥ मूत्रोक्त शब्दो के त को ल होता है। (ब) पलिते वा ।।८।१।२१।हे। पलित पाद वे त को विकल्प से ल होता है । पोते वो ले वा ॥१६॥१३॥०॥ पीत शब्द के त को विकल्प से व होता है स्वाधिक ल परे रहते । ५. वितस्ति-यसति-भरत-कातर-मातुलिने ह ॥१॥२१॥हे सूत्रोत शब्दों के त यो ह होता है। ४. मेपि-शिपिर-शिपिल प्रथमे पस्य ढ ॥८१२१५।हे ।। सूत्रोक् शब्दो के प को ढ होता है। पोध २६ हे०॥ शौरसेनी में पो बिल मेघ होता है। दरान दष्ट-दाय दोला-दरह-दर दाह-दम्म-दर्भ-मदन-दोहदे दो यार. ॥११॥ २१॥ पूरो राम्दों रेमो पिारा ये होता है। ८.
प्राकृत-प्रवेशिका - . . १०)। ल, एह , निम्ब - लिंबो, निबो , नापित = ण्हाविओ, नाविओ।' प>लोप, सुपुरुष = सुउरिसो, रिपु - रिऊ, कपि = कई । फ, पाटयति =,फाडेइ, परुप - फरूसो, परिष =' फलिहो।' म, नीप = नीमो, नीयो , आपीडः = आमेलो, आवेडो। व, पापम् = पाच, दीपम = दीय, उपमा - उवमा। र, पापर्द्धि = पारद्धी। फ>म, रेफ. = रेभो, सफलम् = सभल, शेफालिका - सेभालिआ, सेहालिा। ह, मुक्ताफलम् =मुत्ताहल। 4>प, बालक - पालको (चु० १. निम्ब-नापिते ल ह वा ॥१॥२३०आहे०॥ निम्ब तथा नापित शब्द के न को विकल्प से क्रमश ल तथा एह होते हैं। २. पाटि-परुष-परिघ-परिखा-पनस-पारिभद्रेफ ॥८॥२३॥हे०॥ प्यन्त पाटि घातु तथा परुष प्रादि शब्दों के प यो फ होता है। ३. नोपापीहे मो वा ।।८।११२३५ हे०॥ सूत्रोक्त शब्दों के प को विकल्प से म होता है । ( प फे स्थान पर नियम के अनुसार व हो जाता है तथा कभी कभी म बन जाता है। देखिए पि प्रा पारा न. २४०।) पो व ॥८११२३१०॥ स्वर से परे अरायुक्त अनादि प को व होता है। पापी र ॥८१२३५ाहे०॥ पापदि शब्द के द्वितीय प को र होता है। ६. फोम हौ ।।११॥३६॥ स्पर से परे असंयुक्त अनादि फ को पही भ, नहीं ह तया कहीं दोनों (मह) होते हैं। (परपि के अनुशार शब्द मे भीतर वया स्परों पे बीच में होने से फ सदा म बन जाता है। हेमचन्द्र के अनुसार ये स्थान पर प्राात में म और ह दोनों रसे जा सकते है।-देसिए 1ि प्रा. पारा मं. १९९) ४. 4 सरलष्यमन परिवर्तन १७ - २ % 3D - १ २ भ, निसिनी - भिसिणी। म, य पन्ध = कमन्धो कथन्धो। । प, शनल = सपनो, अन्नायू = अलावू।' भ>फ, भगवती फकरती ( चू० पै.)। व, कैटभ = केढयो। ह, सभा सहा, शोभते - सोहइ नम ह। म> लोप, यमुना = जॅउणा, चामुण्डा(- चॉउण्डा।' ढ, विषम = विसढो, विसमो। घ, मन्मथ = वम्महो, अभिमन्यु = अहिवन्न , अहिमन्नू।" स, भ्रमर = भसलो, भमरो। विसि या भ ॥११२३८हे ॥ विसिनी शब्द के ब को भ होता है । कवधे म यो ।।१।२३९।हे। कबध शब्द के व को म य होते हैं। यो व ॥८१२३७ हे०॥ स्वर से परे असयुक्त अनादि व को व होता है । कैटभे भो य ॥१॥२४०ाहे०॥ कैटभ शब्द के भ को व होता है । यमुना चामुण्डा कामुकातिमुक्त के मोनुनासिकश्च ॥८११७८ हे ।। सूत्रोक्त शब्दो के म का लोप होता है। लोप होन के बाद म के स्थान पर अनुनासिक होता है। विपमे मो ढो वा ॥८१२४१ हे०॥ विपम शब्द के म को विकल्प से ढ होता है। (अ) म मथे व ॥८५१२४२।हे०॥ म मथ शब्द के म को व होता है। (३) वाभिम यौ।।६।२४३।हे ॥ अभिमायु शब्द के म पो विश्ल से व होता है। भ्रमरे सो वा ॥ ११२४४ाहे। भ्रमर शब्द के म को मिल से स होता है। २ ३ ६ ७ ८ १८ विओनो। - प्राकृत-प्रवेशिका य> लोप, नयनम् = णअणं, वियोग ज, यश = जसो, यम = जमो, याति - जाइ। ज्ज, उत्तरीयम् उत्तरिज्ज, उत्तरी, करणीयम्-करणिज्ज, करणी।' त, युष्मदीयः = तुम्हकेरो, युष्मादृश' - तुम्हारिसो।' ल, यष्टिः= लट्ठी। ह, छाया-छाही, छाया।" र>ड, किरिः-किडी, भेर' (दे.)=भेडो। ण, करवीरः कणवीरो। ल, हरिद्रा = हलिहा, भ्रमरः = मसलो। १. आदेयों ज. ॥८५१२४५।१०॥ आदि य को ज होता है। २. वोत्तरीयानीय-तीय कृये उज.11८1१२४८०॥ उत्तरीय शब्द तथा अनीय, वीय, वृत् प्रत्ययो के य को विकल्प से ज्ज होता है। ३. युष्मद्यर्थपरे त ॥८१२४६०॥ युप्मद् शब्द पेय को त होता है। ४. यष्ट्या ला1८1१।२४७हे०॥ यष्टि में य को स होता है। - १. छायापो होवान्ती या १२४९राहे ॥ अयान्त छाया घन्द ये य को विकल्प से ह होता है। ६. किरि-भेरे रोड. ॥१२५१०॥ सूत्रोक शन्नों के र पो होता है। ७. परवोरे ग. ॥१२५३हे ॥ परीर शन्द के प्रथमरकोप होता है। ८. हरिदासः ॥८१२५॥ हरिदा पादिरानों में असपुत र कोस होता है। भमरे घसरोगे एव । पत्ति । भ्रमर घर में म को सही पर ही र पो न होग है।
सरलव्यमन-परिवर्तन ल> ण, राहल =णाहलो ललाटम् = णडाल, पिडाल । र, स्थूलम् = थोर २ । D व> लोप, जीन = जीओ, लावण्य -लाअण्ण । भ, विसिनी-भिसिणी। म, स्वप्न - सिमिणो, सिविणो , नीची-नीमी नीवी ।' श>छ, शमी छमी, शाय = छावो।' स, शब्द सद्दो, निशा = णिसा। ह, दश = दह, दस एसदश = एआरह, एपारस । प>छ, पण्मुस -छमुहो। रह, स्नुपा-सुण्हा सुसा। स, कपाय = कसाओ, निाप - निहसो । ह, पापाण = पाहाणो, पासाणो। (अ) लाहल-लागल लाइ मूले वादेण ॥८॥१२६०॥ सूत्रोक्त शब्दो के यादि ल को विकल्प से ण होता है । (ब) ललाटे च ॥८११२५॥हे। ललाट शब्द के आदि ल को ण होता है। स्थूले लो र ॥११॥२५॥हे०॥ स्यूल शब्द के ल को र होता है। विसियां भ ॥२॥३८॥वर०॥ विसिनी शब्द के व को भ होता है । स्वप्न नीव्योवा ॥८१२२५९।हे०॥ सूत्रोक्त शब्दो के व को विवल से म होता है। पटू-शमी-शाव सुधा सप्तपर्णीष्वादेश्छ ॥ १।२६ हे । सूत्रोक्त शब्दो के आदि वर्ण को छ होता है । श पो स १८१२६०३०॥ श तथा को स होता है। दश-पाषाणे है ॥८१२२ हे०॥ दश एव पाषाण शब्द के श, प को विकल्प से ह होता है। स्नुपाया हो न वा ॥ १.२.१हे ॥ स्नुपा शब्द के प को विकल से पह होता है। २ ३ ५ ६ ७ ८.
२० प्राकृत-प्रवेशिका स>छ, सप्तपर्ण: छत्तियण्णो, सुधा-छुहा । ह, दिवस.= दिवहो, दिवसो।' हघ, सिंहः - सिंघो, सीहो; संहारः संघारो, संहारो।' १. दिवसे गः ॥८॥२३॥ दिवस राम सोविल से होता है। २. हो पोनुहगरात १२:४ाई ।। मनुस्मार के बाद पाने पारेको मिस नेप होता है।
तोसरा अध्याय
संयुक्तव्यञ्जन-परिवर्तन
१. शब्द के प्रारम्भ में संयुक्तव्यञ्जन नहीं आते हैं। किन्तु इस
नियम के निम्न अपवाद हैं:-
(अ) यदि शब्द के प्रारम्भ में ण्ह, म्ह या ल्ह हो अथवा
व्यञ्जन +र हो।
(आ) यदि संयुक्तव्यञ्जन समस्तपद के द्वितीयपद के आदि
में हो।
२
उदाहरण-क्षत्रिय. सत्तिओ, ध्वज = चओ, स्पन्दनम् = फंदणं,
त्यागी = चाई।
अपपाद-(अ) स्नानम् = ण्हाण, स्म: = म्हो, हसति = ल्हसह,
हृद =द्रहो।
आ) महिपस्कन्ध = महिसक्सन्यो।
शब्द के मध्यमे आनेवाले सयुक्तव्यननों मे प्राय समानीकरण
की प्रवृत्ति पाई जाती है किन्तु निम्न संयुक्तव्यञ्जन इसके
अपवाद हैं
(अ) यह व्यञ्जन जिसमे उस व्यञ्जन के वग का हकार युक्त
व्यञ्जन मिला हो।
(आ) संयुक्त ध्वनियाँ पह, म्ह, ल्ह ।
(इ) व्यञ्जन+र।
(ई) अनुनासिक + व्यञ्जन जो कि अनुनासिफ के ही वर्ग का हो।
उदाहरण-चाम्पतिराज = वप्पइराओ, उला= उपका ।
१. देखिए पि.प्रा. पारा न. २६८ ।
२. देखिए पि.प्रा. पारा नं २६९।
२२ प्राकृत-प्रवेशिका . -- । अपवाद :-(अ) मध्यम् = मज्भ, तुच्छम् - चुच्छ, छुच्छं। (आ) कृष्णा = कण्हो, अरमादृशः = अम्हारिसो, प्रहलादः = पल्हाओ। (इ) वोद्रहो ( देशी शब्द ): तरूग, युवा। (ई) मकरन्दा = मंअरन्दो, मञ्जूपां = मञ्जूसा। ३. । समानीकरण का नियम:- संयुक्तव्यञ्जनों में प्राय एक व्यञ्जन दूसरे व्यञ्जन के अनुरूप हो जाता है। इसकी व्यवस्था -बलाबल की दृष्टि से होती है। समानबलकाले संयुक्तव्यजनों में प्रथमव्यञ्जन द्वितीय- व्यजन के अनुरूप, हो जाता है। असमानवलवाले संयुक्त व्यञ्जनों में हीनवलवाला व्यञ्जन अधिकबलवाले व्यञ्जनका रूप धारण कर लेता है। वल की दृष्टि से व्यञ्जनों का क्रम :- (अ) वर्ग के प्रथम ४ वर्ण (आ) अनुनासिक वर्ण (३) ल,स, व, य, र (क्रमश) ३.१ व्यञ्जन+व्यञ्जन घलासारः यसक्कारो, उत्पलम् %D - उप्पलं, प्रागूभार पमारो, उद्घातम् = उग्घात । ३. देखिए Woolner's Introduction To Prakrit Page-17(33) (प्रस्तुत अध्याय में ३.१ से ३.१२ तक ध्यान पद से यर्ग के प्रथम पार वर्ष तपा अनुनासिक पद रो पश्चम यर्ण अभिप्रेत है) ३. १ (4) क-गर-र-त-द-प य प स - ४२-४पामुष्य मुक् ॥८॥२॥७॥३०॥ यदि संयुतम्यम्जनों में प्रथम ध्यजन सूत्रोक्त पजनों में रो हो तो गरासोर हो जाता है। (२) धनाश पारेरायोटिया हे पदरे पनाति में पी होग . - 7 भ .
संयुक्तव्यजन-परिवर्तन
२३
३.२ व्यञ्जन + अनुनासिक
वलहीन अनुनासिक वलयुक्त व्यञ्जन के अनुरूप हो जाता है।
अग्निः अग्गी, युग्मम् = जुग्गं, प्रयत्नः = पयत्तो ।
३.३ व्यञ्जन+य
बलहीन य बलयुक्त व्यञ्जन के रूप में बदल जाता है।
चाणक्यः = चाणक्को, कुप्यति = कुप्पइ, अभ्यर्थनम् -
अब्भत्थर्ण।
३. ४ दन्त्यवर्ण+य
दन्त्यवर्ण के साथ य आने पर दन्त्यवर्ण तालव्यवर्ण में बदल
जाता है। तत्पश्चात् य उसके अनुरूप हो जाता है।
अत्यन्तम् अचन्तं, नेपथ्यम् =णेवच्छं, अद्य: अज्ज,
मध्यम मझ
(स) द्वितीयतुर्ययोपरि पूर्वः ॥८२१९०ाहे०॥
यदि संयुक्तव्यञ्जन का द्वितीयव्यञ्जन वर्ग का द्वितीय या चतुर्थ
व्यजन हो तो प्रथमव्यञ्जन को क्रमशः द्वितीयव्यन्जन के वर्ग
का प्रथम या तृतीय व्यज्जन हो जाता है।
(तुलना कीजिए पि. प्रा पारा नं १८५ तथा २७०)
३.२ देखिए पि. प्रा. पारा न. २७६, २७७ ।
३. जब अन्तिम ध्वनि या शेष वर्ण अश्या अनुनासिक से टकराते हैं
तो, जब तक उनके बीच में अंश स्वर न पाए, नियम यह है कि अधस्वर
शब्द में मिला लिया जाता है। (पि, प्रा पारा नं. २७९)
३.४ (अ) (1) रयप्पा चछ मा. ३१२७/वर०]]
स्य, ध्य, य को क्रमश. ध प ज होते हैं।
(२) ध्ययोम. ॥३॥३८वर०॥
ध्य तथा प्रको म होता है।
(घ) देखिए पि, प्रा. पारा न १८० ।
। प्रात प्रवेशिवा उद्ध। - U । 11 - ३.५ दास्यवरण +4 दत्यवर्ण के साथ व पाने पर प्राय व दन्त्यवर्ण के समान हो जाता है किन्तु कभी कभी पहले दन्त्यवर्ण तालव्यवर्ण बन जाता है, तत्पश्चात् व उसके अनुरूप हो जाता है। चत्वारि = चत्तारि, जम्बुद्वीप जम्बुद्दीयो, ऊर्ध्वम् चत्वरम् - चचरं, पृथ्वी पिच्छी, विद्वान् विज्ज बुद्ध्वा = बुज्मा। ३ ६ व्यञ्जन+र, ल, व चलहीन र, ल, व बलयुक्त व्यञ्जन में बदल जाते है। विक्रम = चिकमो, रात्रि = रत्ती, विक्लव = विकलो, पक्वम् = प, ध्यज = वयो।' ३ ७ अनुनासिक +ध्यान याद पहला अनुनासिक द्वितीय व्यञ्जन के वर्ग का हो तो प्राय उनमे कोई परिवर्तन नहीं होता है। लाञ्छनम् = लञ्छण, कण्ठ = कण्ठो, चन्ध - घ.धो। ३ ८ अनुनासिक + अनुनासिक यदि भिन्न वर्गों के अनुनासिक प्रापस में मिले तो म के पूर्व आने वाले ड् और ण को अनुस्वार हो जाता है। न्म को म्म तथा म्न को ण हो जाता है। पराङ्मुख = परमुहो, पण्मुख = छमुहो, उन्मुस - उम्मुहो, निम्नगा=णिण्णआ। - - ३ ३ ५ (अ) देखिए पि प्रा पारा न २९८, २९९ (आ) त्व व द्व ध्वा च छ ज झा क्वचित् ॥८॥१५॥हे०॥ कहीं कहीं स्य, भ, द्व, ध्व को क्रमश' च, छ, ज, भ होते हैं । ३ ६ देखिए पि. प्रा. पारा न २८७, २१६, २१७ । ३.७ देखिए पि प्रा. पारा न. २७२ । ३ ८ देखिए पि प्रा पारा न २७८ ।
संयुक्तव्यअन परिवर्तन २५ ३.९ अनुनासिक+अन्त स्थ बलहीन अन्त स्त्र बलयुक्त अनुनासिक के अनुरूप हो जाता है। हिरण्य - हिरण्ण, स्न्या = कण्णा, मन्ये = मण्णे अन्वेषणम् - अण्णेसण। ३ १० र+दन्त्यवर्ण- यदि दन्त्यषण के पूर्व र आवे तो वह दन्त्यवर्ण के साथ मिल जाता है, तत्पश्चात् वे बहुधा मूर्धन्यवर्ण हो जाते हैं। चक्रवर्ती = चम्कट्टी, अर्थ = अट्ठो, गर्दभ = गडहो, गद्दहो, अर्धम = अहट, ग्रह ३. ११ श ष, स + व्यञ्जन (१) श्च, श्छ>च्छ, याश्ययम् - अच्छरिअ, निश्छिद्रम् = गिच्छिट्ट। (२ फ स> क्स, गुरु मसुक्स मुस्क, पुष्करिणी : पोकयरिगी। (३) ट, ठ> छ, -ष्टि = दिठा, मुष्ठ = मुठ्ठ । (७) प्प फ>फ, पुष्पम् = पुष्र्फ निष्फरम् शिफल। देविा शिप्रा पारा न २२ । जिगसमूह में र रेप रूप में) अपन मे पढे आना हो उसमें दरयों के स्थान पर बहुधा मूध यव आ जाते हैं। यह ध्यनि-परि पढन रिसपा व माग में हाउा है। दसिएनि प्रा.पारान २८१) ३ ११ ()) सप्या छ र०॥ व, स्या कोप हो जाता है। (२)पा सहायर ॥ र स, योग होता है। (३)स्य 6 ॥३१पर ॥ मेन पर ठहोता है। (४) परय र पशेफ होता है।
प्राकृत-प्रवेशिका अवक्खन्दो, (५) स्क, रख> क्ख, अवस्कन्दः प्रस्खलन्ती पक्खलन्ती। (६) स्त, स्थ> त्य, अस्ति = अत्यि, अवस्था = अवस्था । (७) स्प, स्फ> एफ, प्रतिस्पर्धीः- पडिप्फद्धी आस्फालनं = अप्फालणं। ३. १२ श, प, स + अनुनासिक यदि संयुक्त व्यञ्जन में श, प, स के बाद अनुनासिक आयें तो श, प, स को ह हो जाता है तथा वर्णों के क्रम में परिवर्तन हो जाता है। ग्रीष्मः = गिम्हो, अस्मारशः = अम्हारिसो, स्नानम् = व्हाण, प्रश्नः = पहो । (५) देखिए ३. ११ (क), (२)। (६) स्तस्य यः ॥३॥१२॥वर०॥ स्त के स्थान पर थ होता है। (७) स्पस्य सर्वत्र स्थितस्य ॥३॥३६३र०॥ सर्वत्र स्प को फ होता है। (ख) देखिए पि० प्रा० पारा नं० ३०१, ३००, ३०३, ३०५, ३०६, ३०७ तथा ३११। (ग) यदि संयुक्तव्यञ्जन में प्रथम व्यञ्जन श, प या स हो तथा द्वितीय व्यञ्जन वर्ग के प्रथम दो वर्गों में से कोई हो तो श, ष या स द्वितीय ध्यान का रूप धारण कर लेता है तथा द्वितीय व्यञ्जन हकारयुक्त हो जाता है। (तुलना कीजिए-Woolner's Introduction To Prakrit Page 18 (88)) ३. १३ (अ) पक्ष्म-रम-घूम-स्म-हमा म्हः ॥८१२७४ाहे ॥ पक्ष्म स्थित क्ष्म एवं श्म आदि संयुक्त व्यञ्जनों को म्ह होता है। (ब) सूक्ष्म-श्न-प्ण-स्न-न-हण-क्षणां व्हः ॥ १।२।७।हे.॥ मूत्रोक्त संयुकव्यजनों को ग्रह होता है। (तुलना कीजिए पि. प्रा. पारा नं. ३१२) संयुक्तव्यञ्जन परिवर्तन ३.१३ श, प, स + अन्त स्थल को छोड़कर) श, प, स के वाद अन्त स्थ आने पर अन्त स्थ पूर्ववर्ती व्यअन का रूप धारण कर लेता है। अश्व = अरसो, अवश्यम् = अवस्स, मनुष्य. = मणुस्सो, सहस्रम् = सहस्सा ४. विसर्ग+क, ख, प, क, स, प, फ के पूर्व पानेयाले विसर्ग को स हो जाता है। तत्पश्चात् पूर्वोक्त नियमों के आधार पर उसमे परिवर्तन होता है। अन्त करणम् = अन्तककरणं, 'दु सम् - दुक्ख, अन्त पात:- अन्तप्पाओ। ५. ह+नण, ल, म, य = एह, ल्ह, म्ह, यह (क्रमशः) यहि = यही पूर्वाण + = पुन्यण्हो, प्रहलादः पल्हाओ, ब्राह्मण 3 बम्हणो, गुह्यम् = गुय्हं । ६. विशिष्ट सयुत्तव्यजन (१) क्ष> क्स, च, ज्झ । मक्षिा मक्सिया, मच्छिा; लक्षणम् = लक्सणं, अक्षिम् = अच्छि, प्रक्षीणम् = पामीणं । (२) क्म>cप, हमम्प । रुक्मिणी = रुप्पिणी, कुड्गलम् = कुम्पल। १३ देखिए पि प्रा पारा न ३१५ । ५ देपिए पि प्रा. पारा नं ३२९ । ६ () नहलमपु नरमा यितिरुद्धम् ॥३वापर०॥ सूत्रोक्त सयुक्त ध्यगनों में क्रमशन सम पूर्व में आ जाते हैं। (आ) पेसोः ॥८।२।१२४ाहे ॥ यह हो जाता है। (१) ए पारितु प-सौ ॥८॥ पोप होता है. पहों वहीं पर छापा भी होते हैं। (२) म मो. सह।। एम, पम को समय पाप होया है। am an २८ प्राकृत प्रवेशिका I - यन% । -- शय्या 1 %3D I (३) ज्ञ>ण (शब्द के प्रारम्भ में), ण्ण (शब्द के मध्य मे)। ज्ञानम् = णा विज्ञानम् = विण्णाण । (४) म>प्प, आत्मा = अप्पा, अत्ता। (५),न> हि, ह, त्य, कुन = कहि, कह, कत्थ जहि, जह, जत्थ। (६) प्स, स>च्छ, अप्सरा = अच्छरा उत्साह = उच्छाहो । द्य, य्य यज, मद्यम् = मज्ज, सेज्जा, भार्या = भज्जा। (E) पे, प>ह, वाप्प = वाहो, आपण काहायणो। ७ स्वरभक्ति सयुक्तव्यञ्जन मे यदि एक व्यनन य, र ल, अथवा । 'अनुनासिक हो तो उन्हें स्तर के द्वारा विभक्त कर दिया ( ३ ) म्नज्ञोण हे। स्त्रोक्त सयुक्तव्यानो को ण हो जाता है । ( देखिए पि प्रा पा न ५७ ) (४) भस्मात्मनो पो वा ॥ २।११।हे०॥ सूत्रोक्त शब्दो के सयुक्त व्यञ्जनो को विकल से प होता है। (५) पो हि ह त्या ॥ १२।१६१०॥ अप प्रत्यय को हि ह रथ होते हैं । (६) ह्रस्वात प्य यस प्सापनिश्चले ।। १२१२१॥हे.॥ ह्रस्व से परे घ्य श्च स प्स को छ होता है कि तु निश्चल म नही होता है। (७) द्य-प्य-यो ज ॥१२।२४।हे। । थ, ग्य, यं को ज होता है। (८) (ब) वाप्पेऽत्रुणि ह ॥३॥३८॥वर०॥ अश्रुवाचा याप्प शब्द के ष्प को ह होता है। (ब) कापणे ॥३३३६/वर०॥ कार्षापण के प को ह होता है। ७ (क) विष्टविटरत्नक्रियाशाङ्गपु तस्वरवत्पूर्वस्य ॥३॥६०३र०।। मूत्रोक शब्दों में सयुक्तव्यजन, तद्गत स्वर से विमक होता है ।
चौथा अध्याय
सन्धि-प्रकरण
प्राकृत में सन्धि-व्यवस्था वैकल्पिक है, नित्य नहीं। सन्धि के
दो भेद है-१. स्वर-सन्धि २ व्यञ्जन-सन्धि ।
स्वर-सन्धि
१. अकार, इकार या उकार के बाद सवर्ण-रवर आने पर उनके स्थान
पर सवर्ण दीर्घ हो जाता है।
मगह+अहिवई = मगहाहिबई, मगह अहियई (मगधाधिपति )।
विसम + आयवो = विसमायवो, विसम आययो विपमातप.)।
मुणि+ईसरो = मुणीसरो, मुणि ईसरो (मुनीश्वर)।
भाणु + उवमायो = भारवज्झायो, भाणु उवज्झायो (भानू
पाध्याय)।
समस्तपद में प्रथमपद के अन्त मे आनेवाले दीर्घ स्वर को
कहीं नित्यरूप से तथा वहीं विकल्प से हरव होता है, तथा
ह्रस्व स्वर को दीर्घ।
अन्त + वेई - अन्ता वेई, (अन्तर्वेदि)
सत्त+वीसा
सत्तावीसा, (सप्तविशति ) पई हरं, पइ हरं (पतिगृहम् )।
३. यदि अ या आ के बाद सरलव्यञ्जन से पूर्ववर्ती इकार या
उकार हो तो उन्हें ए या ओ हो जाता है।
पास + इसी = यासेसी, पास इसी (व्यासपि ), दिण + ईसो
दिणेसो, दिण ईसो (दिनेश ), गूढ + उअर = गूढोअर,
१. देखिए पि प्रा. पारा नं १४८।
२. दोघ-हस्वी मियो वृत्तौ ॥१४ाहे।
समस्तपद में स्वरों को दोघं ह्रस्व बहुलता से होते हैं।
३. देखिए पि. प्रा. पारा नं. १४९ ।
२.
%3D
सन्धि-प्रकरण गृढ उधरं ( गृढोदरम्), सास+ऊसासा%3 सासोसासा, सास असासा (श्वासोच्छ्वासः ), रागा+ इअरोरामेअरो, रामा इअरो ( रामेतरः)। ४. यदि अ या आ के बाद संयुक्तव्यजन से पूर्ववर्ती इकार या उकार हो, तो उनको ए या ओ न होकर अ या आ का लोप हो जाता है। गज । इंदो = गइंदो (गजेन्द्रः), कण्ग + उप्पलं = कण्णुप्पलं ( कर्णोत्पलम् ), महा + ऊसवो = महूसवो (महोत्सवः)। ५. यदि प्रथमपद के अन्त में अ हो तथा द्वितीयपद के प्रारम्भ में असमान उदृत्तस्वर हो तो कहीं-कहीं उनमें से श्र का लोप हो जाता है। राअ+ उलं = राउलं, राअउलं, ( राजकुलम् ) वा+ उत्तो: पाउत्तो, याअउत्तो ( वातपुत्रः )। ६ यदि मौलिक या उवृत्त अ या आ के बाद मूल ए या ओ श्रावे तो अ या ा का लोप हो जाता है। गाम+ एणी = गामणी ( देशीशब्द), उदअ + अल्ल= उदओल्लं, ( उदकाम ), मट्टिा + श्रोलितं = मट्टिओलित्तं (मृत्तिकावलिप्तम)। देखिए पि. प्रा. पारा नं १५. । तुलना कीजिए- लुक् ॥८११आहे.॥ स्वर का सर परे रहते प्रायः लोप होता है । 4. देखिए पि. प्रा. पारा नं १६०॥ उदृत्त स्वर--- व्यसनसंपृक्तः स्वरो ध्याने तुम्ने योऽवशिष्यते स उवृत्त इहोच्यते- है. सूत्र ८१०८ की वृत्ति। ६. देखिए पि. प्रा पारा नं. १९३ ।
३२ प्राकृत प्रवेशिका स्परसन्धि निषेध इ, ई और उ ऊ के बाद कोई भी विजातीय स्वर पाये तो ग्नमे सन्धि नहीं होती है। वि+अ = विप्र (इ.), सु+अलफियं = सुअलक्यि (स्व लड्कृतम् ). वहु + अवऊढो = वहुअवऊढो (वधूपगूढ )। ८. ए तथा ओ के बाद स्वरवर्ण होने पर उनमे सन्धि नहीं होती है। वणे+अडइ = वणे अडइ (वनेऽति , अहो+अच्छरिअ अहो अच्छरिअ (अहो आश्चर्यम), देवीए + एत्थ 3 - देवी एस्थ ( देव्या अत्र), एग्रो+एस्थ = एग्रो पथ ( एकोऽन)। ९. स्वर के बाद उवृत्त रवर होने पर सन्धि नहीं होती है। निसा+अ = निसारो (निशाचर ), रयणी + अरो रयणीअरो ( रजन'चर )। १०. क्रियापद के स्वर के बाद स्वर पाने पर सन्धि नहीं होती है। होइ + इह = होइ इह ( भवतीह ) । अव्ययस्पर सन्धि ११. पद के बाद आने वाले अपि शब्द के अ का विकल्प से लोप हो जाता है। अवशिष्ट पिर्याद स्वर से परे हो तो उसे वि हो जाता है। केण + अपि = केण वि, केणापि (केनापि )। किं + अपि = किं पि, मिति (क्मिपि)। न युवर्णस्यास्वे ॥८॥हे || इवर्ण उवण से असमान स्वर परे रहते सघि नही होती है। एदोतो स्वरे ॥१७॥ एकार ओकार से परे स्वर होन पर सधि नही होती है । ९. स्वरस्योदवृत्ते ॥१८हे ॥ स्वर से परे उत्त स्वर होन पर सधि नही होती है । त्यादे ॥ १।९।हे॥ तिप आदि के स्वर से परे स्वर होने पर सघि नहीं होती है। पदादपेर्वा ॥८१५१हे०॥ पद से परे अपि शब्द के अ का विकल्प से लोप होता है । (ध्वनिबल की होनता के प्रभाव से अव्यय बहुधा आरम्न के स्वर का लोप कर देते हैं। स्वर के वाद अपि का शप पि वि म परिणत हो जाता है। पि प्रा पारान १३५)।
सन्धि-प्रकरण १२. पद के बाद आने वाले इति के आदि इा लोप हो जाता है तथा अवशिष्ट ति यदि सर से परे हो तो उसे त्ति हो जाता है। किं+इति = किं ति (मिमिति ), न जुत्तं + इति = न जुत्तं ति (न युक्तमिति), तहा + इति = तह ति ( तथेति)। १३ त्यदादि से परे अव्यय या अव्यय से परे त्यदादि होने पर द्वितीय पद के आदिस्वर का विकल्प से लोप होता है। अम्हे + एत्थ = अम्हेत्थ, अम्हे एत्थ ( वयमत्र ) । ज+इमा जइमा, जइ इमा ( यदीयम्)। व्यञ्जनसन्धि १. संस्कृत अः को ओ हो जाता है। अग्रत = अग्गओ, पुरतः = पुरओ, पुनः= पुणो । २. पद के अन्त मे आनेवाले म को अनुस्वार हो जाता है किन्तु म् के बाद स्वर आने पर म् को अनुस्वार विकल्प से होता है। गिरिम् = गिरि, जलम् - जलं, फलम् = फलं । उसमम + अजिअ = उसमें अजिअं, उसभमजिअं (ऋपभमजि- तम्); यम् + आहु = यं श्राहु यमाहु (यमाहु)। १२. इते. स्वरात तश्च द्विः ॥१५॥ पद से परे इति के इ का लोप होता है। तथा सर से परे तकार को द्विव होता है। १३. त्यदायव्ययात् तस्वरस्य लुक् ॥८५११५०हे.॥ त्यदादि या मन्यय से परे अध्यय या त्यदादि होने पर प्रत्यय या त्यदादि के आदि स्वर का विक्ल से लोप होना है। मौलिब' अर से निकला असभी प्राकृत बोलियो में अधिकाश स्थलों पर प्रो बन जाता है। देखिए पि प्रा पारा न. ३४३ । २. (अ) मोनुस्वारः ॥८॥२३॥हे। अन्य मकार को अनुस्वार हो जाता है। (ब) वा स्वरे मश्च ॥८१२४ाहे॥ स्वर परे रहते अन्त्य मकार को विकल्प से अनुस्वार होता है। ३ प्राकृत-प्रवेशिका ३. हलन्त अन्त्यव्यञ्जन को भी यहुधा मार होकर अनुस्वार हो जाता है। साक्षात् = सक्सं, यत् = सं, तत् = तं । ४. ड्, , ण् , न को व्यञ्जन परे रहते अनुस्वार हो जाता है। पराङ्मुसः = परंमुद्दो, कञ्चकः = कंचुओ, पण्मुखः = छंमुहो, सन्ध्या संगा। ५. अनुस्वार के बाद कवर्ग, चवर्ग, टवर्ग, तवर्ग तथा पर्वर्ग के अक्षर होने पर अनुस्वार को विकल्प से क्रमशः ड्, , ण, न, एवं म होते है। पं+को = पड्को, पंको, ल+छणं = लञ्छणं, लंछणं, सं+ ढोसण्ढो, संढो; चं+ दो = चन्दो, चंदो; पारं+भो प्रारम्भो, प्रारंभो। ६. वकादि शब्दों के प्रथम, द्वितीय या तृतीय स्वर के अन्त में अनुस्वार आगम के रूप में होता है। चक्रम् = चंकं, मनस्वी = मणंसी, उपरि अवरि ( उरि)। . - ३. बहुलाधिकाराद् अन्यस्यापि व्यञ्जनस्य मकार ः ॥८१२४ाहे ॥ सूत्र की वृत्ति ॥ ङ-न-ण नो ध्यजने ॥१२॥हे.॥ अ, ब, ण, न-इनके स्थान पर व्याजन परे रहते अनुस्वार होता है। ( तुलना कीजिए पि प्रा पारा नं २७.) ५. वसुन्त्यो वा ॥३०॥ वर्ग के वर्ण परे रहते अनुस्वार को उसी वर्ग का अन्तिम वर्ण विकल्प से हो जाता है। वादावन्त ॥१०॥ वनादि शब्दो में प्रयोगानुसार प्रथम, द्वितीय या तृतीय स्वरों पर मागम के रूप में अनुस्वार होता है।
सन्धि प्रकरण ३५ ७. . क्या तथा स्यादि प्रत्ययों के ण तथा सु के आगे विकल्प से अनुस्वार का पागम होता है। कृत्वा = काऊण, काऊग, कालेन = कालेणं, कालेण,जिनानाम् = जिणाण, जिगाण , वीरेपु - वीरेसु, धीरेसु । विंशति आदि शब्दों के अनुस्वार का लोप होता है। विंशति = वीसा, त्रिंशत् = तीसा। ९. मांस आदि शब्दों के अनुस्वार का विकल्प से लोप होता है। मांसम् = मासं, मसं सिंह - सीहो, सिघो। १०. जर स्वरादिपदों की द्विरुक्ति हो तो उनके बीच मे विकल्प से म का आगम होता है। एकैकम् = एकमेक, अङ्गे अने= अडगमगम्मि, पते एककमित्यादि। ७ क्वा स्यादेणं-स्वोर्वा ॥ १२॥ कवा तया स्यादि के प तथा सु विकल्प से अनुस्वारान्ठ होते हैं । विशत्यादेर्लुक् ॥८१८ मासादेर्वा शह ॥ मासादि शब्दो के अनुस्वार को विकल्प से लोप होता है। 10. वोप्स्यात्स्यादेवीप्स्ये स्वरे मो वा ॥३॥राहे ।। चोप्सार्थक पद से परे स्यादि (स्वादि) प्रत्यय के स्थान पर स्वरादि वोप्सार्थक पद परे रहते विकल से म होता है।
पाँचवाँ अध्याय अव्यय प्राय प्राकृत-अव्यय सस्कृत अव्यय से सर-व्यञ्जन परिवर्तन द्वारा बनते है। जैसे अति = अइ, अन्यथा = अण्गहा, सदा सइ प्रमुख प्राकृत अव्ययों की सूची सूचक अर्थों के साथ इस प्रकार है :- अइ (अयि)-सम्भावना, आमन्त्रण ऊ (दे.)-गर्दा, आक्षेप (अति)-सामर्थ्य, अतिशय (प्रस्तुत वाक्य के विपरीत अण(अन्)-निपेध, प्रतिपेध अर्थ की आशंका से उसे अप्पणो (आत्मन)-स्वय उलटना) विस्मय, सूचना अम्मो (2)--श्राश्चर्य एफसरिअ (दे०)-शीघ्र, तुरन्त अरे (अरे)-सम्भाषण, रतिररह ओ (ओ)-~-वितर्क, प्रकोप, सूचना, अलाहि (अलहि)-निवारण, पर्याप्त पश्चाताप, सम्बोधन, पादपरक सवि (अपि)-प्रश्न, अवधारण, पिर (क्लि)-इर के समान समुच्चय, सम्भावना, विलाप किणी (किमिति)-क्यों अव्यो-सूचना, दुस, सम्भापग, खु (खलु )-निश्चय, सन्देह, अपराध, विस्मय, थानन्द, वितर्क, विस्मय, सम्भावना। भय, खेद, यिपाद, पश्चाताप चिम (एव)-अवधारण श्राम (ओम)-स्वीकृति प्रशिक चेय (एव)-अवधारण च (एव)- अवधारण इ (इ)-पादपूरक जाहे (यदा)-जिस समय इर (किल)-सम्मारना, निश्चय, जे-पादपूरक, अवधारण हेतु, वार्ताप्रसिद्ध अर्थ, अरचि, जेण (येन)–लक्षणार्थक णइ-निश्चय, निषेध इहरा (इतरथा)-अन्यथा णपर }-वेवल, अनन्तर उअ (उत)-विकल्प, वित, प्रश्न, समुच्चय, अतिशय, देसो णवरं (न परम)--विशेप णवरि उअ (दे०)-सरल ऋजु णपरि (दे०)-देवल, अनन्तर असत्य, सन्देह णवर मध्यय ३७ विव-इव णवि-परीत्य, निषेध विअ (इव, एव)-इव, अवधारण णाई (नैव)-प्रतिषेध तं (तत्)-कारण, वाक्य उपन्यास वेज (एव)-अवधारण ताहे (तदा) --उस समय वेव्व (दे०)-आमन्त्रण तेण (तेन)-लक्षण सूचक वेव्वे (दे०)-भय, वारण, विपाद, थू-निन्दा, तिरस्कार आमन्त्रण दर (दे०)-अर्ध, प्राधाः ईपत् व्व-इव दु (दुर्)-अभाव, दुष्टता, निन्दा सू-निन्दासूचक दे-संमुखीकरण, सखी को आमन्त्रण हरे ( अरे)-आक्षेप, सम्भापण, पाडिक प्रत्येक )-हर एक रतिक्लह पाडिएक्क हला (हला)-सखि के आमन्त्रण पिच ( अपि+इव)-सादृश्य में पुणतं—बारम्बार, कृतकरण बले-निश्चय, निर्धारण हले ( हले)- हद्धि ( हा धिक् )--खेद, अनुताप हन्द-ग्रहण करो' अर्थ में माई (माऽति)-नहीं हन्दि विपाद, विकल्प, मामि - सखी के आमन्त्रग में पश्चात्ताप, निश्चय, सत्य संबोधन, उपदर्शन मोरउल्ला-व्यर्थ, मुधा हिर-किल र-पादपूरक हु (खलु)-निश्चय, वितर्क, संशय, रे (रे)-परिहास, रतिकलह, संभावना, विस्मय किन्तु, अपि, सम्भापण, आक्षेप, तिरस्कार वाक्य की शोभा। घ-इव हुँ (हुम् -दान, प्रश्न, निवारण, वणे-निश्चय, विकल्प, अनुकम्पा, निर्धारण, स्वीकार, हुंकार, सम्भावना अनादर। " " मण } (मन्ये )-विमर्श " मिव इव छठवाँ अध्याय - । शब्दरूप प्राकृत मे शब्द रूपों की प्रमुख विशेषताएँ'- (१) प्राकृत मे व्यञ्जनान्तशब्द नहीं होते है। वे अन्तिम व्यञ्जन के लुप्त होने पर उससे पूर्व आने वाले स्वर की रूपावली में सम्मिलित कर लिए जाते हैं। जैसे राजन् - राय, प्रेमन् = पेम्म । (२) लिंग की सर्वत्र रक्षा नहीं की गई है। कुछ अश तक लिंग परिवर्तन शब्द के अन्तिम वर्ण पर निर्भर होता है। जैसे तम (न०) = तमो (पुं.)। (३) सस्कृत की भाँति तीन वचन न होकर दो ही होते है, द्विवचन के स्थान पर बहुवचन का प्रयोग होता है। जैसे वृक्षौ = वच्छा। (४) चतुर्थी विभक्ति का स्वतन्त्र अस्तित्व नहीं है अपितु उसका अन्तर्भाव पष्ठी विभक्ति मे होता है। जैसे-दारकाय = दारअस्स । अकारान्त पुल्लिङ्ग शब्द विभक्तिप्रत्यय-परिवर्तन विभक्ति बहुवचन सस्कृत प्राकृत सस्कृत प्राकृत प्रथमा सि (सु) डो (ओ) लोप एफरचन जस् १. देखिए पि प्रा. पारा नं. ३६५, ३१६, ३६० । २. चतुर्या पष्ठी ॥८॥३॥१३१ हे ! चतुर्थी के स्थान पर पटी होती है। ३. प्रत सेडों ॥३०॥ अकारात शब्द से परे सि (सु) आदि प्रत्यय के सि (सु) को डो (ओ) होता है। १. जस्-शसोलुंक् ॥३०॥ मकारान्त शब्द से परे जस् तथा शस् का लोप होता है ।
शब्दरूप ३६ अम् म्' लोप शस् भिसू टा ण, ण - हि, हिँ, हिं द्वितीया तृतीया चतुर्थी पञ्चमी - डसि चो,दो(ओ),दु(उ) भ्यस् हि,हिन्तो,लोप आम् डे(ए), म्मि सुप् पष्ठी स्सा डस् डि चो,दो(ओ),दु(उ) हि,हिन्तो,सुन्तो ण, णं सु, सुं लोप सप्तमी सम्बोधन सु ओ, लोप नसू ३. १. अमोस्य ॥८॥३५॥हे०॥ असे परे अम के अकार का लोप होता है। २. रा-आमोणः ॥१३॥६॥ प्रकारान्त शब्द से परे टा तथा पष्ठी के बहुवचन के ग्राम को ण होता है। (ण के ऊपर विकल्प से अनुस्वार के लिए देखिए व्यञ्जन सन्धि ७ भिसो हि हिं हि।।३।०॥ अ से परे मिस् के स्थान पर केवल, सानुनासिक तथा सानुस्वार हि होता है ४. उसेस तो-दो दु-हि-हिन्तो-लुकः । ८।३।।हे अ से परे हसि को तो, दो, दु, हि, हिन्तो, लोप ये ६ आदेश होते हैं। ( दो तथा दु में दकार ग्रहण भाषान्तर (शौरसेनी, मागथी ) के उपयोग के लिए किया गया है। हे सूत्र ८३८ को वृत्ति ।) ५. भ्यसस् त्तो-दो दु-हि हिन्तो सुन्तो ॥८॥३॥९॥हे ।। प्र से परे भ्यस् के स्थान में तो, दो, दु, हि, हिन्तो, सुन्तो ये प्रादेश होते हैं। ६. इस: स्स ॥८३१हे। असे परे ङस् के स्थान पर स्स होता है। डे म्मि २. ॥८॥३।११।हे, असे पर डि को डित एकार तथा म्मि होता है। ८. देखिए पि. प्रा पारा न ३६६ (ब)। ९. देखिए पि प्रा. पारा नं. ३७२ । ७.
प्राकृत-प्रवेशिका वच्छ (वृक्ष) शब्द के रूप विभक्ति एकवचन प्रथमा वच्छो द्वितीया यच्छ तृतीया वच्छेण, वच्छेणं चतुर्थी पञ्चमी वच्छा, वच्छत्तो, वच्छाओ, वच्छाउ, वच्छाहि, वच्छाहिन्तो बहुवचन वच्छा वच्छे, वच्छा वच्छेदि, वच्छेहि, वच्छेहि -- , वच्छत्तो, वच्छाओ, वच्चाउ, वच्छाहि, वच्छेहि, वच्छाहिन्तो, वच्छेहिन्तो, बच्छासुन्तो, वच्छेसुन्तो वच्छाण, वच्छाएं वच्छेसु, वच्छेसु पष्ठी वच्छस्स सप्तमी वच्छे, वच्छम्मि सम्बोधन वच्छ, वच्छा, वच्छो वच्छा १. जस् शस सि तो दो द्वामि दोघं ॥३१२।हे०॥ सूत्रोक्त प्रत्ययो के परे रहते ३ को दोघं होता है । २. टाण-शस्येत् ॥ ८॥३॥१४ाहे ॥ टा के आदेश ण तथा शस् परे रहते ष को एकार होता है । भिस्म्यस्सुपि ॥८१३१०॥ भिस् , म्यस् , सुप् परे रहते अ को ए होता है। ४. दीर्घ स्वर को संयुक्तव्यञ्जन से पूर्ववर्ती होने से ह्रस्व-देखिए पु. २ टि०७ ३ भ्यसि था ॥८॥३॥१३॥०॥ म्यस् को होनेवाले आदेश परे रहते अ को विकल्प से दोघं होता है।
शब्दरूप इकारान्त एवं उकारान्त पुल्लिङ्ग शब्द विभक्तिप्रत्यय परिवर्तन सि(सु) लोप विभक्ति एकवचन बहुवचन सस्कृत प्राकृत सस्कृत प्राकृत प्रथमा जस् अउ,अओणो लोप, अवो (केवल उकारान्त शब्द के लिए) द्वितीया अम् म् शस् णो, लोप तृतीया टा णा' भिस् हि, हिँ, हिं पञ्चमी डसि णो, चो, दो (ओ) भ्यस् तो, दो(ओ), दु(उ), दु(उ)हिन्तो हिन्तो, सुन्तो पष्ठी डस् णो, स्स आम् ण,ण सप्तमी ङि म्मि सुप् सु, सु सम्बोधन सि(सु) लोप नस् अउ, अओ, णो, लोप १ पुसि जसो डउ डमो वा ॥८३॥२०॥हे ॥ इसे परे जसको पु० में डित् प्रउ तथा अओ आदेश होते हैं। जस-शसोणों वा ॥८३२ हे०॥ इ, उसे परे जस पास को पु० में विवल से णो आदेश होता है। ३ वोतो डवो ॥ ३२॥हे ॥ उदत से परे जस को पुर मे विकास से डित् अवो आदेश होता है। टोला।।८ ३।२४ हे। पु तपा नपु० में इ उ से परे टा को गा होता है। इसि डसो पुक्लोवे वा ३.३ हे०॥ पु० तथा नपुं० में वर्तमान इ, उ से परे इसि डस् को विपल्स से पो २ द प्रागत प्रवेशिता गिरि शब्द पे रूप विभक्ति एश्यपन यदुवचन प्रथमा गिरी' गिरी, गिरिणो गिरत,-ओ द्वितीया गिरि गिरो, गिरिणो सृतोया गिरिणा गिरीहि,-हि, दि. पञ्चमी गिरिगो, तो,गिरीश्रो, उ, दिन्तोगिरित्तो,गिरी 3, ओ, हिन्तो, सुन्तो पष्ठी गिरिणो, रस गिरीण,- सप्तमी गिरिम्मि गिरीमामु सम्योधन गिरि, गिरी' गिरी, गिरिगो, गिरउ,-ओ , प. द्वि प० स० तरूसु-सुं तरु शब्द के रूप वरू तरू, तरुणो, तरउ, ओ,यो तलं वरू तरुणो ह. वरणा तरूहि हि , हिं पन् तरुगो,तो, तरूउ, ओ, हिन्डो तरुत्तो, तरूउ, ओ, हिन्तो, गुन्तो तरुगो,-स्स तरूण, ण तरुम्मि सम्बो० तरु, तरू तरू, तरुणो, तरउ, ओ, यो प्रक्लीवे सौ ॥८३१९/हे ॥ नपु० को छोडकर सि (सु) परे रहते इ, उ को दोघं होता है। २. लुप्ते शसि ॥८३१८ाहे ॥ शस् का नोप होने पर इ, उ को दोषं होता है। ३. इदुतो दीर्घ १३१६ हे॥ इकार, उकार को भिस , भ्यस , सुप् परे रहते दीर्घ होता है। ४. ईदूतोह्रस्व ।।१३।४।०॥ सम्बोधन में ईशारा त तथा ऊकारान्त शब्द को ह्रस्व होता है। उदाहरण-हे गामणि, हे वहु । १ शब्दरूप ऋकारान्त पुल्लिङ्ग शब्द ऋकारान्त पुल्लिंग शब्द दो भागों में विभक्त किए जाते हैं-१. विशेष्यवाचक २ विशेपणवाचक । प्रथमा तथा द्वितीया विभक्ति के एकवचन को छोड़कर दोनों प्रकार के शब्दों के अन्तिम ऋ को विकल्प से उ हो जाता है तथा उनकी रूपावली तरु शब्द की भांति होती है।' विकल्पाभाव में विशेप्यवाचक तथा विशेपणवाचक शब्दों के अन्तिम ऋ को क्रमशः अर तथा आर हो जाता है तथा उनकी रूपावली वच्छ शब्द के समान होती है। प्र० . प० पिऊ, पिअर (पितृ) शब्द के रूप विभक्ति एकवचन बहुवचन पिआ, पिअरो पिअरा, पिऊ, पिउणो, पिअउ,ओ, यो द्वि० पिअरं पिअरा, रे, पिउणो, पिऊ पियरेण, , पिउणा पिअरेहि-हि, हिं, पिऊहि,-हि,हिं पिअरत्तो,पिअरा, उ,-यो,- पिअरत्तो, पिअराउ, ओ,-हि,हिन्तो, हि हिन्तो,पिउत्तो, पिणो, सुन्तो, पिअरेहि हिन्तो, सुन्तो, पिट- पिऊउ-यो,-हिन्तो तो,पिऊउ -ओ, हिन्तो, सुन्तो पिअरस्स, पिउणो, रस पिअराण, णं, पिऊण -गणं १. ऋतामुदस्यमौसु वा ॥८1०॥ मि (सु), अम्, श्री को छोड़कर सि (सु ) प्रादि प्रत्यय परे रहते ऋकारान्त शब्दो को विकल्प से उकारान्त हो जाता है। (अ) आरः स्यादौ ।।१३।४ाहे ॥ सि (सु) आदि परे रहते ऋ को आर आदेश होता है। (ब) नाम्न्यरः ८।३।।हे संज्ञावाची दन्त शब्दों के ऋ को सि (सु) ग्रादि परे रहते पर आदेश होता है। आ सौ न वा !.८३३॥१८॥हे.॥ दन्त को सि ( सु) परे रहते विकल से था होता है। प. ३.
१४ प्रारत-प्रशिक्षा स पिअरे, पिअरम्मि, पिउम्मि पिपरेसु,-सं, पिऊसु, सु सम्मो पि, पिअरं पिअरा, पिऊ, पिवणो, पिअउ,-श्रो, वो दाउ, दायार (दान) शब्द के रूप तरु तथा यन्छ शब्द के समान होते हैं। प्रथमा विभक्ति के एकवचन में पिता की भांति दाया तथा सम्बोधन के एक वचन में पित्र की भांति दाय रूप होते हैं। आकारान्त स्त्रीलिङ्ग शब्द विभक्ति प्रत्यय परिवर्तन विभक्ति एकवचन बहुवचन संस्कृत प्राकृत संस्कृत प्राकृत सि (सु) लोप जस् उ, ओ; लोप म् शस् उ, ओ, लोप तृ० टा अ, इ, ए भिस् हि, हिँ, हिं डसि भ्यस् चो,ओ,उ,हिन्तो,सुन्तो प्र० , अम् 3 प० अ,इ,ए,त्तो,ओ उ, हिन्तो २ १. ऋसोदा । ८।३।३९।हे। सम्बोधन में सि ( सु ) परे रहते ऋकारान्त शब्द के अन्त स्वर को अ होता है। स्त्रियामुदोतौ वा । ८ ३।२७॥हे ।। स्त्रीलिंग में वर्तमान सज्ञा शब्दो से परे जस् शस् के स्थान पर विकल से उ एवं ओ तथा पूर्व स्वर को दीर्घ हो जाता है । ३. (म) टा-स्-डेरदादिदेवा तु उसेः । ८१३२९ है ॥ स्रोलिंग में शब्द से परे टा, अस् , ङि के स्थान पर अ, आ, इ तथा ए होते हैं। इसि को ये मादेश होने के साथ पूर्व स्वर को दीर्घ विकल्प से होता है। (ब) नात आत् । ८।३।३० हे०॥ खोलिंग में वर्तमान प्राकारान्त शब्द से परे टा, उस्, डि, डसि को मा आदेश नहीं होता है।
डस्
प०
अ, इ, ए आम् ण, ण
स० डि
अ, इ,ए सुप् सु, मुं
सम्बो० सि (सु) लोप
जस् उ, ओ, लोप
माला शब्द के रूप
विभक्ति एक यचन
बहुवचन
प्र० माला
माला, मालाउ,-श्रो
माल
मालाय, इ.ए
मालाहि, हि, हिं
मालत्तो, मालाम,-इ, ए, ओ, मालत्तो, मालाउ यो,-हिन्तो, सुन्तो
उ, हिन्तो
माला-ए
मालाणणं
मालासु सुं
सम्यो० माले, माला
माला, उ,-श्रो
.
प
पा
मा
"
प्राकृत प्रवशिका ईकारान्त, उकारान्त तथा मारान्त स्त्रीलिंग शब्दों के रूप बुद्धि शब्द की भाँति होते है। किन्तु ईकारान्त शब्दो के प्रथमा तथा द्वितीया विभक्ति के सि सु), जस् तथा शस् के स्थान पर विकल्प से आ भी होता है, जैसे-गोरीपा।' ऋकारान्त स्त्रीलिंग शब्द मात्र आदि स्त्रीलिग शब्दों के मुकार को सि (सु) आदि परे रहते श्रा आदेश होता है। तत्पश्चात् रूपावली माला शब्द के समान होती है। माआ का अर्थ माता होता है। देवी के अर्थ मे मातृ शब्द के ऋ को अरा आदेश होता है। माअरा = देवी। नपुंसकलिंग शब्द विभक्तिप्रत्यय परिवर्तन विभक्ति बहुवचन सस्कृत प्राकृत सस्कृत प्राकृत प्र० सि (सु) म् नस् णि, इँ, इ द्वि० अम् म् सम्बो० सि (सु) लोप नस् शेप विभक्तियो में प्रत्यय-परिवर्तन पु० शब्द के प्रत्यय-परिवर्तन की भाति होते हैं। एकवचन शस् " " २. १. ईत सेवा वा ॥२८॥०॥ ईकारान्त (स्रो०) शब्द से परे सि (सु) जस तथा शस् को विकल्प से आ आदेश होता है। कोवे स्वराम से ॥३॥२०॥ नपुं० स्वरात शब्द से परे सि ( सु ) कोम होता है । जस् शस ई इ-पय साम्दो १३२६हे। नपुं० शब्द से परे जस तथा शसू को इ, इ तथा णि आदश हाते हैं तथा उससे पूर्व स्वर को दोपं होता है । १. नामयात्सी म ॥३॥३७॥हे.॥ नपु० में सम्बोधन वर्ष में सि (सु) विभकि प्रत्यय कोम नहीं होता है।
शब्दरूप ४७ वण (वन) शब्द के रूप विभक्ति एकवचन बहुवचन वणं वणाणि, वाइँ, वणाई द्वि० सम्पो वण शेष रूप वच्छ शब्द के समान होते हैं। " " दहि (दधि) शब्द के रूप दहीणि इ, ई प्र० दहि " " "" सम्बो० दहि शेष रूप गिरि शब्द के समान होते हैं। महु मधु) शब्द के रूप महूणि,इ,ई प्र० महुं " " "" सम्बो० महु " " शेष रूप तरु शब्द के समान होते हैं। प्र. राय (राजन् ) शब्द के रूप राया गया, णो, राइणो राय, राइणं राप राया -णो, राइणो राइगा, रमा, रायेगणं रायेहि,-हि,-हि, राईहि, हि, हि रगो, राइगो, गायत्तो, रायत्तो, रायाउ,ओ,-हिन्तो सुन्तो रायाउ, ओ, हिन्तो राइन्तो राईउ, श्रो,हिन्तो-सुन्तो रमो, राइगो, रास्त राईग-, रायाण,-f राये, रायम्मि, राइम्मि राईमुम, रायेसु-मुं सम्यो- राया, राय गणो, राइणो पा रायाः प्राकृत प्रवेशिका सर्वनाम शब्द प० '- सव्व (सर्व) शब्द के रूप सव्वो सव्वे द्वि० सब्वं सव्वे, सव्वा तू० सव्वेग,-णे सव्वेहि हिं, हिं सम्पत्तो, सव्या,-3,-ओ, हि, सव्वत्तो, सम्याउ, ओ, हि,हिन्तो, हिन्तो सुन्तो, सब्बेहिन्तो, सुन्तो सवस्स सव्वेसि, सव्याण, ण सपरिस,-म्मि, हिं-स्थ सम्वेसु, सुं सव्या शब्द के रूप माला शब्द के समान होते है केवल पठी विभक्ति के बहुवचन में सव्वेसिं रूप भी होता है। सव्य (नपुं) शब्द के रूप प्रथमा द्वितीया विभक्ति मे वण शब्द की भांति होते हैं शेप सब्ध (पुं०) शब्द के समान होते हैं। प० स० प्र० द्वि० जे, जा ज (यद् ) शब्द के रूप यद् = ज (पुल्लिग) जो जे जं जेण,-ण, जिगा जे हे, हि हि जम्हा, जत्तो, जा, प्रो, जत्तो, जाओ, उ,-हि, हिन्तो, सुन्तो, उ, हि, हिन्तो जेहि, हिन्तो, सुन्तो जरस जास जेसिं, जाणणं जाहे, जाला, जइआ, जेसु, सुं जहिं,म्मि, स्मि, स्थ प० पा सा , १. सर्वनाम शब्दों को विस्तृत रूपावलि के लिए देखिए हेमचन्द्र कृत एव डॉ. पी एल वेद्य द्वारा सम्पादित प्राकृत-प्यावरण ८५३.५८ सूम से ३।११७ सूत्र तक।
शब्दरूप ४६ - यद् - जी, जा (स्त्रीलिग) जी,-उ, आ,ओ, जा, उ,-ओ प. जा " ४० जीअ, आ, ई, ए, जीदि,-हि,-हि, जाअ, इ,-ए, जाहि-हि-हिं, प. जित्तो, जीअ, आ, इ,-ए-, जत्तो, जाओ, उ,-हिन्तो, सुन्तो, श्रो, उ,-हिन्तो, जा, अ, इ,- जित्तो, जीओ, उ,-हिन्तो, सुन्तो, . , ए, जम्हा, जत्तो, जाओ,-3,-हिन्तो, प० जिस्सा, जीसे, जी. जेसिं, जाण,-f आ, इ, ए, जाअ, इ, ए, स. जीअ,-मा, इ, ए, जाअ, इ, ए, जोसु, सुं, जासु, सुं " " यद् ज (नपुंसकलिंग) प्र० जं जाणि,इ,ई द्वि० शेप रूप पुलिँग शब्द के समान होते हैं। तीनों लिङ्गों में समान--युष्मद् शब्द के रूप प्र. तुं तुम, तुवं, तुह द्वि० वो ४. वए, तुमे तुम्हेहिं, तुझेहि प. तुमाओ, तुमाहितो, तुझ तुम्हत्तो, तुम्झत्तो प. तुप, तुह, ते, तुम, तुम्ह तुम्हारण- स. तुमे, तुमम्मि, तुहम्मि तुममु, तुम्हेसु, तुम्हामु तुम्हे, तुम्ह " ४ ५० प्राकृत प्रवेशिका तीनों लिङ्गों समान-अस्मद् शब्द के रूप प्र० यह है अम्हे द्वि० मम, में अम्हे १० मई, मए अम्हेहि ५० ममत्तो, ममाओ, ममतो अम्हत्तो, अम्हाहिन्तो, ममाहिन्तो ५० अम्ह, मज्म, मम, अम्हाण,-णं, ममाण,-णं स. अहम्मि अम्हेसु, अम्हासु, ममसु संख्या-शब्द प्राकृत वोलियों में एक के लिए प्रायः एक्क का प्रयोग होता है। स्त्रीलिंग मे एकका रूप है। इनमी रूपावली क्रमशः सव्व तथा सव्वा की भांति होती है। द्वि, त्रि, चतुर, पश्चन्, पप् , सप्तन आदि को प्राकृत के तीनों लिङ्गों में क्रमशः दु, ति, चउ, पंच, छ, सत्त आदि हो जाते है। इनके रूप बहुवचन मे ही चलते है। पा स० दु (द्वि) शब्द के रूप ति (नि) शब्द के रूप प्र०, द्वि. दुवे, दोणि तिण्णि दोदि, हि,हिं तीहि, हि,हिं दुत्तो. दोओ, न,-हिन्तो, सुन्तो तित्तो, तोश्रो,-उ, हिन्तो, सुन्तो दोण्हं, दुण्ड विण्ह, तिण्हं दोमु, मुं तीसु, सुं चउ (चतुर) शब्द के रूप पंच (पश्चन) शब्द के रूप प्र०,द्विचत्तारो, चउरो, चत्तारि पंच पहि, हि, ह पंचेहिहिहिं चउत्तो, चऊओ आदि पंचत्तो, पंचाओ...आदि चउपह, पंचण्ड, घऊन, मुं पंचमु, मुं इसी प्रकार अन्य संख्यावाचक शब्दों के रूप होते हैं। प.
सातवाँ अध्याय
धातुरूप
प्राकृत धातुरूपों की प्रमुख विशेपताएँ'-
१-शब्दरूपों की भाँति द्विवचन के स्थान पर बहुवचन का प्रयोग।
हसत = हसन्ति, अनुभवत = अणुहोति ।
२-अविकरण जोड़कर व्यञ्जनान्त धातु का स्वरान्त धातु मे परिवर्तन ।
हस् = हस भण् = भण।
३-भ्वादिगण के धातुरूपों की ओर अन्य गणों के धातुरूपों
का झुकाव।
तनोति = तणइ, रुप्यति = रूसइ ।
४-प्राय परस्मैपद का प्रयोग ।
लप्स्यते = लहिस्सइ, सहे = सहेमि गम्यते = गच्छीअदि आदि ।
-काल की दृष्टि से वर्तमान काल (लट लकार) भूतकाल (लिट्
आदि), भविष्यत् काल (लट् ) तथा अन्य तीन प्रकारों-
आज्ञार्थक (लोट), विध्यर्थक (विधि लिइ ) एव क्रियातिपत्ति
(लड्)-मे धातुरुपारली दृष्टिगोचर होती है। आज्ञार्थक एव
विध्यर्थक रूपावलि प्राय समान होती है।
६- भूत काल के लिए प्राय सहायक क्रियाओं के साथ कृदन्त
रूपों को व्यवहार में लाया जाता है।
जैसे-वहन्तो आसि।
देखिए पि० प्रा० पारा न. ४५२ एव Introduction To Prakrit
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१
५२ प्राकृत-प्रवेशिका तिम्, इत्था, मिप, मध्यम" कर्तृवाच्य वर्तमानकाल धातु-प्रत्यय पुरुप एकवचन बहुवचन सस्कृत प्राकृत संस्कृत प्राकृत प्रथम त झि, झ न्ति, न्ते, हरे मध्यम सिप्, थास् सि, से थ, ध्वम् उत्तम इट् मि" मस् , महिड् मो, मु, म हस धातु के रूप एकवचन बहुवचन प्रथमपुरुप हसई, हसए हसन्ति, हसन्ते, हसिरे इससि, हससे हसिस्था, हसह हसामि, हसमि हसिमो,-मु,-म, इसामो,-मु,-म, हसमो, मु, म १. त्यादीनामाद्यत्रयस्याद्यस्येवेची ।।३।१३९।हे.॥ त्यादि विभक्तियो के मादि त्रय (प्रथम पुरुप) के मादि ( एकचवन) के प्रत्यय (तिप् , त ) के स्थान में इच (इ) एच् (९) होते हैं। २. बहुवावस्यति न्ते इरे ॥८१३।१४।०॥ प्रथम पुरुप बहुवचन ( झि, म ) यो न्ति, ते, इरे होते हैं। ३. द्वितीयस्य सि से ॥८३१२०-॥ मध्यम पुरष के एकवचन ( सिप् , पास् ) को सि, से होते हैं। ४. मध्यमस्येत्या-हची ॥१५३ ।। मध्यमपुरुष बहुवचन ( प, ध्यम् ) को इत्या, ह होते हैं। १. पृतीयस्य मि ॥३१४१ हे! उत्तमपुरप ये एक्वचन (मि, इट् ) यो मि होता है। ६. दुनीयस्य मो मु मा. ॥८॥३॥१४४ है। उसमरुप के यहरवन ( मस्, महिइ)ो मो, मु. म होते हैं। ७. मी या ४४ हे.॥ बदत पातु म पो मि परे रहते मिल्प में आ होता है। इच मो-मु मे या हे। पदत पातु मे व यो मो-गु म परे रहते पिास रोइ तपा मा होते हैं।
प्रथम पुरुप मध्यम पु० उत्तम" 3 धातुरुप अदन्त धातु के अफार को वर्तमान काल परे रहते विकल्प से एकार होता है। तम हसेइ हसेसि आदि रूप होते हैं।' हो (भू) धातु के रूप एकवचन बहुवचन होइ होन्ति, होन्ते, होइरे होसि होइत्या, होह होमि होमो, मु, म भूतकाल धातु प्रत्यय सी ही हीअ (केवल स्वरान्त धातु को) ईअ (केवल व्यञ्जनान्त धातु को) हो ( भू) धातु के रूप प्रथम पुरुप एक वचन-होसी, होही तथा होहीम। वर्तमाना-पञ्चमो शतृपु वा ।।।३।१९८हे०॥ वर्तमानकाल, पञ्चमी विमत्ति तथा शत प्रत्यय परे रहते अ को विकल्प से ए होता है। अत एवैच् से 11८१३६१४ाहे०॥ अकारात धानु से परे हो एच् तथा से आदेश होते हैं। ३. सी ही होम भूतार्थस्य १८१३३१६२।हे। स्वरात घातुओ से भूतार्थ में विहित प्रत्यय को सो, हो, होम प्रादेश होते हैं। (अ) व्यअनादीम ॥८५३१६३॥हे। व्यञ्जनान्त पातुओ से भूतार्थ म विहित प्रत्यय को ईअ आदेश होता है। (ब) उक्त प्रत्यय प्रथमपुरुप एक पचन के प्रतीत होते हैं क्योकि हमें साहित्य में प्रथमपुरुष बहुवचन के लिए इसु असु प्रत्यय पाते हैं। जैसे गच्छिम, गच्छंसु । देखिए डा पी एल वैद्य द्वारा सम्पादित हेमचन्द्र कृत प्राकृत व्याकरण की टिप्पणी पु २४। १ प्राकृत-प्रवेशिका . ४ हस धातु के रूप प्रथम पुरूप एक वचन-हसीअ । भविष्यत्काल धातु-प्रत्यय पुरुष एकवचन बहुवचन प्रथम हिइ, हिए हिन्ति, हिन्ते, हिइरे मध्यम हिसि, हिसे हित्था, हिह उत्तम रसं२, स्सामि , स्सामो मु, म, हामो, मु, म, हामि हिमि हिमो, मु, म हिस्सा, हित्या हस् धातु के रूप पुरुप एकवचन बहुवचन प्रथम इसिहिइ,"-ए, हसिहिन्ति,न्तेरे मध्यम हसिहिसि,से सिहित्था हे, हसिरसं, हसिरसामि हसिस्तामो मु, म, हसिहामो, मु, म, हसिहामि, हसिहिमि हसिहिमो, मु,-म, हसिहित्था, स्सा १. भविष्यति हिरादिः ॥३॥१६॥हे.॥ भविष्यत् अर्थ में विहित प्रत्यय के पूर्व हि का प्रयोग होता है। मे. स्स 11८३।१६९ ।०॥ घातु से परे भविष्यत् काल में प्रादेश मि के स्थान पर विकल्प से स्स का प्रयोग होता है। ३. मि-मो-मु-मे स्सा हा न वा । ८।३।१६आहे.।। भविष्यत् अर्थ में मि, मो, मु, म परे रहते उनके पूर्व स्सा तथा हा विकल्प से होते हैं। ४. भो मु-माना हिस्सा हित्या ||१३१६८हे। भविष्यत् काल में पातु से परे मो, मु, म को विकल्प से हिस्सा, हित्या-आदेश होते है। एच क्त्वा-तुम्-तव्य भविष्यत्सु ॥८३।११७हे.॥ करवा, तुम, तव्य तथा भविष्यत् काल में विहित प्रत्यय परे रहते थ कोइ तथा ए होते हैं। उत्तम ६ २. ५.
धातुरूप पक्ष में हस के सकारवर्ती अ को ए हो जाता है और फिर रुप हसेहिइ, हसेहिसि, इस तरह चलते हैं। हो (भू) धातु के रूप पुरुप एकवचन बहुवचन प्रथम पु. होहिद होहिन्ति, होहिन्ते, होहिरे मध्यम पु० होहिसि होहित्या, होहिह उसम पु० होस्सं, होस्सामि होस्सामो, मु, म, होदामो, मु, म, होहामि, होहिमि होहिमो, मु, म, होहिस्सा, होहित्या विध्यर्थक तथा आज्ञार्थक धातु प्रत्यय पुरुप प्रथम मध्यम एकरचन वहुवचन उ' लुक,सु. इज्जसु. इज्जहि, ह इग्जे, हि मो उत्तम १. दुसु मुविध्यादिष्वेकस्मिस्त्रयाणाम् ॥८१३३१७३।हे ।। विध्यादि प्रर्थ मे तीनो पुरुषो के एकवचन के प्रत्ययो को क्रमश' दुसु मु ३ २. बहुपु न्तु ह मो ॥८३,१७६।हे०॥ विष्यादि अर्थ मे तीनों पुरुषो के बहुवचन के प्रत्ययो को क्रमश न्तु है मो, होते हैं। अत इजस्विबहोज्जे लुको वा ॥८॥३॥१७पाहे ॥ य से परे सु को विकल्प से इजमु, इबहि, इज्जे होते हैं अथवा सु का लोप होता है। ४. सोहिर्वा ।।८१३ १७४।हे। पूर्वमूत्रविहिन सुको विकल से हि होता है।
५६ प्राकृत प्रवेशिका हस धातु के रूप एकवचन बहुवचन प्रथमपुर हसउ हसन्तु मध्यम पु० हस, हससु, हसहि हसह हसेजसु, हसेन्जहि, हसेज्जे उत्तम पु. हसामु, हसिमु, हसमु हसामो, हसमो, हसिमो पक्ष मे सर्व पुरुष सर्व वचन मे-हसेज हसेजा।' माण हो (भू) धातु के रूप एकवचन बहुवचन प्रथम पुरु होउ होन्तु मध्यम पु० होहि, होसु होह उत्तम पु० होमु होमो क्रियातिपत्ति धातु-प्रत्यय सभी पुरुषों तथा सभी वचनों में-ज, जा, न्त, हस धातु के रूप सभी पुरुषों तथा सभी वचनों मे-हसेज, हसेजा, हसन्तो, हसमायो। १ वर्तमाना-भविष्यन्त्योच बजा वा ८१३३१७७हे। वर्तमान, भविष्यत् तथा विध्यादि अर्थ में विहित प्रत्ययो को ज तथा वा होते हैं। (अ) क्रियातिपत्ते ८५३।१७९हे ।। क्रियातिपत्ति में प्रत्ययों को ब, आ होते हैं। (4)न्त माणौ ॥३॥१८॥हे क्रियातिपत्ति में प्रत्ययो कोन्त, माण मादेश होठे हैं।
धातुरूप हो (y) धातु के रूप सभी पुरुषों तथा वचनों में- होज, होजा, होन्तो, होमाणो। अनियमित-धातुरूप अस धातु एकवचन वर्तमानकाल वहुवचन प्र० पु० अस्थि अत्थि म० पु० अस्थि, सि अस्थि उ० पु० अस्थि, म्हि अस्थि, म्हो, म्ह, भूतकाल सभी पुरुषों तथा सभी वचनों मे-आसि, अहेसि भविष्यत्काल विध्यर्थक तथा प्राज्ञार्थक सभी पुरुषों तथा सभी वचनों मे-अस्थि । प्रेरणार्थक (णिजन्त ) रूप धातु से प्रेरणार्थक क्रिया रूप बनाने के लिए णि के स्थान पर अ, ए, आय, आवे-ये चार आदेश होते है। जैसे-हासइ, हासेइ, हसावइ, हसावे। कर्म तथा भाववाच्य वर्तमानकाल, भूतकाल, विध्यर्थक एव आज्ञार्थक मे कर्म तथा भाव- वाच्य रूपों के लिए तत् तद् धातु-प्रत्ययों के पूर्व ईअ तथा इज्ज प्रत्यय जोड़े जाते है। जैसे-हसीअइ, इसिज्जइ आदि। भविष्यत् काल एवं कियातिपत्ति मे कर्म तथा भाव वाच्य के रुप कर्तृ वाच्य के समान होते हैं। प्रेरणार्थक (बिजन्त) रूप मुल धातु मे प्रावि प्रत्यय जोड़ने या तद्गत अन्तिम अ को आ कर देने के बाद कर्म तथा भाववाच्य के प्रत्यय ईअ एवं इज्ज जोड़ने से प्रेरणार्थक धर्म तथा भाववाच्य के रूप बनते हैं। जैसे-इसायीअइ, इसाविज्जइ, हासीअइ, हासिज्जइ आदि । है
आठवाँ अध्याय
कारक
प्राकृत मे कारकसम्बन्धी नियम कुछ विशेषताओं को छोड़कर
संस्कृत के समान है। विशेषताएँ निम्न है
(१) द्वितीया, तृतीया, पञ्चमी तथा सप्तमी विभक्ति के स्थान पर कहीं.
कहीं पष्ठी विभक्ति होती है।
सीमावरं वन्दे = सीमाधरस्स बन्दे ।
धनेन लब्धः-धणरस लद्धो।
चोराद्विभेति : चोरस्स बीहइ।
पृष्ठे केशभार = पिट्ठीए केसमारो।
(२) द्वितीया तथा तृतीया विभक्ति के स्थान पर कहीं-कहीं सप्तमी
विभक्ति होती है।
ग्राम वसामि = गामे सामि ।
तैरलंकृता पृथ्वी - तेसु अलंकिपा पुयी।
(३) पञ्चमी विभक्ति के समान पर कहीं-कहीं तृतीया तथा सप्तमी
विभक्ति होती है।
चोराद्विभेति = चोरेण बोहइ।
अन्त पुरादु रन्वागतो राजा = अन्तेउरे रमिउमागमो राया।
(४) सप्तमी विभक्ति के स्थान पर पहीं-कहीं द्वितीया विभक्ति होती है।
विधुदुद्योते स्मरति रात्रिम् = विजुजोयं भरइ रत्तिं ।
(५) अर्धमागधी प्रारत में सप्तमी विभक्ति की जगह तृतीया विभक्ति
भी देसी जाती है।
तस्मिन् काले तस्मिन् समये = सेणं कालेणं तेणं समणं।
१. चिद दितीयादेः ।।८।३।१३४ हेमा
१. द्वितीया-तृतीययोः सप्तमी ३१३६ है।
३. पञ्चम्यास्तृतीया प।८।१३: हे॥
सप्तम्या द्वितीया ३१ हेगा
५. माइतीपापि स्यने (हे. मूत्र ८६१३७ यो वृत्ति)।
नवाँ अध्याय समास समास का प्राकृत वैयाकरणों ने अलग से कोई उल्लेख नहीं किया है अतः समास की दृष्टि से प्राकृत में संस्कृत से कोई अन्तर नहीं है। यथा- अव्ययीभाव समास- गुरुणो समीवं - उवगुरु ( समीप अर्थ मे) जिणास पच्छा अणुजिणं ( पश्चात् अर्थ में), आदि। तत्पुरुप समास- पुव्वं कायस्स = पुव्यझायो प्रथमा तत्पुरुष ) भई पत्तो = मद्दपत्तो (द्वितीया तत्पुरुष ) गुणेहिं संपन्नो = गुणसंपन्नो (तृतीयो तत्पुरुप) लोगरस सुहो = लोगसुहो (चतुर्थी तत्पुरुष) चोराओ भयं = चोरभय ( पश्चमी तत्पुरुष) देवरस इन्दो = देविन्दो ( पष्ठी तत्पुरुप ) कलासु कुसलो = कलाकुसलो ( सप्तमी तत्पुरुप ) न विरई = अविरई (नञ्तत्पुरुष )। आदि कर्मधारय समास- महन्तो सो वोरो = महावीरो ( विशेषणपूर्वपद ) कुमारी अ सा गम्भिणी = कुमारगम्भिणी ( विशेष्यपूर्वपद) चंदो इव मुहं = चन्दमुहं ( उपमानपूर्वपद ) मुहं चंदो व्ध = मुहचन्दो ( उपमानोत्तरपद)। आदि। द्विगु समास- नरहं तत्ताणं समाहारो = नवतत्तं ( एकवद्भावी) तिणि लोया = तिलोया ( अनेकवद्भावी) ६० प्राकृत-प्रवेशिका द्वन्द्व समास-- देवा अ देवीओ अ = देवदेवीओ ( इतरेतरद्वन्द्व ) तवो अ संजमो भ एएसि समाहारो = तवसंजमं ( समाहारद्वन्द्व) मामा य पित्रा यत्ति = पिअरा ( एकशेपद्वन्द्व ) बहुव्रीहि समास- पीअ अबर जस्स सो = पीअवरो ( समानाधिकरण) णीलो कण्ठो जस्स सो = णीलकण्ठो (विशेषणपूर्वपद) चन्दो इव मुह जाए - चन्दमुही ( उपमानपूर्वपद) धुओ सव्वो किलेसो जस्स सो = धुअसव्यकिलेसो (बहुपद) न अस्थि भयं जस्स सो = अभयो ( नत्र )। आदि ।
दशवाँ अध्याय कृत्प्रत्यय वर्तमानकृदन्त (१) संस्कृतप्रत्यय शतू, शानच के स्थान पर धातु में न्त, माण प्रत्यय जोड़ने पर वर्तमान कृदन्त के रुप बनते हैं। स्त्रीलिङ्ग में न्न एवं माण के साथ ई प्रत्यय भी जुड़वा है। (२) न्त, माण तथा ई प्रत्यय के पूर्ववर्ती अ को विकल्प से ए हो जाता है। कर्तृवाय्य वर्तमानकृदन्तd नपुं० स्त्री० . हस धातु हसन्तो, हसमाणो हसन्तं, हसमाणं हसन्ता,न्दी, हसेन्ता,वी, हसमाणा-पी, हसेमाणा, णी, हसई, इसेई हसेन्तो, हसेमाणो हसेन्त, हसेमाणं हो (भू) धातु होन्तो, होमाणो होन्तं, होमाणं होन्तान्ती, होमाणा,णी, कर्मवाच्य वर्तमानकृदन्त- हसीअन्तो, इसीप्रमाणो हसीअन्तं, हसीनमाणं हसीअन्ता, ती, हसीअमाणा,णी शत्रानशः १. ॥८१३१८१ है। शतु तथा आनश् (शान ) को न्त एवं माण पादेश होते हैं । २. ई च त्रियाम् ॥८३१८२ है। स्त्रीलिङ्ग में शतृ तथा प्रानश् ( शानच ) को ई होता है। चार से न्त एवं मारा प्रत्यय भी होते हैं।
प्राकृत प्रवेशिका हसिज्जन्तो, हसिन्जमाणो हसिजन्त, हसिज्जमाण हसिज्जन्ता, न्ती, हसिज्जमाणा, णी, हसीअई, हसिजई, आदि कर्तृवाच्य प्रेरणार्थक वर्तमानकदन्त- हस धातु (पु.) हासन्तो हासेन्तो, हासमाणो, हासेमाणो, हसावन्तो, हसावेन्तो, हसावमाणो, हसावेमागो। कर्मवाच्य प्रेरणार्थक वर्तमानकृदन्त- हस धातु (पुं०) हासीअन्तो,हासीयमाणो,हासिज्जन्तो, हासिज्जमाणो, हसावीअन्तो हसायीप्रमाणो, हसाविजन्तो, हसाविज्जमाणो। भूतकृदन्त (१) सस्कृत क्त के स्थान पर प्राकृत मे त, द और अप्रत्यय जोडने से भूतकृदन्त के रूप धनते है । (२) त, द अ प्रत्यय के पूर्ववर्ती अ को इ हो जाता है। कर्तृवाच्य भूतकृदन्त-- गम + त, द, अ = गमितो, गमिदो, गमिओ (गत)। चल + त द, अ = चलिनो, चलिदो, चलिओ (चलिन) आदि। -- कर्मवाच्य भूतश्दन्त- कर+त, द अ% करितो, करिदो, करिओ (कृत)। पढ + त द, अ = पढितो, पढिदो, पढिओ (पठित) | आदि । प्रेरणार्थक (णिजन्न) भूतदन्त - इस धातु (नपु)-हसावित, हसाविद, हसाविअ , हासित, हासिद, हासिअ (हासितम्)। सस्कृत सिद्ध शब्दों से निर्मित भूतादत- गतम्:गअ जितम-जिअ छतम् पट पिहितम् - पिहि मृतम्:मह यादि।
वृप्रत्यय
६३
भविष्यत्कृदन्त
धातु में रसन्त, स्समाण, स्सई प्रत्यय जोडने पर भविष्यत्
कृदन्त के रूप बनते हैं।' स्सई प्रत्यय केवल स्त्रीलिङ्ग मे जुडता है।
हस (पु०) हसिस्सन्लो, हसिस्समाणो ( हसिष्यत् , हसिष्यमाण )।
(सी०) हसिस्सई ( हसिष्यन्ती ) आदि ।
हेत्वर्थककृदन्त
(१) संस्कृत तुम् प्रत्यय के स्थान पर धातु मे तु दु, उ तथा त्तए
प्रत्यय लगाने पर हेयर्थ क कृदन्त के रूप बनते हैं। त्तए प्रत्यय
का प्रयोग अर्धमागधी मे सबसे ज्यादा होता है।
(२) तुं,दु,उ एव त्तए प्रत्ययों के पूर्ववर्ती अ को इतथा ए हो जाते हैं।
इस +तु दु, उ = हसितु हसेतु हसिटु, हसेदु, हसिउ हसेउ
(हसितु)।
कर + त्तए = करेत्तए, करित्तए ( कर्तुं )।
सम्मन्धसूचक भूतकृदन्त
(१) सस्कृन क्या और ल्यप् प्रत्यय के स्थान पर धातु मे तु अ,
तूण तुश्राण, इचा, इत्ताण, आय आए प्रत्यय लगाने पर सम्बन्ध
सूचक भूतकृदन्त के रूप वनते है।
(२) सम्बन्धसूचक भूतकृदन्त के प्रत्ययों के ण विकल्प से
थनुस्वार हो जाता है।
१. वर्तमानकालीन परत प्रत्ययों के पूर्व इस्स जोडन से भविष्पत्कालीन
के
प्रत्यय बनते हैं।
देसिए पि प्रा पारा ने ६७८ ।
६. तुपाप इता इत्ता आय तपा माए प्रत्ययों का प्रयोग प्राय मधमागधी
में हष्टिगोचर होता है। (देसिए पि प्रा पारा न० ५८३ ५६३)।
३
प्राकृत-प्रवेशिका (३) सम्बन्धसूचक भूतकृदन्त के प्रत्ययों के पूर्ववर्ती अ को प्रयोगानुसार इ और ए आदेश होते है। हस+तु = हसिउँ, हसेउं ( हसित्वा) हस + अ = हसिअ, हसेस ( हसित्वा) हस+तूण = हसिऊण-णं, हसेऊण-णं ( हसित्वा) हस+तुाण = हसिउपाण-गं, हसेउआण-णं ( हसित्वा ) कर + इत्ता - करित्ता ( कृत्वा ) कर + इत्ताण = करित्ताण, करित्ताणं ( कृत्वा) गह + आय = गहाय ( गृहीत्वा ) आया + आए = आयाए (आदाय) विध्यर्थककृदन्त (१) धातु मे तव्व, अणिज्न तथा अणीअ प्रत्यय लगाने से विध्यर्थक- कृदन्त के रूप वनते है। (२) संस्कृत के विध्यर्थंक यत् प्रत्यय को प्राकृत में न हो जाता है। (३) तव्य प्रत्यय के पूर्ववर्ती अ को इ तथा ए हो जाते हैं। हस + तव्य = हसिअव्य,हसेअन्च, हसितव्यं, हसेतव्वं (हसितव्यम) इस + अणिज्ज, अणीअहसणिनं, हसणीअं (हसनीयम् ) कर + अणिज्ज, अणीअ = करणिज, करणीअं ( करणीयं ) कर + ज्ज = कर्ज ( कार्य )। इसी तरह बजे ( वय॑म् )। कर्तृसूचक कृदन्त धातु मे इर प्रत्यय लगाने पर कर्तृसूचक कृदन्त के रूप बनते हैं। हस + इर= हसिरो (हसनशील पुरप') हसिरा (हसनशीला स्त्री) वर+इ = तुरिरो । इत्यादि।
ग्यारहवाँ अध्याय तद्धितप्रत्यय अण>पच्चय, योप्माकम् = तुम्हेच्चय, आस्माकम् = अम्हेच्चयं ।' कन्>श्र, चन्द्रक = चदओ, चन्दो, यहुकम् = बहुअय, बहुअं। इल, पल्लवक = पल्लविल्लो, पल्लयो। उल्ल, पितृक = पिउल्लो, पिया, हस्तक = हत्थुल्लो, हत्यो। लो, एकक = एकहो, एकको, नकक - नपल्ली, नो।' कृतस्>हुत्त शतकृत्य = सयहुत्त, सहस्रात्य = सहस्सहुत्त । स>इय, साङ्गीण = सध्यगियो । भगार्थक प्रत्यय >हल, प्रामीणम् = गामिल्ल, गौरी- पुरिल्ला । उल्ल, प्रात्मनि भयम् - अप्पुल्ल। १ युष्मदस्मदोर एचय ॥८१२६१४९।०॥ युप्मद एवं अस्मद शब्द से इदम अ (मण, पा० ) को व्यय होता है। स्या पर पा ।।१२।१६४ाहे॥ स्वार्ध में विस्ता से तया ति, इल, उल्ल प्रत्यय होते हैं। ३. लो नवादा ।।८१२॥१६॥ नप उपा एम शब्द को स्वार्थ में लो विकल्प से होता है। ४. पुरायो हत १५८ हैं। पत्यम् (तस्वम् ) प्रत्यय को हुप्त आदेश होता है। १. सगशादोन ॥१५॥हे ॥ पवान राम न (स)ो होता है । fragमो मेरे ॥३॥ भवा में मरो परेवत प्रापय होवे हैं। २ ६ प्राकृत-प्रवेशिका २ . छ>ण्य, आत्मीयम् = अप्पणयं ।' केर, युष्मदीय = तुम्हकेरो, अस्मदीय = अम्हकेरो। क्क, परकीयम् = पारक्क, पारफेरं ।। इक्क, राजकीयम् = राइक्क, रायके। ग>इकट पान्थः = पहिओ। तसिल>त्तो, दो; सर्वत. = सव्वत्तो, सम्पदो, सम्पओ, यतः = जत्तो, जदो, जो। तैलच्> एल्ल, कटुतैलं = कडुएल्लं। घल>हि, ह, त्य; यन = जहि, जह, जत्थ; तत्र-तहि तह, तत्थ ।' त्व>डिमा, तण पीनत्वम् = पोणिमा पीणत्तणं । दा>सि, सिप, रा; एकदा एक्कसि, एक्कसि, एक्कइआ एगया। १. ईयस्यात्मनो णयः ॥८२११५३॥हे ॥ प्रात्मन् शब्द से परे ईय (छ) को णय प्रादेश होता है। इदमर्थस्य केरः ।।२।१४ाहे ॥ इदमर्थक प्रत्यय को केर आदेश होता है। ३. पर-राजम्यां क-डिकौ च । १३१४८हे॥ पर, राजन शब्द से परे इदमर्थक प्रत्यय को क्रमश. डित् क एवं इक होते हैं। पथो रास्येकट् ।।८।२।१५।हे०॥ पथ शब्द से होने वाले ण को इकट आदेश होता है। तो दो तसो वा । ८१२१६०॥ तस (तसिल) प्रत्यय के स्थान पर विकल्प से तो और दो आदेश होते हैं। ६. अनवोठात्तलस्य डेल्ल. १८१२११५१०॥ घकोठ वजित शब्द से परे तेल (तेलच् ) प्रत्यय को डेल्ल मादेश होता है। ७. प्रपो हि ह-त्याः ॥८॥१६॥हे॥ अप् (पल ) प्रत्यय को विवल्स से हि, ह, स्य पादेश होते हैं। यस्य डिमा-तणो वा । ८१२।१५४ हेगा व प्रत्यय यो विरस से डिमा तथा तण प्रादेश होते हैं। ६. वाह. सि सिइमा ॥८२१६२।हे। एक शब्द से परे दा यो विकल से सि, सिम तया इमा आदेश होते हैं। ४. ५. ८.
तद्धितप्रत्यय ६७ क धति > मतुप > आलु ईर्ष्यावान् = ईसालू , लज्जावान् = लज्जाल।' इल्ल, शोभावान् = सोहिल्लो, छायावान् = छाइलो । उल्ल, विचारपान - विश्रारुल्लो, दर्पसन् दप्पुल्लो । बाल, रसवान् = रसालो, जटारान् = जडालो। वन्त, धनवान् = धणन्तो, भक्तिमान् = भत्तिवन्तो । मन्त, हनुमान् = हणुमन्तो, श्रीमान् = सिरिमन्तो। इत्त, काव्यवान् = कव्यइत्तो, मानवान् = माणइत्तो। इर गर्ववान = गविरो, रेसायान् = रेहिरो। मण, धनपान = घणम गो, शोभावान् = सोहामणो। व्य मधुवत् = महुध, मथुरामन् = महुरम्य । परिमाणा-> इत्तिन, यावत् = जित्तिअं,नान् = तित्तिों,एतायन् = इत्ति' र्थक प्रत्यय इचित्र, इयत् = एत्तिश्र, कियत् = केत्ति, एतावत् = एत्तिअं॥ इपिल, इयत् = एत्तिलं, यारत् = जेत्तिल, एतावन = एत्तिलं ।' एदह, इयत् = एद्दहं. यावत् = जेद्दह, एतारन - एदई । प्राकृत में एक से श्रेष्ठ तथा सबसे श्रेष्ठ के अर्थ में वर (अर), तम ( अम), ईयस् ( ईस् ) तथा इष्ट ( इट्ट) प्रत्ययों का प्रयोग संस्कृत के समान होता है। जैसे- तिरस तिसपर तिसअम पि पिअअर पिअअम गुरु गरीयस गरिह पहु पट्टि पहुअम आदि। पहीयस, पहुअर
वारहवाँ अध्याय
स्त्रीप्रत्ययः
प्राकृत में केवल तीन ही स्त्री प्रत्यय ( श्रा, ई,ऊ) दृष्टिगोचर
होते है तथा इनका प्रयोग संस्कृत के ही समान होता है।
जैसे-
१-आ प्रत्यय
अकारान्त शब्दों को स्त्रीलिङ्ग बनाने मे या प्रत्यय का उपयोग
होता है।
अअ+आ-अश्रा अजा)
वच्छ + आ = पच्छा ( वत्सा)
निउण + आ = निउणा (निपुणा )
पढम + आ = पढमा (प्रथमा)
स्त्रीप्रत्यय
अजातिवाचक पुंलिंग शब्दों से स्त्रीलिंग बनाने के लिए ई प्रत्यय
विकल्प से होता है।
नील+ई, आ-नीली, नीला (नीली)
हसमाण + ई, आ = हसमाणी, हसमारणा (हसमाना ) आदि ।
(४) छाया तथा हरिद्रा शब्दों से स्त्रीलिंग की विवक्षा में विकल्प से ई
प्रत्यय होता है।
छाया+ई छाही छाया, हलद्दा + ई = हलद्दी हलद्दा (हरिद्रा)।
(५) सु, अम्, आम को छोड़कर अन्य सुप् परे रहते किम् यद् वद्
शब्दों से स्त्रीलिंग को विवक्षा मे विकल्प से ई प्रत्यय होता है।
कोश्रो, काओ, जीयो, जाओ, तोओ, ताओ, इत्यादि ।
३--ऊ प्रत्यय
आर्य शद से स्त्रीलिंग को विवक्षा में कहीं-कहीं ऊ प्रत्यय
लगता है।
अन+ऊ अज्जू (
श्रार्या)
१
प्रथा पापा। है. मी ति।
तेरहवाँ अध्याय
लिङ्गानुशासन
प्राकृत मे संस्कृत के समान सभी सज्ञाएँ तीन लिगों-पुंलिग,
स्त्रीलिंग तथा नपुंसकलिंग-मे विभक्त की गयी है। लिंग व्यवस्था की
निम्न विशेषताएँ संस्कृत से भिन्न है-
(१) प्रावृप् , शरद् तथा तरगि शब्दों का प्रयोग पुंलिंग में होता है।
प्राट्, (स्त्री) = पाउसो (पं.), शरद् (खो०) = सरओ
(पुं०), तरणि. (स्त्री०) - तरणी (०)।
(२) दामन, शिरस् तथा नभस् शब्दों को छोड़ कर शेप सकारान्त
एवं नगारान्त शब्दों का प्रयोग प्रायः पुंलिंग मे होता है।
यश. (नपुं०} = जसो (पुं०), पय (नपुं०) = पो (पुं०)
नर्म (नपु०) = नम्मो (पुं०), जन्म (नपु०) - जम्मो (९०)।
(३) अक्षि याचक तथा वचन आदि शब्दों का प्रयोग विकल्प से
पुलिंग में होता है।
अक्षिणी (नपुं०) - अन्छी (०), अच्छोइ' (नपुं, अच्छी
(स्त्री०)
चक्षुपी (नपुं०) - चरखू (पु.), चक्खूई (नपुं०)
नयने (नपुं) णय गा (पुं०), णयणाई (नर्प)
लोचने (मपं०) = लोश्रणा (ः), लोअणाई (नपुं०)
पचनानि (नपुं) = क्यणा (पुं०), ययणाई (नपुं०)
फुलम् (नपुं०) = फुलो (पुं०), युल (नपुं.)
माहात्म्यम् (नपुं)-माहप्पो (पुं०), माइप्प (नपं.)
दुग्गनि (नपुं) = दुक्रता (), दुपाई नपुं)
भाजनानि (न) भायणा पुं०), भायणाणि (न)।
इत्यादि।
१. प्रावर शरसरणय पु1ि1
*. नगराम शिरोनम, गई।
1. पाया।
लिङ्गानुशासन ७१ (४) पृष्ठ, अक्षि तथा प्रश्न शब्दों का प्रयोग विकल्प से वीलिंग में होता है। पृष्टम् (नपुं० ) = पुट्ठी (स्त्री०), पुढे (नपुं०)। अति (नपुं०) - अच्छी ( स्त्री०) अच्छे ( नपुं०)। प्रश्नः (पुं०) पाहा (स्त्री०), परहो (पुं०)। (५) गुण आदि शब्दों का प्रयोग . विकल्प से नपुंसकलिग में होता है। गुणाः (पुं०) गुणाई (नपुं० ), गुणा (पुं०)। देवाः (पं)- देवाणि ( नपुं० ), देवा (पुं.)। बिन्दयः (पुं० ) = बिन्दूई (नपुं०), बिन्दुणो (०)। खड्गः (.) = सग्गं (नपुं), सग्गो ( पुं)। मण्डलामः (०) = मण्डलग्ग (नपुं० ), मण्डलग्गो (पुं०)। कररूहः (क) करसहं (नपुं) कररूहो (पुं)। वृक्षा. (पुं० ) रूपसाई (न), रुस्सा (पु.)। (६) इमान्त तथा प्रअलि श्रादि शब्दों का प्रयोग विकल्प से स्त्रीलिंग होता है। इमान्त शब्द- गरिमा ( पुं०) = एसा गरिमा ( स्त्री० ), एस गरिमा (०)। महिमा (५०) = एसा महिमा ( स्रो०), एस महिमा (३०)। श्रादि। असलि आदि शब्द- असलि. (.- एसा अअली (खो०) एस अाली (पुं)। प्रन्थिः (पुं०) = एसा गण्ठी स्त्रोक, एस गण्ठो (पुंः) आदि । (७) स्त्रीलिंग में प्रयुक्त होने पर याहु शन्द के उकार को आकारादेश हो जाता है। पाहुः (०) = एसा याहा (स्त्री०), एसो पाहू (पुं)। ४. पहाशिवरना: विगं या AIRell दुखापाःये पा ॥१३॥ 1. माश्यापाः जिपाम् ॥११॥३ाहेक पाहोरा Hun ७२ प्राकृत प्रवेशिका गाथा८ प्रथम (संस्कृतच्छाया) प्रथम शतक) छादयन्ति ये प्रभुत्व कुपिता दासा इव ये प्रसादयन्ति । गाथा ९१ त एव महिलाना प्रिया शेश स्वामिन एव वराका ॥१॥ द्वितीयशतकाते विरला सत्पुरुषा येया स्नेहोऽभिन्नमुखराग । गाथा १३ अनुदिवसवर्धमान ऋणमिव पुरेपु सकामति ।।२।। तृतीयशतक) अद्य गत इत्यद्य गत इत्यद्य गत इति गणनशीलया । एवं दिवसाधं कुड्य रेखाभिश्चिनितम् ।।३।। गाथा १७ तन्मित्र कर्तव्य यकिल व्यसने देशकालेपु। आलिसितभिन्तिपुत्तलामिव न पराङ्मुख तिष्ठति ।।४।। गाथा २४ त-मध्यम एन वर दुर्जनसुननाभ्या द्वाभ्यामपि न कार्यम् । यथा दृष्टस्तापयति खलस्तथैव सुजनोऽदृश्यमान ॥५॥ गाथा ३४ यस्य यनैव प्रथम तस्या अङ्गे निपतिता दृष्टि । तस्य तत्रैव स्थिता सङ्ग केनापि न दृष्टम् ||६|| चतुर्थशतक ? दृढरोपक्लुपितरयापि सुजनस्य मुखादप्रिय कुत । गाथा १९ । राहुमुखेऽपि शशिन किरणा अमृतमेव मुञ्चन्ति ॥७॥ व्यसनेऽनुद्विग्ना विभवेऽगर्विता भये धीरा । भवन्त्यभिन्नस्वभावा समेपु विपमेपु सत्पुरपा III गाथा ९७ धन्यास्ता महिला या दयित स्वप्नेऽपि प्रेक्षन्ते । निद्रव तेन विना नैति का प्रेक्षते स्वप्नम् ।।९।। अष्टमशतका सदसदुख सुख च गृहस्य गाथा १२ ता पुनक महिला शेपा जरा मनुष्याणाम् ॥१०॥ सप्तमशतक : गृहमिय वित्तरहित निर्झरकुहरमिव सलिलशून्यम् । गाथाह गोधनरहित गोष्ठमिव तस्या पदन तव वियोगे ॥१॥ गाथा ९५ धन्या यधिरा अन्धास्त एव जीवन्ति मानुपे रोके। न शृण्वति पिशुनवचन सलानामृद्धि न प्रेक्षन्ते ॥१० गाथा८० या जानन्ति ।
७३ गाथा ८ महाराष्ट्र प्राकृत १. गाथावली' प्रथम शतक णूमेन्ति ने पहुत्तं कुवि दासा व जे पसाअन्ति । गाथा ९१ / ते मिा महिलाणं पिआ सेसा सामि विअ पराआ ॥१॥ द्वितीय शतकाते विरला सप्पुरिसा जाण सिणेहो अहिण्णमुहराओ। गाथा १३ अणुदिअहवद्यमाणो रिणं व पुत्तेयु संक्रमइ ॥२॥ तृतीय शतक। अजं गओ वि अन्न गओ ति अन्ज गओ ति गणरीए । पहम विअ दिअहः कुड्डो रेहाहि चित्तलिओ ॥३॥ गाथा १७ तं मित्त काअन्वं न किर वसम्मि देसालम्मि । आलिहियभित्तियाउल्लभं २ ण परम्मुहं ठाइ ॥४॥ गाथा २४ ता मज्झिमो विअ वरं दुजणमुअणेहि दोहि विण कज्ज । जह दिट्टो तवइ खलो, तहेभ मुअणो अईसन्तो ॥५॥ गाथा ३४ नस्स नह विम पडमं तिस्सा अम्मि णिवडिआ दिट्टी। तस्स तहिं चे ठिआ सम्वद् केण वि ण दिट्टम् ॥६॥ चतुर्थ शतक) दढरोसफसिअम्स वि सुअणस्स मुहाहि पिप्पियं को। गाथा १९ / राहुमुहम्मि वि ससिणो फिरणा अमों अि मुअन्ति ॥७॥ गाथा ८० वसणम्मि अणुधिग्गा, विहवग्मि अगन्धिआ, भए धीरा । होन्ति गहिण्णसहाग समेमु सिमेसु सप्पुरिसा ॥८॥ गाथा ९७ धण्णा ता महिलाओ जा दइ सिविणए रि पेच्छन्ति । जिद्द विअ तेण विणा ण एइ का पेच्छए सिरिणम् ॥९॥ पष्ठम शतक) सन्तमसन्तं दुषम्य मुह च नाओ घरस्स नागन्ति । गाथा १२ ता पुराम मरिराओ सेसाओ नरा मनुस्साणम् ॥१०॥ सप्तम शतक गेहं व पिचरहिणिज्झरहरं व सरिमुष्णपिमम् । गाया ९ । गोइणरहि गोट्ट व तीम वर्ग तुद मिओए ॥११॥ गाथा ९५ पणा पदिरा अन्धा ते च्चिा बीअन्ति माणुमे रोए। ण मुन्ति पिमुगभगं बराग नादिन पेस्पन्ति ॥१२॥ १. प्रास गरिहार (गागदा) गमर ६.द्वारा सहित गागाराती (महागरागई) (पो गरि मारमाराम बोगरा गपति तथा प्रमाररान पूनावारी १. मात्र) जस।
प्राकृत प्रवेशिका . (संस्कृतच्छाया) आश्वास-३ गाथा-७ युष्माकमेवैप भर आज्ञामात्रफल प्रभुत्वशब्दः। अरूणः छायानहनो विशदं विफसन्त्यात्मना कमलसरांसि ||१|| गाथा-१० से घिरलाः सत्पुरुपा येऽभणेन्तो घटयन्ति कार्यालापान । स्तोका एव तेऽपिद्रुमा ये अज्ञातकुसुमनिर्गमा ददति फलम् ।।२।। गाथा-१८ अव्यवच्छिन्नप्रसृतोऽधिकमुद्धापति स्फुरितशूरच्छायः। उत्साहः सुभटानां विषमस्सलितो महानदीनामिव स्रोतः ॥३॥ गाथा-१९ मानेन परिस्थापिता कुलपरिपाटिघटिता अनवनतपूर्वा । चिन्तयितुमपि न तीर्यते अवधूयमाना परेण निजकन्छाया ॥४॥ गाथा-२१ आइतसमरागमना व्यसने अप्युत्सवे च समरागमनसः । अवसादितविषमार्था धीरा एव भवन्ति संशयेऽपि समर्थाः ॥५॥ गाथा -२२ व्यवसायसपिपासाः कथं ते हस्तस्थित न पास्यन्ति यशः । ये जीवितसन्देहे विषं भुजङ्गा इवोद्वमन्त्यमर्पम् ॥६॥ गाथा-२६ यो लव यते रविणा यः च क्षप्यते क्षयानलेनापि बहुशः । कथं स उदितपरिभवो दुस्तर इति प्लवगानां भण्यत उदधि ॥७॥ गाथा--२७ चिन्यतां तापच्चिर कुलव्यपदेशक्षमं वहतां यशः। लज्जाया. समुद्रस्य च द्वयोरपि किं भवति दुष्करं. व्यतिक्रमितुम्॥८॥ गाथा-२९ बान्धवस्नेहाभ्यधिको भवति परोऽपि विनयेन सेव्यमानः । किं पुनः कृतोपकारो निष्कारणस्निग्धवान्चयो दाशरथिः ।।९।। गाथा-३८ मुक्तसलिला जलधरा अभिनवदत्तफलाश्च पादपनिवहाः। लघुका अपि भवन्ति गुरुका समरमुसावहृतमण्डला- प्राश्व भुजाः ॥१०॥ गाथा--३९ दपं न मुञ्चती भुजौ प्रहरणकार्यसुलभा घ्रियन्ते महीधरा । विस्तीर्णो गगनपथो नीयते कस्माद् गुरुतत्व प्रतिपक्ष ॥११॥ गाथा-४० धैर्यमेव रक्षन्तो गुरुमपि भर धारयन्ति केवलं सत्पुरुषाः । स्थानमेवामुश्चन्तो नि शेपं त्रिभुवनं तापयन्ति रयिकराः ।।१२।। गाथा-५७ सम्मुसमिलितैकैकस्मिन्क. किलासन्नसंशये सहाय. । यावन्न दीयते दृष्टि कर्त्तव्यं भवति तापचिरनिर्वृत्तम् ।।१३।।
महाराष्ट्रो प्राकृत ७५ २. वानरप्रोत्साहनम् आश्वास -३ गाथा ७ तुम्ह चिम एस भरो आणामेत्तप्फलो पहुत्तणसहो । अरुणो छाआवहणो विसअ विअमन्ति अप्पणा कमल्सरा ॥१॥ गाथा १० ते विरला सप्पुरिसा जे अमणेन्ता घडेन्ति कन्जालावे । थोमच्चिअ ते पिदुमाजे अमुणिमुमणिग्गमा देन्ति फ्ल॥२॥ गाथा १८ अयोच्छिण्णपसरिओ अहिअं उद्धाइ फुरिअसूरच्छाओ । उच्छाहो सुभडाण विसमक्वरिओ महाणईण व सोचो ॥३॥ गाथा १९ माणेग परिदृनिमा कुलपरिवाडिघडिआ अणोणअउव्या । चिन्तेउ पिण तोरह ओहुयन्ती परेण णिअअच्छाया ॥४॥ गाथा २१ आढिअसमराअमणा वसणग्मि वि ऊस अ समराअमणा । 'अवसाइअविसमस्या धीर च्चिस होन्ति ससए वि समस्या ॥५॥ गाथा २२ ववसाअसप्पिआसा कह ते हत्थट्टिअ ण पाहिन्ति नर्स । जे नीमिअसदेहे विस मुअनन्य उज्यमन्ति अमरिस ॥६॥ गाथा २६ नो रद्धिज्जइ रविणा नो अ सपिजइ खाणलेग वि बहुसो। कह सो उइअपरिहयो दुचारोति परआण भण्णइ उअही ॥७॥ गाथा २७ चिन्तिग्जउ दार चिर कुलवरएसक्खम वहन्ताण जस । लजाइ समुदस्स अ दोन्ह पि कि होइ दुबरं वोलेउ ||८|| गाथा २९ बन्धवणेहत्भदिओ होइ परो वि विणएण सेरिनन्तो । कि उण कोरमारो निकारणणिद्धवन्धवो दासरही ॥९॥ गाथा ३८ मुख सरिता नरहरा अहिणअदिष्णप्पा अ पाअवणिवहा । रहुआ पिहोन्ति गरुआ समरमुहोहरिममण्डलगाम भुओ॥१०॥ गाथा ३९ दप्पं ण मुअन्ति भुआ पहरणकत्रमुल्दा घरेन्ति महिहरा । विस्थिण्गो गणरहो णिनइ जोस गुरअठण परिवस्वो ॥११॥ गाथा ४० धोरधिम रक्खन्ता गरअम्पि मर घरेन्ति गर स पुरिमा । ठाणं चिम ममुअन्ता गोसेम तिमग तन्ति रविअरा॥१२॥ गाथा ५७ समुद्रमिरिएपम्मे को दर आसप्पममम्मि सहाओ । बार दिनद दिट्टी पासच होइ तार निरगिबुच ॥१३॥ १. यी प्रान ( .वो राजा) शिचित राय म्ह ( मेगुरप) महापाप ( रापागानिसार द्वारा सम्पादित तपासाबालेन एमरसन १९५९ में प्रतिरे छोर पासाग गे ग्दर।
प्राकृत प्रवेशिका (संस्कृतच्छाया) गाथा ८२ को निन्दति नीचतमान गुरुकतरान् क' प्रशंसितुं तरति । सामान्यमेव स्थानं स्तुतीनां परिनिन्दनानां च ॥११॥ थाथा ८६३ नित्यं धनदाररहस्यरक्षणे शङ्किनोऽपि आश्चर्यम् । आसन्ननीचवर्गा यत् तथापि नराधिपा भवन्ति ॥२॥ गाथा ८६४ प्रेक्षध्वं विपरीतमिदं यही मदिरा मदयति न खलु स्तोका । लक्ष्मी पुनः स्तोका यथा मदयति न तथा किल प्रभूता ॥३॥ गाथा ८६६ एके लघुकस्वभाया गुणैर्लधुं महन्ति धनऋद्धिं । अन्ये विशुद्धचरिता विभवाद् गुणान् विमृग्यन्ति ॥४॥ गाथा ८८ को या न पराङ्मुसो निर्गुणानां गुणिन' न कं या दुन्वन्ति । यो वा न गुणी यो वा न निर्गुणः स सुखं जीवति ॥५॥ गाथा - अविवेकशविन एव निर्गुणाः परगुणान् प्रशंसन्ति । लब्धगुणाः पुनः प्राघुणो बाढं या मा परगुणेषु ।।६।। गाथा -१ सर्व एव स्वगुणोत्कर्पलालसो वहति मत्सरोत्साहम् । ते पिशुना ये न सहन्ते निर्गुणा परगुणोद्गारान् ॥१ गाथा ९०० गुणिनोविमवारूढानां विभयिनो गुरुगुणानां न खलु किमपि। लघुरेव अन्योन्यं गिरीणां ये मूलशिसरेपु गाथा ९२५ धर्मप्रसूता कथं भयतु भगरती द्वेष्यसजना लक्ष्मीः। ता अलक्ष्म्य एव लक्ष्मीनिभा या अनार्येषु ॥९॥ गाथा ९२६ या विपुला या चिरं या परिभोगोयला लक्ष्यः । श्राचारधराणामेव ता न पुनश्चेतराणाम् ॥१०॥ गाथा ९५६ गाडमदमूढहृदया लम्या धनं गुणं वा यं कमपि। क्थं तेस्मरिष्यन्ति परंपारमापिसलु येषां विरमर्यते ॥११॥ गाया ९६२ नपरं दोपास्त एवं ये मृतम्यापि जनस्य धूयन्ते । शायन्ते जीयतोऽपि ये फेरलं गुणा अपि त एय ।। १२ ।।
७७ महाराष्ट्रो प्राकृत ३. सुभापितानि गाथा ८२ को णिन्दइ णीययमे गरुययरे को पससिउ तरइ । सामण्णं च्चिअ ठाण थुईण परि-णिन्दणाण च ॥१॥ गाथा ८६३ णिच्च धण-दार-रहस्स क्खणे सङ्किणो वि अच्छरिय । आसण्णणीयवग्गा न तह रि गराहिवा होन्ति ॥२॥ गाथा ८६४ पेच्छह विवरीयमिम बहुया मइरा मएइ ण हु थोवा । लच्छी उण थोवा नह मएइ ण तहा इर बहूया ॥३॥ गाथा ८६६ एक्के लहुय सहारा गुणेहिँ लहिउं महन्ति धणरिद्धि । अण्णे विसुद्ध-चरिआ विहवाहि गुणे विमग्गन्ति ॥४॥ गाथा ८७८ को न ण परम्मुहो णिगुणाण गुगिणो ण क व दूमेन्ति । जो वाण गुणी नो वाण णिग्गुणो सो सुह नियइ ॥५॥ गाथा ८८० अपिवेय-सङ्किणो च्चेय णिग्गुणा परगुणे पससन्ति । द्धगुणा उण पहुणो वाह वा मा परगुणेमु ॥६॥ गाथा ८८१ सञ्चो च्चिय सगुणुक्करिसरारसो वहइ मच्छरुच्छाह । ते पिसुणा ने ण सहन्ति णिग्गुणा परगुणुग्गारे ॥७॥ गाथा ९०० गुणिणो रिहवाम्ढाग विहविणो गुरुगुणाण ण हु कि पि । रहुआ चिञ अण्णोणं गिरीण जे मूलसिहरेसु ॥८॥ गाथा १२५ धम्म पमूआ यह होउ भयाई वेस सन्नणा रच्छी । ताओ अरच्छिओ च्चिय रच्छि णिहा ना अणजे ॥९॥ गाथा ९२६ ना विउरा नाओ चिर ना परिहोउजाओ रच्छीओ। आयारघराणा चिय ताओ उणो अ इयराण ॥१०॥ गाया ९५६ गाह मय-मूद हियया रहिउण पण गुण व न कि पि । पद ते भरिहिन्ति परं अप्पा पिहुजाण पम्हुसइ ॥१२॥ गाथा ९६२ पवर दोसा ते च्चेय ने मयम्स वि नगस्स मुव्यन्ति । पति नियन्तम्स नि ने णवर गुणा मि ते च्चेय ॥१२॥ थी याति (७५.. गमा) सिचा-उदो (मार पोरदा पाएमा समाति तथा भण्डागर मोरियल रिगण रस्टीट्यूः पूना द्वारा १९२० में प्रगतिमा।
७८
प्राकृत-प्रवेशिका
(सस्कृतच्छाया)
जयन्ति ते सज्जनभानव सदा
विचारिणो येपा सुवर्ण सचया ।
अदृष्टदोपा विकसन्ति सगमे
कथानुबन्धा क्मलाकरा इव ॥१॥
सो जयतु येन सुजना इव दुर्जना इह विनिर्मिता भुवने ।
न तमसा विना प्राप्नुवन्ति चन्द्रकिरणा अपि परहावम् ॥ २॥
दुर्जनसुजनेभ्यो नमो नित्य परकार्यव्यापृतमनोभ्य ।
एके भपणस्वभावा परदोषपराङ्मुसा अन्ये ॥ ३ ॥
अथवा न कोऽपि दोपो दृश्यते सकले जीवलोके ।
सर्व एव सुजनजनो यद्भणाम तन्निशाम्यन्तु ॥४॥
सज्जनसगेनापि दुर्जनस्य न खलु क्लुपत्व समपसरति ।
शशिमण्डलमध्यस्थितोऽपि
कृष्ण एव कुरङ्ग ॥५॥
दुर्जनसगेनापि सज्जनस्य नाश न भवति शीलस्य ।
निय सलवणमपि मुस तथापि सल्वधरो मधु स्त्रवति ॥ ६ ॥
७६ महाराष्ट्रो प्राकृत ४. सज्जनदुर्जनचर्चा जयंति ते सज्जण-भाणुणो सया वियारिणो नाण सुवण्ण-संचया । अइट्टदोसा वियसंति सगमे कहाणुबंधा कमलायरा इव ॥१॥ सो जयउ जेण सुयणा वि(व)दुज्जणा इह विणिग्मिया भुयणे । ण तमेण विणा पावंति चंदफिरणा वि परिहाव ॥२॥ दुजण-सुयणाण णमो णिच्च पर-कन-चावड-मणाण । एके भसण-सहावा पर-दोस परम्मुहा अहवाण को वि दोसो दीसइ सयलम्मि नीय-लोयम्मि । सम्यो चिय सुयणयगो भगिमो तं णिसामेह ॥४॥ सजण-सगेण नि दुज्जगस्म ण हु कलसिमा समोसरह । ससि-मंडल मज्झ-परिट्टिओ नि कसणो चिअ कुरंगो ॥५॥ दुजण-सगेण नि सज्जणस्स णास ण होइ सीलस्स । तीए सलोणे वि मुहे तह वि हु अहरो मई सवइ ॥६॥ अपणे ॥३॥ १. थो महार कोदन (यो शारिति-नीताई (7. ए.पा. उम्मेद्वारा सम्पालि एवं शिमो जैन अपमारा, यम्मई मे १९४९ में प्रारि) (मापा १५-१७) उदछ।
६० प्राकृत प्रवेशिका (सस्कृतच्छाया) श्लोक ३० विच्छाययन्नगररमणीमण्डलस्याननानि, कम्पाययन् गगनकुहर कान्तिज्योत्स्नाजलेन । प्रेक्षमाणाना हृदयनिहित निर्दलयश्च दर्प, दोलालीलासरलतरलो दृश्यतेऽस्या मुखेन्दु ॥१॥ श्लोक ३१ उच्चेषु गोपुरेषु धवलध्वजपटाडम्परावलीपु। घण्टाभिरूज्ज्वलसुरतरुणिविमानानुसार लभन्ती । प्राकार लड्डयन्ती करोति रयवशादुन्नमाती नम ती । प्रायान्ती यान्ती च दोला जनमनोहरण ब्रूडनोत्बेडने ॥२। श्लोक ३२ रण-मणिनूपुर झणझणायमानहारच्छट । कलम्वणितकिङ्किगीमुखरमेखलाडम्परम् ।। विलोलवलयावलीजनितम शिक्षारय न कस्य मनोमोहन शशिमुख्या हिन्दोलनम् ॥३॥ श्लोक ३३ उपरिस्थितस्तनप्राग्भारपीडित चरणपङ्कजयोर्युगम् । आकारयतीव मदन रणन्मणिनूपुररवेण ॥४॥ श्लोक ३४ हिन्दोलनली लायितमुखर रथचक्रवर्तुल रमणम् । फिलकिलायतीय सहप काश्त्रीमणिकिङ्किणी रवेण ॥२॥ श्लोक ३५ तारान्दोलनलोलासरसरिन्छलेनास्या हार । विरोतीर कुसुमायुधनरपते कीर्तिवल्लय ||६|| श्लोक ३७ ताटङ्कयुग गण्डयोहलघुसृणयोर्घटनलीलामि । ददातीव दोलान्दोलनरेसा गणनकौतुफेन ॥७॥ श्लोक ३९ दोलारसविच्छेद कथमपि मा भयविति पततीय । पृष्ठे चेणिदण्डो मन्मथचर्मयष्टिकायमान | महाराष्ट्री प्राकृत ५. दोलालीला' द्वि० जव० श्लोक ३० विच्छामन्तो णअररमणीमण्डलस्साणणाई विच्छोलन्तो गअणकुहरं कन्तिबोण्हानलेण । पेच्छन्तीण हिमअणिहि णिद्दलन्तो,अ दप्पं, दोलालीलासरलतरसे दीसए से मुहेन्दू ॥१॥ श्लोक ३१ उच्चेहिं गोउरेहिं धवलधअवडाडम्बरिलावलीहिं, घण्टाहिं विन्दुरिल्लासुरतरुणिविमाणाणुसार रहन्ती । पामारं लघअन्ती कुणइ रअरसा उण्णमन्ती णमन्ती, एन्ती जन्ती अ दोला नणमणहरणं वुड्डणुब्बुड्डणेहिं ॥२॥ श्लोक ३२ रणन्तमणिणेउर झणझणन्तहारच्छडं, फ्णकणिममितिणीमुहल्मेहाडम्बरं । विलोलवलआनलीनणिअमझुसिञ्जारव, ण कस्स मणमोहण ससिमुहीम हिन्दोलणं ॥३॥ उवरिट्टिअथणपन्भारचम्पिा चल्णपङ्कआण जु । हकारइ ब मअण रणन्तमणिणेउररवेण ॥४॥ हिन्दोलणलीराइअमुल्ल रहचव चकल रमण । किरकिल्इ न्य सहरिस मणिकचीफिद्धिणिरवेण ॥५॥ श्लोक ३५ तारन्दोरणहेरासरन्तमरिअच्टनेण से हारो। विक्खरइ व कुसुमाउणरवइणो फित्तिवलीओ ॥६॥ ताटकजुभंगण्डेमु बहरघुसिणेमु घडणलीलराहिं । देइ व दोलन्दोरणरेहामो गणणकोडेण ||७|| शेफ ३९ दोरारअविच्छेओ फह पि मा होहिइ चि पडइ व्य । पुट्टीम वेणिदण्डो वम्मयट्टिामन्तो ॥८॥ १. रामसर (१००)रिचित-सपूरमधरी (Sten Konoran सम्पादित धपा मोतीलाल बनारमौरास, मंगो रोग, उपाहर नगर, नई रिलो-वारा प्राधित)गे दान। लोक ३३ श्लोक ३४ श्लोक ३७ ६ ८२ प्राकृत-प्रवेशिका (संस्कृतच्छाया) अथ मालिक-दत्त-मालभारी वनमाली मुसली च व्रजन्तं । परिधौत-वरिल्ल भाण्डवाहं रजकं कमपि पश्यतः राजमार्गे ॥१॥ मृदुहासमनोहराननाभ्यां कुमाराभ्यां वसनानि याचितः सः। कुमना धनगर्वदुर्विनीतः कुपित भापते भोजराजभृत्यः ॥ २॥ नखलु संस्मरितुमपिशक्यते यत् तदेतद् जल्पथ डिम्भको रिमेवम्। ननु खादति तर्जितोऽपि यः स स्पृष्टः किं न करोति कृष्णभोगी ।।।। न,परं न लप्स्यत इति ज्ञेय वसनं भोजपतेर्याच्यमानम् । नन्वेतदेव युवयो शीर्ष छेदस्यापिहा भविष्यति कारणंजानीयातम्॥४॥ भवतु सहे एकवारमह युवयोलचापलानि।' न सहेत नराधिप इमानि यदि स श्रोप्यति वात्सल्यवन्ध्य ॥५॥ इति स कटु भापित्या यदा प्रहसन्नेव गन्तुं प्रवृत्तः । सहसा मधुसूदनेन तदा वसनानि हतानि तस्य पराभ्याम् ॥ ६ ॥ अथ .
३ - -- h 1 . महाराष्ट्रो प्राकृत ६.। रजकस्य औद्धत्यम्' अह मालिअ-दिण्ण-माल-भारी वणमाली, मुसली अ वचमाणं । परिघोग-वरिल्ल-भंडवाह रमों के पि णिति राअमग्गे ॥१॥ मउहास-मणोहराणणेहिं कुमरेहिं वसणाइ नाइदो सो । कुमणो घण-गव्व-दुन्विणीओ कुविदो भासइ भोअराम भिचो ॥ २ ॥ ण हु संभरि पि सकए जं तमिणं नपह डिंभआ किमेव्वं । णणु खादह तज्निओ वि नो सो छिविओ किं ण कुणेइ कण्हभोई ॥३॥ णवरं ण लहिस्सइ चि गेअं वसणं भोमवइस्स नच्चमाण ! णमिणं चिअ तुम्ह सीस-छेअस्स वि हो होस्सइ कालणं मुणेह ॥ ४ ॥ अह होदु सहेमि एकवारं, अहके तुज्झाण वाल-चावलाई। ण सहेज गराहिवो इमाई नइ सो सोच्छिइ वच्छलिज्ज-चंझो ॥ ५ ॥ इअ सो कडु भासिऊण जाहे, पहसंतो च्चिअ वोलिउ पवुत्तो । सहसा महु-सूअणेण ताहे वसणाई हरिआइ से करादो ॥ ६ ॥ 1 . १. रामपाणिवाद (१७०७ से १७७५ई.) विरचिठहो (मस्टर ए. एन• उपआप्पे द्वारा समादित) में द्वितीय सर्ग उद्धृत ।
प्राकृत-प्रवेशिका
.
शौरसेनी प्राकृत .
• प्रमुख विशेषताएँ
सरलव्यञ्जन-परिवर्तन
यावहो।
.
तद, जानाति = जाणादि, लता = लदा, प्रभृति = पहुदि ।
ड, व्यापूतः
थ>ध, कथयति = कधेदि, मन्मथः = मन्मधो ( हे० के अनुसार थ को ध
विकल्प से होता है।)
म>ह, भवति = यदि, भवदि
ह>ध, (विकल्प से) इह = इध, इह ; होह (भवथ) = होध, होइ ।
संयुक्तव्यञ्जन-परिवर्तन
यंग्य, ज; आर्यः = अय्यो, अज्जो, सूर्यः = सुय्यो, सुज्जो ।
न्त>द, महन्त = महन्दो, निश्चिन्त - निधिन्दो ।
शब्दरूप
डसि>पादो, पादु (भ से परे हसि होने पर), वीरात = घोरादो, योरदु ।
>मा (सम्बोधन में सु परे रहते), कञ्चुकिन् = कञ्चुइआ,
पक्ष में तपस्विन् = तयरिस ।
नम् = हे राजन् = भो राय, भो राय ।
.
धातुरूप
तिप, त>दि. दे (भ से परे होने पर ), गच्छति = गच्छदि, गच्छदे।
>दि (अभिन्न स्यर परे रहते), भयति = भोदि, होदि।
भविष्यत् काल के प्रत्यय -सिदि, तिन्ति आदि, मयिप्यवि मपिरिसदि
(आदि)।
१. प-हेमपन्द्रः प्राविम्याप २६०.२८६ तक एवं परराषि:
प्राइम-प्रसारा-बाय परिम्पर।
शौरसेनी प्राकृत ५ आगम एवं आदेश ए (आगम), युक्तम् इदम् = जुत्त णिम, जुत्तमिम , एवं एतत् = एवणेद एवमेद। (मू से परे इ या ए होने पर विकल्प से का आगम होता है)। इदानीम्>दाणि, किमिदानी माम् = किं दाणि म । तावत्>दाव ताव , एतस्यास्तारदेवम् = एदाए दाव एद, एदाए ताव एद । तस्मात्ता, तस्माद् यारत् प्रविशामि = ता जाव पविशामि । पूर्व>पूरव, अपूर्व नाटकम् = अपुरव नाडयं । , अव्यय सूची (सूचक अर्थों के साथ ) ग्येव > एव, हीमाणहे-विस्मय, निर्वेद, हजे-चेदी को बुलाने क - अर्थ मे, >ननु, अम्महे-हर्प, हीही-विदूपक की हसी । कृदन्त- क्ला>इय दूण (विकल्प से) पठित्वा = पढिय, पढिदूण, पढित्ता । >अहुन, कृत्वा = कडुअ पक्षे करिय करिदूण । (शेप सामान्य प्राकृत के नियमों के अनुसार ।)
८६ प्राकृत प्रवेशिका Pom । ( सस्कृच्छाया) विदूषक.--अन्यमन्य निमन्त्रयतु तावद् भवान् । अरिक्तस्तावदहम। ननु भणाम्यहमरिक्तक इति । किं भणसि सम्पन्नमशनमशितव्यं भविष्यतीति । अहं पुनर्जानाम्यधिकमधुरस्यानस्यायोग्यतया अस्थि न भक्ष्यत इति । किमिदानी मामुल्लाल्योल्लाल्य भणसि । भणामि व्याप्त इति । किं भणसि दक्षिणा मापका भविष्यन्तीति । एप याचा प्रत्याख्यातो हृदयेनानुबध्यमानो गम्यते । अहो अत्याहिनम् । अहमपि नाम परस्यामन्त्रणानीति तर्कयामि । योऽहं तत्रभवतश्चारुदत्तस्य गेहेऽहोरात्रपर्याप्तसिद्धर्नानाविधैर्हिगुपिढेरुद्गा- रसुगन्धिभिभूक्षेपमानप्रतीक्षितैरन्तरान्तरपानीयेरशनप्रकारैश्चिनार इय बहुमल्लकै परिवृत आकण्ठमाननशिल्या चत्वरवृपम इव मोदकसाथै रोमन्थायमानो दिवस क्षिपामि, स एवेदानीमह तत्रभवतश्चारुदत्तस्य दरिद्रतया सम पारावतै साधारणवृत्तिमुपजीवन् अन्यत्र चरित्या चरित्या तस्यावासमेव गच्छामि। अन्यधाश्चर्यम्। ममोदरमवस्था- विशेष जानाति । अल्पेनापि तुष्यति । बहुममप्योदनभर भरिष्यति दीयमानम्, न याचते अदीयमान, न प्रत्याचष्टे। न सल्वहमोरशेन न सन्तुष्ट । तत् पष्टीकृतदेवकार्यस्य तत्रभवतश्चारुदत्तस्य कारगाद् गृहीत. सुमनोन्तरिक्षयासा। यारदस्य पार्यपरिवर्ती भयामि । (परिम्म्यावलोक्य च) एप तनभनाँश्चारुदत्त प्रभातचन्द्र इस सक्रप्रियदर्शनो यथाविभवेन गृहदेवतान्यर्चयनित एयागन्दति । यायदेनमुपसमि। (नितान्त.) -- ८७ शौरसेनीप्राकृत ७. चक्रवत्परिवर्तन्ते विदूपक -अण्णं अण्णं णिमन्तेदु दाव भव । अरित्तो दाव अहं ।। ण भणामि अह अरित्तो ति। कि भणासि-सम्पण्णं असणं अहिदन्वं भविस्सदि ति। अहं पुण जाणामि अहिअमहुरस्स अम्बस्स अनोगदाए अण्ठी ण भक्खीअदि ति। किं दाणि में उल्लालिअ उल्लालिम भणासि । भणामि वावुदो ति। किं भणासि- दक्खिणामासआणि भविस्सदि ति । एसो वाआ पच्चाचविखदो हिअएण अणुसन्धीअमाणो गच्छीअदि । अहो अचाहिद । अह वि णाम परस्स आमन्तआणि तितकेमि । नो अहं ततहोदो चारुदत्तस्स गेहे अहोरतपय्यत्तसिद्धेहि णाणाविधेहि हिडविवेहि ओगगारणसुगन्धेहि भूक्खेवमनपडिच्छिदेहि अन्तरन्तरपाणीपहि असणप्पआरेहि चित्तअरी विअ बहुमल्लएहि परिवुदो आअण्ठमत्त अहिल चच्चखुसहो विअ मोदअखज्जएहि रोमन्थाअमाणो दिवसं खेवेमि, सो एल्व दाणि अहं तत्तहोदो चारुदत्तस्स दरिद्ददाए समं पारावदेहि साहारणवृत्ति उपनीवन्तो अपणहि चरिअ चरिअ तस्स आवासं एन्व गच्छामि । अण्णं च अच्छरिन मम उदर भवस्थाविसेसं नाणादि। अप्पेणावि तुस्सदि। बहुअ वि ओदणभरं भरिस्सदि दीअमाण, ण आएदि अदीअमाणं, ण पच्चाचिक्खदि । ण खु अहं एरिसेण ण सन्तुट्टो। ता सट्टीफिददेवकय्यस्स तत्तहोदो चारुदत्तस्स कारणादो गहीदो सुमणो अन्तरिखवासो अ। नाव से पस्सपरिवत्ती होमि । (परि. क्रम्यावलोक्य च ) एसो तत्तभवं चारुदत्तो पभादचन्दो विअस करुणप्पि- गर्दसणो नहाविभवेण गिहदेवदाणि अच्चअन्तो इदो एच आअच्छदि । नाव णं उबसप्पामि । (निष्कात ) १-भास (तृतीय शताब्दी) प्रणीत–चारुदत्त ( गणपति मिश्र द्वारा सशोधित एव अन तशयन संस्कृत अधावलो मे १९२२ में प्रकाशित) प्रथम मक (१० ८-११) से उधृत । .
प्राकृत-प्रवेशिका
(संस्कृतच्छाया)
प्रियंवदा-हा धिक् हा धिक् । अप्रियमेव संवृत्तम् । कस्मिन्नपि पूजाहे-
ऽपराद्धा शून्यहृदया शकुन्तला। (पुरोऽवलोक्य ) न सलु
यस्मिन्कस्मिन्नपि । एष दुर्वासाः सुलभकोपो महर्षिः। 'तथा
शप्त्या वेगवटुलोत्फुल्लदुर्वारया गत्या प्रतिनिवृत्तः। कोऽन्यो
हुतवहादग्धुं प्रभविष्यति ।
अनसूया-गच्छ। पादयोः प्रणम्य निवर्तयैनम् । यावदहमोदक.
मुपकल्पयामि।
प्रियंवदा-तथा} (इति निष्क्रान्ता )
अनसूया-(पदान्तरे स्खलित निरूप्य ) अहो । आवेगस्खलितया गत्या प्रभ्रष्टं
मे हस्तात पुष्पभाजनम । (इति पुष्पोचय रूपयति)
(ततः प्रविशति प्रियंवदा)
प्रियंवदा ससि! प्रकृतिवकः स कस्यानुनयं प्रतिगृह्णाति । किमपि
। पुन. सानुक्रोशः कृतः।
अनसूया--(सस्मितम् ) तस्मिन् वदेतदपि । कथय ।
प्रियंबदा-यदा निवतितुं नेच्छति । तदा विज्ञापितो मया। भगवन् ।
प्रथममिति प्रेक्ष्याविज्ञाततप प्रभावस्य दुहितजनस्य भगवतेको
ऽपराधो मर्पयितव्य इति ।
अनसूया-ततस्तत ।
प्रियंवदा -ततः मे वचनमन्यथाभवितुं नाहति चिन्त्यभिज्ञानाभरणदर्शनेन
शापो नियतिष्यत इति मन्त्रयमाणः पयमन्तर्हितः।
अनसूया-शस्यमिदानीमाश्वासितुमस्ति । तेन राजर्पिणा संप्रस्थितेन
स्वनामधेयापितमगुलीयक स्मरणीयमिति स्वयं पिनद्धम् ।
तस्मिन् स्वाधीनोपाया शकुन्तला भविष्यति ।
प्रियंवदा-सपि। एहि ! देवकार्य तावनिर्वतयारः।
(इति परिणामतः)
--
शौरसेनी प्राकृत ८६ ८. अभिशाप-मर्पण प्रियंवदा-हद्धी हद्धी। अप्पिों एव्व संवुत्तं । कस्सिं पि। पूआरुहे अब(व)रद्धा सुण्णहिअआ सउन्दला। (पुरोऽवलोक्य) ण हु जस्सि कस्सि पि । एसो दुव्वासो सुलहकोबो(वो) महेसी । तह सबि(वि)अ वेअचहुलप्फुल्लदुव्वाराए गईए पडिणियुत्तो । को अण्णो हुदवहादो दहिदुं पहविस्सदि । अनसूया-गच्छ । पादेसु पणमिञ णिवचेहि । नाव अहं अग्योद उब(व)कप्पेमि । प्रियंवदा -तह (इति निष्क्रान्ता) अनसूया-(पदान्तरे स्खलित निरूप्य ) अम्मो। आवेअखलिदाए गईए पन्भर्ट्स मे हत्थादो पुप्फभाषणं । (इति पुष्पोचयं रूपयति) प्रियंवदा-(प्रविश्य ) सहि । पकिदिवको सो कस्स अणुण पडिगेण्हदि । किम्पि उण साणुकोसो किदो। अनसूया-(सस्मितम्) तस्सि बहु एदम्पि। कहेहि । प्रियंवदा-जदा णिवत्तिदुं ण इच्छदि तदा विण्णबि(वि)दो मए। भगवं । पढम ति(ति) पेक्खिअ अविण्णादतब(य) पहावस्स दुहिदुजणस्स भअयदा एको अब(व)राहो मरिसिदन्यो ति । अनसूया--तदो तदो। प्रियंवदा—तदो मे वअणं अण्णहामविदु णारिहदि । किन्दु अहि- ण्णाणाभरणदंसणेण सावो(वो) णियतिस्सदि ति मन्तअन्तो सो अन्तरिहिदो। मनसूया--सक्क दाणिं अस्ससिदं अस्थि । तेण राएसिणा सम्पत्थिदेण सणामहेअङ्किअं अङ्गुलीमअं सुमरणीअं ति(ति) स पिणद्धं । तस्सि साहीणोवा(वा)आ सउन्दला भविस्सदि । प्रियवदा-सहि । एहि । देवकज दाव णिवत्तेम्ह । (इति परिणामतः) १-महाकवि कालिदास ( चतुर्थ-शताब्दी ) विरचित-अभिज्ञानशाकुन्तलम् (Aloner Williams द्वारा सम्पादित तथा आक्सफोर्ड से १८७६ में प्रकाशित) चतुर्थ भक विषम्भ (पृ० १३७.१४.) से उधृत ।
प्राकृत प्रवेशिका an - (सस्कृतच्छाया) चेटी-कथमद्यापि आर्या न विबुध्यते। भवतु प्रविश्य प्रबोधयिष्यामि। (इति नाट्येन परिकामति । तत प्रविशत्याच्छादितशरीरा प्रसुप्ता बसन्तसेना) चेटी-उत्तिष्ठतु उत्तिष्ठतु आर्या प्रभात सवृत्तम् । वसन्तसेना-(प्रतिबुध्य ) कथ रात्रिरेव प्रभात सवृत्तम् ? चेटी-अस्माकमेत प्रभातमार्याया पुना रागिरेव । वसन्तसेना-चेटि । क्व युष्माक द्यूतकर ? चेटी-आयें। वर्धमानक समादिश्य पुष्पकरएडक जीर्णोद्यान गत आर्यचारदत्त । यसन्तसेना-किं समादिश्य ? चेटी-योजय रानावेव प्रवहण यसनसेना गच्छत्यिति । घसन्तसेना-चेटि । क्व मया ग तन्यम् ? चेटी-पार्ये । यत्र चारुदत्त । वसन्तसेना-(चेटों परिष्वज्य ) चेटि । सुन निध्यातो रानी । तदद्य प्रत्यक्ष प्रेक्षिष्ये । चेटि । किं प्रविष्टाहमम्यन्तरचतु शाला? चेदी-न केवलमभ्यन्तरचतु शारक सर्वजनस्य हृदयमपि प्रविष्टा । वसन्तसेना-अपि सन्तप्यते चारुदत्तस्य परिजन ? चेटी-सन्तप्स्यते। घसन्तसेना- कदा? चेटी-यदा आर्या गमिष्यति । घसन्तसेना -तदा मया प्रथम सन्तप्तव्यम् । चेटि। गृहाणेमा रलागली मम भगिन्ये आर्याधूताय गत्या समर्पय वक्तव्य च-अह श्रीचारुदत्तस्य गुणनिर्जिता दासी तदा युप्माकमपि । तदेपा तत्र फराठाभरण भवतु रतापली । चेटी-कोपिप्यति चादच आर्याये तावत् । यसन्तसेना-गच्छन कोपिष्यति । पेटी-(गोवा) यदाज्ञापयप्ति। (ति निष्का) शौरसेनी प्राकृत ९. अभिसार चेटी.कथं अज्ज वि(वि) अज्जुआण विबुज्झदि । भोदु पविसिअ पबोधइस्स। (इति नाट्येन परिकामति । ततः प्रविशत्याच्छादितशरीरा प्रसुप्ता वसन्तसेना) चेटी-उत्थेदु उत्थेदु अज्जुआ पभादं संवु । वसन्तसेना-(प्रतिवुध्य) कधं रति ज्जेव्व पभादं संवुत्तं । चेटी--अम्हाणं एसो पभादो अज्जुआए उण रति ज्जेव्ध । वसन्तसेना--हजे कहिं तुम्हाणं जूदिअरो! चेटी--अज्जुए वड्डमाणअं समादिसिअ पुप्फकरण्डों जिण्णुज्जाणं गदो अज्जचारुदत्तो। वसन्तसेना-कि समादिसिअ ? चेटी--नोएहि रादीए ज्जेव्य पवहणं वसन्तसेणा गच्छदु ति । वसन्तसेना--हजे कहिं मए गन्तव्यं ! चेटी-अज्जुए नहिं चारुदत्तो । वसन्तसेना--(चेटों परिष्वज्य) हङ्गे सुटु ण णिज्झाइदो रादीए ता अज्न पच्चक्खं पेक्खिस्सं । हजे किं पविट्टा अहं अन्भन्तर- चतुस्साल! चेटी-ण केवलं अन्भन्तरचतुस्सालअं सव्वजणस्स हिअपि पविट्टा । वसन्तसेना----अवि(वि) सन्तप्पदि चारुदत्तस्स परिअणो ! चेटी--सन्तप्पिस्सदि । वसन्तसेना--कदा! चेटी-जदो अज्जु गमिस्सदि । वसन्तसेना--तदो मए पढम सन्तप्पिदव्यं । हजे गेण्ह एवं रमणावलि । मम बहिणिआए अज्जाघूदाए गदुम समप्पेहि, मणिदव्यं च । अहं सिरीचारुदत्तस्स गुणणिज्निदा दासी तदा तुम्हाण पि। ता एसा तुह ज्जेन्ब कण्ठाहरणं होदु रअणावली । चेटी--कुप्पिस्सदि चारुदतो अज्जुआए दाव । वसन्तसेना-गच्छ ण कुप्पिस्सदि । चेटी--(गृहीत्वा) नं आणावे(वे)सि । (इति निष्क्रान्ता) १. श्री शूरक (५वीं शताम्मी) प्रणोत-मुन्दकटिक (Stenaler द्वारा सम्पादित तथा Bonnac से १८४७ ई. में प्रकाशित) पष्ठम मंग (पृ. ९३.६४) से उद्धृत।
प्राकृत-प्रवेशिका (संस्कृतच्छाया) पुरुषः-आर्या. | अपि नामास्मिन्नुदेशे सारथिद्वितीयो दृष्टो युस्माभि महाराजदुर्योधनो न वेति । कथं न कोऽपि मन्त्रयते । भवत्वेतेपा बद्धपरिकराणा पुरुपाणां समूहो दृश्यत इत्यत्र गत्या प्रक्ष्यामि। (विलोक्य ) कथमेते स्वस्वामिनो गाढमहारा- हतस्य घनसन्नाह जालदुर्भेद्यमुसै कङ्कपत्रैढ दयाच्छल्यान्यु द्धरन्ति । तत्सल्वेते न जानन्ति । भवत्वन्यतो विचेष्यामि । । 'इमे सत्यपरे प्रभूततरा संकलिता वीरमानुपा । अन गत्वा प्रक्ष्यामि । ( उपगम्य ) अहो जानीथ कस्मिन्नुदेशे कुरुनाथो वर्तत इति। क्थमेतेऽपि मा दृष्ट्वा अधिकतरं रुदन्ति । ( दृष्ट्वा) तन सल्वेतेऽपि जानन्ति । हा दुपारं सल्वा वर्तते । एपा वीरमाता समरविनिहत पुनक श्रुत्या रक्ताशुक- निवसनया वया सहानुम्रियते। साधु वीरमात' साधु । अन्यस्मिन्नपि जन्मान्तरेऽनिहत पुनका भविष्यसि । भवत्वन्यतो विचेष्यामि । ( अन्यतो विलोक्य ) अयमपरो बहुप्रहारनिहत. कायोऽकृतव्रणप्रतीकार एव योधसमूहस्तिष्ठति । इम शून्यासन तुरंगममुपालभ्य रोदिति । नूनमेतेपामत्रैव स्वामी व्यापादित इति । तम्न सल्वेतेऽपि जानन्ति । भवत्वन्यतो गत्वा प्रक्ष्यामि। ( सर्वतो विलोक्य ) क्थ सर्व एवारस्थानुरूप व्यसनमनुभयन् भागवेयविमुखतया पर्याकुलो जन । तरस्मत प्रल्यामिक योपालप्स्ये। भवतु स्वयमेवान विज्ञास्यामि । (परिक्रम्य ) भवतु देवमेवेदानीमुपालप्स्ये। अहो देव ! एकादशानाम- क्षौहिणीना नाथो ज्येष्ठो भ्रातृशतस्य भर्ता गाड्यद्रोणाङ्गराज- शल्यपकृतवर्माश्वस्थामप्रमुसस्य राजयस्य सरलपृथियी- मण्डलेकनाथो महाराजदुर्योधनोऽप्यन्विष्यते, न जाने पस्मिन्नुद्देशे स यतर्त इति ।
शौरसेनी प्राकृत १०. समराङ्गणम् पुरुष.-अज्ला ! अधि(वि)णाम इमस्सि उद्देसे सारहिंदुदीओ दिट्टो तुम्हेहिं. महाराअदुज्जोहणो ण वेत्ति । कह ण को वि (वि) मन्तेदि । होदु, एदाण बद्धपरिअराणं पुरिसाण समूहो दीसइ ति एत्थ् गदुम पुच्छिस्सं । (विलोक्य) कहं एदे सस्सामिणो गाढप्पहारा- हदस्स घणसणाहनाल्दुब्भेज्जमुहेहिं कङ्कव(व)हिं हिअआदो सल्लाई उद्धरन्ति । ता खु एदे ण जाणन्ति । होदु, अण्णदो विचिणइस्स । इमे क्खु अव(व)रे पट्टददरा संकलिदा वीरमाणुसा। एस्थ गदुअ पुच्छिस्स (चपगम्य) हहो जाणह कस्सि उद्देसे कुरुणाहो वट्टइ ति। कह एदे रि(वि) म देकिवअ अहिअदर रोअन्ति । (दृष्ट्वा) ताण हु एदे वि(वि) नाणन्ति । हा दुक्करं खु एत्थ वइ । एसा वीरमादा समल विणिहद पुत्त सुणिअ रसुअणि. वसणाए वहूए सह अणुमरदि । (सरलापम) साहु वीरमादे साहु, अण्णस्सि वि(वि) नग्मन्तरे अणिपुत्ता हुविस्ससि ! होदु अण्णदो विचिणइस्स । (मायतो विलोक्य) अअ अन(व)रो बहुप्पहारणिहदकाओ अकिदव्यणप्पडीआरो एव्व जोहसमूहो चिट्टइ । इम सुण्णासण तुलगमं उबा(वा)लहिल रोइदि । णूण एदाण एत्य एव्य सामी बाबा(वा)दिदो ति। ताण हु एदे नि(वि) जाणन्ति । होदु, अण्णदो गदुअ पुच्छिस्स । (सर्वतो विलोक्य) कह सयो एच अवस्थाणुरूब(व) विसणं अणुहवन्तो भाअभविमुहदाए पज्जाउलो जणो । ता क एस्थ पुच्छिस्स क वा उमा(वा)लहिस्स । भोदु सअ एव्व एस्थ विआणिस्स । (परिक्रम्य ) देव्व एव्व दागि उगा(वा)लहिस्स। हहो देव्य ! एआदसाण अक्खोहिणीण णाही जेट्टो भादुसअस्स भत्ता गङ्गेयद्दोणअङ्गराअसल किय(व)किदवम्मअस्सत्थामप्पमुहस्स राअचक्कस्स सअल्पहुवीमण्डलेक्वणाहो महाराभदुज्जोहणो बि(वि)अण्णेसीअदि, ण नाणे कस्सि उद्देसे सो वट्टइ ति। १-श्री भट्टनारायण (८वीं शताब्दी) प्रणीत-वेणोसहार (Julius Grill द्वारा सम्पादित एवं Leipzig से १८७१ में प्रकाशित) के चतुर्थ अंग (पृष्ठ ५८. ५६) से उत्त।
६४
प्राकृत-प्रवेशिका
ज
( सस्कृतच्छाया)
राजा-सत्यं विचक्षणा विचक्षणा चतुरत्वेनोक्तीनां विचित्रतयारीतीनाम् ।
। तत्किमन्यत् । कविचूडामणित्वे स्थिता एपा ।
विदूपक:-(सक्रोघम तहग्वेव किं न भण्यते अत्युत्तमा विचक्षणा
काव्येऽत्यधम कपिजलो ब्राह्मण इति ।
विचक्षणा--आर्य मा कुप्य ! काव्यमेव ते कवित्वं पिशुनयति । यतो
कान्तारजननिन्दनीयेऽप्यर्थे सुकुमारा ते वाणी लम्बस्तन्या
इरावली तुन्दिलाया इव कञ्चुलिका काणाया इच
जलशलाका न सुष्ठुतर रमणीया ।
विदूषक -तव पुंना रमणीयेऽप्यर्थे न सुन्दरा शब्दावली। कनककटिसून
इव लोहकिंकिणीमाला, प्रतिपट्ट इव त्रसरविरचना, गौराङ्गया
इय चन्दनचर्चा, न चङ्गत्वं अवलम्वते । तथापि त्व वय॑से ।
विचक्षण-आर्य । मा कुप्य । का युष्माभि सह प्रतिस्पर्धा ? यतस्त्वं
नाराच इय निरक्षरोऽपि रत्नतुलाया नियुज्यसे। अहं.
पुनस्तुलेव लब्धाक्षरापि न सुवर्णतोलने नियुज्ये ।
विदुपफ'-एवं मां हसन्त्यास्तव वाम दक्षिणं च युधिष्टिरज्येष्ठभ्रातृ-
नामधेयमन झटिति उत्पाटयिष्यामि ।
विचक्षणा-अहमप्युत्तराफाल्गुनीपुर सरनक्षाननामधेयमङ्ग तय भटिति
खएडयिष्यामि।
राजा-वयस्य । मैवं भण। कवित्वे स्थितपा।
विदूषक ---( वक्रोधम् ) तहज्वेव कि न भण्यते अस्माक चेटिका
हरिवृद्धनन्दिवृद्धपोट्टिशहालप्रभृतीनामपि पुरत सुकविरिति ?
(इति परिकामति)
शौरसेनी-प्राकृत ६५ ११. परिहासविजल्पितम्' राजा--सच्चं विअक्खणा विभक्खणा चतुरत्तणेण उत्तीण विचित्तदाए रीदीणं । ता कि अण्ण कइचूडामणित्तणे ठिटा एसा । विदूपक -( सक्रोधम् ) ता उज्जु अव किं ण भणीअदि अच्चुत्तमा विभक्खणा कन्वम्मि अच्चहमो कविञ्जलो बम्हणो चि। विचक्षणा-अज्ज मा कुप्प । कव जेव दे कइत्तणं पिसुणेदि। जदो कन्तारत्तणणिन्दणिज्जे वि अत्ये सुउमारा दे वाणी लम्बत्थणीए विम एक्कावली तुन्दिलाए विअ कञ्चुलिआ काणाए विभ कन्जलसलाआ ण सुटुंदर रमणिज्जा । विदूषक --सुज्झ उण रमणिज्जे वि अत्थे ण । सुन्दरा विली । कण- अकडिसुतए विअ लोहकिङ्किणीमाला पडिवट्टए विअ तसर- विरमणा गोरङ्गीए विभ चन्दणचच्चा ण चङ्गणं अवलम्बेदि । तथा वि तुम वण्णीअसि । विचक्षणा-अज्न मा कुप्प । का तुम्हेहि सम पाडिसिद्धी। नदो तुम णाराओ विअ णिरक्खरो वि रदणतुलाए णिउन्जी- असि । अह उण तुरा पिअ लक्वरा वि ण सुवण्णतुलणे णिउनीआमि। विदूषक-एवं म हसन्तीए तुह वाम दक्षिण च जुहिटिरजेट्टभादरणामहेअ अन तडति उप्पाडइस्स । विचक्षणा-अह पि उतरफग्गुणीपुरस्सरणक्खत्तणामहेअं अङ्गं तुह तडत्ति खण्डिस्स। राजा-अस्स मा एव भण। कइत्तणे ठिदा एसा । विदूषक ---(सक्रोधम् ) ता उज्जुअ जेव किं ण भणीअदि अम्हाणं चेडिआ हरिउडणन्दिउड्डुपोट्टिसहाल्प्पहुदोण पि पुरदो सुक्इ ति। (इति परिक्रामति) १ महाकवि राजशेखर (नवौं शताओ) विरचित-कपूरमपये (Sten Konor द्वारा सम्पादित तघा मोतीलाल बनारसीदास बगलो रोड, जवाहरनगर, दिझी-६ द्वारा प्रकाशित) के प्रथम जवनिका पु०१६-१९ से उद्धव ।
प्राकृत-प्रवेशिका . (संस्कृतच्छाया) विचक्षण-(विहस्य ) तत्र गच्छ यत्र मे प्रथमशाटिका गता।। विदूपफ :-( घलितग्रीवम् ) त्वं पुनस्तत्र गच्छ यत्र में मातुः प्रथमा दन्तावली गता। ईदृशस्य राजकुलस्य भद्रं भवतु, यत्र चेटिका ब्राह्मणेन समं समशीपिकया दृश्यते, मदिरा पञ्चगव्यं चैकस्मिन् भाण्डे क्रियते, काचं माणिक्यं च सममाभरणे प्रयुज्यते ।। विचक्षणा- इह राजकुले तत्ते भक्तु कण्ठस्थितं यद्भगवास्त्रिलोचनः शी समुदहति । तेन च ते मुखं चूर्ण्यतां येनाशोक्तरु- दोहदं लभते। विदूपक:-श्राः दास्याः पुत्रि! टेण्टाफराले ! कोससदचट्टणि ! रथ्या- लोट्टरिण! एवं मां भणसि। तन्मम महाब्राह्मणस्य वचनेन तत्त्वं लभ यत्फाल्गुनसमये शोभाजनो दोहदं लभते यच्च । पामरेभ्यो बलीवो लमते । विचक्षणा, अहं पुनस्तवेवं भणतो नूपुरस्येव पादलग्नस्य पादेन मुसं चूर्णयिष्यामि । अन्यच्च उत्तरापाढानक्षत्रनामधेयमङ्गयुगल- मुत्पाट्य क्षेप्स्यामि। विदूषकः : - ( सक्रोधं परिक्रामति जवनिकान्तरे किंचिदुच्चैः ) ईदृशं राजकुल दूरे वन्द्यते, यत्र दासी ब्राह्मणेन सम प्रतिस्पर्धा करोति । तदद्यप्रभृति निजवसुन्धराब्राह्मण्याश्चरणशुश्रुपुर्भूत्वा गृह एव स्थास्यामि। (सर्वे हसन्ति ) शीरमेनो प्राकृत १७ १२. कपट प्रतिस्पर्डी विचक्षणा-' विहस्य ) तहिं गन्छ नहिं मे पढमसाहुलिआ गदा । विदूषक - ( वलितपोवम् ) तुम उण तहिं गच्छ नहिं मे मादाए पढमा दन्तावली गदा। ईदिसस्स राअउलस्स भद्द भोदु नहिं चेडिआ बम्हणेण समसीसिआए दीसदि मइरा पञ्चगव्य च एक्कस्सि भण्डए करीअदि कच्च माणिक्क च सम आहरणे पउन्नीअदि । विचक्षणा-इघ रामउले त दे भोदु कण्ठहिद न भअव तिलोअणो सीसे समुन्यहदि तेण अ दे मुहं चूरीअदु जेण असोअतक दोहरू रहदि । विदृपक -आ दासीए पुति टेण्गकराले कोससदचट्टिणि रच्छालोदृणि एव मे भणासि । ता मह महारम्हणस्स वअणेण त तुम रह नं फग्गुणसमए सोहचणो दोहल रहदि न च पामराहिंतो गरिबइलो लहदि । विचक्षणा--अहं उण तुद् एवं भणन्तस्स णेउरस्स विअ पाअलगस्स पारण मुह चूरइस्स। अण्ण च उतरासादापुरस्सरणक्वत- णामहे माजुअल उप्पादिम घलिम्स | विदपक -(सोधे परिणामति जवनियातरे पिचिदुप) ईदिस रामउलं दूरे बन्दीअदि बहिं दासी यम्हणेण सम पाडिमिद्धि फरेदि । ता मग्नप्पटुदि णि असमुधरापम्हणी चरणमुम्सूसो भरिम घरे उनेव चिट्टिस्स । (सहरान्ति) २ महाकरि गरगर NिT पे Sten honor Eारा समाधि फरमधये ये पृ० ११-२२ मे व्दा।
६८
प्राकृत प्रवेशिका
मागधी प्राकृत
प्रमुस विशेषताएँ
सरलव्यञ्जन-परिवर्तन
ज>य, जनपद = यणवदे, जानाति = याणदि ।
र>ल, पुरुप = पुलिशे,
राक्षस
लरकशे।
प, स>श, माप = माशे, हंस = हशे ।
संयुक्तव्यञ्जन-परिवर्तन
क्ष>स्क, राक्षस = लस्कशे, दक्ष = दस्के ।
ज्ञ, अ, ण्य, न्य>ज, प्रज्ञाविशाल = पञ्चाविशाले, अञ्जलि = अम्मली,
पुण्यवान् = पुब्यवन्ते, अभिमन्यु = अहिमञ्जू ।
च्छ>श्च, गच्छ - गश्च, पृच्छति = पुश्चदि ।
घ य्य, मद्य- मय्य।
ह, ४>स्ट, भट्टारिका - भस्टालिका, सुप्ठ = शुस्टु ।
य, ज>ग्य, कार्यम् = क्रये, दुर्जन = दुय्यणे ।
स्थर्थ>स्त उपस्थित = उवस्तिदे, सार्थवाह = शस्तवाहे ।
प, स् + व्यञ्जन = स् + व्यजन, कष्टम् - कस्ट, विष्णु विस्नु, विस्मय
विस्मये।
शब्दरूप
अ + सु (विभक्ति प्रत्यय )>ए + सु, पुरुष = पुलिशे, मेप = मेशे ।
डस्> श्राह, भगदत्तशोणितस्य कुम्भ = भगदत्तशोणिदाह कुम्भे ।
आम्> आहे, कर्मणा = कम्माहें, युप्माकम् = तुम्हाहँ ।
आदेश
अहम्>हके, हगे, अहके, अहं भणामि = हके, हगे, अहके भगामि ।
तिष्ठ>चिष्ठ, तिष्ठ रे = चिष्ठ ले, तिष्ठति = चिष्टदि।
द्रव्य----हेमचद्र कृत-प्राकृत व्याकरण ८।४।२७-३०२ तक एव वररुचि
कृत-प्राकृत प्रकाश-एकादश परिच्छेद ।
मागधी प्राकृत
शृगाल>शिनाल, शिआलक, शृगाल आगच्छति = शिआले, शिआलके
आगच्छदि।
हृदय > हडक, हृदये आदरो मम = हडक्के आरले मम ।
गडे।
त> (केवल डुकुन् , मृङ् गम्ल धातु से क्त को ), कृत = कडे,
मृत = मडे, गत =
क>दु, हसित = हशिदु, हशिदे।
क्वा>दाणि, सोवा गत = शहिदाणि गडे, कृत्वा आगत = करिदाणि
आअडे।
(शेप नियम शौरसेनी प्राकृत के समान)
१००
प्राकृत-प्रवेशिका
(संस्कृतच्छाया)
(तत प्रविशति नागरिक. श्यालः पश्चाबद्धपुरुषमादाय रक्षिणी च )
रक्षिणी- ( ताडयित्वा ) अरे कुम्भीलक। कथय । कुन त्वयैतन्मणि-
बन्धनोत्कीर्णनामधेयं राजकीयमङ्गुलीयकं समासादितम् ?
पुरुप -( भोति नाटितकेन ) प्रसीदन्तु भावमिश्रा । अह नेशकर्मकारी।
प्रथम -किं खलु शोभनो ब्राह्मण इति कृत्वा राज्ञा प्रतिग्रहो दत्त ?
पुरुष -शृणुतेदानीम् । अह शक्रावताराभ्यन्तरवासी धीवर ।
द्वितीय -पाटच्चर। किमस्माभिर्जाति पृष्टा ?
श्याल -सूचक! कथयतु सर्वमनुक्रमेण । मैनमन्तरा प्रतिवनीतम् ।
उभौ-यदाबुत्त आज्ञापयति । कथय ।
पुरुष -अह जालोद्गारादिभिर्मत्स्यबन्धनोपाये कुटुम्यभरण करोमि ।
श्याल -(विहस्य ) विशुद्ध इदानीमाजीय ।
पुरुष-भर्त्त । मैव भण।
सहज किल यद्विनिन्दित न खलु तकर्म विवर्जनीयम् ।
पशुमारणकर्मदारुणोऽनुकम्पामृदुरेव श्रोत्रिय ॥
श्याल-ततस्तत
पुरुष -एकस्मिन्दिवसे खण्डशो रोहितमत्स्यो मया कल्पितो यावत् ।
तस्योदराभ्यन्तर एतद्रत्नभासुरमङ्गलीयक दृष्टम् । पश्चादहमस्य
विक्रयाय दर्शयन्गृहीतो भावमित्रै । मारयत वा मुश्चत वा।
अयमस्यागमवृत्तान्त ।
मागधी प्राकृत
१३ प्रत्ययभिज्ञानकम्'
(तत प्रविशति नागरिक श्याल पशाबद्धपुरुषमादाय रक्षिणी च)
रक्षिणी-(ताडयित्वा) अले कुम्भिलआ। कहेहि, कहिं तुए एशे
मणिनन्धणुक्किण्णणामहेए रामकीए महुलीभए शमाशादिए ।
पुरुष - ( भोति नाटितन ) पशीदन्ते(न्तु) भावमिश्शे(श्शा) । महके ण
ईदिशकम्मकाली।
-किं खु शोहणे धम्हणे ति करिअ लण्णा पडिग्गहे दिण्णे ?
पुरुष-शुणुह दाणिं । अहके शक्कापदालम्भन्तलपाशी धीवले ।
द्वितीय -पाडच्चा । किं अम्हेहिं नादी पुच्छिदा ?
श्याल --सूम ! कहेदु सञ्च अणुक्रमेण । मा य अन्तरा पडिबन्धह ।
उभी -य आबु(बु)ते आणवे(वे)दि । कहेहि ।
पुरुष -अहके नालुग्गालादीहिं मच्छरन्धणोबा(वा)एहिं कुडुम्बभलण
प्रथम
कलेमि ।
श्याल -(विहस्य ) विसुद्धो दाणिं आनीनो ।
पुरुष-मट्टा मा एव्य भण ।
शहजे किल जे विणिन्दिए ण हु दे कम्म विवज्जणीअए ।
पशुमारण कम्मदालणे अणुकम्पामिदु एव्य शोचिए ।
श्याल -तदो तदो।
पुरुष-एक्कशिश दिअशे खण्डशो लोहिअमच्छे मए कप्पिदे नाव ।
तश्श उदलब्भन्तले एद रदणभाशुल अङ्गुलीअ देखिन ।
पच्छा अहके शे विक्कआम दशअन्ते गहिदे भावमिश्शेहिं ।
मालेह वा, मुन्चेह था, अअ शे आममवुत्तन्ते ।
महाकवि कालिदास (४ शताम्गे) विरचित-अभिनानशाकुन्तल (Monier
Williams द्वारा सम्पाश्नि एव प्रासकोड से १८७६ में प्रकाशित) धतुर्थ
बैंक वे निम्म (१० २१७ २२१ ) से उदयन ।
सात द्वारा पीरगनी मापा या प्रयोग किया गया है ।
२
प्राकृत-प्रवेशिका (संस्कृतच्छाया) (ततः प्रविशत्याद्र'चीवरहस्तो भिक्षुः) भिक्षुः-अक्षाः ! कुरुख धर्मसनयम् । संयच्छत निजोदरं नित्यं जागृत ध्यानपटहेन । विषमा इन्द्रियचौरा हरन्ति चिरसश्चितं धर्मम् ।। अपि च- अनित्यतया प्रेक्ष्य केवलं तावद्धर्माणां शरणमस्मि । पञ्चजना येन मारिता. स्त्रियं मारयित्वा प्रामो रक्षित । अबलश्च चाण्डालो मारितोऽवश्यं स नरः स्वर्ग गाहते ।। शिरो मुण्डितं तुण्डं मुण्डितं चित्त न मुण्डित किं मुण्डितम् । यस्य पुनश्च चित्तं मुण्डितं साधु सुष्टु शिरस्तरय मुण्डितम् ।। गृहीतरपायोदकमेतच्चीवर, यायदेवत् राष्ट्रियश्याल- कस्योद्याने प्रविश्य पुष्करिण्यां प्रक्षाल्य लघु लघु अपक्रमिष्यामि। (इति परिक्रम्य तया करोति ) (नेपध्ये) तिष्ठ रे दुष्टश्नमणक ! तिष्ठ तिष्ठ। भिक्षु दृष्ट्वा समयम्) ही अविद ही मानवाः। एप स राजश्याल. सस्थानक आगत.। एकेन भिक्षुणा अपराधे कृते, अन्यमपि यत्र यत्र भिक्षु पश्यति तत्र तन गामिव नासां विद्ध्या अपवाहयति । तत् कुत्राशरण शरणं गमिष्यामि ? अथवा भट्टारक एव बुद्धो मे शरणम् । (प्रविश्य ससङ्गेन विटेन सह) । शकार -तिष्ठ रे दुष्ट श्रमणक। तिष्ठ। आपानकमध्यप्रविष्टस्येव रक्तमूलकस्य शीपं से मोटयिष्यामि । (इति ताडयति)
मागधी प्राकृतं
१४. घट्टकुट्यां प्रभातम्'
(ततः प्रविशत्यादंचीवरहस्तो मिशुः)
भिक्षुः :-अन्ना । कलेघ धम्मशन।
शजम्मघ णिअपोटं णिच्चं नग्गेध झाणपडहेण ।
विशमा इन्दियचोला हलन्ति चिलशञ्चिदं घम्मं ॥
अनि(वि):-
अणिच्चदाए पेरिखअ णवल दाव घग्माण शलण म्हि ।
पञ्चजण जेण मालिदा इत्थिा मालिम ना(गा)म लक्खिदे ।
अब(व)ले अ चण्डाल मालिदे अवशं शे णल शग्ग गाहदि ॥
शिल मुण्डिदे तुण्ड मुण्डिदे चिच ण मुण्डिदे कीश मुण्डिदे ।
नाह उण अ चित्त मुण्टिदे, शाहु, शुटु(स्टु) शिल ताह मुण्डिदे ॥
गिहिदकशाओदए एशे चीवले, नाव एदं लश्टि(स्टि)अशालकाह
केलके उज्जाणे पविशिअ पोस्खलिणीए पक्खालिअ लहुं लहुं
अमावस्कमिदश।
(परिक्रम्य तथा क्रोति)
( नेपथ्ये ) चिश्ट(छ) ले दुश्ट(स्ट) शमणका । चिश्ट(8) चिश्ट(छ) ।
भिक्षु-ट्वा समयम् ) ही अविद ही माणहे ।
एशे शे लाअशा-
लशण्ठाणे आअदे एक्केण भिक्खुणा अप(वोलहे किदे अण्णं पि
नहिं नहिं भिक्खु पेक्खदि तर्हि तहिं गोण ब्व णाशं
भिन्दिअ ओबाहेदि। ता कहिं अशलणे शलणं गमिश्श ?
अधवा भश्टा(स्टा)लके ज्जेच बुद्धे मे शलणे ।
(प्रविश्य सखड्गेन ब्रिटेन सह )
शकार -चिश्ट() ले दुश्ट(स्ट) शमणका चिश्ट(छ) चिश्ट(8)। आवा(वा)
णअमज्झपविश्ट(स्ट)श्श विम लत्तमूलअश्श शीशं ते मोडइश्शं ।
(इति ताडयति )
शूद्रक (५ वो शताब्दी) विरचित-मृच्छकटिक (Stenzler द्वारा सम्पादित
तया Bonnne से १८४७ ई. में प्रकाशिन ) के अष्टम अंक (पृ. ११..
११३) से उद्धृत।
प्राकृत-प्रवेसिस . (संस्कृतच्छाया) शकारः-आत्मपरित्राणे भावो गतोऽदर्शनम्। चेटमपि प्रासादवालाप्र- प्रतोलिकायां निगडपूरितं कृत्या स्थापयिष्यामि । एवं मन्त्रो रक्षितो भवति । तद् गच्छामि, अथवा पश्यामि एतां, किमेपा मृता ? अथया पुनरपि मारयिष्यामि । ( अवलोक्य ) कथं सुमृता। भवतु एतेन प्रावारकेण प्रच्छादयाम्येनाम् । अथवा नामाङ्कित एपः, तत्कोऽपि आर्यपुरुषः प्रत्यभिज्ञास्यति । भवतु एतेन पातालीपुअितेन गुप्कपर्णपुटेन प्रच्छादयामि । ( तथा कृत्या यिचित्य ) भवतु एवं तावत् , साम्प्रतमधिकरणं गत्वा व्यवहार लेखयामि, यथा अर्थस्य कारणात् सार्थवाहपुत्रचार- दत्तकेन मदीयं पुष्पकरण्डक जीर्णोद्यानं प्रविश्य वसन्तसेना व्यापादितेति। चारुदत्तविनाशाय करोमि कपट . नवम् । नगर्यो विशुद्धायां पशुघातमिव दारुणम् । ( इति नितम्य दृष्ट्वा सभयम् ) अविदमादिके। येन येन गच्छामि मार्गेण तेनैवेप दुष्ट- श्रमणको गृहीतकपायोदकं चीवरं गृहीत्वा आगच्छति । एप मया नसि छित्त्वा वाहितः कृतवैरः कदापि मांप्रेक्ष्यतेन मारितेति प्रकाशयिष्यति । तत्कथं गच्छामि। (अवलोक्य) भवतु, एतमर्धपतितं प्राकारखण्डमुल्लइथ गच्छामि। एषोऽहं त्वरितत्वरितो लकानगर्यो गगने गच्छन् । भूम्यां पाताले हनूमच्छिखर इव महेन्द्रः।। ( इति निष्क्रान्तः)
भोदि।
मागधी प्राकृत
१०५
१५. दुर्वृत्तवृत्तम्'
शकारः--अत्तपलिचाणे भावे गदे अदंशणं चेडे वि(वि) पाशादबालग्गपदो
लिआए णिअलपूलिदं कदुम थाब(व)इश्श । एवं मन्ते लक्खिदे
ता गच्छामि, अधवा पेवखामि एवं किं एशा मला
आदु पुणो बि(वि) मालइश्श ।
(अवलोक्य ) कथं शुमला ।
भोदु एदिणा पावालेण पच्छादेमि ण । अघा णामतिदे
एशे ता के बि(वि) अज्नपुल्शेि पच्चहिनाणेदि। भोदु
एदिणा वादालीपुञ्जिदेण शुक्खपण्णपुडेण पच्छादेमि ।
{ तथा कृत्वा विचिन्त्य ) भोदु एवं दाव । शम्पदं अधिअलणं
गच्छिा वबहालं लिहावे(वे)मि । जधा अत्थश्श कालणादो
शट्टवाहपुत्तचालुदत्ताकेण मम केलक पुप्फकलण्डकं निण्णुज्नाण
पवेशिअ वशन्तशेणिआ वागा(वा)दितेत्ति ।
चालुदत्तविणाशाय कलेमि कव(व)ड णव ।
णअलीए विशुद्धाए पशुपादं व्य दालुणं ।।
भोदु गच्छामि (इति निष्क्रम्य दृष्ट्वा सभयम)
अविद मादिके ! जेण जेण गच्छामि मग्गेण तेण ज्जेव्च एशे
दुश्ट(स्ट)शमणके गहिदकशाओदकं चीवलं गेव्हिा आगच्छदि ।
एशे मए णशिशअवाहिदे कवेले कदावि(वि) में पेक्खिा
एदेण मालिद ति पआशइदशदि ।
ता कथं गच्छामि
(भक्लोक्य) भोदु एद अद्धपडिद पाआरखण्ड उल्लविअ गच्छामि ।
एशे म्हि तुलिदतुरिदे लक्षाणअलीए गमण गच्छन्ते ।
भूमीए पाआले हणमशिहले पिअ महेन्दे ।।
( इति निष्क्रात )
१. शूद्रक द्वारा विरचित-मुच्दव टिक (Stenrler द्वारा सम्पादित) के अष्टम
मक (पृ० १३२०२३३) से उधत ।
प्राकृत प्रवेशिका स्वर- (संस्कृतच्छाया) मांसेन तिक्ताम्लेन भक्तं शाफेन सूपेन समत्स्यकेन । भुक्तं मया आत्मनो गृहे सादृश्यकूरेण गुडोदनेन । (कणं दत्त्वा) भिन्नकास्यससणाया चाण्डालवाचाया: संयोगो यथा चैप उद्गीतो यध्यडिण्डिमशब्द पटहाना च श्रूयते तथा तर्कयामि दरिद्रचारदत्तको वध्यस्थान नीयत इति । तत् प्रेक्षिप्ये । शनुविनाशे नाम महान् हृदयस्य परितोपो भवति । श्रुत च मया थोऽपि किल शर्नु व्यापाद्यमान पश्यति तस्यान्यस्मिञ्जन्मान्तरेऽक्षि रोगो न भवति । मया सलु विपप्रन्थिगर्भप्रविष्टेनेव कीटकेन विमप्यन्तरं मृग्यमाणेनोत्पादितस्तस्य दरिद्रचारुदत्तस्य विनाश । साम्प्रतमात्मीयाया प्रासादवालाग्रप्रतोलिकायामधिरह्यात्मन पराक्रम पश्यामि । (तथा कृत्वा दृष्ट्वा ) ही ही एतस्य दरिद्रचारदत्तस्य वध्य नीयमानस्य एतावान् जनसम्मर्दो, यस्या वेलायामरमाइश प्रवरो वरमनुष्यो वभ्य नीयते तस्या वेलाया कीदृशं ( कीदृशो ) भवेत् । (निरीक्ष्य ) कथमेप स नवबलीयद इव मण्डितो दक्षिणां दिश नीयते। अथ मदीयाया प्रासादबालाप्रप्रतोलिया समीपे घोपणा निपतिता निवारिता च। (विलोक्य ) कथ स्थावरकचेटोऽपि नास्तीह। मा नाम तेनेतो गत्या मन्त्रभेद कृतो भूयते (भविष्यति। तद्यावदेनमन्वेपयामि । ( इत्यवतोपर्योपसर्पति) मागधी प्राकृत १०७ १६. कापटिक-प्रलाप शकार-(सहर्षम) मशेण तिक्खाबि(वि)लकेण भत्ते शाकेण शूपेण शमच्छकेण | भुत्त मए अत्तणअश्श गेहे शारिश्शकूलैण गुलोदणेण ।। ( कर्ण दत्वा) भिण्णकशखखणाए चण्डालनाआए शलशजोए नधा अ एशे उक्खालिदे वज्झडिण्डिमशद्दे पडहाण अशुणीअदि तथा तस्केमि दलिद्दचालुदत्ताके वज्झहाण णीअदि ति। ता पेक्खिश्श । शत्तु- विणाशे णाम महन्ते हलअश्श पलिदोशे होदि । शुद च मए जे वि(वि) किल शत्तु वाबा(वा)दअन्त पेक्खदि तश्श अण्णशिश जम्मन्तले अक्खिलोगे ण होदि । मए क्खु विशगण्ठिगन्मपविश्टे(स्टे)ण विअ कीडएण किं पि अन्तल मग्गमाणेण उप्पाडिदे ताह दलिद्दचालुदत्ताह विणाशे। शम्पद अत्तणकेलिकाए पाशादबालग्गपदोलिकाए अहिलुहिम अत्तणो पलकम पेक्खामि । (तथा कृत्वा दृथ्वा च ) ही ही एदाह दरिदचालुदत्ताह वज्झ णीअमाणाह एवड्ढे जणशम्मद्दे न वेल अम्हालिशे परले बलमणुश्शे वज्झ णीअदि त वेल कीदिश भवे । (निरीक्ष्य) कघ एशे शे णववरद्दके विअ मण्डिदे दक्खिण दिश णीअदि । अघ किण्णिमित्त मम केलिकाए पाशावालग्गपदोलिकाए शमीबे(वे) घोशणा णिब(4)डिदा णिवालिदा । (विलोक्य ) कध थावलकचेडे बि(वि) णत्थि इघ । मा णाम तेण इदो गदुम मन्तभेदे कडे भरीअदि । ता नाव ण अण्णेशामि । ( इति अवतोपर्योपसपति) १. शूद्रक विरचित-मुच्याटिक (Stenzler द्वारा सम्मानित ) के दशम अंक (पृष्ठ १६३.१६४ ) से उदत ।
प्राकृत-प्रवेशिका
(संस्कृतच्छाया)
राक्षसी-(विकृत विहस्य सपरितोषम् )
हतमानुपमांसभोजनं कुम्भसहस्रवसाभिः सचितम् ।
अनिशं च पियामि शोणितं वर्षशतं समरो भविष्यति ॥
( नृत्यन्ती सपरितोपम्) यदि सिन्धुराजवदिवस इव समरकर्म
प्रतिपद्यतेऽर्जुनस्ततश्च पर्यन्तभरितकोष्ठागारं मांसशोणितम गृह
भूयत्ते ( भवति)। (परिक्रम्य दिशोऽवलोक्य ) अथ क्व नु
रुधिरप्रियो भूयते (भवति)। तद्यावदस्मिन्समरे प्रियभार
रुधिरप्रियमन्विप्यामि । (परिक्रम्य ) भवतु शब्दापयिष्यामि
तावत् । रुधिरप्रिय। रुधिरप्रिय ! इत एहीत एहि ।
(ततः प्रविशति तथाविधो राक्षस )
राक्षस'-(श्रम नाटयन् )
प्रत्यग्रहतानां मांसकं यधुणं रुधिरं च लभते ।
तदेप मम परिश्रमः क्षणमानमेव लघु नश्यति ।।
( राक्षसो पुनाहरति )
राक्षसः-(माकप ) अरे क एप मां शब्दापयति ? (विलोक्य ) अरे
कथं वसागधा। (तपस्त्य ) वसागन्धे मां किं शब्दापयसि ?
राक्षसी-रुधिरप्रिय। एतत् सलु तव कारणात्प्रत्यग्रहतस्य कस्यापि
राजर्षे शरीरावयवप्रभूतं प्रभूतपसारनेहचिकण कोष्णं रुधिरम
अमांस चानीतं तत्पिबैनत्।
राक्षस -( सपरितोषम् ) साधु वसागन्धे साधु, शोभनं कृतं त्वया बली-
योऽस्मि पिपासित एतत्कोष्णं रुधिरमानीतम् ।
राक्षसी-रुधिरप्रिय । ईदृशे हतनरगजतुरगमशोणितवसासमुद्रदु.संचरे
समराङ्गणे परिभ्रमन् त्वं पिपासितोऽसीदित्याश्चर्यमाश्चर्यम् ।
मागपो प्राकृत १०६ १७. शोणित पिपासा' राक्षमी-(विकृत विहस्य, सपरितोपन) हदमाणुशमशमोअगे कुम्भशशवशाहि शचिदे। मणिशम पित्रा(वा)मि शोणिय वरिशशद शमले हुविश्शदि ॥ ( नृयती सपरितोपन ) नइ शिन्धुलामबहदिमहे विन शमस्कम्म पडिव(व)जइ मजुणोणे) तदो भ पनन्तमलिदगोहागाले मशशोणिएहि मे गेहे हुवीअदि । (परिक्रम्य दिशोऽदलोक्य ) अह कहिं णु मुहिलप्पिए हुवीअदि । ता नाव इमरिश शमले पिअमाल लहिलप्पिा मष्णेशामि। (परिक्रम्य ) होदु शद्दान(व,इश्श दाव। लुलिप्पिा मुहिरप्पिा इदो एहि इदो एहि । (तत प्रविशति तयाविषो रापत ) राक्षस -(धम नाटयन ) पच्चग्गहदाण मशए नइ उन्हे लहिले अम्मइ । ता एशे मह परिदशमे खणमेतं एल्व रहुणदाइ । (रासो पुनहिरति) राक्षम -(वारय ) अले के एशे म शद्दावे(वे)दि । (विलोक्य) अले कहं वशागन्या। (उपरत्य) वशगन्धे मॅकोश शद्दावे (व)शि । राक्षमी-लुहिलप्पिा एद क्तु तुह कालणादो पच्चागहदरश कश्श वि (वि) राएशिणो शीलावभयप्पद पदवशाशिदचिक्कण कोण्ह दुहिल अम्गमं च आणीद ता पिपा(वा)हि । राक्षम -(सारितोषम् ) शाहु वशागन्धे शाहु, शोहणं किंद तुए वरिमम्हि मिा(वा)शिदे एन कोशिण मुहिलं माणीद । राक्षमी-बुदिपिया ईविशे दणरगअनुल गमशोणिभवशारामुद्रशचले शामन्महगे पटिन्भमन्ते तुम गि(या)शिमशि वि अच्चलिर्भ मच्चनिया १. मारनाराय(cf यशोरिचित-दोहार (Tulus Grilla समाति एवं Leipzig म १८७१ में प्रसारित) के तृतीर मा (3३३-17) से उनपत्र।
११० प्राकृत प्रवेशिका (संस्कृतच्छाया) राक्षस :-(सक्रोघम्) अरे वसागन्थे ! पुत्रघटोत्कचशोकसंतप्तहृदयां स्वामिनी हिडिम्यादेवीं प्रेक्षितुं गतोऽस्मि । राक्षसी-रुधिरप्रिय ! अद्यापि स्वामिन्या हिडिम्यादेव्या घटोत्कच. शोको नोपशाम्यति । राक्षस :-अयि ! कुतोऽस्या उपशम , किन्त्वभिमन्युवधशोकसमान- दुःखया सुभद्रादेव्या याज्ञसेन्या च समाश्वास्यते । राक्षसी-रुधिरप्रिय। गृहाण त्वमेतद्धस्तिशिर.कपालसंचितमप्रमां- सोपदशं च पित्र नवशोणितासवम्। राक्षस:-(तथाकृत्वा) यसागन्धे । अथ कियत्प्रभूतं त्वया संचितं रुधिर. मग्रमांसंच १ राक्षसी--अरे रुधिरप्रिय ! पूर्वसंचितं त्यमेव जानासि, नवसंचितं शृणु। भगदत्तशोणितकुम्भः सिन्धुराजवसाकुम्भी द्वी मत्स्याधिपभूरिश्रव सोमदत्तबाल्हीकप्रमुखाणां नरेन्द्राणां प्राकृतपुरुषाणां च रुधिरवसामांसस्य घटा अपिनद्धमुखा सहस्रसंख्याः सन्ति मे गृहे। राक्षस -सपरितोपमालिङ्गय) साधु साधु सुगृहिण्याः साधु साधु । अनेन ते सुगृहिणीत्वेन स्वामिन्या हिडिम्बादेव्याः संविभागेन च प्रनष्ट मे दारिद्रयम्। राक्षसी-रुधिरप्रिय ! कीदृश सामिन्या संविभागः कृतः? राक्षस :-अद्याह स्वामिन्या हिडिम्बादेव्या सबहुमान शब्दापयित्वा- ज्ञप्तो यथा रुधिरप्रिय अद्यप्रभृत्यार्यपुत्र भीमसेनस्य पृष्टतोड नुपृष्ठं समर आहिण्डित्तव्यमिति। तत्तस्यानुमार्गगामिनी हतमानुपशोणितनदीदर्शनप्रनष्टबुभुतापिपासयेहैव संगमस्तु मुलको में भूयते (भवति)। त्वमपि विश्नब्धा भूचा रुधिर- .वसाभिः कुम्भसहसं. संचय । है मागधी प्रारत १११ शिणु। १८. योग्यं योग्येन राक्षस:-( सक्रोधम् ) अले वशागन्धे । पुउघडुकमशोमर्शतवाहियों शामिणि हिडिम्यादेई पेक्खिढुं गदम्हि । रासपी-लहिलप्पिआ अज वि(वि) शामिणीए हिडिम्बादेईए घडुक्क- अशोए ण उप(व)शम्मदि। राक्षसः---अइ कुदो शे उप(4)शमे किं तु अहिमष्णुवहशोगशमाणदुक्खाए शुभदादेवीए लण्णशेणीए अ शमाशाशीअदि । राक्षसी-हिलप्पिआ गेह तुमं एवं हत्यिशिलकवा(या)लशंचिय अग्गमंशोव(व)दंश अपिय(ब)हि णवशोणिआशवं । रामस.---' तथा कृत्वा ) वशागन्धे अह फिअप्पहूदं तुए शंचिों लहिल अगमंशं च ! राक्षसी--अले लुहिलप्पिा । पुन्वशंचिों तुमं जेञ्च नाणागि, णवचिों भअदनशोणिकुम्भे शिन्धुलाअक्शाकुम्मे दुवे मच्छाहिय(वालिश्शवशोमदत्यल्हीअप्पमुराणं णसिन्दाणं पाकि- दपुलिशाणं च लहिलयशामंशश्श घडा अनि(विष्णद्धमुहा शह- श्शशुक्ला शन्ति मे गेहे। राक्षसः-(परितोपमासिग्य ) शाह शाहु शुग्परिणीए शाहु शाहु । इमिणा दे शुम्परिणिरण शामिणीए हिडिम्पादेवीए गंविदाएण अ पगह मे दालिदं । राक्षमी.-मुहिलप्पिा केलिदो शामिगोए मविदाए किदे ! राक्षम-अन महं शामिगोग हिटिम्बादेईए शवगाणं शदारि(वि)म आगचे नद दिप्पिा अन्न पदि अचउरीमशेणाम पिट्टदोगुपिट शमले यादिण्डिदच्वं चि(नि)। ता तश्य अणुनग्गग्गा मिणो हदमाणुरायोगिभगईदंशगप्पग मुम्मापिया(या शरय पद एल संगमी तुमुनओ मे दुवीअदि नुमं विवि) सिदा भरिम नहिरवादि गुमराहमा निहि । १. महनापि वेनीगंहार (गनार-Julrus Gnll) दीर (R)रोमा। -- ११२ प्राप्त प्रवेशिया अर्धमागधी प्राकृत प्रमुख विशेषताएं व्यञ्जनपरिवर्तन लुप्त व्यञ्जन > यश्रुति,श्रेणिकम् = सेणिय, च = यामध्वजा = कामज्मया, एतत् = एवं आदि। क>ग, श्रावक = सायगे, दारकस्य - दारगस । न>ण, न; गमनाय-मणाए, नाम - नाम। प>व, उपमा उवमा, तपति % तवइ । " शब्दरूप सु (विभक्ति प्रत्यय)- ए, क्वचित् ओ, श्रेणिक' = सेणिए, भगवन् - भगवन्तो भग। हे( ") आए, पाते , जिनाय = जिणाए, जिणाते । ) मसि, धरणीतले धरणीयलंसि, परिणम्यमाने परिणयमाणसि। तत्+भ्यस् - तेब्भो आदि । युष्मद् + ङस्तव आदि, अस्मत् + आम् = अस्माकं आदि । धातुरूप- भूतकाल बहुवचन में इसु प्रत्यय, पुच्छिसु गच्छिसु । कुछ विशिष्ट रूप- आचक्षति = आइक्सइ, अब्रवीत् = अब्बवी, आसीत् । होत्था आदि। १-संयुक्त व्यन्जन में यदि एक व्यन्जन ण हो तो उसे पण हो जाता है। स्थलों पर न होता है। यथा--जीणं = जुष्णं दत्त = दिन्न । A Manual of Ardha-Magadhi Grammar. (द्रष्टव्य--पाइअ सद्द-महण्णवो को भूमिका पृष्ठ ३६ से ४३ तक) तथा A Manual of Ardha-Magadhi Grammar by P.L Vaidya ) अन्य -
अर्धमागधी प्राकृत
११३
आगम तथा आदेश
म् आगम, एकम् = एगमेगं, निरयगामी निरयंगामी ।
अम्> अाम् ( एव से पूर्व ), तमेव - तामेव, एपमेव = एवामेव ।
इति पा>ति वा, इवा (दीर्घ स्वर से परे ) इन्द्रमह इति वा = इंदमहे
ति वा, दमहे इथा।
यथा>अहा, जहा; यथाजातं = अहाजातं, यथानामकः जहाणामए ।
यावत् > आव, जाय; यावरकथा = आपकहा, यावज्जीव - जावज्जीवं ।
तर>तराय, अल्पतरः- अप्पतराए, बहुतर'=बहुतराए ।
कृदन्त
पता> टु, च्चा, इत्ता, इत्ताणं, तुनाणं, पाय, आए।
कृस्या = कटु, किच्चा, परित्ता, करित्ताण, काउआणं।
गच्या = गधा, गच्छिचाणं ।
गृहीत्या = गहाय; आदाय = आयाए; संप्रेक्ष्य = संपेहाए।
तुम्>त्तए,
पतु = करित्तए, द्रष्टुम् = पासित्तए ।
(शेष प्राकृत के सामान्य नियमों के अनुसार)
प्राकृत-प्रवेशिका . (संस्कृतच्छाया) ततः खलु स कूणिको राजा चेल्लनाया देव्या अन्तिके एतमर्थ श्रुत्वा निशम्य चेल्लनां देवीमेवमवादीत्-"दुध सलु अम्ब ! मया कृतं श्रेणिक राजानं प्रियं दैवतं गुरुजनकमत्यन्तस्नेहानुरागरक्तं निगडबन्धन पुर्घता। तद् गच्छामि खलु श्रेणिकस्य राज्ञः स्वयमेव निगडानि छिनमि", इति कृत्या परशुहस्तगतो यत्रैव चारक्शाला तत्रैव प्रधारयति गमनाय । ततः सलु श्रेणिको राजा कूणिकं कुमारं परशुहस्तगतमेजमानं पश्यति, दृष्ट्वा एवमयादीत्– “एप सलु कूणिकः कुमारः अप्रार्थित- प्रार्थितो यावत् श्रीह्रीपरिवर्जितः परशुहस्तगत इह हव्यामगच्छति । तन्न ज्ञायते खलु मां केनापि कुमारेण (कुत्सितमारेण ) मारयिष्यती" ति कृत्वा भीतो यावत् संजातभयरतालपुटकं चिपमास्ये प्रक्षिपति । ततः खलु स श्रेणिको राजा तालपुटकविपे ास्ये प्रक्षिप्ते सति मुहूर्तान्तरेण परिणम्यमाने निष्प्राणो निश्चेष्टो जीवविप्रत्यक्तोऽक्तीर्णः। ततः सलु स कूणिकः कुमारो यन्नैव चारकसाला तत्रैवोपागतः, उपगत्य श्रेणिक राजानं जीयविप्रत्यक्तमवतीर्ण पश्यति, दृष्ट्वा महता पितृशोकेन आक्रान्त सन् परशुनिकृत्त इस चम्पम्वरपादप "स" इति धरणी- तले सर्याङ्गः सनिपतित । ततः सलु स कूणिक' कुमारो मुहूर्तान्तरेण श्रास्वस्थः सन् रुदन् क्रन्दन् शोचन् विलपन एवमवादीत्-"अहो ! सलु मया अधन्येनापुण्येनाकृतपुण्येन दुष्टु कृतं श्रेणिकं राजानं प्रियं देवतमत्यन्तस्नेहानुरागरक्तं निगडबन्धनं कुर्वता, मम मूलकं चैव खलु थेणिको राजा कालगत" इति ।
अर्धमागधी प्राकृत १९. श्रेणीकराजस्य प्राणत्यागः' तए णं से कूणिए राया चेल्लणाए देवीए अन्तिए एयम? सोच्चा निसम्म चेल्लणं देवि एवं वयासी--"दुटु णं, अम्मो, मए कयं सेणिय रायं पियं देवयं गुरुजणगं अच्चन्तनेहाणुरागरतं नियलबन्धणं करन्तेणं । तं गच्छामि णं सेणियस्स रन्नो सयमेव नियाणि छिन्दामि" ति कट्ट परमुहत्थगए जेणेव चारगसाला तेणेव पहारेत्य गमणाए। तए नं सेणिए राया कूणियं कुमारं परसुहत्थगयं एज्नमाणं पासइ, पासिता एवं वयासी---"एस णं कूणिए कुमारे अपस्थियपस्थिए नाव सिरिहिरिपरिवज्जिए परमुहत्यगए, इह हव्यमागच्छइ । तं न नग्नइ णं ममं केणइ कुमारेणं मारिस्सइ" ति कट्ट भीए नाव संनायभए तालपुहगं विसं आसगंसि परिखबह । तपणं से सेणिए राया तालपुडगविससि आसगंसि पक्खिते समाणे गहुरन्तरेण परिणममाणंसि निप्पाणे निच्चे? नीवविप्पनढे मोडण्णे । तए णं से कूणिए कुमारे जेणेव चारगसाला तेणेव उयागए उयाच्छिता सेणिय राय निप्पाणं निच्चेट नीयविप्पन ओइण्णं पासइ, पासिचा महया पिदसोएणं अप्फुण्णे समाणे परमुनियते विय चम्पगबरपायवे धम ति धरणीयसि सच्चोहिं संनियडिए । तए णं से कूणिप कुमारे मुहुरन्तरेण आसथे समाणे रोयमाणे फन्दमाणे सोयमाणे विलयमाणे एवं वयासी-"महो ग मए अपन्नेणं अपुष्णेणं अकयपुग्णेणं दुदृ कर्य सेणियं राय पियं देवयं अच्चन्तनेहाणुरागर नियनबन्धणं फरन्तेणं । मममूलागं व नं सेमिए राया फालगए" चि। १. रिपारलियामो ( सना एवं प्रशा माटर पो० एमः पेग, पूना १९१२)प्रपम वर्ग (. १७.१८)मेनान ।
११६ प्राकृत प्रवेशिका . (संस्कृतच्छाया) तत खलु स चेटको राजा अस्याः कथाया लब्धार्थः सन् नवमल्लकि- नवलेच्छविकाशीकौशलकान्नष्टादशापि गणराजान् शब्दयति, शब्दयित्वा एवमयादीत्-एवं सलु देवानुप्रियाः! वैहल्ल्यः कुमारः कूणिकस्य राज्ञोऽसविदितेन सेचनकं गन्धहस्तिनमष्टादशवकं च हारं गृहीत्वा इह हव्यमागतः। ततः खलु कूणिकेन सेचनकस्याप्टादशवक्रस्य चाय त्रयो दूताः प्रेपिता । ते च मयाऽनेन कारणेन प्रतिपिद्धाः। ततः खलु स कूणिको मम एतमर्थमप्रतिशृण्वन् चातुरङ्गिण्या सेनया सार्द्ध संपरिवृतो युद्धसज्ज इह हव्यमागच्छति। तत् कि नु देवानुप्रियाः ! सेचनकम- टादशवकं च कूणिराय राज्ञे प्रत्यर्पयामः ? वैहल्ल्यं कुमार प्रेपयामः ? टताहो युध्यामहे ? तत सलु नवमलकिनक्लेन्छविराशीकौशलका अष्टादशापि गणराजाश्चेटकं राजानमेवमवादिपुः-'नैतत् स्वामिन् ! युक्तं वा प्राप्तं वा राजसहशं या यत्खलु सेचनकमष्टादशवक्र कूणिकाय राजे प्रत्यप्यते, वैहल्ल्यश्च कुमार शरणागतः प्रेष्यते । तत् यदि खलु फूणिको राजा चातुरगिण्या सेनया सार्द्ध संपरिवृतो युद्धसज्ज इह दव्यमागच्छति तदा सलु वयं कूणिकेन राज्ञा सार्द्ध युध्यामहे ।' ततः सलु स चेटको राजा तान नवमलकि नवलेच्छवि काशी-कौश- लगानष्टादशापि गणराजान् एवमवादीत् - यदि सलु देवानुप्रियाः ! यूयं कुणिकन राज्ञा सार्द्ध युध्यध्ध, तद्गच्छत सलु देवानुप्रियाः स्वपु सवेषु राज्येषु, स्नाता यथा कालादिका यावजयेन विजयेन पर्द्धयन्ति । ततः सलु स चेटको राजा कौटुम्विकपुरुषान् शब्दयति, शब्दयित्वा एवमवादीत् आभिपेक्यं यथा पूणिको यावद् दुरुढ ।
अर्धमागधो प्राकृत १ २०. कृणिकचेटकयोयुद्धोद्योगः तए णं से चेडए राया इमीसे कहाए लट्टे समाणे नव मलई नव लेच्छई कासीकोसलगा अट्टारस वि गणरायाणो सदावेइ, सदाविना एवं वयासी-एवं खलु, देवाणुप्पिया, वेहल्ले कुमारे कूणियस्स रन्नो असंविदिएणं सेयणगं अट्टारसर्वकं च हार गहाय इहं हव्यमागए। तए गं कृणिएणं सेयणगस्स अट्टारसवंकस्स य अट्टाए तो दूया पेसिया । ते यं मए इमेणं कारणेणं पडिसेहिया । तए णं से कूणिए ममं एयमढें अपडिमुणमाणे चाउरङ्गिणीए सेणाए सद्धि संपरिबुडे जुद्धसग्ने इह हन्धमागच्छइ। तं किं णं, देवाणुप्पिया, सेयणगं अट्टारसर्वकं कूणियस्स रन्नो पच्चप्पिणामो ? वेदल्लं कुमारं पेसेमो ! उदाहु जुम्झिन्था ! तए णं ना मलई ना लेच्छई कासीकोसलगा अट्टारस वि गणरायाणो चेडगं रायं एवं वयासी-~-"न एयं, सामी, जुत्तं वा पतं वा रायसरिसं वा, नणं सेयणगं अट्टारसर्वकं यूणियस्स रन्नो पच्चप्पिणिज्नइ, वेहले य कुमारे सरणागए पेमिन्जड । तं नइ णं कृणिए राया चाउरहिणीए सेणाए सद्धिं संपरिबुडे जुद्धसज्जे इ हल्वमागच्छद, तए णं अम्हे कृगिएणं रन्ना सद्धि जुन्झामो"। तए णं से चेहए राया ते नर मलई नव लेच्छई फासीकोसलगा भारम वि गणरायागो एवं वयामी--"नइ णे, देवाणुप्पिया, तुम्मे कृषिएणं रन्ना सद्धि जुम्झद, तं गच्छह णं, देवाणुप्पिया, सरसु सामु रज्जेमु व्हाया, नहा काराईया," नार नरणं विजएणं वदावेन्ति । मे चेटए राया कोम्बियपुरिसे सद्दानेद, सदाविन एवं वयामी- "वाभिमेर, ददा पृणिप" बार दुम्द्ध । १. निरपापियानो (समास एप प्रारार पो. एन. ग, पूना १६३२) पेपर वर्ग (१४२६.२७सेना। , - प्राकृत-प्रवेशिका (सस्कृतच्छाया) सेन कालेन तेन समयेन (तस्मिन् काले तस्मिन् समये) वाणिजमामो नाम नगरमासीत् ऋद्धस्तिमितसमृद्धम् । तस्य खलु वाणिजग्रा- मस्योत्तरपौरस्त्ये दिग्भागे दूतीपलाश नामोद्यानमासीत् । तत्र खलु दूती- पलाशे सुधर्मणो यक्षस्य यक्षायतनमासीत् । तन खलु वाणिजपामे मित्रो नाम राजा आसीत् । तस्य खलु मित्रस्य राज्ञ श्री म राज्ञी आसीत्। तत्र सलु वाणिजग्रामे कामध्वजा नाम गणिका आसीत् अहीनयावत् सुरूपा द्वासप्ततिकलापण्डिता चतुःपष्टिगणिकागुणोपपेता एकोनविंशति विशेषेषु रममाणा एफविंशतिरतिगुणप्रधाना द्वानिशत् पुरुपोपचार कुशला नवाङ्गसुप्तप्रतियोधिता अष्टादशदेशीयभाषाविशारदा शृङ्गारागार चारुवेपा गीतरतिगन्धर्थनाट्यकुशला संगत-गत-इसित-भणित- विहित-विलास-ललित सलाप-निपुण-युक्तोपचारकुशला, सुन्दर-स्तन- जघन-बदन-र-चरण-लावण्यविलासकलिता उच्छ्रितध्वजा सहस्सलामा वितीर्णकनचामरवालव्यजनिका कीरथप्रयाता चापि आसीत् बहूनां गणिकासहस्राणामाधिपत्यं पौरोवृत्यं स्वामित्वं भर्तृत्वं महत्तरकत्वमा- शेश्वरसेनापत्यं कारयन्ती (पर) पालयन्ती विहरति ।
अर्धमागधी प्राकृत २१. कामध्वजा गणिका' तेणं कालेणं तेणं समएणं वाणियगामे नाम नयर होत्था रिद्ध- स्थिमियसमिद्धे । तस्स णं वाणियगामस्स उत्तरपुरस्थिमे दिसीमाए दुईपलासे नाम उजाणे होत्था । तत्थ णं दूईपासे सुहम्मस्स नस्सस्स जक्खाययणे होत्था । तत्थ पं वाणियगामे मिचे नाम राया होत्था । तस्स णं मितस्स रन्नो सिरी नाम देवी होत्था । तत्थ णं वाणियगामे कामझया नाम गणिया होत्था अहोण-नाव सुरूवा बाबत्तरिकलापण्डिया चउसटिगणियागुणोवरेया एगूणतीसरिसेसे रममाणी एकावीसरइगुणप्पहाणा बत्तीसपुरिसोययारकुसला नबगसुतपडियो- हिया अट्टारसदेसीभासाविसारया सिंगारागार चारुसा गीयरइगन्धरन- कुसला संगय-गय-हसिय-भणिय-विहिय-विलास-ललिय-संलाव-निउण-जुतो- वयारकुसला, सुन्दर-थग-जहण-चयण-करचरण-रावणविलास कलिया असियज्झया सहस्सलम्मा विदिष्णउवचामरवालवीयणीया कप्पीरहप्पयाया यादि होत्था बहूण गणियासहस्साणं आहेवच्चं पोरेवच्चं सामित्र मट्टितं महचरगतं आणाईसरसेगावच्चं कारेमाणी पालेमाणी विहरइ । --- १. मिगुम (आर. एम. पेच पा द्वारा समाति एवं प्रसारित १९५१) ११-१७ से उनष्ठ ।
प्राकृत-प्रवेशिका (संस्कृतच्छाया) तेन कालेन तेन समयेन ( तस्मिन् काले तस्मिन् समये ) श्रमणस्य भगवतो महावीरस्य ज्येष्ठोऽन्तेवासी इन्द्रभूतिर्यावत तेजोलेश्यः पष्ठ पप्ठेन यथा प्रज्ञप्तौ प्रथमायां यावत् यत्रैव वाणिजग्रामः तत्रैवोपागच्छति उपग- त्य बाणिजगामे उच्चनीचमध्यमानि कुलानि अटम् यत्रैव राजमार्गः तत्रैगो- पागच्छति, उपगत्य तत्र खलु बहून् हस्तिन पश्यति सनद्धबद्धवर्मित- गुडितान उत्पीडितवरबान, उहामितघण्टान, नानामगिरत्नविविधप्रैवेय- कान् , उत्तरकञ्चुकितान् , परिकल्पितध्वजपताकावरपञ्चापीडान् आरुढ- हस्त्यारोहान गृहीतायुधप्रहरणान् । अन्यांश्च नत्र बहून् अश्वान् पश्यति, संनद्धबद्धवर्मितगुडितान, आविद्धगुडान , अवसारितपक्सरान् उत्तरक चुकितान् भवचूलकमुखचण्डाधरचामरस्थासकपरिमण्डितकटीन आरूढा- श्वारोहान् , गृहीतायुधप्रहरणान् , तेषां च खलु पुरुपाणा मध्यगतं एक पुरुपं पश्यति, अवकोटकबन्धनम, उत्कृत्तकर्णनासम्, स्नेहतपितगात्रम् बद्धकरकडियुगन्यस्तम्, कण्ठे गुणरक्तमाल्यदामान चूर्णगुडितगाम , चूर्णकम् , वध्यप्राणप्रियं तिलं तिल चैव छेद्यमान कागणिमाससाद्यम् , पापं सर्सरशतैहन्यमान, अनेकनरनारिसंपरिवृतं चत्वरे चत्वरे सण्डपट- हेन उद्घोप्यमाणम् , इमां च ग्यलु एतद्रूपाम् उद्घोपणां शृणोति-नो खलु हे देवानुप्रिया ! उजिमतकस्य दाररस्य कोऽपि राजा या राजपुत्रो घा अपराध्यति, आत्मनस्तस्य स्वकानि कर्माणि अपराध्यन्ति ।
. तत्थ अर्धमागधी प्राकृत २२. कर्म-विपाक तेणं कालेणं तेणं समएणं समणस्स भावओ महावीरस्स जेट्टे अन्तेवासी इन्दभूई नाम अणगारे नाव लेस्से छटुंछट्टेणं, जहा पन्नत्तीए, पहम जाव जेणेव वाणियगामे नयरे तेणेव उवागच्छइ, उवागच्छिता उच्चनीयमज्झिमकुलाई अहमाणे जेणेव रायमग्गे तेणेव ओगाढे । णं वहवे हत्थी पासइ संनद्धवद्धवम्मियगुडियउप्पीलियफच्छे उद्दामियघण्टे नाणामणिरयणविविहगेवेग्जउत्तरकन्चुइज्जे पडिकप्पिए झयपडागवरप चामेलआरूढहत्थारोहे गहियाउहप्पहरणे। गन्ने य तत्थ पहवे भासे पासइ संनद्धवद्धवग्मियगुदिए आविद्धगुडे ओसारियपक्खरे उतरक- न्चुइयगोचू लमुहचण्डावरचामरथासगपरिमण्डियफलिए आरूढमासारोहे गहियाउप्पहरणे। अन्ने य तत्थ बहवे पुरिसे पासइ संनद्धवद्धचम्मियकवए उत्पीलियसरासणपट्टिए पिणद्धगेवेजे विमलरबद्धचिन्धपट्टे गहियाउहप्प- हरणे। तेसिं च णं पुरिसाणं मज्झगयं पुरिसं पासह अवओटयबन्धणं उस्कित्तकण्णनासं नेहतुप्पियगत वज्झकरखडियजुयनियत्थं कण्ठे गुण- रत्तमाटदाम चुण्णगुण्डियगत्तं चुण्णयं वज्झपाणपियं तिलं तिलं चेव बिजमाण कागणिमंसाई खावियन्तं पायं खरखरगसरहिं हम्ममाण अणेगनरनारीसंपरियुदं चच्चरे चच्चरे खण्डपडहएणं उग्पोसिन्जमाणं । इमं च णं एयाख्वं उग्घोसणं पडिमुणेइ-नो खलु, देवाणुप्पिया, अभियगस्स दारगस्स के राया वा रायपुचो वा अरज्झइ, अप्पणो से सयाई कम्माई अपरन्झन्ति । १. निगमगुग (गार पी. ए. पेदा दारा मापादित एवं प्रमाशित, १९३) १४.१८ से उन्त ।
१२२ प्राकृत-प्रवेशिका १ - जैन-शौरसेनी प्राकृत विशेषताएँ प्रमुख १. अनादि असंयुक्त क, ग, आदि व्यञ्जनों का प्राय. लोप हो जाता है। तत्पश्चात् यदि अ या प्रा अवशिष्ट रहे तो लुप्त व्यञ्जन के स्थान पर यश्रुति होती हैं। सामायिकम् - सामइयं, वचनैः = वयणेहि, योगिनी = जोइणी, गजाः गया आदि। २. यदि लुप्त वर्ण के पूर्व उकार हो तो प्राय वश्रुति हो जाती है। मनुज मणुवो, उदरम् = उवरं। ३. कुछ स्थलों पर क को ग एवं त को द हो जाता है। अवकाशम् = अवगासं, एकम् = एगं, गतीनाम् गदीणं, भणितः भणिदो। १. (अ) दिगम्बर जैनो के आगम ग्रन्थो की भाषा को जैन शौरसेनी संज्ञा दी गई। वास्तव में यह भापा शौरसेनी प्राकृत का ही प्रारम्भिक रूप है। नाटको में पाई जाने वाली शौरसेनी इसी का परिष्कृत रूप है। इसमें हमें अर्धमागधी प्राकृत से साम्यता रखने वाले कुछ वर्णविकार मिलते हैं, जिससे कि वर्तमान शौरसेनी से यह कुछ भिन प्रतीत होती है। अत एव इसे जैन-शोरसेनी नामक सज्ञा दे दी गई। इतना अवश्य है कि जिन्होने केवल संस्कृत नाटको मे स्थित शौरसेनी प्राकृत के अशो का सामान्य अध्ययन क्यिा हो उन्हे जैन-शौरसेनी प्राकृत कुछ अपरिचित सो प्रतीत होगी। जैन शौरसेनी प्राकृत के ज्ञान के लिए कही कहीं अर्धमागधी के ज्ञान की भी आवश्यकता होती है । अत: उसको कुछ विशेषताओ का उल्लेख उसे पृथक भाषा मानकर किया गया है। इसके प्रमुख अन्य प्रवचनसार समयसार, कार्तिकेयानुप्रेक्षा आदि हैं। (ब) इस भाषा के विस्तृत ज्ञान के लिए देखिए डॉ० ए० एन० उपाध्ये द्वारा सम्पादित प्रवचनसार एवं वातियानुप्रेक्षा प्रयो की भूमिकाएँ।
जैन-शौरसेनी प्राकृत
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४. अनुनासिक व्यजनों में केवल ण एवं म का ही अस्तित्त्व पाया
जाता है। स्ववर्ग के पूर्व आने वाले ह , न् , ण, न, म , को नियम
से अनुस्वार हो जाता है। न कोण्ण होता है।'
नियमेन -णियमेण, भुजङ्ग = मुयंगो, किश्चित् = किंचि, सण्डेपु =
संडेसु, वन्दितः = वंदिओ, संप्राप्ति: संपत्ती, भिन्नं = भिण्णं ।
५. कुछ स्थलों पर व्यअनों में द्वित्त्वीकरण की प्रवृत्ति देसी जाती
है। त्रिलोकशिसामणिः तिल्लोयसिहामणी, शौचम् - सउच्च ।
६. कहीं कहीं विभक्ति-प्रत्यय से शून्य पद दृष्टिगोचर होते हैं।
जैसे-अधुनमशरणं भणिताः = अद्भुव असरण भणिया ।
७. सप्तमी विभक्ति के एकवचन में टि को म्हि भी होता है।
स्वरूपे = सस्वम्हि, लोके = लोयम्हि ।
८. क्या प्रत्यय के स्थान पर ता, च्चा भी होते हैं।
ज्ञात्या- जागित्ता, फत्त्वा-किच्चा आदि ।
भार• पियत ने अर्धमागपो, जैनमहाराष्ट्रो एवं जैन धोरमेनी में राम्दारे
प्रारम्मिा म एवं मध्यान, पो मारिधि बताया है (देशिए
f.प्रा० पाय• नं. २१) froनगारगेनो में दोनों (म.) ही
महों पारे नगा।
१२४
प्राकृत-प्रवेशिका
(संस्कृतच्छाया)
कथ
गाथा ३ परभवनयानयाहनशयनासनानि देवमनुजराज्ञाम् ।
मातृपितृस्वजनभृत्यसम्बन्धिनश्च पितृव्योऽनित्याः॥१॥
गाथा ४ समग्रेन्द्रियरुपमारोग्यं यौवनं बलं
तेजः।
सौभाग्यं लावण्यं सुरधनुरिव शाश्वतं न भवेत् ।।२।।
गाथा ६ जीवनिबद्ध देहं (देह) क्षीरोदकमिव विनश्यति शीघ्रम् ।
भोगोपभोगकारणद्रव्यं नित्य
भवति ॥शा
गाथा ८ मणिमन्त्रौपधरक्षा हयगजरथाश्च सकलविद्या ।
जीवानां न हि शरण त्रिषु लोकेषु मरणसमये ॥४॥
गाथा ९ स्वर्गो भवेत् हि दुर्ग भृत्या देवाश्च प्रहरणं वञम् ।
एरावणो गजेन्द्र इन्द्रस्य न विद्यते शरणम् ।।५।।
गाथा १० नवनिधिः चतुर्दशरत्नं ह्यमत्तगजेन्द्रचतुरङ्गबलम् ।
चकेशस्य न शरणं पश्यत फर्दिते कालेन ॥६॥
गाथा १४ एफ: क्रोति कर्म एक. हिण्डति च दीर्घसंसारे।
एक: जायते नियते च तस्य फलं भुङ्क्ते एकः ॥७॥
गाथा १५ एकः करोति पापं विपयनिमित्तेन तीव्रलोभेन ।
नरकतिर्यक्षु जीवो तस्य फलं भुङ्क्ते एक ||८||
गाथा १६ एकः करोति पुण्यं धर्मनिमित्तेन पानदानेन ।
मानदेवेषु जीवो तस्य फलं भुक्ते एकः ||६||
गाथा २१ मातृपितृसहोदरपुनकल नादियाधुसन्दोहः ।
जीवस्य न सम्बन्धो निजगर्यवशेन वर्तन्ते ॥१०॥
गाथा २२ अन्योऽन्य शोचति मदीयोस्ति ममनाथक इति मन्यमानः ।
आत्मानं न हि शोचति संसारमहार्णवे पतितम् ॥११॥
४ ८ जैन-शौरसेनी प्राकृत १२५ २३. द्वादश-अनुप्रेक्षा' गाथा ३ वरभवणनाणवाहणसयणासण देवमणुवरायाणं । मादुपिदुसनणभिच्चसंधिणो य पिदिवियाणिच्चा ॥ १॥ गाथा सामग्गिंदियरूपं आरोग्गं नोयण बलं तेनं । सोहग्गं लावण्णं सुरधणुमिव सस्सयं ण हवे ॥ २ ॥ गाथा ६ जीवणिवद्धं देहं सीरोदयमिव विणस्सदे सिग्छ । भोगोपभोगकारणदव्यं णिच्चं कह होदि ॥ ३ ॥ गाथा मणिमंतोसहरक्खा हयगयरहओ य सयलविज्जाओ। जीवाणं ण हि सरणं तिमु लोए मरणसमयहि ॥ ४ ॥ गाथा ९ सम्गो हवे हि दुग्गं भिच्चा देवा य पहरणं वग्नं । अइरावणो गईदो ईदस्स ण विज्जदे सरणं ॥ ५ ॥ गाथा १० णवणिहि चउदहरयणं हयमतगईद चाउरंगरलं । चक्केसस्स ण सरणं पच्छतो कहिये काले ॥ ६ ॥ गाथा १४ एक्को करेदि फम्म एकको हिंदि य दीहसंसारे । एक्को नायदि मरदि य तस्स फलं भुनदे एकको ॥ ७ ॥ गाथा १५ एक्को करेदि पावं विसयणिमिचेण तिचलोहेण । गिरयतिरियेमु नोवो तम्स फलं भुजदे एकको ॥ ८ ॥ गाथा १६ एकको फरेदि पुण्णे धम्मणिमिरोग पत्ताणेण । मणुवदेवेषु नीनो सम्स फलं भुजद एकको ॥ ९॥ गाथा २१ मादापिदरसहोदरपुचफलचादिधुसंदोहो । जीवस्स ण संबंधो णियफग्नपसेण वन्ति ।। १० ॥ गाथा २२ अण्णो अण्ण सोयदि मदो ति मम णाहगो ति मम्णंतो। अप्पाणं ण हु सोयदि संगारमहष्णवे युद्ध ॥ ११ ॥ १. भागार्य पुन्दान (प्रथम रावादी) रिचित-गट्मामृतादिसंपदः (६० पन्नालाल सोनी द्वारा सम्मानित सपा श्री मानिददिगारमेन अन्यमाला समिति द्वारा कि. १९.७ प्रभागित) अतर्गत मारह बवेषगा
१२६
प्राकृत-प्रवेशिका
गाथा ३० पुत्रकलत्रनिमित्तं अर्थमर्जयति पापबुद्धथा।
परिहरति दयादानं सः जीवः भ्रमति संसारे ॥१॥
गाथा ३१ मम पुत्रो मम भार्या मम धनधान्यमिति तीव्रकाक्षया।
त्यक्त्वा धर्मबुद्धिं पश्चात् परिपतति दीर्घसंसारे ॥२॥
गाथा ३६ संयोगविप्रयोग लाभालाभं सुख च दुःखं च ।
संसारे भूतानां भवति हि मानं तथापमानं च ॥३॥
गाथा ७१ क्रोधोत्पत्तेः पुनः बहिरङ्गं यदि भवेत् साक्षात् ।
न करोति किश्चिदपि क्रोधं तस्य क्षमा भवति धर्म इति ॥४॥
गाथा ७२ कुलरुपजातिवुद्धिपु तपश्रुतशीलेषु गर्व किश्चित् ।
यो नैव करोति श्रमणो मार्दयधर्मो भवेत् तस्य ॥ ५॥
गाथा ७३ मुक्त्वा कुटिलभावं निर्मलहृदयेन चरति यः भ्रमणः।
आर्जयधर्मः तृतीयः तस्य तु संभवति नियमेन ॥ ६॥
गाथा ७४ परसन्तापककारणवचनं मुक्त्वा स्वपर-हितवचनम् ।
यो वदति भिक्षु तुरीयः तस्य तु धर्मः भवेत् सत्यम् ॥ ७॥
गाथा ७७ विपयफपायविनिग्रहभावं कृत्वा ध्यानस्वाध्यायेन ।
यो भावयत्यात्मानं तस्य तपः भवति नियमेन ॥८॥
गाथा ७९ भूत्या च निरसङ्गो निजभावं निगृह्य सुखदुःखदम् ।
निर्द्वन्द्वेन तु वर्ततेऽनगार: तस्याफिश्चन्यम् ।।६।।
गाथा ८० सर्वाङ्गं पश्यन् स्त्रीणा तासु मुश्चति दुर्भावम ।
स ब्रह्मचर्यभावं सुकृती सलु दु धरति ॥ १०॥
जैन शौरसेनो प्राकृत
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गाथा ३०
पुतफलचणिमित अत्थं अजयदि पापबुद्धीए ।
परिहरदि दयादाणं सो नोयो भमदि ससारे ॥१॥
गाथा ३१ मम पुत्तं मम भन्ना मम धगधण्योति तिरफखाए ।
चइऊण धम्मबुद्धिं पच्छा परिपडदि दीहसंसारे ॥२॥
गाया ३६ सनोगविप्पनोगं सहाराहं सुहं च दुक्ख च ।
संसारे भूदाणं होदि हु माण तहावमाणं च ॥३॥
गाथा ७१ कोहुप्पत्तिस्स पुणो बहिरंग जदि वेदि सरखाद ।
ण कुणदि किंचि नि कोहो तस्स समा होदि धम्मोति ॥४॥
गाथा ७२
कुलम्काजादिबुद्धिमु तवमुदसोलेसु गारवं किंचि ।
नो ण हि कुञ्चदि समणो मद्दवधामं हवे तस्स ॥५॥
गाथा ७३
मोच्ण कुडिलभाव णि-मरहिदयेण चरदिनो समणो ।
अन्नपपम्म तइयो तस्स दु संभादि गियमेण ॥६॥
गाथा ७४
परसंतावयकारणवयणं मोण सारहिदवयणं ।
नो वददि भिस्सु तुरियो तस्स दु धम्मो ये सच्चं ॥७॥
गाथा ७७
पिसयामायविणिग्गभावं फाऊण साणसम्झाए।
लो भावद अप्पाणं तम्स तर होदि णियमेण ॥८॥
गाथा ७९
होऊण य हिस्संगो गियभाव णिग्गदिच मुहहदं ।
गिददेण दु यदि अणयारो तस्य किंचण्डं ॥२॥
गाथा ८०
सवर्ग पेच्छतो इत्थोण वासु मुयदि दुभावं ।
सो मममेरभा मुकादि मन दुदर परदि ॥१०॥
१२८ प्राकृत-प्रवेशिका गाथा (संस्कृतच्छाया) गाथा४ यत् किचिदत्युत्पन्नं तस्य विनाशो भवति नियमेन । परिणामस्वरूपेणापि न च किंचिदपि शाश्वतमस्ति ॥१॥ गाथा ५ जन्म मरणेन समं संपद्यते यौवनं जरासहितम् । लक्ष्मीविनाशसहिता इति सर्व भड्गुरं जानीहि ॥२॥ गाथा ६ अस्थिरं परिजनस्वजनं पुत्रम्लत्रं सुमित्रलावण्यम् । गृहगोधनादि सर्व नवघनवृन्देन सदृशम् ॥३॥ गाथा ७ सुरधनुरतडिद्वत् चपला इन्द्रियविषयाः सुभृत्यवर्गाश्च । दृष्टप्रनष्टाः सर्वे तुरगगजाः रथवरादयश्च ॥४॥ गाथा पथि पथिकजनानां यथा संयोगो भवति क्षणमात्रम् । बन्धुजनानां च तथा संयोगोऽध्रुवो भवति ॥५॥ अतिलालिनोऽपि देहः स्नानसुगन्धैः विविधभक्षैः। क्षणमात्रेणापि विघटते जलभृत आमघट इव ।।६।। गाथा १० या शाश्वता न लक्ष्मीः चक्रधराणामपि पुण्यवताम् । सा कि बध्नाति रतिमितरजनानामपुण्यानाम् ।। गाथा १० पुत्रापि न रमते लक्ष्मीः कुलीनवीरेऽपि पण्डिते शूरे। पूज्ये धर्मिष्टेऽपि च सुवृत्तसुजने महासत्त्वे ।।३।। गाथा १२ तावद् भुज्यतां लक्ष्मीः दीयतां दानं दयाप्रधानेन । जलतरगचपला द्वित्रिदिनानि तिष्ठति ॥९॥ गाथा १३ थो पुनर्लक्ष्मी संचिनोति न च मुक्ते नेर ददाति पात्रेषु ! स आत्मानं वश्चयति मनुजत्वं निष्फलं तस्य ॥१०॥ गाथा १४ यः संचित्य लक्ष्मी धरणितले संस्थापयत्यतिदूरे । स पुरषः तां लक्ष्मी पापाणसमानिकां करोति ॥११॥ गाथा १५ अनवरत थ. संचिनोति लक्ष्मी न च ददाति नैव भुते । आत्मीयापि च लक्ष्मीः परलक्ष्मीसमानिया तस्य ॥१२॥ या जैन शौरसेनी प्राकृत १२९ गाथा ४ , गाथा ५ गाथा ६ गाथा गाथा गाथा २४. अनित्यानुप्रेक्षा नं किंचि वि उप्पणं तस्स विणासो हवेइ णियमेण । परिणाम-सरूवेण वि ण य किंचि वि सासयं अस्थि ॥१॥ नम्मं मरणेण समं संपज्जद जोवणं जरा-सहियं । लच्छी विणास-सहिया इय सर्व भंगुरं मुणह ॥२॥ अथिरं परियण-सयणं पुत-कलतं सुमित्त-लावणं । गिह-गोहणाइ सवं णव-घण-विदेण सारिच्छं ॥३॥ मुरघणु-तडिन्य चवला इंदिय-विसया सुभिच्च-वग्गा य । दिट्ठ-पणट्ठा सन्वे तुरय-गया रहवरादी य ॥४॥ पंथे पहिय-जणाणं नह संनोओ हवेइ खणमितं । बघु-नणाणं च तहा संजोओ अद्भुओ होइ ॥५॥ अइलालिओ वि देहो व्हाण-सुयंधेहि विविह-मक्खेहिं । खणमित्तेण वि बिहडइ नल-भरिको आम-घडओ व ॥६॥ ना सासया ण लच्छी चक्कहराणं पि पुण्णवंताणं । सा किं बंधेई रई इयर-नणाणं अपुण्णाणं ॥७॥ फत्य विण रमइ लच्छी कुन्गण-धीरे शि पंटिए सुरे। पुज्जे पम्मिट्टे पि य सुवर-सुयणे महासते ॥८॥ ता मुंनिग्नउ लच्छी दिग्बउ दाणं दया पहाणेग । ना नल-तरंग चवरा दो तिष्णि दिणाइ चिट्टेद ॥९॥ नो पुण लच्छि सचदि ण य मुंलदि णेय देदि पन्तु। सो अप्पाणं पंचदि मणुयचं गिफल तम्म ॥१०॥ तो सचिऊग रच्छि धरणियले संटरेदि महदूरे । सो पुरिसो तं रच्छि पाटाग-ममागियं कुगदि ॥११॥ अणवरयं नो संवदि लच्छिन य देदि गेय मुंजेदि । अप्पणिया वि य सच्ची पर-ररिसमागिया तस्म ॥१२॥ गाथा १० गाथा ११ गाथा १२ गाथा १३ गाथा १४ गाथा १५ स्गमी पुमार (१०.११वीं सतासी) द्वारा रिति-पतिवेगाना (रिमानुसा) (यो नमिताप बार बादिनाय जाटार गालिया दी गरी मनाई देगाई माग द्वारा ११९. में प्रामा ९ १३० प्राकृत प्रवेशिका 5 (सस्कृतच्छाया) गाथा ४२६ धर्म न जानाति जीवोऽथवा जानाति कथमपि टेन । पर्नु ततोऽपि न शक्नोति मोहपिशाचेन भ्रामित : गाथा ४२७ यथा जीव क्रोति रति पुनकलनेषु कामभोगेषु । तथा यदि जिनेन्द्रधर्म तल्लीलया सुख लभते॥ गाथा ४२८ लक्ष्मी वाञ्छति नरो नैव सुधर्मेपु आदर करोति । बीजेन विना कुनापि किं दृश्यते सस्यनिष्पत्ति ॥ गाथा ४२९ , यो धर्मस्थो जीव स रिपुवर्गेऽपि क्रोति क्षमाभावम् । तावत् परद्रव्य वर्जयति जननीसम गणयति परदारान् ।। गाथा ४३०१ तावत् सर्वनापि कीर्ति तापत् सर्वत्रापि भवति विश्वास । तावत् सर्व प्रिय भापते तावत् शुद्ध मानस क्रोति ।। गाथा ४३१ उत्तमधर्मेण युत भवति तिर्यगपि उत्तमो देव । चण्डालोऽपि सुरेन्द्र उत्तमधर्मण सभवति । गाथा ४३२ / अग्निरपि च भवति हिम भवति भुजङ्गोऽपि उत्तम रत्नम् । जीवस्य सुधर्माद् देवा अपि च किङ्करा भवन्ति । गाथा ४३३ । तीक्ष्ण सग माला दुर्जयरिपय सुखकरा सुजना । हालाहलमप्यमृत महापदा सम्पदा गाथा ४३४ अलीश्वचनमपि सत्य उद्यमरहितेऽपि लक्ष्मीसप्राप्ति । धर्मप्रभावेण नरोऽनयोऽपि सुखकरो भवति ।। गाथा ४३५ देवोऽपि धर्मत्यक्तो मिथ्यात्ववशेन तरूवरो भवति । चक्री अपि धर्मरहितो निपतति नरके न सन्देह ।। गाथा ४३६ धर्मविहीनो जीव करोत्यशक्यमपि साहस यद्यपि । तन्नापि गप्नोति इष्ट सुप्छु अनिष्ट पर लभते ।। गाथा ४३७ इति प्रत्यक्ष पश्यत धर्माधर्मयो विविधमाहात्म्यम् । धर्म आचरत ! सदा पाप दूरेण परिहरत ।। भवति।
जैन शौरसेनी प्राकृत १३१ २५. धर्म-माहात्म्यम्' गाथा ४२६ धम्म ण मुणदि नीवो अहवा नाणेइ कह व कटेण । काउ तो वि ण सादि मोहपिसाएण भोलविदो ॥१॥ गाथा ४२७ नह जीवो कुणइ रह पुत्त-करतेमु काम भोगेसु । तह जइ निणिंद धम्मे तो लीराए सुह रहदि ॥२॥ गाथा ४२८ लच्छि वछेइ गरो णेव सुधम्मेसु आयर कुणइ । बीएण विणा कत्थ वि किं दीसदि सस्स-णिप्पत्ति ॥३॥ गाथा ४२९ जो धम्मत्थो नोवो सो रिउ वग्गे वि कुणइ खम भाव । ता पर-दव्य वजइ नणणि-समं गणइ पर-दारं ॥४॥ गाथा ४३० ता सव्वस्थ वि फित्ती ता सम्मथ हवेइ वीसासो। ता सन्च पिय भासइ ता सुद्ध माणसं कुणइ ॥५॥ गाथा ४३१ उत्तम धम्मेण जुदो होदि तिरिक्खो वि उत्तमो देवो । चंडालो वि सुरिंदो उत्तम धम्मेण सभरदि ॥६॥ गाथा ४३२ अग्गो वि य होदि हिम होदि भुयगो वि उत्तम रयण । जीवस्स मुधम्मादो देवा वि य किंकरा होति ॥७॥ गाथा ४३३ तिख खग्ग मारा दुज्जय-रिउणो सुकरा सुयणा । हालाहल पि अमिय महावया संपया होदि ॥८॥ गाथा ४३४ अलिय वयण पि सच उज्जम रहिए विरच्छि-सपत्ती । घम्म पहावेण गरो अणओ वि मुह करो होदि ॥९॥ गाथा ४३५ देवो वि धम्मचचो मिच्उत्त-चमेण तस्वरो होदि । चकी वि धम्म-रहिओ णिवटइ गरए ण सदेहो ॥१०॥ गाया ४३६ पम्म विएणो नोरी पुणइ असाक पि साहस नइ वि। तो न वि पावदि दई मुटु भगिह पर रददि ॥११॥ गाया ४३७ इय पच्चरम पेच्छर पामादम्माण शिविद माहप्प । पर्म आयरह सया पाय दरेण परिदरह ॥१२॥ पप बन्दर्भ 'मरपनुगा' के एमITE १३२ प्राकृत-प्रवेशिया जैन-महाराष्ट्री प्राकृत प्रमुख विशेषताएँ (१) अनादि असंयुक्त क, ग, आदि व्यञ्जनों का लोप हो जाता है। यदि लुप्त व्यनों के अनन्तर अ या आ हो तो यश्रुति होती है। राजधूता=रायधूया, निपतिता निगडिया, वचनम् = चयणं, भगवती =भयवई। (२) कुछ स्थलों पर अनादि असंयुक्त क लुप्त न होकर अर्धमागधी प्राकृत की भॉति ग में परिवर्तित हो जाता है। एकाकिनी-एगागिणी, आकृति = आगिई, शोक = सोगो, अनुक- रोति = अणुगरेइ । (३) शब्द के प्रारम्भ मे स्थित न तथा मध्य में स्थित न्न प्रायः अपरिवर्तित रहता है। मुनिकुमारेण = मुणिकुमारेण, नाभि = नाही, दर्शनम् = देसण, अन्यथा :अण्णहा, विपन्न = विवन्नो। श्वेताम्बर जैनों के प्रागमेतर प्राकृत-ग्रन्थो की भाषा में महाराष्ट्री प्राकृत के साथ साथ यत्र तत्र अर्धमागधी प्राकृत के भी प्रयोग दृष्टिगोचर होते हैं। इसलिए इसे "जैन महाराष्ट्री' नामक संज्ञा दी गई है। यह नाम सुविधा की दृष्टि से पाश्चात्य विद्वानो द्वारा रखा गया है। कालान्तर में यही भाषा अर्धमागधी प्राकृत के प्रभाव से मुक्त होकर महाराष्ट्री प्राकृत के रूप मे हमारे सामने आई। प्रत जैन महाराष्ट्री प्रावृत को हम महाराष्ट्रो प्राकृत का प्रारम्भिक रूप कह सकते हैं। हेमचन्द्र कृत प्राकृत व्याकरण में लुप्त व्यजनो के स्थान पर केवल अया मा परे रहते यश्रुति एव शब्द के प्रारम्भिक न को वैकल्पिक ण आदेश का विधान इस बात का समेत है कि हेमचन्द्र जैनमहाराष्ट्री को भी उस भाषा के अन्तर्गत मानते थे जिसे उन्होने सामान्य प्राकृत नाम से कहा है। १ 8.xs जैन महाराष्ट्री प्रात (४) शब्दरुप तथा धातुरूप भी प्राकृत के सामान्य नियमों के अनुसार चलते हैं किन्तु कहीं कहीं अर्धमागधी के प्रयोग भी मिलते हैं। जैसे तृतीया विभक्ति के एकवचन मे मणसा, वयसा, कायसा आदि शब्दरूप एवं वर्तमानकाल प्रथमपुरुष एकवचन मे कुबइ, आइक्सइ आदि धातुरूप। (५) कहीं कहीं समस्तपद मे उत्तरपद के पूर्व अनुस्वार (म्) का आगम हो जाता है। जैसे-निरयगामी = निरयंगामी। (६) अर्धमागधी की तरह कहीं कहीं यथा के स्थान पर जहा एवं जहा तथा यावत् के स्थान पर जाव एवं आम आदेश होते हैं। (७) अर्धमागधी की तरह क्त्वा के स्थान पर कहीं कहीं इत्ता आदेश भी हो जाता है। पन्दित्वा = वन्दित्ता, आईयित्वा = उल्लेत्ता।
प्रारत प्रवेशिका (संस्कृतच्छाया) इतश्च सा राजदुहिता 'कुत्र आर्यपुत्रः' इति गवेपयन्ती निपतिता कान्तारमध्ये। मूढा दिशः । अप्रेक्षमाणा दयितं भ्रान्ता महाटव्याम् । परिणतप्राये वासरे समागता गिरिनदीम् । न दृष्ट आर्यपुत्र इति विपण्णा हृदयेन । चिन्तितं च तया। अल मे आर्यपुत्रविरहिताया जीवितेन । तत एतस्मिन्नशोकपादपे उल्लम्वे आत्मानमिति । निबद्धो वल्ल्या पाशः। न्यस्ता शिरोधरा। भणितं च तया--भगवत्यो वनदेवताः, न मया आर्यपुत्रं मुक्त्वा अन्यो मनसापि चिन्तितः । अनेन सत्येन जन्मान्तरेऽपि आर्यपुत्र एव भर्ता भवेदिति कृतं निदानम् । प्रवाहित आत्मा, त्रुटित. स्तस्याः पाशः, निपतिता धरणीपृष्ठे, 'गता मूर्छाम् । दृष्टाऽऽसन्नतपोवन वासिना संध्योपासननिमित्तमागतेन मुनिकुमारकेन । चिन्तितं च तेन-हा का पुनरेपा यनदेयतेच बी निपतिता धरणीपृष्ठे। अथवा किं मम स्त्रिया। अन्यत्तो गच्छामि। वारितं खलु समये स्त्रीदर्शनम्। भणितं च तत्र-अपि चासितव्यानि तप्तलोहशलाकयाऽक्षीणि, न द्रष्टव्या च अङ्गप्रत्यङ्गसंस्थानेन स्त्री, अपि च भक्षितव्यं विषम् , न सेवितव्या विषयाः, छेत्तव्या जिह्वा, न जल्पितव्यमलीकमिति । ततः किं ममानया, अनधिकारश्चेप मुनिजनस्य । अथवा दोनजनाभ्युद्धरणमपि समशत्रु- मित्रतया प्रतिपादितमेव । भगितं च तन। आत्मनिर्विशेपं द्रष्टव्या सर्वप्राणिनः, प्रवर्तितव्यं हिते यथाशक्ति, अभ्युद्धर्तव्या दीनाः, न खल्य- हिंसातोऽन्यद् धर्मसाधनमिति । दीना चैषा। अन्यथा कुत्रारण्यम् , कुत्रैकाकिनी स्त्री। ततः प्रेक्षे तावत् का पुनरेषा, मा नाम विद्याधरी प्रसुप्ता भवेत् । दृष्टा मुनिकुमारेण । दृष्टरतस्याः पाशः। विषण्णो मुनिकुमारः। चिन्तितं च तेन-अहो एपाऽऽकृतिः, एप च पाश इति विरुद्धमेतत् अथवा नास्ति कर्मपरिणत्या विरुद्धमिति ।
जैन-महाराष्ट्रो प्राकृत अल मे २६. पतिविरहिता राजदुहिता' इओ य रायधूया 'कहिं अज्नउत्त' ति गवेसमाणी निपडिया कन्तारमझे। मूढाओ दिसाओ । अपेच्छमाणी दइयय भमिया महाडवीए। परिणयप्पाए वासरे समागया गिरिनइ । न दिट्ठो अज्जउत्तो ति विसण्णा हियएण। चिन्तिय च णाए। अज्नउत्तपिरहियाए नीविएण | ता एयमि असोअपायवे उक्कलम्बेमि अत्ताणयं । निबद्धो वल्लीए पासओ। निमिया सिरोहरा। भणिय च गाए। भय ईओ वणदेवयाओ, न मए अज्जउत्त मोत्तूण अन्नो मणसा वि चिन्तिओ। इमिणा सच्चेण जम्मन्तरमि मि अज्जउत्तो चेव भना हवेज्ज ति कय नियाण । पाहिओ अप्पा, तुट्टो से पासो, निडिया घरणिवट्टे, गया मुच्छ । दिट्टा आसन्नतनोवणासिणा सझोवासणनिमित्तमागएण मुणिकुमारएण। चिन्तिय च णेणं । हा का उण एसा वणदेवया विव इस्थिया निडिया घरणिवढे । अहवा कि मम इत्थियाए। अन्नओ गच्छामि। वारिय खु समए इस्थियादसण । अवि य अनियव्वाइ ततलोहसरायाए अच्छीणि, न दट्टव्वा य अङ्गपच्चगसठाणेण इत्थिया, अवि य भक्खियन विस, न सेवियन्वा विसया, लिन्दियबा जीहा, न नपियन्वमरियं ति । मम इमीए, अणहियारो य एसो मुणिनणस्स। अहवा दीणनणअब्भुद्धरण पि समसमित्याए पडिवाइयमेव । भणिय च तत्य । अचाणनिन्विसेस दन्या सवपाणिणो, पवत्तियव्व हिए नहासत्तीए, अन्मुद्धरेयया दीणया, न खलु अहिंसाओ अन्न धम्मसाहण ति । दीणा य एसा । अन्नहा कहिं रण्ण, कहिं एगागिणी इत्थिया । ता पेच्छामि ताव, का उण एसा, मा नाम विग्नाहरी पमुचा भवे । पुलइया मुनिकुमारेण । दिट्टो से पासओ। विसण्णो मुणिकुमारो । चिन्तिय च णेण । अहो एसा आगिई एसो य पासओ ति विरुद्धमेय । अहवा नस्थि कम्मपरिणईए विरुद्ध ति । भणिय च तत्थ । ता कि १. श्री हरिभद्रसूरि ( ७०० ७७० ई.) विरचिता-समराइच्चाहा (भगरानास द्वारा सशोधित तया होराताल द्वारा शारदा मुद्रणालय अहमदाबाद से १९४२ में प्रकाशिन) के द्वितीय भाग ( सप्तमभव पृ० ६६२ २६४ ) से उद्धृत ।
प्राकृत प्रवेशिया , . . (सस्कृतन्द्राया) भणिता च तेन-आर्ये । मा रुदिहि । ईदृश एप ससार विचित्रतया कर्मपरिणामस्यानुकरोति नटपेटकम् । क्षणेन वियोग, तेनैव सगम , क्षणेन शोक तेनैव प्रमोद , क्षणेनापद्, तेनैव संपदिति । एवंविघे चैतस्मिन् बुद्धिमता सत्त्वेन आपतितेऽपि विपमदशाविभागे न सेवितव्यो विपाद , न कर्तव्यमनुचितम, न मोक्तव्यं सत्त्वम्, न उन्मितव्य उत्साह । एवं च वर्तमान सत्त्व पुरुपकारजेयं कर्म क्षपयित्वा र इयत्यापदम् । तत आर्ये । मुश्च विपादम्। पुनरपि च करुणाप्रपन्नचित्तेन 'कालोचितमिदम्' इति विशेषतो निरूप्य भणित मुनिकुमारकेन । अन्यच, लक्षणतोऽगच्छामि, न विपन्नस्ते भर्ता, यत शुभफलोदय आभोग, क्नसावदाता देहच्छवि , परभृतालपित- मनोहर शब्द सुप्रतिष्ठिती चरणौ, विक्ट नितम्बफलकम, दक्षिणावर्त- संगता नाभि, अम्लानमान्तिशोभौ करी, सम्पूर्णकलामृगाङ्क इव परिमण्डल पदनकमलम् , मधुगुलिकासदृशे लोचने, सुप्रतिष्ठितस्निग्ध- तिलकभूपित ललाट, श्लद गकृष्णकुटिला शिरोरुहा । तथा एवं विधैर्लक्षणेन नारी वैधव्यदु समनुभवति, पुनभागिनी च भवतीति । तत एहि वत्से । कुलपति वन्दस्वेति । ततो 'यद् भगवान् आज्ञापयति' इति भणित्वा गता तपोवनम् । वन्दित कुलपति , अभिनन्दिता च तेन। कथितो व्यतिकरो मुनिकुमारकेन । समाश्वासिता कुलपतिना, भणिता च तेन । यत्से न सतप्तव्यम् । ज्ञानतोऽवगच्छामि, स्तोकदि. वसैरेवान तपोवने भविष्यति ते समागम प्रियतमेनेति । ततो 'नान्यथा ऋपिवचनम्' इति प्रतिश्रुतमनया। समर्पिता तापसीनां कुलपतिना। . , १३५ न जैन-महाराष्ट्री प्राकृत २७. समाश्वासिता राजदुहिता भणिया य णेण । अज्जे, मा रूय । ईइसो एस संसारो, विचित्तयाए कम्मपरिणामस्स अणुगरेइ नडपेडयं । खणेण विओगो, तेणेव संगमो; खणेण सोगो, तेणेव पमोमो; खगेण आयया, तेणेव संपय ति । एवविहे य एयमि बुद्धिमन्तेण सत्तेण आवडिए वि विसमदसा- विभाए न सेवियन्वो विसाओ, न कायव्यमणुचियं, न मोतन्वं सतं, उज्झियन्वो उच्छाहो। एवं च वट्टमाणो सत्तो पुरिसयारजेयं कम्म खपिऊणं लडेइ आवयं । ता अजे मुश्च विसायं । पुणो वि य करुणापबन्नचित्तेण 'कालोचियमिणे' ति विसेसओ निरूविऊण भणिय मुणिकुमारएणं । अन्नं च । लक्खणओ अवगच्छामि, न विवन्नो ते भत्ता, नओ सुहफलोदओ आमोगो कणगावदाया देहच्छवी, परहुयालवियमणहरो सदो, सुपइट्ठिया चलणा, वियर्ड नियम्बफलयं, दाहिणायत्तसंगया नाही, अमिलाणकन्तिसोहा करा, संपुण्णकलामियंको ब्व परिमण्डलं वयणकमलं, महुगुलियासरिसाई लोयणाई, सुपइट्टियनिद्धतिलयभूसियं निडालं, सिहिण- किण्हकुडिला सिरोरुहा । ता एवं विहेहि लक्खणेहि न नारी वेहळ्य- दुक्खमणुहवइ, पुत्तभाइणी य होइ ति । ता एहि वच्छे, कुलवई बन्दसु तओ 'नं भयवं आणवेई' त्ति भणिऊण गया तवोचणं । वन्दिओ कुलवई, अहिणन्दिया य ण । साहिओ वइयरो मुणिकुमारएण । समासासिया कुलवइणा, भणिया य गेणं। वच्छे न संतप्पियव्यं । नाणो अवगच्छामि थेवदियहेहिं चेव एत्थं तवोवणे भविस्सइ ते समागमो पिययमेणं ति । तो 'न अन्नहा रिसिवयणं' ति पडिस्सु- समप्पिया तावसीण कुलवइणा । + यमिमीए । १. समराइच्चकहा द्वितीयभाग--पृ० ६६५-६६६ ।
भारत प्रवेशिका च (सस्कृतच्छाया) गजशनलक्ष्मीकलित विष्णुतनूरिव सुदर्शनाधारमा सुपिराजित वर रत्ने रत्नपुरनगरम् ।।१॥ तनास्ति वणिक्प्रधान सुधन श्रेष्ठी धनद इव धनलित । तस्थापि च प्रिया सीता शील्गुणपूर्णमाहात्म्या ॥२॥ अथान्यदा तयोजातस्तनयो गुणाना कुलभवनम् । धनसारो नाम्ना, मित्र तस्यारित यणिक्सुत ॥३॥ नाम्ना रूपेण च मदनो धनसारमित्रसहित स । क्रीडति काननादिपु निरङ्कुशो मत्तहस्तीव ॥४॥ अधान्यदा प्रवृत्ते वसन्तसमये समयसारमुनिम् । पश्यति प्रशान्तमूर्तिमुद्याने कुसुमसारे ॥५॥ त दृष्ट्वा प्रभणति मदनो ,धनसार । शारदशशिनमिव । मनोनयनानन्दकर वन्दावहे मुनियरमेतम ॥ ६॥ इति भणित्या वन्दित स ध्यान सहृत्य धर्मलाभेन । अभिनन्दितावनेन द्विजेनैकेन ततो भणितम् ।। ७॥ कि भो । मा मुक्त्यैप शूद्रोऽभिवादित एवम् । प्राप्ते। मानससरसि पिबति सातिकानीरम् ॥८॥ ततस्ताभ्या स भणितो ब्राह्मण । मा भणेश वचनम् । ब्राह्मणशब्दार्थयुत किमेप ब्राह्मणो भवति ॥ ९॥ मा जहि मा जहि जीयान मा भणमा भणतालीकवचनानि । हरत परधनानि गृध्यत युवतिदेहेपु ॥१०॥ मा मूछों कुरुत परिग्रह इत्यादि ददात्युपदेशम् । अब्रह्मणो विरतो य खलु त ब्राह्मण ब्रुवन्ति ॥११॥ तत एवमादिगुणसगतोऽपि कथ सोम । ब्राह्मणो नैप । स एव भवति शूद्रो य सलु पूर्वोक्तगुणक्किल ॥१२॥ इति वचनामृतोपशान्तामिताज्ञानरोगसताप । पन्दित्या द्विज साधु सविनयमवनावुपविष्ट ॥१३॥ क मा १३६ जैनमहाराष्ट्री प्राकृत २८. ब्राह्मणलक्षणम्' गयसखलच्छिकलिय विण्हुतणु पिव सुदसणाहार । सुविराइयं वरेहिं रयणेहिं रयणपुरनयर ॥ १ ॥ तस्थस्थि वणिप्पहाणो सुधणो सिट्टी धणो म धणकलिओ । तस्सवि य पिया सीया सीलगुणग्धवियमाहप्पा ॥२॥ अह अन्नया य ताण नाओ तणओ गुणाण कुलभवण । धणसारो नामेण, मिचो तत्सत्थि वणियसुओ ॥ ३ ॥ नामेण रूपेण य मयणो धणसारमित्तसहिओ सो । कीलेइ काणणाइसु निरकुसो मत्तहत्यि व्य ॥ ४ ॥ अह अन्नया पयट्टे वसतसमयम्मि समयसारणि । पासइ पसतमुर्ति उज्नाणे कुसुमसारम्मि ।। ५ ।। तं दद्दूण पभणइ मयणो धणसार । सारयससि व । मणनयणाणदयर वदेमो मुणिवर एय ॥६॥ इय भणिय वदिओ सो, झाण सहरिय धम्मलाभेण । अभिणादिया इमेण दिएण एक्केण तो भणिय ॥ ७ ॥ किं भो ! म मुतूण एसो सुद्दोऽभिवाइओ एव । पत्तम्मि माणससरे को घुटइ खाइयानीर ॥ ८॥ तो तेहिं सो भणिओ माहण ! मा भणसु एरिस वयण । माहणसद्दथजुओ किं एस न माहणो होइ ॥९॥ मा हण मा हण जीवे मा भण मा भणह अलियवयणाइ । मा हरह परधणाइ मा गिज्झह जुवइदेहेसु ॥१०॥ मा मुच्छ कुणह परिग्गहम्मि इच्चाइ देइ उपएस । अवभाओ विरओ नो खलु त माहण विति ॥११॥ तो एषमाइगुणसगओ वि कह सोम ! माहणो नेसो । सो चेव होइ सुद्दो नो खलु पुवुत्तगुणवियलो ॥१२॥ इय वयणामयउवसमियअमियअन्नाणरोयसतायो । बदेवि दिओ साहु सविणयमपणीए उवविठ्ठो ॥१३॥ - १ श्री सक्मणगि (११४२ ई०) विरचित-पासनाहचरिश (५० हरगोन्दि सेठ द्वारा सम्पादित तथा बनारस से १६१८ म प्रकाशित) के द्वितीय भाग पृष्ठ ३१० से उदत ।
१४०
प्रात प्रवेशिका
(सस्कृतच्छाया)
अत्यवन्तीविषय उज्जयिनी पुरीवरा जगत्प्रसिद्धा।
कुलभूपणश्च श्रेष्ठी तद्भार्या भूपणा नामा ॥ १॥
तयो सुत सजातो दुर्गो नाम्ना यौवनस्थोऽपि ।
वाल एव चेष्टयोन्मत्तो
भ्रमति पुरमध्ये ॥२॥
दौर्भाग्यमवशतो रमणी मनसापि ते न प्रार्थयते ।
स्नेहेनाप्यालपिताऽऽक्रोशास्तस्य प्रयच्छति ॥३॥
दौर्भाग्यर्जितेन
पृष्ट शापालिस्ततस्तेन ।
तव काप्यस्ति' विद्या सौभाग्यफरी विशेपेण ॥४॥
स भणत्यस्ति निपुराविद्या सद्योऽपि ददाति सौभाग्यम् ।
या स्मरणमात्रेणापि विधिना ससाधिता सती ।। ५॥
ततो भणित दुर्गेण यद्येवं तदा प्रयच्छ मे विद्याम् ।
कृत्वा गुरुप्रसाद तेनापि विधिना वितीर्णा सा ।। ६ ।।
कणवीरकुसुमलक्ष सगुग्गुलु गृहीत्वाऽन्यदा दुर्ग ।
निपुराविद्यादेवीप्रसाधनार्थ गतो
मलये ॥७॥
तावद्यापत्तन नृपमन्दिरस्य द्वारे केवली दृष्ट ।
देशयन् सुगतिपथ किन्नरनरसुरसमूहस्य ॥८॥
तत स परिचिन्तयति सौभाग्यगुणनिधिरेप ।
सिद्धनिपुरादिविद्य कोऽपि महात्मा महासिद्ध ॥९॥
सातिशयेय विद्युतस्य कापालिकात् तस्मादेनम् ।
प्रार्थये कामपि विद्यामिति हेतोर्वन्दित साधु ॥१०॥
तेनापि धर्मलाभो दत्त सभापितश्वोपविष्ट ।
मुनिनापि समारब्धा धर्मकथा तमप्युद्दिश्य ॥११॥
जैनमहाराष्ट्री प्राकृत २९ दुर्ग प्रति मुनेरूपदेशः अस्थि अवतीविसए उज्जेणी पुरवरी जयपसिद्धा । कुलभूसणो य सिट्टी तमन्ना भूसणा नामा ॥१॥ ताण सुओ सनाओग्गो नामेण नोव्वणस्थो वि । बालो चिय चिट्टाए उम्मत्तो भमइ पुरमज्झे ॥२॥ दोहगकम्मवसओ रमणी मणसा वि त न पत्थेइ । नेहेण वि आलविया अकोसे से पयच्छेइ ॥३॥ दोहग्गतजिएण पुट्टो कावालिओ तओ तेण । तुह कावि अस्थि विजा सोहग्गकरी विसेसेण ॥४॥ सो भणइ अस्थि तिपुराविन्जा सज्जो वि देइ सोहग्ग । जा सुमरणमित्तेण वि विहिणा ससाहिया सती ॥५॥ तो भणिय दुग्गेण नइ एव ता पयच्छ मे विज । काऊण गुरुपसाय तेण वि विहिणा विइन्ना सा ॥६॥ कणवीरकुसुमलक्ख सगुग्गुल गहिवि अन्नया दुग्गो । तिपुराचिन्नादेवीपसाहणत्य गओ मलए ॥७॥ ता नाव तत्थ निमन्दिरस्स दारम्मि केवी दिट्ठो। देसतो सुगइपह किनरनरसुरसमूहस्स ॥८॥ तत्तो सो परिचिंतइ नूण सोहग्गगुणनिहीं एसो । सिद्धतिपुराइविजो को वि महप्पा महासिद्धो ॥९॥ साइसय चिय विजा एयस्स कावालियाउ, ता एय । पत्थेमि कि पि विज इय हेऊ बदिओ साहू ॥१०॥ तेणावि धम्मराभो दिनो सभासिओ य उवविट्टो । मुणिणावि समारद्धा धम्मकहा त पि उदिसिउ ॥१९॥ १ श्री लक्ष्मणणि विरधित सुपासनाहचरिम, द्वितीय भाग पृष्ठ ३६६-१८ से उद्धृत।
१४२
प्रास-प्रवेशिरा
कामं कामासको
विद्यामन्त्रैश्चूर्णयोगेः।
रमणीर्मोहयित्वा यो भुक्ते स च कालेन ॥१२॥
नच मुश्चति परदारान् गम्यागम्यांचनत्यजति कदापि ।
इह जन्मन्यपि प्राप्नोति पापरततरतीक्ष्णदुःखानि ॥१३॥
अधिकं तथा दीर्भाग्यं भवत्यनिष्टश्च सर्वलोकस्य ।
दौर्भाग्यदु सनटितः
भ्रमति भीमभवगहने ॥१४॥
न्यायागता अपि भोगा भयवहा. कर्मवन्धहेवयश्च ।
कि पुनरुन्मार्गगता समर्गलं गलितगुणगरिमाण ॥१२॥
इतरस्तनुरपि गुणो मा भवतु, भवतु केवलं शीलम् ।
यो जीवानां मनोवाञ्छितानि कार्याणि पूरयति ॥१६॥
यशोविभवहानिपरिभवालकदु खप्रमुखदोपद्वन्द्वाली।
शीलविकलानां पुरुषाधमानां नूनं समापतति ॥१७॥
पवते महापापा
भणिता सर्वज्ञेनेह।
येभ्यः प्राप्नुवन्ति दुःखानि पापबुद्धयो नराधमाः ॥१८॥
भूतहिसा मृपावादश्चोरिका मैथुनं तथा ।
परिग्रहो महारम्भो महाशब्दारे
इमे ॥१९॥
इत्यादिदेशनां श्रुत्वा सवेगमागता परिपत् ।
दुर्गोऽपि भणति भगवन् । पञ्चमहापापपरिहारः ॥२०॥
कर्तव्यस्तस्मात्संप्रति नियम मे देहि, ज्ञानिना दत्त ।
सम्यत्वपूर्वकं स नत्वा मुनिं गतो गेहे ॥२१॥
जैनमहाराष्ट्रो प्राव
कामं कामासत्तो विजामतेहिं चुन्नजोगेहिं ।
रमणीउ मोहिणं नो भुनइ सो य कालेण ॥१२॥
न य मुंचइ परदारं गम्मागम्मं च न चयइ कयावि ।
इह बम्मम्मि वि पावइ पावो तो तिस्सदुक्खाई ॥१३॥
अहियं तह दोगग होइ अणिट्टो य सव्वलोयस्स ।
दोहम्गदुक्खनडिओ सो भमइ भीमभवगहणे ॥१४॥
नायागया वि भोगा भयावहा कम्मघहेऊ य ।
किं पुण उम्मग्गगया समग्गलं गलियगुणगरिमा ॥१५॥
इयरो तणुओ पि गुणो मा होउ, हवेउ केवलं सीलं ।
जो नीवाणं मणवंछियाइ कन्नाई पूरेइ ॥१६॥
जसविहवहाणिपरिभवकलंकदुहपमुहदोसदंदोली।
सोलवियाण पुरिसाहमाण सूर्ण समावडइ ॥१७॥
पच एए महापावा भणिया सव्वन्नुणा इह ।
जेसिं पार्वति दुक्खाई पापबुद्धी नराहमा ॥१८॥
भूयहिंसा मुसावाओ चोरिया मेहुण तहा।
परिग्गहो महारंभो
महासदारिहा इमे ॥१९॥
इच्चाइ देसणं निनुणिऊण सवेगमागया परिसा ।
दुग्गो वि भगइ भयवं पंचमहापारपरिहारो ॥२०॥
छायचो ता संपइ नियम मे देहि, नामिणा दिनो।
सम्मापुचगं सो नमिण मुणि गओ गेहे ॥२१॥
प्राकृत प्रवेशिका तालव्य वर्ण तृतीया विभक्ति दन्त्य वर्ण द्वितीया विभक्ति द्विवचन द्वन्द्व समास धातुरूप नपुसक लिङ्ग पश्चमी विभक्ति पुल्लिंग प्रथमा विभक्ति प्रेरणार्थक बहुवचन बहुव्रीहि समास भूत-कृदन्त मूर्धन्यवर्ण लिङ्ग लिङ्गानुशासन वचन वर्तमान-कृदन्त Palatal consonant Instrumental case Dental consonant Acousativo caso Dual number Copulativo compound Conjugation of verb Neuter gender Ablative caso Masouline gender Nominativo caso Causative Plural number Attributive compound Past Participle Cerebral consonant Gender Law of grammatioal gender Number Present participle Present tense Optative (Potential) Case A kind of aspirato denoted by h Combination of consonants Bases ending in consonant Affixes of the Present Participle Declension of word Genitive वर्तमान काल विध्यर्थक विभक्ति विसर्ग व्यञ्जन सन्धि व्यञ्जनान्त शत, शानच् प्रत्यय शब्दरूप पष्टी विभक्ति संख्या वाचक संयुक्तपरिवर्तन-व्यञ्जन सन्धि सप्तमी विभक्ति समानीकरण का नियम समास सम्बन्धसूचक भूतकृदन्त सम्बोधन सरलव्यअन-परिवर्तन परिशिष्ट १४७ Numeral Change of Compound consonants Combination of two letters Locativo Law of Assimilation Compound Prepositional past participle or Indeclinable participle Vocative Change of Singlo consonant. Pronoun Affix of the Feminino Fominino Gender Change of rowc! Vomel-separation Combination of rotels Bascs cnding in ronel Aspirato Infinitivo सर्वनाम नीप्रत्यय स्त्रीलिङ्ग म्बरपरिवर्तन परभक्ति स्परसन्धि म्यरान्त ६मारयुच्वर्ण देवक (च) अंग्रेजी-हिन्दी Ablatiro Caso Accusative C330 Active Voico Alix of the Feminine खी प्रत्यय Alires of the Present शह, शानच् प्रत्यय Participle पप्रमो विभफि द्वितीया विभटि पत्याच्य परिशिष्ट १. पारिभाषिक शब्द (ग) हिन्दी-अंग्रेजी अकारान्त शब्द a-stem word आज्ञार्थक Imperative अनुनासिक Nasal अन्तस्थ Semiyowel अव्यय Indealinzhle अव्ययीभाव समास Indeclinablo compound or Advorbial compound. इशारान्त शब्द I-stem word उकारान्त शब्द u.stom word एकवचन Singular number फ्र्तृवाच्य Active voice पर्मयाच्य Passivo VOICO Appositional compound कारक Government (of the cascs) फुत्प्रत्यय Primary aflıx (to form word from root) झियातिपत्ति Conditional with negativo implication पतुर्थी विमति Dative घर, म प्रत्यय Terminations of the comparatiro and superlativo degrees सागर समास Determinatisc compound. दिवप्रत्यय Secondary allix (to forma rrord from word) १० धर्मधारय समास प्राकृत प्रवेशिका हकारयुक्त वर्ण मूर्धन्य वर्ण स्वर परिवर्तन A kind of aspirate denoted fakti by h Appositional compound कर्मधारय समास Aspirate a-stem word अकारान्त शब्द Atributive compound बहुव्रीहि समास, Bases ending in consonant 543A1FT Bases ending in yowel स्वरान्त Case विभक्ति Causative प्रेरणार्थक Cerebral consonant Change of compound con. सयुक्तव्यञ्जन-परिवर्तन sonant Ohange of sangle consonant सरलव्यञ्जन परिवर्तन Change of vowel Compond समास Conditional with negative क्रियातिपत्ति implication Conjugation of Verb धातुरूप Copulative compound द्वन्द्वसमास Dative case चतुर्थी विभक्ति Declension of word शब्दरूप Dental consonant दत्यवर्ण Determinative compound तत्पुरुपसमास Daul number द्विवचन Feminine gender स्त्रीलिङ्ग Gender लिङ्ग Genitive case पष्टी विभक्ति Government (of the cases) कारक Imperative आज्ञार्थक Indeclinable अव्यय परिशिष्ट १४६ तृतीया विभक्ति इकारान्त शब्द पुल्लिँड प्रथमा विभक्ति Indeclinable compound अव्ययीभाव समास Infinitivo हेत्वर्थक Instrumental caso i-stem word Laty of Assimilation समानीकरण का नियम Law of grammatrical gender लिङ्गानुशासन Locativo caso सप्तमी Masoulino gender Nasal अनुनासिक Nouter gender नपुंसकलिङ्ग Nominative caso Nombor वचन Namcral संख्यावाचक Optativo (potential) विध्यर्थक Palatal consonant Paesivo VOLCC फर्मयान्य Past participle Plural number यहुयचन Prepositional Past Parti• सम्पन्धसृपक मवदन्त ciple or Indcclinablo Past Participle Present tenso यर्तमानराल Present Partioiplo पर्वमान यदन्त Primary alix (to forın rord from root) Pronoun सर्वनाम Fecondary alis (to form af TETO word from ford) Semisonel Cinnalar bunker एमपन भूतकृदन्त छाती के शुष्क व्रण को विकसित करनेवाली (एक प्रारत-प्रयेविका Terminations of compara• तर, तम प्रत्यय rativo and suporlativo degrcos u-stom word उकारान्त शब्द Vocativo सम्बोधन Vowel separation स्वरभक्ति २. देशी-शब्द आयुत्त भगिनीपति (इसे संस्कृत मे भी अपना लिया गया है, कच्छ वस्त्र कोड कौतुक कोससदचट्टिणी सैकडों झूठी शपथें सानेवाली स्त्री चंपि पीड़ित टेण्टाकराले प्रकार की गाली) छादय् (छिपाना) पाडिसिद्धि प्रतिस्पर्धा पोट ( पोह) उदर भोलविदो भ्रामित, यश्चित वाउल्ल पुत्तलक (पुतला) बिंदुरिल्ल उज्ज्वल समसीसिआ स्पर्धा साहुलिया शाटिका ( वस्त्र) हक्क पुकारना ही अविद विषादसूचक अव्यय वरिल्ल यस्न म लीलावई-सिंघी जैनशास्त्र शिक्षापीठ, भारतीय विद्याभवन बम्बई-७ गीसहार-Julus Grill, Leipzig, 1871, प्राकृतप्रकाश-Edvard Byles Corell, Stephen Austin नाकृत व्याकरण (हेमचन्द्र ) सम्पादक-P L Vadiya, Motilal Ladhaji, 196, Bhavanı Peth Poona city, 1928. वणवह महाकाव्यम्-Sanskrit College Culcutta, 1954. विवागसुयं--PL Vudy Nowrosyee Wadia College सहायक ग्रन्थों की सूची भिज्ञानशाकुन्तलम् --Alonier Williams, Oxford, 1876 सवहो-हिन्दी ग्रन्थ रत्नाकर कार्यालय बन्नई, १९४० त्तगेयाणुप्पैक्खा-रावजी भाई देसाई, अगास, १९६० पुरमन्जरी-मोतीलाल बनारसीदास नेपाली खपड़ा, वाराणसी, १९६३ उडवहो-Bhandarhar Oriental Researoh Institute Poona, 1927. थासप्तशती-प्रसाद प्रकाशन पूना-२, १९५६ रुदत्त-अनन्तशयन सस्कृत ग्रन्थावली, १९२२ नरयावलीओ-Dr P L Vaidya Nowrosjee Wadia college, Poona, 1932 Hertford, 1853 प्राकृत भाषाओं का व्याकरण- विहार राष्ट्रभाषा-परिषद्, पटना, १९५८ मृच्छकटिक-Stenzler, Bonnae, 1817 १९४९ १ Poona, 1935.
BL 17
Bhavan's Library, Bombay
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?-S MAY_1969
1-9 11--1912-
8 JAN
1983