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Samsyapurti Bhag Ii

2010/10

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साना
दिर
भूमिका।
१९२०
पाठको को विदित होगा कि यह कविसमाज श्री
महाराजाधिराज श्री १०८ महाराज वालकृष्णलाल जी
कांकरोलीनरेश ने सम्वत १८५० में स्थापित किया था तब
से लेकर छ महोने की समस्यापूर्ति प्रथम भाग में बाबू ज
गन्नाथप्रसादजी बी०ए० उपनाम रत्नाकर कवि के प्रबन्ध में
छप चुकी है। अब दूसरा भाग जिसमें दूसरे छ महीने की
पूर्तियां हैं प्रकाश किया जाता है। आगे तीसरा भाग भी
छप रहा है। योंहो छः छः महीने का एकएक भाग होता
जायगा-इस अन्य में जिस कवि को जैसी कविता है ज्यों
को यो प्रकाश को गई है । कोई घटाव बढ़ाव अपनी
योर से नहीं किया गया है जिसे कि मर्व साधारण को
भिम २ कवियो को योग्यता का परिचय होय । सहारान
बहादुर ने कबियों का उत्साह पुरष्कार देकर बहुत कुछ व
डाया है और बढ़ा रहे हैं। इन्मे ऐसे अनेक सुयोग्य महाशयों
को फविता है जिनको पुरकार से कोई वान्ता नहीं केवल

( २ )
अपने उत्साह और भाषा काव्य की हधि के निमित्त यह
परियम उठाते हैं। हम उन महाशयों को हृदय से धन्य
याद देते हैं और प्रार्थना करते हे-कि सदाही इसी प्रकार
कटिवह रह कर भापा काव्य की हदि मे तत्पर हो ।
निवेदक
रामप्य वर्भा
रोक्रेटरी-कविउमाज
काशी
-
D

समस्यापूर्ति (द्वितीय भाग) की सम- स्याओं की सूची। १ समस्या कहां से कहां तक। पावस अंधेरी में सावन सुहानो ... ११-२१ विपुंज बगखो पर २१-२८ पाज वा कदव तरे रंग बरसत है २८-३६ मनोज महारान की २६-४६ म्यार को पाखनि में ४६-५४ मलिन्दसतवारे से ५५-६४ रंगभरी मूरति मनगमरी अंखिया हिये में प्रानप्यारी के सुगन्ध की लपट सी ८८-८ एका ते 2 गई है तस्वीरें ८६-८४ फूट चन्द्रमण्डल से छहर छटान को चादनी सी पोलो चार चांदनी ददन की अनंग मदमाती है सारम समेत तारापति फोको परिगो .. ... . ।

( २ )
... १२८-१२८
..
१३८-१४८
१४६-१६२
मरीचि मरकत
१०५-१८३
रासमइल गुपाल को
निशावर करति है
वासुरो बजावै है
मानिकत
मानहु
की
सरोज सकुचाने से
गरक गई है मानो बोजुरो अँधेरे मे •
माल मुकतान को
प्यारे बचचन्द प उज्यारी चलो जातो है
फुलयारो है वसन्त को
अपमान को दुलारो में ...
..
१८२-२०७
२.०-२२५
२२५-२४२
२४२-२५६
९५८-२०६
1

काशी कविसमाज की समस्यापूर्ति का दूसरा भाग। काशीनिवासी श्री १०५ सपणलाला जी महाराज उपनाम रससिंधु। पावस अँधेरी में गरजत आवै घन कारी घटा घेर घेर चम- कत नात विन्जु सोभा नी उँजेरी में। कह रस- सिन्धु फेर दूती गई गोपी पास वातहु बनाय हाथ नीर बाली चेरी मैं ॥ चल वेग प्यारी नि- सा लगत डरारी खूब ऐसा जो न होय मेह आय नाय देरी में । कृपा पै ले आ गई वाल को लिवाय स्याम सखी संग कलि करे पावस अँधेरी में॥ वावू रामझष्ण वर्मा सम्पादक भारतजीवन काशी। आये बलवीर उतै वालक अहोर संग इत मनमोहिनी सखीनन की घेरी में। परम प्रवीन म प्यारी कौतुक विचार हिये ग्वालन की कामरी छपाई नेक देरी में ॥ छायो घन घुमड इतेक मे चहूँघा घोर सूझत न हाथ धुन्धकार की धु- धेरी में। नौलौं गोपगण उतै कामरी का धावें तौलौं लै गई गुविन्दै गहि पावस अँधेरी में ॥ मान कही मेरी खान पान मति छोड़े तेरी वात हौं वनहीं दिन हैकही फी देरी में। नाय ब- लवीर सों सुनेहौं सब तेरी पोर कान साध लैहों वस तीन चार फेरी में ॥ नानति है मोकों हौं प्रवीन परवीनन में वीर मिलिवे का नाहि औ- सर उनेरी में। धीर धरि ही में त अधीर मति हाय श्यामा अवको मिलेहों ताहि पावस अँ. धेरी में ॥२॥ फागोनियासी पं० पम्बिकादत्त व्यास । सावरी सँवारि सारी स्याम वगराय वार छवि सरसायो स्याम घाघरे की घेरी में । घोडा मों घरचि चार चोली स्याम रेसम की स्याम नग पामरन धारो इदि वरी मे ॥ कवि अम्बा- दत्त स्याम अजन को रंजन के हरी हरिनी को मद हरै हेरा हेरी में । स्याम मन धारि चलो स्यामल तमाल ढिग साँचौ स्यामा वनो स्याम पावस अंधेरी में ॥ काशीनिवासी बाबू माधवदास जी। सरट में ले पाऊंगी सावरौ सलोनी स्यामा हेमा त हिमन्त अन्त आवै नेक देरी में। सि- सिर में सारदा मुहाई नी ससांकमुखी विन्दा का वसन्त बुलाऊँ तीन फेरी मे ॥ माधव जू मौज करो ग्रीषम निकुंज माह गनिका सौ गोरी गात ल्याऊँगी सवेरी में । नती हजम- ण्डल में नागरी नवेली बाल लाल हौं लिपा- ॐ तिन्हैं पावस अंधेरी में। पाशी निवासो पण्डित केदारनाथ भूषन वसन अंग अंग सुठि नौंको सानि मिलन चली है बजरान सों हरेरी में। नोबन की वनक विचित्रता विसोके वनै पायल मानक काम कैदी जात वेरी मैं ॥ घमघहरात हहरात ( ४ ) पौन जोरे जोर हर्वरात हिय रे केदार चली टेरी मैं। पीतपटवारी नहि मिल्यो धन वारो घल लाई क्यों वुलाइ रॉड पावस अंधेरी मैं कवि प० अम्बाशंकर जी काशी। उन्नत उरोजन पे चोनदार चोली कसे हो नदार सारी के किनारी लगी घेरी में। अँखिया सरोज लख सफरी लनोन होत ठाव ठाव ना. गत मनोन देह तेरी में ॥ संकर न रोन को ग- मंक फूटि चहूं कोज करति गमोज कई नोजन को फेरी में । मोनभरी बदरी में मौन भरी भा- मिन त खोन भरी काक चली पावस अँधेरीमे। पीतम पियारे ने पियार सों वुलाई मोहि भायो प्राणप्यारी भाज झारिन घनेरी में । ते जो कही एकली न साथ सखी तेरे कोज मेरे साय मेरी मति मेरौ सखी चेरी में ॥ संकर न प्रेम में न नेम कयौ काज कहूं होहूं फँदी तेई फंदे आपनी दिलेरी मे । एरी भरी वौरी नाति उनहीं के खोन लगी मावस की आधी रात पायस अंधेरी मे ॥ २॥ ।

( ५ ) वाबू हरिशंकरप्रसाद बनारस । घन को घमण्ड जो अखण्ड नसाय रहो राह के बटोही ना दिखाय निसिकारी में।मेरो रंग जोई सोई कासरी घटा मों घटा औसर भलो है नहीं बनिहै उजारी में ॥ भने हरिशंकर संखा सों स्याम ऐलो कान्छौ मेरी कटि नैहै मंजु मोद फुलवारी में। गेह वर्षभान के निसंक प्राजु घुस जैहों कौन धरि लैहै मोहिं पावस अँध्यारोमें। काशीनिवासी जचन्द जी बहभीयं । को जाउ कारन विकुण्ठ काऊ छौरसिंधु खेलत प्रतापी प्रभु आयसु जेरौ मैं । विफल विलोकि निन अनुभौ सुनावै सुनी बात यह गूढ़ याते कही अतिं देरी मैं ॥ अंस कला भूति जातें होत है प्रकास सोई व्यापक दुभुज राम- लीला इहि वेरी मैं। याही ते निसंवा हम, सं- कित परे हो सवै सारय विषय रितु पावस अँ- धेरी मैं ॥ सकल सुमार्ग अवसान जड़ही में होत न. - गत प्रकास नित्य याही मति फेरी मैं। ताहूको दुराइ परम निज तत्व माहिँ भाषे अवसान नित्य आपनी उजेरी मैं ॥ चिदाचिद दाज सनवन्ध निज आपुस मैं मानि मानि सन्तत परे हैं भुक्ति वेरी मैं । राखि लै चरन की सरन विट्ठ- लेश मोहि माया मत वाद रितु पावस अँधेरीमें। पटनानियासी बाबू पत्तनलाल जी । कोऊ लपटाने पटताने पर सेजही पै कोज करें कान वारि दीपक उजेरी में। कोज करें आजु का भई है विधिना की रात है है कव प्रात ऐहैं सूर कितै देरी मे ॥ कोज कहैं मोहि भये हैं जुग नाम नगे कछु ना समात कहा वात बुधि मेरी में । कोज कहें देखि चकवाकहिँ म काहे तुम रात दिन मान लेत पावस अँधेरीमें।। कालि अलि राति रही नात हौं अकेली फंटे या घर में नावन को नामन दहेरी में । खिन वा दिसि ते आइगो सुसील कान्ह शुहू ना परी बदरी घनेरी मे ॥ हो तो उनहीं पायम ( ७ ) - भट भेरौ होत भूमि घहराय गिरी ऊपर तें वाहू गिग्यौ पड़ी बड़ी फेरी में । आज ते तिहारी सौंह कैसहू नसाय काज घर तें कहूंगी नाहिँ पावस अँधेरी में ॥ २॥ गंधौलो जिला सीतापुरनिवासी बाबू जुगुल किशोर जो हपनाम वजराज । नीलमनि भूषन सुअंगन कुरंगसार धारी जिन सारी सो अलिन रंग हेरी में । तैसो घन धार कापसार अन्धकार परी सोंधे की सुवास सो दुरेफन को घेरी मे ॥ नाति ब्रजराज सों मिलन कुंजधाम वाम वाम सों उतरि कोज दू सरीन नेरी में। सावस सहेट चलो वा वस हिये के एक रजनो अमावस श्री पावस अँधेरी में । वाबू भगवतीचरण सकला जिला शाहाबाद ! खंजननयन वारी वारिज बदनवारी नाति है मिलन मीत प्रीत को घनेरी में । विद्युत द- मकवारे भूषन अनेक धारे हारे हैं कुरंग कारे चाल की भदेरी में । नेक ना नयून होत रूप ( ८ ) की त- की छटान वाको चलन सने हसनौ बूंद रेरी मे। गात जातरूप को नचाई होत नात माना भगवती कसौटौ सौ पावस अँधेरी में । महाराजकुमार गौरीप्रमादसिंहजी गिधौर। दीपक वुझाय वाल झाँकती झरोखा मग लाल मिलिवे के काज पंच सर फेरी में । वदन मयंक कर ऊपर विराजमान हेग्यो ढिग जाय अन्त अजव उजैरो में । घायो हिय बेर बेर निरखि मु ऐसी छवि समता अनूठो यहै अच- रन हेरौ में । मनु निकलंक पूर सरद मयंक उयो प्रफुलित कांज पर पावस अंधेरी में । गयानिवामो पं. गिरधारीलाल जी गयावान । घेर घेर घूम रहे घन आसमान वीच झूम रहे द्रुम मिले वेलिन की ढेरी में। गिरधारी- लान करी सूनी घाट वाट वोही नगै मुकतान ज्योति जेहरी घनेरी में ॥ संग ना सहेली काऊ वैम मलवेलो अति नमरी पिरात गहे रसरी स्वेरी में । तो सी मुकुमारि को ये पारि भरिवे यो राय भेन्यो का गंवार ऐसी पावस अंधेरीमें। - -- ( ६ ) घोर वन भौतर कठोर बाघ चारो मोर दौ- 'रत है ठोर ठौर वेलिन की ढेरी में। नगर न- गौच नहि डगर सगर खोटी असे अजगर केते कन्दरा घनेरी में ॥ गिरधारीलाल वेसुमार वट पार बसें याहौते कहतियार बार वार टेरी में। भारी दुख पाइही अतौहीं पछताइहो जो जा इही बटोही यह पावस अंधेरी में । सिहोर (काठियावाह) निवासी कविगोविन्द गीलाभाई प्रीतम प्रदेश वाको भावत सँदेश नाहिँ नि- लज ननद गई सासुरे सवेरी में । सास दिन सातक तें गई गंग न्हावन कों पायगी सो प्रा- जही ते तीनरी उजेरी में। घर मे न और कोज रहत अकेली हम यातें कहुँ यामिनी में आव साज टेरी से । गोविन्द सुकवि ऐसे सूने घर माहि कैसे मोतें रधो नाय आली पावस श्र- धेरी में ॥ काहे को करोध करि कहावो कठोर वैन धी- रज को धारो उर भाषत हूं टेरी में। ननद नि. र ( १० ) गोडी नित हेरत हमारी ओर यात उर डरी चलु छौनी पर हेरी में ॥ मिलन समय नाहिँ उ- जलही यामिनी में तातें करजोरि कहूँ आज वर वेरी में। गोविन्द अवस्य आय आपको मि- लेंगी हम सौह तें कहत अव पावस अँधेरी में। कागोनियासी पगित हिज वेगी कपि । अंग अंग भूषन जवाहिरनटित साजि चन्द चपि जात मुख चमक उजेरी में । सारी जर- तारी को किनारीदार सोहे वर वाणी जीन भ. तर गुलावन की ढेरी में ॥ वेनी हिज तडिता तड़ोतड तम तहा निसा घोर कारी घटा घि का घनेरी में। करत मसाल सौ प्रकास वा र- मान वाल नात प्रानप्यारे पाम पावम अंधेरी मे।। फानपुरनियासी पं० ललिताप्रमाद जी विवेदो। पिय परदेस में संदेसज न पायो कछु तौ- नई प्रदेस के कलेम माहि घेरी मैं । ननद सि. धारी दिन पारिक ते सासरे को माइके जेठानी सो रहति पयमेरी में ललित परोम करि रोस '( ११ ) वैर वाँधे रहे काज ना सुनत मेरौ वीस वेरी टेरी मैं । संग ना सहेली कोज निपर अकेली भाजु कैसे रहौं भौन माहि पावस अंधेरी मैं ॥ चन्द्रकला वाई - दूंदी। मावत सघन घन घोरि घरि ओर चोर ठोर ठोर मोरन के सोरन को फेरी मैं । चातक चिकारें ये बलाक दौरि दौरि मारे हारे मन दा मिन को दमक घनेरी मैं ॥ चन्दकला जुगुनू ज- माति चिनगारी देत वालम भये हैं लोन कूबदार चरी मैं । कैसी करों कहाँ जाऊँ कैमे निग्वाह कौं येरी बीर मावस की पावस अँधेरी मैं ॥ ॥ 1 सावन सुहावनो। कामोनिवासी श्री १.५ क्षगणनामा की महाराज उपनाम रसमिधु। बादर जु भाये घेर कारे ओ सपेद भूरे वर- सत मेह मेह सोभा सरसावनो। कहै रससिंधु तही बड़े हे तलाव धागे सघन निकुंज प्रति ( १२ ) वाग मनभावना ॥ कायल पपीहा मोर दादुरह करें सोर भीगुर को भनकार काम उपजावना। झूलत हिंडोरे स्याम राधागल बाह डारि सखी जो मुलावें लगे सावन सुहावना वायू रामकृष्ण वर्मा सम्पादक भारतभीवन काशी। तरुन तमालन सों लपटी लवगीलता दुखद अनङ्ग लाग्यो सुख सरसावनो । कसे के विदेसौ उर धीरज धरेंगे बोर मोरन को सोर हिये ला- गत डरावना ॥ ऐहें बलबीर मन आवत हमारे ऐसा वीतिगो प्रचण्ड पापी ग्रीषम भयावनो । कादरकरावनो प्रवासी विरहीन मन पायो मन भावन या सावन सुहावनो ॥ कागोनिवासी पगिड़त हिज वेनी कषि। सुख सरसावना है बारि बरसावना है म- दन जगावना है नेह का कढावना । घन घह. रावना है विजु चमकावना है कोकिल पपीहा मोर मोद उपजावना | बेनौ हिज आवना ह- माग है तिहारे हेत ऐसो समै चाहिये थाही ( १३ ) ना गवावनी । मान तजि झूलौ चलौ संग मन- भावन के आयो मदनेस वीर सावन सुहावना। काशीनिवासी बाबू माधवदास जी जैसी यह छाई है घटारी घनस्याम आली तैसी निठुराई करि बैठी तूं मनावनी । त्रिविधि वयार वहै कोकिल पुकार कहै चलिये निकुंज माह कीजे मनभावना ॥ माधव जू मोहि को प- ठावत हैं वार वार तू तो मनुहार करै प्यारे को सतावनो। पावन परै है मनसावन तिहारो वीर चलिये निकुंज लगै सावन सुहावनो ॥ कायोनिवासी पं० केदारनाथ जी। छाई छिति मण्डल हरीरी वर वागन मैं फूलै लगे सुमन सुगन्ध सरसावनो । हरी हरी टूबन पै वगरी बहटीवीर पन्ना के फर्श मंजु मानिक विछावनो ॥ चातक चकोर मोर का. किला अलामें घने वारि वारिवाहक लगे हैं व- रसावना । मोद सरसावना अनंग दरसावमा दिनद वरसावना है सावन सुहावना ॥

( १४ ) कवि पं० अम्बाशंकर जी-काशी। अधो यह सूधी सो सँदेसो कधि दीजो भलें केकिन को केका कूक कोकिल जुहावनी । बा- दर को सादर समूह झुक्यो आदर सों चादर सो नौर चहूं परतो फुहावनी ॥ संकर सुकवि वन वागन में बारिन मैं इन्द्रवधू पॉतिन का रंग चुचुहावनी । सरिता सरोवर को संगम सुनाय फेर आवनो सुनावनो जू सावन सुहावनो॥ पति की तोय ताहि तावना सतावना है दम्पति मिलावना मल्हार माद लावना । अ- इन कॅपावनी डरावना विदेसिनहूं भावना सु. जागी जाग जुगति बढ़ावना ॥ केको कुहका वना घनेरी घटा छावना जु पानी बरसावना कवी को हुलसावनी । संकर सुनावना वनावना कवित्त नोड़ि भावना भया ये मस्त सावन सु- हावना। बाबू हरिशंकरप्रसाद वनारस । नागिन सी कारी राति उलटि पलटि डर ( १५ ) तौर ऐसेो लागत है गावनो वजावनो । झूले झे- लुआ की धरि हियरा अलाय देत कजरी सुने ते मुख कजरी लगावनो ॥ साची वात कही हरिशंकर दोहाई करि मोका ना सोहात मन मोद दरसावना। वालम विदेस ते तुरत आय जाय आली तबतौ हमारे हेत सावन सोहावना॥ काशीनिवासी हजचन्द जो वसभीय सोर करें चौहैं चारु कोकिल कि सोर मोर ठौर ठौर भयो है वलाकनि को पावनो । नदी नद नारनि मैं घोर जल जोर छायो मंजुल म- रालनि को कै गयो परावनो ॥ चातक दृषित को दृषा न विनु स्वाति जाति बाढ़त निरन्तर प्रवल प्रेम पावनो । अजहूं न आयो मनभावनो हमारो छायो उमड़ि घमडि धन सावनसुहावनो। महाराजकुमार गोरीप्रसादसिंहजी गिडोर । दाटुर पुकार तैसी झनकार झिल्लिन की धुनि मुरवान को अनंग उपनावनो । चचला चमक संग मेह गरनावन त्यों मंझा पीन ला- ( १६ ) वन पपीहरा को गावनो ॥ हिय हुलसावन ब- सावन समाज सुख मन तरसावन लगत मन भावनो । ताप को नसावन सलिल बरसावन सुमोद सरसावन ये सावन सुहावनो ॥ गंधौलो जिला सीतापुरनिवासी बाबू जुगुल किशोर जो पनामवनराज। गावन मलार सुर तार को बजावन न भा- वत है एरी मोको झूलन भुलावनो। घेरि घन आवन मयूर रट लावन औ चंचला को चारो ओर चमक चलावना ॥ चूनरी रंगावन सुमेंहदी रचावन अलीगन को आवन विनाहक सता- वना । दावन विना री ब्रजगज मनभावन के लागे विन लागत न सावन सुहावना ॥ गयानिवासी प. गिरधारीलाल जी गवावाल । घूमिवो घटा को अरु भूमियो सुवेलिन को दामिनी दमकिवा पयोहा रटि लावना। मेंकन को वोलिवो औ डोलिवो समीर सौर वार वार मोरहुं को सोरहु मचावना ॥ गिरधारीलाल कहै ( १७ ) भूलिवो सु झूलन की त्यौंही बहु फूलन के से- जहिँ विछावना । पावन परति याक नाव नहि लीजे मोहि भावन विना न लागै सावन सुहा- वनो। काहे को अयान भाँति मान ठान वैठौ आज सुनि ये चवाइन के झूठ बहकावनो । ईस की दुहाई वीर साँच मैं वखानत हो अकलंक सरल है तेरो मनभावनो ॥ कहें गिरधारीलाल मान कही मेरौ अब वेगि छाडि दौजे चित देष उप- नावनो। भौंहन चढ़ावो जनि क्रोधहि वढ़ावो ननि विरथा वितावो जनि सावन सुहावनो ॥ पटनानिवासी बाबू पत्तनलाल जी । पूछति कहा री वीर वार वार माते आप तू तो है सयानी कहा ताहि समुझावना। आवनी तो दुरि रह्यो धावनी पठायो नाहिँ कैसो नि- रसोही हाय होय रयो भावनो । नावनो उन्हीं पै सब हालत सुनारनो बुभावनो वनाय वात काह भाँति लावनो । दिन ना वितावनो भु- ( १८ ) लावनो न मेरी सुधि आइ जानो रहते हैं सा वन मुहावनो॥ धन्य ही हमारे मनभावन कहावन को प्रा- वना तो दूर ना सँदेसह पठावना । कहाँ लौं उराहनों पठाऊँ लिखि प्यार तुमैं जानत अ- जान वनै ताहि का बुझावनी ॥ कौन प्रीति रोति या नु आस दे निरास करौ वरसों पर आ- वना न, परसों कहि जावनी । आपुही विचारियै सुसौल विन आप कैसे काट दिन रात आयो सावन सुहावना ॥ वाव शिवनन्दनसहाय हेड किरानी जजी पटना। दामिन दमंक अम धन को घमंक घोर जु. गनू चमक होय भौत उपनावनो। कोइल कौ कूक मारगन की कुहूके झंझा पौनहूं की झूकें हके लूके वरसावनी ॥ नाहर से गरन रहे हैं नद नाहरहूं नाह विनु चाहे ये वियोगिनी च- वावनी। ऐसोही अपावन त्यों अचला सतावन को छिः छिः सिव भाषत हो सावन सुहावना । -

( १६ )
धावै लगें धीरे धीरे धुरवा अकास वीच मे-
घन को शब्द होन लाग्या मनभावना । नाचे
लगे मोर चहुँ ओर त्यों उमंग भरे गावै लगे
कोकिल स होय 'हरसावनी ॥ झूमै लगौं द्रुमन
पै लोनी सु लवंगलता गंजै लगै भौंर मनमोद
उपनावना । दुख झरसावन सनेह सरसावन
सो प्राय गयो फेर सिव सावन सुहावना ॥
चन्द्रकला बाई - दूंदी।
वरषि वरषि वारि हरष वढ़ावत है करखत
चित्तरी मलारन का गावनी। औरै भाति के
किन को केका सुनियत पालौ चातक मुनात
वैन सुख सरसावनौं । चन्दकला मन्द मन्द शी.
तल समौर वहै फरकत वाम अंग मेरी मनभा-
वनौं। ऐहें घनश्याम घनश्यामन में बीसौं विसें
पावन लग्यो है अब सावन सुहावनौं ।
सिहोर (काठियावाड) निवासी कविगोविन्द गीलामाई
औषधि उपावन को वुन्द वरसावन को रंग
नभ सावन को चित में सुहावनो । मान के

( २० )
मिटावन को प्रेम सरसावन कों काम उपजा-
वन का संपा चमकावनो ॥ गोबिंद के गावन
की वेल के बढ़ावन की भूमि हरियावन कों
मोर के नचावनो। बिरही के तावन को संगि
के रिझावन को आयो मनभावन या सावन
सुहावनी ॥
वारिद के बुंद मन्द मन्द बरसत अरु मन्द
मन्द वोलत
मयूर
मनभावनो । चंचला चमक
चहुंओर लसे मन्दमन्द मन्दमन्द मारूत सुहात
सुख छावनो॥ मन्दमन्द झूलत हिंडोरे नर नारि
सवै मन्द मन्द पपिहा पुकारै पिय आवनो ।
गोविद अनेक ऐसे कौतुक उपावन को आयो
मनभावन या सावन सुहावनो ।
कानपुरनिवासी पं० ललिताप्रसाद जी त्रिबेदो।
पपिहा पुकारे तीन प्रानही निकारै मारे
कोयल हुंकारै धुरवानह को धावना । झिल्ली
झनकारै जरै नगनू प्रजारै झरै झारै सी चपल
चपन्तान को सतावना ॥ मोर सेरि सोरि कान

( २१ )
फोरिकै नगावै मैन ललित न भावै नेक अलि-
गन गावना। कैसे धरों धीर मनभावन विदेस
वीर भोहि तो लगै ना यह सावन सुहावनो।
छवीले कवि-बनारस ।
पट फहरात तामों विविध समीर कदै रंग
वर कोसर सुगन्ध सरसावनो। मुकवि छबीले पग
नपुर भनकदार झनकायो झोनुरन मन अरु-
भावनो । घोर स्वर वाँसुरी बजत गरजत मानो
हसन दसन दुति दामिनी लजावनो। वीर हज
वीधिन वहार वरषा है संग आये घनस्याम बनि
सावन मुहावनो॥
छविपुंज बगरयौ परे।
काशीनिवासी श्री १०५ हाणलाला जी महाराज
उपनाम रसमिधु ।
अस्वर कारी घटा मोतीमाल बुंदे पर मांग
लाल इन्द्रधनु खूष अगन्यो परे । कहे रससिंधु
फेर कोयल सों कूके कण्ठ नूपुर की झनकार
जु

( २२ ) लाहु लाहु दिन में सुलाख बार देख नगखो परे ॥ चली वानि कुंजन में प्रेम जो सरोवर पै स्याम संग जाय मिली पास डगयो परे। राधिका को रुप मानो चंचला की चका- चौंधि कुंज को लता छबि पुंज बगस्यो परे॥ वाबू रामकृष्ण वर्मा सम्पादक भारतजीवन काशी। भाखी तुम वाद बलवीर त हमारे रगयो परै । लाऊँ यदि कुछ को अँध्यारो निसा माह तऊ तन को प्र- कास माहताब ज्यों बस्यो परै ॥ धारत ही गह को सुदेहरी के आगे पग ठौर ठौर भौंरन को भोर भगखो परै । कैसे ताहि लाऊँ लाल मा- लतीनिकुंज प्रति अंगन ते वाके छविपुंन वगस्यो परै॥ काशीनिवासी पगिड़त दिज बैनी कवि । मुख महताव सों सहस्र गुना आवदार हो- रन की हार चाम कुच रगयो परे। वेनी दिन वर्गत वनै ना वर्गा तेन ज्वाल काटि मारतण्ड सो प्रकास अगम्यो परै ॥ नेते गुन रूप के वि- - धाता ने बनाये वेस राधिका के गातन विलोकि सगयो परै । राहन में कुंज के चली तो मै दे- खाऊँ लाल छाहन में जाके छविपुंज वगयो परे। आये प्रात कित ते प्रभात ही हमारे भीन अंग अंग सिथिल विलोकि सगयो परै । वनी हिज वोलत हो आलसवलित वैन चलत इतै ते उतै पग डगग्यो परै ॥ अंजन अधर पीक अ- सन कपोल राजै विन गुन माल उगि उर अ- गग्यो परै। लाल लाल परम ललाम लाल मां- खिन ते आज गुंजमाल छवि पुंज वगयो परै ॥ वाबू हरिशंकरप्रसाद वनारस । जमुना के तौर दार फूल मार खेलिवे मों कहीं ली सँभगर कन्धा अंचल टयो परै । गजव गुलाव नेक गुच्छ को उठावै कर मानी मैन साचे माहि कंचन ढयो परै ॥ भने हरिशंकर लचकि लंक लफि नाति एक कुच हाकै एक कुध उ. घन्यो परे। अंग अंग प्यारी के अनंग को तरंग लखि स्याम होत दंग छविपुंन वगयो परे ।

( २४ ) पंडित अम्बिकादन व्यास-काशी। आई धों कहाँ ते विनु कारन लुनाई माई भरी मधुराई सों बिलोकन लगी हरै । कारो ककरना ज्यों करेजा कों निकारि रयो सौप- हार धौरन के हार अरपी गरै ॥ कबि अम्बादत्त मुसुकान वान आई कछु वात के कहत जनु फूल की लरी झरे । देखो गोरटी को छोरटी के या धुरैटे बॅग चारिक दिना ते छविपुंन वगयो परै ॥ काशीनिवासी वावू माधवदास जी। पद कंन की लुनाई नहर जरावताई कि- किनी कलोल कलहंस झगयो परै। पीतपट ल. कुट मकुट वनलाल सोंहैं मोहैं हैं सुढार हार ही मे ढगयो परै ॥ कुण्डल की जोत मुख चन्द दुचन्द होत मन्द मन्द तान ते सुमान पगरयो परे । माधव जू मौजभरे चलु री देखाऊँ जहा माधुरी निकुंज छविपुंज वगयो परै ॥ तें ( २५ ) । कवि पं० अम्बाशंकर जी-काशी। असित सिँगार सार प्यार सों पिया पै चली काटे की गलीन अंग २ रगयो परै। करी हरी चक्रवाक कीर भौंर मार मोर जोर भरे दौर २ भौर झगयो परै ॥ जलज सुवास को निवास आस पास होत हास के प्रकास फूल रास स. गग्यो परै । इन्दु ते करोर गुनो कानन में प्रा- नन तें संकर सुकवि छविपुंज वगस्यो परे । पटनानिवासी वाबू पत्तनलाल नी । झूलत हिँडोरे पान स्यामा स्याम वंसौवट पवन झकार पौतपट फहग्यो परे । त्योंही नर- तारी सारी सुभग किनारोवारी भनत सुसील वार वार उघयो परै। ता समै की सोभा नहि कासु मन लोभा अंग अंगनि लुनाई छिन छिन छहयो परे। वारन तें हारन तें हँसनि उचारन तैं अकथ अतीव छविपुंन वगरयो परै ॥ बैठी स्यामा स्याम-सोच सूने केलिमन्दिर में घेरि घन आयो वार बार घहयो परे। जैसे ॥

( २६ ) जैसे वसंत अपार भरझर नीर तैसे तैसे नैनन ते लोर माहयो परै । ऊरध उसास चले आस ते निरास भई कौनइ उपाय मन नाहिँ ठहयो परे । हाय वही कुंजन में कहस्यो करै है जहाँ संग में सुसौल छवि न वगयो परै । महाराजकुमार गौरीप्रसादसिंहजी गिदौर। हिलन इमेल हार हीरन हसन मन्द मन- कार पैननी पै प्रान फहस्यो परै । चातुरी बचन चारु चिबुक चलन मन्द चचल चितौन पर चित छहयो परै ॥ लोनी लट लोयन लचीलो छीन लंक पै लनौलो मन लालची लटू कै लहयो परै । वारिन वदन वेंदी भाल त्यो वसन बेस वेसर पै आज छविपुंज बगस्यो परै गंधौलो जिला सीतापुरनिवासी बाबू जुगुलकिशोर जो । ॥ एपनाम वजराज । कहाँ रेनि नागे मो अभागे घर आये भोर थंगन अनंगह ते रूप अगस्यौ परे । जैये तहाँ नये न मनैये ना वितैये दिन उनसों इतै न कहूं

( २७ )
आनि झगयो परै ॥ मेरे तज उनके भी उनके
तो उनहीं के एहो ब्रजगन अब क्यों न गयो
परे। लाली भरे लान भरे आलस-ससान भरे
नैनन ते आज छविपुंज वगयो परै ॥
गयानिवासी पं० गिरधारीलालजी गयावाल ।
भौंहन विसाल अरु बोलति रसाल वैन हा-
लई ना गौन आई वा गुवाल के घरै । इन्टु के
से आनन औ अरविन्द के से दृग मन्द मन्द
चाल में गयन्द मद को हरै ॥ गिरधारीलाल
अहै महा सुकुमारि वाल सिसकी भरति जौन
नेकु कर के धरै । आज हनरान मै मिलैहौं ति-
हि संग नाकी अंग अंग संजु रवि पुंज बगयौ
परै॥
कानपुरनिवामी पं० ललितप्रसाद जी त्रिवेदो।
छोटी २ दन फुहारै धन भारै नीर पवन
भुकारै डारै भूमि रगरी परै । गावति मलारै
अलि विविध विहारै भरि धारे मुद पपिहा पु-
कारै अगरी परै ॥ झूलति हिँडोगे स्यामस्थामा

( २८ ) वहु बाम संग तीनो लोक सुखमा ललित ड- गरौ परे । कुंज खग गुंज अलि मंजु मिली - न्दावन आजु सखि कुंज छबिपुंज बगरी परै ॥ चन्दकालाबाई-बूंदी। गावत गुविन्द गौत मुरली मनोहर में लै लै नाम तेरो री विशेष उघस्या परे । नाचत गुवाल बाल दै दै ताल नाना भाति लखि लखि लो- यन का मन तगयो परै । चन्दकला लपटो ल- वंगलता तालन में बहत बयार मैं सुगन्ध घवयो परै । गुंजत मलिन्द आलो डोलत निकुंजन मैं चलि रौ विलोकि छवि पुज बगरयो परै ॥ चौदहवां अधिबेशन। आज वा कदम्बतरे रंग बरसत है काशीनिवासी श्री १०५ कृष्णलाला जी महाराज उपनाम रससिंधु । सघन निकुंज तामें फूल को हिंडोरा सान फूलन का झूमकाहू सोभा सरसत है रससिन्धु तहाँ झुण्डन को झुण्ड सखौ राधिका । कहे सत है ( २६ ) विराज बाम देख हरसत है । बद्दल जु घेर घेर गरजें वे बेर बेर चंचला चमकै मेह आयो दर भूलत हिंडोरे स्याम कालिन्दी कूलन पर पान वा कदम्बतरे रङ्ग बरसत है। सुन्दर सलोने नैन पैने जो रसौले बैन देखे जिय परे चैन मैन हरसत है । कहै रससिन्धु फेर करत सिँगार खूब दर्पन ले देख रही सोभा सरसत है ॥ बातन बनाय नेह घातन लगाय बाल स्याम सो मिलाय गई कुच परसत है । अंगन सों अग लाय चूमे मुख बेर बेर आन वा कदम्ब तरे रग बरसत है कवि पं० अम्बाशंकर जी-काशी। मन्द २ गरज तरन डफ ढोल बनें भिल्लो भानकार माझा वाकी सरसत है । कूकत सि. खण्डी हकि फुकें तुरही की तान अविर मुकेस बज जुग्न दरसत है ॥ संकर सुकवि नृत्यकारी दामिनी है तहा गावत धमार पौन मंझा हर- सत है। धन पिचकारी लिये पावस रचाई फाग आज वा कदंबतरे रंग बरसत है ॥ ॥ --

।
( ३० )
काशीनिवासी बाबू माधवदास जी ।
आली री दिखाऊ तोहि कौतुको कदंब एक
मूलमे जुगल कंज भूमि परसत है। तापै जुग रंभ
खंभ दामिनी दमक तामै सर पै कपोत सोम
सोभा दरसत है। सोम पै कलापी कौर खंजन
कलोल करें खंजन पै नौलकठ सोभा सरसत
है। माधव सो न बोलै तूं चलियो हमारे संग
आजु वा कदंबतरे रंग बरसत है ॥
बाबू हरिशंकरप्रसाद बनारस ।
सावरो बटेरि के अनेक रुपवारी नारी
काहू मुख चूमै काहू कुच परसत है। डर वृष.
भान के अकेली कैसे जाउ आली छटा देखिवे
को मेरो जीव तरसत है। मानौ हरिशंकर अ.
मित भाँति साजि पाति देह वनिता की धरे
काम दरसत है। काल्हि लौं उड़ि के गरद खड़
खड़ाने पत्र आजु वा कदंबतरे रंग बरसत है |
काशीनिवासी जो बलभीय ।
चलै रौ चलै तू अव करै ना विलंब नैक दे-
॥
हजचन्द

खिवे को वौर मेगे चित्त तरसत है । धेरे धन- घोर वोलैं कोकिल किसोर मोर चारोओर त्रि- विधि समोर मरसत झूलत हिंडोर प्यारे नवलकिसोर दोज बाजत अनेक वाद्य मोद द- रसत है। गावत हिंडोर मेघ मधुर मलार गुंड आज वा कदंवतरे रंग बरसत है ॥ काशोनिवासी पं. केदारनाथ जी। हरी हरी डारिन में हरित हिंडोर राजे ह- रित फंदे हैं फाद डोर दरसत है । हरी हरी सखिया मुलावति हैं स्यामा स्याम गावती म- लार मंजु सोभा तरसत है ॥ कारी अँधियारी भारी बौजुरी चमक चारु मन्द मन्ट मारुत फु- हौरी सरसत है । भौंनि पट अंगन ते रगडू के- दार चुवै आजु वा कदंवतरे रंग वरसत है ॥ कोपागंज निवासो मारकंडेलाल उपनाम पिरजीव कवि, चंचला चमक चकचौंध चहुंओर ओप अविर अँधेरो धुन्ध धाक दरसत है । पिहिक मयूर होरी राग झींगुरन माँझ गरज मृदंग जाते अंग ( ३२ ) हरसत है ॥ कवि चिरजीव चलो लाडिलौ दि- खाऊँ जहाँ पावस में फाग को प्रमोद सरसत है। करि के उमग मेघमगडल महौतल मैं आज वा कदंब तरे रंग बरसत है ॥ जुवती बेचारिन ते जल मे जोड़ाये हाथ जाके नंग अग ते अनंग सरमत है। आप चढ़े कदम चौराय चीर कालिंदी पै कान्ह की कलानि मैं खाटाई दरसत है । कवि चिरजीव कयौ ताहू पै न आवो पास पैहो तबै वसन जु अंग परसत है। दंग होय नात लोग ढंग का विलोकि जाके आज वा कदम्बतरे रंग बरसत है पटनानिवासो बाबू पत्तनलाल जी। लाल फालसाई औ गुलावी गुलाबासी पट काह पै बदामी गुलेनार सरसत है। नरद च- मेली काहू काहु धानो गन्धको त्यों काहू आ- समानी पौरोजई दरसत है ॥ सकल अनन्दभरी भूलती हिँडारे चारु भौंगि पेंग मारै लखि नीय तरसत है। चलि रौ सुसौल प्यारी लेोचन को ॥

( ३३ ) लाहु लहै आज वा कदम्व तरे रङ्ग बरसत है। एक मिलि एकन सौं सुर हरषाय आली मारती हैं तान जाय नम परसत है। एक ले सितार एक ढोलक पखावज लै एक बासुरी व- जाय संग सरसत है ॥ चहूंओर लाखन को भीर अभिलाष भरी एकन के आगे एक जान तरसत है। सुघर हिँडोर स्यामा स्याम जू सुसौन्न भूलें आजु वा कदम्बतरे रङ्ग बरसत है महाराजकुमार गौरीप्रसादसिहजी गिहौर। हरषि हिँडारे चढ़ौ नागरीन संग बघुमान को किसोरी हिये मैन वरसत है । वमन सुबेस सजे चंपई हरीरो लाल भूलें कि भूमि त्यों उमंग सरसत है। लर पुखराज पन्ना मानिक लौं कैधौं प्रतिविम्ब इन्द्रधनु की अवनौ पै दर- सत है। मलन म उड़त दुकल उड़त दुकूल की वहार कैधौं आज वा कदम्बतरे रंग बरसत है । गयानिवासी पं० गिरधारीलालजी गयावाल । मलि मलि गाल पे गुलाल है उमंग भरे । ३४ ) ॥ ग्वालन के सहित गोपाल हरसत है। कहै गि- रधारीलाल गारी पढ़ि बार बार युगल उरीज पर कर धरसत है ॥ हौती उतही ते चलि आ- वति हौं एरी बौर देखा ना हमारो रूप कैसा दरसत है । अश्व को सौं भूलहूं न जाय वहि कुंजओर आन वा कदम्बतरे रङ्ग बरसत है ॥ गधौलो जिला सीतापुरनिवासी बाबू जुगुलकिशोर जी ॥ पनाम वनराज । अनूप दरसत है दौरि दुरि आली देखु दीपति दुहूं को दुवा दंपति सरुप से । गोरे स्याम- ताई स्यामताई में गोराई आई रंगन को भाई रंग और मरसत है ॥ राधे में कन्हाई ब्रजरान वृषभानुजाई अंग प्रतिविम्ब अग अग परसत है। एरी मुख सान को समाज करि ठाढे सखी याज वा कदम्बतरे रंग बरसत है वाव शिवनन्दनसहाय हेड किरानो नजी पटना। गोगे वैस थोरी लिये रोरी त्यो गुलाल मोरी रची है स होरी पेख होय हरसत है। लाल मेघ है॥

( ३५ ) ॥ - माल नाई छाई है चहूघा सिव तामें घनस्याम घनस्याम दरसत है। डफ को अवाज सोई गरन दराज होत वौजुरी सौ राधा रूप भोप सरसत है । होयगो अनन्द अंग अंग जाय देखो ढंग आज वा कदंबतरे रंग बरसत है। सिहोर [काठियावाड) निवासी कबि गोविन्द गोलाभाई । नाके तल तेह धरि दोज उठ गये पुनि फे- रही मिलन वाक जीव तरसत है। यातें अप- सोस करि दोज पछताडू अति आखिन ते ऑ- सुन के बुंद वरसत है ॥ गाविद गुमान तनि सोई एक दूजा अव आप ते मनाइ आली हिय हरषत है। चाह त सकारे सोय गोपिका गुपाल मिलि आज वा कदम्बतरे रंग बरसत है। सोहत सघन बन वेस अस वक्षन तें धूप धग में तहाँ नेक दरसत है। भरना भरत एक उते अभिराम ताक सीतल सलील लखि होय हरषत है ॥ गोबिंद सुकवि तहाँ कदँव कदंब नू के विमल बिरानी अति शोभा सरसत है । न ( ३६ ) गोपिका गुपाल मिलि खेले तिति फाग मानो आन वा कदंबतरे रंग बरसत है । कानपुरनिवासी पं० ललिताप्रसाद जी त्रिवेदो। नवलकिशोरी गोरी थोरी २ बैसवारी रेसम को डोरी गहे सोभा सरसत है । भूकन मुलावै कोज गावै हरखावै कोज कोज रतिभाव भरी धाइ परसत है ॥ हँसति हंसावति बढावति प्रमोद मन ललित अनूप सुख सोभा दरसत है। भूले स्थामा स्थाम मंग जुगुल अनंग भरे आज वा कदंबतरे रंग बरसत है ॥ ॥ मनोज महाराज की। काशीनिवासी श्री १०५ सय लाला जी महाराज उपनाम रससिधु । वाजत नगारे घन धुरवा निसान लिये चं. चला चमके तोप फेर जी अवाज की। कहै र- मसिन्धु तहा वहल की फौन साज हाथिन पै वैठ कारे लावत समाज को " कोयल पपीहा मोर दाटुरह झिल्लो ओर वाटत है मेह दौर दे ( ३७ ) भर आज की। पवन भाकोर जोर करत है मोर सोर आवत सवारी ये मनोज महाराज की ॥ चलो आन कुंजन में सघन निकुंजन में स- खिन के पुंजन में सोभा वो समाज की। कहै रससिन्धु फेर जमुनाजी पास बहे बोलत पपीहा मोर मधुर अवान को ॥ सखी बोले आइ तहाँ करी है तयारी जहाँ बक्षन पै डोरी डार भूलन के सान की। मुलत अलावत ओ आप स्याम भूलत हैं करत कलोले ये मनोज महाराज को। पंडित अम्बिकादक्ष व्यास-काशी। वेदिका बनाई वच्छथल को सुस्वच्छ अति अधिक लनाई नौर सौची सुख साज को । पिंड मधुर निकाई सने हास दूधधारा ढरकाई इहि कान को ।। कवि अखादत्त रोम पाति तिल पाति राजे नौवी ससरनि बलि ठानी छवि छाज की। तीय तन तीरथ में जो. वन से मित्र पान श्राद्ध विधि कौनौ है मनोज महाराज को॥ जुग राखे ताप ( ३८ ) पगिड़त अम्बाशङ्कर जी -काशी। ३ चलो तौर भानुजा कदंब तरे झूलत हि डोरे दोज सोभा अति आज की। एक ओर सं कर झुलावै बनि गोपी रूप दूजे अरधङ्गिनि है गोपी गुरु लाज की ॥ गावत मल्हार सचौ सा- रद बिसारद ने नाग्द बजावें बौन सातो सुर साज कौ। वारों छबि रति की निहारिराधिका पै कोटि कोटि ब्रजराज पै मनाज महारानको । पं. केदारनाथ जी बनारस । आयो पुनि ब्रज पै पुरन्दर प्रकोपित व द- मक दिसान होत दामिनी दराज की । घेरि घन घरि घमगड घहरान लागे चातक चकोर मोर कोकिल अवान को ॥ नाथ बिनु धीरज धया ना जाइ पावस मे कैसे कै केदार जू वि- तेगौ निसि आज की । ऊशे जोडू मोहन ते कहियो सँदेस मेरो पौर सहि नाइ ना मनोन महाराज की॥

( ३६ ) वा. हरिशङ्करप्रसाद जी-काशी। ऐसो है उचित कि बियोग को पकड़वाय भेजि देवें सिन्धुपार राह उखमाज कौ । नारी औ पुरुष को निहायत सतावत है प्यास भूलि जाय चाह होत न अनाज की । याही मोह- किमा नाकी होत न अपील कई भने हरिशंकर लचारी है रेवाज की। विरही मनुज दरखास देत थकि गये कारट दिवानी है मनोज महा- रान की। वा० माधोदास जी- काशी। कैधों काहू बिरहो ने ऐंच लिया मध्यभाग कार को गोलाई सोई दसक हिजराज कौ । कैधों सुधा सिधु माह विंब रविमण्डल को कैधों रेख खाची है विधाता सुख साज को ॥ कैधो बस करिबे का माधव पिया को मन जन्ती ये वसीकर श्री मोहनी समाज की। चारु चपला सी खासौ नत्य राधिका की कैधौं भूलती है मासी ये मनोज महाराज की ।

( ४० )
धनचन्द जी बलभीय-काशी।
छवी रितु माहिँ छवो रितु को बहार हेतु
इहैं राजधानी है अनादि रितुराज कौ । चा.
तक चकार मोर रानहंस कोकिलादि गावत हैं
कौरति अनूप बाग राज की । गौरी पूजिबे की
यही आई है स्वयंवरीहु स्वामिनी जो आठह
सखिन सिरतान की। ताही के बनत ये हैं
पायल मधुर मंजु वाजें मनौ दुन्दुभी मनोज
महारान की।
मारकण्डेलाल उपनाम चिरजीवी कवि - कोपागंज ।
लिये खग्ग चपला चमकनि दिवाय प्राय
प्रानन सुखाय दोन्ही दौपन के नाज को। बूदन
के वान धरे सान बेधि गातन का वातन भुलाय
दोन्ही सहस समान कौ ॥ कवि चिरजीव नाके
प्रौतम विदेश छाये आये नाहि अनौं वेस वैस
मे अकाज की। खोज खोन मारती सरोजनी
को रोज चोजभरी घटा ये मनोन महाराज की।
भयो ना अँधेरो भानु छिपिते हमारी वीर

( ४१ ) ॥ उड़ी रेनु छायो धुन्ध सारे मग ताज की। चप- ला चमक ये न दीपत उलंग असि गरन न येरी धुनि रन बाघ बाज को ॥ कवि चिरजीवी हमें प्रीतम विहीन जानि कीन्हो है समान वधिबे के वेससाज की । घटा ये न नभ में हमारी प्रानप्यारी सुनो प्रानहारी फौज ये मनोज म- हाराज की॥ अयोध्याप्रसाद ( स्याम ) वाकरगन - बांकीपुर । कठिन है नौतिवे को देह कामनी का देस प्रवल है दल स्याम तौर नीक साज की। सो- रहो भिंगार सोई शस्त्र वेसुमार जानो अंग अंग सुन्दर सिपाह सब काज को ॥ धारे टोप कारे कुच सोहैं फौजदार दाऊ मधुर नगारे धुनि नूपुर के वाज को। जग घहरात फहरात जव दूरही ते अंचल पताका है मनान महाराज की। गयानिवासी पं. गिरधारीलाल जी गयावाल । दौंके करवाल विकराल द्युति दामिनी के तैसई पताका घूमै वकन समाज को । पैदल ( ४२ ) मयूर अस दाटुरन फैलि रहै घनघोर ताप बन्द प्रवल श्रवान को ॥ गिरधारीलाल काहै मिलु री गुपाल संग कैसेइ न रहिहै गुमानी बौर आन को । मानिनी के मान गढ़ तारिबै को चला आवै सेना लिये पावस मनान महाराज की। बाब शिवनन्दनसहाय हेड किरानी जनी पटना । कुंजन लतान नाही काम के वितान तने भूमि हरिआई ना दरी है सल साज की। कार नाहिं बादर सतंग मतवारे सारे गरज न होत धुनि सलख अवान की ॥ चपला चसक नाहीं खुले हैं सुकरवाल चातक की और नाही सेना के समान की । बूंदन दो धारा ये न जानो सर धारा सिव पावस चढ़ाई ना मनोज महा- राज को॥ पटनानिवासी बाबू पत्तनलाल जी । फूलन को धूनी वनी पटली सुफूलन को ल- मति हिंडोरे डोरी पालन के साज को । फूलन की सेन ताप राजि ब्रजगज रहे फूलन की ( ४३ ) साज सजी राधा छवि आन को ॥ फूलन को माल गरे कंकन सुफूलन के फूलन के कर्नफूल फूलन समाज की। देखि चकाचौंधौ लगी सुधि इ सुसौल भूलो रति रितुराज को मनोज महा- राज को॥ हग अँधियारी छई सौस सित केस भये नि- तही सिकायत है पचन अनाज कौ। तज रंजि अंजन लगाय के खिजाव चलें ढूंढ़त किताब दवा घंभन दराज की । जात अबलागन कों धूरि धूरि देखत हैं होय कै निलाज नेकु लाज न समोज की। सौक साज वान की मिटी ना राज लाज की सु मौज है हनोजहू मनोज म- हाराज की ॥ महागजकुमार गौरीप्रसादसिंहजी गिऔर। छिन छिन कानन की ओर बढ़ो जाति मन मेरो लखि और भयो सोभा कछु आज की। र हत न नेक सुधि डसत अवैहीं तवै तन को न मन को न सुखद समाज कौ ॥ दूत उत नात -

( ४४ )
दौरि रहत न क्योंडू थिर बस करिबे को जग
बिधि मनु काज की। सावक कुरंग कैधौं वि-
षम भुजंग कैधौं चपल तुरंग ना मनोन महा-
राज की।
गंधौलो जिला सीतापुरनिवासी बाबू जुगुलकिशोर जो
पनाम हजरान।
लोचन लखात मदमोचन नपा के दल पज
पल रोमन ममर सुख सान की। अधर कपोलन
हिये पै घने दौसे छत रातेई दुकूलन बिलोकी
छवि पान की । कित रमि रेनि ब्रजराज भोर
आये दूत नित तित हित जित नित रति काज
की। रोज रोजवारी नहीं मोन चोज खोज मानो
ओजभरी मूरति मनोज महाराज को ॥
कानपुरनिवासी पं० ललिताप्रसाद जी त्रिवेदो।
कोकिल के कूकनि मैं मारुत के झूकनि मैं
भौंर मुख फूकनि मैं चातक अवान की। किं-
शुक अनारन मैं मंजु कचनारन मैं वोरे अम्ब
डारन मैं सामा सजे सान की । वाटिका सु-

to dwar ( ४५ ) बागन मैं बिपिनि तड़ागन मैं ललित सुरागन मैं दुति रितुरान की । जगत मभाई विरहीन पै चढ़ाई करि फिरति दुहाई है मनोज महा- राज को॥ बाबू पयोध्यासिंह मधुबन तिला आजमगढ । बादर न होय चढी तो चलो आवति गरज न होत फैली धुनि है अवाज की । बूंदें ना परति बरषत हैं विषोले वान इन्द्रधनु कमान रन काज को ॥ हरि-औध धुरवा न होंहिँ फास जेवरी है और ना लगी है झरी पायुध समाज की · वीजुरी न होय एरी बधन वियोगिनी को तौग्वन कृपान है मनोन महा- राज की। सिहोर (काठियावाड) निवासी कविगोविन्द गीलामाई चामर चिकुर अस गीन गनरान सोहे ज- रन गुरज प्रति ओये युवराज की सोह ध्रुव चाप अरु कोंधत कटाच वान भेजा फहरात नत्य दीपति दरान कौ ॥ कंचुकी कवच सान है ( ४६ ) कर्नफूल ढाल धरि नेवर निनाद शकशूर के स- माज की । गोबिंद सुकवि ऐसे बाल बपु सैन साज आवत सवारी ये मनोन महाराज की । । पन्द्रहवा अधिबेशन। मिती भादों शुक्ल । सम्बत् १८५१ प्यार की आँखनि में। काशीनिवासी यी १०५ रुपालान्ता जी महाराज उपनाम रससिधु । सुन्दर रूप सलोने हैं नैन जू अम्मृत वच मृटु भावनि में । रसमिधु कहे चलि वेगि लली नहि तोसी तिया कोइ लाखनि में ॥ फिर सॅा. वर स्याम सो नाय मिली तहाँ रूप सुधारस चाखनि में । सुरभायो नही सुर: हैं सखी उ- रझ्यो मन प्यार की ऑवनि में । मावन मों अति कोमल गात जु अधर मधुर रस चावनि में । रसमिधु कहे लट नागिन सी नुलुफे भवगहात भावनि में ॥ कटि सिंहन सौ ( ४७ ) कुच कंज लसे नहीं ऐसी तिया को लाखनि में । मन मेरो लग्यो है भला सननी सुन वेरिये प्यार की आखनि में॥ बाबू रामकृष्ण बर्मा सम्पादक भारतजीवन काशी। कत झूठ दुराव करै सजनी रजनी बितौ लाखऽभिलाखनि में । बलबीर सों बीर मिली कसिकै मिसि के क्यों दुरावति या खनि में ॥ मसको उर कंचुको बार खिले कह दे,गे भेट ये लाखन में । यह सच है बीर कही नग को न छिपे पिय प्यार को पाखनि में । पडित अम्बिकादत व्यास - काशी। यह गाल के गाड़न सों गड़ि नात सौ लागे सुहावनी लाखनि मैं । अँचरा झटकाय हठीली इस भरमावति भोर से भाखनि मैं ॥ कवि प्र- म्बिकादत्त जू ग्वारि गँवारि धरै चतुराई ज्यौं साखनि मैं । करि नोर करेजो सो ऐचि रही है बड़ी बड़ी प्यार की आँखनि मैं मधुराई इतौ इहा हैहै कहा सुपियूखन मा ( ४८ ) तो खन दाखनि मैं । छवि पुंज दूतो न बिलोक्यो कहूं लखे सुन्दर लाखन लाखनि मैं ॥ कवि अ- म्बिकादत्त लुनाई लखौ वह आवति क्यौंहू न भाखनि मैं । जग तन्व वसौकर है जो कहूं विलोक्यो सो प्यार को आखनि सें ॥ कवि पं. अम्बाशंकर जी-काशो। एरी सखी व हलावति है यह झूठी बनावट भावनि में । कहि साँचो सहाय करौं अबहों नहिँ नेक भलो ढकि राख नि में ॥ तुम अङ्ग कहै अफ रंग कहै पुनि ढग क है पग नोखनि में । कवि संकर की करि सौंह कहौं सब नाहिर प्यार को चावनि में ॥ हजचम्ट जो बनभीय-काशी। विषयी प्रम खारथी को निदरै ललकारि कहैं हम लावनि मैं । इहि ते रम बारहो त्यागि सदा थिरता नय नेह के राग्वनि मैं ॥ नहि जा- निये काह पढी किहि पै तुम दोष बडो कटु भावनि में । छल वर्जित दीह दया मृदुता नि- वमै नित प्रेम को पावनि में ॥

( ४६ ) है है काशोनिवासी पं० केदारनाथ जी। यह भारी लगावनी लाग है रौ ना छटै उप- चार के लाखन में । मन मानिक जात वि- काय बिदाम सनेह सने मृदु भावनि मैं कछु और की औरई दीसै केदार सुधी अधरारस चाखनि मैं । सुख जधो ल यो ना कोज जगमें दुख दून प्यार की आखंनि मैं॥ कायोनिवासी पण्डित हिज बनी कवि। छिप प्रीत कौ रौत छिपाय नहीं यह बात प्रसिद्ध है लाखनि में । झलकै सब गीतन गा. तन ते अरु प्रेममई मृदु भाखनि मैं ॥ हिन वेनी सो काइ दुरावती हो धरौ लाज उठाय के ता- खनि मैं ॥ दरसे रद दाग कपोल घने बरसे रंग प्यार की आखिन मैं । लगती पलके न पलौ छन है महबूबही की भभिलाखनि में । हिज बेनी न दीद है दीदही की तक प्यारी चपै नहीं लाखनि मैं ॥ दासै उ. नको माहे अनवर परपूरन दोडुन पाखनि में - । ५० ) रंग यार को बेस बहार भरो नमूदार है प्यार की आंखनि मै॥ महाराजकुमार गौरीप्रसादसिंहजी मिहीर । गुरु लोगन में लखि आयो गोबिन्द प्रसेद छुट्यो तिय ता मन में । तन सेद को भेद न जाने को यह मोचि चलो अभिलाखन में ॥ सँग जाति सहेलिनहूं तें छपायो चहै कहि बैन सु- लाखन में । अंगिराय जम्हाय दुरावै तज प्रगट्यो परै प्यार की जाखन में ॥ गंधौलो जिला सीतापुरनिवासी बाबू जुगुलकिशोर जी पनाम वनराज । में - केहूं टुरै नवनेह नहीं करती रही लाखन साखिन मैं । वा दिन की मुसकान चुभी चित है गति ज्यौं मधु माखिन में ॥ भावरौ सौ ब्रज- रान भरै नित तेरिये गोहन वा खिन में । जा- हिर होत अरी प्रतिविम्व तो प्यारे को प्यार की आखिन में । पटनानिवासी बाबू पत्तनलाल जी । निसि सारी दहं को ससौल विती सख सों ( ५१ ) अनुराग को हासिन में। नम लाली विलोकि के मांगी विदा घबराई के प्रीतम ता छिन में। ललना अकुलाडू लगौ गर सौं सुधि बोलन की ना रही तिन में । मुख दोऊ दाज को निहारि रहे भरि वारि सुप्यार को ऑखिन में । पिय सोच पिया जिय सोच तिहि सखियां पिय लाइ के ता छिन में । मिस के हँसि के पतरावै लगौं सुनै आइहैं प्रीतम या खिन में । सुनि बाल कहै अस भाग कहाँ प्रगट्यो पी स- हेट ते वा खिन में । ललना सकुचानी लजानी महा मरे बारि सुप्यार की प्रांखिन में अव काहुहिँ काह गुदानहुगी तुमही तुम एक हो या छिन में । सुख सों सुख लुटन माहि सकोच रही अब राति न ना दिन में ॥ बहु बात तो भूल ही भूल गई परती रही पाय छिनै छिन में । तव तें कछु और भई नब तें गड़ी यार के प्यार को अग्विन में ॥ सुखकन्द नहीं मिसरी में नहीं नहि दाखन

+
( ५२ )
माखन चाखनि में । सुख नाहि मिलै उर रा-
खनि में हॅसिक खिसकै नहि भाखनि में ॥ सुख
जेते सुसौल प्रबौन भने हम ढूंढ़े भली बिधि
लाखनि में । सुख है सुख तो बस एक ही है वह
प्यारी के प्यार की आखनि में ॥
बाब शिवनन्दन सहाय हेड किरानो जजी पटना।
लेन गई प्रिय प्रौतम को दई मारी पगी रस
चावनि में । आई इतै दरकी कॅचुकी कहै फाट
गई लगि माखन में ॥ बात छिपाये छपात नगी
सिव सौंहें करे किन लाखनि में। आरसी लेके
निहारे भजों छवि छाई है प्यार की अखनिमें:
गयानिवासी पं. गिरधारीलाल नी गयावाल ।
किन होठन दन्त के दाग धरै रति से अध
रामृत चाखनि में । कहु क्यों न हिये हरवा न
गडे उर प्रौतम को कसि राखनि में ॥ गिरधारी
कहै अलि क्यों न लगै तुतरानि सुधामयी भा-
खुनि में । घनस्याम मिल्यो तब क्यों न वढे ये
ललाई गै प्यार की ऑखनि में ॥

भाव
में
( ५३ )
कद छोटी महा सुकुमारि अहै ससि सौ
द्युति धारति है तन में । अरु रागिनौ रागहु
जानति है सब हाव औ करै
छन
कटि छोन नबौन है वैस को बौनहि हौन करे
मृदु वैनन मे । गिरधारी दूते पर क्यों न वसे
तिय प्यारे के प्यार को पांखनि में
कानपुरनिवासी पं० ललिताप्रसाद जी विवेदो।
धन भूरे समेटन मैं चसको सिसिको सो भरै
अभिलाखन मैं । ललिते वा अदा की सदा किये
चाह हिये ते भुलाति है नाखिन मैं ॥ तनहू
मन वारे रहे नित जो वित को कहा वावर
भाखिन मैं । मुटु मन्द हँसौ सी रसी सो वसी
रहे यार को प्यार की आग्विन में ॥
गवू प्रयोध्यासिह
मधुवन
जिनामाजमगढ।
कछु प्रोति को रौति ही ऐसी पहै दिन जात
चले अभिलाग्वन मैं । नित होत है पौर नई
हिय में दुख होत धनो हित भाखन मैं ॥ हरि-
पौध दयानिधि मों हो चहौं न भरै कोउ या

( ५४ ) रुचि राखन में । मन काहु को काहु सों लागे न री न परै कोउ प्यार की जाखन मैं ॥ लखि मुन्दरता नहि मोहै कोऊ न दहै परि के अभिलाखन मैं । नहि नेह सों पालो परै क- वहूं न रमै कोउ या रस राखन मैं ॥ हरिऔध सदा हौं चहौं हरि सों विलमै न कोउ कल वा खन मैं । मन काहु को काहु सों लागै न री न परै कोउ प्यार की आँखन मैं सिहोर काठियावाड निवासी कवि गोविन्द गोलामा । मन मेरो चल्यो मुरवा तजि के वह जाय फँस्यो शुभ काखनि मैं । उनते निकसौ कुच शैल चदी उतरत्त गिग्यो गथ लाखनि में ॥ कवि गो- विद नीठ चल्यो उनतें पह नाय बस्यो मुटु भा- खनि मैं । निकमो उततें पुनि प्राय फस्यो तर रुनी तुव प्यार को पाखनि मैं ॥ - ॥

( ५५ ) मलिन्द मतवारे से। काशीनिवासी श्री १.५ कृष्णलाला जी महाराज सपनाम रससिंधु । करत सिँगार चारु केश को संवार रही काच लिये देख बाल चोवा तेउ कारे से। कहे रस- सिंधु फेर जूड़ा को जू बाँधौ जाल अलिन की बैठी पाति जुल्फे घुघरारी से ॥ एते वीच आये स्थाम मिले अभिराम बाम खूब भई घाम धाम नैन अनियारे से। राधा अरविन्द मुख चूमे कृष्ण भोर मानो रुप रस छके ये मलिन्द मतवार से। बाबू रामकृष्ण वर्मा सम्पादक भारतजोवन काशी। आई दधिवेचन कहूं ते वृनमण्डल मैं गो- पिन को कान्ह जहाँ लागत हमारे से । कोमल मृणाल कैसो सुन्दर सुबाहु दोज अंग को सु- बास मानो पद्म बिकसारे से ॥ दरिआई कंचुकी में लसत उरोज जुग सुन्दर सरोन ज्यों सरोवर बगारे से । एरी अरविन्दमुखी कंजनैनो तूने बौर कीन्हे मनमोहन मलिन्द मतवारे से ॥ A ॥

( ५६ ) मान करि मौन गहि बैठी मनमोनन सों मो तन निहार नेक नैन रतनारे से । बागन बहार बन बौथिन बिलोकि बौर बम ना बसैगो या बमन्त बनमारे से ॥ गरबीली गूनरी तू ग- रव गुमान छाड़ि गाँठ गहु प्रेम की गुबिन्द गु. नवार से । ठौर ठौर कूक कौर कोकिलाकलाप बीर भोर भौर झूमत मलिन्द मतवार से ॥ पाली निज भूल का कहानी क्यों बग्वानी नाय कौन्हों हौं गुमान वा गुबिन्द गुनवार से । नेक हौ न मानी वे मनाय बीर थाके अब रुसि जानी गृह-सौतिन पधारे से ॥ तब हौं बखानौंगी प्रवीणता सु तेरी जोपै आली तू मि- लावेगी हमारे प्रागाप्यार से । सौतिन के मद में मतंग मदमाते वीर कै दै मनमोहन मलिन्द मतवारे से ॥ प. केदारनाथ जी बनारस । छिनक छपात हेरिवे को अकुलाय नात जैसे प्रभा लोपित चकोर पति तारे से । ला. कै सु

( ५६ )
गोई रहत संग बैन सुधा पौजिबे को मुकता
गुथोई कर नूरो छोरि बारे से ॥ हार सुरझावत
केदार उरभोई जीन ऑगौ वन्द वाधन करेर
के पिठार से । राधे मुख अमल अनूप अरविन्द
मड़रात मोहन मलिन्द मतवारे में ।।
पडित अखिकादरु व्यास काशी।
चौपाई।
नैन कमल लखि उमंग भरे से।
भृकुटि व्याज जनु पॉति करे से।
ता
다
-
सार।
आज नन्दनन्दन छवि वरनत सुकवि सबै हरि से
रोम राम की सेभा कविगन गरूर गहि गारे से॥
पौरी खोर लिलार लसै तहँ कचहू धुंधरारे से ।
सोहत केसर कली चहूदिस मलिन्दमतवारे से ।।
आा।
साहत मन्द हँसत मुख छटके ताप सुकेस धु
घरारे से । विकसित अमल कमल पै मनहु झुके
हैं मलिन्द मतवारे से।

( ६. )
में सुहात शनि तारे से ॥ मदन महीपति उछाह
ने निमन्त्रणा के सुललित पत्र पै सुबेस पक्ष धारे
से । गुंजाफल केसे विम्ब फन्न पर जम्बु कैसे प्र.
फुलित कञ्च पै मलिन्द मतवारे मे ॥
महाराजकुमार गौरीप्रसादसिहजी गिडोर ।
हीरन-जटित बेंदी बाल भाल पर तें बि-
चलि सुमानिक भो अधर प्रचारे से । हरित दु-
कूल पर पन्नन की छवि होत नीलमनि कंचुकी
सुनील पर धार से ॥ इन्दु गोद बुध सौ बिना-
यक सी कंज पर वेलिन पै कीर छवि मंजुल
सवारे से । सरवर रूप से सुमकरन्द कान आज
इन्दीवर ऊपर मलिन्द मतवारे से ॥
गंधौलो जिला सीतापुरनिवामी बाबू जुगुल किशोर जो
पनाम हनराज।
फूले हैं अनार कचनार अंब डोर वौर एग
कूक कोकिल के कोकिल पुकारे से । चलत स.
मौर वीर मीतल मुगन्ध मन्द सुखद सयोगिन
वियोगिन दवारे से॥ मान को वजि वनगन

( ६ )
को बिलोक किन मदन कदन विरही को चित
धार से । एरी रितुराज की अवाई के करौल
डोलै मन्द मन्द बीथिन मलिन्द मतवारे से
वाव शिवनन्दनसहाय हेड किरानी जजी पटना।
आय परी पलन वसन्त ऋतु कन्त सिव सेमर
सुमन भण्डा मुमख उघार से । बिटप सिपाही
लाल पल्लव की वर्दी कसैं करनैल कोइल कवा.
इद उचार से ॥ घटककली है तौन
कूटत
बँ-
दूक मनो मोरन ठनक होत बानत नगारे से ।
चलत समोर है तुरंग हरकार जिम फिरत अ.
नन्द में मलिन्द मतवारे से।
पटनानिवासी बाबू पसनलाल जी।
साल यह चाल कवौं रावरी कुटैगी नाहिँ
कहूं रात कहूं प्रात भ्रमत सितारे मे । बैठि
एक डार वोलि माधुरी अमोल बोल चित ले
परात हौ परिन्द परवार से ॥ हाय वह
ललना ललाति विललाति महा नेकहु न नाय
लखी हग अनियारे से । कारे ही विकार भर

गुलाब मैं सँवारे से । हरिऔध राधिका की सुखमा कहां लौँ कहों मौस लसैं मोती भन्ध- कार बिच तारे से । कारी कारी पूतरी अरुन अँखियान डोलें अमल कमल मैं मलिन्द मत- वारे से ॥ ॥ छोटी छोटी आम की रसौली मजरीन काहिं निकसि गुलावफूल सौरभ सवारे से । गुंजरत वाही और देखु यह आवत है अति कमनीय कन वन के किनारे से ॥ हरिऔध की सौ आडू अवहीं मचैहै धूम गूंनि गूंजि आनन सुवास के सहारे से । भूलि अव भौन ते न बाहर कढौंगो कबौं अवि गई एरो या मलिन्द मतवारे से ।। सिहोर [काठियावाड निवामी कवि गोविन्द गोलाभा । आवत वसन्त खिले सुमन समान देखो सौ- तल सुगन्ध मन्द पौन बहे भार से। राजत र- साल नवपल्लव विसाल पुनि विकसी पलास अति भोप अनारे से | औरही अनेक फूल फूलि के मधुर महा मंजुल मरन्द दिसतारत अपार से ॥

( ६५ ) गोबिंद सुकबि ताके पान करि चित्त छकि ठौर ठौर डोलत मलिन्द मतवारे से । रंगभरी मूरति अनंगभरी अँखियाँ । काशीनिवासी श्री १०५ कण लाला जी महाराज उपनाम रससिंधु । बंसी की जु धुन सुन चौंक उठी ब्रजवाल छोड़ सब काम काज धौरज न रखियां। कहे रससिन्धु फेर झुण्डन को झुण्ड चली बंसीवट कुंजन में जाय मिली सखियां ! वाजे मिरदंग संग बीन ओ उपङ्ग चङ्ग सारंगी लाल रंग मैन रूप लखियां । राधा और स्वास दोचा गावै गल बांह दिये रंगभरी मूरत अनङ्गभरी अँखियां ॥ बाबू रामकृष्ण वर्मा सम्पादक भारतजीवन शाशो। . बड़ी लाजवारी सौल-गौरव-गुमानवारीज्ञान मान बस तुच्छ कोन्ही सब सखियां । तुही एक बन में पतिव्रत निवैहे वीर कौलो नौलों रुप- सुधा नैन नाहिं चखियां ॥ भूलि नैहे कुल को गुमान नीति जान सबै निरखत साँवरे की मा- धुरी कनखियां । ताकनि तरङ्गभरी सूरत उमन्न भरी रङ्गमरौ मूरति अनङ्गभगै अँखियां ॥ बाबू हरिशंकरप्रसादब - नारस । केती समुभाय हारौं मानति न काहू भांति चलिवे को कहे कोप वार भेख रखियां । एक दूसरी है याते रूप में अनूप नारि वाको नो बुलैहैं स्याम है है प्रति पखियां ॥ यासो चौगुनी है हरिशङ्कर सपथ करौं छबि औ सजावट मों सुनौ सब सखियां । अंगभरे भूषन उमंगभरे कुच दोऊ रंगभरी मूरति अनगभरी अँखियां ॥ काशीनिवासी बाबू माधवदास जी। अधो नौ वसौठौ हेतु आयो है सुचौठौ देत मोठी है के खाटी सो वताओ अरी सखियां । सबै रसभोगी है सुजोगिन वनावै मोहि हम तो वियोगी वा त्रिभंगी रूप लखियां । कूबगै क- साइन के पाइन परत हाय नाइन की नाइ ठ- कुराइन सौ रखियां । माधौ की न भूलति है ( ६७ ) सुरत सुहाई वह रंगभरी सूरत अनङ्गभरी खियां ॥ प. केदारनाथ जी- बनारस । विथुरि गये हैं केस छुटि चहुंओर जूरो झूमक मुरे हैं कर्ण दोऊ छोर लखियां । मौस बिन्दु सरकि गया है कहूं और ठौर कज्जल-कराई गई फैलि दोज चडिया ॥ पौक लोक लागी है क- पोल पै केदार कैसे आई रम ले जैसे कंजन मों मखियां । मोते क्यों छपावती बतावती ना एरौ भटू रंगभरौ मूरति अनंगभरी अँखियां ॥ काशीनिवासी हलचन्द जो बहभीय । बल्लभपियारो नन्दनसुदादुनारो तोहि सेवति निरन्तर तिहानी सब अखियां । तेरे बिन एहो ब्रजचन्द श्रीचकोरो तेरी होति है विकल जैसे बार विन झखियां ॥ धन्य धन्य भाग तिन के हैं ब्रजभूमि माहिँ लखति मदाहीं जो मयानो चोरु चखियां । कव धौं निहारि हैं नयन ये ह. मारे तेरी रङ्गभरौ मूरति पनङ्गभरी अँखियां ॥ U ( ६८ ) । पटनानिषासी बाबू पत्ननलाल जी । दुर रौ निगोड़ी नौंद बैरिन हमारी भई दुर गै निगोडी यह पावस को मखियां । कहा कहीं हाय तुम लोगहु हमारे त बैरिन भई हो सबै प्रानप्यारौ सखियां ॥ करती न बक्वक् सिरहाने जो हमारे बैठि काटतों न मखियां न होती नौंद पखियां । नाहिँ उडि जाती हरखातौ ल- खि प्रीतम की रङ्गभरी मूरति अनङ्गभगै जरिवयां। शिवनन्दनमहाय हेड किरानी जनी पटना । कहत वनै ना जस बनक लखी है सिव गई हुतौ तरनितनूजा तट तखियां । उत ते गोपाल संग लेकै हैं गोपान्त आये इतहूं ते स्यामा त्यो सलोनी लिये सखियां ॥ मची तहा धूंधर धमार धन घोर जोर होन लागी होरी परी पूरि अभि- लखियां । राजै सखी मध्य सोभाग्वानि वृषभानु मुता रङ्गभरी मूरति अनङ्गमरी अखियां ॥ गयानिवामी पं० गिरधारीलालजी गयावाल । भौंहन विशाल अरु चाल है मराल केसी ॥

धारिवा त्यौ सौस पै रसाल मार पखियां । गि-
रधारीलाल कहै कुगडस्न बहार पुनि मंजु कर
कज को चमकदार नखियां ॥ व्याकुल विधा तें
बार वार अति राय रीय ऊधी सन कहत स.
कल बज सखियां । कैसहूं न विसरै विसारे वह
सावरे की रङ्गभरी मूरति अनङ्ग भरौ अँखियां ॥
गंधौलो जिला सीतापुरनिवासी बाबू युगुल किशोर जो
उपनाम वजराज।
गोकुल के संग पति गोकुल विलोकि अलि
को कुल सँभारै बकै जो कुल विलखियां । लखि
हाव भाव त्यौं चवाव की सुनै को भटू राव खांव
खांव की वृथाही रही मखियां ॥ आज सुग्वसान
गृहकान लाज बाज राखि एरौ ब्रजराज-मधु
की हौं भई मखियां । देखिहौ त्रिभंग अंग अंग
की अभंग छवि रङ्गभरी मूरति अनंगभरी अँ.
खियां
अयोध्याप्रसाद ( स्याम ) बाकरगंज - बांकीपुर।
नमुना मै नात रही लेन जल एक वार साथ

( ७० ) में सलोनी सुकुमारी बहु सखियां । टूरही ते देखि स्याम जाय दबकाय रही मोरी चतुराई बनवारी तब लखियां ॥ आदू के निकट चट प्रीत को निकाग रीत गये अब हाय त्यागि हम सव झखियां । कौन ऐसो पल जामे याद ना परत अधो रङ्गभरौ मूरति अनगभरी अखियां ॥ बाबू भयोध्यासिंह - मधुवन जिला आजमगढ । अजहूं न भूले हैं प्रमंग डफ बाजन के सा. लति हैं भंग भीनी अजहूं कनखियां । अंग अंग भौने से गुलाल मैं लखात अजौं गावत जनाति सौ मृदंग संग सखियां । हरिऔध होरी के त. रङ्ग हिय वैसही हैं देखि सुनि पूजो हैं न अजौं अभिलखियां । व्यङ्ग भरे वचन उमंग भरे पान- नाथ रंगभरी मूरति अनंगभरो अँखियां ॥ सिहोर (काठियावाड) निवासी कविगोविन्द गीलाभाई नायिका नवीन एक नैन ते निरखि नेक राजत ललाम वाकी कंचन सी कॅखिया। लो. चन विसाल वाक ग्रोपत अपार ताकी चचलता ( ७१ ) पेख पैठ नौर माहि झाखियां ॥ गोबिंद सुकवि ताकी तिरछी चितौन अफ मन्द मुसक्यान मा. हिँ चित्त मो करखियां । वा दिन ते सोई छवि हिये वसौ सा न टरे रङ्गभरी मूरति अनंगभरौ अँखियां कानपुरनिवासी ५० ललितपसाट जी पिबेटी। गुंजन के पुंज हार काछनी कछनि चारु ल. कुट लपेटे पग सौस मोरपखियां । पट फहरानि मुसकानि में विकानि सब जेतिक तुम्हारी हतों मेरे संग सखियां ॥ वामुरौ के तानन सों प्रानन निकार लेत भूले गृहकाज आज कैसे लाज र- खियां । आजु लखो वौर नमुना के तौर कान्ह और रंगभरी मूरति अनंगभरी अखियां ॥ हिये में प्रान प्यारी के। काशीनिवासी श्री १०५ रुपलाला जी महाराज उपनाम रससिधु। कंजन से नैन चार मोतिन की माल गरे ( ७२ ) हीरन के हार धी सोभा अति भारी के। कहै रससिन्धु फेर देख के लुभाये सभी कोई तरे मिले बाल मन मे बिचारौ के । फूलन को माला हाट पायल बनाती चलो जाय पहराई दौर कण्ठ में मुरारी के । तभी ते बसी है हरि उर माझ लछमी जी स्याम जू की मूरति हिये में प्रानप्यारौ के ॥ बाबू रामकृष्ण वर्मा सम्पादक भारतजोवन काशी। एहो बलबीर मनमोहन गुपाल लाल हाल जो सुनोगे विरहीन बजनारी के । धौरज नसै है विनसै ज्ञानशैल छाय जैहै प्रेमपुंज बात सु- नत हमारी के ॥ नींद भूख प्यास ताहि रंचक न एको पल आठौ नाम नाम रटै कुंजनविहारी के । मिलोगे मुविन्द तोप कसक निकारि लैहै हौसले हजार नो हिये में प्राणप्यारी के ॥ ना दिन गई ही दधि वेचन अकेली भोर औचक दरम पाइ गई वनवारी के । पीतपट पे खत सु पौत सी भई ही वीर विगतविवेक भई देखत विहारी के ॥ ता दिन ते भूल गई आ-

पनी पराई सुधि हाल कहा कहूं वृषभान की
दुलारी के । तान बसी वासुरी को कान में गु-
मानभरी मूरति गुपाल की हिये में प्राणप्यारौके।
हजचन्द जो बमभीय-काशी।
नैननि निहारि निरधारी है कुचालि तज
सादर डरसि उठि लागी गिरिधारो के । कुटिल
कन्हाई को करति मन भाई सदा ऐसे हैं वि-
सुद्ध गुन कीरतिकुमारी के ॥ रमा रति गौरिह
निरन्तर सिहाति देखि गौरव गॅभीर वृषभानु
की दुलारी के । संग को सखौनइ मिखाइ
सौख हारी सबै मान को न भाव भी हिये मैं
प्रानप्यारी के॥
वावू हरिशंकरप्रसाद जी - बनारस ।
गुरुजन त्रास ते वुलावै यहीं मोको पास है
जो जात लटू सुने जिकिर तिहारौ के। फरकाय
अधर लजीले नैन सैन सानि मुसक्याय रहै ओट
बूटेदार सारौ के ॥ ग्वाल सो चाय गाय सौह
हरिशङ्कर को भये निरमोही सङ्ग रहि वनचारी

मैं ( ७४ ) के। आप अँठिलाय सो बितावै जहाँ चाहैं निसा लिखी तसबौर है हिये मों प्रानप्यारी के ॥ घ. केदारनाथ जी बनारस । प्यारे घनस्याम कहौं हज की दसा काह सलिल भये हैं तप्त तनयातमारौ के । हूकि २ हारन मों चरतो न धेनु कबौं चाहती सुनोई श्रीन बसी बॉसवारी के ॥ नेकु नन्दबाबा जू के ऑखिन सों सूझ नाहिँ मोह कहि जाय ना य- शोदा महतारी के । गोपिका नवेली बिरहा- कुन बियोग थारे लालसा है दर्स की हिये में प्रानप्यारी के ॥ गयानिवासी पं. गिरधारीलालजी गयावाल । छोड़ि खान पान नहि करति बखान वैन चलत है आठी याम धारा नैन वारी के । गि. रधारीलाल दसा औरई भई है वाकी जब ते भयो विदेस गमन विहारी के ॥ मलति कपूर अरु चन्दन के धूर अंग त्योही अरविन्दन के सेजहि संवारी के । वैठी याहि विधि खसखाने ( ७५ ) वीच तज नेकु सौतलता पैठी ना हिये में प्रान प्यारी के नित्तहि नदान कैसे मान करो एहो कान्ह हकर सयान किन धारौ वान नारी के। गि- रधारीलाल दुख आपह सहो त्यों कछु पौर नहीं बूझो मम मखौ मुकमारी के ॥ चाहिये न ऐसो जो भयो सो भयो जान दीजै आन रख लौने लाज बातन हमारी के । सब रोष त्या- गिये वो चित्त अनुरागिये जू वेगि उठ लागिये हिये में प्रानप्यारी के वाबू भगवतोचरण सकला जिला शाहाबाद ! लहत ना सन्त सुख सागर के वार पार गा. वत सुनत गुन कुंजनविहारी के । सूम सव फूले भगवति हैं अनन्द मन, भये ते अथोर धन धाम अधिकारी के ॥ नाचक प्रसन्न होत अधिक प- रापति तें बन्दौ चित हर्ष कारागार छुटकारी के ॥ कामी सब जानत हैं नन्म को सुफल निज लगे ते अहर्निस् हिये में प्राणप्यारी के ॥

। ७६ )
बाब शिवनन्दनसहाय हेड किरानी जजी पटना ।
दोऊ बड़े भागे प्रेम पागे अनुरागे दोऊ दिये
कर काँधे फिरें पास फूल क्यारी के। एक रंग
एक ढंग एक हाव एकै भाव कहैं सिव भूषन
वमन एक त्यारी के ॥ एक राग एक तान एक
रीत एकै प्रीत एकै मन बरु दोय देह छवि न्यारी
के । प्रानप्यारी बसति हिये में प्रानप्यारे तैसे
प्रानप्यारे वसत हिये में प्रागा प्यारी के॥
पटनानिवासी बाबू पत्तनलाल जी ।
परे वदनात वदराह वदरा त नेक क्यों न
खुल जात होत हेत दुख भारो के । आजही
की औधि अहै हाय किहि भाँति कहै पहुंचि
सकेंगे हम पास सुकुमारी के ॥ ऊँच नीच बी-
हड है मारग न ताको सोच केवट न कैहै पार
सौगुनो उतारी के । वौती जान औध मेरी दुख
को तरंगें लाख लाखन उठेंगी हा हिये में प्राण
प्यारी के॥
हो तो चलि नाती अवै लाती मनमोहन

( ७७ )
को सहज संघाती कहलाती सुकुमारौ के ।
ज्वर कैसो वेग सो तो वेगही उतर जातो जैसे
नस जातो तम उगत तमारी के ॥ पै सकाती
चाल लखि याक घरबारन को नेकु सुनि पैहैं
है हैं दुस्मन विचारी के । घर से न जान दैहैं
हेत असनानहू के दूनो दुख है है औ हिये में
प्रांगाप्यारी के ॥
सिहोर [काठियावाड निवासी कवि गोबिन्द गोलामाई ।
सुन्दर सुघट सुखदायक उत मांगही ते चा-
हते सरकि चल्यो हर्ष हिय धारी के । भाल पै
भटकि भूरि ऑखिन में आय अत्यो वाहि तें
निकसि नेक नाक को निहारी के ॥ कोमल क.
पोल फिरि औठन पै अ.इ बातें सुन्दर चिवुक
हक गियो गर्वहारी के । गोविन्द सों कौन
भाति निकरैगो मोहि मन पस्यो नाय प्रेस ते
हिये में प्राणप्यारी के
जन्मही ते आजही सो इच्छा अनुसार तेरी
विचस्यो विशेष हम प्रेम कों पसारी के । खान

( ७८ )
पान खेल अस गान आदि आन केते जेहि नहि
चहे सोडू कियो में स्वीकारी के ॥ औरही अनेक
भौति कौनि जेहि कामना ते सोड़ करी पूग्न
में हर्ष हिय धारी के । गोबिंद कहत तोहु मूढ
मन मोहि तजि वस्यो नाय बेग तें हिये में प्रान
प्यारी के ॥
वाबू पयोध्यासिंह - मधुबन जिना प्राजमगढ ।
वीति गये बरस कितेकन विदेस आरी बस
का ऐसे परे विधि अधिकारी के । जिते भौन
जान के विचार व्योंत बार बार विफल भये ते
हेतु पेट अपकारी के ॥ हरिऔध आवतहो गृह
मैं नवेली नारि फद परि गये या बियोग अवि-
चारी के । और कहा है है नेक हँसि बतरानहूं
की हाय । रहो हौसही हिये में प्रानप्यारी के ॥
दाऊ टुहूं चाहैं दोऊ दुहुन सराहैं सदा
दोज रहैं लोलुप दुहुन छवि न्यारी के । एकै
भये रहैं नैन मन प्रान दाहुन के भौने रहैं दोज
रंग मदन खेलारी के ॥ हरिऔध केवल दिखात
॥

( ६ )
है सरौरही है नातो भाव दीखे हैं महेस गिरि-
वारी के । प्रानप्यार चित में निवास प्रानप्यारी
रखै प्रानप्यारो बसन हिय में प्रानप्यारी के ॥
सत्रहवां अधिवेशन
मिती पाखिन शुल १ सम्बत १८५'
सुगन्ध की लपट सी।
काशीनिवासी श्री १.५ कृष्णलाला जी महाराज
पनाम रससिंधु ।
केसर की सारी चाम चौवा को न हॅगा साज
कंचुको जु सौधे भरौ अतिहौ सुघट सौ। कहे
रससिंधु फूलमाना कस्तूरोहार चन्दन बरास
डार खोर करी भाट सो ॥ चली दौर स्यामपास
आलिन की भौर झुकी पतली है कमरहु सिंहिन
के कट सौ । केवड़ा नवाद खस अवर अनेक
अत्र मोमरी गुलाब की
सुगन्ध
की लपट सौ॥
वाबू रामकृ ण वर्मा सम्पादक भारतमोवन कायो।
गुरुजन भावती वखानै सुखमा को सौंव
आलोगन कासलता कहैं अटपट सौ । निधि
॥

( ७८ )
॥
पान खेल अस गान आदि आन केते जेहि जेहि
चह सोइ कियो में स्वीकारी के ॥ औरही अनेक
भांति कोनि जेहि कामना ते सोइ करी पुग्न
में हर्ष हिय धारी के । गोबिंद कहत तोहु मूढ़
मन मोहि तनि वस्यो नाय वेग तेंहिये में प्रान
प्यारी के ॥
बाबू पयोध्यासिंह - मधुबन जिना पाजमगढ ।
वीति गये वरस कितेकन विदेस आरी बस
कछ ऐसे परे विधि अधिकारी के । जिते भौन
जान के विचार व्योत बार वार विफल भये ते
हेतु पेट अपकारी के ॥ हरिऔध आवतही गृह
मैं नवेली नारि फद परि गये या वियोग अवि-
चारी के । और कहा ह है नेक हँसि बतरानहूं
की हाय । रहो होमही हिये में प्रानयाग के ॥
दाऊ टुहूं चाहै दोऊ टुहुन सराहैं सदा
दोज रहे लोलुप टुहुन छवि न्वारी के । एक
भये रहैं नैन मन प्रान दाहुन के भौने रहें दोज
रंग मदन खेलारी के ॥ हरिऔध केवल दिखात

(द )
है सरीरही है नातो भाव दौखै हैं महेस गिरि-
वारी के । प्रानप्यारे चित में निवास प्रानप्यारी
रखे प्रानप्यारो वसन हिय में प्रानपारौ के ॥
। कहे
मत्रहवा अधिवेशन।
मिती पाखिन शुक्ल १ सम्वत् १८५१
सुगन्ध
की लपट सी।
काशीनिवासी श्री १०५ कृष्णलाला जी महाराज
उपनाम रससिंधु।
केसर को सारौ चाम चोवा को लहँगा साज
कंचुको जु
सोधे भरी अतिही
सुघट
सी
रससिंधु फूलमाला कस्तूरौहार चन्दन बरास
डार खोर करी भाट सो॥ चली दौर स्यामपास
आलिन की भौर झुकी पतन्ती है कमरहु सिंहिन
के कट सौ । केवड़ा जवाद खस अम्बर अनेक
अत्र मोमरौ गुलाब को सुगन्ध
की लपट सौ॥
वाबू रामकृष्ण वर्मा सम्पादक भारतजोवन कायो ।
गुरुजन भावती वखानें सुखमा को सौंव
आलोगन कामलता कहैं अटपट सौ । निधि

( ८० ) सी वखार्ने नित ननद जिठानी क है जाउ वलि- हारी यह लागे नटखट सी ॥ बीर प्रिय प्यारी की अनोखी छवि कहै कौन बानी अकुलानी रहै हाय छटपट सौ । सौतिन को साल मौ हिये में गड़े आठो जाम लाल हिये माल व सुगन्ध को लपट सी॥ भले ही सिधारे पिय भोरही हमारे गेह अनव अनूठी यह चाल अटपट मी । पोकलौक नैनन सु अञ्जन अधर धरे सोहत गुपाल पेंच पाग लटपट सौ ॥ बात न बनाओ बलवीर जू हमारी सौंह मूरति तिहारी आज भासति क- पट सी । प्रीति मृगमद लौ दुराये ना टुरैगी लाल चहुंओर फैलती लपट सौ॥ पण्डित अम्बाशर जी -काशी। कृषा महाराज के विजय को जै नागी जग खल गज डाटन को सिंह को डपट सौ। कुटिल कुगोत दुष्ट दानव कपोतन पै संकर जू देखो होत बाज की झपट सौ ॥ और हनवासी गोप सुगन्ध को ..- ( १ ) गोपी मृग झुगड लागि सान दिखरावै बीन तान को कपट सौ । भक्तजन सज्जन के मन के दुरे- फन को नानाभाँति सुमनसुगन्ध को लपट सौ॥ काशीनिवासी पगिड़त दिन बेमी कवि । कुन्दन छरौ सौ चली अंगना उमंगभरी पाई परी भौंर भौर आवत भपट सो। मन्द पग ध- रति गयन्दगति बेनौ दिन कटि ना लखात कई हित के कपट सौ ॥ निस अँधियारों में विहारी के मिलन हेत देत अहि वीछिन को मन्त्रन दपट सौ । चारु मुख चन्द ते पसारत उ- जेरी नात अगन बगारत सुगन्ध को लपट सौ ॥ काशीनिवासी बाबू माधवदास जी। हौरन के हार औ इमेल हियरा में धार झार मुकतान के झलाभल झपट सी । चाँदिन के बादला की चादर चमकदार मिलि रही चन्दा की जुन्हाई में कपट सी माधी जू सयानी सखी सौंध लगी संग जात नेकु ना दिखात गात दावा की दपट सौ। चौंकदार चाँदनी में ॥

( ८२ ) चन्द को कला सौ चारु चलो बन चन्द पै सुगन्ध की लपट सौ ॥ काशोनिवासी पं. केदारनाथ नौ। सौरभ ससोये बार गंधी कुन्दकली चारु ऑगी सित कसी कुच कंचन के घट सी। पैन्हि खेत सारी प्रभा पारद नारी सदं चन्द्र च- न्द्रिका मैं चली चन्द्रिका प्रगट सौ ॥ मोती हीर हार गर सुमन चमेली धारि मौत मिलिबे को जाति पांयन झपट सौ। उडै उपरैनी सनौ अत्र धनी पौन पाइ गैल माहिं फैलती सुगन्ध को लपट सी॥ वावू मनाल नी बनारस । कुहू को अँधेरी में सरद को उजेरी देखि कदली के पत्र पे है नागिन सपट सौ । सुधा के सरोवर में जोत विजली की होत फूल्यो है कमान वोलै कोयल कपट सी॥ मन्नूलाल ताही ठौर कोर एक रानत है ताक चोंच माहिं रही मोरनी छपट सी। चलो तो देखाऊँ ऐसो अ-

( ८३ )
नुभौ विहारीलाल नाके पास उठत सुगन्ध को
लपट सौ
काशीनिवासी हजचन्द जो वसभीय ।
कलपि वितावें हम निसि दिन काम-पौर
तापे तू बकति बहु बात अटपट सा । कहे देत
बचि है न प्रान यह प्यारो आन बोला हमारी
भई नाति लटपट सौ। परम पुनीत प्रीति वाही
सों लगाई वीर नानिये न ताहि वह मानै क्यौं
कपट सौ । ललिता बतावै आइ धंग लपटेहै
कवै चन्द्रावली नागरी सुगंध की लपट सौ ॥
कोपागजनिवासी कवि सालिग्राम जी
छाई है वियोग विधा मोहन के सारे अँग
व्याकुल परजंक पै लोटत अपट सौ। लोग भी
लुगाई पुछ औरही बतावै ताहि भेषजी भुलाने
रहैं वाही में लपट सौ ॥ कहै सालग्राम दूती
ल्याइहै मनाय ताहि जाकी रही चाह अति
सोई झटपट सौ । विना किये जंत्र मंत्र छुटि
गई सबै व्याधि लागी नव अंग मैं सुगन्ध को
लपट सौ॥

१८६ ) चिन्ह गोपन को गात करे केती करतूत सो तो लागत कपट सौ । गोबिंद सुकवि कैसे दुरेगी दु- राये प्रीति फैलो चहुंओर सो सुगन्धकी लपटसी। सासुरे में जाइ सखी रहियो सयानी है के कहियो न बात कभी कोई से कपट सौ। सासु के समीप सदा विनय बलित रही कौजियो स- कल बस्य बेग ते बिकट मौ ॥ गोबिंद मुकवि कहा बेर बेर कहूं आली कौनियो न संग नारि निरखि नफट सी। नेह में निमग्न बनि लागि हो लगन धरी नाथ हिय भाल है सुगंध को लपट सौ॥ एक तें व्है गई है तसवीरें। काशीनिवासी श्री १०५ का लाला जी महाराज सपनाम रससिधु । फूलन को चुन चारु कली लली चोटौ भलौ जो करी बहु धौरे । त्यों रससिंधु जू सारी कि रेफ को मोतिनमाल गोहार है होरे । वाल नई ( ८७ ) - वह रंग गुलाब सो नेहा न जानत वो पर पौरे। काच लिये मुख देखत वो तिया एक ते गई है तसबीरे ॥ कोई कहे यह निरगुन ब्रह्म है कोई कहे साकार सरौरे । त्यों रसमिधुहु साची कहे भ्रम टार करे उतपत्ति जु धौरे ॥ जो कछु यामे स- मर्थ नहीं तो कहा ते करे वे सिष्टि महौरे । ब्रह्म ते माया भई है तभी वह एक ते गई है तसबीरे॥ वाबू बर्मा सम्पादक भारतजोवन काशी। भोरहि आज गई जमुनातट सग लिये सखि. यान को भौरें । औचक देखि पस्यो नदनन्द वजावत बेनु कलिन्दना-तोरें ॥ आधिक नैन सुराध लख्यो तहँ आधिय दौठ लखी बलवीरें। दोज मिले मन एक भयो * पुनि एक तें है गई है तसारे रामकृष्ण • भाधा और पाधा मिलने से एक होता है।

( ६० ) पै नेम पुराण कुरान शरीफ गंभौरें । आपुनो २ रीत चले जग एक ते गई है तसबीरें। बा० माधोदास जी काशी। गौने की आई नई दुलही मिलिबे को लला ने करी तदवीरें । मूनी अटारी परी परजंक स. सेक स माधौ ज आवत धीरे ॥ भोन के भी- तर नाय लखौ छपी चित्र लिखो पुतरीन के तौरें । हेरत हरत हास्यौ पिया मनो एक ते ह गई है तसवीरें ॥ हजचन्द जो बलभीय-कायो। तूही हितू पिय चित्र दिखाइ दया करि दोन्हें सवै हिय धोरें । मोहि कृतार्थ करी स- जनी मैं रिनी हौ सदा री गई सव पोरें ॥ दे. खत चित्र मुर्द दृगह पै लखों में सोई प्रतिमा छवि भीरें। वाहिर भौतर देखिये कों हि एक ते है गई है तसवीरें । बाबू मलाल-काशी। स्याम को रुप लियो कर आपने रात को

( ६१ )
वैठ एकन्त में धौरें। जावक को लिख्यो भाल
से लाल के गान निख्यो सुख दाग गंभीरें ॥
मनूलाल उनौदी लिख्यो अँखिया औ ओढ़े
लिख्यो चचहाती चौरें । आये प्रभात मिलान
कियो कयो एक ते ढगई है तसवीरें।
कवि रघुनाथ
की-काशी।
हौं लखी कौतुक नोखी भली बजवाल को
भौर कलिन्दजा तौरें। न्हाही सबै विधि
भूषन
साजि लगौ पहिरै रुचि सो शुभ चौरें। गागरी
लै निहुरी रघनाथ चको प्रतिबिम्ब बिलोकि
अधोरें । चक्रित्त कै बकै सब सों लखु एक
की के गई वे तसवीरें ॥
मदनमोहन पाठक सपनाम मनोभव गौ घाट काशी।
ऊधो
जू लाये हो पाती गुपाल को रावरी
यामे न हैं तकसोरें। मैंही अभागिनि हौं जो
मनोभव जोग को वामें लिखी तदबीरें। वोलि
ऐसो सुता वृषभानु की स्याम को देखें लगी
तसवीरें । पूतरी काठ सी गई सो मनो
एक ते 8 गई है तसवीरें ।

( ६२ )
कोपागंज निवासी कवि सालिकराम जी ।
चाह रहौ निसु बासर मैं मोहि राधे बसै
हिय बीच सरौरें । साधन साधन सो भगवान
दियो वर वानी
सुनाय
गभौरें ॥ सालिक स्याम
न छोडि सके सॅगही चलि आये कृपा करितीरें।
देखि परी हिय अन्तर मैं तव एक ते कै गई
है तसवीरें ॥
मारकण्डेलाल उपनाम चिरजीवी कवि - कोपागंन ।
पहिले रही औध की आस हिये अब आनि
बसौ ब्रज बास को भीरें । तबतो सरजू हो सो
सौक रह्यो अव भो नमुनाहुं मैं प्रेम गंभोरें ॥
तवतो रह्यो रामही को चिरजीव भयो अब कृ-
पणह के वस धौरें। दिन हैक ते या उर अन्तर
मैं अव एक ते है गई है तसवीरें।
पटनानिवासी
बाबू पत्तनलाल जी।
प्रानप्रिया छिनहू न तुमै विन धौर धरै उर
होत अधीरें। हो अरु मेरी सवै सखियां समु-
भाइ धकों करि कै तदवीरें ॥ पै अव नो तुम

( ६३ )
दैनिन चित्रहिँ तोखत सो न बढ़ावत पोरें ।
एक अनन्यता क्यों रहिहै नव एक गई
है तसवीरें ॥
व्याकुल होति महा छिनही छिन धीर धरै
न कोज तदवीरें । हा मम प्रीतम प्रान अधार
कहा कहि मोचति लोचन नौरें ॥ लाडू तवै
सखि चित्र धरी हरि वेनु बजावत कलिंदीतीरें।
देखतही नकि सौ थकि सौ भई एक ते ढगई
है तसवीरें।
चन्द्रकला वाई - बूंदी।
बैठि रही अलिमण्डल
बषभानुसुता सनि
शोभ शगैरें। ता विरया ललिता सखि नै हरि-
चित्र दियो कर मैं नमि नीरें। चन्दकला लखि
लीन भई तव बोलि उठी सखियां इमि धीरें।
देखहु अद्भुत कौतुक है यह एक ते' है गई
है तसबीरें॥
महाराजकुमार गौरीप्रसादसिंहजी गितीर ।
होत प्रभात पिया घर आयो स क्योंह नहीं
मैं
.
८

( ६४ ) मग में पग थीरें। आनन अंजन रेख बिलोकि लखी तिय चन्दभरे हगनौरें ॥ लाल ते बोली लखो यह कौतुक मो मन देखि धरै नहि धौरें। भोर लो एकै हती नभ मैं अब एक ते है गई है तसबीरें ॥ सिहोर[काठियावाड़ निवासी कबि गोबिन्द गोलाभाई । आपस में मिलि राधिका गोविद पेखत एक दुजा पर धौरे। पेखत पेखित नेन मिले पुनि चित्त मिले अव होइ अधोरे ॥ गोबिंद यों मि- लि एक भये तब घोर भये तित दोउ शरीरे । नेक हले न चले उन ठामनी एक तें है गई है तसवीरे ॥ मंजुल मूरति माधव को लिखि चित्रनी ने धरि राधिका नौर । मोई लखो रमरूप भरी भति माहित है मन भाव मों घौर ॥ पेखत नैन निमेष तजे अस शान मवे तजि आप श- गरे । गोविंद मोय भई छवि सी मनो एक ते है गई है तसवोरे ॥

- ( ६५ ) पठारहवा अधिवेशन मिती कार्तिक कृष्ण १ सम्बत् १८५१ छूटै चन्द्रमण्डल ते छहर छटान की। काशीनिवासी श्री १०५ कृष्णलाला जी महाराज उपनाम रससिंधु। वंसी की जु धुनि सुनि बसीवट आई बाल वृन्दावन सोभा लखौ जमुना तटान की। कहे रससिन्धु कृषा हौरा को मुकुट धरे भूषन ति- रंगी कटिकाछनौ पटान की टेढ़ी भौंह टेढ़े दृग टेढ़ी तान टेढी सान हाव भाव नृत्य करे मदन कटान को । कोइल पटान सम्खी भौडहुड़ तान तैसी छूटै चन्द्रमण्डन ते छहरकटान को । बाबू रामकृष्ण वर्मा सम्पादक भारतजीवन काशी। चामौकरचंचला सौ चमक चहूंघा चारु च- न्टन पर्यङ्ग पर चमक चटान को। भाल मु- केस को सु चारोओर लागौं तित राजै बलबीर संग वेटौ हषभान की ॥ कामकलाकौतुक अ- नूठी छवि छाई राजे दोउन के अङ्ग 4 फहर ।

( ६६ )
टुपटान को। मुखविधुमण्ड न है मुक्तालर टूटें
जनु छूटै चन्द्रमण्डल ते छहर छटान की।
बाबू मनूलाल जी बनारस ।
बिमल अकाश भयो फूले कास आसपास
कहत वनै न सोभा कालिँदीतटान की। मन्नू-
लाल तहाँ रच्यो रास को रसौले लाल बासुरी
बजाय राग गाय के नटान मी ॥ सोरह सहस
गोपी निरतत स्थामा स्याम अंग में भूषन छवि
छाजत पटान की। मुख को मरीचें जाकी वेधि
नभ भण्डल को छूटें चन्द्रमण्डल ते छहर छ.
टान की।
काशोनिवासी पं. केदारनाथ जी ।
कासन श्री कुसुम विकामित भये हैं सेत
लागी हे विदाई होन मेघ औ घटान की ।
निर्मन्न भये हैं नीर सरित सरोवर के फूलि गे
सरोज अति प्रोज प्रगटान की ॥ पाये खग खं-
जन चकोर मनरजन मे बन्द भो केदार मोर
मोर के रटान को। छाई शुभ्र सर्द महिमण्डल
मयूग्वे मज छूटे चन्द्रमण्डल ते छहर छटान को।
-

( ६७ ) कवि पं. गोपीनाथ जो काशी पाली बनमालो रासमण्डल रच्यौ है आजु कारिक तयारी भारी जमुनातठान को । मन्द २ मधुर बजाय राग बासुरी में करत कलोलैं कला विधि सों नटान कौ॥ गापौ ग्वालवाल सब ल- खत निहाल होत वह भनियारी छवि रेशमी पटान की। सरद निसा में लूटें दंपति अनन्द मिलि छूटें चन्द्रमण्डल ते छहर छटान कौ ॥ काशीनिवासी पगिडत विज बेनी कवि । चाँदनी के सरम फरस करि चादनी के रौसैं करौ न्यारी सेत चाँदी के चटान की। चादिही की चौकी पै चमेलो को चगेरें चारु सजि अ. लवेलौ सेन रतन जटान की ॥ वेनौ हिन क- हत बनै न वा समै को छवि रवि से विमल दुति सेतु टुपटान की । सरद निसा में लूटें मानंद पटा पै दोज छूट चन्द्रमण्डल ते छहर छटान की। बारादरी विमल विलौर की बनाई वेस झ- .

( ६८ )
भरी लगाई जाल बिबिध कटान की। चादौ
को चटान पै चगेरें
पै चगेरै चारु फूलन को सजि सनि
सानी सेन रतन नटान की ॥ बेनी दिन तामै
स्याम स्यामा आय माझही ते पहिरि पोशाक
सेत रेशमी पटान की । लूटें दोज सरद निमा
सुख जूटि जूटि छूटें चन्द्रमण्डल ते छहर
मै
छटान की
बज चन्द जो बनभोय-काशो।
सुनि धुनि एई श्री चरण चारु नूपुरनि मृ-
कुंजय पदवी भई है महेसान कौ। मधुरादि
दिव्य सक्ति संग मैं मखी सरूप इहा श्री त्रिपाद
छोडि कानि नाहि आन को ॥ चिदानन्द को-
मल अमल भूमि माहि पाद चिन्ह अड़तालिसो
जनावत हैं जानकी । मुख को मरीचि ते क.
दति सुखमा यों मनौ छूटें चन्द्रमण्डल ते छहर
छटान की।
रसिक नवीन-कागी
गंगभरी वैठी है रंगीली रंग रावटी में सजि वर

(६) सारी मत रेममी पटान को। परम प्रवीन सेन रसिक नवीन रचि धगै हैं चंगेरै चाम रतन नटान की ॥ हीरा मगि महल वितान तने मोतिन के सग्द उजेरी में तयारी के अटान को । लूटौ चलि लाल वेगि वाल सों अनन्द जहाँ छूटै चन्द्रमण्डल ते छहर छटान की ॥ धावू भयोध्यासिंह मधुवन जि ना पाजसगढ । विकसित वारिज वरूध में बढ़ी है विभा बार बार बोरें बौरे भृङ्ग लपटान की। घट गई चहूंओर घहरि घहरि घूमि विरि घिरि घरी २ घेरन घटान की ॥ ौध-हरि अनुपम सरद अ- वाई पाडू आमा भई और आज आँगन अटान को । छन छन छनदा मैं छिटकी सु चादनी सों छूटै चन्द्रमण्डल ते छहर छटान को । मारकण्डेलाल उपनाम चिरजीवी कवि कोपागंज । हिम सी हिमाचल सो हर सौ हयानन सी सेस सौ सतोगुन सो सुखमा अटान को। हो- रक सी हंस मौ हुवाव हास्यरस ऐसी सुधा सी ॥

(१००) सरस्वति सौ स्वच्छता सटान की ॥ कवि चिर- नौव कान्ह कौरतिकिसोरी जू के केलि करिबे की कला करि कै नटान की। छिति पै चहूंघा छोर सिन्धु उमग्यो तो आज छूटें चन्द्रमण्डल वे छहर छटान को ।। अखिल अनन्द की अधार ये अयोध्या मई गई व्यथा साग बिरहानल बटान की। बिबिध विधान नभ तोरन पताक छायो गायो गन ग- ध्रव गुरेजन नटान की ॥ कवि चिरजीव पात्र राज रघुरान जू के छूटौ महताबी खेत सुखमा घटान को । झरत सुफूल ताको महि में लखात मानो छूटें चन्द्रमण्डल ते छहर छटान की ॥ पटनानिवामी वावू पत्तनलाल जी । आज हौं विलोकी वा नवेली अलबेली बाल वैठीही भटान छवि देखति घटान की। कहा कहो लाल वाके रुप की बिसाल धि याही है ममैया नाके उरन उठान की ॥ सुन्दर क- पोल गोल बोल अनमोल महा करती किलोल (१.१ ) नैन डोल भी पटान को। मन्द मुसुकानि सर- सानि सरसाति मानौ छूटें चन्द्रमण्डल ते छ- हर छटान की। क्योंह कहि रामराम बरसा वितीत भई स्वच्छ भे भकास घूटी घिरनि घटान को । हाट बाट घाटन पै घरचा चहूंघा चली मारग खुले के कोच नौर निघटान को || आवा गौन भवन बिदेसिङ को होन लागौ सुधि ना मिली हा याके पोय पलटान को। कूटै उर कर ते लहू की छूट चूंटै जव छूटै चन्द्रमण्डल ते छहर छ- टान की। श्री चन्दकला बाई-बूंदी। राधे चलि जमुना के तट पटपौत धरे राजत गुबिन्द तुति दलन घटान की। नाचत सम्बो- गन में देदै ताल नाना भाति चोरि लत चित्त छवि मुरवा पटान कौ ॥ चन्दकला मुरि सुम- काय गीत गावत हैं चितवनि है री मद मदन इटान की। देखि रौ मुखारविन्द आभा उफ- नात जिमि छूटे चन्द्रमण्डल ते छहर छटान कीम ( १०२ ) सिहोर (काठियावाड) निवासी कविगोविन्द गीलामाई राधिका ललाम तेरे भाल की बिसाल आमा श्रोपत अपार से सोहे छबि कान की। लोचन रसाल पुनि विमल विभायता को सोभा मुख- दाय लसे मोह उपनान को | हास ते प्रकास होत दन्त की दमक ताकी गोबिंद लसत सोभा नेह के निदान की। ऐसे मुखमण्डल ते भाय भास भूरि मानो छूटे चन्द्रमण्डल ते छहर छ- टान की॥ सौसा के महल माहिं नायिका नबेली बैठी लाज ते लुकाइ मुख नेह के निदान की। तहाँ आडू प्रीतम ने अंक भरि आनट ते आनन उ. घास्यो ऐंचि साटिका मुजान को ॥ गोविद सु- कवि तवं दीपति मन्द भई परम प्रकामी प्रभा थानन अमान कौ । विमल विरानी सोई ओ- पत अपार मनो छूटे चन्द्रमण्डल ते छहर छ- टान की। ॥

(१०३ )
भुण्ड खड़ी
चांदनीसी फैली चारु चांदनी बदनकी।
काशीनिवासी श्री १.५ कष्णलाला जी महाराज
उपनाम रससिंधु।
चाँदी के चौतरा पर चादी को तख्त विछयो
तैसीई चमक होत चाँदी के सदन की। कहे
रससिंधु फेर सारी करतारौ भारौ मोतिन के
माल हार जोत जो रदन को ॥ गावत वजावत
नृत्य करे स्याम संग
झुण्डन
की
भरौ वो मदन कौ । राधिका जी गोरी भोरौ
नवलकिशोरी ताकी चादनी सी फैली चारु
चादनी बदन को ।
वाबू रामवाण वर्मा सम्पाट का भारतजोवन काशी।
एक तो सखोजन को मण्डली सुधेरे रहैं
ननद निहानी रहैं पाहरू सदन की। टूजे गु-
मजन को सुभौर सौ लगोही रहै एहो वलवीर
चेती लान विरदन की ॥ वावरे भये हो
तुम
साँवरे विहारी अंग छाई है उमंग बहकावर
मदन की । कैसे गृह अंगना ते अंगना पधारे
लाल चौदनौ सौ फैलै चार चाँदनी बदन कौ।।

(१.४ ) कवि पं. अम्बाशंकर जी-काशी। छाको मद जोबन की चौबन चलाकी मढ़ी सोवन की पाटी पढ़ी मदन सदन की। स्याम मृदुमूरति ज्यों रानी रसराज जू की मानी है प्रमानी दानी चारह पदन की ॥ राधे चलि देखि बैठो औंठी चारू चौकी चढ़ी कारीगर नीके गढी नाग के रदन की। सकर सुकवि कहै क- विता न मान प्यारी चाँदनौ सी फैलौ चारु चा- दनी बदन की ॥ बाबू मबूलालजी~काशी। अवध की रानी ने बोलाई न्चीत रानी सबै करें म देखाई धाई सुर के सदन को। उमा आई रमा आई मारदा सचौह आई रती भाई सजि कै जे मोहनी मदन को ॥ मन्नूलाल को तब कौशिला सुमित्रानी सों वोलि लाउ दुलही नो कोशल नदन को। ल्याई अँगनाई बूंघट के उघारत ही चादनी सी फैली चारु चाँदनी बदन को ॥ में

( १०५ )
पं. केदारनाथ जी बनारस ।
ये जू नदनन्द एक गोरी बरसाने माहिँ तुम
को बुलाई चलो कीरति सदन की । कोमल
मृनाल कजह ते अति खौन कटि पीन कुच
दन्त दुति दाडिम कदन को। भौंहैं धनु बङ्क
ता हगे हैं अङ्क पाठ कर ताकनि चोटौली
नेन तेजना मदन कौ । जनो चन्द पूनो को
प्रकाश ललना को दूनो चाँदनौ सौ फैली चारु
चादनी बदन को ।
कवि गोपीनाथ जो काशी ।
सौस गृह सीमन मै स्वरगा-सरो सी बाल
वानिक विमल वेल सखमा सदन की ॥ सेत
जरी बूटिन विचित्र नरी सारौ मोहे अंग प्रति
अंग ओप बाढ़त मदन कौ । गोपीनाथ पूंजी
सुघराई परी वाके हाथ सरको न जाके तिय
काम के कदन की । चाँदनी विनाही दिव्य
दसह दिमान माहि चाँदनी सौ फैली चारु
चाँदनी
बदन को

( १०६ ) काशीनिवासी बाबू माधवदास जी सरस सिँगार साजि सोंधे को समूह भरी नरीदार सागै सो सपेदही सदन की। मजेदार मोतिन की माल अस हालै मन्द दौने मन मा धव मे मोहनौ मदन को ॥ हरे हरे हरे हीय हौंमला हनारों धारि इसिब मे कौत पात होरा से रदन कौ । चन्द को जुन्हाई मे सुजात बज चन्द जू पै चाँदनी सौ फैनी चारू चादनी ब- दन की। काशीनिवामी पगिहत हि बेनी कवि । वेगही चली तो मै लग्वाऊँ वाल बेनी हिज वैठी है दरीची खोलि आपने सदन को । कु. न्दन के रंग से सवाई है गोगई अंग चपला सौ चौगुनी चमक है रदन की ॥ रूप की निकाई वाकी वरनो कहाँ लौ देखि धरनी धमौ मी नाति घरनी मटन कौ। कातिक के चन्द सी मुछन्द ननु चागैओर चांदनी सी फैली चारु चांदनी वदन कौ ॥

( १०७ )
मानिक सौ ललित ललाई लाल ओठन को
हौरा नग पॉति सी है घवली रदन को। खं-
नर से परम कटौले हैं नुकीले नैन भृकुटी वि-
कट बइ धनुही मदन की । वेनी हिज बनिता
दूजी जग वाकी सर लाई है लोनाई लूटि
विध के मदन को। मैली करि सरद मयत के
प्रभा को श्राव चांदनी सी फैली चार चांदनी
बदन की।
कोपागज निवासी कवि सालिकराम जी ।
एहो घनस्याम तौर वा दिन जो देखी बाम
वार २ पूछो मोते व्याकुल मदन कौ । सोई 8
षभानु को दुलारौ है अनूठी याते दूसरो न देखौ
कामकामिनी कादन की । कहै सालग्राम ता.
की उपमा कहां लों कहीं मौन भई वानी यात
ब्रह्मा क सदन
को
। सरद न पूनो है न तारा
को प्रकाश कछु चांदनौ सौ फैनौ चार चांदनी
है
।
बदन को॥

( १०८ ) पाबू भयोध्यासिंह - मधुमन भिला भाशमगठ । कर पग जलजात सरिस भये हैं मंजु गति मै भई है सोभा सरस नदन की। आनन अ- मन्द चन्द मरिस दिपन लाग्यो जाहि सों जगी है जोति अतन मदन की ॥ हरि-औध जोबन सरद की समैया पाइ कुन्द की कली लौ भई पाति है रदन को। चंचलता आखिन ठनी है खनरौट ऐसी चाँदनी सी फैली चार चाँदनी बदन की। कोपागंज निवामो मारकंडेलाल उपनाम चिरजीव कवि , चाँदनी सो भयो अंग होरन के भूषन ते चाँदनी चपानी दुति काम के कदन की। चाँ दनी वगारन चमेलिन के हार लाग्यो चाँदनी चकाय दोन्ही महिमा रदन की ॥ कवि चिर- जीव चली चाँदनी निसा मैं आज चन्द्रमुखी राधे प्यारी नन्द के नदन कौ। चाँदनी सौ सारी पेंधि चादिनीई मात कीन्ही चाँदनी सी फैली चार चाँदनी बदन की ।

( १०६ )
काह मेरी कटि ये छिनेही छिन छौन होति
काहे गति मन्द भई आनि के पगन को। काह
कछ उर मैं जनान लाग्यौ बोझ कैसो काह चि-
कनाई चढ़ी गात अगदन कौ । कवि चिरजीव
काहे पुल के पसौज्यौ अंग साथ होत नेक कवौं
नन्द के नदन की। काहे चन्द रोंज से हमारे
सुख चन्द्रमा को चाँदनो सौ फैलौ चारु चाँदनी
बदन को॥
पटनानिवासी दाबू पत्तनलाल नी ।
होत है अमावस न पावस कवौहूं नही पू-
छत निसानी तुम ताहि के सदन की। अवमि
दिखाइहाँ चलो जो साथ मेरे पर हँसी ना करेहौं
नाम नन्द के नदन कौ ॥ नित प्रति पूनो को
सुहावनी रहै है निसा अहै तेज सालौ यदि
छोटिही कदन की। मोहि मति हो मति गति
नाहि रैहो देखि चाँदनौ सौ फैली चार चाँदनी
वदन की।
मति घवराय नेकु प्यारो खाय हाहा जिन

( ११० ) कहा भयो जागती जो स्वामिनी सदन को । रैन है अँधारी तनि सेत पेन्डु स्यामसारौ धरि है उतारि बूंघुरन या पढन कौ ॥ भयो है करार तोसें आजही मिलाइबे को आस करै नास जनि नन्द के नदन को। काम है प्रकाम को न मा- रग बतै तेरी चाँदनी सौ फैली चारू चाँदनी बदन कौ ॥ चन्द्रकला बाई - दी। सोरहो सिँगार सनि स्याम से मिलन काज राधिका सिधारी मनु बनिता मदन कौ। मन्ट मन्ट मारग मैं चलत सखीन संग निज गति प्रागै गति गज की कदन की ॥ चन्दकला भृ- कुटो कमान नैन बानन से तारन समान छवि छाजत रदन की। हँसत लसत अति चन्द मो मुखारविन्द चादनी सौ फैली चार चाँदनी व- दन की॥ सिहोर (काठियावाह) निवासी कविगोविन्द गीतामाई राधिका ललाम तेरे कंचन सी काय कैरी ( १११ ) ॥ अोपत अनूप आमा कुहू के कदन को । तामे निरमल नख नरवत से लगे हैं पुनि बिमल वि- भाय आमा रम्य हो रदन कौ ॥ कौंधत कटाक्ष कांति बिमल विशाल सोय आभा अधिकाय मानो मुखमा सदन की । गोबिंद सुहाय ऐसे अग तामें लसे रम्य चाँदनी सौ फैली चारु चौ. हनौ बदन को। उनीसवा प्राधिबेशन । मिती कार्तिक शुक्ल । सम्बत् १८५१ अनंग मदमाती है। काशीनिवासी श्री १.५ कष्णलाला जी महाराज सपनाम रससिंधु। लगत सुहाती लाती अतर लगाती छाती पलंग विछाती नाती सोभा सरमातो है । कहे रससिन्धु रातो नेह वरसाती, भातौ महल स- जाती वाती रोसनौ कराती है ॥ खड़ी मुस- काती नैन भौह मटकाती गाती सब को रि-

( ११२ )
भाती आती लङ्ग लचकाती है। बानाइ बजाती
बतराती इतराती नाच स्याम को दिखाती ये
अनन मदमाती है।
बाबू रामकृष्ण बर्मा मम्पादक भारतजोवन काशी।
कामकाज गृह के सँवारि सब भोरही सो
भोजन कगय गुरुजनन मुवाती है। सुन्दर मु-
बासन सों अंगन बमाय चाम सेज को विकाय
रूप हेरि हरषाती है ॥ पालीगन मण्डली कों
मिस सो हटाय परि पाय इष्टदेव बार बार या
मनातो है। आवै बलबौर पौर हौय की नसावें
इमि वैठी परयझ पै अनङ्ग मदमाती है ॥
जाहि मत कुहू को अँध्यारो निसामाह देख
कारौ घटा चहुंओर घेर घहराती है । गुरुजन
मंक कुललान कों विचार आलो गगन निहार
मगवीधी ना लखाती है | घन को अँधेरी चका-
चौंध टेखि कौंधन की बड़े बड़े वीरन की छाती
दहलाती है। नानति हौ मेरी कहो नेक ना
सुनै गौ घरी बावरी भई है तूं अनङ्गमदमाती है।

( ११३ )
॥
छालाल रसिक नवीन-काशी.
जोमभरी जोबन जवाहिर जलूम भरी प्रा.
बत परी मी चली मग मैं लखाती है। ऐडि २
लचक लचक लचकाइ लस बल भृकुटी के सैन
नैनन वुझातो है ॥ रसिक नवीन है प्रबौन कला
कामन में अंग २ ज्वानी को उमंग दरसाती है।
अति इतरातो नेक मन मैं न लातो सङ्ग नोखी
नई अगना अनङ्ग इदमाती है ।
काशीनिवासी पं० केदारनाथ जी।
अंग अंग चंचल सरौ है चंचला सौ चार
ताकनि तिरीछौ नैन भौहैं मटकाती है । सु-
न्दर रंगोलो चटकीलो पहिरै दुकूल भूषन जरा-
उन को नोति झलकाती है ॥ आचरो न बा.
धति केदारनाथ सूधो कभू ऑगौ को तनौह
सदा खुलो रहि जाती है। वोलिवे को औरई
उचारै
कछु
औरै
मुख
आठो नाम अँगना अनंग
मदमाती है ।

( ११४ ) काशीनिवासी पगिड़त हिज बेनी कवि । लाल लखि आई हौ तिहारे लिये ऐसौ बाल नाको ना मिसाल हाल बनिता लखाती है । रम्भा रमा मैनका तिलोतमा तुलै न तुल्य विध सों लोनाई को ले आई लूटि थाती है ॥ बेनौ द्विज वेगही चली तो मैं मिला ताहि नाहि लखि पतनी मुरेस को लजाती है। राती रस- रंग की उमंग भरी ज्वानी अंग अंगना अनायव अनंग मदमाती है॥ बा. माधोदास जी-काशी । मरकत मनौन के जेहर जरावदार हार चार वाजूबन्द किसिनो सुहाती है । स्यामरंग सारी मखतूल की किनारी कोर स्यामही सुचोली चारु माधो मन भाती है। मृगमद टीको नीको भाल पै विराजै स्याम स्यामही तमाल के नि- कुंज माह जाती है । स्यामही सिँगार साजि सावरी सलोनी वाल स्यामही के रंग में मनग मदमाती है।

( ११५ ) पटनानिवासी बाबू पत्तनलाल जी । बैठी है सरदीन बीच बातें बतरातो कबौं कयौं गीत गाती कबौं बाजन बजाती है। कबौं मुसुकातौ दरसाती दन्त पौतिन को बातनि रिसाती कबौं उठि भागि जाती है। देखो छिपि लाल हाल बाल को निहाल होहु बाजु कछु याकी चाल औरही वुझाती है। ही जो सर- मायी कवौं मुखहू दिखाती नाहिँ सो यों भई बावरी अनंग मदमाती है । सोरहों सिँगार साजि भूषन वतीसो राजि संग से सखौन के हँसौन दरसातो है । चन्द सरमातौ कंज खंजन लजाती पौर कौरहि व. दाती दुति दामिनि दबाती है । शङ्ख के नि. पोरगड संभुहि बोलातौ बँव रंभ थंभ दै अचंभ केहरी कुढ़ातो है । मन्द मुसुकाती बतराती हितराती भोज आती चली मौज मे अनंग म- दमाती है ॥ ॥

( ११६ ) गंधौलो जिला सीतापुरनिवासी बाबू जुगुल किशोर जो एपनामजराज। नवला के अंगन में योबन अवाई हगकोर श्रुति ओर दुरि दुति अधिकाती है । पगन मै छाई मन्दताई कटि छीन दीन अलकै छवान के कै छिति परसाती है ॥ रावरो सँयोग ब्रज- राज नित चाहति है मिलि सुख लूटी छिन २ अकुलाती है । आठौ जाम रहै ऐसे रति रसरग भरी जैसे रति रहति अनग मदमाती है । मेरे ढिग आय पूछ नितही कुशल छेम हौंहूं कहीं कुशल सुनत हरखाती है । सुरति कै तुरत चितेरिनि को बोलि लेति सूरति लिखाय के लगाय लेति छाती है ॥ सपने मै देखति तुम्हें ही ब्रजराज नित सौतुक के हेत चित चेति विलखाती है । रावरे मिलन लो हिये मे अभि- लाप राखि रैनि दिन रहति अनंगमदमाती है। कोपागज निवासी कवि सालिग्राम नी। पान लों न बीती दर मामह तिया के ॥ ( ११७ ) आये जोवन को जोर कोर अधिक देखाती है। दरपन सकारे ले बैठौ वारजा पै सौहै चितवति चहुंओर मन्द मुसकातो है ॥ कहै सालग्राम स्याम चलि के बिलोको ताहि तेरे विन दरस न नेक कल पाती है । कमति उरोज रोज अग तोरि जगुआति कीन्हे चव चंचल अनग मद- माती है ॥ श्री चन्दकला बाई - बूंदी। आई मैं निहारि तुमहू तो चलि देखो स्याम आज राधिका की छवि अति मरसाती है । म. कल सिँगार सानि अधिक उमाह धरि रावरे मिलन हेत मन अकुन्नाती है ॥ इन्दकला दूक टक् निहार मग रावरो हो कबहूं तुम्हे ही लन्ना नन मूदि ध्याती है। चन्द ते चिरौ सौ विजुरी सौ वृषभानुलली वैठो परजंक पै अनंग मद- माती है। वाबू पयोध्यामिह - मधुबन जिला पानमगढ । कठिन कियेहू केलि कसि भुज पासन सो ( ११८ ) स्वामिनी किलकि चंक पिलि पिलि आती है। दल दलि टसन सों बिदलि अधर दोनो तज ना दवति मुरि २ मुसक्याती है ॥ हरि-औध हा हिय मानति न कै मह है जामिनी गयेहूं ऐमी गति दरसाती है। रति रन रंग हिय बै- सही हैं सुनो लाल अंग २ अजहूं अनंग मद- मातो है ॥ | सिहोर[काठियावाड) निवासी कवि गोविन्द गोलामाई । छिन में मदन माहिँ छिन में बहौर पुनि किन में दुवार तक दौरि दौरि जाती है। छिन में अटा पै चढि झांकति झरोखे पुनि छिनही में उतरि के आँगन में आती है ॥ छिन मे हसत अरु छिन मे उदास होत ऐसेही अनेक तेरी गति दरसाती है । गाविद सुकवि तातें मन माहि जाने हम बावरी है फिरत अनंग : मदमाती है। कारी अँधियारी अति भारी भयकारी निसा तामे तजि स्यामसारी बनन वहाती है। मन -- - ( ११६ ) में न माने कैसे वाम जीव जन्तुन को देख अ- धकार अति कांपतही छाती है ॥ गोविंद सुकवि कहा बेर बेर कई आलो मानस में मोच कुल. कानि को न लाती है । यातें उर जाने हमें प्रीतम के प्यार माहि वावरी बनी है मदमाती है। तूं अनंग तारन समेत तारापति फीको परिगो। काशीनिवासी श्री १०५ कृष्णलाला जी महारान उपनाम रससिधु । लोचन नु पंचवान भौंह मनमध चाप सुन्ट- रता लूटि के विरंचि मानो धरिगो । कहे रस- सिन्धु फेर इन्द्र को धनुष मारी लछमी ने भ- षन सो मनी अंग भरिगो ॥ ससू से लसत कुच मोतीमाल गगधार पन्नग मी छूटी लेट पूजा स्याम करिगा । उदित मुखारविन्द रवि सो प्रिया को देख तारन समेत तारापति फौको परिगो॥

( १२२ )
हिज पलक पलो ना लगी चारी जाम नैनन में
नौर वीर हरि हारि भरिगो । चाली निसा
बाली लाली नभ में लखाई देत तारन समेत
तारापति फौको पग्गिो ॥
छबीले कबि बनारस ।
गरिगो गुमान गुन गौरि को गिरा को सुनि
रुप रति रंभा को पताका लौं उतरिगो । सु.
कवि छबोले परिपूरगा पुरन्दरौ को अमल अपू-
रव उजामु ताम् हरिगो ॥ मगिडत अखगड नव
खण्डन प्रचण्डमान राधा छबि पहर प्रभात सों
पसरिगो। औतरी नवौं वष मूरजसुता है तब
तारन समेत तारापति फौको परिगो ॥
वा० माधोदास जी काशी
ललिता कही है
वृषभान को
सता
सों बोर
। देव हिजराज आज के पो तेज भग्गिो । सरद
की राका पाय साका नभमण्डल में होय के
निसंक पंकजात सो पमरिगो ॥ ल्याई मौन
भीतर सों वाहिर दिखायवे को तहाँ एक की-
।

( १२३ ) तुक सु माधी मन हरिगो । प्यारी मुखचन्द को प्रकास गो भकास माह तारन समेत तारापति फौको परिगो ॥ महाराजा सर रावणेश्वरप्रसादसिंह बहादुर के. सी. आई. ई.-गिर। संग सखियान लिये आई सजि साम पास सुखमा समूह भौन भौतरै वनरिगो। नगमगी नोत वारी जेवर जड़ाव अंग हौरन-जटित भाग टोको भाल भरिगो ॥ बूंघट उघारि मंजु बदन विलोकतहों सुछवि गमान काम वामही को हरिगो। फैलत प्रकास मिथिलेसनन्दनी को नीको तारन समेत तारापति फौगो परिगो ॥ महाराजकुमार श्री गोरोसादसिह जी गिर। कोरतिकिशोरी वठी चौहरे अटा पै सजी सौरभ तरंग सौ चहूंचा चारु भरिगो । बंदिन सबारे माल लाल मिलिवे के काज अंगन उ- मंग त्यों अनंग को पसरिगो ॥ चूंघट उघारि झुकि झाकतौ भरोखा मग बदन प्रकास मार- ( १२६ ) टरिंगी गुमान इतै तामरस हो ते उतै तारन समेत तारापति फौको परिगो ॥ गोरे गात अँग राग करिके कपूर धूर कीन्हो अभिसार उर आनँद पसग्गिा । साजे सेत भू- षग जटित हौर भौरन सों तौरन रह्यो रौ तम देश ते निकरिगो ॥ ब्रजगज हेत साजि बादले की सारी तामे मोतिन किनारी सों प्रकास इमि भरिगो। चूंघट खुलत मुख तारापति भयो नभ तारन समेत तारापनि फोको परिगा। चन्द्रकला बाई - बूंदी। भाई तजि गेह मैं न आये बलबीर वीर कसे धरौं धौर नौर नैनन मै भरिगो। पौरी परी देह सौरी मोतिन को माल भई वौती है निसीयोनी चकोर चैन ढग्गो || चन्दकन्ना होत चटकाहट चहूंघा चार ठोर ठोर ताम्रचूड सोर जोर क- रिगो। लाललाल वाटर भये हैं नममण्डल तारन ममेत तारापति फोको परिगो ॥

( १२७ ) बाब अयोध्यासिंह - मधुपन जिला आजमगढ़ । बीजुरी विचारी है बिकल विलखानी फिरी हौरक ममानहं को तेज सब इरिगो । चूर चूर भयो चोप चुन्नी की चित्र कहू को दुतिवारे दीपक दिमाका उतरिगो ॥ हरि-औध बदन बनावत ब्रजेश्वरी के विधिह को बहुरो वना- इबो बिसरिगो । तरनि के तन मैं न तनक ल- नाई रही तारन समेत तारापति फोको परिगो । कोपागंज निवासी कवि सालिग्राम जी। कहै कवि कोन छवि कौरतिसुना को आज कचनलता सौ खासौ सखमा ते भरिगो। ना- गिन सौ वेनो तैसे खंजन जगन्त नैन भृगुटी मनोन चाप आपही ते धरिगो। सोहै सालयोम चक्रवाक ते उरोज दाज कहरि कामर-खौन उ- पमा निदरिगो । आनन अनूप सब व्याधि ते बिहीन यात तारन समेत तारापति फौका प- रिगो ( १२८ ) ॥ बीसवा अधिबेशन । मिती अगहन बदी । सम्बत् १८५॥ रासमण्डल गुपाल को। काशीनिवासी श्री १.५ कृष्णलाला जी महाराज सपनाम रससिंधु । बनत मृदङ्ग इन्दु लेखाने वजाइ खूब रंग. देवी करताल स्यामा देय ताल को। कई रस- सिंधु फेर माधुरी ओ मालतीह दोऊ जो सारंगी ले बजावे वह ख्याल को ॥ बौन तुंग विद्या चित्र लेखा मुहचग वारी ललिता विसाखा गान करे नन्दलाल को । विन्दा का जु हाव भाव चचल: को तान सखौ नित्य राधिका का रासमण्डल गुपाल का॥ वाबू रामकृष्ण वर्मा सम्पादक भारतजीवन काशी। सरद निसा को स्वच्छ चांदनी चहूंघा छाई को कवि वखानै री वहा के सुनु हाल को । कोटि कामदर्प को सुमर्दन करनहारो लैबो गत थिकि अनोखे नन्दलाल को ॥ देवन कौ

( १२६ )
भौर सौ लगी है नभमण्डली में नैन तरसै हैं
रौ अखण्डल भुपाल को । मान कही मेरी मान
छाड़ दै नवेली पान एरी चलु देखुरासमण्डल
गुपाल को॥
एरी मनमोहन की मोहिनी नली सुनु
छाडि है री बावरी सखीनन के जाल को । स.
रद निसा की आज सोहति अनूठी छवि दूनो
चन्दपूनो ते सरूप नन्दलाल को ! तासों मिति
बौर
मुधा-रूप को अचै के भलैं सुफल करै रौ
बलि लोचन विसाल को। देखें सुरमण्डल अ.
खण्डल समेत नभमण्डल ते भान रासमण्डल
गुपाल को॥
कवि गोपीनाथ जो-काशी ।
चांदनी विलोकि खच्छ सूरजसुता के तौर
बौर वलबीर टेखो वासुरी रसाल को । सारी
मन सुन्दर किनारीदार नारी चली कोज सेत
सवुज वसन्ती कोज लाल को ॥ सोरडू इनारन
के वीच बीच गोपीनाथ हाथ गहि नाचे सम
१२

( १३० ) साधे लिये ताल को। देखत बनत आली ल- टक निराली यह राधिका को राब रासमण्डल गुपाल को॥ बाबू मलालजी~काशी। धन्य धन्य बन धन्य धन्य वनबासिन कों धन्य धन्य गाय गोपौ धन्य ग्वालबाल को। धन्य नन्द जमुदा उपनन्द सब धन्य धन्य धन्य धन्य कौरति वृषभानजी के भाल को ॥ धन्य गोवर- धन जाहि कर पै सुधास्यौ आप धन्य बामुरी जो भावे मन्नूलाल लाल को। धन्य धन्य बन्दावन भूमि नवकुंजन को धन्य नहा होत रासमण्डल गोपाल को॥ काशीनिवासी बाबू माधवदास जी । नेक नेक माखन दै हम री नचायो नाहि ऑखि मूदि कैसे के विलोकैं वह लाल को । जा तन में सावरो सनेह सों सनेह लायो ता तन मे कैसे के उढावै मृगछाल को ॥ माधौ निन हाधन ते कवरी करी है नाहि कब री कहेंगे

( १३१ ।
भस्म लावनो सुभाल को। अधव ज वावरो मो
वकत वृथाही बोर याने नहि देख्यौ रासमण्डल
गुपाल को
कै
कागोनिवासी पं. केदारनाथ जी।
कालौदह कूदि के कन्हाई नाग नाथ लाइ
वासुरी बजाइ खेल कौन्हा इन्द्रजाल की। कीपि
पुरन्दर केदार जू वुलाइ मेघ बारि वरसायो
जोर जैसे प्रलेकाल का॥ वाम छोर नख पै गा.
वईनगिरिन्द्र राखि बूडत वचायो ब्रजवासी गाय
ग्वाल को । कुंजवनवास संजु मदनबिलास हाम
अधो ना भुलाय रासमगडन्त गुपाल को ।
जोरि २ अँगुरौ ते जोरी थोरो वैसन की
रोम २ नोवन उमंग भरौ वाल को। नाचिके
नचावनि हँसाइ के हँसनि मंजु गाइ
वनि सुवारि सुर ताल को ॥ वारिन के मध्य
केदारनाथ मयनरूप करिकै कलोल इस्यौ मन के
मलाल को । सालि २ उठत करने सुधि कीन्हे
चैन जधी ना भुलाय रासमण्डल गुपात को ॥
कै
गवा-

( १३२ ) छबीले कबि बनारस । सरद निसा मै आजु भवमि बिलोकिये रौ होइ लखि आई कही ऐसी हाल हाल को।सु- कबि छबोले देवदारन समेत नभमण्डलते देखि होत परम निहाल को ॥ सुखद बिलास सकुल पूरनप्रकासमान तिहपुर ता समान उकति न ख्याल को। कोटि चन्द्रमण्डल को खण्डन क- रत जमण्डल अखण्ड रासमण्डल गुपालको । काशीनिवासी पण्डित दिन बेजी कवि । एक समै वनिता बोलाई कान्ह कुंजन में पूरन प्रकास लखि चन्द छवि जाल को। आई वेगि बज को लोगाई तहा वेनी विज गावत वजावत मृदंग डफ ताल को॥ है है अजवालन के बीच वौच नाचे स्याम ताके मध्य नाचे लिये राधे नन्दलाल को । गोपी पनि देख्यो चन्द्रभाल सो न नान्चो हाल खास इन्द्रजाल रासमण्डल गोपाल को॥

( १३३ )
वा. हरियङ्करप्रसाद जी-काशी।
देह को न सुधि रही गेह को न खोन मोहि
नेह घटि गयो अति पौतम सुचाल को । धूमि
जात सौस कहूं भूमि जात नथ-नाक भूमि जात
टूटि बैना जड्यो मनि लाल को ॥ दया फरमाय
हरिशंकर को ध्याय आली दीजिये नसाय यह
विपति करान को। तेरिये दोहाई चित व्याकु-
लता छाई मेरे जीलों देखि आई रासमण्डल
।
गुपाल को
मनमोहन कवि।
बैठौ माजि मन्दिर में सुन्दरी दरीची बीच
काज हजराज आज सौति हिय साल के । लो-
चन सरोज से वदन चन्द छौनौ कटि वेनौ
कुच
सोभा वह देखे नै वाल के ॥ नीलमगि आस
पास कनक मुदाने लसे मोहन विचारि चास
गोरी गल माल के । मानो स्याम पौत के सुरंग
यो लखात भास पावत प्रकास रासमण्डल गु-
पाल के॥

( १३४ )
महारानकुमार श्री. गुरुप्रसादसिंह जी-गिऔर ।
बाजत रबाब बीणा तानपूरा स्वर सिंगार
सग्गि-रिगम तान ध्रुवपद ख्याल के । राग रा-
गिनीन अलङ्कार कूट तानन से करत अलाप
प्रस्तार स्वर जाल के ॥ टकिट किट चित्ताधा-
कृत मृदंगधगि कडानधा कड़ानधा मान परन
पडाल के । विषम अतीत अनाघात सम ताल
के सुद्रुतगति नृत्य राममण्डल गुपाल के ।
महाराजकुमार श्री गौरीप्रसादसिह जी गिहौर ।
सग्द मयत को मरौचिन लो आवें कढ़ि व.
दन मयत ते प्रकाम वह वान की। बाजे पग
पैजनौन किङ्किनी मधुर धनि वजत अनेक जन्त
मनु सुर ताल को ॥ नीलमनिमाल बीच बीच
पुखराज मनी कृष्ण वीच बीच छटा छुटै ब्रजवाल
को। भाई सजि सान मनिमन्टिर मे मानो
ब्रजमण्डल में होत रासमण्डल गुपाल कौ ॥
कोपागनिवासो मारकंडेलाल सपनाम चिरजीव कवि.
कर सो पकरि कर ब्रज को किसोरी मवै

( १३५ )
री भरे भालन भुलाये गरे माल को । काबो
त कौतुक वगारि काम हो को जाके अंगनि
भूषन
विराज
रत्न जाल को ॥ कवि चिरजीव
पान सरद निसा मैं नहा केलि करें स्यामा
याम कीरति विसाल को। भून्नत न ऐसो औन
आनंद उमंग वारो सुजस संबारो रासमण्डल
गुपाल को॥
चौर को हरन हरै हिय को हेमन्त ही
मिसिर मै फाग मोहै गोपी ग्वाल जाल को ।
काम को महोत्सव वसन्त ब्रजवालनि मैं काली-
नाग नाथनोहूं ग्रीषम मैं लाल को ॥ कवि चि-
रजौव कृष्ण अष्टमी
सु पावम
मैं पालनो समेत
मग्व सुखमा विमान को। रंजन करत रोम २
अवनी में आज सरद निसा मैं रासमण्डल गु-
पाल को॥
गंधौलो जिता सीतापुरनिवासी बाबू जुगुलकिशोर जो
॥
1
एपनाम दराज ।
अजहूं लौ करक करेजे करकत र विसरै

( १३६ ) को। छिनी न अलि रैनि दिन ख्याल को। कर गहि बैंचि बैंचि बसन सखोजन के भरि भुज भेटियो भटू रो भलो लाल को ॥ तब ब्रजराज अब म- थुराधिराज भये हमें सौपि बिरह बिथा के यहि हाल को । सूलत हिये में वह भूलत न केहू भाति हँसि हँसि कीबो रासमण्डल गुपाल लखनऊनिवासी हनुमानलाल कवि शङ्कर को तप जप बिदित अदित सम सत्य- हरिशन्द अहसार दस भाल को । द्रोपदी को अम्बर स्वयम्बर श्रीनानकी को करन को दान ग्यान जनक-भुवाल को ॥ नारद को गुन गान वरदान शारद को हनूमान रामजू ते अपर क- पाल को । काम को सुमन धन सुरभी हरित बन शरद निशा मै रासमण्डल गुपाल को । यीचन्द्रकला वाई - बूंदी। नटवर वेष सानि मदन लजाने लाल मन हरि लौनी हाल नारिन के जाल को। अमित स्वरुप धारि नवसिख सोम मनी राख्यो गहि

( १३७ )
हाथ हाथ भिन्न भिन्न बाल को। चन्दकला गाय
गीत भमत सनेह सने बरनत नारदादि जस
जनपाल को । सुमन ममूह बरसावत विमान
चढे देखि देखि देव रासमण्ड लगपाल
को
पाबू पयोध्यासिंह - मधुवन जिला आजमगढ़ ।
बस मैं न आपने हौं निवस भई हौं महा
वारि टरै वैरीहूं दृगन लखि हाल को । बुद्धि
विनसानी लेस रद्यौ ना विचार हूं को वेदन
बढ़त भाख विरह हवाल को ॥ हरि-औध को
सौं जोग बतियां अनूठी अहैं केवल बतैये इतो
करि बहु ख्याल को । कैसे वह सावरो सरूप
हिय मे ते कद अधी कैसे भूलै रासमण्डल गु-
पाल को॥
कैसे सुधि वासुरी की धुनि को बिसारि
होजे कैसे
दूर
कौजे वांकी भौंहन के ख्यात को।
मन्द मुसकान कैसे चित पे चढ़े ना कौं ध्यान
छूटि नावै कैसे लटकौली चाल को ॥ हरिऔध
को सौं सबै करिहौं तिहारी कही के
न

( १३८ ) . दूतो तनि बह जाल को। कैसे वह सावरी स- रूप हिय में ते कट ऊधो कैसे भूलें रासमण्डल गोपाल को । काकरौली निवासी कबि घनश्याम जी। वृन्दाबन सघन सु बोलत मयूर मंजु कुहुंकत कोकिला कपोत कौर चाल को। घनस्यामप्यारे । मख सुनि मुरली को धुनि थेई थेई नाचे नृत्य गोविद बिसाल को । बाजत मृदंग तक् धुव. किट तद्धिलांग धा धा किट धकिट सु नौको सुर ताल को । लालहू को मन्द मुसकानि रा- धिका की ओर देखें ब्रजबाल रासमण्डल गु. पाल को॥ सिहोर काठियावाड] निवासी कवि गोबिन्द गोलाभाई। वाजत मृदंग चंग नौवत नफेरी अम सारंगी सितार चित्त चोरत रसाल को । नाचत विहारी ब्रजवनिता के सग तहाँ उम्पादि गति धरि आनंद विशाल को ॥ गोविद सुकवि सोय पेम्वन को प्रेम धरी अम्बर ते प्राय सवे माघ मुरपान्त ( १३६ ) को । या समै तूं मान करि बैठी क्यों अबोल आली देखन को चल गसमण्डल गुपाल को ॥ मा रससिन्धु सखी आरती निछावर करति है। काशीनिवासी श्री १०५ कृष्णलाला जी महाराज उपनाम रससिधु । गौवन चराय कान्ह साँझ समै पाये गेह पुष्पन की दृष्टि कौन्हें मन को हरति है । कह राई लोन स्याम उतार फेर पायन परति है ॥ सप्तदीप नवखड चौदे लोक सप्तसिन्धु तेंतीस करोड देव वार के धरति है। काटि मैन कोटि इन्दु कोटि रमा कोटि रवी नन्द के कुमार पै निछावर करति है। वाबू रामकृष्ण वर्मा सम्पादक भारतजोवन काशी। आजु नॅदगाँव में महोछव अनूठो छायो ज- लै लाल जू को अङ्कनि भरति है । ग्वा- लन को भौर चलो आवति है भोरही सों गो- पिन की मगडली प्रसन्न निकरति है ॥ याचक रि सुदा ( १४० ) समूह जुरे द्वार पै पुकारें शुभ बीर नन्दरानी तिन्हें दाम बितरति है । नौवै चिरकाल या पियारो नन्दलाल याते भर भर घाल को नि- छावर करति है। बा० माधोदास जी- काशी। दौरघ उसाँस लेत चेतई बिमारे देत सेत सेत बुंदै अँखियान ते ढरति है। रावरे सुध्यान मे पखान पूतरी सौ होत सावरी कहत ताहि अङ्क में भरति है ॥ बकि बकि उठे बाल वा- वरी सी वोलै वैन चैन ना दिखात गात आ- पनो गरति है । माधव जू वेगही बिलोकिये विदा की वेर नातो प्रान प्रापनी निछावर क रति है। कवि पं. गोपीनाथ नो काशी ननद जेठानी वानी सुनत विकानी सबै सासु वोल सुनिवे को साधन मरति है । नारी रूप वारी जती न की बसनवारी अव तो न कोऊ वाकी सर को अति है ॥ गोपीनाथ वनिता न।

( १४१ ) ॥ वासी है विधाता रची देवर निहार हिये आ- जट भरति है। सास होत परम हुलास वा प्र- कास देखि प्रानधन प्रीतम निकावर करति है। कागोनिवासी पणिहत हिज बेनी कबि । सान सुघराई की निहारि हारि मानै मैन असुनौकुमारहू न सर को अरति है। पारिजाति परम लजात पद पेखि २ पूरन लजाय जाय पंक मे परति है ॥ वेनी हिज लाला लषालाल को प्रताप लखि इन्द्रह हमेस हिय अन्दर डरति है। कविता रसौली जोई रसिक सुनै है कान मान पद पद निछावर करति है ॥ कान सुनि जनम सुजान कान्हजी को नन्द दान दै दै दिनन दरिद्रता हरति है। हार हार वाजत बधाई हनमगडल मे आनंद को सिन्धु आनि उमड़यो परति है ॥ बेनी हिज जसुदा निहारि मुख चूमि चूमि मोद मदमाती न गोद लै धरति है। छोरि छोरि भूषन वमन मनि मोतीमाल लाला नंदलाल पै निछावर करति है। पै (१४२ ) a पं. केदारनाथ जी बनारस । चुभि गो चपाकि अंग मैन को त तौर पौर मेटिवे को समै जानि धौं परति है । कर्कत है चूगै कर मर्कत है बाजूबन्द फर्कत है वाम नैन सगुनोचरति है ॥ ताहौ समै आयगो बिदेस ते केदारनाथ मोदित है विदुखिनि के पायनि धरति है। अम्बर पटम्बर पिन्हाये देत मागे विनु रूप देखि रूपया निछावर करति है। कंस को निटेस पाडू आई नंद के अवास कुच मो लगाई विष रुप मानो रति है। जान्यो नाहिँ नेक नंदरानी बासुरी को भेव कीन्हो म- नमान गोद सत को धरति है ॥ आपु लागी गृह को सँवारन केदार काज प्यावत पै सोर करि पूतना मरति है । धाइ उर लाइ मातु देवन सनाइ महा लाखन को सम्पदा निछावर कति है। पनिहत अम्बागर जी - काशी। पूरब के वामर चराय वच्छ आये हरि हरग्वि (१४३ ) जसोदा गहि गोद ले धरति है। पलक अलक बिथरीले रन रंजित जे चंचल सों पोंछि प्रान मस्तक भरति है ॥ दृव दधि अच्छत गे फूल फल धूप दीप संकर सुकवि देवपूजन सरति है भूषन वसन सोन राजत रतन तीन बार २ वारति निछावर करति है ॥ बा. हरिशहरमसाद जी-काशी। उमगि अनंग रंग छनदा छटा सौ वाम रचि विपरीति केलि सागर तरति है। लंक लचकाय जोम धूधुर मचाय चूमि चिबुक कपोल पी को अस मो भरति है । एहो हरिशंकर मजेन मद- माती महा सासु के मोहासिवे को नेकु न ड- रति है । ज्यों ज्यों हँसि हँसि नंदलाल मुख चूमि लेत योल्यों श्रमसीकर निछावर करति है। छवीले कवि - बनारस । बैठी मृगनैनी मजु मन्दिर मजेजभरौ सेन साजि मोहन को मारग भरति है । मुघर स- हैलिन को संगति समाज सोहै तान तानपूरे ( १४४ ) ॥ पैतराने को ढरति है ॥ सुकवि छबीले छैल तु रत पधार पेखि आनँद पयोधि को प्रवाह हल- रति है । पाडू बजरानी आजचन्द को अमन्द कोटि चन्द मुग्वचन्द पै निछावर करति है महाराजकुमार श्री गौरीप्रसादसिह जी गिहौर जा दिन ते देखो दृग सुघर सलोना रूप ता दिन ते भाँति भाति भावना भरति है । धुनि सुनि भौरन को डोलै संग लागि घनश्याम को विलोकि हिय आनन्द धरति है ॥ नोलपट छोरि धरै पीतपट गातन मं बातन में रावरोई नाम उचरति है । एहो नराज अंक भरिये निमंक वाहि तन मन प्रान जो निछावर क. रति है। कादिराज त छिराम जी-अयोध्या । मोतिन के चौक पुंज पावड़े पसारि पौरि पूजि पग नखन महावर धरति है । भूषन वसन पोरे कान जजीरे कर मौरी माल वन्दन प्र- भावर धरति है । लछिराम अरविन्द स्याम अं-

( १४५ )
जली सै राखि नवलकिमोरी भोरी भावर भरति
है। धारन मै छलकै रतन सुबरन भार भोरहीं
सों गौरि की निछावर करति है।
महल पधारे मनमोहन कहूं तें आज राई
लोन वारि अलबेली आदरति है । लछिराम
चौक चाननी मै नौग्तन चारु मालाकार प्रा-
नंद अपार मै भरति है ॥ स्याम घन रंग बिज्जु
माधुरी हँसनि सोहैं मदन मसाल को प्रभा को
निदाति है। गर वनमाल पर लोचन विसाल
पर स्योर वारे भाल पै निछावर करति है
ला. मारकण्डेलाल उपनाम चिरजीवी कवि कोपागंन ।
मूल नौं दिखात नहा कूल वा कलिन्दना
को रजत समान रेत समता धरति है। ऊपर
अकास अवकास को न अन्त जामैं जोवन जलू-
सन की महिमा भरति है ॥ कवि चिरजीव कृषण
राधिका विराजै जहाँ सरदनिसा मैं खूब चाँदनी
परति है। मानो निसि पूना वर सूरति विलोकि
टूनो चन्द की मरीचें ले निछावर कारति है ।

( १४६ ) ॥ लखनऊनिवासी लाला हनुमानलाल कवि । दनुज संहारि लकराज दै बिभीषन को भ- रत अवध सौंरि कल न परति है । सुमन बि- मान मै सशखा चढि धाए आपु हनूमान बेगि देखि पौन पछरति है ॥ निरखत पुरबासी आडू मिले सुखरासी हय गज दान द्वार नौवति क- रति है। राम सिया लखन पै वारि पानि पौवै माय तन धन प्रान लो निछावर करति है गंधौलो जिल्ला सीतापुरनिवासी बाबू जुगुलकिशोर जी सपनाम वजराज । वाल नव अंगन अनग को अवाई जानि बि. विध विधान के उमाहन भरति है अंजन सँवारि कै दिठौना देति उर उधरते ऐंचि अंचल धरति है ॥ देवत नितही ब्रजराज को विलोकै तिते तोरि टन कोरिक उपाय न स रति है। लाय निज हिय सों लला को ललचाय चूमि प्रानन को आपने निछावर करति है। श्रीचन्द्रकला बाई - दूं दी। आन साज सानि होरी खेलन को ब्रजराज । नैनन में ( १४७ ) ठाढ़े वृषभानु द्वार कौतुक धरत है। उत ते ₹- गौली रसभौनी सखियान संग लेके राधिकाइ अनुराग सरसत है ॥ चन्दकला करत अनेक कला ग्वालवाल जव घनस्याम गाय भावरि भ- रत है। तव वृषभानुलली तन मन धन प्रान पाली वनमाली पै निछावरि करत है। बाबू अयोध्यासिंह - मधुबन जिला आजमगढ़। सेवाही में सास औ ससुर को सदाही रहै सपन सौति जन सों ना लरति है। सौल सुघराई त्यों सनेहभरी मोहति है रोस रिस रार ओर क्यों हूं ना ढरति है ॥ हरि-पौध सकल गु- नागरी सती समान सूधे २ भायन सयानप त. रति है। परम पुनीत पति प्रीति मैं पगोही रहै प्रान धन प्यारे पै निछावर करति है कारोली निवासी कधि धनश्याम जी । कानहू को आगम सुन्योरी प्राइवे को आज दौरि दौरि देखें नेक धौर न धरति है । धन- स्याम प्यारे नोरि२ के सखिन आन गाय गाय ॥

(१४८ ) हरखि बधाये उचरति है ॥ मुर मुर देखें मुस- क्यावे मुग्व मन्द मन्द पौय को उछाह जीय नाहिँ बिसरति है । तोरि तोरि मुकता मणि माणिक मरीरि माल देख पिय दौरि के निछा- वर करति है। सिहोर[काठियावाड निवासी कवि गोबिन्द गोलाभाई। सरप तें छूटे कान्ह आय अवलोकि सबै ब्रज की बधूटी वपु भाय को भरति है। कोज राई लोन लाइ ऊपर उतारे पुनि कोज रछासूत्र लाइ कण्ठ में धरति है ॥ कोऊ लाइ कुमम को सिर पे चढ़ात पुनि कोज आइ आसिख अ- नूप उचरति है। गोविद सुकवि पर मात न. सुदा जौ भरि मोतिन के थाल को निछावर करति है।

( १४६ )
इक्कीसवां प्रधिवेशन।
मिती अगहन सुदी । सम्बत् १९५१
बाँसुरी बजावे है।
काशीनिवासी श्री १०५ कृणुलाला जी महाराज
उपनाम रसमिधु ।
सुन्दर सलोने नैन अन्तहि रसौले वैन देख
निय परे चैन मेरे मन भाव है। कहे रससिन्धु
फेर हाव भाव नृत्य करे घेरदार दावन को हाथ
ते उठाव है। सखी को बुलावे रासमण्डल करावे
मध फूनरौ खिलावे खूब सब को रिझाव है ।
देख ललचावे मुसकावे कभी गावे स्थास रा-
धिका के संग खड़ेः बाँसुरी बजावे है ॥
बाबू रामहाण वर्मा सम्पाटक भारतजोवन काशी।
देखो प्रेम-रंग में पगी है वह बाल लाल वे-
सुध भई सी सुधि आपुनी गवावै है। पौतपट
धारि कटि काछिनी सुधारि सौस मुकट संवारि
ढंग रावरो वनावे है ॥ ऐमी वा भई है तनमई
तुमही में कान्ह एक धुनि राधे राधे नाम को

( १५० ) लगाव है। बंसोबट बिपिन बिलोको बलबीर बलि बौर बलबीर बनी बासुरी बनावै है ॥ बाबू जगन्नाथप्रसाद जी बी. ए. {रनाकर कवि काशी। जाके सुर प्रबल प्रबाह को झकोर तोर सुर मुनिबन्द धौर बिटप बहावै है। कहै रतनाकर पतिव्रतपरायन की लाज कुल कान को करार बिनसावै है ॥ कर गहि चिवुक कपोल कल चूमि चाहि मृदु मुसुकाय जो मयकहिँ लजावै है। ग्वालिनि गुपाल सों कहति इठिलाय कान्ह ऐसी भला कोज कहूं वासुरी बजावै है । वैठे भङ्ग छानते अनंगपरि रङ्ग रमे अङ्ग अङ्ग पानॅद तरङ्ग छवि कावै है छूक रङ्ग ढङ्ग औरै एकाएक मत्त द्वै भुनद्र द- रसावै है ॥ तूंवा तोर साफी छोर मुख सो मोर जैसे कजगन्ध मे मलिन्दबन्द धावै है। वैल पै विराज संग मैनतनया ले बेगि क- हत चले यो कान्ह वासुगै वनावै है ॥ । कहै रतनाकर क- मुख विनया

( १५१ )
॥
बाबू हरिशंकरप्रसादशी - बनारस ।
बसि करि डारत है साती सुर देवलोक
परम अशोक ताल ऊधम मचावै है। खग मृग
जहां तहां चित्र से बनाय देत जल थल एक
भाँति रस सरसावै है ॥ खूब हरिशंकर अजूब
महिमा है नाकी हारद मरम कछू सारद न
पावै है । नासु रौ जो गेको मेरे पासुरी उठत
पोर गजब कहर कान्ह बासुरी बजावै है
काशीनिवासी बाबू माधवदास जी।
छोटी सौ कछोटी और छोटौ ही अंगूली
पाग छोटे छोटे वाजूवन्द किङ्गिनी सुहावै है ।
छोटे से मुग्दारविन्द छोटी नवनीत लोदी मागि
मागि जननौ पैं मोद को बढ़ावै है ॥ छोटी २
पैयां छोटौ पैजनी सुढार चारु छोटे छोटे सखा
संग आँगन में धावै है। छोटे छोट भौंरा लट
छोटी सी चकैया चार छोटे छोटे पानि छोटी
वासुरी वजावै है ॥
काशोनिवासी पं० केदारनाथजी।
सौम क्रौट मुकट मयूरपख केर धारे गर

॥ ( १५० ) लगाव है। बंसोबट बिपिन बिलोको बलबीर बलि बीर बलबीर बनौ बासुरी बनावै है बाबू जगन्नाथ प्रसाद जी बी. ए. [रत्नाकर कवि काशी। जाके सुर प्रबल प्रबाह को झकोर तोर सुर मुनिबन्द धौर बिटप बहावे है । कहै रतनाकर पतिव्रतपरायन की लाज कुल कान को करार विनसावै है ॥ कर गहि चिबुक कपोल कल चूमि चाहि मृदु मुसुकाय जो मयताहिँ लजावै है । ग्वालिनि गुपाल सों कहति इठिलाय कान्ह ऐसी भला कोज कहूं वासुरी बजावै है ॥ वैठे भङ्ग छानते अनंगपरि रङ्ग रमे अङ्ग अङ्ग अानंद तरङ्ग छवि कावै है। कहै रतनाकर क- छूक रङ्ग ढङ्ग औरै एकाएक मत्त व भुजङ्ग द- रसावै है ॥ तूंबा तोर साफी छोर मुख विजया सो मोर जैसे कजगन्ध मे मलिन्दवन्द धावै है। वैल पै विराज संग मैनतनया लै वेगि क- हत चले यों कान्ह वासुरी बजावै है ॥ ॥

( १५१ )
॥
बाबू हरिशंकरप्रसादनी - बनारस ।
बसि करि डारत है सातौ सुर देवलोक
परम अशोक ताल ऊधम मचावे है। खग मृग
नहां तहां चित्र से बनाय देत जल थल एक
भाँति रस सरसावै है ॥ खूब हरिशंकर अजूब
महिमा है नाको हारद मरम कछू सारद न
पावै है । आसुरी नो गेको मेरे पासुरी उठत
पौर गजव कहर कान्ह बासुरी बजावै है ।
काशीनिवासी बाबू माधवदास जी।
छोटी सौ कछोटी और छोटौ ही अंगूली
पाग छोटे छोटे वाजूवन्द किजिनौ सुहावै है ।
छोटे से मुग्दारविन्द छोटी नवनीत नोंदी मागि
मागि नननी पै मोद को बढ़ावै है ॥ छोटी २
पैयां छोटो पैजनी सुढार चार छोटे छोटे सखा
संग आँगन में धावै है। छोटे छोटे भौंरा
लटू
छोटी सी चकैया चार छोटे छोटे पानि छोटी
वासुरी वनावै है ॥
काशोनिवासी पं. केदारनाथजी।
सीम कीट मुकट मयूरपख केर धारे गर

( १५२ ) गुनमाल लाल अति छवि छावे है । काछ कम- नौय का कटि पटपौत केर कर्ण माहिँ मक- गकृतकुण्डल सुहावै है ॥ धन्य बनभूमि जह बिचरै बिहारीलाल गौवन के पार कर साटी लिये धावै है। साझ समै प्रावत उडावत सुधनु रेनु गाइ कै केदार सुर बासुरी बजावै है । छन्नलाल रसिक नवीन ~काशी रसिकनवीन को बिलोकु चलि आली नेक अङ्ग अङ्ग जाकी छमि मदन लजावै है। मोर को मकुट कटि काछनी लकुट हाथ कांधे पीतपट सो अधिक छवि छावै है ॥ उर वनमाल भाल चन्दन बिराने वेस कुण्डल चमक चहुं मोद वरसावे है। लीन्हे ग्वालवाल संग अमित उमग- भरी कुंनन में कान्ह आज बासुरौ वजावै है । कवि गोपीनाथ जो- काशी । सुनि के भनक मन मुनि के न माने छन जोगिन को जान जोग सवहौ भुलावै है। संभु यो बे दिवो विरंच भूल्यौ चन्द चा- ॥ स्वाल ( १५३ ) नो पै पाव चौगुनी चढावै है गोपी बाल ततकालही निहाल होत देव नर किन्नर के मोद सरसावै है । नन्द को कुमार आली कालीदह तौर जवै गधे रंगगतो मातो बासुरी बनावै है। काशीनिवासी पण्डित विज बेनी कवि। सौस न डोलावै सेस मुदित महेस होत छ- कित दिनेस भूलि रथ ना चलावै है । टूटी परें नभ ते वधूटी देवतानन को देव नर किन्नर को टक लग नावै है ॥ बेनौ हिज ब्रह्मा ब्रह्मण्डल समेत मोहे गोपी ग्वाल गैयन को आनंद बढ़ावै । जमुना के तौर बौर कोहरा अहीरवारो टेरि बलवीर जबै बाँसुरी बजावै है रसीले कषि - काशो। कछु ना सोहात थहरात गात बार वार अ- वला अवल नानि प्रान तरसाव है। कहत र- सोले उठै कठिन कुपौर हाय धीरज नसाय उर मदन सतावै है ॥ लाज रहि नाय ना वेहाल है ॥ १४

( १५८ )
बिबादी भेद राग रागनीन पुत्र भारजा लखावै
है। उपज बिलम्बित सुमध्य द्रुत शुद्ध बानी ग
मक के तान कान्ह बांसुरी बजावै है ॥
वाव पयोध्यासिंद - मधुपन जिला आजमगढ़ ।

( १५८ )
सिहोर (काठियावाड) निवासी कविगोबिन्द गीलामाई
सरद को चोदनो मे रचि राममण्डल कों
ब्रनवनिता के हो आनन्द उपजावै है। गोविंद
सुकवि तहा वाजन विविध बाजे उनके अवाज
आज चित्त को चुरावै है ॥ या समै तूं मान
करि बैठी क्यों अजान हरौ चल सोडू देखन
को ताहि को बुलावै है । माने सो न साची
तोतुं सुन श्रुति देके आली टेरि तेरो नाम कान्ह
बाँसुरी वजावै है ॥
कोपागंज निवासो मारकंडेनाल उपनाम घिरजीव कवि,
निषध रिषभ औ गन्धार षर्ज मध्य महूं धैवत
श्री पंचम को मुरनि मुनावै है। कोमल सु ते-
वर त्यों रोही अवरोही सम द्रुत औ विलम्यत
ते मैन उपजावै है ॥ कवि चिरजीव षट राग
रागिनी छतीस है सत अठासी मुत ताके बीच
गावै है । तीन सत साठ ताल मुर्छन यकीस
लैकै काँध वा कलिन्दीकुल वासुरी वजावै है ॥

॥ ( १५८ ) बिबादी भेद राग रागनीन पुत्र भारजा लखावै है । उपज बिलम्बित सुमध्य द्रुत शुद्ध बानी ग मक के तान कान्ह बासुरी बजावै है ॥ बाबू पयोध्यासिंह - मधुपन जिला प्राज मगढ़। काको सुत कैसी छवि धारत बसन कैसे कैसी बानी बोलि को पियूख बरसाव है। जा. नत जुगुत कैसी मोहत कहा धौं करि मन्द मु- सुकानि काकी मन अपनावै है ॥ हरि-ौध की सौं कही मानु चलु देखें नेक काको रूप का- मिनी को बावरी बनावै है । काके बस ब्रज की बिलामिनी भई हैं बौर । कौन बनमाली बन बामुरी बजावै है ॥ विवस बनाइ बारनादिक विहंगडू को वन- चर वानरादिहूं को वहरावै है। बिटप औ व- लौहूं विमोहि विलमावै वारि वहत वयारहूं की गति विरुझावै है | हरि-औध बूझि देखै बैगुन विलोकै कहा वावरी जो व्रजनितान को वनावे है । विबुध वरूथ विवुधेस विधिहूं को वैधि वीर! वनमाली वन वामुरौ वनावै है । ॥

(१५६ )
सिहोर (काठियावाड) निवासी कधिगोविन्द गीलामाई
सरद को चाँदनी में रचि रासमण्डल कों
जनबनिता के हो आनन्द उपजावै है। गोविंद
सुकवि तहा बाजन बिविध वाजे उनके अवाज
आज चित्त को चुरावै है ॥ या समै तूं मान
करि बैठौ क्यों अजान कैरी चल सोडू देखन
को ताहि को बुलावै है । माने सो न साची
तो तूं सुन श्रुति देके आली टेरि तेरो नाम कान्ह
बाँसुरी बजावै है ॥
कोपागंज निवासो मारकंडेलाल सपनाम चिरजीव कवि ,
निषध रिषभ औ गधार षर्ज मध्यमहूं धैवत
श्री पंचम को मुरनि मुनावै है। कोमल सु ते-
वर त्यों रोही अवरोही सम द्रुत औ बिलम्पत
ते मैन उपजावै है ॥ कवि चिरजीव षट राग
रागिनी छतीस है सत अठासी मुत ताके बीच
गावै है । तीन सत साठ ताल मुईन यकीस
लैकै काँध वा कलिन्दीकुल बांसुरी वजावै है ॥

( १६२ ) ॥ काछनी पिताम्बर को आछे रंग दुपट सुढंग ब- नमाल सरसावै है ॥ श्रीवर जू कोट श्रुति कु- ण्डल अमोल नोल इन्दुमुख टूनी दुति दी। दरसाव है । रम को बटोरी मकरन्ट मध बौरी मानो मैन रुचि घोरी मन्द बासुरी बनावै है श्रोकिणं रोलालजी गोस्वामी पारा। माथे मोरमुकुट चटक सिरपंच बँधेि साधे कानकुण्डल लटक ललचावै है। नासिका बु- लाक अनुरागभरे नैननि सो बिहँसि निरखि चित चाह सरसावै है ॥ पीतपट लकुट नकल कटि काछनौ पै नखसिख भूषन बिसेष मन भाव है। भनत किसोरी स्यामसुन्दर छबीलो छैत मन्द मन्द मेरौ गैल बासुरी बनावै है। गंधौलो जिम्ता सीतापुरनिवासी बाबू जुगुलकिशोर जी पनाम वनराज । सौस मंजु मुकुट विरानै गुंजमाल गरे तेसी पीतपट तन दुति सरसावै है । लचकि लवकि ठिलात वनराज वीर ग्वालन समेत नित भीर ( १६३ ) इत भावै है ॥ निकट छुवाय अंग भृकुटौ नचाय रद अधर दबाय करि सिसकी सुनावै है । मो तन निहारि अलि ईछन तिरीछन सो मन्द मु. सकाय मुरि बांसुरी बनावै है नज मै बहाली भरि थाली उजियाली लिये दैदै कर-ताली सबै ग्वाली गीत गावै है। काली- दह बीच संग काली घरवाली सवै वालो वैस व्यालिन सों विनती करावै है । अदभुत ख्याली को निराली करतूति लखि मुख छवि हालौ ससि समता न पावै है। कालीफन अपर क. पाली मौं देख पाली कैसे वनमाली खरो बासुरी वजावै है ॥ मानिक ते मानहु मरीचि मरकत की काशीनिवासी श्री १०५ कृष्णलाला जी महाराज उपनाम रससिंधु । सूरन को पर्व सुन चले द्वारका त स्याम अश्व गन उष्ट्र प्यादे सेनाइ सनत की। त्योंही रस- ( १६४ ) सिंध फेर कुरुच्छेत्र न्हान आये नसुदा जी नन्द गोप गोपी मसलत की॥ भोर भई भारी तहा ठाढ़े नर नारी कृषा देख राधिका सों कई नई उकत को । रवि को जु रंग लाल राहु की स्यामताई मानिक ते मानहु मरीचि मरकतको। बाबू रामण वर्मा सम्पादक भारतनोवन काशी। आये बलबीर पिय भोरही प्रिया के गेह वसे कहूं रात कौन्ही बात हरकत कौ । सारौ रैन जागे पनुगगे प्रेमपागे उतै इतै मनमोहिनी को छाती दरकत की ॥ दोज अनुरक्त नैन श्याम पूतरी की प्रभा उकति अनूठी बौर भासै बरकत की। अरविन्द अन्दर ते कटै अलि-छोना कैधौं मानिकते मानहु मरीचि मरकत की। कालिकास्तव । ठाढ़ी विकराल मुण्ड-माल गर सोहै लाल माल पै सिंदूर जीभ ज्वाला फरकत की। ल- लकि रही है लिये कर में कृपान दुष्टदल हनिवे को जाने भक्त हरकत की। वीरन की सिद्धि ( १६५ ) रिडि धीरज धरैयन की भगत धुरीनन को पुंज वरकत कौ । कालिका के अङ्ग को प्रभा यों लाल सारी कढ़े मानिक ते मानहु मरीचि म- रकत की। कायोनिवासी पगित हिज बेनी कवि । सकल सिँगार साजि मिलन सहेट गई डारि डर लाज गृहकान हरकत की। वेनीदिज वा- लम विलोक्यो ना तहां पैजाय गिरी महराय तुल्य काटे दरखत की ॥ सोचन सों समकै स- कोचन सकै ना वोलि रोयरोय आखें भई तहत रकत की। जासुन के संग मिलि कज्जल कतार कढ़ी मानिक ते मानहु मरीचि मरकत की। आये हो कहां ते प्रात विह्वल विहारीलान्त आँखें ढ रही है लाल वूड़ी ज्यों रकत की। जावक ललाट सौस अटपट पाग सोहै खवर • मरकत प्रायः पसे को कहते हैं किन्तु प्राचीन इ. वियों ने [जैसे थो सूरदास नो, यो गुसाई तुलसीदास जी, श्री वसमट्र जो इत्यादि ने भी इसे नोलमणि कहा है।

नहीं है लर पेच लरकत की। बेनीहिन राजत ( कपोलन पै पीक लोक मोहनी मनोनवारी बातें। आसकत की। नन की रख स्याम भनक अ- धर बीच मानिक ते मानहु मरीचि मरकत की। बाबू हरिशंकरप्रसाद की बनारस । मित्र के प्रकास मिलिब को चली मित्र पास धरि उर आस बायें नैन फरकत की। भमकि चले ते लफि लफि जाति स्लोनी लक्ष घायल करति अदा करा छरकत की ॥ कदम कदम मैं हँसति हरिशङ्कर न रोम रोम सोखी भगे नोखे हरकत को । मिसी मल्यो ओठन सो ऐमो छवि छाई कढी मानिक ते मानहु मरौचि मर. कत को॥ छन्नलाल रसिक नवीन~काशी चन्द ते दुचन्दमुख चन्द्र को छटा हैं चारु बतियां मुधा मी खामी मोहिनी जगत को । रसिकनवीन है प्रबीन सव भातिन सों पाई वा- दशाही सुघराई के तखत की ॥ लालन चली A ( १६७ ) । तो मैं लखाऊँ चलि वाकी छवि सारी सनि वैठी है किनारी के हँकत की । झलक मिसी को आनि अधर लमी है इसि मानिक ते मानहु मरीचि मरकत की। धनचन्द जो वल्लभीय-काशी। सोहैं श्रौद्रजेन्दुसिर चन्द्रिका मयूरपिच्छ अ- मृता कला हैं मानो दानि अभिमत कौ। ल. सति ललाट पै ललित जर्व पुंड जोति मानी रिद्धि सिद्धि रेख सकल जगत की ॥ भौंह बर वांकी ढांको सुखमा त्रिलोकन को सानो कल्प बेलि श्री सिंगार के भगत कौ । अधरन वीच लसै बासरी अनूप कढ़े मानिका ते मानहु म- रीचि मरकत की ॥ पगित अम्बाशङ्कर जी काशी। भौर ते अभौरन के आगे जदुवीर धौर झारें पिचकारी रंगवारी जरकत की। कीरतिकिशोरी टोरी गोरिन मों न्यारी होडू मारी मूठ भारी लै भवीर वरकत की ॥ संकर सुकवि उतै जानो - ( १७० ) की। मर्कत ते मानो चास मानिक मरीचि फै- लौ मानिक ते मानहु मरीचि मरकत कौ ॥ तरनि तनूजा-तौर आजु चलि देखो लाल धाल लता कुंज में बिराजै बरकत की । भनि अवधेश वेश भूषन सुहावै अंग सोभा त्यों बनौ है चारु पट फरकत कौ ॥ लाल रंग रजित सु- झीन कंचुकी में फबै नौलिमा उरोज अग्रभाग थरकत की। मदन महोश मध्य मन्दिर महान मंजु मानिक ते मानहु मरीचि मरकत कौ ॥ कागोनिवासी पं० केदारनाथजी । वैठे स्याम राधे संग मन मैं उमंग भरे क- रत कलोल लोल मैन बरकत की। भई बरजोरी वेहि ठोरी ना कहो री नाय गिरिगो किरीट भाल वैदी सरकत की ॥ कलि बिपरीत करें दम्पति मरोरि कर छाडै ना केदार ऑगुरोहू तरकत कौ । समर वदी है कैधौं अतन अखारे अाजु मानिक ते मानह मरीचि मरकत कौ ॥

( १७१ )
वाबू जगनाथ प्रसाद जी बी. ए. (रत्नावर कवि] काशी।
जब ते रची है रूप रावर रसिक लाल तब
ते वनी है वाल वात बरकत की। कहै रतना-
कर रही है मचि नैनन में मौन मुख मंजुल
मकुत ढरकत कौ ॥ आठो नाम वाम मग जो.
हत मृगौ सौ जव चौंके पाय पाहट तिनका
खरकत की। अनुराग रंजित श्वान सों कढ़त
श्याम मानिक ते मानहु ॥
श्रीकिशोरीलालजी गोस्वामी भारा।
सुन्दर सवारी चारु चन्द्रिका उजारी नहीं
सोहै चित्रसारी प्रानप्यारी प्रानपति की। मनत
किसोरी चौंकि चकित चितौति चित चंचल
चलत चाल इंसान के गत कौ ॥ औषकि उ
चकि मनभावन मनावन को पावन परसि सोस
सादर नमित को । तरुन अरुन पग विस्वित
मुकुटछवि मानिकते मानह मरीचि मरवातको॥
कोपागंज निवासो मारकंडेलाल उपनाम चिरजीव कवि ,
कोज दैहै उत्तर विमारी ते लिख्यौ ना कछु

( १७४ ) सँयोग धूपठाह सोभा सकत बखान कौन आ- तमा जगत को । कुच औ अधर ते उजास यों कट है सदा मानिक ते मानहु मरौचि मर. कत की। वाबू पयोध्यासिंह-मधुधन जिला आजमगढ । पूरन मयक ते सवत मधु बिन्दु को सौ सोभा सई मुख ते प्रसेद ढरकत की। गोल पारसी पै नागछौना सी अनोखी छवि लसी है कपोलन पै ल* लरकत को । बिपरीत रचे हरि औध लाल चोली माहिँ दुति है नकल कुचकोर फ- रकत की। मिलि मिलि मोह लेत मानस म. नोजई को मानिकते मानहु मरीचि मरकतकी। सिहोर[काठियावाड निवासी कवि गोबिन्दगीलाभाई। ओपत असन पीठ राधिका ललाम तेरे सी- तिन के चित्त माहिँ खूब हरकत की। वामें द. मकत दन्त वहिका बलित स्याम मुखमा समूह सोय वेश बरकत कौ ॥ गोविद सुकवि ताकी उपमा अपूर्व लसे आइ अभिराम मेरे चित्त स.

( १७५ ) रकत की। मंगल ते मन्द कढ़े मंजुल मयूख कैधौं मानिक ते मानहु मरीचि मरकत कौ ॥ श्रीचन्द्रकला वाई - बूंदी। सारी रैन भान धान जागि के गुपाललाल नाना भॉति कौनी कामकला कोक मत कौ। जावक लिलार लाय अंजन अधर द्याय पलकन पोक पाय छाती भरी छत की । चन्दकला प्रा- तही पधारि मन भावती के मॉक लाल नैन धारि दीठि छोम रत को । ताहि देखि वोलो अलि देखहु कढ़ी है यह मानिक ते मानहु म- रीचि सरकत की। वाईसवां अधिवेशन । मिती पूस वदी १ सम्बत् १८५' सरोज सकुचाने से। काशीनिवासी श्री १०५ रुणलाला जी महाराज उपनाम रससिधु । सुन्दर सँवारे वार सोने को ज चौकी बैठ अतर फुलेल मले सोधे खूब साने से । कहे रस- 1 다 ( १७८ ) पं. छबलाल रसिक नवीन – काशी अरुन उदै में आज सर नहान आई ना गर नबेली एक मुघर जमाने से । रसिक नवीन मुखचन्द ते दुचन्द चारु ल्याई है लोनाई लूटि विधि के खजाने से ॥ चौर धनि नीर में धसौ है वाल खोले बार बाम हेत भँवर भिराने लोभाने से। लाल चलि देखो तो कमाल वा उ- रोजन को जाहि लखि कै रह सरोज सकचानेसे। मेरे मुख चन्द को बिलोकतै चकोर जोर इकटक लाये खरे रहत लोमाने से । सहन स- रौर को सुबास आस पाम पाय अलि मिडराने फिरें विकल दिवाने से ॥ रसिकनवीन गति दे- खि देखि हंस मेरी चाल को विसारि बैठे सर पे लनाने से। नैनन निहारि मृग हारि कै पराने वन पक परे रहत सरोन सकुचाने से ॥ कवि पं. गोपीनाथ नो-काशी ।, गति देखि हंसन हिये में हार मान लोन्ही कटि देखि सवें सिह कानन लुकाने से । बेन

( १७६. )
सुनि कोकिल के मन में मलोलै उठे नैन देखि
खंजन उडाने खिसियाने से ॥ गोपीनाथ भंग
की गोगई छवि भाव मागे लाल लखि परत
गुलाब कुम्हिलाने से । राधमुखचन्द को विलो-
कत विहारीलाल लागत समस्त है सरोनः ॥
कबीले कवि बनारस ।
वचन बनाय खाति सौं हैं नित झूठी झूठी
बादही मै जात रात दिवस विताने से । सुकवि
बौले हौस होय में हमारे यहै रहत इसेस वैन
कहत सकान से । कत करि मान लेत मानत
अजान होति मो चित चकोर मुखचन्द पै लो-
भाने से। क्यों न प्रानप्यारी कर परसन देति
का उरोज रोज रहत सरोज. ॥
राति रतिरंग में जगी है कहुं काहु संग
भोर उठि आवत बनी सी वरसाने से । सुकवि
छवीले ना छपाये ते छपेगी कहा बचन प्रवीनता
वरवानति वहाने से । कवन कलङ्क नग जानत
कलानिध में उपमा अनूप यहै सरम ममाने मे ।

( १८२ )
कोर पै चकोर है दिवाने से ॥ बेनौ द्विज बान
पंचबान को गुमान गारि ल्याई है लुनाई लूटि
विध के खजाने से। देखि देखि तेरी अँखियान
की अनूबी बौर पंक जाय परत सरोज० ॥
प. केदारनाथ जी बनारस ।
प्रोषित बियोगिनि को पौड़ित करनवारो
सुखद सँजोगिनि को हिय हरखाने से । यसुधा
बनस्पति के जीवन जनक आछे कृषी सुखकारी
अंकुरादि दरसाने से ॥ कहत के दार मनमोदक
चकारन के चोरन अमोद कोक कोको बिल.
गाने में । विकसै कुमोदिनी प्रकासित निसाकर
के मुरझात मुकुल सरोज० ॥
जाइये वहाँही चलि आये जई भोर होत
छपि न मोसों भानु बात के बनाने से । झूठौर
खात काहे सौहैं तं हमारी सौंह कज्जल को
रेखह कपोल दरसाने से ॥ मोसो केर कालिमा
छई है पधरान आकी पलके तमोल पीक लोक
रंग माने से। रैन अंग भारस केदार न भरो है
जगे मुंदै जात नैन है सरोज० ॥

1
( १८३ )
हजपद मो वसभीय-काशी।
एहो आजु धन्य अनजाने से अयाने ऐसे
चकित जकाने विथकान से बिकाने से । भति
अरसाने से ठिकाने ना परत पग हिय हरषाने
से सरस रस साने से ॥ रसिक सयाने ब्रजचन्द
ढंग ठाने ऐसे वात ना बखाने कछु अतिही म.
काने से । मुख कुंभिलाने से अधर पियराने ऐसे
लाल दोज लोचन मरोन० ॥
सुखद सुजान ब्रजचन्द मुखचन्द देखि च
हके चकोर नन अति हरषाने से । अमित उ.
मंग होत आनंद उदधि काहिँ चौहैं टरसात
कूर कोक विलखाने से ॥ रंचहू वियोग तम
कतडूं दिखात नाहिँ रहैं सुद्द जीव तरु गुल्म
हरियाने से। विषयी औ स्वारथी कुटिल कुवि-
चारी अघी पदरज विमुखी सरोज. ॥
साची चन्दवदनी दिखाऊँ ब्रजचन्द तुमैं दे.
खतहि है हो लाल अति तरसाने से। दिनहूं
चहके चकोर संग छोड़ें नाहिँ निरखि कुरग गन

( १८६ )
महारानकुमार श्री गौरीप्रसादसिंह जी गिौर।
तीसरे पहर लों मचाई रसबम बाम राते
विपरीत रति मैन मद सान से । होत परमात
उठि बैठी परजङ्क पर अङ्ग अङ्ग ऊपर तरङ्ग भ.
रसाने से ॥ कंज कर उलटि सवारि कच जूरो
कसै निरखि तमासे मन कै रहो लुभाने से ।
मेरे जान तम है डराय भयो अङ्ग मोरि प्रफु-
लित देखि कै सरोज० ॥
चलि ब्रजचन्द आप कौतुक बिलोकि लौने
सुखमा समूह लखि जग भी विकाने से। सौ-
रभित पारिज बदन पर आठो जाम भोग्न की
भौर त्यों फिरत मडगने से ॥ चहकि चकोर
चोच लावत है पानन पै बरही बिलोकि बेनी
होत है लुभाने से। वाके ढिग हौंसे रही प्रफु-
लित देखिवे को देखती हमेस हौं सरोज० ॥
वाव शिवपालसिंह-भिनगा ॥
चकि २ चकि नात चम्प तकि २ तन सकि
सकि सकि नात मृग हग ताने से । थकि थकि

( १८७ ) थकि जात बौनरी कटाक्षन सों जंकि २ होय जात बूंघट कढ़ाने से ॥ छकि.२ इंस जात चाल लखि शिव कवि पकि २ दाडिम द्रवत दन्त- दाने से । ऐसौ बषभाननन्दिनी ई लाई तेरे हित मुख लखि दौमति मरो० ॥ काहे पूर्ण निशिकर आजही भयो है मन्द काहे है लखात मृग मन में सकाने से। काहे चम्प सुमन परत जात पौरे २ काहे ये गयन्द फिरै वन में विकाने से ॥ पंचम तज्यो है काह कोकिलन गन शिवपाल भनि काहे नात कौर इ धगने से । प्रावती नितहि पर आज लौं लख्यौ हैं नाहि काहे सग्नि दीसत मरोज० ॥ कोपागंशनिवामो मारकंडेलाल उपनाम चिरजीव कपि, नर सों दिखाये छवि नौल न्हाय प्राय इते न्यामत नवैलिन के हौ में सुख साने से । प- रसों पखेरुन से उड़िगे छिनक आय ठोक दो पहर मैं सुकाइ अनजाने से ॥ कवि चिरजीव ये नू कीरति लता के पुंन काहे ना बतावो ( १८८ ) कहा होत ये दुराने से । साँझ के समै तो पाये पंकज खिले से लाल पान आये भोर क्यों स- रोज सकुचाने से ॥ छूटति न टेव जाको जौन सौ परी है आनि कोटिन उपाय गुरुजन के बुझाने से । हमरी सुने है कोन तृतौ सौ नगारखाने और को ब- खाने बानि रावरी प्रसाने मे ॥ कवि चिरजीव सोह लाखन करी है तौह बाज नहि आये काहू गेल उरभाने से । रोज रोज प्राय के दिखावत हनोन इमैं चोजभरे प्यारे यै सरोज० ॥ सिहोर[काठियावाड निवासी कवि गोबिन्द गोलाभाई। कोरतिकुमारी आज लग्वि लाल लोचन ते उपमा अनूप ताकी जाय न बखाने से। ऐसी अभिराम आभा प्रोपे प्रति अगन को नाकों लखि रभादिक रहत लजाने से ॥ गोविद सु कवि ताके दन्तन को द्युति देख नित्य ही नछत्र रहें दिन मे दुराने से । नैन कों निरखि तेसे मानम ते मान तजि रहे नित साम में सरोज.

( १८८ )
पटनानिवासी बाबू पत्तनलाल जी।
प्राये उठि प्रातहो जैमात अँगरात गात
सारी रात सौति पें बिताई अरसाने से। कछु
को बनाइ कछु भाषत पियारी पाहिँ कढ़ नसु-
सौल एक वचन ठिकाने से ॥ लाल को हवाल
देखि वान्न कछु बोलो नाहिँ साधि चुप ठाढ़ी
रही नानि अनजाने से। चन्द के ममान मुख
चन्द ललना के पेखि नैन भये लाल के सरोन०॥
प्यारी बलिहारी जा तेरो धनि भाग क्यों
न रहैं रूप माधुरी पैं लाल ललवाने से । हंस
तरसाने रहैं देखि कै तिहारी गति गजज ल.
खात अति अन्तही लजाने से ॥ तेरे कुच देखि
के महेस काम दुन्दुभी त्यों श्रीफल निहारि परें
अति सरमाने से। चन्द भये मन्द मुख तेरो सु-
खकंद देखि नैनन निहारि भे सरोज० ॥
गंधौली जिला सीतापुरनिवासी बाबू युगुल किशोर जो
उपनाम नजराज।
तेरे कहे आई हौं यहां लों
सुनु
मेरी वीर
१०

( १६० ) देखतही मेरे ये सहमि सरमाने से । खंज मृग मौन कहूं परत न पेखि अलि दबकि गयन्दगन विपिन पराने से ॥ येरौ ब्रजगजहूं लिग्वत तस- बौर रहे चकित निहारि हारि धीरज हेराने से। भेद न बतावति रहति हँसि काह सखि मोहि लखि सकल सरोज० ॥ रजनी विताय कहूं आये ब्रजराज तुम्हें पू. छनि सकल अॅग काहे कुम्हिलाने से । कमल कुमुद नैन भाखौ मोसों साँचौ कही आजु लखि परत सकाने से ॥ निसि मै मुदत वे मुदत दिनही में भेद दौजिये बताय कैधौं मोही सों रिसाने से । वल करि खोलौ तज खुनत न खोले कहूं भोर भये रहत सरोज० ॥ वाव पयोध्यासिंह - मधुवन जिला आजमगढ । श्रीफल कहे ते सान्ति होति सपनेहूं नाहिँ तोष होत हिय मैं न कन्दुक वखाने से । कंचन कलस की कथान को उठावै कौन गति के सिं- धोरा कहे रहत लजाने से ॥ हरि-औध जामैं नयन कै

( १८१ )
परि मत्त मन भृङ्ग मेरो कढत न टौखे अजौं
कौनेहं वहाने से । सोभा सने मौंहैं सोहैं मसि
सुभानन के सरस गेन ए सरोज. ॥
मेरे भाग नागतही जामिनी वितंकी हतो
कौन काज आप हैं लखात अलमाने से । प्यारी
पीक लोकहिँ अनूठे अधगन छोरि कहा लाभ
कलित कपोल में लगाने से ॥ हरि-पौध की
सौं साची कहो छल छन्द छोरी भोरही कहां
हो आज फिरत भुलाने से । रावरे बिसाल टग
कंज लाल ! ह रहे हैं सूरज उगेहूं क्यों स० ॥
श्रीकिशोरीलालजी गोस्वामी पारा।
मोहित मराल चाल देखत छबीली हाल
वानी सुनि कोकिल लजाने अनखाने से। सुधा
को सुहाग मुसुकात हरिलौनो परी जीती सु.
न्दराई सुधरत मनमाने से ॥ कटि के कराह
हरि कन्दर लुकान्यो त्योंहि जलमे समानी मौन
लोचन लजाने से । तेरो ये किशोरि अकल
मुखचन्द
चित
चन्द भये
मन्द
श्रो सगे. ॥

b?
( १६४ )
कनफूल पत्ता रूप के उजेरे मैं। कहै रससिंधु
फेर कंचुकी नरौ की चारु होरा हार मोती
चकाचौंध ज्यौं घनेरे में ॥ देख रौ तू बीजुरी सौ
बौजुगै सों डरे कहा चमके है बीजुरी त्यो स्थाम
धनधेरे मैं । बूंधट कियो है स्याम सारी को
राधिका नै गरक गई।
बाबू रामवाण बर्मा सम्माट भारतजोवने काशी।
कौरति-किशोरी गोरी मदनतरंग-रलो मिली
घनश्याम सों अनंग के दौरे में । सघन नि.
कुंज माहिँ बदनमयझे नाकी हेरि के हिरानो
मनो चन्द धनधेरे में ॥ आयो बलदाऊ उतै
खोजत कन्हाई ताहि देखत संकानी अकुलानी
फन्द फेरे में । दामिनी मी कामिनी यों का-
मरी दुरानी वीर गैरक गई है मनो बी० ॥
कवि पं. गोपीनाथ जो काशी।
राति रसरग के उमंग भरौ आई वाल लेत
अंगराई छाई आलस घनेरे मे । सौसहि नवाय
कै लजाय पाय सासु पास ठाढ़ी सकुचाय नैन

( १६५ ) नीचे किये नैरे मे ॥ दूरही ते आवत तहां पै देखि गोपीनाथ बैढव परी है वीर लाज के द- रेरे मे। टॉपि स्याम पट में तमाम गात बैठी गोय गरक गई.॥ बा. माधोदास जी . काशी। चित्रमई सागै नई दई है ववा ने आजु मा- वरो वचाय परी पावस घनेरे मे । कार कारे बादर ये उनये चहूंधा चारु परन लागी बूंदै चली आवे मेह नेरे मे ॥ मोदभरे माधव नू उ- चकि उथंग लै के लौनो है छपाय स्याम का- मरी के घेरे मे । हेरि हेरि हारे कवि उपमा न पाई और गरक गई. ॥ धावू मबूलालजी-काशी। गई भौन तीन जहा सूरन न स्वावौ जाय दमन को दमक दवी मौसी के फेरे मे । चन्द ते दुचन्द है प्रकास जास आनन को मन्नूलाल सोऊ घिखो बूंघट के घेरे मे ॥ होरन को हार चारु धयो है उतार सवै वरत ना चिराग जाऊँ ( २०२ ) -- बेर मे। कैधों ए नरेम भासमान पासमान बीच गरक गई० ॥ पं. मनमोहन कवि गिडोर । दारिद दतारे मदवार चलै झमि झमि दौ- खत यो रङ्ग निमि मावस के गैर मे। भासै मन- मोहन ए गरब गरूर भरे फैले फिर ऐसेही ह. मारे पलटेरे मे ॥ प्रान' महारान रावणेश्वर. प्रसादसिंह दान कौरवान लै मधारत सबेरे में। मारत गरेपै चलिपैठिगी करने बौच गरकं गई.॥ 'राजत नवेली अनवेली बषभान जी की छाई भली छवि ते सहलिन घनेरे मे । चौकी पर चाँदनी सी फरम विछाई हुती जमुना ते न्हाये भा वैठत मवेरे मे ॥ मघन सँवारे स कुमारि मुख ऊपर ज्यों बार को बगारती ले आरसी मु डेरे मे । भाषत बिचारि मनमोहन जू मेरे नान गरक गई. ॥ बाबू शिवपाल सिंह-भिनगा। मायौ है पनेक दल टायी है प्रचण्ड बोर ।

( २०३ ।
।
फाग्यो है करीन कुम्भ एकही झोरे मे । डाखौ
है पछारि वग्वोर नगमेल आये गायौ है गुमान
शत्रु
नैन के तरेरे मे ॥ हान्यो नानि धाग्यो टोप
झिलम मादतवां आयो गज मत्त चढ़ि युद्ध
के रेरे मे झायो है कृपान भगवन्त भूप शिव
भनि गरक गई।
कोपागंअनिवासो मारकंडेलाल उपनाम चिरत्रीव कवि ,
जाके अङ्ग पोप पै न कुन्दन जचात नेकु
माके रङ्ग देखे चम्या आवत न नेरे मे। नाके
पट भूषन के दाप पै दिनेसहू की, महिमा रही
कछू मुरकि उँजेरे मे ॥ कवि चिरजीव कान्ह
कयौं कर न पावै ताहि, चोर मिहिचान के च.
हुंघा पानि घेरे मे । ऐमो दरसे है वाल कुंजन
लता के बीच, गरक गई. ॥
महाराजकुमार श्री गौरीपसादसिंह जी गिहौर।
कञ्चन जटित परनड्व पै विराजे वाम दीपत
दिनेस लो फनूस के उजैरे मे। आये जो गुविन्द
करि चञ्चल चितौन चित्र मानहैं देखायो रति
है

( २०६ )
,
में रचे कान्ह जू के
सारी सों सरीर भली भांति अली सोवति' परी
है खगै नोंदही के फेरे में ।। हिय मै बिचारि
ब्रजराज मन हारि रहे उपमा निहारि कहूं पा-
वति न हेरे मै । फरक कळू न रह्यो सरक उ.
जेरे ते सु गरक गई० ॥
बाबू पयोध्यासिह - मधुबन
जिला प्रानमगढ़।
कल जलकेलि
जमुना
करि जुबतीन को नमाति निज घेरे में । मो-
हन के अङ्क सों छबीली राधिका को छुटि डू-
बंत बिलोक्यो शरि वा दिन सबेरे मै । हरि-
औध ताकी एक अजब अनूठौ आज उपमा बसौ
है ऐसी आनि उर मेरे मै। गोद सों गरबबारे
वारिद हितू को गिरि गरक • ॥
श्रीकिशोरोलालजो गोस्वामी पारा।
मॉकति झरोखे झुकि उमकि नबेली बाल
लालन निरखि चित चाह निरवरे मै फैलि
फवि कुन्तल कपोलन परसि रहे उड़त निचोल
नील मारुत धनरे मे ॥ चार चव चंचल मिले
1

( २०७ )
ते चन्दमुखी चौंकि आनन अनूप फेयो लोचन
सरेरे मै। दरसि गयो है तमतोम में अमन्द
चन्द गरक गई.
कैधौं सोनलता लपटानी है तमाल तम चं-
पक की माल इन्दौबर के चगेरे मैं। कैधौं मि-
लौ कौमुदी कलङ्क सों सँकोच मोचि कधी रति
काम सों लपटि नेह नरे मै । भनत किसोरी
मेघमाला ज्यों कलाधर मों वन्हि को सिग्वा धों
धूम धारनि के घेरे मै । श्यामघन तन सी मि.
लौ है ब्रजवाल ऐसी गरकि गई. ॥
-
तेईसवा पधिवेशन।
मिती पूस सुदो । सम्बत् १८५१
मालमुकतान की।
काशीनिवासी श्री १.५ कृष्णलाना जी महाराज
सपनाम रससिंधु।
कुचन
मैं पाये स्याम राधिकानी संग लिये
झण्डन को झुण्ड सखी सुन्दर सुनान की। कई

छूक बात है पै नख ( २१८) हार हारी नासों दुति भान को ॥ जो पै ब्रज- रान जू न आये तो सकोच कहा यामै तौ क- न सकुचान । कुचन चन्दहार से पहिरि इतै आई कितै खोय परी माल मु० ॥ श्रीठाकुर राधाचरनप्रसाद साह जागीरदार-पहरा । सब ब्रजबाल हैं निहाल लख लाल चाल डाल दृगजाल सुने बाँसुरी की तान की । भाल मे बिसाल बिन्द लोचन अरबिन्द नैन राजै छबि मानहु मनोज गलतान की ॥ राधिकाप्रसाद श्रुतिकुण्डल रसाल हाल काछनौ सुभग कटि पौतपटतान को । मन को चुरावै वीर रुचि उपजावे धीर लोचन सिरात लग्वि माल० ॥ ला. मारकण्डेलाल उपनाम चिरजीवी कवि - कोपागंन । पग मैं विराजे पायजेब जाके पैनवारी कटि मैं सु मेखला सवारी रतनान की। बाद मैं बि- राजै नाके वानूबन्द धानक सो ककन कलाई मैं पसारे प्रभा भान की॥ कवि चिरजीव ऐसी ( २१६ ) राधिका मनावे कौन नाक मान कौन्हे कान्ह भूलहू न मान की। सौस पै विराजे नाके च. न्द्रिका चमक वारी गर मैं विराजे जाके माल. कटि मैं विराने नाके पौतपट पैज वारो वाह मैं विजेठो बेस बनक महान को । कान मैं वि- राजै जाके कुण्डल कनक वारो नाको देखि लाजै टुति सिगरे जहान कौ ॥ कवि चिरजीव ऐसे कान्ह सो मिलै ना कौन जापै नटू के रही किसोरी बषभान की। सौस पै विगने जाके मोर को मकुट आज गरे मैं विराज मंजु मा । गयानिवासी पं. गिरधारीलाल नी गयावाल । केलि करि यामिनी विताई कामिनी ने नव बिदा है चनन लगी भये ते विहान की। कहै गिरधारी लाल सहित सनेहन की मधुरी बैन वोली मन्द मुमुकान को । ए जू प्रान- प्यारे यादगारी के लिये मै कहौं दौनिये अँगूठी एक मापनो चिन्हान की। अरु दीजै लाल एक ज़र को रुमाल एक रेसमी सुसाल एक मात . सु ( २२२ ) हिये मे तन फरक करक कौन साँची कहु छाडि दे रौ बानि जो सयान को । छुटि गई बेनी कहा लूटि गई कुंजन मैं टूटि गई कैसे उर माल म० ॥ पं. लक्ष्मीनारायण जी - अयोध्या। सारी रैनि कैलि कला कौतुक मयतमुखी गति मै गयन्द गरवीलो गुन ज्ञान को । मन्द प्रभा दीपक बिलोकि चन्द छौन भई मन मै मलीन करी चातुरी प्रमान की ॥ भरि भरि अङ्क लेति चाव मों मयकमुखी करि करि बातें कमलापति सयान की। दर परदान कळू व्या- जही ते दीन्हे छोरि धरति उतारि बाल माल पटनानिवासी बाबू पत्तनलाल जी। छाडि घर कारवार कौन नाय कामी बसे मतीनन ढूंढै लहै शिक्षा भलि जान को । सेवै विश्वनाथ एक सहि के अनेक विद्या प्रात होत लावै चित चिन्ता अमनान की ॥ वैठि मनिक- निका पै मनिका घुमावै अरु ब्रान में समावै

( २२३ )
धुआ मरघट मसान की । जोपै घरहौ में मिलें
एक साथ दोय संभु सकल सुपास पास माल०॥
कैसौ भलि सोमा लाल भाल में महावर
की कैसी भलि सोभा गोल गाल पीकपान की।
कैसौ भलि सोभा यह केस बिखराने सौस कैसी
भलि सोभा यह पलक झपान को। कैसौं भलि
सोभा यह लाल लाल लोयन को कैसो भलि
सोभा वात झूठ के बखान को । मेरो मन मोहे
लेत टोकुली सटे पट औ दाग ये विसाल उर
माल मु.॥
यो प० बलदेव कवि बिलकि छा जौनपुर
प्रेमबस जादूभरे नैनवां नसोले हंसि कहत
कटाचन सों मै जो अनुमान की। कीन्हो मन
काम बलदेव दिन बजरान मैन के मरोर में रही
ना सुधि मान की ॥ छूटी लटै सिथिल वचन
रद छद छवि नलित कपोलन में पीक लोक
पान की । लाला के गरे को गड़ी वाला गोरे
गातन मे भाला रंग लाई लोक माला मु० ॥
-
।

- - ( २२४ ) झूमत चहूघा दल धौग्न के काटिवे को को. रति करत चोपि चंचला कृपान को । फेरि गि रधारी आय अबला बचाओ बेगि चलन अचूक लागी चोट पंचबान की ॥ हिज बलदेव देखो स्थाम ले बलाहक नव कंपति लसत प्रभा सो भरि भान को। बिरहो बधन हेत घेरि घहरान लागे डार हैं गले में मनी माल. ॥ पं. सीताराम उपाध्याय सीतापुर । ल्याई कैलिमन्दिर भोराई भोरी भामिनी को कल सो बताद के तमासो सखियान की। साटन के सुख सनाये सेज फूलन सौ साप धखो धाइ भुजा नावक जपान को॥ माह करि उहरि तहाई ऐंटि बैठि गई निकट निहारिनैन मन्द मुसुकान को । करि गई कामिनी छलाया सौ जकरि गई भरि गई सेज टूटे माल० ॥ श्रीचन्द्रकला वाई - दूं दी राति कहीं रमि के प्रभात प्रानप्यारी पास पाये घनश्याम स्यामसारी धारि पान कौ। अ-

( २२५ )
धर पनूप माहि काजर को रेख धारि लाल २
लोयन पैलाली पीक पान की॥ चन्दकला हि-
कल कलाधर भनेक धरे लखि उर गाड़ बोली
बेटी बषभान की। इन्द्रजाल ढाली गल घाली
कौन शाल भाज पगुन रसाल लाल माल० ॥
प्यारेजचंद पै उज्यारी चलीजाति है।
काशीनिवासी श्री १.५ रुष्णलाला जी महाराज
सपनाम रससिंधु।
कालिदौकूलन पर वासुरी बजावै स्याम सुन
अजवान सभी दोरी वहरात है। कहै रससिन्धु
फेर
मुण्डन को झुण्ड सखी वौच मैं नु राधिका
भी मन्द मुमुकात है ॥ जुगनू सौ दीपक सी
ताग फुलझरौ जैनी दीपत मसाल की सौ पा-
बस दिखात है । छूटे महताव किधों चंचला
सिताव इन्दु प्यारे ब्रजराज पै उ० ॥
साग है सरोकी सेस कारचोवी कामदार
हीरन के पार भारी मोती चमकात है। कई

( २३० ) परै यो प्रतिविम्ब ता बिचित्र बलि कौतुक षखा- नत बिकाति है। कों ब्रजचन्द चन्द्रिका पै चल्यो बात कबौं प्यार बन• ॥ पान करिबे को रस सरस प्रमोद पुंज भौं- रन की कंज पै कतारी चली जाति है। सुकबि छबीले उठे मदन तरंग अंग मन ते सुलाज की सवारी चली जाति है । अब अवलोकि लै ह. ठौलौ ठकुराइन अनूप यह उपमा हमारी चली नाति है । जैसे उदै असन अँध्यारी चली जाति पेखि प्यारे बज० ॥ कवि पं. अस्वाशंकर जी-काशी। पानिप सुपानीदार बारन के वार नोहे मार चाबुक भपाति है । होरन के हार हिये हरत हरेई हियो चन्दन चुपेरो अङ्ग पामा उफनाति है ॥ कचुकौ सुपेत कुच सारौ ह सुपेत धरौ सारौ छिन प्यारी सुच्छ सारी अ- धराति है । संकर सुकवि ननु जोमभरी मिलि वे को प्यारे ब्रजचन्द पै उँ० ॥ मुक्तालार पोहे ।

( २३१ ) कायोनिवासी पगित हिज बनी कवि। सेत सेत हौरन के भूषन सजे हैं अग मांग मुकतान सों सँवारी बहु भाति है। सारौ जर- तारी की है भालक निरालो तामें गहव गोराई दुति अति अधिकाति है । चंचला सौ चलत चमके वहओरन मे वेनी दिन छवि की छटा सौ छहराति है । रुप की अन्हाई छौरनिधि सी उमण्डि जनु प्यारे ब्रजचन्द पै. जेवदार जेवर जवाहिर के साने साज जाकी जोति उमरि अगारी चली जाति है। मागे ज- रतारी की सवारी वर वानिक सो छोग्न ते भरत किनारी चली जाति है ॥ चन्द जानि धेरै हैं चकोर पानि वैनौ हिज पाछे परी भोर भौर भारी चली जाति है। छौरनिधि काढ़ी सी द- वारी सौ कि ऐसी कहों प्यार ब्रजचन्द० ॥ वैठी काह ठनगन को ठाने ठकुराइन हौ हठिये हठौली तेरी मोहिना सोहाति है। वनी दिन वर्वस किये ते मान | हानि याही निय ( २३४ ) किला दुखारी है उड़ाति है। कहत बनत ना केदार गोपिका को पौर नेह नीर सौंचे विनु बारी मुरझाति है । बटिया निहारि भई - ख्यिा धुधारी अधो प्यारे बज० ॥ महाराजकुमार श्री गौरीप्रसादसिंह जी गिडोर । धारे अङ्ग जेवर नड़ाजदार होरन के सेत पट अङ्गन ढकी सी दरसाति है । माल उर मोतिमा नबली अलबेलौ धरे पीतस को ध्यान हिय भीतरै सुहाति है ॥ पून्यो निमा माझ चली सजि के मिलन कार्ज पग पग ऊपर मे ठठकि लनाति है। मेरे नान आली मैन लाज के ह- वाले परी प्यारे ब्रजचन्द पै० ॥ पं. सीताराम पाध्याय पिलपिछा जौनपुर। सारी जरतारी दर-दामन किनारोदार साने अंग अंगन बनाय बहु भाँति है। रचि २ भूषगा सँवार नखसिख सवै नगमगै जटित जवाहिर की कांति है ॥ कसरि को अंगराग कौन्हे सर्व गातन मे वातन मे भला मलकति दरमाति है।

( २३५ )
॥
सीताराम टूनी दामिनी सों दमकति निमि
प्यारे जचन्द पै उज्यारी चली० ॥
पटनानिवासी
बाबू पत्तनलाल जी।
मन्द मुसकाति उमगाति इरखाति हिये देखि
जिन लय कोज मन मे सकाति है। पेन्हि पट
भूषण को अंगन सजाय प्यारी पान की मसा-
लेदार बौरी मुख खाति है॥ संग ले सखीन कों
हँसीन कुंजगैल लखौ गोरे तन भोप चहुंओर
छितराति है। अति हन्नसाति बतराति भाति
भाति वात प्यारे ब्रजचन्द. ॥
आई यदि खेलन को लोचन-मिचौनी खेल
खेल पर गोल गखे जियग डगति है। जव २
रही है त प्यारी संग खेल्न माहिँ तब २ हार
भई ऐमहि सुनाति है ॥ तेरे यह गोरे गात
रात ओप टूनी कदै कैतेह छपायेइ न नेका
छपाति है। सघन निकुंज घनघोर तमह को
फार प्यार हजचन्द पै ॥

( २३६ ) मै श्री कमलापति जी पयोध्या। धागे सेतसारी प्यारी मोतिन किनारीवारी हौरन से जटिस विभूषन विभाति है । सजि गुन गौरव गयन्द गरबोली भगै मदन उमंग संग कोज ना लखाति है ॥ कहै कमलापति पिछानी ना परति ऐसी सौरभ मिलित चन्तिका ते सरसाति है। साथ सहायक मलिन्द मह- मात लीन्हे प्यारे ब्रजचन्द पै.।। पे० बमदेष कवि सीतापुर। धारे सेत वसन हसन में दसन दुति मन हरि फसन को कोन्ही मनौ घास है। गृथे माल मुक्ल से लुरत डिज वनदेव गौरव गवन सौ ग- यन्दगति मात है ॥ सौरभिस सुमन के हारन की सौरभ सों भौंर के कुलान हा कम्पित यों गात है। गमग जोति जागै जल जवाहिर की प्यारे हजचन्द पै० फैधों स्वामधन मैं लसत घिर दामिनी सौ कैधों हेमलसिका समाल सत गात है । कैधौं ( २३० ) कृषा कंज ये चढ़ी है माल चंपक को कैचों नीलमनि मै कनक कृत पात है ॥ सोनजुही अतिसौ कुसुम माल बलदेव बाग पंचवान की विचारी वर बात है । न्यारी होत अंग सों न प्यारी की सुछवि कैधौं प्यारे ॥ गंधौलो जिला सीतापुरनिवासी बाबू जुगुलकिशोर नी उपनाम हनराज। . फेरि रहि है अजू एकही गुनी सों अवै टू- गुनी रही है भरि चारो ओर काँति है। चन्द- मुख चन्द ते सुहोड सो परी है खरी आवति विलोक ढिगही सो भली भांति है ॥ जो मैं प छितैही ऐसो औसर न पैहो हाल चलि अव- लोको यह समयो सिराति है। प्यारी तीन नैहै कहूं इतही रहेगी लखौ प्यार छन० ॥ कतहूं न दीसत प्रकाश दस दिसन मै आय तम तोम जाय छाय भली भाति है । अंगन गु- राईहूं न राई रहि जाय कहूं नैनन कुहू को निसि ऐसी दरमाति है। विरहविधा की कथा २१

( २४२ )
सिहोरकाठियावाड] निवासी कवि गोविन्द गोला ।
काय में लगाय लोने सुन्दर सिताम पुनि
चार में बिसद गुही पुष्पही की पाति है। रुप्य
के ललाम धरे पाभरन आंगन में मोतिन की
माल गरे बिमन बिभाति है ॥ गोबिंद सुकन्न
ऐसें साज सन चाँदनी में मोहन मिलन चलि
राधा अधराति है। आभा उन अंगन को फैल
के फावत मनो प्यारे वनचन्द० ॥
चौबीसवां अधिबेशन ।
मिती मोघ वदी । सम्बत् १८५१
फुलवारी है बसन्त की।
काशीनिवासी श्री १.५ कृष्णलाला जी महाराज
उपनाम रससिंधु ।
बेला श्री चमेली नुहौ मोसरी गुलाब कुन्द
चम्पाह सुपारी वास ताडज सजन्त की । कहे
रससिधु फेर केला अमरूद सेव केवडा अनार
लौबी देखी एक तन्त की । वैठे तहाँ राधा
स्याम दोज अनुराग-भरे पीत पोखरान भी

( २४३ )
॥
सोभा सरसन्त की। श्राम कचनार टेसू सरसो
बसन्त फूल लाल गुललाला फुलवारी है व०॥
सारी है बसन्ती रंग चम्पक सौ अङ्ग धाम
करत सिँगार वाट देखत है कन्त की। कहै र.
ससिधु गरे पौत-पोखराज हार माला इ वमन्त
फूल धरे इकतन्त को॥ एते बौच आये स्याम
पेख के लुभाये नैन मैनभरे घूमे दोऊ बात है
इकन्त की । पाखें सेत सेवती सी डोरे है गु-
लाला लाल अतसौ सौ कोको फुलवारी है.॥
बाबू रामस वर्मा सम्पादक भारतजोवन काशी।
कोकिल को कूक विन कोयल सुनौगे लाल
होहुगे निहाल देदि वैठक ड्रकन्त की। विम्ब
में अनारदाने लरिख के प्रसन्न हो लोट हो
लता देखि मदन महन्त कौ ॥ इक अरविन्द मे
विराज
जुग
वारिज विलोकितै विकै हो छवि
भौर रसवन्त की । चलौ बलवीर तुमैं कौतुक
दिखाऊ कैसौ सुन्दर सुधारी फुलवारी है.॥

( २४६ । वायू सीतल अ- मे अरुन कौधौं लूक लौ लगे है नन्त की । बरि जरि नैहै बाल लाल बिरहागिन ते उत मति जारौ फुलवारी है ब० ॥ पं. केदारनाथ जी बनारस । आयो ऋतुराज महराज सैन साजि आहे कोकिल कुहकनि नकोब बिरतन्त कौ । ठौर २ झुण्ड र गुंजरत भौंर भौर सुभट केदारनाथ क- लरी अनन्त को॥ दाडिम गुलाबन मैं आब अ. धिकाई पुंज पातन में लालिमा अपार सरसन्त कौ । पौत रंग सुमन सुहात सरसोन केर उपमा भनूप फुलवारी है बसन्त की। ऐसो कौन देव जामु मन ना लुभानो देखि पारासर नारदादि जोगडू नसन्त की । बानी पति गौरव गंभौर जाको धाता कहैं ज्ञान सिंधु वासी कइलास उमाकन्त को । च्यवन विहाय तप भोग भरमाद रहे स्याम बनबाम संग को- तुक अनन्त को । मदन मलिन्ट अरविन्द अनु- राग बाग बारी कल क्यारी फुल ० ॥

( २४० ) ताप वा. माधोदास जी- काशी। मौजदार मालती के महल महान मध्य मौलसिरी मालन को माल मिलन्त को। म- ण्डली मरालन की मत्त भई लोलें तहा मधुपन श्रेनी सुखसैनौ है सिमन्त की ॥ माधव के मास माह माधुरी लता मे वैठि मन्द मन्द माल कोस गावें रति कन्त की । मिलि के मयत मुखौ मा- धव जू मौन करै क्यारिन मे फूली फुलवारी० ॥ आवतहीं टूर करै सवै तरुनी को होय मे हजार होस वाढै रति कन्त कौ । रूप-भरी रस-भरी सौरभ समूह भगै अङ्गन मे रङ्ग २ सोभा सरसन्त को ॥ माधव की माधुरी वखानू कहा अरी वीर भौर है अलोगन को सुखमा लसन्त की। ऐसो तो हमारे नान कन्तही लसन्त श्रा- लौ नहि नहि प्यारो फुलवारी है. ॥ कवि पं. गोपीनाथ जो काशी। सूरजमुखी मी नुही जोहै हजचन्दमुख कुन्द- कलौ दन्त दुति पाई है दिगन्त की । धम्पक- । ( २४८ ) बरन चार कंजन से राजे नैन नाहिर है घेरे भौर अलि अनगन्त की ॥ गोपीनाथ श्रीफल से कठिन कठोर कुच-कंचुको कसी है तापै अद्भुत लसन्त की। स्याम बाम भाग मे बिराने प्रान. प्यारी इमि मेरी जान फूली फुल० ॥ पं. बचचौबे उपनाम रसीले कवि - काशो। कूकि कूकि वो लिया कसाइन कलेजो कोचें दरद बिचारे कछु काह के न अन्त की । कहत रसौले भुजि डारत मधुप पुंज [नि के अवाई जानि मदन महन्त की॥ तैसो डोलि विविधि समोर थहराये देत कैसे हम हाय धीर धारें बिनु कन्त को । चेत कै चेताय दीजो ऊधो मन भावन सो अब ना सोहाति फुलवारी है. ॥ बाबू हरिशंकरप्रसाद जी - बनारस । देह सोनजुही सौ चकोर ऐसे नैन राजै न नरि मदनवान सुखमा लसन्त की । मोरनी न- चत नध नाक कौर मुख कंज तिल है मधुप फसे फसनि अनन्त कौ ॥ दोऊ कुच श्रीफल हैं

( २४६ )
नाभी अथाह कूप सौंह हरिशङ्कर पै कहौं बात
अन्त को। सुनिये विहारौ नेती नारी बनवारी
तामे मेरी प्रानप्यारी फुलवारी है.॥
बूंघट नमक सोई हय की ठमक जानो मो-
तियाकली सी सोभा लसै पाति दन्त की । अंग
राग भूरि जो पराग सो उड़त तासों परि नम
रही धूरि महक अनन्त की ॥ भने हरिशङ्कर
कढ़ी जो घर बाहर को तौनि भ्रम वाग सज्यो
कदम चलन्त कौ। कैयौं स्याम प्यारी कैधौं रति
की सवारी कैधौं छाई छवि भारी फुल० ॥
कवि प. अम्बाशकर जी-काशो ।
चंपक दुति देखि बुति जाति केतिकी की
दुति पल्लव ललाई नवपल्लव कसन्त कौ। विजन
करै
कुन्दन
को सारी छवि
कुसुम वसुंभ के खसन्त की । कोकिल अलाप
सों अलाप कोकिला को हरै हुमत झरे है जुही
जूही के हसन्त की। सकर सुकवि कहों कहत
बनै ना कळू प्यारौ कन्त कीधौं फुलवारी० ॥
की पाती कुन्द कुन्द

( २५० ) ॥ काशीनिवासी जचन्द नो बमभीय ग्रीषम सौ भामा श्री कुमारिका को नगें नोति स्थामा रविना मैं दुति पावस दुरन्त को । च- न्द्रावली इन्दु लेख कांति सुभ सारद सौ ललिता बिसाखा माहिं सुखमा हिमन्त कौ ॥ चंपक सौ चंपलतिका की उनियारी माहिँ छाई है अनूप छवि सिसिर सिमन्त की। कोटि कामरूप ब्र. नचन्द जू के सग नित्य भानु को दुलारौ फु० ॥ अमल कमल सौ प्रफुल्लित निहारि मौन- मनको बिचारि कै सवारी रतिकन्त की । मोहि माति सोखि ताइ करिकै अचेत सबै सकल दि गन्तनि लौं विनय अनन्त को ॥ मंजुल मिन्निन्द मत्त मधुर मरन्द छाकि खंजन चकोर मृग सु- खमा सुतन्त की । प्यारे ब्रजचन्द की पियारी वृषभानवारी अंखिया तिहारी फु० ॥ विविधि समोर वातसल्य सख्य दास्य भाव ललित लता हैं भक्ति भावुक अनन्त की। झो- रनि झपनि भौर भौंरनि रसिक रीति कूक ( २५१ ) कोकिला को हत्ति कवित कहन्त कौ ॥ रति के सहित रतिकन्त की अनप कौति प्रौति ब्रजचंद दोज रसिक इकन्त की । वालकृष्णलालकृत कासी कविता की सभा रामकृष्ण जू को फुल- वारी है वसन्त की॥ यो ठाः महेखरवक्स सिंह जी तालुकेदार-रामपुर मथुरा। कूजि रहे कानन मे विपुल विहंग वर भौंर गुंजरत पाय सौरभ सुतन्त की । डोले लगौ ल- तिका लवंगन की लोनी लोनी विविधि समीर साज सुखमा दूकन्त की ॥ ऐसे मे मुदित महा मन मैं महेश्वर जू वाल अभिसार करें प्रीति भारी कन्त की। तनि मान प्यारौ वनवारी सों मिलत क्यों न कैसौ लखु फूली फुल० ॥ पंकज चरन चारु रम्भ खम्म जानु युग लंक लचकौली मृगराजकटि तन्त की। वदर सरोवर सोहाय मान सौरभित ललित लता सौ रोम राजिका लसन्त को॥ प्रफुलित कुमुद से कुच है महेश्वर न इन्दुमुख हरत अध्यारो है दिमत्त ( २५४ ) किला कौ माती निज तन्त की । मोहनि क- मान तान मान करि बैठी कहा देतो गल बाहो कमलापति सुकन्त को । बारी बैसवारी कही मान लै हमारी चलि देखिये तहा री फुल ४ ॥ दासापुरनिवासी पं० वलदेव कवि सीतापुर। कमल पै कंचन कदलि जुग जोयो सिंह ताप सरि हमलतिका मै बिरमन्त की। ताके सिर सिखर युगल हिज बलदेव कम्बु पै रसाल बिम्ब कुन्दिका लसन्त कौ ॥ ता अध सनाल जन्न जात जुग जोहियत क्यारौं प्यारी न्यारी ब- नवारी हित तन्त की। चन्द मे कमल कौर धर्नु अहि बिद्यमान रति संतवारी फुल० ॥ कमल कली से कुंच सौरभ सनेह सने संकुल सुमन सोम मुखमा इकल कौं। पंकन से नैन बैन कोपिला से वलदेव ऐन सुखदाई सैन मैन सर तन्त कौ ॥ चन्द सम भानन वसन वेस चौ. दनी से सोनजुही गात कलौकुन्द टुति दन्त की। क्वारी वैसही मे सुपवारी सर्व बारी हरि भौर राधे वारी फुलवारी है. ॥

( २५५ ) बाबू शिवपाल रिह'-भिनंगा । दाडिम रसाल चम्प श्रीफल नपा प्रसून ल- सत वसन्ती सारी हिय हुलसन्त कौ। नारंगी गुलाबकलौ कंन कदली सपत्र सोहत सिँगार बेलि पालौ रति कन्त की ॥ मूगफली पल्लव सु- बिम्ब तिल फूल भलो सिव कवि भनत सुबात विलसन्त की। मालिनी सुमनवारी कैधौं सुकु. मारी नारी कैधौं मनहारी फुलवारी०॥ पटनानिवासी बाबू पत्तनलाल जी । पीतपट साजे स्याम मारी पीत स्यामा सजी कहा कहौं सोभा प्यारी पीत सरसन्त की। पीत पट ग्वालन को गोपिन को पीत'सागै पौत विलसन्त सोभा दसह दिगन्त को ॥ पौत सेज पौत भौन पौत हार पौत हार दसैक की पौत सोमा पौत दरसन्त की। वेलि पौत द्रुम पौत पात पीत फूल पौत पौतमयी आजु फुल० ॥ अन्त भो हिमन्त को अनों ना घर आये कन्त व्यर्घ दरसन्त सोमा दसह दिगन्त की । पेखि ( २५८ ) ला. मारकण्डेलाल उपनाम चिरजीवी कवि कोपागंज । दोनो कुल कानि को बिराजति दिवारें जामें फाटक सुप्रेम औ किवारी निज तन्त की। बि. टप अनेक हाव भाव के वसत नामैं लतिका सनेह सौल साधिका दिगन्त को ॥ कवि चिर. जीव नामैं नोबन जलूस छायो सुखमा सुगन्ध सुग्वदाई रतिकन्त की । चलिये कन्हाई लोढ़ि चीजे मन भाई वह प्यारी गुनवारी फुल० ॥ जामैं नपा जूहिन को जुगपल विराजै छटा बेला चमेलिन के महिमा हसन्त की। गु- लाला गुलाब गुलतोर्रा गुलमेहदीहू गेंदा श्री गुलाची जहा फूलत दिगन्त को ॥ कवि चिर- जीव सिद्ध पृष्ट ब्रज भूतल मैं कामना दिवैया सारे सन्त श्री असन्त की। आइये कन्हाई कछु कौनिये कृपा की कोर कैसी ये अनोखी फु० ॥

( २५६ ) रे बषभान की दुलारी में। काशीनिवासी श्री १.५ कृष्णलाला जी महाराज उपनाम रससिंधु। गावत है गारी खरी प्यारी ब्रजनारी संग यही निरधारी फाग खलों गिरधारी में। कहै रससिंधु धरे अविर गुलाल रंग चोवा और च- न्दनहुं रवि को उजारी मैं ॥ प्यारे कृष्ण लाल वहाँ नेह को निसान रोप्यो स्याम को जु ल्याई धर मैन फुलवारी मैं । सारी पहिगय चोली घाघरो धराय आज कृष्ण को नचाऊँवषभान की। आज बरसान चली सॉकरी जु खोर तहाँ दूध दधि माखन ले गोपौझुण्ड भारी मैं । कहै रससिंधु स्याम दौर के जो रोकी सखी चलिवे को बाट नाहिं खूबही विचारी मैं ॥ लाठी के सु मारत ही दधि को मटूको फोरी दूध की वो छोट उड़ी लेत वलिहारी में । नन्दगाम आवें तव दान तोजो नन्दलाल दान नहीं द्यों नू अषभान की दुलारी में ॥ ॥

( २६० ) बाबू गमष्ण बर्मा सम्पादक भारतजोवन काशी। ठसक न वाकी पर जैये बलबीर वह रावर प्रेम में बिलीको मतवारी मैं। विरह बिथा सों परी तरफत आठो नाम तुमतें गुमान नेक त- जत न हारी मैं ॥ सुख दुख आपने हिये की कहि देत मोसों तुम सों तनौये रहै कोटिक निवारी में । मोतें कही चेरी हम कान्ह को सदा हैं पर कहन कही है वषभान को० ॥ पान हौं गईही नन्दगांव दधि लै के भोर निररिख सकानौ या अनोखौ हरहारी मैं । रंग- भरे गागर लुढ़ावत उमंगभरे कोन मैं लुकानी भरी देखि पिचकारी मैं ॥ अविर गुलाल जो पै डार दई डार दई कैसे कै सहोंगी वीर लाज- भरौ गारौ मैं । भूलें मत नन्द जसुदा दोनो कान्ह कौरतिकुमारी वृषभान० ॥ महामहोपाध्याय श्रीयुत पगिडत सुधाकर जी द्विवेदी खजुरो-बनारस। लाड़िली को बनक बनाइ बैठे लाल हाल लाड़िली कन्हैया वनि वैठौ चित्रसारी मैं। क- पै कह ( २६१ ) रत कलोल मिलि चूमत कपोल सुख लूटत अ- मोल दोऊ लोल बारी बारी मैं ॥ आरसी में बनक विलोकि भ्रम छाय गयो मन में समाय गयो धाय नारी नारी मैं । नन्द को दुलारो मैं ही राधा कहै बार बार कान्हा कहैं आली वृष- भान को दुलारी मैं ॥ कायोनिवासी पण्डित विज बेनी कवि । ठाढी रही परम निसंक अडी याही ठौर सामना करौंगी वढि गोन के अगागै मैं । आ- वन दे फगुआ धमार वीर गावन दे मारि कुम- कुमा सों करेंगी धुन्ध भारी मै ॥ वेनी हिज अवहों विधोरि गोल ग्वान्लन को भपटि धरौंगी धाय गहि गिरधारी मैं । नर ते बनाय नारी तारी दै नचैहौं नाच वाकुडौ कडी हौं बष० ॥ जाके लरिडवे को लाल पौरि पै परेई रहो होत ते निहाल टुक रुख ते निहारी मैं । नाहि नाचि गाय के रिमाय लेत हाहा खाय रुसिके कहूं जो नेक बैठौं जाय चारौ मैं ॥ सोई कान्ह ૧૨ ( २६२ ) मान कूबरी को लियो वाही भाँति हाय निर. दई ऐसी कौन चूक पारी मैं। माधव भए जो बेनी हिज है हमारे और अधव वही हौं छष.॥ वस्य हौं न देव औ अदेव जक्ष किन्नर के फैसिगो तुही सौ तोहि जबते निहारी मैं। बेनी हिज बस्य हौं न गोपी गोप गादून के करत स दाही हौं तिहारी इन्तिजारी मैं ॥ तेरे बिन देख नेक मन ना धरत धौर फिरत अधीर हौं कहाय गिरधारौ मैं । मेरो प्रानप्यारी रि जीवन ह- मारी एक बस्य हौं तिहारी वृषभान को० ॥ काशोनिवासी पं. केदारनाथजी। गोपन के टोटन लै जोटन खरे है ओट खोट खोट बातें कही कुंज को अँधारौ मैं । म कम भरन भुज भेटन केदार चही चूमन कपोल अनमोल बटपारी में ठाढ़े रही दूर ना तो मा रिहौं गुचों को मार छोनि लैहौं कामरो छदाम रौ तुमारी में । छुटि जैहै तेरो लॅगराई जदुराई धानि कोरतिकुमारी वृषभान को० ॥

. ( २६३ ) छवीले कबि बनारस। रूप रचिवे मे जाहि सुधि विसगय विधि अचल अगाध बुधि विमल विचारी मैं । सुकवि छवीले छवि काम कामिनी को पस्यो मन्द कंज कोमलता पगन हमारी में ॥ जगत लटू है म- टुकीरति वगाखो करें वेद बरनै है करौं सपथ तिहारी मैं। मान नौतिवे को मन कान्ह जी- तिवे को ससि भान नीति को वष० ॥ दा. माधोदास जी. काशी। दम्पति विहार करें एकही भिंगार धार ए- कही किनारौ लगी एक रंग सारी में । माधव जू मारग मे ललिता मिली है आय धाय गहि लीनी लखि चातुरौ तिहारौ मैं ॥ गोरी गरवौली गाम कौन को न देखी कहूं वास नन्दगाँव बड़े गोप की कुमारी मैं । साबरी सलोनौ लोनी कौन की किसोरी वीर पाली ना पिछानी ॥ कवि पं. गोपीनाथ मोकाशी। नाही के फिराक मे विहाल लाल डोलति

( २६६ )
हुसियारी मैं । बनिता बनाइहौं बिचित्र ब्रज
चन्द जू कौं वृन्दाबनवारी वषभान० ॥
मुनिमनहारी देह खेदित सुगन्धवारी आई
रतनारी अलसोही निरधारी मैं। सोचिये सको.
चिये न जनसुखकारी स्याम कबहूं न चूक ब्रज.
चन्द जू निहारी में । खोइ निसि सारी मरजाद
सब धोडू डारी आये प्रात देखि छवि तपति नि-
वारी में । गोपनि जुठारी सबै गोप की कुमारी
कहां उत्तमा तिहारी वृषभान० ॥
महाराजकुमार श्री गुरुप्रसादसिंह जी-गिहीर ।
मझत न मग सूधी परत न पग हाय तड़पि
तड़पि रैन दिवस गुजारौ मैं। भूली सुधि लकुट
मटुक वनमा नहूं की बंसो बसोबट पीतपट हूं
विसारौ मैं ॥ सल सो लगत खान पान ग्वाल
बाल संग सांची ही कहत करि सपथ तिहारी
। चाल मतवारी मन्द हंसनि चितौनवारी
नव से निहारी बषभान को दु० ॥
मैं

( २६० )
यो ठाः भेडेखरबक्स सिंह जो तालु केदार-रामपुर मथुरा ।
टौलौ ढोली नजरि लजीली अँखियान लख्यो
मन्दहास सोभित बदन ससि सारौ मैं । डारो
हरि ता क्षण सों लकुट मकुट कहीं मुरली: न
वाजत भी है भाव भारी मैं ॥ अगि काह है
श्रीमहेश्वरसहाय करे निपटि निकेत के नध्यो
है नेह नारी मैं । भूलौ सव आन मनमोहन को
मोहन यौं लागो मन मोहि दृष० ॥
कौनो तप साधन के आप गति जान जग
कौनौ कारि तीरथ फिरत नित कारौ मैं। कौनो
रचि ग्रन्थ न को धापन उवार देखै कौनो पदि
ग्रन्थ गति जानै हुसियारी मैं " कौनौ कछु मंत्र
यन्त तन्त्र टोटकादि लागे कौनौ व्रत पूजन को
देव धरि थारी मैं । मेरो मन मोदि के महेश्वर
चरन लाग्यो कोमल कमल वृषभान० ॥
श्री नवनीति कवि-मथुरा।
मागत सही का कहा दान इतरान भरे वी-
लम न सूधे बात करत मरोरी मैं। नवनीत प्यारे
-

५ ( २७० ) गति गनराजन को गौरव गहत जात स- कुच सिखापन मिखाय करि हारी मैं। सानै ना सनेह यों बखानै हरि आगमन जानै ना बिभेद जीन गावै गीत गारौ मैं। उनताई पाई और नेसुक उरोजन मे छौनताई कटि त्यो नितम्ब भाति भारी मैं । द्विज बलदेव दिन दूनी दुति होन लाग्री दोसै ना दुराव बष० ॥ महाराजकुमार श्री गौरीप्रसादसिंह जी गिडोर । नाय नन्दगाँव धूम फाग को रचौंगी आज कसक मिटेही हिये यह प्रन धारी में। झोरिन अवीर भरि धुंधर मचैहौं महा रंग भरि मारिहौं उमगि पिचकारी मैं ॥ मेलिहौं गुलाल लाल छाखिन से बरबस गाफिल के लैही गहि तव गुनवारी मैं । आजु जौं न लाऊ बाधि नन्द को दुलारो सखी तेरी सौंह तौ न वृषभान की० ॥ पीतपट काछनी मुकुट मोर चन्द्रिका को सौस आप लीजै धरौं नौलपट सारी में। गुंज- मान्त आप उर धारिये संवारि प्यारी लैहों उर ।

( २७१ ) पापनो सुकंचुको तिहारी मैं ॥ लोजै रतिहूं में सुख लूटि बिपरीत रति रौति यह ठानिये भ- नौत ना विचारौ मैं। पाइये निकुंज पाप नन्द को दुलारो पनि पाऊँ वनि आज बष० ॥ माझानिवासी पं: अच्युतानन्द जी द्विवेदी। नारि नेह तरु को विसारि कौल वातन की गातन लखात घात कोन्ही कुंज भारौ मैं। हारि हेरि हाय हाय करत हजार बार कुंज पार तो लौं ऐसी भई दुखवारी मैं ॥ अच्युत न पायो तो अच्युत अनोखे लाल प्रच्युत इवाल गति वावरी गवारी मैं | काई लागि घेरों उन्हें फेरो बार बार भटू देत काहे गारी वृषमान गयानिवासी पं. गिरधारीलाल नी गयावाल बीन ते मधुरबैनौ सुन्दर सरोजनैनी महा सुखदैनौ ऐसो दूनो ना निहारी में । क है गिर- धारीलाल चाल है मरालवारौ गुन को अगारी जैमो नाहों दिसि चारौ मैं॥ लङ्ग अति खोन चंचलाई के विहीन चारु वैस की नवीन उप- ." -

( २७२ )
मान ढूंढि हारी मैं। करौं का बखान ससि भान
में नहीं है कान्ह जैसी है छटान दृष.।
जवहीं ते छोड़ि पाये आपनी भवन मौत
तबही ते दिना रैन रहत दुखारी में । कहे
गिरधारीलाल खटकत है बार बार कियो जोन
केलि रविनन्दनी-किनारी मैं ॥ भूलती ना बन
छिन ये कहूं कबहुं मोते साँची कहौं तोसे करि
सौहनि तिहारी मैं । ऊधव सुजान जज आये
देश भान तऊ बस मम प्रान वृष. ॥
बाबू शिवपालरिह - भिनगा।
हय गज मृग फणि डोलत मुदित मन दा-
डिम रसाल चम्प नारंगी पत्यारी में । कीर
कोकोकिल कपोत कलरव करें सिव कवि
सर कंज विम्ब को कियारी में ॥ कदली जपा
प्रसून मूगफली वैलि भली भाँति २ छवि छाजे
गति न्यारौ २ में | विपिनि-विहारी ऐसे विपि-
निहि नाहु ननि ये सब लखाऊँ वृष० ॥

( २७३ )
श्रीठाकुर राधाचरनप्रसाद साहब लागीरदार-पहरा।
एरौ सुन हाल हनवाल नन्दलाल सू के नये
रंग ढंग स्यात कौतुकं निहारी में । देखतहीं
भये हैं निहाल नेह जाल फैदे चित्र के लिखे से
रह गये चित्रसारौ मैं ॥ राधिकाप्रसाद खान
पान गान तान ध्यान जानई विसारी समुझाय
धाय हारी मैं। उनको मन छाको वृजचन्द्रलाल
मोहन मेमोहन मन छाको वृषभान ॥
श्री चन्दकला बाई-बूंदी।
जावक रजोगुन है पद जलनात चारु नख
ससि भान उरु करी कर चारी मैं । कुच सिष
सैल ग्रीवा विष्णु शङ्क दन्त हीरा हास्य नोन्ह
मानी वीना मीननैनवारी मैं ॥ चन्दशला भृकुटी
मनोज धनु मुखचन्द वर पद भूषन
को
सुखमा
निहारी मैं । वेग चलि देखी ब्रजचन्द तिलो.
कन की सारी छवि छाई वृषः ॥
कानपुरनिवासी पं० ललितप्रसाद जी विवेदी।
मलयन राग मै गुराई की सुछिति छाई

( २७४ ) होरन के हारन के भार न सभारी में। मालती के भूषन ललित अंग अंग राजी सानी जरतारी को किनारीवारी सारी मैं ॥ हरे ना मिलति झिलमिलति सुदीठि ऐसी कैसी भ्रमि गई मुख- चन्द की उज्यारी है। हरिये ती आपही बिहारी नू तिहारी को सौ इहाँ लगि लाई वृषभान को दुलारी मैं ॥ जानि परै दोन्ही विधि वाही को सकेलि सब रुप अधिकारी कहों कहा जो बिहारी मैं। ललित समारौ नखसिख टुतिवारी लखि भूलति चकोर मुखचन्द उनियारी मैं । दौठि चकचौंधि नाति जोति को नमाति ऐसी दामिनि सौ द- मकि उठति नील सारी मैं । कौन नग नारी कमला सौ विमला सौ वारी आजु लखि पाई हषभान की दुलारी में ॥ भौर लै अहीरन की तौर मति ऐये कान्ह मोद करि राखो है धमारिन की गारौ मैं । भूलि नेहै सब अठिलाइवो विहारी यह धाडूवो भरे

( २०५ )
हो जोन रंग पिचकारी मैं ॥ ललित खलारी
हो तो खेलिये सखान साथ जीन ग डारी
तौन हों न बजनारी मैं । मोदि कारी कामरी
को सारी नरतारी रंगौ जानति न मोहि हष
भान की दुलारौ मैं ॥
कोपागंज निवासो मारकंडेलाल सपनाम चिरजीव कवि ।
कहा कह प्यारी निज भाग्य को खुधारी
जामें वीतौ वैस सारी रोज रोज इन्तजागे में।
नासो रहे पहन इमेस वने प्यारे तामों भये अव
चम्पा अनुकम्पा छाड़ि भारी मैं तब ते न ने.
कह दिखात चिरजीव कहै प्रीति-प्रेमपन्थवारी
कान्ह सुकुमारी मैं । जब सो लुभाने कान्इ चु
वक स्तों लोह मान कौरतिकुमारी बष ॥
करि के चकोर सवही के चल चंचल को
अंचल उमेठि के अभोली लाज भारी मैं । दक्ष
करि सबको सरीर निन वानक सों वाहन स.
मेटि पट प्रीतम तयारी में ॥ सोरहो सिंगार
करि बैठी कुंज भौन राधे रमा चिरजीवी नाके
H

( २७६ )
भई बलिहारी मैं। मानो तीनो लोक को अं-
नोखी सुखमा अपार पानि कै बसौ है वृषभान
को दुलारी में ॥
भई अति त्रस्त नापै अबला नभस्त सारी
ढापि निन मुख हस्त गस्त खाय भारी में। रयो
नहि कान्ह फेरि ध्वस्त करिबे को कस्त परौं ना
अधस्त कहूं आपने अटारी मैं ॥ कवि चिरजीव
आज लाड़िली कढ़त नेक अस्त व्यस्त भयो तीनो
लोक छवि भारी में । पस्त करि मानो उदै अस्त
की समस्त सोभा भई है प्रसस्त हषभान की
दुलारी मैं ॥
॥

किस कवि की कविता किस एष्ठ में है
उसकी सूची।
-
।
प० अच्युतानन्दनो-२५२, २७१,
प० अम्बाशकर नी काशी-४, १४, २५, २८, ३८, ४८,
५८,८०८८, १०४, १४२, १५५, १६७, २११, २३०,
२४६. २६४
पं. अविकादत्तव्यास-२, २४, ३०, ५७,'
प. अयोध्यानाथजी (अवधेश ) १३८ ।
पं. अयोध्याप्रसाद (श्याम)-४१,६८।
बा. अयोध्यासिंह (हरिपौध )-४५, ५३, ६३, ७०, ७८,
-
22.१०८, ११०, १२०, १३०, १४७, १५८ १९४,
१२०,२०६।
श्री १०५ कृष्णलालाजी महाराज-१, ११, ११, १८, २५,
४६, ५५, ६५, ७,७६,८६,६५, १०३, १११, ११९,
१२८, १३, १४, १६, १७, १९३, २००,२२५॥
२४२।
श्री गोस्वामीकिशोरीलालजी (भारा)-१६२, १७१, १९१,
२०६, २२, १३८ ।

( १ )
पं० केदारनाथजी-३, १३, ३१, ३८, ४९, ५६, ६७, ६
८९,८४,८६.१०५, ११३, १२०, १३१, १४२, १५
१७०, १८२, १९७, २१४, २३२, २४६, २५६, १६२
श्रीगिरधारीलाल जी शर्मा-८, १६, २७, ३३, ४१, ५
६२.६८,०४, २१८, २४०, २५६, २० ।
श्रीसहाराज कुमारगुरुप्रसादसिंह --५८, १२४, १३४, १५
१८५, २०३, २६६ ।
पं. गोपीनाथजी-2७, १०५, १२८, १४०, १५२, १०
१८४, २११, १२८, २४०, २६३ ।
श्रीगोविन्द गीला भाई जी -८, १९, ३५, ४५, ५४, ६
००, ७०, ८५,८४, १०२, ११,११५ १३८, १४
१५, १७४, १८८, २४२, २५० ।
महाराजकुमार श्रीगौरीप्रसादसिंहनी-८, १५, २६, ३
४३, ५, ६, ८३, १९३, १३४,१४४, १६, १८॥
२३४,२७०।
पं० घनश्याम कवि काकरौली, १३८, १४०।
श्रीचन्दकलावाई बूंदी-११, १८, २८, ८५, ९३, १०
११०, ११०, १२६, १३६, १४६, १६, १७५, १८
२०१, २२४० २४१, २५७, २७३ ।
श्रीछबूलालजी (रसिक नवीन)-८, ११३, १२०, १३
१५२, १६६, १७६, १८९।

( ३ )
वीले कवि--२१, ११२, १४३, १५४, १६८, १०, २००
२१५, २२८, २४५,२६३ ।
बाबू जगन्नाथप साद वी० ए० (रत्नाकर कवि) १५०, १०१।
वाबू जुगुलकिशोरजी (हनराज )-६, १६, २६, ३४, ४४
५०.६०,६९, ११६, १२, १३, १४६, १६२, १७२,
१८८२.५, २१०,२३७॥
पं. डिजवेनी कवि जी १०, १२, २२, 88. ८१, ८८, ८०
१०६.११४.१०१, १२, १४१, १५३, १६, १८१,
१८८२१२, २१४, २६१ ।
योनवनीति कवि-२६७ ।
वाबू पत्तनलालजी है, १७.२५,३२, ४२, ५०,६१,६८,
७६.८४,८९, १००, १०८, ११५, १२, १६, १७३.
१८८.४, २२२ २३५.२५५, २६८ ।
पं. वचऊ चौवे { रसोले कवि )-१५३, १४७, १८६, २१३
०२८.२४८, २६४।
पं. वलटेवप्रसाद, २२३, २३६. २५४, २१४ ।
श्रीजचन्टजी बलभीय ~५, १५, ३०, ४०, ४८, ५८, ६७
७३, ८३,६०,९८,१५६, १७, १८, १९७, २१६,
२२,२५०, २६५
था. भगवतीचरणनी-७, ०५ ।
प. सदनमोहन पाठक-21
-

(४) मनमोहन कबि-१२३, २०२ । बाबू मन्नूलालनी-८२, ८०, ८६, १०४, १३०, १५५, १६८, १८०,१९५ । ठांकुर महेश्वरबख्रशसिह - २५१, २६७ । बाबू माधवदास-२, १३, २४, ३०, ३६,६६, ८१,८०, १.६, ११४, १२२, १३, १४, १५१, १६८, १८४, १८५, २१३, २२०, २४७,२६३ । लाला मारकण्डेलाल - ३१,४०,८४,९२.९६, १०८, १३४, १४५, १५६, १७१, १८७, २०३, २१८, २५८, २७५ । प. रघुनाथ कवि ~८१ । ठाकुर राधाचरणप्रसाद-१९२, २१८, २७३ । बाबू राममणवम्मा-१, १२, २२, ४०, ५५, ६५, ०२, ७२, ८७, १०६, ११२, १२०, १२८, १३८, १४६. १६४, १०६, १९४, २.८, २२०, २४१, २२० । पण्डित रामदयालजी-२१० । महाराज सर रावणेश्वरसिंह बहादुर KCI : गिहार- १२३. १५६ १८४, २०५। कविराज लछिरामजी-१४४ । पण्डित ललिताप्रसादनी त्रिवेदी-१०, २०, २७, ३६, ४४, ५३, ५६,०१, २२, २३९, १५२, २०६ । पण्डित लक्ष्मीनारायणजी-२२२, २३६, २५३ ।

( ५ )
पहित सालिग्रामजो~६३, ६२. १.७, ११६, १२७ ।
वा शिवनन्दनमहायजो~१८, ३४, ४२, ५२, ६१, ६८ ।
बाबू शिवपालसिंहजी १८६, २०२, २५५, २७२ ।
पं. सिह कवि (कामो) - २१४।
पति सीतारामजी - २२४ २३४ ।
महामहोपाध्याय पण्डित सुधाकर द्विवेदीजो -११०, १९०,
२४४, २६.।
माला हनुमानप्रसादजी (लखनऊ)-१३६, १४६ ।
पगिड़त हनुमानप्रसादजी ( अयोध्या )।
वायू हरिशहरप्रसादनी-५, १४, २३, ३०, ३६, ५८, ६६,
७३, १३, १४, १५, १६, १८, १२६, २.८,
२२६, २४८, २६६ ।
।

सूचना।
भारतरत्न साहित्याचार्य पं. अम्बिकादत्त
व्यास जी की पूर्ति “मलिन्द मतवार से" पर
पृष्ट ५७ में छपी है परन्तु उसमें छापे की गलती
से पद छूट गया है इसलिये उसे यहां पुनः शुद्ध
कर प्रकाश करते हैं।
"नैन कमललखि उमँग भरेसे । भृकुटि व्या-
नजनु पाँति करे से ॥ फरफरात पुनि ठठकार से।
सोहत मलिन्द मतवारे से॥"

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Samsyapurti Bhag Ii

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Title
Samsyapurti Bhag Ii
File name
Samsyapurti Bhag Ii
Text
OCR done
Citation
1896
Published
2010/10
Publisher
Xxxx
Language
Sanskrit
Pages
224
Library
Bhartiya Vidya Mandir Shoudh Pratisthan,bikaner
DLI number
326287
Barcode
99999990002232.00
Scanning centre
Banasthali University
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