Svclrc
Katopanishad Bashyam
Front matter
श्री
1.
[©त्र
प्राप्ति
...
।
सुधीर कुमार चतुर्वे
आमुख - ठोपनिषद् कृष्ण यजुर्वेदीय कठशाखाके अन्तर्गत एक महत्वपूर्ण उपनिषद् है। इसमें गय हैं, प्रत्येक अध्यायमैं ३-३ वल्लियाँ हैं, इसमें यमराज और नचिकेताके संवाद ब्रह्मविद्याका विशदवर्णन है, इसकी वर्णनशैली अतिसुबोध एवं सरल है विद्गोतामें भी इसके कई मन्त्रीका कहीं शब्दत: और कहीं अर्थत: उल्लेख है न्य उपनिषदोंकी भाँति जहाँ तत्त्वज्ञानका गम्भीर विवेचन है वहाँ नचिकेताक ठकों के सामने एक अनुपम आदर्श भी उपस्थित करता है। जब वे देखते हैं कि देनेके अयोग्य गौए ऋत्विजौंको दक्षिणाख्पसे दे रहे हैं, तब पितृभक्त नचिकेता पाप करनेसे रोकने के लिए उसके समीप जाकर कहा-'तत कस्मै मां दास्यसि पर पुनः पुनः पूछनेपर वाजश्रवसने क्रुद्ध हो 'यमाय त्वां दास्यामि' ऐसा कहा 'चिकेताने पिताके द्वारा क्रोधवश कहे वचनकी उपेक्षा न कर उसका अक्षरश केया। वर्तमान युगमैं प्रायः लोगोंकी इसप्रकारके अनभिप्रेत एवं अनर्गल कथनक रखनेके लिए इतना सरदर्द मोललेना केवल पागलपन ही जान पड़ेगा किन्तु उन रहस्य समझनेके लिए कुछ गम्भीर विचारकी आवश्यकता है। योगदर्शन के साधनपाद , सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह' इन पाँच यमौका नाम निर्देशकर फि 'जातिदेशकालसमयानवच्छिन्नाः सार्वभौमा महाव्रतम्' ( यो० २।३१ ) 'जाति 'ल और कर्तव्यानुरोधकी अपेक्षा न कर इनका सर्वथा पालन करना महाव्रत है' तथ दिकी अपेक्षासे पालन करना अल्पव्रत है। इस अल्पव्रजमैं ही सुविधा आदिक महाव्रतमें नहीं। महाव्रतपालन करनेसे ही अभीष्ट सिद्धि प्राप्त होती है [का यमलोक गमन केवल उन्हीं के लिए नहीं, प्रत्युत उनके पिता और सा लिए हितकर हुआ। लोक पहुँचकर नचिकेताने सत्यनिष्ठाका परिचय दिया इसपर यमराजने तीन व तिथि सत्कारका महत्त्व प्रकट किया, अतिथिकी उपेक्षा करनेसे जो हानि होती है कठ० १ । १ । ७-८ ) स्पष्टरूपसे बतलायी गयी है। नचिकेताने तीन वरों में रसे पितृपरितोष, दूसरेसे स्वर्गका साधन अग्निविद्या-यज्ञज्ञान और तृतीयसे प्रात्म . - नुसार छन्दतः प्रार्थयस्व' (कठ० १।१-२३-२५)इत्यादि प्रलोभन दिया, किन्तु नचिकेत मर्त्यस्य' इत्यादिसे अनात्मपदार्थों मैं दोषदर्शन दिखाकर साधनचतुष्टयसम्पन्न प्रात्मा कापना परिचय दिया। इस प्रकार जब यसराजने अनुभव किया कि वे लौकिक एवं भोगों से सर्वथा उदासीन हैं, उसमें मुमुक्षारूपी अग्नि तेजीसे धधक रही है तो शान्तिके लिए ज्ञानामृतकी वर्षा करनी पड़ी वह ज्ञानामृत वर्षा ही सभी लोगाँव करनेके लिए आज भी कठोपनिषद्के रूपमें विद्यमान है। विशुद्ध बोधरूप अंव हृदयरूपी विशुद्ध भूमिमें स्फुट हो सकता है जो नचिकेताके समान साधन च है। मेघ जल तो सब जगह बरसाते हैं, परन्तु परिणाम भिन्न-भिन्न भूमियों भिन्न-भिन्न होता है। ठीक यही बात शास्त्रोपदेशके विषयमैं भी है। ईश्वरकृपा तो सभीपर समान है परन्तु प्रात्मकृपाकी न्यूनाधिकताके कारण उस परिणामों में अन्तर रहता है । 'ज्ञानादेव तु कैवल्यम्' 'ऋते ज्ञानान्नमुक्तिः श्रुतिवाक्य तत्त्वज्ञानसे ही मोक्षकी प्राप्ति कहते हैं, अत: उसे प्राप्त करने के लि सम्पादन करनी चाहिए, क्यों कि 'इह चेदवेदीदथ सत्यमस्ति न चेदिहा बिनष्टिः' ( केन० २।५) इस श्रुतिके अनुसार मानवजीवनका परम ला उपयोगिता ) प्रात्मप्राप्तिमें ही है। अतः आत्माको यथार्थरूपसे जानना ही प्रथम कर्तव्य है। अन्य उपनिषदों के समान इस उपनिषद्पर भी भगवत्पाद जगद्गुरु श्रीमद चार्यने संस्कृतभाषामै सरल एवं सुबोधभाष्यकी रचना की है, संस्कृतम होने जनसाधारणको उससे पूरा लाभ होना कठिन है, अत: मन्त्रों के प्रत्येक वर्णक पर्याय देकर उसका हिन्दी अनुवाद भी किया गया है तथा भाष्यका सरल सुर अनुवादकर भाष्यके तात्पर्यको प्रतिस्पष्ट करनेके लिए उसपर अनेकदर्शनों एवं टी आधारपर हिन्दीभाषामें 'सत्यानन्दीदीपिका' प्रस्तुत की गयी है, आशा है कि इस ग्रन्थरत्नसे पूरा-पूरा लाभ उठा सकेंगे । उपनिषद् शब्दार्थ अत्र चोपनिषछब्दो ब्रह्मविद्य कगोचरः । तच्छब्दावयवार्थस्य विद्यायामेव सं: उपोपसर्गः सामीप्ये तत्प्रतीचि समाप्यते। सामीप्यतारतम्यस्य विश्रान्ते: स्वात्मनीक्ष त्रिविधस्य सदर्थस्य निशब्दोऽपि विशेषणम् । उपनीयेममात्मानं ब्रह्माऽपास्तद्वयं निहन्त्यविद्यां तज्जं च तस्मादुपनिषद्भवेत् । निहत्यनर्थमूलं साऽविद्यां प्रत्यक्तया गमयत्यस्तसम्भेदमतो वोपनिषद्भवेत् । प्रवृत्तिहेतून्निश्शेषांस्तन्मूलोच्छेदकत्व यतोऽवसादयेद्विद्या तस्मादुपनिषद्भवेत् । यथोक्तविद्याहेतुत्वाद्ग्रन्थोऽपि तदभे .
पादपद् शब्दका अथ ब्रह्मात्मकत्व विज्ञान है 'उपनिषदं भो ब्रहि' इस प्रकार ही उपनिषद् शब्दका प्रयोग पाया जाता है। 'एकार्थत्वसंभवति अनेकार्थ- य्या' इस न्यायसे भी उपनिषद् एकार्थक ही है अनेकार्थक नहीं। इसलिए थमैं 'उपनिषद्' शब्दका प्रयोग अनुचित है। उपनिषद्का अवयवार्थ भी की संभव है। यथा--उपनिषझै चार अवयव हैं-'उप, नि, सद् और क्विप्' (प्त है और शेष तीन विद्यमान हैं। उप-सामीप्या, नि-निश्चय, 'सद्' धातुका [, गति और नवसादन है, और 'विवप्' प्रत्ययका अर्थ कर्ता है । 'अतः शुद्धं 'र्थसामीप्योपलक्षितं ब्रह्म निश्चितं नीत्वा-स्वरूपं ग्राहयित्वा-सकायाँ समूला थलयति नाशयति या सा उपनिषद्' इस प्रकारकी व्युत्पत्तिसे शुद्ध-अविद्यादि जीवको सामीप्योपलक्षित ब्रह्मके पास ले जाकर ब्रह्मस्वरूपका बोध कराकर मूल अविद्याका जो नाश करती है वह उपनिषद् है ।। ३ ॥ र्थ सामीप्य दो प्रकारका है-सातीशय और निरतिशय । जैसे बाह्य क्षा शरीर आत्माके समीप है, उसकी अपेक्षा इन्द्रियाँ, उनकी अपेक्षा मन । पसातीशय है और निरतिशय समीप तो आत्मस्वरूप है । 'मुख्यार्थसंभवे य्यः' 'मुख्यार्थका संभव हो तो गौरण' अर्थका ग्रहण अनुचित है' अतः तम्यकी विश्रन्ति निरतिशय सामीप्यमें ही होती है वह निरतिशयस्वरूप । इसलिए यहाँ सामीप्योपलक्षित' स्वरूप विवक्षित है। 'कादाचित्कत्वे वमुपलक्षरणत्वम्' 'उपलक्षण वह है जो कभी लक्ष्यमें रहकर अविद्यमाना- र व्यावर्तक हो' जैसे 'पुस्तकपाणिच्छात्रः' यहाँ पुस्तक उपलक्षण है सदा नहीं रहता, वैसे ही संसारदशामें काल्पनिक धर्ममिभाव ब्रह्ममें है, अतः भी काल्पनिक है, परमार्थदशामें काल्पनिक सामीप्यके न रहनेपर भी दुपलक्षित करने में कोई बाधक नहीं है ॥ ४ ॥ . 'अर्थ विशरण, गति और अवसादन है। उपसर्ग धात्वर्थका द्योतक होता के अर्थका प्रथम' धात्वार्थमें अन्वय होता है 'पूर्व धातुरुपसर्गेण पुज्यते ऐसा शाब्दिकाँका संप्रदाय है, इसके अनुसार 'त्रिविधस्य' इत्यादि लिखते निश्चय गति, विशरण और अवसादनरूप त्रिविध सदर्थमैं विशेषण है उसके । विशेषण है, क्यों कि विशेषगताप्रयोजकत्वरूप विशेषणत्व निशब्दमें भी गति, निश्चित विशरण और निश्चित अवसादन यह अर्थ हुमा । 'विशेष्ये विशेषणम्' इस न्यायसे निशब्दार्थ विशेषित सदर्थमें उप-शब्दार्थ विशेषण - ७ ज्ञान जा अनयमूल आवद्या भार उसके कार्य जगत्को समूल निवृत्त कर चैतन्य परब्रह्मस्वरूपताका बोध कराती है वह विद्या उपनिषद् है । कुछ दार्शनिक विद्वा शब्दकी व्युत्पत्ति इस प्रकार बतलाते हैं-'उपनिषादयति सर्वानार्थसंसारं संसारकारणभूतामविद्यां च शिथिलयति ब्रह्म च गमयति च' इस प्रकार ब्रह्म उपनिषद् नामसे कहा गया है। 'वेदान्तो नाम उपनिषत्प्रमाणं तदुपकारीणि सूत्रादीनि च' 'दु:खजन्मप्रवृत्तिदोषमिथ्याज्ञानानामुत्तोत्तरपाये तदनन्तरापायादपव इस न्यायसूत्रके अनुसार मिथ्याज्ञान ही संसारका कारण है, क्यों कि मिथ्या द्वेष मोह आदि दोष होते हैं। 'प्रवर्त्तनालक्षणा दोषाः' इस सूत्रके अनुसार इ शुभ प्रवृत्ति, उससे जन्म और जन्मसे इनकी पुन: उत्पत्ति । इस प्रकार समान इस प्रवाहका उच्छेद नहीं होता । जन्म होनेपर दुःख अवश्यंभावी है। दुःखका उच्छेद ही मोक्ष है, परन्तु वह तभी संभव है जब संसारके मूलभूत मिथ निवृत्ति हो, मिथ्याज्ञानकी निवृत्तिसे सब दोषोंकी निवृत्ति स्वत: सिद्ध है मतमैं 'प्रभागप्रमेयसंशयप्रयोजनदृष्टान्तसिद्धान्तावयवतर्कनिर्णयवादजल्पवितण्ड सच्छलजातिनिग्रहस्थानानां तत्त्वज्ञानानिःश्रेयाधिगमः (न्या० १।१) इन सोलह तत्त्वज्ञान है, वैशेषिकमतमें 'द्रव्यगुणकर्मसामान्यविशेषसमवायाभावा पदार्थाः' इन सात पदार्थोका साधर्म्य वैधयं ज्ञान तत्त्वज्ञान है। सांख्यतममैं 'मू रविकृतिर्महदाद्याः प्रकृतविकृतयः सप्त । षोडशकस्तु विकारो न प्रकृतिर्न विकृतिः ( सां० ३ ) '१ मूलप्रकृति वह किसीका विकार-कार्य नहीं है, महत्, अहङ्कार ! तन्मात्राएँ सात कार्यकारणरूप हैं, आकाशादि पाँचभूत और ग्यारह इन्द्रियाँ ये १६ रूप हैं, कार्यकारणभावसे रहित १ पुरुष) इन पच्चीस तत्त्वोंका ज्ञान-विवेकख्याति है। योगमतमें ईश्वर सहित सांख्योक्त पदार्थों का ज्ञान तत्त्वज्ञान है। शून्य ही शून्यवादी बौद्ध और विज्ञान ही तत्त्व विज्ञानवादी बौद्ध कहते हैं। जीव और दो तत्त्व आहेत जैन मानते हैं। जीवब्रह्म क्य ज्ञान ही तत्त्वज्ञान है ऐसा अ कहते हैं। इसलिए प्रान्मैकत्वज्ञान प्रवृत्त्यादिके मूलभूत रागादिदोष सहित अं नाशकर स्वाभिन्न ब्रह्मरूप मोक्षकी प्राप्ति कराता है, अत: 'गमयति बोधयति-प्रव साक्षात्कारयति' यह अर्थ है, क्योंकि 'यत्साक्षादपरोक्षाद्ब्रह्म' ऐसी श्रुति है । इससे र शब्दका मुख्यार्थ ब्रह्मविद्या ही है, परन्तु 'तादात्तच्छब्दः 'इस न्यायसे ब्रह्मा प्रतिपादक होनेसे ग्रन्थमें भी उपनिषद् शब्दका गौण प्रयोग होता है। इसमें एक है-'लाङ्गलं जीवनम्' 'कृषकका जीवन हल है' हल तो वस्तुत: जीवन नहीं है जीवनका साधन है। यथा 'अन्नं वै प्राणा:' यह वैदिक दृष्टान्त है। अन्न प्र साधन होनेसे 'अन्नं वै प्राणा: ऐस प्रयोग किया गया ।
जाया ." २ एपिए पद्मा१ मा कहत है- द्धते विपरिणमते अपक्षीयतेऽथ विनश्यति' अपक्षय-अवयव शैथिल्यके अनन्त होना । इस वचन और लोकानुभवसे यह क्रम सिद्ध होता है कि अवयव शैथिल्य अवसादन-विनाश होता है। यह कोई एकान्त नियम नहीं है कि धातुके सर पत् होने चाहिए। अवयव शैथिल्य कहनेका प्रयोजन यह है कि तत्त्वज्ञानी दं होते हैं-जीवन्मुक्त और परममुक्त ! जीवन्मुक्तमैं किञ्चित्कार्यरूपसे अविद्या रहर्त । उसकी भिक्षादिमैं प्रवृत्ति नहीं होगी। तत्त्वज्ञान उत्पन्न होकर भी यदि व कार्य अविद्याका निवर्तक न हुआ तो विद्यामैं अविद्यानिवर्त्तकत्व सिद्ध नहीं होग वेद्यानिवर्त्तक विद्याकी प्राप्तिके लिए अध्यात्मशास्त्रके श्रवण आदिमें भी किसीक ही होगी, इसलिए विद्याके दो कार्य हैं अविद्या-शैथिल्य और अविद्यानाश म नाश सहित विद्या अविद्याकी निवत्तिका है और प्रारब्धकर्म सहित विद्य की शैथिल्य संपादिका है। जीवन्मुक्तमै नाश प्रतिबन्धक प्रारब्धकर्म सहित विद्यार ग नाश न होनेपर भी नाश प्रागवस्थारूप अवयव शैथिल्य अवश्य होता है ते हृदयग्रन्थिश्छिद्यन्ते सर्वसंशयाः। क्षीयन्ते चाऽस्य कर्माणि तस्मिन्दृष्ट परावरे।। २।२।८ ) 'ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा' ( गी० ४।३७) इत्या ति वचनों से रत्त्वज्ञान सर्वकर्मनाशक प्रतीत होता है तो प्रारब्धकर्मका नाश क्य r? 'तस्य तावदेव चिर यावन्न विमोक्ष्येऽथ संपत्स्ये' ( छा० ६।१४।२) 'नाभुर कर्म कल्पकोटिशतैरपि' इत्यादि श्रुति, स्मृति वाक्यों से पूर्वोक्त वचनोंके विरो में प्रारब्धकर्मातिरिक्त कर्मनाशत्वमैं इन वचनौका तात्पर्य मानना चाहिए अथव मैं ही यावत्कर्म नाशत्व है और उसके पूर्वज्ञानमैं अविद्याशैथिल्य जनकत्व नहीं, चरमज्ञानके तात्पर्यसे 'भिद्यते' इत्यादि वाक्य हैं और पूर्वज्ञानके तात्पर्य वदेव' इत्यादि वाक्य हैं। इस प्रकार विषयभेद होनेसे दोनों वाक्यों में परस्प नवृत्त हो जाता है । जीवन्मुक्तावस्था तो माननी चाहिए अन्यथा तत्त्वज्ञानोत्पादक निर्माण ही असंभव हो जायगा, क्योंकि यदि तत्त्वज्ञानोत्पत्तिकालमैं ही यावत्क होनेके कारण शरीर पात हो जाय तो शरीरेन्द्रियादिके न होनेपर शास्त्रक से होगा साथ साथ तत्त्वज्ञानका संप्रदाय भी नष्ट हो जायगा, कोई भी तत्त्वः द्व नहीं होगा, अतएव जीवन्मुक्तावस्था अवश्य माननी चाहिए। अद्वैतवाद आदिका विचार मान जगत्का मूलतत्त्व प्रकृति, द्रष्टा जीव और ब्रह्म ये तीनों पदार्थ अनादि हैं. ईश्वरवादी दार्शनिक मानते हैं। परन्तु इनके स्वरूपनिर्णय और तत्त्वनिर्णय ईश्वरवादियों में अद्वैतवाद. विशिष्टादेतवाट ---- . 4 अद्वैतवादके अनेक भद ह-यापानषद् अताप (Hinm/nav.. ' द्वैतवाद, शब्दाद्वैतवाद, शून्याद्वैतवाद आदि । अद्वैतवाद-औपनिषद् अद्वैतवाद वा ब्रह्माद्वैतवाद-'सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म' 'पान ब्रह्म' 'ब्रह्म सत्, चिद्, अनन्त और आनन्दरूप है' 'तत्त्वमसि, अहं ब्रह्मा ये श्रुतिवाक्य कहते हैं कि जीव ब्रह्म है। औपाधिक भेद होनेपर भी तत्त्वतः ब्रह्मरूप ही है। नित्य निरतिशय आनन्दस्वरूप ब्रह्मकी प्राप्ति और अविद्या सहित र दुःखाँकी अत्यन्त निवृत्ति मोक्ष है, उनका साधन जीवब्रह्म क्य ज्ञान है। माया सदा विलक्षण अनिर्वचनीय और परतन्त्र तत्त्व है। 'ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या जीवो ब्रह्म व ना ऐसा होते भी जगत्को व्यावहारिक सत्य मानते हैं। विशिष्टाद्वैत-यह श्रीमद्रामानुजाचार्यका मत है-जीव, जगत् और ईश्वर ये तत्त्व सत्य हैं । यद्यपि ये परस्पर भिन्न हैं, तो भी एक दूसरेको छोड़कर नहीं रह सक जीव चित्-चेतन और जगत् अचित्-जड़ है दोनों ईश्वरके शरीर है, अत: चिदचिद् वि ईश्वर एक है यही विशिष्टाद्वैत है। जीव ब्रह्मरूप नहीं है किन्तु ईश्वरका अंश अणु है । ईश्वर सगुण सविशेष और साकार है उसमें ही वेदान्ताँका तात्पर्य है निर्वि नहीं, क्योंकि निर्विशेष वस्तुका प्रतिपादन असंभव है। भक्ति और प्रपत्ति-शरणार प्रसन्न हो ईश्वर भक्त को मोक्ष देता है । वैकुण्ठलोकमैं दासभावसे रहकर दिव्यलीला दर्शन करना ही मोक्ष है। शक्तिविशिष्टाद्वैत-श्रीपति पण्डितका है, यह शैव संप्रदायके अनुसार है। शुद्धाद्वैतवाद-इसके प्रचारक श्रीमद्वल्लभाचार्य हैं इसके मतमैं ब्रह्म नित्य शुद्ध मुक्त निगुण, निविशेष है अखिल लीला निकेतन अखण्ड रसामृत सिन्धु गोलोकाधिपति कृष्णचन्द्र ही ब्रह्म है वही वेदान्तैकवेध सच्चिदानन्दरूप है, जैसे कल्पवृक्ष, चिन्तामणि आदि स्वविकारके विना अभीष्ट वस्तुको उत्पन्न करते हैं वैसे ही अ ब्रह्मसे जगत् उत्पन्न होता है। शुद्धाद्वैत, ब्रह्म ही जगत् है और सत्य है 'हरिरेव जगदेव हरिः' । जगत् ब्रह्मका रूपान्तर है । जगत् और संसार एक नहीं किन्तु भिन्न हैं, संसार अविद्याजन्य व जीवाश्रित है। जीव ब्रह्मका अग्नि-चिनगारियों के समान है, अणु और नित्य है । यद्यपि वस्तुतः जीव शुद्ध सच्चिदानन्दस्वरूप है, तथापि दशामें कर्ता, भोक्ता आदि है। मुक्तावस्थामैं जीवगत संसारका नाश होनेपर शुः जाता है, शुद्ध जीवका ब्रह्मके साथ अभेद है। दोनों के अभेदको शुद्धाद्वैत क 'स्थितिवैकण्ठविजयः पोषणं तदनुग्रहः' ( भाग० २।१०।४) गोलोकमैं गोपी का ।
तवाद-इसका प्रचारक बामनवा पाय है । स्वतन्त्र मार शरपति म५० । ईश्वर ( विष्णु ) स्वतन्त्र है और जगत् एवं जीव परतन्त्र हैं । जगत्के उत्पत्त्या- रसे होते हैं, वह वैकुण्ठाधिपति विष्णु है। जगत् सत्य और परिणामी नित्य है। समें पाँच भेद हैं-जीव ईश्वर भेद, जीव जड़ भेद, ईश्वर जड़ भेद, जीवाँका परस्पर डोंका परस्पर भेद । ये. पाँचौँ भेद सत्य हैं, इनका ज्ञान मुक्तिके लिए आवश्यक नीव अणु और प्रत्येक शरीरमें भिन्न है। भक्तिद्वारा भगवान्के अनुग्रहसे सालोक्य सामीप्य एवं सायुज्य मुक्ति प्राप्त होती है । ताद्वैतवाद-यह श्रीमन्निम्बार्काचार्यका मत है-यद्यपि जीव, जगत् और ईश्वर ये तीनों भन्न हैं, तथापि जीव और जगत् व्यापार तथा अस्तित्व ईश्वरेच्छा अधिन है स्वतन्त्र रमेश्वरमें ही जीव और जगत्के सूक्ष्मतत्त्व रहते हैं । ईश्वरके चार रूप हैं-१. परम- रम तत्त्व, २. अपर अमूर्त-ईश्वर सर्वद्रष्टा सर्वशक्तियौंजा उद्गमस्थान, ३. परमूर्त- गर्भ सब व्यक्त रूपौंका मूल स्रोत है, ४. अपरमूर्त-अत्यन्त भिन्नरूप जीव है। इस ब्रह्म द्वैत और अद्वैत दोनों हैं। मुक्तावस्थामैं जीव अपना और जगत् ब्रह्मके साथ [ अनुभव करता है, मुक्तिका साधन भक्ति है। द्वैतवादके प्रचारक एवं प्रसारक भगवत्पाद प्राद्य शङ्कराचार्य थे वे सातवीं शताब्दीमें 'त हुए थे। विशिष्टाद्वैतके प्रचारक श्रीमद्रामानुजाचार्य ११ वीं शताब्दीमैं, वादके प्रचारक श्रीमनिम्बार्काचार्य १३वीं शताब्दीमें, द्वैतमतके प्रचारक ध्वाचार्य १३ वीं शताब्दीमैं और शुद्धाद्वैतवादके प्रचारक श्रीमबल्लभाचार्य १६ मैिं हुए हैं। पाश्चात्य विद्वानोंपर उपनिषदोंका प्रभाव पनिषदोंके सिद्धान्त इतने गूढ एवं सार्वभौम हैं कि उनका विद्वानोंपर चाहे वे किसी नेवासी और किसी धर्मके अनुयायी क्यों न हौं गहरा प्रभाव पड़ा है। किसी म-ग्रन्थको इतरधर्मावलम्बियों से ऐसा व इतना हार्दिक एवं प्रकृतिम आदर प्राप्त प्रा है । हमें यह स्मरण रखना चाहिए कि उपनिषद् भारतियोंके सर्वश्रेष्ठ धार्मिक पात्मिक ग्रन्थरत्न है। प्रत्येक भारतीय चाहे वह वैष्णव, शैव, शाक्त आदि किसी का क्यों न हो, उपनिषदाँको सबसे अधिक प्रामाणिक ग्रन्थरूपसे अवश्य स्वीकार है। प्रत्येक हिन्दुके धार्मिक विश्वासका आधार वेद हैं और वे अपौरुषेय हैं, अतएव कसी प्रकारके भ्रम एवं प्रमादकी तनिक भी संभावना नहीं की जा सकती। इ वेदोंके सारभाग हैं। वेदों के संहिता एवं ब्राह्मणभागों में अधिकतर कर्म एवं और बहुत थोड़े स्थलों में परब्रह्मका उल्लेख है। परन्तु उपनिषद् तो परापरब्रह्म, वरूप. जीवात्माके स्वरूप. ब्रह्म साक्षात्कारके उपाय. ब्रह्म साक्षात्कार उसके अथवा दर्शनों में या तो उन्हें मिला ही नहीं और यदि मिला भी तो बहुत रूपमैं । उदाहरणार्थ---ब्रह्म अथवा ईश्वरका स्वरूप क्या है ? जीवात्मा कि है? संसारकी रचना किस तत्त्वसे हुई है ? मरणानन्तर जीवकी स्वर्ग, नरक कब तक एवं कैसे रहती है और पश्चात् कैसे होती है ? देहकी रचनाके पूर अस्तित्व था क्या ? कुछ जन्मसे सुखी और कुछ जन्मसे दुःखी क्यों ? प्रकारके अन्य प्रश्न ऐसे हैं जो सूक्ष्म दृष्टिसे दर्शनशास्त्रका अवलम्बन कर व्यक्तिके मनमैं प्रायः उठते हैं । वेदान्तदर्शनमैं इनका इतना पूर्ण वैज्ञानिक । उत्तर है कि जिसका प्रत्येक जिज्ञासुके मनपर प्रभाव पड़े विना रह नहीं सव वेदान्तदर्शनकी महिमा व गरिमापर मुग्ध होनेवाले विदेशी विद्वानों थे अरबदेशीय अलबरूनी। ये ११ वीं शताब्दीमें भारत आये और : अध्ययनकर उपनिषदाँकी साररूपा गीतापर मुग्ध हो गये। उन्होंने उपनिष किया कि नहीं, पर गीताकी जो उन्होंने प्रशंसाकी उसे उपनिषदोंकी ही प्र चाहिए। मुगल सम्राट शाहजहाँका ज्येष्ठ पुत्र दाराशिकोह उपनिषदोंकी महिर प्रभावित हुआ कि उसने राज-पण्डित जगन्नाथसे संस्कृतका भली-भाँति अध्र उपनिषदौका फारसीमैं अनुवादकर डाला। इस फारसी अनुवादका फ्रां अनुवाद हुआ । इस फ्रांसीसी अनुवादकी एक प्रति-कापी जर्मनीके प्रसिद्ध हरके हाथ लगी। समस्त विदेशी विद्वानों में उन्हों ने इन ग्रन्थों की सबसे की। वे कहते हैं--१. सम्पूर्ण विश्वमें उपनिषदों के समान जोवनको ऊँच कोई अन्य अध्ययनका विषय नहीं है। उनसे मेरे जीवनको शान्ति और मृत्यु मिलेगी। शोपेनहरके इन्हीं शब्दौंको उद्धृत करते जर्मनीके विद्वान् मैक्समूर २. शोपेनहरके इन शब्दों के लिए यदि किसी समर्थनकी आवश्यकता । जीवन भर अध्ययनके आधारपर मैं उनका सहर्ष समर्थन करूंगा। उपनिषदों 1. In the whole world, there is no study elevatin of the UPANISADS. It has been the solace of It will be the solace of my death, 2. If these words of Schopenhauer required ai rmation, I would willingly give it as a result o lonr at.....
अद्भुत सिद्धान्तोका उल्लख करत शापनहरन फिर कहा---३. व सिद्धान्त एस ह
प्रकारके अपौरुषेय ही हैं। वे जिनके मस्तिष्ककी उपज हैं उन्हें निरे मनुष्य क
है।
४. वेद मनुष्य रचित नहीं हैं इस मान्यताका कैसा अनूठा अनुमोदन है । पालडा
क एक अन्य जर्मनी विद्वान्ने उपनिषदाँका मूल-संस्कृतमै अध्ययनकर उपनिषद्-६
लासफी आफ ही उपनिषद् ) नामक अपनी प्रसिद्ध पुस्तकका निर्माण कि
मैंने लिखा है कि उपनिषदों के भीतर जो दार्शनिक मीमांसा है वह भारतमैं अद्वि
है, सम्भवतः सम्पूर्ण विश्वमैं अतुलनीय है ।
५. डायसनने यह भी कहा कि कांट और शोपेनहरके विचारोंकी उपनिषदों ने ।
कल्पना कर ली थी तथा सनातन दार्शनिक सत्यकी अभिव्यञ्जना मुक्तिदायनी अ
के सिद्धान्तों से बढ़कर निश्चयात्मक एवं प्रभावपूर्ण रूपमैं कदाचित् ही हुई।
पनिषदर्शनम् )
६. 'मैवडानेलने लिखा है-मानवीय चिन्तनाके इतिहासमैं पहले पहल बृहदार
नेषम ही ब्रह्म अथवा पूर्णतत्त्वको ग्रहण कर उसकी यथार्थ व्यञ्जना हुई है।
७. फ्रांसीसी दार्शनिक विद्वान् विक्टरकाजन्स् लिखते हैं----जब हम पूर्वकी और ;
Almost Superhuman Conceptions whose originat
can hardly be said to be mere-men,
Philosophical conception unequalled in India or pe
aps anywhere else in the world.
Eternal philosophical truth has seldom found m
decisive and striking expression, than in the doctı
of the emancipating knowledge of the Atma.
Brahman or absolute is grasped and definitely ex]
ssed for the first time of the bistory of the Hur
thought in the BRHADARANYAKA UPANISAD
When we read the poetical and philosophicalmo
ments of the East, above all those of India. we di
ver there any truths so profound and which make s
a contrast with the result at which the European C
iva had come time, stonned that we are constrained,
111॥ नासा सहारा एक दासाना महात् धातयाका करते हैं, तब हमैं ऐसे अनेक गम्भीर तथ्यौं-सत्यौंका पता चलता है, जिनकी उन तुलना करनेपर, जहाँ पहुँच कर यूरोपीय प्रतिभा कभी-कभी रुक गयी है, हमें ज्ञानके आगे घुटना टेक देना पड़ता है।' ८. जर्मनीके एक दूसरे लेखक और विद्वान् फ्रेडरिकश्लेगेल लिख आदर्शवादके प्रचुर प्रकाश पुञ्जकी तुलनाम यूरोपवासियौंका उच्चतम तर ही लगता है, जैसे मध्याह्न सूर्यके व्योमव्यापी प्रतापकी पूर्ण प्रखरतामैं टिर अनलशिखाकी कोई आदि किरण जिसकी अस्थिर और निस्तेज ज्योति ऐसी मानो अब बुझी की तब । इस प्रकार उपयुक्त पाश्चात्य विद्वानों के विचारों से उपनिषदोंकी महत्त । आशा है कि पाठकगण उपनिषद्की महिमा व गरिमाको अवश्य सर គឺ उठायेंगे। । सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः । सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुःखभाग्भवेत् ॥ स्वामी सत्यानन 8. Even the loftiest philosophy of the Europeans in comparison with the abundant light of idealism like a feeble promethean spark in food of the heavenly glory of the moonday. Sur ing and feeble and ever ready to be extinguish 9. From every sentence deep, original and sublin ghts arise and the whole is pervaded by a b holy and earnest spirit in the whole world no study, except that of the originals, so ben and so elevating as that of the oupnekhat, it h the solace of my life, it will be solace of my de 10. In India our religion will now and never stri The primitive wisdom of the human race wi be pushed aside by the event of Galilee. On trary, Indian wisdom will flow back upon produce a thorough change in our knowi - विषय-सूची विषय १. शान्ति पाठ २. सम्बन्ध-भाष्य - MAA- प्रथम अध्याय प्रथमा वल्ली .. ३. वाजश्रवसका दान ४. नचिकेताकी शङ्का ५. पिता-पुत्र-संवाद ६. यमलोकमैं नचिकेता ७. यमराजका वरप्रदान ८. प्रथम वर-पितृपरितोष ६. स्वर्गस्वरूपप्रदर्शन १०. द्वितीय वर--स्वर्गसाधनभूत अग्निविद्या ११. नाचिकेत अग्निचयनका फल १२. तृतीय वर-आत्मरहस्य १३. नचिकेताकी स्थिर बुद्धि १४. यमराजका प्रलोभन १५. नचिकेताका विषयदोषदर्शन द्वितीया वल्ली १६. श्रेय-प्रेयविवेक १७. अविद्याग्रस्तौकी दुर्दशा १८. आत्मज्ञानकी दुर्लभता .१९. कर्मफलकी अनित्यता २०. नचिकेताके त्यागकी प्रशंसा - - -- - || 1 । । विषय २३. प्रोङ्कारोपदेश २४. आत्मस्वरूपनिरूपण २५. प्रात्मा प्रात्मकृपासाध्य है २६. आत्मज्ञानका अनधिकारी तृतीया वल्ली २७. प्राप्ता और प्राप्तव्य-भेदसे दो आत्मा २८. शरीरादिसे सम्बन्धित रथादि रूपक २६. अविवेकीकी विवशता ३०. विवेकीकी स्वाधीनता ३१. अविवेकीकी संसारप्राप्ति ३२. विवेकीकी परमपदप्राप्ति ३३. इन्द्रियादिका तारतम्य ३४. आत्मा सूक्ष्मबुद्धि ग्राह्य है ३५. लयचिन्तन ३६. उद्बोधन ३७. निविशेष प्रात्मज्ञानसे अमृतत्वप्राप्ति ३८. प्रस्तुत विज्ञानकी महिमा द्वितीय अध्याय प्रथमा वल्ली ३६. आत्मदर्शनका विघ्न-इन्द्रियोंकी बहिर्मुखता ४०. अविवेकी और विवेकीका अन्तर ४१. आत्मज्ञ की सर्वज्ञता ४२. आत्मज्ञकी निःशोकता ४३. आत्मज्ञकी निर्भयता ४४. ब्रह्मज्ञका सात्म्यिदर्शन ४५. अरणिस्थ अग्निमें ब्रह्मदृष्टि ४६. प्राणमें ब्रह्मदृष्टि ४७. भेदहष्टिकी निन्दा हत्यपण्डरीकाश बटा | | | | | 1 | ] । । । wwws o- - - Peso पृष्ठ | | - विषय अभेददर्शनकी कर्तव्यता द्वितीया वल्ली प्रकारान्तरसे ब्रह्मानुसन्धान देहस्थ आत्मा ही जीवन है मरणोत्तरकालमै जीवकी गति गुह्य ब्रह्मोपदेश आत्माका उपाधिप्रतिरूपत्व आत्माकी असङ्गता आत्मदर्शी ही नित्य सुखी है सर्वप्रकाशक ब्रह्म तृतीया वल्ली संसाररूप अश्वत्थवृक्ष ब्रह्मज्ञानसे अमरत्वप्राप्ति सर्वशासक परमेश्वर ब्रह्मज्ञानके विना पुनर्जन्मप्राप्ति स्थानभेदसे ब्रह्मदर्शनमें तारतम्य आत्मज्ञानका प्रकार और प्रयोजन परमपदप्राप्ति आत्मोपलब्धिका साधन सदुद्धि ही है , अमर कब होता है ? उपसंहार शान्तिपाठ ११ ११ १२ १२ १२ १२ १२ १३१-१५ 1 । । - ३ १३ १३ । । । । ] ] ] १४ १४ १६ १५ - . - .
ॐ शं नो मित्रः । शं वरुणः। शं नो भवत्वर्यम
शं न इन्द्रो बृहस्पतिः। शं नो विष्णुरुरुक्रमः
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः
कृत्वा
उद्धारार्थ मुमुक्षोररचिषत
पुरा ब्रह्मसूत्राणि यानि
कृष्णद्वैपायनेन श्रुतिपरमतिनाऽऽम्नायशीर्षार्थवक्त्रा
भाष्यं तदीयं निखिल बुधनुतं गूढतत्त्वोपदेष्ट
निद्वैतानन्ददायी जगति विजयते शङ्करो देशिकेन्द्रः
वक्तारमासाद्य यमेव नित्या सरस्वती स्वार्थसमन्विताऽऽसीत्
निरस्तदुस्तर्ककलङ्कपङ्का नमामि तं शङ्करमर्चिताघ्रिम्
श्रुतिस्मृतिपुराणानामालयं. करुणालयम् ।
नमामि भगवत्पादं शङ्करं लोकशङ्करम् ।।
REIRE
ॐ तत्सद्ब्रह्मणे नमः शाङ्करभाष्योपेता कठोपनिषद - स्वामी सत्यानन्द सरस्वती कृत- मन्त्रार्थ, भाष्यानुवाद, सत्यानन्दीदीपिका सहित सह नाववतु । सह नौ भुनक्तु । सहवीर्यं करवावहै । तेजस्वि नावधीतमस्तु । मा विद्विषावहै । ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! ॐ पदवाच्य परमेश्वर हम ( आचार्य और शिष्य ) दोनोंको साथ साथ रक्ष हम दोनोंका साथ साथ पालन करें। हम साथ साथ विद्या सम्बन्धी सामथ्र करें। हम दोनोंका अध्ययन तेजस्वी हो । हम दोनों परस्पर द्वष न करें । आध्यात्मिक, आधिभौतिक एवं प्राधिदैविक तापत्रय की शान्ति हो। ॐ नमो भगवते वैवस्वताय मृत्यवे ब्रह्मविद्याचार्याय नचिकेतसे च । ॐ ब्रह्मविद्याके प्राचार्य सूर्यपुत्र भगवान् यम' और नचिकेताको नमस्कार है। अथ काठकोपनिषद्वल्लीनां सुखार्थप्रबोधनार्थमल्पग्रन्था वृत्तिरारभ्यते भाष्यानुवाद धन्यं यच्श्रुतिमौलिभव्यवचसां ज्ञानं शिवं सुन्दरं संसारार्णवमग्नमूढजनताज्ञानान्धकारापहम् तस्यैतां जननी कठोपनिषदं सन्तो भजन्तां मुदा सत्यानन्दसरस्वती रचितया भाषाविवृत्यान्विताम् ॥१॥ भक्त्या प्रणम्य भगवत्पादानाचार्यतल्लजान् । सभाष्यस्य कठस्याहं व्याख्यां कुर्वे यथामति ॥२॥ नन्दीदीपिकया काठकोपनिद् युता। भवत्वज्ञानसंहन्त्री विश्वनाथानुकम्पया रं शङ्कराचार्य ब्रह्मविद्भिःसमादृतम् । जगद्गुरुं यतिवरं वन्दे शङ्कररूपिणम मोपनिषतको वल्लियोंका जिज्ञासजनोंको सस्वपर्वक सगमतासे ज्ञान सम्पाद सदेर्धातोर्विशरणगत्यवसादनार्थस्योपनिपूर्वस्य किप्प्रत्ययान्तस्य र दिति । उपनिषच्छब्देन च व्याचिख्यासितग्रन्थप्रतिपाद्यवेद्य विद्योच्यते । केन पुनरर्थयोगेन उपनिषच्छब्देन विद्योच्यत इत्युच *ये मुमुक्षवो दृष्टानुश्रविकविषयवितृष्णाः सन्त उपनिषच वदयमाणलक्षणां विद्यामुपसद्योपगम्य तनिष्ठतया निश्चयेन कराने के लिए संक्षिप्त ग्रन्थवाली वृत्ति प्रारम्भ की जाती है । विशरण (नाश अवसादन (शिथिलीकरण ) इन तीन अर्थोंवाली तथा 'उप' 'नि' उपसर्ग 'क्किप्' प्रत्ययान्त 'सद्' धातुका 'उपनिषद्' यह रूप बनता है । जिस ग्रन्थकी करना चाहते हैं उसके प्रतिपाद्य और वेद्य ब्रह्मरूप वस्तु विषयक विद्या शब्दसे कही जाती है । पुनः किस अर्थ के योग (सम्बन्ध) से उपनिषद् शब्दवे कही जाती है अर्थात् किस अर्थ के सम्बन्धसे उपनिषद् शब्दसे ब्रह्मविद्याका जाता है । इसपर कहते हैं- जो मुमुक्षु पुरुष लौकिक और पारलौकिक शब्दादि विषयोंसे विरक्त शब्दवाच्य वक्ष्यमाण लक्षणवाली विद्याके समीप जाकर अर्थात् प्राप्तक सत्यानन्दीदीपिका यहाँ 'प्रथ' शब्द मङ्गलार्थक है, क्योंकि 'ओंकारश्चाथशब्दश्च द्वावेतो ब्रह्मणः कण्ठं भित्त्वा विनिर्यातो तस्मान्माङ्गलिकावुभौ ॥ ऐसी स्मृति है। 'ग्रन्थसमाप्तिकामो मङ्गलमाचरेत्, इस स्मृतिवाक श्रुतिके आधारपर मङ्गल करना चाहिए। इससे प्राचार्य शङ्करने प्रास्तिक बु करनेके लिए और शिष्टाचार परिपालनार्थ 'ॐ नमो०' और 'अथ' शब्दसे : किया है। *सिद्धार्थं ज्ञातसम्बन्धं श्रोतुं श्रोता प्रवर्तते । शास्त्रादी तेन वक्तव्यः सम्बन्धः स मारते हैं प्राचार्य तो निर्दोष होते हैं। इस शङ्काके निवृत्त्यर्थ "भगवते' पद व 'उत्पत्ति च विनाशं च भूतानामागति गतिम् । वेत्ति विद्यामविद्यां च भगवानिति ॥' इस स्मृतिवचनके आधारपर करामलकवत् ब्रह्मसाक्षात्कार यावत् याम्यपदका अधिकार प्राप्त है तब तक प्रारब्ध कर्मका अतिवहन कर ब्रह्मात्मत्वके बलसे भूतयातनादि दोषोंसे कदापि लिप्त नहीं होते। ' कर्माणि निबन्धन्ति धनञ्जय' (गी० ५१४१) शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति पुरा।
ROctANDAR मविद्यादेः संसारबीजस्य विशरणाद्धिंसनाद् विनाशनादित्यनेनार्थयोगे या उपनिषदित्युच्यते । तथा च वक्ष्यति-निचाय्य तं मृत्युमुखात्प्रमुच्या ठ० ११३।१५) इति । व्य पूर्वक उसका परिशीलन करते हैं उनके अविद्या आदि संसार बीजका विशरण न-विनाश करने के कारण इस अर्थके योगसे विद्या उपनिषद् शब्दसे कही जाती है प्रागे भी कहेगी---'उसे साक्षात् जानकर पुरुष मृत्युमुखसे मुक्त हो जाता है ।' सत्यानन्दीदीपिका महापुरुषोंकी इस उक्ति के अनुसार शास्त्रके प्रारम्भमें यदि विषय, प्रयोजन कारी और सम्बन्धका प्रतिपादन न किया जाय तो उसमें विज्ञपुरुषों की प्रवृत्ति न , इसलिए शास्त्रके प्रारम्भमें उनका निरूपण करना आवश्यक है। ग्रन्थ में प्रवृत्ति जक अनुबन्ध चतुष्टयको सूचित करने के लिए 'उपनिषद्' शब्दसे कार्य सहित प्रवि नत्तिका ब्रह्मविद्याका ग्रहण किया गया है । ब्रह्मविद्या सकार्य अविद्याकी निर्ति तभी हो सकती है जब जगद्रूप कार्य सहित अविद्या मिथ्या हो 'नेह नानाऽसि न' 'ज्ञाते द्वैतं न विद्यते' 'तरति शोकमात्मवित्' इत्यादि श्रुतिवचनोंसे बंध मिथा होता है। इससे दुःखद जगद्रूप कार्य के साथ अविद्याकी निवृत्ति और स्वरूप 'निरतिशय आनन्दकी प्राप्तिरूप प्रयोजन भी सिद्ध होता है । इस प्रयोजनकी काम अधिकारी कहा जाता है। वह 'ये मुमुक्षवः' से कहा गया है। इस पदसे ऐस् हना चाहिए कि विषयासक्त पुरुष इस फलका अधिकारी नहीं है। द्यथेह कर्मजितो लोकः क्षीयते एवमेवामुत्र पुण्यजितो लोकः क्षीयते' (छा० ८।१६) (जैसे यहाँ कर्मोसे उपाजित अन्न आदि भोग्य पदार्थ क्षीण हो जाते हैं वैसे । क-पुण्यकर्मोसे सम्पादित स्वर्गादि भोग भी नष्ट हो जाते हैं) 'ते तं भुक्वा स्वर्गलो लं क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोक विशन्ति' ( गी० ६।२१) ( वे उस विशाल स्वर्गलोकव कर पुण्य क्षीण होनेपर मृत्युलोकको प्राप्त होते हैं ) 'जन्ममृत्युजराव्याधिदुःख दोष 'नम्' (गी० १३१८) इसलिए विवेकी पुरुष इन विषयोंमें क्षयित्व आदि दोषोंक र अनुसन्धान कर इनसे विरक्त हो जाता है। इस प्रकार विवेक, वैराग्य आ र सम्पन्न व्यक्ति इस विद्याका अधिकारी कहलाता है । जीवब्रीक्य उपनिषद्क । है । प्रप्य-प्रापक-प्रतिपाद्य प्रतिपादकभाव आदि सम्बन्ध हैं। इस प्रकार अनुबन्न य सिद्ध होनेपर ग्रन्थका प्रारम्भ सर्वथा युक्त है । उप, नि उपसर्ग पूर्वक 'सद्' धातुसे कर्तृ अर्थमें 'क्विप्' प्रत्यय हो उपनिषद् शब न्न हुमा है । यहाँ उपनिषद् शब्दका अर्थ ब्रह्मविद्या ब्रह्मत्मैकत्व ज्ञान है। 'उपनि पूर्वोक्तविशेषणान्मुमुक्षन्वा परं ब्रह्म गमयतीति ब्रह्म योगाद्ब्रह्मविद्योपनिषद् । तथा च वक्ष्यति-"ब्रह्म प्राप्तो विरजोड ( कठ० उ० २।३।१८) इति । लोकादिर्ब्रह्मजज्ञो योऽग्निस्त द्विषया द्वितीयेन वरेण प्राय॑मानायाः स्वर्गलोकफलप्राप्तिहेतुत्वेन गर्भवाः ग्रुपद्रववृन्दस्य लोकान्तरे पौनःपुन्येन प्रवृत्तस्यावसादयितृत्वेन पादनेन धात्वर्थयोगादग्निविद्याप्युपनिषदित्युच्यते। तथा अथवा [ शान्त दान्त ] आदि पूर्वोक्त विशेषणोंसे युक्त मुमुक्षुओंक परब्रह्मके पास पहुंचा देती है अर्थात् ब्रह्मसाक्षात्कार करा देती है इस प्रका स्कार करानेवाली होने के कारण इस अर्थके योगसे ब्रह्मविद्या 'उपनिषद् 'ब्रह्मप्राप्तो०' (ब्रह्मको प्राप्त हुआ अज्ञानरूपी रज रहित हो अमर हो गया कहेगी। जो अग्नि भूः, भुवः आदि लोकोंसे पूर्व सिद्ध ब्रह्मसे उत्पन्न । तद्विषयक विद्या जो दूसरे वरसे मांगी गई है और स्वर्गलोक रूप फलकी प्र रूपसे लोकान्तरोंमें पुनः-पुन: प्राप्त होनेवाले गर्भवास, जन्म, वृद्धावस्था समूहका अवसादन-शैथिल्यापादनके द्वारा वह अग्निविद्या भी 'सद्' धातु उपनिषद् कही जाती है । 'स्वर्गलोकको प्राप्त होनेवाले पुरुष-यजमान ५ सत्यानन्दीदीपिका पदं भो ब्रूहि' इस प्रकार ब्रह्मविद्यामें ही उपनिषद् शब्दका प्रयोग पाय 'एकार्थत्वसंभवेऽनेकार्थकल्पना अन्याय्या' ऐसा न्याय भी है । उपनिषद् भी ब्रह्मविद्यामें संभव है । यथा---उपनिषद् शब्दमें चार अवयव हैं 'उप. विप्' अन्तिम तो लुप्त है । शेष उप-सामीप्य, नि-निश्चय, सद् धातुका गति और अवसादन है और किप् प्रत्यय क अर्थमें है । 'अतः शुद्धं ज सामीप्योपलक्षितं ब्रह्म निश्चित नीत्वा सत्स्वरूपं ग्राहयित्वा सकार्यां सम शिथिलयति नाशयति या सा उपनिषद्' इस प्रकारकी व्युत्पत्तिसे शुद्ध जीव 'पलक्षित ब्रह्मके पास ले जाकर ब्रह्मरूपका बोध कराकर कार्य सहित समूल शिथिल कर नाश करती है वह उपनिषद्' है । ब्रह्मविद्यासे जगद्रूप कार्य सहित अविद्या निवृत्तिरूप यह प्रयोजनांश सकता है जब कार्य सहित अविद्या मिथ्या ( कल्पित) हो, कल्पितकी ज्ञानसे निवृत्ति होती है अकल्पित की नहीं। जैसे र ज्ञानसे रज्जुमें अध्य निवृत्ति (बाध ) हो जाती है।
द्घात] भाषानुवाद-सत्यानन्दीदीपिका ५ Pariwomanama.TOHunce 'स्वर्गलोका अमृतत्वं भजन्ते' (कठ० उ० १२१।१३ ) इत्यादि । ननु चोपनिषच्छब्देनाध्येतारो ग्रन्थमप्यभिलपन्ति। उपनिषदमधीमहेऽध्यापयाम इति च । एवं नैप दोषोऽविद्यादिसंसारहेतुविशरणादेः सदिधात्वर्थस्य ग्रन्थ- मात्रेऽसम्भवाद्विद्यायां च सम्भवात् । ग्रन्थस्यापि तादयेन तच्छब्दत्वोपपत्तेः, 'आयुर्वे धृतम्' इत्यादिवत् । तस्माद्विद्यायां मुख्यया वृत्त्योपनिषच्छब्दो वर्तते ग्रन्थे तु भक्त्येति। एवमुपनिपनिर्वचनेनैव विशिष्टोऽधिकारी विद्यायामुक्तः। विषयश्च विशिष्ट उक्तो विद्यायाः परं ब्रह्म प्रत्यगात्मभूतम् । प्रयोजनं चास्या उपनिषद आत्यन्तिकी संसारनिवृत्तिब्रह्मप्राप्तिलक्षणा सम्बन्धश्चैवंभूतप्रयोजनेनोक्तः । अतो यथोक्ताधिकारिविषयप्रयोजनसम्बन्धाया विद्यायाः करतलन्यस्तामल- प्राप्त करते हैं, ऐसा आगे कहेंगे । परन्तु 'उपनिषद् पढ़ते हैं अथवा पढ़ाते हैं। इस प्रकार अध्ययन करनेवाले ग्रन्थको भी उपनिषद् शब्दसे कहते हैं ? यह दोष नहीं है, यद्यपि संसारके हेतुभूत अविद्यादिके विशरण-नाश आदि जो 'सद्' धातुके अर्थ हैं वे ग्रन्थमात्र में तो संभव नहीं हैं किन्तु विद्या में संभव हैं, फिर भी घी जैसे आयुवृद्धि में उपयोगी होने के कारण 'धी प्रायु है। ऐसा कहा जाता है वैसे ही ग्रन्थ भी विद्याके लिए है, अतः वह भी उपनिषद् शब्दसे कहा जा सकता है। इसलिए 'उपनिषद्' शब्द ब्रह्मविद्यामें तो मुख्यवृत्तिसे प्रयुक्त होता है किन्तु ग्रन्थमें गौणवृत्तिसे । इस प्रकार 'उपनिषद्' शब्दका निर्वचन करनेसे ही विद्याका विशिष्ट अधिकारी भी कहा गया है, 'त्वं' पद लक्षित प्रत्यगात्मभूत परब्रह्म विद्याका असाधारण विषय कहा गया है। इस प्रकार इस विद्याका संसारकी प्रात्यन्तिक निवृत्ति एवं नित्य निरतिशय आनन्दस्वरूप ब्रह्मकी प्राप्तिरूप प्रयोजन है। इस प्रकारके प्रयोजनके सत्यानन्दीदीपिका ऐक्य ज्ञानं यदोत्पन्न महावाक्येन चात्मनोः । तदा अविद्या स्वकार्येण नश्यत्येव न संशयः॥ 'जब तत्वमसि आदि महावाक्योंसे प्रत्यगभिन्न ब्रह्मका एकत्व ज्ञान हो जाता है, तभी कार्य सहित अविद्या निवृत्त हो जाती है इसमें संशय नहीं है'। 'मायां तु प्रकृति विद्यान्मायिनं तु महेश्वरम्' 'मायाविद्यात्मकोपाधिभेदेनैव न वस्तुतः' 'एकमेवाद्वितीयम्' (छा० ६।२।१) 'नेह नानास्ति किञ्चन' 'ज्ञाते द्वतं न विद्यते' 'नाऽन्योऽतोऽस्ति द्रष्टा' नासद्रूपा न सद्रूपा माया नैवोभयात्मिका । अनिर्वाच्या ततो ज्ञेया भेदबुद्धिप्रदायिनी।। मायिनो मायया भेदं पश्यन्ति परमात्मनि । तस्मान्मायां त्यजेद्योगान्मुमुक्षुर्द्विजोत्तम ।। नश्वरं भासते चैतद्विश्वं मायोद्भवं नृप । यथा शुक्तौ रौप्याभासः काचभूम्यां जलस्य च ।। एक: सन् भिद्यते शक्त्या मायया न स्वभावतः । तस्मादतमेवाहुः मुनयः परमार्थतः ॥
कवत्प्रकाशकत्वेन विशिष्टाधिकारिविषयप्रयोजनसम्बन्धा एर भवन्तीति, अतस्ता यथाप्रतिभानं व्याचक्ष्महे- mevuANEP . कथनसे प्रतिपाद्य-प्रतिपादकभाव, प्राप्य-प्रापकभाव आदि सम्बन्ध भी यथोक्त अधिकारी, विषय, प्रयोजन और सम्बन्ध विशिष्ट विद्याको करा शित करनेवाली होनेसे ये कठोपनिषद्की वल्लियाँ' विशिष्ट अधिकारी विष सम्बन्धवाली हैं, सो हम उनकी यथामति व्याख्या करते हैं- सत्यानन्दीदीपिका तो दतं समध्यस्तमद्वितीये परात्मनि । अतं परमानन्दं ब्रह्मवस्तु अध्यस्तं सर्पवद्यत्र विश्वमेतत्प्रकाशते । विश्वस्मिन्नपि चान्वेति निर्विका सर्वं ब्रह्मैव नानात्वं नास्तीति निगमा जगुः । यदज्ञानाजगद्भाति यस्मि इत्यादि श्रुति, स्मृतिसे यह सिद्ध होता है कि माया और तत्कार्य विलक्षण अनिर्वचनीय-मिथ्या है, अतः उसकी निवृत्ति ब्रह्मविद्यासे ही माया तत्कार्य जगत्को सत् प्रादि माननेवालोंके मत खण्डित समझ प्रकार प्रयोजन सिद्ध होने पर अधिकारी आदि भी सिद्ध हो जाते हैं। 04 १. कल्पलताके समान अभीष्ट फलप्रद होनेसे कठोपनिषद्के भागोंको Amra प्रथमाध्यायस्य प्रथमावल्ली उशन्ह वाजश्रवस: सर्ववेदसं ददौ । तस्य ह नचिकेता नाम पुत्र पास ॥१॥ वाजश्रवसः ( वाजमन्नतदानादिनिमित्तं श्रवः यशः यस्य सः, वाजश्रवाः तस्या जिअवसः ) स उशन् हवै (ह वै ऐतिह्यस्मारको निपाती, स्वर्गलोकमिच्छन् ) सर्व सर्वस्वं ) ददौ ( ब्राह्मणेभ्यो दत्तवान् ) तस्य ह ( प्रसिद्धस्य वाजश्रवसस्य ) नचि म ( नचिकेतो नामा ) पुत्र आस ( आसीत् ) ॥१॥ प्रसिद्धि है कि यज्ञफलके इच्छुक वाजश्रवाके पुत्रने [ विश्वजित् यज्ञमें ] " [रा धन दे दिया। उसका नचिकेता नामक एक प्रसिद्ध पुत्र था ॥१॥ तत्राख्यायिका विद्यास्तुत्यर्था । उशन्कामयमानः, ह वा इति वृत्तार्थ पार्थों निपातौ । वाजमन्नं तदानादिनिमित्तं श्रवो यशो यस्य स वाज कढितो वा। तस्यापत्यं वाजश्रवसः किल विश्वजिता सर्वमेधेनेजे त कामयमानः। स तस्मिन्क्रतौ सर्ववेदसं सर्वस्वं धनं ददौ दत्तवान् । यजमानस्य ह नचिकेता नाम पुत्रः किलास बभूव ॥ १॥ यहाँ यह आख्यायिका विद्याकी स्तुति के लिए है । उशन् स्वर्गफलकी कामनाव ह' और '' ये निपात अतीत वृतान्तका स्मरण करानेके लिए हैं। वाज दानादिनिमित्तक जिसका श्रव-यश हो वह वाजश्रवा है अथवा रूढ़िसे भी माजश्रवा नामवाला हो सकता है। उस वाजश्रवाके पुत्र वाजश्रवस उद्दालकने कामनासे जिसमें सर्वस्व दिया जाता है ऐसा विश्वजित् नामक यागसे यजन मि उस यज्ञमें उसने सर्ववेदस् अर्थात् अपना सारा धन दे दिया। उस यजमानका ना नामक प्रसिद्ध पुत्र था ॥१॥ सत्यानन्दी-दीपिका वेद तथा वेदसम्मत शास्त्रों में तीन प्रकारको वर्णन शैली पाई जाती है, वह स लौकिकी और परकीया भाषा कहलाती है । समाधि गम्य आध्यात्मिक रहस्य प्र भाषा समाधि भाषा है। समाधि गम्य आध्यात्मिक रहस्य को लौकिकरीतिसे प्रा करनेवाली भाषा लौकिकी भाषा है और जो भाषा समाधिगम्य आध्यात्मिक रा गाथाद्वारा हृदयंगम कराती है वह तीसरी अर्थात् परकीया भाषा कहलाती है, Bana wom तह कुमार सन्त दाक्षणासु नीयमानासु श्रद्धाविवेश सोऽमन्यतः॥२॥ दक्षिणासु नीयमानासु ( पित्रा जीर्णासु गोषु ब्राह्मणेभ्यो दक्षिणार्थं दी तं कुमारं सन्तं ( बाल्ये वयसि स्थितं नचिकेतसं ) श्रद्धा (आस्तिक्यबुद्धिः (प्रविवेश ) स: ( नचिकेताः ) अमन्यत ( मनसि प्रशोचत् ) ॥२॥ ऋत्विजोंके लिए दक्षिणास्वरूप गोत्रोंको ले जाते देख उस कुमार नचिवे श्रद्धाका उदय हुआ वह मन ही मन सोचने लगा ॥२॥ तंह नचिकेतसं कुमारं प्रथमवयसं सन्तमप्राप्तजननशक्तिं बाल स्तिक्यबुद्धिः पितुर्हितकामप्रयुक्ताविवेश प्रविष्टवती। कस्मिन्काल ऋत्विग्भ्यः सदस्येभ्येश्च दक्षिणासु नीयमानासु विभागेनोपनीयमान णार्थासु गोषु स आविष्टश्रद्धो नचिकेता अमन्यत ।। २ ।। कथमित्युच्यते- पीतोदका जग्धतृणा दुग्धदोहा निरिन्द्रियाः । अनन्दा नाम ते लोकास्तान्स गच्छति ता ददत् । सन्तानोत्पादन शक्तिकी प्राप्तिसे रहित प्रथमावस्थापन्न उस कुमार बालक पिताकी हितकामनासे प्रयुक्त श्रद्धा-आस्तिक्य बुद्धि प्रविष्ट अर्थात् उत्पन्न समय ? कहते हैं-जिस समय ऋत्विक और सदस्य गणोंके लिए दक्षिणा रही थी अर्थात् दक्षिणाके लिए विभागकर गौएँ लायी जा रही थीं, उस र युक्त हो नचिकेताने मनमें विचार किया ॥२॥ किस प्रकार विचार किया ? सो 'पीतोदका' आदिसे कहते हैं- सत्यानन्दीदीपिका द्रव्ययज्ञास्तपोयज्ञा योगयज्ञास्तथापरे । स्वाध्यायज्ञानयज्ञाश्च यतयः संशिता 'यज्ञो वै विष्णुः, 'यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम्' (गीता० ४।। इस प्रकार अनेक यज्ञोंका विधान है। परन्तु स्वर्गफलकामी उद्दालकने यजेत' इस विधिवाक्यके अनुसार विश्वजित्' नामक याग किया जिसमें र देनेका विधान है ॥१॥ होता, अध्वर्यु, उद्गता और ब्रह्मा ये चार यज्ञके मुख्य ऋत्विज हैं, ४८-४८ गोएं दक्षिणामें देने का विधान है। प्रशास्ता, प्रतिप्रस्थाता, ब्राह्मणः प्रस्तोता इनमेंसे प्रत्येकको २४-२४ । अच्छावाक् , नेष्टा, अग्नीघर और प्रत्येकको १६-१६ और गावस्तत. नेता सोमr Tanr rement.... - पाप ४. | 717 !) दुग्धदोहाः ( दुग्धमेव दोहो (क्षीर) यासां तार ) निरिन्द्रिया ( इन्द्रियशक्तिशून द्वा) ता: ( उक्तरूपा गाः) ददत् (प्रयच्छन् ) स: ( पुरुषः ) ते लोकाः, अना सुखरहिताः ) तान् ( लोकान् ) गच्छति ॥३॥ जिन्होंने जल पी लिया है, जिन्होंने तृण-घास-खा लिया है, जिनका इ लिया गया है और जिनमें प्रजननसामर्थ्य नहीं रही ऐसी जीर्णशीर्ण गौओंका न करता है वह दाता जो आनन्द शून्य लोक हैं उन्होंको जाता है ॥३॥ दक्षिणार्थी गावो विशेष्यन्ते पीतमुदकं याभिस्ताः पीतोदकाः, क्षितं तृणं याभिस्ता जग्धतृणाः, दुग्धो दोहः क्षीराख्यो यासां ता दुग्धदोह रिन्द्रिया अप्रजननसमर्था जीर्णा निष्फला गाव इत्यर्थः। यास्ता एवं [ ऋत्विग्भ्यो दक्षिणाबुद्धया ददत्प्रयच्छन्ननन्दा अनानन्दा असुखा नामे ये ते लोकास्तान्स यजमानो गच्छति ।। ३ ।। स होवाच पितरं तत कस्मै मां दास्यसीति । द्वितीयं तृतीयं त* होवाच मृत्यवे त्वा ददामीति ।। ४ ।। सः ( नचिकेताः) ह ( ऐतिह्यद्योतकमव्ययम् ) पितरम् [ उपगम्य ] उवाच, हे तात ! ) कस्मै (ऋस्विजे ) मां दास्यसि इति द्वितीयवारं तृतीयवारम् वाच अनन्तरं पिता क्रुद्धः सन् तं (पुत्रं ह-किल ) उवाच, त्वा ( त्वां) मृ यमाय ) ददामीति ॥४॥ तब वह अपने पितासे बोला-हे तात ! आप मुझे किस ऋत्विको दान करें सी प्रकार उसने द्वितीयवार, तृतीयवार भी कहा। तब पिताने क्रुद्ध हो उससे 'मैं यु-यम को देता हूँ ऐसा कहा ॥४॥ तदेवं क्रत्वसम्पत्तिनिमित्तं पितुरनिष्टं फलं मया पुत्रेण सता निवारण दक्षिणाके लिए लायी हुई गौत्रोंको विशेषित करते हैं अर्थात् ऋत्विक प्रा। क्षणारूपसे दी जानेवाली गौएं कैसी थीं यह बतलाते हैं जिन्होंने जल पी । वे 'पीतोदका' कहलाती हैं। जिन्होंने तृण-घास जग्ध-भक्षित अर्थात् खा लिर दि जिनमें और घास खानेकी शक्ति नहीं रही है वे 'जग्धतृणा' हैं। जिनका ह लिया जा चुका है अर्थात् जो और दूध देने में समर्थ नहीं हैं वे 'दुग्धदोह था निरिन्द्रिया जो सन्तान उत्पन्न करने में असमर्थ जीर्ण निष्फल-मरण एं हैं ऐसा अर्थ है। इस प्रकारकी उन गौत्रोंको ऋत्विजोंके लिए दक्षिणाबु वह यजमात प्रसन्दा-सखात्य जो लोक सन्द्रीको प्राप्त होता है। पर १० कठोपनिषद्-शाङ्करभाष्य [अ० १ व० १ म०५ and- मात्मप्रदानेनापि ऋतुसम्पत्तिं कृत्वेत्येवं मत्वा पितरमुपगम्य स होवाच पितरं हे तत तात कस्मै ऋत्विग्विशेषाय दक्षिणार्थं मां दास्यसि प्रयच्छसीत्येतत् । एवमुक्तेन पित्रोपेक्ष्यमाणोऽपि द्वितीयं तृतीयमप्युवाच कस्मै मां दास्यसि कस्मै मां दास्यसीति । नायं कुमारस्वभाव इति क्रुद्धः सन्पिता तं ह पुत्रं किलोवाच मृत्यवे वैवस्वताय त्वा त्वां ददामीति ॥ ४ ॥ स एवमुक्तः पुत्र एकान्ते परिदेवयाञ्चकार । कथम् ? इत्युच्यते- बहूनामेमि प्रथमो बहूनामेमि बहूनामेमि मध्यमः । किस्विद्यमस्य कर्तव्यं यन्मयाद्य करिष्यति ॥ ५ ॥ बहूनां ( शिष्यपुत्र दीनां मध्ये ) प्रथम; ( मुख्यः ) एमि ( भवामि ) बहूनां मध्यमः एमि, यमस्य किस्वित् कर्तव्यं ( तत् प्रयोजनम् आसीत् ) यत् ( प्रयोजनम् ) अद्य मया करिष्यति ( सम्पादयिष्यति ) ॥५॥ मैं बहुतसे शिष्यों वा पुत्रोंमें तो मुख्य वृत्तिसे प्रथमताको प्राप्त हूँ पोर बहुतोंमें मध्यमवृत्तिसे मध्यम हूँ। यमका ऐसा क्या कार्य-प्रयोजन है जिसे पिता आज मेरे द्वारा सिद्ध करेंगे ॥५॥ होनेवाला अनिष्टफल मुझ जैसे सत्पुत्रको आत्म-बलिदानकर भी निवृत्त करना चाहिए, ऐसा विचार कर नचिकेता पिताके समीप जाकर बोला-हे तात ! मुझे दक्षिणारूपसे किस ऋत्विग्विशेषको देंगे। नचिकेताके ऐसा कहनेपर पिता द्वारा उपेक्ष्यमाण होकर भी उसने पुनः द्वितीयवार फिर तृतीयवार पूछा मुझे किसको देंगे, मुझे किसको देंगे? तब पिता यह सोचकर कि यह बालकोंकेसे स्वभाववाला नहीं है, तब क्रुद्ध हो पिताने उस पुत्रसे कहा-मैं तुझे सूर्यपुत्र मृत्यु-यमको देता हूँ ॥४॥ पिताद्वारा इस प्रकार कहे जानेपर वह पुत्र एकान्तमैं बैठकर अनुताप करने लगा। किस प्रकार ? कहते हैं- सत्यानन्दीदीपिका ऋषि होकर भी उद्दालकने पुत्र मोहसे मोहित हो अच्छी-स्वस्थ गौएं पुत्रके लिए और मरणासन्न गौएं ऋत्विजोंको दक्षिणा देनी चाहीं, यही यज्ञमें वैगुण्य था। जिससे उत्पन्न अनिष्टसे रक्षा करनेके लिए नचिकेताने पिताको सचेत किया। क्योंकि 'पुंना- म्नो नरकात्त्रायत इति पुत्रः' यही सत्पुत्रका लक्षण है । परन्तु पुत्रमोहवश विकृत बुद्धि हो जानेके कारण उद्दालकने धार्मिक पुत्रके बाल सुलभ, पितृभक्ति पूर्ण धर्म भावसिक्त वचनोंका मर्म न समझ प्रत्युत क्रुद्ध हो 'मृत्यवे त्वा ददामि' ऐसा कहा । क्रोधसे क्या अनर्थ होता है, गीता २।६३ में इसका स्पष्टीकरण इस प्रकार है-- क्रोधाद्भवति संमोहः संमोहात्स्मृतिविभ्रमः । स्मृतिभ्रंशावुद्धिनाशोबुद्धिनाशात्प्रणश्यति॥४॥ tha मं०६] भाषानुवाद-सत्यानन्दीदीपिका ११ बहूनां शिष्याणां पुत्राणां वैमि गच्छामि प्रथमः सन्मुख्यया शिस्यादि- वृत्त्येत्यर्थः । मध्यमानां च बहूनां मध्यमो मध्यमयैव वृत्यैमि । नाधमया कदा- चिदपि । तमेवं विशिष्टगुणमपि पुत्रं मां मृत्यवे त्वा ददामीत्युक्तवान्पिता। स किंस्विद्यमस्य कर्तव्यं प्रयोजनं मया प्रत्तन करिष्यति यत्कर्तव्यमद्य ? नूनं प्रयोजनमनपेक्ष्यैव क्रोधवशादुक्तवान्पिता। तथापि तत्पितुर्वचो मृषा मा भूदित्येवं मत्वा परिदेवनापूर्वकमाह पितरं शोकाविष्टं किं मयोक्तमिति ॥ ५ ॥ अनुपश्य यथा पूर्वे प्रतिपश्य तथापरे । सस्यमिव मत्यःपच्यते सस्यमिवाजायते पुनः ॥ ६ ॥ पूर्वे (पूर्ववत्तिनः ) तथा, अनुपश्य ( पूर्वक्रमेण आलोचय ) तथा अपरे (वर्तमाना: साधवः) प्रतिपश्य (विचारय ) मर्त्यः ( मनुष्यः ) सस्यमिव पच्यते म्रियते ) सस्यमिव पुनः पाजायते ( उत्पद्यते )॥ ६ ॥ जिस प्रकार पूर्व पुरुष व्यवहार करते थे उसका विचार कीजिए तथा वर्तमान कालिक अन्य लोग प्रवृत्त होते हैं उसे भी देखिये । मरणधर्मा मनुष्य खेतीकी भांति पकता ( वृद्ध हो मर जाता ) है और खेतीकी तरह पुन: उत्पन्न हो जाता है ॥ ६ ॥ मैं बहुतसे शिष्यों अथवा पुत्रोंमें मुख्य शिष्यादि वृत्तिसे प्रथम होता आया हूँ ऐसा अर्थ है । बहुतसे मध्यमोंमें मध्यमवृत्तिद्वारा मध्यम स्थान प्राप्त करता आया हूँ, किन्तु अधम वृत्तिद्वारा अधम कभी नहीं हुआ हूँ। ऐसे विशिष्ट गुण सम्पन्न उस मुझ पुत्रको भी पिताने 'तुझे यमको देता हूँ' ऐसा कहा । परन्तु यमका ऐसा कौन-सा कर्तव्य- प्रयोजन इन्हें पूर्ण करना है जिसे ये इस प्रकार दिये हुए मुझसे आज सम्पन्न करेंगे ? निश्चय किसी प्रयोजनकी अपेक्षा न कर ही पिताने क्रोधवश ऐसा कहा है, तथापि पिताका 'मृत्यवे त्वा ददामि' वह वचन मिथ्या न हो ऐसा विचारकर उसने अपने पितासे जो यह सोचकर कि 'मैंने क्या कह दिया' ? शोकातुर थे खेद पूर्वक कहा ।।५।। सत्यानन्दीदीपिका नचिकेता अन्य शिष्योंके साथ पितासे ही विद्याध्ययन भी करते थे इससे नचिकेता अपने पिताके शिष्य भी थे। यथा समय गुरुका इष्ट समझकर उसमें प्रवृत्त होना यह मुख्यवृत्ति है और प्राज्ञाद्वारा प्रवृत्त होना मध्यमवृत्ति है। इन दोनों में पूर्ण होनेसे नचिकेता उत्तम एवं मध्यम श्रेणीके पुत्र व शिष्य थे। गुरु व पिताकी आज्ञाका पालन न करना अधमवृत्ति है इससे नचिकेता सर्वथा मुक्त थे । उत्तम गुण सम्पन्न होते भी नचिकेता अपने पिताकी भाज्ञा पालन करना अपना मुख्य कर्तव्य समझते थे। दूसरी ओर पिताने जब यह कहा-'मृत्यवे त्वा ददामि' इसके अनन्तर उसे अनुताप हुआ --
Romamratana-
१२
कठोपनिषद्-शाङ्करभाष्य
[अ० १ व० १ मं०६
अनुपश्यालोचय निभालयानुक्रमेण यथा येन प्रकारेण वृत्ताः पूर्वेऽतिक्रान्ताः
पितृपितामहादयस्तव । तान्दृष्ट्वा च तेषां वृत्तमास्थातुमर्हसि । वर्तमानाश्चा-
परे साधवो यथा वर्तन्ते तांश्च प्रतिपश्यालोचय तथा न च तेषु मृषाकरणं
वृत्त वर्तमानं वास्ति। तद्विपरीतमसतां च वृत्तं मृषाकरणम् । न च मृषा कृत्वा
कश्चिदजरामरो भवति । यतः सस्यमिव मयो
मनुष्यः पच्यते जीर्णो
म्रियते । मृत्वा च सस्यमिव बाजायत आविर्भवति पुनरेवमनित्ये जीवलोके किं
मृपाकरणेन । पालय आत्मनः सत्यम् । प्रपय मां यमायत्यभिप्रायः ॥ ६ ॥
आपके पिता, पितामह आदि अनुक्रमसे अतिक्रान्त-पूर्व पुरुषोंने जिस प्रकारके
वृत्तका अवलम्बन किया था उसकी आलोचना कीजिए उसपर विचार कीजिए अर्थात्
उसपर दृष्टि डालिये। उन्हें देख आपको भी उनके वृत्त-पाचरणका अवलम्बन करना
उचित है और वर्तमान अन्य साधु पुरुष जैसा पाचरण करते हैं उनका भी आलोचन-
विचार कीजिए। उन लोगोंमें किसी प्रकारका भी मिथ्याकरण नहीं था और न
वर्तमानमें ही है। किन्तु इसके विपरीत असत्पुरुषोंका पाचरण-व्यवहार ही मिथ्याकरण-
असत्यकरण है। परन्तु असत्य आचरण कर कोई भी अजर अमर नहीं हो सकता,
क्योंकि मर्त्य-मनुष्य खेतीके समान पकता अर्थात् जीर्ण हो कर मर जाता है तथा
मरकर खेतीकी भाँति पुनः उत्पन्न-आविर्भूत हो जाता है। इस प्रकार इस अनित्य
जीवलोकमें मुषा आचरणसे लाभ ही क्या है ? अतः अपने सस्यका पालन कीजिए मुझे
यमके यहाँ भेज दीजिए, यह अभिप्राय है ॥ ६ ॥
सत्यानन्दीदीपिका
कि मैंने सर्वगुण सम्पन्न अपने पुत्रको यमके प्रति जानेको कैसे कह दिया। इस प्रकार
शोकाकुल पिताके पास जाकर खेद पूर्वक नचिकेताने कहा ॥ ५ ॥
धर्मनिष्ठ नचिकेता शोकाकुल पिताको 'मृत्यवे त्वा ददामि' इस वचनसे विचलित
न होनेकी प्रार्थना करते हैं-'सत्यं वद धर्मं चर' 'सर्व सत्ये प्रतिष्ठितम्' ।
अश्वमेवसहस्रच सत्यं च तुलया धृतम् । अश्वमेधसहस्रात्तु सत्यमेव विशिष्यते ।।
इत्यादि श्रुति स्मृति भी हैं। इसलिए भूत, भविष्यत्, वर्तमान तीनों कालोंमें भी
महान् पुरुष सत्यसे विचलित नहीं होते । यदि किसी दोषवश मिथ्याभाषण करेंगे तो
उससे किञ्चिदपि लाभ नहीं प्रत्युत अनिष्टकी ही प्राप्ति होती है । इसलिए माप दुःखी व
शोकातुर न हो अपने मुख से निकाले 'मृत्यवे त्वा ददामि' इस वचनको सत्य करें, धर्म
और सत्यपालनसे ही ऋषित्व प्राप्त होता है, अतः मुझे यमके प्रति भेज सत्यका
पालन कीजिए ॥६॥
मं०७-८] भाषानुवाद-सत्यानन्दीदीपिका १३ स एवमुक्तः पितात्मनः सत्यतायै प्रेषयामास । स च यमभवनं गत्वा तिस्त्रो रात्रीरुवास यमे प्रोषिते । प्रोष्यागतं यमममात्या भार्या वा ऊचु:- घयन्त:- वैश्वानरः प्रविशत्यतिथिीह्मणो गृहान् । तस्यैता* शान्तिं कुर्वन्ति हर वैवस्वतोदकम् ।। ७ ।। ब्राह्मणः अतिथिः ( सन् ) वैश्वानरः ( अग्निरिव दहन इव ) गृहान् प्रविशति । तस्य ( अग्निरिव प्रविष्टस्य अतिथेः ) एतां ( शास्त्रोक्तां पाद्यासनादिरूपां) शान्ति कुर्वन्ति । हे वैवस्वत ! (सूर्यपुत्र !) उदकं (पाद्यार्थं जलं) हर (आहर एनं पूजय) ॥७॥ ब्राह्मण अतिथि होकर अग्नि ही घर में प्रवेश करता है । साधु पुरुष उस अतिथिकी यह ( अयपाद्यदानरूपा ) शान्ति किया करते हैं, अतः हे सूर्यपुत्र ! [ इस ब्राह्मण अतिथिकी शान्तिके लिए ] जल ले जाइये ।।७।। वैश्वानरोऽग्निरेव साक्षात्प्रविशत्यतिथिः सन्ब्राह्मणो गृहान्दहन्निव तस्य दाहं शमयन्त इवाग्नेरेतां पाद्यासनादिदानलक्षणां शान्ति कुर्वन्ति सन्तोऽति- थेर्यतोऽतो हराहर हे वैवस्वत उदकं नचिकेतसे पाद्यार्थम् । यतश्चाकरणे प्रत्यवायः श्रूयते ॥ ७॥ आशाप्रतीक्षे संगत*सूनृतां च इष्टापूर्ते पुत्रपशूच सर्वान् । एतद्बङ्क्ते पुरुषस्याल्पमेधसो यस्यानश्नन्वसति ब्राह्मणो गृहे ॥८॥ श्राह्मणः मनश्नन् ( प्रभुञ्जानःसन् ) यस्य गृहे वसति [ तस्य ] अल्पमेधसः (अल्प- बुद्धेः ) पुरुषस्य प्राशाप्रतीक्षे ( आशा च प्रतीक्षा च ते) सङ्गतं (तत्संयोगजं फलं) सुनृतां (प्रियवाचं ) इष्टापूर्ते ( इष्टं च पूतं च ते ) [ इष्टं यागजं फलं, पूर्तं तड़ागोद्या- नादिकर्मजन्यफलं सर्वान् पुत्रपशून् च (पुत्रान् पशूश्च ) एतत् ( सर्व ) वृक्ते (नाशयति ) ॥८॥ पुत्रद्वारा इस प्रकार कहे जानेपर पिताने अपनी सत्यताके रक्षार्थ उसे यमराजके पास भेज दिया। यमराजके बाहर ( ब्रह्मलोक ) जानेके कारण उसने यमराजके भवनमें पहुंचकर तीन रात निवास किया। प्रवाससे लौटे यमराजको उनकी पत्नी अथवा मन्त्रियोंने समझाते हुए कहा- ब्राह्मण अतिथि होकर साक्षात् वैश्वानर अग्नि ही दग्ध करता हुआ-सा घरोंमें प्रवेश करता है। उस अग्निके दाहको मानो शान्त करते हुए ही साधु-गृहस्थजन अतिथि की पाद्य आसन आदि दानरूप शान्ति किया करते हैं । अत; हे सूर्यपुत्र ! नचिकेताके पाद्य-पाद प्रक्षालनार्थ जल ले जाइये, क्योंकि ऐसा न करनेसे प्रत्यवाय सुना जाता है। -- - १४ कठोपनिषद्-शाङ्करभाष्य [अ० १ व० १ मं०६ . जिसके घरमें निराहार हो ब्राह्मण अतिथि वास करता है उस अल्पबुद्धि पुरुषकी ज्ञात और अज्ञात प्राप्य वस्तुओंकी प्राप्तिकी प्रार्थनाएं, उनके संयोगसे उत्पन्न फल, प्रिय वाणी प्रयुक्त फल, यागादि इष्ट एवं तालाब आदि पूर्त कर्म जन्य फल, पुत्र, पशु आदि सबको वह नष्ट कर देता है ।। ८ ।। आशाप्रतीक्षेऽनितिप्राप्येष्टार्थप्रार्थना आशा नितिप्राप्यार्थप्रतीक्षणं प्रतीक्षा ते अाशाप्रतीक्षे, संगतं तत्संयोगजं फलम् , सूनृतां च सूनृता हि प्रिया वाक्तन्निमित्तं च, इष्टापूर्ते इष्टं यागजं पूर्तमारामादिक्रियाजं फलम्, पुत्रपशंश्च सर्वानेतत्सर्वं यथोक्तं वृड क्त आवर्जयति विनाशयतीत्येतत्पुरुषस्याल्पमेध- सोऽल्पप्रज्ञस्य यस्यानश्नन्नभुञ्जानो ब्राह्मणो गृहे वसति । तस्मादनुपेक्षणीयः सर्वावस्थास्वप्यतिथिरित्यर्थः ॥८॥ एवमुक्तो मृत्युरुवाच नचिकेतसमुपगम्य पूजापुरःसरम्- तिस्रो रात्रीर्यदवात्सीयूँहे मे अनश्नन्ब्रह्मन्नतिथिर्नमस्यः । नमस्तेऽस्तु ब्रह्मन्स्वस्ति मेऽस्तु तस्मात्प्रति त्रीन्वरान्वृणीष्व ॥६॥ N जिसके घरमें निराहार हो ब्राह्मण अतिथि वास करता है उस अल्पबुद्धि पुरुषके 'पाशा-प्रतीक्षा' आशा-अज्ञात प्राप्तव्य इष्ट पदाथोंकी प्रार्थना तथा ज्ञात प्राप्य पदार्थोका प्रतीक्षण-प्रतीक्षा एवं उनके संयोगसे उत्पन्न फल, प्रियवाणी और तन्निमित्तक फल, 'इष्टापूर्त'-इष्ट-यागजन्यफल, पूर्त-उद्यानादि कर्मजन्य फल, समन पुत्र, तथा पशु पूर्वोक्त इन सबको वह नष्ट कर देता है। अतः तात्पर्य यह है कि अतिथि सभी अवस्थाओं में अनुपेक्षणीय है ॥ ८ ॥ मन्त्री प्रादि द्वारा इस प्रकार कहे जानेपर यमराजने पूजा पुरःसर नचिकेताके समीप जाकर कहा- सत्यानन्दीदीपिका 'इष्टं मे भूयात्' इस प्रकार अज्ञात अननुभूत इष्ट पदार्थकी प्रार्थना प्राशा है। अग्निहोत्रं तपस्सत्यं वेदानां चानुपालनम् । आतिथ्यं वैश्वदेवं च इष्टमित्यभिधीयते ।। बापीकूपतड़ागादि देवतायतनानि च । अन्नप्रदानमाराम: पूर्तमित्यभिधीयते ।। अग्निहोत्र, तप, सत्य, वेदोंका संरक्षण, अतिथि सत्कार और वैश्वदेव 'इष्ट' कहलाता है। बावड़ी, कुआं, तालाब, देवालय, बाग लगवाना तथा अन्नदान करना 'पूर्त' कहलाता है । इत्यादि कर्मजन्य फल उस अल्पमति पुरुषका नष्ट हो जाता है जिसके घर में ब्राह्मण अतिथि निराहार हो वास करता है, अत: अतिथि कदापि उपेक्षणीय नहीं है । इस मन्त्रमें पांच यज्ञोंमेंसे अतिथि पूजनरूप नृयज्ञकी महिमा बतलाई गई है ॥ ८ ॥ -- - जा142074 -Reskov मं० १०] भाषानुवाद-सत्यानन्दीदीपिका १५ - हे ब्रह्मन् ! [त्वं ] अतिथिः, नमस्यः ( पूजार्हः ) सन्नपि यत् मे गृहे तिस्रः रात्री: ( दिनत्रयम् ) अनश्नन् ( अभुञ्जानः) अवात्सीः ( वासमकार्षीः ) तस्मात् हे ब्रह्मन् ! ते ( तुभ्यं ) नमः अस्तु । मे ( मह्य) स्वस्ति ( मङ्गलम् ) अस्तु, प्रति (तिस्र; रात्री: प्रति ) त्रीन् वरान् वृणीष्व ( एकैकां रात्रि प्रति एकैकं वरं यथाभिलाषं प्रार्थयस्व ।।६।। हे ब्रह्मन् ! तुम्हें नमस्कार हो, मेरा कल्याण हो, तुम नमस्कारके योग्य अतिथि होकर भी मेरे घरमें तीन रात्रि भोजन किये विना रहे अतः एक एक रात्रिके लिए एक एक कर मुझसे तीन वर माँग लो॥ ६ ॥ तिस्रो रात्रीयद्यस्मादवात्सीरुषितवानसि गृहे मे ममानश्नन्हे ब्रह्मन्नतिथिः सन्नमस्यो नमस्काराहश्च तस्मान्नमस्ते तुभ्यमस्तु भवतु। हे ब्रह्मन्स्वस्ति भद्रं मेऽस्तु तस्माद्भवतोऽनशनेन मद्गृहवासनिमित्तादोषात्तत्प्राप्त्युपशमेन । यद्यपि भवदनुग्रहेण सर्वं मम स्वस्ति स्यात्तथापि त्वदधिकसंप्रसादनार्थमनशनेनोपो- षितामेकैकां रात्रिं प्रति त्रीन्वरान् वृणीष्वाभिप्रेतार्थविशेषान्प्रार्थयस्व मत्तः ॥९॥ नचिकेतास्त्वाह-यदि दित्सुर्वरान- प्रथमवर-पितृपरितोष शान्तसंकल्पः सुमना यथा स्याद्वीतमन्युौतमो माभि मृत्यो। त्वत्प्रसृष्ट माभिवदेत्प्रतीत एतत्त्रयाणां प्रथमं वरं वृणे ॥१०॥ हे मृत्यो ! गौतमो ( मम पिता ) शान्तसङ्कल्पः सुमना ( प्रसन्नमनाः ) मा अभि ( मा प्रति ) वीतमन्युः (विगतकोपश्च ) यथा स्यात् प्रतीतः ( स एवायं मम पुत्रः समागत इत्येवं लब्धस्मृतिः सः) त्वत्प्रसृष्टं ( त्वया प्रेषितं) मा अभि ( मां प्रति ) यथा वदेत्, एतत् त्रयाणां ( वराणां मध्ये ) प्रथम वरं वृणे ॥१०॥ हे मृत्यो ! जिससे मेरे पिता गौतम मेरे प्रति शान्तसङ्कल्प, प्रसन्नचित्त व क्रोध रहित हों, तथा आपके द्वारा भेजे जानेपर मुझे पहचान सकें एवं मुझसे बात चीत करें यह मैं [आपके दिये ] तीन वरोंमें प्रथम वर माँगता हूँ ।। १०॥ हे ब्रह्मन् ! क्योंकि अतिथि और नमस्या:-नमस्कार योग्य होकर भी तुम तोन रात्रि ( तीन दिन) विना कुछ भोजन किये मेरे घर में रहे हो, अतः तुम्हें नमस्कार हो । हे ब्रह्मन् ! मेरे घरमें विना भोजन किये आपके निवास निमित्तक दोषसे, उससे प्राप्त अनिष्ट फलकी शान्ति द्वारा मेरा स्वस्ति-मङ्गल-शुभ हो । यद्यपि आपके अनुग्रहसे मेरा सब प्रकार कल्याण हो जायगा, तथापि आपकी अधिक प्रसन्नताके लिए विना भोजन किये निवास की गई एक एक रात्रिके प्रति तुम मुझसे तीन वर-अपने अभीष्ट पदार्थ- शेिष माँग लो ॥६॥ नचिकेताने कहा-यदि वर देना चाहते हैं, तो- - - १६ कठोपनिषद्-शाङ्करभाष्य [अ० १ व० १ मं० १.१ .". - शान्तसंकल्प उपशान्तः संकल्पो यस्य मां प्रति यमं प्राप्य किं नु करिष्यति मम पुत्र इति स शान्तसंकल्पः सुमनाः प्रसन्नमनाश्च यथा स्याद्वीतमन्युर्विगत- रोपश्च गौतमो मम पिता माभि मां प्रति हे मृत्यो किं च त्वत्प्रसृष्टं त्वया विनिर्मुक्तं प्रेषितं गृहं प्रति मामभिवदेत्प्रतीतो लब्धस्मृतिः स एवायं पुत्रो ममागत इत्येवं प्रत्यभिजानन्नित्यर्थः। एतत्प्रयोजनं त्रयाणां प्रथममाद्य वरं वृणे प्रार्थये यत्पितुः परितोषणम् ।। १० ।। मृत्युरुवाच- यथा पुरस्ताद्भविता प्रतीत प्रौद्दालकिरारुणिमत्प्रसृष्टः । सुख* रात्रीः शयिता वीतमन्युस्त्वां ददृशिवान्मृत्युमुखात्प्रमुक्तम् ११ मारुणिः (अरुणस्यापत्यं पुमान् ) प्रौद्दालकिः ( उद्दालक एवं प्रौद्दालकिा ) पुरस्तात् ( यमालये भागमनात् प्राक् ) [ त्वयि ] यथा प्रतीतः ( स्नेहवान् मासीत् मत्प्रसृष्टः ( मया अनुज्ञातः सन् ) मृत्युमुखात् (मम अधिकारात् ) प्रमुक्त (विमुक्त त्वां ददृशिवान् ( दृष्टवान् सन् ) वीतमन्युः ( गत कोपः भविता स्यात् ) रात्रीः सुखं शयिता ( सुखेन निद्रितो भविता ) ॥ ११ ॥ मुझसे प्रेरित हो तुम्हारे पिता अरुणपुत्र प्रौद्दालकि तुझे पूर्ववत् पहचान लेगा पौर शेष रात्रियों में सुखपूर्वक सोवेगा, क्रोध रहित हो तुमको मृत्युसुखसे मुक्त हुआ देखेगा ॥ ११ ॥ जिस प्रकार मेरे पिता मेरे प्रति शान्तसङ्कल्प उपशान्त सङ्कल्पवाला हों-'न जाने मेरा पुत्र यमराजके पास जाकर क्या करेगा' सुमना:-प्रसन्नचित्त और वीतमन्यु- क्रोध रहित हों और हे मृत्यो! आपसे भेजे हुए घरकी ओर जानेके लिए विमुक्त किये मुझसे विश्वस्त लब्ध स्मृति हों कि 'यह वही मेरा पुत्र मेरे पास आया है ऐसा जानकर मेरे साथ सम्भाषण करें' यह अपने पिताका प्रसन्नतारूप प्रयोजन ही मैं अपने तीन वरोंमेंसे प्रथम वर मांगता हूँ ॥ १० ॥ मृत्युने कहा- सत्यानन्दीदीपिका मेरे पिता 'मेरा पुत्र यमके पास जाकर क्या करेगा' इस प्रकारकी मोहजन्य मानसिक उद्विग्नता एवं मुझपर किया क्रोध दोनोंसे रहित हो और आपके द्वारा मुक्त हुए घर चले जानेपर यह न समझे कि यह प्रेत होकर पाया है किन्तु यह वही मेरा नचिकेता पुत्र है, ऐसा समझकर मेरे साथ पूर्ववत् सस्नेह व्यवहार करे। प्रथमवरसे यही मांगता । इस मन्त्रसे पिताके प्रति पुत्रकी कर्तव्यनिष्ठा सूचित की गई है ।। १० ।। mer i sveitza talno (7 12-12/07-1-1 ( . ( व०१] भाषानुवाद-सत्यानन्दीदीपिका . यथा बुद्धिस्त्वयि पुरस्तात् पूर्वमासीत्स्नेहसमन्विता पितुस्तव भविता प्रीतिसमन्वितस्तव पिता तथैव प्रतीतवान्सलौदालकिः, उद्दालक एवौदालकिः । अरुणस्यापत्यमारुणिः, द्वथामुष्यायणो वा। मत्प्रसृष्टो मयानुज्ञातः सन् इतरा अपि रात्रीः सुखं प्रसन्नमनाः शयिता स्वप्ता वीतमन्युर्विगतमन्युश्च भविता स्यात्त्वां पुत्रं ददृशिवान्दृष्टवान्स मृत्युमुखान्मृत्युगोचरात्प्रमुक्तं सन्तम् ॥ ११ ॥ नचिकेता उवाच- स्वर्गे लोके न भयं किंचनास्ति न तत्र त्वं न जरया बिभेति । उभे तीर्वाशनायापिपासे शोकातिगो मोदते स्वर्गलोके ।।१२।। स्वर्गलोके किञ्चन ( किञ्चिदापि ) भयं नास्ति । तत्र ( स्वर्गलोके ) त्वं ( मृत्यु: ) न, न च जरया ( वृद्धावस्थया युक्तः सन् ) बिभेति । उभे अशनायापिपासे तीळ (अतिक्रम्य ) शोकातिग: ( शोकम् अतिक्रान्तः सन् ) स्वर्गलोके मोदते ( हृष्यति- सुखमनुभवति ) ॥ १२ ॥ हे यम ! स्वर्गलोकमें कुछ भी भय नहीं है। वहाँ श्राप नहीं हैं अर्थात् मापका भी प्रभाव नहीं है और जरासे कोई नहीं डरता, पुरुष स्वर्गलोकमें भूख-प्यास दोनोंका अतिक्रमण कर शोकसे मुक्त हो आनन्दित होता है ॥ १२ ॥ तुम्हारे पिताकी बुद्धि जिस प्रकार पूर्व तुम्हारे प्रति स्नेह युक्त थी उसी प्रकार मुझसे अनुज्ञात हो-अनुग्रह प्राप्त कर जानेपर वह प्रौद्दालकि प्रीतियुक्त हो तुम्हारे प्रति विश्वस्त हो जायगा। यहाँ उद्दालक ही प्रौदालिक है तथा अरुणका पुत्र होनेसे वह आरुणि है, अथवा यह भी हो सकता है कि वह द्वयामुष्यायण हो। वह शेष रात्रियोंमें - भी सुख पूर्वक-प्रसन्नमनसे शयन करेगा और क्रोध रहित हो जायगा, तथा वह तुम पुत्रको मृत्युमुखसे-मृत्यु अधिकारसे मुक्त हुआ देखनेवाला होगा ॥ ११ ॥ नचिकेता बोला- सत्यानन्दीदीपिका वयस एव वायसके समान उद्दालक एव प्रौद्दालकि यहाँ भी स्वार्थमें ही तद्धित प्रत्यय है अथवा जो किसी प्रसिद्ध व्यक्तिका पुत्र और दूसरे द्वारा गोद ( दत्तक) लिया हो वह 'द्वयामुष्यायण' कहलाता है । एक ही पुत्र दो पिताओंद्वारा अपना उत्तरा- धिकारी निश्चित किया जाता है । वह एक ही दोनों पित्ताओंकी सम्पत्तिका स्वामी और पिण्डदान देनेका अधिकारी होता है, अत: अकेले वाजश्रवसको औद्दालकि और रुणि कहने से यह सम्भव है कि वह उद्दालक और अरुण दो पिताओंका उत्तरा- टो।। ०७॥ IBIMARAEID- MORE DHARIDAaramam - [अ०१ MAINARuammaMDMRMAartDMRORENA १८ कठोपनिपद्-शाङ्करभाष्य स्वर्गे लोके रोगादिनिमित्तं भयं किंचन किंचिदपि नास्ति न च तत्र त्वं मृत्यो सहसा प्रभवस्यतो जरया युक्त इह लोकवत्त्वत्तो न बिभेति कुतश्चित्तत्र । किंचाभे अशनायापिपासे तीवतिक्रम्य शोकमतीत्य गच्छतीति शोकातिगः सन्मानसेन दुःखेन वर्जितो मोदते हृष्यति स्वर्गलोके दिव्ये ॥ १२ ॥ स त्वमग्नि स्वर्गामध्येषि मृत्यो प्रब्रूहि त्व श्रद्दधानाय मह्यम् । स्वर्गलोका अमृतत्वं भजन्त एतद्वितीयेन वृणे वरेण ॥१३॥ हे मृत्यो ! स त्वं स्वयं (स्वर्गसाधनम् अग्निम्, अध्येषि जानासि ) [ तम् अग्नि ] श्रद्दधानाय ( श्रद्धावते ) मह्यं त्वं प्रब्रूहि ( कथय ) स्वर्गलोकाः ( स्वर्गों लोको येषां ते अमृतत्वं ( देवत्वं ) भजन्ते ( प्राप्नुवन्ति ) एतद् अग्निविज्ञानं ) द्वितीयवरेण वृणे प्रार्थयेयम् ) ॥ १३ ॥ हे यम ! भाप स्वर्गके साधनभूत अग्निको जानते हैं। सो मुझ श्रद्धालुके प्रति उसका उपदेश-वर्णन कीजिए। जिसके द्वारा स्वर्गको प्राप्त पुरुष अमृतत्व प्राप्त करते हैं, दूसरे घरसे मैं यही मांगता हूँ ।। १३ ।। स्वर्गलोको रोगादि निमित्तक किञ्चिदपि भय नहीं है । हे मृत्यो! वहाँ आपका भी सहसा प्रभाव नहीं पड़ता, अतः इस लोकके समान वहाँ वृद्धावस्थासे युक्त हो किसी प्रकार भी कोई शापसे भग भीत नहीं होता। किन्तु पुरुष भूख प्यास दोनोंका अतिक्रमण कर एवं शोकको अतिक्रान्त कर शोकातीत हो अर्थात् मानसिक दुःखसे रहित होकर दिव्य स्वर्गलोकमें हर्षित होता है अर्थात् सुखका अनुभव करता है ।।१२।। सत्यानन्दीदीपिका इस मन्त्र में स्वर्गलोककी विशेषता कही गई है, दुःख बाहुल्य लोक नरक और सुख बाहुल्य लोक स्वर्ग कहलाता है। मृत्युलोकसे सम्बन्ध विच्छिन्न होने पर पुण्योंके तारतम्यने पुमानमा लोग क्रमश: भुवः स्वः आदि दिव्य लोकों में सुख भोगार्थ जाते हैं। पे सब लोक उत्तरोत्तर अधिक दिव्ध एवं सुख पूर्ण हैं। स्वर्ग सुख की विचित्रता यह है वहाँ पुग्धारमाओंको शन्दादि विषयके उपभोगकी जब कभी इच्छा होती है उसी समय वह सब उपलब्ध हो जाता है, वहांके विषय एवं भोगायतन शरीर भी दिव्य होते हैं अर्थात् दिव्य विषयोंको भोगनेके लिए उन पुण्यात्मानोंको दिव्य शरीर प्राप्त होते हैं। मृत्युलोकके समान किसी पदार्थक अभाव जन्य दुःखका अनुभव नहीं होता। इस विषय में शास्त्रों में ऐसा कहा गया है धन्न दुःखेन संभिन्न न च ग्रस्तमनन्तरम् । अभिलाषोपनीतं च तत्सुखं स्वः पदास्पदम् ।। 'जो सुख दुःखसे मिश्रित नहीं है, विघ्न बाधाओंसे ग्रस्त भी नहीं है, इच्छा करते पदार्थ प्राप्त हो जाता है वह सुख स्वर्ग पदवाच्य है ।। १२ ।। - mtoon ०१] भाषानुवाद-सत्यानन्दीदीपिका १४ एवंगुणविशिष्टस्य स्वर्गलोकस्य प्राप्तिसाधनभूतमग्नि स त्वं मृत्युरध्येषि रसि जानासीत्यर्थः, हे मृत्यो यतस्त्वं प्रवहि कथय श्रद्दधानाय श्रद्धावते मां गिर्थिने, येनाग्निना चित्तेन स्वर्गलोकाः स्वर्गों लोको येषां ते स्वर्गलोकाः जमाना अमृतत्वममरणतां देवत्वं भजन्ते प्राप्नुवन्ति । तदेतदग्निविज्ञानं तीयेन वरेण वृणे ॥ १३ ॥ मृत्योः प्रतिज्ञेयम्- प्र ते ब्रवीमि तदु मे निबोध स्वर्यमग्नि नचिकेतःप्रजानन् । अनन्तलोकाप्तिमथो प्रतिष्ठां विद्धि त्वमेतं निहितं गुहायाम् ॥१४॥ हे नचिकेता ! [अहं ] स्वय॑म् अग्नि प्रजानन् (विशेषेण जानन् ) ते ( तुभ्यं ) वीमि ( प्रवच्मि ) तत् उ (एव) मे ( मत्सकाशात् ) निबोध, त्वम् एतम् (उक्तरूपम् 'नम् ) अनन्तलोकाप्ति ( स्वर्गलोकस्य प्राप्तिसाधनम् ) अथो (अषि ) प्रतिष्ठां ( जगतः प्रयं ) गुहायां ( विदुषां बुद्धौ ) निहितं (नितरां स्थितम् ) विद्धि (जानीहि) ॥१४॥ हे नचिकेता ! स्वर्ग के साधनभूत उस अग्निको भली-भाँति जानता हुआ मैं को कहता हूँ। तुम समाहित चित्त हो उसे मुझसे अच्छी तरह जानो। इसे तुम 'त लोककी प्राप्तिका साधन, उसका आधार और बुद्धिरूप गुहामें स्थित जानो ।।१४।। प्र ते तुभ्यं प्रब्रवीमि, यत्त्वया प्रार्थितं तदु मे मम वचसो निबोध बुध्यस्वै- मनाः सन्स्वयं स्वर्गाय हितं स्वर्गसाधनमग्निं हे नचिकेतः प्रजानन्विज्ञात- हं सन्नित्यर्थः। प्रब्रवीमि तन्निबोधेति च शिष्यबुद्धिसमाधानार्थं वचनम् । हे यम ! आप [ भय, मरण, भूख प्यास, शोकरहित ] ऐसे गुण विशिष्ट स्वर्ग- की प्राप्तिके साधनभूत अग्निको स्मरण रखते हैं अर्थात् जानते हैं ऐसा अर्थ है । व स्वर्गार्थी श्रद्धालु मुझको उसका वर्णन कीजिए। जिस अग्नि के चयनसे स्वर्गको करनेवाले अर्थात् स्वर्गलोक है जिनका ऐसे स्वर्गलोका-यजमान अमृतत्व-अमरणता- 'वको प्राप्त हो जाते हैं । इस अग्निविज्ञानको मैं द्वितीय वरसे माँगता हूँ ॥ १३ ॥ यह यमकी प्रतिज्ञा है- हे नचिकेता ! जिसके लिए तुमने प्रार्थना की थी उस स्वयं-स्वर्गके लिए हितरूप : स्वर्ग के साधन भूत अग्निको तू एकाग्रचित्त हो मेरे वचनसे निबोध-भली-भाँति । उसे सम्यक् प्रकार जानता हुश्रा उसका मैं विशेषज्ञ, मैं तेरे प्रति उसको कहता अबवीमि तन्निबोध' 'मैं कहता हूँ तू उसे जान' ये वाक्य शिष्यकी बुद्धिको समाहित सत्यानन्दीदीपिका आदि लोकोंकी अपेक्षा दीर्घकाल स्थायी होनेसे स्वर्गलोकको अनन्त कहा गया आभूतसम्प्लवममृतत्वं प्रचक्षते' (प्रलय पर्यन्त स्थायी होनेसे स्वर्गलोकको अमृत SASUR GaurCHEATERIACADITar - . -- - कठोपनिषद्-शाङ्करभाष्य [अ० अधुनाग्नि स्तौति । अनन्तलोकाप्तिं स्वर्गलोकफलप्राप्तिसाधनमित्येतत , अर्थ अपि प्रतिष्ठामाश्रयं जगतो विरारूपेण, तमेतमग्नि मयोच्यमानं विद्धि जानी त्वं निहितं स्थितं गुहायां विदुपां बुद्धौ निविष्टमित्यर्थः ।। १४ ॥ इदं श्रुतेर्वचनम्- लोकादिग्नि तमुवाच तस्मै या इष्टका यावतीर्वा यथा वा। M स चापि तत्प्रत्यवदद्यथोक्तमथास्य मृत्युः पुनरेवाह तुष्टः ।।१५ [ यमः ] तस्मै ( नचिकेतसे ) लोकादि ( लोकानां आदि प्रथम ) तं ( प्रसिद्धम् अग्निम् ( अग्नि विज्ञानम् ) उवाच ( उक्तवान् ) याः ( यत्स्वरूपाः ) यावती: ( या संख्यकाः ) या इष्टिका ( चेतव्याः) यथा ( येन प्रकारेण ) वा [ अग्निः चीयते स: ( नचिकेता) च अपि तत् ( मृत्युना कथितं) यथोक्त' ( यथावत् ) प्रत्यवा ( अनूदितवान् ) अथ (अनन्तरं ) मृत्युः तुष्टः ( सन्तुष्टः सन् ) पुन: एव ( अपि ) नचिकेतस ) आह ।। १५ ।। तब यमराजने लोकोंके आदि प्रथम उस अग्निका तथा उसके चयन करने में जै और जितनी ईटें होती हैं तथा जिस प्रकार उसका चयन किया जाता है उन स. नचिकेताके प्रति वर्णन कर दिया। उस नचिकीताने भी जैसा उस यमराजसे कहा ग था वह सब सुना दिया, इससे प्रसन्न हो मृत्यु नचिकेतासे फिर भी बोला ।। १५ ।। लोकादिं लोकानामादिं प्रथमशरीरित्वादग्नि तं प्रकृतं नचिकेतसा प्रार्थि मुवाचोक्तवान्मृत्युस्तस्मै नचिकेतसे । किं च या इष्टकाश्चेतव्याः स्वरूपे करनेके लिए हैं। अब उस अग्निकी स्तुति करते हैं। जो अनन्तलोकाप्ति-स्वर्गलोक फलकी प्राप्तिका साधन तथा विरारूपसे जगत्की प्रतिष्ठा-प्राश्रय है। मेरे द्वारा हुए उस इस अग्निको तू गुहामें अर्थात् विद्वानोंको बुद्धिरूपगुहामें स्थित-निविष्ट ज यह अर्थ है ॥ १४ ॥ यह श्रुतिका वचन है- प्रथम शरीरी होनेके कारण लोकोंके आदिभूत नचिकेतासे प्रार्थित उस प्र अग्निको यमराजने उस नचिकेताके प्रति कह दिया। तथा स्वरूपसे जिस प्रकारकी ३ सत्यानन्दीदीपिका एवं अनन्त कहा गया है ) यह पुराणवचन है। अतः स्वर्गमें सापेक्ष अनन्तत्व 'मनन्तलोकाप्तिमयो प्रतिष्ठा' 'अग्नि जगत्की प्रतिष्ठा है' यमराजकी इस प्रतिज्ञा माधार यह श्रुतिवाक्य है--'स त्रेधाऽऽत्मानं व्यकुरुत' उसने अपने को तीन प्रकार : अर्थात् अग्नि, वायु भौर आदित्यरूपसे समष्टिरूप विराड ही अवस्थित है। इस प्रह विरारूपसे अग्नि ही जगत्की प्रतिष्ठा कही गई है । वस्तुतः नक्षत्रादि अनेकरूपसे प्र ही जगतका धारक है ॥ १४ ॥ LAINTS 1 अ० Aware MADRASIDDHARMINOR:- २२ कठोपनिषद्-शाङ्करभाष्य केतसः संज्ञया प्रसिद्धः ) भविता ( भविष्यति ) इमाम् अनेकरूपां (विचित्रां ) सह ( शब्दवती माला ) गृहाण ( स्वीकुल ) ॥ १६ ॥ महात्मा यमने प्रसन्न हो उससे कहा- अब मैं इस विषयमें पुन: तुझे एक अन्य ३ भी प्रदान करता हूँ। यह अग्नि तेरे ही नामसे प्रसिद्ध होगी और तू इस अनेक रूपवार मालाको ग्रहण कर ।। १६ ।। तं नचिकेतसमब्रवीत्प्रीयमाणः शिष्ययोग्यतां पश्यन्प्रीयमाणः प्रीतिमनु भवन्महात्माक्षुद्रबुद्धिर्वरं तव चतुर्थमिह प्रीतिनिमित्तमद्येदानीं ददामि भूयः पुर प्रयच्छामि । तवैव नचिकेतसो नाम्ना विधानेन प्रसिद्धो भविता मयोच्यमा नोऽयमग्निः । किं च मृतां शब्दवती रत्नमयीं मालाभिमामनेकरूपां विचित्रं गृहाण स्वीकुरु । यद्वा सङ्कामकुत्सितां गतिं कर्ममयीं गृहाण । अन्यदपि कर्मविज्ञानमनेकफलहेतुत्वात्स्वीकुर्वित्यर्थः ॥ १६ ॥ किस प्रकार कहा- अपने शिष्यको योग्यताको देखकर प्रसन्न हुए प्रीतिका अनुभव करते हुए महात्मा उदार बुद्धि यमने नचिकेतासे कहा-अब मैं प्रसन्नताके कारण तुझे पुनरपि यह अन्य चतुर्थ वर देता हूँ। मेरे द्वारा कही हुई यह अग्जि तुझ नचिकेताके ही नामसे प्रसिद होगी। तथा तू ईस शब्द करनेवाली रत्नमयी अनेकरूपा विचित्रवर्णा मालाको मैं ग्रहण-स्वीकार कर । अथवा सृङ्घा अर्थात् कर्ममयी अनिन्दिता गतिको ग्रहण कर। तात्पर्य यह है कि अनेक फलका कारण होनेसे तू मुझसे अन्य कर्मविज्ञानको स्वीकृतकर, यह अर्थ है ॥ १६ ॥ सत्यानन्दीदीपिका जैवकर्म कहा है, इन दोनोंसे पृथक् ऐशकर्म है जिसमें नचिकेताको यमराज ले जाना चाहते हैं ॥ १५ ॥ यमराजकी कृपासे नचिकेताको देवत्व प्राप्त होने के कारण उसे माला दी जा रही है, नील, पीत आदि अनेक रूपोंवाली होनेसे माला अनेकवर्णा है। गत्यर्थक सृज्धातुसे- सृङ्का शब्द निष्पन्न हुआ है, अत: वह अनिन्दितागति-धूमादि और अचिरादिगति द्वारा अनेक फलोंको प्राप्त करानेवाली है। फल भेदसे अनेकरूप शास्त्र प्रसिद्ध कर्मविज्ञानको भी ग्रहण कर अर्थात् प्रसन्न होकर यमराजने नचिकेताको समस्त कर्मविषयक ज्ञान प्रदान किया । जब असाधारण पुण्यशाली जीव अपने असाधारण कर्मादिके प्रभावसे मनुष्य श्रेणीसे देवत्व श्रेणीमें प्रविष्ट होता है । तब वह देवभाव प्राप्तकर ऐशकर्मके अधीन हो जाता है। जिस कर्मद्वारा दैवजगत्की शृङ्खला स्थिर रहती है उसे ऐशकर्म कहा गया है। जिस नियमके अनुसार सूर्य, चन्द्रमाका उदय-अस्त, ऋतुओं का परिवर्तन २३ सामान दृष्ट्वा ) इमा व०१] भाषानुवाद-सत्यानन्दीदीपिका पुनरपि कर्मस्तुतिमेवाह- त्रिणाचिकेतस्त्रिभिरेत्य सन्धिं त्रिकर्मकृत्तरति जन्ममृत्यू । ब्रह्मजज्ञं देवमीड्य विदित्वा निचाय्येमा शान्तिमत्यन्तमेति ॥१७॥ त्रिभिः ( त्रिभिः सह ) सन्धि ( सन्धान सम्बन्धम् ) एत्य (प्राप्य ) निणाचिकेता (त्रिःकृत्व! नाचिकेता अग्नि चितः येन सः ) त्रिधर्मकृत् जन्ममृत्यू तरति (अतिक्रामति) ईडय ( स्तुत्यं) ब्रह्मजज्ञं देवं विदित्वा (ज्ञात्वा ) निधाय्या (प्रात्मभानेन शान्ति अत्यन्तम् एति ( अतिशयेन प्राप्नोति ) ॥ १७ ॥ त्रिणाचिकेत अग्निका तीन वार चयन करनेवाला मनुष्य [ माता पिता और आचार्य इन] तीनोंसे सम्बन्धको प्राप्त होकर जन्म मृत्युका अतिक्रमण कर जाता है तथा ब्रह्मसे उत्पन्न ज्ञानवान् एवं स्तुतियोग्य देवको जानकर और उसे पात्मरूपसे अनुभवकर इस स्वबुद्धिप्रत्यक्ष अत्यन्त शान्तिको प्राप्त हो जाता है ॥ १७ ॥ त्रिणाचिकेतस्त्रिः कृत्वो नाचिकेतोऽग्निश्चितो येन स त्रिणाचिकेतस्तद्विज्ञा- नस्तदध्ययनस्तदनुष्ठानवान्वा । त्रिभिर्मातृपित्राचार्यरेत्य प्राप्य सन्धिं सन्धान सम्बन्धं मात्राद्यनुशासनं यथावत्प्राप्येत्येतत् । तद्धि प्रामाण्यकारणं श्रुत्यन्त- रादवगम्यते यथा 'मातृमान्पितृमानाचार्यवान्यात्' (बृह० ४।१।२ ) इत्यादेः। यमराज फिर भी कर्मकी स्तुति ही करते हैं--- जिसने तीन वार नाचिकेत अग्निका चयन किया है वह त्रिणाचिकेता है। अथवा उसका ज्ञान, अध्ययन और अनुष्ठान करनेवाला विणाचिकेता है। वह त्रिणाचिकेत माता, पिता तथा प्राचार्य इन तीनोंसे सन्धि-सन्धान-सम्बन्धको प्राप्त होकर अर्थात् यथाविधि माता आदिके द्वारा उपदेश-शिक्षा प्राप्तकर, क्योंकि एक अन्य श्रुतिसे उनका उपदेश धर्मज्ञानकी प्रामाणिकतामें हेतु अवगत होता है, जैसा कि 'माता, पिता और सत्यानन्दीदीपिका होता है और अष्टवसु, द्वादश आदित्य, एकादश रुद्र तथा स्वयं यमराज महत् देवपदवी प्राप्तकर अपने अपने धर्मका पालन करते हैं, वे सब ऐशकर्मके अधीन हैं। अब तक नचिकेता जैवकर्मके अनुसार मृत्युलोकके भोगोपयोगी कर्मगतिसे सम्बन्धित थे अब यमराजके अनुग्रहसे वह देवत्वके अधिकारी हो गये, उनका सम्बन्ध अब ऐशकर्म के साथ हो गया, उनके नामसे विशेष अग्नि अभिहित होगी तथा यज्ञादिमें भी उनके नामका सम्बन्ध रहेगा ।। १६ ।। यज्ञ-ज्योतिष्टोमादि याग, यथा 'दर्शपूर्णमासाभ्यां यजेत' 'ज्योतिष्टोमेन यजेत' इत्यादि यागोंका विधान है। 'स्वाध्यायोऽध्येतव्यः' इस स्वाध्यायविधिसे वेदाध्ययनका । ग्रहण है। 'बहिर्वेदिदीयमानं दानम् यज्ञवेदिसे बाहर दिया धन प्रादि दान और यज्ञ. - AME । o - कठोपनिषद्-शाङ्करभाष्य [अ०१ वेदस्मृतिशिष्टेवा प्रत्यक्षानुमानागमैर्वा, तेभ्यो हि विशुद्धिः प्रत्यक्षा, त्रिकर्म- कृदियाध्ययनदानानां कर्ता तरत्यतिक्रामति जन्ममृत्यू । किं च ब्रह्मजज्ञं ब्रह्मणो हिरण्यगीजातो ब्रह्मजः, ब्रह्मजश्वसौ ज्ञश्चेति ब्रह्मजज्ञः सर्वज्ञो ह्यसौ। तं देवं द्योतनाज्ञानादिगुणवन्तमीड्यं स्तुत्यं विदित्वा शास्त्रतो निचाय्य दृष्ट्वा चात्मभावनेमा स्वबुद्धिप्रत्यक्षा शान्तिमुपरतिमत्यन्तमेत्यतिशयेनैति । वैराज पर्द ज्ञानकर्मलमुभवानुष्ठानेन प्राप्नोतीत्यर्थः ॥ १७ ॥ इदानीमग्निविज्ञानचयनफलमुपसंहरति प्रकरणं च- त्रिगाचिकेतस्त्रयमेतद्विदित्वा य एवं विद्वा*श्चिनुते नाचिकेतम् । स मृत्युपाशान्पुरतः प्रणोद्य शोकातिगो मोदते स्वर्गलोके ॥१८॥ पविणाचिकेत: एतत् ( यथोक्त ) अयं विदित्वा (ज्ञात्वा) नाचिकेतसम् (अग्निम्) पवार ( एवं प्रकारेण ) विद्वान् चिनुते ( निवर्तयति ) स: पुरतः ( शरीरपातात्पूर्व ) पावाधान अर्थात् तीनोंसे शिक्षित पुरुष कहे' इत्यादि श्रुति है । अथवा वेद, स्मृति मौर मिष्टपुरुषों अथवा प्रत्यक्ष, अनुमान और आगमसे सम्बन्ध प्राप्तकर यज्ञ, अध्ययन, था बान इन लोनों कर्मोका कर्ता जन्ममृत्युका अतिक्रमण कर जाता है, क्योंकि तीनोंसे या सष्ट शुद्धि होती है । 'ब्रह्मजज्ञ' ब्रह्मसे-हिरण्यगर्भसे उत्पन्न हुमा ब्रह्मज है वह बाड ही शर्बज्ञ है, प्रकाशमान होनेसे देव, ज्ञानादिगुण विशिष्ट होनेसे ईड्य-स्तुतिके म है उसे शास्त्रसे जानकर और निचाय्य' प्रात्मभावसे अनुभवकर अपनी बुद्धि से स्वक्षनानेवाली इस प्रात्यन्तिक शान्ति-उपरतिको अतिशयसे प्राप्त हो जाता है अर्थात हान-उपासना और कर्म के समुच्चय अनुष्ठान करनेसे वैराजपदको प्राप्त हो जाता है परमार्थ है।। १७ ॥ सत्यानन्दीदीपिका कादिक मन्दर ऋत्विजोंको दिया धन आदि दक्षिणा कहलाता है। 'विशत्यधिकानि समानाष्टानां संख्या संवत्सरस्य च प्रातःसायंकालयोरनुष्टीयमानान्यग्निहोत्राणि अवस्थाका लेन' संवत्मरमें प्रात: और सायंकालमें अनुष्ठित अग्निहोत्रोंकी संख्या होती है, तदनुसार यागमें इष्टकाओंकी संख्या भी ७२० है। जिस प्रकार इष्ट- का नत, चयन किया जाता है, तथा शास्त्रोंमें फलभेदसे अनेक कर्मोका विधान है, ब: सब मारहस्य बमराजने नचिकेताको समझा दिया, नचिकताने भी उन सबको भली- संगम कर लिया। वैज्ञादि अथवा प्रत्यक्षादि प्रमाणोंसे धर्मादिका भलीभांति मान होना ही यहाँ विशुद्धि है, धर्मादि अतीन्द्रिय हैं, अत: उनका ज्ञान वेदादि द्वारा ही मा है। इस विषयमें 'प्राचार्यवान् पुरुषोवेद' (छा० ) इत्यादि श्रुति भी है ॥ १७ ॥ .
[अ०१ कठोपनिषद्-शाङ्करभाष्य वेदम्मृतिशिष्टेवा प्रत्यक्षानुमानागमैर्वा, तेभ्यो हि विशुद्धिः प्रत्यक्षा, त्रिकर्म- कृदिज्याध्ययनदानानां कर्ता तरत्यतिक्रामति जन्ममृत्यू । किं च ब्रह्मजज्ञं ब्रह्मणो हिरण्यगभांजातो ब्रह्मजः, ब्रह्मजश्चसौ ज्ञश्चेति ब्रह्मजज्ञः सर्वज्ञो ह्यसौ। तं दे द्योतनामानादिगुणवन्तमीड्यं स्तुत्यं विदित्वा शास्त्रतो निचाय्य दृष्ट्वा चात्मभावनेमा स्वबुद्धिप्रत्यक्षां शान्तिमुपरतिमत्यन्तमेत्यतिशयेनैति । वैराजं पदं ज्ञानकर्मसमुञ्चबानुष्ठानेन प्राप्नोतीत्यर्थः ॥ १७ ॥ इदानीमग्निविज्ञानचयनफलमुपसंहरति प्रकरणं च- गानिकेतसयमेतद्विदित्वा य एवं विद्वा*श्चिनुते नाचिकेतम् । २१ मृल्पावापुरत: प्रणोद्य शोकातिगो मोदते स्वर्गलोके ॥१८॥ निमावि केन: एतत् ( यथोक्त ) अयं विदित्वा (ज्ञात्वा) नाचिकेतसम् (अग्निम्) एवम् { प्रकारेरण ) विद्वान् चिनुते ( निवर्तयति ) सः पुरतः ( शरीरपातात्पूर्व ) पाचा धान भवति तीनोंसे शिक्षित पुरुष कहे' इत्यादि श्रुति है। अथवा वेद, स्मृति और मिटर पर अथवा प्रत्यक्ष, अनुमान और आगमसे सम्बन्ध प्राप्तकर यज्ञ, अध्ययन, वा मान्न इन तीनों कर्माका कर्ता जन्ममृत्युका अतिक्रमण कर जाता है, क्योंकि तीनोंसे दाद होती है । 'ब्रह्मजज्ञ' ब्रह्मसे-हिरण्यगर्भसे उत्पन्न हुआ ब्रह्मज है वह ही मान है, प्रकाशमान होनेसे देव, ज्ञानादिगुण विशिष्ट होनेसे ईड्य-स्तुतिके जोदासे जानकर और 'लिचाय्य' प्रात्मभावसे अनुभवकर अपनी बुद्धिसे कामवाली इस यात्वन्तिक शान्ति-उपरतिको अतिशयसे प्राप्त हो जाता है अर्थात हार-जमाना और कर्मक समुच्चय अनुष्ठान करनेसे वैराजपदको प्राप्त हो जाता है Xxt:luseless का सत्यानन्दीदीपिका २ को दिया धन आदि दक्षिणा कहलाता है। 'विशत्यधिकानि म. १गंवत्सरस्थ च प्रातःसायंकालयोरनुष्टीयमानान्यग्निहोत्राणि १ . " : "रम प्रात: और सायंकालमें अनुष्ठित अग्निहोत्रोंकी संख्या . . . . . . यामम इकाओंकी संख्या भी ७२० है। जिस प्रकार इष्ट- २९) । वाहन किया जाता है, तथा शास्त्रोंमें फलभेदसे अनेक कर्मोंका विधान है, और मानचिताको समझा दिया, नचिकताने भी उन सबको भली- असे ना !! वेशदि अथवा प्रत्यक्षादि प्रमाणोंसे धर्मादिका भलीभाँति शुद्धि है, यदि श्रतोन्द्रिय हैं, अत: उनका ज्ञान वेदादि द्वारा ही । यस अवार्षचान पुरुषोवेद' ( छा० ) इत्यादि श्रुति भी है ।। १७ ।।
- व०१] भाषानुवाद-सत्यानन्दीदीपिका मृत्युपाशान् (अधर्मादीन् ) प्रणोद्य ( निरस्य ) शोकातिगः ( शोकातीत: सन् ) स्वर्ग- लोके मोदते ( सुखं प्राप्नोति ) ॥ १८ ॥ जो त्रिणाचिकेत विद्वान् अग्निके इस त्रयको ( कैसी इंटे हों, कितनी संख्या में हों और किस प्रकार अग्निका चयन किया जाय इसको ) जानकर नाचिकेत अग्निका चयन करता है, वह देहपातसे पूर्व अधर्मादि मृत्युबन्धनोंको छिन्नकर शोकसे मुक्त हो स्वर्ग- लोकमें श्रानन्दित होता है ।। १८ ।। त्रिणाचिकेतस्त्रयं यथोक्तं या इष्टका यावतीर्वा यथा वेत्येतद् विदित्वावगम्य यश्चैवमात्मरूपेणाग्नि विद्वांश्चिनुते निवर्तयति नाचिकेतमग्नि क्रतुं स मृत्युपा- शानधर्माज्ञानुरागद्वेषादिलक्षणान्पुरतः अग्रतः पूर्वमेव शरीरपातादित्यर्थः, प्रणोद्यापहाय शोकातिगो मानसैदुःखैर्वर्जित इत्येतत् । मोदते स्वर्गलोके वैराजे विराडात्मस्वरूपप्रतिपत्त्या ॥ १८ ॥ एष तेऽग्निर्नचिकेतः स्वग्र्यो यमवृणीथा द्वितीयेन वरेण । एतमग्नि तवैव प्रवक्ष्यन्ति जनासस्तृतीयं वरं नचिकेतो वृणीष्व ॥१६॥ हे नचिकेतः ! ते ( तुभ्यम् ) एष स्वर्ग्य: ( स्वर्गसाधनभूतः) अग्निः (अग्निः सम्बद्धः वरः) [ दत्तः ] यं (वरं) द्वितीयेन वरेण प्रवृणीथाः ( वृत्तवान् असि ) जनासः ( जनाः) एतम् अग्नि तव एव [ नाम्ना] प्रवक्ष्यन्ति । [अधुना ] हे नचिकेतः तृतीयम् (अवशिष्टं ) वरं तृणीष्व ॥ १६ ॥ हे नचिकेता ! तूने द्वितीयवरसे जिसका वरण किया था स्वर्गके साधनभूत उस इस अग्निका उपदेश तुझे कर दिया। लोग इस अग्निको तेरे ही नामसे कहेंगे। हे नचिकेता ! अब अवशिष्ट तृतीय वर माँगले ॥ १६ ॥ एष ते तुभ्यमग्निर्वरो हे नचिकेतः स्वर्यः स्वर्गसाधनो यमग्नि वरमवृणीथाः अब अग्निविज्ञान तथा उसके चयन के फलका और इस प्रकरणका उपसंहार करते हैं: जो त्रिणाचिकेत अग्निके यथोक्त त्रयको-जो ईटें हों जितनी हों और जिस प्रकार अग्निका चयन हो अर्थात ईटोंका स्वरूप, संख्या और चयन प्रणालीको जानकर उस अग्निका आत्मरूपसे जाननेवाला विद्वान् चयन करता है अर्थात् जो विद्वान् नाचिकेत अग्निका क्रतु-ध्यान-संपादन करता है वह अधर्म, अज्ञान, रागद्वेषादिरूप मृत्युके बन्धनोंका पुरतः अग्रतः शरीरपातसे पूर्व ही नाशकर शोकसे मुक्त हुआ अर्थात् मानसिक दुःखोंसे मुक्त हुआ स्वर्गलोकमें-वैराजलोक में विराडात्मस्वरूपकी प्राप्ति होने से आनन्दित होता है ।। १८॥ हे नचिकेता ! द्वितीय वरसे तूने अग्निका वरण किया था जिसके लिये तूने MAR4 MARATHma DandraMUDRAMEE MEAN- २६ कठोपनिषद्-शाङ्करभाष्य [अ०१ प्रार्थितवानसि द्वितीयेन वरेण सोऽग्निर्वरो दत्त इत्युक्तोपसंहारः। किंचैतमग्नि तवैव नाम्ना प्रवक्ष्यन्ति जनासो जना इत्येतत् । एष वरो दत्तो मया चतुर्थ- स्तुप्टेन । तृतीयं बरं नचिकेतो वृणीष्व। तस्मिन्ह्यदत्त ऋणवानहमित्य- भिप्रायः ॥ १६ ॥ एतावद्ध यतिकान्तेन विधिप्रतिषेधार्थेन मन्त्रब्राह्मणेनावगन्तव्यं यद्वर- दुसूचितं वस्तु। नात्मतत्त्वविषययाथात्म्यविज्ञानम् । अतो विधिप्रतिषेधार्थ- विषयस्यात्मनि क्रियाकारकफलाध्यारोपलक्षणस्य स्वाभाविकस्याज्ञानस्य संसार- बीजस्य निवृत्त्यर्थं तद्विपरीतब्रह्मात्मैकत्वविज्ञानं क्रियाकारकफलाध्यारोपण- लक्षणशून्यमात्यन्तिकनिःश्रेयसप्रयोजनं वक्तव्यमित्युत्तरो ग्रन्थ प्रारभ्यते । तमेतमर्थं द्वितीयवरप्राप्त्याप्यकृतार्थत्वं तृतीयवरगोचरमात्मज्ञानमन्तरेणेत्या- प्रार्थना को थी वह स्वर्ग प्राप्तिका साधनभूत यह अग्नि विज्ञानरूप वर मैंने तुझे दे दिया। इस प्रकार उपर्युक्त अग्निविज्ञानका उपसंहार कहा गया, यही नहीं, लोग इस अग्निको तेरे ही नामसे कहेंगे। प्रसन्न हुए मैंने तुझे यह चौथा वर दिया। हे नचिकेता ! अव तू तीसरा वर माँग ले, क्योंकि उसे विना दिये मैं ऋणी हुँ, ऐसा अभिप्राय है ॥ १६ ॥ विधि प्रतिषेध प्रयोजनवाले ऐसे उपर्युक्त मंत्रब्राह्मण द्वारा इन दोनों वरोंसे सूचित जो वस्तु ज्ञातव्य है वह आत्मतत्त्व विषयक-यथार्थज्ञान विषयक नहीं है, अतएव विधि प्रतिषेधार्थविषयक, प्रात्मामें क्रिया, कारक, फलका अध्यारोप करना ही है लक्षण जिसका ऐसे संसारके बीजरूप प्राविधक-अज्ञानकी निवृत्ति के लिये उसके विपरीत क्रिया, कारक, फलाध्यारोप लक्षण शून्य आत्यन्तिक निःश्रेयस प्रयोजनवाले ब्रह्मात्मैकत्व ज्ञानको कहना चाहिए, इसके लिए उत्तर ग्रन्थका प्रारम्भ किया जाता है। इसी प्रर्थ-बातको आख्यायिकाद्वारा विस्तृत करते हैं--तृतीय वर विषयक आत्मज्ञानके विना द्वितीय- वरकी प्राप्तिसे अकृतार्थता ही है, क्योंकि पूर्वोक्त कर्मविषयक साध्य-साधनरूप अनित्य सत्यानन्दीदीपिका पिताके सौमनस्यसे लेकर स्वर्गलोक पर्यन्त जो दो वरोंसे सूचित किया गया है, यह सब संसाररूप है, वही कर्मकाण्डद्वारा उपनिषद् प्रतिपाद्य आत्मामें अध्यारोपित है उसका निवर्तक आत्मज्ञान है। इस प्रकार अध्यारोप और अपवादरूपसे पूर्वोत्तर ग्रन्थका सम्बन्ध है । 'स्वर्गकामो रजेत, सुनां न पिबेत्' इस प्रकार उपनिषद् व्यतिरिक्त मंत्रब्राह्मण विधि, प्रतिषेध द्वारा प्रवृत्ति, निवृत्ति प्रयोजनवाला है। संसारका बीज अज्ञान है, उससे ही यज्ञादि क्रियाओं, कर्ता, कर्म आदि कारकों, स्वर्गादि फलों तथा प्रमातृ प्रमेयादिको प्रात्मामें आरोपित किया जाता है अर्थात् मैं यज्ञादि क्रियाओंका कर्ता और स्वर्गादि फलोंका गोक्ता हूँ, इस प्रकार असङ्ग प्रात्मामें आरोप करता है, भाषानुवाद-सत्यानन्दीदीपिका ञ्चयति यतः पूर्वस्मात्कर्मगोचरात्साध्यसाधनलक्षणादनित्याद्वि- नेऽधिकार इति तन्निन्दार्थं पुत्राद्युपन्यासेन प्रलोभनं क्रियते । तृतीयं वरं नचिकेतो वृणीष्वेत्युक्तः सन्- विचिकित्सा मनुष्येऽस्तीत्येके नायमस्तीति चैके। मिनुशिष्टस्त्वयाह वराणामेष वरस्तृतीयः ॥२०॥ रिणमात्रे ) प्रते ( मृते सति ) या (सर्वजनविदिता) इयं (प्रत्यक्षसिद्धा) यः) अयं ( परलोकगामी आत्मा ) अस्ति इति एक ( केचन वादिनः इति च एके ( केचिद् वदन्ति ) अहं त्वया अनुशिष्टः ( उपदिष्ट सन् ) व) विद्याम् (विजानीयाँ) वराणां (मध्ये) एषः तृतीयः वरः ॥१२०।। विषयमें जो यह संदेह है कि कोई कहते हैं कि प्रात्मा है और कोई नहीं है। आपसे उपदिष्ट हुमा मैं इसे जान सकू, 'वरों में यह - RATANIN AranMAISM- NORINNARoom केत्सा संशयः प्रेते मृते मनुष्येऽस्तीत्येकेऽस्ति शरीरेन्द्रियमनो- देहान्तरसम्बन्ध्यात्मेत्येके नायमस्तीति चैके नायमेवंविधोऽस्तीति न प्रत्यक्षेण नापि वानुमानेन निर्णयविज्ञानमेतद्विज्ञानाधीनो षका ही पात्मज्ञानमें अधिकार है। इसलिए उनकी निन्दाके लिए से नचिकेताको प्रलोभित किया जाता है । हे नचिकेता ! 'तुम तृतीय प्रकार यमराजद्वारा कहे जानेपर नचिकेता बोला- ज्यके विषयमें जो यह संदेह है कि कोई लोग तो ऐसा कहते हैं कि देह, र बुद्धिसे अतिरिक्त देहान्तरसे सम्बन्ध रखनेवाला आत्मा है और कि इस प्रकारका कोई आत्मा नहीं है, अत: इसके विषय में हमें अनुमानसे भी ऐसा निश्चित ज्ञान नहीं होता और परम पुरुषार्थ इस सत्यानन्दीदीपिका तारसे भिन्न ब्रह्मात्मैकत्व वृत्त्यारुढ ज्ञान ही प्रात्यन्तिक निःश्रेयस विद्याकी निवृत्ति तथा परमानन्दकी प्राप्तिरूप प्रयोजनवाला है, अत: r सातिशय फलसे विरक्त पुरुष ही आत्मज्ञानमें अधिकारी है, इसी +7 'ब्द प्राणिमात्रका बोधक है। वादियोंकी विप्रतिपत्ति-विरुद्धवचन ही यथा--'स्थूलोऽहं कृशोऽहम्' इत्यादि लौकिक प्रतीतिसे देहात्मवादी भ सिद्ध इस देहसे भिन्न प्रारमा नहीं है । 'शृणोगि, पश्यामि' 'सुनता [अ०१ - . कठोपनिषद्-शाङ्करभाष्य हि परः पुरुषार्थ इत्यत एतद्विद्यां विजानीयामहमनुशिष्टो ज्ञापितस्त्वया । वराणामेप वरस्तृतीयोऽवशिष्टः ।। २० ।। किमयमेकान्ततो निःश्रेयससाधनात्मज्ञानाहों न वेत्येतत्परीक्षणार्थमाह- देवैरत्रापि विचिकित्सितं पुरा न हि सुज्ञेयमणुरेष धर्मः । अन्यं वरं नचिकेतो वृणीष्व मा मोपरोत्सीरति मा सृजैनम् ॥२१॥ देयः अपि अत्र ( अस्मिन् विषये ) पुरा (पूर्व ) विचिकित्सितं ( संशयितम् ) एष (प्रात्मा ) धर्मः (जगद्धारका३) अणुः ( सूक्ष्म : ) हि ( यतः ) न सुज्ञेयः [ अतः ] हे नचिकेतः ! अन्य वर वृणीष्व मा ( मां ) मा उपरोत्सी: ( उपरोधम्-अतिशयाग्रह मा कार्षीः मा ( मां प्रति ) एनं (बरम् ) अदिसृज ( परित्यज ) ।। २१ ।। पूर्वकालमें देवताओंको भी इस विषयमें सन्देह हुआ था, क्योंकि यह सूक्ष्म धर्म सुगमतासे जानने योग्य नहीं है । हे नचिकेता ! तू दूसरा वर माँगले, मुझसे इस विषय में अनुरोध-धाग्रह न कर, तू मेरे लिए यह वर छोड़ दे ॥ २१ ॥ विज्ञानके अधीन है। इसलिये आपसे उपदिष्ट-विज्ञापित हो मैं इसे भलीभाँति जान सकू । यही मेरे वरों में अवशिष्ट यह तृतीय वर है ॥ २० ॥ क्या यह नचिकेता नियमतः-वस्तुत:-पूर्णतः मोक्षके साधन प्रात्मज्ञानके योग्य हैं अथवा नहीं ? इस बातको परीक्षा हेतु यमराजने कहा- सत्यानन्दीदीपिका हूँ, देखता हूँ' इत्यादि प्रतीतिके आधारपर 'इन्द्रिय ही आत्मा है' ऐसा इन्द्रिय आत्म- वादी कहते हैं । 'मन इत्यन्ये' इन्द्रियोंकी प्रवृत्ति मनके अधीन है और 'अन्योऽन्तर पात्मा मनोमयः ऐसी श्रुति भी है, अतः मन ही आत्मा है । 'बुद्धिरित्यपरे' विज्ञानवादी क्षणिकविज्ञान-युद्धिको आत्मा मानते हैं, 'भन्योऽन्तर आत्मा विज्ञानमयः ऐसी श्रुति भी है। कोई भात्माको कर्ता भोक्ता, कोई केवल भोक्ता आदि मानते हैं। यदि इस प्रकारको विप्रतिपत्तिसे संशय हो तो स्वयं ही निर्णय कर लेना चाहिए इस विषय में प्रश्न करना व्यर्थ है ? यह सत्य है, परन्तु जैसे स्थाणुमें प्रत्यक्षसे 'यह स्थाणु हैं' ऐसा निश्चय होनेपर 'स्थागु है वा पुरुष' पुनः ऐसा संदेह नहीं होता, वैसे देहसे भिन्न प्रात्माके अस्तित्व में सन्देहके विद्यमान होनेपर प्रत्यक्षसे निर्णय नहीं हो सकता और परलोक सम्बन्धी प्रात्मव्याप्य लिङ्गके न होनेपर अनुमानसे भी निश्चय नहीं हो सकता, अत: इस विषयमें प्रश्न सार्थक है। प्रात्मविषयक विज्ञान निष्फल भी नहीं है, क्योंकि इससे ही अविद्या निवृत्ति पूर्वक दु:खोंकी अत्यन्त निवृत्ति और नित्य निरतिशय मानन्दकी प्राप्तिरूप परम पुरुषार्थ सिद्ध होता है ।॥ २० ॥ - - व०१] भापानुवाद-सत्यानन्दीदीपिका २६ देवैरप्य त्रैतस्मिन्वस्तुनि विचिकित्सितं संशयितं पुरा पूर्वं न हि सुज्ञयं सुष्ठ ज्ञेयं श्रुतमपि प्राकृतैर्ज नैर्यतोऽणुः सूक्ष्म एष श्रात्माख्यो धर्मोऽतोऽन्यमसंदिग्ध- फलं वरं नचिकेतो वृणीष्व मा मां मोपरोत्सीरुपरोधं मा कार्षीरधमणमिवोत्त- मणः। अतिसृज विमुञ्चैनं वरं मा मां प्रति ॥ २१ ॥ एवमुक्तो नचिकेता आह- देवैरत्रापि विचिकित्सितं किल त्वं च मृत्यो यन्न सुज्ञेयमात्थ । वक्ता चास्य त्वादृगन्यो न लभ्यो नान्यो वरस्तुल्य एतस्य कश्चित् ।२२। मृत्यो ! अत्र (अस्मिन् विषये ) किल देवैः अपि विचिकित्सितं ( संदिग्धं ) त्वं च यत् न सुज्ञेयं पात्थ ( कथयसि ) अस्य ( प्रात्मतत्वस्य ) वक्ता च त्वाहा ( त्वत्स- रशः ) अन्य! न लभ्यः [ अतः ] एतस्य ( वरस्य' ) तुल्य: अन्यः कश्चित् वरः न ( नास्ति ) ॥ २२ ॥ हे मृत्यो ! निश्चय ही देवताओंने भी इस विषयमें सन्देह किया था, आप भी ऐसा कहते हैं कि यह तत्त्व सुज्ञेय नहीं है। इस आत्मतत्वका वक्ता आपके समान अन्य मिलना भी संभव नहीं है और इस वरके समान कोई अन्य वर भी नहीं है ।।२२।। पूर्वकालमें देवताओंको भी इस प्रात्मरूप वस्तुमें विचिकित्सा संशय हुआ था। साधारण पुरुषों दारी सुना हुमा भी यह तत्त्व सुगमतया भलीभांति जानने योग्य नहीं है, क्योंकि यह आत्मा नामक धर्म अशु-अतिसूक्ष्म-दुर्विज्ञेय है, अत: हे नचिकेता ! इससे भिन्न कोई निश्चित फलवाला वर मांग ले, जैसे ऋण देनेवाला धनी ऋणीको बाध्य करता है वैसे तू मुझे बाध्य मत कर, इस वरको तू मेरे लिए छोड़ दे ।। २१ ।। यमराजके ऐसा कहनेपर नचिकेताने कहा- सत्यानन्दीदीपिका छान्दोग्योपनिषद्के अष्टम अध्यायमें आत्मविषयक सन्देहका विवरण इस प्रकार है- 'य प्रात्माऽपहतपाप्मा विजरो विमृत्यु विशोको..."ह प्रजापतिरुवाच' (७३) 'जो मात्मा धर्माधर्म आदि रूप पापशून्य, जरारहित, मृत्युहीन, शोकरहित, क्षुधारहित, पिपासा रहित, सत्यकाम और सत्यसङ्कल्प है, वह अन्वेष्टव्य है वह विशेष जिज्ञासितव्य है । जो उस पात्मा को शास्त्र व गुरु उपदेशानुमार खोजकर जान लेता है वह सब लोकों व सब भोगोंको प्राप्त कर लेता है ऐसा प्रजापतिने कहा' प्रजापति के इस वाक्यको देवता और असुरोंने परम्परासे सुना । 'हम उस आत्माको जानना चाहते हैं, जिसके जाननेपर जीव सब लोकों और समस्त भोगोंको प्राप्त कर लेता है ऐसा निश्चयकर देवताओं और असुरोंकी पोरसे प्रतिनिधिरूपसे इन्द्र और विरोचन हाथोंमें समिधाएं लिए दोनो Bureonts - - , ३० कठोपनिषद-शाङ्करभाष्य [अ०१ - त देवैरत्राप्येतस्मिन्वस्तुनि विचिकित्सितं किलेति भवत एव नः श्रुतम् । त्वं च मृत्यो यद्यस्मान्न सुज्ञेयमात्मतत्वमात्थ कथयसि, अतः पण्डितैरप्यवेदनीय- त्वाद्वक्ता चास्य धर्मस्य त्वादृक्त्वत्तुल्योऽन्यः पण्डितश्च न लभ्योऽन्विष्यमाणोऽपि । अयं तु वरो निःश्रेयसप्राप्तिहेतुः। अतो नान्यो वरस्तुल्यः सदृशोऽस्त्येतस्य कश्चिदप्यनित्यफलत्वादन्यस्य सर्वस्यैवेत्यभिप्रायः ॥ २२ ॥ एवमुक्तोऽपि पुनः प्रलोभयन्नुवाच मृत्युः- शतायुषः पुत्रपौत्रान्वृणीष्व बहून्पशून्हस्तिहिरण्यमश्वान् । Art भूमेर्महदायतनं वृणीष्व स्वयं च जीव शरदो यावदिच्छसि ॥२३॥ शतायुषः ( शतं वर्षाणि आयूंषि येषां तान् ) पुत्रपौत्रान् वृणीष्व, तथा बहून् पशून् ( गवादीन् ) हस्तिहिरण्यं ( हस्ति च हिरण्यं च तत् ) प्रश्वान्, भूभेः ( पृथिव्याः) महत (विस्तीर्णम् ) आयतनं ( साम्राज्यं ) वृणीष्व, स्वयं च ( स्वयमपि ) यावत शरदः ( वर्षाणि ) [जीवितुम् ] इच्छसि, [ तावत् ] जीव ( शरीरं धारय ) ॥२३॥ हे नचिकेता ! तु सौ वर्षकी आयुवाले पुन, पौन, बहुतसे पशु, हाथी, सुवर्ण और घोड़े मांग ले, विशाल भूमण्डल भी मांग ले, स्वयं भी जितने वर्ष इच्छा हो जीवन धारण कर ॥ २३ ॥ यह बात हमने अभी प्रापसे ही सुनी कि इस प्रात्मवस्तुमें देवतायोंने भी सन्देह किया था और हे मृत्यो ! श्राप यह भी कहते हैं कि यह प्रात्मतत्त्व सुगमतासे जानने योग्य नहीं है, अत: पण्डितोंद्वारा अज्ञातव्य होनेके कारण इस आत्मरूप धर्मका वक्ता भापके समान कोई अन्य पण्डित हूंढ़े भी नहीं मिल सकता और यह वर निश्श्रेयस-मोक्ष प्राप्तिका हेतु भी है, भता इसके समान कोई अन्य वर भी नहीं है, क्योंकि अन्य सभी वर भनित्य फल वाले यह अभिप्राय है ।। २२॥ नचिकेताके इस प्रकार कहनेपर भी यम उसे प्रलोभित करता हुआ पुनः बोला-- सत्यानन्दीदीपिका प्रजापतिके पास आये, ( वहीं उन्होंने बतीस वर्षतक ब्रह्मचर्य वास किया ) प्रजापतिने दोनोंको य एषोऽक्षिरिण पुरुषो दृश्यत एष आत्मा इस प्रकार प्रक्षिपुरुषका उपदेश किया पौर जलपूर्ण सिकोरामें देखनेको कहा । इससे विरोचनको विपरीतज्ञान-देहमें प्रात्मबुद्धि हुई और इन्द्रको सन्देह उत्पन्न हुआ ॥ २१ ॥ 'वक्ता चास्य त्वादगन्यो न लभ्यः' इस श्रुतिवाक्यसे ऐसा अर्थ ध्वनित होता है कि यमके समान प्रात्मतत्त्वका अन्य वक्ता संसारमें नहीं है, परन्तु इस वाक्यका यह अभिप्राय नहीं है, क्योंकि लोकमें यमसे भिन्न और भी ब्रह्मवेत्ता हैं, किन्तु वे सन्निहित नहीं थे, यमराज सन्निहित थे इस अभिप्रायसे यह श्रुतिवाक्य है ॥ २२ ॥ AlmorINOSECaJAur H . ।
व० १] भाषानुवाद-सत्यानन्दीदीपिका ३१ शतायुषः शतं वर्षाणया!पि येषां ताशतायुषः पुत्रपौत्रान्वृणीष्व । किंच गवादिलक्षणान्बहून्पशून्हस्तिहिरण्यं हस्ती च हिरण्यं च हस्तिहिरण्यम, अश्वांश्च किं च भूमेः पृथिव्या महद्विस्तीर्णमायतनमाश्रयं भण्डलं राज्यं वृणीष्व । किंच सर्वमप्येतदनर्थकं स्वयं चेदल्पायुरित्यत आह-स्वयं च जीव त्वं जीव धारय शरीरं समग्रेन्द्रियकलापं शरदो वर्षाणि यावदिच्छसि जीवितुम् ।। २३॥ एतत्तुल्यं यदि मन्यसे वरं वृणीष्व वित्तं चिरजीविकां च । महाभूमौ नचिकेतस्त्वमेधि कामानां त्वा कामभाजं करोमि ॥२४॥ हे नचिकेत ! यदि एतत्तुल्यम् ( उक्तवरसदृशम् अपर कञ्चन ) वरं मन्यसे [ तदा तमपि वृणीष्व ] [अपि च ] वित्त' चिरजीविका (चिरजीवनं ) च [ वृणीष्व ] महाभूमौ ( विस्तृतभूभागे ) त्वम् एघि ( राजा भव ) त्वा ( त्वां ) कामानां ( दिव्यानां मानुषाणां च काम्यमानानां ) कामभाज ( कामभागिनं ) करोमि ।। २४ ॥ हे नचिकेता ! यदि तू इसीके समान कोई अन्य वर समझता हो तो उसे अथवा धन और चिरस्थायिनी जीविका माँग ले। इस विस्तृत भूमिमें वृद्धिको प्राप्त हो, मैं तुझे काम्यफलोंका भोग-भाजन किये देता हूँ ।। २४ ।। एतत्तुल्यमेतेन यथोपदिष्टेन सदृशभन्यमपि यदि मन्यसे वरं तमपि तृणीष्व । किंच वित्तं प्रभूतं हिरण्यरत्नादि चिरजीविकां च सह वित्तेन वृणीष्वेत्येतत् । सौ वर्ष हो आयु जिनकी ऐसे सौ वर्ष श्रायुवाले उन पुत्र, पौत्रोंको तू माँग ले, तथा गो आदि बहुत से पशु, हाथी और स्वर्ण तथा अश्व और पृथिवीका महान् विस्तृत पायतन-पाश्रय-मण्डल-राज्य, अर्थात् साम्राज्य माँग ले । परन्तु यदि स्वयं अल्पायु हो तो ये सब व्यर्थ ही हैं, इसलिए कहते हैं----तुम स्वयं भी जितने वर्ष जीवित रहना चाहें उतने वर्ष जीवित रह, शरीर अर्थात् सशक्त, अविकल समग्र इन्द्रिय कलापको धारण कर अर्थात् इन्द्रिय पाटव आदिसे शून्य जीवन व्यर्थ है, इसलिए अपने-अपने विषय ग्रहण आदिमें समर्थ इन्दिय युक्त जीवन ही सार्थक है, इस कारण भगवान् भाष्यकारने यहाँ 'समग्र' शब्दका प्रयोग किया है ।। २३ ।। इस यथोपदिष्ट उपर्युक्त वरके समान यदि तू अन्य वर समझता हो तो उसे भी मांग ले, किन्तु यही नहीं, धन-प्रचुर सुवर्ण रत्न प्रादि तथा उस धनके साथ चिर- सत्यानन्दीदीपिका यहाँ 'तुल्य' शब्द अधिकका भी उपलक्षण है। धुलोक सम्बन्धी रम्भा, उर्वशी, कल्पवृक्ष, कामधेनु आदि दिव्यभोग कहे जाते हैं और मनुष्य सम्बन्धी माला, चन्दन, WALPORNA NupuKASHMIRamect cartoon ३२ कठोपनिषद्-शाङ्करभाष्य [अ० १ किं बहुना महत्यां भूमौ राजा नचिकेतस्त्वमेधि भव। किंचान्यत्कामानां दिव्यानां मानुपाणां च त्या त्वां कामभाजं कामभागिनं कामाहं करोमि सत्य- संकल्पो ह्यहं देवः ॥ २४ ॥ ये ये कामा दुर्लभा मर्त्यलोके सर्वान्कामा*श्छन्दतः प्रार्थयस्व । ईमा रामाः सरथाः सतूर्या न हीदृशा लम्भनीया मनुष्यैः । आभिमत्प्रत्ताभिः परिचारयस्व नचिकेतो मरणं मानुप्राक्षीः ॥२५॥ मर्त्यलोके ( मृत्युलोके ) ये ये कामाः ( भोगाः ) दुर्लभाः ( दुःखेन लब्धुं शक्याः ) तान् ] सर्वान् कामान् ( भोग्यपदार्थान् ) छन्दतः ( स्वेच्छानुसारेण ) प्रार्थयस्व, इमा: सरथाः सतूर्याः ( रथवादित्रादिसमन्विताः) रामाः ( रमयन्ति पुरुषान् इति रामाः स्त्रिया अप्सरसो वा ) ईदृशाः ( एवंविधा ) मनुष्यैः नहि लम्भनीयाः (नैब प्रापणीयाः) हे नचिकेत: ! आभिः मत्प्रत्ताभिः ( मद्दत्ताभिः ) परिचारयस्व (प्रात्मनः परिचर्या कारय ) मरणं ( मरणविषयक प्रश्न ) मानुप्राक्षी: (नैवं पृच्छ) ॥२५॥ मृत्युलोकमें जो जो भोग्य विषय दुर्लभ हैं उन सब भोगोंको तू स्वेच्छानुसार माँग ले, यहाँ रय वाद्य यन्त्रों सहित ये रमणियाँ हैं, ऐमी रमणियाँ मनुष्योंको प्राप्त होने योग्य नहीं होती, मेरे द्वारा दी हुई इन कामिनियोंसे तु अपनी परिचर्या करा । परन्तु हे नचिकेता ! तु मरण विषयक प्रश्न मत पूछ ॥ २५ ॥ ये ये कामाः प्रार्थनीया दुर्लभाश्च मर्त्यलोके सर्वांस्तान्कामांश्छन्दतः इच्छातः प्रार्थयस्व । किंचेमा दिव्या अप्सरसो रमयन्ति पुरुषानिति रामाः स्थायिनी जीविका ( जीवन ) भी मांग ले, अधिक क्या, हे नचिकेता ! इस विस्तृत भूमिमें राजा हो अर्थात् राज्यको प्राप्त हो, और तो क्या, मैं तुझे दैवी और मानुषी सभी कामनामों-भोगोंका काम-भागी अर्थात् इच्छानुसार भोगने योग्य कर देता हूँ, क्योंकि मैं सत्य सङ्कल्प देवता हूँ ।। २४ ॥ इस मृत्युलोकमें जो जो प्रार्थनीय-भोग्य पदार्थ दुर्लभ हैं उन सबको छन्दतः स्वेच्छानुसार मांग ले, इनके अतिरिक्त ये रामा जो पुरुषोंके साथ रमण करती हैं ऐसी सत्यानन्दीदीपिका वनिता मादि मानुष भोग कहे जोते हैं। इन भोगोंको प्राप्तकर उन्हें भोगने योग्य किये देता हूँ। यहाँ यह प्रश्न उठता है कि इस प्रकारके न किये कर्मोंका फल पुरुषको कैसे प्राप्त हो सकता है ? तो इसके उत्तरमें यमने 'सत्यसङ्कल्प' कहा है अर्थात् मैं देवता हूँ, अतः अप्रतिहत ज्ञान, ऐश्वर्य, तेज और बलवान् होनेसे मैं सत्यसङ्कल्प हुँ । अपने सत्य सङ्कल्पसे यह सब दे सकता हूँ ॥२४॥ .
DA व० १] भाषानुवाद-सत्यानन्दीदीपिका सह स्थैर्वर्तन्त इति सरथाः सतूर्याः सवादिन्नास्ताश्च न हि लम्भनीयाः प्रापणीया ईदृशा एवंविधा मनुष्यैर्मत्यरस्मदादिप्रसादमन्तरेण । आभिर्मत्प्रत्ताभिर्मया दत्ताभिः परिचारिणीभिः परिचारयस्व आत्मानं पादप्रक्षालनादिशुश्रूषां कार- यात्मन इत्यर्थः। नचिकेतो मरणं मरणसम्बद्धं प्रश्न प्रेतेऽस्ति नास्तीति काकदन्तपरीक्षारूपं मानुप्राक्षीमवं प्रष्टुमर्हसि ॥२५॥ एवं प्रलोभ्यमानोऽपि नचिकेता महादवदक्षोभ्य आह- श्वोभावा मर्त्यस्य यदन्तकैतत्सर्वेन्द्रियाणां जरयन्ति तेजः । अपि सर्व जीवितमल्पमेव तवैव वाहास्तव नृत्यगोते ॥२६॥ हे अन्तक ! ( मृत्यो ! ) श्वो भावाः ( श्वः श्रागामिनि दिने स्थास्यति न वा भावः सत्ता येषां, तथा भूताः ) मयस्य ( मनुष्यस्य ) यदेतत् सर्वेन्द्रिणां तेज: सामर्थ्य ) जरयन्ति ( शिथिली कुर्वन्ति ) सर्वमपि जीवितं (आयु:) अल्पमेन वाहा (अश्वरथादयः) तवैव [ सन्तु ] नृत्यगीते च तव [ एव स्ताम् ] ॥ २६ ॥ हे यमराज ! ये भोग श्वोभावा: 'कल रहेंगे अथवा नहीं' इस प्रकारके हैं शौर मनुष्य के सब इन्द्रियोंके तेजको जीर्णकर देते हैं। यह सारा जीवन भी अल्प ही है। आपको सारथादि वाहन और नृत्यगीत आपके ही पास रहें ।। २६ ।। ये दिव्य अप्सराएं रथोंके साथ और वाद्ययन्त्रोंके साथ विद्यमान हैं । हम जैसे देवताओंकी कृपाके विना ऐसी रमणियाँ मरणधर्मा मनुष्यों को प्राप्त होने योग्य नहीं हैं। मेरे द्वारा दी हुई इन परिचारिकानोंसे अपनी परिचर्या अर्थात् पाद प्रक्षालनादि सेवा करा, यह अर्थ है, किन्तु हे नचिकेता! मरण अर्थात् मरणानन्तर 'मात्मा है अथवा नहीं' ऐसा काकदन्तों की परीक्षाके समान मरण सम्बन्धी प्रश्न मत पूछ ! तुझे ऐसा प्रश्न पूछना उचित नहीं है ।। २५ ॥ इस प्रकार प्रलोभित किये जानेपर नचिकेताने महान् सरोवरके समान प्रक्षुब्ध होकर कहा--- सत्यानन्दीदीपिका भवबन्धनसे मुक्ति चाहनेवाले ब्रह्म जिज्ञासुका 'शान्तोदान्त उपरतस्तितिक्षुः' इत्यादि श्रुतिमें इस प्रकार लक्षण किया गया है। इस आधारपर इन तीनों मन्नों में यमराज नचिकेता विवेक, वैराग्यादि साधन सम्पन्न है अथवा नहीं ? निश्चय करने के लिए ऐहिक, पारलौकिक जड़, चेतन उभयात्मक विषय भोगोंका प्रलोभन देकर परीक्षा करना चाहते हैं ॥२५॥ - ३ कठोपनिषद्-शाङ्करभाष्य [अ०१ - CaLEAran -प्रायु है वह श्वो भविष्यन्ति न भविष्यन्ति वेति संदिह्यमान एव येषां भावो भवनं त्वयोपन्यस्तानां भोगानां ते श्वोभावाः किं च मर्त्यस्य मनुष्यस्यान्तक हे मृत्यो तदेतत्सर्वेन्द्रियाणां तेजस्तञ्जरयन्त्यपक्षयन्त्यासरः प्रभृतयो भोगाः अनर्थायैवैते धर्मवीर्यप्रज्ञातेजोयशःप्रभृतीनां क्षपयितृत्वात् । यां चापि दीर्घजीविकां त्वं दित्ससि तत्रापि शृणु। सब यद्ब्रह्मणोऽपि जीवितमायुरल्पमेव किमुतास्मदा- दिदीर्घजीविका । अतस्तवैव तिष्ठन्तु वाहा रथादयः तथा नृत्यगीते च ।। २६ ॥ किंच- न वित्तेन तर्पणीयो मनुष्यो लप्स्यामहे वित्तमद्राक्ष्म चेत्त्वा । जीविष्यामो यावदीशिष्यसि त्वं वरस्तु मे वरणीयः स एव ॥२७॥ आपके द्वारा जिन भोगोंका उल्लेख किया गया है वे तो श्वोभाव हैं--जिनक भाव-अस्तित्व 'कल रहेगा कि नहीं इस प्रकार सन्देह युक्त हो वे श्वोभाव कहे जा हैं, किञ्च हे अन्तक-मृत्यो ! ये अप्सरा आदि भोग तो मर्त्य-मनुष्यका जो यह इन्द्रिय का तेज है उसे जीर्ण-अपक्षय कर देते हैं, अतः धर्म, वीर्य, प्रज्ञा, तेज, यश आदिक क्षय करनेवाले होनेसे अनर्थके ही हेतु हैं और जो आपको दीर्घ जीवन देने की इच्छा उसके विषयमें भी सुनिये ! ब्रह्माका जो सारा जीवन भी अल्प है, पि अस्मदादिके दीर्घ जीवनकी तो बात ही क्या है ! अत: रथ आदि वाहन तथा नृत गीत आपके ही रहें ।। २६ ।। सत्यानन्दीदीपिका दोनों प्रकारके भोग पुरुषका उपकार नहीं प्रत्युत अपकार ही करते हैं, इसी बात नचिकेता 'श्वोभावाः' इत्यादिसे स्पष्ट करते हैं--प्रत्यक्षादि प्रमाण से भी यही सिद्ध हो है कि अप्सरा आदि भोग विषयी पुरुषके धर्म-इष्टपूर्तादि, वीर्य-शरीर सामर्थ्य, प्रज्ञ शास्त्रावगाहन शक्ति, तेजः-प्रागल्भ्य वा त्वचागत दीप्ति विशेष यश-कीति आदि नाश करते हैं, इसलिए ये सब विषय प्रज्ञ पुरुषके अनर्थके हेतु हैं। यहाँ ब्रह्माशब्द हिरण्यगर्भका ग्रहण है। क्योंकि उसकी आयुमें सबकी प्रायुका अन्तर्भाव है 'चतुर्यु सहस्राणि ब्रह्मणो दिवा भवति' इत्यारभ्य 'वत्सरशतं ब्रह्ममानेन ब्रह्मणः परमायुः प्रर णम्' 'सहस्रयुगपर्यन्तमहर्यद्ब्रह्मणो विदुः'। ( गी० ८।१७ ) इत्यादि प्रमाणं भावारपर ब्रह्माकी आयु निश्चित होती है। परन्तु परिमित होनेसे वह भी अल्प ही तो अस्मदादिकी आयुके विषयमें फिर कहना ही क्या है ? इस प्रकार नचिकेताने सम भोगोंमें क्षयित्व प्रादि दोषोंको बतलाकर अपनेको शमादि सम्पन्न तत्त्वज्ञानमें अधिक सिद्ध किया । 'न कर्मणा न प्रजया धनेन त्यागेनैकेनामृतत्वमानशुः' (न यज्ञादि कर न प्रजासे, न धनसे अमृतत्त्वकी प्राप्ति होती है, केवल एक त्यागसे ही अमृतत्त्व : होता है ) यह श्रुति भी ऐसा ही कहती है ।। २६ ।।
व०१] भाषानुवाद-सत्यानन्दीदीपिका MAR- मनुष्यः वित्तेन (धनेन ) न तर्पणीयः त्वा ( त्वां ) चेद् अद्राक्षम (दृष्टवन्तः स्मः ) [ तर्हि ] वित्त लप्स्यामहे ( प्राप्स्यामहे ) त्वं यावत् ईशिष्यसि (याम्ये पदे स्थास्यसि) तावत् जीविष्यामः [ तस्मात् ] वरस्तु स एव (प्राग याचित एव ) मे (मम) वरणीय: प्रार्थनीयः ) ॥ २७ ॥ मनुष्य धनसे तृप्त नहीं हो सकता । अब यदि आपका दर्शनकर लिया है तो धन तो हम पा ही लेंगे । जब तक आप याम्यपदका शासन करेंगे निश्चित हम जीवित रहेंगे, किन्तु हमारा प्रार्थनीय वर तो वही है ॥ २७ ॥ न प्रभूतेन वित्तेन तर्पणीयो मनुष्यः। न हि लोके वित्तलाभः कस्य- चित्तृप्तिकरो दृष्टः। यदि नामास्माकं वित्ततृष्णा स्याल्लप्स्यामह इत्येतद्वित्तमद्राक्ष्म दृष्टवन्तो वयं चेत्त्वा त्वाम् । जीवितमपि तथैव । जीविष्यामो यावद्याम्ये पदे त्वमीशिष्यसीशिष्यसे प्रभुः स्याः। कथं हि मर्त्यस्त्वया समेत्याल्पधनायुर्भवेत् । वरस्तु मे वरणीयः स एव यदात्मविज्ञानम् ।। २७ ।। यंतश्च- अजीर्यताममृतानामुपेत्य जीर्यन्मर्त्यः क्वधःस्थः प्रजानन् । अभिध्यायन्वर्णरतिप्रमोदानतिदीचे जीविते को रमेत ॥२८॥ [ हे मृत्यो ! ] क्वधः स्था (कुः पृथिवी प्रधः अन्तरिक्षलोकापेक्षया तस्यां तिष्ठति क्वधः स्थ: ) जीर्यन् मर्त्यः (जरामरणशील: मनुष्य: ) अजीर्यतां ( जरारहितानाम् ) अमृतानां ( देवानाम् ) उपेत्य (उपगम्य ) प्रजानन् बर्णरतिमोदान अभिध्यायन् (चिन्त- यन् ) अतिदीर्घ जीवते को रमेत ? ।। २८ ।। किञ्च मनुष्य अधिक धनसे भी तृप्त होने योग्य नहीं है, लोकमें धनलाभ किसीकी तृप्ति करनेवाला नहीं देखा गया है, अब जब कि हम आपको देख चुके हैं तो यदि हमें धन की लालसा होगी तो उसे हम प्राप्त कर ही लेंगे, इसी प्रकार दीर्घ जीवन भी, जब तक आप याम्यपदके शासक-नियामक स्वामी रहेंगे तब तक हम भी जीवित रहेंगे। भला कोई भी मनुष्य आपके सामीप्य में आकर अल्पायु एवं अल्पधन वाला कैसे हो सकता है ? किन्तु वर तो वह जो आत्मज्ञान है वही हमारा वरणीय प्रार्थनीय है ॥ २७ ॥ क्योंकि- सत्यानन्दीदीपिका वैराग्यकी दृढताके लिए पूर्वोक्त ये सब निन्दनीय हैं, इस बातको 'किञ्च' आदि भाष्यसे कहते हैं। मन्त्रमें 'ईशिष्यासि' यह परस्मैपद छान्दस है अन्यथा 'ईशिष्यसे' होना चाहिए ॥ २७ ॥ CHANA
कठोपनिषद्-शाङ्करभाष्य
[अ०१
-
-
श्वो भविष्यन्ति न भविष्यन्ति वेति संदिह्यमान एव येषां भावो भवनं
त्वयोपन्यस्तानां भोगानां ते श्वोभावाः किं च मर्त्यस्य मनुष्यस्यान्तक हे मृत्यो
तदेतत्सर्वेन्द्रियाणां तेजस्तञ्जरयन्त्यपक्षयन्त्यप्सरः प्रभृतयो भोगाः अनर्थायैवैते
धर्मवीर्यप्रज्ञातेजोयशःप्रभृतीनां क्षपयितृत्वात् । यां चापि दीर्घजीविकां त्वं
दित्ससि तत्रापि शृणु। सर्वं यद्ब्रह्मणोऽपि जीवितमायुरल्पमेव किमुतास्मदा-
दिदीर्घजीविका । अतस्तवैव तिष्ठन्तु वाहा रथादयः तथा नृत्यगीते च ।। २६ ।।
किंच-
न वित्तेन तर्पणीयो मनुष्यो लप्स्यामहे वित्तमद्राक्ष्म चेत्त्वा।
जीविष्यामो यावदीशिष्यसि त्वं वरस्तु मे वरणीयः स एव ॥२७॥
आपके द्वारा जिन भोगोंका उल्लेख किया गया है वे तो श्वोभाव हैं-जिनका
भाव-अस्तित्व 'कल रहेगा कि नहीं' इस प्रकार सन्देह युक्त हो वे श्वोभाव कहे जाते
हैं, किञ्च हे अन्तक-मृत्यो! ये अप्सरा आदि भोग तो मर्त्य-मनुष्यका जो यह इन्द्रियों
का तेज है उसे जीर्ण-अपक्षय कर देते हैं, अतः धर्म, वीर्य, प्रज्ञा, तेज, यश आदिका
क्षय करनेवाले होनेसे अनर्थके ही हेतु हैं और जो आपको दीर्घ जीवन देनेकी इच्छा है
उसके विषयमें भी सुनिये ! ब्रह्माका जो सारा जीवन-घायु है वह भी अल्प है, फिर
अस्मदादिके दीर्घ जीवनकी तो बात ही क्या है ! अत: रथ श्रादि वाहन तथा नृत्य-
गीत आपके ही रहें ।। २६ ।।
सत्यानन्दीदीपिका
दोनों प्रकारके भोग पुरुषका उपकार नहीं प्रत्युत अपकार ही करते हैं, इसी बातको
नचिकेता 'श्वोभावाः' इत्यादिसे स्पष्ट करते हैं--प्रत्यक्षादि प्रमाण से भी यही सिद्ध होता
है कि अप्सरा आदि भोग विषयी पुरुषके धर्म-इष्टपूर्तादि, वीर्य-शरीर सामर्थ्य, प्रज्ञा-
शास्त्रावगाहन शक्ति, तेजः-प्रागल्भ्य वा त्वचागत दीप्ति विशेष यश-कीति आदिका
नाश करते हैं, इसलिए ये सब विषय प्रज्ञ पुरुषके अनर्थके हेतु हैं। यहाँ ब्रह्माशब्दसे
हिरण्यगर्भका ग्रहण है। क्योंकि उसकी प्रायुमें सबकी आयुका अन्तर्भाव है 'चतुर्युग-
सहस्राणि ब्रह्मणो दिवा भवति' इत्यारभ्य 'वत्सरशतं ब्रह्ममानेन ब्रह्मणः परमायु! प्रमा-
णम्' 'सहस्रयुगपर्यन्तमहर्यद्ब्रह्मणो विदुः'। ( गी० ८।१७ ) इत्यादि प्रमाणोंके
माधारपर ब्रह्माकी आयु निश्चित होती है। परन्तु परिमित होनेसे वह भी अल्प ही है
तो अस्मदादिको आयुके विषय में फिर कहना ही क्या है ? इस प्रकार नचिकेताने समस्त
भोगोंमें क्षयित्व प्रादि दोषोंको बतलाकर अपनेको शमादि सम्पन्न तत्त्वज्ञानमें अधिकारी
सिद्ध किया। 'न कर्मणा न प्रजया धनेन त्यागेनैकेनामृतत्वमानशुः' (न यज्ञादि कर्मसे
न प्रजासे, न धनसे अमृतत्त्वकी प्राप्ति होती है, केवल एक त्यागसे ही अमृतत्त्व प्राप्त
होता है ) यह श्रुति भी ऐसा ही कहती है ॥ २६ ॥
व० १]
भाषानुवाद-सत्यानन्दीदीपिका
३५
मनुष्यः वित्तेन ( धनेन ) न तर्पणीयः त्वा ( त्वां ) चेद् अद्राक्ष्म ( दृष्टवन्तः स्मः)
[तहि ] वित्त लप्स्यामहे ( प्राप्स्यामहे ) त्वं यावत् ईशिष्यसि (याम्ये पदे स्थास्यसि)
तावत् जीविष्यामः [ तस्मात् ] वरस्तु स एव (प्राग् याचित एव ) मे (मम) वरणीय
प्रार्थनीयः) ।। २७ ॥
मनुष्य धनसे तृप्त नहीं हो सकता । अब यदि आपका दर्शनकर लिया है तो धन तो
हम पा ही लेंगे । जब तक आप याम्यपदका शासन करेंगे निश्चित हम जीवित रहेंगे,
किन्तु हमारा प्रार्थनीय वर तो वही है ।। २७ ॥
न प्रभूतेन वित्तेन तर्पणीयो मनुष्यः। न हि लोके वित्तलाभः कस्य-
चित्तृप्तिकरो दृष्टः । यदि नामास्माकं वित्ततृष्णा स्याल्लप्स्यामह इत्येतद्वित्तमद्राक्ष्म
दृष्टवन्तो वयं चेत्त्वा त्वाम् । जीवितमपि तथैव । जीविष्यामो यावद्याम्ये पदे
स्वमीशिष्यसीशिष्यसे प्रभुः स्याः। कथं हि मर्त्यस्त्वया समेत्याल्पधनायुर्भवेत् ।
घरस्तु मे वरणीयः स एव यदात्मविज्ञानम् ॥ २७ ॥
यंतश्च-
अजीर्यताममृतानामुपेत्य जीर्यन्मर्त्यः क्वधःस्थः प्रजानन् ।
अभिध्यायन्वर्णरतिप्रमोदानतिदीर्घे जीविते को रमेत ॥२८॥
[ हे मृत्यो ! ] क्वधः स्थ: (कुः पृथिवी अधः अन्तरिक्षलोकापेक्षया तस्यां तिष्ठति
क्वधः स्थः ) जीर्यन् मर्त्यः (जरामरणशील: मनुष्य: ) अजीर्यतां ( जरारहितानाम् )
अमृतानां ( देवानाम् ) उपेत्य (उपगम्य ) प्रजानन् बर्णरतिमोदान अभिध्यायन (चिन्त-
यन् ) अतिदीर्घे जीवते को रमेत ? ।। २८ ।।
किञ्च मनुष्य अधिक धनसे भी तृप्त होने योग्य नहीं है, लोकमें धनलाभ किसीकी
तृप्ति करनेवाला नहीं देखा गया है, अब जब कि हम आपको देख चुके हैं तो यदि हमें
धन की लालसा होगी तो उसे हम प्राप्त कर ही लेंगे, इसी प्रकार दीर्घ जीवन भी, जब
तक पाप याम्यपदके शासक-नियामक स्वामी रहेंगे तब तक हम भी जीवित रहेंगे।
भला कोई भी मनुष्य आपके सामीप्यमें आकर अल्पायु एवं अल्पधन वाला कैसे हो सकता
है ? किन्तु वर तो वह जो आत्मज्ञान है वही हमारा वरणीय प्रार्थनीय है ।। २७ ।।
क्योंकि-
सत्यानन्दीदीपिका
वैराग्यकी दृढताके लिए पूर्वोक्त ये सब निन्दनीय हैं, इस बातको 'किञ्च प्रादि
भाष्यसे कहते हैं। मन्त्रमें 'ईशिष्यासि' यह परस्मैपद छान्दस है अन्यथा 'ईशिष्यसे'
होना चाहिए ॥ २७ ॥
कठोपनिषद्-शाङ्करभाष्य [अ० Arunawarware- जरा रहित अमरों-देवोंके समीप पहुँचकर नीचे पृथिवीरर रहने वाला कौन जराग्र विवेकी मनुष्य होगा जो केवल शारीरक वर्णके रागसे प्राप्त ( स्त्रीरभरण आदि ) सुखों क्षणिक अनित्य जानकर भी अतिदीर्घ जीवन में रमण करेगा ? ॥ २८ ।। अजीर्यतां वयोहानिमप्राप्नुवताममृतानां सकाशमुपेत्योपगम्यात्मन उत प्रयोजनान्तरं प्राप्तव्यं तेभ्यः प्रजाननुपलभमानः स्वयं तु जीर्यन्मयो जरामर वान्वधःस्थः कुः पृथिवी अधश्चान्तरिक्षादिलोकापेक्षया तस्यां तिष्ठतीति क स्थः सन्कथमेवमविवेकिभिः प्रार्थनीयं पुत्रवित्तहिरण्याद्यस्थिरं वृणीते । क तदास्थ इति वा पाठान्तरम् । अस्मिन्पक्षे चाक्षरयोजना-तेषु प दिष्वास्थाऽऽस्थितिः तात्पर्येण वर्तनं यस्य स तदास्थः। ततोऽधिव पुरुषार्थ दुष्प्रापमपि प्रापिपयिपुः क तदास्थो भवेन्न कश्चित्तदसारज्ञस्त स्यादित्यर्थः सर्वो ह्यपर्युपर्येच बुभूपति लोकः तस्मान्न पुत्रवित्तादिलोभैः । भ्योऽहम् । किंचा सरप्रमुखान्वणरतिप्रमोदाननवस्थितरूपतयाभिध्याय रूपयन्यथावदतिदीर्घ जीविते को विवेकी रमेत् ।। २८ ।। वयोहानिरूप जीर्णताको प्राप्त न होनेवाले अमरों-देवोंके सान्निध्य में पहुंचकर प्राप्त होने योग्य अपने अन्य उत्कृष्ट प्रयोजन-प्राप्तव्यको जानता-प्राप्त करता भी जीर्ण होनेवाला और मरणधर्मा मनुष्य कधः स्थः-कु-पृथिवी अन्तरिक्ष आदि लो अपेक्षा अधः-नीचे होने के कारण 'क्वधः' है उसपर रहनेवाला 'कधः स्थः' है, होकर भी इस प्रकार अविवेक्यिों द्वारा प्रार्थनीय पुत्र, धन, सुवर्ण मादि अस्थिर-म पदार्थोको कैसे मांगेगा। कहीं 'क्वधः स्थः' के स्थान में 'क्क तदास्थः' ऐसा पाठान्त है। इस पक्षमें अक्षरोंकी योजना इस प्रकार है---उन पुत्र आदि पदार्थोमैं अ' अवस्थिति अर्थात् तत्परता पूर्वक जो प्रवृत्ति वह 'तदास्थ' है । जो उन पुत्र आदि उत्कृष्टतर और दुष्प्राप्य पुरुषार्थ पानेको इच्छुक है वह उनमें आस्था रखनेवाल होगा? अर्थात् उन्हें असार समझनेवाला कोई भी पुरुष उनका अर्थी-इच्छुक न सकता, यह अर्थ है, क्योंकि सभी लोग उत्तरोत्तर उन्नत ही होना चाहते हैं, अतः वित्त आदि लोभोंसे प्रलोभित नहीं हो सकता। किञ्च वर्ण गायन रति क्रीडारे होनेवाले अप्सरा आदिके सम्पर्कसे प्राप्त होनेवाले सुखोंकी अनवस्थिति रूपसे * करता हुआ उन्हें यथावत् (मिथ्यारूपसे ) समझता हुआ कौन विवेकी पुरुष प्रा जीवनमें प्रेम करेगा? ॥ २८ ।। सत्यानन्दीदीपिका लौकिक तथा पारलौकिक विषय भीगोंके सार-प्रसारको न जाननेवाला आ पुरुष गीत तथा क्रीडासे जन्य सुखकी इच्छा करता है। परन्तु इन क्षणभङ्गुर IT- व० १] भाषानुवाद-सत्यानन्दीदीपिका ३७ अतो विहायानित्यैः कामैः प्रलोभनं यन्मया प्रार्थितम्- यस्मिन्निदं विचिकित्सन्ति मृत्यो यत्साम्पराये महति ब्रूहि नस्तत् । योऽयं बरो गूढमनुप्रविष्टो नान्यं तस्मान्नचिकेता वृरणीते ॥२६॥ हे मृत्यो! यस्मिन् ( विषये ) इदम् (आत्मा अस्ति न वेति ) यत् ( यस्मात् ) विचिकित्सन्ति ( सन्दिहन्ति ) तत् (आत्मतत्त्वं ) महति साम्पराये ( परलोकविषये ) न: ( अस्मभ्यं ) ब्रूहि ( उपदिश योऽयं वरः, गूढम् ( गोप्यम् ) अनुप्रविष्टः ( प्राप्तः यस्मात् ( वरात् ) अन्य (वरं ) नचिकेता न वृणीते ।। २६ ।। - हे मृत्यो ! जिस परलोकके विषयमें लोग 'आत्मा है या नहीं' ऐसा सन्देह करते हैं र तथा जो महान् परलोकके विषय में [निश्चित ] है वह हमसे कहिये । यह जो महानता पी को प्राप्त हुपा वर है इससे अन्य कोई वर नचिकेता नहीं मांगता ॥ २६ ।। यस्मिन्प्रेत इदं विचिकित्सनं विचिकित्सन्ति अस्ति नास्तीत्येवंप्रकारं हे ने-) मृत्यो साम्पराये परलोकविषये महति महत्प्रयोजननिमित्ते आत्मनो निर्णय- विज्ञानं यत्तद्रूहि कथय नोऽस्मभ्यम् । किं बहुना योऽयं प्रकृत आत्मविषयो नसे अतः मुझे इन अनित्य-मिथ्याभोगोंसे प्रलोभित करना छोड़कर जिसके विषयमें मैंने वयं प्रार्थना की है। की हे मृत्यो ! जिस परलोकगत जीवके विषय में ऐसा सन्देह करते हैं कि 'प्रते? मरणा- सा नन्तर 'प्रात्मा है अथवा नहीं उस महान् प्रयोजनके निमित्तभूत साम्पराय-परलोकके सत्य सम्बन्धमें उस आत्माका जो निश्चित विज्ञान है वह हमसे कहिये । अधिक क्या ? यह भी मात्मविषयक प्रकृत वर है वह गूढ-गहन-दुविवेचनीयताको प्राप्त है उस आत्मविषयक सत्यानन्दीदीपिका भी हीन पदार्थोसे भी प्रत्युत्कृष्ट परम पुरुषार्थ रूप प्रयोजन जिसे आप जैसे देवताओंके प्रसाद कैसे से प्राप्त होता हो वह इन पदार्थों की इच्छा कभी नहीं करेगा। हो ये हि संस्पर्शजा भोगा दुःखयोनय एव ते । श्राद्यन्तवन्तः कौन्तेय न तेषु रमते बुधः ।। पुत्रा (गी० ५।२२) 'इन्द्रियोंसे सम्बन्धित जो भोग हैं वे निश्चित दुःखके ही हेतु हैं और उत्पत्ति विनाश शोल हैं, अतः हे कौन्तेय ! विवेकी पुरुष उनमें रमण नहीं करता।' ऐसी स्मृति भी है । इस प्रकार नचिकेताने इन तीन मन्त्रोंसे अपनेको साधन चतुष्टय सम्पन्न भधिकारी सिद्ध किया ॥२८ ।। 'येयं प्रेते विचिकित्सा मनुष्येऽस्तीत्येके नायमस्तीति चैके' कठ० १२० ) इससे उपक्रमकर 'यस्मिन्निदं विचिकित्सन्ति' ( कठ० १।२६ ) इस मन्त्रतक नचिकेताका घेको प्रात्मविषयक प्रश्न यमराजद्वारा प्रात्मज्ञानके अधिकारकी परीक्षा लेने के लिए पुत्र, था प्राम सारा JARATuDaaMES ३८ कठोपनिषद्-शाङ्करभाष्य अ०१ वरो गूढं गहनं दुर्विवेचनं प्राप्तोऽनुप्रविष्टः । तस्माद्वरादन्यमविवेकिभिः प्रार्थ- नीयमनित्यविषयं वरं नचिकेता न वृणीते मनसापीति श्रुतेर्वचनमिति ।।२६।। शङ्करभगवत्पाद कृत शाङ्करभाष्य प्रथमावल्ली समाप्त ।। १-१॥ वरसे अन्य अविवेकी पुरुषों द्वारा प्रार्थनीय अनित्य वस्तु विषयक वर नचिकेता मनसे भी नहीं मांगता, यह श्रुत्यर्थ है ॥ २६ ॥ कठोपनिषद्के प्रथमाध्यायकी प्रथमवल्लीका 'स्वामी सत्यानन्द सरस्वती' कृत भाषानुवाद समाप्त ॥१॥ सत्यानन्दीदीपिका वित्त आदि अनेक प्रकारके पदार्थोका प्रलोभन दिया जाना, नचिकेता द्वारा क्षयिर प्रादि अनेक दोषोंको बतलाकर उनमें पूर्ण वैराग्य दिखाकर ब्रह्मज्ञानकी प्राप्तिमें अप योग्यताका परिचय दिया जाना बताया गया है। नचिकेताको निमित्तकर अन्य के अधिकार निर्णयार्थ संवाद रहित श्रुतिका वचन है अर्थात् साधन चतुष्टय सम्पन्न पु' ब्रह्मज्ञान प्राप्तिमें अधिकारी है ॥ २६ ॥ कठोपनिषद्के प्रथमाध्यायको प्रथमवल्लीकी स्वामी सत्यानन्द सरस्वती कृत-सत्यानन्दीदीपिका समाप्त ॥ १-१ ।। - KanwwwwVARAN प्रथमाध्यायस्य द्वितीयावल्ली - श्रेय-प्रेय विवेक परीक्ष्य शिष्यं विद्यायोग्यतां चावगम्याह- अन्यच्छेयोऽन्यदुतैव प्रेयस्ते उभे नानार्थे पुरुष सिनीतः । तयोः श्रेय आददानस्य साधु भवति हीयतेऽर्थाद्य उप्रेयो वृणीते॥१ [यम आह ] श्रेयः (निःश्रेयसम् ) अन्यत् (पृथक् ) प्रेयः उत (प्रियत पुत्रवित्तादिकाम्यमानम् ) अन्यत् एव । ते उभे (श्रेया प्रयसी) नानार्थे (भिन्न प्रयोजने इस प्रकार शिष्य की परीक्षाकर उसमें विद्याकी योग्यता जान यमराजने कहा- सत्यानन्दीदीपिका 'वैष्णवीमात्मनिष्ठां नानूचानाय नावीतरागायोपदिशेत्' स्वाध्यायविहीन 'अभिमान और विषयों में रत पुरुष का प्राचार्य ब्रह्मात्मनिटाका उपदेश न करे। 'अस्मा इमामुप. S ॥
व०१] भाषानुवाद-सत्यानन्दीदीपिका ३६ -- AMALALAMITRAK- पुरुष ( देहिनं ) सिनीत; ( बध्नीतः) तयोः (श्रेयः प्रेयसोमध्ये ) श्रेयः ( ब्रह्मविद्याम्) आददानस्य ( उपासीनस्य ) साधु (संसारमोचनात्मक कल्याणं) भवति । य उ यः पुन:) प्रेयः ( पुत्रवित्तादिकाम ) वृणीते ( उपादत्त') (स: ) अर्थात् परमपुरुषार्थात् हीयते ) (च्युतो भवति ) ॥१॥ श्रेय ( ब्रह्मविद्या ) प्रेयसे भिन्न है और प्रय श्रेयसे पृथक् है, ये दोनों भिन्न प्रयोजनवाले होते भी पुरुषको बांधते हैं,। उन दोनोंमेंसे श्रेयका ग्रहण करने वालेका शुभ होता है और जो प्रेयका वरण करता है, वह परमपुरुषार्थसे च्युत हो जाता है ।। १ ॥ अन्यत्पृथगेव श्रेयो निःश्रेयसं तथान्यदुताप्येव प्रेयः प्रियतरमपि । ते प्रेय:- श्रेयसी उभे नानार्थे भिन्नप्रयोजने सती पुरुषमधिकृतं वर्णाश्रमादिविशिष्ट सिनीतो बध्नीतस्ताभ्यामात्मकर्तव्यतया प्रयुज्यते सर्वः पुरुषः। श्रेयाप्रेयसोय- भ्युदयामृतत्वार्थी पुरुषः प्रवर्तते । अतः श्रेयःप्रेयःप्रयोजनकर्तव्यतया ताभ्यां बद्ध इत्युच्यते सर्वः पुरुषः। ते यद्यप्येकैकपुरुषार्थसंबन्धिनी विद्याविद्यारूपत्वाद्विरुद्धे इत्यन्यतरापरि- श्रेया-निःश्र यस अन्यत्-भिन्न ही है तथा प्रेय-प्रियतर वस्तु भी पृथक् ही है । वे श्रेय और प्रेय दोनों नानार्थे विभिन्न प्रयोजनवाले होनेपर भी वर्णाश्रमादि विशिष्ट अधिकृत पुरुषको बाँधते हैं। उन्हीं विद्याऽविद्यारूपी श्रेय और प्रेयके द्वारा अनेक कर्तव्यरूपसे सब नियुक्त हो जाते हैं। अभ्युदयार्थी पुरुष प्रयमें और मोक्षार्थी पुरुष श्रयमें प्रवृत्त होता है, अतः श्रय और प्रय इन दोनोंके प्रयोजनोंकी कर्तव्यता-कृति- साध्यताके कारण सब लोग उनसे बद्ध हैं ऐसा कहा जाता है। यद्यपि वे एक एक पुरुषार्थ सम्बन्धी हैं तो भी विद्या और अविद्यारूप होनेसे परस्पर विरुद्ध हैं, अतः दोनोंमें एकका परित्याग किये विना एक पुरुष द्वारा दोनोंका साथ साथ अनुष्ठान न सत्यानन्दीदीपिका सन्नाय सम्यक्परीक्ष्य दद्यावैष्णवीमात्मनिष्ठाम्' इत्यादि श्रुतिके भाधारपर यमराजने नचिकेताकी भलीभांति परीक्षाकर उसमें ब्रह्मविद्याविषयक जिज्ञासाका अनुभवकर उसे उपदेश देना प्रारम्भ किया- विविध दुःखोंकी अत्यन्त निवृत्ति तथा नित्य निरतिशय आनन्दकी प्राप्तिका नाम नि: यस-मोक्ष है, निःश्र यसका साधन होनेसे ब्रह्मात्मैकत्व ज्ञान को भी निःश्रेयस कहा गया है । प्रियतर अभ्युदयके साधन भूत ज्योतिष्टोमादि श्रेयसे भिन्न हैं और वे अविद्याकृत हैं। ब्रह्मविद्याका प्रयोजन मोक्ष है और अविद्याका प्रयोजन जन्ममरणरूप संसार है। वे दोनों वर्णाश्रमादि विशिष्ट पुरुषको इस प्रकार बांधते हैं--'प्राह्मणो । HADIMAMMAR CARD -- । . ४० कठोपनिषद्-शाङ्करभाष्य [अ०१ त्यागेनैकेन पुरुषेण सहानुष्ठातुमशक्यत्वात् तयोहित्वाविद्यारूपं प्रेयः श्रेय एव केवलमाददानस्योपादानं कुर्वतः साधु शोभनं शिवं भवति । यस्त्वदूरदर्शी विमूढो हीयते वियुज्यतेऽस्मादात् पुरुषार्थात् पारमार्थिकात्प्रयोजनान्नित्या- त्प्रच्यवत इत्यर्थः । कोऽसौ य उ प्रेयो वृणीत उपादत्त इत्येतत् ॥ १ ॥ यद्युभे अपि कर्तुं स्वायत्ते पुरुषेण किमर्थं प्रेय एवादत्ते वाहुल्येन लोक इत्युच्यते- हो सकने के कारण उनमें से अविद्यारूप प्रयका त्यागकर केवल श्रेयका ही ग्रहण करने वालेका साधु-शुभ-कल्याण होता है। जो मूढ-अविवेकी दूरदर्शी नहीं है वह इस अर्थ- पुरुषार्थ अर्थात् पारमार्थिक मोक्षरूप नित्य प्रयोजनसे च्युत हो जाता है ऐसा अर्थ है । वह कौन है ? जो प्रेयका वरण अर्थात् ग्रहण करता है, यह इसका तात्पर्य है ।। १ ।। यदि विद्याविद्यात्मक श्रेय और प्रेय इन दोनोंका करना भी पुरुपके अधीन है तो लोग अधिकतर प्रेयको ही क्यों ग्रहण करते हैं ? इसपर कहा जाता है- सत्यानन्दीदीपिका बृहस्पतिसवेन यजेत' । ब्राह्मण बृहस्पति सव नामक याग करे ) 'राजा राजसूयेन यजेत' (क्षत्रिय राजा राजसूयनामक याग करे ) यह वर्ण विशिष्टका अधिकार है । 'गृहस्थः सदृशीं भार्यामुपेयात्' (गृहस्थाश्रमी होनेवाला अपने सदृश पत्नीको प्राप्त करे ) यह पाश्रम विशिष्टका अधिकार है । 'जालपुत्रः कृष्णकेशोऽग्नीनादधीत' (उत्पन्न पुत्र व काले केशोंवाला अर्थात् ४० वर्षको प्रायुवाला पुरुष अग्निका प्राधान करे ) यह वय-आयु विशिष्टका अधिकार है। 'अविचिकित्सितव्याधेरपा प्रवेशो वा' (असाध्य व्याधिवाला जलमें प्रवेश करे ) यह अवस्था विशिष्टका अधिकार है । विहित कर्मोमें वर्णाश्रमादि विशिष्ट पुरुष अधिकारी है और ब्रह्मविद्या साधन चतुष्टय सम्पन्न पुरुष अधिकारी है । इस प्रकार अभ्युदयार्थी अभ्युदयके साधनों में और मोक्षार्थी भोक्षके साधनोंमें प्रवृत्त होता है और उनसे बंध जाता है। इस विषयमें- यत्तु चित्तस्य सततमर्थे श्रेयसी बन्धनम् । ज्ञानोयोगः स विज्ञेयः सर्वसिद्धिकर शिवः ।। कर्मकर्तव्यमित्येव विहितेष्वेव कर्मसु । बन्धनं मनसो नित्यं कर्मयोग; स उच्यते ॥ लोकेऽस्मिन्द्विविधा निष्ठा पुरा प्रोक्ता मयाऽनध । ज्ञानयोगेन सांख्यांनां कर्मयोगेन योगिनाम्।। ( गी० ३।३) इत्यादि श्रुति, स्मृतिवचन भी प्रमाण हैं । मोक्षको भी स्वर्गादिमें से अन्यतम मानने वाले मतका 'नित्य' शब्दसे निवारण किया गया है, क्योंकि स्वर्गादि लोक कर्मजन्य होने से अनित्य हैं और प्रात्मस्वरूप मोक्ष अजन्य होनेसे नित्य है। ज्ञान तो केवल प्रज्ञानकी निवृत्तिमात्र करता है, आत्मानन्दरूप - मोक्ष तो नित्य सिद्ध है, अत: अभ्युदयार्थीसे मोक्षार्थी प्रत्युत्तम है ।। १।। ॥
व०२] भाषानुवाद-सत्यानन्दीदीपिका ४१ श्रेयश्च प्रेयश्च मनुष्यमेतस्तौ सम्परीत्य विविनक्ति धीरः । श्रेयो हि धीरोऽभि प्रेयसो वृणीते प्रेयो मन्दो योगक्षेमावृणीते ॥२॥ श्रेयश्च प्रेयश्च [ द्व एव ] मनुष्यम् एत: ( प्राप्य तिष्ठतः ) धीर: (विवेकी ) तौ श्रेयः प्रेयः पदार्थों ) सम्परीत्य ( सम्यग् पालोच्य ) विविनक्ति ( पृथक्करोति ) धीरः धीमान् ) प्रेयसः (पुत्रादिभ्यः) श्रेयः हि (ब्रह्मविद्याम् एव ) अभिवृणीते । मन्दः (अल्पबुद्धिः) योगक्षेमाद् ( योगक्षेमनिमित्त) प्रेयः (वित्तादि ) वृणीते ( प्रार्थयते ) ॥ २॥ श्रेय और प्रेय परस्पर मिश्रितसे होकर ] मनुष्यको प्राप्त होते हैं। उन दोनोंको बुद्धिमान् पुरुष भलीभाँति विचारकर अलग अलग करता है । विवेकी पुरुष प्रयके सामने श्रेयका ही वरण करता है, किन्तु मन्दबुद्धि पुरुष योगक्षेमके लिए प्रयका वरण करता है ॥२॥ सत्यं स्वायत्ते तथापि साधनतः फलतश्च मन्दबुद्धीनां दुर्विवेकरूपे सती व्यामिश्रीभूते इव मनुष्यमेतं पुरुषमा इतः प्राप्नुतः श्रेयश्च प्रेयश्च । अतो हंस इवाम्भसः पयस्तौ श्रेयःप्रेयः पदार्थों सम्परीत्य सम्यक्परिंगम्य मनसालोच्य गुरुलाघवं विविनक्ति पृथक्करोति धीरो धीमान् । विविच्य च श्रेयो हि श्रेय एवाभिवृणीते प्रेयसोऽभ्यर्हितत्वात् । कोऽसौ ? धीरः। यस्तु मन्दोऽल्पबुद्धिः यह बात ठीक है कि वे दोनों मनुष्यके अधीन हैं, तो भी श्रेय और प्रेय मन्दबुद्धि पुरुषोंके लिए साधन और फलकी दृष्टिसे अतिकठिनतासे पृथक् होने योग्य परस्पर मिले हुएसे ही इस मनुष्य-जीवको प्राप्त होते हैं, अत: सुतरां धीर पुरुष जलसे पृथक्कर दूधको प्रहण करनेवाले हंसके समान श्रेय और प्रेय पदार्थोंका भली प्रकार परिगमन-मनसे मालोचनकर गौरव और लाघवका विवेक-पृथक्करण करता है । इस प्रकार श्रेयका विवे- चन कर वह प्रेयकी अपेक्षा अधिक अभीष्ट होनेके कारण श्रेयका ही ग्रहण करता है। सत्यानन्दीदीपिका यज्ञादि कर्मानुष्ठानमें शक्त, अधिकृत प्रादिका ही अधिकार है। यदि धनादिकी शक्ति है तो निकृष्ट जाति आदि होनेसे यज्ञादि कर्म में उसका अधिकार नहीं है। यदि ब्राह्मणत्व आदि उत्कृष्ट जाती है तो यज्ञादि संपादन करनेमें धन प्रादिका सामर्थ्य नहीं है। यदि सब प्रकारके सामर्थ्य और अधिकार आदि भी हैं तो कर्मानुष्ठानमें परिश्रम अधिक और फल अल्प-अनित्य दुःख मिश्रित है, किन्तु विद्या प्राप्त होनेपर अविद्याकी निवृत्ति होनेसे दुःखकी अत्यन्त निवृत्ति एवं परमानन्दरूप नित्य सिद्ध मोक्षकी प्राप्तिमें कोई परिश्रम नहीं है, इस प्रकार गौरव और लाघवका विचार कर मोक्षार्थी श्रयका ही सम्पादन करता है।।२।। -- ४२ कठोपनिषद्-शाङ्करभाष्य [अ०१ स विवेकासामर्थ्याद्योगक्षेमाद्योगक्षेमनिमित्तं शरीराद्युपचयरक्षणनिमित्तमित्ये- तत्प्रेयः पशुपुत्रादिलक्षणं वृणीते ॥२॥ स त्वं प्रियान्प्रियरूपा च कामानभिध्यायन्नचिकेतोऽत्यस्राक्षीः। नैता सृकां वित्तमयीमवाप्तो यस्यां मञ्जन्ति बहवो मनुष्याः ॥३॥ हे नचिकेत: ! स त्वं [ मया प्रलोभ्यमानोऽपि ] प्रियान् (प्रीतिप्रदान् पुत्रादीन् ) प्रियरूपान् च ( स्वभावतो रमणीयान् च ) कामान् ( काम्यमानान् भोगान् ) अभिध्यायन् (अनित्यत्वेन चिन्तयन् ) अत्यनाक्षीः (त्यक्तवान् असि ) वित्तमर्य ( धनप्रायाम् ) एतां ( सन्निहिततरां ) सङ्का ( माला ) न अवाप्त ( न स्वीकृतवानसि बहवो मनुष्याः यस्यां मज्जन्ति ( सीदन्ति ) ॥ ३ ॥ हे नचिकेता ! उस तुने पुत्रवित्तादि प्रिय तथा अप्सरा आदि प्रियरूप भोगोंक उनका असारत्व चिन्तनकर त्याग दिया है। जिसमें बहुतसे मनुष्य डूब जाते हैं उर इस धनप्राया निन्दित गतिको तू प्राप्त नहीं हुमा ।। ३ ।। स त्वं पुनः पुनर्मया प्रलोभ्यमानोऽपि प्रियान्पुत्रादीन्प्रियरूपांश्चाप्सर प्रभृतिलक्षणान्कामानभिध्यायंश्चिन्तयंस्तेषामनित्यत्वासारत्वादिदोषान् है नचि केतोऽत्यस्त्राक्षीरतिसृष्टवान्परित्यक्तवानस्यहो बुद्धिमत्ता तव । नैतामवाप्तवानरि मृतां मृतिं कुत्सितां मूढजनप्रवृत्तां वित्तमयीं धनप्रायाम् । यस्यां मृतौ मजन्ि सीदन्ति बहवोऽनेके मूढा मनुष्याः ॥३॥ तयोः श्रेय आददानस्य साधु भवति होयतेऽर्थाद्य उ प्रेयो वृणीत इत्युत्त तत्कस्माद्यत:- परन्तु वह कौन है ? बुद्धिमान् व्यक्ति । इसके विपरीत जो अल्प बुद्धि है वह विवे सामर्थ्यका अभाव होनेके कारण योगक्षेमके निमित्त-शरीर प्रादिकी वृद्धि तथा रक्षा लिए पशु पुत्र आदि रूप उस प्रयका ही वरण करता है ।। २।। हे नचिकेता! यह तेरी बुद्धिमत्ता है जो कि जिस तूने मेरे द्वारा बारम्बा प्रलोभित किये जाने पर भी पुत्रादि प्रिय तथा अप्सरादि प्रियरूप भोगोंका उनक अनित्यता-असारता आदि दोषोंका विचारकर परित्याग कर दिया, जिसमें मूढजन प्रवृत्त होते हैं उस वित्तमयी-धनप्राया ( धनप्रचुर ) निन्दित गतिको तू प्राप्त नहीं हुमा जिस मार्गमें अनेक मूढजन निमग्न हो रहें हैं ॥३॥ उनमें श्रेयको ग्रहण करनेवालेका शुभ होता है और जो प्रेयका वरण करता। वह स्वार्थसे भ्रष्ट हो जाता है, ऐसा जो [ इस वल्लीके प्रथम मन्त्रमें ] कहा गया है सो क्यों ? ( यमराज कहते हैं ) क्योंकि- व०२] भाषानुवाद-सत्यानन्दीदीपिका , कामा । दूरमेते पिपरीते विषूची अविद्या या च विद्येति ज्ञाता। विद्याभीप्सिनं नचिकेतसं मन्ये न त्वा कामा बहवोऽलोलुपन्त ॥४॥ दूरं दूरेण महतान्तरेणैते विपरीते अन्योन्यव्यावृत्तरूपे विवेकाविवेकात्म- कत्वात्तमः प्रकाशाविव । विषूषी विषूच्यौ नानागती भिन्नफले संसारमोक्ष- हेतुत्वेनेत्येतत् । के ते इत्युच्यते या चाविद्या प्रेयोविषया विद्येति च श्रेयोविषया ज्ञाता निर्मातावगता पण्डितैः । तत्र विद्याभीप्सिनं विद्यार्थिनं नचिकेतसं त्वामहं मन्ये । कस्माद्यस्मादविद्वबुद्धिप्रलोभिनः कामा अप्सरः प्रभृतयो बह्वोऽपि त्वा त्वां नालोलुपन्त न विच्छेदं कृतवन्तः श्रेयोमार्गादात्मोपभोगाभिवांछा- संपादनेन । अतो विद्यार्थिनं श्रेयोभाजनं मन्य इत्यभिप्रायः॥४॥ या अविद्या (प्रेयोविषया ) च विद्या (श्रयोविषया ) ज्ञाता, एते दूरं (अतिशयेन) विपरीते (अन्योन्यपृथक्स्वभावे ) विषूची ( भिन्नफले ) नचिकेतसे त्वा ( त्वां) विद्याभीप्सिनं (विद्याभिकांक्षिणं ) मन्ये (जानामि ) [ यतः ] बह्वः ( भोगाः ) [ त्वां ] न अलोलुपन्तः (श्रेयः पथात् न विचलितं कृतवन्तः ) ॥ ४ ॥ जो विद्या और अविद्यारूपसे परिज्ञात हैं ये दोनों ही अत्यन्त विपरीत स्वभाववाली और विरुद्ध फलप्रद हैं। मैं तुझ नचिकेताको विद्याभिलाषी मानता हूँ, क्योंकि बहुत काम भोग भी तुझे प्रलोभित अर्थात् अयोमार्गसे विचलित नहीं कर सके ।। ४ ।। अविद्यानस्तोंकी दुर्दशा ये तु संसारभाजना अविद्यायामन्तरे वर्तमानाः स्वयं धीराः पण्डितंमन्यमानाः । दन्द्रम्यमाणाः परियन्ति मूढा अन्धेनैव नीयमाना यथान्धाः ॥५॥ प्रकाश और अन्धकारके सनान ये दोनों विवेक और अविवेकरूप होनेसे 'दूरम्' महान् अन्तरके साथ विपरीत हैं-परस्पर-एक दूसरेसे व्यावृत्तरूप हैं। विषूची-नानागतिवाले अर्थात् संसार और मोक्षके हेतु होनेसे विभिन्न फलवाले हैं । वे कौन है ? इसपर कहते हैं-जो कि पण्डितोंद्वारा प्रेयको विषय करनेवाली अविद्या तथा योविषयक विद्यारूपसे जानी गयी हैं। उनमें तुझ नचिकेताको मैं विद्याभिलाषी. विद्यार्थी मानता हूँ। क्यों ? क्योंकि अविवेकियोंकी बुद्धिको प्रलोभित करनेवाले अप्सरादि बहुत-से भोग भी तुझे लुब्ध नहीं कर सके-उन्होंने तेरे हृदयमें अपने भोगकी इच्छा उत्पन्न कर तुझे श्रेय-ज्ञानमार्गसे विच्छिन्न-विच्युत नहीं किया, अत: मैं तुझे विद्यार्थी-श्रेयका पात्र-अधिकारी समझता हूँ, यह अभिप्राय है ।। ४ ॥ किन्तु जो संसारके पत्र हैं- - N -' कठोपनिषद्-शाङ्करभाष्य [ उपद्घात अविद्यायाम् अन्तरे ( मध्ये ) वर्तमानाः स्वयं धीराः (धीमन्तः) पण्डितं मन्यमाना (आत्मानं पण्डितं च अवगच्छन्तः ) दन्द्रभ्यमाणाः ( वक्रगतयः कुटिलस्वभावार ) मूढ़ा ( अविवेकिनः ) परियन्ति ( परिगच्छन्ति ) अन्धेन एव नीयमानाः ( परिचालिताः) .. अन्याः यथा।। ५ ।। an Rani वे अविद्याके भीतर विद्यमान अपनेको महान् बुद्धिमान और पण्डित-शास्त्रकुशल माननेवाले, कुटिल गतिका अवलम्बन करनेवाले मूढ़ पुरुष अन्धेसे ही परिचालित अन्धेके समान अनेक कुटिल गतियोंको प्राप्त होते हैं ।। ५ । अविद्यायामन्तरे मध्ये घनीभूत इव तमसि वर्तमाना वेष्ट्यमानाः पुत्र- पश्वादितृष्णापाशशतैः । स्वयं वयं धीराः प्रज्ञावन्तः पण्डिताः शास्त्रकुशलाश्चेति मन्यमानास्ते दन्द्रम्यमाणा अत्यर्थं कुटिलामनेकरूपां गतिमिच्छन्तो जरामरण- रोगादिदुःखैः परियन्ति परिगच्छन्ति मूढा अविवेकिनोऽन्धेनैव दृष्टिविहीनेनैव नीयमाना विषमे पथि यथा बह्वोऽन्धा महान्तमनर्थमृच्छन्ति तद्वत् ।। ५ ॥ अत एव मूढत्वात् न साम्परायः प्रतिभाति बालं प्रमाद्यन्तं वित्तमोहेन मूढम् । अयं लोको नास्ति पर इति मानी पुन: पुनर्वशमापद्यते मे ॥ ६ ॥ वे धनीभूत अन्धकारके समान अविद्यामें विद्यमान पुत्र, पशु आदि सैकड़ों तृष्णा पाशोंसे परिवेष्टित हुए जिस प्रकार अन्धे-दृष्टि हीनपुरुषसे विषममार्ग में प्रचालित बहुतसे अन्धे महान् अनर्थको प्राप्त होते हैं, उसी प्रकार हम बड़े धोर-बुद्धिमान और पण्डित-शास्त्रकुशल हैं, इस प्रकार अपनेको माननेवाले वे मूढ़ अविवेकी पुरुष नाना- प्रकारकी अत्यन्त कुटिल गतियोंकी इच्छा करते हुए जरा, मरण, रोग आदि (जनित) दुःखोंसे सब ओर भटकते रहते हैं ।। ५ ॥ अतएव मूढ़ताके कारण सत्यानन्दीदीपिका अविद्या जनित देहेन्द्रियादि कार्यकरण सघांतमें तादात्म्याभिमान करनेवाले अविवेकी- जन संसारके योग्य माने जाते हैं । दृष्टिहीन व्यक्तिसे प्रचालित अन्धे कण्टकाकीर्ण मार्ग, गादिमें गिरकर जैसे महान् क्लेशका अनुभव करते हैं, वैसे ही तत्त्वज्ञानरूप दृष्टिहीन अज्ञानीपुरुषसे प्रचालित अविवेकी जनोंको विविध योनियोंको प्राप्तकर वही दशा होती है । इस विषयमें थे- इच्छाद्वेषसमुत्थेन द्वन्द्वमोहेन जन्तवः । धराविवरमग्नानां कीटानां समतां गताः। यह मंत्र भी है ॥ ५॥ - व०२] भाषानुवाद-सत्यानन्दीदीपिका ४५ साम्परायः (परलोकसाधनविशेषः ) बालं (बालसदृशम् अविवेकिन) वित्तमोहेन ( वित्तनिमित्तैनाविवेकेन ) मूढम् ( तमसाच्छन्नम् ) अतएव प्रमाद्यन्तं ( प्रमादोपेतं जनं ) प्रति न भाति (प्रतीतिविषयो न भवति ) अयं ( दृश्यमानः) लोकः ( मृत्यु- लोक: ) अस्ति, परः ( स्वर्गादिलोक: ) न अस्ति, इति मानी पुन: पुन: मे (मम यमस्य) वशम् ( अधीनताम् ) प्रापद्यते (आप्नोति ) ॥ ६ ॥ धनके मोहसे मूढ़ प्रमादग्रस्त अविवेकीको परलोकका साधन प्रतिभात नहीं होता 'यह लोक है परलोक नहीं है। ऐसा माननेवाला पुरुष पुन: पुन: मेरी अधीनताको प्राप्त होता है ।। ६ ॥ न साम्परायः प्रतिभाति । सम्पर ईयत इति सम्परायः परलोकस्तत्प्राप्ति- प्रयोजनः साधनविशेषः शास्त्रीयः साम्परायः। स च बालमविवेकिनं प्रति न प्रतिभाति न प्रकाशते नोपतिष्ठत इत्येतत् । प्रमाद्यन्तं प्रमादं कुर्वन्तं पुत्रपश्वादि- प्रयोजनेष्वासक्तमनसं तथा वित्तमोहेन वित्तनिमित्तेनाविवेकेन मूढं तमसाच्छन्नं सन्तम् । अयमेव लोको योऽयं दृश्यमानः स्त्र्यन्नपानादिविशिष्टो नास्ति परोऽदृष्टो लोक इत्येवं मननशीलो मानी पुनः पुनर्जनित्वा वशं मदधीनतामापद्यते मे मृत्योर्मम । जननमरणादिलक्षणदुःखप्रबन्धारूढ एव भवतीत्यर्थः । प्रायेण ह्येवंविध एव लोकः॥६॥ उसे साम्पराय प्रतिभासित नहीं होता। देहपातानन्तर जो सम्यग्रूपसे प्राप्त किया जाय वह सम्पराय-परलोक है, उसके प्राप्ति प्रयोजनवाला शास्त्रीय साधनविशेष साम्पराय है, वह अविवेकीके प्रति प्रकाशित नहीं होता, क्योंकि वह प्रमादी पुत्र, पशु आदि प्रयोजनोंमें आसक्त मनवाला तथा वित्तमोह-धन निमित्तक अविवेकसे मूढ़ ( अज्ञानसे प्रावृत्त ) है अर्थात् वह उसके चित्तके सम्मुख उपस्थित नहीं होता। यह जो स्त्री, अन्न पानादि विशिष्ट दृश्यमान लोक है बस यही है, इससे अन्य अदृष्ट- स्वर्गादि लोक नहीं है ऐसा माननेवाला पुरुष पुनः पुनः जन्म लेकर मुझ मृत्युको अधीनताको प्राप्त होता है अर्थात् जन्ममरणादिरूप दुःख प्रवाहपर ही प्रारूढ़ रहता है प्रायः लोग ऐसे ही हैं ।। ६ ।। सत्यानन्दीदीपिका प्रारब्धक्षयानन्तर जो सभ्यग्रुप-परापर ब्रह्मरूप प्राप्त किया जाय वह सम्पराय है उसकी प्राप्ति प्रयोजनवाला जीवब्रह्मक्य ज्ञान अथवा श्रीकार ध्यानादि साम्पराय है, वह शास्त्रीय साधन विशेष पुत्रादिमें प्रासक्तमनवाले अविवेकी पुरुषको प्रकाशित नहीं होता अर्थात् पुत्र, पशु आदि विषयोंमें आसक्त अविवेकी पुरुष उस शास्त्रीय साधन विशेषका भनुष्ठान नहीं करता। इससे वह विविध यमयातनाओंको भोगता है। इस विषयमें- wmanuarmatmaavan Lum- WERE कठोपनिषद्-शाङ्करभाष्य [अ०१ ..- - मात्मज्ञानकी दुर्लभता यस्तु श्रेयोऽर्थी सहस्रेषु कश्चिदेवात्मविद्भवति त्वद्विधो यस्मात्- श्रवणायापि बहुभिर्यो न लभ्यः शृण्वन्तोऽपि बहवो यं न विद्युः । आश्चर्यो वक्ता कुशलोऽस्य लब्धाश्चर्यो ज्ञाता कुशलानुशिष्टः ॥७॥ यः (आत्मा) बहुभिः (अनेक जनैः) श्रवणाय अपि (श्रोतुम् अपि) न लभ्यः, शृण्वन्तः अपि बहवः ( अनेके जनाः ) यम् ( आत्मानं ) न विद्युः (न जानन्ति) अस्य (प्रात्मनः) वक्ता ( यथावदतत्त्वोपदेष्टा ) आश्चर्यः (दुर्लभः ) अस्य (प्रात्मनः ) लब्धा, कुशल (निपुणः) कुशलानुशिष्ठः ( कुशलेन प्राचार्येण उपदिष्टः ) ज्ञाता ( बोद्धा ) पाश्चर्य: (दुर्लभः ) [ अस्ति ] ।। ७ ।। जो बहुतोंको सुनने के लिए भी प्राप्त होने योग्य नहीं है, जिसे बहुतसे सुनकर भी नहीं समझ सकते, उस आत्मतत्त्वका उपदेष्टा भी आश्चर्यरूप है, उस पात्माको प्राप्त करनेवाला भी कोई निपुण पुरुष ही होता है तथा कुशल प्राचार्यद्वारा उपदेश किया हुमा ज्ञाता भी आश्चर्यरूप है ॥ ७॥ श्रवणायापि श्रवणार्थं श्रोतुमपि यो न लभ्य आत्मा बहुभिरनेकैः शृण्व- न्तोऽपि बह्वोऽनेकेऽन्ये यमात्मानं न विद्युन विदन्त्यभागिनोऽसंस्कृतात्मानो न विजानीयुः । किंचास्य वक्तापि आश्चर्योऽद्भुतवदेवानेकेषु कश्चिदेव भवति । तथा श्रुत्वाप्यस्य आत्मनः कुशलो निपुण एवानेकेषु लब्धा कश्चिदेव भवति । श्रेयका अभिलाषी तेरे समान तो सहस्रोंमें कोई ही प्रात्मवेत्ता होता है, क्योंकि- जो प्रात्मा अनेकोंको सुनने के लिए भी प्राप्त होने योग्य नहीं है तथा अन्य अनेक अभागे अशुद्ध चित्तवाले पुरुष जिस आत्माको सुनकर भी नहीं जान पाते । यही नहीं, किन्तु इस आत्मतत्वका उपदेष्टा भी आश्चर्य अर्थात् अद्भुत-सा अनेकोंमें कोई होता है । तथा श्रवण कर भी इस मात्माका लब्धा-प्राप्त करनेवाला तो अनेकोंमें कोई एक निपुण सत्यानन्दीदीपिका आसुरी योनिमापन्ना मूढ़ा जन्मनि जन्मनि । मामप्राप्यैव कौन्तेय ततो यान्त्यघमां गतिम् । (गी० १६।२० ) ऐसी स्मृति भी है। आश्चर्यवत्पश्यति कश्चिदेनामाश्चर्यवद्वदति तथैव चान्यः । आश्चर्यवच्चैमन्यः शृणोति श्रुत्वाऽप्येनं वेद न चैव कश्चित् ॥' (गी० २।२९) 'कोई इस प्रात्माको आश्चर्य-सा अनुभव करता है, कोई प्रात्माको आश्चर्यवत् कथन करता है, दूसरा उसका प्राश्चर्यवत् श्रवण करता है और सुनकर भी कोई उसे जान नहीं पाता ।। यह अन्य गीतावचन भी है ॥ ७॥ uhan - व०२] भाषानुवाद-सत्यानन्दीदीपिका यस्मादाश्चर्यो ज्ञाता कश्चिदेव कुशलानुशिष्टः कुशलेन निपुणेनाऽऽचार्येणानु- शिष्टः सन् ॥७॥ कस्मात्- न नरेणावरेण प्रोक्त एष सुविज्ञेयो बहुधा चिन्त्यमानः । अनन्यप्रोक्ते गतिरत्र नास्त्यणीयान्ह्यतय॑मणुप्रमाणात् ॥८॥ एष (प्रात्मा ) अवरेण (प्राकृतबुद्धिशालिना) नरेण (मनुष्येण) प्रोक्तः (उपदिष्टः) सुविज्ञेयः (सम्यग्ज्ञातुं शक्यः) न भवति । बहुधा ( अस्ति नास्ति इत्याद्यनेकप्रकारेण ) चिन्त्यमानः [ वादिभिः , अनन्यप्रोक्ते (अपृथग्दशिना प्राचार्येण उपदिष्टे) अत्र (प्रात्मनि ) गतिः ( अस्ति नास्ति इत्याद्यात्मिका चिन्ता ) नास्ति, हि ( यस्मात् ) अणुप्रमाणात् (अशुपरिमाणतोऽपि ) अरणीयान् (अतिसूक्ष्मः ) अतक्र्यम् ( तर्का- विषयम् ) ॥८॥ वादियोंद्वारा कई प्रकारसे कल्पित किया हुआ यह प्रात्मा साधारण बुद्धिवाले पुरुषसे उपदिष्ट होनेपर सम्यग्ज्ञान गोचर नहीं हो सकता, क्योंकि, अभेददर्शी प्राचार्य द्वारा उपदिष्ट इस आत्मामें अस्ति नास्ति मादिरूप गति-चिन्ता नहीं है, क्योंकि यह सूक्ष्मपरिमाणवालोंसे भी सूक्ष्म और तर्काविषय-दुर्विज्ञेय है ।। ८ ॥ न हि नरेण मनुष्येणावरेण प्रोक्तोऽवरेण हीनेन प्राकृतबुद्धिना इत्येतदुक्त एष आत्मा यं त्वं मां पृच्छसि । न हि सुष्ठु सम्यग्विज्ञेयो विज्ञातुं शक्यो पुरुष ही होता है, क्योंकि प्रात्मदर्शनमें कुशल प्राचार्यद्वारा उपदिष्ट हुमा ज्ञाता भी माश्चर्यरूप कोई ही होता है ॥ ७ ॥ क्योंकि- यह प्रात्मा तुम मुझसे जिसके विषयमें पूछते हो, किसी प्रवर-हीन-साधारण बुद्धिवाले मनुष्यसे उपदिष्ट होनेपर सम्यग्रूपसे जानने योग्य नहीं होता, क्योंकि वह प्रस्ति नास्ति कर्ता अकर्ता, शुद्ध प्रशुद्ध इत्यादि अनेक प्रकारसे वादियोंद्वारा चिन्तन सत्यानन्दीदीपिका मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये । यततामपि सिद्धानां कश्चिन्यां वेत्ति तत्त्वतः ॥ (गी० ७।३) सहस्र-अनेक मनुष्योंमें तत्त्वज्ञानरूप सिद्धि के लिए कोई विरला ही यस्न करता है । उन यत्नशील सिद्धोंमें भी मुझे यथार्थरूपसे कोई भाग्यशाली ही जानता है।' 'तद्विज्ञानार्थं स गुरुमेवाभिगच्छेत्समित्पाणिः श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठम्' (मु. १।२।१२) इत्यादि श्रुतिके अनुसार श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ प्राचार्यद्वारा उपदिष्ट प्रात्मा साधन चतुष्टय सम्पन्न प्रारमजिज्ञासुसे ज्ञात व प्राप्त हो सकता है, किन्तु प्राकृतबुद्धिना-'प्रकृतित - - ४८ कठोपनिषद्-शाङ्करभाष्य [अ०१ यस्माद् बहुधास्ति नास्ति कर्ताकर्ता शुद्धोऽशुद्ध इत्याद्यनेकधा चिन्त्यमानो वादिभिः । कथं पुनः सुविज्ञेय इत्युच्यते-अनन्यप्रोक्तेऽनन्येनापृथग्दर्शिनाऽऽचार्येण प्रतिपाद्यब्रह्मात्मभूतेन प्रोक्त उक्त आत्मनि गतिरनेकधास्ति नास्तीत्यादिलक्षणा चिन्ता गतिरत्रास्मिन्नात्मनि नास्ति न विद्यते सर्वविकल्पगतिप्रत्यस्तमितत्वा- दात्मनः। अथवा स्वात्मभूतेऽनन्यस्मिन्नात्मनि प्रोक्तेऽनन्यप्रोक्ते गतिरत्रान्याव- गतिर्नास्ति ज्ञेयस्यान्यस्याभावात् । ज्ञानस्य ह्यषा परा निष्ठा यदात्मैकत्वविज्ञानम् । अतोऽवगन्तव्याभावान्न गतिरत्रावशिष्यते। संसारगतिर्वात्र नास्त्यनन्य आत्मनि प्रोक्ते नान्तरीयकत्वात्तद्विज्ञानफलस्य मोक्षस्य । अथवा प्रोच्यमानब्रह्मात्मभूते- नाचार्येण प्रोक्त आत्मन्यगतिरनवबोधोऽपरिज्ञानमत्र नास्ति । भवत्येवावगति- स्तद्विषया श्रोतुस्तदस्म्यहमित्याचार्यस्येवेत्यर्थः। एवं सुविज्ञेय आत्माऽऽगम- किया जाता है । तो पुनः यह सम्यग्रूपसे विज्ञेय कैसे हो सकता है ? इसपर कहते हैं- अनन्यप्रोक्ते-वेदान्त प्रतिपाद्य ब्रह्मस्वरूपको प्रात्मरूपसे प्राप्त हुए अपृथग्दी-अभेददर्शी प्राचार्य द्वारा कहे हुए इस आत्मामें प्रस्ति नास्ति ( है वा नहीं ) इत्यादि रूप गति- चिन्ता नहीं है, क्योंकि भारमा समस्त विकल्पोंकी गतिसे रहित है। अथवा [ गतिरत्र नास्ति' इसका यह अर्थ भी हो सकता है ] अनन्यप्रोक्ते- अपने ब्रह्मात्मभूत अनन्य आत्माका प्राचार्यद्वारा उपदेश किये जानेपर अन्यगति- अन्य अवगति अर्थात् अन्य वस्तुका ज्ञान नहीं होता, क्योंकि अन्य ज्ञेयवस्तुका अभाव है । जो आत्माका एकत्व विज्ञान है यही ज्ञानकी पराकाष्ठा है । अतः जानने योग्य वस्तुका प्रभाव होनेसे पुनः यहाँ कोई अन्यगति नहीं रहती। अथवा अनन्य- स्वरूपभूत आत्माका उपदेश किये जाने पर संसारकी गति नहीं रहती, क्योंकि उस प्रात्मविज्ञानका मोक्षरूप फल तो उसके अनन्तर अवश्यंभावी है। अथवा आगे कहे जानेवाले ब्रह्मात्मभूत आचार्यद्वारा उपदिष्ट इस प्रात्मामें पुनः अगति-अनवबोध-अपरिज्ञान नहीं रहता अर्थात् प्राचार्य के समान उस श्रोताको भी यह प्रात्मविषयक ज्ञान हो ही जाता है कि 'वह ब्रह्म मैं हूँ' यह अर्थ है। इस प्रकार शास्त्रज्ञ प्राचार्यद्वारा अनन्यरूपसे उपदिष्ट प्रात्मा सुविज्ञेय होता है, नहीं तो अर्थात् सत्यानन्दीदीपिका आगतेषु पश्वादिष्यभिमानरूपा बुद्धिर्यस्य स: प्राकृतबुद्धिस्तेन' 'प्रकृतिसे प्राप्त पशु आदि की सी बुद्धिवाला अर्थात् देहात्मबुद्धिवाला मनुष्य प्रकृतबुद्धि कहलाता है, उससे उपदिष्ट आत्मा सुज्ञेय नहीं होतr' चार्वाककेसिवा आस्तिक सांख्यादि मतोंमें देहपातानन्तर प्रात्माका अस्तित्व माना गया है, किन्तु उसके स्वरूपमें कुछ विप्रतिपत्तियां हैं । जैसे- सांख्यमत में आत्मा केवल भोक्ता है, नैयायिक मतमें कर्ता भोक्ता है, कोई आत्माको प्रणु "- Pre certer व०२] भाषानुवाद-सत्यानन्दीदीपिका वताऽऽचार्येणानन्यतया प्रोक्तः। इतरथा ह्यणीयानणुप्रमाणादपि सम्पद्यत आत्मा। अतर्कामतर्व्यः स्वबुद्धधाभ्यूहेन केवलेन तर्केण, तळमाणेऽणु- परिमाणे केनचित्स्थापित अात्मनि ततो ह्यणुतरमन्योऽभ्यूहति ततोऽप्यन्योऽणुत- ममिति न हि कुतर्कस्य निष्ठा कचिद्विद्यते ॥८॥ नैषा तर्केण मतिरापनेया प्रोक्तान्येनैव सुज्ञानाय प्रेष्ठ । यां त्वमापः सत्यधृतिर्बतासि त्वादृङ्नो भूयान्नचिकेतः प्रष्टाः ॥६॥ हे प्रेष्ठ ! (प्रियतम ! ) त्वं यां ( मतिम् ) आपः (प्राप्तवानसि ) एषा मति: तर्केण ( स्वबुद्धिपरिकल्पितेन ) न आपनेया ( न प्राप्या वा न हातव्या ) अन्येन ( ब्रह्म- णोऽनन्योहमिति जानता आचार्येण ) प्रोक्ता (तदुपदेशजन्या) सुज्ञानाथ (सम्यग्ज्ञानाय ) [ भवति ] हे नचिकेतः ! सत्यधृतिः असि, बत ( अनुकम्पायां ) त्वाक ( त्वत्तुल्य: ) प्रष्टा ( पृच्छक ) नो ( अस्मभ्यं ) भूयात् ( भवेत् ) ॥ ६ ॥ हे प्रियतम ! सभ्यग्ज्ञानके लिए शुष्क तार्किकसे भिन्न शास्त्रज्ञ प्राचार्यद्वारा उप- दिष्ट-प्रतिपादित यह बुद्धि जिसे तू प्राप्त हुआ है, शास्त्र असम्मत तर्क से प्राप्त होने योग्य नहीं है। अहो, तू सत्यधारणावाला है । हे नचिकेता ! हमें तेरे समान प्रश्नकर्ता प्राप्त हो ॥ ६॥ भेददर्शी आचार्यद्वारा उपदिष्ट तो यह अशुप्रमाण वस्तुओंसे भी अशु-सूक्ष्म हो जाता है अर्थात् ज्ञात नहीं होता। अपनी बुद्धिसे उत्पन्न-श्रारोपित केवल तकसे भी इसका यथार्थज्ञान नहीं हो सकता । यदि कोई पुरुष तर्क द्वारा तकित अशुपरिमारण प्रात्माको स्थापित भी करे तो अन्य उसे तर्कसे अरगुतर, उससे भी अन्य उसे तर्कसे अशुतम स्थापित कर देगा, क्योंकि कुर्तककी स्थिति कहीं भी नहीं है ।। ८ ।। सत्यानन्दीदीपिका कोई मध्यम परिमाण, कोई विभु, कोई जड़, कोई चेतन, कोई उभयात्मक प्रादि मानते हैं । चार्वाक जीवित देहको ही आत्मा कहते हैं । इत्यादि कल्पनाएं ब्रह्मभूत प्रात्मामें नहीं हैं, क्योंकि प्रात्मा निर्विशेष है । 'अहं ब्रह्मास्मि' इस प्रकार आत्माका ज्ञान होने पर अन्य वस्तुका ज्ञान नहीं रहता, क्योंकि 'सर्वं खल्विदं ब्रह्म' 'नेह नानाऽस्ति किञ्चन' 'नाऽन्योऽस्ति द्रष्टा' इत्यादि श्रुतियाँ ब्रह्मात्मैकत्वसे अतिरिक्त ज्ञेयवस्तुका प्रभाव प्रतिपादन करती हैं । अथवा अभेददर्शी गुरुद्वारा ब्रह्मात्मैकका उपदेश किये जाने पर प्रात्मामें पुनः संसारका सत्यरूपसे अवभास नहीं होता, यदि होता है तो वह मी मिथ्यारूपसे । 'श्रोत- व्यो मन्तव्यः' इस प्रकार यद्यपि श्रुतिमें श्रुति सहाय तर्कका स्थान है तो भी श्रुति असहाय तर्कको कुतर्क कहा गया है, 'तर्काप्रतिष्ठानाद्' (ब्र० सू० २।१।११) ईस सूत्र में SANEDEI.PM amarANaMtrvamantarmum premSUCACADEMODERE- - कठोपनिषद्-शाङ्करभाष्य [अ०१ - अतोऽनन्यप्रोक्त आत्मन्युत्पन्ना येयमागमप्रतिपाद्यात्ममतिर्नैषा तर्केण स्वबुद्धयभ्यूहमात्रेणापनेया न प्रापणीयेत्यर्थः। नापनेतव्या वा न हातव्या तार्किको ह्यनागमज्ञः स्वबुद्धिपरिकल्पितं यत्किञ्चिदेव कथयति । अत एव च येयमागमप्रभूता मतिरन्येनैवागमाभिज्ञेनाऽऽचार्येणैव तार्किकात्प्रोक्ता सती सुज्ञानाय भवति हे प्रेष्ठ प्रियतम। का पुनः सा तर्कागम्या मतिरित्युच्यते-यां त्वं मतिं मद्वरप्रदानेनाऽऽपः प्राप्तवानसि । सत्याविथविषया धृतिर्यस्य तव स त्वं सत्यधृतिर्वतासीत्यनुकम्पयन्नाह मृत्युर्नचिकेतसं वक्ष्यमाणविज्ञानस्तुतये । त्वामुक्त्वत्तुल्यो नः अस्मभ्यं भूयाद्भवताद्भवत्वन्यः पुत्रः शिष्यो वा प्रष्टा, कीडग्याक्त्वं हे नचिकेतः प्रष्टा ॥ ६ ॥ पुनरपि तुष्ट आह- अतः अभेददर्शी प्राचार्यद्वारा उपदिष्ट मात्मामें उत्पन्न जो यह शास्त्र प्रतिपाद्य आत्मविषयक मति है, वह तर्कसे-अपनी बुद्धिके ऊहापोह मात्रसे प्राप्य होने योग्य नहीं है यह अर्थ है, अथवा यह प्रात्मविषयक बुद्धि तर्क शक्तिसे आपने तव्य-बाधयोग्य नहीं है, क्योंकि तार्किक तो ब्रह्मात्मैकत्व प्रतिपादक शास्त्रसे अनभिज्ञ होता है, वह अपनी बुद्धि से परिकल्पित जो कुछ चाहे कहता रहता है। अतः हे प्रेष्ठ-प्रियतम ! यह जो शास्त्र- जनित बुद्धि है वह यदि ताकिकसे भिन्न ब्रह्मात्मैकत्व प्रतिपादक शास्त्रके ज्ञाता प्राचार्य द्वारा उपदिष्ट हो तो सम्यग्ज्ञानके-ब्रह्मात्मकत्व ज्ञानके लिए होती है । अच्छा तो फिर तर्कसे प्राप्त न होने योग्य वह बुद्धि-ज्ञान कौन-सी है ? इसपर कहते हैं--जिस मतिको तूने मेरे वर प्रदानसे प्राप्त किया है। सत्य-यथार्थ पदार्थ विषयक धृति धारणा है जिसकी ऐसा तू सत्यधृति है। इस प्रकार अनुकम्पा करते हुए यमराज आगे कहे जाने वाले विज्ञानकी स्तुतिके लिए नचिकेतासे कहते हैं-हे नचिकेता ! हमें तेरे समान प्रश्न- कर्ता और भी पुत्र वा शिष्य हो जैसा कि तू प्रश्न करनेवाला है ।। ६ ।। नचिकेतासे प्रसन्न हुए यमराजने फिर कहा- सत्यानन्दीदीपिका बादरायण महर्षिने श्रुति असहाय तर्ककी अप्रतिष्ठा कही है, पतएव असत् तर्कका अविषय होनेसे भात्माको प्रतयं कहा गया है ॥८॥ 'तत्त्वमसि, अहं ब्रह्मास्मि, ब्रह्मविद् ब्रह्मैव भवति, तरति शोकमात्मवित्' इत्यादि श्रुति जनित प्रात्मकत्व ज्ञान केवल बुद्धि जन्य तर्कसे प्राप्य नहीं है अथवा किसी तर्क द्वारा बाध्य भी नहीं है, अतः अभेददर्शी प्राचार्यद्वारा उपदिष्ट तत्त्वज्ञान ही प्रास्मसा- क्षात्कारका हेतु है 'तर्काप्रतिष्ठानात्' (ब्र० सू० २।१।११) इस सूत्रसे भी श्रुति प्रस. हाय तर्क अप्रतिष्ठित कहा गया है ॥ ६ ॥ - 2324 |S.V.0. College TEXTBOOK. व० भाषानुवाद-सत्यानन्दीदीilrary, ५१ TIRUPATI. जानाम्यह- शेवधिरित्यनित्यं न ह्या प्राप्यते हि ध्रुव तत् । ततो मया नाचिकेतश्चितोऽग्निरनियावानस्मि-रित्यम्।१०॥ शेवधिः (निधिः-कर्मफललक्षण: ) अनित्यम् (अनित्या) इति अहं जानामि । हि (यतः ) ध्रुवं ( शाश्वतं तत् ब्रह्म ) अध्र वैः (अनित्यैः) न हि प्राप्यते, ततः मया अनित्यर्द्रव्यैः ( चयनसाधनैः) नाचिकेत: अग्निः ( इष्टकाचितिस्थोऽग्निः ) चिता ( सम्पादितः ) [ तेन ] नित्यम् ( आपेक्षिकनित्यं याम्यपदं ) प्राप्तवानस्मि ॥ १० ॥ मैं यह जानता हूँ कि कर्मफलरूप निधि अनित्य है, क्योंकि अनित्य साधानोंद्वारा वह नित्य ( ब्रह्मात्मा ) प्राप्त नहीं किया जा सकता। तब मेरेद्वारा नाचिकेत अग्निका चयन किया गया, उन अनित्यद्रव्योंसे ही मैं [आपेक्षिक] नित्य ( याम्यपद ) को प्राप्त . हुमा हूँ॥१०॥ IDEARNamas - जानाम्यहं शेवधिनिधिः कर्मफललक्षणो निधिरिव प्रार्थ्यत इति । असाव- नित्यमनित्य इति जानामि । न हि यस्मादनित्यैः अध्रुवैर्नित्यं ध्रुवं तत्प्राप्यते परमात्माख्यः शेवधिः । यस्त्वनित्यसुखात्मकः " शेवधिः स एवानित्यैव्यैः कर्मफलरूप निधि ही 'शेवधि' है वह निधिके समान प्रार्थित है, यह अनित्य है ऐसा मैं जानता हूँ, क्योंकि इन अनित्य यज्ञादि साधनोंसे वह परमात्मा नामक नित्य- शाश्वत निधि प्राप्त नहीं की जा सकती। जो अनित्य सुखात्मक निधि है वह अनित्य सत्यानन्दीदीपिका स्वर्गादिके साधनभूत यज्ञादि कर्म अत्यधिक प्रयत्न साध्य हैं, ऐसा मैं जानता हूँ, परन्तु तुमने उस कर्मका फल भी ग्रहण नहीं किया, इससे तुम मुझसे भी अधिक प्रज्ञ हो, इस प्रकार सन्तुष्ट होकर यमने फिर कहा- यद्यपि 'शेवधि' शब्द निधिका पर्याय है तो भी कामना विषयत्व गुण योगसे 'शेव धि' शब्द कर्मफलमें भी विद्यमान है 'तद्यथेह कर्मजितो लोकः क्षीयते एवमेवामुत्र पुण्यजितो लोकः क्षीयते नास्त्यकृतकृतेन' (छा० ८।१।६ ) (जैसे हस्त पाद आदि क्रियाओंसे संपादित यह लोक-पदार्थ क्षीण हो जाता है वैसे ही पुण्यकर्मसे सम्पादित स्वर्गादि लोक भी नष्ट हो जाता है, अतः प्रकृत-नित्य यज्ञादि-कर्मसे सम्पादित नहीं होता ) 'एतच्छ्यो येऽभिनन्दन्ति मूढा जरामृत्यु ते पुनरेवापियन्ति' ( जो प्रेय पदार्थको श्रेय मानकर प्रसन्न होते हैं वे मूढ पुनरपि जरा मृत्युको प्राप्त होते हैं ) 'क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति' (गी० ६२१ ) (पुण्यक्षीण हो जानेपर पुनः मृत्यलोकको प्राप्त होते हैं ) 'गतागतं कामकामा लभन्ते' ( गो० ६।२१ ) ( विषयभोगोंकी कामनावाले गमनागमनको प्राप्त करते हैं ) इत्यादि श्रुति स्मृति कर्मफल स्वर्ग आदि सुखको अनित्य कहती हैं । अतः ५२ कठोपनिषद्-शाङ्करभाष्य [अ०१ प्राप्यते । हि यतस्ततस्तस्मान्मया जानतापि नित्यमनित्यसाधनैर्न प्राप्यत इति नाचिकेतश्चितोऽग्निः । श्रनित्यैव्यैः पश्वादिभिः स्वर्गसुखसाधनभूतोऽग्निनिवर्तित इत्यर्थः । तेनामधिकारापन्नो नित्यं याम्यं स्थानं स्वर्गाख्यं नित्यमापेक्षिक प्राप्तवानस्मि ।। १०॥ नचिकेताके त्यागकी प्रशंसा कामस्याप्तिं जगतः प्रतिष्ठां क्रतोरनन्त्यमभयस्य पारम् । स्तोममहदुरुगायं प्रतिष्ठां दृष्ट्वा धृत्या धीरो नचिकेतोऽत्यस्राक्षीः११ हे नचिकेताः! [ त्वं ] धृत्या ( धैर्येण ) धीरः (धीमान सन् ) कामस्य ( अभि- लषितार्थस्य ) प्राप्ति ( समाप्ति ) जगत: प्रतिष्ठाम् (प्राश्रयं ) क्रतो: ( यज्ञस्य वा उपासनायाः ) अनन्त्यम् ( अनन्तफलम् ) प्रभयस्य पाएँ (परां निष्ठा ) स्तोममहत { स्तोम स्तुनयं, महत्-अणिमाद्यैश्वर्यम् ) उरुगाय ( प्रशस्तं ) प्रतिष्ठां (आत्मनः उत्तमा गति च ) दृष्ट्वा ( विचार्य ) अत्यनाक्षी: ( त्यक्तवानसि ) ॥ ११ ॥ हे चचिकेता ! तुने बुद्धिमान होकर भोगोंकी समाप्ति-अवधि, जगत्की प्रतिष्ठा, यज्ञफलके अनन्तत्व, अभयकी परानिष्ठा, स्तुत्य और महती अणिमाद्यैश्वर्य युक्त विस्तीर्ण गति तथा प्रतिष्ठाको देखकर-विचारकर भी उके धैर्य पूर्वक त्याग दिया ।। ११ ।। त्वं तु कामस्याप्तिं समाप्तिम्, अत्रैवेहैव सर्वे कामाः परिसमाप्ताः, जगतः साध्यात्माधिभूताधिदेवादेः प्रतिष्ठामाश्रयं सर्वात्मकत्वात् , क्रतोः फलं हैरण्यगर्भ द्रव्योंसे प्राप्त की जाती है, क्योंकि अनित्य साधनोंसे नित्यकी प्राप्ति नहीं होती ऐसा जानते हुए भी मैंने नाचिकेत अग्निका चयन किया अर्थात् पशु आदि अनित्य द्रव्योंसे स्वर्ग सुख के साधन भूत अग्निका सम्पादन किया, यह अर्थ है । उसीसे मैं अधिकार संपन्न हो पापेक्षिक नित्य स्वर्ग नामक याम्यस्थानको प्राप्त हुन्मा हूँ ।। १० ।। हे नचिकेता ! तूने तो बुद्धिमान हो भोगोंकी प्राप्ति-समाप्तिको, क्योंकि इस [हिरण्यगर्भ ] में ही सम्पूर्ण कामनाएं समाप्त होती हैं तथा सर्वात्यक होने के कारण सत्यानन्दीदीपिका कर्म और उपासनाका फल जन्य होनेसे अनित्य है, इसलिए यज्ञादि कर्मजन्य याम्यपद भी अनित्य है, उसमें नित्यशब्दका प्रयोग अस्मदादिलोकोंकी अपेक्षा अधिक काल स्थायी होने से किया गया है। वस्तुतः ब्राह्मात्मैक्य ज्ञानसे ही प्रात्मसाक्षात्काररूप नित्य फल प्राप्त होता है ।। १०॥ हिरण्यगर्भपदसे भी विरक्त पुरुषका ही ब्रह्मविद्यामें अधिकार है, इसको दिखलानेके लिए यमराज नचिकेताकी 'त्वम्' आदिसे प्रशंसा करते हैं। समष्टि सूक्ष्म सृष्टिके
..
यय:TM.Hasth
व०२]
भाषानुवाद-सत्यानन्दीदीपिका
पदमनन्त्यमानन्त्यम, अभयस्य च पारं परां निष्ठाम, स्तोमं स्तुत्यं महदणिमा-
वैश्वार्याद्यनेकगुणसंहतं स्तोमं च तन्महच निरतिशयत्वात्स्तोममहत , उरुगायं
विस्तीर्णां गतिम् , प्रतिष्टां स्थितिमात्मनोऽनुत्तमामपि दृष्ट्वा धृत्या धैर्येण धीरो
धीमान्सन्नचिकेतोऽत्यनाक्षीः परमेवाकांक्षन्नतिसृष्टवानसिं सर्वमेतत्संसारभोग-
जातम् । अहो बतानुत्तमगुणोऽसि ।। ११ ।।
यं त्वं ज्ञातुमिच्छस्यात्मानम्-
आत्मज्ञानका फल
तं दुर्दर्श गूढमनुप्रविष्टं गुहाहितं गहरेष्ठं पुराणम् ।
अध्यात्मयोगाधिगमेन देव मत्वा धीरो हर्षशोकौ जहाति ॥१२॥
दुर्दुर्श ( दुःखेन द्रष्टु शक्यं ) गूढम् ( अनभिव्यक्तस्वरूपम् ) अनुप्रविष्टं ( सर्वजग-
दन्तः प्रविष्टं) गुहाहितं ( बुद्धौ स्थितं ) गह्वरेष्ठं (विषमस्थाने स्थितं ) पुराणं
अध्यात्म, अधिभूत एवं अधिदैवादि रूप जगतकी प्रतिष्ठा प्राश्रयको, यज्ञ-अपसनाके
अनन्त्य-प्रानन्त्य अर्थात् अनन्तफल हिरण्यगर्भपदको, अभयके पार-परानिष्ठाको, स्तोम-
स्तुत्य तथा महत्- अणिमादि ऐश्वर्य आदि अनेक गुणोंसे युक्त, इस प्रकार जो स्तोम और
महत् भी है ऐसे सर्वोत्कृष्ट होने के कारण स्तोम महत् उरुगाय-विस्तीर्णगति तथा प्रतिष्ठा
अपनी उत्तम स्थितिको देखकर भी धैर्य पूर्वक त्याग दिया। केवल परवस्तु-आत्मवस्तुको
आकांक्षा करते हुए इस सम्पूर्ण सांसारिक भोग समूहका परित्याग कर दिया। अहो ! तुम
अत्युत्तम गुण सम्पन्न हो । ११ ।।
सत्यानन्दीदीपिका
अभिमानीको अथवा समष्टि सूक्ष्म उपाधिवालेको हिरण्यगर्भ कहा जाता है। 'स
प्राणम-सृजत' (प्रश्न० ५।४) 'यो ब्रह्माणं विदधाति पूर्वम्' (कारण मायोपाधिक ईश्वरने
पहले हिरण्यगर्भको उत्पन्न किया ) इत्यादि श्रुतियाँ हिरण्यगर्भको प्रथम शरीरी और
स्थूल जगत्का स्रष्टा कहती हैं । इससे हिरण्यगर्भ अध्यात्म, अधिभूत तथा अधिदैव संपूर्ण
जगत्का कारण होनेसे सर्वात्मक है, क्योंकि कार्य कारणात्मक होता है। हिरण्यगर्भकी
प्राप्तिसे सभी कामनाओंकी प्राप्ति-समाप्ति कही जाती है। हिरण्यगर्भकी उपासनासे
हिरण्यगर्भपदकी प्राप्तिरूप फल भी प्रापेक्षिक अनन्त कहा गया है । 'अनेककालावस्थायि-
हिरण्यगर्भपदं गम्यत इति व्युत्पत्त्या विस्तीर्णगतिरित्युच्यते' 'अत्यधिक काल स्थायी
हिरण्यगर्भपदको प्राप्त किया जाता है इस व्युत्पत्तिसे विस्तीर्ण गति कही जाती है'
हिरण्यगर्भपद पर्यन्त समस्त भोग्य समुदायको अनित्य, असारदृष्टिसे त्याग करने वाला
नचिकेता वस्तुतः प्रशंसनीय है । ब्रह्मविद्याके लिए ऐसा ही अधिकारी अपेक्षित है ॥११॥
- AmmOM १ कठोपनिषद्-शाङ्करभाष्य [अ०१ ( सनातनं ) तं देवं अध्यात्मयोगाधिगमेन मत्त्वा ( ज्ञात्वा ) धीरो हर्षशोको जहाति ॥ १२ ॥ कठिनतासे दीख पड़नेवाले, अनभिव्यक्तस्वरूप, सर्वान्तः प्रविष्ट, बुद्धिरूपी गुहामें स्थित, विषम स्थानमें स्थित, पुरातन, प्रकाशरूप उस परमात्मदेवको अध्यात्मयोगद्वारा जानकर धीर-बुद्धिमान् पुरुष हर्ष और शोकका त्याग करता है ॥ १२ ॥ तं दुर्दर्श दुःखेन दर्शनमस्येति दुर्दर्शोऽतिसूक्ष्मत्वात् , गूढं गहनमनुप्रविष्टं प्राकृतविषयविकारविज्ञानैः प्रच्छन्नमित्येतत्, गुहाहितं गुहायां बुद्धौ स्थितं तत्रोपलभ्यमानत्वात् , गह्वरेष्ठं गहरे विषमेऽनेकानर्थसंकटे तिष्ठतीति गह्वरेष्ठम् । यत एवं गूढमनुप्रविष्टो गुहाहितश्चातो गह्वरेष्ठः; अतो दुर्दशः। तं पुराणं पुरातनमध्यात्मयोगाधिगमेन विषयेभ्यः प्रतिसंहृत्य चेतस आत्मनि समाधानम- ध्यात्मयोगस्तस्याधिगमस्तेन मत्वा देवमात्मानं धीरो हर्षशोकावात्मन उत्कर्षा. पकर्षयोः अभावाजहाति ॥ १२ ॥ जिस प्रात्माको तुम जानना चाहते हो, अतिसूक्ष्म होने के कारण दुर्दर्श-जो कठि. नतासे दर्शन होने योग्य हो उसे दुर्दर्श कहते हैं। यह गूढ़-गहन स्थानमें अनुप्रविष्ट अर्थात् शब्दादि प्राकृत विषय विकाररूप विज्ञानोंसे आवृत्त है। गुहा-बुद्धिमें स्थित है, क्योंकि वहीं उपलब्ध होता है । तथा गह्वरेष्ठ-गह्वर-विषम-अनेक अनर्थोंसे सङ्कुलित स्थान-शरीरादिरूप उपाधिमें रहता है, इससे वह गह्वरेष्ठ है, क्योंकि पाल्मा इस प्रकारके गूढ़ स्थानमें अनुप्रविष्ट है और बुद्धिमें स्थित है, अतः वह गह्वरेष्ठ है, गह्वरेष्ट होनेसे ही दुर्दर्श है । उस पुराण-पुरातन सनातन प्रकाशरूप आत्मदेवको अध्यात्म योगाधिगमेन-चित्तको विषयोंसे हटाकर प्रात्मामें स्थिर कर देना अध्यात्मयोग है उसर्क प्राप्तिसे-उसके द्वारा जानकर-साक्षात्कारकर धीर पुरुष प्रात्मामें उत्कर्ष, उपकर्षका अभाव होने के कारण हर्ष शोकका परित्याग कर देता है ।। १२ ।। सत्यानन्दीदीपिका इस मन्त्र में आत्मज्ञानका फल कहा जा रहा है---जो तुमने देहसे भिन्न प्रात्मा विषयमें प्रश्न किया है उसीका परमार्थ स्वरूपज्ञान कारण सहित संसारका निवर्तक तथा परमानन्द प्राप्तिका साधन है इससे भिन्न श्रेयका साधन नहीं है। इस प्रकार यमराज पृष्ट वस्तुको प्रशंसाद्वारा प्रश्नकर्ता नचिकेताकी भी 'यं त्वं ज्ञातुमिच्छसि इत्यादिसे प्रशंसा करते हैं । 'ऋते ज्ञानान्न मुक्तिः' 'ज्ञानादेव तु कैवल्यम्' इत्यादि श्रुतियों में भी मोक्षका साधन तत्त्वज्ञान ही कहा गया है । 'कश्चिन्मां वेत्ति तत्त्वत: ( गी० ७।३ ) 'बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते' ( गी० ७।१६) ( मुझे तत्त्वता कोई विरला ही जानता है, बहुत जन्मोंके अनन्तर अन्तिम जन्ममें ज्ञानवान होकर व० २] भाषानुवाद-सत्यानन्दीदीपिका ५५ किं च- - एतच्छ्रुत्वा संपरिगृह्य मर्त्यः प्रवृह्य धर्म्यमणुमेतमाप्य । स मोदते मोदनीय हि लब्ध्वा विवृत सम नचिकेतसं मन्ये ।१३। मर्त्य : ( मनुष्यः ) एतत् ( ब्रह्म ) श्रुत्वा, धर्म्यम्, अणु ( सूक्ष्मं ) प्रवृह्य ( देहादे! पृथक्कृत्य) संपरिगृह्य (श्रात्मभावेन सम्यक् उपादाय ) स एनं मोदनीयम् ( आत्मानम् ) आप्य ( प्राप्य ) हि ( निश्चयेन ) लब्ध्वा ( साक्षात्कृत्य ) मोदते 'नचिकेतसं त्वां प्रति सम ( ब्रह्मस्थानं-ब्रह्मस्वरूपं ) विवृतं (अपावृतद्वारं ) मन्ये-जानामि ॥ १३ ॥ मनुष्य इस आत्मतत्त्वको सुनकर और उसका भली प्रकार ग्रहण कर धर्म्य सूक्ष्म- आत्माको देहादिसंघातसे पृथक्कर तथा सम्यग्रूपसे प्राप्त कर और इस मोदनीयकी उपलब्धिकर अति आनन्दित हो जाता है । [तुझ] नचिकेताके लिए ब्रह्मस्थानको मैं खुले द्वारवाला मानता-समझता हूँ अर्थात हे नचिकेता ! मेरे विचारसे तेरे लिए मोक्षका द्वार खुला हुआ है ॥ १३ ॥ एतदात्मतत्त्वं यदहं वक्ष्यामि तच्छु त्वाचार्यप्रसादात्सम्यगात्मभावेन परिगृह्योपादाय मर्यो मरणधर्मा धर्मादनपेत धर्म्य प्रवृह्योद्यम्य पृथक्कृत्य इसके सिवा यह प्रात्मतत्त्व जिसको मैं अब कहूंगा, उसे सुनकर आचार्यकी कृपासे भली-भांति आत्मभावसे ग्रहणकर, मरणधर्मा मनुष्य इस धर्म्य-धर्म विशिष्ट प्रात्माको शरीरादिसे सत्यानन्दीदीपिका मुझे-मुझ ब्रह्मस्वरूपको प्राप्त होता है ) इस प्रकारकी स्मृति भी प्रात्मदर्शनको अत्यन्ता- यास साध्य कहती है। क्योंकि 'प्रात्मन आकाशः संभूतः' परम सूक्ष्म प्राकाशका भी कारण होनेसे प्रात्मा अतिसूक्ष्म है अत: दुर्दर्श है। गुढ़, अनुप्रविष्टत्व तथा गुहाहितत्व गह्वरेष्ठत्व में हेतु हैं और गह्वरेष्ठत्व दुर्दर्शमें । यद्यपि प्रात्मा व्यापक है तो भी संस्कृतबुद्धि ही आत्मदर्शनका स्थान कहा गया है। अपने प्रात्माके उत्कर्ष से सुखादि अन्यके उत्कर्षसे दुःखादि, अपने अपकर्षसे दुःखादि और परापकर्ष से सुखादि इनका प्रात्मवित्में प्रभाव है, क्योंकि इनका सम्बन्ध अन्तःकरणसे है आत्मासे नहीं । 'प्रसङ्गो न हि सज्जते' 'पात्मा प्रसङ्ग है, अत: वह अनात्मपदार्थके किसी धर्मसे लिप्त नहीं होता' इत्यादि श्रुति आत्माको प्रसङ्ग कहती हैं। अतः 'त्रति शोकमात्मवित्' (आत्मवित् शोकसे मुक्त हो जाता है ) यहां धीर शब्दसे श्रवण, मनन विशिष्ट पुरुषका ग्रहण है, अध्यात्मयोग शब्दसे निदिध्यासन कहा गया है, इस प्रकार वह पुरुष श्रवण, मनन तथा निदिध्यासन द्वारा प्रात्मसाक्षात्कार कर हर्ष और शोकसे मुक्त हो जाता है ।। १२ ।। आत्मतत्त्वज्ञानसे संसारके बीजभूत प्रज्ञानकी निवृत्ति हो जानेपर ब्रह्मवित् पुरुषको - ५६ कठोपनिषद्-शाङ्करभाष्य [अ० १ शरीरादेरणु सूक्ष्ममेतमात्मानाप्य प्राप्य स मर्यो विद्वान्मोदते मोदनीयं हर्षणीयमात्मानं लब्ध्वा । तदेतदेवंविधं ब्रह्मसन भवनं नचिकेतसं त्वां प्रत्यपा- वृतद्वारं विवृतमभिमुखीभूतं मन्ये मोक्षाहं त्वां मन्य इत्यभिप्रायः॥ १३ ।। यद्यहं योग्यः प्रसन्नश्चासि भगवन्मां प्रति- सर्वातीतवस्तुविषयक प्रश्न अन्यत्र धर्मादन्यत्राधर्मादन्यत्रास्मात्कृताकृतात् । अन्यत्र भूताच भव्याच यत्तत्पश्यसि तद्वद ॥१४॥ धर्मात् अन्यत्र, अधर्मात् अन्यत्र ( धर्माधर्मातीतमिति ) अस्मात्कृताकृतात् ( कृतं- कार्यम्-अकृतं कारणम् अस्मात् ) अन्यत्र ( उभयविलक्षणं ) भूतात् ( अतीतकालात् ) भव्यात् ( भविष्यत; ) च (वर्तमानात् ) अन्यत्र (कालत्रयविलक्षणं) तत् (प्रसिद्धं) यत् (वस्तु) पश्यसि (जानासि) तद्वद ( मह्यमिति शेषः ) ॥ १४ ।। जो धर्म से पृथक् , अधर्मसे पृथक् तथा इस कार्य कारण रूप प्रपञ्चसे पृथक NAADIMA- N प्रवृह्य-उद्यम्य-पृथक्कर तथा इस अणु सूक्ष्म आत्माको प्राप्तकर और मोदनीय-हर्ष योग्य प्रात्माको उपलब्धकर आनन्दित हो जाता है । इस प्रकारके तुझ नचिकेताके प्रति मैं ब्रह्मैव सद्म ब्रह्मसद्म अर्थात् ब्रह्म भवन-स्वरूपको खुले द्वारवाला-अभिमुख हुप्रा मानता हूँ अभिप्राय यह है कि तुझे मोक्षके योग्य समझता हूँ॥ १३ ।। नचिकेता-भगवन् ! यदि मैं योग्य हूँ और आप मुझपर प्रसन्न हैं तो. सत्यानन्दीदीपिका संसारमें पुनः पहलेके समान सत्यत्व प्रतीत नहीं होता, प्रत्युत मिथ्यातत्व निश्चय हो जाता है, जैसे स्फटिक मणिमें जपाकुसुमकी लालिमा । ऐसा दिखाकर आगे आनन्दकी प्राप्तिका साधन 'किञ्च' इत्यादिसे कहते हैं | 'वक्ष्यामि' इसे 'न जायते' इस पागेके १८ ३ मन्नसे कहेंगे, 'आचार्यवान् पुरुषो वेद, समित्पाणि? स गुरुमेवाभिगच्छेत् श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठम्, प्राचार्याद्धव विद्या विदिता साधिष्ठं प्रापयति, तद्विद्धि प्रणिपातेन' (गी० ४॥३४ ) इत्यादि श्रुति स्मृतिसे यही सिद्ध होता है कि ब्रह्मविद् प्राचार्य द्वारा उपदिष्ट तत्त्वज्ञानसे आत्मसाक्षात्कार होता है अन्यथा नहीं। 'मनुष्यानधिकरोति शास्त्रम्' इस बचनसे प्रायः मनुष्योको ही शास्त्र अधिकृत करता है, इस अभिप्रायसे मन्त्र में 'मर्य' शब्दका ग्रहता है । देहादिसे पृथक्करणका अर्थ निदिध्यासन है और प्राप्तिका अर्थ साक्षात्कार। इससे विद्वान् निरतिशय आनन्द स्वरूप ब्रह्मको प्राप्त होता है। इस प्रकार यमराज वस्तुकी प्रशंसा कर 'तदेतदेवं विधे' इत्यादिसे प्रष्टाकी प्रशंसा करते हैं ।। १३ ॥ . - .
.. २०२] भाषानुवाद-सत्यानन्दीदीपिका . a है और जो भूत, भविष्यत् एवं वर्तमानसे भी अन्य है, ऐसा प्राप जिसे जानते हैं वह मुझसे कहिये ॥ १४ ॥ अन्यत्र धर्माच्छास्त्रीयाद्धर्मानुष्ठानात्तत्फलात्तत्कारकेभ्यश्च पृथग्भूतमित्यर्थः । तथान्यत्राधर्मात्तथान्यत्रास्मात्कृताकृतात् , कृतं कार्यमकृतं कारणमस्मादन्यत्र । किं चान्यत्र भूताचातिक्रान्तात्कालाद्भव्याच भविष्यतश्च तथा वर्तमानात; काल- त्रयेण यन्न परिच्छिद्यत इत्यर्थः। यदीदृशं वस्तु सर्वव्यवहारगोचरातीतं पश्यसि जानासि तद्वद मह्यम् ॥ १४ ॥ इत्येवं पृष्टवते मृत्युरुवाच पृष्टं वस्तु विशेषणान्तरं च विवक्षन्- ओङ्कारोपदेश सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति तपा-सि सर्वाणि च यद्वदन्ति यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति तत्ते पद*संग्रहेण ब्रवीम्योमित्येतत् ।१५। सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति (प्रतिपादयन्ति) सर्वाणि तपांसि यद् वदन्ति (यत् प्राप्तये विहितानि ) यत् इच्छन्तः, ब्रह्मचर्य चरन्ति (आचरन्ति ) तत् पदं ते ( तुभ्यं ) संग्रहेण संक्षेपेण ) ब्रवीमि प्रोम्, इति एतत् ( तत् पदम् प्रोम् इत्युच्यते ) ।। १५ ।। सारे वेद जिस पदका प्रतिपादन करते हैं, सब तपोंको जिसकी प्राप्तिके साधक कहते हैं जिसकी इच्छा करते हुए मुमुक्षुजन ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं, उस पदको मैं तुमसे संक्षेपसे कहता हूँ । 'ॐ' यही वह पद है ।। १५ ।। इस प्रकार पूछनेवाले नचिकेतासे पूछी वस्तु तथा उसके अन्य विशेषण-ओंकार उपासनाको बतलाने की इच्छा करते यमराजने कहा- जो धर्मसे शास्त्रीय धर्मानुष्ठान, उसके फल तथा कर्ता करणादि कारकोंसे अन्यत्र- पृथग्भूत है जो अधर्म से भिन्न है अर्थात् विहिताकरण तथा शास्त्रनिषिद्ध ब्रह्महत्यादि, उसके साधन, फल एवं कारकादिसे भिन्न है और कृत-कार्य, प्रकृत-कारण इस प्रकार इस कार्य कारण ( स्थूल-सूक्ष्म प्रपञ्च ) से भी भिन्न है । किञ्च भूत भविष्यत् तथा वर्तमानकालसे भिन्न है अर्थात् जो तीनों कालोंसे परिच्छिन्न नहीं है, ऐसी जिस सम्पूर्ण व्यवहार विषयसे मातीत वस्तुको आप जानते हैं वह मुझसे कहिये ।। १४ ।। सत्यानन्दीदीपिका 'येयं प्रेते' (कठ० १।१।२०) इस प्रकार पूर्व पूछे गये देहातिरिक्त पात्माका यथार्थ ज्ञान ही मोक्षका साधन है, तो वही मुझसे कहिये 'यद्यहं योग्यः' इत्यादिसे नचिकेताने यमराजसे कहा । जैसे ब्रह्मभिन्न अनात्मपदार्थ देशः काल तथा वस्तुसे परिच्छिन्न है वैसे ब्रह्मात्मा नहीं है, क्योंकि ब्रह्म तो अखण्ड एक रस चिन्मय विभु है ।। १४ ।। MERITRAAma RAMEAauote mauraaRama'RAAVTIMEJaroMINANTamas - कठोपनिषद्-शाङ्करभाष्य [अ०१ सर्व वेदा यत्पदं पदनीयं गमनीयमविभागेनामनन्ति प्रतिपादयन्ति तपांसि सर्वाणि च यद्वदन्ति यत्प्राप्त्यर्थानीत्यर्थः। यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्य गुरुकुलवास- लक्षणमन्यद्वा ब्रह्मप्राप्त्यर्थं चरन्ति तत्ते तुभ्यं पदं यज्ज्ञातुमिच्छसि संग्रहेण संक्षेपतो ब्रवीमि । ओमित्येतत् । तदेतत्पदं यबुभुत्सितं त्वया । यदेतदो- मित्योंशब्दवाच्यमोंशब्दप्रतीकं च ॥ १५॥ अतः m एतद्धये वाक्षरं ब्रह्म एतद्धये वाक्षरं परम् । एतद्धये वाक्षरं ज्ञात्वा यो यदिच्छिति तस्य तत् ॥१६॥ एतत् (ओंकाररूपम् ) अक्षरम् एव ब्रह्म, एतदेव ही अक्षरं परम् एतदेव हि अक्षर ज्ञात्वा यः ( अधिकारी ) यत् इच्छति ( कामयते) तस्य तत् भवति ॥ १६ ॥ - सारे वेद जिस पद-पदनीय-गमनीय-प्राप्य स्थानका अविभाग-एक रूपसे प्रामनन्ति- प्रतिपादन करते हैं, सब तपोंको भी जिसके लिए कहते हैं अर्थात् सब तप जिसकी प्राप्तिके लिए हैं, जिसकी इच्छा करते हुए गुरुकुलवासरूप ब्रह्मचर्य अथवा ब्रह्मप्राप्तिमें उपयुक्त कोई अन्य साधन करते हैं उस पदका जिसे तू जानना चाहता है मैं संक्षेपसे कहता हूँ 'ॐ' यही वह पद है, यह जो 'ॐ' अर्थात् जो ॐ शब्दका वाच्य और ॐ ही जिसका प्रतीक है वही यह पद है जिसे तू जानना चाहता है ॥ १५ ॥ इसलिए. सत्यानन्दीदीपिका ११८० शाखारूप चारों वेदोंके एक देश शिरोभाग उपनिषद्का यहाँ वेद शब्हसे ग्रहण है, वे ही मोक्षके साक्षात्साधन ब्रह्मात्मैकत्व ज्ञानका प्रतिपादन करते हैं। जैसे कि 'तं त्वौपनिषदं पुरुषं पृच्छामि' ( उस उपनिषद् प्रतिपाद्य पुरुषको मैं पूछता हूँ) 'अन्यदेव तद्विदितादयोऽविदितादधि' (ब्रह्मविदितसे भिन्न है और अविदितसे भी भिन्न है, 'सम्मात्रमसदन्यत्' ब्रह्ममात्रमसन्नहि' 'ब्रह्मैवेदं सर्वम्', प्रात्मैवेदं सर्वम्, सर्वखल्विदं ब्रह्म, इत्यादि उपनिषद् वाक्य उस प्राप्य स्थानका प्रतिपादन करते हैं । तप-कर्म चित्त शुद्धि द्वारा ज्ञानोत्पत्तिमें सहायक हैं। जिस शब्दके उच्चारणमें जो अर्थ स्फुरित होता है वह उसका वाच्य है, समाहित चित्तवालेको ओंकारके उच्चारणमें जो साक्षीकी प्रतीति होती है उस ओंकारका पालम्बनकर प्रोंकार वाच्य सत्त्व प्रधान मायावच्छिन्न ओंकारोपाधिक 'ब्रह्म अहमस्मि' ऐसा ध्यान करे। यदि उसमें समर्थ न हो तो ओंकारमें ब्रह्मष्टि करे। इस प्रकार ओंकारद्वारा वाच्य वाचकके अभेदरूपसे तथा प्रतीकरूपमे उपासना कही गयी है ।। १५ ।। - व०२] भाषानुवाद-सत्यानन्दीदीपिका यह ॐ (मोंकार ) अक्षर ही ब्रह्म है यह अक्षर ही परब्रह्म है। इस प्रक्षरको ही जानकर जो जिस प्राप्य की इच्छा करता है वही उसको प्राप्त हो जाता है ।। १६ ॥ एतद्धयेवाक्षरं ब्रह्मापरमेतद्धेचवाक्षरं परं च। तयोहि प्रतीकमेतदक्षरम् , एतद्धेयेवाक्षरं ज्ञात्वोपास्यब्रह्म ति यो यदिच्छति परमपरं वा तस्य तद्भवति । परं चेज्ज्ञातव्यमपरं चेत्प्राप्तव्यम् ॥ १६ ॥ यत एवमतः एतदालम्बन* श्रेष्ठमेतदालम्बनं परम् । एतदालम्बनं ज्ञात्वा ब्रह्मलोके महीयते ॥१७॥ एतत् ( ओंकाररूपम् ) पालम्बनं श्रेष्ठ (प्रशस्यतरम् ) एतदालम्बनं परम्, एतदा- लम्बनं ज्ञात्वा ब्रह्मलोके महीयते पूज्यो भवति ) ॥ १७ ॥ यह. अष्ट आलम्बन है यही पर पालम्बन है इसी पालम्बनको जानकर पुरुष ब्रह्मलोकमें पूज्य होता है ॥१७॥ एतदालम्बनमेतद्ब्रह्मप्राप्त्यालम्बनानां श्रेष्ठ प्रशस्यतमम् , एतदालम्बनं यह ॐ अक्षर ही अपर ब्रह्म है और यह अक्षर ही परब्रह्म है । यह प्रक्षर उन दोनों का प्रतीक है । इस अक्षरको ही 'यही उपास्य ब्रह्म है' ऐसा जानकर जो पर अथवा अपर जिस ब्रह्मकी इच्छा करता है उसे वही प्राप्त हो जाता है । यदि परब्रह्म उपास्य है तो वह ज्ञानद्वारा ज्ञातव्य है यदि अपर ब्रह्म है तो उपासना द्वारा प्राप्तव्य है ।।१६।। यह ओंकाररूप पालम्बन ब्रह्म प्राप्तिके लिए (गायत्री आदि ) सभी पालम्बनों में से श्रष्ठ अधिक प्रशंसनीय है । पर और अपर ब्रह्म विषयक होनेसे यह आलम्बन पर क्योंकि ऐसी बात है, इससे सत्यानन्दीदीपिका तत्त्वज्ञानमें अनधिकृत्तोंके लिए ओंकारकी उपासना कहकर और उसका फल दिख- लाकर 'अतः' शब्दसे मोंकारकी स्तुति करते हैं- यह ॐ अक्षर ब्रह्मका वाचक और प्रतीक है। वाच्य वाचकके अभेद अभिप्रायसे यह ॐ अक्षर अपर-विराड् हिरण्यगर्भ एवं ईश्वरात्मक ब्रह्म प्रणव स्थूलादि भागत्रयो- पाधिकारणक होनेसे आत्मस्वरूप ज्ञान रहित प्रज्ञानियोंको प्रतीकरूपसे उपास्य है । ब्रह्मज्ञोंके लिए यही अक्षर परब्रह्म है । वह ब्रह्म प्रणवकी अर्धमात्राके असङ्गरूपसे उस अक्षरके भागत्रयके अपवादके अधिष्ठानरूपसे ब्रह्मज्ञोंके लिए पालम्बनरूप है, अतः प्रण- घोपासक यदि सगुण ब्रह्मकी इच्छा करे तो सगुणगति-सालोक्य सारूप्य, सायुज्य एवं सामीप्य गतिको, यदि निर्गुण ब्रह्मकी इच्छा हो तो वह क्रयमुक्तिसे निर्गुण ब्रह्मगतिको प्राप्त करता है ॥ १६ ॥ . ma-
६०
कठोपनिषद्-शाङ्करभाष्य
[अ०१
PAN
परमपरं च परापरब्रह्मविषयत्वात् । एतदालम्बनं ज्ञात्वा ब्रह्मलोके महीयते
परस्मिन्ब्रह्मणि । अपरस्मिंश्च ब्रह्मभूतो ब्रह्मवदुपास्यो भवतीत्यर्थः ॥ १७ ॥
अन्यत्र धर्मादित्यादिना पृष्टस्यात्मनोऽशेषविशेषरहितस्याऽऽलम्वनत्वेन
प्रतीकत्वेन चोकारो निर्दिष्टः; अपरस्य च ब्रह्मणो मन्दमध्यमप्रतिपत्तन्प्रति ।
अथेदानों तस्योङ्कारालम्बनस्यात्मनः साक्षात्स्वरूपनिर्दिधारयिषयेदमुच्यते-
प्रात्मस्वरूपनिरूपण
न जायते म्रियते वा विपश्चिन्नायं कुतश्चिन्न बभूव कश्चित् ।
- अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे ॥१८॥
न जायते ( न उत्पद्यते ) म्रियते वा ( न म्रियते ) अयं ( तत्त्वज्ञः ) कुतश्चित्
(कारणान्तरात् ) न बभूव कश्चित् ( अर्थान्तरभूतः सन् ) न बभूव । पुराणः (सनातनः)
अजो नित्यः ( जन्ममरणरहितः ) शाश्वतः ( अविकारश्च ) अयम् (प्रात्मा ) शरीरे
(आत्मन उपाधिभूते देहे ) हन्यमाने ( सति, स्वयं ) न हन्यते ( न हिंस्यते ) विपश्चित्
(प्रात्मा) ॥ १८ ॥
यह विपश्चित् मेधावी आत्मा न उत्पन्न होता है न मरता है, यह न तो पर
कारणसे ही उत्पन्न हुआ है और न स्वतः ही कुछ (अर्थान्तररूपसे ) हुआ है। यह
अज, नित्य, शाश्वत और पुरातन है तथा शरीरके मारे जानेपर भी नहीं मरता ॥१८॥
न जायते नोत्पद्यते म्रियते चोत्पत्तिमतो वस्तुनोऽनित्यस्यानेकविक्रियास्ता
सामाद्यन्ते जन्मविनाशलक्षणे विक्रिये इहात्मनि प्रतिषिध्येते प्रथम सर्वविक्रिया
और अपर रूप है। इस पालम्बनको जानकर साधक ब्रह्मलोक-परब्रह्ममें स्थित होक
महानता को प्राप्त होता है तथा अपर सगुण ब्रह्ममें ब्रह्मत्वको प्राप्त होकर ब्रह्मके समाः
उपास्य होता है, यह अर्थ है ॥ १७ ॥
उपयुक्त 'अन्यत्र धर्मात्' इत्यादि मन्त्रसे नचिकेता द्वारा पूछे गये सर्व विशेर
(जाति गुणादि विशेष ) रहित आत्माके तथा मन्द मध्यम उपासकोंके लिए अप
ब्रह्मके पालम्बनरूपसे तथा प्रतीकरूपसे ओंकारका निर्देश किया गया। अब प्रोका
आलम्बन-उपाधिवाले उस आत्माके स्वरूप का साक्षात् ( उपाधिरहित ) निर्धारणक
इच्छासे यह कहा जाता है-
यह आत्मा न उत्पन्न होता है और न मरता ही है। उत्पन्न होनेवाली अनित्र
वस्तुके अनेक विकार होते हैं। प्रात्मामें उन सब विक्रियाओंका प्रतिषेध करने के लिए
सत्यानन्दीदीषिका
मन्त्र में परशब्द अपरका भी उपलक्षण है 'ब्रह्मैव लोक ब्रह्मलोकः' ! उसमें व
ब्रह्मज्ञ पूज्य होता है ॥ १७ ॥
व०२] भाषानुवाद-सत्यानन्दीदीपिका ६१ प्रतिषेधार्थं न जायते म्रियते वेति। विपश्चिन्मेधावी अविपरिलुपचैतन्यस्व- भावात् । किं च नायमात्मा कुतश्चित्कारणान्तराद्वभूव । स्वस्माच्चात्मनो न बभूव कश्चिदर्थान्तरभूतः । अतोऽयमात्माजो नित्यः शाश्वतोऽपक्षयविवर्जितः । यो ह्यशाश्वतः सोऽपक्षीयते, अयं तु शाश्वतोऽत एव पुराणः पुरापि नव एवेति । यो ह्यवयवोपचयद्वारेणाभिनिर्वयते स इदानीं नवो यथा कुम्भादिः । तद्विपरीत- स्त्वात्मा पुराणो वृद्धिविवर्जित इत्यर्थः। यत एवमतो न हन्यते न हिंस्यते हन्यमाने शस्त्रादिभिः शरीरे। तत्स्थोऽप्याकाशवदेव ॥ १८ ॥ MORARDHA - . 'न जायते म्रियते वा' ऐसा कहकर सबसे पहले उनमेंसे जन्म और विनाशरूप आदि और अन्तको विक्रियाओंका प्रतिषेध किया जाता है । कभी लुप्त न होनेवाले चैतन्यरूप स्व- भावके कारण आत्मा विपश्चित्-मेधावी है। तथा यह आत्मा कहाँसे-किसी अन्य कारणसे उत्पन्न नहीं होता और न अर्थान्तररूपसे स्वयं अपनेसे ही हुआ है, अत: यह मात्मा अज नित्य तथा शाश्वत-अपक्षय रहित है, क्योंकि जो प्रशाश्वत होता है वही क्षीण होता है, परन्तु यह तो शाश्वत है अतएव पुराण भी है अर्थात् पराचीन होकर भी नवीन है। जो पदार्थ अवयवोंके उपचय-वृद्धिसे निष्पन्न किया जाता है वह इस समय नवीन है ऐसा कहा जाता है जैसे घट प्रादि । परन्तु प्रात्मा तो उससे विपरीत स्वभाववाला है-पुराण वृद्धिरहित है, ऐसा अर्थ है, क्योंकि ऐसा है, अतः शस्त्रादि द्वारा शरीरके मारे जाने पर भी वह नहीं मरता-उसकी हिंसा नहीं होती अर्थात् शरीरमें स्थित हुआ वह पाकाशके समान निर्लिप्त ही है ।। १८ ॥ सत्यानन्दीदीपिका आत्मस्वरूपका वर्णन-'पास्ति जायते वर्द्धते विपरिणमत अपक्षीयते विनश्यति' (निरुक्त ) ( है, जन्मता है, बढ़ता है, परिणामको प्राप्त होता है, अपक्षय और नष्ट होता है ) इस प्रकार शरीर आदिमें छ. भाव विकार होते हैं। इनमें से जन्ममरण आदि और अन्तकी विक्रियाओंका निषेध किये जानेपर 'कटाहकुण्डलन्याय से मध्यकी चारों विक्रियाओंका भी स्वत: निषेध हो जाता है, प्रात्माको चैतन्यस्वरूप कहकर जड़ देहादि प्रात्मा है वा प्रात्मा जड़ है इस मत का खण्डन किया है। आत्मा - अज होने के कारण किसी भी कारणसे उत्पन्न नहीं होता। अव्यय एवं विभु होनेसे अर्थान्तररूप हो स्वयं अपनेसे भी उत्पन्न नहीं होता। शरीरका छेदन करनेपर जैसे शरीरस्थ गर्भका नाश होता है, वैसे शरीरस्थ आत्माका भी छेदन हो सकता है ? इसका तत्स्थो- प्याकाशवद्' इससे समाधन करते हैं, जैसे शरीरस्थ आकाश शस्त्रादिसे प्रभावित नहीं होता वैसे प्रात्मा भी शरीरस्थ हो शस्त्रादिसे प्रभावित नहीं होता, क्योंकि वह प्रसङ्ग है, 'प्रसङ्गो न हि सजते' ऐसी श्रुति है ।
in २, हन्ता चेन्मन्यते हन्तु हतश्चेन्मन्यते हतम् । कठोपनिषद्-शाङ्करभाष्य [अ०१ उभौ तौ न विजानीतो नाय हन्ति न हन्यते ॥१६।। हन्ता ( हननकारी जनः ) चेत् ( यदि ) हन्तु ( हनिष्यामि एनम् इति ) मन्यते (चिन्तयति ) हतः ( तथा ) चेत्, हतम् (प्रात्मानं अन्येन विनाशितम् ) मन्यते [ तहि ] तो उमौ न विजानीतः। अयम् (आत्मा) न हन्ति न हन्यते ।। १६ ।। यदि हननकर्ता-मारनेवाला आत्माको मारनेका विचार करता है और मारा जानेवाला उसे मारा हुआ समझता है तो वे दोनों ही उसे नहीं जानते, क्योंकि यह न तो मरता है और न मारा जाता है।॥ १६ ॥ एवं भूतमप्यात्मानं शरीरमात्रात्मदृष्टिहन्ता चेद्यदि मन्यते चिन्तयति हन्तु हनिष्याम्येनमिति योऽप्यन्यो हतः सोऽपि चेन्मन्यते हतमात्मानं हतोऽहमि- त्युभावपि तौ न विजानीतः स्वमात्मानं यतो नायं हन्ति अविक्रियत्वादात्मन- स्तथा न हन्यत आकाशवदविक्रियत्वादेव । अतोऽनात्मज्ञविषय एव धर्मा- धर्मादिलक्षणः संसारो न ब्रह्मज्ञस्य । श्रुतिप्रामाण्यान्न्यायाच धर्माधर्माद्य- नुपपत्तेः ।। १६ ॥ कथं पुनरात्मानं जानाति इत्युच्यते- एवंभूत-प्रसङ्ग स्वभाव पात्माको भी देहमात्रमें ही प्रात्मदृष्टि रखनेवाला हनन कर्ता पुरुष यदि मारनेका विचार करता है यह सोचता है कि मैं इसे मारूगा तथा अन्य मारा जानेवाला भी यह समझकर कि मैं मारा गया हूँ अपने (मात्मा) को मारा गया मानता है, तो वे दोनों ही अपने प्रात्माको नहीं जानते, क्योंकि आत्मा अविकारी है, इसलिए यह मार नहीं सकता और प्राकाशके समान अविकारी होनेसे ही मारा भी नहीं जा सकता, अत: धर्माधर्मादिरूप संसार अनात्मज्ञ विषयक ही है ब्रह्मज्ञ विषयक नहीं, क्योंकि श्रति प्रमाण और युक्तिसे भी ब्रह्मज्ञ-प्रात्मामें धर्माधर्मादि नहीं हो सकते ॥१६ ।। तो पुनः मुमुक्षु प्रात्माको किस प्रकार जानता है ? इसपर कहते हैं- सत्यानन्दीदीपिका न जायते म्रियते वा कदाचिन्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः । अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे ।। नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः । न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः ।। अच्छेद्योऽय मदाह्योऽयमक्लेद्योऽशोष्य एव च । नित्यः सर्वगतः स्थासुरचलोऽयं सनातनः ।। (गीता २-२०,२३-२४ ) इत्यादि स्मृति भी अत्यनुसारी अर्थ कहती हैं ॥ १८ ॥ धर्माधर्मादिरूप हन्तृहननादि संसार अज्ञानीके लिए है, 'इति नु कामयमानः' ऐसी श्रुति है । 'प्रथाकामयमानः' यह श्रुति ब्रह्मज्ञमें संसारका प्रभाव कहती है जिसके प्रज्ञान m व०२] भाषानुवाद-सत्यानन्दीदीपिका ६३ -- अणोरणीयान्महतो महीयानात्मास्य जन्तोनिहितो गुहायाम् । तमक्रतुः पश्यति वीतशोको धातुप्रसादान्महिमानमात्मनः ॥२०॥ अणोः ( सूक्ष्मात् परमाशुप्रभृतेः ) अणीयान् ( सूक्ष्मतरः ) महतः ( महत्परिमा- णात् ) महीयान् ( महत्तरः ) आत्मा (पूर्वोक्तलक्षणः ) अस्य जन्तोः ( प्राणिनः ) गुहायां (हृदये ) निहितः ( स्थितः ) अक्रतुः (अकाम:-वीतरागः ) धातुप्रसादात् ( इन्द्रियप्रसादात् ) प्रात्मनः, तं (पूर्वोक्तं ) महिमानं पश्यति ( अयमहमस्मीति साक्षात् विजानाति [ ततो] वीतशोको भवति ।। २० ।। पशुसे भी अशुतर और महान्से भी महत्तर आत्मा प्राणीकी हृदयरूप गुहामें स्थित है, निष्काम पुरुष अपनी इन्द्रियोंके प्रसादसे आत्माकी उस महिमाको देखता है तता शोक रहित हो जाता है ॥ २० ॥ अणोः सूक्ष्मादणीयाश्यामाकादेरणुतरः। महतो महत्परिमाणान्मही- यान्महत्तरःपृथिव्यादेः, अणु महवा यदस्ति लोके वस्तु तत्तेनैवात्मना नित्येनाऽऽ- त्मवत्संभवति । तदात्मना विनिर्मुक्तमसत्संपद्यते । तस्मादसावेवात्माणोरणीया- न्महतो महीयान्सर्वनामरूपवस्तूपाधिकत्वात् । स चात्मास्य जन्तोर्ब्रह्मादिस्तम्ब- पर्यन्तस्य प्राणिजातस्य गुहायां हृदये निहित आत्मभूतः स्थित इत्यर्थः । प्रात्मा अशुसे भी अगुतर श्यामकादि सूक्ष्म पदार्थों ['एष मे प्रात्मान्तर्हृदयेऽणी- यान बीहेर्वा' ऐसी श्रुति है ] से भी सूक्ष्मतर तथा महान्से भी महत्तर अर्थात् पृथ्वी मादि महत्परिणामवाले [ पृथिव्या ज्यान्, यह श्रुति है ] पदार्थोसे भी महत्तर है। संसारमें प्रशु अथवा महत् परिणामवाली जो कुछ वस्तु है वह उस नित्य स्वरूप आत्मा से ही प्रात्मवान्-स्वरूप सत्ता युक्त हो सकती है उस आत्मासे परित्यक्त हो तो प्रसत् [ गगनकुसुमवत् ] सत्ताशून्य हो जाती है अर्थात् नामरूपात्मक यह सभी वस्तु प्रात्माकी सत्यानन्दीदीपिका से प्रवृत्ति होती है उसके ही ज्ञानसे वह पुनः नहीं होती, यथा शुक्तिके अज्ञानसे कल्पित रजतमें रजतार्थी की प्रवृत्ति होती है परन्तु शुक्तिके ज्ञानसे वह पुन! नहीं होती, वैसे धर्माधर्मादिरूप संसारके विषयमें भी समझना चाहिए, यह न्याय-युक्ति भी है । 'स्थित- प्रशस्य का भाषा' (गीता २६५४ ) "स्थितप्रज्ञकी भाषा क्या है अथवा क्या लक्षण है।' विवेकी सर्वदा मुक्तः कुर्वतो नास्ति कर्तृता। अलेपवादमाश्रित्य श्रीकृष्णजनको यथा । कतृत्वभोक्तृत्वादि धर्मः स्वाज्ञानपरिकल्पितः । स्वाज्ञवन्न स्पृशेत् स्वज्ञं तदृष्टया तदसंभवत् ॥ मात्मवन्तं न कर्माणि निबध्नन्ति धनञ्जय । (गीता० ४।४१) इत्यादि स्मृति भी पात्मज्ञमें संसारका प्रभाव कहती हैं ।। १६ ॥ METAMERADI- कठोपनिषद्-शाङ्करभाष्य [अ०१ तदात्मानं दर्शनश्श्रवणसननविज्ञानलिङ्गमक्रतुरकामो दृष्टादृष्टबाह्यविषयोपरतबुद्धि रित्यर्थः। यदा चैवं तदा मनादीनि करणानि धातवः शरीरस्य धारणाला- सीदन्तीत्येषां धातूनां प्रसादादात्मनो महिमानं कर्मनिमित्तवृद्धिक्षयरहितं पश्य- त्ययमहमस्मीति साक्षाद्विजानाति । ततो वीतशोको भवति ।। २० ।। अन्यथा दुर्विज्ञेयोऽयमात्मा कामिभिः प्राकृतपुरुषैः, यस्मात्- - Des- उपाधि है, अतः नामरूपात्मक सर्व वस्तु उपाधिवाला होनेसे यह प्रात्मा अशुसे अगुतर और महानसे महत्तर है। वह प्रात्मा जन्यो: ब्रह्मसे स्तम्बपर्यन्त इस सम्पूर्ण प्राणी समुदायकी गुहा-हृदयमें निहित अन्तरात्मरूपसे स्थित है, यह अर्थ है । तात्पर्य यह है कि दर्शनार्थ श्रवण, मनन और निदिध्यासनरूप साधनवाला अक्रतु- निष्काम दृष्ट-ऐहिक और अदृष्ट-पारलौकिक बाह्य विषयोंसे उपरत बुद्धिवाला पुरुष उस प्रात्माको देखता है जिस समय ऐसी स्थिति होती है उसी समय मन आदि इन्द्रियाँ जो कि शरीरको धारण करनेके कारण धातु कहलाती हैं, प्रसन्न होती हैं सो इन धातुओं- इन्द्रियों के प्रसादसे वह अपने प्रात्माकी कर्म निमित्तक वृद्धि और क्षय रहित महिमा को देखता है अर्थात् साक्षात् जानता है कि 'यह मैं हूँ' तो इससे वह शोक रहित हो जाता है ॥ २० ॥ अन्यथा सकामी प्राकृत जनोंके लिए यह आत्मा दुविज्ञेय है, क्योंकि- सत्यानन्दीदीपिका अकामत्वादि साधनान्तर विधानके लिए 'कथं पुनः' इस वाक्यको अवतरित करते हैं 'अणोरणीयान्महतो महीयान्' इस श्रुतिवाक्यसे एक प्रात्मामें अशुत्व और महत्व परस्पर विरुद्ध धर्मोंका कथन यद्यपि असंगत है तथापि अणुत्व आदि अध्यासका अधि- ष्ठान होनेके कारण उसमें कल्पित-औपाधिक प्रगुत्वादि व्यवहार होता है, जैसे भ्रमस्थ- लमें रजतत्व अध्यासके अधिष्ठानभूत शुक्तिमें 'इदं रजतम्' ऐसा कल्पित व्यवहार होता है। प्रात्मा सबका अधिष्ठान होनेसे सर्वात्मक है । 'तम्' आदिसे प्रत्यग्ब्रह्म दर्शनका साधन कहते हैं। प्रात्मदर्शनमें केवल कामरहित्व हेतु नहीं है किन्तु आत्मदर्शनके उद्देश्यसे विहित जो 'आत्मा वा अरे थोतव्यः' इस प्रकार श्रवण, मनन एवं निदिध्यासन भी ब्रह्मदर्शनके प्रतिबन्धक-सन्देह और विपरीतभावनाके निरासद्वारा साधन कहे गये हैं। कामरहितत्व इन्द्रियप्रसादमें हेतु है । यद्यपि धातु शब्द शरीरस्थ रस, रक्त, शुक्रादि धातु- प्रोंमें प्रयुक्त होता है तो भी 'धारणात् धातुः' इस यौगिक वृत्तिसे इन्द्रियोंमें भी प्रयुक्त हो सकता है, कर्म निमित्तक वृद्धि, क्षयादि शरीरमें होते हैं प्रात्मामें नहीं, क्योंकि न कर्मणा वर्धते नो कनीयान् 'मर्थात् प्रात्मा न कर्मसे बढ़ता है और न घटता है' ऐसी श्रुति है । और 'तरति शोकमात्मवित्' यह फल बोधक श्रुति है ॥ २० ॥ -- व० २] भाषानुवाद-सत्यानन्दीदीपिका ६५ । आसीनो दूरं व्रजति शयानो याति सर्वतः । कस्तं मदामदं देवं मदन्यो ज्ञातुमर्हति ॥ २१ ॥ आसीन (अचल एव सन् ) दूरं ब्रजति ( गच्छति ) शयान: ( उपरतक्रियश्च ) सर्वत: याति, मदामदं ( मदो-हर्षः, अमदः हर्षाभावः, तद्विशिष्टम् एवं विरुद्धधर्मवन्तं ) देवं (प्रकाशमान) तम् (आत्मानं) मदन्यः कः, ज्ञातुं (विज्ञातुम्) अर्हति (शक्नोति)।२१। वह अवस्थित हुप्रा भी दूरतक जाता है, शयन करता हुमा भी सब ओर पहुंचता है। मद-हर्ष युक्त और मदरहित उस देवको भला मेरे विना और कौन जान सकता है ॥ २१ ॥ आसीनोऽवस्थितोऽचल एव सन्दूरं ब्रजति । शयानो याति सर्वत एवम- सावात्मा देवो मदामदः समदोऽमदश्च सहर्षोऽहर्षश्च विरुद्धधर्मवानतोऽशक्यत्वा- ज्ज्ञातुं कस्तं मदामदं देवं मदन्यो ज्ञातुमर्हति ? अस्मदादेरेव सूक्ष्मबुद्धेः पण्डि- तस्य सुविज्ञेयोऽयमात्मा स्थितगतिनित्यानित्यादिविरुद्धानेकधर्मोपाधिकत्वाद्वि- रुद्धधर्मवत्त्वाद्विश्वरूप इव चिन्तामणिवदवभासते। अतो दुर्विज्ञेयत्वं दर्शयति कस्तं मदन्यो ज्ञातुमर्हतीति । करणानामुपशमः शयनं करणजनितस्यैकदेश- प्रासोन-अवस्थित-अचल होता हुआ भी दूर चला जाता है तथा सोता हुआ भी सब ओर पहुंचता है। इस प्रकार वह प्रात्मा-देव समद-हर्षयुक्त और अमद हर्षरहित विरुद्ध धर्मवाला है, अतः जानने में न आसकनेके कारण उस हर्षयुक्त और कँरहित देवको मेरे सिवा और कौन जान सकता है ? यह आत्मा हम जैसे सूक्ष्मबुद्धि पण्डितोंके लिए ही सुविज्ञेय है। स्थिति, गति तथा नित्य, अनित्य प्रादि विरुद्ध अनेक धर्मरूप उपाधि- वाला तथा विरुद्ध धर्मवाला होनेसे यह चिन्तामणिके समान विश्वरूप-सा भासता है, अतः मेरे सिवा उसे और कौन जान सकता है, [ यमराज ] ऐसा कहकर उसकी दुर्वि- ज्ञेयता दिखलाते हैं। इन्द्रियोंका शान्त हो जाना शयन है, शयन करनेवाले पुरुषका सत्यानन्दीदीपिका अन्वय-व्यतिरेकसे कामरहितत्वको प्रात्माके सुज्ञेयत्व और दुर्विज्ञेयत्वमें 'अन्यथा' पादिसे हेतु कहा गया है। जाग्रत् और स्वप्नमें मन प्रादिके व्यापारके साक्षिरूपसे कूटस्थ हो स्थित है, विषय- देशमें मन मादिकी वृत्तियोंको जानेपर तत्प्रतिबिम्बरूपसे जाता है यही 'दूरं व्रजति'का अर्थ है । इन्द्रियोंके 'यह घट है' इत्यादि घटादि माकाररूप विशेष विज्ञानका प्रभाव शयन-सुषुप्ति है । स्वरूप भूत विज्ञप्ति सामान्यरूपसे अवस्थित होनेसे सर्वत्र जाता है ऐसा कहा जाता है, वस्तुत: व्यापक होने के कारण वह स्वरूपसे तो सर्वत्र व्याप्त है। यथा ५ ६६ ३ कठोपनिषद्-शाङ्करभाष्य [अ०१ NowmawRARINon- विज्ञानस्योपशमः शयानस्य भवति । यदा चैवं केवलसामान्यविज्ञानत्वात्सर्वतो यातीव यदा विशेषविज्ञानस्थः स्वेन रूपेण स्थित एव सन्मनादिगतिषु तदुपाधिकत्वाद्रं व्रजतीव। स चेहैव वर्तते ॥ २१ ॥ तद्विज्ञानाञ्च शोकात्यय इत्यपि दर्शयति- अशरीर* शरीरेष्वनवस्थेष्ववस्थितम् । महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ॥२२॥ अनवस्थेषु ( नश्वरेषु ) शरीरेषु अवस्थितम्, अशरीरं, महान्तं ( देशतः कालत: वस्तु तश्च अपरिच्छिन्नं ) विभुं ( सर्वव्यापिनम् ) प्रात्मानं मत्वा ( ज्ञात्वा ) धीरो ( धीमान ) न शोचति ॥ २२ ॥ जो शरीरमें शरीर रहित तथा अनित्योंमें नित्य स्वरूप है उस महान और सर्वव्या- पक आत्माको जानकर बुद्धिमान् पुरुष शोक नहीं करता ।। २२ ।। अशरीरं स्वेन रूपेण आकाशकल्प आत्मा तमशरीरं शरीरेषु देवपित- इन्द्रिय जनित एकदेश सम्बन्धी विज्ञान शान्त हो जाता है, जिस समय ऐसी अवस्था होती है उस समय केवल सामान्य ज्ञान ( सर्वोपाधि अनुस्यूत स्वरूपविज्ञान ) होनेसे वह सब ओर जाता हुआ-सा जान पड़ता है और जब वह विशेष विज्ञान ( इन्द्रियादि जनित वस्तु विषयक विशेष विज्ञान )-में स्थित होता है तो स्वरूपसे अविचल होता में मन आदि उपाधियोंवाला होनेसे उन मन आदिकी गतियोंमें दूर जाता हुआ-सा जा पड़ता है, वस्तुतः तो वह यहीं ( देहमें ) रहता है ।। २१ ।। अब यह भी दिखलाते हैं कि उस आत्माके विज्ञानसे शोकका अन्त हो जाता है। आत्मा अपने स्वरूपसे आकाशतुल्य है अत! अशरीर है, पुनः अनवस्थित-अवस्पिति सत्यानन्दीदीपिका विश्वरूप मणि नानारूपसे अवभासित होती है, वैसे ही नाना उपाधियोंके सम्बन्धी आत्मा भी नानारूपसे भासता है स्वत: नहीं, अथवा यथा चिन्तामणि जैसे-जैसे चिन्ता किया जाता है वैसे-वैसे ही तत् तत् चिन्तनोपाधिवाली भासित होती है, वैसे ही स्थिति गति, नित्यानित्यादि अनेक विरुद्ध धर्म विशिष्ट धर्मरूपसे उपाधिसे आत्मा भी विरुर धर्मवाला-सा भासता है। उपाधिके कल्पित निश्चित होनेपर विवेकीको सुविज्ञेय है उपाधिके अविवेकदर्शीको दुर्विज्ञेय है । इसमें 'मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये (गीता० १७१३ ) यह स्मृति भी प्रमाण है ।। २१ ।। घट, पट मादि अनेक अनित्य उपाधियोंमें प्रसङ्ग नित्य विभु एक प्राकाशके समान १. विश्वानि नानाविधानि नीलपीतादीनि रूपाणि यस्य स मणिविशेषः । - - - HAMAN व०२] भाषानुवाद-सत्यानन्दीदीपिका ६७ मनुष्यादिशरीरेष्वनवस्थेष्ववस्थितिरहितेष्ववस्थित नित्यमविकृतमित्येतत्, महान्तं महत्त्वस्यापेक्षिकत्वशङ्कायामाह-विभुं व्यापिनमात्मानम् । अात्मग्रहणं स्वतोऽनन्यत्वप्रदर्शनार्थम्, आत्मशब्दः प्रत्यगात्मविषय एव मुख्यस्तमीह- शमात्मानं मत्वाऽयमहमिति धीरो धीमान्न शोचति । न ह्येवंविधस्यात्मविदः शोकोपपत्तिः ॥ २२ ॥ यद्यपि दुर्विज्ञेयोऽयमात्मा तथाप्युपायेन सुविज्ञेय एवेत्याह- आत्मा प्रात्मकृपासाध्य है नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन । यमेवैष वृणुते तेन लभ्यस्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनू स्वाम् २३ अयम् प्रात्मा प्रवचनेन ( अध्ययनादिना ( लभ्यः ( ज्ञेयः-दर्शनीयः) न [ भवति ] न मेधया ( शास्त्रधारणशक्त्या ) न बहुना श्रुतेन ( केवलशास्त्रश्रवणेन न लभ्यो भवति ) रहित देव पितृमनुष्यादि अनित्य शरीरोंमें अवस्थित-नित्य-अविकृत है। तथा महान् है [ किससे महान् है ? इस प्रकार ] महत्त्वमें अन्यकी अपेक्षा विषयक प्राशङ्का होनेपर कहते हैं-उस विभु-व्यापक प्रात्माको यहाँ 'मात्मा' शब्दका ग्रहण अपनेसे ब्रह्मकी अभि- नता प्रदर्शित करने के लिए है, क्योंकि 'आत्मा' शब्द' प्रत्यगात्मविषयमें ही मुख्य है, ऐसे उस प्रात्माको 'यह मैं हूँ' ऐसा जानकर धीर-बुद्धिमान् पुरुष शोक नहीं करता, कारण कि इस प्रकारके आत्मवित्में शोक युक्त नहीं है ॥ २२ ॥ यद्यपि यह प्रात्मा दुर्विज्ञेय है तथापि उपायसे तो सुविज्ञेय ही है, इसपर कहते हैं- सत्यानन्दीदीपिका मात्मा भी नामरूपात्मक अनेक अनित्य देवादि शरीररूपी उपाधियोंमें प्रसङ्ग नित्य विभु अद्वितीय होनेसे अशरीर है । आत्माको अशरीर कहनेसे स्थूल, सूक्ष्म और कारण तीनों शरीरोंका अपवादकर उसे में मिथ्यात्वका भी निश्चय किया गया है। विभु कहकर सापेक्ष महत्त्वका भी निराकरण किया गया है, क्योंकि 'नित्यं विभु सर्वगतम्' 'आकाश वत्सर्वगतश्च नित्यः' इत्यादि श्रुति हैं । सांख्य मत प्रतिपादित प्रत्येक शरीरमें प्रात्मा होनेसे अनेक पुरुषवादका एक वचन 'अशरीरम्' पौर 'विभुम्' कहकर खण्डन किया गया है। अपने शरीरमें कूटस्थरूपसे विद्यमान प्रात्मा प्रत्यगात्मा कहलाता है उसका 'प्रयं' शब्दसे ग्रहण किया गया है, क्योंकि प्रथम उसीकी अपरोक्ष अनुभूति होती है अनन्तर 'अयं प्रात्मा ब्रह्म' 'अहं ब्रह्मास्मि' 'तत्त्वमसि' आदि महावाक्योंसे 'मैं ब्रह्म हूँ' यह मभेद ज्ञान होता है। उस अभेद ज्ञानसे अविद्या जनित भेद दर्शनकी निवृत्ति होने- पर तत्कायं शोकादिकी निवृत्ति भी स्वाभाविक है। 'तत्र को मोह का शोक एक- त्वमनुपश्यतः' ( ईश० ७ ) यह श्रुति अभेददर्शनका फल कहती है ॥ २२ ।। . - .
६८ कठोपनिषद-शाङ्करभाष्य [अ०१ एष ( साधकः ) यमेव ( आत्मनमेव ) वृणुते (आत्मदर्शनाय वरयति ) तेन (आत्मना) ( लभ्यः । एष आत्मा, स्वां (स्वकीयां पारमार्थिकी ) तनुं ( मूर्तिम् ) तस्य (आत्मका- मस्य वृणुते (प्रकाशयति ) ॥ २३ ) यह आत्मा वेदाध्ययन द्वारा प्राप्त होने योग्य नहीं है न धारणशक्ति और न अधिक श्रवणसे प्राप्त होने योग्य है, यह साधक जिस-यात्माका वरण करता है उस आत्मासे ही यह ज्ञात हो सकता है। उसके प्रति यह आत्मा अपने यथार्थ स्वरूपको प्रकाशित- अभिव्यक्त कर देता है ।। २३ ।। नायमात्मा प्रवचनेनानेकवेदस्वीकरणेन लभ्यो ज्ञेयो नापि मेधया ग्रन्थार्थ- धारणशक्त्या। न बहुना श्रुतेन केवलेन । केन तर्हि लभ्य इत्युच्यते-यमेव स्वात्मानमेष साधको वृणुते प्रार्थयते तेनैवात्मना वरित्रा स्वयमात्मा लभ्यो ज्ञायत एवमित्येतत् । निष्कामस्यात्मानमेव प्रार्थयत आत्मनैवात्मा लभ्यत इत्यर्थः । कथं लभ्यत इत्युच्यते-तस्यात्मकामस्यैष आत्मा विवृणुते प्रकाशयति पारमार्थिकी तनू स्वां स्वकीयां स्वयाथात्म्यमित्यर्थः ॥ २३ ॥ किं चान्यत्- यह आत्मा प्रवचन अर्थात् ऋगादि अनेक वेदोंके स्वीकार करने से प्राप्त जानने योग्य नहीं है, न मेधा-ग्रन्थ धारणशक्तिसे जानने योग्य है और न केवल बहुत श्रवण करनेसे ही, तो फिर किस उपाय से लभ्य है ? इसपर कहते हैं-यह साधक जिस अपने आत्माका वरण-प्रार्थना-अभेदरूपसे अनुसन्धान करता है उसी वरण करनेवाले आत्माद्वारा यह मात्मा स्वयं ही लभ्य है अर्थात् 'यह ऐसा है' ऐसा जाना जाता है। केवल प्रात्मलाभके लिए प्रार्थना करनेवाले निष्काम प्रात्मकाम पुरुषको आत्माद्वारा ही प्रात्माकी उपलब्धि होती है यह अर्थ है । किस प्रकार उपलब्ध होता है? इसपर कहते हैं--- उस आत्मकामवे प्रति यह प्रात्मा अपने पारमार्थिक स्वरूप अपने याथात्म्यको विवृत्त-प्रकाशित कर देता है, यह अर्थ है ।। २३ ॥ इसके अतिरिक्त दूसरी बात यह भी है- सत्यानन्दीदीपिका ऋग् आदि चारों वेदोंके पठन पाठनको यहाँ प्रवचन समझना चाहिए। न ब्रह्मा स्मैक्य प्रतिपादक उपनिषद्विचारसे अतिरिक्त शास्त्र श्रवणसे प्रात्मा लभ्य है और न ब्रह्मविदाचार्य उपदेश रहित शास्त्र श्रवणसे । ईश्वर और प्राचार्य अनुग्रहसे साधकको मात्मा लभ्य है, जो अधिकारी प्रत्यवचैतन्यरूप अपने प्रात्माका वेदान्त महावाक्योंके अवरा कालमें ही 'प्रत्यग्ब्रह्म मैं हूँ ऐसा अनुसन्धान करता है उसीके प्रति प्रात्मा अपने यथार्थ स्वरूपको अभिव्यक्त करता है अर्थात् ईश्वर और प्राचार्य से अनुगृहीत 'अहं ब्रह्मास्मि इस प्रकार अनुसन्धाता आत्मसाक्षात्कार कर सकता है ।। २३ ।। AM -
व०२]
भाषानुवाद-सत्यानन्दीदीपिका
आत्मज्ञानका अनधिकारी
नाविरतो दुश्चरितान्नाशान्तो नासमाहितः ।
नाशान्तमानसो वापि प्रज्ञानेनैनमाप्नुयात् ॥ २४ ॥
दुश्चरितात् ( शास्त्रनिषिद्धाचरणात् ) अविरतः (अनुपरत:) न, अशान्तः (असं-
पादितेन्द्रियनिग्रहः ) न, असमाहितः (विक्षिप्तचित्तः ) न, प्रशान्तमानसः (विषय-
भोगे अलंबुद्धिरहितः) न, प्रज्ञानेन ( ब्रह्मज्ञानेन ) एनम् (प्रात्मानम् ) प्राप्नुयात्
(प्राप्नोति ) ॥ २४॥
जो पाप कर्मोसे निवृत्त नहीं है, संयतेन्द्रिय नहीं है, समाहित चित्त नहीं है
और प्रशान्त मनवाला है, वह उस आत्माको ब्रह्मज्ञानद्वारा प्राप्त नहीं कर सकता २४
न दुश्चरितात्प्रतिषिद्धाच्छु तिस्मृत्यविहितात्पापकर्मणोऽविरतः अनुपरतो
नापीन्द्रियलौल्यादशान्तोऽनुपरतो नाप्यसमाहितोऽनेकाग्रमना विक्षिप्तचित्तः,
समाहितचित्तोऽपि सन्समाधानफलार्थित्वान्नाप्यशान्तमानसोव्यापृतचित्तःप्रज्ञा-
नेन ब्रह्मविज्ञानेननं प्रकृतमात्मानमाप्नुयात् । यस्तु दुश्चरिताद्विरत इन्द्रिय-
लौल्याच समाहितचित्तः समाधानफलादप्युपशान्तमानसश्चाचार्यवान्प्रज्ञानेन
यथोक्तमात्मानं प्राप्नोतीत्यर्थः ॥२४॥
ABRDMRO-
जो दुश्चरित-प्रतिषिद्ध-श्रुतिस्मृतिसे अविहित पापकर्मसे अविरत-अनुपरत है-उपरत
नहीं है, जो इन्द्रियोंके चापल्यके कारण अशान्त-उपरति रहित है, असमाहित-जो
एकाग्न मनवाला नहीं है अर्थात् विक्षिप्तचित्त है। तथा समाहित चित्त होते भी एकाग्र-
नाके फलका इच्छुक होनेके कारण अशान्तमना है अर्थात् व्यापार युक्त चित्तवाला है,
सा पुरुष इस प्रकृत आत्माको प्रज्ञान- ब्रह्मज्ञान द्वारा प्राप्त नहीं कर सकता। किन्तु जो
[प कर्म और इन्द्रियोंके चापल्यसे विरत है, समाहित चित्त है और समाधान-एकाग्रताके
कलसे भी उपशान्तमना है, वह प्राचार्यवान् साधक ही ब्रह्मज्ञानद्वारा यथोक्त प्रात्माको
राप्त करता है, ऐसा अर्थ है ॥ २४ ॥
सत्यानन्दीदीपिका
ज्ञानी और अज्ञानी दोनोंमें प्रात्मा सम है, अतः ज्ञानीके समान मज्ञानीको भी ब्रह्म
की प्राप्ति होनी चाहिए ? इसपर 'नाविरतः' आदिसे कहते हैं-
देहसे उत्पन्न पाप दुश्चरित है, नेत्रादि इन्द्रियोंकी विषयोन्मुखतादका नाम चापल्य
इससे विपरीत पाचरणवाला आत्माको प्राप्त करता है, इसे 'यस्तु' आदिसे
हते हैं ॥ २४ ॥
कठोपनिषद्-शाङ्करभाष्य
[अ०१
यस्त्वनेवं भूतः-
RS
यस्य ब्रह्म च क्षत्रं च उभे भवत प्रोदनः ।
मृत्युर्यस्योपसेचनं क इत्था वेद यत्र सः ॥ २५ ॥
यस्य (प्रात्मनः ) ब्रह्म ( ब्राह्मणजाति! ) च क्षत्रं (क्षत्रियजाति:: ) च उभे
मोदनः ( अन्नं ) भवतः। मृत्युः ( सर्वप्राणिसंहारकः ) यस्य उपसेचनम् ( उपकरणं
शाकस्थानीय ) सः ( एव जगत्-संहर्तृत्वगुणः ) यत्र ( स्वमहिम्नि तिष्ठति ) [ तम् ]
इस्था ( इत्थंरूपेण ) को वेद ( जानाति न कोऽपीति भावः ) ॥ २५ ॥
जिस पात्माके ब्राह्मण और क्षत्रिय ये दोनों प्रोदन-भात हैं तथा प्राणिसंहारक
मृत्यु जिस आत्माका उपसे चन - शाकस्थानीय है, वह जहाँ स्वमहिमामें है उसे
कोन (अज्ञपुरुष) इस प्रकार ( उपर्युक्त साधन सम्पन्न अधिकारीके समान ) जान
सकता है ॥ २५ ॥
यस्यात्मनो ब्रह्मक्षत्रे सर्वधर्मविधारके अपि सर्वत्राणभूते उभे ओदनोऽशनं
भवतः स्याताम् , सर्वहरोऽपि मृत्युर्यस्योपसेचनमिवौदनस्य, अशनत्वेऽप्य-
किन्तु जो साधक ऐसा नहीं है अर्थात् उक्त साधन सम्पन्न नहीं है [ उसके सिषयमें
श्रुति कहती है-
सब कर्मोंको धारण करनेवाले तथा सबका रक्षकरूप होते भी ब्राह्मण और क्षत्रिय
ये दोनों भला जिस आत्माके प्रोदन-भोजन हैं तथा सब प्राणियोंका संहारक मृत्यु
भी जिसका भातके लिए उपसेचन-शाकादिके समान है अर्थात् भोजनके लिए
भी पर्याप्त नहीं है, उस प्रात्माको जहाँ कि वह है, ऐसा कौन पूर्वोक्त साधन रहित
सत्यानन्दीदीपिका
साधन सम्पन्न साधकद्वारा जो ब्रह्म ज्ञेय है उसका 'यस्य' श्रादिसे निर्देश करते
हैं, सर्वधर्म विचारकत्व सर्वत्राणमें हेतु है। ब्राह्मण धर्म उपदेश द्वारा और क्षत्रिय
प्राणीको कर्ममें नियुक्त करनेसे रक्षक है। इसप्रकार जगत्के रक्षार्थ दोनों सर्वोपरि
माने गये हैं, अपने स्वरूपमें स्थित प्रात्माको जैसे साधनसम्पन्न पुरुष जानता है वैसे
साधन रहित प्राकृत बुद्धि पुरुष नहीं जान सकता है, अतःनात्मर्शनार्थ साधनसंपन्नता
अपेक्षित है ।। २५ ॥
कठोपनिषद्के प्रथमाध्यायकी द्वितीयवल्लीकी स्वामी सत्यानन्द सरस्वती विरचित
सत्यानन्दीदीपिका समाप्त ॥ २॥
व०३] भाषानुवाद-सत्यानन्दीदीपिका ७१ पर्याप्तस्तं प्राकृतबुद्धिर्यथोक्तसाधनरहितः सन्क इत्था इत्थमेवं यथोक्तसाधनवा- निवेत्यर्थः, वेद विजानाति यत्र स आत्मेति ।। २५ ।। शङ्कर भगवत्पाद विरचित शाङ्करभाष्य कठोपनिषद् द्वितीयवल्ली समाप्त ॥ १-२॥ और साधारण बुद्धिवाला पुरुष जो इस प्रकार यथोक्त साधन सम्पन्न पुरुषके समान जान सकता है ॥ २५॥ कठोपनिषद्के प्रथमाध्यायकी द्वितीयवल्लीका स्वामी सत्यानन्द सरस्वती कृत भाष्यानुवाद समाप्त ॥ १-२ ।। mama and- - प्रथमाध्यायस्य तृतीयावल्ली प्राप्ता और प्राप्तव्यभेदसे दो आत्मा ऋतं पिबन्तावित्यस्यावल्ल थाः सम्बन्धः । विद्याविद्ये नानाविरुद्धफले इत्यु- पन्यस्ते न तु सफले ते यथावन्निर्णीते; तन्निर्णयार्था रथरूपककल्पना, तथा च प्रतिपत्तिसौकर्यम् । एवं च प्राप्तृप्राप्यगन्तृगन्तव्यविवेकार्थं द्वावात्मानौ उपन्यस्येते- ऋतं पिबन्तौ सुकृतस्य लोके गुहां प्रविष्टौ परमे परार्धे । छायातपौ ब्रह्मविदो वदन्ति पञ्चाग्नयो ये च त्रिणाचिकेताः ।। लोके (अस्मिन् शरीरे ) सुकृतस्य ( कर्मणः ) ऋतं ( सस्य फलं ) पिबन्ती (भु- जानी ) गुहां ( गुहायां बुद्धौ ) परमे ( बाह्यशरीराकाशाद्यपेक्षया उत्कृष्टे ) परार्धे (परस्य ब्रह्मणः अर्धस्थानकल्प हृदयाकाशे ) प्रविष्टी, छायातपो ( इव विलक्षणी) ब्रह्मविदः वदन्ति ( कथयन्ति ) ये च पञ्चाग्नयः ( गृहस्थाः) त्रिणाचिकेता (त्रि: कुत्वः नाचिकेतोऽग्निश्चितो यः, ते च वदन्ति ) ॥ १ ॥ 'ऋतं पिबन्तौ' इस तृतीयावल्लीका सम्लन्ध इस प्रकार है-नाना प्रकारके विरुद्ध कलवाली विद्या और अविद्या है ऐसा उल्लेखमात्र किया गया है किन्तु उनका फलसहित पथावत् निर्णय नहीं किया गया है। उनके निर्णयार्थ [ इस वल्लीमें ] रथ रूपककी कल्पना की गई है, ऐसा करनेसे उनके समझने में सुगमता हो जाती है । इस प्रकार प्सा-प्राप्तव्य. गन्ता-गन्तव्यके विवेकार्थ दो आत्माओंका उपन्यास करते ७२ कठोपनिषद्-शाङ्करभाष्य [अ०१ ज G . ब्रह्मश लोग कहते हैं कि शरीर में बुद्धिरूप गुहाके भीतर उत्कृष्ट ब्रह्मस्थान-हृदयाका- शमें प्रविष्ट अपने कर्मफलको भोगनेवाले छाया और घामके समान परस्पर विलक्षण दो (जीव और ईश्वर ) हैं। यही बात तान वार नचकेत अग्निका चयन करनेवाले तथा वे पश्चाग्निकी उपासना करनेवाले भी कहते हैं ॥१॥ ऋतं सत्यमवश्यंभावित्वात्कर्मफलं पिबन्तौ, एकस्तत्र कर्मफलं पिबति भुङ्क्ते नेतरः; तथापि पातृसम्बन्धात्पिबन्तावित्युच्यते छत्रिन्यायेन, सुकृतस्य स्वयंकृतस्य कर्मण ऋतमिति पूर्वेण सम्बन्धः; लोकेऽस्मि शरीरे गुहां गुहायां बुद्धौ प्रविष्टौ, परमे बाह्यपुरुषाकाशसंस्थानापेक्षया परमम्, परस्य ब्रह्मणोऽर्ध स्थानं परार्धम् , तस्मिन्हि परं ब्रह्मोपलभ्यते, अतस्तस्मिन्परमे परार्धे हार्दाकाशे ऋत- अवश्यंभावी होने के कारण सत्कर्मफलका पान करनेवाले दो आत्मा [यद्यपि] उनमेंसे केवल एक कर्मफलका पान-भोग करता है दूसरा नहीं, तथापि पान करनेवाले से सम्बन्ध होनेके कारण यहाँ छत्रिन्याय से दोनोंके लिए 'पिबन्ती' कर्मफलका भोग करते हैं, ऐसा कहा जाता है। सुकृत-स्वयंकृत कर्मफलको भोगते हुए यहाँ 'सुकृतस्य' शब्दका पूर्ववर्ती 'ऋतम्' शब्दके साथ सम्बन्ध है। लोक-इस शरीर में बुद्धिरूप गुहाके भीतर परम-बाह्य देहाश्रित प्राकाश संस्थानकी अपेक्षा उत्कृष्ट परब्रह्मके अर्ध-स्थान-परा- धमें प्रविष्ट है, क्योंकि उसी में परब्रह्म उपलल्ध होता है, अतः तात्पर्य यह है कि उस सत्यानन्दीदीपिका इस मन्त्र में तीन अधिकारोंका वर्णन है इनमें प्रथम 'सर्वं खल्विदं ब्रह्म' इस प्रकार अनुभव करनेवाले ब्रह्मवित्, द्वितीय-जो गार्हपत्य, दक्षिणाग्नि, पाहवनीय, सभ्य और आवासथ्य इस प्रकार पाँच अग्नियोंका सेवन करते हैं अथवा स्वर्ग, पर्जन्या, पृथिवी, पुरुष तथा स्त्री इनमें अग्नि दृष्टि करते हैं, तृतीय-नाचिकेत अग्निका तीनवार चयन करनेवाले इनमें प्रथम उत्तम है। शङ्का-प्रात्मशब्द चेतनवाची है, अतः यहाँ दो चेतन प्रतीत नहीं होते किन्तु केवल ऋतपानकर्तृत्व प्रतीत होता है । समाधान-कर्मफल भोक्ता जीव एक चेतन तो प्रसिद्ध है द्वितीयके अन्वेषणमें दो संख्याके श्रवणसे 'प्रस्य गो- द्वितीयोऽन्वेष्टव्यः' इस गौका द्वितीय अन्वेषण करना चाहिए, इस कथनसे समान जातीय दूसरी गौका अन्वेषण किया जाता है अश्वका नहीं। इस प्रकार यहां चेतन ही दूसरा ऋतपानकर्ता प्रतीत होता है, अतएव दोनों में प्रयुक्त प्रात्मशब्दसे कोई विरोध नहीं है । यद्यपि इस वाक्यमें जीव और ईश्वर दो चेतन उपन्यस्त हैं उन दोनोंमें कर्मफलका सम्बन्ध नहीं है, क्योंकि ईश्वर में कर्मफलका संभव नहीं है तो 'पिबन्ती' यह कैसे कहा गया है ? समाधान-छत्रिन्याससे-जैसे लोकमें 'छत्रिणो यान्ति' ( छातेवाले जाते हैं) छातेवाले और विना छातेवाले दोनोंके लिए वे छातेवाले लोग जा रहे हैं।
। व०३] भाषानुवाद-सत्यानन्दीदीपिका प्रविष्टावित्यर्थः। तौ च च्छायातपाविव विलक्षणो संसारित्वासंसारित्वेन ब्रह्मविदो वदन्ति कथयन्ति । न केवलमकर्मिण एव वदन्ति, पश्चाग्नयो गृहस्था ये च त्रिणाचिकेताः त्रिःकृत्वो नाचिकेतोऽग्निश्चितो यैस्ते निणाचिकेताः॥१॥ यः सेतुरीजानानामक्षरं ब्रह्म यत्परम् । अभयं तितीर्षतां पारं नाचिकेत शकेमहि ।। २ ।। ईजानानां ( यजनशोलानां कर्मिणां ) या ( नाचिकेत: अग्नि: ) सेतुः ( दुःखसंत्तर- णार्थत्वात्सेतुरिव ) तं ( नाचिकेतम् अग्निम् ) शकेमहि ( चेतुं, ज्ञातुं शक्नुमः ) अभय ( भयरहितं ) पारं ( संसारसागरस्येति ) तितीर्षतां (तत्तुमिच्छतां ज्ञानिनां ) आश्रय- भूतं यत् अक्षरं परं ब्रह्म ( तदपि ज्ञातुं शकेमहि ) ॥ २ ॥ यजन करनेवालोंके लिए सेतु-प्राधार भूत नाचिकेत अग्निको हम जानने एवं चयन करने में तथा भयशून्य और संसारको पार करने के अभिलाषी पुरुषोंका प्राश्रयभूत उस परब्रह्मको जानने में हम समर्थ हों ।। २ ।। यः सेतुरिव सेतुरीजानानां यजमानानां कर्मिणां दुःखसंतरणार्थत्वान्नाचि- केतोऽग्निस्तं वयं ज्ञातुं चेतुं च शकेमहि शक्नुवन्तः। किंच यच्चाभयं भयशून्यं संसारपारं तितीर्णतां तर्तुमिच्छतां ब्रह्मविदां यत्परमाश्रयमक्षरमात्माख्यं ब्रह्म परम परार्ध-हृदयाकाशमें प्रविष्ट हैं। वे दोनों संसारी और प्रसंसारिरूप होनेके कारण छाया और घामके समान परस्पर विलक्षण हैं, ऐसा ब्रह्मज्ञ लोग कहते हैं, केवल अकर्मी ही ऐसा नहीं कहते किन्तु जो त्रिणाचिकता-तीनवार नाचिकेत अग्निका चयन करनेवाले तथा जो पञ्चाग्निकी उपासना करनेवाले गृहस्थ भी ऐसा कहते हैं ॥१॥ दुःखको पार करनेका साधन होनेसे जो नाचिकेत अग्नि यजमान-कर्मियोंके लिए सेतुके समान होने के कारण सेतु है । उसे हम जानने व चयन करने में समर्थ हों। तथा जो अभय-भय रहित है और संसारके पार जानेकी इच्छावाले ब्रह्मवेत्ताओंका परम माश्रय अविनाशी आत्मा-नामक ब्रह्म है उसे भी हम जानने में समर्थ हो सकें अर्थात् सत्यानन्दीदीपिका ऐसा वाक्य प्रयोग होता है, यह छत्रिन्याय है। इस प्रकार यहाँ भोक्ता जीवके सम्बन्धसे ईश्वरको भी भोक्ता कहा गया है। श्रुतिमें 'सुकृत" शब्द 'दुष्कृत'का भी उपलक्षण है ॥ १॥ जैसे नदी, नालोंद्वारा अवरुद्ध मार्ग पार करने में सेतु गन्ताके लिए सहायक साधन है, वैसे नाचिकेत अग्नि सब प्रकारके याज्ञिकोंके लिए सेतुरुप है अर्थात् मुमुक्षुको परब्रह्म प्राप्तिके लिए शास्त्रविहित निष्काम यज्ञादि कर्म चित्त शुद्धिद्वारा ब्रह्मात्मैक्य ज्ञान ।
७४
कठोपनिषद्-शाङ्करभाष्य
[अ०१
तच्च ज्ञातु शकेमहि शक्नुवन्तः। परापरे ब्रह्मणी कर्मब्रह्मविदाश्रये वेदितव्ये
इति वाक्यार्थः। एतयोरेव ह्युपन्यासः कृत ऋतं पिबन्ताविति ।। २ ॥
तत्र य उपाधिकृतः संसारी विद्याविद्ययोरधिकृतो मोक्षगमनाय संसारगम-
नाय च तस्य तदुभयगमने साधनो रथः कल्प्यते--
शरीरादिसे सम्बद्ध रथादि रूपक
आत्मान* रथिनं विद्धि शरीर* रथमेव तु ।
बुद्धि तु सारथिं विद्धि मन: प्रग्रहमेव च ॥ ३ ॥
आत्मानं ( शरीराधिष्ठातारंजीवं ) रथिनं ( रथस्वामिनं ) विद्धि (जानीहि) शरीरं
( देहं ) तु ( पुनः ) रथं ( रथस्थानीयम् ) एव (हि ) [ विद्धि ] बुद्धि तु सारथि
( शरीररूपरथचालक ) [ विद्धि ] मनः ( सङ्गल्पविकल्पलक्षणं) च ( अपि ) प्रग्रहम्
(अश्वसंयमनरञ्ज') [विद्धि ] ॥ ३ ॥
शरीराध्यक्ष प्रात्माको रथी-रथ स्वामी जान, शरीरको रथ, बुद्धिको सारथि और
मनको प्रग्रह-लगाम जान ॥ ३ ॥
तत्र तमात्मानमृतपं संसारिणं रथिनं रथस्वामिनं विद्धि जानीहि । शरीरं
रथमेव तु रथबद्धहयस्थानीयैरिन्द्रियैराकृष्यमाणत्वाच्छरीरस्य । बुद्धिं तु अध्य-
वसायलक्षणां सारथिं विद्धि बुद्धिनेतृप्रधानत्वाच्छरीरस्य सारथिनेतृप्रधान इव
कर्मवित्का पाश्रय अपर ब्रह्म और ब्रह्मविदका पाश्रय परब्रह्म ये दोनों ही ज्ञातव्य हैं
यह वाक्यार्थ है । 'ऋतं पिबन्ती' इस मन्त्रमें इन दोनों (परापर ब्रह्म ) का ही उल्लेख
किया गया है ॥२॥
उन दोनों में जो उपाधि परिच्छिन्न संसारी-जीव' मोक्ष एवं संसारके प्रति गमन
करनेके लिए विद्या और अविद्या अधिकृत है। उसके लिए उन दोनोंके प्रति गमनके
साधनभूत रथकी कल्पना की जाती है-
पूर्वोक्त उन दोनोंमें उस आत्माको-कर्मफल भोक्ता संसारीको रथी-रथस्वामी जान,
और शरीरको तो रथ ही समझ, क्योंकि शरीररथमें जुते हुए अश्व स्थानीय इन्द्रियोंसे
खींचा जाता है। निश्चयात्मक बुद्धिको सारथि जान, क्योंकि सारथि नेतृत्व प्रधान
रथके समान यह शरीर भी बुद्धिनेतृत्व प्रधान है । देहगत सभी कार्य प्रायः बुद्धिके ही
सत्यानन्दीदीपिका
संपादन में सहायक साधन हैं । 'बाह्मणा विविदिषन्ति यज्ञन' (बृह० ४-४-२२ ) ऐसी
श्रुति भी है ॥ २॥
७५ (C व०३] भाषानुवाद-सत्यानन्दीदीपिका रथः। सर्वं हि देहगतं कार्य बुद्धिकर्तव्यमेव प्रायेण । मनः संकल्पविकल्पा- दिलक्षणं प्रग्रह रशनां विद्धि । मनसा हि प्रगृहीतानि श्रोत्रानि करणानि प्रवर्तन्ते रशनयेवाश्वाः ॥ ३॥ इन्द्रियाणि हयानाहुविषयास्तेषु गोचरान् । आत्मेन्द्रियमानोयुक्तं भोक्तेत्याहुर्मनीषिणः ॥ ४ ॥ मनीषिणः (विवेकिनः ) इन्द्रियाणि हयान् (अश्वान् ) पाहुः (कथयन्ति ) विषयान् (शब्दादीन् ) ( इन्द्रियेषु ) मार्गान् (विषयभूतान ) [ माहुः ] पात्मेन्द्रिय- मनोयुक्तं ( शरीरेन्द्रियमनोभिः सहितम् ) आत्मानं ( भोक्तारं संसारिणम् ) भोक्ता इति पाहुः ॥ ४॥ विवेकी पुरुष इन्द्रियोंको अश्व, अश्व, तथा प्रवरूपसे कल्पित इन्द्रियोंके गोचर विषयोंको मार्ग और शरीर इन्द्रिय एवं मन युक्त आत्माको भोक्ता कहते हैं ॥ ४ ॥ इन्द्रियाणि चक्षुरादीनि हयानाहू रथकल्पनाकुशलाः शरीररथाकर्षणसा- न्यात् । तेष्वेवेन्द्रियेषु हयत्वेन परिकल्पितेषु गोचरान्मार्गान्रूपादीन्विषया- न्विद्धि । आत्मेन्द्रियमनोयुक्तं शरीरेन्द्रियमनोभिः सहितं संयुक्तमात्मानं भोक्तेति कर्तव्य हैं। सङ्कल्पविकल्पादिरूप मनको प्रग्रह-लगाम समझ, क्योंकि जैसे अश्व लगामसे नियन्त्रित हो चलते हैं, वैसे ही श्रोत्र आदि इन्द्रियाँ मनसे नियन्त्रित हो अपने अपने विषयमें प्रवृत्त होती हैं ।। ३ ॥ रथकी कल्पना करने में कुशल पुरुष शरीररूपी रथके खींचने में सादृश्य होनेसे चक्षु आदि इन्द्रियोंको अश्व कहते हैं । रूपादि विषयोंको अश्वरूपसे परिकल्पित उन इन्द्रियों के गोचर-विचरण पथ जानो। मनीषिगण शरीर, इन्द्रिय और मन सहित-युक्त आत्माको सत्यानन्दीदीपिका भाष्यमें संसारी पद ईश्वरकी व्यावृत्ति के लिए है और मुक्त जीवकी व्यावृत्ति के लिए 'विद्यादि' कहा गया है। विद्यामें अधिकृत जीव मोक्ष और अविद्यामें अधिकृत जीव संसार गमनके लिए है, ऐसा विभाग है। शरीररूपी रथतादात्म्याभिमानी जीव रथी कहलाता है। जैसे रथमें सारथिका नेतृत्व है वैसे शरीरमें बुद्धिका नेतृत्व है, क्योंकि देहगत गमनागमन प्रादि रूप सब व्या- पार प्राय: बुद्धिद्वारा ही संपादित होते हैं । अन्तःकरणकी निश्चयात्मक वृत्ति बुद्धि है । 'इदमेव करिष्ये' यह वृत्ति सङ्कत्य और 'स्थाणुर्वा पुरुषोवा' इत्यादि संशयात्मक वृत्ति विकल्प है। बुद्धिद्वारा निश्चित किये जानेपर मनसे इन्द्रियोंकी प्रवृत्ति होती है, अत: मन लगामसदृश है। जैसे अश्वसे रथका संचालन होता है, ठीक वैसे ही इन्द्रियोंद्वारा शरीरका संचालन होता है। इस साहश्यसे इन्द्रियोंको अश्व कहा गया है ॥ ३ ॥ .
धुपाधिकृतमेव तस्य भोक्तत्वम् । तथा च श्रुत्यन्तरं केवलस्यार दर्शयति-ध्यायतीव लेलायतीव' (बृह० ४।३।७) इत्यादि। एवं वक्ष्यमाणस्थकल्पनया वैष्णवस्य पदस्यात्मतया प्रतिपत्तिरुपपद्यते स्वभावानतिक्रमात् ॥ ४॥ अविवेकीकी विवशता यस्त्वविज्ञानवान्भवत्ययुक्तेन मनसा सदा । तस्येन्द्रियाण्यवश्यानि दुष्टाश्वा इव सारथेः ॥ यस्तु ( पुनः) अयुक्तेन ( असमाहितेन ) मनसा (चित्तेन ) [ सदा अविज्ञानवान् (प्रवृत्तिनिवृत्तिविषये विवेकहीन ) [ भवति ] सारथे तस्य इन्द्रियाणि अवश्यानि ( उन्मार्गगामीनि ) [ भवन्ति ] ।। ५ ।। किन्तु जो बुद्धिरूपसारथि असंयत चित्तसंयुक्त हो प्रवृत्ति और नि विवेकहीन होता है उसकी इन्द्रिय सारथीके दुष्ट अश्वोंको भाँति उसके रहती हैं ॥ ५ ॥ तत्रैवं सति यस्तु बुद्धयाख्यः सारथिरविज्ञानवाननिपुणोऽविवे निवृत्तौ च भवति यथेतरो रथचर्यायामयुक्तेनाप्रगृहीतेनासमाहितेनर Musahaar ONLINAMANI 'यह भोक्ता संसारी है' ऐसा कहते हैं। केवल निरुपाधिक आत्मा तो में उसका भोक्तृत्व तो बुद्धि आदि उपाधि निमित्तक है। इसी प्रकार 'ध्यान सा, चेष्टा करता हुआ-सा' इत्यादि अन्य श्रुति केवल आत्माका अभोक्तृत्व है, ऐसा होनेपर-औपाधिक भोक्तृत्व होनेपर ही वक्ष्यमाण रथकल्पना पदकी आत्मभावसे प्राप्ति बन सकती है, अन्यथा नहीं, क्योंकि स्वभाव नहीं सकता ॥ ४॥ किन्तु ऐसा होने पर (आत्मामें असंसारित्व अस्वाभाविक होनेपर ) सारथि अविज्ञानवान्-अकुशल रथसंचालनमें अनिपुण अन्य सारथिके समा अश्वोंकी ] प्रवृत्ति-निवृत्तिमें विबेक रहित है । जो सर्वदा प्रग्रह-लगाम स्थान सत्यानन्दीदीपिका अग्निके उष्णत्वादिके समान आत्माके स्वाभाविक संसारित्वादि । सकते तो उनकी निवृत्तिके विना स्वाभाविक प्रसंसारित्व अपरिच्छिनत्व भी उस प्रात्माको प्राप्त नहीं हो सकता, अतः प्रात्मामें संसारित्व आदि - न सदा युक्तो भवति तस्याकुशलस्य बुद्धिसारथेरिन्द्रियाण्यश्वस्थानीया- यशक्यनिवारणानि दुष्टाश्वा अदान्ताश्वा इवेतरसारथैर्भवन्ति ॥५॥ विवेकीकी स्वाधीनता यस्तु विज्ञानवान्भवति युक्तेन मनसा सदा । तस्येन्द्रियाणि बश्यानि सदश्वा इव सारथे ॥ ६ ॥ | सदा युक्त न ( समाहितेन ) मनसा विज्ञानवान् भवति, तस्य इन्द्रियाणि, {श्वा (शिक्षिताश्वाः) इव वश्यानि [ भवन्ति ] ॥ ६ ॥ [ जो बुद्धिरूप सारथि-कुशल और सर्वदा समाहित चित्तसे युक्त होता है, शक्षित अश्वोंकी भाँति उसकी इन्द्रियाँ वशमें रहती हैं ।। ६ ।। पुनः पूर्वोक्तविपरीतः सारथिर्भवति विज्ञानवान्प्रगृहीतमनाः समाहित- दा तस्याश्वस्थनीयानीन्द्रियाणि प्रवर्तयितु निवर्तयितुं वा शक्यानि दान्ताः सदश्वा इवेतरसारथेः ॥ ६॥ पूर्वोक्तस्याविज्ञानवतो बुद्धिसारथेरिदं फलमाह- अविवेकीकी संसारमासि यस्त्वविज्ञानवान्भवत्यमनस्कः सदाऽशुचिः । न स तत्पदमाप्नोति स सारं चाधिगच्छति ॥ ७ ॥ (पुनः) प्रविज्ञानवान् (विवेकहीनः) अमनस्कः ( प्रगृहीतमनाः ) सदा अशुचिः : तत् (प्रसिद्ध वैष्णवं) पदं न प्राप्नोति (प्राप्नोति) संसारम् अधिगच्छति ।७। -विक्षिप्तचित्तसे युक्त है, उस अकुशल बुद्धि रूपसाथिके अश्वस्थानीय इन्द्रियाँ थके बेकाबू दुष्ट प्रश्वोंकी भांति अधीन नहीं होती अर्थात् कुमार्गसे हटायी नहीं ॥ ५॥ जो (बुद्धिरूप सारथि) पूर्वोक्त सारथिसे विपरीत विज्ञानवान् कुशल प्रगृहीत अर्थात् सदा समाहित चित्तवाला होता है उसकी अश्वस्थानीय इन्द्रियाँ कर्तव्य संव्यमें क्रमसे प्रवृत्त एवं निवृत्ति की जा सकती हैं जिस प्रकार सारथिके प्रश्व ।। ६॥ पूर्वोक्त प्रविवेकहीन बुद्धिरूप सारथिवाले रथीके लिए श्रुति यह फल कहती है- सत्यानन्दीदीपिका अन्वय-व्यतिरेकका 'तत्र' प्रादिसे उपसंहार करते हैं। नियमन और भनिय- पवहारमें प्रकुशल जिसे बुद्धिरूप सारथिका मनरूपी लगाम घामें नहीं है ACTRENDAR किन्तु जो पुनः विवेकहीन असंयतमना और सदा अपवित्र रहनेवाला पदको प्राप्त नहीं कर सकता, प्रत्युत जन्ममरणात्मक संसारको प्राप्त होता है यस्त्वविज्ञानवान्भवति, अमनस्कोऽप्रगृहीतमनस्कः स तत एवार न स रथी तत्पूर्वोक्तमक्षरं यत्परं पदमाप्नोति तेन सारथिना। न के नाप्नोति संसारं च जन्ममरणलक्षणमधिगच्छति ॥ ७ ॥ विवेकीकी परमपपदप्राप्ति यस्तु विज्ञानवान्भवति समनस्कः सदा शुचिः । स तु तत्पदमाप्नोति यस्माद्भूयो न जायते ॥ यः तु (पुना ) विज्ञानवान् समनस्कः ( युक्तमानसः ) सदा शुचि: * तत्पदं ( वैष्णवपदम् ) आप्नोति ( प्राप्नोति) यस्मात् (पदात् ) भूयः न ज किन्तु जो सविवेक संयतचित्त और सदा पवित्र रहनेवाला होता है, पदको प्राप्त होता है, जहाँ से वह पुन: उत्पन्न नहीं होता ।। ८ ।। यस्तु द्वितीयो विज्ञानवान्विज्ञानवत्सारथ्युपेतो रथी विद्वानित मनाः समनस्कः स तत एव सदा शुचिः स तु तत्पदमाप्नोति, यस्म दप्रच्युतः सन्भूयः पुनर्न जायते संसारे ॥८॥ किं तत्पदमित्याह- जो पुनः विवेकहीन असंयतमना और सदा अपवित्र रहनेवाला है, द्वारा वह जीवरूप रथी उस पूर्वोक्त प्रक्षर परम पदको प्राप्त नहीं होता। प्राप्त नहीं होता केवल इतना ही नहीं प्रत्युत जन्ममरणात्मक संर होता है।॥ ७॥ किन्तु जो द्वितीय रथी विज्ञानसम्पन्न विद्वान् सारथिसे युक्त और सम है अत: वह सदा ही पवित्र रहनेवाला है, वह तो उस पदको प्राप्त कर ले प्राप्त पदसे च्युत होकर पुनः संसार में जन्म नहीं लेता ॥ ८ ॥ वह पद क्या हैं ? इसपर कहते हैं- सत्यानन्दीदीपिका इस मन्त्र में मुमुक्षुका लक्षण भौर लक्ष्य कहा गया है। वह मुमुक्षु उस marafजनोती दी HINो तय ---- विज्ञानसारथिर्यस्तु मनःप्रग्रहवान्नरः । सोऽध्वन: पारमाप्नोति तद्विष्णोः परमं पदम् ॥ ६ ॥ नर: विज्ञानसारथिः (विवेकसम्पन्नाबुद्धिसारथिः यस्य सः ) मन: प्रग्रहवा व प्रग्रहः इन्द्रियाश्वसंयमनरज्जु यस्य, सः) सर अध्वनः ( संसारगतेः) पार 'नं ) विष्णोः ( व्यापकस्य ब्रह्मणः) तत् (प्रसिद्ध ) परमं पदं (स्था ) आप्नोति ( प्राप्नोति ) ॥६॥ मनुष्य विवेक सम्पन्न बुद्धिरूप सारथिवाला और इन्द्रियरूप अश्वोंको संया नरूपी लगामवाला है, वह संसारगतिके पार-पर्यवसनात्मक-समाप्ति विष्णु को प्राप्त करता है ॥६॥ ज्ञानसारथिर्यस्तु यो विवेकबुद्धिसारथिः पूर्वोक्तो मनः प्रग्रहवान्प्रगृहीत माहितचित्तः सशुचिर्नरो विद्वान्सोऽध्वनः संसारगतेः पारं परमेव तव्यमित्येतदाप्नोति मुच्यते सर्वसंसारबन्धनैः तद्विष्णोः व्यापनशीलस्ट परमात्मनो वासुदेवाख्यास्य परमं प्रकृष्टं पदं स्थानं सतत्त्वमित्येतद्यद ति विद्वान् ॥६॥ बुना यत्पदं गन्तव्यं तस्येन्द्रियाणि स्थूलान्यारभ्य सूक्ष्मतारतम्यक्रमेणा मतयाधिगमः कर्तव्य इत्येवमर्थमिदमारभ्यते-- पूर्वोक्त विद्वान् पुरुष विवेक सम्पन्न बुद्धिरूप सारथिसे युक्त, मन प्रग्रहवान्- 'न-समाहितचित्त होनेसे पवित्र है वह विद्वान् संसारगतिके पर पार जो प्तिव्य-ज्ञातव्य है उस परमात्माको प्रास कर लेता है अर्थात् सर्वसंसार बन्धनोंसे नाता है। उस विष्णु-व्यापनशील सर्वव्यापक ब्रह्मरूप बासुदेव संज्ञक पर- जो परम-उत्कृष्ट पद-स्थान-स्वरूप है उसे वह विद्वान् प्राप्त कर लेता है ।।६।। जो गन्तव्य-प्राप्तव्य-ज्ञातव्य परम पद है, स्थूल इन्द्रियोंसे प्रारम्भकर सूक्ष्म भसे प्रत्यगात्मरूपसे उसका ज्ञान प्राप्त करना चाहिए, इसलिए उसी अर्थका कया जाता है- सत्यानन्दीदीपिका यति भूतानि स्वस्मिन्निति वासुः स चासो देवश्च दीव्यत इति स्वप्रकाश इससे तत्' पदका वाच्यार्थ कहा गया है और 'परमम्' इससे लक्ष्यार्थ है। 'विष्णोः परमं पदम्' ( उत्कृष्टनास्वरूप ) यह निrant ram - - इन्द्रियादिका तारतम्य इन्द्रियेभ्यः परा ह्यार्था अर्थेभ्यश्च परं मनः । मनसस्तु परा बुद्धिबुद्धरात्मा महान्परः ॥ इन्द्रियेभ्यः अर्थाः ( विषया) परा: ( सूक्ष्मा:-उत्कृष्टाः ) अर्थे विषयेभ्यः) च (अपि ) मनः ( संकल्पविकल्पात्मक) पर ( सूक्ष्म) परा, बुद्ध। महान् प्रात्मा पर: ( सूक्ष्मः-उत्कृष्टः ) ॥ १० ॥ इन्द्रियोंकी अपेक्षा उनके विषय श्रेष्ठ हैं, विषयोंसे मन श्रेष्ठ, मनसे । और बुद्धिसे भी महान् प्रात्मा-महत्तत्त्व उत्कृष्ट है ।। १० । स्थूलानि तावदिन्द्रियाणि तानि यैर/रात्मप्रकाशनायारब्धानि येभ्यः स्वकार्येभ्यस्ते परा ह्यार्थाः सूक्ष्मा महान्तश्च प्रत्यगात्मभूताः प्यर्थेभ्यश्च परं सूक्ष्मतरं महत्प्रत्यगात्मभूतं च मनः। मनःशब्द आरम्भकं भूतसूक्ष्मं संकल्पविकल्पाद्यारम्भकत्वात् । मनसोऽपि इन्द्रियाँ स्थूल हैं, वे जिन शब्द स्पर्शादि तन्मात्राओं द्वारा अ प्रकाशित करनेके लिए उत्पन्न की गई हैं वे विषय अपने कार्यभूत इन्द्रि महान् एवं प्रत्यगात्मभूत हैं। उन विषयोंसे भी पर-सूक्ष्म महान् एवं प्र है। जो कि मनका प्रारम्भक भूत सूक्ष्म मन शब्दवाच्य है, मनसे पर-सू प्रत्यगात्मभूत बुद्धि है अर्थात् अध्यवसायादिका प्रारम्भक भूतसूक्ष्म बुद्धि सत्यानन्दीदीपिका शब्दादि अर्थोसे मनके प्रारम्भक भूत-सूक्ष्म-पर है, उनसे बुद्धिके आ पर हैं, यह कथन युक्त नहीं है, क्योंकि कार्यकी अपेक्षा उपादानकारण व्यापक और अनपायिस्वरूप प्रसिद्ध है जैसे घटादिके प्रति मृत्तिकादि, भूतोंके परस्पर कार्यकारण भावमें कोई प्रमाण नहीं है । यद्यपि यह तथापि विषयेन्द्रियव्यवहार मनके अधीन है ऐसा देखने में आता है, व्यापकता कल्पित की गई है। कोई मनको परमार्थतः प्रात्मा मानते निवृत्तिके लिए भाष्यमें 'मनः शब्दवाच्यम्' आदि कहा गया है । 'अन्नमय (छा० ६७६ ) इत्यादि श्रुति मनको भौतिक कहती है, अतः भो आत्मा नहीं हो सकता है । संकल्पादिरूप मन अध्यवसायात्मक बुद्धिसे नि बुद्धि मन से पर है । 'बुद्धिश्चात्मा' इस विज्ञानवादी मतका अपनयन करने - प प्रत्यगात्मभूता च बुद्धिः, बुद्धिशब्दवाच्यमध्यवसायाद्यारम्भक भूत- । बुद्धरात्मा सर्वप्राणिबुद्धीनां प्रत्यगात्मभूतत्वादात्मा महान्सर्वमह- । अव्यक्ताद्यत्प्रथमं जातं हैरण्यगर्भ तत्त्वं बोधाबोधात्मकं महानात्मा पर इत्युच्यते ॥ १०॥ महतः परमव्यक्तमव्यक्तात्पुरुषः परः । पुरुषान्न परं किंचित्सा काष्ठा सा परा गतिः ॥११॥ 'हतः अव्यक्तम् (अव्याकृतं ) परम्, अव्यक्तात् अव्याकृतात ) पुरुषः (सर्वापेक्षया हषात् (परमात्मनः ) परं किञ्चित् न (अस्ति) सा काष्ठा (अवधिः ) सा 1 ॥ ११ ॥ हत्तत्वसे अव्यक्त-अव्याकृत मूलप्रकृति पर है और अव्यक्तसे भी पुरुष पर है. पर अन्य कुछ नहीं है, वही सूक्ष्मत्वकी पराकाष्ठा-अवधि है वही उत्कृष्टगति है ।११ हतोऽपि परं सूक्ष्मतरं प्रत्यगात्मभूतं सर्वमहत्तरं चाव्यक्तं सर्वस्य जगतो तमव्याकृतनामरूपसतत्त्वं सर्वकार्यकारणशक्तिसमाहाररूपमव्यक्ताव्या- शादिनामवाच्यं परमात्मन्योतप्रोतभावेन समाश्रितं वटकणिकायामिव शक्तिः। तस्मादव्यक्तात्परः सूक्ष्मतरः सर्वकारणकारणत्वात्प्रत्यगात्म- BHARureate द्धसे भी समस्त प्राणियोंकी बुद्धि का प्रत्यगात्मभूत होने से प्रात्मा महान है, वह सबसे महान् है । अव्यक्तसे प्रथमोत्पन्न हिरण्यगर्भतत्त्व है। जो ( ज्ञानशक्ति याशक्तिसे सम्पन्न होने के कारण ) बोधाबोधात्मक वह महान् पात्मा बुद्धिसे -सूक्ष्म श्रेष्ठ है, ऐसा कहा जाता है ।। १०॥ हत्से पर सूक्ष्मतर प्रत्यगात्मभूत सबसे महान् अव्यक्त है, जो सारे जगत्के बीज याकृत नामरूपका स्वरूप, सम्पूर्ण कार्यकारण शक्तिका संघात अव्यक्त-अव्याकृत काशादि शब्द वाच्य-निर्दिष्ट तथा वटधान में प्राश्रित वटवृक्ष की शक्तिके समान में ओतप्रोतभावसे प्राश्रित है। उस अव्यक्तकी अपेक्षा सर्वकारणोंका कारण सत्यानन्दीदीपिका है । भूतादिमें जो उत्तरोत्तर परत्वकी कल्पना की गई है वह केवल परमपुरुषार्थको [ इच्छासे न कि उनमें परत्व प्रतिपादनकी इच्छासे, क्योंकि ऐसा करनेसे कोई [ नहीं है ।। १०॥ ब्द और अर्थका शक्तिरूप सम्बन्ध नित्य है इसका निर्वाह करने के लिए - त्वाच महांश्च, अत एव पुरुषः सर्वपूरणात् । ततोऽन्यस्य परस्य प्रर यन्नाह-पुरुषान्न परं किंचिदिति । यस्मान्नास्ति पुरुषाञ्चिन्मात्रधनात्प वस्त्वन्तरं तस्मात्सूक्ष्मत्वमहत्त्वप्रत्यगात्मत्वानां सा काष्ठा निष्ठा प अत्र हीन्द्रियेभ्य प्रारभ्य सूक्ष्मत्वादिपरिसमाप्तिः। अत एव च ग गतिमतां संसारिणां परा प्रकृष्टा गति; 'यद्गत्वा न निवर्तन्ते' (: १५॥६) इति स्मृतेः ॥ ११ ॥ ननु गतिश्चेदागत्यापि भवितव्यम् । कथं यस्माद्भूयो न ज नैष दोषः, सर्वस्य प्रत्यगात्मत्वादवगतिरेव गतिरित्युपचर्यते । प्रत्य दर्शितमिन्द्रियमनोबुद्धिपरत्वेन । यो हिं गन्ता सोऽगतमप्रत्यग्रपं गर . तथा प्रत्यगात्मभूत होनेसे पुरुष पर-सूक्ष्मतर एवं महान है, अतएव वह होनेसे पुरुष शब्द बाच्छ है। इसमें 'पर किसी अन्य वस्तुके प्रसङ्गका नि कहते हैं--पुरुषसे पर अन्य कुछ नहीं है, क्योंकि चिद्घनमान पुरुषसे अन्य के नहीं है, अतएव वही सूक्ष्मत्व, महत्त्व और प्रत्यगात्मत्वकी पराकाष्ठा-निष्ट है । इन्द्रियों से प्रारम्भकर इस श्रात्मामें ही सूक्ष्मत्वादिकी समाप्ति होती है। सब गमन करनेवाले गतिशील संसारियोंकी परा-उत्कृष्टगति है, क्योंकि (जिसको प्राप्तकर-जानकर पुनः संसारावर्त में नहीं लौटते ) ऐसी स्मृति में गतिशब्दसे यथाश्रुतार्थका ग्रहणकर शङ्का करते हैं-~यदि वैष्णवपदके है तो वहाँसे आगमन भी होना चाहिए, तो पुन: 'जिससे पुनः जन्म नहीं ले कहा जाता है ? यह दोष नहीं है, क्योंकि सबका प्रत्यगात्मा है, अत: उस उपचारसे गति कहा जाता है। इन्द्रिय, मन और बुद्धिसे परत्वरूपसे प्रात्माका दिखलाया गया है, जो गमनकर्ता है वह अपनेसे भिन्न अनात्मभूत ॥ सत्यानन्दीदीपिका स्मिन्खल्वरे गाग्र्याकाश ओतश्च प्रोतश्च' (बृह० ) 'मायां तु प्रकृति हि तु महेश्वरम्' ( श्वे० ४११०) ( तब यह अव्याकृत ही था, अरे गार्गी ! पद वाच्य प्राकाश-परमात्मामें यह प्रोत प्रोत है। मायाको सबका कारण र महेश्वरको मायावी-माया स्वामी जानो ) इत्यादि श्रुतिसे अव्यक्त प्रसिद्ध पव्यक्तको सांख्याभिमत प्रधानसे 'परमात्मनि' आदि भाष्यसे विलक्षण कह सांख्याभिमत प्रधान जगत्का स्वतन्त्र कर्तृकारण है जब कि अव्यक्त-माया जगत्का कारण है । अव्यक्त ईश्वरकी शक्ति है पृथक्तत्त्व नहीं है, क्योंकि सर mar - पर्ययेण । तथा च श्रुतिः-'अनध्वगा अध्वसु पारयिष्णवः' इत्याद्या । र्शयति प्रत्यगात्मत्वं सर्वस्य- आत्मा सूक्ष्मबुद्धिग्राह्य है एष सर्वेषु भूतेषु गूढोत्मा न प्रकाशते । दृश्यते त्वग्रयया बुद्धया सूक्ष्मया सूक्ष्मदशिभिः ।।१२।। भूतेषु ( ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्तेषु ) गूढः ( निहितः ) एष प्रात्मा न प्रकाशते न विभाति ) सूक्ष्मदशिभिः अग्रयया सूक्ष्मया बुद्धया न दृश्यते ॥ १२ ॥ तोंमें गूढ यह प्रात्मा प्रकाशमान-प्रत्यक्ष नहीं होता। यह तो सूक्ष्मदर्शी पुरुषों पैनी एवं सूक्ष्म बुद्धिसे देखा जाता है-अनुभव किया जाता है ।। १२ ।। रुषः सर्वेषु ब्रह्मादिस्तम्वपर्यन्तेषु भूतेषु गूढः संवृतो दर्शनश्रवणादि- मायाच्छन्नोऽत एवात्मा न प्रकाशत आत्मत्वेन कस्यचित् । अहो रा दुरवगाह्या विचित्रा माया चेयं यदयं सर्वो जन्तुः परमार्थतः तत्त्वोऽप्येवं बोध्यमानोऽहं परमात्मेति न गृह्णात्यनात्मानं देहेन्द्रियादि- : Laakmandwassage न करता है इससे विपरीत नहीं। तथा 'अनध्वगा.' ( संसार मार्ग से पार छावाले पुरुष मार्ग रहित होते हैं ) इत्यादि श्रुति है । इस प्रकार भागेकी • सबका प्रत्यगात्मा है, दिखलाती है...- ष-प्रात्मा ब्रह्मादिसे लेकर स्तम्ब पर्यन्त सब भूतोंमें गूढ़-आवृत छिपा हुआ आदि कर्म करनेवाला तथा अविद्या-मायासे पाच्छन्न-पाच्छादित है, अतएव नरूपसे किसीको प्रकाशित-अनुभूत नहीं होता। अहो ! यह माया प्रतिगम्भीर वं विचित्र है जिससे ये सभी संसारी जीव वस्तुतः परमार्थस्वरूप होते भी सत्यानन्दीदीपिका -यदि प्रात्मा प्रत्यग्रूप है तो वह सबको सर्वदा सर्वत्र प्राप्त है । ऐसी स्थिति प्ति के लिए ज्ञानादि साधन व्यर्थ होंगे ? समाधान-प्रविद्यासे देहादि अनात्म- त्मिभावसे प्राप्त जो अधिकारी है, वह विद्याद्वारा अनात्मभावको निवृत्त कर प्राप्त होता है, अतः ज्ञानादि साधन व्यर्थ नहीं है। शते' पात्मा किसीको प्रकाशित-अनुभूत नहीं होता, इससे यह सिद्ध होता पुष्प, वन्ध्यापुत्रादिके समान नहीं है ? ऐसा नहीं, क्योंकि लिङ्गका दर्शन से देखता हूँ, इसका वरण करता हूँ, यह कार्य करता हूँ' इत्यादि लिङ्ग- संघातमात्मनो दृश्यमानमपि घटादिवदात्मत्वेनाहममुष्य पुत्र इत्यनु गृह्णाति । नूनं परस्यैव मायया सोमुह्यमानः सर्वो लोको बम्भ्रमीति स्मरणम्-'नाहं प्रकाशः सर्वस्य योगमायासमावृतः' (गीता ७२६ ननु विरुद्धमिदमुच्यते 'मत्वा धीरो न शोचति' (कठ २।१।४) (कठ ११३।१२) इति च । नैतदेवम् । असंस्कृतबुद्ध रविज्ञेयत्व इत्यक्तम् । दृश्यते तु संस्कृतया अग्रथया अग्रमिवाग्रथा तया, एका त्येतत् , सूक्ष्मया सूक्ष्मवस्तुनिरूपणपरया, कैः ? सूक्ष्मदर्शिभिः [ शास्त्र और प्राचार्यद्वारा ] इस प्रकार बोध कराये जानेपर भी 'मैं परम ग्रहण नहीं करता प्रत्युत देह, इन्द्रियादि संघात घटादिके समान अ अन त्माको किसीके न कहने पर भी 'मैं इसका पुत्र हूँ' इस प्रकार प्रात करता है । निश्चय परमात्माफी मायासे मोहित हुआ यह सारा जगत् भ्र है । तथा 'नाहं प्रकाश' ० ( योगमायासे प्रावृत हुभा मैं सबको प्रकाशित होता ) इत्यादि स्मृति भी है। पू०परन्तु 'मत्वा०' ( उसे अनुभव पुरुष शोक नहीं करता ) 'न प्रकाशते.' ( प्रकाशित नहीं होता ) यह तो जाता है ? सि०-ऐसा नहीं है, मात्मा असंस्कृतवुद्धि पुरुषके लिए प्रवि 'न प्रकाशते' ऐसा कहा गया है । वह तो संस्कृत-तीक्ष्ण किसी पैनीनोकवे हो ऐसी एकाग्रता युक्त एवं सूक्ष्मवस्तुके निरूपण-निरीक्षण परायण तीव्र अनुभव किया जाता है । किनके द्वारा ? सूक्ष्मदर्शियों द्वारा । 'इन्द्रियोंके ! उनसे सूक्षम हैं' इत्यादि प्रकारसे सूक्ष्मताकी परम्पराका दर्शन-विचार : सत्यानन्दीदीपिका होता कि अविद्या प्रतिबन्धक है, मायासे प्रावृत है, इससे यह अपने ब्रह्मरूपसे नहीं जानता और 'मैं ब्रह्मस्वरूप हूँ' ऐसा व्यवहार योग्य भी अविद्या विद्यासे निवर्त्य और मिथ्या है तो भी ऐसी दुरवगाह्य एवं विचिः पौर प्राचार्य द्वारा 'तत्त्वमसि' ‘पर एव प्रात्मा नासि संसारी' (तू परमा नहीं है ) ऐसा वार वार प्रतिबोधित किये जाने पर भी 'मैं ब्रह्म ऐस प्रत्युत अपने दृश्यमान अनात्म-देहेन्द्रियादि संघातको 'त्वं देवदत्तस्य ५ इस प्रकार प्रतिबोधित न होते भी 'मैं इसका पुत्र हूँ' ऐसा ग्रहण कर विषयमें 'नाहं प्रकाशः सर्वस्य योगमाया समावृतः' (गीता ७१२४) वचन भी है। 'इन्द्रियोंसे लेकर अव्यक्त पर्यन्त जो सूक्ष्मत्व, महत्त्व एवं - - . 17 ॥ण या - म शिनस्तैः सूक्ष्मदर्शिभिः पण्डितैरित्येतत् ॥ १२ ॥ लयचिन्तन तेपत्त्युपायमाह- यच्छेद्वाङ्मनसी प्राज्ञस्तद्यच्छेज्ज्ञान प्रात्मनि । ज्ञानमात्मनि महति नियच्छेत्तद्यच्छेच्छान्त अात्मनि ॥१३॥ ( विवेकी ) वाक् ( वाचं ) मनसि ( नियच्छेत् ) तत् (मन:) ज्ञाने (प्रकाश- आत्मनि ( बुद्धौ ) यच्छेत् । ज्ञान (बुद्धि ) महति आत्मनि (महत्त्वे) त् ( महत्तत्वं ) शान्ते ( विकारहिते ) प्रात्मनि (परमात्मनि) यच्छेत् ॥१३॥ पुरुष वाक् इन्द्रियका मनमें उपसंहार करे, उसका प्रकाशस्वरूप बुद्धिमें द्धिको महत्तत्वरूप प्रात्मा में लीन करे और महत्तत्त्वको शान्त प्रात्मामें ॥ १३ ॥ नियच्छेदुपसंहरेत्प्राज्ञो विवेकी, किम् ? वाग्वाचम् । वागत्रोपलक्षणार्थी न्द्रयाणाम् । क्व ? मनसी। भनसीतिच्छान्दसं दैर्घ्यम् । तच्च मनो ने प्रकाशस्वरूपे बुद्धावात्मनि । बुद्धिर्हि मनादिकरणान्याप्नोती- न्यक तेषाम् । ज्ञानं बुद्धिमात्मनि महति प्रथमजे नियच्छेत् । प्रथम- स्तुको देखनेका स्वभाव हो गया है वे सूक्ष्मदर्शी हैं, उन सूक्ष्मदर्शी पण्डितों जाता है यह अर्थ है ।। १२ ।। उसकी प्राप्तिका उपाय कहते हैं अर्थात् प्रात्मप्राप्तिका साधन कहते हैं- । पुरुष यच्छेत्' अर्थात् नियुक्त करे-उपसंहार करे, किसका ? वाक्-वाणीका सब इन्द्रियोंका उपलक्षणार्थक है, कहाँ उपसंहार करे ? मनमें 'मनसी' पदमें स ह्रस्व इकारके स्थानमें 'ई-सी' दीर्घ प्रयोग वैदिक है, उस मनको ज्ञान- रूप बुद्धि प्रात्मामें नियुक्त करे, बुद्धि ही मन आदि करणोंको व्याप्त करती सत्यानन्दीदीपिका ोता है तब 'तत्त्वमसि' आदि महावाक्योंद्वारा 'अहं ब्रह्मास्मि' ऐसी बुद्धि- न होती है और उसमें अभिव्यक्त ब्रह्मभाव स्वतः अपरोक्षरूपसे व्यवहित १२॥ वाचम्' यहां वाक् वैदिक प्रयोग है । विवेकी पुरुषको अपने इन्द्रिय समुदायको करने के लिए सर्व प्रथम वाणीका निग्रह करना चाति। बागीले rma -Amमर Mus . .
जवत्स्वच्छस्वभावकमात्मना विज्ञानमापादयोदत्यथः। तच महा यच्छेच्छान्ते सर्वविशेषप्रत्यस्तमितरूपेऽविक्रिये सर्वान्तरे सर्व साक्षिणि मुख्य आत्मनि ॥ १३ ॥ एवं पुरुष आत्मनि सर्व प्रविलाप्य नामरूपकर्मत्रयं यन्मिथ्य म्भितं क्रियाकारकफललक्षणं स्वात्मयाथात्म्यज्ञानेन मरीच्युदकरज्जु मलानीव मरीचिरज्जुगगनस्वरूपदर्शनेनैव स्वस्थः प्रशान्तात्मा कृतक यतोऽतस्तदर्शनार्थम्- उद्बोधन उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत । क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्यया दुर्ग पथस्तत्कवयो वर्दा [हे मुमुक्षवः ! ] उत्तिष्ठत (पात्मज्ञानोन्मुखाः भवत ) जाग्रत (मोहनि वरान् ( श्रेष्ठान् प्राचार्यान् ) प्राप्य ( समीपं गत्वा ) निबोधत (नितरां निशिता ( तीक्ष्णीकृता ) दुरत्यया ( दुःखेन अतिक्रमितुं शक्या ) क्षुरस्य ( के साधनस्य ) धारा (अग्रभागमिव ) दुर्ग ( दुःखेन गन्तुं शक्यं ) तत् (तं.) पथ कवयः ( विद्वांसः ) वदन्ति ।। १४ ।। ! PORamerampurraCENTRALI Dammam . है इसलिए वह उनका प्रात्मा-प्रत्यक्स्वरूप है। उस ज्ञानरूप बुद्धिको प्रथमोर आत्मामें लय करे अर्थात् प्रथम उत्पन्न महत्तत्त्वके समान आत्माका स्वच्छ विज्ञान प्राप्त करे ऐसा अर्थ है । और उस महान आत्माको सर्व विशेषोंसे रहि सर्वान्तर तथा बुद्धि के सर्वप्रत्ययोंके साक्षी शान्त मुख्य प्रात्मामें नियुक्त करे ।। मृगतृष्णा, रज और प्राकाशके स्वरूपज्ञानसे मृगजल, रजुसर्प और मालिन्यका बाधकर जैसे बाह्याभ्यन्तरेन्द्रियव्यापार रहित हो पुरुष स्वस्थ व जाता है, वैसे ही मिथ्याज्ञानसे संपादित जो यह सर्व प्रपञ्च-नाम, रूप एक तीनोंको, जो क्रिया, कारक और फलरूप हैं, स्वात्माके यथार्थ ज्ञानद्वारा पुरु लोनकर विवेकी स्वस्थ प्रशान्तचित्त एवं कृतकृत्य हो जाता है, क्योंकि ऐसा उसका साक्षात्कार करने के लिए- सत्यानन्दीदीपिका मिलता और मनको भी अन्य शब्दोंके सोचने का अवसर कम मिलता है, इ भी संयम हो जाता है। मनको बुद्धिमें लय अर्थात् बुद्धिमात्र होनेसे मनका जाता है. व्यघि बढिका सखि बदि Rana लोमा - - m , । MIRafikaDAINIREEmaaaaar लापचा मस्त लागा ! ७०1, [ अज्ञानानद्रास ] जागा भार अष्ठ प्राचायाँक समीप ज्ञान प्राप्त करो, जैसे छुरेकी धार तीक्ष्ण व दुस्तर होती है, तत्त्वज्ञानी लोग उस वैसा ही कहते हैं ॥ १४ ॥ नाद्यविद्याप्रसुप्ता उत्तिष्ठत हे जन्तव आत्मज्ञानाभिमुखा भवत, जाग्रता- द्राया घोररूपायाः सर्वानर्थबीजभूतायाः क्षयं कुरुत। कथम् ? प्राप्यो- वरान् प्रकृष्टानाचार्यास्तद्विदस्तदुपदिष्टं सर्वान्तरमात्मानमहभस्मीति तावगच्छत । न ह्युपेक्षितव्यमिति श्रुतिरनुकम्पयाह मातृवत् । अति- (द्धिविषयत्वाज्ज्ञेयस्य । किमिव सूक्ष्मबुद्धिरित्युच्यते; तुरस्य धाराम । तीक्ष्णीकृता दुरत्यया दुःखेनात्ययो यस्या सा दुरत्यया । यथा सा दुर्गमनीया तथा दुर्गं दुःसम्पाद्यमित्येतत्पथः पन्थानं तत्त्वज्ञानलक्षणं कवयो मेधाविनो वदन्ति । ज्ञेयस्यातिसूक्ष्मत्वात्तद्विषयस्य ज्ञानमार्गस्य पाद्यत्वं वदन्तीत्यभिप्रायः ॥ १४ ॥ कथमतिसूक्ष्मत्वं ज्ञेयस्येत्युच्यते, स्थूला तावदियं मेदिनी शब्दस्पर्श- गन्धोपचिता सर्वेन्द्रियविषयभूता तथा शरीरम् । तत्रैकैकगुणापकर्षण नादि अविद्यासे सोये हुए जीवो ! उठो, आत्मज्ञानके अभिमुख होमो तथा घोर- जान निद्रासे जागो वह सम्पूर्ण अनर्थोकी बीजभूत है, उसका क्षय करो। किस ? श्रेष्ठ-उत्कृष्ट आत्मज्ञानी प्राचार्योके पास जाकर । उनके द्वारा उपदिष्ट सर्वान्तर को 'मैं यही हूँ' ऐसा जानो। उसकी उपेक्षा नहीं करनी चाहिए ऐसा माताके अनुकम्पा कर घु.ति कहती है, क्योंकि वह ज्ञेयपदार्थ अतिसूक्ष्म बुद्धिका विषय सूक्ष्म बुद्धि कैसी है ? इसपर कहते है --निशिता-तीक्ष्ण की हुई छुरेकी धार- | जैसे दुरत्य होती है-जिसे कठिनतासे पार किया जा सके वह दुरत्यय है । इ पैरोंसे दुर्गमनीय है वैसे ही यह तत्त्वज्ञानरूपमार्ग अत्यन्त दुर्गम-दुष्प्राप्य है, वि-मेधावी पुरुष कहते हैं । अभिप्राय यह है कि ज्ञेय अत्यन्त सूक्ष्म है अतः तद्वि- rrन मार्गको भी दुष्प्राप्य कहते हैं ।। १४ ।। इ ज्ञेय अतिसूक्ष्म कैसे है ? इसपर कहते हैं-शब्द, स्पर्श, रूप, रस एवं गन्ध ाँच विषयों) से वृद्धिको प्राप्त हुई तथा सब इन्द्रियोंकी विषयभुत यह पृथिवी ऐसा यह शरीर भी है। उन गन्धादि गुणोंमेंसे एक एक गुणका अपकर्ष (कम) सत्यानन्दीदीपिका न्ममृत्युजराव्याधिदुःखदोषानुदर्शनम्' ( गी० १३।८ ) इस प्रकार विषयदोष प्रयाससे मत प्रादि सभी हस्तियों के ली- योग - - ' ७yारण टमबाा शमिति ते गन्धादयः सर्व एव स्थूलत्वाद्विकाराः शब्दान्ता यत्र न तस्य सूक्ष्मत्वादिनिरतिशयत्वं वक्तव्यमित्येतदर्शयति श्रुतिः- निविशेष प्रात्मज्ञानसे अमृतत्वप्राप्ति अशब्दमस्पर्शमरूपमव्ययं तथारसं नित्यमगन्धवञ्च यत अनाद्यनन्तं महतः परं ध्रुवं निचाय्य तन्मृत्युमुखात्प्रमु यत् ( ब्रह्म) शब्द ( शब्दगुणहीनम् ) अस्पर्श ( स्पर्शगुणरहितम् ) गुणरहितम् ) अव्ययं ( निर्विकारं ) तथा अरसं ( रसगुणरहित ) नित्या नाशरहितम् ) गन्धवत् ( गन्धगुणरहित । भवति ] अनाद्यनन्तं (पा महतः परं (बुद्धितत्त्वात विलक्षणं ) ध्रुवं ( शाश्वतं ) तम् ( आत्मानं अवगम्य ) मृत्युमुखात् ( कामादिबन्धात ) मुच्यते ( मुक्तो भवति ) : जो शब्द, स्पर्श एवं रूपरहित अव्यय तथा रसहीन, नित्य और गन्ध जो अनादि, अनन्त, महत्तत्त्वसे विलक्षण और ध्रुव-निश्चल है उस आत्मतत्त पुरुष मृत्यु मुखसे मुक्त हो जाता है ॥ १५ ॥ अशब्दमस्पर्शमरूपमव्ययं तथारसं नित्यमगन्धवच्च यत, एत ब्रह्माव्ययम् यद्धि शब्दादिमत्तव्येतीदं त्वशब्दादिमत्यादव्ययं नव्येति अत एव च नित्यम् । यद्धि व्येति तदनित्यमिदं तु न व्यत्यतो नित्र नित्यमनायविद्यमान आदिः कारणमस्य तदिदमनादि । यद्धचारि होनेसे प्राकाश पर्यन्त जलादि चार भूतोंमें सूक्ष्मत्व, महत्त्व, विशुद्धत्व एवं का तारतम्य देखा गया है शब्दपर्यन्त वे गन्धादि सभी स्थूल होनेसे विका जिसमें ये शब्द पर्यन्त गन्धादि विकार नहीं हैं उसके सूक्ष्मत्व आदिकी नि विषयमें क्या कहा जाय ? यही बात आगेकी श्रुति दिखलाती है. जो शब्द रहित, स्पर्श रहित, रूपरहित, अव्यय तथा रसरहित, नि रहित है ऐसी जिसकी व्याख्या की जाती है वह ब्रह्म अव्यय-अविनाशी है, पदार्थ शब्दादि युक्त होता है उसका व्यय-क्षय होता है किन्तु यह ब्रह्म श न होने के कारण अव्यय है। इसका व्यय क्षय नहीं होता इसलिये यह नित्य सत्यानन्दीदीपिका सूक्ष्मत्व तारतम्यकी विश्रान्तिका स्थान होनेसे ज्ञेय ब्रह्म अतिसूक्ष्म है, 'उच्यते' से कहते हैं। जितने जितने गुणोंका अपचय (न्यूनता ) होला .NP Mसाटामाा५ । २५ सपारपत्पादकायमका. R नित्यं न तस्य कारणमस्ति यस्मिन्प्रलीयेत । तथानन्तमविद्यमानोऽन्त:- स्य तदनन्तम् । यथा कदल्यादेः फलादिकार्योत्पादनेनाप्यनित्यत्वं दृष्टं न थाप्यन्तवत्त्वं ब्रह्मणः; अतोऽपि नित्यम् । महतो महत्तत्त्वाद् बुद्ध याख्या- विलक्षणं नित्यविज्ञप्तिस्वरूपत्वात्सर्वसाक्षि हि सर्वभूतात्मत्वाद् ब्रह्म । हे 'एष सर्वेषु भूतेषु' (कठ १।३।१२) इत्यादि । ध्वं च कूटस्थं नित्यं न यादिवदापेक्षिकं नित्यत्वम् । तदेवंभूतं ब्रह्मात्मानं निचाय्यावगम्य तमा- मृत्युमुखान्मृत्युगोचरादविंद्याकामकर्मलक्षणात्प्रमुच्यते विमुच्यते ॥ १५ ।। स्तुतविज्ञानस्तुत्यर्थमाह श्रुतिः- प्रस्तुत विज्ञानकी महिमा नचिकेतमुपाख्यानं मृत्युप्रोक्त* सनातनम् । उक्त्वा श्रुत्वा च मेधावी ब्रह्मलोके महीयते ॥१६॥ सका व्यय होता है वह अनित्य होता है, इसका व्यय नहीं होता अतएव नित्य इ इससे भी नित्य है, क्योंकि अनादि है। इसका प्रादि-कारण विद्यमान नहीं है ह अनादि है, क्योंकि जो पदार्थ आदिमान् है वह कार्यरूप होनेसे अनित्य होता अपने कारणमें लीन हो जाता है जैसे पृथिवी आदि, किन्तु यह आत्मा तो कारण होने से अकार्य है और प्रकार्य होनेसे नित्य है, इसका कोई कारण नहीं लीन हो। आत्मा अनन्त भी है, जिसका अन्त: कार्य विद्यमान न हो वह अनन्त है, कार्य उत्पन्न करनेसे भी कदली आदि जैसे अनित्य देखे गये हैं वैसे ब्रह्मका 'व नहीं है, इसलिए भी वह नित्य है, नित्यविज्ञप्ति स्वरूप होने के कारण बुद्धि- महत्तत्त्वसे पर-विलक्षण है, क्योंकि ब्रह्म सम्पूर्ण भूतोंका अन्तरात्मा होने के कारण साक्षी है। यह बात 'एष सर्वेषु०' ( यह प्रात्मा सभी भूतोंमें गूढ़ है, अतः त नहीं होता ) इत्यादि श्रुतिमें कही गई है। इसी प्रकार वह ध्रुव-कूटस्थ नित्य सकी नित्यता पृथिवी आदिके समान प्रापेक्षिक नहीं है। इस प्रकारके उस ब्रह्म को जानकर साक्षात्कारकर पुरुष मृत्युमु खसे-अविद्या, काम और कर्मरूपमृत्यु- बन्धनसे अच्छी तरह मुक्त हो जाता है ।। १५ ।। ब प्रस्तुत विज्ञानकी स्तुतिके लिए श्रुति कहती है- सत्यानन्दीदीपिका भाव है, 'केवलो निर्गुणश्च' (श्व० ६।११) इत्यादि श्रति भी है । इससे ब्रह्म में - states Hi नृत्युभात ( यमन उक्त ) सनातन (चिरन्तनं ) नाचिकेतं । सम्बद्धम् ) उपाख्यानं उक्त्वा ( मुमुक्षवे व्याख्याय ) [ स्वयं ] च श्रुत्वा महीयते ( उपास्यो भवति ) ॥ १६ ।। नचिकेताद्वारा प्राप्त तथा यमसे प्रतिपादित इस सनातन विज्ञानको क सुनकर मेधावी पुरुष ब्रह्मलोकमें महिमान्वित होता है ।। १६ ।। नाचिकेतं नचिकेतसा प्राप्तं नाचिकेतं मृत्युना प्रोक्तं मृत्युप्रोक्तमिद मुपाख्यानं वल्लीत्रयलक्षणं सनातनं चिरन्तनं वैदिकत्वादुक्त्वा ब्रा श्रुत्वाचार्यभ्यो मेधावी ब्रह्म व लोको ब्रह्मलोकस्तस्मिन्महीयत आत्मभूत भवतीत्यर्थः ।। १६॥ य इमं परमं गुह्यं श्रावयेद्ब्रह्मसंसदि । प्रयतः श्राद्धकाले वा तदानन्त्याय कल्पते तदानन्त्याय कल्पत इति ॥ १७ ।। यः (जन:) प्रयत: (पवित्रःसन्) परमम् (उत्कृष्टं) गुह्यं ( गोप्य ) इमं (ज ब्रह्मसंसदि (ब्राह्मणसभायां) श्राद्धकाले वा श्रावयेत्, तत् (श्राद्ध श्रवणं वा) (अनन्तफलोत्पत्तये ) कल्पते ( संपद्यते) ॥ १७ ॥ जो पुरुष इस परम गुह्य ग्रन्थको पवित्र हो ब्राह्मणोंकी सभामें अथवा श्र सुनाता है उसका श्राद्ध वा श्रवण अनन्त फलवाला होता है अनन्त फलवाला है यः कश्चिदिमं ग्रन्थं परमं प्रकृष्टं गुह्यं गोप्यं श्रावयेद् ग्रन्थतोऽर्थतः णानां संसदि ब्रह्मसंसदि प्रयतः शुचिर्भूत्वा श्राद्धकाले वा श्रावयेद् भु नचिकेताद्वारा प्राप्त [ को नाचिकेत कहते हैं ] और नचिकेताके प्रति उ तीन वल्लीरूप उपाख्यानको जो वैदिक होने के कारण सनातन-चिरन्तन है, ६ कहकर तथा प्राचार्योसे सुनकर मेधावी पुरुष ब्रह्म ही लोक है उस ब्रह्मलोक मान्वित होता है अर्थात् सबका आत्मभूत हो उपास्य होता है ऐसा अर्थ है ॥ १ जो कोई पुरुष इस परम-उत्कृष्ट और गुह्य-गोपनीय ग्रन्थको पवित्र होकर ब्रा सत्यानन्दीदीपिका सनातन ब्रह्मका प्रतिपादक होनेसे यह उपाख्यान भी सनातन है । 'यद्ब्रह्म तया लोक्यते' ज्ञायते इति सोऽयं ब्रह्मलोकः' 'जो ब्रह्म अभिन्नरूपसे ही जाना जात ब्रह्मलोक है' अर्थात् 'ब्रह्मविद्ब्रह्मैव भवति' 'ब्रह्मवेद ब्रह्मैव भवति' (ब्रह्मवेत्ता ब ही है ) यह ब्रह्मविद्की महिमा है ।। १६ ।। यमराज और सविता HTTETTrum ---- शमस्थानन्त्यायानन्तफलाय कल्पत संपद्यते । द्विवचनम् अध्यायपरिस यर्थम् ॥ १७॥ ङ्करभगवतः कृतौ कठोपनिषद्भाष्ये प्रथमाध्याये तृतीयवल्लीभाष्यं समाप्तम् ।। ३ ।। इति कठोपनिषदि प्रथमोऽध्यायः समाप्तः ।। १ ॥ में अथवा श्राद्धकालमें भोजन करने बैठे ब्राह्मणोंके प्रति पाठमात्र और प्रर्थक है उसका वह श्राद्ध अनन्त फलवाला होता है । अध्याय परिसमात्यर्थ यह नन्त्याय कल्पते' यह वाक्य दो बार कहा गया है ।। १७ ॥ कठोपनिषद्के प्रथमाध्यायकी तृतीयवल्लीका स्वामी सत्यानन्द सरस्वती कृत भाष्यानुवाद समाप्त ॥ १-३॥ सत्यानन्दीदीपिका करनेसे उनसे जन साधारण भी लाभ उठाकर मानव जीवन सफल कर सकसा है । गलमें शब्दतः और अर्थतः श्रवण करानेसे प्रेतात्माओंको भी अलभ्य लाभ होता स मन्त्रसे यह भी सिद्ध होता है कि श्राद्ध वैदिक है केवल स्मार्त नहीं ।। १७ ।। कठोपनिषद्के प्रथमाध्यायको तृतीयवल्लीकी स्वामी सत्यानन्द सरस्वती कृत-सत्यानन्दीदीपिका समाप्त ॥ १-३ ॥ PM -TED अथवतीयाध्यायस्य प्रथमावल्ली - आत्मदर्शनका विघ्न इन्द्रियों की बहिर्मुखता एष सर्वेषु भूतेषु गूढोत्मा न प्रकाशते दृश्यते त्वप्रथया बुद्धथा, इत्र कः पुनः प्रतिबन्धोऽग्रयाया बुद्धेर्थेन तदसावादात्मा न दृश्यत इति । नकारणप्रदर्शनार्था वल्ल्यारभ्यते । विज्ञाते हि श्रेयःप्रतिबन्धकारणे तर नाय यत्न आरब्धु शक्यते नान्यथेति- पराश्चि खानि व्यतृगत्स्वयंभूस्तस्मात्पराङपश्यति नान्तरात्म कश्चिद्धीरः प्रत्यगात्मानमैक्षदावृत्त चक्षुरमृतत्वमिच्छन् । स्वयम्भूः ( स्वयमेव भवति इति स्वयंभूः-स्वतन्त्रः परमेश्वरः) खानि याणि ) पराश्चि (पराणि वाह्यवस्तुनि अञ्चन्ति गच्छन्ति इति पराङ्मुखानि) ( हननं कृतवान् ). तस्मात् ( कारणात् ) पराङ् ( शब्दादिबाह्यविषयान् ) प अन्तरात्मन् ( अन्तरात्मानं ) न [ पश्यति ] कश्चिद् (धीर: ) अमृतत्वं (नि:४ इच्छन्, प्रावृत्तचक्षुः (सर्वविषयेभ्यः प्रत्यावृत्तसर्वेन्द्रियः सन् ) प्रत्यगात्मानं (ब्रह्मस् ऐक्षत (पश्यति ) ॥१॥ स्वयंभू - परमात्माने इन्द्रियोंको बहिमुखकर हिसितकर दिया है, इस बाह्यविषयोंको देखता है अन्तरात्माको नहीं, अमृतत्वकी इच्छा करते जिसने इन्द्रियोंको बाह्य विषयोंसे रोक दिया है ऐसा कोई धीर पुरुष ही प्रत्यगास्म' पाता है ॥१॥ सम्पूर्ण भूतोंमें छिपा हुआ यह आत्मा प्रकाशित नहीं होता वह तो एकार ही देखा जाता है, ऐसा पहले (कठ० ११३०१२ में ) कहा गया है। अब प्रश्न होता है कि एकाग्र बुद्धिका ऐसा कौन प्रतिबन्धक है जिससे कि उस एका का प्रभाव होनेसे आत्मा दिखाई नहीं देता ? अतः प्रात्म-प्रदर्शनके कारणक लानेके लिए यह वल्ली आरम्भ की जाती है, क्योंकि श्रेयके प्रतिबन्धक ज्ञान होने पर ही उसकी निवृत्ति के लिए यल प्रारम्भ किया जा सकता है अन्यथा सत्यानन्दीदीपिका पहले ( कठ० १०३।१२ ) इस मन्त्रमें ब्रह्मात्मसाक्षात्कारमें अनादि अविध पराञ्चि परागञ्चन्ति गच्छन्तीति । खानि तदुपलक्षितानि श्रोत्रानीनीनि । खानीत्युच्यन्ते । तानि पराच्येव शब्दादिविषयप्रकाशनाय प्रवर्तन्त देवं स्वाभाविकानि तानि व्यतृणद्धिंसितवान्हननं कृतवानित्यर्थः सौ ? स्वयंभूः परमेश्वरः स्वयमेव स्वतन्त्रो भवति सर्वदा न परतन्त्र इति त्पराङ पराग्रूपाननात्मभूताब्शब्दादीन्पश्यत्युपलभत उपलब्धा, नान्तर न्तिरात्मानमित्यर्थः । एवं स्वभावेऽपि सति लोकस्य कश्चिन्नद्याः प्रतिस्रोत नमिव धीरो धीमान्विवेकी प्रत्यगात्मानं प्रत्यक्चासावात्मा चेति प्रत्य । प्रतीच्येवात्मशब्दो रूढो लोके नान्यस्मिन् । व्युत्पत्तिपक्षेऽपि तत्रैव ब्दो वर्तते। 'यच्चाप्नोति यदादत्ते यच्चात्ति विषयानिह । यञ्चास्य संतर स्तस्मादात्मेति कीत्यते।' इत्यात्मशब्दव्युत्पत्तिस्मरणात् । तं प्रत्यगात्मा जो पराक्-बाहरकी पोर अञ्चन-गमन करती हैं वे 'पराञ्चि' कही जाती हैं। 'ख को कहते हैं, उनसे उपलक्षित श्रोत्रादि इन्द्रियाँ 'खानि' कही जाती हैं। वे बहि होकर ही शब्दादि विषयोंको प्रकाशित करने के लिए प्रवृत्त होती हैं, क्योंकि स्वभा ही ऐसी हैं, इसलिए उन्हें हिसित कर दिया है अर्थात् उनका हननकार दिया है ऐस ई । वह कौन है ? स्वयम्भू-परमेश्वर जो स्वतः ही सर्वदा स्वतन्त्र है परतन्त्र नहीं है 'ए उपलब्धा सर्वदा पराक्-बहिःस्वरूप अनात्मभूत शब्दादि विषयों को देखता-उप करता है 'नान्तरात्मन्' अन्तरात्माको नहीं, ऐसा अर्थ है । यद्यपि लोकका ऐसा स्वभाव है तो भी कोई धीर बुद्धिमान् विवेकी पुरुष ही नदीक प्रवाहके विपरीत दिशामें प्रवृत्त कर देने के समान [ इन्द्रियोंको विषयोंकी और र ] उस अपने प्रात्माको देखता है। प्रत्यक्-जो सम्पूर्ण विषयोंका साक्षी श्री हो वही प्रत्यगात्मा है। लोकमें प्रात्मशब्द 'प्रत्यक्' में रूढ़ हैं अन्य में नहीं त्ति पक्षमें भी प्रात्मशब्दकी प्रवृत्ति उसीमें-प्रत्यक् अर्थ में ही है । जैसा कि 'क्योंकि नोति' ( वह सबको व्याप्त करता है, ग्रहण करता है, जो इस लोकमें विषयोंक IT है तथा इसका सर्वदा सद्भाव है इसलिए यह आत्मा कहा जाता है ) इस : भात्मशब्दकी व्युत्पत्तिमें स्मृति है। उस प्रत्यगात्माने अपने स्वरूपको 'ऐक्षत अर्थात् देखता है ऐसा अर्थ है। वैदिक प्रयोगमें कालका नियम न होनेके कारण सत्यानन्दीदीपिका जैसे कार्तवीर्य आदिने नर्मदा आदि नहीं प्रवाहका विपरीत प्रवर्तन किया है वैरे ननेक जन्मसंसिद्ध पुरुष इन्द्रियोंकी विषयों की ओर स्वाभाविक प्रवृत्तिरूप नर्द स्वभावमैक्षदपश्यत्पश्यतीत्यर्थः, छन्दसि कालानियमात् । पश्यतीत्युच्यते वृत्तचक्षुरावृत्तं व्यावृत्तं चक्षुः श्रोत्रादिकमिन्द्रियजातमशेषविषयाद्यस्य वृत्तचक्षुः स एवं संस्कृतः प्रत्यगात्मानं पश्यति । न हि बाह्यविषयालोच त्वं प्रत्यगात्मेक्षणं चैकस्य संभवति । किमर्थं पुनरित्थं महता प्रयास भावप्रवृत्तिनिरोधं कृत्वा धीरः प्रत्यगात्मानं पश्यति इत्युच्यते, अमृतर रणधर्मत्वं नित्यस्वभावतामिच्छन्नात्मन इत्यर्थः ॥१॥ य तावत्स्वाभाविकं परागेवानात्मदर्शनं तदात्मदर्शनस्य प्रतिबन्धकारण । वर्तमानकालके अर्थ में भूतकालकी क्रिया 'ऐक्षत' का प्रयोग हुआ है। वह 'ता है ? इसपर कहते हैं-'प्रावृत्तचक्षुः' व्यावृत्तचक्षु अर्थात् जो श्रोत्रादि इनि दायको सम्पूर्ण विषयोंसे रोकनेवाला है वह प्रावृत्तचक्षु है । वह इस प्रकार संस्कृ तेन्द्रिय, संस्कृतमन हुआ पुरुष प्रत्यगात्माको देखता है। एक ही पुरुषके नि य-विषयोंकी पालोचनपरता और प्रत्यगात्माका साक्षात्कार करना [युगपत्] ये दे भव नहीं हैं। तो इस प्रकार महान् परिश्रमसे इन्द्रियोंकी स्वाभाविक प्रवृत्ति रोधकर धीर पुरुष प्रत्यगात्माको किस लिए देखता है ? इसपर कहते हैं-अमृता रणधर्मत्व-आत्माके नित्यस्वभावत्वकी इच्छा करता हुआ [ उसे देखता है अिर्थ है ॥ १॥ जो स्वभावसे ही बाह्य अनात्मदर्शन है वही आत्मदर्शनके प्रतिबन्धकी कार । अविद्या है, क्योंकि वह उस-मात्मदर्शके प्रतिकूल है। इसके अतिरिक्त अविद्य सत्यानन्दीदीपिका दि में जो प्रात्मशब्दका प्रयोग है वह तादात्म्याभिमानके कारण है, अतः मृ * है, 'प्रतीच्येवात्मशब्दो रूढ़ो लोके' इस प्रकार प्रत्यक्में ही प्रात्मशब्द रूढ कह [ व्युत्पत्तिपक्षोऽपि' इस प्रकार यौगिकवृत्तिसे भी दिखलाते हैं-'यच्चाप्नो प्लव्याप्तौ' इस धातु अर्थके अनुगमसे आत्मशब्दका अर्थ व्यापक है । 'यस्मादाद हरति स्वात्मन्येव सर्वम्' जो अपने में सबको संहार करे, इससे प्रात्मा लयका अधिक हा जाता है । 'कार्यका कारणमें लय' इस अन्य व्युत्पत्तिसे आत्मामें जगत्की उपाद रणता उपलब्ध होती है। 'विषयानत्तीत्यात्मा' जो विषयोंको भोगता है, इ. चैतन्याभाससे प्रात्मा उपलब्धा सिद्ध होता है। इस जगत्को जिससे निरन ता प्राप्त हो अर्थात् अस्ति, भाति और प्रियता प्राप्त हो, इससे अधिष्ठानसे प्रति त्प्रितिकूलत्वात् । या च पराक्ष्वेवाविद्योपप्रदर्शितेषु दृष्टादृष्टेषु भोगेषु तृष्णा विद्यावृष्णाभ्यां प्रतिबद्धात्मदर्शनाः- अविवेकी और विवेकीका अन्तर पराच: कमाननुयन्ति बालास्ते मृत्योर्यन्ति विततस्य पाशम् । प्रथ धीरा अमृतत्वं विदित्वा ध्रुवमधू वेष्विह न प्रार्थयन्ते ।२। 1 ] बालाः (अविवेकिनः ) पराच: (बाह्यान् ) कामान् (विषयान् ) अनुयन्ति न्ति ) ते विततस्य ( बहुकालव्यापिनः ) मृत्योः, पाशे ( बन्धं ) यन्ति ( प्राप्नु- अथ ( तस्मात् ) इह ( लोके ) धीराः ( विवेकिनः ) ध्रुवम् अमृतत्वं ( मोक्षं) ( ज्ञात्वा ) अध्र वेषु (अस्थिरेषु विषयेषु ) न प्रार्थयन्ते ( इच्छन्ति ) - पि] ॥ २ ॥ [ज्ञ पुरुष बाह्यविषयोंका अनुगमन करते हैं, वे मृत्युके सर्वत्र फैले वा बहुकाल श-बन्धनमें पड़ते हैं। किन्तु विवेकीपुरुष अमरत्वको ध्रुव-निश्चल जानकर प्रनित्य पदार्थों में से किसीकी इच्छा नहीं करते हैं।। २ ।। 'चो बहिर्गतानेव कामान्काम्यान्विषयाननुयन्ति अनुगच्छन्ति बाला स्ते तेन कारणेन मृत्योरविद्याकामकर्मसमुदायस्य यन्ति गच्छन्ति विस्तीर्णस्य सर्वतो व्याप्तस्य पाशं पाश्यते बध्यते येन तं न्द्रियादिसंयोगवियोगलक्षणम् । अनवरतजन्मप्रमरणजरारोगाद्य- जातं प्रतिपद्यन्त इत्यर्थः । एवमथ तस्माद्धीरा विवेकिनः ष्ट और अदृष्ट बाह्य भोगोंमें जो तृष्णा है, अविद्या और तृष्णा इन दोनों ही से प्रात्मदर्शनवाले- -आपल्पज्ञ मन्दमति पुरुष पराक्-बाह्यकामनाओं-बाह्यकाम्यविषयों का ही अनुगमन इसी कारणसे वे अविद्या, काम और कर्म समुदाय रूप मृत्युके वितत-विस्तर्ण- त पाशको प्राप्त होते हैं। जिससे जीव पाशित होता है बांधा जाता है उस दके संयोग वियोगरूप पाशमें पड़ते हैं, निरन्तर जन्म, मरण, जरा, रोग आदि र्थ समुदायको प्राप्त होते हैं ऐसा अर्थ है। यतः ऐसा है, इसलिए धीर-विवेकी सत्यानन्दीदीपिका दयो येऽर्था अनर्था इव ते स्थिताः । येषां सक्तस्तु भूतात्मा न स्मरेच्च परं पदम् । जो शब्द, स्पर्श आदि पाँच विषय हैं वे अनर्थरूप ही स्थित हैं, जिसमें प्रासक्त मात्मरूप परं पदको भी स्मरण नहीं करते) 'ये हि संस्पर्शजा भोगा दुःखयोनय - - प्रत्यगात्मस्वरूपावस्थानलक्षणममृतत्वं ध्रुवं विदित्वा, देवाद्यमृतत्वं तु प्रत्यगात्मस्वरूपावस्थानलणं 'न कर्मणा वर्धते नो कनीयान' (बृह इति ध्रुवम् । तदेवंभूतं कूटस्थमविचाल्यममृतत्वं विदित्वाध्रुवेषु र नित्येषु निर्धार्य ब्राह्मणा इह संसारेऽलर्थप्राये न प्रार्थयन्ते किंचिदपि दर्शनप्रतिकूलत्वात् । पुत्रवित्तलोकैषणाभ्यो व्युतिष्ठन्त्येवेत्यर्थः ।। यद्विज्ञानान किंचिदन्यत्प्रार्थयन्ते ब्राह्मणाः कथं तदधिगम इत्यु पुरुष प्रत्यगात्मस्वरूपमें स्थितिरूप अमृत्वको ध्रुव-निश्चल जानकर-देवानि तो अध्रुव है किन्तु यह प्रत्यगात्मस्वरूप में स्थितिरूप अमृतत्व तो 'न का न कर्मसे बढ़ता है और न घटता है ) इस प्रकार ध्रुव है। इस प्रकारके। चाल्य अमृतत्वको जानकर वे ब्राह्मण-ब्रह्मवेत्ता लोग इस अनर्थ प्रायः संर सर्व अनित्य पदार्थो से किसीकी इच्छा नहीं करते, क्योंकि वे सब तो दर्शनके विरोधी हैं, इससे वे पुत्र, वित्त और लोकषणामोंसे ऊपर उठ जाते सबका त्यागकर देते हैं ऐसा अर्थ है ।। २ ॥ ब्रह्मवेत्ता लोग जिसका विज्ञान हो जानेसे किसी अन्य पदार्थकी काम उस ब्रह्मका बोध किस प्रकार होता है ? इसपर कहते हैं- सत्यानन्दीदीपिका भोगोंमें शोभनाध्यास होनेपर इनमें प्रासक्त पुरुष पुनः पुनः जन्म-मरण प्राप्त होता है। प्रारब्धसे प्राप्त भोगायतन-स्थूलशरीर (अन्नमयकोश ) त्यागकर प्राणमय, मनोमया, विज्ञानमय और प्रानन्दमय इन चारों को जीव लोकान्तरमें पहुंचकर वहाँ सुखादि भोगार्थ तत्तत् कर्मानुसार तत्तर स्थूल शरीरको प्राप्त करता है, उसका नाम जन्म है मृत्युलोक, प्रार त्यागको मृत्यु-मरण कहते हैं, यह आधिभौतिक मृत्यु है, इसी प्रकार दुष दुर्बलावस्थाको आधिदैविक और बुद्धिनाशको आध्यात्मिक मृत्यु कहते हैं त्प्रणश्यति' (गीता २।६३) इत्यादि स्मृति प्रमाणसे भी यही सिद्ध होता सक्ति दुःखका हेतु है। परन्तु जो भाग्यवान् धीर पुरुष हैं, 'एतं वै तमात्मानं विदित्वा ब्राह याश्च वित्तषणायाश्च लोकषणायाश्च व्युत्थायाथ भिक्षाचयं चरन्तिः ( (निश्चय उस आत्माको जानकर वे ब्राह्मण पुत्रषणा वित्तषणा एवं लोकं कर अनन्तर भिक्षाचर्य करते हैं संन्यास ग्रहण करते हैं ) इस प्रकार वे । - - येन रूपं रसं गन्धं शब्दान्स्पर्शाश्व मैथुनान् । एतेनैव विजानाति किमत्र परिशिष्यते । एतद्वै तत् ॥३॥ 1 एतेनैव (ज्ञानस्वरूपेण प्रात्मना ) रूपं रसं गन्धं शब्दान स्पर्शान् मैथुनान् नाति ( विस्पष्टं जानाति लोक! ) अत्र ( अस्मिन् लोके ) [ अविज्ञेयं ] किं पते ? [न किञ्चिदपीत्यर्थः) एतत् वै तत् ॥ ३ ॥ ‘स ज्ञानस्वरूप प्रात्माके द्वारा पुरुष रूप, रस, गन्ध, शब्द, स्पर्श और मैथुन जन्य निश्चय पूर्वक जानता है [ उस आत्मासे अविज्ञेय ] इस लोकमें और क्या रह ? [ तुझ नचिकेतासे पुछा हुआ ] वह तत्त्व यही है ॥ ३ ॥ न विज्ञानस्वभावेनात्मना रूपं रसं गन्धं शब्दान्स्पांश्च मैथुनान्मैथुननि- मुखप्रत्ययान्विजानाति विस्पष्टं जानाति सर्वो लोकः। ननु नैवं प्रसिद्धि- 'आत्मना देहादिविलक्षणेनाहं विजानामीति । देहादिसंघातोऽहं विजा- तु सर्वो लोकोऽवगच्छति । न त्वेवम् । देहादिसंघातस्यापि शब्दादि- वाविशेषाद्विज्ञेयत्वाविशेषाच्च न युक्तं विज्ञातृत्वम् । यदि हि देहादि- रूपाद्यात्मकः सन्रूपादीन्विजानीयाद्वाह्या अपि रूपादयोऽन्योन्यं स्वं च विजानीयुः । न चैतदस्ति, तस्मादेहादिलक्षणांश्च रूपादीनेतेनैव देहा- तोक जिस विज्ञान स्वरूप आत्मासे [ चक्षु आदि करणों द्वारा ] रूप, रस, गन्ध र्श और मैथुन जनित सुख प्रत्ययों को स्पष्टतया जानता है [वह ब्रह्म है] शङ्का- कमें ऐसी कोई प्रसिद्धि नहीं है कि मैं देहादिसे विलक्षण आत्मा द्वारा शब्दादि । जानता हूँ। सब लोग तो यही समझते हैं कि देहादि संधातरूप ही मैं शब्दादि [ जानता हूँ। समाधान-ऐसा तो नहीं है, क्योंकि देहादि संघात भी समानरूपस प तथा विज्ञेयरूप है, अत: उसे ज्ञाता मानना उचित नहीं है, यह देहादि पाद्यात्मक होकर भी रूपादिको जाने तो बाह्य रूपादि भी परस्पर एक सत्यानन्दीदीपिका । तदधिगमः' क्या वेदप्रतिपादित होनेसे धर्मके समान परोक्षरूपसे अथवा 'दिके समान प्रत्यक्षरूपसे ब्रह्मका अधिगम होता है ? इसका 'यद्विज्ञानान्न' त्तर कहते हैं---मात्मा ब्रह्म है, इस प्रकार ब्रह्मका अपरोक्षरूपसे ज्ञान ही सभ्य- 'यत्साक्षादपरोक्षाद्ब्रह्म' ऐसी श्रुति भी है । इस बातको आगे 'येन', इस मन्त्रसे - दि संघातसे अतिरिक्त चैतन्यस्वरूप प्रात्मासे ही यह सब दृश्यजात वेद्य है सा अविवेकी पुरुषों में प्रसिद्ध नहीं है. तथापि यह बात विमारी दिव्यतिरिक्तनैव विज्ञानस्वभावेनात्मना विजानाति लोकः। यश दहति सोऽग्निरिति तद्वत् । आत्मनोऽविज्ञेयं किमत्रास्मिल्लोके प किंचित्परिशिष्यते । सर्वमेव त्वात्मना विज्ञेयम् । यस्यात्मनोऽविज्ञ त्परिशिष्यते स आत्मा सर्वज्ञः। एतद्वै तत् । किं तद्यन्नचिकेतसा भिरपि विचिकित्सितं धर्मादिभ्योऽन्यद्विष्णोः परमं पदं यस्मात्पर एतदधिगतमित्यर्थः ॥३॥ अतिसूक्ष्मत्वादुर्विज्ञेयमिति मत्वैतमेवार्थं पुनः पुनराह- प्रात्मज्ञकी निशोकता स्वप्नान्तं जागरितान्तं चोभौ येनानुपश्यति । महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ।। स्वप्नान्तं (स्वप्नमध्य) जागरितान्तं (जाग्रदृश्य) च उभौ ( स्वप्न दूसरेको तथा अपने अपने रूपको जान लेंगे, किन्तु बात ऐसी नहीं है । अर स्वरूप रूपादिको देहादिसे भिन्न विज्ञानस्वभाव इसी आत्मासे ही जा प्रकार लोहा जिसके द्वारा जलता है वह अग्नि है, उसी प्रकार । आत्मासे संसारमें क्या शेष रह जाता है । जिस आत्मासे कुछ भी अविज्ञ य शेष न वह प्रात्मा सर्वज्ञ है और यही वह है। वह कौन है ? जिस विषयक प्रश्न किया है तथा जो देवादिसे भी सन्देहास्पद है जो धर्मादिसे । परम पद है जिससे श्रेष्ठ कुछ भी नहीं है वही यह [ ब्रह्मपद ] अधिगर अर्थ है ।। ३॥ अतिसूक्ष्म होनेसे दुर्विज्ञेय है ऐसा मानकर उसी अर्थको पुनः पुन कहते हैं- सत्यानन्दीदीपिका तस्यास्ति वेत्ता' ( श्वेता० ३।१६ ) ऐसा श्रुति भी कहती है। इसलि यत्' शब्दसे सिद्धवत् परामर्श विरुद्ध नहीं है । देहादिके विज्ञातृत्वके अभ इत्यादि भाष्य से दो हेतुओंको कहते हैं-गुण गुणीके प्रभेद होनेसे देहादि रूप ही देखा जाता है, अतः 'दैहिकाः शब्दादयो न स्वात्मानमन्यं च विज त्वाद् दृश्यत्वाच्च बाधवत्' (देहसम्बन्धी शब्द, स्पर्शादि न अपनेको और जान सकते हैं, क्योंकि उनमें भी शब्दादित्व और दृश्यत्व समान है जैर मानिसको मनोमा inff आत्मना ) अनुपश्यात | तं ] महान्तं विभुम् प्रात्मानं मत्वा (विज्ञाय ) धीरो इति ।।४।। वप्नदृश्य और जाग्रदृश्य ये दोनों जिसके द्वारा देखे-जाने जाते हैं, उस महान् विभु को जानकर बुद्धिमान् पुरुष शोक नहीं करता ।। ४ ।। बनान्तं स्वप्नमध्यं स्वप्नविज्ञेयमित्यर्थः तथा जागरितान्तं जागरितमध्यं तविज्ञेयं च; उभौ स्वप्नजागरितान्तौ येनात्मनानुपश्यति लोक इति ववत् । तं महान्तं विभुमात्मानं मत्वावगम्यात्मभावेन साक्षादहमस्मि मेति धोरो न शोचति ॥४॥ आत्मज्ञको निर्भयता य इमं मध्वदं वेद आत्मानं जीवमन्तिकात् । ईशानं भूतभव्यस्य न ततो विजुगुप्सते। एतद्वै तत् ॥५॥ इमं मध्वदं ( कर्मफलभुजं ) जीवम् आत्मानं भूतभव्यस्य (भूतभाविनः .) ( ईशितारम् ) अन्तिकात् (समीपे) वेद ( जानाति [ सः ] ततः (तद्विज्ञानात्) गुप्तते ( न गोपायितुमिच्छति मात्मानम् अन्यतो भयेन ) एतद्वैतत् ।। ५ ।। । अधिकारी पुरुष इस कर्मफल भोक्ता एवं प्राणादिके धारयिता प्रात्माको उसके हकर भूत, भविष्यत् ( तथा वर्तमान ) के शासकरूपसे जानता है, वह वैसा हो जानेके अनन्तर उस पात्माकी रक्षाकी इच्छा नहीं करता, निश्चय यही मतत्त्व है ॥५॥ नान्त-स्वप्नमध्य अर्थात् स्वप्नावस्थामें ज्ञेय तथा जागरितान्त-जाग्रत् मध्य जाग्रत् अवस्थामें जानने योग्य इन दोनों स्वप्न और जाग्रत्के ज्ञेय पदार्थोंको 'स प्रात्माके द्वारा देखते हैं [ वहीं ब्रह्म है ] इस वाक्यकी अन्य सारी व्याख्या के समान करनी चाहिए। उस महान विभु प्रात्माको जानकर 'यह परमात्मा सा आत्मभावसे साक्षात् अनुभवकर धीर पुरुष शोक नहीं करता ॥ ४ ॥ सत्यानन्दीदीपिका मन्त्र आत्माको स्वयं प्रकाश एवं द्रष्टा कहता है। जाग्रत और स्वप्नावस्थामें | अनुभव आत्मासे ही होता है, प्रात्मा स्वप्नदृश्यका भी प्रकाशक है, इसमें पुरुषः स्वयंज्योतिः' (बृह० ४-३-६ ) इत्यादि श्रुति भी प्रमाण है । महान्त- 'विविधं भवत्यस्मादिति fam: Eम - यः कश्चिदिम मध्वदं कर्मफलभुजं जीवं प्राणादिकलापस्य धा त्मानं वेद विजानात्यन्तिकादन्तिके समीप ईशानमीशितारं भूतभव्या यस्य ततस्तद्विज्ञानादूर्ध्वमात्मानं न विजुगुप्सते न गोपायितुमिच्छर त्वात् । यावद्धि भयमध्यस्थोऽनित्यमात्मानं मन्यते तावद्गोपायितु मानम् । यदा तु नित्यमद्वैतमात्मानं विजानाति तदा किं कः कुतोक तुमिच्छेत् । एतद्वै तदिति पूर्ववत् ॥ ५॥ यः प्रत्यगात्मेश्वरभावेन निर्दिष्टः स सर्वात्मेत्येतद्दर्शयति- यः पूर्वं तपसो जातमद्भ्यः पूर्वमजायत । गुहां प्रविश्य तिष्ठन्तं यो भूतेभिर्व्यपश्यत ॥ एतद्वै तर MIA जो कोई इस मध्वद-कर्मफल भोक्ता और जीव-प्राणादि समुदायके मात्माको समीपसे भूत, भविष्यत् ( एवं वर्तमान ) तीनों कालोंके शासकर है। वह ऐसा विज्ञान हो जाने के अनन्तर उस पात्माकी रक्षा करना न क्योंकि वह अभयको प्राप्त हुपा होता है। जब तक भयके मध्यमें स्थित मात्माको अनित्य मानता है तबतक प्रात्माकी रक्षा करना चाहता है । ज नित्य-अद्वैत जान लेता है, तब कौन किसको कहाँसे रक्षा करने की इच निश्चय यही वह आत्मतत्त्व है, ऐसा पूर्ववत् समझना चाहिए ॥ ५ ॥ जो प्रत्यगात्मा यहाँ ईश्वरभावसे निर्दिष्ट है वह सबका आत्मा है, र मन्त्रसे दिखलायी जाती है. सत्यानन्दीदीपिका कर्मफल- भोक्तृत्व और प्राणादिकलाप धारयितृत्व से उपलक्षित 'त्वा मात्माको कालत्रय वस्तु परिच्छेद्यके ईशितृत्वसे उपलक्षित 'तत्' पद लक्ष्यरू है अर्थात् जब दोनोंका मभेदरूपसे जो साक्षात्कार कर लेता है तब वह अ' मरणादि भयसे रक्षा करना नहीं चाहता। इस बातको प्रकारान्तरसे 'किञ्च' 'मधु-कर्मफलमत्तीति मध्वद; तं मध्वदम्' इस व्युत्पत्ति से 'मध्वदम्' कर्मफल प्राणादिकरण कलापके अध्यक्षको तीनों कालोंके शासिताके रूपसे 'मैं ही प्रकार प्रभेदरूपसे जानता है, तब वह प्रज्ञान जनित भयादि द्वन्द्वसे मुर है, 'अभयं वै प्राप्तोऽसि जनक' (बृह० ४।२४) इत्यादि श्रुति है । इसी बात इस भाष्यसे अन्वय-व्यतिरेकद्वारा स्पष्ट करते हैं। नचिकेताने देवादिसे । उ । पूप । प्रयम ) तपसा जातम् ( उत्पन्नम् ) अद्भया ( पञ्चभूतेभ्यः ) ग्रेि) अजायत, गुहां ( सर्वप्राणिहृदयं ) प्रविश्य तिष्ठन्त भूतेभिः ( कार्यकरण- ह तिष्ठन्तं सन्तं ) यः व्यपश्यत ( पश्यति ) एतत् वै तत् ॥ ६॥ मुमुक्षु पहले तपसे उत्पन्न हुए [ हिरण्यगर्भ ] को जो कि जलादि भूतोंसे पहले ॥ है, भूतों सहित बुद्धिरूप गुहा में स्थित हुप्रा देखता है, निश्चय यही वह कश्चिन्मुमुक्षुः पूर्व प्रथमं तपसो ज्ञानादिलक्षणाद्ब्रह्मण इत्येतज्जात- हरण्यगर्भम् ; किमपेक्ष्य पूर्वमित्याह-अद्भ्यः पूर्वमप्सहितेभ्यः पञ्चभूते- केवलाभ्योऽद्य इत्यभिप्रायः, अजायत उत्पन्नो यस्तं प्रथम देवादि- इत्पाद्य सर्वप्राणिगुहां हृदयाकाशं प्रविश्य तिष्ठन्तं शब्दादीनुपलभमानं तैः कार्यकरणलक्षणैः सह तिष्ठन्तं यो व्यपश्यत यः पश्यतीत्येतत् । य ति स एतदेव पश्यति यत्तत्प्रकृतं ब्रह्म ॥६॥ । प्राणेन संभवत्यदितिर्देवतामयी। हां प्रविश्य तिष्ठन्ती मा भूतेभिर्व्यजायत । एतद्वै तत् ॥ ७ ॥ वतामयी ( सर्वदेवतात्मिका ) अदितिः प्राणेन (हिरण्यगर्भरूपेण ) सम्भवति कोई मुमुक्षु पूर्व-प्रथम तपसे-ज्ञानादिलक्षण ब्रह्मसे उत्पन्न हुए हिरण्यगर्भको पेक्षा पूर्व उत्पन्न हुए हिरण्यगर्भको ? ऐसा प्रश्न होनेपर कहते हैं--जलसे पूर्व [ सहित पाँचों भूतोंसे पहले उत्पन्न हुपा है न कि केवल जलसे पूर्व, ऐसा है। उस प्रथम उत्पन्न हिरण्यगर्भको देवादि शरीरोंको उत्पन्नकर सब | गुहा-हृदयाकाशमें प्रविष्ट हो देहेन्द्रियरूप भूतों सहित शब्दादि विषयोंको नुभव करते स्थित हुएको जो देखता है। वास्तवमें जो इस प्रकार देखता है देखता है जो कि यह प्रकृत ब्रह्म है ॥ ६॥ - सत्यानन्दीदीपिका पश्यति स एतदेव पश्यति यत्तत्प्रकृतं ब्रह्म, 'तपसे प्रथम उत्पन्न हिरण्यगर्भको है वह प्रकृत ब्रह्मको देखता है' ऐसा सम्बन्ध है। शङ्का यहाँ हिरण्यगर्भका दिसे भिन्न प्रकृत ब्रह्मका दर्शन कैसे हो सकता है ? समाधान-जैसे सुवर्णसे rafi, ram-------- अभिव्यज्यते ) या च भूतेभिः ( भूतैः सहिता ) व्यजायत ( उत्पन्ना ) गुहां प्री तष्ठन्ती [ तां यः पश्यति ] एतत् वै तत् ॥ ७ ॥ जो देवतामयी अदिति प्राणरूप-हिरण्यगर्भरूपसे प्रकट होती है तथा जो बुरि हामें प्रविष्ट होकर रहनेवाली और भूतोंके साथ ही उत्पन्न हुई है [ उसे देखो ] नि ही वह तत्त्व है ॥ ७॥ या सर्वदेवतामयी सर्वदेवतात्मिका प्राणेन हिरण्यगर्भरूपेण परस्माद्ब्रह्म भवति शब्दादीनामदनाददितिस्तां पूर्ववद्गुहां प्रविश्य तिष्ठन्तीमदिति मेव विशिनष्टि-- या भूतेभिः भूतैः समन्विता व्यजायत उत्पन्ना इत्येतत् । अररिणस्थ अग्निमें ब्रह्मदृष्टि किंच- अरण्योनिहितो जातवेदा गर्भ इव सुभृतो गर्भिणीभिः । दिवे दिव ईड्यो जागृवद्भिर्हविष्मद्भिर्मनुष्येभिरग्निः ।एतद्वै त जो सर्व देवतामयी-सर्वदेवस्वरूपा अदिति प्राण-हिरण्यगर्भ रूपसे परब्रह्मसे उ ती है । शब्दादि विषयोंका अदन-भक्षण करनेसे वह अदिति है। बुद्धिरूप र्ववत् प्रविष्ट होकर स्थित हुई उस अदितिको [ देखो ] उस अदितिको ही विरे रते हैं---जो भूतों सहित अर्थात् भूतोंसे समन्वित हो उत्पन्न हुई है, वही तेरा त्त्वि है ॥ ७॥ सत्यानन्दीदीपिका इस मन्त्रमें हिरण्यगर्भका ही विशेषणान्तरसे निरूपण किया गया है । 'यो बह वदधाति पूर्वम्' ( श्वेता० ६।१८ ) 'स प्राणमसृजत (प्र० ६।४ ) ( जिस परमा हले हिरण्यगर्भ को उत्पन्न किया ) इत्यादि श्रुति परमात्मासे ही हिरण्यगर्भकी उ हती है । यह हिरण्यगर्भ सूक्ष्म भूतों सहित परमेश्वरसे उत्पन्न होता है । यही स थूल प्रपञ्चका कारण है और स्थूल जगत इसका कार्य है इसी बातको ‘स प्र जत प्राणाच्छ्रद्धां खं वायुर्योतिरापः पृथिवीन्द्रियं मना०' ( उस परमात्माने पारण-हिरण्यगर्भ को उत्पन्न किया, उस प्राणसे श्रद्धा, आकाश, वायु, अग्नि, जल, नादि उत्पन्न हुए ) यह श्रुति भी कहती है। प्रलयकालमें समस्त कार्यजगतका भक्षण-अपने में लय करने के कारण हिरण्यगर्भ अदिति कहलाता है और देवतादि प्रपञ्चको उत्पन्न करनेसे भी अदिति कहलाता है। स्थूल और सूक्ष्म सारे ज व्यापार हिरण्यगर्भ से होता है, अतः इसे प्राणशब्दसे कहा गया हैं । अन्तःकरर Ma HTETEETTE होने का HिOTीतिमा शानिरी .
णिभिः (गर्भवतीभिः ) सुभृतः ( परितोषितः ) गर्भ इव अरण्यो। ( उत्तरा- ) निहितः स्थितः (यः) जातवेदा: अग्निः ( जातं सर्व वेत्ति इति जातवेदाः) जागृवद्भिः ( जागरणशील योगिभिः ) हविष्मद्भिः (हवनसामग्रीसम्पनैः) (प्रतिदिनम् ) ईड्या ( स्तुत्यः ) एतत् वै तत् ॥ ८ ॥ णी स्त्रियों द्वारा भलीभाँति पोषित हुए गर्भ के समान जो जातवेदा-अग्नि अधर दोनों अरणियोंके मध्यमें स्थित है तथा जो प्रमादरहित एवं होम क योगी पुरुषों द्वारा नित्यप्रति स्तुतिके योग्य है यही वह ब्रह्म है ।। ८ ।। धेयज्ञ उत्तराधरारण्योर्निहितः स्थितो जातवेदा अग्निः पुनः सर्वहविषां त्मं च योगिभिर्गर्भ इव गर्भिणीभिरन्तर्वत्नीभिरगर्हितान्नपानभोजना- । गर्भः सुभृतः सुष्ठु सम्यग्भृतो लोक इवेत्थमेवविंग्भिर्योगिभिश्च येतत् । किंच दिवे दिवेऽहन्यहनीड्यः स्तुत्यो वन्धश्च कर्मिभिर्योगिभि- दये च जागृवद्भिर्जागरणशीलवद्भिरप्रमत्तैरित्येतत्, हविष्मद्भिराज्या- निभावनावद्भिश्च मनुष्येभिर्मनुष्यैरग्निरेतद्वै तत्तदेव प्रकृतं ब्रह्म ।।८।। प्राणमें ब्रह्मष्टि - चोदेति सूर्योऽस्तं यत्र च गच्छति । देवा सर्वे अर्पितास्तदु नात्येति कश्चन ॥ एतद्वै तत् ॥६॥ तिवेदा-अग्नि अधियज्ञरूपसे उत्तर और अधर अररिणयोंमें निहित अर्थात् और समस्त हव्य पदार्थोंका भोक्ता है, अध्यात्मरूपमें जैसे लोकमें गभिरणी शुद्ध अन्न पान भोजनादि द्वारा अपने गर्भका बहुत अच्छी तरह पोषण- । हैं, वैसे ही याज्ञिकों तथा योगीजनों द्वारा भलीभांति धारण किया जाता न आदि होम सामग्री युक्त कर्मपरायण एवं जागरणशील प्रमादशून्य याज्ञिक ध्यानभावनायुक्त योगियों द्वारा क्रमशः यज्ञ और हृदय देशमें वह अग्नि 'द्य एवं स्तुल्य है । ऐसा जो (विराटप ) अग्नि है, वहीं निश्चय यह प्रकृत - सत्यानन्दीदीपिका तो अरणियोंका सम्बन्ध दिखाकर ज्ञानयोग और कर्मयोगका रहस्य बताया गया Errm दस रात्रmara.....
atta सूर्य: यतः ( यस्मात् ) उदेति, यत्र च ( यस्मिन् च ) अस्तं गच्छति । तं अर्पिता: ( तम् आश्रित्य स्थिताः) तत् (तं सर्वदेवाश्रयं ) कञ्चन ( को प्रत्येति (अतिक्रामति ) एतत् वै तत् ॥ ६॥ जहाँसे सूर्य उदित होता है और जहाँ वह अस्त होता है, उस प्राणात्मा मादि और वागादि ) सभी देवता अर्पित हैं, उसका कोई भी उल्लङ्घन नहीं क यह वही प्रकृत ब्रह्म है ॥ ६ ॥ यतश्च यस्मात्प्राणादुदेति उत्तिष्ठति सूर्योऽस्तं निम्लोचनं यत्र यसि प्राणेऽहन्यहनि गच्छति तं प्राणमात्मानं देवा अग्नथादयोऽधिदैवं वार ध्यात्म सर्वे विश्वेरा इव रथनाभावर्पिताः संप्रवेशिताः स्थितिका ब्रह्मव । तदेतत् सर्वात्मकं ब्रह्म । तदु नात्येति नातीत्य तदात्मकता गच्छति कश्चन कश्चिदपि । एतद्वै तत् ॥६॥ यद्ब्रह्मादिस्थावरान्तेषु वर्तमानं तत्तदुपाधित्वादब्रह्मवदवभासमान न्यत्परस्माद् ब्रह्मण इति मा भूत्कस्यचिदाशङ्केतीदमाह- जिससे-जिस प्राणसे - हिरण्यगर्भसे सूर्य उदित-उदय ( सन्मुख । होता है और जिसी प्राण में प्रतिदिन प्रस्तभाव ( दृष्टि से ओझल ) को प्राप्त उस प्रारणात्मामें स्थितिकालमें अग्नि प्रादि अधिदैव और वाणी प्रादि प्रह देवगण इस प्रकार अपित हैं अर्थात् संप्रविष्ट हैं जिस प्रकार रथकी नाभिमें से यह प्राण भी ब्रह्म है । वही यह सर्वात्मक ब्रह्म है। उसका अतिक्रमण कोई करता अर्थात् उस ब्रह्मके तदात्मभावको पार-त्यागकर कोई भी उससे अन्य नहीं होता, यही वह ब्रह्म है ॥ ६ ॥ जो ब्रह्मासे लेकर स्थावर पर्यन्त सभी भूतोंमें वर्तमान है और भिन्न घियोंके कारण अब्रह्मवत् अवभासित हुमा है। वह संसारी जीव परब्रह्मसे ऐसी किसीको शङ्का न हो इसलिए यमराज इस प्रकार कहते हैं- सत्यानन्दीदीपिका 'यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते, तद्विजिज्ञासस्व तद्ब्रह्मोति' ( तैति इस श्रुतिके अनुसार 'यत:' उस तटस्थकारण ईश्वरसे सूर्योपलक्षित सारा ज होता है। उसमें ही स्थिति और लयभावको प्राप्त होता है। इस प्रकार का अभेद प्रतिपादित है। 'सता सोम्य तदा सम्पन्नो भवति' (छा० ६७१) कालमें यह जीव सद्ब्रह्मके साथ सम्पन्न-एकताको प्राप्त होता है ) इत्या - भेदष्टिको निन्दा यदेवेह तदमुत्र यदमुत्र तदन्विह। मृत्योः स मृत्युमाप्नोति य इह नानेव पश्यति ॥ १० ॥ (अस्मिन् लोके, संघाते जीवे वा) यत् (आत्मवस्तु).प्रमुत्र (परलोके, परमात्मा (तदेव) (तथा) अमुत्र ( परलोके ) यत् (आत्मवस्तु) इह ( अस्मिन् लोकेऽपि अनुगतं न ततो भिन्नं ) यः (जन: ) इह (आत्मचैतन्ययोः ) नाना इस भेदात् भिन्नमिव ) पश्यति सः ( भेददर्शी) मृत्योः मृत्यु ( मरणात् मरण मरणं) प्राप्नोति )।। १० ।। तत्त्व इस ('देहेन्द्रियसंघात ) में भासता है वह अन्यत्र (देहादिसे परे) भी है वस्तु अन्यत्र है वही इसी में है, जो मनुष्य इस तत्त्वमें नाना-सा देखता है वह युको प्राप्त होता है ॥ १० ॥ वेह कार्यकरणोपाधिसमन्वितं संसारधर्मवदवभासमानमविवेकिनांतदेव ममुत्र नित्यविज्ञानघनस्वभावं सर्वसंसारधर्मवर्जितं ब्रह्म । यच्चामुत्रा- त्मनि स्थितं तदेवेह नामरूपकार्यकरणोपाधिमनुविभाव्यमानं नान्यत् । युपाधिस्वभावभेददृष्टिलक्षणयाविद्यया मोहितः सन् य इह ब्रह्मण्यना- रस्मादन्योऽहं मत्तोऽन्यत्परं ब्रह्म ति नानेव भिन्नमिव पश्यत्युपलभते इस लोकमें कार्य करण ( देहेन्द्रिय ) रूप उपाधिसे युक्त हो भविवेकियोंको युक्त भास रहा है स्व-स्वरूपमें स्थित वही ब्रह्म अन्यत्र-इस देहादि संघातसे विज्ञानघन स्वरूप और सम्पूर्ण संसार धर्मोंसे रहित है। तथा जो अमुत्र-उस 'रमात्मभावमें स्थित है वही इस लोकमें नाम, रूप एवं कार्य करणरूप उपाधिके समान आत्मतत्त्व है अन्य नहीं है । होनेपर भी जो पुरुष उपाधिके स्वभाव और भेददृष्टिरूप भविद्यासे मोहित भिन्नरूप-एकरूप ब्रह्ममें 'मैं परमात्मासे भिन्न हूँ और परमात्मा मुझसे भिन्न हैं' सत्यानन्दीदीपिका भावको और मोक्षार्थी केवल जीवब्रह्म क्यज्ञान द्वारा ब्रह्मभावको प्राप्त इस प्रकार कोई भी ब्रह्मभावका त्यागकर अन्यत्वको प्राप्त नहीं हो सकता, वं खल्विदं ब्रह्म' इत्यादि श्रुति ब्रह्ममें ही सर्वात्मभाव दिखलाती है ।। ६ ।। ह कहा गया है कि ब्रह्म सर्वात्मक है, वह ठीक नहीं है, क्योंकि भिन्न-भिन्न उपाधियुक्त चैतन्य जीव संसारी है और ब्रह्म प्रसंसारी है, अत: अल्पज्ञ - . । मृत्योर्मरणान्मरणं मृत्यु पुनः पुनर्जन्ममरणभावमाप्नोति प्रतिपद्यते । तर [था न पश्येत् । विज्ञानैकरसं नैरन्तर्येणाकाशवत्परिपूर्ण ब्रह्म वाहमस्म श्येदिति वाक्यार्थः ॥ १० ॥ प्रागेकत्वविज्ञानादाचार्यागमसंस्कृतेन- मनसैवेदमाप्तव्यं नेह नानास्ति किंचन । मृत्योः स मृत्युं गच्छति य इह नानेव पश्यति ॥११॥ मनसा एव इदम् प्राप्तव्यम् ( उपलभ्यम् ) इह ( ब्रह्मणि ) किञ्चन (किञ्चिदा ना (भेद:) नास्ति, य: इह नाना इव पश्यति, स मृत्योः मृत्यु गच्छति, एतत्वैतत् । मनसे ही यह तत्त्व प्राप्त करने योग्य है, इस ब्रह्मतत्त्वमें नाना कुछ भी नह ने पुरुष इसमें नानात्व-सा देखता है, वह मृत्युसे मृत्युको प्राप्त होता है, यही त्व है ॥११॥ स प्रकार नाना इव-भिन्न-सा उपलब्ध करता है वह मृत्युसे मृत्युको अर्थात् पुनः न्ममरणभावको प्राप्त होता है, अतः ऐसी उपलब्धि नहीं करनी चाहिए, किन्द बिधिरूपसे आकाशके समान परिपूर्ण और विज्ञानकरस ब्रह्म हूँ' ऐसा देखे-अनुभव ही वाक्यका अर्थ है ॥ १० ॥ एकत्व विज्ञान होनेसे पूर्व प्राचार्य और शास्त्र उपदेशसे संस्कृत हुए-- सत्यानन्दीदीपिका जैसे एक घटको एक स्थानसे अन्यत्र ले जानेसे सब स्थानोंमें वही सर्वगत महा टाकाशरूपसे प्राप्त होता है, वैसे ही सर्वगत एक अद्वितीय चिन्मय प्रात्मा अन्ताकर पाधिके गमनागमन होनेपर भी सर्वत्र समानरूपसे प्राप्त है । अन्तःकरणादि उपाधि ददृष्टि अनिवचनीय अविद्याके विना नहीं हो सकती, इससे जीव और ईश्वरका भे विद्यक-प्रोपाधिक होने से कल्पित है, स्वरूपसे दोनोंमें भेद नहीं है। जैसे स निनात्मस्वभाव प्रत्यगात्मामें नानात्वका अध्यारोपकर 'स्वप्नदृष्ट पदार्थ सत्य हैं' इस ! त्यत्वाभिनिवेशसे व्यवहार करता है, वैसे जानत्में भी नानात्वका अध्यारे जानव जगत् सत्य है' इस प्रकार सत्यत्व अभिनिवेशसे व्यवहार करता है। उसके 'योऽन्यथा सन्तमात्मनमन्यथा प्रतिपद्यते । कि तेन न कृतं पापं चौरेणात्मापहारिए नित्य अखण्ड एक रस आत्माको जो मन्दमति अनित्य परिच्छिन्न जन्मरणादि मानता है, उस आत्माके यथार्थस्वरूपका अपहरण करनेवाले उस चौरने की a - नसेदं ब्रह्म करसमाप्तव्यमात्मैव नान्यदस्तीति । आप्ते च नानात्व थापिकाया अविद्याया निवृत्तत्वादिह ब्रह्मणि नाना नास्ति किञ्चनाणु पे। यस्तु पुनरविद्यातिमिरदृष्टिं न मुञ्चति नानेव पश्यति स मृत्योमृत वेव स्वल्पमपि भेदमध्यारोपयन्नित्यर्थः ॥ ११ ॥ हृदयपुण्डरीकस्थ ब्रह्म नरपि तदेव प्रकृतं ब्रह्माह- कृत मनके द्वारा ही यह एक रस ब्रह्म 'एक मात्र प्रात्मा है उससे भिन्न औ है। इस प्रकार प्राप्त करने योग्य है। इस प्रकार उसकी प्राप्ति हो जाने पर भेदष्टिका स्थापित करनेवाली अविद्याके निवृत्त हो जानेसे इस ब्रह्मतत्व प्रणुमात्र भी नानात्व नहीं रहता। किन्तु जो पुरुष अविद्यारूप तिमिरदृष्टिक ही करता प्रत्युत नानात्व-सा देखता है। इस प्रकार एक अद्वितीय ब्रह्ममें अल्पत्व वेद पारोपित करता है वह मृत्युसे मृत्युको प्राप्त होता ही है ॥ ११ ॥ र भी उस प्रकृत ब्रह्मका ही वर्णन करते हैं- सत्यानन्दीदीपिका रस ब्रह्ममें ज्ञातृज्ञेयभाव कैसे हो सकता है ? तो उसके उत्तर में भगवान रने 'प्रागेकत्वविज्ञानात' ऐसा कहा है, अर्थात् आत्मैकत्व ज्ञानसे पूर्व प्रज्ञ पत भेदको लेकर कहा गया है, अत: कोई दोष नहीं है । अनात्मभावापा 'स्कृत और प्रात्मभावापन्न संस्कृत कहा जाता है । 'नेह नानाऽस्तिकिञ्चन' मात्म्यापन्न ब्रह्ममें नाना-भेद नहीं है ) इस प्रकार भारोप और अपवादके अधि- ब्रह्मका अनुभव करना चाहिए । नास्त्येव नोत्पन्नं नो स्थितं जगत् । चित्त'प्रपञ्चमित्याहुर्नास्ति नास्त्येव सर्वदा ।। प्रपञ्च है ही नहीं, न उत्पन्न हुआ है और न जगत् विद्यमान है, यह चित्त ही अतः विद्वान् सर्वदा ऐसा कहते हैं कि प्रपञ्च है ही नहीं । ञ्चो यदि विद्यत निवर्तेत न संशयः । मायामात्रमिदं द्वैतमद्वैतं परमार्थतः।। ( मा० का० १७) [ञ्च यदि होता तो निवृत्त हो जाता इसमें संदेह नहीं; किन्तु वास्तव में यह द्वैत मात्र-मिथ्या है, परमार्थतः तो अद्वैत ही है ) अतः निष्प्रतियोगिक ब्रह्ममात्रमें भीतप्रपञ्च सत्यरूपसे वा मिथ्यारूपसे 'अस्ति-नास्ति' ऐसा भ्रम नहीं है। 'अद्वितीय ब्रह्ममें नाना-सा देखने वाला जन्म-मरणरूप भयको प्राप्त होता है ।
अंगुष्ठमात्रः पुरुषो मध्य आत्मनि तिष्ठति । ईशानो भतभव्यस्य न ततो विजुगुप्सते ॥ एतद्वै तत् । अङ्गुष्ठमात्रः ( अङ्गुष्ठपरिमाणः ) पुरुषः (मात्मा ) मध्ये प्रात्मनि ( श तिष्ठति' (स:) भूतभव्यस्य (अतीतस्य अनागतस्य च ) ईशानः ( शास' ( तत्स्वरूपपरिज्ञानात् परं) न जुगुप्सते (आत्मानं न कुतश्चित् गोपायित एतद्व तत् ॥ १२॥ जो अगुष्ठपरिमाण पुरुष शरीरके मध्यमें स्थित है, उसे भूत, भविष्र वर्तमान का शासक जानकर वह उस आत्मस्वरूपके ज्ञान होनेके कारण अप किसीसे भी रक्षा करना नहीं चाहता, निश्चय यही वह ( ब्रह्मतत्त्व ) है ॥१ अङ्गुष्ठमात्रोऽङ्गुष्ठपरिमाणः । अङ्गुष्ठपरिमाणं हृदयपुण्डरीक ता न्तःकरणोपाधिरङ्गुष्ठमात्रोऽङ्गुष्ठमात्रवंशपर्वमध्यवर्त्यम्बरवत्, पुरुषः सर्वमिति मध्य आत्मनि शरीरे तिष्ठति यस्तमात्मानमीशानं भृ विदित्वा न तत् इत्यादि पूर्ववत् ।। १२ ।। किंच अंगुष्ठमात्रः पुरुषो ज्योतिरिवाधूमकः । ईशानो भूतभव्यस्य स एवाद्य स उ श्वः ॥ एतद्वै तत् । अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषः ( प्रात्मा ) अधूमकः (धूमरहित ) ज्योतिः (ते भूतभव्यस्य ईशानः स एव ( पुरुषः ) अद्य ( वर्तते ) श्व:उ (श्वोऽपि ) सः ( वतिष्यते एतद्वं तत् ।। १३ ॥ अङ्गुष्ठमात्र-अङ्गुष्ठपरिमाण, हृदयकमल अङ्गुष्ठके समान परिमाणवार हृदयकमलके छिद्रमें अवस्थित अन्तःकरणोपाधिक अङ्गुष्ठमात्र-अङ्गुष्ठके स माणवाले बाँस पर्व के मध्यवर्ती आकाशके समान अङ्गुष्ठमात्र परिमाणव शरीरके मध्य में स्थित है, उससे सारा शरीर पूर्ण है, इसलिए वह पुरुष है भविष्यत् कालके शासक प्रात्माको जानकर [ तत्ववित् अपनेको सुरक्षित इच्छा नहीं करता ] इत्यादि शेष पदकी पूर्ववत् व्याख्या करनी चाहिए ॥१ सत्यानन्दीदीपिका शरीरान्तर्वर्ती हृदयकमलमें प्रत्यग्भावसे स्थित और लोक प्रसिद्ध जीवका 'तत्वमसि' यह श्रुतिवाक्य उसमें ब्रह्मभावका विधान करता है, यद्यपि जीव RET RITE मोर अगुष्ठमात्र पुरुष धूमरहित ज्योतिके समान है, यह भूत, भविष्यत्का शास आज ( वर्तमानकालमें) है और वह कल-भविष्यत्में भी रहेगा और निश्चर ब्रह्मवत्व है ॥ १३ ॥ कुष्ठमात्रः पुरुषो ज्योतिरिवाधूमकोऽधूमकमिति युक्तं ज्योतिष्परत्वात् लक्षितो योगिभिर्हृदय ईशानो भूतभव्यस्य स नित्यः कूटस्थोऽद्येदान वर्तमानः स उ श्वोऽपि वर्तिष्यते नान्यस्तत्समोऽन्यश्च जनिष्यत इत्यर्थः यमस्तीति चैक इत्ययं पक्षो न्यायतोऽप्राप्तोऽपि स्ववचनेन श्रुत्या प्रत्यु क्षणभङ्गवादश्च ॥ १३ ॥ भेदापवाद रपि भेददर्शनापवादं ब्रह्मण आह- यथोदकं दुर्गे वृष्टं पर्वतेषु विधावति । एवं धर्मान्पृथक्पश्यंस्तानेवानुविधावति ॥ १४ ॥ MA - अङ्गुष्ठमात्र पुरुष धूमरहित ज्योतिके समान है । मूलमन्त्रमें जो 'अधूमकः' पद नपुंसकलिङ्ग ) ज्योतिः परक अर्थात् ज्योतिः शब्दका विशेषण होनेके कारण 'ऐसा पढ़ना चाहिए। जो योगियोंको हृदय में लक्षित होता है, वह भूत एवं शासिता नित्य कूटस्थ आज-इस समय प्राणियोंमें वर्तमान है और वही कल अर्थात् उसके समान कोई अन्य पुरुष नहीं होगा, इससे कोई कहते हैं कि है' [ १।१।२० ] मन्त्र में उक्त यह पक्ष न्यायसे अप्राप्त है, तो भी उसका मत-क्षणभङ्गवादका खण्डन श्रुतिने स्ववचनसे कर दिया है ॥१३॥ । जो भेददृष्टि की जाती है उसका अपवाद-निषेध श्रुति फिर भी कहती है-- सत्यानन्दीदीपिका मस्तीति चैके' इस द्वितीय पक्षके उत्तररूपसे उत्तरवाक्यका 'किञ्च' से करते हैं । मन्त्रमें 'ज्योतिः' शब्द नपुसकलिङ्ग है, अतः उसका विशेषण रण पुल्लिङ्ग 'अधूमका' पद भी 'अधूमकम्' इस प्रकार नपुसकलिङ्गसे होना युक्त है । मन्त्रमें 'उ' पदका अर्थ 'अपि' है । भूत, भविष्यत्का शासिता ह मैं हूँ' ऐसा अपने हृदयमें मुमुक्षुजन अनुभव करते हैं। वह इदानी ब्रह्मासे वपर्यन्त सभी प्राणियों में वर्तमान है वही कल भी रहेगा। 'नायमस्तीति । यह शून्यवाद और क्षणभङ्गवादपक्ष 'कृतनाशाकृताभ्यागम' दोषरूप लौकिक HTS an irr re- दुग ( दुगस्थान ) वृष्टं उदकं यथा पर्वतेषु ( निम्नप्रदेशेषु ) विधाओं या धावति ) एवं धर्मान् (प्रात्मनो भिन्नान् ) पृथक् पश्यन् ( जानन् (तदर्शनान्तरमेव ) विधावति ( प्राप्नोति ) जिस प्रकार ऊंचे स्थानमें बरसा जल पर्वतोंमें (पर्वतीय निम्नदेशोंमें) बह जाता है, उसी प्रकार प्रात्मासे भिन्न धर्मोको प्रत्येक शरीर में भिन्न-भिन्न उन्हींको ही प्राप्त होता है ।। १४ ।। यथोदकं दुर्गे दुर्गमे देश उच्छ्रिते वृष्टं सिक्तं पर्वतेषु पर्वतव प्रदेशेषु विधावति विकर्ण सद्विनश्यति एवं धर्मानात्मनो भिन्नान्पृक' प्रतिशरीरं पश्यंस्तानेव शरीरभेदानुवर्तिनोऽनुविधावति । शरीरभेदमे पुनः प्रतिपद्यत इत्यर्थः ।। १४ ।। यस्य पुनर्विद्यावतो विध्वस्तोपाधिकृतभेददर्शनस्य विशुद्धविः समद्वयमात्मानं पश्यतो विजानतो मुनेर्मननशीलस्यात्मस्वरूपं कथ त्युच्यते- अभेददर्शनकी विशेषता यथोदकं शुद्ध शुद्धमासिक्तं ताहगेव भवति । एवं मुनेविजानत आत्मा भवति गौतम ॥ १५ जिस प्रकार दुर्ग-दुर्गम स्थान अर्थात् ऊंचाईपर बरसा जल पर्वतों-प प्रदेशों में विधावति-फैलकर नष्ट हो जाता है, उसी प्रकार धर्मो-प्रात्माओंक शरीरमें भिन्न-भिन्न देखता हुआ पुरुष उन्हीं-शरीरभेदोंका अनुसरण व जाता है अर्थात् पुनः पुनः शरीर भेदको प्राप्त होता है ऐसा अर्थ है ॥ १४ । उपाधिकृत भेददृष्टिको नष्ट करनेवाले, विशुद्ध विज्ञानधनकरस अद्वित देखनेवाले विद्वान् विज्ञानी मननशील उस मुनिका आत्मस्वरूप कैसा होर कहा जाता है- सत्यानन्दीदीपिका स्वरूप भूत प्रात्माके अज्ञानके कारण यह प्रज्ञ जीव अद्वितीय चिन्मय । नात्व-शरीरभेदसे प्रात्मभेदको देखता है, इससे वह भिन्न-भिन्न शरीर-जन्मम होता है, यही इसका विनाश है । ऐसा 'इह चेदवेदीदथ सत्यमस्ति न चेदिह विनष्टिः ( केन० २।५ ) ( इस मनुष्यजन्ममें यथोक्त साधन सम्पन्न ब्रह्मविद्या क्षुने स्वातिरिक्त विदिताविदित कल्पनातीत निष्प्रतियोगिक स्वसत्तामात्र ब्रह्म' रूपसे यदि अनुभव किया तो सत्य-स्वतः प्रकाशरूप ब्रह्मको प्राप्त होता है, यह Troy . हातम ! यथा शुद्ध उदकं शुद्ध ( खच्छे उदके ) मासिक्तं (निक्षिप्त सद) वाह शुद्धमेव ) भवति, विजानतः ( एकत्वं पश्यतः) मुनेः ( मननशीलस्य ) प्रात इतीयब्रह्मस्वरूपम् ) एव भवति ॥ १५ ॥ जिस प्रकार शुद्ध जलमें डाला हुआ शुद्ध जल वैसा ही हो जाता है, उसीप्रका म ! प्रात्मस्वरूपको जाननेवाले मुनिका आत्मा भी हो जाता है ।। १५ ॥ पथोदकं शुद्धे प्रसन्ने शुद्धं प्रसन्नमासिक्तं प्रक्षिप्तमेकरसमेव नान्यथा ता स्वत्यात्माप्येवमेव भवत्येकत्वं विजानतो मुनेर्मननशीलस्य हे गौतम कुतार्किकभेददृष्टिं नास्तिककुदृष्टिं चोज्झित्वा मातृपितृसहस्रेभ्योऽपि हित वेदेनोपदिष्टमात्मैकत्वदर्शनं शान्तदपॅरादरणीयमित्यर्थः ॥ १५ ॥ भगवतःकृती कठोपनिषद्भाष्ये द्वितीयाध्याय प्रथमवल्लीभाष्यं समाप्तम् ।। २-१ ॥ नस प्रकार शुद्ध-स्वच्छ जल में आसिक्त-प्रक्षिप्त शुद्ध-स्वच्छजल उसके साथ मिलक 'हो जाता है अर्थात वैसा ही हो जाता है-तद्रूप ही हो जाता है उससे विपरीत में नहीं रहता, उसी प्रकार हे गौतम ! एकत्वको जाननेवाले मुनी-मननशील मात्मा भी वैसा ही हो जाता है। इसलिए कुतार्किककी भेददृष्टि और नास्तिक ष्टिका परित्यागकर सहस्रों माता-पितामोंसे भी अधिक हितैषी वेदके द्वारा उपदेश स्मैकत्व दर्शनका ही अभिमान रहित हो आदर करना चाहिए ऐसा अर्थ है ।१५। कठोपनिषद्के द्वितीयाध्यायकी प्रथमवल्लीका 'स्वामी सत्यानन्द सरस्वती' कृत भाषानुवाद समाप्त ।। ३-१ ।। सत्यानन्दीदीपिका । चतुर्थवल्लीके १०, ११, १४ मन्त्रोंमें बद्धजीवकी दशाका दिग्दर्शन कराया गया इस मन्त्रमें मुक्तात्माके विषयमें कहा जाता है ... जैसे प्राकाशसे पतित वृष्टि जल में पड़ तद्रूप हो जाता है उससे पृथक् दिखाई नहीं देता, क्योंकि वह पृथिवीकी आदि उपाधिसे रहित है, वैसे ही 'ब्रह्मविद्ब्रह्मैव भवति' विमुक्तश्च विमुच्यते' आत्मैकत्वज्ञान द्वारा अविद्या आदि उपाधिसे रहित हो मुक्त हो जाता है। नि हित्वा स्वयं केवलरूपतः । य प्रास्ते कपिशार्दूल ब्रह्म स ब्रह्मवित्स्वयम् ।। नि और प्रदर्शनका त्यागकर जो स्वयं केवलरूपसे स्थित है, हे कपिशार्दूल ! वित् स्वयं ब्रह्म है ) 'केवलब्रह्ममात्र त्वान्नास्त्यनात्मेति निश्चिनु' ( केवल है, अतः अनात्मा है ही नहीं, ऐसा निश्चयकर ) 'वेदार्थः परमद्वैतं नेतरत्सुर- सुरपुङ्गव ! वेदका अर्थ परम अत है उससे भिन्न नहीं अर्थात् वेदका तात्पर्य ब्रह्ममें है अन्य में नहीं) 'एकमेवाद्वितीयम्, सर्वं खल्विदं ब्रह्म, नेह नानाऽस्ति किञ्चन' ति ब्रह्मातिरिक्तका निषेध करती हैं' अत: ब्रह्मवित् ब्रह्मस्वरूप ही है ||१५|| द्वितीयाध्यायस्य द्वितीयावाली प्रकारान्तरसे ब्रह्मानुसंधान पुनरपि प्रकारान्तरेण ब्रह्मतत्त्वनिर्धारणार्थोऽयमारम्भो दुर्विज्ञेयत्वाद्ब्रह्म पुरमेकादशद्वारमजस्यावक्रचेतसः । अनुष्ठाय न शोचति विमुक्तश्च विमुच्यते ॥ एतद्वै तत् ।। १ । एकादशद्वारं पुरं ( देहम् ) अवक्रचेतसः (अवकं अकुटलं चेतो विज्ञानमस्येति । काशरूपस्य ) अजस्य [ तम् ] अनुष्ठाय (ध्यात्वा ) न शोचति, विमुक्तः ( बन्धर सन् ) विमुच्यते (कैवल्य प्राप्तो भवति ) एतद्व तत् ॥ १ ॥ उस नित्य विज्ञानस्वरूप अजन्मा-प्रात्माका एकादश द्वारवाला पुर-नगरी है, मात्माका सम्यग्ज्ञान पूर्वक ध्यानकर पुरुष शोक नहीं करता और वह मुक्त हुआ ही हो जाता है । निश्चय यही वह (ब्रह्म) है ॥ १॥ पुरं पुरमिव पुरम् । द्वारपालाधिष्ठात्राद्यनेकपुरोपकरणसम्पत्तिदश छरीरं पुरम् । पुरं च सोपकरणं स्वात्मनासंहतस्वतन्त्रस्वाम्यर्थं दृष्टम् । पुरसामान्यादनेकोपकरणसंहतं शरीरं स्वात्मनासंहतराजस्थानीयस्वाम्यर्थं : । मर्हति । तच्चेदं शरीराख्यं पुरमेकादशद्वारमेकादश द्वाराण्यस्य सप्त यानि नाभ्या सहा श्चि त्रीणि शिरस्येकं तैरेकादशद्वारं पुरम् । कस्या ब्रह्म अतिदुर्विज्ञ य है, प्रतः पुनरपि ब्रह्मतत्त्वका प्रकारान्तरसे निश्चय करनेके ह आगेका ग्रन्थ ( वल्ली ) प्रारम्भ किया जाता है- [ यह शरीररूप ] पुर-पुर नगरके समान होनेसे पुर कहलाता है। द्वार अधिष्ठाता आदि अनेकों पुर सम्बन्धी उपकरण-सामग्री दिखाई देने के कारण शरी है। और जिस प्रकार सम्पूर्ण साधन सामग्री सहित प्रत्येक पुर अपने असंहत-अस वतन्त्र स्वामीके उपभोगार्थ देखा जाता है, उसी प्रकार पुरसे सादृश्य होने के क पनेक साधन सामग्री सम्बद्ध यह शरीर भी अपने असंहत-असम्बद्ध राजस्थानीय स्वामीके लिए होना चाहिए। सत्यानन्दीदीपिका प्रात्मतत्व प्रतिबविजय है. अत उसे प्रकारान्तरसे कहा जाता है. इससे Home - क्रियारहितस्यात्मनो राजस्थानीयस्य पुरधर्मविलक्षणस्य । अवक्र- कमकुटिलमादित्यप्रकाशवन्नित्यमेवावस्थितमेकरूपं चेतो विज्ञानमस्ये- स्तस्यावक्रचेतसो राजस्थानीयस्य ब्रह्मणः। यस्येदं पुरं तं परमेश्वरं मनुष्टाय ध्यात्वा, ध्यानं हि तस्यानुष्ठानं सम्यग्विज्ञानपूर्वकम् , तं सर्व- मुक्तः सन्समं सर्वभूतस्थं ध्यात्वा न शोचति । तद्विज्ञानाभयप्राप्तेः भावात्कुतो भयेक्षा । इहैवाविद्याकृतकामकर्मबन्धनैर्विमुक्तो भवति । उन्विमुच्यते पुनः शरीरं न गृलातीत्यर्थः ॥ १॥ नैकशरीरपुरवQवात्मा किं तर्हि सर्वपुरवर्ती । कथम्- सः शुचिषद्वसुरन्तरिक्षसद्धोता वेदिषदतिथिर्दुरोणसत् । दूरसहतसद्वयोमसदब्जा गोजा ऋतजा अद्रिजा ऋतं बृहत् ।। मिक पुर एकादश द्वार-ग्यारह द्वारोंवाला है [ दो श्रोत्र, दो नेत्र, दो ना- एक मुख इस प्रकार ] सात मस्तक सम्बन्धी, नाभि सहित [ शिश्न और तीन निम्नदेशीय तथा [ब्रह्मरन्ध्ररूप] एक शिरस्थ इस प्रकार इन सब द्वारों के कारण यह पुर एकादश द्वारवाला है। यह पुर किसका है ? अजका- विलक्षण जन्मादि छ विकाररहित राजस्थानीय आत्माका । इसके अतिरिक्त ना-अवक्र-प्रकुटिल थादित्य प्रकाशके समान नित्यावस्थित एकरूप चित्त- प्रवक्रचित्त है, उस अवक्रचित्तवाले राजस्थानीय ब्रह्मका [ यह पुर है ] । र है उस पुर स्वामी परमेश्वरका ध्यानद्वारा, क्योंकि सम्यग्ज्ञान पूर्वक ध्यान ष्ठान है, अत: संपूर्ण एषणाओंसे मुक्त हो उस सम सर्वभूतस्थ ब्रह्मका ध्यान- शोक नहीं करता । ब्रह्मके विज्ञानसे अभय प्राप्ति हो जानेसे शोकका अवसर न भयदर्शन भी कहाँ हो सकता है ? अतः वह इस शरीरमें ही अविद्याकृत बिन्धनोंसे मुक्त हो जाता है। इस प्रकार वह मुक्त हुआ ही मुक्त होता शरीर ग्रहण नहीं करता ॥१॥ आत्मा तो केवल एक ही शरीररूप पुरमें नहीं है किन्तु सभी पुरोंमें प्रकार? सत्यानन्दीदीपिका पथ्यं वक्तव्यम्' ( फिर भी पथ्य कहना चाहिये ) इस न्यायसे प्रकारा- ज्ञातव्य है । 'तत्रोपाया एव भिद्यन्ते नोपेयस्य भेदोऽस्ति' (उपाय-साधन . FROTEITFIT ---- 1 . - स, शुचिषत्, वसुः, अन्तरिक्षसत्, होता, वेदिषत्, अतिथिः, दुरोणसत्, वरसत्, ऋतसत्, व्योमसत्, अब्जाः गोजाः, ऋतजाः, अद्रिजाः, ऋतं, बृहत् ॥ २ वह गमन करनेवाला-आकाशमें चलनेवाला सूर्य है, वसु है, अन्तरिक्षमें दि वाला सर्वव्यापक वायु है, होता-अग्नि है, पृथिवीमें स्थित होने से वहवेदिषित् है, सोम होकर कलशमें स्थित होने के कारण द्रोणसत् है अथवा अतिथिरूपसे घरों में होने से ब्राह्मण द्रोणसत् है, मनुष्यों में रहने से नृषत है, वरों-देवताओं में विद्यमान कारण बरसत्, सत्य वा यज्ञमें गमन करनेसे ऋतसत् है, आकाशमें स्थित व्योमसत् है, जल, पृथिवी, यज्ञ एवं पर्वतोंसे उत्पन्न होनेवाला तथा सत्य महान् है ॥ २॥ हंसो हन्ति गच्छतीति । शुचिषच्छुचौ दिव्यादित्यात्मना सीदत वसुर्वासयति सर्वानिति । वाय्वात्मनान्तरिक्षे सीदतीत्यन्तरिक्षसत् । होत "अग्नि होता" इति श्रुतेः । वेद्यां पृथिव्यां सीदतीति वेदिषद् । "इयं परोऽन्तः पृथिव्याः" (ऋ० सं० २।३।२०) इत्यादिमन्त्रवर्णात् । श्री सोमः सन्दुरोणे कलशे सीदतीति दुरोणसत् । ब्राह्मणः अतिथिरूपेर दुरोणेपु गृहेषु सीदतीति । नृपन्नृषु मनुष्येषु सीदतीति नृपत् । वरसद् देवेषु सीदतीति, ऋतसदृतं सत्यं यज्ञो वा तस्मिन्सीदतीति । व्योः वह गमन करता है, इसलिए 'हंस' है, शुचि-पाकाशमें सूर्य रूपसे चलत इसलिए 'शुचिषत्' है, सबको व्याप्त करता है, अत: 'वसु' है, वायुरूपसे अन्तरिक्ष- समें चलता है, इसलिए 'अन्तरिक्षसत्' है, 'अग्नि होता' इस श्रुतिसे होता- कहते हैं । वेदिमें-पृथिवी में गमन करता है, अत: 'वेदिषत्' है, क्योंकि इस विषय में वेदि पृथिवी ( यज्ञभूमि ) का उत्कृष्ट मध्य भूभाग है' इत्यादि मन्त्रवर्ण है, यह भी सोम होकर दुरोण-कलशमें स्थित होता है, इसलिए 'दुरोणसत्' है अथवा ब प्रतिथिरूपसे दुरोणोंमें-घरों में रहता है, अतः वह 'अतिथिः दुरोणसत्' है, वह मनु सत्यानन्दीदीपिका 'पुरम्' ( पुर) इस प्रकार विशेषण देनेसे ऐसा प्रतीत होता है कि एक शरीः होनेसे आत्मामें परिच्छिन्नत्व प्रसक्त होगा ? इस प्रकारकी शङ्काकर आकांक्षा । सत्' इत्यादि भाष्यसे उत्तरका अवतरण करते हैं । 'तु' शब्द शङ्काकी निवृत्तिके लिए ब्रह्माण्डके विशेष-विशेष भागोंमें सर्वव्यापक ब्रह्मसत्ताका वर्णन करनेसे गत्मज्ञानकी प्राप्तिमें सहायता मिलती है, इसलिए वह प्रकार इस मन्त्रमें वर्णित Mmmmmmain . - marrrr- न्याकाश सोदतीति व्योमसत् । अब्जा अप्सु शङ्खशुक्तिमकरादिरूपे त इति । गोजा गवि पृथिव्यां ब्रीहियवादिरूपेण जायत इति । ऋतर ङ्गरूपेण जायत इति । अद्रिजाः पर्वतेभ्यो नद्यादिरूपेण जायत इति त्मापि सन्नृतमवितथस्वभाव एव । बृहन्महान्सर्वकारणत्वात् । यद देत्य एव मन्त्रेणोच्यते तदाप्यस्यात्मस्वरूपत्वमादित्यस्येत्यङ्गीकृतत्वा णव्याख्यानेऽप्यविरोधः। सर्वव्याप्येक एवात्मा जगतो नात्मभेद इi र्थः ॥२॥ आत्मनः स्वरूपाधिगमे लिङ्गमुच्यते- है, अतः 'नृषत' है, वरों-देवोंमें रहता है, वह 'वरसत्' है, व्योम-प्राकाशमें रहर तः 'व्योमसत्' है । अप-जलमें शङ्ख, सीपी, मकर आदिरूपसे उत्पन्न होता है ए 'अब्जा' है, गो-पृथिवीमें ब्रीहि यव पादिरूपसे उत्पन्न होता है, अत: 'गोजा' है ज्ञाङ्गरूपसे उत्पन्न होता है, इसलिए ऋतजा है, नदी आदि रूपसे अद्रि-पर्वतों होता है, अत: अद्रिजा' है, इस प्रकार सर्वात्मा होकर भी वह ऋत-अस्तिथस्वभाव रूप ही है । तथा सबका कारण होने से बृहत्-महान् है । 'असो वा प्रादित्यो हंसः । ब्राह्मणमन्त्रके अनुसार यदि इस मन्त्र से प्रादित्यका ही वर्णन किया गय (पि प्रादित्य [ इस चराचरका ] आत्मस्वरूप है, ऐसा रङ्गीकृत होने के कारर उस ब्राह्मण ग्रन्थकी व्याख्यासे भी अविरोध ही है । अत: इस मन्त्रका यही प्रय जगत्का एक ही सर्वव्यापक प्रात्मा है, प्रात्मभेद नहीं है ॥ २ ॥ ब प्रात्माका स्वरूपज्ञान कराने में लिङ्ग कहा जाता है- सत्यानन्दीदीपिका । मैं दक्षिण, मैं उत्तर और यह सब मैं ही हूँ) इत्यादि श्रुति है। सर्वभूतों में 'मालामें सूत्रके समान व्याप्त होने से ब्रह्म 'वसु' है। यज्ञमें जो प्रसिद्ध वेदि है वह 7 उत्कृष्ट भाग होनेसे और पृथिवीत्व स्वभाव होने से पृथिवीको वेदिशब्दसे कहा । 'प्रतौ वा मादित्यो हंसः शुचिषत्' इस ब्राह्मणमन्त्रसे यद्यपि आदित्यका ता है ब्रह्मका नहीं, तथापि 'यदाऽप्यादित्य एव' इस भाष्यसे तथा 'सूर्य आत्मा- स्थुषश्च' इस मन्त्रसे आदित्यमण्डलसे उपलक्षित चेतन प्रात्माका ही यहाँ ग्रहण कि वह सर्वात्मा है, 'सर्वभूतान्तरात्मा' ऐसी श्रुति भी है, परन्तु आदित्यमण्डल त्मा नहीं हो सकता, 'ब्रह्मैवेदं सर्वम्, आत्मैवेदं सर्वम्, एकमेवाद्वितीयम् एकोदेव: - - । Mihisansar LERRHOMER ऊर्ध्वं प्राणमुन्नयत्यपानं प्रत्यगस्यति । मध्ये वामनमासीनं विश्वे देवा उपासते ।। ३ ।। प्राणं ( प्राणवायुम् ) ऊध्वं उन्नयति (गमयति-प्रेरयति ) अपानं च (अपानव त्या (अधो ) अस्यति ( क्षिपति ) मध्ये ( हृदि ) आसीनम् ( अवस्थित ) तं र भजनीयं ) विश्वे ( सर्वे ) देवा ( चक्षुरादयः ) उपासते ॥ ३ ॥ जो प्राणको ऊपरकी ओर ले जाता है और अपानको नीचेकी ओर ढकेलत इयके मध्य में अवस्थित उस वामन-भजनीयकी सब चक्षुरादि देव उपासना करते हैं ऊर्ध्वं हृदयात्प्राणं प्राणवृत्तिं वायुमुन्नयत्यूचं गमयति । तथापानं : धोऽस्यति क्षिपति य इति वाक्यशेषः । तं मध्ये हृदयपुण्डरीकाकाश आ द्वावभिव्यक्तविज्ञानप्रकाशनं वामनं संभजनीयं सर्वे विश्वे देवाश्चतुरा ‘णा रूपादिविज्ञानं बलिमुपाहरन्तो विश इव राजानमुपासते । तादर्सेर (तव्यापारा भवन्तीत्यर्थः। यदर्था यत्प्रयुक्ताश्च सर्वे वायुकरणव्याप |ऽन्यः सिद्ध इति वाक्यार्थः ॥ ३ ॥ जो देशले प्राण-प्राणवृत्तिरूप वायुको अर्च-ऊपर की ओर ले जाता है, 'निको नीचेकी ओर ढकेलता है। 'य:' ( जो ) यह पद इस वाक्यका शेष है । 'लाकाशके भीतर विद्यमान बुद्धि में अभिव्यक्त विज्ञानरूप प्रकाशरूपी उस वा नीयकी चक्षु आदि सभी देव-इन्द्रियाँ रूप, रस आदि विज्ञानरूप उपहार । सिना करते हैं जैसे वैश्यगण उपहारदिसे राजाको उपासना करते हैं। वे चक्षु के लिए ही उपरतव्यापारवाले नहीं होते। अतः जिसके लिए और जिसकी प्रेरर त हुए सब प्राण और इन्द्रियाँ व्यापारवाली होती हैं वह उनसे अन्य सिद्ध है, यार्थ है ॥ ३ ॥ सत्यानन्दीदीपिका 'येय प्रेते विचिकित्सा मनुष्ये' (कठ० १।१।२०) इस मंत्रसे पहले जो सन्देह । T गया है वह भी निर्मूल है, इसे दिखलानेके लिए 'पात्मनः' इत्यादि से देहसे । माका अस्तित्व सिद्ध करते हैं- जैसे प्रजा विविध उपहारादिसे राजाकी उपासना करती है वैसे ही रूप योका ज्ञान संपादन करती हुई चक्षु प्रादि इन्द्रियाँ भी आत्माकी उपासना करती में 'सर्वे चक्षुरादिकरणव्यापाराः चेतनास्तत्प्रयुक्ताश्च भवितुमर्हन्ति, जड़चेष्टार दिचेष्टावदिति' (जैसे जड़रथादिकी चेष्टा रथी सारथी आदि चेतनके लिए मोर उ क है, क्योंकि जड़की चेष्टा है वैसे ही चक्षु आदि करणोंके व्यापार भी चेतनार्थ । - mata अस्य विस्रंसमानस्य शरीरस्थस्य देहिनः । देहाद्विमुच्यमानस्य किमत्र परिशिष्यते । एतद्वै तत् ॥ ४ ॥ शरीरस्थस्य अस्य देहिनः ( देहवता) विस्त्र समानस्य' (देहं त्यजतः ) देहा यमानस्य (विमुक्तस्य सत: ) अत्र ( देहे ) किं परिशिष्यते ? (न किञ्चदपि तत् ॥ ४॥ इस शरीरस्थ देहीके भ्रष्ट हो जाने पर इस देहसे वियुक्त हो जानेपर भला इस देह शेष रह जाता है ? [ अर्थात् कुछ भी नहीं ] यही वह ( ब्रह्म) है ।। ४ ॥ अस्य शरीरस्थस्यात्मनो विनंसमानस्यावस्रंसमानस्य भ्रंशमानस्य देहिन तः; विस्रंसनशब्दार्थमाह-देहाद्विमुच्यमानस्येति किमत्र परिशिष्य दिकलापे न किञ्चन परिशिष्यते। अत्र देहे पुरस्वामिविद्रवण इव पुर (नां यस्यात्मनोऽपगमे क्षणमात्रात्कार्यकरणकलापरूपं सर्वमिदं हतबल स्तं भवति विनष्टं भवति सोऽन्यः सिद्धः॥४॥ miRAMMARRIAmmonsonamaANERAmmomalesed तथा इस शरीरस्थ देही-देहवान् आत्माके विस्र समान-अवत्र समान-भ्रष्ट हो जानेपर इर दिकरण समुदायसे भला क्या शेष रह जाता है ? अर्थात् कुछ भी नहीं । 'देहाद्वि गनस्य' ऐसा कह कर श्रुति विस्रसन शब्दका स्वयं अर्थ कहती है । नगर कि चले जानेपर जैसे पुरवासी विध्वस्त हो जाते हैं, वैसे ही इस देहसे जिस के चले जानेपर एक क्षणमें यह कार्य-करण-शरीर-इन्द्रिय कलापरूप सबका सर न विध्वस्त-नष्ट हो जाता है, वह इस कार्यकलापसे भिन्न ही सिद्ध होता है ॥ ४ । सत्यानन्दीदीपिका वक्षु आदि इन्द्रियोंसे प्रास्माको पृथक् सिद्धकर अब देहादि कार्य से भी 'तच्च' से सिद्ध करते हैं- जैसे पुरस्वामी राजाके चले जानेपर पुरवासी अन्यत्र चले जाते हैं अथवा इतस्तत 'ष्ट हो जाते हैं, वैसे शरीर-चक्षु आदि इन्द्रिय समुदाय भी। इसमें शरीरं चेतनशेष मे भोगानहत्याद्राजपुरवत्' (यह शरीर चेतनका शेष है, क्योंकि उसके देहसे ..
स्थापना प्राणापानाद्यपगमादवद विध्वस्तं भवति न तु तद्व्या त्मापगमात्प्राणादिभिरेव हि मो जीवतीति, नैतदस्ति- न प्रारणेन नापानेन मर्यो जीवति कश्चन । इतरेण तु जीवन्ति यस्मिन्नेतावुपाश्रितौ ॥ ५ ॥ कञ्चन ( कश्चिदपि ) मर्त्यः ( मरणधर्मः मनुष्यः) प्राणेन न जीवति अपा न [ जीवति ] तु (पुनः ) इतरेण ( तद्विलक्षणेन ) जीवन्ति (प्राणान् धार यस्मिन् एती (प्राणापानी ) उपाश्रितो ( तदधीनतया वर्तते ।। ५ ।। कोई भी मनुष्य न तो प्राणसे जीवित रहता है और न अपानसे ही, किन जिसमें ये दोनों आश्रित हैं ऐसे किसी अन्यसे ही जीवित रहते हैं ।। ५ ॥ न प्राणेन नापानेन चक्षुरादिना वा मर्यो मनुष्यो देवान्कश्चन न कोऽपि जीवति न ह्येषां परार्थानां संहत्यकारित्वाज्जीवनहेतुत्वमुपा स्वार्थेनासंहतेन परेण केनचित्प्रयुक्तं संहतानामवस्थानं न दृष्टं गृहादीनां तथा प्राणादीनामपि संहतत्वाद्भवितुमर्हति । अत इतरेणैव संहतप्राणादिविलक्षणेन तु सर्वे संहताः सन्तो ज -- यदि किसीका यह मत हो कि यह शरीर, प्राण अपान आदिके चले जाने हो जाता है, किन्तु उन प्राणादिसे भिन्न किसी पात्माके चले जानेसे नहीं, प्राणादिके द्वारा ही यह मनुष्य जीवित रहता है, परन्तु ऐसी बात नहीं है, [ कर कोई भी मर्त्य-मनुष्य देहधारी न तो प्राणसे ही जीवित रहता है और न अथवा चक्षु आदि इन्द्रियोंसे ही, क्योंकि परस्पर मिलकर प्रवृत्त होनेवाले तथा शेष भूत अन्य के लिए होनेवाले ये इन्द्रिय आदि जीवनके हेतु नहीं हो सकते । किसी स्वतन्त्र और असंहत अन्य चेतनकी प्रेरणाके विना गृह श्रादि संहत पद स्थिति नहीं देखी गई है, वैसे ही संघातरूप होनेसे-प्राणादिकी स्थिति भी स्वतनः हो सकती, अतः संहतरूप ये सब प्राणादि संहत पदार्थोंसे विलक्षण किसी अन्यके सत्यानन्दीदीपिका 'स्यान्मतम्' इससे अन्यथासिद्धिको शङ्का करते हैं । 'नैतत् से शङ्काका सर करते हैं- अब पात्मामें प्रकारान्तरसे प्राणादिका प्राश्रितत्व इस मन्त्रसे प्रतिपादन किया है । लोकमें इस अन्वय-व्यतिरेकसे यह प्रसिद्ध है कि देहमें प्राणादिके रहते जीर - । Trr.R...
मानसरापणापारमान सात परामनता प्राणापाना दिभिः संहतावुपाश्रितौ, यस्यासहतस्यार्थे प्राणापानादिः स्वव्यापार तते संहतः सन्सः ततोऽन्यः सिद्ध इत्यभिप्रायः ।।५।। मरणोत्तरकालमें जीवकी गति हन्त त इदं प्रवक्ष्यामि गुह्यं ब्रह्म सनातनम् । यथा च मरणं प्राप्य आत्मा भवति गौतम ॥ ६ ॥ गौतम ! हन्त ते ( तुभ्यम् ) इमं गुह्यं सनातनं ब्रह्म प्रवक्ष्यामि, आत्मा मरणं [ यथा भवति [ तच्च प्रवक्ष्यामि ] ॥ ६ ॥ गौतम ! अब मैं फिर भी तुम्हारे प्रति उस गुह्य और सनातन ब्रह्मका वर्णन तथा [ ब्रह्मको न जाननेसे ] मरणको प्राप्त होनेपर प्रात्मा जैसा हो जाता है मी बतलाऊंगा ] ॥ ६ ॥ न्तेदानीं पुनरपि ते तुभ्यमिदं गुह्यं गोप्यं ब्रह्म सनातनं चिरन्तनं मि यद्विज्ञानात्सर्वसंसारोपरमो भवति, अविज्ञानाच्च यस्य मरणं प्राप्य भवति यथा संसरति तथा शृणु हे गौतम ॥ ६॥ बत रहते हैं-प्राण धारण करते हैं। संहत पदार्थोंसे विलक्षण जिस सत्स्वरूप रहते ही ये प्राण, अपान, चक्षु आदि संहत हो प्राश्रित हैं अर्थात् जिस असंहत लिए प्राण, अपान आदि संहत हो अपने ( दर्शनादि ) व्यापारोंको करते हुए हते हैं वह प्रात्मा उनसे भिन्न सिद्ध है ॥ ५ ॥ हो ! अब मैं तुम्हें फिर भी इस गुह्य-गोपनीय सनातन-चिरन्तन ब्रह्मको कहूंगा, वज्ञानसे समग्र संसारकी निवृत्ति हो जाती है तथा जिसके विज्ञान न होने के परणको प्राप्त होकर प्रात्मा जैसा होता है अर्थात् वह जिस प्रकार जन्म-मरणरूप प्राप्त होता है, हे गौतम ! उस प्रकार सुन ! ॥ ६ ॥ सत्यानन्दीदीपिका आदि सब जिसके प्राश्रित हैं वह इन सबसे विलक्षण चेतन प्रात्मा सिद्ध है ।। प्रेते विचिकित्सा'०( कठ० १।१।२०) इस मन्त्रमें प्रष्टाने परलोक विषयक इ अभिव्यक्त किया है, उसके निवृत्यर्थ 'हन्तेदानीम्' से कहते हैं । 'अन्यच्छ्र यो प्रेय:' ( कठ० १।२।१ ) इत्यादि मन्त्रों द्वारा यद्यपि यमराजने ब्रह्म विषयक नर्वचन किया है फिर भी नचिकेताके प्रति कहते हैं, क्योंकि ब्रह्म अतिगोपनीय । इस मन्त्र में ब्रह्मके ज्ञान और प्रज्ञानका फल कहा गया है अर्थात् जिस ब्रह्मके 'न्ममरा रूप संसारकी Hिaति और पता .
। ANDRA पानमन्य प्रपद्यन्त शरारत्वाय दाहनः । स्थाणुमन्येऽनुसंयन्ति यथाकर्म यथाश्रुतम् ।। ७ ।। अन्ये ( केचन ) देहिनः यथाकर्म यथाश्रुतं ( स्वस्वकर्म विद्यानुसारेण ) शरीरर शरीरग्रहणार्थं ) योनि प्रपद्यन्ते । अन्ये ( देहिनः ) स्थाj ( स्थावरदेहम् ) अनुसंय प्राप्नुवन्ति ) ॥ ७ ॥ अपने कर्म और ज्ञानके अनुसार कितने ही देहधारी तो शरीर ग्रहणार्थ कि निको प्राप्त होते हैं और कितने ही स्थारभावको प्राप्त होते हैं ।। ७ ।। योनि योनिद्वारं शुक्रबीजसमन्विताः सन्तोऽन्ये केचिदविद्यावन्तो म द्यन्ते शरीरत्वाय शरीरग्रहणार्थं देहिनो देहवन्तः; योनि प्रविशन्तीत्यर्थ राणु वृक्षादिस्थावरभावमन्येऽत्यन्ताधमा मरणं प्राप्यानुसंयन्त्यनुगच्छनि कर्म यद्यस्य कर्म तद्यथाकर्म यैर्यादृशं कर्मेह जन्मनि कृतं तद्वशेनेत्येतत ( च यथाश्रुतं यादृशं च विज्ञानमुपार्जितं तदनुरूपमेव शरीरं प्रतिपद्य अर्थः । “यथाप्रज्ञं हिं संभवाः” इति श्रुत्यन्तरात् ॥ ७॥ अन्य कुछ अविद्यावान् मूढ ( अविवेकी ) देहधारी शरीर ग्रहण करनेके लिए शु रूप बीजसे संयुक्त होकर योनि-योनिद्वारको प्राप्त होते हैं अर्थात् किसी योनि ट हो जाते हैं, ऐसा अर्थ है। दूसरे कोई अत्यन्त अधम पुरुष मृत्युको प्राप्त. याकर्म यथाश्रु तम् ] स्थाशु-वृक्षादि स्थावरभावका अनुगमन करते हैं अर्था रभावको प्राप्त होते हैं। तात्पर्य यह है कि यथाकर्म-जिसका जो कर्म है अथव जन्ममें जिसने जैसा कर्म किया है उसके अधीन हो स्थावर आदि भावको प्राप्त हो तथा यथाश्रु त अर्थात् जिसने जैसा विज्ञान ( उपासना ) उपाजित किया है उस प ही शरीरको प्राप्त होते हैं, ऐसा अर्थ है। 'जन्म अपनी अपनी बुद्धिके अनुसा करता है एक ऐसी अन्य श्रतिसे भी यही प्रमाणित होता है ।। ७ ।। सत्यानन्दीदीपिका इस मन्त्रमें 'देहिनः' इस विशेषणसे वार वार शरीर ग्रहण और उसका प्रापथ ष्ठान सूचित होता है। मनुष्यानधिकरोति शास्त्रम्' 'वर्णाश्रमके अनुसार मनुष्यों । कर्म करनेमें शास्त्र अधिकृत करता है। इसलिए विहिताविहित कर्म मनुष्य से ही सम्पादित होते हैं और उन कर्मफलोंके भोगार्थ स्थूल शरीरग्रहण करने के योनिद्वारमें प्रवेश होता है। 'भोगायतनं शरीरम्' 'यह स्थूल शरीर शुभाशुभ नित सुख, दुःख-रूप भोगाका स्थान है' या - HTETTEPTErrrr..
MRODAR - तिज्ञात ब्रह्म वक्ष्यामति तदाह- गुड ब्रह्मोपदेश एष सुप्तेषु जागति कामं कामं पुरुषो निमिमाणः तदेव क तद्ब्रह्म तदेवामृतमुच्यते । तस्मिल्लोकाः श्रिताः ★ तदु नात्येति कश्चन । एतद्वै तत् ।। ८ ।। । पुरुषः सुप्तेषु कामं ( भोगविषयं ) कामं ( स्वेच्छानुसारेण ) निर्मिमाण: सन्) जागति, तत् (सः पुरुषः) एष शुक्र (शुद्ध) तत् ब्रह्म, तत् अमृतम् I ) उच्यते । सर्वे लोकाः तस्मिन् (परमकारणे ब्रह्मणि ) श्रिताः (माश्रिताः) कश्चिदपि तत् (ब्रह्म ) न अत्येति ( अतिक्रम्य न वर्तते ) एतद्व तत् ।।८।। गादि इन्द्रियोंके सुप्त हो जानेपर जो यह पुरुष अपने इच्छित पदार्थोकी T हुमा जागता रहता है, वही शुक्र-शुद्ध वह ब्रह्म और वही अमृत कहा सब लोक उसके प्राधित हैं, कोई भी उसका उल्लंघन नहींकर सकता, निश्चय ब्रह्म ) है ॥ ८ ॥ सुप्तेषु प्राणादिषु जागति न स्वपिति । कथम् ? कामं कामं तं स्त्र्याद्यर्थमविद्यया निर्मिमाणो निष्पादयञ्जागर्ति पुरुषो यस्तदेव शुक्र तद्ब्रह्म नान्यद् गुह्यं ब्रह्मास्ति । तदेवामृतमविनाश्युच्यते सर्व- किंच पृथिव्यादयो लोकास्तस्मिन्नेव सर्वे ब्रह्मण्याश्रिताः सर्वलोक- स्य । तदु नात्येति कश्चनेत्यादि पूर्ववदेव ॥८॥ ो यह प्रतिज्ञा की गई थी 'मैं तुझे गुह्य ब्रह्म बतलाऊँगा' अब उसे कहते हैं- प्राणादि-चक्षु आदि इन्द्रियोंके सुप्त हो जानेपर जागता रहता है सोता न प्रकार ? अविद्याके योगसे अपने अपने इच्छित-अभीष्ट स्त्री आदि पदार्थों रित्ता हुमा अर्थात् उन्हें निष्पन्न करता हुआ जो पुरुष जागता है वही शुक्र- वह ब्रह्म है, उससे भिन्न अन्य कोई गुह्य ब्रह्म नहीं है, वही सब शास्त्रोंमें शी कहा जाता है । किञ्च पृथिवी आदि सब लोक उसी ब्रह्मके पाश्रित हैं, 'भी लोकोंका कारण है, अत: उसका कोई भी अतिक्रमण नहीं कर सकता वह ब्रह्म है ] इत्यादि पूर्ववत् समझना चाहिए ।। ८ ।। सत्यानन्दीदीपिका प्राप्तको समाप्तकर अब 'यत्प्रतिज्ञातम्' इस वाक्यसे प्रकृतका प्रतिपादन । , शाAATEm f- -- अनेकतार्किककुबुद्धिविचालितान्तःकरणानां प्रमाणोपपन्नमप्यात्मैव ज्ञानमसकृदुच्यमानमप्यनृजुबुद्धीनां ब्राह्मणानां चेतसि नाधीयत इति र पादन आदरवती पुनः पुनराह श्रुतिः- आत्माका उपाधिप्रतिरूपत्व अग्निर्यथैको भुवनं प्रविष्टो रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव । एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा रूपं रूपं प्रतिरूपो बहिश्च ।। । यथा एकः अग्निः भुवनं प्रविष्टः [ सन् ] रूपं रूपं प्रति प्रतिरूपः ( तर सदृशप्रकाशः) बभूव, तथा सर्वभूतान्तरात्मा एकः [ एव सन् ] रूपं रूपं (प्र प्रतिरूपः ( तत्तदेहोपाध्यनुरूप: ) बहिः च [ स्वयमविकृत एव ] (तिष्ठति ) जिस प्रकार सम्पूर्ण भुवनमें प्रविष्ठ हुमा एक ही अग्नि प्रत्येक रूप ( रूपवा के अनुरूप हो जाता है, उसी प्रकार सभी भूतोंमें एक ही अन्तरात्मा उन अनुरूप हो रहा है तथा उनसे बाहर भी है ।। ।। अनेक ताकि कोंकी कुबुद्धिद्वारा विचालित चित्तवाले तथा ऋजु (सरल) बु ब्राह्मणों के चित्त में प्रमाणोंसे युक्त भी प्रात्मैकत्व विज्ञान वारम्वार उपदिष्ट हो स्थिर नहीं होता, अतः उसके प्रतिपादनमें मादर ( तात्पर्य ) रखनेवाली श्रुति ! कहती है- सत्यानन्दीदीपिका अभिमानी विश्वनामक जीव उनके साथ नहीं सोता किन्तु जागता रहता है, वही वस्थामें अविद्याके द्वारा काम्यमान स्त्री आदि पदार्थोंकी रचना भी करता है, ब्रह्म है, 'अत्रायं पुरुषः स्वयं ज्योति:' यह श्रुति भी है ।। ८ ।। प्रत्येक प्राणीके जन्म-मरण और चक्षु आदि करण भिन्न-भिन्न हैं एवं सः साथ प्रवृत्ति भी नहीं होती तथा कोई सात्त्विक कोई राजस और कोई ताम् गोचर होते हैं, इत्यादि हेतुओंसे शरीरभेदसे आत्माका भी भेद सिद्ध होता है सब शरीरोंमें एक प्रात्माका होना संभव नहीं है, इस प्रकारकी आशङ्काकर 8 भेद होनेपर सिद्ध साधन और स्वाभाविक भेद होनेपर अनैकान्तिकत्व-a दिखलाने के लिए प्रारम्भकर 'अनेकताकिक०' इत्यादि भाष्यसे कहते हैं। शास्त्र लम्बन न कर केवल तर्क का अवलम्बन करनेवाले तार्किक कुबुद्धि कहे जाते है द्वारा स्वमतोपन्यासादिसे जिनका चित्त श्रेयमार्गसे विचलित हो गया है, ऐसे चित्तमें प्रमाण 'तत्त्वर्मास' आदि वेदान्तवाक्यों द्वारा प्रतिपाद्य जीवब्रह्मक्य ज्ञा ज A 4 - ग्नयथैक एव प्रकाशात्मा सन्भुवनं भवन्त्यस्मिन्भूतानीति भुवनमयं मिमं प्रविष्टोऽनुप्रविष्टः। रूपं रूपं प्रतिदादिदाह्यभेदं प्रतीत्यर्थः, प्रतिरूपः प्रतिरूपवान्दाह्यभेदेन बहुविधो बभूव; एक एव तथा सर्वभूतान्तरात्मा पूतानामभ्यन्तर आत्मातिसूक्ष्मत्वाद् दादिष्विव सर्वदेहं प्रति प्रविष्ट- रूपो बभूव बहिश्च स्वेन अविकृतेन स्वरूपेणाकाशवत् ॥६॥ न्यो दृष्टान्तः- गयुर्यथैको भुवनं प्रविष्टो रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव । कस्तथा सर्व भूतान्तरात्मा रूपं रूपं प्रतिरूप बहिश्च ॥१०॥ एव ] वायु: यथा भुवनं प्रविष्टः [ सन् ] रूपं रूपं प्रतिरूप: बभूवा, तथा व ] सर्वभूतान्तरात्मा रूपं रूपं ( प्रतिदेह ) प्रतिरूप: बहिः च ( स्वेन अविकृतः तिष्ठति ) ।। १० ।। प्रकार इस लोकमें प्रविष्ट हुप्रा एक ही वायु प्रत्येक वस्तुके अनुरूप हुआ है, । सब भूतोंका एक ही अन्तरात्मा प्रत्येक देहके अनुरूप हुआ बाहर भी है ।।१०॥ ' प्रकार एक ही अग्नि प्रकाशस्वरूप होकर भी भुवनमें-'इसमें सब भूत होते यह लोक भुवन कहा जाता है । उसी इस लोकमें अनुप्रविष्ट हुमा रूप-रूपके त् काष्ठ प्रादि प्रत्येक दाह्य विशेषके प्रति प्रतिरूप-उस उस पदार्थके अनुरूप अभेदसे अनेक प्रकारका हो जाता है, उसी प्रकार सभी भूतोंका एक ही '-पान्तरिक आत्मा अतिसूक्ष्म होने के कारण काष्ठादिमें प्रविष्ट अग्निके समान प्रविष्ट रहने के कारण उनके अनुरूप हो गया है तथा आकाशके समान अपने पसे बाहर भी है ॥ ६ ॥ एक अन्य दृष्टान्त भी है सत्यानन्दीदीपिका की सर्वव्यापक और निलिप्तसत्ताका अनुभव करानेके लिए अब अग्निका र प्रकारान्तरसे समझाते हैं । जैसे प्राकाशादि पाँच तत्वोंमें मध्यम अग्नि- पूतात्मक सृष्टिमें सर्वत्र व्याप्त है जब वह अग्नि प्रकट होती है तब अपने के अनुसार दीर्घ आदि अनेक रूपोंमें प्रतीयमान ( लक्षित ) होती है, वैसे द्वितीय . मात्मा विभिन्न देहादि उपाधिसे नानारूपोंमें लक्षित होता है। सब न्तरत्वमें अतिसूक्ष्मत्व हेतु है, जो वस्तु अतिसूक्ष्म होती है वह सबके प्राभ्यन्तर विकार में प्रविष्टकी विकृति हो सकती है ? इस शङ्काकी निवृत्तिके लिए HOS वायुर्यथैक इत्यादि । प्राणात्मना देहेष्वनुप्रविष्टो रूपं रूपं प्रतिरूपो त्यादि समानम् ।। १०॥ एकस्य सर्वात्मत्वे संसारदुःखित्वं परस्यैव तदिति प्राप्तमत इदमुच्यते प्रास्माकी असङ्गता सूर्यो यथा सर्व लोकस्य चक्षुर्न लिप्यते चाक्षुषैर्बाह्यदोषैः । एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा न लिप्यते लोकदुःखेन बाह्यः यथा सूर्यः सर्वलोकस्य चक्षुः ( चक्षुनियन्तृत्वेन चक्षुरन्तस्थः सन् अपि ) बाह्यदोषैः न लिप्यते, तथा सर्वभूतान्तरात्मा एकः [ सन् अपि ] लोक लिप्यते, बाह्यः ( मसङ्गस्वभावत्वात् ) ॥ ११ ॥ जिस प्रकार सर्वलोकका चक्षु होकर भी सूर्य नेत्र सम्बन्धी बाह्यदोषोंसे । होता, उसी प्रकार सब भूतोंका एक ही अन्तरात्मा संसार दुःखसे लिप्त नह प्रत्युत उससे बाह्य है ।। ११ ॥ सूर्यो यथा चक्षुष आलोकेनोपकारं कुर्वन्मूत्रपुरीषाद्यशुचिप्रद तद्दर्शिनः सर्वलोकस्य चक्षुरपि सन्न लिप्यते चाक्षरैरशुच्यादिदर्शनमिमि त्मिकैः पापदोषैबायैश्चाशुच्यादिसंसर्गदोषैः। एकः संस्तथा सर्वभूतान जिस प्रकार एक ही वायु प्राणरूपसे देहोंमें अनुप्रविष्ट होकर प्रत्येक रूपले हो रहा है [ उसी प्रकार सब भूतोंका एक ही अन्तरात्मा प्रत्येक रूपके अ रहा है ] इत्यादि पूर्ववत् ही समझना चाहिए ।। १० ।। इस प्रकार एककी ही सर्वात्मता होनेपर भाष्यानुवाद संसारके सब दुःख होना भी परमात्माको ही होता है। ऐसी शङ्का प्राप्त होती है, इसलिए । जाता है. जैसे सूर्य अपने प्रकाशसे नेत्रका उपकार करता हुआ अर्थात् मल, मूत्रादि वस्तुओंको प्रकाक्षित करने से उन्हें देखनेवाले सभी लोकोंका नेत्ररूप होकर भी अपवित्र पदार्थादिके दर्शन-निमित्तक आध्यात्मिक पापदोषों तथा अपवित्र सत्यानन्दीदीपिका 'परमात्मा दुःखी स्यात् दुःख्यभिन्नत्वात् लोकवत्' 'परात्मादुःखी होना क्योंकि दुःखी जीवोंसे अभिन्न है जैसे लोक ( संसार ) है' इस प्रकार 'एकस्य से शङ्का करते हैं- - । लोकदुःखेन बाह्यः । लोको ह्यविद्यया स्वात्मन्यध्यस्तया कामकर्मो- मनुभवति। न तु सा परमार्थतः स्वात्मनि । यथा रज्जुशुक्तिको- । सपरजतोदकमलानि न रज्ज्वादीनां स्वतो दोषरूपाणि सन्ति । [ विपरीतबुद्धयध्यासनिमित्तात्तदोषवद्विभाव्यन्ते । न तद्दोषैस्तेषां वेपरीतबुद्धयध्यासबाह्या हि ते । मनि सर्वो लोकः क्रियाकारकफलात्मकं विज्ञानं सर्पादिस्थानीय ध्यस्य तन्निमित्तं जन्ममरणादिदुःखमनुभवति । न त्वात्मा सर्वलोका- विपरीताध्यारोपनिमित्तेन लिप्यते लोकदुःखेन । कुतः ? बाह्यः देव विपरीतबुद्धयध्यासबाटो हि स इति ॥ ११ ॥ 2000 . . वाले बाह्यदोषोंसे लिप्त नहीं होता, वह एक सब प्राणियोंका अन्तरात्मा । लिप्त नहीं होता, क्योंकि वह उससे बाहर है। लोग अपने आत्मामें विद्या द्वारा कर्म और कर्मजनित दुःखका अनुभव करते हैं। किन्तु वह मार्थतः स्वात्मामें नहीं है। जैसे कि रजु, शुक्ति, मरुस्थल और आकाशमें सर्प, रजत, जल और मलिनता, ये उन रज, आदि में स्वाभाविक दोषरूप न्तु संसर्ग में पाये पुरुषमें विपरीत बुद्धि जनित अध्यायसे दोष प्रतीत होते दोषोंसे वे लिप्त नहीं होते, क्योंकि वे विपरीत बुद्धि जनित अध्याससे बाहर- . कार सब लोग भी अध्याससे [ रजु आदिमें अध्यस्त ] सादिके समान में क्रिया, कारक और फलरूप विपरीत ज्ञानका प्रारोपकर उस निमित्तसे न्म-मरण आदि दुःखोंका अनुभव करते हैं, सम्पूर्ण लोकोंका अन्तरास्मा हो त्मा तो विपरीत अध्यारोप निमित्तके लोक दुःखसे लिप्त नहीं होता, ससे कि वह उससे बाहर है अर्थात् रज्जु आदि के समान वह विपरीत बुद्धि इससे बाहर-प्रतीत ही है ॥ ११ ।। सत्यानन्दीदीपिका त्मा तो निरविद्य एवं दुःखसाधन शून्य है, अतः वह न दुःखी है और न जक हेतु ही है, क्योंकि रज्जु आदिके समान चेतन उपाधिस्वरूपसे अध्यास berpfarrfer forget 4 ? आत्मदर्शी नित्य सुखी है एको वशी सर्वभूतान्तरात्मा एकं रूपं बहुधा यः करोति । तमात्मस्थं येऽनुपश्यन्ति धीरास्तेषां सुखं शाश्वतं नेतरेषाम् वशी ( सर्वनियन्ता ) यः सर्वभूतान्तरात्मा एकः [ एवं सन् ] एकम् [ रूपं बहुधा करोति, प्रात्मस्थं ( स्वहृदय प्रकाशनं ) तम् (आत्मानं ) ये धीर पश्यन्ति (साक्षात् अनुभवन्ति) तेषाम् [एव] शाश्वतं सुखं [ भवति ] इतरेषां न जो एक सबका नियन्ता और सब भूतोंका अन्तरात्मा अपने एकरूपको ही प्रकारका कर लेता है, अपने बुद्धिस्थ उस पात्माका जो विवेकी-पुरुष साक्षात्कार हैं उन्हींको शाश्वत-नित्य सुख प्राप्त होता है अन्योंको नहीं ।। १२ ॥ स हि परमेश्वरः सर्वगतः स्वतन्त्र एको न तत्समोऽभ्यधिको वान्य वशी सर्वं ह्यस्य जगद्वशे वर्तते । कुतः ? सर्वभूतान्तरात्मा । यत एकमेव रसमात्मानं विशुद्धविज्ञानरूपं नामरूपाद्यशुद्धोपाधिभेदवशेन बहुधानेक यः करोति स्वात्मसत्तामात्रेणाचिन्त्यशक्तित्वात् । तमात्मस्थं स्वशरीर काशे बुद्धौ चैतन्याकारणाभिव्यक्तमित्येतत् । न हि शरीरस्याधारत्वमात्मनः, आकाशवदमूर्तत्वात् ; आदर्शस्थं मुर वह स्वतन्त्र और सर्वगत परमेश्वर एक है, उसके समान अथवा उससे बड़ कोई नहीं है, वह वशी है, क्योंकि यह सारा जगत् उसके अधीन है । किससे कि वह सब भूतोंका अन्तरात्मा है। क्योंकि जो अचिन्त्य शक्ति-सम्पन्न नित्य । विशुद्ध विज्ञानस्वरूप हो अपनेको नाम, रूप आदि अशुद्ध उपाधि भेदवश अपन मात्रसे बहुधा-अनेक प्रकारका कर लेता है। उस आत्मस्थ-अपने शरीरस्थ हृदाकार चैतन्यरूपसे अभिव्यक्त आत्माका जो विवेकी पुरुष अनुभव करते हैं उन्हींको सुख प्राप्त होता है। आकाशके समान अमूर्त होनेसे प्रात्माका प्राधार शरीर नहीं है अर्थात् सत्यानन्दीदीपिका स्वापेक्षा परका उत्कर्ष दर्शन और अपने में परतन्त्रता इस प्रकार की दुःखका कारण लोक प्रसिद्ध है- परन्तु वह परमात्मामें नहीं है, इसलिए प दुःखी नहीं है, अतएव परमात्माका प्राप्तिरूप परम पुरुषार्थ हो सकता है, 'किञ्च' से कहते हैं- न तस्य कार्य करणं च विद्यते न तत्समश्चाभ्यधिकश्च दृश्यते । परास्य शत्तिविविधैव श्रयते स्वाभाविकी ज्ञानबलक्रिया च ।। (श्वेता - तमेतमीश्वरमात्मानं ये निवृत्तबाह्यवृत्तयोऽनुपश्यन्ति आचार्यागमो- नु साक्षादनुभवन्ति धीरा विवेकिनस्तेषां परमेश्वरभूतानां शाश्वतं नित्यं मानन्दलक्षणं भवति; नेतरेषां बाह्यासक्तबुद्धीनामविवेकिनां स्वात्मभूत- घाव्यवधानात् ॥ १२॥ मोऽनित्यानां चेतनश्चेतनानामेको बहूनां यो विदधाति कामान् । त्मस्थं येऽनुपश्यन्ति धीरास्तेषां शान्तिः शाश्वती नेतरेषाम् १३ त्यानां ( विनाशशीलानां ) नित्यः (अविनाशी ) चेतनानां चेतना' या एकः बहूनां ( संसारिणां ) कामान् (अभिलषितार्थान् ) विदधाति ( प्रयच्छति ) तं ये धीराः अनुपश्यन्ति, तेषाम् ( एव ) शाश्वती शान्तिः इतरेषां न ॥१३॥ अनित्य पदार्थो में नित्यस्वरूप तथा ब्रह्मादि चेतनोंमें चेतन है, एक होकर भी अभीष्ट प्रदान करता है। स्वबुद्धिस्थ उस प्रात्माका जो धीर पुरुष अनुभव उन्हींको शाश्वती नित्य शान्ति प्राप्त होती है अन्योंको नहीं ।। १३ ॥ योऽविनाश्यनित्यानां विनाशिनाम् । चेतनश्चेतनानां चेतयितृणां ब्रह्मा- गणिनामग्निनिमित्तमिव दाहकत्वमनग्नीमामुदकादीनामात्मचैतन्यनि- है । जैसे दर्पणप्रतिबिम्बित मुखका आधार दर्पण नहीं है। निवृत्त बाद्यवृत्ति धीर-विवेकी पुरुष उस ईश्वर-आत्माको देखते हैं--प्राचार्य और शास्त्रके 'तर साक्षात् अनुभव करते हैं, परमात्मस्वरूपताको प्राप्त हुए उन पुरुषों को 'नन्दरूप शाश्वत-नित्य सुख प्राप्त होता है, किन्तु बाह्य पदार्थों में आसक्त अन्य अविवेकी पुरुषोंको यह सुख प्रात्मभूत होते भी अविद्यारूप व्यवधानके "प्त नहीं हो सकता ॥१२॥ THURAMAILORAMNaa- । मनित्य विनाशशीलोंमें नित्य अविनाशी है, चेतन अर्थात् ब्रह्मादि अन्य चेतयिता- | भी चेतन है । जैसे अग्निसे भिन्न जलादि पदार्थोमें दाहकत्व अग्निनिमित्तक सत्यानन्दीदीपिका विक ज्ञान, बल क्रियारूप है ) यह अन्य श्रुति भी है । जब प्रकृति परमात्माके तो प्रकृतिका विलासरूप यह सारा जगत् मी परमात्माके वशमें होना स्वाभा- जैसे दर्पणमें प्रीतिमासे 'दर्पणस्थमुख' ऐसा उपचार होता है वैसे 'शीरस्थ ता उपचार होता है ।। १२ ।।
कथं
मित्तमेव चेतयितृत्वमन्येषाम् , किंच स सर्वज्ञः सर्वेश्वरः कामिना
कर्मानुरूप कामान्कर्मफलानि स्वानुग्रहनिमित्तांश्च कामान्य एको बहून
मनायासेन विदधाति प्रयच्छतीत्येतत् । तमात्मत्थं येऽनुपश्यन्ति
शान्तिरुपरतिः शाश्वती नित्या स्वात्मभूतैव स्यान्नेतरेषामनेवंविधानार
तदेतदिति मन्यन्तेऽनिर्देश्यं परमं सुखम् ।
नु तद्विजानीयां किमु भाति विभाति वा ॥ १
अनिर्देश्यं ( निर्देष्टुमशक्यन् ) परमं सुखं (आत्मानन्दलक्षणं) तत्
मन्यन्ते, नु (वित ) कथं केन प्रकारेण, तत् (परमं सुखं) विजानीयाम् (आ
कुर्याम् ) भाति किमु ( प्रकाशते किम् ? ) विभाति वा ॥ १४ ॥
उसी इस [आत्मविज्ञानस्वरूप ) को ही विवेकी पुरुष अनिर्वाच्य परम
हैं, उसे मैं कैसे जान सकूँगा, क्या वह प्रकाशित ( हमारी बुद्धिसे गम्य
अथवा नहीं ।। १४ ॥
यत्तदात्मविज्ञानं सुखमनिर्देश्यं निर्देष्टुमशक्यं परमं प्रकृष्टं प्र
है वैसे ही अन्य प्राणियोंमें चेतयितृत्व आत्मचैतन्यनिमित्त ही है। किञ्च
तथा सर्वेश्वर भी है, क्योंकि वह अकेला ही बिना किसी प्रयासके अनेक सका
पुरुषोंको कर्मानुरूप कर्मफल तथा स्वानुग्रह रूप निमित्तसे भोग विधान क
देता है । जो धीर-विवेकी पुरुष अपनी बुद्धि में अभिव्यक्त उस आत्माका
करते हैं उन्हींको शाश्वती-नित्य स्वात्मभूता शान्ति-उपरति प्राप्त होत
जो ऐसे नहीं हैं उन्हें प्राप्त नहीं होती ॥ १३ ॥
यह जो मात्मविज्ञानरूप सुख है वह पनिर्देश्य-निर्देश करने अयोग्य,
सत्यानन्दीदीपिका
सूर्य और चन्द्रमाकी रचनाकी ) इत्यादि. श्रुतिसे प्रकृताभ्यागम और
प्रसङ्गका परिहार किया गया है, क्योंकि प्रलीन कल्पान्तरभावोंको कल्पा
तीयरूपसे उत्पत्ति होती है, इसलिए सृष्टि प्रवाहरूपसे अनादि कही गई है
स्तम्बपर्यन्त सब प्राणियोंमें जो चेतयितृत्व है वह चैतन्यनिमित्त है, वह चेत
है । 'स: सर्वज्ञः सर्ववित्' 'कर्माध्यक्षा' इत्यादि श्रुति और 'विमतं कर्म फलं
भिज्ञ न दीयमानं व्यवहितफलस्वात् सेवाफलवत्' 'विवादास्पद कर्मफल उसके
जाननेवाले द्वारा दिया जाता है, क्योंकि व्यवहित फल है' जैसे सेवाप
अनमानसे ईश्वर सर्वेश्वर और कर्मफलदाता सिद्ध होता है ॥ १३ ॥
? निसयोरगोचरमपि सन्निवृत्तषणा ये ब्राह्मणास्ते यत्तदेतत्प्रत्यक्षमेवेति ते। कथं नु केन प्रकारेण तत्सुखमहं विजानीयाम् । इदमित्यात्मबुद्धि- मापादयेयं यथा निवृत्तैषणा यतयः। किमु तद्भाति दीप्यते प्रकाशात्मक ऽस्मद्बुद्विगोचरत्वेन विभाति विस्पष्टं दृश्यते किं वा नेति ॥ १४ ॥ पत्रोत्तरमिदं भाति च विभाति चेति । कथम् ? सर्वप्रकाशकब्रह्म तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकं नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः । व भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति ॥ १५ ॥ व (तस्मिन् ब्रह्मणि ) सूर्यः न भाति, चन्द्रतारक ( चन्द्रः तारकसमुदाय:) ति ] इमाः ( दृश्यमानाः ) विद्युतः न भान्ति, अयम् अग्निः कुतः ? भान्तं धारण पुरुषोंकी वाणी और मनका भविषय भी है, तो भी निवृत्त एषणामोंवाले पण लोग हैं वे उसे प्रत्यक्ष ही मानते हैं। उस प्रात्मसुखको मैं किस प्रकार जान ? निवृत्त एषणावाले यतियोंके समान 'वह यही है' इस प्रकार उसे मैं द्धिका विषय कैसे संपादन करूंगा ? वह प्रकाश स्वरूप है सो क्या वह भासता । बुद्धिका विषयरूपसे स्पष्ट दिखलायी देता है अथवा नहीं ॥ १४ ।। का उत्तर यही है कि वह भासता है और विशेषरूपसे भासता है। किस प्रकार? सत्यानन्दीदीपिका 'बका त्यागकर जिन यतियोंने प्रात्मकत्व दर्शनकर परमानन्दकी प्राप्ति की है, लोग भी एषणा त्रय त्याग पूर्वक प्राचार्य और शास्त्रद्वारा प्रात्मकत्व प्रतिपादक ' आदि वेदान्त वाक्योंके उपदेशसे प्रात्मानन्दका अनुभव कर सकते हैं । के विषयमें 'यतो वाचो निवर्तन्तेऽप्राप्य मनसा सह' 'वाणी भी मनके साथ कर लौट पाती है' इत्यादि श्रुतिसे तो ऐसा प्रतीत होता है कि प्रात्मदर्शन , परन्तु 'दृश्यते त्वय्यया बुद्धया सूक्ष्मया सूक्ष्मदर्शिभिः ( कठ०२।१२) द्रष्टव्यः' ( विशुद्ध मनद्वारा ही वह दर्शन योग्य है ) समाधिनि—तमलस्य चेतसो निवेशितस्यात्मनि यत्सुखं लभेत् । न शक्यते वर्णयितुं गिरा तदा स्वयं तदन्तःकरणेन गृह्यते ।। आधिद्वारा निर्मल हुए विशिष्टचित्तसे जो प्रात्मामें सुख प्राप्त होता है वह पी वर्णन नहीं किया जा सकता, किन्तु उस कालमें वह आत्मसुख अन्त:- ही गृहीत होता है ) 'बुद्धिमाधमतीन्द्रियम्' (गीता ६-२१ ) (प्रतीन्द्रिय -- प्रकाशमानं ) तम् (आत्मानम् ) एव अनु ( अनुसृत्य ) सर्व ( सूर्यादिकं ज्यो पति (प्रकाशं लभते ) इदं सर्वं ( जगत् ) तस्य (आत्मज्योतिषः ) भासा ( दीप्त भाति (प्रकाशते ) ॥ १५ ॥ उस ब्रह्म स्वरूपमें सूर्य प्रकाशित नहीं होता, चन्द्रमा और तारागण भी प्रक हीं होते और न यह विद्युत, ही प्रकाशित होती हैं, फिर इस अग्निकी तो बा या है ? उसके प्रकाशमान होते हुए ही सब कुछ प्रकाशित होता है और 'काशसे ही यह सारा जगत् भासता है ॥ १५ ॥ न तत्र तस्मिन्स्वात्मभूते ब्रह्मणि सर्वावभासकोऽपि सूर्यो भाति तद्ब्र काशयतीत्यर्थः। तथा न चन्द्रतारकं नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमस्मद् गोचरोऽग्निः। किं बहुना यदिदमादिकं सर्व भाति तत्तमेव परमेश्वरं प्यमानमनुभात्यनुदीप्यते । यथा जलोल्मुकाद्यग्निसंयोगादग्निं दहन हति न स्वतस्तद्वत्तस्यैव भासा दीप्त्या सर्वमिदं सूर्यादि विभाति । या वहाँ उस स्वरूप ब्रह्ममें सबका प्रकाशक होकर भी सूर्य प्रकाशित नहीं होता 'ह भी उस ब्रह्मको प्रकाशित नहीं करता। इसी प्रकार ये चन्द्रमा, तारे और भी प्रकाशित नहीं होते, फिर हमारी दृष्टिके विषय भूत इस अग्निका तो कह या है ? अधिक क्या कहा जाय ? यह सूर्य आदि जो सब प्रकाशित हो र [ब उस प्रकाशरूप परमात्मासे प्रकाशित होते हुए ही अनुदीप्त-अनुभासित हो र जस प्रकार जल और उल्मुक ( जलते काष्ठ ) प्रादि अग्निके संयोगसे अग्निके प्रज होते. ही अनुदहन-दहन करते हैं स्वयं नहीं, उसी प्रकार उसके प्रकाश-तेजसे दुर्यादि सब प्रकाशित होते हैं, क्योंकि ऐसा है, इसलिए वही ब्रह्म प्रकाशित ह और विशेषरूपसे प्रकाशित होता है। सर्वगत नानाप्रकारके प्रकाशसे उस सत्यानन्दीदीपिका यह मन्त्र आत्माको स्वयं ज्योति: स्वरूप कहता है, 'अत्रायं पुरुषः स्ययं ज सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म 'साक्षी चेता केवलो निर्गुणश्च' (श्वेता० ६।११) न तत्र चन्द्रार्कवायुः प्रकाशते न वान्ति वाताः सकला देवताश्च । स एव देवः कृतभावभूत! स्वयं विशुदो विरजः प्रकाशते ।। सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम् ।, ज्योतिषामपि तजयोतिस्तमस पर पदादित्यगतं तेजो जगद्भासयतेऽखिलम् । यच्चन्द्रमसि यच्चाग्नी तत्तेजो विद्धि मा [गी. 93191919-१५ -- व ब्रह्म भाति च विभाति च। कार्यगतेन विविधेन भासा तस्य ब्रह्मण पत्वं स्वतोऽवगम्यते । न हि स्वतोऽविद्यमानं भासनमन्यस्य कर्तुं शक्यम् दीनामन्यावभासकत्वादर्शनाद्भासनरूपाणां चादित्यादीनां तदर्शनात् ।१५ शङ्करभगवतः कृतौ कठोपनिषद् भाष्ये द्वितीयवल्लीभाष्यं समाप्तम् ।। २-२ ॥ शस्वरूपता स्वतः अवगत होती है, क्योंकि जिसमें स्वतः प्रकाश नहीं है व को प्रकाशित नहीं कर सकता। जैसे घटादिका अन्योंमें प्रकाशत्व नहीं देखा गय और प्रकाशरूप आदित्यादिका भन्योंको प्रकाशित करना देखा जाता है ।। १५ ॥ निषद्के द्वितीयाध्यायकी द्वितीयवल्लीके शाङ्करभाष्यका 'स्वामी सत्यानन्द सरस्वती कृत भाषानुवाद समाप्त ॥ २॥३॥ सत्यानन्दीदीपिका |ज चन्द्रामें और अग्निमें स्थित है वह तेज मेरा ही जान ) इत्यादि श्रुति स्मृति त्माको ज्ञानस्वरूप स्वयंप्रकाश प्रतिपादन करती हैं, इसलिए ब्रह्म सच्चिदानन्द है और वही सबका पात्मा है ।। १५ ।। कठोपनिषद्के द्वितीयाध्यायको द्वितीयवल्लीकी 'स्वामी सत्यानन्द सरस्वती' कृत 'सत्यानन्दीदीपिका' समात ।। २।२ ।। mmeerN - द्वितीयाध्यायस्य तृतीयावल्ली संसाररूप अश्वस्थवृक्ष पूलावधारणेनैव मूलावधारणं वृक्षस्य क्रियते लोके यथा, एवं संसारकार्य- धारणेन तन्मूलस्य ब्रह्मणः स्वरूपावदिधारयिषयेयं षष्ठी वल्ल थारभ्यते- ऊर्ध्वमूलोऽवाक्शाख एषोऽश्वत्थः सनातनः । तदेव शुक्रं तद्ब्रह्म तदेवामृतमुच्यते । तस्मिल्लोकाः श्रिताः सर्वे तदु नात्येति कश्चन । एतद्वै तत् ।१। कमें जैसे तुल-कार्यका निश्चय करनेसे ही वक्षके मलका निvar fixmr PRO एषः ( संसारवृक्षः ) अश्वत्थ अवमूला ( ऊध्वं मूलं यस्य सः ) अवाक्शार धोवत्तियः शाखा: विस्तारो यस्य सः) सनातनः (अनादिप्रवाहरूपः ) त म् इत्याग्रंशः पूर्ववत् ॥ १॥ ऊपरकी भोर मूल तथा नीचेकी अोर शाखाओंवाला यह संसाररूप अश्वत्थवृ तन-अनादि है । वही विशुद्ध ज्योतिः स्वरूप है, वही ब्रह्म है और वही अमृत क T है, सब लोक उसके आश्रित हैं, कोई भी उसका अतिक्रमण नहीं कर सकता, य 'य वह (ब्रह्म ) है ॥१॥ ऊर्ध्वमूल ऊर्ध्वं मूलं यत्तद्विष्णोः परमं पदमस्येति सोऽयमव्यक्तादिस्थ न्तः संसारवृक्ष ऊर्ध्वमूलः। वृक्षश्च व्रश्चनात् । जन्मजरामरणशोकाद्य र्थात्मकः प्रतिक्षणमन्यथास्वभावो मायामरीच्युदकगन्धर्वनगरादिवदृष्टन पत्वादवसाने च वृक्षवदभावात्मकः कदलीस्तम्भवनिःसारोऽनेकशतपार बुद्धिविकल्पास्पदस्तत्त्वविजिज्ञासुभिरनिर्धारितेदंतत्त्वो वेदान्तनिर्धारि ह्ममूलसारोऽविद्याकामकाव्यक्तबीजप्रभवोऽपरब्रह्मविज्ञानक्रियाशक्तिद्वर हिरण्यगर्भाङ्कुरः सर्वप्राणिलिङ्गभेदस्कन्धस्तृष्णाजलाबसेकोद्भूतद श्रुतिस्मृतिन्यायविद्योपदेशपलाशो .. न्द्रियविषयप्रवालाङ्कुरः यज्ञदा ऊर्ध्व ( ऊपरकी ओर ) अर्थात् जो वह विष्णुका परम पद है वही इस है ऐसा यह अव्यक्तसे स्थावरपर्यन्त संसार वृक्ष 'ऊर्ध्व मूल' है, इसका 'बश्च ' होनेके कारण यह वृक्ष कहा जाता है। जो जन्म, जरा, मरण, शोक प्रादि अरे रूप प्रतिक्षरण अन्यथाभावको प्राप्त होनेवाला, माया-मृगतृष्णाके जल में निगरादिके समान दृष्ट-नष्ट-स्वरूप होनेसे अन्त में वृक्षके समान प्रभावरूप बाला, केलेके खम्भके समान निःसार और सैकड़ों पाखण्डियोंकी बुद्धि के विकल्पों प है। तत्व जिज्ञासुओद्वारा जो 'तत्त्व' 'इदम्' रूपसे अनिर्धारित है, वेदार रित परब्रह्म ही जिसका मूल और सार है, जो अविद्या, काम, कर्म और अव्यक्तर और क्रिया ये दो शक्तिरूप अपर-ब्रह्मरूप हिरण्यगर्भ अंकुरवाला है बीज प होनेवाला अर्थात् ज्ञान, क्रिया ये दो शक्तियोंवाला हिरण्यगर्भ जिसका अङ्कुर नाणियोंके लिङ्गशरीर विशेष ही जिसके स्कन्ध ( शाखामूल ) हैं, जो तृष्णारूप नसे वृद्धिको प्राप्त तेजवाला, ज्ञानेन्द्रियों के विषय-शब्द, स्पर्श, रूप, रसादिरूप नूत सत्यानन्दीदीपिका कार्य अवश्य कारण मूलक होता है, ऐसा नियम है। जैसे शाल्मली आदि तूर - ML आचनकाक्रयासुपुष्पः सुखदुःखवेदनानेकरसः प्राण्युपजीव्यानन्तफलस्त- सलिलावसेकारूढजड़ीकृतदृढबद्धमूलः सत्यनामादिसप्तलोकब्रह्मादि- क्षिकृतनीडः प्राणिसुखदुःखोद्भूतहर्षशोकजातनृत्यगीतवादिवत्वेलि- टितहसिताक्रुष्टरुदितहाहामुञ्चमुचेत्याद्यनेकशब्दकृततुमुलीभूतमहारवो तविहितब्रह्मात्मदर्शनासङ्गशस्त्रकृतोच्छेद एष संसारवृक्षोऽश्वत्थोऽ- वत्कामकर्मवातेरितनित्यप्रचलितस्वभावः, स्वर्गनरकतिर्यक्रेतादिभिः भिरवाक्शाखः; सनातनोऽनादित्वाचिरं प्रवृत्तः । के अङ्कुरोंवाला, श्रुति, स्मृति, न्याय और ज्ञानोपदेशरूप पत्तोंवाला, यज्ञ, दान, आदि अनेक क्रिया-कलापरूप सुन्दर पुष्पोंवाला । सुख, दुःख और वेदनारूप विविध युक्त प्राणियोंकी भाजीविकारूप अनन्त फलोंवाला तथा फलोंके तृष्णारूप जलके से वृद्धिको प्राप्त हुए और [ सात्त्विक आदि भावोंसे ] मिश्रित एवं दृढतापूर्वक [ कर्मवासनादिरूप अवान्तर ] मूलोंवाला है, ब्रह्मादि पक्षियोंने जिसपर सत्य ( भूः भुवः स्वः महः जनः तपः और सत्यम् ) नामोंवाले सातलोकरूप घोंसले खे हैं, जो प्राणियोंके सुख दुःख जनित हर्ष शोकसे उत्पन्न नृत्य, गान, वाद्यक्रीडा टन ( खम ठोकना ) हंसी, प्राक्रन्दन रोदन, हाय हाय, छोड़ छोड़ इत्यादि प्रकारके शब्दोंकी तुमुलध्वनिसे अत्यन्त गुञ्जायमान हो रहा है तथा वेदान्तविहित क्य दर्शनरूप असङ्ग शस्त्रसे जिसका उच्छेद होता है ऐसा संसाररूप वृक्ष अश्वत्थ व अश्वत्थवृक्षके समान कामना और कर्मरूप वायुसे प्रेरित हुआ नित्य' चश्चल वाला है । स्वर्ग नरक तिर्यक् और प्रेत आदि शाखाओंके कारण नीचेकी पोर खात्रोंवाला है तथा सनातन-अनादि होनेके कारण चिरकाल से चला पा सत्यानन्दीदीपिका सूर्य के प्रचण्ड प्रकाशमें विद्यमान होते भी नक्षत्र स्थूल-दृष्टिवालको दृष्टिगोचर जे, वैसे ही स्थूल दृष्टिवालोंको भी सर्वत्र व्याप्त भारूप ब्रह्म अनुभवमें नहीं पाता, हं प्रकाश: सर्वस्य योगमायासमावृतः (गीता ७।२५ ) (अपनी योगमायासे हुआ मैं सबको प्रकाशित नहीं होता हूँ ) यह स्मृति भी है। अतः यहाँ कार्यसे | निश्चय करने के लिए इस वल्लोका प्रारम्भ है- वान् भाष्यकार संसारमें वृक्ष-शब्दकी प्रवृत्तिमें निमित्त कहते हैं-'वश्वनात्' पत्ति और 'नश्चूछेदने' इस धातुसे स प्रत्ययान्त वृक्ष शब्द निष्पन्न हुआ है । इससे रथ नाश होनेवाला है। माmran..
पदस्थ ससारवृक्षाव मूल तव शुक्र शुभ्र शुद्ध ज्यातष्मा ज्योतिःस्वभावं तदेव ब्रह्म सर्वमहत्त्वात् । तदेवामृतमविनाशस्व कथ्यते सत्यत्वात् । वाचारम्भणं विकारो नामधेयमनृतमन्यदतो तस्मिन्परमार्थसत्ये ब्रह्मणि लोका गन्धर्वनगरमरीच्युदकम् परमार्थदर्शनाभावावगमनाः श्रिता आश्रिताः सर्वे समस्ता उत्पत्तिस्थि तदु तद्ब्रह्म नात्येति नातिवर्तते मृदादिमिव घटादिकार्य कश्चदपि एतद्वै तत् ॥ १॥ यद्विज्ञानादमृता भवन्तीत्युच्यते जगतो मूलं तदेव नास्ति ब्रह्मा निःसृतमिति । तन्न- ब्रह्मज्ञानसे अमरत्वप्राप्ति यदिदं किंच जगत्सर्वं प्राण एजति निःसृतम् । महद्भयं वज्रमुद्यतं य एतद्विदुरमृतास्ते भवन्ति ॥ : इस संसार वृक्षका जो मूल है वही शुक्र शुभ्र-शुद्ध ज्योतिमय अर्थात् ज्योतिःस्वभाव है, वही सबसे महान होनेके कारण ब्रह्म है, वही सत्यस्वरु अमृत अर्थात् अविनाशी स्वभाववाला कहा जाता है। विकार वाणीका कि केवल नाममात्र है, अत: उस ब्रह्मसे भिन्न सब मिथ्था है और नाशवान है दर्शनके प्रभावसे प्रतीयमान गन्धर्वनगर, मरीचिकाजल और मायाके समान ये उत्पत्ति, स्थिति और लयदशामें उस परमार्थसत्यब्रह्ममें आश्रित हैं। हि घटादिकार्य मृत्तिका आदिका अतिक्रमण नहीं कर सकते, उसी प्रकार कोई भी ब्रह्मका अतिक्रमण नहीं कर सकता । निश्चय यही वह ( ब्रह्म ) है ।। १ ॥ शङ्का-जिसके विज्ञानसे अमर हो जाते हैं ऐसा जिसके विषय में कहा ज' जगत्का मूलभूत ब्रह्म तो वस्तुत: है ही नहीं, यह सब तो असत्से प्रादुर्भूत समाधान-ऐसा नहीं, [क्योंकि ] सत्यानन्दीदीपिका ग्रहण है । मायादिके समान प्रतिक्षण अन्यथा-स्वभाववाला है, क्योंकि इस प्रतीति होती है उत्तर कालमें नहीं, इससे संसारको मायादिके समान दृष्ट-न वाला कहा गया है। लोक प्रसिद्ध वृक्ष जैसे 'स्थाणुर्वा पुरुषो वा' : विकल्पास्पद है, वैसे यह संसार भी 'संघात है, परिणाम है वा प्रारब्ध है, सर मसत्' इत्यादि अनेक पाखण्ड-बुद्धिकी कल्पनाका विषय है । परन्तु 'व विकारो नामधेयं मृत्तिकेत्येव सत्यम' (छा0 x इत्यादि प्रतिमे तो av , ' तम् (उत्पन्न) एतत् प्राणाख्यं ब्रह्म महद् भयं ( भयानकम् ) उद्यत वत्रं (वमिव दुः ( जानन्ति ) ते अमृताः ( मुक्ताः) भवन्ति ॥ २ ॥ यह जो कुछ सारा जगत् है प्राण-ब्रह्मके अस्तित्वसे चेष्टा कर रहा है, उसीरे '-उत्पन्न है वह ब्रह्म महान् भयरूप और उठे हुए वनके समान है, जो इसे जानते अमर हो जाते हैं ॥ २॥ यदिदं किंच यत्किचेदं जगत्सर्वं प्राणे परस्मिन्ब्रह्मणि सत्येजति कम्पते रव निःसृतं निर्गतं सत्प्रचलति नियमेन चेष्टते। यदेवं जगदुत्पत्त्यादिकारणं तन्महद्भयम् । महञ्च तद्भयं च बिभेत्यस्मादिति महद्भयम् ; वज्रमुद्यत- मिव वज्रम् । यथा वनोद्यतकरं स्वामिनमभिमुखीभूतं दृष्ट्वा भृत्या नियमेन यह जो कुछ है-यह जो कुछ जगत् है वह सब प्राण परब्रह्मके होनेपर ही उसीस त-उत्पन्न होकर एजन-कम्पन-गमन अर्थात् नियमत: चेष्टा कर रहा है। इस प्रकार म जगत्की उत्पत्ति आदिका कारण है वह महान् भयरूप है, इससे सब भय हैं, इसलिए वह 'महद्भय' है 'वज्रमुद्यतम्' उठाये हुए वनके समान है, भाव यह जिस प्रकार अपने सामने स्वामीको हाथमें वज्र उठाये देखकर सेवक लोग [नुसार उसकी प्राज्ञामें प्रवृत्त होते रहते हैं। उसी प्रकार चन्द्रमा, आदित्य, ग्रह सत्यानन्दीदीपिका कार्यका शून्यपर्यन्त नाश होता है, अतः असत् पूर्वक ही इसका जन्म है, इससे का मूलभूत ब्रह्म नहीं है, 'तद्धक प्राहुरसदेवेदमन आसीदेकमेवाद्वितीय तस्मादसतः त' (छा० ६।२।१ ) ( कोई कहते हैं कि पहले यह एक अद्वितीय असत् ही था, सत्से सत् उत्पन्न हुआ है ) यह श्रुति है। इस शङ्काको 'यद्विज्ञानात्' से कहते : 'तन्न' इससे समाधान करते हैं। ह लोक प्रसिद्ध है कि गगनकुसुम, शशविषाण आदि असत् पदार्थोंसे कहीं भी दार्थकी उत्पत्ति नहीं होती किन्तु सत्से ही होती है, अतः सद्र प ब्रह्म जगतका पण है । 'कुतस्तु खलु सोम्यैव स्यादिति होवाच कथमसत; सजायतेति, सत्त्वेव मग्न प्रासीदेकमेवाद्वितीयम् । तदैक्षत बहुस्यां प्रजायेयेति' (छा०६।२।२३ ) लक हे श्वेतकेतु ! यह ऐसा कैसे हो सकता है, असत्से सत्की उत्पत्ति कैसे हो है ? हे सोम्य ! पहले यह एक अद्वितीय सत् ही था, उसने ईक्षण किया। बहुत 'त्पन्न होऊ ) 'नासतो विद्युते भावः' (गी०) इत्यादि अति, स्मृतिसे भी यही सिद्ध कि सद्रप ब्रह्मसे जगत्की उत्पत्ति होती है। 'सदेव सोम्येदमग्र प्रासीदेकमेवा. - - - Ham aurat राष्छासन वतन्त तथद् चन्द्राादत्यग्रहनक्षत्रतारकादिलक्षणं जगत्सेश्वर क्षणमप्यविश्रान्तं वर्तत इत्युक्तं भवति । ये एतद्विदुः स्वात्मप्रवृत्तिस मेकं ब्रह्मामृता अमरणधर्माणस्ते भवन्ति ।।२।। कथं तद्भयाज्जगद्वर्तत इत्याह- सर्वशासक परमेश्वर भयादस्याग्निस्तपति भयात्तपति सूर्यः । भयादिन्द्रश्च वायुश्च मृत्युर्धावति पञ्चमः ।। ३ ।। अग्निः अस्य (ब्रह्मणः ) भयात् तपति, सूर्यः भयात् तपति, [अस्य इन्द्रश्च, वायुश्च, पञ्चमा मृत्युः धावति ( स्वव्यापारं करोति ) ॥ ३ ॥ इस परमेश्वरके भयसे अग्नि तपति है, इसके भयसे सूर्य तपता है, ता भय से इन्द्र, वायु और पांचवां मृत्यु अपने अपने कार्यमें संलग्न रहते हैं ।। ११६ भयादीत्या परमेश्वरस्याग्निस्तपति भयात्तपति सूर्यो भयादिन्द्रश्च मृत्युर्धावति पञ्चमः। न हीश्वराणां लोकपालानां समर्थानां सतां नक्षत्र, तारा आदि रूप यह सारा जगत् अपने अधिष्ठाताओंके सहित एक { विधाम न लेकर नियमतः उसकी आज्ञामें वर्तता है। अपने अन्तःकरणको साक्षीभूत इस एक ब्रह्मको जो लोग जानते हैं वे अमरणधर्मा-अमर हो जाते हैं । उसके भयसे जगत् किस प्रकार व्यापारकर रहा है ? उसे कहते हैं- इस परमेश्रके भयसे अग्नि तपति है, इसके भयसे सूर्य तपता है तथा इसी इन्द्र, वायु और पञ्चम मृत्यु दौड़ता है। यदि ईशनशील समर्थं लोकपालोंका हा सत्यानन्दीदीपिका अक्षरस्य प्रशासने गागि! सूर्याचन्द्रमसौ विधृतौ तिष्ठतः' (बृह० ३१८६) (याज्ञव हे गार्गी ! इस अक्षर ब्रह्मके प्रशासनमें सूर्य और चन्द्रमा विधूत हुए स्थित है श्रुति ऐसा कहती है कि सब ब्रह्मके प्रशासन में रहते हैं । इस ब्रह्मको प्रत्यगभिन्न जानते हैं वे मुक्त हो जाते हैं ।। २ ।। जैसे एक साम्राज्यके राजप्रतिनिधिगण राजाज्ञा एवं राजनिर्मित नियम करनेके कारण राजपदसे च्युत तथा दण्डाह होते हैं, वैसे ही सूर्य आदि पदोंके अधीश्वरगण अपने पदसे च्युत न हों इसलिए सर्वशक्तिमान परमेश्वरके नियम तत्पर रहते हैं और कदापि उसका भङ्ग न हो इससे सर्वदा भयभीत रहते हैं। न ब्रांद्यतकरवन्न स्यात्स्वामिभयभीतानामिव भृत्यानां नियता प्रवृत्तिरुप ॥३॥ ब्रह्मज्ञानके विना पुनर्जन्मप्राप्ति तञ्च- इह चेदशकद्बोद्ध प्राक्शरीरस्य विस्रसः । ततः सर्गेषु लोकेषु शरीरत्वाय कल्पते ॥ ४ ॥ इह (अस्मिन् देहे ) चेत् ( यदि ) बोद्धम् ( अवगन्तुम् ) अशकत् ( शक्तो भवेत् ) 1 ] शरीरस्य विस्रसः (विसंतनात् पतनात् ) प्राक् (पूर्वमेव ) मुच्यते ( मुक्तो ) ततः ( अनवबोधादेव ) सर्गेषु ( लोकेषु ) शरीरत्वाय ( देहलाभाय ) 1 ॥४॥ दि इस देहमें इसके पतनसे पूर्व ही ब्रह्मको जानने में समर्थ हुआ तो संसार बन्धनसे जाता है और यदि नहीं जान पाया तो जन्ममरण-शील लोकोंमें वह शरीर- प्राप्त होने में समर्थ होता है ।। ४ ।। ह जीवन्नेव चेद्यधशकच्छक्नोति शक्तः सञ्जानात्येतद्धयकारणं ब्रह्म मवगन्तुं प्राक्पूर्व शरीरस्य विस्त्रसोऽवस्रंसनात्पतनासंसारबन्धनाद्वि- '। न चेदशकद्वोढुं ततः अनवबोधात्सर्गेषु सृज्यन्ते येषु स्रष्टव्याः रखनेवाले [ इन्द्र ] के समान कोई नियन्ता न होता तो स्वामीसे भीत हुए सेवकोंके उनकी नियमित कार्य प्रवृत्ति नहीं होती ।। ३ ।। र उस ( भयके कारण स्वरूप ब्रह्म ) को- दे इस देहमें अर्थात् जिवित रहते ही शरीरका पतन-मरण होनेसे पूर्व साधक सूर्यादिके भयके हेतुभूत ब्रह्मको जानने में समर्थ हुआ तो वह संसार बन्धनसे जाता है और यदि उसे जानने में असमर्थ रहा तो उसका ज्ञान न होने के कारण सत्यानन्दीदीपिका लदाता यम है, इसकी राजधानी पितृलोकमें है। ये देवगण समर्थ होते भी भयसे नियमत: अपने अपने कार्य में रत रहते हैं। इस विषयमें- महासत्त्वाः स्वतन्त्रा। बाहुशालिनः । यस्य भीत्या प्रवर्तन्ते स्वे स्वे कर्मणि भृत्यवत् । भी है ।। ३ ।। वेदीदथ सत्यमस्ति न चेदिहावेदीन्महती विनष्टिः ( केन० २।५ ) ( सर्वो- - "ब , बाय कल्पते समर्थो भवति शरीरं गृहातीत्यर्थः। तस्माच्छरीरविप्रेसन गात्मबोधाय यत्न आस्थेयः॥४॥ यस्मादिहैवात्मनो दर्शनमादर्शस्थस्येव मुखस्य स्पष्टमुपपद्यते न लोकान्तरे लोकादन्यत्र, स च दुष्प्रापः, कथम् ? इत्युच्यते- स्थानभेदसे ब्रह्मदर्शनमें तारतम्य पथादर्श तथात्मनि यथा स्वप्ने तथा पितृलोके । पथाप्सु परीव ददृशे तथा गन्धर्वलोके छायातपयोरिव ब्रह्मलोके ।। पादर्श ( दर्पणे ) [ मुखं ] यथा दृश्यते, आत्मनि ( बुद्धौ) [ परमात्मा ] तर ददृशे ( परिदृश्यते ) स्वप्ने यथा पितृलोके तथा। अप्सु ( जले ) यथा गन्धर्वलो परिददृशे ईव ब्रह्मलोके छायातपयोः ( प्रकाशान्धकारयोः ) इव [ प्रात्मानात्मन भवति ] ॥५॥ प्रकार दर्पणमें उसी प्रकार निर्मल बुद्धिमें आत्मा का स्पष्ट दर्शन होता है और जैस में वैसा ही पितृलोकमें, और जैसा जलमें वैसा ही गन्धर्वलोकमें उसका [अस्पष्ट होता है, किन्तु ब्रह्मलोकमें तो छाया और प्रकाशके समान वह [ सर्वथा स्प भूत होता है ॥ ५॥ सोंमें जिनमें स्रष्टव्य प्राणियोंकी रचना की जाती है उन पृथिवी आदि लोकों रत्व-शरीरभावको प्राप्त होने में समर्थ होता है अर्थात् शरीर ग्रहण करता है, य है । अत: शरीरपातसे पूर्व ही प्रात्मज्ञानके लिए यत्न करना चाहिए ।। ४ ।। क्योंकि जिस प्रकार दर्पणमें मुखका प्रतिबिम्ब स्पष्ट पड़ता है उसी प्रकार इ. पदेहमें ही प्रात्माका दर्शन स्पष्ट उपलब्ध हो सकता है, वैसा दर्शन ब्रह्मलोकर कर अन्य किसी लोकमें नहीं हो सकता और वह ब्रह्मलोक दुष्प्राप्य भी है, सो कि र ? इसपर कहते हैं- सत्यानन्दीदीपिका रूपसे नहीं जाना तो उसने अपना महान् विनाश किया अर्थात् पुनः पुना विवि ायोंमें जाकर विविध क्लेशोंका भागी होता है ) वस्तुतः इस पुण्यमय मनुष्य शरी रहत्त्व तभी है जब प्रात्मतत्वका अनुभव करे, भोग इस जीवनका मुख्य उद्देश है वह तो विवध योनियोंमें प्राप्त ही है, 'ये के चात्महनो जनाः' ( ईश०३ ) य वाक्य आत्माको न जाननेवालोंको आत्मघाती कहता है। अत: आत्मतत्त्वक हाशा ना सपना आदर्शवन्निर्मलीभूतायां विवक्तमात्मनो दर्शनं भवतीत्यर्थः । यथा- विविक्तं जाग्रद्वासनोद्भूतं तथा पितृलोकेऽविविक्तमेव दर्शनमात्मनः लोपभोगासक्तत्वात् । यथा चाप्सु अविभक्तावयवमात्मरूपं परीव ददृशे यत इव तथा गन्धर्वलोकेऽविविक्तमेव दर्शनमात्मनः । एवं च लोकान्त- शास्त्रप्रामाण्याद्वगम्यते । छायातपयोरिवात्यन्तविविक्तं ब्रह्मलोक एवै- इस प्रकार लीग दर्पणमें प्रतिबिम्बभूत अपने आपको अत्यन्त स्पष्टरुपसे देखते हैं कार दर्पणके समान प्रतिनिर्मलीभूत अपनी बुद्धि में प्रात्माका स्पष्टरुपसे दर्शन ऐसा अभिप्राय है। जैसे स्वप्नमें जाग्रद्वासनाभोंसे प्रकट हुआ दर्शन अस्पष्ट धैसे ही पितृलोकमें भी अस्पष्ट आत्मदर्शन होता है, क्योंकि वहाँ जीव कर्मफलके में आसक्त रहता है । जिस प्रकार जल में अपना स्वरूप अविभक्तावयव सा दिखलाई देता है उसीप्रकार गन्धर्वलोकमें भी अस्पष्टरुपसे ही आत्माका होता है । शास्त्रप्रमाणसे अन्यलोकोंमें भी ( ऐसा ही अस्पष्ट पात्त्मदर्शन होता है ) एकमात्र ब्रह्मलोकमें ही छाया और प्रातप-अन्धकार काशके समान वह आत्मदर्शन अत्यन्त स्पष्टरूपसे होता है, किन्तु अत्यन्त - सत्यानन्दीदीपिका करणके अवस्थाभेदसे और लोकोंके भेदसे इस मन्त्र में चार अवस्थाओंका या गया है । प्रथम-दर्पणके साथ बुद्धिकी अवस्था का उदाहरण दिया गया जितना मलिन व स्वच्छ होता है तदनुसार ही उसमें प्रतिबिम्बित वस्तु देती है, उसी प्रकार बुद्धि भी जितनी प्रावरणरहित होती है उतना ही त्माका स्वरुप प्रकाशित होता है, विषयमलसे मलिन बुद्धिमें आत्मज्योति: रहती है । दूसरा उदाहरण स्वप्न और पितृतोकका है-जिसप्रकार स्वप्नमें पकी विस्मृति रहती है वैसे पितृलोकमें भी, क्योंकि वहाँ भी वासनाओंसे व कर्मफलोपभोगमें आसक्त होता है। तीसरी अवस्था जल और गन्धर्व दाहरणसे कही गई है-जिस प्रकार जलमें सूर्यादिका प्रतिबिम्ब स्पष्ट दिखलायी । वैसे ही गन्धर्वादि लोकोंमें मानन्दस्वरूप प्रात्मा वैषयिक-सुखसे मिश्रित में आता है स्पष्टरूपसे नहीं, चौथा उदाहरण छाया और पातपके सम्बन्धसे दिया गया है, जैसे अन्धकार और प्रकाश अतिस्पष्ट अनुभवमें पाते हैं, वैसे ब्रह्मलोकमें प्रात्मा और अनात्मका प्रतिस्पष्ट अनुभव होता है. परन्त बद्र 1-41 पुसायन्तापाशष्टकमज्ञानसाध्यत्वात् । तस्मादात्मदर्शन हिव यत्नः कर्तव्य इत्यभिप्रायः ॥५॥ कथमसौ बोद्धव्यः किं वा तवबोधे प्रयोजनमित्युच्यते-- आत्मज्ञानका प्रकार और प्रयोजन इन्द्रियारणां पृथग्भावमुदयास्तमयौ च यत् । पृथगुत्पद्यमानानां मत्वा धीरो न शोचति ॥ ६ ॥ पृथग उत्पद्यमानानां इन्द्रियाणां पृथग्भाव ( पात्मनो भिन्नत्वम् ) उदयास्तमयो , धीरः (धीमान् ) एतत् मत्वा ( ज्ञात्वा ) न, शोचति ( शोक न करोति ) ॥६. पृथक् पृथक् भूतोंसे उत्पन्न हुई इन्द्रियोंके जो विभिन्न भाव तथा उनकी उत्प र प्रलय हैं उन्हें जानकर बुद्धिमान पुरुष शोक नहीं करता ॥ ६ ॥ इन्द्रियाणां श्रोत्रादीनां स्वस्वविषयग्रहणप्रयोजनेन स्वकारणेभ्य आकश पृथगुत्पद्यमानानामत्यन्तविशुद्धात्केवलाचिन्मात्रात्मस्वरूपात्पृथग्भा भावविलक्षणात्मकतां तथा तेषामेवेन्द्रियाणामुदयास्तमयौ चोत्पत्तिप्रलर वत्स्वापावस्थापेक्षया नात्मन इति मत्वा ज्ञात्वा विवेकतो घीरो धीमान गष्ट कर्म और ज्ञान-उपासनासे साध्य होने के कारण वह ब्रह्मलोक तो दुष्प्राप्य अभिप्राय यह है कि इस मनुष्य शरीरमें ही प्रात्मदर्शनार्थ प्रयत्न करना चाहिये । उस आत्माको क्यों जानना चाहिए उसके जानने में क्या प्रयोजन है ? इसप Mea अपने-अपने ( शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध ) विषयोंका ग्रहणरूप प्रयोजन अपने कारणरूप आकाशादि भूतोंसे पृथक् पृथक् उत्पन्न होनेवाली श्रोत्रानि गोंका जो विशुद्धरूप केवल चिन्मात्र आत्मस्वरूपसे पृथक्त्व अर्थात् स्वाभाविक रणरूपता है उसे तथा जाग्रत् और स्वप्नकी अपेक्षा उन इन्द्रियोंके उदयास्तमय त और प्रलयको जानकर अर्थात् विवेक पूर्वक यह समझकर कि ये इन्द्रियोंकी सत्यानन्दीदीपिका करने चाहिए। 'प्रात्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यः' । २।४।५ ) इत्यादि श्रुति भी ऐसा ही कहती है ॥ ५ ॥ पाकाशदि पाँच भूतोंसे श्रोत्रादि इन्द्रियोंका उत्पत्तिक्रम यह है-पाकशसे धोत्र शब्द, वायुसे त्वक्-विषय स्पर्श, अग्निसे नेत्र-विषय रूप, जलसे रसना विषय रस, से घ्राण-विषय गन्ध, इस प्रकार इन्द्रिय उत्पन्न होती और अपने.. Farmire - आत्मनो नित्यैकस्वभावस्याव्यभिचाराच्छोककारणत्वानुपत्तेः। तथा रम् 'तरति शोकमात्मवित्' (छा०७२३) इति ॥ ६ ॥ दात्मन इन्द्रियाणां पृथग्भाव उक्तो नासौ बहिरधिगन्तव्यो यस्मा- । स सर्वस्य । तत्कथमित्युच्यते- इन्द्रियेभ्यः परं मनो मनसः सत्त्वमुत्तमम् । सत्त्वादधि महानात्मा महतोऽव्यक्तमुत्तमम् ॥ ७ ॥ त्यः मनः परं ( श्रेष्ठं ) मनसः [अपि ] सत्त्वं ( बुद्धिः ) उत्तमम्, महान् 'दधि ( अधिक: ) अव्यक्तं महतः उत्तमम्' ।। ७॥ से मन पर-उत्कृष्ट है, मनसे बुद्धि श्रेष्ठ है, बुद्धिसे महत्तत्व (हिरण्यगर्भ की द्धि ) अधिक है तथा महत्तत्त्वसे अध्यक्त उत्तम है ॥ ७॥ भ्यः परं मन इत्यादि । अर्थानामिहेन्द्रियसमानजातीयत्वादिन्द्रय- प्रात्माकी नहीं, धीर-बुद्धिमान् पुरुष शोक नहीं करता, क्योंकि नित्य एक आत्माका कभी व्यभिचार न होने के कारण शोकका कोई कारण कता। जैसा कि 'तरति०' (प्रात्मविद शोकको पार कर जाता है) ऐसी . त्मिासे इन्द्रियोंका पृथक्त्व कहा गया है वह कहीं बाहर है ऐसा चाहिए, क्योंकि वह सबका अन्तरात्मा है, सो किस प्रकार ? इसपर मन श्रेष्ठ है [ तथा मनसे बुद्धि श्रेष्ठ है ] इत्यादि । इन्द्रियोंके सजातीय का ग्रहण करनेसे अर्थों-विषयोंका भी ग्रहण हो जाता है। अन्य सब सत्यानन्दीदीपिका इन्द्रियाँ जाग्रदवस्थामें तो अपने अपने विषयका ग्रहण करती हैं किन्तु नहीं, अत: इनका व्यभिचार प्रसिद्ध है, परन्तु पात्मा सब अवस्थाओं में । उसका कहीं भी व्यभिचार नहीं है। शोकका कारण अविद्या मूलक विद्याकी ब्रह्मविद्यासे निवृत्ति होनेपर 'भिद्यते हृदयग्रन्थिः०' (मु० २।२।८) थ टूट जाती है ) इस प्रकार भेदबुद्धि के निवृत्त होनेसे शोकका अवसर 'तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यत: ( ईश० ३) ( ज्ञानावस्था, वाले उस ब्रह्मवित्को मोह कहाँ और शोक कहाँ अर्थात् एकत्वदर्शीको होते ) ऐसी श्रुति भी है ।।६।। भाभा..
हणेनैव ग्रहणम् । पूर्ववदन्यत् । सत्त्वशब्दाबुद्धिरिहोच्यते ।। ७ ।। अव्यक्तात्तु परः पुरुषो व्यापकोऽलिङ्ग एव च। यं ज्ञात्वा मुच्यते जन्तुरमृतन्व च गच्छति ॥ ८ ॥ व्यापकः अलिङ्गः एव पुरुषा तु (पुनः) भव्यक्तात् च (अपि) पर। G मनुष्यः) यं (पुरुष) ज्ञात्वा (अधिगम्य ) मुच्यते (मुक्तो भवति ) अमृत अमरत्वं ) च अधिगच्छति ( प्राप्नोति ) ॥८॥ अव्यक्तसे पुरुष श्रेष्ठ है, वह व्यापक तथा अलिङ्ग है । जिसे जानकर मनुष्य ' जाता है और अमृतत्वको प्राप्त हो जाता है ।। ८ ।। अव्यक्तात्तु परः पुरुषो व्यापको व्यापकस्याप्याकाशादेः सर्वस्य कार त् । अलिङ्गो लिङ ग्यते गम्यते येन तल्लिङ्ग बुद्धथादि तदविद्यमानमस् वित्' (कठ० १।३।१० के समान ) समझना चाहिए। सत्त्व शब्दसे यहाँ बुद्धि ती है ॥ ७॥ मव्यक्त से भी पुरुष श्रेष्ठ है, वह भाकाशादि सब व्यापक पदार्थोंका भी कारण हो पिक है। अलिङ्ग है-जिसके द्वारा कोई वस्तु जानी जाती है वह बुद्धि आदि नि जाते हैं, परन्तु वह पुरुषमें विद्यमान नहीं है, इसलिए वह अलिङ्ग ही है मर सत्यानन्दीदीपिका इन्द्रियोंसे श्रेष्ठ है । मनसे बुद्धि अन्तर और सूक्ष्म है, बुद्धिसे महत्तत्त्व-हिरण्य पनप महान् पौर श्रेष्ठ है । इस प्रकार क्रमशः पूर्वसे पर श्रेष्ठ कहा गया है ।। ७ 'मात्मन माकाशः संभूतः (आत्मासे प्राकाश उत्पन्न हुआ) इत्यादि श्रुति पा प्राकाशादिका कारण कहती है, और 'सर्वगतश्च नित्यः' यह श्रुति ब्रह्मको सर्वव्या र नित्य कहती है। प्रकृति-मायाकी दो अवस्थाएं हैं-एक व्याकृत-व्यक्त और दूर पाकृत-अव्यक्त, प्रकृतिको व्यक्तावस्थाके ही बुद्धि, मन, इन्द्रियादि लिङ्ग-कार्य स ये सब प्रकृतिको विषमावस्थाके परिणाम हैं। मायाकी साम्यावस्था अव्याकृत 4 ती है, महाप्रलय में यह सारा जगत् मव्याकृतमें लय होता है अर्थात् जगत्की कार नाही अन्याकृत है। परिणामिनी होनेसे वह लिङ्गभावसे युक्त है। परन्तु । तीय सर्वव्यापक चिन्मात्र प्रात्मा लिङ्गभावसे रहित होनेके कारण मलिङ्ग दसुखदुःखादयः साश्रया गुणत्वाद् रूपवत्' (बुद्धि सुख दुःखादि साश्रय-प्रायव एरण होनेसे रूपके समान ) ऐसा वैशेषिक अनुमान करते हैं। साश्रयत्व मात्र सि ने में तो सिद्ध साधन दोष है, क्योंकि 'कामः सङ्कल्प:'..."सर्वं मन एव' आदि अ - यमलिङ्ग एव । सर्वसंसारधर्मवर्जित इत्येतत् । यं ज्ञात्वाऽऽचार्यत: शास्त्र- मुच्यते जन्तुरविद्यादिहृदयग्रन्थिभिर्जीवन्नेव पतितेऽपि शरीरेऽमृतत्वं च ति सोलिङ्गः परोऽव्यक्तात्पुरुष इति पूर्वेणैव सम्बन्धः॥८॥ कथं तबलिङ्गस्य दर्शनमुपपद्यत इत्युच्यते- न संदृशे तिष्ठति रूपमस्य न चक्षुषा पश्यति कश्चनैनम् । हृदा मनीषा मनसाभिक्लुप्तो य एतद्विदुरमृतास्ते भवन्ति ॥ ६ ॥ नस्य (पूर्वोक्तस्य प्रात्मनः ) रूपं ( स्वरूपं ) संदशे ( दर्शनविषये ) न तिष्ठति, }] कश्चन ( कोऽपि ) एनं ( पुरुष ) चक्षुषा न पश्यति । मनीषा (विकल्पहीनया) (हृदयस्थबुद्धया ) मनसा (मननेन-सम्यग्दर्शनेन ) अभिक्लुप्तः ( अभिप्रका- अभिज्ञातः भवति ) ये ( जनाः ) एतद् ( ब्रह्म) विदुः ( जानन्ति ) ते अमृताः ||६|| स भात्माका रूप दृष्टि में नहीं ठहरता, भत: उसे नेत्रसे कोई भी देख नहीं सकता। 'त्मा तो मनका नियमन करनेवाली हृदयस्थ बुद्धिद्वारा मननरूप सम्यग्दर्शनसे 'त हुभा ही ज्ञात हो सकता है। जो इसे [ ब्रह्मरूपसे ] जानते हैं वे अमर ।हैं ॥ ६ ॥ संसार धर्मोसे रहित है। जिसे शास्त्र और प्राचार्य द्वारा जानकर पुरुष जीवित [मविद्या आदि हृदयकी प्रन्थियोंसे मुक्त हो जाता है तथा शरीरका पात होनेपर रत्वको प्राप्त हो जाता है वह पुरुष अलिङ्ग है और भव्यक्तसे भी पर है। इस इसका पूर्ववाक्यसे ही सम्बन्ध है ॥ ८ ॥ * फिर इस पलिङ्ग मात्माका दर्शन कैसे संभव होगा ? सो कहा जाता है- सत्यानन्दीदीपिका कहनेवाली श्रुतिसे विरोध होगा और आत्माके साथ बुद्धि मादिका अविनाभाव हीं है, अतः आत्मा निर्गुण निष्क्रिय होनेसे अलिङ्ग है। 'तद्विज्ञानार्थं स गुरुमेवा- ' (मुण्ड० १।१२) इत्यादि श्रुति शास्त्र और भाचार्यसे प्राप्त तत्त्वज्ञानसे हृदयप्रन्थिः' विद्या मादि हृदयकी ग्रन्थि टूट जाती है । ब्रह्मव भवति' (मुण्डक० ३।६) 'अत्रैव ब्रह्म समथु ते' सदा मुक्तः कृतार्थों ब्रह्मवित्तमः । उपाधिनाशाद्ब्रह्म व सन् ब्रह्माप्येति निर्वयम् ॥ वेऽप्यभिमानहानाद्ब्रह्मात्मविद्ब्रह्म भवेन्न चान्यः । 'अभितो ब्रह्मनिर्वाण दितात्मनाम्' (गीता २६ ) 'शरीररूप उपाधि विमान am - -- - न सहश सदशनावषय न तष्टात प्रत्यगात्मनाऽस्य रूपम् । अतो. सर्वेन्द्रियेण, चक्षुर्ग्रहणस्योपलक्षणार्थत्वात्, पश्यति नोपलभते कश्चन प्येनं प्रकृतमात्मानम । कथं तर्हि तं पश्येदित्युच्यते । हृदा हृत्स्थया मनीषा मनसः सङ्कल्पादिरूपस्येष्टे नियन्तृत्वेनेति मनीट तया हृदा म कल्पयित्र्या मनसा मननरूपेण सम्यग्दर्शनेन अभिक्लृप्तोऽभिसा प्रकाशित इत्येतत् । आत्मा ज्ञातुं शक्यत इति वाक्यशेषः । । ब्रह्मतो विदुरमृतास्ते भवन्ति ॥ ६॥ इस प्रत्यगात्माका रूप संदर्शन-दृष्टिके विषय में स्थिर नहीं होता, अत: को प्रत्यगात्माको चक्षुस-सब इन्द्रियोंसे अर्थात् सभी इन्द्रियोंमेंसे किसीसे भी नहीं देर उपलब्ध नहीं कर सकता। यहाँ चक्षु ग्रहण अन्य सभी इन्द्रियोंका उपलक्ष [अतः चक्षु इन्द्रियके ग्रहणसे सभी इन्द्रियोंका ग्रहण है ] तो फिर उसे कि देखे ? इसपर कहते हैं-हृदा-हृदयस्थ बुद्धिसे, जो सङ्कल्पादिरूप मनकी नियन ईशन करने के कारण 'मनीट' है । उस विकल्प शून्य बुद्धिसे मन अर्थात् मननरूर दर्शन ( जीवब्रह्मक्यज्ञान ) द्वारा सब प्रकार समर्पित-अभिप्रकाशित हुआ व जाना जा सकता है, यह वाक्यशेष है, उस प्रात्माको जो लोग 'यह ब्रह्म जानते हैं वे अमर हो जाते हैं ।। ६ ।। सत्यानन्दीदीपिका 'कथं तहि दर्शनमुपपद्यते' तब उस प्रत्यगात्माका दर्शन कैसे हो सकता है प्रश्नकर्ताका अभिप्राय विषयरूपसे दर्शन है अथवा अविषयरूपसे ? प्रथम तो' से कहते हैं । 'प्रशब्दमस्पर्शमरूपमव्ययं..." (क० १।३।५ ) आदि श्रुति । रूपादि रहित कहती है, अतः रूपादि पांचो गुणोंसे प्रतीत प्रात्मा चक्षु आदि । ग्रहण योग्य नहीं है । द्वितीय विकल्पको 'कथं तर्हि' से कहते हैं । चक्षु आदि बा समुदाय उपरत होनेपर जब मन विषयोंका संकल्प करता है तब मुमुक्षुकी बुद्धि नियन्त्री होती है-हे मन ! किसलिए तू पिशाचके समान इतस्तता दौड़ता है, विषय तथा जड़ हैं, अतः उनसे अभीष्ट प्रयोजन सिद्ध नहीं हो सकता, इसलिए विषय शून्य 'ब्रह्मास्मि' इस प्रकार प्रविषयरूपसे ही ब्रह्मभावको अभिव्यक्त करनेवार ब्रह्मास्मि' 'तत्त्वमसि' इत्यादि महावाक्योंसे उत्थ बुद्धि-वृत्तिसे प्रत्यगात्मस्वरूप सकता है । मुझसे देखे जानेवाले जैसे बाह्य घटादि मैं नहीं हूँ वैसे ही शरीर आदि भी दृश्य होनेके कारण मैं नहीं हूँ, किन्तु सबका साक्षी चेतन हूँ, ऐसा निश्चर वाला अमर हो जाता है 'तमेवं ज्ञात्वा विद्रांस वामता भवनि' ..
सा हन्मनोंद कथं प्राप्यत इति तदर्थो योग उच्यते-- यदा पश्चावतिष्ठन्ते ज्ञानानि मनसा सह । बुद्धिश्च न विचेष्टति तामाहुः परमां गतिम् ॥ १० ॥ यदा पञ्च ज्ञानानि ( इन्द्रियाणि ) मनसा स अवतिष्ठन्ते (विषयेभ्य व्यावृत्त र्मुखतया तिष्ठन्ति ) बुद्धिः च न विचेष्टते (विषयव्यापार न करोति ) तां पर गतिम । ( वदन्ति ) ॥१०॥ जिस समय पांचों ज्ञानेन्द्रियाँ मनके साथ [आत्मामें ] स्थित हो जाती हैं और भी चेष्टा नहीं करती उस अवस्थाको परम गति कहते हैं ॥१०॥ यदा यस्मिन्काले स्वविषयेभ्यो निवर्तितान्यात्मन्येव पञ्च ज्ञानानि-ज्ञानार्थ- छोत्रादीनीन्द्रियाणि ज्ञानान्युच्यन्ते, अवतिष्ठन्ते सह मनसा यदनुगतानि संकल्पादिव्यावृत्तेनान्तःकरणेन, बुद्धिश्चाध्यवसायलक्षणा न विचेष्टति स्व- गरेषु न विचेष्टते न व्याप्रियते तामाहुः परमां गतिम् ॥ १० ॥ वह हृदयस्थित सङ्कल्प शुन्य बुद्धि कैसे प्राप्त होती है ? इसके लिए योगसाधन जाता है। जिस समय अपने अपने विषयोंसे निवृत्त हुई पाँचों ज्ञानेन्द्रियाँ-ज्ञानार्थक होने के धोत्र आदि इन्द्रियाँ 'ज्ञान' कही जाती हैं, मनके साथ अर्थात् जिसका अनुवर्तन हैं उस सङ्कल्पादि व्यापारसे निवृत्त हुए अन्तःकरण सहित पात्मामें स्थिर हो हैं पौर निश्चयात्मिका बुद्धि भी अपने व्यापारोंमें चेष्टा नहीं करती-व्यायार नहीं उस अवस्थाको परम गति कहते हैं ॥ १० ॥ सत्यानन्दीदीपिका दान्त वाक्योंके श्रवण करनेपर भी। जिनमें 'अहं ब्रह्मास्मि' इस प्रकार स्थिर बुद्धि खी जाती, इससे यह सिद्ध होता है कि उनमें कोई प्रतिबन्धक है, उसकी के लिए 'सा हुन्मनीट' प्रादिसे उपायान्तर कहते हैं- दान्तके श्रवण, मननसे यद्यपि प्रमेय विषयक असंभावना निवृत्त हो चुकी है फिर तके पने काग्रतारूप दोष प्रतिबन्धकके निवृत्त्यर्थ अनुष्ठेय योगका उपदेश किया है। 'ज्ञायतेऽनेनार्थ इति ज्ञानम्' ( जिससे विषय ज्ञात होता है) इस करण- - .
तां योगमिति मन्यन्ते स्थिरामिन्द्रियधारणाम् । अप्रमत्तस्तदा भवति योगो हि प्रभवाप्ययौ ॥ ११ ॥ ताम् ( उक्तलक्षण ) स्थिरां ( निश्चलाम् ) इन्द्रियधारणा 'योगम्' इति मन्या अप्रमतः (प्रमादरहितः ) भवति । हि ( यस्मात् ) योगः प्रभवाप्ययो ( उ। पायधर्मको) भवति ।। ११ ॥ उस स्थिर इन्द्रियधारणाको ही योग कहते हैं। उस समय पुरुष 'प्रमादरहित ता है, क्योंकि योग उत्पत्ति और लय धर्मवाला है ॥ ११ ॥ तामीहशीं तदवस्थां योगमिति मन्यन्ते वियोगमेव सन्तम् । सर्वानर्थसंय योगलक्षण हीयमवस्था योगिनः । एतस्यां ह्यवस्थायामविद्याध्यारोपणवा वरूपप्रतिष्ठ आत्मा। स्थिरामिन्द्रियधारणां स्थिरामचलामिन्द्रियधार प्रान्तःकरणानां धारणमित्यर्थः । अप्रमत्तः प्रमादवर्जितः समाधानं प्र यं यत्नवांस्तदा तस्मिन्काले यदैव प्रवृत्तयोगो भवतीति सामर्थ्यादवगम्य उस ऐसी अवस्थाको जो वस्तुत: वियोग ही है योग मानते हैं, क्योंकि योगीकी था सब प्रकारके अनर्थसंयोगकी वियोगरूपा है। इस अवस्थामें ही पात्मा विद्य रोपसे रहित अपने स्वरूपमें प्रतिष्ठित रहता है। उस अवस्थाको ही स्थिर इति पा कहते हैं। स्थिर-अचल इन्द्रियधारण अर्थात् बाह्य भौर आन्तरिक करणोंका चार ऐसा मर्थ है । तब साधक पुरुष अप्रमत्त-प्रमादरहित अर्थात् चित्त समाधानके प्र 'सर्वदा सयत्न रहता है, जिस समय कि वह योगमें प्रवृत्त होता है [ उस सा स्थिति होती है ] ऐसा वाक्यकी सामर्थ्यसे अवगत होता है, क्योंकि बुद्धि प्रादि। सत्यानन्दीदीपिका सर्वानर्थ के वियोगको ही विश्वलक्षणासे योग कहा गया है । जैसे बाध घटा 'मैं नहीं हूँ' वैसे देहादि संघात में भी जो जो विषय है वह 'मैं नहीं हूँ' किन्तु इ समुदायका साक्षी सर्वगत प्रत्य गभिन्न ब्रह्म मैं हूँ ऐसी ब्रह्माकारवृत्ति संपाद चाहिए। यदि कदाचित् विषयोंसे चित्त विक्षिप्त हो तो उसे विषयदोष दर्शन त करे। न्द्रयार्थेषु वैराग्यमनहकार एव च । जन्ममृत्युजराव्याधिदुःखदोषानुदर्शनम् ॥ T० १३१८) ऐसा गीतावचन भी है । विषयोंसें व्यावृत्त मन यदि रागा हो तो वह उसकी कषायावस्था है। उससे निरुद्ध चित्त न जागता न सोता व्यावस्थावाला और न रसस्वादयुक्त केवल ब्रह्मावभासरूपसे जब क्षीर । rafarm for द्वयादिचेष्टाभावे प्रमादसंभवोऽस्ति । तस्मात्प्रागेव बुह्म थादिचेष्टोपर- दो विधीयते । अथवा यदैवेन्द्रियाणां स्थिरा धारणा तदानीमेव निरङ्कुश- वमित्यतोभिधीयतेऽप्रमत्तस्तदा भवतीति । कुतः ? योगो हि यस्मात्प्र- गवुपजनापायधर्मक इत्यर्थोऽतोऽपायपरिहारायाप्रमादः कर्तव्य इत्यभि- ११॥ थादि चेष्टाविषयं चेद् ब्रह्मदं तदिति विशेषतो गृह्येत बुद्धथाद्युपरमे च रणाभावादनुपलभ्यमानं नास्त्येव ब्रह्म । यद्धि करणगोचरं तदस्तीति लोके विपरीतं चासदित्यतश्चानर्थको योगोऽनुपलभ्यमानत्वाद्वा नास्ती- व्यं ब्रह्मेत्येवं प्राप्त इदमुच्यते-सत्यम् , आत्मोपलब्धिका साधन सद्बुद्धि ही है नैव वाचा न मनसा प्राप्तुं शक्यो न चक्षुषा । अस्तीति ब्रुवतोऽन्यत्र कथं तदुपलभ्यते ॥ १२ ॥ वषयमें चेष्टाका मभाव हो जानेपर प्रमादका संभव नहीं है, अत: बुद्धि मादिकी परत होनेसे पूर्व ही अप्रमादका विधान किया जाता है अथवा जिस समय [ धारणा स्थिर होती है उसी समय निरङ्कुश अप्रमत्तत्व होता है, इस कारण मय अप्रमत्त होनेका विधान किया जाता है, क्योंकि योग भी प्रभव और त्ति और लयरूप धर्मवाला है, अतः भाव यह है कि अप्यय-लयकी निवृत्तिके द करना चाहिए अर्थात् योगीको प्रमादरहित होना चाहिए, ऐसा अभि- ११ ॥ ब्रह्म बुद्धि आदिकी चेष्टाका विषय होता तो 'यह ब्रह्म है' ऐसा विशेषरूपसे 'T, किन्तु बुद्धि प्रादिके उपरत हो जानेपर तो उसे ग्रहण करनेके कारणका से उपलब्ध न होता हुमा वह ब्रह्म है ही नहीं, क्योंकि लोकमें जो वस्तु र होती है वह 'है' ऐसी प्रतीतिका विषय होती है और इसके विपरीत- र वस्तु 'सत्' कही जाती है, अत: योग अनर्थक-व्यर्थ है अथवा उपलम्य- से ब्रह्म 'नहीं है' ऐसा जानना चाहिए, ऐसा प्राप्त होनेपर यह कहा जाता -- - सत्यानन्दीदीपिका शरो ह्यात्मा ब्रह्मतल्लक्ष्यमुच्यते । अप्रमत्तेन वेदव्यं शरवन्तन्मयो भवेत् ॥ माणे तु विघ्नान्यायान्ति वै बलात् । अनुसन्धानराहित्यमालस्यं भोगलालसम् ।। विक्षेपस्तेजा स्वेदाश्च शुन्यता । एवं विघ्नबाहुल्यं त्याज्यं ब्रह्मविशारदः।। M.
' पाचा ( शब्दन ) न एव, मनसा (अन्तःकरणेन )न, चक्षुषा न प्राप्तुं ( क्यः । 'मस्ति' इति ब्रुवतः ( आत्मास्तित्ववादिनः ) अन्यत्र ( नास्तिकवादिनि प्रात्मस्वरूपं ) कथम् उपलभ्यते ॥ १२ ॥ यह आत्मा न तो बाणीसे, न मनसे और न नेत्रसे प्राप्त किया जा सकता है है ऐसा कहनेवालोंसे अन्यत्र भिन्न पुरुषोंको कैसे उपलब्ध हो सकता है ? ॥ १२ नैव वाचा न मनसा न चक्षुषा नान्यैरपीन्द्रियैः प्राप्तुं शक्यत इत्य थापि सर्वविशेषरहितोऽपि जगतो मूलमित्यवगतत्वादस्त्येव कार्यप्रविला यास्तित्वनिष्ठत्वात् । तथा हीदं कार्य सूक्ष्मतारतम्यपारम्पर्येणानुगम्य बुद्धिनिष्ठामेवावगमयति । यदापि विषयप्रविलापनेन प्रविलाप्यमाना । तदापि सा सत्प्रत्ययगर्भंव विलीयते । बुद्धिर्हि नः प्रमाणं सदसतोर्याथा गमे। मूलं चेज्जगतो न स्यादसदन्वितमेवेदं कार्यमसदित्येवं गृह्यत न त्वेतर सदित्येव तु गृह्यते; यथा मृदादिकार्य घटादि मृदाद्यन्वितम् । तस्माज्ज यद्यपि वह ब्रह्म न तो वाणीसे, न मनसे न नेत्रसे और न अन्य इन्द्रियोंसे किया जा सकता है, यह तात्पर्य है। तथापि सर्वविशेष रहित होता भी त्का मूल है' ऐसा अवगत होनेसे वह है ही, क्योंकि कार्य का विलय अस्तित्व होता है। इसीप्रकार सूक्ष्मताकी तारतम्यपरम्परासे अनुगत होनेवाला यह काय बुद्धि निष्ठाको ही अवगत कराता है। जब भी विषयविलय करते बुद्धिका विलय । ता है उस समय भी वह सत्प्रत्यय गभिता हुई ही लीन होती है । तथा सत् तुका यथार्थ स्वरूप जानने में तो हमारे लिए बुद्धि ही प्रमाण है। यदि जगर न होता तो यह कार्यवर्ग असदन्वित हुआ 'असत् है' ऐसा गृहीत होता, परन्तु सत्यानन्दीदीपिका शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध इन पाँच विषयोंका ज्ञान क्रमशः श्रोत्र, त्वका । भोर घ्राण इन्द्रियोंसे होता है। ब्रह्म शब्दादिसे रहित है, अत: वह श्रोत्र । इन्द्रिय गृहौत नहीं होता, 'अशब्दमस्पर्शमरूपमव्ययं तथारसं नित्यमगन्धवञ्च र 5० ३।१५) इत्यादि श्रुति भी ब्रह्ममें शब्दादिका निषेध करती है। इससे । पता नहीं है ऐसा नहीं कहा जा सकता, क्योंकि घटादिस्थूल कार्यका विलय होने ह सूक्ष्म कारणरूपसे विद्यमान है। उसका विलय होनेपर उससे भी सूक्ष्मकारण रकार सूक्ष्म तारतम्यपरम्परासे अनुभूयमान कार्यका विलय ही पुरुषके लिए सद्बु , mary WIKitnaयम् । परमात् । अत्तातिशुपतास्तववादित माग सारिणः श्रद्दधानादन्यत्र नास्तिकवादिनि नास्ति जगतो मूलमात्मा निर- वेदं कार्यमभावान्तं प्रविलीयत इति मन्यमाने विपरीतदर्शिनी कथं । तत्त्वत उपलभ्यते न कथञ्चनोपलभ्यत इत्यर्यः॥१२॥ मादपोह्यासद्वादिपक्षमासुरम्- अस्तीत्येवोपलब्धव्यस्तत्त्वभावेन चोभयोः । अस्तीत्येवोपलब्धस्य तत्त्वभाव: प्रसीदति ॥ १३ ॥ भयोः (सोपाधिकनिरुपाधिकयो! ) तत्त्वभावेन ( तत्त्वरूपेण) अस्ति ( सत्.) उपलब्धव्यः 'अस्ति' इति ( एंवम् ) उपलब्धस्य ( ज्ञातस्य ) तस्वभाव। ।।१३। इ पात्मा 'है' इस प्रकार ही उपलब्ध किया जाना चाहिए तथा उसे तत्त्वमावसे रना चाहिए। इन दोनों प्रकारकी उपलब्धियोंमेंसे जिसको 'है' इस प्रकारको व हो गयी है, तत्त्वभाव उसके अभिमुख हो जाता है ।। १३ ॥ स्तीत्येवात्मोपलब्धव्यः सत्कार्यो बुद्धथाधुपाधिः । यदा तु तद्रहितोऽवि- ही है, यह जगत् 'है' इस प्रकार गृहीत होता है, अत: 'जगत्का मूल पात्मा है' लिब्ध करना चाहिए । क्यों ? क्योंकि प्रात्मा 'है' इस प्रकार कहनेवाले शास्त्रा- प्रद्धालु आस्तिक पुरुषोंसे भिन्न नास्तिकवादियोंको जो ऐसा मानते हैं कि जगतका मा नहीं है, यह कार्यवर्ग कारणसे अनन्वित-असम्बद्ध हुमा प्रभाव पर्यन्त लीन । है ऐसे उन विपरीत दर्शियोंको वह ब्रह्म किस प्रकार तत्त्वतः उपलब्ध हो : ? अर्थात् किसी प्रकार भी उपलब्ध नहीं हो सकता है ।। १२ ।। 2 असद्वादियोंके प्रासुरीपक्षका निराकरणकर- -उपलभ्यमान कार्य बुद्धि आदि उपाधिवाले पात्माको 'है' इस प्रकार ही सत्यानन्दीदीपिका विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः' ( गी० २।१६ ) यह स्मृति वचन भी । कार्य जगत्का विलय ब्रह्म तक होता है, इससे वह लय सद्ब्रह्मनिष्ठ है । 'जो हि असत् है जैसे स्वप्न दृश्य' इस व्याप्तिदर्शनसे अस्तित्वेन सब दृश्य असत सकी सद्बुद्धि भी नहीं होगी ऐसी शङ्काका निवारण 'यदापि' से करते हैं । में सद्बुद्धि भी नहीं है ऐसा प्रत्यय अवश्य स्वीकार करना चाहिए, अन्यथा 'वहार नहीं होगा। इसलिए अन्ततोगत्वा सद्बुद्धि स्वीकार करनी चाहिए । . - zrfarerfira tam a . unाना ग५ प कार च्यातरकरण नास्ति वाचारमण विकारा मृत्तिकेत्येव सत्यम्' (छा० ६।१।४) इति श्रुतेस्तदा यस्य निरुपा लिङ्गस्य सदसदादिप्रत्ययविषयत्ववर्जितस्यात्मनः तत्त्वभावो भवति तेन त्मोपलब्धव्य इत्यनुवर्तते । तत्राप्युभयोः सोपाधिकनिरुपाधिकये तत्त्वभावयोःनिर्धारणार्थी षष्ठी-पूर्वमस्तीत्येवोपलब्धस्यात्मनः सत्का कृतास्तित्वप्रत्ययेनोपलब्धस्य इत्यर्थः । पश्चात्प्रत्यस्तमितसोपाधिरूप नस्तत्त्वभावो विदिताविदिताभ्यामन्योऽद्वयस्वभावः 'नेति नेति' (बृह ६।२६) इति 'अस्थूलमनण्वह्रस्वम्' (बृह ३८८) 'अदृश्येऽनात्म्येऽनुः उपलब्ध करना चाहिए। जिस समय प्रात्मा इस बुद्धि प्रादि उपाधिसे । निर्विकार जाना जाता है तथा कार्यवर्ग 'विकार वाणीका विलास और नाम केवल मृत्तिका ही सत्य है' इस श्रुतिके अनुसार अपने कारणसे भिन्न नहीं निश्चित होता है, उस समय जिस निरुपाधिक अलिङ्ग सदसद् आदि प्रतीतिके हि रहित प्रात्माका तत्त्वभाव होता है। उस तत्त्वस्वरूपसे ही आत्माको उपलब चाहिए इस प्रकार यहाँ 'उपलब्धव्य' पदकी अनुवृत्ति की जाती है । सोपाधिक और निरुपाधिक तत्त्वभाव इन दोनोंमेंसे यहाँ 'उभयोः' इस पदमें षष्ठी निर्धारण है, पहले तो 'है' इस प्रकार उपलब्ध हुए आत्माका अर्थात् सत्कार्यरूप उपाधि हुए अस्तित्व प्रत्ययसे उपलब्ध हुए आत्माका पश्चात निवृत्त हुए सम्पूर्ण उपा जो ज्ञात एवं अज्ञातसे भिन्न अद्वितीय स्वरूप है, उसे 'नेति नेति' ( यह नहीं यह अस्थूलम०' ( जो न स्थूल न भरा और न ह्रस्व है ) 'अदृश्ये.' (जो अ अनात्म्य में, अनिर्वचनीयमें आधार रहितमें ) इत्यादि श्रुतियोंसे निर्दिष्ट अ तत्त्वभाव प्रसीदति-अभिमुख होता है अर्थात् जिसे पहले 'है' इस प्रकार प्र सत्यानन्दीदीपिका लोकमें प्रत्येक पदार्थ अस्ति, भाति, प्रिय, नाम और रूपसे दृष्टिगोचर होता है प्रथम तीन सबमें अनुस्यूत होनेसे आत्मस्वरूप हैं और अन्तिम नाम, रूप दोनों हैं और उनमें व्यभिचार निश्चित है, अत: जगद्रूप नाम, रूप मिथ्या है । उन प्रथम नी पहले 'पात्मा अस्ति' 'पात्मा है' ऐसा निश्चय होता है पश्चात् भाति और । उनुभूति होती है अर्थात् प्रात्माका यथार्थस्वरूप सत्-चित्-प्रानन्द है। इस f सत्यं ज्ञानमनन्तं बह्म' 'अयमात्मा ब्रह्म सर्वानुभूः 'सिद्धान्तोऽध्यात्मशास्त्राणां सव' व हि । नाविद्यास्तीह नो माया शान्तं ब्रह्मेदमक्लयम् ॥ इत्यादि श्रुति भी है। नुभूति तो निरुपाधिक अद्वितीय चिन्मय प्रात्मतत्त्वसे होती है। सोपाधिक बटा तो - मयं मस्तीत्युपलब्धवत् इत्येतत् ॥ १३ ॥ अमर कब होता है ? परमार्थदर्शिनो:- यदा सर्वे प्रमुच्यन्ते कामा येऽस्य हृदि श्रिताः । प्रथ मोऽसृतो भवत्यत्र ब्रह्म समश्नुते ॥ १४ ॥ । (विदुषा,) हृदि श्रिताः ( अन्तःकरणगताः) सर्वे कामाः ( वासना ) यदा मथ (अनन्तरं ) माः ( मरणशीलः मनुष्यः) अमृतो ( मुक्तो) अस्मिन् देहे ) ब्रह्म समश्नुते ( भवति ) ॥ १४ ॥ । समय इसके हृदय आश्रित सब कामनाएं छूट जाती हैं, उस समय वह र हो जाता है और इस शरीरसे ही ब्रह्मभावको प्राप्त हो जाता है । १४ ।। । यस्मिन्काले सर्व कामाः कामयितव्यस्यान्यस्याभावात्प्रमुच्यन्ते विशी- ऽस्य प्राक्प्रतिबोधाद्विदुषो हृदि बुद्धौ श्रिता आश्रिताः। बुद्धिर्हि कामा- यो नात्मा । 'कामः संकल्पः' (बृह० १॥५॥३) इत्यादिश्रुत्यन्तराञ्च । हो गई है उसे अपना स्वरूप अभिव्यक्त करने के लिए यह तत्त्वभाव अभिमुख- होता है ।। १३ ॥ प्रकार परमार्थदर्शीकी- -जिस समय सब कामनाएं कामनायोग्य अन्य पदार्थका प्रभाव होने के कारण की हैं छिन्न भिन्न हो जाती हैं, जो कि तत्त्वज्ञान होनेसे पूर्व इस विद्वान्के हृदय- पाश्रित रहती हैं, क्योंकि बुद्धि ही कामनाओंका प्राश्रय है आत्मा नहीं, कारण r: सङ्कल्प:"[ यह सब मन ही है ] इत्यादि अन्य श्रुति भी है । तब फिर जो सत्यानन्दीदीपिका गोंके विचारमें हेतु है। सोपाधिक ब्रह्म उपास्य है और निरुपाधिक ब्रह्म ज्ञेय के ज्ञानसे मुक्ति संभव है, इसमें 'ऋते ज्ञानान्न मुक्तिः 'ज्ञानादेव तु कैवल्यम्' अति प्रमाण है ॥ १३ ॥ प्राप्ति और अनिष्ट निवृत्ति के लिए ही कामना उत्पन्न होती है। तत्त्वबोधसे यही समझता है कि इष्टकी प्राप्ति इष्ट पदार्थकी प्राप्तिसे और अनिष्टकी निवृत्ति दार्थके निवृत होनेसे होती है, अत: उनकी प्राप्ति और परिहारके लिए बाह्य प्रवृत्ति और निवृत्ति करता है। परन्तु जब इष्ट प्राप्तिका सही साधन-मात्मैकत्व .. Rane नानपावादासात्स प्रबाधात्तरकालमविद्याकामक णस्य मृत्योर्विनाशादमृतो भवति । गमनप्रयोजकस्य मृत्योर्विनाशाद्गम पत्तरत्रेहैव प्रदीपनिर्वाणवत्सर्वबन्धनोपशमाद् ब्रह्म समश्नुते ब्रह्म व तीत्यर्थः ॥ १४॥ कदा पुनः कामानां मूलतो विनाश इत्युच्यते- यदा सर्वे प्रभिद्यन्ते. हृदयस्येह ग्रन्थयः । अथ मोऽमृतो भवत्येतावद्धयनुशासनम् ॥ १५ ॥ इह ( देहे ) सर्वे ग्रन्थय! यदा प्रभिधन्ते (विनश्यन्ति ) अथ ( तदा ) मृतः ( मुक्तः ) भवति । एतावत् हि ( एव ) अनुशासनम् (उपदेशः) ॥ १५ ॥ जिस समय इस जीवन में ही इसके हृदयकी सभी अस्थियोंका भेदन हो जार स समय यह मरणधर्मा जीव अमृत हो जाता है, बस सभी वेदान्तोंका इता पदेश है ।। १५॥ यदा सर्वे प्रभिद्यन्ते भेदमुपयान्ति विनश्यन्ति हृदयस्य बुद्धेरिह जीवत न्थयो अन्थिवद् दृढबन्धनरूपा अविद्याप्रत्यया इत्यर्थः । अहमिदं शरीरं । 'त्मसाक्षात्कारसे पूर्व मरणधर्मा था वह जीव आत्मज्ञान होनेके अनन्तर अलि मना और [ यज्ञादि ] कर्मरूप मृत्युका नाश हो जानेसे अमर हो जाता है । पर गमनके प्रयोजक मृत्युका विनाश हो जानेसे वहाँ गमन असंभव होने के कारण । देहमें दीप-निर्वाणके समान सभी बन्धनोके उपशान्त-नष्ट हो जानेसे ब्रह्मभा र हो जाता है अर्थात् ब्रह्म ही हो जाता है ।। १४ ।। परन्तु कामनामोंका मूलतः विनाश कब होता है ? इसपर कहते हैं- जिस समय जीवित रहते ही इसके हृदयकी-बुद्धिकी सब प्रन्थियाँ-प्रन्थिके सा ति बन्धनरूप पविद्याजनित प्रतीतियाँ छिन्न भिन्न होती-भेदको प्राप्त होती-वि सत्यानन्दीदीपिका पोपासककी सभी कामनाएँ शान्त हो जाती हैं और ब्रह्मस्वरूप हो जाता है, 'ब्रह्मा 'व भवति' ऐसी श्रुति है । 'कामा येऽस्य हुदि श्रिताः' यह श्रुति वाक्य वैशेषिक अ का खण्डन करता है जो प्रात्माको कामनाओंका पाश्रय मानते हैं, 'कामः सङ्कर कित्सा श्रद्धाऽश्रद्धा धृतिरतिह्रींर्धी रित्येतत्सवं मन एव (बृह० ११५॥३ मन्य श्रुति भी ऐसा कहती है कि ये सब मनकी वृत्तियाँ हैं' ॥ १४ ॥ यापिकामr mea - दुःखी चाहमित्येवमादिलक्षणास्तद्विपरीतब्रह्मात्मप्रत्ययोपजननाद् स्म असंसारीति विनष्टेष्वविद्याग्रन्थिषु तन्निमित्ताः कामा मूलतो । अथ मोऽमृतो भवत्येतावद्धचेतावदेवतावन्मानं नाधिकमस्ती- कर्तव्या। अनुशासनमनुशिष्टिरुपदेशः सर्ववेदान्तानामिति वाक्य- ॥ शेषविशेषव्यापिब्रह्मात्मप्रतिपत्त्या प्रभिन्नसमस्ताविद्यादिग्रन्थे वत स्य विदुषो न गतिविद्यत इत्युक्तमत्र ब्रह्म समश्नुत इत्युक्तत्वात् । णा उत्क्रामन्ति ब्रह्मव सन्ब्रह्माप्येति (बृह ४।४।६) इदि श्रुत्यन्त- यह अर्थ है-'यह शरीर मैं हूँ' यह धन मेरा है, मैं सुखी हूँ, दुःखी हूँ' रके अनुभव अविद्या प्रत्यय हैं। उसके विपरीत ब्रह्मात्मभावके अनुभवको असंसारी ब्रह्म हूँ' ऐसे तत्त्वज्ञान द्वारा विद्याजनित ग्रन्थियों के विनष्ट हो मित्तक कामनाएं भी मलतः नष्ट हो जाती हैं, तब वह मर्त्य भमर हो । इतना ही सम्पूर्ण वेदान्तोंका उपदेश है, . इससे अधिक कुछ और है ऐसी करनी चाहिए । यहाँ 'सर्ववेदान्तानाम्, यह वाक्यशेष है ॥ १५ ।। सम्पूर्ण गुण क्रिया आदि विशेषोंका प्रभाव है उस सर्वव्यापक ब्रह्मको मान लेने के कारण जिसकी अविद्या प्रादि समस्त ग्रन्थियाँ नष्ट हो गयी हैं में ही ब्रह्मभावको प्राप्त हुए ऐसे विद्वानका कहीं गमन नहीं होता, ऐसा है, क्योंकि 'अत्र ब्रह्म समश्नुते' (कठ० ६.१४ ) ( इस शरीर में ही स हो जाता है ) ऐसा कहा गया है । 'न तस्य.' ( उस ब्रह्मवित्के प्राण करते, वह ब्रह्मवित् हुआ ही ब्रह्ममें लीन हो जाता है) यह अन्य श्रुति जो मन्द ब्रह्मज्ञानी हैं और अन्यविद्या-उपासनाका परिशीलन करनेवाले के अधिकारी हैं अथवा जो उनसे विपरीत जन्ममरणरूप संसारके भागी सत्यानन्दीदीपिका त्मा और अन्तःकरण आदि अनास्मा इन धर्मियों और इनके धर्मोका गो अन्योन्यमें तादात्म्याध्यास है, वही चिजड़ग्रन्थि है । पन्थिश्छिद्यन्ते सर्वसंशया। क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन्दृष्टे परावरे ।। )(उस ब्रह्मका साक्षात्कार होनेपर उस ब्रह्मवित्की अविद्या और तजनित हो जाती है, प्रात्मविषयक सभी संशय निवृत्त हो जाते हैं और कर्म चाय पुनमन्दब्रह्माचदा विद्यान्तरशालिनश्च ब्रह्मलाकभाजा य च तात ताः संसारभाजस्तेषामेव गतिविशेष उच्यते प्रकृतोत्कृष्टब्रह्मविद्याफलस्तुतरे चान्यदग्निविद्या पृष्टा प्रयुक्ता च । तस्याश्च फलप्राप्तिप्रकारो वक्तव्य इ न्त्रारम्भः। तत्र- शतं चैका च हृदयस्य नाड्यस्तासां मूर्धानमभिनिःसृतैका । तयोर्ध्वमायन्नमृतत्वमेति विष्वड्डन्या उत्क्रमणे भवन्ति ॥१ हृदयस्थ शतं च एका च ( एकोत्तरशतं ) नाड्यः [ सन्ति ] तासां ( मध्ये ) ए गनिमभि (प्रति) निःसृता (मूर्द्ध पर्यन्तंगता) तया ऊर्ध्वम् मायन् ( गच्छन् ) अमृता ते । मन्याः ( शतनाज्यः ) विष्वगुत्क्रमणे ( लोकान्तरगमनाथं ) भवन्ति ॥१६॥ इस हृदयकी एक सौ एक नाड़ियाँ हैं, उनमें से एक मूर्धाका भेदनकर बाहर कली है, उसके द्वारा ऊर्ध्व-ऊपरकी अोर गमन करनेवाला पुरुष अमरत्वको प्र ता है । शेष विभिन्न गति युक्त नाड़ियाँ उत्क्रमण-प्राणोत्सर्गमें हेतु होती हैं । १६ शतं च शतसंख्याका एका च सुषुम्ना नाम पुरुषस्य हृदयाद्विनिमृता नाइ रास्तासां मध्ये मूर्धानं भित्त्वाभिनिःसृता निर्गता सुषुम्ना नाम । तया ले हृदय आत्मानं वशीकृत्य योजयेत् । तया नाड्योर्ध्वमुपर्यायन्गच्छन्ना पद्वारेणामृतत्वममरणधर्मत्वमापेक्षिकम् । 'आभूतसंप्लवं स्थानममृतत्वं । उन्हीं की किसी गति विशेषका वर्णन यहाँ प्रकरण प्राप्त ब्रह्मविद्याके उत्कृष्ट फर तिके लिए किया जाता है। इसके अतिरिक्त अग्निविद्याके विषयमें नचिकेताके पू । यमराजने उसका वर्णन किया और उस अग्निविद्याके फलकी प्राप्तिका प्र | कहना चाहिए, इस अभिप्रायसे इस मन्त्रका प्रारम्भ किया जाता है। वहाँ [क ह है कि-] पुरुषके हृदयसे सौ और सुषुम्ना नामकी एक इस प्रकार एक सौ एक नाहि पराएं निकली हैं। उनमें सुषुम्ना नामकी नाड़ी मूर्धाका भेदनकर निकली है। इ लमें उसके द्वारा प्रात्मा-मनको अपने हृदय देशमें वशीभूतकर समाहित करे । डीके द्वारा ऊर्ध्व-ऊपरकी ओर जाकर जीव प्रादित्यमण्डलके द्वारा अमृतत्व-मापे |मरणधर्मत्वको प्राप्त होता है, क्योंकि 'आभूतसंप्लवं.' ( सब भूतोंके क्षय-प्रलयप सत्यानन्दीदीपिका प्रकरण विच्छेद द्वारा उक्त सम्बन्धको 'निरस्ताशेष०' इत्यादिसे दिखलाते हैं- इडादि सौ और सुषुम्ना-ब्रह्मनाड़ी एक इस प्रकार एक सौ एक नाड़ी पुरुषके हृ शाश्रित होकर रहती हैं। एकोत्तरंनाडीशतं तस्य मध्ये परास्थिता । - COLATA त' (व० पु० २।८६७) इति स्मृतः। ब्रह्मणा वा सह कालान्तरेण ममृतत्वमेति भुक्त्वा भोगाननुपमान्ब्रह्मलोकगतान् । विष्वङ नानाविधः रोऽन्या नाड्य उत्क्रमणे निमित्त भवन्ति संसारप्रतिपत्त्यर्थी एवं भवन्ती- : ॥१६॥ इदानीं सर्ववल्ल्यर्थोपसंहारार्थमाह- प्रंगुष्ठमात्रः पुरुषोऽन्तरात्मा सदा जनानां हृदये संनिविष्टः । तं स्वाच्छरीरात्प्रवृहेन्मुजादिवेषीकां धैर्येण । २ विद्याच्छुक्रममृतं तं विद्याछुक्रमृतमिति ॥ १७ ॥ रङ्गुष्ठमात्रः पुरुषः अन्तरात्मा सदा जनानां (प्राणिनां) हृदये सन्निविष्टः (स्थितोऽ- मुखात ( तदाख्यतृणात् ) इषिका ( गर्भस्थदलम् ) इव स्वात् शरीरात् तं धैर्येण पृथक् कुर्यात् ) तं ( देहात् निष्कृष्टं ) शुक्रं ( शुद्धम् ) अमृतं विद्यात् नीयात् ) ॥ १७ ॥ गुष्ठमात्र पुरुष जो अन्तरात्मा है और सर्वदा प्राणियोंके हृदय देशमें स्थित है। सींकके समान उसे धैर्य पूर्वक अपने शरीरसे बाहर निकाले अर्थात् शरीरसे र अनुभव करे। उसे शुक्र शुद्ध और अमृतरूप जाने, उसे शुक्र और अमृत- ने ॥१७॥ ला स्थान अमृतत्व कहा जाता है ) ऐसी स्मृति भी है। अथवा ब्रह्मलोक स्थित भोगोंको भोगकर कालान्तरमें ब्रह्माके साथ मुख्य अमृतत्वको प्राप्त होता है । गतिवाली अन्य नाड़ियाँ केवल प्राण प्रयाणमें हेतु हैं अर्थात् वे संसार प्राप्तिके होती हैं ।। १६ ॥ सब वल्लियोंके अर्थका उपसंहार करनेके लिए कहते हैं: सत्यानन्दीदीपिका हो मूर्धाका भेदनकर निकली है। विद्वान् मरण समय अपने हृदयमें अन्त:- वशकर सुषुम्ना नाड़ी द्वारा मूलाधार आदि षट्चक्र भेदन पूर्वक ऊर्ध्व सहस्रार भी भेदनकर अपने अन्त:करणके साथ सूर्यद्वारा ब्रह्मलोकको प्राप्त होता है, क्षिक अमृतत्व है। सुषुम्ना नाड़ी द्वारा प्रयाण करनेवाले उपासककी यह गति कही षि नाडियाँ तो केवल प्रrm upm - * armer । - अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषोऽन्तरात्मा सदा जनानां सम्बन्धिनि हृद यथाव्याख्यातस्तं स्वादात्मीयाच्छरीरात्प्रवृहेदुद्यच्छेन्निकर्षेत्पृथक्कु किमिवेत्युच्यते मुजादिव इषीकामन्तःस्थां धैर्येणाप्रमादेन । तं श चिन्मानं विद्याद्विजानीयाच्छुक्रममृतं यथोक्तं ब्रह्मति । द्विवंचना समाप्त्यर्थमितिशब्दश्च ॥ १७ ॥ विद्यास्तुत्यर्थोऽयमाख्यायिकार्थोपसंहारोऽधुनोच्यते-- मृत्युप्रोक्तां नचिकेतोऽथ लब्ध्वा विद्यामेतां योगविधिं च कृ ब्रह्मप्राप्तो विरजोऽभूद्विमृत्युरन्योऽप्येवं यो विदध्यात्ममे मथ (अनन्तरं ) नचिकेत: मृत्युप्रोक्तां ( यमेन कथिताम् ) एतां योगविधि च लब्ध्वा ( अधिगम्य ) विरजा ( निर्दोषः ) विमृत्युः ( मृत्युर ब्रह्म प्राप्त: अभूत् । अन्योऽपि यः ( कश्चित् ) एवमध्यात्मम् एवंवित् (! मात्मानं वेत्ति-जानाति )।। १८ ।। मृत्यु-यमसे कही इस विद्या और सम्पूर्ण योगविधिको पाकर नचिकेता प्राप्तकर विरज-धर्माधर्म रहित और मृत्यु हीन हो गया । अन्य भी जो के तत्त्वको इस प्रकार जानेगा वह भी वैसा ही हो जायगा ॥ १८ ॥ मृत्युप्रोक्तां यथोक्तामेतां ब्रह्मविद्यां योगविधिं च कृत्स्नं समस्तं सफलमित्येतत् ; नचिकेता वरप्रदानान्मृत्योर्लब्ध्वा प्राप्येत्यर्थः, कि अङ्गुष्ठमात्र पुरुष-प्रगुष्ठपरिमाण पुरुष अन्तरात्मरूपसे सदा मनुष्य सन्निविष्ट-विद्यमान है, जिसकी व्याख्या पहले ( कठ० २।१।१२-१३ ) में उसे अपने शरीरसे बाहर करे ऊपर नियन्त्रित करे अर्थात् शरीरसे पृथक अर्थ है। किसकी तरह ? इसपर कहते हैं-धैर्य-अप्रमाद पूर्वक जैसे मूंजसे सींक निकाली जाती हैं। शरीरसे पृथक् किये उस अङ्गुष्ठमात्र पुरुषको चिन्मात्र विशुद्ध और अमृतमय ब्रह्म जाने । यहाँ 'तं विद्याच्छुक्रममृतम्' द्विरुक्ति और 'इति' शब्द उपनिषद्की समाप्तिके लिए हैं ॥ १७ ॥ अब विद्याकी स्तुतिके लिए यह आख्यायिकाके अर्थका उपसंहार किया। मृत्युसे कही हुई इस पूर्वोक्त ब्रह्मविद्या और सम्पूर्ण योगविधि उसके स फलसहित वरदानके कारण यमराजसे प्राप्तकर नचिकेता क्या हो गया? सत्यानन्दीदीपिका TITTS fire ऽभून्मुक्तोऽभवदित्यर्थः। कथम् ? विद्याप्राप्त्या विरजो विगतधर्माधर्म युर्विगत कामाविद्यश्च सन्पूर्वमित्यर्थः। न केवलं नचिकेता एवान्योऽपि केतोवदात्मविदध्यात्ममेव निरुपचरितं प्रत्यक्स्वरूपं प्राप्य तत्त्वमेवेत्यभि- ; नान्यद्रूपमप्रत्यग्रूपम् । तदेवमध्यात्ममेवमुक्तप्रकारेण वेद विजानातीत्ये- सोऽपि विरजः सन्ब्रह्मप्राप्त्या विमृत्युर्भवतीति वाक्यशेषः ॥ १८ ॥ शष्याचार्ययोः प्रमादकृतान्यायेन विद्याग्रहणप्रतिपादननिमित्तदोषप्रशम- शान्तिः उच्यते- ॐ सह नाववतु । सह नौ भुनक्तु । सह वीर्य करवावहै । तेजस्वि नावधीतमस्तु । मा विद्विषावहै ॥ १६ ॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः 'रमात्मा हम [प्राचार्य और शिष्य ] दोनोंकी साथ साथ रक्षा करे। दोनोंका साथ पालन करे। हम दोनों साथ साथ विद्याकृत सामर्थ्य संपादित-प्राप्त करें। नोंका किया हुमा अध्ययन तेजस्वी हो । हम परस्पर द्वेष न करें ।। १६ ।। ह नावावामवतु पालयतु विद्यास्वरूपप्रकाशनेन । कः ? स एव परमेश्वर बत्प्रकाशितः। किं च सह नौ भुनक्तु तत्फलप्रकाशनेन नौ पालयतु । वां विद्याकृतं वीर्य सामथ्र्य करवावहै निष्पादयावहै। किंच तेजस्विनी गया अर्थात् मुक्त हो गया । सो किस प्रकार ? [ कहते हैं-] विद्याकी प्राप्ति हले विरज-धर्माधर्म रहित और विमृत्यु-काम और अविद्यासे रहित हो [ मुक्त ] ऐसा तात्पर्य है। केवल नचिकेता ही नहीं प्रत्युत नचिकेताके समान अन्य मात्मवित् उपचार शून्य देहादिके अधिष्ठाता प्रत्यक्स्वरूपको प्राप्तकर यही तत्व रूप नहीं, क्योंकि वह प्रत्यग्रूप नहीं है ऐसा जानता है, ऐसा अभिप्राय है । प्रकारसे अपने उसी अध्यात्मरूपको जानता है, जो उसी प्रकार जाननेवाला है विरज' (धर्माधर्म रहित ) होकर ब्रह्मप्राप्ति द्वारा मृत्यु रहित हो जाता है, य शेष है ॥ १८ ॥ ध्य और प्राचार्य के प्रमादकृत अन्यायसे विद्याके ग्रहण और प्रतिपादनमें होनेवाले निवृत्तिके लिए अब यह शान्ति कही जाती है- बाके स्वरूप प्रकाशन द्वारा हम दोनोंकी साथ साथ रक्षा करे। कौन ? उप- प्रकाशित वह परमेश्वर ही। तथा उसके फल प्रकाशनसे वह हम दोनोंका साथ जन करे। हम दोनों अपने विद्याकृतवीर्य-सामर्थ्यका साथ साथ संपादन करें- सत्यानन्दीदीपिका - तेजस्विनोरावयोर्यदधीतं तत्स्वधीतमस्तु । अथवा तेजस्वि नावावाभ्यां तदतीव तेजस्वि वीर्यवदस्तु इत्यर्थः । मा विद्विषावहै शिष्याचार्यावन्योन्य कृतान्यायाध्ययनाध्यापनदोषनिमित्तं द्वेषं मा करवावहै इत्यर्थः शान्तिः शान्तिरिति त्रिर्वचनं सर्वदोषोपशमनार्थमित्योमिति ।। १६ ।। इति श्रीमदाचार्यशङ्करभगवतः कृतौ कठोपनिषाद्भष्ये द्वितीया वल्ली समाप्ता ।। ३ इति कठोपनिषदि द्वितीयोऽध्यायः समाप्तः ॥२॥ प्राप्त करें । हम दोनों तेजस्वियोंका जो अध्ययन किया हुआ है वह सुपठित हो, हम दोनोंका जो अध्ययन किया हुमा है वह अत्यन्त तेजस्वी-वीर्यवान हो यह । हम शिष्य और प्राचार्य परस्पर विद्वेष न करें अर्थात हम प्रमादकृत अन्यायसे । अध्यापनमें दोष निमित्त प्रन्योन्यसे द्वेष न करें ऐसा तात्पर्यार्थ है । 'शान्तिा शान्तिः' इस प्रकार शान्ति शब्दका तीन वार कथन आध्यात्मिकादि सब । शान्तिके लिए है, इत्योम् ।। १६ ।। कठोपनिषद्के द्वितीयाध्यायकी तृतीयवल्लीका 'स्वामी सत्यानन्द सरस्वती' कृत भाषानुवाद' समाप्त ।। २।३ ।। सत्यानन्दीदीपिका है । अचिरादि मार्गगन्य जो स्थान है उसकी प्राप्तिसे वह संयोग वियोगवाला है, उससे विमृत्यु नहीं होती ।। १८ ।। शून्यत्र्यम्बरनेत्रसंमिततमे संवत्सरे वैक्रमे पौषे मास्यसिते दले विधुदिने श्रीसोमवत्यां तिथौ काश्यां जह्नसुतातटे भगवतः शम्भोः प्रसादादियं सत्यानन्दसरस्वतीविरचिता व्याख्यागमत्पूर्णताम् ॥ १॥ सत्यानन्दीदीपिकया शाङ्करभाष्यभाषया । तनोतूद्भासिता ज्ञानं काठकोपनिषन्नृणाम् ।। २ ॥ कठोपनिषद्के द्वितीयाध्यायकी तृतीयवल्सीको 'स्वामी सत्यानन्द सरस्वती' कुत 'सत्यानन्दीदीपिका' समाप्त ॥ २॥३॥ समाप्तश्चायं ग्रन्थः उमाणका तीकानि मं० पृ पृ० 8 थिको भुवनम् ५ मात्रः पुरुषः 2 १२ ५ ३ १३ १७ ५. २८ २० ६ २५ ३ १ २ ५२ १४ ५ . जी १ १२८ २१ ५३ १५ २२ मन्त्रप्रतीकानि व० सं० १२२ एको वशी सर्वभूतान्तरात्मा ५ १२ एतच्छ त्वा संपरिगृह्य २ १३ १०८ एतत्तुल्यं यदि मन्यसे १५५ एतदालम्बन श्रेष्ठम् ૨ १७ एतद्धये वाक्षरं ब्रह्म २ १६ एष तेऽग्निर्नचिकेत: ११ एष सर्वेषु भूतेषु १२ कामस्याप्ति जगतः ११ जानाभ्यहरशैवधिः २ १०२ तमह कुमार सन्तम् ४३ तदेतदिति मन्यन्ते १४२ तमब्रवीत्प्रीयमाणः १६ तं दुर्दशै गूढम् २ १२ तां योगमिति मन्यन्ते ६ ११ १४६ तिस्रो रात्रीयंदवात्सी: 8 ११७ त्रिणाचिकेतस्त्रयम् ७४ त्रिणाचिकेतस्त्रिभिः १७ १३ दूरमेते विपरीते २ देवैरत्रापि विचिकित्सितम् १ २१ २२ ७५ न जायते म्रियते वा २ न तत्र सूर्यो भाति न नरेणावरेण २ १३७ न प्राणेन नापानेन ५ ५६ न वित्तेन तपरणीयः २७ ७ न संहशे तिष्ठति & न सांपरायः प्रतिभाति २ ६ १३१ नाचिकेतमपागा ६ नाममूतानाम् पीयान्महतः २ 'यथा पूर्व 'योऽन्यत् २ वर्मादन्यत्र २ नहितः ૨ I परः ६ पर्शम् शरीरेषु २ पलब्धव्यः ६ समानस्य ५ 'रथिनम् क्षे संगतम् १ रं व्रजति २ पृथग्भावम् ६ हयानाहुः ३ परं मनः परा ३ बोदुम् ६ ग्रत ३ वाजधवसः १ मुन्नयति ५ शाख ६ १ ३ २३ M २१ २८ ६ २६ ६० ४ ६ १२६ १० ४७ ११८ १ ६ १४३ ३ r १ 31 ir नित्योऽनित्यानाम् नैव वाचा न मनसा ६ नैषा तर्कण मति: २ पराचः कामाननुयन्ति पराञ्चि खानि व्यतृणत् ४ पीतोदका जग्धतृणा पुरमेकादशद्वारम् ५ प्र ते ब्रवीमि तदु १ बहूनामेमि प्रथमः १ भयादस्याग्निस्तपति ६ मनसैवेदमाप्तव्यम् ४ महतः परमव्यक्तम् ३ मृत्युप्रोक्तां नाचिकेत: ६ य इमं परमम् ३ य इमं मध्वदम् य एष सुप्तेषु जागति ५ यच्छेद्वाङ्मनसी ३ यतश्चोदेति सूर्यः यथादर्श तथा ६ यथा पुरस्ताद्भविता १ यथोदकं दुर्ग वृष्टम् ४ यथोदक शुद्ध शुद्धम् यदा पञ्चावतिष्ठन्ते ६ यदा सर्वे प्रभिद्यन्ते यदा सर्व प्रमुच्यन्ते यदिदं किंच जगत्सर्वम् ६ यदेवेह तदमुत्र यस्तु विज्ञानवान् ३ यस्त्वविज्ञानवान् ३ १८.१२७ यस्मिन्निदं विचिकित्सन्ति १ १२ १४७ यस्य ब्रह्म च क्षत्रं च २ है. ४१ यः पूर्व तपसः २ ९५ यः सेतुरीजानानाम् ९२ या प्राणेन संभवति ३ येन रूपं रसम् १२ येयं प्रेते विचिकित्सा १४ १६ ये ये कामा दुर्लभा: ५ १० योनिमन्ये प्रपद्यन्ते लोकादिमग्निम् ३ ११ १०६ वायुर्यथैको भुवनम् विज्ञानसारथिर्यस्तु ११ वैश्वानरः प्रविशति १८ १५६ शतं चैका च हृदयस्य ५ 88 शतायुषः पुत्रपौत्रान् शान्तसंकल्पः सुमनाः १२१ १३ श्रवणायापि बहुभिः १०३ श्रेयश्च प्रेयश्च श्वोभावा मत्य॑स्य ५ १३८ ११ . १६ स त्वमग्नि स्वग्यम् १४. १०६ स त्वं प्रियान्प्रियरूपाश्च... सर्वे वेदा यत्पदम् १५ ११६ १० १४५ सह नाववतु १५ १५२ स होवाच पितरम् १५१ सूर्यो यथा सर्वलोकस्य स्वप्नान्तं जागरितान्तम् २ स्वर्ग लोके न भयम् १०५ ६ हसः शुचिषद्वसुः ७७ ७८ हन्त त इदं प्रवक्ष्यामि ५ ७६ Sm हन्ता चेन्मन्यते