Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner
Dhyana Yoga
Front matter
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ध्यान की व्याख्या शब्दों द्वारा नहीं
हो सकती। अनुभव द्वारा इसका
आनद लिया जा सकता है। शब्दो
का काय है अनुभव के लिए प्रेरित
करना।
माईंड एड बॉडी रिसच सेंटर
का उद्देश्य है
मन तथा तन के छिपे हुए पहलुओ को
प्रकाश मे लाना।
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ध्यान योग
कुछ सरल विधियां
तन और मन को स्वस्थ और सुखी बनाने वाली
सुगम ध्यान साधना-विधिया
लेखक ।
दयानन्द वर्मा
ध्यान योग कुछ सरल विधिया (अध्यात्म)
दयानद वर्मा
प्रकाशक
माईंड एड बॉडी रिसर्च सेंटर (प्रकाशन विभाग)
W-21, ग्रेटर कैलाश पाट-1, नयी दिल्ली-110048
मुद्रक
दुर्गा मुद्रणालय, सुभाष पाक एक्सटेंशन
नवीन शाहदरा, दिल्ली-110032
प्रथम मुद्रण
1989
मूल्य 45 रुपये
DHYANA YOGA Kuchh Sarala Vidhiyan Spirituality
By Verma Dayanand First Print 1989
Rs 45/-
ISBN 81-90001912
पुस्तक के विषय म,7
ध्यान योग किसके लिए क्तिनी मात्रा
?
9
मन को प्रदूषण मुक्त कैसे करें? 17
'ध्यान' गिखर की और पाच पग बहिरग योग
विषय का सक्षिप्त परिचय, 31
पहला पग यम, 36
दूसरा पग नियम, 43
तीसरा पग आसन, 50
चौथा पग प्राणायाम, 60
पाचवा पग प्रत्याहार, 71
ध्यान की सहज विधि विपश्यना
विषय प्रवेश, 79
प्रथम सप्ताह की अभ्यास विधि, 82
दूसरे सप्ताह की अभ्यास विधि, 87
तीसरे सप्ताह की अभ्यास विधि, 93
सेल खेल मे ध्यान स्वर योग, 97
परिशिष्ट स्वाध्याय के सूत्र, 117
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पुस्तक के विषय में पतजलिकृत यागसूनो मे 'अष्टाग योग' की चर्चा हुई है । अष्टाग योग भारभिक पाच अग हैं यम, नियम, आसन, प्राणायाम और प्रत्याहार । इन पाच अगो को बहिरग' अर्थात योग के बाहरी अग कहा गया है। अतिम तीन अग है-धारणा, ध्यान और समाधि । इह आभ्यतर अर्थात् योग के भीतरी अग कहा गया है। बाहरी अग भीतरी अगो के लिए आधार- भूमि का निर्माण करते हैं। सामा य जन जष्टाग योग की साधना को कठिन मानते हैं। उनके लिए अलग अलग मत-मप्रदायो मे 'ध्यान' की अय विधिया भी बताई गई हैं। स्वय श्रीकृष्ण ने गीता मे अलग अलग प्रकृति के व्यक्तियो के लिए अलग-अलग प्रकार की योग-साधनाए बताई हैं। भक्तियोग, कमयोग तथा ज्ञानयोग की साधनाए व्यक्ति भेद के अनुसार अलग अलग प्रकार की साधनाए है। प्रस्तुत पुस्तक मे एक ओर 'बहिरग योग' से सवधित कुछ सूत्रो की आधुनिक व्याख्या प्रस्तुत की गई है, दूसरी ओर अय मत सप्रदायो मे प्रचलित ध्यान की सुगम साधनाए भी बताई गई हैं। कोई भी व्यक्ति साधना की इन विधियो मे स अपनी प्रवत्ति के अनुसार कोई विधि चुनकर अपने मन और तन को सुखी बना सकता है। पुस्तक के परिशिष्ट भाग मे 'स्वाध्याय के सूत्र' शीपक से कुछ विचार- कण सकलित किए गए हैं। ये विचारवण दृष्टिकोण का व्यापक बनाते हैं और व्यक्ति को आत्मविश्लेपण के लिए प्रेरित करते हैं । आत्मविश्लेषण करने वाले
8
व्यक्ति का डावाडोल मन स्थिर होता है और उसने लिए ध्यान-साधना सुगम
होती है।
आज के भाग-दौड से भरे वातावरण मे यह पुस्तक यदि व्यक्ति को अपने
भीतर झाकने के लिए प्रेरित कर सके तो इस पुस्तक का उद्देश्य सफल हो
जाएगा।
W-21, ग्रेटर कैलाश पाट-1
नयी दिल्ली-110048
-दयानद वर्मा
ध्यानयोग
किसके लिए कितनी मात्रा ?
'कला' कला के लिए या क्ला
जीवन के लिए?
साहित्य और कला के क्षेत्र का यह
ज्वलत प्रश्न ध्यान के क्षेत्र मे भी
उठता रहता है। उत्तर अगली
पक्तियों मे प्रस्तुत है।
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ध्यानयोग के बारे में सामान्य व्यक्ति की मान्यता यह है कि यह साधना सामा य व्यक्ति के बस की नहीं है । इस साधना मे डूबने वाले को घर-वार, जीविका-व्यापार सभी कुछ छोडना पडता है। ध्यानयोग के विषय मे आम आदमी के इस मत से यह प्रकट होता है कि इस क्षेत्र के सिद्धजनो ने योग का सामा यजनोपयोगी स्वरूप प्रचारित नहीं होने दिया है। ध्यानयोग सबधी भ्रातिया इस भ्रम का कारण पुराणो मे कथित ऐसी कहानिया हैं जिनके अनुसार तपस्या मे लीन एक टाग पर खडे योगी का शरीर सूखकर वृक्ष की एक शाखा जैसा बन गया या समाधिस्थ योगी के शरीर पर चीटियो ने वल्मीक (वाविया) बना दी। इस प्रकार की धारणाओ का फल यह हुआ है कि हमारा पूरा समाज 'योगी' और 'भोगी' इन दो भागो मे वटकर रह गया है और इन दोनो के मध्य मवाद की स्थिति नही रही है। अब पश्चिमी देशो मे 'योग' के प्रति रुचि बढी है । इसका फल यह हुआ है कि अब 'योग' का नाम आधुनिक समझे जाने वाले लोगो की जवान पर आने लगा है किंतु वे योग के एक अग 12 ध्यानयोग कुछ सरल विधिया 'आसन' को ही 'योग' मान रहे है। योग वस्तुत मन की साधना है। 'आमन' योग-साधना का एक अग वेशक है किंतु केवल भासन को ही योग मान लेना ठीक नहीं है। ध्यानयोग का उद्देश्य मन के व्यापारो के प्रति सजग होना है। योग की सामान्य से उच्चतम तक की अनेक कोटिया है। सामा य योग के अभ्यास से नित्यप्रति के कार्यों के प्रति हमारी कुशलता बढ जाती है। योग की उच्चतर अवस्था मे नित्यप्रति की क्रियाओ के प्रति हमारी विमुखता वढ जाती है। सामान्य और विशिष्ट की अवस्था के ये भेद जीवन के प्रत्येक क्षेत्र मे हम देखते खेल के मैदान का एक उदाहरण लेते है। सामान्य जनो के लिए दौडने, कूदने, फादने तथा तैरने के खेल तन को स्वस्थ रखने के साधन होते है। इस प्रकार के व्यायाम से खिलाडी की दिनचर्या मे विशेष अतर दिखाई नही देता। किंतु जो व्यक्ति खेलो मे विशिष्टता प्राप्त करते हे यानी खेलो की राष्ट्रीय या अतर्राष्ट्रीय प्रतियोगिताओ मे भाग लेते है, उनके लिए ये खेल मात्र तन को स्वस्थ रखने के सावन नही रहते अपितु कीर्ति पाने के माध्यम वन जाते है। प्रत्येक क्षेत्र को उच्च स्थिति तपस्या चाहती है प्रत्येक क्षेत्र मे उच्च स्थिति तक पहुचने के लिए साधक को उस क्षेत्र के नियमो का पालन करना पड़ता है। ध्यानयोग की साधना के लिए यम-नियम आदि अग योगशास्त्रो में बताए गए है। खेल-प्रतियोगिताओ मे विशिष्ट स्थिति प्राप्त करने के गुर उन क्षेत्रो के गुरुजन बताते है । उनके अनुसार तैराकी की विश्व- चैपियनशिप जीतने के लिए प्रतियोगी को जैसे अभ्यास-आहार की जरूरत होती है, दौड की प्रतियोगिता मे आगे निकलने के इच्छुक
घानयाग पिसम लिए शितनी मात्रा
7
13
यो उससे भिन्न प्रकार ये आहार-अभ्यास की जरूरत रहती है।
ऐने प्रतियोगियो पे अभ्यास शिविरो का यदि हम अवलोकन करें
तो हम पाते हैं यि वहा या वातावरण भी एक प्रकार के तपोवन
जमा ही है। उनकी साधना का क्षेत्र अलग होने पे कारण हम
उनी तपस्या की विधि में भिनता देखते हैं।
ध्यान जीयन के लिए या जीयन ध्यान के लिए?
जब हम 'जीवन ध्यान के लिए' कहते है उस समय हमारा
आशय ध्यानयोग की उच्चतम अवस्था से होता है। उस अवस्था
में योगी पूर्ण ग्रा से एकाकार की स्थिति में पहुच जाता है । यह
स्थिति सामान्य भाषा में 'समाधि' है । यह अवस्था योग को साध्य
और जीवन को साधन बनाए बिना प्राप्त नही हो सकती।
जब हम 'ध्यान जीवन के लिए' कहते है तो हमारे सामने
व्यावहारिक जीवन मुय्य होता है। ध्यानयोग एक मानसिक
व्यायाम के रूप में हमारे जीवन को सफल और सुखद बनाने का
साधन बन जाता है।
ध्यानयोग का लाभ
जो व्यक्ति अब तक शरीर को सब कुछ समझकर मन की
अपार शक्ति से अनजान रहा है, वह जानना चाहेगा कि मानसिक
व्यायाम का लाभ क्या है।
हम जो कुछ भी कर रहे हैं, या करना चाहते है, उसका लाभ
जानने की इच्छा उठना स्वाभाविक है। परलोक के लाभ बताने
वाले अनेक ग्रथ हैं किंतु सामाजन तो अपने किए का तुरत लाभ
लेना चाहता है। उधार के बडे लाभ की अपेक्षा तुरत का छोटा
लाभ उसके लिए अधिक प्रेरणादायक होता है ।
ध्यानयोग या तत्काल लाभ यह है कि हम जो कुछ भी कर
14 ध्यानयोग कुछ सरल विधिया रहे है, यदि अपने इस काय मे हम एकाग्र है तो उसे अधिक कुशलता से कर सकते है । ससार के सफल व्यक्ति, चाहे वे कला के क्षेत्र के हो या विज्ञान अथवा अय क्सिी क्षेत्र के, उनकी सफलता का सूत्र उनकी एकाग्रता मे छिपा है। एकाग्रता के प्रकार एकाग्रता दो प्रकार की होती है- 1 सहज, 2 अजित। जिन विषयो मे या व्यक्तियो मे हमारी रुचि या आसक्ति होती है, उनके प्रति हमारी एकाग्रता सहज हो जाती है । यदि हमारी एकाग्रता का ध्येय समाजोपयोगी न हो तो उसका कुफल हमे किसी- न किसी रूप मे भुगतना पड़ता है। वह कुफल शासन की ओर से दड के रूप मे मिले या समाज की ओर से अपयश के रूप मे । अत सहजप्राप्त एकाग्रता पर निभर होना पर्याप्त नही । क्सिी ऐसी विधि की आवश्यकता है, जिससे हम अपनी इच्छा-शक्ति द्वारा वाछित विषय पर एकाग्र हो सके। ऐसी विधि से प्राप्त होने वाली एकाग्रता अजित कही जाएगी। योग एकाग्र होने की विधि सुझाता . ध्यानयोग का अय लाभ योग को दूमरी उपलब्धि है मन की शात अवस्था। मानमिक शाति का हमारे जीवन में विशेष महत्त्व है। उदा- हरणत , शात अवस्था मे किए गए हमारे निणय विवेकपूर्ण होते हैं। शात मन वाले व्यक्ति को दुविधाओ से उबरने की शक्ति सहज ही प्राप्त हो जाती है। शात व्यक्ति मे उतावलापन घट जाता है मोर ठहराव बढ जाता है । विषम स्थिति मे वह घबराता नहीं है उसे प्रयत्न का फल यदि इच्छानुसार न मिले तो भी वह विक्षिप्त ।
ध्यानयोग विसदे लिए कितनी मात्रा 15 नहीं होता। शात अवस्था और एकाग्रता, ये दोनो अवस्थाए एक-दूसरे पर निर्भर हैं । एकाग्र मन को शाति स्वत प्राप्त हो जाती है। अशात अवस्था मे हम एकाग्र हो नहीं सकते। किसी भी विषय मे हमारी एकाग्रता का होना यह स्पष्ट करता है कि हम वहा शात अवस्था की सीढी से होकर पहुचे हैं। परम एकाग्रता की अवस्था समाधि है । इस अवस्था तक पहुचने के उपाय योगशास्त्रों में बताए गए है किंतु यहा हम सामा य जीवन बिताने वाले व्यक्ति के लिए ध्यानयोग की चर्चा कर रहे हैं। वह अवस्था है मन की शाति । मन को शाति पाने के अनेक उपाय है। उनमे से कुछ की चर्चा आगे की जानी है।
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मन को प्रदूषण-मुक्त कैसे करें? इस प्रश्न का उत्तर लेखक ने 'विश्व- योग-सम्मेलन 1986' के अवसर पर एक भाषण के रुपमे दिया था। उसी भाषण के कुछ अश यहा लेख के स्प मे प्रस्तुत हैं।
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।
प्रदूषणो की चर्चा आज जोरो पर है।
कारें, बसें और फैक्टरिया निरतर धुआ उगल रही हैं । इससे
हवा मे प्रदूपण वढ रहा है।
शहरो का मैला, कूड़ा-करकट नदियो मे बहाया जा रहा है,
इससे जल प्रदूपित हो रहा है ।
तीसरा भयानक प्रदूषण है शोर का ।
शोर का अथ है असगत और अनियमित आवाजे । वैज्ञानिको
का कहना है कि एक विशेष मात्रा से अधिक ऊचा शोर आदमी मे
तनाव लाता है । उसे चिडचिडा बनाता है।
इन सभी प्रकार के प्रदूषणो से वातावरण को मुक्त करने के
लिए भारत सरकार का एक पूरा मत्रालय जुटा हुआ है। उस
मत्रालय का नाम ही 'पर्यावरण मत्रालय' रखा गया है। विश्व की
अन्य सरकारें भी पर्यावरण को शुद्ध करने के काम को प्राथमिकता
दे रही है।
इन समो प्रदूषणों से चिंताजनक एक प्रदूषण और है किंतु
उसकी ओर किसी सरकार का ध्यान नही जा रहा है। वह प्रदूपण
है, आदमी के अदर का अर्थात् मन का प्रदूषण ।
विश्व मे आज भय और तनाव का जो वातावरण दिखाई देता
20 ध्यानयोग कुछ सरल विधिया है उसका कारण व्यक्ति का प्रदूपित मन है । यह प्रदूपण जव सरकार चलाने वालो के मन मे होता है तो राष्ट्रो के वीच युद्ध छिडते है । एटमवमो के ढेर ऊचे उठते हैं । यह प्रदूषण यदि सरकार से बाहर के व्यक्ति के मन मे उठता है तो उसका नाम उग्रवाद हो जाता है, आतकवाद हो जाता है । और यही प्रदूषण जव बाहर की बजाय भीतर का रख करता है तो उसी का नाम तनाव हो जाता है। योगदर्शन के अनुसार मन के प्रदूषण योगदशन मे मन के प्रदूषणो को क्लेश कहा गया है।' क्लेश का अथ है 'दुःख, पीडा'। योगसूत्रकार पतजलि ने सभी दुखो को पाच वर्गों में बाटा है। वे पाचो वग ही पाच प्रकार के क्लेश है । वे क्लेश हैं- 1 अविद्या, 2 अस्मिता, 3 राग, 5 अभिनिवेश। ये पाचो क्लेश ही मन के सभी प्रदूपणो के मूल कारण हैं। योगसूत्रो की नयी व्याख्या इन क्लेशो के अगो, उपागो पर विचार करने से पहले योग- सूत्रो का रचनाकाल समझ ले। योगसूत्रो की रचना उस युग मे हुई थी जब प्रिंटिंग प्रेस नही होते थे । ज्ञान या तो हस्तलिखित पुस्तको के रूप मे सुरक्षित था या उसे कठस्थ कर लिया जाता था। 1 साधन पाद 3 से 9 मन को प्रदूषण मुक्त कैसे करें? 21 । वडे ग्रथो को कठस्थ करना कठिन था इसलिए प्रत्येक विषय के प्रमुख मुद्दो को सूनो का सक्षिप्त रूप दिया जाता था। वे सूत्र एक प्रकार के सकेत (Clues) होते थे। अवसर और युग के अनुसार विद्वान् जन उन सूत्रो की व्याय्या करके पुराने ज्ञान को फिर से नया बना लेते थे। फिर से उन्हे पुस्तको मे सुरक्षित कर लेते थे। देश, काल और सदर्भ के अनुसार शब्दो के अर्थ बदलते रहते है। यही कारण है कि शब्दो के पुराने प्रयोग बाद के युग वालो की समझ मे नही आते। अपने ही युग का उदाहरण लेते है । 'रुपया' शब्द हमारे यहा उस समय प्रचलित हुआ जब छोटा सिक्का 'पैसा' तावे का होता था । बडा सिक्का 'अशर्फी' सोने का था। मध्य का सिक्का 'रूपे' का अर्थात् चादी का होता था । 'रूपे' से 'रुपया' प्रचलित हुआ। बाद मे हमने यह भी देखा कि रुपया चादी की बजाय गिलट का बनने लगा और करेंसी नोट के रूप मे कागज पर भी छपने लगा लेकिन नाम फिर भी रुपया ही रहा । तनिक सोचिए कि हजारो साल बाद कोई व्यक्ति हमारे आज के करेंसी नोट पर 'रुपया' छपा देखेगा तो वह 'रूपे' के साथ 'रुपये का सबध कैसे जोडेगा? एक अवस्था और भी। हम दिल्ली वाले विहार वासी को 'पुरविया कहते हैं । कलकत्ता का वासी उस बिहारी को 'पच्छमिया' कहता है। इसी प्रकार की बहुत सी अवस्थाओ का विवेचन जन शास्त्रो मे हुआ है। उही का दिया हुआ शब्द 'स्याद्वाद' हर स्थिति को व्यापक तौर पर देखने की दृष्टि देता है। शब्द और अर्थ की इस भूमिका के साथ आज की शब्दावली मे हम 'क्लेशो' की व्याख्या कर रहे हैं। पहला क्लेश है अविद्या।
22
ध्यानयोग कुछ सरल विधिया
अविद्या अज्ञान को कहते हैं। जितने भी क्लेश हैं, वे सब अज्ञान
से उपजते हैं । इसलिए 'अविद्या' को सभी क्लेशो का मूल कारण
माना गया है।
दूसरा क्लेश है अस्मिता।
जब तक व्यक्ति स्वय को परम शक्ति का निमित्त या साधन
मानता रहता है, तब तक वह इस क्लेश से मुक्त रहता है । जब
उसे अपने 'कर्ता' होने का गर्व हो जाता है तो 'अस्मिता' नामक
क्लेश उपजता है। आज के युग मे प्रचलित शब्द अहम् (Eso)
अस्मिता का ही नया नाम है।
राष्ट्रो के विभाजन के पीछे किसी-न-किसी को आहत अस्मिता
होती है। राजनैतिक और धार्मिक सस्थाओ की स्थापना के पीछे
मी अस्मिता ही काम करती है। अतत इन सस्थाओ का विघटन
भी अस्मिता के ही कारण होता है। अस्मिता जितनी अधिक
सवेदनशील होती है, उस पर लगी चोट उतनी ही अधिक घातक
होती है।
तीसरी क्लेश राग है।
राग का प्रमुख अर्थ है 'सुख की अवस्था' । एक विशेष प्रकार
के सुख को भोग लेने के बाद बार-बार उसी को भोगने की इच्छा
मन मे उठती है। इस प्रकार राग हमे पराधीन बनाता है । 'राग'
को इसीलिए क्लेश की श्रेणी में रखा गया है।
चौथा क्लेश द्वेष है।
राग के मार्ग मे बाबा का आना द्वेष को जन्म देता है । कोध
इसका प्रकट रूप है और इसके छद्म रूप अनेक है। उन छद्म रूपो
की चर्चा हम आगे करेंगे।
पाचवा क्लेश अभिनिवेश है।
अभिनिवेश के बहुत से अर्थ है किंतु योगसूनो के व्याख्याकारो
ने अभिनिवेश का अर्थ बताया है मृत्यु का भय । आधुनिक मनो-
-
मन को प्रदूषण मुक्त कैसे करें?
विज्ञान
मृत्यु को बडा आघात (Tratrma)
हमारे विचार से जितने प्रकार के अकारण अHebias)
है, वे सभी इसी क्लेश के वर्ग मे आते हैं । मृत्यु के भय को भी हम
अकारण यानि 'फोबिया' मानते है। यह इसलिए कि हमारे यहा
'आत्मा की अमरता' स्वीकार की जा चुकी है।
इन पाचो क्लेशो मे से मुहावरे के रूप मे प्रचलित होने वाले
क्लेश दो है । वे है-राग और द्वेष ।
राग को मुख्यता मिलने का कारण यह है कि सभी प्रकार के
दु ख राग के मार्ग में बाधा आने से उपजते है।
द्वैप को इसलिए मुय्य क्लेश माना है कि यह 'कोध' पर
आधारित भावना है। राग के बाद इसी भाव के रूप मन को सबसे
अधिक झकझोरते है।
राग की व्याख्या
हर व्यक्ति के लिए 'राग' का अर्थात् सुख का साधन अलग
होता है।
किसी के लिए धन और सपत्ति सुख का साधन है और किसी
के लिए पद, प्याति, सतान, अहभाव, प्रेमी या प्रेमिका को पाना
सुख की अवस्था है । जिस किसी के लिए जो भी सुख का साधन है,
उसके लिए वही राग है।
नये मनोशास्त्रियो ने मानसिक दुखो के कारणो मे चिता और
भय का नाम भी गिनाया है।
गहरी नजर से देखें तो 'भय' और 'चिता' एक ही सिक्के के
दो पहलू हैं और ये दोनो पहलू 'राग' वर्ग में आते हैं। राग के
साधनो के न मिल पाने का भय ही चिंता का कारण होता है ।
या राग के जो साधन प्राप्त है, उनके छिन जाने का भय भी चिंता.
पैदा करता है।
24 ध्यानयोग कुछ सरल विधिया द्वेष की व्याख्या 'द्वैप' के जाने-माने रूपो में 'क्रोध, ईर्ष्या और प्रतिशोध आते है। क्रोध द्वेष का स्पष्ट और अस्थायी रूप है। क्रोध का आवेश जिस तेजी से शिखर तक पहुचता है, उसी तेजी से उतर भी जाता है। इस थोडी देर की आधी मे क्रोधी किसी की हत्या भी कर सकता है और आत्महत्या भी। इस क्षणभर के आवेश का परिणाम बाद मे पश्चात्ताप' और 'सताप' जैसे अनेक मानसिक कप्टो को जम दे सकता है। अपने से छोटो पर क्रोध करना सरल है किंतु वडो पर रष्ट होना कठिन है। यह बडापन आयु की दृष्टि से भी हो सकता है, पद और धन की दृष्टि से भी हो सकता है। वडे के प्रति उठने वाले क्रोध को दबाने का यत्न किया जाता है लेकिन वह दव नही पाता । कुढन बनकर रिसने लगता है। कुढन व्यक्ति को चिडचिडा बनाती है और तनावग्रस्त करती है । अधिकतर मानसिक रोगो का कारण यह दवा हुआ क्रोव होता द्वेष का अप्रकट रूप ईर्ष्या है। दूसरे को सपत्ति, गुण, यश, सुदरता आदि को देखकर व्यक्ति चाहता है कि वे साधन उसके पास भी हो। यदि व्यक्ति वे साधन नही जुटा पाता और न ही सतोष कर पाता है तो ईर्ष्या उपजती है। ईया क्रोध की तुलना में अधिक स्थायी भावना है। इसे हम द्वेष का छद्म रुप भी कह सकते है । क्रोधी सामने से प्रहार करता है, ईर्ष्यालु पीछे से हमला करता है । प्रतिशोध के पात्र को हानि पहुचाना द्वेषी का उद्देश्य हो जाता है। किसी का अहित-चिंतन करते हुए, द्वेषी कितना सतप्त रहता है, इसका उसे होश नहीं होता। जिस समय वह अहित-कार्य पूरा
25
मन को प्रदूषण मुक्त कैसे करें?
हो जाता है तो उसे लगता है कि उसे शाति मिल गई।
प्रतिशोधी को मिलने वाली शाति नये क्लेश का आधार बनती
है क्योकि जिससे बदला लिया गया है, वह चुप नही बैठता । इस
प्रकार प्रतिशोध पीढी-दर-पीढी चल सकता है।
मन के प्रदूषण कैसे हटें?
योगसूत्रकार ने 'अविद्या' को अन्य चारो क्लेशो को उपजाने
वाली भूमि कहा है। इतना कहकर सूत्रकार ने यह सकेत दे दिया
है कि क्लेशो के नाश का उपाय 'विद्या' या ज्ञान है ।
ज्ञान के अलग अलग क्षेन हैं लेकिन योगदर्शन चूकि अत -
करण का ज्ञान है, इसलिए इस प्रसग मे हम ज्ञान का आशय मन
मै उठने वाली भावनाओ का ज्ञान समझते हैं । इसी के कुछ अशो
को आज मनोविज्ञान कहा जाता है ।
क्लुपित मन क्लुपित विचार को जम देता है। कलुपित
विचार अपने आसपास वैर और कटुता वढाते हैं ।
कलुषित विचारो का प्रदूषण हवा, पानी और शोर के प्रदूषण
भोपाल के यूनियन कारवाईड कारखाने की गैस से मरने वालो
की सय्या से अधिक सय्या उनकी है जो मन के प्रदूषण से मरते
हैं। दोनो मे अतर केवल इतना है कि बाहर के गैस काड से
मरने वालो के आकडे ज्ञात हो सकते है, किंतु भीतरी गैस से मरमे
वालो के आकडे अज्ञात रहते हैं ।
मन के प्रदूषणो को समझ लेना ही उनके निवारण का कारण
से अधिक घातक है।
बन जाता है।
1 साधन पाद4
26 ध्यानयाग कुछ सरल विधिया व्यक्ति-भेद के अनुसार प्रदूषण का प्रभाव कलुषित मन का व्यक्ति यदि अतर्मुखी होता है तो वह खुद को घुन लगाता है, यानी तनावग्रस्त रहता है। यदि वह बहिर्मुखी है तो समाज की हानि करता है। क्सि व्यक्ति के मन का प्रदूषण समाज के लिए कितना घातक है, इसका जवाब देने के लिए यह देखना होगा कि उस व्यक्ति के प्रभाव का घेरा कितना बडा है। यदि वह मामूली हैसियत का आदमी है तो इजेक्शन के नाम पर पानी बेचकर खुदरा हत्याए करता है । अगर बडी हैसियत का है तो किसी धार्मिक या राष्ट्रीय नारे का सहारा लेकर लाखो व्यक्तिया को मौत के मुह मे धकेल देता है। लोहे को लोहा काटता है प्रदूपित मन का इलाज क्सिी औपधि से नही हो सकता । यह इसलिए कि औषधि भौतिक पदाथ है और मन भौतिक पदाथ नहीं है। औषधि का प्रभाव शरीर पर होता है, क्योकि शरीर पार्थिव (भौतिक) है। मन चित्त मे उठने वाली स्मृतियो, वत्तियो और विचारो का पुज है । इसलिए इसका इलाज विचारो से ही होना सभव है। मन यदि कुत्सित विचारो का पुज बना हुआ है तो उसे स्वस्थ करने के लिए सद्विचारो का इजेक्शन देना होगा। यह इजेक्शन है-ज्ञान । व्यक्ति को मात्र इतना ज्ञान हो जाए कि उसकी समस्याओ का वास्तविक कारण अमुक क्लेश है तो आधा इलाज हो जाता है। इसके साथ-ही-साथ मन को शोधन की प्रक्रिया भी अपने आप जारी हो जाती है। मन को पूणत शुद्ध करने का उपाय योगदर्शन ने ध्यान यताया है। ध्यान मन की एकाग्रता यो अवस्था है। एकाग्रता के लिए । मन को प्रदूषण-मुक्त कैसे करें? 27 मानसिक शाति चाहिए। क्लेशभरे मन को शाति नहीं मिल सकती। मानसिक शाति को आवश्यक शत है मन को आनदित अवस्था। योगदर्शन के अनुसार ध्यान की अवस्था तक पहुचने की छ सीढिया है । वे है-यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार और धारणा । सातवी सीढी ध्यान है और उसके बाद की अतिम सीढी 'समाधि' । सामान्य व्यक्ति यदि अष्टाग योग की यह साधना करने मे स्वय को असमर्थ पाता है तो वह मन को शात करने के अन्य उपाय भी वरत सकता है। हर व्यक्ति के स्वभाव के अनुसार गीता मे मन की शाति के लिए अनेक उपाय बताए गए है। उनमे से ज्ञानयोग, कमयोग और भक्तियोग सर्वविदित है । जैन दर्शनो तथा बौद्ध दर्शनो मे भी मन को शात और एकाग्र करने की विधिया दी गई हैं । इनमे से प्रत्येक विधि विशेष व्याप्या चाहती है। उनके विस्तार मे न जाकर अत मे हम योगदर्शन के केवल एक सून का यहा उल्लेख कर रहे हैं। समाधिपाद का तैतीसवा सून शायद उन लोगो के लिए रचा गया है जो अष्टाग योग का लवा मार्ग नही अपना सकते हैं, किंतु मन की शाति चाहते है । इस सूत्र का भावार्थ इस प्रकार है-- चित्त को प्रसनता के लिए- सुखी जनो से मैत्री भाव रखो। दुसी जनो पर दया करो। पुण्यात्माओ से मेल रखो। दुष्टो से उदासीन रहो।
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'ध्यान' शिखर की ओर पाच पग
अर्थात्
बहिरग योग
इस पुस्तक का विषय सामा य जनों
के लिए ध्यान विधि सुझाना है,
इसलिए अष्टाग योग के केवल
भारभिक पाच अगों को यहा
व्याख्या दी जा रही है।
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षय का सक्षिप्त परिचय
वि
एक छात्र को 'गाय' पर निबंध लिखने के लिए
प्राइमरी कक्षा के लिखेगा-
कहा जाए तो वध देती है।
गाय दास खाती है।
गाय घो चार टार्गे होती हैं इत्यादि।
गाय कादि ऊची कक्षा के छात्र को दिया जाए तो वह
यही विषय सास्कृतिक, ऐतिहासिक और आर्थिक पहलुओ का
गाय के धामिक,
विश्लेषण करेगा से यह प्रकट होता है कि प्रत्येक विषय के अनेक
इस उदाहरणारी दृष्टि की सीमा और हमारे ज्ञान की सीमा
पक्ष होते हैं। हमनौर जितनी व्यापक होती है, उस सीमा तक हम
जितनी समुचित ववेचन कर सकते है ।
किसी विषय का जनो की रुचि के अनुसार ध्यानयोग के आरभिक
यहा सामाय रया कर रहे है ।
पाच अगो की व्या
32
ध्यानयोग कुछ सरल विधिया
ध्यानयोग और उसका उद्देश्य
शात जलाशय मे छोटा-सा ककड फेकें तो उस जलाशय मे
बनने वाले लहरो के घेरे व्यापक होते हुए पूरे जलाशय तक फैल
जाते हैं किंतु उफनते लहराते सागर मे वडा पापाण-खड भी गिर
जाए तो उसकी लहरो मे विशेप अतर दिखाई नही पडता।
शात मन शात जलाशय के समान है। उसमे उठने वाली
विचार-तरगो का अध्ययन व्यक्ति कर सकता है किंतु अशात मन
उफनते हुए सागर के समान है । उसमे एक-दूसरे से टकराती हुई
विचार-लहरियो को दूर तक, देर तक निरीक्षण करना सभव नही
होता।
ध्यानयोग की साधना से मन शात जलाशय के समान रहता
है। उसमे उठने वाली विचार-तरगो का व्यक्ति निरीक्षण कर सकता
है। ऐसा करके व्यक्ति आत्मविश्लेषक बनता है। आत्मविश्लेषक
व्यक्ति मे स्थितप्रज्ञ होने की सभावना बढ़ जाती है।
चित्त और योग
योगदशन मे चित्त की वृत्तियो को रोकने की क्रिया को 'योग'
कहा है।
चित्त के विषय मे सारय तथा योग के व्यारयाकारो ने अपने-
अपने विचार प्रकट किए है। उनसे ज्ञात होता है कि
चित्त पूर्व जन्म की स्मृतियो और विचारो का सघन पुज
है। सुप्त अवस्था मे यह पुज चित्त कहलाता है, विकारी अथवा
परिवर्तित अवस्था मे यह पुज 'मन' कहलाता है ।
यहा प्रश्न उठता है कि चित्तवृत्तियो को रोकने का उद्देश्य क्या
है। योगदशन मे उस प्रश्न का उत्तर यह है-
I
समाधिपाद 2
ध्यान शिखर का ओर पाच पग
33
द्रष्टा का अपने अतर मे स्थित होने के लिए।
पिंड और ब्रह्माड का विषय
प्राचीन भारतीय मनीषियो की मान्यता है कि जो कुछ ब्रह्माड
मे है, वही मव कुछ हमारे जीवित शरीर अर्थात् पिंड में भी है।
मानो हमारा पिंड विशाल ब्रह्माड का लघु रूप है।
ब्रह्माड मे जो हो चुका है, हो रहा है, होना है, उन सबको
द्रप्टा अपने अतर मे झाककर देख सकता है । जो हो चुका है, उसके
अवशेष आज मे छिपे है तथा जो होना है, उसकी सभावनाए, 'हो
रहा है' मे विद्यमान हैं। जिन्हे हम स्थिर प्रज्ञा से ही देख सकते है।
जो हुआ है, जो हो रहा तथा होना है, उनके मूल मे सृष्टि का
एक निश्चित कम है। यह बिलकुल ऐसा है जैसे अको के क्रम में
'एक' के वाद 'दो' का होना या 'ग्रीष्म ऋतु' के वाद 'वर्षा ऋतु'
जो व्यक्ति इस क्रम को पूरी तरह समझ लेता है, उसके लिए
त्रिकालदर्शी होना सभव है। ऐसे द्रष्टा को हम 'सिद्ध' व्यक्ति
कहते हैं।
'अतर्मुखी' तथा 'योगी' मे अतर
ब्रह्माड के
लघु रूप को समझने के लिए मन को बाहरी विपयो
से
हटाकर भीतरी जगत् मे एकाग्र करना पड़ता है।
आधुनिक मनोविज्ञान अतर्मुखी (Introvert) और बहिर्मुखी
(Extrovert) ये दो प्रकार के व्यक्तित्व मानता है।
बहिर्मुखी वह जो अपने शरीर से बाहर के समाज मे सुख पाए।
अतर्मुखी वह जो अपने भीतर डूबा रहे ।
का आना।
ममाधिपाद 3
34 ध्यानयोग पूछ सरल विधिया अतर्मुखी वेशक अपने भीतर डूबा रहता है किंतु अतर्मुखी और योगी मे अतर होता है । शैशवकाल मे अपने आसपास के व्यक्तियो से तग आकर जो व्यक्ति विवशतापूर्वक अपने बाहर के समाज से कटकर रहना चाहता है और वह अवेलेपन का अभ्यस्त बन जाता है, मनोविज्ञान उसे अतर्मुसी वर्ग मे रखता है । जो व्यक्ति एक उद्देश्य की प्राप्ति के लिए विधिपूर्वक अपने स्वरूप मे एकाग्र होता है वह योगी होता है। यह अलग बात है कि अतर्मुखी व्यक्ति वहिर्मुखी व्यक्ति की अपेक्षा कम थम से योगी बन सकता है। एकाग्रता के उद्देश्य पर विचार जिन विषयो मे हमारी आसक्ति होती है, उनके प्रति हमारा मन बिना प्रयत्न के एकाग्र हो जाता है। यदि हमारी इस सहज एकाग्रता की उपलब्धि हमारे या समाज के लिए हितकर है तो वह कुछ सीमा तक योग का अभीष्ट पूरा करती है, किंतु हममे से अधिक जनो की एकाग्रता सामा यत उन सासारिक भोगो के प्रति होती है जो क्षणिक सुख तो देते हैं किंतु बाद मे उनका परिणाम दुखद होता है । इसलिए एकाग्रता के उद्देश्य पर भी विचार करना आवश्यक है । योगदशन केवल उन्ही लक्ष्यो की ओर सकेत करता है जिनसे व्यक्ति समाज का अहित किए विना अपने उद्देश्य की ओर बढ सकता है। 'योगदशन' हिंदुओ के छ शास्त्रो मे से एक है। पतजलि ने एकाग्रता की परम अवस्था, समाधि तक पहुचने की यात्रा को इन आठ चरणो मे वाटा है- 1 यम 2 नियम 3 आसन - ध्यान शिखर की ओर पाच पग 35 4 प्राणायाम 5 प्रत्याहार 6 धारणा 7 ध्यान 8 समाधि योगशास्त्र मे इन आठ अगो मे से आरभिक पाच अगो को 'वहिरग' यानी योग के बाहरी अग कहा है और अतिम तीन अगो को 'अतरग' कहा है । आरभिक अग अतिम अगो के लिए आधार- भूमि बनाते हैं। यहा केवल आरभिक पाच अगो की चर्चा होगी। उनमे से प्रत्येक अग ध्यान शिखर की ओर बढता हुआ एक-एक पग है ।
योगमार्ग पर पहला पग यम प्रत्येक क्षेत्र में 'यम' शब्द का अलग अथ है किंतु योग के क्षेत्र मे 'यम' का अर्थ है समाज के प्रति पालन किए जाने वाले कत्तव्य । जिस समाज के हम अग है, उसके प्रति कत्तव्य से विमुख होकर हम शात अवस्था प्राप्त कर ही नहीं सकते। यदि हमने किसी जीव की हानि की है, अपने लाभ के लिए मिथ्या भापण किया है, जय के द्रव्य को चुराने का हमारे मन में विचार आया है, हमारी सचय वृत्ति के कारण हममे समाज के क्सिी वग का अहित हुआ है तो ऐसे दुष्कर्मों की छाप हमारे अतमन या अवचेतन मे कही न कही हमे कचोटती है । जिसमे हमारी शाति मे वाधा आती है । कामुकता एक ऐसी तीव्र उत्तेजना है कि उसके मन मे होते हुए अन्य किसी ओर मन जमता नहीं। इन सारी स्थितियो का निरीक्षण मनन करके योगशास्त्र ने एकाग्रता रूपी ध्येय की प्राप्ति के लिए यमो के पालन का निर्देश दिया है।
ध्यान शिखर की ओर पाच पग
37
यमों का विवरण
योगदर्शन में वर्णित यम पाच है
1 अहिंसा
2 सत्य
3 अस्तेय
4 ब्रह्मचय
5 अपरिग्रह
पहला यम 'अहिंसा'
जीवहत्या से विमुख होने को आमतौर पर अहिंसा कहा जाता
है । यह 'अहिंसा' का आशिक अथ है । इसका व्यापक अथ है किसी
को भी दुख न देना । क्रूरता करने तथा क्रूरता का रस लेने से
सबधित सभी क्रियाओ का निषेध 'अहिंसा' द्वारा किया गया है ।
हमारी क्रूरता तो हमे अशात बनाती ही है, साथ ही फिल्मी,
नाटको मे हिंसा के दृश्य, मुर्गों की लडाई, क्रुद्ध साडो के द्वद्व-प्रदर्शन
आदि उत्तेजक दृश्यो तथा कथनो की स्मृतिया भी हमारे मन को
यदा-कदा अशात बनाती है।
दूसरा यम 'सत्य'
सत्य का अय है जैसा देखना, सुनना तथा समझना, उसे वैसा
ही आगे बढा देना। उससे विपरीत आचरण झूठ है।
सत्य के मूल मे भावना पर-कल्याण की है। साहित्यिक अलकार
झूठ होकर भी यदि आधारभूत सत्य को उजागर करते है तो वे भी
सत्य ही है।
जगली जीवो के वार्तालाप पर आधारित पचतन की कहानिया
कल्पित होने पर भी सत्य के अनेक अशो का उद्घाटन करती हैं।
अत वे कल्याणकारी होने के कारण सच की सीमा में आती हैं।
38 ध्यानयोग कुछ सरल विधिया वे ऐतिहासिक उद्धरण जो घृणा तथा वैमनस्य वढाने के लिए प्रेरित करें, सत्य होकर भी असत्य है । झूठ के खुल जाने का 'भय' हमे भीतर ही कही-न-कही अशात बनाता है। इसलिए 'सत्य' के पालन को 'यमो' मे रखा गया है। . तीसरा यम 'अस्तेय अस्तेय यानी चोरी न करना। चोरी का अभ हम आमतौर पर यह लेते हैं कि किसी की नजर बचाकर कुछ चुरा लेना। यह चोरी का आशिक अर्थ है। वस्तुत चोरी के अतर्गत वे सभी क्रियाए आती है, जिनके अनुसार हम किसी वस्तु को उसके समाज में निर्धारित मूल्य को चुकाए बिना अपनाते हैं। इस दृष्टि से जो मालिक श्रमिक को उसके काय का पारिश्रमिक नही देता या जो श्रमिक काम के घटो के दौरान पूरा कार्य नहीं करता, इन दोनो के कार्य चोरी माने जाने चाहिए। आज के व्यक्ति को मायता है कि जिस वस्तु की रक्षा कोई नहीं कर रहा, उसे ग्रहण न करना मूर्खता है। अर्थात् जहा पकडे जाने का भय नही, वहा से कुछ चुरा लेने में कोई हर्ज नही है । किंतु किसी अरक्षित वस्तु को चुराने की प्रेरणा जिसे अतर्मन से नहीं मिलती, वही अस्तेय व्रतधारी है। चौथा यम 'ब्रह्मचर्य' ब्रह्मचय के पक्ष विपझ मे बहुत कुछ कहा गया है । इसका कारण यह है कि यह सर्वाधिक तीव्र उत्तेजना 'काम' के प्रति निषेध करता है। काम-भाव की उत्पत्ति से उत्कर्ष तक की यात्रा को शास्त्रियो ने आठ चरणो मे बाटा है। यथा विषम लिंगियो का स्मरण करना, उनकी कीर्ति का बखान ध्यान शिखर की भार पाच पग 39 करना, उनसे क्रीडा करना, उन्हे देखना, उनसे गुप्त बातचीत करना, उनसे भोग का विचार मन मे लाना, उनसे भोग का पक्का इरादा कर लेना, उनसे मैथुन कर लेना, यह आठ प्रकार का मैथुन होना है। इससे विपरीत आठ प्रकार का ब्रह्मचर्य हुआ करता है।' इन आठ प्रकारो से सामान्य व्यक्ति का वचाव सभव है या नहीं, यह एक अलग विषय है। इस समय हमे योग की दृष्टि से ब्रह्मचर्य पर विचार करना है और इस दृष्टि से यह बात अत्यत वैज्ञानिक है कि यदि हम काम-सुख की अतिम अवस्था 'मैथुन' से वचना चाहते हैं तो हमे उस सुख की प्रारभिक अवस्था 'स्मरण' से बचाव करना पड़ेगा। इस बात को एक उदाहरण द्वारा स्पष्ट करते है। सामान्य विस्फोटक पदार्थ 'पटाखा' तथा विशेष विस्फोटक पदाथ 'बारूदी सुरग' के साथ पलीता यानी डोरी लगी रहती है । इस डोरी के माध्यम से आग विस्फोटक तक पहुचती है । जिस विस्फोटक पदार्थ की विध्वस-क्षमता जितनी अधिक होती है, उस पदार्थ से लगी पलीते की डोरी भी उतनी ही अधिक लवी रखी जाती है। यदि कोई व्यक्ति काम नामी उत्तेजना से सचमुच बचना चाहता है तो उसे 'मथुन' रूपी विस्फोटक तक पहुचाने वाले लबे पलीते के आरभिक छोर 'स्मरण' से बचना चाहिए। यदि कोई व्यक्ति सप्त चरणो से बचाव न करे और यह समझे कि वह स्वय को मैथुन से विमुख कर लेगा, तो वह भ्रम मे है । वह अपनी इच्छा- 1 स्मरण कीतन केलि प्रेक्षण गुह्य भाषणम । सपलोऽध्यवसायश्च क्रिया निष्पत्ति रेव च ।। एत मथुनमष्टाग प्रवति मनीपिण। विपरीत ब्रह्मचयम एतदेवाप्ट लक्षणम् ॥
40
ध्यानयोग कुछ सरत विधिया
शक्ति द्वारा शारीरिक मैथुन से बच सकता है किंतु मानसिक मैथुन
सेन वच सकेगा।
पाचवा यम 'अपरिग्रह
'अपरिग्रह' द्वारा सचय-वृत्ति का निषेध किया गया है। सामान्य
आवश्यकता से अधिक साधनो (धन सपत्ति) का संग्रह एक ओर
व्यक्ति को अनेक चिंताओं से युक्त रखता है, दूसरी ओर अय
व्यक्तियो की नजर मे सपन्न व्यक्ति दूसगे का ईपिात्र बनता
है। इससे भी मानसिक शाति मे बाधा आती है। यदि वह सचय
बलपूर्वक किया गया है तो व्यक्ति ईपिाय की बजाय 'वर पान'
भी बनता है और अनेक जनो मे अपने प्रति बदले की भावना
जगाता है। उन सब प्रतिशोधी जनो से स्वय को बचाने के यल में
लगा व्यक्ति मन की शाति कैसे प्राप्त कर सकता है?
गई शाति को लौटाने का उपाय सचय-वृत्ति का त्याग ही है।
क्तुि बहुत से अपरिग्रही व्यक्तियो से भी मानसिक शाति दूर
रहती है। उसका कारण यह होता है कि वे त्याग करके त्यक्त
वस्तुओ की स्मृति को अपने मन में बनाए रखते है अथवा उस
विशाल त्याग का अहकार मन में बसाए रखते है।
'नेकी कर कुए मे डाल' कहावत का आशय है--किसी का भला
करने के उपरात उसकी स्मृति से भी मुक्त होना ! अन्यथा वह
स्मृति हमे मानसिक रूप से आदोतित करती रहेगी और हमारी
परम शाति मे बाधक होगी।
पचशील एव महाव्रत
योगदशन मे वर्णित ये पाच यम ही बौद्ध मत के 'पचशील' हैं
और इही यमो का सभी जगह सभी अवस्थाओ और सभी परि-
स्थितिया में पालन करने का निर्देश है।
ध्यान शिखर की ओर पाच पग
41
यदि कोई व्यक्ति कहे कि मैं अमुक तिथि या अमुक वार को
हिंसक कार्य नहीं करूगा या तीथ मे हिंसा नही करूगा, या सोचे कि
व्यापार मे तो विना झूठ के काम चल ही नहीं सकता अथवा जान
बचाने के लिए झूठ का सहारा लेने में कोई हर्ज नही। टैक्स की
चोरी तो सभी करते है इसलिए उचित है। ब्रह्मचर्य का अथ तो
मात्र विवाह बंधन से दूर रहना है अथवा अपने विवाहित यौन
सहयोगी के साथ ऋतु एव काल के अनुसार सहवास करना है।
अथवा धन-संपत्ति मेरे नाम तो है ही नहीं, मेरी पत्नी या पुन के
नाम है इत्यादि । इस प्रकार के बचाव पक्ष के शब्द दूसरो की नजर
मे स्वय को न्यायसम्मत सिद्ध कर सकते है किंतु अपने मन की
शाति प्राप्त करने में ये सहायक नही है ।
देश, काल और पात्र का विचार त्यागकर समभाव से सभी
अवस्थाओ मे इन यमो का पालन करना ही इ हे महाव्रत का रेप
देता है।
महावत और सिद्धिया
योगदर्शन मे इन महाव्रतो की उपलब्धिया अर्थात् सिद्धिया इस
प्रकार है।
1 अहिंसा के पूणत पालन करने मे समीप के प्राणियो
मे वैर का भाव समाप्त हो जाता है।
मत्य मार्ग पर दढ रहने से योगी की वाणी अमोघ
हो जाती है। अर्थात् उसके मुख से निकला हर वचन
पूरा हो जाता है।
3 चोरी के विचार के त्याग से योगी को सभी रत्नो
की प्राप्ति होती है। अर्थात् उसे किसी रत्ल की
2
माधन पाद 35 से 39
42
ध्यानयोग कुछ सरल विधिया
आवश्यकता नहीं रहती।
4 ब्रह्मचर्य की पूर्णता से बल का लाभ होता है।
5 अपरिग्रह पर दृढ रहने से जम-जन्मातर का बोध
हो जाता है।
यदि कोई व्यक्ति इन उपलब्धियो की आशा से इन महाव्रतो
का पालन करता है तो वह एक प्रकार से परिग्रही हो जाता है।
बिना किसी आशा के अपने मन की शाति के लिए इन व्रतो का
पालन करने वाले को सिद्धिया अनचाहे मे मिलती है । चाहने वाले
को नहीं मिलती।
योगमार्ग पर दूसरा पग
नियम
आत्मिक हित के लिए पालन करने योग्य कर्तव्यो को योगदशन मे
नियम कहा गया है।
योगदशन के साधनपाद के ३२वे सूत्र मे जिन पाच नियमो का
उल्लेख है वे है-
शौच, सतोप, तप, स्वाध्याय और ईश्वर-प्रणिधान ।
इन पाच नियमो की उपयोगिता योगदशन में इस प्रकार बताई
शौच से अपने अगो से घृणा होती है तथा दूमरो से ससर्ग
घट जाता है। साथ ही चित्त को शुद्धि, मन की प्रसन्नता,
एकाग्रता तथा आत्मदर्शन की योग्यता प्राप्त होती है ।
सतोप से सर्वोत्तम सुख प्राप्त होता है।
तप से अशुद्धि का क्षय होता है।
साधनपाद 40 से 45
1
44 ध्यानयोग कुछ सरल विधिया स्वाध्याय से इष्ट देवता का मिलाप होता है। ईश्वर-प्रणिधान से समाधि की सिद्धि होती है। उपर्युक्त सूत्रो मे जो भाव छिपे है उ हे समझने के लिए सहस्रो पृष्ठ रचे गए है और रचे जा रहे है । हर युग मे सूत्रो का भाव समझने के लिए नयी व्याख्या की आवश्यकता क्यो बनी रहती है, इस विषय पर विचार करने के साथ सूत्र-शैली की आवश्यकता पर भी विचार करना चाहिए। व्याय्याए और मत मतातर जिन दिनो लेखन-सामग्री सहज रूप से सुलभ न थी और ज्ञान- प्रसार के लिए मुद्रण जैसी पद्धति का आविष्कार न हुआ था, उन दिनो ज्ञान के सरक्षण और प्रसार के लिए सून शली का विकास हुआ। उसी काल मे व्याकरण, धम, दशन, काम आदि विषयो पर सूनो के सुनने और स्मरण रखने की व्यवस्था थी। श्रुति और स्मृति के माध्यम से ज्ञान दिशा और काल की सीमाओ को लापता हुआ सक्षिप्त रूप में सुरक्षित रहा। किसी भी विशाल भडार को पहले सून रूप मे सक्षिप्त करने, तत्पश्चात् उम सक्षिप्त को आवश्यकता के समय व्याय्या देने से मूल ज्ञान मे भाष्यकर्ताओं के विचारो का समावेश होता रहता है। जिस भाष्यकार के चितन का क्षेत्र जितना विशाल या जितना सीमित होता है, उसका आभास भाप्य मे समा जाता है । फल यह होता है कि एक ही सूत्र के दो भाष्यकारा की व्याय्या मे अतर आ जाता है। इसी अतर के कारण मत मतातरो का जन्म होता है। जिन दिनो सूनो की रचना-शैली का विकास हुआ था, उही दिनो व्यास्या-शैली भी विकसित रूप मे थी। उदाहरण स्वय पतजलि है । इसी योगदान के प्रणेता 'पत जलि' स्वय पाणिनित व्याकरण 'अष्टाध्यायी सूत्रपाठ' के व्यास्याकार भी हैं । जी हा,
ध्यान शिखर की ओर पाच पग
45
'महाभाष्य' के रचनाकार पतजलि ही कहे जाते हैं ।
प्राचीन समाज मे सून और भाष्य, इन दोनो विधाओ का
विकास साथ-साथ हुआ। अत उस काल मे एक ही सूत्र पर रचे
गए दो भाष्यो मे अतर की सभावना कम रहती है, क्योकि एक
काल सीमा मे जो शब्द जिस अर्थ में प्रयुक्त होता है, वह सबको
ज्ञात रहता है, किंतु कुछ समय के उपरात शब्दो के प्रचलित अर्थों
में अतर आ जाता है। इस समय पुराने भाष्य को समझना व्यक्ति
के लिए कठिन हो जाता है।
उदाहरणत किसी समय 'वैष्णव' का अर्थ था विष्णु का
उपासक । आज इसका अर्थ 'शाकाहारी' अधिक प्रचलित है।
प्राइमरी कक्षा में कश्मीर सबधी पाठ मे एक बार मैंने पढा
था, "कश्मीर की वूलर झील भारत मे मीठे पानी की सबसे बडी
झील है।"
उन्ही दिनो पिताजी की उगली थामे कश्मीर जाने का सयोग
हुआ। वूलर झील का पानी चखा तो उसे फोका पाया। बाद मे
ज्ञात हुआ कि झील के जल के सदभ मे 'मोठा' का अथ खारेपन
का अभाव है।
कुछ शब्दो के अथ वय और अनुभव से सबंधित होते है । रानि-
क्रीडा की चर्चा करती हुई निरक्षर युवतियो मे जब एक कहती है-
क्या रात तेरे पति ने कुछ दिया? तो इस चर्चा की भनक पाने
वाला पाच सात वप का बालक, जो अक्षर-ज्ञान के विषय में इन
युवतियो से अधिक ज्ञानी है, इस 'किया' का अर्थ क्या समझेगा?
कोई भी शब्दकोश इस सवध मे उसकी सहायता नहीं कर सकता।
और बालपन से किशोर अवस्था तर पहुचते ही बिना किसी के
बताए ही 'क्यिा' का अथ उसकी समझ मे आने लगेगा।
दिशा, काल, वय, अनुभव, सदभ आदि अनेक कारण शब्दो
तथा वाक्यो का अथ समझने में सहायक होते हैं। उनमे से किसी
46
ध्यानयाग कुछ सरल विधिया
भी एक को अनदेखा करके सून मे छिपे अर्थ के निकट पहुचना
असभवाहोता है।
शौच आदि नियमो की व्याय्या करते हुए हमे पहले यह देखना
है कि ये किस सदभ मे आए हैं ।
1 शौच
सामान्य जनो की दृष्टि मे शौच का अर्थ मल-मूत्र-विसजन है।
शौच शब्द को यदि हम तन के स्वास्थ्य की पुस्तक मे पाते तो तन
को स्वच्छ रखने के लिए किए जाने वाले कार्यो की ओर हमारा
ध्यान जाता। इससे जरा आगे बढते तो नेति धौति आदि हठयोग
की क्रियाओ को शौच के अतगत मानते । किन्तु यहा विषय 'ध्यान'
है जिसका उद्देश्य है परम एकाग्रता की अवस्था । इस परम एकाग्रता
के लिए मन के कलुष (मलिनता) को दूर करने की आवश्यकता
है। योगसूनो के प्राचीन भाष्यो मे मन छ प्रकार के कलुप
वताए गए हैं।
1 सुखी होने की कामना होने, किंतु सुख के साधन न
होने से मन का दुखी होना 'राग' कलुप है।
2 दूसरो की सपत्ति, गुण, यश से मन को होने वाला
दु ख 'ईर्ष्या' कलुप है।
3 ईा-पात्र के अपकार करने की इच्छा "अपकार'
कलुष है।
4 ईर्ष्या-पात्र का छिद्रान्वेषण, अनादर तथा चुगली आदि
करने की क्रियाए करना 'असूया' कलुष है ।
5 प्रतिशोध भावना को 'अमप' कलुष कहा गया है ।
'शौच' नियम की सिद्धि होने पर न अपने तन के प्रति आसक्ति
का भाव रहता है न ही दूसरो के प्रति । जव तन गौण और मन
ध्यान शिखर की ओर पाच पग 747 मुख्य बन जाता है तो व्यक्ति अपने आपमे आनद पाने लगता है। फलत बह एकातप्रिय बन जाता है। एकातप्रियता ध्यान में सहायक होती है। 'शौच' सिद्धि से मन घृणा, द्वेष, क्रोध आदि मलिनताओ से मुक्त होकर आत्मसाक्षात्कार करने के योग्य हो जाता है । 2 सतोष विषय यदि राजनैतिक, जीविका या विज्ञान का होता तो सतोप को उन्नति का वाधक समझा जाता, किंतु यहा 'ध्यान' के सदर्भ मे सतोप की व्यारया होनी है। सतोप का आशय तृष्णा का अभाव है। तृष्णा व्यक्ति को मृग- मरीचिका से नस्त करके उसे जो प्राप्त है, उसके सुख से वचित रखती है। इसके विपरीत सतोप 'प्राप्त' को उपलब्धि मानकर उसी मे सुख का आभास पाता है । जिसका मन सुखी है उसके लिए एकाग्रता सहज है। इसीलिए योगशास्त्र सतोष को सर्वोत्तम मुख मानता है। तप तप का अथ है सहन-शक्ति का विकास । देखना यह है कि सहन शक्ति किस क्षेत्र में? समाज में विचरण करते हुए हम देखते हैं कि सामान्य जन उन्ह तपस्वी मानते है जो सर्दी में ठडी रेत पर नग्न बैठे रहते है, या ग्रीष्म ऋतु मे कवल ओढे बैठे रहते है। ऐसे तप स्थूल दृष्टि से सवको दिखाई देते हैं। ऐसे शरीर तपाने वालो को तपस्वी मानना सहज होता है। उच्च स्तर के तप वे हैं जो प्रवटत दिखाई नहीं देते, किंतु विषम स्थिति मे जिनकी परीक्षा होती है। वे हैं-काम, क्रोध आदि मनोभावो पर नियत्रण ।
48 ध्यानयोग कुछ सरल विधिया तप का वास्तविक उद्देश्य है तामस एव राजस गुणो का नाश करके सात्विक गुणो को शेप रहने देना । वही तप समाधि रूपी लक्ष्य का सोपान बन सकता है। 4 स्वाध्याय स्वाध्याय का अथ लिया जाता है ऋपिकृत ग्रथो का पठन । यह शब्द का सीमित अथ है। इसका व्यापक अर्थ है-जो कुछ हमारे अनुभव मे नही आया, किंतु दूसरे मनीपो जनो के अनुभव मे आया है, उसे किसी भी विधि से जानना । अध्ययन की जितनी भी प्रणालिया है, चाहे वे पठन की हो, अनुशीलन की, निरीक्षण की या भ्रमण की, वे सब स्वाध्याय के अतगत है । यहा तक कि सिनेमा, टो० वी०, रेडियो आदि काय- क्रमो का तटस्थ भाव से अध्ययन करना भी स्वाध्याय का ही अग इस पुस्तक के परिशिष्ट भाग मे 'स्वाध्याय के सूत्र' शीषक से कुछ सूक्तिया प्रस्तुत की जा रही है। ये सूक्तिया व्यक्ति के दृष्टि, कोण को व्यापक बनाती है और मन-मस्तिष्क को शाति देती हैं । अत उन्हे स्वाध्याय का अग मानकर इस पुस्तक के अत मे सकलित किया जा रहा है। स्वाध्याय से साधक का दृष्टिकोण व्यापक हो जाता हे और वह ब्रह्म के विराट रूप के अधिक बडे अश का साक्षात्कार करने में समथ हो जाता है। हमारे यहा योगी को दिव्यदृष्टि सपन या सवज्ञ समझे जाने की मा यता है । उसकी पृष्ठभूमि मे स्वाध्याय से उपजा सम्यक् ज्ञान होता है। योगदशन मे स्वाध्याय का लाभ इप्ट देवता से मिलाप कहा गया है। ऋपिकृत ग्रथो मे मत्रो के विषय को देवता कहा गया है। अय मतो में सामान्य जनो से ऊचे दिव्य जना को देवता विशेषण
ध्यान शिखर की ओर पाच पग
49
दिया गया है। जो भी जिसका इष्ट है, उसको देवता मानकर उसी
से 'मिलाप' होना यागदर्शन का आशय है ।
ईश्वर-प्रणिधान
इस नियम का आशय है क्मफल को अपने इष्ट के अपण
करना। ऐसा करके हम अपने इष्ट पर कोई एहसान नहीं करते
बल्कि स्वय को तनावमुक्त करते है ।
गीता मे श्रीकृष्ण ने कम की वर्जना नहीं की, अपितु कमफल
को ईश्वरार्पण करने का सदेश दिया है। आधुनिक समाजविज्ञानी
की परिभाषा मे यह वात यो कही जाती है-"जो भी हमसे होता
है वह परिस्थितियो की प्रेरणावश होता है।"
उसका फल चाहे वह हमारी आशाओ के अनुकूल हो या प्रति-
कूल, उसे हम यदि परिस्थितियो की देन मानकर सहर्ष स्वीकार
कर लें तो हम चाहे आस्तिक हो या नास्तिक, ईश्वर-प्रणिधान
(ईश्वरार्पण) के भाव के निकट पहुच जाते हैं।
योगदर्शन 'ईश्वर-प्रणिधान' को समाधि की सिद्धि का एक
उपाय मानता है । इस सूत्र का भाव यह है कि जब हममे कर्तापन
का भाव लुप्त हो जाता है और जो कुछ हमारे द्वारा हुआ है, उसके
हम निमित्त मात्र रह जाते है तो उसके फल से सुखी या दुखी होने
का प्रश्न ही नहीं उठता। और जो व्यक्ति सुख-दुख की अनुभूति
से शूय है उसके ध्यान और समाधि सहज है।
योगमार्ग पर तीसरा पग आसन 'आसन को अष्टाग योग का तीसरा अग माना गया है। और यह योग का इतना लोकप्रचलित अग है कि सामान्य जन योगासन को ही 'योग' मानते है। आसन के विषय में हठयोगियो ने विशेष परीक्षण-अनुसधान दिए हैं और उन्होने शरीर के विभिन्न अगो, नाडियो और मास- पेशियो को बल देने के लिए अनेक आसनो का आविष्कार किया है । कुछ व्यक्ति चौरासी आसनो को प्रमुख मानते है। किन्तु वास्तव मे आसनो की गणना नही की जा सकती। अधिकतर आसनो का उद्देश्य पेट और पाचन-सस्थान को ठीक रखना तथा रीढ़ की हड्डी की लचक को बनाए रखना होता है किंतु योगदर्शन मे योग-साधना के लिए स्थिर तथा सुखपूर्वक वैठने की स्थिति को 'आसन' कहा गया है । योग की परम अवस्था 'समाधि' के लिए आसन की सिद्धि अत्यावश्यक है।
ध्यान शिखर की ओर पाच पग 'आसन-सिद्धि' क्या है? एक ही स्थिति में साढ़े तीन घटे तक स्थिरतापूर्वक.बठन का क्षमता को 'आसन-सिद्धि' कहा जाता है और इसके उपरात उसी आसन में विना ढलके या लेटे ढाई घटे तक सो सकने की क्षमता को आसन की उच्च सिद्धि माना जाता है। समाधि रूपी सोपान तक पहुचने के लिए सिद्धि की यह अवस्था न्यूनतम अवस्था है। इस अवस्था को बढाकर दिनो, सप्ताहो, मासो तक बढाया जाना अपेक्षित होता है। आसन-सिद्धि को बाधाए यदि साधक लबी अवधि के लिए स्थिर बैठना चाहे तो उसके शरीर से पसीना, मूत्र आदि के रूप मे जल तत्त्व का विसजन होगा । उसे पूरा करने के लिए वह जल तत्त्व ग्रहण करेगा। आहार के अजन-विसजन का अपना तन है। जो आहार लिया जाएगा उसका शेष अश मल-शौच के रूप में विसजित भी होगा। इस प्रकार मल-मूनादि के वेग भी लवे काल तक स्थिर बैठने के लिए बाधक बनते है । इन बाधाओ के निवारण के लिए हमारे ऋपियो ने पहाडो की कदराओ को तपोभूमि के रूप में चुना। आसन सिद्धि के लिए ऐसे स्थानो को उपयुक्त मानने के अनेक कारण है, जिनमे से कुछ को चर्चा यहा की जा रही है। जल की मात्रा अधिर गर्मी में पसीना बनकर बह निकलती है। उस कमी का आभास हमे प्यास के रूप में होता है। इस प्रकार जल लेने और उसका शेपाश मूत्र या स्वेद के रूप मे विसजित करने का चक्र निरतर चलता रहता है। अधिक शीत मे भूख अधिक लगती है। उसकी पूर्ति आहार द्वारा होती है। आहार लेने तथा उसके शेपाश के मल रूप में विसजन का अपना चा है। एक-दूसरे पर आधारित ये दोनो .
52 ध्यानयोग कुछ सरल विधिया अवस्थाए आसन-सिद्धि मे वाधक होती है। पर्वतो की कदराओ का वातावरण समशीतोष्ण रहता है। ऐसे वातावरण मे भूख-प्यास को नियनित करना अपेक्षाकृत सहज होता है। स्थूल आहार को निरतर कम करते हुए अत्पाहारी से निरा- हारी अवस्था तक पहुचना सभव होता है । यहा यह प्रश्न क्यिा जा सकता है कि लबे समय तक निराहार रहकर जीवित कैसे रहा जा सकता है? गभीरता से देखा जाए तो हम पाएगे कि निराहारी साधक भी सूक्ष्म आहार लेता है और उसका मल सूक्ष्म रूप से विसर्जित भी करता है। श्वास के रूप मे वह वायु से पोषक तत्त्व लेता है और प्रश्वास के रूप मे वायु के मल तत्त्व विसजित करता है। वायु मे जीवन-तत्त्वो की सभावना विद्यमान है और उसे हम अनुभव भी कर सकते हैं। उदाहरणत हम जानते ही है कि फूलो के सपर्क से वायु सुगधित होती है और घनी आबादी और कल- कारखाने के क्षेत्र की वायु मे चूल, धुआ आदि अनेक दूषित तत्त्व मिल जाने से वायु दूपित भी हो जाती है। इससे हम जान सकते है कि वायु मे अच्छे या बुरे तत्त्वो को अपने मे समाने की अद्भुत क्षमता है। जरा कल्पना कर नागरिक कोलाहल से दूर ऐसे स्थानो की, जहा की वायु का सपक वृक्षादि वनस्पतियो तया जडी बूटियो से है। वहा की वायु मे पोषक तत्त्वो के होने की सभावना क्तिनी अधिक हो सकती है ? एक योगी को जीवित रहने योग्य तत्त्वो की आवश्यकता ही कितनी होती है ? हमारी अधिकतर शक्ति तो ज्ञानेंद्रियो तथा कद्रियो की क्रियाशीलता के माग से व्यय होती है। जो व्यक्ति स्पश करने,
ध्यान शिखर की ओर पाच पग
53
सुनने, देखने, सूधने, चखने, हाथ-पाव चलाने, वावशक्ति का प्रयोग
बरने, स्थूल आहार के खाने-पचाने तथा काम, क्रोध आदि आवेगो
के रूप से शक्ति व्यय नहीं करता, उसे कितना आहार चाहिए।
उसे मात्र जीवन की लौ को प्रज्वलित रखने के लिए जितने
आहार की आवश्यकता होती है, वह शुद्ध वायु के सेवन से प्राप्त
हो सकता है।
वायु में पोषक तत्वो का समावेश करने के लिए सभवत
होमादि यज्ञो का प्रचार प्राचीन काल मे हुआ होगा।
ध्यान के लिए उपयुक्त आसन
योगी जनो ने 'पद्मासन' तथा 'सिद्धासन' को ध्यान-माधना
के लिए उपयुक्त माना है। इस आसनो के दौरान हाथो और
उगलियो की मुद्रा कमी होनी चाहिए, इस पर भी योगी जनो ने
विचार व्यक्त किए है।
ध्यान के इसी प्रसग के साथ हम यहा केवल इन दो आसनो
तथा इनमे सबंधित हस्तमुद्राओ की विधिया विस्तार से बताते है।
1
'पद्मासन' तथा 'सिद्धासन' से पहले
थालनी-पालती लगाकर बैठने वाले व्यक्ति पद्मासन और
सिद्धासन को अधिक सरलता से सीख सकते है । जो व्यक्ति कुर्सी
पर बैठने के बादी होते हैं, उन्हे पहले आलती-पालती लगाने अर्थात्
'सुखासन में बैठने का अभ्यास करना चाहिए।
।
सुखासन
सुखासन को अनेक विधिया हैं। इन विधियो मे प्रमुख क्रिया
है 'घुटना मोडना'।
54
ध्यानयोग कुछ सरल विधिया
पश्चिमी देशो मे, जहा खडे होकर या मेज-कुर्सी पर काय करने
का रिवाज है, वहा भी आरामकुर्सी तथा सोफासैट की सीट की
अचाई कार्यालय की कुर्सी से कम रखी जाती है । इस कम ऊची
सीट पर घुटना तनिक अधिक मुडता है । इससे थकावट दूर होती
है।
भारत मे चटाई, दरी आदि पर बैठने की प्रथा सामान्य रूप
मे प्रचलित है, इसलिए सामान्यत भारतीय जन बिना किसी यल
के
सुखासन मे बैठ सकते है । पश्चिमी देशवासी तथा भारत के वे
लोग, जो पश्चिमी रिवाज के अनुसार रहते हैं, उहे सुखासन
अभ्यास मे सिद्ध होता है।
नव अभ्यासी जनो को चाहिए कि वे धरती पर कई तहो की
चादर अथवा पतला गद्दा बिछाकर बैठे और बारी-बारी से दाया
और वाया घुटना मोडें। जितनी देर तक आराम से घुटना मुडा
रह सके उतनी देर मोडने का अभ्यास करे । दद या थकावट का
अनुभव हाने पर टागे फिर सीधी करके थोड़ी देर बाद बारी बारी
से दोनो घुटने मोडें।
पहली बार घुटना जितना आसानी से मुड सके, उतना मो.।
फिर धीरे-धीरे अधिक मोडने का अभ्यास करे। जब दोनो घुटने
इतने मुड सकें कि पूरी पिंडली जघा से सट जाए तो दोना
पिंडलियो को एक-दूसरे पर क्ची की तरह आडा टिकाए ।
चायो पिंडली पर दायी पिंडली आए या दायी पिंडली पर
वायी, इस विषय में कोई नियम नहीं है। पदन-बदलकर दाना
प्रसार मे अभ्यास करना चाहिए।
हातमुद्राए
मिदामन और पचासन मे शरीर तथा दागा की स्थिति में साथ
एनमुद्राए भी मुशाई जाती हैं। इसलिए इन दा आसना की विधि
ध्यान शिखरकी और पार पग
55
बताने से पहले हस्तमुद्राओ की विधि बताते हैं।
ध्यानयोग साधना मे चार प्रकार की हस्तमुद्राए प्रचलित हैं।
1 चिमुद्रा
इस मुद्रा मे अगूठे का ऊपरी सिरा तथा तर्जनी
उगली (अगूठे के साथ की पहली उगली) का ऊपरी
सिरा मिलाया जाता है, शेप तीनो उगलिया अलग
खडी अवस्था में रखी जाती है ।
2 ब्रह्माजली
इस हस्तमुद्रा मे खुली हुई हथेलियो की आकृति
बहुत कुछ कटोरे जैसी बनाई जाती है । खुली हुई चायी
हथेली पर खुली हुई दायी हथेली रखी जाती है । दोनो
हथेलियो का रुख ऊपर की ओर रहता है।
3 ज्ञानमुद्रा
तजनी (पहली उगली) को अदर की ओर मोडकर
उसका ऊपरी सिरा अगूठे के मूल मे बने उभार पर
लगाया जाता है। शेष तीनो उगलिया अलग खडी
अवस्था में रखी जाती हैं।
4 योनिमुद्रा
इस मुद्रा मे लेटी अवस्था में पड़ी दोनो हथेलियो
का रुख ऊपर की ओर रहता है। दोनो हाथो की
उगलियो को एक दूसरे मे इस प्रकार फसाया जाता है
कि दोनो अगूठो के मिरे एक-दूसरे को स्पश करने
लगते हैं।
56 ध्यानयोग कुछ सरल विधिया हस्तमुद्राओ का महत्त्व योगी जनो के मतानुसार उगलियो की ओर प्राणो का प्रवाह सबसे अधिक होता है और उगलियो के सिरो से उस प्रवाह का निष्कासन होता रहता है। उगलियो के परस्पर मिलाने से यह प्रवाह शरीर के केद्रो को लौट जाता है। आधुनिक शरीर रचना विज्ञान का अध्ययन करने से ज्ञात होता है कि मुख्य मस्तिष्क मे शरीर के सभी अगो के संचालन सबधी अलग-अलग केंद्र है। उनमे से उगलियो के सचालन सवधी केंद्र शरीर के अन्य अगो के आकार के अनुपात से अधिक व्यापक । इससे यह स्पष्ट होता है कि शरीर के अन्य अगो की तुलना मे स्नायु मडल का उगलियो से अधिक प्रभावी सबध है। हस्तसामुद्रिक के अध्ययन से पता चलता है कि हाथ की प्रत्येक उगली किसी विशेप मानसिक तथा शारीरिक क्षमता का प्रति- निधित्व करती है। मैडिकल पामिस्ट्री के अनुसार अगूठा बौद्धिकता का, तजनी अहभाव (Ego) वा, मध्यमा (दूसरी उगली) सौम्यता (soberness) का, अनामिका (तीसरी उगली) रक्त प्रवाह का, कनिष्ठिका (छोटी अतिम उगली) स्नायु तत्र का प्रतिनिधित्व करती है। आफू पक्चर तथा आफू प्रेशर विद्या मे हथेती तथा उगलिया के अलग-अलग भागो का शरीर के अय अगो से सबध बताया गया है। इन सबके अधिक विवरण मे न जाकर उपर्युक्त जानकारी के आधार पर हम कह सकते हैं कि ऊपर वताई गई हस्तमुद्राए मन मस्तिष्क के अलग-अलग केंद्रो को शक्ति देने वाली हैं। उनका उद्देश्य मस्तिष्क के विद्युत्-प्रवाह को मस्तिष्क की ओर लौटाकर मस्तिष्क के केंद्रो मे सतुलन पैदा करना है।
ध्यान शिखर की ओर पाच पग
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भूमिका के रूप में इतना कहने के उपरात अब ध्यान सवधी
दोनो आसनो की विधि बताते हैं। पहले पद्मासन ।
पद्मासन
इस आसन मे घुटने सुखासन की अपेक्षा अधिक मोडने पडते
हैं और पाव के पजे की लचक भी वढानी पडती है।
विधि दोनो टागें फैलाकर रखें । दाया घुटना मोडकर एडी
को वायी जघा के मूल पर लगा दें। तलुआ ऊपर की ओर दिखाई
देता रहे।
फिर वाया घुटना मोडकर, वाये पाव की एडी को दायी जघा
के
मूल मे लगा दें। तलुआ ऊपर की ओर रहे ।
दोनो टागो की स्थिति बदल-बदलकर यह आसन दोनो प्रकार
से किया जा सकता है।
हाथो की चार प्रकार की जो मुद्राए पहले बताई गई हैं, उनमे
से कोई एक मुद्रा इस आसन के लगाने के समय रखी जा सकती
है। पाचवी मुद्रा यह भी हो सकती है कि बाया हाथ वायें घुटने
पर रहे, दाया दायें घुटने पर । हथेलियो का रुख ऊपर की ओर
हो।
रीढ की हड्डी 90 डिग्री के कोण मे अर्थात उत्थित अवस्था मे
सीधी रहनी चाहिए। कुछ योगीजन ठोढी को यथासभव छाती से
लगाने का निर्देश देते है और ध्यान नासिका के अग्र भाग पर
केंद्रित करने का भी। कुछ योगीजन भौंहो के मध्य भाग पर ध्यान
केंद्रित करने का निर्देश देते है। ये निर्देश पद्मासन की कोई आवश्यक
शतें नहीं है।
आरभ मे यह आसन लगाते समय टागो और पिंडलियो मे दद
का अनुभव होता है। ऐसी दशा मे आसन को खोलकर टागो को
पसारकर आराम कर लेना चाहिए।
58 ध्यानयोग कुछ सरल विधिया इस आसन का धीरे-धीरे अभ्यास बढाना चाहिए। आसन के सिद्ध होने के बाद व्यक्ति विना किसी ओर ढलके देर तक सीधा बैठ सकता है। इस अभ्यास से अन्य लाभ है काम भाव सतुलित रहता है । पाचन मस्थान को बल मिलता है। मन शात होता है। टागो के गठिया से मुक्ति मिलती है । कब्ज दूर होता है। भूख बढती है। सिद्धासन इस आसन मे सर्वप्रथम वायी टाग के घुटने को मोडे । बायी ण्डी को मूलाधार के साथ लगाए । मूलाधार से आशय है मूत्र- जग तथा गुदा के मध्य का स्थान । बायी एडी को मूलाधार से स्पश कराने के साथ वाये तलुए से दायी जघा के भीतरी भाग को म्पश कराए । तत्पश्चात् दाया घुटना मोडकर दायें पैर को बायी पिंडली पर इस प्रकार रखे कि दायें पाव के टखने का दवाव वाये पाव के टखने पर पडे और दायी एडी मूत्र-अग को स्पर्श करे। आरभ मे दोनो टखनो का एक-दूसरे पर दवाव पड़ने पर दद का अनुभव होता है । इसलिए आरभ मे कुछ ही सेकेड यह आसन लगाए । बाद मे अभ्यास वढाते जाए । रीढ की हड्डी 90 डिग्री के कोण से उत्थित अवस्था हाया की स्थिति पहले बताई गई चारो हस्तमुद्राओ मे से किसी एव अवस्था में रखें। इस आमन से काम भाव नियत्रण मे रहता है और शरीर विना रखें।
ध्यान शिसर की ओर पाच पग
59
किसी ओर ढलके देर तक स्थिर रहता है। इस आसन से मानसिक
शाति बनी रहती है। अजीर्ण दूर होता है। स्मरण शक्ति बढती
है। हृदय रोग, श्वास रोग मे लाभ होता है।
ध्यान की उच्चतम अवस्था समाधि मे सिद्धासन और पद्मामन
सहायक होते हैं। फिर भी इन आसनो को ध्यान लगाने की
आवश्यक शर्त के तौर पर नहीं माना जा सकता।
जो व्यक्ति ये आसन सिद्ध न कर सकें वे सुखासन तथा अन्य
सुविधानुसार बैठने की मुद्रा में ध्यान कर सकते है।
ध्यान रहे
1 आसन खाली धरती पर कभी न करें, न ही अत्यत गुदगुदे
बिछौने पर करे। चादर को तीन-चार तहो मे बिछाकर, उस पर
आसन का अभ्यास करना चाहिए । मोटी दरी या सामान्य गलीचा
विछाकर भी आसन किया जा सकता है।
2 बैठने के सभी आसनो मे रीढ की हड्डी ऊपर की ओर सीधी
होनी चाहिए। कमर को टेढा करके बैठना या ढुलककर बैठना
उचित नहीं है।
3 ये दोनो आसन करते समय पलके मुदी रहनी चाहिए।
योगमार्ग पर चौथा पग प्राणायाम सास ही प्राण है। सास हम सब लेते है किंतु सभी व्यक्ति नियमित सास नहीं लेते । सास को नियमानुसार अपनी इच्छा के अधीन कर उसे शरीर के निर्दिष्ट क्षेत्रा मे फैलाने-समेटने की क्रिया ही प्राणायाम है। प्राणायाम योगसाधना का चौथा अग है । आसन सिद्ध होने के उपरात इस क्षेत्र में प्रवेश करने का योगदर्शन मे उल्लेख है। योग दर्शन में प्राणायाम का लाभ यह बताया गया है कि इसके सिद्ध होने पर ज्ञान पर से आवरण हट जाता है तथा योग के छठे अग 'धारणा' के लिए मन में अनुकूल वातावरण बन जाता है। प्रत्येक क्षेत्र की अपनी शब्दावली होती है। सामाय भाषा मे सास लेने की क्रिया कोश्याम कहते हैं। योग की शब्दावली में इस मापनपाद 52-53 ध्यान गिवर की ओरपाच पग क्रिया को पूरक कहा जाता है। श्रीर के आतरिक्त व्यापार को लिए बाहर की शुद्ध वायु को भीतर पहुंचाने का कारावास द्वारा सपन्न होता है। शरीर के आतरिक व्यापार में प्रयुक्त होने से दूपित गातु का निकामन प्रश्वास या नि श्वास द्वारा किया जाता है। योग- शब्दावली में यह क्रिया 'रेवा' है। सास को जहा का तहा रोकने की पिया 'कुमार' कहलाती है। वाम लेकर वायु को भीतर रोरुना 'आभ्यतर कुभा है तथा नि श्वास के उपरात वायु को कुछ समय के लिए भीतर न आने देना, बाह्य 'कुभक' है। योगदर्शन मे इस विषय के सूत्र का अथ इस प्रकार है- बाह्य (रेचक) आभ्यतर (पूरक) स्तभवृत्ति (मुभा)। ये तीन प्रकार के प्राणायाम देश, काल, सय्या से परीक्षित दीप, सूक्ष्म कहलाते हैं। यहा देश का अर्थ है साधक | यह अग जहा प्राणयायु को पहुचाना है। 'काल' का अथ है निर्दिष्ट स्थान पर स्वेच्छित समय के लिए प्राण को रोकने की क्षमता का होना। 'सय्या' शब्द काल की इकाई की ओर रात करता है। हाथ को जघा के चारो ओर घुमाकर गुटकी बजाने मे गितना समय लगता है, योग के क्षेत्र मे काल की इरा माना को एक इकाई माना गया है। आधुनिक घडियो के अनुसार योगशास्त्रियो ने अगले पृष्ठ पर अकित क्रम के अनुसार पूरका, युभव और रेपक के राम्मिलित व्यापार को प्राणायाम की एक इकाई माना है। 1 साधनपाद 50 62 ध्यानयोग कुछ सरल विधिया पूरक कुभक रेचक 12 सेकेंड 48 सैकेंड 24 मैकेड कुल 84 सैकेड 84 संकेड की इस इकाई को दुगुना, चौगुना, आठगुना इत्यादि करके प्राणायाम की क्षमता का विकास किया जाता है, किंतु समाधि की अवस्था तक पहुचने के लिए इस इकाई का ज्यो-का- त्यो गुणा नही किया जाता बल्कि पूरक और रेचक तो 12 और 24 सैकेड का ही रहने दिया जाता है, कुभक की अवधि को 48, 96,192,384 सैकेडो से आगे घटो तक वढाने का अभ्यास किया जाता है। सैकेडो की यह नाप योग के जिज्ञासुओ की मुविधा के लिए दी जाती है। सावक-जन घडी मामने रखकर सावना नहीं किया करते वल्कि वे बाहर को घडिया की बजाय अपने अतर की घडी के आधार पर साधना करते है। चक, पूरक और कुभक, इन तीनो के अतिरिक्त चौथा प्राणा- याम वह है जिसकी स्थिति मे साधक को मात्रा और गणना का ज्ञान नही रहता है। उस प्राणायाम में साधक इप्ट चिंतन मे इतना लीन हो जाता है कि प्राण की गति किस देश मे क्व स्थित (स्तभित) हो गई, यह भी उसे ज्ञात नहीं रहता। इस अवस्था को समाधि का आरभ माना जाता है। प्राणायाम के सिद्ध अभ्यामी नाडी के स्पदन तथा हृदय की गति को एक लवे समय तक इच्छानुसार रोक सकते हैं तथा जब चाहे चला सस्ते है। शरीर के किसी भी भाग मे वे प्राण को एकत्र कर सकते हैं और उसे प्राणो से शून्य भी कर सकते हैं। भूख, प्यास, , घ्यान शिखर की ओर पाच पग 63 ग्रीष्म तथा शीतजयी अनेक प्रकार की प्राणायाम की विधिया हठ- योगियो की दिनचर्या का अग होती हैं किंतु सामान्य जनो के लिए ये मात्र कौतूहल का विषय बनी रहती है। अनेक प्रकार के 'प्राणायाम' के विषय मे श्री नारायण स्वामी रचित 'प्राणायाम विधि' के कुछ अश यहा उद्धत कर रहे है । प्राणायाम की सामान्य विधिया प्राणायाम की विधिया जानने से पहले कुछ मुख्य बातें समझ लेनी चाहिए। 4 श्वास नाक से लेने का अभ्यास करना चाहिए। कुछ लोग मुह से श्वास लिया करते है, यह अभ्यास हानिकारक है। 2 गहरी श्वाम लेने की आदत डालनी चाहिए। 3 मुह ढककर किसी ऋतु मे भी नहीं सोना चाहिए। शुद्ध वायु श्वास के द्वारा फेफडे तक पहुचने के लिए सोते समय भी नाक सदैव खुली रखनी चाहिए। प्राणायाम शुद्ध और शात स्थान मे करना चाहिए, जहा वायु मे धूलि-धुआ आदि हानिकारक वस्तुए शामिल न हो। 5 भोजन भूख से कुछ कम करना चाहिए, जिससे अजीण न होने पाए। 6 रोगी होने की दशा में प्राणायाम नहीं करना चाहिए। अब हम यहा केवल उन्ही पाणायामो के अभ्यास की रीति बतलाएगे, जो सभी के लिए उपयोगी हो । ऐसे प्राणायाम की वात नही कहेगे, जो योग की ऊची अवस्था प्राप्त कर लेने पर ही किए जाते हैं।
64
ध्यानयोग कुछ सरल विधिया
सामान्य प्राणायाम
पद्मासन या किसी आसन मे जिससे सुखपूर्वक उस समय तक
(बिना आसन बदले) बैठ सके, जितनी देर क्रिया करनी इष्ट है,
वैठ जाए । इस प्रकार बैठे कि छाती, गला और सिर ये तीनो एक
सीध मे रह।
वीरे-धीरे नाक की राह से श्वास बाहर निकाले (रेचक) और
उसे बाहर ही रोक दे (बाह्य कुभक)। जब अधिक देर विना श्वास
लिए न रह सके तो धीरे धीरे पूरक करे (श्वास भीतर खीचे) और
अब श्वास को भीतर रोक दे (आभ्यतर कुभक)।
जब अधिक समय कुभा न कर सके तो धीरे-धीरे रेचक
कर।
।
इस प्राणायाम से रेचक, पूरक और कुभक अर्थात् प्राणायाम
की प्रत्येक क्रिया का अभ्यास होता है, जिससे आगे के प्राणायामो
के करने की शक्ति आती है। इस प्राणायाम का अभ्यास बढाना
चाहिए, परतु यह ध्यान रखना चाहिए कि प्रसन्नता से जितनी
देर श्वास रुक सके, रोके । चित्त को परत नही करना चाहिए।
अभ्यास से उत्तरोत्तर बाहर और भीतर दोनो ओर श्वास रोकने
की जवधि स्वयमेव वढती है ।
फेफडो के समस्त कोपो मे वाय भरने का प्राणायाम
पद्मासन अथवा क्सिी आसन, जिसम आप सुखपूवक अत तक
बैठ सक, बैठे और नथुनो से धीरे-धीरे श्वास के द्वारा शुद्ध वायु
भीतर की ओर खीचने लगे। पहले फेफडे से नीचे के भाग को
भरे और प्रबल इच्छा रखे कि फेफडे का अधोभाग वायु से भर
रहा है। पेट कुछ फूलेगा।
इसके बाद उसी श्वास से फेफडे के मध्य भाग में वायु पहुचाए
(इस क्रिया तथा आगे की समस्त क्रियाओ के साथ इच्छा शक्ति
,
।
ध्यान शिखर की ओर पाच पग
का प्रयोग आवश्यक है) 1 इस क्रिया से पेट कुछ भीतर सुकैडेगा,
छाती उभरेगी। इसके बाद श्वांस के तीसरे और अंतिम भाग
से फेफडे के ऊपरी भाग को भरें। इस क्रिया को पार करने से
पहले कधो को कुछ ऊपर उठा ले। इन तीन क्रियाओ से पूरक
होता है ! इसे पूरा होने मे लगभग आधा मिनट लगता है।
इसके बाद कुभक करें। एक मिनट से कुछ अधिक अथवा
कम-से-कम एक मिनट तक वायु को भीतर रोके । इसके साथ
इच्छा यह हो कि फेफडो के समस्त कोप वायु से भर रहे हैं।
फिर रेचक करके वायु को बाहर निकालें।
विशेष अभ्यास के काल में कई प्राणायाम एकसाथ करने
होगे, परतु लगातार नहीं किए जा सकते । एक प्राणायाम के बाद
दो-चार श्वास लेकर तब दूसरा, इसी प्रकार तीसरा और चौथा
करना चाहिए।
थकान दूर करने के लिए 'सुखद प्राणायाम'
सामान्य प्राणायाम करने से थकान पैदा होती है। उसे दूर
करने के लिए यह 'सुखद प्राणायाम करें।
जितनी देर तक सहज हो, नाक से पूरक ओर कुभक करें । मुह
से रेचक करें । मुह की स्थिति ऐसी करे, जैसे सीटी बजाते हुए
होती है । वेग से तीन से अधिक वार मे थोडा-थोडा श्वास बाहर
निकाले। एक बार निकालने के बाद कुछ रुम जाए। इसी प्रकार
कुछ क-रुकवर प्रत्येक बार बलपूर्वक स्वास बाहर निकालें।
ध्यान रहे किसी भी प्राणायाम का अभ्यास करें, अत में
'सुपद प्राणायाम' सदैव कर लें। इससे आराम मिलता है, सब
थकान दूर हो जाती है।
पेट और आत को हया से भरने का प्राणायाम
बाया पैर दाहिनी जाप पर रखें, गर्दन और पीठ को सीधा
66 ध्यानयोग कुछ मरल विधिया रखें। हथेलियो को घुटनो पर रखकर मुह बद कर लें। दोनो नथुनो से धीरे-धीरे परतु शीघ्रता से पूरक करें और बिना कुभव किए ही रेचक करें। यह वात याद रखनी चाहिए कि भोजन तब तक नहीं पचता जव तक उसका प्रत्येक कण ऑक्सीजन के भीतर न घुल जाए, इस- लिए आमाशय और आतो मे मी पर्याप्त मात्रा में वायु रहनी चाहिए। इस प्राणायाम का अभ्यास हो जाने पर इसको करने से साधा- रण ज्वर दूर किया जा सकता है और यदि समय पर भोजन न न मिले, तो इस प्राणायाम को भूख ही मे कर लेने से कुछ देर मनुष्य भूख के कष्ट से भी बच सकता है। यह अभ्यास निरतर करते जाए, जब तक थक न जाए अथवा पसीना न आने लगे। अभ्यास करते समय दृष्टि नासिका के अग्रभाग पर रखें। थक जाने पर दाहिने नथुने से पूरक करके कुभक करें और फेफडो को वायु से खूब भर लें। इसके बाद वायें नथुने से रेचक करके अभ्यास समाप्त कर दे। शक्ति प्राप्त करने और स्थिर रहने के लिए प्राणायाम पद्मासन मे बैठे। मलेंद्रिय को रुई से खूब भर दें। दाहिने नथुने से पूरक करें। अपनी ठोडी को छाती पर रखकर दायें हाथ से बायें पैर के अगूठे को और बायें हाथ से दायें पैर के अंगूठे को पकडें और कुभक करे। बाये नथुने से रेचक करें। दूसरे प्राणायाम मे बायें नथुने से पूरक और दायें नथुने से रेचक करना चाहिए।
ध्यान शिखर की ओर पाच पग
67
यह अभ्यास क्रमश बढाते हुए एक घटे तक ले जाना चाहिए।
रक्त-सचालन को नियमित करने का प्राणायाम
रक्त-सचार की क्रिया को नियमित करने और विचार-शक्ति
की वृद्धि के लिए पहले पद्मासन मे बैठे। दाहिने हाथ से दाहिने
पैर और वाये हाथ से बाये पैर के अगूठे को पकडें ।
बायें नथुने से पूरक करे । फिर कुभक करें। फिर दाहिने
नथुने से पूरक करे और बायें नथुने से फिर धीरे-धीरे रेचक करे।
इसी प्रकार आगे के प्रत्येक प्राणायाम मे रेचक और पूरक का क्रम
वनाते जाना चाहिए।
पसीना आने पर यह अभ्यास बद कर देना चाहिए।
स्मृति एव इच्छा-शक्ति वर्धक प्राणायाम
बायें पैर की एडी मलेंद्रिय पर और दाहिने पाव की एडी बायें
पैर की जधा पर रखे और ठोडी को छाती से लगाए, आखे बद
रखे।
गहरा और लवा श्वास लेकर रेचक करें। फिर कुभक और
उसके बाद रेचक कर डाले।
यह अभ्यास बढाते बढाते एक घटे तक ले जाए।
शीत से बचने के लिए प्राणायाम
बाया पाव मलेंद्रिय के नीचे रखें और ठोडी छाती पर । दोनो
हाथो से बढाकर सीध मे फैले हुए दाहिने पाव को पकड ले और
माथे को दाहिने घुटने मे लगा दे।
बाय नथुने से पूरक करके फेफडो को वायु से भर दें।
दृष्टि को नासिका के अग्र भाग पर जमाकर कुभक करें। फिर
दाहिने नथुने से रेचक करें।
एक घटा अभ्यास करने से पसीना आ जाता है और रक्त
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ध्यानयोग कुछ सरल विधिया
गति बढ जाती है । पसीना आने पर अभ्यास वद कर देना चाहिए।
दातो के रोग दूर करने और शरीर पुष्ट करने के लिए प्राणायाम
बाया पैर दाहिनी जघा पर और दाहिना पैर वायी जघा पर
रखे और दाहिने हाथ से दाहिने पैर और वाये हाथ से वायें पैर
के अगूठे को पकडे।
पूरक मुह से इस प्रकार करे कि दातो की पक्तिया भी श्वास
लेने में सहायक हो और 'सी सी' की आवाज के सदृश
ध्वनि होने
लगे।
कुभक करके दोनो नथुनो से धीरे-धीरे रेचक करे। अभ्यास
बढाते हुए 45 मिनट तक ले जाना चाहिए ।
शरीर में गर्मी की मात्रा बढाने के लिए प्राणायाम
सिद्धासन मे बैठकर दोनो नथुनो से पहले पूरक, फिर धीरे-
धीरे रेचक करें । पुन पहले से कुछ तेजी से पूरक करे और फिर
रेचक।
इसी प्रकार पूरक का वेग कम करते या बढाते जाए, जिससे
श्वास लोहार की धौंकनी की तरह चलने लगे।
पसीना आने पर अभ्यास बद कर दे।
इस प्राणायाम के निरतर अभ्यास से शरीर के जोडो और
पिंडलियो का दर्द भी जाता रहता है । अभ्यास बढाकर एक घटे
तक ले जाना चाहिए।
जिह्वा, तालु, नाक, कान और कठ को
नोरोग रखने के लिए प्राणायाम
पद्मासन मे शातिपूर्वक वैठ जाए ।
जिह्वा की नोक तालु से लगाए फिर मुह से पूरव करें। समस्त
शरीर को ढीला छोडते हुए कुभव करें। नाक से रेचक करें।
ध्यान शिखर की ओर पाच पग 69 जमाए। अभ्यास वढाकर 45 मिनट तक ले जाए । ब्रह्मचर्य के लिए सहायक प्राणायाम चित लेट जाए और कानो को रुई से बद कर लें जिससे बाहर का कोई शब्द न सुनाई दे । नासिका के अग्रभाग पर दृष्टि आधा घटा तक इस स्थिति मे रहे, रुक-रुककर गहरा श्वास लेते रहे। फिर आखो की पुतलियो को ऊपर चढाए और भौंहो के मध्य दृष्टि जमाए। ऐसा करने से आखे वद होने लगेंगी, उन्हे बद हो जाने दे। इस क्रिया के अभ्यास से कुभक करने की शक्ति बढती है, चित्त एकाग्र रहता है और इद्रियो का निग्रह होता है । इस स्थिति मे अधिक रहने से भीतर के शब्द सुनाई देने लगते हैं, जिहे कबीर आदि महापुरुपो ने 'अनहद' शब्दनाद कहा है । ध्यान रहे प्राणायाम की ये विविया इस विषय के अनुभवी जन की देख- रेख मे करनी चाहिए। जो जन स्वय को ये विधिया करने के योग्य नहीं पाते वे अच्छे स्वास्थ्य के लिए इतना तो कर सकते है कि सास को नियमित करे। नियमित सास नाक द्वारा लिया और छोडा जाता है। गहरे श्वास-नि श्वास शरीररूपी भवन के हर कोने को ऑक्सीजनयुक्त करते हैं । अत छोटे-छोटे अधिक श्वास-नि श्वास की बजाय गहरे सास की आदत डालनी चाहिए। गहरी सास लेते समय छाती सामान्यत फूलती है । योगीजनो का निर्देश है कि सास भरते समय पेट भी फूलना चाहिए और सास
70
ध्यानयोग कुछ सरल विधिया
छोडते समय पेट पिचकना चाहिए।
एक निर्देश यह भी है कि आगे की ओर झुकते समय सास
छोडी जानी चाहिए और पीछे की ओर झुकते समय सास भरी
जानी चाहिए।
जो जन अन्य कठिन प्राणायाम नही कर सकते वे सास लेने
और छोडने की यह विधि अपनाकर तन और मन से स्वस्थ रह
सकते हैं।
योगमार्ग पर पाचवा पग प्रत्याहार योगमाग की यात्रा के पाचवें पडाव 'प्रत्याहार' के विषय मे योगदर्शन मे ये सूत्र आए है। इद्रियो का अपने विषयो का त्याग करके चित्त के अनुकूल होना प्रत्याहार है। प्रत्याहार के सिद्ध होने से इद्रियो पर योगी का आधिपत्य हो जाता है। इद्रियो का अपने विषयो से रहित होना योगी की परमावश्यकता है। भारतीय शास्त्रो मे वणित इद्रियो तथा उनके विषयो की चर्चा करने से पूर्व पाच तत्त्वो अथवा पच महाभूतो का परिचय प्राप्त करना आवश्यक है। पाच तत्त्व अथवा पच महाभूत ये पाच तत्त्व हैं-आकाश, वायु, अग्नि, जल तथा पृथ्वी। भारतीय दर्शन इन्हे मूल तत्त्व कहता है किंतु आधुनिक भौतिक 1 साधन-पाद 54-55 72 ध्यानयोग कुछ सरल विधिया विज्ञानी मूल तत्त्व (Element) उस पदार्थ को मानते हैं जिसे किसी भी रासायनिक विधि से सरलतर पदार्थ मे विश्लेपित नहीं किया जा सकता। दूसरे शब्दो मे मूल तत्त्व वह है जो यौगिक (Compound) नहीं है। आधुनिक भौतिक विज्ञान ने अब तक 103 मूल तत्त्वो की खोज की है। उनकी दृष्टि मे आकाश तो कोई तत्त्व ही नही ठहरता और शेप चार तत्त्व यौगिक सिद्ध होते हैं। कुछ पश्चिमी विद्वान् 'ईथर' को ही 'आकाश' तत्त्व मानते है । 'ईथर' ही आकाश है या आकाश तत्त्वहीनता की स्थिति का नाम है, इस विषय पर अभी अन्वेषण चल रहा है किंतु प्राचीन भारतीय तत्त्वज्ञ पाच तत्त्वो का वर्गीकरण पाच ज्ञानेद्रियो की सवेदन क्षमता के आधार पर करते रहे है । आत्मा को जिस तत्व का बोध शरीर के जिस सवेदनशील अग (इद्रिय) के माध्यम से होता है, उस तत्त्व को उस इद्रिय का विपय माना गया है । प्रत्येक तत्त्व के गुण तथा उससे सबधित इद्रिय के विषय इस प्रकार हैं पाच तत्त्वो से सबधित इद्रिया प्रथम तत्त्व 'आकाश' है। आकाश का गुण 'शब्द' है । शब्द कान नामक ज्ञानेद्रिय का विषय है। आकाश का सूक्ष्मतम प्राथमिक तत्त्व माना गया है। दूसरा तत्त्व 'वायु' है। इसका गुण 'स्पश' है । स्पश त्वचा नामक ज्ञानेंद्रिय का विषय है । वायु मे आकाश तत्त्व भी सम्मलित है। तीसरा तत्त्व 'अग्नि' है। इसका गुण 'रूप' है । रूप नेत्र नामक ज्ञानेद्रिय का विषय है। 'अग्नि' आकाश, वायु और अग्नि तत्त्व के सयोग से प्रकट होती है। चौथा तत्त्व 'जल' है। इसका गण 'रस' है। रस 'रसना' ध्यान शिखर की ओर पाच पग 73 नामक ज्ञानेंद्रिय का विषय है। जल मे पूर्वोक्त तीनो तत्त्व आकाश, वायु तथा अग्नि सम्मिलित रहते हैं। पाचवा तत्त्व 'पृथ्वी' है। इसका गुण 'गध' है। गध नासिका नामक ज्ञानेद्रिय का विषय है। पाचो तत्त्वा मे पृथ्वी को स्थूलतम तत्त्व माना गया है क्योकि इसमे उपर्युक्त चार तत्त्वो का समावेश है। कर्मेंद्रिया पाच है पाद, हस्त, वाक्, गुदा तथा उपस्थ (जननेंद्रिय)। 'जिह्वा' नामक अग 'रसना' के नाम से ज्ञानेंद्रिय है तथा 'वाक्' के रूप में कर्मेद्रिय है। रसना से आशय है जिह्वा तथा उसके आसपास मुख के भीतरी मडल में विद्यमान स्वाद केंद्र। ये केंद्र प्रकटत निष्क्रिय रहकर आहार ग्रहण के समय अथवा आहार प्रतीक्षा मे रस सवित करते हैं। इसलिए रसना को ज्ञानेद्रियो म माना गया है। वाक् का सवध जिह्वा की गतिशीलता से है । जिह्वा के अलग- अलग क्षेत्र कठ, तालु, मूर्द्धा, दत और ओष्ठ नामक क्षेनो को स्पर्श करके स्वरो को अलग अलग रूप देते है। इसलिए वाक का कम- द्रियो मे गिना गया है। जिस प्रकार जिह्वा ज्ञानेंद्रियो और कर्मेद्रियो का मिलन-विंदु है, लगभग इसी प्रकार की स्थिति 'उपस्थ' की भी है। स्पश त्वचा का विषय है किंतु त्वचा से तो हाथ-पाव सहित पूरा शरीर मढा हुआ है। पूरे शरीर मे 'उपस्थ' अर्थात जनन-अग ही एक ऐसा अग है जहा स्पर्शानुभूति सर्वाधिक होती है अत उपस्य मंद्रिय होने के साथ स्पश की दृष्टि से व्यापर त्वचा मडल का प्रतिनिधि भी है। अपने स्वामी आप इद्रियो के इन विषयो मे आसक्त व्यक्ति विना पतवार के नाव की भाति ससार रूपी सागर मे थपेडे खाता डोलता रहता है।
74 ध्यानयोग कुछ सरल विधिया ऐसा व्यक्ति यदि सारे संसार का अधिपति हो जाए तो भी अपनी इद्रियो का दास बना रहता है। व्यक्ति अपना स्वामी स्वय बन सके, इसका उपाय योगदर्शन मे सुझाया गया है कि इद्रियो को उनके विपयो से विमुख कैसे किया जाए। शास्त्र ने यह सुझाव योग की उच्चतर साधना के सदभ में दिया है किंतु जो व्यक्ति योग के ऊचे क्षेत्र में प्रवेश नही भी करना चाहता, वह भी यदि अपनी इद्रियो का स्वामी स्वय बन सके तो अधिक सफल, अधिक सुखद जीवन व्यतीत कर सकता है । इद्रियजित् व्यक्ति का व्यवहार उन महानुभावो से अलग प्रकार का होता है जो अपनी इच्छा के विपरीत कुछ भी होने पर घबरा जाते हैं, आपे से बाहर हो जाते हैं । वे ग्रीष्म ऋतु मे गर्मी की शिकायत करते हैं, सर्दी मे शीत की और वर्षा ऋतु मे कभी कम वर्षा की और कभी अधिक वर्षा की। निश्चित समय पर पान, सिगरेट, चाय या अन्य किसी तलब की पूर्ति न होने पर वे बेहाल हो जाते है । ये लोग अपनी इद्रियो के स्वामी स्वय नहीं हैं अपितु इद्रियो के फेर में पड़ा डावाडोल मन ही उनका स्वामी होता है। इद्रियो के सुख की तलाश में भटकते ऐसे व्यक्ति वास्तविक सुख और शाति से सदैव वचित रहते है। जो व्यक्ति इद्रियो के विषयो से विमुख होना चाहते है, दूसरे शब्दो मे जो इद्रियो के आधिपत्य से मुक्ति पाना चाहते हैं, उनके लिए भी सरल उपाय ज्ञानी जनो ने सुझाए है । उनके अनुसार चलकर कोई भी व्यक्ति अपने मन को सरलतापूर्वक वश मे कर सकता है। इनमे से कुछ उपाय यहा दे रहे हैं, जिहे अभी से व्यवहार मे लावर आप एक ही मास में इसका लाभ स्वय देख सकते हैं।
ध्यान शिखर की ओर पाच पग 75 मन को वश में करने की सरल विधि प्रथम सप्ताह मे, जो अभी से आरभ हो रहा है, आप प्रत्येक दिन अपनी किसी एक मनपसद वस्तु का केवल एक दिन के लिए त्याग करें। वह वस्तु चाय, दूध, दही, घी, फल, तरकारी, गेहू, चावल, दाल, मास, अडा, नमक, मीठा, खट्टा, शराब, पानी आदि मे से कोई ऐसी वस्तु होनी चाहिए जिसका सेवन आप नियमित रूप से करते है। जिस वस्तु का सेवन आप कभी-कभी करते है, उसके त्याग करने का कोई महत्त्व नहीं है। इसलिए नियमित व्यवहार की वस्तुओ मे से किसी एक का केवल एक दिन के लिए त्याग करना आवश्यक है। दूसरे सप्ताह में एक खाद्य पदार्थ के त्याग के साथ एक मान- सिक त्याग भी शामिल कर ले । उदाहरणत किसी एक प्रात को जागते ही यह निश्चय कर ले कि चाहे आज कुछ भी हो जाए, क्रोध नहीं करेगे अथवा आज अभिवादन के लिए किसी से हाथ नहीं मिलाएगे, बल्कि अभिवादन का कोई अन्य उपाय बरत लेंगे। किसी दिन यह निर्णय कर लें कि आज किसी के भी कार्य मे कमी होने पर उसकी शिकायत नहीं करेंगे। पीने के लिए ठडे की वजाय गर्म पानी आ गया या चाय ठडी परोसी गई तो उसे सहज भाव से स्वीकार कर लेगे। वत्ती चली गई या पखा बद हो गया तो उसका हल भी सहज भाव से निकाल लेंगे। या सामान्य रुचि के प्रतिकूल भोजन परोसे जाने पर उसका बिना शिकायत के सेवन कर लेंगे। नमक या मीठा कम होगा तो दोबारा नही मागेगे । अधिक होगा तो बिना शिकायत के ग्रहण करेगे। इस ग्रहण का अर्थ यह न समझें कि धार्मिक दृष्टि से या स्वास्थ्य की दृष्टि से जो आपके लिए निषिद्ध है, उसे आप स्वीकार करें। इस प्रकार प्रत्येक प्रात कोई भी प्रण करके पूरे दिन उसका 76 ध्यानयोग कुछ सरल विधिया पालन करे। इस प्रण का भेद अपने तक सीमित रपने से इसका पालन करने मे सुविधा रहेगी। ये उपाय आरभिक दो सप्ताह तक निभाने में कठिनाई होगी तत्पश्चात धीरे-धीरे आपको इस प्रकार के त्याग में रस मिलने लगेगा और एक मास के उपरात आप देखेंगे कि आपके जीवन की पतवार इद्रियो के हाथ से निकलकर आपके हाथो मे आ गई है। आपके अदर एक ऐसी प्रज्ञा जाग्रत हो गई है जो उचित-अनुचित का निर्णय करके आपको गलत राह से बचाती है । आपकी स्मरण शक्ति तेज हुई है और इच्छाशक्ति प्रवल हो गई है। साथ ही यह भी कि अब योग के अतरग अगो-धारणा, ध्यान और समाधि मे प्रवेश करना आपको अपेक्षाकृत सरल लगने लगा है। यदि आप योग के उच्चतर क्षेत्र मे न भी जाना चाहे तो भी योग की परम उपलब्धि 'ब्रह्म स्वरूप होने के लिए पहले की अपेक्षा अधिक योग्य हो गए है। गीता मे श्रीकृष्ण ने ब्रह्म मे स्थित व्यक्ति तथा कम-बधन-मुक्त व्यक्ति के लक्षण इस प्रकार कहे है जो प्रिय वस्तु को पाकर प्रसन्न न हो, अप्रिय को पाकर उद्वेग को न प्राप्त हो, वह निश्चय-बुद्धि, मोहरहित ब्रह्मवेत्ता ब्रह्म मे स्थित है। 5/20 अपने आप जो वस्तु मिले, उसी मे सतुष्ट, शीत-उष्ण आदि द्वद्व पदार्थों के क्लेश को न मानने वाला, मत्सर से रहित, अथ को सिद्धि और असिद्धि मे एक सा रहने वाला पुरुष कर्म करके भी बधन को नहीं पाता। 4/22
ध्यान की सहज विधि
विपश्यना
मन पर अकुश लगाकर उसे एकाग्न
करने की विधिया अनेक योगीजनो
द्वारा बताई गई हैं, किंतु विपश्यना'
मन को मित्र बनाकर उसे एकाग्र
करने की विधि है।
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विषय-प्रवेश मन की चचलता का बखान अकसर हम सुनते रहते है और चचल मन को वश में लाने के उपाय भी हमारे गुरुजन हमे सुझाते रहते है । कभी जप द्वारा, कभी गुरुमन अथवा नाम द्वारा, कभी त्राटक विधि द्वारा, किंतु ज्यो-ज्यो मन को वश मे लाने व मन को एकाग्र करने का हम प्रयत्न करते हैं त्यो-त्यो उसकी चचलता, उसकी गतिशीलता वढती दिखाई देती है । उससे जुझारू रूप से लड़ने का प्रयास करते हुए हम अपनी शक्तियो का अपव्यय कर बैठते है। यदि हम यह स्वीकार कर लें कि चचलता मन का दोप नही बल्कि गुण है तो मन से युद्ध छेडने का हमारा आधार ही नहीं रहता। मन की चचलता हमारी कल्पनाशीलता और हमारे सामान्य ज्ञान के विस्तार पर निर्भर है। हमारी ज्ञान सीमा ही हमारे मन की उडान-सीमा का कारण बनती है। चचल मन पर ग्लानि का अनुभव न करें उदाहरणत एक सीमित ज्ञान वाले व्यक्ति को एक पसिल देकर उस पर ध्यान टिकाने का उसे निर्देश दिया जाए तो वह ।
80 ध्यानयोग कुछ सरल विधिया पंसिल पर अपना मन केंद्रित करने में शीघ्र सफल हो जाएगा। किंतु दूसरा व्यक्ति, जिसके सामाय ज्ञान का दायरा पहले व्यक्ति की अपेक्षा अधिक विस्तृत होगा, उसका ध्यान बार बार पसिल से हटेगा। पंसिल सवधी देखे-अनदेखे अनेक प्रश्न उसके मन को बार-बार पैसिल के आकार से हटाकर उसे कभी पंसिल उद्योग के काम मे आने वाली लकडी के जगलो मे ले जाएगे, कभी उसके आविष्कार सवधी इतिहास के पन्ने उसके सामने खुलेंगे, कभी उसका मन पैसिल की आयात-निर्यात नीति पर विचार करते हुए अथशास्त्र से सबधित विषयो मे जा उलझेगा। इस प्रकार के अनेक विचार उसके मन को पसिल के आकार से हटाने का कारण बनेगे और वह कल्पनाशील व्यक्ति एकाग्रता सबधी प्रतियोगिता मे अपने से अल्पज्ञानी के सामने स्वयं को हीन महसूस करता रहेगा। ऐसे मनस्वी को एकाग्र होने के लिए बेशक अधिक साधना करनी पडेगी किंतु उससे प्राप्त होने वाली उपलब्धिया भी उसे अपेक्षाकृत अधिक सुलभ होगी। दिव्यद्रष्टा वे ही होते हैं जिनके पास सामान्य ज्ञान की आधारभूत राशि सामाय जनो से अधिक होती है। मन की चचलता को दोप माने जाने की पृष्ठभूमि मे वास्तविक कारण यह रहा है कि हम मन को किसी स्थिर आकार पर एकाग्र करने मे प्रयत्नशील रहे हैं । यदि व्यक्ति मन की चचल प्रकृति के अनुकूल क्सिी गतिमान वस्तु पर ध्यान केंद्रित करे तो उसके एकाग्र होने की सभावना बढ सकती है। लगभग ढाई हजार वप पूर्व गौतम बुद्ध ने मनन करके अपने भीतर के साक्षात्कार का माग आना-पाना अर्थात् सास की आवा- जाही का निरीक्षण बताया था। बाद मे यही विधि 'विपश्यना' पद्धति के नाम से प्रचलित हुई। बौद्ध मठो मे इस विधि का अभ्यास हजारो वर्षों से हो रहा
81
ध्यान की सहज विधि विपश्यना
है। किंतु इस विधि को आज के युग मे प्रचलित करने का श्रेय
इगतपुरी (महाराष्ट्र) के श्री सत्यनारायण जी गोयनका को है।
विपश्यना पद्धति को एकाग्रता का सरल उपाय समझते हुए,
इसकी अनुभूत विधियो का सार यहा प्रस्तुत कर रहा हूँ।
।
समोधर्मों से मन का मेल कराए
सास के निरीक्षण द्वारा अपने निरीक्षण की यह विधि एकाग्रता
की अय विधियो की अपेक्षा अधिक सहज इसलिए है कि यह
हमारे मन को उसकी रुचि के अनुकूल विषय पर लगाने का उपाय
सुझाती है। किसी निराकार इष्ट अथवा अनसमझे शब्द-समूह
(मत्र) की अपेक्षा गतिमान सास का निरीक्षण गतिशील मन के
लिए अधिक प्रिय विषय हो सकता है।
विपश्यना का अर्थ है यथार्थ ज्ञान । सास आ रही है, जा रही
है। किंतु हमने इस ओर भी ध्यान ही नहीं दिया। अपना शरीर
भी देखा-भाला है । इसे भी हमने विचारयोग्य कभी नहीं समझा।
फलस्वरूप हमारे अतर मे जो दुनिया छिपी बैठी है उससे हम
अनभिज्ञ रहे हैं । सास के माध्यम से अपने अतर मे झाकना अधिक
सरल है।
प्रतिदिन 30 मिनट प्रात और 30 मिनट साय इस विधि का
अभ्यास करके तीन सप्ताह मे इस साधना का वाछित लाभ उठाया
जा सकता है।
प्रथम सप्ताह की अभ्यास-विधि
विसी प्रात स्थल पर आराम से चटाई पर पद्रह मिनट के लिए
बैठ जाइए । पिसी विशेप आसन में बैठने का आग्रह नहीं है। आप
वद कर लीजिए और सारा ये आने-जाने पर ध्यान दीजिए।
आप पाएगे कि आपया ध्यान बार-बार सास से हटकर दूसरे
विषयो की ओर जा रहा है। वे विषय घर मे, काम-याज मे तथा
अय प्रकार के हैं। जब मन वी उडान के दौरान आपको यह
ध्यान मा जाए कि आप तो सास की आवाजाही को देख रहे थे,
उसी क्षण पुन मन को सास पर ले आए।
सास को नियमित करने को भी जररत नहीं है । सास तेज आ
रही है या धीमी, इसकी सामाय गति में बाधा नही डालनी है।
सास का सही मार्ग है नाक । किंतु कभी-कभी जुबाम के
कारण नाक बद रहती है तो सास मुह से ली जाती है। ऐसी
स्थिति मे मुह से आने-जाने वाली सास पर ध्यान करना चाहिए ।
लेकिन यह समझौता ज्यादा देर तक करना उचित नहीं है । नाक
से सास लेने का अभ्यास करना चाहिए।
ध्यान की सहज विधि विपश्यना
83
आमन की एक मुद्रा मे बैठे-बैठे थक जाए तो बैठने की मुद्रा
बदल लीजिए किंतु आखें बद रखिए।
माम के अवलोकन से मन उचाट होने लगे तो आख खोलकर
याद कीजिए कि आपका मन सास से कितनी बार भटका । एकाध
मिनट के विश्राम के बाद आप पुन पूर्वोक्त अभ्यास कीजिए। इस
अवधि के पश्चात् पुन मन की उडान का लेखा-जोखा कीजिए।
मन की उडान स्वय देखें
इस अभ्यास से आपको यह ज्ञात होगा कि आख वद करने से
मन की उडान की क्षमता बढ जाती है। जब आपकी आखें खुली
रहती है तो आपकी दृष्टि-सामा मे जो कुछ है, मात्र वहीं दिखाई
देता है। किंतु जब आप आखे वद कर लेते हैं तो आपकी दृष्टि-
सीमा असीम हो जाती है। आपो जो कुछ कभी भी देखा, मोगा
या सोचा होता है, वह आपके कल्पना-चक्षुओ के सामने आता
रहता है और आप आश्चर्यचकित रह जाते है कि आप कुछ ही
मिनट की अवधि में कितनी बार कहा कहा से हो आए ।
सायकाल भी उपर्युक्त अभ्यास करें। मन पर कोई दबाव न
डालें। सहज विधि से मन की उडान को देखे और जव भी वह
थककर लौटे उसे सास की आवाजाही पर टिकाए।
अपनी ध्यान-प्रगति जानने के लिए अगले दिन ध्यानस्थ होने
में पूर्व कागज पैसिल अपने पास रख लें। अब आपको मन की
उडानो का हिसाव रखना है। पद्रह मिनट के अभ्यास के दौरान
आपका मन कितनी वार सास से हटा है, वह सय्या आप नोट कर
लें।
अभ्यास के दौरान मन अनेक वार सास से हटेगा। वह कव
हटता है, इसका माधक को उस समय आभास नहीं होता बल्कि
वह जब एक यात्रा पूरी करके पुन लौटकर आता है, तभी उसको
-
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ध्यानयोग कुछ सरल विधिया
ज्ञात होता है कि अभी-अभी मन भटका था। उसके लौटने के
उपरात अव इसे पुन सास के निरीक्षण पर लगाए ।
अगले पाच दिनो तक इसी प्रकार नोट करते रहने से आपके
सामने मन की कल्पना-क्षमता का लेखा-जोखा आ जाएगा। यदि
आपकी मानसिक उडानो मे प्रतिदिन उत्तरोत्तर कमी आई है तो
इससे विदित होता है कि आपमे एकाग्रता की योग्यता बढ रही
है। यदि कमी नही हुई, अथवा वृद्धि हुई है तो भी चिंता की कोई
बात नही, ना ही मन की चचलता पर ग्लानि अनुभव करने की
जरूरत है। सिफ उपर्युक्त अभ्यास को तब तक जारी रखने की
जरुरत है जब तक मानसिक उडानो की सय्या उत्तरोत्तर कम
नही होती जाती है।
खुद ही गुरु, खुद ही चेला
पूरा एक सप्ताह नियमित रूप से सास-अवलोकन का अभ्यास
आवश्यक है । आप स्वय ही शिक्षक हैं, स्वय ही विद्यार्थी । इसलिए
अपनी किसी चूक का प्रायश्चित्त भी स्वय करे । यदि किसी दिन
अभ्यास से चूक जाए तो उसका प्रायश्चित्त यह करे कि अगले दिन
दो की बजाय चार बार यह अभ्यास करें।
जो व्यक्ति अब तक तन से बाहर की दुनिया को ही सब कुछ
मानता रहा है, उसे आरभ मे यह सारा अभ्यास एक वबाल सा
लगेगा। सास-अवलोकन करने की यह क्रिया निरथक-सी लगेगी।
बिलकुल वैसे ही जैसे टाईप राईटिंग सीखने वाले शिक्षार्थी को
की-बोड (Key Board) पर नजरें टिकाए निरर्थक शब्दो या वाक्यो
का अम्यास करना । किंतु जिसे यह विश्वास होता है कि वह एक
दिन सायंक पक्तिया बिना की-बोर्ड' देखे टाईप कर सकेगा, वह
अभ्यासकाल की शुष्कता में भी हताश नहीं होता। अत इस
अभ्यास मे भी अगले चरण तक वे ही पहुचेंगे जिहे यह विश्वास
ध्यान की सहज विधि विपश्यना
85
है कि तन के भीतर भी एक दुनिया है जिसमे भयानक और मनोरम
सभी प्रकार के दृश्य हैं।
प्रथम सप्ताह मे अपनी ध्यान-क्षमता की प्रगति की जाच भी
वीच बीच मे करते रहना चाहिए। अपनी जाच इस प्रकार करे
यदि ध्यान के उपरात आख खोलने पर आप देखते हैं कि अभी
तो पद्रह मिनट की वजाय पाच ही मिनट व्यतीत हुए हैं तो इससे
स्पष्ट है कि आप सास में डूबे नही है । अत आपका सास-निरीक्षण
का अभ्यास काल एक सप्ताह से बढेगा।
यदि आप आखे खोलने पर पाते है कि पद्रह की बजाय बीस
मिनट निकल गए है तो आप अपनी मजिल पर अपेक्षाकृत जल्दी
और निश्चित पहुचेंगे किंतु अपनी विशेष क्षमता का अर्थ यह
विलकुल न ले कि आप प्रथम सप्ताह के अभ्यास को फलागकर
अगले सप्ताह का अभ्यास यह सप्ताह पूरा होने से पूर्व कर सकते
अपने सामने अपनी अपराध स्वीकृति
प्रथम सप्ताह के श्वासावलोकन के दौरान आपके स्मृति-पटल
पर मनोरम की अपेक्षा भयानक यादें आती है तो आप समझें कि
आपका मानसिक शोधन हो रहा है। मानसिक शोधन की इस
प्रक्रिया में व्यक्ति एक प्रकार से अपने सामने आप अपराध स्वीकार
(Confession) करता है। इससे मन निर्मल होता है । यह निर्मलता
तुरत दिखाई नहीं देगी लेकिन कुछ अरसे बाद आपको, आपके
आसपास वालो को आभास होने लगेगा कि आपमे कुछ परिवतन
आया है।
यदि एक सप्ताह के इस अभ्यास के दौरान इस क्रिया में
आपको रस नही मिला तो आप समझ ले कि आप बहिर्मुखी हैं।
बहिर्मुखो व्यक्तित्व के शात और एकाग्र होने के साधन भी उसे
4
86 ध्यानयोग कुछ सरल विधिया अपने आकार से बाहर मिलते हैं। परहित का कोई कार्यक्षेत्र चुन कर आप उसी मे वैसी एकाग्रता और शाति पा सकते हैं जैसी अतर्मुखी व्यक्ति को अपने भीतर स्थित होकर प्राप्त होती है। भक्तियोग, कमयोग और ज्ञानयोग के मार्ग अलग-अलग प्रकार के व्यक्तित्वो के लिए हैं । प्रत्येक व्यक्ति अपनी प्रकृति के अनुकूल मार्ग चुनकर जब उस पर चलता है तो उसे सफलता मिलती है । जो साधक एक सप्ताह की विधि भलीभाति से निभा चुके है, वे अगले सप्ताह का अभ्यास आरभ करें।
दूसरे सप्ताह की अभ्यास-विधि
निराकार से साकार की ओर
शात स्थान में प्रात काल आखें बंद करके आलती-पालती
लगाकर बैठे। लगभग पाच मिनट यथापूर्व सास का अवलोकन
करें। तत्पश्चात् सास से मन को हटाकर अपने शरीर पर लाए।
मन की आख से अपने तन का निरीक्षण करने की विधि यह है
कि मदी आखो की अवस्था मे ही शरीर के प्रत्येक अग को वारी-
वारी ध्यान मे लाए। अपना चेहरा दर्पण मे देखा हुआ है तथा
अपना पूरा शरीर नहाते समय देखा हुआ है। अब आख बद करके
उस देखे हुए को कल्पना-चक्षुओ से देखना है।
नाक से शरीरावलोकन आरभ करे। आखें बंद कर नाक,
आखे, मस्तक, सिर, मुह, कान, गदन, कधे, बाजू, कुहनिया, हाथ,
हाथो की उगलिया, तत्पश्चात् वापस कधे पर लौटें, दूसरे वाजू के
अगो-प्रत्यगो को उसी प्रकार मन से छुआते चले जाए ।
मन बीच मे कई बार उडान भरेगा। जैसे ही लौटे, उसे पुन
कुछ मिनट के लिए श्वाम के निरीक्षण पर लगाए । फिर उसी अग
88 ध्यानयोग कुछ सरल विधिया पर लाए जहा से वह गैरहाजिर हुआ था और वही से अग का निरीक्षण पुन आरभ करें। पुन उगलियो से कधे, कधे से रीढ की हड्डी, गुदा, जननेद्रियो, जाघो, घुटनो, पिंडलियो, पाव, पाव की उगलियो को मुदी आखो से देखें । एक टाग का निरीक्षण खत्म होने पर दूसरे पाव की उगलियो से ऊपरी अगो की मानसिक यात्रा करे । जननेद्रियो, नाभि, पेट, छाती, गदन, ठुड्डी, नासिका तक आकर पुन श्वास-प्रश्वास पर ध्यान लाकर आखें खोल ले और घड़ी में देखे कि शरीर की मान- सिक परिक्रमा मे कितनी देर लगी है और यह भी ध्यान में लाए कि इस यात्रा में मन कितनी बार शरीर से अलग होकर बाहर गया और कहा गया। यदि इस अवलोकन मे पाच मिनट लगे हैं तो आपमें अपने अतर मे झाकने की सामान्य क्षमता है। यदि इससे अधिक समय लगा है तो आपमे विशेष क्षमता है। यदि इससे कम समय में यह निरीक्षण पूरा हो गया है तो आपमे सामान्य से कम क्षमता है। अल्प क्षमता होने पर शरीरावलोकन के लिए आप नित्य अधिक समय दें। पिछली मानसिक यात्रा का लेखा-जोखा करने के उपरात पुन आखें बद करके एक-दो मिनट तक श्वास-प्रश्वास का निरीक्षण करें। तत्पश्चात् शरीर के अगो का पुन मन से निरीक्षण आरभ करें। अपने आपको भनेक कोणो से देखें पहली बार शरीर अवलोकन की य पिछले भाग, पीठ, रीढ़ की हड्डी के मार्ग नाभि, पेट के रास्ते से करें। पिछली व को कुहनी और उगन बाहरी भाग न ध्यान की सहज विधि विपश्यना 89 तो इस बार उगलियो के भीतरी भाग, हथेली, कलाई तथा वाजू के भीतरी भाग को ध्यान मे लाए। पिछली बार यदि आप अगो को मात्र छूते हुए तेजी से निकल गए थे तो अब अपने मन की गति को धीमा करके हर अग पर रुकते हुए आगे वढे । पहले यदि आपने सभी उगलियो का एक- साथ चिंतन किया था तो अव प्रत्येक उगली पर ध्यान टिकाते हुए प्रत्येक उगली के प्रत्येक पोर का मन से अवलोकन करते हुए आगे वढे । अय भागो का भी इसी प्रकार सविस्तार और सूक्ष्मता से निरीक्षण करें। इस दौरान मन शरीर से बाहर जाए तो उसे सहज भाव से जाने दे । लौटने पर उसका स्वागत करके पुन उसी भाग पर लगाए जहा से अनुपस्थित हुआ था। अपनी प्रगति का स्वय निरीक्षण करें इस बार आख खोलकर देखे कि निरीक्षण मे क्तिना समय लगा है । यदि पहली याना मे अधिक समय मे यह यात्रा पूरी हुई है तो आपकी उन्नति की गति तेज है। यदि उतने समय या उससे कम समय मे यात्रा पूरी हुई है तो सामान्य अवस्था है। आधे घटे की अवधि मे जितनी बार बन पडे, शरीर की यह मानसिक परिक्रमा जारी रखें। प्रत्येक अभ्याम में शरीर के कुछ अग छूने से रह जाएगे, अगले अभ्यास मे उन्ही अगो के माग से यात्रा करके उहे मन से छूकर , आगे बढ़ें। सायकाल पुन आधे घटे के लिए यही अभ्यास करें। दूसरे चरण के पहले दिन का यह अभ्यास शरीर का मात्र ऊपरी परिचय कराएगा। रमहीन परिचय । इसके साथ ही आपको अपने मन की उडान क्षमता का एहसास भी रहेगा कि इतने अल्प काल में मन कहा पहुच जाता है। तनिक कल्पना करें, ऐसे द्रुत-
88
पर लाए जहा से वह गैर
निरीक्षण पुन आरभ करें
पुन उगलियो से कधे,
जाधो, घुटनो, पिंडलियो,प
देखें। एक टाग का निरीक्ष
से ऊपरी अगो की मानसि
छाती, गर्दन, ठुड्डी, नासिर
ध्यान लाकर आखे खोल र
सिक परिक्रमा में कितनी
कि इस यात्रा में मन क्ति
गया और कहा गया।
यदि इस अवलोकन में,
अतर में झारने की सामा
लगा है तो आपमे विशेष
निरीक्षण पूरा हो गया है।
अल्प क्षमता होने पर शर
समय दें।
पिछली मानसिक यान
मायें बद करके एक-दो f
करें। तत्पश्चात् शरीर के
करें।
अपने आपको मन कोणी:
पहली बार शरीर अपर
पिटने भाग, पीट, रीढ़ यी
भि पट गम्ते मे मरें
यो मुहनी और उगनियों
91
।
ध्यान की सहज विधि विपश्यना
शरीर पर लहराती हुई प्रतीत होगी। थूक का निगलना, जो
सामान्यत आपके अनजाने मे होता रहता था, वह सब कुछ अब
आपकी जानकारी में हो रहा होगा। किसी अग पर आपका मन
अधिक देर तक रुकेगा, कही तेजी से चल देगा। जहा तेजी से चले
उसे धीमी गति से चलने के लिए बाध्य करे ।
पाच दिन तक यह अभ्यास करने के उपरात छठे दिन इसमे
जरा परिवर्तन करे। आपको जिस अग पर ध्यान टिकाना है,
खुली आख से उसे देख लें। यदि वह अग उगली है तो उगली के
पोर, पोरो पर की लकीरे, उसके नाखून, नखो के निचले भाग के
सफेद चद्र, उनका रग, उन सबको गहरी नजर से देखे । पुन आख
बद करके उस अग को कल्पना की आखो से देखे। सारे विवरण
को उसी प्रकार देखे जिस प्रकार खुली आखो से देखा था।
इसी प्रकार शरीर के प्रत्येक अग को खुली आखो से देखकर
मन की आख से देखने का अभ्यास छठे दिन की दो बैठको मे करें।
अब आप देखेंगे कि आपका मन अपेक्षाकृत शरीर से कम
अनुपस्थित हो रहा है । यह अभ्यास की सफलता की निशानी है।
सातवे दिन के अभ्यास मे आप आख बद करके शरीर के
किसी अग का संचालन करके उस सचालन को मन द्वारा देखे ।
हाथ की उगली को हिलाए तो मुदी आखो की अवस्था मे आपका
मन यह अनुभव करेगा कि वह उगली की हरक्त को देख रहा है।
पांव की उगलियो की हरकत भी मुदी आखो से अनुभव होनी
चाहिए। सास लेते-छोडते समय पेट का उतार-चढाव, यह सब
मानसिक दृष्टि से देखा जाना चाहिए । पहली बैठक मे यदि इस
अनुभूति मे कमी रह जाए तो दूसरी बैठक मे इस कमी को पूरा
करें। प्रत्येक बैठक का अभ्यास सास की आवाजाही के निरीक्षण
से आरभ करें और वैठक के मध्य मे जव आराम करें तो अगला
अभ्यास पुन श्वास-निरीक्षण से आरभ करे।
90 ध्यानयोग कुछ सरल विधिया गामी और शक्तिशाली मन में यदि आप एकाग्र होने की शक्ति वा विकास कर पाए तो आप क्या नही कर सकते, दूसरे से क्या नही करा सकते? निरीक्षण मे अधिक सूक्ष्मता लाए दूसरे दिन के अभ्यास मे पहले दिन की अपेक्षा अधिक सूक्ष्मता से शरीर का दर्शन करना है। प्रत्येक अग पर स्ककर उसके विवरण का परिचय पाना है। यदि चेहरे का निरीक्षण करना है तो भौहे, पलके, आखो की पुतलिया, पुतलियो के भीतर का काला केद्रक, इन सबको बारी-बारी से मन को आख से छूना है । नासिका के साथ उसके छिद्र का भी, आपकी कल्पना मे पूरे अग का चित्र बनना चाहिए। जितना समय पहले पूरे शरीर की यात्रा पर लगा था, उतना ही समय केवल एक चेहरे पर लगना चाहिए। इसी प्रकार पूरे शरीर को सिर, टाग, पीठ, पेट, छाती, कमर, कूल्हे रूपी खडो मे बाटकर प्रत्येक खड का सविस्तार मानसिक निरीक्षण करें। वीच मे जितनी बार अनुपस्थिति हो, उसकी वापसी श्वास की आवाजाही पर ध्यान करके फिर उसी अग पर लाए जहा से छोडा था। दो तीन दिन के अभ्यास से आपको महसूस होने लगेगा कि आपके प्रत्येक अग मे कुछ घटित हो रहा है। आपमे ध्वनि- विस्तारक यन की सी क्षमता उत्पन्न हो गई है जिससे आप अपना एक एक स्पदन सुन सकते है, अपने शरीर के अतर मे होने वाली प्रत्येक क्रिया आपको अनुभव हो रही है। इस ध्यान के दौरान आपको लगेगा कि तन पर कही कुछ रेग रहा है, खुजलाने को जी करेगा । जितनी देर तक बिना खुजलाए रह सके, रहे। जब असहनीय हो जाए तो खुजला लें। शरीर के क्सिी अग पर पडी पसीने की बूद विशाल जलाशय की तरह
91
ध्यान की सहज विधि विपश्यना
शरीर पर लहराती हुई प्रतीत होगी। थूक का निगलना, जो
सामान्यत आपके अनजाने मे होता रहता था, वह सब कुछ अव
आपकी जानकारी मे हो रहा होगा। किसी अग पर आपका मन
अधिक देर तक रुकेगा, कही तेजी से चल देगा । जहा तेजी से चले
उसे धीमी गति से चलने के लिए बाध्य करे ।
पाच दिन तक यह अभ्यास करने के उपरात छठे दिन इसमे
जरा परिवर्तन करे। आपको जिस अग पर ध्यान टिकाना है,
खुली आख से उसे देख ले । यदि वह अग उगली है तो उगली के
पोर, पोरो पर की लकीरें, उसके नाखून, नखो के निचले भाग के
सफेद चद्र, उनका रग, उन सबको गहरी नजर से देखे । पुन आख
बद करके उस अग को कल्पना की आखो से देखे। सारे विवरण
को उसी प्रकार देखें जिस प्रकार खुली आखो से देखा था।
इसी प्रकार शरीर के प्रत्येक अग को खुली आखो से देखकर
मन की आख से देखने का अभ्यास छठे दिन की दो वैठको मे करे।
अब आप देखेंगे कि आपका मन अपेक्षाकृत शरीर से कम
अनुपस्थित हो रहा है । यह अभ्यास की सफलता की निशानी है ।
सातवे दिन के अभ्यास मे आप आख बद करके शरीर के
किसी अग का संचालन करके उस सचालन को मन द्वारा देखे ।
हाथ की उगली को हिलाए तो मुदी आखो की अवस्था मे आपका
मन यह अनुभव करेगा कि वह उगली की हरक्त को देख रहा है।
पाव की उगलियो की हरकत भी मुदी आखो से अनुभव होनी
चाहिए । सास लेते छोडते समय पेट का उतार-चढाव, यह सब
मानसिक दृष्टि से देखा जाना चाहिए । पहली बैठक मे यदि इस
अनुभूति मे कमी रह जाए तो दूसरी बैठक में इस कमी को पूरा
करें। प्रत्येक बैठक का अभ्यास सास की आवाजाही के निरीक्षण
से आरभ करे और वैठन के मध्य मे जब आराम करे तो अगला
अभ्यास पुन श्वास-निरीक्षण से आरभ करे।
90
ध्यानयोग कुछ
गामी और शक्तिशाली मन में यदि आप एकाग्र होने
का विकास कर पाए तो आप क्या नहीं कर सकते, द्र
नहीं करा सकते?
निरीक्षण मे अधिक सूक्ष्मता लाए
दूसरे दिन के अभ्यास मे पहले दिन की अपेक्षा अ
से शरीर का दर्शन करना है। प्रत्येक अग पर रु.
विवरण का परिचय पाना है । यदि चेहरे का निरीक्षण
भौहे, पलके, आखो की पुतलिया, पुतलियो के भीर
केद्रक, इन सवको बारी-बारी से मन को आख से छून
के साथ उसके छिद्र का भी, आपकी कल्पना मे पूरे
बनना चाहिए।
जितना समय पहले पूरे शरीर की याना पर
ही समय केवल एक चेहरे पर लगना चाहिए ।
शरीर को सिर, टाग, पीठ, पेट, छाती, कमर, 4
बाटकर प्रत्येक खड का सविस्तार मानसिक निर
मे जितनी बार अनुपस्थिति हो, उसकी वापसी र
पर ध्यान करके फिर उसी अग पर लाए जहा
दो तीन दिन के अभ्यास से आपको मह
आपके प्रत्येक अग मे कुछ घटित हो रह
विस्तारक यत्र की सी क्षमता उत्पन हो गई
एक-एक स्पदन सुन सकते हैं, अपने शरीर
प्रत्येक क्रिया आपको अनुभव हो रही है।
इस ध्यान के दौरान आपको लगेगा
रहा है, घुजलाने को जी करेगा। जितन,
रह सकें, रहे। जब असहनीय हो जाए
पिसी अग पर पडी पसीने की वूद
A
तीसरे सप्ताह को अभ्यास-विधि सुलेख सीखने के इच्छुक शिशु को वर्णमाला के अक्षरो का ज्ञान कराने के लिए उसका शिक्षक तख्ती पर पंसिल से कुछ अक्षर लिखकर दे देता है और शिशु उन पर कलम से रोशनाई फेरकर उन रूपो को धीरे-धीरे हृदयगम करता है और इस योग्य बनता है कि एक दिन विना पूरने के (पैसिल से बने अक्षरो के) सुलेख लिख लेता है। आपका अब तक का अभ्यास पूरने पर स्याही फेरने के समान रहा है । अब आपको तस्ती या चार लकीरो वाली कापी छोडकर सादे कागज पर लिखने जैसा अभ्यास, ध्यान के क्षेत्र मे करना है। मस्तिष्क के उस केंद्र तक पहुचना है जिसे सहस्रार, तीसरा नेत्र या (छठी ज्ञानेंद्विय) कहा जाता है। पिछले दो सप्ताह की साधना भली भांति निभा लेने के उपरात आपका मन पर पहले की अपेक्षा अधिक अधिकार हो चुका है र तक की यात्रा तीसरे चरण की इस प्रथम बैठक में दो-तीन मिनट श्वास-
92
ध्यानयोग कुछ सरल विधिया
अपनी जाच फिर से
उपर्युक्त अभ्यास मे यदि आपका मन न लगे तो स्पष्ट है कि
आपका मन शरीर मे पूरी तरह डूब नही पाया। इसलिए आप
शरीर मे डूबने के रस से अपरिचित रहे । इससे प्रकट होता है
कि आपमे ध्यानयोगी की अपेक्षा कर्मयोगी या भक्तिमार्गी होने की
सभावना अधिक है। अपने मन को शात एव सयत करने के लिए
आपको मात्र समाजोपयोगी क्रियाशीलता की जरूरत है।
जिहे अपने शरीरावलोकन मे रस मिलने लगा है, वे इस
मानसिक यात्रा के अगले पडाव की ओर बढ़ें।
तीसरे सप्ताह की अभ्यास-विधि सुलेख सीखने के इच्छुक शिशु को वणमाला के अक्षरो का ज्ञान कराने के लिए उसका शिक्षक तरती पर पैसिल से कुछ अक्षर लिखकर दे देता है और शिशु उन पर कलम से रोशनाई फेरकर उन रूपो को धीरे-धीरे हृदयगम करता है और इस योग्य बनता है कि एक दिन बिना पूरने के (पैसिल से बने अक्षरो के) सुलेख लिख लेता है। आपका अब तक का अभ्यास पूरने पर स्याही फेरने के समान रहा है। अब आपको तय्ती या चार लकीरो वाली कापी छोडकर सादे कागज पर लिखने जैसा अभ्यास, ध्यान के क्षेत्र मे करना है। मस्तिष्क के उस केंद्र तक पहुचना है जिसे सहस्रार, तीसरा नेत्र या (छठी ज्ञानेंद्रिय) कहा जाता है। पिछले दो सप्ताह की साधना भली भांति निभा लेने के उपरात आपका मन पर पहले की अपेक्षा अधिक अधिकार हो चुका है। सहस्रार तक की यात्रा तीसरे चरण की इस प्रथम बैठक मे दो-तीन मिनट श्वास-
92
ध्यानयोग कुछ सरल विधिया
अपनी जाच फिर से
उपर्युक्त अभ्यास मे यदि आपका मन न लगे तो स्पष्ट है कि
आपका मन शरीर मे पूरी तरह डूब नही पाया। इसलिए आप
शरीर मे डूबने के रस से अपरिचित रहे। इससे प्रकट होता है
कि आपमे ध्यानयोगी की अपेक्षा कर्मयोगी या भक्तिमार्गी होने की
सभावना अधिक है। अपने मन को शात एव सयत करने के लिए
आपको मान समाजोपयोगी क्रियाशीलता की जरूरत है।
जिहे अपने शरीरावलोकन मे रस मिलने लगा है, वे इस
मानसिक यात्रा के अगले पडाव की ओर बढ़ें।
तीसरे सप्ताह की अभ्यास-विधि सुलेख सीखने के इच्छुक शिशु को वणमाला के अक्षरो का ज्ञान कराने के लिए उसका शिक्षक तरती पर पैसिल से कुछ अक्षर लिखकर दे देता है और शिशु उन पर कलम से रोशनाई फेरकर उन रूपो को धीरे-धीरे हृदयगम करता है और इस योग्य बनता है कि एक दिन बिना पूरने के (पैसिल से बने अक्षरो के) सुलेख लिख लेता है। आपका अब तक का अभ्यास पूरने पर स्याही फेरने के समान रहा है। अब आपको तरती या चार लकीरो वाली कापी छोडकर सादे कागज पर लिखने जैसा अभ्यास, ध्यान के क्षेत्र मे करना है । मस्तिष्क के उस केंद्र तक पहुचना है जिसे सहस्रार, तीसरा नेत्र या (छठी ज्ञानेंद्रिय) कहा जाता है। पिछले दो सप्ताह की साधना भली भांति निभा लेने के उपरात आपका मन पर पहले की अपेक्षा अधिक अधिकार हो चुका है। सहस्रार तक की यात्रा तीसरे चरण की इस प्रथम बैठक मे दो-तीन मिनट श्वास- 94 ध्यानयोग कुछ सरल विधिया निरीक्षण करे। फिर शरीर के निचले भाग, पाव के नयो से ऊपरी अगो की ओर मन की यात्रा आरभ करें। इस याना मे पूरे शरीर का मानसिक अवलोकन करते हुए ध्यान को सिर के केंद्र मे उस भाग पर ले जाए जो तालु से ऊपर तथा माथे व कनपटियो के मध्य है। बड़ी उम्र के व्यक्तियो मे यह स्थान खोपडी के सस्त आवरण के कारण बाहर से प्रतीत नहीं होता किंतु दो-तीन मास के शिशु के सिर के मध्य कोमल बना रहता है। इस स्थान पर ध्यान को लगभग पाच मिनट तक टिका रहना चाहिए । पिछले अभ्यास के आधार के कारण आपमे अपने मन को कही भी टिकाने की क्षमता उत्पन्न हो चुकी है । इसलिए विश्वास है कि जब तक आप चाहेगे, आपका मन उस भाग मे स्थिर रहेगा। क्षण-प्रतिक्षण आपको लगेगा कि मस्तक के इस भाग पर कुछ इकट्ठा हो रहा है । जो कुछ इकट्ठा हो रहा है वह मुक्त होकर बहना चाहता है। किंतु इच्छा-शक्ति की दीवार उसे वहने, निक्लने नही दे रही । लगभग पाच मिनट के पश्चात् आप मन का नियत्रण उस स्थान पर से हटा लें । जो कुछ बहना, विखरना चाहता है, उसे मुक्त होकर बिखर जाने दें। आपकी इस मानसिक क्रिया से आपको लगेगा कि एक विशाल जलाशय का बाध खुल गया है और उसकी धाराए आपकी जटा से निकलकर आपके शरीर के अग-प्रत्यग पर फैल रही हैं। इन अनेक धाराओ में से कोई नासिका, ठुड्डी, गर्दन के माग से होकर नीचे की ओर उन्मुख है, कोई कनपटियो से होकर गदन, को भिगो रही है और कोई उन सबसे तेज बहती हुई शरीर के अन्य भाग को सरावोर कर रही है। मन को अव उन धाराओ का पीछा करना है। लेकिन इतनी धाराआ का पीछा अकेला मन कसे करे? यहा मन के विकेंद्रित होने का भय है । उसे विकेंद्रित न होने दे । ।
95
ध्यान की सहज विधि विपश्यना
बल्कि उसे किसी एक धारा का पीछा करने दे । वह धारा या
चूद कही ठहरे तो मन का धक्का देकर उसे आगे बढाए । यदि
अन्य धारा मन को अपनी ओर आकृष्ट करे तो उसे अनदेखा करके
पूर्व निश्चित धारा को अवोभाग तक पहुचाकर अन्य धारा की
ओर उन्मुख हों। एक धारा को मार्ग में ही छोडकर दूसरी का
पीछा न करें।
मन का यह खेल आपको इतना सुहाएगा कि आपको समय के
कटने का आभास तर न होगा और आनद की किरणें फूटेगी।
हर बार लगेगा कि आपका शरीर पहले से अधिक निर्मल होकर
नूतन रूप धारण कर रहा है। इस खेल मे लगभग पद्रह मिनट
व्यतीत करके आखे खोल ल । आपको सृष्टि का रंग निखरा-
निखरा एव नया-नया-सा लगेगा।
यह अभ्यास एक दिन में दो बार अवश्य किया करे ।
एक स्पष्टीकरण
यहा यह प्रश्न सहज ही उठ सकता है कि इस सारे अभ्यास
का प्रयोजन क्या है । अदृश्य बूदो के स्नान
क्या मिलेगा, जिसके
लिए अपना अमूल्य समय नष्ट किया जाए।
इस प्रकार का प्रश्न उस शिशु के मन मे भी उठता है जो
देखता है कि वयस्क जन विशाल पाक के घेरे मे सैर करते हुए कई
चक्कर लगाते है । जिज्ञासु शिशु यह जानना चाहता है कि यह
पथिक यही क्यो चक्कर काट रहा है। उसे जाना कहा है। शिशु
को क्या मालूम कि ऐसे पथिक का कोई गतव्य नही होता है बल्कि
शरीर की क्षमता वढाना होता है।
जिस प्रकार तन की पुष्टि के लिए खेल-कूद आदि व्यायाम
होते हैं, उसी प्रकार मन को एकाग्र करने के भी अनेक व्यायाम
होते है । उसमे से एक की चर्चा हमने यहा की है। इस विधि का
96 ध्यानयोग कुछ सरल विधिया लाभ तुरत शायद आपको न दिखे लेकिन कुछ समय बाद आप देखेंगे कि अव आपका अतरतम पहले की अपेक्षा अधिक जाग्रत है और इस कारण आपके दृष्टिकोण मे व्यापकता आ गई है। उस व्यापकता के कारण आप अपने प्रयासो के अवाछित फल से भी घवराते नही बल्कि विषम स्थिति को भी सहज भाव से स्वीकार या अस्वीकार करते है । आपमे सही निर्णय करने की क्षमता का विकाम हुआ है । आपकी स्मरण शक्ति बढी है । इन सवका कही- न-कही सासारिक लाभ है। इसके पारलौकिक लाभ श्रद्धा और विश्वास पर आधारित है। जो परलोक पर विश्वास नहीं करते वे इतना जान सकते हैं कि एकाग्रता मन का व्यायाम है, इसका पुरस्कार मानसिक शाति है शात अवस्था व्यक्ति को तनावा से मुक्त रखती है, जिसका लाभ इसी लोक में अनुभव हो सकता है।
खेल-खेल मे ध्यान
स्वरयोग
स्वरयोग तनयोग का प्रवेश-द्वार
है। शकुन तथा प्रश्न ज्योतिष मे भी
स्वरोका महत्त्व माना गया है, किंतु
हम यहा स्वरयोग सवधी केवल
उही अशा को ले रहे हैं जो तन के
स्वास्थ्य और मन की शाति के
लिए लाभदायक हैं।
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विषय-प्रवेश 'स्वर' के अनेक अर्थ हैं। योग के क्षेत्र में स्वर का अर्थ 'श्वास- नि श्वास' अर्थात् सास की आवाजाही है । प्राणायाम सास को नियत्रित करने की विधि है। स्वर-योग सास का निरीक्षण करने तथा सास को अनुकूल बनाने की विधि है । इससे पहले 'विपश्यना' सवधी प्रकरण मे सास के निरीक्षण द्वारा अपने-आपमे स्थित होने का उपाय बताया गया है। स्वर योग मे सास का निरीक्षण करते समय यह देखना होता है कि सास नासिका के दाये छिद्र से आ रही है या बाये छिद्र से। यह सरल-सी क्रिया करते ही तन और मन पर शुभ प्रभाव पड़ने लगता है । स्वर जानने का ढग सास नासिका के दोनो छिद्रो से आती-जाती है । स्वर-योग मे यह देखना होता है कि किस छिद्र से सास का प्रवाह अधिक वेगवान है । यह जानने का ढग अत्यत सरल है। मुख को बद करके नासिका के दाये छिद्र को उगली से बद करें। बाया छिद्र खुला रखे । गहरी सास लें और छोडें। फिर वायें छिद्र को उगली से बद करे।दाया छिद्र खुला रखे। गहरी सासलें और छोडें।
100 ध्यानयोग बुछ सरल विधिया इन दोनो क्रियाओ को दो-तीन बार करने से आप जान लेंगे कि किस छिद्र से सास का प्रवाह अधिक सुगमता से हो रहा है । इस विधि को तुरत ही आजमाए। इस पुस्तक को बद करके इस विधि द्वारा देखे कि आपका कौनसा स्वर इम समय वेगवान है। आरभ मे दोनो छिद्रो को बारी-बारी से बद करके स्वर के वेग का पता चलता है । अभ्यस्त होने के बाद बिना किसी छिद्र को बद किए नासिका से केवल सास छोडने और लेने से ज्ञात हो जाता है कि किस छिद्र का स्वर अधिक तेज है। स्वरो के नाम तथा उनसे सबधित नाडिया नासिका के बायें छिद्र से प्रवाहित होने वाले स्वर को चद्र स्वर अथवा ठडी सास कहा जाता है । जिस समय चद्र स्वर वेगवान हो, उस समय 'इडा' नाडी अधिक प्रभावी होती है। दाये छिद्र की सास को सूय स्वर या गम सास कहते हैं । जिस समय दाया स्वर तेज हो उस समय मानव पर 'पिंगला' नाडी का अधिक प्रभाव होता है। सूय स्वर तथा चद्र स्वर में से प्रत्येक का प्रभावी काल समायत एक घटे से दो घटे के मध्य रहता है। व्यक्ति की मूल प्रवृत्ति तथा वातावरण के अनुसार प्रत्येक म्वर का प्रभावी समय कम या अधिक भी होता रहता है कभी-कभी ऐसा होता है कि दोनो स्वर एकसाथ समान वेग से चलते है । या एक एक दो दो मिनट के अतर से चद्र या सूय स्वर बदलने लगते हैं। उस अवस्था से ज्ञात होता है कि मानव उस समय सुपुम्ना नाडी के प्रभाव मे है । पश्चिमी शरीर-रचना विज्ञान के अनुसार 'सुषुम्ना' आधुनिक शरीर-रचना-विज्ञान मे कही गई मेडुला ओबलागाटा (Medulla oblongata) का हिंदी अनुवाद 'सुषुम्ना शीष' है । यह - खेल-खेल मे ध्यान 101 सुपम्ना शीप बोध-वाहक स्नायुओ (sensory Nerves) तथा कार्य- वाहक स्नायुओ (Motor Nerves) पर आधारित है। सुपुम्ना शीप का विस्तार सुपुम्ना रज्जु (spinal cord) है। सुपुम्ना रज्जु के माध्यम से मस्तिष्क से सारे शरीर का सबध जुडा रहता है। योग मे वर्णित इडा, पिंगला तथा सुपुम्ना का आधुनिक शरीर- रचना विज्ञान मे कहीं कोई नाम नहीं है किंतु यह कहा गया है कि मुख्य मस्तिष्क (Cerebrun) का वाया गोलार्द्ध (Left Heml sphere) शरीर के दाये भाग को प्रभावित करता है और दाया गोलाद्ध (Right Hemisphere) शरीर के दायें भाग को प्रभावित करता है । इन दोनो गोलाद्धों का दायी सास या बायी सास से कोई सबध नही है। कुछ योगीजन सवेदनकारी स्नायु सस्थान (Sympatheitc Nervous System) को सूर्य स्वर का तथा सौम्यकारी स्नायु सस्थान (Parasymphathetic N S) को चद्र स्वर का प्रेरक मानते हैं किंतु स्नायु सबधी अधिक विवरणो से ज्ञात होता है कि सवेदनकारी स्नायु सस्थान पाचन सस्थान पर बुरा प्रभाव डालता है। किंतु स्वर योग के अनुमार सूर्य स्वर के समय भोजन ठीक पचता है। इस प्रकार के विवरण से यह परिणाम निकलता है कि योग मे वर्णित 'नाडी' तथा आधुनिक शरीर-रचना-विज्ञान मे वर्णित 'स्नायु' मे अतर है। वास्तव मे नाडिया शरीर मे च्याप्त प्राण के अलग-अलग प्रवाह हैं। इन प्रवाहो की सख्या बहत्तर हजार है। इनमे से मुख्य प्रवाह तीन है- 1 इडा, 2 पिंगला, 3 सुपुम्ना।
102
ध्यानयोग कुछ सरल विधिया
शरीर सवधी आधनिक तथा प्राचीन ग्रयो के अध्ययन से
प्रतीत होता है कि स्नायु स्थूल शरीर से सवधित हैं और नाडिया
सूक्ष्म शरीर से सबधित है।
सूक्ष्म तथा स्थूल शरीर का भेद
सूक्ष्म तथा स्थूल शरीर का भेद स्पष्ट करना बहुत कठिन है।
आधुनिक शरीर-विज्ञान तथा प्राचीन भारतीय दर्शनो के अध्ययन
मनन से जैसा मैं समझ पाया हू, वह इस प्रकार है
आधुनिक विज्ञान व्यक्ति के चरिन, शरीर-लक्षण तथा उसकी
मूल प्रवृत्ति का कारण क्रोमोसोम्ज (Chromosomes) तथा जींस
(Genes) को मानता है। ये क्रोमोसोम्ज तथा जीस व्यक्ति को उसके
माता पिता से मिलते है। उनमे माता-पिता के पूर्वजो की विशेषताए
भी समाई रहती है।
भारतीय दर्शनो मे व्यक्ति की मूल प्रवृत्ति का निर्णय करने वाले
तत्त्वो मे पूर्वजम के सस्कार मुख्य माने गए है ।
सस्कार मन पर पडी वह छाप है, जो पूर्वजन्म के कृत्यों,
इच्छाओ और आशाओ के सयोग से बनती है। दूसरे शब्दो मे हम
यो कह सकते हैं कि मस्तिष्क के क्षेत्र में जो कार्य 'स्मृति केंद्र' का
है, मन के क्षेत्र मे वही कार्य सस्कार का है ।
सस्कारो के पुज को अलग-अलग दशनो मे अलग-अलग नाम
दिए गए हैं। उनमे 'पूद्गल' तथा 'कारण शरीर' के नाम अधिक
प्रचलित हैं।
'पद्गल' उन द्रव्य परमाणुओ को कहा जाता है, जिनके सयोग
से शरीर, मन, प्राण आदि का निर्माण होता है।
'भारण शरीर' को 'कार्य शरीर' का मूल माना जाता है।
कारण शरीर को सामाय भाषा में 'सूक्ष्म शरीर' तथा कार्य शरीर
को 'स्थूल शरीर' कहा जाता है ।
।
खेल खेल मे ध्यान 103 स्वर सबधी प्रचीन मान्यताए स्वर सबधी प्राचीन पुस्तको मे 'शिव स्वरोदय' सबसे अधिक प्रचलित है। स्वामी चरणदास कृत 'ज्ञान स्वरोदय' मे 'शिव स्वरोदय' के कुछ अशो को हिंदी पद्यो मे कहा गया है । इन पुस्तको के आधार पर स्वर सबधी बहुत सी पुस्तको को रचना हुई है । स्वर सवधी पुस्तको मे श्वास विशेष के चलने की अवधि और समय के अनुसार स्वास्थ्य तथा आयु सबधी भविष्यवाणिया की गई है। दोनो प्रकार के सास के वेग तथा उस वेग के समय के तिथि वार और ग्रह-नक्षत्र के अनुसार व्यक्ति के लिए शुभ-अशुभ फल बताने की व्यवस्था भी बहुत सी पुस्तको मे है । उदाहरणत गृह-प्रवेश, नगर-प्रवेश आदि शुभ कार्यों को चद्र स्वर के प्रभाव काल मे करने का निर्देश है। चद्र स्वर का निरतर चलना दीर्घायु का कारण माना जाता है । भोजन, लडाई तथा कामक्रीडा जैसे कर्मठतापूर्ण कार्यो मे प्रवृत्त होते समय, राजा, अफसर आदि के सम्मुख जाते समय, सूर्य स्वर का चलना फलदायक माना गया है। कई दिनो तक बिना बदले लगातार सूर्य स्वर का चलना मृत्यु को निकट लाता है। सुपुम्ना स्वर को विप के समान माना गया है। लगातार दो घटे तक चलने वाला सुपुम्ना स्वर प्राणघातक है। सुषुम्ना के प्रभाव काल में अन्य क्रियाए स्थगित करके भजन, उपासना में समय विताने का निर्देश है। कुछ सिद्धजनो की मा यता है कि सुपुम्ना स्वर के प्रभाव काल मे मन विना प्रयास के एकाग्र हो जाता है। नवीन अनुसधान आवश्यक है इन मान्यताओ के पीछे कितना मनोवैज्ञानिक सत्य है और क्तिना शारीरिक सत्य है, इस विषय मे कोई भी निणय देना उचित 104 है जा ध्यानयोग कुछ सरल वि प्रया नहीं हैं लेकिन हम यह जरूर चाहते हैं कि पुराने ज्ञान की प रख नवीन युग और नवीन परिस्थितियो मे अवश्य होती रहनी चाहिए कठिनता यह है कि हमारा समाज दो वर्गों में वटा हुआ एक वर्ग पुराने ज्ञान को 'ढकोसला' कहकर उसे एकदम रद्द कर है । दूसरा वर्ग पुराने ज्ञान को ज्यो-का त्यो स्वीकार कर लेता किसी नये अनुसधान की आवश्यक्ता ही नही समझता है। हमारे विचार मे स्वर द्वारा भविष्य-कथन का आधार यह कि स्थूल शरीर मे घटित होने वाली प्रत्येक घटना पहले सूम शरीर में घटित होती है। यदि मूक्ष्म शरीर के सकेत समझ आ जाए तो स्थूल शरीर से प्रकट होने वाली घटना को पहले. जाना जा मयता है और प्रयल करके उस घटना को रोका भी सरता है। स्वर सवधी हमारे निष्कर्ष म्वर समधी कुछ मेरे अनुभव हैं और मेरे साधय मित्रों के अनु- भव भी हैं। उन सबके आधार पर जो निप्पप प्राप्त हुए हैं, ये प्रकार हैं- चद्र पर अथवा वाया म्वर शरीर में शीतलता को प्रधान प्रकट करता है । मूर्य म्बर अर्थात् दाया पर शरीर में अतिरि ताप की स्थिति बताता है। मानव में शीतलता यो प्रधानता रो तो चियामाप ठोर में होते हैं। ऐसे ममय में रिए जाने चाय पियार आधारित होता है। माय ही यह भी तथ्य है तथा नीद या पारण भी बनती है। आयुर्वेद में यनिन 'म' सपया'ने । क्षेत्र नम्बर' में मिलता-जुलता है। मूप पर मानग्य TT पता - अवसर पर यदि सूर्य स्वर बलाया जा सके तो वातावरण की खेल खेल में ध्यान 105 शारीरिक क्रियाशीलता बढाता है । आयुर्वेद मे वर्णिन पित्त अथवा अग्नि तत्त्व जैसा प्रभाव सूय स्वर के समान है। सूर्य स्वर के प्रभावकाल मे अन्न आसानी से पचता है। नहाते समय सर्दी कम लगती है। सूर्य स्वर के प्रभावी काल में हर प्रकार की प्रतिरोध (Resistance) की क्षमता बढ जाती है। भावावेग तथा तनाव के अवसर पर सूय स्वर अधिक प्रभावी होता है। प्राचीन स्वर-ग्रथो मे कहा गया है कि दिन के समय चद्र स्वर का अधिक चलना तथा रात के समय सूर्य स्वर का अधिक चलना उत्तम है। इसका कारण शायद यह है कि दिन को गर्मी होती है, उस समय चद्र स्वर गर्मी की विषमता को कम करता है। रात ठडी होती है, उस समय सूय स्वर का चलना शीत का सामना करने की शक्ति देता है। यह उन दिनो की मान्यताए हैं जब सूर्योदय से सूर्यास्त तक का समय व्यक्ति का जागरण काल होता था। सूर्योदय तथा सूर्यास्त के मध्य काल में भोजन कर लिया जाता था। आज के वैज्ञानिक उपकरणो ने व्यक्ति को सूय चद्र पर निर्भर नहीं रहने दिया है । आज ग्रीष्म ऋतु की प्रखर दोपहर मे शीत का वातावरण बन सकता है। शीतऋतु की ठडी रातो मे पसीना लाया जा सकता है। ऐसे वैज्ञानिक माधनो को देखते हुए हम समझते हैं कि समय दिन का हो या रात का, यदि वातावरण गम है तो चद्र स्वर शाति अथवा नौद का कारण बन सकता है। यदि वातावरण ठडा है तो चद्र स्वर नीद मे वाधक हो सकता है । ऐसे शीतलता सम करके नीद लाई जा सकती है। यदि दिन अथवा रात के समय गर्मी अधिक पड रही हो तो चद्र स्वर का वेग वढाने से बेचनी कम की जा सकती है।
106
ध्यानयोग कुछ सरल विधिया
इस विवरण से आशय यह नही कि जिन प्रदेशो मे बारहो मास
वफ जमी रहती है, वहा निरतर सूर्य स्वर जारी रहना चाहिए।
ऐसे स्थानो मे भी अधिक शीत और कम शीत के समय अलग-अलग
होते हैं । अत एक क्षेत्र के ऋतु की तुलना अन्य क्षेत्र के ऋतु से
नही करनी चाहिए बल्कि उसी क्षेत्र के अनुसार बने मानदड के
अनुसार करनी चाहिए।
स्वत सचालित अनुकूलन व्यवस्था
जिस प्रकार प्रत्येक व्यक्ति के अगूठे की छाप अलग होती है,
उसी प्रकार प्रत्येक व्यक्ति का स्वर-चक्र भी अलग होता है । अपने
स्वर-चक्र को समझने की विधि हम इस प्रकरण के अन्त मे दे रहे
हैं। फिर भी सामान्य नियम यह है कि एक या दो घटे के अतर
से व्यक्ति का स्वर स्वत ही बदल जाता है। बाहरी या भीतरी
ताप के अनुसार स्वर के बदलने की व्यवस्था प्रत्येक स्वस्थ व्यक्ति
मे होती है। उस व्यवस्था को हमने शरीर की अनुकूलन व्यवस्था
नाम दिया है।
इस अनुकूलन व्यवस्था के विषय मे हमने अपनी पुस्तर 'काम
भाव की नयी व्याय्या' मे पर्याप्त प्रकाश डाला है। उसी पुस्तक
के कुछ अश प्रसग के अनुसार यहा उद्धृत कर रहे है-
"वातावरण में फैले ताप को सहन करने की
सामथ्य हर व्यक्ति की अलग होती है । जितनी जिसकी
सामथ्य होती है, उममे अधिक गम वातावरण होने पर
व्यक्ति की अनुकूलन व्यवस्था स्वेद ग्रथियो को क्रिया-
शील कर देती है। इससे पसीना खुलकर आता है और
पसीने का वाष्पीकरण व्यक्ति को ठडक देता है।
गर्मी की अधिकता व्यक्ति को शरीर पसारने के
लिए विवश करती है। इसमे शरीर का अधिकतम भाग
खेल-खेल में ध्यान
107
हवा के सपर्क में आता है और वाष्पीकरण अधिक होता
शीत सहने की सामर्थ्य भी हर व्यक्ति की अलग
होती है। वातावरण अनुकूल से अधिक ठडा हो तो
व्यक्ति गर्म कपडे ओढता है। इससे बाहर की सर्दी
शरीर से दूर रहती है, भीतर की गर्मी बाहर निकल
नही पाती।
पर्याप्त कपडे न होने पर व्यक्ति अपने बाजुओ
और टागो को लपेटकर उकड हो जाता है। इससे शरीर
का फैलाव कम हो जाता है और ताप का निकास घट
जाता है। इस पर भी यदि शीत का मुकाबला न हो
सके तो शरीर की पेशिया सकुचित होकर ज्यादा ताप
पैदा करती हैं। शीतऋतु मे दात कटकटाते है और
शरीर ठिठुरता है । इसका कारण पेशियो का अनैच्छिक
सकोचन होता है। प्रतिकूल को अनुकूल मे बदलने का
यह सारा व्यापार मस्तिष्क के एक अग हाईपोथेलेमस
(Hypothalamus) के निर्देश से होता है।"
अनुकूलन के विषय मे हमारा उपर्युक्त कथन स्थूल शरीर मे
होने वाले परिवर्तनो के विषय मे है । इडा, पिंगला और सुपुम्ना
का सबध सूक्ष्म शरीर से है।
ध्यानयोग सवधी अन्य विषयो का सबध अनुभूति से है । उसे
वाहरी परीक्षणो से सिद्ध नही किया जा सकता है, किंतु इडा,
पिंगला और सुषुम्ना का प्रभाव काल कही भी सिद्ध किया जा
सकता है। कोई भी व्यक्ति कही पर बैठे हुए यह जान सकता है
कि उसका सूय स्वर बलवान है या चद्र स्वर या दोनो स्वर समान
रूप से बलवान है। इन सबसे बड़ी बात है कि इन स्वरो को
इच्छानुसार बदला भी जा सकता है।
108
ध्यानयोग कुछ सरल विधिया
स्वर को इच्छानुसार बदलने के उपाय
स्वर बदलने के बहुत से उपाय हैं जिन्हे आप तुरत व्यवहार
मे ला सकते हैं।
स्वर बदलने के उपायो मे से सबसे प्रभावकारी उपाय है
करवट बदलना।
दायें स्वर के वेग को बाये स्वर की ओर बदलना चाहे तो
दायी करवट लेट जाए । दायी करवट से आशय है सिरहाने की
ओर दाहिना नासिका छिद्र और छत की और वाया नासिका छिद्र
हो।
दायें स्वर का वेग बढाने के लिए वायी करवट लेटें । दस में
से आठ अवसरो पर ये उपाय वाछित फल देते हैं।
परवट बदलने की क्रिया घर पर फुरसत के समय की जा
सकती है। दुकान, कार्यालय या सावजनिक स्थल पर स्वर बदलने
की आवश्यकता हो तो इसका उपाय भी वलाते है
धुर्मी पर बैठो अवस्था मे या सुखासन की अवस्था में (मालती-
पारनी की अवम्या) दायें स्वर को वेगवान करना चाहे तो गदन
वायें क्धे की ओर झुकाते हुए हथेली पर टिका दें। शरीर का
ऊपरी भाग जितना अधिक बायी ओर झुका सम, अच्छा है।
यायें स्वर या वेग बढाने के लिए गदन को दायें वधे की ओर
झुवाए । शरीर का ऊपरी भाग जितना दायो मोर झुवा समें,
पुयाए।
वंटी अवस्या में की गई ये क्रियाए माठ प्रतिशत वाछिन फ्ल
पर बदलने यी तीमरी विधि यह है कि नासिरा ये जिस
दिया गया हो उगे गुला रणे। दूसरे सिर को उगनी में
पागसे वद मरेंदगन्यारह गहरे सारा लें और छा
द्रग विधि मी गपनता की ममाया नातीग प्रतिमा है।
खेल-खेल मे ध्यान 109 - ये उपाय निश्चित रूप से फल क्यो नहीं देते? उपर्युक्त उपायो के शत-प्रतिशत सफल न होने के अनेक कारण है। यदि व्यक्ति के निजी स्वर-चक्र के अनुसार स्वर बदलने का समय एक घटे के लगभग है और स्वर को बदले हुए आधा घटा गुजरा है तो पाच-सात मिनट के प्रयत्ल से पूर्व स्वर लौटाया जा सकता है। यदि निजी स्वर-चक्र के अनुसार स्वर अभी-अभी बदला है तो पूर्व स्वर के लौटने मे बीस-पच्चीस मिनट लग सकते है । अनेक वार ऐसा भी होता है कि प्रयत्न करने पर भी स्वर नही वदलता । इसका कारण यह होता है कि हमारी आतरिक अवस्था के लिए हमारा चाहा हुआ प्रयत्न प्रतिकूल होता है । ऐसी दशा मे हठपूर्वक स्वर वदलने का यत्न छोड देना चाहिए बल्कि अपनी आतरिक अवस्था के निणय को सहर्प मान लेना चाहिए। साथ ही अपनी दिनचर्या को सूक्ष्म शरीर के अनुकूल ढालना चाहिए । उदाहरणत भोजन के समय सूय स्वर का चलना पाचन के लिए लाभकर होता है। किंतु हर वार सूय स्वर के अनुसार कार्यालय के लच का समय नहीं होता। उतने अल्प समय मे न तो सूय स्वर का वदलना सभव होता है, न ही भोजन को स्थगित रखा जा सकता है। ऐसी स्थिति मे भोजन के बाद वज्रासन की मुद्रा मे बैठने से सूय स्वर की कमी पूरी हो जाती है, अथवा सुखासन में बैठकर भोजन करने से भी पाचनक्रिया तनिक प्रबल होती है। कई बार ऐसा होता है कि भोजन ऐसे स्थान पर करना होता है कि जहा वज्रासन या सुखासन मे बैठने की सुविधा नहीं होती। ऐसी स्थिति मे व्यक्ति को चाहिए कि अपने निश्चित आहार से कम भोजन ले। इससे सूय स्वर का कार्य सध जाता है । इस प्रकार ।
110
ध्यानयोग कुछ सरल विधिय
के एवजी प्रयत्लो से अनियत्रित स्वर धीरे-धीरे ठीक होने लगता
है और अवसर के अनुसार विना प्रयत्न के वाछित स्वर का वेग
वढने लगता है।
कुडलिनी और सुषुम्ना
तत्र शास्त्रो के अनुसार कुडलिनी जागरण के सून ये हैं--
1 चद्र स्वर को बढने दो।
2 सूय स्वर को बद करो।
3 सुपुम्ना को जगाओ।
कुडलिनी का स्थान जननेद्रिय (लिंग अथवा योनि) तथा गुदा
के मध्य भाग मे है । मूलाधार चक्र का भी यही स्थान है। यह
मा यता है कि कुडलिनी नागिन की तरह तीन बल बनाकर
मूलाधार चक्र मे सोई रहती है। वह सुपुम्ना का द्वार बद रखती
कुडलिनी को जगाकर सुषुम्ना का द्वार खोलने के लिए आसन,
प्राणायाम, तथा मुद्राबधो के उपाय योगीजनो द्वारा सुझाए गए है।
इन उपायो के अभ्यास से प्राण इडा और पिंगला से निकलकर
सुपुम्ना मे प्रविष्ट हो जाते है। इससे कुडलिनी जाग्रत हो जाती
है । वह निम्नचक्रो का भेदन करती हुई सहस्रार तक पहुचती है ।
महस्रार चक्र से पूर्व निम्न चक्रो के नाम तथा उनके स्थान इस
प्रकार है-
1 मूलाधार चक्र (स्थान गुदा)
2 स्वाधिष्ठान चक्र (स्थान जनन-अग)
3 मणिपूर चक (स्थान नाभि)
4 अनाहत चक्र (स्थान हृदय)
5 विशुद्धि चक्र (स्थान कठ)
6 आज्ञा चक्रा(स्थान भ्रूमध्य)
111 -4 खेल-खेल मे ध्यान . इन चक्रो का सम्मिलित नाम पट्चक्र है। जब कुडलिनी इन पट्चक्रो का भेदन करके सहस्रार तक पहुचती है तो योगी को परमानद की प्राप्ति होती है। स्वरयोग के अनुसार सुषम्ना कुडलिनी जागरण के क्षेत्र मे सुषुम्ना की जो भूमिका है, उससे अलग रहकर हम 'स्वरयोग' की दृष्टि से सुपुम्ना की चर्चा करते आ रहे हैं। स्वरयोग की दृष्टि से सुषुम्ना स्वर का अधिक चलना घातक है, यह भी हम पहले यह आए है। अपने अनुभव और अध्ययन से हमने जाना है कि सुपुम्ना स्वर का अधिक समय तक चलना आतरिक अनियमितता का सूचक होता है। स्थूल शरीर से फूटने वाले फोडे-फुसी को देखकर हम इस परिणाम तक पहुचते हैं कि शरीर मे सचित विप त्वचा द्वारा निकलता है। मल-मूत्र का परीक्षण करके हम स्थूल शरीर मे उपजने वाले अनेक रोग जान पाते हैं। वैसे ही सुपुम्ना स्वर के अधिक देर तक जारी रहने से हम जान सकते है कि मूक्ष्म शरीर तथा स्थूल शरीर के तालमेल (Alignment) मे कुछ कमी है । जीव की अनुकूलन व्यवस्था उस तालमेल को सुधारने में लगी हुई है । स्वस्थ व्यक्ति मे यह व्यवस्था शीघ्र ही तालमेल बिठा लेती है, किंतु यदि सुपुम्ना स्वर लगातार दो घटे से अधिक समय तक जारी रहे तो इस परिणाम तक पहुंचा जा सकता है कि किसी घातक रोग की सभावना है। यह विवरण दो घटे से अधिक समय तक लगातार चलने सुपुम्ना स्वर के विषय मे है। दस, पद्रह मिनट के लिए सुपुम्ना स्वर दिन-रात के दौरान अनेक वार चलता है और यह स्वाभाविक होता है।
112 ध्यानयोग कुछ सरल विधिया तकनीकी भाषा मे हम सुपुम्ना स्वर को मध्यम स्वर (Neutral Breath) कह सकते है। जिस प्रकार कार, स्कूटर या मशीन का गिअर (Gear) बदलते समय मध्य मे न्यूट्रल गिअर अवश्य आता है, उसी प्रकार शरीर की अनुकूलन व्यवस्था एक स्वर से दूसरे स्वर का वेग बदलते समय कुछ मिनट के लिए दोनो स्वरो को सम करती है । यही समय सुषुम्ना स्वर का होता है । सुषुम्ना स्वर के अधिक समय तक जारी रहने पर चिंता करने की आवश्यकता नहीं होती, अपनी दिनचर्या पर गौर करने की जरूरत होती है। एकदम ताप या शीत के बढने से, पाचन-व्यवस्था के गडवडाने से, लवे समय तक तनाव की अवस्था मे रहने से सुषुम्ना स्वर लबे समय का हो जाता है। उस लवे काल को सीमित करने के लिए आहार, व्यवहार, विचार मे परिवतन करना चाहिए, इससे स्वर अनुकूल हो जाता है। यहा तक की चर्चा तन के स्वास्थ्य के सबध मे हुई है। अब मानसिक स्वास्थ्य की दृष्टि से स्वरयोग का उपयोग समझें । मन की शाति के लिए स्वरयोग की भूमिका शाति मन का आहार है। शाति मन को सवल बनाती है। डावाडोल मन को स्थिर करती है। अशाति मन मा प्रदूषण है । यह मन को अस्वस्थ बनाती है । मन के प्रदूपण तथा क्लुप के विषय मे हम इस पुस्तक मे पहले वह आए हैं । अब मन की शाति के लिए 'स्वरयोग' की भूमिका पर विचार करते हैं। हमारा मन कभी धन की इच्छा करता है कभी प्रिय-अप्रिय पात्रों के विषय में सोचता है। कभी भूतकाल पर पछनाता है, कभी भविष्य यो माशका या माशा करता है। सास एक माध्यम है जिसका निरीक्षण करते हुए हम अपने खेल खेल मे ध्यान 113 आपमे स्थित होते हैं। उस समय हम बाहर के ससार से कटे हुए होत है। वही समय हमारे लिए शाति का समय होता है। वह समय क्षणभर का भी हो सकता है और अभ्यास द्वारा उस समय को घटो तक बढ़ाया भी जा सकता है। स्वरयोग द्वारा हम खेल-खेल मे हर समय सास का निरीक्षण करते है। इस दष्टि से हम स्वरयोग के अभ्यास द्वारा हर समय ध्यान की अवस्था से रह सकते है । यथा भोजन करते समय स्वर कौनसा चल रहा था, भोजन के बाद कोनमा । अत्यत भूख के समय हमारा कौनसा स्वर प्रभावी था । और खूब छककर खाने के वाद कौनसा था। इसी प्रकार गर्मी, सर्दी जादि के समय अपने स्वर का निरीक्षण करते रहना खेल जैसा काय है। अपना स्वर जाचते समय हमारे सामने कोई बाधा नहीं होती। सडक पर चलते समय, ग्राहक, मित्र, अफसर या अधीन व्यक्ति से बातचीत करते समय हम सास के निरीक्षण का खेल जारी रख जो माधना हम खाते पीते, चलते-फिरते, कार्यालय आदि के समय करते रह सकते हैं, उस साधना द्वारा हम हर समय अपने- आपको अपने-आपमे स्थित रख सकते हैं। समाधि की ओर वढने वाले एक पग 'ध्यान' का उद्देश्य भी तो यही है । यदि हमारे नियमित सास का नियम टूटने लगे तो हम समझ सकते हैं कि कही तन और मन मे तालमेल नहीं रहा । अपनी दिन- चर्या का विश्लेषण करके हम यह जाच सकते है कि हमारी कौन- सी अनियमितता के कारण मन और तन मे प्रतिकूल अवस्था उत्पन्न हुई। अपने विश्लेषण द्वारा हम सास की अनियमितता का रहस्य पा सकते हैं। अपनी दिनचर्या तथा आहार-व्यवस्था में परिवतन सकते है।
114
ध्यानयोग कुछ सरल विधिया
करके हम बिना कुछ खर्च किए आपने-आपको स्वस्थ रख सकते
हैं । उस दृष्टि से स्वरयोग हममे अपना विश्लेपण करने की आदत
डालता है।
अपना स्वर-चक्र जानने की विधि
अपना नियमित स्वर-चक्र जानना हो तो कुछ दिन के लिए,
अपनी जेब मे हर समय कागज-कलम रखे और अपने प्रत्येक काय
करने के दौरान थोडी-थोड़ी देर बाद अपने स्वर की जाच करें कि
कौनसा स्वर चल रहा है।
जिस समय जाच करें वह समय नोट करके उसके आगे 'दाया'
या 'बाया' जो भी स्वर चल रहा हो वह स्वर नोट कर ले । साथ
ही रवर बदलने का समय भी। अगली जाच के दौरान जब पाए
कि स्वर फिर बदला तो वह समय कागज पर लिखे और अपना
बदला हुआ स्वर नोट कर लें।
यदि सभव हो तो यह भी नोट करे कि भोजन, शयन, स्नान
आदि की क्रियाओ से पहले और बाद मे कौनमा स्वर चला है ।
अति सर्दी अति गर्मी के समय भी स्वर नोट करें।
रात को विस्तर के सिरहाने भी यह कागज-कलम अपने पास
रखें । जब भी नीद खुले, स्वर नोट कर ले।
प्रतिदिन नया कागज रखे। सप्ताहभर की इस जाच से आप
अपना औसत, म्वर-चक्र जान लेगे।
आरम मे आपको स्वर का यह हिसाब किताब रखना अजीब
लगेगा लेकिन कुछ ही दिनो मे आपको इस जाच मे रस आने
लगेगा। फिर कागज-कलम की जरूरत नहीं होगी। आपका ध्यान
विना किसी यत्न के हर समय सांस की ओर रहेगा और आप
विना नासिका छिद्र को छुए अपने स्वर का वेग जान लेंगे।
इस ध्यान की माधना करके आप कुछ ही दिनो मे अपने भीतर
सेल-सेल में ध्यान 115 दिव्यता प्रकट होती अनुभव करेंगे और जब कभी आप तनाव से उद्विग्न होगे तो अपने स्वर की ओर ध्यान देते ही आपकी उद्विग्नता, आपका तनाव दूर हो जाएगा और आप एक नये व्यक्ति के रूप में निरखते चले जाएगे। स्वन-निरीक्षण की बाधाए काम, क्रोध, ईर्ष्या, भय आदि तीव्र भावो और तनावो के समय स्वर की जाच करना साधक जन भूल जाते हैं । ये तनाव और आवेश आधी के समान आते है और व्यक्ति तन-मन की सुधि गवा बैठता है। जो व्यक्ति ऐमे आवेश के अवसर पर अपने स्वर का निरीक्षण करना याद रख सकते है वे अपने स्वामी आप हो जाते हैं। काम, क्रोध आदि भाव उस स्वामी के अधीन हो जाते हैं । मन, मस्तिष्क की जानकारी में होने वाला कोई भी आवेश, कोई भी भाव हानिकर नहीं रहता। अतिम बात जो जन सास लेने और छोड़ने का कार्य नासिका से लेते हैं, उनकी नासिका के छिद्र हर समय खुले रहते हैं । फलस्वरूप वे बिना यत्ल के अपने स्वर का वेग जान सकते हैं जो जन मुख से मास लेने के आदी है उनके नासिका-छिद्र बद हो जाते हैं। वे यदि सास के लिए नाक का नियमित प्रयोग करने लगेंगे तो उनकी नाक सदा खुली रहेगी। तन और मन के स्वास्थ्य के लिए नाक द्वारा सास लेने और छोडने का अभ्यास डालना चाहिए।
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परिशिष्ट :
स्वाध्याय के सूत्र
योगदशन के चौथे नियम स्वाध्याय'
का उद्देश्य है दृष्टिकोण कायापक
होना। इस उद्देश्य के लिए महान
प्रथो तथा महान व्यक्तियो के लेखों,
कथनो से कुछ अश प्रस्तुत हैं । इनके
मनन से आत्मविश्लेषण को प्रवत्ति
बनती है। मात्मविश्लेषण जपने
भीतर प्रवेश को कुजी है।
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(स्वामी) अखडानद सरस्वती --मनुष्य का जीवन श्रद्धा और विवेक, इन दोनो से चलता है। सव लोग विवेकी बन जाए, यह योजना बहुत अच्छी है परतु सारी जनता एक जैसी शिक्षित नही हो सकती। विवेकी न हो परतु श्रद्धा हो तो वह दूसरे के विवेक से लाभ उठा सकता है। दूसरे के विवेक से लाभ उठाने की योग्यता का नाम 'श्रद्धा' है। (श्री) अरविंद ~~~जीवन मे निरतर ताजगी और अटूट दिलचस्पी तभी मिल सकती है जब भीतरी विकास निरतर होता रहता है। (हजरत) अली -~~इस बात का महत्त्व नहीं कि मनुष्य मरता किस प्रकार है, महत्त्व इस बात का है कि वह जीवित किस प्रकार रहता है। उपनिषद् -~जो अविद्या अर्थात् पेवल भौतिक ज्ञान की उपासना करते है, वे धने अधकार में जा पहुचते हैं, और जो विद्या अर्थात् अध्यात्म-
120
ध्यानयोग कुछ सरल विधिया
ज्ञान मे ही डूबे रहते है, (भौतिक जगत् की कुछ भी परवाह नहीं
करते) वे उससे भी अधिक धने अधकार में जा पहुचते है ।
-~~आहार की शुद्धि होने पर अत करण की शुद्धि होती है ।
-~-मनुष्य की तृप्ति धन से नही हो सकती।
-~-परमात्मा ने इद्रियो को स्वभावत बहिर्मुख बनाया है । इसलिए
मनुप्य बाहर देखता है, अपने अदर नहीं। कोई विरला धीर
पुरप ही इद्रियो का सयम करके अपनी अतरात्मा को देखता है ।
--जिसका बुद्धि रूपी सारथी चतुर हो और मन रूपी लगाम जिसके
काबू मे हो, वह विश्व को पार करके ईश्वरीय परमपद तक
पहुचता है।
कथासरित्सागर
-दुर्जनो का सग ही व्यसन रूपी वक्ष का मूल है।
फ हैयालाल माणिकलाल मुशी
-जब तक लोग स्वय को सुधारने का प्रयत्न नही करेगे, तब तक
कोई सुधार होना असभव है।
कालिदास
-दुख के बाद जो सुख आता है, वह ज्यादा आनदमय होता है,
जसे धूप से जले हुए को वृक्ष की छाया अधिक शाति देती है ।
-बुराई नौषा मे छिद्र के समान है। वह छोटा हो या बडा, नीमा
को दुवो देता
का फूजी (कनपयशियस)
-साप से लिए दूध, यदर के लिए छुरी और वालक के लिए आग
पी जो पतरनार उपयोगिता है, वही भयकर म्यिति विद्या ये
प्रसग मे मूग की है।
-~-पानी मे यह विशेषता है कि वह जिस छिद्र मे प्रवेश करना पाहै,
-
स्वाध्याय ने सूत्र
121
कर सकता है, अतर्यामी वनकर धरती और हवा में निवास कर
सकता है। यह इसलिए कि नम्रता उसका स्वभाव है। नम्रता
के पास स्वर्ग के प्रवेश की कुजी है।
-विना मनन के ज्ञान वेकार है, बिना ज्ञान के मनन खतरनाक है।
-जिनका अपने मन पर नियत्रण है, वे वहुत कम गलती करते है ।
कुरान
-जिन पर धर्मग्रथ लादा गया, उन्होने उसे पढा नही, वे उस गधे
के समान है जो पीठ पर किताबें लादे हुए है।
-हे श्रद्धावानो । ऐसी वात क्यो कहते हो, जो करते नहीं ।
-जिसने धन इकट्ठा किया और उसे गिनता रहा, वह इस भ्रम मै
है कि बन उसे जीवित रखेगा।
-जिसने प्राणहानि के बदले या युद्ध छेड़ने के बदले या अन्य किसी
कारण से हत्या की, उसने मानो पूरी मानव जाति की हत्या कर
दी और जिसने किसी प्राणी को बचाया उसने मानो सपूण मानव
जाति को जीवन प्रदान किया।
खलील जिब्रान
- हम शब्दो के द्वारा अपनी बात कहे, इससे कही अच्छा है कि
हमारा आचरण हमारी बात कहे ।
एक बार एक आदमी ने मेरे पास बैठकर मेरी रोटी खाई और
मेरी ही दी हुई शराब पी। इसके बाद वह मेरी खिल्ली उडाता
वह फिर आया और उसने मुझसे फिर रोटी और शराव मागी।
तब मैं उसे खरी खोटी सुनाने लगा। इस पर देवदूतो ने मेरी
चल दिया।
खिल्ली उडाई।
(मुनि) गणेशवर्णी
--जिसने अपने मन और इद्रियो को वश मे नही किया, उसकी
122 ध्यानयोग कुछ सरल विधिया उपासना ऐसी समझनी चाहिए जैसे हायी का नहाना कि इधर तो नहाया, उधर शरीर पर धूल डालकर फिर ज्यो-का-त्यो हो गया। -आत्मा जिस कार्य से सहमत न हो, उस कार्य के करने मे शीघ्रता न करो। (महात्मा) गाधी -मनुष्य की शाति की कसौटी समाज मे ही हो सकती है, हिमालय के शिखर पर नहीं। -सच्चरित्रता के अभाव मे केवल बौद्धिकता सुगधित शव के समान -दोषो से हम सभी भरे है मगर दोषमुक्त होने का प्रयास करना हम सबका कर्तव्य है। --अत्यधिक विरोधी परिस्थितियो मे ही मनुष्य की परीक्षा होती है। -अपनी आवश्यकताए कम करके आप वास्तविक शाति प्राप्त कर सकते । -सच्चा सुख बाहर से नहीं मिलता, अतर से मिलता है। --अगर हम अपने को परमात्मा की इच्छा का यत्र बना दे, तो हमे किसी भी क्षण चिंता नहीं करनी पड़ेगी। -ईश्वर को जानने पर मनुष्य अपने आप रजकण हो जाता है । चाणक्य -जो अपने निश्चित कार्यों अथवा वस्तुओ को छोडकर अनिश्चित की चिंता मे पडा करता है, उसका अनिश्चित तो नष्ट है ही, निश्चित भी नष्ट हो जाता है। -हरएक पर्वत मे मणि नहीं होती, हरएक हाथी मे मुक्तामणि नहीं होनी। साधु लोग सभी जगह नहीं मिलते, हर एक वन मे चदन नही होता, अच्छी-अच्छी चीजें विशेष स्थानो पर हो मिलती हैं।
स्वाध्याय के सूत्र 123 -~-न तो ससार मे कोई तुम्हारा मित्र है और न शत्रु, तुम्हारा अपना व्यवहार ही शनु अथवा मित्र बनाने का उत्तरदायी है। जयशकर प्रसाद -राजभवनो के मोह से मनुष्य आजीवन मानसिक कारावास भोगता है। - -~-अधिकार-सुख कितना मादक और सारहीन है --अधिक हप और अधिक उन्नति के बाद ही अधिक दुख और पतन की बारी आती है। जवाहरलाल नेहरू -~आपत्तिया हमे निरतर बलवान बनाती हैं। --कठिनाइया हमे आत्मज्ञान कराती हैं कि हम किस मिट्टी के बने जनेंद्रकुमार -ईया अपनी हीनता के बीच मे से जम लेती है और वह उस हीनता को दूर नहीं करती, सिर्फ दबाती है । दु ख को यदि हम भगवान के प्रसाद के रूप मे ले सके तो सच- मुच वह जीवन को चमका सकता है। (सत) ज्ञानेश्वर -मूों से बहस करके कोई भी व्यक्ति बुद्धिमान नही कहला --क्रोध से मानव क्रोधपात्र का ही अपमान नहीं करता, अपितु अपनी प्रतिष्ठा भी गवाता है । -ईश्वर को नापना आसमान पर गिलाफ चढाने के समान है। सकता। टालस्टॉय -असत्य मार्ग पर हम चाहे जितनी दूर जा चुके हो, वहा से लौट पडना उस पर चलते रहने से बेहतर है ।
1424
ध्यानयोग कुछ सरल विधिया
तिरुवल्लुवर
। ईर्ष्या करने वाले के लिए ईर्ष्या की बला ही काफी है। यह
इसलिए कि यदि उसके दुश्मन उसे छोड भी दें तो भी उसकी
ईर्ष्या ही उसका सर्वनाश कर देगी।
--बुराई से बुराई पैदा होती है, इसलिए आग से भी बढकर बुराई
से डरना चाहिए।
-दगाबाजी से धन जमा करना ऐसा है जैसा कि मिट्टी के कच्चे
घडे में पानी भरकर रखना।
-~-बडप्पन सदेवही दूसरो की कमजोरियो पर परदा डालना चाहता
है, किंतु ओछापन दूसरो की कमिया बताने के सिवा और कुछ
करना ही नहीं जानता।
-निधना को देना ही सच्चा दान है, अय सब प्रकार का देना
उधार देने के समान है।
-त्याग से अनेक प्रकार के सुख उत्पन्न होते है, इसलिए अगर
उन्हे अधिक समय तक भोगना चाहो तो शीघ्र त्याग करो।
---शानदार रोवीला चेहरा किस काम का जवकि दिल के अदर
बुराई भरी हुई है।
-इच्छा कभी तृप्त नहीं होती। अगर कोई मनुष्य उसको त्याग दे
तो वह उसी दम सपूर्णता को प्राप्त कर लेता है ।
-~-जब घर में अतिथि हो तव चाहे अमृत ही क्यो न हो, अकेले नही
पीना चाहिए।
(महपि) दयानद सरस्वती
-~-प्रत्येक को अपनी ही उन्नति मे सतुष्ट न रहना चाहिए, सबकी
उन्नति मे ही अपनी उन्नति समझनी चाहिए।
-~जो भी मनुष्य अहकार करता है उसका एक न-एक दिन पतन
अवश्य होगा।
स्वाध्याय * सूत्र 125 धूमकतु -समाज की अपूर्णता के विषय में नही, अपनी अपूर्णता के विषय मे विचार करने वाला व्यक्ति एक दिन समाज की अपूणता दूर करने की सामर्थ्य प्राप्त करता है । -हमारी वास्तविक निधनता यह है कि दूसरे को सुधारने का अधिक-से-अधिक प्रयत्न करते है और स्वयं को सुधारने का अल्प मे अल्प। (मुनि) नथमल -परिपक्व के लिए बधन नहीं होता। तरु फल को तब तक बाधे रखता है जब तक वह पूरा पक नहीं जाता। --मन लोभ से भरा था तब मुझे वे लोग बडे लगते थे, जिनके पास बहुत था। मन लोभ से खाली हुआ तो लगा कि महान् वे हैं, जिनके पास अपना कुछ भी नहीं है। -~~-मिलन मे सुख है और विरह मे वेदना। मानव मिलन-प्रेमी है है और विरह विद्वेपी है । पर उसने यह कब मोचा कि विरह के बिना मिलन मे सुख कब होता हे । नरेंद्र कोहली -~~यद्यपि व्यक्ति के अदर वही जीवनी शक्ति है जो स्वय सृष्टि अथवा प्रकृति है किंतु जब शेप सृष्टि से स्वयं को काट, एक व्यक्ति अपने अहकार को सच मान, स्वय को पूण समझ अपने आपको कर्ता घोषित करता है, तो वह एक भ्रम पालता है। --जिहोने अयायपूर्वक, अधर्म से धन का परिग्रह कर लिया है- व समझते है कि उन्होने एक शक्ति अजित की है। पर वे यह नहीं समझते कि वस्तुत उन्होने, जि हे वचित क्यिा है, उनको शनुता ही अजित की है।
126
ध्यानयोग कुछ सरल विधिया
नानक
-यदि तू मस्तिष्क को शात रख सकता है तो तू विश्व पर विजयी
होगा।
पचतन्त्र
-दूसरो को उपदेश देना सरल है।
-मूर्ख धन के लिए जो कष्ट सहते हैं, उसके शताश भाग से मोक्ष
की चेष्टा करने वाले को मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है।
प्रेमचद
-विपत्ति से बढकर अनुभव सिखाने वाला कोई विद्यालय आज
तक नही खुला।
-ज्ञान भी जब सीमा के बाहर हो जाता है तो नास्तिकता के क्षेत्र
मे जा पहुचता है।
-जिसकी आत्मा जितनी विशाल है, वह उतना ही महापुरुष है।
बुद्ध (धम्मपद)
जो दूसरो के अवगुणो की चर्चा करता है, वह अपने अवगुण
प्रकट करता है।
-वैर से वैर कभी शात नही होता, अवर से शात होता है ।
-जागने वाले की रात्रि लबी होती है। थके हुए के लिए रास्ता
लवा होता है । सद्धर्म को न जानने वाले मूर्यो के लिए ससार
लबा होता है।
-युद्ध मे हजारो मनुष्यो को जीतने वाले मे बडा विजेता वह है,
जिसने अपने-आपको जीत लिया है।
-अल्प ज्ञानी मनुष्य बैल के समान वढता है। उसका मास बढता
है पर प्रज्ञा नही वढती है।
--विजय शत्रुता को उत्पन्न करती है । पराजय को त्यागकर शात
हुआ मनुष्य सुखपूर्वक सोता है।
स्वाध्याय के सूत्र 127 , --जो उठे हुए क्रोध को, भ्रात हुए रथ के समान रोक लेता है, उसे मैं सारथी कहता हूँ। दूसरे जन तो केवल लगाम पकडने वाले -दूसरो का दोप देखना सरल है किंतु अपने दोष देखना कठिन है। (श्री) ब्रह्म चैतय -~-जिस घर मे शाति है, वहा भगवान वास करते है। भर्तृहरि -~-सासारिक भोगो को हमने नही भोगा अपितु उन्होने हमे भोग लिया है । तप नही तपा गया प्रत्युत म ही तप्त हो गए। समय नही बीता प्रत्युत हम ही बीत गए । तृष्णा जीर्ण नहीं हुई प्रत्युत हम ही जीर्ण हो गए हैं। -~-दुनिया मे प्रसन्न रहने की चावी अपनी जरूरतो को कम करना -~-कृपण से बडा दाता न कोई हुआ, न होगा क्योकि वह तो छुआए विना ही सारा धन दूसरो को दे जाता है। -~धन की तीन गतिया होती है-दान, भोग और नाश । जो न दूसरो को दे, न स्वय भोगे, उसके धन की तीसरी गति होती है। --जब मुझे (शास्त्रो का) थोडा से ज्ञान था, तब मद से उमत्त हाथी की भाति मैं अहकार मे झूमता था और मन में सोचता था कि मैं तो पर्वज्ञ हू । परतु जब मैंने विद्वानो के बीच रहकर कुछ-कुछ सीखना आरभ किया तब यह बात समझ मे आई कि मैं तो मूर्ख हूँ और फिर मेरा सपूर्ण अहकार ज्वार की तरह समाप्त हो ---फल लगने पर तरु झुक जाते हैं। नये बरसने वाले जल से भरे बादल दूर तक झुक जाते हैं तथा सत्पुरुष समृद्धि के आधिक्य से अतीव नम्र हो जाते हैं। गया।
128
ध्यानयोग कुछ सरल विधिया
मनु
-~-प्रत्येक कार्य किसी कारण का परिणाम है।
-~-शूद्र व्यक्ति ब्राह्मण के कार्य करने से ब्राह्मण हो जाता है, और
ब्राह्मण शद्र के काय करने से शूद्र ।
--भोगो के भोगने से वासना तृप्त नही होती जैसे अग्नि मे ईधन
और घी डालने से वह और प्रचड होती है ।
(युवाचाय) महाप्रज्ञ
-सत्य अच्छा है पर उसे पाने का उतना ही यत्न करो जितना सहन
कर सको। तुमने देखा होगा सामान्य प्रकाश मे मनुष्य देख पाता
है किंतु प्रखर प्रकाश के सामने आखें चौंधिया जाती हैं।
-स्मृति के लिए तुम्हारे पास विशाल अतीत है, कल्पना के लिए
अमीम भविष्य है किंतु करने के लिए केवल वर्तमान है, जो बहुत
हो सीमित है।
-यह कैसा अचरज | जो चाहिए उसका भान नही है और उसके
लिए तडप रहे है जो नहीं चाहिए।
-जितना नीचे देखता हू अपने-आपमे बहुत विशाल लगता हू
जप थोडा ऊपर देखता ह तो मेरी विशालता असीम गगन में
विलीन हो जाती है।
महाभारत
-सुख के बाद दुख और दुख के वाद सुख-ये दोनो गाडी के
पहिये के समान है।
-किमी के प्रति मन मे क्रोध लिए रहने की अपेक्षा उसे तत्काल
प्रकट कर देना अधिक अच्छा है, जैसे क्षणभर मे जल जाना देर
तक सुलगने से ज्यादा अच्छा है।
-वास्तविक धम यह है कि जिन बातो को मनुष्य अपने लिए अच्छा
न समझे, दूसरो के साथ भी वैसा व्यवहार न करे।
स्वाध्याय के सूत्र
129
(भगवान) महावीर
-घृणित वह नही जिससे घृणा की जाती है, किंतु घृणित वह है जो
घृणा करता है, क्योकि उसके ही हृदय मे घृणा भरी है।
-बगुले से अडा और अडे से बगुला उत्पन्न होता है, उसी प्रकार
मोह से तृष्णा और तृप्णा से मोह उत्पन्न होता है ।
--कोध प्रेम का नाश करता है। मान से विनम्रता नष्ट होती है।
माया (कपट) से मित्रता का नाश होता है और लोभ से सर्वनाश
होता है।
-माधक जनो को चाहिए कि क्रोध को शाति से नष्ट करे।
विनम्रता से मान को जीतें। सरलता से कपट का नाश करें और
सतोप से लोभ पर विजय प्राप्त करे।
(श्री) मा
--सबसे पहले पूर्ण रूप से अपने को जानो और फिर अपने ऊपर पूर्ण
सयम स्थापित करो। प्रत्येक क्षण अभीप्सा करते रहने से तुम
ऐसा करने मे समथ हो सकते हो ।
जीवन मे ऐसा कभी नही कहा जा सकता कि इसे करने का
समय अभी नही आया है। यह भी नहीं कहा जा सकता है कि
अव इसे करने का समय नही रहा।
~-जब हम अधीर नहीं होते, तभी हम सत्कर्म कर सकते है । उहै
उपयुक्त समय पर उपयुक्त ढग से कर सकते है ।
(हजरत) मुहम्मद
ताकतवर वह नही जो दूसरो को पछाड दे, बल्कि ताकतवर
वह है जो गुस्से के वक्त अपने पर काबू रखे ।
योश
-वीमारो को चगा करो। कोढियो की सेवा सरो। मुर्दो को
।
130 ध्यानयोग कुछ सरल विधिया उठाओ । दुष्टो को निकालो। खुले हाथ से तुम्हे मिला है, खुले हाथ से दो। योगवासिष्ठ --पानी सतत-प्रवाह क्रिया से पहाडो को गला देता है। कठोर पत्थरो को चिक्ना वनाता है । अभ्यास से क्या नही सिद्ध होता? -मनुप्य त मय होकर जैसी भावना करता है, और जैसा होना चाहता है, वैसा ही हो जाता है। ---अपने भीतर ही यदि शाति मिल गई तो सारा ससार शातिमय प्रतीत होता है। -मानव मे सद्गुण तभी तक है जब तक वह तप्णा से दूर हे । तप्णा का स्पश होते ही सव गुण गायब हो जाते है । (महर्षि) रमण -अहभाव का नाश करना और आत्मा मे अवस्थित होना ही परम- पद है। -जो कुछ हम दूसरो को देते हैं, वास्तव में वह सब हम अपने- आपको दे रहे है। रवींद्रनाथ ठाकुर -ईश्वर का दाहिना हाथ कोमल, परतु वाया बहुत कठोर है। -मनुष्य जव पशु का सा आचरण करता है तो पशुओ से भी नीचे गिर जाता है। का अधिकार केवल उसे है जो प्रेम करता है। -जो व्यक्ति सत्य के साथ क्तव्यपरायणता मे लीन है, उसके मार्ग मे बाधक होना सरल काय नहीं है । -नदी का यह किनारा आह भरकर कहता है, "सामने के किनारे पर ही समग्र सुख है।" सामने का किनारा पहले वाले से भी -सजा
स्वाध्याय के सूत्र
131
गहरी आह भरकर कहता है, "जगत मे जितना सुख है वह सारा
उस किनार पर है।"
(डॉ०) राधाकृष्णन्
--ईश्वर की कोई बौद्धिक परिभापा नहीं दी जा सकती। उसका
आत्मा के सहारे अनुभव किया जा सकता है ।
-चिडियो की तरह हवा में उडना और मछलियो की तरह पानी
मे तैरना सीखने के बाद अब हमे इसाना की तरह जमीन पर
चलना सीखना है।
~-रोटी के ब्रह्म को पहचानने के बाद ज्ञान के ब्रह्म से साक्षात्कार
अधिक सरल हो जाता है।
be
रामकृष्ण परमहस
-पानी और उसका बुलबुला एक ही चीज है, उसी प्रकार जीवात्मा
और परमात्मा एक ही चीज है, अतर केवल यह है कि एक
परिमित है, दूसरा अनत, एक परतत्र है, दूसरा स्वतन ।
-जो ईश्वर को पा लेता है, वह मूक और शात हो जाता है।
-केवल शास्त्र पढकर ईश्वर की व्यवस्था करना ऐसा है जसा
बनारस शहर को सिर्फ नक्शे मे देखकर किसी को उसका
--
विवरण सुनाना।
-समार मे रहा लेकिन मसारी न बनो।
(स्वामी) रामतीय
-निराशावादी वुराई को ढूढता है और आशावादी अच्छाई को।
निराशावादी चिंता के भार से दुखी और आशावादी प्रसनता
की खुशबू मे मुसकराकर आगे बढना है।
-~-प्राथना करना कुछ शब्दो को दुहराना नही है । प्राथना का अथ
है परमात्मा का मनन और अनुभव करना ।
*
132
ध्यानयोग कुछ सरल विधिया
-इच्छाओ से ऊपर उठ जाओ, वे पूरी हो जाएगी, मागोगे तो
उनकी पूर्ति तुमसे और दूर जा पडेगी।
-कर्म करना जीवन के आनद के लिए आवश्यक है। कम करते
समय मनुष्य अपने दुख को भी भूल जाते हैं।
(समर्थ गुरु) रामदास
-विश्वाम क्या है ? स्वय को ईश्वरेच्छा पर छोड देना।
-तुम्हारा अतिम ध्यय शाति है । उसे प्राप्त करने का उपाय त्याग
और सेवा है।
-हम दुनिया को नही बदल सकते, मगर दुनिया के प्रति अपना
दृष्टिकोण बदल सकते हैं।
वालतेयर
--मनुष्य जितना छोटा होता है, अहकार उतना ही बड़ा होता है।
वाल्मीकि
---सत दूसरो को दुख से बचाने के लिए कष्ट सहते हैं । दुष्ट लोग
दूसरो को दुख मे डालने के लिए कष्ट सहते हैं।
(मुनि) विद्यानद
-यदि तुम अच्छा बनना चाहते हो तो अपने-आपको सबसे बुरा
समझो।
विनोबा भावे
-डूबने वाले के प्रति सहानुभूति का मतलब उसके साथ डूबना
नही है, बल्कि तैरकर उसको बचाने का प्रयत्न करना है ।
—जिस त्याग से अभिमान उत्पन होता है, वह त्याग नहीं । त्याग
से शाति मिलनी चाहिए । अतत अभिमान का त्याग ही सच्चा
त्य है।
स्वाध्याय के सूत्र
133
-'मुझे अभिमान नहीं है' ऐसा कहना सबसे बडा अभिमान है ।
-गरीव वह नहीं है जिसके पास कम है, बल्कि धनवान होते हुए
भी जिसकी इच्छाए कम नहीं है, वह सबसे अधिक गरीब है।
(स्वामी विवेकानद
-यदि तुम्हारा अहकार चला गया है तो किसी भी धम-पुस्तक
की एक पक्ति भी पढे विना व किसी भी देवालय में पैर रखे
विना, तुम जहा बैठे हो, वही तुम्हे मोक्ष प्राप्त हो जाएगा।
--इच्छा का समुद्र सदा अतृप्त रहता है। उसकी मागे ज्यो ज्यो
पूरी की जाती हैं, त्यो त्यो और गजन करता है।
-धम को लेकर कभी विवाद न करो। धम सवधी सारे विवाद
और झगडे केवल यही दर्शाते है कि यहा आध्यात्मिकता का
अभाव है।
विष्णु शर्मा
-सपत्ति मिलने पर जो हप मे आपे से बाहर नहीं हो जाता,
विपत्ति आने पर जो विकल होकर रोने नही लगता, युद्ध आ
पडने पर जो कायर नहीं हो जाता, त्रिलोक मे ऐसे पुत्र शिरोमणि
को पैदा करके माता धन्य हो जाती है।
वेद
--ईर्या के पथम वेग को हम शात करें। फिर वेग से उत्पन ज्वाला
को भी हम शात करे। उसके उपरात हृदय-अग्नि को, उससे
उपजे शोक को निर्मल करें।
- हे भरी विपद्, तुझे मेरा नमन हो, तू मेरी लाह बेडियो को,
वधनो को काट दे। तुझे नियामक यम ने मेरा हित करने के
लिए भेजा है। उस मृत्यु स्पी यम को मेरा प्रणाम ।
--अनुदार व्यक्ति व्यथ ही अन-धनादि प्राप्त करता है, वह न तो
134
ध्यानयोग कुछ मरल विधिया
शासक को पुष्ट करता है न ही मित्रो को, वह अकेला खान
वाला पापी है।
--मेरा मन शुभ सकरपो वाला हो।
-हम किसी की निंदा न करें।
--सव मनुष्यो को चाहिए कि वे जिस प्रकार अपने लिए उत्तम
पदार्थ चाहते हैं उसी प्रकार अन्य जनो के लिए भी इच्छा करें।
(महर्षि) वैशम्पायन
--जिस प्रकार काठ अपने ही अदर से प्रकट हुई अग्नि द्वारा भस्म
होकर खत्म हो जाता है, उसी प्रकार मनुष्य अपने ही भीतर
रहने वाली तृष्णा से नाश को प्राप्त होता है ।
शतपथ ब्राह्मण
-जो बहुत घमड करते थे, वे ही अपने घमड के कारण गिरे, इसलिए
किसी को घमड नही करना चाहिए । घमड ही हार का द्वार है ।
--अति अभिमान तिरस्कार का मुह देखता है ।
शरच्चन्द्र
-एक आदमी दूसरे के मन की बात जान सकता है तो केवल
सहानुभूति और प्यार से, उम्र और बुद्धि से नही।
-अति सयम भी एक प्रकार का असयम है।
-जीवन की बहुत-सी बडी चीजो को हम तब पहचान लेते हैं,
जब उहे खो देते है।
(स्वामी) शिवानद
--जिस प्रकार अच्छे फल टोकरी मे चुनकर रख लिए जाते है और
सडे गले फलो को फेक दिया जाता है उसी प्रकार मन मे अच्छे
विचारो को रख लें और बुरे विचारो को उत्सर्जित कर दें।
-सूय की किरणें सब पर पडती है किंतु चिकनी धातु पर उनका
स्वाध्याय के सूत्र
135
प्रतिबिंब चमकता है। उसी प्रकार दिव्य ज्योति सवत्र विकीण है
किंतु विशुद्ध अत करण पर उसका विव पडता है।
(स्वामी) सत्यानद
--जब आप शारीरिक अशुद्धियो से मुक्त होने के लिए कोई रेचक
औपवि लेते है तो शरीर से निकलने वाले द्रव्य बडे दुर्गन्धयुक्त
होते हैं, चेतना की शुद्धि से भी बुरे विचार तथा अनुभव बाहर
निकलते है।
(शेख) सादी
-मैं ईश्वर से डरता हू, ईश्वर के बाद मुख्यत उससे डरता हू
जो
ईश्वर से नहीं डरता।
-ईष्यालु मनुष्य स्वय ही ईर्ष्याग्नि मे जला करता है। उसे और
जलाना व्यथ है।
-अगर तुझे यश चाहिए तो दान कर । जब तक दाना बिखेरा नही
जाता, नही उगता।
हाफिज
-अगर तू तरक्की करके वडा आदमी हो जाए तो भी अपने रास्ते
से न डिग । तू कमान से छोडे हुए तीर की तरह है, जो थोडी
देर हवा में उडकर जमीन पर गिर जाता है।
-किसी भी हालत में अपनी ताकत पर घमड न करो। यह बहु-
रूपिया आसमान हजारो रग बदलता है।
--कम ऐसे कर जसे तूने सौ वप जीना है, शुक्र ऐसे अदा कर जैसे
तू कल नहीं रहेगा।
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की ओर से एक युगप्रवर्तक पुस्तक
कामभाव को नयी व्याख्या
लेखक दयानद वर्मा
यह पुस्तक काम के मानसिक तथा शरीर सबधी पक्षो पर
नयी जानकारी देती है। इस जानकारी के आधार पर स्त्री-
पुरुषो की सैक्स सवधी बहुत सी समस्याए हल की जा सकती
-
साहित्य, चिकित्सा, यौन-विज्ञान, मनोविज्ञान आदि अनेक
क्षेत्रो के विद्वानो द्वारा इस पुस्तक की अत्यत सराहना हुई है।
पुस्तक के विषय मे कुछ प्रशसा-पत्रो का सार
लेखक ने काम सबधी सभी पक्षो का विवेचन किया है। जिज्ञासु जनो के
लिए पुस्तक रुचिकर तथा ज्ञानवधक है
--आचाय प्रियव्रत गर्मा, प्रमुख आयुर्वेद सकाय
काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी
अग्रेजी तथा हिंदी की काम सवधी अन्य पुस्तको म ऐसी नवीन जानकारी
मैंने नही पाई है। इस विषय पर अब तक छपी पुस्तको मे
मर्वोत्तम
यह
श्री अमृतलाल नागर
साहित्यकार, लखनऊ
लेखक ने अछूते समझे जाने वाले विषय पर परपरा और आधुनिक
स्थापनाओ के प्रकाश मे इस पुस्तक को लिखा है। यह पठनीय तो है ही,
मननीय भी है।
-श्री अक्षयकुमार जन
वरिष्ठ पत्रकार, नयी दिल्ली
कामभाव की नयी पाख्या
इस पुस्तक मे मनोविज्ञान तथा जीवविज्ञान के आधार पर कामभाव की
व्यारया प्रस्तुत की गई है। साथ ही काम में सास्कृतिक और सामाजिक
पहलुआ को भी दृष्टि म रसा गया है। यह पुस्तक एक सराहनीय प्रयास
-डा० सूय गुप्ता, एसोसिएट प्रोफेसर क्लोनिकल साईकालोजी विभाग
आल इण्डिया इस्टीटयूट आफ मेडिकल साईसिज, नयी दिल्ली
लेराक ने शरीर रचना (Anatomy) तथा शरीर क्रिया विनान
(Physiology) सवधी महत्त्वपूर्ण उद्धरण देकर अपने निष्कप दिए हैं। ये
निष्क्ष एक्दम नये हैं और स्वीकार करने योग्य हैं।
-~-डा. लक्ष्मी नारायण गर्मा
यौन विशेषज्ञ, दिल्ली
एक नाजुक विषय पर लेखक ने सतुलित, सयत और सम वयात्मक दष्टि
से वैनानिक विवेचन प्रस्तुत किया है।
-डा० पाण्डरग राव
निदेशक भारतीय भाषा परिषद क्लक्ता
यह पुस्तक लेखक के काम सबधी मौलिक चितन का सार । मैं चाहता हूँ
इसका अधिक से अधिक प्रचार हो।
--श्री ममयनाथ गुप्त
साहित्यकार, नयो दिल्ली
यह पुस्तक एक गोध काय है। कामुक्ता के जाग्रत होने म मन मस्तिष्क को
जोडकर कौनसी अथिया और अग प्रत्यग भाग लेत हैं, इसका पूरा विवरण
इम पुस्तक म दिया गया है। साथ ही विवरण को उत्तेजना स रहित रखा
गया है।
-श्री रामेश्वरदास गुप्त
सस्थापक घम भवन, नयी दिल्ली
इसी लेखक ने इससे पहले अपनी पुस्तक 'यौन व्यवहार अनुगोलन' म
'अनुकूलन प्रवृत्ति' की स्थापना की थी। यह पुस्तक उसी स्थापना को मिद्ध
रन की नयी कही है और लेखन की निरतर खोजमा परिणाम है।
a
मनोधि
काममाव को नयी व्याख्या
काम के विषय पर इतने गहन अध्ययन पर आधारित पुस्तक मैन आज तक
नहीं देखी
-~-श्री जगदीश ओझा
सचालक मानसायन, नयी दिल्ली
इस पुस्तक द्वारा काम मनोविज्ञान का एक नया रूप प्रकाश में आया है।
इमसे हिंदी मे एक नये अध्याय का सूत्रपात हुआ है
-श्री क्षेमचन्द्र सुमन
साहित्यकार, दिल्ली
यह पुस्तक स्वस्थ तथा रचनात्मक चिंतन का परिणाम है। इसमे कामभाव
के सबघ म अतर्राष्ट्रीय स्तर पर होने वाले शोध काय के निष्क्ष देकर इसे
एक प्रामाणिक सदभ ग्रथ का रूप दे दिया है
-डा० एच० पी०शर्मा
साहित्य परिचय, आगरा
पुस्तक म कामभाव के बारे मे आधुनिक खोजो को प्रस्तुत किया गया है ।
फिर भी सदम के अनुसार भारतीय चिंतन तथा वात्स्यायन के 'कामसून'
का भी उल्लेख मिलता है। पुस्तक शोधाथियो तथा साधारण पाठको,
दानो के लिए समान रूप से उपयोगी है
-पाक्षिक "मुक्ता' नयी दिल्ली
चाट, रेखाचित्रो तथा फोटोग्राफ्स द्वारा इस पुस्तक मे विषय
भली भांति समझाया गया है। पुस्तक के परिशिष्ट मे
कामसुख बढाने वाले प्राचीन योग तथा उपाय सकलित करके
पुस्तक को अधिक उपयोगी बनाया गया है ।
मूल्य
केवल 75 रुपए
कामभाव की नयी पाख्या इस पुस्तक मे मनाविनान तथा जीवविज्ञान के आधार पर कामभाव की व्यारया प्रस्तुत की गई है। साथ ही काम के सास्कृतिक और सामाजिक पहलुओ को भी दृष्टि म रखा गया है। यह पुस्तक एक सराहनीय प्रयास -डा० सूय गुप्ता, एसोसिएट प्रोफेसर क्लीनिकल साईकालोजी विभाग आल इण्डिया इस्टीटयूट आफ मेडिकल साइसिज, नयी दिल्ली लेखक ने शरीर-रचना (Anatomy) तथा शरीर-फिया विज्ञान (Physiology) सबधी महत्त्वपूर्ण उद्धरण देकर अपने निप्प दिए हैं । ये निष्कप एक्दम नये हैं और स्वीकार करने योग्य हैं। ~-डा. लक्ष्मी नारायण शर्मा यौन विशेषज्ञ, दिल्ली एक नाजुक विषय पर लेखक ने सतुलित सयत और समन्वयात्मक दष्टि स वैनानिक विवेचन प्रस्तुत किया है। -डा० पाण्डरग राव निदेशक भारतीय भाषा परिषद, कलक्ता यह पुस्तक लेखक के काम सबधी मौलिक चिंतन का सार है। मैं चाहता हूँ इसका अधिक से अधिक प्रचार हो। -श्रीममयताय गुप्त साहित्यकार, नयी दिल्ली यह पुस्तक एक शोध काय है। कामुक्ता के जाग्रत होने में मन मस्तिष्क को जोडकर कोनसी नथिया और अग प्रत्यग भाग लेते हैं, इसका पूरा विवरण इम पुस्तक म दिया गया है। साथ ही विवरण को उत्तेजना स रहित रखा गया है। --श्री रामेश्वरदास गुप्त सस्यापा घम भयन, नयी दिल्ली इमी लेखक ने इससे पहले अपनी पुस्तक 'यौन व्यवहार अनुशीलन म 'अनुकूलन प्रवृत्ति' को स्थापना की थी। यह पुस्तक उसी स्थापना वो मिट करन की नयी वडी है और लेखक को निरतर खोज का परिणाम है । -डा०द्वारकाप्रसाद मनोचिकित्सक, राधा
कामभाव की नयी व्याख्या
काम के विषय पर इतने गहन अध्ययन पर आधारित पुस्तक मैंने आज तक
नहीं देखी
-श्री जगदीश ओझा
सचालक मानसायन, नयी दिल्ली
इस पुस्तक द्वारा काम-मनोविज्ञान का एक नया रूप प्रकाश म आया है।
इससे हिंदी म एक नये अध्याय का सूत्रपात हुआ है
-श्री क्षेमचद्र सुमन
साहित्यकार, दिल्ली
यह पुस्तक स्वस्थ तथा रचनात्मक चिंतन का परिणाम है। इमम कामभाव
के सवध मे अतर्राष्ट्रीय स्तर पर होने वाले शोध काय के निष्कप देकर इसे
एक प्रामाणिक सदम ग्रथ का रूप दे दिया है
-~डा० एच० पी० शर्मा
साहित्य परिचय, आगरा
पुस्तक मे कामभाव के बारे में आधुनिक खोजो को प्रस्तुत किया गया है ।
फिर भी सदम के अनुसार भारतीय चिंतन तथा वात्स्यायन के 'कामसूत्र'
का भी उल्लेख मिलता है। पुस्तक शोधार्थियो तथा साधारण पाठको,
दोनो के लिए समान हप से उपयोगी है
-पाक्षिक 'मुक्ता' नयी दिल्ली
चाट,
रेखाचित्रो तथा फोटोग्राफ्स द्वारा इस पुस्तक मे विषय
को भली भाति समझाया गया है। पुस्तक के परिशिष्ट में
कामसुख वढाने वाले प्राचीन योग तथा उपाय सकलित करके
पुस्तक को अधिक उपयोगी बनाया गया है।
मूल्य केवल 75 रुपए
दयानन्द वर्मा रचित । काम मनोविज्ञान विषयक मौलिक कृति यौन व्यवहार अनुशीलन इस शताब्दी के मध्यकाल मे यूरोप तथा अमेरिका से उमडने वाली 'यौन क्राति एक बवडर की तरह भारत की ओर वढ रही थी । इसके प्रभाव के कारण 'यौन स्वेच्छाचार' को आदर की दृष्टि से देखा जाने लगा था। दूसरी ओर विश्व का एक बड़ा वर्ग अति सयम पर जोर देकर 'काम' के विचार मात्र को पाप की कोटि मे ला रहा था। तभी काम का सतुलित पक्ष प्रस्तुत करने वाली यह पुस्तक प्रकाश मे आई। 1968 मे जब पहली बार यह पुस्तक प्रकाशित हुई थी तो मनोपो श्री रजनीश ने कहा था हिंदी में इस भाति की विचारोत्तेजक पुस्तकें ही कहा है वरिष्ठ चित एव कथाकार श्री जने द्र के शब्दो मे इस पुस्तक के रूप में हिंदी न एक अ वपक और चिंतक को प्राप्त किया है साहित्यकार श्री विष्णु प्रभाकर ने कहा था चौंका दने वाली हैं यौन विशेषज्ञ डा. लक्ष्मीनारायण शर्मा के शब्दों में यदि मैं किसी पुरस्कार- समपण समिति का निणायक होता तो इस पुस्तक को सर्वोच्च पुरस्कार के राष्टकयि श्री रामधारी सिंह दिनकर ने कहा था इस पुस्तक के लेखक का दृष्टिकोण पवित्र जोर उपयोगी है इम पुग्नक मे पश्चिमी देशो मे बढते हुए यौन स्वेच्छाचार के परिणाम की जो आशकाए व्यक्त की गई थी वे आज 'एड्स की महामारी के रूप में विश्व के सामने है । और 'विश्व म्वास्थ्य संगठन' (WHO) के सचेतक 'यौन प्राति' की उप- लब्धियो पर पुनर्विचार के लिए बाध्य हो गए हैं । इस पुस्तक की नयी स्थापनाए योग्य ठहराता मूल्य 20 रुपए दयानन्द वर्मा के यूरोप-यात्रा के सस्मरणो पर आधारित एक रोचक पुस्तक पश्चिम के तीन रग • इस पुस्तक मे यूरोप के तीन नगरो, पैरिस, कोपनहेगन तथा बलिन के कला, सैक्स और राजनीति के रगो को अनूठे शब्द- चिनो मे चित्रित किया गया है। इस पुस्तक के विषय मे वरिष्ठ साहित्यकारो की प्रतिक्रियाए इस प्रकार हैं आचाय हजारीप्रसाद द्विवेदी लेखक ने बडी मनोहर शैली में पश्चिमी देशो का भ्रमण कराया है। कोपनगहेन के यौनाचारो का वणन किसी और के हाथ पड़ने पर कदाचित् भयकर हो उठता, लेखक ने बडे सयम के साथ उसका चित्रण क्यिा है इलाचन्द्र जोशी पश्चिम के तीन रगो ने मेरे मन के साथ होली खेल ली डा. विजयेद्र स्नातक लेखक पश्चिम ये विविध रगो मे भूला भटका नहीं है, और उसने भारतीय दष्टि कही खोई नहीं है डा०प्रभाकर माचवे बलिन की दीवार का वणन और वे अश जो मानवीय सवेदन से भरे हैं इस पुस्तक का महत्वपूर्ण भाग है 'पश्चिम के तीन रग' हिंदी क गद्य साहित्य मे एक नया प्रयोग है और यह पुस्तक पजाब सरकार के प्रथम पुरस्कार से सम्मानित है। मूल्य 15 रुपये
दियानन्द वर्मा रचित एक गतिशील उपन्यास
जिदाबाद मुर्दाबाद.
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यह एक मजदूर व्यक्ति की कहानी है जिसकी खामोशी ने उसे
गले तक फूलमालाओ से लाद दिया और जब उसकी खामोशी
टूटी तो जिंदाबाद' शब्द 'मुर्दावाद' मे वदल गया ।
यह उपन्यास एक नये ढग मे कही गई कहानी है । इसे पढते हुए
आपको लगेगा कि कहानी की पर्ते खुलने के साथ साथ आपके
सामने मनो राजनीति, धम, तथा समाजशास्त्र की
गुत्थिया भी खुलती चली जा रही है और आप रस जोर ज्ञान
की गगा मे सराबोर होते जा रहे है।
यह उपयास लीक पर चलते हुए समाज के सामने काम सबधी
एक ज्वलत प्रश्न उपस्थित करता है। इस प्रश्न का उत्तर पाठक
दे सकता है।
इस उपन्यास का इग्लिश, उर्दू, पजावी तथा मराठी भाषा में
अनुवाद छप चुका है।
हिंदी पुस्तक का मूल्य 15 रुपये
दयानन्द वर्मा की लेखनी से अन्य पुस्तकें मानसिक सफलता कैसे यह पुस्तक दैनिक जीवन में उटने वाली मानसिक समस्याआवे व्यावहारिय हल प्रस्तुत करती है। इस पुस्तक का अनुवात इग्लिा, तमिल, कन्नड, उर्दू तथा पजाबी भाषा म छपपर लोकप्रिय हो चुका है। हिन्दी पुस्तक का मूल्य 5 रुपये है। हम सब और वह भारतीय नानपीठ की ओर से प्रकाशित इस पुस्तक म नेखक ने राष्ट्रीयता, घम सयुक्त परिवार, भीख, हीनता की भावना, इच्छाशक्ति, वईमाना आदि प्रवत्तिया की मानमिक्ता पर प्रकाश डाला है, और विपरीत स्थितिया को अनुकूल बनाने के सुझाव भी दिए हैं । ललित शली मे एक मनमाहा रचना। मूल्य 3 रुपये। भारत के पर्वतीय भ्रमण स्थल दयान द वमा द्वारा सपादित 'प्रभागित मन' का यह विशिष्ट सस्वरण सजिल्द पुस्तक के रूप म उपलब्ध है। इसम अनेक यात्रिया में अनुभवा पर आधारित लेख सकलित हैं। इस पुस्तक के अनुसार यात्रा कायम वनावर पयटक्गण अपनी यात्रा का सुगम बना सकते हैं और पाठकगण इस पुस्तक के मनाहर चित्रण द्वारा घर बैठे उन पयटन स्थलो का आनद ले सक्त है । मूल्य 12 . . । । रुपये। - श्रीमद्भगवद्गीता भारत की इस विश्वविख्यात देन पर अलग अलग मत संप्रदाय के मनीषिया ने भाप्य किए हैं । दयान द वर्मा ने एक मनावनानिव की दृष्टि से गीता के मम का समझने का यत्न किया है और जमा समझा है वैमा हिंदी भावानुवादक रूप म इस पुस्तक म प्रस्तुत कर दिया है । जेबी साईज म उपलब्ध है । मूल्य 3 रुपये।
माइड एण्ड बॉडी रिसर्च सेंटर
की ओर से
हस्तरेखाओ और हस्त-लक्षणो (पामिस्ट्री)
के विषय मे अनुसधान कार्य हो रहा है
उस अनुसधान के निष्कर्ष
इस सस्था द्वारा शीघ्र ही प्रकाशित प्रचारित होगे।
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दयानद वर्मा
जन्म 1931 मुलतान (पाकिस्तान)
1960 के आसपास मानसिक समस्याओ पर
आधारित इनके लेख "ज्ञानोदय' "हमारा मन"
आदि पत्रिकाओं में छपते रहे हैं।
1974 से 1984 तक आध्यात्मिक सास्कृतिक
पत्र "प्रकाशितमन'का सपादन करते रहे हैं।
इससे पूर्व लेखक की रचित एव सपादित आठ
पुस्तके तथा सैकड़ों लेख प्रकाशित हो चुके हैं।
विश्वयाग सम्मेलन 1986 ' के अवसर पर इन्हें
योगरत्न' की पदवी से सुशाभित किया गया है।