Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner

Pasva Puran

Kavir,bhudar Das · 2011/01

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3०००००००००००००००००००००००००००००००००००००००००००००० नम श्रीवर्द्धमानाय। स्वर्गीय कविवर भूधरदासविरचित पावपुराण। (जनसिद्धान्तगर्भित सुन्दर काव्यग्रन्थ ।) 20000000000000000000000000000000000000000000000000000000000000000000000GRA 22000००००००००००००००००000000000000000000000000000000000000000000000000000 प्रकाशक- जैन ग्रन्थ-रत्नाकर कार्यालय, हीराबाग, गिरगाँव, बम्बई। आषाढ १९७५ वि०॥ दिनीयावृत्ति] चीर नि० सवत् २४४४ । [मूरय ]

జలం000000000000000000000000000000000000000000000
प्रकागक
नाथूराम गैमी,
हिन्दी-ग्रन्परलाकर कार्यालय,
हीराचाग पो. गिरगाव-बम्बई।
3300000000000000000000000000000000000000000000000000000000000०००००००००००६
1000000
-
7०००००००4
रा रा चितामण सखाराम देवळे,
मुनवभर प्रेस, मझेदन ऑफ इंडिया
मोमायटीज् यिडिंग, गवस्टरोड,
गिग्गॉव-बम्बई।

०००००००००00000000000०००००००००००००००००००००० ग्रन्थकर्ताका परिचय । पार्श्वपुराणके रचयिता कविवर भूधरदासजी आगरेके रहनेवाले सण्टेलवाल जैन थे। सवत् १७८९ में आपने इस ग्रन्थको समाप्त किया है । इसके पहले आप म० १७८१ में 'जेनशतक' बना चुके थे। जैनशतको १०७ कवित्त, सवैया, दोहा और छप्पय है । इसका प्रत्येक पद्य अपने अपने विषयको स्वतत्र रूपसे कहनेवाला है । इसे एक प्रकारका 'सुभाषित-सग्रह' कहना चाहिए। बहुत ही सुन्दर रचना है। जैनसमाजम इसका अच्छा प्रचार है । जैनशतकके सिवाय आपका एक ग्रन्थ पदसग्रह है जिसमें लगभग ८० पद और स्तुतियों आदि हैं। जान पड़ता है, यह आपकी जवा जुदा समयकी रचनाओंका सग्रह है जो किसीने पीछेसे कर दिया है । इसमके कोई कोई पद बडे ही हृदयग्राही और प्रभावशाली है । वे आपके एक अच्छे कवि होनेकी साक्षी देते है । हिन्दीके जैनसाहित्यमें पार्श्वपुराण ही एक ऐसा चरितग्रन्थ है, जिसकी रचना उच्चश्रेणीकी है, जो वास्तवमें पढने योग्य है और जो किसी संस्कृत प्राकृत ग्रन्थका अनुवाद करके नहीं किन्तु स्वतनरूपसे लिखा गया है। लगभग १०-११ वर्षके बाद इस मन्थका यह दूसरा सस्करण प्रकाशित किया जाता है । अबकी बार इसके सशोरनमें पहलेकी अपेक्षा विशेष परिश्रम किया गया है । इतने पर भी यदि इसमें कुछ अशुद्वियों रह गई हों, तो उनके लिए पागण हमें क्षमा कर । -प्रकाशक। Po०००००००० 10000000000000

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PRIORIARRERARIARREARRRRRRRRIERea कविवर भूधरदासजी विरचित- पार्श्वपुराण SAIRastraRARIARRIORANAERONARASNARATRastARISRAER श्रीपार्श्वनाथजीकी स्तुति। दोहा। मोहमहातमदलन दिन, तपलछमीभरतार । ते पारस परमेस मुझ, होहु सुमतिदातार ॥ १ ॥ वामानंदन-कलपतरु, जयो जगतहितकार। मुनिजन जाकी आस करि, जा. सिवफल सार॥२॥ RRRRRRERastrasRastraSTAIRasrasRARRIORamaste:- छप्पय । भुवनतिलक भगवत, संतजन-कमल-दिवायर । जगतजंतु-बंधव अनत, अनुपम गुणसायर ।। राग-नाग-मयमंत,-दुत-उच्छेपन बाल अति । रमाकंत अरहंत, अतुल जसवत जगतपति ।। महिमामहंत मुनिजन जपत, आदिअंत सबको सरन सो परमदेव मुझ मन बसो, पार्सनाह मगलकरन ॥३॥ विमलबोधदातार, विश्व-विद्या-परमेसर । लछमीकमलकुमार, मार-मातग-मृगेसर ।। मसमयंक अवलोकि, रक रजनीपति लाज।

FRORasrease RareARRIGATIONaseaseva पार्चपुराण- जय अस्वसेन-कुल-चंद्र जिन, सक-चक्र-पूजित-चरन । तारो अपार भवजलधितै, तुम तरंड तारन-तरन ॥ ४ ॥ बाघ सिंह बस होहिं, विषम विषधर नहिं डकैं। भूत प्रेत बेताल, ब्याल बैरी मन सके। साकिनि डाकिनि अगनि, चोर नहिं भय उपजा। रोग सोग सब जाहि, विपत नेरे नहिं आवै ।। श्रीपार्सदेवके पदकमल, हियँ धरत निज एकमन । छूटें अनादि बंधन बॅधे, कौन कथा विनसैं विधन ॥५॥ चहुंगति भ्रमत अनादि, वादि बहुकाल गमायौ। रही सदा सुख-आस,-प्यास, जल कहूं न पायौ ॥ सुखकरता जिनराज, आज लौं हियें न आये। अब मुझ माथे भाग, चरन-चिंतामनि पाये । राखौं संभाल उर कोपमैं, नहिं बिसरौं पल रंक-धन । परमादचोर टालन निमित, करौं पार्सजिनगुनकथन ॥६॥ चौपई (१५ मात्रा) बंदी तीर्थंकर चौबीस । बंदौं सिद्ध बसें जगसीस ।। बंदौं आचारज उबझाय । बंदी परम साधुके पाय ॥७॥ ये ही पद पांचौं परमेठ । ये ही सांच और सब हेठ ॥ ये ही मंगल पूज्य अतीव । ये ही उत्तम सरन सदीय ॥ ८॥ बंदौं जिनवानी मन सोपा आदि अंत जो विगत-विरोध ॥

sasteRasranARARRIAS पीठिका। ३ दोहा। चरतो जग जयवंत नित, जिनप्रवचन अमलान । लोक-महलमैं जगमगै, मानिक-दीप समान ॥ १० ॥ हरो भरम दारिद्र दुख, भरो हमारी आस । करो सारदा लच्छमी, , मुझ उरअंबुज बास ॥ ११ ॥ चौपई। बंदौं वृषभसेन गनराज । गुरु गौतम भवजलधिजहाज ॥ कुंदकुंद-मुनि-प्रमुख सुपंथ। जे सब आचारज निरग्रथ ॥१२॥ जैनतत्त्वके जाननहार । भये जथारथ कथक उदार ॥ तिनके चरनकमल कर जोरि। करौं प्रनाम मान-मद छोरि॥ दोहा। सकलपूज्य-पद पूजकै, अलपबुद्धिअनुसार ॥ भाषा पार्सपुरानकी, करौं स्वपरहितकार ॥१४॥ चीपई। जिनगुनकथन अगमविस्तार । बुधिबल कौन लहै कवि पार । जिनसेनादिक सूरि महंत । वरनन करि पायो नहिं अंत॥१५॥ तो अब अलपमती जन और।कौन गिनतिमै तिनकी दीर।। जो बहुमार गयदन बहै । सो क्यों दीन ससक निरबहै १६ दोहा। कह जान ते यों कहें, हम कछ वरन्यौ नाहिं। जे कह जान ही नही, ते अब कहा कहाहि ॥ १७ ॥ नम बिलस्त नाप नहीं, चुलू न सागर-तोय ॥ Uniterastaste BRassaRORas- Rastrase ४ पार्श्वपुराण- चौपई। रे यह उत्तम नर अवतार । जिनचरचा बिन अफल असार॥ सुनि पुरान जा घुमैं न सीस। सो थोथे नारेल सरीस ॥१९॥ जिनचरित्र जे सुनै न कान । देहगेहके छिद्र समान ॥ जामुस जैनकथा नहि होय। जीभ भुजंगनिकौ विल सोय२० या प्रकार यह उद्यम जोग । कहत पुरानन पंडित लोग ॥ जिनगुनगान सुधारसन्याय।सेवत अलप जनम-जुर जाय२१ घनाक्षरी। जौ लौं कवि काव्यहेत आगमके अच्छरको, अरथ विचारै तौलौं सिद्धि सुभध्यानकी । और वह पाठ जब भूपर प्रगट होय, पढ़ें सुनै जीव तिन्हैं प्रापति कै ग्यानकी । ऐसे निज-परको विचार हित हेतु हम, उद्यम किया है नहि बान अभिमानकी। ग्यानअंस चाखा भई ऐसी अभिलासा अब, करूं जोरि भाखा जिनपारसपुरानकी ॥ २२ ॥ आगैं जैनग्रंथनिके करता कवींद्र भये, करी देवमापा महाबुद्धिफल लीनो है। अच्छरमिताई तथा अर्थकी गभीरताई, पदललिताई जहा आई रीति तीनो है ॥ कालके प्रभाव तिन ग्रंथनिके पाठी अब, दीसत अलप ऐसो, आयो दिन हीनों है। staðastastARARASBRZAHRARARARAR strastvastuse Socesseseseseksees Faste ARARANARARASI पीठिका। AN SEASURCETREPREPARSEOSPRERSONSERE तातै इह समै जोग पर्दै बालबुद्धि लोग, पारसपुरानपाठ भापाबद्ध कीनो है ॥ २३ ॥ दोहा। सक्तिभक्तिचल कविनपै, जिनगुन बर. जाहिं ॥ मैं अब बरनी भक्तिवस, सक्ति मूल मुझ नाहि ॥२४॥ वरनौं पूरवकथितक्रम, ग्रंथअर्थ अवधारि। सुगमरूप संछेपसौं, सुनौ सबहि नरनारि ॥ २५ ॥ चौपई। मगधदेस देसनि-परधान । राजगृही नगरी सुभथान ॥ राज करै सेनिक भूपाल । नीतवत नृप पुन्यविसाल ॥२६॥ छायक-सम्यकदरसनसार । रूप सील सबगुनआधार तिनके घर अतेवर धना । पटरानी रानी चेलना ॥ २७ ॥ जाके गुन बरनत बहु भाय । बिरिया लगै कथा बढ़ि जाय॥ एक दिना निज समा नरेस । निक्सै जैसै सुरग-सुरेसा॥२८॥ रोमाचित बनपालक ताम | आय राय प्रति कियौ प्रनाम॥ छह रितुके फल फूल अनूप । आगै धरे अनूपमरूप ॥२९॥ हाथ जोरि विनवै बनपाल । विपुलाचल पर्वतके भाल । वर्द्धमान तीर्थंकर आप । आये राजन-पुन्यप्रताप ॥ ३०॥ महिमा कछु बरनी नहिं जाय । इंद्रादिक सेवै सब पाय ॥ समोसरनसपतिकी कथा। मोपैकही जाय किमि तथा॥३१॥ माली वचन सुनै सुखदाय । हरप्यौ राजा अंग न माय ॥

RanastashaseORastanaserator पावपुराण- सात पैंड गिरिसम्मुख जाय । कियौ परोच्छविनय नरराय। आनभेरि नगरमैं दई । सबहीकौं दरसनरुचि मई ॥३३॥ चल्यो संग पुरजन समुदाय । बंदे वर्द्धमान जिनराय । लोकोत्तर लछमी अवलोक । गये सकल भूपतिके सोक ॥३४॥ थुति आरंभ करी बहुभाय । बार बार भुवि सीस नबाय । गौतम गुरु पूजे कर जोरि। नरको बैठ्यौ मद छोरि ॥३५॥ कियौ प्रस्न सेणिक बड़ भूप । प्रभु पारस निजकथा अनूप। जाके सुनत पाप छय होय । कहिये देव कृपाकरि सोय ३६ तब गनधर बोले हितकाज | जोग प्रस्न कीनों नरराज । सुन पुनीत पारसजिनकथा । सफल होय मानुपभव जथा३५ दोहा। इहि विधि जो मगधेस प्रति, कह्यौ चरित गनराज ॥ ताही क्रम आये कहत, आचारज परकाज ॥ ३८ ॥ तिनहीके अनुसार अब, कहूँ किमपि विस्तार ॥ जैनकथा कलपित नहीं, यह जानौ निरधार ॥ ३९ ॥ जैनवचनवारिधि अगम, पानी अर्थ अनूप ॥ मतिभाजन भर भर लिये, यह जिनआगमरूप ॥४०॥ इति पीठिका । Wssysyvensenos BARABARARE पहला अधिकार। ७ SHESEASER पहला अधिकार। KRIrvasareCESTERE चौपई। जंबूदीप दिपै इह सार । सूरजमडलकी उनहार ।। मध्य सुमेरुकर्णिकामास । बने छेत्र दल दीरच जास ॥४१॥ तारागन मकरंद मनोग । सुरनरसंग भ्रमरकुलजोग । लवनसमुन्द्र सरोवरथान । दीप किधौं यह कमल महान ४२ लच्छ महा जोजन विस्तार । बस विविध-रचना-आधार ।। दच्छिन भरत धनुप-संठान । पर्वत फणच नदीजुग बान॥४३॥ मानों सागरप्रति अनुमानि । तानत तीर छार-जल जानि॥ ऐसी भांति विराजत खेत । छहो खंडमंडित छवि देत ।४४॥ पांच मलेच्छ बसै तामाहि । धर्म कर्म कछु जानें नाहिं ।। उत्तम आरजखंडमझार । देस सुरम्य बसै मनहार ॥ ४५ ॥ जनकुल जहां रहैं बहु भांति । पास पास सोहैं पुर-पांति ।। सरवर नदी सैल उद्यान । वन उपवनसौं सोभामान ॥४६॥ तहां नगर पोदनपुर नाम । मानों भूमितिलक अभिराम ।। देवलोककी उपमा धरै । सब ही विध देसत मनहरै॥४७॥ दोहा। तुंग कोट खाई सजल, सघन बाग गृह-पांति ॥ चौपथ चौक बजारसौ, सोहै पुर बहुमांति ॥४८॥ ठाम ठाम गोपुर लस, वापी सरवर कूप ॥ किधौं स्वर्गने भूमिको, भेजी भेट अनूप ॥ ४९ ।। SEE SraamaRashifal BRastrastasRRANORastrastra पावपुराण- ८ चौपई। जैनी प्रजा जहां परवीन । बसै दानपूजावतलीन ॥ जैनभवन ऊँचे अति वने। सिखर धुजासौं सोभित घने ॥५०॥ इहि विधि पुरसोभा अधिकार । वरनन करत लगै बहुबार ॥ राज करै राजा अरविंद । सोहै मानों स्वर्ग सुरिंद ॥५१॥ पालै प्रजा कुमति जिन दली। नीतिबेलमंडित भुजबली ॥ दयाधाम सज्जन गंभीर । गुनरागी त्यागी रनधीर ॥ ५२॥ तिस भूपतिकै विप्र सुजान । विस्वभूति मंत्री बुधिवान ॥ ताकै तिया अनूदरि सती । रूपसील-गुन-लच्छनवती ॥५३॥ दोय पुत्र तिनकै अवतरे । पापपुन्यकी पटतर धरे ॥ जेठो नंदन कमठ कुपूत । दूजो पुत्र सुधी मरुभूत ॥ ५४ ॥ दोहा। जेठो मतिहेठो कुटिल, लघुसुत सरल सुभाय ॥ विप अम्रत उपजे जुगल, विप्र जलधिके जाय ॥ ५५ ॥ बडे पुत्रने भारजा, व्याही बरुना नाम ॥ लघुने बरी विसुन्दरी, रूपवती अभिराम ॥ ५६ ॥ चौपई। यो सुस निवसै बाधव दोय। निज निज टेव न टारै कोय॥ वक्र चाल विषधर नहिं तजै । हंस वक्रता भूल न भजे ॥५॥ दोहा। उपजे एकहि गर्भसौं, सज्जन दुर्जन येह ॥ लोह-कवच रच्छा करै, खांडो खंडै देह ।। ५८ ॥ RSESASURSEVERESENSERSEPTERESERVEER RanER Rasraseases पहला अधिकार। चीपई। अति सज्जन मरुभूति कुमार । नीति-सास्त्रको जाननहार ॥ सबकौं इट सकलगुनगेह । राजा प्रजा करें सब नेह ॥ ५९॥ एक दिना भूपति-मंत्रीस । सेत बाल देस्यौ निज सीस ॥ उपज्यौ विप्र-हियें वैराग । जान्यौ सब जग आथिर सुहाग ६० दोहा। जरा मौतकी लघु बहिन, यामै ससै नाहि ॥ तौ भी सुहित न चितवै, बड़ी भूल जगमाहिं ॥ ६१ ॥ चौपई। यह विचार मंत्री मनमाहिं । निज सुत सौंपि रायकी चांहि ।। सुगुरु-साखिजिन-चारित लियौ। वनोवास आतमहित कियौ अब मरुभूति विप्र सुस करै । अहनिस नीतिपंथ पग धरै ।। राजा प्रीति करै बहु भाय । सोमप्रकृति सबकौं सुखदाय ॥६३॥ एक समय आपन अरविद । मत्री सेनासहित नरिद ।। राय वज्रवीरजपर चढ़े । क्रोधभाव उरमैं अति बढ़े ॥६४ ॥ पीछे कमठ निरकुश होय | लग्यो अनीति कग्न सठ सोय ॥ जो मन आवै सो हठ गह। 'मैं राजा' सबसौं इम कहै ॥६५॥ एक दिना निजभ्रातानारि । भूपन भूपितरूप निहारि॥ रागअंध अति विहवल भयो। तीच्छन कामताप उरतयो६६ महा मालिन कुमाव । दुर्गतिगामी जीव सुभाव ॥ पुत्री सम लघुभ्रातानारि । तहा कुदिष्ट धरी अविचारि६७ उर बसें ARARAAARRRARAS पाचपुराण- दोहा। पाप कर्मको डर नहीं, नहीं लोककी लाज ॥ कामी जनकी रीति यह, धिक तिस जन्म अकाज ॥ ६८॥ कामी काज अकाजमैं, हो हैं अंध अवेव ॥ मदनमत्त मदमत्त सम, जरो जरो यह टेव ॥ ६९॥ पिता नीर परसै नहीं, दूर रहै रवि यार ॥ ता अंबुजमैं मूढ अलि, उरझि मरै अविचार ॥ ७० ॥ त्यों ही कुविसनरत पुरुप, होय अवस अविवेक ॥ हितअनहित सोचै नहीं, हि विसनकी टेक ॥ ७१॥ Rastrashastamantras चीपई। बनमैं सघन लतागृह जहां । गयाँ कमठ कामातुर तहां ॥ बढी वेदना कल नहिं परै । छिन छिन काम-विथा दुख करै॥ कमठ सखा कलहंस विसेख । पूछत भयो दुखी तिह देख ॥ कौन व्याधि उपजी तुम अंग । अतिव्याकुल दीखत सरवंग ।। तब तिन लाज छोरि सब सही। मनकी बात मित्रसौं कही। सुनि कलहंस कथा विपरीति।सिच्छावचन कहे करि प्रीति॥ अति अजोग कारज इह धीर । सो तुम चिंत्यौ साहस-धीर॥ परनारीसम पाप न आन । परभवदुख इह भव जस-हान ७५ इस ही बंछासौं अघ भरे । रावण आदि नरकमैं परे ॥ जगमैं जेठ पितासमतूल । बात कहत लाजै नहिं भूल ७६ ताते यह हठ भूल न करौ । सुहित सीख मेरी मन धरौ । लोकनिद कारज यह जान । धर्मनिंद निहचै उर आन ७७ You SaPA SU Sess ।

astrashastrasmastrastra पहला अधिकार। , दोहा । यो कलहंस अनेक विध, दई सीस सुखदैन ॥ ते सब कमठकुसीलपति, मये विफल हितवैन ॥ ७८॥ आयुहीन नरकौं जथा, ओषधि लगै न लेस ॥ त्यों ही रागी पुरुप प्रति, वृथा धरम-उपदेस ॥ ७९ ॥ बोल्यौ तब कामी कमठ, सुनो मित्र निरधार ॥ जो नहिं मिलै विसुंदरी, तो मुझ मरन विचार ॥८॥ देख कमठकी अधिक हठ, कुमति करी कलहस ॥ जाय कहे ता नारिसौं, झूठ वचन अपसस ॥ ८१ ॥ अडिल्ल छन् । सुन विमुंदरी आज कमठ वनमैं दुखी । तू ताकी सुध लेख होय जिहि विधि सुखी ॥ 'सुनते ही सतभाव गई बनमैं तहां । निवसै कर परपंच कमठ कपटी जहां ।। ८२ ॥ दोहा। छलबल कर मीतर लई, वनिता गई अजान । राग वचन भासे विविध, दुराचारकी खान ॥ ८३॥ चाल छद। गजमातो कमठ कलंकी । अघसौं मनसा नहि संकी। मावज वन-करनी रंजो। निज सीलतरोवर मंजो।। ८४॥ रिपु जीत विजयजस पायौ । अरविद नृपति घर आयौ ।। जे कर्म कमठने कीनै । राजा सब ते सुन लीनै । ८५॥ RESERVEEVSEMESTISEMROSERIES SEARSSESISEMESENTSUNSERESENSESORSEURSEAREERSEARS AFRasnastoan POST ARARARARARARARA पार्चपुराण- . मंत्री मरुभूति बुलायौ । ताकौं सब भेद सुनायौ ॥ कहु विप्र सुधी क्या कीजै । क्या दंड इसै अब दीजै॥८६॥ दुज कहै सरल परिनामी । अपराध छिमा कर स्वामी जो एक दोप सुन लीजै । ताकौं प्रभु दंड न दीजै ॥ ८७॥ तब भूप कहै सुन भाई । जो निग्रहजोग अन्याई॥ तापै करुना किम होहै । यह न्याय नृपति नहिं सोहै ॥८॥ ताते गृह गच्छ सयाने । मत खेद हिमैं कछु आने ॥ ऐसे कह विप्र पठायौ। तिस पीछे कमठ बुलायौ ॥ ८९ ॥ अति निंदो नीच कुकर्मी । जानो निरधार अधर्मी ।। राजा अति ही रिस कीनौं । सिर मुंड दंड बहु दीनौं ॥१०॥ मुखकै कालोस लगाई । खर रोप्यो पीर न आई ॥ फिर सारे नगर फिरायो । प्रति वीथी ढोल बजायौ ॥११॥ इस माति कमठकी ख्वारी । देख सब ही नर नारी ॥ पुरवासी लोक धिकारै । बालक मिलि कंकर मारें ॥९२॥ यों दंड दियौ अति भारी। फिर दीनौं देश निकारी॥ जो दीरघ पाप कमाये । ततकाल उदै बहु आये ॥ १३ ॥ दोहा। इहि विधि फूल्यो पाप तरु, देख्यौ सब संसार ॥ आगे फलहै नरक फल, धिक दुर्विसन असार ॥ ९४ ॥ 50HRSONS चौपई। महादंड भूपति जब दयौ । कमठ कुसील दुखी अति भयो। बिलखत वदन गयौ चल तहां । भूताचलपर्वत है जहां ९५ HERESENSENSEMESENSES suvuuuuu ARARARARARARARARAR पहला अधिकार। १३ रहै तहां तपसी-समुदाय । ग्यानविना सब सोखै काय ॥ केई रहे अधोमुख झूल । धुंआं पान करैं अधमूल ॥ १६ ॥ केई ऊरधुमुसी अघोर । देसै सबै गगनकी ओर ॥ केई निवसैं ऊरध बाहिं । दुविध दयासौ परचै नाहिं ॥१७॥ केई पंच अगनि झल सहैं । केई सदा मौनमुख रहै । केई बैठे भसम चढ़ाय । केई मृगछाला तन लाय ।। ९८॥ नस बढ़ाय केई दुख भरैं। केई जटा-भार सिर धरै ॥ यो अग्यान तपलीन मलीन । करै खेद परमारथहीन ॥१९॥ तिनमैं एक तापसीनाथ । प्रनम्यो ताहि घरे सिर हाथ ॥ तिन असीस दे आदर कियौदिच्छादान कमठ तह लियौ? करन लग्यौ तब कायकलेस { उर वैराग विवेक न लेस ।। ठाढ़ो भयौ सिला कर लिये । किधौं फनी फन ऊँचो किये मंत्री बंधवकी सुधि पाय । राजासौं विनयो इमि आय ॥ भूताचलपर्वतकी ओर । भ्राता कमठ करै तप घोर ॥१०२।। जो नरनायक आग्या होय । देखू जाय सहोदर सोय ॥ पूछै नृपति कौन तप करै । भो प्रभु तापसके व्रत बरै॥१०३ एक वार मिलि आऊं ताहि । राय कहे मत्री मत जाहि। सलसौ मिले कहा सुख होय । विषधर भेटेलाम न कोय १०४ बरजौ रह्यौ न बारंवारमहा सरलचित विप्रकुमार ॥ भ्रातमोहबस उद्यम किया। कोमल होत सुजनकोहियो १०५ दोहा। दुर्जनदूसित संतको, सरल सुमाव न जाय ॥ दर्पणकी छवि छारसौ, अधिकाहि उज्जल थाय ।। १०६ ॥ Spausovou diners HaserasRASRASRASRARAama पार्चपुराण- १४ - सज्जन टरै न टेवसौं, जो दुर्जन दुख देय ॥ चंदन कटत कुठारमुख, अवसि सुवास करेय ॥ १०७॥ चीपई। गयो विप्र एकाकी तहां । कमठ कठोर कर तप जहां ॥ विनयवंत हो विनयो तास । महा सरलवायक मुस भास ॥ भो बंधव तो उर गंभीर । यह अपराध छिमा कर बीर ॥ मैं तो राय बहुत वीनयो । मानी नाहिं तुमैं दुख दयो १०९ होनहारसौं कहा वसाय । तुम विन मोहि कछू न सुहाय ।। यों कह पायन लाग्यौ जाम । कोप्यौ अधिक कमठ दुठ ताम ॥ दोहा। दुर्जन और सलेखमा, ये समान जगमाहि ॥ ज्यों ज्यों मधुरो दीजिये, त्यों त्यों कोप कराहिं ॥१११॥ सिला सहोदर सीसपै, डारी वज्र समान ॥ पीर न आई पिसुनकौं, धिक दुर्जनकी बान ॥ ११२ ॥ दुर्जनको विस्वास जे, करि हैं नर अविचार ॥ ते मंत्री मरुभूति सम, दुख पावै निरधार ॥ ११३ ॥ दुर्जन जनकी प्रीतसौं, कहो कैसे सुख होय ॥ विषधर पोपि पियूपकी, प्रापति सुनी न लोय ॥११४॥ मंत्रीतनतें रुविरकी, उछली छींट कराल । दुर्जनहिततरुतै किधौं, निकसी कोंपल लाल ॥ ११५ ।। इहिविधि पापी कमठने, हत्या करी महान । तब तपसी मिलि नीच नर,काढ़ दियौ दुठ जान॥११६॥ esposas JesesesessNREENESS Prastarasnasna , , BISHEMSHUUUUSUISONS amPARARIAssame पहला अधिकार। चौपई। फेरि दुष्ट भीलन मिल्यो । भयो चोर घर मूसन हिल्यौ । पाप करत कर आयो जबै । वांधि बुरी विधि मारचौ तबै ॥ दोहा। जैसी करनी आचरै, तैसो ही फल होय ॥ इन्द्रायनकी बेलिकै, आंब न लागै कोय ॥ ११८॥ चौपई। एक दिना अरविंद नरिंदै । पूछे कर जुग जोरि मुनिंद ॥ भो प्रभु मुझ मंत्री मरुभूत।क्यो नहिं आयौवामनपूत११९ यह सुनि अवधिवत मुनिराय । सब बिरतंत कह्यौसमुझाय॥ राजा मन अति भयौ मलीन हामंत्री सज्जनतालीन १२० बरजत गयौ दुष्टके पास । कुमरन लह्यौ सह्यौ बहु त्रास ।। होनहार सोई विधि होय।ताहि मिटाय सकै नहि कोया१२२॥ यो विचारि मन सोक मिटाय । साधु पूजि घर आये राय ॥ यह सुनि दुष्टसंग परिहरो।सुसदायक सतसंगति करो॥१२२॥ छप्पय। तपे तबापर आय, स्वातिजलद विनट्ठी। कमलपत्रपरसंग, वही मोतीसम दिही ।। सागरसीप समीप, भयो मुक्ताफल सोई। संगतको परमाव, प्रगट देखो सब कोई ॥ यों नीचसंगतै नीचफल, मध्यमते मध्यम सही ।। उत्तमसँजोगते जीवको, उत्तमफलमापति कही ॥१२३॥ इतिश्रीपार्धपुराणमाषाया मरुभूतिभववर्णन नाम प्रथमोऽधिकार ॥ १ ॥ SEKSISEMESORSERSERSPEERREEMEER Kereserveersetsspreso ease SKIRTAsranARATRASAN पार्श्वपुराण- १६ दूसरा अधिकार । asRARRRRRAISRO Postastrasmastareasnas दोहा । अस्वसेनकुलचंद्रमा, बामाउरअवतार ॥ वंदौं पारसपदकमल, भविजनअलि आधार ॥१॥ पद्धरी छ । इसभांति तजे मरुभूमि प्रान । अब सुनो कथा आगे सुजान। अतिसधन सल्लकी बन विशाल । जहं तरुवर तुंग तमाल ताल॥ बहु बेलजाल छाये निकुज । कहिं सूसि परे तिन पनपुंज ॥ कहिं सिकताथल कहिं सुद्ध भूभिकहिं कपि तरुडारन रहे झूमि कहि सजलथान कहिं गिरि उतंग कहिं रीछ रोज विचरैकुरंग तिस थानक आरतध्यानदोप। उपज्यौ वनहस्ती वज्रघोप ॥ अति उन्नत मस्तकसिखरजास मद-जीवनझरना झरहिं तास दीसै तमवरन विसाल देह । मनों गिरिजंगम दूसरो येह॥५॥ जाकोतन नख शिख छोमवत । मुसलोपम दीरव धवल दंत॥ मदीजे झलक जुगल गंड। छिन छिनसौं फेरै सुंड दंड॥६॥ जो वरुना नामैं कमठ नार । पोदनपुर निवसै निराधार ॥ सो मरि तिहि हथिनी हुई आन । तिससंग रमै नितरंजमान॥ कचही बहु खंडै बिरछबेलि । कबही रजरंजित करहि कोलि कबही सरवरमैं तिरहि जाय । कवही जल छिरकै मत्तकाय॥ कबही मुख पंकज तोरि देय । कवही दह-कादो अंगलेया॥९॥ NIOSETTEERESTORSES VAMUS Rasrase FRORassa दूसरा अधिकार। १७ SEASORTERSEENA दोहा। यों सुछंद क्रीड़ा करै, बरुना-हथिनी सत्थ । बन निवस बारण बली, मारण-सील समत्थ ॥१०॥ चौपाई। एक दिवस अरविंद नरेस । ज्यो विमानमैं स्वर्ग सुरेस ।। यो निजमहलन निवसै भूप। देस्यो बादल एक अनूप॥११॥ तुंग सिखर अति उज्जल महा । मानो मंदिर ही बनि रहा । नरवै निरसि चिंतवै ताम। ऐसी ही करिये जिनधाम॥१२॥ लिखनहेत कागद कर लयौ । इतने सो सरूप मिटि गयौ । तब भूपति उर करै विचार । जगतरीति सब अथिर असार१३ तन धन राज संपदा सबै । यो ही विनसि जायगी अबै॥ मोहमत्त प्रानी हठ गहै । अथिर वस्तुकौं थिर सरदहै ॥१४॥ जो पररूप पदारथजाति । ते अपने मान दिनराति ।। भोगमाव सब दुसके हेत । तिनहीको जानै सुखसेत ॥१५॥ ज्यों माचन-कोदो परभाव । जाय जथारथ दिष्टि स्वभाव । समझै पुरुष औरकी और । त्यों ही जगजीवनकी दौर॥१६॥ पुत्र कलत्र मित्रजन जेह । स्वारथ लगे सगे सब एह ।। सुपनसरूप सकल संभोग । निजहितहेत विलंब न जोग १७ यो भूपति वैराग विचारि । डारी पोट परिग्रह भारि ॥ राजसमाज पुत्रकौं दियो । सुगुरुसासि नृप चारित लियौ १८ धरी दिगंबरमुद्रा सार । करै उचित आहार विहार ॥ बारहविध दुद्धर तपलीन । छहोंकायपीहर परवीन ॥ १९॥ లలలలలాలలా HREESLEETTE mastras RAGNARARARARA पार्चपुराण- । एकसमय अरविंद मुनीस । सारथवाहीके संग ईस ॥ सिखर सुमेरु बंदनाहेत । चले ईरज्यापथ पग देत ॥ २० ॥ गये सल्लकी बनमें लंघ । तहां जाय उतरचौ सब संघ ॥ निजसिज्झायसमय मन लाय।प्रतिमाजोग दियौ मुनिराय२१ तावत वज्रघोष गजराज । आयौ कोपि कालसम गाज। सकलसंगमैं खलबल परी। भाजे लोग कीकि धुनि करी २२ गजके धकै परयो जो कोय । सो पानी पहुंच्यौ परलोय ॥ मारे तुरग तिसाये गैल । मारे मारगहारे बैल ॥ २३ ॥ मारे भूखे करहा सरे । मारे जन भाजे भय भरे ॥ इहिविध हाथी करत संघार । मुनि सनमुख आयौ किलकार अति विकराल रोपविप भरौ । मुनि मारनको उद्यम करौ। साधु सुदर्सन मेरु समान । सिरीवच्छ लच्छन उर थान २५ सो सुचिन्ह गज देख्यौ जाम । जाती-सुमरन उपज्यौ ताम॥ ततखिन सांत भयौ गजईस ।मुनिके चरन धरयौ निज सीस ॥ तब मुनि चवै मधुर धुनि महा।रे गयंद यह कीनौं कहा ॥ हिंसा करम परम अघहेत । हिसा दुरगतिके दुसदेत ॥२७॥ हिंसासौं भमिये संसार । हिंसा निजपरकौं दुखकार ।। ते ये जीव विधुंसे आय । पातकतै न डरचौ गजराय ॥२८॥ देखि देसि अघके फल कौन । लई विप्रतै कुंजर-जौन ॥ तू मंत्री मरुभूति सुजान।मैं अरविद क्यों न पहिचान ॥२९॥ धर्मविमुख आरतके दोप । पसु-परजाय लई दुखकोप ॥ अब गजपति ये भाव निवारिधर्मभावना हिरदै धारि ३० SEASON 85SE RARARARANARARARAS दूसरा आधिकार। सम्यकदरसन-पूरन जान । पालि अनुव्रत जब लौं प्रान ।। सुन करिद उर कोमल थयौ। किये पापनिज निंदत भयौ ३१ दोहा। फिर गुरु-पॉयन सिर धरची, धर्म गहन उर हेत ॥ तब सत्यारथ धर्मविधि, कही साधु समचेत ॥ ३२ ॥ चौपई। सुन हस्ती सासनअनुकूल । सकल धरमको दर्सन मूल ॥ सब गुनरत्नकोप यह जान । मुक्ति-धौरहर-धुर-सोपान ३३ तातें यह सवहीको सार । या बिन सब आचरन असार । जो सरदह औरकी और । सो मिथ्यातभावकी दौर ॥ ३४॥ दोप अठारह-वरजित देव । दुविधसगत्यागी गुरु एव ।। हिंसावरजित धरम अनूप । यह सरधा समकितको रूप ३५ दोहा। संकादिक दूपन बिना, आठों अंग समेत । मोख-विरछ-अंकूर यह, उपजै भवि-उर-सेत ॥ ३६॥ चौपई। अगहीन दरसन जगमाहिं । भवदुसमेटन समरथ नाहिं । अच्छरऊनमत्र जो होय | विषबाधा मेटै नहि सोय ॥३७॥ ताते यह निरनय उरआन । यह हिरदै सम्यक सरधान ॥ पंच उदंबर तीन मकार । इनकौं तजि बारह बत धार ३८ इहि विध गुरु दीनौं उपदेस । चारण हरपित भयौ विसेस सुगुरुवचन सब हिरदै धरै । सम्यकपूरब बत आदरै ॥३९॥ ERSONSSCRIBERSNISESSIONSESSERSERSEVEAK RSSRSONSIEVEDEOBSERNSRCISESSORSONSOREDSORSE , En asRASTAIRasranARASRASRAR पार्श्वपुराण- २० बार बार भुविसौं सिर लाय । मुनिवर चरन नमै गजराज ॥ चले साधु तिहिं हित उपजाय । तब हाथी आयौ पहुँचाय दोहा। करि उपगार मुनीस तह, कीनौं सुविधि विहार । बन निवसै गजपति बती, सुगुरु सीख उर धार ।। ४१॥ चालछंद। अब हस्ती संजम साधै । त्रसजीव न भूलि विराधैं ।। समभाव छिमा उर आने । अरि मित्र बराबर जाने ॥४२॥ काया कसि इंद्री दंडै । साहस धरि प्रोपध मंडै ॥ सूखे तृन पल्लव भच्छै । परमर्दित मारग गच्छै ॥ ४३ ।। हाथीगन डोद्यौ पानी । सो पीवै गजपति ग्यानी ॥ देसे बिन पांव न रासै । तन पानी पंक न नाखै ॥४४॥ निजसील कभी नहिं खोवै । हथिनीदिस भूलि न जोवै ।। उपसर्ग सहै अति भारी । दुरध्यान तजै दुखकारी ॥४५॥ अबके भय अंग न हालै । दिढ़ धीर प्रतिग्या पालै ॥ चिरलौं दुद्धर तप कीनौं । बलहीन भयौ तन छीनौं ॥४६॥ परमेष्ठि परमपद ध्यावै । ऐसैं गज काल गमावै ॥ एकै दिन अधिक तिसायौ । तब वेगवती तट आयौ ॥४७॥ जल पीवन उद्यम कीधौ । कादोद्रह कुंजर बीधौ । निहचै जब मरन विचारौ । संन्यास सुधी तब धारौ ॥४८॥ सो कमठ कलंकी मूवो । ता बन कुरकट अहि हूवो॥ तिन आय डस्यौ गज ग्याता । यह वैर महादुखदाता॥४९॥ రజలవజడలతటి esORS ARABERARARARAR areARIES दूसरा अधिकार। २१ दोहा। मरन करयौ गजराज तब, राखे निर्मळ भाव ॥ सुरग बारवें सुर भयो, देखौ धर्मप्रभाव ।। ५० ॥ चीपई। तहां स्वयंप्रभ नाम विमान । ससिप्रभदेव भयौ तिहिं थान ॥ अवधि जोड़ सब जान्यौ देव । व्रतको फल पूरवभव भेव ॥ जिनसासन संसौ बहुभाय । धर्मविपै दिढता मन लाय ॥ सदा सासते श्रीजिनधाम । पूजा करी तहां अभिराम ॥५२॥ महामेरु नंदीसुर आदि । पूजे तहां जिनबिब अनादि । कल्यानक-पूजा विस्तरै । पुन्यभंडार देव यो भरै ॥ ५३॥ सोलह सागर आयु प्रमान । साढ़े तीन हाथ तन जान ॥ सोलह सहस वर्ष जब जाहिं। असन-चाह उपजै उरमाहिं अनुपम अम्रतमय आहार । मनसौ भुजे देवकुमार ॥ आठदुगुन पख बीत जास । तब सो लेय सुगध उसास ५५ अवधि चतुर्थ अवनि परजंत । यही विक्रियावल बिरतंत ॥ अवधिछेत्र जावत परमान । होय विक्रिया तावत मान ५६ दोहा। वदनचंद्र उपमा धरै, विकसित वारिज नैन । अंग अंग भूपन लसैं, सब बानक सुसदैन ॥ ५७ ॥ सुंदर तन सुंदर वचन, सुदर स्वर्गनिवास ॥ सुंदर वनितामंडली, सुंदर सुरगन दास ॥५८॥ अनिमा महिमा आदि दे, आठ रिद्धि फल पाय ।। सुर सुछंदक्रीडा कर जो मन बरते आय ॥ ५९ ॥ ERSEARSINGEORSEERSSESIRSONSERTISE Mews Rastra rasRASTERSTARARIANS पार्श्वपुराण- सुनत गीत संगीत-धुनि, निरखत निरत रसाल ॥ सुखसागरमैं मगन सुर, जात न जानै काल ॥६०॥ लोकोत्तम सब संपदा, अनुपम इंद्रीभोग ।। सुफल फल्यौ तपकल्पतरु, मिल्यौ सकल सुखजोग ॥६१॥ जैवंतो बरतो सदा, जैनधर्म जगमाहिं ॥ जाके सेवत दुखसमुद, पसुपछी तिर जाहिं ॥ १२ ॥ इसही जंबूदीप, पूर्व विदेहमझारे । पुहकलावती देस, विकसत नैन निहारै ॥ ६३ ॥ तहां विजयारध नाम, सोहै सैल रवानो। उज्जल वरन विसाल, रूपमई गिरिरानो ॥ ६४ ॥ जोजन परम पचास, भूमिविसै चौड़ाई ॥ तुंग पचीस प्रमान, सोमा कही न जाई ॥६५॥ चौथाई भूमांझ, नौ सिर कूट विराजै । सिद्धसिखर जिनधाम, मनिप्रतिमा तहां छाजै ॥६६॥ उत्तर दृच्छिन ओर, श्रेणी दोय जहां हैं। दोय गुफा गिरि हेठ, अति अधियार तहां हैं ॥ ६ ॥ तापर स्वर्ग समान, लोकोत्तम पुर सोहै । वापी-कूप-तलाव,-मडित सुर मनमोहै ॥ ६८॥ विद्युतगति भूपाल, न्याय प्रजा प्रतिपाले। नीतिनिपुन धर्मग्य, संत सुमारग चालै ॥ ६९ ॥ aranataranakaRastrataste REAssastrasRARPATRA ORSERSES LERasRD aa दूसरा अधिकार। , SORSESSORSHIRSE विद्युतमाला नांव, ता घर नारि सयानी । मानौं मनमथ जोग, आय मिली रतिरानी ॥७॥ तिनकै सो सुर आय, पुत्र भयौ बढभागी । अगनिवेग तसु नाम, अति सुंदर सौभागी ॥१॥ सोमप्रकृति परवीन, सकलमुलच्छनधारी । जिनपदभक्ति पुनीत, सबहीकौं सुखकारी ॥७२॥ राजसंपदा भोग, भुंजत पुन्यनियोगै । एक दिना इन साधु, भेटे भाग संजोगै ॥७३॥ सवन सुन्यौ उपदेस, मर जोबन वैराग्यो। आसन भव्य कुमार, संजमसौं अनुराग्यौ ॥७४ ।। तजि परिग्रह गुरुसास, पंचमहाबत लीनैं । दुद्धर तप आराध, रागादिक कृस कीनें ॥ ७५॥ छीन किये परमाद, विचरै एकविहारी । बारह अंग समुद्र, पार भयो सुतधारी ॥ ७६ ॥ एक दिवस धरि जोग, हिमगिरिकंदरमाहीं। निवसै आतमलीन, बाहरकी सुधि नाही ॥७७ ॥ दोहा। कुरकट नामा कमठचर, दुष्टनाग दुखदाय । सो मरि पंचम नरकमैं, परयौ पापवस जाय ॥ ७८॥ छेदन भेदन आदि बहु, तहां वेदना घोर । सहस जीमसौं बरनिये, तऊ न आवै ओर ॥७९॥ . PROwense asRastrasease पार्श्वपुराण- BASTASE ऐसे दुसमैं कमठ जिय, कीनी पूरन आव। सत्रह सागर भुगतकै, निकस्यौ कूरसुभाव ॥ ८ ॥ चौपई। SOSORSRISE बैर भाव उरतें नहि टरयौ । फेरि आय अजगर अवतरयौ । संसकारवस आयौ तहां । हिमगिरिगुफा मुनीसुर जहां ॥१॥ गिले साधु संजमधर धीर । समभावनः तज्यौ सरीर ॥ लीनौं स्वर्गसोलवै वास । जो नितनिरुपमभोगनिवास ॥२॥ जन्म-सेजते जोवन पाय । उठ्यौ अमर संपूरन काय ॥ देखि संपदा विस्मय भयौ। अवधि होत ससै सब गयौ ॥८३॥ पूजा करी जिनालय जाय । भक्ति-भाव-रोमांचित काय ॥ पूरवसंचित पुन्यसंजोग । करै तहां सुर वांछित भोग ॥४॥ गये बरस बाईस हजार । भोजन मुंजे मनसाहार ॥ तावतमान पच्छ जब जाय। तब ऊसांसौदिसिमहकाय॥८॥ देसै पंचम भूपरजंत । अवधिग्यानबल मूरतिवंत ॥ तितनैं मान विक्रिया करै । गमनागमन हिमैं जब धरै ॥८६॥ तीन हाथ अति सुंदर काय । लेस्या सुकल महा सुखदाय ॥ थिति सागर बाईस विसाल । इहिविध बीतै सुखमै काल॥ दोहा। आदि अंत जिस धर्मसौं, सुखी हाय सब जीव । ताकौं तनमनवचनकरि, हे नर सेव सदीव ॥ ८८ ॥ इतिश्रीमत्पार्श्वनाथपुराणभाषाया गजस्वर्गगमनविद्याधरभवविद्युत्प्रभदेव- भववर्णन नाम द्वितीयोऽधिकार ॥२॥ అవతతతలాతలు , ARREARRIATREATREENASRASTARRINA तीसरा अधिकार। तीसरा अधिकारणाना गोदान पेठिया KERSONSERSEARSDESEveer पौफारर, (राजपुताना.) दोहा। अस्वसेनकुलकमलरवि, वामावर कृपाल । पारसचरनजुग, सरनागत-प्रतिपाल ॥१॥ बंदी , चौपई। जबूदीप बसै चहुफेर । जाके मध्य सुदर्सन मेर । कंचनमनिमय अतुलसुहाग । ता पर्वतके पच्छिम भाग। अपरविदेह विराजै खेत । सो नित चौथेकालसमेत ।। पदपद जहां दिौं जिनधाम । नही कुदेवनको विसराम||३॥ जैनजतीजन दीखें सोय | नहीं कुलिगी दीखै कोय। उत्तमधर्म सदा थिर रहै। हिंसाधर्म प्रकास न लहै ॥ ४ ॥ तीनौं वरन बसें जहां लोय । बामनवरन कभी नहि होय। तामै पदमदेस अभिराम । सोहै नगर अस्वपुरनाम ॥५॥ तहां वज्जवीरज भूपाल । न्याय प्रजा करै प्रतिपाल ॥ गुननिवास सूरजसम दिपै । आन भूप उडगनछबि छिपै ६ विजया नामैं नरपति-नारि । रूपवंत रतिकी उनहारि ।। पटरानी सबमैं परधान, पूरबपुन्यउदय गुणखान ॥ ७॥ एक समय निसिपच्छिमजाम । पच सुपन देखे अभिराम। मेरु दिवाकर-चंद्र-विमान । सजलसरांवर सिधुसमान ॥८॥ मात भये आई पियपास । विकसत लोचन हियँ हुलास ॥ रातसुपन अवलोके जेह । नृप आगै परकासे तेह ॥९॥ SSSSSSSSSSESSENGERS5E PeSURSESSrserse 55555555 RanRaR BRRRRRRRARARAS पापुराण- । तब नरिन्द बोले बिहसाय । सुंदर वचन स्रवन-सुखदाय ॥ सुनि रानी इनको फल जोय । पुत्र प्रधान तिहारे होय १० ऐसे वच पियके अवधारि । अति आनंद भयौ नृपनारि। अचुत स्वर्ग” सो सुर चयौ। वज्रनाभि नामा सुत भयौ ११ चौसठ लच्छन लच्छित काय । पुन्यजोग जिमि उतरचौ आय जनममहोच्छव राजा किया। जिन पूजे जाचक धन दियो। बढ़े बाल जिमि बालक-चंद । सुजनलोकलोचनसुसकंद ॥ क्रमक्रमसौं सिसु भयौ कुमार । पढ़ लीनी विद्या सब सार जोबनवंत कुमर जब भयो । निर्मल नीतिपंथ पग ग्यौ ॥ रूप-तेज-बल-बुद्धि-विग्यान । सकल सारगुनरत्ननिधान १४ कीनी पिता ब्याहविधि जोग । राजसुता बहु वरी मनोग। क्रमकरि कुमर पितापद पाय । राज करै थुति करिय न जाय पुन्यजोग आयुधगृह जहां । चक्ररतन वर उपज्यौ तहां ॥ छहोंखंडवरती भूपाल । वस की. नाये निजभाल ॥ १६ ॥ देव दैत्य विद्याधर नये । नृप मलेच्छ सब सेवक ये ॥ बढ़ी सपदा पुन्यसँजोग । इन्द्रसमान करै सुखभोग ॥ १७॥ दोहा। संपूरन सुख भोगवै, वज्रनाभि चक्रेस । तिस विभूतिबल बरनऊं, जथासकति लवलेस ॥१८॥ चापई। सहस बतीस सासते देस । धनकनकंचन भरे विसेस ॥ विपुल बाद बेढे चहुंओर । ते सब गांव छानवै कोर ॥१९॥ gsmunyerogpgeseer SA 50sex ఆపోతపోతల , ASTARARARARARANARARARA तीसरा अधिकार। २७ कोट कोट दरवाजे चार । ऐसे पुर छब्बीसहजार ॥ जिनकौं लगैं पांचसौ गांव । ते अटंब च सहस सुठांव २० पर्वत और नदीके पेट । सोलह सहस कहे वे खेट । कर्वट नाम सहस चौवीस । केवल गिरिवर बेढ़े दीप ॥२१॥ पत्तन अड़तालीस हजार । रतन जहां उपजै अति सार ।। एकलास द्रोणीमुस वीर । सहस घाट सागरके तीर ।। २२॥ गिरि ऊपर संबाहन जान । चौदह सहस मनोहर थान ॥ अट्ठाईस हजार असेस । दुर्ग जहां रिपुको न प्रवेस ॥२३॥ उपसमुद्रके मध्य महान । अंतरदीप छपन परिमान । रतनाकर छब्बीस हजार । बहुविध सार वस्तुभंडार ॥२४॥ रतनकुच्छ सुंदर सातसै । रतनधरा थानक जहॅ लसै॥ इन पुरसौं वस राज खरे । जैनधाम धरनी जनभरे ॥२५॥ वर गयद चौरासीलास । इतने ही रथ आगम-सास॥ तेज तुरंग अठारह कोर । जे बढ़ चलें पवनतै जोर ॥२६॥ पुनि चौरासी कोटि प्रमान । पायक संघ बडे बलवान ॥ सहस छानवै वनिता गेह। तिनको अब विवरन सुन लेह २७ आरजखंड बसें नरईस । तिनकी कन्या सहस बतीस ।। इतनी ही अतिरूप रसाल । विद्याधरपुत्री गुनमाल ॥२८॥ पुनि मलेच्छ मूपनकी जान । राजकुमारी तावतमान । ' नाटकिगन बत्तीस हजार । चक्री नृपकौं सुसदातार ॥२९॥ आदि सरीर आदि सठान । पूर्वकथित तन लच्छन जान ।। बहुविध विजनसहित मनोग। हेमवरन तन सहजनिरोग ३० SOMEONEDESES weSEREE ।

ARRIORasrantarwastraRRRRRREAR पार्श्वपुराण- २८ areanastaste छहो खंड भूपति बलरास । तिनसौं अधिक देहबल जास ।। सहस बतीस चरनतल रमैं । मुकटबंधराजा नित नमै ॥३१॥ भूप मलेच्छ छोरि अभिमान । सहस अठारह माने आन॥ पुनि गनबद्ध घसानै देव । सोलह सहस करें नृप सेव ॥३२ कोटि थाल कचननिर्मान । लाखकोटि हलसहित किसान॥ नाना बरन गजकुल भरे। तनिकोटि बज आगम धरे ॥३३ दोहा। अब नवनिधिके नाम गुन, सुनौ जथारथरूप । जैनी बिन जानै नहीं, जिनको सहज सरूप ॥ ३४ ॥ चौपई। प्रथम कालनिधि सुभ आकार । सो अनेक पुस्तकदातार ॥ महाकालनिधि दूजी कही । याकी महिमा सुनियो सही ३५ असिमसि आदिक साधन जोग। सामग्री सब देय मनोग।। तीजी निधि नैसर्प महान । नाना विध भाजनकी सान ॥ पांडक नाम चतुरथी होय । सब रसधान समप्पै सोय ॥ पदम पंचमी सुक्रतखेत । वांछित वसन निरंतर देत ॥३७॥ मानव नाम छठी निधि जेह । आयुधजात जन्मभू देह ॥ सप्तम सुभग पिंगला नाम । बहुभूपन आपै अभिगम ॥३८॥ संख निधान आठमी गनी । सब वाजिन-भूमिका बनी ।। सर्वरत्न नवमी निधि सार । सो नित सर्वरत्नभंडार ॥३९॥ दोहा। ये नौनिधि चक्रेसकै, सकटाकृत संठान । आठचक्रसंजुक्त सुभ, चौखूटी सब जान ॥४०॥ KEHORSERESEASECREWSess RESEDGE amasRAN SNEE easeenastarasharaaase तीसरा अधिकार । SROASTERSTERetrasmaster जोजन आठ उतंग अति, नव जोजन विस्तार । बारह मित दीरघ सकल, बसैं गगन निरधार ॥४१॥ एक एकके सहस मित, रखवाले जसदेव । ये निधि नरपति पुन्यसौं, सुसदायक स्वयमेव ॥ ४२ ॥ चौपई। प्रथमसुदरसन चक्रपसत्थ । छहोसंडसाधन समरस्थ ॥ चडवेग दिढदंड दुतीय । जिस बल खुलै गुफा गिरिकीय४३ चर्मरत्न मो तृतिय निवेद । महा वज्रमय नीर अभेद ॥ चतुरथ चूडामनि मनि-रैन । अधकारनासक सुखदैन ॥४४॥ पंचम रत्न काकिनी जान । चिंतामनि जाको अभिधान ॥ इन दोनो गुफामझार । ससिसूरज लसिये निरधार ॥४५॥ सूरजप्रम मुभ छत्र महान । सो अति जगमगाय ज्यो भान । सौनंदक असि अधिक प्रचंड । डरै देसि बैरी बलवंड ४६ पुनि अजोध सेनापति सूर । जो दिगविजय करै बल भूर।। बुधसागर प्रोहित परवीन । बुधिनिधान विद्यागुनलीन ४७ थपित भद्रमुस नाम महंत । सिल्पकलाकोविद गुनवंत ॥ कामवृद्ध गृहपति विख्यात । सब गृहकाज कर दिनरात ४८ व्याल विजयगिरि अति अभिराम । तुरग तेज पवनंजय नाम चनिता नाम सुभद्रा कही। चूरै वज पानिसौं सही।४९ ।। महादेहबल धारै सोय । जा पटतर तिय अवर न कोय ॥ मुरयरतन यह चाँदह जान । और रतनको कौन प्रमान ५० sheeseerNESCOREMEERAREKAREERIEEE RARARARARARARAR पाचपुराण- दोहा। राजअंग चौदह रतन, विविध भांति सुखकार । जिनकी सुर सेवा कर, पुन्यतरोवर-डार ॥५१॥ चक्र छत्र असि दंड मनि, चर्म ककिनी नाम । सातरतन निर्जीव यह, नक्रवर्तिके धाम ॥ ५२॥ सेनापति गृहपति थपित, प्रोहित नाग तुरग । वनिता मिलि सातौं रतन, ये सजीव सरवंग ॥ ५३॥ चक्र छन असि दंड ये, उपजै आयुधथान ॥ चर्म ककिनी मनिरतन, श्रीगृह उतपति जान ॥ ५४॥ गज तुरंग तिय तीन ये, रूपाचलतें होत । चार रतन वाकी विमल, निजपुर लहैं उदोत ॥ ५५ ॥ PosEOS ఆటలలో అతలాజలాలాజలచరాలు चौपई । . मुख्य संपदाको विरतंत । आगें और सुनौ मतिवंत ॥ सिंहबाहनी सेज मनोग । सिंहारूढ चक्कवै जोग ॥ ५६ ॥ आसन तुंग अनुत्तर नाम । मानिकजालजटित अभिराम ॥ अनुपम नामा चमर अनूप । गंगातरलतरंगसरूप ॥ ५७ ॥ विद्युतदुति मनिकुंडल जोट । छिपै और दुति जाकी ओट ॥ कवच अभेद अभेद महान । जामै भिदै न बैरीबान ॥५८॥ विसमोचिनी पादुका दोय । परपदसौं विप मुंचै सोय ॥ अजितजे रथ महारवन्न । जलपै थलवत करै गवन्न ॥ ५९॥ चजकांट चक्रीधर चाप । जाहि चढ़ावत नरपति आप । बान अमोघ जय कर लेत । रनमैं सदा विजय वर देत ६० HUDEBESUEHUYEHSDSGEHyube Sarastrata wastaRRERARIArias तीसरा अधिकार। raa , विकट वज्रतुंडा अभिधान । सत्रुखंडिनी सकती जान ॥ सिंहाटक बरछी विकराल । रतनदंड लागी रिपुकाला६१॥ लोहबाहिनी तीखन छुरी | जिमि चमकै चपलादुति दुरी॥ ये सब वस्तुजाति भूमाहिं । चक्री छूट और घर नाहि॥१२॥ दोहा। मनोवेग नामा कणय (?), ग्रंथन कह्या विख्यात । खेटभूतमुख नाम है, दोनो आयुध जात ॥ ६३ ॥ चौपई। आनंदन भेरी दस दोय । बारह जोजन लौं धुनि होय ॥ वज्रघोस पुनि जिनको नाम | बारह पटह नृपतिके धाम६४ वर गभीरावर्त गरीस । सोभनरूप सख चौवीस ।। नानावरन धुजा रमनीय । अढतालीस कोट मित कीय ६५ इत्यादिक बहुवस्तु अपार । बरनन करत न लहिये पार ।। महलतनी रचना असमान । जिनमत कही सो लीजै जान।। दोहा। चक्री नृपकी संपदा, कहै कहां लौ कोय ।। पुन्यबेल पूरब वई, फली साधनी सोय ॥ ६७ ॥ इहि विध वज्रनाभि नरराय । करै भोग चक्रीपद पाय॥ धर्मध्यान अहनिसि आचर। निर्मल नीतिपथ पग धरै।। पूजा कर जिनालय जाय । पूजे सदा गुरुके पाय ॥ सामायिक साधे अपनास । कर परब प्रोपधरपवास ६९१ sersearSSSSSSBIEW६cess KHESONSPRSERRORSCREENSESIREONSEMESTESONSER

asusta
पार्श्वपुराण-
३२
BESecERS
चारप्रकार दान नित देय । औगुन त्यागै गुन गह लेय ॥
सप्त सील पालै बड़भाग । मनवचकाय धर्मसौं राग ॥७०॥
सिंहासनपर बैठि नरेस । करै पुनीत धर्म उपदेस ॥
सुजन सभाजन किंकरलोग। देय सुहितसिच्छा सब जोग ७१
दोहा।
बीजराखि फल मोगरूँ, ज्यो किसान जगमाहि ।
त्यों चक्रीनृप सुख करै, धर्म बिसारै नाहिं ॥ ७२ ॥
नरेन्द्र अथवा जोगीरासा।
इहिविध राज करै नरनायक,
भोगै
पुन्य विसालो॥
सुखसागरमै रमत निरंतर, जात न जानै कालो॥७३ ॥
एक दिना सुभकर्मसँजोगे, छेमकर मुनि बैदे।
देसे श्रीगुरुके पदपंकज, लोचन अलि आनंदे ॥७४॥
तीन प्रदच्छन दे सिर नायौ, करि पूजा श्रुति कीनी।
साधु समीप विनय कर बैट्यौ, पॉयनमैं दिठ दीनी ॥७५ ॥
गुरु उपदेस्यौ धर्म सिरोमनि, सुनि राजा बैरागे ॥
राज रमा वनितादिक जे रस, ते-रस बेरस लागे॥७६ ॥
मुनिसूरजकथनी किरनावलि, लगत भरमबुध भागी।
भव-तन-भोगसरूप विचार, परम-धरम-अनुरागी॥७७॥
इस संसार महावनभीतर, भ्रमते ओर न आवै।
जामन-मरन-जरा-दों दाझ्यौ, जीव
महादुस
कवही जाय नरकथिति भुजै, छेदन भेदन मारी।
कवही पसु परजाय धरै तह, वध बंधन मयकारी ॥७९॥
Jose Devauxy SIVUA
STAsarastragraarSTERIORAreastanase
पावै ॥ ७८॥

astrastasRISTIAsRasRasna तीसरा अधिकार। सुरगतिमै परसंपति देस, रागउदय दुस होई। मानुप जोनि अनेक विपतिमय, सर्वसुखी नहिं कोई ॥८॥ कोई इष्टवियोगी बिलसे, कोई असुभसॅजोगी। कोइ दीन दारिद्र बिगूचे, कोई तनके रोगी ॥ ८१ ॥ किसही घर कलिहारी नारी, कै बैरी सम भाई। किसहीकै दुख बाहर दीखे, किसही उर दुचिताई ॥ ८२॥ कोई पुत्र बिना नित झूरै, होय मरै तब रोवै । सोटी संततिसौं दुख उपजै, क्यों प्रानी मुख सोवै ॥ ८३॥ पुन्यउदय जिनकै तिनकौं भी, नाहिं सदा सुस साता। यो जगवास जथारथ देसत, सब दीखै दुखदाता ॥ ८४ ॥ जो संसारविपै सुस हो तो, तीर्थंकर क्यो त्यागें। काहेकौं सिवसाधनकर ते, सजमसौं अनुरागैं ॥ ८५ ॥ देह अपावन अथिर घिनावन, यामै सार न कोई। सागरके जलसौं सुचि कीजै, तो भी सुचि नहिं होई ॥८६॥ सात कुधातमई मलमूरति, चामपलेटी सोहै। अंतर देखत या सम जगमै, और अपावन को है ॥ ८७ ॥ नव मलद्वार सवै निसिवासर, नांव लिये घिन आवै । व्याधि उपाधि अनेक जहां तहां, कौन सुपी सुस पावै ।।८८ पोसत तो दुख दोस कर सब, सोखत सुस उपजावे । दुर्जन देहसुभाव बराबर, मूरस प्रीति बढावै ।। ८९ ।। राचनजोग स्वरूप न याकौ, विरचनजोग सही है। यह तन पाय महा तप कीजै, यामैं सार यही है ॥ १० ॥ SubsWEREONSERSONSEDITORRESESENTER ३ SARRASTARanananananas पाचपुराण- ३४ भोग बुरे भवरोग बढ़ावै, बैरी हैं जग जर्जाके । वेरस होहिं विपाक समै अति, सेवत लागें नीके ॥ ९१ ॥ वज्र अगनि विपसौं विषधरसौं, ये अधिके दुखदाई। धर्मरतनके चोर चपल ये, दुर्गतिपंथ सहाई ॥ ९२ ।। ज्यो ज्यों भोग सॅजोग मनोहर, मनवांछित जन पावै । तिसना नागनि त्यो त्यों डकै, लहर जहरकी आवै ।। ९३॥ मोह उदय यह जीव अग्यानी, भोग भले कर जाने । ज्यो कोई जन साय धतूरो, सो सब कंचन माने ॥ ९४ ॥ मैं चक्री पद पाय निरंतर, भोगे भोग घनेरे । तो भी तनिक भये नहि पूरन, भोगमनोरथ मेरे ॥ ९५ ॥ राज-समाज महा अधकारन, वैर बढावनहारा । वेस्थासम लछमी अति चंचल, याकौ कौन पत्यारा ॥१६॥ मोह महा रिपु बैर विचारा, जगजिय सकट डाले । वर काराग्रह वनिता बेड़ी, परिजन जन रसवाले ॥ ९७ ॥ सम्यकदरसन-ग्यान-चरन-तप, ये जियके हितकारी। ये ही सार असार और सब, यह चक्री चित धारी।। ९८॥ छोड़े चौदह रतन नवौं निधि, अरु छोडे संग साथी । कोड़ि अठारह घोड़े छोड़े, चौरासी लख हाथी ॥ ९९ ॥ इत्यादिक संपति बहुतेरी, जीरन तिन ज्यो त्यागी। नीति विचार नियोगी सुतकौं, राज दियौ बडभागी॥१०० होय निसल्य अनेक नृपति सँग, भूपन वसन उतारे । श्री गुरुचरन धरी जिनमुद्रा, पंच महाबत धारे ॥ १०१ ॥ &VER 06GBes RasRASRPRETARINAR तीसरा आधिकार। , धन यह समझ सुबुद्धि जगोत्तम, धन यह धीरज भारी। ऐसी संपति छोरि बसे बन, तिन पद ढोक हमारी॥१०२॥ दोहा । परिग्रहपोट उतारि सब, लीनों चारित पंथ। निज सुभावमैं थिर भये, वज्रनाभि निरनथ ।। १०३ ।। चीपई । बारहविध दुद्धरतप करै । दसलच्छनी धरम अनुसरै ।। पढ़े अंग-पूरब सुति सार । एकाकी विचरै अनगार ॥१०४॥ ग्रीपमकाल बसै गिरिसीस । बरसामै तरुतल मुनिईस ।। सीतमास तटिनीतट रहैं । ध्यान अगनिमैं कर्मनि दहें १०५. एक दिना बनमें थिर काय । जोग दिये ठाड़े मुनिराय ।। कमठजीव अजगर-तन छोरि । उपज्यौ छठे नरक अतिधोर थिति सागर बाईस प्रमान । देसे दुख जाने भगवान् ॥ परनआयु भोगकर मरयौ। बनहिं कुरंग भील अवतरयो १०७ कालसरूप वदन विकराल । वनचर जीवनको छयकाल ॥ धनुपवान लीये निजपान । भ्रमै मांसलोभी बन थान १०८ सो पापी चल आयौ तहां । जोगारुढ खड़े मुनि जहां। सत्रुमिनसो सम कर भाव लगे आपमै सुद्धसुभाव ॥१०९॥ कुकुम कादौ महल मसान | कोमल सेज कठिन पापान || कचन काच दुष्ट अरु दासाजीवन मरन बराबर जास॥११०॥ निर्ममत्त तनकी सुधि नाहिं। सातौं मय-वरजित उरमाहि ।। देसि दिगंबरकोप्यो नीच! कपित अधर दसनतल भीच १११ SHeresRREESOSORRESPEEScre SUSUSDUSU SOUMEURUusBussures ORassease wasnasRGIsreaseena पार्श्वपुराणasanaseas तान कमान कान लौ लई । तीखन सर मारचौ निरदई । मुनिवर धर्मध्यान आराध । दुखमैं धीरज तज्यौ न साध ११२ दरसनग्यानचरन तप सार । चारों आराधन चित धार ॥ देहत्याग तब भये मुनिद्र । मध्यम प्रैवेयिक अहमिंद्र ॥११३॥ तह उत्पादसिला निकलंक । हंसतूलजुत रतन पलंक ॥ उठ्यौ सेज तजि दीपत काय।अल्पकालमैं जोवन पाय ११४ देखै दिसि अतिविस्मयरूप । महा मनोग विमान अनृप ।। अतुल तेज अहमिंद्र निहार। अवधिज्ञान उपज्यौ तिहि वार॥ जान्यो सब पूरब-भवभेव । चारित बिरछ फल्यौ सुखदेव॥ अनुपम आठौं दरब संजोय । रतनबिंब पूजे थिर होय ११६ आयौ सुर हर्पित निजथान । महारिद्धि महिमा असमान ॥ तीनभवनवरती जिनधाम । भावभक्ति नित करै प्रनाम ११७ तीर्थकर केवलि-समुदाय । निजथानक-थित पूजै पाय ॥ पंचकल्यानक काल विचारि । प्रनमै हस्तकमल सिरधारि दोहा। अनाहूत अहमिद्गन, आवै सहज सुभाय । धर्मकथा जिनगुनकथन, करें सनेह बढ़ाय ॥ ११९ ॥ कवहीं रतनविमानमै, कचही महलमझार । कवही बनक्रीडा करें, मिलि अहमिंद्रकुमार ॥ १२० ॥ और बास निज बासतै, उत्तम दीसै नाहि ॥ ताहीतै ते अमरगन, और कहीं नहिं जाहिं ॥ १२१ ।। SEOCEROESRLSORSewssertseree PRANASREastratarafiaranaAPRIES RAFTARREARRARREARRARARARIANTARA तीसरा अधिकार। N . " । प्रीत भरे गुन आगरे, सुभग सोम श्रीमन्त । सातधात मलसौं रहित, लेस्या सुकल धरत ॥ १२२ ।। सब समान-संपतिधनी, सब मानें हम इंद्र । कला ग्यान विग्यानसम, ऐसे सुर अहमिंद्र ॥ १२३ ।। सुकल वरन तनमनहरन, दोय हाथ परिमान । मानौं पतिमा फटिककी, महातेज दुतिवान ।। १२४ ॥ कामदाह उरमैं नहीं, नहिं वनिताको राग । कल्पलोकके सुर सुसी, असंख्यातवें भाग ॥ १२५ ।। सत्ताईस हजार मित, बरस बीति जब जाहि । मानसीक आहारकी, रुचि उपजै मनमाहि ॥१२६ ।। साढे तेरह पच्छपर, लेत सुगंध उसास । छठी अवनि ली जिन कही, अवधिविक्रिया जास ॥१२७॥ सागर सत्ताईस मित, परम आयु तिहिं थान । सुभग सुभद्र विमानमैं, यों सुख करै महान ॥ १२८॥ चीपई। अब सो भील महादुसदाय । रुद्रध्यानसौं छोडी काय ।। मुनिहत्या-पातकतै मस्यौ । चरम सुभ्रसागरमै परची ॥१२९।। दोहा। कथा तहाके कष्टकी, को कर सकै बखान । भुगते सो जानै सही, कै जानै भगवान् ॥ १३० ।। दोहा। जनमथान सब नरकमै, अंध अधोमुस जौन । घंटाकार घिनावनी, दुसह वास दुखभौन ।। १३१ ॥ SENSENSEENSESEARSAMEERESEASERESEREETTERMEENA FOR SARASTAR पार्श्वपुराण- ३८ . तिनमैं उपजै नारकी, तल सिर ऊपर पाय । विषम वज्र कंटकमई, परै भूमिपर आय ॥ १३२॥ जो विपैल बीछू सहस, लगे देह दुस होय । नरक धराके परसते, सरिस वेदना सोय ॥१३३ ॥ तहां परत परवान अति, हाहा करते एम। ऊँचे उछलैं नारकी, तये तवा तिल जेम ॥ १३४ ।। सोरठा। नरक सातवैमाहि, उछलन जोजन पांचसौ। और जिनागममाहि, जथाजोग सब जानियो । १३५ ॥ दोहा। फेर आन भूपर परै, और कहां उडि जाहि। छिन्न भिन्न तन अति दुसित, लोट लोट बिललाहि ॥१३६॥ सब दिसि देखि अपूर्व थल, चकित चित्त भयवान । मन सोचै मैं कौनहूं, परयो कहां मैं आन ॥ १३७ ॥ कौन भयानक भूमि यह, सबदुसथानक निंद । रुद्ररूप ये कौन हैं, निठुर नारकीद ॥ १३८ ॥ काले बरन कराल मुस, गुंजा लोचन धार । हुंडक डील डरावने, करै मार ही मार ॥१३९ ॥ सुजन न कोई दिठ परै, सरन न सेवक कोय । ह्यां सो कछु सूझै नहीं, जासौ छिन सुस होयं ॥ १४०॥ होत विभंगा अवधि तच, निजपरकौं दुखकार । नरक कूपमैं आपकौं, परचौ जान निरधार ॥ १४१॥ MercEOSRESESEREE Seer asiaNARadcasadrasiasmaNamahaARANAS ARREARRIASRARIARRRRRRIANTASTIREE तीसरा अधिकार। ३९ atta emiecemEDSSSOR पूरवपापकलाप सब, आप जाप कर लेय। तब विलापकी ताप तप, पश्चात्ताप करय ।। १४२ ॥ मैं भानुप परजाय धरि, धन-जोबन-मदलीन । अधम काज ऐसे किये, नरकवास जिन दीन ॥ १४३ ॥ सरसोसम सुसहेत तब, भयौ लंपटी जान । ताहीको अब फल लग्यो, यह दुस मेरु समान ॥ १४४ ॥ कंदमूल मद मांस मधु, और अभच्छ अनेक । अच्छन-बस मच्छन किये, अटक न मानी एक ॥१४५॥ जल थल नभचारी विविध, बिलवासी बहु जीव । मैं पापी अपराध बिन, मारे दीन अतीव ॥१४६ ।। नगरदाह कीनौं निठुर, गाम जलाये जान । अटवीमै दीनी अगनि, हिंसा कर सुखमान ॥ १४७ ॥ अपने इद्रीलोमकौं, बोल्यौ मृषा मलीन । कलपित ग्रथ बनायक, बहकाये बहु दीन ॥१४८॥ दावधातपरपंचसौं, परलछमी हर लीय । छलबल हठबल दरवबल, परवनिता बस कीय ॥ १४९ ॥ बढ़ी परिग्रहयोट सिर, घटी न घटकी चाह । ज्यो ईधनके जोगसौं, अगनि करै अतिदाह ॥१५॥ बिन छान्यो पानी पियो, निसि मुंज्या अविचारि । देवदरब सायौ सही, रुद्रध्यान उर धारि ।। १५१ ॥ कीनी सेव कुदेवकी, कुगुरुनकौं गुरु मानि । तिनहींके उपदेशसा, पशु होमैं हित जानि ॥ १५२ ।। PROSEISEMESSORREERSEASONSERTERESEARCH ARARARARARRRRRARARA पार्श्वपुराण- दियौ न उत्तमदान मैं, लियो न संजमभार । पियौ मूढ़ मिथ्यातमद, कियो न तप जगसार ॥ १५३ ॥ जो धर्मीजन दयाकरि, दीनी सीस निहोर । मैं तिनसौं रिस करि अधम, भाखे बचन कठोर ॥ १५४ ॥ करी कमाई परजनम, सो आई मुझ तीर । हा हा अब कैसे धरूं, नरकधरामैं धीर ।। १५५ ॥ दुर्लभ नरभव पायक , केई पुरुप प्रधान । तपकरि साधैं सुरग सिव, मैं अभागि यह थान ॥ १५६ ॥ पूरब संतन यों कही, करनी चाल लार । सो अब ऑसन देसिये, तब न करी निरधार ॥१५७ ॥ जिस कुटुंबके हेत मैं, की. बहुविध पाप । ते सब साथी बीछड़े, पस्यौ नरकमैं आप ॥ १५८ ॥ मेरी लछमी खानकौं, सीरी भये अनेक । अब इस बिपत विलापमैं, कोउ न दीखै एक ॥१५९ ।। सारस सरवर तजि गये, सूखो नीर निराट । फलबिन बिरख बिलोककै, पंछी लागे बाट ॥ १६० ।। पंचकरनपोपन अरथ, अनरथ किये अपार । ते रिपु ज्यो न्यारे भये, मोहि नरकमैं डार ॥ १६१ ॥ तव तिलभर दुख सहनकौं, हुतो अधीरज भाव । अब ये कैसे दुसह दुख, भरिहौं दीरघ आव ॥ १६२॥ अघ बैरीके बस परयौ, कहा करूंकित जाउं । सुनै कौन पूछु किसे, सरन कौन इस ठाउ ॥ १६३ ॥ SEONSERSEENETTEUTSE అతలాకు anateanRSARARANARASTASASARASANAN FRareasana astraFRRRRRA तीमरा आधिकार। FIRMERAPranaSTRIERRORTAstamasRASREARRARIRSTAR . यहा कछू दुख हतनको, उक्त उपाव न मूर । थिति बिन विपतसमुद्र यह, कब तिरहौं तट दूर ॥ १६४ ॥ ऐसी चिंता करत हू, बढ़े वेदना एम । धीव तेलके जोगते, पावक प्रजुलै जेम ॥ १६५ ॥ सोरठा। इहिबिध पूरब पाप, प्रथम नारकी सुधि करें। दुसउपजावन जाप, होय विभंगा अवधितै ॥१६६ ॥ दोहा। तब ही नारकि निर्दई, नयौ नारकी देस । धाय धाय मारन उठे, महादुष्ट दुरभेख ॥ १६७ ॥ सब क्रोधी कलही सकल, सबके नेत्र फुलिंग। दुःस देनकौं अति निपुन, निठुर नपुसकलिग ॥ १६८ ।। कुंत कृपान कमान सर, सकती मुगदर दड । इत्यादिक आयुध विविध, लिये हाथ परचड ॥ १६९ ।। कहि कठोर दुर्वचन बहु, तिल तिल खंडै काय । सो तवही ततकाल तन, पारे-वत मिल जाय ॥ १७॥ कॉटेकर छेर्दै चरन, भेर्दै मरम विचारि । अस्थिजाल चूरन करें, कुचलै खाल उपारि ॥ १७१ ॥ चीरें करवत काठ ज्यों, फारै पकरि कुठार ॥ तोर्दै अतरमालिका, अंतर उदर बिदार ॥१७२॥ पेलें कोल्हू मेलकै, पीसै घरटी घाल । तावै ताते तेलमै, दह दहन परजाल ।। १७३ ॥ reSeesBREORONSESsscSERESESERS aasarafhastaniase CORastarasRARREARRAR पार्श्वपुराणashastrasRAsara , पकरि पाय पटक पुहुमि, झटकि परसपर लेहिं । कंटक सेज सुबावहीं, सूलीपर धरि देहिं ॥ १७४ ।। घसैं सकंटक रूखसौं, बैतरनी ले जाहिं। घायल घेरि घसीटिए, किंचित करुना नाहिं ॥ १७५ ॥ केई रक्त चुवाव (?) तन, विहबल भाजै ताम । पर्वत अन्तर जायके, करें बैठि विसराम ॥ १७६ ॥ तहां भयानक नारकी, धारि विक्रिया भेख । वाघ सिंह अहि रूपसौं, दारै देह विसेस ॥१७७ ॥ केई करसौं पाय गहि, गिरसौं देहिं गिराय । परै आन दुर्भूमिपर, खड खंड हो जाय ॥ १७८ ॥ दुखसौं कायर चित्तकरि, ढूँडै सरन सहाय । वे अति निर्दय घातकी, यह अति दीन घिधाय ॥१७९॥ व्रण-वेदन नीकी करै, ऐसे करि विस्वास । सींचें खारे नीरसौं, जो अति उपजै त्रास ॥ १० ॥ केई जकरि जॅजीरसौ, बैंचि थंभ अति बांधि । सुध कराय अब मारिये, नाना आयुध साधि ॥१८॥ जिन उद्धत आभिमानसौं, की. परमव पाप ॥ तपतलोहआसनविपैं, बास दिसावै थाप ॥ १८२ ॥ ताती पुतली लोहकी, लाय लगावै अंग। प्रीत करी जिन पूर्वभव, परकामिनिके संग ॥ १८३ ॥ लोचनदोपी जानिक, लोचन लेहि निकाल । मदिरापानी पुरुपकौं, प्यावें तांबो गाल ॥ १८४ ॥ SoyEDUvextyuuSORDE RurasRastrasReasRARY KETESSOSORRUSSESERSOSORRESPERORSEURRENESEASONSE ।

ParmatraseramananevastraSEARCas तीसरा अधिकार ranAmARSwasprashasmARASTRSari जिन अंगनसौं अघ किये, तेई छेदे जाहिं । पल-भच्छनके पापते, तोड़ि तोडि तन साहि ॥ १८५॥ केई पूरब बैरके, याद दिवा नाम । कह दुर्वचन अनेक बिध, करै कोप संग्राम ॥ १८६ ॥ भये विक्रिया देहसौं, बहुविध आयुधजात । तिनहीसौं अति रिस भरे, करें परस्पर घात ॥ १८७॥ सिथिल होय चिर युद्धतै, दीन नारकी जाम | हिंसानंदी असुर दुठ, आन भिरावै ताम ॥ १८८॥ सोरठा । तृतिय नरक परजंत, असुरादिक दुस देत हैं। भास्यो जिनसिद्धत, असुरगमन आगे नहीं ॥१८९ ॥ दोहा। इहिबिध नरक-निवासमैं, चैन एकपल नाहि । तपैं निरंतर नारकी, दुसदावानलमाहि ॥ १९० ॥ मार मार सुनिये सदा, छेत्र महा दुरगध । बह बात असुहावनी, असुध छेत्र संबंध ॥ १९१ ॥ तीनलोकको नाज सब, जो भच्छन कर लेय । तौहू भूख न उपसमै, कौन एक कन देय ॥ १९२॥ सागरके जलसौं जहा, पीवत प्यास न जाय । लहै न पानी बूंदभर, दहै निरंतर काय ॥ १९३ ॥ बायपित्तकफजनित जे, रोगजात जावंत । तिन सबहीको नरकम, उदय कधी भगवत ॥ १९४ ।। REETISMEERPREENSERECENTERSERSEMIERE FATRastasarastrahasrashaniastareARARARiRaastasiaReal NAREERINFRASRASTARASTRATratastram पार्श्वपुराण- ४४ .. LastareasnamRATARREARRIAsiastras कटुतुंबी सौ कटुक रस, करवतकी सी फांस । जिनकी मृत मंजारसौं, अधिक देहदुरबास ॥ १९५ ॥ जोजन लाख प्रमान जहें, लोहपिंड गल जाय । ऐसी ही अति उसनता, ऐसी सीत सुभाय ।। १९६ ॥ अडिल्ल छद। पंकप्रभापरजंत उसनता अति कही। धूमप्रभामैं सीत उसन दोनौं सही ॥ छठी सातमी भूमि न केवल सीत है। ताकी उपमा नाहिं महा विपरीत है ॥ १९७॥ दोहा। स्वान स्यार मंजारकी, पड़ी कलेवर-रास । मास वसा अरु रुधिरको, कादौ जहां कुवास ॥ १९८॥ ठाम ठाम असुहावने, सेभल तरुवर भूर । पैनैं दुखदैनै विकट, कंटककलित करूर ॥ १९९ ॥ और जहां असिपत्र बन, भीम तरोवर खेत । जिनके दल तरवारसे, लगत धाव करदेत ॥२०॥ वैतरिनी सरिता समल, लोहित लहर भयान । बहै खार सोनित मरी, मांसकीच धिन धान ॥ २०१॥ पछी वायस गीधगन, लोहतुंडसौं जेह । मरम विदारै दुख करें, चूटै चहुँदिस देह ॥ २०२ ॥ पंचेद्री मनकी महा, जे दुखदायक जोग। ते सब नरकनिकेतमैं, एकपिंड अमनोग ॥ २०३ ॥ RSETTEERSEEEEEERSERSPEERSEVERESORS reastARRIAshastrastrasRasRRERA तीसरा अधिकार कथा अपार कलेसकी, कहै कहां लौं कोय । कोड़ जीमसौं बरनिये, तऊ न पूरी होय ॥ २०४ ॥ सागरबध प्रमानथिति, छिनछिन तीसन घास । ये दुस देखें नारकी, परवस परे निवास ॥ २०५॥ जैसी परवस बेदना, सहै जीव बहु भाय । स्ववस सहै जो अंस भी, तो भवजल तिरजाय ॥२०६॥ ऐसे नरकहिं नारकी, भयो भील दुठ भाव । सागर सत्ताईसकी, धारी मध्यम आव ॥ २०७ ।। सागर काल प्रमान अब, बरनौ औसर पाय । जिनसौं नरकनिवासकी, थिति सब जानी जाय ॥२०॥ चौपई। पहले तीन पल्यके भेव । एकचित्तकरि सो सुन लेव ॥ जिनसौ सागर उपजै सही जथारीत जिनसासन कही२०९ सोरठा। प्रथम पल्य व्योहार, दुतिय नाम उद्धार भन । अर्धा वितिय विचार, अब इनको विस्तार सुन ॥२१॥ चौपई। पहले गोल कृप कलपिये। जोजन बड़े मान थरपिये। इतनी ही करिये गंभीर । बुधिवल ताहि मरौ नर धीर २११ सात दिवसके भीतर जेह । जनै भेटके बालक लेह । उत्तम भोगभूमिके जान । तिनके रोमअन मनआन॥२१२॥ ऐसे सूच्छम करिये सोय । फेरि सड जिनको नहिं होय ।। तिन सौं महाकूप वह मरौ । बारंबार कूट दिट करी॥२१॥ serSEARS SE aଛୟମଞ୍ଜ SSଞ୍ଜୟନ୍ତ୍ରୟଛନ୍ତନ୍ତ୍ର ORDEMES ARANARE erasnasease पार्श्वपुराण- ४६ तिन रोमनकी संख्या जान । पैतालीस अंक परवान ॥ ते श्रीजिनसासनमैं कहे। कर प्रतीत जैनी सरदहे ॥२१४॥ चामर छद। ranase चार एक तीन चार पांच दो छ तीन ले। सुन्न तीन सुन्न आठ दोय अंक सुन्न दे ।। तीन एक सात सात सात चार नौ करो। पांच एक दोय एक नौ समार दो धरौ ॥ २१५ ॥ दोहा। सात वीस ये अंक लिखि, और अठारह सुन्न । प्रथम पल्पके रोमकी, यह संख्या परिपुन्न ॥ २१६ ॥ चौपई। सौ सौ बरस बीत जब जाहिं। एक एक कादौ यामाहि ॥ ऐसी विध सब करते सोय । कूप उदर जब खाली होय २१७ जो कछु लगै काल परवान । सो ब्योहार पल्य उरआन ॥ प्रथम पल्य सवते लघुरूप । बीजभूत भाख्यो जिनभूप२१८ दोहा। संख्या कारन जिन कयौ, और न यासौं काज । दुतिय पल्य विवरन सुनो, जो भाख्यौ जिनराज ॥ २१९ ॥ चौपई। पूरवकथित रोम सब धरौ । तिनके अंस कल्पना करौ । बरस असंख कोटिके जिते। समय होहिं आतम परिमिते२२० SEOCESSORSEERSONSERSerSEMAKEReserve , AGARRARARAS ArrastaserasRGERasta तीसरा आधिकार। एक एकके तावत मान । करौ भाग विकलप मन आन || याबिध ठान रोमकी रास । समय समय प्रति एक निकास जितनौं काल होय सब येह । सो उद्धार पल्य सुन लेह ॥ याकै रोमनसों परवान दीपोदधिकी संख्या जान ॥२२२॥ दोहा । कोडाकोडि पचीसके, पल्प रोम जावत । तितनैं दीप समुद्र सब, बरन जैनसिधंत ।। २२३ ।। चीपई। अब मुन वितिय पल्यकी कथा श्रीजिनसासन बरनी जथा। दुतियपल्यके अमित अपार । रोम अस लीजै निर्धार २२४ एक एकके भाग प्रमान । करि सौ बरस समय परवान ॥ इहिविध रासि होय फिर एह । समय समय प्रति लीजै तेह ।। ऐसे करत लगे जो काल । सोई अर्धापल्य विसाल ॥ करमनकी थिति यासौं जान । यह उत्कृष्ट कही भगवान२२६ दोहा। भथमपल्य संख्यातमित, दुतिय असंत्यप्रमान । असरयातगुन तीसरी, लिस्यौ जिनागम जान ॥ २२७ ॥ इन सब तीनों पल्यमै, अद्धापल्य महान । दस कोडा कोडी गये, अद्धासागर वान ।। २२८ ॥ इस ही अद्धासिधुसौ, पुन्यपाप परभाव । ससारीजन भोगवै, सुरगनरककी आव ॥ २२९ ॥ PEORGENEOSSEURESSE SEN RsxMATRAITASTARATARRARREASEVASTANPATRIKA * ।"

ANARARARANARRARARA पार्चपुराण- ४८ ऐसे दीरघ काल लौं, नरक सातर्फे थान । कमठ जीव दुस भोगवे, परयो कर्मवस आन ॥ २३० ॥ धिक धिक विषयकपायमल, ये बैरी जगमाहिं । ये ही मोहित जीवकों, अवसि नरक ले जाहिं ।। २३१ ।। धर्म पदारथ धन्य जग, जा पटतर कछु नाहिं । दुर्गतिवास बचायकै, धरै सुरगसिवमाहिं ॥ २३२ ॥ यही जान जिनधर्मकौं, सेवो बुद्धिविशाल । मन तन वचन लगायकैं, तिहुँपन तीनों काल ॥ २३३ ॥ इति श्रीमत्पार्श्वपुराणमापाया वजनामअहमिन्द्रसुखभिल्लनरक- दु.खवर्णन नाम तृतीयोधिकार ॥ ३ ॥ ASDIEREN vorespumayuno SrastARARIdianraRasresears RSEReserve FashastraRORE चौथा अधिकार। FAS चौथा अधिकार । RasrasRISRO सोरठा। मारूथल संसार, वामानंदन कलपतरु । वांछितफलदातार, सुखकामी सेवो सदा ॥१॥ इसही जंबूदीपमझार । भरतखंड दच्छिन दिसि सार । कौसलदेस बसै अभिराम । नगर अजोव्या उत्तम ठाम ॥२॥ आरजखंडमाहिं परधान | मध्यभाग राजै सुभथान ।। गढ़ गोपुर साई गृहपाति । धनबनसौं सोहै बहुभाति ॥३॥ ऊंचे जिनमंदिर मनहरैं। कंचन कलस धुजा फरहरैं॥ वज्रबाहु भूपति तिहि थान । वर-इस्वाकवंस-नम-मान ॥४॥ जैनधर्म पालै बड़भाग । जिनपद-कमलनि मधुप सराग ॥ प्रभाकरी तिय ताघर सती जीती जिन रभा-रति-रती॥५॥ दोहा। यथा हंसक वसकौं, चाल न सिखवै कोय । त्यों कुलीन नर-नारिक, सहज नमन-गुन होय ॥६॥ चौपई। वह अहमिद्र तहातै चयो । तिनकै सुदिन पुत्र सो भयो । नाव धरचौ आनंदकुमार । अतुल तेज सब लच्छन सारा॥७ सुभग सोम श्रीवत महान | बल-बीरज-धीरजगुनथान ॥ नरनारी-मन-मानिक-चोर । देसत नयन रह जा ओर ॥८॥ जाके मुगुन सेस कह थकै । और कौन बरनन कर सके। जोबनवंत जनक तिस देस । व्याहमहोत्सव कियौ विसेख ९ HILDREERSENTSPEECTIONSURSESENSWEEEEEEE ४ Rasnasanvastasna पार्चपुराण- Haseraser भूप। परनी राजसुता बहु भाय। जिनकी छवि वरनी नहिं जाय । क्रमसौं कुमर पितापद पाय। बलसौं बस कीये बहु राय १० दोहा। जोबन वय सपति बड़ी, मिल्यौ सकल सुखजोग । 'महामंडली' पद लह्यौ, पूरब-पुन्य-नियोग ॥ ११ ॥ चौपई। अब सुन आठ जातिके जिनकी जिनमत कह्यौ सरूप। कोटि ग्रामको अधिपति होय । राजा नाम कहावै सोय १२ नवें पांचसौ राजा जाहि । अधिराजा नृप कहिये ताहि ॥ सहस राय जिस मानैं आन । महाराज राजा वह जान १३ दोय सहस नृप न असेस । मंडलीक वह अर्ध नरेस ।। चार सहस जिस पूर्जे पाय । सोई मंडलीक नरराय ॥१४॥ आठ सहस भूपतिको ईस । मंडलीक सो महा महीस ॥ सोलह सहस न भूपाल । सो अधचक्री पुन्यविसाल ॥१५ सहस बतीस आन जिस बहैं । ताहि सकलचक्री बुध कहैं । इनमैं श्रीआनंदनरेस । महामंडली पद परमेस ॥ १६ ॥ सोरठा। आठ सहस सुसहेत, नृप नछत्र से0 सदा। कीरति-किरन-समेत, सोहै नरपतिचंद्रमा ॥ १७ ॥ चीपई। एक दिना आनंद महीस । बैठची सभा सिंहासनसीस ॥ मंत्री तहां स्वामिहित नाम । कहै विवेकी सुवचन ताम १८ SASSETTEGREEMESTEREMEMENTERY चौथा अधिकार । ५१ स्वामी यह वसंत रितुराज । सब जन करें महोच्छवकाज ॥ नंदीसुर-व्रत अबसर येह । करिये प्रभु-पूजा जिन गेह ॥१९॥ पूजा सदा पाप निरदलै । पर्वसंजोग महाफल फलै ॥ परम पुन्यको कारन आन । नहीं जगतमै जन्यसमान ॥२०॥ दोहा । जिनपूजाकी भावना, सब दुखहरन-उपाय । करते जो फल संपजे, सो बरन्यौ किमि जाय ॥ २१ ॥ चौपई। सुनि राजा मंत्री उपदेस । नगर महोच्छव कियौ विसेस ॥ करि सनान जिनमंदिर जाय। जैनविध पूजे बिदसाय ॥२२॥ बहुविध पूजा दरब मनोग । धरे आन जिनपूजनजोग । भावभक्तिसौं मगल ठयौ । राजाके मन संसय भयौ ॥२३॥ विपुलमती मुनिवर तिहि थान । दरसन कारन आये जान॥ तिनैं पूजि नृप पूछे येह । भो मुनीद्र मुझ मन संदेह ॥२४॥ दोहा। प्रतिमा धात पखानकी, प्रगट अचेतन अंग। पूजक जनको पुन्यफल, क्यो कर देय अभग ॥२५॥ तुम जगमै संसय-तिमिर, दूरकरन रविरूप । यह मुझ भरम मिटाइये, करै बीनती भूप ॥ २६ ॥ तब ग्यानी गनधर कहैं, समाधान सुन राय । भवि-जनकौं-प्रतिमा भगति, महापुन्य-फलदाय ।। २७ ।। Serestcassesses PRASTARAN क १ पाचपुराण- . RASAAARASANARARARANARARARARARASTARA माव सुभासुभ जीवके, उप® कारन पाय । पुन्य पाप तिनसौं बंधे, यों भाप्यौ जिनराय ॥२८॥ कुसुम बरनको जोग लहि, जैसे फटिक पसान । अरुनस्याम दुतिकौं धरै, यही जीवकी बान ॥२९॥ सो कारन है दोय विध, अंतरंग बहिरंग॥ तिनके ही उर आय है, जे समझै सरवंग ॥ ३०॥ वाहिज कारन जानियौ, अंतरंगको हेत। सोई अंतरभाव नित, कर्मबंधकौं देत ॥ ३१ ॥ जिन परिनामन पुन्य बहु, बधै अन्यथा नाहिं । तिन भावनको निमित है, जिनप्रतिमा जगमाहि॥३२॥ वीतरागमुद्रा निरखि, सुवि आवै भगवान । वही भाव कारन महा, पुन्यबंधकौ जान ॥ ३३ ॥ रागद्वेषवर्जित अमल, सुखदुखदाता नाहिं । दर्पनवत भगवान हैं, यह आनौं उरमाहि ॥ ३४ ॥ तिनको चिंतन ध्यान जप, थुति पूजादिविधान ॥ सुफल फलै निज भावसौं, 8 मुकती सुखदान ।। ३५॥ जैसे गुन प्रभुके कहे, ते जिन मुद्रामाहि । थिरसरूप रागादिबिन, भूपन आयुध नाहिं ॥ ३६ ॥ जद्यपि सिल्पीकृत कृतम, जिनवरबिम्ब अचेत । तदपि सही अंतरविपैं, सुभभावनकों हेत ॥ ३७॥ और एक दिष्टांत अब, सुन अवनीपति सोय । जियके उर दृष्टांतसौं, ससै रहै न कोय ॥ ३८॥ aniRakamananastarkamastrakashasranARASTRI POS astrasaCARESTATAROTESORRESTER चौथा अधिकार। RSSB चौपई। गनिका धरी चितामैं जाय । विसनी पुरुप देसि पछताय ॥ जो जीवत मुझ मिलती जोग । तो मैं करतौ वांछित भोग। स्वान कहै उर क्या यह दही। मैं निज भच्छन करतौ सही। पुनि तिहि देख कहैं मुनिराय । क्योन कियौ तप यह तन पाय इहि बिध देसि अचेतन अंग । उपजैं भाव पाय परसंग तिन ही भावनके अनुसार।लाग्यौ फल तिनकौं तिहि चार दोहा। व्यसनी नर नरकहिं गयौ, लह्यौ भूखदुस स्वान ।। साधु सुरग पहुँचे सही, भावनको फल जान ॥ ४२ ॥ चौपई। यो जिनबिंब अचेतनरूप । मुसदायक तुम जानो भूप ॥ कारनसम कारज संपजै । यामैं बुध ससै नहिं भजे ॥४३॥ दोहा। जैस चिंतामनि रतन, मनवांछितदातार । तथा अचेतन बिंब यह, वांछापूरनहार ॥ ४४ ॥ ज्यों जाचत सुस कलपतरु, दानी जनको देय ।। त्यो अचेत यह देत है, पूजको मुख श्रेय ॥ ४५ ॥ मनिमंत्रादिक ओपधी, है प्रतच्छ जड़रूप । विपरोगादिकका हरे, त्यो यह अघहर भूप ॥ ४६॥ जड़सरूपको पूज पद, प्रगट देसिये लोय । राजपच सिर धारिये, मुद्राअंकित होय ॥ ४७ ॥ RSOREDESENTSSESSMEWee FARARIANARANASTANASI TARArastranasranARRRORasrase . , asteaserasna PARRRRRRISTMISRORE पाचपुराण- BENSOREGGRESPOES राजपत्र सिर धारिये, राजाको भय मानि । जिनवरमुद्रा पूजिये, पातकको डर जानि ॥४८॥ प्रतिमापूजन चिंतवन, दरसनआदि विधान । हैं प्रमान तिहुँ कालमैं, तीन लोकमैं जान ॥४९॥ जे प्रतिमा पूजैं नहीं, निंदा करै अजान । तीन लोक तिहुंकालमैं, तिनसम अधम न आन ॥५०॥ जे प्रतिमा पूजै सदा, भावभगति-विधि-सुद्धि । तिनको जनम सराहिये, धन तिनकी सद्बुद्धि ॥५१॥ इत्यादिक उपदेस सुनि, आई उर परतीत । जिनप्रतिमापूजनविपैं, धरी राय दिढ़ प्रीत ॥ ५२ ॥ SHRTAseantaraRase चौपई। तिस औसर मुनि बरनै ताम । तीनभवनवरती जिनधाम ।। भानुविमानविणै जिनगेह । सो पहले बरनै धरि नेह ॥५३॥ रतनमई प्रतिमा जगमगै । कोटभानुछबि छीनी लगै ॥ निरुपम रचना विविध विसाल । सूरजदेव नमैं तिहुँ काल५४ सुन आनंदी आनंदराय । विकसत आनन अग न माय ॥ जब संदेहसल्य निरबरै। तव अवस्य उर सुख विस्तरै ॥५५॥ प्रात सांझ मंदिर चढ़ि सोय । अर्घ देय रविसम्मुख होय ॥ करि जिनबिवनको मन ध्यान । अस्तुति करै राग मन आन रबिविमान मनिकंचनमई । निरमापो अद्भुत छवि छई ॥ जैनभवनकरि मंडित सोयादेखत जनमन अचरज होय॥५॥ MPREETTEERSERVERSEISEMESEAREERESENSE SRCASTE RaseaseRASTARANA चौथा अधिकार। पूजा तहां करै नित राय । महा महोच्छव हर्प बढ़ाय ॥ प्रतिदिन देय दया उरआन | दीन दुखित जनकौं बहु दान५८ यह नितनेम करै भूपाल | चली नगरमैं सोई चाल ॥ सब सूरजकौं करें प्रनाम | देखादेखि चल्यो मत ताम ॥५९ समझें नहीं मूढ़ परनये । मानुउपासक तबसौं भये ॥ जो महंत नर कारज करै । ताकी रीत जगत आचरै ॥६०॥ यो बहु पुन्य करै भूपाल । सुसमैं जात न जान्यौ काल ॥ एक दिना निजसभा नरेस।निबसै मानौं सुरगसुरेस ॥६१॥ धवल केस देरयौ निज सीस । मन कंप्यौ सोचे नरईस || जाहि देसि मनउत्सव घटै। कामी जीवनको उर फटे॥६॥ सो लखि सेत बाल भूपाल । भोगउदास भये ततकाल ॥ जगतरीति सब आथिर असार । चितै चितमै मोह निवार६३ बाल अवस्था भई बितीत | तरुनाई आई निज रीत || सो अब बीती जरा पसायमरन दिवस यो पहुंचे आय ६४ बालक काया फॅपल सोय । पत्ररूप जोवनमैं होय ॥ पाको पात जरा तन करै । काल बयारि चलत झर परै॥६५॥ कोई गर्भमाहि खिर जाय । कोई जनमत छोड़े काय ॥ कोई बालदसा धरि मरे । तरुन अवस्था तन परिहरै।।६६ ।। मरन दिवसको नेम न कोय । यात कछु सुधि पर न लोय ॥ एक नेम यह तो परमान जन्म धरै सो मरै निदान ||७|| महापुरुप उपजे बडभागि । सव परलोक गये तन त्यागि। संसारी जन अपनी चार । पूरबउदै करै अनुसार ॥ ६८॥ ASPUNOJE POSIONEEDSE RARARARARARARARARAR पार्श्वपुराण- ५६ परवतपतित नदीके न्याय ।छिनहीछिन थिति बीती जाय॥ रागअंधप्रानी जगमाहिं । मोगमगन कछु सोचे नाहिं ॥६९॥ अंतकाल जब पहुंचे आय । कहा होय जो तब पछताय । पानी पहले बंधै जो पाल । वही काम आवै जल-काल ॥७॥ यही जान आतमहितहेत । करै विलंब न संत सुचेत ॥ आज काल जे करत रहाहि । ते अजान पीछे पछताहिं ७१ रात दिवस घटमाल सुभाव । भरि मरिजलजीवनकी आव॥ सूरज चांद बैल ये दोय । काल हट नित फेरै सोय ॥७२॥ दोहा। राजा राना छत्रपति, हाथिनके असवार । मरना सबकौं एक दिन, अपनी अपनी बार ॥ ७३ ॥ दलबल देई देवता, मात पिता परिवार । मरती बिरियाँ जीवकों, कोउ न राखनहार ॥७४।। दामबिना निर्धन दुसी, तिसनावस धनवान । कहूँ न सुख संसारमैं, सब जग देख्यौ छान ॥ ७५॥ आप अकेला अवतरै, मरै अकेला होय । यों कबही इस जीवका, साथी सगा न कोय ॥ ७६ ॥ जहां देह अपनी नहीं, तहां न अपनो कोय । परसम्पति पर प्रगट ये, पर हैं परिजन लोय ॥ ७७ ॥ दिपै चाम-चादर-मढी, हाड पींजरा देह । भीतर या सम जगतमैं, और नहीं विनगेह ॥ ७॥ జలలోకజవరాలజలంత TREATRasanastastras STEEMUSEUROSERSONSERESER 145 चौथा आधिकार। asnastasRITISRCIS सोरठा मोहनींदके जोर, जगवासी घूमै सदा । कर्मचोर चहुँ ओर, सरवस लूटै सुधि नहीं ॥ ७९ ॥ सतगुरु देहिं जगाय, मोहनीद जब उपसमै । तब कछु बने उपाय, कर्मचोर आवत रुकैं ।। ८० ।। दोहा। ग्यान दीप तप तेल भरि, घर सौधै भ्रम छोर । याविध बिन निकसैं नहीं, पैठे पूरब चोर ॥ ८१॥ पंचमहाव्रत-सचरन, समिति पंच परकार । प्रबलपंच इदीविजय, धार निर्जरा सार ।। ८२ ॥ चौदह राजु उतंग नभ, लोकपुरुष संठान । तामै जीव अनादिसौं, भरमत है बिन ग्यान || ८३॥ जॉ. सुरतरु देहिं सुस, चिंतत चिंतारैन । बिन जॉचे चिन चिंतवै, धर्म सकल सुख-देन ॥ ८४ ॥ धन-कन-कंचन राजसुस, सबै सुलभ करि जान । दुर्लभ है संसारमैं, एक जथारथ ग्यान ।। ८५॥ चौपई । इहिबिध भूप मावना भाय । हितउद्यम चिंत्यौ मन लाय ॥ सबसौं मोह ममत निरवारि। उठ्यौ धीर धीरज उर वारि ८६ जेठे सुतकी दीनों राज | आप चल्यो सिवसाधनकाज ॥ सागरदत्त मुनीसुरपास । संजम लियौ तजी जगआस॥८७॥ घनै भूप भूपतिके संग । धरे महानत निर्भय अंग ।। अब आनंद महामुनि धीर । बननिवास बिचर बन बीर ॥८ sessesESesarSERIEO ARARANDRASARRARARANASASARA , RanastasRIRStrasestaree पार्श्वपुराणeraseryoso परवतपतित नदीके न्याय ।छिनही छिन थिति चीती जाय। रागअंधप्रानी जगमाहिं । भोगमगन कछु सोचै नाहि ॥६९॥ अंतकाल जब पहुंचे आय । कहा होय जो तब पछताय ॥ पानी पहले बंधै जो पाल।वही काम आवै जल-काल ॥७॥ यही जान आतमहितहेत । करैं विलंब न संत सुचेत ॥ आज काल जे करत रहाहिं। ते अजान पीछे पछताहिँ ७१ रात दिवस घटमाल सुभाव । भरिभरि जलजीवनकी आव॥ सूरज चांद बैल ये दोय । काल रहट नित फेरै सोय ॥७२॥ दोहा। राजा राना छत्रपति, हाथिनके असवार । मरना सबकौं एक दिन, अपनी अपनी बार ॥ ७३ ॥ दलबल देई देवता, मात पिता परिवार । मरती विरियॉ जीवकों, कोउ न रासनहार ॥७४॥ दामबिना निर्धन दुखी, तिसनावस धनवान । कहूँ न सुस संसारमैं, सब जग देख्यौ छान ॥ ७५ ॥ आप अकेला अवतरै, मरै अकेला होय । यों कयही इस जीवका, साथी सगा न कोय ।। ७६ ॥ जहां देह अपनी नहीं, तहां न अपनो कोय । परसम्पति पर प्रगट ये, पर हैं परिजन लोय ॥ ७७ ॥ दिपै चाम-चादर-मढी, हाड पींजरा देह । भीतर या सम जगतमैं, और नहीं विनगेह ॥ ७८॥ AnAsanastanaRARARARARARASTANT चौथा आधिकार। सोरठा मोहनींदके जोर, जगवासी घूमै सदा । कर्मचोर चहुँ ओर, सरवस लूटें सुधि नही ॥ ७९ ॥ सत्तगुरु देहिं जगाय, मोहनींद जब उपसमै । तब कछु बनै उपाय, कर्मचोर आवत रुकै ॥ ८०॥ दोहा। ग्यान दीप तप तेल भरि, घर सौधै भ्रम छोर । याविध बिन निकसैं नहीं, पैठे पूरब चोर ।। ८१ ॥ पंचमहावत-सचरन, समिति पंच परकार । प्रवलपंच इंद्रीविजय, धार निर्जरा सार ॥ ८२॥ चौदह राजु उतग नभ, लोकपुरुष संतान । तामैं जीव अनादिसौं, भरमत है बिन ग्यान ।। ८३ ॥ जॉ. सुरतरु देहिं सुस, चिंतत चितारैन । बिन जॉचे घिन चिंतवै, धर्म सकल सुख-दैन ॥८४ ॥ धन-कन-कचन राजसुख, सुलभ करि जान । दुर्लभ है संसारमैं, एक जथारथ ग्यान ।। ८५ ।। चौपई । इहिविध भूप भावना भाय। हितउद्यम चिंत्यो मन लाय ॥ सबसौं मोह ममत निरवारि।उठ्यौ धीर धीरज उर धारि ८६ जेठे सुतकौं दीनों राज । आप चल्यो सिवसाधनकाज ॥ सागरदत्त मुनीसुरपास । संजम लियौ तजी जगआस॥८७॥ धनँ भूप भूपतिके संग । धरे महानत निर्भय अंग। अव आनंद महामुनिधीर बननिवास विचर बन बीर cus SBSERSORSEASUREDIREMEDS astrastaserastrAshAshwasnaReaRastrasana , सबै FRESeasuresed पार्श्वपुराण- SEARA తనలోతపోలోకచక दुद्धर तप बारह विध करै । दुविध संग-ममता परिहरै ॥ तिनके नाम कहूं कछु धार। जिनसासन जिनको विस्तारा८९! प्रथम महातप अनसन नाम । दूजो ऊनोदर गुनधाम ॥ तीजो है बतपरिसंख्यान । रसपरित्याग चतुर्थम मान॥९॥ पंचम भिन-सयनासन सार । कायकलेस छठौ अविकार ॥ यह पटबिध बाहज तप जान। अब अन्तर तप सुनौ सुजान ९१ पहले प्राछित विनय दुतीय । वैयावत तीजौ गन लीय ॥ चौथौ अन्तरंग सिज्झाय । पंचम तप व्युत्सर्ग बताय॥१२॥ पष्ठम ध्यान हरै सब खेद । ये अन्तरतपके सबे भेद ।। अब इनको संछेप सरूप। सुनौ संत तजि भाव विरूप ॥१३॥ जिनके सुनत बॅधै सुमध्यान । सेवत पद लहिये निरवान ॥ तप बिन तीनकाल तिहुँ लोय । कर्मनास कबही नहिं होय ९४ दिनसौं लेय बरस लगि करै । चार प्रकार असन परिहरै ।। राग-रोग-निर्दलन उपाय । सो अनसन भाख्यौ जिनराय९५६ पौन अर्ध चौथाई टेक । एक ग्रास अथवा कन एक ॥ ऐसी निध जो भोजन लेत । ऊनोदर आलस हर लेत॥१६॥ जैसी प्रथम प्रतिग्या करै । ताही विध भोजन आदरै ।। सो कहिये बतपरिसरयान । आसाव्याधि-विनासन जान९७ लवनादिक रस छांरि उपाध । नीरसभोजन भुंजै साध ॥ रसपरित्याग कहावै एम । इंद्रियमदनासन यह नेम॥ ९८॥ सून्यगेह गिरि गुफा मसान । नारि-नपुंसक-वर्जित थान,॥ बसै भिन्न-सयनासन सोय । यासौं सिद्धि ध्यानकी होय९९ BREEDASEMATERNERBERGENTSPEERINEERESERE SB%850 चौथा अधिकार। ग्रीपमकाल बसै गिरि-सीस । पावसमें तरुवरतल दीस । सीतसमय तटिनीतट रहै । काय कलेस कहावै यह ॥१०॥ दोहा । या तपके आचरनसौं, सहनसील मुनि होय । अब अन्तर-तप-भेद छह, कहूं जिनागम जोय ॥१०१।। SOLESEARSBIRE 1 चौपई। जो प्रमादवस लागै दोष । सोधै ताहि छोरि छल रोप ॥ आचारजवानी अनुसार । यही प्रथम प्राछित तप सार १०२ जे गुनजेठे साधु महंत । दरसन ग्यानी चारितवंत ॥ तिनकी विनय करै मनलाय । विनय नाम तप सो सुसदाय । रोगाटिक पीडित अविलोय । बाल बिरव मुनिवर जो होय॥ सेव करै निजसंजम रासि। सो वैयावत आगमसासि॥१०४॥ सकतिसमान सकल गुन ठाठ । करै साधु परमागमपाठ ॥ परमोत्तम तप सोसिज्झाय जासौं सब ससय मिटजाय १०५ निजसरीरममता परिहरे । काउसग्गमुद्रा दिढ धरै ॥ अन्तर बाहर परिग्रह छार । सोई तप व्युत्सर्ग उदार १०६ आरत रौद्र निवारै सोय । धर्म सकल ध्यादै थिर होय ॥ जहां सकल चिंता मिट जाहिं। वहीं ध्यानतप जिनमतमाहिं दोहा। यह बारह विध तप विपम, तपै महामुनि धीर । सहै परीपह चीस दो, ते अब बरनौं वीर ॥ १०८॥ RSETESHSEERecseer RERSON RRRRRPases पार्श्वपुराण-। छप्पय serastrasmashastra छुधा तृपा हिम उसन, डंस मंसक दुखभारी। - निरावरन तन अरति, खेद उपजावन नारी ॥ चरिया आसन सयन, दुष्ट वायक वध बंधन । जांचें नहीं अलाभ रोग, तिन-फरस निबंधन ।। मलजनित मान-सनमानवस, प्रग्या और अग्यान कर ॥ दरसन मलीन बाईस सब, साधुपरीपह जान नर॥१०९॥ दोहा। सूत्रपाठअनुसार ये, ये, कहे परीपह नाम ॥ इनके दुख जे मुनि सहैं, तिनप्रति सदा प्रनाम ॥११०॥ सोमावती छद। अनसन ऊनोदर तप पोपत, पाखमास दिन बीत गये हैं। जोगन बन जोगभिच्छाविधि, सूख अंग सब सिथिल भये हैं। तब बहु दुसह भूसकी वेदन, सहत साधु नहिं नेक नये हैं। तिनके चरनकमल प्रति दिन दिन, हाथ जोरि हम सीस ठये पराधीन मुनिवरकी भिच्छा, परघर लेहिं कहैं कछु नाहीं प्रकृति विरोधि पारना मुंजत, बढत प्यासकी त्रास तहांहीं। ग्रीपमकाल पित्त अति कोपै, लोचन दोय फिरे जब जाहीं। नीर न चहैं सहैं ऐसे मुनि, जयवंते बरतो जगमाहीं॥११२॥ सीतकाल सबही जन कापैं, सड़े जहां बन बिरछ डहे हैं झझा बायु बहै बरसा रित, बरसत बादल झूम रहे हैं । तहां धीर तटिनीतट चौवट, ताल-पालपै कम दहे हैं ।। सह सँभाल सीतकी बाधा, ते मुनि तारनतरन कहे हैं ११३ RSONSENSERESEARSEIGNSECONOSER mastrastrashnasease चौथा अधिकार। भूस प्यास पीडै उर अतर, प्रजलै आंत देह सब दागै । अगनिसरूप धूप ग्रीपमकी, ताती बाल झालसी लागे । तपै पहार ताप तन उपजै, कोपै पित्त दाहजूर जागै । इत्यादिक ग्रीपमकी बाधा, सहत साधु धीरज नहि त्यागौ। डांस मांस माखी तन काटें, पीडै बनपंछी बहुतेरे । डसैं ब्याल विपयाले बीछू, लगैं सजूरे आन धनेरे । सिह स्याल सुडाल सतावै, रीछ रोझ दुख देहि बड़ेरे । ऐसे कष्ट सह समभावन, ते मुनिराज हगै अब मेरे ॥११५॥ अतर विषय-वासना बरतै, बाहर लोकलाजभय भारी । तातै परम दिगंबरमुद्रा, धर नहिं सकैं दीन ससारी ॥ ऐसी दुद्धर नगन परीपह, जीतें साधु सीलबतधारी । निर्विकार बालकवत निर्भय, तिनके पायन ढोक हमारी ११६ देस कालका कारन लहिक, होत अचैन अनेक प्रकारै । तब तहां सिन्न होहि जगवासी, कलमलाय थिरतापद छारै ।। ऐसी अरति परीपह उपजत, तहां धीर धीरज उर धारें। ऐसे साधनकी उर अंतर, बसौं निरंतर नाम हमारे॥११७॥ जे प्रधान केहरिकों एकरें, पन्नग पकरि पावसौं चंपत । जिनकी तनक देखि भौं बांकी, कोटिक सूर दीनता जपत ॥ ऐसो पुरुप-पहार-उड़ावन,-प्रलय-पवन तिय-वेद पचंपत । धन्य धन्य ते साधु साहसी, मनसुमेरु जिनकी नहि कंपत ११८ चारहाथ परवान निरास पथ, चलत दिष्ट इत उत नहि ताने। कोमल पांय कठिन धरती पर, धरत धीर बाधा नहि मान ।। PRESENSELORESENTERSITERATURE SOURESSEDEOSEDNSURSE MERRIAFRastarasnastartees पार्श्वपुराण- । ते नाग तुरंग पालकी चढ़ते, ते सवाद उर यादि न आनें । यो मुनिराज भरै चर्यादुख, तब दिढ़कर्म कुलाचल भानै११९ गुफा मसान सैल तरु कोटर, निवसैं जहां सुद्धि भू है। परिमित काल रहैं निहचल तन, वारवार आसन नहिं फेरै ॥ मानुप देव अचेतन पसुकृत, बैठे विपत आन जब धेरै । ठौर न त भजै थिरता पद, गुरु सदा बसौ उर मेरै१२० जे महान सोनेके महलन, सुंदरसेज सोय सुख जोवें। ते अब अचलअंग एकासन, कोमल कठिन भूमिपर सोधें । पाहन-खंड कठोर कांकरी, गड़त कोर कायर नहिं होवें। ऐसी सयन-परीपह जीतत, ते मुनि कर्मकालिमा धो₹१२१ जगत जीव जावंत चराचर, सबके हित सबके सुसदानी। तिनैं देस दुर्वचन कहैं दुठ, पासंडी ठग यह अभिमानी ।। मारी याहि पकरि पापीकौं, तपसी-भेप चोर है छानी । ऐसे वचनबाणकी वर्पा, छिमाढाल ओ मुनिग्यानी॥१२२॥ निरपराध निर्वैर महा मुनि, तिनकौं दुष्टलोग मिलि मारें। केई बैंच थंभसौं बॉधत, केई पावकमैं परजाएँ । तहां कोप नहिं करहिं कदाचित, पूरबकर्मविपाक विचारौं। समरथ होय सह बध बंधन, ते गुरु सदा सहाय हमारै१२३ घोर वीर तप करत तपोधन, भयौ खीन सूसी गल चाही। आस्थि चाम अवसेस रह्यौ तन,नसाजाल झलक्यौ जिसमाहीं। ओपधि असन पान इत्यादिक, प्रान जाय पर जांचत नाही। दुद्धर अजाचीक प्रत धार, करहिं न मलिन धरमपरछाहीं। RSEASOESesy

NARESEARRE
चौथा आधिकार।
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एक बार भोजनकी विरियॉ, मौन साधि बसतीमैं आवें॥
जो नहि बने जोग भिच्छाविधि, ती महत मन खेद न लावै
ऐसे भ्रमत बहुत दिन बीते, तब तप विरद भावना भाव ।
यो अलाभकी परम परीपह, सहैं साधु सोई सिव पावै १२५
बात पित्त कफ सोनित चारी, ये जब घटै बढ़े तनमा ।
रोगसंजोग सोग तन उपजत, जगत जीव कायर हो जाहैं।
ऐसी व्याधि वेदना दारुन, सहैं सूर उपचार न चाहैं।
आतम-लीन देहसौं विरकत, जैन जती निज नेम निवा, १२६
सुसे तिन अरु तीसन काटे, कठिन काकरी पाय विदारै ।
रज उड़ि आय पर लोचनमैं, तीर फांस तन पीर विथारै ।।
तापर पर सहाय नहि वांछत, अपने करसों काढ़ न डाएँ ।
योतिन-परस-परीपहविजई, ते गुरु मव भव सरन हमारे १२७
जावजीव जलन्हौन तज्यौ जिन, नगनरूप बनथान सरे है।
चलै पसेव धूपकी विरियॉ, उड़त धूल सब अंग भरे हैं ।
मलिन देहकौ देखि महामुनि, मलिन भाव उर नाहि कर हैं
यो मलजनित परीपह जीतें, तिनै हाथ हम सीस धरे है१२८
जे महान विद्यानिधि विजई, चिरतपसी गुन अतुल भरे हैं।
तिनकी विनय वचनसौं अथवा, उठि प्रनाम जन नाहिं करे हैं
तो मुनि तहाँ सेद नहि मान, उर मलीनता भाव हरे है।
ऐसे परमसाधुके अहनिसि, हाथ जोरि हम पांय परे है १२९
तर्क छन्द व्याकरन कलानिधि, आगम अलंकार पढ़ जाने।
जाकी सुमति देखि परवादी, भिलखे होहिं लाज उर आने ।
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ARARARARARDRRRARI पार्श्वपुराण- GRANARASTARARASTARARAR जैसैं नाद सुनत केहरिको, बनगयन्द मागत भय माने । ऐसी महाबुद्धिके भाजन, पै मुनीस मद रंच न ठानें॥१३०॥ सावधान बरतें निसिवासर, सजमसूर परमवैरागी । पालत गुपति गये दीरघ दिन, सकल संग-ममतापरित्यागी अवधिग्यान अथवा मनपरजय, केवलकिरन अजौनहिं जागी यो विकलप नहि करहिं तपोधन, सो अग्यानविजई बड़भागी मैं चिरकाल घोर तप कीनौं, अजौं,रिद्धि-अतिसय नहिं जाग तपबल सिद्ध होंहिं सब सुनिये, सो कछु वात झूठसी लागै॥ यों कदापि चितमैं नहिं चिंतत, समकित-सुद्ध-सांतरसपागे। सोई साधु अदर्सनविजई, ताके दरसनसौं अब भागे॥१३२॥ कवित्त इकतीसा। ग्यानावरणीसौं दोय प्रग्या अग्यान होय, एक महामोहतै अदरस बसानिये । अतरायकर्मसेती उपजै अलाभ दुख, सपत चारित्रमोहनीके बल जानिये ॥ नगन निषिद्या नारि मान सनमान गारि, जांचना अरति सब ग्यारै ठीक ठानिये । एकादस बाकी रहीं वेदनी उदैसौं कहीं, बाइस परीपा उदै, ऐसे उर आनिये ॥ १३३॥ आडिह। एक बार इनमाहिं, एक मुनिकै कही। सेन उनीस उतकृष्ट, उदय आवें सही। SREENSETTEEGREEResear चौथा अधिकार। INIRUARose आसन सयन विहार, दोय इनमाहिंकी। सीत उसनमैं एक, तीन ये नाहिंकी ॥ १३४ ।। दोहा। अब दूसलच्छन धर्मके, कहूं मूल दस अंग । जे नित श्रीआनंद मुनि, पालत हैं सरवंग ॥ १३५ ॥ चौपई। FRAROSARARARAAAHARA बिनादोप दुर्जन दुस देय । समरथ होय सकल सह लेय ॥ क्रोध कपाय न उपजै जहां । उत्तम छिमा कहावै तहां १३६ आठ महामद पाय अनूप । निरभिमान बरतै मृदुरूप ॥ मानकपाय जहां नहिं होय । मार्दव नाम धरम है सोय१३७ जो मनचिंते सो मुस कहै । करै कायसौं कारज वहै ॥ मायाचार न उर पाइये । आर्जव धर्म यही गाइये ॥१३॥ बोल वचन स्वपरहितकार । सत्यस्वरूप सुधा-उनहार ॥ मिथ्यावचन कहै नहिं भूल । सोई सत्य धर्मतरुमूल ॥१३९ पर-कामिनि पर-दरवमझार । जो विरक्त बरतै छल छार ।। अंतर सुद्ध होय सरवग। सोई सौच धर्मको अग ॥ १४०॥ मन समेत जो इंद्री पंच । इनकौं सिथिल करै नहिं रंच ॥ बस थावरकी रच्छा जोय । संजम धर्म घसान्यौ सोय१४१ ख्याति लाभ पूजा सब छंड । पच करनकौं दीजै दंड ॥ सो तपधर्म कह्यौ जगसार अनसनादि बारह परकार॥१४२ सजमधारी व्रती प्रधान । दीजै चउविध उत्तम दान ॥ तथा दुष्टविकलप परिहार । त्यागधर्म बहु सुसदातार१४३॥ PETASERESEURSERESTSORSEURSESSURCENCERREERel ॥ ५ पाचपुराण- वाहिज परिग्रहकौं परित्याग | अंतर ममता रहै न लाग आकिंचन यह धर्म महान । सिवपददायक निहचै जान? बड़ी नारि जननी सम जान लघु पुत्री सम बहिन वखान तजि विकार मन बरते जेह । ब्रह्मचर्य परिपूरन एह १४ दोहा। सोलह कारन भावना, मा0 मुनि आनंद । तिनको नाम सरूप कछु, लिसौं सकल सुखकंद ॥१४॥ चौपई। आठ दोप मद आठ मलीन । छै अनायतन सठता तीन ये पचीस मलवरजित होय । दर्सनसुद्धि कहावै सोय ११ रत्नत्रयधारी मुनिराय । दर्सनग्यानचरितसमुदाय ॥ इनकी विनयविपैं परवीन । दुतियभावना सो अमलीन सीलमार धारै समचेत । सहस अठारह अंग समेत ॥ अतीचार नहिं लागै जहां । तृतिय भावना कहिये तहां१४ आगमकथित अर्थ अवधार।जथासकति निजबुधि अनुस करै निरंतर ग्यान अभ्यास । तुरिय भावना कहिये तास १५ दोहा। धर्म धर्मके फलविपै, धरतै प्रीति विसेख। यही भावना पचमी, लिखी जिनागम देख ॥ १५१ ।। चौपई। ओपधि अभय ग्यान आहार । महादान यह चार प्रकार सक्तिसमान सदा निरबहै। छठीभावनाधारक वहै ।।१५२ BEARSERIESer PRARIAFRICARREARRARARIATRE चौथा अधिकार। m X asRARBaaRPERasan अनसन आदि मुकतिदातार । उत्तम तप बारह परकार ॥ बल अनुसार करे जो कोय । सो सातमी भावना होय ॥ जतीवर्गकी कारन पाय । विघन होत जो कर सहाय ॥ साधुसमाधि कहाव सोय । यही भावना अष्टम होय ॥१५४॥ दुसविध साधु जिनागम कहे । पथपीड़ित रोगादिक गहे ।। तिनकी जो सेवा-सतकार । यही भावना नौमी सार ॥१५५॥ परमपूज्य आतम अरहंत । अतुल अनंत चतुष्टयवंत ॥ तिनकी युति नति पूजा भाव । दसम भावना भवजल-नाव जिनवरकथित अर्थ अवधार । रचना करै अनेक प्रकार ॥ आचारजकी भक्तिविधान । एकादसम भावना जान १५७ विद्यादायक विद्यालीन । गुणगरिष्ठ पाठक, परवीन ॥ तिनके चरन सदा चित रहै । बहुश्रुतिभक्ति बारमी यहै १५८ भगवतभापित अर्थ अनूप । गनधरग्रंथित ग्रंथसरूप॥ तहां भक्ति बरतै अमलान । प्रवचनभक्ति तेरमी जान पट आवश्यक क्रिया विधान । तिनकी कबही करै न हान ॥ सावधान बरते थिरचित्त । सो चौदहमी परमपवित्त ॥१६॥ करि जप तप पूजा व्रत भाव । प्रगट करै जिनधर्मप्रभाव ॥ सोई मारग परभावना । यह पचदसमी भावना ॥१६१॥ चार प्रकार संघसौं प्रीति । राखे गाय-वच्छकी रीति ॥ यही सोलमी समसुखदाय । प्रवचनवात्सल्य अभिधाय १६२ दोहा। सोलहकारन भावना, परम पुन्यकी सेत । भिन्न भिन्न अरु सोलहों, तीर्थंकर पद हेत ॥१६३ ।। ANSPORTERScesseDSEIRSONSORSEARSETTE 50 INFARAN RARA asranARORArterasa पाचपुराण- ARARA ARARARARARARAARRARARARA RARANASARAsas बंधप्रकृति जिनमतविपैं, कहीं एकसौ बीस । सो सत्रह मिथ्यातमैं, बांधत है निसदीस ॥ १६४॥ तीर्थंकर आहार दुक, तीन प्रकृति ये जान । इनको बंध मिथ्यातमैं, कह्यो नहीं भगवान ॥१६५॥ तातें तीर्थंकर प्रकृति, तीनों समकितमाहिं। सोलह कारनसौं बंचे, सबको निहचै नाहिं ।। १६६ ।। सोरठा। पूज्यपाद मुनिराय, श्रीसरवारथसिद्धिमैं । कह्यौ कथन इहि भाय, देखि लीजियो सुबुधिजन १६७ कुसुमलता। सोलह कारन ये भवतारन, सुमरत पावन होय हियो । भावै श्रीआनंदमहामुनि, तीर्थकरपदबंध कियौ ॥१६८॥ काय कपाय करी कृस अति ही,सत संजम गुण पोढ कियो। तपबल नाना रिद्धि उपन्नी, राग विरोध निबार दियो। जिस बन जोग धरै जोगेसर, तिस बनकी सब विपत टलैं पानी भरहिं सरोवर सूसे, सब रितुके फलफूल फलें १७० सिंहादिक जे जातविरोधी, ते सब बैरी बैर तजै। हंस भुजंगम मोर मंजारी, आपसमैं मिलि प्रीति भ● १७१ सोहैं साधु चढ़े समतारथ, परमारथ पथ गमन करें। सिवपुर पहुंचनकी उर वांछा, और न कछुचित चाह धरै देहविरक्त ममत्तविना मुनि, सबसौं मैत्री भाव बहैं । आतमलोन अदीन अनाकुल, गुन वरनत नहि पार लहैं SHEIRSDesORSEENSOUSERSERESORERESENSE SSEURSUR sarasREARSASRIESerastra चौथा अधिकार । एक दिना ते छीर बनांतर, ठाड़े मुनि वैराग भरे । पौनपरीपहसौं नहिं कांपैं, मेरुसिसर ज्यों अचल खरे १७४ सो मर नरक कमठचर पापी, नानाभांति विपत्ति भरी। तिसही काननमें विकटानन, पंचाननकी देह धरी ॥१७५।। देखि दिगंबर केहरि कोप्यौ, पूर्वभवातर बैरदह्यो। धायौ दुष्ट दहाड़ ततच्छन, आन अचानक कंठ गयौ १७६ तीसे नखन विदारै काया, हाथ कठोरन खंड करै ।। बांकी दाढ़नसौं तन भेदै, वदन भयानक ग्रास भरै ॥१७७॥ यो पसुकृत परचंड परीपह, समभावनसौं साधु सही ॥ क्रोध विरोध हिये नहि आन्यौ, परमछिमा उरमाझ वहीं धनि धनि श्रीआनंदमुनीसुर, धनि यह धीरजभाव भजे । ऐसे घोर उपद्रवमें जिन, जोगजुगतसौ प्रान तजे ।। १७९ ।। अंतसमयपरजंत तपोधन, सुभभावनसौ नाहि चये। आनत नाम स्वर्गमै स्वामी, सुरगनपूजित इद्र भये ॥१८॥ दोहा। सुरगलोक बरनन लिसों, जथासकतिसुखरीत । धर्म धर्मके फलवि, ज्यों मन उपजै प्रीत ॥ १८१ ।। चौपई। चंदकांतिमूंगामनिमई । नानावरन भूमि बरनई ।। रातदिवसको भेद न जहां। रतनउदोत निरंतर तहां ॥१८२॥ मनि कंगुरे कंचन प्राकार । औंडी परिसा ऊचे द्वार ॥ तोरन तुंग रतनगृह लसैं । ऐसे सुरगलोकपुर वसैं ॥ १८३ ।। ARARARARARARANASA HOST RARIASRAreasarastrastrasma पाश्चपुराण- ७० चंपक पारिजात मंदार । फूलन फैल रही महकार | , चैतबिरछतै बढ्यो सुहाग। ऐसे सुरग रबाने बाग॥ १८४ ॥ विपुल वापिका राजै खरीं । निर्मल नीर सुधामय भरीं ॥ कंचनकमलछई छबिवान । मानिकखंडखचित सोपान१८५ कामधेनु सोहैं सब गाय । कलपवृच्छ सबही तरुराय ॥ रतनजाति चिंताममि सबै । उपमा कौन सुरगकौं फचै१८६ गान करैं कहि सुरसुंदरीं । बन-बीथिन बैठी रसभरी ॥ कहीं देवगन वनितासंग । लीलाबन विचरै मनरग ॥१८७॥ मंद सुगंधि वहै नित वाय । पहुपरैनुरंजित सुखदाय ।। आंधी मेह न कबहीं होय । ताप तुसार न व्यापै कोय १८८ रितुकी रीति फिरै नहिं कदा । सोमकाल सुखदायक सदा॥ छत्रभंग चोरी उतपात । सुपने नहीं उपद्रवजात ।। १८९ ॥ ईति भीति भूचाल न होय । बैरी दुष्ट न दीसै कोय ॥ रोगी दोसी दुसिया दीन । बिरधवैस गुणसंपतिहीन १९० बढती अंगविकलता कहीं। ये सब सुरगलोकमैं नहीं ॥ सहज सोम सुंदर सरवंग। सब आभरनअलंकृत अंग १९१ लच्छनलंछित सुरभि सरीर । रिद्धसिद्धमंदिर मनधीर ॥ कामसरूपी आनंदकंद । कामिनिनेत्रकमलिनीचंद ॥१९२॥ बदन प्रसन्न प्रीतरस भरे । बिनयबुद्धिविद्या आगरे ॥ यो बहुगुणमंडित स्वयमेव । ऐसे सुरगनिवासी देव ॥१९॥ दोहा। ललितवचन लीलावती, सुभलच्छन सुकुमाल । सहजसुगंध सुहावनी, जथा मालतीमाल ॥ १९४ ॥ MSREENETWEEN चौथा अधिकार। सीलरूप लावन्यनिधि, हावभावरसलीन । सीमा सुभगसिंगारकी, सकलकलापरवीन ॥ १९५॥ निरत गीत सगीत सुर, सब रसरीतमझार ॥ कोविद होंहि सुभावत, सुरगलोककी नार ॥ १९६ ॥ पचइंद्रिमनको महा, जे जगमै सुखहेत । तिन सवहीको जानियौ, सुरगलोकसंकेत ॥ १९७ ॥ चौपई। इत्यादिक बहुसंपतिथान । देवलोकमहिमा असमान ।। आनतवर विमान है जहां । धरयौ जनम सुरपतिने तहा ॥ दोहा। उपज्यौ संपुट गर्भत, तेज पुंज अति चड । मानौं जलधरपटलतै, प्रगट्यो दामिनि-दंड ॥ १९९ ॥ एक महूरतमें तहां, संपूरन तन धार । किधौं रतनकी सेज तजि, सोवत उठ्यौ कुमार ॥२०॥ मनिकिरीट माथे दिपै, आनन अधिकसुरूप । कानन कुंडल जगमगै, पानन कटक अनूप ।। २०१ ।। मुजभूपनभूपित भुजा, हिये हार छवि देत । अग अंग इत्यादि बहु, सब आभरनसमेत ।। २०२॥ RastraR258 , चापई। सने सनै देसै दिस सही । लोचनकोर कान लगि रही। विसमयवंत होय मन ताम । कहै कौन आयो किस धाम ।। अहो कौन यह उत्तम देस । सकलसपदाथान विसेस ॥ कंचनके मदिर मनिजरे। दीस दिव्य अपरामरे । २०४॥ HORSMOVIESORSESE REEINSERTMEE traserasRArase पार्चपुराण- ઉર BRastraR अति उतंग अति ही दुति धरै। मध्य सभा मंडप मनहरै ।। सिंहासन अदभुत इहि ठाम । मानौं मेरुसिखर अभिराम ॥ अनुपम नाटक देखनजोग । श्रवणसुखद ये गीत मनोग ॥ ये लावन्यवती वरनारि । रूपजलधिबेला उनहारि।२०६ । ये उतंग हाथी मदभरे । तेज तुरंगनके गन खरे ।। कचनरथ पायकदल जेह । मो प्रति सिर ना सब येह २०७ सब आनद भरे मुझ देख । सब बिनीत सब सुंदर भेख ॥ जयजयकार करैं विहॅसाय । कारन कछु जान्यौ नहिं जाय दोहा । इन्द्रजाल अथवा सुपन, कै माया भ्रम कोय । यों सुरेस सोचै हिये, पै निरनय नहिं होय ॥२०९ ।। चौपई। तब तिस थानक देव प्रधान । मनकी बात अवधिसौं जान जोगवचन बोलै सिरनाय । संसयहरन स्रवनसुसदाय २१० हम विनती सुनिये सुरराज। जीवन जनम सफल सब आज अब सनाथ स्वामी हम मये। जनमजोगते पावन थये २११ सूरजउदय कमलिनी-बाग । विकसै जथा जग्यौ सिर भाग नन्द वर्ध हम देहिं असीस । चिर यह राज करौ सुरईस ॥ अहो नाथ यह उत्तम ठाम । सुरग तेरमो आनत नाम । जगतसार लछमीको येह । निरुपमभोग निरंतर गेह॥२१३॥ तुम इहि थान इन्द्र अवतरे । पूर्वजन्म दुद्धर तप धरे ॥ ये सब सुर सेवक तुमतनें । ये परिवार लोक हैं घनें॥२१४॥ Denuses pouvo Sko Ardita

asmastaRastiseaseaseasevastrastra
चौथा आधिकार।
७३
astaste
सोरठा।
ये मनोग वनितामंडली | तुम आदेस चहै मनरली ॥
ये पटदेवी लावनखान । सब देवी इन मानें आन ॥२१५||
ये विमान पुर महल उतंग । चमर छन्त्र सेना सप्तग ॥
धुजासिंहासनआदि मनोग। सकल सम्पदा यह तुम जोग२१६
ऐसे वचन अनन्तर तबै । जान्यौ इन्द्र अवधिबल सबै॥
मैं पूरव कीनौं तप बोर । दंडे करम धरमधनचोर ।। २१७ ।।
जीवजातकौं निर्भयदान । दीनों आप बराबर जान ।।
सब उपसर्ग सहे धरि धीर । जीत्यौ महारागरिपु वीर२१८
काम विपम वैरी वस कियौ । अरु कपाय बनकौं जारियो।
जिनवरआन अखंडित पोप । चारित चिर पाल्यौ निरदोष
इहि विध सेयौ धर्म महान । तिस प्रभाव दीखै यह थान ।
दुरगतिपात निवारन करौ । तिन मुझ इंद्रलोक ले धरी २२०
सो अब सुलभ नही इस देह । भोग जोग है थानक येह ।।
रागआग दुखदायक सदा । चारितजल विन बुझै न कदा॥
सो कारन सुरगतिमै नाहिं । बतको उदय न या पदमाहिं।
ह्यां सम्यकदरसन अधिकार। संकादिक मलवरजित सार२२२
कै जिनवरकी भक्ति सहाय । और न दाखै धर्मउपाय ।।
यह विचारि जिनपूजनहेत । उठ्यो इन्द्र परिवारसमेत२२३
अमृतवापिकाम करि न्हीन । गयी जहां मनिमय जिनमौन
रतनबिम्ब बन्दे विहसाय | भावभगतसौं सीस नवाय २२४
SECREENSHERSEENESENTERESERVEERESERes

Parraneasesase पाचपुराण- PATARA ७४ S501 anARRESTER पूजा करी दरब धरि आठ । पुलकित अंग पढ्यौ थुतिपाठ॥ चैतबिरछजिनप्रतिमा जहां। महामहोच्छव कीनौं तहां २२५ यो बहु पुन्य उपायौ सही । फेरि आय निज सम्पति गही। दिव्यभोग मुंजे बड़भाग । लोकोत्तम जिस सहजसुहाग २२६ सोभनरूप प्रथम संठान । वसुवैक्रियक सुलच्छनवान ॥ कोमल सुरभि सचिकन देह । सातधातवरजित गुनगेह२२७ पलकपात लोचनमैं नहीं । मलपसेव नस केस न कहीं ॥ जरा कलेस न चिंता सोग । नाहीं अलप मृत्युभय रोग २२८ इत्यादिक दुसजोग अनेक । तिनमैं नहीं अमरके एक ॥ आठरिद्धि अनिमादि पसत्थ । तिसबल सकलकाज समरत्थ सुरग लोकके सुखकी कथा । कहै कहां लौं बुधवल जथा ॥ बैठि मनोगत विमल विमान । विचरै नभपथ वांछितथान॥ कबही मेरु जिनालय गमै । कबही आन कुलाचल रमै ॥ दीप समुद्र असंख अपार | करै सुरेन्द्र सुछद विहार ।।२३१॥ वर्ष वर्षमैं हर्ष बढ़ाय । तीन बार नन्दीसुर जाय ॥ पंचकल्यानक समयसुजोग । करै तीर्थपदनमन नियोग२३२ और केवली प्रभुके पाय । दोय कल्यानक पूजै आय ॥ निज कोठे थिर होय सुग्यान | करै दिव्यवानीरसपान२३३ सभासिंहासन बैटि सुरेस । देय सुरनप्रति हितउपदेस ॥ करै तत्त्ववरनन विस्तार । अनेकांतवानी अनुसार ।। २३४ ॥ जे सुर सम्यकदरसनहीन । तपबल देव भये सुखलीन ।। तिनप्रति धर्मवचन उच्चरै । दरसनगुनकी प्रापति करै २३५ PRESENSESeeserSERSORSEEX । RAFTASEASEARLASSIAHRAasara తలత FRIENRVASRASRFASTERSrastrasease चौथा अधिकार। ७५ इहविध विविध करै सुभकाज । महापुन्य संचै सुरराज ॥ दरसनग्यान रतनभडार।चारित गुनको नहिं अधिकार २३६ धर्मवासनावासित जोग । करै पुनीत पुन्यफलभोग ॥ कवहीं सुनै अपछरा-गान । निरसै नाटक निरुपम थान २३७ कवहीं सुभ सिंगाररसलीन । हाव भाव जोवै परवीन । कबहीं हास्यकथा विस्तर । वनक्रीडा देविन सॅग करै २३८ यौं नानाविध करत विलास । प्रतिदिन सुखसागरमै बास ।। साढ़े तीन हाथ परवान । दिव्यसरीर अतुल दुतिवान २३९ सागर बीस परमाथिति जास । बीस पच्छ पर लेय उसास ।। बीसहजार वर्प अवसान । मनसा भोजन करै महान ॥२४०॥ पंचम पिरथी लौं जिस सही अवधिसकति जिनसासन कहीं तावत मान विक्रियाखेत । सकलकाज साधनसुखहेत ॥२४॥ असंख्यात सुर सेवन पाय । देवीनेत्रकमलदिनराय ॥ यो पूरवकृत पुन्यसँजोग । करै इद्र इंद्रासन भोग ॥ २४२॥ दोहा। कहा इद्रअहमिद पद, जनम धरै फिर आय ॥ जैनधर्म नृपकी बुजा, लोक-सिखर फहराय ॥ २४३ ॥ इति श्रीमत्पा-पुराणभापाया आनन्दरायइन्द्रपदनाप्तिवर्णन नाम चतुर्थोऽविकार । RSHESENERA FARSAStoneRanki KOREATMEROEMSEX SEEDSss ARARARARASARARARA पार्श्वपुराण- ७६ पॉचवॉ अधिकार । दोहा। बंदौं पारसपदकमल, अमलबुद्धिदातार ॥ अब बरनौं जिनराजके, पंच कल्यानक सार ॥१॥ Manakamastrasta चौपई। प्रथम अनंत अलोकाकास । दसौं दिसा मरजाद न जास ॥ दूजी दरब जहां नहिं और । सुन्न सरूप गगन सब ठौर ॥२॥ तहां अनादि लोकथिति जान । छीदे पॉय पुरुप-संठान । कटिपै हाथ सदा थिर रहै । यह सरूप जिनसासन कहै ॥३॥ पौन पिंड बेढ्यौ सरवंग । चौदह राजू गगन उतंग ॥ घनाकार राजू गन ईस । कहे तीन सौ तैतालीस ॥४॥ जीवादिक छह दरव सदीव । तिनसौं भरचौ जथा घट धीव स्वयंसिद्ध रचना यह बनी। ना इस करता हरता धनी ॥५॥ दरब दृष्टिसौं धौव्यसरूप । परजयसौं उतपतछयरूप ॥ जैसे समुद् सदा थिर लसै। लहर न्याय उपजै अरु नसै॥६॥ लोक-नाड़ि तिस मध्य महान । चौदह राजू व्योम उचान ।। राजूमित चौंड़ी चहुंपास । यह सखेत जिनागम मास ॥७॥ याके बाहर जंगम जीव । समुद्घात बिन नाहिं सदीव ।। तामैं तीनों लोक बिसाल । ऊरध मध्य और पाताल ॥८॥ सोलह स्वर्ग पटल बावन्न । नव ग्रीवक नव जान रवन्न । अनुदिस और अनुत्तर येह । एक एक ही पटल गिनेह ॥९॥ ONEDREWEREOSose arerana Prastastrashastrasa पाँचवा अधिकार। ७७ ये सब बेसठ पटल बखान । सिद्धखेत सोहैं सिर थान ॥ ऊरध लोक बसे इहि भाय | उत्तम सुरथानक सुखदाय ॥ अधोलोकमैं बहु बिध भेय । सात नरक असुरादिक देव ।। मध्यलोक पुनि तीजौ तहां । असख्यात दीपोधि जहां ११ तिनमैं सोभावंत सुहात । जंबूदीप जगतविण्यात ॥ लच्छ महाजोजन विस्तार । सरजमंडलकी उनहार ॥१२॥ वज्रकोट जिस ओट अमंग । परिमित जोजन आठ उतंग। चारौं दिस दरवाजे चार । तिनके नाम लिखौँ अवधार १३ विजय नाम पूरबमैं जान । वैजयंत दच्छिन दिस ठान ।। पच्छिम भाग जयंत दुवार । उत्तरमै अपराजित सार॥१४॥ लवन-समुद्र खातिकारूप । चहुदिस बेढ्यौ सजल सरूप ॥ तहां सुदरसन मेरु महान । मध्य भाग सोमा असमान||१५ अति उतग लख जोजन सोय।रिजुविमान जा ऊपर होय।। सब सैलनमै ऊंचो यहै । ग्रीव उठाय किधो इम कहै॥१६॥ कर कौन गिरि मेरी रीस । जिनपति न्हौन होय मुझ सीस॥ चारो दिस चारौं गजदंत । नील नियवसौं लगे महत १७ छह कुलपर्वत बडे विथार । पूरब पच्छिम दीरघ सार । आठ महागिरि दिग्गज नाम । मेरु निकट आठौं दिस ठाम कनक बरन सोलह वच्छार । महाविदेहविपै छबिसार ।। कचनगिरि दीसै परवान । सीता सीतोदा तट थान ॥१९॥ कुरु भूमाहिं जमक गिरि चार नील निपके निकट निहार चार नामिगिरि मिथ्या नाहिं । मध्यम जघनमोगभूमाहि॥ VERSEUORORSeemese younovyne AASTARATAS पार्श्वपुराण- विजयारध पर्वत चौंतीस । इतने ही वृषभाचल दीस ॥ ते मलेच्छमधिखंडनबिखें । चक्री जहां नांव निज लिखें २१ यो गिरि दीपवि बरनये । ग्यारह अधिक एक सौ भये ॥ भद्रसाल बन दोय सुवास । पूरब अपर मेरुके पास ॥२२॥ दो तरु जबू-संभलतनैं । उत्तम भोगभूमिमैं बनें । छह द्रह बड़े कुलाचलसीस । पदम महापदमादिक दीस२३ बीस सरोवर और सुनेह । सीता सीतोदामधि तेह ॥ उत्तम मध्यम जपन विसेस । भोगभूमि छह कही जिनेस ॥ महादेस चौंतीस सुखेत । ऐरावत अरु भरत समेत ॥ इतनी ही नगरी परवान । आरजखंडमध्य थिर थान २५ उपसमुद्रकी सख्या यही । कछू विनासिक कछु थिर सही पूरब दिस दो बाग महंत । देवारन्य दीपके अंत ॥ २६ ॥ ऐसे ही पच्छिम दिस दोय । भूतारन्य नाम तिन होय ॥ गंगादिक सरिता दुसचार । चौंसठ महा विदेहमझार २७॥ बारह विपुल विभगा जेह । महानदी नन्नै सब येह ॥ इतने ही सब कुंड महान । जहा तरंगिनि उतरै आन २८ सनह लाख सबन परिवार । सहसछानवै ऊपर धार । यह सब जंबूदीपसमास । आगममैं विस्तार प्रकास ॥२९॥ दोहा। यही कथन अंगनविपै, वरन्यौ गनधर इस ॥ तीनलाख पदमै सही, ऊपर सहस पचीस ॥३०॥ అనంతలకలవరజలంతాకలో पांचों आधिकार। ७९ चौपई। यों अनेक रचना आधार । दीपराज राजै अधिकार ॥ तहां मेरुके दच्छिन भाग। किधौं भूमितिय सुभग सुहाग३१ भरतखंड छहखड समेत । धनुपाकार विराजत खेत ॥ तामै सवसुखधर्मनिवास । कासीदेश कुसलजनवास ॥३२॥ गांव खेट पुर पट्टन जहां । धन-कन भरे बसैं बहु तहां ।। निवस नागर जैनी लोय । दयाधर्म पालैं सब कोय ॥३३॥ जिनमदिर ऊँचे जिनमाहिं । नरनारी नित पूजन जाहिं ॥ पद पद पुरपंकित पेग्विये । उदवसथान (1) न कहि देखिये। नीर अगाध नदी नित बहै | जलचर जीव जहां नित रहैं।। मुनिजनभूपित जिनके तीर । काउसग्ग धरि ठाडे धीर ३५ ऊंच परवत झरना झरे। मारग जात पथिक मन हरै ।। जिनमैं सदा कदराथान ! निहचल देह धरै मुनि ध्यान३६ जहां बड़े निर्जनधनजाल । जिनमैं बहुविध चिरछ विसाल। केला करपट कटहल कर । कैथ करोदा कौंच कनैर ॥३७॥ फिरमाला कंकोल कल्हार । कमरख कंज कदम कचनार ।। खिरनी खारक पिंडखजूर । सैर सिरहटी खेजड भू॥३८॥ अर्जुन अमली आम अनार । अगर अजीर असोक अपार अरनी बंगा अरलू भने । ऊंबर अड़ अरीठा घने ॥३९॥ पाकर पीपल पूग प्रियंग । पीलू पाटल पाढ़ पतंग ।। गादी गुड़हल गूलर जान । गांडर गुंजा गोरस पान ॥४०॥ STERMEENASEEBSITERSEVISEMEMESERSEE ८० पार्षपुराण- । पंचा चीढ़ चिरोंजी फली । चंदन चोल चमेली मली ।। जंड ऑभीरी जामन कोट । नीम नारियल हीस हिगोट४ सौना सीसम सेभल साल । सालर सिरस सदा फलजाल बांस बबूल बकायन बेर । बेत बहेडा बड़हल पेर ।। ४२ महुआ मौलसिरी मचकुंद । मरुवा मोसा करना कुन्द ।। तूत तबॉलनि तीदू ताल । तगर तिलक तालीस तमाल ४६ इहि विध रहे सरोवर छाय । सबही कहत कथा बढ़ जाय। तहां साधु एकांत विचार । करै पठनपाठनविधि सार॥४४॥ बिबिध सरोवर सीतल ठाम । पंथी बैठि लेहिं बिसराम । निर्मल नीर भरे मनहार । मानौं मुनिचित विगतविकार४५ सोहैं सफल सालके सेत । भये नम्र फलभारसमेत ॥ सजनजन ज्यों संपति पाय । छोड़ गुमान चलें सिर नाय४६ केवलग्यानी करत विहार । जहां सदा सबसुखदातार ॥ अचारज चहुसंघसमेत । विहरमान भविजन हितहेत॥४७॥ केई जहां महावत लेहिं । भवदुसवास जलांजलि देहिं । केई धीर उग्र तप करें। ते आहिमिंद्र जाय अवतरै॥४८॥ केई श्रावकके व्रत पाल । अच्युत स्वर्ग बसैं चिरकाल ॥ केई कर जिनजग्य विधान | पावैं पुन्नी अमरविमान ॥४९॥ केई मुनिवरदानप्रभाव । भोगैं भोगभूमिकी आव ॥ अपुनीत सब ही विध देस । जहां जनम चाहैं अमरेस ५० तहां बनारस नगरी बसे । देखत सुरनरमन हुल्लसै ॥ है प्रसिद्ध धरनीपर मोय । तीरथराज कहैं सब कोय ॥५१॥ ।

reastARArrahasranas पाँचवाँ अधिकार सोमा जाकी कही न जाय । नाम लेत रसना सुचि थाय ।। जहां सरोवर नाना भांति । जिनके तीर तरोवर पॉति ५२ निजजीवन जीवन सुस देहि । कमलसुवास सिलीमुस लेहि सोहैं सघन रवाने बाग । फले फूल फल बढ्यो सुहाग ५३ सजल सातिका राजे सरी । उ लहरि लोयन-गति-हरी ॥ कोट उतंग कागुरे लसै । मानौं सुरगलोक दिस हँसै ॥५४॥ ऊंच महल मनोहर लगें । सुवरन कलस सिखर जगमगैं अति उन्नत जिनमंदिर जहां। तिन महिमा वरनन चुध कहां रतनविव राजै जिहिमाहिं । सिसर सुरग धुजा फहराहि ॥ कंचनके उपकरन समाज । आवै भविजन पूजाकाज ॥५६॥ जय जय सब्द सहितछबि छजै । किधी धर्म-रयनायर गजै॥ नगरनारि नित बंदन जाहिं। जिनदरसनउच्छव उरमाहिं।। भूपनभूपित सुंदर देह । मानौं सुमग अपछरा येह । सब ग्रहस्थ साधैं पट कर्म । पालै प्रजा अहिंसा धर्म ॥५॥ दोप अठारहवर्जित देव । तिस प्रभुको पूजै बहु भेव ।। चाह-चिहन-बरजित जो धीर । सोई गुरु सेवै वरवीर॥५९॥ आदि अंत जे विगत विरोध | तेई ग्रंथ सुनै मन सोध । सत्य सील गुन पालैं सदा । ताते लोग सुखी सर्वदा ॥६॥ anmastasetinderestaste दोहा। मजा बनारस नगरकी, नागर नीत सुजान ।। चार रतनके पारखी, लहिये घर घर थान ॥ ६१ ।। VerserSROISepseeserSEOsces afrastaSRIRA , , पार्श्वपुराण- देव धर्म गुरु ग्रंथ ये, बडे रतन संसार । इनकौं परखि प्रमानिये, यह नर-भव-फल सार ॥ ६२ जे इनकी जानैं परख, ते जग लोचनवान । जिनकौं यह सुधि ना परी, ते नर अंध अजान ॥६३ लोचनहीने पुरुपकौं, अंध न कहिये भूल ॥ उर लोचन जिनके मुंदे, ते आंधे निर्मूल ॥ ६४ ॥ चीपई। इहि बिध नगर बसै बहु भाय । सब सोभा बरनी नहिं जा अस्वसेन भूपति बड़ भाग । राज करै तहाँ अतुल सुहाग कासिपगोत्र जगतपरसंस | बंस-इख्वाक-विमल-सर-हंस ॥ तेजवंत दिनपति ज्यौं दिपै । प्रभुता देसि सचीपति छिपै कलपतरोवर सम दातार । रतिपति लाजै रूप निहार ॥ रयनायर सम अति गभीर । पर्वतराज बराबर धीर ॥६७ सोम समान सवनि सुखदाय। कीरति-किरन रही जग छार तीन ग्यानसंजुगत सुजान । परम विवेकी दयानिधान ६० जिनपदभक्ति धर्म-धन-वास । गुरुसेवारति नीतिनिवास ॥ कला-चातुरी-बुधि-विग्यान । विद्या-विनय-संपदा-थान ६९ सकलसारगुणमानिककोप । उभयपच्छ निर्मल निर्दोष : जिनसूरजउदयाचल राय। तिस महिमा बरनी किमि जाय७८ वामादेवी नाम पबित्त । तिनके घर रानी सुम चित ॥ निरुपम लावन सबगुनभरी । रूपजलधिवेला अवतरी ७ అతలారయఅకణతలతడకలతలకు पाँचवाँ अधिकार। ८३ नखसिस सहज सुहागिनिनार तीनलोकतियतिलक सिंगार सकल सुलच्छनमडित देह । भाषा मधुर भारती येह ॥७२॥ रंभा रति जिस आगे दीन । रोहिनिरूप लगै छवि छीन । इंद्रवधू इमि दीसे सोय । रविदुति आगे दीपकलोय ॥७३॥ जनमनहरपबढ़ावन एम । कातिक-चंद्र-चद्रिका जेम ॥ सकल सार गुनमनिकी सानि । सीलसंपदाकी निधि जानि सज्जनताकी अवधि अनूप । कला सुबुधिकी सीमारूप ॥ नाम लेत अघ तजे समीप । महापुरुप-मुक्ताफल-सीप ॥७॥ त्रिभुवननाथ रत्नकी मही। बुधिबल महिमा जाय न कही। बहुविध दंपति संपतिजोग । करें पुनीत पुन्यफलभोग ॥६॥ उक्त च पदपाहु ग्रन्थे आर्या- तित्थयरा तप्पियरा हलहर चक्काई चासदेवाई। पडिवास भोयभूमिय आहारो णत्यि णीहारो ॥७७ ।। चौपई। जिनवर जिनमाता जिनतात । बासदेव बलदेव विख्यात ॥ चक्रीराय जुगलिया जोय ! इन सबके मल मूत्र न होय॥७॥ दोहा। पूरब गाथाको अरथ, लिख्यौ चौपई लाय ।। पट्पाहुटटीकाविप, देख लेहु इहि भाय ॥ ७९ ॥ चौपई। अब आगे भविजन मन थम । सुनो गर्भमंगलआनंद ॥ एक दिना सौधर्म सुरेस । धनपति मति दीनौं उपदेस ८० DesarSOSORSTUDESSESEARSONSOREDESeas FREERSEEDSDRS - arastrastarreasraemantrastashrase पार्श्वपुराण- आनतेंद्रकी थितिमैं सही। आयु छ मास शेप सब रही । तेवीसम अवतार महान । होसी नगर बनारस-थान ॥१॥ अस्वसेन भूपतिके धाम । पचाचरज करौ अभिराम ॥ यह सुरेंद्रने आज्ञा करी । सो कुबेर निज माथै धरी ॥२॥ चल्यो तुरत लाई नहिं बार । सोहै संग अमर-परिवार ।। हरपित अंग पिता घर आय । करी रतन-वर्षा बहुभाय ८३ जिनके तेज तिमिर नहिं रहै । नाना वरन प्रभा लहलहै । ऐसे निर्मोलक नग भूर । बरसे नृपके आंगन पूर ॥ ८४ ॥ दोहा। नभसौं आवै झलकती, मनिधारा इहि माय ॥ सुरगलोक-लछमी किधौं, सेवन उतरी माय ॥ ८५ ॥ चौपई। साढे तीन कोड परवान । यौँ नित बरसै रतन महान ॥ सुरभि सुगंध कलपतरुफूल । बरसानै सुर आनंदमूल ॥८६॥ गंधोदककी बरसा करैं । मानौं मुकताफल अवतरै ॥ प्रतिदिन देव-दुंदुभी बजै । किधौं महासागर यह गजै ८७ नंद वरद जयजय उच्च। मात पिता प्रति सुर यौं करें। इहि बिध पंचाचरज विलोल। जैनी भये मिथ्याती लोक ॥ दोहा। देवन किये छ मास लौ, पंचाचरज अनूप । देखि देसि परजा भई, आनंद अचरजरूप ॥ ८९॥ అజలతతలత అతలతఅజతపోటు automaterarmarkrarrasnamasuatiarth తలాతలు pase पाँचवा अधिकार । ८५ चौपई। यो अतिआनंदसौं दिन जाहि। माता मगन सुसोदधिमाहिं मानिकजटित मनोहर धाम । रत्नपलंक सेज अमिराम॥९॥ मनिमय दीप जहां जगमगें। अति सुगंध आवत अलि पगैं। करि चतुर्थ आनंद-सनानि। करै सयन जननी सुख मानि९१ पच्छिम रैन रही जब आय । सोलह सुपर्ने देखे माय ॥ तिनके नाम लिसौं अवलोय । पढ़त सुनत पातक छय होय पद्धही। सुपनावलि सोलह सुनहु मीत । जिनराजजनमसूचक पुनीत। ऐरावत हाथी प्रथम दीस । मदगीलो गड विसाल सीस९३ देस्यौ डकारत वृपभराज | अतिउज्जल मोतीबरन भ्राज ।। देख्यौ पचानन धवलदेह । निज नाद करै ज्यों सरद-मेह ९४ देख्यौ मनिआसनसोभमान । तहँ हेमकलस कमला-सनान॥ देसी दो पावन पहुपमाल । भ्रमरावलि-बेढ़ी अतिविसाल रविमंडल देख्यौ तम दलत । उदयाचल ऊपर उदयवत । संपूरन तारापति-विमान । तारावलि मध्य विराजमान ९६ जलतिरत मनोहर मीन-जोट । देखे जिन-जननी पलकओट देसे चामीकरकलस दोय । अति झलकै वारिजउके सोय९७ देख्यौ कमलाकर कमलछन्न । बहु हंसी हसनसौ रवन्न । देख्यौ रयनायर गर्जमान । पुनि सिहपीठ मानिकनिधान ॥ फिर देख्यौ देव-विमान जोग । धुज घंटा झालरसौ मनोग प्रगट्यौ महि फोरि फनीद्रधाम मनिकंचनमय नयनाभिराम Sen SUBBEDSSSUEDEOSE ARRARARRIArease पार्श्वपुराण- అధలత कछु नाहि । पुनि रतनरासि देसी अनूप । इंद्रायुधवरन विचित्ररूप ॥ निर्धूम धनंजय दीपमान । ये देसे सोलह सुपन जान १०० दोहा। गजप्रवेस मुखकमलमैं, सुपनअंत अविलोय ॥ सुखनिद्रा पूरी भई, भयौ प्रात तम सोय ॥ १०१॥ पूर्व दिवाकर ऊगयौ, गयो तिमिर सुसदाय ॥ जैसे जैनसिधांत सुनि, भरमभाव मिट जाय ॥१०२॥ मंद तेज तारे भये, कटु दीखें ज्यों तीर्थंकरके उदय, पासडी छिप जाहि ॥१०॥ सूरजवंसी जे कमल, सिले सरोवरमाहिं। ज्यों जिनबिंब विलोकिकै, भविलोचन विकसाहिँ १०४ चंदविकासी कमल जे, विकसत भये न सोय । ज्यो अजान जिनवचन सुनि, मुदित मूल नहि होय१०५ चक्रवाक हरसित भये, ज्यो जिनमत-संजोग ॥ जीव सुमति पिय-नारिको, मिट्यौ अनादिवियोग १०६ घूघूगण भूतलविपै, आंधे भये असूझ ॥ जैनग्रन्थके रहसमैं, ज्यों परमती अबूझ ॥ १०७ ॥ कमलकोप मधुकर बंधे, छुटे जग्यौ सिर-भाग । जथा जीव जिनधर्मसौं, मुक्त होय भवत्याग ॥१०॥ पथिक लोग मारग चले, सूझे घाट कुघाट । जिनधुनि सुनि सूझै जथा, सुरग मुकतिकी बाट॥१०९॥ SPESIEHUVentsegu onoga STARARATRasrdastastrastrareranRISTOTRARASRASTRITTER baseasRERAR KHERS astrasRAFRPATRANAS पाँचवाँ अधिकार। ८७ , astraRasRastrasRARAreaseaserasmasha इहि बिध भयौ प्रभात सुभ, आनंद भयौ अतीव ॥ धर्मध्यान आराधना, करन लगे मवि जीव ॥११०॥ जिनजननी रोमाच तन, जगी मुदित मुस जान । किधौं सकटक कमलिनी, विकसी निसि अवसान १११ मंगलीक वाजिव धनि, सुनि बंदीजन-गान । उठी सेज तजि सुखमरी, धरयौ हियें सुभ ध्यान ॥११२॥ सामायिकविध आदरी, पंच परमपदलीन । और उचित आचार सब, मान-विलेपन कीन ॥ ११३॥ पहरे सुभ आमरन तन, सुंदर वसन सुरंग । कलपबेल जंगम किधौं, चली सखीजन संग ॥ ११४ ॥ राजसिहासन भूप तब, बैठे सभा-सुथान | देवी आवत देखक, कियौ उचित सनमान ॥ ११५ ।। अर्धामन बैठनि दियौ, जोग वचन मुख भास । यो रानी विकसत वदन, बैठी भूपति पास ॥ ११६ ॥ सभालोग तारे विविध, भूपति चांद सरूप ॥ श्रीवामादेवी तहां, दिपै चंद्रिकारूप ॥ ११७ ॥ स्वामी सोलह सुपन हम, देखे पच्छिम रैन । श्रीमुखरौं इनकी सुफल, कही अवनसुखदैन ॥ ११८॥ अस्वसेन भूपाल तब, बोले अवधि विचार । एकचित्त करि देवि तुम, सुनो सुपनफल सार ॥११९ ॥ EARSINESSISORORSEENSORSE ParamanandanaemastrasmastraRanastraRanam TARARARARARARARARAAAR पार्यपुराण- ८८ चीपई। धुरि गजेंद्रदरसनतें जान । होसी जगपति पुत्र प्रधान ।। महावृपम पुनि देख्यौ सोय । जगजेठो नंदन तुम होय १२० सेत सिंह-दरसनफल भास | अतुल अनंती सकति-निवास ॥ कमलामज्जनतें सुरईस । करै न्हौन कनकाचलसीस ॥१२१॥ पहुपदाम दो देखीं सार । तिसफल दुविध धर्मदातार ॥ ससित सकल लोकसुखदाय । तेजपुंज सूरजत थाय ॥१२२॥ मीन जुगल सब सुखमाज । कुंभविलोकन निधिराज सरवरतें सब लच्छनवान । सागरतें गंभीर महान ।। १२३॥ सिंहपीठौं मृगलोचनी । होय वाल तुम त्रिभुवनधनी ॥ सुरविमान देख्यौ सुस पाय । सुरगलोकतै उपजै आय १२४ नागराज-गृहको सुन हेत । जनमै मत्तिस्रुतिअवधिसमेत ॥ रतनरासिसै गुन-मनि-खान। कर्मदहन पावकतै जान॥१२॥ गजप्रवेस जो वदनमझार । सुपन-अत देख्यौ वरनार ॥ श्रीपारसजिन जगतप्रधान । गर्भ तुम्हारे उतरे आन ॥१२६॥ दोहा। सुनि वामादे सुपनफल, रोमाचित तन भूर ॥ सुवचन-जल सीचत किधौं, उगे हरप अंकूर ॥ १२७ ॥ SRAFRastastarastraa चौपई। अब सौधर्म सुरेस विचार । स्वामिगर्भअवसर निरधार ॥ कुलगिरि-कमलवासिनी जेह । श्रीआदिक देवी गुनगेह १२८ ARAARSC asRaharastra पाँचवाँ अधिकार। ८९ ARARAS तिन्हें बुलाय कह्यौ सुम भाव । अस्वसेन भूपति घर जाव ॥ वामादेवीके उरथान । तेवीसम जिन उतरे आन ॥१२९ ॥ तिनकी गर्भसौधना करो। निज नियोगसेवा मन धरो।। यह सुनि सब आनदित भई। इंद्रआन माथे धर लई॥१३०॥ सुरगलोक तजि आई तहां । बसै बनारसि नगरी जहां ॥ महाकांत तन लावनभरी। मानौं नभदामिनि अवतरी १३१ अंग अंग सब सजे सिगार । रूपसपदा अचर पर॥ चूडामनि माथे जगमगे । देखत चकाचौंध सी लगै ॥१३२॥ सुरतरुसुमनदाम उर धरी । अति सुवास दसदिसि विस्तरी।। श्रवनसुसद नेवर-झंकार। सोभा कहत न आवै पार ॥१३३ आय नृपतिके पायन नई । आयस मांगि महलमैं गईं। सिंहासनथित माय निहार। करि प्रनाम कानो जैकार १३४ दोहा। जननीदेह सुमावसौं, अतिनिर्मल अविकार ।। ताहि कुलाचलवासिनी, और करे सुचि सार ।। १३५ ।। कृष्णपास वैशास दिन, दुतिया निसि-अवसान । विमल विशासा नसतमे, बसे गर्भ जिन आन ॥१३६॥ जथा सीपसपुरविय, मोती उपजै आन । त्योंही निर्मल गर्भमै, निराबाध मगवान ॥ १३७ ॥ गर्भ बसैं पर-गर्भतें, वरतै भिन्न सदीव ।। घटते घटवरती गगन, क्यो नहिं भिन्न अतीव ॥१३८॥ JSRESEARSIGNESISE SONEBDSEISEX RRORasesawaasaasta - FranastraRasRestaste पार्श्वपुराण- . चौपई। तब जिन पुन्यपवनसे हले । चउबिध सुरके आसन चले चिहनदेख इंद्रादिकदेव । जानो अवधिज्ञानबल भेव ॥१३९॥ जिनवर आज गर्भ अवतरे । यह विचार उर आनंद भरे ।। चढ़ि विमान परिवारसमेत । चले गर्भकल्यानक हेत १४० जयजयकार करत बहुभाय । उच्छवसहित पिताघर आय॥ मातपिता आसन पर ठये । कचनकलस नहावत भये १४१ गर्भमध्यवरती भगवान । प्रनमैं देव धरो मन ध्यान ।। गीत निरत बाजिव बजाय । पूजा भेट करी सिर नाय १४२ यो सुरगन सब साधि नियोग । गये गेह करि कारज जोग इन्द्रराजको आयस पाय । रुचकवासिनी देवी आय १४३ जथाजोग सब सेवा करें । छिन छिन जिनजननीमन हरैं॥ रुचक दीप तेरहमो जाँ। रुचकनाम पर्वत है तहाँ १४४ सो चौरासी सहस प्रमान । इतने जोजन उन्नत जान ॥ इतनो ही विस्तीरन धार । दीप मध्यसों बलयाकार १४५ ताके सिखर कूट बहु लसैं । दिसाकुमारी तिनमैं बसें ॥ ते सब सेवन आवै माय । यह नियोग इनको सुखदाय १४६ कुसुमलता। आईं भक्ति नियोगिनि देवी, जिन जननीकी सेव भजें। कोई न्हान-विलेपन ठानैं, कोई सार सिंगार सजै॥१४७॥ कोई भूपण वसन समप्पैं, कोई भोजन सिद्ध करें। कोई देय तंबोल रवाने, कोई सुंदर गान करें ॥ १४८॥ SreesORRENGEORSESESEHRSSORSESS Israsmasan RashrasRashrartarastrastrastra पाँचवा अधिकार। , , , 650608RSESS05RSSSSS050se कोई रतन सिहासन था, कोई ढालें चमर बरो। कोई सुन्दर सेज बिछावें, कोई चा चरन करो ॥ १४९ ॥ कोई चन्दनसौं घर सीचं, सारे महल सुवास करी ॥ कोई आंगन देय बुहारी, झारै फूल-पराग परी ॥ १५० ॥ कोई जलक्रीडा कर रज, कोई बहुविध भेप किये। कोई मनिदर्पन कर धारै, कोई ठाडी सड़ग लिये ॥१५१॥ कोई थि मनोहर माला, आर्दै आन सुगंध सरी । कोई कलपतरोवरसौं ले, फल फूलनकी भेट धरी॥ १५२॥ कोई काव्य कथारसपोसैं, कोई हास्य विलास ठवें । कोई गावै बीन बजावै, कोई नाचत सीस नवैं ॥ १५३ ॥ दोहा। इह बिध सेवा करत नित, नवै मास सुभ य । प्रस्न करै सुरकामिनी, माता उत्तर देय ।। १५४ ।। अंतरलापि पहेलिका, बहिरलापिका एव । बिंदुहीन निरहोठपद, क्रियागुप्त बहुमेव ॥१५५॥ इत्यादिक आगमउकत, अलंकारकी जात ! अर्थगूढ गंभीर सब, समझाबैं जिन-मात ॥ १५६ ॥ चापई। तुमसी त्रिया कौन जग आन । तीर्थंकर सुत जनै महान ।। जगमैं सुभट कौनसे माय । जे नर जीतें विषय कपाय१५७ कौन कहावै कायर दीन । इन्द्रीमदमेटन बलहीन ॥ पंडित कौन सुमारग चलै । दुराचार दुर्मारग दलै ॥१५८॥ SEARSORSEECERSESSERIES FINARASRASTARATrantaSeasERSTORARASTARA . - BARRRARARARARLARI । पार्चपुराण- । माता मूरख कौन महंत | विषयी जीव जगत जावंत | कौन सत्पुरुप नरभव धार।जो साधे पुरुषारथ चार॥१५९॥ कौन कापुरुप कहिये मर्म । जो सठ साध न जानै धर्म ॥ धन्य कौन नर इस संसार । जोवन समै धरै व्रतमार॥१६॥ धिक किनकौं कहिये सर्वंग । जे धरि करें प्रतिग्या भंग ॥ कौन जीवके बैरी लोय । काम क्रोध हैं और न कोय १६१ जननी जगमैं कौन मलीन । पातकपंकमलिन मतिहीन ॥, कहो कौन नर नित्त पवित्त । ब्रह्मचर्यधारी दिढ चित्त १६२ कौन पसू मानुप आकार । जिनके हिरदै नाहिं विचार ॥ अंध कौन जो देव अदेव । कुगुरुसुगुरुको भेद न भेव १६३ बधिर कौनसे उत्तर देह । जैनसिधात सुनै नहिं जेह ॥ मूकनाम नर कैसै लहै । जो हित सांच वचन नहिं कहै१६४ लॉबी भुजा कौन करहीन । जिनपूजा मुनिदान न दीन॥ कौन पॉगले पॉवसमेत । जे तीरथ परसैं न अचेत ॥१६५॥ कौन कुरूप जननि कहु एह । सीलसिगार बिना नरजेह ॥ वेग कहा करिये बड़भाग। दिच्छागहन जगतको त्याग ॥ मित्र कौन हितवंचक होय । धर्म दिढ़ावै आलस खोय ॥ सत्रु कौन जो दिच्छालेत । विधन करै परमवदुसहेत १६७ जियको कौन सरन है माय । पंचपरमगुरु सदा सहाय ॥ इहिविध प्रस्न करै सुरनारि । माता उत्तर देहिं विचारि१६८ वामादेवी सहज प्रवीन । सकल मरम जानै गुनलीन ॥ '; पुरुपरतन उरअन्तर बहै। क्यों नहिंग्यान अधिकतालहै१६९ SesasResearssesEOS SSEMBER asensANARARAFTARAFTARAS पाँचवाँ अधिकार। ९३ PrastasRASRASAIRTELCASTARAMARPARANORMALA दोहा। निबसै निर्मल गर्भमैं, तीन ग्यान-गुनवान | फटिकमहलमैं जगमग, ज्यो मनि दीप महान ॥१७॥ उदयवान दिनकरसमय, पूर्व दिसा छबि जेम । त्रिभुवनपति-सुत उर धरै, सोहत जननी एम ।। १७१ ।। गर्मभार व्यापै नही, बिबली भंग न होय । देह न दीखै पीतछबि, और विकार न कोय ॥ १७२॥ ज्यों दर्पन प्रतिबिंबसौं, भारी कह्यौ न जाय । त्यो जिनपतिकै गर्भसौ, खेद न पावै माय ॥ १७३ ॥ कलपलतासी लसत अति, जननी छविसंयुक्त । मदहास कुसुमित भई, अब फलि है फल पुत्त ॥१७४॥ देवराजके वचनसौं, अहनिस हरखत अंग ॥ अलखरूप सेवै सची, लिये अपछरा संग ॥ १७५ ॥ पूरबवत नवमास लो, पंचाचरज अनृप । अस्वसेन भूपालघर, किये धनद सुखरूप ॥१७६ ॥ यों सुखसौं निसदिन गये, सेद नामकहिं नाहिं ।। यह सब पुन्य-प्रमाव है, यही रहस इसमाहि ॥१७७ ॥ इतिश्रीपार्श्वपुराणभाषाया गर्भावतारवर्णनं नाम पञ्चमोऽधिकार । RARARARARARARASGARRARARAAN - PosenseseDEOewsEOSectrटर ashaastrastaserasnase पार्श्वपुराण- छठा अधिकार। दोहा। रागादिक जलसौं भरयौ, तन तलाव बहु भाय । पारस-रवि दरसत सुखै, अघ सारस उड़ि जाय ॥१॥ गर्भ मास पूरन मये, नभ निर्मल आकार । पौष मास एकादसी, स्याम पच्छ सुभ बार ॥२॥ वामादेवी-पूर्व-दिसि, जनम्यौ जिनवर भान । मुदित मयौ त्रिभुवनकमल, असुभतिमिर अवसान ॥३॥ अस्वसेन नृप उदयगिरि, उगयौ बाल दिनेस । तीन ग्यान-किरनावली, लिये जगत परमेस ॥४॥ पद्धदी। जनम्यौ जब तीर्थंकर कुमार । तिङलोक बढ्यौ आनंदअपार दीखै नमनिर्मल दिसि असेस । कहिं आंधी मेह न धूलि लेस अति सीतल मद सुगंधि वाय। सो वहन लगी सुखसांतिदाय सब सुजनलोक हरपे विसेस । ज्यों कमल-सड प्रगटत दिनेस घंटा धन गरजे देवलोक । ज्योतिपिघर केहरिनाद थोक ॥ भवनालय बाजे सहज सस । वितर-निवास भेरी असख ७ ये अनहद बाजे बजे जान । जिनराज जनमअतिसय महान बहु कलपतरोवर पहुपवृष्टि । स्वयमेव करन लागे विसिष्ट ८ इंद्रासन कापे अकसमात । ये करन किधौं सारथ (2) सुजात जिनजनम भयौ भूलोकमाहिं। उच्चासन अब तुम जोग नाहि, జతకడతాడంత అలకలతలు Seresent RasrasRARoaste STARREARRERARIA छठा अधिकार। आनम्र भये मुनिमुकुट एम । श्रीजिनप्रति करत प्रनाम जेम ये चिहन देसि इंद्रादिदेव । तव अवधिग्यानबल जान भेव॥ निरधार बनारसि-नगर-थानातीरथपति जनम्यौ आज आन प्रमुजन्मकल्यानककरनकाज । उद्यम आरभ्यो देवराज ११ परिवारसहित सब इंद्रनाम । आये मिलि प्रथमसुरधाम ॥ नानाविध वाहन चढ़े जेह । जिनभगतिसलिलसिंचतसुदेह सप्तांग सैन तब चली एम। यह महाजलधिकी लहर जेम ।। हाथी रथ पायक वृषभ बाज । गायनि नर्तकि सेनासमाज एकेक सैनमै सात कच्छ तिहिमाहि प्रथम चर असी लच्छ फिर दुगुन दुगुन सात लो जान । इस भात सात सेना महान सौ कोर और छैकोर जोरि । अठसठ्ठ लाख ऊपर बहोरि॥ यह एकहस्ति सेनाममान । ऐसी ही सब सातौं समान १५ तह नागदत सुर आभियोग। सो करह विक्रिया निजनियोग। ताप्रति आग्या दीनी सुरिद । तिन कीनौं ऐरावत गइन्द १६ लख जोजन मान मतगईस । अति उन्नत देह उतंग सीस ।। सुमसेतवरन मनहरन काय । लीलागति धारै ललित पाय१७ मदजीवनकलित कपोल स्यामानस विद्रुमवरण मनोमिराम सब लसत सुलच्छन अगअग| नहि गिनीजाहिजिसछवितरंग गभीर धनाधनघोप जास । बहु सुदर सुड सुगंध सास ॥ सो कामसरूपी कामगीन । जादेखै मोहत तीन भौन ॥१९॥ घनघोरत घटा लबमान । मनि धूंधुरमाला कठथान । सोवनपाखर () सो दिपै देह । सपाजुत मानौ सरद मेह २० PASER 595 antastirastastARRRROREena पार्यपुराण- सौ वदन विराजत सोभवंत । एकेकवदनमैं आठ दंत ॥ प्रतिदंत सरोवर एक दीस । सरसरहें कमलिनी सौपचीस २१ एकेक कमालनी प्रति महान । पञ्चीस मनोहर कमल ठगन प्रतिकमल एकसौ आठपत्र | सोभावरनी नहिं जाय तब२२ पवनपर नाचें देवनारि । जगमोहत जिनकी छवि निहारि नव नवरस पोपै करत गान । लावन्यजलधि-बेलासमान२३ तिस हाथी ऊपर सचीसंग । सौधर्मसुरगपति मुदितअंग ॥ आरूढ भयो अति दिपत एम । उदयाचलमस्तक भानु जेम चंद्रोपम चामर छत्रसीस । दसजाति कलपसुरसहित ईस ॥ ईसानप्रमुस इमि देवराज । निज निज बाहनकों चले साज ॥ परिजनसमेत उर हरपमाव। जिन जनमकल्यानक करन चाव बाजे सुरदुंदभि विविध भेव। जयकार करै मिलि सकल देव२६ उपज्यो कोलाहल गगन थान। सब दिसि दीसै बाहन विमान आकाससरोवर अतिगंभीर इंद्रादि अमर तन तेज नीर॥२७॥ तहां विकसत मुख अपछरा एम। यह सिल्यौकमलिनीबागजेम इहि विध देवागम मयौ जान अवतरे बनारस नगर थान।२८। चंद्रादिजोतिपी पच जातादस भेद भवनवासी विरयात ॥ पुनि आठ जातके वान देव । सब आये हन्द्र समेत एव ।। २९ ॥ निज निज बाहन चढ़ि सपरिवा। जिनजन्म-महोच्छवहियधार तब पुरप्रदच्छिना सुरन दीन । अतिहरसत उर जयकार कीन बन बीथी मारंग गगन रोका सब ठाडे देवी देव थोक ।। सब सक सची मिलि भूप गेह । आये घर आगन भरोतेह ३१ 2055 RahasranamashasRVERRARRRRA छठा अधिकार। व इंद्रबधू अति रंजमान । सो गई गुपत जिनजनमथान ॥ सी जिनमात सपुत्त ताम । परदच्छिन दै कीनौं प्रनाम ३२ कुत-रागरेंगी सुखसेजमांझोज्यो बालक-मानुसमेत सांझ ॥ कर जोरि जुगल सिर नाय नाय।थुति कीनी बहु जानै न माय पुसनींद रची तब सची तास । मायामय राख्या पुत्र पास ।। करकमलन बालक-रतनलीन। जिन कोटिभानुछबि छीन कीन पुस उपजे जो प्रभु परसदेह । कवि-वानीगोचर नाहिं तेह ॥ प्रभुको मुखवारिज देस देख । हरसै सुररानी उर विसेख॥३५॥ वसु मगलदरव विभूति सार । दिसदिव्यकुमारी अग्रचार ॥ इहिविध सौधर्मसुरेसनार । आन्यौ सिवकन्या-वर कुमार ३६ देख्यौ हरि वालकचंद जाम | आनंदजलधि उर बढ्यौ ताम ॥ सिरनाय इद्र निज बार बार।थुति कीनी कर जुग सीस धार॥ छवि देखि तृपति नहि होय लेसा तब सहस आंख कीनी सुरेस करि नमस्कार निजगोद लीन्ह । ईसान इंद्र सिर छत्र दीन्ह ॥ तहाँ सनतकुमार महेद्र सोय । ए चामर ढालैं इन्द्र दोय ॥ ब्रह्मादि सुरगवासी सुरेस । जय नद वर्ध बोलें विसेस ॥३९॥ ना. सुर-रमनी रूपसान | गंधर्व करें जिनसुजसगान ॥ सुरबाजे बाजै बहुपकार । कर धरहिं किन्नरी बीन सा॥४० केई सुर श्रीजिनसुभगमेव । देसै भरि लोचन निर्निमेप ॥ केई यौं भाऐं सुरसमाज । हम देवजन्मफल लह्यो आज ४१ केई सरधायुत भये देव । मिथ्यात महाविप वम्यो एव ॥ इस भाति चतुरविध देवसघ । सब चले जोतिपीपटल लंघ॥ weSERSEENEURSEELSERESESEDRESSOSORDEY RAATRamanarasi ७ NaRAN पार्श्वपुराण- DaRORE दोहा। जोजन सहस निन्यानवै, सुरगिरि-सिखर उतंग । गये सकल सुरगन तहां, भूपनभूपित अंग ॥ ४३ ॥ चौपई। महामेरुके मस्तकभाग । पांडुकबन बहु धरै सुहाग ॥' जोजन सहस जासु विस्तार । सुर चारन खग करें बिहार४४ चहुँदिसि चार जिनालय तहां । सघन सासते तरुवर जहां मध्यचूलिका मुकट सरीस।सो उतंग जोजन चालीस॥४५॥ बारह जोजन जड़ विस्तार । आठमध्य अर ऊपर चार ॥ जाके ऊपर रजकविमान । रोमांतर नरछेत्रममान ॥४६॥ तिस ईसानदिसा सुभ थान । मनिमय सिला सासती जान पांडुकमाम फटिक उनहार । आकृति अर्ध चंद्रमाकार ४७ सौ जोजन आयाम अभंग । विस्तर आधी आठ उतंग ॥ सुरविद्याधर पूजत नित्त । भरतखंड-जिन-न्हौन-पवित्त ॥ तहां हेम-सिंहासन सार । रत्नजड़ित सो बलयाकार ॥ धनुप पांचसौ उन्नत जोय । भूमिभाग विस्तीरन सोय॥४९॥ ऊपर जास अर्ध विस्तार । जाके तेज मिटै अॅधियार ॥ तिसहीपर पदमासन साज । पूरबमुस थापे जिनराज ॥५०॥ इस औसर सोहैं इमि ईस। मानौ मेघ रतनगिरि सीस ॥ धुजा कलस दर्पन भुंगार। चमर छत्र सुप्रतिष्ठक तार ॥५१॥ मंगल दर्व मनोहर जहां । धरे अनादि-निधन ये तहां ॥ आसन दोय उभय दिस और जुगलइंद्र ठाडे तिहि ठौर॥५२॥ EVASENSEONE Jesus ashanasnamastana ६ RAINITIATRESrastras छठा अधिकार। ९९ चारौं दिस चारौं दिगपाल । जथाजोग जिनमज्जनकाल॥ सची सुरेद्र अपछरा-थोक । सब ठाड़े पांडुकबन रोक ॥५३॥ चौविध देव सड़े चहूंपास । जनम-न्हौन देखन हुल्लास ॥ कियौ महामंडप हरितहां। तीनलोक जन निवसैं जहा॥५४॥ कल्पकुसुममाला मनहार । लटके मधुप करें झंकार ॥ सुर वाजिब बजै बहुभाय । सुरभि सुगंध रही महकाय॥५५॥ मंगल मिल गावै सब सची । नाचै सुर-वनिता रस-रची। तब मज्जन आरंभ विसेस। उद्यम कियौ प्रथम अमरेस॥५६॥ दोहा। तहां कुबेर रतन खची, रची पेंडका पंत । मेरु सिखरसों सोहिये, छीरोदधिपरजंत ॥ ५७ ।। सुर-श्रेणी सोपान-पथ, पंचम सागर जाय । भर लाई कचन-कलस, चंदन-वरचित काय ॥ ५८ ॥ जोजन एक प्रमान मुख, वसु जोजन गभीर । यह मरजादा कलसकी, जिनशासनमैं वीर ॥ ५९ ।। मुकतमालमंडित लसै, कचन-कलस महत ।। नभवनिताके उरज ये, यो अति सोभावंत ॥ ६०॥ चीपई। सहस भुजा सुरपति तब करी । भूपनभूपित सांभा भरी ॥ इस औसर हरि सोहे एम । भूपनाग सुरतावर जेम ।।६१॥ कलस हाथ हरि लीनै जाम । भाजनाग सम सोभा ताम ॥ तीन बार कीनी जयकार । फलसोद्धारन मंत्र उचार ॥२॥ RESERESERSEARSWEURSETTERSSESENSENSERIES - professores consuSUEYSHUE RIERR पार्श्वपुराण- इहिविध श्रीसौधर्माधीस । ढाले कलस स्वामिके सीस ॥ तब सब इंद्र कियो जिनन्हौन ।अतुल उछाव बढ्यो जगमौन महा धार जिनमस्तक ढरी । मानौं नभगंगा अवतरी ॥ मुदित असंख अमरगन तवै। जैजैकार कियौ मिलि सबै ६४ उपज्यौ अति कोलाहल सार। दसदिस बधिर मईं तिहिं बार॥ भयौ असम औसर इहिं भाय । वचनद्वार बरन्यौ नहि जाय॥ दोहा। जाधारासौं गिरिसिखर, खंड खंड हो जाय । सो धारा जिनदेहप, फूल-कली सम थाय ॥ ६६ ॥ अप्रमान वीरजधनी, तीर्थंकर प्रभु होय । ताते तिनकी सकतिको, उपमा लगै न कोय ॥ ६७ ॥ नीलबरन प्रभु देहपर, कलस-नीरछबि एम । नीलाचलसिर हेमके, बादल बरस जेम ॥ ६८॥ चली न्हौनके नीरकी, उछल छटा नभमाहि ॥ स्वामिसंग अघबिन भई, क्यो नहि ऊरध जाहि ॥६९॥ न्हौनछटा तिरछी भई, तिन यह उपमा धार । दिगवनिता-मुख सोहियै, करनफूल उनहार ॥ ७० ॥ सोरठा जिनतनपरस पवित्त, भई सकल जगसुचिकरन । सो धारा मम नित्त, पाप हरो पावन करो ॥७९॥ चौपई। यो सुरेन्द्र मज्जन विधि ठान । फिर कीनौं गंधोदकन्हान ॥ सो जल लेय विनय विस्तरी । सांतिपाठ पढि पूजा करी७२ HESHESHEERESEREOVERSAREERSESMRIOSISEONE RashvasnaSRASREAstras RARastamanartanastrastastanararea Rastages छठा अधिकार। सक सची सुर आनंद भरे । यथाजोग सब कारज करे ।। परदच्छिन दीनी बहुभाय । बारंबार नये सिरनाय ॥ ७३ ॥ हरिगीत। सौधर्मपति अभिषेक कारक, न्हौनपीठ सुदंसनो । गंधर्व गायक निरतकारक, अपछरा-जन ससनो ॥ पंचम पयोनिध न्हौन-कुंड, असख सुर सेवक जहां ॥ तिस जन्ममगलकी बड़ाई, कहन समरथ चुध कहां ॥७४ , - चौपई। जन्महौनविधि पूरन भई । सकल सुरासुर देवनि टई ॥ अब इंद्वानी जिनवर अंग।निर्जल कियौ वसन-सुचिसंग ७५ कुकुमादि लेपन बहु लिये । प्रभुके देह विलेपन किये ॥ इहि सोभाइस औसरमाझ । किधों नीलगिरि फूली सांझ ७६ और सिगार सकल सह कियौ। तिलकत्रिलोकनाथके दियौ।। मनिमय मुकुट सची सिर धरचौ। चूडामनि माथे विस्तरयो७७ लोचन अजन दियौ अनूप । सहज स्वामिग अजितरूप ।। मनि कुडल कातन विस्तरे । कियों चदसूरज अवतरे ॥७८॥ कंठ कठिका मोतीहार । मुककामनि झूला उनहार ॥ भुजभूपनभूपित मुज करी। कटक मुद्रिका सोमित सरी ७९ कदिभूपन कीनों करि-थान । मनिमयछुद्रवटिकावान ॥ पग नेवर पहराये सार। जिनम रतन झलक झकार ॥८॥ दोहा। अंगअंग आभरनजुत, यह उपमा तिहिं काल ।। सुरतरुसम प्रभु सोहिये, भूपनभूपित-डाल ।। ८१ ॥ WERESOSERECEMEENSUSERSOSORRESERSEARSA .

Srastrast asti पार्श्वपुराण- SORS धनि धनि अस्वसेन भूपाल । जिनके जगगुरु जनम्यौ बाल ॥ कीरतबेल अधिक तुम बढ़ी। तीनलोकमंडप सिर चढ़ी १०२ धनि वामादेवी जगमाय । जिन जायौ नंदन जगराय ॥ तीनलोकतियसृष्टिसिंगार । धनि जननी तेरो अवतार १०३ तुम सम जगमैं और न आन । जिनदेवल सम पूज्य प्रधान ॥ यो थुतिकरि हरि हिये प्रमोद । बाल दिवाकर दीनौं गोद कही सकल पूरबली कथा । मेरु महोच्छव कीनौं जथा। तब निज नगरवि भूपाल । जन्म उछाह कियौ तिहिंकाल हरपत सब पुरजन परिवार । घर घर भये मंगलाचार ॥ घर घर कामिनि गावैं गीत । घर घर होय निरत-सगीत१०६ मंगलीक वाजे बहु भेव । बाजन लगे सकल सुसदेव ॥ श्रीजिनभवन न्हौन विस्तार । किये सकल मंगल आचार छिरक्यौ चंदन नगरमंझार । रतन साथिया धरे संवार ॥ जाचक-दान सुजन सनमान । जथाजोग सब रीति विधान॥ इहि बिध अस्वसेन नरनाह । कीनी पुत्र जनमउच्छाह ॥ पूरनआस भये सब लोय । दुसी दीन दीसै नहिं कोय १०९ दोहा । उदय भयौ जिनचंद्रमा, कुलनभतिलक महत ॥ सुखसमुद्रबेला तजी, बढ्यौ लोक-परजत ।। ११०॥ चौपई। तब बहु देवनसंग विसेस । आनंद-नाटक ठयौ सुरेस ॥ कर गान गंधर्व-समाज । समयजोग संघ वाजे साज ॥१११॥ FORSEERSOSem STEPSEUREEMEENRSERESERee IFRARARTHARASTRArea छठा अधिकार। देखें अस्वसेन नरनाथ । पुत्रसहित सब परिजन साथ ।। प्रथमरूप नव भव दरसाय । पुहपांजलि खेपी सुरराय ११२ ताडव नाम निरत आरंभ। कियो जगतजन करन अचंभ ॥ नट सरूप धारची अमरेस । रंगभूमि कीनौं परवेस ॥११॥ मंगलीक सिगार सवार । सब सगीत वेद अनुसार ॥ ताल मान विधिसहित सुभाय। रंग-धरा पर फेरै पाय११४ करें कुसुमबरसा नभ देव । देखि इद्रकी भक्ति सुभेव ।। बीना मुरज बांसली ताल । बाजे गेह गीतकी चाल ११५॥ करें किनरी मगलपाठ । बिरियां जोग बन्यौ सब ठाठ ।। नाचे भमे बहु भाय । मोरै हाथ कट कटि पाय ॥११६ अद्भुत तांडवरस तिहि बार । दरसावै जन अचरजकार।। सहस भुजा हरि कीनी तबै । भूपनभूपित सोहै सबै ॥११७॥ धारत चरन चपल अति चलें । पहुमी कांप गिरिवर हलैं॥ भमै मुकुट चकफेरी लेत । ताकी रतनप्रभा छबि देत ११८ बलयाकृति है झलकै सोय । चक्राकार अगनि जिमि होय छिनमें एक छिनक बहुरूप । छिन सूच्छम छिन थूलसरूप छिनमैं निकट दिसाई देय । छिनमैं दूर देह धर लेय ।। छिनआकासमाहिं संचरै । छिनमैं निरत भूमि पर करै १२० छिन छू तारावलि जाय । छिनक चदसौं परसै काय ॥ इंद्रजालवत यों अमरेस । दरसाई निज रिद्धिविसेस ॥१२१ हाथ अंगुलिनपै अपछरा । नाचें रूप रतनकी धरा ॥ अंग अग भूपन झलकाहिं । विकसत लोचन मुस मुसकाहि॥ HerSEMESTERIORSEESEREENETSMETERMERSEVERE - anRI amaharastravasana पाचपुराण- १०६ निरत-भेदविधि धार पांव । करै कटाच्छ दिखावें भाव ॥ बहुविधकला प्रकासे सार । सुरकामिनि दामिनिउनहार ॥ तिनसंजुत हरि सुरतरु एम । कलपलतागनबेढ्यौ जेम ।। यों नाटकबिधि ठान अनूप । तिहुंजग सक्र किये सुखरूप ।। स्वामिजनम-अतिसयपरताप | जिनवरपिता सभापति आप। इंद्र महानट नाचै जहां । तिस अवसर-बरनन बुधि कहां ॥ तब तहां मातपिताकी सास । पारस नाम सकल सुर भाख॥ राखि सुरासुर सेवा-जोग । चले देव सब साधि नियोग१२६ दोहा। इहिबिध इंद्रादिक अमर, जन्मकल्यानक ठान । बहुबिध पुन्य उपायकै, पहुंचे निज निज थान ॥१२७॥ हरगीति। इंद्रादि जन्मसनान जिनकौ, करन कनकाचल चढ़े। गंधर्व देवन सुजस गायौ, अपछरा मंगल पढे ॥ इहबिध सुरासुर निज नियोगै, सकल सेवाबिधि ठई। ते पासमभु मुझ आस पुरवो, सरन सेवकने लई ॥१२८॥ इति श्रीमत्पार्श्वपुराणभापाया जिनेन्द्रनन्मोत्सववर्णन नाम पष्ठोऽधिकार । ISevasiastrastastarastra BesproseUponsoresposorose BerswerEMEERE Mee BRARARAAReasta सातवाँ अधिकार। १०७ सातवॉ अधिकार । RVEDEISEDIORSPORTERS दोहा । पारस प्रभु तजि औरकौं, जे नर पूजनजाहि । कलपविरछकौं छांकि, बैठे थूहर छाहिं ॥१॥ चीपई। अब जिन बालचंद्रमा बढे । कोमल हास-किरन मुख करै ।। छिन छिन तात-मात-मन हरै । सुखसमुद्र दिन दिन विस्तरै अम्रत इंद्र अंगूठे देय । वही पोप पयपान न लेय ॥ देवी धाय हरप मन धरै । मजनमडनबिधि सब करें ॥३॥ केई मनिभूषन पहराय । करै अलकृत प्रभुकी काय ॥ केई कामिनि करें सिंगार । श्रीमुखचंद्र निहार निहार ॥४॥ केई रहसवती तिय आय । हस्त कमलसौं लेय उठाय ॥ मनिमय आंगनमांझ अनूप । बिचरै जिनपति बालसरूप ५ बहुविध देवकुमार मनोग । बालकरूप भये वयजोग ।। धुटियां गमन करैं तिनसाथ । ज्यों नछत्रगनमैं निसि-नाथ॥ कबहीं सैनासन सोवंत । ऊपर दिढ़ जिन यौं जोवंत ॥ अजों मुक्ति मो केतक परें । मानौं यह सका मन धरै ॥७॥ कवहीं पुहुमीपै जिनराय । कंपित चरन ठ8 इहि माय ॥ सहै कि ना धरती मुझभार । सके उर उपमा यह धार॥८॥ कवही स्वामि उझकि उठि चलें। विकसत मुख सब दुखकौं दलैं बांधैं मुठी अटपटे पाय । कैसे वह छवि बरनी जाय ॥ ९॥ MESERE Josh Deospross Sorgoa PHOTOS QARARA पाचपुराण- १०८ कबही रतन-भीतमैं रूप । झलकै ताहि ग. जगभूप ॥ जिनसौं जिन न मिलैंसर्वथा। करत किधौं कहवत यह वृथा कबही रतन-रेत कर लेत । करै केलि सुरकुमरसमेत ॥ कबहि माय विन रुदन करेय । देखें फेरि विहसि हँस देय११ कवही छोड़ि सनीकी गोद । जननी-अंक जायें मनमोद ॥ मातासौं मानैं अति प्रीति । बाल अवस्थाकी यह रीति१२ यौं जिन बालकलीला करै । त्रिभुवनजनमनमानिक हरै ॥ क्रमसौं बालभारती नाम । श्रीमुखकमल लसी अभिराम१३ अनुक्रम भई अंगबढ़वार । तब त्रिभुवनपति भये कुमार ॥ निरुपम कांति कला विग्यान । लावन रूप अतुलगुनथान१४ मति-श्रुति-अवधि-ग्यानबल देव । जानैं सकल चराचर मेवा सोमसुभाव सहज उपसंत । निर्मल छायकदरसनवंत ॥१५॥ इहिविध आठबरसके भये । तब प्रभु आप अनुव्रत लये ॥ देवकुमार रहैं संग नित्त । ते छिन छिन र0 जिन-चित्त १६ कवहीं गज तुरंग तन धरैं । तिनपै चढ़ि प्रभु जनमन हरैं ।। कवही हंस मोर बन जाहि । तिनसौं जगपति केलि कराहिं कवहीं जलक्रीडाथल गमैं । कबहीं बनविहारभू रमैं । कबही करैं किंनरी गान । सो प्रभु सुजस सुनै निज कान१८ कवहीं निरत ठवें सुर-नार । देसै जिन लोचनसुखकार ॥ कवही काव्यकथारस ठान । करै गोठ जिन बुधि बलवान१९ विना सिसाये बिन अभ्यास । सब विद्या सब कलानिवास॥ यो मुखअनुभव करत महान । भये पास जिन जोबनवान२० EasRSESENSESEARGESTEELSESSERTERESI ARRRARARASRARRRARARAQ सातवाँ अधिकार। दोहा । संपूरन जोबन समय, प्रभुतन सोहै एम ॥ सहजमनोहर चांदकी, सरदसमय छवि जेम ॥२१॥ चीपई। प्रभुके अंग पसेव न होय । सहज सदा मलवरजित सोय ॥ उज्जलवरन रुधिर जिमि सीर । सुसमचतुरसंठान सरीर २२ प्रयम सारसंहननसरुप । इंद्र-चद्र-मनहरन अनूप ॥ बिनाहेत तन सहज सुवास । प्रियहितवचन मधुर मुख जास अतुलदेह बल धरत महान । सहस अठोतर लच्छनवान ॥ तिनके नाम लिसौं कछु जोय । पढत सुनत सुससंपति होय हरिगीत। श्रीवच्छ सख सरोज स्वस्तिक, सक्र चक्र सरोवरो। चामर सिहासन छन तोरन, तुरगपति नारी नरो॥ सायर दिवायर कल्पवेली, कामधेनु धुजा करी ।। वरवजवान कमान कमला, कलस कच्छप केहरी ॥२५॥ गंगा गऊपति गरुड गोपुर, बेणु बीणा बीजना । जुगमीन महल मृद्गमाला, रतन दीप दिपै घना। नागेद्र-भुवन विमान अंकुस, बिरछ सिद्धारथ सही। भूपन पटवर हट्ट हाटक, चद्रचूडामनि कही ॥ २६ ॥ जम्बू तरोवर नगर सूवस (१) बाग जनमनभावना । नौनिधि नछन सुमेरु सारद, साल खेत सुहावना ॥ ग्रह मंगलाष्टक प्रातिहारज, प्रमुख और विराजहीं॥ परमितअठोतर सहस प्रभुके, अंग लच्छन छाजहीं ॥२७॥ KINGERBEESERECORRORSEVERESEREERSEEEEEEEER BEBASARARARARARA - as BRARRESTERSTORastane पार्चपुराण- ୟୟaସମସ୍ତ चौपई। अंतर अनंती अतुल महिमा, कथन दूर रहो कहीं। वहिरंग गुनथुति करन जगमैं, सकसे समरथ नहीं ॥ अब और जनकी कौन गिनती, दीन पार न पावना । पर पासप्रभुकी सुजसमाला, पहिरि दास कहावना ।२८) दोहा। सहस अठोतर लछन ये, सोभित जिनवरदेह । किधौं कल्पतरुराजके, कुसुम विराजत येह ॥ २९ ॥ . सुभ परमानूमय जिन अंग । नीलबरन नौ हाथ उतंग । छबि बरनत नहिं पावें ओर । त्रिभुवनजनमनमानिकचोर॥ सतसवत्सर आव प्रमान । अतुल असाधारन गुनथान । सत्रुमित्रऊपर समभाव । दयासरोवर सोमसुभाव ॥ ३१ ॥ सागरसौं प्रभु अति गंभीर । मेरुसिखरसौं अधिकै धीर ॥ कांति देखि लाजै मिरगाक । तेज विलोकि छिपै रवि रांक कल्पविरछसौ अधिक उदार। तिहुंजगआसापूरनहार ॥ यौं जिनगुनकौं उपमा कहीं। तीनकाल त्रिभुवनमैं नहीं ३३ दोहा। यों सुख निवसत पास जिन, सेवत कमला पाय । सोलह बरस प्रमान प्रमु, भये जगतसुखदाय ॥ ३४ ॥ समासिंहासन एक दिन, बैठे सहज जिनेंद्र ।। मुरनरमै यौं दिपैं, ज्यो उडगनमैं चद्र ॥ ३५ ॥ अस्वसेन भूपाल तब, बोले अवसर पाय । नेहसलिलभीजे वचन, सुनो कुमर जगराय ।। ३६ ।। HORSEENERSONSOUNSE SEASERSEMES ARRARARAAAKARARARARARRRRRRRHRRRRRRRAS SDEOS BRARARAFARA सातवाँ अधिकार । एक राजकन्या बरो, करो उचित व्यवहार। बंसल आगे चलै, सुख पावै परिवार ॥ ३७॥ नाभिराजकी आस ज्यौं, भरी प्रथम अवतार । तथा हमारी कामना, पूरन करो कुमार ॥ ३८॥ पितावचन सुनि प्रभु दियौ, प्रतिउत्तर तिहिं बार ॥ रिपभदेव सम मैं नहीं, देखौ हिये विचार ॥ ३९ ॥ मेरी सब सौ वर्ष थिति, सोलह भये बितीत । तीस वर्ष संजम समय, फिर मत कहो पुनीत ॥ ४० ॥ अल्पकालथिति अल्प सुख, अल्प प्रयोजनकाज। कौन उपद्रव संग्रह, समुझि देस नरराज ॥४१॥ सुन नरेंद्र लोचन भरे, रहे वदन बिलखाय । पुत्रव्याहवर्जनवचन, किसे नही दुसदाय ॥४२॥ चौपई। इहिविध मदराग जिनराय । निवसैं सबजीवनसुखदाय ॥ पूरवकथित कमठचर सीह । पाप करत मानी नहि चीह ४३ मुनिहत्यावस दुर्गति गयौ। पंचमनरकवास सो लयौ ॥ सत्रहजलधि तहां दुख सहे । वचन द्वार जो जाहि न कहे४४ थिति पूरन कर छोड़ी ठौर । सागर तीन भन्यौ फिर और पसुगतिमाहि विपत बहु भरी । वसथावरकी काया धरी४५ इहिविध भयौ पाए अवसान। काहू जन्मक्रिया सुम ठान ॥ महीपालपुर सोहै जहाँ। महीपालनप उपज्यो तहां ॥४६॥ Uuuuuuu astrasnastashatanARRIEDO FRasRISRAFe पार्श्वपुराण- अंतर अनंती अतुल महिमा, कथन दूर रहो कहीं। बहिरंग गुनथुति करन जगमैं, सकसे समरथ नहीं । अब और जनकी कौन गिनती, दीन पार न पावना। पर पासप्रभुकी सुजसमाला, पहिरि दास कहावना ॥२८॥ दोहा। सहस अठोतर लछन ये, सोभित जिनवरदेह । किधौं कल्पतरुराजके, कुसुम विराजत येह ॥ २९ ॥ चौपई। सुभ परमानूमय जिन अंग । नीलबरन नौ हाथ उतंग । छबि बरनत नहिं पावै ओर । त्रिभुवनजनमनमानिकचोर। सतसवत्सर आव प्रमान । अतुल असाधारन गुनथान ॥ सत्रुमित्रऊपर समभाव । दयासरोवर सोमसुभाव ॥३१॥ सागरसौं प्रभु अति गंभीर । मेरुसिखरसौं अधिकै धीर । कांति देखि लाजै मिरगांक । तेज बिलोकि छिपै रवि रांक कल्पविरछसौं अधिक उदार। तिहुंजगआसापूरनहार ॥ यौं जिनगुनकौं उपमा कहीं। तीनकाल त्रिभुवनमैं नहीं ३३ दोहा। यो सुख निवसत पास जिन, सेवत कमला पाय । सोलह वरस प्रमान प्रभु, भये जगतसुखदाय ॥ ३४ ॥ समासिहासन एक दिन, बैठे सहज जिनेंद्र ॥ सुरनरमैं प्रभु यौं दि, ज्यों उड़गनमैं चद्र ॥ ३५ ॥ अस्वसेन भूपाल तब, बोले अवसर पाय । नेहसलिलभीजे वचन, सुनो कुमर जगराय ।। ३६ ॥ WISEMEERESENSENT । acarastasecastARERARARASTRAINEERIAHARASTRA " १ RSHTes 25TRASRARIRasRARRIAsrase सातवाँ अधिकार। . RasadsTERastragrtisamaste एक राजकन्या बरो, करो उचित व्यवहार । बसबेल आगे चलै, सुख पावै परिवार ॥ ३७॥ नाभिराजकी आस ज्यों, भरी प्रथम अवतार । तथा हमारी कामना, पूरन करो कुमार ॥ ३८ ॥ पितावचन सुनि प्रभु दियो, प्रतिउत्तर तिहि बार ॥ रिपभदेव सम में नहीं, देखौ हिये विचार ॥ ३९ ॥ मेरी सब सौ वर्ष थिति, सोलह भये बितीत । तीस वर्ष संजम समय, फिर मत कहो पुनीत ॥ ४०॥ अल्पकालथिति अल्प सुख, अल्प प्रयोजनकाज । कौन उपद्रव संग्रह, समुझि देख नरराज ।। ४१ ।। सुन नरेद्र लोचन भरे, रहे वदन बिलखाय । पुत्रब्याहवर्जनवचन, किसे नही दुसदाय ॥ ४२ ॥ चौपई। इहिबिब मदराग जिनराय । निवसैं सबजीवनसुखदाय ॥ पूरवकथित कमठचर सीह । पाप करत मानी नहि चीह ४३ मुनिहत्यावस दुर्गति गयौ। पंचमनरकवास सो लयौ ॥ सत्रहजलधि तहां दुख सहे । वचन द्वार जो जाहि न कहे४४ थिति पूरन कर छोडी ठौर | सागर तीन भम्यो फिर और पसुगतिमाहि विपत बहु भरी । बसथावरकी काया धरी४५ इहिविध भयो पाप अवसान । काहू जन्मक्रिया सुम ठान || महीपालपुर सोहै जहाँ । महीपालनृप उपज्यौ तहां ॥४६॥ Sosovo S85DWNygeos NFERESENSETTESRSERESEASONEEMISERSEMESTER , Srastaseaseaserasnaste पार्श्वपुराण- ११२ पारसप्रभुकी वामा माय । इनको पिता भयौ यह राय ।। पटरानीके प्रानवियोग । उपज्यौ विरह बढ्यो चित सोग तपसी भेष धरयो दुख मान । पंचागनि साधै बनथान ॥ सीस जटा मृगछाला संग । भसम पीस लाई सब अंग ॥४८॥ भ्रमत बनारसिके उद्यान । आयौ कष्ट करत बिनग्यान ॥ इहि अवसर श्रीपार्वकुमार । गये सहज बन करन बिहार राजपुत्र बहु सुरगन साथ । गज आरूढ़ दिपैं जिननाथ ।। कर सुछंद बनकेलि अनूप । चले नगरकौं आनंदरूप ॥५०॥ देख्यौ मगमैं जननी-जात । तपै पंचपावक-नप गात ॥ सो समीप प्रभुकों अविलौय । चिंते चित रोपातुर होय ५१ मै तपसी कुलवंत महत । जननी-पिता पूज सब भंत ॥ अहो कुमरके यह आभिमान | विनय प्रनाम करै नहिं आन इतने ईधन कारन जान । लकडी चीरन लग्यौ अयान ॥ हाथ कुल्हाड़ी लीनी जबै । हितमितवचन चये प्रभु तबै ५३ भो तपसी यह काठ न चीर । यामैं जुगल नाग हैं बीर ॥ सुनि कठोर बोल्यौ रिस आन । मो बालक तुम ऐसा ग्यान हरिहर ब्रह्मा तुम ही भये । सकलचराचरग्याता ठये ॥ मनै करत उद्धत अविचार । चीरयो काठ न लाई बार ५५ ततखिन सड भये जुगजीव । जैनी बिन सब अदय अतीव दयासरोवर जिन तब कहै । तपसी वृथा गरब तू बहै ॥५६॥ ग्यान विना नित काया कसे । करुना तेरे उर नहि बसै ॥ तब सठ रोपवचन फिर चयौ । जननी जनकर तपसी भयो HowsersWEREDEOSSERS ।

सातवाँ अधिकार। - कर न मदवस विनयविधान । और उलट खंडै मुझ आन । पंच अगनि साधूं तन-दाह । रहूं एकपद ऊरधबॉह ॥५०॥ भूस प्यास बाधा सब सहू। सूखे पत्र पारने गहूं ॥ ग्यानहीन तप क्यों उच्चरै। क्यों कुमार मुझ निंदा करै।।५९॥ तब प्रभुवचन कहे हितकार । तुझ तपमैं हिसाअधमार ॥ छहों कायके जीव अनेक । नास होहिं नित नाहिं विवेक६० जहां जीववध होय लगार । तहां पाप उपजे निरधार॥ पाप सही दुर्गति दुस देह । यातै दयाहीन तप येह ॥६१ ।। ग्यान बिना सब कायकलेस । उत्तम फलदायक नहि लेस ॥ जैसे तुस कंडन (१) कन छार। यों अजान तप अफल असार६२ अंधपुरुप धन-दौमैं दहै। दौर मरै मारग नहिं लहै ॥ त्यों अजान उद्यम करि पचै । भवदावानलसौं नहि बचे ॥६॥ ऐसे ही किरिया बिन ग्यान । सो मी फलदायक नहि जान॥ जथा पंगु लोचनबल धरै । उद्यमविन दावानल जरै ॥ ६४ ॥ तातै ग्यानसहित आचार । निहचे वांछितफलदातार ॥ इहिबिध जिनमतके अनुसार । करि उत्तम तप यह हठ छार६५ मै तुझ वचन कहे हितकार । तु अपने उर देसि विचार ।। भली लगै सोई करि मित्त। ट्था मलीन करै मति चित्त॥६६॥ दोहा। नाग जुगल सुनि जिनवचन, कूरजीव अति निद ॥ देह त्यागि ततसिन भये, पदमावति धरनिंद ॥६७ ॥ ar PecarnamaARASR SIDHULE RORPORAssiataserasRE पार्चपुराण- ११४ Rastareastrase नाग जुगलके भागकी, महिमा कही न जाय । जिनदरसन प्रापति भई, मरन समय मुसदाय ॥ ६८॥ चौपई। घर आये श्री पार्सजिनंद सुरनरनेत्रकमलिनीचंद ॥ समय पाय तपसी तजि देह । भयौ जोतिपी संवर तेह ॥६९॥ देसो जगमैं तपपरभाव । ग्यान बिना बांधी सुरआव ॥ जे नर करें जैनतप सार । तिन् कहा दुर्लभ संसार ॥७॥ स्वामी मगन सुखोदधिमाहिं । हर्प विनोद करत दिन जाहिं।। प्रभुके इष्ट-वियोग न होय । सोगसँजोगन कबही कोय ॥७१।। वायपित्तकफजनित विकार । सुपनै होय न सोच विचार ॥ जरान व्याप तेज न जाय।ना मुखकमल कभी कुम्हलाय ७२ होहि नहीं दुसकारन आन । पुन्यउदधिवेला भगवान ।। यो सुखभोग करत दिन गये। तब जिन तीस वर्षके भये ॥७३॥ नृप जयसेन अजुध्याधनी । भक्ति प्रीत प्रभुसौं अति धनी॥ तुरगादिक बहु वस्तु अनूप । पठई विनय वचन कहि भूप॥७४॥ राजदूत चलि आयौ तहां । सभा थान जिन बैठे जहां ।। हेमासन पर सोहैं एम। हिमगिरिसिखर स्यामधन जेम॥७॥ देखि दूत रोमाचित भयो । बहुविध चरन कमलकौं नयौ ।। मान्यौ सफलजन्म निज सार। त्रिभुवनपति परतच्छ निहार७६ धरी भेट जो राजा दई । विनय प्रनाम बीनती चई ॥ तब पृ॰ तहां त्रिभुवनधनी। संपतिनगरअजोध्यातनी ॥७७॥ CHOTECENERGRESERSONSERTEENAGERSEENE Hearniastasnastastras RAPRGERRRRRRA सातवाँ अधिकार। ११५ कहै दूत कर जुग सिर धार । बरनै तीर्थकर अवतार ।। मोख गये वरनै तिहिठामासुनि स्वामी चिंत उर ताम ॥७॥ बेली चाल । सुनि दूत वचन वैरागे । निज मन प्रभु सोचन लागे॥ मैं इंद्रासन सुसकीनें । लोकोत्तम भोग नवीनैं ।। ७९ ॥ तब तृपति भई तहां नाही । क्या होय मनुपपदमाही ॥ जो सागरके जलसेती । न बुझी तिसना तिस एती ॥८॥ सो डाभ-अनीके पानी। पीवत अब कैसे जानी ॥ इंधनसौं आगि न धाप । नदियौ नहि समुद समापै ॥८॥ यों भोगविपै अतिभारी । तृपते न कभी तनधारी ॥ जो अधिक उदय ये आवै । तो अधिकी चाह बढ़ावै ८२ जो इनसौं तृपति विचारै । सो वैसानर घृत डारै ॥ इन सेवत जो सुख पाच । सो आकौं आंच उम्हावै ॥८३॥ ये भीम भुजंग सरीखे । भ्रम-भाव-उदय सुभ दीखे ॥ चासतहीके मुख मीठे । परिपाक समय कटु दीठे ॥ ८४ ॥ ज्यो साय धतूरा कोई । देख सब कचन सोई॥ धिक ये इद्री-सुख ऐसे । विपबेल लगे फल जैसे ॥ ५॥ इनहीं वस जीव अनादी । भव भाँवर भ्रमत सवादी॥ इन ही धस सीस न मानै । नानाविध पातक ठाने ।॥८६॥ थिर जंगम जीव सघारै । इनके वस झूठ उचारै ॥ पर चोरीसों चित लावै । परतिय संग सील गमावै ॥ ८७॥ SEEMBERSONSIBISWASISEASINEEPRSeries PLORERELESE0sertOSSOSesese ११६ पाचपुराण- परिग्रह-तिसना विस्तारै । आरंभ उपाधि विचारै ॥ इत्यादि अनर्थ अलेसै । करि घोर नरकदुख देखे ॥८॥ ये ही सुखपर्वतकेरे । जग फोरन वज्र बडेरे ।। ये ही सब दोपभंडारे । धन-धर्म-चुरावनहारे ॥ ८९ ।। मोही जन मोहैं योहीं। ये आदरजोग न क्यों हीं॥ इनसौं ममता तज दीजै । पर त्यागत ढील न कीजै ॥१०॥ सामान पुरुष जग जैसे । हम खोये ये दिन ऐसे ॥ , संजम बिन काल गमायौ । कछु लेखेमैं नहिं लायौ ॥११॥ ममतावस तप नहि लीनौं । यह कारज जोग न कीनौं । अब खाली ढील न कीजै । चारित-चिंतामनि लीजै ॥१२॥ दोहा । भोगविमुस जिनराज इमि, सुधि कीनी सिवथान । भावै बारह भावना, उदासीन हितदान ॥ ९३ ॥ चौपई । द्रव्य सुभाव बिना जगमाहि । पर ये रूप कछु थिर नाहिं। तनधन आदिक दीखत जेह। कालअगानि सब ईंधन तेह ९४ भववन,भ्रमत निरंतर जीव । याहि न कोई सरन सदीव ।। व्योहार परमेठी-जाप । निहचे सरन आपकौं आप ॥ ९५॥ सूर कहावै जो सिर देय । खेत तजै सो अपजस लेय ॥ इस अनुसार जगतकी रीत । सब असार सब ही विपरीत९६ तीनकाल इस त्रिभुवनमाहिं । जीव-संगाती कोई नाहि ॥ एकाकी सुस दुस सब सह । पाप पुन्य करनीफल लहैं ९७ HypobyHNivensostres RastrasmastarasraveiastraTONAR

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marriaspree ११८ पावपुराण- तीर्थंकर जब विरकत होय । हर्पवंत तब आवै सोय ॥ और कल्यानक करें प्रनाम सदा सुखी निवसैं निज धाम१०९ हाथ जोरि बोले गुनकूप । थुतिवायक अरु सिच्छारूप ॥ धनि विवेक यह धन्य सयान । धनि यह औसर दयानिधान ।। जान्यौ प्रभु संसार असार । अथिर अपावन देह निहार ।। इंद्रिय सुस सुपने समदीस । सो याही विध हैं जगईस ॥११॥ उदासीन असि तुम कर धरी । आज मोहसेना धरहरी ॥ बढ़यौ आज सिवरमनि सुहाग। आज जगे भविजन सिरभाग जग प्रमादनिद्रावस होय । सोवत है सुधि नाहीं कोय ॥ प्रभु धुनिकिरन पयासै जबै । होय सचेत जगै जन तबै ॥११३॥ यह भव दुस्तर पारावार । दुखजलपूरित वार न पार ॥ प्रभु उपदेस पोत चढ़ि धीर । अब सुखसौं जैहैं जन तीर ११४ सिवपुरि पौर भरमपट जहां । मोह मुहर दिढ कीनी तहां ॥ तुम वानी कूची कर धार । अब भवि जीव लहैं पयसार११५ स्वयबुद्ध बोधन-समरत्थ । तुम पर प्रतिबुध वचन अकत्थ ॥ ज्यो सूरज आगे जिनराज । दीप दिसावन है बेकाज॥११६॥ हम नियोग औसर यह माय । तातें करें वीनती आय ॥ धरिये देव महाबत भार । करिये कर्मसत्रुसंधार ॥११७॥ हरिये भरम तिमिर सर्वथा । सूझै सुरगमुकतिपथ जथा ॥ यो थुति करि बहुमाव दिढाय । बारबार चरनन सिर नाय साधि नियोग गये निजथान | लोकांतिक सुर बड़े सयान ।। अब चौबिध इद्रादिक देव । चढ़ि निज निज बाहन बहुमेव१९ gaserosynergoose VERSE shraserasnamastrasahasranasranas taseastARRsnaserasnasela सातवाँ अधिकार। हर्पित उर परिवारसमेत । आये तृतिय कल्यामक हेत। सुर वनिता ना. रस भरी। गावै मधुरगीत किन्नरी ॥१२०॥ बाजे विविध बजे तिस बार। करै अमरगन जय जय कार सोवन-कलस भरे सुरराय। विमल छीरसागर-जल लाय १२१ हेमासन थापे जिनराय । उच्छवसहित न्हौन-विधि ठाय ॥ भूपन वसन सकल पहिराय । चदनचर्चित कीनी काय १२२ इस औसर प्रभु सोहैं एम । मोखवधूवर दूलह जेम ॥ कहि वैराग वचन जिन तचै । प्रतिबोधे परिजन जन सबै ॥ अति हठसौं समझाई माय । लोचन मरे बदन विलसाय ।। विमला नाम पालकी साज । आनी इंद्र चढे जिनराज१२४ पहले भूमिगोचरी राय । सात पैंड़ लीनी सुसदाय ।। फिर विद्याधर राजा रले । पैंड सात ही ते ले चले ॥१२५॥ पीछे इंद्रादिक सुरसंघ | कांधै धरी चले पुर लय ।। ना अति निकट न दीसै दूर । नभ मारग देखैजन भूर१२६ दोहा। जिस साहयकी पालकी, इंद्र उठावनहार ॥ तिस गुनमहिमा-कथन अब, पूरन होउ अपार ॥१२७॥ चौपई। यो सुर नर हरपित भये । अस्व नाम वनमै चलि गये । बडतरुत्तले सिला सुभ जहां । कीनों सची सांथिया तहां ॥ उतरे प्रभु अति उत्तम ठाम । सात भयौ कोलाहल ताम ॥ सनुमित्र ऊपर समभाव । तिन-कंचन गिन एकमुभाव १२९ SSEURSEVESENSEMESENTENTIONSEEEEERSEMESS SUSU SE भर RARARARARARI पार्श्वपुराण- सोमभाव स्वामी उर धार । पटभूपन सब दीनै डार ॥ उदासीन उत्तरमुख भये । हाथ जोर सिद्धन प्रति नये १३० दुविध परिग्रह तजि परमेस । पंच मुष्टि लोचे सिरकेस ।। सिवकामिनिकी दूती जोय । धरी दिगंबरमुद्रा सोय ॥१३१॥ दोहा। सोहै भूपन वसन बिन, जातरूप जिनदेह ॥ इद्र नीलमनिकौ किधौं, तेजपुंज सुभ येह ॥ १३२ ॥ पोह प्रथम एकादसी, प्रथम पहर सुभ वार ॥ पद्मासन श्रीपार्सजिन, लियौ महावतभार ॥ १३३ ॥ और तीनस छत्रपति, प्रभुसाहस अविलोय ॥ राज छारि संयम धरयौ, दुखदावानल-तोय ॥ १३४ ।। तब सुरेस जिनकेस सुचि, छीरसमुद पहुँचाय ॥ कर थुति साधनियोग सब, गयौ सुरग सुरराय॥१३५॥ चौपई। अब स्वामी बनथान मनोग । तेला थापिदियौ जिन जोग। अट्ठाईस मूलगुन भाख । उत्तरगुन चौरासी लाख ॥ १३६ ॥ सब प्रभु धरे परम समचेत । अचल अग मुख मौनसमेत ॥ यो बन बसत उपन्यो जान । संजमबल मनपर्जयग्यान १३७ सोरठा। लघु वयमैं जगपाल, कियौ निवीरज कामदल ॥ धीरज घनुप समाल, तिनके पदनीरज नमूं ॥१३८॥ इति श्रीपार्श्वपुराणभापाया भगवद्वैराग्यप्राप्तदीक्षाकल्याणकवर्णन नाम सप्तमोऽधिकार । SSORSEENSEResses rwasnamastrastrastrasnastassiasmosranasRes N RANARARAARRRARARASTE आठवाँ अधिकार। १२१ आठवॉ अधिकार। marrinareasuatrain speeEUROSSESISERSee सोरठा। जाममुकौ जसहंस, तीनलोक पिंजरै बसे ॥ सो मम पाप विधंस, करौ पाम परमेस नित ॥ १ ॥ चौपई। अब जिन उठे जोग-अवसान । देहहेत उद्यम उर आन । परमउदास अधोगत दीठ । सहजसांतमुद्रा मनईठ ॥२॥ दया-नीर-निर्मल-परबाह । गुलर-खेटपुर पहुंचे नाह ।। लाभ अलाभ बराबर धार । निर्धन धनको नाहि विचारा॥ ब्रह्मदत्त भूपति बड़भाग । प्रभुकौं देसि बढ्यौ उरराग ॥ उत्तमपात्र सकलगुनधाम । करि मनाम पड़िगाहे ताम ॥४॥ हेमासन थाप्यौ नरराय | प्रासुक जल परछाले पाय ।। आठभांति पूजा विस्तरी । हाथ जोर अंजुलि सिर धरी॥५॥ मन-तन-वायक सुद्धसरूप । नौ दातागुनसजुत भूप । सुद्ध अन्न दीनौ परवीन । प्रासुक मधुर दोपदुखहीन ॥ ६॥ उत्तमपात्र दानविधि करी । तीनभवन कीरति विस्तरी॥ पचाचरज भये नृपधाम । फिर स्वामी आये पन-ठाम ॥७॥ करें घोर तप साधैं जोग । दरसन करत मिटै सब सोग ॥ अचल अंग मुस सोहै मान । एकचित्त निजपद चितौन ॥८॥ RSONSERSONSORSEDRSESSESesereles caserana १२२ पार्श्वपुराण- चौपई। RasRIRasna ज्यों समुद्रजल विगतकलोल।अथवा सुरगिरिसिखर अडोल॥ तथा नीलमनि-प्रतिमा येह । यों अकंप राजै जिनदेह * ॥९॥ वैर भाव छाड्यौ वन जीव । प्रीत परस्पर करैं अतीव ॥ केहरि आदि सतावै नाहिं । निर्विप भये भुजग बनमाहिं १० सील सनाह सजौ सुचिरूप । उत्तरगुनआभरन अनूप । तपमय धनुप धरयौ निजपान । तीन रतन ये तीखन वान११ समताभाव चढे जगसीस । ध्यान कृपान लियो कर ईस ॥ चारित-रंग-महीमैं धीर । कर्मसत्रुविजयी वरबीर ॥ १२॥ दोहा। स्वामीकी सबपर दया, सबहीके रछपाल ॥ जगविजयी मोहादि रिपु, तिनके प्रभु छयकाल॥ १३ ॥ सोरठा। देसो पौन प्रचंड, दूब न खडै दूबरी । मौटे बिरछ बिहंड, बड़े बड़ो ही बल करैं ॥१४॥ दोहा । यो युद्धर तप करत अति, धर्मध्यानपदलीन ॥ चार मास छदमस्त जिन, रहे रागमलहीन ॥१५॥ ** उक्त च- नोकिश्चित्करकार्यमस्ति गमनप्राप्य न किश्चिदृशो- ईश्य यस्य न कर्णयो किमपि हि श्रोतव्यमप्यस्ति न । तेनालम्बितपाणिरुडिझतगतिर्नासाग्रदृष्टी रह । सम्प्राप्तोऽतिनिराकुलो विजयते व्यानकतानो जिन । RSORSERSOSOR ESEARSeeeeeese , PrasRATARARIATRAPARIARIYA astrastraRPIRasRGEFTERESE आठवाँ अधिकार। १२३ चौपई। एक दिवस दीच्छावन जहां । जोगलीन प्रभु निवसैं तहां ॥ काउसग्ग तन विगतविरोध । ठाडे जिनवर जोगनिरोध १६ संवर नाम जोतिषी देव । पूरवकथित कमठचर एव ॥ अटक्यौ अंबर जात विमान । प्रभु पर रह्यौ छत्रवत आन१७ ततसिन अवधिग्यानबल तबै । पूरव बैर सँभालो सबै ॥ कोप्यो अधिक न थांभ्यो जाय । राते लोयन प्रजुली काय१८ आरंग्यौ उपसर्ग महान | कायर देसि भजै भयमान ।। अंधकार छायौ चहुंओर । गरज गरज बरसै घन घोर ॥१९॥ झरै नीर मुसलोपम धार । वक्र बीज झलकै भयकार ॥ चूडे गिरि तरुवर बनजाल । झंझा वायु बही विकराल ॥२०॥ जल थल भयौ महोदधि एम । प्रभु निवसैं कनकाचल जेम ॥ दुष्ट विक्रियाबल अविवेक । और उपद्रव करे अनेक ॥ २२ ॥ BRAnnastARARARARARAN छप्पय। किलकिलंत बेताल, काल कजल छवि सजहि । भौं कराल विकराल, भाल मदगज जिमि गजहि ॥ मुंडमाल गल धरहि, लाल लोयननि डरहि जन । | मुख फुलिंग फुकरहि, करहिं निर्दय धुनि हन हन । इहि विध अनेक दुर्भप धरि, कमठजीव उपसर्ग किय । तिहुंलोकवंद जिनचंद्रमति, धूलि डाल निज सीस लिय २२ दोहा। इत्यादिक उतपात सब, वृथा भये अति घोर । जैसे मानिक दीपकौं, लगै न पौन झकोर ॥ २३ ॥ SOSORS RRRRRRoastasease पार्श्वपुराण- प्रभु चित चल्यौ न तन हल्यौ, रल्यौ न धीरज ध्यान । इन अपराधी क्रोधवस, करी वृथा निज हान ॥ २४ ॥ पावक पकर हाथसौं, अवसि हाथ जलि जाय । परके तन लागै नहीं, वाके पुन्यसहाय ॥ २५ ॥ पानी विपयकपायवस, कौन कौन विपरीत । करत हरत कल्यान निज, जलौ जलौ यह रीत ॥२६॥ प्रभु अचित्य-महिमा-धनी, त्रिभुवनपूजित-पाय | तिनके यह क्यों संभवै, सुर उपसर्ग कराय ॥ २७ ॥ इहि विध जो कोई पुरुप, पूंछ संसय राखि । ताके समुझावन निमित, लिखू जिनागम साखि ॥२८॥ , चौपई। अवसर्पनि उतसर्पनि काल । होंहि अनंतानंत विसाल ।। भरत तथा ऐरावतमाहिं । रॅहटघटीवत आवै जाहि ।। ३१ ।। जब ये असंख्यात परमान, बीते जुगम सेत भू थान ।।। तब हुंडावसर्पनी एक । परै करै विपरीत अनेक ॥ ३२॥ ताकी रीत सुनो मतिवंत । सुखमा-दुखम कालके अंत ॥ बरखादिकको कारन पाय । विकलवय उपजै बहु भाय॥३३॥ कलपबिरछ विनसें तिहि बार । घरतै कर्मभूमि-ब्योहार ॥ प्रथम जिनेस प्रथम चक्रेस । ताही समय होहि इहि देस॥३४॥ विजयभंग चक्रीकी होय । थोड़े जीव जाहि सिवलोय ॥ चक्रवर्ति विकलप विस्तरै । ब्रह्मवंसकी उतपति करे ॥३५॥ REONSEREMIERREENSEMESEAREERSEASOTEIN STARRIAstrasanaSTARTISTIANTRARTAINE आठवा अधिकार। १२५ पुरुप सलाका चौथे काल । अहावन उपजें गुनमाल ॥ नवम आदि सोलह परजंत । सात तीर्थमैं धर्म नसंत ॥३६॥ ग्यारह रुद्र जनम जहँ धरैं। नौ कलिनिय नारद अवतरै ॥ सत्तम तेईसम गुनवर्ग । चरमजिनेश्वरको उपसर्ग ॥३७॥ तीजे चौथेकालमझार। पचममैं दीसै बढवार । विविध कुदेव कुलिंगी लोग । उत्तमधर्म नासके जोग ॥३८॥ सबर विलाल भील चंडाल । नाहलादि कुलमैं विकराल ॥ कल्की उपकल्की कलिमाहि । बयालीस लै मिथ्या नाहिं ३९ अनावृष्टि अतिवृष्टि विस्यात । भूमिवृद्धि वज्रागनिपात ॥ ईतभीत इत्यादिक दोप । कालप्रभाव होहिं दुसपोप ॥४०॥ दोहा। यो त्रिलोकप्रज्ञप्तिमैं, कथन कियौ बुधराज । सो भविजन अवधारियो, संसयमेटनकाज ॥४१॥ गीता। तीसरे कालहें मुकति साथै, प्रथमतीर्थंकर सही। पुनि तीन तीरथ होहिं चक्री, एक हरि जिनवर वहीं ॥ इस भाति चौथे जुग सलाका पुरुष ऊने अवतरैं। हुंडावसर्पिनिमैं अठावन जीव वासठ पद धरै ॥४२॥ fanananaRARARARE चौपई। तब फनेस आसन कंपियौ । जिनउपकार सकल सुधि किया। ततसिन पदमावति ले साथ आयौ जहॅ निवसैं जिननाथ४३ 5 DESIREONSISEARRORSCIEEEEER 50 Rastaste पावपुराण- करि प्रनाम परदछना दई । हाथ जोरि पदमावति नई ॥ फनमंडप कीनौं प्रभुसीस । जलबाधा व्यापै नहिं ईस ॥४४॥ नागराज सुर देख्यौ जाम । भाज्यौ दुष्ट जोतिपी ताम ॥ हीनजोग सूधी यह बात । भागि जाय तबही कुसलात ॥४५॥ अब सब कोलाहल मिट गये । प्रभु सत्तमथानक थिर भये॥ विकलपरहित चिदातमध्यान । करै कर्मछयहेत महान॥४६॥ सात प्रकृति चौथे गुनठान । पहले नास करीं भगवान ॥ अब ह्यां धर्मध्यानबल धीर । तीन प्रकृति जीती बरबीरा४७। प्रथम सुकल पदसौं परनये । खिपकसेनिमारग पर ठये ॥ प्रकृति छतीस नवें छय करी । दसवै लोभप्रकृति प्रभु हरी ४८ दोहा। एकादसम उलंघिपद, चढे बारहैं थान ॥ कर्मप्रकृति सोलह तहां, नास करी अवसान ॥ ४९ ॥ चौपई। इहिबिध त्रेसठ प्रकृति निवार । घाते कर्म धातिया चार ॥ चैतअंधेरी चौदस जान । उपज्यौ प्रभुके पंचम ग्यान १५०॥ लोकालोक चराचर माव । बहुविध परजयवंत सुभाव ॥ ते सब आन एक ही बार । झलके केवलमुकुरमंझार ॥५१॥ भये अनंतचतुष्टयवंत । प्रगटी महिमा अतुल अनंत ॥ दिव्य परम औदारिक देह । कोटि भानुदुति जीती जेह ५२ अलौकीक अद्भुत संपदा । मंडित भये जिनेसुर तदा ॥ वचनअंगोचर महिमा सार । बरनन करत न पइये पार ॥५३॥5 WWEENSHERSOCIETIERRESENTERNE HORSE0s0ORS60 resmoRORRORATORashAstcasease आठवाँ अधिकार। १२७ BREsna दोहा। पांच हजार प्रमान धनु, उपजत केवलग्यान ॥ अतरिच्छ प्रभु तन भयौ, ज्यों ससि अंबरथान * ॥५४॥ चौपई। प्रकटी केवल रविकिरन जाम। परिफूल्यौ त्रिभुवन कमल ताम आकास अमल दीसै अनूपा दिसि-विदिसि भई सब विमलरूप सुरलोक बजै घंटागरिष्ट । तर करन लगे तहां पुहपविष्ट । इंद्रासन कांपे अतिगरीस । आनम्र भये मनिमुकुट सीस ५६ इत्यादिक बहुविध चिहन चार । प्रभु केवलसूचक भये सार॥ तब अवधि जोडि जान्यौ सुरेस । छय करे कर्म पारसजिनेस सिहासन तजि निज सीस नाय । प्रनमो परोख सुख उरन माय इंद्रानी पूछ कहहु कंत । क्यो आसन तजि उतरे तुरत॥५८॥ किस कारन स्वामी नयौ सीस । याको प्रतिउत्तर देहु ईस ।। तब बोले विकसित देवराज।प्रभु उपज्यो केवलग्यान आज।। ऐरावतगज सजि सपरिवार । प्रथमेंद्र चल्यो आनंद अपार ।। बाजे बहु पदह पयान-भेर । सब बरनन करत लगै अबेरा॥६॥ ईसानप्रमुख सब स्वर्गनाथ । निजबाहन चढि चढ़ि चले साथ। हरिनाद सुन्यौ जोतिपी देव।चंद्रादि चले तब पंच भेव ॥६॥ भावन-घर बाजे सख भूरि । दसविध सुर निकसे हरप पूरि ।। वसुविंतर-घर गरजे निसान।योंपरिजन सब कीनों पयान ६२ *उक्त च गाथा- जादे केवलणाणे परमोदार जिणाण सव्वाण । गच्छदि उबरे चाबा पचसहस्साणि वसुहाओ। ఆడవాడలాజలతత 3RDS SarastsRGAR पार्चपुराण- १२८ यों चली चतुरबिध सुरसमाज । जिन-केवलपूजा करन काज॥ अंबर तजि आये अवनिमाहि। जहें समोसरन धुज फरहराहिं जो सुरपतिको उपदेस पाय । धनपतिने कीनों प्रथम आय ।। वर पंचवरन मनिमय अनूप । जगलछमीको कुलगृह सरूप६४ दोहा। समोसरनकी संपदा, लोकोत्तर तिहुं भौन वचनद्वार बरनै तिसै, सो बुध समरथ कौन ॥ ६५॥ सोरठा। पै थल अवसर पाय, धर्मध्यानकारन निरखि ॥ लिख्यौ लेस मन लाय, पढ़त सुनत आनँद बढ़े ॥६६॥ पहले गोलपीठिका ठई । इंदनीलमनिमय निर्मई॥ पांच कोस चौडी परवान । तीनलोक उपमा नहिं आन॥ जाके चहुंदिस गिरदाकार । बनी पैंडिका बीसहजार ॥ हाथ हाथपर ऊंची लसैं । नभपरजंत देखि दुख नसें ॥६७॥ तापर धूलीसाल उतंग । पंचरतनरजमय सरवंग ॥ विविध वरनसौं वलयाकार । झलकै इन्द्रधनुप उनहार॥६८ कहीं स्याम कहि कंचनरूप । कहि विद्रुम कहिं हरितअनूप॥ समोसरन लछमीको एम । दिपै जडाऊ कुंडल जेम ॥६९॥ चारो दिसि तोरन बन रहे । कनक थंभ ऊपर लहलहे ॥ आगे मानभूमि है जहां । मानर्थम चारोदिसि तहां ॥७॥ तिनकी प्रथम पीठिका बनी। सोलह पैंडी संजुत ठनी ॥ चार चार दरवाजे ठान । तीन तीन तहां कोट महान ॥७१ RSERESORRUPASSOSORS rashastanastaseasee चौपई।

asTASHATIARRIORSRIVARARIES आठवाँ अधिकार। १२९ तिनमैं और निमेखलपीठ। तिनपै मानथंभ थिर दीठ ।। अति उतग कंचनके ठये छत्रधुजादिकसौं छबि छये॥७२॥ जिन देखि मानी मद बढ़े । उतरे मान-महागिरि-चढ़े ॥ मूलभाग प्रतिमा मनहरै । इद्राटिक पूजा विसतरै ॥ ७३ ॥ एक एक दिसि चहुं दिसि ठई।सहज वापिका वारिज-छई॥ मदादिक सुभ जिनके नाम | चारौं दिसि सोलह सुसधाम ॥ आगे खाई सोभित सरी । औंडी अधिक विमलजलभरी॥ रतन-तीर राजै चहुंओर । हंसकलाप करै जहं सोर ॥७५ ॥ दोहा। बलयाकृति साई बनी, निर्मल जल लहरेय । किधौ विमल गगानदी, प्रभु परदछना देय ॥७६ ॥ चौपई। आगे पुहपबेल बन सार । महासुगंध मधुपसुखकार ।। ई सघन छांह सब रितुके फूल । फूले जहा सकल सुसमूल ७७ याकै कछु अंतर दुति धरै । कंचन कोट प्रथम मनहरै॥ बलयाकृति अति उन्नत जेह । मानौं मानुपोत्र गिरि येह ।। नईदिसि सोहें चार दुवार । रूपमई तिखने मनहार ॥ रतनकूट अपर जगमगै । लाल बरन अतिसुंदर लगै ॥७९॥ किधौ अरुन-छवि हाथ उठाय । जगलछमी नाचै विहसाय नौनिधि जहा रहैं अभिराम । पिगलादि हैं जिनके नाम८० प्रमुअजोग गिन दीनी छार । वे मचली सेवे दरबार ॥ मंगल दरव एकसौ आठ । धरे प्रतेक मनोहर ठाठ ॥ ८१ ॥ SERESEASESERSEASEARRESENSPIRSITAREILS nasRARASTRARASRAS पाचपुराण- गावै जिनगुन देवकुमार । और विविध सोमा तहं सार । वितरदेव खड़े दरवान । विनयहीनकौं दैहि न जान ॥८॥ यह पहले गढ़की बिधि कही। आगे और सुनौ अब सही। गोपुर तजि चारौं दिसि गली । गमनहेत भीतरकौं चलीट तहां निरतसाला दुहुँ पास । सब दिसिमैं जानौ सुखवास । सुवरनथंभ फटिकमय भीत । तिखनी मनिमय सिखर पुनीत सुरवनिता नाचें तह एम । लावन-तोय-तरंगनि जेम ॥ मंदहास मुख सोहैं खरी । जिनमंगल गावै सुसभरी ॥८५॥ बाजै बीन बांसली ताल । महा मुरजधुनि होय रसाल ॥ आगे बीथी अंतर वरे । दोनों दिसा धूपघट भरे ।। ८६ ॥ सोरठा। स्याम वरन यह जानि, धूप धुआं नभकौं चल्यो। किधी पुन्य-डर मानि, धूआं मिस पातग भज्यौ ॥८॥ चौपई। आगे चार बाग चहु ओर । प्रथम असोक नाम चितचोर॥ सप्तपरन चंपक सहकार । ये इनकी संग्या अविधार ॥८॥ सब रितुके फल-फूलन-भरे । बिरछ बेलसौं सोहत खरे ।। वापीमंडप महल मनोग । राजै जहां जथाविध जोग |८९॥ चैत-बिरछ चारौं बनमाहि । मध्यभागसुदर छबि छाहिं । जिनमुद्रामंडित मन हरॆ । सुर नर नित पूजा विस्तरै ॥१०॥ वाग ओट बेदी चहुंओर । चार द्वारमंडित छवि-जोर ॥ अब इस बन-बेदीत सही। गढ़परजंत गली जे रही ।। ९१ ॥ seases RARIRRER आठवाँ अधिकार। १३१ rastratasiasmastastasha तिनमैं धुजापांति फहराहिं । कंचनथंभ लगी लहराहिं । दसमकार आकार समेत । तिनके भेद सुनौ सुखहेत ॥९२॥ माला वसन मोर अरविंद । हंस गरुड़ हरि वृपभ गयंद ॥ चक्रसहित दस चिहन मनोग । धुजा दुकूलनि सोहैं जोग ये दस एक जातकी जान । एक एकसौ आठ प्रमान ॥ दससे असी सबै मिल भईं। एक दिसामैं सब बरनई ॥१४॥ चारौं दिसिकी जोड़ सरीस । चार हजार तीनसै बीस ॥ यह परमित जिनसासनमाहि। अतिविचित्र सोमा अधिकाहि हालै धुजा पवन-बस येह । जिनपूजन भवि आये जेह ॥ पथखेद तिनको मन आन । करत किधौं सतकार-विधान । मानथंभ धुजथभ अनूप । चैतबिरछ बेदी गढ़रूप ॥ इत्यादिक ऊचे इकसार । जिन-तनत बारह गुन धार॥९७॥ आगे रजतमयी निरमान । तुंग कोट अति धवल महान ॥ किधी सेत भभु-सुजस-भकास । फेरी देय फिरचौ चहुपास ॥ पूरबवत दरवाजे चार । रतनमई अनुपमछवि-धार ॥ नौनिधि मंगलदरव समाज । तोरनप्रमुख और सब साज ।। प्रथमकोटबरननसम जान । ठाडे भवन देव दरवान ।। यासों लगी और अब गली। चारों तरफ एक सी चली ।। कलपचिरछ-चन राजै तहां । दस विध कलपतरोवर जहां। भपन वसन लगे जिन डार ।सोमा कहत न लहिये पार ॥ मध्यभाग जिनविबसमेत । सिद्धारथ तरुवर छवि देत ॥ चहुंदिसि बेदी चहुं दिसि द्वार । रचना और अनेक प्रकार vouooundergoyagyLS ६EOBOUse १३२ पाचपुराण- इस बेदीके बाहर भाग। आगे फटिक कोट लौं लाग॥ अति विचित्र महलनकी पांति । जिन सिर रतनकूट बहुमांति चंद्रकांतिमनि-मासुर भीत । सुवरनमय तहां थंभ पुनीत ।। सुरनरनाग रमैं जिनमाहिं । किन्नरगन बहु केलि कराहिं ।। 5. बीथीमध्यदेस सुभरूप । पद्मराग-मनिमय नव तूप ॥ धुजा छत्र घंटा छबि देहि । जिनमुद्रासौं मन हर लेहि ॥ आज तृतिय कोट बन एम। फटिकमई निर्मल नम जेम ॥ अति उतंग सो बलयाकार । लालबरन मनिनिर्मित द्वार । और कथन पूरबवत जान । ठगड़े सुरगदेव दरवान ।। महामनोहर लोचनहारि। अनुपमसोभा अचरजकारि १०७ अब सुनि मध्य भूमिकी कथा। फटिककोटभीतर विधि जथा गढसौं प्रथम पीठ लग लगी । फटिकभीत सोलह जगमगी तिनपै रतनथंभ छवि देहिं । प्रभाजालसौं तम हर लेहि ॥ तिनहीपै श्रीमंडप छयो । फटिकमई नभमैं निरमयौ १०९ सोरठा। या श्रीमडपमाहिं, निराबाध तिहुं जग बसैं । भीर होय तहां नाहि, त्रिभुवनपति अतिसय अतुल ११०० चौपई। भीतन बीच गली जे रहीं। बारहसभा तहां जिन कही। बैठे मुनि अपछर अजिया। जोतिप-बान-असुर-सुर-तिया ।। भ.वन बितर जोतिपि देव । कल्पनिवासी नर-पसु एव ।। तिनमैं प्रथम पीठिका ठई । अनुपम बैज-मनिमई ११२ VOTEREST డజజజజజలది asdanan REFRARE ARARAFARR आठवॉ अधिकार। मोरकंठवत आमा जास । सोलह पैड़ साल पहुं पास ॥ बारह सभा महा दिसि चार । तिनकौं यह पथ सोलह सार मंगलदरव जहां सब धरे। जच्छदेव सेवक तहां खरे ।। धर्मचक्र तिनके सिर दिपै । जिनको देसि दिवाकर छिपै॥ तापर दुतिय पीठिका बनी। चामीकरमय राजत धनी ॥ मेरुशृंगवत उन्नत एम । जगमगाय मंडल रवि जेम ॥११५॥ आठधुजा आठौं दिसि जहा । तिन सोभा बरनन बुधि कहां तिनमें आठ चिहन चित्राम । चक्र गयद वृषम अभिराम । वारिज वसन केहरीरूप । गरुड़ माल आकार अनूप ॥ मंदपवनवस हालै जेह । किधौं पापरज झारत येह ॥११७॥ तापर तृतिय पीठिका और । तीन मेखला-मंडित ठौर ॥ सर्वरतनमय झलकत खरी। किरन जास दस दिसि विस्तरी गधकुटी तहा बनी अनूप । पंचरतनमय जडित सरूप ।। जाके चार द्वार चहुओर । झलकै मानिक होरा-होर ११९ तीनपीठ सिर सोहत खरी । किधौं त्रिजगछबि नीची करी परम सुगंध न बरनी जाय । सुन्दर सिसर धुजा फहराय ॥ तहां हेम-सिंहासन सार । तेजसरूप तिमिर छयकार ।। नानारतन प्रभामय लसै । जगलछमी प्रति किरनन हसें ॥ वचनगम्य नहि सोमा जहाँ। अतरीच्छ प्रमु राजै तहां ॥ निमुवनपूजित पासजिनेस । ज्यो जगसिसर सिद्धपरमेस ॥ दोहा। समवसरन रचना अतुल, ताको अति विस्तार । संपति श्रीभगवानकी, कहत लहत को पार ।। १२३ ॥

पार्श्वपुराण- - सोरठा। जिन-बरनन-नभमाहिं, मुनि विहंग उद्यम करें । पै उड़ि पार न जाहिं, कौन कथा नर दीनकी ॥१२४॥ गीता। राजत उतंग असोक तरुवर, पवनप्रेरित थरहरै । प्रभु निकट पाय प्रमोद नाटक, करत मानौं मनहरै ॥ तिस फूलगुच्छन भ्रमर गुंजत, यही तान सुहावनी । सो जयौ पासजिनेद्र, पातकहरन जगचूड़ामनी ॥ १२५ ॥ निज मरन देखि अनंग डरप्यो, सरन ढूंढत जग फिरयौ । कोऊ न रासै चोर प्रभुकौ, आय पुनि पायन गिरयौ । यो हार निज हथियार डारे, पुहप-बरसा मिस भनी । सो जयो पासजिनेद्र, पातकहरन जगचूडामनी ॥ १२६ ॥ प्रभु अंग नील उतंग नगरौं, वानि सुचि सीता ढली। सो भेदि भ्रम गजदंत पर्वत, ग्यानसागरमैं रली॥ नय सप्तमंगतरंगमंडित, पापतापविधंसनी ॥ सो जयौ पासजिनेंद्र, पातकहरन जगचूडामनी ॥ १२७ ॥ चद्रार्चिचय छवि चारु चंचल, चमरटंद सुहावने । ढोलैं निरंतर जच्छनायक, कहत क्यों उपमा बनै ॥ यह नीलगिरिक सिसर मानौ, मेघझर लागी धनी। सो जयौ पोसजिनेद्र, पातकहरन जगचूड़ामनी ॥ १२८ ॥ हीराजवाहरसचित बहुबिध, हेमआसन राजए । तहं जगतजनमनहरन प्रभुतन, नीलबरन विराजए । PRESENCESDESERSOSSESSEMBER SacarrassessmastarastraTORanaserasRARASRASTARE , ,

आठवॉ अधिकार।
१
-
यह जटित वारिज-मध्य मानौं, नीलमनिकलिका बनी।
सो जयौ पासजिनेंद्र, पातकहरन जगचूड़ामनी ॥ १२९
जगजीत मोह महान जोधा, जगतमैं पटहा दियो ।
सो सुकलध्यान कृपानबल, जिन बिकट वैरी बस किया
ये वजत विजय निसान दुंदुभि, जीत सूचे प्रभुतनी ।
सो जयौ पासजिनेद्र, पातकहरन जगचूडामनी ॥ १३०
छदमस्त पद में प्रथम दरसन, ग्यान चारित आदरे ।
अब तीन तेई छत्र छलसौं, करत छाया छवि-भरे ।।
अति धवलरूप अनूप उन्नत, सोमबिंबप्रभा हनी ।
सो जयौ पासजिनेंद्र, पातकहरन जगचूडामनी ॥ १३१
दुति देसि जाकी चांद सरमै, तेजसौं रवि लाजए।
अब प्रभामंडलजोग जगमैं, कौन उपमा छाजए ।
इत्यादि अतुल विभूतिमडित, सोहिए त्रिभुवनधनी ।
सो जयौ पासजिनेंद्र, पातकहरन जगचूड़ामनी ॥ १३२
यो असम महिमासिधु साहब, सक्र पार न पावही ।
तजि हासभय तुम दास 'भूधर,' भगतिवस जस गावही
अब होउ भव भव स्वामि मेरे, मैं सदा सेवक रहीं।
कर जोर यह बरदान मागौं, मोसपद जावत लहौ।१३३
चौपई
इह बिध समोसरनमडान । कियो कुधेर जथाविध थान
आये सुर बरसावत फूला जयजयकार करत सुसमूल॥१३४
RESSESEREC..

SARRRARBRARARAR पार्श्वपुराण- अति प्रसन्नता सब विध भई । हरसत तीन प्रदछिना दई ॥ धृलसालि मैं कियाँ प्रवेस | चकित भयौ छवि देखि सुरेस१३५ मुदित महर्धिक देवन साथ । जिनसनमुख आयौ सुरनाथ॥ हंस्तकमल जोरे अमरेस । देखे हग भरि पासजिनेस ॥१३६॥ मनि उतंग आसन पर ईस । मानौं मेघ रतनगिरि-सीस ॥ फैल रही तनकिरनकलाप । कोटभानुसौं अधिक प्रताप १३७ विकसत चित रोमांचित काय। प्रनम्यौ चरन सीस भुवि लाय मनिझारी भरि तीरथतोय । पूजे मघवाजिनपद दोय॥१३८॥ सुरग-सुगंधनि भक्ति बढाय । अरचे इंद्र जिनेसुरपाय ॥ मुक्ताफलमय अच्छत लिये। पुंज परमगुरु आगे दिये॥१३९॥ पारिजात मदार मनोग । पुहप चढ़ाये जिनवर जोग। सुधापिंड चरु लेय पवित्त । पूजा करी सक्र धरि चित्त॥१४०॥ रतनप्रदीप रवाने खरे । श्रीपति पॉय सचीपति धरे ॥ देवलोककी अगर अनूप । पासचरन खेई सुरभूप ॥ १४१॥ कलपतरोवरके फल रजे । जगपतिपॉय पुरदर जजे ॥ सरच दूरव धरि करि परनाम दीन्यौ इंद्र अरघ अभिराभ१४२ दोहा। करि जिनपूजा आठ विध, भावभगति बहुभाय । अब सुरेस परमेसथुति, करत सीस निज नाय ॥ १४३ ॥ चौपई। प्रभु इस जग समरथ नहिं कोय | जापै जसबरनन तुम होय॥ चारग्यानधारी मुनि थके । हमसे मंद कहा कर सके ॥१४४॥ ఆది PRSEEDSENREERESEHREENSEE Alsace RSEENSE ArrasRashIREFRASTA आठवाँ आधिकार। १३७ यह उर जानत निहचै कीन । जिनमहिमाबरनन हम हीन ॥ पैतुमभगति करै वाचाल।तिसवस होय गहूंगुनमाल॥१४५॥ जय तीर्थकर त्रिभुवनधनी । जगचंद्रोपम चूडामनी ॥ जय जय परमधरमदातार | करमकुलाचलचूरनहार १४६ जय सिवकामिनिकंत महंत । अतुल अनत चतुष्टयवंत ॥ जय जगआसभरन बडभागासिवलछमीके सुभग सुहाग१४७ जय जय धर्मधुजावर धीर । सुरगमुकतिदाता वर वीर । जय रतनत्रय रतनकरंड | जय जिन तारनतरन तरंड ।।१४८॥ जय जय समोसरन-सिंगार । जय संसयवनदहन तुसार ॥ जय जय निर्विकार निर्दोप। जय अनंतगुनमानिककोप १४९ जय जय ब्रह्मचरजदल साज । कामसुभटविजयी भटराज ॥ जय जय मोह-महानग-करी। जय जयमदकुजरकेहरी॥१५॥ क्रोधमहानलमेघ प्रचंड । मानमहीधरदामिनिदड ।। मायावेलधनंजयदाह । लोभसलिलसोपक दिननाह ॥१५१॥ तुम गुनसागर अगम अपार । ग्यानजिहाज न पहुंचै पार ॥ तट ही तट पर डोलत सोय । स्वारथ सिद्ध तहांही होय१५२ प्रभु तुम कीर्तिबेल बहु बढी । जतनबिना जगमंडप चढी ।। और अदेव सुजस नित चहै । ये अपने घरही जस लह १५३ जगतजीव घूमैं बिनग्यान । कीनें मोहमहाविषपान ॥ तुमसेवा विपनासन जरी । यह मुनिजन मिलि निहचै करी जन्मलता मिल्यामतमूल । जामनमरन लगैं जिहि फूल ॥ सो कबही विन मगतिकुठार । कटै नही दुखफलदातार१५५ SSSSDNEDEOES SEARE 06690SENSUSMSXESE as HRSRoastraSRPATRA पाचपुराणas १३८ कलपतरोवर चित्राबेल । काम पोरसा नौनिधि मेल ।। चिंतामनि पारस पापान । पुन्यपदारथ और महान ॥१५६॥ ये सब एकजनमसंजोग । किंचित सुखदातारनियोग । त्रिभुवनाथ तुमारी सेव । जनमजनम सुखदायक देव १५७ 'तुम जगवांधव तुम जगतात । असरनसरन-विरद-विख्यात ।। तुम जगजीवनके रछपाल । तुम दाता तुम परमदयाल १५८ तुम पुनीत तुम पुरुप पुरान । तुम समदरसी तुम सबजान ॥ तुम जिन जग्यपुरुप परमेस । तुम बह्मा तुम विष्णु महेस१५९ तुमही जगभरता जगजान । स्वामि स्वयंभू तुम अमलान । तुम बिन तीनकाल तिहुंलोय । नहिं नहि सरन जीवकौं कोय तिस कारन करुनानिधि नाथ । प्रभु सनमुख जोरे हम हाथ जबलौं निकट होय निरवान । जगनिवास छूटै दुखदान१६१ तब लौं तुम चरनांबुज-बास । हम उर होहु यही अरदास और न कछु वांछा भगवान । यह दयाल दीजै वरदान १६२ टोहा। इहिबिध इंद्रादिक अमर, करि बहुभगति विधान ॥ निज कोठे बैठे सकल, प्रभुसम्मुस सुखमान ॥ १६३ ॥ जीति कर्मरिपु जे भये, केवललब्धिनिवास । ते श्रीपारसमभु सदा, करो विधन धन नास ॥ १६४ ॥ इति श्रीपार्धपुराणभाषाया भगवत्ज्ञानकल्याणकवर्णन नाम अष्टमोऽधिकार । SERSEEDS ORSEASEARSESecareerSENTERESwespecrecene नौवाँ अधिकार। LEARNSERESENSERTREASE . नौवॉ अधिकार । - सोरठा पारसप्रभुको नाउँ, सार सुधारस जगतमैं। मैं याकी बलि जाउँ, अजर-अमर-पदमूल यह ॥१॥ दोहा। बारह सभा सुथानमधि, यों प्रभु आनदहेत । जथा कमलिनीसंडकौं, ससिमडल सुस देत ॥२॥ विकसितमुख सुरनर सकल, जिनसन्मुख करजोर । निवसैं प्यासे अमृतधुनि, ज्यौं चातक धनओर ॥ ३ ॥ SEDNSIDEORSEASESese चौपई। तम-गनराज स्वयभू नाम । चार ग्यानधारी गुनधाम ॥ करि प्रनाम पारसप्रभुओर । विनती करी करांजुलि जोर॥४॥ भो स्वामी त्रिभुवनधर येह । मिथ्यातिमिर छयौ अति जेह॥ भूले जीव भमैं तामाहि । हितअनहित कछु मुझे नाहि॥५॥ श्रीजिनवानी दीपक-लोय । ता बिन तहां उदोत न होय ।। ताते करुनानिधि स्वयमेव । करि उपदेस अनुग्रह देव ॥६॥ जाननजोग कहा है ईस । गहनजोग सो कह जगदीस ॥ त्यागनजोग कहो भगवान । तुम सबदरसी पुरुष प्रमान॥७ कैसे जीव नरकमै परै। क्यो पसुजोनि पाय दुस मरै ॥ काहेसौं उपजै सुरलोय । कौन कर्मः मानुप होय ॥८॥ RSERECREENSERSEMESSERESERSERECEMEMES HAR १४० RASTARATARNARASTARA ARE पार्श्वपुराण- कौन पापफल जनमै अंध । बहरा कौन क्रियासम्बन्ध । किस अघ उदय होय नर पंग । गूंगा किस पातक-परसंग ९ कौन पुन्यतै दरव अतीव । क्यों यह होय दरिद्री जीव ॥ पुरुप-वेद किस कर्म उदोत । नारि नपुंसक किस बिध होत किस आचरन बड़ी थिति धरै।क्यो करिअलप आयुधरि मरै भोगहीन अरु भोगसमेत । सुसी दुखी दीसै किस हेत ११ किस कारन भूरस मतिहीन । क्यों उपजै पडित परवीन ॥ किस करनी” होय सरोग । किस अधर्मरौं पुत्रवियोग ॥१२ विकल सरीर पाय दुस सहै । नीच ऊंचकुल कैसे लहै ।। किनभावनि भवथिति विस्तरै । भवथितिभेद कहाकरि करै क्योंकर होय सुरगमैं इंद्र । कैसे पद पावै अहमिंद्र ॥ चक्रीपद किस पुन्यउदोत । किमि बाधै तीर्थंकरगोत॥१४॥ इत्यादिक यह प्रस्न समाज । इनको उचर कह जिनराज ॥ तुम सब ससयहरन जिनेस । जैसे भवतमदलन दिनेस॥१५॥ दोहा। तब श्रीमुखवानी विमल, बिनअच्छर गंमीर । महामेधकी गरज सम, खिरी हरन जगपीर ॥ १६ ॥ तालु होठ सपरस विना, मुखविकार बिन सोय । सब भापामय मधुरतर, श्रीजिनकी धुनि होय ॥ १७ ॥ जथा मेघजल परिनमैं, निंबादिकरसरूप । तथा सर्वभाषामई, श्रीजिनवचन अनूप ॥ १८॥ ఆలు Sarastashastastrastra Fastrastastesta नौवाँ अधिकार। -- -- चौपई। छहौं दरव पचासतिकाय । सात तत्त नौ पद समुदाय ।। जाननजोग जगतमैं येह । जिनसौं जाहिं सकल संदेह॥१९॥ सब विध उत्तम मोखनिवास । आवागमन मिटै जिहि वास।। ताते जे सिवकारन भाव । तेई गहनजोग मन लाव ॥२०॥ यह जगवास महादुखरूप । तातै भ्रमत दुसी चिप ॥ जिनभावन उपजै संसार । ते सब त्यागजोग निरधार ॥२१ नरकादिक जग-दुख जावंत । पापकर्मवसतै बहुमत । सुरगादिक सुससंपति जेह । पुन्य तरोवरको फल तेह ॥२२॥ दोहा। इहि विध प्रस्नसमाजको, यह उत्तर सामान । अब विसेस इनकी लिसौं, जथासकति कछु जान ॥ २३ ॥ जीव अजीव विसेस बिन, मूल दरव ये दोय । इनहीको फैलाव सब, तीनकाल तिहुँ लोय ॥ २४ ॥ चेतन जीव अजीव जड़, यह सामान्यसरूप । अनेकांत जिनमतविपै, कह्यौ जथारथरूप ॥ २५॥ दरव अनेक नयातमक, एक एक नय साधि । भयौ विविध मतभेद यौ, जगमैं बढ़ी उपाधि ॥ २६ ॥ जन्मअध गजरूप ज्यो, नहिं जानै सरवग। त्यों जगम एकांत मत, गहै एक ही अग ॥ २७ ॥ ता विरोधके हरनकौं, स्यादवाद जिनवैन । सब संसयमेटन विमल, सत्यारथ मुसर्दैन ।॥ २८ ॥ FORMER ' RARGEShastra SDEOSce TasmastarastrasRRARE १४२ पार्श्वपुराण- - SASURSeesexSBIRSeptswesosekseenE सात भंगसौं साधिये, दरवजात जामाहिं । सधै वस्तु निरविधन तब, सब दूपन मिट जाहिं ॥२९॥ घनाक्षरी। अपने चतुष्टैकी अपेच्छा दर्व 'अस्ति'रूप, परकी अपेच्छा वही 'नासति । बसानियै ॥ एकही समै सो 'अस्ति नासति । सुभाव धरै, ज्यों है त्यो न कहा जाय 'अवक्तव्य मानिये ॥ अस्ति कहै नासति अभाव 'अस्ति अवक्तव्य,' त्योंही नास्ति कहै 'नास्ति अवक्तव्य' जानिये ॥ एकै बार अस्ति नास्ति कह्यौ जाय कैसैं ताते, 'अस्तिनास्तिअवक्तव्य' ऐसे परवानिये ॥३०॥ दोहा। इहि विध ये एकांतसौं, सात भंग भ्रमखेत । स्यादवाद पौरुप धरै, सब भ्रमनासन हेत ॥ ३१ ॥ स्यादसब्दको अर्थ जिन, कह्यौ कंथचित जान । नागरूप नयविपहरन, यह जग मंत्र महान ॥ ३२॥ ज्यों रससिद्ध कुधातु जग, कंचन होय अनूप । स्यादवाद-संजोगतै, सब नय सत्यसरूप ॥ ३३ ॥ चौपई। दरवदिष्टि जिय नित्तसरूप । परजयन्याय अथिर चिद्रूप ॥ नित्यानित्य कथचित होय । कही न जाय कथंचित सोय३४ नित्य अवाचि कथंचित वही। अथिर अवाचि कथंचित सही॥ नित्यानित्यअवाचक जान । कहत कथंचित सब परवान ३५ SEAREERSOGOURSEVSENTSETTPSESSPATI SRARARARARArrastARARARARARARARARAS Pasana नीवाँ आधिकार। इहिबिध स्यादवाद नयछाहि । साध्यौ जीव जैनमतमाहिं। और भाति विकलप जे करें । तिनके मत दूपन विसत॥३६॥ जीव नाम उपयोगी जान ! करता भुगता देहप्रमान ॥ जगतरूप सिवरूप अरूप । ऊरधगमन सुभावसरूप ॥३७॥ सोरठा। ये सब नौ अधिकार, जीवसिद्धिकारन कहे । इनको कछु विस्तार, लिसौं जिनागम देखिकै ॥ ३८ ॥ चौपई। चार भेद ब्यौहारी मान । निहचे एक चेतना जान ॥ जो इनसौं नित जीवित रहै । सोई जीव जैनमत कहै॥३९॥ सोरठा। प्रथम आव अवधार, इंद्री सांस उसांस वल। मूल प्रान ये चार, इनके उत्तरभेद दस ॥४०॥ दाहा। पांच मान इंद्रीजनित, तीनभेद बलपान । एक सांस उस्वास गनि, आवसहित दस जान ॥ ४१ ॥ चौपई। सैनी जीव जगतमै जेह । दसौं प्रानसौं जीवें तेह ॥ मनसौं रहित असैनी जात । ते नौमान धरै दिनरात ॥४२॥ कान बिना चौइंद्री जिते । आठ प्रानके धारक तिते ।। तेइद्रीके ऑस न भनी । तातै सात प्रानके धनी ।। ४३ ।। नासा बिन वेइंद्री जीव । तिन सबके पट पान सदीव ।। जीभ-वचनवर्जित तन तास । एकेद्री चउ पाननिवास ॥४४॥ SHRSOCIRCREDEEONSEREER SHOROSOMSEBEDEOS , In

Seasease
पार्श्वपुराण-
१४४
ARASARAS
दोहा ।
इहिविध जीव अजीव सब, तीनकाल जगथान ॥
सत्तासुख अवबोध चित, मुकतजीवके प्रान ॥४५॥
चौपई।
दोप्रकार उपयोग बखान । दरसन चार आठ विधं ग्यान ॥
चच्छु अचच्छु अवधि अवधार । केवल ये सब दरसन चार
अब सुन वसुविधग्यान-विधान । मति-श्रुतअवधिग्यानअज्ञान
मनपर्जय केवल निरदोख । इनके भेद प्रतच्छ परोख ॥४७॥
मतिश्रुतिग्यान आदिके दोय । ये परोस जानैं सब कोय ॥
अवधि और मनपरजयग्यान । एकदेसपरतच्छ प्रमान॥४८॥
केवलग्यान सकल परतच्छ | लोकालोक-विलोकन दच्छ ।
जहां अनंत दरबपरजाय । एक बार सब झलकै आय ॥४९॥
दरसन चार आठ बिध ग्यान । ये व्यवहार चिहन जी जान॥
निहरुप चिदातम येह । सुद्ध ग्यान दरसन गुनगेह ॥५०॥
कल्पित असदभूत व्यवहार । तिस नय घटपटादि कर्तार ॥
अनुपचरित अजथारथरूप । कर्मपिंडकरता चिद्रूप ॥५१॥
जब असुद्धनिहचैबल धरै । तब यह रागदोपको हरै ।।
यही मुद्ध निह कर जीव । सुद्ध भावकरतार सदीव ॥५२॥
astarastrastastr. Rasreas
सोरठा।
ARARARA
पानी सुस दुस आप, भुगतै पुग़लकर्मफल ।
यह व्यवहारी छाप, निहचै निजसुखभोगता ॥ ५३ ॥

नौवाँ अधिकार। १४५ BARSANSased issertaSCARASHARAasmanastra , राम, दोहा। देहमान व्यवहार कर, कह्यौ ब्रह्म भगवान । दरवित नयकी दिष्टिसौं, लोकप्रदेससमान ॥ ५४॥ अडिल्ल लघुगुरु देहप्रमान, जीव यह जानिये । सो विथार-संकोच-सकतिसौं मानिये ॥ ज्यों भाजनपरवान, दीपति विस्तरै । समुदधात विन यही उपमा धरै ॥ ५५॥ चौपई। तैजस कारमानजुत भेस । बाहर निकसैं जीवप्रदेस ।। छोड़ें नहीं मूल तन ठाम । समुदयातविधि याकौ नाम॥५६॥ सातभेद सब ताके कहे । गोमठसार देखि सरदहे ॥ प्रथम वेदना नाम बखान । दुतिय कयाय नाम उर आन ॥ तन-विकुर्वना तीजो येह । चौथो मारनांत सुनि लेह ।। पंचम तैजस सग्या जान । छट्ठम आहारक अभिधान ॥५८॥ केवल समुदधात सातमा । ऐसी सकति धरै आतमा ॥५९॥ दुसह वेदनाके वस जहाँ । जीवप्रदेस कढ़त है तहाँ ॥ किसी जीवकै हो परवान । पहला समुदधात यह जान॥६०॥ जब काहू रिपु करन विधम । बाहर जाहि जीवके अंस ॥ अतिकपायसौं हो है तेह । दूजो समुदधात है येह ।। ६१ ॥ नाना जात विक्रियाहेत । निकसे ब्रह्मप्रदेस सचेत ।। देवनारकीके यह होय । तीजो समुद्घात है सोय ।। ६२॥ RESUsersearcEOISONEERESERRENTER पार्श्वपुराण- किसी जीवकै मरते समै । हंस अंस तन बाहर गमै ॥ बांधी गतिके परसन काज । चौथो भेद कह्यौ जिनराज६३ जो मुनिकै कछु कारन पाय । उपजै क्रोध न थांभ्यौ जाय ॥ तैजस तनको औसर यही । वामकंधसौं प्रगटै सही ॥१४॥ ज्वालामई काहलाकार । अरु सिंदूरपुंज उनहार ।। बारह जोजन दीरच सोय । नौ जोजन विस्तीरन होय॥६५ दंडकपुरवत प्रलय करेय । साधुसमेत भस्म कर देय ॥ असुभकपाय यही विख्यात । अब सुनि सुभ तैजसकी बात॥ दुर्भिच्छादिक दुस अविलोय । दयाभाव मुनिवरकै होय ॥ सुभआकृतिसौं निकसै ताम । दच्छिन कांधेसौं अभिराम ॥ पूरवकथित देह-विस्तार । रोगसोग सब दोष निवार ॥ फिर निज थान करै पैसार । पंचम समुदधात यह धार ६८ करत साधु पदअर्थ-विचार । मन संसय उपजै तिहिं बार ॥ तहां तपोधन चिंता करै । कैसे यह विकलप निरवरै ॥६९॥ भरतखेत आदिक भूमाहिं । अब ह्यां निकट केवली नाहि॥ तातेकरिये कौन उपाय । विनभगवान भरम नहिं जाय७० तब मुनि-मस्तकसौं गुनगेह । प्रगट होय आहारक देह ।। एक हाथ तिस परमित कही। श्रीजिनसासनसौं सरदही७१ फटिक वरन मनहरन अनूप । तहां जाय जहं केवल भूप ॥ दरसनकरि सदेह मिटाय । फेरि आनि निजथान समाय७२ अष्टम समुदधात यह मान । मुनिके होहि छठे गुनथान ॥ जव सजोगि जिनकै परदेस । बाहर निकसैं अलस अभेस।। SOUDSBEUuuuuuuu । FRasRG NARESRARE नावॉ अधिकार। १४७ दंड-कपाटादिक-विधि ठान । क्रमसौं होहिं लोकपरवान ॥ सप्तम समुदघात यह भाय । सरधा करो भविक मन लाय७४ मरनांतक आहारक जेह । एक दिसागत जानौ येह ॥ बाकी पांच रहे जे आन । ते सब दमौं दिसागत जान॥७५ दुबिध रास ससारी जीव । थावर जगमरूप सदीय ।। तहां पांच विध थावरकाय । भू जल तेज वनस्पति बाय७६ चार जातके जंगम जंत । चलत फिरत दीखै बहुमंत ॥ संख सीप कौडी कृमि जोक । इत्यादिक वेददी-थोक ।।७७ चैटी दीम कुंथ पुनिआदि । ये तेइंद्री जीव अनादि । मासी माछर भृगीदेह । भ्रमरप्रमुख चौइंद्री येह ॥ ७८ ।। देव नारकी नर विख्यात । केतक पसू पचेगी जात ॥ ये सब बस थावरके भेव । इनको विषयछेत्र सुन लेव १७९। छप्पय। ROSUNGDESs0SWEENSE GayerasRGAHRAItsTaTEERese, फरस चारसै पाच, जीभ चौसठ सौ नासा। हग जोजन उनतीस, सतक चौवन क्रम भासा ॥ दुगुन असैनी अंत, श्रवन वसु सहस धनुप सुनि । सैनी सपरस विपै, कह्यौ नौ जोजन श्रीमुनि ॥ नौ रसन प्राण नो चच्छुपति, सैतालीस हजार गिन । दोस सठि बारह स्रवनविप-छेत्रपरवान भन ।। ८० ॥ चौपई। एकेंद्री सूच्छम अरु थूल । तीनमेद विकलत्रय मूल ।। दोय प्रकार पचंदी कहे। मनसौं रहित सहित सरदहे ॥१॥ HeresSSONSERTERSNE REWSee SeasrashastraseaRastrashant पार्चपुराण- १४८ दोहा । LSHRINSERSERSON PASSANARTMaRanastastrasRIORahasranas सातों ही परयाप्ततै, अपरयाप्ततै जान । चौदह जीवसमास यह, मूलभेद उर आन ॥ ८२।। चीपई। ऐसे ही चौदह गुनथान । चौदह मारगना उर आन ॥ जब लग है इन रूपी राम । तबलौंससारी यह नाम ॥८३॥ अडिल्ला यह अनादि संसार, जीवकी भूल है । इस कारजमैं और, हेतु नहिं मूल है ॥ तौ असुद्ध नयन्याय, जीव जगरूप है। दिव्यदृष्टिसौं देख, सबै सिवभूप है ।। ८४ ।। दोहा। भये कर्म-संजोगते, संसारी सब जीव । साधनबल जीतें करम, तब यह सिद्धसदीय ॥ ८५ ॥ अडिट। अष्ट गुणातमरूप, कर्ममलमुक्त हैं। थिति उतपत्ति विनास, धर्मसंजुक्त हैं । चरम देहत कछुक, हीन परदेस हैं । लोकअग्रपुर बसैं, परम परमेस है। ॥ ८६ ॥ दोहा। अथिर अर्थपरयाय जो, हानिवृद्धमय रूप । तिसमै सिद्ध बसानिये, उतपति नाससरूप ॥ ८७॥ SERESERSONSORRORS a ARARAKARARARARARARARARARARARARARA RSERE नौवाँ अधिकार। ग्येय विविध परनति धरै, ग्यान तदाकृत भास । यों भी सिवपदमैं सधै, थित उतपत्ति विनास ॥ ८८॥ अथवा सब परनति नसे, भई सिद्धपर्याय । सुद्धजीव निहचल सदा, यो तीनौं ठहराय ॥ ८९ ॥ अडिल। चरन पांच रस पांच, गंध दो लीजिए। आठ फरस गुनजोर, बीस सब कीजिए। जीववि इनमाहिं, एक नहिं पाइए । याते मूरतिहीन, चिदातम गाइए ।। ९ ।। जगमै जीव अनादि, बंध-संजोगरौं । छूटयौ कवही नाहिं, कर्मफलभोगते । असदभूत व्यवहार, पच्छ जो ठानिए । तो यह मूरतिवंत, कथंचित मानिए ॥ ९१ ।। , , Fannaraštaastaghtanasiassa SANADRASARANARARANASTASTARAStAnast दोहा। प्रकृतिबंध थितिबंध पुनि, अरु अनुभाग प्रदेस । चारभेद यह बंधके, कहे पास परमेस ॥ ९२॥ बंधविवर्जित आतमा, ऊरधगमन करेय । एकसमयकरि सरलगति, लोकअत निवसेय ॥ ९३ ॥ ज्यों जलतूंची लेपचिन, ऊपर आवै सोय । त्यों ऊरधगति राम यह, कर्मवध विन होय ॥ ९४ ॥ जबलौं चऊविध बँधसौं, बंधे जीव जगमाहिं । सरल वक तबलौं चलें, विदिसामैं नहि जाहिं ॥ १५ ॥ WHEREMRENDECENSORSEMESEMEEree RRIARrareras RamasranAmaste पार्श्वपुराण- अमृतचंद्रमुनिराजकृत, किमपि अर्थअवधार ।। जीवतत्त्ववर्णन लिख्यौ, अब अजीव अधिकार ॥९६ ॥ पुद्गल धर्म अधर्म नभ, कालनाम अवधार । ये अजीव जड़तत्त्वके, भेद पंच परकार ॥ ९७ ॥ तिनमैं पुद्गल दोय बिध, बंधरूप अनुरूप । यह सब हैं रूपी दरब, चारौं और अरूप ॥ ९८॥ अनुरूपी पुद्गल दरब, छेद भेद नहिं जास । अगनि जलादिक जोगसौं, होय न कबही नास ॥१९॥ जा अविभागीमैं नहीं, आदि मध्य अवसान । सब्द रहित पर सब्दको, कारणभूत बसान ॥ १० ॥ secreasranciseaRASRAVASNAasesathanastastase सोरठा। भू जल पावक वाय, हेतुरूप सबको यही । बहुविध कारन पाय, वरनादिक पल तुरत ॥ १०१ ॥ अविनासी जिसमाहिं, सदा पंच गुन पाइए । इंद्रीगोचर नाहिं, अवधि ग्यानसौं जानिए ॥ १०२॥ दोहा। वरन पांच रस पांचमैं, एक एक ही होय ।। एक गंध दो गधमैं, आठ फरसमैं दोय ॥ १०३।। ये परमानू पंचगुन, सात बंधमैं जान ॥ वरनादिक जे बीस हैं, ते गुन जात बखान ॥ १०४ ॥ आगे पुद्गल बंधके, सुनो भेद खट सोय ॥ सरधा करतें समझते, संसय रहै न कोय ॥ १०५॥ RSeesess 55555 ORatanRapeet नावाँ अधिकार। चौपई। प्रथम भेद अतिथूल बखान । दुतिय थूल संग्या उर आन॥ तृतिय थूल सूच्छम सरदहो । सूच्छम थूल चतुर्थम गहो।१०६॥ पंचम सूच्छम नाम गिनेह । छट्ठम अतिसूच्छम खर येह ।। अब इनकी वरनन बिरतंत । सुनी एकमनसौमतिवंत ।।१०७॥ संडसंड की. जे बन्ध । फेर न मिलें आपसौं सध ।। मादी ईंट काठपाखान । इत्यादिक अतिथूल बसान ॥१८॥ छिन्न भिन्न हो फिर मिल जाहि । ऐसे पुद्गल जे जगमाहि ॥ घृत अरु तेल जलादिक जान । ये सब थूल कहे भगवान १०९ देखत लगैं दिष्टिसौं थूल । करमैं गहे जाहिं नहिं मूल । धूप चांदनी आदि समस्त । जान थूल ते सूच्छम वस्त॥११॥ आंसनसौं दीसै नहिं जेह । चारौं इंद्रीगोचर तेह ।। विविध सपर्स सब्द रस गंध । सूच्छमथूल जान ते बंध॥१११॥ नाना भाति वर्गना भिड । कारमान परमानू पिड ॥ काहू इंद्रीगोचर नाहि । ते सूच्छम जिनसासनमाहिं ॥११२॥ कर्मवर्गना सो ही कहा । जो अति ही सूच्छम सरदहा ॥ दुनुकआदि परमानूबंध । सो सूच्छमसूच्छम सुन बंधा॥११३॥ सट प्रकार पुद्गल इहि भाय । मुख्य गौन सबमैं गुन थाय ॥ इनहीसौं निर्मापत लोक । और न दीखै दूजो थोक ॥११४॥ सब्द बंध छाया तम जान । सूच्छम थूल भेद सठान ।। अरु उदोत आतप बहु भाय। यह सविध पुद्गलपरजाय११५ RSEARSESSENSESSETTEERSERESERESERSERRENSE SKSEOSSOSE REFERRRRRRRRRRRRRRR पार्श्वपुराण- १५२ जब जड़जीव चलै सतभाय । धर्मदरब तब करै सहाय ॥ जथा मीनको जलआधार । अपनी इच्छा करत विहार ११६ यों ही सहज करै थित सोय । तब अधर्म सहकारी होय ॥ ज्यों मगमैं पंथीकौं छाहिं । थितिकारन है बलसौं नाहिं ११७ जो सब द्रव्यनकौं अवकास । देय सदा सो द्रव्य अकास ॥ ताके भेद दोय जिन कहे। लोक अलोक नाम सरदहे॥११॥ जहं जीवादि पदारथवास । असंख्यातपरदेस निवास ॥ लोकाकास कहावै सोय । परै अलोक अनंता होय ॥११९॥ लोकप्रदेस असंसे जहां | एक एक कालानू तहां ॥ रतनरासि-वत निवसैं सदा । द्रव्यसरूप सुथिर सर्वदा १२० बरतावन लच्छन गुन जास । तीनकाल जाको नहिं नास ॥ समय घड़ी आदिक बहुभाय । ये व्यवहारकालपरजाय १२१ पहले कयौ जीवअधिकार । और अजीव पंचपरकार ॥ ये ही छहौं द्रव्यसमुदाय । कालबिना पंचासतिकाय ॥१२२॥ दोहा। बहु परदेसी जो दरव, कायवंत सो जान । ताते पचअथिकाय हैं, काय काल बिन मान ॥ १२३ ॥ wastrasnastasnastastratiane सवैया छद। जीवरुधर्म अधर्म दुरव ये, तीनौं कहे लोक-परवान ॥ असख्यात परदेसी राजै, नम अनंतपरदेसी जान ॥ संख असंख अनंतप्रदेसी, विविधरूप पुद्गल पहिचान ।। एकप्रदेस धरै कालान, तातै काल कायविन मान ॥१२४॥ ropese UERSPISE OSTALES SANER नौवाँ अधिकार। दोहा। काल काय बिन तुम कह्यौ, एकप्रदेसी जोय । पुद्गल परमानू तथा, सो सकाय क्यों होय ॥१२५॥ संवैया। , अलख असंख्य दरव कालान, भिन्नभिन्न जगमाहि बसाहिं। आपसमाहिं मिलैं नहिं कवहीं, तातै कायवंत सो नाहि ॥ रूप सचिकनते परमान, ततखिन बधरूप हो जाहिं। यो पुद्गलको कायकलपना, कही जिनेसुरके मतमाहि॥१२६॥ जितने मान एक अविभागी, परमानू रोकै आकास ॥ ताको नाव प्रदेस कहावै, देय सर्व दरवनकौं बास ।। तहां एक कालानू निवस, धर्मअधर्म प्रदेसनिवास ॥ रहैं अनंत प्रदेस जीवके, पुद्गलबध लहैं अवकास ॥ १२७ ।। पोमावती। धर्म अधर्म कालअरु चेतन, चारो दरव अरूपी गाये ताते एक अकास-देसमै, प्रमु सबके परदेस समाये ॥ मूरतवंत अनंते पुद्गल, ते उस नभमै क्योंकर माये ।। यह संसय समझाय कहो गुरु,दास होय हम पूछन आये १२८ सोरठा। बहु प्रदीप परकास, जथा एक मंदिरविपै। लहै सहज अवकास, वाधा कछु उपजै नहीं ॥ १२९ ।। दोहा । त्यो ही नम परदेसमैं, पुद्गल बंध अनेक ॥ निराबाय निवसे सही, ज्यों अनंत त्यो एक ॥ १३०॥ RSersister PARENSEENETWwere stantrase SHuu AFTER CARRARTISTERARY पार्श्वपुराण- १५४ ARARASI जो कर्मनको आगमन, आस्रव कहिये सोय । ताके भेद सिद्धांतमैं, भावित दुरवित दोय ॥ १३१ ॥ चौपई। मिथ्या अविरत जोग कपाय । और प्रमाददसा दुखदाय ।। ये सब चेतनके परिनाम । भावासव इनहीको नाम ॥१३२॥ तिनही भावनके अनुसार । ढिगवरती पुगल तिहि बार ।। आवै कर्म भावके जोग । सो दरवित आस्रव अमनोग १३३ सारटा। रागादिक परिनाम, जिनसौं चेतन बॅधत है। तिन भावनको नाम, भावबंध जिनवर कह्यौ ॥ १३४ ॥ दोहा। जो चेतनपरदेसपै, बैठे कर्म पुरान ॥ नये कर्म तिनसौं बॅ., दरवबंध सो जान ॥ १३५ ।। पद्धटी। आस्रव अविरोधनहेत भाव । सो जान भावसंवर सुभाव ।। जो दर्वित आस्रव सुद्धरूप । सो होय दूरव संवरसरूप१३६ व्रत पंच समिति पांचौं सुकर्म। वर तीन गुप्ति दस भेद धर्म बारह बिध अनुप्रेच्छाविचार । वाईस परीपहविजय सार ।। पुनि पांच जात चारित असेस,। ये सर्व भावसंवर विसेस ।। इनसौं कर्मास्रव रुकै एम । परनालीके मुख डाट जेम १३८ दोहा। सुभ उपयोगी जीवके, व्रत आदिक आचार । , पापास्रव अविरोधकौं, कारन हैं निर्धार ॥ १३९॥ MSHEMSEAŞDIASPARSEASES , + SORSEESEDIrse

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areARARIATREATRAPRARIASIASTE पार्श्वपुराण- -- RahasranAmastraRIBRARAreas लेश त्याग जहं होय, देशचारित वही। सो गृहस्थको धर्म, गृही पालै सही ।। १४९ ॥ , दोहा। तीर्थकर निरग्रंथपद, धर साधो सिवपंथ । सोई प्रभु उपदेसियो, मोखपंथ निरग्रंथ ॥१५० ॥ दसबिध बाहिज ग्रंथमैं, राखै तिल तुस मान । तौ मुनिपद कहिये नहीं, मुनि बिन नहिं निर्वान ॥१५१ जे जन परिग्रहवंतकौं, मानै मुक्तिनिवास । ते कबही न मुकत लहैं, भ्रमैं चतुरगतिवास ॥१५२ ।। क्रोधादिक जबही करै, बंधै कर्म तब आन । परिग्रहके संयोगसौ, बंध निरंतर जान ॥ १५३ ॥ बंध अभावै मुक्ति है, यह जानै सब लोय । बंध हेत बरतें जहां, मुक्ति कहांत होय ॥ १५४ ॥ पच्छिम भान न ऊगवै, अगनि न सीतल होय । जथाजात जिनलिंगबिन, मोख न पावै कोय ॥१५५ ॥ RASARANA anaStuistas ARARASARASAAANAA - छप्पय। wasti धन्य धन्य ते साधु, देह-मव-मोग विरच्चे । धन्य धन्य ते साधु, आप अपने रस रचे । धन्य धन्य ते साधु, पीठ जगकी दिसि कीनी। धन्य धन्य ते साधु, दिष्टि सिवसम्मुख दीनी ॥ तजि सकल आस बनवास वस, नगन देह मद परिहरे। ऐसे महंत मुनिराज प्रति, हाथ जोर हम सिर धरे॥१५६॥ SWESORSEARS FRASTARATranasuraPARRERSTASTRI नौवाँ अधिकार। પછ पंच महावत दुद्धर धरै । सम्यक पांच समिति आदरै॥ तीन गुपति पालैं यह कर्म । तेरहविध चारित मुनिधर्म ॥ यातै सधै मुक्तिपदखेत । गिरही-धर्म सुरगसुस देत ॥ सो एकादस प्रतिमारूप । ते चरनों सच्छेप सरूप ॥१५८॥ पंच उबर तीन मकार । सात व्यसन इनको परिहार ।। दरसन होय प्रतिग्यायुक्त । सो दरसनप्रतिमा जिनउक्त १५९ ढाल। श्रीगुरु सिच्छा सामलो, (ग्यानी)सात व्यसन परित्यागौरे॥ ये जगमैं पातक बड़े, (ग्यानी ) इन मारग मत लागौरे ।। जूवा खेल न मांडिये, (ग्यानी)जो धन धर्म गवॉवैरे ।। सब विसननकी बीज है, (ग्यानी) देखता दुख पावरे १६१ रजवीरजसैं नीपजै, (ग्यानी) सो तन मास कहावैरे ॥ जीव हते बिन होय ना, (ग्यानी) नाव लियां घिन आवरे सडि उपजै कीड़ां भरी, (ग्यानी ) मद दुर्गंध निवासरे ॥ छीयासौं सुचिता मिटै, (ग्यानी) पीयां बुद्ध विनासैरे १६३ धिक वेस्या बाजारनी, (ग्यानी) रमती नीचन साथैरे ॥ धनकारन तन पापिनी, (ग्यानी) बेचै विसनी हाथैरे १६४ अतिकायर सबसौं डरै, (ग्यानी) दीन मिरग वनचारीरे ॥ तिनपै आयुध साधते, (ग्यानी ) हा अतिकूर सिकारीरे॥ प्रगट जगतमै देखिये, (ग्यानी) प्रानन धनते प्यारौरे ।। जे पापी परधन हरे, (ग्यानी) तिनसम कौन हत्यारीरे ॥ RaR RAERastu १५८ पार्चपुराण- , परतिय व्यसन महा बुरो, (ग्यानी ) यामैं दोप बड़ेरोरे ॥ इहि भव तनधनजस हरै, (ग्यानी) परभव नरकबसेरोरे॥ पाडवआदि दुखी भये, (ग्यानी) एक व्यसन रति मानीरे सातनसौं जे सठ रचे, (ग्यानी) तिनकी कौन कहानीरे ॥ दोहा। पंच उदंबर फल कहे, मधु मद मास मकार । इनके दूपन परिहरो, पहली प्रतिमा धार ॥ १६९ ॥ चौपई। पांच अनुव्रत गुनवत तीन । सिच्छावत चारो मलहीन ॥ बारहवत धारै निर्दोष । यह दूजी प्रतिमा बतपोप ॥१७॥ दोहा। अब इन बारह बतनको, लिखों लेस विरतंत । जिनको फल जिनमत कह्यौ, अचुतस्वर्गपरजंत ॥१७१॥ EastREanG ARRASARAARASTARARASRAAR ढाल। SREPSINESS जो नित मनवचकायसौं, कृतआदिकसौं जेहो जी ॥ वसको त्रास न दीजिये, प्रथम अनुव्रत एहों जी ॥ बारहबत-विध वरनऊँ ॥ १७२ ॥ झूठवचन नहि बोलिये, सबही दोप निवासो जी । दूजो व्रत सो जानिये, हितमित वचन संभासो जी॥ बारहवत बिध वरनऊं॥१७३॥ भूलो विसरो भूपरो, जो परधन बहु भायो जी ॥ विन दीयें लीजै नही, जनम जनम दुखदायो जी॥ बारहवते बिव बरनऊ ॥१७४ ॥ అలజడల కలకతలాలలజలజ ཁ་ཐུགས་ལ་ ERR FRESTARREARS नावॉ अधिकार। १५९ PrastastrarastratandsrcastasianRSTAREERStayridit ब्याही वनिता होय जो, तासौं कर संतोपो जी। परिहरियै परकामिनी, यासम और न दोषो जी॥ बारहव्रत विध बरनऊं।। १७५॥ धन-कन-कंचन आदि दे, परिग्रह संख्या ठानो जी। तिसना नागिनि वस करो, यह बत मंत्र महानो जी। बारहबत विध वरनऊं ॥ १७६ ॥ अवधि दसों दिसि सेतकी, कीजै सवर जानी जी॥ बाहर पाव न दीजिये, जब लग घटमैं प्रानो जी॥ बारहवत विध वरनऊ॥१७७ ॥ कर मरजादा कालकी, करिये देस-प्रमानो जी ॥ वन-पुर-सरिता आदि दे, नित्त गमनको थानो जी। बारहवत विध परनऊ ॥ १७८ ।। जहा स्वारथ नहि संपजै, उपज पाप अपारो जी। अनरथदंड वही कह्यौ, त्यागी पंच प्रकारो जी। बारहवत विध बरनऊं ॥ १७९ ।। सामायिक-विधि आदरो, थल एकांत विचारो जी ।। उर धरिये सुभ भावना, आरत रौद्र निवारो जी ।। बारहवत विध चरनऊं ॥१०॥ पोपह व्रत आराधिये, चारौ परब-मंझारो जी। बहुविध भोजन परिहरो, घरआरंभ सब छारो जी॥ बारहव्रत विध बरनऊ ।। १८१ ॥ ఇంజలజ SE annaRAnasaRRRRRARARARAS .

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asROR ARRRRRRRRCaseRARCas पार्श्वपुराण- १६२ दोहा। एक हाथपै ग्रास धरि, एक हाथसौं लेय । श्रावकके घर आयके, ऐलक असन करेय ॥ २०० ॥ यह ग्यारह प्रतिमा कथन, लिख्यौ सिधांत निहार । और प्रस्न बाकी रहे, अव तिनको अधिकार ॥ २०१॥ चौपई। जे जगमैं पापी परधान । सात व्यसनसेवक अग्यान ।। रुद्रध्यान धारै अधमई । अति ही कूरकर्म निर्दई ॥२०२॥ झूठवचन बोलैं सत छोर । परधन परवनिताके चोर ॥ बहु आरंभी बहुपरिग्रही । मिथ्यामतकौं पोपैं सही ॥२०॥ चड कपायी अधिक सराग । जिनप्रतिमानिंदक निर्भाग ॥ मुनिवर निदि पाप सिर लेहिं । जैनधर्मकौं दूपन देहि २०४ नीचदेवसेवारसरचे । धरै कृस्नलेस्या मद-मचे ॥ इत्यादिक करनी-रत हैं। ऐसे नीच नरकगति लहैं ॥२०५॥ asmastarashastrasranAmashasranASTARRERan छप्पय । सप्तमसौं पसु होय, देस सयम न संभाले। छठे नरकसौं मनुप, होय व्रत नाहीं पालै ॥ पंचमसौं व्रत धरै, मोखगतिकौं नहिं साधै । चौथेसौं सिव जाय, नही तीरथपद लाधै ।। सब सुभ्रवाससौं आयकै, वासुदेव नहिं भव धरै ।। प्रति वासुदेव बलदेव पुनि, चक्रवर्ति नहिं अवतरै ॥२०६ ఆజ SORECTOBERSeasese FROPRABORROR नावों अधिकार। चौपई। agtogha मायाचारी जे दुठ जीव । परपचनमैं निपुन अतीव ।। झट लिसँ अरु चुगली साहि । झूठी साखि भरत भय नाहिं सील न पालें मोहउदोत । लेस्या जिनकै नील कपोत ।। आरतध्यानी धर्मविहीन । पसुपर्याय लहैं अकुलीन ॥२०८॥ आरतरोगरहित नीराग । धर्म-सुकल-ध्यानी बडभाग | जिनसेवक पाल व्रत सील । कसैं करन मदमाते कील२०९ जिनप्रतिमा जिनमंदिर ठवें । सातसेत उत्तम धन बवें। सदाचार सुन सावक होय । जथाजोग पावै सुर लोय २१० सहज सरल-परनामी जीव । भद्रभाव उर धरै सदीव ॥ मंद मोह जिनके देसिये । मंदकपायप्रकृति पेखिये ॥२१॥ अलपारंभ अलप धन चहें । उर कपोतलेस्या निर्बहै ।। पुन्यपाप नहिं बरतें दोय । मिस्रभावसौं मानुप होय ॥२१२॥ परके दोष सुनै मन लाय । विकथा-बानी बहुत मुहाय ॥ कुकविकाव्य सुन हर जोय । ते बहरे उपजै परलोय २१३ पढ़ें सुछंद विवेक न करे। मृपापाठ विकथा विस्त ॥ परनिंदा भाव बहुभाय । निजपरसंसा करें बढ़ाय ॥२१४ ॥ मलमूत्रादिक-मोजन-काल । मौन छाड़ि बोल बाचाल । झूठ कहत कछु सबै नाहि । ते गूगे जनमैं जगमाहि ॥२१५।। परतियमुख देखें करि नेह । निरख सब योनादिक देह ।। बधबंधन याचें धरि राग। ते मरि आधे होहिं अभाग २१६ SHREENSENSEOSREERSesesureGERRER sasranassasarwaSePASTISTIAst पाचपुराण- १६४ जे नर करें कुतीरथ-गौन । बहुत बोझ लादै बिनमौन ॥ वृथाविहारी देख न चलें । होय पंगु ते पातक फलें ॥२१७॥ नीति-बनिज करिलछमी लेहिं ओछालेहिं न अधिका देहि अलप वित्त दानादिक करें।ते नर दरबधनी अवतरै ॥२१॥ जे धन पाय धरै अभिमान । समरथ होकर देहिं न दान ।। धनकारन छलछिद्र कराहिं । बढ़त परिग्रह धापैं नाहिं २१९ लछमीवंत कृपन जन जेह । परभव होहिं दरिद्री तेह ॥ मंदकपायी सरलसुभाव । अहनिसि बरतें पूजाभाव ॥२२०॥ निजवनितासंतोषी सदा । मंदराग दीखें सर्वदा ॥ दुराचार जिनके नहि होय । पुरुपवंद पावै सुरलोय ॥२२१॥ जे अतिकामी कुटिल अतीव ! महा सरागी मोहित जीव॥ परवनितारत सोकसंजुक्त । ते कामिनि-तन लहैं निरुक्त २२२ रागअंध अति जे जगमाहिं । कामभोगसौं तृपते नाहि ॥ वेस्यादासीरक्त कुसील । ते नर लहैं नपुंसकडील ॥ २२३ ।। मनवचकाय महानिर्दई । बध बंधन ठानैं अधमई ॥ परकौं पीड़ा बहुविध करें। ते जिय अलप आयु धरि मरें । कृपावंत कोमल परिनाम । देसि विचार करें सब काम ॥ जीवदयामैं तत्पर सदा । परकी पीड़ा देहि न कदा ॥२२५॥ सबही जीवनसौं हितभाव । धरै पुरुप ते दीरघ आव ॥ जे जिनजग्यपरायन नित्त । पात्रदानरत सीलपवित्ता२२६॥ इंद्रीजीत हिये संतोष । ते नर भोग लहैं व्रत-पोष ॥ पूजादानविमुख मदलीन | इंद्रीलुब्ध दयागुनहीन ॥२२॥ SoSMSOSSORSEASOTREMES नौवाँ अधिकार। అయన दुराचार दुरध्यानी लोग। इनकौँ प्रापत होहिं न भोग। समय विचारि पढ़ें जिनग्रंथ । पढ़ें पढ़ावे जे सुभपथ ।२२८॥ हितसौं धर्मदेसना कहैं । ते परभव पंडितपद लहै ।। ग्यानगरच हिरदें धर लोहिं । जिनसिधांतकों दूपन देहि २२९ इच्छाचारी पढ़ें असुद्ध। ग्यानविनयवरजित जडबुद्ध । पढ़नेजोग पढ़ावै नाहि । ऐसे मरि मूरस उपजाहिं ।।२३०॥ अनाचाररत आरमवान | परकौं पीडन करें अयान || पापकर्मरत धर्म न गहै। ते परभवमैं रोगी रहैं ॥ २३१ ।। परदुख देखि हरख उर धरै । परवनिता परधन जो हरै। नरपसुजीव विछोहैं जोय । सो पुत्रादिवियोगी होय॥२३२॥ नीचकर्मरत करुना नाहिं । हाथ पांव छदै छिनमाहिं । जे परको उपजावै पीर । ते नर पावें विकल सरीर ॥२३३॥ जो मिथ्यामतमदिरा पियें । पापमृत्रकी सरधा हिये ।। धर्मनिमित्त जीवबध करें। महाकपायकलुपता धरै ।।२३४॥ नास्तिकमती पाप-मग गहैं। ते अनंतससारी रहे। रतनत्रयधारी मुनिराज । आगमध्यानी धर्मजहाज ॥२३५॥ इच्छारहित घोर तप करें । कर्म नास करि भवजल तिरै । उत्तम देव नमैं सिरनाय । पूजें परम साधुके पाय ॥ २३६ ॥ साधरमी-वत्सल मुनिप्रीत | उत्तम गोत बधैं इहि रीत || जे जिन जती जिनागम जान | नमैं नही सठ करि अभिमान मानैं नीच देव गुरु धर्म । ये सब नीच गोतके कर्म ॥ जिनके हिय रमै वैराग। धारै संजम तिसना त्याग॥२३८॥ జతకలతలాతలాజలజతలు GOSEKS ।

anand tasRAreasrasta पाचपुराण- PrastrastFIRahraseas अतिनिर्मल चारितभंडार । ग्यानध्यानतत्पर अविकार ।। ख्याति लाभ पूजा नहिं चहैं । ते अहमिंद-संपदा गहैं २३९ पंच करन बैरी वस आन । चारित पालैं अति अमलान ॥ दुद्धर तप कर सोझै काय । चक्री होंय देवपद पाय ॥२४॥ जे सम्यकदृष्टी गुनग्रही । सोलहकारन भावे सही ।। ते तीर्थंकर त्रिभुवनधनी। होहिं तीन-जगचूड़ामनी ॥२४१॥ दोहा। इहिबिध पूछनहारको, समाधान जिनराज ॥ कीनौ गनधरदेवप्रति, जगतजीवहितकाज ॥ २४२ ॥ बानी सुन बारह सभा, भयो सबन आनंद ॥ जैसे सूरजके उदय, विकसै वारिजद्वंद ॥२४३।। वचनकिरनसौं मोहतम, मिट्यौ महा दुखदाय ॥ वैरागे जगजीव बहु, काललब्धिबल पाय ॥ २४४ ॥ चौपई। केई मुक्तिजोग बड़माग । भये दिगंबर परिग्रह त्याग ॥ किनही श्रावक-व्रत आदरे । पसुपर्याय अनुव्रत धरे ॥२४५॥ केई नारि अर्जिका भई। भाके संग बनकौं गईं। केई नर पसु देवी देव । सम्यकरत्न लह्यौ तहां एव ॥२४६ ॥ केई सक्तिहीन संसारि । व्रत भावना करी सुखकारि ॥ पूजादानभाव परिनये। जथाजोग सब सेवक भये ॥ २४७ ॥ दोहा। कमठ जीव सुरजोतिपी, करि वचनामृतपान ।। बम्यौ बैर मिथ्यात्व विप, नम्यौ चरन जुग आन ॥२४८॥ Haftasosstastastrandstrannan srraselatastrastrasRC 5050SORSERESCESS ६ नौवाँ अधिकार । - , , OBORGEOMUSE सम्यकदरसन आदरयौ, मुक्तितरोवरमूल || संकादिक मल परिहरे, गई जनमकी मूल ॥२४९ ॥ तहां सातसै तापसी, करत कष्ट अग्यान ॥ देखि जिनेसुरसंपदा, जग्यौ जथारथ ग्यान ॥ २५० ॥ दई तीन परदन्छिना, प्रनमैं पारसदेव ।। स्वामि-चरन संयम धरचौ, निंदी पूरव टेव ॥ २५१ ।। धन्य जिनेसुरके वचन, महामंत्र दुसहत ।। मिथ्यामत-विपधर-उसे, निर्विप होहिं तुरंत ॥ २५२ ॥ कहां कमठसे पातकी, पायौ दरसन सार । कहां पाप-तप-तापसी, धरयौ महाबत-मार ।। २५३ ॥ जिनके वचनजहाज चढ़ि, उतरे भवजलपार ॥ जे प्रतच्छ आये सरन, क्यो न होय उद्धार ॥ २५४ ॥ अब श्रीगनधरदेव तह, चार ग्यान परवीन ॥ जिन समुद्रतै अर्थजल, मतिभाजन भर लीन ॥२५५॥ नाम स्वयंभू दयानिधि, विविधरिद्धिगुनखेत ।। द्वादसांग रचना करी, जगतजीवहितहेत ॥२५६ ॥ परमागम अम्रतजलधि, अवगाह मुनिराय ॥ जन्मजरामृतदाह हरि, होय सुखी सिव पाय ।। २५७ ॥ चौपई। प्रथम एकसौ बारह कोड । लाख तिरानवै ऊपर जोड। बावन सहस पांच पद सही।हादसांगकी परमित कही २५८ ARARARANSAARA uradnan STARA BEOSREEvertmeSCRISESSES vastarastraseaRORastra पार्चपुराण- १६८ Prastastrastras . पद्धडी। इक्यावन कोड़ी आठ लाख। चौरासी सहस सिलोक भास॥ छस्सै साढ़े इक्कीस जान। यह एक महापदको प्रमान ॥२५९॥ दोहा। इहि बिध सभासमूह सब, निवसै आनंदरूप ।। मानौं अम्रत नीरसौं, सिंचत देह अनृप ॥ २६० ॥ चौपई। तब सुरेस उठि विनती करी। हाथ जोर सिर अंजुलि धरी॥ भो जगनायक जगआधार। तीन भवनजनतारनहार ॥२६१॥ यह विहारअवसर भगवान । करिये देव दया उर आन । भविकजीवखेती कुम्हलाय। मिथ्यातपसौं सूसी जाय॥२६२॥ भो परमेस अनुग्रह करो । बानीबरसासौं तप हरो॥ मोखमहापुरके परधान । तुम चिनजारे दयानिधान ॥२६३॥ प्रभुसहाय भवि सुखपद लेहिं । आवागमन जलांजुलि देहिं॥ इहिविध इंद्र प्रार्थना करी। सहसनाम करि थुति विस्तरी२६४ भयो अनिच्छागमन जिनेस । भविजीवनके भावविसेस ।। सकलसुरासुर जय जय कियौ। जिनविहारअम्रतरस पियौ ॥ गमनसमय और बिध मई। समोसरनरचना खिर गई। चले संग सुर चतुरनिकाय । चउबिध सकल चले सुरराय २६६ सुरदुंदुभि बाजै सुसकार । जिनमंगल गावै सुरनार ॥ हाथ धुजाजत देवकुमार।चले जाहिंनभमैं छवि सा॥२६७॥ चहुंदिसि चार चारसौ कोस । होय सुभिच्छ सदा निर्दोस । नमविहार जिनवरकै होय | जीवधात तहां करै न कोय।२६८॥ HOMSEARSENSE RastraRE RrasharaRRIFRERArra नौवाँ अधिकार। सब उपसर्गरहित भगवंत । निरआहार आयुपरजंत ॥ चतुरानन देसै संसार । सबविद्यापति परमउदार ॥ २६९ ॥ प्रभुके तनकी परै न छाहिं । पलक पलकसौं लागै नाहिं ॥ नख अरु केस बढ़ें नहि जास। ये दस केवल-अतिसय भास२७० मापा सकल अर्थ मागधी। खिर सकल संसयहर सधी।। नरपसु जातिविरोधी जीव । सबउर मैत्री धरैसदीय ॥२७॥ नानाजाति बिरछ दुस दलै । सब रितुके फल फूलनि फलैं । अमुसचारभूमि मनिमई। दर्पनवत आगम बरनई ॥२७२॥ सुरमि पवन पीछे अनुसरै । वायुकुमारजनित सुख करै । सुरनरपसू सभागत जेह । परमानंदसहित सब तेह ॥२७३।। मारतसुर जोजनमित मही। करै धूलितृनवर्जित सही ॥ मेघकुमार करै मन लाय । गधोदकबरसा सुसदाय ॥२४॥ चरनकमल जिन धारै जहां। कंचन कमल रचें सुर तहां ॥ सातकमलतें आगें ठान । पीछे सात एक मधि जान।।२७५॥ ए यो पंकजकी पंद्रह पांति । सवा दोइ सै सब इहिभांति ॥ सुकलध्यान उपजे बहुभाय । निर्मलदिसि निर्मल नम थाय मुदित बुलावै देवसमाज । भविजनको जिन-पूजनकाज || धर्मचक आगे संचरै । सूरजमंडलकी छवि हरै ।। २७७ ॥ मंगलदर्व आठ झलकाहिं । जथाजोग सुर लीये जाहि ॥ ये चौदह देवनकृत जान । वरअतिसयमंडितभगवान २७८ करें विहार परमसुख होत । मविजीवनके भाग उदोत ॥ स्वर्गमोखमारग प्रभु सार । प्रगट कियौ भ्रमतिमर निवार २७९ RARVARATRArrastanAria पार्श्वपुराण- १७० कहीं कुलिंगी दोसैं नाहिं । भानु उदय ज्यौं चोर पलाहिं ॥ सब निज निज वांछाअनुसार । पूरनआस भये तनधार २८० कासी कौसलपुर पचाल । मरहठ मारूदेस विसाल ।। मगध अवंती मालवठाम । अंग बंग इत्यादिक नाम ॥२८॥ कीनी आरजखंड विहार । मेटौ जगमिथ्याधियार ॥ अब सब गनकी गनना सुनो । जथापुरानकथित विध मुनो प्रथम स्वयम्भूप्रमुख प्रधान । दस गनधर सर्वागमजान ।। पूरवधारी परमउदास । सर्व तीन सै अरु पंचास ॥ २८३ ॥ सिष्य मुनीसुर कहे पुरान । दसहजार नौ सै परवान ॥ अवधिवंत चौदह सै सार । केवलग्यानी एकहजार ॥२८॥ विविध विक्रियारिद्धिबलिष्ट । एकसहस जानो उतकृष्ट । मनपरजयग्यानी गुनवंत । सातसतक पंचास महंत ॥२८५॥ छसै वादविजयी मुनिराज । सब मुनि सोलहसहस समाज ॥ सहस छवीस अर्जिका गनी। एकलाख स्रावक बतधनी २८६ तीनलाख सावकनी जान । बरनी संख्या मूल पुरान ॥ देवीदेव असंख्यअपार । पसुगन संख्याते निरधार ।। २८७ ॥ इहबिध बारह सभासमेत । रतनत्रयमारगविध देत ।। विहरमान दरसावत बाट । सत्तर बरस भये कछु घाट २८८ सम्मेदाचल सिखर जिनेस । आये श्रीपारसपरमेस । एक मास जिन जोग निरोधाभनवचकाय क्रियासबरोध २८९ सूच्छम कायजोगथिति ठान । त्रितियमुकलसंजुत तिहिं ठान तजि सयोगिथानक स्वयमेव । आये फिर अयोगिपद देव२९० PRESENSESSERESEReseksee HIVRSONSORSEURSEIRSOEBISORSE ORGARISRORRERa नौवाँ अधिकार। पंच लघुच्छर है थिति जहां । चतुरथ सुकलध्यानबल तहां ।। दोयचरम समये जिन भनी । प्रकृति बहत्तर तेरह हनी २९१ इहिविध कर्म जीत भगवान । एक समय पहुंचे निर्वान ।। औ छत्तीस मुनीसुर साथ । लोकसिखर निवसे जिननाथ२९२ सावन सुदि सात सुम वार । विमल विसासा नसतमझार ॥ तजि संसार मोसमें गये । परमसिद्ध परमातम भये ॥२९३॥ पूरव चरम देहत लेस । भये हीन आतम परदेस ॥ अष्टगुनातममय व्यवहार । निहचे गुन अनंतमंडार ॥२९४॥ सादि अनतदसा परिनये । सिद्धभाव वसुगुनजुत थये । परमसुखालय वासो लियौ । आवागमन जलांजलि दिया। दोहा। पंच कल्यानक पाय सुख, जगतजीव उद्धार । मये पूज्य परमातमा, जय जय पासकुमार ॥ २९६ ॥ जिनके सुसकौं ग्यानकी, नहि उपमा जगमाहि । जोतिरूप सुखपिंड थिर, इंद्रीगोचर नाहि ॥ २९७ ॥ अब तिनको आकार कछु, एकदेस अवधार । लिखौं एक दृष्टांत करि, जिनसासने अनुसार ॥ २९८॥ चौपई। मोममई इक पुतला ठान | नखसिख समचतुरस्रसठान ॥ सब तन सुंदर पुरुषाकार । नराकार इसही विध सार २९९ माटीसौ इमि लेपहु सोय । जैसे त्वचा देहपर होय ॥ कहीं अंग साली नहिं रहै । सब उपचारकल्पना यहै ३०० REMECESSORSMSSESSMEMESTER SABRANAS tastane AF १७४ पार्श्वपुराण- . सवैया। धूम प्रभामै उपजि, भील अति भयो भयानक । चरम नरक पुनि सिंघ, फेर पंचमभू-थानक ॥ पसुजोनि भुंजि महिपाल नृप, देव जोतिपी अवतरचौ । इहि विध अनेक भवदुख भरे, बैरभाव-विपतरु फल्यौ३१९ दोहा। छिमाभाव फल पासजिन, कमठ बैर फल जान । दोनों दिसा विलोककै, जो हित सो उर आन ॥ ३२० ॥ सोरठा। जीव जाति जावंत, सबसौं मैत्रीमाव करि। याकौ यह सिद्धंत, बैरविरोध न कीजिये ॥३२१ ।। जो भगवान बखान करी धुनि, सो गुरु गौतमने उर आनी । तापर आइ ठई रचना कछु, द्वादस अंग सुधारस बानी ॥ ता अनुसार अचारजसंघ, सुधीबलसौं बहु काव्य बखानी। यों जिनग्रंथ जथारथ हैं, अजथारथ हैं सब और कहानी ॥ दोहा। जितने जैनसिद्धांत जग, ते सब सत्यसरूप । धर्मभावना हेत सब, हितमित सिच्छारूप ॥३२३ ।। कलपित कथा सुहावनी, सुनते कौन अरत्थ । लाख दाम किस कामके, लेखन लिसे अकत्थ ३२४ १ उक्त च--- सत्त्वेषु मैत्री गुणिषु प्रमोद, क्लिष्टेषु जीवेषु कृपापरत्व । -- माध्यस्थ्यभाव विपरीतवृत्ती, सदा ममात्मा विदधातु देव ॥ ३२३ ।। ఆతరవాత అచరజలతల astrwasnasrirashasmashastrastrashastrashastrastashaRRE , - नौवाँ अधिकार। सोरठा। सुन श्रीपार्सपुरान, जान सुभासुभ कर्मफल । सुहित हेत उर आन, जगत जीव उद्यम करो ॥३२५॥ दोहा। प्रभुचरित्र मिस किमपि यह, कीनौ प्रभु-गुनगान । श्रीपारस परमेसकौ, पूरन भयौ पुरान ॥ ३२६ ॥ पूरव चरित विलोकिकै, भूधर बुद्धिप्रमान । भापाबंध प्रबंध यह, कियौ आगरे थान ॥ ३२७ ॥ , . छप्पय । EsRATRIRAFRImastaras अमरकोप नहिं पढ्यौ, मैं न कहि पिंगल पेख्यौ । काध्य कंठ नहिं करी, सारसुत सो नहिं सीख्यौ। अच्छर-संधि-समास-ग्यानवर्जित बुधि हीनी । धर्मभावना हेत, किमपि भापा यह कीनी । जो अर्थ छंद अनमिल कही, सो बुध फेर सवारियो । सामान्यबुद्धि कविकी निरखि, छिमाभाव उर धारियो दोहा । जिनसासन अनुसार सब, कथन कियौ अवसान । निज कपोलकल्पित कही, मति समझो मतिवान ३२९ छयउपसमकी ओछसौं, कै प्रमादवस कोय ॥ इहिबिध भूल्यौ पाठ मै, फेर सवांरो सोय ॥ ३३० ॥ पंच बरस कछु सरससे, लागे करतन बेर ॥ बुधि थोरी थिरता अलप, तातें लगी अबेर ॥ ३३१ ॥ ASARARARARMARARA ARARARARARRARA , S525555 Prast १७६ araserasnasex पार्श्वपुराण- - सुलभ काज गरुबो गर्ने, अलपबुद्धिकी रीत ॥ यौं कीड़ी कन ले चलै, किधौं चली गढ़ जीत ॥३३२॥ विधनहरन निरमयकरन, अरुन वरन अभिराम ॥ पासचरन संकटहरन, नमो नमों गुनधाम ॥ ३३३ ॥ छप्पय। ANARARAFTARBRARARASARAsaseannarnaranASA , नमो देव अरहंत, सकल तत्त्वारथभासी । नमों सिद्ध भगवान, ग्यानमूरति अविनासी ॥ नमों साध निरग्रंथ, दुविध परिग्रहपरित्यागी। जथाजात जिनलिंग धारि, बन बसे विरागी । बंदी जिनेसभापित धरम, देय सर्व सुख सम्पदा ॥ ये सार चार तिहुलोकमैं, करो छेम मंगल सदा॥३३४॥ संवत सतरह से समय, और नवासी लीय । सुदि अपाढ़ तिथि पंचमी, ग्रंथ समापत कीय ॥३३५॥ इति श्रीपार्श्वपुराणभाषाया भगवनिर्वाणगमनवर्णन नाम नवमोऽधिकार । RamanamrinakasasecastastraRARISHAIRATNERARAHare, EmmmmmmmODY समाप्तोऽय अन्ध ।

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Pasva Puran

Author
Kavir,bhudar Das
Title
Pasva Puran
File name
Pasva Puran
Text
OCR done
Citation
1962
Published
2011/01
Publisher
Jain Granth Ratnakar Kariyalye Bombay,
Language
Sanskrit
Pages
182
Library
Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
Classification
Literature
DLI number
546394
Barcode
4990010024874.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
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