Shri Jawahar Vidyapith Binasar, Bikaner
Navat Tatav
Front matter
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अनुक्रमणिका
विपय
पृष्ट
जीवतत्त्व :
३
अजीवतत्त्व :
है
पुण्यतत्त्व
१३
...
पापतत्त्व
२१
आस्रवतत्त्व
संवरतत्त्व
४०
निर्जरातत्त्व
५४
...
वन्धतत्व
५८
...
६१
माक्षतत्त्व
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12. Trum
श्री जवाहर विद्यापीठ
भीनासर (बीकानेर)
पुस्तक क्रमाक 506
विषय जैन धी
Main
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कलकत्ता-निवामी लाला देवीप्रमाद जी जौहरी ।
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वक्तव्य। महानुभावो! जिन व्यक्तिका फोटो इस पुस्तक में आप देख रहे हैं काशीके एक प्रसिद्ध जौहरी थे लेकिन विशेप जोवन उन्होंने कलकत्ते में बिताया था, उनको मृत्यु वृद्ध अवस्थामें होनेपर उनकी पत्नी मुन्नी बीबीने इस मण्डलको पुस्तकें छपानेके कार्य में पूर्ण सहायता की थी इस कारणमे उक्त महाशयका फोटो आप इस पुस्तकमें देख रहे हैं। इस उत्तम विचारकेलिये मण्डल उनका अति प्रभारी है। मण्डल जिस तरह हिन्दी जैन साहित्य की सेवा बजा रहा है उसी तरह दानवीरोको सेवा भी बजा रहा है। आशा है कि हमारे ओर दानवोर भी इसी तरह देश कालको गतिका ध्यान रखते हुये हिन्दो जैन साहित्य प्रचारमें सहायता देकर मण्डलको अपनी उदारताका परिचय देनेकी कृपा करेंगे। आगरा रोशन-मुहल्ला ता०१ जनवरी १९२६ श्रापका दास- मन्त्री श्री यात्मानन्दजैनपुस्तकप्रचारकमण्डल
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. * नवतत्व हिन्दी-भाषानुवादसहित । जीवाजीवा पुण्णं, पात्रासवसंवरो य निजरणा । बधो सुक्खो य तहा, नव तत्ता हुति नायव्वा ॥१॥ जोव, अजीय, पुण्य, पाप, प्रास्त्रव, संवर, निर्जरा, पन्ध और मोक्ष ये नवतत्व ज्ञेय हैं अर्थात् इन्हें जानना चाहिये ॥ १ ॥ (१) जिसमें ज्ञान हो, उसे जीव कहते हैं । (२) जिसमें ज्ञान नहीं है, उसे अजीव कहते हैं । (३) जिस कर्म से जीव सुख पाता है, उस कर्म का नाम पुण्य है । (४) जिस कर्म से जीव दुःख पाता है, उस कर्म का नाम पाप है । ( ५ ) आत्मा से सल्बन्ध ( मेल ) करने के लिये जिसके द्वारा पुद्गलद्रव्य आते हैं, उसे प्रास्रव कहते हैं । (६) आत्मा से पुद्गलद्रव्य का सम्बन्ध होना जिसके द्वारा रुक जाय, उसे संवर कहते हैं। (७) आत्मा से लगे हुए कुछ कर्म, जिसके द्वारा आत्मा से अलग हो जाय, उसे निर्जरा कहते हैं।
२
(८) दूध और पानी की तरह आत्मा और पुद्गलद्रव्य
का आपस मे मिलना, बन्ध कहलाता है। (8)
सम्पूर्ण कर्मों का आत्मा से अलग होना, मोक्ष
कहलाता है
ज्ञान और चैतन्य का मतलव एक है तथा जड़ और
अजीव का मतलब एक है । इन नवतत्वों में से पुण्य,
संवर, निर्जरा और मोक्ष, ग्रहण करने योग्य हैं; पाप,
आस्रव और बन्ध का त्याग करना चाहिये। आत्मा
जिन पुद्गलद्रव्यो को ग्रहण कर अपने प्रदेशों से मिला
लेता है वे पुद्गलद्रव्य, कर्म कहलाते हैं। जिसमें रूप,
रस, गन्ध और स्पर्श हो, उसको पुद्गल कहते हैं ।
"अव जीव आदि तत्त्व के भेद कहते हैं।"
चउस चउदस वाया-
लासा वासीन हुंति बायाला!
सत्तावन्न वारस.
चउ नव भेला कसेणेसि ॥ २ ॥
जीव के चौदह, अजीव के चौदह, पुण्य के
बयालीस, पाप के बयासी, आस्रव के बयालीस, संवर
के सत्तावन, निर्जरा के वारह, बन्ध के चार और मोक्ष
के नव भेद है ॥२॥
३ "इस गाथा मे छ प्रकार से जीव का विवेचन है ।" एगावह दुविह तिविहा, चउठिवहा पंच छावहा जीवा । चेयण तस इयरोहि, वेय गइ करण काएहिं ॥३॥ चेतनरूप से जीव एक तरह का है; त्रस और स्थावर- रूप से दो तरह का; स्त्रीवेद, पुरुषवेद और नपुन्सकवेद रूप से तोन तरह का; देनगति, मनुष्यगति, तिर्यञ्चगति और नरकगति रूपले चार तरह का; एकेन्द्रिय, द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय और पंचेन्द्रियरूप से पांच तरह का; पृथ्वीकाय, जतकाय, तेजःकाय, वायुकाय, वनस्पति- काय और त्रसकायरूप से छः तरह का ॥३॥ सूर्य बादलों से चाहे जितना धिर जाय तो भी उसका प्रकाश कुछ न कुछ ज़रूर बना रहता है इसी तरह कर्मों के गाढ प्रावरण से ढके हुए जोव के ज्ञान का अनन्तवां भाग खुला रहता हैमतलब यह है कि पूर्ण- कर्मवद्धदशा में भी जीव में कुछ न कुछ ज्ञान ज़रूर वना रहता है; यदि ऐसा न हो, तो जीव और जड़ में कोई फर्क ही न रहेगा। सर्दी गरमी आदि से बचने के लिये जो जीव चल
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फिर सकें वे 'वस' कहलाते हैं, जैसे:-द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय
आदि । जो जीव शीत उष्ण आदि से अपना बचाव
करने के लिये चल फिर न सके वे 'स्थावर' कहलाते हैं,
जैसे:--एकेन्द्रिय जीव, वृक्ष, लता, पृथ्वीकाय, जलकाय
आदि ।
जिस कर्म के उदय से पुरुष के साथ सम्भोग करने
की इच्छा होती है उस कर्म को 'स्त्रीवेद' कहते हैं । जिस
कर्म के उदय से स्त्री के साथ सम्भोग करने की इच्छा
होती है उस कर्म को 'पुरुपवेद' कहते हैं । जिस कर्म के
उदय से स्त्री और पुरुष दोनों के साथ सम्भोग करने की
इच्छा होती है उस कर्म को 'नपुन्सकवेद' कहते हैं।
देव, मनुष्य, तिर्यश्च और नरक, ये चार गतियाँ हैं।
अनादिकाल से इन गतियो में जीव घूम रहा है, और
जब तक मुक्ति नहीं मिलती तबतक बरावर घूमता रहेगा।
एकेन्द्रिय जीव वे हैं, जिन्हें सिर्फ शरीर हो, जैसे:-
पृथ्वीकाय, जलकाय, तेजःकाय, वायुकाय और वनस्पति-
काय के जीव ।
श्रीन्द्रिय जीव चे हैं, जिन्हें सिर्फ शरीर और जीभ
हो, जैसे:-केंचुया, जोंक, शंख आदि के जीव ।
त्रीन्द्रिय जीव चे हैं, जिन्हें सिर्फ शरीर, जीभ
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-- - और नाक हो, जैसे:-चींटी, खटमल, , इन्द्रगोप (बरसाती लाल रंग के कीड़े ) आदि जीव । चतुरिन्द्रिय जीव वे हैं, जिन्हें सिर्फ शरीर, जीभ, नाक और आंख हो, जैसे:-बिच्छू, भौरा, मक्खी, मच्छर आदि। पञ्चेन्द्रिय जीव वे हैं, जिन्हें शरीर, जीभ, नाक, आँख और कान हो, जैसे:-देव, मनुष्य, पशु, पक्षोआदि। काय का मतलम है शरीर, जिनका शरीर सिर्फ पृथ्वी का हो, वे पृथ्वी काय; जिनका शरीर सिर्फ जल का हो वे जलकाय (अपकाय); जिनका शरीर सिर्फ तेज का हो, वे तेजःकाय (अग्निकाय ); जिनका शरीर सिफ वायु का हो, वे वायुकाय; शाक, भाजी, फल फूल श्रादि का जिनका शरीर हो, वे वनस्पतिकाय कहलाते हैं। पृथ्वीकाय, जलकाय, अग्निकाय, वायुकाय, वन- स्पतिकाय और त्रसकाय, इनको ‘पड्जीवनिकाय' कहते हैं। "अब जीव के चौदह भेद कहते हैं।" एगिदिय सुहुमियरा, सन्नियर पणिदिमा य सवितिचउ । अपजत्ता पज्जत्ता, कर्मण चउदस जियठाणा ॥४॥. - ६ एकेन्द्रिय जीव के दो भेद हैं, सूक्ष्म और वादर । पञ्चेन्द्रिय के दो भेद हैं, संज्ञी और असंज्ञी ( दोनों के मिलाकर चार भेद हुए। ) द्वीन्द्रिय का एक भेद, त्रीन्दिय का एक भेद और चतुरिन्द्रिय का एक भेद ( तीन और पहिले के चार मिलाकर सात हुए) ये सातों प्रर्याप्त और अपर्याप्तरूप से दो प्रकार के हैं। इस तरह जीव के चौदह स्थान-भेद हुए ॥ ४ ॥ सूक्ष्म जीव वे हैं जिनको हम अांख से नहीं देख सकते, न उन्हें अग्नि जला सकती है, न कोई चीज़ उनको उपघात पहुँचा सकती है, न वे किसी को उपधात पहुँचा सकते हैं, मनुष्य, पशु, पक्षी आदि प्राणियों के उपयोग में वे नहीं आते, सारे लोक में वे भरे पड़े हैं। वादर जीव वे हैं, जिन्हें हम देख सकते हैं, आग उन्हें जला सकती है, मनुष्य आदि प्राणियों के उपयोग में वे आते हैं, उनकी गति में रुकावट होती है, वे सारे लोक में व्याप्त नहीं हैं किन्तु उनके रहने की जगह नियत है संज्ञी पञ्चेन्द्रिय ये हैं जिनको पांच इन्द्रियां और मन हो, जैसे:-देव, मनुष्य, पशु, पक्षी आदि । ,
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असंज्ञी पञ्चेन्द्रिय को पाँचों इन्द्रियां होती हैं पर
मन नहीं होता, जैसे:-मछली, मेढ़क तथा खून, वीर्य,
वात, पित्त, कफ आदि के सम्मूछिम मनुष्य जीव ।
शक्ति विशेष को पर्याप्ति कहते हैं; जीवसम्बद्ध पुद्गल
में एक ऐसी शक्ति है जो आहार को ग्रहण कर उसका
रंस बनाती है, उस शक्ति का नाम है 'आहारपर्याप्ति' ।
रसरूप परिणाम का खून. मांस, मेद (चर्वी),
अस्थि ( हड्डी) मजा ( हड्डी के अन्दर का कोमल पदार्थ)
और वीर्य बनाकर शरीर रचना करने वाली शक्ति को
'शरीरपर्याप्ति' कहते हैं।
सात धातुओं में-रक्त, मांस आदि में परिणत रस
से इन्द्रियों के वनाने वाली शक्ति को 'इन्द्रियपर्याप्ति'
कहते हैं।
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श्वासोच्छ्वास बनने योग्य पुद्गलद्रव्य को ग्रहण
कर उसे श्वासोच्छ्वासरूप में परिणत करने वाली शक्ति
को 'श्वासोच्छ्वासपर्याप्ति' कहते हैं।
मन बनने योग्य पुद्गलद्रव्य को ग्रहण कर मनोरूप
में परिणत करने वाली शक्ति को 'मनःपर्याप्ति' कहते हैं।
न
भाषायोग्य पुद्गलद्रव्य को ग्रहण कर भापारूपा में
परिणत करने वाली शक्ति को 'भाषापर्याप्ति' कहते हैं।
पदार्थ के स्वरूप को बदलना परिणाम कहलाता है,
जैसे- दूध का परिणाम दही ।
इस तरह आहार, शरीर, इन्द्रिय, श्वासोच्छ्वास,
भाषा और मन, ये छः पर्यासियाँ हैं । इनमें से पहली चार
पर्याप्तियॉ एकेन्द्रिय जीव को होती है। मनःपर्याप्ति को
छोड़ बाकी को पॉच पर्याप्तियाँ विकलेन्द्रिय तथा असंज्ञी
पञ्चेन्द्रिय जीव को होती हैं।
द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय तथा चतुरिन्द्रिय जीव को
'विकलेन्द्रिय कहते है । छः पर्याप्तियाँ संज्ञी पञ्चेन्द्रिय
जीव की होती हैं। पहली तीन पर्याप्तियाँ पूरी किये
विना कोई जीव नही मर सकता । जिन जीवों की जितनी
पर्याप्तियाँ कही गई हैं उन पर्याप्तियों को यदि वे पूरी कर
चुके हों, तो 'पर्याप्त' कहलाते हैं। जिन जीवों ने अपनी
पर्याप्ति पूरी नहीं की, वे 'अपर्याप्त' कहलाते हैं।
॥जीवतत्व समाप्त ॥
न
है - "अव अजोवतत्त्व के चोदह भेद कहते हैं "' धम्माधम्मागासा, तिय तिय भेया तहेव अद्धा य । खंधा देस पएसा, परमाणु अजीव चउदसहा ॥ ५ ॥ - स्कन्ध, देश और प्रदेश रूप से धर्मास्तिकाय, अधर्मास्तिकाय और 'आकाशास्तिकाय के तीन तीन भेद हैं, इसलिये तीनों के नव भेद हुए; काल का एक भेद और पुद्गल के चार भेद हैं:-स्कन्ध, देश, प्रदेश और परमाणु । सब मिलकर अजीव के चौदह भेद हुए ॥५॥ स्कन्धः-चतुर्दशरज्ज्वात्मक लोक में पूर्ण जो धर्मास्तिकाय, अधर्मास्तिकाय, आकाशास्तिकाय और पुद्गलास्तिकाय हैं, ये प्रत्येक 'स्कन्ध' कहलाते हैं। मिले हुए अनन्तपुद्गलपरमाणुओं के छोटे समूह को 'स्कन्ध' कहते हैं। देशः-स्कन्ध से कुछ कम, अथवा बुद्धिकल्पित स्कन्धभाग को 'देश' कहते हैं। प्रदेशः-स्कन्ध से अथवा देश से लगा हुअा अति सूक्ष्म भाग (जिसका फिर विभाग न हो सके) 'प्रदेश' कहलाता है। .
१० परमाणु:- स्कन्ध अथवा देश से पृथक् , प्रदेश के समान अतिसूक्ष्म स्वतन्त्र भाग 'परमाणु' कहलाता है। धर्मास्तिकाय, अधर्मास्तिकाय और आकाशास्ति- काय के परमाणु नहीं होते। अस्तिकाय-अस्ति का अर्थ है प्रदेश और कायका अर्थ है समूह, प्रदेशोंके समूहको 'अस्तिकाय' कहते हैं । कालद्रव्यका वर्तमानसमयरूप एक ही प्रदेश है, प्रदेशोंका समूह न होने से अाकाशास्तिकाय की तरह 'कालास्तिकाय' नहीं कह सकते। है "इस गाथा में तथा इमसे आगे की गाथा में अजीवतत्त्व का स्वरूप विशेषरूपसे कहते हैं । धम्माधम्मा पुग्गल, नह कालो पंच हुति अजीया । * चलणसहावो धरमो थिरसंठाणो अहम्मो अ॥६॥ धर्मास्तिकाय, अधर्मास्तिकाय, श्राकाशास्तिकाय, पुद्गलास्तिकाय और काल, ये पांच अंजीव द्रव्य हैं। धर्मास्तिकाय, चलनस्वभाव वाला है अर्थात् जैसे मछलीके चलनेफिरने में जल सहायक है उसी तरह जीव और पुद्गल के सञ्चार में हिलनेडुलने में-धर्मास्तिकाय ११ सहायक है । अधर्मास्तिकोय, स्थिरस्वभाव वाला है अर्थात् जैसे वृक्षादि की छाया पक्षियों को विश्रान्ति लेने में-ठहरने में-कारण है उसी तरह जीव और पुगल को स्थिर रखने में अधर्मास्तिकाय कारण है ॥ ६ ॥ है । - . अवगाहो आगास, पुग्गल जीवाण पुग्गला चउहा । खंधा देस पएसा. परमाणू वेव नायव्वा ॥७॥ अवकाश देना आकाशास्तिझाय का समाव है। जैसे दूध, शक्करको अवकाश देता है उसी तरह आकाशा- स्तिकाय, जीव और पुदलों को अवकाश देता है। पुगल के चार भेद ये हैं; "स्कन्ध, देश, प्रदेश और परमाणु" ॥ ७ ॥ आकाश के दो भेद है, लोशाकाश 'ओर अलोकाकाश। जितने प्राकाशदेश में जीव, पुल, · धर्मास्तिकाय, अधर्मास्तिकाय और काल व्याप्त हैं, वह 'लोकाकाश कहलाता है, और उससे जुदा अलोकाकाश । - - १२ . रूप, रस, गन्ध, स्पर्श और शब्द; ये सिर्फ पुद्गला- स्तिकाय में रहते हैं, धर्मास्तिकाय आदिमे नहीं । "अब दो गाथाओंसे कालद्रव्यका स्वरूप कहते हैं।" एगा कोडी सतसट्टि, लक्खा सतहुत्तरी सहस्सा य। दो य सया सोलहिया. श्रावलिया इगमुहुत्तम्मि ॥ ॥ समयावली मुहुत्ता, दीहा पक्खा य माल वरिका य। भणिो पलिया सागर, उस्सप्पिणो सप्पणी कालो ।।। एक क्रोड़, सड़सठ लाख, सतहत्तर हजार, दो सौ सोलह (१६७७७२१६) श्रावलिकाओं का एक 'मुहूर्त' होता है ॥८॥ असंख्य समयों की एक 'श्रावलिका' होती है। जिसका विभाग न हो सके ऐसे अतिसूक्ष्म कालको 'समय' कहते हैं । तीस मुहूर्तों का अहोरात्ररूप एक 'दिन' होता है । पन्द्रह दिनों का एक 'पक्ष'। दो पक्षों १३ का एक 'मास' । बारह महीनों का एक 'वर्ष' । असंख्य वर्षोंका एक 'पल्योपम' । दस क्रोडामोड़ी पल्योपम का एक 'सागरोपम' । दस क्रोडाकोड़ी सागरोपम की एक 'उत्सर्पिणी' । दूसरे दस क्रोडाकोड़ी सागरोपम की एक 'अवसर्पिणी' ॥ ६ ॥ उत्सर्पिणी और अवसर्पिणी मिलकर एक 'कालचक्र' होता है । ऐसे अनन्त कालचक्र बीतने पर एक 'पुद्गल- परावत' होता है । क्रोडाक्रोडी-क्रोडको क्रोड़ से गुणने पर जो संख्या होती है उसे 'क्रोडाकोड़ी' कहते हैं। पुण्यतत्त्व। सा उच्चगोअ मणुदुग, सुरदुग पंचेंदिजाइ पणदेहा । आइतितणूणुवंगा, आइमसंघयणसंठाणा ॥१०॥ "इस गाथामें तथा आगे को दो गाथाओं मे पुण्य तत्व के बयालोस भेद कहे गये हैं।" सातावेदनीय, उच्चैर्गोत्र, मनुष्यगति, मनुष्यानुपूर्वी, देवगति, देवानुपूर्वी, पञ्चेन्द्रिय जाति, औदारिक शरीर, वैक्रिय शरीर, आहारक शरीर, तेजस शरीर, कार्मण १४ शरीरं, प्रयम के तीन शरीरो के अंग, उपांग ओर अंगो- पांग, आदि संहनन और आदि संस्थान ॥ १० ॥ ( १ ) जिस कर्म से जीव सुखका अनुभव करे, उसे सातावेदनीय' कहते हैं। (२) जिस कर्म से जीव उच्चकुल में पैदा हो, उसे उच्चैर्गोत्र' कहते हैं। (३) जिस कम से जीव को मनुष्यगति भिले. उसे 'मनुष्यगति' कहते हैं। ( ४ ) जिस कर्म से मनुष्य की आनुपूर्वी मिले, उसे 'मनुष्यानुपूर्वी' कहते हैं । आनुपूर्वी का गतलब यह है कि विग्रहगति से गत्यन्तर में जाने वाला जीव जब शरीर छोड़कर समणि से जाने लगता है तब आनुपूर्वी कर्म उस जीव को जबरदस्ती से, जहां पैदा होना हो, वहाँ पहुँचा देता है। मनुष्यगति कर्म और मनुष्यानुपूकिर्म, · दोनों को 'मनुष्यहिक' संज्ञा है। ( ५ ) जिस कर्म से जीव को देवगति मिले, उसे 'देवगति' कहते हैं। (६) जिस कर्म से जीव को देवता को आनुपूर्वी प्राप्त हो, उसे देवानुपूर्वी कहते हैं ।
१५ (७) जिस कमसे जीवको पांचों इन्दियां मिलें, उसे 'पञ्चेन्द्रियजातिकम' कहते हैं। (८) जिस कर्म से जीव को औदारिक शरीर मिले उसे 'औदारिककर्म' कहते हैं। उदार अर्थात् बड़े बड़े अथवा तीर्थंकरादि उत्तम पुरुषों की अपेक्षा उदार-प्रधान पुद्गलों से जो शरीर बनता है उसे 'औदारिक' कहते हैं । मनुष्य, पशु पक्षी आदि का शरीर औदारिक कहलाता है। (6) जिस कर्म से वैक्रियशरीर मिले उसे 'बैंक्रिय- कर्म' कहते हैं। अनेक प्रकार की क्रियों से बना हुआ शरीर, 'बैंक्रिय' कहलाता है। उसके दो मेद हैं; औपपातिक और लब्धिजन्य । देवता और नरकनिवासी जीवों का शरीर 'औपपातिक' कहलाता है । लब्धि अर्थात् सामर्थ्य विशेष प्राप्त होने पर तियञ्च और मनुष्य भी कभी कभी वैक्रिय शरीर धारण करते है, वह 'लब्धिजन्य' है। (१० ० ) जिस कम से आहारक शरीर की प्राप्ति हो उसे 'आहारक' कर्म कहते हैं। दूसरे द्वीप में विद्यमान तीर्थकर से अपना सन्देह दूर करने के लिये या उनका - १६ १ ऐश्वर्य देखने के लिये चौदह पूर्वधारी मुनिराज चाहते हैं। तव निजशक्ति से एक हाथ प्रमाण, चर्मचक्षु के अदृश्य, अति सुन्दर शरीर बनाते हैं, उस शरीर को 'पाहारक- शरीर' कहते हैं। (११) जिस कर्म से तैजस शरीर की प्राप्ति हो, उसे 'तेजस' कर्म कहते हैं। किये हुये आहार को पका कर रस, रक्त आदि बनाने वाला तथो तपोबल से तेजोलेश्या निकालने वाला शरीर. 'तेजस' कहलाता है। (१२) जीवों के साथ लगे हुये आठ प्रकार के कर्मों का विकाररूप तथा सब शरीरों का कारणरूप, कार्मण' शरीर कहलाता है। तैजस शरीर और कार्मण शरीरका अनादिकाल से जीव के साथ सम्बन्ध है और मोक्ष पाये विना उनके साथ वियोग नहीं होता। (१३) अंग, उपांग और अंगोपांग, जिन कर्मों से मिलें, उनको अंग' कर्म, 'उपांग' कर्म और अंगोपांग' कर्म कहते हैं। जानु, भुजा, मस्तक, पीठ आदि अंग हैं, अंगुली वगैरह उपांग और अंगुलीके पर्व, रेखा आदि 'अंगोपांग' कहलाते हैं। .
औदारिक, वैक्रिय और आहारक शरीरको अङ्ग, उपाङ्ग आदि होते हैं लेकिन तैजस और कार्मण शरीर को नही। (१६) प्रथम संहनन-'वज्रऋषभनाराच'- जिस कर्मसे मिले, उसे 'वज्रऋपभनाराच' नामकर्म कहते हैं। हड्डियोंकी रचनाको 'संहनन' कहते हैं । दो हाड़ोंका मर्कट बन्ध होनेपर एक पट्टा (बेठन) दोनोंपर लपेट दिया जाय फिर तीनोंपर खीला ठोका जाय, इस तरहकी मजबूत हड्डियोंकी रचनाको 'वज्र- ऋषभनाराच' कहते हैं (१७) प्रथम संस्थान–'समचतुरस्र' जिस कर्मसे मिले, उसे 'समचतुरस्र' संस्थान नामकर्म कहते हैं । पालथी मारकर बैठनेसे दोनों जानु और दोनों कन्धों का इसी तरह वायें जानु और दहिने कन्धे का तथा दक्षिण जानु और वामस्कन्धका अन्तर समान हो, तो उस संस्थानको 'समचतुरस्र' संस्थान कहते हैं। जिनेश्वर भगवान् तथा देवताओंका यही संस्थान है। वरण चउक्काऽगुरुलहु. परघा ऊसास आयवुजोनं । २ १८ - . . सुभखगइ निमिण तसदस, सुर-नर-तिरिआउ तित्थयरं ॥ ११॥ वर्णचतुष्क (वर्ण, गन्ध, रस और स्पर्श), अगुरुलघु, पराधात. श्वासोच्छ्वास आतप, उद्योत, शुभविहायोगति, निर्माण, त्रसदशक, सुरायुष्य, मनुष्यायुष्य, तियञ्चायुष्य और तीर्थङ्कर नामकर्म ॥११ ।। (१८-२१) जिन कर्मोंसे जीवका शरीर, शुभवर्ण, शुभगन्ध, शुभरस और शुभस्पर्शवाला हो, उन कर्मोको भी 'शुभस्पर्श' नामकर्म कहते हैं । लाल, पीला और सफेद रंग, शुभ वर्ण कहलाता है । सुगन्ध-खुशबूको शुभगन्ध कहते हैं। खट्टा, मीठा और कसैला रस, शुभ रस कहलाता है। लघु, मृदु (कोमल), उपण और स्निग्ध (चिकने) स्पर्शको शुभ स्पर्श कहते हैं। (२२) जिस कर्मसे जीवका शरीर न लोहे जैसा भारी हो, न आँक की कपास जैसा हलका हो किन्तु मध्यम हो, उसे 'अगुरुलघु' नामकर्म कहते हैं। (२३) जिस कर्मसे जीव, वलवानोंसे भी पराजित न हो, उसे 'परापात' नामकर्म कहते हैं।
१६ . (२४) जिस कर्मसे जीव श्वासोच्छ्वास ले सके उसे, 'श्वासोच्छ्वास' नामकम कहते हैं। (२५) जिस कर्मसे जीवका शरीर, उष्ण न होकर भी उष्ण प्रकाश करे उसे, 'प्रातप' नामकम कहते हैं.। सूर्यमण्डलमें रहनेवाले पृथ्वोकाय जीवोंका शरीर ऐसा ही है। (२६) जिस कर्मसे जीव का शरीर शीतल प्रकाश करनेवाला हो, उसे 'उद्योत' नामकर्म कहते हैं । ऐसे जीव, चन्द्रमण्डल और ज्योतिश्चक्रमें होते हैं। वैक्रिय लब्धिसे साधु, बैंक्रिय शरीर धारण करते हैं, उस शरीरका प्रकाश शीतल होता है, वह इस उद्योत नामकर्मसे समझना चाहिये। (२७) जिस कर्मसे जीव हाथी, हंस, बैल जैसी चाल चले, उसे 'शुभविहायोगति' नामकर्म कहते हैं । (२८) जिस कर्मसे जीवके शरीरके अवयव, नियत- स्थानमें व्यवस्थित हों उसे 'निर्माण' नामकर्म कहते हैं। जैसे कारीगर, मूर्तिमें यथायोग्य स्थानोंमें अवयवोंको बनाता है वैसे ही 'निर्माण' नामकर्म भी अवयवोंको व्यवस्थित करता है।
२० - (२६-३८) सदशकका विचार आगेकी गाथामें कहा जायगा। (३६-४१) जिन कर्मोसे जीव देव, मनुष्य और तिर्यञ्चकी योनिमें जीता है, उनको क्रमसे 'देवायु', 'मनुष्यायु' और 'तिर्यञ्चायु' नामकर्म कहते हैं। (४२) जिस कर्मसे जीव, चौतीस अतिशयोंसे युक्त हो कर त्रिभुवनका पूजनीय होता है, उसे 'तीर्थङ्कर' नामकर्म कहते हैं। तस बायर पज्जत्तं, पत्तेत्र थिरं सुभं च सुभगं च । सुस्सर आइज्ज जसं तसाइदसगं इमं होइ ॥ १२॥ "इस गाथामे त्रसदशकका वर्णन है" (१) जिस कर्मसे जीवको 'स' शरीर मिले उसे वस' नामकर्म कहते हैं । त्रस जीव वे हैं, जो धूपसे व्याकुल होनेपर छायामे और शीतसे दुखी होनेपर धूपमें जा सकें । द्वीन्द्रियादि जीव त्रस कहलाते हैं। (२) जिस कर्मसे जीवका शरीर या -शरीर-समुदाय देखनेमें आसके इतना स्थूल हो, उसे 'बादर' नामकर्म कहते हैं।
(३) जिसके उदयसे जीव अपनी पर्याप्तियोंसे युक्त हो, उसे 'पर्याप्त' नामकर्म कहते हैं । (४) जिस कर्मसे एक शरीरमें एक ही जीव स्वामी रहे, उसे 'प्रत्येक' नामकर्म कहते हैं । (५) जिस कर्मसे जीवके दॉत, हड्डी आदि अवयव मजबूत हो, उसे 'स्थिर' नामकर्म कहते हैं ।। (६) जिस कर्मसे जीवकी नाभिके ऊपरका भाग शुभ हो, उसे 'शुभ' नामकर्म कहते हैं। (७) जिस कर्मसे जीव, सबका प्रियपात्र हो, उसे 'सौभाग्य' नामकर्म कहते हैं। (८) जिस कर्मसे जीवका स्वर [आवाज ] कोयल की तरह मधुर हो, उसे 'सुस्वर' नामकर्म कहते हैं। (8) जिस कर्मसे जीवका वचन लोगोंमें आदरणीय हो, उसे 'आदेय' नामकर्म कहते हैं, (१०) जिस कमसे लोगों में यश और कीर्ति फैले, उसे 'यशःकोति' नामकर्म कहते हैं ॥ १२ ॥ पापतत्त्व । नाणतरायदसगं, नव बीए नीअऽसाय मिच्छत्तं थावरदस नरयतिग ७ कसायपणवीस तिरियदुर्ग ॥ १३ ॥ इस गाथामें तथा आगेकी दा गाथाओंमें पापतत्त्वक वयासी भेद कहे जात हैं।" । }. ज्ञानावरणीयके पॉच भेद और अन्तरायके पॉच मेद मिलाकर दस भेद;-१ मतिज्ञानावरणीय, २ श्रुत- 'ज्ञानावरणीय, ३ अवधिज्ञानावरणीय, ४ मनःपर्यवज्ञाना- चरणीय, ५ केवलज्ञानावरणीय; ६ दानान्तराय, लाभान्तराय, ८ भोगान्तराय, 8 उपभोगान्तराय, १० वीर्यान्तरायः दर्शनावरणीय कर्मके नव भेद-११ चक्षुर्दर्शनावरणीय, १२ अचक्षुर्दर्शनावरणीय, १३ अवधिदर्शनावरणीय १४ केवलदर्शनावरणीय, १५ निद्रा, १६ निद्रानिद्रा, १७ प्रचला, १८ प्रचलामचला, १६ स्त्यानर्द्धि, २० नीचैर्गोत्र, २१ असातावेदनीय, २२ मिथ्यात्वमोहनीय; स्थावरदशक–२३ स्थावर. २४ सूक्ष्म, २५ अपर्याप्त, २६ साधारण, २७ अस्थिर २८ अशुभ, २६ दुर्भग, ३० दुःत्वर, ३१ अनादेय और ३२ अयशःकीर्ति; नरकत्रिक-३३ नरकायु, ३४ नरकगति और ३५ नरकानुपूर्वी; पच्चीस कपाय-३६ अनन्तानु- बन्धी क्रोध, ३७ अ० मान, ३८ अ० माया, ३६ अ० लोभ; ४० अप्रत्याख्यान क्रोध, ४१ प्र० .मान, ४२ २३ - - अप्र. माया, ४३ अप्र० लोभ; ४४ प्रत्याख्यान क्रोध, ४५ प्र० मान, ४६ प्र० माया, ४७ प्र. लोभ, ४८ संज्वलनक्रोध, ४६ सं० मान, ५० सं० माया, ५१ सं० लोभ; ५२ हास्य, ५३ रति, ५४ अरति, ५५ शोक, ५६ भय, ५७ जुगुप्सा, ५८ स्त्रीवेद, ५६ पुरुषवेद, ६० नपुन्सकवेद, तिर्यश्चद्विक-६१ तिर्यश्चगति और ६२ तिर्यश्चानुपूर्ण ॥ १३॥ (१) मन और पाँच इन्द्रियोंके सम्बन्धसे जीवको जो ज्ञान होता है उसे मतिज्ञान कहते हैं, उस ज्ञानका आवरण अर्थात् आच्छादन, 'मतिज्ञानावरणीय' पापकर्म कहलाता है। (२) शास्त्रको 'द्रव्यश्रुत' कहते हैं और उसके सुनने या पढ़नेसे जो ज्ञान होता है उसे 'भावश्रुत' कहते हैं, उसका आवरण, 'श्रुतज्ञानावरणीय' पापकर्म कहलाता है। (३) अतीन्द्रिय अर्थात् इन्द्रियोंके बिना आत्माको रूपी द्रव्यका जो ज्ञान होता है, उसे अवधिज्ञान कहते हैं, उसका आवरण, 'अवधिज्ञानावरणीय' पापकर्म कहलाता है। (४) संज्ञी पंचेन्द्रियके मन की बात जिस ज्ञानसे मालूम होती है, उसे मनःपर्यविज्ञान कहते हैं, उसका आवरण, मनःपर्यवज्ञानावरणीय' पापकर्म कहलाता है। fam ,
२४
-
.
(५) सारे संसारका पूरा ज्ञान जिससे होता है उसे
केवलज्ञान कहते हैं, उसका आवरण,
'केवलज्ञानावरणीय
पापकर्म कहलाता है।
(६) दानसे लाभ होता है, उसे जानता हो, पासमें
धन हो, सुपात्र भी मिल जावे, लेकिन दान न कर सके,
इसका कारण, 'दानान्तराय' पापकर्म है।
(७) दान देनेवाला उदार है, उसके पास दानकी
चीज़ भी मौजूद हैं, लेनेवाला भी हुशियार है, तो भी
मांगी हुई चीज़ न मिले, इसका कारण, 'लाभान्तराय
पापकर्म है।
(E) भोग्य चीजें मौजूद हैं, भोगनेकी शक्ति भी
है लेकिन नहीं भोग सके, उसका कारण, 'भोगान्तराय'
पापकर्म है।
(8) उपभोग्य चीजें मौजूद हैं, उपभोग करनेकी
शक्ति भी है लेकिन उपभोग नहीं ले सके, उसका कारण
'उपभोगान्तराय' पापकर्म है।
जो चीज़ एकवार भोगनेमे आवे वह भोग्य; जैसे-
पुप्प, फल, भोजन आदि । जो पदार्थ वारवार भोगने में
आवे उसे उपभोग्य कहते हैं, जैसे-स्त्री, वस्त्र, आभरण
आदि।
।
उसे रणीय स पके (१०) रोगरहित युवावस्था रहते और सामर्थ्य रहते हुये भी अपनी-शक्तिका विकास न कर सके, उसका कारण, 'चीर्यान्तराय' पापकर्म है। (११) आँखसे पदार्थों का जो सामान्य प्रतिभास होता है उसे 'चक्षुर्दर्शन' कहते हैं, उसका आवरण, 'चक्षुर्दर्श- नावरणीय' पापकर्म कहलाता है। (१२) कान, नाक, जीभ, त्वचा तथा मनके सम्बन्ध से शब्द, गन्ध, रस और स्पर्शका जो सामान्य प्रतिभास होता है उसे 'अचक्षुर्दर्शन' कहते हैं, उसका आवरण, अचक्षुर्दर्शनावरणीय पापकर्म कहलाता है । (१३) इन्द्रियोंके बिना रूपी द्रव्यका जो सामान्य वोध होता है उसे 'अवधिदर्शन' कहते हैं, उसका आवरण, 'अवधिदर्शनावरणीय पापकर्म कहलाता है । (१४) संसारके सम्पूर्ण पदार्थोंका जो सामान्य अवबोध होता है, उसे 'केवलदर्शन' कहते हैं, उसका आवरण 'केवलदर्शनावरणीय' पापकर्म कहलाता है। (१५) जो सोया हुआ आदमी ज़रासी खटखटाहटसे या आवाज़से जाग जाता है। उसकी नींदको निद्रा कहते हैं, जिस कर्मसे ऐसी नींद आवे उस कर्मका भी नाम 'निद्रा है। -
२६
(१६) जो आदमी, पड़े जोरसे चिल्लाने या हाथसे
जोरसे हिलानेपर बड़ी मुश्किलसे जागता है, उसकी
नींदको निद्रानिद्रा कहते हैं, जिस कमसे ऐसी नींद आवे
उस कर्मका भी नाम 'निद्रानिद्रा' है।
(१७) खड़े खड़े या बैठे बैठे जिसको नींद आती
है, उसकी नींदको प्रचला कहते हैं, जिस कर्मसे ऐसी
नींद आवे, उस कर्मका भी नाम 'प्रचला' है।
(१८) चलते फिरते जिसको नींद आती है, उसकी
नींदको प्रचलाप्रचला कहते हैं, जिस कर्मसे ऐसी नींद
आने, उसका भी नाम 'प्रचलाप्रचलो' है।
(१६) दिनमें सोचे हुये कामको रातमें नींदकी
हालतमें जो कर डालता है, उसकी नींदको 'स्त्यानद्धि
कहते हैं, जिस कमसे ऐसी नींद आवे, उस कर्मको मी
'स्त्यानर्द्धि' कहते हैं।
स्त्यानर्द्धिकी हालतमें वज्रऋपभनाराचसंहननवाले
जीवको वासुदेवका आधा बल होता है।
(२०) जिस कर्मसे नीच कुलमें जन्म ही, उसे
'नीचैर्गोत्र' पापकर्म कहते हैं
न
२७
-
(२१) जिस कमसे जीव, दुःखका अनुभव करे,
उसे 'असातावेदनीय' पापकर्म कहते हैं।
(२२) जिस कर्मसे मिथ्यात्वकी प्राप्ति हो उसे
'मिथ्यात्वमोहनीय' पापकर्म कहते हैं।
मिथ्यात्वका लक्षण यह है, 'अदेवे देवबुद्धिर्या,
गुरुधीरगुरौ च या । अधर्मे धर्मबुद्धिश्च, मिथ्यात्वं तन्नि-
गद्यते ॥ देवताके गुण जिसमें न हों उसे देव समझना,
गुरुके गुण जिसमें न हों उसे गुरु मानना और अधर्मको
धर्म समझना, यह मिथ्यात्व है।
(२३-३२) स्थावरदशकका वर्णन आगेकी गाथामें
'आवेगा।
(३३) जिस कर्मसे जीव नरक में जाता है, उसे
'नरकगति' पापकर्म कहते हैं।
(३४) जिस कर्मसे जीव नरकमें जीता हैं, उसे
"नरकायु' पापकर्म कहते हैं।
(३५) जिस कर्मसे जीवको जबरदस्ती नरकमें जाना
पड़े, उसे 'नरकानुपूर्वी' पापकर्म कहते है।
(३६-३६) जिस कर्मसे जीवको अनन्तकाल तक
संसारमें घूमना पड़ता है, उसे 'अनन्तानुबन्धी' - पापकर्म
कहते हैं। इसके चार भेद हैं; अनन्तानुवन्धी क्रोध,
अनन्तानुबन्धी मान, अन० माया ओर अन० लोभ ।
जवतक जीव जीता है तबतक प्रायः बने रहते हैं और
अन्तमें प्रायः नरकगति प्राप्त होती है।
(४०-४३) जिस कर्मसे जीवको देशविरतिरूप
प्रत्याख्यानकी प्राप्ति न हो, उसे 'अप्रत्याख्यान' पापकर्म
कहते हैं। इसके भी चार भेद हैं; अप्रत्याख्यान क्रोध,
अप्रत्याख्यान मान. अ० माया और अ० लोभ । इनकी
स्थिति एक वर्षकी है, इनके उदयसे अणुव्रत धारण करने
की इच्छा नहीं होती और मरने पर प्रायः 'तिर्यञ्चगति'
मिलती है।
(४४-४७) जिसके उदयसे सर्वविरतिरूप प्रत्याख्यान
की प्राप्ति न हो, उसे 'प्रत्याख्यान' पापकर्म कहते हैं।
,
इसके चार भेद हैं:-प्रत्याख्यान क्रोध, प्रत्याख्यान
मान, प्र० माया और प्र० लोभ । इनकी स्थिति चार
महीनेकी है; ये पापकर्म, सर्वविरतिरूप चारित्रके प्रति-
वन्धक है और मृत्यु होने पर प्रायः मनुष्यगति मिलती है।
(४८-५१) जिस कर्मसे यथाख्यातचारित्रकी प्राप्ति
न हो, उसे 'सज्वलन' पापकर्म कहते हैं।
२६
इसके भी चार भेद हैं; सञ्चलन क्रोध, सं० मान,
सं० माया और से० लोम । इनकी स्थिति पंदरह दिनों
की है और मृत्यु होने पर देवगति प्राप्त होती है।
(५२) जिस कर्मसे, विनाकारण या कारणवश हॅसी
आवे, उसे 'हास्यमोहनीय' पापकर्म कहते हैं।
(५३) जिस कर्मसे अच्छे अच्छे पदार्थों में अनुराग
सो, उसे 'रतिमोहनीय' पापकर्म कहते हैं ।
(५४) जिस कर्मसे, बुरी चीजोंसे नफरत हो,
'अरतिमोहनीय' पापकर्म कहते हैं ।
(५५) जिस कर्मसे इष्ट वस्तुका वियोग होने पर
शोक हो, उसे 'शोकमोहनीय' पापकर्म कहते हैं।
(५६) जिस कर्मसे, विनाकारण या कारणवश
दिलमें भय हो, उसे 'भयमोहनीय' पापकर्म कहते हैं।
(५७) जिस कर्मसे दुर्गन्धी या वीभत्स पदार्थों को
देखकर घृणा हो, उसे 'जुगुप्सामोहनीय' पापकर्म
उसे
.
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कहते हैं।
(५८-६०) स्त्रोवेद, पुरुपवेद और नपुन्सकवेदका
मतलव पहले लिखा जा चुका है।
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३० (६१) जिह कर्मसे तिर्यश्चगति मिले, उसे 'तिर्यञ्चगति' पापकर्म कहते हैं। (६२) जिस कर्मसे जीवको जबरदस्तो तिर्यञ्चगतिमें जाना पड़े, उसे 'तिर्यश्चानुपूर्वी' पापकर्म कहते हैं। इग-वि-ति-चउजाईओ कुखगड उबघाय हुति पावस्त । अपसत्थं वरणचउ, अपढमसंघयण-संठाणा ॥ १४ ॥ एकेन्द्रिय, द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय और चतुरिन्द्रिय जासिकर्म, अशुभविहायोगति नामकर्म, उपघातकम, अप्रशस्त वर्ण, गन्ध, रस और स्पर्श, अप्रथम संहनन अर्थात् ऋषभनाराच, नाराच, अर्धनाराच, कोलिका और सेवा संहनन, अप्रथम संग्थान अर्थात् न्यग्रोध, सादि, कुन, वामन और हुंड संस्थान | ये बयासी भेद पापतत्वके हैं ॥ १४ ॥ (६३) जिस कर्म से जोवको एकेन्द्रिय जाति मिले, उसे 'एकेन्द्रियजाति' पापकर्म कहते हैं इसी प्रकारः
३१
(६४) द्वीन्द्रिय, (६५) नोन्द्रिय, और (६६) चतुरि-
न्द्रियजाति पापकर्मोंका समझना चाहिये।
(६७) जिस कम से जीव, ऊँट या गधे जैसा चले,
उसे 'अशुभविहायोगति' पापकर्म कहते हैं।
(६८) जिस कम से जीव अपने ही अवयवों से दुखी
हो, उसे 'उपघात' पापकर्म कहते हैं । वे अवयव प्रति-
जिह्वा [ पडजीभ ], कण्ठमाला, छठी अँगली आदि हैं।
(६६-७२) जिन कर्गोसे जीवका शरीर अशुभ वर्ण,
अशुभ रस और अशुभ स्पर्श वाला हो, उनको क्रमसे
'अप्रशस्तवर्ण', 'अप्रशस्तगन्ध', 'अप्रशस्तरस' और
'अप्रशस्तस्पर्श' पापकर्म कहते हैं ।
नील और कृष्णवर्ण, अशुभ वर्ण हैं। दुगन्ध,
अशुभ गन्ध । गुरु, स्वर, रूक्ष और शोत स्पर्श, अशुभ
स्पर्श । विक्त और कटु रस, अशुभ रस हैं ।
(७३-७७) जिन कर्मोंसे अन्तिम पॉच संहननोंकी
प्राप्ति हो, उन्हें 'अप्रथमसंहनन' नाम पापकर्म कहते हैं।
पांच संहनन ये हैं:-ऋषभनाराच, २ नाराच,
३ अर्धनाराच, ४ कीलिका और ५ सेवार्च ।
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1
-
१-हड्डियोंकी सन्धिमें दोनों ओरसे मर्कटवन्ध
और उनपर लपेटा हुआ पट्टा हो लेकिन खीलना हो,
वह 'ऋषभनाराच' संहनन है।
२-दोनों ओर सिर्फ मर्कटबन्ध हो, वह 'नाराच' ।
३-एक ओर मर्कटवन्ध और दूसरी तरफ खीला
हो, तो 'अर्धनाराच'।
४-मर्कटवन्ध न हो कर सिर्फ खोलेस ही हड्डियाँ
जुड़ी हों, तो 'कीलिका' ।
५-खीला न होकर इसी तरह हड्डियाँ आपसमें
जुड़ी हों; तो 'सेवार्त।
(७८-८२) जिन कर्मोंसे अन्तिम पाँच संस्थानोंकी
प्राप्ति हो; उन्हें अप्रथमसंस्थान' नाम पापकर्म कहते हैं।
पॉच संस्थान ये हैं:-१ न्यग्रोधपरिमण्डल; २
सादि; ३ कुब्ज; ४ वामन और ५ हुंड ।
१-बड़के वृक्षको न्यग्रोध कहते हैं, वह जैसा ऊपर
पर्ण और नीचे हीन होता है, वैसे ही, जिस जीवके
नाभिका ऊपरी भाग पूर्ण और नीचेका हीन हो, तो
न्यग्रोधपरिमण्डल' संस्थान समझना चाहिये।
२- नाभिके नीचेका भाग पूर्ण और ऊपरका हीन
हो, तो सादि।
7
३-हाथ, पैर, सिर आदि अवयव ठीक हों और पेट तथा छाती हीनहो तो, 'कुब्ज' । ४-छाती और पेटका परिमाण ठीक हो और हाथ पैर सिर श्रादि छोटे हों, तो, 'वामन' । ५-शरीरके सब अवयव हीन हों, तो, 'हुंड' । थावरसुहुमअपज्ज, साहारणनथिरमसुभदुभगाणि । दुस्तरमाइज्जजसं. थावरदसगं विवज्जत्थं ॥ १५ ॥ "इस गाथामें पहले कहे हुये स्थावरदशकका वर्णन है ।" स्थावर, सूक्ष्म, अपर्याप्त, साधारण, अस्थिर, अशुभ, दुर्भग, दुःस्वर, अनादेय और अयशःकीर्ति, ये पुण्यतत्व में कहे हुये त्रसदशकसे विपरीत अर्थवाले हैं ॥ १५ ॥ (१) जिस कर्मसे स्थावर शरीरकी प्राप्ति हो, उसे स्थावर' नामकर्म कहते हैं । स्थावरशरीरवाले एकेन्द्रिय जीव, गरमी या सर्दीसे, चल फिर न सकनेके कारण अपना वचार नहीं कर सकते। (२) जस कसेमिॉ, अखसे नहीं देखने योग्य शरीर मिले उसे 'सूक्ष्म' नामकम कहते हैं। ,
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निगोदके जीव, सूक्ष्म शरीरवाले होते हैं।
(३) जिस कर्मसे अपनी पर्याप्तियाँ पूरी किये बिनाही
जीव मर जावे, उसे 'अपर्याप्त' नामकर्म कहते हैं।
(४) जिस कर्मसे अनन्त जीवोंको एक शरीर मिले,
उसे, 'साधारण' नामकर्म कहते है। जैसे:-बालू ,
जमीकन्द आदिके जीव ।
(५) जिस कर्मसे कान, मोह, जीव आदि अवयव
अस्थिर होते हैं; उसे 'अस्थिर' नामकर्म कहते हैं।
(६) जिम कर्मसे नाभिके नीचेका भाग अशुभ हो,
उसे 'अशुभ' नामकर्म कहते है।
(७) जिस कर्मसे जीव किसीका प्रीतिपात्र न हो,
उसे 'दुर्भग' नामकर्म कहते हैं।
(e) जिस कर्मसे जीवका स्वर सुनने में बुरा लगे,
उसे 'दुःस्वर' नामकर्म कहते हैं ।
(6) जिस कर्मसे जीवका वचन, लोगोंमें माननीय
न हो, उसे 'अनादेय' नामकर्म कहते हैं।
(१०) जिस कर्मसे लोकमें अपयश और अपकीर्ति
हो, उसे 'अयशाकीति' नामकर्म कहते हैं।
३५ स्त्रिवतत्व। इंदिय कप्तोय अभय, जोगा पंच चउ पंच तिन्ति नमा। किरिआआ हणवीसं. इमा उ ताओ अणु मनसो ॥ १६ ॥ "इस गाथामें श्रास्रवके बयालोस भेट कहे हैं।" पाँच इन्द्रियाँ; चार कपाय, ऑच अनत, तीन योग और पच्चीस क्रियायें, ये श्रासबके बयालीस भेद हैं ॥१६॥ आसबके दो भेद हैं; भावास्रव और द्रव्यास्त्रव । जीका शुभ, अशुभ परिणाम, 'भावात्रव' कहलाता शुभ-अशुभ परिणामों को पैदा करनेवाली बयालोस प्रकारको वृत्तियोको 'द्रव्यास्त्र कहते हैं । इन्द्रियाँ दो तरहकी हैं; द्रव्येन्द्रिय और भावेन्द्रिय । द्रव्येन्द्रिय पुगलरूर है और भावेन्द्रिय है जीवकी शब्दादिको ग्रहण करने की शक्ति । कषाय चार हैं;-क्रोध, मान, माया ओर लोम । पॉव अवत;-प्राणातिपात (हिंसा), मृपावाद (झूठ बोलना), अदत्तादान (चोरी), मैथुन और परिग्रह । तीन योग;-मनयोग, वचनयोग और काययोग। है - , ३६ . ( काइब अहिगरणीया, पाउसिया पारितावणी किरिया । पाणाइवाइरंभित्र परिग्गहिया मायवत्तीया ॥१७॥ "इस गाथामे तथा आगेकी दो गाथाओंमे पच्चीस क्रियाओंके नाम हैं।" - कायिकी, अाधिकरणिकी, प्राद्व पिकी, पारितापनिकी, प्राणातिपातिकी आरम्भिकी, पारिग्रहिकी, मायाप्रत्य- यिकी ॥१७॥ (१) असावधानीसे शरीरके व्यापारसे जो क्रिया लगती है उसे 'कायिकी' कहते हैं। (२) जिस क्रियासे जीव, नरकमें जानेका अधिकारी होता है उसे 'अधिकरणिकी' कहते हैं । जैसे खड्ग आदिसे जीवकी हत्या करना । (३) जीव तथा अजीवके ऊपर दूप करनेसे 'प्रापिकी' । (४) अपने आपको और दूसरोंको तकलीफ पहुँचानेसे 'पारितापनिकी क्रिया लगती है। (५) दूसरोंके प्राणोंका नाश करनेसे 'प्राणाति- पातिकी' । (६) खेती आदि करनेसे 'प्रारम्भिकी' ।
३७ - (७) धान्य वगैरहके संग्रह तथा उसपर ममता करनेसे 'पारिग्राहिकी। (८) दूसरोंको ठगनेसे 'मायाप्रत्ययिकी' । मिच्छादसणवत्तो, अप्पच्चक्खोणा य दिट्ठी पुट्ठो अ । पाडुच्चि सामंतो, वणो नेसस्थि साहस्थि ॥१६॥ मिथ्यादर्शनप्रत्ययिकी, अप्रत्याख्यानिकी, दृष्टिकी, स्पृष्टिकी, प्रातीत्यकी, सामंतोपनिपातिकी, नैशस्त्रिकी, स्वहस्तिकी ॥ १८ ॥ (6) जिनेन्द्रबचनसे विपरीत, मिथ्यादर्शनसे 'मिथ्यगदर्शनप्रत्ययिकी' क्रिया लगती है। (१०) संयमके विघातक कपायोंके उदयसे प्रत्या- ख्यान न करना उससे 'अप्रत्याख्यानिकी' । (११) रागादिकलुषित चित्तसे पदार्योंको देखनेसे 'दृष्टिकी' । (१२) रागादिकलुषित चित्तसे स्त्री आदिके अंगका स्पर्श करनेसे 'स्पृष्टिकी' क्रिया लगती है। (१३) जोवादि पदार्थोंको लेकर कर्मबन्धनसे जो क्रिया लगती है उसे 'प्रातीत्यको' कहते हैं।
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5
(१४) अपना वैभव देखनेकेलिये आये हुये लोगों
की वैभवविषयक प्रशंसा सुनकर खुश होनेसे तथा घी,
तेल आदिके खुले वर्तनोंमें त्रस जीवोंके गिरनेसे जो
क्रिण लगती है उसे सामन्तोपनिपातिकी' कहते हैं।
(१५) राजा आदिके हुक्मसे यन्त्र, हथियार आदिके
बनाने तथा खीचने आदिसे जो क्रिया लगती है उसे
'नैशस्त्रिकी' कहते हैं।
(१६) हिरन, खरगोश आदि जीवोंको शिकारी
कुत्तोंसे मरवाने या खुद मारनेसे जो क्रिया लगती है
उसे 'स्वहस्तिकी' कहते हैं।
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-
अन्न पोग
आणवणि विश्रारणिया,
अणभोगा अणवखपच्चइथा।
समुदाण,
पिज्ज दोसरियावहिआ |॥ १६ ॥
आनयनिकी, दारणिकी, अनाभोगिकी, अनव-
कांक्षाप्रत्ययिकी. प्रायोगिकी, सामुदायिकी, प्रेमकी,
द्वपिकी और ऐर्यापथिकी । इन पच्चीस क्रियाओंसे कर्मका
आस्रव होता है ॥ १६ ॥
३६
(१७) जीव तथा जड़ पदार्थों को किसीके हुक्मसे
या खुद लाने लेजानेसे जो क्रिया लगती है उसे
'नियनिकी' कहते हैं।
(१८) जीव और जड़ पदार्थोंको चीरने फाइनेसे जो
क्रिया लगती है, उसे 'वैदारणिकी' कहते हैं।
(१६) वेपर्वाहीसे चीजोंके उठाने रखने तथा चलने
फिरनेसे जो क्रिया लगती है, उसे 'अनाभोगिकी'
कहते हैं।
(२०) इस लोक तथा परलोकके विरुद्ध आचरण
करनेसे 'अनवकाक्षाप्रत्ययिकी' ।
(२१) मन, वचन और शरीरके अयोग्य व्यापारसे
'प्रायोगिकी क्रिया लगती है।
(२२) किसी महापापसे आठों कर्मोंका समुदितरूपसे
बन्धन हो, तो 'सामुदायिकी' ।
(२३) माया और लोभ करनेसे जो क्रिया लगती है
उसे 'प्रेमिकी' कहते हैं।
(२४) क्रोध और मानसे 'द्व पिकी' ।
(२५) सिर्फ शरीरव्यापारसे जो क्रिया लगती है उसे
'ऐर्यापथिकी' कहते हैं।
यह क्रिया अग्रमत्त साधु तथा सयोगी केवलीको
T
मी लगती है।
-- ४० 1 . संवरतत्त्व। समिई गुत्ति परीसह, जइधम्मो भावणा चरिताणि । पण ति दुवोस दस बार, पंच भेएहि सगवन्ना ॥ २०॥ "इस गाथामें संवरके सत्तावन भेद गिनाये हैं। पाँच समिति, तीन गुप्ति, वाईस परीसह, दस प्रकार- का यतिधर्म, बारह भावना और ताँच प्रकारक्षा चारित्र, ये संवरके सत्तावन भेद हैं ॥ २० ॥ संवरके दो भेद हैं; द्रव्यसंवर और भावसंवर । पाते हुये नवीन कर्मको रोकनेवाले आत्माके परिणामको 'भावसंवर' कहते हैं और कर्मपुद्गलकी रुकावटको 'द्रव्यसंवर' कहते हैं। आर्हतधर्मके अनुसार जो चेष्टाविशेष, उसे 'समिति' कहते हैं। पाँच समिति । (१) कोई जीव पैरसे न दब जाय इस प्रकार राहमें सावधानीसे चलना, उसे 'ईर्यासमिति' कहते हैं (२) निर्दोष भाषा बोलनेको 'भापासमिति' कहते हैं।
४१
(३) निर्दोष आहार जो बयालीस दोपोंसे रहित होता
है, उसको लेना, 'एपणासमिति' ।
(४) दृष्टि से देखके और रजोहरणसे प्रमार्जन करके
चीजोंका उठाना और रखना, 'आदाननिक्षेप समिति' ।
(५) कफ, मूत्र, मल आदिको जीवरहित जगहमें
छोड़ना, 'पारिष्ठापनिका' समिति ।
[तीन गुप्ति । ]
(६) मनोगुप्तिके तीन भेद हैं; असत्कल्पनावियोगिनी,
समताभाविनी और आत्मारामता ।
आर्च तथा रौद्र ध्यान सम्बन्धी कल्पनाओंका त्याग,
'असत्कल्पनावियोगिनी'।
सब जीवोंमें समान भाव, 'समताभाविनी' ।
केवलज्ञान होनेके वाद सम्पूर्ण योगोंके निरोध
करनेके समय 'आत्मारामता' ।
(७) वचनगुप्तिके दो भेद हैं; मौनावलम्बिनी और
वानियमिनी । किसी अभिप्रायको समझानेकेलिये
भृकुटि श्रादिसे संकेत न करके मौन धारण करना,
'मौनावलम्बिनी' । वॉचने या पूछनेके समय मुंहके सामने
'मुखवत्रिका' धारण कहना, 'वानियमिनी' ।
४२
..
(८) कायगुप्तिके दो भेद हैं; चेष्टानिवृत्ति और.
यथासूत्रचेष्टानियमिनी ।
.
१, योगनिरोधावस्थामें केवलीका सर्वथा शरीरचेष्टाका
परिहार तथा २ कायोत्सर्गमें अनेक प्रकारके उपसर्ग होते
हुये भी शरीरको स्थिर रखना, चेष्टानिवृत्ति' ।,
साधु लोग, उठने बैठने सोने आदिमें जैनसिद्धान्तके
मुताविक शरीरके व्यापारको नियमित रखते हैं, उसे
'यथासूत्रचेष्टानियमिनी' कहते हैं।
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खुहा पीवासा सिउण्ह.
दंसा चेलाऽरइथियो।
रिया निलिहिया सिजा,
शक्कोस वह जायणा ।। २१ ॥
"इस गाथामें तथा अगली गाथामें वाईस परिसहोंका वर्णन है।।
चुघा, पिपासा, शीत, उष्ण, दंश, चेल, अरति,
स्त्री, चर्या, नैवेधिकी, शय्या, आक्रोश, वध, याचना ।
धर्मकी रक्षाकेलिये तथा कर्मोंकी निर्जराकेलिये
प्राप्त हुये दुःखोंको सब तरहसे सहन करना. 'परिसही
कहलाता है ॥२१॥
४३
(१) क्षुधापरिसह-सुधाके समान कोई चीजें
अधिक पीड़ा देनेवाली नहीं है। भृखसे पेटकी आँतें
जलने लगती हैं। कैसीभी तेज भूख लगे तौभी साधु-
लोग निर्दोपाहार जबतक नहीं मिलता है तबतक
भूखकी पीडाको सहन करते हैं । क्षुधापरिसह सब
परिसहोंसे कड़ा है इसलिये प्रथम कहा गया ।
(२) पिपासा-जबतक अचित्त जल न मिले तबतक
प्यासके वेगको सहना।
(३) शीत-बड़ी ठण्ड पड़ती होतौभी आग जलाकर
तापे नहीं, न दूसरेकी जलाई आगसे भी शीत दूर करे ।
अकल्पनीय वस्त्रोंकी इच्छा न करे । जो कुछ फटे पुराने
वस्त्र अपने पास हों उसीसे काम निकाले और ठण्डको
शान्तचित्तसे सहन करे।
(४) उरण-अत्यन्त गरमी पड़ती हो तौभी साधु
स्नान करनेकी इच्छा न करे । छत्र धारण न करे ।
पंखेकी हवा न करे । गरमीको सहन करे ,
(५) दंश-वर्षाऋतु में मच्छर आदि जीवोंका बहुत
उपद्रव रहता है, कार्योत्सर्ग आदि धर्मक्रियाओंमें वे जन्तु
काटते हैं, उसे सहन करे।
(६) अचेल-चेलका अर्थ है वस्त्र, उसका अभाव,
अचेल कहलाता है । यहाँ अचेलका मतलब सर्वथा वस्रो-
-
४४
का प्रभाव नहीं समझना चाहिये किन्तु आगममें साधुओं
को जितने वस्त्र रखनेकी आज्ञा है उतने ही रक्खे । कीमती
नये वस्त्रोंकी इच्छा न करे, जो कुछ फटे पुराने वस्त्र हो
उनमें सन्तोष रक्खे।
(७) अरति-अपने मनके मुवाफिक उपाश्रय आहार
आदि न मिलनेसे दुखी न होवे।
(८) स्त्री-स्त्रियोंके अंगप्रत्यंगोंको न देखे । उनके
साथ एकान्तमे बात चीत करना, हॅसना आदि व्यापार
न करे। मोक्षमार्गमें उन्हें अर्गलाके समान समझकर
कभी कामदृष्टिसे देखे नहीं।
(6) चर्या-बहता हुआ जल और विहार करनेवाला
साधु, दोनों स्वच्छ रहते हैं इसलिये साधुको किसी एक
जगह अधिक ठहरना न चाहिये । धर्मका उपदेश देते
हुये अप्रतिवद्ध विहार करे।
(१०) नैधिकी-स्मशान, शून्यमकान, सिंहकी
गुफा आदि स्थानोंमें ध्यान करनेके समय, विविध उपसों
के होनेपर निपिद्ध चेष्ठा न करे,
(११) शय्या-जहाँ ऊँची नीची जमीन हो, धूल
पड़ी हो, विस्तर दुरुस्त न हो, तो नोंदमें खलल पहुँचता
है तो भी मनमें उद्वेग न करे ।
+ - ( में साधु नेपा (१२) आक्रोश-कोई गाली देवे या कटु वचन वोले, तो उसे सहन करे। (१३) वध-कोई दुष्ट मार पीट करे या जानसे मार डाले तो भी साधु क्रोध न करे । (१४) याचना--साधुको चाहिये कि यदि अाहार आदि चीज, गृहस्थ लाकर अपने स्थानपर पहुंचावे तो न लेवे विन्तु खुद भिक्षा मॉगकर लाये। मांगने में कोई अपमान करे तो बुरा न माने, न भिक्षा माँगनेमें लजा करे। पवार । उनले व्यापार देवाला एक अलाभ रोग तणफासा, मल सक्कार परीसहा। पन्ना अन्नाण सम्मत्तं. इन बाविस परिसहा ॥ २२ ॥ अलाभ, रोग, तृणस्पर्श, मल, सत्कार, प्रज्ञा, अज्ञान और सम्यक्त्व ये वाईस परीसह हैं ॥ २२ ॥ (१५) लाभान्तराय कर्मका जन उदय होता है तो मांगनेपर भी वस्तु नही मिलती चाहे वह चीज दाताके घरमें अधिक हो । साधु लोग निर्दोष आहार आदिकी अप्राप्तिस उद्योग न करें किन्तु यह समझकर कि अन्तराय -
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कर्मका उदय है, समचित्त बने रहें । इसे 'अलाभपरिसह'
कहते हैं।
,
(१६) रोग-जयर, अतिसार आदि भयङ्कर रोग
होनेपर जिनकल्पी साधु चिकित्सा कराने की इच्छा भी
न करे किन्तु अपने कृतकर्मका परिपाक समझकर वेदना-
को सहन करे । स्थविरकल्पी साधु आगमोक्त विधिसे
निरवद्य चिकित्सा करावे और कर्मफल मिल रहा है ऐसा
विचार करे किन्तु वेदनाप्रयुक्त आर्तध्यान न करे ।
(१७) तृणस्पर्श-रोगपीड़ित साधु, घास आदिके
विस्तरके तृणके गड़नेसे दुखो न हो किन्तु शान्तचित्तसे
वेदना सहन करे।
(१८) मल-पसोनेसे शरीरमें मल बढ़जाय, दुर्गन्ध
श्राने लगे तौभी स्नान करनेकी इच्छा न करे ।
(१६) सत्कार-लोकसमुदाय या राजा महाराजाओं
की स्तुति, वन्दना या आदर-सत्कारसे साबु अपना
उत्कर्ष न समझे । ओर न आदर-सत्कारके न पानेसे
दुखी हो।
(२०) प्रज्ञा-बड़ी विद्वत्ता होनेपर भी साधु घमण्ड
न करे तथा अल्प ज्ञान होनेपर भी शोक न करे।
(२१) अज्ञान-ज्ञानावरणीय कर्मके उदयसे पढ़नेमें मेहनत करने पर भी विद्या हॉसिल नहीं होती। साधु कभी ऐसा दुर्ध्यान न करे कि, "मैंने गृहस्थाश्रम छोड़ा, साधु बना हूं, तप जप करता हूं, पढ़ने में मेहनत करता हूं तौभी मुझे विद्या प्राप्त नहीं होती इसलिये मुझे धिक्कार है कि साधु होकर भी मैं मूर्ख हूं" किन्तु अपने किये कर्मका फल सोचकर सन्तोष करें। (२२) सम्यक्त्व-जैनसिद्धान्त, देव, गुरु, धर्म आदि जिनोपदिष्ट पदार्थों में सन्देह न करे। खंतो मद्दव अज्जव, मुत्तो तव संजमे अबोधव्वे । सच्चं सो आकि- चणं च वभं च जइधम्मो ॥ २३ ॥ "इस गाथामें दस प्रकारके यतिधर्मका वर्णन है।" क्षमा, मार्दव, आर्जव, मुक्ति (सन्तोष), तप, संयम, सत्य, शौच, अकिञ्चनत्व और ब्रह्मचर्य, ये दस यत्तिके धर्म हैं ।। २३॥ सब प्राणियोंपर समान दृष्टि रखनेसे क्रोध नहीं होता । क्रोधका न होना, 'क्षमा' कहाती है।
। । । 'आर्जव' कहाता है है अहङ्कारका त्याग, 'मार्दव कहाता कपट न करना, लोभ न करना, 'मुक्ति' कहाती है। इच्छाका निरोध, 'तप' कहाता है। बाह्य और अभ्यन्तर भेदसे बारह प्रकारका तप है। प्राणातिपात ( हिंसा ) का त्याग, 'संयम' कहाता है। सच बोलना, 'सत्य' कहाता है। किसी जीवको तकलीफ न हो ऐसा बर्ताव करना, हाथ, पैर आदिको पवित्र रखना, चोरी न करना, 'शौच' कहाता है। सब परिग्रहोंका त्याग, 'अकिंचनत्त्व' कहाता है। मैथुनका परित्याग, 'ब्रह्मचर्य' कहाता है। ऊपर कहे हुये दस गुण जिसमें हों, उसे साधु समझना चाहिये। -- 1 । पढममणिच्चमसरणं, संसारो एगया य अण्णतं। ससुइ ओसव संवरो, न तह णिज्जरा नवमी ॥ २४ ॥ - , ४६ - - "इस गाथामे तथा आगेको गाथामें बारह भावनाएँ कहो गई हैं।" अनित्यभावना, अशरणभावना, संसारभावना, एकत्वभावना, अन्यत्वभावना, अशुचित्वभावना, आस्रव- भावना, संवरभावना, निर्जराभावना ॥ २४ ॥ (१) धन, यौवन, कुटुम्ब आदि. संसारके सब पदार्थ अनित्य हैं, ऐसा चिन्तन करना 'अनित्यभावना' कहाती है। (२) सम्राट, चक्रवर्ती, इन्द्र, तीर्थङ्कर आदि महापुरुषोको भी मृत्युसे कोई नहीं बचा सकता, फिर साधारण जीवोंकी तो बात ही क्या ? मृत्युके मुखमें पड़े हुए जीवका धन, कुटुम्ब आदि कोई शरण नहीं है, ऐसा हमेशा विचार करना तथा सिवा धर्मके किसीको शरण न मानना, 'अशरणभावना' कहाती है। ३) चौरासी लाख योनियोंमें जीव भ्रमण करता है। किसी योनिमें माता, स्त्री बन जाती है; स्त्री, माता बन जाती है; पिता, पुत्र बन जाता है; पुत्र, पिता वन जाता है। संसारकी इस तरहकी अव्यवस्थाका हमेशा विचार करना, 'संसारभावना' कहाती है । ४ ५० 1- , (४) यह जीव संसारमें अकेला आया है, अकेला ही जायगा और अकेला ही सुख या दुःख भोगेगा, कोई साथी होनेवाला नहीं, ऐसा हमेशा विचार करना, 'एकत्वभावना' कहाती है। (५) आत्मा, ज्ञानस्वरूप है; शरीर जड़ है; शरीर आमा नहीं, न ओत्मा शरीर है; शरीर, इन्द्रिय, मन, धन, कुटुम्ब आदि, आत्मासे जुदे हैं, ऐसा हमेशा विचार करना, 'अन्यत्वभावना' कहाती है। (६) यह शरीर खून, मॉस, हड्डी, मल, मूत्र आदिसे भरा है; यह शरीर किसी उपायसे पवित्र होने- वाला नहीं है, ऐसा हमेशा विचार करना, 'अशुचित्य- भावना' कहाती है। (७) संसारके जीव क्रोध, मान, माया, लोभ, मिथ्याज्ञान आदिसे नये नये कर्म वांधते हैं, ऐसा हमेशा विचार करना, 'श्रावभावना' कहाती है। (८) कर्मवन्धके कारणभूत, मिथ्याज्ञान आदिको रोकनेके उपाय सम्यकज्ञान आदि हैं, ऐसा विचार करना 'संवरभावना' कहाती है। (६) निर्जराभावना दो तरहकी है;-सकामा और अकामा । समझकर तपके जरिये कर्मका क्षय करना, . सकामा । विना समझे भूख प्यास प्रादि दुःखोंके वेगको सहन करनेसे जो कर्मक्षय होता है, उसे अकामा कहते हैं । ऐसे चिन्तनको 'निर्जराभावना' कहते हैं। द्र लोगसहावो बोही, दुल्लहा धम्मस्त साहगा अरिहा। एआश्रो भावणाओ. भावेअव्वा पयत्तेणं ॥ २५ ॥ लोकस्वभावभावना, बोधिदुर्लभभावना और धर्मके कथक---उपदेशका सर्वज्ञ वीतरागका पाना मुश्किल है, इस तरहकी धर्मभाना, इन बारह भावनाओं को प्रयत्नसे विचारे ॥२५॥ (१०) कमर पर दोनों हाथों को रखकर और पैरोंको फैलाकर खड़े हुये पुरुषको आकृतिके समान यह लोक है, जिसमें धर्मास्तिकायादि छह द्रव्य भरे पड़े हैं । ऐसा विचार करना, 'लोकभावना' कहाती है। (११) संसारमें अनन्तकालसे जीव भ्रमण कर रहा है अनेकवार चक्रवर्तीके जैसी ऋद्धि पाई; मनुष्य- जन्म, उत्तम कुल, आर्य देश पाया तथापि सम्यकज्ञान ( यथार्थज्ञान ) पाना मुश्किल है, इस भावनाको 'वोधिदुर्लभभावना' कहते हैं 1 ५२ (१२) संसारसमुद्रसे पार उतारनेमें नौकाके समान ज्ञान, दर्शन और चारित्ररूप धर्मका उपदेश करने वाले अरिहंत आदिको पाना तथा उसके कहे हुए धर्मको पाना मुश्किल है; ऐसे विचारको 'धर्मभावना' कहते हैं। - १ सामाइ पत्थ पढम छेओवट्ठावणं भवे वी परिहारविसुद्धीमं, सुहुमं तह संपरायं च ॥ २६ ॥ "इस गाथामे पाँच प्रकारके चारित्रका वर्णन है।" सामायिकचारित्र, छेदोपस्थापनीयचारित्र, परिहार- विशुद्धिचारित्र, सूक्ष्मसंपरायचारित्र ॥ २६ ॥ (१) सदोप व्यापारका त्याग और निर्दोप व्या- पारका सेवन अर्थात् जिससे ज्ञान, दर्शन और चारित्रकी प्राप्ति हो, उस व्यापारको 'सामायिकचारित्र' कहते हैं। (२) प्रधान साधुके द्वारा दिये हुये पॉच महाव्रतों को 'छेदीपस्थापनीय चारित्र' कहते हैं। (३ ) नव साधु गच्छसे अलग होकर सिद्धान्तमें लिखी हुई विधिके अनुसार अठारह मास तक तप करते हैं, उसे 'परिहारविशुद्धिचारित्र' कहते हैं। (४) दसवें गुणस्थानक में पहुंचे हुये साधुके चारित्र को 'सूक्ष्मसंपरायचारित्र' कहते हैं। . 1 । तत्तो अ अहक्खायं खायं सव्वमि जीवलोमि । जं चरिऊरण सुविहिना; वच्चंतऽयरामरं ठाणं॥ २७॥ सब लोकमें यथाख्यात-चारित्र प्रसिद्ध है, जिसका सेवन करके साधु लोग मोद पाते हैं ॥ २७ ॥ (५) क्रोध, मान, माया और लोभ इन चार कषायोंके सर्वथा क्षय होनेपर या उपशम होनेपर माधु का जो चारित्र है, उसे "यथाख्यातचारित्र" कहते हैं । .. इस जमानेमें श्रादिके दो चारित्र हैं, अन्तके तीन व्युच्छिन्न हुये। संवरतत्व समाप्त। - । .. निर्जरातत्त्व। अणसणमूणोअरित्रा, वित्तीसंखेवणं रसच्चाओ। कायकिलेसो संलीणया, य बज्झो तो होइ ॥ २६ ॥ "इस गाथामें छह प्रकारका बाह्य तप कहा है।" अनशन, ऊनोदरता, वृत्तिसंक्षेप, रसत्याग, कायक्लश और संलीनता, ये छह प्रकारके वाय तप हैं ।। २८ ।। (-१) आहारका त्याग, 'अनशन' कहलाता है, वह दो प्रकारका है; 'इत्वर' और 'यावत्कथिक' । चतुर्थ, पष्ट, अष्टम श्रादि तप, 'इत्वर' कहलाता है और जब तक जीवे तब तक आहारका त्याग, 'यावत्काथिक' तप कहलाता है। (२) आहार कम करना, 'ऊनोदरता' तप कहाता है। : (३) वृत्तिका-जीवनके निर्वाहकी चीजोंका- संक्षेप करना, 'वृत्तिसंक्षेप' तप है। द्रव्य, क्षेत्र, काल, भावसे चार प्रकारका यह तप है। (४) दूध, घी, तेल, दही, गुड़, शकर आदिका ।
M त्याग, 'रसत्याग' कहलाता है; जैसे नोवी, आम्बिल आदि तप। ( ५) साधु लोग, लोच करते हैं अर्थात् सिरके बाल उखाड़ते हैं, कायोत्सर्ग करते हैं और भी अनेक 'प्रकारसे शरीरको कष्ट पहुंचाते हैं, उसे सहते हैं, यह सब 'कायक्लेश' तप कहलाता है । (६) इन्द्रियोंको वशमें रखना; क्रोध, लोभ आदि न करना; मन, वचन, कायासे किसी जीवको तकलीफ न होने देना; उपाश्रय आदि एकान्त जगहमें रहना; यह 'संलीनता' तप कहलाता है। पायच्छित्तं विणओ, देयावच्चं तहेव सज्झाओ। झाणं उत्सगो वि श्र, शभितरो तवो होइ |॥ २६ ॥ "इस गाथामें छह प्रकारका अभ्यन्तर तप कहा है।" प्रायश्चित्त, विनय, वैयावृत्य, स्वाध्याय, ध्यान और उत्सर्ग, ये छह अभ्यन्तर तप हैं ॥ २६ ॥ (१) जो पाप किये हों, उन्हें गुरुके पास कहे, पापशुद्धिकेलिये गुरु जो तप बतलायें, उसे करे, यह 'प्रायश्चित्त" कहाता है।
.
(२) देव, गुरु, माता, पिता, आदि पूज्योंका
आदर-सत्कार करना उन्हें अपने शुद्ध आचरणसे सन्तुष्ट
रखना; इसे 'विनय' कहते हैं।
( ३ ) आचार्य, उपाध्याय, साधु, तपस्वी, दीन
आदिको अन्न, जल, वस्त्र, ठहरनेकेलिये जगह आदि
देना; इसे “वैयावृत्य" कहते हैं ।
(४) पढ़ना, पढ़ाना, सन्देह होनेपर ,गुरुसे पूछना,
पढ़े हुये ग्रन्थको याद रखना, धर्मकी कथा कहना, धर्मका
उपदेश देना; यह सब 'स्वाध्याय' कहलाता है ।
(५) चित्तकी एकाग्रताको 'ध्यान' कहते हैं, उसके
चार भेद हैं:-आर्त, रौद्र, धर्म और शुक्ल ।
आर्त और रौद्र ध्यानका त्याग करना चाहिये।
धर्म और शुक्ल ध्यानका सेवन करना चाहिये।
आर्त-मित्र, माता, पिता आदिकी मृत्यु होनेपर
शोक करना; कोढ़ी, रोगी आदिको देखकर घृणा करना;
शरीरमें कोई रोग होनेपर उसीकी चिन्ता करना; इस
जन्ममें किये हुये दान आदि तपका दूसरे जन्ममें अच्छे
फल पानेकी चिन्ता करना; ये सब 'आर्तध्यान'
कहलाते हैं।
रौद्र-द्वपसे किसी जीवको मारने या उसे कर
पहुँचानेकी चिन्ता करना; छल, कपट करके दूसरेका
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धन लेनेको चिन्ता करना; हिस्सेदार कुटुम्नी मरजाँय तो.
मैं अकेला ही मालिक बन बैलूंगा' ऐसी चिन्ता करना;
ये.सव 'रौद्रध्यान' कहाते हैं।
धर्म-ज्ञान, दर्शन, चारित्र, वैराग्य आदिको भावना
करना; सर्वज्ञ वीतरागके उपदेशरूप सिद्धान्तमें सन्देह न
करके उसपर पूरी श्रद्धा रखना; राग, द्वप, क्रोध, काम,
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लोभ, मोह आदि, इस लोक तथा परलोकमे भी दुःखें
देनेवाले हैं ऐसा चिन्तन करना; सुख दुःख प्राप्त होनेपर
हर्प और शोक न कर पूर्व कर्मका फैलं मिल रहा है,
ऐसा समझना; जिनेन्द्र भगवान्के कहे हुये छह द्रव्योंका
विचार करना; यह सब 'धर्मध्यान केंहाता है।
शुक्ल--शुक्लध्यानके चार भेद है; पृथक्त्ववितर्क
सविचार, एकत्यवितर्क अविचार, सूक्ष्मक्रिया अप्रतिपाति
और व्युपर सक्रिया अनिवृत्ति । -
(१) द्रव्य, गुण और पर्यायके जुदाईको - पृथक्त्व
कहते हैं; अपनी आत्माके शुद्ध स्वरूपका अनुभवरूप
भावश्रुत,, वितर्क कहलाता है और मन, वचन, औरं काय, ..
इन तीन योगोंमें से एक योग ग्रहण कर दूसरेमें संक्रमण
करना, विचार कहलाता है।
(२) आत्मद्रव्यमें या उसके विकाररहित सुखके
अनुभवरून पर्यायमें या निरुपाधि ज्ञानरूप गणमें
।
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अात्मानुभवरूप भावश्रुतके बलसे स्थिर होकर द्रव्य, गुणे
और पर्यायोंका विचार करना ।
( ३ ) तेरहवें गुणस्थानके अन्तमें मनोयोग और
वचनयोगको रोकने के बाद काययोगको रोकने में प्रवृत्त
होना।
( ४ ) तीनों योगोंको अभावं होनेपर फिर च्युत नं
होनेवाला अनन्त ज्ञान, अनन्त सुखका एकरस अनुभवे ।
६) उत्सर्ग तपके द्रव्य और भावरूपसे दो भेद
हैं। द्रव्य उत्सर्ग-गच्छका त्याग करके 'जिनकल्प'
स्वीकार करना; अनशनवत लेकर शरीरका त्याग; किसी
कल्पविशेषमें उपधिका त्याग, सदोष आहारका त्याग;
ये सब 'द्रव्योत्सर्ग' कहलाते हैं।
भावोत्सर्ग-क्रोध, मान, माया और लोभका त्याग,
नरक आदि योनिकी आयुं बाँधनेमें कारणंभूतें मिथ्याज्ञान
आदि का त्याग; ज्ञानके आवरण करनेवाले ज्ञानावरणीय
आदि कर्मका त्यांग; ये सब 'भावीत्सर्ग' कहलाते हैं।
वारसविहं तवो णि,--
ज्जार य बंधो चउंविगप्पो भ।
-- W पयई-ठिइ-अणुभाग,- प्पएसमेएहि नायव्वो ॥ ३०॥ "इस गाथामें कुछ अंशका सम्बन्ध निर्जरातत्त्वके साथ है, अवशिष्ट अंशमें बन्धतत्त्वके चार भेद कहे गये हैं।" प्रयम कहे हुये बारह प्रकारके तप ही निर्जरातत्त्वके चारह भेद है । प्रकृति, स्थिति, अनुभाग और वन्ध, चार चन्धके भेद हैं ॥ ३० ॥ , ये पइ सहावो वुत्तो, ठिई कालावहारण। अणुभागो रसो णेो, पएसो दलसंचओ।। ३१॥ इस गाथामें पूर्वोक्त प्रकृति श्रादिका स्वरूप कहा गया है।" - कर्मका स्वभाव 'प्रकृतिवन्ध' कहा जाता है; कर्मके कालका निश्चय 'स्थितिबन्ध' कर्मका रस 'अनुभागबन्ध' और कर्मके दलका सचय, 'प्रदेशबन्ध' कहाता है ॥३१॥ प्रकृतिवन्ध-जिस तरह वात, पित्त और कफके हरण करनेवाली चीजोंसे बने हुए लड्डका स्वभाव, वात 'आदिका दूर करना है, उसी तरह किसी कर्मका स्वभाव - ६० 1 जीवके ज्ञानका आवरण करना, किसी, कर्मका जीवके दर्शनका आवरण करना, किसीका स्वभाव चारित्रका आवरण करना होता है, इस स्वभावको 'प्रकृतिवन्धी कहते हैं। स्थितिवन्ध-जैसे बना हुआ लड्डु , महीने, छह महीने या वर्ष तक एक हो हालतमें रहता है उसी तरह कोई कर्म अन्तमुहूत तक रहता है, कोई सत्तर क्रोडाकोड़ी सागरोपम तक, कोई वर्ष तक, इसीको 'स्थितिबन्ध . हैं 4 अनुभागवन्ध-जिस तरह कोई लड्डू ज्यादा मीठा होता है कोई थोड़ा, कोई अधिक करना होता है, कोई अल्प और कोई ज्यादा तीखा होता है कोई थोड़ा, इत्यादि अनेक प्रकारके रमवाला होता है, उसी तरह ग्रहण किये हुये कर्मदलोंमें तरतमभावसे देखा जाय तो किसीका रस-फल ज्यादा शुभ होता है, किसीका थोड़ा और किसोका रस-फल अधिक अशुभ होता है किसीका अल्प इत्यादि अनेक प्रकारका रस होता है, उसे 'रस- वन्ध' कहते हैं । अनुभाग और रस, दोनोंका मतलब एक ही है। प्रदेशबन्ध- जैसे कोई लड्डु पावभर, कोई आधसेर परिमाणका होता है । उसी तरह कोई कर्मदल, परिमाणमें ६१ कम होता है और कोई ज्यादा, अनेक प्रकारके परिमाण होते हैं, इन परिमाणको 'प्रदेशबन्ध' कहते हैं । मोक्षतत्त्व संतपयपरूवणया, दव्वपनाणं च खित्त फुसणा य। कालोअ अंतर भाग, भावे अप्पाष९ चेव ।। ३२ ॥ "इस गाथामे मो सके नव भेद कहे हैं ।" सत्पदाहरणाद्वार, द्रव्यप्रमाणद्वार, क्षेत्रद्वार, स्पर्श- नाद्वार, कालद्वार, अन्तरद्वार, भागद्वार, भावद्वार और अल्पबहुत्ववार, ये मोक्ष के नव द्वार हैं अर्थात् मोक्षका स्वरूप समझने के नव भेद हैं ॥३२॥ - संतं सुहपयत्ता, विज्जतं खकुमुमं व न असंतं । मुक्ख त्ति पयं तस्स उ, परूवणा मग्गणाईहिं ॥३३ ।।
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"इस गाथामें सत्पदप्ररूपणाद्वारका स्वरूप कहा है।"
मोक्ष, सत् अर्थात् विद्यमान है क्योंकि उसका वाचक
एक पद है, आकाशकुसुमकी तरह वह अविद्यमान नहीं
है, मार्गणा द्वारा मोक्षकी प्ररूपणा (विचार) की
जाती है।॥ ३३ ॥
एक पदका वाच्य अर्थ अवश्य होता है; घट, पट
आदि एकपदवाले शब्द हैं उनका वाच्य अर्थ भी
विद्यमान है । दोपदवाले शब्दोंके वाच्य अर्थ होते भी हैं,
और नहीं भी होते;-जैसे 'गोशृङ्ग', 'महिपशृङ्ग' । ये
शब्द, दो दो पदोंसे बने हैं, इनका वाच्य अर्थ, 'गायका
सींग', 'भैसका सोंग' प्रसिद्ध है । 'खरशृङ्ग', 'अश्वशृङ्ग'
ये दो शब्द भी दो दो पदोंसे बने हुये हैं परन्तु इनके
वाच्य अर्थ, 'गधे का सींग', 'घोड़ेका सींग' अविद्यमान
हैं । मोक्ष शब्द एकपदवाला होनेसे उसका वाच्य अर्थ
भी घट, पट आदि पदार्थोंकी तरह विद्यमान है। इस
प्रकार अनुमान प्रमाणरो 'मोक्ष' है, यह बात सिद्ध
होती है।
नरगइ पणिदि तप्स भव,
सन्ति अहक्खाय खइअसम्मत्ते।
मुक्खोऽणाहार केवल,
दसणनाणे न सेसेसु ॥ ३४ ॥
६३ , - . - "इस गाथामें यह बतलाया गया है कि जोव किन मार्गणाओं के द्वारा मोक्ष पाता है । मनुष्यगति, पंचेन्द्रिय, त्रसकाय, भवसिद्धिक संज्ञी, यथाख्यातचारित्र, क्षायिकसम्यक्त्त, अनाहार, केवलदर्शन और केवलज्ञान, इन दस मार्गणाओंके द्वारा मोक्ष होता है, शेष मार्गणाओंके द्वारा नहीं ॥ ३४ ॥ सम्पूर्ण जीवद्रव्यका जिसके जरिये विचार किया जाय उसे 'मार्गणा' कहते हैं । मार्गणाके मूलभूत चौदह भेद हैं और उत्तर भेद बासठ। (१) नरक, तिर्यञ्च, मनुष्य और देव इन चार गतियोंमेंसे सिर्फ मनुष्यगतिसे मोक्ष मिलता है; अन्य तीन गतियोंसे नही । ( २ ) इन्द्रियमार्गणाके पाँच नेद हैं, एकेन्द्रिय, द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय और पंचेन्द्रिय । इनमेंसे : पंचेन्द्रियद्वारमें मोक्ष होता है अर्थात् पाँचों इन्द्रियाँ पाया हुआ जीव मोक्ष जा सकता है। (३) कायमार्गणाके छह भेद हैं, पृथ्वीकाय, : अप्काय, तेजःकाय, वायुकाय, वनस्पतिकाय और त्रसकाय । इनमेंसे त्रसकायके जीव मोक्ष जासकते हैं, अन्यकायके नहीं।
६४ ( ४ ) भवसिद्धिकमार्गणाके दो भेद हैं, भवसिद्धिक और अयवसिद्धिक । इनमेंसे भवसिद्धिक अर्थात् भव्य जीव मोक्ष जासकते हैं, अमव्य नहीं। (५) संज्ञीमार्गणाके दो भेद हैं, संज्ञीमार्गणा और असंज्ञीमार्गणा । इनमेंसे संज्ञी जीव मोक्ष जासकते हैं, असंज्ञी नहीं। (६) चारित्रमार्गणाके पांच भेद हैं, सामायिक, छेदोपस्थापनीय, परिहारविशुद्धि, सूक्ष्मसम्पराय और यथाख्यातचारित्र। इनमेंसे यथाख्यात चारित्रका लाम होनेपर जीव मोक्ष जाता है, अन्य चारित्रसे नहीं। (७)सम्यक्त्वमार्गणाके पाँच भेद है, औपशमिक सास्वादन, क्षायोपशमिक. वेदक और क्षायिक । इनमेंसे क्षायिक सम्यक्त्वका लाभ होनेपर जीव मोक्ष जाता है अन्य सम्यक्त्वसे नहीं। (८) अनाहारमार्गणाके दो भेद हैं, अनाहारक और श्राहारक । इनमेंसे अनाहारक जीवको मोक्ष होता है, याहारक अर्थात् श्राहार करनेवालेको नहीं। (8) ज्ञानमार्गणाके पॉच भेद हैं, मतिज्ञान, श्रुत- ज्ञान, अवधिज्ञान, मनःपर्यवज्ञान और केवलज्ञान । इनमेसे केवलज्ञान होनेपर मोक्ष होता है, अन्य ज्ञानसे नहीं।
६५ (१०) दर्शनमार्गणारे चार भेद हैं; चक्षुर्दर्शन, अचक्षुर्दर्शन, अवधिदर्शन और केलदर्शन | इनमें से केलेलदर्शन होनेपर मोक्ष होता है; अन्य दर्शनसे नहीं। दव्वप नाणे सिद्धारण जीवदव्वाणि हुंति णताणि। लोगस असंखिज्जे, भागे इक्को य सव्वे वि ॥ ३५ ॥ "इस गाथामें द्रव्यप्रमाणद्वार और शेत्रद्वारका वर्णन है।" द्रव्यप्रमाणद्वारके विचारसे सिद्धोंके जोवद्रव्य अनन्त हैं। क्षेत्रद्वारके विचारसे लोकाकाशके असंख्यात भागमें एक सिद्ध रहता है, उसी तरह सब सिद्ध भी, लोकाकाश के असंख्यातवें भागमें रहते हैं। परन्तु एक सिद्धसे व्याप्त क्षेत्रकी अपेक्षा, सभ सिद्धोंसे व्याप्त क्षेत्रका परिमाण अधिक है ॥ ३५ ॥ फुलणा अहिश्रा कालो, इग सिद्ध पडुच्च साइनोऽणंतो। ५ ६६ पडिवायाभावात्रो, सिद्धाणं अंतरं नस्थि ॥ ३६ ।। "इस गाथामें स्पर्शना, काल और अन्तर, ये तीन द्वार कहे हैं।" (१) क्षेत्रसे सिद्ध जीवोंकी स्पर्शना अधिक है एक सिद्धकी अपेक्षासे काल, सादि ( श्रादिसहित ) और अनन्त होता है। सिद्धगतिमें गये हुए जीवका पतन नहीं होता इसलिये अन्तर नहीं है ॥ ३६ ॥ जीव, कर्मसे मुक्त होकर जिस आकाशक्षेत्रमें रहते हैं, उसे सिद्धक्षेत्र कहते हैं । उसका (सिद्धाकाशक्षेत्रका) प्रमाण पैंतालीस लाख योजन लंबा चौड़ा है, उस क्षेत्र में विद्यमान सिद्धोंके नीचे, ऊपर तथा चारों तरफ़ आकाश- प्रदेश लगे हुये हैं इसलिये क्षेत्र की अपेक्षासे सिद्धजीवोंकी स्पर्शना अधिक है। ( २.) एक सिद्धको अपेक्षासे काल, सादिअनन्त है,। जिस समय जीव मोक्ष गया, वह काल उस जीवके मोक्षका आदि है, फिर उस जीवका मोक्षगतिसे पतन नहीं होता इसलिये अनन्त है। सब सिद्धोंकी अपेक्षासे विचारें तो मोक्षकाल, अनादि अनन्त है क्योंकि यह नहीं कहा जासकता कि, अमुक जीव सबसे प्रथम मुक्त हुा । अर्थात् उससे पहले कोई जीव मुक्त न था।
- (३) अन्तर उसे कहते हैं, "यदि सिद्ध 'अपनी अवस्थासे पतित होकर दूसरो योनि धारण करने के बाद फिर सिद्धगति प्राप्त करे;" सो हो नहीं सकता क्योंकि सिद्धगतिको छोड़कर अन्यगति पानेका कोई निमित्त नहीं है, इसलिये उक्त अन्तर मोक्षमें नहीं है। अथवा सिद्धोंमें ' परस्पर क्षेत्रकृत अन्तर नहीं है क्योंकि जहाँ एक सिद्ध है, वहाँ बहुतसे सिद्ध है । कालंकृत और क्षेत्रकृत, दोनों अन्तर सिद्धांमे नहीं हैं। - , सम्वजियाणमणते, भागे ते तेसि देसणं नाणं । खइए भावे परिणा,- मिए अ पुण होई जोवत्तं ॥३७॥ "हम गाथामे भागद्वार और भावद्वार कहते हैं।" सब सिद्धोंके जोव, संसारी जीवोंका अनन्तवाँ भाग है। उन सिद्धोंका केवलज्ञान और केवलदर्शन, क्षायिक' भावसे और जीवितव्य (जीना), पारिणामिक भावसे है ।। ३७ ॥ (१) भागद्वार-भूत, भविष्यत् और वतमान इन तीनों कालोंमें यदि काई ज्ञानीसे सिद्धोंके बारेमें +
६८
पूछे तो, ज्ञानी यही उत्तर देगा कि, "असंख्यात निगोद
हैं, प्रत्येक निगोदमें अनन्त जीव हैं, उनमेंसे एक
निगोदका अनन्तवां भाग मोक्ष पा चुका," इसे भागद्वार
कहते हैं।
(२) भावद्वार-सिद्धोंके दो भाव होते हैं; क्षायिक
और पारिणामिक । क्षायिक के नव भेद हैं और पारि-
णामिकके तीन । केवलज्ञान और केवलदर्शनसे अतिरिक्त
सात क्षायिक भाव सिद्धको नहीं होते इसी प्रकार जोवि-
तव्यको छोड़कर अन्य दो पारिणामिक भाव भी नहीं
होते।
क्षायिक भाव ये हैं; दान, लाभ, भोग, उपभोग,
वीर्य, सम्यक्त्व, चारित्र. केवलज्ञान और केवलदर्शन ।
किसी धर्मके क्षयसे होनेवाले भावको क्षायिक भाव
कहते हैं।
पारिणामिक भाव ये हैं; भव्यत्व, अभव्यत्व और
जीवितव्य।
ज्ञान, दर्शन, चारित्र और वीर्य-रूप भावप्राण,
सिद्ध जीवोंके हैं । पाँच इन्द्रियाँ, मनोवल, वचनवल,
कायवल, श्वासोच्छ्वास और आयु, ये दस - द्रव्यप्राण
सिद्धोंको नहीं होते। उपशम क्षय और क्षयोपशमकी
६६ अपेक्षा न रखनेवाले जोरके स्वभावको पारिणामिक भाव कहते हैं। 1 थोवा नपुंससिद्धा, थीनरसिद्धा कमेण संखगुणा । इअ मुक्खतत्तमेश्र नव तत्ता लेसो भणिया ॥३॥ "इस गाथामें अल्पबहुत्वद्वार कहा है ।" नपुन्सकसिद्ध, कम हैं; उससे स्त्रीसिद्ध, संख्यात गुण अधिक हैं; स्त्रीसिद्धसे पुरुपसिद्ध संख्यात गुण अधिक हैं। यह मोक्षतच है। इस तरह नव तत्त्व संक्षेपसे कहे गये ॥३८ दो तरह के नपुन्सक होते हैं; जन्मसिद्ध और कृत्रिम । जन्मसिद्ध नपुन्सकोंको मोक्ष नहीं होता, कृत्रिम नपुन्सक एक समयमें उत्कृष्ट दस तक मोक्ष जाते हैं, स्त्रियाँ एकसमयमें उत्कृष्ट बीस तक मोक्ष जातो हैं और पुरुष एक समयमें उत्कृष्ट एकसो आठ तक मोक्ष जाते हैं। जीवाइ नव पयत्थे, जो जाणइ तस्स होइ सम्मत्त ।
७० भावेण सदहतो, अयाणमाणेवि सम्मत्तं ॥३६॥ "इस गाथामे नवतत्व जानने का फल कहते हैं ।” जो जीव, जीवादि नव तत्त्वोंको जानता है उसे सम्यक्त्व प्राप्त होता है । जीवादि पदार्थोंके नहीं जानने- वाले भी यदि अन्तःकरणसे ऐसी श्रद्धा रखें कि, "सर्वज्ञ वीतराग, जिनेश्वर भगवान्के कहे हुये नव तत्त्व सच हैं, अशङ्कनीय हैं," तो समझना चाहिये कि उन्हें भी सम्यक्त्व है ॥ ३६॥ सव्वाइ जिणेसरभा,- सिआई वयणाइ नन्नहा हुँति । इय बुद्धी जस्स मण, सम्मत्तं निच्चलं तस्स ॥ ४०॥ "इस गाथामें सम्यकन्यचा न्वरूप कहा गया है !" जिनेन्द्र भगवानके कहे हुये सभी वचन अन्यथा (झूठं) नहीं है, ऐसी जिसकी बुद्धि हो, उसे निश्चल सम्यक्त्व हुआ है, ऐसा पमझना चाहिये ॥ ४० ॥ श्राप्त, वीतराग, सर्वज्ञके उपदिष्ट पदार्थ सच हैं ऐसी दृढ़ श्रद्धाको (आत्माके परिणामविशेपको) सम्यक्त्व कहते हैं। - ܀ ७१ . अंतोमुहुत्तमित्तं पि फासिझं हुज जेहिं सममत्तं । तेसिं प्रवड्ढयुग्गल-- परिअहो चवः संसारो ॥४१॥ "इस गाथामें सम्यक्त्वलार्भका फन कहते हैं । जिनको एक अन्तमुहूर्त मात्र भी सम्यक्त्वका स्पर्श हुआहो, उनका अर्धपुद्गलपरावर्त संसार बाकी रहा है।॥४१॥ सिर्फ अन्तर्मुहूर्त तक, जिस जीवका परिणाम, सम्यक्त्वरूप होगया हो, उम जीवको 'अर्धपुद्गलपरावर्त तक संसारमें भ्रमण करना पडेगा, वाद अवश्य "मोक्ष मिलेगा। यह कालपरिमाण उस जीवके लिये कहा गया है जिसने बहुत आशातना की हो, या करनेवाला हो शुद्ध सम्यक्त्वका अाराधन करनेवाला जीव, तो, उसी जन्ममें, कोई जीव तीसरे जन्ममें, कोई सातवें जन्ममें, कोई पाठवें जन्ममें इस तरह शीघ्र मुक्ति, पाता है । na उस्सप्पिणी अणंता, पुग्गलपरिअदृशो मुणेअत्रो । i.
७२ तेणंता तीनद्धा, अणागयदा अणंतगुण। ॥ ४२ ॥ "इस गाथामें पुद्गलपरावर्तनका स्वरूप कहा है ।" अनन्त उत्सर्पिणी और अनन्त अवसर्पिणी वीत जानेपर एक 'पुद्गलपरावर्तन' होता है, इस तरहके अनन्त 'पुद्गलपरावर्तन' पहले हो चुके और अनन्तगुण आगे होंगे ॥ ४२ ॥ 1. r जिण-अजिण-तिन्थ-ऽतित्या, गिहि-अन्न-लजिंग थी-नर-नपुंसा। पत्तेय-सयंबुद्धा, वुद्धबोहिक्कऽणिक्का य ॥४३॥ "इस गाथामें सिद्धोके पंदर भेद कहे गये हैं।" (१) तीर्थङ्करसिद्ध, (२) अतीर्थङ्करसिद्ध, (३) तीर्थ- सिद्ध, (४) अतीर्थसिद, (५) गृहस्थलिङ्गसिद्ध, (६) अन्यलिङ्गसिद्ध, (७) स्वलिङ्गसिद्ध, (८) स्त्रीसिद्ध, (६) पुरुषसिद्ध, (१०) नपुसकसिद्ध, (११) प्रत्येकबुद्धसिद्ध, (१२) स्वयंबुद्धसिद्ध, (१३) युद्धबोधितसिद्ध, (१४) एकसिद्ध और (१५) अनेकसिद्धः ये पंदरह सिद्धके भेद हैं ॥ ४३ ॥ - ७३ - .. 1 - (१) तीर्थङ्कर होकर जिन्होंने मुक्ति पाई, वे जिन- तीर्थकर सिद्ध । ऋषभ, महावीर आदि । (२) सामान्य केवली, अजिन-तीर्थङ्करसिद्ध कहलाते हैं, जैसे पुण्डरीक आदि। (३ चतुर्विध संघकी स्थापना करनेके बाद जिन्होंने मुक्ति पाई वे 'तीर्थसिद्ध, जैसे गौतम आदि गणधर । (४) चतुर्विध संघकी स्थापना करने के पहले जिन्होंने मुक्ति पाई वे 'अतीर्थसिद्ध, जैसे मरुदेवी आदि । (५) गृहस्थके वेषमें जिन्होंने मुक्ति पाई वे 'गृहस्थ- लिङ्गसिद्ध, जैसे'मरुदेवी माता आदि । (६) संन्यासी आदि अन्यवेषधारी साधुओंने मुक्ति पाई वे 'अन्यलिङ्गसिद्ध,' जैसे 'वल्कलचीरी' आदि । (७) रजोहरण आदि अपने वेषमें रहकर जिन्होंने मुक्ति पाई वे 'स्वलिङ्गसिद्ध,' जैसे जैनवेषधारी साधु । (E) 'स्त्रीलिङ्गसिद्ध, जैसे चन्दनवाला आदि । (6) 'पुरुषलिंगसिद्ध,' जैसे गौतम आदि । (१०) 'नपुन्सकलिंगसिद्ध, जैसे भीष्म आदि । -
७४
१
(११) किसी अनित्य पदार्थको देखकर विचार
करते करते जिन्हें वोध हुआ वाद केवलज्ञान प्राप्त हुआ
और सिद्ध हुए वे 'प्रत्येकबुद्ध, जैसे करकण्डू राजा
आदि ।
(१२) 'स्वयंबुद्धसिद्ध',-विना उपदेशके, पूर्वजन्मके
"संस्कार बुद्ध होनेसें जिन्हें ज्ञान हुआ और सिद्ध हुए
वे। जैसे कपिल श्रादि ।
(१३) गुरुके उपदेशसे ज्ञानी होकर जो सिद्ध हुये,
बे, 'युद्धबोधित सिद्ध'।
(१४) एक समयमें एक ही मोक्ष जानेवाले
'एकसिद्ध', जैसे महावीर स्वामी श्रादि ।
(१५) एक समयमें अनेकमुक्त होनेवाले 'अनेकसिद्ध'
कहलाते हैं, जैसे ऋषभदेव आदि।
:।।
7
समाप्त
,
.
..
.
-
परिशिष्ट । ': . P । नवतत्त्वको दूसरी प्रतिमें १६ गाथायें अधिक हैं, - जो यहाँ दी जाती हैं ! १६।७११।१४।२६.३८।३६॥४०॥४११४२।४.५१५६ ५७/५८/५६ 7 + "जोवका लक्षण" Dirgamer . नाणं च दंसणं चेव, चरित्तं च तवो तहा। वीरियं उवयोगोत्र, एअंजीअस्ल लक्खणं ॥१॥ - ज्ञान, दर्शन, चरित्र, तप, वीर्य और उपयोग, ये जीवके लक्षण हैं- अर्थात् ये, जोयको छोड़कर किसी दूसरे पदार्थमें नहीं रहते ॥ १॥ - (१) पाँच प्रकारका ज्ञान और तीन प्रकारका प्रज्ञान; ये दोनों ज्ञानशब्दसे लिये जाते है ,
७
ज्ञानके पाँच मेद ये हैं:-मतिज्ञान, श्रुतज्ञान,
अवधिज्ञान, मनःपर्यवज्ञान और केवलज्ञान ।
अज्ञानके तीन भेद ये हैं;-मतिअज्ञान, श्रुतअज्ञान,
विभंगज्ञान | इनको क्रमसे कुमति, कुश्रुत और कुअवधि
भी कहते हैं।
जिस जीवमें ज्ञान हो, उसे सम्यग्दृष्टि और जिसमें
अज्ञान हो उसे मिथ्यादृष्टि कहते हैं।
(२) दर्शनके चार भेद हैं;-चतुदर्शन, अवक्षुर्दर्शन,
अवधिदर्शन और केवलदर्शन !
(३) चारित्रके दो भेद हैं:-भावचरित्र और
द्रव्यचारित्र । भावचारित्रकं पॉच भेद हैं;-सामायिक,
छेदोपस्थापनीय, पारहारविशुद्धि, सूक्ष्मसम्पराय और
यथाख्याता
', क्रियाक निरोधको द्रव्यचारित्र कहते हैं ।
(४) तपके दो भेद हैं;---द्रव्यतप और भावतप ।
द्रव्यतपके बारह भेद है, वे २८-२६-३० वीं
गाथाओं में कहे गये हैं।
इच्छाके निरोधको भावतप कहते हैं।
(५) सामर्थ्य, बल अथवा पराक्रमको वीर्य
कहते हैं।
(६) उपयोगके दो भेद हैं;-साकार और निरा- कार । साकार उपयोगको ज्ञान कहते हैं, और निराकार उपयोगका दर्शन । "छह पर्याप्तियोंके नाम, और वे किन जीवोंको कितनी होतो हैं, सो कहते हैं।" आहार-सरीर-इंदिर- पज्जत्ती आणपाण भास-मणे । चउ पैच पंच छ पिन इग-विगलाऽसन्नि-सन्नीणं ॥२॥ आहारपर्याप्ति, शरीरपर्याप्ति, इन्द्रियपर्याप्ति, श्वासो- च्छ्वासपर्याप्ति और मनःपर्याप्ति, ये छह पर्याप्तियाँ हैं । एकेन्द्रिय जोक्को चार; विकलेन्द्रिय तथा असंज्ञी पञ्चे- न्द्रियको पाँच, और संज्ञीपञ्चेन्द्रियको छह पर्याप्तियाँ होती हैं ॥ २ ॥ पर्याप्तियोंका अर्थ चौथी गाथामें देख लेवें। "द्रव्यप्राणोंके दस भेद, और वे किन जीवोंको कितने हैं, सो कहते हैं।" पणिंदिश-त्तिवलूसा-, साऊ दस पाणचउ छ संग अट्ट । - - १ ~ ७८, । इग-दु-ति-चउरिंदीणं, असन्नि-सन्नीण नव दस य ॥३॥ पाँच इन्द्रियाँ, तीन वल, श्वासोच्छ्वास और आयु, ये दस प्राण कहलाते हैं । एकेन्द्रियको चार प्राण; द्वीन्द्रियको छह; त्रीन्द्रियको सात; चतुरिन्द्रियको पाठ, असंज्ञी पञ्चेन्द्रियको नव और संज्ञी पञ्चेन्द्रियको दस प्राण होते हैं ॥ ३ ॥ (१) एकेन्द्रियके चार प्राण ये हैं;-त्वगिन्द्रिय, श्वासोच्छ्वास, कायवल और आयु । (२) एकेन्द्रियजीवकी अपेक्षा, द्वीन्द्रिय जीवके रसनेन्द्रिय और वचनवल-ये दो प्राण अधिक हैं (३)द्वीन्द्रियको अपेक्षा, त्रोन्द्रिय जोबको घ्राणे- न्द्रियप्राण अधिक है (४) त्रीन्द्रियकी अपेक्षा चतुरिन्द्रिय जीवको चनुरिन्द्रिय—यह एक प्राण अधिक है । ( ५ ) चतुरिन्द्रियकी अपेक्षा, असंज्ञी पञ्चेन्द्रियको. श्रोनेन्द्रिय-यह एक प्राण अधिक है। (६) असंही पञ्चेन्द्रियकी अपेक्षा, संज्ञो पञ्चे- न्द्रियको मनोवल---यह एक प्राण अधिक है। असंज्ञी पञ्चेन्द्रियके दो भेद हैं—मनुष्य और तिर्यञ्च । , ७६ . इनको सम्मूच्छिम कहते हैं। सम्मूच्छिम मनुष्यको चनवल नहीं होता इसलिये उसको अाठ प्राण समझना वाहिये । वह यदि श्वासोच्छ्वास पर्याप्तिको पूर्ण किये चेना ही मर जाय तो सात प्राण समझना। नीचे लिखे हुये श्लोकमें भी दस प्राणोंका वर्णन है- पञ्चेन्द्रियाणि त्रिविधं वलं च, ' उच्छ्वासनिःश्वासमथान्यदायुः । प्राणा दशैते भगवद्भिक्ताः, तेषां वियोजीकरणं तु हिसा ॥१॥ पाँच इन्द्रियां, तीन वल—मनोवल, वचनबल और कायबल, श्वासोच्छ्वास और . आयु, ये दस प्राण, भगवानने कहे हैं; जोवको इन प्राणोंसे जुदा करना, हिंसा कहलाती है। जीवके ज्ञान, दर्शन, चारित्र आदि गुणोंको "भावप्राण' कहते हैं। . "पुद्गलका लक्षण" सइंधयार-उज्जोम-, पभा-छाया-ऽऽतवे इथ। , hor है ८० वन्न गंध रसा फासा, पुग्गलाणं तु लक्खणं ॥४॥ शब्द, अन्धकार, रत्नादिका उद्योत, चन्द्रादिकी प्रभा, छाया और सूर्यादिका आतप, ये पुनल हैं, अथवा जिसमें वर्ण, गन्ध, रस और स्पर्श हो, उसे पुगल सम- झना चाहिये ।। ४.॥ पूरण-गलन, जिसका स्वभाव हो, उसे पुदगल कहते हैं-अर्थात् जो इकट्ठे हो कर मिल जाते हैं. और फिर जुदे जुदे हो जाते हैं, वे पुद्गल कहलाते हैं । . "छह द्रव्योंका विशेप स्वरूप कहते हैं ।" परिणामि जीव मुत्तं, सपएसा एग खित्त किरिश्रा य । पिच्चं कारण कत्ता, सव्वगय इयरअप्पवेसे १५ ।। जीव, पुद्गल, धर्मास्तिकाय, अधर्मास्तिकाय, आकाशास्तिकाय और काल-ये छह द्रव्य हैं। इनमेंसे जीव और पुद्गल, ये दो परिणामी हैं; जीव, चेतन द्रव्य है; पुद्गल मूर्ग हैं; जीव पुद्गल, धम, अधर्म और आकाश ये पाँच द्रव्य प्रदेशसहि हैं; धतर्म, अधर्म और - ८२ . आकाश-ये तोन, एक एक हैं; आकाश क्षेत्र है; जीव और पुद्गल सक्रिय हैं; धर्म, अधर्म, आकाश और बाल नित्य हैं; धर्म, अधर्म, आकाश, काल और पुद्गल, कारण हैं : जीव कर्ता है; आकाश सर्वगत-अर्थात् लोक- अलोक व्यापी है, और छहों द्रव्य प्रवेशरहित हैं- अर्थात् एक द्रव्य, दूसरे द्रव्यका स्वरूप नहीं धारण करता॥ ५ ॥ विशेष-परिणाम दो प्रकारके होते हैं,-स्वभाव- परिणाम और विभावपरिणाम । अन्यद्रव्य के निमित्तसे होनेवाला विरूप परिणाम, विभाव परिणाम कहलाता है, जैसे-जीवके निमित्तसे पुद्गल, कर्मके स्वरूपमें बदल जाते हैं, और पुद्गलके निमित्तसे जीवका ज्ञान, अज्ञानके रूपमें बदल जाता है विभावररिणामकी अपेक्षासे जीव और पुद्गल परिणामी हैं, अन्य द्रव्य नहीं क्योंकि उनमें स्वभावपरिणाम ही होता है, विभावपरिणाम नहीं होता। . द्रव्यप्राण और भावप्राणोंको जीवद्रव्य ही धारण करता है । अतएव अन्य पांच द्रव्य, निर्जीव हैं। इन्द्रियोंके द्वारा ग्रहण किये जानेकी योग्यता जिस द्रव्यमें हो, उसे मूर्त समझना चाहिये। अथवा, जिसमें ५ w .
८२ रूप, रस, गन्ध और स्पर्श हों उसे मूर्त कहते हैं । पुद्गल- द्रयको छोड़, अन्य पाँच द्रव्य अमूर्त हैं । । 4 काल द्रव्यको,छोड़, अन्य पाँच द्रव्य, प्रदेशवाले . हैं । जीव, धर्मास्तिकाय और अधर्मास्तिकाय के प्रत्येक क असंख्य प्रदेश हैं । सामान्यरूपसे आकाशके अनन्त प्रदेश हैं परन्तु लोकाकाशके असंख्य प्रदेश हैं । पुद्गल- द्रव्य संख्यात प्रदेशोंवाला, असंख्यात प्रदेशोंवाला और अनन्त प्रदेशोंवाला होता है। . आकाश द्रव्य, अन्य द्रव्योंको अवकाश देता है, इसलिये वही एक क्षेत्र कहलाता है । एक जगहसे दूसरी जगह जाना यह क्रिया है । जीव और पुद्गलको छोड़ अन्य दव्योंमें क्रिया नहीं है इसलिये जीव और पुद्गल सक्रिय, और अन्य द्रव्य निष्क्रिय कहलाते हैं। धर्म, अधर्म, आकाश और काल-इन चार द्रव्योंमें विभावपरिणाम नहीं होता इसलिये ये नित्य और जीव तथा पुदगलमें विभावपरिणाम होता है इसलिये ये दोनों अनित्य है । नयवादको लेकर जीवको अनित्य कहा है, अन्यथा, जैनसिद्धान्त सब द्रव्योंको नित्यानित्य कहता है ।
८३ जीवके शरीर-इन्द्रिय आदिके बननेमें कारण; पुङ्गल है; जीवके गमनमें कारण, धर्मास्तिकाय है; जीदके स्थिर होने कारण, अधर्मास्तिकाय है; जीवकी वर्तनामें कारण, काल है । इसलिये ये पॉचों द्रव्य, कारण हैं; और जीव- द्रव्य अकारण है, क्योंकि जीवसे उन पॉचों द्रव्योंका कोई उपकार नहीं होता। २ "पाच समितियोके और तोन गुप्तियोंके नाम " इरिया भासेसणादाणे, उच्चारे समिईसु अ। मणगुत्ति वयगुत्ति, कायगुत्ति तहेव य ॥६॥ ईर्यासमिति, झापासमिति, एपणासमिति, आदान- निक्षेपसमिति और पारिष्ठापनिकासमिति; ये पॉच समितियाँ हैं, मनगुप्ति, वचनगुप्ति और काय गुप्ति, ये तीन गुप्तियाँ हैं ॥ ६॥ सम्यक् चेष्टाको समिति कहते हैं । मन, वचन और कायाके अशुभ व्यापारोंका रोकना, गुप्ति कहलाता है।
समिति और गुप्ति, "अष्ट-प्रवचन-माता" कहलाती हैं क्योंकि ये, आत्माके चारित्रगुणका पालनपोपण करती हैं। - "आठ कोका-प्रत्येकका-स्वभाव, धान्तों केद्वारा दिखलाते हैं।" पड-पडिहारऽसि-मज्ज, हड-चित्त-कुलाल-भंडगारीणं । जह एएसि भावा, कम्माण वि जाण तह भावा ॥७॥ पट, प्रतिहारी, असि, मद्य, कारागृह, चित्रकार, कुलाल और भण्डारी इनके स्वभावके सदृश फर्मोंका स्वभाव है ॥ ७॥ ( १ ) आँखपर वॉधी हुई पट्टीके सदृश, ज्ञानावर- रणीय कर्मका स्वभाव है । वह आत्माके अनन्त ज्ञानको रोक देता है। (२) द्वारपालके समान, दर्शनावरणोय कर्मका स्वभाव है । जिस प्रकार राजदर्शन चाहनेवालेको द्वारपाल रोकता है, उसी तरह आत्माके दर्शनगुणकोदर्शनावरणीय कर्म रोक देता है।
1 - (३ ) वेदनीय कर्मका स्वभाव, शहर लगी हुई तलवारकी धारके सदृश है। यह कर्म आत्माके, 'अव्या- बाध' गुणको रोक देता है । तलवारकी धारमें लगे हुये शहदको चाटनेके समान, सातवेदनीय कर्मका विपाक है। खड्गधाराम जीभके कटनेपर, अनुमबमें आती हुई पीड़ाके समान, असातवेदनीय कर्मका विपाक है । सांसारिक सुख, दुःखसे मिला हुआ है इसलिये निश्चय- दृष्टि से, सिवा आत्मसुखक, पुद्गलनिमित्तक सुख, दुःख- रूप ही समझा जाता है । ३- (४) मद्यके नशेके समान, मोहनोय कमका स्वभाव है। यह आत्माके सम्यग्दर्शन पार सन्यावारित्र गुणको ढक देता है। जैसे मद्यके नशेमें चूर, अपना हित-अहित नहीं समझ सकता, इसी प्रकार मोहनीय कर्मके उदयसे आत्मा को धर्म अधर्मका भान नहीं रहता। (५) आयुकर्मका स्वभाव, कागगृहके समान है। यह कर्म, आत्माके 'अविनाशित्व' धर्मको रोक देता है। जिस प्रकार जेल में पड़ा हुआ मनुष्य, उससे निकलना चाहता है पर सजा पूर्ण हुये विना नहीं निकल सकता,
८६
उसी तरह नरकादि योनिमें पड़ा हुआ-जीव, आयु पूर्ण
किये विना, उन योनियोंसे नहीं छूट सकता ।
(६) नामकर्मका स्वभाव, चित्रकार जैसा है। यह
कर्म, आत्माके 'अरूपित्व' धर्मको रोकता है। जैसे चितेरा,
भले-बुरे अनेक प्रकारके चित्र बनाता है, उसी प्रकार
नामकर्म, आत्माको भले बुरे नाना प्रकारके देव-मनुष्य
-नारकतिर्यञ्च बना देता है।
(७) कुम्भार जैसा गोत्र कर्म हैं। यह कर्म आत्मा
के 'अगुरुलघु' गुणको रोकता है।
कुम्भार घी रखनेके पड़े बनाता है और मद्य रखने के
भी । घोका घड़ा अच्छा समझा जाता है और मद्यका
वुरा । इसी तरह गोत्रकर्मके उदयसे जीव ऊँच-नीच
कुलमें जन्म लेता है।
(८) अन्तराय कर्मका स्वभाव भण्डारी जैसा है।
यह कर्म जीव वीर्यगुणको तथा दान आदि लब्धियोंको
रोकता है । जैसे मालिक इच्छा होते हुये भी, दुष्ट
भण्डारीके कारण दान आदि नहीं कर सकता, इसी
प्रकार अन्तराय कर्मके उदयसे जीव दान आदि नहीं कर
सकता, न अपनी शक्तिका विकास कर सकता है।
+ "आठ कर्मों के नाम और उनकी उत्तर प्रकृतियाँ। इह नाण-दंसणांवरण, वेय-मोहाउ-जाम-गोत्राणि । विग्धं च पण-नव-दुअ---- ट्ठवीस-चउ-तिलय-दु-पणविहं ॥८॥ ज्ञानावरणीय, दर्शनावरणीय, वेदनीय, मोहनीय, 'श्रायु, नाम, गोत्र और अन्तराय ये आठ कर्म हैं। ज्ञानावरणीयकी उत्तर प्रकृतियाँ पाँच हैं; 'दर्शनावरणीय की नवः वेदनीयकी दो; मोहनीयकी अट्ठाईय; आयुकी चार; नामकर्मकी एकसौ तीन; गोत्रकी दो; और अन्त- रायको पाँच उत्तर प्रकृतिया हैं ॥ ८॥ - , "आठ कर्माका उत्कृष्ट स्थितिवन्ध ।" नाणे अ दंसणावरणे, वेसणीए चेव अंकराए अ। तीसं कोडाकोडी. अयराणं ठिइ अ उक्कोसा ॥६ ज्ञानावरणीय, दर्शनावरणीय, वेदनीय और अन्तराय इन चार कर्माकी उत्कृष्ट स्थिति-अर्थात् अधिकसे अधिक स्थिति, तीस क्रोडाकोड़ी सागरोपमझी है ।।।। २ सत्तरि कोडाकोडी, मोहणीए वीस नाम-गाएसु । तित्तोसं श्रायराई, आउट्टिइबंध उक्कोसा ॥ १० ॥ मोहनीय कर्मकी उत्कृष्ट स्थिति सत्तर ७० कोड़ानोड़ी सागरोपमकी है । नामकर्म और गोत्रकर्मकी उत्कृष्ट स्थिति वीस क्रोडाकोड़ी सागरोपमकी है। श्रायु कर्मकी उत्कृष्ट स्थिति, तेतोस सागरोपमकी है ।। १० ।। प्र "पाठ कमोंको जघन्य स्थिति कहते हैं।" वारस मुहुत्त जहन्ना, वेयणीए अह नाम-गोएसु । सेसाणंतमुहुत्तं, एयं बंधट्टिईमाणं ॥ ११ ॥ वेदनीय कर्मकी जघन्यस्थिति-अर्थात् कमसे कम स्थिति, वारह मुहरीकी है। नामकर्म और गोत्र कर्मकी ८९ जघन्यस्थिति आठ मुहूर्णकी है। शेष कर्मोंकी-अर्थात् ज्ञानावरणीय, दर्शनावरणीय, मोहनीय, आयु और अन्त- राय इन पाँचकर्मों की जघन्यस्थिति अन्तमुहूर्तकी है ॥११ 2 "चौदह मार्गणाओंके नाम " गइ इंदिएय काए, जोए वेए साय नाणेय। संजम देसण लेसा, भव सम्मे सन्नि माहारे ॥१२॥ १ गतिमार्गणा, २ इन्द्रियमार्गणा, ३ कायमार्गणा, ४ योगमार्गणा, ५ वेदमार्गणा, ६ कषायमार्गणा, ७ ज्ञानमार्गणा, ८ संयममार्गणा, ६ दर्शनमार्गणा, १० लेश्यामार्गणा, ११ भव्यमार्गणा. १२ सम्यक्त्वमार्गणा, १३ संज्ञोमार्गणा और १४ आहारमार्गणा ॥ १२ ॥ मार्गणाका अथ और प्रत्येक मार्गणाके भेद, चौतीसवीं गाथाके अर्थमें कहे गये हैं। 1 to
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"सिद्ध जीवोंके भेद तेतालीसवीं गाथामें कह चुके, उनके
उदाहरण चार गाथाओकेद्वारा कहे जाते हैं।"
जिणसिद्धा य अरिहंता,
अजिणसिद्धा य पुंडरिम पमुहा ।
गबहारि तित्थसिद्धा,
सतिन्थसिद्धा य मरुदेवी ।। १३ ।।
ऋपम आदि तीर्थकर, 'जिनमिद्ध' कहलाते हैं,
और पुण्डरीक वगैरह 'अजिनसिद्ध' । गणधर 'तीर्थसिद्ध'
कहलाते हैं और मरुदेवी 'अतीर्थसिद्ध ॥ १३ ॥
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गिहिलिंगसिद्ध भरहो,
वक्कलचीरी य अन्नलिंगग्मि ।
साहू सलिंगसिद्धा,
थीसिद्धा चंदणापमुही ॥१४॥
भरत चक्रवर्ती 'गृहस्थलिङ्ग सिद्ध'; वल्कलचीरी
"श्रन्यलिङ्गसिद्ध'; जैनसाधु 'स्वलिङ्गसिद्ध'; चन्दनवाला
श्रादि 'स्त्रीसिद्ध' ॥ १४ ॥
१ पुसिद्धा गोयमाई, गांगेयपमुह नपुसया सिद्धा। पत्तेय-सयंबुद्धा, भणिया करकंडु-कविलाई ॥१५॥ गौतम आदि 'पुरुषलिङ्गसिद्ध' ! भीष्म श्रादि 'नपु- न्सफलिङ्गसिद्ध' । करकंडु राजा 'प्रत्येकबुद्धसिद्ध कपिल आदि 'स्वयंवुद्ध' ॥ १५॥ तह बुद्धबोहि गुरुबो- हिया य इगसनय एकसिद्धा य । इगसनये वि अणेगा, सिद्धा ते णेगसिद्धा य ॥ १६ ॥ गुरुके उपदेशसे ज्ञानी होकर जो युक्त हुए वे, 'बुद्धबोधित सिद्ध' । महावीर स्वामीकी तरह, एक समयमें एक ही मोक्ष गया, वह 'एकसमयसिद्ध' । ऋषभदेव भगवान्के सदृश, एक समयमें अनेक मुक्त हुये, 'अनेकसिद्ध' ।। १६॥ खुलासेके लिये ४३ ची गाथाको देखें । वे ' प्रकाशक- मंत्री श्रीआत्मानन-जैन-पुस्तक प्रचारक-मण्डल रोशनमुहल्ला-आगरा। + - --
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