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Jatakalankara

Ganga,.vishnu Shri Kirshan Das · 2012/08

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श्री। अथ जातकालंकार विषयानुक्रमणिका । .... .... ....१ खजादिरोग ३ .... .... ६ .... .00 .... ..." .... .... .... .. विषय. पृष्टांक. विषय. पृष्टीक. अथ संज्ञाध्याय १. सुवादिरोगयोग मगलाचरण अयप्रयोजन सुनुद्धिडियोग .... तन्वादिमाव हृद्रोगादियोग तन्वादिमज्ञा वणादियोग ग्रहाबुमित्रसमसंज्ञा (उच्चदेहादियोग ग्रहदृष्टि जारादियोग अपकीतियोग अथ भावाध्याय २. खोमीतियोग तनुभावफल १ स्वल्पामयोग शुभयोग १० अल्पनेत्रकाणादियोग घनमावफल तृतीयभावफल वामनयोगदगुरोगयोग ४५ चतुर्थभारफर प्लीहादिरोगयोग होनांगयोग पञ्चमभावफल सतानाभावयोग पवादियोग रिपुभावफल पदयोग विवाहयोग मगृहियोग ....४९ गर्भमापयोग राजवधनयोग अरममावयोग देहदुर्गघियोग नवममावयोग .२६, अथ विपकन्याध्याय ४. दशममाश्योग एकादशभावयोग रिपन्यायाग ૧૮) बादशमाश्येग विषकन्यादोपारिहार अय योगाध्याय ३, अथायुर्दापाध्याय ५. कापरताव्यभिचारा- दीपायुयोग दिपोग ३२ पूर्णायुयोग ...." ..A .... ... ... 0044 .... ... ... .... .. .... .... ... .... ०६४ H ....

॥ श्रीगणशाय नमः । अथ जातकालंकार भाषाटीकासहितः। अथ संज्ञाध्यायः॥ मंगलाचरणम् । सानन्दं प्रणिपत्य सिद्धिसदनं लम्बोदरं भारती सूर्यादिग्रहमण्डलं निजगुरुं भक्त्यादब्जे स्थि- तम् ॥ येषामंघ्रिसरोरुहस्मरणतो नानाविधा: सिद्धयः सिद्धिं यान्ति लघु प्रयान्ति विलयं प्रत्यू- हशैलबजाः॥१॥ अर्थ--श्रीगणेशं गुरूंश्चव स्वेष्टदेवं सरस्वतीम् । प्रणम्य क्रियते ोपा भाषाटीका सुशाजना ॥ १ ॥ जिनके चरण- कमलके स्मरण करनेसे अनेक प्रकारकी सिद्धियां शीघही परिपूर्ण होती हैं और विघ्नरूप पर्वतोंके समूह शीघही नष्ट होते हैं ऐसे गणेशजीको सरस्वतीको सूर्यादि ग्रहके मंडलको अपने गुरुओंको हृदयकमलमें स्थित हुए आनंदसहित रहनेवाले और सिद्धिके निलय विष्णुभगवान्को प्रणाम करके फिर ॥१॥ सद्भावाकलितं पदार्थललितं योगाङ्गलीलाचितं श्रीमद्भागवतं शुकास्यगलितं यच्छीधरस्वामिना।।

(२) जातकालंकारः अ० १॥
सुव्यक्त क्रियते गणेशकविना गाथोक्तितजातकं
वृत्तस्रग्धरया जनादिसुफलं ज्योतिर्विदा जीवनम् २॥
अर्थ-श्रीशुकदेवजीके मुखसे प्रगट हुआ (६५
कासंस्कृतबदनात जैसे श्रीशुकदेवजीके मुखसे प्रगट हुआ
श्रेष्ठ भक्तिभावॉकरके विशिष्ट, श्रवण कीर्तन आदि
करके मनोहर, भक्तियोगके यम नियम आदि अंगोंकी लीला
कहिये उपदेशविशेपोंकरके पूजित, ज्योतिःस्वरूप परमात्माके
जाननेवालोंका तथा ब्रह्मवेत्ताओंका जीवनके कालक्षेप योग्य
ऐसा श्रीमद्भागवत पुराण, श्रीधर स्वामीजीने (दौंका रचके
प्रगट कियाहै तैसेही सद्भाव ( द्वादशाक्षायों करके) विशिष्ट पदा
लालिन (आनंदस्थानोंकरके मनोहर ), योगांग कहिये ग्रह
भागादिकोंकी लीलाकरके सुन्दर, ज्योतिर्विद् (ज्योतिपियों)
का जीवनरूप ऐमा यह गाथा, दंडकउक्तिसे कहा हुआ, जन
आदिकोंको सुन्दर फल कहनेवाला जातक स्रग्धरा छंदसे
गणेशनामक (मुझ) कविकरके सुन्दर प्रगट किया जाता
अर्थाव में गणेशकार इस जातकको स्रग्धरा छंदकरके
रवता हूं ॥२॥
यत्पूर्वं परमं शुकास्यगलितं सज्जातक फकिका-
रूपं गूढतमं तदेव विशदं कुर्वे गणेशोऽस्म्य-
हम् ॥ देवज्ञः सुतरां यशम्सुखमतिः श्रीहर्पदं
स्रग्धरावृत्तैश्चारु नृणां शुभायनपदं श्रीमच्छिया-
नुज्ञया ॥३॥

नापाटीकासहितः। अर्थ-जो पहले श्रीशुकदेवजीके मुससे प्रगट हुआ (छंदरहित होनेसे ) फक्किारूप अत्यन्त गूढ उत्तम जातक है उसीको दैवज्ञ निरंतर यशसे उत्पन्न हुए सुखमें बुद्धि रखनेवाला में गणेशनामक कवि श्रीमान् शिवनामक गुरुकी आज्ञासे विशद ( तोफा, सुंदर ) लक्ष्मी और कीर्ति देने- वाले आनंदसिद्धिदायक भावोंका स्थानरूप जातकको करता हूं ॥ ३ ॥ भूयांसः सन्ति भूमौ निजमतिरचनाशालिनःका- व्यगुम्फे संख्यावन्तस्तथापि प्रचुरपरगुणानन्द- लीला भजन्ते ॥ चञ्चद्गाम्भीर्यपद्माविबुधविट- पिनां जन्मसंप्राप्तिभूतोमर्यादा न स्वकीयां त्यज- ति किल महान रनधामा सरस्वान् ॥ ४ ॥ अर्थ-यद्यपि काव्य रचनेमें पृथ्वीतलमें अपनी बुद्रिकी रचना करनेवाले बहुतसे कविजन है तथापि वे कविजन विशे- पकरके पराये गुणोंसे उत्पन्न हुई आनंदलीलाको भजते हैं क्योंकि प्रकाशमान, गांभीर्य, लक्ष्मी कल्पनरु इन्होंको उत्पन्न करनेवालाती महान रत्नोंका स्थान समुद्र अपनी मर्यादाको नहीं त्यागता है सेही महंत उत्तमजन अपनी मर्यादामें रहते है ॥ ४॥ तन्यादिगावाः। देहं द्रव्यपराकमा सुखसुतो शत्रुः कलत्रं मृतिभी ग्यं राजपदं त्रामेण गदिता लाभव्ययौ लगतः ।।

(४) जातकालंकारः अ०१॥ भावा द्वादश तत्र सौख्यशरणं देहं मतं देहिनां तस्मादेव शुभाशुभाख्यफलनः कार्यों बुधोने- णयः॥५॥ अर्थ-देह १ द्रव्य २ पराक्रम ३ सुख ४ सुत ५ शत्रु ६ कला मृति ८ जाग्य ९ राज्यपद १० लाज ११ व्यय १२ ये बारहों भाव मकरके उनसे कहे हैं तहां देहधारी जीवोंके देहे ( शरीरही ) सुखका आश्रय कहा है इसलिये पण्डितज- नोको तिस देहभावसेही अर्थात् लमसेही शुभ अशुल फलका निर्णय करना चाहिये ॥ ५॥ तन्वादिसंज्ञाः। लयं मूर्तिस्तथाङ्गं तनुरुदयवपुः कल्पमाद्यं ततः सं कोशााख्यं कुटुम्बं धनमथ सहजं भ्रातृदु- श्चिक्यसंज्ञम् ॥ अम्बा पातालतुर्य हिबुकगुहसु- रद्वाहन यानसंज्ञं बन्ध्याख्यं चाम्बु नीरं जलमय तनयं बुद्धिविद्यात्मजाख्यम् ॥ ६॥ अर्थ-लम, मूर्ति, अंग, तनु, उदय, वपु, कल्प, आव ये लम ( तनुभाव ) के नाम हैं और स्य, कोश, अर्थ, कुटुंब, धन इन नामानाला दूसरा भवन है और सहन, भात, दुचिस्य ये तीसरे भवनकी संज्ञा हैं. अंबा, पाताल, तुर्य, हिबुक, गृह, सुहट, पान, बंधु, अंबु, नीर, जल ये चौथे भवनके नाम और तनय, बुद्धि, विद्या, आत्मज नामक ॥ ६ ॥ , जापाटीकासहितः। (५) वास्थानं पञ्चमं स्यात्तनुजमथ रिपुद्रेपरिक्षता- स्थ पठं जामित्रमस्तं स्मरमदनमधूनकामा भिषामम् ॥ रन्ध्रायुछिद्रयाम्यं निधनलयपदं चाष्टमं मृत्युरन्यवाख्यं धर्मसंज्ञं नवममिह शुभं स्पात्तपो मार्गसंज्ञम् ॥ ७॥ अर्थ-वास्स्थान ये पांचवें घरके नाम हैं और द्वेष, वैरी, क्षत ये छठे घरके नाम हैं. जानित्र, अस्त, स्मर, मदन, मद, 1 यत, काम ये सातवें वरके नाम हैं. रंध्र, आयु, छिद्र, याम्य, निधन, लय, मृत्यु ये आठवे घरके नाम है और गुरुनामक, धर्मनामसे प्रसिद्ध और शुन तपोमार्ग ये नवम घरके नामह॥७॥ ताताज्ञामानकास्पदगगननभोव्योममपूरणाख्यं मव्यं व्यापारमूचुर्दशममथ भवं चागमं प्राप्तिमा- यम् ॥ इत्थं प्रान्त्यान्तिमाख्यं मुनय इह ततो द्वादशं रिफमाहुयिं बुद्धा प्रवीणयंदधि- कममुतः संज्ञया तस्य तच ॥ ८॥. अर्थ-तात, आता, मान, कर्म, आस्पद, गगन, नार, व्योम, मेपूरण, मध्यम, व्यापार ये दश घरके नाम कहे हैं और ग्यारहवें घरको आगम, प्रानि, आय इन नामोंसे कहने हैं और प्रात्यांतिम नामक अर्थात् प्रांत्य, अंतिम, रिसफ ये बारहवें घरके नाम हैं और इस कहे हुए नामममुदायसे गो अधिक नाम दीव वह पण्डितजनांने तिमी २ नामक पर्यायसे

(६) जातकालंकारः अ०१॥
जानके ग्रहण कर लेना जैसे वित्त ऐसा नाम हो तो धनका
पर्याय होनेसे दूसरा प्रवल जान लेना ॥ ८ ॥
आद्यं तुय कलत्रं दशममिह बुधैः केन्द्रमुक्तं त्रि-
कोणं पुत्रं धर्माख्यमुक्तं पणफरमुदितं मृत्युला-
भात्मजार्थम् ॥ धर्म चापोक्किमारुगं व्ययरिपुस-
हज कण्टकाख्यं हि केन्द्र चैतचातुष्टयं स्यात्रि-
कमिह गदितं वैरिरि फान्तकाख्यम् ॥ ९॥
अर्थ-इस शास्त्रसे पण्डितजनोंने आग १ चतुर्थ ४ सप्तम
७ दशम १० इन चार घरोंकी केंद्र संज्ञा कही है. और कोई
केंद्र (१।४।७१ १० । इन चार घरों) कोही कंटक
नामकभी कहते हैं. पांचवां ५ नवम ९ घरको त्रिकोण कहते
आठवां ८ म्यारहवां ११ पांचवां ५ दूसरा २ इन घरोंको
पणफर कहते हैं. नवम ९ वारहवां १२ छठा ६ तीसरा ३
इन घरोंको आपोलिम कहते हैं और छठा ६ बारवां ३२
आठवां ८ इन घरोंकी विकसज्ञा कही है ॥ ९ ॥
ग्रहाणां शत्रुमित्रसमसंत्राः ।
चन्द्रेव्यक्षितिजा रवीन्दुतनयो गुविन्दुसूयीःक्रमा-
च्छुकाको रविचन्द्रभूमितनया ज्ञाकी सितज्ञी
मताः ॥ अकादेः सुहृदः समा अथ बुधःसर्व हि
शुक्रानो भौमाचार्ययमा यमः कुजगुरू, पूज्यः
परे वैरिणः ॥१०॥

भापाटीकासहितः।. अर्थ-चंद्रमा, बृहस्पति, मंगल ये सूर्यके मित्र हैं, बुध समान है, अन्य (शुक्र, शनि, राहु ) ये शत्रु हैं और सूर्य, बुध चंद्रमाके मित्र हैं, अन्य सब ग्रह सम हैं ( परन्तु राहु नो शत्रुही जानना ) और बृहस्पति, चंद्रमा, सूर्य मंगलके मित्र, शुक्र, शनि सम हैं, अन्य (बुध ) शत्रु है और शुक्र, सूर्य बुधके मित्र हैं, मंगल, बृहस्पति, शनि ये समान चंद्रमा शत्रु है और सूर्य, चंद्रमा, मंगल ये बृहस्पतिके मित्र हैं, शनि सम है, अन्य शत्रु हैं और बुध, शनिके मित्र हैं, मंगल, बृहस्पति सम है, अन्य शत्र हैं, शुक, बुध शानिके मित्र हैं, बृहस्पति सम है, अन्य कहिये वाकी रहे सूर्य, चंद्रमा, मंगल ये शत्रु हैं ॥१०॥ ग्रहद्दष्टिः। तृतीयदशमे ग्रहो नवमपञ्चमष्टांबुनी क्रमाचरण- द्वितः स्मरगृहं ततः पश्यति ॥ कुजः सितबुधौ शशी रविवुधौ सितक्ष्मासुतो गुरुर्यमशनी गुरुभं- वनपा इमे मेषतः॥११॥ अर्थ-नीसरे दश पर सब ग्रह एक चरण दृष्टिसे देखते है, नवम पांचवें दो चरण दृष्टिसे देखते हैं. आठवें चौथे तीन चरण दृष्टिकरके देखते हैं और सातवें घरमे स्थित सय ग्रह चार पददृष्टिसे अर्थात् पूर्णटिसे देखते हैं ( अन्य ग्रंथका यहनी मत है कि तीसरे दशवें शनि, नवम पांचवं बृहस्पति,

(८) जातकालंकारः भ०२॥
चौथे आठवें मंगल पूर्ण दृष्टिलेही देखते हैं) और मंगल १
शुक्र २ बुध ३ चंद्रमा ४ सूर्य ५ बुध ६ शुक्र ७ मंगल ८
बृहस्पति ९ शनि १० शनि ११ बृहस्पति १२ ऐसे कमसे
मेप आदि राशियोंके ये स्वामी कहेहैं. तहां मंगल मेपका
स्वामी शुक्र वृपका स्वामी इसी क्रमसे १ आदि अंक राशि-
योंके समझना ॥ ११ ॥
होः पधैगुम्फिते सूरितोपेऽलंकाराख्ये जातके
मंजुलंऽस्मिन् ॥ संज्ञाध्यायः श्रीगणेशेन वयवृत्त-
दिग्भिः संयुतोऽयं प्रणीतः ॥ १२ ॥
इति जातकालंकारे प्रथमोऽध्यायः ।। १ ।।
अर्थ-श्रीगणेशनामक कविने मनोहर छंदोंकरके रचे हुए
जातकालंकार नामक इस ग्रंथमें श्रेष्ठ दश श्लोकोंकरके यह
प्रथम अध्याय रचा है ॥ १२ ॥
इति श्रीजातकालंकारनापाटीकायां प्रथमोऽध्यायः॥१॥
अथ भावाध्यायः२॥
शुकाननसरोरुहागलितमत्र भूमीतले फलं परम-
सुंदरं सकलमाकलय्याधुना ॥ ब्रवीमि तनुभा-
यतः प्रवरदेववित्तोपदं यत्र मम चापलं किमपि
तत्क्षमध्य युधाः ॥ १॥

भाषाटीकासहितः।
अर्थ-मैं गणेशकवि अब श्रीशुकदेवजीके मुखसे प्रचलित
झोके यहां पृथ्वीपर शिष्यपशिष्यद्वारा प्राप्त हुए परम सुन्दर
संपूर्ण फलको विचारके उत्तम दैवज्ञोंकी प्रसन्नताके वास्ते
ननुभावसे लेके सब भावोंको कहता हूं. हे पंडितजनो ! जो
यहां कुछ चपलता, न्यूनता हो उसको क्षमा करो ॥ १ ॥
अथ तनुभावफलम्।
देहाधीशः स पापो व्ययरिपुमृतिगश्चेत्तदादेहसौ-
ख्यं न स्याजन्तोनिज व्ययरिपुमृतिपस्तत्फल-
स्यैव कर्ता ।। मूतों चेत्क्रूरखेटस्तदनुतनुपतिः
स्वीयवीर्येण हीनो नानातंकाकुलास्याद्रजति
मनुजा व्याधिमाधिप्रकोपम् ॥२॥
अर्थ-लपका स्वामी पापग्रहसे युक्त हो अथवा बारहवें
१२ छठे ६ आठवें ८ घरमें पडा हो तो उसको देहका सुख
नहीं हो और द्वादशनायका पति बारहवें घर हो, छठे घरका
पति छठे घर हो आठवें घरका पति आठवें घर हो तोगी
यही फल करनेवाला है अर्थात देहसुख नहीं हो. (परंतु बृह-
ज्जातकमें यह शुभ योग कहा है इसलिये दूसरा अर्थ यह
जानना कि लग्नपति पापग्रहसे युक्त हो अथवा १२, ६,८
इन स्थानोंके स्वामियों के संगमेंही पडा हो तो देहसुख नहीं
जानना और लममें क्रूर ग्रह हो, लमका पति अपने चलकरके
हीन हो तो वह मनुष्य अनेक पीडा, रोग, चिंताओंको प्राप्त
होव) ॥२॥

(१०) जातकालंकारः अ०२॥ अथ शुञ्जयोगाः। अङ्गाधीशः स्वगेहे बुधगुरुकाविभिः संयुतः केन्द्र- गोवा स्वीये तुङ्गे स्वामित्र यदि शुभभवने वीक्षितः सत्त्वरूपः ॥ स्यान्ननं पुण्यशीलः सकलजनमतः सर्वसम्पन्निधानं ज्ञानी मन्त्री च भूपः सुरुचिरन- यनो मानवो मानवानाम् ॥३॥ अर्थ-लग्नका पति लममें हो अथवा बुध, बृहस्पति, शुक्रसे युक्त होके केंद्रों पड़ा हो अथवा उच्चका हो अथवा अपने मित्रके घरमें हो अथवा शुभयह अर्थात् नववें ९ घरमें हो वा शुभ ग्रहसे दृष्ट हो तो वह मनुष्य मनुष्योंके मध्यमं राजा हो अथवा मंत्री हो, सब संपत्तियोंका स्थान हो, ज्ञानी और सत्वगुणी रूपवाला सुंदर नेत्र आदि उत्तम शरीरवाला पुण्य- वान संपूर्ण जनोंकरके मान्य होवे ॥ ३ ॥ लग्ने कूरेऽथ याते खलखचरगृहं लगनाथे खान्दू क्रूरान्तस्थानसंस्थावथ दिनपनिशानाथयोधून- यायी ॥ भूमीपुत्रस्तु पृष्टादुदयमधिगतश्चन्द्रजश्चे मनस्वी स्पादन्यो टुप्टकर्मा परभवनरतः पूरुपः क्षीणकायः॥४॥ अर्थ-लमका पति क्रूर ग्रहकी राशिपर स्थित हो अथवा सूर्य चंद्रमा क्रूरयहाँके मध्य (बीच ) में स्थित ही यह दूसरा योग हुआ और सूर्यमे वा चंद्रमासे सातवें स्थानमें मंगल हो ,

भापाटीकासहितः। (११)
और बुध पिछली राशिपर स्थित होवे तो इन तीन योगाम
एक योगकेभी होनेसे उदार मनवाला अंधा दुष्टकर्म करनेवाला
पराई स्त्रीसे रमण करनेवाला क्षीण शरीरवाला मनुष्य होवे यहां
उदार चित्तवाला चंद्रमा बलकी अपेक्षासे जानना ॥ ४॥
अथ धनत्तावफलम् ।
कोशाधीशः स्वराशौ सुरगुरुसहितः सर्वसंपत्प्रदः
स्यात् केन्द्रे वाथ निके चद्भवति हि मनुजः के
शभार द्रव्यहीनः ।। स्वान्याधीशी त्रिकस्थौ
कवितनुपयुतौ स्यात्तदा नेत्रहीनश्चन्द्रः पापेन
युक्तो धनभवनगतः शुक्रयुङ् नेत्रहीनः ॥५॥
अर्थ-धनस्थानका पति बृहस्पतिसे युक्त होके अपनी रा-
शिका हो अथवा केंद्रस्थान में स्थित हो तो संपूर्ण संपत्तियोंको
देनेवाला होता है और बृहसतिसे युक्त होके छठे, आठवें,
बारहवें घरमें हो तो द्रव्यसे हीन होबे और धनस्थानका तथा
बारहवें घरका पति शुक्र और बृहस्पतिसे युक्त होके पड़े हो
तो जन्मनेवाला अंधा होवे और शुक्र तथा पापमहसे युक्त होके
चंद्रमा धनमवनमें पडे तोनी यह मनुष्य अन्या हो ॥ ५॥
शुकः सेन्दुत्रिकस्थो जनुपि निशिनरः प्राप्नुयाद
न्धकत्वं जन्मान्धः सार्कशुक्रस्तनुभवनपतिः
स्यात्तदानों मनुष्यः । एवं तातानुजाम्वासुत-
निजगृहिणीस्थाननाथाः स्थिताश्चेदादेयं तत्र
तेषां प्रवरमतियुतेरन्धकत्वं तदानीम् ॥६॥

. (१२) जातकालंकारः अ०२। अर्थ-चंद्रमासहित हुआ शुकं छठे आठये बारहवं घरमें 'पहा हो तो रात्रि में अंधा रहनेवाला (रतीपीवाला) जन हो. जो यदि सूर्य शुक्रसे युक्त हुआ लमेश ६ । ८ । १२ घरम हो तो जन्मांध होवे. इसी प्रकारसे पिता, भाता, पुत्र, बी, माता इन स्थानोंके स्वामीजी जो सूर्य, चंद्र, शुक्र इनसे युक्त ६।८।१२ इन घरों में हो तो येमी अंधे बताने पण्डि- तजनोंने ऐसा विचार करना चाहिये ॥ ६ ॥ अथ तृतीयज्ञायफलम् । भ्रातृस्थानेशभौमौ व्ययरिपुनिधनस्थानों वन्धु- हीनः स्वक्षेत्रे सौम्यदृष्टे सहजभवनपे मानवःस्या- च तदान ॥ केन्द्रस्थे बन्धुसौख्यं शुभविहगयुते स्थादद_ नराणां पापैश्चदन्यथैतत्तदनु निमधिया ज्ञयमित्थं समस्तम् ॥७॥ अर्थ-भातृस्थानका पति और मंगल पारहवें, छठे, आ- खें घर पडं तो जन्मनेवाला जन बंधुसे हीन होये और जो यदि वह तीसरे घरका पति अपने घरमें पड़ा हो अथवा शु- ग्रहसे दृष्ट हो तो बंधुसे युजः होते. जो यदि तृतीय घरका पति केंद्रस्थानमें हो शुभग्रहोंसे युक्त होवे तो बंधु (भाई) का सुख बहुत होवे और पापग्रहोंसे युक्त होके केंद्रस्थान 11 ४। ७११० में हो तो बंधुका सुख नहीं हो ऐसा पंडितन- नॉने संपूर्ण हाल अपनी बुद्धिसे विचारके कहना ॥ ७॥ ।

भापाटीकासहितः। अथ चतुर्थभावफलम् । पातालेशः स्वराशो शुभखचरयुतो भाग्यनाथेन युक्तः सामन्तः स्यात्ततश्चेत्सुरपतिगुरुणावाहने शस्तनुस्थः ॥ संदृष्टो राजपूज्यस्तदनु च हिवकाधीश्वरो लाभसंस्थो यानं पश्यन्नराणां निवहमभिमतं वाहनानां प्रदत्ते ॥ ८॥ अर्थ-चौथे घरका पति अपनी राशिपर शुभग्रहसे और नक्म घरके स्वामीसे युक्त होके पडे तो राजा हो. फिर जो यदि चौथे बरवा पति लममें स्थित हो और बृहस्पतिसे पूर्ण दृष्टि करके दृष्ट हो तो राजपूज्य होवे. जो यदि यही चौथे घरका पति बृहस्पतिसे दृष्ट हुआ ग्यारहवें घरमें स्थित हो और चौथे घरको देखता हो तो मनुष्योंके वास्ते हस्ती घोडा आदि वाहनोंका बहुत पूरा सुख देवे ॥ ८॥ स्वक्षेत्रे तुर्यनाथस्तनुपतिसहितः स्यादकस्मा- हाप्तिः सौहार्दै वो सुदृद्भिस्तदितरगृहगश्चेद्गृहाल- भ्ययोगः॥ यावन्तः पापखेटा धनदशमगृहप्रान्त्य- पैश्चेत्रिकस्था युक्तास्तावत्प्रमाणाज्वलनक्शगताः क्लेशदाः स्युहा नुः ॥९॥ अर्थ-अथ गृहमाति आदि योग, चौथे घरका पति जो अपने क्षेत्र (४ घर) में लमपातसे युक्त होके बैठा हो तो विनाही यल घर ( मकान ) की प्राति होवे और मित्र हित- (१४) जातकालंकारः अ०२॥ कारक जनोंके संग प्रीति बढे जो यदि चौथे घरके विना अन्यही घरमें हो तो गृहमाप्तिका अभाव हो और जितने पाप ग्रह दूसरे, दशवें, बारहवें घरके स्वामी के साथ होके निक ६। ८ । १२ घरॉम हो उतनेही घर (मकान ) मनुष्य के अनिसे जल जाते हैं इसीवास्ते दुःखदायी होते हैं ॥ ९ ॥ यावन्तो वाहनस्था शुभविहगदृशां गोचरा नो भवेयुस्तावन्तो वा विरामाः परमगुणवतां वाह- नानां नृणां स्युः॥ क्रूराः पश्यन्ति यानं व्यय- निधनगताश्चेत्तदा तद्रदेव प्राज्ञैरादेश्यमेपां खलु शुभकरणं शान्तिकं वाहनानाम् ॥ १० ॥ अर्थ-जितने पापग्रह चौथे धरम स्थित होवें और शुभग्रहोंकरके दृष्टानी नहीं हो तो उतनेही परम उत्तम गुणवाले वाहन (हस्ती घोडा आदि ) नष्ट हो और जो यदि किसीके १२ । ८ इन घरोंमें पापग्रह बैठके फिर वे पापग्रह चौथे घरको देखते हो तो पूवाक्त फल अर्थात् वाहन नष्ट होवेंगे ऐसा बताना तहां पंडित जनोंने पाहनाकी शुमकारक शांति करना चाहिये ॥ १० ॥ अथ पंचमानावफलम् । विद्यास्थानाधिपो वा वधुकुमस्तिोरिकवर्न मानो विद्याहीनो नरः स्यादथ नयमनिजक्षेत्रके- न्द्रेषु तदान ॥ वालत्वं वृद्रता वा यदि गगनरादा आपाटीकासहितः। (१५) जन्मकाले तदा स्यात्प्रज्ञामान्यं नराणामथ यदि विहगः स्वर्भगो दोपहृत्स्यात् ॥ ११ ॥ अर्थ-पांचवें घरका पति अकेला अथवा बुध बृहस्स- तिसे युक्त होके त्रिक ६।८।१२ इन घरोंमें पडा हो तो वह नर विद्याहीन हो और जो वह पंचमेश ५।९ केंद्र १ । ४ । ७।३० इन घरोंमें हो तो विद्यावान् होवे और जन्मसमयमें बुद्धिकारक ग्रहोंकी बालसंज्ञा हो अथवा वृद्ध- संज्ञा हो तो मंदबुद्धि होवे. जो यदि वही बालवृद्धसी अपने क्षेत्रका होवे तो मंदबुद्धिका दोष दूर होता है ॥ ११ ॥ वाक्स्थानेशो गुरुर्वा व्ययरिपुविलयस्थानगोवा विहीनश्चैवं पित्रादिकानां पतय इह युता मूकता- स्याच ताभ्याम् । वागीशात्पञ्चमेशस्त्रिकभवन- गतः पुत्रधीङ्गनाथा रन्धे द्वेष्यान्तिमस्था यदि जनुपि नृणामात्मजानामभावः ।। १२॥ अर्थ-जो यदि पांचवें घरका पति अयया बृहसति बार- हवें, छदे, आठवें स्थानमें पड़ा हो तो जन्मनेवाला जन गूंगा हो इसी प्रकार पिता आदिकों (दशम भाव आदिकों ) के पति पंचमेश और बृहस्पतिसे युक्त होके ६ । । १२ घरमें हो तो पिता आदिकोंको गूंगा बताना. यहां आदिशब्दसे भाई पुत्र आदिका स्थान देसना. वहस्पतिकी राशिसे ६। ८।१२ घरमें पंचमेश होये और पांच गाम लमका पनि (१६) जानकालंकारः अ० २॥ जन्मलमकी राशिसे ६ । ८।१२ राशिपर होवे तो मनु- प्याके पुत्रका अनाव बताना ॥ १२ ॥ किंचित्कालं विलम्बः शुभखगसहितास्तेऽथकर्के सुतः चन्द्रे कन्याप्रजावान प्रमिततनयवांश्वाथ देवेन्द्रपूज्यात् ।। ऋरश्चेत्पञ्चमस्थः सुतभवनगतः स्यात्तदाऽपत्यहीन छायापुत्रस्वगेहाद्यदि भगव- ति सुते सूनुरेकस्तदानीम् ॥ १३ ॥ अर्थ-५।९। १ घरके पति शुभग्रहांसे पुक्त हो तो संतान उत्पन्न होने में कुछ कालकी देरी होवे. जो यदि कर्कराशिका चंद्रमा पांचवे घरमें हो तो कन्यासन्तान अथवा अल्प १ ही पुत्र होवे और बृहस्पतिसे पांचवें वरमें क्रूर ग्रह हो अथवा वह क्रूर ग्रह लग्नसे पांचवें घरमें हो तो संतान नहीं हो जो यदि अपनी राशिसे पांचवें घर अर्थात् २।३ को शनि होवे तो एकही पुत्र हो, पूर्वोक्त कर योग होनेसे और क्रूर दृष्टि होनेसे यह फल होते हैं ॥ १३ ॥ कुम्भे चेत्पञ्च पुत्रास्तदनु च मकरें नन्दनेऽप्या- त्मजाः स्युस्तिस्रो भौमासुतानां नितयमथ सुता- दायको रोहिणेयः ॥ इत्थं काव्यः शशांको जन- पिच गुरुणा केवलनेव पुत्राः पञ्च स्युःक्षेतुराताः कियवृपभवने कर्कटे नो विलम्बः ॥ १४ ॥ अर्थ-पांचवें घरमें कुंजका शनि पडा हो तो पांच पुन होते और मकरका होके हो तो तीन पुत्र हो, जो यदि भापाटीकासहितः। मकरका मंगल ५ वे घरमें हो तो तीन पुत्र हो. जो पांचवें घरमें बुध हो तो कन्या हो. ऐसे ५ ये घरमें शुक चंद्रमा हो तोगी पुत्री होये. जन्मसमय ५३ अरमें अक्षेलाही बृहस्पति हो तो ५ पुत्र होते हैं जो यदि ५ वे घरमें मेष वृप कर्क इन राशियोंके राहु केतु पडे हों तो संतान होनमें कुछ विलंब नहीं हो (इससे विपरीत सब बात हो तो विलंब जानना)॥१४॥ पापो वा वासवेज्यः सुखभवनगतः पञ्चमे वाऽष्ट- मे वा शीतांशुः सन्ततेः स्यात्वगुणमितसंमातु- ल्य एवं प्रबन्धः यावन्तः पापखेटास्तनयगृह- गताः सौम्यदृष्टयान दृष्टास्तावद्रप्रमाणोनियत- मिह भवेत्संततेवविलम्बः ॥ १९ ॥ अर्थ-पापग्रह अथवा बृहस्पति ४ घरमें हो अथवा ५। ८ घरमें चंद्रमा हो तो तीस वर्षतक संतान होनेका पबंध देरी रहे और जितने पाप ग्रह पांचवें घरमें बैठे हों शुभ अहाँसे दृष्ट नहीं हो तो उतनेही वर्षांतक निश्चय संतान होनेका विलंब कहना ॥ १५॥ तत्प्राप्तिधर्ममूला तदनु बुधकवी शंकरस्याभि- काचन्द्रश्चेत्तद्रदेव विदिवपतिगुरुमैत्रयंत्रोपधी- नाम् ॥ सिद्ध्या मंदारसूर्या यदि शिखितमसी तत्र वंशेशपूजा कार्यानायोक्तरीत्या बुधगुरुनव- पाः क्षिप्रमेवार सिद्धिः॥१६॥ . ।

(१८)
जातकालंकारः अ२॥
अर्थ-तिस संतानकी प्राप्ति हरिवंशश्रवण संतानगोपाल
मंत्र जप इत्यादिक धर्मसे होती है वहां ऐसा विशेष है कि
बुध शुक संतानका विलंब करते हों तो शिवजीका आधि-
येक (मंत्रपूर्वक ) करवाये. चंद्रमा विलंबकारक हो तोषी
यही विधि कराना, जो बृहस्पपि संतानका निरोधक हो नो
मंत्र यंत्र औषधी (लक्ष्मणादि) सेवन करानेकी सिद्धिसे संतान
हो. शनि, मंगल, सूर्य, राहु इनमें गो एक कोई प्रतिबंधक
होवे तो कुलदेवताका पूजन वेदोक्त रीतिसे करना. तहां बुध
बृहस्पति जो ९ घरके सी हो तो ( कुछ यनसे ) शीमही
सिद्धि होवे ॥ १६ ॥

नापाटीकासहितः । (१९) बुध हो तो हृदयपर, बृहस्पति हो तो नाजिके समीप ऋण चिह्न बताना ॥१७॥ नेत्रे पृष्ठे च शुको दिनकरतनयः स्यात्परे चाधरे चेत्केतुर्वा सैहिकेयस्तदनु तनुपतिभौमषिक्षेत्रसं- स्थः ।। आभ्यामालोकितः सम् भवति हि कति चित्स्थानगो वा तदानीं नेत्र रोगी नरः स्यात्प्रव- रमतियुत्तोरिकैज्ञेयमेवम् ॥ १८॥ अर्थ-शुक्र हो तो नेत्रपर, शनि हो तो पीटपर, राहु हो तो पैरके ऊपर, केतु हो तो होठपर व्रणका चिह्न बताना. अब नेत्रव्याधिक योगको कहते हैं कि लनका पति मंगल और चुपकी राशिपर स्थित हो इनसेही देखा जाता हो तो चाहे वह लमपति किसी स्थानमें पडा हो परंतु वह नर नेत्ररोगी है ऐसा दैवज्ञ जनोंने जानना ॥ १८ ॥ पप्ठेशे लग्नयाते भवति हि मनुजो चैम्हिन्ता धन- स्थे पुत्रात्तार्थोऽतिदुष्टः सहजभवनगे ग्रामदुः- साकरः स्यात् ॥ नाभिस्थाने च रोगी तनुनि धनपती शत्रुभावस्थितो ना नेत्रे वामेतरे स्या:- सुरकुलगुरुः सूर्यजस्त्वंघ्रिरोगी॥ १९॥ अर्थ-छठे घरका पति लममें पडा हो तो जमोवाला जन शत्रुको नष्ट करनेवाला हो और जो धास्थानमें पडा हो तो पुत्रकरके धन हरा जाये, वह नर अत्यन्त दुष्ट हो, नारे घरमें जो छठे स्थानका पति हो तो ग्रामको दुःस गाला -

(२०) जातकालंकारः अ०२।
और नाभिकी जगह रोगवाला होता है, लग्न और आठवें
घरका पति छठे घरमें हो तो वह नर बायें नेत्रमें रोगवाला
हो और ६ । ८३ घरमें शुक्र हो तो दहिने नेत्रमें रोग हो,
शनैश्चर होवे तो पीटपर वा चरणपर रोग बताना ॥ १९ ॥
दन्ते दन्तच्छदे वा कुमुदपतिरिपुः संस्थितः पष्ट-
भावे केतुर्वा लग्ननाथः कुजबुधभवने संस्थितः
कापि हटः ॥ स्वेन प्रत्यार्थिना वा भवति जनुपि
चेदासनाधै सरोगस्तो भूमीसूर्यपुत्रौ यदि रिपुगृ-
हुगौ तद्भवः स्याद्दो नुः ॥२०॥
अर्थ-जो यदि राहु केतु छठे घरमें हो तो दातपर अथवा
होठपर रोग बताना और मंगल नथा बुधकी राशिपर स्थित
हुआ लमेश अपने शत्रुकरके पूर्ण दृष्टिसे देखा हुआ हो तो
चाहे किसी घरमं भी होवे नोनी गुदाके समीपमें रोग होवे.जो
यदि मंगल शनि छठे घरमें हो तो यह रोग ऐसे बताना कि
मंगल हो तो रुधिरका विकार, शनि हो तो अन्यविकार
बतावे ॥ २० ॥
प्रालेयांशी रिपुस्थे खलखगसहिते मानवो रोगवान्
स्यात्रेनिप्पीडितश्चेत्तनुसदनगतः शीतरहिम-
स्तदानीम् ॥ क्रूरे केन्द्रालयस्थे यदि शुभक्ति-
गर्नेक्षिते रोगवान् स्यात्तस्मिन् काव्यालयस्थे
कुजगुरुकविभिनेशिते तद्रदेव ॥ २१ ॥

जापाटीकासहितः। (२१) अर्थ-जो यदि चन्द्रमा पापग्रहसे युक्त होके छठे घरमें बैठा होवे तो और शनि आदि क्रूर ग्रहॉकरके दृष्टि या योग- करके पीडित होके लममें चंद्रमा पड़ा तोनी रोगी हो. जो यदि क्रूर ग्रह केंद्रस्थानमें हो शुभ ग्रहोंकरके दृष्ट नहीं हो तो रोगी हो, वह क्रूर ग्रह शुक्रकी राशियर हो मंगल शुक बृहस्पति इनकरके देखा नहीं गया हो तो रोगी होते. या रोगकारक ग्रहके स्वभावके अनुसार कफ वात आदिकी बीमारी कहना ॥ २१ ॥ पुंलग्ने स्वीयतुङ्गे रिपुभवनपतो वीक्षिते सन्नभो- गैरङ्गे नूनं नराणामरिजनवशतः स्याद्गदो गूढ- रूपः ॥रिःफस्याने स्थिते चेदरिसदनपत्तो सिहि- कापुत्रयुक्ते किंवा सप्ताश्वयुक्ते परगृहवसतिर्नीच- वृत्तिर्नरः स्यात् ॥२२॥ अर्थ-छठे घरका पति पुस्प लमकी राशिपर हो स्वोचका हो पापयोंकरके पृष्ट हो तोमनुष्योंके शरीरनं शत्रु- भोंकरके किया हुआ रात रोग बताना. छठे. घरका पति राहुसे युक्त होवे अथवा सूर्यसे युक्त होये अथवा १२ । में स्थित होने तब यह जन पराये घरमें रहनेवाला नया नीचवृनिवाला होय ॥ २२ ॥ . अथ रिवाहयोगः। यावन्तो वा विहङ्गा मदनसदनगाश्चेनिजाधीश- दृष्टास्तावन्तो निर्विवादास्त्वय सुमतिमता शेय-

(२२) जातकालंकारः अ०२॥
मित्थं कुटुम्बे ॥ कार्यों होरागमज्ञेरधिकवलवतां
खेचराणां हि योगादादेइयं तत्र वीर्य रविविधुकु-
भुवामङ्गदिक्शैलसंख्यम् ॥ २३॥
अर्थ-जितने यह सातवें घरमें स्थित हो सप्तमेशकरके दृष्ट
हो उतनेही विवाह पुरुपके होने चाहिये. उत्तम बुद्धिवाले देव-
ज्ञने इसी प्रकार कुटुंबमें पिता भाई आदिकोकेभी विचारने.
जातकशास्त्रवत्ता पंडितजनांने अधिक बलवाले ग्रहोंके योगसेभी
विचार करना जैसे पड़बलमं सूर्य के छःरूप हैं, चंद्रमाके दश
मंगलके ७, अन्योंमें ६ हैं, इनमें यथाक्रमसे ये यह वली
होते हैं ऐसा विचार करना ॥ २३ ॥
केन्द्रस्था वा त्रिकोणे यदि खलु गृहिणीकारका-
ख्या नभोगाःकामाथेशी निजः परिणयनविधिः
स्यात्तदानी नुरेकः ॥ जायाधीशः कुटुम्बाधिप-
तिरपि युत्तश्चेत्रिके गहिताख्यर्यावद्भिः शुक्रयुक्तो
नियतमिह भवेत्तावत्तीनां विरामः ॥ २४ ॥
अर्थ-स्त्रीकारक (शुक्र, चंद्र, गुरु, बुध ) ग्रह केंद्र
स्थित हो अथवा १५ घरमं स्थित हों और सातवे दूसरे
घरका पति अपने घरोम होय तो एकही विवाह होना कहे और
सनम भावका पति अथवा दूसरे घरका पनि शुक्रसे युक्त होके
जितने कर यहांकरके दृष्ट हुआ त्रिक ६।८। १२ घरमें
पडा हो उतनीही वियोंकी मृत्यु होय ॥ २२ ॥

भापार्टीकासहितः। (२३)
अथ गर्मजावयोगः।
लग्रस्थे सप्तसप्तौ दिनमणितनये कामगे चार्कम-
न्दौ द्यूने चन्द्रे नभःस्थे नच यदि गुरुणालोकिते
नो प्रसूते ॥ द्वेष्येशे मित्रमन्दी द्विपि सितकिर-
णेऽस्ते बुधेनेक्षिते नो सूतेद्वेष्ये जलः यदि कुज-
रविजो गर्मिणी स्यान्न नारी ॥२५॥
अर्थ-सूर्य लग्नमें हो, शनि सात घरमें हो यह १ योग
और सूर्य शनि सातवें होवे, बृहस्पतिकी दृष्टिसे रहित हुआ
चंद्रमा दशवां होय यह दूसरा योग इन दोनों योगोंके होनेसे
तिस पुरुषकी स्त्री संतान नहीं जने और छठे घरका पति तथा
सूर्य शनि छठे घरमें हो बुधकरके दृष्ट होयें और चंद्रमा
सातवें घरमें होवे तो स्त्री संतान नहीं जनेगी और जो मंगल
शनि छठे घरमें हो अथवा चौये घरमें हो तो स्त्री गर्भवती नहीं
हो ऐसे ये चार वंध्यायोग हैं (पुरुपके ग्रहोंसे सब फल
मानना) ॥ २५ ॥
अथामभावयोगः ।
स्वस्थानस्थिता वा स्थिरभवनगता शुक्रबागी-
'शसौम्याः कृच्छ्राणां कर्मणां ना भवति हि निय-
तं कारकः स्तव्धभावः ॥ वाल्ये दुःखी नरः
स्यानिधनगृहपत्तो लाभयाते सुखी स्यात्पश्चात
पापेऽल्पमायुः शुभखगसहिते दीर्घमायुनरा-
णाम् ॥ २६ ॥

(२४) जातकालंकारः अ०२। अर्थ-शुक्र बृहसति बुध ये आठवें घरमें हो अथवा स्थिरराशिपर होवें तो निरंतर कष्ट (कठोर ) कर्म करनेवाला और कठिनचित्तवाला होवे और अष्टमभावका पति घरमें हो तो बाल्य अवस्थामै दुःखी रहे पीछे सुखी होवे और 6 घरका पति पापमह हो ११ घरमें बैठा हो तो अल्प आयु कहे, जो यदि वह शुज यहसे युक्त होके बैठा हो तो दीर्घ आयु बताना ॥ २६॥ कुर्यादायुगृहशः खलखगयुगरिप्रान्त्यसंस्थोऽल्प- मायुश्चेल्लानाधीशयुकोऽनिधनभवनपः स्वल्प- मायुः प्रदत्ते ॥ रन्ध्रस्थो वा चिरायुस्तदनु रवि- भवस्तत्र तहलयेशः केशस्थानस्थितश्चेजनुपि हि मनुजो वेरियुक् तस्करः स्यात्॥ २७ ॥ अर्थ-आठवे घरका पति करयो युक्त होके छठे और १२ घरमें हो तो अल्प आयु बताना, जो यदि ८ घरका पति लमेशकरके युन होफे ६ । १२ वें घरमें हो तो स्वल्प आयु करता है और आठवें घरका पति आठवें घरमेंही हो अथवा ८वं घरं शनि हो तो दघि आयु होये, जो यदि अष्टम घरका पनि धनस्थानमें जन्मसमयमें पड़ा हो तो पह मनुष्य चोर हो और शकरके युन रहे ॥ २७ ॥ आयुहाधिनायो निधनरिपुगतो द्दीनवीयों प्रसूती संग्रामे कौतिशेपं वनति बलयुतो तो , जापाटीकासहितः। (२५) सदा तज्जयाप्तिम् ॥शुक्रेणान्दोलिकायास्तनुपवि- धियुत्तो वाहनस्थाननाशो मृतौ दन्तावलेन्द्ररथ थो गुरुसहितः स्याजयो वाजिवाहः ॥ २८॥ अर्थ-जिसके जन्मसमय हीन बलवाले हुए लमेश और अष्टम घरका पति ६८ घरमें हो तो वह नर युद्धमें उलटा होके मृत्युको प्राप्त होता है वेही ८ । १ के पति बली होवे तो युद्धमें विजय पानेवाला हों, चौथे घरका पति शुक्रसे युक्त होवे तो पीनसमें बैठा हुआ विजय पावे और चौथे घरका पति लग्नेश और चंद्रमाकरके युक्त हो लममं स्थित होवे तो महाहस्तियांकरके विजय पावे अथवा चौथे घरका पति बृह- सतिसे युक्त होके लममें पडा हो तो घोडे और हस्तियोंकरके विजय पाये ॥ २८॥ अथ नवमभावयोगः । भाग्येशो मूर्तिवती सुरपतिगुरुणालोकितो भूपबन्यो लनस्थो वाहनेशो नवमपतिरुभी पश्यतश्चेत्स्वगेहम् ॥ सर्वासामास्पदं स्यान्मनुज इह तदा सम्पदां वाहनेन्द्रो रन्ध्रस्थानस्थितश्चे- जत्ति हि मनुजो भाग्यराहित्यमेवम् ॥ २९ ॥ अर्थ-नयंवं घरका स्यामी बृहस्पति घट होके लपमें पड़ा हो तो जन्मनेवाला जन राजाओंसे मान्य हॉ, नववे घरका पति लममें बैठा हो और चौथे घरका पति, तथा नवें घरका (२६) जातकालंकारः अ०२॥ पति, दोनों अपने २ घरको पूर्णदृष्टिकरके देखते हो तो वह मनुष्य संपूर्णसंपत्तियोंका आश्रय हो अर्थात् सर्वसंपत्तिमान हो और चौथे घरका पति आठवें घरमें बैठा होय तो वह मनुष्य भाग्यहीन होता है ॥ २९ ॥ हीनानां वाहनानां तदनु चपलताप्राप्तिरेवं नराणां ज्ञेया होरागमझेरथ नवमपतो लाभगे राजवन्धः। दीर्घायुर्धर्मशीलस्तदनुधनवपुर्वाहनेशः स्वगेहे धर्मशो लमवर्ती जनुपि यदि गजस्वामिसिंहास- नानाम् ॥ ३०॥ अर्थ-इस शोकमें कही हुई भाग्यहीनताका लक्षण यह हैं कि अवस्था बल आदिसे रहित हुए वाहनोंकी प्राप्ति हो फिर चपलता हो अथांत स्थिरसी नहीं रहे ऐसे होराशा- सके जाननेवालोंको बताना चाहिये और नयय घरका पति ११ घरमें पड़ा हो तो राजासे मान्य दीर्घ आयुवाला तथा धर्म स्वगायवाला होवे फिर जन्मसमयमें धन २ लम १ चतुर्थ ४ इन घरोके पति अपने घरों में स्थित होये तो और ८ घरका पति लममें पटा हो तो हस्ती राज्यनिहागन आदिको- की प्रामि होय ॥ ३० ॥ योगानां स्यादमीपां प्रचुरवल्युतो योऽधिपस्तद- शायां लब्धिश्चान्तर्दशायामथ गुरुभृगुजो वाहना- धीशयुक्तौ ॥ केन्द्रे याने त्रिकोणे त्वथ गुरुकावि- भापाटीकासहितः। (२७) 'युग्वाइनस्थानगो वा भाग्याधीशः स्वराशौ भव- ति नरपतिहिनव्यूहनाथः ।। ३१] अर्थ-इन कहे हुए तथा अमे वक्ष्यमाणयोगोंको करने- वाला जो ग्रह अधिक बलवान् हो विसकी दशा अंतर्दशामें वह फल होगा ऐसा जानना और वृहस्पति शुक्र चौथे घरके स्वामीसे युक्त होके केन्द्रमै अथवा ११ में होवे अथवा ५ घरमें होवे तो अथवा बृहसति शुक्रसंयुक्त हुआ ९ घरका पति चौथे घरमें वा अपने घरमें हो तो वाहनोंके समूहका पति राजा हो ॥ ३१ ॥ कर्मस्थे क्षेत्रचिन्ता त्रिकभवनगते सौख्यचिंता महीजे वागीशे यानभूपावसनहयभया चामरच्छ- चिन्ता ॥ प्रालेयांशौ सिते स्यादथ मदनगते वाक्पतौ पुत्रचिन्ता संतानस्थानयाते हिमकरत- नये बुद्धिजाथ त्रिकोणे ॥ ३२॥ मार्तण्डे तात- बन्धोरथ सुतनवमधूनगे दानवेज्ये यात्राचिन्ना नराणामथ नवमसुते पुत्रजा वासवेज्ये ॥ कमांधी- झो विवी- यदि जनुपि तदा सर्वकास्पदं नो गेहे स्वीये यदाप्तौ शुभविगहयुतो मानको मान- शीलः॥३३॥ अर्थ-दश घरमें मंगल हो तो खेतकी चिंता रहे त्रिक (६।८।१२) घरमें मंगल हो तो सब बातोंके सुखकी (२८) जातकालंकारः अ.२॥ चिंता बनी रहे और ६।८।१२ । घरमें बृहस्पति हो तो वाहन, आभूषण, वस्त्र, घोडा इनकी चिंता बनी रो चंद्रमा अथवा शुक्र ६।८।१२ घरमें हो तो चंवर छत्र इनकी प्राप्ति रक्षाकी चिंता बनी रहे और जो बृहस्पति सातवें घरमें हो तो पुत्रकी चिंता बनी रहे, ५ घरमं बुध हो तो बु दिकी चिंता बनी रहे और ९ । ५ घरमें सूर्य हो तो पिता भाईकी चिंता बनी रहे और ५।९। ७ इन घरोंमें शुक्र हो नो यात्राकी चिंता बनी रहे, जो यदि नवरे पांच वरमें (अ. पनी राशिका होके ) बृहस्पति पडा हो तो मनुष्यों के पुत्रकी चिंता रहे, जो यदि जन्मसमयमं दशव घरका पति निर्वल होय तो सब कामांको सिद्ध करनेवाला न होये अर्थात् जन्मकालमें १० घरका पति वली हो तो यह सब कामाको सिद्ध करने वालाही हो, यदि १० घरका पनि शुशमे युक्त होके १० घ. में पड़े तो वह मनुष्य मानवाला हो ॥ ३२ ॥ ३३ ॥ साभे केन्द्र त्रिकोणे तनुनिधनभवस्थानयाः सं- स्थितादीपायुः पापखेटाः पणफरदिवुकवि- स्थिता मध्यमायुः ॥ हीनायुः प्रोक्तमते यदि ज- नुपि नृणां स्युस्तदापाकिमस्था रन्ध्रस्थानस्थि- तानां तनुपनिगगनस्सामिपूर्यात्मनानाम्॥३४॥ यो हीनस्तद्शायुस्त्वच निनभवने धमकमात्म- जेशाश्चेत्स्युस्तेपदिशायां बहुटबलयशालघुद्धि- - भापाटीकासहितः। (२९) नराणाम् ॥ हानिः स्यादन्यथारो तनुनिधनपती भानुपुत्रेण युक्तौ स्यातां स्वभानुना चेत्तदनु च शिखिना तद्दशायां व्रणाः स्युः ॥ ३५ ॥ अर्थ--मनुष्योंके जन्मसमयमें लग्न अष्टम दशम इन घरों- के पति ११ और केंद्र में और ९॥ ५ घरमें हो तो वीर्ष- आयुवाला हो और जो पापग्रह पणफर २।८।११ इन घरोंमें या ३ । ४ घरमें हो तो मध्यम आयु होवे और ये पूर्वोक्त ग्रह ३ । ६.९ । १२ इन घरोंमें हो तो अल्पआयु होय तहां ३२ वर्षसे नीचे अल्प आयु, पीछे मध्यमआयु, ६४ वर्षसे अधिक दीर्घ आयु होती है, आठवें धरम स्थित लगेश दशम घरका पति शनि इनमेंसे जो ग्रह हीनबलवाला हो तिसकी दशापर्यंत आयु होवे आरै ९।३०१५ इन घरोंके पति अपने घरों में अर्थात् इन्ही घरों में हो तो इनमें जो भधिक बलवाला हो उसकी दशामें मनुष्योंकी धर्ममें बुद्धि होती है अन्यथा कहिये अन्य घरमि परे हो तो अधिक बलयालेकी दशामें धर्मकी हानि हो, लम और ८ घरका पति, ये दोनों ग्रह शनि राहु केतु इनमेंसे एक किसीसे युक्त होवे और छठे घरमें बैठे हों तो इन १८ घरके पति ग्रहमें जो अधिकबलवान हो उसीकी दशामें व्रण (घाव आदि) होय ॥ ३४ ॥ ३५॥ यानेशस्तन संस्थो यदि भवति तदा यानहेतु- मृतिः स्याचोराच्छन्त्रण चिन्ता नवमभवनतो (३०) जातकालंकारः अ०२। भाग्यजाता विधेया ॥ व्योनो भूपालभूपावसन- इयमहत्काणां प्राप्तिचिन्तालाभस्थानेऽखिलानां व्ययनिधनगृहात्कल्मपाणां विधेया ॥ ३६ ॥ अर्थ-जो यदि चौथे घरका पति छठे घरमें हो तो सवारी (वाहन ) हेतुसे चोरसे वा शत्रुसे मृत्यु हो (शनिके योगसे वाहनसे, राहुके योगसे चोरसे, केतुके योगसे शस्त्रकरके मृत्यु वतानी) और नवम घरमं भाग्यकी चिंता ( शुजाशुन फल) विचारना और दशव घरसे राज्यसंबंधका काम, आभूषण, वस्त्र, घोडा इत्यादिक बडे कामोंका फल विचारना, ग्यारहवें वरसे संपूर्ण लामों (प्राप्तियों ) की चिंता विचारनी, बारहो घरमें मल्टिन कामोंकी चिंता विचारनी, शुभाशुभ ग्रहोंकी दृष्टि और इन स्थानों के स्वामियों के विचारसे शुमाशुभ फल कहे. टीकामें विस्तारपूकि अन्य ग्रंथांका मत लिखा है ॥ ३६ ॥ समस्थे रिस्पताथे भवति सुवचनो मानको रूप- वान्वा स्वों कार्पण्यबुद्धिहुतरपशुमान् ग्राम- युक्तः सदा स्यात् ॥ में तीर्थावलोकी बहुलवृ. पनिकायुके च पापी मिथ्याशेशान्तकृत्स्या नियतानेदमिति ज्ञेयमेव सुधीभिः ॥ ३७॥ अर्धः-याहये घरका पति रममें बैठा हो तो वह मनुष्य सुन्दरवागा तथा सुन्दरमायान हो और अपने घरमें हो तो काणांशारा होय अनेक पगुभावाला तया महाशामका

भाषाटीकासहितः।
अधिकारी रहे और ८ घरमें हो तो तीर्थयात्रावान् तथा
बहुतधर्ममें अत्यंत बुद्धि रक्खे और जो पापग्रहसे युक्त होके
पडा हो तो पापी हो संचितव्यका नाश करे इस प्रकारके
योगसे यह फल पंडितजनोंने नियमकरके जानना ॥ ३७ ॥
हृद्यैः पधैगुम्फिते सुरितोपेऽलंकाराख्ये जातके
मन्जुलेऽस्मिन् ॥ भावाध्यायः श्रीगणेशेन वय-
वृत्तेर्युक्तः शैलरामः प्रणीतः ।। ३८ ॥
इति श्रीजातकालंकारे भावफला-
ध्यायो द्वितीयः ॥२॥
अर्थ-डिनजनाको संतुष्ट करनेवाले तथा मनोहरछंदों
करके रचे हुए अतिसुंदर इस जातकालंकारविपे श्रीगणेशक-
विने उत्तम सैंतीस (३७) श्लोकोंकरके भावाध्याय रचके
समाप्त किया है ॥ ३८॥
इति श्रीजातकालंकारनापाटकियां
द्वितीयोऽध्यायः ॥ २॥
अथ योगाध्यायः।
ग्रहाधीना योगाः सरतामेगना जनित्रता ततो
योगाधीनं फलमिति पुरागैः समुक्तिम् । अतो
वक्ष्ये योगान् सकलगणकारन्दननकान् शुकार
स्यादुद्भूतं मतमहविलोक्येह रुचिरम् ॥ १ ॥

(३२) मातकालंकार: अ०३। अर्थ-प्राचीन कापियोंकरके कहा हुआ फल योगोंके अधीन कहा है और वे योग ग्रहोंके अधीन है तथा जन्मनेपालॉके शुभाशुभ फलको कहनेवाले हैं इसलिये श्रीशुकदेव के मुखसे निकले हुए सुंदर मतको अच्छी तरह देखके संपूर्ण ज्योति- पियोंके आनंददायक योगोंको कहूंगा ॥ १ ॥ ऋक्षेशः क्षीणवीर्यः सुतनवमगतो मानवो मन्यु- मान्चे राशीशे साङ्गनाथे रिपुनिधनगृहे प्रान्त्यगे दुर्बलः स्यात् ।। धर्मद्वेप्याप्टनाथाः खलखचर- युताः स्थानके वापि संस्थास्तेष्टाः स्यात्तदानी परपुरुपस्ता सुन्दरी तस्य पुंसः ॥२॥ अर्थ-जन्मराशिका पति क्षीण पन्नाला हो ५ । ८ स्थानमें पडा हो तो जन्मनेवाला नर कोपी होय और जन्मराशिका पति रमपति संग होके ६ । ९ । । १२ इन घरों में बैठा हो तो यह नर दुर्बल होये और ९ ।६। ८ इन घरोंके पति क्रूरमहाँसे युन हो अथवा करमहाकी रटिसे युक्त होके किसी स्थानमें पटे हो तो उसकी मी जारि- मी ( व्यभिचारिणी) होये ॥२॥ मातृस्याने स्थितो चेत्कुविधुनहिलो पटरन्प्राषि- नायो स्मातां यस्य प्रसूतो भनि खलु नास्व- न्य ज्ञानस्लदानीम् !। कापि स्याने स्थिती स्तः भापाटीकासहितः। कलुषसगयुतौ भाग्यरन्ध्राधिनायो चेदेवं राहुणा • वा तदनु च शिखिना संयुतावन्यजातः॥ ३॥ अर्थ-जिसके जन्मसमय छठे आठवें घरके पति मंगल और चंद्रमासे युक्त होके चौथे घरमें स्थित हो तो वह नर अन्यपुरुष (जीरपुरुष)से उत्पन्न हुआ जानना और ८१६ घरके पति पापग्रहोंकरके युक्त तथा राहुकेतुसे युक्त होके किसी स्थानमें स्थित हो तोनी वह नर पितासे अन्य युरुषसे उत्पन्न हुआ जानना ॥ ३ ॥ युक्तो मन्देन शूद्रादथ भवति विदा वैश्यतो भा- स्करण क्षत्राजातः पितेन त्रिदशपगुरुणा भूमिदे- वात्प्रसुतः ॥ दैत्येशेज्यौ सपापो मदनरिसुधन- स्थानगो चेत्परस्त्रीगामी व्योमारिपो स्तो गगन- भवनगौ तत्पिताऽन्यारतः स्यात् ॥ ४ ॥ अर्थ-वह ८६ घरके पति शनिकरके युक्त हो तो शूदकरके उत्सन्न भया है, बुधसे युक्त हो तो वैश्यसे उत्पन्न जया सूर्यसे युक्त हो तो क्षत्रियकरके उत्पन्न अया और शुक्रकरके युक्त हो तथा बृहस्पतिसे युक्त हो तो बामणसे उत्पन्न भया है। इन शुजयहाँका योग पापग्रहोंके साथ होनेसे अथया ये नीचके होवे तव जानना और शुक्र, बृहस्पति पापग्रहोंकरके युक्त होके ७६२ इन घरोंमें पडें तो जन्मने- वाला जन परस्त्रीगामी (जार) होवे दश और छठे घरके १ जन मुले माग्यवाधिनायो इति पाठः पर्तय जातकालंकारः अ०३१ पति १० घरमें स्थित हो तो उसका पिता अन्यखीके संग रमण करनेवाला जानना ॥४॥ मूर्तीशः पापयुक्तो धनसदनगतश्चेत्तदा सजनस्त्री- संयुक्तस्तत्पिता स्याइलविहगयुताः कामशस्व- नाथाः ॥ कोशस्थास्तद्दे फलमिति विविध भ्रातृपन्योश्च पित्रोः स्थानेशा क्वापि भावे तनु- पतिसहिताश्चेत्पुमानन्यजातः॥५॥ अर्थ-लमका पति पापमहसे युक्त होके २ घरमें स्थित हो तो उसका पिता उत्तमजनकी स्त्रीके संग रमण करता और ७ १६।२ इन घरोंके पति पापग्रहोंसे युक्त होके दूसरे घर स्थित होवे तोगी यह फल जानना इस प्रकारसे अनेक प्रकारके (दुराचारफल ) जानने और ३१७।४ । १० इन घरोंके पति लमपतिके संग होके किसी घरमें पडे हो तो वह जन अन्य पुरुषसे उत्पन्न हुआ जानना ॥ ५॥ लयाधीशेन्दुपुत्रो शितितनयनिशानायको वापि संस्थौ युक्तो स्वर्भानुना वा भवति हि मनुजः केतुना श्वेतकुटी ॥ आदित्यो भोमयुक्तस्तदनु शनियुतो रक्तकृष्णाख्यकुष्टी साका लग्नाधिनाथो व्यपरिपुनिधनस्थानगत्तापगण्डः ॥६॥ अर्थ-टमका पति और बुध अथवा मंगल, चंद्रमा, राहु करके अथवा केतुकरके युक्त होके किसी स्थानमें पडे हाँ वो १भत्र मूडे सविहायुता इत पाट. पयः।

नापाटीकासहितः। जन्मनेवाला नर श्वेतकुटी होरे और मंगलशनिकरके युक्त सूय कही स्थित हो तो रक्कुटी वा कृष्णवर्णका कुठवाला होय और सूर्यसहित हुआ लमका पति १२ । ६ । ८ चे घरमें स्थित होवे तो ताप और गंडमाला रोगसे युक्त होवे ॥ ६ ॥ ज्ञेयश्चन्द्रेण गण्डो जलजइह युतो ग्रन्थिशस्त्रवणः स्याद्भूमापुत्रेण पित्तं हिमकरतनयेनाथ जीवन रोगः आमोद्भूतस्ततश्चेदृगुतनययुतो नुः क्षया- ख्यो गदस्याचोरोद्धृतोऽन्त्यजाद्वा यमशिखितम- सामेकयुक् तन्वधीशः ॥७॥ अर्थ-चंद्रसे युक्त हुआ लमपति त्रिक (६। ८1१२) घरमें स्थित हो तो जलसे उत्पन्न हुआ गंडमालारोग होते, मङ्गलसहित लमेश ६ । ८1१२ घरमें स्थित हो तो गाय, शन आदिकका घाव होवे, बुधसे युक्त हुआ लग्नेश ६।८। १२ में हो तो पितरोग हो, वृहस्पतिसे युक्त होके स्थित हो तो आमरोग होय, शुक्रकरके युक्त हो तो मनुष्य के क्षयी रोग कहना और शनि, राहु, केतु इनमेंसे एक किसीसे युक्त होके लग्नेश ६।८।१२ घरमें पड़े तो चोरसे अथवा नीचना- निसे उत्तन हुआ रोग जानना ॥ ८ ॥ चन्द्रो मेपे वृषे वा कुनशनिसहितः श्वेतकुष्टी सगेगो दैत्येज्यारेन्दुमन्दास्तिमिभवनगताः कर्क- टालिस्थिता वा ॥ अङ्गे सौख्येन हीनः परमक- लुपद्धतकुटी नरः स्यादागीशो भार्गवो वा (३६) जातकालंकारः अ०३॥ यदि रिपुगृहपो मूर्तिगः कूरखेटः॥८॥ दृष्टश्चे- द्वक्रशोफी त्वथ खलसहिता मीनकालिभावा लूताकारश्चिरं स्यात्परमगदकरः कुष्ट एवं नरा- णाम॥म्फिस्थानस्थितश्चेद्विबुधपतिगुरुगुप्तरोगी नितान्तं भूमीमार्तण्डपुत्रो व्ययभवनगतो शत्रु! वा व्रणी स्यात् ॥९॥ अर्थ-मंगल शनिमे युक्त वा वृप चंद्रमा मेप राशिपर स्थित हो तो वह श्वेतकुटी रोगी होय और शुक्र, मंगल, शनि ये मीनराशिके अथवा कर्कराशिपर वा बृश्चिकराशिपर स्थित हो तो उसको शरीरका सुख नहीं होवे, महापातकी और रजकुष्ठी होते. जो यदि बृहस्पति अथया शुक्र या छठे घरका पति क्रूर यहाँकरके दृष्ट हो और टममें स्थित होय तो मुखपर सोजा (रसोली आदि) होये और मीन, कर्क, वृश्चिक इन राशियोंवाले भाव (कोईजी घर ) ऋर होंसे संयुक्त होवे तो लूताकार ( मकडीके जालासदृश ) अत्यंत कुष्टरोग होवे, बृह- सति वारहवें स्थानमें स्थित हो तो गुदाका रोगवाला अथवा गुतरोग जो कि वैद्यकी समझमें न आये ऐसा रोग निरंतर रहे, मंगल सूर्य १२ । ६ घरमें हो तो व्रण (धार) स्फोटक- विहले शुरू हो ॥ ८॥१॥ मेपे मीने कुलीरे तद्नु च मकरे वृश्चिके मन्द्र- चन्द्रो स्यातां करान्वितो चेन्नवपभवनगो मानवः 4 १ जापाटीकासहितः। (३७) स्याच सत्तः॥ ल्यस्थः पश्यतीन्, दिनमाण- तन्यू भूमिजो छूनदृष्ट्या बुद्ध्या हीनो नरः स्यादिनविधुविवरे भूमिजश्वेत्तथे ॥ १० ॥ अर्थ-कूरग्रहसे युक्त हुए शनि, चंद्रमा मेप, मीन वृश्चिक कर इन राशियोंपर स्थित हों और नक्वें घरमें पड़े हो व जन्मनेवाला जन लंगडा लूला होये और लग्नमें स्थित हुए चंद्रमाको अथवा शनिको सतम दृष्टिकरके मंगल देखता हो तो वह नर बुद्धिहीन हो और सूर्य चंद्रमाके १० में मंगल पडा हो तो भी बुद्धिहीन बताना ॥ १० ॥ पालेयांशो तनुस्थे गगनसदनगे साधिकारेऽकसू- नौ दृऐऽस्मिन्कामदृष्टया हिमकिरणभुवा बुद्धि- युङ मानवः स्यात् ॥ पृथ्वी सूनुं मृगाई तनुनि- लयगतं पूर्णदृष्टयेन्दुसूनुः पश्येचेद्धिहीनस्त्वय शशितनुपौ भूभुवा पीडितो वा ।। ११.॥ अर्थ-चंद्रमा लममें स्थित हो और साधिकार अर्थात् अपना घर, होरा, देकाण, नवांशक आदि आधिपत्यस- हित हुआ शनि दशवे घरमें होवे और पूर्णदृष्टिकरके बुधसे हट होवे तो वह मनुष्य बुद्धिमान् होवे, जो यदि लग्नमें स्थित हुए मंगलको और चन्द्रमाको पूर्ण दृष्टिकरके चुध देखता हो तो वह नर वृद्धिसे हीन हो अथवा चन्द्रमा और समका स्वामी ये दोनों मंगलसे पूर्णदृष्टि करके पीडित हो तो बुद्धिहीन होवे ॥ १३ ॥ १सन मूले स्वस्थ इति पास कनमः।

(३८)। जानकालंकारः अ०३। लग्नस्थे रोहिणेये तदनु रविशनी क्रूरदृष्टोरिपुस्था- वेकः चेकभागे भवति गतमतिर्दृष्टिहीनो शुभा- नाम् ॥ तिग्मांशो वैरिनाथे खलविहगयुते तुयंगे सूर्यसूनौ हृद्रोगी वापतौ वा भवति हदि नरः कृष्णपित्ती सकम्पः ॥ १२॥ अर्थ-बुध लग्नमें स्थित होवे और पापग्रहोंसे दृष्ट तथा शुभ ग्रहोंकी दृष्टि से रहित हुए सूर्य, शनि एक राशिपर स्थित होवें अथवा एक नवांशकपर स्थित हों और संग हुराही छठे घरमें पडे होवें तो यह नर बुद्धिहीन होवे.छठे चरका पति सूर्य गापयहमे युक्त होके चौथे घरमें बैठा होय तो हृदयमें रोगवाला होवे. शनि अथवा वृहस्पति छठे घरके पति हों और पापग्रहोंसे युक्त होके चौथे घरमें बैठे होय तो हृदयमें कृष्ण- पित्त रोगवाला हो अथवा दुष्टजनों करके पीडित हुआ हृदयमें कंपरागवाला होता है ॥ १२॥ दुष्टेवा पीडितः सन्नथ कुजरविजो वाक्पतिवन्धुसं- स्थो हृद्रोगः स्यान्नराणां व्रण इह नियतं क्लेश- कारी शरीरे । पातालस्यो महीजस्तनपनिल- यगाः सूर्यविरसेंहिकेया रन्ध्रस्थो भानुपुत्रो यदि जनुपि तदा स्यानरो दुःखभागी ॥ १३ ॥ अर्थ-परन्तु जो यदि मंगल, शनि, बृहत्सनि ये चौथे वरमें स्थित हो तो मनुप्पोंके इम योग होनमें हृदयके भाषाटीकासहितः। रोमके हेतुसे शरीरमें क्लेशकारी वण (घाव ) हो जाता मंगल सातवें स्थित हो और सूर्य, अध, राहु ये पांचवें घरमें स्थित हों, शनि आठवें घरमें हो तो जन्मनेवाला नर दुःख भोगता है ॥ १३॥ लग्नं पश्येन्निजः यदि धरणिसुतः संस्थितः का- तरः स्याच्छायासूनुर्नभःस्थो यदि निशि जननं तदवापि वाच्यम् ॥ मूर्ती भूमीतनूजे स्वजनक- लहकृत् धूनगे स्वाधिकारादीने भौमे पुष्मा परमयुधि रतस्तीक्ष्णभावश्च नूनम् ॥ १४ ॥ अर्थ-अपने क्षेत्रमें बैठा हुआ मंगल जो यदि लमको देखता हो तो जन्मनेवाला नर डरपोक ( भीरु ) होता है यदि शनि दशवें वरमें हो और रात्रि में जन्म नया हो तोनी वह नर डरपोक होता है. लममें मंगल होय तो मित्रसज- नोंके साथ कलह करनेवाला हो और अपना घर, होरा, द्रेष्काण, नवांश आदिसे रहित होके सातवें घमें बैठा होय नौ बढशरीरवाला, युद्धमें अत्यंत प्रीति रखनेवाला और तेन- स्वभाववाला निश्चयकरके होता है ॥ ११ ॥ पश्येता कामदृष्टया धरणिविधुसुतो चेन्मियः स्यात्तदानीमुच्चाकारोऽथ चन्द्रे शनिरविमहिना श्रेत्प्रपश्यन्ति शीतः ॥ क्षीणे पालेयभानो घर- णिजसहिते पापभूमी सरः स्यान्मृतिस्थो धून- जातकालंकारः अ०३॥ ट्या हिमकरतनयो वासवेज्यं प्रपश्येत् ।।१५।। हास्यासक्तः सभौमे हिमकरतनये स्याच्छुभो कुजज्ञौ मन्द वाकदृष्टौ नरपतिविदुपां रञ्जने कोविदः स्यात् ॥ पश्येत्काव्यं सितांशुर्व्ययवि- लयरिपुस्थानगो विस्मयालुः क्षिप्रं वास्फूर्तिमान स्यात् कुजबुधशशिनो वीर्यवत्खेटदृष्टाः ॥ १६॥ अर्थ-मंगल, बुध ये आपसमें सातवें भवनकी दृष्टिकरके परस्पर देखते हो तो जन्मनेवाला जन उच्च ( ऊंचे) शरीर- वाला होता है और शनि, सूर्य, मंगल पूर्णदृष्टिकरके चन्द्र- माको देखते हो तो जन्मनेवाला जन शीतल हो अर्थात् मूर्स होता है. यदि क्षीण चन्द्रमा मंगलसहित होके पडा हो तो पाप करनेवाला और तेजस्वजावाला होय. जो यदि लग्नमें स्थित हुआ बुध सातवें घरमें स्थित हुए बृहस्पतिको देखता हो तो जन्मनेवाला जन हास्य (ठहा) करनेमें आसक्त रहे. जो यदि मंगलसहित हुआ बुध शुभग्रहकी राशिपर स्थित हो अथवा मंगल, बुध ये दोनों शनिको राशिपर स्थित हो और सूर्यकरके देखे गये हो तो राजाओंके और पंडितोंको अमन करनेमें चतुर (निपुण ) होता है और ६ । ८1१२ इन घरोमस्थिर हुआ चंद्रमा शुक्रको देखता होय तो विस्मय ( आश्चर्य ) युक्त रहनेवाला होता है. जो यदि मंगल, बुध, चंद्रमा ये बलिप्रग्रहोंकरके देखे गये हों तो जन्मनेवाला जन भाषारीकासहितः। (४१) वचन बोलनेकी स्फूर्ति (शीघ्रता ) वाला हो ॥१५॥१६॥ शुक्रज्ञौ धूनयातौ गगनविलयगौ मानवः पुंश्चलः स्थात् कामाज्ञामन्दिरस्थौ कविधरणिसुतौ तद्ध- दाज्ञाम्बुयातौ । कान्यारौ तदिन्दोनभसि रवि- सुतादास्फुजिन्नारयायी तद्वत्कामास्पदस्था बुधसि- तशनयः स्वांगे भार्गवे हि ॥१७॥ अर्थ-शुक्र, बुध ये ७।८।१० इन घरों में बैठे हों तो वह नर व्यभिचारी (जार) होता है मंगल सातवें दशवें वरमें होवे अथवा ४ । १० इन घरों में हो तो व्यभिचारी (जार) पुरुष होता है. जो यदि चंद्रमासे दशवें शुक्र होय. शनिसे चौथे घरमें शुक्र हो तो जन्मनेवाला जन जार (परस्त्री गामी) हो. बुध, शुक्र, शनि ये सातवें दशमें घरमें स्थित हाँ और शुक्र, अपनी राशिपर स्थित हो तोजी तद्वद अर्थात् पर स्त्रीगामी (जार ) होता है ॥ १७ ॥ पालेयांशासितादा दिनमणितनयस्तत्पुरोभाग- वर्ती मूर्ती चेञ्चन्द्रशुको यदि तरणिसुतं पश्यत- आयशाः स्यात् ।। शेफच्छेदो नराणामथ तपन- सुते भूमिकेन्द्रेऽर्कयुक्त दृष्टे काव्योडुपाभ्यां यदि दिवसपतेश्चोपरागोऽत्र तद्वत् ॥ १८॥ अर्य-चन्द्रमासे अथया शुक्रसे अगली राशिपर (अगले जावमें) शनि स्थित हो और चंद्रमा, शुक ये दोनों लपमें स्थित होके शनिको देखते हों तो जन्मनेवाला नर अपयश- (४२) जातकालंकारः अ०३ वाला (कीर्तिरहित ) होता है. जो यदि शनि लममें स्थित हो और शुक्र चंद्रमाकरके दृष्ट होवे तथा सूर्यका ग्रहण होता हो तो जन्मनेवाला जन लिंगच्छेदयुक्त ( सुजाक आदि रोग, वाला) होता है और तदत कहिये पूर्वोक्तकी तरह अर्थाद अपयशवालाभी होता है ॥ १८ ॥ याते वक्रयही जनुपि भृगुसुते मानवस्तोपदायी सीमन्तिन्या रतःस्यान्न खलु मदनगं भार्गवं लन- नाथः ॥ पश्येत्स्वीयालयस्थो यदि रहसि तदा कामिनातोपदाता न स्यादेवं हिमांशुर्दिनकरसुत- युक भौमतः खेसुखे वा ॥ १९॥ अर्थ-जो यदि शुक्र क्रूरग्रहकी राशिपर स्थित होवे तो- जन्मनेवाला जन स्त्रीको संभोग ( रमण ) के हेतुसे सुखदायी नहीं होता है और लममें बैठा हुआ लमका पति ( पूर्णदृष्टि- करके ) घरमें स्थित हुए शुक्रको देखता हो तो संभोगसमयमें सीको सुखदाई न हो ऐसा नहीं अर्थात् रमणसमयमें सुसदाई होता है. जो यदि शनिसे युक्र हुआ चंद्रमा मंगलसे चौथे अथवा दश घरमें बैठा होय तो ऐसेही उक्त प्रकारसे स्त्रीको सुख देनेवाला होता है ॥ १९ ॥ क्षोणीपुत्रेण युक्तः प्रथमसुरगुरुलंग्नतः पष्टपोऽय कामाधिक्यं नराणां जनयति नियतं पापदृष्टो विशेषात्।। काव्ये स्वीयालयस्ये तदनु मिथुनगे जापाटीकासहितः । । (४३) कामवान्मानवः स्यान्मूर्ती सप्ताश्वसुनो धनुपि च वृषभे चेत्पुमानल्पकामः ॥२०॥ अर्थ-मंगलसे युक्त हुआ शुक्र लगते छठे घरका पति हो तो मनुष्योंके कामदेवकी प्रबलता करता है. जो यदि वह शुक्र पापयहसे देखा गया हो तो विशेषकरके निरंतर कामदेवकी प्रबलता करता है. जो यदि शुक्र अपनी राशिपर स्थित हो अथवा मिथुन राशिपर स्थित हो तो मनुष्य कामदेवसे युक्त होता है, जो यदि लंगमें शनि हो धनराशिका अथवा मकररा- शिका होवे तो मनुष्य स्वल्प काम देनेवाला होता है ॥२०॥ मन्दे नकेऽल्पभापी त्वथ रिपुगृहपे वा सुधांशा- वहश्ये चेदधैं संस्थिते ऽङ्को भवति जनिमतां ने- त्रयोः कूरयुक्ते ॥ पश्येत्क्षीणन चन्द्रं यदि भृगु- तनयः सूर्यजः पश्यतीन्दुं स्वः चन्द्रे नभःस्थ- यदि मदनगतीक्ष्यते पापखेदैः ।। २१ ॥ अर्थ-मकरराशिका शनि होवे तो अल्प बोलनेवाला हो- ता है. जो यदि छठे घरका पति अथवा चंद्रमा क्रूरग्रहसे युक्त होके ( अदृश्याई ) सप्तमभावके जोग्यांशसे लेके ८१९। १०।११ | १२ | लमका भुक्तांश इतनी जगहमें कहीं हो तो जन्मनेवालेके नेत्रों में कोई चिह्न हो. यदि क्षीणचंद्रमाको शुक्र नहीं देखता हो तब शनि देखता हो अथवा कर्कराशिपर (४४) जातकालंकारः अ० ३। चंद्रमा स्थित हो तब दश अथवा ७ घरमें स्थित हुए प पग्रहोंकरके वह चंद्रमा देखा जाता हो तो ॥ २१ ॥ स्यानूनं चाल्पनेत्रस्तदनु तनुगतं भूमिजं वा क्ष- पेशं पश्येद्वाचस्पतिश्चेदसुरकुलगुरुः काण मानवः स्यात् ॥ विच्छायातिग्मभानोः क्षिति भुवि च पुरोभागगे दृङ्नराणां सौम्ये चिह्न दृशि स्यादथ वपुपि लये भागवे क्रूरदृष्टे ॥ २२ ॥ अर्थ-वह नर छोटे नेत्रोंवाला होता है. नो यदि इस यो- गके पीछे लममें स्थित हुए मंगलको अथवा चंद्रमाको बृहस्पति अथवा शुक्र देखता हो तो यह नर काणा होता है. जो यदि सूर्यसे अगली राशिपर पान हुआ मंगल हो तो मनुष्योंकी दृष्टि कांतिरहित होती है ,और सूर्यसे अगली राशिपर बुध होवे तो नेत्र चिह्न होय. जो यदि लग्नमें आठ घरमें -शुक हो पापग्रहसे देखा जाता हो तो ॥ २२ ॥ नेत्रे पीडाझुपातात्तदनु शशिकुजावेकभावे यदा- कृणोश्चिरं किंचित्तदानी ग्रहबलयशतो दृश्यमय सुधीभिः ॥ मार्तण्डे रिस्फयाते तदनु नवमगे पु- वगे वा सलाढये दृष्टे वा स्यान्मनस्वी सुपिकल- नयनः सूर्यजे व्याधियुक्तः ॥२३॥ अर्थ--उस पुरुपके आम गिरनेके हेतुमे नेमें पीटा होती है. जो यदि चंद्रमा और मंगल एक नवांशकपर स्थित होने नेत्रों में कुछ चिह्न होने पंडितजनाने योगकारक ग्रहों के

भाषाटीकासहितः। (४५)
बलके विचारसे यह सब हाल कहना. जो यदि क्रूरग्रहोंसे दृष्ट
अथवा क्रूरग्रहोंकरके संयुक्त हुआ सूर्य १२ १९१५ इन
घरोंमें पडा हो तो वह नर बुरे ( खराव) नेत्रोंवाला हो अथवा
१२।९। ५ इनही घरोंमें पापग्रहोंसे दृष्ट अथवा युक्त होके
शनि पडा हो तो वह नर रोगी होवे ॥ २३ ॥
चन्द्र पृष्टोदयस्थं हियुकगृहगतः सूर्यसूनुः प्रप-
स्येदित्थं लनाधिनाथे क्रियभवनगते मानवो
वामनः स्यात् ।। कोशे पीयूपभानुर्जलचरगृहगः
सोरिणा संयुतो वा मार्तण्डे भूमिकेन्द्रे यदि भवति
वदा दद्भुमान्पूरुषः स्यात् ॥२४॥
अर्थ-पृष्टोदय (११२।४।९।१० इन राशियों)
पर स्थित हुए चंद्रमाको चौथे घरमें बैठा हुआ शनि देखता
हो और इसी योगसमयमें लग्नका स्वामी भेपताशपर स्थित
हो तो वह नर वामन हो. जलचर रागिपर स्थित हुआ चंद्रमा
दूसरे घरमें स्थित हो अथवा शनिसे युक्त हो अथवा सूर्य
लपमें हो तो वह नर दुदु ( दाद ) रोगवाला होता है ॥ २४॥
हटेरेन सौम्यैर्यदि रियुगृहपे चोडुपे शीहवान
स्थादेवे कामाङ्गनाथे तदनु रविसुतस्तुर्यगो नष्ट-
हाष्टिः ।। पीही स्याल्लमनाथे दिनकरतनये क्रूरनि-
प्पीडिते चेत्सौख्यायुद्धमानवः स्यात्तनु सदनगेते
हिवान हपहानः ॥ २५॥

जातकालंकारः अ०३। अर्थ-जो यदि शत्रुघर (छठे चर) का पति हुआ चंद्रमा पापग्रहोंकरके दृष्ट हो और सौम्यग्रहोंकी दृष्टि नहीं होवे तो पीहा (नापतिल्ली ) रोगवान हो इसी प्रकार सातवें घरका पति अथवा लमका पति चंद्रमा केवल पाप ग्रहोंकर- केही देखा गया हो तोनी पीहारोगवाला हो और पापग्रहोंक- रके दृष्ट हुआ शनि चौथे घरमें बैठा हो तो अंधा होवे और दृष्टि अथवा योगकरके क्रूरग्रहोंसे विकल हुआ शनि लगका पति होवे तो वह नर सुखरहित हो और शनि लग्नमें पडा हो तो वह नर पीहा (तापतिल्ली) रोगवान् और आनंदरहित हो ॥ २५ ॥ कराः केन्द्रालयस्था वपुपि च विकलाः केन्द्रगो पुष्पदन्ती किंवा लग्ने प्रपश्येत्कविमिनतनयः श्रोणिभागेऽङ्गाहीनः ।। काव्यः पातालयायी सुर- पतिगुरुणा वापि युक्तोऽकसूनु मो वा रोहि- यो भवति हि विकल श्रोणिभागे भुनेंऽनो॥२६॥ अर्थ-जो यदि कूरग्रह केन्द्र में स्थित हो तो जन्मनेवाला नर विकल शरीरवाला होता है.जो यदि सूर्य चंद्रमा (एकनही) केंद्रों पडे हो तौनी स्किल शरीरवाला हो अथवा लममें स्थित हुए शुक्रको शनि देखता हो तो कटिनागपर अंगहीन हो. शुभ चौथे घरमें बैठा हो और वृहसनिकरके युक्त हुभा शनि, मंगल अथवा बुध जहां कहीं (किमी घरमैनी) स्थित हो तो जापाटीकासहितः। (४७) कटीकी जगह हाथ वा पैरकी जगह विकल ( अंगहीन) होता है ।। २६ ॥ आयुःपुण्याधिनाथी यदि खलखचराचर्यगी पाप- युक्तो जसार्वेकल्यवान स्यात् कुजशानसहित सैंडिकेये च सूर्ये ॥ द्वेष्यस्थे तहदेवं शनिरिपुर- हपो रिफयाती खलेश्चेदृष्टौ तद्वत्तदानी रविविधु- रविजा वैरिरन्ध्रालयस्थाः ॥ २७॥ स्यादार्तिः पञ्चशाखे तदनु दशमगे सूर्यसूनौ सिताढ्ये कविः स्यात्सूर्यसूनो व्ययरिपुगृहगेशुक्रतःक्लीवरूपः ।। पश्येत्सूर्यालयस्थो मदनभवनगं भूमिसूनुं सुधां- शुश्चार्कः काणश्च कर्के यौदि शुभगृहपो मेपर्सि- हालिनके ॥२८॥ अर्थ-आठवें और नववें घरके पति पापग्रहोंसेही चौथे घरमें बैठे हों और पापग्रहांसे युक्त होवे तो जांच नहीं हो अर्थात् पांगला हो. जो यदि मंगल और शनिसे युक्त हुआ राहु छठे घरमें बैठा हो अथवा शनि मंगलसे युक्त हुआ सूर्य छठे घरमें बैठा हो तो तिसी प्रकार पांगला होता है, शनि और छठे घरका पति कुरगहोंसे देखे गये हों और १२ घरमें स्थित होवे तौभी पांगला होता है.जो यदि सूर्य,चंद्रमा, शनि ६ । ८३ घरमें स्थित हो तो जन्मनेवालेके हाथमें पीडा होती है. जो यदि शुक्रसे युन हुआ शनि दश घरमें . .

(४८) जातकालंकारः अ०३। बैठा हो तो नपुंसक होता है और शुक्र बैठे हो उस राशिसे १२।६ घरमें शनि स्थित होवे तो नपुंसकसरीखा रूपवाला होता है जो यदि सिंहराशिपर स्थित हुआ चंद्रमा सातवें घमें बैठे हुए मंगलको दखता हो तो काणा होता है और कर्कराशिपर स्थित हुआ सूर्य सातवें घरमें स्थित हुए मंगलको देखता हो तोनी काणा होता है. जो यदि नक्वें घरका पनि मेष, सिंह, वृश्चिक, मकर इन राशियोंपर स्थित हो तब यह योग पूर्ण जानना ॥ २७ ॥ २८ ॥ अन्योऽन्यं पश्यतश्चेत्तरणिहिमकरों तत्तनूजो मिथो वा भूसूनुः पश्यतीनं समभवनगतं त्वङ्गच- न्द्रो यदौजे ॥ओजः युग्मराशो हिमकरशशिजी भूसुतेनेक्षितौ चेत्राशी लपशुको तदनु हिम- करः क्लीवयोगाः पडेते ॥ २९॥ अर्थ-विषमराशि और समराशिपर स्थित हुए सूर्य,चंद्रमा आपसमें देखते हों अर्थात् विपमराशिका सूर्य समराशिक चंद्रमाको और वह चंद्रमा सूर्यको देखता हो यह एक योग और इनके पुत्र अर्थात् शनि, बुध येगी विपमराशिपर इसी प्रकारसे स्थित हुए आपसमें देखते हों यह दूसरा योग.समरा- शिके सूर्यको विपमराशिगत मंगल देखता हो, मंगलको सूर्य देसता हो यह तीसरा योग. विपमरागिके लम और चंद्रमा समगशिगन मंगलकरके दृष्ट यह चौथा योग. चंद्रमा, बुध ये - जापाटीकासहितः। (४९) कमकरके विषम सम राशिपर हों और मंगलकरके देखे जाते हों यह पांचवां योग और लय, शुक्र, चंद्रमा, ये पुरुपग्रहकी राशिपर तथा नवांशकमें स्थित हों यह छठा योग. ऐसे छ: योग नपुंसक करनेवाले हैं ॥ २९ ॥ आयुःस्यानोपयातेधरणिसुतयुते भार्गवे वातको- पात्काव्ये भौमेन युक्ते कुजभवनगते भूमिना मु- एकवादिः ॥ भोमः काव्यचन्द्रौ सुरपतिगुरुणा सुर्यजेनाथ दृष्टौ नूनं स्यान्मानवानां जनुपि कल- लना मुष्कवृद्धिनितान्तम् ॥ ३० ॥ अर्थ-मंगलसे युक्त हुआ शुक्र आठवें घरमें हो तो वा- कोपसे वृषणवृद्धि (वृषण बढ जावे ) हो. मंगलसे युक्त हुआ शुक्र मंगलकी राशिपर स्थित होवे तो पृथ्वी के संसर्गसे वात कोपसे वृषण बढ जाते हैं. जिन मनुष्योंके जन्मसमयमें मंगल- की राशिपर स्थित हुए शुक्र, चंद्रमा, बृहनति शनिसे देते गये हों तो तिनके शुक्रशोणित (रक्तकलिल) से अत्यत वृषण बढ़ते हैं ॥ ३०॥ कोर्टऐ विलये सुविकृतरदनचापगो मेपर्सने सल्लाटः पापलने धपि गाये तथालोकिते चरखेटः|| धमीर्यान्त्यात्मजस्था यदि खलखचरा बन्धभाक् पूरुपः स्यादेवं लग्ने किये वा धनुपि गर्षि तथा रश्मिजं वन्पनं नुः ॥३१॥ -

(५०) जातकालंकारः अ०३।
अर्थ-धन, वृप, मेप इन राशियोंका लग्न पापग्रहों करके
देखा गया हो तो दांतोंमें रोग होता है. पापग्रहोंसे युक्त हुआ
लम धन तथा वृपराशिका हो पूर्वोक्त प्रकारसे पापग्रहोंकरके
देखानी जाता हो तो जन्मनेवाला जन गंजा होता है और
९।२।१२।५ इन घरोंमें पापग्रह हो तो बंध (कैद आदि)
में बंधनेवाला हो इसी प्रकार मेप, धन, वृप ये लम क्रूरग्रहोंसे
युक्त हों तो मनुष्यक रस्सी आदिसे बंधन होता है ॥ ३१ ॥
दुर्गन्धिर्दानवेज्ये शनिभवनगते मानवो विग्रहे
स्याद्वेप्याधीशे बुधः तदनु मकरगे तद्वनाथ
काव्ये ।। केन्द्रस्थे तेन युक्स्यादथ कविरविजी
स्वीयहहायुतो चेत्तचंद्रेऽजयाते तनुसदनगते
चानने स्याद्विगन्धः ।। ३२॥
अर्थ-शनिकी राशिपर शुक हो तो जन्मनेवाले मनुष्यके
शरीरपर दुर्गधि होती है. छठे घरका पनि ३१६ । १० इन
राशियोंपर हो तोजी शरीरमें दुर्गंधिवाला हो. जो यदि बुधकी
राशिपर स्थित हुआ शुक बुधसे युक्त होके केंद्रस्थानमें पड़ा
हो तो शरीरमें दुर्गधि होती है और शुक्र, शनि अपने त्रिंशांशमें
प्रान होवें तोगी शरीरमें दुधिवाला होता है और मेपरराशिका
चंद्रमा लममें पड़ा हो तो मुखमें दुर्गय होती है ॥ ३२ ॥
एवं ग्रहाणां सदसत्फलानां योगादू ग्रहजेरनुयोज़-
नीयम् ॥ शुभाशुभं जन्मनि मानवानां फलं
सुमत्या प्रविचार्य नूनम् ॥ ३३ ॥

21361 जापाटीकासहितः । अर्थ-ग्रहोंको जाननेवाले पंडिताने शुजाशुभफलदायी यहाँके योगसे इस प्रकारसे योजना करनी, मनुष्योंके जन्म- समयमें शुजाशुभ फल अपनी बुद्धिसे विचारके निश्वयसे कहना चाहिये ॥ ३३ ॥ यः पद्याम्फिते मुरितोपेऽलंकाराख्ये जातके मञ्जलेऽस्मिन् ॥ योगाध्यायः श्रीगणेशेन यत्र- त्युक्तो रामरामैः प्रणीतः ॥ ३४ ॥ इति जातकालंकारे योगाध्यायस्तृतीयः ॥ ३ ॥ अर्थ-मनोहर छंदकरके रचे हुए पंडितोंको प्रसन्न करने- वाले, मनोहर इस जातकालंकारविषे श्रीगणेशकविने उत्तम तेतीस श्लोकोंकरके यह योगाध्याय समाप्त किया ॥ ३४ ॥ इति श्रीजातकालंकारनापाटीकायां योगाध्यायत्तृतीयः ॥ अथ विषकन्याध्यायः४ भोजङ्ग कृत्तिकायां शतमिपनि तथा सूर्यमन्दार- वारे भद्रासंज्ञे तियो या किल जननामियात्सा कुमारी विपाख्या ॥ लमस्यौ सौम्पखेटावशुभ- गगनगश्चक आस्ते ततो दो वैरिक्षेवानुयातो यदि जनुपि तदा सा कुमारी विपाख्या ॥१॥ 221 (५२) जातकालंकारः अ०४। अर्थ--आश्लेषा, कृतिका, शतभिया इन नक्षोंने सूर्य, शनि, मंगलवार और भद्रासंज्ञक तिथियोंमें कन्या जन्मे तो वह विपकन्या होती है अर्थात् रविवार द्वितीया १ योग, आश्लेषा, कृत्तिका, शनिवार सममी २ योग, शतभिपा मंगल- वार द्वादशी यह तीसरा योग है. इनमें जन्मनेवाली विषकन्या होवे और दो शुभमह लग्नमें स्थित हों एक पाप मह दश घरमें स्थित हो दो पापग्रह छठे घरमें हों तब जन्मने- वाली वह लडकी विपकन्या कहलाती है ॥ १ ॥ मन्दाश्लेषाद्वितीया यदि तदन्छ कुजे सप्तमी वारु- पक्षे द्वादश्यां च द्विदेवं दिनमणिदिवसे यजनिः सा विपाख्या ॥ धर्मस्थो भूमिसनुस्तनुसदना- तः सूर्यसनुस्तदानी मातण्डः सूनुयातो यदि जनिसमये सा कुमारी विपाख्या ॥ २ ॥ अर्थ-शनिवारको आटेषा नक्षत्र द्वितीया तिथि हो, मंगलको सप्तमी शतभिपा नत्रक्ष द्वादशी तिथि हो इन तीन योगोंमें जिसका जन्म हो वह विपकन्या कहलाती नावे घरमें मंगल हो, शनि सममें हो, सूर्य पांच पर नम जन्मनेवाली विपकन्या होती है ॥ २॥ व्यादिदोः शुभो वा यदि मदनपतिऍनयायी विपा- ख्या दोपचवानपत्यं तदनु च नियतं इन्ति वैध- व्योपम् ॥ इत्यं यं ग्रहोः सुमतिभिरतिकं

नापाटीकासहितः। (५३)
योगनातं, ग्रहाणामारायानुमत्या मतमिह गदितं
जातके जातकानाम् ॥३॥
अर्थ-जो यदि सातवें घरका पति अथवा शुत्यह लगसेवा
चंद्रमासे सातवें घरमें बैठा हो तो विपकन्याका दोप तिससे .
होनेवाला संतानहीन फल और वैधव्यदोप दूर होता है ऐसे
इस उक्त प्रकारले इस जातकालंकारमें दैवज्ञ सायजनों के
अनुमत करके जातकों के संपूर्ण योग कहे हैं सो उत्तम बुद्धि-
वाले दैवज्ञजनोंने इसी प्रकारसे जानने अर्थात् ये संपूर्ण योग
इसी प्रकारसे बताने चाहिये ॥ ३ ॥
होः पोर्गुम्फिते सूरितोपेऽलंकाराख्ये जातके
मन्जुलेऽस्मिन् ॥ कन्याध्यायः श्रीगणेशेन वय-
वृत्तयुक्तो वह्निसंरस्यविपाख्यः ।। १ ॥
इति श्रीजातकालंकारे विपकन्याध्यायश्चतुर्थः ॥४॥
सर्थ-मनोहर छंदोंकरके रचे हुए पंडितजनोंको संतुष्ट
करनेवाले मनोहर इस जातकालंकारविपे उत्तम तीन श्लोकों-
करके श्रीगणेशकविने विपकन्या अध्याय कहाहै ॥ ४ ॥
इति श्रीजातकालकारनापाटीका विपकन्या-
ध्यायचतुर्थः ॥ ४॥

(५४)
जातकालंकारः अ५।
अथायुदायाध्यायः ५।
आयुर्मूलं जन्मिनां जीवनं च ह्यानीवानां निर्ज-
राणां सुधैव ॥ एवं प्राहुः पूर्वमाचार्यचर्यास्तस्मा-
दायुदायमेनं प्रवक्ष्ये ॥ १॥
अर्थ- जन्मनेवालों के जीवनेका मूल नायु है जस देवता-
ऑको अमृत है नने आय है इस प्रकारमे पहलेके आचार्याने
कहा है इसीयाने इस आयुर्दाय अध्यायको कहूंगा ॥ १ ॥
समाधीशातिवीयों यदि शुभविगैरीक्षितः केन्द्र-
यातबंद्यादायुः सुदीप गुणगणसहितं श्रीयुतं
मानयानाम् ॥ सौम्याःफेन्त्रालयग्या जनपिन
रंजनानापर्क स्वीयनु पीयांचे समनाय कार्पि
शारदा पटिरायुनराणाम् ॥२॥

मापारीकासहितः। (५५)' स्वायतुङ्गे सुरेज्ये लग्नाधीशेऽतिवीर्य गगनवसुस- मातुल्यमायुनराणाम् ॥३॥ अर्थ-सौम्य ग्रह केंद्र (१।४।७।१०) में स्थित हो और वृहस्पति लमही हो और ये सब दश घरमें स्थित हुए कूरमहॉकरके दृष्ट नहीं हो तो सत्तर वर्षकी आयु हो और शुभग्रह लग्नमें तथा नववे पांचवें बरमें स्थित होने तथा बृह- स्पति उच्चका हो और समपति अति बलिष्ठ होवे तो मनुष्योंकी अस्सी वर्षकी अवस्था होवे ॥३॥ सोम्ये केन्द्रेऽतिदीचे यदि निधनपदं खेटहीनं वीधे समाः स्युत्रिंशत्सोम्येक्षितं चेद्गहिमकरः संयु- ताथो स्वभे चेत् ॥ स्वत्र्यंशे चामरेज्ये मुनिनय- नमितं स्वसंगो लग्रगो वा चन्द्रे यूने शुभश्चेद्गग- नरसमितं कोणगाः सौम्य खेटाः॥४॥ अर्य-बुध केन्द्रस्थानमें पड़ा हो, अत्यंत बलिष्ठ हो और आठवे घरमें कोई ग्रह न हो तो तीस वर्षकी आयु होती जो यदि वह आठवां घर शुजग्रहोंकरके देखा जाता हो तो चालीस वर्षकी अवस्था हो और बृहस्पति अपनी राशिपर अपने देकागपर हो तो सत्ताइस यपंकी अवस्था हो. चंद्रमा अपनी राशिका हो अथवा लममें पड़ा हो और नानवें घरमें शुन यह बैठा हो तो साठ वर्षको अवस्था होरे ॥ ४ ॥ कीटे लने सुरेज्ये यदि भवति तदा सातुल्यं लयेशो धर्मऽङ्गे चाङ्गनाये निधनभवनगे करोड (५६) जानफालंकारः अ० ५। ब्धिहस्ताः ॥ लगाधीशाटनायो लयभवनगतो सप्तविंशदिलये कोज्यो चन्द्रदृष्टौ यदि निधनगतः वाचनास्ते द्विपक्षाः॥२॥ अर्थ-जो यदि शुभ ग्रह ९ । ५ घरमें हो और कर्क लमपर बृहस्पति होवे तो अस्ती वर्षकी अवस्था होती है. आठवें घरका पति नचवें घरमें हो और समाति कूरग्रहसे प्रष्ट होके आठवें घरमें बैठा हो तो चौबीस वर्षकी अवस्था होवे और लमका पति तथा अटम घरका पति आठ घरमें होवे तो सत्ताईस वर्षकी अवस्था हो. जो यदि पापमहसे गुर हुभा वृहस्पति लममें स्थित हो और चंद्रयाकरके दृष्ट हो, आठवें घरमें अन्य कोई ग्रह बैठा होवे तो बाईस वर्षकी अवस्था होती है ॥ ५॥ लगेन्दू क्रूरहीनों वपुपि सुरगुरौ रन्ध्रभं खेटदीनं केन्द्रे सौम्ये खौलाः सितविबुधगुरूस्याच्छतं केन्द्रगो चेत्॥ वागीशे कर्कलग्ने शतमिह भृगुने केन्द्रगेऽयाकसूनो धमागस्ये सुधांशो व्ययनवम- गते हायनानां शतं स्यात् ॥६॥ अर्थ-लम और चन्द्र ग्रहोंसे रहित और लममें वृहस्पति होवे, आठवें घरमें कोई ग्रह नहीं हो, केंद्र शुज यह हो तो सनर वर्षको अवस्था हो. जो यदि शुक्र, बृहस्पति केंद्रों पडे हो नौ सौ वर्षको अवस्था हो. जो यदि बृहस्पति मापाटीकासहितः। (५७) का हो और शुक्र केंद्रमें पडा हो तो सौ वर्षकी अवस्था है और शनि नवने घरमें हो अथवा लपमें हो, चंद्रमा हो अथवा नवो घरमें हो तो सौ वर्षको आयु होने ये सब ग यश संपत्तिकेजी सूचक जानने ॥ ६ ॥ धोकेन्द्रायुर्नवस्था यदि खलखचरा नो गुरोमें पिलग्ने केन्द्रे काव्ये गुरौ वा शुभमपि निधन सौम्यदृष्टं शत स्यात् ॥ लगादिन्दोन खेटा याद निधनगता वीर्यभाजो सितेज्यो पूर्णायुः स्वीय- राशौ शुभगगनचराः पष्टिरशोच्चगेऽन्ने ॥ ७ ॥ अर्थ-कर मह ५।१४।७।१०1८1९इन घरोंमें नहीं होवे और धन मीन राशियर तथा लममें या केंद्र शुक्र अथवा बहसति होते और नयवां आठवां घर शुनपहले देखा जाता हो तो सौ पपही अवस्या होती है. जो यदि लमसे अथवा चंद्रमास आठवें घरमें कोई ग्रह नहीं होने और शुक्र, बृहस्पति घटवत हो तो पूर्ण आयु (१२० वर्षकी) होये. जो यदि शुन ग्रह आनी राशिपर होवे और लयमें नया वृषा चंद्रमा होवे तो साठ वर्षकी अवस्था होती है ॥ ७॥ कोदण्डान्त्याधमदं यदि सकलसगाः स्वोचमा ज्ञे जिनशिगांस्य पूर्ण चन्द्रे सुरपतिभूमुजों अभगेऽन्ने परायुः ॥ शुक्र माने तवस्य नियन- गृहमते सौम्यदृष्टे सुधांशो जीवे केन्द्रे शतं स्या-

(५८)
जातकालंकारः अ०५॥
दथ तनुग्रहपे छिद्गे पुष्करेऽज्जे ॥८॥ वागीशे
वीर्ययुक्ते नवमभवनगाः सर्वखेटा शतायुःकर्केऽङ्गे
जीवचन्द्रौ सहजरिपुभवे सत्कविज्ञौ च केन्द्रे ॥
केन्द्रे सूर्यारमन्दा गुरुनक्लवगा वाक्पतो लम-
याते व्ययस्थानेषु शेषाः शरगजतुलितं स्यान्न
राणां तदायुः॥९॥
अर्थ-धनु राशिका पिछला अनाग लम हो तहां सब
उच्चके होवें और बुध चौवीस अंशोंसे वृषका होवे तव पूर्ण
आयु (१२० वर्षकी) होती है. जो यदि शुक्र बृहस्पति
केंदमें स्थित हों और चन्द्रमा ग्यारहवें घरमें हो तो परम
आयु होती है. मीन राशिका शुक्र लपमें हो और सौम्य ग्रहों-
करके देखा हुआ चंद्रमा आठवें घरमें हो, वृहस्पति केंद्रमें हो
तो सौ वर्षको आयु होती है और लमका पति आठवें धरमें
हो, चन्द्रमा दश घरमें हो, बृहस्पति चलवान हो, अन्य सब
ग्रह नववे घरमें होवे तो सौ वर्षको अवस्था होती है. कर्क
टम हो, बृहस्पति और चन्द्रमा ३।६। ११ इन घरोंमें हों
और शुभग्रहोंसे युक्त हुए शुक, बुध केंद्रस्थान में हो तोगी
सौ वर्षकी आयु होती है. सूर्य, मंगल, शनि ये वृहस्पतिक
नवांशकमें स्थित होके केंदमें बैठे हो और बृहस्पति लपमें
स्थित होवे. अन्य सब यह अष्टम स्थानमें नहीं हो तो मनु-
प्योंकी अवस्था पचासी वर्षकी होती है ॥ ॥ ९ ॥

भाषाटीकासहितः। (५९) क्रूराः सौम्यांशयाता उपचयगृहगाः कातराः क- पटकस्थासौम्या व्योमार्कसंख्या यदि तनुपकुजो रन्ध्रगो नो परायुः ॥ केन्द्रे लग्नेशजीवो नवसुत- निधने कण्टके नो खलाख्याः संपूर्ण पापखेटा यदि गुरुजलगा जीवभावे च सौम्याः ॥१०॥ युग्मक्षांगे गता वा व्ययधनगृहगाश्वेच्छुभाः शीत-, भानुः संपूर्णो लपयायी शतमिह जानिनामि- न्दिरामन्दिरं स्यात् ।। लग्नेशे सौम्ययुक्त वपुपि च लयपे रन्ध्रगे नान्यदृष्टे विंशत्केन्द्रे लयेशे बल वियुनि तथा लग्नपे त्रिंशदायुः ॥११॥ अर्थ-पापग्रह शुजगहोंके नवांशकमें स्थित होके ३॥६॥ १०११३ इन घरोंमें पड़े हो तो डरपोक (युद्धमें भागने वाले) नर होते हैं, जो यदि शुभयह केंद्रस्थानमें पड़े हों तो एक सौ वीस वर्षकी परम आयु होती है परन्तु इस परम आयुयोगमें शनि, मंगल आठवें घरमें होवे तो परम आर नहीं होती है. लमपति और बृहसति केंदमें हों और ९ ॥५॥ ८ इन घरोंमें तथा केंदमें पापग्रह नहीं होते तो पूर्ण आय. होता है, जो यदि पापग्रह नववें चौथे घरमें हो और शुजयह बृहस्पतिके नवांशकमें हो अथवा समराशिके नवांशकमें स्थित होवे और शुन मह १२१२ घरमें हो पूर्ण चंद्रमा लग्नमें स्थित हो तो संपत्ति लक्ष्मीसहित हुआजन सौ वसंतक जीवता (६०) जातकालंकारः अ०६। है. जो यदि शुजग्रहोंसे युक्तहुआ लग्नपति लममें बैठा हो, अन्यग्रहों करके देखा नहीं जाता हो और अष्टम घरका पनि आठही पडा हो तो वीस वर्षको अवस्थाघाला होता है और बलहीन हुए लमपति तथा अष्टम घरके पति केंद्र में पड़े हों तो तीस वपंकी अवस्था होती है ॥ १० ॥ ११ ॥ इन्दावापोक्किमस्थे तदनु तनुपतो निवले पापड- ऐ दन्तस्तुल्यं ततोऽकः खलखगविवरे लग्नगोऽ- जत्रिप्तख्यम् ॥ रिस्फे केन्द्रे सुरेज्ये गुरुरिपुस- हजे स्यात्सपापेऽङ्गनाथे रामान्दं कर्कलग्ने कुज- तुहिनकरो केन्द्ररन्ध्र ग्रहोनम् ॥ १२ ॥ अर्थ- चंद्रमा आपोलिम (३।६।९।१२) इन घरोंमें जेठा हो और लनातिनी ३१ ६ । ९ १२ इनहीं घरोंमें हो, ये दोनों निर्वल हों तथा पापग्रहोंकरके दृष्ट होवे तो बत्तीस वर्षकी आयु हो. जो यदि क्रूरग्रहोंके मध्यमें आया हुआ सूर्य लग्नमें बैठा होवे तो इकतीस वर्षकी आयु होती है वृहस्पति केंद्रमही अथवा चारहहें घरमें हो और लमका पति पापमहसे युक्त होके ९।६। ३ इन परोंमें बैठा हो तो तीन वर्षकी अवस्था होती हैं, कसम हो चन्दमा मंगल केन्द्र (१।४।७।१०) स्थानमें हो और ८ घरमें कोई यह नहीं हो तोनी ॥ १२ ॥ रामान्दं स्याल्लयेशेवपि च निधनं सौम्यहीन सवेदा लगेशो रन्ध्रयातो वपुपि निधनपः स्या- आपाटीकासहितः । (६३) नृणां वाणसंख्यम् ॥ नके तिग्मांशुमन्दो सहज रिपुगतौ कण्टके म्ध्रनाथे पारावाराब्धिसंख्यं तदनु शुभखगाः सल्ललऽत्र खाग्निः ॥ १३ ॥ अर्थ-तीनही वर्षतक जीवता है. आठवें घरका पति लपमें हो. आठवें घरमें शुभग्रह नहीं पड़ा हो तो चालीस वर्षकी अवस्था हो लमका पति आठवें घरमें हो और आठ घरका पति लममें हो तो मनुष्योंकी पांचही वर्षकी आयु होती है. मकरराशिपर स्थित हुए शनि सूर्य तीसरे वा छठे घरमें होवें और अष्टम घरका पति केंदमें हो तो वा लीस वर्षकी अवस्था होती है. जो यदि शुभग्रह शुभग्रहों के नवांशक्रमें अथवा शुत्तग्रहोंकी राशिपर स्थित हो तो तीस वर्षकी आयु होती है ॥ १३॥ कोईटेऽङ्गनाथे यदि शुभविहगा वीर्यवन्तः सु- धांशो संस्थे सौम्ये गणे चेद्गुणमुनितुलितं न्ध्र गर्मध्यमायुः ॥ स्याचन्द्रादह्नि पापरथ तपनसुते ब्यङ्गलने हि याते रिम्फेशेरधनाये यदि बलर- हिते कङ्कपत्राशिसंख्यम् ॥ १४॥ अर्थ-जो यदि लमका पति पापग्रहोंकरके दृष्ट हो और शुनग्रह बलवंत होवे और चंद्रमा शुभग्रहके नवांशमें स्थित होके किसी घरमें बैठा हो तो तिहचर वर्षकी भरस्था होती है और चंद्रमासे आठवें घरमें पापग्रह हो, दिनमें जन्म भया हो तो मध्यम आयु होती है इससे अनंतर शनि सिमान-

(६२) जातकालंकारः अ०५।
संज्ञक लग्नमें पडा हो और बारहवें घरका पति तथा अष्टमं
वरका पति बलहीन होवे तो पच्चीस वर्षको अवस्था होती
है ॥ १४ ॥
कर्केऽङ्गे सप्तसप्तो खलविहगयुते पुष्करस्थे द्वि-
जेशे केन्द्रे याते सुरेज्ये शरविशिखमितं पुष्कर
नीरगे वा ॥ सौम्ये पीयुपभानौ व्ययनिधनगते
देहगे वा कवीज्यावेकः व्योमवाणैर्व्ययरिपु-
निधने लग्ननाथाढ्यचन्द्रे ॥ ३५ ॥
अर्थ-कर्कलममें सूर्य हो और पापग्रहसे युक्त हुआ चंद्रमा
दशवे घरमें स्थित होने और बृहस्पति केंद्रमें होवे तो पचपन
वर्षकी अवस्था होती है. बुध दशवे घरमें हो वा चौथे घरमें
होने और चंद्रमा चारहवें आठवें घरमें वा लममें होवे और
शुक्र,बृहस्पति एकराशिपर कहाँ स्थित हो तो पचास वर्षकी
आयु होती है और लग्नपतिसे युक्त हुआ चंद्रमा १२ । ६ !
८ इन घरोंमें पडा हो ॥ १५ ॥
शन्यशे लगनाथे भुजगशरमितं स्यादयो सौम्य-
खेटा न्योना देहनाथो व्ययरिपुनिपने पापयुक्
पटिरायुः ॥ राशीशो लगनायो दिनमणिसहितो
मुत्युगो वाक्पतिश्चेनो केन्द्रे पष्टिरायुर्वपुपि दिन-
पतिः शत्रुभौमान्वितश्चेत् ॥ १६ ॥

भापाटीकासहितः । (६३) अर्थ-और लग्नेश शनिके नवांशकमें स्थित होवे वो अठावन वर्षकी आयु होती है. जो यदि शुजमह अष्टमानायके विना अन्य कहीं स्थित होवे और टमका पति पापग्रहसे युक्त होके १२१६।८ इन घरोंमें बैठा हो तो साठ वर्षकी अक्- स्था होती है. चंद्रमाकी राशिका पति सूर्यसहित होके ८ घरमें पडे और लग्नेशजी आठवें हो और बृहस्पति केंदमें नहीं होते तो साठ वर्षको अवस्था होती है. अपने शत्रु और मंगलसे युक्त हुआ सूर्य लममें हो ॥ १६ ॥ वागीशे हीनवीय व्ययतनुजगते यामिनीशे ख- शैला धर्मे सर्वैः परायुः खलखगलवगैः केन्द्रया- तैरशीतिः ॥ करैः तरक्षयातैः शुभभवनगतेः सौम्यखेटेः सवीर्यलयेशे स्यात्परायुः सुतभवन- गतः पष्टिरायुनराणाम् ॥ १७ ॥ अर्थ-बृहस्पति बलहीन हो और चंद्रमा १२।५ घरमें बैठा हो तो सत्तर वर्षको अवस्था होती है और सब सौम्य यह नववे स्थानों पडे हो तो परम आयु होवे और पापग्रहोंके नवांशकमें प्राप्त होके केंद्रों पढे हों तो अस्सी वर्षको अवस्था होती है. परपमहाँकी राशिर स्थित हो और शुभग्रह मौम्य ग्रहोंकी राशियोंपर स्थित हों और लमका पति बलवान होवे तो परम आयु होती है, जो सब सौम्य पाप यह पांचवें वरमें स्थित हो तो मनुष्योंकी साठ वर्षको अवस्या होती (६४) जातकालंकारः अ०५। सारंगस्यान्त्यभागे यदि वपुपि गते चाद्यभागे च केन्द्रे सौम्यः खेटेः शतं स्यादसुसहजसुखे स्याच्चिरायुः समस्तैः ॥ लग्नात्प्रालेयभानोनिध- नसदनपे रिफकेन्द्रेऽएपिंशत्केन्द्रे सौम्यग्रहोंने यदि मृतिभवने कश्चिदास्ते खरामाः ॥१८॥ अर्थ-धनुराशिके पिछले नागा नवांशक लममें प्राप्त हो और शुभग्रह प्रथम भागके नवांशमें स्थित होके केंद्रमें बैठे हो तो सौ वर्षकी अवस्था होती है और तीसरे, चौथे, आठवें घरमें सब ग्रह स्थित हो तो मनुष्यकी दीर्घ आयु होती है. लमसे अथवा चंद्रमासे बारहवें घरमें अथवा केंद्रों अप घरका पति हो तो अहाइस वर्षकी अवस्था होती है. केंद्रस्थानमें शुभ ग्रह नहीं हो और आठवें घरमें कोई शुभ यह बैठे हों तो नीस वर्षको अवस्था होती है ॥ १८ ॥ क्षीणे पालेयभानो यदि सलसचरी मृत्युगो मृत्युनाथः केन्द्रस्थो लमनाथो निजवलरहितः ताश्चितुल्यं तदायुः ॥ सौम्यरापोक्किमस्थैदिनम- पिनविधू परिरमालयस्थो तुल्यं फरमाइशेः स्यादय घनमृतिगो रिम्फगो पापसेटो ॥ १९ ॥ हीनो स्वर्भानुना वा यदि हिममटसा व्योमनेनन- मा केन्द्रस्यो सूर्यमन्दौ यदि वपुपि कुजः पुष्प वाणाकुशं स्यात् ।। शुकगारद्यातो तनय- भाषाटीकासहितः। (६५) भवनगो सार्कलमे खलशुभसहितश्चेक्षितः स्या- दनायुः ॥२०॥ अर्थ--चंद्रमा क्षीण हो और कर यह आठवें घरमें बैठा हो और अष्टम घरका पति केंद्रमें स्थित हो, लमका पति निर्बल हो तो बीस वर्षकी अवस्था होती है. शुन ग्रह आपोक्लिम (३।६।९ । १२ इन घरों) में स्थित हो, शनि और चंद्रमा ६८ घरमें स्थित हो तो वीस वर्षकी अ- वस्था होती है इससे अनन्तर दूसरे और आठवें घरमें तथा बारहवें घरमै रहित क्रूरयह बैठे हो तो वीस वर्षकी आयु होती है. जो यदि सूर्य, शनि केंद्रमें स्थित हों और मगट लममें होवे तो २० वर्षको अवस्था होती है. शुक्र, वृहस्पति लग्नमें हो मंगल और पापग्रह (शनि ) दोनों पांचवें घरमें होने तो कुछी आयु नहीं होती है अर्थात् स्वल्प आयु हो और जन्म राशिका स्वामी सूर्यसहित हुए लग्नमें बैठा हो और अन्य पापग्रह तथा शुभग्रहोंसे युक्त वा दृष्ट होवे तो स्वल (बहुत कम ) आयु होती है ॥ ३९ ॥ २० ॥ यसंप्रोक्तं योगजं पूर्वमायुहोरापारावारपारंग- मझेः। तस्मादायुः सारभूतं यदेत्पुण्याचारलोक भाजां नराणाम् ॥२१॥ अर्थ-जातकरूपी समुद्रको पार उहंचनको जाननेवाले पंडित जनोंने पहले जो योगोंले प्राप्त हुई आयु कही है वही

(६६)
जातकालंकारः अ०५
पूर्वोक्त साररूप यह आयु सदाचार धर्ममें ‘युक्त रहनेवाले
जनोंकी इसी प्रकारसे होती है ॥ २३ ॥
वलावलविवेकेन पुष्करालयशालिनाम् ॥ सुम-
नोभिरिदं देश्यमायुधर्मादिशालिनाम् ॥ २२ ॥
अर्थ-सूर्य आदि ग्रहोंके बलाबलका विचारपूर्वक यह
आयुर्योग उत्तमचित्तवाले जनोंने धर्मात्माजनोंको बताना
चाहिये अर्थात् पाप करनेवालोंके यह योग नहीं मिलता
है ।। २२ ॥
हृद्यः पद्यैर्गुम्फिते मूरितोपेऽलंकाराख्ये जातके
मन्जुलेऽस्मिन् ॥ आयुदयः श्रीगणेशेन वय-
त्तैर्युक्तो वाहुपक्षेः प्रणीतः ॥ २३ ॥ इति श्रीजा-
तकालंकारे पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५॥
अर्थ-मनोहर छन्दोंकरके रचे हुए, पौडेतजनोंको प्रसन्न
करनपाले मनोहर इस जातकालंकार नामक ग्रंथमें श्रीगणे-
करिने उनम पाईस शोकोंकरके आयुर्दाप अध्याय
रचा है ॥ २३॥
इति श्रीजातकालंकारनापार्टीकायां
पंचमोऽध्यायः ॥५॥

भापाटीकासहितः। (६७) अथ भावाध्यायः ६३ लगाधीशेऽर्थगे चेदनभवनपतो लगयातेऽर्थवान्- स्यादद्धयाचारप्रवीणः परमसुकृतकृत् सारभू- भोगशीलः ॥ भ्रातृस्थानेऽङ्गनाथे सहनभवन लग्नयातेऽल्पशक्तिः सन्धू राजपूज्यः कुलजनसु- खदो मातृपक्षेण युक्तः ॥ ॥ अर्थ-लमका पति धनस्थानमें बैठा हो और धनस्थानका पति लममें हो तो वह नर धनवान होताहै, बुद्धिके आचरणमें निपुण, उत्तम सुरूत करनेवाला, बलवान् और भोगशील (पदार्थ भोगनेवाला ) होता है. लमका पनि तीसरे घरमें हो और तीसरे घरका पति लग्नमें पडा हो तो अल्मबलवाला हो और श्रेष्ठ बंधुजनोंसे युक्त हो, कुलके जनोंको सुख देने- वाला और मातृपक्ष (मामा नाना आदिकों) में संयुक्त होता है ॥१॥ तुर्येशे लगयाते तदनु तनुपतो तुर्यगे स्यात्क्षमा- वान् ताताज्ञाराजकार्यप्रगुणमतियुतः सद्गुरुः स्वीयपक्षः ॥ लग्रस्थे सूनुनायेतनुजपदगते लग- नाथे मनस्वी विद्यालंकारयुक्तो निजकुलविदितो ज्ञानवान मानसक्तः ॥२॥ अर्थ-चौथे घरका पति लग्नमें पड़े और लपका पति चौथे घरमें पडे तो क्षमा ( शांति) वाला होवे; पिताकी (६८) जातकालंकारः अ०६। आज्ञामें और राज्यकार्यमें सरल बुद्धिवाला रहे, श्रेष्ठ गुरु- वाला अथवा श्रेष्ठ जनोंका गुरु होवे और अपने पक्षमें स्थित (कायम ) रहे. पंचम घरका पति लममें स्थित हो और लयका पति पंचम घरमें स्थित हो तो उत्तम मनवाला, विद्यासे विभूपित, अपने कुलमें विख्यात, ज्ञानवान् अभिमान युक्त होता है ॥२॥ पृष्ठेशे लगयाते तदनु, तनुपतो पप्ठगे व्याधि- हीनो नित्यं द्रोहादिसको चपुपि सवल्यान व्यवान्संग्रही स्यात् ॥ मृर्तीशे कामयाते मद- नसदनपे मूर्तिगे तातसेवी लोलस्वान्तोऽङ्गनायां भवति हि मनुजः सेवकः शालकस्य ॥ ३॥ अर्थ-उठे घरका पति लममें हो और लमका पति छठे घरमें बैठा हो तो रोगी नहीं होताहै और हमेशह द्रोह (उल) गादि करनेमें आसक, शरीरमें बलयान तथा संग्रह करनेवा- ला होता है. उनका पति सानवें घर में बैठा हो और मात परका पति लपमें पड़ा हो तो वह मनुष्य पिताकी सेवा कर- नेवाला मीवि चंचलमनवाला और शालकके काम करने वाला होता है ॥ ३॥ अगशे रन्प्रयाते निधनगदपतापगगे घुनयुद्धिः शुरश्चीयांदिसतो निधनपदमियाद्भूपतेलोकतो वा ॥ देहाधीशे शुभस्ये शुभभवनपती देवसंस्थे

भाषादीकासहितः। (६९)
विदेशी धर्मासक्तो नितान्तं सुरगुरुभजने तत्परो
राजमान्यः॥४॥
अर्थ-लनका पति आठवें घरमें होवे और आठवें घरका
पति लममें हो तो जुवा खेलनेमें बुद्धिवाला, शूर वीर, चोरी
आदि करनेमें निपुण हो और राजासे अथवा लोगोंसे मृत्युको
प्राप्त होवे, लमका पति नववे घरमें हो तो विदेशमें वास करे
और निरन्तर धर्ममें आसक्त रहे, देवताके पूजनमें, गुरुकी
सेवामें तत्पर रहे तथा राजासे मान्य होता है ॥ ४ ॥
कर्मस्थे लगनाथे गगनभवनपे लागे भूपतिः
स्यात् ख्यातो लाभे च रूपे गुरुभजनरतो लो-
लुपो द्रव्यनाथःलाभेशे लग्नयाते तनुभवनपतों
लाभसंस्थे सुकर्मा दीर्घायु क्षोणिनाथः शुभविभ-
वयुतः कोविदो मानवः स्यात् ॥ ५ ॥
अर्थ-लयका पति दशवे घरमें हो और दशवें घरका पति
उनमें हो तो राजा होता है, लाज करनेमें और उत्तम रूपमें
प्रसिद्ध (विख्यात) हो, सुरुकी सेवामें प्रीतिवाला, चंचल-
चित्तवाला और द्रव्यका अधिपति होता है. ग्यारहवें घरका
पति लममें हो, और लमका पति ग्यारहवें घरमें हो तो सुन्दर
कर्मवाला तथा दीर्घ आयुवाला होता है, राजा हो अथवा
वह मनुष्य घरमें होते तो सुन्दरकर्मवालासुन्दर ऐश्वर्यसे युक्त
हो धीरजवान और पंडित होता है ॥५॥

(७०) जातकालंकारः अ० ६।
लनेशे रिफयाते व्ययसंदनपतो लागे सर्वशत्रु-
बुद्धया हीनो नितान्तं कृपणतरमतिव्यनाशी
विलोलः ॥ इत्थं तातादिकानामपि जनुपि तथा
खेचराणां हि योगाद्वाच्यं होरागमस्तदनु तनुप-
युगू भार्गवे राजपूज्यः ॥६॥
अर्थ-रमका पति बारहवें घरमें हो और बारहवें धरका
पति लममें हो तो सब जनोंका शत्रु हो अथवा सब जन
उसके शत्रु होते हैं, वह निरंतर बुद्धिहीन होता है, अत्यंत
रूपणबुद्धि हो और द्रव्यका नाश करनेवाला तथा चंचल
स्वभाववाला होता है. इसही प्रकारसे जन्मसमयमें ग्रहोंके
योगसे पिता आदिकोंका शुभाशुभ फल जातकशास्त्रवेत्ता पंडि-
तोंने बताना चाहिये, जैसे पिताका घर दशवां है उसको लम
समझे, ११ को धन भवन समझे, फिर पूर्वोक्त सब, योगोंको
विचारके पिताका सब हाल कहे. इसी प्रकार पुत्र आदि
भवनसे पुत्र आदिकोंका हाल कहना और लमेशसे युक्त हुआ
शुक्र.६।८।१२ इन घरोंके बिना अन्य किसी घरमें बैठा
हो तो वह नर राजपूज्य होता है अर्थात् मनोवांछित फलोंकी
प्राप्तिवाला होता है ॥६॥
एवं स्वमत्या सुफलप्रवोधं श्रीजातकालंकरणं
मनोज्ञम् ॥ वृत्तैरनन्तेशमितैर्निवद्धं मया मुदे
देवविदामुदारम् ॥७॥

.
भाषाटीकासहितः। (७१)
अर्थ-मैंने (गगेशकविने ) ऐसे आनी बुद्धि करके सुन्दर
फलॉको कहनेवाला पदपदायाँकरके मनोहर यह जातकालंकार
दैवज्ञ (ज्योतिषी जनों) के आदनके वास्ते एक सौ दश
टोकॉकरके रचा है ॥ ७ ॥
पुष्करालयपशा गुणसारा, जातकोक्तिरमलेन
मराला ।। संस्कृता विहरता भवतां मे मानतेऽति
सरले सुकवीनाम् ॥ ८॥
अर्थ-पुष्करालय अर्थाद ग्रहों के अधीन अर्थात् शुमा-
शुनसूचक ग्रहोंकरके उपयुक्त हुई गुणोंकी साररूपा संस्कृता
अर्थात् मनोहर वाणीसे शुद्ध की हुई ऐसी मेरी यह
जातकोक्ति ( जातकफलकथनरूपा वाणी) सुन्दर कवि-
योंके तुम्हारे अत्यंत सरल मानसहृदयमें कीडा करे
कैसे कि जैसे पुष्कर (जलस्थानमें ) रहनेवाली, गुणमारा
और अमला (शुद्धा दोपरहिता), संस्कना (स्वासे
रुचिर) ऐसी हंसी मानससरोवरमें क्रीडा किया करती है तैसे.
यहां इस शोकमें पूपिमालंकार है ॥ ८ ॥
हृद्येः पद्येगुम्फिते मुरितोषऽलंकाराख्ये जातके
मालेऽस्मिन् ॥ भावाध्याय श्रीगणेशेन वी-
तेयुक्तोऽयाभिरेप प्रणीतः ॥ ९॥ इति श्रीना-
तकालंकारे पष्ठोऽध्यायः॥६॥

(७२) जातकालंकारः अ०७॥ अर्थ-मनोहर छंदोंकरके रचे हुए पंडितजनोंको प्रसन्न करनेवाले मनोहर इस जातकालंकार नामक ग्रंथमें श्रीगणेश- कविने उत्तम आठ श्लोकोंकरके यह भावाध्याय रचा है॥९॥ इति श्रीजातकालंकारशापाटीकायां पष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥ अथ वंशाध्यायः ७॥ अभूवनिमण्डले गणकमण्डलाखण्डलः श्रुति- स्मृतिविहारभूषिबुधमण्डलीमण्डनम् ॥ प्रचण्ड- गुणयुर्जरधिपसभाप्रभातप्रभाकवीन्द्रकुलभूपणं जगात काहनी कोविदः ॥ १ ॥ अर्थ-अवनिमंडल ( पृथ्वीतल) में कागजी नामक पंडित भया वह जगतमें ज्योतिपियोंके प्रतिपादन करनेवाला, पंडि- नोंकी मंडलीका मंडन, शोभादायक, प्रचंडगुणवाले, गुर्जरदे- शके अधिपति रानाकी सभाम प्रभातसमयके उजियालेके समान प्रकाशवाला, कवींद्रजनोंके कुलका आभूषण ऐसा होता भया ॥१॥ भारद्वाजकुले वभूव परमं तस्मात्सुतानां त्रयं ज्यायांस्तेष्वभवद् ग्रहज्ञतिलकः श्रीसूर्यदासः सुपीः ॥ श्रीपार सफलानिरिस्तदनुजो गोपार- लनामाभवच्छीमद्देवविदां वरस्तदनुजः श्रीराम- कृष्णोऽभवत् ।। २॥

भाषाटीकासहितः। (७३) अर्थ-सो यह भारद्वाज कुल ( गोत्र) में होता भया इसके तीन पुत्र भये तिनमें बड़ा दैवज्ञोंमें श्रेष्ठ श्रीमान् सूर्य- दास पंडित होता गया, तिसका छोटा भाई श्रीमान सब कलाओंका निधि (खजानारूप ) गोपालनामक होताजया, तिससे छोटा श्रीमद् दैवज्ञोंमें श्रेष्ठ श्रीरामकृष्ण नामक होता शाके मार्गणरामसायकपरा १५३५ संख्ये. नभस्ये तथा मासे बनपुरे सुजातकमिदं चके गणेशः सुधीः ॥ छन्दोलंकृतिकाव्यनाटककला- भिज्ञः शिवाध्यापकस्तत्र श्रीशिवविन्मुदे गणित- भूगोपालसूनुः स्वयम् ॥३॥ अर्थ-इनमें गोपाल नामक पंडितका पुत्र छंद, अलंकार, नाटक, कला (चित्रकर्म ) इनको जाननेवाला और शिवना- मक आचार्यका शिष्य ज्योतिपसिद्धांतशास्त्रको जाननेवाला, गणेशनामक कवि श्रीशिवनामक पंडितवरके आनंदके वास्ते पांच, तीन, पांच एक संख्या में अमित अर्थात पंद्रह सौ पैंती- सके शाके भाद्रपद महीने में सूर्यपुरविपे इस सुन्दर जातक (जातकालंकार) को करता जया ॥ ३ ॥ ये पठिप्यन्ति देवज्ञास्तेपामायुःसुखे शिवम् ॥ भूयात्कैरवकुन्दामा सुकीर्तिः सर्वतो दिशम्।। ४ ।।

(७४ जातकालंकारः अ०७॥ अर्थ-जो देवज्ञजन इतको पढेंगे तिनके आयु सुखमें कल्याण बना रहो और कमल तथा कुन्दके पुष्पसमान सुन्दर स्वच्छ कीर्ति सब दिशाओंमें हो ॥४॥ हृद्यः पद्यैर्गुम्फिते सूरितोपेऽलंकाराख्ये जातके मलेस्मिन् ॥ वंशाध्यायः श्रीगणेशेन वृत्ते- युक्तो वेदैः शैलसंख्यः प्रणीतः ॥ ५ ॥ इति श्रीगणेशेन विरचितजातकालंकारे सप्तमोऽ ध्यायः ॥ ७॥ अर्थ-मनोहर छेदोंकरके रचे हुए और पंडितजनोंको संतुष्ट करनेवाले इस मनोहर जातकालंकारविपे चार श्लोकों करके श्रीगणेशकविने यह सातवां वंशाध्याय अर्थात् अपने शविख्यातिका अध्याय रचा है ॥ ७ ॥ इति श्रीयेरीपुरनियासिगोडवंशोद्भवद्विजशालयामात्मन- बुधवसतिरामशाखिविरचितजातकालंकारभा- पाटीकायां सतमोऽध्यायः ॥ ७॥ अन्दे सवाणाऽङ्कपरामिते वैशासे सिते नागतिथी भृगौ च ॥ बस्त्यादिरामांतयुधेन जापाटीका रुता स्वल्पधियां मुदे वै ॥ इति मापाटीकामस्तिो नातफाकार समाप्तः । पुस्तक मिटनेका ठिकाना. गंगाविष्णु श्रीकृष्णदास, खेमराज श्रीकृष्णदास, "रक्ष्मावकटेश्वर" स्टीम् प्रेम, "श्रीवेंकटेश्वर" स्टीम मेस, पापाग-मुंबई खववादी-मुंबई

जाहिरात.
ज्योतिष-ग्रन्थाः।
की. रु. भा.
अर्थप्रकाश-भापाटीकासमेत । इसमें तेजी-मन्दी
वस्तु देखनेका विचार भलीभांति लिखागयाहै
आनन्दप्रकाश-भापाटीकासमेत । यह ग्रन्थ ज्योति-
पियोंकोअतीवउपयोगी है। इसमें-रोगकी स्थिति,
असाध्यरोग किस प्रकार शान्त होगा तथा
रोगमुक्ति, स्नानदानादि कितनेही उत्तम विषय
लिखेगये हैं.
आर्यभटीय-(ज्योतिपशास्त्र ) संस्कृतटीका भाषाटी-
कासमेत
कर्णकुतुहल-सटीक तथा उदाहरणसहित । ब्रह्मपक्षीय
নার অন্য
...
....
.-
करणेन्दुशेखर-इसमें रव्यादि ग्रहोंकी सारणी
भालीमाँति दीगईहै । तथा सिद्धान्तोक्त
सब विपय संक्षेपसे इसमें आगये हैं
पुस्तकें मिलनेका ठिकाना-
गंगाविष्णु श्रीकृष्णदास,
"लक्ष्मीवेंकटेश्वर" छापाखाना
कल्याण-मुंबई.

S
"लक्ष्मीकटेश्वर स्टीम्-य मालयकी परमोयोगी
स्वच्छ शुद्ध और सस्ती पुस्तकें।
यह विषय आज ३० । ४० वर्षसे अधिक हुआ मारतवर्ष
प्रसिद्ध है कि, इस यन्त्रालयकी छवीहुई पुस्तके सर्वोत्तम और
सुन्दर प्रतीत तथा प्रमाणित हुई हैं सो इस यन्त्रालयमें प्रत्येक
विषयको पुस्तकें जैसे-वैदिक वेदान्त, पुराण, धर्मशास्त्र, न्याय,
मीमांसा, छन्द, ज्योतिप, काव्य, अलंकार, चम्पू नाटक,
कोप, वैयक, साम्प्रदायिक तथा स्तोत्रादि संस्कृत और हिन्दी
मपाके प्रत्येक अक्सापा विकीके अर्थ तैयार रहते है।
शुद्धता स्वच्छना तथा कागनको उत्तपता मोर जिल्दको बधाई
देशभरमें विख्यात है। इतनी उत्तमता होने परमी दाप बहुतही
मस्ते रक्ख गये हैं और कमीशनमी पृथा काट दिया जाता है।
ऐसी सरलता पाउको मिलना अमंभव है संस्कृत तथा
दिन्दीके रसिको अपश्य मानी २ आवश्कतानुसार पुस्त.
को मंगानमें घुटन करना चाप.पं.मा उत्तम, सस्ता और
मार दूसरी जगह मिलना असम्भव है. 'सपीपत्र' मगा देखो।
पुस्तकें मिटनेका ठिकाना-
गङ्गाविष्णु श्रीकृष्णाम,
"रक्ष्माकटेश्वर" छापासाना,
कल्याण-मुंबई.

Jatakalankara

Author
Ganga,.vishnu Shri Kirshan Das
Title
Jatakalankara
File name
Jatakalankara
Text
OCR done
Citation
1855
Published
2012/08
Publisher
Bombay,.kalyan Malik Sitam Press
Language
Sanskrit
Pages
77
Library
Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
DLI number
312408
Barcode
99999990321198.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
PxurtvsWaLT
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