Sanmati Library, Jaipur

Siddantasarsangrah

Chandrasenacharya · 2009/11

PDF Proofread

Front matter

प्रकाशक श्री. लालचंद हिराचन्द दोशी, जैन संस्कृति संरक्षक संघ, सोलापुर. TITLTITITLETITHILITTLTATITHTTATRALIATTTTTTTTTTTA ITARATATARRELATEHTHHTHHEALTHTHLIATELLITY शोलापुर निवासी ब्रह्मचारी जीवराज गौतमचन्द्रजी दोशी कई वाँसे संसारसे उदासीन होकर धर्मकार्य में अपनी वृत्ति लगा रहे थे। सन १९४० में उनकी यह प्रबल इच्छा हो उठी की अपनी न्यायोपार्जित संपत्तिका उपयोग विशेषरूपसे धर्म और समाजकी उन्नतिके कार्यमें करें । तदनुसार उन्होंने समस्त देशका परिभ्रमण कर जैन विद्वानोंसे इस बातकी संमतियोंका साक्षात् और लिखित संग्रह किया कि कोनसे कार्यमें संपत्तिका उपयोग किया जाय । स्फुटमतसंचय कर लेनेके पश्चात् सन १९४१ के ग्रीष्मकालमें ब्रह्मचारीजीने तीर्थक्षेत्र गजपन्था (नाशिक) के शीतलवातावरणमें विद्वानोंको समाज एकत्रित की और ऊहापोहपूर्वक निर्णयके लिये उक्त विपय प्रस्तुत किया। विद्वत्संमेलनके फलस्वरूप ब्रह्मचारीजीने जैन संस्कृति तथा साहित्य के समस्त अंगोंके संरक्षण, उद्धार और प्रचारके हेतु जैन संस्कृति संरक्षक संघ' की स्थापना की और उसके लिये (३०,०००) तीस हजार के दानकी घोपणा कर दी। उनकी परिग्रहनिवृत्ति बढती गई और सन १९४४ में उन्होंने लगभग (२,००,०००) दो लाखकी अपनी संपूर्ण संपत्ति संघको ट्रस्टरूपसे अर्पण की। इसी संघके अन्तर्गत 'जीवराज जैन ग्रन्थमाला' का संचालन हो रहा है । प्रस्तुत ग्रन्थ इसी मालाका पञ्चम पुष्प है। श्रीब्रह्मवाडीजी अब इस संसारमें नहीं हैं । वे पोप पौर्णिमा दिनकि ६ि२२९५७ के दिन सल्दैखनामरणसे शान्तिपूर्वक स्वर्गस्थ उनकी आत्माको चिरगोन्तिमुखका लाभ हो। परिहा 34972 行出山HHYYYHYLL HTTHARATTETTERTALENTRITTENAME! 1 । मुद्रक श्री. कुमुदचन्द्र फुलचन्द शाह, मे. सन्मति मुद्रणालय, १६६, शुक्रवार पेठ, सोलापुर-२,

श्री.
जीवराज जैन ग्रन्थमालायाः पञ्चमो ग्रन्थः ।
ग्रन्थमालायाः सपादकी
डॉ. आदिनाथ उपाध्याय.
डॉ. हीरालालो जैनः
नरेन्द्रसेनाचार्यविरचितः
सिद्धान्तसारसंग्रहः
( जीवाजीवादिसप्ततत्त्वप्रतिपादकः संस्कृतपद्यग्रन्थः)
पोडशपुरनिवासिना 'न्यायतीर्थ', 'आगमभक्तिपरायण' पदभूषितेन
फडकुलेइत्युपाह्वाधारिणा जिनदासशास्त्रिणा
पाठान्तरं सयोज्य हिन्दीभाषान्तरेण सह संपादित ।
द्वितीया आवृत्तिः
}
जीवराजजीवराजजैन ग्रंथमाला
सोलापूर
वीरनिर्वाणसवत् २४९८
विक्रमसवत् २०२८
१९७२
रुपये
रपये 20/

संपादकीय सिद्धान्तसारसंग्रहका प्रस्तुत. संस्करण द्वितीय वार प्रकाशित किया जा रहा है। विषयकी दृष्टिसे यह ग्रंथ तत्त्वार्थाधिगमसूत्र व गोम्मटसारादि सिद्धान्त ग्रंथोंकी परम्पराका है। इसमें सम्यग्दर्शन आदि रत्नत्रय तथा जीवादि सात तत्त्वोंका स्वरूप विधिवत् सरल रीतिसे समझाया गया है जिसकी रूपरेखा विषयपरिचयसे जानी जा सकती है। संस्कृत पद्यात्मक इस ग्रंथके रचयिता आचार्य नरेन्द्रसेन हैं जिनका प्रतिष्ठादीपक नामक एक और ग्रंथ पाया जाता है तथा जिनका काल विक्रम संवत्की वारहवीं शतीका मध्यभाग सिद्ध होता है। प्रस्तुत ग्रंथका संस्करण पं. जिनदास पार्श्वनाथ फडकुले शास्त्री द्वारा तैयार किया गया है। उन्होंने मूल पाठ दो प्राचीन हस्तलिखित प्रतियों परसे किया है, उसका हिन्दी अनुवाद भी किया है, प्रस्तावनामें विपयपरिचय, ग्रंथके कर्तृत्त्व व रचनाकालादिका विवेचन किया है, तथा अनुक्रमणिकादि भी तैयार की है जिसके लिये हम उनके अनुगृहीत हैं। इस ग्रंथका संस्करण और प्रकाशन करानेमें संस्कृति संरक्षक संघके संस्थापक ब्रह्मचारी जीवराज भाईकी विशेष रुचि थी। किन्तु हमें अत्यन्त दुःख है कि ग्रंथका मुद्रणकार्य पूर्ण होनेसे पूर्व ही उनका स्वर्गवास हो गया। हमें आशा है कि अव भी इस ग्रंथके प्रकाशनसे स्वर्गीय आत्माको संतोष लाभ होगा। इस ग्रंथमाला का जो यह संशोधन-प्रकाशन कार्य विधिवत् चल रहा है उसमें संघकी ट्रस्ट कमेटी तथा प्रवन्ध समितिके समस्त सदस्योंका हार्दिक सहयोग ही प्रधानत: कारणीभूत है। इसके लिये हम उन सव के कृतज्ञ है। हमें विश्वास है कि इस ग्रंथके स्वाध्यायसे पाठकोंको जैन सिद्धान्तकी समस्त व्यवस्था समझने में सुलभता होगी। संतोषभवन, - ग्रंथमालाके सम्पादक- आदिनाथ नेमिनाथ उपाध्ये शोला पूर. १९७२ हीरालाल जैन

सिद्धांतसारसंग्रहः
ON
A
,
6-20
।
5
स्व ब्रह्मचारी जीवराज गौतमचंद्रजी दोशी
सस्थापक, जैन सस्कृति सरक्षक संघ, शोलापुर

No text on this page.

प्रस्तावना १. ग्रन्थका नाम प्रस्तुत ग्रन्थके रचयिता श्रीनरेन्द्रसेनाचार्य हैं। इन्होने इस ग्रन्थके पहले अध्यायके चौथे श्लोकमे 'तत्वार्थसग्रह वक्षे' इस चरणसे जीवादिक सप्त तत्त्वार्थोंका संग्रह कहनेकी प्रतिज्ञा की है। ग्रन्थके प्रत्येक परिच्छेदकी पुष्पिकामे 'सिद्धान्तसारसग्रह' नामसे इस ग्रन्थका उल्लेख किया है। 'सिद्ध अन्त निश्चयो स सिद्धान्त ' ऐसी सिद्धान्त शब्दकी निरुक्ति है। तदनुसार जीवादिक सप्ततत्त्वोका निश्चय प्रमाण और नयोके द्वारा करके, उसका सारसग्रह इस ग्रन्थमे किया है। इसलिये इसका सिद्धान्ससारसग्रह' यह सार्थक नाम है। २. विषयपरिचय इस ग्रन्थके बारह परिच्छेदोमे क्रमश निम्नोल्लेखित विषय है। पहले परिच्छेदमें सम्यग्दर्शनका सुविशद वर्णन है । " रत्नत्रयधर्मसे मनुष्य जीवन सफल होता है । तथा वह समन्तभद्राचार्यके वचनके समान प्राप्त करना कठीन है। " ऐसा प्रथकारने लिखा है । " रत्नपरीक्षक रत्नकी परीक्षा कर उसे ग्रहण करते हैं। वैसे धर्मकी भी परीक्षा कर उसे ग्रहण करना चाहिये ।" "कुलक्रमसे प्राप्त हुए कुष्ठरोगको मनुष्य जैसे औषध सेवनसे नष्ट करते हैं वैसे कुलक्रमसे प्राप्त हुए अधर्मको भी विवेकी पुरुष छोडते है । कुलधर्मको नही छोडनेसे यशोधरादिक राजामओके समान अविवेकी लोक दुर्गतिको प्राप्त हुए है। यहा हिंसात्मक कुलधर्मका आश्रय करनेसे यशोधर राजाको दुर्गतिमे भ्रमण करना पड़ा यह दृष्टान्तसे दिखाया है, जिससे मिथ्या कुलधर्मकी त्याज्यता सिद्ध होती है। तदनन्तर सम्यग्दर्शन और उसके आनुषडगिक सवेग निवेगादिक गुणोका उल्लेख कर सम्यग्दर्शनसे नरकतिर्यग् गति, भवनत्रिकदेवपद, स्त्रीत्व, नपुसकत्व आदिकी प्राप्ति नही होती है ऐसा दिखाया है। सम्यग्दर्शनके विना चारित्रकी प्राप्ति नहीं होती, सम्यग्दृष्टिजन गुणोको ग्रहण करते है। सार्मिकोके दोषोको ग्रहण नही करते तथा उनके ऊपर अवर्णवाद कदापि नहीं करते हैं। इस प्रकारसे वर्णन कर प्रथम दर्शनाराधना पूर्ण की है। द्वितीय परिच्छेदमें सम्यग्ज्ञानके मति, श्रुत, अवधि, मन पर्यय तथा केवल ऐसे पाच भेदोका विशद विवेचन है। पहले तीन ज्ञान मिथ्यात्वके उदयसे कुज्ञान होते है और सम्यक्त्वसे सम्यग्ज्ञान होते है । जिसे सम्यग्ज्ञान प्राप्त हुआ है उसके सदाचारको चारित्र कहते हैं। चारित्रका मूल कारण सम्यग्ज्ञान है । आचार्य नरेन्द्रसेनने इस अध्यायके अन्तिम श्लोकमे प्रथमादि आठ विभक्तियोमे ज्ञान शब्दका प्रयोग कर अपनी रचनाचातुरी व्यक्त की है।

(२) तीसरे परिच्छेदमें ग्रन्थकारने सामायिकादि पाच चारित्रोका उल्लेख किया है। तदनन्तर पाच पापोसे विरक्त होना यह व्रतका लक्षण कहा है । हिंसादिक पाच पापोसे इस लोक और पर लोकमे दुखकी प्राप्ति होती है । देव, अतिथि, मन्त्रसाधन तथा यज्ञादिकके लिये जो प्राणिहिंसा की जाती है वह अहिंसा नही हिंसा ही है । हिंसा करनेवाले जीव वालमृत्युसेही मरते हैं । एकेन्द्रियावस्थासे पञ्चेन्द्रियावस्थातक जितने क्षुद्रजन्म और मरण है वे सब हिंस्त्र प्राणियोको ही प्राप्त होते है। " यज्ञमे जो हिंसा होती है वह मत्रसे पवित्र होनेसे पापका कारण नहीं है " ऐसे याज्ञिक विचारका खण्डन करते हुए ग्रन्थकारने उसको एक छोटेसे वाक्यमे उत्तर दिया है अर्थात् यदि ता प्रवर्तयेन्मन्त्रः पापात्मा च कथ न हि । " अर्थात् यदि वह मन्त्र हिंसाका प्रवर्तन करनेवाला है तो वह भी पापमन्त्र ही है । इसके अनन्तर असत्य, चोरी आदि पापोका वर्णन कर सत्यादि व्रतोकी जैनागमसे अविरुद्ध आत्महितकारिता दिखलाई है। कर्मनोकर्मका संग्रह आत्मा प्रतिसमय करता है, परंतु वह किसीने नही दिया है, मत यह चोरी है, इस शंकाका उत्तर आचार्यने यह दिया है " कर्मनोकर्मके ग्रहणमे दानादानादि च्यवहार नही होता अत इसमे चोरीका प्रसग नही । अन्तराय कर्मका क्षयोपशम होनेसे उनका ग्रहण स्वय ही होता रहता है"। शून्यगृह, नगर, प्रामादिकमे प्रवेश करने परभी साधुओंके मनमे प्रमत्तयोग न होनेसे उन्हे चोरीका दोष नही लगता । ब्रह्मचर्य व्रतका रक्षण करनेके हेतुसे साधुगण रसयुक्त पुप्टिकारक, कामोत्पत्ति करनेवाला आहार ग्रहण नही करते । धनधान्यादिकोमे साधुओको ममत्ववुद्धि न होने पर भी उनके मनमे 'ज्ञानदर्शनादिक मेरे हैं' ऐसा सकल्प उत्पन्न होता है अत उन्हे परिग्रहदोष क्यों नही होता इस शकाका उत्तर आचार्यने यह दिया है 'ज्ञानदर्शनादिक भाव आत्माके स्वभाव तथा सत्यसुखके हेतु होनेसे त्याज्य नही हैं । अत उनकी परिग्रह संज्ञा नही है। किन्तु कर्मोदयवश आत्मामे जो रागद्वेप तथा परपदार्थोमे ममत्वभाव उत्पन्न होते हैं वे परिग्रहरूप होनेसे त्याज्य हैं । इस प्रकार साधुगण पांच पापोके त्यागी होनेसे महाव्रती हैं। हिंसादिक पाच पापोका त्याग कर जो साधु चारित्र पालते है उनको आत्माका शुद्धस्वरूप प्राप्त होता है । चतुर्थ परिच्छेदमें माया, मिथ्यात्व और निदान इन तीन गल्योंका त्याग करनेसे अहिंसादि भावोको अणुव्रतपना तथा महाव्रतपना प्राप्त होता है यह बतलाया गया है मिथ्यात्वशल्यके वर्णनमे कहा गया है कि जीवादि पदार्थोको सर्वदा और सर्वथा नित्य एव अनित्य, गुणोसे सर्वथा भिन्न वा अभिन्न आदि मान्यता प्रमाण सिद्ध नही होनेसे श्रद्धामें विपरीतता लाती है । तथा आत्मादिक पदार्थोमे जो कर्मवन्ध, संसार-भ्रमणादिक दिखते हैं वे सिद्ध नही होते और व्रतोका पालन, दोपत्याग, गुणकी प्राप्ति, आत्माकी कथचिन्नित्यानित्यता जीवतत्त्व नही माननेसे सिद्ध नही होगे। इसलिये मिथ्यात्व शल्यका त्याग करना चाहिये।

(३) इसी मिथ्यात्व शल्यके प्रकरणमे ग्रन्थकारने बौद्धोका क्षणिकवाद, चार्वाकका जडवाद, साक्ष्यका प्रकृतिवाद व अकर्तृत्व, मीमासकका असर्वज्ञत्ववाद, वेदोका अपौरुषेयत्ववाद, नैयायिक वैशेषिकका ईश्वरसृष्टिकर्तृत्व तथा श्वेताम्बरोका कवलाहार व स्त्रीमुक्ति इन मान्यताओका खण्डन किया है। - तदनन्तर मायाशल्य और निदानशल्यके भेद देकर प्रशस्त निदान-अन्य भवमे जिन- धर्मकी प्राप्तिके लिये योग्य देश, काल, क्षेत्र, भव तथा भाव और ऐश्वर्यकी चाह करना योग्य है ऐसा दिखाया है । इस प्रकार तीन निदानोका वर्णन त्यक्तव्यकी दृष्टिसे इस परिच्छेदमे किया है। जो मुनिराज गुरुवचनरूपी सडसीसे ये तीन शल्य अपने हृदयसे निकालकर फेक देते हैं उनका चारित्र निर्मल होता है तथा वे स्वर्गवैभवको भोगकर मोक्षको प्राप्त करते है। पांचवे परिच्छेदमें जीवका ज्ञानोपयोग तथा दर्शनोपयोग लक्षण बताकर नयोकी अपेक्षासे मूर्तिकत्व, अमूर्तिकत्व, कर्तृत्व, अकर्तृत्व, अभोक्तृत्व, भोक्तृत्व, व्यापकत्व, देहप्रमाणत्व आदिक भावोका विवेचन आचार्यने किया है । तथा जो आत्माको सर्वथा अमूर्तिक, सर्वथा शुद्ध, सर्वथा व्यापक, सर्वथा अकर्ता आदि स्वरूप मानते हैं उनका खण्डन किया है । पाच प्रकारके ससार परिवर्तनके अनन्तर ससारी जीवके त्रस स्थावरादि भेदोका खुलासा ग्रन्थकारने किया है। विग्रहगतिमे जीवका स्वरूप दिखाकर चार गतिमोमे चौरासी लाख योनियोमे जीवके परिभ्रमणका वर्णन किया है । प्रसस्थावर जीवोके आयु, गुणस्थान, तथा मार्गणाओका वर्णन कर पञ्चमाध्यायकी समाप्ति की हैं। छठे परिच्छेदमें अधोलोकस्थित सप्तनरकोमे नारकियोके देहोकी ऊचाई, उत्कृष्ट जघन्य आयु तथा लेश्याओका वर्णन किया है। सातवे परिच्छेदमें मध्यलोकका वर्णन है । इस लोकमे असख्यातं द्वीप तथा सागर एक दुसरेको वेष्टित करते हुए स्थित हैं । ठीक मध्यमे जम्बूद्वीप है। उसे लवणसागरने घेरा है। उसको घातकी खण्डने, उसे कालोद समुद्रने, कालोदको पुष्करद्वीपने-उसको पुष्करवर-समुद्रने इस प्रकार घेरकर द्वीपसमुद्र मध्यलोकमे स्थित है। सर्व द्वीपसमुद्रोके बीचमे जम्बूद्वीप एक लाख योजन विस्तारका गोलथाली के समान है। इसमे हिमवदादिक छह पर्वत, और भरतादिक सप्त क्षेत्र है । भरतक्षेत्र मेरुपर्वतके दक्षिणमे है। वह विजयाईपर्वत और गगा-सिंधु दो नदियोसे विभक्त होनेसे षट्खण्ड हुआ है। जिसे पाच म्लेच्छखण्ड तथा एक आर्यखण्ड कहते है । आर्यखण्ड भरतक्षेत्रके बीचमे है । इस जबूद्वीपमे भरत, विदेह और ऐरावत ये तीन क्षेत्र कर्मभूमि हैं । तथा हैमवत, हरि, रम्यक, हैरण्यवत, देवकुरु और उत्तरकुरु ऐसी छह शाश्वत भोगभूमिया हैं ।

(४) विदेहके सीता तथा सीतोदा नदी, वक्षारपर्वत तथा विभगा नदियोसे बत्तीस विभाव हुए हैं। उन्हे देश कहते हैं। वह प्रत्येक देश पाच म्लेच्छखण्ड तथा एक आर्यखण्ड ऐसे छहों विभागोसे युक्त है । भरतखण्डके समान एक विजया और दो नदियोसे इन बत्तीस देशोमे छह छह विभाग हुए हैं। ढाई द्वीपोमे पाच मेरुसंबधी पांच भरत, पाच विदेह और पाच ऐरावत ऐसी पद्रह कर्मभूमिया है। विदेहक्षेत्रके आर्यखण्डोमे सदा मोक्षमार्ग चालू है । परतु पाच भरत तथा पाच ऐरावतोमे अवसर्पिणीके चतुर्थ कालमे तथा उत्सर्पिणीके तीसरे कालमे मोक्षमार्गकी प्रवृत्ति होती है। अन्य कालमे भोगभूमिका स्वरूप इन क्षेत्रोको प्राप्त होता है । ग्रथकारने इन ढाई द्वीपोमे नदी, पर्वत, द्रह, मनुष्य, उनकी आयु, इत्यादिक अनेक विषयोका खूब विस्तारसे वर्णन किया है। आठवे परिच्छेदमें भवनवासी, व्यन्तर, ज्योतिप्क तथा स्वर्गीयदेवोके इन्द्रादि दशभेद, इनके जघन्यादि आयुर्भेद, लेश्या देहोत्सेधआदि का वर्णन है। ज्योतिष्क देवोके भ्रमणसे यहा ढाई द्वीपोमे दिवस, रात्रि, घटिका, मास, वर्षादि विभागरूप व्यवहार कालका प्रवर्तन हो रहा है। इसी प्रकरणमे सूर्य चन्द्रके ग्रह, नक्षत्र, तारकादि परिवारका भी वर्णन ग्रन्थकारने किया है। ब्रह्मलोकान्तवासी अर्थात् लौकान्तिक देव, सौधर्म स्वर्गका इन्द्र, उसकी पट्टमहिषी- शची, सौधर्मेन्द्रको लोकपाल सोम, कुवेर, यम, वरुण तथा इशान, दक्षिणेन्द्र ये सब स्वर्गसे च्युत होकर मनुष्यभव धारण कर उसी भवमे कर्मक्षयसे मुक्त होते हैं । मुक्तजीवोको जरामरणवर्जित अव्याबाध ऐसा अनन्तसुख सदैव प्राप्त होता है । देव तथा नारकियोके चार, पशुओको पाच, तथा मनुष्योको चौदह गुणस्थान हैं । इस प्रकार वर्णन कर इस अध्यायकी समाप्ति आचार्यने की है। नौवे परिच्छेदमें अजीव आस्रव तथा बन्धनत्वका वर्णन किया गया है। पुद्गल, धर्म, अधर्म, आकाश और कालद्रव्योको जीवन गुणरहित होनेमें अजीव कहते हैं। कालद्रव्य एक प्रदेशी ही है और अन्यद्रव्य बहुप्रदेशी हैं । बहुप्रदेशी द्रव्योको तथा पुद्गलाणुओंको 'अस्तिकाय' कहते हैं । एक पुद्गलाणु अन्य पुद्गलाणुसे तथा स्कन्धसे जव मिल जाता है तब वह बहुप्रदेशी होता है । उस समय उसको काय कहते हैं। जल, वायु, पृथ्वी, अग्नि ये चार स्वतन्त्र द्रव्य नही हैं। ये पुद्गलकी ही अवस्थाविशेष है। मन भी स्वतन्त्र द्रव्य नही, भावमन जो कि ज्ञानस्वरूप होनेसे जीवमे अन्तर्भूत है और द्रव्यमन अष्टदल कमलाकार पुद्गलावस्था-विशेषरूप होनेसे पुद्गलमें अन्तर्भूत है। वायु, मन तथा जलादिकोमे पुद्गलपनाकी सिद्धि युक्तिसे आचार्यने दिखायी है । शब्द आकाश गुण है ऐसा अन्यवादी कहते हैं परतु शब्दभी पुद्गल है क्यो कि, शब्दमे स्थूल सूक्ष्मतादि धर्मों के साथ अभिघातादि धर्म हैं । जो कि पुद्गलके सिवाय अन्यत्र उपलब्ध नही होते है। आकाशके समान यदि शब्द अमूर्तिक होता तो वह श्रवणयोग्य नही होता। उसमे भापात्मकता नही आ सकती। दिशाकाभी आकाशमे अन्तर्भाव होता हैं क्योंकि आकाशके प्रदेशोमेही चन्द्र सूर्यादिके उदयादिसे पूर्व पश्चिमादि व्यवहार होते हैं । अत जैनागममे छहही द्रव्य कहे हैं। .

(५) पुद्गलादि द्रव्योको लोक कहते हैं उनको आश्रय देनेवाले आकाशको लोकाकाश कहते हैं । तथा जहा ये द्रव्य नही हैं केवल आकाशही है उसे अलोकाकाश कहते हैं। ऐसे आकाश- द्रव्यके दो भेद हैं। धर्मादि द्रव्योके गतिहेतुत्वादिक लक्षण कहकर उनके उपकारोका वर्णन कर ससारी जीवको पहचाननेके हेतु जो प्राणापान हैं वे वायु अर्थात् पुद्गलद्रव्यके अवस्थाविशेष हैं यह वतलाया गया है। तदनन्तर आस्रवतत्त्वका वर्णन किया गया है। आत्मामे कर्मके आगमनको आस्रवतत्त्व कहते हैं । वह मन, वचन तथा कायके स्पदनसे होता है। इस स्पन्दनको योग कहते हैं। और उससे प्राणिहिंसनादि अशुभ कार्य तथा देवपूजनादि शुभ कार्य होनेसे उनको क्रमसे अशुभयोग तथा शुभयोग कहते है। आस्रवके इन्द्रिय, कषाय, अबिरति तथा क्रियाओसे पाच, सोलह, वारा और पच्चीस ऐसे क्रमसे भेद होते हैं । कषायरहित जीवके आस्रवको ईर्यापथ और कषायसहित जीवके आस्रवोको सापरायिक कहते हैं। ज्ञानावरणादिक कर्मास्रवोंके विशेष कारणोका वर्णन करनेके अनतर वन्धतत्त्वका और सवरतत्त्वका सक्षेपसे वर्णन कर नीवा अध्याय समाप्त किया है। दशवे अध्यायमें सविपाका और अविपाका निर्जराका वर्णन है। ससारी प्राणीके आत्मप्रदेशके साथ वधे हुए कर्मके निषेक प्रतिसमय उदयमे आकर अपना फल देकर खिर जाते हैं। उसको कालकृत निर्जरा अथवा सविपाका निर्जरा कहते है। यह निर्जरा चतुर्गतिके प्राणियोको होती है। उस समय रागद्वेष उत्पन्न होनेसे नये कर्म वधते हैं। दूसरी अविपाका निर्जरा वीतराग मुनियोंके कर्मका उदयकाल प्राप्त होनेके पूर्वही तपश्चरणसे होती है। इस निर्जराके समय आत्मा रागी, द्वेषी, मोही नही होता । तपश्चरणको उपक्रम कहते हैं। इसके प्रभावसे होनेवाली निर्जराको औपक्रमिकी निर्जरा कहते हैं। इसके अनन्तर तपकी निरुक्ति और उसके हेतु दिखाकर वृत्तिपरिसख्यानादि बाह्य तपोका वर्णन आचार्यने किया। तदनन्तर अभ्यन्तर तपोमेसे पहले प्रायश्चित्त तपका अतीव विस्तारसे १५० श्लोकोमे वर्णन किया है । यह प्रायश्चित्त तप मुनि, आर्यिका, श्रावक तथा श्राविका दोपानुसार आचार्यके पास जाकर अपना दोष कह कर धारण करते हैं। काल, क्षेत्र आदिकी अपेक्षासे तथा तीव्र मन्दादि परिणामोकी अपेक्षास प्रायश्चित्त अनेक प्रकारसे न्यूनाधिक धारण करना पड़ता है। जो दोष मुनिसे हुआ वही दोप क्षुल्लक ऐलकसे होनेपरभी प्रायश्चित्त समान नही होता। दोष लगनेसे चारित्र नष्ट होता है। उसके नाशसे कर्मनाश नही होता। कर्मके सद्भावसे मुक्ति प्राप्त नहीं होती। अतएव दोपके नाशार्थ मुनिवर प्रायश्चित्त तप करते हैं। कोई दोष कायोत्सर्गसे नष्ट होते है । जिनवन्दनाको जाते समय ईर्यापथशुद्धिमे यदि असावधानता होगी तो कायोत्सर्गसे वह (६) 7 दोष नष्ट होता है। मलोत्सर्ग करनेपर कायोत्सर्गसे शुद्धि होती है। एक कायोत्सर्गमे नौ पच- नमस्कार होते है। कौनसा दोष कितने कायोत्सर्गोंसे नष्ट होता है इस विषयका विवेचन कायोत्सर्गके प्रकरणमे है । कुछ दोष प्रतिक्रमणसे नष्ट होते हैं जैसे जू, खटमल आदिक जन्तुओको मुनि पकडे तो प्रतिक्रमणसे उनकी शुद्धि होती है। उष्णकालमे दोषका प्रायश्चित्त जघन्य होता है। वर्षाकालमे मध्यम तथा शीतकालमे उत्कृष्ट होता है। इस प्रायश्चित्ततपके आलोचना, प्रतिक्रमण, तदुभय, विवेक, व्युत्सर्ग, तप, छेद, परिहार, उपस्थापना, पारचिक ऐसे दश भेद हैं। इनका आचार्यने खुलासा इस विभागमे किया है। इस प्रकार दसवे अध्यायमे निर्जरा और प्रायश्चित्तका वर्णन आचार्यने किया है। - - - ग्यारहवे अध्यायमें आचार्यने आर्तध्यान, रौद्रध्यान, धर्मज्ञान और शुक्लध्यानका वर्णन कर शुक्लध्यानसे सब कर्मोंका नाश होनेसे मोक्षप्राप्ति होनेका प्रतिपादन किया है। इस अध्यायके प्रारम्भमे विनयतपका वर्णन करते हुए आचार्यने उसके चार भेदोका निरूपण किया है। तदनतर वैयावृत्त्यतपके कथनमे आचार्य, उपाध्याय, साधु आदि दशविध मुनियोका वर्णन किया है। उनकी सेवाशुश्रूषा करना महापुण्य प्राप्तिका कारण है। स्वाध्यायसे व्रतोका निरतिचार पालन होता है। स्वाध्यायमे मन, नेत्र, आदिक इन्द्रियोके लगनेसे सयमकी प्राप्ति होती है। स्वाध्यायसे धर्म और शुक्लध्यानकी प्राप्ति होती है जिससे कर्मका क्षय होकर मोक्ष प्राप्त होता है । स्वाध्यायके अनन्तर ध्यानका लक्षण लिखकर आर्तरौद्र ध्यानके भेदोका वर्णन किया है। ये ध्यान ससारभ्रमणके कारण है। इसलिये इनको अप्रशस्त कहते है। धर्मध्यान तथा शुक्लध्यान प्रशस्त हैं। इनसे जीवको स्वर्ग तथा मोक्षकी प्राप्ति होती है। आर्तध्यान मिथ्यात्व- गुणस्थानसे लेकर प्रमत्तगुणस्थानतक होता है । तथा रौद्रध्यान मिथ्यात्वसे लेकर सयतासयतान्त- पाचवे गुणस्थानतक होता है। धर्मध्यानके चार भेदोमेसे पहला भेद आज्ञाविचय है। उपदेशके अभावसे, जीवादि तत्त्वोके सूक्ष्मस्वरूपका ज्ञान अपनी स्थूलबुद्धीसे नही होता अतः सर्वज्ञकी आज्ञाको प्रमाण मानकर तत्त्वोके अर्थका निश्चय करना आज्ञाविचय कहलाता है। अपायविचय- जो मिथ्यादृष्टि जीव सर्वज्ञकी आज्ञा न मानकर रत्नत्रय मार्गसे हट गये हैं-च्युत हुए है उनको किस प्रकार रत्नत्रय- मार्गमे लगाना चाहिये इस प्रकारके चिन्तनको अपायविचय धर्मध्यान कहते हैं। विपाकविचय- ज्ञानावरणादिक कर्मोंका द्रव्य, क्षेत्र, काल तथा भावादिकारणोसे विपाक होता है तथा उनका नानाविध फल मिलता है ऐसा बार बार चिन्तन करना विपाकविचय है। लोकसस्थान विचय- लोककी आकृतिका बार बार विचार करनेको सस्थानविचय कहते हैं । ये चार प्रकारके धर्मध्यान अविरत सम्यग्दृष्टिसे लेकर अप्रमत्तसयत नामक सातवे गुणस्थानतक होते हैं। ये चार धर्मध्यान योगियोको अनन्तानन्त सुखकी प्राप्तिके कारण हैं।

(७) शुक्लध्यानके पृथक्त्ववितर्क सविचार, एकत्ववितर्क अविचार, सूक्ष्मक्रियासपाति, तथा समुच्छिन्नक्रिय ऐसे चार भेद हैं, पहिले दो भेद श्रुतकेवलीको होते हैं। उत्तर दो भेद सयोग- क्रेवलीको तथा अयोगकेवलीको होते हैं। शुक्लध्यानके इन चार भेदोका अथकारने विस्तारसे वर्णन किया है। इन चार ध्यानोंसे- यथाख्यात चारित्रकी प्राप्ति होती है। यह चारित्र साक्षान्मोक्षका कारण है। ज्ञानावरणादि आठ कर्मोंका नाश होनेसे मोक्षकी प्राप्ति होती है। ज्ञानावरण, दर्शनावरण, मोहनीय और अन्तराय ये चार कर्म घातिकर्म हैं। इनसे ज्ञान, दर्शन, सम्यक्त्व तथा शक्तिका घात होनेसे इन्हे घातिकर्म कहते हैं। बन्धके कारणभूत मिथ्यात्वादिकोका नाश होनेसे तथा संपूर्णतया कर्मनिर्जरा होनेसे मोक्ष होता है। उस समय शरीरोका अभाव होकर अनन्तसौख्यादिक-भावयुक्त आत्मा बन जाता है । इस अवस्थाका कभीभी नाश नहीं होता। इस अध्यायके अन्तमे समन्तभद्राचार्यके वचनोकी प्रशसा की है। आचार्यके वचन भव्योको भ्रान्तिरहित करते है। उनके वचन सुननेवालोको दो-तीन भवोसे मुक्तिप्राप्ति होती है। तथा जो मन, वचन, कायसे भक्ति करता है उसे इच्छितसिद्धि शीघ्र होती है । बारहवे परिच्छेदमें प्रथमत पचपरमेष्ठियोका स्वरूप लिखा है। तदनन्तर सक्षेपसे अनुप्रेक्षाओका स्वरूप लिखा है। तदनन्तर ग्रन्थकारने पडित-पडितादि पाच मरणोका उनके भेदप्रभेदोके साथ विशदतया वर्णन किया है। पडितपडितमरण- क्षायिकज्ञानादि नवकेवल- लब्धियोके धारक केवली इस मरणसे कर्ममुक्त होते है। पण्डितमरण- महाव्रत, समिति, गुप्तियोंके पालकमुनियोको यह प्राप्त होता है। रत्नत्रयपरिणतबुद्धिको पण्डा कहते हैं। मुनियोमे रत्नत्रयपरिणतबुद्धि होनेसे उनको पण्डित कहना'योग्यही है। वालपण्डितमरण- सयतासयतके मरणको वालपण्डित मरण कहते हैं। बालमरण- सम्यग्दर्शन तथा सम्यग्ज्ञान ये दो गुण जिनमे हैं किन्तु जो सर्वथा चारित्ररहित हैं, उनको वाल कहते हैं। उनके मरणको वालमरण कहना चाहिये । वालवालमरण- मिथ्यादृष्टियोके मरणको वालवालमरण कहते हैं। आवीचिमरणादि और भी भेद है। सव मिलकर सत्रह प्रकारके मरण हैं। सन्यासमरणके विषयमे आचार्य नरेन्द्रसेन ऐसा कहते हैं-आयुष्यका क्षय होनेसे प्राणी मरता ही है । उस समय वह अधीर हो या धैर्यवान् हो मरणसे अपनेको नही बचा सकता। इसलिये धैर्य धारण कर प्राणत्याग करनेसे उसके ससारदुखका नाश होता है । सन्यास मरणके समय जो क्रियाकाण्ड किया जाता है उसके चालीस अधिकार हैं। उनका वर्णन अतिविस्तारसे शिवकोटयाचार्यने मूलाराधनामे किया है। परतु उनके केवल यहा आचार्य नरेन्द्रसेनजीने नाम दिये है। उनके आवारसे आराधना की जानी चाहिये अन्यथा प्राणी मिथ्यात्वाराधनासे हीन हो जावेगा। जव सयमको नष्ट करनेवाला असाध्य महाव्याधि उत्पन्न होता है, अतिशय भयकर दुर्भिक्ष उत्पन्न होता है, अथवा नि प्रतीकार उपसर्ग होता है तब वह साधु सल्लेखनाके योग्य .

(८) होता है। मरणभय छोडकर, मनको शान्तिमें रखकर कान्दी, किल्बिषी आदिक पाच अशुभ भावनाओको छोडकर सम्यग्दर्शन, ज्ञान, चारित्र, तप और वीर्यादिकोंकी भावना करनी चाहिये जिससे वह साधु शुभगतिको प्राप्त होता है। इस प्रकार वर्णन कर ग्रन्थकारने अन्तमे सज्जन- दुर्जनका वर्णन कर ग्रन्थरचनाके विषयमें अपनी लघुता प्रगट की है। ३. ग्रन्थकारको आचार्यपरंपरा, काल व रचना। ? ग्रन्थकारने इस ग्रन्थके अन्तमे जो प्रशस्तिपद्य दिये हैं उनके प्रारभके दो श्लोकोमे लाडवागड संघकी उत्पत्तिका उन्होने इस प्रकार उल्लेख किया है। श्रीवर्धमान जिनेश्वरके इन्द्रभूत्यादि ग्यारह गणधरोमेसे मेदार्य नामके दसवे गणधर थे । वे जिस देशमे थे वहां की भूमि उनके प्रभावसे स्वर्गतुल्य हुई थी तथा वहाके लोग हार केयूरादि भूषणोसे समृद्धभूषित होनेसे वे झाट ( लाट ) हुए और उनसे वागडोकी उत्पत्ति हुई जिससे यह सघ लाडवागड (7) नामसे प्रसिद्ध हुआ। लाडवागड सघकी उत्पत्तिके विषयमे 'धर्मरत्नाकर' श्रावकाचारके रचयिता श्रीजयसेनाचार्यकाभी यही अभिप्राय है। श्रीजयसेनाचार्यने धर्मरत्नाकरके अन्तमे जो प्रशस्ति लिखी है उसके 'भञ्जवादीन्द्रमान यत्रास्पद विदधती' उत्पत्तिस्तपसा' ये तीन श्लोक नरेन्द्रसेनाचार्यकी प्रशस्तिमेभी पाये जाते हैं।' , धर्मरत्नाकरकी प्रशस्तिमे धर्मसेन, शान्तिषेण, गोपसेन और भावसेन, ऐसे आचार्योंके क्रमसे नाम दिये हैं। जयसेनाचार्य भावसेनाचार्यके शिष्य थे। जयसेनाचार्यने अपने पूर्ववर्ती आचार्योका उल्लेख करके धर्मरत्नाकरकी प्रशस्ति-समाप्ति की है। इस प्रशस्तिके आगे नरेन्द्रसेनाचार्यने अपने पूर्ववर्ती ब्रह्मसेन, वीरसेन तथा गुणसेन इन तीन और आचार्योंका उल्लेख किया है। प्रस्तुत ग्रन्थकर्ता नरेन्द्रसेन गुणसेन आचार्यके शिष्य हुए हैं। गुणसेन आचार्यके नरेन्द्रसेनके समान गुणसेन, उदयसेन और जयसेन ऐसे अन्य तीन शिष्य थे। प्रथम गुणसेनके पट्टपर ये द्वितीय गुणसेन आरूढ होकर आचार्यपद भूषित करने लगे। इस प्रकार नरेन्द्रसेनाचार्यको प्रशस्ति है। श्रीजयसेनविरचित धर्मरत्नाकरका समय । जिन्होने धर्मरत्नाकरकी रचना की वे जयसेनाचार्य नरेन्द्रसेनाचार्यके पूर्ववर्ती है। उन्होने अपना ग्रन्थ ' सवलीकरहाटक' नामक ग्राममे वि. सं. १०५५ मे रचकर पूर्ण किया है। इसका खुलासा आगेके श्लोकमें उन्होने किया है।- वाणेन्द्रियध्योमसोममिते संवत्सरे शुभे । ग्रन्थोऽयं सिद्धता यातः सबलीकरहाटके ।

(९) इसमे वाण और इन्द्रियशब्द पांच अकके वाचक है, व्योमशब्द शून्यका तथा सोमशब्द एक अकका। अत धर्मरत्नाकर ग्रन्थ वि स १०५५ मे रचा है ऐसा सिद्ध होता है । इसके पश्चात् उक्त तीन आचार्यो अर्थात् ब्रह्मसेन, वीरसेन और गुणसेनका काल यदि हम १०० वर्षभी मानले तो नरेन्द्रसेनाचार्यका काल लगभग वि स ११५० सिद्ध होता है। सिद्धातसारके अन्त परीक्षणसेभी उसकी रचनाका यही काल सिद्ध होता है। इस ग्रन्यमे ' शव्दकी नित्यता, वेदकी अपौरुषेयता, केवलिकवलाहार, स्त्रीमुक्ती, ईश्वरका सृष्टिकर्तृत्व आदिविपयोके खण्डनमे प्रभाचन्द्राचार्य तथा अनन्तवीर्याचार्यद्वारा दी हुई युक्तियोका आश्रय लिया गया है । उसके कुछ उदाहरण- १) देवैर्दीप्तगुणैविचार्य विविधवत्सङ्ख्यातते सग्रहात् । ( अनन्तवीर्याचार्य ) १) देवर्दीप्तगुणदृष्टमिष्टमत्राभिनन्दतु ( नरेन्द्रसेनाचार्य ) २) न चाध्यक्षमशेपज्ञविषय, तस्य रूपादिनियतगोचरचारित्वात् । सम्बद्धवर्तमान- विषयत्वाच्च । न चाशेपवेदी सवद्धो वर्तमानश्च । न च सर्वज्ञसद्भावाविनाभाविकार्यलिङ्ग वा सपश्याम । तज्ज्ञप्ते पूर्व तत्स्वभावस्य तत्कार्यस्य वा तत्स्वभावाविनाभाविनो निश्चेतुमशक्यत्वात्। नाप्यागमात्तत्सद्भाव स हि नित्योऽनित्यो वा तत्सद्भाव भावयेत् । न तावन्नित्य तस्य अर्थवाद रूपस्य कर्मविशेष सस्तवनपरत्वेन पुरुपविशेपावबोधकत्वायोगात् । अनादेरागमस्यादिमत्पुरुष- वाचकत्वाघटनाच्च । नाप्यनित्य आगम सर्वज्ञ साधयेत् । तस्यापि तत्प्रणीतस्य तनिश्चयमन्तरेण प्रामाण्यानिश्चयादितरेतराश्रयत्वाच्च । प्रमेयरलमाला अ ३ रा पृष्ठ ३३ २) वदन्त्यन्ये न सर्वज्ञो वीतरागोऽस्ति कश्चन । प्रमाणपञ्चकाभावादभावेन विभावित ॥ तथा ह्यध्यक्षत सिद्धि सर्वज्ञे नोपजायते । रूपादिनियतानेकविषयत्वेन तस्य च ।। सम्बद्धवर्तमानत्वपरत्वान्नास्य साधकम् । तत्प्रत्यक्षमसबद्धवर्तमानत्वत सदा ॥ नैवानुमानत सिद्धि सर्वविद्विपया क्वचित् । यल्लिङ्गाल्लिङ्गिनि ज्ञानमनुमान प्रजायते ।। स्वभावकार्यरूप वा न तल्लिङ्ग विलोक्यते । ततस्तस्य कुत सिद्धिरनुमानुपपत्तिता ॥ आगमादपि नो सिद्धिर्जायते सर्ववेदिन । स च नित्यो ह्यनित्यो वा तत्स्वभावे विभावयेत्।। नानित्योऽनादिरूपत्वादर्थवादप्ररूपणात् । आदिमत्पुरुषेणास्य वाचकत्वविरोधत ॥ तदुक्तानुक्तभेदाभ्यामनित्यो नास्य साधक । अन्योन्याश्रयतस्तस्य प्रामाण्याभावतस्तत ।। सिद्धान्तसारसग्रह अ ४ पृष्ठ ८१-८२ हमने यहा एक विपयमेही नरेन्द्रसेनाचार्यके पद्योमे अनन्तवीर्याचार्यके उपर्युक्त गद्याशका अनुकरण दिखाया है। इसी तरह वेदकी अपौरुषेयता आदिक विषयोके विकल्पोके खण्डनमण्डनमेभी अनन्तवीर्याचार्यका अनुकरण स्पष्ट दिखाई देता है । अत अनन्तवीर्याचार्यके उत्तरवर्ती ये नरेन्द्र- सेनाचार्य हुए है ऐसा निश्चय अयुक्त नही है । श्रीप्रभाचन्द्राचार्य भोजराजाके राज्यमे अर्थात् धारानगरीमे रहते थे। उन्होने भोजराजाके समयमे परीक्षामुख नामक ग्रन्थकी 'प्रमेयकमलमार्तण्ड ' नामक टीका रची है । भोजनृपका समय इतिहासज्ञोने वि स १०७० से १११० पर्यन्त माना है । अत प्रमेयकमल- 4 (१०) मार्तण्डकी रचना १०७० से १११० के बीचमे हुई होगी । तथा अनन्तवीर्याचार्यने प्रमेयकमल- मार्तण्डका समीचीनरीतीसे अध्ययन कर तदनन्तर प्रमेयरत्नमाला बनाई है। अत. प्रमेयरत्न- "FT मालाकार उनके उत्तरवर्ती तथा सिद्धान्तसारसङग्रहकर्तासे पूर्ववर्ती सिद्ध होते है । नरेन्द्रसेनाचार्यका प्रतिष्ठादीपक । नरेन्द्रसेनाचार्यने । सिद्धान्तसारसग्रह ' तथा 'प्रतिष्ठादीपक ' ऐसे दो ग्रन्थ रचे है। प्रतिष्ठादीपकके अन्तमे ' इति श्रीपण्डिताचार्यश्रीनरेन्द्रसेनाचार्यविरचित प्रतिष्ठादीपक समाप्त. ऐसा उल्लेख है । तथा-- सर्वग्रन्थानुसारेण सक्षेपाचित मया। प्रतिष्ठादीपक शास्त्र शोधयन्तु विचक्षणा ॥ ग्रन्थारम्भमे मगल श्लोक इस प्रकार है- विश्वविश्वम्भराभारधारिधर्मधुरन्धर । देयादो मङ्गल देवो दिव्य श्रीमुनिसुव्रत । नमस्कृत्य जिनाधीश प्रतिष्ठासारदीपकम् । वक्ष्ये बुद्धयनुसारेण पूर्वसूरिमतानुगम् ॥ इस प्रतिष्ठासारदीपकमे जिनमूर्ति, जिनमदिर आदिकोके निर्माणमे तिथि, नक्षत्र, योग आदिकका विचार करना चाहिये ऐसा कहकर किस तिथ्यादिकोमे इनकी रचना करनेसे रचयिताका शुभाशुभ होता है इत्यादि वर्णन किया है । यह ग्रन्थ साडेतीनसौ श्लोकोका है। इस ग्रन्थके अन्तमे प्रशस्ति नही है। इस ग्रन्थमे स्थाप्य, स्थापक और स्थापना ऐसे तीन विषयोका वर्णन है। पञ्चपरमेष्ठी तथा उनके पञ्चकल्याण और जो जो पुण्यके हेतुभूत हैं वे स्थाप्य हैं। यजमान इन्द्र स्थापक है। मत्रोसे जो विधि की जाती है उसे स्थापना कहते है। तीर्थंकरोके पञ्चकल्याण जहा हुए हैं ऐसे स्थान तथा अन्य पवित्रस्थान, नदीतट, पर्वत, ग्राम, नगरादिकोके सुदरस्थानमे जिनमदिर निर्माण करने चाहिये । आरभसे हिंसा होती है, हिंसासे पाप लगता है, तोभी जिनमदिर बान्धनेमे किये नानेवाले आरभसे महापुण्य प्राप्त होता है, जिनधर्मकी स्थिति जिनमदिरके विना नही रहती। तथा जिनमदिर मुक्तिप्रासादमे प्रवेश करनेमे सोपानके समान सहायक है । अत जिनमदिरकी रचना करनी चाहिये ऐसा हेतु आचार्यने प्रदर्शित किया है । वे ऐसा कहते है- यद्यप्यारम्भतो हिंसा हिंसाया पापसम्भव । तथाप्यत्र कृतारम्भो महत्पुण्य समश्नुते ।। निरालम्बनधर्मस्य स्थितिर्यस्मात्तत सताम् । मुक्तिप्रासादसोपानमाप्तैरुक्तो जिनालयः ।। इस प्रतिष्ठा ग्रन्थकी रचना देखनेसे आचार्य ज्योति शास्त्रमे निष्णात थे ऐसा सिद्ध होता है । अस्तु । प्रस्तुत सिद्धान्तसारसग्रहकी प्रेसकापी, अनुवाद, सशोधन आदि दो प्रतियोसे किया है। एक प्रति यहाके गुरुकुलके पुस्तकालयमे थी। तथा दुसरी आमेर भाण्डारमे थी। दोनो प्रतियाँ प्राय शुद्ध है। यदि अनुवादमे जहा कही प्रमादवश दोष लग गया हो उसे सुधार लेनेकी व सूचना देनेकी मैं विद्वान् पाठकोसे प्रार्थना करता हूँ । - सिद्धान्तसारसंग्रहका विषयानुक्रम لہ ३ ३ ४ ४ ५ पृष्ठसख्या प्रथमपरिच्छेद मङ्गलस्तुति १-२ ग्रन्थरचना-प्रतिज्ञा रत्नत्रयसे जीवितसाफल्य समन्तभद्राचार्यके वचनोको दुर्लभता ३ धर्मसेही सुखप्राप्ति परीक्षापूर्वक धर्मग्रहण मिथ्याकुलधर्मकी हेयता सम्यग्दर्शनका स्वरूप देव, आगम-गुरुका लक्षण ५-६ सम्यग्दर्शनके पच्चीस दोषोका सविस्तर कथन निसर्गजादि सम्यग्दर्शनभेदोका स्वरूप ८-१० काललब्धियोका वर्णन १० सम्यग्दर्शनकी श्रेष्ठता ११-१२ सवेगादिक आठ गुणोका स्वरूप १२-१३ सम्यग्दृष्टि दोषदृष्टि नहीं हैं १४ सम्यग्दृष्टि जीव कहा उत्पन्न १५-१६ द्वितीय परिच्छेद १७-४८ पृष्ठसख्या श्रुतज्ञानके पर्याय, पर्यायसमासादिक वीसभेदोका वर्णन ३६-३९ अवधिज्ञानका विवरण ३९-४० देशावधिज्ञानके भेद और स्वामी ४०-४२ अवधिज्ञानके तीन भेदोका कथन ४२ मन पर्ययज्ञानके भेद और उनके स्वरूपका कथन ४२-४४ केवलज्ञानके स्वरूपका वर्णन ४४-४५ मत्यादिक ज्ञान और कुज्ञान कैसे होते है? ४६-४७ प्रत्यक्ष और परोक्षज्ञानका वर्णन तथा सम्यग्ज्ञानकी महिमा ४७-४८ तृतीय परिच्छेद ४९-६७ महावीर-जिनस्तुति ४९ चारित्रका लक्षण और उसके भेद ४९-५० हिंसा और हिंसाके भेद ५०-५१ हिंसासे इहपरभवमे दारुणदुखकी प्राप्ति- ५१-५२ मन्त्रपूर्वक पशुहिंसा शान्ति करनेवाली है इस विषयका ख़डन ५३ देव, अतिथि और गुरुके निमित्त की गयी हिसाभी हिंसाफलकोही देती है ५४ अहिंसाका फल तथा उसकी पाच भावनाओका वर्णन ५४-५५ असत्यवचनका लक्षण और उसके भेद ५५-५७ सत्यभाषणका शुभ फल तथा उसकी भावनाओका वर्णन ५७-५८ अचौर्यव्रतका लक्षण, धन वाह्य प्राण है, चोरसे अधिक पापी कोई नहीं है ५८ अचौर्यव्रतकी भावनामोका वर्णन ५९ नहीं होते ? सम्यग्ज्ञानका लक्षण १७ सन्निकर्ष प्रमाणका खण्डन १७-१९ सम्यग्ज्ञानके भेद मतिज्ञानका सविस्तर वर्णन २०-२३ बुद्धिऋद्धिरूपमतिज्ञानका वर्णन २३-२५ बारह अग और चौदह पूर्वोकी प्रदसख्या और उनके विषयोका वर्णन २५-३३ पदभेदोका वर्णन सामायिकादि चौदह अङ्गवाह्य ३४-३६ श्रुतका वर्णन (२) ७७ पृष्ठसख्या कर्मनोकर्मग्रहण भी चोरी है ऐसी शंकाका उत्तर ५९-६० नगरादिमार्ग तथा श्रावकगृह आदिक अदत्त होनेसे उसमे प्रवेश करनेसे मुनियोको चौर्यदोष लगता है इस शकाका उत्तर ६० ब्रह्मचर्यव्रतका लक्षण ६० ब्रह्मचारी धन्यवादका पात्र है ६१ स्त्री रात्रि, नदी, दृष्टिविषासर्पिणी तथा वह्निज्वालाके समान है ६१-६२ ब्रह्मचारीको निरतर सुखकी प्राप्ति ६२ ब्रह्मचर्यकी पांच भावनाओका वर्णन ६३ मुनिजन कामोन्मादक आहार नही लेते है ६३ परिग्रहविरति-व्रतका वर्णन ६४ ज्ञानादिक भाव परिग्रह क्यो नही? इसका उत्तर ६५ रागद्वेषोके अभावसेही व्रतपालन ६५ सज्जन सपत्ति आपत्तिओमे हर्षविषाद रहित होते हैं ६६ गुरु कैसा होना चाहिये ६६-६७ चतुर्थपरिच्छेद ६७-११० शल्यके निरुक्तिपूर्वक भेद ६८ मायाशल्यका वर्णन मिथ्यात्वशल्यके भेदोका प्रतिपादन ७० आत्मा नित्य माननेमे दोष आत्मा क्षणिक माननेमे दोष ७१-७३ आत्मा नामक पदार्थ नहीं है ऐसा चार्वाकका पूर्वपक्ष ७३-७४ आत्मतत्त्वकी सिद्धि करनेवाला जैनोका सिद्धान्तपक्ष-उत्तरपक्ष ७४-७६ शरीर पूर्वकर्मकृत है तथा अचेतन है तथापि उसमे हर्ष विपादादि उत्पन्न करनेवाले नाना स्वभाव है पृष्ठसख्या आत्मा नित्य, व्यापी, अकर्ता अमूर्तिक है ऐसा साख्योके मतका खण्डन प्रकृति सर्वज्ञ, जगन्निर्मात्री तथा सर्व सहार कारिणी है ऐसा साख्यका पूर्वपक्ष ७८ प्रकृतिवादका खण्डन तथा साख्यमतमे अहिंसावतके सिद्धयभावका कथन ७९-८१ कोई आत्मा सर्वज्ञ नही होता ऐसा मीमासकोका पूर्वपक्ष ८१-८३ कोई आत्मा सर्वज हो सकता है ऐसा जैनोका सिद्धान्तपक्ष ८३-८५ प्रत्यभिज्ञान प्रमाणसे शब्द नित्य, व्यापी तथा वर्णसहित होनेसे अपौरुषेय है ऐसामीमासकोका पूर्वपक्ष८५ वेदकी अपौरुषेयताका खण्डन ८५-८७ कान ध्वनियोसे सस्कृत होकर शब्द ग्रहण करते हैं इस विषयका खण्डन ८७ वेदकी प्रवाहनित्यताका खण्डन ८७-८९ ईश्वर सृष्टिकर्ता होनेसे सर्वज्ञ हैं ऐसा नैयायिक वैशेपिकोका पूर्वपक्ष ९०-९१ ईश्वर सृष्टिकर्ता नही हो सकता ऐसा जैनोंका सिद्धान्तपक्ष ९१-९५ जिनेश्वर कवलाहार करते हैं ऐसा श्वेताम्वरोके कथनका खण्डन आहारग्रहणसे सुख होता है ऐसे कथनका दिगबरोसे खण्डन ९५ लोग आहार रागभावसे ग्रहण करते हैं केवलि जिनेशमे रागभाव नही अत वे भोजन नही करते हैं । वे पूर्ण वीतराग हैं कवलाहारके बिना केवलीकी देहस्थिति नही अत. वह आहार ग्रहण करते है इसका उत्तर ९६-९७ ९५ ७७ पृष्ठसख्या अरिहन्त औदारिक देहवाले हैं इसलिये कवलाहारसे उनकी देहस्थिति होती है इस मतका दिगबर जैन निराकरण करते हैं ९७-९८ वेदनीय कर्मका केवलियोमे सद्भाव होनेसे वे आहार लेते हैं इस कथनका खण्डन ९८-९९ शुद्ध अशुद्धका स्मरण न करते हुए हम भोजन करते है वैसे केवलीभी भोजन करते हैं इस मतका निराकरण १०० केवलियोको क्षुधा तृषादि ग्यारह परिषद होते हैं ऐसा आगमके 'एकादश जिने इस सूत्रमे कहा है इस आक्षेपका उत्तर १०१ "स्त्रियोको अविकल कारण होनेसे मुक्ति होती है जैसे पुरुषको होती है" इस श्वेताम्बर मतका निरसन १०३-१०४ शरीरकी उष्णतासे हवामे रहने- वाले जन्तुओका नाश होता है परतु वस्त्र ग्रहणसे उनका नाश नही होता अत आर्यिकाये वस्त्रग्रहण करती है । वे रागा- दिभावसे ग्रहण नही करती हैं, इस अभिप्रायका खण्डन १०४-१०५ नग्नतासे स्त्रियोके मनमे लज्जा उत्पन्न होती है इसलिये मुनियोको नग्नता धारण करना योग्य नही है इस आक्षेपका दिगम्बराजनोके द्वारा निरसन १०५-१०६ पृष्ठसख्या आचेलक्य दश स्थितिकल्पोमे पहला स्थितिकल्प सर्व व्रतोका अधिष्ठान है । स्त्री परिषहभग्न पाखडी लोग इसे धारण करनेमे असमर्थ हैं । इत्यादिक वर्णन १०६-१०७ निदानशल्यके प्रशस्त निदान और अप्रशस्त निदान ऐसे भेदोका वर्णन १०७ प्रशस्त निदानके ससार- निमित्तक और मोक्षनिमित्त भेदोका वर्णन १०७-१०८ अप्रशस्त निदानके भोगहेतुक और मानहेतुक निदान ऐसे दो भेद है और ये दोनोभी ससारके कारण है १०८-१०९ पञ्चम परिच्छेद १११-१४३ जीवशब्दकी निरुक्ति उपयोगका स्पष्टीकरण ११२ जीवके अमूर्तिकत्व, मूर्तिकत्व, कर्तृत्व, अकर्तृत्वका नयोंके द्वारा विवेचन आत्माकी व्यापकता और देह- परिमाणता, सोपाधिकत्व और निरुपाधिकत्व का नयदृष्टिसे वर्णन आत्माके ससारित्व, मुक्तत्व, सिद्धत्व तथा असिद्धत्व, उर्ध्वगति और ससारभ्रमणका नयदृष्टिसे वर्णन ११४ (४) पृष्ठसख्या पृष्ठसख्या विग्रहगतिमे कार्मणकाययोगका सविस्तर कथन १३१ चौरासी लक्ष योनियोका कथन १३२-१३४ सर्व ससारिजीवोके कुल कोटियोका तथा उनके आयुका कथन १३४-१३६ ससारिजीवोके देहोकी ऊचाई तथा गर्भादि जन्मोका वर्णन १३६-१३७ मार्गणाका लक्षण और उसके भेद १३७ औदारिक पाच शरीरोंका वर्णन १३७-१३९ जीवोका लिंगनिर्णय १३९ अनपवायुष्क जीवोका वर्णन १३९-१४० चौदह गुणस्थानोका कथन १४०-१४१ छह लेश्याओका कथन १४२ - ११७ छटा परिच्छेद चार्वादिक अन्यमतोका निरास करने के लिये जीव, उपयोगमय, कर्ता, भोक्ता आदि आधि- कारोका वर्णन ११५ आत्माके अकर्तृत्वमे दोषकथन ११५ आत्माके व्यापित्वका निरसन ११६ कर्मफल-भोक्तृत्व जीवमे नही है ऐसे कहनेवाले वौद्धमतका निराकरण ११६ आत्मा सदामुक्त है ऐसे सदाशिव मतका निरसन ११६ आत्माको मुक्तिप्राप्ति नही होती है ऐसा भाट्ट और कोलके मतका निराकरण ११६ मुक्तजीव सतत उर्ध्वगमन करते हैं ऐसा कहनेवाले मण्डलीक मतका निराकरण पञ्चप्रकार-ससारोका वर्णन ११७-१२१ ससारीके समनस्क अमनस्क भेद १२२ स्थावर जीवोमे पृथिवी, पृथिवीकाय तथा पृथिवीका- यिकादिक तीन भेदोका वर्णन १२२-१२३ स्थावरोके सूक्ष्मादि छह भेद १२३ एकेन्द्रियादि जीवोके प्राणोंका वर्णन १२३-१२४ द्रव्येन्द्रियादिके उपकारणा- दिक भेदोका वर्णन १२४-१२६ चौदह जीवसमासोंका वर्णन १२७ सज्ञी असज्ञी जीवोके लक्षण १२७ पर्याप्त तथा अपर्याप्त जीवोका कथन १२८ भव्य तथा अभव्य जीवोका लक्षण १२९ नामादिक निक्षेपोसे जीवके चार भेद। १३०. . -- १४४-१५४ नारकियोका आधारभूत स्थान १४४ तीन वातवलयोका विस्तार १४४ नरकभूमियोमे विलोकी सख्या १४५ रत्नप्रभादि नरकभूमियोकी मोटाईका कथन १४५ रत्नप्रभाके खरभागादि तीन विभागोका वर्णन १४६ खरभाग तथा पड्कभागमे भवनवासी तथा व्यन्तरदेवोके निवासस्थान १४६ अब्बहुलभागमें नरकवासोका कथन १४६ नरकपटलोका वर्णन १४७ नारकियोके देहोकी ऊंचाई १४७-१४९ नारकियोके आयुका पटलोकी १४९-१५० नारकियोकी लेश्याओका वर्णन १५०-१५१ अपेक्षासे कथन पृष्ठसख्या नरकविलोकी शीतोष्णताका वर्णन १५१ कौन कौन जीव किसकिस नरकमे उत्पन्न होते है इसका कथन १५१-१५२ किस नरकसे निकलकर जीव कौनसी अवस्थाको प्राप्त करता है ? १५२ नरकोमे नारकियोको प्राप्त होनेवाले दु खोका वर्णन १५३ ? सप्तम परिच्छेद १५५-१८५ (तिर्यड महालोकका वर्णन ) द्वीपसमुद्रोका वर्णन १५५-१५६ कालोदादिक तीन समुद्र जलस्वाद युक्त है १५६ वारुणीवर-समुद्र जलका मदिरा- स्वादके समान है १५६ क्षीरोदकवर-स -समुद्रजल शर्करा- मिश्रितदूधके समान है १५७ घृतोदकवर-समुद्रजल घृतस्वाद १५७ अवशिष्ट समुद्रोका जल मधु और इक्षुरसके समान है १५७ इन द्वीप समुद्रोपर व्यन्तरोके निवास है १५७ लवणोद, कालोद और स्वयभूरमण समुद्रमे ही मत्स्यादिक १५७ जम्बूद्वीपके क्षेत्र, पर्वत और १५७-१५९ विजयार्धपर्वत तथा उसके दोनो श्रेणियोका वर्णन १५९-१६० भरतक्षेत्रका सक्षेपसे वर्णन १६० पृष्ठसख्या हिमवान्, महाहिमवान्, निषध पर्वतोका तथा उनके ऊपर पद्मादि सरोवर और हैमवत, हरिवर्षका वर्णन १६०-१६३ मेरुपर्वत, विदेहक्षेत्र, उसके देश, वक्षारपर्वत, विभङ्गानदिया आदिकोका वर्णन १६३-१६९ मेरुके उत्तर दिशाके क्षेत्रादिकोका सक्षिप्त कथन १६९-१७० घातकीखडका सक्षेपसे कथन १७०-१७१ पुष्करद्वीपका सक्षेपसे कथन १७१ मनुष्यक्षेत्र कहातक है १७१ स्वयभूमरणद्वीपके आधे भागमे नागेन्द्र पर्वत वलयाकार है १७१ मानुपोत्तर पर्वतके आगे असख्यात द्वीपसमुद्रोमे व्यन्तर और तिर्यंच रहते है १७२ आर्योंके भेदप्रभेदोका कथन १७२-१७७ कर्मभूमिज, म्लेच्छभूमिज और अन्तरद्वीपज म्लेच्छोका वर्णन १७७-१७८ कर्मभूमिका स्वरूप १७९ मनुप्यका उत्कृष्टत्तथा जघन्य आयु१८० पल्योपमके भेदोका वर्णन १८०-१८१ अवसर्पिणी उत्सपिणीके भेदोका वर्णन १८१-१८२ तियंच, मनुष्य, मत्स्य, सर्प तथा पक्षियोके आयुका वर्णन २८२-१८३ मत्स्योकी शरीरावगाहना १८३ पृथ्वीजलादिके आकार १८३ वनस्पति, वस तथा नारकियोके आकार १८३ मिथ्यादृष्टि मरकर कहा उत्पन्न होते है? १८४ निर्ग्रन्थमुनि और श्रावक कहा उत्पन्न होते है १८४-१८५ युक्त है हृदोका वर्णन (६) पृष्ठसल्या पृष्ठसंख्या देवोंके मूलदेहों की ऊचाई १९७-१९८ सौधर्मसे सर्वार्थसिद्धितक देवोकी लेश्यायें १९८ कल्पवासी तया कल्पातीत लौकान्तिक देवोका स्वल्प आयु तथा भेद १९८-१९९ देवोंके विचरमत्वका निरूपण १९९-२०० देवदेवीयोके उपपाद स्थान २०० भवनत्रिक, कल्पवासी तथा कल्पातीत देवोंके अवधिज्ञानोंमे विशेषता २००-२०१ नारकियोंके अवधिज्ञानका कथन २०१ एकभव धारण कर मुक्त होनेवाले देव २०१ आठवा परिच्छेद १६८-२०३ देवोंके चार भेद तथा पहले तीन भेदोंमें लेश्याओका कथन १८६-१८७ भवनवासि तथा व्यन्तरोंके भेदवर्णन १८७ ज्योतिप्क देवोके अवान्तर भेद १८८ ढाईट्ठीपके वाहर ज्योतिष्क देवस्थिर हैं १८९ जम्बूद्वीपमें तथा लवणसमुद्रमें चन्द्रसूर्योका चारक्षेत्र १८९ कर्कटसङक्रान्तिके समय सूर्यका पहले मार्गपर आना १८९ दक्षिणायनमे रात्रि-दिनका प्रमाण १९० चन्द्रका तारका-ग्रहनक्षत्रादि परिवार १९० चन्द्र और सूर्यके वलय १९१ ज्योतिप्कोका उत्कृष्ट और जघन्य आयु १९१ चन्द्रसूर्यके विमानोका प्रमाण १९१-१९२ ऋतुविमान कहां है १९२ स्वर्गयुगलोका वर्णन १९२-१९३ ऊलोकके अन्तिम एकरज्जु प्रदेशमे नववेयकादिक तथा सिद्ध जीव हैं १९३-१९४ भवनवासिदेव तथा व्यन्तरदेवके १९४ सौधर्मादि सर्वार्थसिद्ध्यन्त देवोके १९४-१९५ इन्द्रादिक दशभेदोका वर्णन १९५-१९६ इन्द्रादि दाभेदोमेसे व्यन्तर तया ज्योतिप्क देवोमे लोकपाल और त्रास्त्रिग ये भेद नहीं है १९६ प्रवीचारयुक्त तथा अप्रवीचार युक्त देवोका निरूपण १९७ मोक्षसुखका कथन २०१-२०२ चतुर्गतिमें गुणस्थान २०२ नववा परिच्छेद २०४-२३९ धर्माधर्मादि द्रव्योका लक्षणकथन २०४-२०५ पुद्गलका लक्षण, अन्नद्रव्योका कायपना तथा कायका अकायत्व २०५ जीवपुद्गलोका साधारण लक्षण २०६ पुद्गलोमे स्निग्वल्क्षत्वसे बन्द तथा जीवमे रागादित्नेहसे कर्मवन्व २०६ पृथिव्यादिकोमे पुद्गलत्वसिद्धि २०७-२०८ भावमन आत्मरूप तथा द्रव्यमन पुद्गलरूप हैं २०८ शब्द भी पौद्गलिक ही है २०८-२०९ पुद्गलोके स्थूलादिक छह भेद २०९ भाषात्मक शब्दके भेद २०९-२१० दिशाका आकागमे अन्तर्भाव २१० आकान तथा पुद्गलोंके प्रदेश २११ परमाणुका स्वरूप २११ आयुका वर्णन आयुका वर्णन (७) पृष्ठसख्या लोकाकाशका स्वरूप-निरूपण २१२ जीव लोकाकाशके कितने प्रदेशोमे रहता है उसका स्पष्टीकरण २१३ धर्मादिक द्रव्योका जीव पुद्गलपर उपकार २१४ प्राणापानोका स्वरूप तथा उनकी मूर्तिकता, पुद्गलके और भी उपकार २१५-२१६ जीवके ऊपर जीवके उपकार २१६ आसवका लक्षण तथा उसके भेद २१६-२१८ कषायकी निरुक्ति, भेद और स्वरूप २१८ इन्द्रियास्रव तथा क्रियास्रवके भेद २१९-२२२ तीवभावादिक आस्रवविशेष २२२-२२३ ज्ञानदर्शनावरणोके आस्रवकारण २२३-२२४ असद्वद्य तथा सद्वेद्य कर्मास्रवके कारण २२४-२२५ दर्शनमोहास्रवके कारण २२५-२२६ चारित्रमोहके आस्रवकारण २२६-३२७ नरकायु आदिक आस्रवके कारण २२८-२२९ अशुभ तथा शुभनामास्रवके कारण २२९-२३० तीर्थकर कर्मास्रवके कारण २३०-२३१ नीच गोत्र उच्चगोत्रालवके कारण २३१ अन्तरायास्रवके कारण २३१ एक समयमे कितनी कर्म प्रकृतियोका आस्रव होता है २३१-२३२ मिथ्यात्वके भेदप्रभेद २३२-२३४ कषाय बधके कारण २३४-२३५ कर्मकी उत्तर प्रकृतिया २३५-२३६ स्थितिबधादिक चार वधोका स्वरूप २३६-२३७ सवर तथा उसके भेदोका निरूपण २३७-२३८ पृष्ठसख्या दशम परिच्छेद २४०-२६२ निर्जराके दो भेदोका वर्णन २४० बाह्यतपके भेद २४१-२४२ अन्तर्गततपके भेद २४२ प्रायश्चित्तकी निरुक्ति २४३ प्रायश्चित्तके अज्ञाता आचार्य २४३ प्रायश्चित्तोके नाम २४३ पचकल्याण प्रायश्चित्तका स्पष्टीकरण २४३ उपवासका लक्षण २४४ प्रायश्चित्त प्रकरणमे छह बाते २४४ प्रायश्चित्तके सोलह दोष २४५ कायोत्सर्गसे निवृत्त होनेवाले दोष २४५-२४६ पुरुमण्डल प्रायश्चित्तके दोष ૨૪૬ अनन्तकायिक वनस्पतिका लक्षण २४६ त्रसजीवके नाशका प्रायश्चित्त २४७ मिथ्याकारसे शुद्धि २४८ सघकार्यकेलिये वर्षाकालमे गमन प्रायश्चित्तार्ह नही २४८ मैथुनसेवन-दोषका प्रायश्चित्त २४८ ज्ञानादिमदसे सार्मिकका अपमान करनेसे प्रायश्चित्त २४९ कषाय करनेवालेको प्रायश्चित्त २४९ तर्कादि अध्ययन पावस्थादि मुनियोंसे करनेवालेको प्रायश्चित्त २४९ प्राणीको मारते हुए देखनेसेभी मुनिको प्रायश्चित्त २४९ सघपालनार्थ राजस्नेह करना प्रायश्चित्त नही है २५० कालकी अपेक्षासे प्रायश्चित्त २५१ दश क्षेत्रोके नाम २५१ उत्कृष्ट प्रायश्चित्त कहा देना? २५२ (८०) पृष्ठसख्या जीवके मद मध्यमादि भावोके अनुसार प्रायश्चित्तके कोमल तीव्रादि भेद २६२ ग्यारहवा परिच्छेद २६३-२७८ पृष्ठसख्या आहारकी अपेक्षासे प्रायश्चित्त २५२ गर्व करनेवालाभी प्रायश्चित्ताह है २५२ प्रायश्चित्तके दशभेद २५३ दीक्षाच्छेद कब किया जाता है ? २५३-२५४ पारञ्चिक प्रायश्चित्त २५५ क्षेत्रकालाटिकोकी अपेक्षासे प्रायश्चित्त २५५ सावु, श्रावक, वालक आदिके घातका प्रायश्चित्त २५६-२५७ असत्यभापणादिकका प्रायश्चित्त २५७-२५८ मिथ्यादृष्टिसे कलह करनेका प्रायश्चित्त २५८ निद्रामेसे उठाना आदि २५८ विषयोमे प्रायश्चित्त सघापराध प्रकट करनेवालेको प्रायश्चित्त २५९ औदृगिक प्रायश्चित्त तथा मिथ्यात्वी साधुके साथ विहार करनेका प्रायश्चित्त २५९ गिलादिकोमे मुत्र लिखकर पढनेका प्रायश्चित्त अश्रावकोके यहां आहारका प्रायश्चित्त २५९ ज्ञानोपकरणादिकोके निषेधका प्रायश्चित्त २६० चाण्डालस्पनका प्रायश्चित्त २६० जिनदीक्षाके अधिकारी २६० वस्त्रप्रक्षालनका प्रायश्चित्त २६० यतिके साथ अकीतिको प्राप्त हुई आर्यिकाका नामभी ग्रहण न करे २६१ रजस्वला आर्यिकाकी शुद्धि २६१ २६१ श्रावकके प्रायश्चित्त २६१-२६२ विनयतपके चार भेद २६४ वैयावृत्त्यके दशभेद २६४-२६५ स्वाध्यायके भेदोका कथन २६५-२६८ ध्यानका लक्षण तथा उसके भेद २६८ आर्तध्यानके चार भेद २६८-२६९ रौद्रध्यानके चार भेद २६९-२७० धर्मध्यानके चार भेद २७०-२७१ शुक्लध्यानके स्वामी और भेद २७२ पृथक्त्ववितर्क शुक्लध्यानके व्यञ्जन- सङक्रान्त्यादिकका स्पष्टीकरण २७२-२७४ एकत्ववितर्कघ्यानका विषयविवरण २७४ सूक्ष्म क्रियाप्रतिपातिव्यान २७५ यथाख्यात चारित्र और मोक्षतत्त्वका निरूपण २७५-२७६ सिद्धपरमेष्ठीका स्वरूप ૨૭૬ जिनमतका श्रद्धान ससारनाशका कारण है २७७ समन्तभद्रका वचन मुक्तिका कारण है २७७ जिनशासनभक्तिसे इच्छितसिद्धि २७८ वारहवां परिच्छेद २७८-२९६ आराध्य, आराधना तथा अर्हदादि- पंच-परमेष्ठियोका स्वरूप २७९-२८० भव्यजीवका स्वल्प तथा उसकी अनुप्रेक्षाचिन्तना २८०-२८२ पण्डितपण्डित मरणादि पाच मरणोका विवरण २८२-२८३ २५९ स्नानके प्रकार (९) पृष्ठसंख्या पृष्ठसंख्या पण्डितपण्डित मरणसे मुक्ति २८३ सल्लेखनाधारण करनेकी अवस्थाका पण्डितमरणके तीन भेद २८४ निरूपण २८९ सल्लेखनाधारकका जिनमदिरमे बालमरण तथा बालबालमरणका निवास २९० स्वरूप २८४-२८५ कन्दर्पभावनादि पाच भावनाओंका आवीचिमरण, अवधिमरण, आद्यन्त स्वरूप २९०-२९१ मरण, सगल्यमरण, समुत्सृष्टमरण, प्रशस्तभावनायुक्त मुनिको गृद्धपृष्टमरण, विघ्रागमरण, प्रशस्त- शुभगतिप्राप्ति २९१ मरण आदिका वर्णन २८५-२८६ गन्थकारकी नम्रताव्यक्ति २९१ सविचारभक्त प्रत्याख्यानके महं, दुर्जनके स्वभावका कथन २९२-२९३ लिग दिक्षा विनयादि चालिस पञ्चमकालका दोष २९३ नूत्रपदोका विवरण २८६-२८९ ग्रन्थकर्ताको आचार्यपरम्परा २९४-२९६ There ॐ नम. सिद्धेभ्यः । श्रीनरेन्सेनाचार्यविरचितः सिद्धान्त सा र : भूर्भुव स्वस्त्रयोनाथं त्रिगुणात्मत्रयात्मकम् । त्रिभिः 'प्राप्तपदं त्रेधा वन्दे त्रुटितकल्मषम् ॥ १ नित्यायकान्तविध्वंसि मतं मतिमतां मतम् । यस्य स श्रीजिनः श्रेयान्यांसि वितनोतु नः ॥ २ श्रीमतो वर्षमानत्य वर्धमानस्य शासनम् । देवैःप्तगुणैर्दृष्टमिष्टमत्राभिनन्दतु ॥ ३ जिन्होने पापोंको-ज्ञानावरणादि चार घातिकर्मोको नष्ट किया, जो सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान व सम्यक्चारित्ररूप तीन गुणोते युक्त है, अर्थात् ये तीन गुण जिनके स्वभाव है तथा जो अर्हत्केवलित्व, गणधरकेवलित्व और सामान्यकेवलित्वको धारण करते हैं, जो क्षायिक, औदयिक तथा पारिणामिक भाव धारण करते है, जिन्होने रत्नत्रयकी पूर्णतासे कैवल्यपद धारण किया है, जो भू (अधोलोक) भुवर् (मध्यलोक) तथा स्वर् (स्वर्गलोक) के स्वामी-त्रिलोकनाथ है ऐसे अर्हत्परमेष्ठीको मै मन, वचन तथा शरीरके द्वारा वन्दन करता हूँ ॥१॥ भावार्थ-जिनेश्वरमे नव केवललब्धिल्प अनन्तज्ञानादिक क्षायिक भाव है । भव्यत्व, जीवत्वरूप पारिणामिक भाव है। मनुष्यगति, तीर्थकरत्व, परमशुक्ललेश्या आदि शुभकर्मोका उदय होनेसे औदयिक भाव है । ऐसे तीन भाव होनेसे जिनेश्वर त्रयात्मक है। कर्मोके क्षयसे होनेवाले भावको क्षायिक भाव, कर्मके क्षय, उपशम उदयादिके विना होनेवाले जीवभावको पारिणामिक भाव तथा कर्मके उदयसे होनेवाले भावको औदयिक भाव कहते है ॥१॥ जिनका अनेकान्तरूप मत नित्यायेकान्तमतोका निरसन करता है, तथा जो बुद्धयादि- ऋद्धियोके धारक गणधरादिकोको मान्य है, जो अनेकान्तनायक, दुर्जन-कठिन घातिकर्मोको जीतने- १ बा प्राप्तपर धाम. २ मा श्रीमच्छोजिनचन्द्रस्य ३ जीवादिक वस्तु सर्वथा नित्य-एकस्वरूप-अपरिणामी तमझनेवाला जो मत ज्ते नित्यकान्त कहते है। जीवादिक वस्तुओको सर्वथा क्षणिक माननेवाला मत अनित्यकान्त है । गुण गुणी सर्वया भिन्न माननेवाला भेदकान्त मत है तथा उनको सर्वथा अभिन्न माननेवाला बभेदकान्त मत है।

२) सिद्धान्तसार १ जैनी द्विसप्तति नत्वातीतानागतवतिनीम् । तत्त्वार्थसंग्रहं वक्ष्ये दृष्ट्वागमपरम्पराम् ॥४ मितो जिननाथस्य वचोऽनन्तगुणं' यतः । कथं तत्र मतिं कुर्वन यास्याम्युपहास्यताम् ॥५ अथवा तत्र भक्तिर्मे यदि स्यात्सहकारिणी । तदा कार्यमिदं किञ्चित्सिदि समधिगच्छति ॥ ६ अथ श्रीजिनसिद्धान्तभक्तिभारवशीकृतः । ततोऽहमपि मूढात्मा करिष्ये स्तुतिमात्मनः ॥७ वाले, श्रीके-अनन्तज्ञान, दर्शन, सुख तथा गक्तिरूप अनन्तचतुष्टयके धारक है वे जिन-ऋपभादिक तीर्थकर आराधक भव्य ऐसे हम लोगोका कल्याण करे।॥ २ ॥ श्रीसे अनन्तचतुष्टयरूपी अन्तरगलक्ष्मी और समवसरण, प्रातिहार्य आदि वहिरग लक्ष्मीसे शोभनेवाले, द्रव्य, क्षेत्र, काल तथा भावोको सपूर्णतया जाननेवाले अर्थात् सर्वज्ञ, श्रीवर्धमान भगवान्का शासन-स्याद्वादमत उज्ज्वल सम्यग्दर्शनादिक गुणोके धारक गणधरदेवोने जाना है अर्थात् द्वादशागरूप द्रव्यश्रुतको उन्होने अपने मनमे धारण किया है। प्रभुका यह शासन भव्योको इष्टप्रिय है, अतएव यह नित्य वृद्धिंगत होवें ॥ ३ ॥ (तत्त्वसग्रहकथन-प्रतिज्ञा ) भूतकालीन, भविष्यत्कालीन तथा वर्तमानकालीन ऐसे वाहात्तर जिनेन्द्रोको नमस्कार कर, तथा गौतमादि गणवरोसे चली आई हुई आगम-परपराको देखकर मै 'तत्त्वार्थसग्रह' नामक ग्रथकी रचना करता हूँ। जिसका दूसरा नाम 'सिद्धान्तसग्रह भी है ॥ ४ ॥ भावार्थ-गत उत्सर्पिणी-कालचक्रके तृतीय आरेमे दुषमसुषमामे निर्वाण, सागर आदिक चोवीस भूतकालीन तीर्थकर हो चुके है । तदनतर इस अवसर्पिणी-कालचक्रके चतुर्थ आरेमे ऋषभादि वर्धमानान्त चोवीस तीर्थकर हुए । इस समय वीरजिनेशका शासन चल रहा है। आगामी उत्सर्पिणी कालचक्रके तृतीय आरेमे पद्मनाभादि अनन्तवीर्यतक चोवीस तीर्थकर होने- वाले है ॥ ४॥ अनन्तचतुष्टयसे विराजमान जिनेश्वरका वचन (आगम) अनत गुणोसे भरा हुआ है। इस लिये उसमें अपनी बुद्धि प्रवृत्त करनेवाला मै उपहासको क्यों नही प्राप्त होऊगा? अर्थात् गणधरादिकोकेद्वारा निर्वाह्य आगमकी रचना करनेमे में प्रवृत्त हुआ हूं। इसलिये मेरा उपहास होगा तो भी मेरे अन्तःकरणमे जो आगमभक्ति वास करती है वह इस रचनामे मुझे सहायक होगी, जिससे मेरा यह कार्य कुछ सिद्ध होगा ।।५-६ ॥ जिनेश्वरकथित सिद्धान्तोमे मेरी उत्कट भक्ति होनेसे मै मूढ होकरभी उनका कथन करूगा । यह मैने अपनीही स्तुति की है ऐसा आप समझे ॥ ७ ॥ --- १ आ गुणा --१ १५) सिद्धान्तसार (३ संसारसागरे भीमे दुःखकल्लोलसंकुले । सतो रत्नानि गृहन्ति परे मज्जन्ति लोण्ठवत् ॥८ तत्सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्रत्रितय हितम् । तद्वन्त. सर्वदा संत. कथयन्ति जिनेश्वरा.॥९ लब्धं जन्मफल तेन सार्थकं तस्य जीवितम् । येनावाप्तामिद पूत रत्नत्रयमनिन्दितम् ॥१० श्रीमत्समन्तभद्रस्य देवस्यापि वचोऽनघम् । प्राणिना दुर्लभं यद्वन्मानुषत्व तथा पुन ॥११ सुदुर्लभमपि प्राप्त तत्कर्मप्रशमादिह । न ये धर्मरता मोहाद्धा हता हन्त ते नरा ॥ १२ धर्मादवाप्तसत्सोख्या न धर्म कथितं पुनः । शतशोऽपि विजानन्ति ये ते किं न विजातयः॥१३ विषयेषु रता दीना यथा क्लिश्यन्त्यहनिशम् । धर्मार्थ क्लिश्यतां तद्वत्क्षणेनापि न कि सुखम् ॥१४ स्वर्गापवर्गसौख्यानां कारणं परम मतः । धर्म एव सतां मान्यो मन्यन्ते तमतो बुधाः ॥ १५ जो सम्यग्दृष्टि सज्ज्जन है वे नाना दुखरूप तरगोसे भरे हुए भयानक ससारसमुद्रमे सम्यग्दर्शनादि गुणरलोको ग्रहण करते है परतु जो दुर्जन है वे उसमे मिट्टीके डलेके समान डूबते है ।। ८॥ 'रलत्रयसे जीवितसाफल्य) इसलिये इस ससारमे सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान तथा सम्यक्- चारित्ररुप रत्नत्रयही आत्माका हित करता है । जो भव्यजीव इसे धारण करते है उन्हे जिन- श्वर सज्जन कहते है । जिसने यह पवित्र और प्रशसनीय रत्नत्रय प्राप्त किया है उसे मनुष्यजन्मका फल प्राप्त हुआ और उसका जीवित सार्थक हुआ है ।। ९-१० (समन्तभद्राचार्यके वचनकी दुर्लभता) जैसे प्राणियोको मनुष्यजन्म दुर्लभ है वैसे गणधरतुल्य समन्तभद्राचार्यका पूर्वापरविरोधादि दोषोसे रहित वचनभी दुर्लभ है । परतु कुछ अशुभकर्म शान्त होनेसे उनका सुदुर्लभ वचन पाकरभी जो मनुष्य मिथ्याकर्मके उदयसे धर्ममें तत्पर नहीं होते है। हा । वे मोहसे मारे गये है ।। ११-१२ ।। । ? पूर्वाजित धर्मसे जिन्हे उत्तम सुख प्राप्त हुआ है ऐसे मानव, धर्माचार्यसे धर्मस्वरूप सौ बार कहा जानेपर भी उसे नही जानते है वे क्या विजाति नही है ? वि-पक्षीके जाति-जाति- वाले नही है ? अर्थात् ऐसे मनुष्य पक्षियोके समान है ॥ १३ ॥ (धर्मसेही सुख-प्राप्ति ) विषयासक्त दीन लोग विषय-प्राप्तिके लिये जैसे हमेशा दुख सहते है, धर्मके लिये यदि वे वैसा दुख एक क्षणतकभी सहेगे तो क्या वे सुखी नही होगे' धर्म, स्वर्ग और मोक्षसुखका प्रधान कारण है । सज्जनोको धर्मही मान्य होता है (मत विद्वान् लोग उसे मानते है उसका स्वीकार करते है ॥ १४-१५ ॥ . --- ---mod १ आ सम्यग्दर्शनसज्ञान २ आ प्राप्य ४) सिद्धान्तसार (१ १६- तं परीक्ष्यात्र गृह्णन्ति प्रेक्षावन्त. प्रयत्नतः । वञ्चनाभयतो रत्नं यथा रत्नपरीक्षकः ॥ १६ अधर्मोऽपि मतो धर्मो मत्यज्ञानादिदोषत. । अत एव परीक्ष्यमं न गृह्णन्ति महाधियः ॥ १७ हेयोपादेयबुद्धीनां सतामानन्दतिनाम् । न पारम्पर्यतो धर्मः प्रमाणं जातु जायते ॥१८ कुलायातमपि त्याज्यमवद्यमतिनिन्दितम् । 'मूर्खापवादमात्रोक्तदोषोऽनन्तगुणा गुणा. ॥ १९ धर्म धर्मफले रागो द्वेष (राग द्वेषं)स्तदितरे महान् । यःकरोति नर.प्राज्ञःसफलं तस्य जीवनम् ॥२० सर्वसौख्याकर सम्यगश्वर्यमविनिन्दितम् । लब्ध्वा सन्तस्त्यजन्त्येव कुलदौःस्थित्यमञ्जसा ॥ २१ कुलजोऽकुलजो वापि धर्मो ग्राह्य. सतां मतः । न च पक्षवशादेष लभ्यते केनचित्क्वचित् ॥ २२ कुलायातं महाकुप्ठं सर्वाडगानां विनाशकम् । नीरोगत्व समासाद्य त्यज्यते कि न धीमता ॥२३ कुलधर्मरता दीना विचारातिगता भुवि । के के न दुर्गति प्राप्ता यशोधरनृपादयः ॥ २४ नां निस्पृहाणामनेनसाम् । विचारचतुरक्यैिः सोऽपि संगृह्यते बुधैः ॥ २५ गुरूणां । . and (परीक्षापूर्वक धर्म-ग्रहण) जैसे रत्नपरीक्षक वञ्चनाकी भीतिसे परीक्षा करके रत्न- ग्रहण करते है वैसेही वुद्धिमान् लोक धर्मकी परीक्षा कर प्रयत्नसे उसे ग्रहण करते है । कुमति, कुरुत और विभगावधि ज्ञानके द्वारा लोग अधर्मको भी धर्म समझते है । इसलिये महावुद्धिमान् लोग अधर्मकी परीक्षा कर उसे छोड़ देते है । ग्राह्याग्राह्यका निर्णय करनेवाले लोग कुलपरपरासे चले आये धर्मको आँख मीचकर कभीभी ग्रहण नहीं करते है। उसे प्रमाण नही मानते है । कुलपरपरासे जो अतिशय निन्द्य द्यूतादिक पाप चले आये है उनको छोडनाही चाहिये । और मूर्खके अपवाद वचनकाही जिसमे दोष है ऐसा अनन्त गुणवाला धर्म नही छोडना चाहिये ॥१६-१९॥ (विवेकी जीवन सफल) जो धर्ममें तथा धर्मसे प्राप्त सुखादिक फलोमे प्रीति रखता तथा अधर्म और उसके फलको त्याज्य समझता है वह पुरुष प्राज्ञ-विवेकी समझना चाहिये उसका जीवनही सफल है ।। २० ॥ (अप्रमाण कुलधर्मकी हेयता) सर्व प्रकारके सुख देनेवाला वैभव प्राप्त होनेपर सज्जन कुलपरंपरासे चले आये दारिद्यको शीघ्रही छोडते है। सज्जन जो धर्म मानते है वह कुलपरं- परासे प्राप्त हो या न हो उसे ग्रहण करना चाहिये । ऐसा प्रशंसनीय धर्म किसी दुष्पक्षवश होनेसे कही नही मिलेगा। आरोग्य प्राप्त होनेपर आनुवनिक तथा हाथ पांव आदिक अवयवोको गलानेवाले महाकुष्ठरोगको क्या विद्वान् नही छोडेगे ? तात्पर्य-कुलपरपरासे आया हुआ अधर्म भी कुष्ठरोगके समान छोड़नाही चाहिये । कुलधर्मका पालन करनेवाले, दीन, विचारहीन ऐसे यशोधर सजा-आदि कितनेही,लोग दुर्गतिको प्राप्त हुए ॥ २१-२४ ॥ (गुरु कैसे हो?) जो नि स्पृह और पापरहित है, और जो हेयादेय समझनेवाली विशाल वुद्धिके धारक है, ऐसे गुरुओ के विचारचतुर उपदेशोसे बुधजन धर्मको-आत्महितकर धर्मको ग्रहण करते है । सत्यपदार्थ स्वरूप जाननेवाले गुरुओका दुर्लभ उपदेश सुननेवाले संसारी - -. १ आ. एवा २ मा. मात्रोत्र दोष ३ आ. जीवितम् -१ ३५) सिद्धान्तसार (५ १ वैभव सकलं लोके सुलभं भवतिनाम् । तत्त्वार्थदर्शिनां दृष्ट्वा गुरूणा दुर्लभ वचः ॥ २६ अज्ञानान्धतमस्तोमविद्ध्वस्ताशेषदर्शनाः । भव्याः पश्यन्ति सूक्ष्मार्थान्गुरुभानुवचोऽशुभि ॥ २७ मिथ्यादर्शनविज्ञानसन्निपातनिपीडनात् । गुरुवाक्यप्रयोगेण सर्वे मुञ्चन्ति मानवा ॥ २८ संसारार्णवमग्नाना कर्मयादोऽभिभाविनाम् । भविनां भव्यचित्तानां तरण्ड गुरवो मताः ॥ २९ भववाद्धि तितीर्षन्ति सद्गुरुभ्यो विनापि ये। जिजीविषन्ति ते मूढा नन्वायु:कर्मवर्जिता ॥ ३० अन्तर्मुहूर्तकालेऽपि विविधासु च योनिषु । नमन्ति भविनो नित्यं गुरुवाक्यविमोचिन ॥ ३१ सर्वशास्त्रविदो धीरा' सर्वसत्त्वहितकराः । रागद्वेषविनिर्मुक्ता गुरवो गरिमान्विता ॥ ३२ सदृष्टिज्ञानसद्वृत्तरत्नत्रितयनायकः । कथित परमो धर्मः कर्मकक्षक्षयानल ॥ ३३ श्रद्धानं शुद्धवृत्तीनां देवतागमलिङिगनाम् । मौढ्यादिदोषनिर्मुक्तं दृष्टि दृष्टिविदो विदुः ॥ ३४ अष्टादशमहादोषविमुक्तं मुक्तिवल्लभम् । ज्ञानात्मपरमज्योतिर्देव वन्दे जिनेश्वरम् ॥ ३५ जीवोको इस जगतमे सपूर्ण वैभव सुलभतासे प्राप्त होता है । अज्ञानरूप अध कारसमूहसे वस्तुओको अवलोकन करनेकी जिनकी शक्ति नष्ट हुई है ऐसे भव्य जीव गुरुरूपी सूर्यके वचनकिरणोसे सूक्ष्म पदार्थोको देखते है । गुरूपदेशके प्रयोगसे सर्व मनुष्य मिथ्यादर्शन और मिथ्याज्ञानरूपी सन्निपातज्वरकी पीडासे मुक्त हो जाते है । ससारसमुद्रमें डूबे हुए, तथा कर्मरूपी मगर मत्स्यादिकोसे पीडित हुए भव्यजीव जो कि भव्यचित्त-रत्नत्रयप्राप्ति योग्य मनके धारक है उन्हे गुरु नौकाके समान ससार-तारक होते है ।। २५-२९ ।। सद्गुरुके विनाभी जो ससारसमुद्रसे तैर जानेकी इच्छा करते है वे मूढ जीव आयुकर्मसे रहित होकर भी जीनेकी इच्छा करते है । जिन्होने गुरूपदेशका उल्लघन किया है वे 'लोग अन्तर्मुहूर्त कालमेभी सतत अनेक योनियोमे क्षुद्रभव धारण कर भ्रमण करते है। ( वे क्षुद्रभव छ्यासठहजार तीनसौ छत्तीस होते है ) ॥ ३०-३१ ॥ वे सद्गुरु सर्वशास्त्रोके ज्ञाता, धीर, सर्व प्राणियोको हितका उपाय कहनेवाले, रागद्वेषरहित, तथा सत्य, अहिंसा, शील आदि गुणोंके गौरवको धारण करते है ॥ ३२ ॥ (परमधर्म) रलत्रयधारी सद्गुरूओने सम्यग्दृष्टि, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्रात्मक उत्तम धर्म कहा है जो कि कर्मवनको दग्ध करनेके लिये अग्नि के समान है ॥ ३३ ॥ ( सम्यग्दर्शनका स्वरूप ) सम्यग्दर्शनके ज्ञाता शुद्धस्वभावको धारण करनेवाले जिनदेव, उन्होने कहा हुआ आगम-शास्त्र और शुद्ध आचारणवाले गुरु इन विषयमे लोकमूढतादि-दोषोसे रहित श्रद्धानको सम्यग्दर्शन कहते है ॥ ३४ ॥ ( देवका स्वरूप ) जो क्षुधा, प्यास, वृद्धावस्था, रोग आदि अठारह दोषोसें सर्वथा- रहित, जो कर्मोंका नाश कर मुक्तिपति हुए है, जो सर्वोत्कृष्ट, अप्रतिहत केवलज्ञानरूप प्रकाशके धारक है ऐसे जिनेश्वर परमार्थ ( सच्चे ) देव है, उनको मै वदन करता-हू-॥ ३५ ।। . १ आ दिष्ट्वा ६) सिद्धान्तसार. (१ ३६- १ श्रीजिनेन्द्रवचोऽनेकरचनारुचिरं महत् । आगमो' गमको गम्यः सतामानन्ददायकः ।। ३६ बाह्याभ्यन्तरभेदेन निर्ग्रन्थ ग्रन्थसंयुतम् । कर्मणा' लघुमप्युच्चैर्गुरु हि गुरवो विदुः ॥ ३७ षोढानायतनं मूढत्रय शडकादिकाष्टकम् । मदाष्टकममी दुष्टा दोषाः सद्दर्शनोज्झिताः ॥ ३८ मिथ्यादर्शनविज्ञानचारित्रत्रितयं तथा । तद्वन्तः पुरुषाः प्राज्ञैरनायतनमीरितम् ॥ ३९ कामक्रोधमहालोभमानमायाविनोदनान् । देवान्दैत्यादिदुर्वृत्तान्मन्यते मूढदृष्टिकः ।। ४० वीतरागं सरागं च निर्ग्रन्थं ग्रन्थसंयुतम् । सगुणं निर्गुणं चापि समं पश्यन्ति दुधियः ॥ ४१ मूढात्मानो न जानन्ति को वन्द्यो वन्दकश्च कः । गूथयथाशनां नो चेद्वन्दन्ते गां कथं नराः ॥ ४२ , ( आगमलक्षण ) जिसको गणधरादि यति जानते है, जो सज्जनोको आनन्द देता है, जो अनेक रचनाओसे सुन्दर और महान् है ऐसे जिनेन्द्रवचनको आगम कहते है । वह भव्योको जीवादि-वस्तुओका स्वरूप दिखलाता है ।। ३६ ।। ( गुरुका लक्षण ) धनधान्यादिक दश प्रकारके बाह्य परिग्रह तथा क्रोधादिक अन्तरंग चौदह परिग्रहोके त्यागी, अर्थात् निर्ग्रन्थ, तथा जो ग्रन्थसे-शास्त्रसे युक्त है अर्थात् स्वपरमतके ज्ञाता है, जो कर्मभार नष्ट होनेसे लघु हुए है अर्थात् मोहकर्म, ज्ञानावरण, दर्शनावरण तथा अन्तराय कर्मोंका क्षयोपशम होनेसे सम्यग्ज्ञानादि गुणोसे जो भारी हुए है-उच्च हुए है, उनको गणधरदेव गुरु कहते है ।। ३७ ॥ ( सम्यग्दर्शनके दोष ) छह अनायतन, तीन मूढतायें, शकादिक आठ दोष, और आठ गर्व ये सम्यग्दर्शनके पच्चीस दोष है। क्योकि ये सम्यग्दर्शनको मलिन करते है ।। ३८ ।। ( अनायतनस्वरूप ) मिथ्यादर्शन, मिथ्याज्ञान तथा मिथ्याचारित्र ये तीन तथा इनके धारक अर्थात् मिथ्यादृष्टि पुरुष, मिथ्याज्ञानी पुरुष, तथा मिथ्याचारित्रवाला तपस्वी, इन छहोको विद्वानोने अनायतन कहा है। ये छह वस्तुये सम्यग्दर्शनके आयतन-आश्रयस्थान नहीं है, क्योकि इनके ससर्गसे सम्यग्दर्शन मलिन होता है ।। ३९ ।। ( कुदेवस्वरूप ) जिसकी दृष्टि श्रद्धा मूढ हो गई है ऐसा विवेकहीन पुरुष जिनमे काम, क्रोध, महालोभ, गर्व, कपट और विनोद, हास्य, रति आदिक दोष है ऐसे दुराचारी दैत्यादिकोंको देव समझता है । ऐसी श्रद्धासे सम्यग्दर्शन मलिन होता है ॥ ४० ॥ विवेकहीन पुरुष वीतराग जिनदेवको तथा सराग हरिहरादिकोंको, वाह्याभ्यन्तर परिग्रहरहित जैनगुरुको और परिग्रहधारी मिथ्यात्वी गुरुको, गुणसहित तथा गुणरहित पुरुषोको समान देखते है ।। ४१॥ मूर्खपुरुष वन्दने योग्य कौन है और अवन्द्य कौन है इनका भेद नही जानते। यदि उनको भेदज्ञान होता तो विष्टा भक्षण करनेवाली गोको वे कैसा वन्दन करते ? ये मूढ लोग पृथ्वी, अग्नि, १ आ आगमो गम्यगमक २ आ कर्मणो ३ आ घनान् । ४ आ. देव्यादिदुर्वित्तान्.

-१ ४९) सिद्धान्तसार (७ पृथिवीं ज्वलन तोयं देहली पिप्पलादिकम् । देवतात्वेन मन्यन्ते येते चिन्त्या विपश्चिता ॥४३ पाखण्डिनःप्रपञ्चाढ्यान्मिथ्याचारविहारिणः। रण्डाश्चण्डाश्च मन्यन्ते गुरुश्च गुरुमोहिनः ॥४४ हिसाधारम्भकत्वेन सर्वसत्त्वदयाभयावहान् । समयान्मन्यते मूढः सत्यं स समयेष्विह ।। ४५ य य दुष्टमदुष्टं वा पुरः पश्यति मानवम् । त तं नमति मूढात्मा मद्यपायीव निस्त्रपः ।।४६ एकेनैव हि मोढयेन जीवोऽनन्तभवी भवेत् । अपरस्य यस्यह फलं किमिति सशय. ॥ ४७ ज्ञान कुल बल पूजा जातिमश्वर्यमेव च । तपो वपुः समाश्रित्याहङ्कारो मद इष्यते ॥४८॥ शङ्काकाडाक्षान्यदृष्टीनांप्रशसा सस्तवस्तथा। विचिकित्सेति ये दोषास्तेऽपि वाः सुदृष्टिभिः ॥४९ पानी, देहली, पीपल आदिकोको देव समझते है। इनका विचार विद्वान करे अर्थात कुदेव तथा सुदेवादिकोका स्वरूपभेद जानकर अपना सम्यग्दर्शन निर्मल रखे ।। ४२-४३ ।। (गुरुमूढता) गुरुके स्वरूपको न जाननेवाले पुरुष मिथ्याचारित्रधारियोको गुरु समझते है । जटाजूट रखना, पचाग्नितप करना, नदीमे स्नान करना इत्यादिक मिथ्याचार है। मिथ्यात्वी गुरु हिसा तथा आरभोमे तत्पर रहते है। विधवा स्त्रीको रण्डा कहते है तथा जिनके परिणाम क्रूर, हिंसामय होते है, जो यज्ञमें पशुवधका उपदेश देते है, उनको चण्ड कहते है, ऐसे लोगोको गुरु समझना गुरुमूढता है ।। ४४ ।। (समयमूढता) जिनमे हिंसादिक आरभोका वर्णन होनेसे जो सम्पूर्ण प्राणियोको भय उत्पन्न करते है, ऐसे शास्त्रोको जो मानते है और उनकी श्रद्धाको आदरणीय समझते है, वह उनकी समयमूढता है । मद्यपायी के समान निर्लज्ज्ज और मूढ मनुष्य अपने आगे आये हुए जिस किसी मनुष्यको देखता है, वह दुष्ट हो चाहे अदुष्ट, उसको वदन करता है ।। ४५-४६ ॥ एक मूढताहीसे यह जीव अनन्त ससारमे घूमनेवाला होता है फिर अन्य दो मूढताओका फल क्या मिलेगा ऐसा मनमे सगय उत्पन्न होता है ।। ४७ ॥ (आठ प्रकारके मद) ज्ञान, पितृवश, शक्ति, मातृवश, धनधान्यादिक सपत्ति, लोगोसे प्राप्त होनेवाली मान्यता, तप और शरीर-सौदर्य, इनके आश्रयसे जो अहकार उत्पन्न होता है उसे गर्व कहते है ( ऐसे गर्वसे धार्मिक लोगोका अनादर करनेसे सम्यग्दर्शन मलिन होता है ) ॥४८॥ (गडकादिक दोप) शका, काक्षा, अन्यमिथ्यादृष्टियोकी प्रशसा, सस्तव, तथा विचि- कित्सा ये दोषभी सम्यग्दृष्टियोसे त्याज्य है । देव, गुरु और शास्त्रोका जो सत्यस्वरूप है वह वही है या अन्यथा है ऐसा मनमे जो सशय उसे शका कहते है । काक्षा-जो कर्मपरवश है, नाश- शील है, जिसके वीचमे दुखकी उत्पत्ति है ऐसे पापकारण सुखमे अभिलाषा होना काक्षा है । विचिकित्सा स्वभावत अपवित्र परतु रत्नत्रयसे पवित्र ऐसे धार्मिकोके शरीरकी ग्लानि करना उनके गुणोमें प्रेम न करना विचिकित्सा है। अन्यदृष्टिप्रशसा-मिथ्यादृष्टियोके ज्ञान और चारित्रको भनमे अच्छा समझना । अन्यदृष्टिसस्तव-मिथ्यादृष्टियोके विद्यमान अविद्यमान गुणोकी वचनसे ८) सिद्धान्तसार (१ ५०- एतैर्दोविनिर्मुक्तं श्रद्धानं तत्त्वगोचरम् । दर्शनं दर्शनीयाश्च कथयन्ति यतीश्वराः॥५० 'निसर्गाधिगमाभ्यां च तद्वधा कथितं जिन । उपशमादिभेदेन पुनस्त्रेधोपलभ्यते ॥५१ प्रागुपात्तेन भावेन स्वात्मन्यात्मात्मना पुनः । स्वभावं लभते शुद्ध दर्शनं तनिसर्गजम् ॥ ५२ यत्प्रमाणनयैरन्ताप्रस्फुरञ्ज्योतिरुज्ज्वलम् । सम्यक्त्वं लभते जीवोऽधिगमात्तन्निगद्यते ।। ५३ स्तुति करना । इन दोषोसे रहित ऐसी जो तत्त्वविपयक श्रद्धा उसे दर्शनीय अर्थात् गुणसुदर और शरीरसुदर ऐसे मुनिनाथ गणधर सम्यग्दर्शन कहते है ॥ ४९-५० ।। (सम्यग्दर्शनके दो और तीन भेद) जिनदेवोने सम्यग्दर्शन निसर्ग-सम्यग्दर्शन और अधिगमसम्यग्दर्शन ऐसा दो प्रकारका कहा है। पुन वह उपशमादिभेदसे तीन प्रकारका उपलब्ध होता है । अर्थात् उसके औपशमिक सम्यग्दर्शन, क्षायिक सम्यग्दर्शन, तथा क्षायोपशमिक सम्य- दर्शन ऐसे तीन भेदभी होते है। ।। ५१ ।। (निसर्ग सम्यग्दर्शन) यह आत्मा अपने आत्मामे अपने आत्माके द्वारा जो पूर्वभवमे ग्रहण किये हुए भावसे अपना शुद्ध दर्शन स्वभाव प्राप्त करता है उसे निसर्ग सम्यग्दर्शन कहते है ।। ५२॥ (विशेपार्थ) दर्शनमोहकी मिथ्यात्व, सम्यक्त्व, तथा सम्यक्मिथ्यात्व ये तीन प्रकृतिया और चारित्रमोहकी अनन्तानुबधी क्रोध, मान, माया, लोभ मिलकर सात प्रकृतियोके उपशमादि होनेपर परोपदेशके विना आत्माकाही आत्मामे आत्माके द्वारा जो श्रद्धान होता है उसे निसर्ग- सम्यक्त्व कहते है। - इस निसर्गसम्यक्त्वमे गुरुका उपदेश कारण पडता है परतु उपदेश देनेमे गुरुको प्रयत्न नही करना पडता है। क्योकि जिसमे सम्यक्त्व उत्पन्न होनेवाला है उसे पूर्वभव सुनना, वेदनाका अनुभव, धर्मश्रवण, 'जिनप्रतिमाका अवलोकन, महामहोत्सव देखना, महद्धि प्राप्त आचार्योकी वन्दना इत्यादि कारणोंसे मन खेदके बिना जीवादिक-पदार्थोमे यथार्थ श्रद्धा प्राप्त होती है । परतु अन्तरंग कारण दर्शनमोहादि सप्तप्रकृतियोके उपशमादिक यदि नही हो तो उपर्युक्त बाह्य कारण मिलनेपरभी वह प्राप्त नही होगा । (य ति च ६ आश्वास ) (अधिगमजसम्यग्दर्शन) गुरुसे प्रमाण-नयद्वारा जीवादि पदार्थोका कहा गया स्वरूप सुनकर जो जीव उसका मनन-चिन्तन करता है, तब उसके मनमे वृद्धिंगत होनेवाली उज्ज्वल ज्योति अर्थात् सम्यग्दर्शन उत्पन्न होता है। गुरूपदेशपूर्वक होनेसे उसे अधिगमसम्यक्त्व कहते है ॥ ५३॥ -- ' १ आ त्रेधोपलाल्यते '२' आ'सुभाव 1 -१ ५६) सिद्धान्तसार (९ शुद्धाशुद्धविमिश्राणां तथानन्तानुवन्धिनाम् । चतुर्णां हि कषायाणां प्रशमात्प्रथमं भवेत् ॥ ५४ दृग्धातिनां क्षयाज्जेयं क्षायिक क्षीणकल्मषः । क्षायोपशमिकं तावदुभयेनोभयात्मकम् ॥ ५५ सप्तानां प्रकृतीना च क्षयात्क्षायिकमुत्तमम् । साध्यं साधनभूतं तु पूर्व द्वयमुदाहृतम् ॥ ५६ अधिगमजमे अन्तरग कारण दर्शनमोहादिकोका उपशम, क्षय तथा क्षयोपशम होनेसे बाह्य कारणरूप गुरुका वारवार उपदेश होता है। सशयादिक-दोष-रहित जीवादि पदार्थ जानना प्रमाण है । तथा वस्तुके नित्यत्वादि धर्मोमेसे एकधर्मको जानना नय है। नय जिस धर्मको जानता है उसे मुख्यता और अन्यधर्मोको गौणता प्राप्त होती है। प्रमाण पूर्ण वस्तुको जानता है अत उसमे गुणमुख्यताका प्रश्नही नही ॥५३॥ ( वचनभेद, नयवाद और परसमय ) जितने वचनभेद है उतने नयवाद है। जितने नयवाद है उतने परसमय है । ब्रह्मवाद, भेदवाद, नित्यवाद, अनित्यवाद आदिक परसमय है। ये परसमय वस्तुओको सर्वथा नित्य, अनित्य,एक अनेकरूप मानते है इस लिये मिथ्या है। परतु जव सर्वथा पक्ष छोडकर कथञ्चित्पक्षसे वस्तुको कथञ्चित् नित्यानित्यादि रूप मानेंगे तब उनमें सत्यता-प्रामाणिकता आती है। उनका मिथ्यापना नष्ट होता है ।। १ ।। ( उपशम सम्यग्दर्शन ) सम्यक्त्व, मिथ्यात्व तथा मिश्र-सम्यक्मिथ्यात्व इन तीन दर्शनमोहप्रकृतियोका तथा अनतानुवधी क्रोध, मान, माया और लोभ इन चार कषायोका जव उपशम होता है तव जैसे कतक-द्रव्यसे मैला पानी निर्मल होता है वैसा सम्यग्दर्शनभी निर्मल होता है । उस पहले सम्यग्दर्शनको औपमिक सम्यग्दर्शन कहते है । विशेषार्थ-मिथ्यादर्शन अनत ससारका कारण है इसलिये उसे 'अनत' कहते है। उसके सबंधी जो कपाय है उन्हे अनतानुवधी कहते है । मिथ्यात्व प्रकृति सम्यग्दर्शनको नष्ट करती है। सम्यडमिथ्यात्वप्रकृति जीवमे एक समयमे सम्यक्त्व और मिथ्यात्व मिश्र परिणाम उत्पन्न करती है । तथा सम्यक्त्वप्रकृति जीवमे सम्यग्दर्शनको तो प्रकट करती है परतु चलमलिनादिदोषोको साथ जोड देती है। परतु इन सातो प्रकृतियोके पूर्ण उपशमसे प्रगट हुए सम्यक्त्वमें ये दोष नही रहते है। ऐसे सम्यग्दर्शनको उपगम सम्यग्दर्शन कहते है। इसमें जीवादित्त्वोका श्रद्धान निर्मल होता है ।। ५४॥ (क्षायिक और क्षायोपशमिक सम्यग्दर्शन ) सम्यग्दर्शन-घाती सातो प्रकृतियोका पूर्ण नाश होनेसे प्रकट हुआ सम्यग्दर्शन सदा निर्मल रहता है। ऐसे सम्यग्दर्शनमे शकादिक दोष नही रहते है । प्रक्षीण-पापवाले जिनदेव उसे क्षायिक सम्यग्दर्शन कहते है । क्षय और उपशम होनेसे क्षायोपगमिक सम्यग्दर्शन उभयात्मक होता है । अनतानुवधी चार कषाय, मिथ्यात्व तथा सम्यङ- मिथ्यात्व इन छह प्रकृतियोका उदयाभावी क्षय होनेसे तथा आगामि कालमे उदयमे आनेवाली इन प्रकृतियोका उपशम होनेसे और सम्यक्त्व प्रकृतिके देशघातिस्पर्धकोका उदय होनेसे जो तत्त्वार्थमे श्रद्धा उत्पन्न होती है उसे क्षायोपशमिक सम्यग्दर्शन या वेदक सम्यग्दर्शन कहते है ॥ ५५-५६ ।।

१०) सिद्धान्तसार, (१ २८- 1 लब्धपञ्चेन्द्रियो जीवस्तथा कालादिलब्धिकः । भव्यश्च लभते साक्षाद्दर्शन' न तथा परः॥५७ कल्याणपञ्चकं यस्माल्लभ्यते क्षणतोऽपि सत् । सिद्धौ निदानभूतं तु दर्शनं किं न दुर्लभम् ॥ ५८ ------- उपर्युक्त सात प्रकृतियोका क्षय होनेसे उत्तम क्षायिकसम्यग्दर्शन प्राप्त होता है। इसका कभी भी नाश नही होनेसे यह साद्यनन्त है । औपशमिक और क्षायोपशमिक सम्यग्दर्शन साधन- भूत है । अर्थात् इनकी उत्पत्ति नही होगी तो क्षायिक सम्यग्दर्शन कदापि नही होगा। प्रथमत. ससारीजीवोको औपशमिक सम्यग्दर्शन होता है । तदनतर क्षायोपशमिक होता है । इसके अनतर क्षायिक होता है । क्षायिककी उत्पत्तिमे ये दोनो सम्यक्त्व साधन है और क्षायिक सम्यक्त्व साध्यरूप है ॥ ५५-५६ ॥ ( सम्यग्दर्शन किस जीवको उत्पन्न होता है ? ) जिसको स्पर्शनादि पाच इद्रियोकी प्राप्ति हुई है तथा जिसे कालादिलब्धिया प्राप्त हुई है, ऐसे भव्यको साक्षाद्दर्शन प्रगट होता है । पचेन्द्रिया और कालादिलब्धिया नहीं प्राप्त होनेपर भी भव्यता रहती है । तथापि वह अकेली सम्यग्दर्शनको प्रगट नही कर सकती। ( विशेष स्पष्टीकरण-अनादि मिथ्यादृष्टि जीवको सम्यग्दर्शनकी प्रतिबधक प्रकृतियोका उपशम कालादिलब्धिया प्राप्त होनेसे होता है। कर्मोसे घिरी हुई भव्य आत्मा अर्धपुद्गलपरिवर्तन-अवशिष्ट रहनेपर प्रथमसम्यक्त्वकाल प्राप्ति-योग्य होती है। पुद्गलपरिवर्तनके कर्मद्रव्य पुद्गलपरिवर्तन तथा नोकर्मद्रव्यपुद्गलपरिवर्तन ऐसे दो भेद है । उनमेसे किसी एककोभी अर्द्धपुद्गलपरिवर्तन काल कहते है। जिसका ससारमे रहनेका काल इससे अधिक होगा उसे सम्यग्दर्शन नहीं होता । यह प्रथम काललब्धि है।) २ कर्मस्थितिकाललब्धि-जीवमे जब कर्म उत्कृष्ट स्थितिके अथवा जघन्यस्थितिके होते है तब उसको प्रथम सम्यक्त्व नहीं होता अर्थात् जिस जीवमे वध्यमान कर्मसमूह विशुद्ध परिणामोसे अन्त कोटिकोटिसागरोपमप्रमाणवाला होता है तथा पूर्ववद्ध कर्म जिसमेसे सख्यात सागरोपमसहस्र कम होकर अन्त कोटिकोटीकी स्थितिमे आता है उसको उपशम सम्यग्दर्शन प्राप्त होनेकी योग्यता प्राप्त होती है । ३ भावापेक्षासे उसको काललब्धि अर्थात् भव्यता, पचेन्द्रियपना, पर्याप्तकता, प्राप्त हुई है ऐसे सर्व विशुद्ध जीवको सम्यग्दर्शन होता है । इतरोंको नही । सम्यग्दर्शनकी उत्पत्तिमे जातिस्मरण, गुरूपदेश, वेदनानुभवादिक अनेक कारण पडते है ।। ५७ ॥ जिस सम्यग्दर्शनकी प्राप्तिसे क्षणमे अन्तर्मुहूर्तमे त्रिलोकवन्धकल्याणपचककी प्राप्ति होती है अर्थात् तीर्थकरपदका बघ होनेसे गर्भ, जन्म, दीक्षा, केवलज्ञान और मोक्ष ऐसी पचकल्याणोकी , . . १ आ. पुण्याद्दर्शनं न परो नर २ आ. लभते. .

~१. ६४) सिद्धान्तसार (११ ज्ञानचारित्रयोराद्य तन्मूलत्वात्तयोद्धयो । दर्शन दर्शनाधारा निगदन्ति गदातिगाः ॥ ५९ तस्याणुव्रतनामापि विद्यते न कदाचन । दृग्विशुद्धिर्न यस्यास्ति कि पुनस्तन्महाव्रतम् ॥ ६० तप्तोऽपि तीव्रतपसा ग्लप्तदेह. प्रतिक्षणम् । दर्शनेन विशुद्धात्मा नरो वेद्यस्य वेदकः ॥ ६१ पदार्थानखिलाल्लोके यथार्थान्नव पश्यति । कुदृष्टिरत एवादी दृग्विशुद्धिविधीयते ॥ ६२ न दर्शनसम किञ्चिद्विद्यतेऽपि जगत्रये । यस्य स्पर्शनमात्रेण संसृति हन्ति मानव.।। ६३ दृष्टि विना गति पूता गच्छतोऽप्यतियत्नतः । चरित्रेऽप्यस्खलढत्तेरध.पातो भवेद्धृवम् ।। ६४ ? प्राप्ति होती है तथा मोक्षप्राप्तिके लिये जो कारण है वह सम्यग्दर्शन क्या दुर्लभ नही है ? अर्थात् सम्यग्दर्शनकी प्राप्ति होना दुर्लभ है । प्राप्त होनेपर यदि वह नहीं छूटेगा तो जीवको अवश्य मोक्षप्राप्ति कर देता है ।। ५८ ।। ज्ञान और चारित्रके आदिमें सम्यग्दर्शन है क्यो कि वह उन दोनोका मूल है । अर्थात् ज्ञान और चारित्रको मम्यग्दर्शनसेही समीचीनपना प्राप्त होता है । जव सम्यग्दर्शन प्राप्त होता है उसी समय ज्ञानको और चारित्रको सम्यक्पना आजाता है ससाररोगको उल्लघन करनेवाले, सम्यग्दर्शनको आधारभूत ऐसे गणधरादिक मुनीश ऐसा कहते है ।। ५९ ।। सम्यग्दर्शनकी विशुद्धिये रहित अर्थात् मूढता, मद, अनायतन, और शकादिकोसे मलिन हुए भव्योको नाममात्रभी अणुव्रत नही फिर महावत कैसे प्राप्त होगा? अर्थात् सम्यग्दर्शनकी विशुद्धिसे हिंसादि पापोका एकदेश त्याग अथवा सपूर्ण त्याग होता है अन्यथा नही ।। ६०॥ (तपसेभी सम्यग्दर्शनकी श्रेष्ठता) तीव्र तपसे तप्त होनेसे जिसका देह क्षीण हुमा है ऐसा मुनिराज जव सम्यग्दर्शनसे निर्मल होता है तब उसे आत्माका अनुभव आता है । अर्थात् सम्यग्दर्शनसेही आत्मानुभूति होती है तपसे नहीं । अकेला तप शरीरको क्षीण करेगा परतु वह आत्माको आत्मानदसे वचित रखता है अत सम्यग्दर्शन तपसे श्रेष्ठ है ।। ६१ ॥ मिथ्यात्वके उदयसे कुदृष्टिको कारणविपर्यास, स्वरूपविपर्यास, तथा भेदाभेदादि-विपर्यास होते हैं जिनसे वह सपूर्ण पदार्थोका यथार्थ स्वरूप नहीं जान सकता है । इस लिये दर्शनविशुद्धि प्रथम कही है । तात्पर्य-दर्शनविगुद्धिसे स्याद्वाददृष्टि उदित होती है जिससे भव्यात्मा आत्मा- नुभवके साथ वस्तुओकी कथचित् नित्यानित्यात्मकता जान सकता है ।। ६२ ।। इस जगत्रयमें सम्यक्त्वके समान कोई अमूल्य पदार्थ नहीं है, क्यो कि इसको धारण करनेसे मनुष्य ससारनाश करता है । तात्पर्य-सम्यग्दर्शन प्राप्त होकर नष्ट होनेपरभी मनुष्य दीर्घ समारवाला रहता नही । क्यो कि उसका ससार अर्धपुद्गलपरिवर्तन कालतक रहता है, अनंतर वह मुक्त होता है । और यदि सम्यक्त्व नष्ट नही हुआ तो वह पुरुष थोडे भव धारण कर मुक्त होता है ।। ६३ ॥ सम्यग्दर्शनके विना देव गति प्राप्त होनेपरभी तथा चारित्रमें अतिप्रयत्नसे अप्रतिहत वृत्ति करनेपरभी निश्चयसे मुक्त होता नही। तात्पर्य-सम्यक्त्वरहित जीव चारित्रके वलसे १२) सिद्धान्तसार (१ -६५ प्राणिनः संसृतेर्दुःखमनन्तमनतिक्रमम् । न नामन्ति क्रियायुक्ता अपि दर्शनजिताः ॥ ६५ ज्ञानं सच्चरणं वापि येनोज्झितमनिन्दितम् । अज्ञानमचरित्रं च भववृद्धिकरं भवेत् ॥ ६६ दर्शनं परमो धर्मो दर्शन शर्म निर्मलम् । दर्शनं भव्यजीवानां निवृतेः कारणं परम् ॥ ६७ शासनं जिननाथस्य भवदुःखैकनाशनम् । यस्याधिवासनामेति स कृती कृतिनां वरः ॥ ६८ सद्रत्नमिदमत्युचं हृदये गणसंयुतम् । यो दधाति श्रियो रामाः स्वत एव श्रयन्ति तम् ॥ ६९ धर्मे धर्मफले शास्त्रे साधौ संगविवजिते । निश्चलो योऽनुरागोऽयं संवेगः स निगद्यते ॥ ७० माद्यन्मित्रकलत्राद्याः सर्वे सयोगसंभवाः । मुक्त्वा रत्नत्रयं पूतमिति निर्वेदमादिशेत् ॥ ७१ ( नवमग्नैवेयकतक जाता है परतु वह भवसमुद्रमें भ्रमण करता है । सम्यग्दर्शनके साथ अप्रतिहत चारित्र पालनेवाले मुनिराज सर्वार्थसिद्धिमें जाकर दूसरे भवमे मुक्त भी होते हैं ।। ६४ ।। जो जीव सम्यग्दर्शनरहित है वे कितना भी घोर चारित्र पाले, तथापि जिसका उल्ल- घन-नाश करना शक्य नही है ऐसे अनत सासारिक दुखोका पार वे नही लगा सकते । तात्पर्य- सम्यग्दर्शन नावके समान है उसका आश्रय छोडकर जो केवल चारित्र ही पालता है वह मुक्त नही होता । जैसे नौकाका आश्रय छोडकर आजतक समुद्रके दूसरे किनारेको अपने वाहुओके द्वारा कोई भी नहीं जा सका ॥ ६५ ॥ (सम्यक्त्वरहित ज्ञान तथा चारित्र, अज्ञान और अचारित्र है)सम्यग्दर्शनसे रहित ज्ञान और निर्मल चारित्र प्रशसायुक्त होनेपर भी अज्ञान और अचारित्र होते है, तथा ससारवर्धक होते हैं ।। ६६ ॥ इस लिये सम्यग्दर्शन परम-उत्कृष्ट धर्म है। सम्यग्दर्शनही निर्मल सुख है । तथा वह भव्य जीवोकी मुक्तिका उत्तम कारण है ॥ ६७ ।। ससार दुखोका मुख्यतया अन्त करनेवाला यह जिनेश्वरका शासन जिसके हृदयमें रहता है वह विद्वद्गणमे श्रेष्ठ है । जिसके मनमे एकवार सम्यग्दर्शनकी वासना उत्पन्न होती है वह नर सर्वजनोमे श्रेष्ठ होता है ऐसा समझना चाहिये ।। ६८ ॥ नि शकादिक अष्टगुणोसे युक्त यह सम्यग्दर्शन एक उत्कृष्ट रल है । इसे जिसने अपने हृदयमे धारण किया है उसके पास चक्रवर्ति आदि सर्व प्रकारकी लक्ष्मी प्राप्त होती है ।। ६९ ।। (सवेगका लक्षण) रत्नत्रयरूप धर्म, अभ्युदयनिश्रेयसादि प्राप्तिरूप धर्मफल, जिनेश्वर कथित तथा गणधरादि-प्रणीत शास्त्र, परिग्रहरहित रत्नत्रयाराधक मुनिवर्ग इनमे जो स्थिर अनुराग उत्पन्न होता है उसे सवेग कहते है ॥ ७० ॥ (निर्वेगका लक्षण) रत्नत्रयरहित पुरुषको उन्मत्त मित्र, पुत्र, और स्त्री आदिक सर्व सामग्री मिथ्या कर्मके सयोगसे प्राप्त होती है। सिर्फ रत्नत्रयही आत्माका स्वभाव है ऐसा चिन्तन निर्वेगका लक्षण है ।। ७१ ॥ (निन्दाका लक्षण) जब आत्मा कषायसे व्याकुल होता हैं तब वह मज्जननिन्ध कार्य करता है। परंतु जब कषायका वेग कम होता हैं तब मैने अयोग्य कार्य किया है ऐसा जो मनमे अनु- -१ ७८) सिद्धान्तसार (१३ कषायाकुलितो जीवः कार्यमार्यविनिन्दितम् । कृत्वानुतायते' चान्ते सा निन्दा निन्धनाशिनी ॥७२ जातेऽत्र दुष्कृते घोरे रागद्वेषादिदोषतः । आलोचना भता गर्दा गुरूणामग्रतो बुधैः ॥ ७३ कालुष्यकारणे जाते दुनिवारे गरीयसि । नान्तः क्षुभ्यति कस्मिश्चिच्छान्तात्मासौ निगद्यते ॥७४ देवे संघे श्रुते साधौ कल्याणादिमहोत्सवः। निर्व्याजाराधना ज्ञेया भक्तिर्भव्यार्थसाधिका ।। ७५ चतुर्विधस्य संघस्य वैयावृत्त्यमाहितम् । अन्नौषधादिभिर्दिव्यं वात्सल्यमभिधीयते ॥ ७६ फर्मपाफभवानेकदुःखानुभवभाविषु । जीवेष्वान्तमो भावोऽनुकम्पा कथिता जिनः ॥ ७७ गुणाजनप्रयोगेण सदृष्टिनिर्मलीकृता । यथाभिलषितं देशं प्राणिनं प्रापयत्यसौ ॥ ७८ ताप होता है उसे निन्दा कहते है । यह निन्दा नामक सम्यक्त्वगुण निन्द्य-पापका नाश करनेवाला है ॥ ७२ ॥ ( गर्दाका लक्षण ) रागद्वेषादिदोषोके अधीन होकर जब पाप उत्पन्न होता है तब गुरुके आगे उसकी आलोचना करना यह सम्यक्त्वका 'गहीं' नामक गुण है, ऐसा बुद्धिमान लोग मानते है । अपने दोषोका स्वय अनुताप करना निन्दा है तथा गुरुके आगे अपने दोषोका पश्चा- त्तापपूर्वक वर्णन करना गर्दा है ।। ७३ ।। (प्रशमका लक्षण ) कोई दुर्निवार तथा बडा कलुषताका कारण उत्पन्न होनेपर जिसका मन क्षुब्ध होता नही, वह भव्यजीव शान्तात्मा अर्थात् प्रशमगुणका धारक है ऐसा विद्वान् कहते है ।। ७४ ॥ (भक्तिगुण) दोषरहित जिनदेव, मुनि, आर्यिका, श्रावक, श्राविकारूप चार प्रकारका सघ, रत्नत्रयाराधक मुनि, तथा गर्भजन्मादि पाच कल्याणोका महोत्सव इत्यादि प्रसगोंमे सम्यग्दृष्टि अन्त करणपूर्वक इच्छा और कपटरहित जो आराधना करता है वह उसका भक्तिनामक गुण कहा जाता है । यह गुण भव्य अर्थको अर्थात् पुण्यफलरूप सपत्तिकी प्राप्ति करनेवाला है। परिणामोकी निर्मलतासे जो देवादिकोपर अनुराग किया जाता है उसे भक्ति कहते है ।। ७५ ।। (वात्सल्यगुण ) अन्न, औषध आदिके द्वारा चार प्रकारके सघकी जो प्रशसनीय सेवाशुश्रूषा मनवचनकायसे की जाती है उसको वात्सल्यगुण कहते है ।। ७६ ।। ( अनुकम्पागुण ) असातावेदनीय, और अतरायादि अशुभ कर्मोके उदयसे प्रगट हुए दारिद्रय, रोग, चिन्ता वगैरेह दुखोसे पीडित हुए जीवोपर दया भाव उत्पन्न होना उसे जिनेश्वर अनुकम्पाभाव कहते है । परपीडाको देखकर मानो वह पीडा अपनेकोही हो रही है ऐसा समझ उसे दूर करना अनुकपागुण है ।। ७७ ॥ इन आठ गुणरूपी अजनप्रयोगसे सम्यग्दर्शनरूपी नेत्र जब निर्मल होता है तब वह जीवको अभिलाषितस्यानके प्रति ले जाता है ॥ ७८ ॥ १ आ तपते १४) सिद्धान्तसार (१ ७९- द्रव्य क्षेत्रं सुधीः कालं भवं भावं विविच्य यः । सद्दर्शनमहारत्नमादत्ते स विदग्रणीः ॥ ७९ सम्यक्त्वेन विशुद्धात्मा भवी सरभवति क्षमः। ग्रहीतुं चरणं चारु तद्विना न मनागपि ॥ ८० निर्दूषणा सती दृष्टिददाति विपुलं फलम् । सुविशुद्धं यथा क्षेत्रं कर्षितं हि कुटुम्बिना ॥८१ उपस्थित कियभूरि कर्मणां पाकहेतुजम् । सुदृष्टिः साधुदोषं न पश्यतीति महाद्भुतम् ॥ ८२ विद्यमान महादोष परकीयं महाधियः । प्रकाशयन्ति नो जातु स्वसिद्धिमुपलिप्सवः ॥ ८३ निमज्जन्ति भवाम्भोधौ यतीनां दोषतत्पराः। कि चित्रं यद्भवेन्मृत्युः कालकूटविषाशनात् ॥ ८४ भुक्त्वा दुःखशतान्युच्चः सर्वासु श्व-भूमिषु । निगोतेऽभिपततन्त्येते यतिदोषपरायणाः ॥ ८५ --- जो भव्यजीव द्रव्य, क्षेत्र, काल, भव तथा भावरूप ससारसे विविक्त होकर सम्यग्दर्शन- महामणिको ग्रहण करता है वह विद्वानोमे अग्रणी ( श्रेष्ठ ) होता है ॥ ७९ ॥ ( सम्यग्दृष्टिको चारित्रग्रहण योग्यता ) जिसका आत्मा सम्यग्दर्शनसे निर्मल हुआ है ऐसा ससारीजीव उत्तम-निर्दोषचारित्र ग्रहण करने के लिये पात्र होता है । यदि सम्यग्दर्शन-प्राप्ति नही हुई हो तो वह चारित्रग्रहण करनेकोभी असमर्थ है । जैसे किसानोंद्वारा खेत हलसे कर्षित होनेपर वह विपुल धान्य देता है वैसा निर्मल सम्यग्दर्शन जीवको विपुल सुखसपत्ति देता है ।। ८०-८१ ॥ ( सम्यग्दृष्टि दोषदृष्टि नही है ) अनेक विपुल कर्मके उदयरूपी कारणको पाकर साधुमे उत्पन्न हुए दोषको सम्यग्दृष्टि नही देखता यह महाश्चर्य है ।। ८२ ।। आत्मसिद्धिकी इच्छा करनेवाले महाबुद्धिमान महापुरुष दूसरेके विद्यमान महादोषोको कभीभी प्रगट नही करते । तात्पर्य-उनके पास जब अपराधी पुरुष (मुनि या श्रावक ) आकर अपना दोष कहते है तब वे गुरु-आचार्य उसको अपने हृदयमे रखते है, किसीसे नही कहते । यदि कहेगे तो जैनधर्म की निंदा होगी और बडी अप्रभावना होगी, अत वह उपगूहनागके धारक उस अपराधीको योग्य प्रायश्चित्त देकर उसके व्रतोकी शुद्धि करते है। इसतरह सम्यग्दर्शनके उपगूहन अथवा उपवृहण अगका पालन करते है ।। ८३ ।। ( दोषग्रहण ससारवर्धक है ) जो यतियोके दोषग्रहणमे तत्पर होते है वे ससार- समुद्रमे डूबते है । योग्य ही है कि कालकूट विषको भक्षण करनेसे मुत्यु प्राप्त होती है । इसमे क्या आश्चर्य हैं ।। ८४॥ जो यतियोके दोपग्रहणमे तत्पर होते है, उनके विद्यमान अथवा अविद्यमान दोषोको जगतमे फैलाते है वे दोषभावनासे तीव्र और बहुत पापसग्रह करके सपूर्ण नरकभूमियोमे उत्पन्न होकर वहा सैकडो दुखोका अनुभव लेते है । तथा पुन वे निगोदमे जाते हैं ॥ ८५ ॥ १ आ सविदग्रणी २ आ सभवति ३ आ तदृते ४ आ कुटुम्बिन ५ आ निपतन्त्येते -१ ९०) सिद्धान्तसार (१५ . विज्ञायेति महादोषान्देवतागमलिङ्गिनाम् । नापलाप प्रजल्पन्ति मनागपि विपश्चित. ॥ ८६ षट्स्वधोभूमिभागेषु भावनव्यन्तरेषु च । ज्योतिनपुसकस्त्रीषु सदृष्टि व जायते ॥ ८७ मिथ्यात्वकारणेष्वेषु तिर्यगादिषु जातु' न । उत्पद्यते च सदृष्टिर्बद्धायुश्चेन्न तिष्ठति ॥ ८८ मिथ्यात्वान्धतमो घोरं हत्वा सम्यक्त्वभानुना। स्वमार्गे गच्छता प्राप्ति स्वसिद्धिनिलये' सताम् ।।८९ निरयनगरावासायासप्रकाशपरम्परम्परा - परिचयपरां वृत्ति हत्वा नरो निलये कृतः । बहुगुणगणरन्तःस्फूर्जप्रबन्धपटीयसीम् । नटयति पुरः सिद्धि शुद्धः सुदृष्टिविभूषितः ॥ ९० दोषग्रहणका फल जानकर जिनदेव, जिनागम तथा जैनमुनि इनके असत्य दोषोका अल्पभी वर्णन विद्वान् नही करते ।। ८६ ।। (सम्यग्दृष्टि कहा उत्पन्न नही होते) पहला नरक छोडकर सम्यग्दृष्टि जीव शर्करा प्रभादि महातम प्रभान्त छह नरकभूमियोमे नही जन्मते हैं । भवनवासी, व्यन्तर, तथा ज्योतिष्क देवोमे सम्यग्दृष्टि जन्मग्रहण नही करता तथा नपुसक और स्त्रियो वह उत्पन्न नहीं होता। तात्पर्य-जिसको नरकायुका बध होनेपर सम्यग्दर्शन उत्पन्न होता वह जीव पहले नरकमेही उत्पन्न होता हैं । देवायुका वन्ध होनेपर सम्यग्दर्शन जिसको प्राप्त हुआ हैं वह जीव सौधर्मादि स्वर्गोमे महद्धिक देव होता है ।। ८७ ॥ जिनको मिथ्यात्व कारण है ऐसे एकेन्द्रिय विकलत्रयमे सम्यग्दृष्टि उत्पन्न नहीं होते। तिर्यगायुका वध होनेपर सम्यग्दर्शन जिसको प्राप्त हुआ हैं ऐसा मनुष्य भोगभूमीका पुल्लिंगी तिर्यंच होकर जन्म लेता है । तथा मनुष्यायुका वध होनेपर जिसे सम्यग्दर्शन प्राप्त हुआ ऐसा कर्मभूमिज मनुष्य अथवा पचेन्द्रिय सज्ञी तियंच भोगभूमीमे पुरुष होकर उत्पन्न होता है। स्त्रीपर्यायमे उसकी उत्पत्ति नहीं होती ।। ८८॥ सम्यक्त्वरूपी सूर्यके द्वारा मिथ्यात्वरूप गाढ अधकारका नाश कर मोक्षमार्गमे जानेवाले महापुरुषोको आत्मसिद्धिका घर ऐसा जो मोक्ष उसकी प्राप्ति होती है ।। ८९ ।। (शुद्ध सम्यग्दृष्टिके आगे मोक्षलक्ष्मी नाचती है) निर्मल परिणामवाला तथा सम्य- ग्दर्शन भूषित पुरुप नरक-नगरमे निवास करनेसे उत्पन्न हुई खेदकी प्रकाश-परम्पराके परिचयकी प्रवृत्तिको नष्ट कर तथा स्वर्गमे रहकर अनेकगुणसमूहोसे अन्त करणमें वृद्धिंगत हुआ जो परिचय उससे अतिशय चतुर ऐसी सिद्धि-लक्ष्मीको अपने आगे नचाता है ।। ९० ॥ . १ आ वा पुन २ आ सुमार्गे ३ आ निलयीकृत

१६)
सिद्धान्तसार.
(१ ९१-
A
A
आद्यामाराधनां तां विशदतरगुणग्रामयुक्तां सुगुप्तो । दृष्टि सदृष्टिहुष्टः कलयति
कलिताशेषतत्त्वकसत्वः।
योती भवतोत्तमाडगस्फुरदमलरमारम्यलीलामलोलः । कल्याणानां क्षणेनावहति
सुरपतेरचनामर्चनीयः ॥९१
इति श्रीसिद्धान्तसारसंग्रहे' आचार्यश्रीनरेन्द्रसेनविरचिते
सम्यग्दर्शननिरूपणे प्रथमः परिच्छेदः ।। १
-
जो मिथ्यात्वसे दूर रहा है, जो सम्यग्दर्शनकी प्राप्तिसे आनदित हुआ है, जिसने
सपूर्ण जीवादि तत्त्वोका मुख्य अस्तित्वगुण जाना है तथा उत्तम शरीरसे सुदर और निर्मल
एमी लक्ष्मीकी लीलाका भोग लिया हैं, जो निरिच्छ है ऐसा पुरुष अतिशय निर्मल सवेगादिकी
गुणसमूहमे युक्त सम्यग्दर्शनाराधनाको धारण करता हैं । जिससे वह पूज्य महात्मा इन्द्रके द्वारा
की जानेवाली पचकल्याण पूजाको उत्सवके साथ धारण करता हैं ।। ९१ ।।
आचार्य श्रीनरेन्द्रसेनविरचितसिद्धान्तसारसग्रहमे सम्यग्दर्शनका
निरूपण करनेवाला पहिला परिच्छेद समाप्त हुआ।
amme
N
१ का नरेननविरचित सिद्धान्तमारमनहे प्रथम परिच्छेद ।

(द्वितीयोऽध्यायः ) सम्यग्ज्ञान परज्योति स्वपरार्थावभासकम् । आत्मस्वभावमाभाव्य भावयन्ति भवातिगा. ॥१ वोधो बुद्धिस्तथा ज्ञानं प्रमाणं प्रमिति. प्रमा। प्रकाशश्चेति नामानि मन्यन्ते मुनयोऽन्वयात् ॥२ ज्ञान प्रमाणमित्येतन्मन्यन्ते न मनागपि । नैयायिकादयो दत्सिन्निकर्षादिवादिनः ॥ ३ सूक्ष्मान्तरितदूरार्थाः सन्निकर्षादिवादिनाम् । अप्रमेया भवन्त्येव तत्सम्बन्धाद्यभावतः ॥ ४ --- (दूसरा अध्याय ) (सम्यग्ज्ञानका लक्षण)-सम्यग्ज्ञान यह आत्माका स्वभाव है । यह उत्कृष्ट प्रकाश- स्वरूप है, अर्थात् इससे अपना स्वरूप जानता है तथा परपदार्थका स्वरूप जानता है। जिन्होने ससारका नाश किया है ऐसे सिद्धपरमेष्ठी अनुभवन-योग्य इस ज्ञानकी भावना करते है अर्थात् वे सतत केवलज्ञानमय हैं। उनका ज्ञान प्रतिसमय अनन्तानन्त पदार्थोको तथा उनके त्रिकालवर्ती अनतानन्त पर्यायोका साथ जानता है । सम्यग्ज्ञानको बोध, बुद्धि, ज्ञान, प्रमाण, प्रमिति, प्रमा, प्रकाश ऐसे नाम मुनि मानते हैं । क्योकि सबमे अर्थकी अन्वयता ( सार्थकता ) है अर्थात ये सव नाम ज्ञानके एकार्थवाचक है । ज्ञानकेही ये नाम हैं । दीपक जैसा अपनेको और घटादि पदार्थोको प्रकाशित करता है वैसा ज्ञानभी स्व और परस्वरूप जानता है ॥ १-२ ।। नैयायिकादिक दर्पसे सन्निकादिकोको प्रमाण मानते है । उन्होने 'ज्ञान प्रमाण है ऐसा अल्पतयाभी नहीं माना है । तात्पर्य-नैयायिक और योग सन्निकर्पको प्रमाण मानते है। साख्य इन्द्रियवृत्तिको प्रमाण मानते है । मीमासक ज्ञातृव्यापारको प्रमाण मानते है। बौद्ध निर्विकल्पज्ञानको प्रमाण मानते है । इस प्रकार सन्निकर्षादिकोको प्रमाण माननेवाले नैयायिकादिकोने ज्ञानको प्रमाण नही माना है। परतु सन्निकर्षादिक विना ज्ञानकेभी होते है और वे अचेतन है । अचेतन पदार्थोंमे जाननेका सामर्थ्य नहीं है। अन्यथा घटपटादिक पदार्थभी जमीन आदिके साथ सम्बध होनेसे-सन्निकर्ष होनेसे जानेगे । परतु उनमे वह जाननेका धीसन्निकर्षसेभी उत्पन्न हुआ नही दीखता । तथा सन्निकर्प जगतके सभी पदार्थोके साथ नही होता है, क्योकि सूक्ष्मादि पदार्थोका इन्द्रियोसे सवध नही होता है ऐसा आचार्य कहते हैं ॥ ३ ॥ सन्निकर्पादिवदियोने सूक्ष्मपदार्थ, अन्तरितपदार्थ, दूरपदार्थको अप्रमेय माना हैं क्योकि उनके साथ इद्रिय सम्बन्यादिकोका अभाव है।॥ ४॥ विशेष स्पष्टीकरण-आत्मा, इन्द्रिय, मन और घटादिक पदार्थ इनका सवध होनेसे ज्ञान उत्पन्न होता है। ऐसे सवधको सनिकर्ष कहते हैं। जैसे घटमे रूपका ज्ञान होता है, यहा आत्माका मनसे सबध होता है, मनका नेत्रेन्द्रियके साथ सबध होता है और नेत्रका घटरूपके साथ सवध होता है तब यह घट काला है, यह घट पीला है इत्यादि ज्ञान होता है । अत ज्ञान सन्निकर्षसे S.S3 १८) सिद्धान्तसार (२५- तदभावे ह्यनिष्टोऽपि सर्वज्ञाभाव इष्यते । तेषामतो वचश्चार तदीयं न कदाचन ॥ ५ तदेतत्कथमित्येवं शंकनीयं न धोधनः । न ह्यतीन्द्रियविज्ञानं सर्वज्ञं साधयन्ति ते ॥६ ----- - होता है । उपर्युक्त घटका रूपज्ञान चक्षु सन्निकर्षसे हुआ । सुखादिकमे त्रिसन्निकर्षज ज्ञान है। आत्माका मनसे सबध होता है और मनका सुखसे सबध होकर सुख जाना जाता है । योगिओको आत्मा और मनका सबध होनेसे ज्ञान उत्पन्न होता है ऐसा सनिकर्षवादी कहते हैं । आचार्य इसका खडन इस प्रकार करते हैं-सन्निकर्ष होनेसेही यदि ज्ञान होता,तो घटके समान आकाशादिकके साथभी चक्षुका सबध है तथापि वह सन्निकर्ष आकाशविषयक ज्ञानको उत्पन्न नही करता है । सन्निकर्ष सशयादिकोमेभी होनेसे ऐसे सन्निकर्षकोभी प्रमाण मानना पडेगा । कज्जलसे नेत्रका सनिकर्ष होनेपरभी कज्जल-विषयक ज्ञान वह उत्पन्न नही करता है। आम्रफलके रूपके साथ चक्षुका जैसा सम्बध है, वैसा उसके रसके साथभी है, तोभी रसका ज्ञान नही होता है । अत सन्निकर्ष ज्ञानका असाधारण कारण नही है, इसलिये वह प्रमाण नही है । सन्निकर्षसे ज्ञान होता, तो उसमे क्रमवर्तिपना मानना पडेगा परन्तु एकही समयमे चद्रका और शाखाका ज्ञान होता है । तथा सन्निकर्ष होनेसे यदि ज्ञान हो जाता तो सूक्ष्म परमाणुकाभी ज्ञान होना चाहिये क्योकि आपने उनके साथ चक्षुरिन्द्रिय सन्निकर्ष माना है । सन्निकर्षसे यदि ज्ञान होता है तो व्यवहित पदार्थोका ज्ञान नही होना चाहिये परतु भूमिके अन्तर्गत पदार्थोंको उनके साथ सन्निकर्ष न होनेपरभी अञ्जनसहित नेत्र देखता है । तथा सूक्ष्म-परमाणु, देशान्तरित- मुठ्ठीमे रखा हुआ पदार्थ, दूरार्थ-मेरु आदिक, कालान्तरित-रामरावणादिक सन्निकर्ष वादियोको अप्रमेय होगे अर्थात् उनके साथ इन्द्रियोंके सम्बन्धादिकोका अभाव है ॥ ४ ॥ नैयायिक, योग, साख्योने सपूर्ण पदार्थोको जाननेवाला अर्थात् सर्वज्ञ माना है परतु सन्निकर्षको प्रमाण माननेसे सपूर्ण पदार्थोंके साथ आत्मा, इन्द्रिय और मनका सम्बध होना शक्य नही है, अत सर्वज्ञाभाव होगा, जो कि उनको अनिष्ट है। सन्निकर्ष वर्तमानकालीन पदार्थोकाही हो सकता है, वहभी जगतके सपूर्ण पदार्थोंके साथ होना नितरा असभव है । ऐसी अवस्थामे वर्त- मान कालीन पदार्थभी-सपूर्णतया नही जाने जाते है । भविष्यत्कालीन पदार्थ-उत्पन्न होनेवाले होनेसे वर्तमान कालीन इद्रियोका उनके सबध होना असभव है, भूतकालीन पदार्थ नष्ट होनेसे इन्द्रियोके साथ सम्बद्ध हो नही सकते हैं, अत भूतभविष्यके सपूर्ण पदार्थोंका ज्ञान न होनेसे नैयायिकादिकोके मतमे सर्वज्ञत्वका अभाव होगा । इसलिये सन्निकर्षवादी नैयायिकादिकोका सन्निकर्षवाद सुदर-प्रामाणिक नही है ॥ ५ ॥ नैयायिकादिकोने सर्वज्ञ माना है अत आप सर्वज्ञाभावका दोष उनको क्यो देते हैं ऐसीभी बुद्धिमानोको शका नही करनी चाहिये, क्योकि अतीन्द्रिय ज्ञानवाले सर्वज्ञको वे सन्निकर्षवादी सिद्ध -२ १०) सिद्धान्तसार (१९ न हीन्द्रियादिविज्ञान सूक्ष्माद्यविभासकम् । तेषामनवभासेषु क्व सर्वज्ञः कुतः प्रमा ॥७ ततश्च ज्ञानमेवंतत्प्रमाणमभिधीयते । तत्र विप्रतिपन्ना ये न ते तत्त्वार्थशिनः ॥८ मतिज्ञानं श्रुतज्ञानमवधिज्ञानमुत्तमम् । मनःपर्ययविज्ञान कैवल्यमिति पचघा ॥९ भावान्तरगता भावि सम्यग्ज्ञानगता ह्यमी । सामान्येनावगन्तव्या विशेषेण पुनः परः ॥ १० - ---. ? नही कर सकते हैं । इन्द्रियादिकोसे उत्पन्न होनेवाला ज्ञान सूक्ष्म, अन्तरित और दूरके पदार्थोंको नही जानता है, और वे नही जाने गये तो सर्वज्ञ और उसका ज्ञान कैसे होगा ? ॥६-७ ।। भावार्थ-अत सन्निकर्षमे प्रमाणता नही है ज्ञानही प्रमाण है । इन्द्रियोमें और मनमे जो जाननेका सामर्थ्य आया है वह आत्माके ज्ञानगुणसे आया है। उसके साहाय्यसे आत्मा जानता है। सामर्थ्य होनेसेही पदार्थका स्वरूप आत्मासे जाना जाता है, वह सामर्थ्य यदि नहीं होता तो सन्निकर्पका होना व्यर्थ पड जाता । अत योग्यताही साधकतम है, सन्निकर्ष नही है। वह योग्यता प्रतिबधक-ज्ञानावरणादि-कर्मोंका आवरण हट जानेसे उत्पन्न होती है, इसलिये योग्यता प्रतिबन्ध- कापायरूप है। योग्यता होनेसे स्वपरार्थावभासक ज्ञान होता है और वह नही होनेसे नही होता है । अत वह योग्यता साधकतम है । जैसी कुल्हाडी वृक्षको काटनेमे साधकतम है, उसके बिना वृक्ष नही काटा जाता । वैसी योग्यता होनेपर पदार्थज्ञान होता है। उसके विना वह उत्पन्न नही होता है । इसलिये ज्ञानको जैनाचार्योंने प्रमाण माना है । ज्ञानके विषयमें जो मूढ है वे जीवा- दिक तत्वोको नही जानते है । यहातक ज्ञानकोही प्रमाण मानना चाहिये ऐसा विवेचन आचार्यने किया ॥ ८॥ (सम्यग्ज्ञानके भेद)- मतिज्ञान, श्रुतज्ञान, अवधिज्ञान, मन पर्ययज्ञान और केवलज्ञान ऐसे सम्यग्ज्ञानके पाच भेद कहे है । स्पष्टीकरण-सम्यग्ज्ञानमें सशय, विपर्यय और अनध्यवसाय नही रहते है । सशयमें अनेक कोटियोका अवलवन होता है, परतु कोईभी कोटि निश्चित नही रहती है । इसलिये वह ज्ञान प्रमाणरूप नही है । विपर्यय-कुछ सादृश्यसे एक वस्तुमें उससे भिन्न स्वरूप वस्तुका निर्णय होना, जैसे चादीमे चमकीलापन देखकर सीपके तुकडेमें चादीका भ्रम होनेसे उसे चादी कहना व जानना । अनध्यवसाय-यह कुछ है ऐसा ज्ञान होना यानी पदार्थको विशेषता ज्ञात न होना। ऐसे तीन ज्ञानोको अप्रमाण ज्ञान कहते हैं। "प्रकर्षेण सशयादिव्यवच्छेदेन मीयते परिच्छिद्यते वस्तुतत्त्व येन तत्प्रमाणम् " सशयादिक जिसमे उत्पन्न नहीं होते हैं ऐसा वस्तुका जो यथार्थ निर्णय उसे सम्यग्ज्ञान कहते हैं । उपर्युक्त पाचही ज्ञान सशयादिकोसे रहित होते हैं ।। ९॥ ये पाच भेदयुक्त ज्ञान अपने अपने विषयभूत अन्य पदार्थको जाननेवाले है । और ये सब सम्यग्ज्ञान है, ये सम्यग्ज्ञानके पाचभेद सामान्यसे कहे हैं । विशेषसे पुन दुसरे अनेक भेद होते है ॥ १०॥ १ आ श्रुत २आ भावा ३ मा परे २०) सिद्धान्तसार - (२.११- मतिज्ञान भवेत्पूतमिन्द्रियानिन्द्रियोद्भवम् । षट्त्रिंशत्रिशतभेद' भव्यसत्त्वसुखावहम् ॥ ११ अवग्रहेहावायानां धारणायाश्च भेदतः । मतिज्ञानमिदं दिव्यं चतुर्विधमुदीरितम् ॥ १२ सम्यग्ज्ञानार्थयोराद्यसङग्रहोऽवग्रहो मतः । तत्तद्विशेषकाडक्षायामीहामीहाविदो विदुः ॥ १३ विशेषव्यवसायात्मा स त्ववायो निगद्यते । अर्थाविस्मृतिरूपं तु धारणाज्ञानमञ्जसा ॥ १४ बहुश्च बहुधा क्षिप्रश्चानुक्तोनिसृतो ध्रुवैः । सेतरश्चापि भिन्नः सोऽवग्रहो द्वादशप्रमः ॥ १५ (मतिज्ञानके कारण और भेद)- मतिज्ञान पवित्र है वह इन्द्रियो और मनसे उत्पन्न होता है । उसके तीनसौ छत्तीस भेद है और वह भव्य-प्राणियोको सुखदायक है । क्योकि उससे हितकी प्राप्ति और अहितका परिहार होता है। नेत्रसे घटपटादिका ज्ञान होता है यह नेत्रमतिज्ञान है । स्पर्शनेन्द्रियसे जो पानी, अग्नि आदिका स्पर्श होनेसे ठडा और उष्ण आदि ज्ञान होता है, उसे स्पर्शमतिज्ञान कहते हैं । इसतरह रसनेन्द्रियादिकसे मधुररसादिकोका ज्ञान होता है। मनसेभी मतिज्ञान होता है ॥ ११ ॥ (मतिज्ञानके चार भेद)- अवग्रह मतिज्ञान, ईहा मतिज्ञान, अवाय मतिज्ञान और धारणा मतिज्ञान ऐसे मतिज्ञानके चार भेद है। सम्यग्दर्शनके साथ उत्पन्न होनेसे इसे दिव्य कहते है।। १२॥ सम्यग्ज्ञान और पदार्थका जो आद्य-ग्रहण उसे अवग्रहमतिज्ञान कहते है। विषय घटादिक पदार्थ और विषयी-उनको ग्रहण करनेवाले स्पर्शनादिक इन्द्रिया इनका सयोग होनेपर जो प्रथमज्ञान होता है, उसको अवग्रह कहते है । यह अवग्रह दर्शनपूर्वक होता है । अर्थात् विषय और विषयीका सबध होनेपर दर्शन-वस्तुका सामान्यवलोकन' होता है जिसमे घट, पट इत्यादि प्रकार प्रतिभासित नही होते है । केवल यह कुछ है ऐसा प्रतिभास होता है उसको दर्शन कहते है, उसके अनन्तर जो प्रथम ग्रहण होता है वह पहिला अवग्रहज्ञान है । जैसे यह मनुष्य है ऐसा प्रथमज्ञान हुआ। इसके अनन्तर मनुष्यके विशेष जाननेकी इच्छा होनेपर ईहामतिज्ञान होता है, ऐसा ईहाका स्वरूप जाननेवाले आचार्य कहते है । जैसे यह मनुष्य दाक्षिणात्य है या उत्तरीय है अर्थात् दक्षिणदेशका है वा उत्तरदेशका रहनेवाला है ऐसा संशय होनेपर उसके निरसनके लिये यह उत्तरदेशका होगा ऐसी भवितव्यताप्रतीति उत्पन्न होती है उसे ईहामतिज्ञान कहना चाहिये ॥ १३ ॥ ईहामे जिस विशेषका भवितव्यतारूपसे ज्ञान हुआ था उसका जो निश्चय होता है उसे अवाय कहते है। और अवायसे जाने हुए विषयका कालान्तरमेभी विस्मरण न होना ऐसा जो ज्ञान उसे परमार्थसे धारणामतिज्ञान कहते है। जैसे यह मनुष्य उत्तरदेशवासी है ऐसा उसके वेषभूषाभाषादिकसे निर्णय होना अवायमतिज्ञान है । तदनन्तर उस उत्तरदेशवासी मनुष्यको कालान्तरसे देखनेपर पहले देखी, जानी हुई वातको न भूलना यह धारणा-मतिज्ञान है ।। १४ ।। (अवग्रह मतिज्ञानके बारा भेद ) - बहुअवग्रह, बहुविधावग्रह, क्षिप्रावग्रह, अनुक्ताव- ग्रह, अनिसृतावग्रह, ध्रुवावग्रह ऐसे छह भेद और उसके विरुद्ध छह भेद होते हैं इसप्रकारसे एकाव- १ मा त्रिशती २ आ आद्य ३ आ स्त्वनुक्ती -२ २३ ) सिद्धान्तसार ( २१ बहूनां ग्रहणं यत्र समाना' समर्मिणाम् । प्रक्षयोपशमादेष वव्हवग्रह इष्यते ॥ १६ एकस्यव पदार्थस्य बहूनां न कदाचन । ग्रहादवग्रहः प्राशेरबहुः परिकीर्तितः ॥ १७ प्रकारविविधर्यत्र सदर्थग्रहणं भवेत् । असौं बहुविधो शेयोऽवग्रही गेहवजितः ॥ १८ एकेनैव प्रकारेण यत्रावग्रहो भवेत् । एकप्रकारमाख्यान्ति मुनयस्तमवग्रहम् ॥ १९ ज्ञानावरणवीर्यस्य क्षयोपशमसभवात् । शोजमर्थग्रहो यत्र स क्षिप्रावग्रहाभिधः ॥ २० चिरकालेन यश्चार्थ गृण्हाति बहुदुखतः । स चिरावग्रहोऽभाणि सुचिरन्तनपौरुषः ॥ २१ उन्मीलत्पुग्दलद्रव्यं गृह्यतेऽसकलं यत । अवग्रहं गृहातीता गृणन्ति तमनि सृतम् ॥ २२ तद्विपक्ष क्षमावन्तो नि सृतावग्रह विदुः । अभिप्रायवशाद्गृण्हन्ननुक्त. पुनरुच्यते ॥ २३ ३ - ग्रह, एक प्रकारावग्रह, अक्षिप्रावग्रह, उक्तावग्रह, नि सृतावग्रह और अध्रुवावग्रह ऐसे छह भेद है। दोनो मिलकर अवग्रह-मतिज्ञानके वारह भेद होते हैं ।। १५ ॥ ( बहुअवग्रह और एकावग्रह )- समानधर्मवाले अनेक पदार्थोंका ग्रहण जिसमे होता है वह बहुअवग्रह है। इसके विरुद्ध एकावग्रह है अर्थात् एक पदार्थकाही जो अवग्रह होता है अनेकोका कदापि नही होता है उसे एकावग्रह कहते है । विद्वान् लोग इसे अवहु अवग्रहभी कहते है ॥ १६-१७ ॥ - (बहुविधावग्रह और एकविधावग्रह )- अनेक प्रकारोके, अनेक धर्मोके, अनेक पदार्थोंका अनेक प्रकारोंसे जहा अवग्रह होता है उसे गृहत्यागीमुनि बहुविधावग्रह कहते है । जहा एक प्रकारके अनेक पदार्थोंका अवग्रहज्ञान होता है उसे मुनि एकप्रकारावग्रह कहते है ।। १८-१९ ।। ( क्षिप्रावग्रह और अक्षिप्रावग्रह )- अवग्रहमतिज्ञानावरण कर्मका क्षयोपशम और वीर्यान्तराय कर्मका क्षयोपशम होनेसे पदार्थको शीघ्र जानना क्षिप्रावग्रह है, और चिरकालसे बहुत कष्टसे जो पदार्थोंका अवग्रहज्ञान होता है उसे अक्षिप्रावग्रह कहते है। ऐसा पुरातन पुरुषोने- गणरादि देवोंने कहा है ।। २०-२१ ।। ( अनि सृतावग्रह और नि सृतावग्रह )- पानी आदिकमेसे किंचित् ऊपर आया हुवा असकल पुद्गल देखकर सपूर्ण पदार्थका ज्ञान होना अनि सृतावग्रह है । अर्थात् एक वस्तुका कुछ अश देखकर इतर अशोसहित सपूर्ण पदार्थका ज्ञान होना अनि मृतावग्रह है। ऐसे गृहत्यागी मुनि कहते हैं । इसके विरूद्ध अवग्रहको क्षमावान्मुनि नि सृतावग्रह कहते हैं । अभिप्रायसे जानना वह अनुक्तावग्रह कहा जाता है ।। २२-२३ ॥ ४ आ भावस्य २ आ सोऽय ३ आ पूरुष ५ आ नात् १आ समानासम २२) सिद्धान्तसार (२. २४- उक्तावग्रहमाख्याति यदुक्ते सत्यवग्रहः । प्रजायते पदार्थस्य कर्मणां प्रशमक्षयात् ॥ २४ कालान्तरे पदार्थस्य यथार्थग्रहणं ध्रुवम् । अध्रुवस्तु भवेत्सोऽयमयथार्थावभासनम् ॥ २५ ईहादयोऽपि विज्ञेया बव्हादिक्रमभेदतः । प्रत्येकं द्वादश प्रास्त्रियस्त्रुटितकल्मषैः ॥ २६ प्रत्येकं द्वादशाप्यते करणैर्मनसा हताः । सप्ततिद्वधिका तेषामेकैकं प्रति जायते ॥ २७ अष्टाशीत्यधिकं तावच्छतद्वयमुदीरितम् । तन्मतिज्ञानमर्थस्यावग्रहादिविशेषितम् ॥ २८ ---- ( उक्तावग्रह, ध्रुवाग्रह, और अध्रुवावग्रहोका वर्णन )- शब्दद्वारा कहनेपर जो पदार्थका प्रथम ज्ञान होता है उसे उक्तावग्रह कहते है। पदार्थका यथार्थ (जितना था उतनाही) अवभासन होना अर्थात् कम-जादा न होना ध्रुवावग्रह है। पदार्थका यथार्थ अवभासन न होना अर्थात् कम जादा अवभास होना अध्रुवावग्रह है । भावार्थ-बहु बहुविधादिक अवग्रह मतिज्ञाना- वरण कर्मका क्षयोपशम अधिक होता है तब होते है, और मद क्षयोपशम होनेसे एकावग्रह, एकविधावग्रह, अक्षिप्रावग्रह, आदि अवग्रह होते है । ध्रुवावग्रह और धारणामे क्या अन्तर है क्षयोपशमकी प्राप्तिके समयमे परिणामोकी निर्मलता सतत होनेसे प्राप्त हुए क्षयोपशमसे पहिले समयमे जैसा अवग्रह हुआ है वैसाही बार बार द्वितीयादिसमयोमे होता रहता है । वह न्यून नही होता है और अधिकभी नही होता है ऐसे अवग्रहको ध्रुवावग्रह कहते है और जब विशुद्ध परिणाम और सक्लेश परिणामोका मिश्रण होता है तब जो मतिज्ञानावरणका क्षयोपशम होता है उससे उत्पन्न हुवा अवग्रह कभी बहुत पदार्थोंका होता है तो कभी अल्पोका होता है, कभी कभी बहुविधोका और कभी एकविधोका होता है ऐसा न्यूनाधिकभाव होनेसे अध्रुवावग्रह होता है। तथा धारणासे जाना गया पदार्थ कालान्तरमे भी विस्मृत नही होता है उसकी याद रहती है उस अविस्मृतिके कारण ज्ञानको धारणा कहते हैं। ऐसे अवग्रहके भेदोका वर्णन किया है ॥२४-२५॥ ( ईहादिकोंका बव्हादिक्रमसे भेद प्रतिपादन )- जिनका पाप नष्ट हुवा है ऐसे विद्वानोके द्वारा ईहा, अवाय और धारणाके बारह बारह भेद जानने योग्य हैं । बहुईहा, वहु- विधईहा, क्षिप्रेहा, अक्षिप्रेहा इत्यादिरूपसे बारह भेद होते है । बहुअवाय, बहुविधावाय, क्षिप्रावाय इत्यादि बारह भेद अवायके होते है । तथा धारणाके बहुधारणा, बहुविधधारणा, क्षिप्रधारणा, अक्षिप्रधारणा आदि धारणाकेभी बारह भेद होते हैं । स्पर्शनादिक पाच इद्रियाँ और मन इनसे गुणित करनेपर अवग्रहादिकोके बहत्तर बहत्तर भेद होते है । स्पर्शनावग्रहके बारह भेदके समान रसनेन्द्रियावग्रहके बारह भेद होते है । घ्राणावग्रह, चक्षुरिन्द्रियावग्रह और कर्णावग्रहकेभी बारह बारह भेद मिलकर साठ भेद इन्द्रियावग्रहोके होते है । इनमे मनोवग्रहके बारह भेद मिलानेसे अवग्रहोके बहत्तर भेद होते है । ईहाके, अवायके और धारणाकेभी पाच इद्रियाँ और मनसे गुणित करनेपर बहत्तर प्रकारकी ईहा, बहत्तर प्रकारका अवाय और बहत्तर प्रकारकी धारणा होती है। सब मिलकर दोसौ अठठ्यासी भेद मतिज्ञानके अर्थ अवग्रहादि विशेषोसे होते है ऐसा जिनेश्वरने कहा है ॥ २६-२७-२८ ।।

-२. ३५ ) सिद्धान्तसार ( २३ १ व्यञ्जनं व्यञ्जितं प्रारिव्यक्त शब्दसम्भवम् । तस्यावग्रह एवास्ति न परे त्वविशेषतः ॥ २९ चक्षुर्मनो विना तावदिन्द्रियर्गुणितश्च सन् । स द्वादशविकल्पोऽपि बव्हादिभिरितीरितः ॥ ३० अष्टाधिका भवेत्तावच्चत्वारिंशत्समासतः । व्यञ्जनावग्रहस्येति षत्रिशत्रिशताधिकम् ॥ ३१ मतिज्ञानस्य ये भेदा गदिता भेदकोविदः। ते सर्वे भव्यजीवस्य जायन्ते नापरस्य च ॥ ३२ अर्थव्यञ्जनभेदेन सत्पदार्थावबोधकम् । इन्द्रियानिन्द्रियोत्पन्नं तन्मतिज्ञानमीरितम् ॥ ३३ ऋद्धिबुद्धिप्रवृद्धं च प्रवृद्धजनपूजितम् । क्वचिदासन्नभव्यस्य' स्यात्तदावरणक्षयात् ॥ ३४ सा कोष्ठबीजसभिन्नश्रोतृपादानुसारिणी । ऋद्धिबुद्धिर्भवेत्तस्य सद्वृद्धः कारण परा ॥ ३५ जिनको अठारह प्रकारको वुद्धि-ऋद्धि प्राप्त हुई है, ऐसे गणघरदेवोने अव्यक्त शब्दा- दिकोंसे उत्पन्न हुआ जो अव्यक्त अवग्रहजान उसको व्यञ्जनावग्रह कहा है। स्पर्शनेन्द्रिय रसनेन्द्रिय, ध्राणेन्द्रिय और कर्णेन्द्रियसे जो अस्पष्टावग्रह होता है वह वहादिक पदार्थोकी अपेक्षासे बारह वारह प्रकारका होता है । अत उपर्युक्त चार इन्द्रियोसे अस्पष्ट अवग्रहके अडतालीस भेद होते है । दोसौ अठासी भेदोमे ये व्यजनावग्रहके अडतालीस भेद मिलानेपर मतिज्ञानके तीनसौ छत्तीस भेद होते हैं। भावार्थ- जैसे मट्टीके नये घडेपर पानीके दो तीन विंदु डालनेपर वह घडा गीला नही होता है, पुन पुन सिंचित करनेपर गीला हो जाता है । इस प्रकार कान, नाक, स्पर्शन और जिव्हा ऐसे चार इन्द्रियोंसे शब्दादि-परिणत पुद्गल दो तीन आदि समयोमे जव ग्रहण किये जाते हैं तव व्यक्त नही होते है । पुन पुन अवग्रह होनेपर वे व्यक्त होते है । इसलिये व्यक्तग्रहणके पूर्वमे व्यजनावग्रह है और व्यक्तग्रहण होनेपर अर्थावग्रह है । अव्यक्तग्रहण होनेपर उसके ईहा, अवाय और धारणा नही होते है । यह व्यजनावग्रह चक्षु और मनको छोडकर शेष चार इन्द्रियो- द्वारा होता है ।। २९-३०-३१ ॥ भेद जाननेवालोने मतिजानके जो भेद कहे हैं वे सव भव्य जीवको सम्यग्दृष्टिको होते हैं मिथ्यादृष्टिको नही होते हैं । अर्थावग्रह, व्यजनावग्रह आदि भेदोसे युक्त और जीवा- जीवादि पदार्थोंका ज्ञान करानेवाली इन्द्रिया और मनसे उत्पन्न हुआ जो ज्ञान वह मतिज्ञान है ऐसा मुनिश्वरोने कहा है ।। ३२-३३ ॥ (अनृद्धि-मतिज्ञानका वर्णन समाप्त ।) ( वुद्धिऋद्धिरूपमतिज्ञानका वर्णन ) - कभी कभी आसन्न भव्यजीवको बुद्धिऋद्धि प्राप्त होनेसे वृद्धिंगत हुआ और वृद्ध-ज्ञानी मुनीश्वरोंके द्वारा पूजा गया ऐसा मतिज्ञान प्राप्त होता है । वह उसके आवरणके तीव्र क्षयोपशमसे प्राप्त होता है ।। ३४ ॥ यह ऋद्धियुक्तवुद्धि, कोष्टवुद्धि, वीजवुद्धि, सभिन्नश्रोतृवुद्धि और पादानुसारिणीवुद्धि इसप्रकार चार प्रकारकी है । यह किसी आसन्न भव्यको होती है । यह उत्तम वृद्धिका उत्तम कारण है ।। ३४-३५ ॥ respo-00- १ या प्रमाणत २ आ भव्ये २४) सिद्धान्तसार ( २ ३६- यस्यामवगतानेकग्रन्थार्थानामवस्थितिः । अविनष्टाप्रकीर्णानां कोष्ठे सभृतधान्यवत् ॥ ३६ कोष्ठबुद्धिमताशेषविशेषार्थावभासिनी । बीजबुद्धिः पुनर्जेया विविधागमपारगः ॥ ३७ भव्यक्षेत्रे यथा बीजमुप्तं कालादियोगतः । अनेकधा भवेदवृद्धमृद्धिसम्पादकं नृणाम् ॥ ३८ तथैकबीजभूतार्थसग्रहादर्थदर्शिनी । अनेकधा मता सेयं' बीजवुद्धिर्महात्मनाम् ।। ३९ एकस्यापि पदस्यादावन्ते ग्रन्थस्य बोधतः । यस्यां ग्रन्थावबोधोऽसौ बुद्धिः पादानुसारिणी ॥४० यत्सामान्यविशेषात्माभेदो भवति चानयोः । अत एवेदमत्युधं बुद्धिद्वयमुदाहृतम् ॥ ४१ द्वादशयोजनायामचक्रवर्तिचमूध्वनिम् । मनुष्यकरभादीनां संकरादिकजितम् ॥ ४२ यस्यां शृणोति भव्यात्मा निर्मलीकृतमानसः । सभिन्नश्रोतृबुद्धिः सा गीता-गानविचक्षणः ॥४३ ( कोष्ठबुद्धिऋद्धिका वर्णन )- जैसे भाडागारमे अर्थात् धान्यागारमे गेहूँ, उडद आदि अनेक प्रकारका धान्य नष्ट नही हो और आपसमे मिश्र न हो ऐसा अलग अलग स्थापन किया जाता है। वैसे जो ऋद्धि प्राप्त होनेपर जाने गये अनेक ग्रथोका अवस्थान, अविनाश और अमि- श्रतारूपसे होता है ऐसी बुद्धिऋद्धिको कोष्ठबुद्धि कहते हैं । तात्पर्य यह है, कि अनेक ग्रथोका ज्ञान और उनके प्रकरण जो जैसे है वैसे कोष्ठवुद्धिवाले मुनियोके हृदयमे रहते है। कुछ ज्ञान उन ग्रथोका नष्ट होना अथवा कुछ किसी विषयमे मिल जाना इत्यादि दोप उनमे नही रहते है। यह कोष्ठबुद्धि सपूर्ण विशेष अर्थोको प्रकाशित करनेवाली होती है ।। ३६-३७ ।। ( वीजवुद्धिऋद्धिका वर्णन )- जैसे उत्तम खेतमे वोया हुआ वीज वर्षाकालादिकके सयोगसे अनेक प्रकारसे वृद्धिको प्राप्त होता है अर्थात् उससे खूब धान्यवृद्धि होती है, एक वीजसे हजारो धान्यके दाने प्राप्त होते है, वेसे एक बीजाक्षरसे उत्पन्न हुआ जो अर्थसग्रह उससे अनेक प्रकारके अर्थ यह वीजऋद्धि महात्माओको दिखाती है। इसप्रकार इसका स्वरूप है ।। ३८-३९।। ( पादानुसारिणीऋद्धिका स्वरूप ) - ग्रथके प्रारभमे एक पद अथवा ग्रथके अन्तमे एक पदका ज्ञान होनेपर सपूर्ण ग्रथका ज्ञान ऋद्धिधारक मुनीश्वरको जिससे होता है वह पादा- नुसारी बुद्धिऋद्धि है ॥ ४० ।। इस ऋद्धिके सामान्य और विशेप अर्थका प्रतिपादन होता है । अत इस ऋद्धिको सामान्य पदानुसारिणी और विशेष पदानुसारिणी कहते है। ये दो अतिशय उत्तम वुद्धिऋद्धिया हैं । ऐसा मुनीश्वरोने कहा है ।। ४१ ।। ( सभिन्नश्रोतृवुद्धिका वर्णन ) - वारा योजन दूरतक चक्रवर्तिका सैन्य रहता है और उसमे मनुष्य, हाथी, घोडे, ऊट, बैल आदिकोके शब्द होते रहते है । जिसका अन्त करण निर्मल है ऐसा भव्यात्मा उन शब्दोको सकरादिदोप-रहित अलग अलग जिस ऋद्धिकी प्राप्ति होनेसे सुनता है उसे चतुरोने सभिन्नश्रोतृवुद्धि नामकी ऋद्धि कहा है । ४२-४३ ॥ १ आ सैपा २ आ विवर्जितम् -२ ५६) सिद्धान्तसार (२५ यत्किञ्चिज्ज्ञातमज्ञातं बुद्धिशास्त्रानुसारतः । तन्मयोक्तमह वन्दे मतिज्ञानस्य' लब्धये ॥ ४४ तत्पूर्वच श्रुतज्ञानमनेकद्वादशप्रमम् । श्रुतावरणवीर्यस्य क्षयोपशमतो भवेत् ॥ ४५ अङ्गाङ्गबाह्यभेदेन द्विविधं तदुदीरितम् । अक्षरानक्षरत्वेन पुनद्वेषोपलभ्यते ॥४६ अङ्गबाह्यमनकं च दशकालिकादिकम् । अङ्गं द्वादशधा प्रोक्त श्रुतज्ञानज्ञकोविदः॥ ४७ आचाराङ्गं सूत्रकृतं स्थानाङ्ग समवायतः । व्याख्याप्रज्ञप्तिरित्येवं ज्ञातृधर्मकथा तथा ॥ ४८ उपासकाद्यध्ययनं अन्तकृदृशमुत्तमम् । अनुत्तरदश चेति प्रश्नव्याकरण पुनः ॥ ४९ पूतं विपाकसूत्रं तु दृष्टिवादश्च पञ्चधा । अङ्गं द्वादशधा चतच्छुतज्ञानं हि नामत ॥ ५० परिकर्म च सूत्र तु प्रथमाद्यनुयोगतः। पूर्वकृतं चूलिका च दृष्टिवादस्तु पचधा ॥ ५१ पूर्वगतं हि विज्ञयं चतुर्दशविघं बुधैः । चतुर्दशगुणस्थानप्रापकं प्रगुणात्मनाम् ॥ ५२ उत्पादपूर्वसन्नाम परमग्रायणीयकम् । तृतीयं वीर्यवादं च चतुर्थ हस्तिनास्तिकम् ॥ ५३ सम्यग्ज्ञानप्रवादं च पञ्चमं पञ्चमप्रदम् । षष्ठ सत्यप्रवादं स्यात्सत्यसौख्यविधायकम् ॥ ५४ पूर्वमात्मप्रवादं च सप्तमं चाष्टमं पुनः । कर्मप्रवादपूर्व तत्प्रत्याख्यानं ततः परम् ॥ ५५ विद्यानुवादं दशमं परं कल्याणनामकम् । प्राणावायं प्रभायूतं ख्यातं द्वादशसंख्यया ॥५६ .. वुद्धि और शास्त्रके अनुसरणसे मैने जो कुछ ज्ञात, अज्ञात पदार्थोंको जाना है वह मैने कहा है। मतिज्ञानकी प्राप्तिके लिये मै मतिज्ञानको वदन करता हू ॥ ४४ ॥ श्रुतज्ञान मतिज्ञानपूर्वक होता है । उसके दशवकालिक, उत्तराध्ययनादि अनेक भेद और आचाराडगादि बारह भेद हैं । यह श्रुतज्ञान श्रुतावरण कर्मके क्षयोपशमसे होता है । यह श्रुत- ज्ञान अग व अगवाह्य नामसे दो प्रकारका है । पुन अक्षरश्रुत और अनक्षरश्रुत ऐसे भी दो प्रकार इसके हैं । ऐसा श्रुतज्ञान जाननेवाले विद्वान कहते हैं ॥ ४५-४६ ॥ ( अगजानके वारा भेद )- आचाराग, सूत्रकृत, स्थानाग, समवाय, व्याख्याप्रज्ञप्ति, ज्ञातृधर्मकथा उपासकाध्ययन, अन्तकृद्दश, अनुत्तरदश, प्रश्नव्याकरण, पवित्र विपाकसूत्र, और दृष्टिवाद ऐसे अगज्ञानके वारह भेद है । दृष्टिवादके पाच भेद है । पूर्व, परिकर्म, सूत्र, प्रथमानु- योग और चूलिका । पूर्वगत श्रुतज्ञानके उत्पादपूर्व अग्रायणीयादिक चौदा भेद हैं । ये चौदा भेद गुणवानोके चौदह गुणस्थानोकी प्रसिद्धि करनेवाले है ।। ४७-५२ ।। ( चौदह पूर्वोके नाम )- पहिला उत्पादपूर्व, दूसरा अग्रायणीय, तीसरा वीर्यानुवाद, चौथा अस्तिनास्तिवाद, सम्यग्ज्ञानप्रवाद पाचवा पूर्व है, यह पचमगति देनेवाला है । छट्ठा सत्य- प्रवाद सत्यसुख-मुक्तिसुख उत्पन्न करनेवाला है । सातवे पूर्वका नाम आत्मप्रवाद, कर्मप्रवादपूर्व आठवा है। नौवा प्रत्याख्यानपूर्व और दसवा विद्यानुवादपूर्व, ग्यारहवा कल्याणनामक पूर्व है। प्रभासे ४ आ स्थान च १ आ ज्ञान स्वलब्धये २ आ द्व्यनेक ३ लातल्ये SS.4.

सिद्धान्तसार २६) - (२ ५७- क्रियाविशालमत्युद्ध त्रयोदशकमुत्तमम् । लोकाग्रबिन्दुसारं च' चतुर्दशकमजसा ॥ ५७ जलस्थलगता मायांगता रूपगता तथा । आकाशादिगता चेति चूलिका पञ्चधा स्मृता ॥५८ चन्द्रादित्यनदीद्वीपव्याख्याप्रज्ञप्तिरुज्ज्वला । जम्बूद्वीपादि-प्रज्ञप्तिः परिकर्मापि पञ्चधा ।। ५९ अष्टादशसहस्रा' चं पदसंख्या विराजते । यत्याचरणरूपस्य तदाचाराङ्गमिष्यते ॥ ६० जानादिविनयादीनां क्रियाणां यत्प्ररूपकम् । पदानां च सहस्राणि षत्रिंशत्सूत्रकृन्मतम् ॥ ६१ एकाद्यकोत्तरस्थान जीवादीनां प्ररूपकम् । स्थानं पदसंहस्राणि चत्वारिंशद्विरुत्तरा ॥ ६२ ? ? पवित्र प्राणावायपूर्व वारहवा है । अत्युत्तम क्रियाविशालपूर्व तेरहवा है और परमार्थरूप चौदहवा पूर्व लोकाग्रविन्दुसार नामका है ।। ५३-५७ ।। ( पच चूलिकाओके नाम )- दृष्टिवादका चूलिका नामकभेद है। इसके पाच भेद है। उनके नाम १ जलगता, २ स्थलगता, ३ मायागता ४ रूपगता, और ५ आकाशगता ॥ ५८॥ ( परिकर्मके भेद )- चन्द्रप्रज्ञप्ति, सूर्यप्रज्ञप्ति, नदीद्वीपसागरप्रज्ञप्ति, व्याख्याप्रज्ञप्ति और पाचवी जम्बूद्वीपप्रज्ञप्ति ऐसे परिकर्मके पांच भेद हैं ॥ ५९ ।। ( आचारादिकअङ्गोकी पदसंख्या )- मुनियोके आचरणोका प्रतिपादन करनेवाले आचाराङ्गकी संख्या अठारह हजार है । भावार्थ-इस अंगमे किसप्रकार आचरण करना चाहिये। किस तरह खडा होना चाहिये ? कैसे बैठना चाहिये? किस प्रकारसे सोना चाहिये किस तरह भापण करना चाहिये ? किस तरह भोजन करना चाहिये ? किस तरह पापका वध होता है इत्यादि प्रश्नोके उत्तर-यत्नपूर्वक आचरण करे, यत्नपूर्वक खडा हो, यत्नपूर्वक वैठे, यत्नपूर्वक गयन करे, यत्नपूर्वक भाषण करे, यत्नपूर्वक भोजन करे। इस तरहके आचरणसे पापवध नही होता है । इत्यादि प्रश्नोत्तररूप विवेचन आचारागमे है ।। ६० ।। सूत्रकृतागकी पदसख्या छत्तीस हजार प्रमाण है। इसमे ज्ञानविनय, दर्शनविनय, चारित्र- विनय और उपचारविनय ऐसे विनयोका तथा ज्ञानविनय आदि निर्विघ्न अध्ययनका अथवा प्रज्ञापना, कल्पाकल्प, छेदोपस्थापना आदि व्यवहारधर्मोका तथा स्वसमय और परममयोका स्वरूप सूत्रोद्वारा बताया है ।। ६१ ॥ स्थानागमे वियालीस हजार पदोकी सख्या है । इस अगमे सपूर्ण द्रव्योके एकसे लेकर अनेक विकल्पोका प्रतिपादन किया है। जैसे सामान्यकी अपेक्षासे जीव-द्रव्यका एकही विकल्प- स्थान होता है । ससारी और मुक्तकी अपेक्षासे जीवके दो भेद हैं । उत्पाद, व्यय, ध्रौव्यकी अपेक्षासे तीन भेद हैं, चार गतियोकी अपेक्षासे चार भेद हैं, इत्यादि वर्णन जीवका है। वैसेही पुद्गलकाभी १ आ तु २ आ सहस्त्रैश्च -२ ७०) सिद्धान्तसार (२७ धर्माधर्मकजीवानां द्रव्यतो गगनस्य च । जम्बूद्वीपादिभावाना कालचक्रस्य सूचकम् ॥ ६३ समवायाभिषं पूतं क्षायिकादिनिरूपणात् । चतुःषष्टिसहस्रकलक्षसख्यापदप्रमम् ॥ ६४ प्रश्नानां हि सहस्राणि षष्टिर्या गणनायकैः । जीव. किमस्ति नास्तीति तीर्थशपुरतः कृता ॥६५ अष्टाविंशतिसहस्रर्लक्षद्वयपदप्रमा। व्याख्याप्रज्ञप्तिरित्येव कथिता जिननायकैः ॥ ६६ षट्पञ्चाशत्सहस्राणि पञ्चलक्षपदप्रमा। कथा तीर्थकृदादीना ज्ञातृधर्मकथाऽकथि ॥ ६७ सप्ततिश्च सहस्राणा लक्षकादशशोभनम् । श्रावकाध्ययन नाम श्रावकाचारसूचकम् ॥ ६८ प्रतितीर्थ यतीना च संसारान्तकृता सताम् । घोरोपसर्गयुक्ताना दशाना प्रतिपादकम् ॥ ६९ त्रयोविंशतिलक्षाणि सहस्रास्त्वष्टविंशति । अन्तकृशमाख्यात पदानि पदकोविद ॥७० 7 । एक, दो, तीन आदि विकल्पोके आश्रयसे वर्णन किया है । धर्म, अधर्म, आकाश, काल इन द्रव्योकाभी एकादि विकल्पोसे वर्णन किया है ।। ६२ ।। चौथे समवायाङ्गकी पदसख्या एक लाख चौसठ हजार है। इसमे द्रव्योके सादृश्यका वर्णन द्रव्य, क्षेत्रादिकी अपेक्षासे है । जैसे धर्म द्रव्य, अधर्म द्रव्य, जीव और लोकाकाश इनकी प्रदेश- सख्या असख्यात होनेसे प्रदेशसाम्य है । जवूद्वीप सर्वार्थसिद्धि विमान और सप्तमनरकके विल एक लक्ष योजन प्रमाण है । क्षायिक सम्यग्दर्शन, क्षायिक केवलज्ञान आदि अन्योन्य समान है। उत्सर्पिणी कालके समान अवसर्पिणी काल दश कोडाकोडी सागर प्रमाण है । इत्यादि वर्णन पवित्र समवायागमे है ।। ६३-६४ ॥ व्याख्याप्रज्ञप्ति अगमे पदसख्या दो लाख अठाईस हजार है । इस अगमे जीव है ? अथवा नही ? वक्तव्य है अथवा अवक्तव्य है ? नित्य है या अनित्य है, एक है या अनेक हैं इत्यादि साठ हजार प्रश्न गणधरोने किये और तीर्थकरोने उनके उत्तर दिये । ऐसा इस अगका जिन-नायकोने वर्णन किया है ।। ६५-६६ ।। ज्ञातृधर्म-कथामे पाच लक्ष छप्पन हजार पद सख्या है। इस अगमे जीवादि वस्तुओका स्वभाव, तीर्थकरोका माहात्म्य, तीर्थकरोकी दिव्यध्वनिका समय तथा माहात्म्य, उत्तम क्षमादि दशधर्म, तथा रत्नत्रयधर्मका स्वरूप बताया है । तथा. तीर्थकर, गणधर, इन्द्र आदिकी कथा उपकथाओका वर्णन है ।। ६७ ॥ श्रावकाध्ययन नामक सातवे अगकी सुदरपद-सख्या ग्यारह लाख सत्तर हजार है। इसमे श्रावकाचारका वर्णन है अर्थात् श्रावकोके सम्यग्दर्शनादिक ग्यारह प्रतिमासवधी व्रत, गुण, शील, आचार, तथा दूसरे क्रियाकाण्ड और उनके मत्रादिकोका सविस्तर वर्णन है ॥ ६८ ॥ अन्तकृद्दशागमे तेईस लाख अठ्ठाईस हजार पदसख्या है । इसमें प्रत्येक तीर्थकरके समयमे जो दश दश मुनि चार प्रकारके घोरोपसर्ग सहन कर ससारके अन्तको प्राप्त हुए उनका वर्णन है ॥ ६९-७० ॥

२८) सिद्धान्तसार (२ ७१- तीर्थ प्रति मुनीनां च जितघोरोपसर्गिणाम् । अनुत्तरोपपादानां दशानां हि प्ररूपकम् ॥ ७१ चत्वारिंशच्च चत्वारः सहस्रा नवतिस्तथा । लक्षाणां द्वयधिका चैतदनुत्तरदशं मतम् ॥ ७२ नष्टमुष्टयादिकादीनां प्रश्नानां परतो भुवाम् । सर्वेषां हि तदर्थानां सूचकं शुचिवर्तिनाम् ॥७३ लक्षाणां नवतिस्त्रीणि सहस्राश्चापि षोडश । पदानां पूतवृत्तीनां प्रश्नव्याकरणं स्मृतम् ॥ ७४ सुकृतानां दुष्कृतानां कर्मणां पाकसूचकम् । सर्वं विपाकसूत्रंतु कथितं तथ्यवेदिभिः ॥ ७५ कोटयेकपदसंख्यं तदशीतिश्चतुरुत्तरा । लक्षाणां च मतं मान्यमथिताशेषकल्मषैः ॥ ७६ कोटीचतुष्टयं तावल्लक्षाः पंचदशाधिकाः । द्विसहस्रः पदानां च संख्या चैकादशानिका ।। ७७ द्वादशाङगस्य भेदा ये प्रोक्ताः पञ्च विधानतः। परिकर्मादयस्तेषां पदसङख्या निगद्यते ॥ ७८ सहस्रः पञ्चभिः साकं लक्षा. षट्त्रिंशदायताः । चन्द्रप्रज्ञप्तिरुद्गीता चन्द्रायुर्गतिसूचिका ॥ ७९ अनुत्तरौपपादिक दशागमे प्रत्येक तीर्थकरके समयमे चार प्रकारके देव, मनुष्य, पशु और अचेतनकृत दारुण उपसर्ग सहन कर दश दश मुनि अन्त समयमे समाधिके द्वारा अपने प्राणोका त्याग कर विजय आदि पाच अनुत्तर विमानोमे उत्पन्न हुए उनका सविस्तर वर्णन है। इस अगकी पदसख्या बानवे लाख चवालीस हजार है ॥ ७१-७२ ।। प्रश्नव्याकरण नामक दसवे अगमे नष्ट-मुष्टयादिकके पवित्र प्रश्न और उनके सर्व अर्थोका कथन हैं । इसमे पवित्र पदसख्या तिरानवे लक्ष सोलह हजार है । दूतवाक्य, नष्ट, मुष्टि, चिन्ता आदि अनेक प्रकारके प्रश्नोके अनुसार तीन कालसवधी धनधान्यादिका लाभालाभ, मुखदुःख, जीवनमरण, जय-पराजय आदि फलोका वर्णन है । और प्रश्नोके अनुसार आक्षेपणी, विक्षेपणी, सवेजनी और निर्वजनी इन चार कथाओका वर्णन है ।। ७३-७४ ।। विपाकसूत्र नामक ग्यारहवे अगमे सत्यस्वरूप जाननेवालोने पुण्य और पापोके फलोका वर्णन किया है अर्थात् द्रव्य, क्षेत्र, काल और भावके अनुसार शुभाशुभ कर्मोंकी तीव्र मद, मध्य आदि अनेक प्रकारकी अनुभागशक्तिके फलदानरूप विपाकका वर्णन है । इस अगकी पदसख्या एक कोटि चौरासी लाख की है ऐसा सपूर्ण पापोका नाश करनेवाले मुनियोने कहा है । पूर्वोक्त ग्यारह अगोकी पदसख्या चार कोटी पद्रह लक्ष दो हजार की है ।। ७५-७७ ।। (परिकर्मादिकोकी पदसख्या )- द्वादशाङ्गके अर्थात् वारहवे दृष्टिवाद नामक अङ्गके जो आगमके अनुसार परिकर्मादिक पाच भेद कहे हैं उनकी पदसख्या अब हम कहते है ।। ७८ ॥ चन्द्रप्रज्ञप्तिकी पदसख्या छत्तीस लक्ष पाच हजार है और इसमे चन्द्रकी आयु और गतिका वर्णन है अर्थात् चन्द्रमासवधी विमान, आयु, परिवार, ऋद्धि, गमन, हानि, वृद्धि, पूर्णग्रहण, अर्द्धग्रहण, चतुर्थांश ग्रहण आदिका वर्णन है ।। ७९ ॥ १ आ शौचवर्तिनाम् -२ ८९) सिद्धान्तसार ( २९ त्रिसहस्रपञ्चलक्षा' पदानां परिमाणता । प्रज्ञप्तिः सूर्यपूर्वेयं तद्भवादिप्ररूपिका ॥ ८० पदानां त्रीणि लक्षाणि सहस्रा. पञ्चविंशतिः । जम्बूद्वीपस्य प्रज्ञप्तिस्तद्गतार्थप्ररूपिका ॥ ८१ सहस्राणां च षत्रिशद्विपञ्चाशच्च लक्षकाः। द्वीपसागरप्रज्ञप्तिस्तत्स्वरूपप्रकाशिका ॥८२ जीवाजीवादिभावानां रूपित्वारूपसूचिका । व्याख्याप्रज्ञप्तिरित्येवं जायते पदसङख्यया ॥ ८३ लक्षाणां सदशीतिः स्याच्चतुभिरधिका पुनः । षत्रिंशच्च सहस्राश्च विचित्रक्रमसयुता ॥ ८४ जीवस्य फर्मनोकर्मकर्तृत्वादिप्ररूपकम् । सर्वगत्वानुमातृत्वप्रभृतीनां निवेदकम् ॥ ८५ सर्वाश्चर्यकरं वीर्यधुर्यविद्याप्ररूपकम् । पदान्यष्टाधिकाशीतिर्लक्षाणा सूत्रमक्षयम् ॥ ८६ त्रिषष्टिपुरुषाणां य. प्रवन्धः प्रवणो महान् । प्रथमानुयोगः पञ्चसहस्रर्भणितः पदै. ॥ ८७ नवतिः पञ्चभिः साध कोटीनां हि तथा पुनः । पञ्चाशल्लक्षपञ्चैव पदानि परिमाणतः ॥८८ ध्झौव्योत्पादव्ययानेकधर्मार्थाना प्रकाशकम् । श्रुतं पूर्वगतं गीतं श्रुतशास्त्रविचक्षणः ॥ ८९ सूर्यप्रज्ञप्तिमे पदसख्या पाच लक्ष और तीन हजार है। इसमे सूर्यसवधी भव, आयु, परिवार, गति, ग्रहण आदिका वर्णन है ।। ८० ॥ जबूद्वीप प्रज्ञप्तिकी पदसख्या तीन लाख पच्चीस हजार हैं । इसमे जबूद्वीपके मेरु, कुला- चल, हृद, क्षेत्र, कुड, वेदिका वन, व्यन्तरोंके निवासस्थान, महानदी आदिका वर्णन है ॥ ८१ ।। द्वीपसागर-प्रज्ञप्तिकी पदसख्या बावन लाख छत्तीस हजार है । इसमे असख्यात द्वीप और समुद्रोका तथा वहाके अकृत्रिम चैत्यालयोका वर्णन है ॥ ८२ ॥ व्याख्याप्रज्ञप्तिमे जीव अजीवादिकोके भावोका वर्णन है । रूपित्व, अरूपित्वसे युक्त जीव अजीव द्रव्योका वर्णन है । अनतरसिद्ध तथा परम्परासिद्धोका तथा दूसरी वस्तुओका भी वर्णन है। इसकी पदसख्या चौरासी लाख छत्तीस हजार है ।। ८३-८४ ॥ दृष्टिवादके सूत्रनामक भेदमे जीव ज्ञानावरणादि आठ कर्मोका तथा नोकर्मका भी कर्ता है इत्यादिक निरूपण है । तथा यह सूत्र आत्मा ज्ञानसे सर्व पदार्थोंको जाननेसे व्यापक है, वह अतीन्द्रिय पदार्थोको अनुमानसे छद्मस्थावस्थामे जानता है इत्यादि निरूपण करता है । और सव जीवोको आश्चर्यचकित करनेवाला सामर्थ्य और श्रेष्ठ विद्याओका निरूपण इसमे है। इसकी पदसख्या अळ्यासी लक्ष प्रमाण है ।। ८५-८६ ।। प्रथमानुयोगमे चौवीस तीर्थकर, वारह चक्रवर्ती, नौ नारायण, नौ प्रतिनारायण, नौ बलिभद्र ऐसे त्रेसष्ट महापुरुषोके महान् चरितोका वर्णन किया है। इसकी पाच हजार पदसख्या है ।। ८७ ॥ उत्पादादि चौदह पूर्वोकी पदसख्याका प्रमाण पचानवे कोटी पचास लक्ष और पाच है । उत्पाद, ध्रौव्य, व्यय इत्याद्यनेक धर्मयुक्त पदार्थोका प्रकाशक यह पूर्वज्ञान है ऐसा श्रुत- शास्त्रमे निपुण आचार्योने कहा है ।। ८८-८९ ।। १ आ. प्ररूपिका २ आ. निषेधकम् ३ आ वर्य ३०) सिद्धान्तसार ( २. ९०- १ या पूर्व पञ्चधा प्रोक्ता चूलिका भेदकोविदः । तद्भेदान्स्फुटभेदेन निगदामि यथाक्रमम् ॥ ९० कोटिद्वय तथा लक्षा नवैकोननवतिस्तथा । सहत्राणां शतं द्वन्द्व पदानि परिकीर्तिता ॥ ९१ जलस्तम्भनहेतूनां मन्त्रादीनां प्रकाशिका । जलपूर्वगता चेयं चूलिका गदिता जिनः ॥ ९२ एतान्येव पदान्युक्ता चूलिकास्थलमागमे । भूगता कारणानेकमन्त्रतन्त्रादिसूचिका ।। ९३ इन्द्रजालाबनेकार्थक्रियाकाण्डप्ररूपिका । एतत्पदप्रमाणैव मायादिर्गदिता सताम् ॥ ९४ व्याघ्रसिंहादिसद्रूपमन्त्रतन्त्रप्रकाशिका । इयन्त्येव पदान्युक्ता सुरूपा गदिता जिनः ॥ ९५ आकाशगतिस तुमन्त्रतन्त्रावबोधिका । आकाशादिगता ज्ञेया पूर्वसङख्यापदप्रमा॥ ९६ पूर्वेषु' हि गतं पूतमतः पूर्वगतं मतम् । तच्चतुर्दशधा प्रोक्तं निगदामि यथापदम् ॥ ९७ प्रौव्योत्पादव्ययानेकसाघुधर्मप्रकाशकम् । जीवस्योत्पादपूर्व तत्कोटचेकपदपूर्वकम् ॥ ९८ अङ्गानामग्रभूतार्थनिवेदनपर बलम् । लक्षाः षण्णवतिः पूतं पूर्वमग्रायणीयकम् ॥ ९९ भेदज्ञोने पाच प्रकारकी चूलिकाये कही है उनके भेदोका स्पष्टतया मै यथाक्रम वर्णन करता हू ।। ९० ॥ ( पचचूलिका )- जलगताचूलिकाकी पदसख्या दो कोटी नौ लाख नवासी हजार दो सौ है । इस चूलिकामे जलस्तभनके कारणमत्रोका वर्णन है तथा अग्निस्तम्भन, अग्निभक्षण, अग्निमे बैठना और अग्निप्रवेश तथा तदर्थ तपश्चरण आदिका वर्णन है । स्थलगतचूलिकाकेभी इतनेहि पद है । इस चूलिकामे मेरु, कुलाचलभूमि आदिमे प्रवेश, शीघ्रगमन आदिके कारण मत्रतत्रादिक है । मायागताचूलिकामे इन्द्रजालादि अनेक अर्थोके क्रियाकाण्डोका निरूपण किया है। इसकी भी पदसख्या जलगतचूलिकाके समान ही है । रूपगताचूलिकामे वाघसिहादिके रूप धारण करनेके मत्रतत्रका वर्णन है । इसकी पदसख्याभी उपर्युक्त जलगतचूलिकाके समान है। आकाशगतचूलिकामे आकाशगमनके कारण मत्रतत्र आदिका वर्णन है। इसकी पदसख्याभी जलगताके समान है ॥ ९१-९६ ।। ( चौदह पूर्व ) दृष्टिवादका पूर्व नामक चौथा भेद है उसके उत्पादपूर्वगतादिक चौदह भेद आचार्यने कहे है । सर्व जीवादिक अर्थोंमे जो चला गया है इसलिये उसे पूर्वगत कहते है । यह पूर्वगत पवित्र ज्ञान है । उसके चौदह भेद उनकी पदसख्याके साथ मै ( नरेन्द्रसेनाचार्य ) कहता हू, उत्पादपूर्वकी पदसख्या एक कोटि प्रमाण है। उसमे जीवके उत्पाद, व्यय, ध्रौव्य आदि अनेक धर्मोका स्वरूप कहा है तथा मुनियोके धर्मोका वर्णन किया है ।। ९८ ॥ अग्रायणीय पूर्वकी पदसख्या छयानवे लाख प्रमाण है। इस पवित्र पूर्वमे अगोके प्रधान- भूत पदार्थोंका वर्णन करनेका सामर्थ्य है, अर्थात् सातसौ सुनय तथा दुर्णय, पञ्चास्तिकाय, पद्रव्य, सप्ततत्त्व, नवपदार्थ आदिका वर्णन है ॥ ९९ ॥ ९७ ॥ - . -- १ आ गामने २ आ रास्य ३ सो सर्वेषु ४ आ सख्यकम् ५ आ वरम् ६ आ आग्रायणीयका -२ १०७) सिद्धान्तसार ( ३१ १ पदानां सप्ततिलक्षा यस्य संख्या प्रकीर्तिता। वीर्यानुवादवीर्यस्य श्रीजिनादेनिरूपम् ॥ १०० षष्टिलक्षपदोपेत षट्पदार्थोपवर्णकम् । अस्तिनास्तिमहाधमरस्तिनास्तिवादकम् ॥ १०१ एकोनकोटिसख्यातपद' सूर्यांशुनिर्मलम् । ज्ञानप्रवादमाख्यात ज्ञानभेदादिसूचकम् ॥ १०२ वागडगुलिंप्रकाराणा' शुभाशुभवचस्तथा । सूचकं सत्यवाद च कोटीषडधिका पदम् ।। १०३ षड्वशतिश्च कोटीनां पदानां प्रतिपादकम् । आत्मप्रवादं जीवस्य कर्तृत्वादेर्मतं सताम् ।। १०४ अशीतिलक्षकोट्येकपदसंख्यं हि कर्मणाम् । निर्जरावन्धमोक्षादिसूचकं कर्मवादकम् ।। १०५ समस्तद्रव्यपर्यायप्रत्याख्यानादिसूचकम् । प्रत्याख्यानं हि लक्षाणामशीतिश्चतुरुत्तरा ।। १०६ क्षुद्रविद्या महाविद्या सप्तपंचशतानि याः । पृथुविद्यानुवादं तद्यत्र तासां निरूपणम् ।। १०७ वीर्यानुवादकी पदसख्या सत्तर लाख प्रमाणकी कही है। इसमे श्रीजिनेश्वर, गणधर आदिके वीर्यका वर्णन है ।। १०० ।। अस्तिनास्ति-प्रवादमे छह लाख पद हैं । यह पूर्व जीव पुद्गल, धर्म, अधर्म, आकाश और कालके अस्तिनास्ति धर्मोका वर्णन करता है ।। १०१ ।। ज्ञानप्रवादपूर्वकी पदसख्या एक कम एक कोटि प्रमाणकी है । यह पदसख्या सूर्य- किरणके समान उज्ज्वल है और इसमे मति, श्रुत, अवधि, मन पर्यय तथा केवलजान ऐसे पाच सम्यग्ज्ञानोका और कुमति, कुश्रुति तथा कुअवधि ऐसे तीन अज्ञानोका स्वरूप, सख्या और फलोका वर्णन है ॥ १०२ ।। सत्यप्रवादपूर्वमे एक कोटि और छह पद है । इस पूर्वमे वचन और अगुलि आदिकोके प्रकार कहे हैं तथा शुभ और अशुभ वचनके भेद और गुप्तिओका वर्णन है ।। १०३ ॥ आत्मप्रवादपूर्वमे छब्बीस कोटि पद हैं । इसमे आत्माके कर्तृत्वादि अनेक धर्मोंका वर्णन किया है जो कि सज्जनोंको मान्य हे ॥ १०४ ।। कर्मप्रवादमे पदोका प्रमाण एक कोटि अस्सी लाखका है। इसमे कर्मोंकी निर्जरा, वध, मोक्ष, उदय, उदीरणा आदिका कथन है ।। १०५ ।। प्रत्याख्यानपूर्वमे चौरासी लाख पदमख्या है और इसमे समस्त द्रव्यपर्यायोको प्रत्या- ख्यानत्यागका वर्णन है, अर्थात् नाम, स्थापना, द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव तथा पुरुषके सहननादिकी अपेक्षासे सदोष वस्तुका त्याग, उपवासकी विधि, पाच समिति, तीन गुप्ति आदिका वर्णन है ॥ १०६ ॥ विद्यानुवादपूर्वमे सोतसो क्षुद्रविद्या और पाचसी महाविद्याओर्को वर्णन अर्यात् उनका सामर्थ्य, स्वरूप, मत्रतत्र, पूजाविधान तथा सिद्ध विद्याओका फल, और अन्तरिक्ष, भौम, अग, स्वर, स्वप्न, लक्षण, व्यजन, छिन्न ऐसे आठ निमित्तोका वर्णन हैं। जिनका विज्ञान असत्यप्रमाणे है ऐसे तत्त्वज्ञ विद्वानोने इसकी पदसख्या एक कोटि दश लाख प्रमाणकी कही है ।। १०७-१०८ ॥ .... १ आ सख्य तु २ आ वाचागुप्ति ३ आ स्त्वत ४ आ. तत्व -- ३२) सिद्धान्तसार (२ १०८- दशलक्षाधिककोटी पदानि प्रतिपादितम् । संख्या यासंख्यविज्ञानस्तत्त्वविद्भिर्मनीषिभिः ॥१०८ कल्याणनामधेय तद्यत्कल्याणप्ररूपकम् । षड्विंशतिश्च कोटीनां अहंदादिमहात्मनाम् ॥ १०९ कोटीत्रयोदश प्राज्ञःप्राणावाय पदानि तत् । प्राणापानविभागायुर्वेदमन्त्रादिवादकम् ॥ ११० छन्दोऽलङ्कारशास्त्राणां क्रियाणां प्रतिपादकम् । क्रियासाधनमाम्नातं नवकोटिपदप्रमम् ॥१११ लोकानसाधनानेकव्याकर्णनपरं' वरम् । कोटीद्वादशपञ्चाशल्लक्षा लोकानबिन्दुकम् ॥ ११२ निगद्य पदसंख्यानं पूर्वाणां गणितप्रियः । अशेषाणाममीषां च वस्तुसंख्या निगद्यते ॥ ११३ दश चतुर्दशाष्टौ च क्रमादष्टादशाधिका । द्वादश द्वादश प्रास्तित. षोडश विंशतिः ॥११४ त्रिंशत्पञ्चदश ख्याता वस्तुसंख्या दशस्वपि । त्रिलोकाग्रपदप्राप्तिहेतुभूता मनस्विभिः ॥ ११५ ततः सर्वेषु पूर्वेषु दशकं दशकं मतम् । वस्तूनां वस्तुत प्राज्ञैर्यावदन्त्यं भवेत्पुनः ॥ ११६ सर्वेषामिह पूर्वाणां वस्तुसंख्या समासतः। शतं च नवभिः पंच गदितागमकोविदः ॥ ११७ कल्याण नामक पूर्वमे तीर्थकरादिके गर्भावतारादि कल्याण, उनके कारण पुण्यकर्म, षोडश भावना आदिका तथा चन्द्र, सूर्य, ग्रह, नक्षत्रोके चारका, ग्रहण, शकुन आदिके फलोका वर्णन है । इसकी पदसख्या छब्बीस कोटि प्रमाण है ॥ १०९ ॥ प्राणावायपूर्वकी पदसंख्या विद्वानोने तेरा कोटि प्रमाण बताई है । इसमे प्राणापानोंका विभाग तथा आयुर्वेद-मत्रवादोका वर्णन है ॥ ११० ॥ क्रियाविशालपूर्वमे छद शास्त्र और अलकार शास्त्रका विवेचन है, तथा पुरुषोंकी बाह- त्तर कला, स्त्रियोकी चौसठ कला शिल्पादि विज्ञान, गर्भाधानादिक क्रिया, तथा नित्यनैमित्तिक क्रियाओका वर्णन है। इसकी पदसख्या नौ कोटि प्रमाणकी है ॥ १११ ।। लोकाग्रबिन्दुपूर्वमे लोकान-मोक्षको साधनेके कारण और मोक्षके सुखका वर्णन किया है तथा लोकका स्वरूप, छत्तीस परिकर्म, आठ व्यवहार, चार बीज, आदिका वर्णन है। इसकी पदसख्या बारह कोटि पचास लक्ष प्रमाणकी है ॥ ११२ ।। जिनको गणित प्रिय है ऐसे विद्वानोने पूर्वोकी पदसख्या इस प्रकार कही है । अब इन समस्त पूर्वोमे जो वस्तुसख्या है, उसका वर्णन वे करते है ।। ११३ ।। (पूर्वोकी वस्तुसख्या )- उत्पादपूर्वसे विद्यानुवाद पूर्वतक दसपूर्वोमे वस्तुओका जो प्रमाण क्रमसे विद्वानोने कहा है वह इस प्रकार है-दस, चोदह, आठ, अठारह, बारह बारह, सोलह, बीस, तीस, पद्रह । तदनतर आगेके चार पूर्वोमे त्रैलोक्यके अग्रकी-मोक्षकी प्राप्तिमे कारणभूत ऐसी वस्तुसख्या विद्वानोने दस, दस, दस, दस कही है। चौदह पूर्वोमे १०, १४, ८, १८, १२, १२, १६, २०, ३०, १५, १०, १०, १०, १०, कुल वस्तुसख्या एकसौ पिचानबे है। ऐसे वस्तु नामक अधिकार चौदह पूर्वमे कहे है ॥ ११४-११७ ॥ १ आ सख्यया २ आ. क्रियाविशालमाख्यात ३ आ व्यावर्णन ४ आ सख्या ता ५ आ धिकादश ६ आ. मनस्विनाम् ~२ १२९) सिद्धान्तसार (३३ विशतिविशतिर्यावत्प्राभृतान्यत्र' कोविदाः । वस्तु वस्तु प्रतिवादो निगदन्त्यधिकप्रभा ॥११८ शतद्वयं तदेवास्मादशीतिसहित ततः । शतं षष्टिग्रुत गीत त्रिशती षष्टिसयुता ॥ ११९ द्विशती द्विशती पश्चाच्चत्वारिंशत्समन्विता । तथा विशतिसयुक्त शतत्रयमुदीरितम् ॥ १२० चत्वारिशच्छतान्यस्सात्षट्शतानि ततःपरम् । शतत्रय च सर्वेषु द्विशती द्विशती पुनः॥ १२१ कोटीनां च शत पूतं तथा द्वादश कोटय. लक्षास्त्र्यशीतिपञ्चाशत्सहना चाष्टभिः सह ।।१२२ पदानि पच चंवेद द्वादशाङ्ग श्रुत सताम् । वन्द्य वन्देऽहमप्युच्चस्तस्य लब्धिवशीकृतः ॥ १२३ पदं च त्रिविध ज्ञेय सर्वश्रुतनिबन्धनम् । अर्थमध्यप्रमाणादिभेदतो भिन्नकल्मषैः ॥ १२४ अर्थ्यमर्यसमाप्तिश्च प्रमाणं चाष्टभि पदम् । अक्षररक्षराख्यान कथित तथ्यवेदिभिः ॥ १२५ अङ्गश्रुतपद चैतन्मध्यमं मध्यभागतः । तस्य वर्णाश्च विज्ञेया मानतो मातशालिभि. ॥ १२६ शत षोडश कोटीनां चतुस्त्रिशच्च लक्षका. । अशीतिस्त्र्यधिकाः सप्त सहस्राःशतमष्टकम् ॥१२७ अष्टाशीतिश्च सद्वर्णा मध्यमस्येह मध्यमा. । पदस्याङ्गप्रविष्टस्य श्रुतस्य गदिता जिन. ॥१२८ अङ्गप्रविष्टमाख्याय ख्यापित यद्यतीश्वरैः। अङ्गबाह्यं श्रुतं सम्यडनिगदन्ति गदातिगाः ॥१२९ ( सर्व प्राभृतसख्या )- अधिक कान्ति जितकी है ऐसे गणधरादि महापुरुष प्रत्येक वस्तुमे वीस बीस प्राभृत है ऐसा कहते है ॥ ११८ ॥ दोसो, दोसौ अस्सी, एकसौ साठ, तीनसौ साठ, दोसौ चालीस, दोसौ चालीस, तीनसौ वीस, चारसौ, छहसौ, तीनसो, दोसौ, दोसो, दोसौ, दोसौ सब मिलकर प्राभृतसख्या १९५ वस्तुमओमे ३९०० सी होती है ।। ११९-१२१ ।। (द्वादशागोकी पदसख्या )- एकसौ बारह कोटि, तिरासी लक्ष, अट्ठावन हजार, पाच इतनी द्वादशागोकी पदसख्या है । यह द्वादशागश्रुतज्ञान विद्वन्मान्य है । उसकी प्राप्तिके वश होकर में इस वन्ध श्रुतज्ञानको अत्यादरसे वन्दन करता हू ॥ १२२-१२३ ।। (पदभेदोका वर्णन ) जिन्होने पापविनाश किया है ऐसे जिनेखरोने पदके तीन भेद कहे हैं । अर्थपद, मध्यपद और प्रमाणपद । ये तीनो पद सर्व श्रुतज्ञानके कारण हैं। जिससे अर्थसमाप्ति होती है उसे अर्थपद कहते है जैसे सफेद गौको रस्सीसे बाधो, अग्निको लाओ, ये अर्थपद हैं। आठ आदि अक्षरोसे जो उत्पन्न होता है उसे प्रमाणपद कहते हैं । अर्थात् प्रमाणयुक्त अक्षर जिसमे हैं उसको सत्य जाननेवाले विद्वान प्रमाणपद कहते हैं । अगश्रुतके पदको मध्यपद कहते है, क्यो कि प्रमाणपद और अर्थपदके वीचमे इसकी गणना की है । ज्ञानशाली विद्वान उनके वर्णोकी सख्या ऐसी समझते है-सोलह सौ चौतीस कोटि, तिरासी लक्ष, सात हजार, आठसौ अठ्यासी इतने वर्ण एक मध्यम पदमे रहते हैं । इस प्रकार जिनेश्वरने अगप्रविष्ट श्रुतज्ञानके पदके अक्षर कहे है ॥ १२४-१२८ ।। (अगवाह्य श्रुतज्ञानके भेद)- यहा तक यतीश्वरोने अगप्रविष्टका वर्णन करके खुलासा किया है। ससाररोगसे रहित जिनेश्वर अगवाह्य श्रुतज्ञानका सम्यक निरूपण करते हैं ।। १२९ ॥ + १ आ स्तावत् २ आ प्रायो ३ आ निगदामि गदातिग SS.5 ३४) सिद्धान्तसार (२ १३०- सामायिकं स्तवश्चेति वन्दना सप्रतिक्रमम् । वैनयिकं तथा पूत कृतिकर्म ततः परम् ॥१३० दशवकालिकं तस्मादुत्तराध्ययनं पुनः । कल्पादिव्यवहारं च कल्पाकल्पमकल्पकम् ॥ १३१ महाकल्पं ततस्तावत्पुण्डरीकाख्यमुत्तमम् । महादि-पुण्डरीकं तदशीतिगमिति स्फुटम् ॥१३२ चतुर्दशविघं पूतं प्रकीर्णकमिदं विदुः । नामतो देशना यासु कथञ्चित्कथयामि तत् ॥ १३३ नियतानियतः कालो यतीनां समयः स्मृतः तत्र या समया तत्र भवं सामायिकं विदुः ॥ १३४ चतुविशतितीर्थानां प्रातिहार्यादिवर्णनम् । यत्र तत्कथितं प्राश्चतुविशतिसंस्तवम् ॥ १३५ एककशो जिनाना च यत्र नामादिकीर्तनम् । वन्दनानामतो ज्ञेयं प्रकीर्णकमनिन्दितम् ॥ १३६ संवत्सरचतुर्मासपक्षाहोरात्रिका पुनः । ईर्यापथोत्तमार्थाश्च प्रतिक्रान्तिस्तु सप्तधा ॥ १३७ कथ्यते यत्र भव्यानां कर्मणः क्षपणक्षमा । प्रतिक्रान्तिप्रकोणं तत्साधुवर्गफसेवितम् ॥ १३८ . सामायिक, स्तव, वन्दना, प्रतिक्रमण, वैनयिक, पवित्र कृतिकर्म, दशवकालिक, उत्तरा- ध्ययन, कल्पव्यवहार, कल्पाकल्प, महाकल्प, पुण्डरीक, महापुण्डरीक, अशीतिग, इन नामोके चौदह पवित्र प्रकीर्णक बाह्य श्रुत कहे गये है। इनके उपदेशके लिये कुछ निरूपण मैं करता हू ॥ १३०-१३३ ॥ . 7 (चौदह प्रकीर्णकोका वर्णन )- सामायिक-यतियोका जो नियत और अनियत काल है उसे समय कहते है उसमे जो हुआ है उसको सामायिक कहते है । सामायिकके नियतकाल सामायिक और अनियतकाल सामायिक ऐसे दो भेद है। स्वाध्यायादिकोको नियतकाल सामायिक कहते है। ईर्यापथादिकोको अनियतकाल सामायिक कहते है ॥ १३४ ॥ चतुर्विशतिसस्तव-चौबीस तीर्थकरोके प्रातिहार्यादिकोंका वर्णन जिसमे किया है उसको बुद्धिमानोने चतुर्विशतिस्तव कहा है। ऋषभादि वर्धमानान्त चौबीस तीर्थकरोके नाम, लाछन, जन्म- समयके दस गुण, केवलज्ञान होनेपर दश अतिशय, देवकृत चौदह अतिशय, उनका वर्ण; उनकी उंचाई, उनके वश इत्यादि वर्णन इसमे आता है। प्राज्ञ उसे चतुर्विंशति स्तुति कहते हैं ॥ १३५ ।। वदना-एकेक जिनेश्वरके नामादि गुणोका कीर्तन करना उसे वदना कहते है । यह स्तुत्य प्रकीर्णक हैं ।। १३६ ।। प्रतिक्रमणके सावत्सरिक, चातुर्मासिक, पाक्षिक, देवसिक, रात्रिक, ऐपिथिक और उत्तमार्थ ऐसे सप्त भेद हैं। यह प्रतिक्रमण भव्योके कर्मका नाश करनेमे समर्थ हैं। यह 'प्रतिक्रान्ति नामका प्रतिक्रमण-प्रकीर्णक कीतिके अधिपति जिनेश्वरोने कहा है? गमनादि कार्य करनेके समय जो दोष लगते हैं वे मेरे मिथ्या होवे पुन मै नही करूंगा ऐसा कहना उसे प्रतिक्रमण कहते हैं । १३७-१३८ । १ मा सप्रतिक्रमा २ आ. था च -२ १४७) सिद्धान्तसार (३५ ज्ञानदर्शनचारित्रतपोविनयसूचकम् । वैनयिकप्रकोणं तत्कीर्तितं कोतिनायक. ॥ १३९ दीक्षाग्रहणपूर्वाया क्रियाया. प्रतिपादनात् । कृतिकर्म मतं तज्जैः कृतकर्मविनाशकम् ॥१४० मपुष्पितपूर्वैर्यद्दशभिस्त्वधिकारकः । सूचकं साघुवृत्तानां दशवकालिकं मतम् ॥ १४१ सहन युपसर्गाणां तत्फलादिनिवेदकम् । उत्तराध्ययनं ध्यानध्येयाधाररुदीरितम् ॥ १४२ यतिकल्पसमाचारप्रच्यवो चित्तमुत्तमम् । प्ररूपयत्प्रायश्चित्त तत्कल्पव्यवहारफम् ॥ १४३ कालविशेषमाश्रित्य योग्याचारप्ररूपकम् । यतीनामुदित तज्ज. कल्पाकल्पप्रकीर्णकम् ॥ १४४ दीक्षाशिक्षादिपटकालसाघुवृत्तप्ररूपकम् । प्रकीर्णकं प्रकृप्टस्तन्महाकल्पं प्रकल्प्यते ॥ १४५ भवान्तरविशेषस्य हेतुभूत तपोविधे । स्यापक पुण्डरीकाख्यमसंख्यसुखकारकम् ।। १४६ सर्वाप्सरोगणानां यज्जन्महेतुप्ररूपकम् । महादिपुण्डरीक तद्भणितं भणितिप्रियः ॥ १४७ वनयिक-ज्ञान, दर्शन, चारित्र, तप और उपचार ऐसे पाच विनयोका वर्णन जिसमे है, वह वैनयिक प्रकीर्णक है, उसका कीर्तिनायक मुनियोने वर्णन किया है ।। १३९ ।। कृतिकर्म-दीक्षाग्रहणपूर्वक क्रियाका प्रतिपादन इसमे होनेसे इसका कृतिकर्म यह नाम है। यह कृतिकर्म किये हुए पापकार्योंका नाश करनेवाला है ।। १४० ॥ द्रुमपुष्पित अध्याय जिसके पूर्वमे है, ऐसे तेरा अध्यायोका मुनियोंके आचरणका जो सूचक प्रकीर्णक है उसे दशवकालिक कहते हैं । अनेक उपसर्ग-देवकृत मनुष्यकृत, पशुकृत और अचेतनोपसर्ग ऐसे उपमर्गोको महन करना और उसके फल आदिका प्रतिपादक ऐसे प्रकीर्णकको, ध्यान और ध्येयके आधारभूत आचार्योने उत्तराध्ययन कहा है ।। १४१-१४२ ।। यतियोंके योग्य आचरणको कल्प्य कहते हैं। उसका वर्णन करनेवाला तथा उस आचरणसे भ्रष्ट होनेपर उससे उत्तम प्रायश्चित्त कहनेवाला जो प्रकीर्णक उसे उसके ज्ञाता विद्वान् कल्प्यव्यवहार कहते है ।। १४३ ॥ विशेप कालके आश्रयसे मुनियोके योग्य आचारोका प्रतिपादन करनेवाले प्रकीर्णकको कल्प्याकल्प्य प्रकीर्णक कहते हैं । दीक्षा काल, शिक्षाकाल, गणपोषण काल, आत्म-सस्कार काल, भावना काल और उत्तमार्थ काल ऐसे पटकालसवधी मुनियोंके आचरणको निरूपण करनेवाले प्रकीर्णकको श्रेप्ठोने महाकल्प्य कहा है ।। १४४-१४५ ।। अन्यजन्मविपके अर्थात् भवनवासी, व्यन्तरादि देवजन्मविपके कारणभूत तपश्चरणका वर्णन करनेवाले प्रकीर्णकको पुण्डरीक कहते है, यह असख्य सुखको देनेवाला है ॥ १४६ ॥ सर्व अप्सराममूहकी उत्पत्ति कैसी होती है इसका निरूपण करनेवाला जो प्रकीर्णक उसे व्याख्यान-प्रिय आचार्योने महापुण्डरीक कहा है ॥ १४७ ।। . १ आ कारणम् ३६) सिद्धान्तसार (२ १४८- दोषाणां स्थूलसूक्मीणां प्रायश्चित्तं प्ररूपयत् । अशीतिगं' प्रकोणं तद्वयःसत्त्वाद्यपेक्षया ॥ १४८ अङ्गाङ्गवाहाभेदा ये ध्रुतस्यावगता मया। प्रोक्ताःस्वबुद्धितः सर्वे यच्छन्तु विपुलां श्रियम् ॥ १४९ परं विशतिभेदं यत्पर्यायाधभिधानतः । श्रूतं तदपि वक्ष्येऽहं यथाशक्ति ययागमम् ॥ १५० पर्यायश्चाक्षरं ज्ञानं पदं संघात इत्यपि । प्रतिपत्त्यनुयोगाभ्यां विकल्पाः षडमी श्रुते ॥ १५१ प्रा तप्रामृतं प्राभृद्वस्तु पूर्व चतुर्थकम् । इत्येवं मिलिताः सर्वे विकल्पा दश शोभनाः ॥ १५२ तेषां समासभेदा ये तावन्तः परिकीर्तिताः । ते. समस्तैर्भवेत्सवं श्रुतं विंशतिभेदभाक् ।। १५३ नित्यनिगोदजीवस्यापर्याप्तस्यादिमक्षणे । जायते यच्च विज्ञानं तत्पर्याय इति श्रुतम् ।। १५४ पुरुपोकी आयु, गक्ति, उनका प्रमाद, अथवा ज्ञाताजातादिक भाव इनकी अपेक्षासे स्थूल और सूक्ष्म दोपोका प्रायश्चित्त निरूपण करनेवाले प्रकीर्णकको अगीतिग' कहते हैं ।।१४८।। श्रुतनानके जो अंगप्रविष्ट और अङ्गवाह्यके भेद मैने जाने है वे अपनी बुद्धिके अनुसार सर्व कहे हैं, वे मुझे विपुल अनंतनानादि लक्ष्मीको देवे ॥ १४९ ।। ( श्रुतजानके वीस भेद ) उत्तम-श्रुतज्ञानके पर्याय, पर्याय समास आदि वीस भेद है। मै यथाशक्ति-यथामति और आगमानुसार उसकाभी वर्णन करता हू ।। १५० ।। पर्यायश्रुत, अक्षरश्रुत, पदश्रुत, संघातश्रुत, प्रतिपत्तिश्रुत, अनुयोगश्रुत ऐसे श्रुतज्ञानमे छह विकल्प हैं । प्राभृत, प्राभृतप्राभृत, वस्तु, और चौथा भेद पूर्व ये और ऊपरके हितकर सर्व भेद मिलकर दस भेद श्रुतज्ञानके हैं। इन दस भेदोंके समासभेदभी उतनेही कहे हैं । और उन संपूर्ण भेदोसे यह श्रुतंज्ञान वीस भेदवाला होता है। उनके नाम इस प्रकार हैं-पर्याय, पर्यायसमास, अक्षर, अक्षरसमांस, पद, पदसमास, संघात, संघातसमास, प्रतिपत्ति, प्रतिपत्तिसमास, अनुयोग, अनुयोगसमास, प्राभृत, प्राभृतसमास, प्राभृतप्राभृत, प्राभृत-प्रांमृतसमास, वस्तु, वस्तुसमास, पूर्व, पूर्वसमास ।। १५१-१५३ ॥ (पर्याय नामक श्रुतज्ञान किसे होता है? ) अपर्याप्त नित्य निगोदका जो जन्मका प्रथम क्षण उसमें जो ज्ञान उत्पन्न होता है, उसे पर्यायश्रुत कहते हैं। वह श्रुतनान सवसे जघन्य है, परतु वह हमेगा प्रकागयुक्त प्रगट होता है, उसके ऊपर कदापि आवरण आता नहीं। जगदीश्वर अर्थात् जिनेन्वर'उसके ज्ञानको जानते हैं। तात्पर्य पर्यायावरण कर्मके उदयका फल पर्यायज्ञानमे हो जाय तो ज्ञानोपयोगका अभाव होनेसे जीवकामी अभाव ही जायगा । इस लिये पर्यायावरण कर्मका फल उसके आगेके ज्ञानके प्रथम भेदमही होता है। इसलिये कमसे कम पर्यायरूप नान जीवके अवश्य पाया जाता है। तथा वह ज्ञान हमेशा निरावरण और प्रकाशुमान रहता है । सूक्ष्म निगोंदी १ मा जनीतिकम् । २ आ नित्य -२ १५९) सिद्धान्तसार (३७ सर्वज्ञानजघन्यं तत्सुप्रकाशं निरावृति' । निरावृतपरिज्ञानो जानाति जगदीश्वर. ॥१५५ तदेवासंख्यभागेन वर्धमान ततः परम् । प्रागक्षरश्रुतात्सर्व पर्यायादिसमासभाक् ॥ १५६ एकाक्षरस्य विज्ञानमक्षरश्रुतमुच्यते । द्विवाद्यक्षरवृद्धया' तु तत्समासं पदावधि ॥ १५७ पदज्ञानं भवेत्तद्धि यत्रिधा पदसंभवम् । पदादक्षरवृद्धया तु समासपदपूर्वकम् ॥ १५८ सघात. कथ्यते पथ्यः सहस्रकपदप्रम । तत्समासस्तु विज्ञेयः प्रतिपत्त्यवषिर्बुधैः ॥ १५९ -- -- ... लब्ध्यपर्याप्त जीवके अपने २ जितने भव (छह हजार वारह) सभव है उनमे भ्रमण करके अन्तके अपर्याप्त गरीरको तीन मोडोद्वारा ग्रहण करनेवाले जीवके प्रथम मोडेके समय जघन्य ज्ञान होता है ।। १५४-१५५॥ ( पर्यायसमासश्रुत )- सूक्ष्मनिगोदी लव्व्यपर्याप्तिक जीवको जो पर्यायश्रुत ज्ञान है वही असख्यात भागसे वढता वढता जाता है, तब उसमे असख्यात स्थान बढते हैं, तव एक अक्षर श्रुतज्ञान होता है । उसके पूर्व और पर्यायश्रुत ज्ञानके ऊपर जितने ज्ञानके भेद होता है, वे सव पर्यायसमास ज्ञान कहलाते हैं ।। १५६ ॥ (अक्षरश्रुत)- एक अक्षरका जो ज्ञान उसे अक्षरश्रुत कहते हैं । इसके ऊपर दो अक्षरज्ञान बढता है, तीन अक्षरज्ञान वढता है, ऐसी अक्षरज्ञानोकी वृद्धि पदज्ञानके पूर्वतक होती है। यह लब्ध्यक्षरज्ञान सूक्ष्मनिगोदी अपर्याप्तक जीवके उत्पन्न होनेके प्रथम समयमे स्पर्शन इन्द्रिजन्य मति ज्ञानपूर्वक होता है । लब्धिनाम श्रुतज्ञानावरण कर्मके क्षयोपशमका है और अक्षर नाम अविनश्वरका है इसलिये इस ज्ञानको लब्ध्यक्षर कहते हैं । क्यो कि इस क्षयोपशमका कभी विनाश नहीं होता है, कमसे कम इतना क्षयोपशम जीवके रहता ही है । एक अक्षरके ऊपर जो पदतक ज्ञान बढता है, उसे अक्षरसमास ज्ञान कहते हैं। अन्तिम अक्षर समासके ऊपर एक अक्षर वढनेपर पदनामक ज्ञान उत्पन्न होता है ।। १५७ ॥ पद तथा पदसमाम)- जो ज्ञान तीन प्रकारके पदोसे उत्पन्न होता है, उसे पदज्ञान कहते हैं । वे पद तीन हैं-अर्थपद, प्रमाणपद और मध्यमपद (इनका वर्णन पहले आया है)। इस पदज्ञानके जो एकाक्षरादि वृद्धि होती है वह सव पद समास ज्ञान समझना चाहिये। इस तरह अक्षरोकी वृद्धि होते होते दुसरा पदज्ञान होता है । तदनतर तीसरा, चौथा, पाचवा ऐसे पदज्ञान होते होते पदके ऊपर और सघातके पूर्व जितने ज्ञानके भेद होते हैं वे सब पदसमासके भेद सम- झने चाहिये ।। १५८ ॥ ( सघात और सघातसमास)- एक हजार पदप्रमाण ज्ञानको हित करनेवाला सघातज्ञान कहते हैं। इसके अनतर अर्थात् सघातज्ञानके अनतर और प्रतिपत्ति नामक श्रुतज्ञानके पूर्व जितने ज्ञानके १आ निरावृत २ आ द्विश्या ३८) सिद्धान्तसार (२ १६०- संख्यातानेकसघातप्रमाणं प्रतिपत्तिकम् । मनुयोगावधिः पूतस्तत्समासो निगद्यते ॥ १६० अनुयोगो मतस्तावत्तत्संख्याप्रतिपत्तिकः । अनुयोगसमासस्तु यावत्प्राभृतप्राभृतम् ॥ १६१ सुसंख्यातानुयोगैस्तु प्राभृतं प्राभृतं मतम् । प्राभृतप्राभृताध्वं समासः प्राभृतावधि ॥ १६२ प्राभृतप्राभृतस्तावच्चतुर्विशतिभिः परम् । प्राभृतं वस्तुमर्यादा' समासोऽस्य निगद्यते ॥ १६३ --- । विकल्प होते है वे सव सघातसमास ज्ञानके भेद होते हैं। तात्पर्य यह सघात नामक श्रुतज्ञान चार गतिमेसे एक गतिके स्वरूपका प्रतिपादन करनेवाले अपुनरुक्त मध्यम पदोका समूह रूप हैं। एक पदके ऊपर क्रमसे अक्षरोकी वृद्धि होते होते सख्यात हजार पदोकी वृद्धि होनेपर सघात ज्ञान उत्पन्न होता है ।। १५९॥ (प्रतिपत्ति और प्रतिपत्ति समास श्रुतज्ञान)- सघातज्ञानके ऊपर अनेक सघातश्रुत- ज्ञानोकी वृद्धि होनेपर प्रतिपत्तिक श्रुतज्ञान उत्पन्न होता है । और अनुयोग ज्ञानकी उत्पत्ति जहासे होती है, उससे पूर्वतक होनेवाले जितने ज्ञान विकल्प हैं, वे सर्व प्रतिपत्तिसमास श्रुतज्ञान समझने चाहिये । भावार्थ-चार गतियोमेसे एक गतिका निरूपण करनेवाले सघात श्रुतज्ञानके ऊपर पूर्वकी तरह क्रमसे एक एक अक्षरकी वृद्धि होते होते जब सख्यात हजार सघातकी वृद्धि हो जाय तब एक प्रतिपत्ति श्रुतज्ञान होता है । सघात और प्रतिपत्ति श्रुतज्ञानके मध्यमे जितने ज्ञानके विकल्प होते हैं उतनेही सघात समासके भेद होते हैं। यह प्रतिपत्तिक ज्ञान नरकादिक चार गतियोका विस्तृत स्वरूप जाननेवाला है ।। १६० ।। (अनुयोग और अनुयोगसमास)- प्रतिपत्तिक ज्ञानके ऊपर पुन सख्यातो प्रतिपत्तिक ज्ञानकी वृद्धि होनी चाहिये अर्थात् प्रतिपत्तिक ज्ञानके ऊपर पूर्वकी तरह एक एक अक्षरकी वृद्धि होते होते जव सख्यात हजार प्रतिपत्तियोकी वृद्धि होती है, तव एक अनुयोग श्रुतज्ञान होता है। इसके अनतर और प्राभृतप्राभृतज्ञानके पूर्व जितने अनुयोग ज्ञानके विकल्प होते है उसे अनुयोग समास कहते है । इस अनुयोग श्रुतज्ञानके द्वारा चौदह मार्गणाओका विस्तृत स्वरूप जाना जाता है ।। १६१ ॥ (प्राभृतप्राभृतश्रुत तथा प्राभृतप्राभृतसमास ।)- सख्यात अनुयोग होनेपर प्राभृत- प्राभृतश्रुतज्ञानकी उत्पत्ति होती है। प्राभूतप्राभूतके ऊपर और प्राभृतश्रुतके पूर्वमे जो ज्ञानविकल्प होते हैं वे सब प्राभृतप्राभृतसमास कहे जाते. हैं । तात्पर्य-चौदह मार्गणाओका निरूपण करनेवाले अनुयोग ज्ञानके ऊपर पूर्वोक्त क्रमानुसार एक एक अक्षरकी वृद्धि होते होते जव चतुरादि अनु- योगोकी वृद्धि हो जाय तब प्राभृतप्राभृतका श्रुतज्ञान होता है ।। १६२ ।। (प्राभृत और प्राभृतसमास श्रुतज्ञान )- प्राभृतप्राभृत ज्ञानके ऊपर पूर्वोक्त क्रमसे एक एक अक्षरोकी वृद्धि होते होते जब चौवीस प्राभृतप्राभृतोकी वृद्धि होती है तब एक प्राभृत श्रुतज्ञान होता है। प्राभृतश्रुतके ऊपर और वस्तुज्ञानके पूर्वमे जो जो ज्ञानविकल्प होते है उसे - - १ आ मर्याद -२ १६७) सिद्धान्तसार (३९ विशतिप्राभृत वस्तु श्रुत श्रुतविचक्षणाः । कथयन्ति समासोऽपि तस्य पूर्वावधिर्बुधाः ॥ १६४ दशादि वस्तु संख्यातं पूर्व पूर्वविदो विदुः । तत्समासो भवेत्सर्व श्रुतस्कन्धावधिर्महान् ॥ १६५ यथा ज्ञातं मया प्रोक्तं श्रुतज्ञानं विकल्पतः । समस्तश्रुतलब्धिर्मा करोतु ध्वस्तकल्मषम् ॥ १६६ अधो बहुतरो येन विषयो धीयते स्वतः । सोऽवधिविविधो बोधो बोधशुद्धधिया' मतः ॥१६७ प्राभृतसमास कहते हैं । उत्कृष्ट प्राभृतप्राभृतसमासके भेदमे एक अक्षरकी वृद्धि होनेसे प्राभृत- श्रुतज्ञान होता है ॥ १६३ ॥ (वस्तुश्रुत और वस्तुसमासश्रुत)-वीस प्राभृतोकी वृद्धि होनेपर वस्तु नामक श्रुतज्ञान होता है । ऐसा श्रुतज्ञान-चतुर कहते है । वस्तु नामक ज्ञानके ऊपर अक्षरादिवृद्धिके अनुसार 'पूर्वज्ञानके पूर्व जितने विकल्प होते है, वे सब वस्तुसमासके भेद समझने चाहिये ।। १६४ ।। (पूर्वश्रुत और पूर्वसमासश्रुत )- दश, चौदह, आठ आदि वस्तुओसे क्रमसे उत्पादादि पूर्वज्ञान उत्पन्न होते है ऐसा पूर्वश्रुतज्ञानी आचार्य कहते हैं । जो महान् श्रुतस्कन्धकी अवधि है तब तक पूर्वसमासश्रुतज्ञान होता है, जैसे दश वस्तुओंसे उत्पादपूर्व होता है । इसके अनन्तर अग्रायणीय श्रुतज्ञानके पूर्व उत्पादपूर्वसमास होता है ऐसा आगेभी समझना चाहिये ॥ १६५ ।। जैसे मैने जाने थे वैसे इस श्रुतज्ञानके भेद मैने कहे हैं । यह सपूर्ण श्रुतज्ञानको लब्धि (ऋद्धि) मुझे पापरहित करे ।। १६६ ।। (अवधिज्ञानका विवरण)-जिस ज्ञानके द्वारा नीचेका रूपी द्रव्य अधिक व्यवस्थापित किया जाता हैं-जाना जाता है और जिसके अनेक भेद हैं उसे अवधिज्ञान कहना चाहिये, ऐसा निर्मल ज्ञानी आचार्योंका मत है । भावार्थ-अवधिज्ञानावरण कर्मका क्षयोपशम होनेसे अधोगत द्रव्य-रूपी पदार्थ द्रव्य, क्षेत्र, काल और भावसे नियत होकर जिसके द्वारा जाना जाता है, ऐसा जो विकल प्रत्यक्ष ज्ञान उसे अवधिज्ञान कहते हैं । अवधि शब्दका सीमा, मर्यादा ऐसाभी अर्थ है। इस अर्थकी अपेक्षासे इसके सीमाज्ञान, मर्यादाज्ञान ऐसाभी कहते हैं। यह ज्ञान द्रव्य, क्षेत्र, काल और भावकी मर्यादा धारण करता है। अर्थात् अवधिज्ञानका क्षयोपशम जितना अधिक होगा उसकी उतनी द्रव्य, क्षेत्र, काल और भावकी मर्यादा बढती है, और अधिक अधिकतर रूपी द्रव्य उसका विषय होता है । इस ज्ञानावरणके क्षयोपशमके तरतमरूप असख्य भेद है। इसलिये यह अवधिज्ञान असख्य प्रकारका है। यह ज्ञान मतिज्ञानके समान इन्द्रिय और मनसे उत्पन्न नही होता है अथवा श्रुतज्ञानके समान मनसे उत्पन्न नही होता है, परतु यह आत्मासे उत्पन्न होता है, इसको प्रकाश, अधकार आदिकी आवश्यकता नहीं है, वाह्य रूपी पदार्थोंका इद्रिय और मनके साथ सबध होकर १ मा बोधि ४०) सिद्धान्तसार (२ १६८- क्षयोपशमहेतुश्च भवप्रत्यय इत्यपि । आदौ' नारकदेवानां शेषाणां षड्विधः पुनः ।। १६८ अनुगाम्यननु गामी वर्धमानस्तथैतरः । अवस्थिताभिधानोऽपि ततोऽयमनवस्थितः ॥ १६९ ------- यह उत्पन्न नही होता है । इस अवधिज्ञानके देशावधि, परमावधि और सर्वावधि ऐसे तीन भेद है । देशावधिके अनुगामी, अननुगामी, वर्धमान, हीयमान, अवस्थित और अनवस्थित ऐसे छह भेद है । परमावधिज्ञानके अनवस्थित और हीयमानं भेदोको छोडकर अनुगामी, अननुगामी, वर्धमान और अवस्थित ऐसे चार भेद है । तथा सर्वावधिके अनुगामी, अननुगामी और अवस्थित ऐसे तीन भेद है ॥ १६७ ॥ ( देगावधिज्ञानके भेद और स्वामी । )- यह देशावधिज्ञान क्षयोपशमजन्य और भव- प्रत्यय भेदसे दो प्रकारका है। पहिला भेद भवप्रत्यय अवधिज्ञानरूप है । वह देव और नारकियोको प्राप्त होता है और क्षायोपशमिक अवधिज्ञान बाकीके जीवोको अर्थात् मनुष्य और पशुओको प्राप्त होता है । तात्पर्य-देवनारकियोको जब पर्याप्तावस्था प्राप्त होती है तब उनको भवप्रत्यय अवधिज्ञान प्रगट होता है । भावार्थ- देव और नारकी अपने उत्पन्न होनेके स्थानमे उत्पन्न होनेपर अन्तर्मुहूर्तमे छह पर्याप्तियोसे-आहार, शरीर, इद्रिय, श्वासोच्छवास, भाषा और मन इनसे परिपूर्ण होते है और 'मै यहा कैसे आया, मैने पूर्वजन्ममे कौनसा शुभाशुभ कृत्य किया था इत्यादि रूपसे जब विचार करता है तब उसे यह भवप्रत्यय अवधिज्ञान प्राप्त होता है। जिनेश्वरकोभी भवप्रत्यय अवधि रहता है। वह देव नारकियोके समान उनके सर्व अगमेसे उत्पन्न होता है। जो क्षयोपशमज 'अवधिज्ञान मनुष्य और पशुओंको उत्पन्न होता है, उसे गुण-प्रत्यय ऐसाभी नाम है। सम्यग्दर्श- नादि निमित्त प्रप्ति होनेपर जिनका कर्म उपशान्त और क्षीण हो गया है उन्हे यह प्राप्त होता है। 'अवधिज्ञान क्षयोपशमसेंही प्राप्त होता है। परंतु भवकी प्रधानतासे देव-नारकियोको यह प्राप्त होनेसे इसे भव-प्रत्यय कहते हैं। जैसे पक्षियोके कुंलमे जन्म होनेसे विना शिक्षणके पक्षियोंको आकाशगमन गुण प्राप्त होता है, वैसे देव और नारकावस्था प्राप्त होनेर उनको अवधिज्ञान प्राप्त होता है। मनुष्य और 'पशुओंकोभी पर्याप्तावस्थामेही सम्यग्दर्शनादि गुण प्राप्त होनेपर गुण-प्रत्यय अवधिज्ञान प्राप्त होता है। जो असज्ञिपशु होते है उन्हे अवधिज्ञान प्राप्त नहीं होता । अर्थात् सज्ञि और पर्याप्तक मनुष्य और पशुओको अंवधिज्ञानकी योग्यता होती है ।। १६८ ॥ । . (गुणप्रत्यय देशावधिके छह भेदोके नाम । )- अनुगामी, अननुगामी, वर्धमान, हीयमान, अवस्थित और अनवस्थित ऐसे छह भेद गुण-प्रत्यय देशावधिज्ञानके समझने चाहिये ।। १६९ ॥ . . १ आ आद्यो -२ १७६ ) सिद्धान्तसार (४१ भास्करस्य प्रकाशो वा गच्छन्तमनुगच्छति । अनुगामी स विज्ञेयः परो यो नानुगच्छति ॥ १७० काष्ठनिर्मन्थजो वह्निः शुष्कपत्रगतः पुनः । समिद्धन्धनमासाद्य प्रवृद्धो जायते पुनः ॥ १७१ तथा जातोऽवधिः पूतोऽवधिज्ञानावृतिक्षयात् । वर्धते वर्धमानोऽसौ वर्धमाननिबन्धतः ॥ १७२ सम्यग्दर्शनसज्जानसच्चारित्रविशुद्धितः । आ असंख्येयलोकेऽपि वृद्धिमान् वर्धमानकः ॥ १७३ संक्लिष्टपरिणामेन शुद्धदृष्टयादिहानितः । अङगुलासख्यभागोऽय हीयमानः सहीनकः ॥ १७४ समुत्पन्नप्रमाणाद्यो हीयते नापि वर्धते । भवक्षयावधि शुद्धो लिंगवत्स त्ववस्थितः ।। १७५ चीयतेऽपचयं याति यश्चोत्पन्नस्तथाविधात । सम्यग्रत्नत्रयाद्वायुप्रेरितोर्मिसमूहवत् ॥ १७६ ( अनुगामी और अननुगामी देशावधिज्ञान । )- सूर्यका प्रकाश जैसे सूर्यके साथ जाता है वैसे जो अवधिज्ञान एकक्षेत्रसे अन्यक्षेत्रमे, एकभवसे अन्य भवमे आत्माके साथ जाता है उसे अनुगामी अवधिज्ञान कहते है । जो अवधिज्ञान आत्माके साथ क्षेत्रान्तरमे और भवान्तरमे नही जाता है उसे अननुगामी देशावधिज्ञान कहते हैं । तात्पर्य- जैसे मूर्ख मनुष्यको प्रश्न पूछनेपर उसका उत्तर नही मिलता है वैसे जो अवधिज्ञान स्वस्थानमे और पूर्वभवमेही रहता है, स्थानातर और भवान्तरमे नही जाता है उसे अननुगामी कहते है ।। १७० ।। ( वर्धमान देशावधिज्ञान । )- अरणी नामक दो लकडियोको एक दूसरीपर घिसनेसे उत्पन्न हुआ और शुष्क पत्रोके सयोगसे वृद्धिंगत हुआ तथा लकडियोसे भडकता हुआ अग्नि खूब बढता है वैसे अवधिज्ञानावरण कर्मका क्षयोपशम होनेसे जो पवित्र अवधिज्ञान उसके कारणोके वृद्धिगत होनेसे बढता है उसको वर्धमान अवधिज्ञान कहते है । यह अवधिज्ञान सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्रकी विशुद्धिवृद्धि होनेसे बढते बढते असंख्यात लोकतक बढता है ॥ १७१-१७२ ॥ (हीयमान अवधिज्ञान।)-जब सक्लेश परिणामसे निर्मल सम्यग्दर्शनादि गुणोकी हानि होती जाती है, तब जो अवधिज्ञानभी सम्यग्दर्शनादिकोके साथ कम कम होता हुआ अगुलके असख्यात भागपर्यन्त घटता है, उसे हीयमान अवधिज्ञान कहते हैं ।। १७४ ।। ( अवस्थित अवधिज्ञान । )- जो अवधिज्ञान जितने प्रमाणसे उत्पन्न हुआ है उससे कमभी नही होता और वढताभी नहीं । जितना उत्पन्न हुआ है उतनाही रहता । उसे अवस्थित अवधिज्ञान कहते हैं। वह शरीर पर उत्पन्न हुए तिलमाषादि चिन्होके समान भवक्षय होनेतक हानिवृद्धि रहित एकरूप रहता है। उसे अवस्थित अवधिज्ञान कहते है ।। १७५ ।। ( अनवस्थित अवधिज्ञान।)-सम्यग्रलत्रय बढनेसे जो बढता है और कम होनेसे कम होता है, वह अवधिज्ञान अनवस्थित है। वायुसे प्रेरित होनेसे लहरीसमूह जैसे हीनाधिक होता है - 4. १ आ निवेदित । २ आ लोकेम्यो ४२) सिद्धान्तसार (२ १७७- सोऽनवस्थित इत्येवं कथितस्तथ्यवेदिभिः। जिनेन्द्रजितफाँघरघविध्वंसकारिभिः ॥ १७७ देशावधिः प्रपूतात्मा द्वितीयः परमावधिः। सर्वावधिस्तृतीयोऽसौ देशाद्यर्थप्रदर्शकः ॥ १७८ देशावधिस्तु सर्वेषा परौ चान्त्यैकदेहिनाम् । महर्षीणां मतो पूतौ स्वामित्वमिति निश्चितम् ॥१७९ परमानसगार्थस्य पर्ययणादिदं महत् । मनःपर्ययविज्ञानं ज्ञायते ज्ञानकोविदः ।। १८० तद्भेदावृजुवैपुल्यमती मतिमतां मतौ । मनःपर्ययविज्ञानं गतौ' साधुगतिप्रदौ ॥ १८१ वैसे यह अवधिज्ञान कमजादा होता है। इसलिये जिन्होने कर्मसमूहपर विजय पायी है और पाप- विनाश जिन्होने किया है, जो सत्य पदार्थ स्वरूप जानते है ऐसे जिनेद्र भगवानने इसे अनवस्थित अवधिज्ञान कहा है ॥ १७६-७७ ॥ ( अवधिज्ञानके तीन भेद।)-पहिला पवित्र देशावधिज्ञान, दूसरा पवित्र परमा- वधिज्ञान और तीसरा पवित्र सर्वावधिज्ञान ऐसे इसके तीन भेद है और ये देशादि अर्थोंको प्रगट करनेवाले है । देशावधिज्ञान चारो गतियोके सज्ञीपर्याप्तक प्राणियोको उत्पन्न होता है। परमावधि और सर्वावधि ये दो पवित्र अवधिज्ञान चरमशरीर-धारक महर्षियोको होते है। इस प्रकार अवधिज्ञानके स्वामित्वका निश्चय किया है। तात्पर्य-देशावधिज्ञान मनुष्यको असख्यात द्वीपसमुद्रोको जाननेवाला होता है। उसका कालभी असख्यात वर्षोंका होता है। द्रव्य-कार्मणद्रव्य विषय होता है। यह अवधिज्ञान शख, कमल आदिक शरीरलाछनोसे जोकि नाभिके ऊपर भागपर रहते है उनसे उत्पन्न होता है । तथा जो विभगावधिज्ञान है, वह नाभिके नीचे गिरगिट, मर्कट आदि चिन्होसे उत्पन्न होता है । इस- प्रकार अवधिज्ञानका वर्णन हुआ है ।। १७८-१७९ ॥ ( मन पर्ययज्ञानका स्वरूप।)- अन्य व्यक्तिके मनमे स्थित पदार्थको जाननेसे यह मन पर्ययज्ञान महान् है ऐसा ज्ञाननिपुण आचार्य जानते हैं । भावार्थ-मन पर्ययज्ञानावरण कर्मके क्षयोपशमसे सस्कृत अपने मनके द्वारा अन्य व्यक्तिके मनका जो पदार्थ चिन्तन किया जाता है, अथवा चिन्तित हुआ होगा अथवा चिन्तन किया जायगा ऐसे पदार्थको मुनि जानते हैं । उसके जाननेका नाम मन पर्यय है । यह ज्ञान मतिज्ञान नही है क्योकि मतिज्ञानावरण क्षयोपशमयुक्त मन इस पदार्थको नही जानता है । वह मतिज्ञान प्रत्यक्ष नहीं है । परतु यह मन पर्ययज्ञान प्रत्यक्ष है । मन शब्दका अर्थ मनमे स्थित जो भाव-पदार्थ अर्थात् वस्तु विषयक विचार उसे मन कहना चाहिये । उसे पर्ययण-स्पष्ट जानना मन पर्यय कहते है ॥ १८० ॥ (मन पर्ययके दो भेद। )- इस मतिज्ञानके ऋजुमति और विपुलमति ऐसे दो भेद बुद्धिशाली आचार्योके मान्य है। और ये दोनो मन पर्ययके लक्षणको प्राप्त हुये है तथा शुभगति देनेवाले हैं ।। १८१ ॥ १ आ विज्ञानगतौ -२. १८९) सिद्धान्तसार (४३ १ विशुद्धयप्रतिपाताभ्यां तद्विशेष. प्रकीर्तितः । ज्ञानाराधनतनिष्ठराराध्यस्तस्य लब्धये ॥ १८२ क्षयादुपशमाज्जात. कर्मणामात्मनो महान् । य प्रसादो विशुद्धिः सा कथिता' शुद्धमानसः॥१८३ द्रव्यतः क्षेत्रतः कालात् भावतस्तु चतुर्विधा । विशुद्धिस्तारतम्येन पुनर्नानात्वमञ्चति ॥ १८४ कर्मद्रव्यस्य योऽनन्तभागः सर्वावधेर्महान् । स सूक्ष्मात्सूक्ष्मविज्ञानविषयो जिननायक. ॥ १८५ तस्यानन्तविभागस्य योऽन्त्यो भागः स इष्यते । विषयो विषयातीत ऋजुपुर्वमतेमहान् ॥ १८६ तस्याप्यनन्तभागस्य पुनर्भागस्तथान्तिम । विपुलादिमते यो विषयः शुद्धमानसः ।। १८७ जघन्येन च गव्यूतिपृथक्त्व क्षेत्रतो मतम् । ऋजुपूर्वमतेर्मान्यरुत्कर्षाद्योजनानि तत् ॥ १८८ द्वितीयस्य जघन्येन योजनानि पृथक्त्वकम् । मानुषोत्तरशैलान्तमुत्कर्षेण समादिशेत् ॥ १८९ .. ( ऋजुविपुलमतिमे विशेषता )- ज्ञानकी आराधना कर उसमे तत्पर रहनेवाले पूज्य मुनियोने उसकी प्राप्तिके लिये विशुद्धि और अप्रतिपात इन दोनोमे विशेषता कही है ॥ १८२ ।। मन पर्ययज्ञानावरणके क्षयोपशमसे जो मनमे सक्लेशरहित प्रसन्नता उत्पन्न होती है वह विशुद्धि है ऐसा शुद्ध मनवाले आचार्योंने कहा है। वह विशुद्धि द्रव्यविशुद्धि, क्षेत्रविशुद्धि, काल- विशुद्धि और भावविशुद्धि ऐसे चार भेद धारण करती है । ऋजुमति ज्ञानकी अपेक्षा विपुलमति- ज्ञानकी द्रव्य, क्षेत्र, काल और भावसे विशुद्धि अधिक है-विशुद्धतर है। कार्मणद्रव्यका अतिम अनतवा भाग जो कि सर्वावधिज्ञानने जाना था उसके पुन अनन्तभाग करके जो अनन्तवा भाग आता है, वह ऋजुमति-मन.पर्ययका ज्ञेय होता है । उसकोभी अनतवार अनतसे भागनेपर जो द्रव्य अनन्तवा आ जाता है, वह विपुलमति मन पर्ययका ज्ञेय-विषय समझना चाहिये । इस प्रकार विपुलमतिकी विशुद्धता ऋजुमतिकी अपेक्षासे विशुद्धतर होकर अनेक प्रकारोको धारण करती है ॥ १८३-१८४ ॥ कर्मद्रव्यका जो अनन्तवा सूक्ष्म भाग माना गया है वह सर्वावधिज्ञानका विषय है ऐसा सूक्ष्मज्ञानी जिनेश्वरने कहा है । उसको फिर अनन्तसे अनन्तवार भागनेपर जो अन्त्य अनन्तवा भाग माना जाता है वह पचेन्द्रिय-विपय-विरक्त मुनियोसे ऋजुमतिका महत्वशाली विषय माना है। उसकोभी पुन अनन्तवार भागनेसे जो अन्तिम भाग आता है वह विपुलमति मन पर्ययका विषय है ऐसा विशुद्ध मनवाले महर्पियोने माना है ।। १८५-१८६ ।। ( ऋजुमति और विपुलमतिकी क्षेत्रविशुद्धि )- पूज्य ऐसे ऋजुमति मन पर्ययका जघन्यक्षेत्र क्षेत्रकी अपेक्षासे गन्यूतिपृथक्त्व है अर्थात् तीन कोसके ऊपर और 'नौ कोसके भीतर है अर्थात् इतने क्षेत्रमे लोगोके मन स्थित विचारोको ऋजुमतिवाले मुनि जानते हैं। और उत्कर्षसे तीन योजनके ऊपर और नौ योजनोके भीतर लोगोके मन स्थित पदार्थोंको-विचारोंको जानते हैं ॥१८८॥ विपुलमति मन पर्यय ज्ञानका क्षेत्र जघन्यत. तीन योजनके ऊपर और नौ योजनके भीतर है। और उत्कर्पसे मानुषोत्तर पर्वतके अन्ततक अर्थात् उस पर्वतके भीतर है, बाहर नही है ॥१८९॥ १ आ गदिता २ आ योजनादि ४४) सिद्धान्तसार (२. १९०- कालतश्च जघन्येन जीवानामात्मनः पुनः। भवान्तराणि जानाति द्वित्राण्यूजुमतिर्महान् ॥ १९० उत्कर्षेण तु सप्ताष्टभवान्गत्यादिभेदतः । प्ररूपयति शुद्धात्मा विशुद्धतरभावतः ॥ १९१ सप्ताष्टौ च जघन्येन विपुलादिमतिर्महान् । भवान्गृह्णात्यसंख्यातानुत्कर्षेणातिशुद्धितः॥ १९२ सूक्ष्मसूक्ष्मतरस्तावद्भावोऽपि द्वितये मतः । सर्वद्वन्द्वविनिर्मुक्तद्वितयामहर्षिभिः ॥ १९३ अपातिपातितस्तावद्विशिष्टो' विपुद्धिमान् । स्वामिनां वर्धमानेन चारित्रेण विशेषतः ॥ १९४ विशुद्धिक्षेत्रसत्स्वामिविषयेभ्यो विशेषतः । अवविशिष्टश्चैष मनःपर्यय इष्यते ॥ १९५ लोकालोकप्रकाशात्मा केवलज्ञानमुत्तमम् । केवलं जायते यस्मादशेषावरणक्षयात् ॥ १९६ ( कालकी अपेक्षा दोनो मन पर्यय ज्ञानोकी विषयविशुद्धि । )- कालकी अपेक्षासे जघन्यत महान् शुद्धस्वरूप ऋजुमतिज्ञान जीवोके और अपने दो तीन भव जानता है। और उत्कर्षसे गति आगतिके अपेक्षासे सात-आठ भव जानता है । महान् विपुलमति जघन्यसे सात- आठ भव अपने और अन्योके जानता है, तथा उत्कर्षसे अत्यत विशुद्धता होनेसे अपने और अन्योके असख्यात भव गति-आगतिसे जानता है ।। १९०-१९२ ।। (भावकी अपेक्षासे दोनो ज्ञानोमे विशेषता।)- भावकी विशुद्धता दोनो ज्ञानोमे सूक्ष्म सूक्ष्मतर है अर्थात् ऋजुमतिकी जो भावकी अपेक्षासे विशुद्धता है, उससेभी अधिक विशुद्धता विपुलमतिकी है, ऐसा सर्व रागद्वेषादि द्वद्वोसे रहित इन दोनो ज्ञानोको जाननेवाले महर्षियोंने माना है ।। १९३ ॥ ( अप्रतिपाती और प्रतिपातीकी अपेक्षासे विशेषता।)-विपुद्धि मन.पर्ययके धारक मुनि क्षीणकषाय गुणस्थानमे सर्व कषायोका घात करते है । इसलिये वे सयमशिखरसे नीचे नही गिरते हैं । परंतु ऋजुमति मन पर्ययवाले मुनि उपशातकषायमे चारित्रमोहोदय होनेसे सयम- शिखरसे च्युत होते है । विपुलमति मन.पर्ययवाले मुनि बढते हुए चारित्रके कारण ऋजुमतिवाले मुनियोसे श्रेष्ठ होते हैं ।। १९४ ।। ( अवधि और मन पर्ययज्ञानमे विशेषता। )- विशुद्धि, क्षेत्र, स्वामी और विषय इनकी अपेक्षासे अवधिज्ञान और मन पर्ययविज्ञानमे विशेष विशेषता है अर्थात् अवधिज्ञानसे मनःपर्ययज्ञान विशिष्ट माना गया है ।। १९५ ।। स्पष्टीकरण-विशिष्ट संयमगुण जिसमें होता है उस मुनीश्वरकोही मन पर्यय होता है। मनुष्योमे मन पर्यय होता है, देव, नारकी और पशुओमे नही होता है। गर्भज मनुष्यमेंही मन:- पर्यय उत्पन्न होता है, संमूर्छन मनुष्योंमे नहीं । गर्भजोमे उत्पन्न होनेवाला वह मन.पर्ययज्ञान - . . . १ ना अप्रपातित्वतस्ताव २ आ. विपुलादिमान् -२ १९७) सिद्धान्तसार. (४५ मतिज्ञानं श्रुतज्ञानमीषद्धर्मेषु वस्तुष । वर्तते विषयत्वेन रूपिष्वेवावधिर्मतः ॥ १९७ अकर्मभूमिजोमे-भोगभूमि और म्लेच्छादिकोमे उत्पन्न नही होता है । कर्मभूमिजोमेभी, पर्याप्त- कोमेही उत्पन्न होता है, अपर्याप्तोमे नही । पर्याप्तकोमेभी जो सम्यग्दृष्टि हैं उनमे उत्पन्न होता है मिथ्यादृष्टियोमे, सासादन सम्यग्दृष्टियोमे और सम्यअमिथ्यादृष्टियोमे नही। सम्यग्दृष्टियोमेभी वह मुनियोमेही उत्पन्न होता है, असयतसम्यग्दृष्टि और सयतासयतोमे उत्पन्न नही होता । सयतोमेभी प्रमत्तसयतसे लेकर क्षीणकषायान्त उत्पन्न होता है । उत्तरगुणस्थानोमे सयोग अयोग- गुणस्थानोमे नही मिलता है । प्रमत्त सयतादि गुणस्थानोमे जो मुनि प्रवर्द्धमान चारित्रवाले होते हैं, उनमे वह ज्ञान होता है । हीनचारित्रोमे नही होता है। प्रवर्द्धमान चारित्रवालोमेभी सात प्रकारकी ऋद्धियोमेसे जिनको कोई ऋद्धि प्राप्त हुई है, उनको मन पर्यय प्राप्त होता है । ऋद्धि- प्राप्तोमेभी सबको प्राप्त नही होता है। किसी एककोही प्राप्त होता है। अवधिज्ञान तो चतुर्गतिके जीवोको प्राप्त होता है । अत स्वामिभेदसे इनमे भेद है । अवधिज्ञानका क्षेत्र बडा है। विषयकी अपेक्षासे-अवधिज्ञानके विषयसे मन पर्ययज्ञानका विषय अत्यत सूक्ष्म है । इस प्रकार क्षेत्र, स्वामी और विषयकी अपेक्षासे इन दो ज्ञानोमे विशेषता व्यक्त की है ।। १९५ ।। (केवलज्ञानका स्वरूप और उसका विषय)- संपूर्ण ज्ञानावरण कर्मका क्षय होनेसे लोकको और अलोकको प्रकाशित करनेवाला उत्तम केवलज्ञान उत्पन्न होता है । वह अकेलाही रहता है। उसके साथमे अन्य सब ज्ञान नहीं होते है ॥ १९६ ॥ ( मतिज्ञानादिक पाच ज्ञानोके विषय ।)- मतिज्ञान और श्रुतज्ञान ये द्रव्योके कुछ पर्यायोको विषय करते हैं और अवधिज्ञान रूपीपदार्थोंको विषय करता है। जीव, पुद्गल, धर्म, अधर्म आकाश और काल इन षड्द्रव्योके कुछ पर्याय मति और श्रुतज्ञानके विषय होते है । सब पर्याय इनके विषय नही होते हैं । क्योकि मतिज्ञान इन्द्रियोंसे उत्पन्न होता है और इन्द्रियो रूप- रसादिक पर्यायोको ग्रहण करती है । सपूर्ण पर्यायोको ग्रहण करनेमे वे असमर्थ होती हैं। श्रुतज्ञान शब्दसे उत्पन्न होता है और शब्द सर्व सख्यातही होते है और द्रव्योके पर्याय असख्यात अनत होते हैं वे सब विशेषाकारोसे शब्दोद्वारा नही ग्रहण किये जाते हैं । विशेषार्थ धर्मादिक द्रव्य अतीन्द्रिय होनेसे उसमे मतिज्ञान कैसे प्रवृत्त होगा? इस- लिये उसके सर्व द्रव्य विषय मानना योग्य नहीं है? यह कहना ठीक नहीं है? क्योकि नोइद्रिया- वरण कर्मकी क्षयोपशमलब्धिकी अपेक्षासे नोइद्रिय मन धर्मादिकोमे प्रवृत्त होता है। यदि वह उनमे प्रवृत्त न होता तो अवधिज्ञानके साथ उसका उल्लेख करना पडता । नोइद्रियावरण कर्मके १ आ रूपिष्ववधि ४६) सिद्धान्तसार ( २ १९८- तस्यानन्तविभागो यः स मन.पर्ययस्य च । समस्तद्रव्यपर्यायविषय केवलं मतम् ॥ १९८ मतिज्ञान श्रुतज्ञानमवधिज्ञानमित्यपि । अज्ञानानि प्रजायन्ते मिथ्यात्वानुगतानि च ॥ १९९ सरजस्कटकालाबुगतदुग्धं यथा भवेत् । विपर्यस्तं तथा ज्ञान मिथ्यात्वेनोपजायते ॥ २०० 1 . क्षयोपशमसे अवग्रहादिरूप उपयोग धर्मादि द्रव्योमे प्रथमत उत्पन्न होता है । इसके अनन्तर धर्मादिद्रव्योमे श्रुतज्ञान उत्पन्न होता है । इसलिये मति और श्रुतज्ञानके सर्व द्रव्य अपने अपने अल्पपर्यायोके साथ विषय होते हैं ऐसा आचार्यका कहना अयोग्य नहीं है। अवधिज्ञान विकल प्रत्यक्ष है और इद्रिय, मनकी अपेक्षा छोडकर आत्मामे अवधिज्ञाना- वरण क्षयोपशमसे होता है । उसका विषय रूपिद्रव्य और उसके स्वयोग्य-पर्याय विषय है, रूपि- द्रव्योके समस्त पर्याय अवधिज्ञानके विषय नहीं होते है । रूपिशब्दसे पुद्गलद्रव्य ग्रहण किया जाता है, जो कि स्पर्श, रस, गधवर्णसे युक्त होता है। ससार अवस्थामें जीवको पुद्गलद्रव्यका सबध होनेसे वहभी रूपी माना जाता है । इसलिये रूपियोमे अर्थात् पुद्गलोमे और जीवपर्याय-स्वरूप जो औदयिक, औपशमिक और क्षायोपशमिक भाव, है उनमे अवधिज्ञान, उत्पन्न होता है। क्योकि ये जीवपर्याय रूपिद्रव्यके सबसे उत्पन्न हुए है । परतु क्षायिक पर्याय और पारिणामिक पर्याय जीवके रूपिद्रव्यके सबधसे विना उत्पन्न होनेसे उनमे अवधिज्ञान प्रवृत्त नही होता है। वैसे धर्मास्तिकायादिकोमेभी रूपिद्रव्यका सबध नही होनेसे प्रवृत्त नही होता है ऐसा समझना चाहिये ॥ १९७॥ (मन पर्यय और केवलज्ञानका विपय ।)- पहले जो सर्वावधिज्ञानका विषय कहा है, उसके अनतभाग करके उसके एक भागमे मन पर्यय प्रवृत्त होता है। केवलज्ञान सपूर्ण जीवादिक- षड्द्रव्य और उनके सपूर्ण पर्याय त्रिकालके अनन्तानत पर्याय जाननेमे समर्थ है। विशेषार्थ-ऐसा द्रव्य वा पर्याय नही है, जो कि, केवलज्ञानका विषय नही हुआ है। इस केवलज्ञानका माहात्म्य अपरिमित है, मत्यादिक चार ज्ञान क्षायोपशमिक हैं परतु केवलज्ञान क्षायिक होनेसे पूर्ण निर्मल और ज्ञानावरणका पूर्ण नाश होनेसे उत्पन्न हुआ है । यह ज्ञान अनत, एक असहाय अद्वितीय है। त्रिकालके सपूर्ण अर्थ व उनके, सपूर्ण पर्याय इसका विषय है तथा सतत सपूर्ण सुखका स्थान है ॥ १९८ ॥ (मत्यादिक ज्ञान और कुज्ञान है।)-मतिज्ञान, श्रुतज्ञान और अवधिज्ञानी जब मिथ्या- दर्शनके साथ सबद्ध होते है तव अज्ञान होते है। जैसे रजके साथ कटुतुबीमे मधुर दुग्ध रखनेसे वह दुग्ध कटुक होता है, वैसे ये तीन ज्ञान मिथ्यात्वके सबसे अज्ञान स्वरूप हो जाते है, 'विपर्यस्त होते है। मिथ्यादृष्टि इच्छाके वश होकर पदार्थको जानते हैं । किस अपेक्षासे पदार्थ नित्य माना जाता है और किस अपेक्षासे वह अनित्य माना जाता है इसकी विवेचकता मिथ्यादृष्टियोमे नही रहती है, वे एकान्तपनेसे वस्तुके स्वरूप मानते है और कभी विपरीतभी मानने लगते है। तथा सत्- पदार्थको सत् और असत्पदार्थको असत्भी मानने लगते है। परतु उनका वह मानना अप्रमाण है। - . - -२ २०३) सिद्धान्तसार (४७ इच्छाया वशतो नित्य युक्तायुक्ताविवेचकः । मद्यपेनेव गृहाति पदार्थांस्तेन दुष्यति ॥२०१ आद्ये परोक्षमित्येव प्रत्यक्षमपरं त्रयम् । सापेक्षणानपेक्षेण भावनेतन्निगद्यते ॥ २०२ सम्यग्ज्ञानप्रदीपोज्ज्वलवहलशिखारश्मिजालविशालः। अज्ञानाधान्धकारं निजहृदयगुहाक्रीडलीनं निरस्य ।। ये वर्तन्ते त एते जगदखिलमिद कर्मणा क्लिश्यमानम् । पश्यन्तः स्वस्य सिद्धेर्दधति पटुधियः कार्यमन्त. स्फुरन्त ।। २०३ - जैसे मद्यपान करनेवाला मनुष्य माताको भार्या और भार्याको माता मानता है, कभी यदृच्छासे भार्याको भार्या और माताको माताभी मानता है, तो भी उसका मानना प्रमाण नहीं है। इसी प्रकार मत्यादिक ज्ञानोको रूपादि पदार्थोंमे मिथ्यात्वसे विपरीतपना प्राप्त होता है । मिथ्यादर्शन परिणाम जव आत्मामे प्रगट होता है तब रूपादिक ज्ञान होनेपरभी उसमे कारण-विपर्यास, भेदाभेदविपर्यास और स्वरूपविपर्यास उत्पन्न करता है ।। १९९-२०१॥ (प्रत्यक्ष और परोक्षज्ञान )- पहिले मतिज्ञान और श्रुतज्ञान परोक्षज्ञान है, और अवधिज्ञान, मन पर्ययज्ञान तथा केवलजान ये तीन ज्ञान प्रत्यक्ष है। मतिज्ञान और श्रुतज्ञान इद्रिय और मनकी अपेक्षा लेकर पदार्थको जानते हैं । अत वे दोनो ज्ञान सापेक्ष होनेसे परोक्ष है। उनकी अपेक्षा विना वे पदार्थोंको नही जान सकते है। इद्रियाभी प्रकाश आदिकी अपेक्षाविना मतिज्ञान श्रुतज्ञानको उत्पन्न नही करती है । अर्थात् आद्य दो जान परावलम्बी होनेसे परोक्ष हैं और अवधि आदिक तीन ज्ञान इन्द्रिय, मन, पदार्थ आदिकी अपेक्षाके विनाही पदार्थोको सीधा जाननेमे समर्थ है, इसलिये वे प्रत्यक्ष है। जैसे लगडा मनुष्य हाथमे लाठी लेकर उसके सहायतासे चलता है यद्यपि उसमे जानेका सामर्थ्य है परतु लाठीके विना वह चल नही सकता । उसके गमनमे लाठीका आश्रय प्रधान है, वैसे मतिश्रुत ज्ञानको इन्द्रियाँदिकी अपेक्षा लेनी पड़ती है। अवधिज्ञानादि तीन ज्ञानोको वह अपेक्षा नही रहती है। अत वे प्रत्यक्ष हैं ऐसा समझना चाहिये ।। २०२ ॥ ( सम्यग्ज्ञानीकी महिमा । )- सम्यग्ज्ञानरूपी प्रदीपकी उज्ज्वल और विपुल ऐसी जो शिखा उसके विशाल किरणसमूहोमे विद्वान् लोग अपनी हृदय गुहाके मध्यभागमे ठहरे हुए अज्ञानरूपी सघन अधकारको निकालकर शान्ततासे रहते है । तथा कर्मसे पीडित होनेवाले इस सपूर्ण जगतको देखते हुए, तथा अपनी आत्मामे स्फुरायमान होते हुए, ज्ञानसे वृद्धिंगत होते हुए सिद्धिका कार्यरूप सुख धारण करते है । अर्थात् उनका सम्यग्ज्ञान वढनेसे वे मुक्तिसुखका अनुभव लेते है ।। २०३ ॥ - १ आ यदृच्छा २ आ दूपित ४८) सिद्धान्तसार (२. २०४- ज्ञानं चारित्रमूलं श्रयति बुधजनो ज्ञानमेवाद्य तत्त्वम् । ज्ञानेनोच्चैः पदं तद्भवति नम इति ज्ञानतत्त्वाय तस्मै । ज्ञानान्मोक्षस्तु तुल्यं भवति न हि पुनर्ज्ञानमानस्य किञ्चित् । ज्ञाने बुद्धि तदस्माद्विदधत विबुधाः साधु वन्द्येऽनवद्याम् ॥ २०४ इति श्रीसिद्धान्तसारसंग्रहे पण्डिताचार्यनरेन्द्रसेनविरचिते' सम्यग्ज्ञाननिरूपणो द्वितीयः परिच्छेदः ।। ----- - ( ज्ञान शब्दका सात विभक्तियोमे प्रयोग कर उसका महत्त्व आचार्य दिखाते है।)- यह सम्यग्ज्ञान चारित्रका मूल है अर्थात् सम्यग्ज्ञानसे चारित्रका स्वरूप ज्ञात होता है जिससे वह धारण करनेमे और उसके पालनमे महती सहायता प्राप्त होती है। इसलिये वुद्धिमान लोग जीवादि पदार्थोंको जाननेमे मुख्य उपाय भूत सम्यग्ज्ञानका अवलब करते है, ज्ञानही पहिला तत्त्व है। इस सम्यग्ज्ञानसे उच्च पदकी प्राप्ति होती है । इसलिये इन ज्ञानतत्त्वको हम नमस्कार करते है । इस ज्ञानसे मोक्षकी प्राप्ति होती है। सम्यग्ज्ञानरूपी जो प्रमाण है, उसकी समानताको कोईभी प्राप्ति नही कर सकता । अत हे विद्वद्गण यतिसमूहसे वन्दनीय इस ज्ञानमे आप अपनी बुद्धि स्थिर करे ।। २०४॥ पण्डिताचार्य नरेन्द्रसेनविरचित श्रीसिद्धान्तसारसडग्रहमे सम्यग्ज्ञानका निरूपण करनेवाला दूसरा परिच्छेद समाप्त हुआ। - १ आ. पण्डित इति नास्ति २ आ सम्यग्ज्ञाननिरूपणो इति नास्ति ।

( तृतीयोऽध्यायः ) नमस्कृत्य महावीरमुररीकृतसद्गुणम् । गुणेभ्यो निर्गतं किञ्चिद्वक्ष्ये चारित्रमजसा ॥१ चर्यते चरणं वापि कर्मफलक्षयानलम् । पञ्चधा पञ्चमज्ञाननायकरुपलक्ष्यते ॥२ ( तृतीय अध्याय) (महावीर जिनस्तुति ।)- अनन्तज्ञान, अनन्तदर्शन, अनन्तसुख और अनन्तशक्ति आदि अनन्तगुण धारण किये हुए महावीर जिनेश्वरको नमस्कार कर गुणोंसे प्रगट हुए चारित्रको मैं सक्षेपसे कहता हूँ ॥ १॥ विशेप स्पष्टीकरण-चारित्र-मोहकर्मके क्षयोपशमसे अथवा उपशमसे किंवा क्षयसे जो आचरा जाता है उसे चारित्र कहते हैं । अथवा जो सदाचार पाला जाता है उसे चारित्र कहते हैं। संसारके कारण मिथ्यादर्शन, अविरति, प्रमाद, कषाय और योग है । उनका नाश करनेके लिये उद्यत हुए अथवा ससारके कारण भूत-ज्ञानावरणादि आठ काँका नाश करनेके लिये उद्यत हुए ज्ञानवान् सम्यग्दृष्टिके वाचिक, कायिक और मानसिक क्रियाविशेषोका अभाव होना परमचारित्र है, यथाख्यात-चारित्र है । क्रियाओका पूर्ण अभाव वीतरागोमे होता है। उसे यथाख्यातचारित्र कहते है और सयतादिकसे सूक्ष्म सापरायतक जो क्रियाओका अभाव होता है, वह कम जादा होता है। पाचवे सयतासयत गुणस्थानमे कुछ अविरतिरूप क्रियाओका अभाव होता है अर्थात् वहा देशविरती होती है । इसके अनतर प्रमत्तसयतमे अविरतिरूप क्रियाका पूर्ण त्याग होता है। अप्रमत्त गुणस्थानमे प्रमादरूप क्रियाका अभाव होता है, अपूर्वकरण गुणस्थानसे सूक्ष्मसापरायतक गुणस्थानोमे कपायरूपी क्रियामओका अभाव होता है और उपशातकपाय, क्षीणकषाय, सयोगकेवली और अयोगकेवलियोमे योगकाभी अभाव होता है अर्थात् सयोगकेवलि जवतक विहार करते हैं तवतक उपदेशादि क्रियारूप योग रहता है और जब विहार बद होता है, तव वचनादि क्रिया कम होते होते चौदह गुणस्थानमे योगक्रिया पूर्ण नष्ट होती है । अनतर उस अयोगकेवलि गुण- स्थानके अन्त्यसमयमे परम यथाख्यातचारित्र प्राप्त होकर मोक्षप्राप्ति होती है ॥१॥ जो आचरा जाता है अर्थात् जो सदाचार पालन किया जाता है, वह कर्मवनको नष्ट करनेके लिये अग्निकासा है । इसके पचम ज्ञानके नायकोने पाच प्रकार बताये है । वे ये है-सामा- यिक, छेदोपस्थाना, परिहारविशुद्धि, सूक्ष्मसापराय और यथाख्यातचारित्र । जैसा शुद्ध मात्माका स्वरूप आगममे कहा है वैसा यथाख्यात चारित्रमे प्राप्त होता है । इसलिये यह चारित्र शुद्ध मात्माके -- १ मा उपलाल्यते S.S.7 ५०) सिद्धान्तसार सामायिक तथा छेदोपस्थापनमुदीरितम् । परिहारविशुद्धि स्याच्चतुर्थ' सूक्ष्मसम्परम् ॥ ३ यथाख्यातं यथाख्यातपदे चानुप्रवेशकम् । चारित्रं त्रितयज्ञानकोविदा निगदन्ति तत् ॥ ४ या च हिंसानृतस्तेयाब्रह्मणस्तु परिग्रहात् । विरतिस्तद्वतं ज्ञेयं कर्तव्यकनिरूपकम् ॥ ५ प्रमत्तयोगतः प्राणिप्राणानां व्यपरोपणम् । हिंसा भवति जीवानां भवदुःखैककारणम् ॥६ त्रित्रित्रिभिश्चतुभिश्च संरम्भाद्यैः परस्परम् । अष्टोत्तरशत हिंसा भेदतो जायते नृणाम् ॥ ७ स्वरूपमे प्रवेश करनेकेलिये कारण है ऐसा अवधि, मन पर्यय और केवलज्ञानके धारक विद्वान् कहते है ।। २-४॥ (व्रतलक्षण ।)- हिंसा, असत्य भाषण, चोरी, मैथुनसेवन और परिग्रहाभिलाप इनसे विरक्त होना व्रत है । मैं इस प्रकारसे यह कार्य करूगा ऐसा जो मन संकल्प उसे व्रत कहते है । मैं हिंसासे, असत्य भाषणसे, चोरीसे, मैथुनसे और परिग्रहकी अभिलाषासे-एकदेशसे अथवा पूर्ण- रूपसे विरक्त होता है, ऐसा जो नियम-मन सकल्प करना उसे व्रत कहते है । अथवा मैं अहिंसाका पालन करूगा, सत्य वचन कहूगा, धनस्वामी जो मुझे धन देगा उसे ग्रहण करूगा, ब्रह्मचर्यका पालन करूगा और अपरिग्रहत्वका स्वीकार करूगा, इस प्रकार कर्तव्यको प्रतिज्ञा करना विध्या- त्मक व्रत है ॥ ५ ॥ - . . (हिंसाकी व्याख्या ।)- प्रमत्तयोगसे प्राणियोके प्राणोका नाश करना हिंसा है । वह जीवोको ससारदु ख देनेमे मुख्यकारण है ॥ ६ ॥ स्पष्टीकरण- जो प्रमादयुक्त है, कषायसयुक्त परिणामवाला है उसे प्रमत्त कहते है। इन्द्रियोकी क्रियाओमे सावधानता न रखता हुआ स्वच्छदसे प्रवृत्ति करनेवाला जो मनुष्य उसे प्रमत्त कहते है । अथवा जिसके मनमे कषाय बढ गये हैं, जो प्राणघातके कारणोंमे तत्पर हुआ है, परतु अहिंसामे शठतासे प्रवृत्ति दिखाता है, कपटसे अहिंसामे यत्न करता है, परमार्थरूपतासे अहिंसामे प्रयत्न जिसका नही है उसे प्रमत्त कहते हैं । अथवा चार विकथा, चार क्रोधादि कषाय, पाच स्पर्शनादि इद्रियाँ और निद्रा तथा स्नेह ये पद्रह प्रमाद है । इनसें जो युक्त है उसे प्रमत्त कहते है । ऐसे प्रमत्तं पुरुषकी जो मन, वचन और शरीरकी प्रवृत्ति उसे प्रमत्तयोग कहते है । इस प्रकारके प्रमत्तयोगसे जो प्राणियोके इद्रियादि दश प्राणोका घात करना-वियोग करना उसे हिंसा कहते है । वह ससारदुखका मुख्य कारण है ॥ ६ ॥ . । - . (हिंसाके एकसौ आठ भेद ।)- सरंभ, समारभ और आरभ इनसे मनवचनकायको गुना करनेसे नौ भेद होते है। फिर इन नौ भेदोसे कृत, कारित और अनुमोदनको गुना करनेसे १ आ सूक्ष्मपदप्रदम् .

-३. ११) सिद्धान्तसार (५१ घोरान्धकारकूपे या निरये वसति क्रमात् । यच्छत्याराधिता हिंसा नराणा दुःखहेतुका ।। ८ हिसासरित्प्रवाहातनिमग्ना येऽत्र दुधियः । ते पतन्ति भवाम्भोधी बहुदुःखसमाकुले' ॥९ यानि दुःखानि विद्यन्ते विविधासु च योनिषु । तानि सर्वाणि हिलस्य सुलभानि भवान्तरे ॥१० शिरश्च्छेदं खरारोपं कुलालकुसुमार्चनम् । हिंसको लभते दुःखमिह लोकेऽपि दारुणम् ॥ ११ . सत्ताईस भेद होते है । तथा इन सत्ताईस भेदोसे चार कपायोको गुना करनेसे एकसौ आठ भेद होते है । ये हिंसाके एकसौ आठ भेद मनुष्योको दुखदायक होते है ॥ ७॥ । स्पष्टीकरण-प्रमादयुक्त पुरुषका प्राणिहिंसामे जो प्रयत्ल करना उसे सरभ कहते हैं। हिंसाके सावनोको प्राप्त करनेको समारभ कहते है और हिंसाकार्य करनेमे प्रवृत्त होनेको आरभ कहते है । कृत-स्वय हिंसा करना, कारित-दूसरोसे हिंसा कराना, अनुमत-हिंसा करनेवालोको अनुमोदन देना । क्रोध, मान, माया लोभोको कपाय कहते है। क्रोधकृत-कायहिंसा-सरभ, मानकृत-काहिंसा-संरभ, मायाकृत-काहिंसा-सरभ, लोभकृत-काहिंसा-सरभ । क्रोधकारित-काय हिंसा-सरभ, मानकारित-काहिंसा-सरभ, मायाकारित-कायहिंसा-सरभ, लोभकारित-काहिंसा- सरभ । क्रोधानुमत-काहिंसा-सरभ, मानानुमत-काहिंसा-सरभ, मायानुमत-काहिंसा-सरभ, लोभानुमत काहिंसा-सरभ । ऐसे कार्याहसा-सरभके बारह भेद है। ऐसेही वचनद्वारा हिंसासरभके बारह भेद, तथा मनोहिंसा सरभके बारह भेद होनेसे छत्तीस भेद सरभके होते है । इस प्रकारसे छत्तीस समारंभके और छत्तीस आरभके भेद होते है । सव मिलकर एकसो आठ भेद हिंसाके होते है। ऐसेही असत्यादिक पापोकेभी एकसौ आठ, एकसौ आठ भेद होते है। इन पापोके त्यागभी एकसौ आठ, एकसौ आठ प्रकारके होते है ॥ ७ ॥ दुखका हेतु ऐसी हिंसाकी आराधना करनेसे वह हिंसा जहा घोर अधकारके कुए हैं ऐसे नरकमे मनुष्यको क्रमसे निवास करनेके लिये भेजती है ।। ८ ॥ हिंसारूप नदीके प्रवाहके वीचमे जो दुर्बुद्धि पुरुष डूब गए है वे अनेक दु खोसे भरे हुए ससारसमुद्रमे जाकर गिरते हैं ॥ ९ ॥ अनेक योनियोमे जो दुख है वे सब हिंसा करनेवाले पुरुषको अन्यजन्ममे सुलभतासे प्राप्त होते हैं ॥ १० ॥ इहलोकमेभी हिंसक मनुष्यको मस्तकच्छेदका दुख प्राप्त होता है । उसे गधेके ऊपर चढाते हैं, मट्टीके वर्तनोके टुकडे और पत्थरोसे मारते है ऐसे दुख उसे प्राप्त होते है ॥ ११ ॥ १ आ समाकुला ५२) सिद्धान्तसार (३. १२- षट्षष्टिस्तु सहस्त्राणां पत्रिंशत्षट्शतीयुता' । अन्तर्मुहूर्ततो हिने बालमृत्युः प्रजायते ॥ १२ नरकानिर्गतानां च हिस्राणां दुःखदुःखतः । सिंहव्याघ्रादितिर्यक्षु दुःखं वाचामगोचरम् ॥ १३ काकतालीययोगेन यदि मानुष्यमञ्चति । हिलस्तत्रापि तेनैव दोर्गत्यमभिगच्छति ॥ १४ काणाकुण्टस्तथा भण्टो बधिरो दुर्भगः कुणिः । क्षुद्रः सुदुर्वचा नीचः कुष्ठादिबहुरोगभाक् ॥ १५ सर्वधर्मातिगो नित्यं सर्वपापपरायणः । सर्वद्वन्द्वसमायुक्तः सर्वदुःखखनिः पुमान् ॥ १६ निरयानिर्गतो दुष्टः क्रोधशोकभयाकुलः । हिसको जायते हिनः कुधर्मफरतो भुवि ॥ १७ (हिंसक बालमृत्युसे मरता है।)- जो हिंसक है उसे छयासठ हजार छहसौ छत्तीस वार वालमृत्यु प्राप्त होते हैं। स्पष्टीकरण-विकलेन्द्रियोमे द्वीन्द्रिय लब्ध्यपर्याप्तकके अस्सीभव, श्रीन्द्रिय लब्ध्यपर्या- प्तकके साठ भव, चतुरिन्द्रिय लब्ध्यपर्याप्तकके चालीस भव और पचेन्द्रिय लब्ध्यपर्याप्तकके चौवीस तथा एकेन्द्रियोके छयासठ हजार एकसौ बत्तीस भव हिंसकको प्राप्त होते है। ये भव मिथ्यात्वसे प्राप्त होते हैं और अन्तर्मुहूर्तमे इतने मरण प्राप्त होते हैं । मिथ्यात्वसे प्राप्त होनेवाले मरणको बालमरण कहते हैं । एकेन्द्रियोके मरणोका स्पष्टीकरण इस प्रकार है-स्थूल और सूक्ष्म दोनोही प्रकारोके जो पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और साधारण और प्रत्येक वनस्पति इस प्रकार सपूर्ण ग्यारह प्रकारके लब्ध्यपर्याप्तकोमेसे प्रत्येकके छह हजार बारह मरण होते हैं। भावार्थ-स्थूल- पृथ्वी, सूक्ष्मपृथ्वी, स्थूल जल, सूक्ष्म जल, स्थूल वायु, सूक्ष्म वायु, स्थूल अग्नी, सूक्ष्म अग्नि, स्थूल साधारण, सूक्ष्म साधारण, तथा प्रत्येक वनस्पति इन ग्यारह प्रकारके लब्ध्यपर्याप्तकोमेसे प्रत्येकके छह हजार बारह मरण होते हैं। इसलिये ११ को ६०१२ से गुना करनेपर एकेन्द्रिय लब्ध्यपर्याप्तक जीवोके उत्कृष्ट मरणोका प्रमाण निकलता है ॥ १२ ॥ ( गो. जी. का गा १२२-१२४) १ हिंस्रजीव नरकमे अतितीव्र दुख भोगकर बड़े कष्टसे वहासे निकलता है, और सिंह, वाघ आदि पशुओंमे जन्म लेकर वहा वचनातीत दुखानुभव करता है ।। १३ ।। (मनुष्यगतिमेभी हिंसक दुःखी होता है।)- काकतालीय न्यायसे यदि हिंसकको मनुष्यपर्याय प्राप्त हो गया तो वहाभी दारिद्रयदुःख प्राप्त होता है । तथा वह काना, लगडा, अधा, वहरा, कुरूप, लूला, क्षुद्र, अतिशय कर्णकठोर शब्दवाला, नीच और कुष्ठादि अनेक रोगोसे पीडित होता है । वह सर्व धर्मरहित, हमेशा पापोमे तत्पर, सर्व कलह और सक्लेशोसे युक्त और सर्व दुखोकी खान उत्पन्न होती है ।। १४-१६ ॥ हिंस्र और दुष्ट प्राणी नरकसे जब निकलता है तब वहांके क्रोध, शोक, भय आदि १ मा त्रिशतीयुता २ आ निमृताना -३.२०) सिद्धान्तसार (५३ हिंसां धर्म ववनेवं हिंसा मङ्गलमुत्तमम् । हिंसा शान्तिकरा तस्य हिंसयोद्भूतदुर्मतेः ॥ १८ मूढात्मानो न जानन्ति कार्यकारणनिर्णयम् । मन्त्रपूतां बदन्त्येव हिसां सद्धर्मकारिणीम् ॥ १९ अमन्त्रपूतां पापैकहेतुभूतां वदन्त्यमी । यदि तां प्रवर्तयन्मन्त्रः पापात्मा च कथं न हि ॥ २० सस्कारोंसे भरा हुआ इस भूतलपर जन्म धारण करता है । तथा कुधर्ममे मुख्यतासे तत्पर होकर प्राणियोका यज्ञादिरूपसे घात करता है ।। १७ ।। हिंसासे जिसको दुर्बुद्धि उत्पन्न हुई है, ऐसे उस मनुष्यको कई कुवुद्धि लोग " हिंसा शाति करनेवाली है, हिंसा उत्तम मगल है, और हिंसा धर्म है " ऐसा उपदेश देते हैं ॥ १८ ॥ कितनेही मूढात्मा कार्यकारणका निर्णय नही जानते हैं और मत्रसे जव हिंसा पवित्र होती है तब वह सद्धर्मको उत्पन्न करती है " ऐसा कहते हैं । स्पष्टीकरण-कई कहते हैं, कि "जो हिंसा वेदमत्रके बिना की जाती है, वह रागादिकोका हेतु होती है और जो हिंसा वेदविहित है वह शातिके लिये है । उससे शाति मिलती है, उसमे क्रोधादिकोका उदय नही होता है ।" यह किसीका वचन अयुक्त है। क्योकि वेदमत्रसे की गई हिंसा शातिको नही उत्पन्न करती है। अन्यथा 'मातरमुपेहि स्वसारमुपेहि ' इस वेदवाक्यसे उत्पन्न हो गई मातृसमागमकी और भगिनीसमागमकी प्रवृति शातिका कारण होगी। तथा जो वेदविहित नही है ऐसे सत्पात्र कार्य दानादि शातिके प्रतिपक्ष हो जायेंगे। वेदविहित कार्य परम्परासे शाति करनेवाले हैं यह कहनाभी योग्य नही है । वेदविहित हिंसा परम्परासेभी शाति हेतु नही होती है । जो शाति चाहते हैं, वे गातिके प्रतिकूल हिंसादिकोमे प्रवृत्त होगे तो वे विद्वान् कैसे कहलावेगे? इससे तो मदके नाशार्थ मदिरापानमे लोग प्रवृत्ति करेगे ॥ १८ ॥ (युक्त्यनुशासन श्लो. ३८) " सत्पात्रदान, देवतार्चनादि कार्योंमे जो सूक्ष्म जीवोंका नाश होता है, वह परम्परासे शातिका कारण होता है क्योकि वह संकल्प करके नही किया जाता हैं। उसमे दर्शन-विशुद्धि और परिग्रहपरित्यागकी प्रधानता है। इसलिये वह शातिहेतु होता है । चैत्यालय बंधवाना, शिल्प- कारसे जिनप्रतिमा करवाना आदिकमे प्रमत्तयोग होनेसे प्राणिहिंसा होती है ऐसा समझना अयोग्य है। चैत्यालय जिनप्रतिमादिक कार्य करनेमे प्रमत्तयोग नहीं है, क्योकि वह कार्य सम्यक्त्ववर्धन करनेवाला है। अत पाप कारणभी नहीं है " ॥ १९ ।। (युक्त्यनुशासन श्लो. ३८ की टीका) जो हिंसा मत्रसे पवित्र नही है वह मुख्यतासे पापकाही कारण है ऐसे याज्ञिक लोग कहते हैं । आचार्य इसका इस प्रकार खण्डन करते है- “यदि मत्र हिंसाको कहता है तो पशुवध करनेवाला वह मंत्र पापात्मा क्यो नही है ? अर्थात् हिंसाको करनेवाला मत्रभी पापमत्रही समझना १ या वदत्येव २ आ हिमोद्भूतमुदुर्भते ३ आ वदन्त्येके ४ आ प्रवर्तयनेष मन्त्र ५४) सिद्धान्तंसार पापहेतुर्मता हिंसा पापमेव करोति सा। न कोद्रवकणः क्वापि गन्वशालिर्भवेद् भुवि ॥२१ देवातिथिगुरूणां च कृते या क्रियते बुधः । हिंसा च हिंस्रदोषस्य फलमाहुस्तदप्यमी ॥ २२ प्रेक्षावन्तस्ततो हिंसा हेयतन्त्रमिदं त्रिधा । वर्जयन्ति जिनाधीशशासनाज्ञाप्रयत्नतः ।। २३ अहिंसालक्षणो धर्मः सर्वशर्मकरो नृणाम् । कथं नि.सारदेहेन कर्तव्यो न मनीषिभीः ॥ २४ अहिंसव ब्रतं पूतमेकमेवेदमुच्चकैः । अपराणि व्रतान्यस्य परिपालनहेतुतः ॥ २५ भवहानिकराः पञ्च भावनाश्चास्य' निर्मला. । भावनीया महाभव्यताराधनंतत्परः ॥ २६ मुखेऽनन्तानि मे सन्ति वचांसि विविधान्यपि । इति मत्वा न यो वक्ति वचसो गुप्तिमश्नुते ॥२७ कृत्याकृत्यविदो धीराः कृत्याकृत्यपरायणम् । पथ्यं तथ्यं वदन्त्येव वचोगुप्ति समाश्रिताः ॥२८ वचोव्यापारजाः सन्ति दोषा हिंसाकरा नृणाम् । वारगुप्तिभावनायुक्तेन ते सन्ति कदाचन ।।२९ चाहिये । हिंसा पापका कारण होनेसे वह पापको उत्पन्न करेगीही। कोद्रव धान्यका कण जमीनमे बोनेसे क्या वह सुगधितगालि घान्यल्प-उत्पन्न होगा? कदापि नही" ।। २०-२१ ॥ देवके लिये अर्थात् देवको सतुष्ट करनेके लिये, अतिथिको तृप्त करनेके लिये और गुरुको प्रसन्न करनेके लिये मूर्खलोगोसे जो प्राणिवध किया जाता है सुजजन उसे हिंसादोषका फलही समझते हैं ।। २२ ।। जिनेश्वरकी शासनाज्ञामें प्रयत्न होनेसे बुद्धिमान लोग हिंसाको हेयकर्म समझकर मन, वचन और कायसे त्यागते हैं ।। २३ ॥ (अहिंसाका महत्त्व ।)- यह अहिंसालक्षण धर्म मनुष्योको सर्व प्रकारके मुख देता है, ऐसा समझकर विद्वान् लोगोसे अपने निस्सार देहद्वारा यह व्रत क्यो नही किया जाता है? वाकीके सत्यादि व्रत इसके परिपालनके लिये होनेसे अहिंसाही वडा पवित्र एकही व्रत है ।। २४-२५ ॥ (अहिंसावतकी पाच भावनाये ।)- इस अहिंसावतकी निर्मल पाच भावनाये ससार- हानि करनेवाली हैं। इस व्रतकी आराधना-करनेमे तत्पर महाभत्र्योके द्वारा ये भावना चिंतन करने योग्य हैं ।। २६ ॥ मेरे मुखमे अनंत वचन हैं, और नाना प्रकारकेभी है ऐसा समझकर जो नही बोलता है वह वचनकी गुप्तिको प्राप्त होता है ।। २७ ॥ (वचनगुप्ति)- जो कार्य अकार्यको जानते हैं, और जो धीर है वे वचनगुप्तिको प्राप्त होकर हितकर ऐसाही सत्यवचन वोलते हैं । वचन बोलनेकी क्रियाते मनृप्योकी हिंसा उत्पन्न करनेवाले दोष लगते हैं । परन्तु वाग्गुप्तिकी भावनासे जो विद्वान् व्रतिक है उन्हें उन दोषोंका सपर्क नहीं होता ।। २८-२९ ।। - ----- १ मा शालिभवो २ आ अस्य ३ मा. स च वागुति ४ आ वाग्गुतिमाश्रिता ३-३६) सिद्धान्तसार (५५ मन एव मनुष्याणां व्यापारान्कुरुते बहून् । अत एव प्रयत्नेन मनोगुप्तिविधीयते ॥ ३० व्रतानितस्य तिष्ठन्ति तस्य सौख्य निरन्तरम् । सम्पदो विविधास्तस्य मनो यस्य'हि निश्चलम् ॥३१ प्रमादातिगतो नित्यं सयमानविराधयन् । पश्यन्यो याति सर्वत्र स होर्यापथगुप्तिमान् ॥३२ मुञ्चत्यादाति यो नित्य वस्तुजातमतन्द्रितः । निरीक्षयन्प्रयत्नेन समितः स मतः सताम् ।। ३३ अन्नपानविधे. शुद्धि विदधत्स्वीकरोति य. । अन्नपानादिकं तस्य समितिश्चेषणाभिधा ॥ ३४ इत्थं पञ्चप्रकाराभिर्भावनाभि प्रभावितम् । अहिंसादिवतं पूतमनन्तसुखद भवेत् ॥ ३५ वदन्त्यज्ञानिनो दुष्ट यनयापगतं वच । अनुत तद्विजानन्ति ऋतवाक्यविचक्षणाः ॥ ३६ ( मनोगुप्ति। )- मनुप्योका मनही नानाविध विचार करता है । इसवास्ते प्रयत्नसे मनोगुप्ति की जाती है। मनको अपने अधिकारमे रखनेमे महान् प्रयत्न करना पडता हैं। जिसका मन निश्चल है अर्थात् स्वाधीन है उसके व्रत स्थिर होते हैं और उसे निरन्तर सौख्य मिलता है। अनेकविध सम्पदायेभी उसे प्राप्त होती है ।। ३०-३१ ॥ ( ईर्यापथपालन । )-प्रमादका उल्लघन कर अर्थात् सावधानतासे सयमकी विराधना न करता हुआ जो मुनि अथवा त्यागी गृहस्थ-ऐलक, क्षुल्लक आदि व्रतिक गृहस्थ मार्गकी देख- भाल करके हमेशा सर्वत्र गमन करता है वह ईर्यापथ-गुप्तिका धारक समझना चाहिये ॥ ३२ ॥ ( आदान-निक्षेपण-समिति। )- जो आलस्य-रहित होकर और प्रयत्लसे देखकर हमेशा पिंछी, कमडलु, शास्त्र आदि वस्तु रखता है अथवा ग्रहण करता है वह समितियुक्त महात्मा सज्जनोसे पूज्य होता है ॥ ३३ ॥ ( आलोकित-पानभोजन । )- खानेके पदार्थ रोटी, दालभात, आदि और पीनेके पदार्थ जल, दूध आदि इनकी शुद्धि करता हुआ जो उनका स्वीकार करता है उसकी एषणा नामक समिति होती है ॥ ३४ ॥ इस प्रकारसे पाच भावनाओसे प्रभावयुक्त हुआ यह पवित्र अहिंसावत अनत सुख देनेवाला होता है ॥ ३५ ॥ ( असत्यवचनका लक्षण और उसके भेद ।)- जो अज्ञानी लोग हैं, वे पुण्य और पाप- सवधी दुष्ट बचन बोलते है । उसको सत्य बोलनेमे चतुर पुरुष अनृतभाषण-असत्य-भाषण समझते हैं। जो भाषण ऋत भापणसे-सत्य भाषणसे दूर है उसको अनृत कहते है । ऐसी अनृत शब्दकी व्युत्पत्ति है । वह अनृतभापण चार प्रकारका है अर्थात् प्राणियोसे-मनुष्योसे चार प्रकारका असत्य भापण बोला जाता है और वह पापरूपी वृक्षका बड़ा भारी मूल है ॥ ३६-३७ ॥ ३ - १ आ यस्येह २ मा वीर्या ३ आ चपणादिका

५६)
सिद्धान्तसार
(३ ३७-
ऋतादपगतं तावदनृतं तद्वयुत्पत्तितः । चतुर्षा जायते जन्तोर्मूलं पापतरोमहत् ॥ ३७
युक्तायुक्तविमूढानां नित्यायेकान्तवाविनाम् । असदुद्भावनं निन्धमाचं ह्यनृतमादिशेत् ॥ ३८
संवृत्त्येव भवन्त्येते भावाः सर्वे निराश्रयाः । यद्वदन्ति तदेव स्याद्वितीयं सदपह्नवम् ॥ ३९
सावधाप्रियगादि निन्धं त्रेधा मतं जिनः । असत्यं वचनं घोरं श्वभ्रभूमिप्रवेशकम् ॥ ४०
विपरीतमिदं तावत्तृतीयमनृतं मतम् । केवली कवलं भुङक्ते स्त्रीमोक्षादि वदन्ति तत् ॥ ४१
---
( असदुद्भावन नामक पहिला असत्य वचन । )- आत्मा ज्ञानादिगुणोसे मुक्त-रहित
कभीभी नही होता है, परतु वह उनसे मुक्त-रहित है ऐसा कहना । आत्मा काँसे रहित होकर
मुक्त दशाको धारण करता है । परतु वह सदा संसारी रहता है ऐसा मीमांसक कहते है अर्थात्
मुक्त-अमुक्त आदि भेदोको न जाननेवाले जो नित्यादि एकान्तवादी लोग हैं, वे असदुद्भावन
नामका पहिला निन्द्य भाषण बोलते हैं ऐसा समझना चाहिये । अर्थात् वस्तु सर्वथा नित्य नही
होनेपरभी उसे नित्यही कहना । सर्वथा अनित्य वस्तु नही है, तो भी उसे अनित्यही समझना
अर्थात् जो वस्तुका स्वरूप नहीं वह है ऐसा समझना, उसे प्रगट करना यह पहिला असदुद्भावन
नामक निंद्य असत्य वचन है ॥ ३८ ॥
( सदपह्नव-नामक असत्य-भाषण।)- ये सब घटपटादि पदार्थ संवृतिसे हैं-मायासे हैं,
वास्तविक नही हैं। इनका कुछ आश्रय नही है । जैसे स्वप्नमे हाथी, घोडा आदिक अनेक पदार्थ
हम देखते है, परतु उस समय हमारे सामने वे पदार्थ वास्तविक नही रहते हैं, इसवास्ते जागृति-
समयमेभी ये पदार्थ नहीं हैं, ऐसा जो प्रतिपादन करना वह सदपह्नव है। अर्थात् पदार्थोंका
अस्तित्व होनेपरभी वे नही है, ऐसा युक्त्याभासोके द्वारा दिखाना यह दूसरा 'सदपह्नव' नामक
असत्य भाषण है। भावार्थ-स्वप्नमेभी जिसका अनुभव आता है वह पदार्थ जागृत अवस्थामे
अनुभवमे आया था । इसलिये उसे असत्य नही कह सकते। तथा पदार्थ यदि नही होते तो
आघात, प्रत्याघात आदिक अर्थक्रिया और उससे होनेवाले सुखदुःखादिकोके अनुभव सबको
माननेही पडते हैं, क्योकि वे वास्तविक है। किसी समय हमारा कोई अनुभव मिथ्या हो जानेसे
सव प्रकारके अनुभव जैसे मिथ्या मानना अयुक्त हैं वैसेहि कोई पदार्थ असत्य होनेपरभी सब
पदार्थ सवृति-असत्य मानना युक्तिके विरुद्ध है ॥ ३९ ॥
(विपरीत नामक असत्य भाषण।)- विपरीत नामका तीसरा असत्य भाषण है।
उसका उदाहरण केवली भगवान हमारे समान अन्न सेवन करते है, तथा स्त्रीको मोक्ष प्राप्त
होता है इत्यादि बाते कहना यह विपरीत नामक तीसरा असत्य भाषण है। ( केवली-कवलाहार
और स्त्रीमोक्ष इन विषयोका ग्रथकारने स्वय विस्तारसे आगे खंडन किया है ) अत. यहां इसका
केवल नामनिर्देश ग्रथकारने किया है ॥ ४० ॥

-३ ४९) सिद्धान्तसार (५७ १ हिंसाद्यनर्थमूलानामारम्भाणा प्रवर्तकम् । सहावद्येन यद्वाक्य तत्सावद्यमुदीरितम् ॥ ४२ क्रोधादिगर्भित निन्द्य विधुर' वैरकारणम् । तदप्रिय वचोऽवाचि दुर्गदुर्गतिदायकम् ॥ ४३ भिनत्ति परमर्माणि सर्वस्वहरणादिभिः । तद्वचो गर्हामाख्यान्ति गर्झदुःखप्रद जिनाः ॥ ४४ हित मितं क्रियायुक्त सर्वसत्वसुखावहम् । मधुर वत्सल वाक्य वक्तव्यं धर्मवत्सलः ॥ ४५ चतुर्विधमिदं निन्द्यमसत्य सेवितं नृणाम् । चतुर्गतिमहादुःखवृक्षकक्षप्ररोहणम् ॥ ४६ अविश्वासकर निन्दापदमडगुलिदर्शकम् । इह लोकेऽपि दौर्भाग्यशोकसन्तापकारकम् ॥ ४७ सत्यं तदुदितं प्राजर्यदादेयमहिंसकम् । तथा तद्वदतामत्र किमसाध्यममुत्र वा ॥ ४८ स्वयमेव समायान्ति सम्पद सत्यवादिनाम् । किं चित्र यद्यदायान्ति हस्य. पद्माकर वनम् ॥ ४९ जिनेश्वरोने सावध, अप्रिय और गादि निन्द्य भाषणके तीन भेद कहे हैं। यह घोर असत्य भाषण नरकभूमिमे जीवका प्रवेश करनेमे कारण होता है ॥ ४१ ॥ (सावद्यादि-वचनोका-वर्णन ।)- हिंसादि अनर्थोंका-सकटोका जो मूल कारण है और जीव-धात जिनमे होता है ऐसे सेवा, कृषि, व्यापार आदि आरभोको उत्पन्न करनेवाला जो पाप- सहित वाक्य वोला जाता है, उसे सावधवचन नामक असत्य भाषण कहते है । क्रोध जिसके आदिमे है, ऐसा भाषण अर्थात् क्रोधसे आखे लाल करके बोलना, गर्वसे दूसरोको नीच-तुच्छ समझकर अपमानकारक भाषण बोलना निंदायुक्त वचन, सकट उत्पन्न करनेवाला भाषण और वैरजनक भापण इन भाषणोको अप्रिय भाषण कहते है । यह भाषण कष्टयुक्त दुर्गति देनेवाला है । जिस भाषणसे दूसरोका मर्मछेद होता है, दूसरोके सर्वस्वका हरण हो जाता है, जो चुगलीका कारण है, उसे जिनेश्वर गीभाषण कहते हैं । यह भाषण गद्य-निन्दनीय दु खोको देनेवाला हैं ॥ ४२-४४ ।। (धर्मप्रेमी लोगोका भाषण ।)- हितकर, मित-अल्प, सदाचारप्रयुक्त, सर्व प्राणियोको सौख्य देनेवाला, मधुर और प्रेमयुक्त ऐसा भाषण धर्मप्रेमियो द्वारा बोला जाना योग्य है ॥४५॥ ऊपर जो असत्यके चार प्रकार कहे है वे निंद्य है । उनका सेवन जिन मनुष्योने किया है, उन्हे वे नरकादि चतुर्गतिके महादु खरूपी वृक्षवनको उत्पन्न करनेके कारण हैं । ऐसे वचन अविश्वास उत्पन्न करते है, निन्दाके कारण है ' यह आदमी असत्य बोलनेवाला है' ऐसा अगुलीसे लोग उसे दिखाते है । इहलोकमेभी दुर्भाग्य, शोक और सन्तापको वे उत्पन्न करते है ।।४६-४७॥ (सत्यभाषण और उसका फल)- विद्वानोने उसको सत्यभाषण कहा है, जो सज्जन- ग्राह्य-मान्य है और हिंसासे रहित है । ऐसा भाषण बोलनेवाले पुरुषको इहलोकमे और परलोकमे क्या असाव्य है? सत्यवादियोके पास सपत्ति विना बुलाये स्वय प्राप्त होती है। हसिनिया कमलवनको F १ आ निष्ठुरम् २ आ. प्ररोहकम् ३ आ सत्यवादिनम् ४ आ वरम् ५८) सिद्धान्तसारः (३.५०- - महाव्रतमिदं पूतं कर्मानदनिरोधकम् । कर्मान्न निल्धानाः प्रयताशु महाधियः ।। ५० कोलोनसुनील्वहात्यसावधभाषणः । प्रत्याल्यानं मताःपञ्च भावना नृतस्य च ॥ ५१ अदत्तादानमाल्यातं स्नेयं स्यविजितः । तयावृत्तिर्मतं पूतमस्तेयवतनुत्तमैः ।। ५२ क्षेत्रे ग्रामे गृहे घोषे रच्यायां यत्र तत्र वा । भ्रष्टं नष्टं स्थितं वापि परद्रव्यं न गृह्यते ॥ ५३ यो यत्त्य हरते वित्तं स तज्जीवितहानरः । बहिरङ्ग हि लोकानां नीवितं वित्तमुच्यते ॥ ५४ धनतीवितयोर्मध्ये धनं बहुमतं नृणान् । जीवितव्यत्ययेनापि तदिन्छन्त्यन्यथा कयन् ।। ५५ मातरं पितरं वापि स्त्रियं वालं तपस्विनन् । स्तनो निहन्ति पापात्मान तन्मारपरो भूवि॥५६ व्याघ्रादिभ्योऽपि पापी त्याच्चौरोव्यानादयो यतः। महातप.प्रवृत्तानामपि प्राणनलिम्लुचः।। ५७ । प्राप्त होती है इसमे कौनसा आश्चर्य है ? यह सत्यवचन महावत है. पवित्र है, अमुनकर्मावको रोन्नेगला है। जिन्हें अपने कर्मात्रको रोकना है, दे महाबुद्धिवान् लोग इसका नीश यात्रय करें।।। ४८-४९-५० ।। (सत्यक-नावना।)- मोक्का त्याग करना, लोभका गग करना, नका त्या करना, हात्या त्याग करना तथा बवद्य भाषणा त्याग करना ऐनी पत्र भावनायें सत्यव्रतकी हैं ॥५॥ ( अत्रौर्यन्तका लनन।)-ओरीना त्याग करनेगले उत्तम पुरुषोंने दुसरेका दिया हुला जो उतन्त्रादिक ग्रहण करना वह चौर्य है, ऐसा कहा है । तथा उस व्यावृत्त होना नर्यात दिना दिये नादिना रहा नहीं करना कह पवित्र अर्यस्त है ऐना श्रेष्ठ गणवर परमेप्ीने कहा है ॥५२॥ तेतमें, गांवमें. घर कोषमें-अहीरोने ग्राम, मार्गने, आँगन और जहां कहीनी गिरा हुला, नष्ट हुला बयग स्यानस्थित ऐसा पद्धन्य है उसे नहीं लेना चाहिये। ऐसा परस्नामिक धन लेना चोरी है ॥५॥ (धन बहिरंग प्रान है।)-जो जितना वन हरण करता है, वह उसका जीवितहरन करता है, ऐसा समझना चाहिये । क्योकि वन लोगोंका बहिरंग प्राण न्हा जाता है॥५४॥ ( वन प्राणोसनी प्रिय है।)- वन और जीवित इन दोनोंमले वन मनुष्यों को अत्यंत प्रिय है। यदि वह ऐसा नहीं होता तो लोग प्रणाने व्यसेमी उसे क्यो चाहते हैं? ॥५५॥ (चोरसे अधिक पापी कोई नहीं हैं। )-चौर मातापिताकोभी मारता है। स्त्रीको, बालकगो और वीनोनी मारता है । इसलिये इस जगतमें गेरसे अधिक पापी आत्मा कोई नहीं ॥५६॥ व्याघ, सिंह आदिकोभी चोर पापी हैं क्योंकि वे व्याघ्रादिक हिंसक प्राणी महातपमें प्रवृत्त हुए तपस्वी जनाने प्राणोंना हल नहीं करते ॥५॥ ----- १ का.निल्यम् २. बा.यन्ति ३. नुनहाधिय. .

-३ ६३) सिद्धान्तसार ( ५९ बन्धनं ताडन कृतेरुत्कर्तनमतीव्यथाम् । इहैव लभते चौरो मृतो याति तम प्रभाम् ।। ५८ तृणमात्रमपि द्रव्य परकीय हृत नृणाम् । बहुदुःखप्रद लोके कालकूटविषाशनात् ॥ ५९ इति मत्वा महादोषमस्तेयव्रतधारिणः । सन्तो धर्मरता नित्य भवन्ति भवभीरव. ॥ ६० शून्यागारविमुक्तकवासी धर्माविसङ्गतिः । परस्यानुपरोधत्व भक्ष्यशुद्धिरिति ध्रुवम् ॥ ६१ भावना पञ्च भव्यास्ता अस्तेयवतमाश्रिता । भावनीया प्रयत्नेन भवस्यान्तमियासुभिः ॥६२ पापात्मनो वदन्त्येके फर्मनोकर्मसंग्रहात् । अदत्तवतभङ्गोऽपि जायते न कथ सताम् ॥ ६३ (चोरको इहपरलोक दुखदायक है। )- इस लोकमे चोर वन्धन, ताडन और शरीरका चर्म निकालना आदिक अतिशय दुखको प्राप्त होता है और मरणोत्तर वह तम प्रभा नरकमे जन्म धारण करता है ।।५८।। तृणके समान तुच्छ ऐसा थोडासाभी परकीय द्रव्य हरण करना लोगोको कालकूट विपके भक्षण करनेसेभी अधिक दुख देनेवाला है। इस प्रकार चोरी करनेमे महादोप है ऐसा समझकर अचौर्यव्रत धारण करनेवाले तथा ससारसे डरनेवाले सज्जन धर्ममे नित्य तत्पर रहते है ।५९-६०॥ (अचौर्यव्रतकी पाच भावनाये ।)- शून्यागारावास, विमोचितावास, धर्माविसगति-सद्धर्म- अविसवाद, परोपरोध न करना, भक्ष्यशुद्धि ऐसी अ पाच भावनाये अचौर्य व्रतकी हैं। अचौर्यवत- सवधी ये पाच भव्य भावनाये भावने योग्य है। ससारके अतके प्रति जानेकी इच्छा करनेवालोके द्वारा प्रयत्लसे इनकी भावना करना योग्य है। इन पाच भावनाओका स्पष्टीकरण-पर्वतगुहा, वर्षकी पोल, नदीतट इत्यादिक स्थान अस्वामिक होनेसे इनको शून्यागार कहते है। ऐसे स्थानमे रहनेसे अचौर्यव्रतका पालन होता है। शत्रुके भयसे छोडे हुए गाव, नगर, पत्तनादिको विमुक्तकवास अथवा विमोचितावास कहते हैं, ऐसे स्थानोमे रहना । यह मेरा है, यह आपका है, ऐसा साधर्मियोके साथ झगडा नही करना। परके साथ हठ न करना। अमुक वस्तु मुझे चाहिये ऐसी प्रार्थनासे अन्यको मकुचित नही करना चाहिये। और भिक्षाकी शुद्धि रखना चाहिये अर्थात् पिण्डशुद्धिके प्रकरणमे जो दोष कहे हैं, उनका परिहार-त्याग करके आहार लेना। आहारमे लपटता होनेसे उसकी शुद्धिके प्रति अनादर होता है, जिससे दोषोको त्याग करनेकी जिनाज्ञाका लघन होनेसे चौर्यदोष उत्पन्न होता है ।।६१-६२॥ (कर्म-नोकर्मग्रहणभी चोरी है ऐसी शकाका उत्तर)- कोई पापी लोग ऐसा कहते हैं- 'सज्जन लोग-मुनिवर्ग पुण्यकर्म और उसके सहायक शरीरादि नोकर्मको ग्रहण करते है अर्थात् नही दिया हुवा कर्म-नोकर्म ग्रहण करनेसे वे चौर्यदोषके पात्र होते हैं । तव उनके अदत्तव्रत-अचौर्यव्रतका -- १ आ. यथा २ आ यिमुक्तकावासो ३ आ भव्याना ।

६०) सिद्धान्तसार (३. ६४- नैष दोषो मतः साधो नादानाद्यभावतः । अन्तरायक्षयादेतत्स्वयमेव प्रजायते ॥ ६४ शून्यागारपुरग्रामसंग्रहाद्भङ्ग त्यपि । मिथ्याप्रमत्तयोगेन यतोऽमीषां परिग्रहः ॥ ६५ हिंसादीनि च पापाय संगतानि प्रमादिनाम् । अप्रमादवतां नापि तन्नामापि निगद्यते ॥ ६६ अत एव विशोध्यादौ मिथ्यात्वं शुद्धवुद्धयः। परिहारविशुद्धयर्थ सन्तो गृहन्ति तद्वतम् ।।६७ ब्रह्मचर्य बुधाः प्राहुर्यच्च मैथुनवर्जनम् । नवघा धर्मविज्ञानां मुनीनां परम तप. ॥ ६८ विनाश कैसे नही होगा?' उत्तर- 'यह दोष नहीं है, क्योकि कर्म और नोकर्मोमे धनवस्त्रादिके समान देने-लेनेका व्यवहार नही है। साधुओंके अन्तरायकर्मका क्षय और क्षयोपमग होनेसे कर्म नोकर्मका संग्रह स्वय होता है, उनमे देने-लेनेका व्यवहार नही होता। उनका प्रतिसमय आत्मामे आना जाना होता है। इसलिये चोरीका दोष साधुओको नहीं लगता। अन्तरायकर्मका क्षयोपशम साधुओको होता है। और केवली भगवानको तेरहवे गुणस्थानमे अन्तरायकर्मका क्षय होता है, जिससे अनन्त भोग उपभोगादि सामग्री स्वय प्राप्त होती है। मुनियोंको तपश्चरणसे ऋद्धियां प्राप्त होती है। तोभी वे निस्पृह होनेसे उनको अचौर्यव्रत स्वय प्राप्त होता है ॥६३-६४॥ (पुन गका और परिहार)- 'भिक्षु-मुनि जव शून्यागारमे गावमे अथवा नगर आदिकमे भ्रमण करते है तव मार्गसे उनको जाना पड़ता है। किसी श्रावकके गृहद्वारमेभी वे जाते है। मार्ग अथवा श्रावकका गृहद्वार वास्तविक अदत्त है। राजाने मार्गमे प्रवेश करनेके लिये उनको आजा नही दी है और श्रावकने गृहद्वारके भीतर प्रवेश करो ऐसा नही कहा है, तोभी वे प्रवेश करते हैं। अत यह अदत्तादान हुआ- 'अचौर्यव्रतका भंग हुआ' ऐसा नही समझना। क्योकि सामान्यत सव लोगोको मार्गमे प्रवेश करना और श्रावकद्वारमे आहारार्थ प्रवेश करना मना नही है। प्रमत्तयोगसे इनमे प्रवेश किया जाना, कपायवश, लोभवश इनमे प्रवेश करना या इनका स्वीकार करना व्रतभंगका कारण होता है। प्रमादी लोगोके हिंसादिक कार्य पापके कारण होते हैं । परतु जो प्रमादरहित है, उन साधुजनोमे पापनामकाभी सपर्क नही हैं। साधुजन प्रमादयोगसे रहित होनेसे मार्ग या गृहद्वारका आश्रय करनेपरभी अचौर्यव्रतभगसे या तज्जनित पापसे वे लिप्त नही होते ।।६५-६६॥ - इसलिये शुद्धवुद्धिवाले सम्यग्दृष्टिजन मिथ्यात्वको गोधते हैं-दूर करते हैं और पापके परिहारार्थ तथा परिणामकी निर्मलताके लिये साधुगण अचौर्यव्रतको धारण करते है ।।६७।। ब्रह्मचर्यव्रतलक्षण । )- धर्मही धन जिनका है, ऐसे मुनि नौप्रकारसे मैथुनका त्याग करते है। इस त्यागको विद्वान लोग ब्रह्मचर्य कहते हैं। यह व्रत मुनियोका उत्तम तप है । मैथुन सेवन मनसे नही करना, नही करवाना और करनेवालोंको अनुमति नहीं देना। तथा वचनसे मैथुनसेवनके अश्लील शब्द नही बोलना, नही बुलवाना और बोलनेवालेको अनुमति नहीं देना।

-३ ७४) सिद्धान्तसार (६१ समस्तसंयमाचारः स एवाभिमत. सताम् । यस्यास्ति निर्मलं लोके ब्रह्मचर्य पर तप. ॥ ६९ रामाचक्षु क्षुरप्रेण क्षिप्र दुर्गतिदायिना । भिद्यते यस्य नो चेतः स धन्यतम ईरितः ॥७० यो दधाति नरः प्राज्ञश्चतुर्थव्रतमुत्तमम् । सोऽश्नुते सुभग. सौम्यः सिद्धिसौख्य चतुर्विधम् ॥ ७१ तमोमयी महाभीमा शुद्धमार्गापहारिणी । रामारात्रिस्त्रिधा त्याज्या दुष्टसत्वसुखावहा ॥ ७२ त्रावि' दुर्गन्धवीभत्स कृमिजालसमाकुलम् । रामाकलेवरं मूढा. सेवन्ते शुनका इव ।। ७३ नीचर्गच्छति या नित्य तटद्वयनिपातिनी । रामासरिद्भवाम्भोधिवर्द्धनी वय॑ते बुधः ॥ ७४ शरीरसे मैथुनसेवन नही करना, नहीं करवाना और मैथुन सेवनवालोको अनुमति न देना । इस- प्रकार नवधा मैथुनत्याग मुनिगण करते हैं ।। ६८॥ ब्रह्मचर्य उत्तम तप है । जगतमे जिस पुरुषने इस व्रतका निर्मल पालन किया है वह पुरुप सपूर्ण सयमोका आधार समझना चाहिये तथा वही सज्जनोको मान्य है ॥ ६९ ।। ( अत्यत धन्यवादका पात्र कौन है ? )- शीघ्र दुर्गति देनेवाली स्त्रीके नेत्ररुपी वाणसे जिसका मन भिन्न नही हुआ है, वह पुरुष अतिशय धन्य है, धन्यवादके लिये पात्र है ।। ७०॥ जो वुद्धिमान पुरुष इस ब्रह्मचर्य नामक उत्तम चतुर्थव्रतका पालन करता है, वही सुभग- सुदर है और वही सौम्य-गात है तथा वही चार प्रकारके मुक्तिसुखोका अनुभव लेता है। अन्योको ऐसा सुख कदापि नही मिलेगा । अनतज्ञान, अनतदर्शन, अनतसुख और अनन्तशक्ति इनको चार प्रकारका मुक्तिसुख कहते है ।। ७१ ।। (स्त्री रात्रि और नदीके समान है । )- यह रामारात्रि-स्त्रीरूपरात्रि अधकारमय है अर्थात् अज्ञानमय है । ज्ञानीभी उसके सगसे अज्ञानी मोही होते हैं । रात्रि महाभय उत्पन्न करती हैं । स्त्रीभी भयदायक है । उसका अभिलाष करनेवालोपर अनेक सकट आते हैं, इसका सवको प्रत्यक्ष अनुभव आता है । शुद्ध मार्ग अधकारमय रात्रिसे आछादित होता है । तथा स्त्रीरूपी रात्रिभी मोक्षमार्ग, जो कि अत्यत निर्दोष होनेसे शुद्ध है, उसको आच्छादित करती है। स्त्रीका ससर्ग करनेसे मन मोहान्धकारमय होता है, जिससे शुद्ध मोक्षमार्ग विलकुल दिखताही नहीं। अंधकारमय रात्रि दुष्ट सर्प और चोर आदिकोसे भरी रहती है, उनको वह सुखदायक होती है। यह स्त्रीरूपी रात्रिभी दुष्टजारादिकोको सुख देनेवाली है, सज्जनोको भयदायिनी है । अत. इसे भनवचनकायोसे त्यागना योग्य है ।। ७२ ॥ स्त्रीका शरीर मलवाही, दुर्गंध और वीभत्स - ग्लानि उत्पन्न करनेवाला तथा असख्यात किडियोसे भरा हुआ है । मूढ पुरुप ऐसे स्त्रीशरीरका सेवन कुत्तेके समान करते हैं ॥ ७३ ।। यह स्त्रीरूपी नदी नीच पुरुषका आश्रय करती है। जैसे नदी हमेशा नीच स्थानमे रहनेवाले समुद्रका आश्रय करती है। नदी जैसे अपने दोनो तटोको विदीर्ण करती हुई पानीके -- १ आ सवद् ६२) सिद्धान्तसार (3. ७५- यस्या दर्शनमात्रेण नरः पञ्चत्वमञ्चति । सर्पिणीव सतां रामा हेया दृष्टिविपा न किम् ॥७५ वह्निबालेद या दुप्टा स्पृष्टा दहति मानवम् । समुज्ज्वलापि सा हेयावला बलविनाशिनी ॥ ७६ अपि काष्ठमयं रूपं यस्या हरति तत्क्षणात् । संयमस्तिमित चेतो मुनेरप्यचलं वलात् ॥ ७७ तावद्विवेकवदग्ध्यं नरो वहति बुद्धिमान् । यावद्विलासिनी दृष्टिगरपातैन हन्यते ॥ ७८ अहो दुष्टागया रामा रमणीयमपि प्रियम् । परिहत्यापरं याति निस्त्रपा दुष्टचेष्टिता ।। ७९ यस्यामधिगता जोवा महापापानि कुर्वते । आत्मबन्यवधादीनि सद्भिस्त्याज्या त्रिधापि स॥ ८० इति दोपवती नारी नरो यो नैव मुञ्चति । नैव मुञ्चति सोऽवश्यं संसारं शर्मवजितम् ॥ ८१ स कृती कृतिनां नायस्तस्य सौख्यं निरन्तरम् । यः पुनाति परात्मानं स ब्रह्मतपसा सुवीः॥ ८२ - देगने वहती है वैसे त्रीभी कामाकुल होकर पतिकुल और पितृकुलका नाग करती है। नदी समुद्रको बढ़ाती है और नी मसारसमुद्रको वढानेवाली है । इसलिये विद्वान् उसका त्याग करने है ।। ७४ ।। जैसे दृष्टिविषा सर्पिणी क्रोवसे जिसको देखती है वह तत्काल मृत्युवश होता है उसी तरह स्त्रील्पी दृष्टिविपा सर्पिणीके दर्गनमात्रसे मनुप्य मरणको प्राप्त होता है । इसलिये सज्जन उसका त्याग करते हैं ।। ७५ ।। वह्निज्वाला~ अग्निशिखा स्पर्ग करनेवालेको जलाती है, वैसेही दुष्ट स्त्रीको जो स्पर्श करता है उस मानवको वह जला देती है। अग्निज्वाला प्रकागमान होनेपरभी जैसी त्याज्य है वैसी यह न्त्री सुदर होनेपरभी वलविनागक होनेसे त्याज्य है ।। ७६ ॥ काप्ठसे निर्मित स्त्रीरूपभी संयमसे दृढ और निञ्चल ऐसे मुनिके मनको वलात्कारसे तत्काल हरण करता है। इसलिये गीलवान पुरुप स्त्रीकी मूर्तिसेभी सदा दूर रहते है ।। ७७ ॥ जबतक विलासवती स्त्रीके नेत्ररूप वाणोके आघातसे मनुष्य विद्ध नहीं होता तबतक उसमे विवेक वाम करता है और तवतक वह बुद्धिमान् पुरुष चातुर्यको धारण करता है ।। ७८॥ (दुष्ट स्त्रीके दुराचारका वर्णन 1 )- दुष्ट अभिप्रायवाली तथा दुराचारिणी स्त्री अपने सुदर पतिकोभी छोडकर निर्लज्ज होकर अन्य पुरुपके पास जाती है, यह आश्चर्य है, विचारणीय है ।। ७९ ॥ जिसके वश होकर जीव महापापोको करते हैं और वव-वधादिक कप्टोको अनुभवते हैं ऐसी स्त्रीका मन-वचन-कायोसे सज्जन त्याग करते है ।। ८० ॥ ऐसी दोपोले भरी हुई स्त्रीको जो पुरुप नहीं छोडता है वह सुख-रहित ससारको कभीभी नही ठोडता । स्त्रीके मोहसे मोहित हुए पुरुपोको कदापि मोक्षप्राप्ति नहीं होती ॥८१॥ जो बुद्धिमान् पुनप ब्रह्मचर्यरूपी तपसे अपने उत्तम आत्माको पवित्र करता है वह संज्जन सन्ननोका-पंडितोंका नाय होता है और उसे निरन्तर सौख्यकी प्राप्ति होती है ।। ८२।। । - १ आ. बंदग्वीम् २ या गर्मवजिन.

-३ ८९) सिद्धान्तसार (६३ अस्यापि भावनाः पञ्च भावनीया मनीषिभिः । स्त्रीकथाश्रवणाद्याश्च ब्रह्मचर्य प्रपित्सुभिः॥ ८३ यः प्रमादाकुलो नित्य कन्दर्पण कथितः। रामारागकथादीना श्रावकस्तस्य किं व्रतः ॥ ८४ तत्यागो भावनामाणि भावनाविधिकोविदः । आद्या ब्रह्मनतस्येयं शर्मकर्मविधायिनी ॥ ८५ स्त्रीणामवयवाः सर्वे दृष्टिमार्गगता अपि । ब्रह्मव्रतस्य नामापि घ्नन्ति साधोरपि क्षणात् ।। ८६ साङ्गोपाडगं स्त्रियो रूप दृष्ट्वा ह्यानतमौलयः। साधवो यान्ति मेघाम्वुहता गाव इव क्षिती॥८७ हसितं क्रीडितं पूर्वरतानुस्मरणं पुनः । आलिङगनं स्त्रिया नैव स्मरन्ति ब्रह्मचारिणः ॥ ८८ सरस वृष्यमाहारं कन्दर्पोद्रेककारणम् । साधवो नैव गृह्णन्ति चतुर्थव्रतमाश्रिताः ॥ ८९ ----awar (ब्रह्मचर्यव्रतकी पाच भावनाये।) स्त्रीकथा-श्रवण-त्याग, स्त्रीके मनोहर स्तनमुखादिक अवयवोको देखनेका त्याग, पूर्वकालमे उनके साथ भोगे हुए सभोगसुखके स्मरणका त्याग, वल उत्पन्न करनेवाले और प्रिय ऐसे घृतादिरसोका त्याग और अपने शरीरको वेपभूषादिसे अलकृत करनेका त्याग ऐसी पाच बाते ब्रह्मचर्य धारण करनेवालोको योग्य है, स्त्रीकथा-श्रवणादिकोको छोडकर इनसे विरुद्ध भावनाये विद्वानोसे भाई जाती है ।। ८३ ।। जो कन्दर्पसे-कामविकारसे हमेशा पीडित होकर प्रमादी-स्वच्छदी उन्मत्त होता है और स्त्रीविषयके प्रेमको वढानेवाली कथा सुनता है, स्त्रियोके मनोहर अवयव देखता है उसके व्रत निष्फल होते हैं ।। ८४॥ उपर्युक्त पाच वातोका जो त्याग उसे भावनाविधिको जाननेवाले विद्वान् ‘भावना कहते है। स्त्रीरागकथाका जो त्याग है वह पहिली ब्रह्मचर्य व्रतकी भावना है । वह सुख देनेवाले कर्मका-सद्वेद्यादि शुभकर्मोका बध करनेवाली है ।। ८५ ।। स्त्रियोके सर्व अवयव दृष्टिमार्गमे आनेमात्रहीसे साधुओके ब्रह्मचर्य-व्रतका नामभी रहने नही देते तो अन्य लोगोका ब्रह्मचर्य स्त्रियोंके अवयव देखनेसे कैसे टिक सकता है? कदापि नहीं टिक सकता ॥८६॥ मेघवृष्टिसे ताडित बैल अपना मस्तक नीचे करके जैसे जाते हैं वैसे उपाङ्गोका रूप देखकर मस्तक नम्रकर अर्थात् स्त्रियोके सुदर अवयवोंसे अपनी दृष्टि हटाकर सज्जन जाते है ॥ ८७॥ स्त्रियोका हसना, उनकी क्रीडा, उनके पूर्व सभोगका स्मरण, और उनके आलिङ्गनका स्मरण, ब्रह्मचारी नही करते है ।। ८८ ॥ जो कामपीडाकी तीव्रताका कारण है, ऐसा सरस और उन्मत्त बनानेवाला आहार ब्रह्मचर्य-व्रत धारण करनेवाले मुनिजन लेतेही नही ।। ८९ ।। १ मा स्त्रिया ६४) सिद्धान्तसार (३. ९०- स्वशरीराङगसंस्कार भूषावेषादिभिः क्वचित् । ब्रह्मवतविरुद्धं यत्तन्न जातु विधीयते ॥ ९० परिगृह्णाति येनेद कर्म प्राणी दुरुत्तरम् । परिग्रहः स विज्ञेयो मूर्छा वा वस्तुगोचरा ॥ ९१ बाह्याभ्यन्तरभेदेन द्विविधः कथितो जिनः । चतुर्दशप्रकारोऽयमान्तरो दशधा बहिः ॥ ९२ क्षेत्रं वास्तु धनं धान्यं दासी दासस्तथा पुनः । सुवर्ण रजतं भाण्डं हिरण्यं च परिग्रहम् ।। ९३ बाह्यो दशप्रकारोऽयं संरम्भादिविशेषतः । अमीषां जायते नित्यं दुर्गदुर्गतिहेतुकः ॥ ९४ वेदत्रयं च मिथ्यात्वं तथा हास्यादयश्च षट् । चतुष्कं तु कषायाणामान्तरोऽसौ निगद्यते ॥ ९५ ममेदं भाव इत्येवं सङ्कल्पो यः परिग्रहः । ज्ञानादिष्वपि सोऽस्त्येव तत्राप्येष प्रसज्यते ॥ ९६ नायं दोषो मतः किञ्चिदप्रमत्तादियोगतः । ज्ञानादिग्रहणे मूर्छा नास्ति मोहप्रमाथिनि ॥ ९७ ब्रह्मचर्यव्रतके विरुद्ध ऐसे भूषणोसे और चित्र विचित्र वस्त्रादि वेषोसे युक्त अपने शरीरका सस्कार साधुजन कदापि धारण नहीं करते है ।। ९० ॥ (परिग्रहविरतिव्रता)-- जिससे पार होना कठिन ऐसा कर्म जिससे प्राणी प्राप्त कर लेता है उसे परिग्रह समझना चाहिये । इसकोही ' मूर्छा' यह नाम है। धनादिकी जो अभिलाषा उसे मूर्छा कहते है । मूर्छाका कारण होनेसे धन, धान्य, दासीदास, वस्त्र, खेत, घर ये पदार्थभी परिग्रह कहे जाते हैं । मुख्यत आत्मामे जो अभिलापा है वही परिग्रह है। उपर्युक्त धनधान्यादि- कभी अभिलाषाके कारण होनेसे इनकोभी गौणतया परिग्रह कहते है। ये बाह्य परिग्रह हैं। जिने- श्वरोंने बाह्य और अभ्यन्तर परिग्रह ऐसे दो भेद कहे हैं। उनमेसे अभ्यन्तर परिग्रहके चौदह भेद है और बाह्य परिग्रहके दस भेद हैं ॥९१-९२ ।। (बाह्य परिग्रह)-क्षेत्र-खेत, वास्तु-घर, धन-गौ, भैस, घोडा आदिक, धान्य-शालि, गेहू आदिक, दासीदास-नोकर स्त्रीपुरुष, सुवर्ण-सोना, रजत-चादी आदि, भाण्ड-पात्र, हिरण्य- जिससे व्यवहार चलता है ऐसे रुपया आदि, ये सब बाह्य परिग्रह हैं ।। ९३ ।। इन दश बाह्य परिग्रहके लिये मनुष्य सरभ समारभ आरभादिक करते है । तथा वे दुखदायक दुर्गतिके बधके कारण होते है ॥ ९४ ॥ (अभ्यतर परिग्रह ।)-तीनवेद-स्त्रीवेद, पुरुषवेद और नपुसकवेद, हास्य, रति, अरति शोक, भयं; और जुगुप्सा, क्रोध, मान, माया और लोभ ये चार कषाय तथा मिथ्यात्व ये चौदा अभ्यन्तर परिग्रह कहे जाते हैं ॥ ९५ ॥ यह मेरा है ऐसा जो ममत्व-सकल्प वह परिग्रह है ऐसा यदि मानोगे तो यह मेरा ज्ञान है, यह मेरा दर्शन है, यह मेरा चरित्र है इत्यादि आत्मगुणोमेभी ममत्व-सकल्प होनेसे उन्हेभी परिग्रह कहना पडेगा ऐसी शकाका उत्तर आचार्य ऐसा देते है- जिससे प्रमादयोग उत्पन्न होकर- ममत्वसे पदार्थोंका ग्रहण होता है ऐसे सकल्पको परिग्रह कहते है। सम्यग्ज्ञानादिक गुण मोहका नाश करनेवाले है। उनके, ग्रहण करनेमे मूर्छा . १ आ वेदद्वय २ आ रागो . ५ -३ १०५) सिद्धान्तसार (६५ १ किञ्च ज्ञानादयो भावाः सर्वे ह्यात्मस्वभावकाः । अहेया सुखहेतुत्वात्ततो नेते परिग्रहाः ॥९८ कर्मोदयवशाये तु भावा नात्मस्वभावकः । हेयास्तेषु ममेदं यः सङ्कल्पः स परिग्रह. ॥ ९९ महापापानि पञ्चव प्रभवन्ति निरन्तरम् । यस्मात्स एव साधूनां हेयः सततवर्तिनाम् ॥ १०० मनोज्ञत्वामनोजत्वरागद्वेषत्ववर्जनम् । इन्द्रियार्थेषु चैता स्युर्भावनाः पञ्च पञ्चमे ॥ १०१ इष्टे वस्तुनि या प्रीतिः स रागो रागजितः। कथित. सर्वमोहस्य मूल मूलमिवायतम् ॥ १०२ सर्वसंसारमूलानां वैराणा कारण परम् । अनिष्टे वस्तुनि प्रीतेरभावो द्वेष इष्यते ॥ १०३ साधौ व्रतानि तिष्ठन्ति रागद्वेषविवर्जनात् । रागद्वेषवत. साधो. सरागा गृहिणो वरम् ॥१०४ किं तेन तपसा येन न रागद्वेषवर्जनम् । रागद्वेषौ हि जीवाना दुर्गते. कारणं मतौ ॥ १०५ नही है । प्रमत्तयोगसे उनका ग्रहण नही होता । तथा सम्यग्ज्ञानादिक भाव आत्माके स्वभाव रूप है, ये आत्मभाव सत्यसुखके हेतु होनेसे हेय-त्याज्य नही हैं । इसलिये उनको परिग्रह नहीं कहना चाहिये । कर्मोदयके वश होकर जो भाव उत्पन्न होते है वे आत्मस्वभावरूप नही होनेसे त्याज्य है। उनमे ये मेरे है ऐसा जो सकल्प होता है, उसे परिग्रह कहना चाहिये ॥ ९६-९९ ॥ जिससे हिंसा, झूठ, चोरी आदि महापाप-पचक निरन्तर होता है वह परिग्रह सवत- धारक मुनियोके लिये छोडने योग्य है । जो मनोहर है ऐसे स्पर्शेन्द्रियादि पाँच इन्द्रियोके विषयोमे हर्ष नही मानना और जो अमनोहर-अप्रिय है उनमे द्वेष नही मानना ऐसी इस पाचवे परिग्रहत्याग महाव्रतकी पाच भावनाये है ॥ १००-१०१ ॥ ( रागद्वेष ससारके मूल हैं। )- जो इष्ट-प्रियवस्तुमे प्रीति उत्पन्न होती है उसे रागरहित मुनीश्वर 'राग' कहते है । जैसे पेडके दीर्घ मूल उसके शाखा, पत्र, पुष्प, फल आदिके लिये कारण है , वैसे रागभाव सर्व मोहका मूल है । यदि रागभाव न होता तो मोहका जन्म कहासे होता । अनिष्ट वस्तुओमे जो प्रीतिका अभाव है, उसे द्वेष कहते हैं । यह द्वेष सपूर्ण ससारका मूल कारण जो वैर उसका जन्मदाता है ।। १०२-१०३ ॥ ( रागद्वेषोका अभाव व्रतोका कारण है । )- रागद्वेषोका त्याग करनेसे साधुमे व्रतोका निवास होता है । परतु रागद्वेषसे जो साधु पूर्ण भरा हुआ है उससे रागभावयुक्त गृहस्थ अच्छे है, ऐसा समझना अनुचित नही है ।। १०४ ॥ जिससे रागद्वेष नष्ट नहीं होते है, वह तपश्चरण किस काम का? राग और द्वेष ये ही दोनो भाव जीवोको दुर्गति देनेवाले प्रधान कारण है ।। १०५ ॥ . १ मा. विवर्जनम् २ मा इन्द्रियार्थस्य ३ आ शूलमिव SS.9.

६६) सिद्धान्तसार (३. १०६- मूप्रिलापसंमोहदाहदुःखकाशनाम् । रागद्वेषाहिदष्टानां न हेयादेयसंगतिः ॥ १०६ मातरं हन्ति हन्त्येव पितरं भ्रातरं पुनः। हन्ति बन्धूस्त्रियो' हन्ति हन्त्यात्मानमलज्जितः॥१०७ रामां हन्ति सुतं हन्ति हन्ति देवगुरूंस्तथा। रागद्वेषविमूढात्मा व्रतं तस्य कुतस्तनम् ॥ १०८ रुणद्धि नवमात्मानं इन्द्रियार्थेषु यः पुमान् । सर्वत्रापत्पदं स स्यात्पतङ्ग इव दुर्गतौ ॥ १०९ शुभोदयवशात्प्राप्ते मनोज्ञे सुखकारिणि । न मदोद्रेकमायान्ति ये ते धन्यतमा नराः ॥ ११० तथा चाशुभतः प्राप्ते दुष्टवस्तुनि दुःखदे। क्लिश्यन्ति क्लेशनिर्मुक्ता न मनागपि पण्डिताः।।१११ भावनाभावितान्येवं व्रतान्येतानि देहिनाम् । महाफलप्रदान्याहुः सर्वज्ञज्ञानशालिनः ॥ ११२ देशं कालं तथा क्षेत्रं भावं पात्रं विविच्य यः। समयाचारमाचाराद्देशकः स गुरुः सताम् ॥ ११३ रागद्वेषरूपी सर्पने जिनको दश किया है, उनमे मूर्छा, अभिलाषा, प्रलाप-असत्यभाषणा समोह-मोहित होना और दाह इत्यादिक दुख दिखते है । उनकी सगति आदेय-योग्य नही है । जो रागद्वेषयुक्त हुआ है, वह माताको मारता है, पिताको मारता है, पुन अपने भाईको मारता है । अपनी पत्नीके भाईको मारता है, स्त्रियोको मारता है तथा निर्लज्ज होकर अपनेकोभी मारता है । रागद्वेषसे जो मूर्ख हुआ है वह अपनी पत्नीको मारता है, पुत्रको मारता है, तथा देव और गुरुको मारता है, इसलिये उसको व्रतप्राप्ति कहासे होगी? ॥ १०६-१०८ ।। ? जैसे पतग दीपकका उज्ज्वलपना देखकर अपनेको नही रोकता है, वह उसपर जाकर पडता है वैसे रागद्वेषवश पुरुष अपनेको नही रोकता हुआ इन्द्रियोके विषयोंमे जाकर गिरता है। इसलिये वह दुर्गतिमे सर्वत्र आपत्तियोका स्थान होता है ।। १०९ ।। (सज्जन सपत्ति-आपत्तिमे हर्षविषादरहित होते है। )- शुभ ऐसे वेदनीयकर्मके उदयसे और लाभान्तराय, भोगातराय, उपभोगान्तराय आदि कर्मके क्षयोपशमसे मनोहर और सुखदायक ऐसी धनधान्यादि भोगोपभोग सामग्री प्राप्त होनेपर जिनका मन उद्रेकको प्राप्त नही होता, सगर्व नही होता वे पुरुष धन्यतम हैं । तथा अशुभकर्मके उदयसे दुखदायक दुष्टवस्तु प्राप्त होनेपर जो क्लेशरहित होते हुए सुखदायक वस्तुसे रहित होनेपरभी तिलमात्रभी दुखी नही होते हैं वे पण्डित हैं ।। ११०-१११ ॥ सर्वज्ञ तीर्थकरके मुखसे प्रगट हुए भावश्रुतको धारण करनेसे शोभनेवाले गणधरोंने ये अहिंसादि पाच व्रत कहे है । भावनाओसे सस्कृत व्रती पुरुषोको ये व्रत महाफल-स्वर्ग और मोक्षफल देते हैं ऐसा कहा है ॥ ११२ ॥ (गुरु कैसा होना चाहिये।)- देश, काल, भाव, क्षेत्र और पात्र-(जिसको व्रत दिये जाते १ आ स्त्रिय २ आ दुर्मति -३ ११७) सिद्धान्तसार (६७ देशकालवलतो विशुद्धधीर्यः करोति करुणापरायणः । सद्वत जिनमतानुसारतः स व्रती भवति शल्यजितः ।। ११४ ज्ञानदर्शनविशुद्धचेतसामाश्रित व्रतमिदं प्रजायते । निर्मल मलविलोलचेतसा नापरेण कलित कदाचन ॥ ११५ प्राप्तमानुषभवे हि दुष्टधीर्यो व्रतानि न दघाति मानवः । सोऽत्र साधुसुमतेरसंभवाद्भरिजन्मजलधावटाट्यते ॥ ११६ इत्यवेत्य भवभारभीरवः साधवोऽत्र चरण चरन्ति ये। तः स्वरूपममलं सुदुर्लभं स्थीयते समुपलभ्य चात्मनः ॥ ११७ इति श्रीसिद्धान्तसारसंग्रहे' पण्डिताचार्यनरेन्द्रसेनविरचिते' अहिंसादिपञ्चव्रतनिरूपणं' तृतीयः परिच्छेदः । - aesorees. -o-es- . है,) तथा आगममे कहा हुआ आचार इन सव वातोका योग्य विचार करके आचारका उपदेश करनेवाले यतीश्वर सज्जनोके गुरु हैं ।। ११३ ॥ ( व्रतीका स्वरूप । )- देश, अनूप, जागल और साधारण ऐसी देशकी अवस्थाओका, हिमकाल, वर्षाकाल, उष्णकाल ऐसे कालका और अपनी शक्ति और वात, पित्त कफादिरूप प्रकृति इन बातोका जो विचार करता है ऐसा निर्मल वुद्धिका पुरुष प्राणिदयामे तत्पर होकर जिनमतके अनुसार माया, मिथ्यात्व और निदान इन तीन शल्योसे रहित होता हुआ निरतिचार अहिंसादि व्रत धारण करता है, वही व्रती होता है । ज्ञान और सम्यग्दर्शनसे जिनका चित्त निर्मल हुआ है, उनका यह व्रतपचक निर्मल होता है किन्तु मलिनचित्तवाले पुरुषोका व्रत शल्यसे और मिथ्यादर्शन मिथ्याज्ञानसे युक्त होनेसे कदापि निर्मल नही होता ॥ ११४-११५ ।। ( अवती ससारमे भ्रमण करता है। )- जिसको मनुष्यभव प्राप्त हुआ ऐसा जो दुर्बुद्धि मनुष्य व्रत धारण नहीं करता है वह सज्जनोकी बुद्धिके अभावसे अपार ससारसमुद्रमे दीर्घकालतक भ्रमण करता है ।। ११६ ।। इस प्रकार व्रतोका स्वरूप और उसका फल जानकर ससारभारसे भययुक्त जो साधु इस भरतक्षेत्रमे सम्यक्चारित्रका पालन करते हैं वे अत्यन्त दुर्लभ ऐसा अपना आत्मस्वरूप प्राप्त कर आनन्दसे मोक्षमे रहते है ॥ ११७ ॥ श्रीपडिताचार्यनरेन्द्रसेन विरचित श्रीसिद्धान्तसारसग्रह नामक ग्रथमे अहिंसादि पाच व्रतोका निरूपण करनेवाला तीसरा अध्याय समाप्त हुआ ।। १ आ. 'श्री' इति नास्ति २ आ पडित इति नास्ति ३ आ अहिंसादिपञ्चप्रतनिरूपण इति नास्ति चतुर्थोऽध्यायः अहिंसादीनि यान्येवमुदितानि मयाधुना । श्रीगुरूणां प्रसादेन तानि द्वेधा भवन्ति च ॥१ देशतोऽणुव्रतान्याहुः सामस्त्येन तथा पुनः । महानतानि पूतानि भवन्ति भविनामिह ॥ २ तद्वान्त्रती द्विधा ज्ञेयः सागारेतरभेदतः। परं निःशल्य एवासौ तस्माच्छल्यमुदीर्यते ॥ ३ शृणाति प्राणिनं यच्च तत्वज्ञः' शल्यमीरितम् । शरीरानुप्रविष्टं हि काण्डादिकमिवाधिकम् ॥४ शारीरमानसी बाधां कुर्वत्कर्मोदयादि यत् । मायामिथ्यानिदानादिभेदतस्तत्त्रिधा मतम् ॥५ चौथा अध्याय। ( अणुव्रत और महाव्रतरूप अहिंसादिवतोका वर्णन । )- श्रीगुरुओके प्रसादसे जो हिंसादिक व्रतोका मैने इस समय तृतीय अध्यायमे वर्णन किया है उनके दो भेद होते हैं ॥ १॥ ससारी जीवोके अहिंसादिव्रत एकदेशसे पालन करनेसे पवित्र अणुव्रत होते है और सपूर्णतासे पालन करनेपर पवित्र महावत होते हैं। स्पष्टीकरण- अनन्तानुबधि क्रोध, मान, माया, लोभ और अप्रत्याख्यान क्रोध, मान, माया, लोभ इन आठ कषायोका क्षयोपशम होनेसे और प्रत्याख्यान-कषाय तथा सज्वलन-कषाय और यथा सभव नौ नोकषायोका उदय होनेपर जीवको एकदेश त्यागकी बुद्धि उत्पन्न होती है तब वह पाच पापोका एकदेश त्याग करता है । तथा जब उसको अनतानुबध्यादि बारह कषायोका क्षयोपशम होकर सज्वलन क्रोध, मान, माया, लोभ, ऐसे चार कषायोमेसे किसी एकके देशघातिकस्पर्द्धकका उदय होता है तब पाच पापोका पूर्ण त्याग बुद्धि उत्पन्न होती है, तब वह जीव अर्थात् मुनि महाव्रत धारण करता है । इस प्रकार अणुव्रती गृहस्थ और महाव्रती मुनि ऐसे व्रतिकोके दो भेद होते हैं । परतु ये दोनो व्रती नि शल्यही होते है । इसलिये अब शल्यका वर्णन हम करते हैं ।। २-३ ।। , जो प्राणीको शृणाति-पीडा देता है वह शल्य है, ऐसी तत्त्वज्ञोने शल्य शब्दकी व्याख्या की है ( शृणाति प्राणिन पीडयति इति शल्य ) जैसे शरीरमे घुसा हुआ बाणादिक शल्य प्राणीको अधिक व्यथित करता है वैसे माया, मिथ्यात्व, निदान ये तीन प्राणीको ससारभ्रमणका दुख देते हैं, इसलिये इनको शल्य कहना चाहिये ॥ ४ ॥ शारीरिक और.मानसिक पीडा देनेवाला कर्मोंका उदय, क्षयोपशमादिक रूप जो माया, मिथ्यात्व और निदान भेदसे तीन प्रकारका शल्य है वह जीवोको पीडा देता है ।। ५ ।। १ मा शब्द २ आ शारीरी ४-१२) सिद्धान्तसार (६९ प्रपञ्चबहुलावृत्तात्कूटमानादितोऽपि यत् । वञ्चना प्राणिनामुक्ता माया मायाविवजितः ॥६ हिंसासत्यमशौच च तस्य चौर्य निरन्तरम् । पापीयान्' सोऽस्ति सा यस्य प्रपञ्चबहुला स्थितिः।। अन्यच्चित्ते करोत्यन्यच्चेष्टायामन्यदेव हि । मायावी तस्य किं शौचमुच्यते दुष्टदुमतेः॥८ मायाविनःप्रपञ्चाढ्या वञ्चयन्ति जगायम् । तस्यात्मवञ्चनामात्र दोष किं निगदाम्यहम्।।९ इति दोषवती ज्ञात्वा वर्जयन्ति विचक्षणा. । माया त्रिधापि दूरेण पापं परिजिहीर्षवः ॥ १० धर्म जिघृक्षुभियं मिथ्यात्व सर्वथा तयोः । सहानवस्थितिनित्यं विरोधो यावता महान् ॥ ११ मिथ्याशल्यमिदं दुष्टं यस्य देहादनिःसृतम् । तस्यापदाभिभूतस्य निर्वृतिर्न कदाचन ॥ १२ (माया शल्य,) फसानेकी प्रचुरता जिस स्वभावमे रहती है उसे माया कहते है। धान्यादि नापनेके लिये खोटे वाट, नाप आदिक रखकर उससे धान्यादिक पदार्थ ग्राहकको कम देकर फसाना माया है ऐसा मायारहित मुनियोने कहा है । उपर्युक्त प्रकारसे फसानेका प्रचुर स्वभाव जिसका है वह पापी समझना चाहिये । उससे हिंसा, असत्य, अपवित्रता और चोरीके दोष निरन्तर होते हैं ॥ ६-७॥ मायावी- कपटी मनुष्य मनमे अन्य विचार करता है तथा शरीरसे और वाणीसे अन्य चेष्टा करता है । इसलिये वह दुष्ट-दुर्बुद्धि क्या पवित्रता धारण कर सकता है ? मायावी महान् अपवित्र है ॥८॥ कपटी पुरुष प्रपच करनेमे - फसानेमे चतुर होते हैं, वे त्रैलोक्यको फसाते हैं। जब वे त्रैलोक्यको फसाते हैं, तव उनके स्वय-अपनेको फसानेके दोषको मै क्या कहू ? अर्थात् मायावी पुरुप अपनेको सबसे जादा फसाता है, जिससे दीर्घकाल ससारमे उसे घूमना पडता है । अत. उसके आत्मवचना दोषका वर्णन मै नही कर सकता ॥ ९॥ माया महादोषोसे भरी है ऐसा जानकर पापत्याग चाहनेवाले चतुर पुरुष मन वचन और कायसे उसे छोड़ देते है ।। १० ।। ? (मिथ्यात्व-शल्य-त्याग।) धर्मग्रहण करनेकी इच्छा करनेवाले पुरुषोको मिथ्यात्वका सर्वथा त्याग करना चाहिये। क्योकि धर्म और मिथ्यात्व इन दोनोमे सहानवस्थिति नामक महान् विरोध दोष हमेशासे है । एकस्थानमे-एकाश्रयमे दो विरोधी पदार्थ न रहना उसे सहानवस्था कहते हैं। जैसे शीत और उष्ण, सर्प और नकुल, वैसे धर्म जहा रहता वहा मिथ्यात्व नही रहता। जहा मिथ्यात्व रहता है वहा धर्म नही रहता । यह मिथ्यात्व शल्य जिसके देहसे नही निकल गया ऐसे मिथ्यात्वसे प्राप्त हुए दु खोसे पीडित पुरुषको कभीभी मोक्ष प्राप्त नहीं होगा ॥११- १२॥ १ आ पापीयसोऽस्ति २ आ मात्रदोषम् ७०) सिद्धान्तसार (४. १३-- जिनोक्तानां हि भावानामश्रद्धानकलक्षमम् । शुद्धाशुद्धविमिश्रादिभेदतस्तत्रिधा मतम् ॥ १३ एफमप्यक्षरं यस्तु जिनोदितमनिन्दितम् । अन्यथा कुरुते तस्याप्यानन्त्यं संसृतेर्भवेत् ॥ १४ यस्तु तत्त्वमिदं सर्व जीवाजीवादिगोचरम् । विपरीतं करोत्येष कि स्याज्जानादि केवली ॥ १५ क्षणं क्षणान्तरस्थायि नित्य क्षणविनश्वरम् । अभावो भाव इत्येवं भावोऽभाव इति ध्रुवम् ॥ १६ चलं स्थिर स्थिरं यच्च चञ्चलं तत्समन्ततः । उच्चर्नीचैस्तथा नीचरच्चं तदवरं वरम् ।। १७ मतत्त्वं तत्त्वमित्येवं तत्वं वा तत्त्वमित्यपि । विपरीतं प्रपश्यन्ति मिथ्यात्वविषमोहिताः॥१८ मिथ्यात्वान्धत्तमो घोरं येषा हृदयति तत् । तत्त्वार्थास्ते न पश्यन्ति मदिराकुलिता इव ॥ १९ प्रमाणनयनिर्णीतं न स तत्त्वं प्रपद्यते । सुष्ठ स्वादुरसं पित्तज्वरेणाकुलितो यथा ॥ २० (मिथ्यात्वके भेद।)- जिनेश्वरके कहे हुए पदार्थोंपर श्रद्धान करना यह मिथ्यात्वका मुख्य लक्षण है। इस मिथ्यात्वके शुद्ध, अशुद्ध और मिश्र ऐसे तीन भेद हैं । इसेही सम्यक्त्व मिथ्यात्व और सम्यग्-मिथ्यात्व कहते है ।। १३ ॥ जिनेश्वरका कहा हुआ प्रशसनीय एक अक्षरभी जो अन्यथा करता है उसेभी अनन्त, ससारकी प्राप्ति होगी। अर्थात् जिनेश्वरने त्रिकालाबाधित वस्तुस्वरूप कहा है परन्तु उसके विपरीत एक अक्षरकाभी परिवर्तन मिथ्यात्वके वश होकर जो करेगा उसे मिथ्यात्वका तीन वन्ध होनेसे निगोदावस्थामे दीर्घकाल भ्रमण करना पडेगा ॥ १४ ॥ जिनेश्वरने जीव, अजीव, आस्रव, वन्ध, सवर, निर्जरा तथा मोक्षका यथार्थ स्वरूप कहा है । परतु मिथ्यादृष्टि उसका विपरीत श्रद्धान करता है, वह ज्ञानादिको केवली समझता है किन्तु ज्ञानादि क्या केवली है ? तात्पर्य-विज्ञानाद्वैतवादी बौद्ध आत्मतत्त्व नही मानता है वा, केवल ज्ञानको ही मानता है, वह ज्ञानही केवली होता है ऐसा समझता है परन्तु यह विपरीत श्रद्धान है।। १५ ॥ (विपरीत मिथ्यादृष्टिका स्वरूप ।)- जो वस्तुपर्याय एकक्षणके अनतर नष्ट होनेवाली है उसे अनेक क्षणतक रहेगी ऐसा कहना । जो नित्य है उसे तत्क्षण नष्ट होगी ऐसी श्रद्धा करना- अभावको भाव कहना, ये सव निश्चयसे उलटे है । अर्थात् जिनेश्वरने तत्त्वस्वरूप कथञ्चित्- क्षणिक, कथञ्चित्-अक्षणिक, स्वस्वरूपकी अपेक्षासे कथञ्चित्-भावात्मक, परस्वरूपकी अपेक्षासे कथञ्चित् अभावात्मक कहा है। परंतु मिथ्यात्वके उदयसे जीव अभावको भाव, और भावको अभावरूप श्रद्धा करता है। मिथ्यात्वविषसे मोहित लोग चल पदार्थको अचल देखते हैं। अचलको चल देखते है। उच्च पदार्थको नीचा देखते है और नीचेको ऊचा देखते हैं। हीनको श्रेष्ठ समझते है। इस प्रकार विपरीत श्रद्धानीकी दृष्टि होती है। जिनके मनमे घोर मिथ्यात्वाधकार वास कर रहा है वे लोग मदिरापानसे उन्मत्त बने हुए मनुष्यके समान जीवादि तत्त्वोके यथार्थस्वरूपको नही देखते हैं । पित्तज्वरसे पीडित मनुष्य जैसा सुदर मधुर रसयुक्त अन्नभी कटुक समझता है.

--४. २६) सिद्धान्तसार (७१ ये वदन्ति महामोहपिशाचवशगा नरा । आत्मा नित्यो न तेषा हि धर्माधर्मव्यवस्थितिः॥ २१ न' नित्यः कुरुते कार्य स्वभावव्यभिचारतः। तस्माच्छुभाशुभं कर्म न तस्य फलवन्मतम् ॥ २२ नित्यस्य व्यापिनो नैव क्रियमाणा कदाचन । जीवस्य जायते हिंसा ततो हिंसा कुतस्तनी ॥ २३ सयमो नियमो दान कारुण्यं दर्शन तपः । सर्वथा घटते तेषां कथ नित्यैकवादिनाम् ॥ २४ क्षणिके स्वीकृते जीवे क्षणावं स्वभावत' । पुण्य पाप च तत्रापि कः प्राप्नोति पुरातनम् ॥ २५ निरन्वयविनाशे तु हिंसाहेतोरभावतः । तत्त्वमाकस्मिकं तेषा कय मिथ्यादृशां न हि ॥ २६ वैसेही विपरीत मिथ्यात्वी जन प्रमाण और नयसे निर्णीत वस्तुको अन्यथा समझते है । महामोह- पिशाचके आधीन हुए मनुष्य आत्मा सर्वथा नित्य है ऐसा कहते हैं । उनके इस मतसे पाप पुण्यकी व्यवस्था नही हो सकती ॥ १६-२१॥ (आत्मा नित्य माननेमे दोष ।)- नित्यपदार्थ कार्य करता हुआ नही दिखता हैं, क्यो कि कार्य करना उसके स्वभावसे विरुद्ध हैं। परिणमनशील पदार्थ कार्यकारी देखा गया है। मृत्पिण्ड परिणमनशील होनेसे उससे घट कार्य होता है । आत्मा नित्य होनेसे उसमे परिणमन नही होगा। परिणमनसे शुभाशुभ कार्यका वध होता है और उसका मधुर तथा कटुक फल मिलता है । आत्माकी नित्यतासे उसमे शुभाशुभ वध तथा उसका फलानुभवन नही होता ॥ २२ ॥ आत्मा नित्य और व्यापक है, ऐसा जिन्होने माना है उनके दृष्टिसेही यदि विचार किया जावेगा, तो व्यापक चीज क्रियाहीन होती है । आकाश व्यापक है और यह क्रियाहीन है तथा नित्यभी हैं । अर्थात् वह यदि कुछ परिणमन करेगा तो पूर्व परिणमनसे अन्य परिणमन होनेसे नित्यता नष्ट होकर अनित्यता आए विना न रहेगी। वैसेही आत्मामे परिणमन नही माननेसे आत्माके द्वारा हिंसादि क्रिया कदापि नही होगी । क्रियासे कर्मवध और उससे शुभाशुभ 'फलानुभवन जो प्रत्येक आत्मामे अनुभवमे आता है वह आत्मा नित्य माननेसे और व्यापक माननेसे न आवेगा । अत व्यापक आत्मामे क्रियाका अभाव होनेसे हिंसाका अभाव होगा तो हिंसा कहासे होगी ॥ २३ ॥ सयम, नियम, दान, दया, सम्यग्दर्शन और तप इत्यादि क्रियाओकी और आचारोकी नित्यवादियोके मतसे सभावना कदापि न होगी? ॥२४॥ (आत्मा क्षणिक माननेमे दोष।)-बौद्धोने आत्मा क्षणिक मानी है। इसलिये एक क्षणके अनन्तर वह नष्ट हो जानेपर पूर्व पुण्य और पापका कौन भोक्ता होगा ? अर्थात् पुण्य जिस समय किया जाता है उसी समय उसका फल प्राप्त नही होता है। एकही क्षणमे कारण कार्यरूप नही परिणत होता है। पदार्थ अनेक क्षणवर्ती होगा तो पूर्वपर्याय नष्ट होकर द्वितीयादि पर्याये उसमे दृग्गोचर होगी। परतु एकही समयमे पदार्थको उत्पत्ति होती है और विनाशभी होता है तथा वह १ मा अनित्यः २ मा पुण्यापुण्यम् ७२) सिद्धान्तसार. (४. २७- तस्मिन्नाकस्मिके ताद्धिसाहेतुर्न हिंसफः । प्रवृत्तिस्तु कथं मार्गे तत्र मार्गोऽपि वा कथम् ॥ २७ अन्यव्यावृत्तिरूपं स्याज्जगत्सर्वमिदं यदि । जीवोऽप्यजीव एवास्य का कथा धर्मकर्मणि ॥ २८ जगच्छ्न्यमिदं सर्व धर्मो हिंसाविवर्जितः । मूढात्मानो वदन्त्येतत्तथ्यं ताथागताः कथम् ॥ २९ विनाश पर्यायान्तरसे परिणत न होकर निरन्वय विनाशरूप होनेसे पूर्वकृत पापपुण्योकाभी निरन्वय नाश होगा । तथा जैसे निरन्वय विनाश होता है, वैसी निरन्वय उत्पत्तिभी होगी। तो पाप-पुण्योकी व्यवस्था हिंस्य, हिंसक, हिंसा और हिंसाफल ये बाते अस्थिर क्षणिक पदार्थोमे नही सभवती । इसलिये बौद्धके मतमे कारणविनाही कार्यतत्त्वकी उत्पत्ति माननी होगी ।। २६ ।। जब आत्मतत्व अकारण उत्पन्न होगा, तो हिंसक मनुष्य हिंसा कार्यका कर्ता है ऐसा मानना उचित न होगा । जैसे हिंसा करनेवाला कारणके बिनाही उत्पन्न होता है वैसे हिंसाभी कारणके बिनाही उत्पन्न होगी। तथा हिंसाका हिंसकसे कुछभी सबंध न होनेसे हिंसकको पापी अथवा निंद्य मानना अविचाररम्य होगा। ऐसी परिस्थितिमे मोक्षमार्गमे प्रवृत्ति कैसे होगी? और मार्गकीभी स्थिति नही होगी। मार्ग किसको कहना यह प्रश्नभी अनुत्तरही रहेगा। तात्पर्य यह है, कि निरन्वयविनाश और निरन्वय उत्पत्ति मानना युक्तिसगत नही है ॥ २७ ।। निरन्वय उत्पत्ति होनेसे जीव जीवत्व धारण करकेही उत्पन्न होगा यह नियम नहीं बनेगा। जीव अपना जीवत्व छोडकर अजीव होगा। अजीव अपना अचेतनपना छोडकर जीव होगा। क्योकि नियामकता जब पदार्थमे नही रहती तब जीवका परिणमन जीवरूपही होना, अजीवका परिणमन अजीव रूपही होना, ऐसी सम्बद्धता उनमे कहासे रहेगी ? अत. जीवाजीवादिक तत्त्व सान्वय मानने चाहिये ॥ २८॥ ताथागत बौद्ध सर्व जगत् शून्य हैं और धर्म हिंसाविवर्जित है, अर्थात् अहिंसा धर्म है ऐसा कहते हैं । आचार्य इसके ऊपर ऐसा कहते हैं, कि यह उनका कहना मूर्योके समान है। जगत् यदि शून्य है, तो धर्म नामक वस्तुभी नही है, क्यो कि जगत् जो धर्मी है, वहभी यदि शून्य है, तो उसका स्वभाव अहिसा धर्म है ऐसा कहना कैसे सिद्ध होगा? वध्याका लडका मृगतृष्णामे स्नान करता है, ऐसा कहने के समान यह बौद्धका विवेचन है । इसलिये ऐसा कथन करनेवाले बौद्ध ताथागत-सत्यज्ञानवाले बुद्धके अनुयायी कैसे हो सकते है ? स्पष्टीकरण- जगत् शून्य है ऐसा कहना योग्य नही । यद्यपि स्वप्न इन्द्रजाल आदिकमे पदार्थोका ज्ञान उनके अभावमेभी होता है, अत जगत् शून्य है ऐसा कहोगे तो ज्ञान मिथ्या होनेपर पदार्थका अभाव मानना योग्य होगा परतु सर्व ज्ञान मिथ्या नही होते । मृगतृष्णामे जलका ज्ञान मिथ्या होनेसे तृष्णा हरण करनेवाले सच्चे जलका ज्ञानभी मिथ्या मानना कैसे योग्य होगा? स्वप्नमे होनेवाले ज्ञान वाह्य पदार्थ रहित होते हैं परतु जाग्रदवस्थामे होनेवाला ज्ञान स्थिर, स्थूल, साधारण स्तम्भकुम्भादि पदार्थोको प्रकाशित करनेवाला होता है। यह प्रत्यक्षसे -४ ३३) सिद्धान्तसार (७३ नास्तिका निगदन्त्येके जीवाभावविभाविनः । तपस्यन्त्यन्यलोकाय किमयं जडबुद्धयः ॥ ३० जीवो नास्ति कियानत्र पदार्थों 'नामगोचरः । भूतात्मकमिदं ज्ञानं केवलं यन्त्रवाहकम् ॥३१ भूतोपादान एवायं जायते जनरञ्जक' । कश्चिद्धावस्तमज्ञानाज्जीवभ्रान्त्या' वदन्त्यमी॥३२ अचेतनानि भूतानि नोपादानानि चेतने । मिथ्येति गोमयादिभ्यो वृश्चिकायुपदर्शनात् ॥ ३३ - उसको मिथ्याज्ञान नही कह सकते । तथा उसके विषय स्तम्भकुभादिकभी मिथ्या नही है। स्वप्नभी सव वाह्य पदार्थके अवलम्बनके विनाही होते हैं ऐसा नही समझना चाहिये । स्वप्नभी सत्य और असत्य दो प्रकारके होते है । सत्यस्वप्न देवताविशेषसे उत्पन्न किये हुये अथवा अपने पापपुण्यसे किये हुये होते है और वे साक्षात् पदार्थसे अव्यभिचारी होते है । और कोई स्वप्न परम्परासे अर्थानुकूल होते हैं । स्वप्नमे राजादिकोका दर्शन होनेसे कुटुम्बवृद्धि आदिक फल मिलता है । वातपित्तादिकके उद्रेकसे उत्पन्न हुआ स्वप्न असत्यपनेसे यद्यपि प्रसिद्ध हैं, तो भी अर्थमात्रसे व्यभिचारी है ऐसा नही, क्योकि कोईभी अर्थ सत्ताके साथ व्यभिचारी नही है । परतु विशेषार्थके साथ व्यभिचारी होनेसे वह मिथ्या माना जाता है । इसलिये जगतमे अर्थ और उसको विषय करनेवाले ज्ञान ये दोनो पदार्थ सत्ताके साथ अव्यभिचारी होनेसे जगच्छून्य है ऐसा कहना योग्य नही ॥ २९ ॥ ( चार्वाक आत्मा पदार्थ नही मानते है, उनका पूर्व पक्ष । )- जीव नही है ऐसा प्रतिपादन करनेवाले नास्तिक-चार्वाक ऐसा कहते हैं " जीव नामक पदार्थ नही है । इसलिये ये जड वुद्धिवाले लोग परलोकप्राप्तिके लिये-स्वर्गसुख के लिये क्यो तपश्चरण करते हैं ?" ॥३०॥ " जीव नही है और उसकी क्रिया नही है । जीव नामका पदार्थ केवल नामगोचर है। जैसे आकाशपुष्प केवल नामही है, उसका वाच्यभूत पदार्थ कोई नही है, वैसे तो 'जीव' यह शब्द सुना जाता है परतु उसका वाच्य जीव पदार्थ नही है । जो ज्ञान अनुभवमे आता है वहभी भूतात्मक है । पृथ्वी, हवा, पानी, अग्निसे उत्पन्न हुआ है और उसके द्वारा यह शरीररूपी यत्र चलता है अर्थात् शरीरके द्वारा चलने बोलने आदिकी क्रिया ज्ञान कराता है, वह भूतात्मक होनेसे जडही है " ॥ ३१ ॥ " जो लोगोके मनको अनुरजित करनेवाला कोई पदार्थ दिखता है वहभी भूतोपादानही है । अर्थात् अज्ञानसे लोगोकी उसमे यह जीव है, ऐसी भ्रान्ति हुई है और वे उसे जीव कह रहे है । जैसे मट्टीके पिण्डसे घट उत्पन्न होता है, अर्थात् मट्टीका पिण्डही घटाकार होता है वैसे भूतोसे उत्पन्न हुआ यह जनरजक पदार्थ स्वय भूतात्मकही है । कोई भूतोसे भिन्न पदार्थ नही ॥ ३२॥ कोई जीव माननेवाले जैनादिक ऐसा कहते हैं, कि ' पृथ्वी, हवा, पानी आदि भूत अचेतन होनेसे चेतनरूप जीवकी उत्पत्तिके लिये उपादान नही होते हैं “ यह जीववादियोका विधान मिथ्या-असत्य है । क्योकि गोमयादि पदार्थोसे विच्छ आदिक जीव उत्पन्न होते हुए दिखते २ तमज्ञाना १. आ मानगोचर S.S 10.

७४) सिद्धान्तसार. (४. ३४- विजातिभ्योऽपि भूतेभ्यश्चेतनो न विरुध्यते । पिष्टोदकगुडादिभ्यो मदशक्तिरिव ध्रुवम् ॥ ३४ मुक्त्वेहलौकिकं सौख्यं व्रतैः क्लिश्यन्त्यहनिशम् । ही वञ्चितास्त एवास्मिन्नाशापाशवशीकृताः।। अहिंसादिवतं तेषां नोपपत्तिमिति तत् । हिंस्याभावे क्व सा हिंसा हिंसाभावे क्व तहम् ॥३६ नास्ति जीव इति व्यक्तं यद्वदन्तीह दुधियः । तन्मिथ्यैव यतो जीवः प्रत्यक्षेणव सिध्यति ॥ ३७ स्वसंवेदनवेद्यत्वात्सुखदुःखादिवद्धृवम् । जीवे सिद्ध कथं नैते नास्तिका दुष्टवादिनः ॥ ३८ --- . -- ? है । अत भूतोंसे चेतन पदार्थ उत्पन्न नही होता ऐसा जैनोका कहना मिथ्या है, अर्थात् भूतोसे चलनेवाला, बोलनेवाला, लिखनेवाला अनेक स्वभावोका धारक चेतन पदार्थ उत्पन्न होता है ऐसाही मानना चाहिये । इसलिये जीव नामक चेतन पदार्थ भूतोसे अलग नही हैं ॥ ३३ ॥ पृथ्वी, हवा आदिक भूत अचेतन हैं और जीव चेतन है, अत पृथ्वी आदिक भूत चेतनसे विरुद्ध होनेसे विजातीय है तो भी उनसे जीवकी उत्पत्ति होना विरुद्ध नहीं है, क्योकि पिष्ट, पानी, गुड आदिक पदार्थोंमे मदशक्ति न होनेपरभी उनसे वह निश्चयसे उत्पन्न होती है " ॥ ३४ ॥ परलोकसुखके आशापाशने जिनको वश किया है ऐसे लोग इह लोकसंबंधी स्त्री चन्दन पुष्पमालादिकोका सुख छोडकर व्रतोसे स्वयको हमेशा पीडित करते है, वे लोग फसाये गये हैं। ऐसे लोगोके अहिंसा, सत्य, अचौर्य, ब्रह्मचर्य आदि व्रतोकी उपपत्ति सिद्ध नहीं होगी। यदि जीव होता तो अहिंसादिवतोकी सफलताभी होती । जीव नही होनेसे व्रतपालन केवल क्लेशरूपही है । हिंस्यही नही है तो हिंसा पापरूप कैसे सिद्ध होगी ? अर्थात् जीव पदार्थ होता तो उसकी हिंसा होती । उसकी सिद्धि न होनेसे हिंसाकाही अभाव हुआ है तो अहिंसाव्रतकी सिद्धि कहा होगी" यहातक चार्वाकका पूर्वपक्ष हुआ ॥ ३५-३६ ॥ ( आत्मतत्त्व है ऐसा जैनोका सिन्धातपक्ष । )- 'आत्मा नही है ' ऐसा जो दुर्बुद्धि- मिथ्यात्वग्रसित बुद्धिवालोका स्पष्ट कहना है वह मिथ्याही है, क्योकि जीव प्रत्यक्ष प्रमाणसेही सिद्ध होता है । उसके लिये अन्य प्रमाणोकी आवश्यकता नही । जैसे सुखदुख हर्षविषादादि स्वसवेदनसे जाने जाते हैं वैसे आत्माभी स्वसवेदन प्रत्यक्षसे अनुभवमे आता है । मैं सुखी हूं, मैं दुखी हूं, ऐसा अनुभव प्रतिव्यक्तिको खुदही उत्पन्न होता है । मैं जीव हू यह अनुभवभी स्वयंको स्वय आता है। यदि शरीरसे भिन्न आत्मतत्त्व न होता तो ऐसा अनुभव कदापि नही आसकता । इस स्वसवेदनसे आत्मतत्त्व सिद्ध होनेसे ये चार्वाक दुष्टवादी क्यो नही ? अर्थात् मिथ्यात्व कर्मका तीव्र उदय होनेसे आत्मा नही है ऐसी इनकी विपरीत बुद्धि हो गयी है ॥३७-३८ ॥ जीवको प्राप्त हुआ शरीर पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि ऐसे अनेक भूतोसे बना हुआ है वैसा आत्मा इन भूतोसे नही बना हुआ है अत वह इनका कार्य नही है । तथा ये भूत अचेतन है । अत इस चेतनकी उत्पत्तिमे ये उपादानकरण नही हो सकते । अचेतनोंका कार्य अचेतनही होगा । चेतनके कार्य चेतनही होते हैं । अर्थात् सजातीय कारणसे सजातीय कार्यही उत्पन्न -४. ४३) सिद्धान्तसार (७५ शरीरारम्भकानेकभूतकार्य न चेतनः । तेषामचेतनत्वेन हेतुत्व' नैव चेतने ॥ ३९ गुडादिभ्योऽपि या जाता मदशक्तिरचेतना । चैतन्ये नैव सा जातु दृष्टान्तं प्रतिपद्यते ॥ ४० गोमयादृश्चिकादीना शरीरोत्पत्तिदर्शनात् । चेतनेऽसिद्धरूपत्वान्न साध्यं सिद्धिमञ्चति ॥ ४१ जन्मादिमृत्युपर्यन्तं चैतन्ये सिद्धिमाश्रिते । प्रागूद्ध्वं सिद्ध एवासौ तत्राभावप्रसङ्गतः ॥ ४२ न तत्रोत्पत्तितः सत्ता कारणाभावतः सताम् । सम्मता पूर्व एवाय ततः सिद्ध.प्रमाणतः ॥ ४३ होता है । विजातीय कार्यका वह कदापि कारण नही होगा । जैसा कारण होता है वैसाही कार्य होता है । शरीर भूतोका कार्य है, इसलिये शरीर पुद्गल-परमाणुओसे उत्पन्न होता है । चैतन्य पुद्गल परमाणुओसे नही उत्पन्न होता ॥ ३९ ॥ । गुड, धातकीपुष्प आदि पदार्थोंसे जो मदशक्ति उत्पन्न होती है, वह यदि चेतना होती तो भूतोसे चैतन्य उत्पन्न होता है ऐसा पक्ष सिद्ध करनेमे वह समुचित उदाहरण मानी जाती परतु मदशक्ति अचेतन है, इसलिये चैतन्यके साथ उसका दृष्टान्त देना विषम पडता है। गोमयसे विच्छ आदि जीव उत्पन्न होते हैं ऐसा कहनाभी युक्तियुक्त नहीं है । गोमयसे विच्छुका शरीर उत्पन्न होता है । विच्छुका आत्मा गोमयसे उत्पन्न नहीं होता । चैतन्य करनेमे गोमय असमर्थ है । पूर्वशरीर छोडकर गोमयसे बने हुए शरीरमे आत्मा आकर उसको धारण करता है। न कि स्वय उससे उत्पन्न होता है । अन्यथा माता पिताके रजवीर्यसे पुत्रका आत्मा उत्पन्न हुआ ऐसा मानना पडेगा ।। ४०-४१ ।। जन्मसे लेकर मरणतक चैतन्य सिद्ध है परतु उसके आगे वही यह है ऐसी सिद्धि नही होती " ऐसा यदि कहोगे तो आगे उसका अभाव मानना पडेगा । परतु मृत्युके अनतरभी वह नष्ट नही होता अर्थात् उसकी सत्ता पूर्वशरीर छूटनेपरभी रहती है अन्यथा नवीन शरीरमे वह कैसे प्रगट होगा ? ।। ४२ ।। आत्मा नवीन शरीरमे पूर्व शरीरको छोडकर आता है। इसलिये घटादिके समान वह सान्त नहीं है । वह सत् पदार्थ द्रव्यरूप होनेसे उसकी उत्पत्ति नही होती है अर्थात् आत्मा अनादि निधन है । वह यद्यपि पूर्वशरीर छोडता है और नवीन शरीर धारण करता है तथापि पूर्व शरीरके विनाशसे उसका नाश और नवीन शरीरकी उत्पत्तिसे उसकी उत्पत्ति नही होती। पूर्व-देव पर्यायका विनाश और मनुष्यपर्यायकी उत्पत्ति होनेपरभी वही आत्मा है, जो देवपर्यायमे था । इसलिये पूर्वकाही यह आत्मा है ऐसा माननेमे कुछ विसगति नही दिखती । देहसे आत्मा कथञ्चिद् भिन्न और कथञ्चिद् अभिन्न मानना चाहिये । सर्वथा देहसे आत्मा भिन्न है ऐसा --- १ आ न हेतुत्व हि चेतने ७६) सिद्धान्तसार (६. ४४- तद्विघातात्ततो हिंसा प्राणिनामपकारिणी । अनिवार्या भवेत्त्रेधा वर्जनीया ततः सताम् ॥ ४४ यद्वदन्ति च नो कर्म विद्यते 'दुष्टकारणम् । तद्भावे हि लोकानां कथं हिंसादिवर्जनम् ॥ ४५ तन्न युक्तं हि जीवस्य हीनस्थानपरिग्रहात् । एतत्पूर्वकृत कर्म विना नैव हि जायते ।। ४६ अथ सत्त्वेऽपि नो कार्य किञ्चित्तत्कुरुते स्वतः । अचेतनत्वारिक क्वापि कुर्वनिह घटादिकम् ।। एषा भाषापि मोहात्मतमश्च्छन्नात्मनां मता। यतोऽस्ति साधकं साधु प्रमाणं बाधवजितम् ॥४८ विषवाय्वग्निजातानां विकारं कुर्वतां सताम् । अचेतनानां किं कर्म स्वकार्य कुरुते न हि ॥ ४९ २ माननेपर शरीरको तोडकर आत्मासे अलग करनेपर हिंसा नही होगी तथा आत्मा और शरीर अन्योन्यसे अभिन्न माननेपर शरीरनाशसे उसकाभी सर्वथा नाश होगा। इसलिये आत्माका शरीरसे सबध होनेसे वह शरीरसे कथञ्चिद् भिन्नाभिन्न माननेसे शरीरका विघात होनेसे आत्माकाभी घात होता है, हिंसा होती है और वह प्राणियोको अपकार करनेवाली होती है। जो हिंसक है उसको वह हिसा नरकादि दुर्गतिमे दुख देती है । तथा जिसका घात किया जाता है वह सक्लेश परिणामसे-आरौिद्रध्यानसे मरण करता है । अत. वहभी ससारमे घुमता है । परंतु जिसकी हिंसा हो रही है वह यदि समदर्शी होगा तो उसमे रागद्वेप उत्पन्न न होनेसे दुर्गतिप्रापक कर्मबंध उसे नही होगा । प्राणिका घात होनेसे हिंसा होती है । उस हिंसाको सज्जन मन, वचन और कायसे त्यागे ॥ ४३-४४ ॥ कई लोग ऐसा कहते है कि नोकर्मरूप शरीर दोषका कारण है यदि उस शरीरका अभाव हो जायगा तो लोगोको हिंसादित्याग करनेकी क्या जरूरत है ? परतु ऐसा कहना योग्य नही । आत्मा और शरीर एक क्षेत्रावगाही हैं । इसलिये शरीरविनाशसे आत्माका विनाश होगाही, यानी आत्मघात होगा ॥ ४५ ॥ जीवने हीनस्थानका-शरीरका स्वीकार किया है और यह शरीर पूर्वकृत कर्मके विना प्राप्त नही होता । कदाचित् कोई यह कहेगा कि कर्म अचेतन है, इसलिये वह स्वत कुछभी कार्य करनेमे समर्थ नही है । क्या घटादिक पदार्थ यहा कुछ कार्य करते हुए दिखते है ? ॥४६-४७॥ कुछ वादियोका ऐसा कहनाभी मोहसेही है । कर्म अचेतन होकरभी अनेक प्रकारका कार्य करता है । इस विषयमे वाधावर्जित और साधक प्रमाण है । जैसे-विष, वायु, अग्नि आदि पदार्थोका समूह अचेतन होकरभी मरण, हरण, दहन आदि कार्य करता हुआ देखा जाता है। वैसे यह कर्मभी ज्ञानको आच्छादित करना आदि अनेक प्रकारका कार्य करता हुआ क्या नही दिखता है ? ॥ ४८-४९ ॥ ? १ आ दुखकारणम् २ आ कुर्वन्तीह घटादय ३ आ विषमद्याग्निजाताना -४ ५५) सिद्धान्तसार (ওও १ कालोऽप्यचेतन. किं न भावाना नवजीर्णताम् । करोति कर्म' येनेदं कुर्वत्कार्य न मन्यते ॥ ५० विचित्रसुखदुःखादि जीवाना कार्यमजितम् । विचित्रं कारण किञ्चिहिना नवोपजायते ॥५१ नित्यो व्यापीत्यकर्ता च न क्रियावानमूर्तिकः । भोक्तेति गुणयुक्तोऽपि निर्गुणो यैनिगद्यते ॥ ५२ मूच्छिता इव ते लोके सुरामदनकोद्रव । रवोक्तमपि न जानन्ति मौन्यहं निगदग्निव ॥ ५३ यद्यकर्ता कय भोक्ता भोक्तृत्वं विदधन्नपि । अक्रियोऽपि कय स स्याहन्धाभावप्रसङ्गत ॥५४ अथेदमुच्यते नात्मा कर्मणा वध्यते क्वचित् । अमूर्तत्वात्खवत्तस्मानप दोषो मत. सताम् ॥ ५५ कालभी अचेतन है तथा वह पदार्थोमे नवीनता और जीर्णता क्या उत्पन्न नही करता है ? जिससे यह कर्म कुछ कार्य नहीं करता है ऐसा कहते हो? ॥ ५० ॥ ? जीवोमे नानाविध मुखदुःखादिक कार्य होते हुए दिखते हैं । वे कारणोंके वैचित्र्यसेही दिखते हैं । अर्थात् कर्ममे यदि हर्पविपादादि उत्पन्न करनेके नाना स्वभाव नही होते, तो वे कार्य कैसे दृष्टिगोचर होते ? अत कर्म अचेतन होकरभी विप, अग्नि, वायु, काल आदिके समान नाना कार्य करनेमे समर्थ है, इसलिये अचेतन होनेसे कर्म कार्य करनेसे असमर्थ है ऐसी भापा योग्य नहीं है। यहांतक चार्वाकका ' आत्मा नही है ' इस पक्षका खडन कर आत्माकी सिद्धि जैनोने की है। अब सान्योने आत्माका जो स्वरूप नित्य अमूर्तिक, व्यापक, अकर्ता इत्यादि स्प कहा है उसका खण्डन जैन करते है- ( साख्यमत आत्माके विपयमे ऐसा है )- आत्मा नित्य, व्यापी, अकर्ता, अक्रियावान्, अमूर्तिक, भोक्ता ऐसे गुणोसे युक्त है और निर्गुणभी है ऐसा साख्य कहते है, वे मदिरा, धत्तूर, और कोद्रवभक्षणमे मानो मूच्छित हुए है, क्योकि वे गब्दसे स्वय कहा हुआभी नहीं जानते । मैं मौनी हू ऐमा कहनेवालेके समान वे दिखते है ।। ५१-५३ ।। यदिआप आत्माको अकर्ता अर्थात् कुछ चटपटादि अथवा सुखदु खादिकोका कर्ता नही मानते है, तो वह भोक्ता कैसे होगा? भोगनेकी क्रिया करनेवाला जो है, उसे भोक्ता कहते हैं। जाननेकी क्रिया करनेवाले उमे ज्ञाता कहते है, देखनेकी क्रिया करनेवाला जो है उसे द्रष्टा कहते हैं, वैसे भोगनेकी क्रिया करनेवाला उमे भोक्ता मानना चाहिये । अर्थात् जानना, देखना और भोगना आदिक क्रियाओका कर्तृत्व मानकर फिरभी आत्माको अकर्ता मानना लज्जाजनक है । अर्थात् आत्माको भोक्तृत्व, ज्ञातृत्व, द्रष्टुत्व ये कर्तृत्वके विना मानना युक्तिसगत नही है । इसलिये साख्योका आत्माका अकर्तृत्व मत योग्य नही है। यदि आत्मा अक्रियावान है, तो उसे वधाभावका प्रसग आवेगा । अर्थात् आत्मा वधरहित है ऐसा मानना पडेगा । ऐसा दोप प्राप्त १ आ कार्य येनेद २ आ मूर्जिनम् ३ आ स्वोक्न ७८) सिद्धान्तसार (४.५६- बध्यते प्रकृतिमूर्तकर्मणा' मुच्यते च सा । सम्बन्धः सर्वदा दृष्टो मूर्तेष्वेव न चान्यथा ॥५६ स्यान्मतं प्रकृतिः सर्वा ज्ञानशून्या त्वचेतना । कथं क्रियावती येन कर्म बध्नाति मुञ्चति ॥५७ नैष दोषो यतः सैव सर्वज्ञा तत्त्वदशिनी। जगन्नितिका नित्या सर्वसंहारकारिणी ॥ ५८ प्रकृतेर्महान्बुद्धयात्मा ततोऽहङकार इत्यपि । गुणः षोडशकस्तस्मात्पञ्चभ्यो भूतपञ्चकम् ॥५९ एष स्पष्टक्रमो यस्या व्यावृत्तिः संहृतिस्तथा । सत्त्वं रजस्तमश्चेति प्रकृतिः सर्वमुतोखी ॥६० सिद्धव प्रकृतिः सम्यक् प्रसादाद्युपदर्शनात् । व्यक्तस्य कारणं तेषु तदन्वयविलोकनात् ।। ६१ एतत्सर्वं हि सांख्यानां प्रमाणातिगतं भुवि । मिथ्याशल्यानुविद्धानां आक्रन्द इव लक्ष्यते ॥ ६२ अमूर्तो बध्यते नैव कर्मणा नेति सुन्दरम् । अमूर्तचेतनाशक्तेमद्यादेबन्धदर्शनात् ॥ ६३ होनेपर वे जैनोको कहते है कि, आत्मा कर्मसे किसी स्थानमे और कभी बद्ध नही होता है, क्योकि वह अमूर्त है । जैसे आकाश अमूर्त होनेसे निर्लेप है उसे कर्मवध नही होता है । अर्थात् आत्मा सदैव बधरहित है । जो वद्ध होती है वह प्रकृति है, वह कर्मसे बद्ध होती है और मुक्तभी होती है । कर्म मूर्त है और मूर्त-पदार्थमे उसका वध दिखता है । अमूर्त आकाश और अमूर्त आत्मामे उसका बध नही दिखता है ।। ५४-५६ ।। ? इसके ऊपर जैन पुन ऐसा कहते हैं कि, तुम्हारी मानी हुई प्रकृति सर्वज्ञानसे शून्य है और अचेतन है। इसलिये वह क्रिया करनेका ज्ञान नही होनेसे क्रियावती कैसी होगी ? जिससे वह कर्म बाध लेती है और उससे मुक्तभी होती है इस शंकाका उत्तर साख्य इसप्रकार देते है। आप जो कह रहे हैं, वह दोष नही है अर्थात् प्रकृतिको आप असर्वज्ञ कहते हैं यह उचित नही है, क्योकि 'वही सर्वज्ञ है, तत्त्वोको देखनेवाली है, जगत्को निर्माण करती है, नित्य है और सर्व वस्तुओका सहार करती है ऐसा उसका स्वरूप है । उस प्रकृतिसे बुद्धिस्वरूप महान् नामक तत्त्व उत्पन्न होता है। विषयोका जानना-निश्चित करना यह बुद्धिका कार्य है । इस बुद्धिसे अहकार उत्पन्न होता है, " मैं सुदर हू, मै दर्शनीय हू" ऐसा जो अभिमान उसे अहकार कहते है । इस अहंकारसे षोडशक गण उत्पन्न होता है अर्थात् अहकारसे पाच तन्मात्रा-शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गध यह तन्मात्राओका स्वरूप है । तथा इस अहकारसे ग्यारह इद्रिया, पाच बुद्धीन्द्रिया कान, स्पर्शन, आखे, जिह्वा और नाक, पाच कर्मोन्द्रिया-भाषा, हाथ, पाव, गुदद्वार और उपस्थ, तथा मन-अनेक प्रकारके सकल्प करना-विचार करना मनका कार्य है । जैसे- मै भोजनके लिये उस घरमे जाऊगा । वहा आज दही खानेको मिलेगा या गुड मिलेगा' इस प्रकारके सङ्कल्प मनमे उत्पन्न होते है । पाच तन्मात्राओसे पाच भूतोकी सृष्टि होती है । जैसे शब्दसे आकाश, स्पर्शसे वायु, रूपसे तेज, रससे जल और गन्धसे पृथ्वी उत्पन्न होती है। इसप्रकार प्रकृतिका जन्यपरिवार है । प्रकृतिसे सृष्टिक्रम इसप्रकारसे उत्पन्न होता है । और. १ आ मूर्ता २ तु ३ आ र्मता ४ आ सृष्टि ५ आ प्रकृति सिद्धव -४ ६६) सिद्धान्तसार (७९ अमूर्ततापि नो तस्य सर्वथा युक्तिमृच्छति । रूपस्पर्शामिकामूर्तेरेवाभावात्परात्मनि ॥ ६४ प्रधानं कर्म बध्नाति तन्मिथ्याजल्पजल्पितम् । न ह्यज्ञानं विजानाति हेयादेयपरिग्रहम् ॥ ६५ अचेतनत्वादज्ञानं तत्प्रधानमिति ध्रुवम् । स्तम्भकुम्भादयो भावाः किं क्वापि ज्ञानशालिनः॥६६ - जव सहार होता है तब ये सृष्ट हुए बुद्धयादिकतत्त्व प्रकृतिमे अन्तर्भूत होते हैं उससे अलग नही रहते । प्रकृतिके सत्व, रजस् और तमस् ऐसे तीनस्वभाव हैं-गुण है । महदादिकोको व्यक्त कहते है क्योकि वे दिखते है-प्रकट होते हैं । प्रकृतिको अव्यक्त कहते हैं उसे सामान्यभी बोलते है । प्रकृति व्यापक और क्रियारहित है, बुद्धयादिक व्यापक नही हैं । प्रकृति कारण है, वुद्धयादिक कार्य है। प्रसादादिक दिखते हैं, इसलिये प्रकृति तत्त्व सिद्ध होता है । व्यक्त जो महदादिक उनकी प्रकृति कारण है । क्योंकि प्रकृतिका महदादिकोमे अन्वय-सवध दिखता है । जैसे स्थास, कोश, कुसूल, घट आदिकोमे मृत्तिकाका सवध दीख पडता है । इत्यादिक प्रकृतितत्त्वका जो साख्योने वर्णन किया है, वह प्रमाणका उल्लघन करनेवाला है अर्थात् युक्तियुक्त नही है । मिथ्यात्व शल्यसे-मिथ्यात्व बाणसे विद्ध होनेसे उनका तज्जात वेदनासे मानो चिल्लाना है ॥ ५७-६३ ॥ ( उपर्युक्त प्रकृतिवादका जैन खण्डन करते है )- अमूर्त आत्मा कर्मोसे वद्ध नही होता ऐसा वचन सुदर युक्तिसगत नही है । अमूर्त ऐसी जो आत्माकी चेतनाशक्ति है, वह मद्यादिकमे उन्मत्त होती है ऐसा दिखता है । इसलिये उसमे बधका-कर्मवधका दर्शन होता है। अर्थात् आत्मा अमूर्त होनेसे वह कर्मवद्ध नही होता, ऐसा नही कहना चाहिये । आत्मा अमूर्तिक है यह कहनाभी सर्वथा युक्तियुक्त नही है । अर्थात् आत्मा कथञ्चित् मूर्तिक है और कथञ्चित् अमूर्तिक है । रूप, रस, गध, स्पर्श जिसमे रहते हैं वह मूर्ति है । ऐसी मूर्ति परमात्मामे-ससार- रहित जीवोमे नही होती, इसलिये सिद्ध परमेष्ठी अमूर्तिक है और कर्मवधरहित हैं । परतु मसारी आत्मा रूपस्पर्शादिकसे युक्त होनेसे मूर्तिक है और उसमे कर्मवध दिखता है । भावार्थ यह है, कि आत्मा अमूर्तिक होनेपरभी वीजाकुरके समान अनादिकालसे मूर्तिक कर्मसे नीरक्षीरके समान एकरूप हो गया है। इसलिये कथञ्चिन्मूर्तिक है, रूपादिमान् है । कर्मके साथ अन्योन्य- प्रदेशोका प्रवेशरूप एकत्वपरिणमन हुआ है । इसलिये कथचिन्मूर्तिक होता हुआ यह आत्मा वन्धको प्राप्त हुआ हैं ।। ६४ ।। प्रधान कर्मवद्ध होता है, यह कहना मिथ्या है । क्योकि प्रधान-प्रकृति अचेतन है । अज्ञान है, इसलिये ग्राह्याग्राह्य वोध उसे कैसे होगा ? अचेतन होनेसे वह प्रधान निश्चयसे अज्ञान है । स्तम, कुभ, आदिक पदार्थ क्या कहा ज्ञानी देखे गये है ?॥ ६५ ।। यह प्रधान-प्रकृति व्यक्त स्वरूपवाले बुद्धि, अहकार तन्मात्रादिकोकी उत्पत्तिमे हेतु नही है, क्योकि वह सर्वथा नित्य है । जो सर्वथा नित्य है वह कदापि विकारयुक्त नही होगा। १ आब्रुवन् ८०) (४. ६७- सिद्धान्तसार प्रधानं व्यक्तरूपाणां न हेतुर्महदादिनाम् । नित्यत्वात्तस्य सर्वत्र विकारानुपपत्तितः ॥ ६७ प्रमाणाभावतस्तस्याप्यभावो धीमता मतः । ततो वन्ध्यासुतस्याङ्गव्यावर्णनमिवाखिलम् ।। ६८ प्रसादाद्यनुमानं यत्प्रसाधकमितीरितम् । तन्न सत्यं यतोऽनेन ह्यात्मा भवति साधितः ॥ ६९ यतो हर्षविषादाद्या. सर्वे ह्यात्मविवर्तकाः । सिद्धास्तदन्वयादेव' घटे चानुपलम्भतः ॥ ७० प्रधानं कर्म बध्नाति भोक्तात्मेति प्रजल्पतः । सांख्यस्य सत्यमायातं लोकवाक्यमिदं भुवि ॥ ७१ अप्रगो हरते भारं मुहुःस्वनति पृष्ठतः । भुक्तिक्रियां करोत्यन्यस्तृप्तिमन्योऽधिगच्छति ॥ ७२ ततोऽहिंसावतं नास्ति कापिलानां मते क्वचित् । नित्यस्य व्यापिनस्तस्य प्रघातानुपपत्तितः।।७३ २ .. नित्य पदार्थ अपने एकरूपसे दुसरे स्वरूपमे आताही नही है । अतः प्रकृति कालत्रयमेभी महदादिक तत्त्वोकी जननी नही हो सकती। तथा सर्वथा नित्य प्रकृति तत्त्व सिद्धिके लिये कोईभी प्रमाण नही होनेसे बुद्धिमानोने प्रकृतितत्त्वका अभाव माना है। इसलिये प्रकृति महदादिकोकी जननी है इत्यादि सकल वर्णन वन्ध्यापुत्रके अगवर्णनके समान है, ऐसा समझना चाहिये ॥ ६६-६८॥ प्रसादादिक गुण देखकर प्रकृतिकी सत्ताका जो अनुमान कहा गया है, वहभी सत्य नही है । इस अनुमानसे प्रकृतिकी सिद्धि नही होती, प्रत्युत यह अनुमान आत्माको सिद्ध करता है। क्योकि हर्षविषादादिक आत्मामे देखे जाते है, घटपटादिक अचेतन पदार्थोमे नही और वे पर्याय जीवकेही है और क्रमसे उत्पन्न होते हैं । क्योकि हर्ष और विषाद परस्पर विरुद्ध हैं । जो पर्याये परस्पर विरुद्ध होती है, वे युगपत् एक पदार्थमे नही दिखती । अत. आत्मा हर्षविषादादि पर्यायोसे परिणत होता है। जिनका जिनके साथ सबध होता है वे उनको छोडकर अन्यत्र नही उपलब्ध होगे । घटमे स्पर्शादिकोका सबध रहता है। अतः उसको छोडकर आत्मादिकमे वे नही रहते है । वैसेहि हर्षविषादादिक आत्माके धर्म हैं वे प्रकृतिमे नही रहेगे ।। ६९-७० ॥ 'प्रधानको तो कर्मबध होता है, और उसका अनुभव-भोग आत्माको लेना पडता है,' ऐसा बोलनेवाले साख्यका यह वचन यदि सत्य है, तो यह लोकवाक्यभी सत्य क्यो नही मानना चाहिये, कि " आगेका पुरुष तो भार बहता है, और पीछेका मनुष्य उस भारसे चिल्लाता है। एक मनुष्य प्रियभोजन कर रहा है और दुसरे मनुष्यको उससे तृप्ति हो रही है " तात्पर्य यह, कि आत्माकोही बध और मोक्ष मानना चाहिये । आत्माकोही सर्वज्ञता प्राप्त होती है । अचेतन प्रकृतिको सर्वज्ञता मानना अत्यत मूर्खता है ।। ७१-७२ ।। इसलिये कापिलोंके मतसे आत्मा नित्य और व्यापी होनेसे अहिंसा व्रत उसे नहीं है क्योकि आत्मा नित्य होनेसे हिंसाही नही होती है, तो व्रत कैसा होगा ? हिंसाका त्याग करनेसे अहिंसा व्रत होता है । त्याग और स्वीकार ये दो पर्याये हैं । नित्य पदार्थमे परिणमन न होनेसे पूर्व पर्यायका त्याग और उत्तरका स्वीकार हो नहीं सकता जिससे कापिलमतकी सिद्धि नहीं होती है ।। ७३ ॥ १. मा. तदन्वयत्वेन २ आ वर्तमानस्य सर्वदा -४ ७९) सिद्धान्तसार (८१ नित्यानित्यमतस्तत्त्वं निरपेक्षं परस्परम् । येषा मिथ्यादृशस्तेऽपि सर्वे नयविधाततः ॥ ७४ त सर्वज्ञमृते देवं वीतराग जिनेश्वरम् । मिथ्यात्वमिति जल्पन्ति सम्यग्ज्ञानातिगाः परे ।। ७५ वदन्त्यन्ये न सर्वज्ञो वीतरागोऽस्ति कश्चन । प्रमाणपञ्चकाभावादभावेन विभावितः ॥ ७६ तथा ह्यध्यक्षत. सिद्धि. सर्वक्षे नोपजायते । रूपादिनियतानेकविषयत्वेन तस्य च ॥ ७७ सबद्धवर्तमानत्वपरत्वानास्य साधकम् । तत्प्रत्यक्षमसबद्धवर्तमानत्वतः सदा ॥ ७८ नैवानुमानतः सिद्धिः सर्वविद्विषया क्वचित् । यल्लिङ्गाल्लिङ्गिनि ज्ञानमनुमान प्रजायते ॥ ७९ सर्वथा नित्यवादी और सर्वथा अनित्यवादी दोनोही मिथ्यादृष्टी हैं परतु जो पदार्थोंको नित्यानित्य मानते है वे तो मिथ्यादृष्टि नहीं है ऐसा कहना योग्य नही। निरपेक्ष नित्यानित्यवाद भी सर्वथा नित्यवाद और सर्वथा अनित्यवादके समान मिथ्याही है, क्योकि अपेक्षाके बिना नित्यानित्य वस्तु माननेसे सर्व नयोका घात होता है ।। ७४ ।। जो सम्यग्ज्ञानसे रहित है ऐसे लोग रागद्वेषरहित सर्वज्ञ जिनेश्वरको न मानकर अर्थात् उनके मतका स्वीकार न करके उपर्युक्त प्रकारसे मिथ्यात्वकी कल्पना करते है ।। ७५ ॥ (सर्वज्ञके विषयमे मीमासकोका पूर्वपक्ष ।)- अन्य-मीमासक वीतराग और सर्वज्ञ कोई है ही नही' ऐसा कहते हैं " प्रत्यक्ष प्रमाण, अनुमान प्रमाण, प्रत्यभिज्ञा प्रमाण, आगम प्रमाण और अर्थापत्ति प्रमाण इन पाचो प्रमाणोसेभी सर्वज्ञ सिद्ध नही होता" अत अभाव प्रमाणसे उसका अभाव सिद्ध होता है, यह मीमासकोका मत है । वे क्रमसे पाचो प्रमाणोके द्वारा सर्वज्ञका अभाव सिद्ध करते है ।। ७६ ।। प्रत्यक्षप्रमाणसे सर्वज्ञकी सिद्धि नही होती, अर्थात् प्रत्यक्ष प्रमाण सर्वज्ञकी सिद्धि नही कर सकता, क्योकि प्रत्यक्ष प्रमाण रूप, रस, गध और स्पर्श इन नियत विषयोको जानता है। अर्थात् रूपरसादिकके समान सर्वज्ञ इद्रियप्रत्यक्षसे जानने योग्य वस्तु नही है । अत अध्यक्ष प्रमाण सर्वज्ञकी सिद्धि करनेमे असमर्थ है। प्रत्यक्ष प्रमाण सम्वद्ध और वर्तमानकालीन रूपादि विषयोको जानता है अर्थात् वर्तमान घटके रूपका चक्षुसे सम्बन्ध होता है, तब चक्षु प्रत्यक्ष यह काला घट है, यह पीला घट है, ऐसा जानता है। परतु सर्वज्ञ असबद्ध है और वर्तमानकालमे विद्यमान नही है इसलिये प्रत्यक्षका विषय नही होता है ॥ ७७-७८ ॥ अनुमानके द्वारा सर्वज्ञ विषयकी सिद्धि होगी ऐसाभी नही कह सकते है। "लिंगज्ञानसे लिंगीका ज्ञान होना अनुमान है । धूमरूप लिंग देखकर पर्वतपर अग्निरूप लिंगीको सिद्ध करना अनुमान है । ऐसा कोई अनुमान-ज्ञानभी सर्वज्ञकी सिद्धिमे उपयुक्त नहीं है । सर्वज्ञका कोई Roman- १ आ वर्तमानस्य सर्वदा २ आ यल्लिङ्गिर्मिणि ज्ञान SS.11 ४. ८०- सिद्धान्तसारः ८२) स्वभावकार्यरूपं वा न तल्लिङ्ग विलोक्यते । ततस्तस्य कुतः सिद्धिरनुमानुपपत्तितः ॥ ८० आगमादपि नो सिद्धिर्जायते सर्ववेदिनः । स च नित्यो ह्यनित्यो वा तत्स्वभावं' विभावयेत् ॥८१ नानित्योऽनादिरूपत्वादर्थवादप्ररूपणात् । आदिमत्पुरुषेणास्य वाचकत्वविरोधतः ॥८२ तदुक्तानुक्तभेदाभ्यामनित्यो नास्य साधकः । अन्योन्याश्रयतस्तस्य प्रामाण्याभावतस्ततः ॥ ८३ नैवार्थापत्तिरप्यस्य सर्वज्ञस्यावबोधिका । अनन्यथाभवस्येह सर्वार्थस्याप्यभावतः ॥ ८४ धर्मादरुपदेशस्य मिथ्यात्वेनापि दर्शनात् । सर्वत्र व्यभिचारित्वात्कथं तस्मात्तदन्वयः ॥ ८५ - स्वभाव अथवा सर्वज्ञका कोई कार्य लिंग होकर उससे लिंगिरूप सर्वज्ञ-यदि जाना जाता, तो अनुमानसे सर्वज्ञकी सिद्धि होती परंतु ऐसा कोई लिंगभी नहीं है, जो सर्वज्ञको सिद्ध करेगा। अतः उसकी कहांसे सिद्धि होगी ? ।। ७९-८० ।। ? सर्वज्ञकी सिद्धि आगमसेभी नहीं होती। आगमके नित्य अनित्य दो भेद हैं। नित्य- आगम सर्वज्ञके स्वभावको जानता है अथवा अनित्य आगम उसके स्वभावको जानता है ? नित्य आगम सर्वज्ञको विषय नहीं करता ; क्योंकि वह आगम अनादि-स्वरूपका है, तथा वह अर्थ- वादका निरूपण करता है, यज्ञकी स्तुति करता है । यज्ञ सर्वज्ञ शब्दसे वाच्य होता है, तथा यज्ञकी महिमा गानेके लिये वह नित्य आगम है । सर्वज्ञ आदिमान् पुरुष है और वेद अनादि है। अनादि वेदसे आदिमान् सर्वज्ञ वाच्य कैसे होगा ? ।। ८१-८२ ।। अनित्य-आगम सर्वसाधक माननेपर उसके दो भेद होते हैं। एक सर्वज्ञ-प्रणीत अनित्य-आगम और एक असर्वज्ञ-प्रणीत अनित्य-आगम । प्रथम पक्षमें अन्योन्याश्रय दोष उत्पन्न होता है । प्रथम सर्वज्ञसिद्धि होनेपर आगमका सर्वज्ञप्रणीतत्व सिद्ध होगा। और उसकी सिद्धि होनेपर उस आगमकी प्रामाण्यसिद्धि होगी, प्रामाण्यसिद्धि होनेपर उस आगमसे सर्वज्ञसिद्धि होगी। असर्वज्ञप्रणीत आगमसे सर्वज्ञसिद्धि नहीं हो सकती; क्योंकि असर्वज्ञप्रणीत आगमको प्रमाणता आ नहीं सकती । अप्रमाणभूत आगम सर्वज्ञको कैसे सिद्ध कर सकेगा? ।। ८३ ।। अर्थापत्ति नामक प्रमाणसे सर्वज्ञकी सिद्धि होगी, ऐसाभी आप नहीं कह सकते । क्योंकि सर्वज्ञके बिना नहीं होनेवाले संपूर्ण पदार्थोंका अभाव है। ऐसा कोईभी पदार्थ नहीं है, कि जिसके होनेपर सर्वज्ञकी सिद्धि हो सकेगी। कदाचित् जैन यहां कहेंगे कि सर्वज्ञका धर्मादिका उपदेश अबभी विद्यमान है और उससे सर्वज्ञ सिद्ध हो सकता है। परंतु वह उपदेश सच्चा है, ऐसा जैन नहीं समझे; क्योंकि मिथ्या उपदेशभी देखा जाता है। इसवास्ते मिथ्या उपदेशसे सर्वज्ञत्वका व्यभिचार होनेसे अर्थात् असर्वज्ञमें मिथ्या उपदेशके होनेसे सर्वज्ञके साथ उपदेशका संबंध नहीं रहता । अतः उपदेशभी सर्वज्ञसाधक नहीं है ।। ८४-८५ ॥ १ आ. अनुमानानुत्पत्तितः २ आ. तत्सद्भावं -४ ९३) सिद्धान्तसार (८३ - ततोऽभावप्रमाणस्य प्रवृत्तिरनिवारिता । सर्वज्ञविषया चेति तदभावो विभाव्यते ॥ ८६ तदेतत्सर्वमिथ्यात्वमहारागहतात्मनाम् । वपरीत्यं विभात्येव सर्वथा वेदवादिनाम् ॥ ८७ कश्चित्पुमानशेषज. प्रमाणाबाधितत्वतः। न चासिद्धमिदं तावत्कस्यचिद्वाधकात्ययात् ॥८८ प्रत्यक्ष बाधक तस्य नैषा भाषापि युज्यते । तद्विषयं भवेदेतत्तस्य प्रत्युत साधकम् ॥ ८९ अतद्विषयताया हि प्रत्यक्षस्य न जायते । सर्वसाधकत्व वा बाधकत्वं कदाचन ॥ ९० नैवानुमानबाधापि सर्वज्ञप्रतिषेधिनी । सर्वदातीन्द्रियत्वेन तस्य तत्राप्रवर्तनात् ॥ ९१ साध्यसाधनयोस्तावत्क्वचिदेकत्र दर्शनात् । ततः साधनतः साध्यविज्ञानं जायते पुनः ॥ ९२ सर्वज्ञस्य तु चेल्लिङ्गं सर्वज्ञाभावसाधकम् । तद्विरुद्धं ततोऽन्यच्च कथ सर्वज्ञभाषितम् ॥ ९३ सर्वज्ञमे अभाव प्रमाणको प्रवृत्ति अनिवार्य है । उसे कोई रोक नहीं सकता। इसलिये अभाव प्रमाणसे सर्वज्ञका अभाव सिद्ध हुआ ॥ ८६ ॥ यह मीमासकोका सर्वज्ञाभावके विषयमे जो कहना है वह योग्य नहीं है । सपूर्ण मिथ्यात्वरूप महारोगसे जो घाते गये ऐसे वेदप्रामाण्य माननेवाले मीमासकोका यह कहना सर्वथा विपरीत है ।। ८७ ॥ (जैन सर्वज्ञ सिद्ध करते है। )- कोई पुरुष सर्वज्ञ है, क्योकि किसीभी प्रमाणसे उसका सर्वज्ञपना वाधित नहीं होता। यहा 'प्रमाणावाधितत्त्व' हेतु जो जैनोने सर्वज्ञत्त्वकी सिद्धिमे दिया है वह असिद्ध नहीं है, क्योकि इस हेतुमे किसीभी बाधकका सभव नही है । सब वाधकोका अभाव हो गया है ।। ८८ ॥ प्रत्यक्ष प्रमाण उस सर्वज्ञका वाधक है, यह भाषाभी योग्य नही । यदि यह प्रमाण सर्वजको विषय करनेवाला है, तो वह उसका साधकही होगा। उससे सर्वज्ञका सद्भावही सिद्ध होगा । अभाव सिद्ध नही होगा । और यदि वह सर्वज्ञको विषय नहीं करता है, तो वह सर्वज्ञ- साधकभी नही है और वाधकभी नही है । जो जिसको जानता है, विषय करता है उससे उसकी सिद्धि होती है। परंतु जो जिसको नही जानता है वह उसका निषेध करनेमे अधिकारी नहीं है। जैसे कर्णेन्द्रिय रूपको जानती नही अर्थात् वह रूपकी न साधकही है और न बाधकही है, वैसे सर्वज्ञको अविषय करनेवाला प्रत्यक्ष सर्वज्ञका न साधक है और न बाधक है ॥ ८९-९० ॥ अनुमान-बाधा सर्वज्ञका प्रतिषेध करेगी ऐसाभी नही कहना चाहिये । क्योकि सर्वज्ञ सदा अतीन्द्रिय होनेसे वाधक अनुमानकी वहा प्रवृत्ति नही होती । जो बाधक अनुमान है उसमे साध्य और साधनकी सिद्धि नही है । अर्थात् सर्वज्ञनिषेधक धर्मी और साधन कोई नही है । वे यदि होते तो पक्षमे उनका दर्शन होता । साधनसे जो साध्य ज्ञान होता है उसे अनुमान प्रमाण कहते है । सर्वज्ञका कोई लिंग-हेतु है, और वह सर्वज्ञका अभाव सिद्ध करता है, ऐसा कहोगे तो वह कहना विरुद्ध होगा। क्योकि सर्वज्ञका लिंग सर्वज्ञके अभावके विरुद्ध सर्वज्ञका सद्भाव सिद्ध करता है। यदि सर्वज्ञसे अन्यवचन होगा तो वह सर्वज्ञभाषित कैसा माना जायगा ॥९१-९३ ॥ १ आ सार्वज्ञ ८४) सिद्धान्तसार. (४. ९४- आगमोऽपि हि नो जातु कृतकश्चेतरोऽपि वा । तस्याबाधां करोत्येष प्रामाण्याभावतस्ततः॥९४ गुणवद्वक्तृकत्वेन तत्प्रामाण्यमुदीरितम् । तस्याभावेऽस्य दुष्टत्वमप्रामाण्यनिषेधनात् ॥ ९५ धर्माद्यतीन्द्रियार्थस्यानन्यथार्थस्य दर्शनात् । अर्थापत्तिस्तु सर्वज्ञसाधिका नैव बाधिका ॥ ९६ अभावोऽपि न सर्वज्ञाभावसिद्धिविधायकः । यतोऽन्यत्रान्यदा तस्य ग्रहणे सति जायते ॥ ९७ अत्राधुना न सर्वज्ञ इत्यप्यामोहजल्पितम् । सिद्धसाधनदोषत्वादुदुष्टमिष्टविघातकृत् ॥ ९८ देशान्तरकालान्तरद्न्यान्तरनिषेधकम् । अखिलशमृते तस्य क्रियते केन कथ्यताम् ॥ ९९ आगम प्रमाणभी सर्वज्ञका वाधक नही है । कृतक आगम और अकृतक आगम ऐसे आगमके दो भेद होते है । कृतक-पौरुषेय आगम; अकृतक-अपौरुषेय-जिसका कर्ता कोई नही है ऐसा आगम, ऐसे दोनों आगमसेभी सर्वज वाध्य नहीं है। क्योकि उनमे स्वयं प्रामाण्यका अभाव है । जो आगम गुणवान् वक्तासे कहा गया है उसमे प्रामाण्य है अर्थात् गुणवान् वक्ता निर्दोष होनेसे उसके वचनोमे प्रामाण्य होता है और ऐसा वक्ता जिस आगमका कर्ता है वह अप्रमाण नहीं हो सकता, अर्थात् ऐसे आगमसे सर्वज्ञकी सिद्धि होती है। यदि आगममे गुणवद्वक्तृत्वका अभाव होगा तो वह आगम दुष्ट होगा-सदोप होगा तथा सदोष आगमका अप्रामाण्य निषिद्ध नही किया जा सकता ।। ९४-९५ ।। धर्म-अधर्म आदिक जो अतीन्द्रिय पदार्थ हैं उनका परिज्ञान सर्वज्ञके विना नही होता अत यह अर्थापत्ति सर्वज्ञकी साधक है, वाधक नही ॥ ९६ ॥ अभावप्रमाणभी सर्वज्ञका अभाव सिद्ध करनेमे समर्थ नही । क्यो कि किसी पदार्थका किसी स्थलमे और किसी कालमे यदि ग्रहण होगा तो अन्यस्थलमे और अन्यकालमे उसका अभाव अभावप्रमाणसे कर सकते हैं। तात्पर्य-अभाव प्रमाण त्रिकालमे और त्रिलोकमे सर्वज्ञका अभाव सिद्ध नही कर सकता। वर्तमानकालमे सर्वज्ञ नहीं दिखता, अत उसका अभाव कहना है, तो वह कथन मोहयुक्त है। वर्तमानमे सर्वज्ञ है ऐसा कौन मानता है? वर्तमानकालमे सर्वज्ञका अभाव है ही। जो अभाव है ही, उसकी सिद्धि करनेका प्रयास करना सिद्धसाधन दोषसे दुष्ट होता है और यह दोष मीमासकके 'सर्वथा सर्वजका अभाव सिद्ध करनेके इष्ट पक्षका' विघातक है ॥ ९७-९८॥ जो सर्वन है वही देशान्तर, कालान्तर, द्रव्यान्तरका निपेघ करेगा अर्थात् जो सर्व देशोको सर्व भूतभविष्यद्वर्तमान कालोको और सपूर्ण द्रव्योंको जानता है, वही 'सर्वज्ञ नही है' ऐसा कह सकेगा । अर्थात् सव जानकर जो सर्वज्ञ नही है ऐसा कहता है वही सर्वज होगा। निसी वस्तुको जानकर कोई उस वस्तुका निषेध या विधि कर सकता है। न जानते हुए किसी वस्तुका निषेध करनेवाले पुरुषको प्रमाण कौन मानेगा? ॥ ९९ ॥ ----- १ आ. निषेधनम् -४ १०५) सिद्धान्तसार (८५ प्रमाणाबाधितत्वेन सर्वज्ञस्य महात्मनः । सिद्धिर्न हन्यते मिथ्यादृष्टिभिर्वेदवादिभिः ॥ १०० अथागमस्य नित्यस्य प्रामाण्यं स्वत एव हि । अपौरुषेयतस्तस्माद्धर्माद्यर्थेषु सत्प्रमा ॥ १०१ अपौरुषेयता तस्य सद्भिः शब्दस्य सर्वथा । नित्यत्वात्कथिता तद्धि वर्णानां नित्यधर्मतः॥ १०२ तदेवेदमिति व्यक्ता देशकालान्तरेऽपि या।प्रत्यभिज्ञा ततः शब्दो नित्यो व्यापी सवर्णकः॥१०३ अभिव्यञ्जकवायूनां नियतत्वान्न सर्वदा । सर्वत्र श्रवणं तेषामिति वाचो विपश्चिताम् १०४ फर्तुरस्मणाद्वापि पौरुषेयत्वनिह्नवः । वेदे भवति किं तस्मात्सर्वज्ञसमवस्थिति ॥ १०५ सर्वज्ञमहात्मा प्रमाणोसे बाधित नही होनेसे उसकी सिद्धि वेदवादी मिथ्यादृष्टियोसे नष्ट नही की जा सकती ।। १०० ।। यहा तक सामान्य सर्वज्ञकी सिद्धि जैनोने की है। इसके अनतर मीमासक 'आगम अपौ- रुषेय है ' ऐसा पूर्व पक्ष स्थापित करते है- आगम नित्य है, क्योकि सज्जनोने शब्द सर्वथा नित्य कहे है और शब्दोकी नित्यता वर्णोंकी नित्यतापर निर्भर है । अर्थात् वर्ण, शब्द और आगम तीनोही नित्य हैं । नित्य आगमका- वेदका प्रामाण्य स्वत ही है, इसलिये वह आगम अपौरुपेय है तथा धर्मादिक अर्थोके प्रतिपादनमे वही प्रमाणभूत है, अन्य नही ।। १०१ ।। शब्द नित्य है, व्यापी है और वर्णसहित है । तथा उसकी नित्यता देश और कालान्तर- मेभी ' वही है' इस प्रकारकी प्रत्यभिज्ञासे सिद्ध होती है । जो शब्द मैने कल सुना था वही शब्द मै आज सुन रहा हू, जो शब्द मैने घरमे सुना था वही शब्द मै आज पाठशालामे सुन रहा हू इस प्रकार शब्दकी नित्यताका द्योतक ज्ञान होता है । वह ज्ञान शब्द नित्य और व्यापक नहीं होता तो कैसे होता ? अत शब्द नित्य है, व्यापी है और वाँसहित है ॥ १०२-१०३ ॥ " यदि शब्द नित्य और व्यापक है तो सर्वकालमे और सर्व स्थानमे उसको लोग क्यो नही सुनते हैं ? अर्थात् शब्द नित्य होनेसे सब जगतके लोग उसे सुन पाते, और व्यापकताभी उसकी प्रकट हो जाती परंतु वैसा वह नही है अत उसको व्यापक और नित्य मानना योग्य नही है " ऐसा जैनके कहनेपर मीमासक उसका उत्तर इस प्रकार देते हैं- " शब्दको प्रगट करनेवाले अभिव्यजक वायु नियत हैं इसलिये शब्दका हमेशा और सर्वस्थानोमे श्रवण नही होता है, ऐसा विद्वानोका कथन है " जव शब्द नित्य है तो वेद शब्दात्मक होनेसे वे भी नित्य हैं, अनादिनिधन और अपौरुषेय हैं । " वेदके कर्ताका स्मरण नहीं होता है " इस अन्य हेतुसेभी उस वेदके पौरु- षेयत्वका निरास होता है । अपौरुषेय वेदसेही सर्व पदार्थोंका ज्ञान होता है । अत सर्वज्ञका अवस्थान माननेकी आवश्यकता नही है ॥ १०४-१०५ ॥ (वेदके अपौरुषेयताका खण्डन)- मोहरूप गाढान्धकारसे व्याप्त हुआ है चित्त जिनका ऐसे मीमासकोका यह कहना है । ये मीमासक नष्टकर्मा और नष्टधर्मा है । अर्थात् इनका कोई कार्य और धर्म सिद्ध नही होता, क्योकि उसका विचार करनेसे वह सिद्ध नहीं होता।। १०६ ।।

८६) सिद्धान्तसार (४ १०६- तदेतदपि मोहान्धतमःसंछन्नचेतसाम् । चेष्टितं नष्टधर्माणां विचारानुपपत्तितः ॥ १०६ नित्यत्वं व्यापकत्वं च यदि स्याद्वर्णशब्दयोः । खण्डश प्रतिपत्तिश्चेत्कथं केन निवार्यते ॥१०७ सर्वत्र सर्वदा तेषां वृत्तित्वात्कथमेकदा । सर्वात्मना प्रतीतिः स्याद्धटादेरनिवारिता ॥१०८ सादृश्ये प्रत्यभिज्ञानमाभासं यत्तदेव हि । ततस्तस्मात्कथं सिद्धिनित्यव्यापित्वदर्शिनी ॥ १०९ तदभिव्यञ्जकानां यनियमायुगपच्छुतिः । तस्मात्तदपि मिथ्यात्वं मत्यज्ञानकवर्तिनाम् ॥ ११० ------ ? वर्ण और शब्दोको नित्य और व्यापक माननेसे उनका खडश ज्ञान होगा यह दोष कैसे दूर किया जावेगा? एक शब्द पूर्णतया कोई मनुष्य नही सुन सकेगा, क्योकि उसका कुछ अश यहा होगा तो कुछ अश अन्यत्र होगा । तथा जो अश जहा होगा वह उतनाही सुना जानेसे वर्णका और शब्दका पूर्ण ज्ञान नही होगा जिससे अर्थपूर्णताका अभाव होगा। और अल्प प्रतिपत्तिसे- ज्ञानसे कोई कार्य किसीसे न किया जायेगा अर्थात् सर्व कार्य अधूरेही रह जायेगे । सर्वत्र और सर्वदा वर्ण और शब्द पूर्ण भरकर रहनेसे एक समयमे और एक स्थानमे संपूर्णतया घटादि पदा- र्थीका ज्ञान बेरोकठोकके एकसाथ कैसे होगा? इसलिये वर्ण और शब्द व्यापक मानना योग्य नही । जैसे घटादिक वा पटादिक पदार्थों का ज्ञान हमको पूर्णरूपसे हो जाता है, वैसेही अक्षरका और शब्दका पूर्ण ज्ञान हो जाता है । अत वह अक्षर और शब्द घटपटादिके समान अनेक और अव्यापक है ऐसाही मानना योग्य है ।। १०७-१०८ ॥ वही यह अक्षर है 'वही यह शब्द है' ऐसा जो प्रत्यभिज्ञान होता है, वह मिथ्या है। यहा सादृश्यमे आपको नम हुआ है इसलिये यह वही शब्द है, यह वही अक्षर है इस तरह एकत्वप्रत्यभिज्ञान होता है, ऐसा आप कहते है। ऐसे भ्रान्त एकत्वप्रत्यभिज्ञानसे अक्षर और शब्दकी नित्यत्व और व्यापित्वकी सिद्धि कैसे होगी ? वही दीप है 'वही नृत्य है' ऐसा प्रत्यभिज्ञान एकत्वका साधक नही है। वैसेही वही शब्द है इत्यादि ज्ञान एकत्वका प्रसाधक नहीं है । अत. शब्द, अक्षर अनेक हैं और अव्यापक है ऐसा समझना चाहिये ॥ १०९ ॥ शब्दको प्रगट करनेवाले अभिव्यजक वायु होनेसे शन्द प्रगट होता है, ऐसा नियम मानना भी योग्य नही है । जैसे दीपक घरमे लानेसे घट दिखताही है, ऐसा नियम नही है क्योकि घट यदि घरमे नही है तो दीपक लानेसेभी नही दिखेगा, अत शब्दको वायु प्रगट करते हैं ऐसा कहना योग्य नही । अर्थात् शब्दको वायु उत्पन्न करते हैं, ऐसाही मानना चाहिये । अभिव्यजक वायुसे शब्द प्रगट होताही है, ऐसा नियमपूर्वक समझना मत्यज्ञान धारण करनेवालोका मिथ्यात्व है अर्थात् शब्दको वायु प्रगट करता है, तथा वह शब्द नित्यव्यापक है, ऐसी कल्पनाभी मिथ्यात्वसे मीमासकोके मनमे प्रगट हुई है ॥ ११० ॥ . - १ मा तमश्च्छन्नकचेतसा २ आ पटादे 1 ८७) सिद्धान्तसार (४ ११४- समानेन्द्रियग्राह्याणां समदेशकवर्तिनाम् । समानधर्मयुक्तानां युगपद्दर्शनादिह ॥ १११ तथा हि श्रोत्रमर्थानां समधर्मकर्तिनाम् । न स्यानियतसंस्कारमिन्द्रियत्वात्सुदृष्टिवत् ॥ ११२ वेदे प्रवाहनित्यत्वमयुक्तं युक्तिदर्शिनाम् । शब्दमात्रविशेषाभ्या विकल्पाभ्यामतिक्रमात् ॥ ११३ शब्दमात्रस्य नित्यत्वे लौकिके' चापि तद्भवेत्। वैदिका एव नित्या स्युःस्वल्पं तदभिधीयते॥११४ . तात्पर्य यह है, कि जो कारक-कारण होते हैं वे नियमसे कार्यको उत्पन्न करते हैं, अन्यथा कारक-कारण और व्यजककारण इनमे अन्तरही न रहेगा और चक्रादिकोका व्यापार व्यर्थ होगा ।। ११० ॥ कर्णके उपर ध्वनियोद्वारा सस्कार किया जाता है, जिससे शब्द प्रगट होता है । यहभी कल्पना अनुचित है, क्योकि यदि ध्वनिके द्वारा कान सस्कृत हुआ तो समान श्रवणधर्म धारण करनेवाले अनेक शब्द युगपत् कानके द्वारा सुने जाने चाहिये। परतु कानसे क्रमसे शब्द सुने जाते हैं, अत कान ध्वनिवायुसे सस्कृत होता हे ऐसा नियम सिद्ध नहीं होता। जैसे आँख इद्रिय है और समानधर्मके पदार्थ अर्थात् देखने योग्य पदार्थोंको अजनसे सस्कृत होकर कुछ पदार्थको देखती है और कुछ पदार्थ उससे नही देखे जाते हैं 'ऐसा नियम नही है' अर्थात् सब पदार्थोंको आँख देखती है और अपने समीपके कुछ पदार्थोंको देखती है, और समीप होते हुएभी कुछ नील धवलादिक पदार्थोंको नही देखती ऐसा कुछ नियम नही । कानभी इद्रिय हैं और आँखभी इद्रिय है तो भी आँखके समान कानभी सब शब्दोको युगपत नही सुनते है । अत यहा इद्रिय-सस्कारोसे शब्द अभिव्यक्त होते हैं, यहभी कल्पना योग्य नहीं हैं। जैसे आँख समानेन्द्रियग्राह्य-चक्षुर्ग्राह्य और समदेशवति सभी नील धवलादि पदार्थोंको इद्रिय होनेसे ग्रहण करती है तो भी वह नियत सस्कार युक्त नही होती है, वैसे कानभी समानेन्द्रियग्राह्य-कर्णेन्द्रियग्राह्य और समान धर्मवाले- श्रावण धर्मवाले सपूर्ण शब्दोको इद्रिय होकर एकदम ग्रहण नहीं करता है अथवा ग्रहणभी करेगा तो भी उसके ऊपर वायुओका सस्कार होगा । तभी वह ग्रहण करता है ऐसा नियम नही है। प्रदीपादिकोसे अनुगृहीत आँख युगपत् अनेक घटादिक पदार्थोंको देखती है, वैसे सस्कृत-ध्वन्यनु- गृहीत कान एक समयमे अनेक शब्द ग्रहण करेगा ऐसा प्रसग आवेगा। इसलिये कान अभिन्नदेशमे स्थित पदार्थोंको शब्दोको ग्रहण करनेके लिये प्रतिनियतसस्कारसे सस्कृत होता है तभी उनको ग्रहण करता है ऐसा नियम नही ॥ १११-११२ ।। मीमासक वेदमे प्रवाहनित्यत्व मानते हैं । वहभी युक्तिसे विचार करनेवाले विद्वानोको अयुक्त दिखता है । शब्दमात्रमे प्रवाहनित्यत्व और शब्दविशेषमे नित्यत्व ऐसे दोनो विकल्पोका यहा उल्लघन होता है अर्थात् दोनोमेभी प्रवाहनित्यत्व सिद्ध नहीं होता। शब्दमात्रमे नित्यत्व १ मा लौकिकेप्वपि ८८) सिद्धान्तसार (४. ११५- .० विशिष्टेष्वपि शब्देषु प्रवाहान्नित्यता यदि । ज्ञाताज्ञातार्थरूपाणामिति प्रश्नद्वयं भवेत् ॥ ११५ अज्ञातार्थे ' च शब्दस्यानप्रामाण्यं कदाचन । ज्ञातार्थत्वं हि नो तेषां तद्वयाख्यातुरभावतः॥११६ तद्वयाख्याता च किञ्चिज्ञश्चेत्कथं तत्प्रमाणता।सर्वज्ञत्वे च सुस्थं स्यात्सर्व सर्वज्ञवादिनाम्॥११७ धर्माद्यतीन्द्रियार्थेषु तस्यैव ज्ञानरूपिणः । प्रामाण्यं न तु शद्वानामज्ञानाचेतनात्मनाम् ।। ११८ ताल्वादिकारणाज्जातः कार्यरूपस्तु सर्वथा। शब्दो नित्यः कथं तेषां मीमांसापक्षवादिनाम्।।११९ तस्मादनित्य एवायं कृतकत्वादिधर्मतः । वदन्त्यकृत्रिमं ये तु तेऽपि मिथ्यादृशः सताम् ॥ १२० -- माननेपर लौकिक शब्दोमेभी नित्यत्व मानना पडेगा और तब वैदिक शब्दही नित्य हैं ऐसा कथन अल्पज्ञानका होगा । शब्दत्व समान होनेपर लौकिक शब्द क्यो अनित्य होवे इस प्रश्नका उत्तर मीमासक क्या देगे? ॥ ११३-११४ ।। कदाचित् विशिष्ट शब्दोमेही प्रवाहनित्यता अनादिकालसे चली आ रही है ऐसा कहोगे, तो जिनका अर्थ जाना गया है ऐसे विशिष्ट शब्दोको प्रवाहनित्य आप मानते है अथवा जिनका अर्थ नही जाना गया ऐसे विशिष्ट शब्द प्रवाहनित्य मानते हैं, ऐसे दो प्रश्न उपस्थित होते हैं ॥ ११५ ॥ जिसका अर्थ नही जाना गया, उसमे कभी प्रामाण्य नही आ सकेगा । क्योकि उसके व्याख्याताका अभाव होनेसे ज्ञानार्थत्व नही है (अर्थात उस पदार्थका ज्ञान नहीं होगा)॥११६॥ उन शब्दोका व्याख्याता कोई असर्वज्ञ होगा, तो उस असर्वजको कौन प्रमाण मानेगा? और वह यदि व्याख्याता सर्वज्ञ होगा, तो वह प्रमाण माना जावेगा और सव घुटाला मिटेगा। अर्थात् सर्वज्ञवादीका पक्ष सिद्ध होगा ॥ ११७ ॥ धर्म-पुण्य, अधर्म-पाप, सूक्ष्म-परमाण्वादिक पदार्थोकी शक्तिया, तथा अग्नि आदिक पदार्थोकी दहनादि शक्तियाँ ये सब अतीन्द्रिय पदार्थ है । उनका निरूपण सर्वज्ञके विना कौन करेगा? उनका ज्ञान करानेका सामर्थ्य सर्वज्ञमेही है, अन्योमे नही है। शब्द अज्ञान और अचेतन हैं। उनमे वक्ताके प्रामाण्यसेही प्रामाण्य आता है, क्योकि सम्यग्ज्ञानको आचार्य प्रमाण मानते है शब्दोको नही ।। ११८॥ गन्द ताल्वादि कारणोसे उत्पन्न होता है अत वह सर्वथा कार्य है वह नित्य कैसे होगा? इसलिये मीमासापक्षवालोका ' शब्द नित्य है' यह पक्ष सिद्ध नही होता ।। ११९ ॥ शब्दमे कृतकत्व धर्म है, परिणमन है, रुकना प्रेर्यता आदि धर्म है। अत एव वह अनित्यही है। परतु जो उसे अकृत्रिम-नित्य-अपरिणामी एक व्यापक आदि कहते है, वे मिथ्या- दृष्टि है ऐसा सज्जनोका-सम्यग्ज्ञानियोका मत है ।। १२० ।। - ? १ आ अज्ञातार्थेपु २ आ शब्देपु ३ आ सर्वज्ञेऽत्र च -४ १२४) सिद्धान्तसार (८९ ताल्वादयस्तु शब्दाना व्यजकाः स्युःप्रदीपवत्। घटादिषुन तत्सत्यं दीपाभावेऽपि दर्शनात् ॥ १२१ कर्तुरस्मरणं तावन्न युक्तं वेदवादिनाम् । जीर्णकूपादिषु व्यक्तव्यभिचारोपलम्भतः ॥ १२२ बहुनात्र किमुक्तेन हिंसाधर्मकवादिनाम् । सर्वेषां वेदवाक्यानां श्रवणं वर्जयेत्रिधा ॥ १२३ तस्मात्पुमानशेषज्ञः कश्चित्कृत्स्नावृतिक्षयात्। सिद्धःप्रमाणतः सिद्धि देयान्मीमासफस्य च ॥१२४ तालु आदिक कारण शब्दोको व्यक्त करते है। इसलिये उनको प्रदीपके समान व्यजन कहना चाहिये' यह मीमासकोका कहना योग्य नही है । घटादि पदार्थोंको दीपक जैसे दिखाता है वैसे ताल्वादिक शब्दोको प्रकट करते है, यह वचन योग्य नही है । घटादिक पदार्थ दीपकके अभावमेभी दिखते हैं अर्थात् हस्तस्पर्शसे घटादिक पदार्थ जाने जाते है। वैसे शब्द ताल्वादिकोंसे व्यक्त नही होते हैं, अपितु उत्पन्न होते है । घट जैसा चक्रादिकोसे उत्पन्न होता है, व्यक्त नही होता चक्रादिक न होनेपर घट उत्पन्न नही होगा । दीपक हाथमे लेकर कोठरीमे हम गये और वहाँ घट न होनेपर नही दिखेगा तथा दीपक उसे उत्पन्न नहीं करता है । ताल्वादिकोमे जब प्रयत्न होता है तब शब्द उत्पन्न होता है और जब उनमे प्रयत्न नही होता है तब शब्द उत्पन्न नही होता हैं । अत व्यजक और कारक कारणोमे यह विशेषता है । व्यजक होनेपर घटादि पदार्थ वहा पूर्व कालमे अधकारादिसे आवृत होगा तो अधकार नष्ट होनेपर वह व्यक्त होगा। परतु व्यजक उस घटादिकोको उत्पन्न करनेमे असमर्थ है । कारक कारण पूर्वमे अविद्यमान घटादिकोको उत्पन्न करते हैं ऐसा दोनोमे अन्तर है ।। १२१ ॥ कर्ताका अस्मरण होनेसे वेद अपौरुषेय है' यह अनुमान वेदकी नित्यता सिद्ध करता है, ऐसा मीमासावादियोका वचन योग्य नही है । इसमे कर्ताका अस्मरण होना यह हेतु जीर्ण कूपादिकोसे व्यभिचरित होता है । क्योंकि पुराने कुँए और पुराने प्रासाद जगलमे दिखते हैं। हजारो वर्षोंके पुराने होनेसे उनके कर्ताको लोक जानते नही । उनको उनका अस्मरण हुआ है। एतावता वे पदार्थ अकृत्रिम, नित्य और अनादि नही है। उनका जरूर कोई कर्ता था। वैसे वेदके कर्ताका स्मरण न होनेसे वे नित्य है ऐसा मानना योग्य नहीं है। अब इस विषयमे हम ज्यादह नही कहते है । सिर्फ इतनाही कहते हैं, कि हिंसाधर्मकाही निरूपण करनेवाले सपूर्ण वेदवाक्योका सुनना मनवचनसे और शरीरसे छोडना चाहिये ॥ १२२-१२३ ॥ इसलिये कोई पुरुष कर्मोके आवरणोका क्षय होनेसे सर्वज्ञ होता है। ऐसा प्रमाणसे सिद्ध होता है। वह सर्वज्ञ मीमासकोको-परीक्षावानको सिद्धि देवे। ज्ञानावरण, दर्शनावरण, मोहनीय और अन्त- राय इन चार घातिकर्मोका क्षय जिसने किया है, ऐसा पुरुष जगतके संपूर्ण पदार्थोंको उनके सर्व पर्या- योके साथ जानता है, वही सर्वज्ञ है। वह परीक्षावानको अर्थात् जैनाचार्योंको मोक्ष प्रदान करे ।।१२४॥ SS 12. ।

९०) सिद्धान्तसार - (४. १२५- कश्चिदाह न सर्वज्ञः कर्मणामावृतिक्षयात। किन्त्वशेषस्य विश्वस्य कर्तृत्वात्संमतः स च ॥१२५ कृत्रिमत्वं हि विश्वस्य न चासिद्धमहेतुतः । तद्धतीविद्यमानत्वात्कार्यत्वादेश्च सर्वथा ॥ १२६ तथा हि बुद्धिमत्पूर्व सर्वं तन्विन्द्रियादिकम् । कार्यत्वाद्धटवच्चासौ बुद्धिमानीश्वरो मतः ।। १२७ सन्निवेशविशिष्टं यद्यच्चैतन्यविजितम् । तत्कार्य स्वत एवेति जायते न पटादिवत् ।। १२८ न चासिद्धं विरुद्धं वा नाप्यनैकान्तिकं पुनः । कार्यादिकमिदं सर्व सिद्धत्वादिनिरूपणात् ॥ १२९ --- (ईश्वर सृष्टिकर्ता होनेसे सर्वज्ञ है, ऐसा नैयायिक वैगेषिकोका पूर्व पक्ष । )- कोई नैयायिक कहता है कि सपूर्ण कर्मोके आवरणोंका क्षय होनेसे सर्वज्ञ नही होता, किन्तु संपूर्ण सृष्टिका कर्ता होनेसे वह सर्वज्ञ होता है, और ऐसा सर्वन बुद्धिमानोको पूज्य है । यह जगत् कृत्रिम है, यह वात असिद्ध नही है । क्योकि उसकी असिद्धता सिद्ध करनेके लिये कोई हेतु नही है अर्थात् जगत् अकृत्रिम है उसे किसीने उत्पन्न नहीं किया ऐसा सिद्ध करनेवाला कोई हेतु नही है । तथा जगत्का कृत्रिमत्व सिद्ध करनेके लिये कार्यत्वादिक सद्धेतु सर्वथा तयार है, सन्नद्ध है। कार्यत्व सद्धेतुकाही अब हम समर्थन करते हैं ।। १२५-१२६ ॥ सर्व शरीर, इन्द्रिय आदिक पदार्थ बुद्धिमान् कर्तासे बने हुए हैं । क्योकि वे कार्य हैं जैसे घट कार्य होनेसे उसका वुद्धिमान् कर्ता है । यहा वह बुद्धिमान् ईश्वर समझना चाहिए । अव कार्य किसको कहना चाहिए वह हम कहते हैं । जो सन्निवेश विशिष्ट हैं अर्थात् रचनाविशेषसे युक्त है, जिसमे चैतन्य नहीं है ऐसा कार्य वस्त्रके समान स्वत उत्पन्न नही होता है । उसको कोई उत्पन्न करनेवाला हो तो वह उत्पन्न होता है अन्यथा उसकी उत्पत्तिही नही होती ।। १२७-१२८।। यह हमारा कार्यत्व हेतु असिद्ध, विरुद्ध अथवा अनैकान्तिकभी नही है । " सर्व शरीर इन्द्रियादिक पदार्थ वुद्धिमान हेतुसे उत्पन्न होते हैं; क्योकि वे कार्य हैं " ऐसा अनुमानवाक्य है। इसमे सर्व शरीर इन्द्रियादिक पदार्थ पक्ष है, हेतु कार्यत्व है और वह हेतु पक्षमे जानेसे असिद्ध नही है । साध्यसे विरुद्ध अर्थात् विपक्षमे हेतु जब जाता है तब वह विरुद्ध हेत्वाभास होता है । यहां कार्यत्व हेतु अवुद्धिमत्पूर्व ऐसे आकाशादिकोमे नही जाता है, इसलिये कार्यत्वहेतुकी विरुद्धताभी नही है । तथा हेतु जव पक्ष, सपक्ष और विपक्षमे जाता है तब वह अनैकान्तिक होता है। यहां कार्यत्व हेतुतो गरीर इन्द्रियादि पक्षरूप पदार्थोमे है और सपक्ष घट,प्रासाद इत्यादिकोमेभी विद्यमान होनेसे कार्यत्व हेतुकी सपक्षमेभी सत्ता है । तथा विपक्ष जो आकाश, जो कि कार्य नही है वुद्धि मत्पूर्व नही है, उसमे कार्यत्वहेतु नही जाता है अत विपक्षमे नही जानेसे अनैकान्तिक नही है। यही अभिप्राय अधिक स्पप्ट किया जाता है-कार्यत्वका अर्थ अवयव रचनासे युक्तत्व होता है । यह १ आ स च इति नास्ति २ मा न वा -४ १३५) सिद्धान्तसार (९१ सर्वत्रावयवत्वेन विपक्षे चाप्रवृत्तितः। आकाशादौ सपः तु प्रासादादौ प्रवर्तनात् ॥ १३० विशिष्टकार्यमार्याणां कारणं नाति वर्तते । तस्मात्तस्य तु य कर्ता स महानीश्वर प्रभुः ॥१३१ मागमेनापि सिद्धत्वाद्विश्वरूपप्ररूपणात् । सर्वेषा हेतुभूतत्वात्सर्वज्ञः शशिशेखरः ॥ १३२ एतत्सर्वं हि विज्ञानं शुद्धबोधोद्धचेतसाम् । विचारातिक्रमाद्वन्ध्यासुतव्यावर्णनं यथा ॥ १३३ विश्वकर्ता स सर्वज्ञो न कश्चिन्मानगोचरः । केवल दृग्विमोहेन भ्रान्तेरेवास्य साधिका ॥१३४ अध्यक्षं साधन नास्य तत्रासत्प्रतिपत्तितः । हेत्वाभासात्मकत्वेन कादिन नुमापि वा ॥ १३५ - अवयव रचनायुक्तत्व विपक्ष जो आकाश उसमे नही है, क्योकि आकाश निरवयव है। उसके अवयव नही है, इसलिये कार्यत्वहेतु विपक्षमे न जानेसे अनैकान्तिकताभी कार्यत्वहेतुमे न रही, और सपक्षभूत प्रासादादिकोमे अवयवरचना होनेसे कार्यत्वहेतु उसमे चला जाता हैं अर्थात् पक्ष और सपक्षमे कार्यत्व हेतु है और विपक्षमे नही है इसलिये यह सद्धेतु है ॥ १२९-१३० ॥ जो विशिष्ट तरुतन्वादिक कार्य हैं वे कारणको उलघ कर स्वयमेव नही होते हैं अर्थात् उनका कर्ता कोई बुद्धिमान् व्यक्ति मानना पडता है । अत ऐसे विशिष्ट कार्योंका जो कर्ता है, वह महान् प्रभु ईश्वर है ऐसा समझना चाहिये ॥ १३१ ।। वह चद्रशेखर अर्थात् ईश्वर आगमसेभी सिद्ध है , क्योकि आगममे उसके विश्वरूपका निरूपण किया है (उस ईश्वरको सर्वत्र आँखे होती है । उसके पांव सर्व जगतमे फैले हैं वह परमाणुओको लेकर अपने वाहुओंसे स्वर्ग और पृथ्वी उत्पन्न करता हैं ऐसा ईश्वर एक है ।)वह सर्व पदार्थोंकी उत्पत्तिमे हेतु है, अत वह सर्वज्ञ है ॥ १३२ ॥ यहातक नैयायिकोने ईश्वर सृष्टिका कर्ता है ऐसा अपना पक्ष सिद्ध किया है। अब जैनाचार्य ' ईश्वर सृष्टिकर्ता होनेसे सर्वज्ञ है ' इस पक्षका खडन करते हैं । ' ईश्वर सृष्टिकर्ता होनेसे सर्वज्ञ है, ऐसा नैयायिकोका युक्तिज्ञान वन्ध्यासुतके वर्णनके समान है, क्योकि शुद्ध ज्ञानसे- सम्यग्ज्ञानसे जिनका चित्त निर्मल हुआ है ऐसे लोगोंके विचारको उल्लघनेवाला हैं॥१३३ ।। ईश्वर सृष्टिका कर्ता है, इस वातकी अध्यक्षसे-प्रत्यक्षसे सिद्धि नहीं होती ; क्योकि ईश्वरको साक्षात् करनेवाला कोई इन्द्रियप्रत्यक्ष नही है । तथा जो नैयायिकोने कार्यत्वादिक हेतु दिये हैं, वे भी हेत्वाभास-स्वरूपी हैं इसलिये “ सर्व तन्विन्द्रियादिक बुद्धिमत्पूर्व कार्यत्वाद्धटवत्" यह अनुमान अनुमानाभास है ।। १३४ ।। कार्य- 'अवयवयुक्त पदार्थको कार्य कहना' ऐसी जो कार्यत्वकी व्याख्या है वहभी योग्य नही है, क्योकि उस व्याख्यासे नैयायिकोके इण्टका विघात होता है अर्थात् तन्वादिक पदार्थोमे --- .. - १ आ. सपक्षेषु २ आ वैश्व ३ आ विज्ञाना ४ आ साधक ९२) सिद्धान्तसार. (४ १३६- कार्यस्यावयवत्वादिसाधनं नैव साधकम् । यतोऽवयवसामान्याद्दष्टमिष्टविधाततः ॥ १३६ तच्चावयवसामान्यं विद्यते गगनादिषु । न तु कार्यत्वमित्येवं व्यभिचारोपलम्भतः ।। १३७ नन्वाकाशमिदं तावत्सर्वथावयवच्युतम् । मतं स्याद्वादिनां तस्य सर्वशून्यत्वयोगतः ॥ १३८ सदेव कुरुते कार्य तन्वादिकमिदं यदि । ईश्वरस्तत्कथं न स्याद्दोषोऽफिञ्चित्करो महान् ॥१३९ असतः करणे तस्य विरोधः केन वार्यते।न ह्यसत्क्रियमाणं तदृष्टमिष्टं विपश्चिताम् ॥ १४० अवयवत्व रहकर वह अवयव सामान्यमेभी जाता है, जो कि अवयवसामान्य कार्यरूप नही है, अर्थात् ईश्वरसे नही बनाया जानेपरभी अकार्य होनेसेभी अवयवोमे रहता है जैसे मनुष्यत्व सामान्य होनेपर हस्तपादादिकोमे वह रहता है । अत. अवयवत्व उसमे है और सामान्य पदार्थ ईश्वरने नही बनाया हैं ऐसा नैयायिक मानते है । अत. यह उनके लिये इष्टविघातक हुआ। तथा यह अवयवसामान्य गगनमे, आत्मामे, दिशामे और कालमे नैयायिकोने माना है परंतु वे आकाशादिक पदार्थ उन्होने कार्यरूप नही माने है । इस प्रकारसे 'कार्यत्व' हेतु व्यभिचारी होनेसे विपक्षोमे आकाशादिकोमे जाता है । अत कार्यत्व हेतु अनैकान्तिक है ॥ १३५-१३६ ॥ इसपर नैयायिक कहते है, कि आकाश अवयवरहित है, उसमे अवयव नही है। अत कार्यत्व हेतु उसमे प्रविष्ट नही होनेसे व्यभिचारी नही है ऐसा कहनाभी योग्य नहीं है। इस प्रकारसे आकाशका वर्णन करोगे तो आकाश सर्वत शून्य है ऐसा दोष आपको स्याद्वादी देगे । अर्थात् अवयवरहितता वन्ध्यासुतके समान असद्रूप है । अथवा परमाणु जैसे स्वत.के एक प्रदेशको छोड- कर अन्य प्रदेशको धारण नहीं करता है । अत उसे निरवयव कहते हैं। वैसे आकाशको यदि मानोगे तो आकाशके व्यापकपनेका विघात होगा ॥ १३७-१३८ । ईश्वर शरीररहित होता हुआ, यदि शरिरादिक कार्य करता है ऐसा कहोगे तो हस्त पादादिरहित ईश्वर पृथ्वीनिर्माणमे समर्थ नहीं होगा, इसलिये ईश्वरमे अकिंचित्करत्व दोष उत्पन्न होता है । असत्से ईश्वर सृष्टिको उत्पन्न करता है ऐसा यदि मानोगे तो उसके कर्तृत्वमे विरोध उत्पन्न होगा अर्थात् असत् वस्तु की जाती है, ऐसा किसीने देखाभी नही और विद्वानोने असत् वस्तुभी की जाती है ऐसा नही माना है ।। १३९-१४० ॥ यदि ईश्वर विना उपकरणोके जगत् उत्पन्न करता है, ऐसा कहोगे तो वह किसके लिये उत्पन्न करता है? यदि पृथ्वी, हवा, अग्नि और पानी इनकेद्वारा जगत् उत्पन्न करता है, ऐसा कहोगे तो उनका यदि अभाव होगा तो जगत्की उत्पत्ति वह कैसे करेगा' क्या अभावरूप पृथिव्यादिकसे जगत् निर्माण कर सकता है ? नही । अभावसे जगत् उत्पन्न करना मिथ्या है। अर्थात् ईश्वरके मनमे जगत् उत्पन्न करनेकी इच्छा है और यदि पृथिव्यादिक नही है तो जगन्निर्माण शक्य नही । और यदि पृथिव्यादिक हैं तो इनसे भिन्न दूसरा जगत् कौनसा माना जाता है? इनका जो समूह सर्वत्र दिखता -४ १४७) सिद्धान्तसार (९३ विनोपकरणस्तेन जगत्केभ्यो विधीयते । पृथिव्यादिभिरित्येवं मिथ्या तेषामभावतः ॥ १४१ भावे पुनर्विरोधादिस्तस्य पृष्ठं न मुञ्चति । येन दुष्टमिदं सृष्टेरदुष्टं नोपपद्यते ॥ १४२ नद्रव्याणि च योगस्य सम्मतानोह तत्वतः।तानि चेत्सर्वदा सन्ति सन्ति शम्भुः करोति किम् ॥१४३ शरीरारम्भकरेभिः पृथिव्यादिभिरङ्गिनः। योजयत्यथ' कर्ता स्यादिति चेत्संमतं मतम् ॥१४४ एषापि भारती तेषामशेषाणामशेषतः । नव युक्तिमियत्येव धर्माधर्मविघाततः ॥ १४५ स्वत एवं करोत्येतदन्येन प्रेरितोऽथवा । उताशावशतोवापि क्रीडया यन्त्रिताशयः ॥१४६ स्वतः करोति चेद्विश्वं दुःखिनः किं करोत्यसौ। तत्कार्ये प्रत्यवायः स्यात्तक्रियाजनितो महान् ॥१४७ है उसकोही जगत् कहना चाहिये । वह पहिलेभी अर्थात् इच्छाके पूर्वमेभी था तो पूर्वमेही जगत् था । अत जगन्निर्माणकी इच्छा होना व्यर्थ है । ये पृथिव्यादिक है, तो पुन रचनेका विरोध है। उनकी रचना पहलेसेही पुन रचनाकी आवश्यकता नही रही । ऐसा दोष ईश्वरके पीठपर लादा जाता है । वह विरोध दोष ईश्वरकी पीठ नही छोडेगा । जिससे ईश्वरकी सृष्टिका दोष दोषही रहेगा वह अदोष नही होगा ।। १४१-१४२ ॥ योगके मतमे द्रव्यपदार्थ सिद्ध नही होता है । क्योकि 'द्रव्यत्वयोगाद् द्रव्यम्' द्रव्यत्वका सवध होनेसे द्रव्य है ऐसा माननेपर द्रव्य और द्रव्यत्व ये दो चीजे अलग ठहरी। यदि उन दोनोकी स्वतत्रता सिद्ध होगी तो द्रव्यत्वके सम्बन्धसे पूर्वमेभी द्रव्य होनेसे द्रव्यत्वका सम्बन्ध द्रव्यके साथ करना व्यर्थ हैं । इसलिये द्रव्यपदार्थ योगके मतमे सिद्ध नहीं होता। यदि वे द्रव्यपदार्थ हैं तो शभुको अब क्या करना बाकी रहा है ? ॥ १४३ ॥ शरीरको निर्माण करनेवाले पृथिव्यादिकोसे प्राणियोको ईश्वर जोड देता है, जिससे ईश्वर कर्ता होता है और यह मत समत है ऐसा आप समझेंगे तो यहभी आपका विवेचन योग्य नही है । तथा जो शरीरोको उत्पन्न करनेवाले पृथिव्यादिकोसे ईश्वरकेद्वारा सब प्राणी जोडे जायेगे तो यह जोडना युक्तिसगत नही होगा । इसमे धर्म और अधर्मका अर्थात् पुण्य और पापका नाश होगा । क्योकि कौन जीव पापी है और कौन जीव पुण्यवान् है इसका कुछ विचार न करके बुरे भले चाहे जैसे शरीरारभक पृथिव्यादिकोंसे ईश्वर प्राणियोको जोड देगा।॥ १४४-१४५ ॥ ईश्वर स्वत जगत्को उत्पन्न करता है? अथवा अन्यसे प्रेरित होकर उत्पन्न करता है? अथवा कुछ आशावश होकर जगत्को निर्माण करता है ? या क्रीडासे नियत्रित चित्त होकर जगत्को वनाता है? इन बातोपर अव क्रमसे विचार करना ठीक होगा ॥ १४६ ।। यदि ईश्वर स्वत स्वतत्र रहकर जगत् बनाता है तो यह दुखी लोगोको क्यो उत्पन्न करता है ? दुखियोको उत्पन्न करनेसे दुख देनेकी क्रियासे ईश्वरको महान् पापबध होता होगा। ? ? ? १ आ योजयन्नेव २ आ आगाया वशतो ९४) सिद्धान्तसारः (४. १४८- अन्येनात्य प्रयुक्तत्वे स्वातन्त्र्यं तस्य हीयते । आशावनाच्च हीनत्वं तस्य स्याटुनिवारतः ॥१४८ क्रीडया तस्य कर्तृत्वे क्रीडोपायव्यपेक्षणात् । प्रागेव जगतः सिद्धिः स्यानित्यमनिवारिता ॥१४९ मूर्तस्य जगतः कर्तासौ मूर्तोऽमूर्त एव वा । विकल्पद्वयमायाति दुरतिक्रममायतम् ॥ १५० नामूर्तो मूर्तकार्याणां घटादीनां कदाचन । कुम्भकारः क्वचिदृष्टः केनचिता कयञ्चन ॥ १५१ अय मूर्तः करोत्येष सर्वं तन्वादिकं क्षणात् । ततः सैव स्वपक्षस्य व्याघ्रीव समुपस्थिता ।। १५२ आगमात्तस्य सिद्धिर्न प्रमाणं जातु जायते । तत्राप्रमाणभूतत्वात्स्वाभिप्रायनिवेदनात् ॥ १५३ ततश्च जगत. कर्ता सर्वज्ञो न हि कश्चन । किन्त्वावृतिक्षयादेप विश्वज्ञो विश्वदर्शनात् ॥ १५४ दूसरेके द्वारा प्रेरित होकर यदि जगन्निर्माण कार्य ईश्वर करता है ऐसा कहते हो तो ईवरका स्वातत्र्य नष्ट होता है और आनाक्न होकर यदि ईघर जगत् वनाता होगा तो वह हीनताका भागी होगा, क्योकि आगावनतासे व्ह हीनता नष्ट न होगी ।। १४९-१४८ ॥ ईम्बरसे क्रीडा जगत् रचा जाता है तो वह नीडाके उपायोको हमेगा चाहता होगा? और इससे तो पूर्वमेही जगत्की उत्पत्ति सिद्ध हुई । क्योंकि क्रीडाके उपाय इस जगतसेही उसे प्राप्त होते होगे जिससे पूर्वमही अनिगरित जगत्की उत्पत्ति सिद्ध हो चुकी ॥ १४९ ॥ इस मूर्तिमान जगतका कर्ता मूर्त है अयवा अमूर्तही है, ऐसे दो विकल्प उत्पन्न होते हैं जिनका उल्लघन करना अनन्य है । अमूर्तिक ईश्वर मूर्तिक पदायाँका क्ता कभीभी नहीं हो सकता, क्या मूर्तिक घडा आदि पदार्योंका कर्ता कुंभकार कभी अमूर्तिकल्पसे किसीको कथञ्चित् दृष्टिगोचर हुया है ? अर्थात मूर्तिक घटादिकोंका कर्ता कुंभकार मूर्तिक ही होता है । कुंभकार कदापि अमूर्तिक नहीं होता ।। १५०-१५१ ॥ अव यदि मूर्तिक ईश्वर सर्व तन्वादिक पदार्थोंको क्षणमें करता है तो यह उसकी मूर्ति- कता इन्वरले पक्षको खानेवाली व्याघ्रीके समान उपस्थित हो गई। क्योकि ईश्वर मूर्तिक है इस विषयका आगममें कुछभी उल्लेख नहीं है । ईश्वरको हाथ नहीं है, पांच नहीं है, उसको आंखें नहीं हैं तो भी वह देखता हैं । तया कान न होनेपरभी वह सुनता हैं । इत्यादिल्प उसका वर्णन जो आगममे है वह उसकी अमूर्तताको व्यक्त करता है " अपाणिपादो जन्नो ग्रहीता पश्यत्यत्रः स श्रृणोत्यकर्णः” इत्गदि ।। १५२ ।। ईश्वरके नृप्टिकर्तृत्वकी बागमचे सिद्धि होती है ऐसा कहना कभी प्रमाणभूत नहीं हो सकता है । बागममें प्रमाणभूतता होनेसे वह बागम अपना अभिप्रायही कह देता है ॥ १५३ ।। इसलिये जगत्का का कोई सर्वज्ञ नही होता है। सर्व कर्मोके आवरणोंका भय करकेही सर्वनपना प्राप्त होता है । सर्वन क्षुधा, तृषा, वृद्धावस्या, रोग, आदि अठारह दोपोंसे रहित होता १ ला निवारित २ आ.वस्या -४ १६२) सिद्धान्तसार (९५ परमेष्ठी परज्योतिः परमात्मा पराशयः । सर्वज्ञः सादिमुक्तश्च जिन एवावशिष्यते ॥१५५ ये वदन्ति च कैवल्ये केवली फवलाशन. । न तच्चारु यतो मिथ्या वैपरीत्यविजृम्भितम् ॥१५६ स चानिष्टोऽपि भूढात्मा ह्यनन्तादिचतुष्टये । व्याघातो जायतेऽनन्तसुखस्य विरहाद्यतः ।।१५७ क्षुत्तुटपीडावशादेप सुखाभावस्तु जायते । प्रतीकारार्थमस्या हि गृह्णन्त्याहारमङ्गिनः॥ १५८ सुखाद्यानुकूल्यत्वाद्भोजनादेः कथ पुन । सुखाभावो भवेत्तस्माद्योगिनोऽप्यविरोधत ॥ १५९ दृश्यते ह्यस्मदादीनां भोजनादौ कृते सति । उत्पन्न च सुख वीर्यं तदृते हानिरेव वा ॥ १६० एतत्सर्व महामोहपिशाचवशवर्तिनाम् । जल्पित युक्तिशून्यत्वाद्वितण्डामर्हति क्षणात् ॥ १६१ विषयेभ्यः प्रजायन्ते ह्यस्मदादिसुखादय । कादाचित्कतया तस्मान्नवं भगवत क्वचित् ॥ १६२ है और सर्व प्रकारोसे वह विश्वको देखता है। वह परमेष्ठी, परज्योति, परमात्मा, पराशयवेदी, सर्वज्ञ और सादिमुक्त होता है। ऐसे गुणोका धारक जिनही होता है। अन्य हरिहरादिकोमे ये गुण नही है। वह जिन इन्द्रादिपूजित पदको धारण करता है, इसलिये परमेष्ठी है। उसकी ज्ञानरूपी ज्योति उत्कृष्ट अनुपम होती है । वह सर्वश्रेष्ठ आत्मा होनेसे परमात्मा है और उसका आशय-अभिप्राय रागद्वेपरहित शुद्धोपयोगरूप है। वह सर्वज्ञ है और कर्मोको नष्ट करके मुक्त हुआ है। अत सादि मुक्त है। ॥ १५४-१५५ ॥ केवली कैवल्य अवस्थामे अर्थात् अरिहन्तको अवस्थामे कवलाहार-पासाहार लेते हैं ऐसा श्वेताम्बर जैन कहते हैं, परतु वह उनका कथन युक्तियुक्त नहीं है, क्योकि यह उनका कयन विपरीत मिथ्यात्वका विलासरूप है। उन मूढोका अभिप्राय आगमसूत्रसेभी अनिष्ट है। आहार ग्रहण करनेसे अनत चतुष्टयमे व्याघात उत्पन्न होता है, क्योंकि अनतसुखका आहारसे नाश होता है । अर्थात् अनतज्ञान, अनतदर्शन, अनतशक्ति और अनतसुख इनको अनतचतुष्टय कहते है। इनमेसे अनतमुख कवलाहारसे नष्ट होता है। भूख, प्यासकी पीडाके वश होनेसे सुख नष्ट होता है। उस भूख और प्यासकी पीडा मिटानेके लिये प्राणी आहार लेते है ।।१५६-१५८ ॥ (आहारग्रहणसे सुख होता है ऐसा श्वेताम्वरोका कथन)- भोजन करनेसे और पानी पीनेसे सुख और शक्ति प्राप्त होती हे परतु आप दिगवर जैन लोक आहारपानसे सुखका अभाव होता है ऐसा कहते हैं । यह कथन आपका कैसा योग्य समझा जायेगा? योगीकोभी आहारसे व पानसे वही सुख होगा उसका अभाव नही होगा ।। १५९ ।। हम तुम जब भोजन करते हैं तब अपनेमे सुख और शक्ति उत्पन्न हुई है ऐसा अनुभव करते हैं। परतु आहार पानके अभावमे सुख और शक्तिकी हानिका अनुभव हमे आता है।। १६०॥ (दिगवर जैन कहते है)- महामोहरूप पिशाचके वश जो हुए हैं ऐसे श्वेताम्वरोका यह सर्व कहना है । इस कथनमे यह युक्ति नहीं होनेसे तत्काल वितण्डाके योग्य है ॥ १६१ ॥ आपके और हम लोगोके सुखशक्ति आदिक गुण पचेन्द्रियके विषय सेवन करनेसे होते हैं और वे कादाचित्क होते है अर्थात् कुछ कालतक आहारसे सुख और शक्ति प्राप्त होती है। ऐसी भगवान् जिनेश्वरमे कादाचित्क सुख और शक्ति नहीं है ॥ १६२ ।।

९६) सिद्धान्तसार. (४ १६३- विषयाशावशातीतमनन्तं सुखमर्हति । क्षुत्क्षामक्षीणशक्तित्वात्कथ व्याहन्यते न हि ॥ १६३ रागद्वेषविमुक्तत्वात्कथं भुङक्ते स केवली । कवलं गृह्यते रागात्यज्यते द्वेषतो यतः ॥ १६४ अथौदासीन्ययुक्तानां साधूनां भोजनादिकम् । कुर्वतां वीतरागत्वं वीतदोषत्वमस्ति च ॥ १६५ मिथ्यात्वज्वरसम्पन्नतीव्रदाघवतामयम् । प्रलापस्तूपचारेण वीतरागा झमी यतः ॥ १६६ प्रवृत्तिस्तु निवृत्तिस्तु ह्याहारे जायते सदा । अभिलाषरुचिभ्यां च तद्वानाप्तः कथं ततः ॥१६७ आहोस्वित्कवलाहारमन्तरेणास्य न स्थितिः । देहस्य जायते तस्मात्केवली कवलाशनः ॥ १६८ ? ? जो विषयकी आशाके वश नही हुआ है उसको सुखकी प्राप्ति होती है। परतु जो भूखसे पीडित होकर क्षीण शक्तिवाला होता है उसके सुखका नाश कैसे नहीं होता ? तथा मनुष्य भोजन क्यो करता है ? उसको भूखसे दुख होता है उसकी निवृत्तिके लिये वह भोजन करता है ऐसा सिद्ध हुआ ॥ १६३ ।। केवली भगवान् सपूर्ण मोहकर्मसे रहित हुए है; अत. वे रागभावना और द्वेषभावनासे पूर्ण मुक्त हुए है । इसलिये वे भोजन कैसे करेगे ? आहार रागभावनासे लिया जाता है और द्वेषसे उसका त्याग करते है । रागद्वेषोसे मुक्त जिन पूर्णवीतराग हुए हैं ; अत वे कवलाहार रहित है ।। १६४ ॥ औदासीन्यसे युक्त साधुभी भोजनादिक करते है तोभी उनमे रागद्वेषरहितत्व अर्थात् वीतरागत्व और द्वेषरहितपना दिखता है अर्थात् भोजन करना रागभावनाका कार्य है और उसका त्याग द्वेषभावनाका कार्य है ऐसा नियम सिद्ध नही होता, अन्यथा उदासीन मुनि भोजन करते हुए क्यो दीखते है, ऐसी श्वेताबरोंने शंका खडी की है। उसका उत्तर आचार्यने इस प्रकार दिया है- मिथ्यात्व-ज्वर-युक्त होनेसे तीव्र दाह जिनको हो रहा है ऐसे लोगोका यह प्रलाप है। वे अपूर्ण वीतराग मुनिके समान पूर्ण वीतराग मुनिकोभी समझकर उनमे कवलाहारकी प्रवृत्ति सिद्ध करनेकी चेष्टा कर रहे है । परतु प्रमत्तादि गुणस्थानोके मुनियोमे वीतरागत्व औपचारिक है, इसलिये उदासीन मुनि भोजन करते है, वैसे केवली भोजन करते हैं ऐसा कहना योग्य नहीं है। अर्थात् पूर्ण वीतरागता बारहवे गुणस्थानमे प्राप्त होती है। उस समय इच्छा नष्ट होनेसे वे आहार नही ग्रहण करते हैं, कोईभी संसारी प्राणी भोजनकी इच्छा होनेपर भोजन करता है। क्षुद्वेदनीय कर्मका उदय किसीकी अपेक्षा न करता हुआ यदि आहारमे केवलीको प्रवृत्त करेगा तो प्रमत्तादिगुणस्थानोमे तीन वेदोका उदय होनेसे तथा कषायोका उदय होनेसे मैथुनादिकोमे उनको वह वेदोदय और कषायोदय प्रवृत्त करेगा परतु वह सापेक्ष कर्मोदय अपने कार्यमे जीवको प्रवृत्त करता है, निरपेक्ष नही करता ऐसा यहा समझना चाहिये । केवली समस्त रागद्वेष-भाव-रहित है । मुनियोमे रागकी मदता है इसलिये उनको उपचारसे वीतराग कहा है । एतावता वीतराग केवलीभी आहार ग्रहण करते हैं ऐसा कहना योग्य नहीं है ।। १६५-१६७ ।। (फिर श्वेताम्बर ऐसा कहते हैं)- कवलाहारके बिना केवलीके देहकी स्थिति नहीं टिकेगी इसलिये वे आहारग्रहण करते हैं ।। १६८ ॥ १ -४ १७५) सिद्धान्तसार (९७ इत्यप्याहारमात्रेण सिद्धसाधनदोषतः । न प्रमाणं भवेत्तेषामतत्त्वाभिनिवेशिनाम् ॥ १६९ कर्मनोकर्मनामानमाहार गृह्णतः सत' । देहस्थितिः कथ तस्य नानिवार्या प्रजायते ॥ १७० कर्मनोकर्मनामा च लेप्याहारस्तथापर । ओजोऽथ मानसाहार. कवलश्चेति षड्विधः ॥ १७१ आहारोऽनेकाधाभाणि देहस्य स्थितिकारणम् । तत्कथ कवलाहारेणवासौ हतचेतसाम् ॥ १७२ एतेन कवलाहारेणाप्यसौ व्यभिचरिणा । एकेन्द्रियादिदेवाना तदभावेऽपि दर्शनात् ॥ १७३ अथोदारिकदेहत्वादहत फवलाशनात् । देहस्थितिस्ततो नो न कदाचिद्वयभिचारिणी ॥ १७४ तदतेदपि मिथ्यात्वं तत्वार्थानवधारणात् । परमौदारिका यस्मादहतो देहसंस्थितिः ॥ १७५ 7 ? दिगवरोका इसके ऊपर इस प्रकार कथन है । केवलीकी देहस्थिति आहारमात्रसे होती है ? अथवा कवलाहारसे होती है? प्रथम पक्ष यदि माना जायगा तो सिद्धसाधनता है अर्थात् आहारमात्र तो केवलीको हमभी मानते है परतु आहारमात्रसे कवलाहारभी उनको है ऐसा सिद्ध नही होता । अत अतत्त्वमे आग्रह करनेवाले श्वेतावरोका कवलाहार पक्ष प्रमाणभूत नही है ।। १६९ ॥ केवली नोकर्माहार और कर्माहार ग्रहण करते है इसलिये उनकी देहस्थिति अनिवार्य क्यो नही है ? अर्थात् केवलीको देहस्थितिको कवलाहार कारण नहीं है। नोकर्माहार और कर्माहारसे केवलीकी देहस्थिति है ॥ १७० ॥ कर्माहार, नोकर्माहार, लेप्याहार, ओजआहार, मानसाहार और कवलाहार ऐसे आहारके छह प्रकार है ॥ १७१॥ इस प्रकार देहकी स्थितिका कारण आहार अनेक प्रकारका कहा गया है तो कवला- हारसेही देहस्थिति होती है ऐसा क्यो मानना चाहिये। जिनकी बुद्धि नष्ट हुई है, वे ऐसा मानते हैं अर्थात् कवलाहारसेही देहस्थिति है, ऐसा मानना अयोग्य है । अत कवलाहारसे देहस्थिति मानना व्यभिचार-दोषसे युक्त है, क्योकि एकेन्द्रियादि जीव और देवोकी देहस्थिति कंवलाहारके अभावमे भी रहती है नष्ट नहीं होती ।। १७२-१७३ ।। श्वेतावरोका कहना यहा ऐसा है- अरिहन्त औदारिक देहवाले हैं इसलिये कवलाहारसे उनकी देहस्थिति होती है अत उपर्युक्त व्यभिचार दोष नही है ।। १७४ ।। (आचार्य उसका खडन करते हैं)- तत्त्वार्थका निश्चय न होनेसे श्वेतावरोका कथन मिथ्यात्वरूप है। क्योकि हमारी देहस्थिति और केवलियोकी देहस्थिति समान नही है। केवलियोकी देहस्थिति परमौदारिक देहरूप है। इसलिये हमारी और आपकी देहस्थितिसे केवलियोंकी देहस्थितिका मिलान करना योग्य नही है । केवलिजिनेश्वरोकी-देहस्थिति नानाविध आश्चर्यकारक अतिशयोंसे - १ आ सती SS 13 ९८) सिद्धान्तसार. (-४ १७६ ततोऽस्मदादिदेहानां स्थित्या जातु न युज्जते। विचित्रातिशयोपेता जैनेन्द्रो देहसंस्थितिः॥१७६ अस्मदादिक्षरीरेषु ये धर्माः सन्ति तेऽपि वा। मतिज्ञानादयस्तेषां प्रसङ्गस्तत्र तत्स्थितिः' ॥१७७ अथवा भुक्तिरस्त्वस्य वेदनीयस्य संभवात् । तत्स्वकार्यकरं तत्र कर्मत्वादन्यकर्मवत् ॥ १७८ तहर्षापारसंसारसरणि सरतां वचः । जन्तो क्तिर्यतो जातु फलमात्रत्वसाधना ॥१७९ क्षुदादीनां निमित्तं तन्न निमित्तं प्रजायते । न क्षुदादिफलं तस्मादन्योन्याश्रयदोषतः॥ १८० अयवासातरूपस्य वेदनीयस्य सम्भवात् । तन्निमित्तत्वमस्त्येव ततो भुक्तिरवाधिता ।। १८१ तन्न सत्यं हि सामर्थ्यवैकल्यात्तस्य सर्वथा। तहकल्यं च तत्रैव मोहनीयाद्यभावतः ।। १८२ विषेऽपि भक्षिते यहन्मन्त्रतो निर्विषीकृते । मन्त्रिणो दाघमूर्छादिकार्य तस्मान्न दृश्यते ॥१८३ असातवेदनीयेऽपि तत्तत्यपि सर्वदा । क्षुदादिदुष्टकार्य न तस्य मोहविवर्जनात् ॥ १८४ युक्त है। यदि हमारी देहस्थितिके साथ भगवानकी देहस्थितिका मिलान करोगे तो आपकी और हमारी देहोंमे जो धर्म हैं उनका भी अर्थात् मतिनानादिक धर्मोकाभी केवलियोमें प्रसंग-स्थिति मानना पडेगा. जो कि आपकोभी मान्य नहीं है ।। १७५-१७७ ।। (श्वेताम्बरोंका पुन. कयन)- केवलीमे वेदनीय कर्मका संभव है अत. वह कर्म अन्य- कर्मके समान अपना कार्य भूखकी और प्यासकी पीडा उत्पन्न करता है । मिथ्यात्वके दर्पसे अपार- संसारमे घुमनेवालोंका 'केवली कवलाहार करते हैं ऐसा वचन है। कवलाहारकी सावना केवलि- योंको छोडकर अन्य प्राणियोम है ऐसा समझना चाहिये । क्षुधादिकोको असातावेदनीय निमित्त है परंतु वह असातावेदनीय क्षुधादि-फलयुक्त नहीं होता है अर्थात् असातावंदनीय कर्मका उदय होनेपरभी केन्लीको उससे क्षुधादिक पीडा नहीं होती इसलिये वहाँ अन्योन्याश्रय दोष नहीं है। अर्थात् असातावेदनीयसे भुवा उत्पन्न होती है और क्षुधा उत्पन्न होनेसे असातावेदनीय होता है यह अन्योन्याश्रय दोप है ।। १७८-१८० ॥ (फिर श्वेतांवर कहते हैं)- केवलीमें असातल्पवेदनीयका संभव है इसलिये वह क्षुधाका निमित्त है और इससे मुक्ति होना निर्वाध है ।। १८१ ।। (बाचार्य उत्तर देते हैं)- यह आपका कहना योग्य नहीं है, क्योकि उस असात- वेदनीयकर्ममें क्षुघाफल देनेका सामर्थ्य विलकुल नहीं है। मोहनीकर्मका अभाव होनेसे वह असात वेदनीयकर्म सामर्थ्यरहित हो गया है । इसलिये क्षुधावाधाको वह उत्पन्न नहीं करता । जैसे मंत्रकेद्वारा निर्विय किया हुआ विप भनण करनेपरभी मंत्रीको वह मूर्छादिक होते हुए नहीं दीखते है। केवली-भगवानमे असातवेदनीयकर्म सर्वदा रहकरभी-उदयमें आकरभी क्षुधादि दुष्ट कार्य उत्पन्न नहीं करता है, क्योकि मोहका अभाव हो गया है। मोहके सामर्थ्यसे असातवेदनीयकर्म भुषादि फल उत्पन्न करता है उसके अभावमें वह अपना कार्य नहीं करता है ।। १८२-१८४ ॥ १ ग. तत्स्यिते २ मा रत्त्यस्य ३ मा. तदस्यपार ३ आ. तदस्यपार ४ मा. नातो ५ आ. सावनात् ६ वा. लात्तत्स्या ७ वा कृत -४ १९१) सिद्धान्तसार ( ९९ तदेवमन्तरायस्य स्वकार्य केन वार्यते । तत्कार्ये' च प्रदत्तः स्यात्सर्वज्ञाय जलाञ्जलिः ॥१८५ उपसर्गप्रसङ्गोऽपि निषेद्ध तस्य दुःशकः । अनन्तादिस्वभावेषु जातु पृष्ठ न मुञ्चति ॥ १८६ असातवेदनीयेऽस्य स्वकार्यकरणक्षमे । दण्डप्ररूपणादीनां वैययं न कथं भवेत् ॥ १८७ नैव कारणमात्रेण कार्य जगति जायते । अन्यथेन्द्रियमात्रेण मतिज्ञानादिमान्विभुः ॥ १८८ भोक्तुमिच्छा बुभुक्षेति मोहनीयमृते कथम् । न च सा वेदनीयस्य केवलं कार्यमुच्यते ॥ १८९ यदि स्यादिति निर्बन्धो रिरसापि कथ न हि । सापि चेद्वीतरागाय पुनर्दत्तो जलाञ्जलिः ॥ १९० अस्तु वा तस्य वेद्यादि बुभुक्षाफलदायकम् । तथाप्यनेकहिंसादीन्पश्यन्भुङक्ते कथ विभुः ॥ १९१ - इसी प्रकार अन्तराय कर्मका कार्य कौन रोकेगा? और उसका कार्य यदि होगा तो सर्वज्ञको जलाञ्जलि देनी पडेगी। असातावेदनीयके उदयसेभी उपसर्गका प्रसग होगा तो उसका निषेध करना दुशक्य होगा । अनन्तसुखादि स्वभाव प्राप्त होनेपर वह उपसर्गप्रसङ्ग कभीभी केवलीकी पीठ न छोडेगा । अर्थात् असातवेदनीयका उदय मोहनीयके विनाभी अपना फल देने लगेगा तो उपसर्गमे अनन्तसुखादिक नष्ट होकर उपसर्गसे पीडा होने लगेगी ॥ १८५-१८६ ।। असातावेदनीयकर्म अपना कार्य करनेमे यदि समर्थ होगा तो दण्डप्रतरादि समुद्घात केवलीको होते है वे व्यर्थ हो जायेंगे । केवलीका आयुकर्म कम और वेदनीयादि कर्म जब अधिक होते है तव उनको सम करनेके लिये दण्डप्रतरादि समुद्घात किया जाता है और अधिक स्थितिका वेदनीयादिक कर्म उपायशत करनेपरभी अपना फल देगेही तो कोई मुक्त नहीं होगा और दण्डप्रतरादि समुद्घात करना व्यर्थ होगा। कारणमात्रसे कार्य होताही है ऐसा नियम नही है। अन्यथा केवलियोको द्रव्येन्द्रिय होनेसे मतिज्ञानादिक प्राप्त होगे ऐसा कहना पडेगा ।। १८७ ॥ अन्तरायकर्मका कार्य होनेसे अनन्तवीर्यादि गुण नष्ट होगे । अत वेदनीयकर्म क्षुधा- पिपासा उत्पन्न होनेमे कारण होनेपरभी उसमे कार्य करनेका सामर्थ्य उत्पन्न करनेवाला मोहकर्म नही होनेसे वह द्रव्यकर्म वेदनीय सत्तारूपसे केवलिमे रहता है । उसका फल नही मिलता। अत कारणमात्रसे कार्य नही होता है क्योकि उसमे विशेषता लानेवाला मोहकर्म नही है ।। १८८॥ भोजन करनेकी इच्छाको बुभुक्षा अर्थात् भूख कहते हैं। और वह मोहनीय कर्मसे उत्पन्न होती है, विना उसके बुभुक्षा कैसी होगी? केवल वेदनीयकर्मका वह कार्य नहीं है। यदि वह वेदनीयकर्मकाही कार्य है ऐसा कहोगे तो योनिमे रमण करनेकी इच्छा जिसको रिरसा कहते है वहभी वेदनीयकर्मकाही कार्य कहो और वेदनीयकर्मका सद्भाव होनेसे वहभी होने लगे तो वीतरागपनाको जलाञ्जलि देनी पडेगी ॥ १८९-१९० ॥ अथवा आपका कहना हम स्वीकारते है, केवलीको वेदनीयादि कर्म भूख, प्यास आदि -- - - १ आ तत्कार्येषु २ आ सुखाभावो १००) सिद्धान्तसार (४ १९२- यथा शुद्धमशुद्धं वास्मरन्तश्चास्मदादयः । भोजनं कुर्वते तद्वत्केवलीति न सुन्दरम् ॥ १९२ यथाख्यातं हि चारित्रं नास्मदादिषु विद्यते । तथापि तद्विशुद्धयर्थ प्रतिक्रमणमीहितम् ॥ १९३ केचिनिन्धं स्मरन्तोऽपि वर्जयन्त्यस्मदादयः । आहारं होनसत्त्वाश्च कथं पश्यन्न केवली ॥ १९४ अथाहारं गृहीत्वासौ तस्य दोषविशुद्धये । आवश्यकादिकं कर्म किं करोति न वा पुनः ॥ १९५ प्रथमे दोषवानेष द्वितीये शुद्धिमात्मनः । तद्दोषेभ्यः कथं कुर्यादिति मिथ्यात्वमञ्जसा ॥ १९६ तदाहारकथामात्रात्प्रमत्तो जायते यतिः।भुजानोऽपि न तत्स्वामी' यत्तच्चित्रं महात्मनाम्॥१९७ तदा प्रमत्त एवायं केवली तन्मताश्रितः । प्रमत्तत्वे विरोधः स्यात्कैवल्येषु सुधियाम् ॥ १९८ शरीरोपचयाथं स प्राणत्राणार्थमेव च । क्षुद्वेदनोपशान्त्यर्थ भोजनं कुरुते प्रभुः ॥ १९९ पीडा उत्पन्न करता है ऐसा हम क्षणतक मानते है तथापि अनेक हिंसादि पापोको देखते हुए केवली भगवान् कैसे भोजन करेगे ? ॥ १९१ ।। ? श्वेताबर इस प्रश्नका उत्तर देते हैं- "जैसे शुद्ध अशुद्धका स्मरण न करते हुए हम लोग भोजन करते है वैसे केवलीभी भोजन करते हैं" इसके ऊपर दिगम्बर जैन कहते हैं, कि यह कहना योग्य नहीं है , क्योकि यथाख्यातचारित्र हम आदिको नहीं है । तथापि जो भोजन करनेमे हमको दोष लगता है उसके निराकरणार्थ हमको प्रतिक्रमण करना पड़ता है। तथा अस्मदादिक कोई मुनि निन्धका स्मरण करते हुए हीनसत्त्व-असमर्थ आहारका त्याग करते हैं और सर्व जगत्को जानने देखनेवाले केवली आहार कैसे लेते है ? ॥ १९२-१९४ ।। हम आपको पूछते हैं कि, केवली आहार ग्रहण करके उसके दोष निराकरणके लिये आवश्यकादिक-प्रतिक्रमणादिक कर्म करते है अथवा नही ? पहिले पक्षमे अर्थात् आवश्यकादिक यदि वे करते है, तो वे दोषवान है। अन्यथा आवश्यकादिक करनेकी क्यो आवश्यकता पडी ? दूसरे पक्षमे यदि आवश्यकादिक नही करते है तो उन दोषोसे वे अपनी शुद्धि कैसी करते हैं? यदि नही तो मिथ्यात्वका प्रसग शीघ्र प्राप्त होगा ॥ १९५-१९६ ॥ आहारकी कथा विकथा है । विकथाको प्रमाद माना है । अर्थात् आहारकी कथा यदि मुनि करे तो प्रमादी होता है फिर केवली भोजन करनेपरभी प्रमादका स्वामी नही होते है, यह महात्माओकी आश्चर्यवाली कथा समझना चाहिये ।। १९७ ।। ? तब श्वेताबर मतके केवली प्रमत्तही होगे । तथा प्रमत्त होनेपर दुर्बुद्धिवाले श्वेताम्बरोके कैवल्यकी अनत चतुष्टयादि बातोमे विरोध आजायेगा ।। १९८ ।। (श्वेताम्बरमतके केवली शरीर पुष्ट होनेके लिये भोजन करते हैं। या प्राण रक्षणकेलिये भोजन करते हैं ? अथवा भूखकी वेदनाकी शान्ति होनेके लिये भोजन करते है ? ऐसे तीन प्रश्न कर ? ? १ आ च स्वामी सिद्धान्तसार शरीरोपचयाथं यन्न प्रमाणपरायते । क्षयाल्लाभान्तरायस्य सिद्ध नोर्मकर्मतः ॥२० प्राणत्राणार्थमित्येव दुष्टमिय्यात्वचेष्टितम् । अपमृत्यु विमुक्तत्वाद्यतो नतदपि प्रभो ना २०१ तृतीयोऽपि विकल्पोय सोऽपि मिथ्यात्वसूचक.। तस्यानन्तसुखत्वेन तत्पीडायास्त्वसंभवात् ॥२०२ एकादश जिने प्रोक्ता बुभुक्षादिपरीषहाः । तत्कय तन्निपेधः स्यादिति व्यामोहजल्पितम् ॥ २०३ अमीपामुपचारेण तत्र सत्त्वनिरूपणात् । पारमार्थिकसत्त्वे स्यात्सोऽस्मदादिसमो मतः ॥ २०४ भोजनं रसनेनासी स्पर्शनं स्पर्शनेन्द्रियात् । कुर्वन्केवलभागेप मिथ्यात्वं किमत. परम् ॥ २०५ उनका खडन दिगम्बराचार्य करते हैं)- शरीरपुष्टिकेलिये भोजन करते हैं यह कहना प्रामाणिक नही माना जाता । क्योकि केवलीके लाभान्तरायकर्मका पूर्णक्षय होनेसे अन्यजन दुर्लभ परमशुभ सूदम अनत ऐसे नोकर्म परमाणु, जो कि शरीरमे वलस्थापनके हेतु होते है, प्रतिसमय आते हैं, जिनसे उनका गरीर सदा पुष्टही रहता है। प्राणरक्षणके लिये केवली आहार करते हैं ऐसा कहना दुष्ट मिथ्यात्वका कार्य है । क्योकि केवली अपमृत्यु रहित होते हैं, अत यह कहनाभी युक्त नही। भूखकी वाधा शान्त करनेकेलिये केवली आहार करते हैं यह तिसरा विकल्पभी मिथ्यात्वका सूचक है । केवली अनतमुखी होनेसे भूखकी पीडाका उनमे सभव नही है ।। १९९-२०२ ।। (श्वेताम्बरका पुन कथन)- 'एकादश जिने' इस सूत्रमे आचार्योंने जिनेश्वरमे भूख, प्यास, गीत, उष्ण, दशमगक, चर्या, शय्या, वध, रोग, तृणस्पर्श, मल ऐसे ग्यारह परीषह उत्पन्न होते है ऐसा कहा है। परंतु 'उनको वे नही होते हैं ऐसा आपका कहना योग्य नहीं है। आचार्यश्रीने कहा कि "हे श्वेताम्बरविद्वन्, यह आपका प्रतिपादन व्यामोहसे मिथ्यात्ववश होकर हो रहा है " ॥२०३।। इसका उत्तर मुनो- " इन क्षुधादि परीपहोका अस्तित्व वहा उपचारसे है। यदि पारमार्थिक रूपसे इनका अस्तित्व होता तो जिनेश्वर अस्मदादिके समान हैं ऐसा समझना होगा।" स्पष्टीकरण-ध्यानाग्निसे घातिकर्मरूपी इधनोको केवलि-भगवानने भस्म किया है, तथा अतराय कर्मका अभाव होनेसे उनको प्रतिसमय शुभपुद्गल समूहकी प्राप्ति होती है, इसलिये वेदनीयकर्म मोहकर्मके साहाय्यसे विरहित होनेसे स्वयोग्य प्रयोजन उत्पन्न करनेमे अर्यात् क्षुधादि परीपह पीडा देनेमे असमर्थ हुआ । अत ध्यानोपचारके समान क्षुधादि परीपहोका सद्भाव उपचारसे केवलीमे माना है । केवली पूर्ण ज्ञानी होनेसे एकाग्रचिन्तानिरोध नहीं होनेपरभी कर्मरज- निर्जरारूप फल-लाम होनेसे जैसे व्यानोपचार उनमे हैं वैसे क्षुधादिवेदनारुप परिपहोका अभाव होनेपरभी वेदनीयकर्मोदयरूप द्रव्यपरीपहोका सद्भाव होनेसे जिनेश्वरमे ग्यारह परिपह है ऐसा उपचार करना योग्य है। ये केवलीजिन रसनेन्द्रियसे भोजनका स्वाद लेते हैं और स्पर्शवेन्द्रियसे स्पर्णका अनुभव लेते हैं ऐसा यदि माना जायगा तो इससे दूसूर्य क्या मिथ्यात्व हो सकता है ? || २०४-२०५ ।।

१०२) सिद्धान्तसार (४. २०६- कुर्वाणो भोजनं नाथो लोकर्यन्नावलोक्यते । तत्कि विद्याविशेषेण तथातिशयतोऽपि वा ॥२०६ आये निर्ग्रन्थताहानिद्वितीये कि न जायते । भोजनाभावरूपो वातिशयः सर्वसाधक. ॥ २०७ अन्यद्यदुच्यते मूडैस्तत्त्वनिह्नवकारिभिः। तस्मिन्नेव भवे स्त्रीणां मुक्तिर्यु क्तिर्न सा क्वचित् ॥२०८ नियमादृद्धिसंपन्नं ज्ञानमात्रमपि स्त्रियः । यस्था नास्तीह सर्वज्ञा सा कयं कथ्यतेऽधमैः ।। २०९ मुक्तिरस्त्येव रामाणामयाविकलकारणात् । पुंवद्धतोरसिद्धत्वान्नतच्चारु कदाचन ॥ २१० ज्ञानादीनां प्रकर्षोऽयं मोक्षहेतुरुदीरितः । स न स्त्रीषु प्रकर्षत्वादपुण्यादिप्रकर्षवत् ॥ २११ मायापरप्रकर्षण व्यभिचारो न युज्यते । मायाबाहुल्यमात्रस्य स्त्रीषु शश्वनिरूपणात् ॥ २१२ यदि भोजन करते हुए केवलीको लोग नही देखते है ऐसा आप (श्वेताम्बर) मानते हो तो इसमे हम पूछते हैं कि विद्याविशेषसे वे दीखते नही हैं अथवा केवलज्ञानके अतिशयसे वे नही दिखते हैं ? आद्य पक्षमे निग्रंथता-हानि होगी क्योकि विद्याविशेषसे युक्त होनेपर जैसे विद्याधर निर्ग्रन्थतासे रहित होते हैं वैसा केवली विद्याकेद्वारा अदृश्य होनेसे निर्ग्रन्थतासे रहित होगे । अन्य जनोमे असभवी अतिशय उनमे है, जिससे वे भोजन करते हुए नहीं दीखते हैं ऐसा यदि मानोगे तो भोजनका अभावरूप अतिशय माननाही योग्य होगा क्योकि वह प्रमाणसे सिद्ध हुआ है और सर्व गुणोकी सिद्धि करनेवाला है ।। २०६-२०७ ।। वस्तुस्वरूपको छिपाकर रखनेवाले श्वेताम्बरोंने अन्यभी ऐसा कहा है “ उसी भवमें स्त्रियोको मुक्ति होती है" परंतु उसमे कहाभी युक्ति नही है ।। २०८ ॥ स्त्रीको नियमसे ( ऋद्धिसम्पन्न ) चारित्रसंपन्न-महाव्रतयुक्त ज्ञानमात्रभी नही है। वह स्त्री सर्वज्ञानवाली केवलज्ञानयुक्त होती है ऐसे इन अधमोंने कैसा कहा है ? ॥ २०९ ।। ? ( श्वेताम्बर स्त्रियोको मुक्ति सिद्ध करनेकेलिये अनुमान कहते हैं )- " स्त्रियोंको अविकलकारण होनेसे मुक्ति होती है जैसे पुरुषको होती है । आचार्य कहते है, कि इस अनुमानमें अविकलकारण होनेसे' यह हेतु असिद्ध होनेसे यह अनुमान कभीभी युक्तियुक्त नही है। यहां अविकलकारण जो रत्नत्रय वह परमप्रकर्षको प्राप्त होकर मुक्तिका कारण है अथवा तन्मात्र- रत्नत्रयमात्र मुक्तिका कारण है ? तन्मात्र मुक्तिका कारण है तो गृहस्थकोभी तन्मात्र-रलत्रयमात्र कारणसे मुक्तिप्रसंग प्राप्त होगा। यदि परमप्रकर्पको प्राप्त ऐसा कारण स्त्रीमुक्तिके लिये हैं ऐसा कहोगे तो स्त्रियोम कारणोंका परमप्रकर्ष नही होता है। ज्ञानादिक कारणोका प्रकर्ष, जो कि मोक्षहेतु है ऐसा कहा है, वह स्त्रियोंमे नही होता है, क्योकि वह प्रकर्ष है । जैसे अपुण्यका प्रकर्ष अर्थात् पापका प्रकर्ष स्त्रियोमे नहीं है वैसा मोक्षके कारणोकाभी परमप्रकर्ष स्त्रियोमे नही है । इसके ऊपर श्वेताम्वर कहते है, कि अपुण्यका प्रकर्ष स्त्रियोमे नही है यह योग्य नही हैं क्योकि मायाप्रकर्ष स्त्रियोमे हैं इससे अपुण्यप्रकर्प नही है ऐसा कहना व्यभिचारी है। दिगंवर कहते है कि यह कहना योग्य नहीं है। मायावाहुल्यही मायाकी प्रचुरताही स्त्रीमे है, ऐसा यहां समझना चाहिये । अर्थात् माया ४. २२०) सिद्धान्तसार ( १०३ अत एव गतिर्नास्ति सप्तमे नरके स्त्रियाः। ततोऽनकान्तिको दोषो न स्यादिष्टविघातकृत् ॥२१३ तन्न ज्ञानप्रकर्षोऽस्ति मोक्षहेतुः प्रमाणतः । स्त्रीणां तृतीलिंगस्य यथा नायमहेतुतः ॥२१४ तद्धतुः सयमाभावान्नासौ तासु निगद्यते । संयमोऽपि हि सग्रन्थस्तासां सागारिणामिव ॥२१५ गृहिसंयमकेनापि यदि मोक्ष प्रजायते । दीक्षाग्रहणवैयर्थ्यं कथं केन निवार्यते ॥२१६ अथ निग्रंथ एवाय तन्न सत्यं कदाचन । सचेलसयमत्वेन सग्रन्थत्वप्रसङ्गत ॥२१७ सचेलसंयमो मुक्तिहेतुरित्यप्यसुन्दरम् । तदागमप्रसिद्धत्वादस्माकं प्रत्यसिद्धितः ॥२१८ न साधूनामवन्धत्वात्सयम'स्त्रीषु विद्यते । मोक्षहेतुर्गृहस्थानां न यथा बुद्धिशालिनाम् ॥ २१९ बाह्याभ्यन्तरतो वापि सनन्थत्वान्न जायते। निहीनशक्तिकाना च स्त्रीणा मुक्तिर्गृहस्थवत् ॥२२० . अधिक है ऐसा अभिप्राय है । परमार्थत पुरुषोमेही अपुण्यप्रकर्ष है ऐसा सिद्ध होता है । मायाका प्रकर्ष यदि स्त्रियोमे सिद्ध होता तो अपुण्यप्रकर्ष सिद्ध होनेसे रत्नत्रयरूप अविकल कारणोका प्रकर्षभी सिद्ध होता परतु ऐसा नही है ।। २१०-२१२ ॥ सप्तमनरकमे स्त्रियोकी गति नही है इसलिये उपर्युक्त जो अनेकान्तिक दोष आपने हमे (दि जैनोको) दिया था वह हमारे इष्ट साध्यमे (स्त्रियोको मोक्षप्राप्ति नही है इस विषयमे) विघातक नहीं है। इसलिये ज्ञानका प्रकर्ष, जोकि मोक्षप्राप्तिमे कारण है वह स्त्रियोको नही है। उसही प्रकारसे ज्ञानप्रकर्ष नपुसकोमेभी नही है। क्योकि वहाभी मोक्षके अविकलकारणका सद्भाव नही है ॥ २१३-२१४ ॥ स्त्रियोको सयमका अभाव होनेसे वे अविकलकारणोकी प्राप्ति करनेमे समर्थ नहीं हैं। और उनको गृहस्थोके समान परिग्रहयुक्त सयम है। गृहस्थ-सयमसेभी यदि मोक्षप्राप्ति होगी तो दीक्षाग्रहणकी व्यर्थता कौन कैसे दूर कर सकेगा? अर्थात् जिनदीक्षा ग्रहण करना व्यर्थही होगा। ॥ २१५-२१६ ॥ अव कदाचित् कहोगे कि, आर्यिकाका जो सयम है वह निग्रंथ सयम है ऐसा कहना योग्य नहीं है क्योकि, वह सवस्त्र-सयम होनेसे परिग्रहयुक्त सयमका प्रसगही है। सवेल-सयम मुक्तिका कारण है यह अर्थसे सुदर वचन तुम्हारे आगममे प्रसिद्ध है परतु ऐसे अर्थका प्रतिपादक आगम हमारेलिये असिद्ध है, प्रमाण नही है ॥ २१७-२१८ ॥ स्त्रियाँ साधूओंसे अवन्ध होनेसे उनमे निग्रंथ सयम नही है । जैसे बुद्धिशाली गृहस्थोंका संयम मोक्षहेतु नहीं है ।। २१९ ।। वाह्याभ्यन्तरपरिग्रह होनेसे स्त्रियां सग्रन्थ है तथा वे हीनशक्तिवाली होनेसे उनको गृहस्थोके समान मुक्ति नहीं है ॥ २२० । , १ आ गृहस्थसयमेनापि १०४) सिद्धान्तसार. (४. १२१- प्रत्यक्षेण गृहीतो वा स वस्त्रादिपरिग्रहः । ग्रन्थमाभ्यन्तरं तस्यास्तद्रागादिकमादिशेत् ॥ २२१ शरीरस्योष्मणा जन्तुविघातकनिवारणम् । वस्त्रमादीयते ताभिरथ रागाद्यभावतः॥ २२२ तन्न युक्तं वचस्तेषामचेलवतधारिणाम् । यतस्तीर्थकरादीनां हिंसकत्वं प्रजायते ॥ २२३ आचेलक्यं व्रतं तेषां नासिद्धं हि तदागमे । स्थितिकल्पस्य मयेऽस्य तैरेव प्रतिपादनात् ॥ २२४ किं च वस्त्रे गृहीतेऽपि पाणिपादाद्यनावृतेः । जन्तूनामुपघाताच्च तथावस्थित एव सः ॥ २२५ यूकालिक्षादिजन्तूनां मूछनायाश्च कारणं । वस्त्रं हिंसाडामहद्भिर्गृह्यते कि महात्मभिः ॥२२६ जो वस्त्रादि वाह्य परिग्रह उन्होने प्रत्यक्षसे ग्रहण किये है, वह उनके अभ्यन्तर रागादि परिग्रहोको सुझाता है । अर्थात् वस्त्रादि परिग्रह होनेसे उनके अन्तरंगमे रागाटिक मोहविकार हैं ऐसा सिद्ध होता है ॥२२१ ॥ (श्वेतांवर कहते हैं)- यदि वस्त्र ग्रहण नहीं किया जाता तो गरीरकी उष्णतासे हवामे रहनेवाले जन्तुओका नाग होगा । उनका नाग न होवें इस हेतुसे यायिकायें वस्त्र ग्रहण करती हैं। उनके मनमें रागादिक अभ्यन्तर परिग्रह नही हैं । अर्थात् आपने 'रागादिक विकारसे उन्होंने परिग्रह धारण किया है' ऐसा जो आक्षेप उनके ऊपर किया है वह व्यर्थ है ।। २२२ ।। - (उत्तर)- वेतांबरोंका यह वचन योग्य नहीं है । जन्तुओंका विधात टालनेके लिये वस्त्र ग्रहण करते हैं, तो अचेलव्रत धारण करनेवाले अर्थात् निर्वस्त्र-संयम धारण करनेवाले तीर्यकरको हिंसाका दोष लग जायेगा, ऐसा मानना पडेगा। भावार्य-तीर्थकरोने वस्त्रका त्याग किया था, अत उनके खुले अवयवोकी उष्णतासे जीवनाश होनेसे वे हिंसक थे ऐसा मानना पडेगा, जोकि मानना आपको अनिष्ट होगा। दाविवस्थिति कल्पोमे 'आचेलक्य' आपनेभी माना है और अब सवस्त्रसंयमको अहिंसाका हेतु मानने लगे हैं, अतः यह आपका कथन परस्पर दिरुद्ध है ।। २२३ ॥ अतः आचेलक्य व्रत श्वेतांबरोंको असिद्ध है-अमान्य है ऐसा नहीं है, क्योंकि उनके आगममे स्थितिकल्पके का भेदोंमें पहिला कल्प आवेलक्य माना है ।। २२४ ।। पुन. आपके कथनानुसार वस्त्रग्रहण करनेपरभी उससे सर्व अवयव आच्छादित नही होते हैं अर्थात् हाथ, पाँव, आँखे, नाक, कान, मस्तक आदि अवयव खुले रहतेही हैं और उनकी उष्णतासे प्राणियोंकी हिंसा जैसीकी वैसीही रही ॥ २२५ ।। वस्त्र, जू, लीख आदि सूक्ष्म जन्तुओंकी उत्पत्तिका कारण है तथा मूर्च्छनाका-ममत्त्वका कारण है। ऐसा हिंसाका कारण वस्त्र महात्माबोके द्वारा को ग्रहण किया जाता है ? अर्थात् वस्त्र धारण करनेसे हिला तो टलतीही नहीं परंतु उससे मनमें ममत्व उत्पन्न होता है। वस्त्रसे एसे दो दोष उत्पन्न होते हैं ।। २२६ ।।

-४ २३४) सिद्धान्तसार (१०५ यज्ञानुष्ठानवद्वस्त्र समस्तव्रतनाशकम् । महाव्रतधरा जातु न गृह्णन्ति महाधियः ॥ २२७ याचन सीवनं शश्वत्प्रक्षालनविशेषणम् । निक्षेपादानमित्येतच्चोरादिहरण तथा ॥ २२८ वस्त्रे गृहीते चैतानि व्रतबाधाकराणि च । मनःसक्षोभहेतूनि जायन्ते व्रतवर्तिनाम् ॥ २२९ अय लज्जाकरं नाग्न्यं रामाणाक्षोभकारणम् । कर्मास्त्रवनिमित्त तन्न युक्तं मुक्तकर्मणाम् ॥ २३० तदेतदपि मिथ्यात्व विपरीतं हतात्मनाम् । यदेवाद्य व्रत पूत तदेवासमत यतः ॥ २३१ नाग्न्य लज्जा करोत्येव स्वस्य चैतत्परस्य वाहन स्वस्य वीतरागाणा लज्जाक्षोभावभावतः॥२३२ परस्य करणे तस्य स्वस्यायातं किमेतया। अन्य. कर्ता विभोक्तान्य. साडख्यस्येव मतं भवेत् ॥२३३ मलिनाङ्ग सुवीभत्सनग्न लुञ्चितमस्तकम्।दृष्ट्वा साधु कथ रामाः क्षुभ्यन्ति क्षीणविग्रहम्।।२३४ जैसे यज्ञ करना अर्थात् पशुओका यज्ञकुण्डमे हवन करना हिंसाका कारण है वैसे वस्त्र- धारण करना सपूर्ण व्रतनागक है । इसलिये महावुद्धिमान् महावतधारक मुनिराज वह (वस्त्र) कदापि धारण नहीं करते है ।। २२७ ।। याचना करना, सीना, हमेशा जलसे धोना, रखना, और ग्रहण करना ऐसे दोष वस्त्र धारण करनेसे उत्पन्न होते है। ये सव दोष अहिंसादि व्रतोको वाधक है। जो व्रत-धारक आचेलक्य- व्रतके धारक है उनको वस्त्र धारण करनेकी इच्छासे प्रथमत मनमे क्षोभ उत्पन्न होता है।। २२८॥ (श्वेताम्बरोका आक्षेप)- नग्नतासे स्त्रियोको लज्जा उत्पन्न होती है और उनके मनमे क्षोभ उत्पन्न होता है । तथा कर्मागमनका वह निमित्त होता है । इसलिये योग्य कार्य करनेवाले मुनियोको नग्नता धारण करना योग्य है ।। २२९-२३० ।। (आक्षेपनिराकरण)- मिथ्यात्वसे जिनका आत्मघात हुआ है, ऐसे श्वेताम्बरोका यह विपरीत मिथ्यात्व है । क्योकि आचेलक्यसे जो पहिला पवित्र व्रत अर्थात् अहिंसाव्रत रक्षा जाता है उससे ये श्वेतावर लोग असयम होता है ऐसा उलटा कहने लगे हैं अर्थात् यह कथन विपरीत मिथ्यात्वका द्योतक है ।। २३१ ॥ (श्वेताम्बरोसे प्रश्न)- यह नग्नता मुनियोके मनमे लज्जा उत्पन्न करती है अथवा अन्य लोगोके मनमे लज्जा उत्पन्न करती है ? स्वत मुनियोको लज्जा उत्पन्न होती है ऐसा कहना योग्य नहीं है, क्योकि वे वीतराग होते है । इसलिये यह आपका मत साख्यमतके समान मालूम पडता है क्योकि साख्योने प्रकृति सर्वज्ञ मानी है, और आत्माको असर्वज्ञ माना है। प्रकृतिको वधमोक्ष होते है और आत्माको वध तथा मोक्षरहित माना है, यह उनका मानना जैसा विपरीत हैं, वसा नाग्न्यसे हिंसा होती है ऐसा श्वेताम्बरोका प्रतिपादन करनाभी विपरीतमिथ्यात्व है। क्योकि अहिंसा महाव्रतका साधक है, तो भी हिंसाका हेतु है ऐसी विपरीत कल्पना विपरीत- मिथ्यात्वका कार्य है ॥ २३२-२३३ ।। (स्त्रियोका मन क्षुब्ध नही होता)-जिसका शरीर मलिन है, तथा ग्लानि पैदा करनेवाला SS. 14 १०६) सिद्धान्तसार (४. २३५-- सुवस्त्रं गन्धमालाढचं कामकल्पितविग्रहम् । इद्देशं पुरुषं दृष्ट्वा रामा रागप्रकाशिका ॥ २३५ आचेलक्यं हि सर्वेषां व्रतानां मूलमुत्तमम् । स्त्रीपरीषहभग्नानां कथं पाखण्डिनां भवेत् ।। २३६ लज्जाशीतादिदुःखानां कारणत्वान्न संमतम् । नाग्न्यं केषां मतं तेषां दुःखदंन महावतम् ॥२३७ येभ्यो येभ्यः पदार्थेभ्यो विना पीडा प्रजायते । ते ते सर्वेऽपि सडग्राह्या मधुमांससुरादयः॥ २३८ रागद्वेषमदक्रोधलोभमूलमनर्थकृत् । वस्त्रं हि त्यजतां लज्जा गृह्णतां नेति कौतुकम् ॥ २३९ यस्या मिथ्यात्वदोषेण जातायाः सुमहद्धिकम् । पदं चक्रधरादीनामपि नैवोपजायते ॥ २४० है, जिसका मस्तक केशलोचसे युक्त है ऐसे कृश शरीरवाले नग्न साधुको देखकर स्त्रियाँ कैसे क्षुब्ध होगी ? अर्थात् साधुकी नग्नता स्त्रियोको क्षुब्ध नही कर सकती ॥ २३४ ।। - जिसके वस्त्र सुदर है, जो इत्र और पुष्पमालाओको धारण करता है, जिसका शरीर मदनके समान सुदर है ऐसे पुरुषको देखकर स्त्री अपना रागभाव-प्रेम प्रगट करती है । यह आचेलक्य स्थितिकल्प सर्व व्रतोका उत्तम मूल है । अर्थात् इसके आधारसेही सब अहिंसादि व्रत- समूह स्थिर रहता है अन्यथा नहीं । जो स्त्रीपरिषहसे भग्न हुए है ऐसे पाखडी लोग इसे धारण करनेमे कैसे समर्थ होगे ? ॥ २३५ ।। लज्जा, ठण्डी आदि दुख नग्नतासे उत्पन्न होते है, इसलिये कई पाखडियोको यह नान्य मान्य नहीं होता । उनको यह महावत दुख द है अर्थात् जो लज्जादिकसे पीडित हैं उनको नान्य सौख्यदायक नही है । परतु जो लज्जा, शीत, आदि दुख सह सकते हैं, जो स्त्री- परीषहसे भग्न नही हुए उनको इस नाग्न्यकी योग्यता ज्ञात होनेसे वेही उसको पूर्णतासे निभाते हैं। अन्य जनोंको इसका धारण करना शक्य नही ॥ २३६-२३७ ॥ यदि नान्य दुखदायक होनेसे त्याज्य है, तो जिन जिन पदार्थोंके विना पीडा होती है वे पदार्थ सुखके लिये ग्रहण करने चाहिये ऐसा कहते हो तो मधु, मास, मदिरा आदि पदार्थोंको ग्रहण करो, क्योकि इनके विना आपके दुःख होता होगा ॥ २३८ ।। राग, द्वोष, मद-गर्व, क्रोध और लोभ उत्पन्न होनेमे वस्त्र मूल कारण है और इससे अनर्थ उत्पन्न होता है । अत ऐसे वस्त्रका त्याग करना लज्जाका हेतु है और उसका ग्रहण करना लज्जाका हेतु नही है ऐसा कहना हमको आश्चर्यचकित करता है ।। २३९ ।।। " मिथ्यात्वदोषसे स्त्री-पर्याय प्राप्त होता है। अत उस पर्यायमें जीवको चक्रवर्ति आदि- कोंका महेश्वर्य प्राप्त नहीं होता । अर्थात् जिस स्त्रीको चक्रवति आदि पदभी प्राप्त नहीं होते, उसे -- . --- . १ आ नाग्न्य चेत्समतम् ---४. २४८) सिद्धान्तसार (१०७ तस्यास्तीर्थकरत्वं हि त्रिलोकीपतिपूजितम् । मोक्षककारणोपेत कथ मूनिगद्यते ॥ २४१ केवली कवलंभुङक्ते स्त्रिया मुक्तिः सुदुर्लभा। सग्रन्थो मोक्षमार्गश्च विपरीतदृशां मतम् ॥ २४२ ज्ञान चारित्रनिर्मुक्त चारित्र ज्ञानवजितम् । ते वा दर्शननिर्मुक्ते मिथ्यात्व नैव मुञ्चत. ॥२४३ इत्याद्यनेकमिथ्यात्वं नराणां शल्यमूजितम् । महादुःखप्रद तेन वर्जनीय मनीषिभिः ।। २४४ निदानमपि शल्यत्वाद्धेय हेयविशारदै । अयुक्त तद्धि साधूना सर्वव्रतविनाशकम् ॥ २४५ शस्ताशस्तप्रभेदेन द्विविध विधिकोविदा. । कथयन्ति जिनाघीशा निदानं तद्विजिताः॥ २४६ ससारस्य निमित्तं च विमुक्ते कारण परम् । प्रशस्त द्विविध जैन कथित तथ्यवेदिभिः ॥२४७ कर्मणां विच्युति बोधि समाधि भवदुःखतः । हानिमाकाक्षतो मुक्तिहेतुभूत निगद्यते ॥ २४८ इंद्र, धरणेन्द्र और चक्रवर्ती जिसे पूज्य मानते हैं तथा जो मोक्षके मुख्य-अद्वितीय कारणसे युक्त होता है ऐसा तीर्थकर-पद प्राप्त होता है ऐसा मूढ लोग कैसा कहते है ? ॥ २४०-२४१ ।। केवली कवलाहार करते है, और स्त्रियोको दुर्लभ मुक्ति प्राप्त होती है और परिग्रह- सहित मोक्षमार्ग है ऐसा विपरीत-मिथ्यात्वियोका मत है ।। २४२ ।। मिथ्यात्वके अनेक प्रकार हैं- चारित्रसे रहित ज्ञान, ज्ञानरहित चारित्र और दर्शनरहित चारित्र और ज्ञान मुक्तिका हेतु मानना यह मिथ्यात्व है । यह मिथ्यात्व आत्माको नही छोडता इत्यादिक अनेक प्रकारका मिथ्यात्व है । इसको शल्य कहते है । यह शल्य मनुष्योको दुख देता है । यह शल्य (मिथ्यात्व ) महादु ख देनेवाला होनेसे विद्वान् उसे छोडते हैं ।। २४३-२४४ ।। (निदानशल्यका वर्णन । )- त्याज्य भावोको-मिथ्यात्व, कषाय आदिकोको छोडनेमे चतुर ऐसे गणधरादि महापुरुषोने निदानभी प्राणिओको दुख द होनेसे त्याज्य माना है। साधुओको यह शल्यधारण करना योग्य नहीं है, क्योकि यह सब व्रतोका नाश करता है ।। २४५ ।। इस निदानके प्रकार जाननेमे निपुण और उनसे पूर्ण रहित जिनेश्वरोने उसके प्रशस्त और अप्रशस्त ऐसे दो भेद कहे है ॥ २४६ ।। यह प्रशस्त-निदान ससारका कारण और मोक्षकाभी उत्तम साधन है । अर्थात् सत्य वस्तुस्वरूपको जाननेवाले जैनोने ससारनिमित्तक प्रशस्त-निदान और मोक्षनिमित्तक प्रशस्त निदान ऐसे दो भेद कहे है ॥ २४७ ॥ कर्मोंका नाश, बोधि-रत्नत्रयप्राप्ति, समाधि-धर्मध्यान, शुक्लध्यान, ससार दुखोका नाश आदिको चाहनेवालोको यह प्रशस्त-निदान मुक्तिका कारण माना है । अथवा जिनधर्मकी प्राप्ति होनेके लिये योग्य देश-आर्य देश, योग्यकाल-चतुर्थकाल, भव-जैनके उच्चकुलोमे जन्म, योग्य क्षेत्र- . १ आ पुण्य २ आ स्थ १०८) सिद्धान्तसारः (४. २४९- देश कालं भवं भावं क्षेत्रमैश्वर्यमेव वा। जिनधर्मप्रसिद्धयर्थ कांक्षतो वा दरिद्विताम् ॥ २४९ संसारहेतुकं तद्धि निदानं जिननायकः । कथितं हि यतो नैते जायन्ते संसृति विना ॥ २५० आधं पूतमनन्तैकसुखधामविधायकम् । द्वितीयं दुःखदं किञ्चिद्यदन्यभवहेतुतः ॥२५१ अप्रशस्तं पुनधा. भोगमानादिभेदतः । संसारकारणं निन्धं सिद्धिसौधाप्रवेशकम् ॥ २५२ भोगाशक्तिमनाः' प्राणी न जानाति हिताहितम् । अहिदष्ट इवानेकमूर्छादाहप्रलापवान् ॥२५३ मन्त्रतन्त्रादिभिः केचिज्जीवन्त्यहिविषादिताः।भोगभोगीन्द्रदष्टाश्च न जीवन्ति कथञ्चन ॥२५४ भोगाभिलाषिणा पुंसा यत्कर्मेह विधीयते । वह्निभिर्भवकोटीभिर्न स तस्यान्तमञ्चति ॥२५५ भोगा लोकान्त्रिमोह्याशु विषयौषधयोगतः । ठका इव हठात्तेभ्यो धर्मवित्तापहारिणः ॥ २५६ स्थान जहां जैनधर्माराधक श्रावक रहते हैं और भाव-शुभ परिणाम और वैभव चाहनेवालोंको यह संसारका कारण प्रशस्त-निदान होता है । क्योंकि संसारके विना ये देश, काल, क्षेत्र, भव, भाव और ऐश्वर्य प्राप्त नहीं होते हैं ऐसा जिनेश्वरोने कहा है ॥ २४८-२५० ॥ पहिला जो प्रशस्तनिदान है वह पवित्र अनंत और अद्वितीय ऐसा सुखस्थान देनेवाला- मोक्षप्राप्ति करनेवाला है । और दूसरा प्रशस्तनिदान किञ्चित् दुःख देनेवाला है; क्योंकि अन्य- भवमें जिनधर्मकी प्राप्तिके लिये देश, काल, क्षेत्र, भव, भाव और ऐश्वर्य चाहनेसे वह होता है ।। २५१ ॥ अप्रशस्त-निदानकेभी दो भेद हैं, पहिला भेद भोगहेतुसे होता है और दूसरा भेद मान- हेतुक है। ये दोनोंभी संसारके कारण हैं, निन्द्य है और सिद्धिमन्दिरमें प्रवेश होनेमें बाधक हैं ॥२५२॥ जो प्राणी भोगोंकी आसक्तिमें अपना मन लगाता हैं उसे हितकर कौन है और अहितकर कौन है, इसका परिज्ञान नहीं होता । सर्पदंश जिसको हुआ है ऐसे मनुष्यके समान वह अनेक मूर्छा, दाह क्षौर प्रलापसे युक्त होता है । अर्थात् भोगासक्ति होनेसे उसको भोगोंमें ममत्व-बुद्धि होती है। उससे उसको दाह उत्पन्न होता है अर्थात् तृष्णा अधिकाधिकतया वृद्धिंगत होने लगती है तथा वह भोगोंकीही सतत बातें करता रहता है। सर्पके विषसे पीडित हुए कितनेक लोग मंत्रतन्त्रादिसे विष दूर होनेसे जीते है परंतु भोगरूपी महासर्पसे दंश किये गये लोग किसी प्रकारसेभी नही जीते हैं ।। २५३-२५४॥ इस जगतमें रोग और भोग अतिशय दुःख देनेवाले हैं । इस लोकमेंही रोग दुःख देते हैं परंतु ये भोग भवभवमें जीवको दुःख देते हैं। भोगाभिलाषी मनुष्य इस भोगके लिये जो कर्म करता है अर्थात् जो कर्मबंध उसको भोगाभिलाषासे होता है उसका अन्त.अनेक कोटि भवोंसेभी नहीं होता है अर्थात् कोट्यवधिभवोंमें भोगाभिलाषाजन्य कर्मका उदय होता है और वह प्राणीको सन्तत दुःख देता १ आ. भोगासक्तमनाः -४. २६२) सिद्धान्तसार (१०९ येषामलाभतो होनास्तदाशापाशतिन । कुम्भीपाका इवानेके दन्दान्ते नराधमाः ।। २५७ तदर्थ कुर्वतां तावन्निदानं हतचेतसाम् । का गतिर्दष्टवृत्तीना निदानमिति निश्चितम् ॥ २५८ मानिनः पञ्च पापानि कुर्वतो न मनागपि । पापीयसो घृणाप्यस्ति महाहडकारवर्तिनः ॥ २५९ अतो मानं विमुञ्चन्ति पापमूलमनेनसः । न मानाग्निप्रदग्धेषु धर्मवीनं प्ररोहति ॥ २६० इति शल्यं विधाप्येतद्वर्जयन्ति विचक्षणाः । न हि शल्यवतां जातु जायते निर्वृतिर्यत. ॥२६१ शल्यानां त्रितयं हृदि प्रविततं नि सारयन्तीह योश्रीमन्तो गुरुवाक्यवैभवमहासन्दंशकरङ्गत ॥ ते चारित्रपवित्रिताशयवशा स्वर्गाश्रिता. संपदो।भुजानाःकलयन्तिनिवृतिमलंव्यापत्तिवृत्तिच्युता इह भवति सुभव्यो भूरिदुःखापहारी। जिनपतिमतसारी य सदा ब्रह्मचारी ॥ है। विषयरूपी जडीवुटीके द्वारा भोग लोगोको ठक पुरुषोके समान विमोहित करते है और उनसे वर्मधन छीन लेते हैं । भोगोकी अभिलापारूपी पागसे वघे गये नराधम इनकी प्राप्ति न होनेसे दीन होकर कुभी-पाकके समान अतिशय सन्तप्त होते हैं ॥ २५५-२५७ ।। उन भोगोकी अभिलापामे मारा गया है, चित्त जिनका ऐसे निदान करनेवाले दुष्ट स्वभाववालोको कौनसी गति होगी? इस प्रकारसे निदानका निश्चय समझना चाहिये ॥२५८॥ अतिशय अहवारयुक्त पापी और मानी ऐसे पुरुषको यत्किञ्चित्भी घृणा नही होती है। ऐसा समझकर पापरहित सत्पुरुप पापका मूल ऐसा मानकपाय छोडते हैं। क्योकि मानरूपी अग्निसे दग्ध हुए मनुष्योमे धर्मका वीज अकुरित नही होगा ॥ २५९-२६० ।। चतुर पुरुप इस प्रकार तीनो गल्योकाभी त्याग करते हैं। क्योकि शल्यधारणसे पुरुषोको कभीभी सन्तोष नही होता ।। २६१ ।। जो अहिंसादि व्रतरूप सपत्तिके धारक भव्य जन हृदयमे विस्तीर्णतासे प्रविष्ट हुए माया, मिथ्यात्व और निदानरूप तीन शल्योको निकालकर फेक देते है, तथा श्रीगुरूपदेश-वाक्य- रूप महा सडसीसे अगमेसेभी गल्य निकाल देते है, जिनका चित्त चारित्र धारण करनेसे पवित्र हुआ है ऐसे सत्पुरुप स्वर्गकी सपदाको भोगते है । अनतर वहासे च्युत होकर वे मनुष्यभवमे कर्मका क्षय करके पूर्ण व्यापकताको धारण करनेवाली मुक्तिको प्राप्त करते हैं अर्थात् मुक्त होते हैं । कालको व्याप्त करनेवाली मुक्तिको अर्थात् नित्य मुक्तावस्थाको धारण करते है ।। २६२ ।। जो सुभव्य जिनेश्वरके मतको धारण करता है, जो सदा ब्रह्ममे अर्थात् अहिंसादि गुणोंमे चरण करता है, अहिंसादि गुणोको नि गल्य होकर धारण करता है, वह अनेक दुखोको ११०) सिद्धान्तसार (४. २६३-- . करकलितममन्दं साधुवृत्तप्रमोदम् । पुरुषमतिशयानः सम्पदो नो ददानः ॥२६३ इति श्रीपण्डितनरेन्द्रसेनविरचिते सिद्धान्तसारसंग्रहे मतान्तरनिरूपणं चतुर्थः परिच्छेदः ॥४॥ -- नष्ट करता है । वह मनुष्य विशाल ऐसे मुनिव्रतोका आनद हाथमे धारण करनेवाले पुरुषका अतिशयसे अनुकरण करनेवाला होता है । वह भव्य हमे सपत्ति-रत्नत्रयधन प्रदान करे ॥ २६३ ।। श्रीपण्डितनरेन्द्रसेनविरचित सिद्धान्तसारसडग्रहमे चार्वाक, वैशेषिक, साख्य, श्वेताबरादि मतान्तरोका निरूपण करनेवाला चौथा अध्याय समाप्त हुआ ॥४॥ - 4. १ आ इति सिद्धान्तसारसग्रहे आचार्यश्रीनरेन्द्रसेनविरचिते चतुर्थ परिच्छेद पंचमः परिच्छेदः पञ्चानां हि पवित्राणा व्रताना मूलमादिमम् । यत्तत्त्वार्थपरिज्ञानं तच्च वच्मि समासतः ॥ १ यो यथावस्थितः सर्वस्तस्य भाव इति स्फुटम् । तत्त्वंतत्त्वविदस्तथ्यं प्रथयन्ति तदद्भुतम् ॥२ जीवाजीवात्रावा बन्धसवराभ्या सनिर्जरा । मोक्षश्चेति मतं तत्त्वं सप्तधा तत्त्ववेदिभिः ॥३ तत्र निश्चयतोऽनादिमध्यान्तेन प्रकाशिना । विशुद्धोपाधिमुक्तेन चैतन्याख्येन सर्वदा ॥ ४ असाधारणरूपेण प्राणेनानेन जीवति । योऽसौ जीव इति व्यक्त जीवजैः स निगद्यते ॥५ यथा शुद्धनयापेक्षः कर्मबन्धवशात्पुनः । चतुःसाधारणः प्राणर्जीवोऽयं जीवतीत्यपि ॥ ६ उभयेन निमित्तेन यो भावोऽस्योपजायते । उपयोगः स विज्ञेयस्तन्मयोऽसौ निगद्यते ॥ ७ पञ्चम अध्याय । - जीवादि तत्त्वार्थोके स्वरूपका निर्दोष ज्ञान पवित्र पाच व्रतोका आद्य मूल है, इसलिये मैं यहा सक्षेपमे उसका प्रतिपादन करता हू ॥१॥ जीवादिक सर्व अर्थसमूह जो जैसा है उसका वैसा भाव होनाही सत्य तत्त्व है, ऐसा तत्त्वके ज्ञाता गणधर देव कहते है वह आश्चर्यचकित करनेवाला है। भावार्थ-जीवादिकोके यथार्थ स्वरूपको जिसका आगममे वर्णन है उसको तत्त्व कहते हैं ॥ २ ॥ ( तत्त्वोके सात भेद)- तत्त्वज्ञोने जीव, अजीव, आस्रव, बध, सवर, निर्जरा और मोक्ष ऐसे तत्त्वके सात प्रकार माने हैं ।। ३ ।। (जीवकी व्याख्या)- निश्चयनयसे जीवका चैतन्यस्वरूप है । वह आदि, मध्य और अन्तसे रहित है । अर्थात् वह अनादिनिधन होनेसे मध्यहीन है । यह चैतन्य उत्पत्तिहीन, अन्तहीन तथा मध्यहीन और सदा प्रकाशयुक्त है । यह विशुद्ध-कर्मरहित तथा उपाधि-रागद्वेषोंसे रहित है। यह चैतन्य सर्व कालमे रहता है । इस चैतन्यको असाधारण प्राण कहते हैं। क्योकि यह प्राण जीवके विना अन्यपदार्थोंमे कदापि नही होता है। ऐसे चैतन्य प्राणसे जो सर्वदा जीता है उसे जीवके स्वरूपको जाननेवाले आचार्य व्यक्तरूपसे 'जीव' कहते हैं, शुद्ध नयकी अपेक्षासे जीवका ऐसा स्वरूप कहा है । परन्तु कर्मवन्धके वश होकर यह जीव चार साधारण प्राणोंसे जीता है। अत व्यवहारनयसे जो चार प्राणोसे जीवन धारण करता है उसे जीव कहते है । तात्पर्य यह जीव अनादि कर्मबधसे परतन्त्र हुआ है जिससे वह इन्द्रियप्राण, बलप्राण, आयुप्राण, तथा श्वासोच्छ्वास प्राण ऐसे चार प्राणोको धारण करता हुआ जीता है, इसलिये उसे जीव कहते हैं ॥ ४-६ ॥ ( उपयोग किसे कहते है )- उभय निमित्तके आश्रयसे वस्तुस्वरूप जाननेके लिये जो वस्तुके प्रति भाव प्रेरा जाता है उसे उपयोग कहते हैं । अथवा उप-आत्माके समीप योग-योजना १ आ यो यथावस्थितो ह्यर्थ ११२) सिद्धान्तसार (५.८- सोऽपि द्वेधा भवेन्नित्यं ज्ञानदर्शनभेदतः । समस्तो वासमस्तो वा ज्ञेयः शुद्धनयात्पुनः ॥८ साकारं कथ्यते ज्ञानं निराकारं च दर्शनम् । आद्यमष्टविधं ज्ञानं चतुर्दा दर्शनं परम् ॥ ९ जिसकी होती है उसे उपयोग कहते हैं । सामान्यत आत्माके ज्ञान और दर्शनको उपयोग कहते हैं । यह जीव उस उपयोगसे तन्मय है । वह ज्ञानोपयोग और दर्शनोपयोग ऐसा दो प्रकारका है। वह आत्माका लक्षण होनेसे आत्मामे सर्वदा विद्यमान है । शुद्ध नयसे इस आत्मामे पूर्ण ज्ञानो- पयोग और दर्शनोपयोग है, तथा व्यवहार नयसे असमस्त उपयोग है । अर्थात् मत्यादि ज्ञाना- वरण कर्मके क्षयोपशमसे तथा चक्षुर्दर्शनाद्यावरणके क्षयोपशमसे मतिज्ञानादि उपयोग तथा चक्षुर्दर्शनादि तीन दर्शनोपयोग आत्मामे रहते है ।। ७-८ ॥ विशेषार्थ-पदार्थको जानने के लिये जो चैतन्यकी प्रवृत्ति होती है उसको उपयोग कहते है । वह वाह्य कारणोंसे और अभ्यन्तर कारणोसे होता है । वाह्य कारण आत्मभूत और अनात्मभूत इस तरह दो प्रकारका है । आँख, कान आदिक इद्रियसमूह आत्मभूत बाह्य कारण है और दीपक आदि अनात्मभूत बाह्य कारण है। अभ्यन्तर कारणभी आत्मभूत और अनात्मभूत ऐसे दो प्रकारके हैं। चिन्तादिकोको सहायभूत ऐसी जो मनोवर्गणा, कायवर्गणा और वचनवर्गणा जिनको द्रव्ययोग कहते हैं, वह अदर होनेसे अतरग कारण है । परतु आत्मासे पृथक् होनेसे उनको अनात्मभूत कहते हैं । यह द्रव्ययोग जिसको निमित्त है ऐसा भावयोग वीर्यान्तराय कर्म, ज्ञानावरणकर्म, दर्शनावरण कर्मके क्षयसे तथा क्षयोपशमसे उत्पन्न होता है, जिसको आत्माकी प्रसन्नता कहते है, यह आत्मभूत अभ्यन्तर कारण है। इन कारणोका सबध होनेपर चैतन्यमय ऐसा जो आत्माका परिणाम पदार्थोको जाननेमे और अवलोकनमे प्रवृत्त होता है उसे उपयोग कहते हैं । जव उपयोग पदा- र्थोको जाननेके लिये देखनेके लिये प्रवृत्त होता है तव वस्तुको आत्मा जानता है और देखता है। ( राजवार्तिक 'उपयोगो लक्षण' इस सूत्रका भाष्याग ) (ज्ञानोपयोग और दर्शनोपयोगके भेद ।)- ज्ञान साकार है और दर्शन निराकार है। वस्तुके विशेषस्वरूपको और सामान्यस्वरूपकोभी ज्ञान जानता है जैसे .यह वटवृक्ष है । वटत्व विशेषको वृक्षत्वसामान्यके साथ जानना साकारोपयोग है इसीको ज्ञानोपयोग कहते हैं। तथा विशेषको न जानकर वस्तुकी सत्तामात्रका अवलोकन करना दर्शनोपयोग है । इसीको अनाकारोपयोग कहते है । पहिला ज्ञानोपयोग आठ प्रकारका होता है अर्थात् मतिज्ञान, श्रुतज्ञान, अवधिज्ञान, मन पर्यय ज्ञान, केवलज्ञान, कुमतिज्ञान, कुश्रुतज्ञान और विभगावधिज्ञान । दर्शनोपयोगके चक्षुर्दर्शन, अचक्षु- दर्शन, अवधिदर्शन और केवलदर्शन ऐसे चार भेद है। दोनोके मिलकर वारह भेद होते है ॥ ९॥ -- -- १ आ शुद्धाशुद्धनयात्पुन , -५ १४) सिद्धान्तसार (११३ तथा शुद्धनयेनासावमूर्तः कथ्यते जिन । अशुद्धेन तु मूर्तोऽय कर्मणा सहितो यतः ।। १० एवम्भूतनयापेक्षप्टोत्कीर्ण इवामलः । अकर्ता कर्मणा जीवो निश्चयानिश्चितो जिनः ॥ ११ अनवंभूततः कर्ता कर्मणामयमुच्चकैः । उच्चकैनियुक्तैश्च कथितो जिननायकैः ॥ १२ यदि शुद्धनयादेव' लोकाकाशप्रदेशकः । अशुद्धन तथाप्यात्मा देहमानो' निगद्यते ॥ १३ तथा निश्चयतो नार्थनिरुपाधिरयं पुनः । अनिश्चयेन सोपाधिजेपास्फटिकवद्भवेत् ॥ १४ (जीव अमूर्तिक और मूर्तिक है।)- यह आत्मा शुद्धनयको अपेक्षासे अमूर्तिक है, ऐसा जिनेश्वर कहते हैं । तथा अशुद्धनयसे आत्मा मूर्तिक है, क्योकि वह कर्मोसे बद्ध हुई है। विजली, मेघगर्जना, वज्रपात इत्यादिकसे आत्मामे भय उत्पन्न होता है । इसलिये आत्मा कथंचित् मूर्तिक है । मद्यादिक सेवनसे आत्मा शक्तिविकल होती है अत मूर्तिक है ॥ १० ॥ (जीवका कर्तृत्व और अकर्तृत्व । )- एवभूतनयकी अपेक्षासे यह आत्मा टाकीके द्वारा उत्कीर्ण हुए पाषाणके समान निर्मल-कर्म रहित है । निश्चयनयसे आत्मा कर्मोंका कर्ता नही है ऐसा जिनेश्वरोने निश्चय किया है ।। ११ ॥ एवभूतनयकी अपेक्षासे रहित होकर अर्थात् अशुद्धनयकी अपेक्षासे यह आत्मा ज्ञानावरणादि कर्मोका कर्ता है ऐसा उच्चज्ञानी-केवलज्ञानी जिनेश्वरोने कहा है ॥ १२ ॥ ( आत्मा व्यापक और देहप्रमाण है।)- यद्यपि शुद्धनयसे आत्मा लोकाकाशके प्रदेश परिणाम है अर्थात् लोकपूरणसमुद्घातमे आत्मा सपूर्ण लोकाकाशको अपने असख्यात प्रदेशोको फैलाकर व्याप्त करती है तथापि अशुद्धनिश्चयसे यह आत्मा देहमात्र है, अर्थात् जो छोटा बडा देह उसे नामकर्मके उदयसे प्राप्त होता है, उसमे अपने प्रदेशोको सकुचित अथवा विस्तृत करके रहती है । तथा आत्मा देहमे सर्वत्र स्वानुभूतिसे अनुभवमे आती है। वह प्रतिव्यक्तिको अपने अपने शरीरमै ज्ञानसुखादिगुणोंसे पूर्ण भरी हुई अनुभवमे आती है। इसलिये उसको अशुद्धनयसे देहप्रमाण माननेमे प्रत्यवाय नही है ।। १३ ॥ (आत्माका निरुपाधित्व तथा सोपाधित्व)-प्रभु जिनेश्वरने निश्चयसे यह आत्मा निरुपाधि है, ऐसा कहा है और अनिश्चयसे जपापुष्पयुक्त स्फटिकके समान सोपाधि कहा है। जैसे स्फटिक मणि जपापुष्पके सयोगसे लाल नही होनेपरभी लाल दिखता है वैसी यह आत्मा निरुपाधि है, परतु कर्मके सयोगसे रागी, द्वेषी, मोही होती है ।। १४ ॥ १ आ देप २ आ मानो S.S 15 ११४) सिद्धान्तसार (५. १५- - शुभाशुभवशानेकसुखदुःखकभुक्तिमान् । व्यवहारात्तथा शुद्धनयेनात्यन्तसौख्यभाक् ॥ १५ परमार्थनयेनासौ संसारेण विवजित । नित्यानन्दस्वभावत्वात् संसारी चापरेण सः ॥ १६ स्वात्मोपलब्धिरूपस्य स्वरूपस्य निषेधनात् । कर्मोदयादसिद्धोऽसौ सिद्ध एव सुनिश्चयात् ॥ १७ अद्ध्वं व्रज्यास्वभावेन विभावेन पुनर्न हि । भाम्यमाणो' भवाम्भोधौ चातुर्गतिककर्मणा ।। १८ फर्ताऽमूर्तस्तथा, भोक्ता स्वदेहमितिर्भवी । उपयोगमयः सिद्धो ह्यात्मासाबूदूर्ध्वगामिकः ॥ १९ मूर्त एव हि जीवोऽस्य भाट्टानां नास्तिकस्य च । तन्मतापह्नवायेदं ह्यमूर्तग्रहणं सताम् ।। २० - -- - व्यवहारनयसे गुभाशुभ कर्मके वश होकर आत्मा अनेक सुखदु खोका भोक्ता है । अर्थात् जो शुभ और अशुभ कर्म इस आत्माकेद्वारा वाधे जाते हैं, उनका उदय आनेपर वह मुखोका और दु.खोका अनुभव करने लगती है। ससारमे इसका भोक्तृत्व इस प्रकारका है। परन्तु शुद्धनयसे आत्मा अनन्तसुखयुक्त है ।। १५ ।। (आत्मा ससारी और मुक्त है । )- आत्मा परमार्थनयसे ससाररहित है। क्योकि यह हमेशा नित्य आनन्दस्वभावका धारक है और व्यवहारनयसे ससारी है ।। १६ ॥ ( आत्मा सिद्ध और असिद्ध है। )- इस आत्मामे अशुद्धनयकी अपेक्षासे पूर्ण शुद्ध आत्मस्वरूपकी प्राप्ति नही होनेसे असिद्धता है अर्थात् कर्मके उदयसे यह आत्मा असिद्ध है और शुद्ध निञ्चयनयसे आत्मा अष्टविध कर्मोंसे रहित है इसलिये शुद्ध सिद्धस्वरूप है ।। १७ ॥ (उर्ध्वगति और ससारभ्रमण । )- स्वभावसे आत्मा उर्ध्वगतिवाली है, परंतु विभावसे उर्ध्वगतिवाली नही है। चतुर्गतिमे कर्मके उदयसे यह आत्मा ससारसमुद्रमे. भ्रमण कर रही है । आत्मा कर्ता, अमूर्त, भोक्ता, स्वदेह-परिमाण, ससारी, उपयोगमय असिद्ध और ऊर्ध्वगति- वाली है ॥ १८-१९ ॥ (अन्यमत तथा जैनमतसे आत्माका वर्णन )- भाट्ट-कुमारिलभट्टके अनुयायियोको अर्थात् मीमासकोको भाट्ट कहते है। उनकी अपेक्षासे तथा नास्तिकोकी-चार्वाकोकी अपेक्षासे आत्मा मूर्त है । विशेष स्पष्टीकरण-मीमासक आत्मा कर्मरहित-शुद्ध कभीभी नही होती ऐसा मानते हैं। "कोयला जैसा कालाही रहता है उसे कितनाभी धो डालो वह सफेद नही होता, वैसेही आत्माभी कभीभी शुद्ध नहीं होती, सर्वज्ञपना उसे प्राप्त नही होता है" ऐसा मीमासक कहते है। चार्वाक तो शरीरसे भिन्न आत्मा हैही नही ऐसा मानते हैं अर्थात् वे देहकोही आत्मा मानते हैं । इन दोनों मतवालोंके निराकरणार्थ जैनोने आत्मा कथंचित् मूर्तिक और कथंचित् अमूर्तिक मानी है ॥ २० ॥ यह T . . ----- ----. १ या नानन्त २ आ म्यमाणो -५ २५) सिद्धान्तसार (११५ १ एकान्ततोऽपि मूर्तः स्याद्ययेष हतचेतसा । तदा' बाटेन्द्रियग्राह्यः सर्वेषां स कय न हि ॥ २१ शुद्धचैतन्यमात्रे स योगानामभिसम्मतः । तन्मतस्य निरासार्थमुपयोगी निगद्यते ॥ २२ बुद्धयादिकगुणोच्छेदे सर्वथा तस्य किं न हि । उच्छेदश्चेतनायाश्च सर्वशून्यमतो भवेत् ॥ २३ कर्मकर्तृकता तस्य भोक्तु साडख्यो निषेधति । अकर्तृत्वे कथ तेषा भोक्ता निर्लज्जचेतसाम् ॥ २४ स्वदेहप्रमितिश्चासौ कथितस्तत्त्ववेदिभिः। योगानां भाट्टसाडख्याना तद्वयापित्त्वनिषेधनात् ॥२५ -- ? जिनकी विचारशक्ति नष्ट हुई है ऐसे भाट्ट और चार्वाकको अपेक्षासे यदि यह आत्मा एकान्तमे मूर्तही है तो वह सब लोगोको वाह्य इन्द्रियोंसे ग्राह्य क्यो नही होती है ? अत आत्मा कथचित् अमूर्तिक माननी चाहिये ॥ २१ ।। योगोने आत्मा शुद्ध चैतन्यमात्र मानी है, उसके निराकरणार्थ आचार्योंने आत्मा उपयोगी मानी है । अर्थात् ससारावस्थामे आत्मामे मत्यादिज्ञानरूप उपयोग रहता है, और कर्मोका नाश होनेपर आत्मा शुद्ध उपयोगका धारक केवलज्ञान, केवलदर्शन ऐसे दो उपयोगोकी धारक रहती है ॥२२॥ भावार्थ-यौगोने आत्माको शुद्ध चैतन्यमात्र मानकरभी उसके वुद्धि, सुख, दुख, इच्छा, द्वेप, प्रयत्न, धर्म, अधर्म और सस्कार ऐसे नौ गुणोका अत्यन्त क्षय होनेसे मुक्त दशा प्राप्त होती है ऐसा माना है । यह उनका मानना योग्य नही है , क्योकि वुद्धयादिक गुणोका नाश होनेसे चेतनाकाभी नाश अवश्य होगा क्योकि वुद्धिसे विभिन्न चैतन्य नही है । और चैतन्यका नाश होनेपर मुक्तावस्था पत्यरके टुकडेके समान हो जायगी , जो कि किसी प्रकारसेभी स्पृहणीय नही है । ससार अवस्थामे अन्तरालमे अर्थात् कभी कभी सुख प्राप्त होता था वहभी मुक्तावस्थामे नही मिलनेसे वह ससारावस्थासेभी निकृष्ट होगी। चैतन्यावस्था पूर्णतया नष्ट होनेसे तत्स्वरूप- धारक आत्माकाभी नाश होगा जिससे सर्वशून्यता प्राप्त होगी ॥ २३॥ (आत्माके अकर्तृत्वमे दोप।)- साख्य आत्माको भोक्ता मानते हैं परतु वह कुछभी कार्य नहीं करती है ऐसा वे मानते है । आचार्य इस विषयमे ऐसा कहते हैं कि, यदि आत्मा अकर्ता है तो निर्लज्जमनवाले साख्य उसको भोक्ता कैसा मानते हैं ? क्योकि भोगनेकी क्रिया न करनेपर वह भोक्ता कैसे होगा ? इसलिये कर्तृत्व और भोक्तृत्व अविनाभावी है । आत्माका ज्ञातृत्वमी विनाकर्तृत्वके सिद्ध नही होता है । क्योकि जाननेकी क्रिया करनाही ज्ञातृत्व है । अत साख्योका आत्मसंवधी अकर्तृत्ववाद सदोष है ॥ २४॥ योग, भट्ट और साडख्यमतियोने आत्मा व्यापक माना है । उसके व्यापित्वका निषेध करने के लिये तत्त्वज्ञोने-जिनेश्वरोने आत्मा स्वदेहप्रमाण है ऐसा कहा है ।। २५ ॥ १ आ तथा २ आ शुद्ध चैतन्यमात्रम् ३ आ प्रोक्ता साङस्यनिषेधिनी ११६) सिद्धान्तसार (५. २६- व्यापित्वे तस्य सर्वत्र वृत्तित्त्वात्किन वेदनम् । त्रैलोक्यान्तर्गतानां हि शीतोष्णानां सुदुस्सहम् ।।२६ कर्मभोक्तृत्वमप्यस्य सौगतानां निषेधकम् । तदृते पुण्यपापानां कारणं फल्गुतां व्रजेत् ॥ २७ संसारी कथ्यते जीवः प्रत्याख्यानाय केवलम् । सदाशिवस्य सर्वेषां संसारस्याप्रसङ्गतः ॥ २८ सिद्धत्वं तस्य जीवस्य भट्टकौलनिषेधकृत् । अन्यथा सर्वजीवानां सुखं वा दुःखमेव वा ॥ २९ ? (आत्माके व्यापित्वका निरसन । )- आत्मा यदि व्यापी मानी जायगा तो वह सर्वत्र रहनेसे उसे त्रैलोक्यके अन्तर्गत शीतोष्णोका सुदुःसह अनुभव क्यों नहीं आयेगा? इसलिये आत्मा देहप्रमाण माननी चाहिये, क्योकि देहसे अन्यत्र सुखदुःखोका अनुभव कभीभी आत्माको आताही नही ॥ २६ ॥ (कर्मफल भोक्तृत्व नहीं है ऐसे सौगतपक्षका खण्डन । )- सौगत-बौद्ध आत्माको कर्मफलका भोक्तृत्व नही मानते हैं । परंतु यह मानना अयोग्य है, क्योकि कर्मफलभोक्तृत्व नही माननेसे पुण्यपापोकी कारणकल्पना व्यर्थ होगी । दान देना, पूजन करना, परोपकार करना ये पुण्यके कारण हैं । हिंसा करना, असत्य बोलना आदि पापके कारण है। ऐसा आगममे पुण्यपापके कारणोका किया हुआ उल्लेख व्यर्थ होगा । इसलिये आत्मा कर्मफलोका भोक्ता माननाही चाहिये ॥ २७ ॥ - (आत्मा सदामुक्त है ऐसे मतका निरसन । )- आत्मा सदाशिव है अर्थात् अनादि मुक्तावस्थाका धारक है । उसे कर्मलेप हुआही नही ऐसा सदाशिवका मत है । जैनाचार्यने सर्व आत्माओकी अनादि मुक्तताका खण्डन किया है । क्योकि यदि अनादि मुक्तता मानी जायेगी तो आत्माको ससारावस्थाका प्रसगही नही प्राप्त होगा । इसलिये आत्मा संसारी है । उसका वह ससार अनादिसे है, परन्तु अनन्त नही है । कर्मोका नाश करके आत्मा मुक्तावस्थाको प्राप्त करती है, इसलिये मुक्तावस्था सादि है और अनन्त हैं । सदा मुक्तावस्था जीवकी प्रत्यक्षप्रमाणसे सिद्ध नही होती, क्योकि प्रत्येक आत्मा संसारमे शरीरधारी सुखदुःखोंका अनुभव लेती हुई दिखती है । जैनोने एकान्तसे ससार नही माना है, क्योंकि ज्ञानादिगुणोका विकास कर्मोंका क्षय होनेसे पूर्ण होता है, और आत्मा मुक्त होती है ।। २८ ॥ (आत्माको मुक्ति नही होती ऐसे माननेवाले भट्ट और कौलके मतका निरसन । )- जीव मुक्त नहीं होता। उससे कर्म अलग नहीं होते हैं । इसलिये वह हमेशा संसारीही रहता ऐसा भट्ट और कौल कहते हैं यह कहना योग्य नही है ; क्योकि ऐसा माननेपर सर्व जीवोको सुखी अथवा दुःखीही मानना पडेगा। लेकिन कोई पुण्यवान् जीव सुखी देखे जाते है तथा कोई पापी १ आ. निषे धनम् -५ ३४) सिद्धान्तसार ( ११७ मण्डलाख्यस्य वौद्धस्य मतव्याघातकारिणी। उर्ध्वस्वभावता जीवे कथिता जैनवादिभिः ॥३० चेद्यत्रैव' च मुक्तोऽसी तत्र तिष्ठति निश्चितम् । ततो धर्मास्तिकायस्य वैफल्य केन वार्यते॥ ३१ किञ्चिदागमतो ज्ञात्वा स्वरूप गदित मया । विस्तरेण तु सर्वज्ञादृते केन निगद्यते ॥ ३२ जीवोऽनादिफसामान्यगुणेनको मतः सताम् । मुक्तससारिभेदेनपुनधोपजायते ॥ ३३ संसारिणां हि संसार. परिवर्तनमुच्यते । तच्च पचविधं प्रोक्त विविधागमपारगः ॥ ३४ - जीव दुखी देखे जाते हैं । तथा कोई जीव कभी दुखी कभी सुखी, कोई कभी दरिद्री और कभी श्रीमान् देखे जाते हैं इत्यादिक प्रमाणसे ससार अवस्था अनेक प्रकारकी देखी जाती है । आत्माको नित्य माननेपर कोई दुखीही हमेशा देखे जायेंगे तो कोई हमेशा सुखीही देखे जायेगे। एकरूप- ताकाही अनुभव आवेगा । अत ससारावस्थाको नष्ट करनेवाली सिद्धावस्थाभी माननी पडेगी जिसमे आत्मा स्वम्वरूपमे और अनन्तसुखादिगुणोमे रममाण होती हुई सदा रहेगी ।। २९ ॥ (जीवके उर्ध्वगतिस्वभावका प्रतिपादन । )- मण्डलनामक बौद्धोका मत ऐसा है, कि आत्मा मुक्त होकरभी पुन ससारमे नीचे आगमन करती है । पुन ससारावस्था धारण करती है। इस मडलके मतका खडन करनेकेलिये जैनवादियोने जीवमे उर्ध्वगति स्वभाव माना है । अर्थात् कर्मोंका पूर्ण नाश होनेपर जीव उर्ध्वगमन करता है और लोकशिखरपर जाकर वास्तव्य करता है। कर्मसे जीव कभी नीचे कभी ऊपर और कभी पूर्वादिक दिशामे गमन कर शरीर धारण करता था । अव कर्म विनाश होनेपर उसकी गति इधर उधर न होकर मीधी और ऊपरकोही होती है। और वह सिद्धशिलापर सदा विराजमान होता है ।। ३० ।। जीव जहा कर्मनाश होता है उस स्थानपरही मुक्त होकर निश्चित यदि स्थिर होता तो धर्मास्तिकाय नामक द्रव्यका-जो कि जीव पुद्गलोके गतिका कारण माना है-उसका अभाव मानना पडता परतु उसका अभाव नही है । वह धर्मद्रव्य लोकान्ततक व्याप्त है, अत वहातक मुक्त हुए जीवका गमन होता है । उसके आगे वह द्रव्य न होनेसे मुक्तजीव आगे गमन नही करते हैं ।। ३१॥ इस प्रकार जीवका स्वरूप मैंने आगमसे थोडासा जानकर कहा है । सर्वज्ञके विना विस्तारसे कौन जीव वर्णन करता है ? ॥ ३२ ।। सज्जनोने अनादि सामान्य गुणसे जीव एक माना है । तथा मुक्त और ससारी भेदसे जीवके दो भेद होते है ।। ३३ ।। ससारीके ससारको-(चतुर्गतिमे भ्रमणको परिवर्तन कहते हैं ) नाना प्रकारके आगमोमे प्रवीण ऐसे आचार्योने पाच प्रकारका कहा है ।। ३४ ।। १ द्रव्यपरिवर्तन २ क्षेत्रपरिवर्तन ३ कालपरिवर्तन ४ भवपरिवर्तन और ५ भावपरिवर्तन । . ५ आ. मसरण १ आ नो २ मा वैफल्य ३ आ मर्वज्ञमृते ४ आ जीवनादिका ११८) सिद्धान्तसार. (५ ३५ - तद्रव्यक्षेत्रकालादिभवभावप्रभेदतः। परिवर्तनमाख्यातं पंचधा सूत्रकोविद. ॥ ३५ नौकर्मकर्मभेदेन द्रव्यादिपरिवर्तनम् । ख्यापिताशेषतत्त्वार्था द्विप्रकारमुशन्ति तत् ॥३६ त्रयाणां हि शरीराणां पर्याप्तीनां च पुद्गलाः । एकेनैवात्मना ये च गृहीताःप्रथमक्षणे ॥ ३७ स्निग्धरुक्षादिभेदेन तीवमन्दादिभावतः । अवस्थिता द्वितीयादिसमयेषु च सर्वथा ॥ ३८ जीर्णाश्चानन्तवारांस्ते व्यतिक्रम्यक्रमात्पुनः यावन्नो कर्मतां यान्ति तन्नोकर्मविवर्तनम्॥३९त्रिकलम् एकेनैव हि जीवेन गृहीताः प्रथमक्षणे । पुद्गलाः कर्मयोग्या ये समयेनाधिकाश्च ते ॥४० आवलिकामतिक्रम्य निर्जीर्णाः समयेषु च । द्वितीयादिषु पूर्वेण क्रमेणापि समन्ततः ॥४१ यावत्तस्यैव जीवस्य प्रपद्यन्ते प्रयोगतः । कर्मभावमिदं ज्ञेयं कर्मद्रव्यनिवर्तनम् ।। ४२ त्रिकलम् । नोकर्मकर्मभावेन निवर्तन्तेऽत्र पुद्गलाः । ये च जीवस्य विज्ञेयः ससारः पुद्लाभिधः ॥ ४३ someon - (द्रव्यपरिवर्तन )- द्रव्यपरिवर्तनके नोकर्मद्रव्यपरिवर्तन और कर्मद्रव्यपरिवर्तन ऐसे दो भेद हैं ऐसा सपूर्ण तत्त्वार्थोका स्पष्टीकरण करनेवाले आचार्य कहते है ॥ ३६ ॥ तीनशरीर-औदारिक शरीर, वैक्रियिक शरीर और आहारक शरीर तथा आहार पर्याप्ति, शरीर पर्याप्ति, इद्रिय पर्याप्ति, श्वासोच्छवास पर्याप्ति, भाषा पर्याप्ति और मन पर्याप्ति ऐसी छह पर्याप्तियोके योग्य पुद्गलोको पहिले क्षणमे स्निग्ध, रुक्षादि भेदसे तथा तीव्र, मन्द, मध्यादि भावसे एकही आत्माने जैसे ग्रहण किये थे वे द्वितीयादि समयपर्यन्त आत्मामे रहकर जीर्ण हुए। इसके अनतर अनतबार अगृहीत पुद्गलोको ग्रहण कर छोड दिया है। अनतबार मिश्र पुद्गलोको ग्रहण कर छोड दिया, अनतबार गृहीतकोभी ग्रहण करके छोड दिया, पुन वही जीव उनही स्निग्ध रूक्षादि भावोसे युक्त उनही पुद्गलोको जितने समयमे ग्रहण करे उतने कालसमुदायको नोकर्म-द्रव्यपरिवर्तन कहते है ।। ३७-३९॥ ( कर्मद्रव्यपरिवर्तन )- एकही जीवने प्रथम क्षणमे कर्मयोग्य जो पुद्गल ग्रहण किये थे वे एक समयाधिक आवलिकाकालपर्यन्त रह कर द्वितीय समय, तृतीय समय आदि समयोमे निर्जीर्ण हो गये। फिर पूर्वोक्त क्रमसे अगृहीत पुद्गलोको अनतबार ग्रहण करके छोड दिया, अनंत- बार मिश्रपुद्गलोको ग्रहण करके छोड दिया । अनतबार गृहीतपुद्गलोको. ग्रहण करके छोड दिया। तदनतर उसी जीवद्वारा प्रथम क्षणमे जैसे कर्मद्रव्य ग्रहण किये थे वैसे हि उतनेहि तीव्रमन्दमध्यादि भावसे पुन ग्रहण किये जाते हैं उस समय कर्मद्रव्यपरिवर्तन होता है । ४०-४३ ।। जो पुद्गल जीवके नोकर्मरूप और कर्मरूप परिणत होते है, उसको पुद्गलपरिवर्तन कहते है। जब दोनोंमेसे कोई एक पूर्ण होता है तब उसे अर्धपुद्गलपरिवर्तन कहते है। और जब दोनोभी पूर्ण होते है तब एक पुद्गल परिवर्तन कहते है ॥ ४२ ॥ . ---- १ मा समयेनाधिका च ते २ आ. ये जीवस्य स ~५. ४९) सिद्धान्तसार (११९ लोके सर्वत्र सर्वाणि क्षेत्राणि विविधानि च । जीवोऽवगाहयत्येष यत्र' क्षेत्रनिवर्तनम् ॥ ४४ सर्वस्मिन्नपि लोकेऽस्मिन्प्रदेशो नास्ति कश्चन । कर्मणा येन जीवेन भुक्त्वा मुक्तः समन्ततः॥४५ अत एव महात्मानो भग्ना संसारदुःखत । तपस्यन्ति परित्यज्य भावास्तस्य विधायिन. ॥ ४६ उत्सपिण्यवसपिण्योर्युगमित्यभिधीयते । तत्र ये सन्ति सर्वेऽपि समयावलिकादयः ॥ ४७ प्रत्येकं तेषु सर्वेषु जायते भुवनत्रये । यत्तदुक्तं हि सूत्रीः कालादिपरिवर्तनम् ॥ ४८ यद्यप्येवं भवाददुःखं कालादिपरिवर्तनात् । सहते हि तथाप्येष विरामं नैव गच्छति ।। ४९ . (क्षेत्रपरिवर्तन।)- इस त्रैलोक्यमे सर्व आकाशमे अनेक प्रकारके क्षेत्र हैं । उसमे यह जीव अवगाहन करता है वह क्षेत्रपरिवर्तन समझना चाहिये । इस सपूर्ण लोकमे ऐसा कोई प्रदेश नहीं है, कि जो कर्मके उदयसे जीवने भोगकर नही छोड दिया है । अर्थात् सर्व प्रदेशोमे यह जीव मरकर उत्पन्न हुआ है । इसलिये जो महात्मा हैं वे ससारदु खसे भग्न होकर क्षेत्रभ्रमणके भावोका त्याग कर तपश्चरण करते है ॥ ४४-४६ ॥ विशेष स्पष्टीकरण-क्षेत्रपरिवर्तनके दो भेद हैं । एक स्वक्षेत्रपरिवर्तन और दुसरा पर- क्षेत्रपरिवर्तन । एक जीव सर्व जघन्य अवगाहनाको जितने उसके प्रदेश हैं उतनी वार धारण करके पीछे क्रमसे एक एक प्रदेश अधिक अधिककी अवगाहनाओको धारण करते करते महामत्स्यकी उत्कृष्ट अवगाहनापर्यन्त अवगाहनाओको जितने समयमे धारण कर सके उतने कालसमुदायको एक क्षेत्रपरिवर्तन कहते हैं । .. कोई जघन्य अवगाहनाका धारक सूक्ष्मनिगोदी लब्ध्यपर्याप्तक जीवलोकके अष्टमध्य प्रदेशोको अपने शरीरके अष्टमध्य प्रदेश बनाकर उत्पन्न हुआ, पीछे वही जीव उसही रूपसे उसही स्थानसे दुसरी तीसरी बारभी उत्पन्न हुआ। इसी तरह घनाङगुलके असख्यातमे भागप्रमाण जघन्य अवगाहनाके जितने प्रदेश है उतनी बार उसी स्थानपर क्रमसे उत्पन्न हुआ। और श्वासके अठारहवे भागप्रमाण क्षुद्रआयुको भोग भोगकर मरणको प्राप्त हुआ। पीछे एक एक प्रदेशके अधिक क्रमसे जितने कालमे सम्पूर्ण लोकको अपना जन्मक्षेत्र बनाले उतने कालसमुदायको एक परक्षेत्रपरिवर्तन कहते है। (गोम्मटसार जीवकाण्ड) (कालपरिवर्तन। )- दसकोटि कोटि सागरोपम परिणामका उत्सर्पिणी काल है और अवसर्पिणी कालका प्रमाणभी इतनाही है। दोनो कालके प्रमाणको युग कहते है। उनमे जो समय, आवलिका, घटिका, मुहूर्त इत्यादिक भेद है उन सबमे यह जीव इस त्रैलोक्यमे उत्पन्न होता है । उसको सूत्रके ज्ञाताओने कालपरिवर्तन कहा है ॥ ४७-४८ ॥ यद्यपि यह जीव कालपरिवर्तनरूप ससारसे दुःख सहता है, तथापि यह जीव विराम नही लेता है अर्थात् उसका भ्रमण सतत चालू रहता है ।। ४९ ॥ १ आ यत्तत् २ आ रता ३ आ कर्मणा जामते भवी ४ आ भवी ५ आ ही १२०) सिद्धान्तसार. (-५ ५० तिर्यग्नारकदेवानां मानवानां गति' स्वयं । जीवो याति यदावृत्य तद्भवादिविवर्तनम् ।। ५० सर्वेषां कर्मणां तावत्प्रकृत्यादिविभेदतः । आत्माशयविवर्तो यस्तद्भावपरिवर्तनम् ॥ ५१ । - कालपरिवर्तनका स्पष्टीकरण-कोई जीव उत्सर्पिणीके पहिले समयमें प्रथम उत्पन्न हुआ है। इसी तरह दुसरी वार, दूसरी उत्सर्पिणीके दूसरे समयमे उत्पन्न हुआ, तिसरी उत्सर्पिणीके तीसरे समयमें तिसरी बार उत्पन्न हुआ। इसही क्रमसे उत्सर्पिणी तथा अवसर्पिणीके वीस कोडा- कोडी सागरके जितने समय हैं उनमें उत्पन्न हुआ। तथा इसही प्रकार मरणको प्राप्त हुआ इसमें जितना काल लगे उतने कालसमुदायको एक कालपरिवर्तन कहते हैं । (गोम्मटसार जीवकाण्ड) (भवपरिवर्तनका वर्णन।)- जिन कर्मोसे आवृत होकर-आच्छादित होकर जीव, तिर्यंच, नारकी, देव और मानवपर्यायोंको धारण करके ससारमे घूमता है उसे भवपरिवर्तन कहते हैं ।। ५०॥ भवपरिवर्तनका स्पप्टीकरण-कोई जीव दस हजार वर्षोंके जितने समय होते हैं उतनी वार जघन्य दस हजार वर्षकी आयुसे उत्पन्न हुआ। पीछे एक एक समयके अधिक क्रमसे नरक सबंधी तेतीस सागरकी उत्कृष्ट आयु क्रमसे पूर्ण कर अन्तर्मुहूर्तके जितने समय है उतनी वार जघन्य अन्तर्मुहूर्तकी आयुसे तिर्यंचगतिमे उत्पन्न होकर यहांपरभी नरकगतिकी तरह एक एक समयके अधिक क्रमसे तिर्यंच गतिसम्बधी तीन पल्यकी उत्कृष्ट आयुको पूर्ण किया। पीछे तिर्यग्गतिकी तरह मनुष्यगतिको पूर्ण किया । क्योकि मनुष्यगतिकीभी जघन्य अन्तर्मुहूर्तकी तथा उत्कृष्ट तीन पल्यकी आयु है। मनुष्यगतिके वाद दस हजार वर्षके जितने समय है उतनी वार जघन्य दश हजार वर्षकी आयुसे देवगतिमे उत्पन्न होकर पीछे एक एक समयके अधिक क्रमसे इकत्तीस सागरकी उत्कृष्ट आयुको पूर्ण किया । यद्यपि देवगतिसबंधी उत्कृष्ट आयु तेतीस सागरकी है तथापि यहांपर इकत्तीस सागरही ग्रहण करना चाहिये । क्योकि मिथ्यादृष्टि देवकी उत्कृष्ट आयु इकत्तीस सागरतकही होती है । और इन परिवर्तनोंका निरूपण मिथ्यादृष्टिकी अपेक्षासेही है । क्योकि सम्यग्दृष्टि संसारमे अर्षपुद्गलपरिवर्तनका जितना काल है उससे अधिक कालतक नहीं रहता है। इस क्रमसे चारो गतियोंमे भ्रमण करनेमे जितना काल लगे उतने कालको एक भवपरिवर्तनका काल कहते हैं। तथा इन कालमे जितना परिभ्रमण किया जाय उसको एक भवपरिवर्तन कहते हैं। (भावपरिवर्तन)- सपूर्ण कर्मोके जो मिथ्यात्व, अविरति, प्रमाद, कपाय और योग- प्रत्ययोके भेदसे जो आत्माके परिणामोमे असंख्य प्रकार उत्पन्न होते हैं उनको भावपरिवर्तन कहते हैं ।। ५१ ॥ विशेष स्पष्टीकरण-योगस्थान, अनुभागवन्धाध्यवसायस्थान, कषायाध्यवसायस्थान और स्थितिस्थान इन चारोंके निमित्तसे भावपरिवर्तन होता है। योगस्थान-प्रकृति और प्रदेशवन्धकों १ आ. गतिप्वयम् २ मा. नात्माधितो -५ ५३) सिद्धान्तसार (१२१ पञ्चप्रकारसंसारसागरे सरतोऽपि च । आपत्कल्लोलभग्नस्य जीवस्याशु निमज्जनम् ॥ ५२ श्रीजिनेन्द्रमहाधर्म सदलत्रयलक्षणम् । मुक्त्वा पोतमिम तस्मात्तरन्ति प्राणिनः कुतः ॥५३ . कारणभूत आत्माके प्रदेश परिस्पन्दरूप योगके तरतमरुप स्थानोको योगस्थान कहते है। अनुभागवन्धाध्यवसायस्थान-जिन कषायके तरतमरुप स्थानोसे अनुभाग बध होता है, उनको अनुभागवधाध्यवसायस्थान कहते है । स्थितिबधाध्यवसायस्थान-स्थितिवधको कारणभूत कषाय- परिणामोको कषायाध्यवसायस्थान या स्थितिवन्धाध्यवमायस्थान कहते है। स्थितिस्थान-बधरूप कर्मकी जघन्यादिक स्थितिको स्थितिस्थान कहते है । इसके परिवर्तनको दृष्टान्तद्वारा कहते हैं । श्रेणीके असख्यातमे भागप्रमाण योगस्थानोके हो जानेपर एक अनुभागबधाध्यवसायस्थान होता है । और असख्यात लोकप्रमाण अनुभागवधाध्यवसायस्थान हो जानेपर एक कषायाध्यवसाय- स्थान होता है । तथा असख्यात लोकप्रमाण कपायाध्यवसायस्थानोके हो जानेपर एक स्थितिस्थान होता है । इस क्रमसे ज्ञानावरण आदि समस्त मूल-प्रकृति वा उत्तर-प्रकृतियोके समस्त स्थानोके पूर्ण होनेपर एक भावपरिवर्तन होता है । जैसे किसी पर्याप्त मिथ्यादृष्टि सज्ञी जीवके ज्ञानावरण कर्मकी अत कोडाकोडी मागरप्रमाण जघन्यस्थितिका बध होताहै। यही यहापर जघन्यस्थितिस्थान है। अत इसके योग्य विवक्षित जीवके जघन्यही अनुभागवधाध्यवसायस्थान जघन्यही कषायाध्यवमाय- स्थान और जघन्यही योगस्थान होते है । यहासेही भावपरिवर्तनका प्रारभ होता है। इसके आगे श्रेणीके असख्यातमे भागप्रमाण योगस्थानोके क्रमसे हो जानेपर दूसरा अनुभागवधाध्यवसायस्थान होता है । इसके बाद फिर श्रेणीके असख्यातवे भागप्रमाण योगस्थानोके क्रमसे हो जानेपर तीसरा अनुभागबधाध्यवसायस्थान होता है। इसही क्रमसे असख्यात लोकप्रमाण अनुभागवधाध्यवसायस्थान हो जानेपर दूसरा कषायाध्यवसायस्थान होता है । जिस क्रमसे दूसरा कषायाध्यवसायस्थान हुआ उसही क्रमसे असख्यात लोकप्रमाण कपायाध्यवसायस्थानोके हो जानेपर जघन्यस्थितिस्थान होता है । जो क्रम जघन्यस्थितिस्थानमे वताया है वही क्रम एक एक समय अधिक द्वितीयादिस्थिति- स्थानोमे समझना चाहिये । तथा इसी क्रमसे ज्ञानावरणके जघन्यसे लेकर उत्कृष्टतक समस्त- स्थितिस्थानोके हो जानेपर और ज्ञानावरणके स्थितिस्थानोकी तरह क्रमसे सम्पूर्ण मूल वा उत्तर प्रकृतियोके समस्त स्थितिस्थानोके पूर्ण होनेपर एक भावपरिवर्तन होता है। तथा इस परिवर्तनमे जितना काल लगे उसको एक भावपरिवर्तनका काल कहते है । इस प्रकार सक्षेपसे यहा पाच परिवर्तनोका स्वरूप कहा है । इनका काल उत्तरोत्तर अनतगुणित हैं । (गोम्मटसार जीवकाण्ड भव्यमार्गणा) इस पाच प्रकारके ससारसमुद्रमे भ्रमण करनेवाले तथा आपदारूप कल्लोलोसे भग्न हुए इस जीवका शीघ्र मज्जन होता है ।। ५२॥ इस ससारसमुद्रमे निर्दोष रत्नत्रय जिसका लक्षण है ऐसा जो जिनेन्द्रका महाधर्म वही नौका है, इसको छोडकर प्राणी किसकी सहायतासे ससारसमुद्रको तीर जायेगे? ॥ ५३ ।। - SS.16 - १२२) सिद्धान्तसार (५.५४- येऽत्र संसारिणो जीवास्ते द्विधा परिकीर्तिताः । समनस्कामनस्कादिभेदमाश्रित्य कोविदः ॥५४ मनो द्विविधमाख्यात द्रव्यभावप्रभेदतः । तत्र पुद्गलपाककर्मज द्रव्यमानसम् ॥ ५५ नो इन्द्रियस्य वीर्यस्यावरणोपशमक्षयात् । परात्मनी विशुद्धिर्या तद्भावमन इष्यते ॥ ५६ समनस्का निगद्यन्ते मनसा सहवर्तिन । अमनस्का अतस्तेषां मनो नास्ति मनागपि ॥ ५७ द्वितीयेऽपि प्रजायन्ते स्थावरेतरभेदतः । संसारिणः पुनधा तत्कर्मप्रभवा इह ॥५८ पृथिवी सलिल तेजो मारुतश्च वनस्पतिः । पञ्चधा स्थावरा ज्ञेया विचित्रक्रमसंयुताः॥ ५९ पृथिवी पृथिवीकायः पृथ्वीकायिक इत्यपि । प्रत्येकं त्रिविधाः सर्वे जायन्ते भेदतो हमी॥६० समाप्तपृथिवीकायनामकर्मोदयोऽपि वा । कायत्वेन न चाप्नोति पृथ्वीं स पृथिवी मतः ॥ ६१ (ससारीके समनस्क और अमनस्क ऐसे दो भेद। )- इस जगतमे जो ससारी जीव हैं उनके समनस्क जीव और अमनस्क जीव ऐसे दो भेद विद्वानोने कहे हैं। मन द्रव्यमन और भावमन ऐसा दो प्रकारका कहा है । उसमे द्रव्यमन पुद्गलविपाकी कर्मके उदयसे उत्पन्न होता है अर्थात् अगोपाङ्ग नामकर्मके उदयसे वह उत्पन्न होता है । ज्ञानावरण कर्म तथा वीर्यान्तराय कर्म इनका क्षयोपशम होनेसे और अगोपागनाम कर्मका उदय होनेसे गुणदोषका विचार करना, स्मरण करना, किसी पदार्थके ऊपर एकाग्रचिन्तनयुक्त होना इत्यादि कार्यके तरफ जब आत्मा अभिमुख होता है, तब उसके ऊपर उपकार करनेवाले जो पुद्गल मनरूपसे परिणत होते है उनको द्रव्यमन कहते है । भावमन-नो इद्रियावरण कर्मका क्षयोपशम तथा वीर्यान्तराय कर्मका क्षयोपशम होनेसे जो आत्मामे विशुद्धि प्रगट होती है उसे भावमन कहते हैं ।। ५४-५६ ॥ जो जीव मनसे सहित है वे समनस्क कहे जाते हैं और जो जीव अमनस्क होते है उनको मन बिलकुल उत्पन्नही नही होता । मनसहित जीवको सज्ञी कहते हैं और जिनको मन नहीं है उनको असज्ञी कहते है ।। ५७ ।। अमनस्क जीवोमेभी स्थावर और त्रस ऐसे दो भेद हैं । एकेन्द्रिय ससारी जीव स्थावर नामकर्मके उदयसे स्थावर होते है और जिनको त्रसनाम कर्मका उदय होता है वे जीव त्रस कहे जाते है । वे द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय और पचेन्द्रिय होते हैं ॥ ५८ ॥ पृथ्वी, पानी, अग्नि, वायु और वनस्पति ऐसे स्थावर जीव पाच प्रकारके है। ये सब मनरहित अनेक भेदयुक्त और क्रमयुक्त है । इनको एक स्पर्शनेन्द्रियही होता है ॥ ५९॥ पृथ्वी, पृथिवीकाय, पृथिवीकायिक ऐसे तीन भेद पृथ्वीके होते है। इसी प्रकारसे सलिल, सलिलकाय और सलिलकायिक, तेज, तेजस्काय और तेजस्कायिक, मारुत, मारुतकाय, मारुत- कायिक, वनस्पति, वनस्पतिकाय, वनस्पतिकायिक ऐसे पाच प्रकारके स्थावरोमे जल, अग्नि, वायु और वनस्पति प्रत्येकके तीन तीन भेद होते हैं, जो कि ऊपर बताये है ॥ ६० ॥ जिसमे पृथ्वीनाम कर्मका उदय हुआ है परतु जिसने पृथिवीको शरीररूप धारण नही किया है उसको पृथ्वी कहते हैं ।। ६१ ॥ - -५६८) सिद्धान्तसार (१२३ पृथ्वीकायिकजीवेन यच्छरीरं विवर्जितम् । पृथ्वीकायस्तदेव स्यान्मृतमानुषकायवत् ॥ ६२ पृथ्वीकाय. स यस्यास्ति स पृथ्वीकायिको मतः । इति सर्वेऽपि गोयन्ते परेऽप्यप्कायिकादयः॥६३ सूक्ष्मवादरभेदेन पर्याप्तेतरतोऽपि वा । तथा साधरणत्वाच्च साधारणतया पुनः ॥ ६४ सर्वेऽप्यमी प्रजायन्ते स्थावरा स्थितिशालिन । प्रत्येक षट्प्रकाराश्च विचित्राकारसयुताः ॥ ६५ तत्र त्रसाश्च विज्ञेयाःद्वीन्द्रियादय इत्यमी। सर्वेऽपि प्राणिन. प्राण सहिता हि भवन्ति च ॥ ६६ इन्द्रियायुमनोवाचा निश्वासोच्छ्वासविग्रहाः । दशप्राणा भवन्त्येते प्राणिप्राणित्वहेतवः ॥ ६७ चतुःप्राणश्च जीवन्ति शरीरानायुरिन्द्रिय । सर्वेऽप्येकेन्द्रिया जीवा बहुधा भेदशालिन ॥६८ - - पृथ्वीकायिक जीवने जो शरीर छोड दिया उस शरीरको पृथिवीकाय कहते है। जैसे मृत मनुष्यका शरीर । वैसे पृथ्वीजीव जिसमेसे निकल गया उसे पृथ्वीकाय कहते है ।। ६२ ।। पृथ्वी जिसका शरीर है वह जीव पृथिवीकायिक है । जल जिसका शरीर है वह जल- कायिक है । इत्यादि ।। ६३ ।।] (जीवममासकी अपेक्षासे स्थावरोके भेद)- ये पृथिव्यादि-स्थावर जीव सूक्ष्म और वादर ऐसे भेदसे दो दो प्रकारके होते है । पुन उनके प्रत्येक और साधारण ऐसे दो दो भेद होते है। ये मव स्थावर स्थितिशाली है । इनके प्रत्येकके पर्याप्त और अपर्याप्त भेद होनेसे छह प्रकार होते हैं और वे सब विचित्राकारवाले है । अर्थात् सूक्ष्मपर्याप्त पृथ्वी, वादरपर्याप्त पृथ्वी, सूक्ष्म अपर्याप्त पृथ्वी, वादर अपर्याप्त पृथ्वी । ऐसेही जलादिके चार चार भेद होते है । वनस्पतिके साधारण और प्रत्येक मिलकर छह भेद होते हैं ।। ६४-६५ ।। द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय और पचेन्द्रिय जीवोको त्रस कहते हैं। जिनको स्पर्शनेन्द्रिय और रसनेन्द्रिय है, ऐमे गवादि जीवोको द्वीन्द्रिय कहते है । स्पर्शन, रसना और नाक जिनके होती है वे श्रीन्द्रिय जीव है । जैसे चीटी आदिक जीव है। स्पर्शन, रसना, नाक और आखे जिनको होती है ऐसे भ्रमर पतगादिक जीव चतुरिन्द्रिय हैं । स्पर्शन, रसना, नाक, आखे तथा कान ऐसी पाच इद्रिया जिनको हैं वे जीव पचेन्द्रिय हैं जैसे मनुष्य, गौ, भैस, कौवा, सर्प, देव, नारकी। इन सवको अर्थात् अस और स्थावर जीवोको प्राणी कहते है, क्योकि ये यथायोग्य प्राणोसे सहित होते है । प्राणोके दस भेद हैं, और वे प्राणित्वके हेतु हैं, अर्थात् उनसे प्राणी जीते हैं । वे प्राण इस प्रकार है-पाच इद्रिया, आयु, मन, वचन, गरीर और श्वासोच्छ्वास ऐसे दस प्राण है ।। ६६-६७ ॥ (एकेन्द्रियादि जीवोके प्राणोका वर्णन । )- एकेन्द्रिय जीव चार प्राणोसे जीते हैं। शरीरप्राण, श्वासोच्छ्वाम, आयु और स्पर्शनेन्द्रिय ऐसे चार प्राण उनको होते हैं । सर्व एकेन्द्रिय जीव अनेक भेदोसे युक्त है । जैसे पृथ्वीके मृत्तिका, वालुका, शर्करादिक छब्बीस भेद हैं । जलके हिमविन्दु, शुद्धजल, धनजल आदि भेद हैं । ज्वाला, अगार आदि अग्निके भेद हैं। महावात, घनवात, तनुवात, मण्डली वायु आदिक वायुके भेद हैं । वनस्पतिके मूल, अग्र, पर्व, बीजरुह आदिक भेद है ।। ६८ ॥

१२४) सिद्धान्तसार. (५ ६९- 1 वाग्रसनेन्द्रियाभ्यां च चत्वारोऽप्यधिकाः पुनः। द्वीन्द्रियेषु प्रजायन्ते शंखाद्याश्च प्रमाणतः ॥६९ सप्तव त्रीन्द्रियेज्वेते घ्राणाधिपतया मताः । चक्षुषा सहिताश्चाष्टौ त एव चतुरिन्द्रिये ॥७० पञ्चेन्द्रियस्य जीवस्य तिरश्चोऽसज्ञिनश्च ते । नव प्राणाः प्रजायन्ते श्रोत्राधिकतया सदा ॥७१ मनोऽधिकतया तेऽपि संजिनो दश सम्मताः। प्राणाः प्राणभृतां प्रोक्ता दशैते संविभागतः॥७२ इन्द्रियाणि तु' पंचैव प्रोक्तानि जिननायकः । स्पर्शनं रसनं घ्राणं चक्षुः श्रोत्रमिति क्रमात् ॥७३ - तानि द्वेधा भवन्त्येव द्रव्यभावप्रभेदतः । उपकारणनिर्वृत्ती द्रव्येन्द्रियमपि द्विधा ।।७४ यावनिर्वय॑ते तावत्कर्मणा सा द्विधा पुनः । बाह्याभ्यन्तरभेदेन निर्वृत्तिः कथ्यते बुधैः ॥ ७५ उत्सेधस्याङगुलासडख्यविभागाः परमात्मनः । इन्द्रियत्वेन निर्वृत्ता निर्वृत्तिः सान्तरा मता ॥७६ - द्वीन्द्रिय जीवको छह प्राण होते है-अर्थात् शरीरप्राण, श्वासोच्छ्वास, आयु, स्पर्शनेन्द्रिय, रसनेन्द्रिय और वचन ऐसे छह प्राण होते है । शख आदिको द्वीन्द्रिय जीव कहते है ॥ ६९ ।। - - त्रीन्द्रियोमे उपर्युक्त छह प्राण होते है तथा नाक अर्थात् घाणेन्द्रिय यह सातवा प्राण अधिक होता है । तथा चतुरिन्द्रिय जीवमे उपर्युक्त सात प्राणोसे अतिरिक्त आँखेभी होती है अर्थात् आठ प्राण होते हैं ॥ ७० ॥ पचेन्द्रिय असज्ञी तिथंच जीवको उपर्युक्त आठ प्राणोके साथ श्रोत्रप्राण अर्थात् कान प्राण मिलकर नौ प्राण होते है । तथा नौ प्राणोसे सहित मन प्राण जिनको होता है वे सज्ञी पचेन्द्रिय जीव दस प्राणवाले होते हैं। ऐसे विभागके द्वारा दस प्राणोका विवेचन किया है।।७१-७२।। स्पर्शनेन्द्रिय, रसनेन्द्रिय, घ्राणेन्द्रिय, चक्षुरिन्द्रिय तथा श्रोत्रेन्द्रिय ऐसी पाच इन्द्रियाँ क्रमसे जिनेश्वरने कही हैं ॥ ७३ ।। (द्रव्येन्द्रिय और भावेन्द्रियोका वर्णन ।)- वे पाच इन्द्रिया द्रव्येन्द्रियरूप और भावे- न्द्रियरूप है । द्रव्येन्द्रियके उपकरण और निर्वृत्ति ऐसे दो भेद है। कर्मके द्वारा जो इन्द्रियोकी रचना होती है वह निर्वृत्ति कही जाती है । अर्थात् रचनाको निर्वृत्ति कहते है। उसकी अभ्यन्तर निर्वृत्ति और बाह्य निर्वृत्ति ऐसे दो भेद है । अर्थात् इन्द्रियोकी अन्दरकी रचना अभ्यन्तर निर्वृत्ति है और इन्द्रियोकी वाहरकी रचनाको बाह्य निर्वृत्ति कहना चाहिये ।। -७४-७५ ।। उत्सेधाडगुलके असख्येय भागसे प्रमित जो क्षयोपशमयुक्त आत्मप्रदेश है जो कि प्रतिनियत आख, कान, नाक आदि इन्द्रियोके आकारके हुए है उनको अभ्यन्तर निर्वृत्ति कहते है। उन आत्मप्रदेशोंके ऊपर इन्द्रिय नामका धारक ऐसा जो पुद्गलसमूह नामकर्मके द्वारा रचा जाता है, जो कि सपूर्ण आश्चर्यका कारण है उसे विद्वान् वाह्य निर्वृत्ति कहते हैं । जैसे नेत्रमे मसूरके आकार की १ आ ण्यत्र -५ ८४) सिद्धान्तसार (१२५ तेष्वेवात्मप्रदेशेषु करणव्यपदेशभाक् । पुद्गलानां समूहो यो जायते नामकर्मणा ॥ ७७ निर्वृत्ति बाह्यरूपांता समस्ताश्चर्यकारिणीम् । जानन्ति जनविख्याता ज्ञानध्यानधना जिना ॥७८ निर्वृत्तेः क्रियते येनोपकारस्तन्निगद्यते । द्वेषोपकरण प्राजर्वाह्यमाभ्यन्तर तथा ॥ ७९ कृष्णशुक्लयोपेतं गोलकं चान्तर मतम् । वाह्यं वाह्यप्रकाराक्षिपत्रपक्ष्मद्वयादिकम् ।। ८० लब्ध्युपयोगरूपं च भावेन्द्रियमिदं पुन । सर्वभावविभावज्ञा भावयन्ति भवातिगाः ।। ८१ क्षयोपशमभावो यो ज्ञानावरणकर्मण. लन्धिलब्धमहातत्त्व णिता भयवजितः ॥ ८२ इन्द्रियाणां फलं यच्च परिच्छित्त्यात्मक महत् । उपयोग स विज्ञेय. सर्वसत्त्वसुखावहः ॥ ८३ इन्द्रियत्व कथ तस्य घटनामुपढीकते । इन्द्रियाणां फलत्वेनोपयोगस्य समन्ततः ॥ ८४ गोल आत्मप्रदेशोकी जो रचना होती है उसे अभ्यन्तर निवृत्ति कहते है । जान और व्यानही धन जिनका है ऐसे जनविख्यात जिनेश्वरोने इस प्रकार अभ्यन्तर निर्वृत्तिका स्वरूप कहा है। मसूराकार आदि मात्मप्रदेशोपर नामकर्ममे पुद्गलोकी जो प्रतिनियत आकारकी अवस्था उत्पन्न होती है, जो कि मूहम है, और जिसको इन्द्रिय कहते हैं उसे वाह्यनिर्वृत्ति कहना चाहिये ॥ ७६-७७-७८॥ जिससे निर्वृत्तिके ऊपर उपकार किया जाता है-निर्वृत्तिका मरक्षण तथा महाय किया जाता है उसे उपकरण कहते है । मुनोने उसके वाह्योपकरण और अभ्यन्तरोपकरण ऐसे दो भेद कहे हैं । जैसे आँखमे कृष्ण और शुक्लतामे युक्त जो अन्दरका गोलभाग है उमे अभ्यन्तरोपकरण कहना चाहिये । तथा वाह्य उपकरण नेत्रके वाह्यमे जो नीचे और ऊपरके विभाग तथा पक्ष्मद्वय आदिक हैं वे बाह्य उपकरण है । नेत्रके ममान अन्य इन्द्रियोमेभी निर्वृत्ति और उपकरण समझ लेना चाहिये ।। ७९-८० ॥ (भावेन्द्रियका वर्णन । )- जो ससाररहित है तथा सर्व पदार्थोंके स्वभाव और विभावको जानते है ऐसे जिनेश्वर भावेन्द्रियको लब्धिरूप और उपयोगरूप कहते है । स्वर्शेन्द्रिय जानावरण, रसनेन्द्रियनानावरण आदि नानावरण कर्मोके क्षयोपगमको जीवादि महातत्त्वोके जाता और भयरहित ऐमे जिनेश्वरोने 'लब्धि' कहा है। ज्ञानावरणकर्मके क्षयोपशमसे आत्मा द्रव्येन्द्रियरूप रचना करनेकेलिये उद्युक्त होता है । यदि वह क्षयोपशम नही होगा तो द्रव्येन्द्रिय रचना, जो कि नेत्र, कान आदिकी दर्शक है, वह नही होगी । वस्तुको जाननेरूप जो इन्द्रियोका महत्वयुक्त फल है उसे उपयोग कहते हैं । यह उपयोग सर्व प्राणियोको सुखावह है , क्योकि इससे सर्व प्राणी हित प्राप्त करते हैं और अहितसे निवृत्त होते है ।। ८१-८२-८३ ।। उपयोग सर्व प्रकारसे इन्द्रियोका फल है । इसलिये जो फलरूप होता है उसे इन्द्रिय कहना योग्य नही, उपयोगमे इन्द्रियपना घटित नहीं होता, इस शकाका आचार्यने ऐसा उत्तर . --- मा द्विधा १२६) सिद्धान्तसार (५.८५- १ नायं दोषो भवेद्यस्मात्कार्यकारणदर्शनात् । घटाकारपरिज्ञान यथा घट इति स्फुटम् ॥ ८५ स्पर्शो रसस्तथा गन्धो वर्णः शब्दश्च पञ्चधा । तेषां विषय एवायं पदार्थेऽनन्तामणि ॥ ८६ ये पृथिव्यादयः कायाः स्थावराः कथिताः पुरा। सर्वेऽप्येकेन्द्रिया जीवाश्चतुःप्राणा निरन्तरा ॥८७ अक्षः कृमिजलौकाद्या विविधाकारधारिणः । द्वीन्द्रिया गदिता दक्षैर्भूरिशो भूरिपापिनः ॥ ८८ यूका मत्कुणपूर्वा ये वृश्चिकादय इत्यपि । अनेकाकारसंयुक्तानिहषीकाः शरीरिणः ॥ ८९ मक्षिका भमरा दंशा बहुधा दुःखभागिनः । पापवर्गभुजो दीना बोद्धव्याश्चतुरिन्द्रियाः ॥९० --- दिया है-यह दोष नही है। कारणका जो धर्म है वह कार्यमे देखा जाता है जैसे घटाकार परिणत-- ज्ञानको घट कहते हैं । अर्थात् ज्ञानके प्रति घट निमित्त कारण है और ज्ञान-कार्य इसलिये कारण धर्म घटत्वको कार्यरूप ज्ञानमे आरोपित कर ज्ञानकोभी घट कहते हैं। क्योकि घटको ज्ञानने जाना है । ग्राह्यको जाननेसे ग्राहककोभी उपचारसे ग्राह्य कहते है। इसमे स्वार्थकीभी मुख्यता है अर्थात् इद्रिय शब्दका जो अर्थ है वह उपयोगमे मुख्यतासे है । इद्रको-आत्माको पहचाननेका जो लिंग चिन्ह उसको इद्रिय कहते है । ज्ञानसे आत्मा पहचाना जाता है, इसलिये ज्ञान-उपयोग यहा मुख्य स्वार्थ है । इसलिये उपयोगको इद्रिय कहना योग्यही है। उपयोग जीवका लक्षण है। उपयोगो लक्षणम्' ऐसा सूत्रकारका वचनभी है ॥ ८४-८५ ।। पदार्थ अनत धर्मात्मक है। स्पर्श, रस, गध, वर्ण और शब्द ऐसे पाच इन्द्रियोके विषय है ॥ ८६ ॥ पूर्वमे पृथिवीकायादिक पाच प्रकारके स्थावर जीव कहे हैं । वे सब एकेन्द्रिय जीव हैं अर्थात् उनको एक स्पर्शनेन्द्रिय है । तथा स्पर्शनेद्रिय, आयु, श्वासोच्छ्वास और कायबल ऐसे चार प्राण निरतर रहते हैं ।। ८७ ॥ कौडी, कृमी, जौक आदिक प्राणी अनेक आकार धारण करनेवाले असंख्यात द्वीन्द्रिय जीव है वे अतिशय पापयुक्त है। इनको स्पर्शनेन्द्रिय और रसनेन्द्रिय ऐसी दो इन्द्रिया होती है ।।८८॥ जू, खटमल, बिच्छु आदिक अनेक आकारके धारक त्रीन्द्रिय प्राणी हैं। उनके स्पर्शनेन्द्रिय, रसनेन्द्रिय और घाणेन्द्रिय ऐसे तीन इद्रिया होती है ।। ८९ ॥ मकरवी, भौरा, दश, मशक ये अनेक प्रकारके दुख भोगनेवाले जीव हैं । पापसमूहको अनुभवनेवाले है,। इनको चतुरिन्द्रिय समझना चाहिये । स्पर्शनेन्द्रिय, रसनेन्द्रिय, घाणेन्द्रिय और चक्षुरिन्द्रिय ऐसी चार इन्द्रिया इनको होती है ।। ९० ॥ १ आ सर्वे २ आ. अक्ष ३ आ इत्यमी ४ आ कर्म -५ ९५) सिद्धान्तसार (१२७ शेषास्तिर्यडमनुष्याद्याः सुखदुःखैकभागिन । शुभाशुभाशया.' सर्वे सत्य पञ्चेन्द्रिया मताः ॥९१ एकेन्द्रियेषु चत्वारः षट्पुन:न्द्रियादिषु । पञ्चेन्द्रियेषु चत्वार समासाः स्युश्चतुर्दश ।। ९२ येऽपि पञ्चेन्द्रिया जीवास्तेऽपि द्वेधा भवन्त्यमी । सज्यसज्ञिविभेदेन पूर्णापूर्णतयाथवा ॥ ९३ कृत्याकृत्यविधी ये च प्रवर्तन्ते तया' पुन । शिक्षोपदेशनालापस्तत्र सज्ञितया मता ॥ ९४ विपरीताश्च ते तेभ्यो भूरिपापभराकुला । असज्ञिनश्च ते सर्वे मनसा वजिता यतः ॥ ९५ -- इन जीवोके व्यतिरिक्त तिर्यंच मनुष्यादिक शेष जीव सुखदु खके अनुभव करनेवाले होते हैं । इनके परिणाम शुभ और अशुभ होते है और इनके पाच इन्द्रिया होती हैं। स्पर्शनेन्द्रिय, रसनेन्द्रिय, घ्राणेन्द्रिय, चक्षुरिन्द्रिय और श्रोत्रेन्द्रिय ऐसी पाच इन्द्रिया इन जीवोको होती हैं।९१॥ जीवसमासके चौदह भेद है । जिनकेद्वारा अनेक जीव तथा उनकी अनेक प्रकारकी जाति जानी जाय उन धर्मोको अनेक पदर्थोंका सग्रह करनेवाले होनेसे जीवसमास कहते है ऐसा समझना चाहिये। भावार्थ- उन धर्मविशेषोको जीवसमास कहते है, कि जिनकेद्वारा अनेक जीव अथवा जीवोकी अनेक जातियोका सग्रह किया जा सके । वे चौदह भेद इस प्रकार हैं- एकेन्द्रियोमे चार जीवसमास, द्वीन्द्रियादिकोमे छह जीवसमास और पचेन्द्रियोमे चार जीवसमास हैं । ये सब मिलकर जीवसमासके चौदह भेद है । एकेन्द्रिय सूक्ष्म पर्याप्त, एकेन्द्रिय बादर पर्याप्त, एकेन्द्रिय सूक्ष्म अपर्याप्त और एकेन्द्रिय वादर अपर्याप्त । द्वीन्द्रिय पर्याप्त, द्वीन्द्रिय अपर्याप्त । त्रीन्द्रिय पर्याप्त, त्रीन्द्रिय अपर्याप्त । चतुरिन्द्रिय पर्याप्त, चतुरिन्द्रिय अपर्याय । सज्ञी पर्याप्त, सज्ञी. अपर्याप्त, असजी पर्याप्त, असज्ञी अपर्याप्त ऐसे चौदह जीवसमास हैं ।। ९२ ।। (पचेन्द्रियके सज्ञी और असज्ञी ऐसे दो भेद।)- जो भी पचेन्द्रिय जीव है, वे सभी सज्ञी और असज्ञी ऐसे दो प्रकारके है तथा उनके पर्याप्त और अपर्याप्त ऐसे दो दो भेद है ।। ९३ ।। जो जीव शिक्षा, उपदेश और आलापकेद्वारा यह कार्य करने योग्य है और यह कार्य करने योग्य नही है अर्थात् इसके करनेसे हित होगा और इसके करनेसे अहित होगा ऐसा विचार कर प्रवृत्ति करते है वे सजी माने जाते है। तात्पर्य- हितका ग्रहण और अहितका त्याग जिसकेद्वारा किया जाता है उसको शिक्षा कहते है । इच्छापूर्वक हाथपरके चलानेको क्रिया कहते हैं । वचन अथवा चावुक आदिकेद्वारा वताये हुए कर्तव्यको उपदेश कहते है और लोक आदिके पाठको आलाप कहते हैं । इस सज्ञीके जो विपरीत है उन्हे असज्ञी कहना चाहिये । वे अतिशय पापके बोझसे पीडित हुए है, क्योकि वे मनसे वर्जित हुए हैं ॥ ९४-९५ ॥ . ३ सदा ४ आ स्तेऽत्र १ आ वशा २ आ तु मा १२८) सिद्धान्तसार. (५ ९६- आहारो विग्रहश्चेति मनोभाषेन्द्रियाणि च । निश्वासोच्छ्वास इत्येवं पर्याप्तय उदीरिताः ॥९६ अनिर्वतितपर्याप्ति प्रपन्ना ये शरीरिणः । अपूर्णास्तेऽत्र विज्ञयाः पूर्णास्तदितरे पुनः ॥ ९७ त्रसस्थावरभेदेन जीवनामो निवेदितः। द्विप्रकारः प्रकारविविधागमपारगः।। ९८ . (छह पर्याप्तिया।)- आहारपर्याप्ति, शरीरपर्याप्ति, मन पर्याप्ति, भाषापर्याप्ति, इद्रियपर्याप्ति और श्वासोच्छ्वासपर्याप्ति ऐसी छह पर्याप्तिया कही है। जो शरीरपर्याप्तिको प्राप्त नही हुए है वे अपूर्ण अर्थात् अपर्याप्त जीव है । और जो गरीरपर्याप्तिको पूर्ण कर चुके है वे पूर्ण अर्थात् पर्याप्त है ॥ ९६-९७ ॥ विशेप स्पष्टीकरण-पर्याप्त, निर्वृत्त्यपर्याप्त और लब्ध्यपर्याप्त ऐसे जीवके तीन भेद है। जिनको पर्याप्ति नामक कर्मका उदय है ऐसे जीव जिनको जितनी पर्याप्तिया प्राप्त होनेकी योग्यता है, उतनी पर्याप्तिया उनको यदि प्राप्त हो गई हो, तो उनको पर्याप्त कहना चाहिये। पर्याप्त जीवके दो भेद है, एक पर्याप्त और दुसरे निर्वृत्त्यपर्याप्त । पर्याप्ति नामकर्मके उदयसे जबतक उसकी शरीरपर्याप्ति पूर्ण नही हुई है तबतक उसको पर्याप्त नही कहते है किन्तु निर्वृत्त्य- पर्याप्त कहते है । अर्थात् इन्द्रिय, श्वासोच्छ्वास, भाषा और मन इन पर्याप्तियोके पूर्ण न होनेपरभी यदि शरीरपर्याप्ति पूर्ण हो गई तो उस जीवको पर्याप्त कहना चाहिये किन्तु उससे पूर्व उसको निर्वृत्त्यपर्याप्त कहना चाहिये । अपर्याप्त नामक कर्मके उदयसे जीव लब्ध्यपर्याप्त होता है, उसको जितनी पर्याप्तिया प्राप्त होनी चाहिये उतनी कभीभी प्राप्त नहीं होती और वह शरीरपर्याप्तिकी पूर्णता होनेके पूर्वही भवान्तरमे चला जाता है । ऐसा पर्याप्तक, निवृत्त्यपर्याप्तक और लब्ध्यपर्याप्तकका स्वरूप कहा है ॥ यहा पर्याप्तियोका स्वरूप कहते है-पूर्वशरीरको छोडकर नवीन शरीरको कारणभूत जिस नोकर्म वर्गणाको जीव ग्रहण करता है, उसको खलरस भाग रूप परिणमानेकेलिये जीवकी शक्तिके पूर्ण हो जानेको आहारपर्याप्ति कहते हैं । खलभागको हड्डी आदि कठिन अवयवरूप और रसभागको रक्त आदि द्रवभागरूप परिणत करनेकी जीवकी शक्ति पूर्ण होना वह शरीरपर्याप्ति है। उन नोकर्मवर्गणाके स्कयोमेसे कुछ वर्गणाओको अपनी अपनी इद्रियस्थानपर द्रव्येन्द्रिय आकाररूप परिणमानेकी शक्तिकी पूर्णता होना इद्रियपर्याप्ति है। इसही प्रकार कुछ स्कधोको श्वासोच्छ्वासरूप परिणत करनेकी जीवकी शक्तिकी पूर्णता होना आनपान-श्वासोच्छ्वास पर्याप्ति कहते हैं। वचनरूप होनेके योग्य पुद्गल स्कन्धोको ( भाषावर्गणाको) वचनरूप परिणत करनेकी आत्मशक्तिकी पूर्णता होना भाषा पर्याप्ति है। । 1 -५ १०२) सिद्धान्तसार (१२९ भव्याभव्यविभेदेन' जीवराशिद्विधा भवेत् । पारिणामिकभावौ हि तावेतावस्य सम्मती ॥९९ पारिणामिकता तावदनयोर्जस्वभावतः। कर्मणा जनितो भाव पुनरौदयिको मत ॥ १०० सद्रत्नत्रयभावेन जीवो योऽत्र भविष्यति । स भव्य इति सूत्र पितो ज्ञानशालिभि ॥ १०१ सम्यग्दर्शनसज्ञानसच्चरित्रस्वभावभाक् । न भविष्यति चाभव्योऽनन्ततसारवानयम् ॥ १०२ द्रव्यमनरूप होनेके योग्य मनोवर्गणाको द्रव्यमनके आकाररूप परिणत करनेकी जीव- शक्तिकी पूर्णता होना मन पर्याप्ति है। एकेन्द्रिय जीवको आहारपर्याप्ति, शरीरपर्याप्ति, इद्रियपर्याप्ति और श्वासोच्छ्वास पर्याप्ति ऐसी चार पर्याप्तियाँ होती है । द्वीन्द्रियसे लेकर असज्ञीपचेन्द्रियतक पूर्वको चार और भाषा ऐसी पाच पर्याप्तियाँ होती है । तथा सज्ञी पर्याप्तकको पूर्व पाच पर्याप्तियोके साथ मन पर्याप्ति प्राप्त होती है अर्थात् छहो पर्याप्तियाँ सज्ञीको होती है ।। विविध आगमोके पारगामी और अनेक जीवप्रकारोको जाननेवाले आचार्योने त्रस और स्थावर भेदसे दो प्रकारके जीव कहे हैं ॥ ९८॥ (भव्य और अभव्यका वर्णन । )- भव्य और अभव्यके भेदसे जीवराशि दो प्रकारकी है । इस जीवराशिके ये दो भेद परिणामिक भाववाले हैं । जिस भावको द्रव्यका निजस्वरूपही कारण है अर्थात् द्रव्यका अपने स्वरूपमे रहना पारिणामिक भाव है । इस भावकी द्रव्यमे अनादि निधनता है अर्थात् यह भाव कर्मोंका उपशम, उदय, क्षय और क्षयोपशम होकर उत्पन्न नही होता है, यह भाव वस्तुका निजस्वरूप है । जगत्मे कोई जीव भव्यही है और कोई जीव अभव्यही है। ऐसा स्वभाव तर्कके अगोचर है । इसमे तर्क करना व्यर्थ है ।। ९९ ॥ चैतन्यस्वभाव जैसा पारिणामिक है, उसमे कर्मोदयादि कारण नहीं है, वैसा भव्यत्वभाव और अभव्यत्वभाव पारिणामिक है । जो भाव कर्मसे उत्पन्न होता है उसे औदयिक भाव कहते हैं ॥ १००॥ जीवराशिमेसे जो जीव उत्तम निर्दोप रत्नत्रयभाव इस ससारमे धारण करेगा वह भव्य है, ऐसा ज्ञानवान सूत्र जाननेवाले उमास्वामी आदि आचार्योंने कहा है ।। १०१।। सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सच्चारित्र ऐसा रत्नत्रय स्वभाव जो जीव नही धारण करता-रत्नत्रयरूप स्वभावको जो नही धारण करेगा वह अभव्य है, और वह अनन्तससारवानही होता है ।। १०२॥ २ कर्मणो १ आ त्व SS 17 १३०) सिद्धान्तसार (५ १०३- नामतो द्रव्यतो वापि स्थापनायाश्च भावतः। चतुर्घा जायते न्यासो जीवतत्त्वस्य तत्त्वतः ॥१०३ अजीवनगुणोपेतं यत्किञ्चिद्वस्तु विद्यते । तत्रापि जीवनाम्ना स्यानामजीवो विभावितः॥१०४ काष्ठपुस्तसुचित्रादिरूपेणासौ' प्रकल्पितः । स एवायमिति व्यक्तं स्थापनाजीव इप्यते ।। १०५ जीवनादिगुणोपेतं यद्रव्यं पारमाथिकम् । यस्तदात्मा भवेन्नित्यं द्रव्यजीव. स सम्मतः ।। १०६ वर्तमानस्वपर्यायस्थितिमानेष कथ्यते । भावजीव इति प्राज्ञः प्रदिण्टाशेषदर्शनः ।। १०७ . विशेष स्पष्टीकरण- कितनेही भव्य ऐसे है, कि जो मुक्तिप्राप्तिके योग्य हैं परन्तु कभी मुक्त न होगे । जैसे वन्च्यापनेके दोपसे रहित विधवा सती स्त्रीमे पुत्र प्राप्त होनेकी योग्यता है परन्तु उसके कभी पुत्र उत्पन्न न होगा। कोई भव्य ऐसे हैं, कि जिनको नियमसे मुक्ति प्राप्त होगी जैसे वध्यात्वदोपसे रहित स्त्रीको निमित्त मिलानेपर पुत्रोत्पत्ति होगी। इन दोनो स्वभावोसे जो रहित है उनको अभव्य कहते हैं जैसे वन्ध्या स्त्रीको निमित्त मिलनेपरभी पुत्र उत्पन्न नही हो सकता है। ( नामादि निक्षेपोसे जीवके चार भेद हैं । )- नामसे, स्थापनासे, द्रव्यसे और भावसे जीवतत्त्वका यथार्थतया चार प्रकारका न्यास होता है। जीवका चार प्रकारका लोकव्यवहार होता है ।। १०३ ॥ (नामजीव ।)- जिसमे कुछभी जीवन क्रिया नहीं है ऐसी जो कोईभी वस्तु है, उसमेभी जीव ऐसी सज्ञासे व्यवहार करना वह नामजीव है। (स्थापना जीव )- काष्ठ, पुस्त, धातु आदिकमे चित्रादिरूपमे जीवको कल्पित करके वही यह है ऐसी जो स्थापना की जाती है उसे स्थापनाजीव कहते है ।। १०५ ।। (द्रव्यजीव और भावजीव)- जीवन आदिक गुणोसे जो द्रव्य युक्त है, वह परमार्थसे द्रव्यजीव है और इस ससारमे सदा उसी स्वरूपमे वह दिखता है । यहा सक्षेपसे उसका स्वरूप कहा है । जीवनपर्याय, मनुष्यजीवनपर्यायसे परिणत जीवको भावजीव कहते है। सामान्यकी अपेक्षासे जीवनसामान्य हमेगाही विद्यमान है वह जीवन कभी है और कभी नही है ऐसा नही । इसलिये विशेषकी अपेक्षासे गत्यन्तरमे जीव स्थित है, वह मनुष्यभावप्राप्तिके सम्मुख वा पशु आदि भवकी प्राप्तिके सम्मुख जव होता है तव भविप्यत्की अपेक्षा करके वर्तमानकालमे उसे द्रव्यजीव कहते है और भावजीव हमेगाही जीवनक्रिया होनेसे माना जाता है ।। १०६ ।। सपूर्ण दर्शनोका स्वरूप कहनेवाले विद्वानोने वर्तमानकालमे जो अपनी जिस पर्यायको धारण करता है उसे उस मनुष्यादि पर्यायवाला कहना भावजीव है ॥१०७|| १ आ पत्र -५. ११२) सिद्धान्तमार ( १३१ - विग्रहमहणायास्य प्रवृत्तौ गतिकारणम् । तत्कार्मण शरीर स्यात्सर्वेषा बीजमादिमम् ॥ १०८ योगो वा वामन कायसव्यापारकलक्षणः। तद्गतौ कारणत्वेन निश्चिन्वन्ति विपश्चित.॥१०९ जीवानां पुद्गलाना च लोकाकाशैकतिनाम् । अनुश्रेणिगतिज्ञेया गतिज्ञान जिघृक्षुभि ॥ ११० एवं चेद्धास्करादीना कथ विश्रेणिका गति । नैष दोष क्वचिन्मृत्यो कालदेशाद्यपेक्षणात् ॥१११ गतिर्मुक्तस्य जीवस्य कौटिल्येन विजिता। कारणाभावत कार्य कि क्वापि व्यवतिष्ठते॥११२ (कार्मणगरीर)-पूर्वशरीर छोडकर जब आत्मा उत्तरशरीर ग्रहण करनेकेलिये प्रवृत्ति करता है तब उसको भवान्तरकेलिये गति करनेमे जो कारण होता है, उसे आचार्य कार्मणशरीर कहते है। यह शरीर औदारिक, वैक्रियिक, आहारक, तैजस और कार्मण शरीरकी उत्पत्तिमे मूल कारण है । तथा यह सव शरीरोमे पहिला है । इसके न होनेपर सर्व शरीरोकी उत्पत्ति नही होगी, इसके होनेसेही औदारिकादि शरीरोकी प्राप्ति होती है ॥ १०८ ॥ (जीवकी प्रवृत्तिमे योग कारण है । )- वचन, मन और शरीरकी जो हालचाल होती है उसे योग कहते है । यही योगका लक्षण है । जीवकी एकस्थानसे दूसरे स्थानमे जो गति होती है, उसमे विद्वान लोग योगको कारणरूपतासे निश्चित करते हैं ॥ १०९ ।। (अनुश्रेणि गतिका स्वरूप। )- लोकाकाशमे रहनेवाले जीव और पुद्गलोकी गति अनुश्रेणि होती है ऐसा गतिज्ञानको ग्रहण करनेकी इच्छा रखनेवालोको जानना चाहिये । शका- जीव और पुद्गलोकी यदि आकाशप्रदेशोको अनुसरण करके गति होती है, तो सूर्य, चन्द्र विद्याधरादिकोकी विश्रेणि गति क्यो होती है ? अर्थात् तिरछी और विदिशा आदिमे क्यो होती है ? आचार्य कहते हैं कि यह दोष नही हैं । यहा मृत्युके समयमे कालदेशादिकी अपेक्षासे अनु- श्रेणि गति जीव पुद्गलोकी कही है । जीव जव मरते हैं, तब भवान्तरमे जाते समय उनकी अनुश्रेणि गति होती है । अर्थात् नीचेसे-अधोलोकसे सीधे ऊपर ऊर्ध्वलोकमे, ऊपरसे सीधे नीचे, पूर्वसे पश्चिम, पश्चिमसे पूर्व, दक्षिणसे उत्तर और ऊत्तरसे दक्षिणमे ऐसी गति होती है और उसको अनुश्रेणि गति कहते हैं । यह कालकी अपेक्षा जीवोकी भवान्तर गति कही है । मुक्तोकी उर्ध्वगमनकालमे नियमसे अनुश्रेणि गतिही होती है। पुद्गलोको जो लोकके अन्ततक ले जानेवाली गति होती है वहभी अनुश्रेणिही होती है । इससे भिन्न कालमे जो गति होती है, वह अनेक प्रकारकी होती है ॥ ११०-१११ ।। ( मुक्तजीवकी गतिका स्वरूप ।)- मुक्तजीवकी गति टेढीमेढी न होकर सीधीही होती है। टेढीमेढी गति होनेका जो कारण होता है वह उनकी गतिमे नही होनेसे वह सीधी होती है। कार्मणशरीर गतिको-भवान्तरकी गतिको ले जाता था वह अब नही रहा अर्थात् कारणके अभावमे क्या कहा कुछ कार्य ठहर सकता है ? अपि तु नहीं ॥ ११२ ॥ ?

सिद्धान्तसार (५ ११३- प्राक्चतुर्यो भवत्येषा जीवस्येह सविग्रहात्' । गतिः ससारिण सत्य विग्रहाय प्रवर्तिता॥११३ निष्कुटक्षेत्रमुत्पित्सो समुद्घातान्प्रकुर्वतः । तथा गतिश्चतुर्थेऽस्य समयेऽविग्रहा हि सा ॥ ११४ एक वा समयं जन्तु वा त्रीन्वा विजितः । आहारेण प्रवृत्तोऽसौ देहान्तरमनन्तरम् ॥ ११५ नवमूर्त्यन्तरं तस्य मूर्च्छनातः प्रजायते । गर्भादथोपपादाद्वा विचित्रं चात्र कारणम् ॥ ११६ सचित्ताचित्तशीतोष्णाः सवृता विवृतास्तथा । मिश्राश्च योनयो ज्ञेया नवेति भविनामिह ॥११७ (विग्रहगतिका काल ।)- चार समयके पूर्वमे ससारी जीवकी गति विग्रहसहित होती है अर्थात् मोडेवाली होती है । और वह विग्रहके - शरीरके लिये होती है । निष्कुट क्षेत्रमे जो जीव उत्पन्न होनेवाला है उसकी गति निष्कुटक्षेत्रतक सरल आकाशप्रदेश नहीं होनेसे इषुके बाणके समान सरलगति न होनेसे उस क्षेत्रको लेजानेकेलिये तीन मोडेकी गतिको प्रारभ करता है । चौथे समयमे वह मोडा रहित सरल गमन करता है । इसके ऊपर चार मोडीवाली, पाच मोडीवाली गति नही होती है, क्योकि इतने मोडे लेनेके लिये क्षेत्रही नही है ॥ ११३-११४ ।। एक समय, दो समय और तीन समयमे यह प्राणी तीन शरीर-औदारिक, वैक्रियिक और आहारक शरीरोको और आहारादि छह पर्याप्तियोको ग्रहण करने योग्य ऐसा आहार ग्रहण नहीं करता । और चौथे समयमे देहकी रचनाकेलिये आहारक होता है अर्थात् शरीर निर्माणयोग्य पुद्गलवर्गणाओको ग्रहण करता है ।। ११५ ।। - (जन्मके तीन प्रकार ।)- जीवका शरीर मूर्च्छनासे या गर्भसे और उपपादसे होता है, क्योकि, इसके कारण विचित्र हैं। देवोका शरीर उपपादशिलासे उत्पन्न होता है और नारकियोके शरीर नरकविलमे उत्पन्न होते हैं। मनुष्य और पशुओका गरीर गर्भसे उत्पन्न होता है । तथा एकेन्द्रियादि जीवोका शरीर सम्मछेनासे होता है । अर्थात् मातापिताके रजवीर्यकी अपेक्षाके विना चारो तरफके स्कधोका आकर्पण करके उनके शरीरकी अवयवरचना होती है ।।११६ ।। - (जीवके जन्मके आधारभूत योनियोका वर्णन । )- सचित्त, अचित्त, शीत, उष्ण, सवृत, निवृत और मिश्र अर्थात् सचित्ताचित्त, शीतोष्ण और सवृतविवृत ऐसे योनियोके नौ भेद हैं । जीवोत्पत्तिके चैतन्ययुक्त स्थानको सचित्तयोनि कहते है । जिस जन्मस्थानके प्रदेश अदृश्य होते है अर्थात् नही दिखते है उसको सवृतयोनि कहते है । जिस जीवोत्पत्तिका स्थान ठडा होता है उसे शीतयोनि कहते है । इसके उलट स्वभावके जन्मस्थानोको अचित्त, विवृत और उष्णयोनि कहते है तथा जिनमे मिश्र स्वभाव रहता है उनको सचित्ताचित्त, सवृतविवृत और शीतोष्ण योनि कहते है । ऐसे गुणयोनियोके नौ भेद कहे है । ये योनियाँ जीवोके जन्मस्थान है ॥ ११७ ॥ १ मविग्रहा २ आ प्रवतिन ३ आ विचित्राश्चर्यकारणम् ४ सवृताऽ- स वृतास्तथा -५ १२४) सिद्धान्तसार (१३३ अचित्तयोनिजा. सर्व जीवा ये नारकामरा । विमिश्रयोनयोजन्ता गर्भजा प्राणिनो मता ॥११८ सम्मूच्छिन. परे सर्वे सर्वयोनिभवा पुन । भवन्ति भविनो नित्य विचित्राकारधारिण ॥११९ नानाकारविकाराणा मनुष्याणा चतुर्दश । योनिलक्षा मतास्तनिदर्शनशालिभिः ॥ १२० दुष्टकर्मभवानेकदु खदौर्गत्यशालिनाम् । नारकाणा हि ते लक्षाश्चत्वारो गदिता जिने ॥१२१ देवाना दिव्यवृत्तीना विचित्राकारधारिणाम्। लक्षाश्चत्वार इत्येवं योनीना योजिता वध ॥ १२२ वधबंधक्षुधातृष्णाशीतवातादिगोचरम् । तिरश्चा भुञ्जता दुःखं लक्षाश्चत्वार एव ते ॥१२३ विकलेन्द्रियजीवाना भूरिपापपरात्मनाम् । सर्वेषा योनयो लक्षा पडेव परिकीर्तिता. ॥ १२४ - (तत्तद्योनिज जीवोका वर्णन । )- जो नारकी और देव है, वे जीव अचित्तयोनियोमे उत्पन्न होते है । अर्थात् उनके उत्पत्तिस्थान उपपादप्रदेश है और वे अचित्त-अचेतन हैं। जो गर्भज जीव है वे मिश्रयोनिके है, क्योकि उनके माताके उदरमे शुक्र और श्रोणित-रक्त अचित्त हैं और माताके आत्मामे मिश्रण होनेसे वह योनिस्थान सचित्ताचित्त है । किंवा जिस माताके उदरमे शुक्र शोणित पडा है वह उदरस्थान सचित्त है । इसलिये गर्भज जीव सचित्ताचित्त योनिज है। इन जीवोसे भिन्न अर्थात् सर्व सम्मच्छिन जीव तीन प्रकारके योनियोसे उत्पन्न होते है । अर्थात् कोई सचिन योनिके है, कोई अचित्त योनिके है और कोई सचित्ताचित्त योनिके है। साधारण शरीरवाले सम्मूच्छिन जीव मचित्त है क्योकि वे अन्योन्यके आश्रयसे उत्पन्न होते है । कोई सम्मूर्छनज जीव अचित्त योनिसे उत्पन्न होते है । तथा कोई मिश्रयोनिके होते है । इस प्रकार इस ससारमे जीव नाना आकारोको धारण करनेवाले है ।। ११८-११९ ।। जो सम्यग्दर्शन और सम्यग्ज्ञानसे गोभते है, ऐसे तज्ज लोगोने नाना आकार और विकारोको धारण करनेवाले मनुप्योकी चौदह लक्ष योनियाँ मानी है ॥ १२० ॥ अशुभनाम, अशुभगोत्र, असातवेदनीयादि कर्मोके उदयसे अनेक दुख दारिदयसे युक्त ऐसे नारकियोकी चार लक्ष योनियाँ हे ऐसा जिनेश्वरोने कहा है ।। १२१ ।। अणिमामहिमादिक ऋद्धियोके धारक तथा नाना प्रकारके आकारोको धारण करनेवाले देवोकी योनिसख्या विद्वानोने चार लक्ष कही है ॥ १२२ ॥ वघ, वध, भूख, प्यास, ठडी, हवा, उष्णता इत्यादिसे उत्पन्न हुआ दुख भोगनेवाले तियंचोकी चार लक्ष योनियाँ है ।। १२३ ।। तीव्र पापयुक्त जिनका आत्मा है ऐसे सपूर्ण विकलेन्द्रिय जीवोकी छह लक्ष योनियाँ कही है ॥ १२४ ॥ १ आता १३४) सिद्धान्तसार (५. १२५-- पृथिवीफायिकानां हि जीवानां जितकल्मषैः । योनय. कथिता देवैः सप्तलक्षप्रमाणतः ॥ १२५ घोरमिथ्यात्वसंभूतभवभावविवर्तिनाम् । मतास्तावन्त एवामी योनयो जलकायिनाम् ॥ १२६ तेजःकायभृतां तावत् तावन्त. परिकीर्तिता. । योनयो जितमात्सर्यंराराध्यः पूर्वसूरिभिः ॥ १२७ वातकायिकजीवानां कर्मपाकहतात्मनाम् । योनीनां सप्तलक्षाणि प्रवक्ष्यन्ते विचक्षणः ॥ १२८ नित्यं निगोदजीवाना नारकेभ्योऽतिवर्तिनाम्। योनीनां सप्तलक्षाश्च भवन्ति भवतिनाम् ।।१२९. तथेतरनिगोतानां अनन्तासातवतिनाम् । गोयन्ते योनयो नित्यं मुनिभिः सूत्रवेदिभिः ॥ १३० भूरुहाणामनन्तानां योनयो गदिता जिन । दशलक्षाः प्रमाणेन प्रमाणनयनायकः ॥ १३१ सर्वे सम्मिलिता गोता योनयो भवतिनाम् । जीवानां सर्वलक्षाणामशीतिश्चतुरुत्तरा ॥ १३२ द्वाविंशतिस्तथा सप्त त्रयः सप्त ततः पुन.! पृथ्वीदकाग्निवातानां कुलानां कोटिलक्षका. ॥१३३ जिन्होने पापनाश किया है, ऐसे गणधरदेवोने पृथिवीकायिक जीवोकी योनियाँ सात लक्ष कही है ॥ १२५ ।। घोर मिथ्यात्वसे उत्पन्न हुए सासारिक-भावोसे ससारमे घूमनेवाले जलकायिकजीवोकी योनिसल्या सात लक्ष है ।। १२६ ।। जिन्होंने मत्सरभावोको जीत लिया है और जो भव्योके आराध्य हैं ऐसे पूर्वसूरियोने तेजस्कायिक जीवोकी योनिसंख्या सात लक्ष कही है ॥ १२७ ॥ अशुभ कर्मोदयसे जिनकी आत्मा मारी गयी है ऐसे वातकायिक जीवोकी योनिसख्या विचक्षण-चतुर आचार्य सात लक्ष कहते हैं ॥ १२८ ॥ नारकियोंसेभी अतिशय दुखी और भवमें घूमनेवाले नित्यनिगोदी जीवोकी योनियाँ सात लक्ष हैं ।। १२९ ॥ अनत दुःखोसे व्याकुल ऐसे इतर निगोदी जीवोंकी योनिसत्या सूत्रज मुनियोने हमेगा सात लक्ष प्रमाण कही है ।। १३० ।। प्रमाणनयोके नायक ऐसे जिनेन्वरोने अनत वनस्पतियोंकी योनिसंख्या दस लक्ष कही है ।। १३१ ॥ ससारमे घूमनेवाले सपूर्ण जीवोंकी कुल योनिसल्या चौरासी लक्ष होती है ऐसा जिनेश्वरोने कहा है ॥ १३२ ।। (कुलोंकी संख्या कहते हैं । )- पृथिवीकायिक जीवोकी कुलसख्या बाईस कोटि लक्ष है । जलकायिक जीवोकी सात लक्ष कोटि है। अग्निकायिक जीवोकी तीन लक्ष कोटि है और वातकायिकोंकी कुलसख्या सात लक्ष कोटि है ।। १३३ ।। -- १ सप्तलमा -५ १४२) सिद्धान्तसार (१३५ कोटिलक्षा. कुलान्याहु. सप्ताष्टौ च तथा नव । तदष्टाविंशतिद्वित्रिचतुरिन्द्रियवीरुधाम् ॥ १३४ कोटिलक्षा कुलाना हि सममर्द्धत्रयोदश । द्वादशापि दश प्रोक्ता जन्मिना जितकल्मषैः ॥ १३५ जलजाना तथा वीनां चतु पदयुतात्मनाम्' । उरसा सर्पतां तावन्नववते यथाक्रमम् ॥ १३६ कुलानि लक्षकोटिना देवनरयिफनृणा । षड्विंशतिस्तथा पविशतिश्च चतुर्दश ॥ १३७ कुलानां लक्षकोटिना सर्वसंख्या जिनेश्वरैः । सर्वाधिकशतेनोक्ता नवतिर्नवसयुता ॥ १३८ खरादिपृथिवीकायजीवानामायुरुत्तमम् । द्वाविंशतिसहस्राणा वर्षाणामृषिभिर्मतम् ॥ १३९ परेषा पृथिवीकायजीवाना पुनरुत्तम । वर्षाणा द्वादशैवायु सहस्राणि समन्तत ॥ १४० सप्तवर्षसहस्राणि जीवन्त्यष्कायवर्तिन । जीव. प्रकर्षतः सर्वे विचित्राश्चर्यकारिण. ॥१४१ तेजःकायभृतसर्वे जीवन्त्युत्तममानत । दिनत्रय त्रयाधीशाः कथयन्ति जिनेश्वरा ॥ १४२ द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय और वनस्पति इन जीवोकी कुलसख्या क्रमसे सात कोटि लक्ष, आठ कोटि लक्ष, नौ कोटि लक्ष और अठाईस कोटि लक्ष कही है ॥ १३४ ।। जलचर प्राणियोकी कुलसख्या साडेबारह लक्ष कोटि है । पक्षियोकी कुलसख्या बारह लक्ष कोटि है । चतुष्पद प्राणियोकी कुलसख्या दस लक्ष कोटि है और छातीसे चलनेवाले साप आदि प्राणियोकी कुलसख्या नौ कोटि लक्ष है ॥ १३५-१३६ ॥ (देव, नारकी और मनुष्योकी कुलसख्या ।)- देवोकी कुलसख्या छब्बीस कोटि लक्ष है । नारकियोकी कुलसख्या पच्चीस कोटि लक्ष है और मनुष्योकी कुलसख्या चौदह कोटि लक्ष हैं ॥ १३७ ॥ सपूर्ण जीवोकी कुलसख्याका प्रमाण एकसौ साठ निन्याणबै लक्ष कोटि है ऐसा जिने- श्वरोने कहा है। कुल-अरीरके भेदको कारणभूत नोकर्मवर्गणाके भेदको कुल कहते हैं।। १३८॥ (जीवोकी आयुका वर्णन । )- ऋपियोने खरपृथिवीकायिक जीवोकी उत्कृष्ट आयु बावीस हजार वर्षों की कही है ।। १३९ ॥ शुद्ध पृथिवीकायिक जीवोकी उत्कृष्ट आयु वारह हजार वर्षोंकी है ।। १४० ।। जलकायिक जीवोकी उत्कृष्ट आयु सात हजार वाँकी है । ये सव जलकायिक जीव विचित्र आश्चर्य उत्पन्न करनेवाले होते है ।। १४१ ।। सपूर्ण तेज कायिक जीवोकी उत्कृष्ट आयु तीन दिनोकी है ऐसे रत्नत्रयके स्वामी जिनेश्वर कहते हैं ।। १४२ ।। १ आ चतु पादवतामत , २ आ कुलानि, कुलाना इति ग्लोकद्वय ३ परतु गोम्मटमारमे सपूर्ण जीवोकी कुलसख्या एक कोटाकोडी मत्ताणवे लक्ष तथा पचास हजार कोटि कही है। ४ मा भापुस्तके नास्ति १३६) सिद्धान्तसार (५ १४३- त्रीणि वर्षसहस्राणि परमं वातकायिनाम् । आयुर्भवति जीवाना दुर्गदुर्गतिवर्तिनाम् ॥ १४३ दशवर्षसहस्राणि परमायुः प्रकाशितम् । भूरुहाणां जिनाधीशैर्नानाभावविवर्तिनाम् ॥ १४४ द्वादशैव तु वर्षाणि प्रकृष्ट द्वीन्द्रियेषु तत् । एकेनोना च पञ्चाशत्रीन्द्रियेष्वायुरुत्तमम् ॥ १४५ चतुरिन्द्रियजीवाना षण्मासा ह्यायुरुत्तमम् । कर्मभूमिनरादीनां पूर्वकोटी तदुत्तमम् ॥ १४६ (जीवानां देहमानम् ।) पञ्चेन्द्रियस्य जीवस्य देहमानं निगद्यते । योजनानां सहस्त्रैकमुत्कर्षेण जिनागमे ॥ १४७ तदेवाधिकमाख्यात मानमेकेन्द्रिये पुनः । द्वीन्द्रिये द्वादशैवेद योजनान्युत्तम मतम् ॥ १४८ क्रोशत्रयप्रमाण च शरीर त्रीन्द्रिये परम् । चतुरिन्द्रियजीवानां एकयोजनमुत्तमम् ॥ १४९ -- दुखदायक दुर्गतिमे रहनेवाले वातकायिक जीवोकी उत्तम आयु तीन हजार वर्षोकी है ॥ १४३ ॥ अनेक भवोमे घूमनेवाले वनस्पतियोकी उत्कृष्ट आयु जिनेश्वरोने दस हजार वर्षकी प्रकाशित की है ॥ १४४ ।। द्वीन्द्रिय जीवोकी उत्कृष्ट आयु बारह वर्षोकी कही है। और त्रीन्द्रिय जीवोंकी उत्कृष्ट आयु उनचास दिनोकी कही है ।। १४५ ॥ - चतुरिन्द्रियजीवोकी उत्कृष्ट आयु छह महिनोकी कही है और कर्मभूमिके मनुष्य आदि- कोकी उत्कृष्ट आयु एक पूर्व कोटीकी कही है ॥ १४६ ।। ( जीवोकी देहावगाहना ।)- पचेन्द्रियजीवकी देहावगाहना जिनागममे उत्कर्षसे एक हजार योजनोकी कही है । एकेन्द्रियकीभी अवगाहना साधिकसहस्र है । भावार्थ - स्वयभूरमण समुद्रमे स्थित महामत्स्यकी अवगाहना एक हजार योजनोकी है। तथा एकेन्द्रिय कमलकीभी अवगाहना महामत्स्यके समान एक हजार योजनकीही है । द्वीन्द्रियजीवोमे शखकी उत्तम अवगाहना बारह योजनोकी कही है ॥ १४६-१४७ ॥ - त्रीन्द्रियजीवोमे उत्तम अवगाहना गैष्मी ( चीटीकी ) तीन कोश प्रमाणकी कही है। और चतुरिन्द्रिय जीवकी उत्तम अवगाहना एक योजन प्रमाणकी कही है ॥ १४८ ॥ (गर्भादिजन्मधारि जीवोका वर्णन ।)- पोत, अण्डज और जरायुज ये सब जीव गर्भ- जही होते हैं । तथा देव और नारकी ये सब जीव औपपादिक देहवालेही होते है । पोत-जिनके ऊपर जालके समान वेष्टन नही होता है, जो परिपूर्ण अवयववाले योनिसे निकलतेही चलते फिरते है, ऐसे प्राणियोको पोत कहते है । जरायुज-जालके समान जो प्राणियोके ऊपर चर्मका वेष्टन रहता है उसको जरायु कहते है। ऐसे जरायुसे जिनका जन्म होता है वे जरायुज प्राणी है जैसे मनुष्य आदि ।

-५. १५५) सिद्धान्तसार (१३७ भवन्ति गर्भजाः सर्वे पोताण्डजजरायुजाः । औपपादिफदेहाश्च देवनारकयोनिजाः ॥ १५० शेषाः सम्मूच्छिनो जीवा भूरिपापपरायणाः । गदिता विविधाकारा बहुदुःखोपजीविनः ॥ १५१ वपुर्गतीन्द्रियज्ञानक्रोधाहारसुसंयमाः । वेदभव्यत्वसम्यक्त्वलेश्येक्षायोगसञ्जिनः ॥ १५२ जीवा यासु च मार्यन्ते मार्गणा विधिकोविदः।ता इमा मार्गणा जेया विचित्रक्रमसंयुताः॥१५३ वपुः शरीरमाख्यात तच्च पञ्चविधं बुधैः । जीवाधारमिद तस्मान्निगदामि यथाक्रमम् ॥ १५४ औदारिकमिदं रम्य तथा वैक्रियिक' पुनः । आहारकमिहाख्यात तेजस फार्मणं महत् ॥ १५५ २ अण्डज-जो प्राणी अण्डोंसे उत्पन्न होते है, उनको अण्डज कहते है जैसे पक्षी । उपपाद शिलापर देव अकस्मात् अन्तर्मुहूर्तमे तरुणके समान षोडश अलकारीसहित उत्पन्न होते हैं । तथा नारकी नरकविलोंमे अन्तर्मुहूर्तमे उत्पन्न होते हैं । ये देव नारकी औपपादिक देहवाले कहे जाते हैं ॥ १४९-१५०॥ सम्मूच्छिन जीव अतिशय पापोमे तत्पर रहते है । ये सम्मूछिन जीव मातापिताके रक्तवीर्यके विना उत्पन्न होते है । तीनो लोकोमे ऊपर, नीचे और चारो तरफसे जिनके अवयवोकी रचना होती है, उनको सम्मूर्छन कहते है। ये जीव अनेक आकारवाले और बड़े दुखसे उपजीविका करनेमे तत्पर होते है ।। १५१ ।। (मार्गणाओके नाम और लक्षण।)- गरीर-कायमार्गणा, गति, इन्द्रिय, ज्ञान, क्रोध, आहार, सुसयम, वेद, भव्यत्व, सम्यक्त्व, लेश्या, दर्शन, योग और सज्ञी ये चौदह मार्गणाये हैं 1॥ १५२ ॥ कर्मस्वरूप जाननेवाले विद्वानोकेद्वारा जीव जिनमे ढूढे जाते है उनको मार्गणा कहते हैं, वे मार्गणाये अनेक क्रमसे युक्त हैं ।। १५३ ॥ (औदारिकादि पाच गरीरोका वर्णन । )- शरीरको वपु कहते है और विद्वानोने उसके पाच भेद बताये हैं । यह शरीर जीवका आधार होनेसे मैं इसका यथाक्रम वर्णन करता हूँ॥ १५४॥ औदारिक, तथा रम्यवैक्रियिक, पुन आहारक और तैजस तथा महान कार्माण ऐसे पाच प्रकारके शरीर कहे है । उदारका अर्थ स्थूल है अर्थात् जो शरीर स्थूल है उसको औदारिक कहते है। यह शरीर मनुष्य और तियंचोको होता है । जो शरीर नाना आकृतियोको धारण करता है जो अनेक छोटा, बडा दृश्य, अदृश्य आदिक विक्रिया करता है उसे वैक्रियिक शरीर कहते हैं । जिनके मनमे सूक्ष्म तत्त्वमे सशय उत्पन्न हुआ है ऐसे प्रमत्तसयत मुनिराजके मस्तकसे संशयको दूर करनेके लिये जो शरीर प्रगट होता है उसे आहारक कहते है। यह शरीर केवलिभगवानके पास जाता है। १ आ वैक्रियिकमहाद्भुतम् २ आ ख्यान्ति ३ आ तथा . S.S. 18 " १३८) सिद्धान्तसार (-५ १५६ उदारं स्थूलमोख्यात नानाकारघरं परम् । आह्नियमाणमाहारं तेजोजातं सुतैजसम् ॥ १५६ कर्मणां कार्यमर्थं च यत्कार्मणमिहोदितम् । परं परं हि सूक्ष्म स्यादेतत्पञ्चविधं क्रमात् ॥१५७ औदारिक वैक्रियिकमाहारकमिदं वपुः । त्रिप्रकारमसंख्यातगुणाकारप्रदेशकम् ।। १५८ क्रमशस्तैजस तद्धि कार्मणं च शरीरकम् । कथयन्ति कथानाथाः प्रदेशानन्त्यसडगुणम् ॥ १५९ तदेवाभव्यजीवानामनन्तगुणकारकम् । अनंतप्रविभागश्च तद्रव्यं पुनरिष्यते ॥ १६० वजादिपटलस्तावद्व्याधातो नानयोः क्वचित् । सुसूक्ष्मत्वादयः पिण्डे तेजसोऽनुप्रवेशवत् ।। १६१ २ । उनके शरीरको स्पर्श कर लौटता है तब मुनिका सशय दूर होता है। यह शरीर हस्तप्रमाण होता है । धन-दृढ स्फटिकके समान रहता है । मुनिके तालुप्रदेशमे रोमानके अष्टम भागप्रमाण जो छिद्र होता है, उससे यह निकलता है । जिस क्षेत्रमे तीर्थकर परमदेव गृहस्थावस्थामे, दीक्षित छमस्थावस्थामे अथवा केवलीअवस्थामे होगे उसके पास जाता है। उनके शरीरको स्पर्श कर पुनः लौटता है। उन मुनिके उस तालु छिद्रसे पुन देहमे प्रवेश करता है तब उनका संशय नष्ट होता है और वे सुखी होते हैं । ( सर्वार्थसिद्धिकी श्रुतसागरी टीका- अध्याय दूसरा) जो तेजसे उत्पन्न होता है उसे तैजस कहते है । जो तेजका निमित्त है उसेभी तेजस कहते है और जो कर्मका कार्य है उसे कार्मण कहते हैं। मिथ्यात्वादि कर्मोसे यह कार्मणशरीर उत्पन्न होता है । तथा यह कर्मोकेलिये उत्पन्न होता है अर्थात् कर्मोको उत्पन्नभी करता है। ये पांच प्रकारके शरीर उत्तरोत्तर क्रमसे सूक्ष्म सूक्ष्म हैं ।। १५७ ।। औदारिक, वैक्रियिक और आहारक ये तीन प्रकारके शरीर क्रमसे असख्यात गुणाकार- युक्त प्रदेशवाले हैं । औदारिकसे वैक्रियिक शरीर असख्यात गुणित प्रदेशवाला है । वैक्रियिकसे आहारक शरीर असख्यात गुणित प्रदेशवाला है ।। १५८ ।। क्रमशः तैजस और कार्मण शरीर अनन्त गुणित प्रमाण हैं । आहारक शरीरसे तैजस प्रदेशोंकी अपेक्षासे अनत गुणित है तथा तैजससे कार्मण शरीर अनंत गुणित है, ऐसा कथानक निवेदनी, सवेजिनी आदि कथाओके प्रतिपादक जिनेश्वर कहते हैं ॥ १५९ ॥ वह कार्माण शरीरका द्रव्य अभव्य जीवोसे अनतंगुणित हैं और भव्यजीवोंसे अनन्तवा विभाग है ऐसा कहा हैं ॥ १६० ॥ तैजस और कार्मण इन शरीरोको कहींभी प्रतिबंध नही होता । जैसे लोहके पिण्डमे अग्निका प्रवेश उसकी-अग्निकी सूक्ष्मतासे होता है वैसे तैजस और कार्मण ये दो शरीर अतिशय सूक्ष्म होनेसे वजादि-पटलोमेभी घुसकर उसमेसे निकल जाते हैं । इसलिये इनके साथ रहा हुआ यह - 0.4- १ आ तत् २ आ नन्तसद्गुणम् ३ आ तद्भव्यानाम् -५ १६८) सिद्धान्तसार ( १३९ सर्वसंसारिजीवस्यानादिसम्बन्ध इष्यते । कार्यकारणसन्तत्या झनयोर्बोजवृक्षवत् ॥ १६२ विशेषापेक्षया सादिसम्बद्ध ते शरीरिणाम् । निगद्यते गतासातसगतैर्यतिनायकैः ॥ १६३ इत्थं पञ्चविधेनामी शरीरेण शरीरिणः। व्यापत्कल्लोललोलेऽस्मिन्भ्रमन्ति भववारिधौ ॥१६४ सर्वेऽपि नारका जीवास्तथा सम्मूच्छिनः पुनः। नपुसका भवन्त्येव न देवाः पुण्यभागिनः ॥ १६५ शेषास्त्रिवेदा विज्ञेयास्तियंचो मानवा अपि । त्रिवेदानुगतानेककर्मभावनिबन्धतः ॥ १६६ औपपादिकदेहा ये येऽपि चान्त्यशरीरिणः । नापवायुषस्तेषा' कृतपुण्यविपाकतः ॥ १६७ मिथ्यादृष्टिस्ततस्तावत्सासादनदृगुच्यते । तृतीयो मिश्रदृष्टिश्चासंयतः सम्यग्दृक्परः ॥ १६८ १ जीव विग्रहगतिमे जाकर मुदूरवर्ती क्षेत्रोमे उत्पन्न होता है । बीचमे पहाड आदिक पदार्थोसे उन शरीरोंसे युक्त यह जीव रोका नही जाता है ॥ १६१ ॥ सपूर्ण ससारी जीवोके साथ इन दो शरीरोका सम्बन्ध अनादिकालसे हुआ है । जैसे वृक्ष वीजसे उत्पन्न होता है । वह बीज पूर्व वृक्षसे उत्पन्न हुआ। वह वृक्ष उसके पूर्व बीजसे उत्पन्न हुआ है । वीजवृक्षका सबध जैसा अनादि कालसे है वैसा प्रस्तुत तेजस-कार्मण पूर्व तैजस-कार्मणसे उत्पन्न हुए, पूर्व तैजस-कार्मण उनके पूर्व तैजस-कार्मणोंसे उत्पन्न हुए हैं ऐसी इन तैजस कर्मणोकी अनादि कार्यकारण-सतति है। जैसे इस बीजसे यह वृक्ष हुआ है, ऐसा कहनेसे उन बीज-वृक्षोका सादि सवध सिद्ध होता है, वैसे तैजस कार्मण शरीरविशेषकी अपेक्षासे सादि कह सकते है, जैसे साप्रतका मिथ्यात्व-कर्मका वध पूर्व मिथ्यात्वके उदयसे होता है। इस प्रकार इनकी कार्यकारणकी सन्तति है। विशेषापेक्षासे प्राणियोके लिये सादिभी है । जिनकी दुखोकी सगति दूर हुई है ऐसे यतिनायकोने इस प्रकार तैजस-कार्मण शरीरोका सबंध कहा है ।।,१६२-१६३ ।। इस प्रकार पाच प्रकारके शरीरसे ये शरीरधारी प्राणी आपत्तिरूप तरगोसे चचल ऐसे ससारसमुद्रमे भ्रमण करते हैं ।। १६४ ।। (जीवोका लिगनिर्णय ।)- सपूर्ण नारकी जीव तथा सम्मूच्छिन जीव नपुसकही होते है। देव पुण्यवान होनेसे नपुसक नही होते हैं ॥ १६५ ॥ शेष अर्थात् तिर्यंच और मनुष्यभी तीन वेदके धारक है , क्योकि तीन वेदोको अनुकूल कर्मवधके योग्य उनके भाव होते है ।। १६६ ॥ जो औपपादिक देहवाले देव और नारकी हैं तथा जो अन्त्यशरीरवाले-तद्भव मोक्षगामी जीव हैं, उनको किये हुए पुण्यके उदयसे अपवायुष्कता नही है। अर्थात् विष-शस्त्रादि कारणोसे १ आ स्तेऽमी घनपुण्यविपाकत १४०) सिद्धान्तसार (४. १६९- नंयतातंयतस्तस्मात्प्रमत्तादिसुसंयतः । अप्रमत्तो यतिः पश्चादष्टमोऽपूर्वकृन्मतः ॥ १६९ अनिवृत्त्यल्पलोभौ च मान्तनीणकषायको । सयोगी च तयायोगी गुणाश्चैते चतुर्दश ॥ १७० -- ---- उनका आयुरय कम नहीं होता है। विष नस्त्रादि कारणोसे, नीत्र अन्यादि उपसर्गोस उनको अकालमें मरण नहीं आता ! १६७-१६९ ॥ (गमस्थानोंके नाम।)-निश्यावृष्टि, नामादन, मित्र, यमयत सम्यग्दृष्टि, संयतासंयत, प्रनत्तसंयत, अप्रमत्तसंयत, अपूर्वकरण, अनिवृत्तिकरण, मृल्मलोन, उपगान्तकपाय, नीणकपाय, नगेगवली और अयोगवली ऐसे त्रौदह गुणस्यान हैं ।। १९० !! विशेष सप्टीकरण-आचार्य नरेन्द्रमेनजीने यहां गुणस्यानोंक नामही बताये हैं। उनका स्वल्प विस्तारभयने नहीं दिया । उन गुणस्यानोंगा लक्षण यहां दिन्गने हैं- १ पहिला गुणस्थान मिथ्यात्नफर्मके उदयने होता है। २ दुसरा नासादन गुगस्यान है। प्रथमोनम सम्यक्त्व अयत्रा द्वितीयोपगम सम्यक्त्वक बन्नहर्त कालमेसे जनन्य एक समय अथवा उत्कृष्ट छह आवलिकाल मेष रहता है उन समय बनन्तानृवि नोक. मान, माया लोभमसे गिनीका उदय होनेते सम्यग्दर्मन नष्ट होता है और वह जीव मिष्यत्वले सम्मुख होता है । इस अवस्थाको सामान गुणस्थान रहते हैं। ३ तीसरा गुपस्थान मित्रदृष्टि नामक है। इसमें सम्बद्ध मिथ्यात्ल कर्मका उदय होता है न सभ्यमिथ्यालय परिणाम होते हैं ! परिणाम न सन्यग्दर्भनर हैन मिथ्यास्प हैं। परंतु मित्रपरिणाम होते हैं । अर्थात सर्वनकयित-पदार्यस्वरूपों श्रद्धानकी अपेमा समीचीनता और सुजानगर-कथित अनलाद्वानकी अपेक्षा मिथ्यापना ये दोनोंही वन एककाल और एक- आत्मग घटित हो सकते हैं। इसमें नोईभी विरोवादि दोष नहीं है। जैसे दही और गुडको परस्सर मिलानेने दोनोंका स्वाद सट्टा और मीरा मिला हुआ होता है उसही प्रकार एककालमें मित्रत परिणाम- सम्यक्चत्य और मिथ्यालल्प परिणाम होते हैं। ४ असंवत सल्लावृष्टि-सर्वजनयिन जीवादि-पदार्योने ऊपर श्रद्धा करता है, तया बग्मी होता है। क्योंकि इन्द्रियाने विषयोंसे विरक्ति तथा प्राणिनंयम उसको नहीं होता है। इसलिये उसको अचमी न्हत हैं। परंतु वह विनाप्रयोजन किसी हिसा प्रवृत्त भी नहीं होता है। ५ संतानयन-अनन्तानुबंधी नपाके उपनम, लय, भोपनमाविकसे यह श्रावक सम्बन्दृष्टि होता है और अप्रत्याख्यान क्यायके भयोपगमले उसको अगुतोंकी प्राप्ति हुई हैं, इसलिये इसको नाती कहते हैं।

-५ १७०) सिद्धान्तसार (१४१ ६ प्रमत्तसयत-सज्वलन कषाय और नोकषाय इनका उदय इस गुणस्थानमें होता है। अनतानुवन्व्यादि वारह कषायोका क्षयोपशम होनेसे इस गुणस्थानमे महाव्रत प्राप्त होते हैं, परन्तु सयममे कुछ मल उत्पन्न करनेवाला प्रमाद उत्पन्न होनेसे इसे प्रमत्तसयत कहते हैं । ७ अप्रमत्त सयत जव प्रमाद नष्ट होता है और सज्वलन कपायोदय और नोकषायोदय मद होता है, तव इसके सयम-महाव्रत अतिशय निर्मल होते हैं । ८ अपूर्वकरण इस गुणस्थानमे अनतानुवघ्यादि. वारह कषाय और नौ नोकषाय इनका क्षय अथवा उपशम करनेवाले अपूर्व ऐसे निर्मल परिणाम होते हैं, जो कि पूर्वगुणस्थानोमे नही होते । जितने मुनिराज इस गुणस्थानमे प्रवेश करते हैं उनमेसे जो समानसमयवर्ती मुनि हैं उनके परिणाम सदृगभी होते हैं और विसदृगभी होते हैं परतु भिन्न समयमे स्थित जीवोंके परिणाम सर्वदा विसदृशही होते हैं । इस गुणस्थानमे प्रतिसमयमे परिणामोकी निर्मलता वढतीही है । ९ अनिवृत्तिकरण - इस गुणस्थानमे अधिक निर्मल शुक्लव्यानम आयुको छोटकर शेष सात कर्मोकी गुणश्रेणिनिर्जरा, गुणसक्रमण, स्थितिखडन, अनुभागकाण्डखडन होता है और मोहनीय कर्मकी बादरकृष्टि, सूक्ष्मकृष्टि आदि होती है । इस गुणस्थानमे जो मुनिराज हैं उनके प्रतिसमय एकही परिणाम होता है अर्थात् एक समयमे जितने मुनि होगे उनमे समानही परिणाम होगे और भिन्न समयमे जो मुनिराज होगे वे सव विसदृश परिणामकेही धारक होगे। १० सूक्ष्मसापराय इस गुणस्थानमे धुले हुए कौसुम्बवस्त्रमे जैसी सूक्ष्मलालिमा रह जाती है वैसी रागभावना अत्यत मूक्ष्म होती है। यहां मोहकी वीस प्रकृतियोका उपशम अथवा क्षय होता है। सिर्फ एक मज्वलन लोभ सूक्ष्मकृष्टिको प्राप्त होता हुमा पाया जाता है। वह अत्यत सूक्ष्म होकर रहता है। ११ उपशातकपाय कतकफलसे पानी निर्मल होता है और मल नीचे बैठता है, वैसा यहा सपूर्ण मोहकर्म उपशान्त होनेमे आत्मा उपशातकपाय होता है १२ क्षीणकपाय सपूर्ण मोहकर्म नष्ट होनेसे आत्मा पूर्ण कषायरहित होती है। इसलिये निर्मल स्फटिक पात्रमे रखे हुए जलके ममान निर्मल होती है। १३ सयोगकेवली इस गुणस्थानमे जीवको केवलज्ञान प्रगट होता है और क्षायिक नो केवललब्धियोकी प्राप्ति होती है । फक्त योगसहित होनेसे उनको सयोगकेवली कहते हैं । यहा अठारह हजार गीलोकी प्राप्ति होती है और कर्मोका आगमन-आस्रव सर्वथा वद होता है। सत्त्व और उदय अवस्थाको प्राप्त कर्मरजकी सर्वोत्कृष्ट निर्जरा होनेसे काययोगरहित केवलीको चौदहवे गुणस्थानमे अयोगकेवली कहते है । यहाही 'पूर्णशील, पूर्णसवर, पूर्णनिर्जरा होनेसे मुनिराज मुक्ति अवस्थाके सम्मुख होते हैं । १४ अयोगकेवली - १४२) सिद्धान्तसार (५ १७१- सुवर्णानुगता वर्णा यथा पञ्चदशप्रमाः । लोके तथात्र विज्ञेया गुणाश्चैते चतुर्दश ।। १७१ जपापुष्पादिसाचिव्याद्य. स्वभावः प्रजायते । स्फटिकादौ तथा जीवे लेश्या स्यात्कर्मयोगतः ॥१७२ कृष्णा नीला च कापोता पीता पद्मा तथा पुनः।शुक्ला च षड्विधा लेश्या जीवेऽभाणि विचक्षणः ।। जीवतत्त्वमिदं तावद्युक्तं वाऽयुक्तमेव वा । किञ्चिदागमतो ज्ञात्वा भणितं यन्मया पुनः ॥ १७४ श्रीजिनेन्द्रमतं पूर्वसूरिसूर्यप्रकाशितम् । तत्खद्योतनिभेनतत्कि मया बत भाष्यते ॥ १७५ दुष्पमाकालयोगेन सम्यग्ज्ञानविजितः । सर्वत्र संशयानस्तन्मादृशैः कि निगद्यते ॥ १७६ केवलं तत्त्वविज्ञानलिप्सालुन्धोहमूच्चकैः । दरिद्रोऽपि हि कि लोके सौराज्यं नाभिवाञ्छति ॥१७७ - जैसे सुवर्णमे पदरह वर्ण-भेद दिखते है वैमे इस जगतमे चौदह गुणस्थान होते है । जैसे अधिक वर्णमे उत्तरोत्तर शुद्धता बढती है और पदरहवे वर्णमे सोना पूर्ण प्राय शुद्ध होता है वैसे इस गुणस्थानमे आत्माकी उत्तरोत्तर विशुद्धता होती होती चौदहवे गुणस्थानमे निर्मलता पूर्णप्राय होती हैं ॥ १७१ ॥ लेल्यावर्णन :- स्फटिकादिक पदार्थोमे जैसे जपापुप्पादि पदार्थोके सान्निध्यसे जो स्वभाव प्रगट होता है, वैसे जीवमे कर्मयोगसे लेश्या होती है । स्पष्टीकरण- 'कषायानुरजिता योगप्रवृत्तिलेश्या' कषायके उदयसे जो मनवचनकी प्रवृत्ति होती है जिससे आत्माके प्रदेशोमे कप उत्पन्न होता है वह लेश्या है। इस लेश्याकेद्वारा जीव अपनेको पुण्य और पापसे लिप्त करता है । ऐसे लेण्याके आचार्यने छह भेद बताये हैं। वे इस प्रकार- = कृष्णा, नीला और कापोता, पीता, पद्मा और शुक्ला ऐसी छह लेश्याये जीवमे चतुर सूरियोने वताई है । स्पष्टीकरण- इनमे पहिली तीन लेश्याय क्रमसे अशुभतम, अशुभतर और अशुभ ऐसी है और पीत, पद्म तथा शुक्ललेल्या क्रमसे शुभ, शुभतर और शुभतम है। प्रकृतिवध, स्थितिवध, अनुभागवध और प्रदेगवंधर्मसे कषायोदयसे स्थितिबंध और अनुभागबंध होता है । तथा योगसे प्रकृतिबंध और प्रदेशवव होता है । जहापर कषायोदय नही होता है, वहां केवल योगको उपचारसे लेश्या कहते हैं । यह भावलेश्याका स्वरूप समझना चाहिये, क्योंकि, शरीरके रगको द्रव्यलेण्या कहते हैं ।। १७२-१७३ ।। यह जीवतत्त्व कुछ आगमको जानकर युक्त तथा अज्ञानसे कुछ अयुक्त मैने कहा है। यह जिनेन्द्रका मत पवित्र और आचार्यरूपी मूर्यसे प्रकाशित हुआ है। मै तो जुगनूके समान हूं। जिनेन्द्रमतविषयमे मै अधिक क्या कह सकता हूं। १७४-१७५ ।। मेरे सदा लोग दुष्षमाकालके प्रभावसे सम्बन्जानरहित हो गये हैं और सर्वत्र संशययुक्त हुए हैं । इसलिए हम क्या कह सकते हैं। परंतु तत्त्वज्ञान प्राप्तिकी इच्छासे मै अत्यन्त लुब्ध हुआ हूं। योग्यही है, कि इस जगतमे क्या दरिद्री मनुष्यभी उत्तम राज्यको नहीं चाहता है ? अर्थात् दरिद्रीकोभी जैसे राज्यप्राप्तिकी इच्छा होती है वैसे मुझे तत्त्वज्ञानकी तीव्र इच्छा हुई है ॥१७६ -१७७ ॥ ।

-५ १८२) सिद्धान्तसार (१४३ कालस्यापेक्षया धर्मो नष्ट सर्वत्र सर्वथा । तं प्रकाशयता किञ्चित् पक्षपातो' भविष्यति ? ॥१७८ इति वाग्देवता जैनी दुष्षमाफालवर्तिनाम् । मां प्रलपन्तमित्युच्चविज्ञायोद्धरतु' क्षणम् ॥ १७९ स्वरूपादिविभेदेन जीवतत्त्व निरूपितम् । साम्प्रत गतिभेदेन निगदामि यथागमम् ॥ १८० इति निगदितमेतज्जीवतत्त्वं विदित्वा । हृदि दधति पटिष्ठाः साधवो ये सुनिष्ठाः ॥ त इह निहतफर्मव्यापदानन्दरूपम् । पदमधिगतबोधा. प्रस्फुरन्तः सरन्ति ॥ १८१ धारयन्ति मुदितान्तरात्मकाः श्रीजिनेन्द्रमतभेतदद्भुतम् । ये त एव कलयावलम्बिनो नापरे जगति जाड्यसङ्गताः ॥ १८२ इति श्रीसिद्धान्तसारसडग्रहे पण्डिताचार्यनरेन्द्रसेनविरचिते जीवतत्त्वप्ररूपण. पञ्चमः परिच्छेदः॥ . कालकी अपेक्षासे सर्वत्र सर्वथा सर्व प्रकारसे धर्म नष्ट हुआ है । परतु उसको प्रगट करनेवालोंके विषयमे कुछ पक्षपात-प्रेम उत्पन्न होता है । इसलिये जिनेश्वरके मुखकमलसे निकली हुई वाग्देवता दुप्षमाकालमे उत्पन्न हुए लोगोको धर्मका स्वरूप कहनेवाले मुझको जानकर शीघ्र मेरा उद्धार करे ।। १७८-१७९ ।। स्वरूपादिभेदोंसे मैने जीवतत्त्वका निरूपण किया है। अब मै जिनागमानुसार गति भेदोंसे- नारकी, मनुष्य, देव, पशु ऐसी चार गतियोकी अपेक्षासे जीवतत्त्वका वर्णन करूगा ॥१८० इस प्रकार कहा हुआ जीवका स्वरूप जानकर जो अतिशय चतुर और मधुरभाषी भले साधु हृदयमे धारण करते है वे कर्मजन्य आपत्तियोको नष्ट करनेवाले और आनदरूप-अनन्तसुख रूप पदको सम्यग्ज्ञानकी प्राप्ति करके वृद्धिंगत होते हुए प्राप्त होते है ।। १८१ ।। जिनका अतरात्मा मानदित हुआ है ऐसे विद्वान् इस आश्चर्यकारक जिनेश्वरके मतको धारण करते हैं । वेही कलाके अवलम्बी है अर्थात् श्रेष्ठ ज्ञानी है परतु जिन्होने जिनमतको धारण नही किया है ऐसे अन्यलोग जाड्यसे सगत हैं-अज्ञानी है ।। १८२ ।। पण्डिताचार्य नरेन्द्रसेन विरचित श्रीसिद्धान्तसारसग्रहमे जीवतत्त्वका वर्णन करनेवाला यह पाचवा अध्याय समाप्त हुआ। 11 2. . - ५ मा कुशला १ आ पक्षमात्रम् २ आ मत्युच्च्य ४ आशया ३ आ क्षणात् ६ आ इति श्रीसिद्धान्तमारमग्रहे आचार्यश्रीनरेन्द्रसेनविरचिते पञ्चम परिच्छेद समाप्न षष्ठोऽध्याय.। २ नारकतिर्यङमानुष्यदेवगत्यादिभेदतः । चतुर्धा जायते जीवः संसारे सारजिते ॥१ माद्या रत्नप्रभानामो द्वितीया शर्कराप्रभा । वालुकादिप्रभाभूमिस्तृतीया बहुदु.खदा ॥ २ पङ्कप्रभा चतुर्थो स्यात्पञ्चमी घूमसत्प्रभा । षष्ठी तम.प्रभा निद्याभिहिता' जिननायकः॥३ महातम-प्रभा घोरा घोरदु.खप्रदशिनी । सप्तमी पापिनां दुःखानिमिता पापकर्मणा ॥ ४ एताश्च भूमयः सर्वा धनाम्बुवलयस्थिताः । घनाम्बुवलयं तद्धि घनवातप्रतिष्ठितम् ॥५ घनादिवलयं तावत्तनुवातव्यवस्थितम् । तदाकाशस्थितं तद्धि स्वप्रतिष्ठमुदीरितम् ॥ ६ वलयानि च पिण्डेन त्रीण्येतानि प्रमाणतः । प्रत्येक योजनानां हि सहस्राणि तु विशतिः ॥७ मेरोराधार भूता स्यात्पृथ्वी रत्नप्रभाभिधा । रज्ज्वन्तरालवतिन्यस्ततोऽघोऽघः पराञ्च षट् ॥८ ततोऽवस्ताद्वरा शून्यं रज्जुमानं सुदुस्तरम् । क्षेत्रमस्ति निगोतादिजीवस्यानमनेकधा ॥ ९ महापापभवानेकफलानीव हतात्मनाम् । त्रिशन्नरकलक्षाणि विद्यन्ते प्रथमक्षितौ ॥ १० छटा अध्याय। - इस सारवजित ससारमें नारक, तिर्यच, मनुष्य और देव ऐसी बार गतियोके भेदसे यह जीव चार प्रकारका होता है ।। १॥ (नरकगतिक जीवोका आधारभूत स्यान । )- पहिली रलप्रभा, दूसरी शर्कराप्रभा और अतिशय दुःख देनेवाली तीसरी वालुकाप्रभा नामक भूमि, चौथी पकप्रभा, पांचवी धूमप्रभा त्या छळी तम.प्रभा भूमि है । जिननायकोने के भूमियाँ निच हैं ऐसा कहा है । घोर दुःखको देने- वाली प्राणियोंकि पाप कर्मने दु खसे निर्माण की गई सातवी महातम.प्रभा नामक नरक भूमि है। ये सातोही भूमिगं घनाम्बुवातबल्यो चारों तरफसे घिरी हुई हैं । धनाम्बुवातवलय घनवातके आधारसे रहा है, और धनवातवलय तनुवातवलयसे व्यवस्थित है। तथा वह तनुवातवलय आकागमें है और आकाग स्वप्रतिष्ठित है- अपनही आधारसे है अर्थात् वह बाकाश स्वयं अपनेको याघारभी है तथा अपनेमे रहनेसे आधेयभी है ॥२-६ ॥ (तीन वातवलयोका विस्तार ।)-तीन वातवलयोमेंसे प्रत्येकका पिण्डप्रमाण वीस वीस हजार योजनोंका है। पहली रत्नप्रभा नामक पृथ्वी मेल्को आधारभूत है। तदनन्तर दूसरी, तीसरी आदि छह पृथ्वियाँ एक एक रज्जके अन्तरालमें हैं। उसके नीचे पृथ्वीरहित एक रज्जुविस्तारके अवकाशमे सुदुस्तर ऐसा स्थान है, जो कि निगोट जीवोंका स्थान है और अनेक प्रकारका हैं ।। ८-९॥ १ ना. गदिशा २ मा. प्राणिना मन्यै निर्मिता पापकर्मणाम् । .

-६ २० ) सिद्धान्तसार (१४५ द्वितीयाया पुनस्तानि विद्यन्ते पविशति । तथा पञ्चदश प्राजस्तृतीयाया मतानि च ॥११ दशलक्षाणि विद्यन्ते चतुर्थ्यां नरकावनौ । नरफाणि निमेषार्द्धमपि सौख्यातिगानि च ॥ १२ पञ्चम्यां त्रीणि लक्षाणि षष्ठया पुनरुदीरितम्। पञ्चोनमेक लक्षं च सप्तम्यां पञ्चकं पुनः॥१३ अथाशीतिसहस्रश्च लक्षमेकमुदीरितम् । वाहुल्य' बहुधा रत्नप्रभायां जिननायकैः ॥ १४ द्वात्रिंशच्च सहस्राणि प्रत्युत्व योजनानि तु । द्वितीयाया मत प्राज्ञ प्रगताशेषकल्मषः ।। १५ योजनानां सहस्राणि बाहुल्य ह्यष्टविंशतिः । तृतीयाया भवन्त्यत्र' श्वभ्रभूविनिन्दितम् ॥१६ विस्तारः कथितस्तज्जैश्चतुर्थ्यां नरकक्षितौ । योजनाना सहस्राणि चतुर्विशतिरित्ययम् ॥ १७ पञ्चम्या विंशतिः पिण्डः षष्ठया षोडश वा पुनः। अष्टौ च सप्तमपृथ्व्या योजनाना सहस्रकाः॥१८ पश्चम्या नरफभूमेश्च विंशतिर्योजन मतम् । षष्ठया षोडशसख्या च सप्तम्यां योजनाष्टकम् ॥१९ तिर्यग्विस्तार एवासामेकरज्जुप्रमाणतः । मध्यस्थो लोकमानोऽत्र त्रसनालिर्बहिर्भवेत् ॥ २० २ (नरकभूमियोमे विलसख्या।)- जो अत्यत दीन है ऐसे नारकियोके महापापोंसे उत्पन्न मानो अनेक फल, ऐसे तीस लाख विल पहले नरकमे हैं । दूसरे नरकमे पच्चीस लाख बिल है। तिसरे नरकमे पद्रह लाख विल हैं। चौथे नरकमे दस लाख नरक बिल है। ये सर्व नरक बिल निमिषार्द्धभी सुखयुक्त नहीं हैं । अर्थात् हमेशा इन विलोमे नारकी दुखही भोगते हैं। पाचवे नरकमे तीन लाख नरक बिल है । छठे नरकमे एक लाखमे पाच कमी अर्थात् निन्यानवे हजार नौसौ पिचानवे विल है । पुन सातवे नरकमे पाचही नरक विल है ॥ १०-१३ ।। जिननायकोने रत्नप्रभाका बाहुल्य-मोटाई एक लाख अस्सी हजार योजनोका कहा है ॥ १४ ॥ जिनका सपूर्ण पाप नष्ट हो गया है ऐसे बुद्धिमानोने दूसरे शर्कराप्रभानरककी मोटाई बत्तीस हजार योजन कही है ।। १५ ।। तिसरी निन्द्य नरकभूमि वालुकाप्रभाकी मोटाई अट्ठावीस हजार योजन है ॥ १६ ॥ चतुर्थ नरक पङ्कप्रभाकी मोटाई तज्ज्ञ लोगोने विस्तृत चौवीस हजार योजनकी कही है।॥ १७ ॥ पाचवी नरकभूमीकी मोटाई बीस हजार योजनप्रमाणकी कही है । तथा छठी नरक- भूमीकी मोटाई सोलह हजारकी कही है । और सातवी नरकभूमीकी मोटाई आठ हजार योजनोकी कही है ॥ १८-१९ ।। इन सात पृथ्वियोका तिर्यग्विस्तार एक राजुप्रमाण है। यह लोग जिसके बीचमे नाभिके समान असनालि है और वह लोकप्रमाण अर्थात् चौदह राजुप्रमाण ऊची है ॥ २० ॥ - १ आ. वाहल्य २ मा भवत्यत्र S.S.19 १४६) सिद्धान्तसार (६ २१- योजनानां सहस्रकबाहुल्या मन्दराश्रया। चित्रा मही तया सार्द्धमधोभागो' व्यवस्थित. ॥२१ खरभागो भवेत्तावद्योजनानां हि षोडश । सहस्राणि स बाहुल्यावहुधा कौतुकावहः ॥२२ युग्मम् तदधस्तात्स विज्ञेयः पङ्कभागोऽपि विस्तरात् । योजनानां सहस्राण्यशीतिश्च चतुरुत्तरा ॥ २३ सहस्राशीतिबाहुल्यस्ततोऽबहुल' इत्यपि । भागो भवति भूरीणा नारकरणां समाश्रयः ।। २४ एवं रत्नप्रभाभूमिर्भागत्रयविभाजिता । सहत्राशोतिलकबाहुल्या बहुदु.खदा ॥ २५ प्रथम भावनानां हि भवनानि धनानि च । नवाना सन्ति साधूनि विचित्राकारधारिणाम् ॥२६ तथा सप्तप्रकारेण व्यन्तराणां सुशोभना । आवासा सन्ति तत्रैव खरभागे विभागतः ॥ २७ पद्धभागे पुनर्भव्यगृहाण्यसुररक्षसाम् । तृतीये नरकाः सन्ति नारकाणां समाश्रयाः ॥ २८ योजनानां सहलेकं सर्वासु श्वनभूमिषु । उपर्यध परित्यज्य पटलानि भवन्ति च ॥ २९ - चित्रा नामक पृथ्वी जो कि मदरपर्वतको आधारभूत है वह एक हजार योजनप्रमाणकी है । उसके नीचे उसके साथ अधोभाग व्यवस्थित हैं। उसके नीचे खरभाग है। वह मोटाईसे सोलह हजार योजनप्रमाणका है और अनेक प्रकारोसे कौतुकयुक्त है ।। २१-२२ ॥ खरभागके नीचे पंकभागभी जानने योग्य है। उसका विस्तार चौरासी हजार योजनोका है। उसकेभी नीचे अव्वहुलभाग है । उसका विस्तारका प्रमाण अस्मी हजार योजनोका है। वह बहुत नारकी जीवोका आश्रयस्थान है ॥ २३-२४ ।। इस प्रकार रत्नप्रभाभूमि खरभाग, पङ्कभाग और अब्बहुलभाग ऐसे तीन विभागोंसे विभक्त हुई है। उसकी मोटाई एक लाख अस्सी हजार योजनप्रमाणकी है और अतिशय दुखदायक है ॥ २५॥ पहले खरभागमे विचित्र आकार धारण करनेवाले नौ प्रकारके भवनवासियोंके दृढ और सुदर रत्नमय भवन हैं । अर्थात् नाग, विद्युत्, सुपर्ण, अग्नि, वात, स्तनित, उदधि, द्वीप और दिक् ऐसे नौ प्रकारके भवनवासियोंके स्थान है। तथा उसी खरभागमे सात प्रकारके व्यतरदेवोके सुदर आवास विमागक्रमसे हैं । किन्नर, किंपुरुष, महोरग, गंधर्व, यक्ष, भूत और पिशाच्च ऐसे सप्त व्यंतरोके निवास हैं। खरपृथ्वीभागके ऊपरके हजार योजनोका और नीचेके हजार योजनोका प्रदेश छोडकर वीचके चौदह हजार योजनोके विस्तृत प्रदेशमे असुर और राक्षसोको छोडकर भवनवासी और व्यतरोंके निवास हैं । पङ्कभागमे पुन असुर और राक्षसोके भव्य गृह हैं। तीसरे अन्वहुल विभागमे नारकियोंके निवासस्थान अर्थात् नरक विल हैं ।। २६-२७-२८ ।। संपूर्ण नरकभूमियोमे ऊपरका और नीचेका हजार हजार योजनोंका प्रदेश छोडकर मध्य- -- -- १ आ मन्दरोऽस्तु य. २ आ भागे. ३ आ.वाहल्य. ४ आ सप्तप्रकाराणां -६ ३९ ) सिद्धान्तसार (१४७ १ सप्तम्यां मध्यभागे स्युर्नारका नरकाश्रया । अब्बहुलभागेऽन्यासु सस्वेते निवेदिताः ॥ ३० पटलानि भवन्त्येव प्रथमाया त्रयोदश । एकादश नवैतानि सप्त पच यथाक्रमम् ॥ ३१ द्वितीयाया तृतीयाया चतुर्थ्यां च तथा पुन । पचम्या त्रीणि षष्ठयाचसप्तम्यामेकमेव तत् ॥३२युग्मं तत्र सीमतसज्ञ स्यात्प्रथमे प्रस्तरे विलम् । नलोकपरिमाण तत्प्रथमाया यदिन्द्रकम् ॥ ३३ बिलान्येकोनपञ्चाशच्छ्रेणीभूतानि सन्ति च । चतुर्दिक्ष्वप्यसडख्यातयोजनानि दिशं प्रति॥३४ अष्टाधिका भवेत्तेषा चत्वारिंशद्विदिक्ष्वपि । दिगवस्थितरूपाणां प्रकीर्णान्यन्तरे पुनः ॥ ३५ सर्वाण्येकोनपञ्चाशत्सर्वासु श्वनभूमिषु । पटलानि च तेष्वेव क्रम एव विवर्ण्यते ॥ ३६ श्रेणिश्रेणिगत फितु पटल प्रति हीयते । एकैकमिति सप्तम्या यावदेकदिश प्रति ॥ ३७ प्रथमे प्रतरे तावन्नारकाणां समृच्छ्यः । प्रथमाया त्रयो हस्ता ज्ञातव्यास्तत्ववेदिभिः ॥ ३८ प्रतरे प्रतरे तावद्विवर्द्धन्ते यथाक्रमम् । सहार्घषट् च पञ्दाशदङगुलाश्च त्रयोदश ॥ ३९ प्रदेशमे पटल हैं । सातवे नरकके मध्यभागमे नारकोके आश्रयस्थान ऐसे नारकावास है । अब्बहुल भागमे और अन्य सर्व नारकपृथ्वीमे ये नारकावास कहे गये है ॥ २९-३० ॥ (नरकपटलोका वर्णन । )- पहिली रत्नप्रभामे तेरह पटल हैं । दुसरीमे ग्यारह पटल हैं। तीसरीमे नौ हैं । चौथीमे सात है । पाचवीमे पाच हैं । छठीमे तीन है और सातवीमे एक है ।। ३१-३२ ॥ पहली पृथ्वीमे पहले प्रस्तरमे सीमत नामक बिल है। वह मनुष्यलोकपरिमाणका पैतालीस लाख योजन परिमाणका है । पहिले नरकमे वही इन्द्रक बिल है ।। ३३ ॥ पहले प्रस्तारमे प्रत्येक दिशामे-चार दिशामे उनचास उनचास श्रेणिवद्ध विल हैं और वे असख्यात योजनोके है । विदिशाओमे जो विलश्रेणि है उनमे अडतालीस अडतालीस बिल है। दिशा और विदिशामोके अन्तरालोमे प्रकीर्णक विल हैं ॥ ३४-३५ ॥ { , सर्व नरकोमे उनचास पटल हैं । अव उनमेही इस प्रकारसे वर्णन करते हैं ॥ ३६॥ एकेक पटलकी श्रेणि श्रेणिमे एक एक बिल कम होता है । इस प्रकार कम होते होते सातवे नरकमे एक एक दिशामे एक एक बिल अवशिष्ट रहता है ॥ ३७ ॥ (प्रथमनरकमे नारकियोंके शरीरकी ऊचाईका वर्णन ।)- पहली पृथ्वीमे पहले प्रस्तारमे नारकियोके शरीरकी ऊचाई तीन हाथ है, ऐसा तत्त्वज्ञोने कहा है ॥ ३८ ॥ प्रत्येक प्रस्तारमे यथाक्रम ऊचाई बढती जाती है। तेरहवे प्रस्तारतक साढे छप्पन अगुलतक बढती जाती है । अर्थात् दो हाथ साढे आठ अगुल बारह जौतक बढती जाती है । तेरहवे पटलमे सात धनुष्य, तीन हाथ और छह अगुलप्रमाण नारकियोके देहकी ऊचाई है ॥ ३९-४० ।। --- १ या तस्य च २ आ एव ३ आ सहार्धानि च पष्टाशादड्गुलान्या त्रयोदशम् १४८) सिद्धान्तसारः (६. ४०- धनूंषि सप्त जायन्ते त्रयो हस्ताः षडालैः । समं त्रयोदशे मानं नारकाणां समुच्छ्यः ॥ ४० द्वितीयायां स एव स्यादुत्सेधः प्रथमे महान् । प्रतरे वर्धते तस्मात्रिकरस्यङगुलाधिकम् ॥ ४१ एकादशे धनूंष्याहुः पञ्चाधिकतया दश । हस्तद्वयं शरीरस्य मानं सद्विदशाङ्गुलम् ॥ ४२ तृतीयायां स एव स्यात्प्रथमे प्रतरे महान् । उत्सघो यो द्वितीयायां कथितश्चान्तिमे बुधः ॥४३ सहार्द्धकोनविंशत्या सप्तहस्तैः प्रकीर्तिता । वृद्धिस्ततः परा यावन्नवमप्रतरं भवेत् ॥ ४४ उत्सेधं च धनूंष्याहुरेकत्रिंशत्कराधिकम् । नवमे' च तृतीयायां प्रतरे प्रज्ञयान्विताः ॥ ४५ चतुर्थ्यां हि स एव स्यात्प्रथमे प्रतरे ततः । वृद्धिर्घनूंषि पञ्चैव सा विशत्यङगुलः सह ॥ ४६ उत्तेघो नारकाणां च हस्तद्वयसमन्वितः । स्यात्स एव हि पञ्चम्यमादिमे प्रतरे ततः ॥ ४७ सप्तमे प्रतरे तत्स्यावाषष्टिर्घनुषां मतः । दश पंच च चापानि साधहस्तद्वयं पुनः ॥ ४८ प्रतरे प्रतरे वृद्धिर्यावत्पञ्चमकं भवेत् । पञ्चमे च शतं तस्माद्धनुषां पञ्चविंशतिः ॥ ४९ (दूसरे नरकमे नारकीके देहकी ऊचाई।)- दूसरी पृथ्वीमे - शर्कराप्रभामे पहले प्रस्तरमे वही उत्सेध है अर्थात् सात धनुष्य तीन हाथ और सहा अगुलप्रमाण नारकियोका देह ऊंचा है । तदनंतर प्रत्येक प्रस्तरमे तीन हाथके ऊपर तीन अगुल वृद्धि होती है । ऐसी यह वृद्धि ग्यारहवे प्रस्तारतक होती जाती है । ग्यारहवे प्रस्तारमे पंद्रह धनुष्य दो हाथ बारह अगुलका शरीर ऊचा रहता है ।। ४१-४२ ।। (तीसरे नरकमे नारक देहकी ऊंचाई।)-दूसरे नरकके अन्तिम पटलमें जो नारकियोंके शरीरका उत्सेघ विद्वानोने कहा है, वही तीसरे नरकके प्रथम प्रतरके नारकियोंके शरीरका उत्सव है । तदनंतर आगे प्रत्येक प्रतरमे वृद्धि होती जाती है वह तीसरे नरकके नवमे : प्रतरतक होती रहती है । तीसरे नरकके नवमें प्रतरतक सात हाथ साडे उन्नीस अंगुलप्रमाण वृद्धि होती है। जो प्रज्ञासे युक्त है ऐसे गणधर देवने तीसरे नरकके नवमें पायडेमे नारकियोका शरीर इकत्तीस धनुष्य एक हाथ ऊंचा कहा है ॥ ४३-४५ ॥ m- (चौथे और पांचवे नरकके नारकियोंके देहका उत्सेध । )- चौथे नरकके पहले प्रतरमें वही गरीरोलेघ है । उसके अनंतर पांच धनुष्य और वीस अंगुलप्रमाण वृद्धि प्रत्येक प्रतरमे । होती हुई पांचवे नरकपृथ्वीके पहले प्रतरमे नारकियोका गरीरोत्सेध वही है-पूर्वोक्त है। तदनन्तर आगेके प्रतरों में शरीरोलेध वढता हुआ सातवे प्रतरमे वासप्ट घनुप्य हुआ है । तदनंतर प्रत्येक प्रतरमे पद्रह धनुष्य अढाई हाथकी वृद्धि होती हैं और पांचवे प्रतरमें एकसौ पच्चीस धनुष्य प्रमाण शरीरका उत्सेध होता है । अर्थात् पांचवे नरकके अन्तिम पटलमे नारकियोंका शरीरोत्सेध एकता पच्चीस धनुष्य प्रमाणका होता है ।। ४६-४९ ॥ - १ मा. यड्गृलाविक २ आ. नवमेनु तृतीगया -६ ५८) सिद्धान्तसार (१४९ २ पञ्चम्यां पञ्चमेऽभाणि य उत्सेधः स आदिमे। षष्ट्या च प्रतरे प्राज्ञ. कथितोयतिनायकैः॥५० प्रतरे प्रतरे वृद्धिस्ततः सार्धद्वयान्विता । जायते धनुषा षष्ठिस्तृतीयं यावता भवेत् ॥ ५१ उत्सेधो जायते षटया' तृतीये प्रतरे पुन । पञ्चाशदधिकं तावद्धनुषा च शतद्वयम् ॥ ५२ सप्तम्यां' प्रतरे तावन्नारकाणां समुच्छ्य । ख्यातः पञ्चाशतान्येषा धनुषा यतिनायकैः ॥५३ ' एकस्यस्तथा सप्त दश सप्तदशापि वा। द्वाविंशतिस्त्रयस्त्रिशत्सागरास्तासु जीवितम् ॥५४ प्रथमायां यदुत्कृष्ट द्वितीयाया हि तत्पुन । जघन्यमिति सर्वासु क्रमोऽयं वणितो बुधैः ॥ ५५ आयू रत्नप्रभायां तत्प्रथमे प्रतरे मतम् । दशवर्षसहस्राणि नवतिः परमं पुनः ॥ ५६ दशलक्षं जघन्य स्याद्वितीये नवतिः परम् । तदायु रकाणां हि कथितं जिननायकैः ॥ ५७ जघन्यं नवतिलक्षास्तृतीये कथित जिनः । उत्कृष्ट पूर्वकोटी" स्यादायुस्तत्र हतात्मनाम् ॥ ५८ } , (षष्ठनरकमे नारकियोका शरीरोत्सेध।)-पाचवे नरकके पाचवे प्रतरमे जो शरीरोत्सेध नारकियोका कहा है, वही छठी पृथ्वीमे पहले प्रतरमे विद्वान यतीश्वरोने कहा है । इसके अनतर प्रत्येक प्रतरमे साडेबासष्ट धनुष्य प्रमाण शरीरोत्सेध वढता है । वह बढ़ते बढते तृतीय प्रतरमे ढाईसौ धनुष्यप्रमाण शरीरका उत्सेध हुआ है ।। ५०-५२ ॥ ( सातवे नरकमे नारकियोका शरीरोत्सेध । )- सातवे नरकके प्रथम प्रतरमें नारकियोकी शरीरकी ऊचाई पाचसौ धनुष्य है ऐसा यतिनायकोने कहा है ॥ ५३ ।। ( सात नरकोमे नारकियोके आयुष्यका वर्णन।)- प्रथम नरकको आरभकर सातवे नरकतक क्रमसे नारकियोका उत्कृष्ट आयुष्य एक सागर, तीन सागर, सात सागर, दश सागर, सतारह सागर, बावीस सागर और तेहतीस सागर प्रमाण है। पहले नरकमे जो उत्कृष्ट आयु कही है वह दूसरे नंरकमें जघन्य है। इस प्रकारसे सातवे नरकतक विद्वानोने आयु क्रमका वर्णन किया हैं ॥ ५४-५५ ।। (पहले नरकके प्रत्येक प्रतरमे जघन्य और उत्कृष्ट आयुका प्रतिपादन ।)- पहले नरकके पहले प्रतरमे दस हजार वर्षोकी जघन्य आयु है और उत्कृष्ट आयु नब्बे हजार वर्षकी है ॥५६ ।। दूसरे प्रतरमे नारकियोकी जघन्य आयु नब्बे हजार वर्षकी है और उत्कृष्ट आयु दस लाख वर्षकी है ऐसा जिनेश्वरोने कहा है। तीसरे प्रतरमे दीन नारकियोकी जघन्य आयु नब्बे लक्ष है और उत्कृष्ट आयु पूर्वकोटिवर्ष-प्रमाण है। चौथे प्रतरमे एक पूर्वकोटि आयु जघन्य है और उत्कृष्ट आयु सागरका दसवा भाग है। चतुर्थ प्रतरमे जो उत्कृष्ट आयु है, वह पाचवे प्रतरमे जघन्य समझना चाहिये। पाचवे प्रतरमे सागरका जो दशमअश जघन्य आयु कही है उसके दो अश प्रमाण आयु उत्कृष्ट है। छठे प्रतरमे जघन्य आयु सागरके दश अशमे दो अश है और उत्कृष्ट तीन अश है। आगेके प्रतरोमे एक एक अशकी वृद्धि होती है ऐसा निश्चय हैं । इसका स्पष्टीकरण ऐसा है-सातवे " ३ आ सप्तम्या ४ घृतिनायक ५ आ पूर्वकोटि १ आ पञ्चम्या २ आ पष्च्या १५०) सिद्धान्तसार (६. ५९-- १ चतुर्थे प्रतरे तस्या पूर्वकोटिर्जघन्यकम् । दशमो भाग उत्कृष्ट सागरस्येह कथ्यते ॥ ५९ आयुस्त्रयोदशे ज्ञेयमुत्कृष्ट सागरोपमम् । जघन्य तस्य भागायुर्नवैवेति सुनिश्चितम् ॥ ६० पञ्चमे च जघन्य तद्यदुत्कृष्टं चतुर्थके । तावेव द्वौ विभागौ स्यादुत्कृष्टं तस्य' जीवितम् ॥६१ परेण्वेकोत्तरा वृद्धिर्भागानामिह निश्चिता । आयुर्जघन्यमुत्कृष्ट तथा तेषु निगद्यते ।। ६२ ऊर्ध्वक्षितिस्थितेर्यस्तु विशेष प्रतरैर्हतः । स्वकीयैर्गुणित स्वेच्छ तेनामोत्कृष्टमिष्यते (?)॥६३ नित्याशुभतरा लेश्यास्तेषु ते सन्ति नारकाः । स्वभाववेदनादेहविक्रियादुष्टभागिन. ॥ ६४ प्रथमायां द्वितीयायां सर्वे कापोतलेश्यकाः । नारकाः सन्ति दुःखार्ताः पच्यमानाः पदे पदे ॥६५ उपरिष्टात्तृतीयाया जीवाः कापोतलेश्यका. । अधस्तानीललेश्यास्युमिथ्यात्वचलभावनाः ॥६६ - प्रतरमे जघन्य आयु तीन अश है उत्कृष्ट आयु चार अग है। आठवे प्रस्तारमें सागरके चार अश जघन्य आयु है और सागरके पाच अश उत्कृष्ट आयु है । नौवे पाथडेमे जघन्य आयु पाच अश है उत्कृष्ट आयु छह अश है । दसवे प्रतरमे जघन्य आयु छह अश है और उत्कृष्ट आयु सात अश है । ग्यारहवे प्रतरमे जघन्य आयु सात अश है और उत्कृष्ट' आठ अंश है। बारहवे पाथडेमे जघन्य आयु सागरके आठ अश है और उत्कृष्ट आयु नौ अश है। तेरहवे पाथडेमे उत्कृष्ट आयुष्य एकसागरोपम है और जघन्य आयु सागरके नौ अश प्रमाण निश्चित है ।। ५७-६२ ।। आगेके प्रतरके भागोमे एक एक भाग अधिक वृद्धि होती है उसको उत्कृष्ट कहना चाहिये। तथा पूर्व पूर्वभाग मात्र आयु जो आगेके प्रतरमे होती है उसको जघन्य आयु कहते है ॥६३।। । उत्कृष्ट और जघन्य स्थितिका अन्तर निकालकर प्रतरोकी सख्यासे उसे भाजित कर पहली पृथ्वीको उत्कृष्ट स्थितिमे जोडनेपर दूसरी पृथ्वीके प्रथम पटलकी, उत्कृष्ट स्थिति होती है ॥ ६३ ॥ (नारकियोके लेश्यादिक अशुभतरही है. ऐसा कथन।)- उन सात नरकोमे वे नारकी हमेशा अशुभतर लेण्या,, अशुभतर देह, अशुभतर वेदना, अशुभतर स्वभाव और अशुभतर विक्रिया आदिक दोषवाले होते है । स्पष्टीकरण- मध्यलोकमे तिथंचोमे जो अशुभ लेश्या, देह, वेदनादिक होते हैं, उससे अधिक अशुभलेश्या, देह, वेदनादिक नारकियोके होते हैं, ऐसा अभिप्राय व्यक्त करनेके लिये 'अशुभतर' कहा है । अथवा रत्नप्रभादि उपरके नरकोकी अपेक्षा नीचेके नरकोंमें उत्तरोत्तर लेश्या, देह, वेदना परिणामादिक अशुभतर अशुभतर होते है । ६४ ॥ पहले और दूसरे नरकमे सर्व नारकी कापोत लेश्यावाले तथा दुर्भावना युक्त और दुखोसे पीडित और वहाके प्रतिस्थानमे वे दु खसे पचते रहते है। तथा वालुकाप्रभा नरकके उपरिष्ट भागमे उत्तम कापोत लेश्या है और नीचेके विभागमे नीललेश्या हैं। इन नारकियोंके भाव मिथ्यात्वसे चचल होते है ॥ ६५-६६ ।। १ मा तत्र - ~६ ७५) सिद्धान्तसार ( १५१ १ चतुर्य्या नीललेश्यास्ते पञ्चम्यामुपरि स्थिता । नीलाः कृष्णास्त्वधः षष्ठया कृष्णा एव निरन्तराः॥ सप्तम्यां कृष्णकृष्णास्ते नारका नरफावनौ । क्षेत्रस्वभावतो हीना' जायन्ते ते नपुसका ॥६८ असुरोदीरितानेकदु खिनस्त्रिषु ते पुनः । तत. परस्पर दुःखान्युद्गिरन्ति दुराशयाः ॥ ६९ मिथ्यादर्शनविज्ञानचारित्रस्तीवभावगे । जायते दुर्गति सत्य सत्त्वानामिति नारका. ॥ ७० वेदना द्विविधा तेषा वाह्याभ्यन्तरभेदत । असातजनिताश्चित्तसम्भवा देहजा परा ॥ ७१ क्षेत्रस्वभावतो घोरा शीतोष्णजनिता परा । वेदना जायते तेषा नारकाणामसातजा ॥ ७२ आचतुर्थ्या भवन्त्येते नारका हयुष्णवेदना । पञ्चम्यामुपरिष्टात्ते द्वे लक्षे चोष्णवेदने ॥ ७३ लक्षमेकमधस्ताच्च तस्याः शीतकवेदना । षष्ठया चैव तथा पञ्च सप्तम्या शीतवेदना ॥७४ असंजिनश्च ये तावज्जीवा. पञ्चेन्द्रिया मृताः। यान्ति ते नरकेऽधस्तात्प्रथमे न परेष्वमी ॥७५ चतुर्थी पृथ्वीमे-पकप्रभामे नीललेश्या है, पाचवी धूमप्रमाके उपरके भागमे नीललेश्या है और अधोभागमे कृष्णलेश्या है । छठे नरकमे कृष्णलेश्या है और सातवे भागमे कृष्णकृष्णलेश्या है । इस प्रकार नरकपृथिवीओमे लेश्याओका क्रम है । क्षेत्रस्वभावसे वे अतिशय दुःखी, हीन हैं और वे नपुसक होते हैं ।। ६७-६८॥ तीसरे नरकतक असुरोके द्वारा वे नारकी दुखित किये जाते हैं । चौथे नरकसे सातवे नरकतक वे नारको जीव दुर्भावनाओसे अन्योन्यको दुख देते है । नाना प्रकारके दुखोसे वे अन्योन्यको पीडित करते है ॥ ६९ ।। तीव्र परिणामोसे युक्त ऐसा मिथ्यादर्शन, मिथ्याज्ञान और मिथ्याचारित्रसे जीवोको दुर्गति प्राप्त होती है, अर्थात् वे जीव नरकमे नारकी होकर जन्मते है ॥ ७० ॥ उन नारकियोको नाना प्रकारको वेदना भोगनी पडती हैं । वे वेदनाये बाह्यवेदना और अभ्यन्तर वेदना ऐसी दो प्रकारकी हैं । असातावेदनीय कर्मके उदयसे उत्पन्न हुई वेदनाए, मान- सिक वेदनाये, और देहसे उत्पन्न हुई वेदनाये, क्षेत्रस्वभावसे भयकर शीत और उष्णसे उत्पन्न हुई वेदनाये ऐसे वेदनाके अनेक प्रकार हैं । वे असाता वेदनीयसे उत्पन्न होती हैं ।। ७१-७२ ।। (नरकविलोके गीतोष्णत्वका वर्णन । )- पहली पृथ्वीसे आरभ कर चौथी पृथ्वीतक जो नरकविल हैं वे उष्णवेदनाको उत्पन्न करते है । अर्थात् वहा अत्यत उष्णता है। पाचवी पृथ्वीके उपरके दो लक्ष विल उष्णवेदनाके धारक है । और पाचवी नीचले भागमे एक लाख नरकविल शीतवेदनावाले होते है अर्थात उन बिलोमे अत्यन्त शीतवेदना है। छठे नरकके एक लाख बिल और सातवी नरकके पाच विल ये शीतवेदनाके हैं ॥ ७३-७४ ।। कौन कौनसे जीव किस किस नरकमे उत्पन्न होते हैं-जो असज्ञी पचेन्द्रिय जीव हैं, १ मा होना २ मा यान्ति चेन्नरके १५२) सिद्धान्तसार. (६ ७६- द्वितीयाया मृता यान्ति सरटाः पक्षिणः पुन । तृतीयामेव गच्छन्ति चतुर्थ्यामुरसर्पकाः ॥ ७६ सिंहाश्च हस्तिनो यान्ति पञ्चम्या च तथा स्त्रियः।षष्ठयामेव प्रबध्नन्ति नारकं कर्म दुस्तरम्।।७७ मनुजेषु पुमासश्च तथा मत्स्यादयः परे । सप्तम्यां च मृता यान्ति कर्मणा नारकेन च ।। ७८ सप्तम्या निःसृता जीवा मानुषत्वं न जातुचित् । लभन्ते च भवन्त्येव तिर्यञ्चः केवलं पुनः॥७९ षष्ठीतो निर्गता जीवा जायन्तेऽनन्तरे भवे । मानुषा यदि ते नैव संयमेन विभूषिताः॥८० संयमोऽपि भवत्येव पञ्चम्या आगतस्य च । न कर्मान्तक्रिया तस्य दुखभावविभाविनः ।। ८१ चतुर्थ्या निर्गतस्यास्य निर्वृतिर्जायते क्वचित् । न जातु तीर्थकारित्वं तथा शक्तेरभावतः॥ ८२ तीर्थकारित्वमप्यस्य जीवस्य जायते ध्रुवम् । तृतीयाया द्वितीयायाः प्रथमानिर्गतस्य च ।। ८३ नरकानिर्गतानां न तस्मिन्नेव भवे भवेत् । चक्रित्वं वासुदेवत्वं बलदेवत्वमित्यपि ॥८४ आहारोऽपि भवेत्तेषामाभोगविनिवृत्तितः । उच्छ्वसन्ति च ते सर्वे भस्त्रायन्त्रमिवानिशम् ॥८५ -------- वे पहले नरकमे उत्पन्न होते है । वे दूसरे तीसरे आदि नरकभूमिमे उत्पन्न नही होते । गिरगिट नामक प्राणी मरणोत्तर दूसरे नरककी भूमिमे उत्पन्न होते है। पक्षी जीव तीसरे नरकतक उत्पन्न होते है । इसके आगे वे उत्पन्न नहीं होते । छातीसे चलनेवाले गोह आदि प्राणी चौथे नरकतक जाते है । उसके आगेके नरकमे वे उत्पन्न नहीं होते । सिंह और हाथी ये प्राणी पाचवे नरकमे उत्पन्न होते है । अर्थात् पहलेसे पाचवे नरकतक उत्पन्न होते हैं। स्त्रियाँ अर्थात् मनुष्य-स्त्रियाँ छठे नरकमे उत्पन्न होती है । अर्थात् छठी नरकभूमितकही पापसे उत्पन्न होनेकी योग्यता उनकी है । सातवे नरकमे उनका जन्म नही होता है । मनुष्योमे पुरुष तथा तिर्यंचोमे मत्स्यादिक प्राणी सातवे नरकमे उत्पन्न होते है अर्थात् प्रथम नरकसे सातवे नरकतक वे उत्पन्न होते है।।७५-७८॥ (कौनसी नरक भूमीसे निकले हुए जीव कौनसी अवस्थाको प्राप्त होते हैं? उत्तर) सातवी नरकभूमीसे निकले हुए नारकी जीव मध्यलोकमे अनतरभवमे मनुष्यपर्याय कदापि धारण नही करते है अर्थात् सातवे नरकमेसे निकले हुए जीव मध्यलोकमे केवल तिर्यंचोमेही जन्म धारण करते है । छठी पृथ्वीसे निकले हुए जीव अनतरभवमे यदि मनुष्यपर्याय धारण करे तो नियमसे, सयमभूषित नहीं होते हैं । पाचवे नरकसे निकला हुआ जीव मनुष्य होकर सयमभी धारण कर सकता है । परतु सक्लेशपरिणामोसे सस्कृत होनेसे उसको कर्मक्षय न होनेसे. मोक्ष प्राप्त नही होता है । चौथे नरकसे निकले हुए जीवको क्वचित् मोक्षप्राप्ति होती हैं । परतु तीर्थकरपना उसको प्राप्त नही होता है । क्योकि तीर्थकर होनेकी शक्ति उस जीवमे प्रगट नही होती है। जो जीव तीसरा नरंक, दूसरा नरक और पहले नरकसे निकलते हैं उनको तीर्थकरपदकी प्राप्ति होती है । नरकसे निकले हुए जीवोको उसी भवमे चक्रवर्तिपद, वासुदेवपद और बलदेवपदभी प्राप्त नही होता है । नारकियोको आहारभी होता है परतु उनको कभी तृप्ति नहीं होती हैं। और वे हमेशा भस्त्राके समान श्वासोच्छ्वास करते हैं ।। ७९-८५ ॥ A -६ ९२) सिद्धान्तसार (१५३ तप्तायोरसपानं च तप्तायस्तम्भरोहणम् । घनाभिधातन तीक्ष्णवासोक्षुरविकर्तनम् ॥ ८६ तत्रैव क्षारतलानामभिपेक सुदु सहम् । अयसः कुम्भीपाकैफभर्जन यन्त्रपीडनम् ॥ ८७ छेदन भेदन दुष्टं त्रासनं भीषण भयम् । इत्यादिबहुदुखेकहेतुभूत सुदुस्सहम् ॥ ८८ जन्तुधातभवानेफरौद्रध्यानविद्धिन । लभन्ते नारका ह्ययं दुकर्मपरिपाकतः ॥ ८९ ज्ञात्वेति भव्यजीवेन दुर्गतर्दु खमायतम् । अहिंसादिवत पूत घियते श्रीजिनोदितम् ॥ ९० संसारकानने भीमे नारकादिकुयोनिषु । सरन्नपि न विश्राम ही जीवो याति जातुचित् ॥ ९१ मुक्त्वा जनेश्वर धर्म सर्वशर्मकर परम् । जीवो दुर्गतिदु खेभ्यो घियते केन सत्सुखे ॥ ९२ नरफगतिगताना प्राणिना वृत्तमेतत् । हृदि घृतमपि दुख यज्जनाना ददाति ।। वहा नारकी आपसमें तपे हुए लोहेका रस पिलाते है, तप हुए लोहेके खभोपर चढाते हैं, घनोसे मस्तकपर खूब पीटते है । तीक्ष्ण वासी और उस्तरेमें वे शरीरोको ठीलते है, विदारण करते है । उन नरकामे वे नारकी क्षारजलोका अभिषेक ठीले हुए नारकियोके अगोपर करते है जिससे उनको अत्यत दुस्सह वेदना होती है। लोहेकी कढाईम पकाना, भुजाना और यत्रमे पेलना, छेदन करना, भेदन करना, दोपयुक्त त्रास देना, भीपण भय दीखाना ये सव कार्य अत्यन्त दुःखके मुख्य हेतुभूत हैं और अतिगय दुस्मह है ॥ ८६-८८ ॥ नारकी जीव प्राणियोक धातसे उत्पन्न हुए अनेक रौद्रव्यानोको वढानेवाले ऐसे नारकीय अनर्थीको दुष्कर्म परिपाक होनेसे-अशुभ कर्मका उदय होनेम भोगते हैं ।। ८९ ॥ नारकियोको प्राप्त हुए दुर्गतिके विस्तीर्ण दुखोको इस प्रकार जानकर भव्यजीवोंकेद्वारा श्रीजिनेश्वरने कहे हुए पवित्र अहिमादि व्रत धारण किये जाने है ।। ९० ।। अरेरे ! इस भयकर ससाररूप वनमे नारकादिक अनेक कुयोनियोमे इस जीवने स्वल्प विश्रामभी कदापि प्राप्त नही किया है ।। ९१ ।। सपूर्ण मुखको देनेवाला अर्थात् अनन्त सुखरुप मुक्तिको प्रदान करनेवाला जिनेश्वरका उत्तम धर्म छोडकर दूसरा कोनसा धर्म वैदिकादि धर्म जीवको दुर्गतिदु खोसे निकालकर उत्तम दुखरहित मुखमे स्थापन करता है ? अर्थात् जीवोको अन्यधर्म दुखरूप चतुर्गतिमे भ्रमण करानेके कारण है ॥ १२ ॥ नरकगतिमे जो प्राप्त हुए हैं, ऐसे प्राणियोका यह वृत्त हृदयमे धारण करनेपरभी लोगोको दुखित करता है। तो भी ज्ञान और चारित्रमे हीन अर्थात् अज्ञानी और स्वच्छदी पुरुष उन १ आ दुप S.S 20.

१५४) सिद्धान्तसार (६ ९३- तदपि यदि निहीना ज्ञानचारित्रहीना । न हि परिगणयन्ते हा हतास्ते हताशाः ॥ ९३ अतुलितमहिमानं वर्द्धमानं ह्यमानम् । जिनवरवरवीरं चारुचारित्रघीरम् ।। हृदयगतमनूनं यो दधात्यत्र नूनम् । नरकगतिविशेषस्तस्य नामकशेषः ॥ ९४ इति श्रीसिद्धान्तसारसडग्रहे पण्डिताचार्यश्रीनरेन्द्रसेनविरचिते नरकगतिस्वरूपप्ररूपणः षष्ठः परिच्छेदः दुखोको ध्यानमे नही लाते हैं । नरकोमे तीव्र दुख असदाचारसे भोगना पडता है इस बातका विचारही नही करते है । अहह । ऐसे हताश पुरुष नष्टही हुए ऐसा समझना चाहिये ।। ९३ ॥ जिनकी महिमा अनुपम है और जो अमान-गवरहित है अर्थात् उपलक्षणसे क्रोधादि कषाय और ज्ञानावरणादि कर्मोसे रहित हुए है, जिनका ज्ञान पूर्ण वृद्धिंगत हुआ है, जो सर्वज्ञ हुए है, जिन्होने सुदर चारित्र-यथाख्यात चारित्र धारण किया है, तथा जो धीर है-अनन्त शक्तिमान हैं, जो जिनवरमे गणधरादिकोमे वर-श्रेष्ठ है ऐसे वीरभगवानको, जोकि अनून अर्थात् महान् है, गुणोसे परिपूर्ण जो हृदयमे उनको धारण करते है उनको नरकगतिका विशेष नामसेहि शेष है अर्थात् वे नरकगतिको प्राप्त होते नही ॥ ९४ ॥ इस प्रकार पण्डिताचार्य श्रीनरेन्द्रसेनजीके रचे हुए सिद्धान्तसार सग्रहमे नरकगतिका स्वरूप कथन करनेवाला छठा अधिकार समाप्त हुवा। 7 १ आ इति श्रीसिद्धान्तसारसग्रह आचार्यश्रीनरेन्द्रसेनविरचिते पष्ठ परिच्छेद समाप्त ॥

सप्तमः परिच्छेदः अथ तिर्यडमहालोक कथयामि यथागमम् । तिर्यङमानवदेवानामानन्दकप्रदायकम् ॥ १ जम्बूद्वीपादयो द्वीपा. शुभनामान इत्यमी । लवणोदादय. सर्वे समुद्रास्तत्र विश्रुता ॥२ जम्बूद्वीपस्ततो द्वीपो घातकीखण्ड इत्यपि । पुष्कराख्यस्तृतीय स्याच्चतुर्थो वारुणीवर. ॥३ पञ्चमः क्षीरनामा च षष्ठो घृतवरो मत. । सप्तमो मुनिभिर्गीतस्तथेक्ष्वादिवरो महान् ॥ ४ नन्दीश्वरस्तथा पूतश्चाष्टमो नवम पुन । अरुणाख्य इति ख्यातस्ततोऽरुणवरो महान् ॥ ५ अरुणादिवराभासो द्वीपश्चकादशो मतः । द्वादश कुण्डलाख्यश्च कुण्डलादिवरः परः ॥६ चतुर्दशस्तदाभास. कथितो मुनिभास्करै । शङ्खस्तत' परो ज्ञेयस्तस्माच्छडखवर पर. ॥ ७ तत. शडखवराभासो रुचफस्तत्परो वर । रुचकादिवरस्तस्माद्रुचकामास इत्यपि ।। ८ भुजग. कथितो' द्वीपो भुजगादिवरस्ततः । भुजगादिवराभास. कुशः कुशवरो महान् ॥९ कुशाभासश्च विज्ञेय क्रौञ्च. क्रौञ्चवरस्ततः । स क्रौञ्चादिवराभासो नामतोऽमी निवेदिताः॥१० अत. परमसडख्याता द्वीपा सन्ति सुशोभनाः । यावदन्तिमको द्वीप. स्वयम्भूरमणाभिधः ॥११ ( सातवा अध्याय) अव मै (पडिताचार्यनरेन्द्रसेन) आगमका अनुसरण करके तिर्यंच, मनुष्य और देवोको आनन्द देनेवाले तिर्यडमहालोकका वर्णन करता हू ॥१॥ इस मध्यलोकमे जो शुभनाम हैं उनको धारण करनेवाले सर्व जम्बूद्वीपादिक प्रसिद्ध द्वीप है और शुभनाम धारण करनेवाले लवणोदादिक प्रसिद्ध समुद्र है ॥ २ ॥ (द्वीपोके नाम । )- पहला जम्बूद्वीप है तदनन्तर धातकीखण्डद्वीप है। तीसरा पुष्कर- द्वीप है। चौथा वारुणीवर द्वीप, पाचवा क्षीरवरद्वीप, छठा धृतवर द्वीप, सातवा महान्द्वीप इक्षुवर है । आठवे द्वीपका नाम नन्दीश्वर है । नौवा द्वीप अरुणनामका है । दसवा द्वीप अरुणवर है । ग्यारहवा द्वीप अरुणवराभास नामका है । वारहवा द्वीप कुण्डल नामवाला है । कुण्डलवरद्वीप तेरहवा है । मुनिओमे सूर्यसमान तेजस्वी गणधरोने चौदहवा द्वीप ऐसे कुडलवरा भास कहा है । तदनतर शख नामक द्वीप पद्रहवा है । इसके अनंतर सोलहवे द्वीपका नाम शखवर है। इसके अनतर शखवराभास, तदनन्तर रुचक, पुन रुचकवर, तदनतर वीसवा द्वीप रुचकाभास नामका है। इसके अनतर भुजगद्वीप है । फिर भुजगवरद्वीप है । तदनतर भुजगवराभास नामका द्वीप है । इसके अनतर कुशद्वीप, तदनतर महान् कुशवरद्वीप है । पुन कुशवराभासद्वीप है । पुन क्रौंचद्वीप है । तदनतर क्रोचवरद्वीप है । इसके अनतर क्रौचवराभास द्वीप है ऐसे नामोल्लेख करके अठ्ठाईस द्वीप कहे है । इन द्वीपोके अनन्तरभी सुदर ऐसे असह्यातद्वीप है। और वे अन्तिमद्वीपतक है और अन्तिमद्वीपका नाम स्वयभूरमण हैं ।। ३-११ ॥ १ आ कथ्यते १५६) सिद्धान्तसार. (७. १२- लक्षयोजनमानेन जम्बूद्वीपः प्रमाणभाक्' । लक्षद्वयप्रमाणेन लवणोदेन वेष्टित. ॥ १२ चतुर्लक्षप्रमाणोत्यघातकोखण्ड इत्यपि । लक्षाष्टकप्रमाणेन कालोदवलयान्वितः ॥ १३ ततः पोडशलक्षकविस्तारः पुष्कराभिवः । मानुषोत्तरशैलस्य वलयेन द्विघाकृतः ।। १४ पुष्कराख्यसमुद्रेण द्विगुणेनाभिवेप्टिन । द्विगुणा द्विगुणास्तस्मात्सन्त्यन्ये द्वीपसागरा. ॥ १५ वलयाकृतयः सर्वे तिर्यग्लोकव्यवस्थिता. । स्वयम्भूरमणो यावद्द्वीपञ्चान्तिमको भवेत् ॥ १६ समुद्रा अपि सर्वेऽपि वलयाकृतय. परे' । विद्यन्ते द्वीपनामानो मुक्त्वाद्यद्वितयं पुनः ॥ १७ द्रवल्लवणसंवादिरसतोयभृतौ पतौ । लवणोदस्तु कालोद. सत्यं तोयरसः स्मृतः ।। १८ पुष्कराम्बुधिरप्येवं स्वयम्भूरमणोऽपि च । उदककरसौ शेयो जिनागमनिवेदितौ ॥ १९ वारुणीवर इत्येवं यस्य नामेह विश्रुतम् । मदिरेकरसास्वादतोयसंपूरितः स च ॥ २० (जम्बूद्वीपादि द्वीपसमुद्रोका विस्तारवर्णन ।)- विस्तारसे एक लाख योजन प्रमाणको धारण करनेवाला जम्बूद्वीप, दो लाख प्रमाण युक्त लवणोद ममुद्रसे वेप्टिन है । इस लवणसमुद्रको चार लाख योजन प्रमाणको वारण करनेवाले वातकी खंडने वेप्टित किया है। इसको आठ लाख योजनका विस्तार धारण करनेवाले कालोद समुद्रने घेरा है । इस कालोदसमुद्रको घेरनेवाला द्वीप पुष्कर नामका है । वह सोलह लाख योजन विस्तारवाला है । उसके वीचमे मानुपोत्तर पर्वतका वलय है । उससे वह द्विधा हुआ है अर्थात् उसके दो भेद हुए हैं । इस पुष्करद्वीपको पुष्करवरनामक समुद्रने जोकि बत्तीस लाख योजन विस्तारका है, घेरा है। इसके अनन्तर समुद्रसे द्विगुण विस्तारवाला द्वीप और द्वीपसे दुगुने विस्तारवाला समुद्र ऐसे द्वीपसमुद्र हैं, वे सब वलायाकार हैं और तिर्यग्लोकमे विगिप्ट अवस्थासे व्यवस्थित हैं। उनका वर्णन आगममे है। इस निर्यग्लोकमे अन्तिमद्वीप स्वयंभूरमण नामवाला है । सव समुद्रभी द्वीपके समान वलयाकार है । जो समुद्र हैं वे द्वीपके नामवाले है परंतु जम्बूद्वीप और धातकीखंड ये दो द्वीप छोडकर अर्थात् जम्बूसमुद्र, धातकी समुद्र ऐसे नाम पहिले और दूसरे समुद्रके नही है पहिले समुद्रका नाम लवणोदसमुद्र है और दूसरे समुद्रका नाम कालोद है परतु उनके आगेके समुद्रोंके नाम द्वीपके नामका अनुसरण करते हैं अर्थात् पुष्करद्वीप, पुष्करसमुद्र, वारुणीवर द्वीप, वारुणीवर समुद्र, मीरद्वीप, क्षीरसमुद्र इत्याढिमे सर्वत्र द्वीपके नामही समुद्र के नाम हैं ।। १२-१७ ॥ (पहिले दो समुद्रोंके जलका स्वाद । )- द्रवीभूत नमकके नमान स्वादवाला पानी लवणसमुद्रका है । और कालोदका पानी पानीके स्वादकाही माना है। पुष्करसमुद्रभी जलस्वाद- वाला है । तथा स्वयभूरमण समुद्रका पानीभी जलस्वादवालाही है ऐसा जिनागमने कहा है ।। १८-१९ ॥ (अन्यसमुद्रके जलास्वादोंका वर्णन । )- इस मध्यलोकमे जिसका नाम वारुणीवर ऐसा प्रसिद्ध है वह केवल मदिरारसके आस्वादको धारण करनेवाले जलोसे भरा हुआ हैं । जो क्षीरो- १ आ नुवृतभाक् २ मा परा ३ नवाद -७ २६) सिद्धान्तसार (१५७ क्षीरोदकवरो यस्तु समुद्रस्तेषु विश्रुत' । खण्डसम्मिश्रसत्क्षीररसास्वादाम्बुपूरित.॥ २१ सुगन्धघृतसवादितोयसन्दोहपूरित । धृतादिकवरो वर्यः कथितो जिननायकः ॥ २२ मविक्षुरससवादिजलजातप्रपूरिताः । शेषा. सर्वेऽपि विज्ञेया. समुद्राः श्रीजिनागमात् ॥ २३ एषु द्वीपसमुद्रेषु पर्वताद्युपरि स्थिता । व्यन्तराणा समावासा विद्यन्ते विविधा पुन. ॥ २४ लवणोदे च कालोदे स्वयम्भूरमणाम्बुधौ । मत्स्यादय प्रभूता स्युर्न परेषु कदाचन ।। २५ मेरुनाभि शुभो वृत्तो मध्यस्थो हि यतो महान् । जम्बुद्वीपस्ततोऽप्येव कथयामि विशेषत ॥२६ दकवर नामक समुद्र समुद्रोमे प्रसिद्ध है वह खाण्डका मिश्रण जिसमे है ऐसे दूधके रमके आस्वादको धारण करनेवाले जलोसे भरा हुआ है ।। २०-२१ ।। श्रेष्ठ ऐसे जिननायकोने-वृषभादि तीर्थकरोने घृतवर-समुद्र सुगधित घीके समान आस्वादवाले जलसमूहोसे भरा हुआ है ऐसा कथन किया है । वाकीके समस्त समुद्र मधु और ईखके रसका स्वाद धारण करनेवाले जलसमूहोसे भरे हुए हैं ऐसा श्रीजिनेश्वरके आगमसे जानना चाहिये ॥ २२-२३ ॥ (व्यतरोके आवासस्थान ।)- इन द्वीपोमे और समुद्रोमे और विजयाद्ध, कुलपर्वत, मेरुपर्वत और इतर पर्वतोपर व्यतरोके आवासस्थान है तथा और भी व्यतरोके नाना निवास- स्थान हैं । स्पष्टीकरण-इस जम्बूद्वीपसे आगे असख्य द्वीपसमुद्रोको उल्लघकर ऊपरके खरभागमे राक्षसोको छोडकर सात व्यतरोके निवासस्थान हैं, अर्थात् किन्नर, किंपुरुष, महोरग, गधर्व, यक्ष, भूत और पिशाच ऐसे व्यतर जातियोके निवासस्थान है। राक्षसोके निवासस्थान पकवहुलभागमे हैं । तथा इस भूतलपरभी द्वीप, पर्वत, समुद्र, देश, ग्राम, नगर, त्रिक-तीन मार्ग जहासे निकलते हैं उसको त्रिक कहते हैं, चतुष्क- जहासे चार मार्ग निकलते है ऐसा स्थान, गृहका अगण, तथा विस्तृत मैदान, जलागय, उपवन, देवमदिरादिक अनेक निवासस्थान हैं, जहा व्यतरदेव रहते है। तथा गगादिक नदियोमे व्यतरदेवदेवियोके निवासस्थान है । समुद्रमे मागध, प्रभास आदिक व्यतरदेव रहते है । विजयार्घ पर्वतपर व्यतरोके निवासस्थान हैं। इस प्रकार व्यतरोके अनेक निवासस्थान हैं ॥ २४ ॥ ( तत्त्वार्थवार्तिक अ ३ रा) ( मत्स्य कौनसे समुद्रोमे है ? उत्तर)- लवणोदसमुद्र, कालोदसमुद्र और स्वयम्भूरमण समुद्र इन तीन समुद्रोमे मत्स्यादिक जलचर प्रभूत है । परतु इनको छोडकर अन्य पुष्करादि समुद्रोमे ये जलचर प्राणी कदापि उत्पन्न नहीं होते ।। २५ ।। ( जम्बूद्वीपका विशेषतासे वर्णन । )- यह जम्बूद्वीप शुभ, गोल-सूर्यमडलके समान है। असख्यात द्वीपसमुद्रोके बीचमे है । इस जम्बूद्वीपके विलकुल वीचमे मेरुपर्वत है, वह इसकी मानो नाभि है। ऐसे महान् द्वीपका मैं ( नरेन्द्रसेनाचार्य) विशेपतासे वर्णन करता हूँ ॥ २६ ॥ १ मध्यस्थोऽस्ति यो सिद्धान्तसार १५८) - (७. २७- १ तत्र सन्ति विचित्राणि सप्त क्षेत्राणि सर्वतः । भरतो हिमवर्षश्च हरिवर्षः सुशोभनः ॥ २७ विदेहो रम्यको नाम हैरण्यवतमायतम् । ऐरावतं ततः क्षेत्रं विद्यते विस्मयावहम् ।। २८ पूर्वापरायता अस्य' पर्वतास्तद्विभाजिनः । हिमवानाद्य इत्येवं महादिहिमवान्परः ॥ २९ निषधश्च तृतीयोऽसौ चतुर्थो नील इष्यते । रुक्मी च शिखरी तस्मात् षडेते मणिपार्श्वकाः॥३० हिमवान्हेमवर्णोऽसौ पीतवस्त्रनिभ. शुभः । शुक्लः सर्वोऽपि सर्वत्र द्वितीयो द्युतिमानयम् ॥ ३१ तपनीयमयस्तावत्तृतीयश्च चतुर्थकः । स वैडूर्यमयोऽभाणि मयूरग्रीवसन्निभः ॥ ३२ रजतैकमयो ज्ञेयः पञ्चमः पर्वतो महान् । षष्ठो हेममयस्तस्मात्कथ्यते कौतुकावहः ॥ ३३ तेषामुपरि विद्यन्ते सरासि हृदनामतः । पद्मो महादिपद्मश्च तिगिच्छः केसरी ततः ॥ ३४ महादिपुण्डरीकश्च पुण्डरीक इति ध्रुवाः । हृदा. सर्वेऽपि विद्यन्ते नदीना निर्गमाश्रयाः ॥ ३५ हिमवन्मस्तकस्थाच्च पद्मनाम्नो हृदानदी । गङ्गेति विश्रुता पूर्वतोरणेन प्रवर्तते ॥ ३६ - ( भस्तादिक सप्तक्षेत्रोके नाम।)- इस जम्बूद्वीपमे विचित्र आश्चर्यावह भरतादिक सात क्षेत्र सर्वत्र है । अर्थात् इन क्षेत्रोसे युक्त जम्बूद्वीपका भूदेश है । इनको छोडकर अन्य क्षेत्र नही है । इन क्षेत्रोके नाम-भरत, हिमवर्ष-हैमवतक्षेत्र, सुदर हरिवर्ष-हरिक्षेत्र, विदेहक्षेत्र, रम्यक- क्षेत्र, दीर्घ हैरण्यवतक्षेत्र, और तदनतर विस्मय उत्पन्न करनेवाला ऐरावतक्षेत्र ऐसे सात क्षेत्र है ।। २७-२८ ॥ (हिमवदादिक छह कुलपर्वत । )- इस जम्बूद्वीपके जो हिमवदादि छह पर्वत है वे भरतादिक क्षेत्रोके विभाग करनेवाले होनेसे उनको वर्षधर कहते है । अर्थात् भरतादिक वर्षको- क्षेत्रको विभक्त रखकर धारण करनेवाले ये पर्वत है । ये पर्वत पूर्वदिशासे पश्चिम दिशातक दीर्घ है। इनमे पहला पर्वत हिमवान है । दूसरा पर्वत महाहिमवान है। तीसरा पर्वत निषध, चौथा नील पर्वत है, पाचवा पर्वत रुक्मी, और छठा शिखरी पर्वत है। इन छहो पर्वतोके दोनो पसवाडे नाना मणियोसे विचित्रित है । हिमवान् पर्वत सुवर्णवर्णका है, पीले वस्त्रके समान वह दिखता है। दूसरा महाहिमवान् पर्वत है । वह सर्वत्र सपूर्ण शुक्ल है। तीसरा कान्तिमान् निषध पर्वत सुवर्णमय है । चौथा नीलपर्वत वैडूर्यमणिमोसे खचित् अर्थात् नील वर्णका है। मोरके कण्ठके समान नील रगका है । पाचवा महान् पर्वत सर्व बाजुओसे रजतमय है चांदीका है। उसको रुक्मी पर्वत ऐसा नाम है । छठा पर्वत शिखरी है , वह सुवर्णमय है और आश्चर्य उत्पन्न करनेवाला है ॥ २९-३३ ॥ (हिमवदादि पर्वतोपरके सरोवरके नाम । )- उन पर्वतोपर हृद नामके छह सरोवर है। उनके नाम पद्म, महापद्म, तिगिञ्छ, केसरी, महापुण्डरीक और पुण्डरीक ऐसे है। ये सरोवर अनादिनिधन-नित्य हैं, तथा गगादिनदियोके उत्पत्तिके आधारस्थान हैं ॥ ३४-३५ ।। (पद्मसरोवरसे निकली हुई गगानदीका वर्णन । )- हिमवत्पर्वतके मस्तकपर जो पद्म १ आ म्तमपीषत् -७ ४६) सिद्धान्तसार (१५९ १ षडयोजनसुविस्तारा' क्रोशाधिकतया पुन । अर्धक्रोशावगाहा सा निर्गमे गदिता जिने ॥३७ पूर्वेण दिग्विभागेन पर्वतोपरि गच्छति । यावच्छतानि पञ्चैव योजनाना सुशोभना ॥ ३८ गगाकूटसमीपे सा व्यावर्त्य दक्षिणेन तु । भूमिकुण्डे पतत्याशु सुविस्तीर्णे सुशोभने ॥ ३९ तस्य दक्षिणमार्गेण विनिर्गत्याभिगच्छति । भरतक्षेत्रमध्यस्थ रूप्यादि रूपसयुतम् ॥ ४० पूर्वापरमभिव्याप्य समुद्रान्त स्थितो हि स । विजयस्यार्द्धभागे यद्विजया इतीरितः ॥ ४१ पञ्चविशतिरित्येव योजनान्युदये मत । विस्तरेण तु पञ्चाशद्योजनानि जयावहः ॥ ४२ अघस्तायोजनान्यस्य दशमत्वात्सुशोभने । विभागे श्रेणय सन्ति विद्याधरसमाश्रयाः ॥ ४३ नगर्य. सन्ति पञ्चाशद्दक्षिणश्रेणिसश्रिता । उत्तरश्रेणिगा षष्टिविचित्रजनसकुला. ॥ ४४ द्वितीयदशके सन्ति विचित्राकारधारिणः । व्यन्तराणां समावासा नवकूटानि मस्तके ॥ ४५ नवमे सिद्धकूटेऽस्ति पूर्वस्या दिशि शोभने । जिनचैत्यगृह रम्यमकृत्रिममनिन्दितम् ॥ ४६ नामक हृद है, उससे गगा नामकी प्रसिद्ध नदी उसके पूर्वतोरणसे निकलती है। उग्दमस्थानमे गगानदीका विस्तार छह योजन और एक कोग अधिक अर्थात् सव्वा छह योजन प्रमाणका है। तथा वह आधा क्रोश अवगाहवाली है ऐसा जिनोने कहा है । वह सुदर नदी पर्वतपरसे पूर्वदिशाके तरफ पाचसी योजनतक वहती है । अनतर गगाकूटके समीप पहुचकर वह दक्षिण दिशाको मुडती है । और वही सुदर तथा सुविस्तीर्ण ऐसे भूमिकुण्डमे गिरती है। उसके दक्षिण मार्गसे निकलकर वह नदी भरतक्षेत्रके मध्यस्थित सुदर रूप्याद्रि पर्वतके पास आती है ॥ ३६-४० ।। (विजया पर्वतका वर्णन । )- यह विजया पर्वत समुद्रके पूर्व और पश्चिम विभागको व्याप्त कर रहा हैं अर्थात् पूर्व समुद्र और पश्चिम समुद्रमे विजयार्द्धके तट प्रविष्ट हुए हैं । इसको विजयार्द्ध नाम अन्वर्थक है । क्योकि चक्रवर्तीके विजयका आधा भाग यहा पूर्ण होता है इसलिये इसे विजयार्द्ध कहते है । यह पर्वत पच्चीस योजन ऊचा है और इसका विस्तार पचास योजनोका है। चक्रवर्तीको विजयप्राप्ति करानेवाला यह पर्वत है । जमीनसे दश योजन ऊपर जानेपर पर्वतके विभागपर विद्याधरोके आधारस्थानरूप श्रेणियाँ है। उनमे-दक्षिणश्रेणिमे पचास नगरिया है। और उत्तर श्रेणीमे नानाजनोसे व्याप्त ऐसी साठ नगरिया हैं ॥ ४१- ४४ ॥ विद्याधरश्रेणीके ऊपर पुन दशयोजन गमन करनेपर व्यन्तरदेवोके विचित्र आकृतिके धारक निवासस्थान हैं । अर्थात् जैसी दो विद्याधरश्रेणिया कही है वैसीही दश योजन विस्तारवाली और पर्वतकी जितनी लवाई है उतनी दीर्घतावाली व्यतरोकी दो श्रेणिया है। वहा सोम, यम, वरुण और वैश्रवण ऐसे इद्रके लोकपाल और आभियोग्य जातीके व्यतरदेवोके निवासस्थान हैं । इस पर्वतके ऊपर नौ कूट हैं । उनमेसे आठ कूटोपर दक्षिणार्धभरत, वृत्तमाल्यदेव आदिकोके प्रासाद है। उनमे उन उन नामोके देव रहते हैं । नौवे कूटपर सिद्धकूट नामका अकृत्रिम जिनमदिर है ।। ४४-४६ ॥ १ आ पडयोजनानि विस्तार २ आ समीपान् ३ तस्मात् ४ आ रित्येव ५ आ दश गत्वा १६०) सिद्धान्तसार (७ ४७- तमिस्रायां' विशालायां मार्गानिर्गत्य' गच्छति । आर्यखण्डमभिव्याप्य किञ्चित्पूर्वपयोनिषौ ॥४७ चतुर्दशसहस्रः सा नदीनां परिवारिता । प्रवेशे विस्तृता सार्घ द्विषष्टिर्योजनानि च ॥४८ विस्तरेणावगाहेन परिवारप्रदेशिताः । गडगावसिन्धुरप्यस्ति भारतेऽत्र महानदी ॥ ४९ आरोपितमहाचापसमाकार सुविस्तरम् । नदीभ्या विजयार्द्धन षट्खण्ड भारतं भवेत् ॥ ५० विस्तारेण तदेव स्याद्योजनाना शतानि च । पञ्चैव हि षड्विंशत्या सहितानि कलाश्च षट् ॥५१ पद्मनामहृदः पूतो दीर्घेणैकसहस्रकम् । योजनानां तदर्घ स्याद्विस्तरेणेति विस्तृतः ॥ ५२ तच्छीदेवी निवासैकस्थानं तन्मध्यगं महत् । सत्पद्म विद्यते चारु चारुतारदलाकुलम् ॥५३ --- इस पर्वतमे दो गुहाये है उनके नाम तमिस्रागुहा और खडप्रपातागुहा । विशाल तमिस्रागुहामेसे जो गगानदीको मार्ग मिला उससे वह निकलकर आर्यखडमे आई और उसे कुछ व्याप्त करके पूर्व समुद्रमे उसने प्रवेश किया। चौदह हजार परिवारनदियोंसे मिलकर उसने जहा प्रवेश किया है, उस स्थानमे वह साडेबासठ योजनप्रमाण विस्तृत हुई है ॥ ४७-४८ ॥ जैसा गगा नदीका अवगाह और विस्तार है तथा जितनी परिवारनदियाँ उसको मिली है, वैसाही अवगाह और विस्तार सिंधुनदीका है तथा उतनीही परिवार नदिया सिंधुको मिली हैं। वह सिंधुनदीभी इस भारतमे आर्यखडमे आकर पश्चिम समुद्रमे प्रविष्ट हुई है ॥ ४९ ॥ (भरतक्षेत्रका सक्षेपसे विवरण।)- यह भरतक्षेत्र सज्य किये हुए महाधनुष्यके समान आकृतिको धारण करनेवाला है और उत्तम विस्तारवाला है । दो नदियोसे (गंगा और सिंधु)तथा विजयार्द्ध-पर्वतसे इस भरतके छह विभाग हुए हैं । स्पष्टीकरण- भरतक्षेत्रके बिलकुल मध्यमे विजया पर्वत पूर्वसे पश्चिम दिशातक सीधा दीवारके समान खडा हुआ है। इससे भरतके दक्षिण भरत और उत्तर भरत ऐसे दो विभाग हुए है । तथा गगानदी और सिन्धु नदी ये दो नदिया उत्तर भरत और दक्षिण भरतके बीचमेसे बहती हुई लवणसमुद्रको जाकर मिली है, इससे उत्तर भरतके तीन विभाग और दक्षिण भरतके तीन विभाग होनेसे भरतक्षेत्र षट्खण्ड युक्त हुआ है ॥ ५० ॥ यह भरतक्षेत्र विस्तारसे पाचसौ छब्बीस योजन और छह कला प्रमाण है । अर्थात् एक योजनके उन्नीस भागोमेसे छह भाग लेना चाहिये ।इतना भरतखण्डका विस्तार है ।। ५१ ॥ (पद्महृदका और हिमवान् पर्वतका वर्णन ।)- हिमवान् पर्वतपर पद्मनामका अनादि निधन और पवित्र सरोवर है। वह एक हजार योजनप्रमाण लबा है। तथा पाचसौ योजनप्रमाण चौडा है । इस प्रकार उसका विस्तार कहा है । यह सरोवर श्रीदेवीका मुख्य निवासस्थान है। इस सरोवरके बिलकुल बीचमे प्रशस्त और [सुदर पद्मनामक महाकमल है वह सुदर और प्रकाशमान दलोसे पूर्ण है ।। ५२-५३ ॥ १ आ तिमिस्त्राया २ आ गगा ३ आ प्रदेशत ४ आ णाति ५ दलसकुलम् -७६०) सिद्धान्तसार- (२१६१ हिमवानुदयेऽभाणि योजनानां शतं पुनः । सहस्रसद्विपञ्चाशत्कला द्वादश विस्तरात् ॥५४ हिमवन्मस्तकस्थानपनादिकहृदात्पुन । रोहितास्या नदी रम्या नि.सरत्युत्तरेण सा ॥ ५५ योजनार्धन सन्त्यज्य नाभिपर्वतमुत्तमम् । तमघदक्षिण कृत्वा पश्चिम याति वारिषिम् ॥५६ गंगासिन्धुनदीसक्तस्वरूपाद्विगुणा श्रिता' । स्वरूपेण स्वरूप कि वर्ण्यतेऽस्या कवीश्वरः ॥५७ महाहिमवत. साधुमस्तकस्थात्सुशोभनात् । महापग्रहृदाद्रोहिनदी निर्गत्य गच्छति ॥ ५८ नाभिदक्षिणतो मुत्त्ववा पर्वत योजनार्द्धतः। रोहितास्यास्वरूपा च पूर्वस्या याति वारिधौ ॥५९ पद्मादिकहुदात्सोऽय महापग्रहृदो महान् । हीदेवता निवासोऽय द्विगुणोऽभाणि सूरिभिः॥६० - . , हिमवान् पर्वतका उदय अर्थात् ऊचाई सौ योजनोकी कही है । और उसका विस्तार एक हजार बावन योजन और एक योजनके उन्नीस भागोमेसे बारह भाग अर्थात् बारह कला इतना है ।। ५४॥ हिमवत्पर्वतके मस्तकपर जो पद्मसरोवर है, उसके उत्तरतोरणद्वारसे रोहितास्यानामक रमणीय महानदी निकली है ।। ५५ ।। वह नदी उत्तम नाभिपर्वतसे आधा योजनप्रमाण दूर रहकर तथा उसको दूरसे आधी प्रदक्षिणा देकर पश्चिम समुद्रमे प्रविष्ट हुई है ।। ५६ ॥ गगानदी और सिंधु नदीके जो स्वरूप है उससे इसका विस्तार दुगुना है, अर्थात् साडेबारह योजन विस्तार इस नदीका है । एक योजनप्रमाण इसकी धाराकी मोटाई है । इस नदीका अवगाह उत्पत्ति स्थानमे एक कोसका है और प्रवेशस्थानपर अवगाह ढाई योजनका है । उत्पत्तिस्थानमे इसकी चौडाई साडेबारह योजनोकी है और मुखमे सवासौ.योजन विस्तार है। इत्यादि स्वरूप गगानदीके स्वरूपसे द्विगुण है। गगानदीके स्वरूपसे इसका स्वरूप कवीश्वरोके द्वारा क्या कहा जावेगा? ॥ ५७ ॥ ( महाहिमवान और महापद्मसरोवरका वर्णन । )- महाहिमवत्पर्वतके सुदर और पवित्र मस्तकपर जो महापद्मसरोवर है उससे रोहित् नामक नदी निकलकर नाभिपर्वतके समीप जाती है । उसको आधा योजनके फासलेपर प्रदक्षिणा देकर उसे छोडकर आगे बहती है और पूर्व दिशामे समुद्रमे प्रवेश करती है । इसका स्वरूप, अवगाह, विस्तार सबकुछ रोहितास्या नदीके समान है ॥ ५८-५९ ॥ महापद्महृद पद्मसरोवरसे बडा है अर्थात् उसकी लबाई, विस्तार, अवगाह दुगुने है। इस महापद्मसरोवरमे महापद्मनामक कमलके बीचमे सुदर प्रासादमे ही देवीका निवासस्थान है । वह पद्म कमलस्थित प्रासादसे द्विगुणप्रमाणका है ऐसा आचार्योंने कहा है ।। ६० ॥ - . .. -- १ आ मता, S.S 21 '१६२) सिद्धान्तसार (७.६१- । हिमवत्पर्वतात्प्रोक्तो महादिहिमवान्' शुभः। द्विगुणोत्सेघसंयुक्तो विशुद्धतरदर्शनः ॥ ६१. सहस्राणि तु चत्वारि योजनानां शतद्वयम् । दशाधिकश्च विस्तारो महाहिमवतो मतः ॥ ६२ तयोर्मध्येऽतिविस्तीर्ण क्षेत्रं हैमवत महत् । तन्मध्ये नाभिपूर्वत्वान्नाभिपूर्वोऽस्ति पर्वतः ।। ६३ योजनानां हि तत्क्षेत्रं सहस्रद्वयमायतम् । शतं च पञ्चभिर्युक्तं कलाः पञ्च तथा पुनः ॥ ६४ जघन्या भोगभूमिस्तत्कल्पवृक्षसमन्वितम् । पल्योपमायुषस्तत्र क्रोशकोत्सेधमानवाः ॥ ६५ हरिकान्ता नदी तस्मान्महापग्रहदात्पुनः । उत्तरेण विनिर्गत्य नाभि मुक्त्वार्द्धयोजनम् ॥ ६६ रोहिनद्याः स्वरूपेण द्विगुणा समृदायतः । अनेकाश्चर्यसंयुक्ता पश्चिमं याति वारिधिम् ।। ६७ निषधस्थमहागाधतिगिञ्छहृदनिर्गता । हरिनामनदी याति पूर्ववत्पूर्ववारिधिम् ।। ६८ महापद्महदात्सोऽपि तिगिञ्छो द्विगुणो मतः । धृतिदेवीनिवासश्च पुण्डरीकसमन्वितः ॥ ६९ - - - ( हैमवत जघन्यभोगभूमिका वर्णन । )- हिमवत्पर्वतसे शुभ और विशुद्धतर-अतिशय शुभ्र वर्णका धारक महाहिमवान् पर्वत द्विगुण ऊचाईवाला है । अर्थात् दोसी योजनप्रमाण ऊंचा है। इस पर्वतका विस्तार चार हजार दोसौ दस योजनप्रमाण है । हिमवान् और महाहिमवान् इन दो पर्वतोके बीचमे महान् हैमवतक्षेत्र है वह अतिविस्तीर्ण है । इस क्षेत्रकी मानो नाभि ऐसा नाभि पर्वत ठीक बीचमे है । हैमवतक्षेत्र दो हजार एकसौ पाच योजन और पाच कलायुक्त है । यह हैमवतक्षेत्र जघन्य भोगभूमि है । इसमे दग प्रकारके कल्पवृक्ष हैं । उनसे यहाँके भोगभूमि- जोंकी इच्छाये पूर्ण होती हैं । यहाके भोगभूमिजोकी आयु एक पल्यकी कही है। उनकी ऊचाई एक कोसकी है। क्षेत्रकी दीर्घता दो हजार एकसौ पाच-योजनप्रमाणकी है । तथा पाच- कला अधिक है ।। ६१-६५ ।। ( हरिकान्ता नदीका वर्णन । )- उस महापद्मसरोवरसे हरिकान्ता नामक नदी उत्तर तोरणद्वारसे निकलती है। नाभिपर्वतको अर्धयोजन अन्तरसे छोडकर अनेक आश्चर्योसे युक्त होती हुई पश्चिम समुद्रको जाकर मिलती है । यह हरिकान्ता नदी रोहिनदीके समान है अर्थात् दीर्घता, अवगाह, परिवार नदियोकी संख्या आदिक वाते रोहित नदीके समान है ।। ६६-६७ ॥ ( निषधपर्वत, तिगिञ्छ सरोवर और हरिन्नदीका वर्णन । )- निषधपर्वतके महान् और. अगाध ऐसे तिगिञ्छ सरोवरसे निकली हुई हरित् नामकी नदी पूर्वनदीके समान अर्थात् हरिकान्ता नदीके समान पूर्वसमुद्रमे जाकर प्रवेश करती है ।। ६८ ।। महापद्म- सरोवरसे वह तिगिञ्छ सरोवरभी द्विगुण है अर्थात् चार हजार योजन दीर्घ और दो हजार योजन चौडा तथा चालीस योजन अवगाहवाला है। इस सरोवरके मध्यभागमे जो कर्मल है, उसके महलमे धृति देवीका निवास है । इसके आसमन्तात् अनेक कमल परिवार है ।। ६९ ॥ ३ १ मा हिमवच्छुभ 1 २ मा मतम् ३ मा अर्वयोजने -७ ७८) सिद्धान्तसार (१६३ निषधोऽप्युदयेऽभाणि योजनाना चतु-शती । विस्तरे तु सहस्राणि षोडशाष्टशतानि च ।। ७० चत्वारिंशच्च विज्ञेया द्वयधिका च फलाद्वयम् । पूर्वापरसमुद्रान्त यावद्दीभ्रुण सुस्थित ॥७१ युग्मम् तस्य दक्षिणतः पूतो हरिवर्ष इतीरितः । मध्यमा भोगभूमिश्च कल्पवृक्षसमाकुला ॥ ७२ पल्योपमहय तत्र जीवन्ति युगलानि च । द्विक्रोशोत्सेधयुक्तानि भोगयुक्तानि नित्यश. ॥ ७३ निषधस्थहदात्पूतादुत्तरेण विनिर्गता। सीतोदेति नदी याति मध्ये देवकुरो. कियत् ।। ७४ गजदन्त विभिद्यैषा मुक्त्वा मेरुप्रदक्षिणा। सहस्रार्जुन विस्तीर्णा पश्चिम याति वारिधि ॥ ७५ विदेहो भण्यते मध्ये नीलस्य निषधस्य च । यतो देह विमुञ्चन्ति तीर्थेशा यत्र सर्वदा ॥७६ नाभिभूतोऽस्य विख्यात. सुवर्णाद्रिः सुशोभन । उत्सेधेन सहस्राणा नवतिश्च नवाधिका ॥ ७७ अवगाह. सहस्र स्यादादी भूमिगत 'पुन. । योजनानां सहस्राणि दश वृत्तो विराजते ॥ ७८ निपथ पर्वतकी उच्चता चारसी योजन है । और उसकी चौडाई सोलह हजार आठसौ वियालीस योजन और दो कला है । यह पर्वत पूर्वसमुद्र और पश्चिमसमुद्रको अपनी दीर्घतासे स्पर्श करता है ।। ७०-७१ ॥ ( हरिवर्प क्षेत्रका वर्णन । )- इस निषध पर्वतके दक्षिणमे हरिवर्ष नामक पवित्र क्षेत्र है। इसमे शाश्वत मध्यभोगभूमि है । इसमे दश प्रकारके कल्पवृक्ष हैं। यहा के भोगभूमिज मनुष्य और पशुओकी आयु दो पल्योपम हैं। ये सब भोगभूमिज युगलरूपसे जन्म लेते है। इन युगलोकी शरीरकी ऊचाई दो कोसकी होती है। हमेशा उनको कल्पवृक्षसे नाना भोगोकी प्राप्ति होती है ।। ७२-७३ ।। (सीतोदानदी वर्णन । )- पवित्र निषध पर्वतके हृदयसे अर्थात् तिगिञ्छ सरोवरके उत्तर तोरणद्वारसे सीतोदा नामक नदी निकली है । वह देवकुरुभोगभूमिके मध्यप्रातमे कुछ प्रवेश कर गजदन्त पर्वतको भेदकर मेरुका स्पर्श न करती हुई उसको प्रदक्षिणा देकर मुखमे पाचसौ योजन विस्तीर्ण होकर पश्चिम समुद्रको प्राप्त होती है ।। ७४-७५ ।। ( विदेह क्षेत्रमे सीता और सीतोदा नदी तथा मेदिक पर्वत और विदेहके देशोका सविस्तर वर्णन 1 )- नील और निपच पर्वतोंके वीचमे विदेह क्षेत्र है। इसमे हमेशा तीर्थकर देहका त्याग करके मुक्त होते हैं, इसलिये इस देशको जिनेश्वर विदेह कहते हैं ॥ ७६ ॥ इस विदेह क्षेत्रकी मानो नाभि ऐमा सुदर और प्रसिद्ध मेरु पर्वत है । वह.सुवर्णमय है। उसकी ऊचाई निन्यानवे हजार योजन प्रमाणकी है। इस मेरुका अवगाह अर्थात् नीव जमीनमे एक हजार योजनकी है। तथा इसका जमीनपर विस्तार दस हजार योजनका है। यह सामान्य कथन है। स्पष्टीकरण-तत्त्वार्थवार्तिकमे मेरुका जमीनपरका विस्तार सूक्ष्मतासे इस प्रकार कहा है- 'दश -- १ आ सुहृदात् २ आ योजनान ३ आ भूमितले १६४) सिद्धान्तसारः (७.७९- एकादशसहस्राणि उपर्युपरि हीयते । यावत्सहस्रमेकं स्यान्मस्तकाविस्तृतो महान् ।। ७९ . देवसम्भवनानेकविचित्राश्चर्यसङकुलः । तथा कृत्रिमसच्चैत्यगृहाणामालयोऽपि च ॥ ८० तस्योत्तरविभागे च दक्षिणे च सुशोभनम् । गजदन्तसमाकारं पर्वतानां चतुष्टयम् ।। ८१ नीले च निषधे लग्नमग्रभागेन चायतम् । तिष्ठत्यकृतजैनेन्द्र चतुश्चैत्यालयान्वितम् ॥ ८२ तेषां द्वयोर्द्वयोर्मध्ये मेरोरुत्तरदक्षिणे । उत्कृष्टभोगभूसंज्ञमस्ति क्षेत्रद्वयं महत् ॥ ८३ . उत्तरादिकुरुमरोरुत्तरं कथ्यते जिनः । दक्षिणं देवकुर्वाख्यं कल्पवृक्षसमन्वितम् ॥ ८४ उत्तरादिकुरोर्मध्ये मेरोरीशानदिक्पथे । सीतानीलान्तरे रम्ये जम्बूवृक्षोऽस्त्यकृत्रिमः ॥ ८५ . हजार नव्वे योजन और एक योजनके ग्यारह भाग कर उनमेसे दस भाग ग्रहण करना चाहिये।" मा ७७-७८ ॥ -- यह मेरु पर्वत दीवारके समान नही है । इसके ग्यारह हजार ऊचीपर जानेसे इसका एक हजार योजनका विस्तार घटता है । घटते घटते मस्तकपर मेरुपर्वत एक हजार योजनका रह जाता है । इस मेरुके ऊपर देवोके निवासस्थान आदि अनेक आश्चर्योके स्थान है। अर्थात् यह अनेक आश्चर्यजनक वस्तुओसे भरा हुआ है । तथा यह पर्वत अकृत्रिम सुदर जिनमदिरोका स्थान है । अर्थात् सौमनस, भद्रशाल, नदन और पाण्डुवनमें, प्रत्येकमे चार चार अकृत्रिम जिन- मदिर है ।। ७९-८० ॥ इस मेरुके उत्तर विभागसे और दक्षिण विभागसे सुदर चार गजदन्त पर्वत हैं, जो हाथीके दातके आकार सदृश दिखते हैं । इसलिये 'गजदन्त' ऐसा उनका अन्वर्थ नाम है ।।८१॥ इन गजदन्त पर्वतोके अग्रभाग नील और निषध पर्वतोको स्पर्श करते हैं। तथा इन गजदन्त पर्वतोपर चार अकृत्रिम जिनमदिर हैं । अर्थात् प्रत्येक गजदन्तपर एक एक अकृत्रिम जिनमंदिर है ॥ ८२ ।। मेरुपर्वतकी उत्तर दिशामे दो गजदन्त पर्वत हैं, और मेरुकी दक्षिणमें दो गजदन्त 'पर्वत हैं ।।इन दो दो गजदन्त पर्वतोके बीचमे अर्थात् मेरुके उत्तरमे और दक्षिणमे उत्कृष्ट भोग- भूमि नामक दो बडे क्षेत्र हैं। उनमेसे जो क्षेत्र मेरुकी उत्तरदिशामे है उसको जिनोने उत्तरकुरु उत्तम भोगभूमि कहा है । और मेरुकी दक्षिण दिशामे जो है, उसे देवकुरु उत्तम भोगभूमि कहा है । ये दोनो भोगभूमियाँ दस प्रकारके कल्पवृक्षोंसे सम्पन्न है ।। ८३-८४ ।। मेरुपर्वतकी ऐशानदिशामे उत्तर कुरुक्षेत्रमें सीतानदी और नीलपर्वतके सुदर मध्यप्रदेशमे अकृत्रिम जम्बूवृक्ष है ॥ ८५ ।। - - . १ आ एकादशाशहान्या .

-७. ९६) सिद्धान्तसार (१६५ सीतोभयतटे रम्ये पर्वतद्वितय मतम् । युग्मफारव्यमिति ख्यातं प्रख्यात मुनिपुङ्गवः ॥ ८६ तस्माच्च युग्मकद्वन्द्वाद्दक्षिणे' कियदन्तरम् । सीतायाश्च नदीमध्ये पद्मादिहृदपञ्चकम् ॥ ८७ सान्तरं विद्यते येषां पार्श्वयोरुभयो पुन. । प्रत्येक पर्वतानां च दशक दशक मतम् ॥ ८८ सौवर्णाश्चारुसंस्थाना जिनालयविमण्डिताः। ते सर्वे प्राणिनां मन्ये पुण्यपुजा इव स्थिता ॥८९ मेरोदक्षिणभागे च तथा सर्वविचक्षणः । शाल्मलीवृक्षसंयुक्त ज्ञातव्य नान्यथा क्वचित् ॥ ९० एकादशसहस्राणि शतानामण्टक पुन' । चत्वारिंशद्वयोपेता योजनाना कलाद्वयम् ॥ ९१ उत्तरादिकुरोश्चैष विस्तारः कथितो जिन. । विस्तारो विस्तृतज्ञानस्तथा देवकुरोरपि ॥ ९२ सुमेरो पूर्वदिग्भागे श्रीभद्रसालसदनम् । द्वाविंशतिसहस्राणि विष्कम्भं चारुवेदिकम् ॥ ९३ तत्र या वेदिका तस्यः पूर्व कच्छाभिघ मतम् । सीतोत्तरतटे क्षेत्रं क्षेमानामपुरीयुतम् ॥ ९४ ततो वक्षारनामास्ति पर्वतोऽत पर महत् । सुफच्छा क्षेत्रमध्ये च चारुक्षेमपुरीयुतम् ॥ ९५ विभङ्गाख्या तत सिन्धुस्तस्या पूर्व सुपुष्कलम्। महाफच्छाभिध क्षेत्रमरिष्टाख्यपुरी' युतम्॥९६ - ( युग्मकपर्वत तथा मौ सुवर्णपर्वत।)- सीताके दो तटोपर 'युग्मक' नामसे प्रसिद्ध और मुनियोद्वारा वर्णन किये हुए दो पर्वत है जिनको यमकपर्वतभी कहते है। उन दो युग्मक पर्वतोके दक्षिणदिशामे कुछ अन्तर चले जानेसे सीतानदीके मध्यमे पद्मादिक पाच हृद हैं, जो कि अन्तरसहित हैं ।। ८६-८७ ।।। प्रत्येक सरोवरके दोनो तटपर दश दश पर्वत है। वे सुवर्णके है और उनकी आकृति सुदर हैं । तथा वे जिनालयोमे भूषित है। मानो वे सर्व पर्वत प्राणियोंके पुण्यपुज हैं ऐसा मैं ( नरेन्द्रमेनाचार्य ) समझता हू ।। ८८-८९ ।। मेरुके दक्षिणभागमे देवकुरुक्षेत्रमे शाल्मलिवृक्षसयुक्त भूप्रदेश है ऐसा सर्व विद्वान जानें। जैनागममे कहाभी अन्यथा प्रतिपादन नही है ॥ ९० ॥ ( उत्तरकुरू और देवकुरुका विस्तार । )- विस्तृतज्ञानी जिनेश्वरोने उत्तरकुरु भोगभूमिका विस्तार ग्यारह हजार आठसो बियालीस योजन और दो कला कहा है। इतनाही विस्तार देवकुरुकाभी कहा है ।। ९१-९२ ॥ (भद्रसालवन और कच्छादि देश तया वक्षार पर्वत वर्णन।)-सुमेरुपर्वतकी पूर्व दिशाके विभागमे शोभायुक्त प्रशस्त भद्रशाल वन है। वह बावीस हजार योजनप्रमाण विस्तारवाला तथा सुदर वेदिकावाला है। उसकी वेदिकाकी पूर्व दिशामे कच्छ नामक देश है। वह सीतानदीके उत्तर तटपर है। उसमे क्षेमापुरी नामक नगरी ( राजधानीका स्थान ) है ।। ९३-९४ ।। २ तदनन्तर वक्षार नामका महान् पर्वत है। इसके अनन्तर महान् सुकच्छ नामक देश है। उसमे क्षेमपुरी नामक सुदर राजधानी है ।। ९५ ॥ ३ इसके अनन्तर विभगा नामकी नदी है। उसकी पूर्व दिशामें विस्तृत महाकच्छ नामक देश है। और उसकी राजधानी वरिण्टा नामकी नगरी है ।। ९६ ।। - ३ आ रिप्टादिनगरी. १ आ सत्पर्वतद्वन्द्वात् २ आ तेषा १६६) सिद्धान्तसार (७. ९७- ततो वक्षारनामास्ति पर्वतोऽतः परं महत् । क्षेत्रं कच्छावती नाम गरिष्ठादिपुरीयुतम् ॥ ९७ विभङ्गाल्या तत' सिन्धुस्तस्याः पूर्व मुपुष्कलम् । आवर्ताख्यं महाक्षेत्रं खड्गनामपुरीयुतम् ॥९८ ततो वक्षारनामास्ति पर्वतोऽतः परं महत् । लाङ्गलावर्तकं क्षेत्र मापूपानगरीयुतम् ॥ ९९ विभङ्गाल्या तत. सिन्धुस्तस्याः पूर्व मुपुष्कलम् । पुष्कलानाम तत्क्षेत्र वृषभानगरीयुतम् ॥१०० ततो वक्षारनामास्ति पर्वतोऽतः परं महत् । पुष्कलादिवतीक्षेत्रं यत्पुरी पुण्डरीकिणी ।। १०१ ततः पूर्वसमुद्रस्य समीपतरवति यत् । देवारण्यं च विस्तीर्णा वेदिका विद्यते परा ॥ १०२] सीतादक्षिणतो भान्ति क्षेत्राणि विविधानि च ।नगराण्यपि तेषां हि विभागः कथ्यतेऽधुना ॥१०३ देवारण्याश्रिता या तु विद्यते वेदिका स्तुता तस्याः पश्चिमतःक्षेत्रं वत्सानाम सुशोभनम् ।।१०४ सुसीमानगरीयुक्तं विचित्राश्चर्यकारकम् । प्राणिनां बहुपुण्येन निर्मितं वा विभाति यत् ॥१०५ ४ तदनंतर पुन. वक्षार पर्वत है। इसके आगे महान् क्षेत्र कच्छावती नामका है और उसमें गरिफा नामक नगरी है ।। ९७ ॥ ५ तदनंदर विभंगा नामक सिन्धु नदी है। तथा उसके पूर्वमे विस्तृत आवर्त नामक महादेग है और उनमें 'खड्गा' नामक नगरी (राजधानी) है ॥ ९८ ।। ६ पुन. वक्षार पर्वत है और उसके अनन्तर लांगलावर्त नामक क्षेत्र-देश है उसके राजवानीका नाम मापूपा है ।। ९९ ॥ ७ तदनंतर विभगा नामकी नदी है और उसके पूर्व दिग्भागमे सुविस्तृत आवर्तक नामक महाक्षेत्र देश है और उसकी राजधानीका नाम वृषभानगरी ऐसा है ॥ १०० ॥ ८ पुन. वभार पर्वत है और इसके अनंतर महान् पुष्कलावती नामक क्षेत्र है और उसमे पुण्डरीकिणी नामक नगरी है ॥ १० ॥ ( देवारण्य और उसकी वैदिका)- इसके अनंतर पूर्वममुद्रके अधिक समीप देवारण्य नामक वन है और उसकी सुदर वेदिका है अर्थात् वह वन उत्तम वेदिकाले सुशोभित है ।।१०।। सीता नदीके दक्षिण तटपर अनेक क्षेत्र और उनकी नगरियाँ (राजधानी) नोभायमान है । अब उनका विभाग हम कहते हैं ॥ १०३ ।। देवारण्यके आश्रयसै जो उत्तम वेदी है उसकी पश्चिम दिशामें वत्सा नामक गोमायुक्त क्षेत्र-देन है। उसकी राजधानी मुसीमा नामक नगरी है ॥ १०४ ।। १ यह क्षेत्र नाना प्रकारके आश्चर्याने भरा हुआ है। जो मानो प्राणियोंके विपुल पुण्योंने उत्पन्न किया हुमासा गोमता है ।। १०५ ।। WF १ आ. मयूषा २ वा. पुष्पलानामसक्षेत्र ३ मा वतिन. ४ आ. देवारण्यस्य '५ आ यानि ६ आ शुभा -७. ११५) सिद्धान्तसार (१६७ ततो वक्षारनामास्ति पर्वतोऽतः पर महत् । सुवत्सा नाम सत्क्षेत्र कुण्डलापूःसमन्वितम् ॥१०६ विभङ्गाख्या तत सिन्धुस्तस्याः पश्चिमतः परम् । महावत्साभिध क्षेत्रं यत्पूरस्त्यपराजिता ॥१०७ ततो वक्षारनामास्ति पर्वतोऽत. पर महत् । प्रभाकरीपुरीयुक्तं सत्क्षेत्र वत्सफावती ॥ १०८ विभङ्गाख्या तत. सिन्धुस्तस्या पश्चिमत परम् । रम्यानामधर क्षेत्र पुरी पङ्कावती' परा॥१०९ ततो वक्षारनामास्ति पर्वतोऽत पर महत् । रम्यकानामसत्क्षेत्रं पद्माख्यपुरसयुतम् ।। ११० विभङ्गाख्या तत सिन्धुस्तस्या पश्चिमत. परम् । अस्ति रम्यामहाक्षेत्र शुभानामपुरीयुतम् ॥१११ ततो वक्षारनामास्ति पर्वतोऽत पर महत् । मङ्गलादिवती क्षेत्र यत्पुर रत्नसञ्चयम् ॥ ११२ क्षेत्राणि षोडशतानि मेरो पूर्वगतानि च । तावन्त्यस्तेषु विद्यन्ते नगर्योऽप्यतिसुन्दरा. ॥ ११३ द्वाविंशतिशतान्येषा सम द्वादशभि पुन. । सर्वेषा विस्तर. किञ्चिदधिक. कथ्यते जिनः ॥ ११४ शताना नवक तावद्द्वाविंशतिसमन्वितम् । सहस्र द्वे च विस्तारो देवारण्यस्य कथ्यते ॥ ११५ । २ उसके अनतर वक्षार नामक पर्वत है और इसके अनतर महान् सुवत्सा नामक उत्तम क्षेत्र है। उसकी राजधानी कुण्डला नामक नगरी है ॥ १०६ ।। ३ विभगा नामक नदीकी पश्चिम दिशामे महावत्सा नामक विगालदेश है । इस देशको राजधानी अपराजिता नामक नगरी है ।। १०७ ॥ ४ तदनतर वक्षार नामक पर्वत है और इसके अनतर वत्सकावती नामक देश है, जो कि प्रभाकारीनामक राजधानीमे युक्त है ।। १०८॥ ५ तदनतर विभगा नामक सिन्धु नदी है। उसकी पश्चिम दिशामे रम्या नामक क्षेत्र है। उसमे पकावती नामक उत्तम राजधानीका नगर है ॥ १०९॥ ६ इमके अनतर वक्षार पर्वत है । और उसके आगे रम्यका नामक उत्तम क्षेत्र है', जो कि पद्मपुरमे युक्त है ॥ ११० ॥ ७ इसके अनतर विभगा नदीकी पश्चिम दिशामे रम्या नामक महाक्षेत्रमे शुभा नामक नगरी है ।। १११॥ ८ इसके अनतर फिर वक्षार पर्वत है और उसके अनतर मगलावती नामक सुदर देश है। उसमे रत्नसचय नामक सुदर राजधानीका नगर है ।। ११२ ॥ ये सोलह क्षेत्र अर्थात् देश मेरूके पूर्वदिशामे हैं । और इन सोलह देशोमे , अतिशय सुदर सोलह राजधानीके नगर हैं ।। ११३ ।। ये जो सोलह देश कहे है, उनका विस्तार बावीससी वारा योजनोसे किञ्चित् अधिक है, ऐसा जिनेश्वरोने कहा है ॥ ११४ ।। देवारण्यका विस्तार दो हजार नौसी बावीस योजन है, ऐसा जिनेश्वरोने कहा है।।११५॥ - १ आ पुर्यपहावती १६८) सिद्धान्तसार (७. ११६- १ इति पूर्वविदेहोऽसौ मेरो पूर्वविभावितः।-पश्चिमेन तथैव स्याद्विदेहः पश्चिमाभिधः ॥ ११६ नामान्येव विभिद्यन्ते तत्र नान्यत्कियत्पुनः । क्षेत्राणां च पुरीणां च तान्यतो निगदाम्यहम् ॥ ११७ सीतोदा दक्षिणे' पद्मा सुपद्मा च तथा पुनः। महापद्मा ततोऽपि स्यात्सत्क्षेत्रं पद्मकावती॥११८ संख्या च नलिना तस्मात्कुमुदा सरिता सह । इत्येवं क्षेत्रनामानि ज्ञातव्यानि मनीषिभिः॥११९ अश्वादिकापुरी सिंहपुरी चापि महापुरी। विजयारजा च विरजाऽशोका वीतादशोकिका॥१२० नगर्यः क्षेत्रमध्यस्थाः सुविस्तीर्णाः सुशोभनाः । निषधस्योत्तरे भागे विद्यन्ते क्षेत्रमध्यगाः॥१२१ भूतारण्यवन देवारण्यवद्विस्तृतं मतम् । तस्य या वेदिका तस्याः पूर्वतः क्षेत्रमुत्तमम् ।। १२२ सीतोदायास्तटे रम्ये नीलपर्वतदक्षिणे । वप्रानाममहाक्षेत्रं विजयानगरान्वितम् ॥१२३ सुवप्राथ महावप्रासत्क्षेत्रं वप्रकावती । गधिकारे च सुगन्धा च गन्धिला गन्धमालिनी ॥ १२४ क्षेत्राण्यष्टातिरम्याणि ज्ञातव्यानि मनीषिभिः। नगर्योऽपि तथा तावच्छीभद्रा सालवेदिका ॥१२५ , मेरुके पूर्व दिशामे बसे हुए विदेहक्षेत्रके देशोको पूर्व विदेह कहते हैं और मेरुकी पश्चिम दिशामे विद्यमान विदेहदेशोको पश्चिम विदेह कहते है। इन दोनो विदेहोके देशोके और नगरि- योके नामही भिन्न भिन्न है इनसे व्यतिरिक्त कुछ विशेषता उनमे नही है । इनके विस्तारादिक समान है । अव क्षेत्रोके और नगरियोके नाम मैं कहता हू ।। ११६-११७ ।। सीतोदा नदीके दक्षिण तटपर जो देश हैं, उनके नाम इस प्रकार हैं-पमा', सुपना', महापद्मा', पद्मकावती, सख्या", नलिना , कुमुदा और सरिता' ऐसे आठ देशोके नाम विद्वानोके जानने योग्य हैं ।। ११८-११९ ॥ (नगरियोके नाम )- अश्वपुरी', सिहपुरी, महापुरी', विजयापुरी', अरजापुरी, विरजापुरी', अशोकापुरी", तथा वीतशोकापुरी ये आठ नगरिया उपर्युक्त आठ क्षेत्रोंके बीचमे है । ये नगरिया विस्तीर्ण और सुदर है । निषधपर्वतके उत्तर भागमे और क्षेत्रके मध्यमे है २.१२०-१२१॥ देवारण्यके समान भूतारण्य विस्तृत है और उसकी जो वेदिका है उसके पूर्वभागमे उत्तम क्षेत्र है ।। १२२ ॥ सीतोदाके रमणीय तटपर और नील पर्वतके दक्षिण दिगामे वप्रा' नामक महाक्षेत्र है, जो कि विजया नामक नगरीसे युक्त है । तदनतर सुवप्रा महावप्रा', वप्रकावती, गधिका', सुगंधा', गंधिला", और गधमालिनी ऐसे आठ क्षेत्र अत्यंत रमणीय है , सो विद्वानोके द्वारा जानने योग्य है ॥ १२३-१२४ ।। (इन देशोके नगरियोके नाम । )- भद्रसाल वनकी वेदीपर्यन्त ये आठ देश और नग- रिया है। नगरियोके नाम इस प्रकार है-वैजयन्तीपुरी', जयन्तीपुरी', रम्यापुरी', अपराजितापुरी, - ---- १ मा. दक्षिण २ आ गधा ३ आ यावत् -७ १३६) सिद्धान्तसार (१६९ वैजयन्ती जयन्ती च पुरी रम्यापराजिता । चक्रादिका पुरी पूता तथा खड्गपुरी परा॥१२६ अयोध्या च तथावध्या ज्ञातव्या सुमनीषिभिः । शेष पूर्वविदेहस्य स्वरूप पूर्वमेव तत् ॥ १२७ त्रयस्त्रिशत्सहस्राणि शतानि षट् तथा पुन । चतुभिरधिकाशीतिः कलानां हि चतुष्टयम् ॥१२८ विदेहस्यापिविष्कम्भ कथितःकथितप्रिय । जिनेन्द्रजितकौघेराधिविध्वसकारिभिः॥१२९युग्मम् पूर्वापरविदेहे स्याच्चतुर्थेन सम. सदा । कालः कोटिश्च पूर्वाणा जीवितव्य नृणां परम् ॥१३० मेरोरत्तरतो यानि क्षेत्राणि विविधानि च । विद्यन्ते तानि सर्वाणि दक्षिणानीव सर्वथा ॥१३१ केशर्यादिहृदेवता. केवल सन्ति देवता. आये कीर्तिस्ततो बुद्धिलक्ष्मीश्चान्त्ये व्यवस्थिता॥१३२ नरकान्ता च नारी च रूप्यकूला तथा पुन । सुवर्णा च मता कूला रक्ता रक्तोदका पुनः॥१३३ रम्यकादिषु विद्यन्ते नद्यो नामविभेदतः । शेष दक्षिणवत्सर्वं जानन्ति यतिनायकाः ॥ १३४ चतुर्गोपुरसंयुक्त प्राकारोऽस्ति महानघः । मर्यादायाः पर हेतुर्जम्बूद्वीपसमुद्रयोः ॥१३५ योजनानि स विस्तीर्णो भूमुखे द्वादशैव हि । ऊ भागे च चत्वारि तथाष्टौ मध्यमे पुनः॥१३६ , चक्रापुरी', पवित्र खड्गपुरी', अयोध्यापुरी" और अवध्यापुरी ऐसी आठ नगरिया विद्वानोको जानने योग्य है । अन्य सब स्वरूप पूर्वविदेहके समान है ॥ १२५-१२७ ॥ ( विदेहक्षेत्रका विस्तार। )- विदेहक्षेत्रका विस्तार तेहतीस हजार छसौ चौरासी योजन और चार कला इतना है। जिन्होने कर्मसमूह नष्ट किया है, जिनकी मानसिक व्यथा अथवा सपूर्ण परिग्रह नष्ट हुए हैं, जिनका कथन प्रिय है, ऐसे जिनेश्वरोने इस प्रकार विदेहका विस्तार कहा है ।। १२८-१२९ ॥ पूर्वविदेहक्षेत्रमे और अपरविदेहक्षेत्रमे चतुर्थ काल सदा समान विद्यमान है और इन क्षेत्रोमे रहनेवाले मानवोका जीवितव्य अर्थात् आयु एक कोटिपूर्व वर्षोंकी है। यह उनके उत्कृष्ट आयुका प्रमाण कहा है ॥ १३० ॥ ( मेरुके उत्तर दिशाके क्षेत्रादिकोका सक्षिप्त कथन । )- मेरुके उत्तर दिशामे जो अनेक क्षेत्र हैं, वे सर्वथा दक्षिणके भरतादिक क्षेत्रोके समान समझने चाहिये। केसरी, पुण्डरीक और महापुण्डरीक सरोवरोमे देवताये निवास करती है। केसरी सरोवरमे कीर्ति देवता, पुण्डरीकमे बुद्धि देवता और महापुण्डरीकमे लक्ष्मी देवता ऐसी देवताये निवास करती हैं ॥ १३१-१३२॥ नरकान्ता नदी, नारी, रूप्यकूला, सुवर्णकूला, रक्ता और रक्तोदा ये नदियां रम्यक, हैरण्यवत और ऐरावत क्षेत्रके बीचमेसे वहती हुई पूर्वसमुद्र और पश्चिमसमुद्रमे प्रवेश करती हैं। वाकीका सर्व स्वरूप यतिनायक जिनेश दक्षिणके क्षेत्र, नदी, सरोवरादिकोके समान जानते है ।। १३३-१३४ ॥ ( जम्बूद्वीप और लवणसमुद्रके तटका वर्णन। )- जम्बूद्वीप और लवणसमुद्रका जो तट है वह चार गोपुरोसे विराजित है और अतिशय निर्दोष रचनावाला है। वह इस द्वीप तथा + 1 २ आ महानय ३ आ ष्टावुदये मत १ आ रघ SS 22 १७०) सिद्धान्तसार (७. १३७- । तस्योपरि महापद्मवेदिका विद्यते परा । द्विकोशोत्सेधसंयुक्ता क्रोशपादं सविस्तरा ॥ १३७ लक्षत्रयं सहस्राणि षोडशव तथा पुनः । योजनानां शतद्वन्द्वंर सप्तविंशतिसंयुतम् ॥ १३८ गव्यूतित्रितयं तस्माच्छतं च धनुषां पुनः । अष्टाविंशतिसंयुक्तमगुलानि त्रयोदश ॥ १३९ अडगुलार्द्धमिति ज्ञेयो जम्बूद्वीपस्य शोभन । परिवेषोऽप्रमज्ञानः कथितो मुनिपुङ्गवः ॥ १४० जम्बूद्वीपपरिधिः ३१६२२७ यो. ३ गन्यू १२८ ध. १३ अंगुलानि तथा अर्घाडगुलम् ॥ पूर्वेण विजयद्वारं वैजयन्तं सुदक्षिणे । जयन्तं पश्चिमे भागे ह्यपराजितमुत्तरे ।। १४१ तहहिः सुमहाँल्लक्षत्रयं वलयविस्तृतः । जलोत्सेधः सहस्राणि योजनानां हि षोडश ॥ १४२ विद्यते लवणाम्भोधेर्वहुधा कौतुकावहः । लक्षयोजनगम्भीरो' वडवाग्निसमन्वितः ॥ १४३ ततोऽस्ति धातकीखण्डो द्वीपो मेरुयुगान्वितः। योजनानां चतुर्लक्षवलयविस्तृतो महान् ॥१४ चतुभिरषिकाशीतिर्योजनानां समुन्नतम् । क्षुद्रं मेरुद्वयं तत्र विद्यते विस्मयावहम् ॥ १४५ --- . समुद्रको मर्यादाभूत है। यह तट प्रारभमे वारह योजनोका है, ऊपरके भागमे चार योजनोंका और मध्यभागमे आठ योजनोका । इस तटके ऊपर सुदर महापद्म नामकी वेदिका है। वह दो कोश उचाईको धारण करती है। और पाव कोसकी रुद है ।। १३५-१३७ ।। इस तटका परिक्षेप तीन लाख सोलह हजार दोसौ सत्ताईस योजन तीनं गव्यूति (तीन कोस) एकसौ अट्ठाइस धनुष्य तेरह अगुल और अर्धाङ्गुल अधिक इतना है (राजवार्तिकमे तैरह अगुलके अनतर अर्धांगुलसे कुछ अधिक अगुल ऐसा उल्लेख है ) ॥ १३८-१४० ।। - इस तटको पूर्व, दक्षिण, पश्चिम और उत्तर इन चार दिशाओमे क्रमसे विजयद्वार, वैजयन्तद्वार, जयन्तद्वार और अपराजित द्वार ऐसे चार द्वार हैं ।। १४१ ॥ १ - उस तटके वाहर महान् तीन लाख योजनोकी और वलयाकार विस्तृत ऐसी लवण- समुद्रकी जलकी ऊंचाई है, जो कि सोलह हजार योजन प्रमाणकी है और नाना प्रकारके कौतुक उत्पन्न करनेवाली है । यह लवणसमुद्र एक लाख योजन परिमाणकी गंभीरता धारण करता है और वडवाग्निसे युक्त है ।। १४२-१४३ ॥ (धातकीखंडका सक्षेपसे वर्णन।)-लवणंसमुद्रको जिसने घेर रखा है, ऐसा धातकीखड चार लक्ष योजन परिमाणवाला वलयाकार विस्तृत है। इसमे चौरासी हजार योजन ऊंचे दो मेरु पर्वत हैं । जम्बूद्वीपस्थ मेरुसे छोटे होनेसे इनको क्षुद्र मेरु कहते हैं । लवणसमुद्र और कालोद- समुद्रकी वेदिकाको स्पर्श करनेवाले दो इष्वाकार पर्वत हैं, एक दक्षिण दिशामे और दूसरा उत्तर- - -------- . १ आ सुविस्तरम् २ मा द्वय ३ आ गम्भीर ४ आ वलये -७ १५४) सिद्धान्तसार (१७१ लवणाम्भोधिकालोदवेदिकास्पर्शकारको । इष्वाकारगिरी तत्र विद्यते दक्षिणोत्तरी॥१४६ योजनानां सहस्रं स विष्कम्भे हयुदये पुन । शतानां च चतुष्क स्यात्तद्वीपार्षविभागकृत् ॥ १४७ जम्बूद्वीपे यथा सर्वं भरताद्य मत तथा । खण्डद्वयेऽपि तत्सर्वं तत्र मेरुद्वयाश्रितम् ॥ १४८ तत्र ये सन्ति विस्तीर्णाः सर्वेऽपि कुलपर्वता. । चकारवत्सुसस्थाना वर्षास्तद्विवराणि वा ॥१४९ वेष्टित वलये तत्कालोदस्य पयोनिधे । पुष्करद्वीपमप्यस्ति धातकीखण्डवत्ततः॥ १५० योजनानां सुलक्षाणि विस्तीर्णः षोडशावनौ । तद॰ वलयाकारो मानुषोत्तरपर्वतः ॥१५१ यस्तु कश्चिद्विशेषोऽस्ति द्वीपद्वयसमाश्रित । जम्बूद्वीपात्स विज्ञेय सर्वो लोकानुयोगतः॥ १५२ मानुषोत्तरशलान्ते' मानुष क्षेत्रमुत्तम । तद्वहिर्न यत सन्ति मानुषा इत्यतोऽन्वयात् ॥ १५३ मानुषोत्तरशैलाग्ने स्वयम्भूरमणार्द्धके । नागेन्द्राख्यो नग. सर्व परिक्षिप्य व्यवस्थितः ॥ १५४ दिशामे है। वे दोनो पर्वत एक हजार योजन चौडाईको धारण करनेवाले हैं और चारसौ योजनकी उनकी ऊचाई है । इन दो पर्वतोने इस धातकीखडके दो विभाग किये हैं ॥ १४४-१४७ ॥ जम्बूद्वीपमे जैसे भरतादिक क्षेत्र, हिमवदादिक पर्वत, पद्मादिक सरोवर गगासिन्ध्वा- दिक नदियाँ है वैसे धातकीखडमेभी हैं और पुष्करार्द्धमेभी है। सिर्फ इन दो खडोमे दो दो मेरु होनेसे भरतादिक क्षेत्र दो दो है । हिमवदादिक पर्वतभी दो दो है । पद्मादिक सरोवरभी दो दो है। ऐसेही गगासिन्ध्वादिक नदियाँभी दो दो है ।। १४८ ॥ धातकीखडमे क्षेत्रादिकोकी सख्या द्विगुण कही है । इस धातकीखडमे जो सर्व विस्तीर्ण कुलपर्वत है वे चक्रके आरेकी आकृतिको धारण करते है तथा उनमे जो क्षेत्र है वे विवरोका आकार धारण करते हैं ॥ १४९ ॥ (पुष्करद्वीपका सक्षिप्त वर्णन । )- कालोदसमुद्रके वलयसे वेष्टित धातकी खण्डके समान पुष्करद्वीप नामक द्वीप है । वह द्वीप सोलह लाख योजन विस्तारको धारण करता है। इस द्वीपके आधे भागमे वलयाकार मानुषोत्तर नामक पर्वत है । जम्बूद्वीपकी अपेक्षा इन दोनो द्वीपोमे जो कुछ विशेषता है वह सब लोकानुयोग नामक शास्त्रसे जानने योग्य है ।।१५०-१५२ ॥ (मनुष्यक्षेत्र कहातक है ? )- मानुषोत्तोर पर्वतके अन्ततक उत्तम मनुष्यक्षेत्र है। इस मनुष्यक्षेत्रके बाहर मनुष्य नही है, अत मानुषोत्तर यह नाम अथवा मनुष्यक्षेत्र यह नाम योग्य है ॥ १५३ ॥ मानुपोत्तर शैलके आगे और स्वयभूरमण द्वीपके आधे भागमे नागेद्र नामक पर्वत वलयाकार है उसने आधे स्वयम्भूरमण द्वीपको घेर रखा है ।। १५४ ॥ 1 - १ आ शैलान्तर्मानुप १७२) सिद्धान्तसारः - (७. १५५- १ ततः पूर्वेष्वसङख्येषु द्वीपेषु सागरेषु च। विद्यन्ते व्यन्तरावासास्तिर्यञ्चोऽपि निरन्तराः ॥ १५५ तिरश्चां जीवितं तस्मिन्नेकपल्योपमप्रमम् । भोगभूमिर्जघन्यासौ यतो जैननिवेदिता ।। १५६ नागेन्द्राच्च बहिर्भागे' स्वयम्भूरमणार्द्धके । विदेहवत्समुद्रे च कर्मभूमिविचक्षणः ॥ १५७, परं न मानुषाः सन्ति मानुषान्ते च केवलम् । द्वीपेष्वर्द्धतृतीयेषु तेऽपि द्वेषा भवन्त्यमी ॥ १५८ आर्या म्लेच्छाश्च ते सर्वे कर्मजा भोगभूमिजाः।आर्यखण्डभवास्त्वार्या म्लेच्छाश्च म्लेच्छखण्डजाः।। कर्मभूमिप्रसूता ये' सर्वे ते कर्मभूमिजाः । भोगभूमिसमुद्भता. कथ्यन्ते भोगभूमिजाः ॥१६० द्वीपेष्वर्द्धतृतीयेषु स्युस्त्रिशद्धोगभूमयः । तथा पंचदशैवात्र सन्त्येताः कर्मभूमयः ॥ १६१ गुणरर्यन्त इत्यार्यास्तेऽपि द्वेषा भवन्ति च । केचिदृद्धीस्तु सप्राप्ताः केचित्तदितरे पुनः॥ १६२ हैं मानुषोत्तरपर्वतके असख्यात द्वीप समुद्रोमे नागेन्द्र पर्वततक व्यतरदेवोके निवासस्थान और पशुभी सर्वत्र रहते हैं ।। १५५ ।। इन द्वीपसमुद्रमे तियंञ्चोकी आयु एक पल्योपम वर्पोकी है । इन द्वीपादिकोको जिनेश्वरोने जघन्य भोगभूमि कहा है ॥ १५६ ॥ नागेन्द्र पर्वतके बाह्यभागमे, आधे स्वयभूरमण द्वीपमे और स्वयभूरमण समुद्रमे विदेहके समान कर्मभूमि है ऐसा विद्वानोने-आचार्योंने कहा है । परतु इनमे मनुष्य नही है। मनुष्य सिर्फ मानुषोत्तर पर्वततक हैं यानी ढाई द्वीपोमे है और वे दो प्रकारके है ।। १५७-१५८ ॥ (आर्य और म्लेच्छ मनुष्योका वर्णन । )- आर्य और म्लेच्छ ऐसे मनुष्योके दो भेद हैं । वे सव कर्मभूमिज और भोगभूमिज है । आर्यखण्डमे जो उत्पन्न हुए है वे आर्य है, और म्लेच्छ खण्डमे जो उत्पन्न हुए हैं, वे म्लेच्छ हैं । कर्मभूमिमे जो उत्पन्न हुए है वे सब कर्मभूमिज हैं । तथा भोगभूमिमे जो उत्पन्न हुए हैं वे सव भोगभूमिज हैं ।। १५९-१६० ॥ ढाई द्वीपोमें तीस भोगभूमियाँ है और कर्मभूमियाँ पद्रह है। पांच हैमवत, पाच हरिक्षेत्र, पाच रम्यकक्षेत्र, पाच हैरण्यवत, पाच देवकुरु और पाच उत्तरकुरु क्षेत्र ऐसी तीस भोगभूमियाँ हैं । इनमे पाच उत्तरकुरु और पाच देवकुरु, उत्तम भोगभूमियाँ हैं। पांच हैमवत और पाच हैरण्यवत जघन्य भोगभूमियाँ हैं । पाच हरिवर्प और पाच रम्यक मध्यमभोगभूमियाँ है । कर्म- भूमियाँ पद्रह हैं । पाच भरतक्षेत्र, पाच विदेहक्षेत्र और पाच ऐरावतक्षेत्र ऐसी पद्रह कर्मभूमियाँ हैं ॥ १६१॥ ( आर्योका वर्णन । )- जो सम्यग्दर्शनादि गुणोसे सेवे जाते हैं उन्हे आर्य कहना चाहिये अर्थात् जिनमे सम्यग्दर्शनादि गुण उत्पन्न होते हैं, जो आर्योंके कुलमे उत्पन्न होते हैं वे आर्य हैं । वे आर्य दो प्रकारके हैं । कोई ऋद्धिको प्राप्त किये हुए हैं उनको ऋद्धि-प्राप्तार्य कहते - ------ १ मा जया २ आ ते -७. १६४) सिद्धान्तसार (१७३ तएते ऋद्धीसम्पन्ना पञ्चधा परिकीर्तिताः। क्षेत्राश्चि सुजात्याः कर्माश्चि तथा पुनः॥१६३ चारित्राश्चि विज्ञेया दर्शनार्याश्च ते पुनः। श्रीजिनेन्द्रस्य सद्वाक्यविश्वस्तैर्मुनिभिः सदा ॥ युग्मम् है और कोई जिनको ऋद्धि प्राप्त नहीं हुई हैं वे अनृद्धि-प्राप्तार्य है । जो ऋद्धि-प्राप्तार्य हैं वे पाच प्रकारके कहे है । क्षेत्रार्य, सुजात्यार्य, कर्मार्य, चारित्रार्य और दर्शनार्य । श्रीजिनेन्द्रके सत्य वचनोपर विश्वास रखनेवाले मुनियोने अनृद्धिप्राप्तार्यके ऐसे प्राच भेद कहे है ।। १६२-१६४ ॥ स्पष्टीकरण- १ क्षेत्रार्य- काशीकोशलादि स्थानोमे उत्पन्न हुए जो आर्य है उनको क्षेत्रार्य कहते हैं । २ जात्यार्य- इक्ष्वाकुआदिवशोमे उत्पन्न हुए आर्योंको जात्यार्य कहते है । अर्थात् क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र और ब्राह्मणोके जो अनेक वशभेद हैं उनमे उत्पन्न हुए आर्योंको जात्यार्य कहना चाहिये । ३ कार्यके तीन भेद है- सावध कार्य, अल्पसावध कार्य और असावध कार्य । १ सावद्यकार्योंके यह भेद है- असि, मसि, कृषि, विद्या, शिल्प और वणिक कर्म अर्थात् असिकार्य, मसिकर्मार्य, कृपिकर्मार्य, विद्याकार्य, शिल्पकर्मार्य और वणिक्कआर्य । १ असिकर्मार्य- तरवार, धनुष्य आदि आयुधोके प्रयोगमे कुशल आर्योंको असिकर्मार्य कहते है । २ मसिकर्मार्य- धनकी आय और व्ययादि लिखनेमे चतुर आर्योंको मसिकार्य कहते हैं । ३ कृपिकर्मार्य- हल आदि खेतीके उपकरणोके जानकार आर्योको कृषिकर्मार्य कहते है। ४ विद्याकार्य- चित्रकला गणितादि वाहत्तर कलाओमे चतुर आर्योंको विद्याकार्य कहते है । ५ शिल्पकर्मार्य- धोबी, नाई, लुहार, कुम्हार, सुनार आदिकोको शिल्पकर्मार्य कहते हैं । ६ वणिक्कर्मार्य- चन्दनादिगध, घी, तेल आदिक रस, शालि आदिक धान्य, कपास आदिकोके वस्त्र, मोती, रत्न आदि नाना वस्तुओका संग्रह करनेवाले आर्योको वणिक्कार्य कहते हैं । ये छहो प्रकारके आर्य अविरतियुक्त होनेमे सावध कार्य कहे जाते है। २ अल्पसावध कर्मार्य अर्थात् श्रावक, जोकि स्थावरहिंसाके त्यागी नही है और असहिंसाके त्यागी तथा अणुव्रतके पालक होते है। ३ असावद्यकर्यि- सपूर्ण हिंसादिपापोके पूर्ण त्यागी मुनिराज असावद्यकार्य हैं। क्योकि कर्मक्षयके लिये उद्यत ऐसे विरतिरूप परिणामोके वे धारक होते हैं। चारित्रार्य- इनके अभिगत-चारित्रार्य और अनभिगत-चारित्रार्य ऐसे दो भेद है। चारित्रमोहकर्मका उपशम होनेसे और क्षय होनेसे वाह्य उपदेशकी अपेक्षाके विना आत्माकी प्रसन्नता होनेसेही चारित्रपरिणामोको धारण करनेवाले उपशात-कषाय और क्षीण-कषाय मुनिराजोको अभिगतचारित्रार्य कहते है। अनभिगत चारित्रार्य- अतरगमे चारित्रमोहकर्मका क्षयोपशम होनेसे और वाह्यमे उपदेशका निमित्त प्राप्त होनेसे जिनको विरतिरूप परिणाम होते हैं उसको अनभिगतचारित्रार्य कहते हैं।

१७४) सिद्धान्तसारः (७.१६५-- विक्रियावुद्धिसत्क्षेत्रबलौषधितपोरसैः । ऋद्धिमन्तो मताः सप्त प्रकारास्ते तथाविधैः ॥ १६५ --- - दर्शनार्य-दश प्रकारके हैं। १ आज्ञा दर्शनार्य- भगवान् अर्हन्त सर्वज्ञ प्रणीत आज्ञामात्रको प्रमाण मानकर श्रद्धा करनेवाले आर्य आज्ञादर्शनार्य हैं। २ मार्गदर्शनार्य-परिग्रहरहित मोक्षमार्गका श्रवण करनेसे जिनको रुचि उत्पन्न हुई है, ऐसे आर्य मार्गदर्शनार्य हैं । ३ उपदेश दर्शनार्य-तीर्थकर बलदेव आदिकोके शुभचरित सुननेसे जिनको श्रद्धा हुई है वे उपदेशदर्शनार्य है । ४ सूत्रदर्शनार्य- दीक्षा, और मुनियोके आचारोके सूत्रोके श्रवणसे जिनको रुचि हुई है ऐसे आर्योंको सूत्रादर्शनार्य कहते हैं । ५ बीजदर्शनार्य-वीजरुचि-वीजपदोको ग्रहण करनेसे सूक्ष्मार्थका परिज्ञान होनेसे जिनको श्रद्धा होती है, वे बीजदर्शनार्य कहे जाते है। ६ सक्षेपदर्शनार्य-जीवादि पदार्थोके सामान्य उपदेग- श्रवणसे जिनको सम्यग्दर्शन हुआ है ऐसे आर्योको सक्षेपदर्शनार्य कहते है । ७ विस्तारदर्शनार्य- अग और पूर्वोके विषय भूत जीवादि पदार्थोका विस्तार प्रमाण और नयोके द्वारा सुननेसे जिनको श्रद्धा हुई है, ऐसे आर्य विस्तारदर्शनार्य है। ८ अर्थदर्शनार्य-वचनविस्तारसे रहित ऐसा अर्थग्रहण होनेसे जिनको श्रद्धा हुई हैं ऐसे आर्य अर्थदर्शनार्य है। ९ अवगाढदर्शनार्य-आचारागादि द्वादशागोका ज्ञान होनेसे जिनके श्रद्धानमे दृढता आई है ऐसे आर्योको अवगाढदर्शनार्य कहते है और १० परमावगाढदर्शनार्य- परमावधिज्ञान केवलज्ञानसे प्रकाशित जीवादिक पदार्थविषयक श्रद्धानको धारण करनेवाले आर्योको परमावगाढ दर्शनार्य कहते है । ( राजवार्तिक अध्याय ३ रा आर्या म्लेच्छाश्च सूत्रका भाष्य) ( ऋद्धि प्राप्तार्योके भेद । )-विक्रियाऋद्धि, बुद्धिऋद्धि, क्षेत्रऋद्धि, वलऋद्धि, औषध- ऋद्धि, तपऋद्धि और रसऋद्धि आदि ऋद्धियोसे युक्त ऐसे आर्योको ऋद्धिमदार्य कहते है॥१६५॥ विक्रियाऋद्धिमदार्य- अणिमा, महिमा आदिक आठ प्रकारको विक्रिया है । छोटा रूप धारण करना, वडा रूप धारण करना, एक अनेक रूप धारण करना आदि विक्रियाके धारकोको विक्रियाऋद्धिमदार्य हैं। वुद्धिऋद्धिमदार्य-बुद्धिऋद्धि अठारह प्रकारकी है। केवलज्ञान,अवधिज्ञान, मन पर्ययज्ञान, बीजवुद्धि, कोप्ठबुद्धि, पदानुसारित्व, सभिन्नश्रोतृत्व, दूरसे आस्वादन, दर्शन, स्पर्शन, प्राण, श्रवण इनमे समर्थता, दशपूर्वित्व, चतुर्दशपूर्वित्व, अष्टागमहानिमित्तज्ञत्व, प्रज्ञाश्रवणत्व, प्रत्येकबुद्धता और वादित्व । इन ऋद्धियोको धारण करनेवाले आर्योको बुद्धिऋद्धिमदार्य कहते है। सम्यग्ज्ञानाधिकारमे इनका वर्णन आया है। H . क्षेत्रऋद्धि-के धारक आर्य दो प्रकारके होते है । अक्षीणमहानस और अक्षीणमहालय। अक्षीणमहानस- लाभान्तराय कर्मका क्षयोपशम जिनमे अतिशय प्रकर्षको प्राप्त हुआ है, ऐसे मुनिराजोको जिस पात्रमेसे आहार दिया जाता है उस पात्रका आहार चक्रवर्तीके सपूर्ण सैन्यकोभी दिया जाय तो भी कमी नहीं होता है। ऐसे मुनीश्वरको अक्षीणमहानसार्य कहते है।

-७. १६५) सिद्धान्तसार (१७५ अक्षीणमहालय- इस ऋद्धिके मुनि, जहाँ बैठते हैं वहा देव, मनुष्य, पशु सब यदि बैठ जाय तो भी वे परस्परोको बाधा न देते हुए सुखसे बैठते हैं। ऐसे मुनिको अक्षीणमहालयमुनि कहते हैं। बलऋद्धि- मनोवलऋद्धि, वचनबलऋद्धि और कायबलऋद्धि, मन श्रुतावरणकर्मका और वीर्यान्तरायकर्मका क्षयोपशम परमप्रकर्षको प्राप्त होनेसे अन्तर्मुहूर्तमे सपूर्ण श्रुतज्ञानके अर्थका चिन्तन करनेमे चतुरता प्राप्त होती है । वचनवलऋद्धि- मन श्रुतावरण, जिह्वाश्रुतावरण और वीर्यान्तरायकर्मका अतिशय प्रकर्षयुक्त क्षयोपशम होनेसे अन्तर्मुहूर्तमे सपूर्ण श्रुतका उच्चारण करनेका सामर्थ्य प्राप्त होता है। और सतत तथा उच्च उच्चारण करनेपरभी श्रमरहित और कठमे विकाररहितपना उत्पन्न होता है। कायबलऋद्धि-वीर्यान्तरायके क्षयोपशमसे शरीरमे असाधारण सामर्थ्य उत्पन्न होता है। जिससे मासिक, चातुर्मासिक, सावत्सरिक आदि कालका प्रतिमायोग धारण करनेपरभी श्रम और थकावट आतीही नही- प्रसन्नता रहती है। औषधऋद्धि- आठ प्रकारकी होती है। जिनके हस्तपादादिक अवयवोके स्पर्शसे असाध्य रोगभी नष्ट होते है वह आमर्शीषध ऋद्धि है। जिनके मुखकी लाली औषधके समान रोग दूर करती है वे मुनि क्ष्वेलौषद्धिके धारक है । जिनके पसीनेमे मिली हुई धूलि रोगहरण करती है ऐसे मुनीश्वरोंको जल्लऋद्धिके धारक कहते हैं। जिनके कान, नाक, दन्त और आखोके मल औषधरूप हुए हैं वे मल्लौषद्धिके धारक हैं। जिनकी निष्ठा औषधस्वरूप होकर रोग दूर करती हैं वे विडोषद्धिके धारक है । साषधिऋद्धि-जिनके अग, प्रत्यग, नख, केशादिक सर्व अवयव औषधरूप बने हैं तथा जिनको स्पर्श करनेवाले वायु जलादिकभी औषधमय होते हैं वे मुनि सर्वोद्धिके धारक हैं। आस्याविषद्धि-- उग्रविषयुक्त आहारभी जिनके मुखमे जानेपर निर्विष होता है अथवा जिनके मुखसे निकले हुए वचन सुनकर महाविषसे व्याप्त शरीरवालेभी जीव निर्विष होते हैं उनको आस्याविष मुनि कहते हैं । दृष्टयविष- जिनके दर्शनसे अति तीन विषसे दूषित लोगभी निर्विष होते हैं वे दृष्टयविष ऋद्धिके धारक है। तपोऽतिशयद्धि- सात प्रकारकी है। १ उग्र तपऋद्धि- चतुर्थ, पष्ठ (दो उपवास) अष्टम (तीन उपवास) दशम (चार उपवास) द्वादय (पाच उपवास) पक्ष (पद्रह उपवास) और मास (एक महिनेके उपवास) इस प्रकारके उपवासोमेसे कोई एक प्रकारका उपवास आमरण करनेवाले मुनीश्वरोको उग्र तपऋद्धिके धारक कहते हैं। २,दीप्ततपस्- महोपवास करनेपरभी जिनका मनवचनशरीर सामर्थ्य बढताही है, । J १७६) सिद्धान्तसार (७ १६५- سلم . 1.. 1 ३ जिनका मुख दुर्गधरहित है, जिनका श्वासोच्छवास पद्मके समान गधवाला होता है तथा जिनका शरीर कान्तियुक्त होता है वे दीप्ततप ऋद्धिके धारक मुनिराज है। ३ तप्ततपस्- तपे हुए कटाहपर पड़े हुए जलबिंदु सूख जाते है वैसा जिन्होने लिया हुआ आहार मलरुधिरादिरूपतासे परिणत नही होता है, वे मुनि तप्ततपस्ऋद्धिके धारक हैं। ४ महातपस्-सिंहनि क्रीडितादि महोपवास करनेवाले मुनि महातप ऋद्धिके धारक हैं। ५ घोरतपस्- नाना प्रकारके रोगोसे पीडित होनेपरभी उपवास कायक्लेशादि तपश्चरणको नही त्यागनेवाले मुनीश्वरको घोरतपऋद्धिके मुनि कहते हैं। ६ घोर पराक्रम- वे ही मुनि जब अपना उपवास कायक्लेशादि तप अधिकाधिक बढाते है तब उन्हे घोर पराक्रम ऋद्धि धारक कहते है । , ७ घोर ब्रह्मचारी- जिनका ब्रह्मचर्य अस्खलित होता है और जिनको कभी दुःस्वप्न पडतेही नही वे घोरब्रह्मचारी है। रसऋद्धिके छह भेद होते है- १ आस्यविष- उत्कृष्ट तपोबलके धारक मुनि 'तू मर' ऐसा जिसको कहते है वह तत्काल विषव्याप्त होकर मरता है ऐसे मुनीश्वरको आस्यविषऋद्धि होती है। २ दृष्टिविष- उत्कृष्ट तपस्वी क्रुद्ध होकर जिसे देखते है वह तत्काल उनविषसे व्याप्त होकर मरता है, ऐसे मुनि दृष्टिविद्धिके धारक समझना चाहिये। ३ क्षीरास्रावि- विरस अत्रभी जिनके हाथमे पडनेपर दूधके रससे परिणत होता है वे क्षीरालाविऋद्धिके धारक है। अथवा जिनके वचन दूधके समान क्षीणलोगोको सतुष्ट करनेवाले होते हैं वे क्षीरास्रावि मुनि हैं । १४ मध्वालावि-जिनके हाथमे पड़ा हुआ आहार नीरस होनेपरभी मधुररसवाला और शक्तिवर्धक होता हैं, तथा जिनके वचन दुखपीडितोको मधुके समान पुष्ट करते है वे मध्वास्रावि मुनिराज है। ५ सपिरास्रावि- जिनके हाथमे आया हुआ आहार नीरस होनेपरभी- रूक्ष होनेपरभी धीके समान रस और शक्तिवाला होता है अथवा जिनके वचन प्राणियोको घीके समान सन्तोषप्रद होते हैं वे मुनि सपिरास्रावी ऋद्धिके धारक है । ६ अमृतास्रावि- जिनके हस्तपुटमे पडा आया हुआ अन्न अमृत हो जाता है अथवा जिनके भाषण अमृतके समान प्राणियोपर 'अनुग्रह करते है वे अमृतास्रावी ऋद्धिके धारक मुनि है। तत्त्वार्थवर्तिकमे इन सात ऋद्धिके सिवाय क्रियांऋद्धि आठवी ऋद्धि मानी है। इस ऋद्धिके दो भेद है, चारणत्व और आकाशगामित्व। चारणभी अनेक प्रकारके है। जल, जघा, तन्तू, पुष्प, पत्र,श्रेणि, अग्निशिखादिकोका अवलबन लेकर गमन करनेवाले चारणमुनि जलादिकमें, जमीनके समान पाव उठाकर रखते हुए गमन करते है। तथापि जलादिकोके जन्तुओको पीडा नही - T - - 1 -७. १७३) सिद्धान्तसार (१७७ म्लेच्छाश्च द्विविधा.प्रोक्ता फार्माश्चम्लेच्छभूमिजा कर्मभूमिषुयेसन्तितेसर्वे कर्मभूमिजाः॥१६६ अन्तर्वीपजास्तावदन्तरद्वीपतिनः । ते च द्वीपा भवन्त्यत्र जन्बूद्वीपपयोनिधौ ॥ १६७ योजनानि शतान्यस्मात्तिर्यक् पञ्च प्रविश्य ते।दिक्षु द्वीपा भवन्त्यष्टौ लवणाम्भोधिमध्यगाः॥१६८ सार्द्धपञ्चशतान्यस्माद्योजनाना प्रविश्य च । द्वीपा विदिक्षु ते ह्यष्टौ विद्यन्ते कौतुकावहा ॥१६९ वेदिकाया समुद्रान्त षड्योजनशतेषु च । गतेषु पर्वतान्तेषु वो ही द्वीपो मतो ततः ॥ १७० चतुर्विशतिसख्यास्ते जम्बूद्वीपस्य सन्निधौ । तत्सडख्या धातकीखडसमीपे गदिता जिनः ॥१७१ शतयोजनविस्तारा दिक्षु द्वीपा अमी पुन । स्युविदिक्षु तदर्धास्ते शैलान्ते पञ्चविंशति.॥१७२ प्राच्यामेकोरुका. सर्वेऽपाच्या तेतु विषाणिनः । लाडालिन प्रतीच्या यदुदीच्या वाग्विजिता॥ होती है । जमीनपरसे चार अगुल ऊपर आकागमे अतिगय शीघ्र सेकडो योजन गमन करनेवाले मुनि जघाचरण मुनि है। आकाशगामी-पर्यड्डासनसे अथवा कायोत्सर्गसे पाव नही उठाते हुए आकाशमे गमन करनेवाले मुनि आकाशगामी ऋद्धिके धारक है। इस प्रकार ऋद्धिमदार्योंका वर्णन हुआ। ( राजवार्तिक 'आर्याम्लेच्छाश्च' सूत्रका भाष्य ) (म्लेच्छोके भेदोका वर्णन ।)- कर्मभूमिज म्लेच्छ और म्लेच्छभूमिज म्लेच्छ ऐसे म्लेच्छोके दो भेद हैं । जो कर्मभूमिमे रहते है वे सर्व कर्मभूमिज म्लेच्छ है ॥ १६६ ।। अन्तरद्वीपमे रहनेवाले म्लेच्छोको आन्तरद्वीपज म्लेच्छ कहते हैं तथा ये अन्तर्वीप जम्बूद्वीपके समुद्रमे हैं । अर्थात् लवणसमुद्रके द्वीपोमे उत्पन्न हुए मनुष्योको आन्तरद्वीपज म्लेच्छ कहते हैं । इनको कुभोगभूमिजभी कहते है ॥ १६७ ॥ लवणसमुद्रके अदर पाचसौ योजन प्रवेश करनेपर लवणसमुद्रके मध्यमे पूर्व, पश्चिम, दक्षिण, उत्तर ऐसी चार दिशाओमे आठ द्वीप हैं ।। १६८॥ तथा लवणसमुद्रमे साडे पांचसो योजनतक प्रवेश करनेपर विदिशाओमे आश्चर्यकारक आठ द्वीप हैं ।। १६९ ॥ वेदिकासे लवणसमुद्रमे छहसौ योजन प्रवेश करनेपर पर्वतोके अन्तपर-टोकोपर दो दो द्वीप हैं। सब मिलकर जम्बूद्वीपके सन्निध चौवीस द्वीप हैं। धातकीखडके समीपके द्वीपोकीभी जिनेश्वरोने ऐसीही सस्या कही है । अर्थात् धातकीखडके कालोद समुद्रमेभी चौवीस अन्तरद्वीप है ।। १७१॥ दिशाओमे जो द्वीप हैं वे सौ योजन विस्तारवाले है और विदिशाओमे जो द्वीप हैं वे पच्चीस योजन विस्तारवाले है । तथा पर्वतोपर जो द्वीप हैं वे पच्चीस योजन विस्तारवाले हैं ।। १७२ ॥ पूर्व दिशाके द्वीपोमे जो अन्तर्वीपज मनुष्य है वे सब एकोरुक है अर्थात् एक पाववाले है। दक्षिण दिशाके द्वीपोमे सीगवाले मनुष्य हैं । पश्चिम दिशाके द्वीपोमे पूछवाले मनुष्य हैं और - SS 23 १७८) सिद्धान्तसार (७. १७४- शशादिशकुलीकर्णा महिष्यावरणा पुनः । लम्बकर्णा विदिक्ष्वेते भवन्ति मनुजाधमाः॥ १७४ अश्वसिंहमुखास्तावच्छ्वमुखेभमुखाः पुनः । वराहत्यानकाककपिवर्गमुखाः परे ॥ १७५ विद्युन्मेषमुखाः सर्वे पार्श्वयोरुभयोर्मताः । शिखर्याख्यस्य शैलस्य विविधाकारधारिणः ॥ १७६ मत्स्यमेषमुखाः कालमुखा हिमवतस्ततः । तत्पार्श्व उभयोः सन्ति सर्वे पल्योपमायुषः ॥ १७७ आदर्शहस्तिवक्राश्च पार्श्वयोरुभयोर्मता. । उत्तरस्यां हि रूप्याद्रेः समुद्रान्तकर्तिनः ॥ १७८ दक्षिणस्यां हि रूप्याद्रे पार्श्वयोरुभयोः पुनः । गोमेषवदना. सन्ति मानुपाश्चिरजीवनाः ॥ १७९ एकोरुका मृदाहारा गुहायां सन्ति वासिनः । शेषाः पुष्पफलाहारा वृक्षकतलवासिनः ।। १८० द्वीपा सर्वेऽपि ते तोयात् योजनोत्सेधतिनः। कालोदेऽपि तथा ज्ञेयाः कुत्सिता भोगभूमयः॥१८१ कर्मभूमिभवाः सर्वे पुलिन्दा नाहलादयः । पापकर्मरता नित्यं दुष्टा दुर्गतिगामिनः ।। १८२ उत्तर दिनाके द्वीपोमे वचनरहित अर्थात् मूक मनुप्य हैं । विदिशाओमे जो द्वीप हैं उनमे रहने- वाले मनुजाधमोके कान गगके समान, शप्कुलीके समान-भैसके समान हैं तथा आवरणके समान कर्ण हैं और लंव कर्ण हैं ।। १७३-१७४ ।। अन्वके समान मुखवाले, सिंहके समान मुखवाले, कुत्तेके समान मुखवाले, हाथीके समान मुखवाले, वराह-मूकर, व्याघ्र, कौवा और बंटर इन प्राणिओके समान मुखवाले ऐसे अन्तर्वीपज विदिशाके द्वीपमे रहते हैं ।। १७५ ।। विजलीके समान मुखवाले, मेप-वकरेके समान मुखवाले, मनुष्य शिखरी नामक कुल पर्वतके दोनो पावॉपर जो द्वीप हैं उनमे रहते हैं । हिमवान पर्वतके दोनो पाश्वोपर जोद्वीप है उनमे मत्स्यमुखवाले, मेपके मुखवाले और काले मुखवाले ये सभी मनुष्य है । ऐसे विविधाकारको धारण करनेवाले ये सभी मनुष्य एक पल्योपम आयुके धारक हैं । समुद्रके बीचमे जिसके अन्त घुस गये है ऐसे विजयार्द्ध पर्वतके उत्तरके जो पार्श्व भाग हैं उनके द्वीपोमे दर्पणके समान मुख- वाले और हाथीके समान मुखवाले म्लेच्छ रहते हैं । विजयार्द्ध पर्वतके दक्षिणके दो पार्श्वभागमे जो द्वीप हैं उनमे गायके मुखसमान मुखवाले और बकरेके मुखसमान मुखवाले दीर्घकालीन आयुवाले मनुप्य है ।। १६७-१७९ ।। जो एक पांववाले हैं वे गुहामे रहते हैं । और मृत्तिकाभक्षण करते है तथा वाकीके पुष्प और फलोका आहार लेते हैं तथा वृक्षके तलमे रहते हैं ।। १८० ।। वे सर्वद्वीप पानीसे एक योजनकी ऊंचाईपर है। कालोदसमुद्रमेभी लवणसमुद्रके समान कुत्सित भोगभूमि हैं ।। १८१ ।। पुलिन्द, नाहल-पक्षियोको पकडनेवाले पारधी, आदि शब्दसे शक, यवन, शवर आदिक कर्मभूमिज म्लेच्छ हैं । वे कर्मभूमिज म्लेच्छ पापकर्म करनेमे प्रीति रखते हैं । हमेगा दुष्ट होनेसे दुर्गतिमे जानेवाले हैं ।। १८२ ।। - -७ १८७) सिद्धान्तसार (१७९ सर्वार्थसिद्धिसोधकप्रापकस्य सुकर्मणः । दु.कर्मणस्त्वधोभूमिप्रापकस्य समाश्रयः ॥ १८३ यास्ताः कर्मभुवो शेया. शेषा भोगकभूमिका. । कर्ममात्राभिसस्थानं जगत्सवं निगद्यते ॥ १८४ पड्विधस्य महापापकर्मण कर्मभूमय । संस्थान पात्रदानादि सुमहाकर्मणोऽपि च ॥ १८५ समस्तकर्मणा मोक्ष भन्या कुर्वन्ति यत्र वा । नान्यस्मिन्नत एवासी कर्मभूमिनिगद्यते ॥ १८६ फर्मभूमावपि प्राप्य मानुषत्व सुदुर्लभम् । ही मोहान्धतमश्छन्नो नात्मानमधियास्यति ॥१८७ (कर्मभूमिका म्वरूप । )- सर्वार्थसिद्धिस्पी प्रासादकी प्राप्ति करनेवाले शुभकर्मका बच जहा होता है तथा जो सप्तमनरक- भूमिकी प्राप्ति करानेवाले दुष्कर्मका बध करानेवाली है उमे कर्मभूमि कहते है । तात्पर्य यह है, कि सर्वार्थसिद्धिकी प्राप्ति करनेवाली तथा तीर्थकरत्व महाऋद्धिको उत्पन्न करनेवाले असाधारण शुभ कर्मका वध जीवको कर्मभूमीमेही होता है । अन्यत्र ऐसा उत्कृप्ट शुभ कर्मवध नही होता । तथा अप्रतिष्ठान नरकभूमिमे ले जानेवाला अत्यत अशुभकर्म कर्मभूमीमे ही जीव उपाजित करते हैं । अन्यत्र अत्यत तीन अशुभकर्मका वध नही होता । क्योकि कर्मवध जो होता है वह द्रव्य, क्षेत्र, काल और भावकी अपेक्षामे होता है। कर्मभूमिमेही उत्कृष्ट शुभाशुभ कर्मवध होने योग्य द्रव्य, क्षेत्र, काल, भावोका मयोग होता है अन्यत्र नही । तथा मसारकारण कर्मोकी निर्जरा भी यहाही होती है। अत एव भरतादि क्षेत्रोकोही आचार्योने कर्मभूमि कहा है ।। १८३ ।। उपर्युक्त कर्मभूमिका लक्षण जिनमे है उनको कर्मभूमि कहते हैं । वाकीकी भूमियाँ भोगभूमियाँ कही है। यद्यपि आठ प्रकारके कर्मबंध सर्व मनुष्यक्षेत्रोमे साधारण हैं । तथापि विगिप्ट कर्मवधकी अपेक्षामे यहा कर्मभूमिका लक्षण किया है, तथा वह लक्षण देवकुरु, उत्तरकुरु विरहित समस्त विदेहक्षेत्र, भरतक्षेत्र और ऐरावतक्षेत्रमे चला जाता है। अत उनकोही कर्मभूमि कहना चाहिये । बाकीके स्थान भोगभूमि स्वरूप है, क्योकि सपूर्ण जगत् सामान्यतया कर्मवधनका स्थान है ॥ १८४ ॥ असि, मपि, कृपि, विद्या, वाणिज्य और गिल्प ऐसे छह प्रकारके महापाप उत्पन्न करनेवाले कर्मोकी प्रवृत्ति कर्मभूमिमेही देखी जाती है । तथा देवपूजा, गुरूपासना, स्वाध्याय, मयम, तप और दान ऐसे छह शुभ कर्मोंमे प्रवृत्तिभी इस कर्मभूमिमेही देखी जाती है । यहाही सपूर्ण कर्मोका नाश कर भव्य मोक्षप्राप्ति कर लेते हैं । अत भरतादि क्षेत्रोकोही कर्मभूमि कहना चाहिये । अन्यत्र जीवनके पट्कर्म, देवपूजादि शुभ षट्कर्म, और कर्मनिर्जरा तथा कर्ममुक्तता नहीं होती है । अत ऐसे देवकुरु, उत्तरकुरु, हैमवत, हरिवर्ष, रम्यक, हैरण्यवत , आदि क्षेत्रोको भोगभूमिही कहते है ॥ १८६ ॥ कर्मभूमिमेभी मनुष्यपना प्राप्त करके मोहान्धकारसे व्याप्त होकर मनुष्य अपने आत्माकी प्राप्ति नहीं करता है यह बात उसको दूपणास्पद है ॥ १८७ ।। १ आ मधियस्यति ।

१८०) सिद्धान्तसार (७. १८८- पल्योपमत्रयं तावन्नृणामायुरथोत्तमम् । जघन्यं जायते तेषामान्तर्मुहूर्तकं पुनः ॥ १८८ व्यावहारिकमायं स्यादुद्धाराख्य द्वितीयकम् । अद्धापल्यं तृतीयं तदिति पल्यत्रयं मतम् ॥ १८९ व्यवहारैकहेतुत्वादुत्तरस्यादिमं मतम् । व्यवहारेकपल्यं तदर्थेनैव च केवलम् ॥ १९० उद्धाराख्यं द्वितीयं स्याल्लोमच्छेदैस्तदुध्दृत । भवत्येव यतस्तस्याप्यन्वर्थः स्फुट एव हि ॥ १९१ अद्धाकालस्थितिर्यस्माज्जायते तत्त्वगोचरः । इत्यन्वर्थबलात्तस्याप्यद्धापल्यत्वमीरितम् ॥ १९२ प्रमाणाङ्गुलसम्भूतयोजनकप्रमाणतः । दीर्घावगाहविष्कम्भः कुसूलः पल्यमिष्यते ॥ १९३ ( मनुष्यकी उत्कृष्ट तथा जघन्य आयु ।)- मनुष्योकी उत्कृष्ट आयु तीन पल्योपम हैं, तथा उनकी जघन्य आयु अन्तर्महूर्तकी होती है ॥ १८८ ।। -- 1 ( पल्योपम- सख्याका निर्णय । )- पल्यके तीन भेद है, व्यवहार पल्य, यह पहला पल्य है, दूसरा पल्य उद्धार नामक है, तथा तीसरा पल्य अद्धापल्य है। ऐसे तीन पल्य जैन शास्त्रमे माने है ॥ १८९ ॥ पहला पल्य आगेके पल्योके व्यवहारका कारण होनेसे व्यवहारपल्य नामसे कहा जाता है । अत उसका नाम अन्वर्थक है ।। १०० ॥ दूसरे पल्यका नाम 'उद्धार पल्य' ऐसा है, क्योकि उससे निकाले गये लोमच्छेदोंसे द्वीपसमुद्र संख्याका निर्णय किया जाता है । इसलिये 'उद्धारपल्य' यह नाम अन्वर्थ है, सो स्पष्टही है ।। १९१ ॥ अद्धा- कालको अद्धा कहते है । इससे स्थितिका- कालका निर्णय होता है। इसलिये यह अद्धापल्य नाम तत्त्वगोचर- यथार्थताका विषय है । अन्वर्थता होनेसे इसकोभी अद्धापल्य कहते हैं ।। १९२॥ (व्यवहारपल्यका स्वरूप । )- प्रमाणडगुलोंसे उत्पन्न हुए योजनके प्रमाणसे जिसकी दीर्घता अवगाह और विष्कंभ- विस्तार है ऐसा एक कुसूल गडहा खोदना चाहिये । उसको पल्य कहते है । स्पष्टीकरण- आठ यवमध्योका एक उत्सेधागुल होता है । इस उत्सेधागुलको पाचसौ सख्यासे गुणनेसे प्रमाणागुल होता है । यह प्रमाणागुल अवसर्पिणीमे प्रथम चक्रवर्तीका आत्मागुल माना जाता है । उस आत्मागुलसे चक्रवर्तीके समयोके ग्राम नगरादि-प्रमाणको निर्णय होता है । इतर समयमे जो मनुष्योका आत्मागुल होता है उससे ग्रामनगरादि प्रमाणका निर्णय होता है । जो प्रमाणागुल है, उससे द्वीपसमुद्र, जगतीवेदिका, पर्वत, विमान, नरकप्रस्तार, आदिक अकृत्रिम द्रव्योके दीर्घता, विस्तार आदि जाने जाते हैं । इस प्रमाणागुलसे उत्पन्न हुए योजनके द्वारा किया हुआ एक प्रमाण योजनके अवगाहका, एक प्रमाण योजन दीर्घतासे युक्त और एक प्रमाण योजन विस्तारवाला ऐसा गड्ढा खोदना चाहिये उसे पल्य कहते है ॥ १९३॥ - .

-७ २०३) सिद्धान्तसार (१८१ तदहर्जाविलोमानच्छेदै. पूर्ण धनीकृतम् । व्यवहारमिदं' पल्य कथ्यते यतिनायक. ॥ १९४ एफेफलोमसकर्षाध्वृते वर्षशते शते । यावद्रिक्तं भवेत्पल्य स च पल्योपमो मतः ।। १९५ असख्याताब्दकोटीना यावन्त समया पुन । तावन्मात्रपरिच्छिन्नतल्लोमच्छेदसम्भृतम् ॥१९६ उद्धाराख्य मत पल्यं समये पूर्णता ततः। एककस्मिन्हृते लोम्नि यावद्रिक्तं प्रजायते ॥ १९७ स सर्वोपि मत कालो हयुद्धार. पल्यसज्ञक । कोटीकोटयो दर्शतेषां उद्धार सागरोपमः ॥१९८ अर्द्धतृतीयसख्याना उद्धाराणा भवन्ति ये रोमच्छेदाश्च तावन्त' कथ्यन्ते द्वीपसागरा. ॥ १९९ पुनरुद्धारपल्यस्य रोमच्छेदै. प्रजायते । शताब्दसमयच्छिन्नरद्वापल्यं प्रपूरितम् ॥ २०० एककस्मिन्हते तस्मिन्समये समये ततः । यावद्रिक्त भवेत्सोऽयमद्धापल्योपमो मत ॥ २०१ कोटिकोटयो दर्शतेषा स्यादरा सागरोपमः । कोटिकोटयो दर्शतेषा एका स्यादवसर्पिणी॥२०२ तथवोत्सर्पिणी जेया यस्यामुत्सर्पण सदा । सर्वेषा हि पदार्थानामायुरुत्सेधपूर्विणाम् ॥ २०३ जिनको जन्म लेकर एक दिन हुआ है ऐसे मेपोके केशाग्रोमे- जिनका पुन टुकड़ा नही होता है ऐसे केगाग्रोंसे वह गड्ढा दृढतया भरना चाहिये तब उसको यतिनायक व्यवहारपल्य कहते हैं ॥ १९४ ॥ ( व्यवहारपत्योपमका लक्षण। )- सौ वर्ष बीतनेपर एक रोमान निकालना चाहिये। पुन' सौ वर्ष समाप्त होनेपर दूसरा लोमान निकालना चाहिये, पुन सौ वर्ष समाप्त होनेपर, तिसरा, इस प्रकार लोमान निकालते निकालते जब वह गड्ढा जितने कालसे पूर्ण रिक्त होता है उतने कालको व्यवहारपल्योपम कहते है ।। १९५ ॥ ( उद्धारपल्योपमका लक्षण। )-पुन असख्यात वर्ष-- कोटियोके जितने समय होते हैं उतने समयोसे परिगणित एक एक मेपकेगाग्रोसे भरा हुआ जो गड्ढा उसको उद्धारपल्य कहते हैं । वह उद्धारपल्य पूर्ण भरनेपर एक समयमे एक रोमान निकालना चाहिए, पुन एक समयमे एक रोमान निकालना चाहिए, इस प्रकारसे निकालते निकालते जब वह गड्ढा जितने कालसे खाली हो जाता है-रिक्त होता है उतने बडे कालको उद्धारपल्योपम कहा जाता है। दश कोटि कोटि उद्धारपल्योपमोका एक उद्धारसागर होता है। ढाई उद्धारसागरोपमोंके जितने रोमच्छेद होते है उतने इम मध्यलोकमे द्वीप और समुद्र है ।। १९६-१९९ ।। ( अद्धापन्योपम अवसर्पिणी और उत्सर्पिणीका लक्षण । )- सौ वर्षोंके जितने समय होते है उतने टुकडे उद्धार पल्यके एक एक रोमच्छेदके करने चाहिये। और ऐसे रोमच्छेदोसे वह अद्धापल्य भरना चाहिये। इसके अनतर एक एक समयमे एक एक रोमच्छेद वहासे निकालना चाहिये । ऐमा निकालते निकालते जब वह रिक्त होगा तव उस कालको उसे अद्धापल्योपमकाल कहते हैं। दस कोटी कोटी अद्धापल्योपमोका एक अद्धासागरोपम होता है । और दस कोटीकोटी २ आ मकहते ३ मा ममये ममये तत ४ मा सज्ञिक १ आ वै व्यावहारिक पल्य १८२) सिद्धान्तसार (७. २०४- अवसर्पणतस्तेषामेवाभाण्यवसर्पिणी। तस्याः कालकलाषट्कं सुषमासुषमादयः ॥ २०४ कोटीकोटयश्चतस्रः स्युः सुषमासुषमादयः । सुषमासुषमाकालः सर्वसौख्यकरो नृणाम् ॥ २०५ कोटीकोट्यस्तथा तिस्रः सुषमाकाल इष्यते । सुषमादुःषमाकाल: कोटीकोटिद्वयं मतः॥२०६ दुष्षमासुषमाकालः कोटिकोटिनिंगद्यते । द्विचत्वारिंशता हीनः सहस्राणां हि कोविदः ॥२०७ एकविंशतिरुग्दीता सहस्राणां हि दुःषमा । तथातिदुःषमाकालो' बहुदुःखप्रदो नृणाम् ॥ २०८ उत्सपिण्यास्तथा चैते षटकालाः सम्प्रकीर्तिताः। अतीवदुष्पमा आधा सुषमासुषमान्तिका॥२०९ नारकतिर्यग्देवानां मनुष्याणामनेन च । अद्धापल्येन फर्मायु कालस्थितिरुदीर्यते ॥ २१० तिरश्चामायुरुत्कृष्ट त्रिपल्योपममीरितम् । अन्तर्मुहूर्तकं तेषां जघन्यं मुनिनायकैः॥ २११ उत्सेधः परमो नृणा क्रोशानां त्रितयं मतम् । अङगुलासङख्यभागश्च जघन्यो मध्यमः परः॥११२ अद्धासागरोपमकालकी एक अवसर्पिणी होती है। उत्सर्पिणीकालका परिमाणभी दस कोटीकोटी अद्धासागरोपमकाल है। दोनो मिलकर अर्थात् वीस कोटीकोटी अद्धासागरोपमकालको एक कल्पकाल कहते है। जिसमे सर्व पदार्थोकी आयु, ऊचाई, आदि गुण बढते है उस कालको उत्सर्पिणीकाल कहते है, तथा ये जिसमे कम कम होते है उसे अवसर्पिणीकाल कहते है। इस कालके सुषमासुषमादिक छह भेद है । पहला सुपमासुषमाकाल मनुष्योको सर्व प्रकारके सुखोको देनेवाला है । यह काल चार कोटीकोटी सागरोपमवर्षोका है। तीन कोटीकोटी सागरोपमकाल सुषमा नामका है । सुषमादु षमानामका काल दो कोटीकोटी सागरोपमोंका है और दुषमासुषमा- नामक काल एक कोटीकोटी सागरोपमवर्षोंका है । मात्र उसमेसे वियालीस हजार वर्ष कम करने चाहिये ऐसा विद्वान् लोग कहते है । उसमे दुषमाकाल इकईस हजार वर्षोंका है और अतिदुष- माकालभी इतनाही है और वह मनुष्योको अतिशय दुखप्रद है । उत्सर्पिणीके छह काल कहे है, परन्तु उसमे अतिदुषमा पहला भेद है और सुषमासुषमा यह अन्त्यका' अर्थात् छठा भेद है ॥ २००-२०९॥"- (अद्धापल्यसे कौनसी वस्तुओकी गणना की जाती )- नारकी, तिर्यञ्च, देव और मनुष्य इनकी अद्धापल्यके द्वारा कर्मस्थिति, भवस्थिति, आयु स्थिति और शरीरस्थिति जानने योग्य होती है ।। २१०॥ (तिर्यञ्चोकी उत्कृष्ट और जघन्य आयु। )- तिर्यञ्चोकी उत्कृष्ट आयु तीन पल्योपम है ऐसा मुनिनायक कहते हैं और उनकी जघन्य आयु अन्तर्मुहूर्त परिमाण की है ।। २११ ॥ (मनुप्योकी उत्कृष्ट और जघन्य ऊचाईका कथन )- मनुष्योकी उत्तम ऊंचाई तीन कोसोकी है । और जघन्य ऊंचाई अडगुलासख्यात भाग है और मध्यम ऊचाई अनेक प्रकारकी है ॥ २१२॥ - १ r im - --- १ आ मेषा २ आ स ३ आ दुखमा ७ आ अतीव दुखमा या सा सुखमासुखमान्तिका ६ आ दुखमा ४ आ दुखमा ८ आ मोहूर्तिक ५ आ दुखमा ९ आ मत -७ २२१) सिद्धान्तसार (१८३ मत्स्यानां पूर्वकोट्येका परमायु प्रकोतितम् । फर्मभूमिगतानां च तथैव मुनिपुङ्गवै. ॥ २१३ वर्षाणां च सहस्राणि चत्वारिंशद्विस्तरा । सर्पाणां च परं प्रोक्तमायुरायविजितः ॥२१४ द्विसप्ततिसहस्राणि' पक्षिणामायुरुत्तमम् । कथयन्ति जिनाघोशा विविधागमपारगाः ॥२१५ लवणाम्बुधिमध्यस्थमत्स्यदेह प्रमाणत । योजनान्यप्टसंयुक्तदर्शतानि मतो जिन. ॥ २१६ नदीमुखेषु सर्वेषु पुनरेतत्प्रमाणत । योजनानि नववाहुविश्वतत्त्वविचारका ॥ २१७ पत्रिंशद्योजनान्याहुः कालोदे मत्स्यविग्रहम् । अण्टादश नदीद्वारे प्रमाणाद्यतिनायकाः ।। २१८ स्वयम्भूरमणे सन्ति मत्स्या. सहस्रकायिका २ । अन्ये पञ्चशतान्येते परमोत्सेघधारिण.॥२१९ मसूरिकाकुशाग्रस्थविन्दुसूचिपताफिन । पृथ्व्युदकाग्निवाताश्च सस्थानेन निरूपिता ॥ २२० नानासस्थानसयुक्ता हरित्कायात्तथा त्रसा । अव्यक्तहुण्डसंस्थानानारका. कथिता जिनः ॥ २२१ (मत्स्योकी उत्कृष्ट आयु । )- कर्मभूमिगत मत्स्योकी उत्कृष्ट आयु पूर्व कोटीकी है ऐसा श्रेष्ठ मुनियोने कहा है ।। २१३ ।। (सर्पोकी उत्कृप्ट आयु। )- आयुकर्मरहित तीर्थंकर परमदेवोने सर्पोकी आयु चौरासी हजार वर्पोकी कही है ।। २१४ ।। (पक्षियोकी उत्कृष्ट आयु। )- नानाविध आगमोके पारगामी जिनेश्वरोने पक्षियोकी आयु वहात्तर हजार कही है ।। २१५ ।। (मत्स्योकी गरीगवगाहनाका वर्णन । )- लवणसमुद्रके मध्यमे रहनेवाले मत्स्योका गरीरावगाहन अठारह योजनप्रमाणका है ऐसा जिनेश्वरोने कहा है । विश्वतत्त्वका विचार जिन्होने किया है ऐने गणधरोने गगादि नदियोके मुखमे रहनेवाले मत्स्योकी शरीरावगाहना नीयोजनप्रमाणकी कही है । कालोदसमुद्रमे मत्स्योकी शरीरावगाहना छत्तीस योजनोकी है। गगादिनदियोके मुग्वमै अठारह योजनांकी मत्स्यशरीरोकी अवगाहना है। स्वयभूरमणसमुद्रमे मत्स्य हजारयोजनोके रहते हैं और नदियोके मुखमे पाचसी योजनोकी अवगाहनावाले मत्स्य है ऐसा यतिनायकोने कहा है ॥ २१६-२१९ ॥ (पृथ्वीजलादिकोका आकार । )- पृथ्वीजीवका आकार मसूरके समान है । जलका आकार दर्भानके ऊपरकी जलविन्दु समान, अग्निका आकार सूईयोंके समूहके समान, वातका आकार पताकाके समान है ।। २२० ॥ ( वनस्पति त्रम और नारकियोका आकार । )- वनस्पति और त्रसोके आकार नाना- विध है । तथा नारकियोका आकार हुट सस्थानका है ऐसा जिनेश्वरोने कहा है । अर्थात् नार- कियोके शरीरका आकार अव्यक्त टेडामेडा अनेक प्रकारका होता है, वीभत्स होता है ।।२२१॥ - १ मा सप्तत्यब्दमहस्त्राणि २ आ माहम्बिकान्तरा १८४) सिद्धान्तसार (७ २२२- उत्कर्षेणैव जायन्ते ज्योतिय॑न्तरभावनाः । मिथ्यादृशस्तपोदानयुक्ताअपि सुनिश्चितम् ॥ २२२ ब्रह्मलोकावधि कृत्वा तापसानां परा गतिः । मिथ्यात्वबलयुक्ताना न पुरस्तात्कदाचन ॥ २२३ जीविकाया निमित्त ते जिनलिगं समाश्रिताः। तन्मिथ्यात्वममुञ्चन्तो ब्रह्मवतसमन्विता.॥२२४ यदि यान्ति मृताः स्वर्गसहस्रारं न चाग्रतः। ततोऽन्यलिङ्गिना नास्ति समुत्पत्तिः कदाचन ॥२२५ दर्शनज्ञानचारित्रत्रयाज्ञामात्रधारिणः । उत्कृष्टतपसा यान्ति यावद्गवेयकं परम् ॥ २२६ निम्रन्थ श्रावकाणां च समुत्कर्षात्प्रजायते । आरणाच्युतदेवानामुपपादो मनोरमः ॥ २२७ दर्शनज्ञानचारित्रत्रितयस्यैकधारकाः । निर्ग्रन्था एव जायन्ते पचानुत्तरत्तिनः ॥ २२८ ये मिथ्यात्ववशात्प्राप्ता देवत्वमतिनिन्दितम्।आ ऐशानाच्च्युतास्तेऽमी गच्छन्त्येकेन्द्रियेषु च।।२२९ ततः पर सहस्राराद्यावत्ते प्रच्युताः पुनः । अनन्तरभवे यान्ति तिर्यडमानवयोनिषु ॥ २३० ततः पर सुधर्मेण पूर्व वा स्वर्गगामिनः । तस्माच्च्युता मनुष्येषु तिर्यक्ष न कदाचन ॥२३१ (मिथ्यादृष्टियोकी उत्पत्तिका निर्णय । )- मिथ्यादृष्टि जीव तप करनेपर और दान देनेपरभी निश्चयसे उत्कृष्ट ज्योतिष्क, व्यन्तर और भवनवासि देवोमे उत्पन्न होते है। जो मिथ्यादृष्टि तापसी साधु. है वे मिथ्यात्वसहित ब्रह्मस्वर्गतकही जन्म लेते है । उनकी उत्कृष्ट गति वहातकही है। उसके आगे कभीभी उनकी उत्पत्ति नही होती है ।। २२२-२२३ ।। जिन्होने जीविकाके निमित्त जिनलिंगका आश्रय किया है, जो मिथ्यात्वको नही छोडते हुए ब्रह्मचर्य व्रतके धारक है, वे यदि मरनेके बाद स्वर्गमे जाते है तो सहस्त्रारस्वर्गतक जायेगे, उसके आगे अन्यलिंगियोकी उत्पत्ति कदापि नही होती है ।। २२४-२२५ ।। दर्शन, ज्ञान और चारित्र इस रत्नत्रयकी आज्ञा फक्त धारण करनेवाले मुनि उत्कृष्ट अवेयकतक जन्म ग्रहण करते है ।। २२६ ॥ (निग्रंथ मुनि और श्रावक इनकी उत्पत्ति)- निग्रंथ मुनि और श्रावक इनका उत्कर्षसे मनोहर जन्म आरण अच्युत देवोमे होता है। सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्रके धारक ऐसे निम्रन्थही पचानुत्तरपर्यन्त उत्पन्न होते है ।। २२७-२२८ ॥ जिन्होने मिथ्यात्व वश होकर ऐगान स्वर्गतक निन्दित देवत्व प्राप्त किया है, वे आयुष्य समाप्ति होनेपर एकेन्द्रियोमे उत्पन्न होते हैं । तथा जो मिथ्यादृष्टि जीव सहस्रारस्वर्गतक देव होकर उत्पन्न हुए है, वे'जब वहासे आयु समाप्त होनेपर च्युत होते हैं, तब अनन्तरभवमे तिर्यच अथवा मनुष्यभवमे जन्म धारण करते है ॥ २२९ ॥ जिन्होने पूर्वभवमे सुधर्मसे-रत्नत्रयसे स्वर्ग प्राप्त किया है, वे आयुष्य समाप्त होनेपर वहासे च्युत होकर मनुष्योंमे जन्म धारण करते है, वे तिर्यचोमे कदापि जन्म धारण नहीं करते ॥ २३० ॥ लोकके भेदस्वरूपी तिर्यग्लोकका किञ्चित् वर्णन मैंने किया है। अब ऊर्ध्व लोकके आश्रयसे किञ्चित् वर्णन करना चाहता हू ॥ २३१ ॥ - १ आ ये २ आ सम्यग्दर्शनचारित्रत्रितयस्यक -७. २३४) सिद्धान्तसार (१८५ तिर्यग्लोकगता किञ्चित्कृतालोकस्य वर्णना। अचलोकाश्रिता तावत्साम्प्रतं साविधीयते॥२३२ इत्याद्यनेकभवगर्तविवर्ततियोनिवनादि विचरन्नपि जीव एष । नाद्यापि भङगमलमङ्ग समाकलय्य जनेश्वर श्रयति हा किमिहातनोमि ।। २३३ जनेश्वरं मतमिहाप्य च सिद्धवोधाः शृण्वन्ति साधु कलयन्ति विचारयन्ति । ये ते जगत्रयशिर शुभशेखरत्वमात्मन्यनन्तसुखमाशु निमापयन्ति ।। २३४ इति श्रीसिद्धान्तसारसङग्रहे पण्डिताचार्यश्रीनरेन्द्रसेनविरचिते 'मध्यलोकविचारणानिरूपणं समाप्तम् सप्तमः परिच्छेदः । ? पूर्वमे कहा हुमा जो ससाररूपी गडहा वही भौरारुपी जो चौरासी हजार योनि उनमे यह जीव अनादि कालसे भ्रमण कर रहा है। हे जीव | यह ससार अद्यापि नष्ट नही होता ऐसा जानकर तू जिनेश्वरका मतका आश्रय कर । हे जीव । अव मै इससे अधिक तुझे क्या कहू जिनका ज्ञान निर्मल है ऐसे जो भव्य जीव जिनेश्वरका मत प्राप्त करके उसे मुनते हैं, घारण करते हैं और उसका विचार करते है, वे जगत्रयको सुखदायक ऐसे जिनमतमे स्थिर रहकर शुभकार्योमे शेखररूप- अर्थात् श्रेष्ठ ऐसा अनन्त सुख आत्मामे प्राप्त करते हैं ।। २३३-२३४ ।। श्रीपडिताचार्य नरेन्द्रसेनविरचित सिद्धान्तसारसङग्रहमे मध्यलोकविचारणाका निरूपण करनेवाला सातवा अध्याय समाप्त हुमा । २ आ 'पण्डित' इति नास्ति ३ आ मध्य इति नास्ति १ आ जीवस्य SS 24 . अष्टमः अध्यायः। देवा निकायभेदेन जायन्तेऽत्र चतुविधाः । यतो दीव्यन्ति सर्वत्र तन्नामाभ्युदये सति ॥ १ भावना व्यन्तरास्तस्माज्ज्योतिष्का कल्पवासिनः । चतुविधा भवन्त्येते विविद्धिसमन्विताः॥२ कृष्णा नीला च कापोता पीता चैव तथा पुनः। आदितस्त्रिषु देवानां लेश्याः समुपवर्णिताः ॥३ भावना दशधा देवा व्यन्तराश्चाष्टधा मताः।ज्योतिष्काः पञ्चधा कल्पवासिनो द्वादशप्रमाः॥४ - आठवा अध्याय (ऊर्ध्वलोक वर्णन तथा देव निरुक्ति।)-इस लोकमे निकायोके भेदसे देव चार प्रकारके होते हैं। देवगतिनाम कर्मका उदय होनेसे जो सर्वत्र क्रीडा करते हैं उनको देव कहते हैं। स्पष्टीकरण- जो अभ्यन्तर कारण देवगतिनाम कर्मका उदय और वाह्य कारण जो कान्ति ऐश्वर्यादिक उनसे द्वीप, समुद्र, सरोवर, पर्वतादि स्थलोमे यथेष्ट क्रीडा करते है उनको देव कहते हैं ॥शा (देवोके चार भेद । )- भावन- भवनवासी, व्यन्तर, ज्योतिष्क और-कल्पवासी ऐसे ये देव चार प्रकारके होते हैं । इनमे अणिमा, महिमा आदि नाना प्रकारकी विक्रिया ऋद्धिया होती हैं । स्पप्टीकरण- अणिमा- अतिशय छोटा गरीर बनाना। महिमा- मेरूसेभी वडा गरीर बनाना । गरिमा- वज्रसेभी अधिक वजनवाला शरीर वनाना । लघिमा- वायुसेभी हलका शरीर बनाना । प्राप्ति- जमीनमे खडे होकर अंगुलीके अग्रभागसे मेरुशिखर सूर्यादिकोंको स्पर्श करना । प्राकाम्य- जमीनपर जैसा गमन करते है वैसा पानीमे गमन करना । पानीमे जैसा उन्मज्जन निमज्जन करते हैं वैसा भूमिमे करना। ईगित्व- त्रैलोक्यके ऊपर प्रभुत्व रखना। वगित्व- सर्व जीवोको वश करना । अप्रतिघात-पर्वतमे आकागके समान गमनागमन करनेका सामर्थ्य रहना । अन्तर्धान- अदृश्यरूप धारण करना । कामरूपित्व-युगपत्- एक कालमे अनेक आकारके रूप प्रगट करनेका सामर्थ्य होना । ऐसी अनेक प्रकारकी ऋद्धिया देवोको प्राप्त होती हैं ।। २ ।। ( राजवार्तिक आर्या म्लेच्छाश्च सूत्रका भाष्य ) (पहिलेके तीन निकायोके देवोमे लेग्याये।)- प्रथमके तीन निकायोंमे-भवनवासी, व्यन्तर और ज्योतिष्क देवोमे कृष्ण, नील, कापोत और पीत ये चार लेश्याये है ॥ ३ ॥ स्पप्टीकरण- लेश्याका स्वरूप पूर्व अध्यायमे कहा गया है । कृष्णलेश्यावालेके लक्षण कृष्णलेश्यावाला जीव तीन क्रोधी, वैरको न छोडनेवाला, लडनेका स्वभाव धारण करनेवाला, धर्म और दयासे रहित, और किसीके वश न होनेवाला होता है । नील लेश्यावाला जीव मद, कार्य करनेमे विवेकरहित, कलाचातुर्य- रहित, इन्द्रियलंपटी, मानी, कपटी, अतिशय निद्रालु और दूसरोको ठगानेमे अतिदक्ष, धनधान्योंम तीव्र अभिलापी होता है । कापोत लेश्यावाला जीव- दूसरेके ऊपर रोष करनेवाला, निन्दा करनेवाला, भययुक्त और शोक करनेवाला, दूसरेके ऐश्वर्यादिक सहन नहीं करनेवाला, अन्योंका तिरस्कार करनेवाला, स्वप्रशसा करनेवाला, दूसरोके ऊपर विश्वास न करनेवाला, तथा प्रगसकोंको धन देनेवाला होता है।

-८८) सिद्धान्तसार (१८७ असुरादिकुमारास्ते नागविद्युत्कुमारका । सुपर्णाग्निकुमाराश्च तथा वातकुमारका. ॥५ स्तनितोदधिसवीप दिक्कुमारा भवन्त्यभी । भावना भवनावासास्तसामान्यविशेषतः॥६ किन्नराः किम्पुरुषाश्च व्यन्तरास्ते महोरगाः । गन्धर्वाश्च तथा यक्षा राक्षसा भीमविग्रहाः॥७ भूताश्चेति' पिशाचाश्च विविधान्तरवासिन । यतोऽमी व्यन्तरास्तस्मानिगद्यन्ते मनीषिभिः ॥८ पीतलेश्यावाला- कार्य अकार्यको समझता है, सेव्य असेव्यको जानता है। सबके विषयोमे समदर्शी, दया और दानमे तत्पर, और कोमलपरिणामी होता है। पद्मलेग्यावाला- दानशील, भद्रपरिणामी, उत्तम कार्य करनेवाला, क्षमाशील तथा मुनि, गुरु आदिकी पूजामे तत्पर होता है। शुक्ललेश्यावाला- पक्षपात नही करता है, निदान नही वाधता है, समदर्शी होता है, इण्टसे राग और अनिष्टमे द्वेष नही करता है। पहले तीन निकायोके देवोकी कृष्णादिक चार लेश्याये भावलेश्याये हैं। द्रव्यलेश्याये इन देवीकी भिन्न भिन्न हुआ करती है । भावलेश्याके अनुसार द्रव्यलेश्याये इनकी नही होती हैं। (भवनादि देवोके प्रभेद । )- भवनवासी देव दश प्रकारके, व्यन्तर देव आठ प्रकारके, ज्योतिष्क देव पाच प्रकारके और कल्पवासी देव वारह प्रकारके हैं ॥ ४॥ (भवनवासियोके दश प्रकार । )- असुरकुमार, नागकुमार, विद्युत्कुमार, सुपर्णकुमार, अग्निकुमार, वातकुमार, स्तनितकुमार, उदधिकुमार, द्वीपकुमार, और दिक्कुमार ऐसे भवनवासी देव दश प्रकारके हैं । स्पष्टीकरण-सामान्यकी अपेक्षासे इन दश प्रकारके देवोको 'भवनवासी देव' कहते है और विशेषकी अपेक्षासे असुरादि भेद है। मूलकर्म देवगति नाम है। उसके अन्तर्भेद भवनवास्यादि चार हैं , तथा असुरादिक विशेष सज्ञाये हैं, और वे विशिष्ट नामकर्मो- दयसे प्राप्त हुई हैं । अत. ये सब भेद देवगति- नामकर्मके हैं । अर्थात् इस गतिनामकर्मके असख्यात भेद होते है । इन सर्व देवोकी आयु और स्वभाव निश्चित होनेपरभी कुमारावस्था- वालोके समान उद्धतवेप, भाषा, आभरण, आयुध, यान वाहनादिक रहते हैं। रागक्रीडामे इनको अत्यत रुचि रहती है । इसलिये इनको कुमार कहते है ॥ ५-६ ॥ (व्यतरोके अवान्तर भेद ।)- किन्नर, किंपुरुप, महोरग, गधर्व, यक्ष और भयानक शरीरवाले राक्षस, भूत और पिशाच ये आठ भेद व्यतरोके है । व्यतर यह इन देवोकी सामान्य सज्ञा है। विविध देशोमे इनके निवासस्थान है इसलिये इनको व्यन्तर कहते है। इनके जो किन्नरा- दिक आठ भेद कहे हैं वे किन्नर नामकर्मोदय, किंपुरुष नामकर्मोदय, महोरग नामकर्मोदय इत्यादिकसे उत्पन्न हुए है । ये सव देवगति नामकर्मके विशेष भेद हैं ऐसा विद्वान् लोग कहते है ।। ७-८ ॥ १ आ श्चते १८८) सिद्धान्तसार (८. ९- सूर्याचन्द्रमसौ तस्माद्ग्रहनक्षत्रतारकाः । ज्योतिःस्वभावरूपत्वाज्ज्योतिष्का कथिता जिनः॥९ तारकाणां विमानानि शतानि सप्तसंयुताः। नवतिश्च जिनः प्रोक्ता योजनानि महीतलात् ॥१० अस्मादेव समाद्भूमिविभागाद्योजनानि च । नवत्यामा शतान्यूध्वं सप्त सन्ति सुतारकाः॥११ दर्शव योजनान्यूध्वं ततः सूर्याश्चरन्ति ते । ततोऽशीति परित्यज्य तवं शीतभानवः ॥ १२ नक्षत्राणि च विद्यन्ते योजनानां त्रये ततः । योजनत्रितयं गत्वा ततोऽप्यूवं बुधाश्रयाः॥ १३ योजनत्रितये शुक्रास्तवं त्रितये पुनः । बृहस्पतिविमानानि विद्यन्ते शोभनानि च ॥ १४ अङगारकास्तद्वं ते योजनानां चतुष्टये । विचरन्ति ततोऽप्यूध्वं तथैते च शनैश्चराः ॥ १५ ज्योतिर्ग्रहगणाकीर्णप्रदेशो नभसो मतः । दशाधिकशतं तावद्योजनानां स विस्तरात् ॥ १६ तिर्यक्पुनः स विज्ञेयस्तिर्यग्लोकप्रमाणतः । मेरुप्रदक्षिणा नित्यगतयस्ते नृमण्डले ॥ १७ एकविंशतिसंयुक्ताः शतकादशयोजन । मेरुं त्यक्त्वा ममन्त्यत्र ज्योतिष्कानमणान्विताः ॥१८ आभियोगिफदेवौघेरामानविमानकै । तैरेव क्रियते सर्वः कालोऽयं व्यावहारिकः ॥ १९ ( ज्योतिष्क देवोके अवान्तर भेद । )- सूर्य, चन्द्र, ग्रह, नक्षत्र और तारका ये पाच प्रकारके देव ज्योति स्वभाववाले होनेसे ज्योतिष्क देव कहे जाते है । सूर्य, चद्र, ग्रह- शुक्र, बुध, अश्विनी आदिक सज्ञाविशेष नामकर्मोदयसे उत्पन्न होते है, ऐसा जिनेश्वरोने कहा है।॥ ९ ॥ तारकाओके विमान इस समान भूमिभागसे ऊपर सातसौ नब्बे योजन आकाशमे ऊंचे जानेपर सुशोभित है ऐसा जिनेश्वरोने कहा है ।। १०-११ ॥ इनके ऊपर दश योजन जानेसे सूर्य भ्रमण करते हैं । तदनन्तर अस्सी योजन पुनः ऊपर जानेपर चन्द्र भ्रमण करते है। उनके ऊपर तीन योजन जानेपर नक्षत्र फिरते है । पुन तीन योजनोपर जानेसे बुधोके स्थान हैं । पुन तीन योजनोपर शुक्र है । पुन तीन योजनोपर बृहस्पतिके विमान है । उनके ऊपर चार योजन क्षेत्र जानेसे अगारक - मगल भ्रमण करते हैं। उसके ऊपर चार योजन जानेसे शनैश्वर विहार करते है। इस प्रकार ज्योतिष्क देवसमूहसे आकाशप्रदेश व्याप्त हुए है, अर्थात् एकसौ दस योजनप्रमाणका आकाश इन्होने व्याप्त किया है। इतने आकाशके विस्तारमे ज्योतिर्गण है । तथा आसमन्तात् तिर्यग्लोकप्रमाण आकाशमे ज्योति- मंडल है। ये सब ज्योतिष्क देव मडलाकारसे मेरुको प्रदक्षिणा देते है और इनका घूमना सतत चलता है । ये ज्योतिष्क देव ग्यारह सौ इक्कीस योजनतक मेरुको छोडकर उसके आसपास भ्रमण करते है ॥ १२-१८ ॥ आभियोग्य देव, ज्योतिष्क देवोके-सूर्य, चद्र, ग्रह, नक्षत्र और तारकाओके विमान लेकर घूमते है तथा वे ही सर्व व्यावहारिक काल समय, आवली, घटिका, मुहूर्त, प्रहर, दिन, पक्ष, माम आदिक रूप कालको उत्पन्न करते हैं ॥ १९ ॥ 1 १ आ मुक्त्वा २ आ भ्रमन्त्येते ३ आ आभीतियोगिर्दैव ४ आ वैवहारिक .

-८ २९) सिद्धान्तसार (१८९ नृलोकान्ते बहिर्भागे सर्वे तावदवस्थिताः । विद्यन्ते प्रस्फुरज्ज्योति प्रकाशितदिगन्तराः ॥ २० जम्बूद्वीपे मतं प्राजे सूर्यचन्द्रद्वयं द्वयम् । ते चत्वारश्च चत्वारो लवणाम्भोधिध्यगा. ॥ २१ आदित्याश्च तथा चन्द्राश्चत्वारिंशद्विरत्तरा । कालोदाम्बुधिमध्यस्था निगद्यन्ते मनीषिभिः॥२२ द्वादश द्वादश प्राश्चन्द्रादित्या निवेदिताः । धातकीखण्डमध्यस्था. परमोद्योतकारिणः ॥ २३ सप्ततिधिकाप्रोक्ता पुष्कराद्धेऽतिविस्तृते। चन्द्राणां भास्कराणां च तमस्तोमापहारिणाम् ॥२४ जम्बूद्वीपान्तरेऽशीतिर्योजनाना तथा शतम् । लवणाम्भोनिघौ त्रिंशत्सहित च शतत्रयम् ॥ २५ चारक्षेत्रमिद तावत्प्रथितं चन्द्रसूर्ययो । समुदायेन पञ्च स्युः शतानि दशभि. समम् ॥ २६ चतुभिरधिकाशीति शतमादित्यवर्त्मनाम् । पंचदशैव चन्द्रस्य कथितास्तत्र तद्विदै ॥ २७ जम्बूद्वीपान्तरे तत्र सङक्रान्ती कर्कटस्य च । दक्षिणायनसंरंभे ह्यादिमार्गेण गच्छतः ॥ २८ आदित्यस्य विमानस्थ जिनविम्वमिहाद्भुतम्।ज्ञात्वायोध्यास्थितश्चक्रो'भरतोऽर्घ प्रयच्छति॥२९ (ढाई द्वीपके बाहरके ज्योतिप्क देव स्थिर हैं। )- मनुष्य लोकके वाहरके सर्व ज्योतिष्क देव स्थिर विद्यमान है, तथा स्फुरायमान कान्तिके द्वारा उन्होने सव दिशाये उज्ज्वल की है ॥२०॥ (ढाई द्वीपोमे चन्द्र और सूर्योकी सख्याका वर्णन । )- जम्बूद्वीपमे दो चन्द्र और दो सूर्य हैं ऐसा विद्वानोने माना है । लवणसमुद्रके मध्यमे चार चद्र और चार सूर्य है। कालोदसमुद्रके मध्यमे वयालीस चन्द्र ओर बयालीस सूर्य है । धातकीखडके मध्यमे उत्तम प्रकाश करनेवाले वारह चद्र और बारह मूर्य है । अतिशय विस्तृत पुष्करार्द्धद्वीपमे वहत्तर चद्र और वहत्तर सूर्य हैं । अधकार नष्ट करनेवाले चद्र और सूर्योकी इस प्रकार ढाई द्वीपमे सख्या कही है ।।२१-२४॥ (जम्बूद्वीपमे और लवणसमुद्रमे चद्रसूर्योका चारक्षेत्र)- जम्बूद्वीपमे चद्र-सूर्योंका चारक्षेत्र एकसी अम्मी योजनोका है । तथा लवणसमुद्रमे चन्द्र-सूर्योंका चारक्षेत्र तीनसौ तीस योजनोका है । इस प्रकार चन्द्रसूर्योका चारक्षेत्र दोनोका मिलकर समुदायसे पाचसौ दस योजनोका होता है । सूर्योके मार्ग एकसौ चौरासी हैं और चद्रके मार्ग पद्रह हैं, ऐसा ज्योतिर्विदोका कथन है ।। २५-२७ ॥ (कर्कटसङक्रान्तिमे सूर्य पहिले मार्गपर आता है।)- जम्बूद्वीपके मध्यमे कर्कटसक्रान्तिके समयमे दक्षिणायनका आरभ होता है। उस समय पहिले मार्गसे गमन करनेवाले सूर्यके विमानमे जो अद्भुत जिनर्विव है, उसे अयोध्यामे तिप्ठा हुआ भरत चक्रवर्ती अर्घ्य देता है। तवसे सभी ३ आ वध्या १ आ तमम्तोमापमारिणाम् २ आ पचदर्शव १९०) सिद्धान्तसार. (८ ३०- १ ततः प्रभृति लोकोऽयमादित्यर्घ प्रयच्छति । परमार्थमजानन्तस्तत्र' जनेश्वरं महः ॥ ३०. योजनानां सहस्राणि नवतिश्चतुरुत्तरा । पञ्चविंशतियुक्तानि तथा पञ्चशतानि च ॥३१ दक्षिणायनसरंभे ह्याद्यमार्गावलम्बिन. । रवेर्धर्मस्य विस्तार. पौर्वापर्येण सम्मतः ।। ३२ अप्टादशमुहूर्त.स्यादिवसस्तत्र विस्तृतः । रात्रि दशभि. प्रोक्ता मुहूर्तस्तत्प्रकर्षतः ॥ ३३ तन्मुहूर्तद्वयस्यैकषष्टिभागीकृतस्य च । भागको हीयते तस्माद्दिवसं दिवसं प्रति ॥ ३४ क्रमादातपहानौ च सडक्रान्ती मकरस्य च । यावत्पयोनिधावन्त्ये मार्गे सूर्योऽधिगच्छति ॥३५ सहत्राणां त्रिपष्टिः स्याद्योजनानि तु षोडश । तत्रादित्यविमानस्य धर्मविस्तार इण्यते ॥ ३६ द्वादशभिर्मुहूतः स्याद्दिनं रात्रिस्तु जायते । अष्टादशमुहूर्तश्च जघन्येनोत्तरायणे ॥ ३७ कोटिकोटिस्तु षट्षष्टिः सहस्राणि तथा नव । शतानि पञ्चसप्तत्या समं चन्द्रस्य तारकाः॥३८ अण्टाशीतिम्रहाणां च नक्षत्राण्यटविंशतिः । इत्येवं परिवारोऽपि चन्द्रस्यकस्य कय्यते ॥ ३९ सर्वज्योतिविमानानां पीष्ठर्द्धकपित्यवत् । तस्योपरि तथा सन्ति प्रासादाश्च यथाभवम् ॥४० लोगभी सूर्यको अर्घ्य देने लगे । सूर्यविमानमे जिनर्विव है और उसको भरतचक्रवर्ती पूजता है, अर्घ्य देता है इस परमार्थ अभिप्रायको लोगोने नही जाना ।। २८-३० ॥ (पहले मार्गपर आनेसे सूर्यका प्रकाश कितने योजन फैलता है ? )- दक्षिणायनके प्रारभमे जब सूर्य प्रथम मार्गका आश्रय लेता है तव सूर्यका जो प्रकाश आगे और पीछे फैलता है उसका विस्तारप्रमाण चौरानवे हजार पांचसौ पच्चीस योजनोका होता है ॥ ३१-३२ ।। (दक्षिणायनमे रात्रि और दिनका प्रमाण।)- दक्षिणायनके प्रारभमे अठारह मुहूर्तांका दिवस होता है और रात्रिका प्रमाण दिनका प्रकर्ष होनेमे वारह मुहूर्तका रह जाता है ।। ३३ ।। तदनतर दो मुहूर्तके इकसठ भाग करने चाहिये और प्रत्येक दिनमे एक एक भाग कम कम होता जाता है। इस प्रकार क्रमसे सूर्यके प्रकागकी हानि होती जाती है और मकर- सङक्रान्तिके समयमे जब सूर्य लवणसमुद्रके अन्त्यमार्गमे चला जाता है, तव सूर्यके विमानका प्रकागविस्तार त्रेसप्ट हजार सोलह योजन प्रमाणवाला होता है । और उस समय दिन बारह मुहूर्तका होता है और रात्रि अगरह मुहुर्तकी होती है । अर्थात् उत्तरायणके प्रारंभमे दिन रात्रिकी जघन्यतया ऐसी परिस्थिति होती है ।। ३४-३७ ॥ (चन्द्रके तारका, नक्षत्र, ग्रहादिपरिवारका वर्णन 1 )- एक चन्द्रका तारकापरिवार हजार नौ सौ पचहत्तर कोडाकोडी है । तथा ग्रहोका परिवार अठासी और नक्षत्रोंका अट्टाईस है ।। ३८-३९ ॥ ( देखो ति प भाग २ अ ७ गाथा ७१ पृ. ६६१ ) सपूर्ण ज्योतिविमानोंका तलभाग आवे कैथके समान है और उसके ऊपर यथायोग्य प्रासादोकी रचना है ।। ४०।। छचार ----- ----- १ आ.अजानान २ आ तु ३ आ. अभिगच्छति ४ आ. दिवमो ५ आ.सु ६ मा भवेत -८ ५१) सिद्धान्तसार (१९१ सर्वोऽपि वर्तुलाकारो गोलको मिलितोऽपि स.। मध्याह्ने वा परालेवा पूर्वाह्ने वृत्तदर्शक ॥ ४१ मानुषोत्तरशैलाद्या विद्यन्ते द्वीपवेदिका. । तस्या सहस्रपञ्चाशद्योजनानि पयोनिधौ ॥ ४२ वलयाकारसत्पङक्त्या क्षेत्र वेष्टय समन्तत.आदित्याश्च तथा चन्द्रा.सर्वे तिष्ठन्ति निश्चला ॥४३ चतुभिरधिका तावच्चत्वारिशच्छतं तथा । मन्त्यत्र वलये सर्वचन्द्राश्च वहुशोभना. ॥ ४४ लक्षे लक्षे तत. सन्ति योजनानां गते सति । सूर्याणा च तयेन्दुनां वलयानि ययाक्रमम् ॥ ४५ परं विशेष एवायं वलये वलये स्वतः । सूर्याश्चन्द्राश्च चत्वारो वर्द्धन्ते यावदष्टमम् ॥ ४६ अण्टमाच्च पुनस्तस्मात्प्रथम वलय भवेत् । आधाद्विगुणसूर्येन्दुसहितं साधवो जगुः ॥ ४७ लक्षे लक्षे तत. सन्ति वलया' येषु केवलं । सूर्याश्चन्द्राश्च वर्द्धन्ते चत्वारो यावदन्तिमम् ॥ ४८ स्वयम्भूरमणाम्भोघेर्वहिर्या वजवेदिका । तावत्पर्यन्त एवाय ज्योतिष्कक्रम' इष्यते ॥ ४९ एकपल्योपम. कालस्तेपा समधिक. कियान् । आयुरुत्कृष्टमाख्यातं तदष्टाशो जघन्यकम् ॥५० एकापष्टिविभागा ये योजनस्य विभाजिता । षट्पञ्चाशद्विभागास्ते विमाना रोहिणीपते ॥५१ -- सर्वज्योतिप्क देवके विमान वर्तुलाकार गोलकरूप है । तथा मध्याह्नमे, अपराह्लमे और पूर्वाह्लमे वे गोलही दिखते है ।। ४१ ।। मानुपोत्तर पर्वतसे आगे जो द्वीपोकी वेदिकायें हैं उनमे पचास हजार योजनके अन्तर- पर चन्द्र और सूर्योके वलय हैं । तथा मानुषोत्तर पर्वतके आगे जो जो समुद्र हैं उनमेभी पचास पचास हजार योजनोके अन्तरपर चन्द्रसूर्योंके वलय हैं और वे उतना उतना क्षेत्र वेप्टित करके रहते है । सपूर्ण वलयोमेसे प्रत्येक वलयमे एकसौ चवालीस चन्द्र और सूर्य है । तदनन्तर एक एक लाख योजन अन्तर चलकर जानेमे सूर्य और चन्द्रके क्रमसे वलय होते है। परतु विशेषता यह है, कि प्रत्येक वलयमे चार चन्द्र और चार सूर्य वढते है । ऐसा वढना आठवे वलयतक होता है। आठवे वलयके अनतर पुन पहिला वलय होता है और वह वलय-प्रथम वलय दुगुने चन्द्र और सूर्योसे सहित होता है ऐसा मुनिराज कहते हैं । फिर एक एक लाख योजनके फासलेपर एक एक वलय होता है । और उसमे चार सूर्य और चार चन्द्र प्रतिवलयमे वढते जाते है। यह वढना स्वयभूरमण समुद्रकी जो वाहरकी वज्रवेदिका है वहातक है ऐसा ज्योति क्रम समझना चाहिये ॥ ४२-४९ ॥ (ज्योतिप्क देवोका उत्कृष्ट और जघन्य आयुष्य । )- ज्योतिष्क देवोकी उत्कृप्ट आयु एक पल्योपम और कुछ अधिक है और जघन्य आयु पल्योपमका अष्टमाग है ॥ ५० ॥ (चन्द्रके विमानका प्रमाण । )- योजनके इकसठ विभाग करके उनमेमे छप्पन विभागोका जो प्रमाण होगा उतने प्रमाणवाले चन्द्रोके विमान होते है ।। ५१ ।। स्पप्टीकरण-चद्रके विमानोका विस्तार और दीर्घता ऊपर वताये हुए प्रमाणका अनुसरण करते है । और उनके विमानकी मोटाई योजनके इकसठ भागोमेसे अठाईस भागप्रमाण है। ये १ मा वलयान्येषु २ आ ज्योतिपा ३ आ एकपप्टि १९२) सिद्धान्तसार (८. ५२-- चत्वारिंशन्मतास्तावदष्टाधिकतया पुनः । विभागास्तादृशा एव विमानं भास्करस्य च ।। ५२ अन्यदागमत सर्व ज्ञातव्यं चन्द्रसूर्ययोः । दिडमानं तदिदं किञ्चिनिर्लज्जेन मयाकथि ॥ ५३ भावनव्यन्तराणां च विमानाः' कथिताः पुरा । आयुरुत्सेधसौख्यादि ज्ञातव्य पुरतः पुनः॥ ५४ आदौ मध्ये तथान्ते च द्वादशाष्टौ चतुष्टयम्।योजनानि तु विस्तीर्णा चत्वारिंशत्तथोच्चका॥५५ या मेरुचूलिका रम्या तस्या उपरि शोभनं ऋज्वाख्यं सद्विमान स्यात्केशाग्रान्तरितं महत् ॥५६ तद्विमान विद्यायादौ मेरु मध्ये विधाय च । सौधर्मेशानयोर्युग्मं विचित्राश्चर्यकारकम् ॥५७ साधैंकरज्जुमानं यन्मेरुशैलात्सुशोभनम् । आकाशक्षेत्रमस्त्येव तत्पर्यन्तं विभाव्यते ॥ ५८ सार्धंकरज्जुपर्यन्तं ततःस्यायुगलं पुनः । सनत्कुमारमाहेन्द्रस्वर्गयोनिगदन्ति तत् ॥ ५९ विमान सोलह हजार देवोके द्वारा धारण किये जाते है । इस विमानके पूर्वादिक दिशाओमे चार चार हजार देव सिंह, हाथी, अश्व और बैलके रूप धारण करके इस विमानको धारण करते हैं। (सूर्योके विमानोका प्रमाण )- सूर्योंके विमान योजनके इकसठ भागोमेसे अडतालीस भागप्रमाणके हैं। योजनके इकसठ भागोमेसे छप्पन भाग चन्द्रके विमानके हैं । और सूर्यके विमा- नके विभाग ऊपर कहे है। स्पष्टीकरण- सूर्यके विमान तप्तसुवर्णके समान हैं, लोहित्तमणिमय और अर्धगोलकाकार है । सोलह हजार देव क्रमसे विमानके पूर्व, दक्षिण, पश्चिम और उत्तर भागमे सिंह, हाथी, वैल और अश्वके रूप धारण करके विमानको वहते हैं ॥ ५२ ।। चन्द्र और सूर्यके विपयमे इतर अनेक बाते आगमसे जानने योग्य है। यहां निर्लज्ज होकर अर्थात् अज्ञान होकरभी मैने थोडासा कहा है ।। ५३ ॥ भावनदेव और व्यन्तरदेवोके विमान पूर्वमे कहे है। आयुष्य, शरीरकी ऊचाई, सुख आदिकोका वर्णन आगे ज्ञातव्य हैं ॥ ५४ ।। (ऋजुविमान मेरुचूलिकाके ऊपर है । )- जो मेरुपर्वतकी रम्य चूलिका चालीस योजनोकी ऊची है । तथा वह आरभमे बारह योजन विस्तीर्ण है, मध्यमे आठ योजन विस्तीर्ण है और अन्तमे चार योजन विस्तीर्ण है । इस चूलिकाके ऊपर महान् ऋजुनामक विमान है और वह चूलिकासे एक केशान अन्तरपर है ।। ५५-५६ ।। ( सौधर्म ऐशान आदिक स्वर्गयुगलोका वर्णन । )- ऋजुविमानको आरभ कर और मेरुको मध्यमे कर सौधर्मशान स्वर्गके युगल विचित्र और आश्चर्यकारक हैं । मेरुपर्वतसे ऊपर जो डेड रज्जुपर्यन्त आकाशक्षेत्र है वहातक सौधर्मशान-स्वर्गका युगल है । इसके ऊपर डेड रज्जु- पर्यन्त आकाशक्षेत्रमे सानत्कुमार माहेन्द्र स्वर्गका युगल है, ऐसा आचार्य कहते है ॥ ५७-५९ ।। १ आ निवासा २ आन्नता ३ आ ऋत्वाख्यम् ४ आ मेरुमध्ये ५ आ शुभसयुतम् -८ ७०) सिद्धान्तसार ३ (१९३ ततो रज्ज्वर्षपर्यन्त ब्रह्मब्रह्मोत्तराभिधम् । स्वर्गयुग्मं हि विस्तीर्ण कीर्तयन्ति क्रियाविदः॥६० ततो रज्ज्वर्द्धपर्यन्त स्वर्गयोर्युगल महत् । चारुलान्तवकापिष्टसज्जयोनिगदन्ति तत् ॥ ६१ ततो रज्ज्वर्षपर्यन्त स्वर्गयोयुगल महत् । अस्ति शुक्रमहाशुक्राभिधान चारतान्वितम् ॥ ६२ ततो रज्ज्वर्षपर्यन्त स्वर्गयोर्युगल महत् । सच्छतारसहस्रारसज्ञया प्रथित भवेत् ॥ ६३ ततो रज्ज्वर्षपर्यन्त स्वर्गयोयुगल महत् । आनतप्राणताह स्यात्सर्वसौख्यकर वरम् ॥ ६४ ततो रज्ज्वर्धपर्यन्त स्वर्गयोयुगल महत् । आरणाच्युतसज्ञ यद्विद्यते विस्मयावहम् ॥ ६५ आये युग्मद्वये तत्र तन्नामानः सुशोभनाः । इन्द्राश्चत्वार एवामी विज्ञेया ऋद्धिसयुताः ॥ ६६ तवं सिद्धिसोपानस्वर्गयुग्मचतुष्टये । प्रत्येकमेक एवेन्द्रस्तन्नामासौ निगद्यते ॥ ६७ तवं च' युगद्वन्द्वे इन्द्राश्चत्वार एव च । सर्वे' स्वर्गेषु जायन्ते द्वादशैते समासतः ॥ ६८ एकरज्ज्वन्तरे तस्मादूर्ध्वग्रेवेयफानि च । ततश्चानुदिशान्याहुनवानुत्तरपञ्चकम् ॥ ६९ द्वादशयोजनान्यस्मादूर्व मुक्तशिला मता । अष्टयोजनबाहुल्या नृलोकपरिमाणतः ॥ ७० उसके अनन्तर अर्थात् सानत्कुमारमाहेन्द्र - स्वर्गयुगलके अनतर आधी रज्जुपर्यन्तके आकाशप्रदेशमे ब्रह्मब्रह्मोत्तर-स्वर्गका युगल है । इसके अनन्तर अर्घ रज्जु-प्रमित आकाश- प्रदेशोमे लान्तवकापिष्टका युगल है, इसके अनन्तर अर्धरज्जुपर्यन्तके आकाशप्रदेशमे शुक्र महा- शुक्र नामक सुदर स्वर्गयुगल है। उसके अनन्तर अर्धरज्जु-प्रमित आकाशप्रदेशमे शतारसहस्रार- युगल है । तदनतर अर्घ रज्जुप्रमाण आकाशमे आनत-प्राणत नामक स्वर्गयुगल है, जो कि उत्तम और सर्व सुखोका आगर है । इसके अनतर आधे रज्जुके आकाशप्रदेशमे आरणअच्युत नामक महान् स्वर्गयुगल है, जो कि जीवोको अपनी रचनासे आश्चर्यचकित करता है ॥ ६०-६५ ॥ (सोलह स्वर्गामे अधिपति इद्रोका वर्णन । )- पहले दो युगलोमे अर्थात् सौधर्मसे सानत्कुमारतक चार स्वर्गोमे सौधर्मादि स्वर्गके नामवाले शोभायुक्त चार इद्र हैं। वे महद्धिके धारक है। उनके ऊपर सिद्धि-मुक्तिके पैडी के समान चार स्वर्गयुगलोमेसे प्रत्येकमे स्वर्गके नामवाला एक एक इन्द्र है । ब्रह्म ब्रह्मोत्तर स्वर्गमे ब्रह्मेन्द्र नामक इन्द्र है। लान्तव और कापिष्ठ स्वर्गमे लातवेन्द्र है । शुक्रमहाशुक्रमे शुक्रेन्द्र है और शतारसहस्रारमे शतारेन्द्र हैं । ऐसे चार इन्द्र हैं । इनके ऊपर आनतादि दो स्वर्गयुगलमे चार इन्द्र हैं । ऐसे सर्व स्वर्गोमे-सोलह स्वाँमे बारह इन्द्र है ।। ६६-६८ ॥ (एकरज्जु प्रदेशमे नववेयकादिक और सिद्धजीव हैं।)- एकरज्जुके अन्तराल रूप आकाशप्रदेशमे नवग्रेवयक विमान, नवअनुदिश विमान, और पचानुत्तर विमान हैं । पञ्चानुत्तरके ऊपर द्वादश योजन जानेपर मुक्तिशिला है । वह आठ योजन मोटी और मनुष्यलोकके समान . १ आ तु २ आ हि ३ आ. सर्व ४ मा मोक्ष SS.25 १९४) सिद्धान्तसार (८ ७१- तस्या उपरि यत्तावद्वातत्रयमुदीर्यते । तनुवातेऽत्र तिष्ठन्ति सिद्धा लोकारवर्तिनः ॥ ७१ भावनानां जघन्येन जीवितं कथितं जिनः । दशवर्षसहस्राणि सागरोपममुत्तमम् ॥ ७२ तत्रासुरकुमाराणां सागरोपममीर्यते । पल्यत्रयं तु नागानां सार्घपल्यद्वयं पुनः ॥७३ सुपर्णेषु मतं द्वीपकुमारेषु द्वयं तथा । सार्घपल्य च शेषेषु परमायुरिति ध्रुवम् ॥ ७४ दशवर्षसहस्राणि व्यन्तराणां जघन्यकम् । साधिकं पल्यमुत्कृष्टं जीवितं विविधात्मनाम् ।। ७५ उत्कर्षतो मतं चन्द्र जीवितं लक्षसंयुतम् । पल्यमेकं सहस्रेण सहितं तद्धि भास्करे ॥ ७६ सौधर्मशानयोरायुः साधिकं पल्यमीरितम् । जघन्यं हि तदुत्कृष्टं साधिकं सागरद्वयम् ॥ ७७ सानत्कुमारमाहेन्द्रयुगले जीवितं परम् । साधिकं कथितं जैन. सागरोपमसप्तकम् ॥ ७८ ब्रह्मब्रह्मोत्तरे युग्मे साधिका दशसागराः । गिरन्ति गरिमायुक्ता गुरवो गुरुसंयमाः ॥ ७९ ततो लान्तवकापिष्ठयुग्मे जीवितमुत्तमम् । चतुर्दशाधिकाः किञ्चित्तथते सागरोपमाः ।।८० आयुः शुक्रमहाशुक्रयुगले परमं मतं । सागरा साधिकाः किञ्चित्षोडश क्षिप्तकल्मषः ॥ ८१ . पैतालीस लाख योजन विस्तारवाली है। इसके ऊपर जो तीन वातवलय कहे गये हैं उनमें अन्तिम तनुवातमें -लोकके अग्रभागमे सिद्धपरमेष्ठी विराजमान हैं ।। ६९-७१ ।। ( भवनवासी और व्यन्तरोके आयुका वर्णन । )- भवनवासी देवोका जघन्य आयुष्य जिनोने दस हजार वर्षोका और उत्कृष्ट आयुष्य सागरोपम वर्षाका कहा है । असुरकुमारोंकी आयु सागरोपम है । नागकुमारोंकी आयु तीन पल्योंकी है । ढाई पल्योपम आयु सुपर्णकुमारोकी है। द्वीपकुमारोकी आयु दो पल्योपमकी है तथा शेष छह कुमारोकी आयु डेड पल्योपमकी है । ऐसा भवनवासियोके उत्कृष्ट आयुका क्रम कहा है ॥ ७२-७४ ।। अनेक स्वभाव धारण करनेवाले व्यंतरोकी जघन्य आयु दस हजार वर्षांकी है और उत्कृष्ट नायु एक पल्य और कुछ अधिक कही है ।। ७५ ॥ (चद्रसूर्योकी उत्कृप्ट आयु । )- चन्द्रकी उत्कृष्ट आयु एक पल्य और एक लाख वर्षकी है । तथा सूर्यकी आयु एक पल्य और एक हजार वर्षोंकी है ।। ७६ ।। (सौधर्मादि अच्युतान्त देवोकी जघन्य और उत्कृष्ट आयु । )- सौधर्म और ऐगान स्वर्गके देवोकी जघन्य आयु एक पल्य और कुछ अधिक है । और उत्कृष्ट आयु दो सागर और कुछ अधिक है । सानत्कुमार और माहेन्द्र स्वर्गके देवोकी उत्कृष्ट आयु सात सागरोपम वर्षोकी और कुछ अधिक है ऐसा जैनोने-गणघरादिकोने कहा है। ब्रह्म और ब्रह्मोत्तर स्वर्गके देवोंकी उत्कृप्ट आयु दस सागरसे कुछ अधिक है ऐसा महान् संयम धारण करनेवाले प्रभावशाली गुरु कहते हैं । तदनन्तर लान्तव और कापिष्ठ स्वर्गमें देवोकी उत्तम आयु चौदह सागरोंसे कुछ अधिक कही है । जिन्होंने पापविनाग किया है ऐसे महापुरुषोने शुक्र और महाशुक्र स्वर्गके देवोंकी उत्तम आयु सोलह सागरोंसे कुछ अधिक कही है ।। ७७-८१ ॥ - -८ ८८) सिद्धान्तसार (१९५ शतारे च सहनारे ते चाण्टादशसाधिका । आनतप्राणतद्वन्द्वे जीवित विशति परम् ॥ ८२ आरणाच्युतयुग्मे तद्द्वाविंशतिमुदीरितम् । एकक वर्द्धते तस्मान्नवनैवेयकेषु च ।। ८३ नवस्वनुदिशेष्वेतत् द्वात्रिंशत्परम मतम् । अनुत्तरेषु सर्वेषु त्रयस्त्रिशन्नदीशिन ॥८४ पूर्वस्वर्गे यदुत्कृष्टं जघन्य हि तदुत्तरे। मुक्त्वा सर्वार्थसिद्धि च तस्यामुत्तममेव तत् ॥ ८५ प्रतरादिषु सर्वेषु विशेषो यस्तु कश्चन । सर्वो लोकानुयोगात्स ज्ञातव्यो नात्र गौरवात् ॥८६ इन्दन्त्यपरदेवानामसाधारणवृत्तित । आजैश्वर्यगुणोपेता इन्द्रास्ते गदिता जिन. ॥ ८७ 'सप्तधातुविनिर्मुक्ता गुरूपाध्यायवत्सदा । आयुर्वीर्यादिभिस्तेषां समा सामानिका मता ॥८८ शतार और सहस्रार स्वर्गके देवोकी उत्तम आयु अठारह सागरोपमसे कुछ अधिक कही है । तथा आनत प्राणत स्वर्गाके देवोकी उत्तम आयु वीस सागरोपमकी कही है । आरण और अच्युत स्वर्गोमे देवोकी उत्तम आयु वाईस सागरोपमोकी होती है । तदनतर नववेयकोमे एक एक सागर आयु बढती है, अन्तिम नववे अवेयकमे एकत्तीस सागरोपमकी उत्कृष्ट आयु है और नव अनुदिगोमे वत्तीस सागरोपमकी उत्तम आयु है । तथा सर्व अनुत्तरोमे अर्थात् विजय, वैजयत, जयत, अपराजित और सर्वार्थसिद्धिमे तेत्तीस सागरोपम उत्तम आयु है ।।८२-८४।। (स्वर्ग, नवग्रेवेयक, नवानुदिश तथा सर्वार्थसिद्धिके विना चार अनुत्तरोमे जघन्य आयुका वर्णन।)- पूर्व स्वर्गमे जो उत्कृष्ट आयु होती है वह उत्तर स्वर्गमे जघन्य होती है ऐसा क्रम सर्वार्थसिद्धिको छोडकर चार अनुत्तर विमानोतक समझना चाहिये । जैसे सौधर्म स्वर्गमे उत्कृष्ट दो सागर आयु है वही सानत्कुमार माहेन्द्र स्वर्गके देवोकी जघन्य समझनी चाहिये । आरणाच्युत देवोकी उत्तम आयु वाईस सागर है वही प्रथम वेयककी जघन्य आयु समझनी चाहिये । नौवेवेयकको उत्तम आयु इकत्तीस सागरकी है वह अनुदिशोमे जघन्य समझना। अनुदिशोकी वत्तीस सागर आयु उत्कृप्ट है वह चार अनुत्तरोमे जघन्य समझे, परतु सर्वार्थ- सिद्धिमे कभी जघन्य आयुवधवाला जन्मही नही लेता है, इसलिये सर्वार्थसिद्ध देव उत्कृष्ट आयुके तेत्तीस सागर आयुवालेही होते हैं ।। ८५ ॥ सपूर्ण प्रतरादिकोमे तथा स्वर्गपटलोमे जो कुछ विशेष होता है वह सर्व लोकानुयोग ग्रथसे जानना योग्य है । यहा विस्तारके भयसे हम नही कहते है ।। ८६ ॥ ( देवोके इन्द्रादि-दश-भेदोका वर्णन । )- १ इन्द्र -इतर देवोंमे नही पाये जानेवाले असाधारण अणिमामहिमादि गुणोसे जो परमेश्वर्यवाले माने जाते है, जिनकी आज्ञा इतर देव शिरोधार्य समझते हैं, जो ऐश्वर्यगुणसे युक्त हैं ऐसे देव, जिनेश्वरके द्वारा इन्द्र कहे जाते हैं ॥८७॥ २ सामानिक देव- सब देव सप्तधातुओंसे रहित अर्थात् दिव्य शरीरवाले होते हैं, उनमे जो गुरु और उपाध्यायके समान हैं तथा जो आयु, वीर्य, परिवार तथा भोगोपभोगादि सामग्रियोसे इद्रके समान हैं परतु आज्ञा और ऐश्वर्य जिनका इन्द्रके समान नही है ऐसे देवोको सामानिक देव कहते है ।। ८८॥ . ... १ आ आनेश्वर्यविनिर्मुक्का १९६) सिद्धान्तसार. (८. ८९- पुरोहितमहामंत्रिस्थानीया ये दिवौकसः । त्रस्त्रिशत्सुसंख्यानास्त्रायस्त्रिशा भवन्त्यमी ॥ ८९ पीठमईनसङ्काशा परिषत्परिवर्तिनः । देवाः पारिषदाः सर्वे तेऽत्र संवादिनो मताः॥९० अडगरक्षसमाना ये ते सर्वे ह्यात्मरक्षकाः। लोककपालनोद्युक्ता लोकपाला भवन्त्यमी ॥ ९१ सप्तानीकभुवोऽनीका. प्रकीर्णाः पौरसन्निभाः । आभियोग्यमता दासा देवा देवगतावपि ॥ ९२ ये चान्तेवासिवन्नीचा दीनां दुर्गतिगामिनः। प्रायशो बहुदुःखार्ताः किल्बिषाः सम्प्रकीर्तिताः॥ ९३ इत्येवं दशधा देवा निकायेषु निवेदिताः। लोकपालास्त्रयस्त्रिशा न ज्योतिर्व्यन्तरेषु च ॥९४ द्वौ द्वाविन्द्रौ मतो तेषु भावनव्यन्तरेषु च । सर्वेषां ज्योतिषामिन्द्रौ सूर्याचन्द्रमसौ पुनः ॥ ९५ -- ३ त्रास्त्रिग- पुरोहित तथा महामत्रियोके समान जो देव है, तथा जिनकी सख्या तेहतीसही नियत रहती है वे त्रास्त्रिश देव है। ४ पारिषद - जो देव मित्र और हसी मस्करी करनेवालोके समान सभामे वैठते हैं, तथा जो सभामे प्रामाणिक माने जाते है, उनको पारिषद देव कहते हैं । ५ आत्मरक्ष - अगरक्षकोके समान जो देव हाथमे शस्त्र धारण कर इन्द्रके पीछे रहते हैं, उनको आत्मरक्ष देव कहते हैं। ६ लोकपाल- प्रजाके समान देवोको पालन करनेवाले देव लोकपाल कहे जाते हैं। ७ अनीक – सात प्रकारके सैन्योके समान जो देव होते हैं उनको अनीक देव कहते हैं। ८ प्रकीर्णक-- प्रजाके समान जो देव है उनको प्रकीर्णक देव कहते है। ९ आभियोग्य- देवगतिके होनेपरभी जो देव दासके समान वाहनादि वनकर उच्च देवोकी-अपने स्वामियोकी सेवा करते हैं उनको आभियोग्य देव कहते हैं। १० किल्विषिक - जो अन्तेवासियोके समान अर्थात् चाण्डालोके समान नीच हैं, दीन है तथा दुर्गतिको जानेवाले है, प्राय. वहुदु खोसे पीडित हैं उनको किल्विष कहते है। किल्विप- पाप जिनको है अर्थात् जिनको पापोका उदय है ऐसे देवोको किल्विषक कहते है ।। ८९-९३ ।। ये दश प्रकारके देव चार निकायोमे इस प्रकारसे कहे गये हैं। परतु लोकपालदेव और त्रास्त्रिशदेव ये दो प्रकारके देव भवनवासि देव और व्यतरदेवोमे नही होते हैं। भवनवासिदेव और व्यतरदेवोमे दो दो इन्द्र माने हैं। तथा संपूर्ण ज्योतिष्कदेवोके चन्द्र और सूर्य ऐसे दो इन्द्र माने गये है ।। ९४-९५ ।। स्पष्टीकरण- भवनवासी देवोंके दस भेद हैं और उनमे प्रत्येक भेदके दो दो इन्द्र है अत भवनवासियोके इन्द्र वीस हैं। व्यतरोके भेट आठ हैं तथा प्रत्येक भेदमे दो दो इन्द्र होनेसे व्यतरोके सव इन्द्र सोलह होते हैं। ।

-८ १०७) सिद्धान्तसार (१९७ आ ऐशानान्मता देवा सडक्लिष्टपरिणामतः । कायेनैव प्रवीचारं प्रकुर्वाणा मनुष्यवत् ॥ ९६ सानत्कुमारमाहेन्द्रद्वये देवा भवन्त्यमी । दिव्यदेवाङ्गनास्पर्शमात्रेणापि' सुनिर्वृताः ॥ ९७ तत कापिष्टपर्यन्ते देवा देवीविलोकनात् । परम सुखमायान्ति बहुपुण्यमनोरमा ॥ ९८ आसहस्रारमत्यन्तमधुरस्वरमात्रत । देवीना सौख्यमञ्चन्ति देवा दिव्याङ्गधारिण ॥९९ अच्युतान्तेषु सर्वेपुर तवं स्मरणादपि । देवीना टिव्यरूपाणां सुखिनः सर्वदेव' ते ॥ १०० अच्युतादूर्ध्वत सर्वे प्रवीचारविजिता । सर्वार्थसिद्धिपर्यन्त सङक्लेशापगता यत ॥ १०१ भावनेष्वसुराणा हि प्रमाणं पञ्चविंशति । धनुपाणि तु देहस्य कथितं पूर्वसूरिभिः ॥ १०२ धनू पि दश शेषाणां व्यन्तराणा च दर्शनम् । ज्योतिप्काणां च सप्तैव धनूषि कथित वपु ॥१०३ सौधर्मशानयो. सप्तहस्तो देहो निगद्यते । सनत्कुमारमाहेन्द्रयुग्मे हस्ताश्च षट् पुन ॥ १०४ तत कापिण्टपर्यन्त पचहस्ता प्रमाणत । देहमान च देवानां दिव्यरूपैकधारिणाम् ॥ १०५ आसहस्रारमस्माच्च देवाना देह उच्यते । चतुर्हस्तप्रमाणश्च स्फुरद्युतिसमन्वितः ॥ १०६ आनतप्राणतद्वन्द्वे सार्द्धहस्तप्रमाणत" । आरणाच्युतयोर्हस्तत्रयं देहो दिवौकसां ॥ १०७ . (प्रवीचारयुक्त और अप्रवीचारयुक्त देवोका वर्णन।)- भवनवासी, व्यन्तर, ज्योतिष्क देव तथा सौधर्म और ऐशान स्वर्गवासी देव ये सक्लेशयुक्त परिणाम होनेसे मनुष्योके समान गरीरकेद्वारा मैथुनसेवन करते हैं। सानत्कुमार और माहेन्द्र-स्वर्गमे जो देव हैं वे दिव्य ऐसी देवाङ्गना ओके स्पर्शमात्रसे अतिशय सुखी होते हैं। ब्रह्म, ब्रह्मोत्तर, लान्तव और कापिष्ट स्वर्गतक देव, जो कि विशाल पुण्यसे मनोहर है, वे देवियोको देखकर अतिशय सुखी होते हैं । शुक्र, महाशुक्र, शतार और सहस्रार स्वर्गतकके दिव्यागधारक देव देवियोके अत्यन्त मधुर स्वर सुनकर सुखी होते है । महनार स्वर्गके ऊपर आनत-प्राणत, आरण और अच्युत स्वर्गके देव देवियोके दिव्यरूप का स्मरण कर सर्वदा सुखी होते है । अच्युत स्वर्गके ऊपर सर्वार्थसिद्धितक जो अहमिन्द्रदेव हैं, वे प्रवीचारकाममेवामे वर्जित-रहित है अर्थात् उनके सक्लेशपरिणामोका अभाव है। क्यो कि उसके सद्भावमे कामेच्छा प्रगट होती है ।। ९६-१०१ ।। ( देवोके देहोकी उच्चताका वर्णन । )- भवनवासियोमे असुरोके देह पच्चीस धनुष्य प्रमाणके होते है ऐमा पूर्वाचार्य कहते है। नागकुमारादि नो भवनवासि देव तथा व्यतरदेवोके देहका उत्सेव दग धनुष्य-प्रमाण होता है। ज्योतिष्क देवोके शरीरकी ऊचाई सात धनुष्य प्रमाण है। सौधर्मशान स्वर्गके देवोकी गरीरकी ऊचाई सात हाथकी हैं। सानत्कुमार और माहेन्द्र स्वर्गके देवोके गरीर छह हस्तप्रमाण हैं। अनतर दिव्य-रूपकोही धारण करनेवाले कापिष्ठ स्वर्गतक देवोकी शरीरकी ऊचाई पाच हस्त प्रमाणकी है। कापिण्ठ स्वर्गके सहस्रारस्वर्गतकके सुदर, कान्तियुक्त देवोके देहकी ऊचाई चार हस्त प्रमाणवाली है। आनत प्राणत स्वर्गके देवोके शरीर साडेतीन - ४ आ मर्वप्रवीचारविजिता ५आ तथा दश १ आ दिव्या २ आ कल्पेषु ३ आ देवता ६ आ हस्ता ७आ हस्तग्रय मत -- १९८) सिद्धान्तसार. (८.१०८- अधोवेयकेषूक्तं सार्द्धहस्तद्वयं पुनः । देहमानं हि देवाना मध्यप्रैवेयके द्वयम् ॥ १०८ सार्द्धहस्तप्रमाणोऽय देहोऽभाणि पुरातनः उर्ध्वमेवेयकस्थानां देवानां श्रुतिशालिनाम् ॥ १०९ ततः परं हि सर्वेषां देवानां देह उच्यते । एकहस्तप्रमाणेन प्रमाणहर्यतीश्वरः ॥ ११० सौधर्मशानयोः पीतलेश्या देवा भवन्त्यमी। सनत्कुमारमाहेन्द्राः पीतपद्मादिलेश्यका. ॥ १११ ब्रह्मब्रह्मोत्तरे कल्पे लांतवे च तथा पुनः । कापिष्ठे सर्वदेवाः स्युः पद्मलेश्याः समन्ततः ॥११२ शुक्रे चापि महाशुक्रे शतारे सर्वसुन्दरे । सहलारे च देवानां पद्मशुक्ला' हि सा पुनः ॥ ११३ आनतादच्युतान्तेषु शुक्ललेश्या दिवौकसः । महाशुक्लकलेश्याः स्युस्ततो यावदनुत्तरम् ॥ ११४ पूर्व ग्रेवेयकेभ्यो ये देवास्ते कल्पवासिनः । कल्पातीताः परे सर्वे पुण्यपक्वफलाशिनः ॥ ११५ लौकान्तिकाश्च ते देवा ब्रह्मलोकान्तवासिनः । अथानन्तर एवामी भवे लोकान्तकारिणः ॥११६ पूर्वोत्तरविभागे ते सन्ति सारस्वता मता.२ । पूर्वस्यां हि तथादित्या आग्नेय्यामग्निसंज्ञकाः ॥११७ हस्तप्रमाण है। और आरण अच्युतके देवोके शरीर तीन हस्तप्रमाण हैं। अधोग्नैवेयकके अहमिन्द्रोके देहकी ऊचाई ढाई हाथकी है। मध्यमवेयकके देवोका देहमान दो हाथका है। कान्तिशाली ऐसे जो ऊर्ध्वग्रैवेयकके देव है उनका देह पुरातन आचार्योने डेढ हाथ प्रमाणका कहा है। तथा उसके आगेके सपूर्ण देवोका देह हस्तप्रमाण है, ऐसा देव देहप्रमाण देह यतीश्वरोने कहा है। अर्थात् नव अनुदिश और पचानुत्तरके निवासी अहमिंद्र देवोका देह एक हस्तप्रमाण है ।। १०२-११० ॥ ( सौधर्मसे सर्वार्थसिद्धितक देवोकी लेश्याये )- सौधर्मशान स्वर्गके देव पीतलेश्याके धारक है । सानत्कुमार और माहेन्द्र स्वर्गके देव पीतलेश्या और पद्मलेश्याके धारक है। ब्रह्मस्वर्ग तथा ब्रह्मोत्तरस्वर्गके देवोमे तथा लांतवकापिष्ट स्वर्गके देवोमे सर्वत्र पद्मलेश्या है। शुक्र, महाशुक्र तथा सर्वमनोरम ऐसे शतारस्वर्गमे और सहस्रारस्वर्गमे देवोंकी पद्मलेश्या और शुक्ललेश्या है। आनतसे अच्युततकके देव शुक्ललेश्यावाले है। तदनन्तर नवग्नैवेयकसे लेकर पचानुत्तरतक सपूर्ण अहमिन्द्र देव महाशुक्लरूप ऐसी एकलेश्याके धारक हैं ॥ १११-११४ ॥ ( कल्पवासी और कल्पातीत ।)- नवगैवेयकोके पूर्वके देव अर्थात् सौधर्मस्वर्गसे अच्युततकके जो देव है, उनको कल्पवासी देव कहते है। और नवगैवेयकसे पचानुत्तरतक सपूर्ण अहमिन्द्रोको कल्पातीत कहते है। ये सर्वदेव पुण्यरूपी पक्वफल भक्षण करनेवाले है ॥ ११५ ।। (लौकान्तिक देवोका स्वरूप।)- ब्रह्मस्वर्गके अन्तिम पटलमे निवास करनेवाले देवोको लौकान्तिक देव कहते हैं। ये देव अनन्तर मनुष्यभव धारण कर लोकान्तकारी-ससारका अन्त करनेवाले होते हैं। उनके सारस्वतादिक आठ भेद हैं, तथा अग्न्याभसूर्याभादि सोलह भेद है। पूर्वोत्तर दिशाके कोनेमे सारस्वत विमानमे सारस्वतनामक लौकान्तिक देव रहते है। पूर्व दिशाके १ आ पना २आ मरा.

-८ १२५) सिद्धान्तसार (१९९ अरुणा दक्षिणस्या च नैऋत्ये गर्दतोयका. । तुषिता. पश्चिमायां च 'अव्यावाधास्तदन्तरे ॥११८ उत्तरस्यामरिष्टानां विमानानि तदन्तरे । द्वौ च द्वौ च गणो शेयो विचित्राकारघारिणी ॥११९ अग्निसूर्याभनामानौ चन्द्रसत्याभनायकौ । श्रेय क्षेमडरावेतौ वृषकामचरौ वरौ ॥ १२० निर्वाणादिरजोदिव्यदिगन्तरसुरक्षितौ । आत्मरक्षितसर्वादिरक्षितौ दिव्यविग्रही ॥ १२१ मरुद्वस्वश्वविश्वौ च क्रमादन्तरवर्तिनौ । लौकान्तिकसुदेवानामिति वाचो विपश्चिताम् ॥१२२ देवानामर्चनीयास्ते सर्वे लौकान्तिकामराः। प्रतिवोधपरास्तीर्थकृतां पूर्वधरा पुनः॥ १२३ तेषामायु प्रमाणं स्यात्तदप्टौ सागरोपम । देवर्षयश्च ते सर्वे संक्लेशेन विजिताः ॥ १२४ विजयादिपु ये देवास्ते तदिद्वचरमा मता । तस्मिन्नेव भवे मुक्ताश्चयुता सर्वार्थसिद्धित ॥ १२५ आदित्य विमानमे आदित्यनामक देव रहते हैं। पूर्व-दक्षिण दिशामे-आग्नेय दिशामे अग्निनामक देव रहते हैं । दक्षिण दिशामे अरुण विमानमे अरुणदेव रहते है। नैऋत्य दिशामे गर्दतोय विमानमे गर्दतोयदेव रहते हैं। पश्चिम दिशामे तुषित देव रहते हैं। उत्तरपश्चिम दिशाके अव्यावाव विमानमे अव्यावाधनामक देव रहते हैं। उत्तर दिशाके अरिष्टनामक विमानमे अरिष्टनामक देव रहते हैं। तथा इन सारस्वतादिकोके वीचमे औरभी दो दो देवगण, जो आश्चर्यकारक आकार धारण करते हैं, रहते हैं। उनका स्पष्टीकरण इसप्रकार है- सारस्वत और आदित्यके अन्तरालमे अग्न्याभ और सूर्याभ देव रहते हैं। आदित्य और वह्निके अन्तरमे चन्द्राभ और सत्याभ देव रहते है । वह्नि और अरुणके अन्तरालमे श्रेयस्कर क्षेमकर देव रहते हैं। अरुण और गर्दतोयके अन्तरालमे वृपभेष्ठ और कामचर ये देव रहते हैं। गर्दतोय और तुषित देवोके अन्तरालमे निर्माणरज और दिगतरक्षित देव रहते हैं। तुषित और अव्यावाधके मध्यमे आत्मरक्षित और सर्वरक्षित देव रहते हैं। अव्यावाध और अरिष्टके अन्तरालमे मरुद् और वसु रहते हैं। अरिष्ट और सारस्वतोके मध्यमे अश्व और विश्व देव रहते है। ये सर्व लोकान्तिक देव देवोमे श्रेष्ठ हैं 'ऐसा विद्वान कहते हैं। ये सर्व लोकान्तिक देव देवोंके द्वारा पूजनीय है। तीर्थकरोको जव वैराग्य होता है, तव उनको प्रतिवोध करनेमे तत्पर रहते हैं। ये चौदह पूर्वोके ज्ञानको धारण करते हैं। उनके आयुका प्रमाण आठ सागरोपम वोका होता है। इनको देवर्षि कहते हैं, क्योकि ये सक्लेशपरिणामोसे रहित होते हैं ।। ११६-१२४ ।। (द्विचरम देवोका स्पष्टीकरण।)- विजय, वैजयत, जयत, अपराजित, तथा नव अनुदिश विमानवासि देव द्विचरम हैं। मनुष्यभवकी अपेक्षासे चरमत्व यहा समझना चाहिये। जिनके दो चरम देह हैं उनको द्विचरम कहना चाहिये। विजयादिकोसे च्युत होकर सम्यक्त्वसे मनुष्योंमे उत्पन्न होते हैं । पुन सयमकी आराधना कर विजयादिकोमे उत्पन्न होते हैं और पुन. वहासे च्युत होकर सम्यक्त्वके साथ मनुष्यभव धारण कर मुक्त होते हैं इसलिये वे द्विचरम - ' १ आ देव्योवावा २ आ देवगणी २००) सिद्धान्तसार (८. १२६- उपपादो' हि देवानां देवीनां च तथा पुनः । आ ईशानात्ततो नैव देवीनां ते निवेदिता. ॥ १२६ मारणाच्युतपर्यन्तं देवा गच्छन्त्यतः परम् । न गच्छन्ति न चायान्ति विज्ञेयमिति निश्चितम् ॥१२७ सस्यन्तरकुमाराणामवधिः पञ्चविंशतिः । सडख्यातयोजनान्येष ज्योतिष्काणां जघन्यतः॥१२८ असुराणामसंख्यातकोटयः शेषेषु सोऽवधिः । असंख्यातसहस्राणि ज्योतिष्काणां परो मतः॥१२९ सौधर्मशानदेवानामवधिः प्रथमावनि । सनत्कुमारमाहेन्द्राः जानन्त्याशर्कराप्रभम् ॥ १३० ब्रह्मब्रह्मोत्तरे कल्पे लान्तवे तस्य चापरे । दिव्यावधिर्भवत्येषाभातृतीयावधिर्महान् ॥ १३१ आसहनारमेतेभ्यो जायतेऽवधिरुत्तमः । चतुर्थ नरकं तावदभिव्याप्नोति निर्मल ॥ १३२ मानते प्राणते देवाः पश्यन्त्यवधिना पुरः। पंचमं नरकं यावद्विशुद्धतरभावतः ॥ १३३ आरणाच्युतदेवानां षष्ठीपर्यन्त इष्यते । अवेयकेषु सर्वेषु सप्तम्या विधितोऽवधिः ॥ १३४ देहवाले कहे जाते हैं। तथा जो अहमिन्द्र सर्वार्थसिद्धिसे यहा मनुष्यजन्म वारण करते हैं, वे उसी भवमे मुक्त होते हैं, क्योकि सर्वार्थसिद्धि यह नाम अन्वर्थक होनेसे वहाके अहमिन्द्र देव एकचरम होते हैं ।। १२५ ॥ ( देव और देवियोंका उपपादस्थान। ) - देव और देवियोंके सौधर्म ऐगान तक उपपाद जन्मस्थान है। देवोके तो सर्व स्वर्गाम उपपादस्थान है; परन्तु देवियोंके उपपादस्थान ऐनान स्वर्गके आगे नहीं है । नीचेके देव आरण अच्युतपर्यन्त जाते हैं और आते हैं, परतु उसके ऊपर ग्रैवेयकादिकोमे नीचेके देव न जाते हैं और न आते हैं ऐसा निश्चित है ।। १२६-१२७ ( भवनत्रिकमे अवविज्ञानकी मर्यादा। )- व्यंतरदेवोको पच्चीस योजनपर्यन्तका अवविज्ञान होता हैं। जहां उनके अवविज्ञानका उपयोग किया हो वहासे पच्चीस योजनतकका क्षेत्र द्रव्य, काल और भाव उनके अवविज्ञानका विषय होता है। ज्योतिप्कदेवोंका जघन्यसे अवधिज्ञान क्षेत्र संख्यात योजनोंका होता है । असुरकुमार देवोंका अवधिज्ञान क्षेत्र असंख्यात कोटि योजनोंका है । वाकी नागकुमारादिक नव भवनवासियोंका अवधिक्षेत्र असंख्यातसहन योजनोंका होता है। ज्योतिप्कदेवोंका उत्कृष्ट अवधिज्ञान असल्यात सहस्र योजनोंका है ।। १२८-१२९ ।। ( कल्पवासि और कल्पातीत देवोका अवधिनान।) - सौधर्मशानदेवोंका अवधिज्ञान- क्षेत्र पहला नरक है । वे पहले नरकमे अवधिनानसे नारकियोकी प्रवृत्तियां जानते हैं। सानत्कुमार और माहेन्द्रदेव गर्कराप्रभातक अवधिनानसे जानते हैं। ब्रह्म, ब्रह्मोत्तर, लांतव और कापिप्ट स्वर्गके देवोका महान दिव्यावधिनान तीसरे नरकतक है। शुक्र, महागुक्र, शतार और सहस्रार ऐसे चार स्वर्गके देवोंका उत्तम निर्मल अवधिज्ञान चौथे नरकको व्यापता है। आनत प्राणत स्वर्गके देव विशुद्धतर परिणामोंसे पांचवे नरकतक देखते हैं। आरण और अच्युत स्वर्गके देवोंका अवधिनान छठे नरकतक होता है। संपूर्ण ग्रेवयकोमे अवविज्ञान सातवे नरकतक होता २ देव्यो १ आ.उपपादा मा.नानत प्रापते ३ मा. न्यावालुकप्रभम् ४-५ बा. तावत, चान्तरे -८ १४२) सिद्धान्तसार (२०१ ततः परे च पश्यन्ति सर्वलोकावधि' पुनः । सम्यग्ज्ञानादिसद्धर्मप्रभावप्रभवा यतः ॥ १३५ तथा रत्नप्रभाया स नारकोऽवधिरुच्यते। योजनकप्रमाणोऽसौ कोशाई हीयते तत. ॥ १३६ शक्राग्रमहिषी शक्रलोकपालामराश्च ते । दक्षिणेन्द्राश्च लोकान्ताश्च्युता निर्वृतिगामिनः ॥१३७ आज्योतिष्काश्च ये देवास्तेऽनन्तरभवे न हि । शलाकापुरुषा ये तु केचिनिर्वृतिगामिनः ॥१३८ सम्यग्दर्शनसज्ज्ञानसच्चारित्रविभूषिताः। निघूय सर्वकर्माणि निवृति यान्ति मानवाः ॥ १३९ अनन्तसुखनिर्मग्ना जरामृत्युविवर्जिताः । अव्यावाधाश्च ते तत्र भाविनं कालमासते ॥ १४० यत्कन्दर्पसुख लोके यच्च दिव्य महासुखम् । न तन्मोक्षसुखस्यास्यानन्तभागो निगद्यते ॥ १४१ अहो धर्ममही धर्म सद्रत्नत्रयलक्षणम् । ये श्रयन्ति महाभव्यास्तेषा किमिह दुर्लभम् ॥ १४२ है। और उसके बाद नव अनुदिश और पचानुत्तरके देवोका अवधिज्ञान सर्व लोककी मर्यादा धारण करनेवाला होता है। ये सव अवधिज्ञान सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्र, तप आदिक धर्माचारसे उत्पन्न होते है। इसलिये इनमे उपर्युक्त सामर्थ्य प्रगट होता है ।। १३०-१३५ ॥ ( नारकियोका अवधिज्ञान । )- रत्नप्रभा नामक पहले नरकमे नारकियोको जो अवधिज्ञान होता है वह एक योजनतकका विषय जानता है। आगे दूसरे नरकसे सातवे नरकतक आधा आधा कोस कम होता है । अर्थात् दूसरे नरकमे साडे तीन कोस, तीसरे नरकमे तीन कोस, चौथे नरकमे ढाई कोस, पाचवे नरकमे दो कोस, छठे नरकमे डेढ कोस और सातवेमे एक कोसका होता है ।। १३६ ॥ ( एक भव धारण कर मुक्त होनेवालोका वर्णन । )- सौधर्मेन्द्र और उसकी अनमहिषी अर्थात् गची देवी, सौधर्मेन्द्रके लोकपालदेव-कुवेर, यम, वरुण और ईशान ये देव, दक्षिण दिशाके इन्द्र तथा लौकान्तिक देव ये स्वर्गसे च्युत होकर मनुष्यभव धारण करते है और वे उसी भवमे कर्मक्षयसे मुक्त होते हैं ॥१३७ ।। भवनवासी, व्यतर और ज्योतिष्क देव वे अनतरभवमे शलाका पुरुष नही होते हैं अर्थात् तीर्थंकर, चक्रवर्ती, नारायण, प्रतिनारायण और वलभद्र नही होते हैं। परतु इनमेसे कोई मनुष्यभवमे आकर मोक्षगामी होते हैं ।। १३८ ॥ ( मोक्षप्राप्ति किनको होती है । )- सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्रोसे भूषित हुए मानव सर्व कर्मोका नाश कर मुक्तिको जाते है । मोक्षमे सिद्ध हुए जीव तत्काल और भावी कालमे अनत सुखी होते है, जरामरणसे रहित होते है और वाधारहित होकर रहते है। उनका सपूर्ण भावी काल उपर्युक्त गुणोसे परिपूर्ण होता है ॥ १३९-१४० ॥ ( मोक्षसुख । )- जो जगतमे कामसुख है, तथा जो जगतमे दिव्य ऐसा महासुख है वह मोक्षसुखके अनतवे अशकाभी साम्य नही धारण करता ॥ १४१ ।। उत्तम-अतिचाररहित रत्नत्रय लक्षण-धर्म आश्चर्यकारक और प्रशसनीय धर्म है। १ आ सर्व लोकावधि २ आ सुरा ३ आ तेपा ४ आ शको ५ आ दिव्य -- ------ S.S 26 २०२) सिद्धान्तसारः (८. १४३- यदित्थमनुवादेन' किञ्चिदागमरूपतः । अविज्ञातपरार्थेन जीवतत्त्वं निरूपितम् ॥ १४३ अन्यानुवादतो नास्ति सा शक्तिर्मम वर्णने । जीवतत्त्वस्य सर्वस्याथवा ग्रन्थस्य गौरवात् ॥ १४४ सद्गुणाद्यनुवादेन जीवतत्त्वमनेकधा । यदुक्तं मुनिभिः पूर्व तन्मया कथ्यते कथम् ॥ १४५ गुणस्थानानि चत्वारि देवानां नारकेषु च । तिरश्चां पंच विद्यन्ते मनुष्येषु चतुर्दश ॥ १४६ इत्याद्यागमतः सर्व ज्ञातव्यं तत्त्ववेदिभिः। न ज्ञातुं नैव कर्तुं वा शक्तोऽहं बुद्धिवजितः ॥ १४७ ज्ञात्वा जीवमजीवं जिनवरवरवीरभाषितं जगति । हिंसासत्यादीनां परिहारो युज्यते नृणाम् ॥१४८ -..-.-.-..... . इसका जो महाभव्य आश्रय करते हैं उनको इहलोकमें कौनसी वस्तु दुर्लभ है ? सर्व उत्तम वस्तु इस श्रेष्ठ रत्नत्रयधर्मसे प्राप्त होती है ।। १४२ ॥ जिसको जीवादि-पदार्थों का ज्ञान नहीं है, ऐसे मैंने इस प्रकार अनुवादसे आगमद्वारा किञ्चित् जीवतत्त्वका निरूपण किया है । निर्देशादिक अनुयोगके आधारसे मैंने यह वर्णन किया है । सत्, संख्या, क्षेत्र, स्पर्शनादि अनुयोगोंके द्वारा जीवादितत्त्वोंका वर्णन करने में मैं असमर्थ हूं ॥ १४३-१४४ ।। उत्तम गुणस्थान, मार्गणा, जीवसमास इत्यादिक अनुवादोंकी अपेक्षासे मुनियोंने जीव- तत्त्वका अनेक प्रकारोंसे पूर्व कालमें वर्णन किया है । वैसा वर्णन करनेमें मैं समर्थ नहीं हूं।।१४५ ( चतुर्गतिमें गुणस्थान । )- देवोंमें मिथ्यात्व, सासादन, मिश्र और अविरत सम्यग्दृष्टि ऐसे चार गुणस्थान होते हैं । नारकियोंकोभी वेही चार गुणस्थान होते हैं । पशुओंको उपर्युक्त चार और पांचवा देशसंयम ऐसे पांच गुणस्थान होते हैं तथा मनुष्योंको चौदह गुणस्थान होते हैं ( इन गुणस्थानोंका वर्णन पूर्व में आया है ) ॥१४६।। ( ग्रंथकारकी नम्रता।)- तत्त्व जाननेवाले आचार्योंको गुणस्थानादिकोंका सर्व स्वरूप आगमसे जानना चाहिये । उनका स्वरूप में जाननेके लिये और कहनेके लिये असमर्थ हूं क्योंकि मैं वुद्धि रहित हूं ।। १४७ ।। जिनोंमें - मुनियोंमें वर-श्रेष्ठ ऐसे गणधरोंके नायक-स्वामी श्रीवीरप्रभुके द्वारा उपदेश गये जीव और अजीव तत्त्वोंको जानकर इस जगतमें मनुष्योंको हिंसा, असत्य भाषण, चोरी आदि पातकोंका त्याग करना योग्य होता है, अर्थात् जीवादिद्रव्योंका स्वरूप समझनेसे हिंसादिकका क्यों त्याग करना चाहिये? इस शंकाका स्पष्टीकरण हो जाता है। सम्यग्ज्ञान होनेसे जीव-राग-द्वेषादिकोंके कारण हिंसा, असत्य भाषणादिपापोंका त्याग करता है। जिससे वह चारित्रसंपन्न, रत्नत्रययुक्त होकर शुद्धात्मस्वरूपकी प्राप्ति कर लेता है ।। १४८ ।। ...... ? .......... १ आ. इत्यं गत्यनुवादेन -८. १४९) सिद्धान्तसार (२०३ सुविहितचरणः शरणे जिनवरनाथस्य करणहतवृत्तिः । न सरति स कथं पटुतामटति भवाम्भोधिसन्तरणे ॥ १४९ इति श्रीसिद्धान्तसारसंग्रहे पण्डिताचार्यश्रीनरेन्द्रसेनविरचिते गत्यनुवादद्वारे जीवतत्त्व- प्ररूपणं अष्टमोऽध्यायः॥ --- जिसने उत्तम चारित्रका पालन किया है, जो गणघरोंके स्वामी है ऐसे वीर प्रभूको जो शरण आया है, परन्तु इन्द्रियोके वश होनेसे जिसका मन चरित्रभ्रष्ट हुआ है, वह पुरुष यदि पुन चारित्रमार्गमे प्रवेश नहीं करेगा तो ससारसमुद्रके पार जानेमे कैसे समर्थ होगा? तात्पर्य-चारित्रसे रत्नत्रयपूर्ण होता है और उससे यदि जीव च्युत होगा तो वह ससारसमुद्रमे डूबे विना नही रहेगा। १४९ ॥ पडिताचार्य श्रीनरेन्द्रसेन-विरचित सिद्धान्तसारसग्रह शास्त्रमे गत्यनुवादद्वारसे जीवतत्त्वका निरूपण करनेवाला आठवा अधिकार समाप्त हुआ। - -- १ आ सत्तरणे नवमोऽध्यायः। यो जीवनगुणाज्जीवस्तस्मादन्योऽभिधीयते । अजीव इति सूत्रः सामान्येन जिनागमे ॥ १ धर्माधर्मनभःकालपुद्गला इति पञ्चधा । विशेषेण पुनः प्राजः कथितस्तत्त्ववेदिभिः ।। २ जीवपुद्गलयोयौ तौ गतिस्थितिनिवन्धनौ धर्माधर्मो तथाकाशमवकाशकलक्षणम् ॥ ३ वर्तनालक्षण. काल स च कायविजितः । परे पञ्चास्तिकायाः स्युर्जीवतत्त्वसमन्विताः॥ ४ ran नववा अध्याय। जीवनगुण-चेतना-जानननसे जो युक्त है उसे जीव कहते हैं। जिसमें जीवनगुण नहीं है उसे सूत्रन आचार्य जिनागममे सामान्यतया 'अजीवतत्त्व' कहते हैं ॥ १ ॥ स्वप्टीकरण- जीवका लक्षण उपयोग-जानवर्णनस्वल्पता कहा है। यह लक्षण जिसमे नहीं पाया जाता वह अजीव तत्त्व है। धर्म, अधर्म, आकाग, काल और पुद्गल ये अजीवतत्त्वके विशेप हैं। धर्म अधर्म, आकाश, काल और पुद्गल ये अजीवतत्त्वके पांच भेद हैं ऐसा तत्त्वनोने कहा है ॥ २॥ (धर्माधर्मादि-द्रव्योका लक्षण।)-जीव और पुद्गलोंकी गति होनेमें जो कारण है उसे वर्मद्रव्य कहते हैं, तया जो उनके स्थितिके लिये कारण है उसको अधर्मद्रव्य कहते है। अर्थात् जीव और पुद्गलोंकी गतिमे जो द्रव्य सहायक होता है उसे धर्मद्रव्य कहते है। तया जो उनकी स्थितिमे सहायक है वह अवर्मद्रव्य है। ऐसे इन द्रव्योंके लक्षण कहे हैं । तथा जो संपूर्ण द्रव्योंको- धर्म, अवर्म, पुद्गल और जीवद्रव्योंको अवकाश अवगाह स्थान देता है उसे आकागद्रव्य कहते हैं ॥ ३ ॥ वर्तना यह लक्षण जिसका है ऐसे द्रव्यको द्रव्यकाल कहते हैं। वह कायरहित है। जीवतत्त्वके साथ धर्मद्रव्य, अवर्मद्रव्य, आकागद्रव्य तथा पुद्गलद्रव्य ऐसे पांच द्रव्योको ‘पचास्ति नाय' कहते हैं। जीवादिक द्रव्योमे जो पर्याय उत्पन्न होती हैं उनकी उत्पत्तिमें जो असाधारण- साधकतम है उसको कालद्रव्य कहते हैं, जैसे दीपक अथवा प्रकागके विना अध्ययन नहीं होता इसलिये वह जैसा अध्ययनका साधकतम कारण है वैसा यह कालद्रव्य जीवादिकोंके पर्याय उत्पन्न होनेमे सावकतम है। उसके विना जीवादिकी पर्याय उत्पन्ही नहीं होती। अतः वर्तना-पर्याय उत्पन्न करना यह कार्य जित करणरूपके होनेसे होता है वह काल है ऐसा कालका लक्षण है। जो पदार्याने नया, पुराना इत्यादि पर्याय उत्पन्न होती हैं उसे धर्मादिक द्रव्य कारण नहीं है, आकागभी कारण नहीं है, वह केवल अवकागदान देनेका कार्य करता है। अतः कल, आज, नया, ~९ ९) सिद्धान्तसार (२०५ रूपगन्धरसस्पर्शशब्दवर्णसमन्वितः । गलनात्पुरणाद्वापि पुद्गलः स' मतो जिनः ।। ५ पुद्गलस्य च कायत्व युक्तमन्येषु तत्कथम् । शरीराभावतस्तस्मादुपचारेण तद्भवेत् ॥ ६ पुद्गलप्रचयात्मत्वाच्छरीरं काय इष्यते । प्रदेशप्रचयात्मत्वात्तथान्ये चोपचारतः ॥ ७ यदुक्तं सूरिभिः पूर्वमसख्येयाः प्रदेशकाः । धर्माधर्मकजीवानामसाधारणवर्तिनाम् ॥८ कायाभावश्च कालस्य होकप्रादेशिकत्वत । अणोरपि भवेत्तस्याप्यणूनां हि तथा स्थिते ॥ ९ पुराना इत्यादि पदार्थोंकी अवस्थाओकी उत्पत्तिमे जो सहायक है वह कालही ऐसा समझना चाहिये ॥ ४ ॥ ( वर्तनापरिणाम इस सूत्रकी सर्वार्थसिद्धि टीका) (पुद्गलका लक्षण। )- रूप, गध, रस, स्पर्श, शब्द तथा वर्ण ऐसे गुणोसे जो द्रव्य युक्त है अर्थात् जिसमे रूपादिक रहते है उसे पुद्गलद्रव्य कहना चाहिये। अथवा जिनमे गलन और पूरण होता है उन्हे पुद्गल कहते है। अर्थात् भेदसे, सघातसे और भेदसघातसे जिनमे पूरण और गलन होता है उसे पुद्गल कहते हैं। यह पुद्गल शब्द इस प्रकारसे अन्वर्थक है । अर्थात् एक पुद्गलस्कन्ध फूटकर अलग होता है, तब उसकी गलन क्रिया हुई। दूसरे स्कन्धमे मिल जानेसे पूरणक्रिया उसने की और एकसे फूटकर दूसरेमे मिल जानेसे पूरण गलन दोनो क्रियाये हुई । इसलिये इस द्रव्यको जिनेश्वर पुद्गल कहते है ॥ ५ ॥ ? इस ( अन्य द्रव्योमे कायपना औपचारिक है। )- पुद्गलको कायपना है, यह योग्यही है, परतु अन्यद्रव्योमे कायपना कैसे समझना चाहिये? काय शब्दका अर्थ शरीर होता है, और पुद्गलके विना अन्यद्रव्य शरीररहित होनेसे-शरीररूप न होनेसे उनको काय कैसे कहा जायगा प्रश्नका उत्तर-उपचारसे अन्यद्रव्योको काय कहना चाहिये। स्पष्टीकरण-शरीर पुद्गलसमूहरूप होनेसे उसको काय कहते है। वैसे प्रदेशोका समूह धर्म, अधर्म आकाश और जीवोमे पुद्गलके समान होनेसे इन द्रव्योकोभी 'काय' कहना योग्यही हैं । अत एव धर्मद्रव्य, अधर्मद्रव्य तथा एक जीव, जो कि असाधारण लक्षणयुक्त हैं, उनमे आचार्योंने असख्यात प्रदेश कहे है ।। ६-८ ।। ( कालमे कायत्व नही है। )- कालद्रव्य एक एक अणुरूप है और उसमे एकप्रदेशसे अधिक प्रदेश रहतेही नही? परन्तु जो पुद्गलाणु है उसमे कायत्वभी है, क्योकि अणु अन्य अणुओसे रूक्षता और स्निग्धता गुण होनेसे मिलकर स्कन्धरूप होता है। वैसे कालाणु आपसमे अन्योन्यमे नही मिलते है। वे रत्नराशिके समान अलग रहते है। इसलिये कालाणुओको उपचारसेमी काय नही कहते हैं ॥ ९॥ १ आ पुद्गलोऽसौ २ आ अणोरिव २०६) सिद्धान्तसार (९. १०- यया दर्शनविनानसुखवीर्यचतुष्टयम् । जीवसाधारणं तद्वत्स्वरूपादिचतुष्टयम् ॥१० पुद्गलेऽपि मतं सर्व साधारणमतीन्द्रियम् । अणोरपि हि तच्छुद्ध जीवे ज्ञानादिवद्भवेत् ॥ ११ रागादिस्नेहयुक्तत्वोत्कर्मबन्यव्यवस्थितौ । सज्ज्ञानादेरशुद्धत्वमात्मनोऽपि यया भवेत् ॥ १२ स्निग्धत्क्षगुणत्वेन द्विगुणादी व्यवस्थितेः । वन्यस्यास्यापि रूपादेरशुद्धत्वं निगद्यते ॥ १३ यया शुद्धात्मरूपस्य भावनाया वलेन च । रागादिस्नेहहानौ स्याज्ञानादेः शुद्धतात्मनि ॥ १४ जघन्यैकगुणानां तदणूनां केवलात्मनाम् । वन्वाभावात्स्वरूपादेः शुद्धत्वं गदितं जिनः ॥ १५ जीवेनैव समं तानि षड्व्याणि जिनागमे । भूपयःपवनानीनां मनसः पुद्गलात्मता ॥ १६ ( जीट पुद्गलोंका सावारणलक्षण । )- जैसे दनन, ज्ञान, सुख और भक्ति ये चार गुण समस्त जीवोंमे हैं, इसलिये उनको जीवके साधारण-गुम कहते हैं। वैसे संपूर्ण पुद्गलोंमें भी गर्न, रस, गंव, वर्ण वे गुण रहते हैं, इसलिये ये पुद्गलने नावारण गुण हैं। जैसे गृद्ध जीवमें नान, दर्जन, सुख और शक्ति ये चार गुण अतीन्द्रिय है वैसे पुद्गलाणुमें ये स्पादिक बार गुण यतीन्द्रिय हैं। परमाणु इंद्रियोंसे नहीं जाना जाता है, वह अतीन्द्रिय हैं। जो अतीन्द्रिय पदार्थ होते हैं उनके गुगमी इंद्रियग्राह्य न होनेसे अतीन्द्रिय होते हैं। गुद्ध जीव इन्द्रियग्राह्य नहीं है। इसलिये उसके ज्ञानादि गुण अतीन्द्रिय होते हैं ।। १०-११ ॥ पुद्गलमे स्निग्धगुण और सगुण रहते हैं। इनसे बंध होता है। एक परमातृका दूसरे परमाणुके साथ इन गुणोंसे बंध होता है। तथा दो गुण अविक जिसमें रहते हैं, वह परमाणु बव योग्य होता है । अर्थात् जिसमें दो गुण कम हैं उसके साथ उसका बंध होता है। परंतु जव जिन दो परमाणुलामे समनुण होगे वे परमाणु पी कहे जाते हैं और ऐसे ल्पी परमाणुओंको मुद्ध कहते हैं और उनका वंध नहीं होता है ॥ १२ ॥ जब बात्माके सम्यन्नानादिक गुण रागादि-लेहले युक्त होते हैं तब जीव कोस वद्ध होता है और आत्माके सम्यग्ज्ञानादिक गृणभी अशुद्ध होते हैं ।। १३ ॥ जैसे गुद्ध आत्मस्वल्पकी भावनाका सामर्थ्य जव अत्यंत वृद्धिगत होता है, तब रागादि स्नेहली हानि होती है। जिससे आत्मामे जानादिक गुणोकी निर्मलता होती है वैसे जिनमें जघन्य एक गुण है ऐसे अणूलोंको केवल' कहते हैं। उनका किसीभी परमाणुके साथ क्व नहीं होता अतः उनके स्वल्पको उनके स्पादिकोंको जिनेन्वरने 'बुद्ध' कहा है ।। १४-१५ ।। जीवके साथ वर्म, अधर्म मानान, काल और पुद्गल इन द्रव्योको जिनागममें पद्रव्य पहा है। तया पृथ्वी, पानी, स्ला-वायु अग्नि और मनको जिनागममें पुद्गल कहा है ।। १६ ॥ १ का जीव २ वा. मनना -९. २२) सिद्धान्तसार (२०७ पुद्गलत्वं कथं तेषामेषा भाषा न युज्यते । तद्रूपाद्यन्वयत्वेन तत्स्वभावविभावनात् ॥ १७ अथेदमुच्यते चित्ते बाह्यरूपाद्यदर्शनात् । तत्रान्वयाप्रसिद्धत्वात्कथ पुद्गलतानयोः ॥ १८ तन्न युक्तमनुद्भूतरूपो वायुर्यतो मतः । अत एव न चक्षुभ्यां गृह्यते परमाणुवत् ॥ १९ रूपादिमानय वायुः स्पर्शवत्त्वाद्धटादिवत् । प्रसिद्धो धीमतां यस्मात्पुद्गलात्मा' प्रभजन॥२० चक्षुषाग्रहणान्नास्य तदभावो विभाव्यते । अतिप्रसङ्गदोषेण दुष्टत्वात्परमाणुषु ॥ २१ तथापो गन्धवत्यश्च पृथ्वीवत्स्पर्शवत्वतः । तेजोऽपि रसगन्धाढ्यं रूपित्वात्तद्वदेव हि ॥ २२ -- ( इन पदार्थोमे पुद्गलत्वकी सिद्धि । )- इन पृथ्वी, पानी, वायु, अग्नि, और मनको पुद्गल कैसा कहे ? ऐसी भापा अर्थात् ऐसा प्रश्न पूछना योग्य नही है। क्योकि, पुद्गलके स्पर्श, रस, गध, वर्ण इन गुणोका अन्वय पृथिवी, पानी आदिकमे दिखता है। अत एव इनमे पुद्गलके स्वभाव प्रगट हैं, ऐसा माननेमे कुछ विरोध नहीं दिखता। अर्थात् जलादिकमे स्पर्श, रस, गधादिक गुण जो कि पुद्गलमे दिखते है वे होनेसे उनकोभी पुद्गल कहना चाहिये ॥ १७ ॥ ( वायु और मनकी पुद्गलत्व सिद्धि। )- अव आप इस विषयमे ऐसा कहेगे कि मनमे रूप स्पर्शादिक नही दिखते हैं। वायुमे स्पर्श दिखता है परतु रूपादिक गुण नही दिखते है, अनुभवमे नही आते हैं। अत मन और वायुको पुद्गलपना नही है। आचार्य उत्तर देते हैं- " आपका कहना योग्य नहीं हैं, क्योकि, वायुभी पुद्गल है उसमे रूपगुण है। परतु वह अनुभूत है अप्रगट है । इसलिये वह आखोसे नहीं दिखता।" हम अनुमानसे वायुमे रूपगुणकी सिद्धि करते हैं- जैसे 'वायु रूपरसादि-गुणवाला है, क्योकि, वह स्पर्शयुक्त है जैसे घडा। अतः विद्वान लोग वायु स्पर्शवान् होनेसे उसे पुद्गलात्मा-रूपवान् मानते हैं यह बात प्रसिद्ध है। यदि आप इसके ऊपर फिरभी ऐसा कहोगे “ वायु आखोसे ग्रहण नहीं किया जाता । अत उसमे रूपका अभाव है" यह आपका कहना योग्य नही है। यह आपका कहना अतिप्रसग- दोपसे दुष्ट है, क्योकि, आप परमाणुओमे रूप मानते है परतु क्या वह आखोसे दिखता है ? नही दिखता है। एतावता वायुमे रूप नही है ऐसा कहोगे तो परमाणुमेभी रूप नहीं दिखता है । अत परमाणु रूपगुणरहित मानो ऐसा हम कहेगे जिससे परमाणुमे अतिप्रसगदोष आवेगा । जव परमाणुमे आप स्पवत्व मानते हैं तो वायु, जो कि स्पर्शनेन्द्रियसे अनुभवमे आता है उसमे तो अवश्य रूपवत्व माननाही चाहिये । परमाणुको कोईभी इन्द्रिय नही जानती है। वायु तो स्पर्शनेन्द्रियसे जाना जाता है । अत उसे रूपवान् मानना विरोधरहित है ॥ २१ ॥ ( जलादिकभी पुद्गल है। )- जैसा वायु रूपवान् है वैसा जलभी गधयुक्त है, क्योकि उसमे स्पर्शगुण है जैसा पृथ्वीमे है। अग्निभी रस और गधसे युक्त है, क्योकि वह रूपवान् है । - १ आ अस्मात् २०८) सिद्धान्तसार. (९. २३- मनो द्विविधमाख्यातं द्रव्यभावप्रभेदतः । तत्र भावमनो ज्ञानमात्मन्यन्तर्भवेद्यत.' ॥ २३ आत्मैव कथ्यते तावदान्तरं द्रव्यमानसम् । बाह्यं रूपादिमत्त्वात्तत्पुद्गलद्रव्यमीर्यते ॥ २४ ज्ञानोपयोगहेतुत्वान्मनो रूपादिवन्मतम् । चक्षुरिन्द्रियवत्प्राजैः प्रगताशेषकल्मषैः ॥ २५ शब्दे भूर्तेऽपि तदृष्ट्वा व्यभिचारो न युज्यते। तस्य पौद्गलिकत्वेन मूर्तिमत्त्वोपवर्तिन.२॥२६ पुद्गलत्वं न चासिद्धं शब्दे तस्य प्रसाधनात् । बहिरिन्द्रियसंग्राह्यः शब्दो यस्माद्घटादिवत् ॥२७ शिखरादिप्रपातस्याभिघातात्कथमन्यथा । ततः स एव शब्दस्य पुद्गलत्वं प्रसाधयेत् ॥ २८ जैसी पृथ्वी रूपवती है। इन दो अनुमानोसे जल और अग्निमे वायुके समान पुद्गलस्वरूपता जैनाचार्योने सिद्ध की है ॥ २२ ॥ ( भावमन आत्मतत्वमे और द्रव्यमन पुद्गलमे अन्तर्भूत है।)- द्रव्य और भाव ऐसे भेदसे मनभी दो प्रकारका कहा है। अर्थात् द्रव्यमन और भावमन ऐसे मनके दो भेद है। उनमे भावमन ज्ञानरूप होनेसे आत्मामे उसका अन्तर्भाव होता है क्योकि भावमन वास्तविक आत्माही है। वह आत्मरूप होनेसे उसे अन्त करण कहते हैं। नो इन्द्रियावरणके क्षयोपशमसे युक्त जो आत्मप्रदेश है उन्हे भावमन कहते हैं । जिनका सब पाप नष्ट हुआ है ऐसे विद्वानोने चक्षुके समान रूपादियुक्त होनेसे वाह्य द्रव्यमनको पुद्गलद्रव्य माना है। जैसा चक्षू ज्ञानोपयोगको कारण होनेसे पुद्गलरूप है वैसा मनभी ज्ञानोपयोगको कारण होनेसे रूपादिमान् है ।। २३-२४ ।। - ( शब्दभी पौद्गलिकही है। )- नैयायिकादिक कहते है, कि शब्द अमूर्त होकरभी जानोपयोगके लिये हेतु होता हैं । अर्थात् मूर्तिमान् पदार्थही ज्ञानोपयोगके हेतु होते है ऐसा समझना ठीक नही है । अमूर्तिक पदार्थभी ज्ञानोपयोगके हेतु होते हैं। अत मूर्तिमत्त्व मनमे सिद्ध करनेके लिये दिया हुआ ज्ञानोपयोग हेतु विपक्षभूत अमूर्तिक पदार्थोमे चला जानेसे अनैकातिक हुआ ऐसा प्रतिपक्षीने कहा। इसके अनन्तर वादी जैन कहते हैं, कि यह व्यभिचार दोष योग्य नहीं है, क्योकि, जिस शब्दको आप अमूर्तिक समझ रहे है वह वैसा नही हैं, क्योकि वहभी चक्षुरादि इन्द्रियोके समान मूर्तिमान् है । इसलिये उसकोभी जैन पौद्गलिकही कहते हैं । शब्दमे पुद्गलत्व असिद्ध नहीं है, क्योंकि घटादिक जैसे वाह्य इन्द्रियसे-चक्षुरादिकसे ग्रहण किये जाते हैं वैसे शब्दभी वाह्य इन्द्रियसे ग्रहण किये जाते हैं अत. वेभी पौद्गलिक हैं ।। २५-२७ ।। पर्वतके शिखरादिक पडनेसे वडा शब्द उत्पन्न होता है, जो कि कर्णके ऊपर आघात करता है। इसलिये शब्द पौद्गलिक अर्थात् मूर्तिक है, अमूर्तिक वस्तुका आघात नही होता, मूर्तिक वस्तु आघातयोग्य-अभिभवयोग्य होती है। इसलिये अभिघात होना, अभिघात करना इत्यादि धर्म १ मा. आत्मन्यन्तर्भवत्यपि २ आ मूर्तिमत्त्वोपपत्तित ३ आ शिखरादे -९ ३२) सिद्धान्तसार (२०९ सूक्ष्मस्थूलादिधर्मत्वाच्छब्दोऽयं पुद्गलात्मकः । यतोऽमी पुद्गलद्रव्यपर्याया गदिता जिनः।।२९ अतिस्थूल तथा स्थूल स्थूलसूक्ष्म च सूक्ष्मकम् । सूक्ष्मस्थूल सूक्ष्मसूक्ष्म' कथयन्ति जिनेश्वराः॥३० ततस्तद्धर्मयुक्तत्वाच्छब्दोऽयं पुद्गलात्मकः । भाषाभाषात्मकत्वेन द्विप्रकारो भवत्यपि ॥ ३१ चतुर्भाषात्मको यस्तु स भाषात्मा निगद्यते । आर्यम्लेच्छमनुष्येषु व्यवहारकहेतुतः ॥ ३२ शब्दकी पुद्गलताके साधक हैं । शब्दमे सूक्ष्मधर्म, स्थूलताधर्म, अभिघातधर्म, अभिभाव्यधर्म, आदि धर्म होनेसे वह पुद्गलात्मक है । स्थूलता, सूक्ष्मतादिक पुद्गलद्रव्यके पर्याय हैं ऐसा जिनेश्वरने कहा है ।। २८-२९॥ जिनेश्वरने पुद्गलद्रव्य छह प्रकारका है ऐसा कहा है। वे प्रकार-अतिस्थूल, स्थूल, स्थूलसूक्ष्म, सूक्ष्म, सूक्ष्मस्थूल और सूक्ष्मसूक्ष्म । अतिस्थूल इसको बादरवादरभी कहते हैं । जिसका छेदन, भेदन, अन्यत्र प्रापण-दूसरे स्थानमे पहुचाना होता है वह अतिस्थूल है । जैसे पृथ्वी, काष्ठ, पाषाण आदि । स्थूल-जिसका छेदन, भेदन न हो सके परतु अन्यत्र प्रापण हो सके उस स्कन्धको स्थूल वा वादर कहते है । जैसे जल, तैल आदि । स्थूलसूक्ष्म-जिसका छेदन, भेदन अन्यत्र प्रापण कुछभी न हो सके ऐसे नेत्रसे देखने योग्य स्कन्धको स्थूलसूक्ष्म कहते हैं जैसे-छाया आतप, चादनी आदि । सूक्ष्मस्थूल-नेत्रको छोडकर शेष इद्रियोके विषयभूत पुद्गल स्कन्धको सूक्ष्मस्थूल कहते हैं जैसे शब्द, गध, रस आदि । सूक्ष्म-जिसका किसी इद्रियके द्वारा ग्रहण न हो सके उस पुद्गल स्कन्धको सूक्ष्म कहते है जैसे कर्म । और सूक्ष्मसूक्ष्म जो स्कधरूप नही है ऐसे अविभागी पुद्गलपरमाणुको सूक्ष्मसूक्ष्म कहते है । पुद्गलके ऊपरके श्लोकमे जो धर्म बताये हैं, वैसे धर्म शब्दमे होनेसे शब्द पुद्गलात्मक है । तथा यह शब्द भापात्मक और अभाषात्मक ऐसा दो प्रकारकाभी होता है ।। ३०-३१ ।। जो चार भाषात्मक है उसे भाषात्मक शब्द कहते है। यह भाषात्मक शब्द आर्य और म्लेच्छोको व्यवहारके लिये कारण है । स्पष्टीकरण-सत्यभाषा, असत्यभाषा, उभयभाषा और अनुभयभाषा ऐसे भापाके चार भेद है । अथवा सस्कृत, प्राकृत, अपभ्रश और भूतभाषा ऐसी चार भाषाये काव्यका शरीर मानी गई हैं । दस प्रकारके सत्यार्थके वाचक वचनको सत्यवचन कहते है । जो इससे विपरीत है उसको असत्यभाषा कहते है । जो कुछ सत्य और कुछ असत्यका वाचक है उसे उभयभाषा कहते है । तथा जो सत्यरूप न हो और मृषारूप-असत्यरूप न हो उसको अनुभयवचन कहते है । असज्ञियोकी समस्त भाषा और सज्ञियोकी आमत्रणी आदिक भापाये अनुभयभाषा कही जाती है । आमत्रणी आदिक नौ भाषाये अनुभय-वचन-रूप मानी है। १ आ सुसूक्ष्म च SS 27 २१०) सिद्धान्तसार. (९. ३३- अभाषात्मा तिरश्चां स्याच्छ्रीजिनेन्द्रध्वनावपि । स च प्रायोगिकोऽन्यश्च वैनसिकस्तथा परः॥३३ वीणावंशादिसंभूतः प्रायोगिक इतीरितः । वैश्रसिकश्च मेघादिप्रभवोऽनेकधा पुनः ॥ ३४ पुद्गलोत्पन्न एवायं पौद्गलिकोऽपि कथ्यते । उपचारेण जीवस्य तद्वयापारप्रयोगतः॥ ३५ ततो न व्यभिचारोऽस्ति मनोरूपित्वसाधने । शब्दज्ञानोपयोगित्वात्तस्य पोद्गलिफत्वतः ।। ३६ ततः पृथ्वी पयरच्छाया चतुरिन्द्रियगोचरम् । कर्माणि परमाणुश्च पर्यायाः पुद्गलस्य च ॥३७ दिशोऽप्याकाश एवायमादित्याधुदयादिह । तस्य पडक्तिव्यवस्थासु' व्यवहारोपपत्तितः ।। ३८ तस्मात्षडेव द्रव्याणि नाधिकानि जिनागमे । धर्माधर्मनभःकालास्तेषु नित्या मता जिनः ॥ ३९ क्योकि, इनके सुननेसे व्यक्त और अव्यक्त दोनोही अशोका बोध होता है। इसलिये सामान्य अशके व्यक्त होनेसे असत्यभी नही कह सकते है, और विशेष अशके व्यक्त न होनेसे सत्यभी नही कह सकते हैं ।। ३२ ॥ यह अनुभयभाषा तिर्यचोकी-द्वीन्द्रियादि-जीवोकी है तथा श्रीजिनेश्वरकी जो दीव्य- ध्वनि है वहभी अनुभयभापात्मक है । अभाषात्मक शब्दके प्रायोगिक और वैनसिक ऐसे दो भेद है। वीणावशादि वाद्योसे जो शब्द उत्पन्न होता है उसे प्रायोगिक कहते हैं । मेघादिकसे उत्पन्न होनेवाला शब्द वैस्रसिक है और उसके अनेक प्रकार हैं । यद्यपि शब्द पुद्गलसेही उत्पन्न होता है । इसलिये उसको पौद्गलिक कहते है तोभी उपचारसे शब्द जीवकाभी कहा जाता है; क्योकि उसके प्रयत्न उसकी उत्पत्तिमे कारण होते है । इतने विवेचनसे मनको रूपी सिद्ध करनेमे जो ज्ञानोपयोगहेतुत्व' नामक हेतु दिया है, शब्दको पौद्गलिकत्त्व साधनेमे वह उपयुक्त होनेसे अनैकान्तिक हेतु नही होता है । इतने विवेचनसे पृथ्वी, जल, छाया और नेत्रेन्द्रियको छोडकर शेष चार इद्रियोका विषय, कर्म और परमाणु ये सब पुद्गलके पर्याय है ऐसा सिद्ध हुआ है ॥ ३३-३७॥ (दिशाका आकाशमे अन्तर्भाव होता है । )- दिशाओका आकाशमे अन्तर्भाव होता है, क्योंकि आकाशके प्रदेशोमेही सूर्य-चन्द्रादिकोके उदयसे पूर्व पश्चिम इत्यादि व्यवहार होता है । अत दिशा यह द्रव्य यह अलग नहीं है । उसका आकाशमेही अन्तर्भाव होता है ॥ ३८ ॥ ( जैनागममे छहही द्रव्य कहे हैं। )- इसलिये जिनागममे छहही द्रव्य कहे है उनसे अधिक नहीं है । छहो द्रव्योमेसे धर्म, अधर्म, आकाश और काल ये चार द्रव्य जिनेष्वरोने नित्य माने हैं। जो लक्षण जिस द्रव्यका आचार्यने कहा है, वह लक्षण इससे कभी नष्ट नही होता है। अर्थात् उस द्रव्यमे उसका लक्षण हमेशाही रहता है । अन्यथा वह द्रव्य कैसे पहचाना जायगा धर्मद्रव्यका गतिहेतुत्व लक्षण है, अधर्मद्रव्यका स्थितिहेतुत्व लक्षण है, आकाशका अवगाहनहेतुत्व लक्षण है और कालका वर्तना लक्षण है। ये लक्षण अपने अपने द्रव्योको कभीभी नही ? १ आ पड्क्तिप्रदेशेषु -९ ४६) सिद्धान्तसार (२११ अमूर्ता नि.क्रियाश्चामी जिनागमे विशेषतः । तथात्मकपरिज्ञान कर्तव्य सुमनीषिभिः ॥ ४० आकाशस्य प्रदेशा. स्युरनन्ता पुद्गलस्य च । तेऽसङख्येयाश्च सख्यया अनन्ताश्च भवन्त्यपि ॥४१ कश्चित्सडख्येयदेश. स्यादसख्येयप्रदेशभाक् । कश्चित्कस्याप्यनन्तास्ते प्रदेशा समुदीरिता ॥४२ असख्यातप्रदेशो वा लोकः सर्वोऽपि कथ्यते । तत्रानन्तप्रदेशस्य तस्याधारो विरुध्यते ॥ ४३ नंप दोषो यतः सूक्ष्मपरिणामावगाहतः । आकाशकप्रदेशेऽपि तदानन्त्येन तिष्ठति ॥ ४४ सूक्ष्मावगाहसच्छक्तिस्तेषामव्याहतास्ति च । प्रमाणप्रतिपन्नत्वादग्नेर्दाहकशक्तिवत् ॥ ४५ नाणो. प्रदेशनानात्वमविभागस्वभावत' । नास्मादल्पप्रमाण तत्किञ्चिदल्पप्रमाणकम् ॥ ४६ छोडते हैं इसलिये इनको नित्य कहना योग्यही है । ये द्रव्य नित्य है, अमूर्तिक है, और नि क्रिय है, ऐसा जिनागममे विशेपत प्रतिपादन किया है । जैसा आगममे प्रतिपादन किया है, वैसा विद्वान् उनको जान लेवे ।। ३९-४० ।। (आकाश और पुद्गलोके प्रदेशोका वर्णन । )- आकाशके प्रदेश अनन्त है, पुद्गलोके प्रदेश सख्यात असख्यात और अनत हैं । अर्थात् पुद्गलोके प्रदेश तीनो प्रकारके हैं । कोई पुद्गल सत्यात प्रदेशवाला, कोई पुद्गल असख्यात प्रदेशवाला और कोई पुद्गल अनत प्रदेशवाला है। इस प्रकारसे पुद्गलोके प्रदेश तीन प्रकारके कहे है ।। ४१-४२ ।। लोकाकाश असख्यात प्रदेशवाला है । वह अनत प्रदेशवाले पुद्गलोका आधार कैसे होता है ? इस शकाका उत्तर- सर्व लोकाकाग असख्यात प्रदेशवाला है ऐसा कहा जाता है और पुद्गल अनत प्रदेश- वालाभी है । अत वह अनन्तप्रदेशवाले पुद्गलोका आधार कैसे हो सकता है ? यह वात विरुद्ध है । आचार्य कहते हैं, कि इसमे दोप नहीं है । सूक्ष्मत्वशक्ति और अवगाहनशक्ति परमाणुगोमे और ब्द्यणुकादिकोमे अव्याहत है । इसलिये उपयुक्त शका यहा उत्पन्न नहीं होती । परमाणु और न्यणुकादिक स्कध सूक्ष्मभावसे परिणत होकर एकेक आकाशप्रदेशमेभी अनतानत रहते हैं। अव- गाहनशक्तिभी इनकी अव्याहत है । इसलिये एक आकागप्रदेशमेभी अनतानत परमाणुओका और सूक्ष्मस्कधोका वास्तव्य विरुद्ध नही । जैसे अग्निकी दाहशक्ति लोहेके गोलेमे प्रवेश करती है वैसे पुद्गलपरमाणु और सूक्ष्मस्कधोमे अवगाहनशक्ति होनेसे एक आकाशप्रदेशमेभी अनतानत परमाणु- ओका स्कधभी रहता है ।। ४३-४५ ॥ (परमाणुका स्वरूप)-परमाणुमे अनेक प्रदेश नही हैं, क्योकि, वह अविभागि स्वभाव- वाला है। परमाणुके पुन खड नही होते है । वही सबसे अल्पप्रमाणवाला है। उससे कोई छोटा पदार्थ हैही नही ।। ४६ ॥ ५ आ प्रयात्मक

२१२)
सिद्धान्तसारः
(९. ४७-
लोकाकाशेऽवगाहोऽस्ति धर्मादीनामशेषतः । आकाशस्यावगाहस्तु स्वात्मन्येव व्यवस्थितः॥४७
धर्मादीनि विलोक्यन्ते यत्र लोकः स इण्यते । तमभिव्याप्य सर्वत्र धर्माधर्मों व्यवस्थितौ ॥ ४८
यत्र लोकस्तदेवाहुलॊकाकाशं जिनेश्वराः । तद्रहितमनन्तं तदलोकाकाशमञ्जसा ॥ ४९
स्पष्टीकरण- जैसे एक आकागप्रदेशमेभी दूसरा प्रदेश न होनेसे उसे अप्रदेशी कहते हैं
वैसे परमाणुमेभी सिर्फ प्रदेशमात्रत्व होनेसे प्रदेशभेद नहीं है । यदि परमाणुसेभी कोई छोटी वस्तु
होती तो परमाणुमें प्रदेशभेद मानना पडता । परमाणु स्वत. आत्मआदि, आत्ममध्य और आत्मा-
अन्त है । जिसमे प्रदेशाधिक्य होता है उसमे आदि, मध्य, अन्त ऐसे भागोकी कल्पना होती है।
परमाणुमे प्रदेगभेद न होनेसे- वह स्वयप्रदेशमात्र होनेसे वह स्वत ही आदिरूप है, मध्यल्प है
और अन्तल्पभी है। जैसे किसी मनुप्यको एकही पुत्र होता है, तो उसमेही बडा, छोटा और
मध्यमको कल्पना करनी पड़ती है। वैसे परमाणुमे स्वयं आदि, मध्य और अन्तकी कल्पना करनी
पडती है । तथा वह परमाणु इन्द्रियग्राह्य नहीं है ।। ४६ ॥
(लोकाकागका वर्णन । )- धर्मादि द्रव्योका लोकाकागमेही अवगाह है । लोकाका-
गने धर्मादि द्रव्योंको अपनेमे आश्रय दिया है । धर्मद्रव्य, अधर्मद्रव्य, पुद्गलद्रव्य, जीवद्रव्य और
कालद्रव्य लोकाकागमेही हैं । लोकाकागमे धर्मादिक अमूर्तद्रव्य अन्योन्य प्रदेशोमें विना व्याघातसे
रहे हैं । तथा जितना लोकाकाग है, उतने प्रदेशोंमे धर्मद्रव्य, अधर्मद्रव्य और कालद्रव्यके अणु
समान रूपसे रहे हैं । लोकाकानके एक प्रदेशमे धर्मद्रव्यका एक प्रदेश, अधर्मद्रव्यका एक प्रदेश
और एक अणुल्प कालद्रव्य रहता हैं । लोकाकागके जितने प्रदेश हैं उतनेही धर्मद्रव्यके प्रदेश हैं,
उतनेही अवर्मद्रव्यके प्रदेश हैं और उतनेही कालाणु है । इसलिये तिलमे जैसा तैल सर्वत्र व्याप्त
होकर रहता है, वैसे धर्मादिक द्रव्य लोकाकाशमे समानरूपसे व्याप्त होकर रहे हैं । धर्मादिक
द्रव्य लोकाकागके वाहर नहीं है, ऐसा अभिप्राय व्यक्त करनेकेलिये यहां धर्मादिक आधेय और
लोकाकाग आधार है ऐसी कल्पना है। धर्मादिक द्रव्य लोकाकाशमे हैं, परतु लोकाकाग अथवा
आकान स्वयं अपनेमेही है । एवभूननयकी अपेक्षासे सभी द्रव्य स्वस्वरूपमेही रहते हैं । आकाशसे
दूसरा कोईभी द्रव्य अधिक परिमागका नहीं है जिनमे आकाग स्थित होगा । वह सर्वत. अनन्त
है।॥ ४७-४८॥
धर्मादिक द्रव्य जिसमे देखे जाते है, उसको लोक कहते है । इस लोकको व्याप्त करके
धर्म और अधर्म सर्वत्र व्यवस्थित रहे हैं। जहा यह लोक है, जिनेश्वर उसको लोकाकाश कहते
हैं । तया इस लोकसे रहित सर्वत. जो अनंत आकाश फैला है, उसे परमार्थतया अलोकाकाश
कहते है ॥ ४९ ॥

-९.५८) सिद्धान्तसार (२१३ असख्येयविभागादिष्ववगाहक्रमादयम् । जीवाना तत्र जानन्ति यावल्लोक विशारदाः ॥ ५० यद्येवमप्यसख्येया विभागा जगतो मताः । आश्रयाः सर्वजीवानां कय तेषामनन्तता ॥५१ नैष दोषो यतो जीवाः सूक्ष्मवादरभेदतः । भवन्ति द्विविधाः सर्वे विविधाकारधारिणः ॥५२ सप्रतीघातदेहास्ते बादराः परितो मत । सूक्ष्माश्च न तथा सूक्ष्मभावादेव भवन्त्यमी ॥ ५३ सूक्ष्मनिगोदजीवकावगूढकप्रदेशके । सूक्ष्माः साधारणानन्तास्तिष्ठन्त्यन्योन्यमिश्रिता ॥ ५४ न ते वादरवर्गाणा' व्यान्यन्ते परस्परम् । अत श्रीगुरुपादानां न दोषस्तनिवेदने । ५५ जीवाना पुद्गलाना च गतिस्थित्युपकारको । धर्माधी तदाकाशमवगाहोपकारकम् ॥ ५६ जलवन्मत्स्यदेहस्य गच्छतो गतिकारणम् । धर्मद्रव्य हि जीवस्य पुद्गलस्य न तिष्ठतः ॥ ५७ अधर्मद्रव्यमप्येव तिष्ठत स्थितिकारणम् । जीवपुद्गलयो पि गच्छतोस्तत्कदाचन ॥ ५८ (जीव लोकाकाशके कितने असख्यातवे भागमे रहता है इस प्रश्नका निर्णय।)- लोका- काशके असख्यात भाग करनेपर जो एक भाग, दो भाग, तीन भाग आदिक भागभी असख्यात प्रदेशोकेही होते है, क्योकि, असख्यातको छोटे असख्यातसे भाजित करनेपर जो भागाकार आता है, वह असरयातरूपकाही आता है । जीवका अवगाह लोकाकाशके एक-दो-तीन आदि असख्येय भागोमे होता है । तथा लोकपूरण समुद्घातके समय जीवका अवगाह सपूर्ण लोकमे होता है। एक जीवकी अपेक्षासे यह कथन किया । नाना जीवोकी अपेक्षासे तो सर्व लोक अवगाह है ॥ ५० ॥ यद्यपि लोकाकागके असल्येयविभाग माने गये है और वे जीवोके आश्रयभूत हैं, किन्तु जीव तो अनत हे और आथय असख्येयरूप है। इसलिये द्रव्यप्रमाणसे अनन्तानन्त सशरीर जीव उनमे कैसे अवगाह पा सकेगे ? आचार्य इस शकाका परिहार करते है-यह दोष नहीं है, क्योकि, विविध आकार धारण करनेवाले जीव दो प्रकारके हैं अर्थात् सूक्ष्मजीव और बादरजीव । जिनका देह सप्रतिघात है, अर्थात् दूसरेसे जिनको बाधा पहुचती है वे सप्रतिघात-वादरदेह हैं । सूक्ष्मजीव सगरीर होनेपरभी उनमे सूक्ष्मता होनेसे एक निगोदजीव जितने आकाशके प्रदेशोमे रहता है उतनेमे साधारण गरीरवाले जीव अनन्तानन्त रहते है । परतु वे अन्योन्यसे वाधित नही होते हैं और वादरोसेभी वाधित नहीं होते है । इसलिये श्रीगुरुपादोका उनका वर्णन करनेमे कुछभी दोप नही है ।। ५१-५५ ।। (धर्म, अधर्म आकाशद्रव्योके उपकारोका वर्णन । )- जीव और पुद्गलोके गतिमे उप- कारक धर्मद्रव्य है । जीव और पुद्गलद्रव्यके स्थितिमे अधर्मद्रव्य उपकारक है और आकाशद्रव्य अवगाहमे उपकारक है। पानी जैसा चलनेवाले मत्स्यदेहके गतिमे कारण है उसी तरह धर्मद्रव्यभी गतिमे कारण है, परतु स्थिर जीवद्रव्य और पुद्गलद्रव्यकी, गतिकेलिये कारण नही है। अधर्मद्रव्यभी जो पुद्गलद्रव्य और जीवद्रव्य स्थिर है उनकी स्थितिमे कारण है । परतु जो जीव और पुद्गल गतिमान् हो रहे है उनके स्थितिमे अधर्मद्रव्य कारण नहीं है ।। ५६-५७-५८ ॥ 4.4 १ मा वादग्वर्गण २१४) सिद्धान्तसार (९ ५९- १ शरीरपञ्चकर्वाचा मनसा च तथा पुनः । प्राणापानकजीवानां' पुद्गलोपकृतिर्मता ॥ ५९ अथ कार्मणदेहस्य पुद्गलत्वमसङ्गतम् । अनाकारत्वतस्तस्य साकारत्वेन निर्णयात् ॥ ६० तन्न युक्त विपाकेन मूर्तिमत्त्वस्य साधनात् । विपाकः सर्वभावेषु मूर्तेष्वेव विलोक्यते ॥ ६१ उदकादिकसम्बन्धाद्वीह्यादेः परिपाकतः । तथा पुद्गलता सिद्धा तेषां कर्मण्यबाधिता ॥ ६२ स्वाद्वम्लकटुलावण्यत्रग्वनितादियोगतः । कण्टकाद्यस्त्रसंयोगात्तद्विपाकोऽपि दृश्यते ॥ ६३ तस्मात्तत्पच्यमानत्वात्कर्म पौद्गलिकं मतम् । अन्यद्रव्यस्य सम्बन्धे व्रीह्यादिवदनेकधा ।। ६४ मनोवाक्पुद्गलत्वं च पूर्वमेव निवेदितम् । प्राणापानस्वरूपं तु किञ्चिदत्र निगद्यते ॥ ६५ ( पुद्गलके उपकारका वर्णन । )- औदारिकादिक पाच गरीर, वचन, मन, श्वास और उच्छ्वास इनकेद्वारा पुद्गल जीवके ऊपर उपकार करता है । यहा शिष्यने शका की है- कार्मणदेहको आप पुद्गल मानते है यह असगत है । क्योकि वह अनाकार है-आकाररहित है, जो आकाररहित है उससे उपकार होना शक्य नही है। उपकारके लिये साकारत्वकी आवश्यकता है। आचार्य खुलासा करते हैं- यह आपका कहना योग्य नही है । कार्मणशरीरका विपाक होता है, उसका उदय होकर नया कर्म बंध-जाना आदि फल मिलता है इससे वह मूर्तिमान् है ऐसा सिद्ध होता है । कार्मणशरीरका उदय मूर्तिमान् पदार्थके सबधसे होता है और वह उसके सबसे सुखदुःखादि फल देता है। सर्व अवस्थामे जो कर्मविपाक होता है, वह मूर्तिक होनेसेही होता है। जैसे जलादिकका सबध होनेसे शालि आदिक धान्य पक जाता है वैसे विष कण्टकादिकोका सबध होनेसे कार्मणशरीर विपाकयुक्त होकर सुखदुःखरूप फल देता है। नये रागद्वेषादिक विकार उत्पन्न करता है, जिससे नया कर्म बध जाते है ।। ५९-६१ ॥ जल, हवा आदिके सयोगसे व्रीहि आदिक धान्य परिपक्व होता है अर्थात् जलादिक मूर्तिक पदार्थोका सयोग होनेसे व्रीह्यादि बीज अकुररूप होकर उससे ब्रीह्यादि फलनिष्पत्ति होती है । तद्वत् कार्मणशरीरमे अबाधित ऐसा पुद्गलपना सिद्ध होता है । मिष्ट, अम्ल, कडु, क्षार आदि पदार्थ पुष्पमाला, स्त्री आदिकोका सयोग होनेसे तथा कण्टक, शस्त्रादिकोका सयोग होनेसे कर्मकाभी सुख दुख रूप फल देने रूप विपाक दिखता है । इसलिये कर्म अनाकार होनेसे पुद्गल नही, इत्यादिक कहना अयुक्त है ।। ६२-६४ ।। मन और वचन ये पुद्गल है ऐसा पूर्वमेव कह चुके है । प्राण और अपानके स्वरूपके विषयमे यहाँ कुछ कहते हैं ।। ६५ ।। १ प्राणापानश्च -९ ७३) सिद्धान्तसार (२१५ क्षयोपशमतो ज्ञानावृतिवीर्यान्तराययो । आत्मनोदस्यमानस्तु प्राण. कोष्ठय. समीरण ॥ ६६ आत्मनाभ्यन्तरे यस्तु वाह्यो वायुविधीयते । निश्वासलक्षणः सोऽयमपान इति कथ्यते ॥ ६७ समानोदानसद्व्याना अभिन्नाः सन्ति वायव । स्वरूपमनयोरेव तेषा समवतिष्ठते ॥ ६८ तेषामपि मन प्राणापानादीना हि मूर्तता । सप्रतीघातत. सिद्धा हन्त हन्तुं न शक्यते ॥ ६९ सुरामूर्छादिमिस्तस्य मनसो भयहेतुभिः । दृश्यते सप्रतीघातस्ततः पौद्गलिकं मनः ॥ ७० सत्प्राणापानयोर्वाधा. श्लेप्महस्ततलादिभि । व्याघातो दृश्यते तस्मान्मूतित्वमनयोध्रुवम् ॥ ७१ अत एवात्मन. सिद्धिस्तत्कर्मापेक्षया मता । यथा यन्त्रमये रुपे चेप्टा पुरुपहेतुका ॥ ७२ आभिमानिकसत्सौख्य जीवितं मरणं तथा। दुःखं वा जीवतत्त्वस्य पुद्गलेभ्य प्रजायते ॥ ७३ (प्राणापनका स्वरूप । )- ज्ञानावरण कर्म और वीर्यान्तराय कर्मके क्षयोपशमसे तथा अगोपाग नामके उदयकी अपेक्षामे आत्माके द्वारा वाहर जो निकाला जाता है ऐसे कोठेके वायुको प्राण कहते हैं । इसका दूसरा नाम उच्छ्वास है । वाहरका वायु आत्माके द्वारा अभ्यन्तरमे ग्रहण किया जाता है उसको अपान कहते है, इसको निश्वासभी कहते हैं। समान, उदान, व्यान आदि जो वायु हैं, वे प्राण और अपानमे अभिन्न हैं अर्थात् समानादिकभी वायुही हैं। प्राण और अपानका जो स्वरूप है वही स्वरूप समानादिकोकाभी है । स्थानभेदमे एकही वायु भिन्न भिन्न भिन्न नामधारक है ।। ६६-६८ ।। मन, प्राण और अपानादिकभी मूर्तिक हैं क्योकि ये प्रतिघातसहित है। इनकी मूर्तिकता अबाधित है । स्पप्टीकरण- भयके कारण वज्रपात इत्यादिकसे मनको आघात पहुचता है । मद्यपानादिकसे मनका अभिभव होता है । वह विचारशून्य बनता है। इसलिये मन पौद्गलिक है। हायसे मुख दवानेसे उच्छ्वासनि श्वासका घात होता है । जब श्लेष्मा वढता है तव उच्छ्वास नि श्वासमे वावा आती है । प्राणापानादिकके सद्भावसे क्रियावान् आत्माकी सिद्धि होती है । जैसे यत्रमय प्रतिमाकी-कठपुतलीको जो चेष्टा होती है वह किसी नचानेवाले पुरुपसे होती है। विना उसके वह यत्रप्रतिमा चेप्टा नही करती। वैसे प्राणापानादिककी क्रियाकी अपेक्षामे आत्माकी सिद्धि होती है ।। ६९-७२ ।। (पुद्गलके और भी उपकार ।)- अन्तरग कारण सद्वदनीय कर्मका उदय होनेपर तथा स्त्री पुष्पमालादिक वाह्य कारण प्राप्त होनेपर जीवके अन्त करणमे जो प्रसन्नता-प्रीति उत्पन्न होती है, उसे सुख कहते है । इस प्रीतिसे मै मुखी हू ऐसा अभिमान जीवमे उत्पन्न होता है। भवधारणका कारण आयुकर्म है। उसके उदयमे जीवको भवस्थिति प्राप्त होती है। और प्राण अपानका सद्भाव रहता है इसकोही जीवित कहते हैं । भवधारणका कारणरूप आयुकर्म जव अनुभव देकर समाप्त होता है तव प्राणयपानका सद्भाव नही रहता है अर्थात् जीवनक्रियाका उच्छेद होता है। इसको मरण कहते हैं । अन्तरग कारण असद्वेद्यका उदय और वाह्यकारण विप, कण्टक, शत्रु आदिक २१६) सिद्धान्तसार (९.७४- जीवस्याजीवद्रव्याणामुपकारो निवेदितः । जीवे जीवोपकारस्तु कीदृशोऽसौ निगद्यते ॥ ७४ परस्परोपकारस्तु जीवानामुदितो जिनः । स्वामी भृत्यस्तथाचार्यः शिष्य इत्येवमादिकः ।। ७५ अजीवद्रव्यनिर्देशोऽप्युद्देशेन निवेदितः । अन्यैरन्यत्र सिद्धान्ते ज्ञातव्य सूत्रवेदिभिः ॥ ७६ इदानीमास्रवं किञ्चित्स्वरूपादवबुध्यते । समासाद्वच्मि भव्यानामुपकाराय चात्मनः ॥ ७७ यस्तु वीर्यान्तरायस्य क्षयोपशमतो भवेत् । कायवाडमानसापेक्षो व्यापारो ह्यात्मनश्च सः॥७८ आस्रवोऽभाणि सूत्रः कर्मानवनिमित्ततः । यथा सरसि तोयस्यास्रवणद्वारमात्मनः ॥ ७९ शुभाशुभभवाद्भेदात्कर्म द्वधा व्यवस्थितम् । शुभः शुभस्य विज्ञेयोऽशुभस्याशुभ एव सः ॥ ८० प्राप्त होनेपर जो अप्रीतिरूप परिणाम उत्पन्न होता है उसे दुख कहते हैं। ये अजीव द्रव्यके जीवपर उपकार बतलाये है। अब जीवके ऊपर जीवका उपकार कैसा होता है ? इसका उत्तर दिया जाता है ।। ७३ ।। ( जीवके ऊपर जीवका उपकार । )- जिनेश्वरोने जीवोका अन्योन्य उपकार कहा है। वह उपकार स्वामी और नोकरसबधी आचार्य और शिष्यसबधी इत्यादि अनेक रूपका होता है। मालिक नोकरको धन देकर उपकार करता है। नोकरभी हितकार्य करना, अहितकार्यसे मालिकको दूर रखना इत्यादि रूपसे मालिकपर उपकार करता है। आचार्य इहलोकमे और परलोकमे सदाचार दुराचारसे भला बुरा फल मिलता है ऐसा उपदेश देकर शिष्यके ऊपर उपकार करते है, तथा शिष्यभी उनके अनुकूल चलते है यह शिष्योका आचार्यके ऊपर उपकार है ।।७४-७५॥ हमने यहा अजीव द्रव्यका नाममात्र कथन किया है अन्य सूत्रज्ञ विद्वानोको अन्य सिद्धान्त अथोसे इसका स्वरूप जानना योग्य है ॥ ७६ ॥ (आस्रवतत्त्वकथनकी प्रतिज्ञा। )- अब आस्रवतत्त्वका कुछ स्वरूप, जो कि मै जानता हू, सक्षेपसे भव्योके उपकारके लिये और मेरे उपकारके लिये कहता हू ।। ७७ ॥ ( आस्रवका लक्षण । )- वीर्यान्तरायके क्षयोपशमसे शरीर, वचन और मनकी अपेक्षा लेकर जो आत्माकी चेष्टा होती है, उसे सूत्रके ज्ञाताओने कर्मास्रवोका निमित्त होनेसे आस्रव कहा है। जैसे सरोवरमे पानी आनेके द्वारको आस्रव कहते है, वैसे आत्मामे कर्मागमनके कारण ऐसी जो मन वचन कायकी प्रवृत्ति उसे आस्रव कहते है ।। ७८-७९ ।। स्पष्टीकरण- वीर्यान्तराय कर्मका क्षयोपशम होनेसे औदारिकादि सात प्रकारकी वर्गणाओमेसे किसी एक वर्गणाके साहाय्यसे जो आत्मप्रदेशमे चचलता उत्पन्न होती है उसे काययोग कहते है। वचनयोग - शरीरनामकर्मके उदयसे आई हुई वचनवर्गणाओका आलंबन प्राप्त होने- पर वीर्यान्तराय तथा मत्यक्षराद्यावरण कर्मके क्षयोपशमसे आत्मामे बोलनेकी लब्धि - शक्ति प्राप्त होती है, जिससे आत्मा जब बोलनेकी चेष्टा करता है तब उसके प्रदेशोमे चचलता उत्पन्न होती है, उसे वचनयोग कहते है।

-९ ८४) सिद्धान्तसार (२१७ प्राणातिपातनादत्तादानमैथुनसेवनात् । अशुभ. काययोगोऽय कथितो मुनिपुडगवः॥८१ असत्यायशुभोऽभाणि वाग्योगो गतिनायकः । अशुभस्तु मनोयोगो वाचिन्तनादित ॥ ८२ तस्मादन्यस्त्रिधाप्येष शुभोऽवाचि विचक्षणः । आत्मनस्तु तथाभूतस्वभाविनिवर्तते ॥ ८३ संसारहेतुः कोपादिः सकषायस्य सूरिभि । इतरश्चाकषायस्य कषायस्तेन वय॑ते ॥ ८४ मनोयोग-अभ्यन्तर वीर्यान्तराय कर्मका क्षयोपशम होनेसे तथा नो इन्द्रियावरण कर्मका क्षयोपशम होनेसे मनोलब्धि प्राप्त होती है, और वाह्य कारणरूप मनोवर्गणाका आगमनभी होता हैं। तव मनकी परणतिके सम्मुख हुए आत्माके प्रदेशोमे चचलता होती है, उसे मनोयोग कहते हैं। (शुभयोग और अशुभयोग।) - शुभपरिणामोसे उत्पन्न होनेवाली मन, वचन और शरीरकी चेष्टासे आत्मामे शुभ कर्मका आगमन होता है और अशुभपरिणामोसे उत्पन्न होनेवाली मन, वचन और शरीरको चेष्टासे अशुभ कर्मका आगमन होता है । इस प्रकारसे कर्मके शभकर्म और अशुभकर्म ऐसे दो भेद होते है। शुभयोग शुभास्रवका-पुण्यास्रवका कारण है, और अशुभयोग अशुभास्रवका-पापका कारण है ऐसा समझना चाहिये ।। ८० ॥ प्राणिहिंसा करना, नही दी हुई वस्तु ग्रहण करना, मैथुनसेवन करना ऐसे अकार्यको मुनिश्रेष्ठ अशुभकाययोग कहते है। असत्य भाषण करना, निन्दा करना, द्वेषवचन बोलना यह अशुभ वचनयोग है, ऐसा पचमगतिके नायक जिनेश्वर कहते हैं। किसीके वधका विचार करना, ईर्ष्या करना, परगुणोको सहन न करना इत्यादिसे अशुभ मनोयोग होता है, और इन अशुभ मन वचन काययोगोंसे उलटे स्वरूपको धारण करनेवाले शुभ मन वचन और शुभकाययोग ऐसे तीन शुभयोग हैं। परोपकार करना, देवपूजा करना इत्यादि शुभ काययोग है। सत्यभापण करना, धर्मोपदेश देना शुभ वचनयोग है और किसीको जिलानेका विचार करना, गुणोका मनसे आदर करना आदि शुभ मनोयोग है, ऐसा चतुर पुरुष कहते हैं। ये शुभयोग वैसे शुभ परिणामोसे उत्पन्न होते हैं ॥ ८१-८३ ॥ (आस्रवके भेद।)- क्रोध, मान, माया और लोभसे उत्पन्न हुए आस्रवको- कर्मागमनको सापरायिक आस्रव कहते है। सापरायका अर्थ ससार है। ससार जिसका प्रयोजन है, ऐसे आसवको सापरायिक आस्रव कहते हैं। यह आस्रव कषायवाले जीवको होता है और ईपिथआस्रव अकपाय जीव-कषायरहित जीवको होता है। इसलिये आचार्य कषायोका त्याग करते हैं जिससे सापराय आस्रव उनको होते नही ।। ८४ ।। - -...- २ आ अभिवतिन ३ आ ससारहेतुकोऽवादि ४ आ इतरस्त्वकषायस्य १ आ चिन्तया मत S.S 28 २१८) सिद्धान्तसारः (-९. ८५ - स चतुर्धा मतः क्रोधलोभमायादिमानतः । कषाय इव जीवानां कर्मरागैकहेतुकः ॥ ८५ संज्वलनस्तथान्यश्च प्रत्याख्यानः स इष्यते । अप्रत्याख्यान इत्येवं तथानन्तानुबन्धिकः ॥ ८६ प्रत्येकमिति चत्वारो'भेदाः क्रोधादिना मताः। सर्वे सम्मिलिताः सन्ति षोडशेतेऽतिदुर्घराः॥ ८७ संज्वलनोऽथक्षणध्वंसी विलास इव विद्युताम् । यः प्रत्याख्यायते कालात्स प्रत्याख्यान ईरितः॥८८ कियत्कालेन यो याति विनाशं स्वत एव हि । अप्रत्याख्याननामानं तमाहुर्गणनायकाः ॥ ८९ अनन्तसंसृतेहेतोः कर्मबन्धकहेतुकः । यश्चानन्तानुबन्ध्याख्यः कषायः स निगद्यते ॥९० कषायास्रव इत्थ यश्चतुर्द्धा गदितो जिनः । वर्जयन्ति विधाप्येनं भव्याः संसारभीरवः ॥ ९१ --- स्पष्टीकरण - सापरायिक आस्रव कषायसहित जीवोके होते हैं और वे दसवे गुण- स्थानतकके जीवोको होते हैं। ग्यारहवे गुणस्थानमे कषायोका उपशम होता है तथा बारहवे आदिक गुणस्थानोमे जीवोके कषाय पूर्ण नष्ट हुए हैं, अत उन गुणस्थानवी जीवोको ईर्यापथ आस्रव होते है। ईशिब्दका अर्थ योग होता है, और पथ शब्दका अर्थ मार्ग-द्वार ऐसा होता है। अर्थात् केवल योगके द्वारा कर्मागमन जिससे होता है। ऐसे आस्रवको इर्यापथास्राव कहना चाहिये। इर्यापथास्रव ससार-परिभ्रमणका कारण नही है, क्योकि उससे जो कर्म आता है वह प्रकृतिबंधसे और प्रदेशबधसे युक्त होता है। तथा सापरायिकास्रव स्थितिबध और अनुभागवधको उत्पन्न करनेवाला होता है। ( कषायकी निरुक्ति भेद और स्वरूप।) - वह कषाय क्रोध, मान, माया और लोभ ऐसे भेदसे चार प्रकारका है। जैसे कषाय-- अर्थात् वटवृक्षकी छाल, हरे और बेहडाके कषाय रससे धोये वस्त्रपर रग जम जाता है, वैसे ये क्रोधादि कषाय कर्मरूपी रगको जमानेमे कारण होते है। अतः क्रोधादिकोका कषाय यह नाम अन्वर्थक है। कपायोके सज्वलन, प्रत्याख्यान, अप्रत्याख्यान और अनतानुबधी ऐसे चार भेद हैं और प्रत्येकके क्रोध, मान, माया और लोभ ऐसे चार भेद हैं । मिलकर सर्व भेद सोलह होते हैं। ये भेद अतिशय दुर्धर है, क्योकि इनसे आत्मा अलग होना महाकठिन कार्य है ।। ८५-८७ ।। सज्वलन कषाय जल्दी नष्ट होता है जैसे विद्युत्का प्रकाश क्षणके अनतर नष्ट होता है। स-सम्यक् शीघ्र ज्वलन-जलनेवाला-नष्ट होनेवाला ऐसी सज्वलन शब्दकी निरुक्ति हैं। प्रत्याख्यान-जो कषाय कालसे त्यागा जाता है उसे प्रत्याख्यान कषाय कहते हैं। कुछ परिमित कालसे जो स्वय नष्ट होता है उसे गणनायक-गणधर अप्रत्याख्यान, कषाय कहते है। अनत ससारका जो हेतु है तथा जो कर्मबधका मिथ्यात्वके समान मुख्य हेतु है ऐसे कषायको अनतानुबधी कहते है। इस प्रकारसे जो कषायास्रव चार प्रकारका जिनेन्द्रोने कहा है, ससारसे डरनेवाले भव्य जीव उसे मन वचन और शरीरसेभी छोडते हैं ॥ ८८-९१ ॥ - । १ आ मायाभिमानत २ मा सज्वलन क्षणध्वसी ३ आ विस्फार ४ आ यस्त्वनन्तानु -९ ९९) सिद्धान्तसार (२१९ १ पञ्चेन्द्रियवशात्कर्म यदास्रवति दुर्धरम् । स चेन्द्रियात्रवोऽभाणि पञ्चधा परमेश्वर. ॥ ९२ क्रियास्रवस्तु विज्ञेयः पञ्चविंशतिसख्यकः । जिनागमपयोऽम्भोधिपारगै कथितो बुधः॥ ९३ चैत्याना सुगुरूणा च सिद्धान्तस्यापि शक्तितः । पूजादिलक्षणाभाणि क्रिया सम्यक्त्ववधिनी॥९४ कुलिङ्गदेवपाखण्डचारित्रस्तवनादिका । या क्रिया क्रियते विद्धिर्मता मिथ्यात्ववधिनी ॥ ९५ शुभाशुभनिमित्तैफगतप्रत्यागतक्रिया। प्रायोगिकी मता प्राज्ञ प्रगताशेषकल्मषे ॥ ९६ सयतस्य सतो यच्चाविरति प्रतिवर्तना । आभिमुख्येन सावादि समादानक्रिया बुधैः ॥ ९७ ईयापथविशुद्धयर्थं प्रवृत्तिर्या विधीयते । तामीर्यापथिकामाहु. क्रिया शश्वत्क्रियाविद. ॥९८ क्रोधावेशात्प्रवृत्तिर्या यत्र तत्राविचारतः । प्रादोषिकी क्रियां दक्षा कथयन्त्यतिदुःखदाम् ॥ ९९ ( इन्द्रियास्रवके भेद । )- पाच इन्द्रियोके विषयोमे लुब्ध होनेसे दुर्धर कर्म जीवमे आता है उसे इन्द्रियास्रव कहते है । इसके जिनेश्वरने पाच भेद कहे हैं। स्पर्शनेन्द्रियके वश होकर जो कर्मास्रव होता है उसे स्पर्शनेन्द्रियास्रव कहते हैं । इसी तरह रसनेन्द्रियास्रव, प्राणेन्द्रियानव, चक्षुरिन्द्रियास्रव और श्रोत्रेन्द्रियास्रव ऐसे इन्द्रियास्रवके पाच भेद हैं ।। ९२ ।। ( क्रियास्रवके पच्चीस भेद । )- जिनागमरूप समुद्र के दूसरे किनारेको पहुचे हुए विद्वानोने क्रियास्रवके पच्चीस भेद कहे है ।। ९३ ॥ ( सम्यक्त्ववर्धिनी क्रिया। )- जिनप्रतिमा, निर्ग्रन्थगुरु और जिनागमकी यथाशक्ति पूजा, आदर, भक्ति, विनय आदि करना सम्यक्त्ववद्धिनी क्रिया कही गई है ॥ ९४ ॥ ( मिथ्यात्वद्धिनी। )- मिथ्यात्वी साधु, हरिहरादिक मिथ्यादेव और पाखण्डियोके चारित्रकी जो स्तुति - प्रशसा आदि की जाती है उसे विद्वान् मिथ्यात्ववधिनी क्रिया कहते है ।। ९५ ॥ (प्रायोगिकी क्रिया। )- शुभ और अशुभ कार्योंके निमित्त जो शरीरादिसे और वाहनोसे जाना आना आदि क्रिया की जाती है उसे जिनका समस्त पाप नष्ट हुआ है ऐसे विद्वानोने प्रायोगिकी क्रिया कहा है ॥ ९६ ।। ( समादान क्रिया। )- सयत अर्थात् मुनिका मुख्यतासे अविरतिके प्रति झुक जाना समादान क्रिया है ऐसा विद्वानोने कहा है ॥ ९७ ।। ( ईयापथिका क्रिया।)- ईर्यापथकी विशुद्धताके लिये जो क्रिया की जाती है, उसे नित्यक्रियाके स्वरूपके ज्ञाता - ईर्यापथक्रिया कहते है । अर्थात् सूर्योदय होनेपर चार हाथ जमीन देखकर सावधानतासे गमन करना ईर्यापथ क्रिया है ॥ ९८ ।। ( प्रादोषिकी क्रिया। )- क्रोधके आवेशसे किसीभी कार्यमे विचार किये विना जो प्रवृत्ति होती है उसे चतुर लोग अतिशय दुख देनेवाली प्रादोषिकी क्रिया कहते हे ॥ ९९ ।। १ आ दुर्घर २२०) सिद्धान्तसारः (९. १००- प्रदुष्टस्य सतः कश्चिदत्युद्यमविधिर्महान् । यत्र विज्ञायते निन्द्या क्रिया कायभवा हि सा १०० हिसोपकरणादानकारिणी भवधारिणीम् । क्रियामाहुः त्रियावन्तस्तामाधिकरणीमिह ।। १०१ यस्यां हि क्रियमाणायां दुःखोत्पत्तिःप्रजायते।जीवानां मुनिभिर्गीतासा क्रिया पारितापिकी॥१०२ प्रमत्तयोगतः सर्वप्राणानां व्यपरोपणम् । यथा विधीयते सेयं क्रिया प्राणातिपातिकी ॥ १०३ रामारम्यैकरूपादिविलोकनपरा मतिः । यत्र तामिह गायन्ति प्रदुष्टां दर्शनक्रियाम् ॥ १०४ प्रमादकवशावत्याः स्पर्शनीयस्य वस्तुन. स्पर्गे चिन्तानुवन्धः स्यात्सा हि संस्पर्शनक्रिया ॥ १०५ आधारादेरपूर्वस्योत्पादात्प्रात्ययिकी मता । क्रिया क्रियावतां मान्यमुनिभिर्मलजिते. ॥ १०६ स्त्रीपुरुषादिसम्पातिदेशे मलविसर्जनम् । क्रियते सा क्रियामाणि समन्तादनुपातिनी ॥ १०७ अमृष्टादृष्टभूमौ यत्कायादीनां निवेशनम् । विधीयते क्रिया संपाप्रोक्तानाभोगिता जिनः॥१०८ - ( कायिकी क्रिया।)- किसी कार्यमे लोभादिके वश होकर गरीरसे महान् उद्यम करना वह निन्ध कायिकी क्रिया समझनी चाहिये ॥ १०० ।। ( आधिकरणिकी क्रिया )- हिंसाके उपकरणभूत शस्त्रादिग्रहण करना आधिकरणिकी क्रिया है । यह क्रिया संसारको धारण करनेवाली है ऐसा क्रियावान्चारित्र पालनेवाले मुनिराज कहते हैं । १०१॥ ( पारितापिकी क्रिया )- जो क्रिया करनेसे जीवोको दुःख उत्पन्न होता है उस क्रियाको मुनियोने पारितापिकी क्रिया कहा है ॥ १०२ ।। (प्राणातिपातिकी क्रिया )- आयु, इन्द्रिय, वल और प्राण उवासोच्छवास ऐसे प्राणोका वियोग करनेका यह कार्य जिससे होता है वह प्राणातिपातिकी क्रिया कहते हैं ।।१०३।। ( दर्शनक्रिया )- जिस क्रियामे स्त्रियोका रमणीयरूप उनके सुदर अग, हावभाव देखनेमे बुद्धि तत्पर हो जाती है ऐसी दुष्ट क्रियाको मुनि दर्शनक्यिा कहते है ।। १०४ ।। ( स्पर्गनक्रिया)- रागभावसे युक्त होकर और प्रमादी बनकर स्पर्शयोग्य वस्तुको स्पर्श करनेका सतत मनमे चिन्तन होना स्पर्शनक्रिया है ॥ १०५ ॥ (प्रात्ययिकी क्रिया । )- अपूर्व ऐसे अधिकरण- पदार्य उत्पन्न करना वह प्रात्ययिकी क्रिया है ऐसा दोषरहित मान्य मुनि कहते हैं । १०६ ।। ( समन्तानुपातिनी क्रिया। )- जहां स्त्रीपुरुष आते जाते हैं ऐसे स्थानमें मलविसर्जन करना ऐसी क्रियाका नाम समन्तानुपातिनी है ।। १०७ ॥ (अनाभोगक्रिया।)- जो जमीन झाडकर स्वच्छ नहीं की है, तथा जो माखोसे सम्यक् नहीं देखी है ऐसी भूमिपर शरीरसे वैठना, सोना, हाथ पाँव फैलाना वह अनामोगिता क्रिया है ।।१०८॥ १ मा. मन्युद्यमः -९ ११६) सिद्धान्तसार (२२१ परेणाडगीकृतां तावदङ्गीकृत्य करोति यः। क्रिया तामिह भाषन्ते स्वहस्तविनिवर्तिताम् ॥१०९ पापादानप्रवृत्तेर्यदभ्यनुज्ञा विधीयते । निसर्गाख्या क्रियामाहुर्मुनयोऽनयनिर्गताः ॥ ११० परेण विहितछन्नसावधादिप्रकाशनम् । विदारणक्रिया दुष्टा कुर्वतां तत्प्रजायते ॥ १११ आज्ञाव्यापादिकोमाहुः क्रिया सच्चरणादिषु । स्वयं कर्तुमशक्तो यो योजनं कुरुतेऽन्यथा ॥११२ शाठ्यालस्यवशे जोवे ह्यागमोद्दिष्टसद्विधेः । कर्तव्योनादरः सैषानादरादिक्रियाधमा ॥ ११३ छेदभेदादिदुःकर्मपरत्व परतोऽपि वा । प्रारम्भे तस्य यो हर्षः सा प्रारम्भक्रिया मता ॥ ११४ परिग्रहाविनाशार्था सा पारिग्राहिकी क्रिया । ज्ञानदर्शनचारित्रनिन्दा मायात्रियां विदुः ॥११५ मिथ्यादर्शनविज्ञानक्रियाकरणकारणे तदाविष्टे प्रशंसा या सा मिथ्यादर्शनक्रिया ॥ ११६ ( स्वहस्तक्रिया। )- दूसरेसे करने योग्य क्रियाका स्वय आचरण करना उसको विद्वान् स्वहस्तविनिवर्तन क्रिया कहते है ।। १०९ ॥ ( निसर्गक्रिया । )- जिससे पापका आस्रव होता है, ऐसी क्रिया करनेके लिये सम्मति देना उसे मुनि, जोकि कुनयसे दूर हुए हैं, वे निसर्गक्रिया कहते हैं ॥ ११० ॥ ( विदारणक्रिया। )- दूसरे स्त्रीपुरुषोने जो कुछ गुप्त पापादि किये होगे उनको प्रकाशित करना विदारण क्रिया है। उसे प्रकाशित करनेवालोंसे यह क्रिया होती है ॥ १११ ।। ( आज्ञाव्यापादिकी क्रिया। )- जमीनपर बैठना, चलना इत्यादि कार्योंके विषयमे जो आगमाज्ञा है, उसके अनुसार स्वय चलनेमे असमर्थ है और दूसरोको जो आगमाजाविरुद्ध चलनादि क्रियाओमे प्रवृत्त करता है उसकी वह प्रवृत्ति अज्ञाव्यापादिकी क्रिया है ।। ११२ ।। ( अनादर क्रिया। )- जो जीव सदा आलसी है, वह आगममें कही गई शुभक्रियाओके कर्तव्यमें अनादर करता है। उसकी यह अधम अनादर क्रिया है ॥ ११३ ।। ( प्रारम्भक्रिया। )- छेदनभेदनादि दुष्कर्म करनेमे स्वय तत्पर रहना और दूसरे यदि ऐसी क्रिया करते हैं तो उसमे हर्ष मानना वह प्रारभ क्रिया मानी गई है ।। ११४ ॥ ( पारिग्राहिकोक्रिया और मायाक्रिया। )- अपने परिग्रहोका नाश न होवे एतदर्थ जो सरक्षणादिमे तत्पर रहना वह पारिवाहिकी क्रिया है और ज्ञान, दर्शन तथा चारित्रकी निन्दा करना मायाक्रिया है ॥ ११५ ॥ ( मिथ्यादर्शन क्रिया। )- मिथ्यादर्शन, मिथ्याज्ञान और मिथ्याचारित्रमे स्वय तत्पर होना और दूसरोको तत्पर कराना, जो इनमे प्रविष्ट है उसकी प्रशसा करना यह मिथ्यादर्शन क्रिया है ।। ११६ ॥ - १ विनिवतितम् १ आ तच्चरणादिकम् ३ मा निन्दा २२२) सिद्धान्तसार. (९. ११७- उदयात्कर्मणो निन्द्यात्संयमस्य विघातिनः।या निवृत्तिर्भवत्यस्य सा प्रत्याख्यानकी क्रिया॥११७. पञ्चविंशतिसख्याकः क्रियास्रव इहेरितः । कर्मास्त्रवत्यनेनेति व्युत्पत्तेः पूर्वसूरिभिः ।। ११८ मानवस्य विशेषोऽपि प्राणिनां जायते महान् । भावस्तीव्रस्तथा मन्दस्तद्विशेषैरनेकया ॥ ११९ ज्ञातानातस्तया वीर्यभावादिभिरय पुनः । मालवस्य विशेषोऽस्ति तारतम्यविशेषतः ॥ १२० वाह्याभ्यन्तरहेतुन्यस्तत्कालष्यमिवाम्भसि । आत्मन्यद्रेकवाहुल्यं तीव्रो भावो निगद्यते ॥ १२१ विपरीतो मतो मन्टो मन्दधर्मास्लवोऽपि सः । तद्विशेषस्तु विज्ञेयस्तारतम्येन तत्परः ॥ १२२ अयं प्राणी निहन्तव्य इति ज्ञात्वा प्रवर्तनम् । जातभावोऽत्र जीवानां महालविनवन्धनम् ॥ १२३ यत्प्रमादवशाज्जीवो दुष्टाचारेषु वर्तते । अविज्ञातेषु सर्वेषु तमज्ञातं जगुर्वधाः ॥ १२४ -------- ( प्रत्याख्यान त्रिया।)- सयमका घात करनेवाले निंद्य अशुभ कर्मका उदय आनेसे संयमसे मुनिका निवृत्त होना प्रत्याख्यान क्रिया है ।। ११७ ।। जिसकी संख्या पच्चीस है ऐसा क्रियानव मैंने यहां कहा है । ' इन क्रियाओसे कर्मका आवव होता है; इसलिये इनको क्रियानव कहते हैं ऐसी पूर्वाचार्योने क्रियानव शब्दकी व्युत्पत्ति की है ।। ११८ ॥ ( आत्रवविणेपका वर्णन।)- तीव्रभाव, मंदभाव और उसके विशेप तीव्रतर, तीव्रतम, मदतर, मंदतम आदि भावोंसे महान् आत्रवविणेप होता है। वैसे ज्ञातभाव, अजातभाव तथा वीर्य इत्यादि भावोंसे पुन. तारतम्यादि प्रकारोसे आस्रवोंमे विगेपता उत्पन्न होती है ।।११९-१२०॥ ( तीव्रभाव तथा मंदभावका लक्षण ।)- बाह्यकारणोंसे और अन्तरगकारणोंसे जो आत्मामें अर्थात् आत्माके परिणामोमे उत्कटता होती है, जो उद्रेककी अतिमयता उत्पन्न होती है, उसे तीव्रभाव कहते हैं । जैसे पानीम कलुपता उत्पन्न होती है । तथा इससे विपरीत ऐसी जो आत्मामे परिणति होती है उसे मन्द कहते है। इस मंदपरिणामसे मंद मानव आता है । इस तीव्रभाव और मंदभावके जो विशेष प्रकार उत्पन्न होते हैं वे तारतम्यसे मदभाव और तीव्रभावके समझने चाहिये ।। १२१-१२२ ॥ (जातभाव और अन्नातभाव )- यह प्राणी मारना चाहिये ऐसा समझकर प्रवृत्ति- करना जातभाव है और वह महानवका कारण है ॥ १२३ ॥ प्रमाद वग होकर असावधानता, बालस्य आदिसे जिनका स्वरूप नहीं मालूम है ऐसे दोपयुक्त सर्व माचरणोमे जीवकी जो प्रवृत्ति होती है उसे विद्वान् लोग अज्ञातभाव कहते हैं।। १२४ ।। : तारतम्यादा १ मा व्गनिका २ आ. बारा ६ ना. जावे ७ ग तनम् ४ आ. कर्मा ५ मा निवन्धन.

-९. १३२) सिद्धान्तसार (२२३ भावरूपाधिकरणो' जीवाजीवाश्रयो मतः । वीर्यभावस्वसामर्थ्य द्रव्यस्य गदित बुधः ।। १२५ तद्विशेषास्रव फिञ्चिन्निगदामि यथागमम् । यदि जानामि जीवानां परिहारविशुद्धये ॥ १२६ फर्ममात्रालवाश्चैते ये सन्ति बहुधा पुनः । तद्विशेषाश्च विज्ञेयाः परमागमतो बुधैः ॥ १२७ तत्त्वज्ञानस्य सन्मोक्षसाधनस्य निवेदने । अन्त पैशून्यमन्यस्य प्रदोष इह निश्चितः ॥ १२८ कुतश्चित्कारणान्नास्ति न जानामीति य. पुन' । विज्ञानस्यापलापोऽन्यं प्रत्यपह्नव इष्यते॥१२९ विभावितमपि ज्ञान दानयोग्यमपि ध्रुवम् । पशुन्याद्दीयते नैतत्तन्मात्सर्यमुदीरितम् ॥ १३० पठने पाठने चापि ज्ञानविच्छेदकारिता । अन्तरायो मतो दुष्टो विशिष्टज्ञानशालिभि ।। १३१ कायेन वचसा वापि ज्ञानज्ञानवतोरिह । प्रकाशव्याहतो प्रोक्तमासादनमनिन्दितैः ॥ १३२ --- ( अधिकरण और वीर्य )- ऐसे भाव होनेमे जो आधारभूत वस्तु है वह जीवरूप और अजीवरूप है । उनको क्रमसे जीवाधिकरण और अजीवाधिकरण कहते हैं । वस्तुका द्रव्यका जो स्वसामर्थ्य उसको वुद्धिमान् वीर्यभाव कहते हैं ।। १२५ ॥ जीवोके वधके त्यागमे विशुद्धताप्राप्ति होनेके लिये इनके विशेष आस्रवोको मैं जिनागमके अनुसार कहता हू ।। १२६ सपूर्ण कर्मोके जो नाना प्रकारके आस्रव हैं और उनके जो विशेष हैं वे विद्वानोके द्वारा परमागमसे जानने योग्य है ।। १२७ ।। ( ज्ञानदर्शनावरणोके आम्रव । )- १ प्रदोप- साक्षात् मोक्षकी प्राप्तिमे साधनभूत ऐसे तत्त्वनानका कोई पुरुप निवेदन कर रहा हो तो उसके विषयमे मनमे जो दुष्ट भाव उत्पन्न होना, उसकी प्रशसा तो दूरही रही उलटा मनमे दुष्ट भाव धारण करना ऐसे दुष्ट भावको प्रदोष कहते हैं ।। १२८ ।। २ निह्नव - कोई शास्त्रकी कुछ वाते जाननेके लिये पूछता है तो बतानेवाला पुरुष किमी कारणसे मुझमे वह ज्ञान नहीं है, मैं नही जानता हू ऐसा कह कर ज्ञानको छिपाता है ।।१२९ ३ मात्सर्य - खूव परिश्रम करके जो ज्ञान प्राप्ति कर लिया है, तथा जो निश्चयमे दूमरोको देनेके योग्य है, ऐमाभी ज्ञान कुछ कारणोसे नही देना वह मात्सर्य है ।। १३० ॥ ४ अन्तराय - विद्यार्थियोके पढनेमे तथा गुरुजीके पढानेमे ज्ञानका विच्छेद करना यह अन्तराय दोप है, ऐसा विशिष्ट ज्ञानवालोने माना है ।। १३१ ।। ५ आसादन ज्ञान और ज्ञानी इनको प्रकाशमे लानेके कार्यमे मनसे, वचनसे और शरीरसे व्याघात उत्पन्न करना आसादन है, ऐसा प्रशसनीय जनोने-गणधरादिकोने कहा है।।१३२॥ १ मा भावस्त्वाधिकरण्योऽपि २ आ श्च ३ आ यदि जानामि २२४) सिद्धान्तसारः ; (९. १३३- - प्रशस्तस्यापि बोधस्य बाधाविरहितस्य च । दूषणं हयुपघातोऽयं मतो मतिमतामिह ॥ १३३ प्रदोषादय इत्येव ज्ञानावृतिनिबन्धनम् । दर्शनावरणस्यापि भवन्ति भविनामिह ॥ १३४ तुल्येऽप्यन्त्र प्रदोषादौ कारणे न विरुद्वयते । ज्ञानावृतिदृगावृत्योः कार्यत्वं हि प्रदीपवत् ॥ १३५ ज्ञानस्य विषयाः स्युर्वा ज्ञानावृतिनिबन्धनम् । यथा दृग्विषयाः सर्वे दृगावृतिनिबन्धनम् ॥ १३६ दुःखकशोकसन्तापवधाक्रन्दनदेवनः । स्वपरात्मोभयस्थैः स्यादसद्वेद्यं नृणामिह ॥ १३७ . ६ उपघात - जो ज्ञान प्रशसनीय है और वाधारहित निर्दोष है उसकाभी नाश करनेका विचार रखकर उसको दूषण लगाना उसे मतिमान् लोक उपधात कहते है ।। १३३ ।। ये प्रदोषादिक, जो कि ससारी प्राणियोको ज्ञानावरण कर्मके आस्रवमे कारण है, वेही दर्शनावरण कर्मके आस्रवमेभी कारण है ॥ १३४॥ ये प्रदोष निवादि कारण समान होनेपरभी इनसे ज्ञानावरण और दर्शनावरणके आस्रवरूपी कार्य होना विरुद्ध नहीं है, क्योकि एक कारणसे अनेक कार्य सिद्ध होते हैं । जैसे एक प्रदीपसे प्रकाश मिलता है, अधकारका नाश होता है, भय दूर होता है। उसके साहाय्यसे अध्ययन किया जाता है । ऐसे अनेक कार्य एक प्रदीपरूप कारणसे होते है वैसे प्रदोषादिक अनेक - ज्ञान और दर्शनके आवरणोके आस्रवमे कारण होते है ॥ १३५ ॥ अथवा जब ये प्रदोषादिक ज्ञानके विषयमे होते है तब ज्ञानावरणके कारण होते हैं और जब दर्शन विषयके होते है तब दर्शनावरणके कारण होते हैं ऐसा समझना चाहिये ॥ १३६ ।। ( असद्वेद्य कर्मके आस्रवके कारण। )- दुख शोक, सन्ताप, वध, आक्रन्दन और देवन अपनेमे, दूसरोमे और दोनोमे करना मनुष्योको यहां असवेंदनीयकर्मके आस्रवके कारण होते है । १ दुख-पीडारूप परिणामको दुख कहते हैं। २ शोक- जिसने अपने ऊपर उपकार किया था उस व्यक्तिका वियोग होनेपर 'जो व्याकुलता उत्पन्न होती है उसे शोक कहते हैं। ३ सताप-किसीने अपनी निंदा की, किसीने मानभग किया, किसीके कर्कश वचन सुने ऐसे कारणोसे चित्त कलुषित होनेसे जो पश्चात्ताप-खेद होता है उसे सताप कहते है । ४ आक्रदन- बहुत सतापसे अश्रुपात होना, प्रचुर विलाप होना इत्यादिकोसे रुदन करना आक्रदन है। ५ वध, आयुष्य, इन्द्रिय, बल और श्वासोच्छ्वासका वियोग करना वध है । --- -------- - १ आ निवन्धना २ आ तथा -९. १४०) सिद्धान्तसार (२२५ दानसंयमसच्छौचक्षान्तियोगानवक्रता । भूतव्रत्त्यनुकम्पा च सर्वे सद्वेधकारणम् ॥ १३८ केवलिश्रुतसडघाना देवे धर्मे तथा पुनः । जायतेऽवर्णवादेन कर्म दर्शनमोहकम् ॥ १३९ केवली कवलाहार गृह्णात्येष तथा पुनः । नीहार कुरुते पश्चाद्दोषः केवलिनो मतः ॥ १४० ६ परिदेवन - सक्लेशपरिणामोसे गुणस्मरण और गुणवर्णनपूर्वक अपने ऊपर और अन्योके ऊपर किया गया उपकार जिसका विषय है ऐसा दया उत्पन्न करनेवाला जो रोना उसे परिदेवन कहते हैं । अन्तरगमे क्रोधादि आवेशसे युक्त होकर यदि ऐसे दुःखोके प्रकार स्वपरोभयमे किये जाते हैं तो वे असद्वेद्य कर्मके आस्रवके निमित्त होते हैं। मुनि अथवा व्रतिक उपवासादिक शास्त्रविहित कर्म करते हैं परतु उनमे सक्लेश परिणाम नही है ससारदुःखसे दूर होनेके लिये उनसे उपवासादिक किये जाते हैं, उनके करनेपर दुख होता है तोभी सक्लेशपरिणाम न होनेसे असद्वेद्यकर्मास्त्रव उनके आत्मामे नही होते हैं । पापबध नही होता है, प्रत्युत महान् पुण्यात्रव होते हैं ।। १३७॥ ( सवैद्यकर्मास्रवके कारण। )- दान, सयम, शौच, शान्ति, योग, अवक्रता, भूतानुकम्पा, और व्रत्यनुकम्पा ये सव सद्वेद्यकर्मके कारण हैं। दान - दूसरोपर तथा अपने परभी अनुग्रह करनेको वुद्धिसे अपने धनका त्याग करना दान है। सयम-प्राणियोका रक्षण करनेकी प्रवृत्ति होना और इद्रियोको अशुभप्रवृत्तिसे रहित कर शुभ प्रवृत्तिमे लगाना। सच्छौच- लोभका त्याग करना । क्षान्ति- क्रोधादिकोका त्याग । क्रोध, मान और मायाओका त्याग । योग- शुभध्यान। अवता- मनमे निष्कपट होना। भूतानुकम्पा- कर्मोदयसे उन उन गतियोंमे उत्पन्न हुए प्राणियोको भूत कहते है । उन भूतोमे दया करना अर्थात् अनुग्रह करनेकी इच्छासे आर्द्रचित्त होकर दूसरोको होनेवाली पीडा मानो स्वत को हो रही है ऐसी भावना होना दया है। व्रत्यनुकम्पा- अणुव्रत पालनेवाले गृहस्थ और महाव्रत धारण करनेवाले मुनिराज इनको व्रती कहते हैं । इनके ऊपर मन दयामुक्त होना ऐसी सर्व अच्छी प्रवृत्तिया जीवोको सद्वेद्यकर्मास्रवके लिये कारण होती हैं । इन कार्योंसे जीव आगेके भवमे देवगतिमे तथा मनुष्य- गतिमे नानाविध सुखोको प्राप्त करता है ॥ १३८ ॥ ( दर्शनमोहकर्मके आस्रवकारण। )- केवली, श्रुत-जैनागम, सघ, इनमे दोष न होनेपरभी दोषारोपण करना केवल्यादिकोका अवर्णवाद है । वेव, धर्म-अहिंसात्मक धर्म, जो कि जैनागमका कहा हुआ है इनके ऊपर दोषारोपण करनेसे दर्शन-मोहकर्मके आस्रव उत्पन्न होते हैं। S.S.29 २२६) सिद्धान्तसारः (९. १४१- सामान्यसंयतस्येहावर्णवादेन दुर्गति । यान्ति केवलिनस्तेन क्व ते लोका न वेअघहम् ।। १४१ मांसचर्मोदकादीनामनवद्यनिरूपणम् । शास्त्रे जैनेऽपि शास्त्रस्यावर्णवादः सतां मतः ॥ १४२ नग्नाश्चण्डाश्च बीभत्साः सर्वथा शुचिवजिताः । इत्याद्याभाषणं संघावर्णवादो विभाव्यते ॥१४३ आसुरोऽय मती धर्मो जैनेन्द्रो निर्गुणस्तथा । इत्याद्याभाषणं धर्मावर्णवादोऽतिदु सहः ॥ १४४ सुरामांसवधादीनामभावं निगदन्नयम् । तदेव' तस्य वर्णस्यावर्णवादो निगद्यते ॥ १४५ यः कषायोदयात्तीवः परिणामः प्रजायते । चारित्रमोहनीयस्य स हेतुः कर्मणो मतः ॥ १४६ कषायोत्पादनं स्वस्य परस्य च तथा पुनः। क्लिष्टलिङ्गग्रहो वापि वतिनां व्रतदूषणम् ॥ १४७ . केवली अवर्णवाद - जिनका ज्ञान आवरणरहित हुआ है, ऐसे सर्वज्ञ जिनेश्वर, सामान्य- केवली और गणधरकेवली ये कवलाहार करते है, तथा इनको नीहारभी है अर्थात् मलमूत्रभी है इनको रोग होता है, उपसर्ग होता है, वे नग्न होते है परन्तु वस्त्राभरणमडित दीखते है इत्यादि ऐसे दोषोका आरोपण करना केवली अवर्णवाद है। सामान्य मुनिके विपयमेभी दोषारोपण करनेसे प्राणीको दुर्गतिकी प्राप्ति होती है फिर जो लोग केवलीके ऊपर उपर्युक्त झूठे आक्षेप करते हैं, उनको कौनसी दुर्गति प्राप्त होगी, मैं नही जानता ॥ १४१ ॥ श्रुतावर्णवाद - मासभक्षण करना, चर्ममे रखा हुआ पानी पीना, मद्यपान करना, रात्रिभोजन करना, जलगालन नही करना, माता तथा वहनके साय सभोग करना, कदमूलभक्षण करना आदि पापोकोभी जैनशास्त्र विधेय बतलाता है ऐसा जैनशास्त्रपरभी आक्षेप करना यह श्रुतावर्णवाद है ॥ १४२॥ सघावर्णवाद - रत्नत्रययुक्त मुनिसमूहको सघ कहते है उनके ऊपर इस प्रकारसे आक्षेप मिथ्यात्वी कहते है-ये जैनमुनि नग्न रहते है, अतिशय कोपी होते है और बीभत्स तथा अपवित्र रहते है, कलिकालमे ये उत्पन्न हुए है ऐसा आक्षेप करना सघावर्णवाद है ॥ १४३ ।। धर्मावर्णवाद - यह जैनधर्म असुरोंका है, और गुणरहित है इत्यादि आक्षेप करना यह धर्मावर्णवाद अतिशय दुखकारक है ।। १४४ ॥ देवावर्णवाद - देव मदिरापान करते है, मास सेवन करते है, यज्ञादिकमे आकर बली- ग्रहण करते हैं इत्यादि बाते देवोका अवर्णवाद है । ( श्रुतसागरी अध्याय छठा) मदिरा, मास, प्राणिवध आदिका अभाव कहनेवाला देव नही हो सकता ऐसा कहना यह देवदेवके ऊपर अवर्णवाद है ॥ १४५ ॥ (चारित्रमोहनीय कर्मके आस्रव-कारण । )- कपायोंके उदयसे जो तीव्र परिणाम होता है, वह चारित्रमोहनीय कर्मके आस्रवका कारण होता है ॥ १४६ ॥ अपनेमे तथा दुसरोमे कषाय उत्पन्न करना, सक्लेशपरिणाम युक्त होकर मिथ्यासाधुका १ मा न देवो देवदेवस्य वर्णवादो निगद्यते -९. १५६) सिद्धान्तसार (२२७ इत्याद्यनेकधाभाणि जिनागमविशारदः । कषायवेदनीयस्य ह्यास्रवद्वारमायतम् ॥ १४८ समानर्धामणो' हास्यं दीनानामतिहासता । बहुधा विप्रलापश्च सोपहासफशीलता ॥ १४९ इत्याद्यनेकदुर्वृत्त कथितं पूर्वसूरिभि. । हास्यकवेदनीयस्य कारणं दुःखधारणम् ।। १५० क्रीडकपरता नित्यं व्रतशीलारुचिस्तथा । रत्यादिवेदनीयस्य कारणं कथितं जिनः ॥ १५१ परस्यारतिकारित्व तत्पापिजनसङ्गमः । मरतेवेंदनीयस्य कारणत्वेन निश्चितम् ।। १५२ स्वशोकोत्पादन तावत्परशोकाभिनन्दनम् । शोकादिवेदनीयस्य हास्रवद्वारमीरितम् ॥ १५३ आत्मनो भयभीरत्वं परस्य भयकारिता । भयादिवेदनीयस्याप्यास्त्रवः श्रमणमत. ॥ १५४ कालफौशलमाश्रित्य क्रियाचारविदस्तु या । जुगुप्सा सा जुगुप्सादिवेदनीयस्य कारणम् ॥ १५५ अलीकस्याभिधानादिपरत्व वृद्धरागता । मालवोऽस्त्यादिवेदस्य कर्मणः कथितो जिनः ॥ १५६ -- ------ भेप धारण करना, व्रतियोंके व्रतोमे दूपण लगाना, सक्लेग परिणाम उत्पन्न करनेवाला लिंगग्रहण करना इत्यादि अनेक प्रकारसे कपायवेदनीयका दीर्घ आस्रवद्वार जिनागममे निपुण विद्वानोने कहा है ॥ १४७-१४८ ॥ साधर्मिकोकी हसी करना, दीनोका अतिशय उपहास करना, अनेक प्रकारोसे विरुद्ध भापण करना, हमेशा विनोद हसी करनेका स्वभाव होना, इत्यादिक अनेक दुर्वृत्त-दुराचारोमे प्रवृत्त होना ये हास्यवेदनीयके दुख देनेवाले कारण हैं ऐसा पूर्वाचार्योंने कहा है ॥१४९-१५०॥ रतिवेदनीयके कारण- हमेशा क्रिडा करनेमे तत्पर रहना, व्रत और शीलमे अरुचि उत्पन्न होना, ये रतिवेदनीय कर्मके आस्रवके दुखदायक कारण है ।। १५१ ॥ अरतिवेदनीयके कारण- दूसरेमे अरति- अप्रेम उत्पन्न करना, पाप करनेवाले लोगोंके साथ सहवास रखना, ये अरतिवेदनीयके निश्चित कारण हैं ॥ १५२ ।। शोकवेदनीयके कारण- अपनेमे गोक उत्पन्न करना, कोई गोकयुक्त हुआ हैं ऐसा देखकर आनदित होना ये शोकवेदनीयके आलवद्वार कहे हैं ।। १५३ ।। भयवेदनीयके कारण- स्वय भययुक्त होना, दूसरोको भयभीत करना, ये भयवेदनीयके आस्रव हैं ऐसा मुनियोने कहा है ।। १५४ ॥ जुगुप्सावेदनीयके कारण- काल और कुशलताका आश्रय लेकर जो कुशल आचारोका पालन कर रहे हैं, उनकी ग्लानि करना जुगुप्सावेदनीयके कारण हैं ॥ १५५ ।। स्त्रीवेदके कारण-- अलीक-असत्य भाषण करनेकी आदत होना, दूसरोको फसाना, दूसरोके दोप देखनेमे तत्पर रहना, तीव्र रागभाव उत्पन्न होना आदिक स्त्रीवेदके कारण है ऐसा जिनेश्वरने कहा है ।। १५६ ॥ 4 १ मा घमणो २ आ स्त्रीवेद्यकर्मणो हेतुमानव २२८) सिद्धान्तसार (९. १५७- अनुत्सिक्तत्वं स्वल्पक्रुत्स्वदारपरितुष्टता । आस्रवोभाणि सर्वज्ञः पुंवेद्यस्य तु कर्मणः ॥ १५७ प्रचुरफकषायत्वं परगुह्यप्रकाशनम् । इन्द्रियोद्रेकिता नित्यं परस्त्रीसेवने रति. ॥ १५८ इत्येवमादिकं सर्व आस्रवद्वारमायतम् । नपुंसकादिवेदस्य गृणन्ति गरिमान्विताः ॥ १५९ चारित्रमोहनीयस्य कर्मणः कथितो मया । आस्रवः साम्प्रतं तावदायुषो निगदामि तम् ॥१६० हिंसादिक्रूरकार्याणामजस्र परिवर्तनम् । सर्वस्वहरणं निन्द्यविषयस्यातिगृद्धिता ॥ १६१ कृष्णलेश्याभिसंजातरौद्रध्यानकतानता । नारफस्यायुषो हेतुर्मरणाद्वालबालतः ॥ १६२ प्रपञ्चबहुला वृत्तिमिथ्याधर्मोपदेशना' । अप्रियस्यातिसंधानं नीलकापोतलेश्यता ॥ १६३ आर्तघ्यानभवो मृत्युरित्यादिकमनेकधा । कथितं संयतैरेतत्तिर्यग्योनस्य कारणम् ॥ १६४ पुवेदवेदनीयके कारण- गर्व न धारण करना, अल्प क्रोध, स्वस्त्रीमे सतोष, ये पुवेदकर्मके कारण हैं ऐसा जिनेश्वरोने कहा है ॥ १५७ ॥ नपुसकवेदनीयके कारण- प्रचुर कषाय होना, दूसरोके गुह्य प्रगट करना, इंद्रियोद्रेक धारण करना- अत्यत कामाकुल होना, हमेगा परस्त्री सेवनमे आसक्त होना इत्यादिक सर्व नपुसकवेदके आस्रवके कारण हैं, ऐसा गरिमाको- माहात्म्यको धारण करनेवाले आचार्य कहते हैं ।। १५८-१५९ ।। यहातक मैंने चारित्रमोहनीयके आम्रव कारण कहे है । अव आयुकर्मके आस्रव कारण मैं कहता हूं ।। १६० ॥ ( नरकायुके आसवकारण )- हिंसादिक क्रूरकार्योमे सतत तत्पर रहना, लोगोका सपूर्ण धन, स्त्री आदिक अत्यत प्रिय वस्तुओका हरण करना, जो कि अत्यत निंद्य कार्य माना है, पंचेद्रियोके स्त्री आदिक विषयोमे अत्यत अभिलाषा- लंपटता रखना, कृष्णलेश्यासे उत्पन्न हुए रौद्रध्यानमे लवलीन होना, और बालमरणसे मरना । ये सब कारण नरकायुआस्रवके होते हैं । ऐसीही क्रिया नित्य करना जिसमे प्राणियोको पीडा होती है और धनधान्यादि परिग्रहोमे अत्यासक्ति होना ये नरकायुके आस्रवके कारण हैं ॥ १६१-१६२ ।। ( तिर्यगायुके आस्रवके कारण।)- अतिशय धोखा देनेवाला स्वभाव होना, मिथ्यात्व युक्त धर्मोपदेश देना, अप्रिय लोगोको फसाना, नीललेश्या और कापोतलेश्यायुक्त स्वभाव होना, आर्तध्यानसे मरण होना इत्यादिक तियंचायुके कारण हैं, ऐसा संयतोने- जैन मुनियोने कहा है। चारित्रमोहकर्मके उदयसे जो आत्मामे कुटिलभाव- कपटभाव उत्पन्न होता है उसे माया कहते हैं । इस मायासे अतिशय धोखा देना आदि स्वभाव जीवमे उत्पन्न होते है। ऐसे परिणामोंसे तिर्यंचायुका आस्रव जीवको होता है ।। १६३-१६४ ॥ ---- -- १ आ स्तोकक्रोधानुसिक्तत्वम् २ आ देगिता ३ आ प्रियत्वस्या ४ सर्वज्ञरायुप. कारण मतम् आ तैर्यग्योनस्य -९ १६९) सिद्धान्तसार (२२९ विनीतकस्वभावत्वमनौद्धत्यमनेकधा । अल्पसारम्भताक्लेशमरणं मानुषस्य च ॥ १६५ स्वभावमार्दवं चापि तस्यायुषो निवन्धनम् । सरागसंयमस्तावत्संयमासंयमोऽपि वा ॥ १६६ अकामनिर्जरा वालतपो देवस्य कारणम् । तस्याप्यत्र विशेषेण सम्यक्त्व यत्तु कारणम्॥१६७ अविशेषाभिधानेऽपि सौधर्मादिविशेषत । आस्रवद्वारमाख्यान्ति प्रख्यातव्रतधारिणः ॥ १६८ योगस्य वक्रता मिविसवादनमायतम् । मिथ्यात्वेनास्थिरत्वं च वञ्चनाबहुला स्थिति.॥१६९ ( मनुष्यायुके कारण । )- प्राणिपीडाका आरभ जिसमे अल्पप्रमाणमे होता है, मरणकालमे जिमके परिणाममे सक्लेश नही रहता है, उपदेशके विना अर्थात् स्वभावसेही जिसके मनमे मृदुभाव- दया रहती है, जो नम्न स्वभाववाला, सरलस्वभावी, नीतियुक्त व्यवहार करने- वाला, जिसके कषाय मंद हैं उसे मनुष्यायुके आस्रव होते हैं ।। १६५ ।। ( देवायुके आसवकारण । )- सरागसयम, सयमासयम, अकामनिर्जरा और वालतप ये देवायुके आसवकारण है। तथा जो सम्यग्दर्शन- जीवादि सप्त तत्त्वोपर यथार्थ श्रद्धान है, वह विशेषतासे देवायुके आरवका कारण समझना चाहिये । यद्यपि सम्यग्दर्शन सामान्यतया देवायुका कारण कहा है, तोभी यहा वह सौधर्मादि स्वर्गके देवायुका कारण समझना चाहिये । तथा सम्यक्त्वके होनेसेही चारित्रको सरागसयम, सयमासयम ऐसे नाम प्राप्त होते है । उसके अभावमे यदि चारित्र चारित्रस्वरूप नही माना जाता, तो वह सरागसयम, सयमासयम ऐसे नामवाला कैसे होगा? सरागसयम और सयमासयम इनका लक्षण पूर्वमे कह चुके हैं। अब अकाम निर्जरादिका स्वरूप यहा कहते है- जैसे कैदमे पड़ा हुआ कोई मनुष्य पराधीन होनेसे भूखको सहता है, प्यासकी वेदना सहता है, ब्रह्मचर्यसे रहता है, जमीनपर सोता है, इत्यादि वाधाये सहन करता है, सहनेच्छा- रहित होनेपरभी नाइलाजसे सहन करनेसे उसके थोडेसे कर्म निर्जीर्ण होते हैं । अपनी इच्छा न होते हुएभी कष्ट सहन करना अकाम निर्जरा है । बालतप- मिथ्यादृष्टि तापस, सान्यासिक, पाशुपत, पारिवाजक, एकदडी, त्रिदडी, परमहसादिकोके कायक्लेशादि-लक्षण युक्त जो तप, जिसमे कपटसे युक्त व्रत धारण होता है, उसे बालतप कहते है ॥ १६६-१६८।। ( अशुभनामके आनवकारण।)-योगकी वक्रता, धर्ममे दीर्घकालतक विसवाद, मिथ्या- त्वके साथ मनकी अस्थिरता, अतिशय प्रतारणायुक्त स्वभाव ये अशुभनाम कर्मास्रवके कारण हैं, ऐसा आगमसमुद्रके मध्यमे अवगाहन करनेवाले जैनाचार्य कहते हैं। स्पष्टीकरण-योगवक्रता-मन- वचन और शरीरसे कपटवृत्ति धारण करना । विसवादन-अभ्युदय और मोक्षप्राप्तिकी क्रियाओमे कोई प्रवृत्त हुआ है और वह सत्य मार्गमे तत्पर है, परतु उसमे भ्रम उत्पन्न करके तू अयोग्य मार्गमे लगा हुआ है। इसको छोडकर मेरे कहे हुए सत्य मार्गपर तू चल, जिससे तेरा हित होगा, ope -- १ आ शुभकारण २ मा मिथ्यात्वमस्थिरत्व २३०) सिद्धान्तसार. (९. १७०- नाम्नोऽशुभस्य विज्ञेयमित्येतत्कारणं पुनः । विपरीतं शुभस्याहुरागमाम्भोधिमध्यगाः ॥ १७० सद्दर्शनविशुद्धिश्च विनीतत्वमनिन्दनम् । तेषु सर्वथा शोलेष्वतीचारविवर्जनम् ॥ १७१ अभीक्ष्णज्ञानसवेगौ शक्तितस्त्यागतापसी । तथा साधुसमाधिश्च वैयावृत्त्यं सुनिर्मलम् ।।१७२ अहंदाचार्यसद्भक्तिर्भक्तिर्वहुश्रुते तथा । जिनागममहाभक्तिः षडावश्यककारिता ॥ १७३ मार्गप्रभावना जनवचोवत्सलता परा । इति तीर्थकरत्वस्य कारणानि भवन्ति च ॥ १७४ व्यस्तानि च समस्तानि चिन्त्यान्येतस्य कारणम् । तारतम्येन जायन्ते विहितानि महात्मनाम् ।। ----- ऐसा मिथ्या उपदेश देकर उसे मिथ्यामार्गमे लगाना विसवादन है । मनकी अस्थिरता होनेसे श्रद्धानमे और चारित्रमे दृढता उत्पन्न नही होना, व्रतधारणकी प्रतिज्ञामे वारवार परिवर्तन होना, प्रतिज्ञाको छोड वैठना इत्यादि कार्योसे अशुभनाम कर्मका आस्रव होता है । अशुभनाम कर्मके आस्रव जिनसे आते हैं ऐसे जो योगवक्रतादिक कारण हैं उनसे विपरीत अर्थात् शरीर, मन वचनोकी सरलता होना, दुसरोको जो मिथ्यामार्गमे लगे हुए है उन्हे सन्मार्गमे- रत्नत्रयमार्गमे लगाना, सम्यग्दर्शनके साथ स्थिरचित्तता होना, प्रतारणा-स्वभावका सर्वथा अभाव होना इत्यादिक अच्छे कारणोसे शुभनाम- कर्मानव जीवमें आते हैं ।। १६९-१७० ॥ १ ( तीर्थकरत्व नामास्रवके कारण। )- १ सम्यग्दर्शनमे विशुद्धि- जिनेश्वरने कहे हुए निप्परिग्रहरूप मोक्षमार्गमे जो रूचि होना वह दर्गन-विशुद्धि है । २ विनीतत्व-मोक्षके साधन- रूप सम्यग्ज्ञानादिकोमे तथा सम्यग्ज्ञानादिकोकी प्राप्ति जिनसे होती है ऐसे गुरु मादिकोमे अपनी योग्यताके अनुसार प्रशंसनीय सत्कार- आदर करना । ३ व्रत और शीलमे अतिचाररहित प्रवृति करना अर्थात् अहिंसादिक व्रतोमे तथा उनके पालनार्थ कोषादिकोके त्यागरूप शीलोमे निर्दोप प्रवृत्ति करना । ४ अभीक्ष्णनानसंवेग-जीवादि पदार्थोका तथा स्वस्वरूपका बोध कराने- वाले सम्यग्जानमे हमेशा लवलीन होना तथा ससारदु खोसे सदा भयभीत रहना। ६-७ यथाशक्ति दान देना- आहारदान, अभयदान और ज्ञानदान देना। अपनी शक्ति न छिपाते हुए रत्नत्रयमार्गके अविरुद्ध तप करना। ८ साघुसमाधि- जैसे भांडागारमे आग लगनेपर उसको बुझाते है, वैसे साधु अनेक व्रत और गीलोंका समूहरूप होनेसे वहुत उपकारी हैं, इसलिये उनके तपमें कुछ कारणोसे सकट उपस्थित होनेपर उनका तप संकट हटाकर निर्विघ्न करके उसकी धारणा करना।९ वैयावृत्त्य- गुणिजनोपर दुख आनेपर निर्दोष उपायसे वह दूर करना । १०-११ अर्हद्भक्ति, आचार्यभक्ति- अर्हन्तके तथा आचार्यके गुणोमे अनुराग रखना। १२ वहुश्रुतभक्ति- स्वपरमतोके ज्ञाता उपाध्याय परमेष्ठीके गुणोमें अनुरक्त रहना । १३ जिनागम-महाभक्ति-जिनप्रणीत सिद्धान्तागममे परिणाम विशुद्ध अनुराग होना । १४ आवश्यकापरिहाणि-सामायिक, प्रतिक्रमणादिक छह कर्तव्योमें --- -- -- १ मा पारगा. २ आ. अनिन्दितम् ३ आ सव्रते ४ आ. वहुश्रुतवतस्तथा।

- -९ १८०) सिद्धान्तसार (२३१ परनिन्दात्मनो नित्यं प्रशंसाकरण सदा । सद्गुणोच्छादनं तावदसदुद्भावनं परम् ॥१७६ यः करोति नरो नीचो निजत्वोच्चकवाञ्छया। नीचर्गोत्रं स बध्नाति कुधी(रविजितः॥१७७ तद्विपर्ययतः प्राणी गुणोत्कृष्टेषु वत्सल । सगुणो निर्मदः स स्यादुच्चैर्गोत्रस्य' साधनम् ॥१७८ विघ्नस्य कारणं घोरं घोरदुःखप्रदायकम् । यः करोति नरो दीन. सोऽन्तरायसमन्वितः॥१७९ आयुःकर्मविमुक्तानि सप्तकर्माणि देहिनाम् । युगपत्क्षणतस्तस्मानालवन्त्ययतात्मनाम् ॥१८० १ यथाकाल अर्थात् जिसका जो काल नियत है, उसमे वह कार्य करना आवश्यकापरिहाणि है। १५ मार्गप्रभावना- ज्ञान, तप, जिनपूजा और विद्या आदिकोके द्वारा धर्म प्रकाशित करना। १६ प्रवचनवत्सलता- गाय जैसे बछडेपर स्नेह करती है वैसा सार्मिकोपर प्रेम करना। ऐसे ये सोलह कारण तीर्थकरत्व प्राप्तिके हेतु है। ये व्यस्त अथवा समस्त कारण उत्तमतया तरतमरूपतासे चिन्तनमे लाने चाहिये ऐसा महात्माओने कहा है ।। १७१-१७५ ॥ (नीचगोत्रके आस्रवहेतु।) - परनिंदा-दोष वास्तविक हो अथवा न हो तोभी उसको प्रगट करनेकी जो इच्छा उसे निन्दा कहते है। दूसरोके विद्यमान दोष प्रगट करना अथवा झूठे दोष कहना परनिंदा है । आत्मप्रशंसा-गुण प्रगट करनेका अभिप्राय होना प्रशसा है। अपनेमे गुण न होते हुएभी मै सत्य बोलता हू, प्रामाणिक हू, इत्यादिक गुणोका वर्णन करना स्वप्रशसा है। दूसरे लोगोमे गुण होनेपरभी उनके गुणोको ढक देना और अपनेमे गुण न होनेपरभी उनको प्रगट करना, उनकी वाहवा करना नीच गोत्रास्रवके कारण है। जो मनुष्य स्वयकी उच्चत्वकी इच्छासे उपर्युक्त कारणोको करता है, गभीरता रहित वह कुमति नीचगोत्रका बध कर लेता है ॥ १७६-१७७ ॥ (उच्चगोत्रके आस्रव कारण। ) - जो नीचगोत्रके कारण कहे हैं, उनके विपरीत कारणोसे उच्चगोत्रके आस्रव जीवमे आते है। अर्थात् आत्मनिंदा, परप्रशसा, परसद्गुणोद्भावन और स्वसद्गुणाच्छादन ऐसे कारणोसे उच्चगोत्रके आस्रव आते हैं। तथा जो अपनेसे गुणोसे अधिक श्रेष्ठ है उनके ऊपर स्नेह करना, उनके साथ विनयवृत्तिसे रहना, कदाचित् स्वय विज्ञानादि गुणोसे उत्कृष्ट होनेपरभी उनसे गर्वरहित होना ऐसे कारणोसे उच्चगोत्रके आस्रव आते हैं ।। १७८॥ ( अन्तरायास्रवके कारण।)- जो दान, लाभ, भोग, उपभोग और शक्तिमे घोर विघ्न उत्पन्न करता है, उसे ऐसे कुकार्यसे घोर दुख प्राप्त होता है। जो दीन-अज्ञान मनुष्य ऐसे दानादिकोमे विघ्न करता है, वह अन्तरायकर्मसे युक्त होता है ।। १७९ ।। (एक समयमे कितनी कर्मप्रकृतियोका आस्रव होता है इस प्रश्नका उत्तर।)-जिनको आयुकर्मका वध हो चुका है उनको उसके बिना वाकीके सात कर्मोका निरतर बध होता है। तथा जिनको आयुकर्मका वध नही हुमा है उनको एकक्षणमे आठोही कसैंका बध होता है। - १ आ निजोच्चत्वस्य २ आ भाजनम् २३२) सिद्धान्तसार. (९. १८१- मिथ्यादर्शनाविरतिप्रमादाश्च तथा पुनः । कषायाश्च ततो योगा गदिता बन्धहेतवः ॥ १८१ मिथ्यात्वं पूर्वमाख्यातं क्रियायां बन्धकारणम् । हिंसादिषु प्रवृत्तिर्या साऽभाष्यविरतिर्बुधः ॥१८२ कुशलेष्वनादरो यस्तु प्रमादः स निगद्यते । कषायाः पूर्वमुक्ताः स्युः सर्वे बन्धस्य कारणम् ॥१८३ मनोवाक्फायफर्मादियोगाश्चापि निवेदिताः । आस्रवे ते च बन्धस्य हेतुभूता भवन्त्यमी ॥१८४ यद्यप्युक्तं हि मिथ्यात्व पूर्व किञ्चित्तथापि तत् । बन्धप्रस्तावतश्चात्र निगदामि विशेषतः ॥१८५ मिथ्यात्वं द्विविधं प्रोक्तं स्वभावादुपदेशतः । मिथ्याकर्मोदयाज्जात स्वाभाविकमुदीरितम् ॥१८६ परोपदेशतो निन्धं तत्त्वश्रद्धानलक्षणम् । उपदेशजमाख्यात' मिथ्यात्वं तच्चतुर्विधम् ॥१८७ क्रियावादाः क्रियावादे तथा चाज्ञानिकं पुनः । वनयिकं ततो दुष्टं चतुर्थ कथयन्ति तत् ॥१८८ अशीतिशतभेदं तक्रियामिथ्यात्वमुच्यते । अक्रियागतभेदः स्युरशीतिश्चतुरुत्तरा ॥१८९ तथापि जो प्रदोषादि-कार्योंसे ज्ञानावरणादि सर्व कर्मप्रकृतियोका प्रदेशवध नियम नही है तोभी वे प्रदोषादिक ज्ञानावरणादिके अनुभाग बधके लिये अवश्य कारण होते हैं ।। १८० ।। (बधके कारण) - मिथ्यादर्शन, अविरति, प्रमाद, पुन. कषाय और योग के बधके कारण कहे गये हैं। मिथ्यात्व जोकि बधका कारण है, उसका वर्णन क्रियाओमे किया है। हिंसा- दिकोमे जो प्रवृत्ति होती है उसको विद्वानोने अविरति कहा है। तथा कुशल कृत्योमे-पुण्यकारक कार्योंमे ध्यान-स्वाध्यायादिकोमे अनादर रहना प्रमाद है । कषायोंका वर्णन पूर्वमे किया गया है। सब कषाय बधके कारण है। मन वचन और शरीर इनकी प्रवृत्तियाही योग हैं इनकाभी वर्णन पूर्वमे आस्रवके प्रकरणमे आया हैं। ये मिथ्यादर्शनादिक सब कारण आस्रव और बधमे कारणभूत है ॥ १८१-१८४ ।। ( मिथ्यात्वके दो भेद।)- यद्यपि मिथ्यात्वका पूर्वमे थोडासा वर्णन किया है तोभी अब वधप्रकरणमे इसका विशेषत. मैं कथन करता हू ॥ १८५ ।। मिथ्यात्वकर्मके स्वभावसे और उपदेशसे दो भेद कहे है। मिथ्यात्वकर्मके उदयसे जो निन्द्यतत्त्वोका श्रद्धान होता है वह स्वाभाविक मिथ्यात्व है और उपदेशसे-कुगुरुके द्वारा किये गये कुतत्त्वोंके उपदेशसे जो निंद्यतत्त्वोके प्रति श्रद्धान उत्पन्न होता है, वह उपदेशज मिथ्यात्व कहा जाता है। इसके आचार्योने चार भेद कहे है। क्रियावाद, अक्रियावाद, आज्ञानिक और वैनयिक ऐसे मिथ्यात्वके चार भेद हैं ।। १८६-१८८ ॥ ( चार मिथ्यात्वोके उत्तर भेद।) - क्रियामिथ्यात्वके एकसौ अस्सी भेद हैं। अक्रियामिथ्यात्वके चौरासी भेद हैं। आज्ञानिक मिथ्यात्वके सदुसठ भेद हैं और वैनयिकके निश्चयसे वत्तीस भेद है। पुन सबके भेद मिलकर तीनसौ तिरेसठ भेद होते हैं। ये सब भेद जीवोके बधके कारण हैं।। १८९ ।। Re-- १ आ तथा २ आ. तक्रिया ३ आ औपदेशिक ४ आ. क्रियावदक्रियावच्च -९, १९७) सिद्धान्तसार (२३३ 1 २ ३ सप्तषष्टिर्मता भेदास्तथा चाज्ञानिनश्च ते। द्वात्रिंशद्भेदभिन्न स्याद्वैनयिकमिति ध्रुवम् ॥१९० इति मिथ्यात्वभेदाः स्यु सर्वे समुदिताः पुनः। त्रिषष्टित्रिशतीसख्या जीवाना बन्धहेतव ॥१९१ विपरितमथकान्त सशयाज्ञानिके तथा । वनयिक च पञ्चते भेदा वा तस्य निश्चिता ॥१९२ वह्मात्मकमिद सर्व नित्यानित्यकमेव च । ऐकान्तिकमत' कान्ते मिथ्यात्वे बन्धकारणम् ॥१९३ यः सग्रन्थ स निर्गन्थ. केवली कवलाशन । विपरीतमहामिथ्यादृष्टिरेव वदन्त्यपि ॥ १९४ सम्यग्दर्शनसज्ज्ञानचारित्रर्मोक्ष इत्यपि । तथा न वेद स ज्ञेयो दृष्टिरज्ञानगोचरः ॥ १९५ प्रमाणनयनिर्णीत तथा सर्वज्ञभाषितम् । ज्ञात्वापि सशयानाना तत्स्यात्साशयिक ध्रुवम् ॥१९६ देवाः सर्वेऽपि धर्माश्च सर्वशास्त्राणि तद्विदः । वनयिकी समा' सर्वे पश्यतीति दुराशयः॥१९७ -- ( अथवा मिथ्यात्वके पाच भेद । )- विपरीतमिथ्यात्व, एकान्तमिथ्यात्व, संशय- मिथ्यात्व, अज्ञानमिथ्यात्व, विनयमिथ्यात्व ऐसे मिथ्यात्वके पाच भेद है ॥ १९२ ।। (एकान्तमिथ्यात्वका स्वरूप। )- यह सर्व जगत् ब्रह्ममय है, जो कुछ दिखता हैं वह ब्रह्मके सिवाय कुछ नहीं है, ऐसा जो आग्रह उसे एकान्तमिथ्यात्व कहते हैं। वस्तु यही है अथवा ऐसीही है दूसरी नही है ऐसा जो आग्रह उसे एकान्त कहते है । वस्तु नित्यही है ऐसा आग्रह अथवा वस्तु अनित्यही है ऐसा आग्रह होना एकान्तमिथ्यात्व है। यह ऊपरसे कान्त-सुदर दिखता है परतु मिथ्यात्वप्रकृति का वध करनेवाला है ॥ १९३ ॥ (विपरीत मिथ्यात्वका स्वरूप । )- विपरीत मिथ्यादृष्टि जीव, जो परिग्रहसहित है, उसे निग्रंथ समझते हैं। केवली अनत सुखी होनेपरभी वे कवलाहार ग्रहण करते है ऐसा बोलते हैं ।। १९४ ॥ ( अज्ञानमिथ्यात्व । )- सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र मोक्षका कारण है, परतु जो वैसा नही समझता है वह अज्ञानमिथ्यादृष्टि है ।। १९५ ।। ( सशयमिथ्यात्व। )- सर्वज्ञसे कहा हुआ जीवादिकतत्त्वस्वरूप प्रमाण और नयोंसे निश्चित सत्य सिद्ध हुआ है ऐसा जानकरभी मनमे सशय धारण करनेवालोका वह निश्चयसे साशयिक मिथ्यात्व है ॥ १९६ ॥ (वैनयिक मिथ्यात्व। )- सब देव, सब धर्म, सर्व शास्त्र उनके जानकार विद्वान् ये सव समान है ऐसा समझता है। ऐसा दुष्ट अभिप्राय धारण करनेवाला वनयिकमिथ्यात्वी समझना चाहिये ॥ १९७ ॥ A.. - ३ आ ऐकान्तिकमत जैनस्तद्वन्ध- १ मा चाज्ञानिकम्य ते २ आ नित्यत्व वानित्यत्वमेव वा कान्तकारणम् ४ आ पश्यतीह SS 30 २३४), सिद्धान्तसारः, (९., १९८- तथ्यं न वेति सन्देहैदृष्टिः संशयगोचरा । सन्ति मिथ्यादृशः पंचाप्यते बन्धस्य हेतवः ॥ १९८ ततश्चत्वार एवामी त्रिषु सासादनादिषु । विरताविरते मित्रं प्रमादाः सकषायकाः ॥ १९९ योगाश्च सन्ति बन्धस्य कारणं भवधारणम् । प्रमादाश्च कषायाश्च तथा योगा इति त्रयम् ॥२०० प्रमत्तसंयतस्यास्ति तद्वन्धस्यैककारणम् । अप्रमादादिकानां हि चतुर्णा द्वौ निवेदितौ ॥ २०१ कषायाश्च तथा योग इत्येतौ शान्तकल्मषैः। एक एवमतो योगस्त्रयाणां बन्धकारणम् ॥ २०२ शान्तक्षीणकषायैकयोगकेवलिनां पुनः । अयोगिनां न सोऽप्यस्ति बन्धहेतुः क्रिया न च ॥ २०३ अत एव महात्मानः सिद्धिभाजो भवन्त्यमी । कषायत्वादयं जीवः कर्मयोग्यांश्च पुद्गलान् ॥२०४ - - ये पाच प्रकारके दुरभिप्राय मिथ्यात्वबधके कारण है । तथा मिथ्यात्वगुणस्थानमे मिथ्यात्व, अविरति, प्रमाद, कषाय और योग पाच बधकारण है । सासादन, मिश्र और असयत सम्यग्दृष्टि ऐसे तीन गुणस्थानोमे मिथ्यात्व नही होनेसे अविरति, प्रमाद, कषाय और योग ये, चार बधके कारण है ॥ १९८-१९९ ॥ विरताविरत नामक पाचवे गुणस्थानमे मिश्र अर्थात्, अविरति विरतिसे मिश्र है और वाकीके प्रमादादि तीन वधके कारण हैं । अर्थात् प्रमाद, कषाय और योग ये, तीन बधके कारण जीवको भवधारण करनेवाले है। प्रमत्तसयत नामक छठे गुणस्थानवाले मुनीश्वरको प्रमाद, कषाय और योग ये तीन बधकारण हैं। अप्रमत्तसयत, अपूर्वकरण; अनिवृत्तिकरण, सूक्ष्मसापराय ऐसे चार गुणस्थानवर्ती मुनियोको योग और कषाय बधके कारण है,। उपशान्तकषाय, क्षीणकषाय और सयोगकेवली इन तीन गुणस्थानवति मुनीश्वरोंको एक योगही बधका कारण है, ऐसा जिनका पापकर्म शान्त हुआ है ऐसे गणधर कहते हैं। अयोगकेवलगुणस्थानवर्ती मुनीश्वरको योग भी बधका कारण नहीं है, क्योकि वहा कुछभी क्रिया नही है। इसीलिये बधका अभाव होनेसे ये महात्मा मुक्तिके भोगनेवाले होते है ॥ २००-२०३ ।। ( कषाय बधका कारण है। )- जीव कषाययुक्त होनेसे कर्मरूप परिणमन को धारण करने योग्य पुद्गलोंको-विनसोपचयको जब ग्रहण करता है, तब बंध होता है, ऐसा बधरहित जिनेश्वरने प्रतिपादन किया है ।। २०४ ।। स्पष्टीकरण- जीव कषाययुक्त कैसे होता है ? इसका उत्तर आचार्य देते हैं, कि कर्मसे जीव कषाययुक्त होता है। जो कर्मरहित है उसे कषायलेप नही है। तथा जीव और कर्मका अनादि सबध है। यदि यह सबध बीचमेही होता है तो सबधके पूर्वमे आत्मा शुद्ध था। वह अशुद्ध कैसे हो गया? बध आदिमान् माननेपर आत्यन्तिक शुद्धि धारण करनेवाला आत्मा सिद्धके समान यदि है तो उसको बन्ध न होगा। अत जीव कथचित् मूर्तिक है और कर्मका सबध अनादि है ? ? - १ इत्येतो तीर्णकल्मष ३ -९. २०५) सिद्धान्तसार (२३५ आदते स्म यतो बन्धः सर्ववन्धविजितः । महस्तोऽपि स गृह्णाति तानायु.कर्मयोगतः ॥ २०५ जठराग्निवशायदाहारमुपढ़ौफते' । आद्यः प्रकृतिवन्धोऽसौ द्वितीयः स्थितिरिष्यते ॥ २०६ अनुभागस्तृतीयश्च प्रादेशादिश्चतुर्थक । स्वभावः प्रकृतिः प्रोक्ता सा द्वधा कथिता जिनः ॥२०७ मूलोत्तरप्रभेदेन गुडादौ मधुरादिवत् । ज्ञानावृत्यादिभेदेन मूलप्रकृतिरष्टधा ।। २०८ शतमष्टाधिक तस्माच्चत्वारिंशत्तदुत्तरा । पञ्च ज्ञानावृतेः सन्ति नवैता दर्शनावृते. ॥ २०९ ऐसा मानना योग्य है। जैसा वस्तुस्वरूप है वैसाही उसको जानना सम्यग्ज्ञान है। मिथ्यादर्शन, अविरति, प्रमाद, कपायोसे आत्मा गीला होकर सर्व भवमे तीनमन्दमध्यादि योगविशेषोसे सूक्ष्म, एक क्षेत्रावगाही ऐसे अनतानत प्रदेशयुक्त पुद्गलोके स्कघ, जो कि कर्मपरिपतियोग्य हैं, उनके साथ अविभागरूपसे मिल जाता है-सयुक्त होता है ऐसी आत्माकी जो अवस्था होती है उसको वध कहना चाहिये । २०५ ॥ ( सर्वार्थसिद्धिटीका सकषायत्वात् सूत्र ) जैसे लोग जठराग्निकी तीवमन्दतादिकोके अनुरूप आहार ग्रहण करते है, वैसे यह आत्मा हातके बिनाही आयुष्यके सबसे युक्त होकर उन कर्मयोग्य पुद्गलोको ग्रहण करता है ।। २०६॥ ( वधके भेद। )- पहला प्रकृतिबध, दूसरा स्थितिवध, तीसरा अनुभागवध और चौथा प्रदेशवध है ॥ २०७॥ स्पष्टीकरण- प्रकृति शब्दका अर्थ 'स्वभाव' है। जैसे निम्बका स्वभाव कटुक है । गुडका स्वभाव मधुर है । वैसे ज्ञानावरणादिक आठ कर्मोके स्वभाव इस प्रकार हैं-ज्ञानावरणका स्वभाव पदार्थोंका बोध नही होने देना। दर्शनावरण- पदार्थोंका अनालोचन अर्थात् पदार्थ है ऐसा सामान्य अवलोकनभी नही होने देनेवाला स्वभाव धारण करना । वेदनीय-सुख दुखका अनुभव देनेका स्वभाव वेदनीयका है। दर्शनमोहका स्वभाव तत्त्वार्थमे अश्रद्धा उत्पन्न करना है। चारित्रमोहका स्वभाव असयम उत्पन्न करनेवाला है। आयुष्यका स्वभाव भवधारण है अर्थात् जीवको जो मनुष्यादि अवस्था प्राप्त होती है उसमे कुछ कालतक आत्माको रोकना स्वभाव है। नारकी, पशु, मनुष्य, देव ऐसे नाम निर्माण करनेका स्वभाव नामकर्मका है। यह उच्च है, यह नीच है, ऐसा कहलानेवाला गोत्रका स्वभाव है। दानलाभादिकमे विघ्न करना अन्तरायका स्वभाव है। यह प्रकृतिबध मूलप्रकृतिबध और उत्तरप्रकृतिबध ऐसे दो प्रकारका है। जैसे गुडका स्वभाव मधुर होता है तथा उस गुडके अनेक भेद होते हैं। ज्ञानावरण, दर्शनावरण, वेदनीय, मोहनीय, आयु, नाम, गोत्र और अन्तराय ऐसे प्रकृतिके आठ भेद हैं। और इनके उत्तरभेद एकसो अडतालीस होते है ।। २०८॥ ( सर्वार्थसिद्धिटीका 'आद्यो ज्ञानेति' सूत्रपरको ) ( उत्तरप्रकृति भेद। )-ज्ञानावरणादिके भेद इस प्रकार हैं- ज्ञानावरणके मतिज्ञाना- वरण, श्रुतज्ञानावरण, अवधिज्ञानावरण, मन पर्यवरण और केवलज्ञानावरण ऐसे पाच भेद हैं। दर्शनावरणके चक्षुर्दर्शनावरण, अचक्षुर्दर्शनावरण, अवधिदर्शनावरण और केवलदर्शनावरण, निद्रा, १ आ उपढौकितम् । - २३६) सिद्धान्तसारः (९. २१०- द्वे एव वेदनीयस्य मोहस्याप्यष्टविंशतिः । चतस्त्रश्चायुषो ज्ञेया नाम्नस्त्रिनवतिः पुनः ॥ २१० द्वे गोत्रस्य पुनश्च स्तोऽन्तराये पञ्च'तामताः। कालस्यावस्थितिस्तेषां स्थितिमाहुजिनेश्वराः।२११ सा च सिद्धान्ततो ज्ञेया नैवात्र ग्रन्थगौरवात् । कर्मणां यो विपाकस्तु सोनुभागो निगद्यते ॥ २१२ लोभ । . निद्रानिद्रा, प्रचला, प्रचलाप्रचला, और स्त्यानगृद्धि । वेदनीयके सातवेदनीय और असातवेदनीय । मोहनीयके मिथ्यात्व, सम्यडमिथ्यात्व, सम्यक्त्व, अनतानुबधी क्रोध, मान, माया, अप्रत्याख्यानके चार क्रोधादिक, प्रत्याख्यानके तथा संज्वलनके चार क्रोधादिक हास्य, रति, अरति, शोक, भय, जुगुप्सा, स्त्रीवेद, पुरुषवेद, नपुसकवेद, ऐसे मोहनीयके अठ्ठावीस भेद हैं। आयुके नरकायु, तिथंचायु, मनुष्यायु और देवायु ऐसे चार भेद है। नामकर्मके गति, आदिक तिरानवे भेद हैं। उच्चगोत्र, नीचगोत्र ऐसे गोत्रके दो भेद हैं। अन्तरायके दानान्तराय, लाभान्तराय, भोगान्तराय, उपभोगान्तराय और वीर्यान्तराय ऐसे' पांच भेद हैं। इन एकसौ अडतालीस प्रकृतियोका स्पष्टीकरण पथकारने ग्रंथगौरवके भयसे नही किया है। उनका खुलासा सिद्धांतग्रथोमें किया है। वहांसे जानना चाहिये ।। २०९-२१० ।। ( स्थितीवंधका स्वरूप । )- एकसौ अडतालीस कर्म कुछ मर्यादित कालतक आत्मामे रहते हैं, उनका रहना स्थितिबध है। स्थितिके जघन्य, मध्यम और उत्कृष्ट ऐसे भेद हैं, जिनका सविस्तर निरूपण आगमग्रथसे जानना चाहिये । ज्ञानावरण, दर्शनावरण, वेदनीय और अन्तराय ऐसे चार कर्मोको स्थितिबध तीस कोटिकोटि सागरोपमका है। मोहनीयका सत्तर कोटिकोटि सागरोपम स्थितिबध है । नामकर्मका वीस कोटिकोटि सांगरोपम है। गोत्रकर्मका वीस कोटिकोटि सागरोपम है और अन्तरायका तीस कोटिकोटि सागरोपमका है। यह उत्कृष्ट स्थितिवध कहा है। जो कर्म आत्मामे वध जाता है वह आवाधिकालको छोडकर अपना फल अपनी स्थिति जितनी कालकी है उतने कालतक आत्माको देता है। जघन्य स्थितिबध-ज्ञानावरण, दर्शनावरण और अन्तराय कर्मकी जघन्य स्थिति सूक्ष्मसापराय गुणस्थानमे अन्तर्मुहूर्तकी है । मोहनीयकी अनिवृत्ति बादर साम्पराय गुणस्थानमे अन्तमुहूर्तकी है। आयुकी संख्यातवर्षवाले तिर्यंच और मनुष्योमे जघन्य स्थिति अन्तमुहूर्तकी है । वेदनीय कर्मकी जघन्य स्थिति बारह मुहूर्तकी है और उसका वध सूक्ष्मसाम्पराय गुणस्थानमे होता है । नामगोत्रकी दशमे गुणस्थानमे आठ मुहूर्तकी जघन्य स्थिति है। मध्यमस्थितिवध असख्य प्रकारका है आगममें उसका खुलासा है, वहांसे समझ लेना चाहिये । ग्रंथगौरव होगा इसलिए यहा नही लिखा है ।। २११ ।। ( सर्वार्थसिद्धिटीका अध्याय आठवा ) ( अनुभागवध और प्रदेशवव।)- विशिष्ट और नाना प्रकारोका जो फलानुभव आत्माको कर्मसे प्राप्त होता है उसको अनुभागवध कहते हैं और वह कर्मोंका जैसा नाम है उसके अनुसार होता है, जैसा ज्ञानावरणका फल ज्ञानाभावरूप होता है, दर्शनावरणका फल दर्शनशक्तिको । १ आ द्वे गोत्रस्य च पञ्चव हन्तरायाश्रिता मता ~९ २१७) सिद्धान्तसार (२३७ स प्रदेशगतो बन्ध. प्रदेश. परिपठ्यते । यो विशेषोऽस्य बन्धस्य स श्रीसर्वज्ञगोचरः ॥२१३ स कथं कथ्यते बन्धो नृकोटेन मयाधुना । मानवस्य निरोधोऽयं संवर स मतः सताम् ॥२१४ द्रव्यभावप्रभेदेन सोऽपि द्वधा भवेदिह । संसारकनिमित्ताना क्रियाणां विनिवर्तनम् ॥ २१५ भावसंवरमाख्यान्ति मुनीन्द्राः कृतसवरा । तन्निरोधे च तत्पूर्वकर्मपुद्गलविच्युतिः ॥२१६ मात्मनस्तु स विज्ञेयो यतीन्द्रर्द्रव्यसवर । समितस्य च गुप्तस्यानुप्रेक्षानुरतस्य च ॥ २१७ -- . ? प्रगट न होने देना है । इत्यादि । सपूर्ण आत्मप्रदेशोमे अनतानत सूक्ष्म कर्मप्रदेशोका सर्व भवोमे 'एक क्षेत्रावगाही जो योगविशेपोसे बध होता है उसे प्रदेशबध कहते है। योगविशेषसे आत्मा कर्मोको ग्रहण करता है । वे कर्म सव सूक्ष्मही होते हैं, उन कर्मके स्कन्धोमे पाच वर्ण, पाच रस, दो गध और चार स्पर्श- शीत, उष्ण, स्निग्ध, रूक्ष ऐसे चार होते हैं। ये कर्मस्कध आठ प्रकारोके कर्म प्रकृतियोंके योग्य रहते हैं ॥ २१२-२१३ ।। इस प्रदेशवधका जो विशेष है वह सर्वज्ञका विषय है । मैं मनुष्यकीटक हू, मुझसे वह वध इस समय छद्मस्थावस्थामे-- अज्ञानावस्थामे कैसा कहा जायगा तात्पर्य यह है कि ये, चार प्रकारके वध अवधिज्ञानी, मन पर्ययज्ञानी और केवलज्ञानियोको प्रत्यक्ष प्रमाणके विषय हैं अर्थात् इनका स्वरूप वे प्रत्यक्ष ज्ञानसे जानते है । और उन्होने जो आगम कहा है, उससे इन वधके स्वरूपका ज्ञान किया जाता है अर्थात् अनुमानसे उनका स्वरूप जाना जाता है ।। २१४ ।। ( सपसे सवरवर्णन। )- आस्रवका जो निरोध है, वह सज्जनोको मान्य ऐसा सवर नामका पदार्थ है। इसके यहा द्रव्यसवर और भावसवर ऐसे दो भेद है। स्पष्टीकरण- नवीन कर्मका आत्मामे आगमन होना आस्रवतत्त्व है और वह आगमन जिससे रुकता है ऐसे तत्त्वका नाम संवरतत्व है । यह सवरतत्त्व आस्रवका प्रतिपक्षी है, इसलिये आस्रवके लक्षणसे सवरका लक्षण विलकुल उलटा है ।। २१५ ।। ( भावसवरका स्वरूप । )- ससारके मुख्यनिमित्त ऐसी जो मन वचन शरीरोंकी प्रवृत्तिया-- चेष्टायें होती हैं उनका निवारण करनेवाला जो आत्माका निर्मल परिणाम उसका नाम भावसवर है, ऐसा जिन्होने नये कर्मोंका निरोध किया है ऐसे मुनीन्द्र कहते हैं ।। २१६ ।। (द्रव्यसवरका स्वरूप । )- उनके निरोधसे अर्थात् नया कर्म जिनसे आता है ऐसी मनवचन शरीरकी चेष्टाओका निरोध करनेसे तत्वूर्वक जो कर्मका आना होता था वहमी रुक जाता है । यतीन्द्रोने उसको द्रव्यसवर जाना है ।। २१७ ॥ नये कर्म आत्मामे आनेका रुक जाना द्रव्यसवर है, मनवचनशरीरकी जिन चेष्टाओसे कर्म आता था उनका आगमन न होने देनेवाले जो आत्मामे निर्मल समित्यादिक परिणाम होते हैं 1 १ आ प्रदेशपरिकल्पनम् २ आ श्रीसर्वज्ञस्य गोचर ३ आ परस्य च २३८) सिद्धान्तसार (९. २१८- सच्चारित्रवतः पुंसः संवरो जायते क्षणात् । परीषहजयेनासौ दशधा धर्मकारणः ॥ २१८ सुनिर्जरायुतस्यैष संवरो जायते परः । ये केचिद्धतवः सन्ति संवरस्य विधायिनः ।। २१९ तपसो निर्जरायास्तान्कियतो निगदाम्यहम् । धाष्टर्यमेवमिदं सर्व मदीयं यज्जिनागमे ।। २२० इदं करोमि नो वेदमिति वाचो निवर्तनम् । उक्तं युक्तमयुक्तं वा मदीयं मुनिपुङ्गवाः ॥ २२१ श्रुत्वा भवन्तु सर्वेपि सर्वदेवाधिकक्षमाः । आगमोऽनन्तपर्याय कथ्यतेऽनन्तसद्गुणः ॥ २२२ श्रीमत्समन्तभदादिगणेशन तु मादृशः । पद्मसेनादयो ये तु श्रीमेदार्यान्वये परम् ॥ २२३ बभूवुस्तत्प्रसादेन मच्चेतोऽप्यत्र भक्तिमत् । - --- - उनको भावसवर कहते है । जो ईर्यासमित्यादिक समितियोको पालता है, मनोगुप्त्यादिक गुप्ति- योका धारक है, अनित्यादिक बारह अनुप्रेक्षाओंमे तत्पर होता है, तथा जो सम्यक्चारित्रको धारण करता है, ऐसे पुरुषको- यतिराजको तत्काल सवर होता है उनके पास नये कर्म नही आते हैं । यह सवर परीषहजयसे होता है तथा उत्तम क्षमादिक दशधर्मोंका पालन करनेसे होता है । तथा जो अविपाका निर्जरासे युक्त है ऐसे मुनीश्वरको उत्कृष्ट सवर प्राप्त होता है ॥२१८॥ संवरको उत्पन्न करनेवाले जो कोई हेतु हैं, तथा निर्जराको करनेवाले जो तपश्चरण हेतु रूप हैं उनका मैं कितना वर्णन कर सकूगा । अर्थात् सवरके और निर्जराके समग्र कारणोका वर्णन करनेमे मै असमर्थ हू ॥ २१९ ॥ जो जिनागममे है, वही मैंने कहा है । अत मेरा यह कहना सब हृदयमे धारण करना चाहिये । उसमे मैं यह हृदयमे धारण करूगा और यह नहीं करूंगा ऐसा भाषण बोलना छोड देना चाहिये ।। २२० । ( मुनिश्रेष्ठोके प्रति ग्रथकारकी क्षमा याचना। )- मेरा युक्तियुक्त वचन सुनकर है मुनिश्रेष्ठ | आप सब सदैव मुझपर अधिक क्षमा धारण करे । अर्थात् मैं आपसे क्षमा याचना करता हू क्योकि मेरे वचन सदोषभी होगे और निर्दोषभी होंगे मै कुछ नही समझता हू॥ २२१ ॥ ( समन्तभद्राचार्यकी प्रशसा। )- अनतगुणवाले श्रीसमन्तभद्र गणधरसे अनतपर्यायोंका प्रतिपादन करनेवाला आगम कहा गया है परतु मुझ सरीखोके द्वारा ऐसा विशाल आगम नही कहा जायगा ॥ २२२ ॥ ( पद्मसेनादिकाचार्योंमे मेरा मन भक्तियुक्त है। )- महावीरप्रभुके श्रीमेदार्य नामके गणधरकी गुरुपरपरामे पद्मसेनादिक आचार्य हुए है। उनकी कृपासे मेरा मनभी इस आगममे भक्तियुक्त हुआ है ॥ २२३ ।।

~९ २२५) सिद्धान्तसार (२३९ श्रीमत्सामन्तभद्रं वचनमिति बुधः प्रीतिमन्तविनीतो ।। धृत्वा संवृत्य कर्माण्यखिलभवभवोद्भूतिहेतोनिशल्यः । योऽभूच्छीवीरसेनो विबुधजनकृताराधनोऽगाववृत्ति ॥ तस्माल्लब्धप्रसादे मयि भवतु च मे बुद्धिवृद्धौ विशुद्धि ॥ २२४ ॥ सो'sय श्रीगुणसेनसयमधरप्रव्यक्तभक्ति सदा। सत्प्रीति तनुते जिनेश्वरमहासिद्धान्तमार्ग नरः ।। भूत्वा सोऽपि नरेन्द्रसेन इति वा यास्यत्यवश्यं पदम् । श्रीदेवस्य समस्तसाधुमहितं तस्य प्रसादात्ततः ॥ २२५ ॥ इति श्रीसिद्धान्तसारसग्रहे पण्डिताचार्यश्रीनरेन्द्रसेनविरचिते अजीवतत्त्वमास्त्रवतत्व बन्धतत्त्वनिरूपणं नवमोऽध्यायः ॥ यह श्रीसमन्तभद्र स्वामीका वचन है ऐसा समझकर, अन्त करणसे नम्र होकर उस प्रिय वचनको धारण कर तथा अनेक भवोमे उत्पत्ति होनेके कारण ऐसे सपूर्ण कर्मोंका सवर करके जो शल्यरहित हुए हैं, विद्वज्जनोके द्वारा आराधाना की जानेपरभी जिनका स्वभाव गभीरही है ऐसे श्रीवीरसेनआचार्यसे मुझे प्रसाद प्राप्त हुआ है, इसलिये मेरी बुद्धिकी वृद्धिमे निर्मलता प्राप्त हो ॥ २२४ ॥ श्रीगुणसेन नामक सयमधारी आचार्यमे जिसने अतिशय व्यक्त ऐसी भक्ति हमेशा की है वह मनुष्य जिनेश्वरके महासिद्धान्तमार्गमे उत्तम प्रीति करता है तथा वह भी नरेन्द्रसेनके समान होता है और श्रीगुणसेन आचार्थके प्रसादसे सपूर्ण साधुओसे पूज्य श्रीदेवसेन आचार्यके पदको अवश्य प्राप्त होते है। तात्पर्य यह है, कि नरेन्द्रसेन आचार्यके गुरु गुणसेन थे उनकी भक्ति करनेसे नरेन्द्र सेनाचार्यको श्रीदेवसेन आचार्यके पट्टपर अभिषेक हुआ वे देवसेनपट्टके अधीश बने ॥ २२५ ॥ पण्डिताचार्य श्रीनरेन्द्रसेन विरचित सिद्धान्तसार-सग्रहपथमे अजीवतत्त्व, आस्रवतत्त्व और वधतत्त्वका निरूपण करनेवाला नवमा अध्याय समाप्त हुआ। --- ३ आ इति श्रीसिद्धान्तसारसङ्ग्रहे नाचार्यश्रीनरेन्द्रसेनविरचिते १ आ योऽय २ आ प्रसादादत नवमोऽध्याय - दशमोऽध्यायः। निलार्यते यया कर्म प्राणिना भवतिना । निर्जरा सा हिघा ज्ञेया कालेनोपक्रमेण च ॥१ या च कालता सेयं मता सावारणा निनः । सर्वेषां प्राणिनां शश्वदन्यकर्मविधायिनी ॥ २ या पुनस्तपसानेकविधिनात्र विवीयते । उपमभवा सेयं सर्वेषां नोपजायते ॥३ येन तप्त्वा नरः पर्मपुद्गलान्प्रविमुञ्चिति । पुटापकान्निसन्तप्तहेमवत्तत्तपो मतम् ॥ ४ वाह्याभ्यन्तरभेटेन द्विविधं तदुदीरितम् । षड्विवं बाह्यमन्यच्च तयव मुनिपुङ्गवः ॥ ५ वृत्तिसंख्यामोदर्यमुपवासन्चतुर्विधः। रसत्यागो विविक्नं तच्छय्यासनमथापरम् ॥ ६ कायक्लेशश्च तद्वारं षप्रकारमिदं तपः । कथयन्ति लिनाधीशाः कर्मणः क्षपणनमम् ॥ ७ दसवा अध्याय । (निराके दो नेद।)-संसारमें रहा हुआ प्राणी जिसके द्वारा कर्मकी निर्जरा करता हम अपनेमे थोडा थोत्र निरालकर नष्ट करता है उसको निर्जरा कहते है। वह बाल द्वारा और उगम द्वारा होती है अर्थात् सविपाका निर्जरा और अम्पिाका निर्जरा ऐन निर्जरा दो भेद होते हैं ॥१॥ कालकृतनिर्जरा जिसे सविपाका निर्जरा रहते हैं। उसे जिनेश्वरीने साधारण निर्जरा नाम दिया है । अर्थात् वह संपूर्ण प्राणियोको हमेना होनेवाली और हमेशा अन्यकर्मोको जीवमें लानेवाली है। तार्य यह है, कि मका उदय होकर कर्म अपना फल देकर निकल जाता है परंतु उसी समय वात्मा रागपन्न होता है और बहुतसे नये कनोंका संग्रह तत्काल उसमे होता है। यह निर्जरा चतुर्गतिके सर्व प्राणियोंको होती है ।।२।। (अविणका निर्जरा। )- कर्मा उदयकाल प्राप्त होनेके पूर्वही अनेक प्रकारके तपश्चरणोंसे उदयमें लाकर उसको बात्मासे अलग करना बविपाका निर्जरा है । इस निर्जराक समयमें बात्मा रोगी-ट्रेपी-मोही नहीं होता; जिससे नया कर्म मात्मामें प्रविष्ट नहीं होता। ऐसी निर्जरको औपक्रमिकी निर्जरा कहते हैं। यह निर्जरा सभी जीवोंको नहीं होती । अर्थात् वीतराग नुनियों को यह निर्जत होती है ।। ३ ।। (तप शब्दकी निक्ति अर्थात् अन्वर्थता।)- मूसने अग्निमें सन्तप्त हुए सोनेसे इतर धानुका मिश्रण और मल नष्ट होता है, वैसे जिससे तप्त होकर मनुष्य कर्मपुद्गलोंको छोड देता है वह तप है. ब्यान तपसे मनुष्य संतप्त होने कर्ममल नष्ट होता है।॥ ४॥ (तपने ने भेद।)- वाहतप और अन्यंकर तप ऐसे तपके दो भेद कहे हैं। बाह्यतपके छह भेद हैं तण अभ्यंतर तपकेभी छह नेद है, ऐसा श्रेष्ठ मुनियोंने कहा हैं। बृत्तिसंख्यान, -१०. ११) सिद्धान्तसार (२४१ १ मिक्षाथिनो मुनेरत्र तद्गृहैः परिसख्यया । वर्तन वृत्तिसख्यान कथयन्ति कथाविदः ॥८ अथाशाया निवृत्त्यर्थ एकागारादिचिन्तनम् । यत्रैव कुरुते साधुर्वृत्तिसंख्या नु सा मता ॥९ तोषसयमसिद्धयर्थ शमस्वाध्यायकारकम् । निद्रादोषापह सापोरवमोदर्यमीर्यते ॥ १० विषयेभ्यो निवृत्त्याशु संयमस्तिमितात्मनः । अक्षप्रशमनार्थ च सूपवासो निगद्यते ॥ ११ अवमोदर्य, चतुर्विध उपवास, रसत्याग, विविक्तशय्यासन और कायक्लेश ऐसा छह प्रकारका वाह्य तप कहा है । यह कर्मका क्षय करनेवाला है ऐसा जिनेश्वर कहते हैं । ५-७ ( वृत्तिपरिसख्यान तपकी निरुक्ति । )- भिक्षाग्रहण करनेकी इच्छा रखनेवाले मुनि दाताओके घरोका प्रमाण कर उनमेसे किसी एक घरमे आहार लेते हैं । उनके इस तपका नाम वृत्तिपरिसख्यान है ऐसा तप कथाको जाननेवाले मुनि कहते हैं ॥ ८ ॥ स्पष्टीकरण- एक घर, सात घर, एक गली, आधा गाम आदिमे आहार मिलेगा तो मैं ग्रहण करूगा ऐसी प्रतिज्ञा करके आहार लेना वृत्तिपरिसख्यान तप है। यह गृहविषयक वृत्तिपरिसख्यान हुआ । इसी प्रकार दातृविषयक, पात्रविषयक आदि परिसख्यानभी इसी तपसे समाविष्ट होते हैं । अमुक दाताने आहार दिया तो मैं ग्रहण करूगा, अमुक पात्रमे- सोनेके पात्रमे, चादीके पात्रमे इत्यादि पात्रमे आहार मिलेगा तो ग्रहण करूगा इत्यादि प्रतिज्ञाको- सकल्पको वृत्तिपरिसख्यान कहते है ।। ८॥ ( अनगारधर्मामृत अ ७ वा श्लो २६ ) आशाका त्याग करनेके लिये ऊपरके श्लोकमे जैसा कहा है, उसके अनुसार जो साधु एक घर सात घर आदिका सकल्प करता है, उसका यह वृत्तिसख्यान नामक तप है ॥ ९ ॥ ( अवमोदर्य तप करनेके हेतु )- जिसमे थोडा अन्न खानेसे पेट पूर्ण नही भरता, खाली रहता है ऐसे तपको अवमोदर्य तप कहते है। यह तप सतोषको प्राप्तिके लिये सयमसिद्धिके लिये, किया जाता है । यह तप वातादिक दोषोका प्रशमन करके स्वाध्यायकी सिद्धि करता है, निद्राके दोपभी इस तपसे दूर होते हैं साधुके इस तपको अवमोदर्य कहते हैं ॥ १०॥ स्पष्टीकरण- पुरुषका आहार बत्तीस घास प्रमाण हैं और स्त्रियोका आहार अट्ठाईस घास प्रमाण होता है । इस आहारमेसे इकतीस तीस आदिको लेकर एक घासतक जो आहार लेना वह सव अवमोदर्य तप है । ( अनगारधर्मामृत अ ७ वा श्लो. २२ वा) ( अनशन तप )- पचेद्रियोके विषयोसे निवृत्त होकर सयमकी स्थिरताके लिये और इद्रियोका प्रशम होनेके लिये उपवास तप कहा है ॥ ११ ॥ -- ४ मा अक्षाण्युपवसन्त्यस्यो ५ आ. स १ आ तवृत्ते २ मा पाका ३ आ सम S.S 31 २४२) सिद्धान्तसार. (१० १२- नियम्य करणग्रामं तप्त्वा देहमशेषतः । कर्मात्मनोः पृथक्त्वं न' कर्तुमेनं विना क्षमः ॥ १२ इन्द्रियाणां महावीर्यविनिवृत्त्यर्थमेव च । घृतादिवृष्यवस्तूनां त्यागो रसविवर्जनम् ॥ १३ विविक्तेषु प्रदेशेषु स्वाध्यायध्यानवृद्धये । यच्च शय्यासनं साधोः पञ्चमं तत्तपो महत् ।। १४ आतापनमहायोगो वृक्षमूलाधिवासना । साधोनिरावृतस्यापि कायक्लेशो महानयम् ॥ १५ बाह्यत्व बाह्यभूतस्यापेक्षयास्य तपस्विनः । कथयन्ति मनोरोधादान्तरं हि तथेतरत् ।। १६ प्रायश्चित्तं विनीतत्वं वैयावृत्त्यमनिन्दितम् । स्वाध्यायश्च तनूत्सर्गो ध्यानमन्तर्गतं तपः ॥ १७ 44 - ' यदि यह उपवास तप नही किया जायगा तो इद्रियोका समूह अपने स्वाधीन नही रहेगा । इन्द्रियोका समूह स्वाधीन करके सपूर्ण देहको सतप्त कर कर्म और आत्माको भिन्न करने के लिये उपवासके बिना कोई समर्थ नही है ।। १२ ।। ( रसत्याग तप। )- इद्रियोंका जो विशाल सामर्थ्य है उसको घटानेके लिये घी, दही, गुड, तेल आदिक रसोका, जो कि वीर्यवर्धक हैं त्याग करना रसविसर्जन- रसत्याग नामक तप है ॥ १३ ॥ (विविक्तशय्यासनत्याग।)- स्वाध्याय और ध्यानमे वृद्धि होनेके लिये जहा जन्तुपीडा नही होती ऐसे एकान्त स्थानोमे जो सोना और बैठना वह महान् पाचवा तप है ॥ १४ ॥ ( कायक्लेश तप । )- सपूर्ण परिग्रह त्यागी- दिगवर मुनीश्वर आतापन नामक महायोग धारण करते हैं तथा वृक्षमूलाधिवास नामक महायोग धारण करते है उनका वह महान् कायक्लेश नामक तप है ।। १५ ।। स्ष्टीकरण- ग्रीष्मके दिनोमे पर्वतके ऊपर खडे होकर तप करना और सूर्यका आताप सहन करना आतापन योग है । वर्षाकालके दिनोमें वृक्षतलमे बैठकर जलवृष्टिआदिक क्लेश सहन करना तथा शरीरखेद सहन करना कायक्लेश तप है। सुखासक्ति नष्ट करनेके लिये, धर्म प्रभावनाके लिये और देहदुःख सहन करने के लिये यह तप मुनि करते हैं । (तपके बाह्यत्व और अन्तरगत्वकी सिद्धि।)- अनशनादि तपोमे तपस्वियोको बाह्य- भूत जो आहारादि पदार्थ उनके त्यागादिकी अपेक्षा होती है इसलिये अनशनादिक तप बाह्यतप कहे जाते हैं । प्रायश्चित्तादि तपोको अतरगतप कहते हैं; क्योकि उनमे मनको स्वाधीन करना पडता है । तथा अनशनादिक तप परप्रत्यक्ष होते है इसलिये भी उनको बाह्यतप कहते है । तथा अन्य धर्मीय साधु और गृहस्थभी अनशनादिक तप करते हैं इसलियेभी इनको बाह्य तप कहना चाहिये ॥ १६ ॥ ( अन्तरग तपके भेद । )- प्रायश्चित्त, विनीतत्व- विनय, प्रशंसनीय वैयावृत्य, स्वाध्याय कायोत्सर्ग और ध्यान ये छह तप अन्तरंग तप है ।। १७ ॥ 1 - १ आ क २ आ दर्प -१० २६) सिद्धान्तसार '(२४३ नमस्कृत्य महावीर मेदार्य च गणेश्वरम् । वीरसेनं च वक्ष्यामि प्रायश्चित्त कियत्स्वतः ॥ १८ प्रायः प्राणी करोत्येव यत्र चित्तं सुनिर्मलं । तदाहुः शब्दसूत्रज्ञाः प्रायश्चित्त यतीश्वराः ॥ १९ सति दोषे न चारित्रं कर्माभावो न तद्विना । निर्वृतिस्तदभावे न तस्माद्वतमनर्थकम् ॥ २० अत एव प्रकुर्वन्ति तदेवादी महत्तपः । प्रायश्चित्तमकुर्वाणो न नरः शुद्धिमृच्छति ॥ २१ प्रायश्चित्तविधि शुद्धमजानानो गणी पुनः । स्वात्मान दूषयत्येव शिष्य च प्रतिवर्तिनम् ॥ २२ गुरुमासस्तथा भिन्नमासो लध्वादिमासक । पञ्चकल्याणभेदश्च भवन्त्येते सुनिर्मलाः ॥ २३ पञ्च चाम्लानि पूतानि नीरसाहारपञ्चकम् । एफस्थानानि पञ्चेति' पुरुमण्डलपञ्चकम् ॥२४ क्षपणानि तथा पञ्च सर्वेः समीलितर्भवेत् । पञ्चकल्याणकं नाम विशुद्धे. कारणं परम् ॥ २५ कालक्षेत्र तथा भावद्रव्यसत्वाद्यपेक्षया । स एव सान्तर प्राजर्गुरुमासो निगद्यते ॥ २६ (प्रायश्चित्ततपका वर्णन करनेकी प्रतिज्ञा।) - श्रीमहावीरप्रभुको, मेदार्य नामक गणधरजीको और श्रीवीरसेन आचार्यको नमस्कार करके मैं खुद कुछ प्रायश्चित्त तपका वर्णन करता हू॥ १८॥ (प्रायश्चित्तकी निरुक्ति। )- जिसमे प्राय प्राणी अपने चित्तको मनको निर्मल बनाता है, ऐसे तपको शब्दसूत्रके ज्ञाता मुनीश्वर प्रायश्चित्त कहते है ।। १९ ।। (प्रायश्चित्तको प्रथम स्थान क्यो?) - यदि दोष उत्पन्न होगे तो चारित्र नही रहता और चारित्रके बिना कर्मका नाश नही होगा और कर्मोंका अभाव नही होनेपर मोक्षसुखकी प्राप्ती नही होती और व्रतोका पालन व्यर्थ होगा । इसलिये मुनीश्वर वही तप प्रथमत करते है। प्रायश्चित्ततप नही करनेवाला मनुष्य दोषोका अभाव न होनेसे शुद्ध नही होगा । परिणाम निर्मल नही होगे ।। २०-२१ ॥ (प्रायश्चित्तके अज्ञाता आचार्य । )-प्रायश्चित्तकी विधि और शुद्धि न जाननेवाला आचार्य अपनेकोभी तथा अपना अनुसरण करनेवाले शिष्यकोभी दोषयुक्त करता है ॥ २२ ॥ (प्रायश्चित्तोके नाम । ) - गुरुमास, भिन्नमास, लघुमास, पञ्चकल्याण ये प्रायश्चित्तके प्रकारोके नाम हैं और ये प्रायश्चित्त अतिशय निर्मल हैं ।। २३ ।। ( पचकल्याण प्रायश्चित्तका स्पष्टीकरण । ) - पाच आचाम्लभोजन-काजीमिश्रित भात, पाच नीरस आहार, पाच एकस्थान, पाच पुरुमडल-काजी भोजन तथा पाच क्षमण- उपवास ये सब मिलकर पचकल्याणक होता है और यह पचकल्याणक नामक प्रायश्चित्त विशुद्धिका उत्तम कारण हैं ।। २४-२५ ॥ जहा पानी बहुत है ऐसा प्रदेश, जिसमे कम वर्षा होती है ऐसा प्रदेश, काल-प्रीष्म वर्षा, हिमकाल-क्षेत्र भाव-परिणाम, द्रव्यसत्त्व शरीरका सामर्थ्य इत्यादिकोकी अपेक्षासे जब उपर्युक्त पच- A १ आ मिच्छति २ आ भेदा ३ आ लघुमासा ४ आ लघुमासो २४४) सिद्धान्तसार (-१० २७ , J आचाम्ले क्षपणे वापि नीरसे वापि शोधिते । अन्तराये तथैवासौ यो विरम्य' विधीयते ॥ २७ एककेषु च पञ्चैषु सर्वेष्वपगतेषु च ॥ भिन्नमासः स एव स्याद्विभिन्नवहुकल्मषः ॥ २८ उपवासस्त्रिभिः प्रोक्तमपि कल्याणकं बुधैः । एकैकेनाथवा तेषु निरन्तरकृतेषु तत् ॥ २९ नवधा सुनमस्कारस्तनू त्सविनिर्मितः । एतै दशभिस्तावदुपवासः प्रजायते ॥३० पादोनं काञ्जिकाहारात्पादकः पुरुमण्डलात् । अर्ध निर्विकृतेस्तस्य स्यादेकस्थानतस्तथा ॥ ३१ मनोवावकायगुप्तः सन्नष्टोत्तरशतं जपेत् । योऽपराजितमाप्नोति स भव्यः प्रोषध फलम् ॥ ३२ दोष कालस्तथा क्षेत्रं छेदो भुक्तिः पुमानिति । षोढा विधिर्भवत्यत्र ज्ञातव्यः स मनीषिभिः ॥३३ - कल्याणक प्रायश्चित्त कुछ कालके अन्तरसे किया जाता है तव विद्वान् उस प्रायश्चित्तको गुरुमास प्रायश्चित्त कहते है ।। २६ ॥ पाच आचाम्ल, पाच उपवास, पाच नीरस भोजन, इनमेसे कुछ कम यदि किया जाता है अथवा पाचोमेसे एक एक कम यदि किया जाय तव उसको भिन्नमास कहते है। यह भिन्न मास प्रायश्चित्त बहुत पापोका नाश करता है ।। २७-२८ ।। तीन उपवास करनेपरभी कल्याण प्रायश्चित्त होता है ऐसा विद्वानोने कहा है । अथवा एक आचाम्लभोजन, एक नीरस भोजन, एक एकस्थान, एक पुरुमडल और एक उपवास निरन्तर करनेपरभी वह कल्याण नामक प्रायश्चित्त होता है ।। २९ । । एक कायोत्सर्गमें नौ पचनमस्कार होते हैं और एकसौ आठ वार पचनमस्कारोका जप करनेसे उपवास होता है। अर्थात् वारह कायोत्सर्गोका एक उपवास कहा है ।। ३० ।। काञ्जिकाहार करनेका जो फल है वह फल एकासी बार पचनमस्कारका जप करनेसे प्राप्त होता हैं। तथा एकस्थानसे जो फल मिलता है वह चौवन बार पचनमस्कारका जप करनेसे प्राप्त होता है ।। ३१ ।। (एक प्रोषधका फल।)- मन, वचन और शरीरकी एकाग्रता कर जो भव्य एकसौ आठ बार पंचनमस्कार मंत्रका जप करता है उसे एक प्रोषध अर्थात् एक उपवासका फल प्राप्त होता है। अर्थात् एक प्रोषधसे जितनी कर्मनिर्जरा होती है उतनी कर्मनिर्जरा १०८ बार पच मत्र जपनेसे प्राप्त होती है ।। ३२ ।। इस प्रायश्चित्तके प्रकरणमे जो छह बाते विद्वानोको जानना आवश्यक है वे इस प्रकार हैं- दोष, काल, क्षेत्र, छेद-प्रायश्चित्त, भुक्ति और पुरुष-दोषी। दोष-अपराध, काल ग्रीष्मादिकाल, क्षेत्र-जलप्राय, शुष्क, साधारण ऐसे देश, छेद-प्रायश्चित्त, भक्ति-प्रायश्चित्त -- --04- -- -- १ आ विश्रम्य २ मा नायवैतेषु ३ आ स्तत्तत्सर्गो ४ आ विनिर्मित ६ आ पादोन ७ आ प्रौषध ८ आ दोष काल तथा क्षेत्र ५ आ सते.

-१०. ४०) सिद्धान्तसार. (२४५ निमित्तादनिमित्ताच्च दोषस्याचरण द्विधा । अष्टौ भङ्गाः पुनः सन्ति द्वयोरपि विभाविताः॥३४ सहेतुकोऽपरस्तस्य सकृत्कारी तथेतर' । सानुवीचिविपक्षोऽस्य सप्रयत्नोऽप्रयत्नकः ॥ ३५ एवमण्टौ विकल्पाः स्यु सनिमित्तानिमित्तयोः । सर्वे संमिलिताः सन्ति षोडशेते जिनागमे ।।३६ अन्येऽपि बहवो भङ्गा सन्त्यत्रागमणिता । ज्ञात्वा तास्तारतम्येन छेदं दद्याद्यतीश्वरः ॥ ३७ परिहर्तुमशक्यत्वाच्छोध्यते यत्पुनः पुनः । परिस्पन्दादितद्दोषात्कायोत्सर्गेण शुध्यति ॥ ३८ अन्नपानादिहेतूत्थं यच्च दूषणमल्पकम् । तस्मादपि विशुद्धयन्ति कायोत्सर्गान्मुनीश्वरा २ ॥३९ अप्रतिलेखितस्परों तथा कंडूयनादिषु । मलोत्सर्गादिके वापि कायोत्सर्गेण शुध्यति ॥ ४० लेनेवालेका निर्मल परिणाम, मुक्ति-आहार और दोषी पुरुष-इन बातोको विचारमे जो लेते हैं वे योग्य और आगममान्य होते हैं। अन्यथा अज्ञानसे प्रायश्चित्त देना योग्य नहीं है ॥ ३३ ॥ जो दोष मुनियोके द्वारा किया जाता है वह निमित्तसे या अनिमित्तसे होता है इस प्रकारसे दोषके दो भेद होते हैं। निमित्तजात-दोप और अनिमित्तजात-दोष। इन दोनोकोभी पुन आठ आठ भेद होते है ऐसा आचार्योने प्रगट किया है ॥ ३४ ॥ सहेतुक-हेतुपूर्वक दोष करना, अहेतुक हेतुके विनाही दोष करना, एकवार दोप करना, अनेकवार दोप करना, सानुवीचि-विचार करके दोष करना, अविचारसे करना, प्रयत्न पूर्वक दोप करना और अप्रयलपूर्वक दोष करना, इस प्रकार निमित्त और अनिमित्तके आठ आठ दोष होते हैं। सब मिलकर सोलह प्रकार जिनागममे कहे हैं। अन्यभी बहुतसे भग अर्थात् दोषोके प्रकार हो सकते हैं जिनको आगममे वर्जित माना है। उन सब दोपोको जानकर यतीश्वर अर्थात् आचार-तारतम्यसे प्रायश्चित्त देवे ॥ ३५-३७ ॥ कायोत्सर्गसे निवृत्त होनेवाले दोप। कोई दोष ऐसे होते है, कि उनका परिहार-त्याग करना अशक्य होता है। इसलिये पुन पुनः उनका प्रायश्चित्त लेकर उन दोषोसे शुद्ध होना पडता है। जैसे गमनागमन करना पड़ता है और उसमे असावधानतासे दोष शुद्ध होते है। ऐसे दोषोका परिहार कार्योत्सर्गसे होता है ।। ३८ ।। अन्नपानादि कारणोसे जो अल्पसा दोष उत्पन्न होता है उससे भी मुनीश्वर कार्योत्सर्ग करके शुद्ध होते है । जो वस्तु पिच्छिकासे नही स्वच्छ की है, उसको स्पर्श होनेपर कार्योत्सर्गसे शुद्धि होती है। तथा शरीरके खुजानेसे जो दोष होता है वह कार्योत्सर्गसे होता है। लोत्सर्गादिकमे शौचको जाना; मूत्र करके आना आदिक दोषनिराकरणके लिये कायोत्सर्ग प्रायश्चित है ।। ३९-४० ।। स्पष्टीकरण- अन्न पानादिकके दोषमे पच्चीस उच्छ्वासतक कायोत्सर्ग करना चाहिये। १ आभा सेपने २ यतीश्वरा ३ कायोत्सर्गे विशोधनम् २४६) सिद्धान्तसार. (१० ४१- तृणलोष्टादिकच्छेदे स्तोके वा हस्तकर्मणि । कायोत्सर्गमितो दण्डो मनोमासिकसेवनात् (?)॥४१ मृत्तिकायवगोघूममुद्गमाषादिमर्दने । हरितत्रसकायानां संघट्टेऽपि तनूसृतिः ॥ ४२ उद्धूलितपदस्तोये तोयलिप्तपदोऽथवा । पांसुमध्ये विशेद्यस्तु तस्य स्यात्पुरुमण्डलम् ॥ ४३ यस्तु कर्दमलिप्ताघ्रिजले विशति संयतः । कल्याणपञ्चकं तस्य जायते शुद्धिहेतवे ॥ ४४ माकतृणविच्छेदे छिन्ने वानंतकायिके । आचाम्लादि दिशेइंडं एकस्थानं द्वितीयके ॥ ४५ अनंतकायिनो नेयाः सूरणस्नुहिमूलिकाः । अन्ये वा स्युगडूच्याद्या बहवोऽनंतकायिकाः ॥-४६ यस्य मूलेषु शाखायां पत्रे वा सन्ति सर्वदा । अनन्तकायिनो जीवा नियन्ते तद्विघाततः ।। ४७ तृण, मट्टीका डेला, आदिक पदार्थ हायसे तोडने फोडने पर नया हाथसे कुछ अन्य कार्य करनेपर कायोत्सर्ग मात्र दण्ड है अर्थात् कायोत्सर्ग करनेसे शुद्धि होती है। ('मनोमासिक सेवनात्' इसका अर्थ हमारे ध्यान नहीं आता है ) ॥४१॥ मट्टी, जौ, गेहु, मूग, उडद यादि धान्योका मर्दन करनेपर हरी-सचित्त वनस्पति और त्रसकायके आपसमे सघट्ट-मुनिके हाय आदिके द्वारा होनेपर कायोत्सर्गसे शुद्धि होती है ॥४२॥ (पुरुमडल प्रायश्चित्तका दोष। )- जिसके पांव धूलीसे भरे हुए हैं ऐसा मुनि पानीम चला जाय अथवा पानीमे जिसके पाव भीगे हैं ऐसा मुनि वूलीमे प्रवेश करे तो पुरुमंडल नामक प्रायश्चित्तसे वह शुद्ध होता है । अर्थात् वह कांजीभोजन करनेसे शुद्ध होता है ॥ ४३ ॥ कीचडसे जिसके पांव भर गये हैं-लिप्त हुए हैं ऐसा मुनि यदि जलमे प्रवेश करेगा तो उसकी शुद्धिके लिये कल्याणपंचक नामका प्रायश्चित्त है। अर्थात् वह मुनि जिससे जिह्वा और मन विकारयुक्त न हो ऐसा आहार करे, जिसको निर्विकृति आहार कहते हैं। पुरिमंडल माहार, आचाम्ल आहार-भात इमलीका पानक खावें, एक स्थान करे और उपवास करे। एक निर्विकृति माहार, एक पुरुमडल आहार-कांजी भोजन, एक माचाम्ल आहार, एक एकस्थान और एक उपवास ऐसे पांच प्रकारको कल्याणपंचक प्रायश्चित्त कहते हैं ॥ ४४ ।। यदि मुनि गीली घास तोडेगा अथवा अनंतकायिक वनस्पति तोडेगा तो आचार्य उसे मात्राम्लाहारका प्रायश्चित्त और एकस्यानका प्रायश्चित्त देवें ॥ ४५ ॥ अनंतकायिक वनस्पति और उसका लक्षण। )- मूरण, स्तुही-तीन बारवाली नागफणी नामक वनस्पति, मूलक, गडूची-गिलोय आदि शब्दसे कुमारी आदिक अनेक अनंतकायिक वनस्पति हैं। जिसके मूलमें, गाखामे और पत्रोमें सर्वदा अनंतकायिक जीवं रहते हैं और उनके ऊपर बावात करनेसे-प्रहार करनेसे-मूल, माखा, पत्रके ऊपर आघात करनेसे वे जीव मरते हैं ।। ४९ ॥ १ मनोमासिकमेवने २ मा मूलिका.

-१०. ५६)
सिद्धान्नसार.
(२४७
व्यापत्ती त्रसजीवस्य सप्रमादाप्रमादयो । एक कल्याणकं तद्वा नीरमाहारपञ्चकम् ॥ ४८
पञ्चकल्याणकं दण्डे तस्मिनाभीक्ष्ण्ययोगतः । व्यापन्ने सति पञ्चाले दात्कल्याणपञ्चकम् ॥४९
पीठादिचलने वास्मिन्ब्यापन्ने सति जायते । निप्रमादवतरच्छेद एककल्याणपञ्चकम् ॥ ५०
वसतेारदेशे चेत्पञ्चाक्षो कृयते मृत । तन्निर्गतप्रविष्टानामेककल्याणकं भवेत् ॥ ५१
गृहस्यसंयतेभ्यो वा न यत्र कथिते सति । वृश्चिकाटी हतेऽन्येन क्षमणं पञ्चक क्रमात् ॥ ५२
अनेनंव मेणाऽपि मादी निहते सति । प्रयत्नेन तु कल्याणं मासिकं वा प्रयत्नतः ॥ ५३
यत्तीनामतियत्नेन विपीति प्रतिपादिते । अन्येन निहते तस्मिन्विशुद्ध समितो यत. ॥ ५४
मिषगादेशतो वह्न प्रन्चालनमतिव्यथम् । मनापृच्छयातुर कुर्वन्पञ्चकल्याणभाग्भवेत् ॥ ५५
कारिणे ननु गृह्णाति हरीतकोवचादिकान् । यदि न दुप्यति तदा सावुरिति वाचो विपश्चिताम् ।।
-
-
-
(सजीवके नागका प्रायश्चित्त।)- असावधानतामे एक मजीवका घात यदि मुनि
करे तो उसे एक कल्याण नामक प्रायश्चित्त है अर्थात् एक निर्विकृति, एक पुरुमडल, एक
याचाम्ल, एक एकस्थान और एक उपवास । और अप्रमाद अवस्थाम सजीवका घात यदि
मुनिमे हो जाय तो पात्र नीरमाहार ग्रहण करनेका प्रायश्चित्त आचरे ।। ४८ ॥
मुनि प्रमादरहित है परनु पीठादिकं चलनेमे अब अकस्मात् कोई जीव मर जाय तो
एक कल्याणपत्रक नामका प्रायश्चित्त है जिमका ऊपर उल्लेख आया है ।। ४९ ॥
वसतिकामे बाहर निकलते समय अयवा वनतिकामे प्रवेश करते समय यदि वसतिका
द्वारदेशमे पञ्चेन्द्रिय जीव मरा हुआ देखा जाय तो एक कल्याणक प्रायश्चित्त है अर्थात् निर्विकृति
आदिक पात्रोमेमे कोईभी प्रायश्चित्त जो आचार्य वतावे मुनि उसका आचरण करे ।।५०-५१।।
(बिच्छुके नागका प्रायश्चित्त । )- गृहस्थ अथवा मुनियोने विछु मादिक जन्तु यत्न-
पूर्वक पकडो ऐमा नहीं कहा और किनीने उसका घात किया तो गृहस्य और मुनिको क्रमसे पाच
उपवासका प्रायश्चित्त है ।। ५२ ।।
इसी प्रकारमे मदिकोका घात कोई करे तो प्रयत्न पूर्वक उसको छोड दो ऐसा
कहनेपरभी यदि कोई मारेगा तो कल्याणनामक प्रायश्चित्त है और अप्रयत्नपूर्वक घात किया
होगा तो मामिक प्रायश्चित्त है अर्थात् पचकल्याण नामक प्रायश्चित्त है। यतियोने अतिशय
प्रयत्नपूर्वक विषयका प्रतिपादन किया अर्थात् बहुत सावधानतासे विच्छ, सर्प आदिक प्राणीका
रक्षण कर उसे छोड दो ऐसा कहनेपरभी यदि किसीने उनको मार डाला तो मुनिको प्रायश्चित
नही है, क्योकि मुनि विशुद्ध है-समितियुक्त हैं ।। ५४ ।।
वैद्यकी आज्ञासे अग्निको बुझाना, आदि करे और रोगी मुनिको इस विषयमे कुछभी
न पूछे तो मुनि पञ्चकल्याण प्रायश्चित्तको ग्रहण करे ॥ ५५ ॥
कुछ कारणसे हर्र, वचा आदिक यदि मुनि ग्रहण करे तो वह निर्दोष है ऐसा विद्वान्
कहते हैं ॥ ५६ ॥

२४८)
सिद्धान्तसारः
(१०. ५७-
बीजपूरकबिल्वादिग्रहणेन तु शुद्धयति । एककल्याणकेनैव यदि कारणमाश्रितः ॥५७
कन्दर्पकौतुकुच्ये वा स्तोके मिथ्या प्रजल्पने। मिथ्याकारेण शुद्धः स्यानिषिद्ध मलसर्जने ॥५८
द्वादश योजनान्येष वर्षाकालेऽभिगच्छति । यदि सङ्घस्य कार्येण तदा शुद्धो न दुष्यति ॥ ५९
यदि वादविवादः स्यान्महामतविघातकृत् । देशान्तरगतिस्तस्मान्न च दुष्टो वर्षास्वपि ॥६०.
धातुवादेऽथवा गन्धयुक्ते रसविपर्यये । सधमरेककल्याणं दर्शनान्मासिकं परः॥ ६१
चित्तमैथुनसेवायां मिथ्याकारेण शुद्धयति । तत्र तीवाभिलाषेण मासिकं लभते मुनिः ॥ ६२
मैथनस्योपसेवायां यतीनां दण्ड इष्यते । मासांस्तु चतुरो यावदेकान्तरितभोजनात् ॥ ६३
किसी कारणसे बीजपूर-बिजौरा, बेलफल आदिका ग्रहण यदि मुनि करें, तो वह
एक कल्याणसेही शुद्ध होता है ॥ ५७ ॥
( मिथ्याकारसे शुद्धि । )- कंदर्पवचन-रागके उद्रेकसे प्रहासमिश्रित अशिष्ट वचः ।
प्रयोग, कौत्कुच्य- हसीपूर्वक भाण्डवचन बोलना, भौंहें आंखें आदिकके अभिनयके साथ हसीपूर्वक
भाण्डवचन बोलना, थोडासा झूठ वचन बोलना ऐसे कार्य यदि मुनिके द्वारा होंगे तो मिथ्याकारसे
शुद्धि होगी अर्थात् मेरा यह कार्य अयोग्य हुआ ऐसा वह बोलें । तथा निषिद्ध स्थानपर यदि
मलमूत्रक्षेपण मुनि करें तो मैंने यह कार्य मिथ्या किया है, ऐसा वचन बोलें, जिससे अपनी निंदा
व्यक्त होती है । ५८॥
( संघकार्यके लिये वर्षाकालमें गमन प्रायश्चित्तयोग्य नहीं। )- वर्षाकालमें संघके
कार्यके लिये यदि मुनि बारह योजन तक कहीं जायगा तो वह प्रायश्चित्तहि नहीं है । यदि वाद
विवादसे महासंघका नाश होनेका प्रसंग हो तो वर्षाकालमेंभी देशान्तरमें जाना दोषयुक्त
नहीं है ॥ ५९-६० ॥
(धातुवादादिक कथनमें प्रायश्चित्त । )- धातुवादका कथन-उपदेश करनेपर तथा
गंधादिक तयार करनेका उपदेश, पारदका शोधन मारणका उपदेश करनेपर एक कल्याण और
मासिक प्रायश्चित्त देना चाहिये । उपर्युक्त उपदेश देते हुए मुनिको साधर्मिक देखे तो उपदेश
देनेवालेको एक कल्याण नामक प्रायश्चित्त और अन्य धर्मियोंके द्वारा देखे जाय तो मासिक
प्रायश्चित्त देना चाहिये ॥ ६१ ॥
( मैथुनसेवाका प्रायश्चित्त।)- मनमें मैथुन सेवाका विचार आनेसे मिथ्याकारसे शुद्धि
होती है । और उसमें तीव्र अभिलाषा उत्पन्न हो गई तो मासिक नामक प्रायश्चित्त है ॥ ६२ ॥
( मैथुनसेवन दोषके लिये प्रायश्चित्त। )- यदि मुनि मैथुनसेवन करे तो उनको यह
दण्ड है-चार महिनेतक एकान्तरित भोजनका प्रायश्चित्त है । अर्थात् एक दिन भोजन करें, दूसरे
दिन उपवास करें, ऐसी प्रायश्चित्त विधि सतत चार महिने तक करनी चाहिये; तब इस दोषका
परिहार होता है ॥ ६३ ॥

--१० ७१) सिद्धान्तसार (२४९ हरिदडकुरगर्ताम्बुमृत्तिकाजन्तुसडकुले । पथि गच्छन्विशुद्ध स्यान्मार्गाभावे प्रयत्नत ॥ ६४ विद्यमानेऽपि चेन्मार्गे तानेव यदि लङ्घते । प्रमादाल्लभते दण्ड कल्याणपञ्चकं यति. ॥ ६५ ज्ञानादिमदमत्तो य. स्वयूथ्यानपमन्यते । पञ्चकल्याणत' शुद्धिस्तस्यावश्य प्रजायते ॥ ६६ क्षणध्वस्तकपायो योऽमिथ्याकाराद्विशुद्धयति । अहोरात्रेण कल्याण मासिकं लभते तत ॥ ६७ तर्फव्याकरणादीना ज्योतिर्गणितछन्दसा । महाकाव्यादिशास्त्राणा शिक्षायै यदि सेवते ॥ ६८ दर्शनज्ञानचारित्रत्रयं पार्श्वकवतिन । मिथ्याकारो मतस्तस्य पञ्चकल्याणमन्यथा ॥ ६९ मार्यमाणान्विलोक्यासून्पञ्चक लभते नर । भिन्नमासोऽथवानिदाम्रियमाणान्सरोगिण ॥७० यूकादिमत्कुणादीनां धारणे स्यात्प्रतिक्रम. । तैश्च क्रीडापरस्यास्ति शुद्धि कल्याणपञ्चकात् ॥ ७१ - जिम मार्गमे हरे अकुर ऊगे हुए खड्डे है, पानी, किचड और जन्तु है, ऐसे मार्गसे मुनि यदि प्रयत्नपूर्वक यानी जीवोका रक्षण करते हुए दूसरा निर्जन्तुक मार्ग न हो तो गमन करे वह विशुद्ध प्रायश्चित्त योग्य नही ।। ६४ ॥ और वैसा विशुद्ध मार्ग होनेपरभी यदि मुनि अकुर, पानी, जतु आदिको उल्लघते हुए गमन करे तो प्रमादगमन करनेसे कल्याणपचक नामका प्रायश्चित्त ग्रहण करे ॥ ६५ ॥ (ज्ञानादिमदसे साधर्मिकका अपमान करनेसे प्रायश्चित्त । )- ज्ञानादि गर्वसे सामिकोका अपमान करनेवाले मुनिकी 'पच कल्याण' प्रायश्चित्तसे शुद्धि अवश्य होती है ।।६।। ( कपाय करनेवालेको प्रायश्चित्त । )- कपाय उत्पन्न होकर जल्दी यदि नष्ट हो जावेगा तो वह मुनि मिथ्याकारसे शुद्ध होता है । यदि अहोरात्रतक कषाय रहेगा तो कल्याण- पचकल्याण प्रायश्चित्त और अहोरात्रसेभी अधिक कालतक कपाय रहेगे तो 'मासिक' प्रायश्चित्त है।। ६७ ।। (तर्कादि अध्ययन पावस्थादि मुनियोसे करनेसे प्रायश्चित्त।)- तर्क, व्याकरणादिक, ज्योतिष, गणित, छद शास्त्र महाकाव्यादि शास्त्रोका अध्ययन दर्शनज्ञानचारित्रके सन्निध रहनेवाले पार्श्वस्थ मुनिके पास यदि किया जायेगा तो उसका प्रायश्चित्त ' मिथ्याकार' है । अन्यथा पार्श्वस्थ मुनिसे भिन्न अन्य कोई अन्यधर्मी साधुके पास अध्ययन करेतो 'पचकल्याण' प्रायश्चित्त धारण करना चाहिये ॥ ६८-६९ ।। ( प्राणीको मारते हुए जो देखे तो वह प्रायश्चित्ताह है। )- कोई प्राणीको मारता है और कोई मुनि उनको देखता है तो उसको कल्याणपचक प्रायश्चित्त है । और मरते हुए रोगीको कोई मुनि देखे तो भिन्नमास प्रायश्चित्त उसको है अथवा यदि वह निंदा करे तो दोपरहित होता है ।। ७० ।। जू, खट्मल आदिक छोटे जन्तुओको मुनि पकडे तो प्रतिक्रमणसे शुद्ध होता है। और यदि वह मुनि उनसे क्रीडा करेगा तो कल्याणपचकसे उसकी शुद्धि होती है ।। ७१ ॥ आ भा १ सूरिसूर्यो न दूप्यति । SS.32 २५०) सिद्धान्तसार. (१०.७२- शय्यागारादिकस्यापि सधर्मणां कृते कृतौ । कर्तुत्सल्यतो यत्तन्नास्ति दोषो मनागपि ॥ ७२ वन्दारुः शुद्ध एवासी पार्श्वस्थगणिनो गणी । संघमेलापकेऽन्यत्र मासिकं दण्मडश्नुते ।। ७३ राजादिराजलोकानां स्नेहमुत्पादयन्नपि । नव दुष्टो गणी कश्चित्सङ्घपालनहेतुतः ॥ ७४ अभ्युत्थानादिकं कुर्वन्गृहस्थेष्वन्यलिङ्गिषु । दीक्षादिकारणाच्छुद्धो मासिकं चान्यथा भजेत् ॥७५ राजासन्नासनस्थोऽपि धर्मादः कारणाश्रयात् । अभ्युत्थानेऽथवा तस्य सूरिसूर्यो न दुष्यति ॥७६ भूपत्याद्याः समागत्य पूजयन्ति यतीश्वरम् । पूजितस्य च तैर्ग मासिकं तस्य जायते ॥ ७७ निषद्यासेवन मिथ्याकारेच्छा- सुनिमन्त्रणं । यो न कुर्वन्नरस्तस्य पुरुमण्डलमीरितम् ॥ ७८ ( सार्मिकोको शय्या और वसतिका देनेमे प्रायश्चित्तका अभाव।)- तृणकी शय्या, फलककी शय्या तथा वसतिका सार्मिकोके लिये कोई दे अथवा करे तो वात्सल्यभाव होनेसे शय्यादिके देनेवालेको प्रायश्चित्त दोष हैही नही ।। ७२ ।। सघमे सव मुनियोका समूह होनेसे पार्श्वस्थ गणीको यदि आचार्य वदन करे तो वह शुद्धही है परतु जव अकेले पार्श्वस्थ आचार्यको वदन करें तो वह मासिक प्रायश्चित्तको योग्य है ।। ७३ ॥ ( सघपालनार्थ राजस्नेह करनेवाले आचार्य निर्दोष है । )- राजादिक और उनके सेवकोका स्नेह रखनेवाले आचार्य दोषी नही हैं, क्योकि, वे संघका पालन राजादिकोके साथ स्नेह रखनेसे होगा ऐसा उद्देश मनमे रखकर वैसा स्नेह पालन करते हैं ।। ७४ ।। कोई गृहस्थ दीक्षा आदि कार्यके लिये आया है, तो उसका अभ्युत्थानादिक यदि करे तो वह दोषी नही है और अन्यधर्मीय साधु दीक्षा ग्रहणके लिये आया हो तो उसकाभी आदर करनेमे आचार्य दोषी नही है । यदि इन कारणोंके विना आचार्य आदर करे उठकर खडे होना आदि विनय करे तो वह मासिक प्रायश्चित्तके योग्य है ।। ७५ ।। राजा आसनपर बैठा है और धर्मादिक कारणसे आचार्य राजाकी सभामे आये और राजा आदरके लिये आसनसे ऊठनेपर अथवा न ऊठनेपर आचार्यको दोष नहीं है। राजा, मत्री आदिक आकर आचार्यकी पूजा करनेसे मेरी पूजा राजादिक करते हैं ऐसा गर्व यदि आचार्य करे तो उनको मासिक प्रायश्चित्त है ।। ७६-७७ ।। जो साधु.निषद्यासेवन नहीं करता है अर्थात् जहा जैन मुनि समाधिमरण करते है उस स्थानकी वदना नही करता हैं, जो मिथ्याकार, इच्छाकार और निमंत्रण नहीं करता है- नहीं बुलाता है उसको पुरुमंडल नामक प्रायश्चित्त होता है ।। ७८ ।। १ आ छेद २ मा नय ३ आ नृपाद्या ४ आ. सेविका -१० ८६) सिद्धान्तसार (२५१ उष्णकाले जघन्य स्याद्वर्षाकाले तु मध्यमं । उत्कृष्ट शीतकाले तत्प्रायश्चित विधीयते ॥ ७९ चतुर्थ ग्रीष्मकाले स्यात्षष्ठं' हि स्यादनागमे । प्रदेय शीतकाले स्यादष्टम च विशोधनम् ॥८० शरद्वसन्तो ग्रीष्मश्च त्रयोऽमी गुरवो मताः । प्रावृशिशिरहेमन्ता लघवो लघुकर्मभिः ॥ ८१ इति कालविभागेन तपो देयं मनीषिभिः । अन्यथा दातुरप्येतत्प्रायश्चित्त प्रजायते ॥ ८२ अनूपं फथ्यते क्षेत्र सिन्ध्वादिमलयादिकम् । जाडगल जलसयुक्त समुद्रान्त त्रसाधिकम् ॥ ८३ भक्तयुग्माषयुक्तावत्पञ्चम सक्तुयुग्मतम् । रसधान्यपुलाक च यवाग्वाधुपभोजनम् ॥ ८४ सूरणादिमहाकन्दप्रचुर फन्दयुग्मतम् । तन्मनारमूलिनीपूर्व मूलयुग्मूलभुङमतम् ॥ ८५ क्षेत्राणि च दर्शतानि ज्ञातव्यानि विशेषतः । समस्तवस्तुसात्म्यात्स्यात्सौम्य साधारणं मतम् ॥८६ ( कालकी अपेक्षासे प्रायश्चित्त वर्णन । )- उष्णकालमे जघन्य प्रायश्चित्त है। वर्षाकालमे मध्यम प्रायश्चित्त है और शीतकालमे उत्कृष्ट प्रायश्चित्त है ।। ७९ ।। ग्रीष्मकालमे एक उपवासका प्रायश्चित्त, वर्षाकालमे दो उपवास और शीतकालमे तीन उपवासका प्रायश्चित्त देना चाहिये ।। ८० ॥ शरत्काल, वसन्त और ग्रीष्म ये तीन ऋतुकाल गुरु है और वर्षाऋतु, शिशिरऋतु और हेमन्तऋतु ये लघु-कार्यसे लघु है ।। ८१ ।। ऐसे काल विभागके अनुसार विद्वान् आचार्य मुनियोको प्रायश्चित्त देवे । परतु कालविभागका विचार न करते हुए आचार्य यदि प्रायश्चित्त देने लगे तो वेही प्रायश्चित्ताह हो जाते हैं ।। ८२ ॥ ( दश क्षेत्रोके नाम । )- जलप्राय क्षेत्रको अनूप कहते हैं जैसे सिंधु, मलयादिक देश । जागलक्षेत्र वह है जो जलसयुक्त है । समुद्रके समीपका प्रदेश त्रसादिक रहता है, सजीवोसे भरा हुआ होता है । जहा भात और उडद ये धान्य प्रचुर उत्पन्न होते है ऐसा चौथा क्षेत्र पाचवा क्षेत्र सत्तु धान्यके उपयोगका होता है । छठा क्षेत्र रसधान्य और पुलाक धान्यसे युक्त है। यव और गोधूमगेहूँ इन धान्योका जहाके लोक भोजन करते हैं ऐसा सातवा क्षेत्र । सूरणादि महाकदोसे भरा हुआ क्षेत्र जिसे कन्दयुक् कहते है वह आठवा क्षेत्र है । जहा मूलकादिक विपुल उत्पन्न होते हैं ऐसे क्षेत्रको मूलयुक् कहते हैं। जहा लोक मूलकादि पदार्थ भक्षण बहुत करते हैं उसको मूलभूक् कहते है । ये दश क्षेत्र विशेपतासे समझने चाहिये, क्योकि ये दशक्षेत्र समस्त- वस्तुओका सात्म्य धारण करते हैं अर्थात् इनका भक्षण करनेसे मनुष्योको सुख होता हैं । जो आहार और पान प्रकृतिके विरुद्ध होनेपरभी बाधक नहीं होते है, सुखके लिये कारण होते हैं उनको सात्म्य कहते हैं। ऐसे आहारपानको सौम्य और साधारणभी कहते हैं ॥ ८३-८६ ।। - १ अष्टम हि धनागमे २ पण्ठमेव २५२) सिद्धान्तसारः (१०, ८७- शैत्यं यत्र रसाधिक्यभोजनं वा सुभोजनम् । तत्रोत्कृष्टं भवेत्तावच्छोधनं मुनिभिर्मतम् ॥ ८७ उष्णे चापि तथा रूक्षे हीनं देयं मनीषिभिः । यत्तु मध्य प्रदीयेत प्रायश्चित्तं च मध्यमे ॥ ८८ उत्कृष्टाहारयुक्तानामुत्कृष्टं तत्तपो मतम् । मध्यमाहारयुक्तानां ईषदूनं तदेव हि ॥ ८९ रुक्षाल्पभुक्तियुक्तानां क्षीणानामतिरूक्षिणाम् । प्रायश्चित्तं भवेन्नित्या क्षमणेन विजितम् ॥९० चिरं यो दीक्षया गर्वी प्रायश्चित्तं च दीयते । तपोबलीति गर्वेण गवितोऽपि तथा भवेत् ॥९१ छेदे वितीर्यमाणेऽपि मृदुर्यो हर्षमञ्चति । वन्द्योऽहमित्यनेनास्मिन्निति नैतेन शुद्धचति ॥ ९२ परिज्ञाय यथादोषं दातव्यानि मनीषिभिः । अकुर्वाणस्तपः प्राज्यं न शुध्द्येद्गुरुवाक्यतः॥ ९३ अकुर्वाणस्तपः प्राज्यमश्रद्धो गुरुवाक्यतः । अश्रद्धावानयं घोरशोधनेनैव शुद्धयति ॥ ९४ ( उत्कृष्ट प्रायश्चित्त कहा देना चाहिये ? )- जिस क्षेत्रमे शीत जादा है और जहाका भोजन दूध, घी, गुड, खाड इत्यादि रसप्रचुर होता है अथवा जहाका भोजन उत्तम होता है वहा मुनिओको उत्कृष्ट प्रायश्चित्तका उपयोग करना चाहिये ऐसा कहा है । उष्ण क्षेत्रमे और रूक्ष क्षेत्रमे विद्वानोका जघन्य प्रायश्चित्त देना चाहिये । मध्यमक्षेत्रमे मध्यम प्रायश्चित्त देना योग्य है ।। ८७-८८ ॥ ( आहारकी अपेक्षासे प्रायश्चित्त वर्णन।)- उत्कृष्टाहार जो करते हैं उनको उत्कृष्ट तपप्रायश्चित्त देना चाहिये । मध्यम आहार करनेवालोको वही उत्कृष्टतप-प्रायश्चित्त किन्तु कुछ कम प्रायश्चित्त देना चाहिये । रूक्ष और अल्पभोजन करनेवालोको- अर्थात् अशक्त मुनियोको अतिरूक्ष प्रायश्चित्त देना चाहिये, अर्थात् असमर्थोंको उपवासरहित प्रायश्चित्त देना चाहिये ॥ ८९-९०॥ ( गर्व करनेवालेभी प्रायश्चित्ताह है। )- जिसको दीक्षा लेकर बहुत दिन हुए है और जो अपनेको पुराना साधु समझकर गर्व करता है, वह प्रायश्चित्तयोग्य है । उसको प्रायश्चित्त देना चाहिये तथा जो अपने तप.सामर्थ्यका गर्व करता है वह तपोगर्वी मुनिभी प्रायश्चित्त योग्य है ।। ९१॥ छेद- प्रायश्चित्त देनेपरभी जो मृदु मुनि- कोमलाचार पालनेवाले मुनि हर्षयुक्त होता है । मैं इस प्रायश्चित्तसे वन्दनीय हुआ हू ऐसा अभिमान धारण करता है, वह उस प्रायश्चित्तसे शुद्ध नही होता ॥ ९२ ॥ दोषोको जानकर विद्वान् आचार्य प्रायश्चित्त देवें । उत्कृष्ट तप नहीं करनेवाला गुरुदत्त प्रायश्चित्तसे शुद्ध नही होता है ॥ ९३ ।। जो उत्तम तप नही करता और जो गुरुके वचनोपर श्रद्धा नही करता वह श्रद्धारहित मुनि घोर प्रायश्चित्तसेही शुद्ध होता है ।। ९४ ।। 1 आ यत्तु मध्य मत क्षेत्र तत्र मध्य प्रदीयते । २ आ. सप्रायश्चित्तमञ्चति ।

-१० ९८) सिद्धान्तसार (२५३ प्रियधर्मादिकाक्षात्वा पञ्चाशत्पुरुषान्सदा । प्रायश्चित्त प्रदातव्य यथोक्तं मुनिपुङ्गवै. ॥ ९५ अज्ञानपि' बहु ज्ञात्वा जिनागमनिवेदितान् । पुरुपान्दीयते दण्डो विविधागमपारग ॥ ९६ आलोचना प्रतिक्रान्तिस्तद्वय त्याग एव वा । व्युत्सर्गश्च तपच्छेदः परिहारोऽभिरोचनम् । मूल वापि दर्शतानि शोधनानि जिनागमे ॥ ९७ शोधयितुं न यो दोष शक्यते तपसापि वा। दीक्षा विच्छिद्यते तेन क्लिन्नताम्बूलपत्रवत् ।। ९८ जिनको धर्मप्रिय है ऐसे पचास पुरुपोको ( ? ) जानकर मुनिश्रेष्ठ सदा आगमोक्त- प्रायश्चित्त श्रद्धारहित मुनिको देवे ।। १५ ।। नाना प्रकारके आगमके पारगामी मुनि जिनागममे कहे हुए अनेक अज्ञ पुरुषोको जानकर प्रायश्चित्त देवे ।। ९६ ॥ (प्रायश्चित्तके दगभेद। )- आलोचना- आलोचनाके दस दोपोका त्याग कर गुरुको अपने प्रमाद दोप काहना आलोचना है। प्रतिक्रमण- यह मेरा दोप मिथ्या हो जावे ऐसा कहकर दोप दूर करना । तदुभय- दोष होनेपर प्रतिक्रमण और आलोचना दोनोंके द्वारा जो नष्ट किये जाते हैं उन्हे तदुभय कहते हैं । विवेक~ जिनके ऊपर ममत्व उत्पन्न हुमा है ऐसे अन्नपानादिक त्यागना विवेक है । अथवा अप्रामुक पदार्थ विस्मृतिसे ग्रहण किये जानेपर अथवा ( त्याग किये हुवे ) प्रामुक पदार्थका ग्रहण किया गया तो उसका स्मरण पूर्वक त्याग करनाभी विवेक हैं। मलमूत्रादि क्षेपण करते हुए जो दोप हुए हैं उनके निराकरणार्य जो गरीरके ऊपर ममत्व छोडकर अन्तर्मुहूर्तादि कालपर्यन्त कायोत्सर्ग करना उसे व्युत्सर्ग तप कहते हैं । तप- कुछ अपराधोके क्षालनार्थ उपवास, आत्राम्ल, निविकृति आदिक विधि करना वह तप प्रायश्चित्त हैं। छेद-अपराध होनेपर दीक्षामेमे दिन, पक्ष, मास आदिक कम किये जाते हैं वह छेद प्रायश्चित्त है । मूल- पार्श्वम्यादिक मुन्याभासरूप अवस्था प्राप्त होनेसे सपूर्ण दीक्षा नष्ट होकर पुन दीक्षा देना मूलप्रायश्चित्त है । परिहार- पक्ष मामादिक कालमर्यादाकी अपेक्षासे सघसे दूर करना परिहार कहते है । पारचिक- अनेक महापराध करनेपर जो चातुर्वर्ण्यश्रमणसघसे यह महापापी है, यह जिनमतवाह्य है, इसको वन्दन मत करो ऐसी घोषणा देकर अनुपस्थापना नामक प्रायश्चित्त देकर देशमे निकाला जाता है वह मुनिभी स्वधर्मरहितक्षेत्रमे जाकर आचार्यसे दिया हुआ प्रायश्चित्तका पालन करता है। ऐसे दस प्रायश्चित्त जिनागममे कहे हैं । विद्वान आचार्य दोपानुसार जानकर अपराधीको प्रायश्चित्त देवे ॥ ९७ ॥ ( दीक्षाच्छेद कब किया जाता है ? )- जो दोष तपश्चरणसेभी निवारित नहीं किया जाता- दूर नहीं होता ऐसे दोपसे दीक्षा छेदी जाती है अर्थात् वह दोप दीक्षाकोभी नष्ट करता है । जैसे पानीमे भीगा हुआ ताम्बूलपत्र सड जाता है वैसे कोई दोप मुनियोकी दीक्षाको नष्ट करता है ॥ ९८ ॥ Cons.- - १ आ अन्यानपि बहूज्ज्ञात्वा इत्यपि पाठ ।

२५४) सिद्धान्तसार (-१०.९९ आचार्यगणमुत्सृज्य भ्राम्यत्येको महीतले । यावक्रियामजानानस्तावद्दीक्षास्य छिद्यते ॥ ९९ पार्श्वस्थगणसयुक्तः षण्मासान्यो व्यवस्थितः । तपस्तस्य भवेदूवं छेद एव निगद्यते ॥ १०० न सन्त्यत्र पुनस्तस्य व्रतारोपणमीर्यते।श्रामण्योक्ता गुणा यस्य नश्यन्ति काय॑तोऽथवा ॥१०१ आयिकासयतानां च गृहस्थानामहेतुकम् । अभ्युत्थानं करोत्यस्य प्रायश्चित्तं भवेत्पुनः ॥ १०२ जिनसूत्रापरिज्ञानादुत्सूत्रं वर्णयेत्युनः । स्वच्छन्दस्य भवेत्तस्य मूलदण्डो विधानतः ॥ १०३ अत एव महात्मानो जिनसिद्धान्तवेदिनः । उपवासे परायत्तास्तपः कुर्वन्त्यहनिशम् ॥ १०४ तत्पार्श्वस्थावसन्नैककुशीलमृगचारिषु । ये गृहीतव्रतास्तेषां दातव्यं मूलमेव च ॥ १०५ आचार्योका गण छोडकर वह दोषी मुनि अकेला पृथ्वीपर विहार करता है, जबतक वह क्रिया नही जानता, नही करता तबतक उसकी दीक्षा छेदी जाती है ॥ ९९ ॥ पार्श्वस्थगण- भ्रष्ट मुनिसमूहके साथ जो मुनि छह महिनोतक रहते है उनकी दीक्षा छेदी जाती है और यह छेदनामक प्रायश्चित्त है ।। १०० ।। जिसके मुनिपदयोग्य सब गुण नष्ट हुए हैं अथवा जिसके कुछभी गुण नही हैं उसको पुन व्रतारोपण नही दिया जाता ॥ १०१ ॥ आर्यिका, असयमी तथा गृहस्थ आनेपर बिनाहेतु जो अभ्युत्थान करता है उस आचार्यको प्रायश्चित्त कहा है ।। १०२ ।। जिनसूत्रका ज्ञान न होनेसे जो उत्सूत्र प्रतिपादन करता है, उस स्वच्छन्द मुनिको शास्त्रोक्त विधिसे मूलदण्ड देना चाहिये । अर्थात् उसको पुन दीक्षा देनी चाहिये ॥ १०३ ।। इसलिये जो सत्पुरुष है और जैन-सिद्धान्तके वेत्ता होते हैं वे उपवासमे अधीन होकर हमेशा तपश्चरण करते हैं ।। १०४ ।। जो पार्श्वस्थ, अवसन्न, कुशील और मृगचारीके पास दीक्षा ग्रहण करते हैं उनको मूल-प्रायश्चित्तही देना चाहिये अर्थात् पुन दीक्षा देनी चाहिये ।। १०५ ॥ पार्श्वस्थ- जो वसतिकामें आसक्त रहता है, उपकरणोसे उपजीविका करता है और श्रमणोके- मुनियोके पास रहता है । अवसन्न- जो चारित्र पालनमे आलस्य युक्त होता है । जिनवचनोंको नही जानता है, जिसने चारित्रभार छोड दिया है, ज्ञानसे व चारित्रसे जो भ्रष्ट है और क्रियाओमे आलस्ययुक्त dhid कुशील- क्रोधादिकोसे कलुषित, व्रत गुण और शीलोसे रहित सघका अपमान करनेवाला। मृगचारी- स्वच्छन्दी, गुरुकुलको छोडकर विहार करनेवाला, और जिनवचनको दूषित करनेवाला होता है ।। १०५ ॥

-१० ११४) सिद्धान्तसार (२५५ आसादनं प्रकुर्वाणास्तीर्थेशगणयोरपि । श्रुतं जनमतिकामन्भूय पारञ्चिको भवेत् ॥ १०६ साधूनां श्रावकाणां च मूलोत्तरगुणेषु यत् । व्रतभङ्गेषु भग्नेन कथयामि यथागमम् ॥ १०७ मूलोत्तरगुणोपेते साधौ यत्नवति स्थिरे । वधे दण्डतनूत्सर्गा भवन्तीन्द्रियङ्खयया ॥ १०८ अस्थिरस्यास्य जायेत कायोत्सर्गविशोधनम्।प्राणादिसङख्ययोत्पन्ने वधे एकेन्द्रियादिनाम् ॥१०९ अप्रयत्नवतस्तस्य स्थिरस्यन्द्रियसडख्यया । उपवासा भवन्त्येव प्रायश्चित्त विशुद्धये ॥ ११० अस्थिरस्यास्य जायन्ते हयुपवासा विशोधनम् । प्राणादिसख्यया जाते वघे चैकेन्द्रियादिषु।।१११ अथवा जायते दण्ड. क्षेत्रकालाद्यपेक्षया । योऽय तमपि वक्ष्यामि श्रीगुरूणां प्रसादत ॥ ११२ तदैकेन्द्रियजीवाना द्वादशानां वधे सति । उपवासो भवेत्साघो. शोधन शुद्धिवतिन ॥ ११३ स षड्भिर्तीन्द्रिय साधोश्चतुभिस्त्रीन्द्रिय पुनः । निहतेर्जायते' दण्डः सत्यमेकोपवासत.॥११४ ... (पारचिक प्रायश्चित्तका वर्णन । )- जो मुनि तीर्थकरोका, गणघरोका और गणका आसादन- अपमान करता है, जैनागमको उल्लघता है- विरुद्ध प्रवृत्ति करता है, राजस्त्री आदिका सेवन करता है वह मुनि पारचिक प्रायश्चित्तके योग्य है ॥ १०६ ॥ ( मूलगुण और उत्तर गुणोके दोपोमे प्रायश्चित्त- वर्णन । )- साधु और श्रावकोके जो मूलगुण और उत्तर गुण है, उनमे व्रतोके प्रभेदोका जो भग होता है- व्रतनाश होता है, उसके लिये आगमानुसार मैं प्रायश्चित्तका वर्णन करता हू ॥ १०७ ॥ मूलगुण और उत्तर गुणोसे युक्त साधुके द्वारा यदि हिंसा हुई तो इद्रियसख्याके अनुमार उतने कायोत्सर्ग करने चाहिये ।। १०८ ।। जो साधु व्रतोमे अस्थिर है उसको कायोत्सर्गका प्रायश्चित्त है अर्थात् एकेन्द्रियादि जीवोका वध होनेपर उनके प्राणसख्याके अनुसार कायोत्सर्ग करना चाहिये ॥ १०९ ।। जो प्रयत्नपूर्वक प्रवृत्ति नहीं करता है ऐसे अस्थिर साधुको विशुद्धिके लिये इन्द्रिय- सख्याके अनुसार उपवास करने चाहिये ॥ ११० ।। अप्रयलवान् और अस्थिर ऐसे साधुको एकेन्द्रियादिकोका वध होनेपर प्राणादि संख्याके अनुसार उपवास करना चाहिये ।। १११ ।। अथवा क्षेत्रकालादिकोकी अपेक्षासे जो प्रायश्चित्त दिया जाता है उसकामी श्रीगुरुके प्रसादसे में वर्णन करता हू ।। ११२ ।। शुद्धिमे रहनेवाला जो साधु है उससे यदि वारह एकेन्द्रिय जीवोका वध होवे तो एक उपवास प्रायश्चित्त है ।। ११३ ॥ छह द्वीन्द्रिय जीव और चार त्रीन्द्रिय जीव इनका वध होनेसे एक उपवासका प्रायश्चित्त है ।। ११४ ॥ १ आ व्रत भग्नेषु भग्नेन ।

२५६) सिद्धान्तसार (१० ११५- एकेन्द्रियेषु पत्रिंशन्मृतेष्वत्र प्रजायते । प्रायश्चित्तं प्रतिक्रान्तिः षष्ठमेकं निरन्तरम् ॥ ११५ द्वीन्द्रियेषु तथा चैवमष्टादशसु कथ्यते । त्रीन्द्रियेष्वेतदेव स्याद्वादशसु मृतेषु च ॥ ११६ चतुरिन्द्रियजीवेषु नवसु प्रणिगद्यते । पञ्चेन्द्रिये तदेकस्मिञ्जायते निःप्रमादिनाम् ॥ ११७ साधूनां श्रावकाणां च स्त्रीवालादिगवादिनाम् । विघाते जायते दण्डस्तं वक्ष्यामि यथागमम् ॥ साधुघाते भवेद्दण्डो मासान्द्वादश यावतः । षष्ठषष्ठोपवासेन नैरन्तर्येण सर्वथा ॥ ११९ श्रावकस्य तु घातेऽस्य षण्मासान् षष्ठपप्ठतः। पारणाविधिना सर्वे प्राणिनो दोषहारिणः॥१२० वालघाते भवन्त्येते त्रयो मासा निरन्तराः। सार्दो मासश्च षष्ठः स्यास्त्रीसामान्यविघातिनाम् ।। दिवसाश्च प्रजायन्ते त्रयोविंशतिरेव च । षष्ठोपवासतो दण्डो गवादीनां विशोधतः ॥ १२२ १ छत्तीस एकेन्द्रिय जीवोंका घात होनेपर प्रतिक्रमण और दो उपवास निरतर करने चाहिये ।। ११५ ॥ द्वीन्द्रिय जीव अठारह और त्रीन्द्रिय जीव वारह इनका घात होनेपर यही प्रायश्चित्त है। ( प्रतिक्रमण और दो उपवास ) ॥ ११ ॥ चतुरिन्द्रिय जीव नौ और पचेन्द्रिय जीव एक इनका मरण प्रमादरहित साधुके द्वारा होनेपर प्रतिक्रमण और दो उपवास का प्रायश्चित्त है ॥ ११७ ॥ ( साधु आदिके घातक प्रायश्चित्त । )- साधु, श्रावक, स्त्री, वालक, गाय आदिका घात होनेपर जो प्रायश्चित्त है उसका वर्णन मागमानुसार मै करता हूं ।। ११८ ।। ( साधुघातका प्रायश्चित्त।)- साधुका घात करनेपर निरन्तर दो दो उपवास वारह मह्निोतक करना चाहिये । अर्थात् दो उपवास अनतर पारणा फिर दो उपवास पुन पारणा ऐसा क्रम एक वर्षतक करनेसे साधुघातका प्रायश्चित्त पूर्ण होकर विशुद्धि होती है ।। ११९ ॥ ( श्रावकघातका प्रायश्चित्त । )- श्रावकघात करनेपर छह महिनोतक दो उपवासके अनतर पारणा, दो उपवासके अनतर पारणा ऐसा उपवास विधि करना चाहिये जिससे श्रावक- घातक पापमुक्त होकर शुद्ध होता है ॥ १२० ॥ ( वालघात और स्त्रीघातका प्रायश्चित्त।)- वालघात करनेपर निरतर तीन मासतक दो उपवासके अनतर पारणा करनी चाहिये और स्त्री सामान्यका घात करनेपर साडेतीन महिनो- तक निरन्तर दो उपवास और पारणा, दो उपवास और पारणा ऐसा प्रायश्चित्तका क्रम करनेसे शुद्धि होती है ॥ १२१॥ ( गाय आदि पशुघातका प्रायश्चित्त।)-गाय वगैरह प्राणियोंका घात करनेपर तेईस दिनोका प्रायश्चित्त करना चाहिये अर्थात् दो दो उपवास और पारणा करना चाहिये । १२२ ।। १ आ विधातत.।

-१० १२८) सिद्धान्तसार (२५७ षण्मासान्यावदेतत्स्याद्दण्डः पाषण्डघातिनः । तद्भक्तानां त्रयोमासान् षष्ठयोगाद्विशोधनम् ॥१२३ साघोर्योऽसौ विघाते स्यात्तधोनीना तथा क्रमात् । कथ्यते मुनिभिर्मान्य शोधन शुद्धिहेतवे ॥१२४ तृणभक्षविधाते स्युरुपवासाश्चतुर्दश । सिंहव्यायादिजीवाना घाततोऽपि त्रयोदश ॥ १२५ मयूरकुक्कुटादीनां द्वादश स्युर्विघाततः । एकादशोपवासाश्च सर्पजातिवधे सति ।। १२६ शुद्धिर्दशोपवास स्यात्सरटादिवघे सति । मत्स्यफच्छपपूर्वाणा विधातान्नवभिस्तकः ॥ १२७ नीचःपैशुन्ययुक्तो यो ह्यन्त परिभाषते । प्रत्यक्ष वा परोक्ष वा गणात्तस्य बहिः कृतिः ॥ १२८ (पाषडिघात और तद्भक्तघातका प्रायश्चित्त।)- पाषण्डी अर्थात् भस्मधारी भिक्षु, कापालिक, परिव्राजक आदि अन्य धर्मीय साधुओका घात करनेपर छह महिनोतक दो दो उपवास पूर्वक पारणा करनी चाहिये । और उनके भक्तोका-माहेश्वर आदिकोका घात करनेपर तीन महिनीतक दो दो उपवास पूर्व पारणा करे तथा जो स्त्रीभक्त है, उनका घात होनेसे डेढ मासतक दो दो उपवासोके अनतर पारणा करनी चाहिये ।। १२३ ॥ (आयिकाघातका प्रायश्चित्त।)- जैन मुनिमओका घात करनेसे जो प्रायश्चित्तका क्रम कहा है वह प्रायश्चित्त-क्रम आर्यिकामोका घात करनेमे समझना चाहिये। इस प्रकार मान्य मुनियोने शुद्धिके लिये शोधन-प्रायश्त्ति कहा है ।। १२४ ।। ( तृणभक्षक और मासभक्षक पशुओके घातका प्रायश्चित्त।)- तृणभक्षकपशु-हरिण, खरगोश, वकरा आदि प्राणियोका घात करनेसे चौदह उपवासोका प्रायश्चित्त है। अर्थात् एक उपवास एक पारणा, एक उपवास एक पारणा इस क्रमसे चौदह उपवासोका प्रायश्चित्त करना चाहिये। सिंह, व्याघ, आदि हिंस्र प्राणियोका घात करनेसे तेरह उपवास पारणापूर्वक करने चाहिये अर्थात् एकान्तरोपवास पूर्वक तेरह उपवास और तेरह पारणा करना चाहिये ॥ १२५ ॥ ( मयूरादिके घातका प्रायश्चित्त । )- मोर, मुर्गा, कबूतर, तीतर आदि पक्षियोके घातसे बारह एकान्तरोपवास करने चाहिये । और सर्पके जातिका वध किया जानेसे ग्यारह उपवास एकान्तरपूर्वक करने चाहिये ॥ १२६ ॥ गिरगिट आदिकोका नाश करनेसे एकान्तरपूर्वक दस उपवास करना चाहिये । एक उपवास, एक पारणा ऐसा क्रम दसवे उपवास तक करना चाहिये। तथा मछली, कछुवा, मगर आदि जलचर प्राणियोके घातसे नौ उपवास और नौ पारणायें करनी चाहिये। इस प्रकार अहिंसावतका प्रायश्चित्त निरूपण किया है ॥ १२७ ।। ( असत्यभाषणका प्रायश्चित्त । )- जो साधु नीच दुष्टतायुक्त-निंदायुक्त असत्य बोलता है वह चाहे प्रत्यक्ष बोले किंवा परोक्षतासे बोले उसको गणसे बाहर करना चाहिये। ३ आ नीचे पैशुन्ययुक्तो यो। स ( सोलापुर ) १ आ. विशोधकम् । २ आ सा! मासो। प्रथम नीचपशुन्य ह्यन्त परिभाषते । S.S.33 २५८) सिद्धान्तसार (१०.१२९- जल्पतस्तस्य शृण्वाना तिष्ठन्ति समीपगाः । तस्य दोषस्य तद्भागं चतुर्थ प्राप्नुवन्ति च ॥ १२९ यो गृह्णाति' परस्यायं यतीनां मध्यवर्त्यपि । स गृहस्थोपधिः सोऽयं षण्मासक्षपण. शुचिः ॥१३० स्वप्ने मैथुनसेवी च मद्यमांसाशनोऽपि वा । उपवासेन शुद्धः स्यात्स प्रतिक्रमणेन सः॥ १३१ कन्दर्पोद्रेकमायाति रामारूपावलोकनात् । सोऽयमालोचनायुक्तः कायोत्सर्गेण शुद्धचति ॥ १३२ परिग्रहनहनस्तो' यः सदा जायते यदि । मूलं तस्य समायाति न याति परमां गतिम् ॥ १३३ मिथ्यादृष्टिजनानां य. करोति कलहं पुनः । बहूपवाससंयुक्तं मौनं तस्य प्रदीयते ॥ १३४ मुनिमध्यगतो यस्तु हस्ताभ्या कुरुते कलिम् । तस्य षष्ठेन षण्मासान्प्रायश्चित्तमुपाश्रितः ॥१३५ असयतजनानां हि बोधने विहिते सति । नृत्ये गाने च साधूनामष्टमं दण्ड इष्यते ॥ १३६ - नीच, दुष्टता युक्त असत्यभापण बोलनेवाले साधुके पास उसका भाषण सुनते हुए जो मुनि तिष्ठते है वे भी उसके असंत्यभापण दोषका चतुर्थांश दण्ड प्राप्त करते हैं ।। १२८-२९ ॥ ( अचौर्यव्रतका प्रायश्चित्त।)- जो मुनियोके वीचमे रहनेपरभी दूसरोका धन ग्रहण करता है वह गृहस्थका परिग्रहण करता है ऐसा मुनि छह मासतक उपवास और पारणा करके पवित्र होता है ।। १३० ॥ ( ब्रह्मचर्यव्रतका प्रायश्चित्त । )- जो साधु स्वप्नमे-अर्थात् निद्रामे मैथुनसेवन करता है किंवा मद्यपान और मासाशन करता है वह प्रतिक्रमणपूर्वक उपवाससे शुद्ध होता है। जो साधु स्त्रीका रूप देखकर कामोद्रेकको प्राप्त होता है वह आलोचनायुक्त होकर कायोत्सर्गसे शुद्ध होता है ।। १३१-१३२ ।। (परिग्रहत्यागका प्रायश्चित्त।)- जो साधु हमेशा परिग्रहोसे ग्रस्त रहता है उसको मूल प्रायश्चित्त प्राप्त होता है अर्थात् उसे पुनर्दीक्षा धारणका प्रायश्चित्त है। ऐसा परिग्रहयुक्त साधु उत्तम गतिको-मुक्तिको प्राप्त नही होता है ।। १३३ ।। ( मिथ्यादृष्टिसे कलह करनेका प्रायश्चित्त। )- जो मिथ्यादृष्टि-जनोसे कलह करता है उस मुनिको अनेक उपवाससहित मौनका प्रायश्चित्त आचार्य देते हैं। मुनियोके वीचमे जो मुनि हाथोसे कलह करता है उस पापीको छह महिनोतक दो 'उपवासपूर्वक पारणाका प्रायश्चित्त है ।। १३४-१३५ ।। ( निद्रामेसे उठाना, नृत्य और गायन आदिका प्रायश्चित्त । )- जो साधु असयमी लोगोंको निद्रामेसे जगाता है, तथा साधुओकोभी निद्रामेसे जगाता है तथा तुम गाओ, नाचो ऐसा बोलता है उसको निरतर तीन उपवासका प्रायश्चित्त है ।। १३६ ॥ --- -- १ आ द्वितीय २ आ तृतीय ३ आ चतुर्य ४ आ पञ्चम ५ आ गण -१० १४४) सिद्धान्तसार (२५९ चतुर्विधस्य' सघस्य योऽपराधान्विभाषते । अभाष्योऽवन्दनीयश्च स गणो गणकोऽथवा ॥ १३७ स्वाध्यायापेक्षया साधुः सेवते यदि यत्नतः । औद्देशिक ततस्तस्मात्प्रतिक्रान्ति स शुद्धयति ॥१३८ दुःशीलक्रोधमिथ्यात्वमानमायाविलः सह । विहारे पञ्चकल्याण जायते शुद्धिहेतवे ॥ १३९ अहंदाचार्यसाधूनामुपाध्यायस्य वा पुनः । अवर्णे वा प्रमादेन क्षमणेन विशुद्धयति ॥ १४० क्रोधेन गवतो वापि कृते तेषा विनिन्दने। कर्तुमिथ्यादृशो नास्ति दण्ड ससारभागिन' ॥ १४१ शिलाया भूमिदेशे वा जद्धाया जठरेऽपि वा। विलिख्य पठत सूत्र प्रायश्चित्त प्रजायते॥१४२ अश्रावकगृहे भुक्ति कुर्वन्वा च्युतमिण । सोपस्थानचतुर्थेन शुद्धत्यज्ञानतो यति ॥ १४३ अनाभोगान्मुहुस्तस्य मासिको दण्ड इण्यते । आभोगेन तु यात्येष मूलभूमि नराधम. ॥ १४४ ( सघापराध प्रगट करनेवालोका प्रायश्चित्त । )- चार प्रकारका सघ-ऋषि, यति, मुनि और अनगार यह चार प्रकारका सघ है अथवा मुनि, आर्यिका, श्रावक और श्राविका ऐसा चार प्रकारका सघ है। इनके जो मुनि दोष प्रगट करता है उसके साथ कोई नही बोले, तथा उसकी वन्दनाभी नही करे, तथा गणसे उसको निकाल देना चाहिये। यदि दूसरे गणमे वह जायगा तो उसमेभी उसको हटाना चाहिये । यदि वह पश्चात्तापसे सतप्त होकर 'हे भगवन् मुझे प्रायश्चित्त दीजिये ऐसा कहेगा तो चातुर्वर्ण्य श्रमणसघमे उसकी विशुद्धि करनी चाहिये ।।१३७॥ (औद्देशिक प्रायश्चित्त।)- यदि कोई मुनि स्वाध्यायको अपेक्षासे उद्देशाशिक दोषोका सेवन करता है तो वह प्रतिक्रमणसे शुद्ध होगा ॥ १३८ ।। ( मिथ्यात्वी-साधुके साथ विहारसे प्रायश्चित्त । )- दुशील, क्रोधी, मिथ्यात्वी, मानी और मायावी ऐसे मनुष्योके साथ साधु विहार करे तो उसकी शुद्धिके लिये पचकल्याण प्रायश्चित्त कहा है ।। १३९ ।। ( अहंदादिकोके अवर्णवादका प्रायश्चित्त।)- अर्हन्त, आचार्य, साधु अथवा उपाध्याय इनके ऊपर प्रमादसे जो मुनि अवर्णवाद करता है-दोष न होते हुएभी दोषारोपण करता है वह एक उपवाससे शुद्धि प्राप्त करता है। क्रोधसे अथवा गर्वसे उनकी निंदा यदि साधुने की तो ससारमे घूमनेवाले उस मिथ्यादृष्टिको प्रायश्चित्त नही है ॥ १४०-१४१ ।। ( शिलादिकोमे सूत्र लिखनेवालेको प्रायश्चित्त । )- शिलापर, भूमिपर, जाघोपर और पेटपर कोई साधु सिद्धान्तसूत्र लिखकर यदि उसे पढता है उसको प्रायश्चित्त है अर्थात् शिला और भूमिपर सूत्र लिखनेसे उपवास प्रायश्चित्त है तथा उदरादिकपर लिखनेसे आलोचना प्रायश्चित्त है ।। १४२ ॥ ( अश्रावकोके यहा आहारका प्रायश्चित्त ।)- जो श्रावक नही है ऐसे मिथ्यादृष्टि- लोगोके घरमे तथा जो धर्मच्युत है ऐसे लोगोके घरमे अज्ञानसे यदि मुनि आहार लेगे तो - ४ आ अवर्णादी ५ मा दर्पतो। १ आ चतुर्वर्णस्य २ आ औद्देशिकादिक ३ आ प्रतिक्रान्ते २६०) सिद्धान्तमार (१० १४५- ज्ञानोपकण किञ्चिद्दीयमानं महौषधम् । निषेधयेत्प्रमादेन पञ्चकल्याणमश्नुते ॥ १४५ तदेव च मुहुः साधोरावासमथवा पुनः। प्रत्याख्यातुर्भवेन्नित्यं मासिकं शोधनं मुनेः ।। १४६ चाण्डालेन समं स्याच्चेच्छृप्तिर्यस्य प्रमादतः।पञ्चकल्याणकेनासौ शुद्धः स्यादिति निश्चितम् ॥१४७ ब्राह्मणक्षत्रियाणां च वैश्यानां च प्रकल्पते । जनी मुद्रा निहीनाय दत्ता पापाय जायते ॥ १४८ मुलोत्तरगुणेष्वेषु साधूनां यानि कानिचित् । प्रायश्चित्तानि तानीह ज्ञातव्यानि जिनागमात् ॥१४९ वस्त्रप्रक्षालनात्तावदायिकाणां' विशोषणम् । वस्त्रयुग्ममतिक्रम्य तृतीये मूलमिष्यते ॥ १५० अपनाययुता' (?) नित्यकल्पिता शून्यकारिणी । आज्ञाविजिता देशानिःसार्या या विमिणी ॥ प्रतिक्रमणके साथ उपवासका प्रायश्चित्त लेना चाहिये । अनाभोगसे अप्रगटरूपसे वारवार यदि मुनि आहार लेगे तो उनको मासिक प्रायश्चित्त है और आभोगसे-प्रगटरूपसे यदि वार वार आहार लेगे तो मूलभूमि नामक प्रायश्चित्तको पात्र है-मूलभूमि प्रायश्चित्तमे दिवसादि रूपसे दीक्षाच्छेद होता है ।। १४३-१४४ ।। ( ज्ञानोपकरण और औपवनिषेधका प्रायश्चित्त।)- ज्ञानका उपकरण अर्थात् शास्त्र और औषध देनेवालोका जो साधु प्रमादसे निपेष करेगा वह पचकल्याण प्रायश्चित्तको प्राप्त होता है। यदि उसी नानोपकरणका और औपधका वारवार निषेध करनेवाले साधुको मासिक प्रायश्चित्त देना चाहिये तथा यतिको आवास-वसतिका देनेका कोई साधु निषेध करता है तो उसकोभी वही मासिक प्रायश्चित्त देना चाहिये ।। १४५-१४६ ।। (चाण्डाल- स्पर्शका प्रायश्चित्त । )- प्रमादसे जिस साधुको चाण्डालसे स्पर्श होगा उसको साधुको पंचकल्याण तपसे शुद्धि होती है ऐसा निश्चित है ।। १४७ ।। (जैनदीक्षाके अधिकारी )- जैनी मुद्रा-दिगम्वर दीक्षाधारण ब्राह्मण, भत्रिय और वैच्योंकोही योग्य है । इनसे जो हीन शूद्रादिक हैं उनको यदि दीक्षा दी जायगी तो दीक्षादाता प्रायश्चित्तयोग्य होता है ।। १४८ ॥ ( अवशिष्ट प्रायश्चित्त आगमसे जानो। )- मूलगुण और उत्तरगुणोमे साधुओके लिये जो अन्य कुछ प्रायश्चित्त कहे हैं वे जिनागमसे जानना चाहिये ।। १४९ ।। ( वस्त्रप्रक्षालनका प्रायश्चित्त।)- यदि आयिका वस्त्रप्रक्षालन अप्रासुक जलसे करेगी तो उसे एक उपवासका प्रायश्चित्त है । आर्यिका अपने पास दो वस्त्र धारण करे । दोसे अधिक धारण करनेपर मासिक प्रायश्चित्तसे उसकी गुद्धि होगी ।। १५० ॥ जो आर्यिका आज्ञापालन नहीं करती अर्थात् अपनी गणिनीकी आज्ञा नही मानती और जिसने धर्मत्याग किया है अर्थात् जो स्वच्छदचारिणी हुई है, जिनशासनका त्याग किया है ( अप- नाययुता नित्यकल्पिता शून्यकारिणी इस पदका अर्थ हमको मालूम नहीं है) जो आर्यिका यतिके ------ १ मा प्रक्षालने। २ मा अपनाययुता नित्य कलिप स्तन्यकारिगी।

-१० १६०) सिद्धान्तसार (२६१ यतिना सह या वाच्यं गतार्या-नामधारिका । हा हा कष्ट वचोऽप्यस्या' महापापमिति श्रुतम् ॥ तस्मात्रामापि' न ग्राह्यमुभयोरनयोरिह । अन्येनापि प्रयुक्तेऽस्मिन्पिधातव्ये श्रुती क्षणात् ॥ १५३ रजसो दर्शनाच्छुद्धिरार्याणा क्षमणैरथ । चतुभिर्नीरसाहारैर्यथाशत्त्या प्रजायते ॥ १५४ चतुर्थे दिवसे तस्या मौनेनावश्यका क्रिया । मता पश्चाद्गुरोः पार्वे व्रत ग्राह्य पुनस्तया ॥ १५५ मासे मासे च भागः स्याद्रामाणा रजसा व्रते । अत एव न शुद्धयन्ति स्त्रियो हीनमयच्युताः॥ स्नान हि त्रिविधं प्रोक्तं व्रतान्मन्त्रजलात्पुन । तोयात्स्नान गृहस्थाना यतीना व्रतमन्त्रतः ॥ १५७ एकादशविषाः सन्ति श्रावका गुणभेदत । तेषामागमतः किञ्चिच्छोघनं निगदाम्यहम् ॥ १५८ आद्यो दर्शनमात्रेण द्वितीयो व्रतयुक्तित. । सामायिकी तृतीय स्थाच्चतुर्थ. प्रोषधी पुनः ॥ १५९ सचिताहारनिर्मुक्तो दिनब्रह्मचर पुन.' । ब्रह्मचारी सदान्यश्च निरारम्भोऽपरिग्रहः ॥ १६० १ साथ निंदाको- अपकीतिको प्राप्त हुई है वह केवल आर्यिका नाम धारण करनेवाली है, वह भावायिका नही रही । भावायिकाके गुण उसमे कुछभी नही हैं । अरेरे उसका नामभी महाकष्ट- कारक है । उसका नामश्रवणभी महापापका कारण है। इसलिये उन दोनोका नामभी नहीं ग्रहण करे । यदि किसीने उनके नामका उच्चारण किया तो अपने दो कान हाथोसे ढकने चाहिये ।। १५१-१५३ ।। ( रजस्वला आर्यिकाकी शुद्धि।)- रजके दीखनेपर आर्यिकाकी शुद्धि चार उपवासोसे अथवा चार नीरस आहारोंसे होती है । अपनी शक्तिके अनुसार आर्यिका चार उपवास करे अथवा चार नीरसाहार करे । चौथे दिन वह मौनसे सामायिक, प्रतिक्रमणादिक करे । तदनन्तर गुरुके पास व्रतारोपण- व्रतग्रहण करना चाहिये । रजोधर्मसे प्रतिमास स्त्रियोके व्रतोका नाश होता है। अत रजोदर्शनके समय वे शुद्ध नही होती ॥ १५४-१५६ ।। ( स्नानके तीन प्रकार । )- स्नानके व्रतस्नान, मत्रस्नान और जलस्नान ऐसे तीन भेद हैं । जलसे स्नान गृहस्थ करते हैं और मुनियोका स्नान व्रतोसे और मत्रोसे होता हैं ।।१५७॥ ( श्रावकोके प्रायश्चित्तोका वर्णन । )- गुणोकी अपेक्षासे श्रावकोके ग्यारह प्रकार है। आगमके अनुसार उनका प्रायश्चित्त सक्षेपसे मैं कहता हू ।। १५८ ॥ पहला श्रावक दर्शन- सम्यग्दृष्टिधारक हैं । और वह मूलगुणोको निरतिचार पालता है । उसको दर्शन-प्रतिमाधारक कहते हैं । दूसरी व्रतप्रतिमा है । इसका धारक श्रावक अणुव्रत, गुणव्रत, और शिक्षाक्तोका पालक होता है । तिसरी प्रतिमा धारण करनेवालेको सामयिकी कहते है । वह त्रिकाल सामायिक करता है । चौथी प्रतिमा प्रोषधोपवास है । इसका धारक श्रावक अष्टमी चतुर्दशीको धारणा और पारणासहित उपवास कर अपना इन दिनोका समय सामायिक, धर्म ध्यान, धर्मोपदेशमे विताता है । पाचवी प्रतिमाका श्रावक सचित्ताहार वयं करता है । कच्चे फल, शाक भाजी, आदि नही खाता। छठी प्रतिमाधारक श्रावक दिवाब्रह्मचारी -- . १ आ वचोऽप्यस्या। २ आ पापमपि। ३ न स्यान्नामापि सग्राह्यम् ।

२६२) सिद्धान्तसार (१०. १६१- निरनुज्ञस्तथोद्दिष्टवर्जी व निगद्यते । एकादश मता जैने शासने श्रावका इति ॥ १६१ यतीनामर्घदण्डः स्यात्तेषामन्तद्वयोरपि । तस्याप्य त्रये तस्याप्यधं षण्णामुदीरितम् ॥ १६२ श्रावकाणां विशेषेण प्रायश्चित्तं जिनागमात् । परिज्ञाय प्रदातव्यं नान्यथा मुनिपुङ्गवः ॥ १६३ ये तु जीवाश्रिताः सन्ति भावास्तीवादयः पुनः । तद्वशाहहुधा देयं शोधनं शुद्धिहेतवे ।। १६४ पूर्वाचार्यः प्रणीतं यत्प्रायश्चित्तमनेकधा । तदशांशो मयाप्यत्र तत्प्रासादानिवेदित. ॥ १६५ यद्यत्र जायते किञ्चिद्विरुद्धं श्रीजिनागमात् । न मे दोषो यतः किञ्चिन्न जानामि विशेषतः ॥१६६ केवलं जिनराद्धान्तश्रद्धानावाप्तिहर्षतः । स्तोतुमेनं तदालम्बाद्यदृच्छावचनोऽभवम् ॥ १६७ --- रहता है । अर्थात् दिनमे ब्रह्मचर्यका पालन करता है । सातवी प्रतिमावाला पूर्ण ब्रह्मचारी होता है। जिसमे हिंसा होती है ऐसे आरभका पूर्ण त्यागी आठवी प्रतिमावाला होता है । उसको निरारभ श्रावक कहते हैं । वाह्य दा प्रकारोके परिग्रहोका त्याग करनेवाला नवमी परिग्रहत्याग प्रतिमाका पालक श्रावक है । आरभ, परिग्रह और विवाह आदिक ऐहिक कर्मोमे पुत्रादिकोको जो श्रावक सम्मति नहीं देता है वह अनुमतित्यागी श्रावक है । उद्दिष्ट आहारका त्यागी जो श्रावक उसे उद्दिष्टाहारत्यागी कहते है । इस प्रकार जैनशासनमे ग्यारह प्रकारके श्रावक होते है ।। १५९-१६१ ॥ (श्रावक प्रायश्चित्तकी व्यवस्था। )- जो यतियोको प्रायश्चित्त दिया जाता है उसका आधा प्रायश्चित्त दसवी व ग्यारहवी प्रतिमावालोको है। इनके प्रायश्चित्तसे आधा प्रायश्चित्त सातवी, आठवी और नौमी प्रतिमावालोंको है। और इनके प्रायश्चित्तसे आधा प्रायश्चित्त पहली प्रतिमासे छठी प्रतिमावालोको होता है ।। १६२ ।। श्रेष्ठ मुनियोको श्रावकोका जो विशेप प्रायश्चित्त है यह जिनागमसे जानकर देना चाहिये । विना जाने देना योग्य नही है ।। १६३ ।। जीवके आश्रयसे तीव्र मंदमध्यमादिक भाव होते हैं और जिन्होसे दोषोमे तीन मदादिक भेद होते हैं और उनसे प्रायश्चित्तभी अनेक प्रकारके कोमल मृदु आदि भेदवाले होते हैं। ऐसे प्रायश्चित्त शुद्धिके लिये देने चाहिये ।। १६४ ।। पूर्वाचार्योने जो प्रायश्चित्त अनेक प्रकारोसे लिखा है उसके अंशका अश मैने इस प्रकरणमे पूर्वाचार्योके प्रसादसे कहा है ॥ १६५ ।। ( ग्रथकारकी लघुता )- इस प्रायश्चित्तका वर्णन करते समय मुझसे जिनागमके विरुद्ध कुछ लिखा गया होगा। परतु मेरा वह दोप नहीं है, क्योकि, मैं कुछ विशेष नहीं जानता हूं ॥१६६।। केवल जिनसिद्धान्तके ऊपर श्रद्धा करनेसे जो मुझे आनद प्राप्त हुआ है उसके आश्रयसे मैने जिनसिद्धान्तकी स्तुति करनेके लिये कुछ वचन कहे हैं ।। १६७ ।।

-१० १६०) सिद्धान्तसार (२६३ अतुलसत्त्ववतां सुमहात्मना चरितमेतदनिन्धमनेकधा । कथयितु न हि सप्रति साधवो घृतधियः किमुताचरितु पुनः ॥ १६८ असमसयमनाय जिनेश्वरक्तमिद हृदये विघृतं सताम् । भवति निर्वचनीयपदप्रद कृतवतां बत तत्किमिहोच्यते ॥१६९ इति श्रीसिद्धान्तसार सडग्रहे पण्डिताचार्यश्रीनरेन्द्रसेनविरचिते निर्जराप्रायश्चित्तनिरूपणं दशमोऽध्यायः। ( प्राचीन मुनियोके चारित्रका पालन करनेमे आजके मुनि असमर्थ है। )- अनुपम धैर्य और सामर्थ्य धारण करनेवाले महापुरुषोका चारित्र प्रशसनीय और अनेक प्रकारका है। आज स्थिर वुद्धिवाले आजके साधु उस चारित्रके कथनमे समर्थ नही है फिर आचरण करनेमे वे कैसे समर्थ होगे? ॥ १६८ ॥ असम सयम-अनुपम चारित्रके लिये जिन सज्जनोने यह जिनेश्वरका व्रत हृदयमे धारण किया है, उनको यह व्रत अनिर्वचनीय अकथनीय उत्कृष्ट पद देनेवाला है। परतु जो यह व्रत धारण किये हुये हैं उनको जो पद प्राप्त होगा उसकी महिमा यहाँ कौन कह सकता है ॥ १६९ ॥ श्रीपडिताचार्य श्रीनरेन्द्रसेनविरचित-सिद्धान्तसारसग्रहमे निर्जरा और प्रायश्चित्तका वर्णन करनेवाला दसवा अध्याय समाप्त हुआ। -- २ आ इति श्रीसिद्धान्तसारसग्रहे आचार्यश्रीनरेन्द्रसेनविरचिते दशमोऽध्याय ममाप्त ।

एकादशोऽध्यायः । दर्शनशानचारित्रोपचारप्रविभेदतः । सूरिसूर्या जगुः पूतं विनयं तं चतुर्विधम् ।। १ शङकादिदोषनिर्मुक्तं श्रद्धानं यदहनिशम् । तत्त्वतत्त्वार्थदृष्टीनां विनयो दर्शनस्य सः ॥२ ज्ञानस्य ज्ञानयुक्तस्य बहुमानमनेकधा । स्मरणाभ्यासपूजाद्यानस्य विनयो भवेत् ॥ ३ चारित्रस्य तथा तावत्तद्वतो बहुभेवतः । स्मरणं पूजनं दक्षश्चारित्रविनयोऽकथि ॥ ४ आचार्यादिषु दृष्टेषु यावत्कालं विधीयते । अभ्युत्थानाभिगम्यादि यत्सोऽध्यक्षौपचारिकः॥५ आचार्यादिष्वदृष्टेषु सर्वदा गुणऊर्तनम् । कुर्वन्ति यवमी भव्यः स परोक्षोपचारिकः ॥६ आचार्याध्यापकादीनां वैयावृत्यमनिन्दितम् । दशधाभाणि सूत्रबहुधा पुण्यकारकम् ।। ७ स्वय चरन्ति एवास्मिन्नन्यानाचारयन्ति ये। पञ्चधानेकघाचारमाचार्यास्ते भवन्त्यमी ॥८ ग्यारहवा अध्याय । ( विनयतपका वर्णन । )- पूज्य अहंदादि व्यक्तियोका और सम्यग्दर्शनादिक सद्गुणोका आदर करना विनय है । इस पवित्र तपके दर्शनविनय, ज्ञानविनय, चारित्रविनय और उपचार विनय ऐसे चार भेद आचार्य सूर्योंने कहे है ॥ १ ॥ ( दर्शनविनय।)- जीवादिक सप्ततत्त्व और उनके ऊपर श्रद्धा करनेवाले साधर्मिक व्यक्तिके ऊपर अहोरात्र अर्थात् हमेगा शकादि-दोषरहित जो श्रद्धा करना वह दर्शनविनय है ।।२।। ( ज्ञानविनयका लक्षण। )- सम्यग्ज्ञान और सम्यग्ज्ञानयुक्त मुनियोंका अनेक प्रकारसे स्मरणपूजन आदिक करना वह ज्ञान विनय है ऐसा दक्ष मुनियोने कहा है ।। ३ ।। ( चारित्रविनय।)- चारित्रका और चारित्रके धारक पुरुषोका अनेक प्रकारसे दक्ष- चतुर पुरुषोसे स्मरण पूजन किया जाता है उसे चारित्र विनय कहा है ।। ४ ।। ( प्रत्यक्षोपचार विनय, परोक्षोपचार विनय।)- आचार्यादिक दृष्टीगोचर होनेपर आदरसे ऊठना, उनका स्वागत करना, हाथ जोडना इत्यादिक आदर यावत्काल किया जाता है उसको अध्यक्षोपचार अर्थात् प्रत्यक्षोपचार विनय कहते हैं। जव आचार्यादि परोक्ष है ऐसे समय उनका भव्यजीव गुणकीर्तन करते हैं वह परोक्षऔपचारिक विनय है ।। ५-६ ।। ( दसप्रकारका वैयावृत्त्य। )- शरीरकी क्रियामोसे और औषधादिकसे जो उपासना करना वह वैयावृत्त्य है। उसके आचार्ययावृत्त्य, उपाध्यायवैयावृत्त्य आदि दस प्रकार है । यह प्रशसनीय वैयावृत्त्य अनेक प्रकारोसे पुण्यकारक है ऐसा सिद्धान्तसूत्रके ज्ञाता आचार्य कहते हैं ।।७।। १ आचार्य- जो पाच प्रकारोंके आचारोमे स्वय प्रवृत्ति करते है और जो दूसरोको- शिप्योको प्रवृत्त करते हैं वे आचार्य हैं । ये आचार्य दर्शनाचार, ज्ञानाचार, वीर्याचार, चारित्राचार १ आ ज्ञान दर्शनेति । २ आ. पुण्यकारणम् । - -११ १५) सिद्धान्तसार (२६५ उपेत्याधीयते येभ्यो मोक्षार्थ शास्त्रमुत्तमम् । उपाध्याया भवन्त्येते ज्ञानध्यानधनाः सदा ॥९ धर्मादेश' न कुर्वन्ति परेभ्यो वितरन्ति न । ये दीक्षामात्मनः सिद्धि साधयन्तीति साधव ॥१० घोरवीरतपोयुक्तस्तपस्वी स निगद्यते । शिक्षाशील.' सुशैक्षोऽसावजिकाक्षुल्लिकादिकः ॥ ११ रुजाक्लान्तशरीरोऽसौ ग्लान इत्यभिधीयते । योऽय सुचिरसन्तान " साधूनां स गणो मतः॥१२ दीक्षाचार्यस्य या शिष्यसन्ततिस्तत्कुल मतम् । श्रवणादिचतुर्वर्णसस्त्याय. सङघउच्यते ॥ १३ लोकानां सम्मतो यस्तु मनोज्ञ. स निगद्यते । इत्येषा हि दशाना तद्वयावृत्यमुदीरितम् ॥ १४ वाचना प्रच्छनाम्नायोऽनुप्रेक्षा धर्मदेशना । स्वाध्याय. पञ्चधा ज्ञेय. सदा स्वाध्यायकारिभिः॥१५ ---.. और तप आचार इन पाच प्रकारके आचारोको और उनके भेदप्रभेदोको स्वय आचरते है तथा शिष्यादिकोको उनके आचारमे प्रवृत्त कराते है ॥ ८॥ २ उपाध्याय- जिनके पास जाकर मोक्षके लिये उत्तम- निर्दोष रत्नत्रय प्रतिपादक शास्त्रका अध्ययन किया जाता है तथा जिनके पास ज्ञान और ध्यानरूपी धन सदा रहता है ऐसे मुनीश्वरको उपाध्याय कहते है ।। ९ ।। ३ साधु - जो मुनि दूसरोको धर्मोपदेश नही देते हैं और जो दीक्षा नहीं देते है, जो आत्मध्यान करके आत्मसिद्धिके मार्गमे लगे हैं वे साधु मुनि है ॥ १० ॥ ४ तपस्वी- जो घोरवीर तप करते है वे तपस्वी मुनि है। ५ शैक्ष्य- शास्त्राभ्यास करनेवाले आर्यिका, क्षुल्लिका, आदिकोको शैक्ष्य कहते हैं । ६ ग्लान- रोगोसे जिनका शरीर थक गया है कृश हुआ है वे ग्लान- मुनि हैं। ७ गण- साधुओका जो दीर्घकालीन समूह अर्थात् वृद्धमुनियोका जो समूह उसे गण कहते हैं। ८ कुल- दीक्षा देनेवाले आचार्यका जो शिष्यसमुदाय उसको कुल कहते है। ९ सघ- ऋषि, मुनि, यति, अनगार ऐसे चार प्रकारके मुनि अथवा मुनि, आयिका, श्रावक और श्राविका इनका समूह सघ है ।। ११-१३ ॥ १० मनोज्ञ- वक्तृत्वादि गुणोंसे शोभनेवाले लोकमान्य विद्वान् मुनिको मनोन कहते हैं। ऐसे दस प्रकारके मुनियोकी औषधसे और शरीरचेष्टासे जो शुश्रूषा करना वह वैयावृत्य है । रोग, परिषह, मिथ्यात्व आदिक सकट आनेपर उनको औषधादिकसे दूर करना वैयावृत्त्य है ।।१४।। ( स्वाध्यायतपके भेद । )- वाचना, पृच्छना, आम्नाय, अनुप्रेक्षा और धर्मदेशना ऐसे स्वाध्यायके पाच भेद सदा स्वाध्याय करनेवाले मुनियोको जानने योग्य है ।। १५ ।। ५ मा स्थविर १ आ. घख्यिान २ आ दीक्षाद्या ३ आ भिक्षाशीलस्तु भैक्षोऽ ४ आ यो ६ आ मेलाप । S.S. 34.

२६६) सिद्धान्तसार. (११ १६- ३ t सन्देहहन्तृशास्त्रस्यानुवादो' वाचना मता । ससन्देहपरिप्रश्नः प्रच्छनार्थदृढाय वा ॥ १६ निश्चितार्थस्य शास्त्रस्य मनोऽभ्यासः सतां मतः।यो वाचासावनुप्रेक्षा भवदुःखविनाशिनी॥१७ परिघोषविशुद्धं यत्परिवर्तनमुत्तमम् । तदाम्नाय इति प्राज्ञाः कथयन्ति यतीश्वराः ॥ १८ महाधर्मकथानां यत्प्रख्यापनमनारतम् । धर्माख्यानं मतं तद्धि संसारासातशातनम् ॥ १९ सर्वेभ्यो यद्वतं मूलं स्वाध्यायः परमं तपः । यतः सर्वव्रतानां हि स्वाध्यायो मूलमादितः ॥२० स्वाध्यायाज्जायते ज्ञानं ज्ञानात्तत्त्वार्थसङग्रहः । तत्त्वार्थसङमहादेव श्रद्धानं तत्त्वगोचरम् ॥२१ तन्मध्येकगतं पूतं तदाराधनलक्षणम् । चारित्रं जायते तस्मिस्त्रयीमूलमयं मतम् ॥ २२ प्रशस्ताध्यवसायस्य स्वाध्यायो वृद्धिकारणं । तेनेह प्राणिनां निन्धं सञ्चितं कर्म नश्यति ॥ २३ -- । - ज्ञानकी भावनासे आलस्यका त्याग करना स्वाध्याय है। १ वाचना- सदेह दूर करनेवाले शास्त्रका अनुवाद कहना । २ पृच्छना- मनमे उत्पन्न हुए सदेहको दूर करने के लिये जो प्रश्न करना उसको पृच्छना कहते है अथवा जो अभिप्राय मनमे निश्चित किया है उसको पुष्ट करनेके लिये प्रश्न करना। ३ अनुप्रेक्षा- जिसका अर्थ निश्चित जाना है ऐसे शास्त्रका जो मनसे अभ्यास करना उसे सज्जनोको मान्य अनुप्रेक्षा कहते है । आम्नाय- घोषशुद्धतासे शास्त्रको अच्छी तरह बार बार पढना आम्नाय है ऐसा विद्वान् यतीश्वर कहते है। ५ धर्मदेशना- लोकोद्धारक ऐसे महान् जैनधर्मका जो हमेशा उपदेश करना उसको धर्मदेशना कहते हैं । वह ससारका दुख नष्ट करनेवाली है ॥ १६-१९ ।। ( स्वाध्यायकी श्रेष्ठता। )- सर्व व्रतोकी अपेक्षासे देखा जाय तो यह स्वाध्यायव्रत मूल माना है । तथा यह स्वाध्याय उत्तम तप है। क्योकि सर्वव्रतोंका स्वाध्याय आदिमूल है ॥ २०॥ स्वाध्यायसे ज्ञान होता है और ज्ञानसे जीवादिक तत्त्वार्थोका सग्रह होता है। तत्त्वार्थका सग्रह होनेसे तत्त्वविषयक श्रद्धान होता है । रत्नत्रयके बीचमे पवित्र सम्यग्ज्ञान है और वह ज्ञानाराधनात्मक है । सम्यग्ज्ञान होनेसे चारित्र होता है अत: यह स्वाध्याय रत्नत्रयका मूल माना है ।। २१-२२ ॥ जो जीवके उत्तम परिणाम होते है- शुभ और शुद्ध परिणाम होते है उनकी वृद्धिका कारण स्वाध्यायही है । इस स्वाध्यायसे प्राणियोंका निंद्य पूर्वबद्ध कर्म विनष्ट होता है ॥ २३ ॥ १ आ नि सन्देहस्य २ आ ससन्देहे ३ आ योऽसावनुप्रेक्षा ४ आ सर्वेभ्योऽपि व्रतेभ्योऽय ५ आदिम - -११. ३१) सिद्धान्तसार (२६७ सवेगो जायते यस्मान्मोहध्वान्तविनाशकः । मोहादपगताना हि क्व संसार. क्व तत्फलम् ॥ २४ स्वाध्यायेन समं किञ्चिन्न फर्मक्षपणक्षमं । यस्य संयोगमात्रेण नरो'मुच्येत कर्मणा ॥ २५ बह्वीभिर्भवकोटीभि. बताद्यत्कर्म नश्यति । प्राणिनस्तत्क्षणादेव स्वाध्यायात्कथितं वुषः ॥ २६ पदार्थानस्थूलसूक्ष्माश्च यन्न जानाति मानवः । तज्ज्ञानावृतिमाहात्म्यं नात्मभावो हि तादृशः ॥२७ आजन्म मृत्युपर्यन्त तप. कुर्वन्तु साधवः । नैकस्यापि पदस्यह ज्ञानावृतिपरिक्षय ॥ २८ सर्वशास्त्रविदो धीरान्गुरूनाश्रित्य कुर्वतः । स्वाध्याय तत्क्षणाच्छुद्धः पदार्थानवगच्छति ॥ २९ तपोवृद्धिकरश्चासौ स्वाध्याय. शुद्धमानस. । कय्यतेऽनेकधा तावदतीचारविशुद्धितः ॥ ३० चित्तमर्थनिलीन स्याच्चक्षुरक्षरपडक्तिषु । पत्रेऽस्य सयमः साधो. स स्वाध्यायः किमुच्यते ।। ३१ - ------ जव कि इस स्वाध्यायसे सवेग-ससारसे भय उत्पन्न होता है जिससे मोहरूप अधकारका नाश होता है। और जो मोहसे दूर भाग गये हैं अर्थात् जिनका मोह नष्ट हुआ है उनका ससार कहासे रहेगा और उसका फलभी कैसे प्राप्त होगा? (स्वाध्याय कर्मनाशक है। )- स्वाध्यायके समान कोईभी अन्य तप कर्मक्षय करनेके लिये समर्थ नहीं है। इस स्वाध्यायके सयोगमावसे मनुष्य कर्मसे मुक्त होता है ।। २५ ॥ (व्रत और स्वाध्यायमे महान् अन्तर है। )- जो कर्म खिपानेके लिये कोट्यवधि भव तक मनुष्यको व्रत धारण करने पडते है वह प्राणीका कर्म स्वाध्यायसे तत्काल नष्ट होता है ऐसा वुद्धिमतोने कहा है ॥ २६ ॥ मनुष्य स्यूल और सूक्ष्म पदार्थोंको नही जानता है वह सव ज्ञानावरणकाही माहात्म्य है । ज्ञानके विना स्वपरपदार्थोंका विचार करनेवाला दूसरा आत्मभाव नहीं है । अर्थात् शक्ति आदिक आत्मगुणोमे यह विचार नहीं है। जन्मसे मरणतक साधु तपश्चरण करे परतु किसीभी तपसे एक पदकेभी ज्ञानावरण कर्मका क्षय नही होता ।। २७-२८ ।। सपूर्ण शास्त्रोके ज्ञाता ऐसे धीर गुरुका आश्रय लेकर स्वाध्याय करनेवाला मनुष्य तत्काल शुद्ध पदार्थोंको जानता है ॥ २९ ॥ यह स्वाध्यायतप तपोमे वृद्धि करनेवाला है। इससे व्रतोके अतिचार शुद्ध होते है अर्थात् नष्ट होते है। शुद्धचित्तवाले विद्वानोने इस स्वाध्यायके अनेक भेद कहे हैं ॥ ३० ॥ ( स्वाध्यायमे सव इद्रिया तत्पर होती हैं। )- साधुका चित्त अर्थमे एकाग्र होता है और पथके पत्रमे जो अक्षरोकी पक्तिया होती है उनमे उसकी आखें लगती हैं। इसलिये स्वाध्यायसे चित्त और नेत्रको सयम प्राप्त होता है ऐसे स्वाध्यायका हम कैसे वर्णन कर सकेगे? . १ नरो मुञ्चति कर्मण २६८) सिद्धान्तसार. (११. ३२- श्रद्धावान्यदि सत्साघुः स्वाध्यायं कुरुते सदा। परः स्याद्धयानवान्वेगात्स याति परमां गतिम् ॥३२ साधुसंहननस्येह यदेकाननिरोधनम् । चित्तस्यान्तर्मुहुर्त स्यादयानमाहुर्मनस्विनः ।। ३३ आतं रौद्रं मतं धर्म शुक्लं चापि चतुर्विधम् । ध्यानं भवति जीवानां शुभाशुभगतिप्रदम् ॥ ३४ शस्ताशस्तादिभेदेन तवघा पुनरीरितम् । आये प्रशस्तमेवेदं परे शस्तं सुनिमलम् ॥ ३५ यत्प्रशस्तं तदेवेह मोक्षहेतुनिवेदितम् । अप्रशस्तं पुनीतं संसारस्यैककारणम् ॥ ३६ विषकण्टकशत्रूत्थवाधाविच्युतिचिन्तनम् । अमनोज्ञभवं चैतदाद्यमातं निगद्यते ॥ ३७ माद्यन्मित्रकलत्रादिधनधान्यादिलब्धये । संकल्पो यस्तु तज्ज्ञेयं मनोज्ञाख्यं द्वितीयकम् ।। ३८ ( स्वाध्यायसे मोक्षकी प्राप्ती। )- श्रद्धावान् होकर यदि साधु हमेगा स्वाध्याय करेगा तो वह उत्तम ध्यानवान् होगा अर्थात् वह आत्मस्वरूपके चिन्तनमे तत्पर और कुशल होगा जिससे वह शीघही उत्तम गतिको मोक्षको प्राप्त होगा ।। ३२ ।। ( ध्यानतपका वर्णन । )- जो उत्तम सहननवाला है अर्थात् वज्रर्षभनाराचसहनन, वज्रनाराचसहनन और अर्धनाराचसहननका धारक है ऐसे विद्वानको अन्तर्मुहूर्ततक ध्यानतप होता है । अर्थात् उसका मन एक पदार्थपर स्थिर होकर अन्तर्मुहूर्तकालतक उसका विचार करता है। अन्य सव पदार्थोसे अलग होकर एक पदार्थमे मन निश्चल होना एकाग्रचिन्तानिरोध है । अनेक पदार्थोंमे मन भ्रमण करता है और उनका वोध आत्माको होता है उस बोधको ज्ञान कहते हैं परतु वह ज्ञान जव अग्निकी स्थिर ज्वालाके समान एकही विषयपर स्थिर होता है तब उसे ध्यान कहते हैं ।। ३३ ॥ ( ध्यानके भेद। )- आर्तध्यान, रौद्रध्यान, धर्मभ्यान और शुक्लध्यान ऐसे ध्यानके चार भेद हैं । ये जीवोको अशुभगति देनेवाले और शुभगति देनेवाले हैं। इनकेही प्रशस्त ध्यान और अप्रगस्त ध्यान ऐसे दो भेद कहे हैं । जो ध्यान पापास्रवके कारण हैं उन्हे अप्रशस्त ध्यान कहते हैं । ये अप्रशस्तव्यान जीवको नरक तिर्यग्गतिके कारण है और प्रशस्तध्यानसे जीवको मुगतिकी प्राप्ति होती है और संपूर्ण कर्मका क्षय होनेसे मोक्षप्राप्ति होती है। पहले दो ध्यान अर्थात् मार्तध्यान और रौद्रध्यान अप्रगस्तही हैं । और धर्मध्यान तथा शुक्लध्यान निर्मल हैं। इसलिये वे मोक्षके कारण हैं तथा प्रशस्त हैं। जो अप्रशस्त ध्यान हैं ससारके मुख्य कारण हैं ।। ३४-३६ ।। ( अमनोज्ञ संयोगज आर्तव्यान । )- विष, कण्टक, शत्रु इनसे जो पीडाये उत्पन्न होती हैं उनसे पीडित होकर ये पीडायें कव दूर हो जावेगी ऐसा संतत चिन्तन वह अमनोज्ञ- अनिप्ट सयोगज नामका पहला आर्तध्यान है ।। ३७ ।। (मनोज्ञ-वियोगज आर्तव्यान।)- हर्षयुक्त मित्र, पत्नी, आज्ञाधारक पुत्र इत्यादिकोंकी तथा धन्यधान्यादिकोंकी प्राप्ति मुझे होवे, ऐसा जो मनमे सतत संकल्प उत्पन्न होता है उसे मनोज्ञ - 6. २ आ योगात् ३ आ यदेकाने निरुवनम् ४ आ तद्ध्यान ५ आ धम्यं १ मा पदस्यध्यान ६ मनोनात -११ ४४) सिद्धान्तसार (२६९ वातपित्तादिसंभूतविकाराणा समागमे । तस्यापायविकल्पो यस्तृतीय समुदाहृतम् ॥ ३९ अनागतपदार्थस्य प्राप्त्यर्थ चित्तफल्पनम् । निदानाख्य तुरीयं स्यावार्ता' यान्ति भवं भुवि ॥४० चतुर्विधमिदं तावदार्तध्यान प्रजायते । प्रमत्तसंयतान्ताना जीवानामतिदुःखदम् ॥ ४१ वघे बन्धे च सर्वस्वहुती दुष्टमिमं कदा । मारयामीतिर संकल्पो हिसारौद्रं निगद्यते ॥ ४२ अनेनानृतवाक्येन वध वन्धं गमिष्यति । दुष्टात्मेति मनोरोघो रौद्र चासत्यसभवम् ॥ ४३ परकीयस्य वित्तस्य ग्रहायोपधिचिन्तनम् । स्तेयरौद्र मत दक्षर्दुर्गतेः कारण परम् ॥४४ वियोगज आर्तध्यान कहते हैं । प्रिय वस्तुओको- मित्रादिकोको मनोज्ञ कहते हैं । उनका वियोग होनेसे जो सक्लेग मनमे पैदा होकर मित्रादिकोकी, धनधान्यादिकोकी कव प्राप्ति होगी ऐसा चिन्तन होता है ।। ३८ ॥ ( वेदनाजात आर्तध्यान।)- वातपित्तादिकोसे जो शरीरमे रोग और वाधायें उत्पन्न होती हैं उनसे मुझे कव मुक्ति मिलेगी ऐसा जो चिन्तन होता है वह वेदनासयोगज आर्तध्यान है ।। ३९ ।। ( निदाननामक आर्तध्यान । )- अनागत पदार्थ- भावी राज्यादिक, स्वर्ग आदिक सुखोकी प्राप्तिकी आशा करना निदान है । भोगोकी इच्छा करनेवाला मनुष्य उसकी प्राप्तिके लिये मनकी एकाग्रता सतत करता है। ऐसे ध्यानका नाम निदान है। यह चौथा ध्यान है। ऐसे चार ध्यानोसे इस लोकमे भ्रमण करना पडता है ।। ४० ।। इस प्रकारसे चार आर्तध्यानोका वर्णन किया है। यह मिथ्यात्व, सासादन, मिश्र, अविरत- सम्यग्दृष्टि, सयतासंयत और प्रमत्तसयत ऐसे छह गुणस्थानवाले जीवोंको होता है। यह ध्यान अतिशय दुखदायक है ॥ ४१ ।। विशेषता- पाच गुणस्थानोतक असयम परिणाम होनेसे ये चार आर्तध्यान होते हैं परतु प्रमत्त गुणस्थानमे निदानको छोडकर तीन आर्तध्यान कदाचित् प्रमादके उदयसे होते हैं । ( हिंसानन्द नामक रौद्रध्यान । )- इस दुष्टने वध, वध, सर्वस्वहरण किया हैं अत इस दुष्टको में कव मारूगा ऐसा जो सतत चिन्तन होता है वह हिंसानद नामक रौद्रध्यान है ।। ४२ ॥ ( अनृतानद रौद्रध्यान । )- यह दुष्टात्मा हमेशा असत्य बोलकर मेरा नाश करता है। इसलिये असत्य भाषणसे यह दुष्टात्मा वधववको प्राप्त होगा तो अच्छा होगा ऐसा मनमे विचार करना अनृतानद रौद्रध्यान है ।। ४३ ।। ( चौर्यानद रौद्रध्यान।)- परकीयोका धन किस उपायसे ग्रहण किया जा सकता है इसका जो वार वार चिन्तन करना उसे चौर्यानद रौद्रध्यान कहते हैं । यह दुर्गतिका मुख्य कारण है ।। ४४ ॥ १ आर्तमातिभवभुवि २ आ योजयामीति २७०) सिद्धान्तसार (११.४५- गन्धरूपरसस्पर्शशब्दसंरक्षणाय च । क्रूरभावे मनोरोधश्चतुर्थ रौद्रमुच्यते ॥ ४५ संयतासंयतान्तानां जीवानामुपवणितम् । चतुर्विधमिदं रौद्र श्वभभूमिप्रवेशकम् ॥ ४६ आज्ञाविचारणा तस्मादपायविचयः परः। विपाकविचयश्चान्यः संस्थानविचयः पुनः ॥ ४७ इत्थं चतुर्विधं धयं धर्माधारैनिंगद्यते । येन प्राप्नोति जीवोऽयं सिद्धिसौख्यं निरन्तरम् ॥ ४८ उपदेष्टुरभावन मन्दबुद्धितयाथवा । पदार्थानां हि सूक्ष्मत्वात्कर्मोदयवशादथ ॥ ४९ सदृष्टान्ताद्यभावेन सर्वज्ञाज्ञाप्रमाणतः । अर्थावधारण धयं स्यादाजाविचयः स्फुटम् ॥ ५० --- ( परिग्रहानद रौद्रध्यान । )- गध, रूप, रस, शब्द, स्पर्शयुक्त पदार्थोका सग्रह- रक्षणके लिये अतिशय सक्लेश परिणाम होकर उनमे मनकी एकाग्रता होना चौथा रौद्रध्यान है ।। ४५ ॥ ( रौद्रध्यानके स्वामी। )- यह चार प्रकारका रौद्रध्यान पहले गुणस्थानसे पाचवे सयतासयत गुणस्थानतक होता है और यह नरकभूमिमे प्रवेश करनेवाला है ।। ४६ ॥ विशेष- अविरत जीवको रौद्रध्यान होना योग्य है, क्योकि वह व्रतरहितही होता है। उसको हिंसादिकोका त्याग नहीं है । परतु जो देशव्रतोको पालता है उसे रौद्रध्यान कैसे होगा? उत्तर- उसकोभी कदाचिद् हिंसादिकोका आवेश होता है और धन, स्त्री, कुटुबवर्गका संरक्षण करनेसे सक्लेश परिणाम होगे जिससे रौद्रध्यान कदाचिद् हो सकता है । परन्तु वह नरकगति आदिका कारण नहीं होता । क्योकि सम्यग्दर्शनका सामर्थ्य उसको रहता है । सयतको अर्थात् मुनिको रौद्रध्यान नही होता। यदि वह होगा तो उसका संयम नष्ट होगा ।। ४६ ॥ ( सर्वार्थसिद्धि हिंसानृतादि सूत्र ) (धर्मध्यानका भेदसहित विवेचन । )- धर्मध्यानका पहला भेद आज्ञाविचारणा नामक है । दूसरा भेद अपायविचय है। तीसरा भेद विपाकविचय और चौथा भेद संस्थानविचय है। इस प्रकारसे धर्मके आधारभूत आचार्य धर्म्यध्यानके चार भेद कहते हैं । जिससे यह जीव निरतर सिद्धिका सुख प्राप्त करता है ।। ४७-४८ ।। ( आज्ञाविचय धर्मध्यान । )- उपदेशकका अभाव होनेसे अर्थात् जीवादिक तत्त्वोंका यथार्थ स्वरूप कहनेवाले गुरुका अभाव होनेसे, तथा अपनी बुद्धि मद होनेसे, पदार्थोका स्वरूप सूक्ष्म होनेसे तथा कर्मोदय होनेसे, उत्तम निर्दोष दृष्टान्तादिकोका अभाव होनेसे सर्वज्ञके आगमको प्रमाण समझ कर जीवादि पदार्थोका निश्चय करना आज्ञाविचय नामक धर्मध्यान है। सर्वज्ञकी आज्ञाको प्रमाण कर यह वस्तुस्वरूप ऐसाही है, जिनेश्वर अन्यथाभाषी- असत्यभाषी नही है ऐसा मानकर गहनपदार्थोंपर श्रद्धान करके जीवादि पदार्थोंका निश्चय करना यह आज्ञाविचय है। अथवा स्वत सिद्धान्तके अविरुद्ध जीवादिक पदार्थों को जाननेमे जो प्रवीण है तथा शिष्यादिकोको सिद्धान्तसे अविरुद्ध तत्त्वसमर्थनके लिये तर्क, नय और प्रमाणकी योजना करके निवेदन करनेकी इच्छासे जो -११. ५९) सिद्धान्तसार. (२७१ तत्त्वार्थवेदिना' वाचा स्वसिद्धान्ताविरोधिना' । परं प्रति प्रमाणेन निवेदयितुमिच्छता ॥५१ जायते यः स्मृते पूतः समन्वाहार इत्यथ । सोऽयमाजाप्रकाशार्थ वरमित्यादिचिन्तनम् ॥५२ ये मिथ्यादृष्टयः सर्वे सर्वज्ञाज्ञावहि स्थिता । सम्यडमार्गादपेतास्ते दूरमित्यादि चिन्तनम् ॥५३ मिथ्यादर्शनविज्ञानचारित्रेभ्यश्च्युता अमी। कथं जीवा भवन्त्यत्रेत्यवधारणमुत्तमम् ॥ ५४ अपायविचयो धर्मध्यानमाहुर्मनीषिणः । येनावाप्नोति भव्यात्मा फर्मापाय क्षणादपि ॥ ५५ कर्मणां हि विपाकेन फलानुभवन प्रति । प्रणिधान विपाकैफधर्मध्यान निगद्यते ॥ ५६ लोकसंस्थानचिन्ताया सस्थानविचयो महान् । धर्मध्यानं मतं प्राजः फर्माष्टफविनाशनम् ॥५७ अप्रमत्तान्तजीवाना तद्धयानं जायते परम् । अनन्तसौख्यसंप्राप्तिहेतुभूतं महात्मनाम् ॥ ५८ शुक्ले पृथक्त्ववीतर्फमवीचारि द्वितीयकं । सूक्ष्मक्रियकसम्पाति समुच्छिन्नत्रियं ततः ॥ ५९ वार वार जिनाज्ञाकी- जीवादितत्त्वोकी चिन्ता करता है उसका वह पवित्र- प्रशस्त आज्ञाविचय नामक पहला धर्मध्यान है । जिनेश्वरकी आज्ञा प्रकाशित करनेके लिये जो उत्तम चिन्तन है वह आज्ञाविचय है ।। ४९-५० ॥ ( अपायविचय धर्मध्यान । )- जो मिथ्यादृष्टि हैं वे सर्वज्ञकी आज्ञाके बाहर रहते हैं, अर्थात् सर्वज जिनेश्वरकी आज्ञाको प्रमाण नही मानते है, वे यथार्थ मोक्षमार्गसे दूर रहे है इत्यादि चिन्तन करना अपायविचय है। मिथ्यादर्शन, मिथ्याज्ञान और मिथ्याचारित्रसे च्युत होकर ये जीव यथार्थ मोक्षमार्गमे कैसे प्रवृत्त होगे, ऐसा जो वार वार स्मरण करना विद्वान लोग उसे अपायविचय धर्म्यध्यान कहते है। इस धर्मध्यानसे भव्यात्माके कर्मोंका अपाय-नाश तत्काल होता है ।। ५१-५५॥ (विपाकविचय धर्मध्यान। )- ज्ञानावरणादि कर्मोंका द्रव्य, क्षेत्र, काल, भव और भाव आदिक कारणोसे विपाक- उदय होता है और उसका नानाविध फल मिलता है ऐसा बार वार चिंतन करना विपाकविचय है ।। ५६ ॥ ( लोकसस्थानविचय । )- लोककी आकृतिका बार वार विचार करनेको विद्वान लोग सस्थानविचय धर्मध्यान कहते हैं । यह धर्मध्यान आठ कर्मोंका विनाश करनेवाला है। यह चार प्रकारका धर्मध्यान अप्रमत्त गुणस्थानतक जीवोको होता है अर्थात् अविरतसम्यग्दृष्टि, देशविरत, प्रमत्त और अप्रमत्तसयतोको होता है । यह चार प्रकारोका धर्मध्यान महात्माओको अनतानत सौख्यकी प्राप्ति करानेमे कारण है ॥ ५७-५८ ॥ ( शुक्लध्यानके भेद।)- शुक्लध्यानमे पृथक्त्ववितर्कसविचार, एकत्ववितर्क अविचार, सूक्ष्मक्रियासम्पाति, समुच्छिन्नक्रिय ऐसे चार भेद हैं ॥ ५९ ॥ . -- -- ३ आ इत्यय ४ आ आज्ञाविचय उच्यते १ मा वेदिनो वाथ २ आ स्वसिद्धन्ताविरोधत ५ आ विनाशकम् ६ आ अपृथक्त्वादिक च तत् ।

२७२) सिद्धान्तसार (११ ६०- श्रुतकेवलिनः साधोराद्ये शुक्ले तु शोभने । धर्मध्यानं च तस्येति कथयन्ति जिनेश्वरा ॥ ६० परे द्वे भवतस्तावदतिशुद्धेऽतिनिर्मले । केवलज्ञानयुक्तस्य सयोगायोगिनः पुनः॥ ६१ यत्पृथक्त्ववितकं तत्रियोगेषु प्रजायते । एकयोगस्य चैकत्ववितकं चारुतान्वितम् ॥ ६२ केवलकाययोगस्य ध्यानं सूक्ष्मक्रियं मतम् । समुच्छिन्नक्रियं तावदयोगस्य महात्मनः ॥ ६३ सवितर्कप्रवीचारमाधध्यानं भवेदिह । सवितर्काप्रवीचारं द्वितीयमतिदुर्लभम् ॥ ६४ श्रुतज्ञानं वितर्कः स्यात्प्रवीचारस्तु यः पुनः । अर्थव्यञ्जनसद्योगमकान्तिरतिशोभना ॥ ६५ विशेष- जैसे मलरहित होनेसे कपडा शुक्ल कहा जाता है, वैसे शुद्ध आत्मस्वरूप परिणति इस ध्यानसे प्राप्त होती है । इसलिये इसे शुक्ल कहते हैं। आत्माकी निर्मलतामे शुक्लगुणकी सदृशता समझकर इस ध्यानको शुक्ल कहते है। ( शुक्लध्यानके स्वामी । )- श्रुतकेवली मुनिराजको पहले दो उत्तम शुक्लध्यान होते है। धर्मध्यानभी उसी श्रुतकेवली साधुको होता है ऐसा जिनेश्वर कहते हैं । तीसरा और चौथा शुक्लध्यान निर्मल हैं, और अतिशय निर्मल हैं, क्योकि, सपूर्ण कषाय और घातिकर्मका नाश होनेसे वे उत्पन्न होते है, इसलिये वे ध्यान अत्यत निर्मल और विशुद्ध हैं । सयोगकेवली और अयोगकेवली जिनेश्वरको ये दो ध्यान होते है ।। ६०-६१ ।। पहला पृथक्त्ववितर्क- नामक ध्यान तीन योगोके धारकोको होता है । एकत्ववितर्क नामक दूसरा सुदर ध्यान तीन योगोमेसे किसी एक योगके धारकको होता है । केवल काययोगके धारकको तीसरा सूक्ष्म क्रियाप्रतिपाति नामक ध्यान होता है और चौथा समुच्छिन्नक्रिय नामका ध्यान अयोगी महात्माको- चौदहवे गुणस्थान धारक महापुरुषको होता हैं । विशेष-सकल श्रुतधरको अपूर्वकरणके पूर्वमे चौथे गुणस्थानसे सातवे गुणस्थानतक धर्मध्यान है । अपूर्वकरणसे लेकर उपशातकषायतक चार गुणस्थानोमे पहला पृथक्त्ववितर्क नामक शुक्लध्यान है । क्षीण कषाय गुणस्थानमे एकत्ववितर्क अविचार नामक दूसरा शुक्लध्यान है ॥ ६२-६३ ॥ ( वितर्क और विचारका स्पष्टीकरण । )- पहली पृथक्त्ववितर्कविचार नामक ध्यान वितर्कसे युक्त और प्रविचार युक्त है । और दुसरा शुक्लध्यान अतिशय दुर्लभ है तथा वह वितर्कके साथ होता और अप्रवीचार है ।। ६४ ॥ श्रुतज्ञानको वितर्क कहते हैं और शोभना- निर्मल ऐसी अर्थसक्रान्ति, व्यजनसक्रान्ति और योगसक्रान्ति होती है । अर्थात् पहले शुक्लध्यानमे वितर्क और विचार होता है। विशेष- श्रुतज्ञान मतिपूर्वक होता है । मतिज्ञान इन्द्रिय और अनिन्द्रिय- मन पूर्वक होता है । मतिज्ञानके अनन्तर नो इन्द्रियके प्राधान्यसे जो ज्ञान उत्पन्न होता है उसे श्रुतज्ञान कहते हैं । यद्यपि ईहादिक १ आ आद्य 4- सिद्धान्तसार -११. ७१) (२७३ अर्थो ध्येय. सुद्रव्यं वा पर्यायो वा निगद्यते । व्यञ्जन वचन योगः कायवाश्चित्तलक्षणः ॥६६ द्रव्य विहाय पर्याय परिहत्य त्वतोऽपि तत् । द्रव्य यातीति सक्रान्तिव्यस्य कथिता बुधः ॥६७ श्रुतस्य वचनं तावदेकमादाय तत्क्षणात् । गृह्णात्यन्यत्ततोऽप्यन्यद्वयञ्जनस्येति वर्तनम् ॥ ६८ काययोग परित्यज्य गृह्णात्याग्रहजितः । योगान्तर मता सेयं योगसक्रान्तिरुत्तमः ॥ ६९ यत्परिवर्तन चैतत्प्रवीचार. स उच्यते । स्वाध्यायाहितसच्चित्ततर्फसामर्थ्यसभवः ॥ ७० पृथक्त्वादिति वीचारसामर्यप्रगत मनः । यस्यापर्याप्तवालस्योत्साहवच्चाव्यवस्थितम् ॥ ७१ मतिज्ञानभी- नोइद्रियसे उत्पन्न होते है तो भी अवग्रहके विपयकोही वे विशेषतया जानते है । वैसा श्रुतजान मतिज्ञानके विपयकोही यदि जानता तो वह अलग ज्ञान नही माना जाता। श्रुतज्ञानका विपय मतिज्ञानसे अपूर्व है । एक घडेको इद्रिय और मनके द्वारा जानकर उसके जातिके देश, काल, रूप आदिकसे विलक्षण घडेको जो जानता है वह ज्ञान श्रुतज्ञान है । अथवा अनेक प्रकारोसे युक्त अर्थका निरुपण करनेवाले ज्ञानको श्रुतज्ञान कहते हैं । अथवा इद्रिय और अनिंद्रयसे एकजीव वा अजीव पदार्थको जानकर उसमे सत्, सख्या, क्षेत्र, स्पर्शन, काल, अतर, भाव और अल्पवहुत्व आदि प्रकारोसे पदार्थ निरूपण करनेमे जो ज्ञान समर्थ है उसे श्रुतज्ञान कहते है । ऐसे श्रुतज्ञानको यहा वितर्क कहा है- विशेष प्रकारोसे जीवादिक पदार्थोंका ऊह करना, व्याप्ति आदिका निर्णय करना वितर्क है। प्रवीचार- अर्थ सक्रान्तिको, व्यजनसक्रातिको और योग सक्रान्तिको वीचार कहते है। परिवर्तनको सक्रान्ति कहते है ।। ६४-६५ ।। ( राजवातिक प्रथम अध्याय सूत्र मतिश्रुतावधीति ) ( सक्रान्तिका स्पष्टीकरण । )- अर्थ - ध्येयवस्तुको अर्थ कहते है । वह ध्येय द्रव्य और पर्यायरूप हैं। व्यजन- वचन, शब्द, वाक्य आदिको व्यजन कहते हैं । योग- शरीर, वचन और मनकी प्रवृत्तिसे जो आत्मप्रदेशोमे चचलता उत्पन्न होती है उसे योग कहते है । अर्थसक्रान्ति द्रव्यको छोटकर पर्यायको ध्येय समझकर उसका विचार करना, पर्यायको छोडकर द्रव्यकी चिन्ता करना हैं । अर्थात् शुक्लच्यानका विषय कभी द्रव्य होता है और कभी पर्याय होता है, कभी द्रव्यातर होता है । एक विपयमे स्थिरता नही होती । वार बार परिवर्तन होता है। इसको अर्थसक्रान्ति कहते है ।। ६६-६७ ॥ व्यजनमक्रान्ति- श्रुतका एक वचन लेकर उसका विचार कर फिर अन्य श्रुतवचनका चिन्तन करना, उसे छोडकर तीसरे श्रुतवचनका विचार करना, उसेभी छोडकर चौथे श्रुतवचनका अवलव करना, ऐसे विचारको व्यजनसक्रान्ति कहते हैं । आग्रहजित योगिराज काययोगको छोडकर अन्ययोगका आश्रय करते हैं इसको उत्तम पुरुपोने योगसङक्रान्ति माना हैं ॥६८-६९।। इस प्रकार इन तीन प्रकारके परिवर्तनोको प्रवीचार कहते हैं। यह प्रवीचार स्वाध्यायसे उत्तम मनमे उत्पन्न हुए तर्कका फल है ॥ ७० ॥ पहले शुक्लध्यानमें योगीका मन वीचारके सामर्थ्यसे अधिक उत्पन्न होता है । परतु जैसे वालकका उत्साह अल्प होता है वैसे उस योगीका मन मोहकर्मप्रकृतियोका शनै शनै क्षपण SS 35.

२७४) सिद्धान्तसार. (११.७२- तस्य क्षपयतस्तत्र प्रशमं नयतोऽपि च । मोहस्य प्रकृतीः कुण्ठकुठारात्तरुभेदवत् ।। ७२ तत्पृथक्त्वसुवीतर्कवीचारं ध्यानमुत्तमम् । जायते जितकौघमघविध्वंसकारिणः ॥ ७३ दुरन्तं मोहजालं तन्निर्मलं निकषनिह । स एवातिविशुद्धात्मा ज्ञानावृतिनिरुन्धनात् ॥ ७४ स्थितिहासक्षयौ कुर्वश्रुतज्ञानोपयोगवान् । अर्थव्यञ्जनयोगानां सत्संक्रान्तिविवर्जनात् ।। ७५ स्थिरचित्तंकवृत्तिश्च कषायपरिवजितः । वैडूर्यमणिवन्नित्यं निर्मलं हि यतो महान् ।। ७६ ध्यात्वा निवर्तते नव तस्य ध्यानं सुनिर्मलम् । यदेकत्ववितकं तत्तत्र केवलमश्नुते ॥ ७७ तेन ध्यानाग्निना चैव घातिकर्मेन्धनानि सः । दग्ध्वाप्नोति रुचि धर्म कर्मयुक्तः शुभानि च ॥७८ स यदान्तर्मुहूर्तायुः शेषकर्मसमस्थितिः । वादरं काययोगं तं परिहत्यावलम्बते ॥ ७९ अथवा उपशम करता है । जैसे अतीष्ण कुल्हाडीसे वृक्ष शनै शनैः काटा जाता है वैसे पहले गुक्लच्यानधारकके द्वारा गन. शनै मोहकी प्रकृतियां क्षीण या उपगान्त की जाती हैं ।।७१-७२।। यह पृथक्त्ववितर्कविचार- ध्यान पापनाग करनेवाले योगिसे उत्तमतया किया जाता है और इससे कर्मसमूहका नाश होता है ।। ७३ ।। दुसरे शुक्लध्यानको जव योगी प्रारम्भ करता है तव जिसका नाश करना अतिशय कठिन है ऐसा मोहकर्म नष्ट होता है । तथा योगी श्रुतज्ञानोपयोगसे युक्त होकर ज्ञानावरण कर्मको रोकता है । अर्थात् ज्ञानावरण कर्मकी स्थितीका हास प्रथमत. कर अनन्तर उसका नाग करता है । उस समय अर्थसडक्रान्ति, व्यञ्जनसङक्रान्ति और योगसङक्रान्तियोंका अभाव होता है।। ७४-७५ ॥ ( एकत्ववितर्क- ध्यानका विवरण । )- जब यतिराजकी चित्तवृत्ति प्रथम शुक्ल- ध्यानसे अधिक स्थिर होती है और जब वे कपायरहित होते हैं तव वैडूर्यमणिके समान निर्मल होकर वे नहीं लौटते हैं अर्थात् दूसरे ध्यानमें वे तत्पर होते हैं प्रथम ध्यानके तरफ वे नही आते। ऐसे निर्मलध्यानको एकत्ववितर्क नामक शुक्लध्यान कहते हैं । इस शुक्लव्यानसे केवलजानकी प्राप्ति होती है । इस घ्यानरूपी अग्निसे ज्ञानावरणादि घातिकर्मरूपी इन्वन जलाकर यतिराज अतिशय प्रकाशमान होते हैं । अघातिकर्मही अव अवगिप्ट रहे हैं। इसके अनंतर वे केवली भगवान् आयुप्यकर्म जबतक कुछ अवशिष्ट रहा है तवतक विहार करते हैं ।। ७६-७७ ।। उस व्यानाग्निसे वे मुनि घातिकर्मरूप इत्यनको जलाकर मेघोंसे मुक्त हुए सूर्यके समान महाज्योतिको अर्थात् केवलनानको प्राप्त होते हैं ॥ ७८ ॥ जव योगीके वाकी कर्मोकी स्थिति आयुकर्मके समान अन्तर्मुहूर्त रह जाती है तव वादरकाय योगको छोडकर योगी सूक्ष्मकाय योगका अवलम्ब करते हैं ।। ७९ ॥ १ आ कपायप वनित. २ आ. निर्मलत्वयुतो महान् ३ महाज्योतिर्मघमुक्तासुभानिव -११. ८६) सिद्धान्तसार (२७५ परमेष्ठी परञ्ज्योतिर्म्यानमारकन्तुमर्हति । तस्मादुद्ध्वस्तयोगी स समुच्छिन्नक्रियाभिधम् ॥८० सत्सूक्ष्म काययोग तं तत्र सूक्ष्मक्रियाभिधम् । प्राणापानादिकस्पन्दक्रियाव्यापारवर्जनात् ॥ ८१ तत्र ध्याने भवत्यस्य सत्सामर्थ्यमयोगिनः । कर्मसतानविच्छित्ते कारण भववारणम् ॥ ८२ यथाख्यातं च चारित्रं तदा तस्य प्रजायते । साक्षान्मोक्षकसत्तत्त्वहेतुभूतं महात्मनः ॥ ८३ एतन्महातप. पूत कर्मनिर्जरणक्षमम् । अस्माच्च निर्जरा पूता सैवोपक्रमजा मता ॥ ८४ अथावसरसप्राप्त मोक्षतत्त्व निगद्यते । साक्षाच्च केवल तस्य हेतुस्तद्घातिनां क्षयात् ॥ ८५ ज्ञानस्यावरण तावद्दर्शनावरण तथा। मोहनीयान्तराये च धातिकर्माणि तज्जगुः ॥ ८६ (तीसरा सूक्ष्मक्रिया प्रतिपाति ध्यान। )- जव काययोग सूक्ष्म होता है तव परमेष्ठी, उत्कृष्ट ध्यानरूपी ज्योतिके धारक वे केवली सूक्ष्मक्रिया नामक तीसरा शुक्लध्यान धारण करते है। इस ध्यानसे योग सव नष्ट होते है और वे 'समुच्छिन्नक्रिया' नामक चौथा ध्यान धारण करते है। उस समय श्वासोच्छ्वासादि क्रिया वद होती है। इस ध्यानमे इस अयोगकेवलीका सामर्थ्य बढता है, जो कि कर्मसमूहका नाश करनेवाला और ससार नष्ट करनेवाला है ।। ८०-८२ ।। (यथाख्यात-चारित्रकी प्राप्ति।)- उस समय उस महात्माको साक्षात् मोहरूपी उत्तम निर्दोष तत्त्वका कारणरूप यथाख्यात चारित्र प्राप्त होता है। इस प्रकार यह महातप पवित्र और कर्मकी निर्जरा करनेमे समर्थ है। ऐसे तपसे पवित्र निर्जरा होती है। इस निर्जराको उपक्रमजा निर्जरा कहते हैं। उपक्रम शब्दका अर्थ तप होता है। उससे होनेवाली निर्जराको उपक्रमजा कहते हैं । इस निर्जराकेद्वारा कर्म उदयमे आनेके पूर्वकालमेही तपश्चरणके सामर्थ्यसे उदीर्ण करके उदयावलीमे प्रवेशित किया जाता है, और आम्र आदिके फलकी पक्वताके समान उपभोगमे लाया जाता है। यथाख्यात चारित्र सपूर्ण मोहकर्मके क्षयसे और उपशमसे आत्मस्वभावमे जो स्थिरता प्राप्त होती है वह यथाख्यात चारित्र है। चौथे ध्यानसे योग पूर्ण नष्ट होते है और आत्मामे अपूर्व स्थिरता प्राप्त होती है। इसलिये इसमे पूर्णता प्राप्त होती हैं ॥ ८३-८४ ।। ( राजवार्तिक अ ९ वा ) ( मोक्ष-तत्त्वका निरूपण। )- अव सरल-अनतसौख्ययुक्त मोक्षतत्त्वका प्रतिपादन किया जाता है। उस मोक्षप्राप्तिका कारण साक्षात्केवलज्ञान है और वह धातिकर्मोके क्षयसे होता है ।। ८५ ॥ ज्ञानावरण, दर्शनावरण, मोहनीय और अन्तराय ये चार घातिकर्म हैं। मिथ्यादर्शन, अविरति, प्रमाद, कषाय तथा योग ये पाच बधनकारण। ( इनका स्वरूप पूर्वमे कहा गया है। इनका जव नाश होता है, तब आत्मामे नवीन कर्मवध होना पूर्णतया रुक जाता है, तथा पुराने कर्म उदयमे आकर तथा उनकी उदीरणा होकर नष्ट होते है। उनकी निर्जरा होती है। तब १ आ ते जगु २७६) सिद्धान्तसार (११.८७- । वन्धहेतोरभावेन निर्जरायाश्च सर्वथा । सर्वकर्मविमोक्षोऽयं मोक्षोऽभाणि पुरातनः।। ८७ शरीरेण विमुक्तस्य कलङ्करहितस्य च । आत्मनोऽनन्तसीख्यादिभावान्तरमयं पुनः ।। ८८ कर्माष्टकविनिर्मुक्तास्त्रिलोकाग्रव्यवस्थिताः । अनन्तसुखनिर्मग्ना भाविनं कालमासते ॥ ८९ ये ते सिद्धाः प्रयच्छन्तु मम भक्तिमतोऽचिरात् । सिद्धि विशोध्य कर्माणि कुक्षेत्रपतितस्य च ॥९० अज्ञानेनापि यत्प्रोक्तं श्रीसिद्धान्तमतं फियत् । तत्तदाराधनायव निर्गुणां ख्यातिमीप्सुना ॥९१ अगाधस्त्वागमाम्भोधि. श्रीसर्वज्ञनिवेदितः। गौतमादिगणेन्द्रोऽवगूढः स कथं पुनः ॥ ९२ मादृशेर्दरभिप्रायैर्दुष्टकालसमस्थितैः । नृकोटः शक्यते ज्ञातुं सदुपाध्यायजितैः ॥ ९३ केवलं सांप्रतं जाते" दुःषमाकालयोगतः । म्लेच्छान्ते भारते क्षेत्रे जैनी वागतिदुर्लभा ।। ९४ आत्मामे कर्म विल्कुल नहीं रहता। ऐसी जो कर्मरहित, शुद्ध, मनतनानादि गुणपरिपूर्ण आत्माकी अवस्था उसे पुरातन महर्षि मोक्ष कहते है ।। ८६-८७ ।। उस समय आत्मा औदारिकादि पाचो शरीरोंसे रहित होता है। तथा कलंक-कर्मरहित होता है । और आत्मा अनन्त सौख्य, अनंत ज्ञान-दर्शन वीर्य सपन्न होता है। पूर्वकी ससारावस्था नष्ट होकर वह उपर्युक्त शुद्ध अवस्थान्तर प्राप्त होता है ।। ८८॥ ( सिद्धपरमेष्ठीका स्वरूप। )-जानावरणादि आठो कर्मोसे सिद्ध परमेष्ठी रहित होते हैं । त्रैलोक्यके अग्रभागमे सिद्धगिलापर अन्तिम तनुवातवलयमे वे विराजमान होते है। वे अनन्त सुखोमे सदा निमग्न रहते हैं। और भावी कालमेंभी वे अनन्तमुखीही रहेगे। क्योकि, वंधके कारण मिथ्यात्वादिक उत्पन्न करनेवाला कर्म अव उनके पास नही है। कर्मका अत्यन्त अभाव हो गया है। जैसे वीज जल जानेपर अंकुर उत्पन्न नहीं होता वैसा कर्मवीज नप्ट होनेसे अव संसारांकुर उत्पन्न नहीं होता ।। ८९ ।। ( ग्रंथकारकी सिद्धोको विज्ञप्ति ! )-हे सिद्धपरमेष्ठिन् । मैं कुक्षेत्रमे पडा हू, भक्ति तत्पर ऐसे मेरे कर्मोको नष्ट कर मुझे आप सिद्धिपद दें। हे प्रभो ! निश्चयसे ज्ञानादि गुणोंके साथ कीर्तिको चाहनेवाले मैने यह सिद्धान्तका मत अज्ञानसे थोडासा कहा है ।। ९०-९१ ।। ( भागमसमुद्रका स्वल्पवोव मुझे नही है। )- श्रीसर्वज्ञ महावीरप्रभुने .जिसका स्वरूप कहा है, वह भागमसमुद्र अगाध है। उसके तलका स्पर्श करना शक्य नहीं है। ऐसे आगमसमुद्रमे गौतमादि गणेशोने प्रवेश किया है। परंतु जो उत्तम उपाध्यायसे-सिद्धान्तज्ञ गुरुसे रहित हैं, तथा पंचमकाल, जो कि दुप्ट है, उसमे उत्पन्न हुए हैं और खोटे ज्ञानसे युक्त हम सरीखे मनुप्य हैं, उनके द्वारा यह सर्वन प्रतिपादित आगम जानना शक्य नहीं है ।। ९२-९३ ॥ (अव जिनवाणीका पाना दुर्लभ है।)- दुपमाकालके सवसे यह भारतक्षेत्र म्लेंच्छोंसे व्याप्त हुमा है । इसमे अव जिनेश्वरकी वाणी प्राप्त होना अत्यंत दुर्लभ है ।। ९४ ।। - १ आ. शरीरस्य सत. २ आ गर्न ३ आ. लिप्नया ४ समाश्रित ५ मा याते -१०. १००) सिद्धान्तसार (२७७ गतं शीलं गत ज्ञानं गत दानं गतं तपः । गत शौच गत सत्यं गत ध्यान' गता क्रिया ॥ ९५ भव्यानामपि चित्तानि धर्मादपगतानि च । जैनी मुद्रापि दुःप्राप्या यास्मिन्कालेऽतिदुर्घरे ॥ ९६ तत्र जातोऽहमत्युच्चः स्थानमानविजितम् । ज्ञानाराधनतः किञ्चित्करोम्यस्यानुवर्तनम् ॥९७ जिनेन्द्रस्य मतस्यास्याचिन्त्यमाहात्म्यवर्तिनः । श्रद्धानादपि सिद्धयन्ति सन्तः संसारनिर्गता.॥९८ यदि जैनेश्वरे मार्गे निदानमतिनिन्दितम् । सद्रत्नत्रयलाभो मे तथाप्यस्तु भवे भवे ॥ ९९ ये शृण्वन्ति महाधिय. शुभमत सामन्तभद्र वचो । वैचित्र्य बहुमानमावहदिद भ्रान्तेविमुक्ता जनाः ॥ इस कलिकालमे शील-व्रतोका पालन जिनसे होता है ऐसे सदाचार नष्ट हुए है। ज्ञान नष्ट हुआ, दान नष्ट हुआ और तप नष्ट हुआ, निर्लोभता नष्ट हुई, सत्य चला गया, ध्यान नष्ट हुआ और विनयादिक क्रिया नष्ट हुई ।। ९५ ॥ (भव्यभी धर्ममे मद आदर हुए हैं। )- इस कलिकालमे भव्योके चित्तभी धर्मसे हट गये हैं । यह कलिकाल महाकठिन है । इसमे जिनमुद्राभी प्राप्त होना कठिन है ।। ९६ ।। इस कलिकालमे मैं उत्पन्न हुआ हू । मैं उच्च स्थान और मानसे रहित हू । मै ज्ञानकी आराधना कर इस ज्ञानका कुछ अनुसरण करुगा ।। ९७ ॥ ( जिनमतका श्रद्धान ससारनाशका कारण है। )- अचिन्त्यमाहात्म्य धारण करनेवाले इस जिनेद्रमतका श्रद्धान करनेसेभी सज्जन ससारसे पार हो गये हैं अर्थात् उनका संसार अनतानत कालका नही रहा है। अर्द्धपुद्गल कालतक ससारमे अधिकसे अधिक रहकर जीव मुक्त होता है । यद्यपि जिनेश्वरके मार्गमे निदान-भावि सुखोकी आशा करना अतिशय निन्दित माना है तोभी मुझे भवभवमे उत्तम रत्नत्रय लाभ होवे ऐसी मैं इच्छा करता हू । निदान यद्यपि ससारवर्धक है परतु वह भोगोकी चाह करनेसे निंद्य है और उससे ससार बढता है। रत्नत्रयलाभ, बोधिलाभ आदिकी चाह ससारवर्धक नही है, क्योकि, वह प्रशस्त निदान है ॥ ९८-९९॥ ( समन्तभद्रका वचन मुक्तिका कारण है। )- जैनमत अर्थात् शास्त्र और अतिशय आदरको उत्पन्न करनेवाला, नानाविषयोका प्रतिपादन जिसमे है ऐसा समन्तभद्र मुनिराजका वचन जो महाबुद्धिमान् पुरुष सुनते हैं वे भ्रान्तिसे रहित हो जाते हैं। कलासमूहमे अतिशय कुशल ऐसे वे पुरुष दो तीन भव धारण करके सुखसे-मुक्तिके सुदर नगरमे शीघ्र प्रवेश करते है ।। १००॥ --- १ आ मान २७८) सिद्धान्तसारः (११.१००- अप्यत्यन्तकलाकलापकुशलाः सम्प्राप्य द्विवान्भवान् । सौख्येनाशु विशन्ति वैभवयुताः सिद्धः पुरं सुन्दरम् ॥ १०० यो जिनशासनक्ति मनसा वचसा च कायतो वापि । कुरुते तस्य समीहितसिद्धिस्त्वचिरेण कालेन ॥ १०१ इति श्रीपण्डिताचार्य श्रीनरेन्द्रसेनविरचिते चतुर्विधध्यानं मोक्षतत्वनिरूपणं एकादशोऽध्यायः । ( जिनशासन-भक्तिसे इच्छित सिद्धि होती है। )- जो पुरुष मनसे, वचनसे और शरीरसेभी जिनशासनमे भक्ति करता है उसे शीघ्रही इच्छित सिद्धि होती है ॥ १०१॥ श्री पण्डितनरेन्द्रसेनाचार्य-विरचित सिद्धान्तसार-सग्रहमे मोक्षतत्त्वका निरूपण करनेवाला ग्यारहवा अध्याय समाप्त हुआ। - M १ आ. इति सिद्धान्तसारसङग्रहे आचार्य श्रीनरेन्द्रसेनविरचिते एकादशोऽध्याय समाप्तः ।

द्वादशोऽध्यायः। प्रणिपत्य गुरूत्पञ्च पञ्चकल्याणभागिनः । आराधनां प्रवक्ष्यामि पञ्चमज्ञानहेतवे ॥१ दर्शनज्ञानचारित्रतपःपञ्चगुरूनिति । आराध्य जीव एवायं भव्यस्त्वाराधको भवेत् ॥ २ उपसेवा क्रिया पूता यामीषामतिभक्तितः। भव्यजीवस्य साभाणि जिनराराधना धना॥ ३ तत्त्वार्थाभिरुचिः पूता दर्शन तद्विवोधनम् । ज्ञानं भवति चारित्रं यत्सावधनिवर्तनम् ॥ ४ यस्त्रयीविषये वर्य महोद्योगः प्रजायते । कायक्लेशावहोऽसह्यस्ततपस्तापकारणात् ॥ ५ घातिकर्मक्षयावाप्तकेवलज्ञानसपदः । पूजामर्हन्ति सर्वेभ्यस्तेऽत्रार्हन्तः प्रकीर्तिताः ।। ६ प्रविधूताष्टफर्माणः प्राप्ताण्टगुणसंपदः । स्वस्वरूपस्थिता नित्यं सिद्धास्ते सिद्विभागिनः ॥ ७ बारहवां अध्याय । गर्भ, जन्म, दीक्षा, केवलज्ञान और मोक्ष ऐसे पचकल्याणोंके इन्द्रादिदेवकृत महोत्सवोके धारक अहंदादि पचपरमेष्ठियोको वन्दन करके मैं पाचवे ज्ञानके लिये- केवलज्ञानकी प्राप्तिके लिये मैं आराधना करता हू ।। १ ।। ( आराध्य और आराधक। )- सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्र, सम्यक्तप और पचपरमेष्ठियोकी वन्दना ये आराध्य है और यह भव्यजीवही उनका आराधक अर्थात् आराधना करनेवाला है ।। २॥ ( आराधना । )- सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्र, सम्यक्तप और पचपर- मेष्ठियोकी स्तुति इनकी अतिशय भक्तिसे जो पवित्र सेवा करना वह भव्यजीवकी दृढ आराधना है ऐसा जिनेश्वरने कहा है ।। ३ ।। जीवादिक तत्त्वार्थोपर जो पवित्र रुचि है वह सम्यग्दर्शन है । जीवादिक पदार्थोंका जो ज्ञान, उसको सम्यग्ज्ञान कहते हैं । तथा हिंसादि पापोसे जो परावृत्त होना-हिंसादिकोका त्याग करना सो चारित्र है । सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्ररूप, तीन श्रेष्ठ विषयोमे जो महान् प्रयत्न किया जाता है तथा उष्णकाल, वर्षाकालमे परीषह सहन किया जाता है वह तप आराधना है । यह आराधना कर्णके समान है । अर्थात् जैसा नौकाका कर्ण नौकाको चलानेमे सहाय्यक है, वैसी यह तप आराधना सम्यग्दर्शनादि आराधनाओको प्रबल बनानेमे सहाय्यक है ॥ ५ ॥ ( अर्हत्परमेष्ठीका स्वरूप । )- जिन्होने घातिकर्मका क्षय करके केवलज्ञानसम्पत्ति प्राप्त की है, जो इद्र धरणेन्द्र, चक्रवर्ति आदिकोसे पूजा योग्य हैं, वे अर्हन्त कहे गये हैं। वे आराधने योग्य हैं ।। ६ ॥ ( सिद्धपरमेष्ठियोका स्वरूप । )- जिन्होने ज्ञानावरणादि आठ कर्मोंका नाश किया है और जिनको ज्ञानादि आठ गुणोकी प्राप्ति हुई है जो अपने स्वरूपमे नित्य स्थित हैं, जिनको --- १ मा पञ्जज्ञानकहेतवे २ आ जैन २८०) सिद्धान्तसारः (१२.८- आचारज्ञाः समाचारमन्येषां कथयन्ति ये । आचार्यास्ते भवन्त्यत्र गुरवो गरिमान्विताः ।।८ मोक्षार्थ मोक्षसच्छास्त्राण्यन्यानध्यापयन्ति ये । ज्ञानध्यानधना नित्यमुपाध्याया भवन्त्यमी ॥९ अन्येभ्यो नैव यच्छन्ति दीक्षां तीव्रतपस्विनः । साधयन्ति स्वसिद्धि ये साधवस्तेऽत्र कीर्तिताः॥१० भव्यैराराधनायां तेऽद्याराध्याः परमेष्ठिनः । तैरेवाराधितः सर्वमन्यदाराषितं भवेत् ॥ ११ भव्यः क्षान्तिकरो' नित्यं हिताहितविचारकः। जिनशासनसिद्धान्तवेदी श्राद्धः सुसंयतः॥ १२ माद्यन्मित्रकलत्राद्या भवभ्रान्तिविधायकाः । सर्वेऽप्यमी न मे किञ्चिदिति यो हृदि मन्यते ॥ १३ - मुक्तावस्था प्राप्त हुई है वे सिद्ध परमेष्ठी आराधनके लिये योग्य है। विशेष- ज्ञानावरणादि आठ कर्मोका नाश होनेसे जो आठ गुण प्राप्त हुए हैं उनके नाम- मनतजान, अनतदर्शन, अव्यावाध, सम्यक्त्व, सौम्य, अवगाहन, अगुरुलघु और अनंतवीर्य ।। ७ ॥ ( आचार्य परमेष्ठीका स्वरूप । )- जो पांच प्रकारके जानादि आचारोका पालन करते हैं और जो उसके जाता है, दस प्रकारके इच्छाकारादि समाचारोका शिष्योको वोध करते है वे आचार्य परमेष्ठी है । वे माहात्म्यके धारक प्रभावी गुरु हैं। विशेप- आचारवत्वादिक आठ गुण, वारह तप, दस स्थितिकल्प और छह आवश्यक ऐसे छत्तीस गुण आचार्यके कहे है ।। ८॥ ( उपाध्याय परमेष्ठीका स्वरूप । )- जो ज्ञान और ध्यानरूप धनके स्वामी हैं, जो मोक्षप्राप्तिके लिये शिष्योंको मोक्षप्रद उत्तम सिद्धान्तशास्त्र हमेशा पढाते हैं वे उपाध्याय परमेष्ठी हैं ।। ९॥ ( साधुपरमेष्ठीका स्वरूप। )- जो अन्योको- श्रावक श्राविकाओको दीक्षा नहीं देते, जो तीव्र तपश्चरण करते है और जो अपनी सिद्धिको आत्मसिद्धिको-रत्नत्रयको साधते हैं वे इस लोकमे साधु कहे गये है ॥ १० ॥ भव्यजीव सम्यग्दर्शनादिक चार आराधनाओंमे पचपरमेष्ठियोकी आराधना करे। क्योकि इनकी आराधना करनेसे सव अन्य आराधित होते हैं । अर्थात् सम्यग्दर्शनादिक चार आराधनायें पंचपरमेष्ठीयोंकी आराधना करनेसे आराधित होती हैं। क्योकि इनका वैयावृत्त्य करना, इनका उपदेशा हुआ आचार-चारित्र पालना, इनके ऊपर श्रद्धान करना आदिक वातोंके पालनते चारो आराधनाओका पालन हो जाता है ॥ ११ ॥ भव्यका स्वरूप । )- भव्य क्षमागील होता है । सदा अपने हिताहितका विचार करता है। जिनगासनके सिद्धान्तको वह जानता है, पंचपरमेष्ठियोंपर श्रद्धा करता है। और उत्तम निर्दोष सयम पालन करता है- जितेन्द्रिय होता है ।। १२ ।। ( भव्य जीवकी चिन्तना अर्थात् अनुप्रेक्षायें। )- वह भव्य उन्मत्त मित्र, पत्नी आदिक पदार्य ससारभ्रान्ति उत्पन्न करनेवाले है । ये सभी मेरे कुछ सवंधी नहीं है, ऐसा हृदयमे समझता -- १ मा शान्तिपरो -१२ २०) सिद्धान्तसार (२८१ १ शरदभ्रसमाकारं जीवन यौवनं धनम् । आराध्य' च वन नित्यमित्य यस्य सदा मतिः ॥ १४ मुक्त्वा जनेश्वर धर्म शरणं मम गच्छतः । दुर्गतिं नोपजायन्ते पुत्राद्या वेत्ति यस्त्वद. ॥ १५ पञ्चप्रकारसंसारसरणं सरता मया । दुःखान्याप्तान्यनन्तानि ह्यधर्मादिति वेत्ति यः ॥ १६ सुखं वा यदि वा दुःखं सुति वाथ दुर्गतिम् । एक एवाभिगच्छामि न सम्बन्धभवा परे ॥१७ यो जानाति महाप्राज्ञः शरीरमपि नान्तरम् । मदीय यत्र किं तत्र धनधान्यादिकं पुनः ॥ १८ सप्तधातुमय चास्थिचर्मनद्ध कुसस्थिति । शरीर क्षणविध्वसि धर्म एव हि शाश्वत. मनोवाक्कायकर्मेति' योगोऽसावास्रवो महान् । कर्मास्त्रवत्यनेनेति यो जानाति स तत्त्ववित् ॥२० है । यह जीवन, तारुण्य और धन शरत्कालके मेघके समान है। अब मुझे वनही आरध्य है- सेवने योग्य हैं ऐसी उस भव्यकी बुद्धि होती है। ऐसा विचार कर वह धनादिकसे विरक्त होता है।॥ १४ ॥ दुर्गतिको जानेवाले मुझको जिनेश्वरका धर्म छोडकर अन्य पुत्रादिक शरण नही है अर्थात् जिनधर्मही मेरा दुर्गतिसे रक्षण करनेवाला है ॥ १५ ॥ ससारानुप्रेक्षा- पाच प्रकारके ससारमे भ्रमण करनेवाले मुझे अधर्मसे अनन्त दुख प्राप्त हुए हैं ऐसा भव्य मनमे विचार करता है ॥ १६ ॥ सुख अथवा दुख, सुगति अथवा दुर्गतीको मैं अकेलाही जाऊगा। मेरे सबसे उत्पन्न हुए पुत्रादिक मेरे साथ सुखी और दुखी नही होगे। सुगति अथवा दुर्गतिमे मेरे साथ चलेगे ऐसा नहीं ॥ १७ ॥ जो महाबुद्धिवान् पुरुष अपने अतिशय अभिन्न शरीरकोभी यह मेरा है ऐसा नही समझता है, वह धन-धान्यादिक पदार्थ, जो सर्वथा भिन्न है, अपने कैसे मानेगा?॥ १८ ॥ यह शरीर रस, रक्त, मास, मेद, अस्थि, मज्जा, शुक्र ऐसे सात धातुओसे बना हुआ है। अस्थि और चर्मसे बधा हुआ है । इसकी आकृतिभी कुत्सित है। यह शरीर क्षणविध्वसि- क्षणविनाशी है परन्तु धर्मही नित्य है ॥ १९ ॥ मन, वचन और शरीरसे होनेवाली जो आत्माके प्रदेशोकी चचलता उसे योग कहते है। यह योगही महान् आस्रव है। कर्मोके आगमनका द्वार होनेसे इसे आस्रव कहते है। इस योगसे कर्म आत्मामे आ जाता है । इस आस्रवतत्त्वको जो जानता है वह तत्त्ववेदी है ॥ २० ॥ जो उत्तम क्षमा मार्दवादि दश धर्मोंका पालन करनेमे तत्पर रहता है, जिसका मन तपमे नित्य तत्पर रहता है, जो कर्मोको अपनेमे नही आने देता है, वह बुद्धिमान् इस प्रकारका ? - २ आ एवेह ३ आ कर्मकयोगो ४ आ सुतत्त्ववित् १ आ आराध्याराधन SS 36 सिद्धान्तसार २८२) (१२. २१- - -- दशधर्मरतो नित्य तपस्तनिष्ठमानसः । संवृणोति च कर्माणि यस्त्वेव चिन्तयेद्बुधः ।। २१ मिथ्यात्वाराधनायुक्तः कर्म बध्नाति चेतनः । निर्जीयते पुनस्तेन सम्यक्त्वाद्युपसेवनात् ।। २२ लोकः सर्वोऽपि जीवेन कर्मणां वशवर्तिना । अवगाह्य विमुक्तोऽस्ति यस्येति हृदि वर्तते ॥ २३ वैभवं सर्वलोकानां सुलभं भवतिनाम् । श्रीजिनेन्द्रमहाधर्मलन्धवोधिस्तु' दुर्लभा ॥ २४ इत्थं परात्मविज्ञान यस्य स्यादनिवारितम् । तं सदात्मानमाख्यान्ति सम्यगाराधकं जिना॥२५ पञ्चैय मरणान्याहु. साराधारा' यतीश्वराः । शुभाशुभगतिर्येभ्यो जानन्तीह विचक्षणाः ॥२६ आधः केवलिनः प्रोक्तो मृत्युः पण्डितपण्डितः । साधूनां संयमोक्तानां पण्डितं मरणं पुनः ॥२७ विचार करता है कि यह आत्मा मिथ्यात्वकी आराधनासे युक्त होकर कर्म बाधता है। परतु जव यह आत्मा सम्यक्त्वकी सेवा करता है तव वधे हुए कर्मकी निर्जरा करता है ।। २१-२२ ।। यह जीव कर्मवश होकर सपूर्ण लोकको अपने जन्मसे व्याप्त करके छोड देता है ऐसा विचार इस सयतके मनमे सदा रहता है ॥ २३ ॥ ससारमे भ्रमण करनेवाले सपूर्ण मनुष्योको सर्व प्रकारका वैभव प्राप्त होता है, परतु जिनेन्द्रके महाधर्मसे होनेवाली रत्नत्रयकी प्राप्ति, जिसको बोधि कहते है, वह अतिशय दुर्लभ है ।। २४ ॥ इस प्रकारसे जिसको अपने स्वरूपका और परपदार्थोका ज्ञान हुआ है, तथा जो अनिवारित है अर्थात् परको आत्मा समझकर जिसके मनमे अब कभीभी भ्रान्ति उत्पन्न नही होगी, जो परको परही मानता है, उसमे आत्मीय-बुद्धिको धारण नहीं करता है ऐसे आत्माकोही जिनेश्वर सदात्मा-प्रशस्त आत्मा और वही उत्तम आराधक है ऐसा कहते है ।। २५ ( मरणोके पाच भेद।)- सार-रत्नत्रय जिनको आधार है अथवा रत्नत्रयके आधारभूत मुनीश्वर मरण पाच प्रकारसे है ऐसा कहते है तथा विद्वज्जन उन मरणोसे शुभाशुभगति जानते हैं ।। २६ ।। विशेष- उत्पन्न हुए पदार्थका नाश होना मरण है। देवपना, पशुपना, नारकीपना और मनुष्यपना ऐसे पर्यायोका नाश होना मरण है। पूर्व आयुके नाशसे जीव मरता है और अन्य आयुके उदयसे वह नया पर्याय-देव मनुष्यादि पर्याय धारण करता है। ऐसे मरणके आचार्योने पाच भेद कहे है। १ पण्डितपण्डित-मरण, २ पण्डितमरण, ३ वालपण्डित-मरण- ४ वालमरण और ५ वालवाल मरण । ( पण्डितपण्डित मरण और पण्डित मरण। )- क्षायिक ज्ञान, क्षायिक दर्शनादि नव- केवल लब्धिके धारक ऐसे केवलिके मरणको पण्डितपण्डित-मरण कहते है। जिनको सयमी कहा है ऐसे साधुओको अर्थात् महाव्रत, गुप्ति और समितियोके पालकोको सयमी मुनि कहते है। इनके १ आ लब्धिवाधि २ आ महात्मान ३ आ सारोद्धाराद्यतीश्वरा -१२ ३१) सिद्धान्तसार (२८३ संयतासंयताना तद्वालपण्डितसज्ञिकम् । वाल चासयतस्येह' सम्यग्दृष्टेनिवेदितम् ॥ २८ मिथ्यादृष्टिजनाना तत्पञ्चम वालवालकम् । 'जायतेऽनन्तदुष्टंकमरण भवधारिणाम् ।। २९ लघुपञ्चाक्षरोच्चारकालेनैव तु कर्मणाम् । क्षय कृत्वा शिवं याति केवलो तदिहादिमम् ॥३० समाराधयतोऽनघं सद्रलत्रयमुत्तमम् । सत्समाधियुतस्येह साघोर्मृत्यु स पण्डित. ॥ ३१ मरणका नाम पण्डितमरण है । स्पष्टीकरण- ज्ञान, दर्शन, चारित्र और तपोमे जिनको सीमातीत पाण्डित्य प्राप्त हुआ है, उनको पण्डित कहते है अर्थात् अनतज्ञान, अनत दर्शन, अनतमुख और अनतगक्ति आदिक प्राप्त हुए, वे केवलिजिन पण्डितपण्डित कहे जाते है । इनसे भिन्न जो है उनको पण्डित कहते है अर्थात् प्रमत्तमयत, अप्रमत्तसयत आदिमे लेकर क्षीणकषाय गुणस्थानतक जो साधु- मुनि है उनको पण्डित' कहते है । पण्डा- रत्नत्रय- परिणत बुद्धिको पण्डा कहते हैं, ऐमी बुद्धि जिसको उत्पन्न हुई है वह पण्डित है । मुनियोमे रत्नत्रय- पण्डितवुद्धि होनेसे वे पण्डित कहे जाते है ।। २७ ।। ( वालपण्डित मरण और वालमरणका विवेचन । )- सयतासयतके मरणको वालपण्डित मरण कहते है। श्रावक जो अणुव्रतके धारक है अर्थात् दर्शनादि- प्रतिमाओके धारक है उनको सयतासयत कहते हैं । स्थावर जीवके घातरूप असयमसे निवृत्त न होनेसे वे श्रावक वाल कहे जाते है । तथा सजीवोका सरक्षणस्पसयम और रत्नत्रयमे तत्पर होनेमे पण्डित कहे जाते है । असयम होनेसे वाल व रत्नत्रय होनेमे पण्डित ऐसे दोगुणोके धारक होनेसे वालपण्डित कहे जाते है। दर्शनज्ञान ये दो जिनमे है परतु जो सर्वथा चारित्ररहित है ऐसे असयतसम्यग्दृष्टीके मरणको वालमरण कहते है ।। २८ ।। ( वालवालमरणका स्वरूप । )- मिथ्यादृष्टियोके मरणको वालवालमरण कहते है। ससारको धारण करनेवाले जीवोको यह पाचवा मरण अनन्त दोपोसे भरा हुआ और जिसका साम्य कोई मरण नहीं कर सकेगा ऐसा मरण है। इस मरणसे मरनेवाला जीव सम्यक्त्वसेभी रहित है, दर्शन और चारित्र तो उमे है ही नहीं। इसलिये मिथ्यादृष्टिको वालवाल कहते हैं।।२९।। ( पण्डितपडित मरणवाला मुक्त होता है। )- अ, इ, उ, ऋ, लु ऐसे पाच हस्व- स्वरोका उच्चार करनेमे जितना समय लगता है उतनेमे अघातिकर्मोका क्षय करके केवली भगवान मोक्षको जाते है वह मरण पहिला मरण है ।। ३० ॥ (पडितमरणका खुलासा)- उत्तम, प्रशसनीय और अमूल्य ऐसे रत्नत्रयकी आराधना करनेवाला उत्तम ध्यान युक्त-धर्मध्यान और शुक्लध्यान युक्त ऐसे साधुका जो मरण वह पडितमरण है ॥ ३१॥ १ आ.वा २ मा दुखककारण भवधारणम् ३ आ नप स्वकर्मणा ४ आ ऽनध्य २८४) सिद्धान्तसार. (१२. ३२- तदेतत्त्रिविधं प्रोक्तं पण्डितं मरणं यतेः । प्रायोपगमनं चाद्यमिङ्गिनीमरणं पुनः ॥ ३२ भक्तत्यागस्तदर्थः स्यादात्मनः स्वपरस्य च । वैयावृत्त्यस्य सापेक्ष सद्गतेः कारणं परम् ॥३३ प्रायोपगमन यत्तद्वैयावृत्त्यविजितम् । स्ववयावृत्यसापेक्षमिङ्गिनीमरणं मतम् ॥ ३४ काले संन्यस्य वेगेन सर्वग्रन्थविजितः । आराधयन्गुरुत्पञ्च मियते बालपण्डितः ।। ३५ संन्यासादिविनिर्मुक्तमाकस्मिकविघाततः । शुद्धदृष्टर्भवेन्मृत्युस्तद्वालो गदितो बुधैः॥ ३६ ( पडितमरणके तीन भेद । )- यतिका यह पडितमरण तीन प्रकारका है। प्रायोपगमन मरण, इगिनीमरण, भक्तत्याग-मरण । इगिनीमरणवाला केवल अपने वैयावृत्त्यकोही अपेक्षा करता है अर्थात् आहारका त्याग करके स्वय उठता बैठता है अन्योका साहाय्य नही चाहता। इसमे तीसरा मरण जिसको भक्तत्यागमरण कहते हैं वह अपने और अन्योंके वैयावृत्त्यकी अपेक्षा रखता है। भक्तत्यागमरणको भक्तप्रतिज्ञा कहते हैं। भक्त शब्द आहारका वाचक है और प्रतिज्ञा शब्दका अर्थ प्रत्याख्यान त्याग ऐसा है। जिसमे क्रमश. आहारका त्याग किया जाता है ऐसे मरणको भक्तप्रतिज्ञा मरण कहते हैं ।। ३२-३३ ।। (प्रायोपगमन और इगिनीमरणका विवरण। )-प्रायोपगमन मरण वैयावृत्त्यसे रहित होता है और इंगिनीमरण स्ववैयावृत्त्यकी अपेक्षा करता है । प्राय. अर्थात् अनशन-आहारोका त्याग करना । पादोपगमन ऐसाभी इस मरणका नाम है। इसका खुलासा-पावोसे गमन करना अर्थात् अपने सघका त्याग कर उस सघसे निकलकर योग्य स्थानका आश्रय लेना। अथवा प्रायोग्य-संसार नाशके लिये योग्य ऐसे संस्थान और सहननके गमन प्राप्तिसे जो मरण किया जाता है उसको प्रायोग्य मरण कहते हैं। इगिनीमरण-स्ववैयावृत्यकी अपेक्षा करता है। इगिनी शब्द अपने अभिप्रायका वाचक है । अपने अभिप्रायके अनुसार स्वयंही स्वत.की शुश्रूषा कर जो मरण किया जाता है उसे इगिनी मरण कहते हैं। परिचारक मुनिकी शुश्रूषा इसमे क्षपक नही चाहता है ॥ ३४ ॥ ( वालपण्डित-मरणका विवरण । )- बालपण्डित पंचमगुणस्थानी क्षुल्लकादिक, प्रतिमाधारी श्रावक अतकालमे रागद्वेषादिकोंका त्याग कर सपूर्ण परिग्रहोंसे रहित हो जाता है। और पचपरमेष्ठीयोकी आराधना करके मरण प्राप्त करता है ॥ ३५ ।। ( बालमरणका स्वरूप। )- संन्यासादिकोसे रहित आकस्मिक कुछ प्रहारादिक होनेसे जो शुद्ध सम्यग्दृष्टिका मरण होता है वह बालमरण है ऐसा सुज्ञोने कहा है ।। ३६ ।। -- -- १ आ. यत २ आ पादो ३ मा स्तुतीय ४ पादो ५ पण्डितात् ६ आ तद्वाल गदित - -१२ ४५) सिद्धान्तसार (२८५ मातरौद्रवता मृत्युर्जायते बहुदुःखतः । सर्वेषां बालबालानां' मरणं कथयन्ति ते ॥ ३७ आवीचिमरणं चान्यत्समय समय प्रति । आयुष सक्षयात्प्रोक्त मुनीन्द्रर्हतकल्मषः ॥ ३८ भुज्यमानायुषश्चान्ते मृत्युस्तद्भवसभव.' । कथ्यते श्रीजिनाधीशरनेकगुणसयुतैः ॥ ३९ येनैव ये मृतःपूर्व तेन तस्य पुनर्भवेत् । मृत्युविधिनामान तमुशन्ति यतीश्वरा. ।। ४० येन पूर्व मृतस्तेन न मृत्युर्जायते पुनः । यस्मात्तन्मरण प्राहुराधन्तमिह रूढितः ॥ ४१ मायामिथ्यानिदानादिशल्यर्यन्मरण भवेत् । सशल्यमरण तद्धि दुष्टं दुर्गतिकारणम् ॥ ४२ दर्शनज्ञानचारित्रत्रयमुत्सृज्य जायते । मरणं तत्समुत्सृष्टं दू.खपाथोधिवर्धकम् ॥ ४३ गृखपृष्ठभवो मत्युः कथ्यते यस्य जायते । हस्त्यादेरुदरस्थस्य महादुःखविधायकः ॥ ४४ घाणादिकनिरोधेन यो मृत्युभववर्तिनाम् । विद्यासमरणं तद्धि कथयन्ति कथाविदः ॥ ४५ . (बालवालमरणका स्वरूप। )- आर्तध्यानसे और रौद्रध्यानसे अतिशय दुखित होकर जो मरण होता है वह सब बालवालोका मरण है ऐसा कहते हैं ।। ३७ ॥ ( आवीचिमरण तथा तद्भव मरण। )- प्रत्येक समयमे जो आयुका क्षय होता रहता है उसको, नष्ट किया है पाप जिन्होने ऐसे मुनीश्वरोने आवीचिमरण कहा है। वर्तमानकालमे जिस आयुष्यका प्राणी उपभोग ले रहा है उसको भुज्यमान आयु कहते हैं । उसका अन्त होनेपर जो मृत्यु आती है वह तद्भवमरण है, ऐसा अनेक गुणोसे सयुक्त श्रीजिनेन्द्रोने कहा है ॥३८-३९॥ ( अवधिमरण। )- जो जिस मरणसे पूर्वभवमे मरा था उसी मरणसे वह पुन' इस भवमेंभी यदि मरेगा तो उसके इस मरणको यतीश्वर अवधिनामका मरण कहते हैं ।। ४० ॥ (आद्यन्तमरणका स्वरूप ।)- जिस मरणसे प्राणी पूर्वभवमे मरा था उस मरणसे पुन. मरण न होना उसको रूढिसे आद्यन्त मरण कहते हैं ।। ४१ ॥ ( सशल्यमरणका विवरण । )- माया, मिथ्यात्व और निदान आदि शल्योसे जो मरण होता है उसको सशल्य मरण-शल्यभाव-सहित मरण कहते हैं और वह दुष्ट तथा दुर्गति प्राप्तिका कारण है ॥ ४२ ॥ (समुत्सृष्ट-मरणका विवरण । )- सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और चारित्रका त्याग करके जो मरण होता है उसको समुत्सृष्ट मरण कहते हैं। यह मरण दुःखरूपी समुद्रको बढानेवाला है ।। ४३ ॥ (गृद्धपृष्ठ-मरण । )- हाथी आदिके पेटमे घुसकर जो मृत्यु होती है उसको गृद्धपृष्ठ मरण कहते हैं, यह मरण महान् दुखको उत्पन्न करता है ।। ४४ ।। (विघास मरण। )- नाक, कण्ठ आदि दवाकर-श्वासोच्छ्वासका निरोध कर जो ससारी जीवोका मरण होता है वह विघ्रास मरण है ऐसा उसका यथार्थस्वरूप जाननेवाले विद्वान् कहते है ॥ ४५ ॥ --- १ आ बालबाल तन्मरण २ मा मक्षये ३ आ सभव ४ आ यस्य २८६) सिद्धान्तसारः (१२ ४६- २ दर्शनज्ञानचारित्रत्रय सक्लिष्टयोगतः । मृत्युभवति जीवानामप्रशस्तः स एव हि ॥ ४६ पार्श्वस्थादिकरूपेण बलाकामरण मतम् । सप्तदशेति सन्त्यत्र मरणानि शरीरिणाम् ।। ४७ ज्ञात्वेति विबुधेनात्र त्यक्त्वासाधूनि सर्वथा। धीरेण च निजप्राणास्त्याज्याः पण्डितमृत्युना ॥४८ अधीरेणापि मर्तव्य प्राणिनामायुषः क्षये । तस्माद्धर्यवता' प्राणसर्जनं दुःखभर्जनम् ॥ ४९ जैनराद्धान्तसूत्राणामभिप्रायेण धीधनाः । क्रियाकाण्डं प्रकुर्वन्ति तानि वक्ष्येधुना ततः ।। ५० अर्हो लिङ्गं च शिक्षा च विनयं च तथा पुनः । समाध्यनियतावासौ परिणामस्ततः परम् ॥५१ उपधेर्वर्जन श्रेणिसमारोहणमुत्तमम । तपसो भावना पूता सल्लेखनमनिन्दितम् ॥ ५२ दिशा परस्पर शान्तिरनुशासनमुत्तमम् । चर्या च मार्गणा चेति सुस्थितः स्वसमर्पणम् ॥ ५३ परीक्षाराधनायाश्च निर्विघ्नेनावलोकनम् । आपृच्छा प्रतिपृच्छा च गुरोरालोचना पुनः ।। ५४ --- ( अप्रशस्त मरण। )- सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्रमे सक्लेश परिणाम उत्पन्न होकर जो मृत्यु होती है वह अप्रशस्त मरणही है ।। ४६ ।। ( वलाकामरण। )- पार्श्वस्थादिक रूपसे जो मरण प्राप्त होता है उसे बलाका मरण कहते है अर्थात् पार्श्वस्थादिक जो मुन्याभास है उनके स्वरूपमे मरण होना, भ्रष्ट मुनि होकर मरण करना वलाकामरण है। इस प्रकार यहा सत्रह प्रकारके मरणोका वर्णन किया है ॥४७।। वालवाल मरणादिक मरण असाधु है अर्थात् ससारमे घुमनेवाले है ऐसा समझकर विद्वान् धीर व्यक्ति उनका त्याग कर अपने प्राण पण्डितमृत्युसे छोडे ।। ४८ ॥ (धैर्यसे मरण दुःखनाशक हैं। )- आयुष्य जव समाप्त होता है तब धैर्यगलित होनेपरभी मरनाही पडता है। इसलिये धैर्यवान् लोगोका जो मरण है वह दुखको जलानेवाला है । तात्पर्य-धैर्यसे प्राणत्याग करनाही श्रेष्ठ है ।। ४९ ।। ( क्रियाकाण्डका वर्णन। )- जैन सिद्धान्तसूत्रोके अनुसार विद्वज्जन (मुनि) क्रियाकाण्ड करते है इसलिये उस क्रियाकाण्डका अव मैं वर्णन करता हू॥ ५० ॥ ( सविचारभक्तप्रत्याख्यानके सुत्रोका विवरण।)- अर्ह, लिग, शिक्षा, विनय, समाधि, अनियतावास ( अनियतविहार ) परिणाम, उपधित्याग, उत्तम श्रेणिसमारोहण, पवित्र तपकी भावना, प्रशसनीय सल्लेखना, दिशा, परस्परक्षान्ति (क्षमा), उत्तम अनुशासन, चर्या, मार्गणा, सुस्थित, स्वसमर्पण, परीक्षा, निर्विघ्नतासे अवलोकन करना, आपृच्छा, प्रतिपृच्छा, आलोचना, गुणदोपालोचना पवित्र सस्तरोपस्था, निर्यापकगण, प्रकाशन, अवहानि, प्रत्याख्यान, पुन. क्षमा, क्षमण, सारण, शुद्धि, कवच, समता, ध्यान, लेश्या, फल, वास और देहत्याग। इन सूत्रोके ----- १ आ त्रये २ आ. वालाक ३ आ धर्यवता ४ आ पर -१२ ५७) सिद्धान्तसार (२८७ शय्या च संस्तरोपस्था निर्यापकगणस्तथा। प्रकाशना च हानिश्च प्रत्याख्यान क्षमा पुन ॥५५ क्षमणं सारणा शुद्धिः कवच समता पुन. । ध्यान लेश्या फल वासो देहत्यागस्तत परम् ॥५६ आराधना विधातव्या ह्येतत्सूत्रानुसारत । अन्यथा जायते जन्तुमिथ्यात्वाराधनाधम ॥ ५७ अनुसार आराधना करनी चाहिये । यदि ऐसा नहीं किया जायगा, इनसे उलटा क्रियाकाण्ड किया जायेगा, तो वह यति-श्रावक आराधक मिथ्यात्वकी आराधनासे अधम होगा॥५१-५७।। इन चालीस सूत्रपदोका स्पष्टीकरण इस क्रमसे है- १ अर्ह- सविचारभक्त प्रत्याख्यानके योग्य व्यक्तिको अर्ह कहते है । जो मुनि अथवा गृहस्थ उत्साह और वलसे युक्त है, जिसको मरणकाल अकस्मात् प्राप्त नही हुआ है और जिसका विधिपूर्वक परगणमे विहार होता है तथा वहा जाकर आहारका और कपायोका त्याग विधीपूर्वक करता है ऐसे साधु तथा गृहस्थके मरणको भक्तप्रत्याख्यानमरण कहते है अर्हप्रकरणमे उपर्युक्त लक्षणोका व्यक्ति सल्लेखनाके योग्य है। २ लिंग- शिक्षा, विनय, समाधि वगैरह क्रिया भक्तप्रत्याख्यानकी सामग्री है । उस सामग्रीका यह लिंग योग्य परिकर है । सर्व परिकर सामग्री जुडनेपर जैसे कुभकार घट निर्माण करता है, वैसे योग्य व्यक्तिभी साधन सामग्री पाकर सल्लेखना कार्य करता है। लिङ्ग शब्दका अर्थ चिन्ह होता है। सपूर्ण वस्त्रोका त्याग अर्थात् नग्नता, लोच- हाथसे केग उखाडना, शरीरपरसे ममत्व दूर करना अर्थात् कायोत्सर्ग करना, प्रतिलेखन प्राणिदयाका चिन्ह अर्थात् मयूरपिच्छिको हाथमे धारण करना इस तरह चार प्रकारका लिंग है । ३ शिक्षा- शास्त्राध्ययन । ज्ञानके विना विनयादिक करना अशक्य है, अत शास्त्राध्ययन करना चाहिये । जिनेश्वरका शास्त्र पापहरण करनेमे निपुण है, अत उसको पढना चाहिये। ४ विनय- मर्यादा पालन करना । गुरुओकी उपासना करना । ५ समाधि- मनको एकाग्र करना, मनको शुभोपयोगमे अथवा शुद्धोपयोगमे एकाग्न करना। ६ अनियतावास- अनियत ग्राम, पुरादिक स्थानोमे रहना । ७ परिणाम- अपने कर्तव्यका सदा विचार करना । ८ उपधित्याग- परिग्रहका त्याग करना । ९ श्रेणिसमारोहण- उत्तरोत्तर शुभपरिणामोकी उन्नति करना । १० भावना- परिणामोमे सक्लेश नही उत्पन्न होनेका अभ्यास करना । ११ सल्लेखना- शरीर और कपायोको कृश करना । । -- १ आ सस्तर पूनो २ आ जन्तो २८०) सिद्धान्तसार. (१२ १६- १२ दिशा- आचार्यने अपने स्थानपर स्थापित किया हुआ शिष्य जो परलोकका उपदेश करके मोक्षमार्गमे भव्योको स्थिर करता है, जिसको वालाचार्य कहते हैं, यह गिष्य आचार्यके समान गुणोका धारक होता है। १३ परस्पर क्षान्ति- अन्योन्य क्षमाकी याचना करना । १४ अनुशासन- आगमके अविरुद्ध उपदेश देना। १५ चर्या- अपना सघ छोडकर परगणमे- अन्यसघमे गमन करना। १६ मार्गणा- रत्नत्रयकी विशुद्धि करनेमे समर्थ अथवा समाधिमरण करनेमे समर्थ ऐसे आचार्यको ढूडना, शोधना। १७ सुस्थित- परोपकार करनेमे तथा स्वकीय आचार्यपद- योग्य कार्य करनेमे प्रवीण गुरुको सुस्थित कहते है। १८ स्वसमर्पण- आचार्यके चरणमूलमे गमन करना, आचार्यके स्वाधीन होना । १९ परीक्षा- गण, शुश्रूषा करनेवाले मुनि समाधिमरणाराधक, उत्साहशक्ति, आहारकी अभिलाषा इत्यादिककी परीक्षा करना। २० निर्विघ्न अवलोकन- आराधनामे विघ्न उपस्थित होनेसे आराधनाकी सिद्धि नही होती है । अत. उसकी निर्विघ्नताके लिये राज्य, देश, गाव, नगर वगैरहका शुभाशुभावलोकन । २१ आपृच्छा- यह आराधक भक्तप्रत्याख्यानके लिये आया है इसके ऊपर अनुग्रह करना योग्य है या नही ऐसा संघसे प्रश्न करके उनसे सम्मति प्राप्त करना। २२ प्रतिपृच्छा- परिचारक मुनियोकी सम्मति मिलनेपर एक आराधकको स्वीकारना। २३ आलोचना- गुरुके आगे अपने पूर्वापराध कहना। २४-२५ गुणदोष- आलोचनाके गुणदोषोका वर्णन करना। २६ सस्तरोपस्था- समाधिमरण साधनेके लिये आराधककी योग्य वसतिका निवास । सस्तर- अर्थात् आराधकके लिये आगमोक्त शय्या। २७ निर्यापकगण- आराधकको समाधिमरण साधनेमे सहायता करनेवाले आचार्यादिक । २८ प्रकाशन- आहारको दिखाना। २९ अवहानि- क्रमसे आहारका त्याग करना । ३० प्रत्याख्यान- तीन आहारोका त्याग । ३१-३२ क्षमा क्षमण- आचार्यादिकोको क्षमाकी याचना करना तथा दूसरोके किये हुए अपराधोंकी क्षमा करना । ३३ सारणा- दु खसे पीडित हुए और मोहसे बेसुध हुए मुनिराजको सावधान करना सचेत कर देना।

-१२ ६०) सिद्धान्तसार (२८९ -- -- असाध्ये च महाव्याघौ दुर्भिक्षे वातिदारुणे। उपसर्गप्रवृत्तौ वा साधुर्योग्य. प्रजायते ॥ ५८ गृहीत्वा लिङ्गमत्युद्घ कृत्वा शान्तं मनोऽधिकम् । सर्वसगपरित्यागो विधातव्य. प्रयत्नतः ॥५९ मृत्योर्मोति' परित्यज्य स्थिरचित्तेन धीमता । शुभकभावनाया हि स्थातव्यं शुभलेश्यया ॥६० ३४ शुद्धि- समाधिमरणके लिये उद्युक्त हुए मुनिराजको आचार्य उपदेश देते हैं । ३५ कवच- जैसे कवच- बखतर सैकडो वाण पडनेपर उत्पन्न हुए दुखोसे वीर- पुरुषको बचाता है, वैसे आचार्यका किया हुआ धर्मोपदेश आराधकको दु खोसे बचाता है। चतुर्गतिमे पूर्वभवमे आराधकके आत्माने दुसह दुखोका अनुभव लिया है, परतु वह सब व्यर्थ हुआ । वह दु खसहन आत्म-हितकारी नहीं हुआ। परतु हे आराधक इस समय जो दुख तेरे द्वारा सहा जा रहा है वह तेरे कर्मकी निर्जरा करेगा। वर्तमान दुखोको नष्ट करके अतीन्द्रिय, निश्चल, उपमारहित, वाधारहित सुख देगा। इस प्रकार कहा हुआ आचार्यका उपदेश आराधकके दु खोका नाश करनेवाला होनेसे कवचके तुल्य है । अत इसको कवच नाम देना योग्यही है । जैसे किसी तेजस्वी बालका शौर्यगुण सूचित करनेके लिये उसमे सिंह शब्दका आरोपण करते है वैसे यहाभी कवचगुणोका अध्यारोपण उपदेशमे करके उसको कवच शब्दसे गौरवित किया है । ३६ समता- जीवित, मरण, लाभ, हानि, सयोग, वियोग, सुख और दुख इनमे रागद्वेपोका त्याग करके उपेक्षावुद्धि धारण करना । ३७ ध्यान- अन्यपदार्थोंसे चित्तको हटाकर उसको एकविषयमे नियुक्त करना। ३८ लेश्या- मन-वचन और शरीरके व्यापार कषाययुक्त होना । ३९ फल- आराधनासे प्राप्त हुए साध्यको फल कहते हैं। ४० देहत्याग- आराधकका देह छोडना । इस प्रकार भक्त प्रत्याख्यानके चालीस अधि- कारोका सक्षिप्त विवेचन किया है। इसका विस्तृत विवेचन मूलाराधनामें पाठक देखें॥५१-५७।। ( सल्लेखनाधारण करने योग्य परिस्थितिका वर्णन । )- जब किसी साधुके सयम- समुदायको नष्ट करनेवाला और महाप्रयत्नसेभी जिसकी चिकित्सा न हो सके ऐसा रोग होनेसे वह भक्तप्रत्याख्यानके योग्य होता है । जिसमे जीनेकी सभावना नहीं है ऐसा अतिशय भयकर दुर्भिक्ष पडनेपर, या देवकृत, मनुष्यकृत, तियंचकृत उपसर्ग होनेपर साधु सल्लेखनाके लिये योग्य होता है ।। ५८॥ ऐसी परिस्थितिमे अत्यन्त श्रेष्ठ-महान्- जिनलिंग धारण कर, तथा मन अधिक शान्त करके सपूर्ण परिग्रहोका त्याग प्रयत्नसे करना चाहिये ॥ ५९ ॥ मृत्युका भय हृदयसे निकाल देना चाहिये । जिसका स्थिरचित्त हुआ है, ऐसे विद्वान् मुनिवर्यको शुभलेश्या धारणकर ( पीत, पद्म और शुक्ल लेश्यामोको शुभलेश्या कहते हैं । इनके लक्षण गताध्यायमे दिये हैं ) शुभभावनाओमेही तत्पर रहना चाहिये ॥ ६० ॥ - .. १आ मरणस्य भय त्यक्त्वा SS 37.

२९०) सिद्धान्तसार (१२ ६१- आराधनामहाशास्त्रवाचनादत्तमानसः । स्थातव्यं श्रीजिनागारे भव्यनिर्यापकान्विते ।। ६१ असंक्लिष्टा च संक्लिष्टा भावना द्विविधा मता । संक्लिष्टां च परित्यज्य भावयेदपरां वुधः॥६२ संसर्गा-सन्ति ये केचिद्रागद्वेषस्य बृहकाः । वर्जनीया भवन्त्येतैः संक्लिष्टा भावना यतः ॥ ६३ कन्दर्पकौत्कुचालादि' भावयजायते यदि । कन्दर्पभावनोपेतो ह्यपेतः शुभसन्ततः ॥ ६४ ज्ञानस्य ज्ञानयुक्तस्य धर्माचार्यस्य साधुषु । मायाद्यवर्णवादी स्याकिल्बिषी भावनान्वितः ।। ६५ ( सल्लेखनाधारक जिनमदिरमे रहे। )- आराधना- महाशास्त्रके पढनेमे जिन्होंने अपना मन एकाग्र किया है, ऐसे मुनियोको ( सल्लेखना धारक मुनिको ) भव्य और निर्यापक जिसमे हैं ऐसे श्रीजिनमदिरमे निवास करना चाहिये ।। ६१ ।। ( भावनाके भेद । )- असक्लिष्ट-भावना और सक्लिष्ट-भावना ऐसे भावनाके दो भेद हैं । परतु सक्लिष्टभावनाओको छोडकर असक्लिष्टभावनामे विद्वान् मुनि स्थिर रहे-शुभ और शुद्ध भावनाओका हमेशा चिन्तन-अभ्यास करे ।। ६२ ।। रागद्वेषको वृद्धिंगत करनेवाले जो सग-मिथ्यादृष्टि कामी आदि पुरुषोकी सगति है उसे त्यागना चाहिये । यदि इनका त्याग नही किया जायेगा तो इनसे संक्लिष्ट भावनाओंकी प्रसूति होगी ॥ ६३ ॥ ( कन्दर्पभावनाका लक्षण । )- कंदर्प-प्रीतिकी उत्कटतासे-तीव्रस्नेहसे हास्यसहित असभ्य वचन बोलना, भंडवचन बोलना कदर्पवचन है । अतिशय रागवश होकर, हसकर दूसरोके प्रति शरीरके असभ्य अभिनयके साथ असभ्य वचनोच्चार करना कौत्कुच्य है, कुचाल है। इत्यादि भावनाओका यदि कोई साधु चिंतन करता है तो वह कन्दर्पभावनाओसे युक्त है । ऐसी भावनामोसे वह शुभकार्योसे और शुभपरिणामोसे दूर होता है ।। ६४ ॥ ( किल्विषभावनाका स्वरूप । )- जो मुनि ज्ञानका, ज्ञानयुक्त केवली भगवतका, धर्मका तथा उसका प्रतिपादन करनेवाले गणधरादि श्रुतकेवलियोंका, उपाध्याय मुनियोका और रत्नत्रयाराधक साधुओका अवर्णवाट प्रगट करता है अर्थात् उनमे दोष न होते हुएभी दोष दिखाता है तथा जो ज्ञानमे-श्रुतज्ञानमे कपट करता है अर्थात् जो उसमे प्रेम तो नही रखता है, परंतु ऊपरसे विनय करता है वह ज्ञानविषयक मायावी है। केवलियोमे मानो आदर दिखा रहा है परतु मनमे उनकी पूजा करना जिसे पसंत नही है वह केवलिविषयक मायावी है। चारित्रको धर्म कहते है इस धर्मकी मैं अतिशय भक्ति करता हू ऐसा वाह्य धर्माचारसे लोगोको दिखाता है, परतु मनमे धर्मके प्रति जिसका अनादर-अरुचि है, वह धर्म मायावी है। आचार्य, १ मा कौतुकुच्यादि २ आ यति ३ आ कैल्विषी - -१२. ७०) सिद्धान्तसार (२९१ हृद्यास्वादनिमित्तं' यो मन्त्रतन्त्रादितत्परः । आभियोगिकनिन्यायां भावनाया स जायते ॥६६ अनुवद्धमहारोपो बद्धवरः सविग्रहः । सुतीव्रतपसा युक्तोऽप्यासुरीभावनावहः ॥ ६७ अप्रपन्नं जिनेन्द्रेण समुन्मार्ग प्रकाशयन् । मोहेन मोहयल्लोकं योऽयं समोहभावकः ।। ६८ इत्यादिभावनोपेतो यस्तीवरतपसा' युतः । देवदुर्गतिमाप्नोति तदृते भवभागिह ॥ ६९ ज्ञानदर्शनचारित्रतपोवीर्यादि भावयेत् । प्रशस्तभावनोपेतो यः स याति शुभां गतिम् ॥ ७० - ... .. .---- - उपाध्याय और साधुओकी ऊपरसे भक्ति करता है, परतु हृदयमे उनके प्रति अरुचि रखता है वह आचार्यविपयक, उपाध्यायविपयक और साधुविषयक मायावी है। ऐसी भावनाओसे युक्त मुनिको किल्विपभावनावाला मुनि कहते है ।। ६५ ।। ( अभियोगि-भावनाका स्वरूप। )- मृष्ट आहारके आस्वादनके लिये जो मत्रतत्रादिकोमे तत्पर रहता है, जो इन्द्रियसुखके लिये मत्रतत्रादिक करता है, वह अभियोगिक- नामक निन्द्यभावनासे युक्त है ऐसा समझना चाहिये ।। ६६ ।। ( आसुरीभावनावाले साधुका स्वरूप । )- जिसका महाकोप अन्य भवमेमी जानेवाला है ऐसे महाकोपी मुनिको अनुवद्धमहारोप धारण करनेवाला मुनि कहते हैं। तथा जो कलह करता है, तथा जो सक्लेशपरिणाम धारण करता हुआ तीन तप करता है वह आसुरी- भावनाओका धारक मुनि माना जाता है ।। ६७ ।। ( समोहभावनावाले मुनिका स्वरूप । )- जिसने जिनेश्वरका बताया हुआ मोक्षमार्ग नही माना है अर्थात् जिससे रत्नत्रयमार्गमे दूपण दिखाये जाते हैं ऐसे मोहसे-मिथ्यात्वसे जो लोगोको मोहित करता है तथा आप्ताभासो-हरिहरादिकोद्वारा चलाया हुआ यज्ञमे पशुवध करना धर्म है इत्यादि कुमार्गीको प्रगट कर जो लोगोको मोहित करता है वह मुनि समोह- भावनावाला समझना चाहिये ॥ ६८ ॥ जो मुनि कान्दी आदिक भावनामोसे युक्त होकर तीव्र तपश्चरण करता है वह देव- दुर्गतिको प्राप्त होता है । अर्थात् मरणोत्तर कंदर्प जातिके देवोमे, आभियोग्य देवोमे, तथा किल्विपिक देवोमे यानी हीन देवोमे जन्म लेता है ।। ६९ ।। ( प्रशस्त भावनायुक्त मुनिको शुभगतिकी प्राप्ति । )- उपर्युक्त कुभावनाओंसे भिन्न जो शुभभावनाये हैं उनकी भावना करनेवाला मुनि प्रशस्त भावनावाला है । अर्थात् सम्यग्दर्शन सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्र, तप और वीर्य आदिक गुणोका आदर, मनन करनेवाली भावनामोमे जो तत्पर रहता है उसको प्रशस्त-शुभगतिकी प्राप्ति होती है । अर्थात् वह इन्द्र सामानिकादि श्रेष्ठ देवोमे जन्म लेता है ॥ ७० ॥ ma .. १ आ. गृया २ आ यति ३ आ तपोयुत ४ मा भावयन् ५ आ. उत्तमभावनोपेत २९२) सिद्धान्तसार. (१२.७१- एवमागमतः सर्वं ज्ञातव्यं तत्त्ववेदिभिः । न ात्रावगतं किञ्चिद्यतः सारं प्रगृह्यते ॥ ७१ अत्र युक्तमयुक्तं वा मयाज्ञानेन भाषितम् । सन्तः संशोव्य शृण्वन्तु सौजन्यमिति संश्रिताः॥७२ सत्यं मधुरमाख्यान्ति छमृतादिरसं बुधाः । परं सुजनवाक्यस्य माधुर्यमपरं कियत् ॥ ७३ अनय मणिनमल्यं जडस्यापि भवेदिह । अजाड्यस्वच्छवृत्तीन सौजन्येन कथं सताम् ॥ ७४ ये सन्तः सर्वदा सन्ति साधवः शुभसंयुताः । ते साधम्यं समालोक्य हृष्यन्ति न गुणैर्मम ।। ७५ सन्तः श्रीजिनराद्धान्तनामतोऽप्यतिवत्सलाः । भवन्ति किं पुनर्यत्र किञ्चिच्चित्रं निशम्यते ॥७६ ये तु दुर्जनभावेन भवन्ति भविनो भुवि । ते च सर्वे' स्वभावेन दूषयन्ति दुराशयाः ॥ ७७ विषाददुःखमवाप्नोति सत्यं प्राणी सुदुःसहम् । दुर्जनादाप्तदुःखस्यानन्तभागो न तत्पुनः ॥ ७८ ------- तत्त्वोंके ज्ञाताओको आगमसे सर्व जानना योग्य है । मेरे पास ऐसा कुछ विशेष जान नहीं जहांसे आप बुद्धिमान पुरुष सारग्रहण करेंगे ॥ ७१ ॥ ( ग्रंथकारकी नम्रता।)- इस सिद्धान्तसारसंग्रह ग्रंथमें अजानी ऐसे मुझसे जो कुछ युक्तियुक्त अथवा अयुक्त कहा गया हो उसे सौजन्यवृद्धिका आश्रय करनेवाले सज्जन संशोधन करके सुने । अर्थात् यह ग्रंथ युक्तियुक्त हैं या अयुक्त है इसका निर्णय करे। दोषोंको त्यागकर गुणग्रहण करें।। ७२॥ ( सज्जनोंके वचन अमृतके समान हैं। )- वुध-विद्वज्जन अमृतादिके समान जिसका रस है-स्वाद है ऐसा मधुर सत्य भाषण वोलते हैं। सज्जनोंका भाषण अत्यंत मधुर है ऐसा हम कहते हैं । इससे अधिक हमने क्या कहा जा सकता है ।। ७३ ।। जिनमे जाड्य-मूर्खता-अज्ञान नहीं है तथा जिनकी मनोवृत्ति निर्मल-निष्कपट है ऐसे सज्जनोकी सज्जनतासे जो जड-अचेतन है ऐसे रलकी निर्मलता क्या अनर्य-अमूल्य-श्रेष्ठ हो सकती है? कदापि नहीं ॥ ७४ ।। जो सज्जन सर्वदा शुभविचारोसेयुक्त ऐसे साधुस्वभावको धारण करते हैं वे यहभी हमारे समान हैं ऐसा समझकर हर्पित होते हैं । परंतु इसमे मेरा कुछ गुण कारण नहीं है । अर्थात् उनकाही सज्जनता गुण होनेसे वे हर्पित होते हैं ।। ७५ ।। सज्जनगण श्रीजिनसिद्धान्तके नामसेभी अतिशय आल्हादित होते हैं । इसमे क्या आश्चर्य है? ।। ७६॥ (दुर्जनोंका स्वभाव 1 )- जो प्राणी इस जगतमे दुष्टोंका स्वभाव धारणकर उत्पन्न होते हैं वे सब अपने दुरभिप्रायसे स्वाभाविकतया सबको विगाडनेका प्रयत्न करते हैं ।। ७७ ॥ प्राणी विपसे सुदुःसह दुखको प्राप्त होते हैं, यह वात सत्य है । परतु दुर्जनके संगसे जो दुःख होता है उसका व अनन्तवा भाग है अर्थात् दुर्जनसगका दुख विपसे उत्पन्न होनेवाले दुःखसे अनंतगुणित अधिक है ॥ ७८ ॥ १ बा. मेष. २ आ. अविमत्रित. ३ मा सर्व -१२ ८७) सिद्धान्तसार (२९३ वह्निर्दहति संस्पर्शादुर्जनी दर्शनादपि । कथं वह्निसमं निन्यं कथयन्ति महाधियः॥ ७९ सर्पा व्याघ्रा गजाः सिंहाः वश्या जगति धीमताम् । तेषामपि न ते दुष्टा दुर्जना वशतिन ॥ ८० भवन्ति दवदग्धा ये फलिताः पुष्पिता. पुनः । दुष्टदावाग्निदग्धाना प्ररोहोऽपि न दृश्यते ॥८१ मन्त्रतन्त्रप्रयोगेण कालदष्टोऽपि जीवति । दुष्टसर्पप्रदष्टा ये न ते जीवन्ति जातुचित् ॥ ८२ भिषग्वरविधानेन गदादपगतो नरः । दुष्टवाक्यविकाराणा चिकित्सापि न विद्यते ॥ ८३ यदि वाग्देवता जैनी प्रसादं कुरुते नरः । गुणान्दोषांश्च शक्नोति वक्तुं सदसतोरिह ।। ८४ दुष्षमाकालयोगेऽस्मिज्ञानवानिति गवित । यःस्यात्सोऽस्तु सतां मध्ये सोऽह मूर्योऽस्मि केवलम्।। पुरा जाताः केचित्सकलभुवनाभासिमतयः । ततस्त्रिज्ञानाढयाः कति कतिचनाङ्गेषु निपुणाः ।। इदानी ते देशादपि लवलवाकचतुराः । चरन्तो मन्यन्ते त्रिभुवनपाण्डित्यमहह ।। ८७ -- ----- अग्नि स्पर्शसे आदमीको जलाता है परतु दुर्जन दर्शनसेही मनुष्यको जलाता है। महाबुद्धिमान् पुरुष उस निंद्य दुष्टको क्या अग्निसमान समझते हैं ? अर्थात् अग्निसेभी दुर्जन- अधिक दुखदायक है ।। ७९ ॥ सर्प, वाघ, हाथी, सिंह ये जगतमे बुद्धिमानोके वश होते हैं परतु दुष्ट दुर्जन उनकेभी (बुद्धिमानोकेभी) वश नही होते हैं । ८० ।। जो वृक्ष अग्निसे दग्ध हुए हैं वे पुन पुष्पित और फलोसे लद जाते हैं परतु दुर्जन- रूपदावाग्निसे जले हुए पुरुष तो भस्मही हो जाते हैं, उनका अकुरभी दुष्टिगोचर नहीं होता। कृष्णसर्पसे डसा हुआ मनुष्य मत्रप्रयोगसे तथा तत्रप्रयोगसे पुन जीवित होता है परतु जो दुर्जनरूप सर्पसे डसे हुए हैं वे कदापि नही जीयेंगे ॥ ८१-८२ ॥ उत्तम वैद्यके इलाजसे मनुष्य रोगसे रहित होता है परतु दुष्टोका उपदेश सुनकर जिसमे विकृति पैदा हुई है उसके लिये चिकित्सा नही है अर्थात् दुष्ट उपदेशसे बिगडा हुआ मनुष्य सज्जन नही होता है ।। ८३ ॥ यदि जिनेश्वरके मुखसे उत्पन्न हुई सरस्वती देवता प्रसाद देगी अर्थात् जिसके ऊपर प्रसन्न होगी वह मनुष्य सज्जन दुर्जनोके गुण और दोषोका विवेचन करनेमे समर्थ होगा ॥८४॥ ( पचमकालका दोष । )- पचमकालका सयोग प्राप्त कर ज्ञानवान मनुष्य सज्जनोके समूहमे अतिगर्वयुक्त होता है लेकिन मैं तो वास्तविक मूर्ख हू ॥ ८५ ।। पूर्वकालमे चतुर्थकालमे सपूर्ण जगतको प्रकाशित करनेवाली मति जिनकी थी ऐसे महापुरुष अर्थात् केवली भगवान होते थे। तदनतर मति श्रुत और अवधिज्ञानके धारक हुए तदनतर कुछ कुछ अगोमे निपुण ऐसे आचार्य हुए। अब उन अगकाभी कुछ भागका भाग और उसकाभी आधा भाग जाननेमे चतुर ऐसे लोक इस जगतमे है इतना तुच्छज्ञान होनेपरभी वे सपूर्ण त्रैलोक्यको अपने सामने अपण्डितोसे भरा हुमा समझ रहे हैं ॥ ८६-८७ ॥ । --- १ मा नरे २ आ दुखमा ३ आ. मान्य २९४) सिद्धान्तसार (१२.८८- अन्यकर्तुः प्रशस्तिपद्यानि । श्रीवर्धमानस्य जिनस्य जातो मेदायनामा दशमो गणेशः । श्रीपूर्णतल्लान्तिकदेशसंस्थो यत्राभवत्स्वर्गसमा धरित्री ।। कल्पोर्वोरहतुल्याश्च हारकेयूरमण्डिताः । जाता झाटा (लाटा ) स्ततो जातः संघोऽसौ झाट (लाट ) बागडः ।। ८८ श्रीधर्ममेनोऽजनि तत्र संघे दिगम्बरः श्वेततरंगुणः स्वः। व्याख्यासु दन्तांशुभिरल्लसद्भिर्वस्त्रावृतो वा प्रतिभासते स्म ।। भजवादीन्द्रमानं पुरि पुरि नितरां प्राप्नुवन्नुद्घमानम् । तन्वशास्त्रार्थदानं कृतिरुचिरुचिरं सर्वथा घ्ननिदानम् ।। ८९ विद्यार्थीपमानं दिशि दिशि विकिरन्स्वं यशो योऽसमानम् । तस्माच्छीशान्तिपेणः समननि मुगुरुः पापधूलोसमीरः ।। यत्रास्पदं विदधती परमागमश्रीरात्मन्यमन्यत सतीत्वमिदं विचित्रम् । वृद्धा च संततमनेकजनोपभोग्या श्रीगोपसेनगुरुराविरभूत्स तस्मात् ॥ ९० --- --- ( कवि प्रगस्ति मेदार्य गणवर । )- श्रीवर्धमान जिनेश्वरके मैदार्य नामक दसवे गणवर हुए। उनका देह लक्ष्मीसे पूर्ण और उत्तम सामुद्रिक चिह्नोंसे युक्त था। वे प्रभु मेदार्य जहाँ हुए वह भूमि स्वर्गके समान थी। ( लाट और लाटवागड संव।)- वहां हार केयूर-भूषणोंस मंडित कल्पवृक्षके समान लाट हुए और उनसे लाट वागड संघ उत्पन्न हुआ ।। ८८॥ (श्रीधर्मसेन मुनिराज।)- उस लाट वागड सघमे श्रीधर्मसेन नामक दिगम्बर मुनि उत्पन्न हुए । वे जब आगमकी व्याख्याओंका प्रतिपादन करते थे उस समय वे अपने अतिशय शुन्न गुणोंने तथा चमकनेवाले दन्तकिरणोंसे मानो वस्त्रसे आच्छादित हुएसे दीखते थे। (शान्तिपेण गुरु। )- प्रत्येक नगरमें वादियोंके इन्द्रोंका अर्थात् अन्यमतीय महाविद्वानोंका मान तोडनेवाले, ग्रंथरचनाकी कांतिसे सुदर ऐसे गास्त्रार्थक झारको सर्वत्र फैलानेवाले, निदान शल्यको नष्ट करनेवाले, सरस्वतीका मानो निर्मल दर्पण है ऐसा अपना अनुपम या परमार्थतया सर्व दिशाओंमे फैलानेवाले ऐसे शान्तिपेण मुनि धर्मसेन यतिसे उत्पन्न हुए हैं। जो कि पापल्पी वूलीको उडानेमे वायुके समान थे और सद्गुरु थे। (गोपवेन गुरु।)- इस शान्तिपेण मुनिराजमें वसनेवाली परमागमल्म लक्ष्मी वृद्ध होकरभी हमेचा अनेक जनोंसे उपभोगी जाती थी, तथापि वह अपनेको पतिव्रता समझती थी यह बडा आश्चर्य है। परिहार-वान्तिपेण मुनिमें परमागमका जान अतिगय वढ गया था। वे अपना मागमनान अनेक लोगोंको देते थे, उनका वह ज्ञान पवित्र था, ऐसे शान्तिपेण गुरुसे गोपसेन नामक गुरु-आचार्य उत्पन्न हुए हैं ।। ८९-९० ।।

-१२ ९३) सिद्धान्तसार (२९५ उत्पत्तिस्तपसां पद च यशसामन्यो रविस्तेजसाम् । आदिः सहचसां विधिः श्रुतरमासान्निध्यनिःश्रेयसाम् ॥ आवासो गुणिना पिता च शमिना माता च धर्मात्मनाम् । अज्ञातः कलिना जगत्सु वलिना श्रीभावसेनस्ततः ॥ ९१ ख्यातस्ततः श्रीजयसेननामा जातस्तपश्रीमतदुष्कृतौधः। सत्तर्कविद्यार्णवपारदृश्वा विश्वासगेह करुणास्पदानाम् ॥ आचार्यः प्रशमैकपात्रमसमः प्रज्ञादिभिः स्वर्गुण । पट्टे श्रीजयसेननामसुगुरो. श्रीब्रह्मसेनोऽजनि ॥ ९२ यज्जल्पाम्बुधिमध्यमग्नवपुषः शश्वद्विकल्पोमिभिः । जल्पाकाः परवादिनोऽत्र विकला के के न जाताः क्षिती। तस्मादजायत गणी गुणिनां वरिष्ठो भव्याम्बुजप्रतिविकासनपद्मबन्धुः । कन्दर्पदर्पदलने भुवनैकमल्लो विख्यातकोतिरवनौ कविवीरसेन ॥ ९३ m- ( श्रीभावसेन यतिराज । )- गोपसेन आचार्यसे भावसेन यतिराज उत्पन्न हुए। वे तपोका उत्पत्तिस्थान थे। यशोका निवासगृह थे। दूसरे सूर्यके समान तेजका आश्रम थे। शुभ सुदर वचनोको वे आदि थे । अर्थात् शुभ सुदर उपदेश चे भव्यजनोको देते थे। श्रुतलक्ष्मीका सानिध्य धारण करनेवाले नि श्रेयस्का-मोक्षमार्गका वे निधि थे। वे गुणियोंके आश्रयदाता, शम धारण करनेवाले मुनियोके पिता और धर्मात्माओके लिये माताके समान थे। इस जगतमे बलवान् कलहोका जिन्हे ज्ञान नही था ऐसे भावसेन मुनि श्रीगोपसेन गुरुसे प्रगट हुए ॥ ९१ ।। (श्रीजयसेन गुरु । )- तपोलक्ष्मीके द्वारा जिन्होने पापसमूह नष्ट किया है, जो निर्दोष तर्कविद्यारूप समुद्रके पारगामी थे और करुणासे स्थानरूप मुनिजनोके लिये विश्वासगृह थे ऐसे प्रसिद्ध जयसेन नामक गुरु भावसेन मुनीश्वरके अनतर हुए। (ब्रह्मसेन गुरु । )- श्रीजयसेन नामक सद्गुरुके पट्टपर श्रीब्रह्मसेन नामक मुनिराज हुए, जो कि प्रशमके अद्वितीय पात्र थे। तथा स्वसमयज्ञान, परसमयज्ञान और न्यायादिक शास्त्रोका ज्ञान इत्यादि गुणोसे शोभते थे। निर्दोष जल्परूप समुद्रमे उनका देह मग्न हुआ था वे हमेशा विकल्परूप तरगोको धारण करते थे। उनके सामने इस भूतलपर कुत्सितवाद करनेवाले कौन कौन अन्यमतीय विद्वान् वादसामर्थ्यसे हीन नहीं हुए हैं ? ।। ९२ ।। ( कवि वीरसेन । )- जो भव्यकमलोको विकसित करनेके लिये पद्मवधु सूर्य हैं, जो मदनका गर्व दलित करनेमे जगतमे अद्वितीय मल्ल हैं, जो गुणियोमे महान् हैं, जिनकी कीर्ति भूतलमे प्रसिद्ध है ऐसे श्रीवीरसेन आचार्य ब्रह्मसेन गुरुसे उत्पन्न हुए अर्थात् ब्रह्मसेनके शिष्य वीरसेन उनसे पट्टपर आरूढ हुए ॥ ९३ ॥ ?

२९६) सिद्धान्तसार (१२. ९४- श्रीवीरसेनस्य गुणादिसेनो जातः सुशिष्यो गुणिनां विशेष्यः । शिष्यस्तदीयोऽजनि चारचित्तः सदृष्टिचित्तोऽत्र नरेन्द्रसेनः ॥ गुणसेनोदयसेनौ जयसेनो संबभूवुरतिवर्याः । तेषां श्रीगुणसेनः सुरिजर्जातः कलाभूरिः ॥ ९४ आदुष्पमानिकटवतिनि कालयोगे, नष्टे जिनेन्द्र शिववर्त्मनि यो बभूव आचार्यनामनिरतोऽत्र नरेन्द्रसेन. । तेनेदमागमवचो विगदं निबद्धम् ॥ ९५ इति श्रीसिद्धान्तसारसंग्रहे' पण्डिताचार्यनरेन्द्रसेनाचार्यविरचिते द्वादशोऽध्यायः । समाप्तोऽयं सिद्धान्तसारसंग्रहः । (गुणसेन मुनि और नरेन्द्रसेन । )- श्रीवीरसेनाचार्यके शिष्य गुणसेन हुए जिनमे शास्त्राभ्यासकी विशेषता थी। तथा गुणसेनसूरिके नरेन्द्रसेन नामक गिण्य हुए, उनका चित्त सुदर था अर्थात् कोपादिकपायोसे दूर था और जिनवाणीके ज्ञानसे भूपित तथा वे सम्यग्दृष्टि थे। ( गुणसेन, उदयसेन और जयसेन भाचार्य। )- श्रीवीरसेनमूरीके गिप्य गुणसैन, उदयसेन और जयसेन सूरी हुए । उनमे श्रीगुणसेन सूरि अनेक कलाओके धारक हुए ॥ ९४ ।। ( सिद्धान्तसार-सग्रह ग्रंथके कर्ता श्री नरेन्द्रसेनाचार्य । )- दुप्षमाके निकटवर्ति कालके योगसे श्रीजिनेश्वरका कहा हुआ मोक्षमार्ग नष्ट होनेपर जो आचार्योंके नाममे तत्पर हैं ऐसे नरेन्द्रसेन आचार्य हुए और उन्होंने इस विशद आगमवचनकी रचना की अर्थात् 'श्री सिद्धान्तसारसंग्रह' ग्रय रचा है ।। ९५ ।। श्री पण्डिताचार्य श्रीनरेन्द्रसेनाचार्य विरचित सिद्धान्तसारसङ्ग्रहमे वारहवा अध्याय समाप्त हुआ। १ आ. इति सिद्धान्तसारसका आचार्यत्रीनरेन्द्रनेनविरचिते द्वादशोऽव्याय. समाप्त ।

No text on this page.

Siddantasarsangrah

Author
Chandrasenacharya
Title
Siddantasarsangrah
File name
Siddantasarsangrah
Text
OCR done
Citation
1972
Published
2009/11
Publisher
Sholapur, Jivaraj Jain Granthamala
Language
Sanskrit
Pages
322
Library
Sanmati Library, Jaipur
Classification
Siddhant - Sar - Sangrah
DLI number
344425
Barcode
99999990234291.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
Rights
Copyright permitted
VMLT id
PzwDErHMApJ
Download PDF

Siddantasarsangrah