Hindi Sahataya Samalayan

Padaya Parijat (pahala Bhag)

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HINDI PADYA-PARIJAT
PART 1
A SELECTION FROM PROMINENT POETS OF
HINDI
SUITED FOR
High School Classes of the United
Provinces
-
3
काशी नागरी प्रचारिगीसभा
Hello PEYE
Compiled and edited
BY
NAROTTAM DAS SWAMI, M.A.
Published by the Nagri-Pracharini Sabha, Benares.
1938

Printed by A. Bose, at The Indian Press, data.. Benares-Branch.

हिंदी पद्य-पारिजात
पहला भाग
अर्थात्
हिंदी के प्राचीन तथा अर्वाचीन प्रमुख कवियों की
कविताओं का संग्रह
संयुक्त प्रदेश के हाई स्कूल-क्लासे के निमित्त ।
संकलनकर्ता तथा संपादक
नरोत्तमदास स्वामी, एम० ए०
न
काशीनागरी प्रचारिणीसभा)
स्थापित
काशी-नागरीप्रचारिणी सभा की अोर से
प्रकाशक
इंडियन प्रेस, लिमिटेड, प्रयाग

निवेदन . हिंदी कविता की ऐसी संग्रह-पुस्तक प्रस्तुत करने में, जो स्कूलों की उच्च कक्षा के विद्यार्थियों के योग्य हो, संग्रहकार को कुछ कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। पहले तो उसके सामने भाषा की समस्या खड़ी होती है। व्रजभाषा, अवधी और खड़ी बोली के तीन मोटे भेदों के भी सरल-क्लिष्ट कितने ही छोटे उपभेद हो गए हैं। संस्कृत-बहुल, उर्दू-बहुल और ठेठ हिंदी के रूपों से भाषा में इतने अंतर हो जाते हैं कि उनसे आजकल के विद्यार्थी एक नवीन भाषा सीखने का सा कष्ट अनुभव करते हैं। संग्रहकार के सम्मुख यह प्रश्न उपस्थित होता है कि वह विद्यार्थियों के इस कष्ट की क्या दवा करे। दूसरी समस्या स्थान-संकोच और चयन की है। सौ-डेढ़ सौ पृष्ठों के घेरे में संपूर्ण हिंदी कविता के सभी प्रतिनिधि कवियों की चुनी हुई रचनाएँ आ नहीं सकतीं। फिर प्राचीन हिंदी के कतिपय बड़े बड़े कवियों ने रामचरित अथवा कृष्ण. चरित के कथानक लेकर खंडकाव्यों तथा महाकाव्यों की सृष्टि की है जिन्हें इस संग्रह में बिना काट-छाँट किए कैसे रखा जाय ? किंतु काट-छाँट करने से कवियों की कृतियों पर कुठाराघात होता है। अँगरेजी की भाँति हिंदी में छोटी छोटी गीति-रचनाओं का चयन करना संभव नहीं है क्योंकि यहाँ के अथवा ( २ ) अनेक श्रेष्ठ कवियों ने गीति-कविता में अपनी प्रतिभा का परिचय नहीं दिया। तीसरी समस्या यह है कि हिंदी की पढ़ाई का एक क्रम निर्धारित हो गया है जिसकी श्रृंखला स्कूलों से लेकर कालेजों तक बन गई है। उस क्रम तथा उस शृखला पर भी दृष्टि रखनी पड़ती है। यदि स्कूलों में शिक्षार्थियों को हिंदी की काव्यधारा का सिंहावलोकन न करा दिया जाय तो कालेजों में आते ही उन पर हठात् एक भार सा लाद दिया जायगा, जिसे वहन करने में उन्हें और भी असुविधा होगी। यदि स्कूलों में उन्हें दुर्बोध-साहित्य का ही श्रीगणेश कराया गया तो स्वभावत: उन्हें अरुचि उत्पन्न हो जायगी और आगे चलकर वे हिंदी से पिंड छुड़ाने की ही चेष्टा करने लगेंगे। ऐसा क्रम-विकास होना चाहिए कि हिंदी का अध्ययन किसी प्रकार भी विषम अथवा अस्वाभाविक न प्रतीत हो। हमारे विचार से स्कूलों की उच्च कक्षा के विद्यार्थियों ब्रजभाषा, अवधी अथवा खड़ी बोली की त्रिधारा से भय- भीत न होना चाहिए। उन्हें उस त्रिवेणी में स्नान करना यह बात दूसरी है कि प्रारंभ में वे गहरे पानी में नहीं पैठ सकेंगे, परंतु इसके लिये हम आग्रह भी नहीं करते। यह तो शिक्षालयों के सुयोग्य शिक्षकों की कृतविद्यता होगी कि वे अपने विद्यार्थियों को इस जलक्रीड़ा के बहाने साहित्य की सरस्वती का रसपान करा दें। को चाहिए।

( ३ )
कोई यह आशा नहीं रखता कि इस संग्रह-पुस्तक का
पाठ करते हुए पाठक कविता की सूक्ष्म परिधि में पहुँचकर
उसके रहस्यों से अवगत हो जायँगे। यदि शब्दों के खुरदरे
रोड़े पार कर स्निग्ध-हृदय छात्र भावों की उज्ज्वलता का
आभास भी पा जायँगे तो पुस्तक का उद्देश्य पूरा हो जायगा।
अपनी भाषा के कवियों और अपने देश और जाति के विचारों
का परिचय प्राप्त कराने में यदि यह प्रवेशिका का काम भी
कर सकी तो संग्रहकार अपने इस 'उपनिषद्' को सफल
समझकर गौरव का अनुभव करेगा।
--

विषय-सूची पृष्ठ १ १ ४ ... विषय कबीरदास (१) साखी (२) सबद मलिक मुहम्मद जायसी गोरा बादल की वीरता सूरदास पद गोस्वामी तुलसीदास (१) भरत-मिलन (२) चातक-प्रेम नरोत्तमदास ११ ११ .. २५ २७ सुदामा-चरित्र अब्दुर्रहीम खानखाना 'रहीम' (१) दोहे ३२ ... (२) बरवै :: बिहारीलाल दोहे ३५ ... ३५ ( २ ) विषय ७.. 2.0 ४३ ४५ ४८ ४८ ५१ पद्माकर भट्ट गंगा-स्तव हरिश्चंद्र नारद की वीणा श्रीधर पाठक काश्मीर-सुषमा अयोध्यासिंह उपाध्याय 'हरिऔध' (१) वर्षा-वर्णन (२) भेद की बातें जगन्नाथदास 'रत्नाकर भगीरथ की वर-प्राप्ति रामचंद्र शुक्ल भगवान बुद्ध और हंस जयशंकर प्रसाद (१) भारत-महिमा . (२) चित्रकूट मैथिलीशरण गुप्त पर्णकुटी के द्वार पर लक्ष्मण रामनरेश त्रिपाठी पथिक को साधु का उपदेश ६८ .. ७२ ७२ ८३

( ३ )
विषय
गोपालशरण सिंह
पृष्ठ
ब्रज-वर्णन
६२
सियारामशरण गुप्त
एक फूल की चाह
सुमित्रानंदन पंत
बादल
::
रस-चषक
टिप्पणी पृष्ठ १ से ३३ तक

कबीरदास पाय। (१) साखी गुरु गोविद दोनों खड़े खड़े काके लायूँ बलिहारी गुरु आपने, गोविद दियो बताय ॥१॥ माली आवत देख करि, कलियाँ करी पुकार । फूले फूले चुन लिए. काल्हि हमारी बार ।। २॥ बाढी आवत देख करि, तरवर डोलन लाग। हम्म कटे की कुछ नहीं, पंखेरू घर भाग ॥ ३ ॥ फागुन आवत देख करि, बन रूना मन माहिँ । ऊँची डाली पात हैं, दिन दिन पीले थाहि ॥ ४ ॥ तेरा साँई तुझ में, ज्यों पुहुपन में बास । कस्तूरी का मिरग ज्यों, फिर फिर ढूंढ़ घास ॥ ५ ॥ कमोदनी जलहरि बसै, चंदा बसै अकास। जो जाही का भावता, सो ताही के पास ॥६॥ जिभ्या में अमृत बसै, जो कोइ जानै बोल । बिस वासिक का ऊतरै, जिभ्या का इक बोल ॥ ७ ॥ रोड़ा है रहु बाट का, तजि पाषंड अभिमान । ऐसा जे जन है रहे, ताहि मिलें भगवान ॥८॥ The 15 Che २ पद्य-पारिजात रंग ॥१०॥ रोड़ा भया तो क्या भया, पंथी को दुख देह । हरिजन ऐसा चाहिए, जिसी जिमी की खेह ॥६॥ खेह भई तो क्या भया, उड़ि उड़ि लागै अंग। हरिजन ऐसा चाहिए, पाँणी जैसा पाणी भया तो क्या भया, ताता सीरा हाइ। हरिजन ऐसा चाहिए, जैसा हरि ही होइ ॥११॥ साधू ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय । सार सार को गहि रहै, थोथा देइ उड़ाय ॥१२॥ सिंहों के लहँड़े नहीं, हंसों की नहिँ पाँति । लालों की नहिँ बोरियाँ, साधु न चले जमाति ।।१३।। लघुता से प्रभुता मिले, प्रभुता से प्रभु दूरि । चींटी ले सक्कर चली, हार्थी के सिर धूरि ॥१४॥ आछे दिन पाछे गए, हरि में किया न हेन । अब पछतावा क्या करै, चिड़ियाँ चुग गई खेत ॥१५॥ मूड़ मुड़ाए हरि मिलें, सब कोइ लेय मुड़ाय । बार-बार के मूड़ते, भंड़ न बैकुंठ जाय ॥१६॥ हंसा बगुला एक सा, मान सरोवर माहि । बगा ढंढोरै माछरी, हंसा मोती खाहिँ ॥१७॥ जो हंसा मोती चुगै, काँकर क्यों पतियाय । काँकर माथा ना नवै, मोती मिले तो खाय ॥१८॥ देह धरे का दंड है, सब काहु को होय । ज्ञानी भुगतै ज्ञान ते, मूरख भुगतै रोय ॥१८॥ , कबीरदास ३ । , ऐसी बानी बोलिए, मन का आपा खोइ। औरन को सीतल करै, आपहु सीतल होइ ॥२०॥ खूदन तो धरती सहै, काट-कूट बनराइ । संत सहैं दुरजन बचन, औरन सहा न जाइ ॥२१॥ करगस सम दुरजन बचन, रहै संत जन टारि। विजुली परै समुद्र में, कहा सकैगी जारि ॥२२॥ कबिरा, गुरु के मिलन की, बात सुनी हम दोय । कै साहेब को नाम लै, के कर ऊँचा होय ॥२३॥ ऋतु बसंत जाचक भया, हरषि दिया द्रुम पात । तातें नव पल्लव भया, दिया दूर नहिं जात ॥२४॥ जो जल बाढ़ नाव में, घर में बाढ़ दाम । दोऊ हाथ उलीचिए, यहि सज्जन को काम ॥२५॥ साई, इतना दीजिए, जामें कुटुम समाय । मैं भी भूखा ना रहूँ, साधु न भूवा जाय ॥२६॥ साधू गाँठि न बाँधई, उदर समाता लेय। आगे पाछे हरि खड़े, जब माँगै तब देय ॥२७॥ गोधन गजधन बाजिधन, और रतन धन खान । जब आवै संतोषधन, सब धन धूरि समान ॥२८॥ धीरे धीरे, रे मना, धीरे सब कुछ होय । माली सी, सौ घड़ा, ऋतु आए फल होय ॥२॥ साँचे कोइ न पतीजई, झूठे जग पतियाय । गली गली गोरस फिरै, मदिरा बैठि बिकाय ॥३०॥ , , , पद्य-पारिजात , -- कबीर, गरब न कीजिए, इस जोबन की आस । टेसू फूला दिवस दस, खंखर भया पलास ॥३१॥ चातक सुतहि पढ़ावही, पान नीर मत लेय । मम कुल यही सुभाव है, स्वाति-बूंद चित देय ॥३२॥ ऊँची जाति पपीहरा पियै न नीचा नीर । कै सुरपति को जाँचई, के दुख सहै सरीर ॥३३॥! करु बहियाँ बल आपनी, छाँड़ि बिरानी प्रास । जाके आँगन है नदी, सो कस मरै पियास ॥३४॥ साधु कहावन कठिन है, लंबा पेड़ खजूर । चढ़ तो चाखै प्रेम-रस, गिरै तो चकनाचूर ॥३५॥ हंसा बक एक रँग लखिय, च. एक ही ताल । क्षोर नीर ते जानिए, बक उघरै तेहि काल ॥३६॥ कबीर, साई दिन भला, जा दिन संत मिलाहि । अंक भरे भरि भेटिया, पाप सरीराँ जाहि ॥३७॥ खुलि खेला संसार में, बाँधि न सक्क काय । घाट जगाती क्या करै, जो सिर बोझ न होय ॥३८॥ (२) सबद नाम सुमिर, पछतायगा। पापी जियरा लोभ करत है, आज काल्हि उठि जायगा ॥ लालच लागो माया-भरम भुलायगा। धन-जोबन का गरब न कीजै, कागद ज्यों गलि जायगा ।। जब जम आय केस गहि पटकै, ता दिन कळू न बसायगा। . जनम गँवाया, कबीरदास ५ । सुमिरन भजन दया नहिं कीन्ही, तो मुख चोटा खायगा । धरमराय जब लेखा माँगै, क्या मुख लेके जायगा । कहत कबीर, सुनो भाई साधो, साध-संग तरि जायगा ।।१।। संतो, देखहु जग बौराना साँच कहैतो मारन धावै, झूठे जग पतियाना ।। नेमी देखे, धरमी देखे, प्रात करहिं असनाना । आतम मारि पखानहिँ पूजै, उनमें कछू न ग्याना ।। आसन मारि डिंभ धरि बैठे, मन में बहुत गुमाना । नाखो-सबदै गावत भूले, आतम-खबरि न जाना ।। कह हिंदू मोहि राम पियारा, तुरुक कहै रहिमाना। आपस में दोउ लरि-तरि मूवे, मरम न काहू जाना ।। कहत कबीर, सुनो हो संतो. ए सब भरम भुलाना । कंतिक कहाँ, कहा नहिँ मान आपहि आप समाना ॥२॥ ऐसे लोगन सौ का कहिए । जे नर भए भगति ते बाहर तिनते सदा डराने रहिए । हरि-जस सुनहिँ न हरि-गुन गावहिँ,बातन ही असमान गिरावहिँ। आप न देहिँ चुरू भरि पानी, तिहि निंदहिँ जिह गंगा आनी। बैठत-उ त-उठत कुटिलता चालहिँ. आप गए औरनहू घालहिँ। छाँड़ि कुचर्चा पान न जानहिँ, ब्रह्माहू को कह्यो न मानहिँ ।। आप गए औरनहू खोवहि, आगि लगाइ मँदिर में सोवहिँ । औरन हँसत आप हहिँ काने, तिनका देखि कबीर डराने ॥३॥ , . .

६ पद्य-पारिजात , , , हृदय कपट, मुख ज्ञानी; झूठे कहा बिलावसि पानी। काया माँजसि कौन गुना; जो घट भीतर है मलना।। लौकी अठसठि तीरश न्हाई, करुअापन तऊ न जाई । माँगत कबीर बारंबारी, भव-सागर तारि, मुरारी ॥४॥ हरिगुन सुमिर, रे नर प्राणी । जतन करत पतन है जैहै, भावे जाण म जाणो । छीलर नीर रहै धौँ कैसे, को सुपनै सचु पाव सूकित पान परत तरवर त, उलटि न तर वरि आवै । जल-थल जीव डहके इन माया कोई जन उबरि न पावै। राम अधार कहत है जुग जुग, दास कबीरा गावै ॥५॥ बागड़ देस लूवन का घर है, तहाँ जिनि जाइ दामन का डर है। टेक सब जग देखों कोई न धोरा, परत धूरि सिरि कहत अबोरा। न तहाँ सरबर ने तहाँ पाणी, न तहाँ सतगुर साधू बाँगी न तहाँ कोकिल न तहाँ सूवा, ऊँचै चढ़ि चढ़ि हंसा मूवा । देस मालवा गहर गंभीर, डग डग रोटो पग पग नीर । कहै कबीर घरहाँ मन माँनाँ, गूंगे का गुड़ यूँ गै जाँनाँ ॥६॥ . ।

मलिक मुहम्मद जायसी गोरा बादल की वीरता पदमावति के भेस लोहारू । निकसि, काटि बँदि, कीन्ह जोहारू।। उठा कोपि, जस छूटा राजा । चढ़ा तुरंग, सिंघ अस गाजा ।। गोरा बादल खाँड़े काढ़े । निकसि कुँवर चढ़ि चढ़ि भए ठाढ़े ।। लेइ राजा, चितउर कहँ चले । छूटेउ सिंघ, मिरिग खलभले ।। चढ़ा साहि, चढ़ि लागि गोहारी । कटक असूझ, परी जग कारी।। फिरि गोरा बादल सौं कहा । 'गहन छूटि पुनि चाहै गहा ! चहुँ दिसि आवै लोपत भानू । अब इहै गोइ, इहै मैदानू' ।। 'तुइ अब राजहि लेइ चलु, गोरा । हौं अब उलटि जुरौं भा जोरा॥ आजु खड़ग चौगान गहि, करौ सीस-रिपु गोइ। खेली सौह साह सौं, हाल जगत महँ होइ' । तब अगमन होइ गोरा मिला । 'तुइ राजहि लेइ चलु, बादला।। मैं अब पाउ भरी औ पूँजी । का पछिताव, पाउ जौ पूजी ?।। बहुतन्ह मारि मरौं जो जूझी । तुम जिनि रोएहु तो मन बूझी।। कुँवर सहस सँग गोरा लीन्हे । और बीर बादल सँग कीन्हे ।। गोरहि समदि मेघ अस गाजा। चला लिए आगे करि राजा।। गोरा उलटि खेत भा ठाढ़ा । पूरुष देखि चाव मन बाढ़ा। आव कटक सुलतानी, गगन छपा मसि मांझ। परति प्राव जग कारी, होति आव दिन साँझ ।। ,

पद्य-पारिजात
.
फिरि आगे गोरा तब हाँका । 'खेलों, करौं आजु रन-साका ||
है। कहिए धौलागिरि गोरा । टरौं न टारे, अंग न मोरा' ।।
ओनई घटा चहूँ दिसि आई । छूटहिँ वान मेघ झरि लाई ।
हाथन्ह गहे खड्ग हरद्वानी । चमकहिँ सेल बीजु कै बानी ।।
गोरै साथ लीन्ह सब साथी । जस मैमंत सूड़ बिनु हाथी ।
रुड मुंड अब टूटहिँ , स्याँ बखतर श्री कँड़ ।
तुरय होहिं बिनु काँधे, हस्ति होहि बिनु सूड ।।
भइ बगमेल, सेल बनवोरा । औ गज-पेल, अकेल सा गोरा ॥
सहस कुवर, सहसौ सत बाँधा। भार-पहार जूझ कर काँधा।।
लगे मरै गोरा के आगे। बाग न मोर घाव मुख लागे ।
जैस पतंग आगि धंसि लेई । एक मुवै, दूसर जिउ देई ।।
टूटहिं सीस अधर धर मारै । लोटहि कंधहि कंध निरारै ।।
कोई परहि रुहिर होइ राते । कोई घायल घूमहि माते ।।
कोइ खुरखेह गए भरि भोगो । भलम चढ़ाइ परे होइ जागी ।
घरी एक भारत भा, भा
असवारन्ह मेल ।
जूझि कुवर सब निबरे, गोरा रहा
गोरै देख साथि सब जूझा । आपन काल नियरभा, बूझा ।।
कोपि सिंघ सामुह रन मेला | लाखन्ह सौ नहि मरै अकेला ॥
लेइ हाँकि हस्तिन्ह कै ठटा । जैसे पवन बिदारै घटा ।।
जेहि सिर देइ कोपि करवारू । स्याँ घोड़े टूटै असवारू ।।
लोटहि सीस कबंध निनारे । माठ मजीठ जनहुँ रन ढारे ।।
खेलि भाग सेंदुर छिरकावा । चाँचरि खेलि आगि जनु लावा ।।
क
।
अकल ॥

मलिक
मुहम्मद
जायसी
हस्ती घोड़ धाइ जो धूका । ताहि कीन्ह सो रुधिर भभूका ।।
भइ अज्ञा सुलतानी, "बेगि करहु एहि हाथ ।
रतन जात है आगे लिए पदारथ साथ" ।
सबै कटक मिलि गारहि छेका । गूंजत सिंघ जाइ नहिँ टेका ॥
जेहि दिसि उठ सोइ जनु खावा । पल टि सिंघ तेहि ठाँव न आवा।।
तुरुक बोलावहि, बोलै बाँहाँ । गोरै मीचु धरी जिउ माहाँ ।।
जिनि जानहु,गोरा सो अकेला । सिँघ के मांछ हाथ को मेला ?
सिंघ जियत नहि आपु धरावा । मुए पाछ कोई घिसियावा ।।
करै सिंघ मुख सौहहिँ दोठी । जौ लगि जिय, देइ नहिँ पोठी।
रतनसेन जो बाँधा, मसि गोरा के गात ।
जौ लगि रुधिर न धोवौं, तो लगि होइ न रात ।।
सरजा बीर सिंघ चढ़ि गाजा । आइ सौंह गोरा सौं बाजा॥
पहुँचा आइ सिंघ-असवारू । जहाँ सिंघ गोरा बरियारू।।
मारेसि साँग पेट महँ धंसी । काढ़ेसि हुमुकि,आँति भुइँ खसी ।।
भाँट
कहा, धनि गोरा, तू भा रावन राव ।
आँति समेटि बाँधि के, तुरय देत है पाव ।।
कहेसि, अंत अब भा भुइँ परना । अंत त खसे खेह सिर भरना ।
कहि कैगरजि सिंघ अस धावा । सरजा सारदूल पहँ आवा ।।
सरजै लोन्ह साँग पर घाऊ । परा खड़ग,जनु परा निहाऊ ।।
बज्र क साँग, बज्र के डाँडा । उठी आगि तस बाजा खाँड़ा।
मानहु बज्र बज्र सों बाजा । सब ही कहा, परी अब गाजा।।
,

१० पद्य-पारिजात तस मारा हठि गोरै, उठी बज्र के आगि । कोइ नियरे नहिं आवै, सिंघ सदूरहि लागि ।। तब सरजा कोपा बरिबंडा । जनहु सदूर केर भुजदंडा ।। कोपि गरजि मारेसि,तस बाजा। जानहु परी टूटि सिर गाजा ।। ठाँठर टूट, फूट सिर तासू । स्यों सुमेरु जनु टूट अकासू ।। धमकि उठा सब सरग-पतारू । फिरि गइ दीठि,फिरा संसारू ।। भइ परलय अस सबही जाना। काढ़ा खड़ग सरग नियराना ।। तस मारेसि,स्याँ घोड़ काटा । धरती फाटि, सेस-फन फाटा ।। गोरा परा खेत महँ, सुर पहुँचावा पान । बादल लेइगा राजा. लेइ चितउर नियरान ।। १ . mymummus-

सूरदास
-
पद
ऐसा कब करिहा गोपाल ।
मनसा नाथ मनोरथ दाता है। प्रभु दीन-दयाल ।।
चित्त निरंतर चरनन अनुरत रसना चरित रसाल ।
लोचनस जल प्रेम पुलकित तन कर कंजनि दल माल ।।
ऐसे रहत, लिखै छिनु छिनु जम अपना भाया जाल ।
'सूर' सुजस-रागी न डरत मन सुनि जातना कराल ||१||
प्रभु मेरे औगुन चित न धरो।
समदरसी प्रभु नाम तिहारो अपने पनहि करो ॥
इक लोहा पूजा में राखत इक घर बधिक परो।
यह दुबिधा पारस नहिं जानत कंचन करत खरो ।।
एक नदिया एक नार कहावत मैता नीर भरा।
जब मिलिकै दोउ एक बरन भए सुरसरि नाम परो ।।
एक जीव, इक ब्रह्म कहावत, 'सूर स्याम' झगरा।
अब की बेर नाथ, मोहि तारा नहिँ पन जात टरी ।।२।।
मेरो मन अनत कहाँ सुख पावै।
जैसे उड़ि जहाज को पंछी फिरि जहाज पर आवै ।।
कमल-नैन को छाँड़ि महातम और देव को ध्यावै ।
परम गंग को छाँड़ि पियासो दुरमति कूप खनावै ।।

१२ पद्य-पारिजात -- जिन मधुकर अंबुज-रस चाख्यो, क्यों करील फल खावै। 'सूरदास' प्रभु कामधेनु तजि छेरी कौन दुहावै ॥३॥ जसोदा हरि पालने झुलावै। बलरावै दुलराइ मल्हावै जोइ माई कछु गावै ।। मेरे लाल की प्राउ निदरिया काहे न आनि सुवावै । तू काहे न बेगि सी आवै तेाको कान्ह बुलावै ।। कबहुँ पलक हरि मूदि लेत हैं कबहुँ अधर फरकावै सावत जानि मौन है रहि रहि करि करि सैन बतावै ।। इहि अंतर अकुलाइ उठे हरि जसुमति मधुरं गावै । जो सुख'सूर' अमर मुनि दुरलभ सो नद-भामिनि पावै॥४॥ कहन लगे मोहन मैया मैया। पिता नंद सों बाबा बाबा अरु हलधर मां भैया ॥ ऊँचे चढ़ि चढ़ि कहत जसोदा लै लै नाम कन्हैया । दूरि कहूँ जिनि जाहु लला रे मारैगी काह की गैया ।। गोपी ग्वाल करत कौतूहल घर घर लेत बलैया मनि-खंभन प्रतिबिंब बिलोकति नचत कुँवर निज पैया !! नंद जसोदाजी के उर ते इह छबि अनत न जइया । 'सूरदास' प्रभुतुमरे दरस को चरनन की बलि गइया ॥३॥ मैया कबहि बढ़ेगी चोटी। किती बार मोहिँ दूध पिवत भई, यह अजहूँ है छोटी ॥ तू जो कहति बल की बेनी ज्यों हैहै लाँबी मोटी । काढत गुहत न्हवावत छत नागिनि सी भुंइ लोटी!। , सूरदास १३ अबकी बार, साध काचा दूध पिावत पचि पचि, देत न माखन रोटी। 'सूर' स्याम चिरजिव दोउ भैया हरि-हलधर की जोटी ।।६।। बलि बलि जाउँ, मधुर सुर गावहु । मेरे कुँवर कन्हैया, नंदहि नाचि देखावहु । तारी देहु आपने कर की, परम प्रीति उपजावहु॥ जिन संका जिय करी, लाल मेरे, काहे को भरमावहु । बाँह उँचाइ कालि की नाई, धौरी धेनु बुलावहु॥ नाचहु नेकु, जाउँ बलि तेरी, मेरी पुरावहु। रतनजटित किंकिनि पग नूपुर अपने रंग बजावहु ।। कनक-खंभ प्रतिबिंबित सिसु इक लौनी ताहि खवावहु । 'सूर' स्याम मेरे उर ते कहुँ टारे नेक न भावहु ॥७॥ सोभित कर नवनीत लिए। घुटुरुन चलत, रेणु तन मंडित, मुख दधिलेप किए । चारु कपोल, लोल लोचन, गोरोचन तिलक दिए। लट लटकनि, मना मत्त मधुपगन मादक मदहि पिए । कठुला कंठ बज्र, केहरि नख राजत रुचिर हिए। धन्य, 'सूर' एको पल या सुख, का सत कल्प जिए ॥८॥ किहि बिधि करि कान्है समुझहौं। मैं ही भूलि चंद दिखरायो, ताहि कहत "मोहि दै, मैं खैहौं” ॥ अनहोनी कहुँ होत, कन्हैया, देखी सुनी न बात। यह तो आहि खिलौना सबको, खान कहत तेहि तात ।। . .

पद्य-पारिजात - . . १ यहै देत लवनी नित मोको, छिन छिन साँझ-सबारे बार बार तुम माखन माँगत, देउँ कहाँ ते प्यारे ।। देखत रहै। खिलौना चंदा, आरि न करौ, कन्हाई । 'सूर' स्याम लियो महरि जसोदा नंदहि कहत बुझाई ।।६।। खेलत स्याम ग्वालन संग। सुबल, हलधर अरु सुदामा करत नाना रंग ।। हाथ तारी देत, भाजत, सबै करि करि हाड़। बरज हलधर-स्याम, तुम जनि, चोट लगिहै गोड़ ।। तब कह्यो-मैं दारि जानत, बहुत बल मो गात । मोरी जोरी है सुदामा हाथ मारे जात ॥ बोलि तब उठे श्री सुदामा-जाहु तारी मारि । आगे हरि पीछे सुदामा धर्यो स्याम हँकारि ।। जानिकै मै रह्यो ठाढ़ा, छुवत कहा जु मोहि ? 'सूर' हरि खीझत सखा सों, मनहिं कीना कोहि ॥१०॥ खेलत में को काको गोसैयाँ ? हरि हारे जीते श्रीदामा, बरबस ही कत करत रिसैयाँ ? जाति-पाँति हमतें कछु नाहिं, न बसत तुम्हारी छैयाँ । अति अधिकार जनावत यातें, अधिक तुम्हारे हैं कछु गैयाँ । रूहठि करै तासाँ को खेले, रहे पौढ़ि जहँ-तहँ सब ग्वैयाँ ॥११॥ सखा कहत है स्याम खिसाने । आपुहि आपु ललकि भए ठाढ़े, अब तुम कहा रिसाने ? बीचहि वोलि उठे हलधर तब-इनके माय न बाप । ।

सूरदास १५ हार जीत कछु नेक न जानत लरिकन लावत पाप ।। आपुन हारि सखा सौं झगरत,-यह कहि दिए पठाई । 'सूर' स्याम उठि चले राइक, जननी पूछति धाई ॥१२॥ खेलन अब मेरी जात बलैया । जबहि माहि देखत लरिकन सँग तबहिं खिझत बल भैया।। मासाँ कहत-पूत बसुदेव को, देवकी तेरी मैया । मोल लियो कछु दै बसुदेव को करि करि जतन बढ़ेया ।। अब बाबा कहि कहत नंद साँ जसुमति को कहै मैया । ऐसे कहि सब मोहि खिझावत, तब उठि चला खिसैया ॥ पाछे नंद सुनत है ठाढ़े, हँसत हसत उर लैया । 'सूर' नंद बलरामहि धिरयो, सुनि मन हरख कन्हैया ॥१३॥ मैया, मोहि दाऊ बहुत खिझायो । मोसाँ कहत-मोल को लीना, तोहि जसुमति कब जायो ? गोरे नंद, जसोदा गोरी, तुम स्याम-सरीर ? चुटकी दै दै हँसत ग्वाल सब, सिखै देत बलबोर ।। सुनहु कान्ह, बलभद्र चबाई, जनमत ही को धूत । 'सूर' स्याम मोहिं गोधन की सौँ हाँ माता तू पूत ॥१४॥ जसोदा, कहाँ लौ कीजै कानि । दिनप्रति कैसे सही परति है दूध दही की हानि ॥ अपने या बालक की करनी जो तुम देखो पानि । गोरस खाइ हँदि सब बासन भली करी यह बानि ।। , कत १६ पद्य-पारिजात मैं अपने मंदिर के कोने माखन राख्यो जानि । सोई जाइ तुम्हारे लरिका लीनो है पहिचानि ।। बूझो ग्वालिनि घर में आयो नेकु न संका मानी। 'सूर' स्याम तब उतर बनायो ची टी काढतु पानी ॥१५॥ मधुबन, तुम कत रहत हरे ? बिरह बिजोग स्यामसुंदर के ठाढ़े क्यों न जरे ? तुम हो निलज, लाज नहिं तुमको, फिर सिर पुहप धरे। ससा स्यार औ बन के पखेरू, धिक धिक सबन्ह करे। कौन काज ठाढ़े रहे बन में, काहे न उकठि परे ? ॥१६॥ ऊधो मोहिं ब्रज बिसरत नाही। हंससुता की सुंदरि कगरी अरु कुंजन की छाहीँ ।। वे सुरभी, वे बच्छ, दोहनी, खरिक दुहावन जाहीँ । ग्वाल-बाल सब करत कोलाहल नाचत गहि गहि बाहीँ ।। यह मथुरा कंचन की नगरी मनि मुकताहल जाहौँ । जबहिँ सुरति प्रावत वा सुख की जिय उमगत तनुनाहौँ।। अनगन भाँति करी बहु लीला जसुदानंद निबाही । 'सूरदास' प्रभु रहे मौन है, यह कहि कहि पछिताहीं ॥१७॥ . momema-

गोस्वामी तुलसीदास
(१) भरत-मिलन
दो०-तेहि बासर बसि प्रातहि चले सुमिरि रघुनाथ।
राम-दरस की लालसा भरत सरिस सब साथ ।।
मंगल सगुन होहिँ सब काहू । फरकहिँ सुखद बिलोचन बाहू॥
भरतहि सहित समाज उछाहू । मिलहहिँ राम,मिटिहि दुख-दाहू।।
करत मनोरथ जस जिय जाके। जाहि सनेह-सुरा सब छाके ॥
सिथिल अंग,पग मग डगि डोलहिँ । बिहबल बचन प्रेमबस बोलहिँ।।
रामसखा तेहि समय देखावा । सैलसिरोमनि, सहज सुहावा ।।
जासु समीप सरित-पय-तीरा । सीय समेत बसहि दोउ बीरा॥
देखि करहि सब दंड प्रनामा। कहि, जय जानकिजीवन रामा ।।
प्रेममगन अस राजसमाजू । जनु फिरि अवध चले रघुराजू ।।
दो० भरत प्रेम तेहि समय जस, तस कहि सकइ न सेषु ।
कबिहि अगम, जिमि ब्रह्मसुख अह-मम-मलिन-जनेषु ।
सकल सनेह सिथिल रघुबर के । गए कोस दुइ दिनकर ढरके।
जल थल देखि बसे निसि बीते । कीन्ह गवन रघुनाथ-पिरीते ।।
उहाँ रामु रजनी अवसेखा। जागे सीय सपन अस देखा ॥
सहित समाज भरत जनु आए। नाथ-बियोग ताप तन ताए ।
सकल मलिनमन दीन दुखारी । देखी सासु आन अनुहारी ॥
सुनि सिय सपन भरे जल लोचन। भए सोचबस सोचबिमोचन ।।
२
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पद्य-पारिजात
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लषन, सपन यह नीक न होई । कठिन कुचाह सुनाइहि कोई ।।
अस कहि बंधुसमेत नहाने । पूजि पुरारि साधु सनमाने ।।
छंद-सनमानि सुर मुनि बंदि बैठे, उतर दिसि देखत भए ।
नभ धूरि, खग-मृग भूरि भागे बिकल प्रभु आश्रम गए ।
तुलसी, उठे अवलोकि, कारनु काह चित सचकित रहे।
सब समाचार किरात कोलन्हि आइ तेहि अवसर कह।
सो०-सुनत सुमंगल बैन, मन प्रमोद, तन पुलक भर ।
सरद सरोरुह नैन, तुलसी भरे सनेह-जल्ल ।।
बहुरि सोच-बस भे सियरमनू । कारन कवन भरत-आगमनू ।।
एक आइ अस कहा बहोरी । सेन संग चतुरंग न थोरी ॥
सो सुनि रामहिमा अति सोचू । इत पितु-बच, उत बंधु-सँकोचू ॥
भरत सुभाउ समुझि मन माहीं। प्रभुचित हित थिति पावत नाहीं॥
समाधान तब भा यह जाने । भरत कहे महँ साधु सयाने ।।
लषन लखेउ प्रभु-हृदय-खभारू । कहत समय सम नीति बिचारू।
बिनु पूछे कछु कहहुँ, गोसाई । सेवक समय, न ढीठ ढिठाई ।।
तुम्ह सर्वज्ञ-सिरोमनि, स्वामी । आपनि समुझि कहउँ अनुगामी ।।
दो०-नाथ, सुहृद सुठि सरल चित सील-सनेह-निधान
सब पर प्रीति प्रतीति जिय जानिय आपु समान ॥
बिषयी जीव पाइ प्रभुताई । मूढ़ मोहबस होहि जनाई ।।
भरत नीतिरत साधु सुजाना । प्रभु-पद-प्रेम सकल जग जाना ।।
तेऊ आजु राजपदु पाई । चले धरम-मरजाद मिटाई ॥
कुटिल कुबंधुकुअवसरु ताकी। जानि राम बनबास एकाकी ।

करि कुमंत्र मन,
गोस्वामी तुलसीदास
१६
साजि समाजू। आए करइ अकंटक राजू ॥
कोटि प्रकार कलपि कुटिलाई । आए दल बटोरि दोउ भाई ॥
जौँ जिय होति न कपट कुचाली। कोहि सोहाति रथ-बाजि-गजाली।
भरतहि दोष देइ को जाए। जग बोराइ राजपद पाए ।
दो०-ससि गुरु-तिय-गामी नहुष चढ़ेउ भूमि-सुर-जान ।
लोक बेद ते बिमुख भा अधम न बेन समान ॥
सहसबाहु, सुरनाथ, त्रिसंकू । केहि न राजमद दीन्ह कलंकू ॥
भरत कीन्ह यह उचित उपाऊ । रिपु-रिन रंच न राखब काऊ ॥
एक कीन्ह नहिँ भरत भलाई । निदरे राम जानि असहाई ।।
समुझि परिहि सोउ आजु बिसेखी। समर सरोष राममुख पेखी ।
एतना कहत नीतिरस भूला । रन-रस-बिटप पुलकमिस फूला ।।
प्रभुपद बंदि, सीस रज राखी। बोले सत्य सहज बल भाखी ।
अनुचित, नाथ, न मानब मोरा । भरत हमहिँ उपचरा न थोरा ।
कहँ लगि सहिय, रहिय मन मारे। नाथ साथ, धनु हाथ हमारे ।।
दो०-छत्रिजाति, रघुकुल-जनम, रामअनुज जग जान ।
लातहुँ मारे चढ़ति सिर नीच को धूरिसमान ।।
उठि कर जोरि रजायसु माँगा। मनहुँ बीर रस सोवत जागा ॥
बाँधिजटा सिर,कसिकटिभाथा । साजि सरासन सायक हाथा॥
आजु रामसेवक जसु लेऊँ । भरतहि समर-सिखावन देऊँ ।।
रामनिरादर कर फल पाई । सोवहु समर-सेज दोउ भाई ।।
आइ बनाभल सकल समाजू। प्रगट करउँ रिस पाछिल आजू ।।
जिमि करिनिकर दलइ मृगराजू। लेइ लपेटि लवा जिमि बाजू ॥

पद्य-पारिजात
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तैसेहि भरतहि सेन समेता । सानुज निदरि निपातउँ खेता ।।
जौं सहाय कर संकर आई। तो मारउँ रन राम दोहाई ॥
दो०-अतिसरोष माष लषन, लखि सुनि सपथ प्रवान ।
सभय लोक सब लोकपति चाहत भभरि भगान ।।
जग भयमगन गगन भइ बानी । लषन-बाहु-बल बिपुल बखानी ।।
तात, प्रताप प्रभाउ तुम्हारा । को कहि सकइ, को जाननिहारा ।।
अनुचित उचित काज कछुहोऊ । समुझि करिय भल कह सब कोऊ।
सहसा करि पाछे पछिताहीँ । कहहि बेद-बुध, ते बुध नाही।
सुनि सुरबचन लषन सकुचाने । राम सीय सादर सनमाने ।।
कही, तात, तुम्ह नीति सुहाई। सब ते कठिन राजमद भाई ।।
जो अँचवत मातहिं नृप तेई । नाहि न साधु सभा जेहि सेई ।।
सुनहु,लषन, भलभरत-सरीसा। बिधि-प्रपंच महँ सुना नदीसा।।
दो०-भरतहि होइ न राजमद बिधि हरि-हर-पद पाइ।
कबहुँ कि कॉजी-सीकरनि छीर-सिंधु बिनसाइ ।।
तिमिर तरुन तरनिहि मकु गिलई। गगन मगन मकु मेघहि मिला।
गोपद जल बूड़हि घटजोनी । सहज छमा बरु छाड़इ छोनी ।।
मसक-फूंक मकु मेरु उड़ाई । होइ न नृपमद भरतहि, भाई ।।
लषन, तुम्हार सपथ,पितुआना। सुचि सुबंधु नहि भरतसमाना।।
सगुन षीर, अवगुन जल, ताता। मिलइ रचइ परपंच बिधाता ।।
भरत हंस रबि-बंस-तड़ागा.। जनमि कीन्ह गुन-दोष-बिभागा ।।
गहि गुन-पय, तजि अवगुन-बारी।निज जस जगत कीन्हि उजियारी।।
कहत भरत-गुन-सील-सुभाऊ । प्रेमपयोधि मगन रघुराऊ ।।

लघु भाई
गोस्वामी तुलसीदास
२१
दो०-सुनि रघुबरबानी बिबुध, देखि भरत पर हेत ।
सकल सराहत, राम सो प्रभु को कृपानिकेत ।।
जौं न होतजग जनम भरत को। सकल-धरम-धुर-धरनि धरत को ।।
कबि-कुल-अगम भरत-गुन-गाथा। को जानइ तुम्ह बिनु, रघुनाथा॥
लषन राम सिय सुनि सुरबानी । अति सुख लहेउ, न जाइबखानी।।
इहाँ भरत सब सहित सहाए । मंदाकिनी पुनीत नहाए ।
सरित समीप राखि सबलोगा। माँगिमातु-गुरु-सचिव-नियोगा।
चले भरत जहँ सिय-रघुराई । साथ निषादनाथ,
समुझि मातु-करतब सकुचाही। करत कुतरक कोटि मनमाहाँ।।
राम-लषन-सिय सुनि मम नाऊँ । उठि जनि अनत जाहिँ तजि ठाऊँ।।
दो०-मातु मते महँ मानि मोहि जो किछु कहहिँ, सो थोर।
अघ-अवगुन छमि आदरहिँ समुझि आपनी ओर ॥
जौं परिहरहि मलिन मन जानी। जौं मन मानहिँ सेवक मानी ।।
मोरे सरन राम की पनहाँ । राम सुस्वामि, दोष सब जनहीं।।
जग जस-भाजन चातक मीना । नेम-प्रेम निज निपुन नबोना ।।
अस मन गुनत चले मग जाता। सकुच सनेह सिथिल सब गाता॥
फेरति मनहिँ मातुकृत खारी। चलत भगति-बल धीरज धोरी॥
जब समुझत रघुनाथ-सुमाऊ। तब पथ परत उताइल पाऊ॥
भरत-दसा तेहि अवसर कैसी । जलप्रवाह जल-अलि-गति जैसी॥
देखि भरत कर सोचु सनेहू । भा निषाद तेहि समय बिदेहू ॥
दो०-लगे होन मंगल सगुन, सुनि गुनि कहत निषादु ।
मिटिहि सोच, होइहि हरषु, पुनि परिनाम बिषादु ॥
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२२
पद्य-पारिजात
भारी॥
सेवक वचन सत्य सब जाने । आस्रमनिकट जाइ नियराने ।।
भरत दीख बन-सैल-समाजू । मुदित छुधित जनु पाइ सुनाजू ।।
ईति-भीति जनु प्रजा दुखारी । त्रिविध ताप पोड़ित ग्रह
जाइ सुराज सुदेस सुखारी। होहि, भरतगति तेहि अनुहारी।।
रामबास बनसंपति भ्राजा । सुखी प्रजा जनु पाइ सुराजा ॥
सचिव बिरागु, बिबेकु नरेसू । बिपिन सुहावन पावन देसू ।।
भट जम-नियम,सैल रजधानी। सांति सुमति सुचि सुंदर रानी।।
सकल-अंग-संपन्न
सुराऊ । राम-चरन आस्रित चित चाऊ ॥
दो०-जीति मोह-महिपाल-दल सहित बिबेक भुआलु ।
करत अकंटक राज्य, पुर सुख संपदा सुकालु ।
बनप्रदेस मुनिबास घनेरे । जनु पुर नगर गाउँगन खेरे ॥
बिपुल बिचित्र बिहँग मृग नाना। प्रजासमाज न जाइ बखाना ।।
खगहा करि, हरि बाघ बराहा । देखि महिषबृष साजु सराहा।।
बयरु बिहाय चरहिँ एक संगा। जहँ-तहँ मनहुँ सेन चतुरंगा ॥
झरनाझरहिमत्त गजगाजहिँ। मनहुँ निसान बिबिध बिधि बाजहिँ।।
चकचकोर चातकसुक पिक गन । कूजत मंजु मराल मुदितमन ॥
अलिगन गावत, नाचत मोरा । जनु सुराज मंगल चहुँ ओरा।।
बेलि बिटप तृन सफल सफूला । सब समाज मुद-मंगल-मूला ॥
दो०--राम-सैल सोभा निरखि भरत हृदय अति प्रेमु ।
तापस तपफल पाइ जिमि सुखी सिराने नेमु ।।
तब कोवट ऊँचे चढ़ि धाई । कहेउ भरत सन भुजा उठाई ।।
नाथ,देखियहि बिटपबिसाला । पाकरि जंबु रसाल तमाला ।।

गोस्वामी तुलसीदास
२३
तिन्ह तरुबरन्ह मध्य बटु सोहा। मंजु बिसाल देखि मनु मोहा ।।
नील सघन पल्लव, फल लाला। अबिचल छाँह,सुखद सब काला॥
मानहुँ तिमिर-अरुन-मय रासी। बिरची बिधि सकेलि सुखमा सी॥
ए तरु सरित समीप गोसाई। रघुबर परनकुटो जहँ छाई ।।
तुलसी-तरुबर बिबिध सुहाए । कहुँ कहुँ सिय,कहुँ लषन, लगाए।।
बटछाया बेदिका बनाई। सिय निज-पानि-सरोज सुहाई ।।
दो०-जहाँ बैठि मुनि-गन-सहित नित सिय राम सुजान ।
सुनहिँ कथा इतिहास सब आगम निगम पुरान ॥
सखाबचन सुनि बिटप निहारी । उमगे भरत बिलोचन बारी ॥
करत प्रनाम चले दोउ भाई । कहत प्रीति सारद सकुचाई ।।
हरषहिँ निरखि राम-पद-अंका। मानहुँ पारसु पाएउ रंका॥
रजसिरधरिहियनयनन्हिलावहिरिघुबर-मिलन-सरिससुखपावहि।।
देखि भरत गति अकथ अतीवा। प्रेम-मगन मृग-खगजड़जीवा ।।
सखहिँ सनेह-बिबस मग भूला । कहि सुपंथ सुरबरषहिँ फूला ।।
निरखि सिद्ध साधक अनुरागे । सहज सनेह सराहन लागे ।
होत न भूतल भाउ भरत को । अचर सचर,चरअचर करत को।
दो०-प्रेम अमिय, मंदरु बिरह, भरतु पयोधि गंभीर ।
मथि प्रगटे सुर-साधु-हित कृपासिंधु रघुबीर ।।
सखा समेत मनोहर जोटा । लखेउ न लषन सघन बनोटा।
भरत दीख प्रभु आस्त्रम पावन । सकल-सु-मंगलु-सदनु सुहावन।।
करत प्रबेस मिटे दुख-दावा । जनु जोगी परमारथु पावा ।।
देखे भरत लषन प्रभु आगे । पूछे बचन कहत अनुरागे ।।

२४ पद्य-पारिजात सीस जटा कटि मुनि-पट बाँधे । तून कसे, कर सर, धनु काँधे ।। बेदी पर मुनि-साधु-समाजू। सीय सहित राजत रघुराजू ॥ बलकल बसन, जटिल,तनु स्यामा। जनु मुनिबेष कीन्ह रति-कामा।। कर-कमलनि धनु सायकु फेरत। जिय की जरनिहरत हँसि हेरत ।। दो०-लसत मंजु मुनि-मंडली-मध्य सीय रघुचंदु । ग्यानसभा जनु तनु धरे भगति सच्चिदानंदु ।। सानुज सखा समेत मगन मन । बिसरे हरष-साक-मुख-दुख-गन।। पाहि नाथ, कहि पाहि गोसाई । भूतल परे लकुट की नाई ।। बचन सप्रेम लषन पहिचाने । करत प्रनामु भरत जिय जाने । बंधुसनेह सरस एहि ओरा । उत साहिब-सेवा बरजोरा ।। मिलि न जाइ,नहिँ गुदरत बनई। सुकबि लपन मन की गति भनई।। रहे राखि सेवा पर भारू । चढ़ी चंग जनु बैंच खलारू । कहत सप्रेम नाइ महि माथा। भरत प्रनाम करत, रघुनाथा ।। उठे राम सुनि प्रेम अधीरा । कहुँ पट, कहुँ निषंग धनु तीरा।। दो० -बरबस लिए उठाइ, उर लाए कृपानिधान । भरत राम की मिलनि लखि बिसरे सबहिँ अपान ।। मिलनि प्रीति किमिजाइ बखानी । कबि-कुल-अगम करम-मन-बानी परम-प्रेम-पूरन दोउ भाई । मन बुधि चित अहमिति बिसराई ।। कहहु सुप्रेम प्रगट को करई । केहि छाया कबिमति अनुसरई ॥ कबिहिँ अरथ-पाखर-बलु साँचा। अनुहरि ताल गतिहि नटु नाचा।। अगम सनेहु भरत रघुबर को। जहँ न जाइ, मनु बिधि-हरि-हर को। सो म कुमति कहउँ केहि भाँती । बाजु सुराग कि गाँडर ताँती ।।

गोस्वामी तुलसीदास मिल नि बिलोकि भरत-रघुबर की। सुरगन सभ्य धुकधुकी घरकी। समुझाए सुरगुरु जड़ जागे । बरषि प्रसूनु प्रसंसन लागे । दो०-मिलि सप्रेम रिपुसूदनहि केवट में टेउ राम । भूरि भाय भैंटे भरत लछिमन करत प्रनाम ।। (२) चातक-प्रेम , जौ धन बरपै समय सिर, जौ भरि जनम उदास । तुलसी, याचक चातकहि, तऊ तिहारी आस ॥१॥ चातक ! तुलसी के मते, स्वातिहु पियो न पानि । प्रेम. -तृषा बाढति भली, घटे घटेगी आनि ।।२।। रटत रटत रसना लटो, तृषा सूखि गे गे अंग। तुलसी, चातक-प्रेम को, नित नूतन रुचि रंग ॥ ३ ॥ बरषि परुष पाहन पयद, पंख करौ टुक टूक । तुलसी, परी न चाहिए चतुर चातकहि चूक ॥ ४ ॥ उपल बरषि गरजत तरजि, डारत कुलिस कठार । चितव कि चातक मेघ तजि कबहुँ दूसरी ओर ॥५॥ मान राखिबो, माँगिबो, पिय साँ नित नव नेहु । तुलसी, तीनिउ तब फबै, जो चातक मत लेहु ॥ ६ ॥ तुलसी, चातक माँगना एक, एक घन दानि । देत जो भूभाजन भरत, लेत जो चॅटक पानि ॥ ७ ॥ नहि जाचत, नहि संग्रही, सीस नाइ नहि लेइ । एसे मानी मांगनेहिं को बारिद बिनु देइ ।।८।। - २६ पद्य-पारिजात साधन साँसति सब सहत, सबहिं सुखद फल-लाहु । तुलसी, चातक-जलद की रीझि बूझि बुधि काहु॥ ६ ॥ मुख मीठे, मानस मलिन, कोकिल मार चकोर । सुजस धवल, चातक नवल ! रह्यो भुवन भरि तोर॥१०॥ चरग चंगुगत चातकहिँ नेम प्रेम की पीर । तुलसी, परबस हाड़ परि परिहै पुहुमी-नीर ॥११॥ बध्यो बधिक, परयो पुण्य जल, उलटि उठाई चोंच । तुलसी, चातक प्रेम-पट, मरतहु लगी न खोंच ॥१२॥ तुलसी, चातक देत सिख, सुतहि बार ही बार । तात न तर्पन कीजियो, बिना बारिधर-धार ॥१३॥ तुलसी के मत, चातकहि केवल प्रेम-पियास । पियत स्वाति-जल,जान जग, जाचत बारहमास ॥१४॥ उष्णकाल, अरु देह खिन, मग-पंथी, तन ऊख । चातक बतियाँ ना रुची, अन जल सी चे रूख ।।१५।। , ७ , नरोत्तमदास सुदामा-चरित्र १ कही सुदामा एक दिन, 'कृस्न हमारे मित्र' । करत रहति उपदेस तिय ऐसो परम-बिचित्र ॥ "महादानि जिनके हितू , जदु-कुल-कैरव-चंद । ते दारिद-संताप ते, रहै न किमि निरद्वंद" ॥१॥ 'सिच्छक हौं सिगरे जग को,तिय,ताको कहा अबदेति है सिच्छा। जे तप कै परलोक सुधारत,संपति की तिनके नहिँ इच्छा ।। मेरे हिए हरि के पद-पंकज, बार हजार लै देखु परिच्छा। औरन को धन चाहिय,बावरि,बाँभन कोधन केवल भिच्छामा२॥ "दानी बड़े तिहुँ लेकिन मैं , जग जीवत नाम सदा जिनको लै । दीनन की सुधि लेतभली बिधि, सिद्धि करौ, पिय, मेरो मतो लै ।। दीनदयाल के द्वार न जात, सो और के द्वार पै दीन ह बोले । श्री जदुनाथ से जाके हितू ,सो तिहूँ पन क्यों कन माँगत डोलेगा३।। "छत्रिन के पन जुद्ध, जुवा दल साजि चढ़े गज-बाजिन हाँ। बैस को बानिज और कृषी, पन सूद्र को सेवन-साजन ही ॥ बिप्रन को प्रन है जु यही, सुख-संपति साँ कछु काज नहीं । कै पढ़िबो के तपोधन है, कन माँगत बाँभनै लाज नहीं ॥४॥ 'कोदो सवाँ जुरतो भरि पेट, न चाहति हाँ दधि दूध मिठौती । सीत बितीतत जा सिसियात, तो हाँ हठती पै तुम्हें न हठौती ।।

पद्य-पारिजात ॥ जो जनती न हितू हरि साँ, तो मैं काहे को द्वारिकै पेलि पठौती। या घर ते न गयो कबहूँ, पिय, टूटो तवा अरु फूटी कठौती॥५॥ "प्रीति मैं चूक न है उनके, हरि मा मिलिहै उठि कंठ लगायकै। द्वार गए कछु देहे भला हमें ,द्वारिकानाथजू है सब लायक या बिधि बीति गए पन द्वै, अब तो पहुँची बिरधापन प्रायक। जीवन कता है,जाके लिये हरि माँ अब हाहुँ कनावड़ा जायकै ॥६॥ "हजै कनावड़ो बार हजार लौं, हितू दीनदयाल मा पाइए। तीनहुँ लोक के ठाकुर हैं , तिनके दरबार न जात लजाइए । मेरी कही जिय मैं धरिक, पिय, और न भूलि प्रसंग चलाइए। और केद्वार सो काजकहा,पिय,द्वारिकानाथके द्वारे सिधाइए"॥५॥ "द्वारिका जाहु जू, द्वारिका जाहु जू ,आठहु जाम यहै जक तेरे। जो न कहो करिए तो बड़ा दुख, जैए कहाँ अपनी गति हेरे॥ द्वार खड़े प्रभु के छड़िया, तहँ भूपति जान न पावत नेरे । पाँच सुपारी, ते देखु बिचारिक,मेंट को चारि नचाउर मेरे" ॥८॥ यह सुनिक तब ब्राह्मनी, गई परोसिनि पास । पाव सेर चाउर लिए, आई सहित हुलास ।। सिद्धि करी गनपति सुमिरि, बाँधि दुपटिया-खूट । माँगत खात चले तहाँ, मारग बाली बूट ।। ६ ।। दीठि चकचौंधि गई देखत सुबर्नमई, एक त सरस एक द्वारिका के भौन है। पूछे बिन कोऊ कहूँ काहू साँ न करै बात, देवता से बैठे सब साधि साधि मौन है ॥ , २६ नरोत्तमदास देखत सुदामै धाय परिजन गहे पाय, "कृपा करि कहौ, बिप्र, कहाँ कीन्हो गौन है ? "धीरज अधीर के, हरन पर-पीर के, बताओ बलबीर के महल यहाँ कौन हैं" ॥१०॥ "सीस पगा नझंगा तन मैं, प्रभु, जानै कोआहि, बस केहि ग्रामा। धोती फटीसी, लटो दुपटी, अरु पाँय उपानह की नहिँ सामा ।। द्वार खरो द्विज दुर्बल, देखि रहो चकि सो बसुधा अभिरामा । पूछत दोनदयाल कोधाम, बतावत आपनो नाम सुदामा ॥११॥ बोल्यो द्वारपालक "सुदामा नाम पाँड़े' सुनि, छाँड़े राज-काज ऐसे जी की गति जाने को ? द्वारिका के नाथ हाथ जोरि धाय गहे पाय, भेटे लपटाय करि ऐसे दुख साने को ? नैन दोऊ जल भरि पूँछत कुसल हरि, बिप्र बोल्यो “बिपदा मैं मोहिँ पहिचाने को ? जैसी तुम कीन्ही तैसी करै को, कृपा के सिंधु ! ऐसी प्रीति,दीनबंधु! दोनन सौं मान को" ॥१२॥ ऐसे बेहाल बेवाइन साँ पग, कंटक-जाल लगे पुनि जोए । "हाय ! महादुख पायो, सखा! तुमाए इतै न कितै दिन खोए''। देखि सुदामा की दीन दसा करुना करिकै करुनानिधि रोए। पानी परात कोहाथ छयो नहि ,नैनन के जल सो पग धोए॥१३॥ "आगे चना गुरु-मातु दए ते लए तुम चाबि हमै नहि दीने" । स्याम कहीमुसुकाय सुदामा साँ, “चोरी की बानिमै हौ जू प्रबीन।। , पद्य-पारिजात भीने। - , पोटरी काँख मैं चाँपि रहे तुम, खोलत नाहि सुधारस पाछिली बानि अजॉन तजी तुम तैसेई भाभी के तंदुल कीने ॥१४॥ तंदुल माँगत मोहन, बिप्र सँकोच ते देत नहीं अभिलाखे । 'है नहिँ पास कछू कहिकै तेहि गोपि धनी बिधि काँख में राखे। सो लखि दोनदयालु तहाँ, 'तुम चोरी करी यह' यों हँसि भावे । खोलिकैपोट,अछोट मुठी गिरिधारनचाउरचाउ साँ चाखे॥१५॥ हाथ गह्यो प्रभु को कमला, कहै, “नाथ कहा तुमनै चित धारी । तंदुल खाय मुठो दुइ, दीन किया तुमने दुइ लोक बिहारी। खाइ मुठीतिसरी अब, नाथ! कहाँ निज बास की आस बिचारी । रंकहि आपसमान कियो तुम,चाहतापहि होन भिखारी" ॥१६॥ धन्य, कहा कहिए, द्विज जू, तुम साँ जग कौन उदार प्रचीना । पाछिलीप्रीति निबाहि भलीबिधि,दोष निवारिकै राप न कीना। है। द्विज के चरनोदक हेतु अजन्म कहाय के जन्म सु लीनो । आवन कै निजपाँवनसौं यहाँ,मोसो अपावन पावन कीन।।।१७॥ वह पुलकनि, वह उठि मिलनि, वह आदर की भाँति यह पठवनि गोपाल की, कछू न जानी जाति ।। घर घर कर ओड़त फिरे, तनक दही के काज । कहा भयो जो अब भयो, हरि को राज-समाज ॥ फखत आयो निज पुर दीठि परी इकबार ही हय गयंद की भीर ॥ हरि-दरसन ते दूरि दुख भयो, गयो निज देस । गौतम रिषि को नाउँ लै, कीन्हो नगर-प्रबेस ॥१८॥ इमि सोचत सोचत झखत, तीर।

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नरोत्तमदास
३१
वैसई राज-समाज, वेई गज-बाजि घने, मन संभ्रम छायो ।
कैधों परयो कहुँ मारग भूलिकै, कै अब फेरि हौं द्वारिकै आयो।।
भौन बिलोकिबे को मग लोचन साँचत ही सब गाँव मझायो।
पूछि भे पाँड़े कथा सब सो फिरि झोपरि को कहुँ सोधुन पायो॥१६॥
फूटी एक थारी, बिन टोटनी की झारी हुती,
बाँस की पिटारी, औ कथारी हुती टाट की।
बेटे बिनु छुरी, श्री कमंडलु सौ टूक वहै।,
फटे हुते पावा, पाटी टूटी एक खाट की ।।
पथरौटा, काठ को कठौता, कहूँ दीस नाहि,
पीतर को लोटो हो, कटोरो हो न बाटकी ।
कामरी फटी सी हुती, डौड़न की माला ताक,
गोमती की माटी की न सुध कहूँ माटकी ॥ २० ॥
चौतरा उजार कोऊ चामीकर धाम कियो,
छानी तो उपारि डारी, छाई चित्रसारी जू ।
जो हौं होतो घर तो पै काहे को उठन देतो,
होनहार ऐसी,
खोटी दसाई हमारी जू ।।
हौँ तो हो न, काहू लोभ लाहु को दिखाय वाहि,
महल उठाय लया हाय ! सुखागारी जू ।
लामी लूमवारी, दु:ख-भूख
को दलनहारी,
गैया बनवारी काहू सोऊ मारि डारी जू ।। २१ ॥
कही बाँभनी आयकै, “यहै कंत निज गेह ।
श्री जदुपति तिहुँ लोक में कीन्हो प्रगट सनेह" ॥२२॥

१ अब्दुर्रहीम खानखाना रहीम' ( १ ) दोहे अच्युत - चरन - तरंगिनी, शिव-सिर-मालति-माल । हरि न बनायो, सुरसरी, कीजो इंदव-भाल ॥ १ ॥ धूर धरत नित सीस पै, कहु, रहीम, केहि काज । जेहि रज मुनि-पत्नी तरी, सो ढूँढ़त गजराज ॥२॥ पसरि पत्र झपहि पितहि, सकुचि देत ससि सीत । कहु, रहीम, कुल कमल के, को बैरी, को मीत ॥३॥ बड़े पेट के भरन को, है रहीम, दुख बाढ़ि । याते हाथी हहरि कै, दिए दाँत द्वै काढ़ि ।। ४ ।। भलो भयो घर ते छुट्यो, हस्यो सीस परि खेत काके काके नवत हम, अपन पेट के हेत ॥ ५ ॥ मन से कहाँ, रहीम, प्रभु, दृग सो कहाँ दिवान । देखि दृगन जो आदरै, मन तेहि हाथ बिकान ॥ ६ ॥ रहिमन, अपने पेट साँ, बहुत कह्यो समुझाय ।। जो तू अनखाए रहे, ते साँ को अनखाय ।। ७ ॥ रहिमन, अँसुवा नयन ढरि, जिय दुख प्रगट करेइ । जाहि निकारो गेह ते, कस न भेद कहि देइ ॥८॥ होइ न जाकी छाँह डिंग, फल रहीम अति दूर । बाढ़ेउ सो बिनु काज ही, जैसे तार — खजूर ॥६॥ नाद रीझि तन देत मृग, नर धन हेत समेत । ते, रहीम, पसु ते अधिक, रीझेहु कळू न देत ॥१०॥ , ३३ होय ॥१२॥ , . अब्दुर्रहीम खानखाना 'रहीम' ज्याँ, रहीम, गति दोप की कुल कपूत-गति सोय । बारे उजियारो करै, बढ़े बढ़े अँधेरो रहिमन, कबहुँ बड़ेन के, नाहि गर्व को लेस । भार धरै संसार को, तऊ कहावत सेस ॥१२॥ रहिमन, करि सम बल नहीं, मानत प्रभु की धाक । दाँत दिखावत दीन है, चलत घिसावत नाक ॥१३॥ रहिमन, रहिला के भली, जो परसै चित लाय । परसत मन मैलो करै, सो मैदा जरि जाय ॥१४॥ रहिमन, यों सुख होत है, बढ़त देखि निज गोत । ज्यों बड़री अँखिया निरखि, आँखिन को सुख होत ॥१५॥ रहिमन, राज सराहिए, ससि सम सुखद जो होय । कहा बापुरो भानु है, तप्यो तरैयन खाय ॥१६॥ रहिमन, रिस सहि तजत नहिँ, बड़े प्रीति की पौरि। मूकन मारत आवई, नाद बिचारी दारि ॥१७॥ रहिमन, जिह्वा बावरी, कहि गई सरग-पतार । आपु ती कहि भीतर भई, जूती खात कपार ॥१८॥ जो, रहीम, करिबी हुता ब्रज को यहै हवाल । तो काहे कर पर धरयो गोबर्धन, गोपाल ॥१॥ बिरह-रूप धन-तम भयो, अवधि-पास उद्योत । ज्याँ, रहीम, भादो निसा, चमकि जात खद्योत ॥२०॥ दादुर मार किसान मन लग्यो रहै धन माहि । रहिमन, चातक रटनि के सरवरि को कोउ नाहिँ ॥२१॥ ३ ३४ पद्य-पारिजात हरि, रहीम, ऐसी करी, ज्यों कमान सर पूर । खें चि आपनी ओर को, डारि दियो पुनि दूर ॥२२। , (२) बरवै दीनबंधु, - परम बखानत उधार । पुनि पुनि बंदहुँ गुरु के पद-जलजात । जिहि प्रताप तै मन के तिमिर बिलात ॥ १॥ भजि मन, राम सियापति, रघुकुल-ईस । दुख टारन, कोसलधोस ॥ २॥ रे मन, भज निसबासर श्री बलबीर । जो बिन जाँचे टारत जन की पीर ।। ३ ।। भज रे मन, नंदनंदन बिपति-बिदार । गोपीजन-मन-रंजन, उदार ॥ ४ ॥ बेद पुरान अधम केहि कारन, करुनानिधि, करत बिचार ? ।। ५ ।। करत घुमड़ि घन-घुरवा, मुरवा सोर । लगि रह बिकसि अँकुरवा, नंदकिसोर ॥ ६ ॥ ब्रजबासिन के मोहन जीवन प्रान। ऊधो, यह संदेसवा अकह कहान॥ ७॥ ज्याँ चौरासी लखि में मानुष देह । त्याँही दुर्लभ जग में सहज सनेह ॥ ८ ॥ जदपि भई जल-पूरित छिति, बसु आस । स्वाति बूंद बिन चातक मरत पिपास ।। ६ ॥

विहारीलाल दोहे मेरी भव-बाधा हरौ, राधा नागरि साइ। जा तन की झाँई परै, स्यामु हरित-दुति हाइ ॥१॥ नीकी दई अनाकनी, फीकी परी गुहारि । तज्यौ मनौ तारन बिरदु, बारक बारनु तारि ॥२॥ जम-करि-मुँह-तरहरि परयो, इहि धरहरि चित लाउ। बिषय तृषा परिहरि अजौं, नरहरि के गुन गाउ ॥३॥ जगतु जनायो जिहिं सकलु, सो हरि जान्यौ नाहिँ। ज्यों आँखिनु सबु देखियै, आँखि न देखी जाहिँ ॥४॥ दीरघ साँस न लेहि दुख, सुख साईहिँ न भूलि । दई दई क्यों करतु है, दई दई सु कबूलि ॥ ५ ॥ बंधु भए का दीन के, को तारयो, रघुराइ । तूठे तूठे फिरत है।, झूठे बिरद कहाइ ॥ ६ ॥ कब को टेरतु दीन रट, होत न, स्याम, सहाइ । तुमहूँ लागी, जगत-गुरु, जग-नाइक, जग-बाइ ।।७।। दिया, सु सीस चढाइ लै, अाछी भाँति अएरि। जापै सुखु चाहतु लिया, ताके दुखहि न फेरि ॥८॥ काऊ कोरिक संग्रहा, कोऊ लाख हजार। मा संपति जदुपति सदा, बिपति-बिदारनहार ॥ ६॥ , पद्य-पारिजात . जपमाला, छापै, तिलक, सरै न एको कामु । मन-काँचै नाचै बृथा, साँचै राँचै राँचै रामु ॥१०॥ धरु घरु डोलत दीन है, जनु जनु जाचत जाइ । दियै लोभ-चसमा चखनु, लघु पुनि बड़ौ लखाइ ॥११॥ बड़े न हूजै गुननु बिनु, बिरद-बड़ाई पाइ। कहत धतूरे सौं कनकु, सौं कनकु, गहनौ गढ़यौ न जाइ ॥१२॥ कीजै चित सोई, तरे जिहिँ पतितनु के साथ । मेरे गुन-औगुन-गननु गनौ न, गोपीनाथ ॥१३॥ हरि कीजति बिनती यहै, तुम सौं बार हजार । जिहि तिहि भाँति डरयो रह्यो, पस्यौ रहाँ दरबार ॥१४॥ जिन दिन देखे वे कुसुम, गई सु बीति बहार । अब, अलि, रही गुलाब में , अपत कँटीली डार ॥१५॥ स्वारथु, सुकृतु न, श्रमु बृथा; देखि, बिहंग, बिचारि बाज पराएँ पानि परि तू, पच्छीनु न मारि ॥१६॥ सीस मुकट, कटि काछनी, कर मुरली उर माल । इहिँ बानक मो मन सदा बसौ, बिहारीलाल ॥१७॥ नर की अरु नल-नीर की, गति एकै करि जोइ। जेता नीचा तेती ऊँचौ हाइ ॥१८॥ बढ़त बढ़त संपति-सलिलु, मन-सरोजु बढ़ि जाइ। घटत घटत सु न फिरि घटे, बरु समूल कुम्हिलाइ ॥१८॥ कोरि जतन कोऊ करौ, परै न प्रकृतिहिँ बोचु । नल-बल जल ऊँचें चढ़े, अंत नीच को नीचु ॥२०॥ , चले, ३७ ३ १ . बिहारीलाल गुनी गुनी सबकै कहै, निगुनी गुनी न होतु । सुन्यौ कहूँ तरु अरक तैं, अरक-समानु उदोतु ॥२१॥ दुसह दुराज प्रजानु कौं, क्यों न बढ़े दुख-दंदु । अधिक अँधेरौ जग करत, मिलि मावस रबि-चंदु ॥२२॥ भजन कह्यो, तातै भज्यौ; भज्यौ न एकौ बार । दूरि भजन जातें कह्यो, सो तै भन्यौ, गँवार ॥२३॥ बसै बुराई जासु तन, ताही को सनमानु । भली भला कहि छोड़िये, खो, ग्रह जपु, दानु ॥२४॥ यह बरिया नहिँ और की, तूं करिया वह सोधि । पाहन-नाव चढाइ जिहिँ, कीने पार पयोधि ॥२५॥ अति अगाधु, अति औथरौ, नदी, कूप, सरु, बाइ। सो ताकौ सागरु, जहाँ जाकी प्यास बुझाइ ॥२६॥ कहै यहै श्रुति सुम्रत्यौ, यहै सयाने लोग। तीन दबावत निसक ही, पातक, राजा, रोग ॥२७॥ जो सिर धरि महिमा मही, लहियति राजा राइ । प्रगटत जड़ता अपनिपै, सु मुकटु पहिरत पाइ ॥२८॥ को कहि सके बड़ेनु सौ, लखें बड़ीयौ भूल । दीने दई गुलाब की, इन डारिनु वे फूल ॥२८॥ भव-पारावार की उलँघि पार को जाइ। तिय-छबि-छायाग्राहिनी, ग्रहै बोचही आइ ॥३०॥ दिन दस आदरु पाइकै, करि लै आपु बखानु । जो लगि काग ! सराधपखु, तो लगि तो सनमानु ॥३१।। - , या ३८ पद्य-पारिजात मरतु प्यास पिंजरा-परयौ, सुपा समै के फेर ! आदरु दै दै बोलियतु, बाइसु बलि की बेर ।।३२।। इहीं पास अटक्यौ रहतु, अलि गुलाब के मूल । हहै फेरि बसंत ऋतु, इन डारिनु वे फूल ॥३३।। वे न इहाँ नागर, बढ़ी, जिन आदर तो प्राब । फूल्यो अनफूल्यो अनफूल्यौ भयो, गवई गाँव, भयौ, गवई गाँव, गुलाब ॥३४॥ चल्यौ जाइ, ह्याँ को करै, हाथिनु के ब्यापार । नहिं जानतु, इहिँ पुर बसै धोबी ओड़, कुंभार ॥३५॥ इक भीज, चहलै परै, बूड़े, बहै हजार । किते न औगुन जग करै, बै-नै चढ़ती बार ॥३६॥ जाके एकाएक हूँ, जग ब्यौसाइ न कोइ । सो निदाघ फूलै फरै, आकु डहडहा होइ ॥३७॥ मीत, न नीति गलीतु है, जो धरियै धनु जोरि । खाएँ खरचें जौ जुरै, तो जोरिये करोरि ॥३८॥ कहलाने एकत बसत, अहि मयूर, मृग बाघ । जगतु तपोबन सौ कियौ, दीरघ-दाघ निदाघ ॥३॥ छकि रसाल सौरभ सने, मधुर माधुरी-गंध । ठोर ठौर झाँरत झपत, भौर-झार मधु-अंध ॥४०॥ लोपे कोपे इंद्र लौं, रोपे प्रलय अकाल । गिरिधारी राखे सबै, गो, गोपो, गोपाल ।।४१।। चितु दै देखि चकोर त्यौँ, तीजै भजे न भूख । चिनगी चुगै अँगार की, चुगै कि चंद-मयूख ॥४२।।

ch बिहारीलाल अपने अपने मत लगे, बादि मचावत सोरु । ज्यौं त्याँ सबकौँ सेइबौ एकै नंदकिसोरु ॥४३॥ बुरी बुराई जी तजै, तो चित खरौ डरातु । ज्यौँ निकलंकु मयंकु लखि गर्ने लोग उतपातु ॥४४!! ता, बलियै. भलियै बनी, नागर नंदकिसोर जो तुम नीकै के लख्यौ मो करनी की ओर ॥४५॥ मनमोहन सौं मोहु करि, तूं घनस्यामु निहारि । कुंजबिहारी सौं बिहरि, गिरधारी उर धारि ॥४६॥ को न छल्यौ इहि जाल परि; कत, कुरंग, अकुलात । ज्याँ ज्यौँ सुरझि भज्या चहत, त्या त्या उरझत जात ॥४७॥ चिरजीवी जोरी, जुरै क्यों न सनेह गंभीर । को घटि, ए बृषभानुजा, वे हलधर के बीर ॥४८॥ ज्यौँ Qहौं, त्याँ हाउँगा, हौँ हरि, अपनी चाल । हठु न करो, अति कठिनु है, मो तारिबी, गुपाल ।।४।। .

- पद्माकर भट्ट गंगा-स्तव कूरम पै कोल, कोल हूँ पै शेष कुंडली है, कुंडली पै फबी फैल सुफन हजार की । कहै पदमाकर, त्यो फनन फबी है भूमि, भूमि पै फबी है थित रजत-पहार की । रजत - पहार पर शंभु सुरनायक है, शंभु पर ज्योति जटाजूट है अपार की। शंभु जटाजूटन पै चंद की छुटी है छटा, चंद की छटान पै छटा है गंगधार की ॥१॥ है तो पंचभूत, तजिबे को तक्यो ताहिँ, पर ते तो करयो मोहि भलो भूतन को पति है। कहै पदमाकर, सु एक तन तारिबे में कीन्हे तन ग्यारह, कही, सा कौन गति है। मेरे भाग यही लिखी भागीरथी गंगे, तुम्है कहियो कछुक, ता कितेक मेरी मति है। एक भव शूल आयो मेटिबे को तेरे कूल, तोहि तो त्रिशूल देत बार ना लगति है। २ ॥ योग जप जागै छाड़ , जाहु न परागै भैया, मेरी कही आँखिन के आगे सु तो आवैगी। .

पद्माकर भट्ट कागद कहै पदमाकर, न ऐहै काम सरस्वती, साँचहूँ कलिंदी कान करन न पावैगी । लैहै छीन अंबर, दिगंबर के जोरावरी, बैल पै चढ़ाइ, फेरि शैल पै चढ़ावैगी। मुंडन के माल की, भुजंगन के जाल की, सु गंगा गज खाल की खिलत पहरावैगी ॥ ३ ॥ कलि के कलंकी कूर कुटिल कुराही केते, तरिगे तुरंत तबै लीन्हीं रेणु राह जब । कहै पदमाकर, प्रयाग बिनु प्रयाग बिनु पावै सिद्धि, मानत न कोऊ यम-दूतन की दाह दब ।। करम करतूति के उठाइ धरे, पचि पचि पंच में परे है प्रेत-नाह अब । बेपरद बेदरद गजब गुनाहिन के, गंगा की गरद कीन्हें गरद गुनाह सब ॥ ४ ॥ गंगाजू , तिहारे तीर आछो भाँति पद्माकर देखी एक पातकी की अदभुत गति है । आय के गोबिंद वाहि धारिकै गरुड़ जू पै, आपनेई लोक जाइबे की कीन्ही मति है। जालौं चलिबे में भयो गाफिल गोविंद तो लौं, चोरि चतुरानन चलाई हंसगति है। जो लौँ चतुरानन चितैबे चारों ओर तो लौ, वृष चढाइ लै गयोई वृषपति है॥ ५ ॥ . पै पद्य-पारिजात . आस करि आयो हुतो, मैया, पास रावरे में , गाँठहू के पास दुख दुरि बुटि बुटि गे । कहै पदमाकर, कुरोग से संघाती, तेऊ गैल में चलत धूमि घूमि घुटि घुटि गे ।। दगादार दोष दीह दरिद बिलाय गए, फिकिर के फंद बिनु छोरे छुटि छुटि गे । जो लाँ जाउँ जाउँ तेरे तीर पर गंगा, तो लौं बीचही में मेरे पापपुंज लुटि लुटि गे ॥ ६॥ -

हरिश्चंद्र
नारद की वीणा
पिंग जटा को भार सीस पै सुंदर सोहत !
गल तुलसी की माल बनी, जोहत मन मोहत ।।
कटि मृगपति को चरम, चरन मैं घुघरू धारत !
नारायण गोविंद कृष्ण यह नाम उचारत ॥
लै बीना कर बादन करत, तान सात सुर साँ भरत ।
जग-अघ छिन मैं हरि कहि हरत, जेहि सुनि नर भवजल तरत ॥
जुग तुंबन की बीन परम सोभित मनभाई।
लय अरु सुर की मनहुँ जुगल गठरी लटकाई ।।
आरोहन अवरोहन के के द्वै फल सोहै।
कै कोमल अरु तीव्र सुर भरे जग-मन मोहै ।
श्रीराधा अरु कृष्ण के अगनित गुन-गन के प्रगट ।
यह अगम खजाने द्वे भरे, नित खरचत तो हूँ अघट ।
मनु तीरथ-मय कृष्णचरित की काँवरि लीने ।
कै भूगोल खगोल दोउ कर-अमलक, कीने ।।
जग-बुधि तौलन हेत मनहुँ यह तुला बनाई।
भक्ति-मुक्ति की जुगल पिटारी के लटकाई ॥
मनु गावन साँ श्रीराग के बोना हू फलती भई
के राग-सिंधु के तरन हित, यह दोऊ तूंबी लई !

पद्य-पारिजात ब्रह्म-जोव, निरगुन-सगुन, द्वैताद्वैत बिचार । नित्य-अनित्य विवाद के, द्वै तूबा निरधार ॥ जो इक तू बा लै कढ़े, सो बैरागी होय । क्यों नहिं ये सबसौं बढ़े, लै तूबा कर दोय ।। Son- श्रीधर पाठक काश्मीर-सुषमा . प्रकृति यहाँ एकांत बैठि निज रूप सँवारति । पल पल पलटति भेस, छनिक छबि छिन छिन धारति । विमल-अंबु-सर-मुकुरन महँ मुख-बिंब निहारति । अपनी छबि पै मोहि आपही तन-मन वारति ।। सजति, सजावति, सरसति, हरसति, दरसति प्यारी। बहुरि सराहति भाग पाय सुठि चित्तरसारी॥ विहरति विविध विलास-भरी जोबन के मद सनि । ललकति, किलकति, पुलकति, निरखति, थिरकति, बनि ठनि ॥ मधुर मंजु छबि-पुंज छटा छिरकति बन-कुंजन । चितवति, रिझवति,हसति, उसति, मुसिक्याति, हरति मन ॥१॥ यहँ सुरूप सिंगार-रूप धरि धरि बहु भाँतिन । सर, सरिता, गिरि, सिखर, गगन, गह्वर, तरुवर, तृन ।। पूरन करिबे काज कामना अपने मन की । किंकरता करि रह्यो प्रकृति-पंकज-चरनन की । चहुँ दिसि हिम-गिरि-सिखर, हीर-मनि मालि-अवलि मनु । स्रवत सरित-सित-धार, द्रवत सोइ चंद्रहार जनु । फल-फूलन-छबि छटा छई जो वन-उपवन की। उदित भई मनु अवनि-उदर साँ निधि रतनन की । ,

पद्य-पारिजात
,
तुहिन-सिखर, सरिता, सर, विपिनन की मिलि मा छबि ।
छई मंडलाकार, रही चारहुँ दिसि याँ फबि ॥
मानहु मनिमय मौलि-माल-आकृति अलबेली ।
बाँधी बिधि अनमोल गोल भारत-सिर सेली।।
अर्द्धचंद्र सम सिखर-नि कहुँ यों छबि छाई ।
मानहुँ चंदन-धौरि, गौरि-गुरु, खोरि लगाई ।।
पुनि तिन निन बीच वितस्ता-रेख जु राजति ।
वैष्णव "श्री" अरु शिव-त्रिशूल की आभा भ्राजति ।।२।।
हिम-स्रनिन साँ घिरचौ अद्रि-मंडल यह रूरौ ।
सोहत द्रोनाकार सृष्टि-सुखमा-सुख पूरौ ।
बहु विधि दृश्य-अदृश्य कला-कौशल साँ छाया।
रक्षन निधि नैसर्ग मनहुँ विधि दुर्ग बनायौ ।।
अथवा विमल बटोर विश्व की निखिल निकाई।
गुप्त राखिबे काज सुदृढ़ संदूक बनाई ।।
यह जादू भरी विश्व बाजीगर थैली।
खेलत में खुलि परी शैल के सिर पै फैली ।।
खिली प्रकृति-पटरानी के महलन फुलवारी ।
खुली धरी कै भरी तासु सिंगार-पिटारी ॥
यह विकसित ब्रह्म-बाटिका की कोउ क्यारी ।
योगिराज ने यहाँ योग बल ऐ चि उतारी।
किधी चढ़ायौ धाता ने भारत के मस्तक ।
माया-मालिनि-रच्यो चाम कुसुमन
को
गुच्छक॥
कै

श्रीधर पाठक कै काम-धेनु के रवि-हय की खुर-छाप सलानी । वसुधा पै सुधा-धार-ब्रह्मद्रव-द्रौनी ॥ ३ ॥ परमपुरुष की पटरानी माया को स्यंदन । मंडप छत्र उतारि धरयौ, उतरन्यौ के नंदन ॥ कै जब लै शिव चले दक्ष-तनया के अंगन । गिरि-शृगन गिरि खिल्या प्रिया के कर को कंगन ।। विष्णु-नाभि ते उग्यौ सुन्यौ जो कमल सहसदल । कै यह सोई सुभग स्वयंभू को सुजन्म-थल ।।४।। सुरपुर अरु सुरकानन की सुठि सुंदरताई । त्रिभुवन-मोहन-करनि, कविन बहु बरनि सुहाई ॥ सो सब कानन सुनी, किंतु नैनन नहिं देखी। जहँ-तहँ पोथिन पढ़ी, पै सु परतच्छ न पेखी ।। सो, कवियन जो कही, कलित सुरलोक-निकाई । याही कौँ अवलोकि एक कल्पना सुरपुर अरु कश्मीर दोउन में को है सुंदर ? को सोभा को भौन, रूप कौ कौन समुंदर ? काकी उपमा उचित देन दोउन मैं काकी ? याकौँ सुरपुर की, अथवा सुरपुर कौँ याकी ? याकौं उपमा याही की मोहि देत सुहावै । या सम दूजा ठौर सृष्टि में दृष्टि न आवै ।। यही स्वर्ग सुरलोक, यही सुर-कानन सुंदर । यहिं अमरन को ओक, यहाँ कहुँ बसत पुरंदर ॥६॥ , बनाई ॥५॥ , जिसमे रही, अयोध्यासिंह उपाध्याय 'हरिऔध' ( १ ) वर्षा-वर्णन सरस सुंदर सावन मास था, घन-घटा नभ थी घिर-घूमती । विलसती बहुधा छबिवती उड़ती बक-मालिका ॥१॥ घहरता गिरि-सानु समीप था, बरसता छिति छ नव-वारि था। घन कभी रवि-अंतिम अंशु ले, वियत में रचता बहु चित्र था ॥२॥ नव-प्रभा परमोज्ज्वल-लीक सी, गति-मती कुटिला फणिनी-समा। दमकती दुरती घन-अंक थी, विपुल केलि-कला-खनि दामिनी ॥ ३॥ विविध रूप धरे नभ में कभी, विहरता वर-वारिद व्यूह था । बरसता बहु पावन वारि था, वह कभी सरसा करके रसा ॥४॥ सलिल-पूरित थी सरसी हुई, उमड़ते पड़ते सर-वृंद थे।

४६ मृदु-मंद समीर के अयोध्यासिंह उपाध्याय 'हरिऔध' कर सु-प्लावित कूल समस्त को, सरित थी स-प्रमोद प्रवाहिता ॥ ५ ॥ अवनि के तल थी अति शोभिता, नवल कोमल श्याम तृणावली। नयन-रंजन थी करती महा, अनुपमा तरु-राजि-हरीतिमा ॥ ६ ॥ हिल, लगे सलिल-बिंदु गिरा सुठि अंक से । महि न थे किसका मन मोहते, जल-धुले दल पादप-पुंज के ॥ ७ ॥ विपुल मोर लिए बहु मोरनी, से स-विनोद थे। जटित-नीलम-पुच्छ-प्रभाव से, मणि-मयी करके वन-मेदिनी ॥८॥ बन प्रमत्त-समान पपीहरा कथन था करता मुख ‘पी कहाँ। लखि वसंत-विमोहिनि-मंजुता, पिक सदा उठता वन कूक था ॥६॥ स-रव पावस-भूप-प्रताप जो सलिल में कहते बहु भेक थे। विपुल झी गुर, तो, थल में उसे, धुन लगा करते नित गान थे॥१०॥ विहरते सुख पद्य-पारिजात , सुखद-पावस के प्रति सर्व की, प्रगट सी करती अति प्रीति थी। वसुमती - अनुराग - स्वरूपिणी, विलसती बहु वीर-वधूटियाँ ॥ ११ ॥ परम म्लान हुई बहु बेलि को, निरख के फलिता अति-पुष्पिता। सकल के उर अंकित थी हुई, सुखद शासन की उपकारिता ।। १२ ।। विविध-प्राकृति औ फल-फूल की, उपजती अवलोक सु-बूटियाँ । प्रगट थी महि-मंडल हो रही, प्रियकरी प्रतिपत्ति पयोद की ॥ १३ ॥ रस-मयी लख वस्तु असंख्य को, सरसता लख भूतल-व्यापिनी । समझ था पड़ता बरसात में, उदक का रस नाम यथार्थ है॥१४॥ मृतक-प्राय हुई तृण-राजि भी, सलिल से फिर जीवित हो गई। फिर सु-जीवन जीवन को मिला, बुध न जीवन क्यों उसको कह ॥ १५ ॥ ब्रज-धरा यक बार इन्हीं दिनों पतित थी दुख-वारिधि में हुई। .

, , अयोध्यासिंह उपाध्याय 'हरिऔध' पर उसे अवलंबन था मिला, ब्रज-विभूषण के भुज-पोत का ॥ १६ ॥ दिवस एक प्रभंजन का हुआ अति प्रकोप, घटा नभ छा गई। बहु भयाविनि, गाढ़-मसी-समा, सकल-लोक-प्रकंपितकारिणी ॥ १७॥ अशनि-पात-समान दिगंत में रव विभीषण हो उठने लगा। कर विदारण वायु पुन: पुन: दमकने नभ दामिनि भी लगी ॥१८॥ मथित, चालित, ताड़ित हो महा अति प्रचंड प्रभंजन-पुंज से। जलद थे दल के दल आ रहे, घुमड़ते, घिरते, ब्रज घेरते ॥ १६ ।। तरल-तायधि-तुग-तरंग लौं, निविड़ नीरद थे नभ घूमते । प्रबल हो जिसकी बढ़ती रही, असितता, घनता, रवकारिता ॥ २० ॥ ( २ ) भेद की बाते है उसी एक की झन्तक सब में, हम किसे कान कर खड़ा देखे ।

५२ , पद्य-पारिजात तो गड़ेगा न आँख में कोई, हम अगर दीठ को गड़ा देखे ॥१॥ एक ही सुर सब सुरों में है रमा, सोचिए, कहिए कहाँ वह दो रहा । हर घड़ी हर अवसरों पर हर जगह, हरिगुनों का गान ही है हो रहा ॥२॥ पेड़ का हर एक पत्ता हर घड़ी, है नहीं न्यारा हरापन पा रहा । गुन सको गुन लो, सुनो जो सुन सको, है किसी गुनमान का गुन गा रहा ॥३॥ हरिगुनों को ए सुबह है गा रही, सुन हुई वे मस्त कर अठखेलियाँ। चहचहाती है न चिड़ियाँ चाव से, लहलहाती है न उलही बेलियाँ।। ४ ।। छा गया हर एक पत्ते पर समाँ, पेड़ सबने सिर दिया अपना नवा । खिल उठे सब फूल, चिड़ियाँ गा उठी, बह गई कहती हुई हर हर हवा ॥५॥ है नदी दिन-रात कल कल बह रही, बाँध धुन झरने सभी हैं झर रहे। हर कलेजे में अजब लहरें उठा, हरिगुनों का गान ए हैं कर रहे।। ६॥

, अयोध्यासिंह उपाध्याय 'हरिऔध' चाहिए था कि गुन-भरे के गुन, भाव में ठीक ठीक भर जाते। पा सके जो न एक गुन भी तो क्या रहे बार बार गुन गाते ॥ ७ ॥ क्या हुअा मुँह से सदा हरि हरि कहे, दूसरों का दुख न जब हरते रहे । जब दयावाले बने न दया दिखा, तब दया का गान क्या करते रहे ॥८॥ तह-बतह जो कीच है जमती गई, कीच से कोई उसे कैसे छिले । तब भला किस भाँति अंधापन टले, जब किसी अंधे को अंधा ही मिले ॥६॥ भूल से बचकर भुलावों में फंसी, धंधा छोड़ सतधंधी रही। सूझ सकता है मगर सूझा नहीं, बावली दुनिया न कब अंधी रही ॥१०॥ साँस पाते जब बुराई से नहीं, लाभ क्या तब साँस की साँसत किए। जब दबाए से नहीँ मन ही दबा, नाक को तब है दबाते किस लिये॥११॥ उन लयाँ लहरों सुरों के साथ भर, रस अछूते प्रेम का जिनले बहे। काम पद्य-पारिजात to . १ कंठ की घंटी बजी जिनकी न, कंठ में क्या बाँधते ठाकुर रहे । १२॥ रंग में जो प्रेम के डूबे नहीं, जा न पर-हित की तरंगों में बह । किस लिये हरिनाम, तो सह साँसते कंठ भर जल में खड़े जपते रहे ॥१३।। जान जब तक सका नहीँ तब तक बना जीव बैल तेली का। जब सका जान, तब जगत सारा हो गया आँवला हथेली का ॥१४॥ डूबने हम आप जब दुख में लगे, सूझ पाया तब गया क्यों दुख दिया। जान गहराई गुनाहाँ की सकं, काम जब गहरी निगाहाँ से लिया॥१५॥ था जगन्नाथदास 'रत्नाकर भगीरथ की वर-प्राप्ति जाइ गोकरन - धाम नृपति अति आनँद पायो । मनु गज तोरि अलान उमगि कदली-बन आयो । सिद्धि-छेत्र सुभ देखि नेत्र तहँ ललकि लुभाए । मनहु सोधि मनि-खानि-सोध सोधी हुलसाए ॥१॥ तरु बल्ली बहु भाँति फलित प्रफुलित तहँ भावै । मनहु कामना सफल होन के सगुन दिखावै ॥ सर सरिता सब स्वच्छ जथा-इच्छित जल पावत । मनु मन-आसय पूर होन के जोग जतावत ॥ २॥ गुंजत मंजु मलिंद-पुंज मकरंद - अघाए। मनहु मुदित मन करत तोष के घोष सुहाए । पसु-पच्छिनि के बृद करत आनंद-नाद कल । धन्यबाद मनु देत पाइ बांछित जीवन-फल ॥३॥ बिद्याधर गंधर्ब सिद्ध तप-बृद्ध बिचरत तहाँ बिनोद-मोद-मंडित मनसाने । मुनि-पास्रम अभिराम ठाम - ठामनि छबि छावै । साधक-गन मैं सिद्धि तहाँ खोजति चलि आवै ॥४॥ सो सुभ धाम ललाम देखि भूपति मन मान्यौ। तह तप-कष्ट उठाइ इष्ट-साधन ठिक ठान्यो सयाने। ॥

पद्य-पारिजात
।
पूजि छत्रपति पुलकि माँगि प्रायसु मुनि-गन सौं।
लगे भूपमनि करन कठिन जप-तप तन-मन सौं ।। ५ ।।
कंद-मूल तिन करि अहार कछु बार बिताए ।
कछुक दिवस तृन-पात परे पुहुमी चुनि खाए ।।
कछु दिन बारि, बयारि, पान करि कछु दिन टेरे।
इहिँ बिधि कष्ट उठाइ किए ब्रत घोर घनेरे ॥६॥
रह्यो भूप को रूप भावना के लेखा सौ।
अस्ति नास्ति के बीच गनित-कल्पित रेखा सौ ।।
सुर-मुनि-अग्र समग्र देखि तप उग्र सिहाए।
नृपहिँ निवारन-हेत सबनि बहु हेत बुझाए ॥ ७ ॥
रहे ध्यान धरि जपत भूप बिधि-मंत्र निरंतर ।
भरि जिय यहै उमंग गंग आवै अवनी पर ।।
तरै सगर के सुवन भुवन मुद मंगल छावै ।
ड देखि जम-दूत पुरी पुरहूत
बोते बरस अनेक टेक जब नै कु न न टारी।
सह्यौ सीस धरि धीर बीर हिम आतप बारी ।।
तब ताकै तप - तेज तपन लाग्यो महि-मंडल ।
उफनि उठ्यौ ब्रह्मंड भभरि भय भर्यो अखंडल ।। ६ ।।
सुर नर मुनि गंधर्व जच्छ किन्नर कहलाने ।
नभ-जल-थल-चर बिकल सकल थल थल हहलाने ।।
जानि परयौ त्रिपुरारि तमकि तीजौ दृग खोल्यौ ।
त्रासनि परी पुकार चारमुख-आसन डोल्यौ ॥१०॥
बसावै ॥८॥

जगन्नाथदास 'रत्नाकर लै सँग देव-समाज काज बिसराइ जगत को। उठि आतुर अकुलाइ ल्याइ मन भाय भगत कौ ॥ चले प्रसंसत हसत हंस हाँकत चतुरानन । पहुँचे आनि तुरंत तपत भूपति जिहि कानन ॥११॥ कृपा-छलक-छबि नैन बैन गदगद मुख मिलकित । बर बरदान-उमंग-तरंगनि सौँ तन पुलकित ॥ मृदुल मनोहर उर-उछाह-कारी स्रमहारी। सुघर सब्द सौं कलित ललित बिधि गिरा उचारी ॥१२॥ अहो भूप - कुल-कमल-अमल-अति-प्रबल प्रभाकर । कियौ कठिन तप जाहि निरखि रबि लगत सुधाकर ।। जाकै प्रखर प्रभाव पदारथ परम सुलभ सब । तजि सँकोच जो चहहु लहहु सानँद हमसौं अब ॥१३॥ सुनत बैन सुख-दैन भगीरथ नैन उघारे । बिबुधनि-बलित प्रसन्न-बदन बिधि निकट निहारे । तप-तापें तन परी सुखद आसा-जल-धारा । सुधा स्रवन भरि चली उबरि ढरि नैननि द्वारा ॥१४॥ सरक्यौ सब दुख-दंद चंद-आनन मुद छरक्यौ । फरक्यौ सुभग सरीर चीर बलकल को दरक्यौ । जोरि पानि परि भूमि भूमि-पति सिर पद परसे । सब देवनि सादर प्रनाम करि अति सुख सरसे ॥१५॥ पाद अरघ आसन सुमूल फल फूल सुहाए । अरपि जथा-बिधि बिनय-बचन कर जोरि सुनाए ।

पद्य-पारिजात
जय चतुरानन चतुर चतुर-जुग-जगत-बिधायक ।
जय सुर-नर-मुनि-बंद्य सदा सुंदर-बर-दायक ॥१६॥
तव दरसन सौं आज काज पूजे सब मन के
लखि यह देव-समाज साज छाए सुख-गन के ।
धरयो माथ पर हाथ नाथ तो देहु यहै बर ।
तारन-बिरद-उतंग गंग
आवै पुहुमी पर ॥१७॥
असन बसन बर बाम धाम भव-विभव न चाहै।
सुरपुर-सुख बिग्यान मुक्तिहूँ पं उमाहै ॥
अति उदार करतार जदपि तुम सरबस-दानी ।
हम लघु जाचक चहत एक चिल्लू भर पानी ॥१
ताही सौँ तप-ताप दूरि करि अंग जुड़े हैं।
ताही सौँ सब साप-दाप पितरनि के जैहै ॥
ताही सौं जग सकल महा मुद मंगल छैहै ।
ताही सौँ सुख पाइ लाख अभिलाष परहै ॥१६
यह सुनि मृदु मुसकाइ चतुर चतुरानन
भाष्यो
धन्य धन्य महि-पाल मही-हित पर चित राख्यौ ।
तुम्है न कछुहुँ अदेय, एक यह असमंजस पर ।
गंग-धार को बेग धरै किमि धरनि धरा-धर ।।२०।।
धमकि
धूम
सौं
धाइ
धंस जबही ब्रह्मद्रव ।
उथलपथल तल होइ रसातल मचहि उपद्रव ।।
जगत जलाहल हाइ कुलाहल त्रिभुवन ब्यापै।
है सनद्ध कटिबद्ध कौन थिरता फिरि थापै ॥२१॥

जगन्नाथदास 'रत्नाकर' - ताते कहत उपाय एक अतिसय हितकारी । आराधी तुम आसुतोष संकर संकर त्रिपुरारी ॥ सो सब भाँति समर्थ अर्थ-दायक चित-चाहे। करत न नै कु बिचार चार फल देत उमाहे ॥२२॥ बिकल सकल जग जोहि छोहि करुना जिन धारी निधरक धरि गर गरल सुरासुर-बिपति बिदारी ।। गर्ब खर्ब करि सर्ब कठिन कालहु दुर्दर को। चिर जीवन थिर कियौ मारकंडे मुनिबर की ॥२३॥ सोइ इक सकत सँभारि गंग को बेग बिपुल बर । करि जु कृपा बर देहि लेहि यह काज सीस पर ।। सकल मनोरथ होहिं सिद्ध तब तुरत तिहारे । याँ कहि बिधि सब सुरनि सहित निज लोक सिधारे ॥२४॥ यह सुनि महा धीर भूपति-मन नै कु डग्यो ना। संसय संका सोक सोच मैं पल हुँ पग्यौ ना ।। बरु बाढ़ी चित चोप ओप आनन पर आई । अमित उमंग-तरंग अंग अंगनि मैं छाई ॥२५॥ अब तो हम सुभ ढंग गंग-पावन को पायौ। पारावार-अपार - परे कौं यह बिचार निर्धारि हियै आनँद सरसायौ। धन्यबाद है नीर निकरि नैननि तै आयौ ॥२६॥ पुनि लागे तप तपन जपन संकर दुख-भंजन। बर-दायक करुना-निधान निज-जन-मन-रंजन ।। पार लखायो ।। -- . खान पान बस पद्य-पारिजात इक अँगुठा है ठाढ़ गाढ़ ब्रत संजम लीने । सहे बिबिध दुख गहे मौन इक दिसि मन दीने ॥२७॥ किए नीद नारी बिसराए। और ध्यान सब धाइ देवधुनि की धुनि लाए ॥ गयो बीति इहिं रीति एक संबतसर सारौ उठ्यौ गगन लौँ गाजि भूप को सुजस-नगारौ ॥२८॥ तब तजि अचल समाधि प्राधि-हर संकर जागे। निज-जन-दुख मन आनि कसकि करुना सौं पागे ॥ आतुर चले उमंग-भरे भंगहु नहिँ छानी कृपा-कानि बरदान-देन-हित हिय हुलसानी ॥२६॥ डगमग पग मग धरत तजे बरदहु हरबर सौं आए तिहि बन सघन बिभूषित जो नरबर सौं ॥ देखि भूप को कृसित रूप नैननि जल छायो । सृगो-नाद बिषाद-हरन सुख-करन बजायौ ।।३०॥ हग उघारि त्रिपुरारि निरखि नृप निपट चकाए। रहे ललकि छबि-छकित पलक बिन पलक गिराए । सुंदर अमल अनूप भब्य भव-रूप सुहायौ। मनु तप-तेज-स्वरूप भूप आगैं चलि आयौ ॥३१॥ हेम-बरन सिर जटा चंद-छबि-छटा भाल पर। कलित कृपा की कटा-घटा लोचन बिसाल पर । फनि-पति - हार - बिहार-भूमि बच्छस्थल जग-अवलंब प्रलंब भुजनि फरकति छबि छाजै ॥३२॥ राजै।

- जगन्नाथदास 'रत्नाकर दृढ़ कटि-धाम ललाम चाम सुभ दुरद-दवन कौ । गूढ़ जानु जो भार भरत सहजहि त्रिभुवन कौ ।। अरुन-कोकनद-चरन सरन जो असरन जन कं । जिनको गुन गुंजार करत मन-अलि मुनि-गन के ॥३३॥ गौर सरीर बिभूति भूति त्रिभुवन की सोहै । आनन परम - उदार-प्रकृति-छबि-छलक बिमो है ।। उमगि कृपा को बारि पगनि डगमग उपजावत । तकि तकि तांडव नचत दमकि दम डमरु बजावत ॥३४॥ मानि कामना सिद्ध जानि तूठे दुख-हारी । भयो भूप-मन मगन बढ़े आनंद-नद भारी ॥ किं-कर्तब्य बिमूढ़ गूढ़ भायनि भरि भाए। रहे थकित से दंग छनक बिन अंग डुलाए ॥३५॥ पुनि कछु धीर बटोरि जोरि कर परे धरनि पर । बरुनिनि झारत पाय पखारत नैन - नीर-झर ॥ कंपित गात लखाति प्रेम-पुलकावलि बिकसति । उमगि कंठ लौ प्राइ बात हिचकी ह निकसति ॥३६॥ यह करुनामय दृश्य संभु प्रनतारति - हारी। सके न देखि बिसेषि भक्त-दुख भए दुखारी ॥ नृपहि और कछु करन कहन को ठोर न दीन्यौ। अंतरजामी जानि भाव अंतर को लीन्यौ ॥३७॥ भुज उठाइ हरषाइ बाँकुरौ बिरद संभारयो। दियौ बिसद बर-राज भूप को काज सँवारयो । - पद्य-पारिजात सिव को हम ले हैं सिर गंग दंग जग होहि जाहि ज्वै यो कहि अंतर्धान भए नृप रहे चकित है ॥३८॥ उठि महि सौ महिपाल लगे चारों दिसि हेरन । कृपा-सिंधु करुना-निधान कहि इत-उत टेरन ।। सुखद स्वरूप चखनि भरि चहन न पाए। मन की मनहीं रही हाय कछु कहन न पाए ॥३॥ इहिँ गिलानि की आनि घटा अासा धुंधराई । भयो मंद दंद-उम्मस पै गुनि हर के बैन नैन आनँद-रस बरसे। जप-तप को करि बिहित बिसर्जन अति सुख सरसे ॥४०॥ इहि भाँति भगीरथ भूप बर साधि जोग जप तप प्रखर । लीन्यौ सिहात जिहिलखि अमर मान सहित चित-चहत बर४१ मुख-चंद उमगाई ॥

रामचंद्र शुक्ल
भगवान् बुद्ध और हंस
करत श्री भगवान गुरुजन को सदा सम्मान;
वचन कहत विनीत यद्यपि परम ज्ञाननिधान ।
राजतेज लखात मुख पै, तदपि मृदु व्यवहार;
हृदय परम सुशील कोमल, यदपि शूर अपार ।
कबहुँ जात अहेर को जब सखा लै सँग माहि
साहसी असवार तिन सम कोउ निकसत नाहि ।
राजभवन समीप कबहूँ होड़ जो लगि जाय
रथ चलावन माहिं कोऊ तिन्है सकत न पाय ।
करत रहत अहेर सहसा ठिठकि जात कुमार;
जान देत कुरंग को भजि, लगत करन विचार ।
कबहुँ जब घुर दौर में हय हाँफि छाँड़त साँस,
हार अपनी हेरि वा जब सखा होत उदास
लगत कोऊ बात अथवा गुनन मन में आनि,
जोति आधी कुँवर बाजी खाय देतो जानि ।
बढ़त ज्यों ज्याँ गयो प्रभु
को
वयस्
लहि दिन-राति
बढ़ति दिन दिन गई तिनकी दया याही भाँति ।
यथा कोमल पात द्वै ते होत विटप विशाल,
करत छाया दूर लौँ बहु जो गए कछु काल ।
१

पद्य-पारिजात
चाप
उठाय,
किंतु जानत नाहि
अब लौं रह्यो राजकुमार
क्लेश, पीड़ा, शोक काको कहत है संसार ।
इन्हैं ऐसी वस्तु कोऊ गुनत सो मन माहि
राजकुल में कबहुँ अनुभव होत जिनको नाहि ।
एक दिवस वसंत ऋतु में भई ऐसी बात,
रहे उपवन बीच साँ है हंस उड़ि के जात ।
जात उत्तर ओर निज निज नीड़ दिशि ते धाय,
शुभ्र हिमगिरि अंक में जो लसत ऊपर जाय ।
प्रेम के सुर भरत, बाँधे धवल सुंदर पाँति,
उड़े जात विहंग कलरव करत नाना भाँति ।
देवदत्त कुमार
संधानि
लक्ष्य अगिले हंस को करि मारि दीनो तानि ।
जाय बैठ्यो पंख में सो हंस के सुकुमार,
रह्यो फैल्यो करन हित जो नील नभ को पार ।
गिरयो खग भहराय, तन में बिध्यो विशिख कराल;
रक्तरंजित है गयो सब श्वेत पंख विशाल ।
देखि यह सिद्धार्थ लीनो धाय ताहि उठाय,
गोद में ले जाय बैठ्यो पद्म आसन लाय ।
फेरि कर लघु जीव को भय दियो सकल छुड़ाय,
और धरकत हृदय को यों दियो धीर धराय।
नवल कोमल कदलिदल सम करन साँ सहराय,
प्रेम साँ पुचकारि ताकत तासु मुख दुख पाय ।

६ रामचंद्र शुक्ल खें चि लीना निठुर शर करि यन बारंबार घाव पै धरि जड़ी-बूटी कियो बहु उपचार । देखिबे हित पीर कैसी होति लागे तीर लियो कुँवर धंसाय सी शर आप खोलि शरीर । चौंकि सो चट परयो पीरा परी दारुण जानि; छाय नयनन नीर खग पै लग्यो फेरन पानि । पास ताके एक एक सेवक तुरत बोल्यो आय "अब मेरे कुँवर ने है हंस दियो गिराय । गिरयो पाटल बीच बिधि कै ठौर पै सो याहि । मिलै मोको, प्रभो ! मेरो कुँवर माँगत ताहि ।" ताकी सुनत बोल्यो तुरत राजकुमार "जाय कै कहि देहु दैहाँ नाहिँ काहु प्रकार । मरत जो खग अवसि पावत ताहि मारनहार, जियत है जब तासु तापै नाहिँ कछु अधिकार । दियो मेरे बंधु ने बस तासु गति को मारि रही जो इन श्वेत पंखन की उठावनहारि।" देवदत्त कुमार बोल्यो “जिये वा मरि जाय, होत पंछी तासु है जो देत वाहि गिराय । नाहि काहू को रह्यो जो लौ रह्यो नभ माहि; गिरि परयो तब भयो मेरो, देत है। क्यों नाहिँ ?" लियो तब खग कंठ को प्रभु निज कपोलन लाय पुनि परम गंभीर स्वर साँ कह्यो ताहि बुझाय बात --- .. ५

पद्य-पारिजात
का टेरि,
हरि ।
"उचित है यह नाहि जो कछु कहत है। तुम बात,
गया है यह विहग मेरो, नाहि देहाँ, तात !
जीव बहु अपनायहाँ या भाँति
या भाँति या संसार
दया को औ प्रेम को निज करि प्रभत्व प्रसार ।
दयाधर्म सिखायहाँ मैं मनुजगन
मूक खग पशु के हृदय की बात कहिहाँ
रोकिहाँ भवताप की यह बढ़ति धार करात
परे जाम मनुज ते ले सकल जीव विहाल ।
किंतु चाहै कुँवर तो चलि विज्ञजन के तीर
कहैं अपनी बात, चाहै न्याय धरि जिय धीर ।"
भयो अंत विचार नृप के सभामंडप माहि ।
कोउ ऐसो कहत,
कोऊ
कहत ऐसा नाहि ।
कह्यो याही बीच उठि अज्ञात पंडित
"प्राण है यदि वस्तु कोऊ करो नैकु विवेक;
जीव प है जीवरक्षक को सकल
सकल अधिकार,
स्वत्व वाको नाहि चाह्यो बधन जो करि वार ।
बधक नासत औ मिटावत, रखत रच्छनहार;
हंस है सिद्धार्थ को यह, सोइ पावनहार ।"
लग्यो सारी सभा को यह उचित न्याय-विधान ।
भई मुनि की खोज, 4 सो भए अंतर्धान ।
व्याल रगत लख्यो सब तहँ और काहुहि नाहि;
देवगण या रूप आवत कबहुँ भूतल माहि।

रामचंद्र शुक्ल
दया के शुभ कार्य को प्रारंभ याहि प्रकार
कियो श्री भगवान ने लखि दुखो यह संसार ।
छाँड़ि पीर विहंग की, उड़ि मिल्यो जो निज गोत,
और क्लेश न कुँवर जानत कहाँ कैसे होत ।
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जयशंकर प्रसाद (१) भारत-महिमा हिमालय के आँगन में उसे प्रथम किरणों का दे उपहार । उषा ने हँस अभिनंदन किया और पहनाया हीरक-हार ।। जगे हम, लगे जगाने विश्व, लोक में फैला फिर आलोक । व्योम-तम-पुंज हुआतब नाश,अखिल संसृति हो उठीअशोक।।१।। विमल वाणी ने वीणा ली कमल-कोमल-कर में सप्रीत। सप्तस्वर सप्त सिंधु में उठे, छिड़ा तब मधुर साम-संगीत ॥ बचाकर बीज रूप से सृष्टि नाव पर झेल प्रलय का शीत । अरुण-केतन लेकर निज हाथ वरुण-पथ में हम बढ़े अभीत ॥२॥ सुना है दधीचि का वह त्याग, हमारी जातीयता विकास। पुरंदर ने पवि से है लिखा अस्थि-युग का मेरे इतिहास ॥ सिंधु सा विस्तृत और अथाह, एक निर्वासित का उत्साह । रही अभी दिखाई भग्न मग्न रत्नाकर में वह राह ॥३॥ धर्म का ले लेकर जो नाम हुआ करती बलि, कर दी बंद । हमी ने दिया शांति-संदेश, सुखी होते देकर आनंद ।। विजय केवल लोहे की नहीं, धर्म की रही धरा पर धूम । भितु होकर रहते सम्राट, दया दिखलाते घर घर घूम ॥४॥ यवन को दिया दया का दान, चीन को मिली धर्म की दृष्टि । मिला था स्वर्ण-भूमि को रत्न, शील की सिंहल को भी सृष्टि । .

जयशंकर प्रसाद . . किसी का हमने छीना नहीं , प्रकृति का रहा पालना यहाँ । हमारी जन्म-भूमि थी यहीँ, कहीँ से हम आए थे नहीँ ॥५॥ जातियों का उत्थान-पतन, आँधियाँ, झड़ो, प्रचंड समीर । खड़े देखा, झेला हँसते, प्रलय में पले हुए हम वीर ॥ चरित थे पूत, भुजा में शक्ति, नम्रता रही सदा संपन्न । हृदय के गौरव में था गर्व, किसी को देख न सके विपन्न ॥६॥ हमारे संचय में था दान, अतिथि थे सदा हमारे देव । वचन में सत्य, हृदय में तेज, प्रतिज्ञा में रहती थी टेव ॥ वही है रक्त, वही है देश, वही साहस है, वैसा ज्ञान । वही है शांति, वही है शक्ति, वही हम दिव्य आर्य-संतान । जिएँ तो सदा इसी के लिये, यही अभिमान रहे, यह हर्ष । निछावर कर दें हम सर्वस्व, हमारा प्यारा भारतवर्ष ॥७॥ (२) चित्रकूट उदित कुमुदिनी-नाथ हुए प्राची में ऐसे। सुधा - कलश रत्नाकर से उठता हो जैसे ॥ धीरे धीरे उठे नई आशा प्राशा से मन में। क्रीड़ा करने लगे स्वच्छ स्वच्छंद गगन में । चित्रकूट भी चित्र लिखा सा देख रहा था। मंदाकिनी - तरंग, उसी से खेल स्फटिक शिला . आसीन राम-वैदेही ऐसे । निर्मल सर में नीलकमल-नलिनी हाँ जैसे ।। , पद्य-पारिजात प्रेम भरा , था व्योम, । निज प्रियतम के संग सुखी थो कानन में भी। था वैदेही के आनन में भी । मृगशावक के साथ मृगी भी देख रही थी। सरल विलोकन जनक सुता से सीख रही थी ।। निर्वासित थे राम, राज्य था कानन में भी । सच ही है, श्रीमान भोगते सुख वन में भी ।। चंद्रातप तारका-रत्न जड़े थे। स्वच्छ दीप था सेाम, प्रजा तरु-पुंज खड़े थे ।। शांत नदी का स्रोत बिछा था अति सुखकारी। कमल-कली का नृत्य हो रहा था मनहारी ॥ बोल उठा जो हंस देखकर कमल-कली को। तुरत राकना पड़ा गुंजकर चतुर अली को । हिली आम की डाल, चला ज्याँ नवल हिँडोला। आह कौन है ?, पंचम स्वर से कोकिल बोला ।। मलयानिल प्रहरी सा फिरता था उस वन में । शांति शांत हो बैठी थी कामद-कानन राघव बोले देख जानकी के अानन को- 'स्वर्गगा का कमल मिला कैसे कानन को ?' 'नील मधुप को देख, वहीँ उस कंज-कली ने । स्वयं आगमन किया' कहा यह जनक-लली ने ॥ बोले राघव-'प्रिये ! भयावह से इस वन में शंका होती नहीं तुम्हारे कोमल मन में ?' म ॥ - -

जयशंकर 'प्रसाद'
स्मरण न
होते तुम्हें,
कहा जानकी ने हँसकर-'उसको है क्या डर ?
जिसके पास प्रवीण धनुर्द्धर ऐसा सहचर !'
कहा राम ने—'अहा, महल मंदिर मनभावन ।
कहो, क्या वे अति पावन ?
रहते थे झनकार-पूर्ण जो तव नूपुर
सुरभि-पूर्ण पुर होता था जिस अंत:पुर से ।'
जनक-सुता
ने कहा-'नाथ, यह क्या कहते हैं ?
नारी के सुख सभी साथ पति के रहते हैं ।
कहो उसे, प्रिय प्राण ! अभाव रहा फिर किसका ?
विभव चरण का रेणु तुम्हारा ही है जिसका ।।'

मैथिलीशरण गुप्त पर्णकुटी के द्वार पर लक्ष्मण . की नाकों से, चारु चंद्र की चंचल किरणे खेल रही है जल-थल में , स्वच्छ चाँदनी बिछी हुई है अवनि और अंबर-तल मे ।। पुलक प्रकट करती है धरती हरित तृणों मानों झीम रहे है तरु भी मंद पवन के झाँकॉ से ॥१॥ पंचवटी की छाया में है सुंदर उसके सम्मुख स्वच्छ शिला पर धीर, वीर, निर्भीकमना, जाग रहा यह कौन धनुर्धर जब कि भुवन भर सोता है ? भोगी कुसुमायुध बना दृष्टिगत होता है ॥ २ ॥ किस व्रत में है व्रती वीर यह निद्रा का यों त्याग किये ? पर्ण-कुटीर बना, , योगी सा मैथिलीशरण गुप्त ३ , " . राजभोग के योग्य विपिन में बैठा आज विराग लिये। बना हुआ है प्रहरी जिसका, उस कुटीर में क्या धन है, जिसकी रक्षा में रत इसका तन है, मन है, जीवन है ? ॥ ३ ॥ मर्त्यलोक-मालिन्य मेटने स्वामि-संग जो आई है, तीन लोक की लक्ष्मी ने यह कुटी आज अपनाई है वीर-वंश की लाज वही है, फिर क्यों वीर न हो प्रहरी ? विजन देश है, निशा शेष है, निशाचरी माया ठहरी ! ॥४॥ कोई पास न रहने पर भी जन मन मौन नहीं रहता, आप आप की सुनता है वह आप आप से है कहता । बीच बीच में इधर-उधर निज दृष्टि डालकर मोदमयी, मन ही मन बातें करता है धीर धनुर्धर नई नई ॥ ५ ॥ , Ctur ७४ पद्य-पारिजात , क्या ही स्वच्छ चाँदनी है यह, है क्या ही नि:स्तब्ध निशा ! है स्वच्छंद सुमंद गंधवह, निरानंद है कौन दिशा? वंद नहीं , अब भी, चलते है नियति-नटो के कार्य-कलाप, पर कितने एकांत भाव से, कितने शांत और चुपचाप ! ॥ ६ ॥ है बिखेर देती वसुंधरा मोती, सबके सबके साने पर रवि बटोर लेता है उनको सदा, सबेरा होने पर। और विरामदायिनी अपनी संध्या को दे जाता है, शून्य श्याम तनु जिससे उसका झलकाता है॥७॥ तेरह वर्ष व्यतीत हो चुके, पर है मानो कल की बात ! वन को आते देख हमें जब आर्त, अचेत हुए थे तात । अब वह समय निकट ही है जब अवधि पूर्ण होगी वन की, नया रूप मैथिलीशरण गुप्त ही धार गे. , किंतु प्राप्ति होगी इस जन को इससे बढ़कर किस धन की ? ॥८॥ और आर्य को ? राज्य-भार तो वे प्रजार्थ व्यस्त रहेंगे, हम सबको भी मानो विवश बिसारं गे। कर विचार लोकोपकार का हमें न इससे होगा शोक, पर अपना हित आप नहीं क्या कर सकता है यह नरलोक ? ॥६॥ मझली माँ ने क्या समझा था ? कि मैं राजमाता हूँगी ? निर्वासित कर आर्य राम को अपनी जड़ें जमा लूँगी! चित्रकूट में किंतु उसे ही देख स्वयं करुणा थकती, उसे देखते थे सब, वह थी निज को ही न देख सकती! ॥१०॥ अहो ! राजमातृत्व यही था, हुए भरत भी सब त्यागी, पर सौ सौ सम्राटों से भी है सचमुच वे बड़भागी ।

पद्य-पारिजात एक राज्य का मूढ़ जगत ने कितना महामूल्य रक्खा, हमको तो मानो वन में ही है विश्वानुकूल्य रक्खा ! ॥ ११ ॥ होता यदि राजत्वमात्र ही लक्ष्य हमारे जीवन का, तो क्याँ अपने पूर्वज उसको छोड़ मार्ग लेते वन का ? परिवर्तन ही यदि उन्नति है, तो हम बढ़ते जाते हैं, किंतु मुझे तो सीधे सच्चे, पूर्व-भाव ही भाते है ॥१२॥ जो हो, जहाँ आर्य रहते हैं वहाँ राज्य वे करते हैं, उनके शासन में वनचारी सब स्वच्छंद विहरते हैं। रखते है सयत्न हम पुर में जिन्हें पीजरों में कर बंद, वे पशु-पक्षी भाभी से है हिले यहाँ स्वयमपि सानंद ! ॥१३॥ करते हैं हम पतित जनों में बहुधा पशुता का आरोप, मैथिलीशरण गुप्त मैं गहरी । करता है पशुवर्ग किंतु क्या निज निसर्ग नियमों का लोप? मनुष्यता को सुरत्व की जननी भी कह सकता हूँ, किंतु पतित को पशु कहना भी कभी नहीं सह सकता हूँ॥१४॥ आ आकर विचित्र पशु-पक्षी यहाँ बिताते दोपहरी, भाभी भोजन देती उनको, पंचवटी छाया चारु चपल बालक ज्याँ मिलकर, माँ को घेर खिझाते है खेल-खिझाकर भी प्रार्या को वे सब यहाँ रिझाते है ! ॥१५॥ गोदावरी नदी का तट वह ताल दे रहा है अब भी, चंचत जल कल कल कर मानों तान ले रहा है अब भी! नाच रहे हैं अब भी पत्ते; मन से सुमन महकते है चंद्र और नक्षत्र ललककर लालच भरे लहकते है ॥१६॥ १ पद्य-पारिजात वैतालिक विहंग भाभी के संप्रति ध्यानलग्न से है, नए गान की रचना में वे कवि-कुल-तुल्य मग्न से हैं। बीच बीच में नर्तक केकी मानो यह कह देता है- मैं तो प्रस्तुत हूँ, देख कल कौन बड़ाई लेता है ? ॥१७॥ आँखों के आगे हरियाली रहती है हर घड़ी यहाँ, जहाँ-तहाँ झाड़ी में झिरती है झरनों की झड़ी यहाँ। वन की एक एक हिम-कणिका जैसी सरस और शुचि है, क्या सोसो नागरिक जनों की वैसी विमल रम्य रुचि है ? ॥१८॥ मुनियों का सत्संग यहाँ है जिन्हें हुआ है तत्त्व -ज्ञान, सुनने को मिलते हैं उनसे नित्य नए अनुपम पाख्यान । जितने कष्ट-कंटकाँ म जिनका जीवन-सुमन खिला, " १ मैथिलीशरण गुप्त गौरव-गंध उन्हें उतना ही अत्र, तत्र, तत्र, सर्वत्र मिला ॥१८॥ शुभ सिद्धांत-वाक्य पढ़ते है शुक-सारी भी आश्रम के. मुनि-कन्याएँ यश गाती है क्या ही पुण्य-पराक्रम के। अहा! आर्य के विपिन-राज्य में सुख-पूर्वक सब जीते हैं, सिंह और मृग एक घाट पर आकर पानी पीते है ॥२०॥ गुह,निषाद,शवराँ तक कामन रखते हैं प्रभु कानन में; क्या ही सरल वचन रहते हैं इनके भोले आनन म ! इन्हें समाज नीच कहता है, पर हैं ये भी तो प्राणो, इनमें भी मन और भाव है, किंतु नहीं वैसी वाणी ॥२१॥ कभी विपिन में हम व्यजन का पड़ता नहीं प्रयोजन है, , निर्मल जल, मधु, कंद, मूल, फल---- प्रायोजनमय भोजन है।

पद्य-पारिजात भर मनःप्रसाद चाहिए केवल, क्या कुटीर फिर क्या प्रासाद ? भाभी का आह्लाद अतुल है, मझली माँ का विपुल विषाद ! ।।२२।। अपने पौधों में जब भाभी भर पानी देती है. खुरपी लेकर आप निराती जब वे अपनी खेती पाती है तब कितना गौरव, कितना सुख, कितना संतोष ! स्वावलंब की एक झलक पर न्यौछावर कुबेर का कोष ॥२३॥ सांसारिकता में मिलती है यहाँ निराली नि:स्पृहता, अत्रि और अनसूया की सी होगी कहाँ पुण्य-गृहता ? माना है यह भुवन भिन्न ही कृत्रिमता का काम नहीं, प्रकृति अधिष्ठात्री है इसकी, कहाँ विकृति कानाम नहीं ॥२४॥ स्वजनों की चिंता है हमको होगा उन्हें हमारा सोच, मैथिलीशरण गुप्त यही एक इस विपिन-वास में दोनों ओर रहा संकोच । सब सह सकता है, परोक्ष ही कभी नहीं सह सकता प्रेम, बस, प्रत्यक्ष भाव में उसका रक्षित सा रहता है क्षेम ॥२५॥ इच्छा होती है, स्वजनों को एक बार वन ले आऊँ, और यहाँ की अनुपम महिमा उन्हें घुमाकर दिखलाऊँ । विस्मित हाँगे देख आर्य को वे घर की ही भाँति प्रसन्न, मानो वन-विहार में रत है ये वैसे ही श्रीसंपन्न ! ॥२६॥ यदि बाधाएँ हुई हमें तो उन बाधाओं के ही साथ, जिससे बाधा-बोध न हो, वह सहन-शक्ति भी आई हाथ । जब बाधाएँ न भी रहेगी तब भी शक्ति रहेगी यह, पुर में जाने पर भी वन की स्मृति अनुरक्ति रहेगी यह ॥२७॥ १

८२
पद्य-पारिजात
,
-
नहीं जानता, हाय ! हमारा,
माताएँ
आमोद-प्रमोद,
मिली हमें है कितनी कोमल,
कितनी बड़ी प्रकृति की गोद ।
इसी खेल को कहते है क्या
विद्वज्जन जीवन-संग्राम ?
तो इसमें सुनाम कर लेना
है कितना साधारण काम !" ॥२८॥

रामनरेश त्रिपाठी
पथिक को साधु का उपदेश
बोले मुनि- "हे पुत्र ! जगत को तुमने त्याग दिया है।
प्रेम स्वाद चख मोहित हो वन में विश्राम लिया है।
अपनी अद्भुत शक्ति भूल अज्ञानी सा बन बन में
फिरते हो तुम चकित विमोहित प्रकृति-रूप-दर्शन में ॥
'जग में सचर अचर जितने हैं सारे कर्म-निरत हैं।
धुन है एक न एक सभी को सब के निश्चित व्रत है ॥
जीवन भर आतप सह वसुधा पर छाया करता है
तुच्छ पत्र की भी स्वकर्म में कैसी तत्परता है
"सिंधु-विहंग तरंग-पंख को फड़काकर प्रति क्षण में ।
है निमग्न नित भूमि-अंड के सेवन में-रक्षण में ।
कोमल मलय-पवन घर घर में सुरभि बाँट आता
सस्य सी चने घन जीवन धारण कर नित जाता है।
"रवि जग में शोभा सरसाता सोम सुधा बरसाता ।
सब हैं लगे कर्म में, कोई निष्क्रिय दृष्टि न आता ॥
है उद्देश्य नितांत तुच्छ तृण के भी लघु जीवन का।
उसी पूर्ति में वह करता है अंत कर्ममय तन
"तुम मनुष्य हो, अमित बुद्धि-बल-विलसित जन्म तुम्हारा ।
क्या उद्देश्य-रहित है जग में तुमने कभी विचारा ?
मानो, एक बार सोचो
तुम
अपने मन में ।
क्या कर्त्तव्य समाप्त कर लिये तुमने निज जीवन में ?
का ॥
बुरा न

.
खड़े हुए
हो ।
८४
पद्य-पारिजात
"जिस पर गिर कर उदर-दरी से तुमने जन्म लिया है।
जिसका खाकर अन्न सुधा-सम नीर समीर पिया है।
जिस पर खड़े हुए, खेले, घर बना बसे सुख पाये।
जिसका रूप विलोक तुम्हारे हग, मन, प्राण जुड़ाये ।।
"वह सनेह की मूर्ति दयामयि माता-तुल्य मही है
उसके प्रति कर्त्तव्य तुम्हारा क्या कुछ शेष नहीं है ?
हाथ पकड़कर प्रथम जिन्होंने चलना तुम्हें सिखाया।
भाषा सिखा हृदय का अद्भुत रूप स्वरूप दिखाया ।।
"जिनकी कठिन कमाई का फल खाकर बड़े हुए हो।
दीर्घ देह ले बाधाओं में निर्भय
जिनके पैदा किये, बुने वस्त्रों से
देह ढके हो।
आतप-वर्षा-शीत-काल में पीड़ित हो न सके हो ॥
"क्या उनका उपकार-भार तुम पर लवलेश नहीं
उनके प्रति कर्त्तव्य तुम्हारा क्या कुछ शेष नहीं है ?
सतत ज्वलित दुख-दावानल में , जग के दारुन रन में
छोड़ उन्हें कायर बनकर तुम भाग बसे निर्जन में ॥
"केवल सुनकर कष्ट, तुम्हारा विचलित हुआ हृदय है।
मनुष्यता के लिये घोर लज्जा, अति निंद्य विषय है।
शुद्ध प्रेम के मर्म, प्रेम की महिमा से परिचित हो ।
प्रेम-मार्ग के पथिक, प्रेम-पीड़ा से व्याकुल-चित हो ।
"तुम्हें उचित था, तुम उदार बनकर घर घर में जाते ।
अमित प्रेम-निधि एक एक प्राणी को मुफ्त लुटाते ।।
?

रामनरेश त्रिपाठी . - and किंतु कृपण बन सब समेट सानंद स्वयं रहते हो। इस पर भी तुम स्वार्थ-ग्रसित कुत्सित जग को कहते हो ! ''केवल अपने लिये सोचते मौज भरे गाते हो। जीते, खाते, सोते, जगते, हँसते, सुख पाते हो। जग से दूर, स्वार्थ-साधन ही सतत तुम्हारा यश सोचो तुम्हीँ, कौन जन जग में तुमसा स्वार्थ-विवश है ! 'त्राहि त्राहि सब ओर मची थी जहाँ प्राणि-मंडल में । आँखाँ ने देखो क्या हित की अनुपस्थिति उस थल में ? सदुपदेश से सफल हुई क्या भाषण-शक्ति तुम्हारी ? दयावान कर सकी किसी निष्ठुर को भक्ति तुम्हारी ? "आवश्यकता की पुकार को श्रुति ने श्रवण किया है ? कहो, करों ने आगे बढ़ किसको साहाय्य दिया है ? आर्तनाद तक कभी पदों ने क्या तुमको पहुँचाया ? क्या नैराश्य-निमग्न जनों को तुमने कंठ लगाया ? "कभी उदर ने भूखे जन को प्रस्तुत भोजन पानी। देकर मुदित भूख के सुख की क्या महिमा है जानी ? मार्ग-पतित असहाय किसी मानव पीठ पवित्र हुई क्या सुख से उसे सदन पहुँचाके ? "मस्तक ऊँचा हुआ तुम्हारा कभी जाति-गौरव से ? अगर नहीं , तो देह तुम्हारी तुच्छ अधम है शव से । भीतर भरा अनंत विभव है उसकी कर अवहेला। बाहर सुख के लिये अपरिमित तुमने संकट झेला ।। का भार उठाके।

पद्य-पारिजात
॥
में बंधु,
वैद्य पीड़ा
,
.
"जिसे प्रेम से बहुत समीप सहज ही पा सकते थे
अंधे सा उसको टटोलते अब तक तुम थकते थे
यदि तुम अपनी अमित शक्ति को समझ काम में लाते ।
अनुपम चमत्कार अपना तुम देख परम सुख पाते ॥
"यदि उद्दोप्त हृदय में सच्चे सुख की हो अभिलाषा ।
वन में नहीं, जगत में जाकर करो प्राप्ति की आशा ॥
जाओ पुत्र ! जगत में जाओ, व्यर्थ न समय गँवाओ।
सदा लोक-कल्याण-निरत हो जीवन सफल बनाओ ।।
"दुख
में, साथी घोर विपद में ।
दुसह दीनता में आश्रय, उत्साह निराशा-नद में ।
भ्रम में ज्योति, सुमति संपति में , दृढ़ निश्चय संशय में ।
छल में क्रांति, न्याय प्रभुता में , अटल धैर्य बन भय में ।
"जनता के विश्वास, कर्म, मन, ध्यान, श्रवण, भाषण में
वास करो, आदर्श बनो, विजयी हो जीवन-रण में ।
अति अशांत दुखपूर्ण विखल क्रांति-उपासक जग में ।
रखना अपनी आत्म-शक्ति पर दृढ़ निश्चय प्रति पग में ।
"जग की विषम आँधियाँ के झाँके सम्मुख हो सहना ।
स्थिर उद्देश्य-समान और विश्वास-सदृश दृढ़ रहना ।।
जाग्रत नित रहना उदारता-तुल्य असीम हृदय में
अंधकार में शांत चंद्र सा ध्रुव सा निश्चल भय में ।
"तुम्हें स्मरण करके उदार, संयमी, सच्चरित जन हाँ।
पर-दुख देख दूर करने की उत्सुकता-मय मन हाँ ।

रामनरेश त्रिपाठो है ॥ - जनता सुनकर नाम तुम्हारा एक भाव में जागे। सत्य न्याय के संरक्षण में मुदित प्राण तक त्यागे ।। "जग में सुख की प्राप्ति के लिए एक सहायक दुख है। वही जगाता है सद्गुण को सद्गुण लाता सुख बाधा, विघ्न, विपत्ति, कठिनता जहाँ जहाँ सुन पाना । सबके बीच निडर हो जाना दुख को गले लगाना ।। “घृणित अछूत अकिंचन जग में जो जन है जितना ही। तुमसे है वह प्रेम-प्राप्ति का पात्र अधिक उतना ही ॥ जो कहते हो जगत महामाया है, भीषण भ्रम है। इस विचार में तुमको ही धोखा है, भ्रांति विषम है। "एक अनंत शक्ति वसुधा का संचालन करती है। वह स्वतंत्र इच्छा से लय, उद्भव, पालन करती है। उसी शक्ति से ग्रह नियमित कक्षा में चकराते है किंतु चीरकर महाशून्य को केतु निकल जाते हैं । "उसी शक्ति से सुंदर घन से सुधा-बिंदु हाहाकार वन वज्र पृथ्वी पर आ पड़ता है। उसी शक्ति की सुखद प्रेरणा शुद्ध आत्म-सम्मति है। करो उसी का कर्म, उसी की नियत समस्त प्रगति है। "परम विचित्र यंत्र यह जग है उसी शक्ति से चलता। मत करना अभिमान मिले जो तुमको कभी सफलता ।। कर्म तुम्हारा धर्म अटल हो, कर्म तुम्हारी भाषा । हो सकर्म मृत्यु ही तुम्हारे जीवन की अभिलाषा ॥" झड़ता है। करता -- गोपालशरण सिंह ब्रज-वर्णन १ आते जो यहाँ हैं ब्रज-भूमि की छटा वे देख नेक न अघाते, होते मोद-मद-माते है। जिस ओर जाते, उस ओर मनभाते दृश्य लोचन लुभाते और चित्त को चुराते हैं । पल भर को वे अपने को भूल जाते सदा, सुखद अतीत-सुध-सिंधु में समाते हैं। जान पड़ता है उन्हें आज भी, कन्हैया यहाँ मैया मैया टेरते हैं, गैया को चराते हैं ॥१॥ करते निवास छवि-धाम घनश्याम-भृग उर-कलियों में सदा ब्रज-नर-नारी की। कण कण में है यहाँ व्याप्त दृग-सुखकारी मंजु मनोहारी मूर्ति मंजुल मुरारी की ॥ किसको नहीं है सुध आती अनायास यहाँ, गोवर्धन देखकर गोवर्धन-धारी की ? न्यारी तीन लोक से है प्यारी जन्म-भूमि यही जन-मन-हारी वृदा-विपिन-विहारी की ॥२॥ अंकित ब्रजेश की छटा है सब ठौर यहाँ, लता-द्रुम-बल्लियों में और फूल फूल में ।

गोपालशरण सिंह
८६
भूमि ही यहाँ की सब काल बतला सी रही,
ग्वाल-बाल संग वह लोटे इस धूल में ॥
कल कल रूप में है वंशी-रव गूंज रहा,
जाके सुनो कलित कलिंदजा के कूल में ।
ग्राम ग्राम धाम धाम में हैं घनश्याम यहाँ,
कितु वे छिपे हैं मंजु-मानस-दुकूल में ॥३॥
गूंज रही आज भी सभी के श्रवणों में यहाँ,
रुचिर रसाल ध्वनि नूपुरों के जाल की ।
भूल सकता है कोई ब्रज में कभी क्या भला,
निपट निराली छटा चारु वनमाल की ?
समता मराल ने न नेक कभी कर पाई,
मंजु मंद मंद नंद-नंदन की चाल की।
रहती हगों में छाई, उर में समाई सदा,
छवि मनभाई बाल मदन-गोपाल की ॥ ४ ॥
अब भी मुकुंद रहते हैं ब्रज-भूमि ही में,
देखते यहाँ
के दृश्य
हग फेर फेरके।
छिपे उर-कुंज में है वृदावन-वासियों के,
थकते वृथा ही लोग उन्हें हेर हेरके ॥
चित्त-वृत्तियाँ है सब गोपियाँ उन्हीं की बनी,
रहती उन्हीं के आस-पास घेर घेरके ।
आठौँ याम सब लोग लेते हैं उन्हीं का नाम,
माना है बुलाते "श्याम श्याम" टेर टेरके ॥ ५ ॥

पद्य-पारिजात जिसने विपत्तियाँ से ब्रज को बचाया सदा, दिव्य बल-पौरुष दिखाया बालपन में । मार कर कंस को स्वदेश का छुड़ाया क्लेश, सुयश-प्रकाश छिटकाया त्रिभुवन में ॥ सबको सदैव सिखलाया शुचि विश्व-प्रेम, गोता को बनाया उपजाया ज्ञान मन में दुख को हटाया सुख-बेलि को बढ़ाया वह, श्याम मनभाया है समाया वृदावन में ॥ ६। वही मंजु मही, वही कलित कलिंदजा है, ग्राम और धाम भी विशेष छवि-धाम है। वही वृदावन है, निकुंज द्रुम-पुंज भी हैं, ललित लताएँ लोल लोचनाभिराम है ॥ वही गिरिराज गोपजन का समाज वही, वही सब साज-बाज आज भी ललाम हैं। ब्रज की छटा विलोक आता मन में है यही, अब भी यहाँ ही शुभ-नाम घनश्याम है ॥ ७ ॥ देते हैं दिखाई सब दृश्य अभिराम यहाँ, सुषमा सभी की सुध श्याम की दिलाती है। फूली-फली सुरभित रुचिर द्रुमालियों से सुरभि उन्हीं की दिव्य देह की ही आती है। सुयश उन्हीं का शुक-सारिका सुनाती सदा, कूक कूक कोकिला उन्हीं का गुण गाती है।

गोपालशरण सिंह
हरी-भरी हग-सुखदाई
मनभाई मंजु
यह ब्रज-मेदिनी उन्हीं की कहलाती है ॥८॥
सुखद सजीली सस्य-श्यामला यहाँ की भूमि,
श्याम के ही रंग में रंगी है प्रेम-भाव से।
रज भी पुनीत हुई उनके चरण छूके,
शीश पर उसको चढ़ाते भक्त चाव से ।।
पाप-पुंज-नाशी
उर-कमल-विकासी हुआ
यमुना-सलिल बस
उनके प्रभाव से।
कर दिया पूरा उसे वर वृदावन ने ही,
जो थो कमी मेदिनी में स्वर्ग के अभाव से ॥६॥

,
सियारामशरण गुप्त
एक फूल की चाह
[१]
उद्वेलित कर अश्रु-राशियाँ,
हृदय-चिताएँ
धधकाकर
महा महामारी प्रचंड हो
फैल रही थी इधर-उधर ।
क्षीण-कंठ मृतवत्साओं का
करुण-रुदन दुदीत नितांत,
भरे
हुए था निज कृश रव में
हाहाकार अपार प्रशांत ।
बहुत रोकता था सुखिया को,
'न जा खेलने को बाहर',
नहीं खेलना रुकता उसका,
नहीं ठहरती वह पल भर ।
मेरा हृदय काँप उठता था
बाहर गई निहार उसे;
यही मनाता था कि बचा लूँ
किसी भाँति इस बार उसे ।
भीतर जो डर रहा छिपाये,

सियारामशरण गुप्त ३ ताप-तप्त हाय ! वही बाहर आया । एक दिवस सुखिया के तनु को मैंने पाया। ज्वर में विह्वल हो बोली वह, क्या जानें किस डर से डर,- मुझको देवी के प्रसाद का एक फूल ही दो लाकर [२] बेटी, बतला तो तू मुझको किसने तुझे बताया यह; किसके द्वारा, केसे, कैसे, तूने भाव अचानक पाया यह? मैं अछूत हूँ, मुझे कौन, हा ! मंदिर में जाने देगा; देवी का प्रसाद ही मुझको कौन यहाँ लाने देगा ? फिर फिर, तेरा हठ ! पूरा किससे कहूँ कौन बतलावे, धीरज हाय ! धरूँ कैसे ? कोमल कुसुम-समान देह हा ! अंगार-मयी; - बार बार, इसे करूँ कैसे; हु तप्त पद्य-पारिजात - प्रति-पल बढ़ती ही जाती है विपुल वेदना, व्यथा नई । मैं ने कई फूल ला लाकर रक्खे उसकी खटिया पर; सोचा,-शांत कर मैं उसको, किसी तरह तो बहलाकर । तोड़-मोड़ वे फूल फ क सब बोल उठी वह चिल्लाकर- मुझको देवो के प्रसाद का एक फूल हो दो लाकर ! [३] क्रमश: कंठ क्षीण हो पाया, शिथिल हुए अवयव सारे, बैठा था नव नव उपाय की चिंता में, मैं मन मारे । जान सका न प्रभात सजग से हुई अलस कब दोपहरी, स्वर्ण-धनों में कब रवि डूबा, कब आई संध्या गहरी । सभी ओर दिखलाई दी बस, अंधकार की ही छाया, छोटी सी बच्ची को ग्रसने सियारामशरण गुप्त - कितना बड़ा तिमिर आया ! ऊपर विस्तृत महाकाश में जलते से अंगारों से, झुलसी सी जाती थी आँख जगमग जगते तारों से। देख रहा था--जो सुस्थिर हो नहीं बैठती थी क्षण भर, हाय ! वही चुपचाप पड़ी थी अटल शांति सी धारण कर। सुनना वही चाहता था मैं उसे स्वयं ही उकसाकर- मुझको देवी के प्रसाद का एक फूल ही दो लाकर ! [४] हे मातः, हे शिवे, अंबिके, तप्त ताप यह शांत करा; निरपराध छोटी बच्ची यह, हाय ! न मुझसे इसे हरो ! काली कांति पड़ गई इसकी, हँसी न जाने गई कहाँ, अटक रहे हैं प्राण क्षीणतर साँसों में ही, हाय ! यहाँ,

६६
पद्य-पारिजात
किसे ज्ञात,
अरी निष्ठुरे, बढ़ी हुई ही
है यदि तेरी तृषा नितांत,
तो कर ले तू उसे इसी क्षण
मेरे इस जीवन से शांत !
मैं अछूत हूँ, तो क्या मेरी
विनती भी है, हाय ! अपूत,
उससे भी क्या लग जावेगी
तेरे श्रो-मंदिर को छूत ?
मेरी विनती वह
पहुँची अथवा नहीं वहाँ,
उस अपार सागर का दीखा
पार न मुझको कहाँ वहाँ।
अरी रात, क्या अक्षयता का
पट्टा लेकर आई तू,
आकर अखिल विश्व के ऊपर
प्रलय-घटा सी छाई तू !
पग भर भी न बढ़ी आगे तू
डटकर बैठ गई
गई ऐसी,
क्या न अरुण आभा जागेगी,
सहसा आज विकृति कैसी !
युग के युग से बीत गये हैं,
तू ज्यों की त्यों है लेटो,

सियारामशरण गुप्त
पड़ो एक करवट कब
से
तू,
बोल, बोल, कुछ तो, बेटी!
वह चुप थी, पर गूंज रही थी
उसकी गिरा गगन भर भर,-
'मुझको देवी के प्रसाद का-
एक फूल तुम दो लाकर !'
M
[५]
एक
"कुछ हो, देवी के प्रसाद का
तो लाऊँगा;
हो तो प्रात:काल, शीघ्र ही
मंदिर को मैं जाऊँगा।
तुझ पर देवी की छाया है,
और इष्ट है यही तुझे;
देखू, देवी के मंदिर में
रोक सकेगा कौन मुझे।"
मेरे इस निश्चल निश्चय ने
झट से हृदय किया हलका:
ऊपर देखा,-अरुण राग से
रंजित भाल नभस्थल का!
झड़ सी गई तारकावलि थीं
म्लान और निष्प्रभ होकर;

पद्य-पारिजात
निकल पड़े थे खग नीड़ों से
मानो सुध-बुध सी खोकर ।
रस्सी-डोल हाथ में लेकर,
निकट कुएँ पर जा, जल
खी
च.
मैंने स्नान किया शीतल हो,
सलिल-सुधा से तनु को सी च।
उज्ज्वल वस्त्र पहन, घर आकर,
अशुचि ग्लानि सब धो डाली;
चंदन-पुष्प-कपूर धूप से
सज ली पूजा की थाली ।
सुखिया के सिरहाने जाकर
मैं धीरं में खड़ा हुआ;
आँखें फँपी हुई थी, मुख भी
मुरझा सा था पड़ा हुआ।
-उसे
चूम लूँ,
किंतु अशुचिता से
से डरकर
अपने वस्त्र सँभाल, सिकुड़कर,
खड़ा रहा कुछ दूरी पर ।
वह कुछ कुछ मुसकाई सहसा,
जाने किन स्वप्नों में लग्न,
उसकी वह मुसकाहट भी, हा !
कर न सकी मुझको मुद-मग्न ।
मैं ने चाहा,

-
सियारामशरण गुप्त
င်
--
तेरी।
अक्षम मुझे समझकर क्या तू
हँसी कर रही है मेरी ?
बेटी, जाता हूँ मंदिर मैं
आज्ञा यही समझ
उसने नहीं कहा कुछ, मैं ही
बोल उठा तब धीरज धर,-
तुझको देवी
देवी के प्रसाद का
फूल तो दूं लाकर !
-
एक
[६]]
ऊँचे शैल-शिखर के ऊपर
मंदिर था विस्तीर्ण विशाल;
स्वर्ण-कलश सरसिज विहसित थे
पाकर समुदित रवि-कर-जाल ।
परिक्रमा सी कर मंदिर की,
ऊपर से आकर झर झर
वहाँ एक झरना झरता था
कल कल मधुर गान कर कर ।
पुष्प-हार सा अँचता था वह
मंदिर के श्री.चरणों में,
त्रुटि न दीखती थी भीतर भी
पूजा
के उपकरणों

१०० पद्य-पारिजात आँगन सारा; - दीप-धूप से प्रामादित था मंदिर का गूंज रही थी भीतर बाहर मुखरित उत्सव की उत्सव की धारा। भक्त-वृंद मृदु-मधुर कंट से गाते थे सभक्ति मुद-मय,- 'पतित-तारिणी पाप-हारिगो. माता, तेरी जय जय जय !' 'पतित-तारिणी, तेरी जय जय'- मेरे मुख से भी निकला. बिना बढ़े ही मैं आगे का जाने किस बल से ढिकला ! माता, तू इतनी सुंदर है, नहीं जानता था मैं था मैं यह; माँ के पास रोक बच्ची की, कैसी विधि यह तू ही कह ? आज स्वयं अपने निदेश से तूने मुझे बुलाया तभी आज पापी अछूत यह श्री-चरणों तक आया है! मेरे दीप-फूल लेकर वे अंबा को है; अर्पित करके,

1
सियारामशरण गुप्त
किया पुजारी ने प्रसाद जब
मागे को अंजलि भरके,
भूल गया उसका लेना झट,
पाकर मैं।
सोचा,-बेटी को माँ के ये
पुण्य-पुष्प दूँ जाकर मैं।
परम लाभ सा
.
[७]
पाया,
-~-
सिंह-पौर तक भी आँगन से
नहीँ पहुँचने मैं
सहसा यह सुन पड़ा कि-"कैसे
यह अछूत भीतर आया ?
पकड़ो, देखो भाग न जावे,
बना धूर्त यह है कैसा;
साफ-स्वच्छ परिधान किए है,
भले-मानुषों के
पापी ने मंदिर में घुसकर
किया अनर्थ बड़ा भारी;
कलुषित कर दी है मंदिर की
चिरकालिक शुचिता सारी ।"
ऐं , क्या मेरा कलुष बड़ा है
देवी की गरिमा से भी;
जैसा!
,

पद्य-पारिजात
किसी बात में हूँ मैं आगे
माता की महिमा के भी ?
माँ के भक्त हुए तुम कैसे,
करके यह विचार खोटा?
माँ के सम्मुख ही माँ का तुम
गौरव करते हो छोटा।
कुछ न सुना भक्तों ने, झट से
मुझे घेरकर पकड़ लिया;
मार-मारकर मुक्के-से
धम से नीचे गिरा दिया !
मेरे हाथों से प्रसाद भी
बिखर गया हा! सब का सब,
हाय ! अभागी बेटी, तुझ तक
कैसे पहुँच सके यह
मैं ने उनसे कहा,- दंड दो
मुझे मारकर, ठुकराकर,
बस यह एक फूल कोई भी
दो बच्ची को ले जाकर ।
अब।
[८]
न्यायालय ले गए मुझे वे,
सात दिवस का दंड-विधान

सियारामशरण गुप्त १०३ १ मुझको हुअा; हुआ था मुझसे देवी का महान अपमान ! मैं ने स्वीकृत किया दंड वह शीश झुकाकर चुप ही रह; उस असीम अभियोग दोष का क्या उत्तर देता, क्या कह ? सात रोज ही रहा जेल में या कि वहाँ सदियाँ बोती, अविश्रांत वर्षा करके भी आँखें तनिक नहीं रीती। कैदी कहते- "अरे मूर्ख, क्यों ममता थी मंदिर पर ही ? पास वहीँ मसजिद भी तो थी, दूर न था गिरजाघर भी।" कैसे उनको समझाता मैं, वहाँ गया था क्या सुख से देवी का प्रसाद चाहा बेटी ने . था अपने मुख से। [] दंड भोगकर जब में छूटा, पैर न उठते थे १ घर को;

पद्य-पारिजात था कोई तनु-पंजर को। - , पोछे ठेल रहा भय-जर्जर पहले की सी लेने मुझको नहाँ दौड़कर आई वह; उलझी हुई खेल में ही, हा ! अबकी दी न दिखाई वह। उसे देखने मरघट को ही गया दौड़ता हुआ वहाँ,- मेरे परिचित बंधु प्रथम ही फूक चुके थे उसे जहाँ। बुझी पड़ी थी चिता वहाँ पर, छाती हा! फूल सी कोमल बच्ची हुई राख राख की थी की थी ढेरी ! अंतिम बार गोद में, बेटो, तुझको ले न सका मैं, हा ! एक फूल माँ का प्रसाद भी तुझको दे न सका मैं, हा ! वह प्रसाद देकर ही तुझको जेल न जा सकता था क्या ? तनिक ठहर ही सब जन्मों के दंड न पा सकता था क्या ? धधक उठी मेरी,

सियारामशरण गुप्त
बेटी की छोटो इच्छा वह
कहीँ पूर्ण
पूर्ण मैं कर देता,
तो क्या, अरे दैव, त्रिभुवन का
सभी विभव मैं हर लेता?
यहाँ चिता पर धर दूंगा मैं ,
-कोई अरे सुनो, वर दो,
मुझको देवी के प्रसाद का
फूल ही लाकर दो।
एक

सुमित्रानंदन पंत
जगत्प्रामा
चातक
बादल
सुरपति के हम ही हैं अनुचर,
के
भी सहचर
मेघदूत की
सजल-कल्पना
पना,
के
चिर-जीवनधर;
मुग्ध-शिखी के नृत्य मनोहर,
सुभग स्वाति के मुक्ताकर;
विहग-वर्ग के गर्भ-विधायक,
कृषक-बालिका के
जलधर।
जलाशयों में कमल-दलों सा
हमें खिलाता नित दिनकर,
पर बालक सा वायु सकल दल
बिखरा देता, चुन
सत्वर,
लघु लहरों के चल पलनों में
हम झुलाता
वही चील सा झपट, बाँह गह,
हमको ले जाता
विपुल कल्पना से त्रिभुवन की
विविध रूप घर, भर नभ अङ्क
जब सागर,
ऊप

मत्त नभ सुमित्रानंदन पंत हम फिर क्रोडा-कौतुक करते. छा अनंत-उर में नि:शङ्क । कभी चौकड़ी भरते मृग से भू पर चरण नहीं धरते, मतङ्गज कभी झूमते, सजग शशक नभ को चरते; कभी कीश से अनिल-डाल में नीरवता से मुंह भरते. बृहत् गृद्ध से विहग-छदाँ को बिखराते में तरते। फिर परियाँ के बच्चों से हम सुभग सीप कं पङ्ख पसार, समुद पैरते शुचि पकड़ इन्दु के कर सुकुमार । अनिल-विलोड़ित गगन-सिंधु में प्रलय-बाढ़ से चारों ओर उमड़ उमड़ हम लहराते है बरसा उपल, तिमिर, घनघोर; दमयन्ती सी कुमुद-कला के रजत-करों में फिर अभिराम स्वर्ण-हंस से हम मृदु ध्वनि कहते प्रिय-संदेश ललाम। ज्योत्स्ना में, कर, १ पद्य-पारिजात , अवदात, स्वर्ण-भृग-तागवलि वेष्टित, गुजित, पुंजित, तरल, रसाल, मधुगृह से हम गगन-पटल में लटके रहते विपुल-विशाल; व्याम-विपिन में जब वसंत सा ग्विलता नव-पल्लवित प्रभात, बहते हम तब अनिल-स्रोत में गिर तमाल-तम के मे पात; उदयाचल मे बाल-हंस फिर उड़ता अंबर में फैल स्वर्ण-पंखाँ से हम भी, करते द्रुत मारुत से बात । धीरे धीरे संशय से उठ, बढ़ अपयश से शीघ्र अछार, नभ के उर में उमड़ माह से फैल लालसा में निशि-भार, इंद्रचाप सी व्योम-भृकुटि पर लटक मौन चिंता से घोर, घोष भरे विप्लव-भय से हम छा जाते द्रुत चारों ओर । धूलि, धूलि से पर्वत बन, पल में, साकार- पर्वत से लघु , .

पल में
फिर जल-धार;
सुमित्रानंदन पंत
१०६
काल-चक्र से चढ़ते, गिरते,
जलधर,
कभी हवा में महल बनाकर,
सेतु बाँधकर कभी अपार,
हम विलीन हो जाते सहसा
विभव-भूति ही से निस्सार ।

रस-चषक n अलि हाँ तो गई जमुना-जल को सो कहा कहाँ,बीर, बिपत्ति परी। घहराय के कारी घटा उनई, इतनेई में गागर सीस धरी ॥ रपट्यो पग, घाट चढ़यो न गयो, कवि मंडन ह के बिहाल गिरी। चिरजीवहुनंद को वारो, अरी, गहि बाँह गरीब ने ठाढ़ी करी ॥१॥ -मंडन - " , पर कारज देह को धारे फिरै, परजन्य ! यथारथ ह दरमौ । निधिनीर सुधा के समान करो, सबही विधि सज्जनता सरसौ।। धन आनँद, जीवनदायक हैा, कबै मेरिना पीर हिए परसौ कबहूँ वा विसासी सुजान के आँगन माँ अँसुवान को लै बरसौ ॥२॥ -घनानंद तन की दुति स्याम सरोरुह, लोचन कंज की मंजुलताई हरें। अति सुंदर सोहत धूारे भरे, छबि भूरि अनंग की दुरि धरैं ।। दमकैं द॑तियाँ दुति दामिनि ज्यों, किलकै कल बाल-बिनोद करें। अवधेस के बालक चारि सदा, तुलसी-मन-मंदिर में बिहरै ॥३॥ -तुलसी घोड़ा गिरयो घर-बाहर ही महाराज कळू उठवावन पाऊँ। होय कहाँरन को जो पै आयसु डोली चढाय इहाँ तक लाऊँ ॥

रस-चषक १११ ऐंडो गिरयो बिच पेंडोइ माइँ चलै पग एक ना कैसे चलाऊँ । जीन धरौं कि धरौं तुलसी मुँह देहुँ लगाम कि राम कहाऊँ ।।४।। - अज्ञात ॥ , गर्भ के अर्भक काटन को पटु धार कुठार कराल है जाको । सोई हौँ बूझत राजसभा, धनु कै दल्यो, हौँ दलिहाँ बल ताको लघु प्रानन उत्तर देत बड़ो, लरिहै मरिहै करिहै कछु साको । गोरोगरूर गुमान भरो,कहु कौशिक,छोटो सो ढोटा है काको॥५॥ ---तुलसी हाथिन से हाथी मारे, घोरे पोरे साँ सँहारे, रथनि साँ रथ बिदरनि बलवान की। चंचल चपेट चोट चरन चकोट चाहै, हहरानी फौजें महरानी जातुधान की। बार सेवक-सराहना करत राम, तुलसी सराहै रीति साहेब सुजान की। लाँबी लूम लसत लपेटि पटकत भट, देखा, देखा, लषन, लरनि हनुमान की ॥६।। -तुलसी इंद्र जिमि जंभ पर, बाड़व सु अंभ पर, रावन सदंभ रघुकुल राज है। पौन बारिबाह पर, संभु रतिनाह पर, ज्यों सहसबाहु पर राम द्विजराज है ॥ बार - पर ११२ पद्य-पारिजात पर, पर, दावा द्रुमदंड चीता मृगझुड भूषण, बितुंड पर जैसे मृगराज है। तेज तम अंश पर, कान्ह जिमि कंस त्याँ मलेच्छ बंस पर सेर सिवराज है ॥७॥ -भूपण पर, संपति सुमेर की कुबेर की जु पावै, ताहि तुरत लुटावत, बिलंब उर धारै ना। कहै पदमाकर, सो हेम हय हाथिन के हलके हजारन के बितर बिचारै ना। गंज महीप रघुनाथ राव पाय गज धोखे कहूँ काहू देइ डारै ना। याही डर गिरिजा गजानन को गोइ रही गिरि त , गरे त , निज गोद ते उतारै ना ।।८।। गज बकस - पद्माकर मुंड के ओझरी की झोरी काँधे आँतनि की सेल्ही बाँधे, कमंडलु खपर किए कोरि के। जोगिनी झुटुग झुंड मुड बनी तापसी सी, तीर तीर बैठौँ सो समर सरि खोरि कै॥ सोनित साँ सानि सानि गूदा खात सतुआ से, प्रेत एक पियत बहोरि घोरि घोरि के रस-चषक तुलसी बैताल भूत साथ लिए भूतनाथ, हेरि हेरि हँसत है हाथ हाथ जोरि कै ॥ -तुलसी लागि लागि आगि भागि भागि चले जहाँ-तहाँ, धीय को न माय बाप पूत न सँभारही। छूटे बार बसन उघारे धूम धुध अंध, कहै बारे बूढ़े बारि बारि बार बार हाँ ।। हय हिहिनात भागे जात घहरात गज, भारी भीर ठेलि पेलि रौंदि चाँदि डारही। नाम लै चिलात बिललात अकुलात अति तात तात तौसियत झौ सियत झारही ॥१०॥ -तुलसी लीन्हाँ उखारि पहार बिसाल चल्यो तेहि काल बिलंब न लायो। मारुतनंदन मारुत को, मन को, खगराज को बेग लजायो । तीखी तुरा तुलसी कहतो पै हिए उपमा को समाउ न आयो। मानो प्रतच्छ परब्बत कीनभलीक लसी कपि याँधुकि धायो॥११॥ -तुलसी जा थल कीन्हें बिहार अनेकन, ताथल काँकरिबैठिचुन्यौ करें। जारसना साँ करी बहु बातन,तारसना साँ चरित्र गुन्यौ करें ॥ आलम,जौन से कुंजनि में करी खेल, तहाँ अब सीस धुन्यौ करें। आँखिनमें जेसदारहते, तिनकी अब कान कहानी सुन्यौ करें । १२॥ -आलम 4 पद्य-पारिजात या लकुटी अरु कामरिया पर राज तिहूँ पुर को तजि डारौं आठहु सिद्धि नौ निधि के सुख नंद की गाय चराय बिसा ।। नैनन सौ रसखान जबै ब्रज के बन बाग तडाग निहारौं । कोटिन वे कलधौत के धाम करील के कुंजन ऊपर वारौं ।।१३।। रसखान हाँ तो कहा बसु मानुष हाँ तो वही रसखान बसौं सँग गोकुल गाँव के ग्वारन । जो पसु मेरो चरौं नित नंद की धेनु मँझारन ॥ पाहन हों तो वही गिरि को जो कियो हरि छत्र पुरंदर-धारन । जौखगाँतो बसेरो करौं मिलि कालिँदि-कूल कदंब की डारन॥१४॥ -रसखान टिप्पणी कबीरदास [कबीर का जन्म मगहर (जिला बस्ती) में हुआ था। कब हुअा था, इसका निश्चय नहीं। कोई संवत् १४५६ में मानते हैं और कोई सवत् १४६७ में। कबीर मुसलमान जुलाहे थे। उनके पिता का नाम नूरुद्दीन और माता का नीमा कहा जाता है। जब उनकी अवस्था थोड़ी ही थी, उनका पिता परिवार सहित काशी चला पाया। कुछ लोग उनका जन्म लहरतारा (काशी) में ही मानते हैं। वहाँ वे साधुओं के सत्संग में रहने लगे। अपना सारा रहन-सहन उन्होंने हिंदुओं के ऐसा कर लिया। उनके हृदय में वैराग्य जग गया था । उनकी जिज्ञासा बहुत बढ़ने लगी। स्वामी रामानंदजी उन दिने काशी में थे। कबीर ने उन्हें अपना गुरु बनाया। उन्होंने सूफियों का भी सत्संग किया था। उन्होने अपना अलग पंथ चलाया जिसमें वेदांत और सूफी मत के आधार पर सबकी एकता सिद्ध की गई थी। यही कबीर-पंथ कहलाया। कबीर की शिक्षाएँ बीजक ग्रंथ में संगृहीत हैं। बीजक में तीन प्रधान खंड हैं-साखी, सबद और रमैणी। हिंदू-मुसलमान दोनों ने कबीर की शिक्षाएँ ग्रहण की और दोनों ही के धर्म-पुरोहितों ने उनका विरोध किया। सिकंदर लोदी के पास जब फर्याद पहुँची तो उसने उन्हें काशी से निकलवा दिया। फिर वे मग- हर चले गए और वहीं सं० १५७५ में उनकी मृत्यु हुई ।]

( २ ) (१) साखी दो० १.१५.-.-साखी-साक्षी, सबूत। संता ने अपने दाहा में परमात्मा का सबूत दिया है इसलिये उनके दोहे साखी कहाते हैं । माली-काल के लिये अन्योक्ति । बाढ़ी-बढ़ई (काल)। तरवर-वृक्ष, शरीर । डोलन लाग-बुढ़ापे का कंप। पंखेरू-पक्षी, प्राण । फागुन- पतझड़ का महीना ( काल)। रूना-रोया। पोले थादि-पीले होते जाते हैं। कस्तुरी का मिरग-इस मृग की नाभि में कस्तूरी की थेली रहती है। लेकिन यह स्वयं इस बात को नहीं जानता और घास को । घता फिरता है कि यह सुगधि कहाँ से आ रही है। जलहरि- जलधर, जलाशय। जिन्या-जिह्वा । वासिक-वासुकि, सर्प । जिसी- जैसी। जिमी-पृथ्वी। पाणी-पानी। थाथा-खाली, जिसमें छिलका या भुस ही भुस हो ।. लहँडे-मुड। लाल-एक मणि । दो० १६-३८-दंड-दुःख । खूदन-कुचला और खादा जाना । बनराइ-वनराजि । करगस-बाण । कर ऊँचा हाना-दान देना । दिया-दान। उलीचिए-बाहर फैकिए। खंखर-वीरान । भरे भरि- भर भरकर। सरीराँ-शरीर से। जगाती-महसूल लेनेवाला। (२) सबद सबद-गाने की चीज, पद। संतों का मत है कि भीतर परमात्मा अपना शब्द उच्चारण करते रहते हैं। इसी को अनहद शब्द कहते हैं। संतों के गानों में इसी शब्द का प्रकाश रहता है इसी लिये व भी शब्द या सबद कहलाते हैं।

( ३ )
१-भुलायगा-भूल गया, धोखा खा गया ।
२-पातम-श्रात्मा। डिंभ-दंभ ।
३-जिह-जिसने। गये-नाश हुए ।
४-बिलोवसि-मथता है। मॉजसि-धोता है। कौन गुना-
क्या लाभ या किस हेतु। मलना-मलिन । लौकी-तूंबी।
५-भावे इ०-चाहे जान या न जान । सचु-मुख। डहके-
बहकाए।
६-बागड़ देस-रेगिस्तान, यह संसार । दाझन-जलना । हंसा-
जीव। देस मालवा-मालवा की भूमि बड़ी उपजाऊ है, सिंचाई के
लिये भी अच्छा सुबीता है; पारमात्मिक जीवन । घरही-हृदय में स्थित
परमात्मा में।
। गूंगे का गुड़ मूंगै जाँनाँ-परमात्मा के मिलने का
आनंद उसी प्रकार नहीं कहा जा सकता जैसे गूंगा गुड़ खाकर उसका
स्वाद नहीं बतला सकता।
मलिक मुहम्मद
मुहम्मद जायसी
[ मलिक मुहम्मद प्रसिद्ध सूफी फकीर शेख मोहिउद्दीन के शिष्य
थे जायस में रहने के कारण ये जायसी कहलाते हैं। ये एक
आँख के काने और एक कान के बहरे थे। इन्होंने सं० १५६७ के
लगभग शेरशाह के समय में अपना प्रसिद्ध ग्रथ पद्मावत रचा।
वेदांत के मत का विवेचन करते हुए इन्होंने एक ग्रथ अखरावट भी
लिखा है।
गोरा बादल की वीरता
पृ० ७. गोरा बादल-गोरा चित्तौर के राजा रत्नसेन का सामंत

( ४ ) था। इतिहास में बादल उसका भतीजा माना गया है, परंतु जायसी ने पुत्र माना है। कथा चलती है कि दिल्ली का सुलतान अलाउद्दीन राजा रत्नसेन की स्त्री पदमावतो की अनुपम सुदरता पर मुग्ध था और उसे प्राप्त करना चाहता था। इसलिये उसने चित्तौर पर अाक्रमण किया पर विजय होती हुई न दिखाई दी। अलाउद्दीन का अब छल सूझा। उसने संधि का प्रस्ताव भेजा। गोरा-बादल ने राजा का सावधान रहने की चेतावनी दी पर उसने ध्यान न दिया। मुलतान चित्तौर गढ़ में अतिथि होकर आया था। रत्नसेन उसका पहुंचाने के लिये अंतिम फाटक तक गया। वहाँ से उसे मुसलमान कैद करके दिल्ली ले आए। अब पदमावती ने गोरा-बादल की शरण ली। उन्होंने भी एक छल सोचा। सुलतान को खबर दी गई कि पदमावती आएगी सही पर रानी के योग्य ठाठ के साथ। वह पहले कैदखाने में राजा से मिलकर चित्तौर की कुजी सौंपेगी तब शाही हरम में जायगो। सुलतान ने इस शर्त पर राजा को छोड़ना स्त्रोकार किया। पाँच सौ डोलियों में सहेलियों के स्थान पर हथियारबंद सिपाही, और ले जानेवाले कहार भी सिपाही, रखे गए। पदमावती की डोली में उसकी जगह एक लोहार को बिठाया गया । बँदि-बंधन। जस-जैसे ही कि । कुँवर-राजपूत सरदार जो पालकियों में थे। मिरिग-मृग ( मुसलमान)। गोहारी-पुकार । कटक-सेना। असूझ-दिखाई नहीं देता था। कारी-कालिमा, अंध- कार। फिरि-मुड़कर, पीछे ताककर । गहन छूटि पुनि चाहै गहा- ग्रहण छूटकर अब फिर ग्रहण लगना चाहता है। लापत-छिपाता ( ५ ) हुआ। गोइ-गोय, गद। जोरा-खेल का जोड़ा या प्रतिद्वंद्वी, या बल के साथ । चौगान--गेंद मारने का डंडा। सीस-रिपु-रिपु-सीस, शत्रु का सिर । हाल-कप, हलचल। अगमन-अागे। तुइ इ०-बादल का कथन । अाउ भरी इ०-पूरी आयु पा ली और भोग ली। पूजी-समाप्त हो गई। बूझी-समझकर। समदि-भेंटकर। पूरुष-योद्धा। सुल- तानी-सुलतान का। मसि-अंधकार । दिन-दिन में हो। पृ० ८. हाँका-ललकारा । साका-महान् वीरतापूर्ण कार्य । गोरा-( क ) गोरा सामंत, (ख ) श्वेत । अोनई-उमड़ी। हरद्वानी- हलद्वान की तलवार प्रसिद्ध थी। सेल-माला । बानी-कांति, चमक । गोरे-गोरा ने। स्याँ-साथ । .ड-लोहे की टोपी जो लड़ाई में पहनी जाती है। बगमेल-घोड़ों की मुठभेड़। गज-पेल-हाथियों की रेल-पेल । जूझ-युद्ध । अधर धर मारै-धड़ या कबंध अाकाश में वार करता है। कहा जाता है कि कबंध आकाश में लड़ते हैं। कंध- धड़ ही धड़। निरारै-बिल्कुल, यहाँ से वहाँ तक (अवध)। भोगी- जो भोग-विलास करनेवाले सरदार थे। भारत-घोर युद्ध। कुवर- गोरा के साथो राजपूत । निबरे-समाप्त हुए । गोरै-गोरा ने। देख- देखा। बूझा-समझा। सामुह-सामने। रन मेला-युद्ध प्रारंभ किया। ठटा-ठठ, समूह । करवारू-करवाल, तलवार । स्याँ-साथ । टूट-कटकर गिर जाता है। निनारे-अलग। माठ-मटके। चाँचरि- होली का नाच । पृ० ६. धूका-मुका । भभूका-अँगारे सा लाल । हाथ-इसे पकड़ा। रतन-राजा रतनसेन । पदारथ-अर्थात् पदमावती । करहु एहि ( ६ ) छेका-घेरा। गूंजत-गरजता हुआ। टेका-पकड़ा। पलटि सिंघ... आवा-जहाँ से आगे बढ़ता है वहाँ पीछे हटकर फिर नहीं पाता। वोलै बाँहाँ-(वह मुंह से नहीं बोलता है) उसकी बाँ हे खड़कती हैं । धरावा- पकड़ाता है । घिसियावा-बिसियावे, घसीटे । साहहिँ-केवल सामने । रतनसेन जो...गात-रत्नसेन जा बाँधे गए इसका कलंक गोरा के शरीर पर लगा हुआ है । रुधिर-रुधिर से । रात-लाल अर्थात् कलंकरहित । सरजा-अलाउद्दीन का एक दैवी-शक्ति-संपन्न सरदार। बाजा-भिड़ा। बरियारू-बलवान् । साँग-भाला। काढ़ेसि हुमुकि-सरजा ने जब भाला जोर से खींचा। खसी-गिरी । रावन राव-राजायों का राजा। तुरय-घोड़ा। अंत त इ०-अाखिर गिरकर सिर को धूल में भरना ही है। सरजै-सरजा ने। घाऊ-आघात। जनु परा निहाऊ- मानो निहाई पर पड़ा (अर्थात् साँग को न काट सका)। डाँडा-वन । गाजा-बिजली। पृ० १०. हठि-जार से। सदूर-शार्दूल ( सरजा )। लागि- मुठभेड़ या युद्ध में। बरिबंडा-बलवान् । तस बाजा-ऐसा ग्राघात पड़ा। ढाँठर-ठटरी। तासू-उसका (गोरा का)। फिरा संमारू.- आँखों के सामने संसार न रह गया। नियराना-पास पहुँचा। मुर पहुँचावा पान-देवताओं ने पान का बीड़ा दिया, देवता युद्ध में मरे वीरों का सत्कार करते हैं । सूरदास [ सूरदास का जन्म संवत् १५४० के लगभग मथुरा और आगरा के बीच रुनकता गाँव में हुआ था। ये सारस्वत ब्राह्मण बताए जाते ये बहुत ने कृष्ण- उस समय ( ७ ) हैं पर अनेक लोग इन्हें चंद वरदाई के वंशधर मानते हैं। दिनों तक निराश्रय फिरते रहे। एक बार कुएँ में गिर पड़े, छः दिन तक वहीं पड़े रहे। आखिर निस्सहायों के सहाय भगवान् रूप में इन्हें दर्शन दिए और कुए से बाहर निकाला। इनकी दृष्टि भी खुल गई। सूरदास ने वर माँगा कि जिस दृष्टि से आपका देखा है उससे साधारण चीजे न देखनी पड़े और सदा आपका ध्यान हृदय में रहे। इसी से सूरदास फिर अंधे हो गए। अपने प्रभु की लीलाभूमि में इन्होंने आश्रम बनाया। ये बड़े भक्त कवि हुए ये सवा लाख पदों के रचयिता प्रसिद्ध हैं। पर अभी तक इनके मुश्किल से छः हजार पद मिलते हैं, जो 'सूरसागर' में संगृहीत हैं। गोसाई विट्ठलनाथजी ने आठ प्रसिद्ध कृष्णभक्त कवियों की अष्टछाप नामक मंडली स्थापित की थी जिसमें उन्होंने सूरदास का सबसे पहला स्थान दिया। पद १-३-रागी-प्रेमी। जातना-यातना, पीड़ा । करो-पालन करो। नार-नाला । पन-प्रण । झगरो-यह सब झगड़ा है। अनत-अन्यत्र । करील-एक काँटेदार झाड़ी। ४.१६-बार-देर । गुहत-गू थने हुए। ओछत-पोंछते हुए। धौरी-धवली, श्वेत । साध-अभिलापा। लौनी-माखन । हीरा। केहरि-नख-बाघ के नाखून। श्राहि-है। लवनी-नवनीत । सबारे-सबेरे। आरि-हठ । कोहि-क्रोध । गुसैयाँ-मालिक, राजा। हम ते-हमसे बढ़कर। रूहठि-खेल में झूठ या कपट का व्यवहार ।

( ८ ) । लावत पाप-दोप लगाते हैं । धिरयो-धमकाया । चबाई-चुगलखोर । धूत-धूर्त । बूझी ग्वालिनि-गोपो ने पूछा। उकठि-सूखकर । गोस्वामी तुलसीदास [ गोसाईजी की शिष्य-परपरा में उनका जन्म-संवत् १५५४ माना जाता है। शिवसिंह सेंगर ने १५८३ में इनका जन्म होना लिखा है। ये राजापुर के पं० आत्माराम के पुत्र थे। इनकी माता का नाम हुलसी था। वेणीमाधवदास के मूल गोसाईचरित में लिखा है कि इनके पेट ही से दाँत उग आए थे और इनका जन्म देकर इनकी माता मर गई थी। एक दासी ने पाँच वर्ष तक इनका पालन किया। साँप काटने से वह भी मर गई। कुलक्षण समझकर इनके पिता ने इन्हें त्याग दिया तब नरहर्यानंदजी ने इनको पाला-पोसा और इनके सब संस्कार किए। इन्होंने इनका नाम तुलसीदास रखा। इनका पहला नाम रामबोला था। शेष-सनातनजी के पास काशी में इन्होंने विद्या प्राप्त की। आगे चलकर इनका विवाह भी हुआ। एक बार ये अत्यंत प्रेम के कारण अपनी स्त्री के पीछे पीछे अपनी ससुराल को दौड़े गए। इस पर इनको स्त्री ने इन्हे फटकारा जिससे इन्हें वैराग्य हो गया। इन्होंने सारे भारत का भ्रमण किया और रामचरितमानस तथा गीतावली सरीखे कई अनुपम ग्रंथ लिखे। इनकी मृत्यु काशी में स० १६८० में हुई ।] (१) भरत-मिलन पृ० १८. चतुरंग सेन-चतुरंगिणी सेना, जिसमें पैदल, घुड़- रथ और हाथी ये चार अंग होते हैं। खभारू-क्षोभ, खलबली।

( ६ ) पृ० १६. गजाली हाथियों की पंक्ति। ससि-चंद्रमा ने तीनों लोकों को जीतकर राजसूय यज्ञ किया। अपने वैभव के मद में उसने अपने गुरु बृहस्पति की स्त्री तारा को हरकर उसके साथ अनीति की जिससे बुध उत्पन्न हुआ। इस पर देवताओं ने चंद्रमा पर चढ़ाई की। राक्षस चंद्रमा की तरफ से लड़े। युद्ध का जब अंत न दिखाई दिया तो ब्रह्मा ने बीच-बिचाव किया। चंद्रमा को तारा लाटा देनी पड़ी, पर बुध उसे मिल गया। नहुष -ये बड़े न्याय-निपुण तथा ज्ञानी राजा थे। इंद्र पर एक बार ब्रह्महत्या का दोष लगा और वह छिप गया। नहुष को इंद्र-पद दिया गया। मद में आकर इन्होंने बुरी वासना से इंद्राणी का अपने पास बुला भेजा। बृहस्पति के कहने से इंद्राणी ने कहला भेजा कि यदि ब्राह्मणों से अपनी पाल की उठवाकर अायो तो तुम्हें स्वीकार करूं। नहुष ने ऐसा ही किया। ब्राह्मण चल नहीं सकते थे। नहुष ने कहा 'सर्प सर्प' ( जल्दी चलो, जल्दी चलो )। इस पर ब्राह्मणों ने क्रुद्ध होकर शाप दिया कि जा, सर्व हो जा और नहुष सर्प हो गए। इंद्राणी के सतीत्व की रक्षा हुई। . बेन-यह राजा जन्म ही से बड़ी दुष्ट प्रकृति का था। इससे तंग आकर इसके पिता ने वानप्रस्थ ले लिया। जब इसे राजगद्दी मिली तो यह बड़ा उत्पात मचाने लगा। विष्णु के स्थान पर यह अपनी पूजा चलवाने लगा। ब्रह्मर्षियों ने इसे बहुत समझाया पर जब इसने एक न माना तो उन्होंने शाप देकर इसे भस्म कर दिया।

( १० ) सहसबाहु-यह एक बार आखेट करते करते जमदग्नि के आश्रम पर जा पहुँचा। मुनि ने इसका राजोचित सम्मान किया जिसे देख- कर सहस्रबाहु दंग रह गया । जब सहस्रबाहु ने जाना कि मुनि के पास कामधेनु है जिससे उन्हें किसी बात की कमी नहीं तो उसने उनसे उसे माँगा। माँगने पर न मिली तो वह जमदग्नि को मारकर उसे ले चला। गऊ तो छूटकर इंद्रलोक को भाग गई परंतु परशुराम ने क्रु द्ध होकर सहस्रबाहु के सहित क्षत्रियों का २१ बार संहार करके इस अपमान का बदला लिया। उन्होंने यज्ञ करके अपने पिता को जीवित भी कर लिया। सुरनाथ-एक बार इंद्र ने खड़े होकर बृहस्पति के याने पर उनका स्वागत नहीं किया। बृहस्पति के अप्रसन्न होकर चले जाने पर दैत्यों ने देवताओं पर आक्रमण किया और उन्हें स्वर्ग से खदेड़ दिया। फिर देवता वृहस्पति ही की शरण गए तब उन्होंने उपाय बताया। त्रिशंकु-अपने ऐश्वर्या के गर्व से त्रिशकु सशरीर स्वर्ग जाना चाहता था। विश्वामित्र ने तपोबल से उसे स्वर्ग की ओर भेजा। देवतात्रों ने उसे नीचे ढकेला। इससे वह बीच ही में टँगा रह गया। पृ० १६-२०-रजायसु-राजादेश, अाज्ञा । भाथा-तरकस । प्रवान- प्रमाण । अँचवत-पीते ही। मातहिँ-मत्त हो जाते हैं । तरनि- सूर्य । मकु-चाहे। आन-दुहाई । पृ० २१-मंदाकिनी-गंगा। खारी-बुराई, दोष । जल-अलि- भांतुवा, एक काला कीड़ा जो पानी पर तैरता रहता है। -

( ११ )
पृ० २२–ईति-अतिवृष्टि, अनावृष्टि, चूहे, टिड्डीदल, तोते और
पास के राजे-ये छः कृषि के विघ्न । खेरा-छोटा ग्राम, पुरवा ।
खगहा-गैंडा। चक = चकवा ।
पृ० २३-२४-परमारथु-मोक्ष । तून-तरकस । गुदरत-अलग
रहना। चग-पतंग, गुड्डी। निषंग-तरकस । गाँडर ताँती-वीरन
या खस की जड़ की ताँत ।
पृ० २५-सुरगन सभय धुकधुकी धरकी-डर से देवताओं की
छाती धड़कने लगी कि न हो राम अयोध्या लौट जाएँ और देवद्रोही
रावण न मारा जाय।
(२) चातक-प्रेम
पृ० २५ -लटो-विकृत हो गई है, जिससे अावाज अच्छी तरह
नहीं निकलती। परुप पाहन-कठोर पत्थर, अोले। कुलिस-वज्र ।
एक-निराला ।
पृ० २६-चरग-बाज की जाति का एक शिकारी पक्षी, चरख ।
ऊख-ऊष्म, गरम।
नरोत्तमदास
[ 'शिवसिंहसरोज' में नरोत्तमदास का संवत् १६०२ में वतमान
रहना कहा गया है। ये सीतापुर जिले के बाड़ी नामक कसबे के
निवासी थे। मिश्रबंधुओं ने अनुमान किया है कि ये कान्यकुब्ज ब्राह्मण
थे।
। इनका सुदामाचरित्र बहुत सरस तथा हृदयग्राही है। इस संग्रह
में यह ग्रंथ संक्षप से दिया गया है। इसके वर्णन बिल्कुल यथातथ्य

( १२ )
एवं स्वाभाविक और इसी कारण अत्यंत प्रभावशाली हैं। भापा भी
बहुत शुद्ध है।
सुदामा-चरित्र
पृ० २७-निरद्वंद-निश्चिंत । सिद्धि करौ-जाओ।
मंगला-
कांक्षा से प्रस्थान करने का सिद्धि करना कहा जाता है। पन-अवस्था।
कोदो-सा-काद्रव और श्यामाक, कदन्न ।
पृ० २८-पेलि-ठेलकर, जबर्दस्ती। कनावड़ा-अहसानमंद ।
जक-बर्राहट । छड़िया-छड़ी लिए हुए द्वारपाल। बाली-अनाज की
बाल । बूट-चने का पौधा ।
पृ. २६-ग्राहि-है। लटी-जीर्ण ।
उपानह-जूता। सामा-
सामान, सामग्री । दुख सानै-दुखी होवे ।
पृ० ३०-अछाट-बड़ी। तंदुल-चावल । दुइ लोक बिहारी-दो
लोकां की संपत्तिवाला या स्वामी। धन्य, कहा कहिए...पावन कीना-
सुदामा को बिदा करते समय कृष्ण का कथन । पटवनि-बिदा करने
का ढंग। कर अोड़त फिरे--( माँगने के लिये ) हाथ फैलाते फिरे ।
झखत-दुःखित होते हुए। गयंद-गजेंद्र, श्रेष्ठ हाथी। गौतम रिषि
को नाउँ-किसी अनजान नगर में जाने से पहले आपत्तियों से
रक्षा
के
निमित्त गौतम ऋषि का स्मरण किया जाता है ।
सुदामा ने अपने
नगर को, जिसमें इसी बीच विश्वकर्मा ने कृष्ण
के
अाज्ञानुसार फेरफार
कर दिया था, पहचाना नहीं ।
पृ. ३१--संभ्रम-भ्रम, आश्चर्य । मझाया-छान डाला। पूछि भे-
पूछ चुके । टोटनी-टांटी। बेट-छुरी का वह भाग जो हाथ में पकड़ा

के पैर । जाता है। सौ टूक-सौ टुकड़ों का। वहा-वह भी। पावौ-खाट पाटी-खाट की लकड़ी। डाँड़न की माला-बड़ी इलायची के अाकार के एक प्रकार के फलों की माला । ताक-ताक ( आले) पर । चामीकर-सुवर्ण। हो न-नहीं था। लाहु-लाभ । वाहि-उस ( स्त्री ) को। उठाय लयो-बनवा लिया। लूम-पूँछ । बनवारी- जगल में घूमनेवाली। अब्दुर्रहीम खानखाना 'रहीम' [इनका जन्म सं० १६१० में हुआ था। ये अकबर के अभि- भावक बैरम खानखाना के पुत्र थे। ये बड़े कवि और दानी थे । गंग कवि को इन्होंने एक बार छत्तीस लाख रुपए का पुरस्कार दिया था। इन्होंने संस्कृत, हिंदी और फारसी सभी भाषाओं में अच्छी कविता की है। इनके दोहे और बरवै प्रसिद्ध हैं। बरवै छंद में इन्होंने नायिका-भेद भी लिखा है। इनकी गोसाई तुलसीदासजी से बड़ी घनिष्ठता थी। ये अकबरी दरबार के रत्न थे। ये अकबर के सेनापति और मत्री भी थे। पीछे ये जहाँगीर के विरुद्ध हो गए थे जिससे कैद कर लिए गए और इनकी जागीर छीन ली गई। पर फिर इन्हें क्षमा मिल गई। सं० १६६६ में ये विद्रोही महाबतखाँ के विरुद्ध भेजे गए। परंतु मार्ग ही में, दिल्ली में, इनका स्वर्गवास हो गया।] ( १ ) दोहा दो० १.१२-- अच्युत-चरन-तरंगिनी-अच्युत विष्णु का एक नाम है। पुराणों में गंगा का विष्णु के चरणों से निकलना कहा गया है ।

( १४ ) पखड़ी। शिव के सिर पर भी वे विराजती हैं। हरि (विष्णु) न बनायो-क्योंकि उस दशा में गंगा को मेरे चरणों पर रहना पड़ेगा। बनायो-बनाइयो। इंदव-भाल-(चंद्रमा है जिसके ललाट पर ) शिव बनाना जिससे तुम मेरे सिर पर ही रहो। मुनि-पत्नी--अहल्या । पत्र-दल, पितहिँ -अर्थात् जल को। सकुचि...सीत-सिकुड़कर चद्रमा के शीत का जल में उसकी वृद्धि के लिये पड़ने देता है। पिता-पुत्र में इतनो प्रीति है कि परकीय वैरभाव का कोई फल नहीं होने पाता। अनखाए-बिना खाए । अनखाय-क्रुद्ध हो। सेस-(१) शेषनाग, (२) बचा खुचा। ( २ ) बरवै था। ६-६-घुरवा-घोर अर्थात् गर्जन। ऊधो-उद्धव, कृष्ण के सखा जिन्हें कृष्ण ने विरह-व्याकुल गोपियों को समझाने के लिये भेजा यह संदेसवा-कृष्ण को भुलाकर निर्गुण परमात्मा का ध्यान करना और योग साधना करना। अकह कहान-अकथ कहानी। बमु आस-पाठों दिशाएँ। बिहारीलाल [बिहारीलाल का जन्म ग्वालियर के पास बसुश्रा-गोविंदपुर गाँव में संवत् १६६० के लगभग हुआ माना जाता है। बचपन में ये बँदेल- खंड में रहे और जवानी में अपनी ससुराल, मथुरा में। ये जयपुर के मिर्जा राजा जयसाह ( महाराजा जयसिंह ) के आश्रय में रहते थे। इन्हीं के कहने पर इन्होंने वे सात सौ के लगभग दोहे रचे जो इनकी सतसई में संगृहीत हैं। बिहारी-सतसई इतना गंभीर ग्रंथ बना कि ( १५ ) इस पर दर्जनों टीकाएँ हो चुकी हैं और नई नई होती जा रही हैं । इनका मृत्यु-काल सं० १७२० के आस-पास माना जाता है ।। दोहे पृ० ३५. स्यामु-(१) कृष्ण, (२) काला रंग, (३) पाप । हरित-दुति-(१) नीका, कम सुंदर, (२) हरा रंग, (३) जिसका प्रभाव हर लिया गया हो। अनाकनी-आनाकानी । दई दई-दैव दैव । दई दई -दैव ने जो दी है। जग-बाइ-दुनिया की हवा। अएरि-अंगीकार करके। पृ० ३६. कनकु-(१) धतूरा, (२) सोना । अपत-अपत्र, बिना पत्तों की। बीचु-फर्क। पृ० ३७. अरक-आक का पेड़ । अरक-सूर्य । उदातु-उद्योत, प्रकाश। भज्यौ-भागा । भज्यौ-भजन किया। भज्यौ-भजन किया। बरिया-अवसर । करिया-कर्णधार । औथरी-छिछला । बाइ-बावली। श्रुति-वेद, जो पीढ़ी दर पीढ़ी सुनकर के याद होते आ रहे हैं। सुम्रत्यौ-स्मृति । निसक ही-दुर्बल ही को। छायाग्राहिनी-राक्षसी जो जल में के प्रतिबिंब के सहारे बिंब (असल) वस्तु को खींचकर चट कर जाय । इसी प्रकार की एक राक्षसी लंका के पास समुद्र में रहती थी जो अाकाश- मार्ग से लंका जानेवालों को भी खा जाया करती थी। हनुमान् पर जब इसने अपना बल दिखाना चाहा तो उन्होंने इसे मार डाला। पृ० ३८. अोड़-मिट्टी खोदनेवाली एक जाति जो गधे पर मिट्टी ढोती है। बै-नै-वय-नदी, नई उमर रूपी नदी। कहलाने-कातर, व्याकुल । चिनगी चुगै अँगार की—कहते हैं कि चकार जलते हुए अँगारे खा जाता है। ६ ( १६ ) , - पृ० ३६. बृषभानुजा-(१) वृषभानु की पुत्री, राधा । (२) वृषभ या बैल की अनुजा । हलधर-(१) बलदेव, (२) हल चलानेवाला बैल । पद्माकर भट्ट [पद्माकर मोहनलाल भट्ट के पुत्र थे ये तैलग ब्राह्मण थे। इनका जन्म सं० १८१० में, बाँदे में, हुआ था। पद्माकर के पिता भी कवि थे। पुत्र में यह गुण कई गुना होकर पाया। ये कई राजा. महाराजाओं के यहाँ से सम्मानित हुए थे। अधिकतर ये जयपुर दरबार में रहे । महाराजा प्रतापसिंह और उनके पीछे उनके पुत्र जगत्सिंह इन्हें बहुत मानते थे। जगत्सिंह के नाम पर इन्होंने जगद्विनाद बनाया। सं० १८५६ में ये महाराजा रघुनाथ राव के यहाँ गए। उनके यहाँ इनका बड़ा सम्मान हुअा था। कुछ दिनों ये उदयपुर, ग्वालियर और बूंदी में भी रहे थे। वृद्धावस्था में ये, बहुत रुग्ण होने के कारण, कानपुर में गंगातट पर बस गए। वहीं इन्होंने गंगालहरी बनाई। ८० वर्ष की अवस्था में इनका शरीर-पात हुआ।] गंगा-स्तव पृ० ४०-कूरम-कूर्मावतार । काल-वाराहावतार । पृथ्वी का कूर्म ( कछुए ) की पीठ पर, सुअर के दाँत पर और शेष-नाग के सिर पर रहना पुराणों में कहा गया है। रजत-पहार-कैलास । पंचभूत- पंचभूतों का बना शरीर, बार बार शरीर धारण। भूतन भूतन को पति- महादेव। तन ग्यारह-महादेव के ग्यारह रूप माने गए हैं। शूल-संसार का दुःख । त्रिशूल देत-महादेव बनाते । . भत्र ( १७ ) पृ० ४१-४२- गरद कीन्हें-धूल में मिला दिए। बुटना-भागना । सँघाती-साथी। घुटना-दम घुटकर मर जाना। दीह-दीर्घ, बड़े। लुटना-लूटा जाना, नष्ट हो जाना। हरिश्चंद्र [बाबू हरिश्चंद्र का जन्म सं० १६०७ के भाद्रपद की शुक्ला सप्तमी को, काशी में, हुआ था। ये प्रसिद्ध सेठ अमीचंद के वंशज थे। इनके पिता का नाम गोपालचंद था जो अच्छे कवि और चालीस ग्रंथों के रचयिता थे। पिता के गुण पुत्र में आए। छः वर्ष की अवस्था में ही ये कविता करने लगे थे। इन्होंने पेनीरीडिंग रूम, तदीय समाज आदि कई संस्थाओं को स्थापना की थी और कविवचनसुधा, हरिश्चंद्र- चंद्रिका और हरिश्चंद्र-मेगजीन नामक पत्र-पत्रिकाएँ निकाली थीं। सं० १६२७ में ये ऑनरेरी मजिस्ट्रेट बनाए गए। इन्होंने बीसियों नाटक लिखे और अनुवाद किए । इनकी कविता और उपाख्यान तथा निबंधों की कुछ गिनती नहीं। ये बड़े उदार व्यक्ति थे। ब्यय में संयम न रखने के कारण इनको अंत में धन-संकट उठाना पड़ा। इनका हिंदी भाषा का प्रेम अगाध था। राजा शिवप्रसाद फारसी मिली भाषा के पक्षपाती थे, इससे इन्होंने उनका विरोध किया। राजा शिवप्रसाद को सितारेहिंद खिताब मिलने पर हिंदी के समाचारपत्रों ने एकमत होकर इन्हें भारतेंदु की उपाधि दी जो सबको पसंद हुई।] नारद की वीणा पृ० ४३.४४-पिंग-कुछ पीलापन लिए हुए, मटमैले रंग की। बनी-शोभित है। आरोहन अवरोहन-संगत में स्वरों का चढ़ाव-उतार ।

( १८ ) अघट-जो घटे नहीं । खगोल-गोलाकार आकाश । कर-अमलक-हथेली पर का आँवला जो उलट-पुलट करके संपूर्ण देखा जा सकता है; भली भाँति जान लेने योग्य वस्तु । ब्रह्म-परम तत्त्व, परमात्मा। जीव- प्राणियों की आत्मा। निरगुन-निर्गण; परमात्मा का शुद्ध निरुपाधि निराकार रूप जिस पर गुणों का आरोप नहीं हो सकता। सगुन- सगुण-परमात्मा का त्रिगुणात्मक व्यक्त साकार रूप । द्वैत-वह दार्शनिक मत जिसमें परमात्मा, जीवात्मा और प्रकृति की अलग अलग सत्ता मानी जाती है । अद्वैत-जिसमें इन तीनो की एकता और अभिन्नता मानी जाती है, जो भेद दिखाई देता है वह मायाकृत और केवल भ्रम माना जाता है। नित्य-अविनाशी। अनित्य-नाशवान् । श्रीधर पाठक [पं० श्रीधर पाठक सारस्वत ब्राह्मण थे। संवत् १६१६ में इनका जन्म आगरा जिले के जोंधरी गाँव में हुआ था। पहले इन्होंने घर पर संस्कृत पढ़ी। इंट्रेंस तक इन्होंने स्कूली शिक्षा प्राप्त की । सं० १६३७ में इन्होंने सरकारी नौकरी कर ली। वहाँ इन्होंने बड़ी तत्परता दिखाई। अंत में ये युक्त-प्रांतीय सरकार के दफ्तर के सुपरिंटडेंट पद तक पहुँचे। सरकार में इनकी बड़ी प्रशंसा हुई। सरकारी नौकरी से इन्होंने पेशन ले ली थी। इन्होंने खड़ी बोली और ब्रजभापा दोनों में कविता की है। इनकी ब्रजभाषा की कविताएँ अधिक सरस और मधुर हैं । भाषा इनकी और सुमधुर परतु खड़ी बोली इतनी शुद्ध नहीं है। ये प्राकृतिक सौंदर्य के बड़े उपासक थे ! 'देहरादून', 'शिमला' तथा 'काश्मीर-सुषमा' में इनका प्रकृति-प्रेम खूब झलकता है। है ( १६ ) इन्होंने भारत की प्रशंसा में भी कविता की है जिसका संग्रह भारत-गीत नाम से प्रकाशित हुअा है। इनके अनुवाद इनकी स्वतंत्र रचनाओं से भी सुदर हैं। इनके ऊजड़ ग्राम, श्रांत पथिक और एकांत-वासी योगी गोल्डस्मिथ के ग्रंथों के अनुवाद । कालिदास के ऋतुसंहार का भी इन्होंने अनुवाद किया है जो बहुत मधुर है। संवत् १९८५ में इनकी मृत्यु हुई।] हैं काश्मीर-सुषमा पृ० ४५-~-छनिक-क्षण भर ठहरनेवाली । मुकुर-दर्पण । उसति- उच्छ्वसित होती है। गह्वर-गुफा । पृ० ४६-सैननि-श्रेणियों में, पंक्तियों में। वितस्ता-झेलम नदी का एक नाम । वैष्णव "श्री"-वैष्णव तीन रेखाओं का ऊर्ध्वपुंड्र तिलक लगाते हैं, बीच की रेखा को श्री कहते हैं। अद्रि-पर्वत । नैसर्ग निधि- प्राकृतिक खजाना। निखिल-सब । अयोध्यासिंह उपाध्याय 'हरिऔध' [पं० अयोध्यासिंह उपाध्याय अगस्त्य गोत्री, शुक्ल यजुर्वेदी सनाढ्य ब्राह्मण हैं। इनका जन्म सं० १९२२ में आजमगढ़ जिले के कसबा निजामाबाद में हुआ। इन्होंने सं० १६३६ में वर्नाक्युलर मिडिल परीक्षा पास की और सं० १९४४ में नार्मल । घर पर इन्हें संस्कृत और फारसी की भी शिक्षा मिली थी। पहले ये अपने ही कसबे के तहसीली स्कूल में अध्यापक हुए। पीछे इन्होंने कानूनगोई पास की और कानूनगो बनाए गए। पेंशन लेते समय ये सदर कानूनगो थे। अाजकल काशी-विश्वविद्यालय में हिंदी के अवैतनिक अध्यापक ( २० ) . हैं। कविता के त्तेत्र में उपाध्यायजी का स्थान बहुत ऊँचा है। आपका 'प्रियप्रवास' एक अत्यंत सुदर महाकाव्य है जिसमें प्रेम की मधुर व्यंजना के साथ साथ समाज-सेवा का ऊँचा आदर्श दिखाया गया है। प्रियप्रवास में मधुर और कोमल संस्कृत पदावली का उपयोग किया गया है। उपाध्यायजी ने बोलचाल की भाषा में भी बड़ी चुटीली उक्तियाँ कही हैं। इन पिछली रचनाओं में इन्होंने मुहावरों और कहावतों का बड़ा फबता प्रयोग किया है। इन रचनाओं का 'चाखे चौपदे', 'चुभते चौपदे' और 'बोलचाल' इन तीन ग्रंथों में संग्रह किया गया है। इसी तरह उपाध्यायजी के गद्य-लेखों में भी दो शैलियाँ मिलती हैं।] (१) वर्षा-वर्णन पृ० ४८-४६-अंशु-किरण । वियत-अाकाश । व्यूह-घेरा । रसा- पृथ्वी । उमड़ते पड़ते-उमड़े पड़ते थे होना चाहिए। कर सु-प्लावित- डुबाकर । हिल-हिलकर, इसका कर्ता 'पादप-पुंज के दल' है । पृ० ५० -अनुराग-अनुराग का रंग लाल माना गया है। प्रति- पत्ति-कृपा, प्रसाद। राजि-पंक्ति । जीवन-पानी का नाम भी है। पृ० ५१-भुज-पोत-बाहु-रूपी जहाज। प्रभंजन-आँधी। असि- - - तता-कालापन । २) भेद की बाते पृ० ५१-५३--किसे-किसी को । ए-चिड़ियाँ । वे-बेलें । उलही- प्रसन्न, उल्लसित । गुन-भरे के-परमात्मा के छिले-कुरेदकर दूर ( २१ ) करे सतधंधी-अनेक धंधोंवाली। साँस की साँसत-साँस रोककर प्राणायाम करने का कष्ट । नाक दबाना-प्राणायाम करना । पृ० ५४-आँवला हथेली का जो उलट-पुलटकर अच्छी तरह देखा जा सकता है। संस्कृत मुहावरा, हस्तामलक । जगन्नाथदास 'रत्नाकर' [ बाबू जगन्नाथदास का जन्म सं० १६२३ में, काशी में, हुआ। इनके पिता बाबू पुरुषोत्तमदास अग्रवाल थे। इनके पूर्वज मुगल बादशाहों के यहाँ प्रतिष्ठित पदों पर रहे थे। अतएव इनके घर में फारसी का बड़ा मान था। जगन्नाथदास ने भी बी० ए० में फारसी ली थो और फारसी ही लेकर एम० ए० करना चाहते थे पर किसी कारण से परीक्षा न दे सके। पहले-पहल ये फारसी में कविता किया करते थे। परंतु उस समय के हिंदी-प्रेम की लहर से, नागरीप्रचारिणी सभा जिसका प्रतीक है, ये नहीं बच सके और इन्होंने भी हिंदी में कविता रचना आरंभ कर दिया। इनकी कविता पुरानी पद्धति पर चलती हुई भी अत्यंत अोजपूर्ण होती थी। पढ़ने पर यही भान होता है कि पद्माकर और देव की कविता पढ़ रहे हैं। ये ब्रजभाषा के उच्च कोटि के कवि थे। इनके 'हरिश्चंद्र', 'गंगावतरण' और 'उद्धवशतक' काव्य बहुत प्रसिद्ध हैं। गंगावतरण पर इन्हें हिंदुस्तानी एकेडेमी से ५००) का पुरस्कार मिला था। ये अयोध्या-नरेश महाराज सर प्रतापनारायण सिंह के प्राइवेट सेक्रटरी थे। उनकी मृत्यु पर उनकी महारानी साहिबा ने इन्हें अपना प्राइवेट सेक्रटरी बनाया था। ये जीवन भर उसी पद पर रहे। जून सन् १६३२ में, हरद्वार में, इनका देहांत हो गया।

( २२ ) प० ५६-रह्यो कौ रूप... भगीरथ की वर-प्राप्ति पृ० ५५ --गोकरन-धाम-एक शैव क्षेत्र जो मालाबार में है । रावण आदि ने यहीं तप किया था। भूप ...लेखा सौ-तप से राजा इतने क्षीण हो गए कि संदेह होने लगा कि वे हैं या नहीं है । भावना की तरह गुप्त से हो गए । रेखागणित में मानी हुई रेखा के समान वे थे भी और नहीं भी थे । पुरहूत-इंद्र । अखंडल-इंद्र। कहलाने-व्याकुल हुए। चारमुख-ब्रह्मा । पृ० ५८-तारन-बिरद-उतंग-तारने की कीर्ति से उत्कृष्ट । जुरे है- ढंढा करेंगे। ब्रह्मद्रव-गंगा के रूप में द्रवीभूत परमात्मा । पृ० ५६-आसुतोष-बहुत जल्दी संतुष्ट होनेवाले । छोहि-स्नेह करके। खर्ब-कम, नष्ट | दुर्दर-जिसको दलन करना कठिन हो । पारावार-समुद्र । पृ० ६०-बच्छस्थल-वक्षःस्थल, छाती। प्रलंब-लंबी। पृ० ६१-दुरद-दवन-सिंह। तांडव-शिवजी का उग्र नृत्य । प्रनतारति-हारी-प्रणत (भक्त) की आर्ति (दुःख ) को हरनेवाले । पृ०६२-दंद-उम्मस-विरोधी विचारों का ताप। रामचंद्र शुक्ल [पंडित रामचंद्र शुक्ल का जन्म सं० १६४१ में बस्ती जिले के अगोना गाँव में हुआ। इन्होंने एफ० ए० तक कालेज में शिक्षा पाई । फिर मिर्जापुर के मिशन स्कूल में मास्टर हो गए । सन् १६०८ में काशी- नागरीप्रचारिणी सभा में हिंदी-शब्दसागर का काम करने के लिये बुलाए गए। आठ-नौ वर्षों तक नागरीप्रचारिणी पत्रिका का संपादन ( २३ ) - भी इन्होंने किया। आजकल ये काशी हिंदू-विश्वविद्यालय में हिंदी के अध्यापक हैं। उच्च कोटि के के कवि, समालोचक और निबंधलेखक हैं। इनके निबंध गूढ़ विषयों पर होते हैं। वे या तो साहित्यिक आलोचना पर हैं या मनोविकारों पर। तुलसीदास, सूरदास और जायसी को बड़ी ही मार्मिक और विस्तृत अालोचनाएँ इन्होंने लिखी हैं, जिन्होंने हिंदी के समालोचना-क्षेत्र में नवीन युग उपस्थित कर दिया है। इनकी कविताएँ भावपूर्ण होती हैं । करुण- रस लिखने में ये सिद्धहस्त हैं। फुटकर कविताओं के अतिरिक्त इन्होंने बुद्धचरित नामक महाकाव्य लिखा है। भगवान् बुद्ध और हंस पृ० ६३-६६-वयस-अवस्था। देवदत्त-बुद्ध का चचेरा भाई। बैठ्यो-घुस गया। सहराय-सुहलाकर । पाटल-एक पौधा। विधि कै- विद्ध होकर। तीर-पास । देवगण इ०-बौद्धों का एक विश्वास । जयशंकर 'प्रसाद' [ बाबू जयशंकर 'प्रसाद' कान्यकुब्ज वैश्य हैं। इनका जन्म सं. १६४६ में, काशी में, हुअा। इन्होंने घर पर ही संस्कृत, फारसी, हिंदी और अँगरेजी की शिक्षा पाई है। इनकी अपनी विशिष्ट शैली है जो इनकी मब प्रकार की रचनात्रों में समान रूप से विद्यमान है। भाषा में प्राचीन शब्दों का प्रयोग और ग्रंथों में प्राचीन दृश्यों का चित्रण इनकी विशेषता है। इनकी सर्वतोमुखी प्रतिभा ने साहित्य का कोई अङ्ग अछूता नहीं छोड़ा। इन्होंने अजातशत्रु, स्कंदगुप्त, जनमेजय का नागयज्ञ , ( २४ ) बहुत हैं। आदि आधे दर्जन से अधिक नाटक लिखे हैं। कविताएँ भी इनकी अब तक इनकी कविताओं के छोटे मोटे पाँच संग्रह प्रका- शित हो चुके हैं। इनकी कहानियाँ भी बड़ी रसीली होती हैं । समाज के विकृत स्वरूप का चित्रण ये बड़ी खूबी के साथ करते हैं, पर उसमें कुरुचि नहीं आने पाती। हाल में 'कंकाल' नाम का इनका एक उपन्यास निकला है जिसमें इनकी कहानियों के सब गुण विद्यमान हैं ।। (१) भारत-महिमा पृ० ६८-हिमालय के आँगन-आर्यावर्त; यहीं गंगा तथा सिंधु के जल से प्रक्षालित भूमि में भारतीय सभ्यता का उदय हुअा था । यहीं से सभ्यता दूसरे देशों में गई। सप्तस्वर -संगीत के सात स्वर सा-रे-ग-म-प-ध नि । सप्तसिंधु- वह प्रदेश जो आर्यों का आदिम निवास स्थान था। साम-संगीत- सामवेद का गान। यह वैदिक काल था। बचाकर बीज रूप से .....बड़े अभीत-प्रलय के समय केवल मनु अपनी नौका पर बच रहे थे। पुनः उन्हीं से मानव-सृष्टि हुई। वरुण-पथ-सागर। दधीचि-इन्होंने वृत्रासुर को मारने के निमित्त वज्र बनाने के लिये इंद्र को अपनी हड्डी दी थी। सिंधु सा विस्तृत...वह राह-वनवासी रामचंद्र ने समुद्र के समान गंभीर और विस्तीर्ण उत्साह से बंदरों के द्वारा समुद्र के ऊपर लंका जाने के लिये पुल बनवाया था। रामेश्वरम् और सिंहल के ( २५ ) बीच में कुछ टापू दिखाई देते हैं, वे इसी के भग्नावशेष बताए जाते हैं। शेषांश, कहते हैं, जल में डूब गया है । धर्म का ले...कर दी बंद-विक्रम से पहले पाँचवीं शताब्दी में गौतम बुद्ध ने अपना अलग धर्म चलाया जो बौद्ध-धर्म कहाया। इसकी नींव करुणा और प्रेम पर रखी गई। बुद्ध ने हिंसा का घोर विरोध किया था। विजय केवल ...घर घर घूम-सम्राट अशोक की ओर संकेत है जिसने बौद्ध-धर्म स्वीकार किया था और मनुष्य एवं पशु सब पर दया दिखलाई थी। यवन को दिया...को भी सृष्टि-अशोक ने अंतियोक नामक यवन- राज तथा उसके सामंतों के राज्यों तक में मनुष्यों तथा पशुओं के चिकित्सालय खुलवाकर अपनी दया का परिचय दिया था। इसका उल्लेख उसके द्वितीय शिलाभिलेख में है। उसने चीन में उपदेशक भेजकर बौद्ध-धर्म का प्रसार किया था। स्वर्ण-भूमि-बर्मा । रत्न- सम्यग् दर्शन, सम्यग ज्ञान, सम्यग् चारित्र्य । पृ० ६६-कहीं से हम आए थे नहीं -इतिहासज्ञों का विश्वास है कि भारत में आर्य मध्य-एशिया से पाए थे । कुछ लोग उन्हें दक्षिणी द्वीपसमूहों से आया हुआ बताते हैं और कुछ कहीं से, कुछ कहीं से पर कवि का मत है कि भारत ही से लोग और जगह गए हैं। विपन्न -विपत्ति में पड़े हुए । (२) चित्रकूट पृ० ७०-चंद्रातप-चदोश्रा। सोम-चंद्रमा ।

( २६ ) मैथिलीशरण गुप्त [ बाबू मैथिलीशरण गुप्त का जन्म बाबू रामचरण गुप्त के यहाँ सं० १६४३ में, चिरगाँव (झाँसी) में, हुआ। ये शुद्ध खड़ी बोली में कविता करते हैं। व्याकरण के नियमों का कहीं भी उल्लंघन नहीं करते। यह गुण पं० महावीरप्रसाद जो द्विवेदी का शिष्यत्व प्रदर्शित करता है। इनकी कविताओं में उत्कट देशप्रेम भरा रहता है जो इस युग की विशेषता है। इसी लिये ये इस युग के प्रतिनिधि कवि कहे जाते हैं। बहुधा नवयुवक कवि गुप्तजी को ही श्रादर्श मानकर चलते हैं । 'भारत-भारती' इनकी सर्व-प्रिय रचना हुई है; पर उनका कवित्व उत्तरोत्तर प्रस्फुटित हो रहा है। झंकार, पंचवटी आदि कई ग्रंथ इनके बड़े सुदर हुए हैं। इन्होंने तिलोत्तमा और चंद्रहास दो नाटक भी लिखे हैं। विरहिणी व्रजांगना, मेघनाद-वध, पलासी का युद्ध इन बँगला ग्रंथों का अनुवाद भी किया है। साकेत महाकाव्य भी अपूर्व है। इन्होंने अपने गाँव में साहित्य प्रेस खोला है। इनका सारा समय साहित्य-सेवा में व्यतीत होता है-यही इनका व्यवसाय है। ] पर्णकुटी के द्वार पर लक्ष्मण पृ० ७४-मोती-तारागण । सोना--शयन और सुवर्ण । पृ० ७७--लहकते हैं-लेने लपकते हैं। पृ. ७८-वैतालिक -भोर को जगानेवाले। केकी-मोर । तत्त्व- ज्ञान-परमात्मा के स्वरूप का परिचय । पृ० ७६-प्रायोजनमय-बड़ी तैयारी का।

( २७ )
पुण्य-गृहता-पवित्र
पृ०८०-मनःप्रसाद-मन की प्रसन्नता ।
गार्हस्थ्य ।
पृ०८१-सब...क्षेम-प्रेम की खैरियत संयोग में ही है, वियोग
में नहीं।
रामनरेश त्रिपाठी
[प. रामनरेश त्रिपाठी का जन्म संवत् १६४६ में जौनपुर जिले
के कोइरीपु र गाँव में हुआ। ये
बहुत उत्साही सज्जन हैं। इन्होंने
भारतवर्ष के दूर दूर प्रदेशों की यात्रा की है। इन्होंने प्राचीन और
आधुनिक हिंदी-कवियों की कविता का एक अच्छा संग्रह दो भागों में
तैयार किया जिसका नाम कविता-कौमुदी है।
इस संग्रह में कवियों
का संक्षिप्त परिचय भी दिया गया है। इसके अतिरिक्त बहुत
से
ग्राम-गीतों का भी इन्होंने अच्छा संग्रह किया है जो कविता-कौमुदी के
पाँचवें व छठे भागों के रूप में प्रकाशित हुआ है। इनके मुख्य कविता-
ग्रंथ मिलन, पथिक और स्वप्न नाम के खंड-काव्य हैं। इनकी
कविता में राष्ट्रीय भाव भरे रहते हैं और वह सरल, सुबोध तथा
जोशीली होती है। उसमें प्रकृति-वर्णन की बहार अच्छी रहती है।
अाजकल ये प्रयाग में रहते हैं और पुस्तक प्रकाशन का कार्य करते हैं ।
बानर नामक एक बालकोपयोगी पत्र भी अपने संपादकत्व में निकालते हैं।]
पथिक को साधु का उपदेश
पृ० ८३-जीवन धारण कर-पानी लेकर ।
१०८४-जुड़ाये-शीतल हुए, सुखी हुए ।
.

( २८ )
पृ० ८५--अवहेला-अवज्ञा ।
पृ० ८७ - केतु-धूमकेतु।
गोपालशरण सिंह
[ ठाकुर गोपालशरण सिंह का जन्म संवत् १६४८ में हुआ। ये
रीवाँ-राज्यांतर्गत नई गढ़ी के इलाकेदार हैं और बड़ी सहृदयता के. साथ
अपने इलाके का प्रबंध करते हैं। स्कूली शिक्षा इन्होंने मैट्रिक तक
ही पाई है। इनकी विद्या अधिकतर स्वाध्याय का ही फल है। इन्हें
संस्कृत का भी पर्याप्त ज्ञान है। बाल्यकाल से ही इन्हें कविता से
प्रेम है। २० वर्ष की अवस्था से इन्होंने स्वयं कविता लिखना आरंभ
किया। 'सरस्वती' में इनको कविताएँ अधिकतर छपा करती हैं।
इनकी स्फुट कविताओं का संग्रह अभी हाल में 'माधवी' नाम से
प्रकाशित हुआ है।
इनकी भाषा साफ-सुथरी होती है और कविता
में प्रवाह अच्छा रहता है। खड़ी बोली में घनाक्षरी लिखने में इन्होंने
अच्छी सफलता पाई है।]
सियारामशरण गुप्त
में
हुआ।
[बाबू
सियारामशरण मैथिलीशरणजी के छोटे भाई हैं। इनका
जन्म सं० १६५२
मौर्यविजय, अनाथ,
विवाद, आद्रा आदि
इनके कई छोटे छोटे काव्य अब तक प्रकाशित हो चुके हैं। अाधु-
निक समय की पुकार को इनकी वाणी ने जनता के मुग्ध हृदय तक
पहुँचाने में सरस और सफल प्रयत्न किया है। ]

( २६ ) । एक फूल की चाह पृ० ६२, मृतवत्सा--जिन माताओं के बच्चे मर गए हों। दुदीत - जिसका दमन न किया जा सके पृ० ६४-स्वर्ण-धन-डूबते हुए सूर्य की सुनहली किरणों से रँगे हुए बादल । पृ० ६६-अपूत-अपवित्र । पृ० ६६-त्रुटि-दोष, कमी। उपकरण- सामग्री । सुमित्रानंदन पंत [प सुमित्रानंदन पंत का जन्म सं० १६५८ में अल्मोड़े में हुआ। इनके पिता प. गंगादत्त बड़े धर्मनिष्ठ थे। पिता में जिस सहृदय- भावना ने धर्मनिष्ठा का चोला पहना था, पुत्र में वह कवित्व होकर आई । सुमित्रानंदनजी ने एफ० ए० तक शिक्षा प्राप्त की; पर अप्राकृतिक शिक्षा का बंधन उन्हें रुचा नहीं। कॉलेज छोड़कर प्रकृति देवी की अप्रतिबंध गोद को उन्होंने अपना शिक्षालय बनाया। प्रकृति देवी के ही इष्ट से उन्हें कवित्व-सिद्धि हुई। उनके 'उच्छवास' ने एक प्रतिभा- नक्षत्र की उदयदिशा का संकेत दिया। उनके 'पल्लव', 'वीणा' और 'ग्रंथि में उसकी प्रखरता कुछ लोगों को असह्य हुई । आशा है 'मधु- वन' की छाया ऐसे लोगों को भी रुचेगी। सुमित्रानंदनजी ने कविता- क्षेत्र में एक नया पौधा रोपा है। उसकी काट-छाँट उन्होंने अपने ढंग की की है। उनकी कविता में भाषा-सौष्ठव है, प्रवाह है और है उत्पतन- शीलता। उन्होंने अँगरेजी साहित्य का भी परिशीलन किया है, इससे उनमें अँगरेजी भावों का आना स्वाभाविक है। परंतु अब वे धीरे ।

- * . ( ३० ) धीरे हिंदी के अनुरूप होकर आ रहे हैं। उनका गद्य भी वैसा ही अलंकृत होता है जैसा उनका पद्य ।। बादल - - -सूर्य । पृ० १०६-जगत्प्राण-वायु जो जगत् का प्राण है। मेघदूत - महाकवि कालिदास का एक काव्य जिसमें एक विरही यक्ष अपनी प्रियतमा के पास मेघ को दूत बनाकर संदेश भेजता है। शिखी-मयूर। नृत्य- नृत्य के पड़ जाय तो मोती बन जाता है। कृषक इ.-कृपक-बाला को मेघ देखकर अत्यंत आनंद होता है। दिनकर- चल-चंचल। विपु ल इ० - त्रिभुवन की विपु ल कल्पना के समान हम । पृ० १०७-अनंत--अनंत अाकाश । मत्त मतंगज-मत्त हाथी बने हुए । सजग शशक-चौकन्ने खरगोश बने हुए । सीप के - सीप जैसे उज्ज्वल । समुद-सानद । कर-किरणें । उपल--ओले । रजत- कर-चाँदी जैसे उज्ज्वल हाथ । दमयंती...स्वर्ण-हंस-एक स्वर्णरंगी हंस ने दमयंती को नल का संदेश सुनाया था । पृ० १०८-तमाल-तम इ०-अंधकार-रूपी तमाल-वृक्ष के पत्तों के समान। बाल-हंस-प्रात:कालीन सूर्य । स्वर्णपख-प्रातःकालीन सूर्य की ललाई से रंजित अतः सोने के से रंगवाले होकर । अछोर- अंत-रहित । निशि-भोर-रात और प्रभात में। घोप भरे-शब्द करते हुए। विप्लव-भय-राज्यक्रांति से उत्पन्न भय जो शीघ्र चारों ओर प्रस- रित हो जाता है।

पृ० १०६-काल-चक्र-जो सदा नीचे-ऊपर आता-जाता रहता है। जलधर-मेष रूप मेव रूप में। जल-धार-जल की धारा के रूप में ( बरसने लगते हैं)। हवा में महल बनाकर-(१) वायुमंडल में बादल अनेक महलों की सी आकृतियाँ बना लेते हैं, (२) बड़े बड़े मनोरथ बाँधते हुए। विभव-भूति ही से-वैभव संपत्ति के तुल्य । रस-चषक ( रसो का प्याला ) [ काव्य के श्रास्वाद को रस कहते हैं। रसों के आधार भाव हैं। जो भाव मन में बहुत काल तक रहकर उसे तन्मय कर दें वे ही रस हो जाते हैं। ऐसे भाव स्थायी भाव कहलाते हैं । अब तक प्रेम, हास, क्रोध, उत्साह, भय, घृणा, आश्चर्या, शोक और शांति ये नौ स्थायी भाव माने गए हैं। जो भाव मन में केवल अल्प काल तक संचरण कर चले जाते हैं वे संचारी भाव कहलाते हैं। ये प्रवृत्ति के अनुसार भिन्न भिन्न स्थायी भावों को रस की उच्च भूमि तक पहुँचाने में सहायक होते हैं। संचारी और स्थायी भावों के अतिरिक्त रस की निष्पत्ति के लिये विभाव और अनुभावों की आवश्यकता होती है। रसों को उदित और उद्दीप्त करनेवाली सामग्री विभाव कहलाती है। इसके तीन अंग हैं-आश्रय, आलंबन और परिस्थिति। विषयी आश्रय, विषय अालंबन और अनुकूल देश-काल परिस्थिति है। जैसे- सीता-विषयक प्रेम यदि राम में है तो राम उसके आश्रय, सीता आलं- बन और जनकपुर का उपवन परिस्थिति समझना चाहिए। परिस्थिति को केवल उद्दीपन भी कहते हैं। अनुभाव अांतरिक मनोभाव का १० ( ३२ ) श्राश्रय के , बाहरी शारीरिक लक्षण है। मुखमंडल की मुद्रा आदि भीतर के भावों को प्रकट करते हैं। हृदय में आलबन को विशेष परिस्थिति में देखकर जो विशेष प्रकार का बहुत देर तक उसे मग्न कर देनेवाला उसकी प्राकृति से लक्ष्यमाण भाव उदय होता है उसकी अनु- भूति का पाठक या श्रोता के हृदय में, रस के रूप में, आविर्भाव होता है। प्रेम से शृगार और वात्सल्य, हास से हास्य, क्रोध से रौद्र, उत्साह से वीर, भय से भयानक, घृणा से वीभत्स, शोक से करुण, आश्चर्य से अद्भुत और शांति अथवा निर्वेद से शांतरस का उदय होता है। इस प्याले में छंद १, २ शृंगाररस (दांपत्य प्रेम ) के हैं, ३ वात्सल्यरस ( संतान के प्रेम ) का है, ४ हास्य का, ५ रौद्र का, ६-८ वीररस के ( ८ वें छंद में दानवीर का वर्णन है), ६ वीभत्स का, १० भयानक का, ११ अद्भुत का, १२ करुण का और अंतिम दो शांतरस के हैं। ] १-कवि मंडन-ये जैतपुर, बुंदेलखंड के निवासी थे । सं० १७१६ में राजा मंगदसिंह के दरबार में विद्यमान थे। इनके ग्रंथ हैं-रस- रत्नावली, रसविलास, जनक-पचीसी, जानकीजू को ब्याह, नैनपचासा । कुछ बिखरे हुए फुटकर कवित्त भी हैं। २-धनानंद-इनका जन्म १७४६ में हुआ और १७६६ की नादिरशाही में ये मारे गए। ये जाति के कायस्थ और दिल्ली के बाद- शाह मुहम्मदशाह के मीर मुशी थे। इनकी कविता अत्यंत रसवती है । ये विरक्त होकर निंबार्कमतावलंबी वैष्णव हो गए थे। ग्रंथ-सुजान- सागर, विरहलीला, कोकसार, रसकेलिवल्ली और कृपाकांड ।

( ३३ ) - परजन्य-दूसरे के लिये जनमा (बादल) । जीवनदायक-(१) जल देनेवाले, (२) जीवन देनेवाले। विसासी-विश्वासघात करनेवाले । ६-लूम-पूँछ । ७-भूषण-इनका जन्म स० १६७० में और मृत्यु १७७२ में हुई। ये शिवाजी के राज-कवि थे। इन्होंने वीररस की बड़ी ओज- स्विनी कविता लिखी है। इनके ग्रंथ शिवराज भूषण, शिवाबावनी, छत्रसाल-दशक हैं। जंभ-जंभासुर, जिसे इंद्र ने मारा था। बितुड-हाथी । ८-हलके-झुड। गज गज बकस-अनेक हाथियों के दाता । ६-ओझरी-पेट, आमाशय । मुटुग-झोंटेवाला । खोरि कै- नहाकर। १२-आलम-ये जाति के ब्राह्मण थे पर मुसलमान हो गए थे । इनका समय १७१२ से १७६० तक माना जाता है। ये और इनकी स्त्री शेख दोनों अच्छे कवि थे। इनको कविता बड़ी भावपूर्ण और हृदय-स्पर्शिणी है। इनकी पुस्तके आलम केलि और माधवानल- कामकंदला की कथा हैं। १३- रसखान ( सं० १६२०-१६८०)-ये जाति के तो पठान सरदार थे, पर थे वास्तव में उच्च कोटि के उच्च कोटि के भगवद्भक्त वैष्णव । इनकी कविता प्रेमपूर्ण और रसीली है। इनके ग्रंथ प्रेम-वाटिका और सुजान- रसखान हैं। कलधौत- -सुवर्ण ।

Padaya Parijat (pahala Bhag)

Title
Padaya Parijat (pahala Bhag)
File name
Padaya Parijat (pahala Bhag)
Text
OCR done
Citation
1938
Publisher
Indian Press Ltd Prayag
Language
Sanskrit
Pages
156
Library
Hindi Sahataya Samalayan
Classification
Literature
DLI number
486448
Barcode
5990010113726.00
Scanning centre
IIIT, Allahabad
VMLT id
Q1dVqrx5b9R
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