Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
Jataksiromani
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: (४). भूमिका। टीका इस ग्रन्थको समझना चाहिये, क्योंकि, उसमें थोडे श्लोक अर्थ बहुत है इसमें वे गुप्तार्थ प्रगट करके बडा ग्रंथ किया गया है, सर्वसाधारणके सुबोधार्थ मैंने इसकी सरल हिन्दी भाषाटीका बनाई है इस मेरे परिश्रमको सफल करना सजन पाठकोंके आधीन है। मेरे उक्त कृत्योंके सहायक श्रीमान् सेठ खेमराज श्रीकृष्ण- दासजी हैं जो मेरे कृत्योंको प्रसन्नतापूर्वक शीघ्रप्रकाश करके लोकोपकार पुण्यके भागी होते हैं और मुझको भी प्रसन्न रखते हैं, यह ग्रन्थभी मैंने उन्हीं सेठजीके समर्पण किया है। अन्थकर्ता- पंन्महीधरशर्मा धर्माधिकारी राजधानी टीहरी, जिला-गढ़वाल.
॥ श्रीः॥ जातकशिरोमणि। भाषाटीकासमेत । प्रणम्य भास्करं भक्त्या वराहमिहिरादिकान् ॥ बृहज- न्मपदार्थस्य प्रकाशः क्रियते मया ॥ १ ॥ सुवुद्धिप्ल- वसंस्थोऽपि बृहज्जातकवारिधेः॥ पदार्थलब्धये शक्तः कर्णधार विना न हि ॥२॥ कर्णधारायते सम्यक्पदा- र्थप्रतिपत्तये ॥ वराहमिहिराचार्यों होराशास्त्रप्रका- शकः॥३॥ प्रणम्य गुरुपादुकां गणपति च गीर्देवतां महीधरधरासुरो विवृतिमार्यया भाषया । करोति विशदा सुजातकशि- रोमणे: पद्धतीतिपाठनिरताकप्रचुरबुद्धिसंधायिनीम्॥१॥ कृतास्ति विवृतिः पुरा बृहति जातके यद्यपि तथापि बहु- विस्तृतस्तदनुकारिणोस्यामुना प्रकाशकरणाद्भनेदुपकृति- र्जनानामिहेति हेतुत इयच्छ्रमाट्टिहरिराजधान्यामयम्॥२॥ भाषार्थ-में महीधरशर्मा भाषाकार मन्थारंभमें अपने इष्टदेव- ताओंको प्रणामरूप मंगलाचरण करताहूँ कि, श्रीगुरुपादुका, गणेश और सरस्वती देवीजीको प्रणाम करके जातकशिरोमणि नामा जातक ग्रन्थकी हिन्दी भाषाटीका (जो पठनमें तत्पर (२) जातकशिरोमणि- वालकॉकी बुद्धिउत्तेजित करनेवाली है ) करता हूँ॥११॥ यद्यपि पहिले बृहज्जातककी भाषाटीका ऐसे जातकोक्त कार्यसम्पा- दन करनेवाली बनायली है तथापि उसी ग्रन्थका अनुकरण कर बहुत विस्तारवाले इस जातकके प्रकाश करनेसे मनुष्यों का उपकार होवै ऐसा कारण विचारके यह ग्रन्थ भाषाटीका सहित करना उपयोगी समझा. यह कार्य राजधानी टीहरी (जिला गढवाल) में कियागया ॥२॥ ग्रन्थकर्त्ता ग्रन्थारंभमें विघ्नविधातार्थ अपने इष्टदेवको प्रणा मरूप मङ्गलाचरण करता है कि, भक्तिसे श्रीसूर्यनारागणको वराहमिहिरादिआचार्योको प्रणाम करके मुझसे (बडे जन्म- पदार्थ) जन्मपत्रीके विचारका प्रकाश किया जाताहै ॥ १ ॥ बृहज्जातकरूप ज्योतिःसमुद्र में अच्छी बुद्धिरूपी नावमें बैठा हुआ "ज्योतिषी" भी विना (मल्लाह ) ग्वेवटके उस पदार्थके पानेमें समर्थ नहीं है ॥२॥ उस पदार्थके सम्यक् ज्ञानके लिये होराशास्त्रका प्रकाश करनेवाला श्रीसव्वतार वराहमिहि- राचार्य कर्णधार होता है। अर्थात् बृहज्जातकरूपी समुद्रसे पारहोनेकेवास्ते सुबुद्धिरूप नावमें बेठाहुआ भी मैं वराह- मिहिररूप खेवटकी कृपासेसमर्थ होकर बृहज्जातकके अनुमत उसीके ऊपर तिलक जैसा यह ग्रन्थ रचता हूं ॥ ३ ॥ अहोरात्रोत्थिता होरा कालस्यावयवा हि सा ।। मेपादिराशयो होरा होरा राशीदलं स्मृतम् ॥ ४॥ अहोरात्र दिनराविरूप (काल) समयका नाम है । इस अहोरात्रके पहिले पिछले वर्ण लोप करनेसे उसकी प्राकृत होरा बनती है अर्थात् यह पद समयज्ञान वाचक है इसीसे कालका अवयव इमे कहते हैं तथा उस ज्ञानकी परिभाषा भाषाटीकासमेत। मेषादिराशियों द्वारा होनेसे इन राशियोंके सर्वागसमुदाय को होरा कहते हैं। और राशिके आधा दलकोभी होराकहते हैं पूर्व व्याख्या (होराशास्त्र) ज्योतिषशास्त्रवाची है और दूसरीराश्यर्द्ध विभागवाचक है ॥४॥ मेपः शिरो वृपो वक्त्रं नृयुग्वाहू च कर्कटः ॥ हृत् पिच- ण्डं मृगपतिः कटिः कन्या समाश्रिता ॥५॥ बस्ति- स्तुलाथ गुह्यं स्यात्कीट उरू धनुः स्मृतम् ! जानुनी मकरोजंघे कुंभः पादौ झपो द्वयम् ॥ ६॥ कालांगके राशिविभाग शरीरमें ऐसा है कि, मेष शिर, वृष मुख, मिथुन बाहुयुग्म, कर्क हृदय, सिंह पेट और कन्या कटिमें रहती है ॥ ५॥ तुला (वस्ति) नाभिसे नीचे, वृश्चिक गुह्यस्थान, धन ऊरू, मकर जानु, कुंभ (जंघा) घुटने मीन दोनहूं पैर ये राशिके अंगविभाग कहे हैं ।। ६ ।। मेषो वन्यो दिवा रात्रौ ग्राम्यो गौमपराशिवत् ॥ पृष्टो- दयावजवृपावरुणश्वेतरूपिणौ ॥ ७॥ मिथुनं पुरुपो नारी सवीणा सगदः पुमान ॥ग्राम्यं शीर्पोदयं दूर्वादल- श्याममुदाहृतम् ॥ ८॥ नित्यं जलचरः कर्कः पृष्ठदर्शी विपाटलः ॥ सिंहो वनवरः पाण्डुः स याति शिरसोद यम् ॥ ९॥ ससस्यदहना कन्या प्लवगा शीर्पदर्शिनी।। विचित्ररूपाभरणा दीर्थी कन्या च सा स्मृता॥१०॥ तुलाराशिस्तुलां धत्ते राजती पण्यवीथिगः ॥ शीर्पो- यः पुमान्कृष्णो ग्राम्यो ग्राम्यजनाचितः ।। ११ ।।
(४) जातकशिरोमणि- पिशंगो वृश्चिकः कीटः शीर्पदी विलालयः ।। पृष्ठो- दयी पुमान्धन्वी ग्राम्योश्वजघनो धनुः ॥ १२॥ मृगो मृगास्यः प्राग्वन्यः पष्टदर्शी जलेशयः ॥ कुंभे रिक्त- घटः कुंभो ह्युदेति शिरसा पुमान् ॥ १३॥ मीनो मीन द्वययुतो जलजन्मोभयोदितः॥ लक्षणानीति राशीनां क्रमशः कथितानि मे ॥१४॥ अब राशियोंके लक्षण कहते हैं कि, मेष राशि दिनरात्रि बली, वनचर,माम्यपशु और वृषराशि भी मेषके समान है ये दोनहूं पृष्ठोदय है मेषका लाल रंग और वृषका श्वेत रंग है ॥७॥ मिथुन राशि स्त्री पुरुषका जोडा, गदा और वीणा धारणकरता ग्राम्य शिर्षोदय, और दूर्वापत्रके समान श्याम रंगवाला कहा है ॥ ८॥ कर्कराशि नित्य जलचर पृष्ठोदयी, विशेषतः श्वेत रक्त रंगकी है सिंह वनचर हरितरंग और शीर्षों दयी है ॥ ९॥ कन्या राशि नावमें बैठी धान्य और जलती. आग हाथों में धारण किये अनेक रंग रूपके आभरण और रूपवाली दीर्घाकार कन्या कहीं है ॥ १०॥ तुला चांदीकी तखडी हाथमें लिये दुकानमें बैठा पुरुप शीर्पोदय, कृष्णवर्ण माम्य और ग्राम्यजनोंसे पूजित है ॥ ११ ॥ वृश्चिक थोडा पीला (कोटा) वृश्चिकाकार शीर्पोदय, छिद्रों में रहनेवाला है. धन, पृष्ठोदयी, पुरुप धतुपधारी, ग्राम्य घोडेकेसे जंघा वाला है ॥ १२ ॥ मकर, राशिका पूर्वार्द्ध वनचर, उत्तरार्द्ध जलचर मृगकासा मुख, पृष्टोदयाहे कुंभ, खाली घडा कांधे लिये, पुरुष शादिया है॥१३॥ मीन दो मछलियोंका जोडा एकके मुखपर दूसरेका पुच्छ मिलाहुआ जलचर और शीर्ष पृष्ठ दोनहंभागोंसे उदयीहे इतने राशियोंके लक्षणमैंने कहे हैं॥१४|| , N ३ ८ भाषाटीकासमेत। कुजः शुक्रो बुधश्चन्द्रो रविज्ञो भृगुजः कुजः ॥ गुरुयमार्कजो मंत्री मेपादीनामधीश्वराः ॥१५॥ मेषका स्वामी मंगल, वृषकां शुक्र, मिथुनका बुध, ककका चंद्रमा, सिंहका सूर्य, कन्याका बुध, तुलाका शुक्र, वृश्चिक का मंगल, धनका वृहस्पति, मकरका शनि, कुंभका शनि, मीनका वृहस्पति, ये राशियों के स्वामी हैं ॥ १५ ॥ राशिस्वामिनः। २ भी. भ. बु. चं. सू. गु. भू. भी. बु. श. श, गु. मेपो मृगस्तुला कर्को नवांशेशा अजादिषु ॥ त्रिंशांश पतयो भौमशनीज्यबुधभार्गवाः ॥१६॥पंच पंच गजाः सप्त पंचौजे व्युत्क्रमात्समे ॥ द्वादशांशा गृहादेव द्रेष्का णाः स्वस्वराशितः ॥ १७॥राशेराद्योद्वितृतीयौ तत्रि कोणोभयोः क्रमात् ॥ होरेशावर्कशशिनावोजे चन्द्रवी समे ॥ १८॥ • नवांशक मेषमें, मेषसे वृषमें,मकरसे मिथुनमें लादि कर्क में, कर्कादि सिंहमें मेषादि कन्यामें,मकरादि तुलामें, तुलादि वृश्चिकमें, कर्कादि धनमें, मेषसे मकरमें मकरसे कुंभमें तुलादि मानमें, कर्कादि गिनना एक नवांशाः। राशिके तीस अंश होते हैं ३६/१०/१३१६२०/२३,२३३० में इनके ९भाग ३अंश २० कला २०५० ० २०४० ०२०४० ० ० हैं प्रकट चक्रमें हैं त्रिंशांशेश विषमराशिम ५ अंशपर्यन्त मंगल ५ से १० तक शनि १० १|३३|४|५४६/७/८/९/भाग ५७८१५०५ ५/१२/२०/२५/३० जातकशिरोमणि- ऊपर १८तक बृहस्पति१८ऊपर २५तक बुध और पिछले५अंशोंमें शुक्र होता है समराशिमें यह विभाग उलटा लेना प्रकट चक्रमें है द्वादशांश अपनी राशिसे गिने त्रिंशांशेशाः। जाते हैं ३० अंशके १२ भाग २ अंश ३० म.श... शु. कलाका प्रत्येक होता है, द्रेष्काण अपनी पाच५ अपनी उत्तराशिसे अर्थात् राशिके पूर्वत्रि ५/१०/१८२५/३० भाग १० अंश पर्यन्त उसी राशिके . स्वामीका मध्यभाग १० अंश ऊपर २० पर्यंत उससे पंचमराशिस्वामीका पिछला त्रिभाग २० अंश ऊपर ३० अंशपर्यंत उससे नवमीराशिके स्वामीका होता है होरेश विषमराशिमें पूर्वार्द्ध १५ अंशपर्यन्त सूर्य उत्तरार्द्ध १५ अंशऊपर. ३० अंशपर्यन्त चंद्रमा समराशिके पूर्वार्द्ध में 'चंद्रमा उत्तरार्द्ध में सूर्य होरेश होता है ।। १६॥ १७ ॥ १८ ॥ क्रूरः सौम्यः पुमान्नारी क्रमेण विषमाः समाः ॥अजा या विपमाःराः समाः सौम्याः स्वभावतः।। १९॥ मेषादिराशि क्रमसे क्रूर सौम्य अर्थात् मेप क्रूर, वृष सौम्य इत्यादि जानने ऐसे ही मेष पुरुष वृष स्त्री, इत्यादि तथा मेषविषम वृप सम इत्यादि सभी जानने, और मेपादि योमेसे जो विषम वैक्रूर जो सम वही सौम्यस्वभावसे हैं॥१९॥ चरस्थिरद्विस्वभावाः क्रमतः स्युरजादयः ॥ मेपादयश्च चत्वारोनिशाख्या मगवाहको।२०सिंहादयश्च चत्वारः कुंभमीनौ दिवाभिधाः ॥ क्रियो मेपस्तारिगौनृयुग्जि तुमनामभृत् ॥२१॥ कुलीरो मृगयोलेयः कन्यापाथेय . .
भाषाटीकासमेत। (७) संज्ञिका ॥ जूकः कौर्यों वृश्चिकश्च धनुस्तौक्षिकसं ज्ञकः ॥ २२॥ आकोकेरोऽथ हृद्रोगो मीनश्चात्यभसं ज्ञकः ॥ मेपो गौमकरः कन्याकमीनतुलाः क्रमात ॥ २३॥ व्यादीनामुच्चगृहा उच्चानीचं च सप्तमम् ॥ निजोचे परमोच्चांशा दश रामा गजाश्विनौ ॥२४॥ तिथीद्रियविनवकविंशतिस्ते तुनीचके । वर्गोत्तमाख्या मेषादौस्वनवांशा नवांशकाः ॥२५॥ मेषादि राशि चर स्थिर द्विस्वभाव क्रमसे हैं जैसे मेषचर वृष स्थिर मिथुन द्विस्वभाव इत्यादि भेषादि ४ राशि और धन मकर रात्रिबली हैं ॥ २० ॥ सिंहादि ४ राशि और कुंभ मीन दिवायली हैं मेष क्रिय,वृष ताबुरि ॥ मिधुन जितुम नाम सेहें॥२१॥तथा कर्क कुलीरसिंहलेय, कन्या पाथोन,तुला जूक, वृश्चिक कौर्य, धन तौक्षिक, ॥२२॥ मकर आकोकेरो, कुम्भ हृद्रोग, मीन अन्त्यम,ये इन राशियोंकी संज्ञायेहैं सूर्यका उच्च- मेष,मंगलका मकर, बुधका कन्या,बृहस्पतिका कर्क, शुक्रका- मीन, शनिका तुला, उच्च है ।। २३ ॥ अपने उच्चसे सप्तमराशि नीच होतीहें अपने उच्चराशि परमोच्चांश कहाते हैं कि, सूर्य मेषके १० अंशपर, चंद्रमा वृषके ३ में, मंगल १० के २८ में, बुध ६ के १५ में, बृहस्पति के ५ में, शुक्र १२ के २७ में, शनि ७ के २० में, परमोच्चांशके और ऐसे ही सप्तम नीचरा- शियों में भी परम नीचांश जानने और मेषादिराशियोंमें जिसराशिमें वही नवांश हो वह वर्गोत्तमांश कहाता है॥ २४ ॥ २५ ॥ + जातकशिरोमणि- राशीनां संज्ञाचक्रम् । ७ ८ राशयः ६ नामानि राशीनाम् मे. वृष. मि. कक सिंह क.तु..धन.मक.कुंभ.मी. राशिस्वामिनः म शु. बु.चं.सू.पु.) शु. म. वृ.श. श .. दूरसौम्य. सौ. क. सौ. क्रू. सौ. कृ. सौ. कृ. सो. पुरुपस्त्री. मुंखी. पुं. स्त्री. पुं. स्त्री..स्त्री. पुं. स्त्री. पु. स्त्री. विषम, सम. वि.स. वि. स.वि.स. वि. स.वि.स., वि.स. चरस्थिराद्धःस्व० च.स्थि दि.च. स्थि, दि.च. स्थि. दि.च. स्पि.दि. चलो. दि.रा. रा. रा. रा. रा. दि.दि.दि.दि. रा. रा. दि.दि. . उच्चमूलत्रिकोणाः। ग्रहाः सु. . श. वन्धराशयः १ २ १० ६ ४ उच्चरात्यशा. 01१०।३।९/२८/५/१५] ३५ (१२२७६२० नीचराशयः ८ ४ नीचांशाः ६१०७३।३।२८/१२१५ ९५५२७/०२० मूलत्रिकोणाः २ ६ १२ ग्रहाणा राशयः ४ १२८३६ ९।१२। २७/१०१११ १ सिंहो गजत्रियोऽश्वश्च तुला कुंभास्त्रिकोणभम् ॥ गृह होरात्रिभागश्च नवांशद्वादशांशकाः ॥२६॥ त्रिंशांशः स तु यद्यस्य स वर्गस्तद्हस्य च ।।
भाषाटीकासमेत।
सूर्यका मूलत्रिकोण सिंह, चन्द्रमाका कर्क, मंगलका मेष,
बुधका कन्या, गुरुका धन, शुक्रका तुला, शनिका कुंभहै
गृह १ होरा २ द्रेष्काण ३ नवांश ४ द्वादशांश ५ त्रिशांश
६ यह षड्वर्ग है जो वर्ग जिस राशिका है वह उस राशिस्वा-
मीका कहलाता है ॥ २६ ॥
तनुः कुटुंवः सहजो बंधुः पुत्रोऽरियोपितः॥
मृत्युः शुभास्पदावायव्ययौ भावास्तनोरमी ॥ २७ ॥
बारह भावोंके नाम लग्नसे कहते हैं ततु प्रथम भाव १
कुटुम्ब २ सहज ३ बंधु ४ पुत्र ५ रिपु ६ योषित् ७ मृत्यु
शुभ ९ आस्पद?० आय ११ व्यय १२ये संज्ञा क्रमसे हैं॥ २७ ॥
कल्पस्वविक्रमगृहाः पुत्रो घातश्च वित्तजः ॥ रंध्रे गुरु-
मानभवौ व्ययस्तन्वादयः पुनः॥२८॥
पुनः इन्हीं १२ भावोंकी अन्यप्रकारकी संज्ञा ह कि,
कल्प १ स्व २ विक्रम ३ गृह ४ पुत्र ५ घात ६ वित्तज ७ रंध्र
गुरु ९ मान १० भव ११ व्यय १२ इति ।। २८ ।।
लग्नं गृहं शरीरं च तनुदेहाङ्गमुच्यते ॥ स्वं धनं द्रविणं
प्राहुर्द्धनभावे कुटुंबकः ॥ २९ ॥ विक्रमः सहजो
भ्राता सहायश्च सहोदरः ।। चतुर्थभावे भवनं गृहं बंधु-
सुहृत्सुखम् ॥ ३० ॥ पातालं हिवुकं वेश्म चतुरखं
जलं क्षितिः ॥ पंचमे मंत्रपुत्रौ च त्रिकोणं नवपंचमम् ॥
॥ ३१ ॥ प्रज्ञावुद्धिसुतापत्यधीप्रज्ञागर्भसंज्ञकम् ॥
रिपुभावे रोगशत्रू.क्षतं घातोऽरिसंज्ञकम् ॥ ३२॥
जायाभावे द्युनं धूनमस्र यामित्रसंज्ञकम् ॥ जायाम-
नोभवो मार्गः पंथाः संज्ञाश्च सप्तमे ॥३३॥
- (१०) जातकशिरोमणि- लग्रादि भावोंके विशेष संज्ञा कहते हैं। लग्न गृह, शरीर, तनु देह, शरीर इतने पर्याय नाम प्रथम भावके हैं ऐसे ही दूसरे भावकी, स्व, धन, द्रविण, कुटुम्ब, संज्ञाये कहते हैं । ॥ २९ ॥ तीसरेकी विक्रम, सहज, भ्राता, सहाय, सहोदर, । चतुर्थकी भवन, गृह, बंधु, सुहृत, सुख ॥ ३० ॥ पाताल, हिबुक, वेश्म, चतुरस्र जल, क्षिति । पंचमकी मंत्र, पुत्र- त्रिकोण (त्रिकोणसंज्ञा नवमकी भी है ) ॥ ३१ ॥ प्रज्ञा, बुद्धि, सुत, अपत्य, धी, प्रज्ञा, गर्भ, संज्ञायें हैं। छटे भावकी रोग, शत्रु क्षत, वात, रिये संज्ञायें हैं ॥ ३२॥ सप्तकी जायामाव, शुन, यून, अन यामित्र, जाया, मनोभव, मार्ग, पंथा इतनी संज्ञायें हैं ।। ३३ ॥ अटमे निधनं मृत्युमरणं रंध्रसंज्ञकम् ॥ चतुरस्र छिद्र- संज्ञं संज्ञाः पर्यायवाचकाः ॥ ३४ ॥ नवमे शुभ- धौ च भाग्यं गुरुगृहं तपः ॥ त्रिविकोणं त्रिकोणं च पुण्यं कल्याणमुच्यते ॥ ३५॥ आस्पदं दशमं मानमाज्ञा खं व्योम कर्म च ॥ मेपूरणं पदं राज्यमाहु- भर्भावविदो जनाः ॥३६॥ एकादशे प्राप्तिलाभौ भव- दायमनोरथाः ।। रिप्फाख्यं द्वादशेऽत्यं च व्ययभावा- स्तनोरमी ॥३७॥ अष्टमस्थानमें निधन, मृत्यु, मरणरंध,चतुरस्र, छिद्रसंजक, संज्ञा पर्यायवाचकह॥३४ानवमभाव शुम,धर्म,भाग्य गुरुगृह, तप,वित्रिकोण,त्रिकोण,पुण्य,कल्याण संज्ञायें कही जाती दशममावकी संज्ञायें आस्पद, दशम, मान, आज्ञा, स्व. व्योम, कर्म, मेपुरण, पद, राज्य, भाववेत्ता मनुष्य कहते
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भाषाटीकासमेत।
(११)
हैं॥ ३६॥ ग्यारहवेंमें एकादश, प्राप्ति, लाभ, भव, दाय,
मनोरथ और बारहवेंमें रिष्फ, द्वादश, अंत्य व्यय संज्ञायें हैं.
इतने लग्न भावसे क्रमशः पर्यायसंज्ञा हैं ॥ ३७ ॥
तनोरुपचया भावा कर्मायभ्रातृशत्रवः ॥
स्वभावतोऽन्येपचया वृद्धिक्षयनिदर्शिनः ॥३८॥
लग्नसे कर्म १० आय ११ भ्रातृ ३ शत्रु ६ इतने स्थान
उपचयसंज्ञक वृद्धिदेनेवाले और अन्यस्थान (अपचय )
क्षयदिखानेवाले हैं ॥ ३८॥
प्राच्यादिनाथाश्चत्वारः सत्रिकोणा अजादयः॥ कालं
देशं वदेदेभिरेप स्वस्वामिदिग्भवः ॥३९॥ लग्नास्तदश
वंधूनां कंटकं च चतुष्टयम् ॥ केन्द्रं च नाम त्रितयं
प्रवदंति महर्पयः॥४०॥ केन्द्राणां परतः स्थानचतुर्णा
च द्वयं द्वयम् ॥ तद्दये प्राक् पणफरमापोक्किममथाप-
रम् ॥११॥
मेषादि ४ राशि अपनी अपनी त्रिकोण ९।५ राशियों
सहित पूर्वादिदिशाओंके बली है जैसे १।५।९ पूर्व २।६।१०
दक्षिण ३६७।११ पश्चिम ४ । ८११२ उत्तरमें काल और
देश इनसे कहनाजो अपनी अपनी दिशासे स्वामी होता है
॥ ३९ ॥ लग्न १ अस्त ७ दश १० बंध ४ इन स्थानोंकी संज्ञा
कंटक चतुष्टय और केन्द्र ये तीन महर्षि कहते हैं ॥ ४० ॥
केंद्रस्थानोंसे परके ४ स्थान और उनसे भी परेके ४ स्थान जो
एक केन्द्रसेपरे दूसरेके भीतर हैं इनमें पहिले वाले २।५।८।११
की संज्ञा पणफर और दूसरेवालों ३।६ । ९।१२ की आपो
क्लिम है ॥४१॥
, . (१४) जातकशिरोमणि- हेलि मूर्यका नाम, विधु चंद्रमाका, हेना, वित, बोधन, बुधके, आर, वक्र, कुज, क्रूर मंगलके, कोण, मंद, असित, अर्कज शनिके ॥ ५ ॥ जीव, अंगिरा, सुरगुरु, वाक्पति, ईज्य बृहस्पतिके, सित,भृगु, आस्फुजित, भृगुपुत्र, दैत्यपूज्य, भार्गव, शुक्रके ॥ ६ ॥ तम, राहु, अगु, पात, असुर, राहुके और केतु, शिखी; गुद, केतुके, सूर्यादिग्रहोंके ये पर्याय नाम हैं और नाम ग्रंथांतरोंके उक्त भी जानने ॥ ७॥ रविः शुक्रः कुजो देत्यः शनिश्चन्द्रो वुधो गुरुः ॥ प्राच्यादीशाः कुजार्किपापास्तैः संयुतो बुधः ॥ ८॥ ताम्रो रविः सितश्चन्द्रो रक्तवर्णः कुजो बुधः ॥ हरि- दी गुरुः पीतःसितश्चित्रोऽसितः शनिः ॥९॥ पूर्वदिशाका स्वामी सूर्य,आग्नेयका शुक्र,दक्षिणका मंगल, नत्यका राहु,पश्चिमका शनि,वायव्यकाचंद्रमा,उत्तरका बुध, ईशानका बृहस्पति है,मंगल मूर्यशनि पापसंज्ञका है और पापयुक्त बुध भी पाप ही माना जाता है।८॥सूर्यका ताम्रवर्ण,चन्द्रमाका धेत मङ्गलका रक्त, बुधका हरित, बृहस्पतिका पति, शुक्रका चिन, शनिका कृष्णवर्ण है ॥९॥ नपुंसको बुधशनी युवती शशिमार्गवा ॥ शेषा नराः शशी क्षीणः पापः पक्षवलेन हि ॥ ३०॥ कुजस्य जन्मभूरमिर्विदः क्षितिरुदाहता।। गुरुर्भार्गवसौराणां व्योमवारिमरुद्गणाः ॥ ११॥ विप्राधिपी शुक्रगुरू राज्ञः कुजरवी प्रभुः ॥शशी वेश्यस्य शूद्रस्य धोत्य- स्य पतिः शानिः ।। १२॥ चन्द्रार्फगुरवः सत्त्वं बुध.
. भाषाटीकासमेत। (१५) शुक्रौ रजोगुणौ ॥ तमोगुणौ कुजशनी स्वदशासु गुणप्रदाः॥१३॥ बुध शनि नपुंसक, चन्द्रमा शुक्र स्त्रीग्रह, अन्य सूर्य मंगल बृहस्पति पुरुषग्रह हैं, क्षीण चन्द्रमा पक्षवलमें पाप ही माना- जाता है ॥ १०॥ मंगलकी जन्मभूमि अग्नि बुधकी पृथ्वी,कही. है, बृहस्पतिकी आकाश, शुक्रकी जल और शनिकी वायु- *गण है ॥ ११॥ ब्राह्मण वर्णके स्वामी बृहस्पति,शुक्र,क्षत्रियोंके सूर्य मंगल वैश्योंका,चन्द्रमा शूद्रोंका, बुध और अंत्यज जाति का स्वामी शनि है ॥ १२ ॥ चन्द्रमा सूर्य बृहस्पति सत्त्वगुणी बुध शुक्र रजोगुणी और मंगल शनि तमोगुणी है अपने गुणा नुकूल फल अपनी दशाओंमें देते हैं॥१३॥ भास्करो मधुवद्याटिश्चतुरस्रतनुः स्मृतः ॥ बहुपित्तप्र- कृतिकः कीकसान्योऽल्पमूर्द्धजः ॥ १४ ॥ प्राज्ञः शशी मृदुवचाः शुभहक्कफमारुतः ।। क्रूरदृक् पैत्तिकोदारसम- जश्चारुणः कुजः ।। १५ ।।चन्द्रजो गद्गदवचाः सततं हसने रुचिः ॥ सस्थूलंबारुत्पित्तकफप्राज्ञ उदाहृतः ॥१६॥ पिंगलेक्षणकेशश्च गुरुः श्रेष्ठमतिः स्मृतः ।। कफात्मको बृहद्वात्रो वसाधातुसमन्वितः ॥ १७ ॥ सुलोचनः सुखी कांतः कृष्णवक्रशिरोरुहः॥ कफानि- लात्मा भृगुजा शुक्रसार उदाहृतः ॥ १८॥ कृशदीघ- वपुः स्थूलः स्नायुदन्तोऽनिलःशनिः॥ १९॥ ग्रहोंके आकारादि लक्षण कहते हैं कि सूर्य शहदकासा रंग मेत्रोंका (चतुरस्त्र) छोटा एवं स्थूल अथवा शिरसे पैरों- . (१६) जातकशिरोमणि- तक और दोनों हाथ लम्बे फैलायके मापमें बराबर हो उसे चतुरस्र कहते हैं पित्तप्रकृति हड्डी मजबूत केश थोडा ॥ १४ ॥ चन्द्रमा विद्वान कोमल वाणी कहनेवाला, सुन्दरदृष्टि, कफ वायु प्रकृति, मंगल क्रूर दृष्टि पित्तप्रकृति उदार चर्बीवाला रक्तरंग॥ १५ ॥ बुध गद्गद् वाणी वारंवार हँसनेमें रुचि मस- खरा मोटी आवाज वात पित्त कफ तीनों प्रकृति और पंडित कहा है ।। १६ ॥ वृहस्पति पीलेनेत्र पीलेकेश श्रेष्ठबुद्धि कफ प्रकृति बड़े बड़े हस्तपादादि अवयव चर्बी और धातुब-. हुल ॥ १७ ॥ सुन्दरनेत्र, सुखी, सुहावना, शिरके बाल काले और मुडे हुये, कफपित्तप्रकृति शुक्रसार शुक्र है ॥ १८॥ शनि, लम्बाशरीर, माडा, नसी एवं दांत मोटे वायुप्रकृति वाला है उक्त लक्षण जो ग्रहोंके कहे हैं इनका विचार मनुष्य शरीर पर किया जाता है जिसका जो ग्रह बलवान हो उसके शरीरमें उसीके उक्तलक्षण होते हैं ॥ १९॥ देवालयाधिपः सूर्यश्चंद्रो जलगृहाधिपः॥२०॥अग्नि- शालाधिपो भौमः क्रीडालयपतिर्बुधः ॥ गुरुभडिगृहा- धीशः शयनालयपो भृगुः ॥२१॥ गुहाद्यवस्करचये शनिरीश उदाहृतः॥प्रश्ने वा जन्मकाले वा यो ग्रहो बलवान् भवेत् ॥ २२॥ देवालयादौ प्रवदेनटं वा वस्तु जन्म वा ॥२३॥ सूर्य देवालयका चन्द्रमा जलके घरका मंगल अग्निशाला का बुध खेलके घरका वृहस्पति भांडागारका शुक्र शयनके घरका ॥ २० ॥ घरआदिके उपयोगी तृणकाप्टादिकोंके स्थान का स्वामी है प्रश्नमें अथवा जन्म समयमें जो ग्रह बलवान् हो उसका स्थान देवालयादिमें कहना अथवा नष्टादिवस्तुके बतलाने तथा जन्मस्थान कहने में यह विचार करना:२१-२३ भाषाटीकासमेत। (१७) स्थूलं नवं वाग्निहतं जलक्लिन्नं च मध्यमम् ॥ सूतीवासो दृढं जीण तद्वर्ण ग्रहवर्णवत् ॥ २४ ॥ सूतीगृहे बदेत्ता- भ्रमणयो हेमपित्तलिः ॥ सुवर्ण रजतं लोहमर्कान्मुक्ता च भार्गवात् ॥२५॥शनिशुक्रकुजेन्दुज्ञगुरूणां शिशि- रादयः॥द्रेष्काणैर्ऋतवो वाच्यास्तेषु चोदयवर्तिपु॥२६॥ सूतिकाआदिके वस्त्रकहने में सूर्य बलवान हो तो मोटा चन्द्रमा होतो नवीन एवं मंगलसे अग्निदग्ध बुधसे जलमें भीगा बृहस्पतिसे मध्यम शुक्रसे मजबूत और शनिसे पुराना फटा जानना उस वस्त्रका रंग उस ग्रहके पूर्वोत्तरंगके तुल्य कहना ॥ २४ ॥ मूतिकाके घर विशेषधातु प्रथम गया धातु सूर्यसे तांबा चन्द्रमासे मणिजात मंगलसे सुवर्ण बुधसे पित्तल बृहस्पतिसे सुवर्ण शुक्रसे चांदी शनिले लोहा और शुक्रसे मोती भी कहना ॥ २५ ॥ ग्रहोंकी ऋतु कहते है कि, शनि की शिशिर, शुक्रकी वसंत, मंगलकी ग्रीष्म, चन्द्रमाकी वर्षा बुधकी शरद, गुरुकी हेमन्त, सूर्यकी ग्रीष्म है यह विचार नष्ट जातक तथा चौरविचारमें काम आताहै लग्नमें जोगह हो उसके द्रेष्काणपतिकी ऋतु जाननी ! लग्नमें बहुत ग्रह हों तो उनमें विशेष बलवान्की और लग्नमें कोईभी ग्रह न होतो लग्नमें जिसका ट्रेप्काण हो उसकी कहनी ।। २६ ।। सौरेज्याराः पूर्णदृशस्त्रिदशेऽथ त्रिकोणयोः॥ चतुरस्त्रे परे जायागृहेन्दुज्ञभार्गवाः ॥ २७॥ ग्रहाणां त्रिदशे दृष्टिरेकपान्नवपंचमे ॥ द्विपादा दृक्च तुरसे त्रिपात्पूर्णदृशो धुने ॥२८॥ - " - (१८) जातकशिरोमणि- दृष्टि कहते हैं कि, शनि अपने स्थित भावसे ॥१० स्था नोंमें बृहस्पति ९५ में मंगल ४।८ में अन्य ग्रह सूर्य चन्द्र- मा. बुध शुक्र सप्तममें दृष्टिका पूर्ण फल देते हैं ॥२७॥ दूस रा प्रकार है कि, ग्रहोंकी ३।१० भावों में एक पाद ९१५ में दोपाद ४।८ में तीनपाद और सप्तममें पूर्ण दृष्टि होतीहै॥२८॥ काला रवीन्दुभीमानामयनक्षणवासराः ॥ ऋतुमासा वर्षाणां शेज्यभृग्वजाधिपाः ॥ २९ ॥ लग्नोदितांश नाथस्य कालो वाच्योंशसंख्यया ॥ भविष्यद्वर्तमाने थो गर्भाधाने जये रिपोः॥३०॥तथाऽन्येषु च कार्येषु गणकेन विनिश्चयात् ॥ ३१॥ अयनका स्वामी सूर्य. मुहूर्तका चंद्रमा. (वार)दिनका मंगल ऋतुका बुध. महीनोंका वृहस्पति. पक्षोंका शुक्र. और वर्षों का शनि है ।।२९ ॥ लग्नमें जो उदित नवांश है उसके स्वामी अंश संख्याके अनुसार अयनादि समय ज्योतिषीने भविष्य वा वर्तमान काल. गर्भाधानमें शत्रुके जीतने में तथा अन्य कार्य नष्टजातक प्रश्न गमागम विवाह कार्य सिद्धि आदिका विचार इससे करना अर्थात् लग्नमें जो नवांश वर्तमान है उसका स्वामी उस नवांशसे जितने नवांशपर स्थित हो उत ने संख्यक अयनादिकाल ग्रहवशसे उस कार्यको कहना इतनेही विचारसे नष्ट जन्मपत्री बनजाती इसका खुलासे नष्टजातकाध्थायमें कहेंगे ॥३०॥३१॥ कटुको लवणस्तितो मिश्रितो मधुरो रसः ॥ अम्लः कपायो गर्भिण्या भोजनादिशक्तिभिः॥३२ ॥धनां त्यबंधुधीधर्मरंध्रोचेशास्त्रिकोणतः ॥ सुहृदः प्रोक्तभवने .
भाषाटीकासमेत। (१९) भवंति यस्य समनि ॥३३॥ सम एक भयानुक्तस्था नस्था रिपवः स्मृताः ॥ अधिमित्रसुहत्तुल्याः स्वत्रि लाभादिषु स्मृताः ॥३४॥ सूर्यका कदुआ, चंद्रमाका सलोना, मंगलका तीता, बुध का मिश्रित, बृहस्पतिका मीठा, शुक्रका खट्टा, शनिका कसेला, ये ग्रहोंके रस हैं जो ग्रह बलवान हो उसका उक्तरस सूतिका भोजनप्रश्न आदिकोंमें कहना ।। ३२ ।। अब मित्र शत्रु विचारमें प्रथम सत्याचार्यका मत कहते हैं कि ग्रहके अपने मूलत्रिकोणसे २ । १२ । ४।५।९।८। राशियोंके और अपनी उच्चराशिके स्वामी मित्र अन्य शहोते हैं जैसे मंगलका मूलत्रिकोण है इससे चौथका स्वामी चंद्रमा पांचवेंका सूर्य १ । १२ का गुरु ये मित्र हुये. और मेषसे ३ । ६ अनुक्त होनेसे इनका स्वामी बुध शत्रु भया मेषसे २ । ७ का स्वामी शुक्र इनमें २७ उक्त अनुक्त हैं इस उक्तानुक्त होनेसे शुक्र सम भया. १० । ११ अनुक्त हैं इनमें १० उच्चराशि होनेसे उक्त ११ अनुक्त है इनका स्वामीशनि उक्तानुक्त होनेसे सम भया. जहां दो प्रकार उक्त सो मित्र जहां दो प्रकार अनुक्त सो शत्रु जो उक्त तथा अनुक्त सो सम होता है यह नैसर्गिक मैत्री है और तत्काल में अपनेसे ३॥ ११॥२॥१२ । १०। ४ स्थान, में बैठा ग्रह तत्काल मित्र होता है. इन दोनहूं प्रकारोंसे जो मित्र हो वह अधिमित्र कहाताहै ॥ ३३ ॥ ३४ ॥ रवेः शत्रू मंदसितौ ज्ञः समः सुहृदोऽपरे ।। रविज्ञौ सुह दावन्ये समाश्च रजनीपतेः ॥ ३५ ॥ समौ सिताकी भौमस्य बुधोऽरिः सुहृदोऽपरे ॥ शुक्रसूर्यो हितो ज्ञस्य चंद्रः शत्रुः समाः परे ॥३६॥मध्योर्कजोऽरीज्ञसिताव " चं० बृ० (२०) जातकशिरोमणि- परे सुहृदो गुरोः॥ ज्ञार्की कुजगुरू शेपौ मित्र तुल्यावरी भृगोः ॥३७॥ ज्ञशुको सुहृदावीज्यः समोऽन्ये रिप वः शनेः ॥ मित्रामित्रसमा प्रोका गृहा नैसर्गिका अमी ॥३८॥ तत्काले स्वायबंध्याज्ञात्रयांत्ये सुहृदः स्थि ताः ॥ रिपूदासीनमित्राणि सममित्राऽधिमैत्रपाः॥३९॥ पूर्वोक्तानुसार रिपु सम मित्र और सम मित्र अधिमित्र, प्रकट कहते हैं कि, सूर्यके शनि शुक्र शत्रु, बुध सम, चं० 2. वृ० ० मित्र हैं। चंद्रमा सूर्य बुध, मित्र और सब सम हैं शत्र है ही नहीं ।। ३५ ।मंगलके शु० श० सम. बुध शत्र, अन्य. सू० मित्र हैं। बुधके शु० सू० मित्र चंद्रमा शत्रु अन्य मं० बृ० श० सम हैं ॥ ३६॥ गरुके शनि सम बुध शुक्र शव सू० पं. मं० मित्र हैं शुक्रके ७० श० मित्र मं० ० सम. स० ० शत्रु है ॥ ३७ ॥ शनिके बु० शु मित्र वृ० सम. सू० चं० मं. शत्रु है. इस प्रकार ग्रहोंकी नैसर्गिक मित्र शत्रु समता कही है ।। ३८॥ तत्कालमें २।११।४।१०।३। १२ स्थानोंमे अपने भावसे मित्र होते हैं जो दोन प्रकारोंसे मित्र वह अधिमित्र जो दो प्रकारसे शव सो अधिश होजाता है जो एक जगह मित्र दूसरीमें शत्रु वह सम होता है ॥ ३९ ॥ स्वोच्चमुलसुहाचैव स्वनवांशोपगे ग्रहे ॥ स्वपवर्गे स्त्रि यो युग्मे विपमे पुरुपा गृहाः ॥१० ग्रहाः स्थानवला ज्ञेया विद्गुरू कुजभास्करौ । शनिरिंदुभृगू लग्नादिग्व लाः प्राक्प्रदक्षिणाः ॥ ११ ॥ स्वस्वदिकेंद्रसंस्थानां बलं पष्टिकलावधि ॥ दिग्दिकलाभिईसति बलमा- सप्तमावधेः॥४२॥ ग्रहाः स्युः कालबलिनो नक्तं सौरिकुजेंदवः ॥ दिने गुर्वर्कभृगवो बली जश्व दिवा भाषाटीकासमेत। (२१) निशि ॥ ४३ ॥ कृष्णे च पापा बलिनः शुक्ल- पक्षे शुभग्रहाः ॥ स्ववर्गे स्वदिने मासे बलवंतः शुभा ग्रहाः ।। १४ ।। मंदावनीसूनुबुधा गुरुशुकेंदुभास्कराः॥ निसर्गबलिनो ज्ञेया बलसाम्ये वलाधिकाः ॥ ४५ ॥ सौम्यायनेऽकशशिनौ याम्येऽन्ये वक्रसंगमे।।उत्तरस्थाः पूर्णकरा युद्धे चेष्टा बलान्विताः॥४६॥ इति श्रीपाठ- कमहादेवविरचिते जातकशिरोमणौ ग्रहयोनिभेदा- ऽयोध्या द्वितीयः॥२॥ षड् बल कहते हैं कि, ग्रह अपने उच्च. मूलत्रिकोण तत्काल मित्र अपने नाशसंज्ञक पड्वर्गमें स्थित एवं समराशिमें स्त्री- ग्रह विषममें पुरुषग्रह, स्थान बली होते हैं पूर्णराश्यंशकादि कोंमें पूर्णबल न्यूनमें अनुपातसे न्यून होता है. यह स्थानबल है लग्नादि ४ केन्द्रोंमें ४ दिशा हैं सो लग्नमें बुध बृहस्पति चतुर्थमें मंगल सूर्य सप्तममें शनि दशममें चं० शु० पूर्वादिप्रद क्षिणक्रमसे बली होते हैं ॥ ४० ॥४१॥ अपने अपने दिशाके केद्रों स्थितग्रहोंका ६०कला वल होता है दूसरे स्थानसे १०० कला प्रत्येक भावमें घटकर सप्तममें शून्य होजाता है यह दिग्बल है ॥ ४२ ॥ ॥ कालवल कहतेहैं कि, शनि, मंगल, चन्द्रमा रात्रिमें, बृहस्पति, सूर्य, शुक्र, दिनमें और बुध दिनरात्रि दोनहूमें बलपाता है । ४३॥ पक्षपल कहते हैं पाप- ग्रह कृष्णपक्षमें शुभग्रह शुक्लपक्षमें बली होते हैं अपने वर्गमें अपने वारमें अपने महीने में शुभग्रह बलवान होते हैं ॥४४॥ नैसर्गबल कहते हैं कि, शनिसे मंगल, मंगलप्ते बुध, बुधसे गुरु, गुरुसे शुक्र, शुक्रसे चंद्रमा, चंद्रमासे सूर्य क्रमसे अधिक , , (२२) जातकशिरोमणि- बलवान हैं अन्यबलोंकी समतामें इस वलसे बलाधिक होता है ॥ ४५ ॥ अयनपल कहते हैं कि, उत्तरायणमें सूर्य शनि, अन्य ग्रह दक्षिणायनमें तथा वक्रतामें अयनबली होते हैं चेष्टा- बल कहते हैं कि, जो ग्रह युद्ध में जीते अर्थात युद्धहोने बाद उत्तरसर हो और कांतियुक्त भी हो वह चेष्टावली होता है। ।। ४६ ॥ इति श्रीजातकशिरोमणो महीधरकृतायां माही- धरीभाषायां ग्रहभेदोनामाऽध्यायो द्वितीयः ॥२॥ वियोनिप्रश्नविज्ञानं वराहमिहिरोदितम् ॥ प्रवक्ष्ये सुगमैर्वणहलग्नबलाबलेः ॥ १॥ ग्राम्या वियोनयः केचित्केचिदन्या वियोनयः ॥ जलजा स्थलजाश्चैव प्राणिनो भिन्नरूपिणः ॥ २ ॥ व्याघ्राः शृगाला: मार्जारा मृगमाहिपवानराः ॥ गावश्चमों गवयाः सुकरा नकुला अपि॥३॥ गोधामूपकसाश्च वृश्चिकाद्या विलेशयाः ॥ एते त्वारण्यसत्त्वाश्च कतिचिताम्यवा- सिनः ॥ ४॥अजा गावो महिप्यश्च तुरगा उष्ट्रवेसराः॥ गर्दभाः कृकलासाश्च श्वानोऽन्या गृहगोधिकाः ॥५॥ स्थलजा जलजाश्चैव ग्राम्यारण्याश्च पक्षिणः। वटकाः कुकुटा काकाः सारिका ग्रामचारिणः॥६॥कोक- कारण्डहंसाश्च सारसा टिट्टिभादयः ।। कुररीवककारं- वचकवाका जलाश्रयाः॥७॥ आरण्याः स्थलजाः श्येनाः शुका गृध्रा विहंगमाः॥ कोकिलाः खंजरीटाश्च कृष्णकाकाश्च पक्षिणः ॥ ८ । जलजाः स्थलजा भाषाटीकासमेत। वृक्षा दुर्भगाःसुभगा अपि॥ वियोनिसंज्ञामेतेऽपि लभंते मुनिवाक्यतः॥९॥ अब इस अध्यायमें. वराहमिहिराचार्यका कहा हुआ वियोनि. ( विनायोनिसे उत्पन्न) पदार्थोंके प्रश्नका ज्ञान सुगम अक्षरोंकरके ग्रह एवं लग्नके बलाबलके अनुसार कहते हैं ॥ १ ॥ वियोनिका तात्पर्य यही है कि, जो वृक्षआदि 'भगद्वारा उत्पन्न नहीं भये वही वियोनि है, परंतु यहां आचा- याने अलग प्रकरण करनेकी आवश्यकता न समझकर गौआदि पशु, वत्तक आदि पक्षि, वृश्चिकादि तिर्यक भी इसी वियोनिप्रकरणमें कहदिये हैं. इसलिये कहते हैं कि कोई ग्राम्य कोई वनचर कोई जलज कोई स्थलज, भिन्न रूप प्राणीहैं ॥ २ ॥ वाय, स्यार, वनबिलाई, मृग, जडाउ, झांक, वानर, गवयमृग, चामरी गौ, सूअर, नौला, आदि वनचर हैं॥३॥गोधा,चूहा,सर्प,बिच्छू,आदि.छिद्र बांबी आदि- योंमें रहनेवाले हैं. ये सर्व वनके जीव हैं । और इनमें कितने ही प्रामवासी भी हैं ।। ४ ।। जो बकरी, गौ, भैंस, घोडे, ऊंठ, खञ्चर, गदहा, कृकलास, कुत्ता और छिपकली आदि नामोंसे प्रसिद्ध हैं ॥ ५॥ तथा स्थलज, जलन, वन्य, आरण्य पक्षि- योंमें वत्तक, कुक्कुट, काक, मेंढा, ये आमचारी हैं ॥६॥ कोक, कारंड, हंस, सारस, टिभिआदि, कुरर, बगुला, कारंब, चकवा जलाश्रयी हैं वनके स्थलज, बाज, शुक, गीध, पक्षिराज गरुड, कोकिला खंजन काला कौवा ये पक्षी हैं।॥७॥८॥ ऐसे ही जलज स्थलज वृक्षको कोई दुर्मग कोई सुमग अर्थात् कोई शुभ कोई निकम्मे कोई फूल फलोंके कोई घास लकडीके कामके भी अनेक है ये भी मुनिया- ज्योंसे वियोनि संज्ञाको प्राप्त होते हैं ॥९॥ " ~ + - (२४) जातकशिरोमणि- ग्राम्यारण्यजलोद्भूतचितुष्पदराशिभिः ॥ अवलैब- लवद्भिश्च तत्समाना वियोनयः ॥ ३०॥ प्रश्नलगं समा. नीय ग्रहस्तित्कालसंभवान् ॥ पडूबलानि ग्रहणांश्च द्वादशांशगतं विधुम् ॥ ११॥ क्रूरंग्रहरतिवलैर्विवलैन्च शुभग्रहै। चन्द्रकांतद्वादशांशरूपे कीबे चतुष्टय|१२|| प्रश्नं वियोनौ प्रवदेत्प्रष्टुवक्किीवीक्षणात् ॥ कोबे केन्द्र गते क्रूरा बलवन्तश्च कारणम् ॥ १३॥ बलिनःस्त्री- खगाः क्रूराः परांशे विवलाः शुभाः । पूर्ववत्क्लीवकेंद्र- भागरूपं वियोनिमे॥१४॥ प्रश्न वा जन्ममें, ग्राम्य, अरण्य, जलचर, द्विपद, चतु- स्पद, जैसी राशि जिस प्रकार बलवान वा निर्बल हो. उसके समान वियोनि जाननी ॥ १० ॥ प्रश्नलग्न स्पष्ट तात्कालिक अह स्पष्ट और ग्रहोंके पडूबलसाधन भी करलेना तब जिस द्वादशांशमें चन्द्रमा है उस राशिके तुल्य वियोनिका रंगरूप आदि कहना, यह निश्चय है ॥ ११॥ योग कहते हैं कि, कर ग्रह बहुत बलवान् तथा शुभग्रह निर्वली और नपुंसक (धुध शनि ) केंद्र में हो तो चन्द्रमा जिस द्वादशांशमें है उसके समान वियोनियोनि कहना ।। १२ । इस योगमें प्रकारांतर भी है कि, नपुंसक ग्रह लग्नचन्द्रमाको देखें केंद्र में स्थित हो. और क्रमह बलवान हों यही वियोनिके कारण हैं उन्हींक अनुसार प्रश्नकर्ताका प्रश्न वियोनिका कहना ॥ १३ ॥ दूसरा योग कहते हैं कि, खीमह चं० शु० तथा रग्रह बलवान ही और शुभमह शहनवांशकों में तथा निर्वल हों और पक्ति प्रकारसे केंद्रस्थ नपुंसकमह देखें तो राशिल्य वियोनि कहना ॥१४॥ .
भाषाटीकासमेत (२५) मेपो दिवा मृगा वन्या रात्री ग्राम्या अजादयः॥ वृषो दिवा चमर्यश्च गवया महिपादयः॥१५॥कन्यामिथुनयो- वन्या विज्ञेया वानरा अपि ॥ कर्कटे जलजाः सत्त्वाः कर्कटाः शम्बुकादयः ॥ १६ ॥ शुक्तिकाः शम्बुकाः शंखा मुक्ता अपि कपर्दिकाः।। सिंहे व्याघा जम्बुकाया नखिनो-वनसंभवाः ॥ १७ ॥ तुलायां ग्राम्यपशवः सूकराः कुकुटादयः ॥ वृश्चिके वृश्चिकाः कीटाः सर्पा मूपा बिलेशयाः ।। १८॥ कोदंडस्य परे खण्डे तुरगा गर्दभादयः॥मृगाद्यखण्डे हरिणा जलजा उत्तरे स्मृताः॥ ॥ १९ ॥ कुंभे जलचरा जीवा पक्षिणश्च जलेशयाः॥ मीने मीना कपश्चिशंखा ये च जलोद्भवाः ॥ २० ॥ ग्राम्ये चतुष्पदेऽरण्ये मृगव्याघ्रादिकास्तथा । मेपादि राशयो ज्ञेया लेख्या वर्णविनिर्णयः ॥२१॥ चन्द्रस्थितद्वादशांशराशियोंके अनुरूप वियोनि कहते हैं कि, मेष राशि दिनमें. हो तो मृग. वनचर, रात्रिमें. ग्राम्य- पशु बकरा आदि. वृष. दिनमें. (चामरी मृग) चौरीगाय गयमृग. और भैमे आदि ॥ १५ ॥ कन्या एवं मिथुनमें वनचर और वानर भीजानने कर्कटमें जलचर जीव.कर्कट.घोंघा आदि ॥१६॥और सीपी. (गंडेल) जलजंतुविशेष शंख. मोती कौडी, सिंहमें वाघ स्यार आदि. वनचर नखी जीव ॥१७॥ तुलामें ग्राम्यपशु सूकर कुकुटादि ॥ १८ ॥ वृश्चिकमें विच्छू, कीडे. सर्प. मूषक और बिलों में रहनेवाले जीव धनके पिछले दलमें घोडे गधे आदि (मृग) मकरके पूर्वदल में हरिण उत्तर .
(२६) जातकशिरोमणि- दलमें जलजन्तु ॥ १९ ॥ कुंभमें जलचर जीव जलचर पक्षि मीनमें मछली कौड़ी शंख और जलजीव ॥ २० ॥ इस प्रकार प्रश्नमें एवं वर्णनिर्णयमें. ग्राम्य चौपइये वनचर मृग वाघ आदिमें मेषादिराशि जाननी ॥ २१ ॥ शिरो मेपो वृपो वकं गलश्च चरणौ नृयुक् ॥ स्कंधे कर्कटकः सिंहः पृष्ठे कन्या स्थितोरसि ॥२२॥ तुला पार्श्वद्वये कुक्षी वृश्चिको वस्तु पाणिक ॥ मकरोंघी मेढ़ मुष्कं कुंभः स्फिक पुच्छकं झपः ॥ २३ ॥ वियोनिके राश्यंगविभाग कहते हैं कि । मेष शिर वृष मुख और कंठ, मिथुन अगले पैर कर्क कंधा सिंह पीठ कन्या छाती ॥ २२॥ तुला दोनों बगल वृश्चिक कुक्षि धन हाथ मकर पिछले पैर कुंमालिंग वृपण मीन(स्फिग)गोप्याग और पुच्छ जानने यहां अगले पिछले पैर कहनेसे चतुष्पद और हाथभी जो कहे हैं इससे हाथवाले तिर्यग जीव जानने ॥ २३ ॥ वर्ण वदेद्वियोनौ तु लगलग्नाशयोर्बलात ।। ग्रहयोगे क्षणाद्वापि नानावण वदेवहात्।। २४ ॥ग्रहा क्रूरा यदंगस्था घातं तत्र वदेदुधः ॥ शुभग्रहाः यदंगस्था स्तत्तवर्ण समाशिदेत् ॥ २५ ॥ सप्तमस्था गृहा ये च 'तेषां वर्णन रेखिका वक्तव्या पृष्ठगा एव रेखिका दृष्टि संख्यया ॥२६॥ वियोनिमें रंग लग्न और लग्नगत नवांशके बलसे, कहना अथवा जो मह लग्नमें हैं वा जो लमको देखता है उस महके अनुसार कहना बहुतोंका योग वा दृष्टि हो तो नानावर्ण कहना ॥ २४ ॥ उपरोक्त कालांगविमागमें यह विचार है कि भाषाटीकासमेत । (२७) क्रूरग्रह जिस अंगमें हो उसमें घात आदिका चिह्न और शुभ- ग्रह अंगमें पुष्टता वा सुन्दरता आदि ग्रहवर्ण समान कहना ॥ २५ ॥ जो ग्रह सप्तमस्थानमें हो उसके वर्णकी रेखा कहनी वह भी अग्रहष्टि पृष्ठदृष्टिके अनुसार आगे वा पीछे और ग्रह- दृष्टि संख्याके अनुसार उनकी संख्या कहनी ॥ २६॥ लग्नांशबलयोगेन ग्रहयुक्ते क्षणेन वा ॥ पक्षिणोपि प्रव क्तव्या जलजा स्थलजा अपि ॥२७॥ नृयुर द्वितीय प्रथमश्च सिंहे मध्यस्तुलायाः प्रथमो घटस्य ॥ पक्षि- हकाणाः कथिता वियोनौ लग्गेषु तत्स्थेषुच पक्षियोनिः ॥२८॥ खगे हकाणे बलिनि चरांशे वा बुधांशके । तद्युक्ते वीक्षिते वापि विहगाः स्थलजाम्बुजाः॥२९॥ वियोनियों में भी लग्नतथा लग्नगत नवांशके बल एवं ग्रहके योग तथा दृष्टिसे जलचर और स्थलचर भी पक्षी कहने ॥ ।। २७ । मिथुन, वृष, मेष. सिंह. तुलाका मध्य और कुम्भका पहिला इतने द्रेष्काण पक्षिसंज्ञक हैं इनमेंसे कोई भी लग्नमें होतो वियोनि पक्षिजाति कहनी ॥ २८ ॥ बलवान् पक्षि द्रेकाण हो लग्नमें चरांशक हो वा. बुधका अंशक हो अथवा बुधसे युक्त यद्वा दृष्ट हो तो वियोनि स्थलज वा जलज कहनी ॥ २९॥ स्थलजा विहगा वाच्याः शनियोगक्षणोद्भवाः॥ चंद्र युग्वीक्षणभवा जलजाः पक्षिणो बुधैः ॥ ३० ॥ वियो निलग्ने चरभे लगदुगुरुभास्कराः ॥ विबलास्तरवो वाच्यास्तद्भेदा अंशसंभवाः॥३१॥जलजा जलराश्यशः
(२८)
जातकशिरोमणि-
स्थलजाः स्थलजांशकैः ।। स्थलांशै शनियुग्हर्जलां
शैरिंदुदृग्युतैः ॥३२॥ यावत्संख्यांशके लग्ने जलस्थल
नवांशकाः ॥तावंत एव तरवः स्थलजा जलजोद्भवाः
॥ ३३॥ अकाशे तरवः साराः क्षीरिणश्चन्द्रभांशके ।।
कौजे कंटकिनो वृक्षा दुर्भगाः शनिभांशके ॥३४॥
गुवैशे सफला ज्ञांशे विफला ऊपरोद्भवाः ॥ पुष्पवृक्षाश्च
शुक्रांशे मुनिभूचरुहचंपकाः ॥ ३५॥
लग्नलमांशमें शनिका योग वा शनिकी दृष्टि हो तो
स्थलज पक्षी कहने यदि चंद्रमाका योग वा दृष्टि हो तो इस
से पंडित जलचर पक्षी कहें॥ ३० ॥ वियोनिप्रश्नमें चर
लग्न हो तथा लग्नचंद्रमा बृहस्पति और सूर्य निर्वल हाँ
तो वृक्ष कहने उनमें भी कौन वृक्ष है ऐसे विचार में अंशोसे
कहना ॥ ३१ ॥ जलराश्यंशोसे जलजवृक्ष स्थलराश्यंशोसे
स्थलज वृक्ष जानने इसमें भी विशेषता है कि स्थलांश हों
तो उनमें शनिकी दृष्टि योग और जलराश्यंश हो तो चंद्र
माके योग वा दृष्टिसे उक्तफल पूर्ण जानना ॥ ३०॥ जितनी
संख्या नवांशक लग्नमें भुक्ते हैं उनमें कितने जलचर और
कितने स्थलचर हैं उनके अनुसार उतनी संख्या स्थलज जल
ज वृक्ष कहने । ३३ ।। सूर्यका अंशक हों तो (संसारवृक्ष.)
पक्की लकहीवाले. चंद्रमाके राशि अंशक हों तो दूधवाले वृक्ष
मंगलका होतो कांटा वाले वृक्ष. शनिके रास्यंशकसे (दुर्भग)
निकम्मे वा निस्सार वृक्ष.॥३४॥बृहस्पतिके अंशमें फलवाले.
युधमें (निष्फल )विनाफलवाले और उपर भूमिमें उत्पन्न
हुये वृक्ष, शुक्रांशकमें फूल वाले वृक्ष. अगस्ति वृक्ष और
चंपा कहने ॥ ३५॥
भाषाटीकासमेत। (२९) लग्गस्थितांशांशपतिः स्थिरांशोत्तरस्थिशिस्तरवः प्रदिष्टाः॥स्वांशात्परांशोपगतांशनाथस्तावंत एवांशपतु ल्यवृक्षाः ।। ३६ ।। यदि खलु गृहचारी वृक्षकारी शुभः स्याद्भवति रुचिरवृक्षः कुत्सितायां धरायाम् ॥अशुभभ- वनसंस्थः पापिनः शक्तियुक्ता रुचिरधराणिजाता दुर्भगा भूरुहाः स्युः ॥ ३७ ॥ इति श्रीपाठकमहादेववि रचितेजातकशिरोमणौ वियोनिजन्माध्यायस्तृतीयः३॥ लग्नगत नवांश तथा अंशेष स्थिरराश्यंशकों में हो तो उनके तुल्य अवयवादि वृक्ष कहे हैं यद्वा प्रथम स्थिरांशकसे उत्तरके पुनः वर्तमान स्थिरांशकमें हों इस बीच जितने अंश क हों उतनी संख्या कहनी तथा अपन अंशकसे चलकर जितने संख्याक परांशपर गया हो उतनी संख्या वृक्षोंकी कहनी ॥ ३६॥ यदि वृक्षवतलाने वा ग्रह पापराशिमें शुभग्रह हो तो ऊपर भूमिमें सुंदर वृक्ष होगा तथा पापग्रहरा 'शिमें पापग्रह बलवान् हो तो सुंदर भूमिमें निकम्मे वृक्ष होवें ॥ ३७॥ इति महीधरकृतायां जातकशिरोमणि भाषाटी कायां वियोनिजन्माध्यायस्तृतीयः॥३॥ वराहमिहिरोकार्थ ज्ञात्वाऽधानविधि वे ॥ प्रथमा दार्त्तवात्स्त्रीणां मासिमासि यथा रजः ॥१ ॥ अर्का न्मुक्तःशशी यवद्दादशांशानुदेति यत् ॥ रजोदर्शनमप्या सां द्वादशाब्दे तु जन्मतः ॥ २ ॥ नारीणामाघरजसां विषमा बिन्दवो यदि ॥ दृश्यते वस्त्रसंलग्नाः पुत्रिण्यऽ- न्यैः सकन्यका ॥३॥ सुभगा श्वेतवस्त्रा स्यानववस्त्रा (३०) जातकशिरोमणि- पतिव्रता ॥ क्षौमवत्रा क्षितीशा स्याद्रक्तवस्त्रातिरो- गिणी ॥४॥पीतवस्त्रा सुशीला स्यात्पतिपुत्रप्रवर्दिनी ॥ विधवा दुर्भगा नारी जीर्णवस्त्रातिदुःखिनी॥५॥ वराहमिहिराचार्यके बृहजातकमें कहेहुये अर्थको जान कर मैं आधानविधि कहता हूं अर्थात् उक्तआचार्यने थोडे अक्षरोंमें बहुत अर्थ द्योतन करनेके लिये गूढार्थग्रंथ बनाया उसको यहां विशेषतर स्पष्ट करता हूं कि स्त्रियों के प्रथमरजोदर्श नसे प्रत्येक मासमें जैसे रजोदर्शन होता है ॥ १ ॥ वह सूर्य से निकप्ता चन्द्रमाके तरह बारहवां भाग क्रमसे बढकर एक महीने में पुनः वैसा ही होजाता है तैसे ही स्त्रियोंका रजोदर्शन भी भीतर बारहवें भागकरके घट बढ होता हुआ प्रत्येकमहीनेमें होता है उसकाआरंभस्त्रियोंके जन्मसे बारहवें वर्षसे होतादे॥ प्रथमरजोदर्शनमें स्त्रियोंके वस्त्रपर विषमविन्दु देखेजा तो वह पुत्रवती होगी. समविन्दु प्रथम देखेजावें तो कन्या अधिक होंगी ॥ ३॥ प्रथमरजोदर्शनके समयमें श्वेतवस्त्र पहिने हो तो सौभाग्यवती रहेगी नवीनवस्त्र हों तो पति- बता रेशमीवस्त्र हों तो पृथ्वीको अधिपतिनी हो लालवस्त्र ५ हों तो अतिरोगिणी रहै ॥ ४॥ पीलेवन हों तो सुशीला एवं पतिकी आपुषढाने और पुत्रोंको बढानेवाली. यदि पुराने वस्त्र हों तो विधवा, दुर्भगा और अतिदुःखिनी होगी. यहां उपलक्षणसे मलिन, कृष्ण और फटे टूटे वस्त्रोंका भी फल जानना ॥५॥ प्रतिमासं यथा स्त्रीणां गर्भार्थं जायते रजः॥ भूमिजो राविनाथश्व तौ हेतृ ह्यात प्रति ॥६॥ इन्दुर्जलं 'कुजो वह्निर्यथा स्थालीगतं जलम् ॥ उद्रेगिवतियो- भाषाटीकासमेत। गेन कुजेन्दौ दृग्युतौ रजः ॥ ७॥ पोडश निशाः स्त्रीणां तासु युग्मासु संविशेत् ॥ युग्मासु पुत्रा जायते विषमासु च कन्यकाः॥८॥ जैसे महीने महीने में स्त्रियोंका रज गर्भधारणके लिये उत्पन्न है इस आर्तव होनेके हेतु चन्द्रमा और मंगल भी हैं। कि चन्द्रमा जल, मंगल अग्नि है. जैसे स्थालीके नीचे जलानेसे थालीपरका जल उफनता है एसे ही मंगल माके दृग्युत होनेमें. अर्थात् स्त्रीके अनुपचयराशिगत दृष्टियुक्त होनेमें रज उत्पन्न होताहै ॥ ७॥ स्त्रियोंके रजो- नसे सोलहरात्रिपर्यन्त गर्भाधान होना संभव है इन- समरात्रियों में गमन पुत्रेच्छुने और विषमरात्रियों में आर्थियोंने करना क्योंकि समरात्रिके आधानसे पुत्र विषमरात्रिकेमें कन्या उत्पन्न होती है ॥८॥ नखदशनवैकृतानि कुदिनुसमये पुरुपः स्त्रियः चित्।।ऋतुरपि दश पट् च वासराणि प्रथमनिशा- यं न तब गच्छेत् ॥ ९ ॥भयाहं पञ्च पर्वाणि मयोः सकलं दिनम् ।। गर्भार्थ वर्जयेद्विद्वान्सज्वरो वर्जितः ॥१०॥ र्भाधानसमयमें पुरुष स्त्रीके शरीरपर वारंवार नख दातोंक क्षत कदाचित् भी न करे तथा ऋतुके भी १० प्रथमकी तीनरात्रियों में स्त्रीगमन न करे ॥९॥पि क्षयदिन. संक्रांतिआदि पांच पर्वदिन. प्रातमध्य समय. और समस्तदिन गर्भार्थी विद्वान् गर्भाधार वर्जित करे. तथा ज्वरवाला और बलरहित भी गमा करे ।।१० जातकशिरोमणि- अनुपचयगृहस्थे शीतरश्मौ युक्त्या धरणितनयदृष्टे संयुते वारजस्य॥ उपचयगृहसंस्थे कामिनी रात्रिनाथे सुरपतिगुरुदृष्टे पुप्रयोग प्रयाति ।। ११ ॥ यथास्तरा- शिमिथुनं प्रयाति नृचतुष्पदः ॥ तथैव पुंस्त्रीसंयोगो वक्तव्यः पुरुषः स्त्रियः ॥ १२ ॥ अस्ते युतेक्षिते पाश सरोपकलहानुगः।संयोगः शुभयुग्दृष्टे स्त्रीनरौ सुविला सिनौ ।। १३॥ जिस रजोदर्शनसमयमें स्त्रीके जन्मराशिले चन्द्रमा उपचंय ३।६।११ । १० स्थानोंसे अन्यस्थानोंमें हो उसे मंगल देखें, तथा पुरुषके जन्मराशिसे चन्द्रमा इन्हीं उपचयस्थानमेंस किसी में हो उसे बृहस्पति देखे, ऐसे योगप्राप्तहुयेमें स्त्रीपुरु षका संयोग होनेसे गर्भाधान होताहै अन्यथा वह रज निप्पल, जाता है ॥ ११ ॥ आधान वा प्रश्नसमयमें सप्तम भावमें मनुष्य वा चतुप्पदादिजैसीराशि हो उसीके सदृश स्त्रीपुरुषका संयोग कहना यहां ऋचतुष्पद और स्त्री पुरुष राशि कहनेका सयो, जन यही है कि, उसीके सदृश मैथुनक्रीड़ा कामशास्त्रोक्त आसन आदिसे वह संयोग जानना ॥ १२ ॥ सप्तममाव पापग्रह हो अथवा पापग्रहकी दृष्टि हो तो वह स्त्रीपुरुपसंग्रोम मुस्से में वा कलहमें हुआ कहना यदि सप्तमभाव, शुभनाई ही वा शुभग्रहकी दृष्टि हो तो वीपुरुष हंसीखेलमें उस बसन्नथे कहना ॥ १३ ॥ गलगत्रिकोणे सुरनाथपूज्ये रवीन्दुशुकावनिजाः स्त्र भागाः ॥ भवत्यपत्यं नियतं नराणां नपुंसकस्यापि सबीजिनः किम् ॥ १४ ॥अर्कशुक्रौ दिवा रात्रौ शनीवर भाषाटीकासमेत। पितृमातरौ ॥ पितृमातृव्यसहजे दिवारात्रिविपर्य- यात् ॥ १५॥ पितुः पितृव्यस्य शुभौ भवेतां यद्यर्क- सौरी विषमसंस्थौ ॥ मातृष्वसुर्भार्गवरात्रिनाथी शुभौ च मातुः समराशिसंस्थौ ॥१६॥ कुजार्कजौ सप्तमराशिसंस्थौ रोगप्रदौ भास्करतो. विधोर्वा ॥ पितुश्च मातुर्मरणप्रदौ तौ तन्मध्यगावेकयुतेक्षिते वा ॥ १७॥ यदिआधानसमयमें बृहस्पति लग्न वा त्रिकोणमेंहो और सूर्य चन्द्रमा शुक्र अपने अंशकोंमें हों तो अवश्य संतान होगी यह योग नपुंसकको भी संतति करता है जो सवार्य हैं उनके तो क्या ही कहनाहै ॥१४॥ दिनमें सूर्य पिता शुक्र माता और रात्रिमें शनि चन्द्रमा होते हैं इनके बलवान् होने में पिता माताको शुभ तथा निर्बल होनेमें अशुभ फल होता है यदि दिवासंज्ञक रात्रिमें और रात्रिसंज्ञक दिनमें बली वा निर्बल हो तो ऐसी विपरीततामें पितृसंज्ञक पिताके भाइयोंको तथा मातृसंज्ञक माके बहिन यद्वा चाची ताईको उक्त फल देते हैं इनका खुलासा कहते हैं कि ॥१५॥ यदि सूर्य शनि विषमरा: शिमें होवे तोपिता और चाचा ताऊकी भलाई होवै यदि शुक्र चन्द्रमा शुभदायक हों और समराशिगत हों तो माता और चाचीताईको शुभफल देते हैं ॥१६॥मंगल शनि सातमराशिमें हों तो मातापिताको रोग देते हैं यदि सूर्यसे अथवा चन्द्रमासे मंगल शनि सप्तम हों अथवा उनके बीच में हों या उनसे दृष्ट हों तो मातापिताको मृत्यु देते हैं ये योग, सूर्यसे पितृपक्षको चन्द्रमासे मातृपक्षको फल देते हैं यह क्रम जानना ॥ १७॥ आधानं गंतुमिच्छद्भिः पापैः स्त्री प्रियते शुभैः॥न दृष्टै- रुदये सौरे क्षीणेन्दुकुजहग्युते ॥ १८॥ युगपदा पृथ:
तु मिथुन कुरुतः स्वकम् ॥ २४ ॥ मिथुनहयां- जातकशिरोमणि- खापि लग्नेन्दू पापमध्यगौ ॥ नारी गर्भयुता याति मरणं न शुभेक्षितौ ॥ १९ ॥ क्रूरैश्चतुर्थगेळ्याच्छशि- नो वा कुजे मृतौ ॥ शुभहग्योंगरिहते सगर्भा स्त्री विपद्यते ॥२०॥ व्ययवस्थितौ लगाकुजार्की वा शशी कुजः ॥ नारी सगर्भा म्रियते शुभहग्योगवर्ज- नात्॥२॥नारी शस्त्रेण म्रियते कुजार्की वुदयास्तगी। शुभयोगेक्षितौ न स्तो योगभंगकराः शुभाः ॥२२॥ पापग्रह आधान लग्नमें जाना चाहते हो अर्थात् बारहवें भावके २७ अंशसे ऊपर हों उनको शुभ ग्रह न देखे जा लग्नमें शनैश्वर मंगलसे दृष्ट हो अथवा युक्त हो तो स्त्रीकी मृत्यु होवे ।। १८॥ लग्न और चंद्रमा भी एक ही वार अथवा लग्न वा चंद्रमा अलग २पापमहाँके बीच हों उनकी शुभग्रह न देखे तो गर्भसहित स्त्री मृत्युको प्राप्तहोतीहै ॥ १९॥ चंद्रमासे दूरग्रह लग्नमें हों उनको शुभग्रह न देखें न • साथ हों तो गर्भसहित स्त्री मरजावै ॥२०॥ लगसे वा चंद्र मासे मंगल शनि दूसरे बारहवें भावों में हो उनपर शुभग्रहाँकी दृष्टि न हो शुभग्रहोंसे युक्त भी न हों तो भी सगर्भास्त्री मर जावै ॥२१॥ जो मंगलमूर्य लग्नसप्तममें • .पाकी रहित हों तो गर्भवती स्त्री शस्त्रसे मृत्यु पावै इतने शुभग्रह दृष्टि वा योग हो तो योगभंग करते हैं ॥१२॥ युग्मे चंद्रसितावोजे स्युर्बुधारगुरूदयाः ॥ युग्मे वा वलिनस्ते स्युः कुवैति मिथुनं स्वकम् ॥ २३॥ लग्नेन्दु समगौ दृष्टी रविभौमसुराचितैः । वलिभिर्वलिनी तो - ८ भाषाटीकोसमेत। (३५) शकगान् ग्रहोदयान्पुरंपनिजांशगतेंदुजवीक्षितान् ॥ त्रितयसतं.वनितांशगते बुधे वनितैका पुरुपद्वयं प्रसूयते ॥ २५ ॥ झपवनितांशगान्ग्रहोदयान्कन्यांशोपगत- बुधेन वीक्षितान् ॥ वनितानां त्रितयं नृयुड्नवांश क्षे पुत्रौ भवतश्च कन्यके द्वे॥२६॥धनुदरस्यांशगते विलग्ने ग्रहैलिटर्द्धनुरंशजातैः ॥ दृष्टे बलिष्ठे न नपुंसकेन जाताःप्रभूता अपि कोशसंस्थाः॥२७॥ चंद्रमा शुक्र समराशिमें बुध मंगल बृहस्पति और लग्न विषमराशियों में अथवा समोंमें हों परंतु बलवान हों तो यमल उत्पन्न करते हैं ॥ २३॥ लग्न चंद्रमा समराशियों में हा बलवान भी हों तथा इन्हें बलवान सूर्य मंगल वृहस्पति देखें तो यमल उत्पन्न करते हैं ॥२४॥ ग्रह एवं लग्न मिथुन वा धनके अंशकोंमें हों और पुरुषांशक वा अपने अंशकमें स्थित बुध उन्हें देखे तो तीन पुत्र होते हैं यदि ऐसे योगमें बुध स्त्री राशिके अंशकमें वे तो एक कन्या दो पुत्र उत्पन्न होते हैं॥२५॥मह एवं लग्नमीन थवा कन्याके अंशकोंमें हों तथा उन्हें बुध देखे तो तीन कन्या त्पन्न होवें यदि बुध मिथुन नवांशकमें हों तो एक पुत्र और दो कन्या होवें ॥२६॥ यदि लग्नमें धन नवांशकहो और लग्न- को धनांशकी बलिष्ठग्रह उसे देखें तथा बलवान् नपुंसक महभी देखें तो गर्भमें बहुतवालक हैं कहना इतने योग आधानकाल गर्भप्रश्न और जन्ममें भी फल देते हैं ॥ २७ ॥ शुक्रशोणितसंयोगे गुडवत्कललं भवेत् ॥ धनं द्वितीयेऽ वयवस्तृतीयेऽस्थि चतुर्थके ॥२८॥क्रमात्त्वग्लोमाचे तन्यं मासपाः शुक्रभूसुतौ ॥ जीवसूर्येन्दुसौरिज्ञा लग्न- (३४) जातकशिरोमणि- ग्वापि लग्नेन्दू पापमध्यगौ ॥ नारी गर्भयुता याति मरणं न शुभेक्षितौ ॥ १९॥ क्रूरैश्चतुर्थगेलनाच्छशि- नो वा कुजे मृतौ ॥ शुभहग्योगरिहते सगर्भा स्त्री विपद्यते ॥२०॥ व्ययबंधुस्थिती लग्नात्कुजार्की वा शशी कुजः ॥ नारी सगर्भा म्रियते शुभहग्योगवर्ज- नात्॥२१॥नारी शस्त्रेण म्रियते कुजार्की बुदयास्तगौ।। शुभयोगेक्षितौ न स्तो योगभंगकराः शुभाः ॥२२॥ पापग्रह आधान लग्नमें जाना चाहते हो अर्थात् बारहवें भावके २७ अंशसे ऊपर हों उनको शुभ ग्रह न देव जा लग्नमें शनैश्चर मंगलसे दृष्ट हो अथवा युक्त हो तो मृत्यु होवे ॥ १८॥ लग्न और चंद्रमा भी एक ही वार लग्न वा चंद्रमा अलग २पापग्रहोंके बीच हों उनको शुभग्रह देखे तो गर्भसहित स्त्री मृत्युको प्राप्तहोतीहै ॥ १९ ॥ लग्न चंद्रमासे क्रूरमह लपमें हों उनको शुभग्रह न देखें न साथ हों तो गर्भसहित स्त्री मरजावै ॥ २० ॥ लग्नसे वा चं मासे मंगल शनि दूसरे बारहवें भावों में हो उनपर शुभग्रहों दृष्टि न हो शुभग्रहोंसे युक्त भी न हों तो भी सगर्भास्त्री मर जावै ॥२॥ जो मंगलमूर्य लग्नसप्तममें शु દષ્ટ रहित हों तो गर्भवती स्त्री शखसे मृत्यु पावै इतने योगाम शुभग्रह दृष्टि वा योग हो तो योगभंग करते हैं ॥२२॥ युग्मे चंद्रसितावोजे स्युर्बुधारगुरूदयाः ॥ युग्मे वा वलिनस्ते स्युः कुर्वति मिथुनं स्वकम् ।।२३।। लग्नेन्दू समगी दृष्टौ रविभीमसुरार्चितैः॥ वलिमिलिनी तो तु मिथुनं कुरुतः स्वकम् ॥ २४ ॥ मिथुनहयां- A भाषाटीकासमेत। . प्रवदंति संतः॥३३॥ कर्कस्थे तनुगे चन्द्रे कुज अर्का- किवीक्षितपिंगुर्झषद्वये जातो लग्नेन्दुकुजवीक्षित॥३४॥ मृगांत्यांशगते लग्ने रवींद्वार्किविलोकिते ॥ जातो वाम- नको भूयात्सौम्या यदि न लग्नगाः ॥३५॥ समस्त ग्रह निर्बल हों और बुध लग्नमें हो तो बालकके दो मुख होंगे ऐसे ही पंचममें हों तो चार हाथ हो यदि ऐसे ही सर्वग्रह निर्वलतामें बुध नवम हो तो तीन वा चार पर होंगें यदि वही बुध पिछले द्रेष्काणमें हो तो विना पैरका होगा ॥३॥ चंद्रमा वृषका तथा पापग्रह (भसंधि) कर्क वृश्चिक मीनमें हों तो गूंगा होगा यदि इनको शुभग्रह देखें तो बडी उमरमें वाणी बोलने लगेगा दूसरा योग है कि शनि मंगल बुधके अंशकमें हों तो बालकदंतसहित पैदा होगा ऐसा सज्जन कहते है ॥ ३३ ॥ कर्कका चंद्रमा लग्नमें मंगल सूर्य शनिसे दृष्ट हो(पंगु)खोडा होगा यदि शनि चंद्रमा मंगलसे दृष्ट मीनलममें हो तो भी वही फल है ॥ ३४॥ लग्नमें मकरका अंत्यांश हो उसे चन्द्रमा शनि देखे तथा लग्नमें शुमग्रह नहों तो बालक वामन होगा ॥३५॥ लग्नद्रेष्काणगैः पापैरशिरो द्वित्रिभागगैः ॥ अभुजों- तहकाणस्थैरनंघिरपरे जगुः ॥३६ ॥ धर्मोदितहका- णस्थे सूर्येन्दय वीक्षिते ॥ पादहीनो महीपुत्रे शुभह- ग्योगवजिते ॥३७॥ पूर्ववाले योगमें विशेष कहते है कि लग्नमें दूसरा द्रेष्काणहो और शनि चन्द्र सूर्य देखें तो बालक हाथ रहित होगा लपमें (३६) जातकशिरोमणि- पान्दवः क्रमात्॥ २९॥ गर्भाधानाचरे राशौ दशमे मासि सूयते ॥ स्थिरेणैकादशे मासि द्वितीये द्वादशे भवः ॥३०॥ पुष्टिः शुभंच गर्भस्य मासपे विपुलद्युतौ॥ अहे लिपीडिते तेन ह्यन्यथा पंतनं भवेत् ॥३॥ आधान होनेपर प्रथम मासमें घुले हुये गुडकेसमान गीला शुक्र और रजका कलल होताहे दूसरेमें घनाहोकर पिंडसमान तीसरेमें उस घन में हस्तपादादि अवयव होते हैं चौथेमें हड्डी उत्पन्न होतीहैं ॥ २८ ॥ऐसे ही क्रमसे पांचवें में त्वचा छठेमें रोम सातवेंमें चैतन्यता अंगोंकी होती है "ग्रंथांतरमत है कि आठवेंमें माने जो खाया उसका असर नालनसके द्वारा रुधि रसंचार बच्चे के शरीरमें होने लगता है नवममें बाहर निकल. नेकी उद्वेगता और दशममें प्रसव होता है "प्रथम मासका अधिपति शुक्र दूसरेका मंगल तीसरेका बृहस्पति चौथेका सूर्य पंचमका चंद्रमा छठेका शान सातवेंका बुधआठवेंकालदेश नवमेका सूर्य दर्शनका चन्द्रमाक्रमसे हैं॥२९॥किसी आचार्यका यह भी मत है कि, चरराशिमें गर्भाधान होनेसे दशममासमें स्थिरसे ग्यारहवें और द्विस्वभावसे बारहवें महीने में प्रसव होता है ॥ ३० ॥ मासेश श्लवान होनेमें उस मासमें गर्भकी पुष्टि होती है यदि मासेश पोोहित हो तो पुष्टि नहीं होती और वह हीन वलक्षीण आदि हो तो गर्भपात होजाता है३१॥ स्यात्रिचतुर्भुजश्च॥ त्रिपाचतुष्पानवमेंदुपुत्रे चांत्ये विभागे सति बाझपादः ॥ ३२ ॥ मूको गींदावशुभा भसंघो शुभौधते चेच्चि- रमस्ति वाणी ॥बुधांशगौ सूर्यसुतावनीजी जाते सदत - लग्ने बुधेऽन्यैर्विवर्लेर्मुखद्वयं प्रजागृह V भाषाटीकासमेत। (३९) जो कहे हैं वे वैसे ही होते हैं परन्तु उनमेंसे जो योग भूक वा बहुतकालमें वाणी बोलनेवाले कहे हैं वे यदि शुभग्रहोंसे दृष्ट युक्त हों तो (जाप्य )जपआदि उपाय करनेसे शुम भी हो जाते हैं उपरोक्त विचार आधान, प्रश्न, जन्म, सवहीमें होता है॥३९॥ प्रश्ने चन्द्राधिष्ठितद्वादशांशक्षेत्रे चन्द्रे भाविजन्मादि- शन्ति ॥ लग्नं प्राप्तं द्वादशांशाः शुभार्या गर्भाधानं जातमाहुर्मुनीन्द्राः॥४०॥ लग्नहकाणोपगते महीजे निरीक्षिते सूर्यसुधांशुसौरैः॥शिरोविहीनो भुजपादहीनो धीधर्मराशावपि भूमिपुत्रे ॥११॥ अब आधान वा प्रश्नकालीन लमसे जन्मसमय निकालने के लिये कहते हैं कि, प्रश्न समयमें जिस राशिके द्वादशांश में चन्द्रमा बैठा है उस राशिके चन्द्रमामें नवम दशम मासमें जन्म होना कहते हैं जन्मलग्रमें जो द्वादशांश हो उस राशि लम वा चन्द्रमामें स्त्रीको गर्म रहा है जानना अर्थात् गर्भा- धान लग्नमें जो द्वादशांशक है उस लग्नमें जन्म होगा इसका खुलासा आगे कहेंगे ॥ ४० ॥ लग्नद्रेष्काणमें मंगल हो उसे सूर्य चन्द्रमा शनि देखें तो बालक शिर अथवा हाथ पैरसे हीन उत्पन्न होगा यदि ५ वा ९भावमें मंगल सूर्य चंद्रशनिसे दृष्ट हो तो भी यही फल होगा ॥४१॥ तत्कालेन्दुयंत्र राशौ प्रयातस्तस्मादाशेगादशांशे प्रमाणे ।। अग्रे राशौ चन्द्रगे जन्मकालमन्ये प्राहुर्जन्म काले निपके ॥ ४२ ॥ यावत्संख्यो रात्रिसंज्ञस्य राशे- भांगा याता जन्मतावद्गतेषु ॥ यावत्संख्यो वासराख्य- (३८) जातकशिरोमणि- तीसरा ट्रेकाण हो श०सू० देखें तो पैर न होंगे लपमें प्रथम द्रेष्काण श०० सू० की दृष्टि हो तो बालक शिर रहित होगा अथवा और प्रकार भी अर्थ है कि लग्नमें प्रथम द्रेष्काण और दूसरे तीसरे द्रेष्काण पापयुक्त हों तो हाथ न होंगे लग्न में दूसरा द्रेष्काण और प्रथम तृतीय द्रेष्काण पापयुक्त हों तो पादरहित। लग्नमें तीसरा टेकाण प्रथम द्वितीय पापयुक्त हो तो शिररहित होगा तीसरे प्रकारका अर्थ है कि पंचम राशि में जो द्रेष्काण है वह मंगल युक्त हो श० चं० सू० उसे देखें तो हाथ रहित लग्नगत द्रेष्काण भौमयुक्त श० चं० सू० से दृष्टि हो तो शिररहित यदि नवमगत द्रेष्काण मंगलयुक्त श० चं० सू० से दृष्ट हो तो पादरहित होगा. यह तीसरा अर्थ प्रथांतरोंसे भी पुष्टि पाता है ॥ ३६ ॥ ३७ ॥ सिंहे लग्नगते रवींदुसहिते भौमासिंवीक्षिते जातोंधो नियतं पुमान्छुभयुतेस्यादबुद्धदाक्षोऽथवा चन्द्रो हन्ति विलोचनं व्ययगतो वामं कुजार्कीक्षितः सूर्यों दक्षिण- लोचनं व्ययगतो भौमाहिसंगतः ॥३८॥ आधान कालेप्यशुभानि यानि पुंसां यदुक्तानि भवंति तानि ।। जाप्यान्यवागायशिरोऽनुजातान्याहुः शुभालोकन- संगमेन ॥३९॥ 'लग्नमें सिंहराशि हो उसमें सर्य चन्द्रमा हों इनपर मंगल शनिकी दृष्टि हो तो अवश्य वह पुरुष अन्धा होगा अथवा शुभमहाँसे युक्त भी हो तो चंचलदृष्टि तिरछी निगाह वा कातर नेत्रवाला होवै यदि चन्द्रमा व्ययभावमें मंगल शनिसे दृष्ट होतो वामनेत्र और ऐसाही सूर्य हो तो दाहिने नेत्रकी हानि होती है।॥३८॥आधानकालिक अशिर आदि अशुभ फल -
भाषाटीकासमेत। (४१)
तब ठीक जानना यह गर्भकुण्डलीका प्रश्नमैंने बहुतवार मिला.
या ठीक मिलता है परंतु इसमें तथा नष्ट जन्म प्रश्नमें मतांतर
विधि बहुत है उनमें बहुधा ज्योतिषियोंको भ्रम होजाता है
इसका निश्चय तब होता है जब २॥ ४ प्रकारसे एकही
मिले तथा गुरुकृपा इष्टदेवकी कृपा और इष्ट साधन
होनेपर ठीक मिलते हैं बुद्धिकी चातुर्यता सवही जगहे
चाहिये अब नक्षत्रभुक्त इष्ट
निकालनेका उदाहरण
लिखताहूं कि प्रश्नसमय चत्रशुक्ला ४ दिन २७शनि
वार इष्ट २०१५सूर्यस्पष्ट ११ ॥ २८॥ २४ । २५ गति ५८ ।
१०। लग्न ४।५ ।५८। १४ चंद्रपष्ट १।१ । ११ । २६
में द्वादशका चौथा है वृषसे गिनकर चौथे सिंहके चंद्रमामें
नवम वा दशम मासमें जन्म होगा अव नक्षत्रके लिये कहते
हैं कि, चंद्रस्पष्टमें गतद्वादशांश ३ के ७ अंश ३० कला भुक्त
होगई यह चंद्रस्पष्टमें घटाया शेष १।४१।२६ अंशकी कला
१०१ । २६ एकराशिकी कला १८०० से गुणा किया १८२५
८० एकद्वादशांशकी कला १५० से भाग लिया लब्धि १२१७॥
१२ यह नक्षत्रप्रमाण पिंड है इसमें एक नक्षत्र प्रमाण ८००
घटाया शेष४१७११२पुनः चरणप्रमाण२०७घटाया२१७११२ पुनः
चरणप्रमाण घटाया शेष १७। १२ पहिले एक नक्षत्र घटेमें
मघा मुक्त होगई फिर चरणप्रमाण • घटाये तो पूर्वाफाल्गुनी
के २ चरण भी मुक्त होगपे अब तीसरे चरण लिये शेष१७ ॥
१२ चरण प्रमाण घटी १५ से गुणा किये २०० से भाग लिया
लब्धि १ घटी २ पल तीसरे चरणकी मुक्तिहुई पूर्वा फाल्गुनी.
नक्षत्र भुक्त १ । २ हुआ दिनरात्रिके निमित्त लग्नमें नवांश
वृष रात्रि बली है इससे रात्रिमें जन्म होगा इस कालके
लिये लगस्पष्ट ४१५१५९ । १४ में भुक्तनवांश ३।२० अंशा-
दिघटाया1३९ । १४ इसकी कला १५९ ॥ १४ रात्रिमान
(५०) जातकशिरोमणि- स्य राशेः कालो वाच्योऽहनिशाव्यत्ययेन ॥४३॥ मकरघटनवांशे लग्नगे सप्तमस्थेभवति तपनजन्मात्रीणि वाणिसूतें।युवतिभवनसंस्थेशीतरश्मौ तदंशावुदयति च निपेकाहादशान्दे प्रसूते ॥४४॥ इति श्रीमहादेवविर- चित जातकशिरोमणावाधानाध्यायश्चतुर्थः ॥ ४॥ आधानकालमें तत्काल चन्द्रमा जित राशिमें है उसके तत्काल द्वादशांशराशिके चन्द्रमामें आगे ९॥ १० महीनेमें जन्म होताहै आधान कालज्ञातन होतो प्रश्नलग्नसे यह विचार होता ऐसा कोई आचार्य कहते हैं एक द्वादशांशकमें चंद्र- माकी एक राशि मिलती है द्वादशांश जितने कला भुक्तहुआ उसीके अनुपात करनेसे जन्मकालिक चन्द्रराशि भुक्त वा नक्षत्र मुक्त मिलता है एक राशिके १८०० लिप्ता तथा एक द्वादशाशके १५० लिप्ता होती हैं इनका त्रैराशिकानुपात करनेसे जन्मकालिक नक्षत्र भुक्त मिलता है इसीसे जन्मेष्ट- कुण्डली बन जाती है ॥ ४२ ॥ तत्काल लग्नरात्रि बली हो तो जितने अंश उसके मुक्त हुये उतने अनुपातानुकूल समय रात्रि में और दिवाबली हो तो वैसेही दिनके समय में जन्म होना लिखा है परन्तु यहां मन्थकर्त्ताने तत्काल लम रात्रि बली होने दिनका जन्म और दिवाबली होने में रात्रिमें जन्म होना लिखा है मतांतर होगा तत्काललग्नमें जो द्वादशांश है टतनी संख्याक टसीसे गिनकर जो आता है वह लम जन्ममें होगा कोई कहते हैं कि, चन्द्रं द्वादशांशसे लग्न और लम- द्वादशांशसे चन्द्रमा मिलता है जैसे यहां भी अन्यकर्त्ताने "व्यत्ययेन" यह पद लिख दिया है यहां मतांतरीका फर्क है अन्यग्रन्थों में और भी प्रकार लिखेशप्रकारोंसे एक जना मिले " भाषाटीकांसमेत! (४३) के कानपर शब्द करना आदि दाइयोंकी युक्ति करनेपर बालक श्वासा लेने लगता है प्राण नाम वायुका है जब (वायु) श्वासा चलने लगते हैं तबही उसपर प्राण पडाजानना, इस के पूर्व वह अपनी माताके शरीरके रुधिरकी गति (जो नाल द्वारा उसके शरीरमें पहुंचती है) के द्वारा मांका हस्तपाद आदि अंगके तुल्य जीवित है जुदा प्राण उसपर नहीं है क्यों कि खास लेनेसे रुधिरकी गति होती है जो मांके श्वासा. लेनेसे उसके शरीरमें भी रुधिर गति होती है, बरा. बर देखने में आता है कि, जो बालक निश्चेष्ट होता है उसके नालको दाई लोग शीघ्र बांध देते हैं जो निश्चेष्ट नहीं होते उनके नालपर बाहर निकलने में किसी प्रकार दबाव लग- जाता है तात्पर्य यह कि, नालद्वारा जो रुधिर मांक एवं बाल कके शरीरमें चलता रहता है बंद होजानेपर जुदा श्वास लेनेकी आवश्यकता उसको होती है और आयुका प्रमाण श्वासाओंकी गिनतीपर है मरजाने समय वही श्वासा पूरे होजाते हैं उसीको गतायु कहते हैं इस व्यवस्थासे भी जब मरण श्वासा बंदहोनेपर है तो जन्म भी श्वासा लेनेपर कैसे न हो। इत्यादि ज्योतिष, वैद्यक, धर्मशास्त्र, और सायन्स तथा अनुभवसे प्रथम श्वास लेनेका इष्टकाल मानना सिद्ध है न केवल शीर्षोदय इसका कुछ विस्तार बृहज्जातक सूति- काध्यायके प्रारंभमें मैंने अपनी भाषाटीका लिखी है इसीका- रण यहां उद्देश्य मात्र लिखा अव लग्न निश्चयार्थ सूतिका गृहके चिह्न कहते हैं कि, जन्मलग्नको चन्द्रमा न देखे तो उस समय बालकका पिता परोक्ष था इसमें विशेष यह है कि, लग्नको चन्द्रमा न देखे और सूर्य चरराशिका ८ । ९ वा ११ ॥ १२ भावॉमेंसे किसीमें हो तो पिता परदेशमें था जो सूर्य उन्हींस्थानोंमेंसे किसीमें हो और चन्द्रमा लग्नको न देखे तो (४२) जातकशिरोमणि- २९॥ ६से गुणा किया ४६१७ चरणकला प्रमाण २०० से भाग लिया लाभ २३॥ ४१ यह रात्रिका इष्टकाल भया ज्येष्ठ शुक्ला ६रात्रि गतघटी२३३४१ में जन्म होगा इसीपर नक्षत्रभुक्ति भी मिलती है गणितकी रीति यही है प्रश्न विचार और प्रकार- से भी मिलाय लेना चाहिये ॥ ४३ ॥ योगांतर कहते हैं। कि, लग्नमें मकर वा कुंभ नवांश हो तथा शनि सप्तम हो ऐसा योग आधान वा प्रश्नमें हो तो वह गर्भ तीनवर्षमें प्रसव होगा यदि चंद्रमा सप्तमस्थानमें हो और उसका अंशक लग्नमें हो तो १२ वर्ष में प्रसव होगा इस प्रकरणमें जो अंग हीनाधिकादि योग कहे हैं वे प्रश्न और जन्ममें भी विचारकर युक्तिसे फल कहना ॥४४॥ इति श्रीजातकशिरोमणी माहीधरीभाषाटी- कायामाधानाध्यायश्चतुर्थः॥४॥ पितुः परोक्षस्य वदंति जन्म विलममिन्दावनिरीक्ष्यमा ॥ प्राकर्मराशेः परतश्चरेके पिता स्वदेशे परदेश संस्थः॥१॥ स्वग्रामवा। पितरि स्थितेकै विदेहगे- के पथिगो विदेशात् ॥ पितुः परोक्षस्य वदंति जन्म विलग्नमिन्दावनिरीक्ष्यमाणे ॥ २॥ पितुर्जातः परो- क्षस्य विलनस्थेकनंदने ।कुजे वाऽस्तगते चंद्रे मध्ये वा भार्गवज्ञयोः॥३॥ प्रथम बालकके जन्म समयमें इष्टकाल ठीक होना चाहिये जो बहुधा शीर्पोदय समय इष्ट मानते हैं यह साधारण स्थू. लबात है विशेषताइसमेंयह है कि, शिर देखजानेको शीर्षोदय कहते हैं परंतु कोई शिर देखे जानेसे घटी वा मुहूर्तमें बाहर निकलसकता है कोई शीघ्र भी निकलआता है कोई बाहर आयेमें भी निश्चेष्ट रहता है कान नाकमें फूंक देना या उस .
भाषाटीकासमेत। गुरुयुतश्चंद्रो गुरुनवांशके ॥ द्रेष्काणे गुरुलग्ने वान परैर्जायते हि सः ॥८॥ भौमदृष्टे चरे भानौ दिवा पितरि दूरगे॥ जाताः शनैश्चरे रात्रौ रविदृष्टे विदेशगे ॥९॥यमवको सौरिगृहे चरस्थे विदेशगः॥ मृतः पिता न संदेहो दिवा स्वेवा गृहे पथि ॥३०॥अर्कात्पा- पर्शगौ पापौ त्रिकोणघूनसंस्थितौ ॥ बद्धः पिता विदे- शस्थः चराध गृहे पथि ॥ ११ ॥ लग्न चन्द्रमा साथ हों अथवा पृथक् हों उन्हें बृहस्पति न देखे तो बालक जारज होगा सूर्य चंद्रमा इकट्ठे हों उन्हें बृहस्पति न देखे तो वही फल है और मूर्य चंद्रमा मंगल शनिसे युक्त तो भी वही फल जानना ।। ७ ।। इन तीनयोगोंमें बृहस्पतिका योग हो अथवा चन्द्रमा बृहस्पतिके नवांशकमें वा गुरु द्रेष्काणमें हो अथवा बृहस्पति लग्नमें हो तो जारज न होगा अपने पितासे उत्पन्न होगा ॥ ८॥ दिवाजन्ममें सूर्य चरराशि मंगलसे दृष्ट हो तो पिता उस समयमें दूर था यदि शनि चरराशिमें सूर्यसे दृष्ट और रात्रिका जन्म हो तो पिता विदेशमें था ॥९॥ शनि मंगल शनिके घरमें और सूर्य चर- राशिमें हो दिनका जन्म हो तो निश्चय बालकका पिताचरा- दिराशियोंके सहश घरमें वा मार्गमें मरगया कहना ॥१०॥ पापग्रह शनि मंगल पापराशि १।५।८।१०।११ ओमें तथा सूर्यसे ७ । ९.५ भावोमॅसे किसीमें हो तो बालकका पिता परदेशमें बँधा है कहना इसमें भी विशेष है कि, सूर्य चरराशिमें हो तो परदेशमें स्थिरराशिका हो तो स्वदेशमें और द्विस्वभाव राशिका हो तो मार्गमें बंधा होगा कहना ॥११॥ -- (४४) जातकशिरोमणि- परोक्ष तो था परंतु उसी देशमें था ॥१॥ ऐसे योगमें यदि सूर्य द्विस्वभाव राशिका हो तो विदेशसे चलकर मार्गमें था अथवा अपने ग्रामके बाहर समोपही था इसमें भी लग्नको चंद्र- माका देखना मुरूप है इसकारण यह आधा श्लोक पुनरु- क्तिसे खुलासे करके लिखा ॥२॥ और भी पिता परोक्षके योग कहते हैं कि शनि लग्नमें हो अथवा मंगल सप्तम हो अथवा चन्द्रमा शुक्र बुधके बीचमें हो तो भी पिता परोक्ष जन्मसमय में होगा ॥३॥ कीटकर्कटमीनानां प्राङ्मध्यांत्यहकाणगैः ॥ ससर्पः स्वायगैः सौम्यैः पापलमोदये विधौ ॥ ४॥ चतुश्चर- णगे भानौ बलिद्विस्वभावगैः ॥ चन्द्रादिभिश्च यमलो जायेत कोरवेहिती ॥६॥ सौरे सिंहाजरी लग्ने कुजे वा नालवेष्टितः ॥ कालांगराशितुल्येंगे जायते नाल एव तु॥६॥ वृश्चिकके पहिले कर्कके मध्य और मीनके तीसरे द्रेष्का- णमें दूसरे वा ग्यारहवें स्थानमें शुभग्रह हो और लग्नमें चन्द्रमा पापराशिका हो तो यालक सर्पसहित वा सर्पाकार नससहित हुआ होगा ॥ ४ ॥ सूर्य चतुष्पद राशियों में हो तथा चन्द्रादिमह बलवान् होकर द्विस्वभाव राशियों में हो तो एक जरायुसे वेष्टित दो बालक उत्पन्न हुये होंगे ॥ ५ ॥ सिंह मेपका शनि अथवा मंगल लग्न में हो तो बालक नालसे वैटित होगा । वह नालवेष्टन भी पूर्वोक्त कालांगराशि द्रेष्काणतुल्य अंगमें कहना ॥ ६॥ युगपत्स्थौ पृथक्स्थौ वा लग्मेंदूनेशते गुरुः ॥ नासा- केन्दुपरैजातः सपापार्कयुतः शशी॥७॥ योगत्रयो भाषाटीकासमेत। करोति नूनम् ॥रम्यालये भार्गवचंद्रदृष्टे देवेज्यदृष्टः शनिरमिहोने ॥ १७ ॥ राजालये देवकुलालये वा गवालये गोकुलभूमिभागे॥ सूर्येक्षितः सूर्यसुतो विलग्ने शिल्पालये सोमसुतेक्षितश्च ॥ १८ ॥ तत्तत्स्थाने वदेजन्म बलिना येन वीक्षितः ॥ बहुभिर्वा स्वभावेन राशीनामपि युक्तितः ॥ १९॥ जलचरराशिके लग्नमें बुधदृष्ट शनि होवे तोआधानके घरमें जन्म कहना जो उसपर सूर्यकी दृष्टि हो तो देवालयमें ऐसे ही चंद्रदृष्टि से ऊपरभूमिमें जन्म कहना ॥ १६ ॥ मनुष्यराशिके लग्नमें शनिहो उसपर मंगलकी दृष्टिहो तो श्मशानमें शुक्र चंद्र- माकी दृष्टि से रमणीय घरमें और बृहस्पतिकी दृष्टिसे अग्नि- होत्रशालामें जन्म कहना ॥ १७ ॥ यदि सूर्यसे दृष्ट शनि लग्नमें हो तो राजभवन में वा देवालय वा गुरुगृह यद्वा गौशा- लामें अथवा गोष्ठआदि गोकुलभूमिमें जन्म होगा यदि उस- पर चंद्रमाकी दृष्टि होवे तो कारीगरीके स्थानमें जन्म होगा ॥ १८ ॥ यहां जब बहुतोंकी दृष्टि होव तो जो द्रष्टा बलवान् है उसका फल कहना बली भी बहुत हो तो राशियोंके स्वभा. वानुकूल स्थान युक्तिसे कहना ॥ १९ ॥ चरे चरांशोपगते विलग्ने ध्रुवं प्रसूता चरसत्त्वमार्गे ॥ चरे विलग्ने स्वनवांशयुक्ते गृहाख्यसत्त्वालयेगा प्रसूते ॥२०॥ स्थिरे चरांशोपगते विलग्ने स्वरोहमार्गे प्रव- दंति जन्म || स्थिरे स्थिरांशोपगते विलग्ने स्वमन्दिरे सा नियतं प्रसूता ॥२१॥मागें गृहे वा स्वगृहे विचार्य (४६) जातकशिरोमणि- पूर्णे चन्द्रे स्वराशिस्थे सौम्ये लग्ने शुभे सुखे ॥ जल- लग्नेस्तगे वापि चंद्रे नौस्था प्रसूयते ॥ १२ ॥ जलो- दयं जलक्षेदुः पूर्णः पश्यति वारिणि ।। जातः शशिनि वा लग्ने खे सुखे जायते जले ॥ १३ ॥ उदयनाथसु- धाकरयोग्य॑ये रविसुते वधबंधनवेश्मनि ॥ अशुभदृष्टि- गते युगपत्स्थयोर्भवति जन्म शुभैरविलोकिते॥१४॥ कीटकर्कटगे सौरे लगस्थे चंद्रवीक्षिते ॥. जायते नियतं गर्ने शुभदृग्योगवर्जिते ॥ १५॥ पूर्ण चंद्रमा कर्कका हो बुध लग्नमें शुभप्रद चतुर्थस्थानमें हों तो नाव जहाज अथवा पुलमें प्रसव हुआ होगा अथवा जलजराशि लग्नमें और चन्द्रमासप्तमस्थानमें हो तो भी यही फल कहना ॥ १२ ॥ जलचरराशि लग्नमें चन्द्रमा जलरा. शिमें हो तो जलमें प्रसव भया होगा अथवा पूर्णचन्द्रमा लग्न- को पूर्ण देखे तो वही फल होगा यदि जलराशिका चन्द्रमा लम दशम चतुर्थ से किसी में हो तो भी जलमें वा जलके समीप प्रसव कहना ॥१३॥ लग्न वा चन्द्रमासे यद्वा लग्नेश था चन्द्रमासे शनि बारहवा होवै तथा पापमह उसे देखें शुमग्रह न देखे तो फेदमें, हवालातमें अथवा जीवहत्याफे स्थानमें जन्म हुआ होगा ॥ १४ ॥ शनि वृश्चिक फर्फराशिका लममें हो चन्द्रमा उसे देखे शुभग्रहोंसे युक्त दृष्ट न हो तो खाती वा गढेमें जन्म कहना ॥ १५ ॥ मंदे विलने जलराशिसंस्थे बुधेक्षिते जन्म निपेकगेहे ।। देवालये सूर्यविलोकितेच चंद्रेलिते सोपरभूमिभागे । ।१६॥ नृलग्नसंस्थो रविजो स्मशाने कुजेक्षिते जन्म + भाषाटीकासमेत। (४९) रविः पिता भृगुर्माता पितृव्योर्कसुतो दिवा ॥ चन्द्रः पितृष्वसतपां यो वली तहे भवः ॥२५॥शनिः पिता विधुर्माता पितृव्योऽको निशाभवः ॥भृगुर्मातृष्वसैतेषां यो बली तद्गृहे भवः ॥२६॥ दिनके जन्ममें सूर्य पिता शुक्र माता शनि ताऊ चाचा.' चन्द्रमा पिताकी वहिन होती हैं इनमें जो बलवान् हो उसके उक्तबालके घरमें जन्महुआ होगा ॥ २५॥ रात्रिजन्ममें शनि पिता चन्द्रमा माता सूर्य ताऊ चाचा शुक्र मांकी बहिन होते हैं इनमें जो बलवान् हो उसके उक्त नातेदारके घरमें जन्म भया कहना ॥ २६॥ बुधगुरुभृगुपूर्णरात्रिनाथाः स्युः सकला यदि नीचरा- शिसंस्थाः॥ भवति तरुतलेषु जन्म नूनं तरुशालादि- ककोटरे प्रसूतः ॥ २७॥ लग्नेदू नीचराशिस्थैः शुभै- रेका संस्थिता नेक्षितौ.विजनेऽटव्यां स्थानेवानावृते भवः ।।२८ ॥ शुभैरेकालयप्राप्तैक्ष्यिते लनशीतगू ।।. प्रसूयते जनाकीणे नात्र कार्या विचारणा ॥२९॥ शन्यंशे रजनीनाथे हिवुके वा शनीक्षिते ॥ शौरेशिते जलक्षे वा गंधकारे प्रसूयते ॥३०॥ आधाने जन्मका- वा तमोभावे प्रजायते॥ सर्वेष्वेतेपु योगेषु सूर्यदृष्टेनिशा पत्तौ ॥ ३१॥ भास्करो चलवान दृष्टः क्षितिजेनचली- यसबहुप्रदीपा दृष्टोन्यैस्तृणाज्ज्योतिरवीयभिः॥३२॥ यदि बुध, गुरु, शुक्र और पूर्णचन्द्रमा सभी नीचराशियों में हों तो बालकका जन्म वृक्षके नीचे, वा वृक्षमें अथवा काष्ठ,
(४८) जातकशिरोमणि-
वलेन वाच्यं भवनांशयोश्च ॥ लग्नांशनाथे स्वगृहे परे
वा तद्वीक्षितौ लग्ननवांशपौ वा ॥२२॥
चरलग्न चरांशकी हो तो निश्चय है कि, धनचर जीवोंके
चलनेके मार्गमें प्रसव मया यदि चरलग्न वर्गोत्तम हो तो घरमें
रहनेवाले मार्जार कुफुटादिकोंके रहने के स्थानमें प्रसव होता
है।॥ २० ॥ स्थिर लग्नमें चरांशकहो तोअपने घरके मार्गमें
जन्म कहते हैं यदि स्थिर लग्न स्थिरांशकी हो तो अपने घरमें
निश्चय प्रसव मया कहना ॥ २१ ॥ मार्ग घर पा अपने घरमें
राशि और नवांशके यलसे कहना जिसका यल अधिक हो
ठसका फल होता है लमका अंशकनाथ अपने या परायफसे
घरमें हैं तथा लमेश अंशश कैसे यली वा निर्यलीसे इष्ट हैं
ऐसा विचारके कहना ॥ २२॥
एकराशिगतयोर्यमारयोः सप्तमे शशिनि वा त्रिकोणगे।।
त्यज्यते नियतमंवया सुरेज्येशिते च परमायुसारख्य-
भाक् ॥२३॥ पापावलोकिततनाबुदये सुधांशी त्यतो
विनश्यति धरातनयेस्तभावे ।। आये शुभेक्षितविधी
कुजसूर्यपुत्री पापेक्षिती परनिवासगतोप्पनायुः ॥२४॥
भाषाटीकासमेत। (तिी ) एक हाथ ऊपरके और दूसरा नीचेकी ओर होकर प्रसव जानना । प्रसवदेशरीतिसे कहीं खाटमें कहीं दोमंजिले तमीजलमें कहीं भूमिमें होते हैं और दिनमें विना दीपक भी अंधकार नहीं रहता ऐसा विचार स्वत्- द्धिसे करना चाहिये ॥ ३३ ॥ शीर्षोदयमें प्रसवकरनेवाली मुख और उदर देखके पृष्ठोदयमें पीठ और उभयोदयमें दोनों अंग देखती हुई गर्भ मोक्ष करती है ॥३४॥ लग्नेश तथा लग्न नवशिश लग्नमें वा सप्तममें हों अथवा लग्नगत ग्रह वा लग्नेश लग्नांश वक्री हो तो उलटा प्रसव पहिले पैर पीछे शिर करके होता है और माताको कष्ट भी उस समयमें कहना ॥३५॥ चंद्रमासे वा लग्नसे पाप ग्रह सप्तम वा चतुर्थमें हो तो प्रसव समयमें माताको बढा क्लेश भया होगा पापयुक्त चंद्रमासे भी यही फल है ।। ३६ ॥ पूणे शशिनि प्रसवे प्रदीपस्तैलपूरितः ॥ मध्येईपूरि- तक्षीणे तैलस्य क्षयमादिशेत् ॥ ३७॥ लगवर्तिसमा- वर्तिर्नान्या लग्नमुखोदये ॥ यावद्भागा विलयस्य भुक्ता वर्तिस्तु तावती ॥३८॥ चरभे भास्करे दीपो हस्तस्थः स्थिरभे पुनः ॥ द्विःस्वभावस्थिते सूर्य दीपो राशि पूर्व ब्रजेत् ॥ ३९॥चरे चरांशोपगते दिवाकरे स्वस्था- नतोन्यत्र गतःप्रदीपः॥ आसीदजेप्राचि मृगेतु याम्यां तुले प्रतीच्यां शशिभेप्युदीच्याम् ॥ ४०॥ प्रसवसयमें चंद्रमा पूर्ण हो तो दीपक तेलसे भरा था मध्यम हो तो आधा तेल, और क्षीण होतो तेल नहीं रहाथा अथवा चंद्रमा राशिके आदि मध्य और अंत्यमें यह फल करता है॥३७॥ लग्नके प्रारंभमें पत्ती पूरी मध्यमें आधा और अंत्य.
(५०) जातकशिरोमणि- गृह आदिमें यद्वा वृक्षके कोटरमें हुआहै निश्चय जानना॥२७॥ यदि शुभ ग्रह नीचराशिमें और लग्न चन्द्रमाको तीनसे अधिक ग्रह न देखें तो वनमें अथवा जहां कोई मनुष्य न हो ऐसे स्थान में बिना (ओट) पर्दाम जन्म भया ॥ २८॥ यदि शुभग्रह एक स्थानमें बैठकर लग्न चन्द्रमाको देखे निश्चय मनु- प्योंके समुदायमें जन्म भया जानना ॥ २९ ॥ चन्द्रमा शनिके नवांशकमें हो अथवा चतुर्थ चन्द्रमाको शनि देखे यद्वाजलरा. शिमें चन्द्रमा हो उसे शनिदेखे तो अन्धेरे में जन्म भया होगा ॥३०॥ऐसा योग आधान वा जन्मसमयमें अन्धेरा होनेका विचारना होता है इन सभी योगोंमें चन्द्रमापर सूर्यदृष्टिका फल मुख्य अन्धकारका होता है ॥ ३१॥ सूर्यको बलवान् मंगल देखे तो उस घरमें बहुत दीप होंगे यदि सूर्यको मंग- लसे अन्य ग्रह देखें और वे निर्वल भी हों तो उस घरमें घास लकडीका उजेला होगा ऐसा जानना ॥ ३२॥ भूशयनं नीचगतैश्चंद्रे नीचे सुखोदये । शीर्पपृष्ठोभये लमे शिरःपृष्टोभयत्रजः ॥ ३३ ॥ शीर्पोदये प्रसूतायां दर्शयन्त्यामुखोदरौ ।। मोक्षः पृष्ठोदये पृष्टं पार्श्वस्था यद्विधोदये ॥ ३४ ॥ लग्ने लग्नांशनाथै; वक्रितो वाऽथ सप्तमे ।। विपरीतगती मोक्षो मातुः केशेन वा भवेत् ॥३५॥ चन्द्राद्वाथ विलग्नादा पापाचूनेथवामुखे।। मातुः केशेन महता जातः पापयुते विधा । ३६ ।। शुभग्रह नीचके हो अथवा चंद्रमांनीचराशिका लग्न वा चतु- में हो तो भूमिमें जन्म भया जानना लग्न शीपर्पोदय हो तो प्रसघ समयमें बालकका मुख आकाशकी और होगा, पृष्ठो. दय हो तो भूमिके ओर, और (उभयोदयी) मीन लग्न हो तो भाषाटीकासमेत। (५३) सूर्य उससमय किस दिशामें था उससे किस ओर प्रसव भया इसके लिये कहते हैं कि सूर्य स्थिरराशिमेंनषम द्विस्व- भावमें पंचम चरमें लग्नराशिकी दिशामें सूर्य जानना दिशा स्वामियोंमें जो बलवान् ग्रह केंद्र में हो उसकी दिशाके और सतिकागृहका द्वार होगा ॥४१॥ केन्द्रादिपदस्थ बलवान् प्रहसे सूतिका गृहद्वार कहना जो ग्रह है उसके स्वभावानु- रूप घरके लक्षण और उसके दिशामें द्वार कहना यदि बहु- त ग्रह हों तो बली से मुख्य द्वार अन्योंसे छोटे द्वार खिड़की आदि जानना केंद्रमें कोई न हो तो लग्नराशि और उसके द्वादशांशसे जानना ॥४२॥ सूर्य बलवान हो तो सूतिकागृह लकही युक्त और ( अदृढ) कशा होगा मंगलसे अग्निसे जला. चंद्रमासे नवीन बुधसे चित्रकारीवाला, वृहस्पतिसे पका, शुक्रस नवीन और रमणीय होगा ॥ ४३ ॥ शनिसे पुराना और उसपर नया संस्कार भयाहुआ होगा यदि अपने उच्च का मंगल लग्नमें हो तो मकानका पूर्वमाग, दशम हो तो दक्षिणभाग सप्तम हो तो पश्चिमभाग और चतुर्थ हो तो उत्त- रमाग दग्ध होगा। मंगलपर शुभग्रहकी दृष्टि हो तो थोड़ा दग्ध होगा. लम जिस दिशामें ग्रह हों उन ग्रहोंके अनुमान उन दिशा एवं स्थानोंमें गृहके लक्षण कहने ॥ ४४ ॥ आज्ञास्थिते सुरगुरौ रजनीशगेहे गेहादुपर्युपार द्वित्रि चतुष्कखंडम् ॥ तस्मिन् हयोति सवले भवति विशा- लं वेश्म द्विशालमपरद्विशरीरगेहे ॥४५॥ वास्तुपूर्वदि शिसूतिकागृह मेषकर्कटकालिकवृश्चिके । उत्तरे बुधगुरूदये वृषे पश्चिम हरिमृगे यमांशके ॥ ४६॥ बृहस्पति कर्कका दशमस्थानमें हो तो घरके ऊपर घर दो मांजेला नेमंजिला आदि गृह होगा और लममें बलवान् धन
(५२) जातकशिरोमणि-
में थोडी रही जाननी अथवा जितने नवांश लमके भुक्त हुये
उतने भाग बत्तीके जलगये थे जानना ॥ ३८॥ सूर्य चरराशि
में हो तो दीपक उस समय किसीके हाथमें था स्थिरमें हो तो
स्थिर था द्विस्वभावमें होतो एक जगहसे दूसरी जगह धराग-
या था सूर्यकी राशि जिसदिशाकी हो उस दिशामें दीप
कहना अथवा सूर्य साठपहरोंमें ,आद ही दिशा घूमता
है उस समय जिस दिशामें हो वह दिशा दीपककी कहनी
इन योगों में पापयुक्त होनेसे तैलादि मलिन शुभयोग निर्मल
कहना और राशियोंके रंग संदश रंग कहना ॥ ३९ ॥ सूर्य
चरराशि चरांशकमें हो तो दीप अपने स्थानसे दूसरेस्थान
लेजायागया था इसमें भी विशेषता है कि, मेपसे पूर्व
मकरसे दक्षिण तुलासे पश्चिम और कर्कसे उत्तरमें गया
कहना ॥४०॥
स्थिरोदये वा द्वितनी वो वा चरे त्रिकोणोदयदिस्थि-.
तोर्कः ॥ दिशामधीशा वलवान् ग्रहो यः केंद्रे तदीशा-
धिमुखं गृहं स्यात्।।४॥ग्रहण केंद्रादिपदस्थितेन वली-
यसा सूतिगृहं प्रदत्तम् ।।ग्रहस्वभावेन गृहं प्रवाच्यं ग्रह-
स्य दिक्स्थं प्रतिवेशितं च ॥ ४२ ॥ काष्टाध्यमदृढं सूर्ये
कुजे दग्धं नवं विधौ । बुधे शिल्पिगृहं जीवे दृढं रम्यं
नवं भृगौ ॥१३॥ जीर्ण संस्कृतमर्कजे कुतनये लग्न
स्थिते स्वोचगे पान्दग्धं दशमस्थिते यमककुल्दार्थ
प्रतीच्या धुने ।। कौवेयी हिबुकोपगे कुतनये स्वल्पं
शुभप्रेक्षिते लग्नाद्यत्र दिशि स्थिता ग्रहगणास्तत्तहणा-
स्तत्र तु॥१४॥
भाषाटीकासमेत।
(५५)
पाये ६.९ से पायंतके पाये ७ ८से पायंतकी पट्टी ४१५
१०। ११ से बगलोंके पट्टियों कहनी इनमें भी लग्नसे ६ भाव-
पर्यंत दक्षिणभाग ७ से १२ पर्यंत वाममाग जानना जहां
द्विस्वभाव राशि है तहाँ कबी लकडी, त्वचाशन्य आदि
कहना जिस अंगराशिमें पापग्रह हो तहां फूला, दाग, छेद
वा कीलक आदि होगा शुभग्रहोंसे पुष्टतादि शुभ कहना।।५०॥
लग्ने शशी यत्र न तब वामाः क्षीणेथ पूणे वनिताशतं
ताः॥ दृश्येप्यदृश्ये ग्रहसंख्यया ताब्वायुः क्रमाद्दित्रि-
गुणा विकल्प्याः॥५१॥ सुधांशलगांतरखेटसंख्या
ग्रहस्य रूपा उपसूतिकाः स्युः ॥ रंधादिपङ्के वनिता
बहिस्था धनादिपटकेतरगा युवत्यः ॥ १२ ॥ पूर्णः
शशी सप्तमगो विलग्नाचंद्रानना द्वारिगतो युवत्यः॥
दृश्येप्यदृश्ये शुभपापखेटेःशुभैः सुरूपाअशुभैर्विरूपाः५३
जहां क्षीणचन्द्रमा लग्नमें हो तहां प्रसवसमयमें अन्य स्त्री
कोई नहीं होगी यदि यह चन्द्रमा पूर्ण हो तो बहुत खी
होंगी उनमें भी दृश्यसे भीतर अदृश्यसे बाहर ग्रहसंख्यासे
कहनी तद्ग्रहके अनुरूप आयु तथा स्वगृह वक्रोचमतसे
द्विगुण त्रिगुण नीचादिसे आधा तिहाई आदि जाननी ॥
॥५१॥ लग्न और चन्द्रमाके बीच जितने ग्रह हों उतनी
उपसूतिका होंगी इनमें भी दृश्यचक्रसे ६ पर्यंतके प्रह
भीतर और अदृश्यचक्र ७ से ६ स्थान पर्यंतके तुल्य बाहर
कहनी ।। ५२ ॥ यदि पूर्ण चंद्रमा लग्नसे सप्तम स्थानमें हो तो
बन्द्रमुखी खिये दरवाजेमें बैठीहोंगी ऐसे हो दृश्य एवं
अदृश्य चक्रमें जैसे शुभ पाप बली निर्बली हों उनके अनुरूप
उन भीतर बाहरवाली सूतिकास्त्रियोंके रूप रंग सौभाग्यादि
कहना ॥ ५३॥
जातकशिरोमणि। राशि हो तो त्रिशाल, तिमजिलातीन दीवारी होगा अन्य द्विस्वराशियोंसे द्विशाल होता है ॥ ४५ ॥ लग्नमें १।४।७। ८ राशि हों तो सतिकास्थान वा गृह वास्तुस्थानसे पूर्व दिशा- में, ३ । ६।९। १२ से उत्तर में ५। १० से पश्चिममें और वृषसे दक्षिण दिशामें होगा ॥ ४६॥ मेपे वृपे प्राग्दिशि सूतिकासीदायकोणे मिथुने गृहस्य ॥ कर्के हरौ वाच्यसुरे युक्त्यां कीटे तुलायां दिशि पश्चिमायाम् ॥ १७॥ सूता प्रसूता वायव्ये हये धनपतौ मृगे ॥कुंभेप्युत्तरदिक्स्थासीदेशान्यां मीनभो- दये ॥४८॥ मूतिका घरके किस दिशामें थी ऐसे विचारमें ११२। लग्न हो तो पूर्वमें से आग्नेय४५से दक्षिणपसे नैर्ऋत्यणसे पश्चिममें ॥४७॥धन से वायव्य१०।११ से उत्तरमें और१२ से ईशानमें घरके सूतिकाके प्रसव हुआ ॥ ४८॥ खट्वाशिरः प्रसूतीव वदेत्याच्याः प्रदक्षिणम् । आधाने जन्मकाले वा प्रश्ने वा सूतिकागृहे ।। ४९॥खट्वा- शिरस्तनुधने गृहपुत्रभावौ दक्षे कलत्रनिधने भवतोऽ- वसाने । वामांगमत्र दशमाप्तिगृहं द्विदेहे सौम्येन वा शुभयुते ग्रहतुल्ययातः॥५० ।। जिस देशमें खाटमें प्रसूती होती है तहाँ खाटके लक्षण स्थान दिशा प्रसूतीके तुल्य पूर्वादिप्रदक्षिणक्रमसे कहना आधान, जन्मकाल प्रश्न अथवा सूतिकागृहमें खाटका शिर आदि उसी प्रकारसे कहना ॥ ४९ ॥ लग्नद्वितीयराशिके स्थानमें खाटका शिर तीसरी वारहवींकेमें शिरहानेके दो
भाषाटीकासमेत। (५७)
बस्तिविलग्नं धनरिष्फमुस्कं त्रिलाभभावौ वृपों
खमित्र ॥ जानू त्रिकोणे खलु जानुनी स्तो जरि-
मृत्यू चरणौ युनश्च ॥ ५८॥
कालांगविभाग काहते हैं कि प्रथम द्रेष्काण हो तो लग्न शिर
२।१२ नेत्र ३ । ११ कान ४।१० नाक ९ । ५गाल ६।८
दाढ़ी मूछ और७ मुख इनमेंभी १ से ६तक दक्षिणभाग से
ऊपर वामभाग जानना ॥५६॥ लग्नमें दूसरा द्रेष्काण हो तो
१कंठ २। १२ कंधे ३१११ भुजा४।१० बगल ५१९हृदय
६८ पेट में नामि ॥५७॥ यदि लग्नमें तीसरा द्रेष्काण हो तो
में नाभिके नीचे मुत्रस्थान २॥१२ से लिंग गुदा और चूतड
३ । ११ से अंडकोश १० । ४ जानु ५ ॥९जंघा ६८ पैर
पादामभाग.जिस राशिमें जैसा शुभ पाप बैठाहो उसीके तुल्य
उस अंगमें पुष्टिआदि वा व्यंगता तिल मश दागआदि
कहने ॥५८॥
लग्नहकाणेरुदितैः क्रमेण तनोस्त्रिभागाः शिरसोवसा-
नम् ॥ वामांगमत्रोदितराशिपटकमसव्यमवानुदिनं
भपट्कः ॥१९॥ आद्ये व्यंशे जन्म कस्यापि राशेः
सौम्ये मेषे वा वृषे जन्मनि स्युः॥ चिह्न पापास्तव
वा शीर्पभागे दृश्यादृश्ये वामदक्षे व्रणः स्यात् ॥६॥
लग्नमें जो ट्रेप्काण (उदित ) वर्तमान आदि मध्यान्त्य हो
उसके सदृश शरीके भी विभाग शिरसे पादपर्यंत हे लग्नसे
६ राशिपर्यंत दाहिना ७ से वामांग जानना ॥ ५९॥ किसी..
राशीके प्रथमद्रेष्काणमें जन्म हो और मेष वृषमें हों तो प्रथम
ट्रेकाणोक्त अंगमें चिह्न होगा पापग्रहोंसे व्रणादि होगा ॥६॥
(५६) जातकशिरोमणि- लमलग्नांशपत्योर्यों बली तत्तुल्यविग्रहः।। वर्णश्चन्द्रांश- कपतेातिदेशकुलस्य वा ॥५४॥ घटायाश्चत्वारो मुनिभिरुदिता ह्रस्वतनवो वृहदेहाः सिंहप्रभृतिनि- लयाः शेपनिलयाः॥बृहद्धस्वांतःस्थाः स्वपतिसहिताः कालपुरुपे यदंगं तद्दीधै भवति लघुमध्यं चखचरैः॥५५॥ लग्न वा लग्नांशेश जो बलवान् हो उसके समान ग्रह भेदा. ध्यायोक्त प्रकारसे बालकका शरीर कहना तथा चन्द्रस्थित नवांशपतिके तुल्य गौरादि वर्ण कहना अथवा जाति देश कुलके अनुमानसे कहना जैसे अंग्रेजोंके पुत्र गौर ही होते हैं पूर्वदेशमें बहुधा कृष्णवर्ण होते हैं। ५४ ॥ कुंभ मीन मेष वृष हस्व, सिंह कन्या तुला वृश्चिक दीर्घ शरीर, शेष राशि ४।९।१० मध्यम शरीर हैं जो राशि निजस्वामिसंहित हो वह अंग पुष्ट और सुन्दर जहां पाप शत्रुआदि हों तहां द्वस्व मध्यादि बलाबल देखके कहना। ये दीर्घ मध्य द्वस्व राशि वस्तुके आकार शरीराकारादि ज्ञान प्रश्नादिकोंमें भी काम आती हैं॥५५॥ शिरोलग्नं नत्र व्ययधनगृहे लाभसहजी श्रुतीनां सा संज्ञौ सुखदसमभावौ शुभसुतौ॥ कपोलो रंधारी चिवु- कयुगलं सप्तममुखं तनोरायव्यशे ह्युदयति विभागः प्रथमकः ॥ ५६ ॥ गलो लग्नं स्कंधौ व्ययधनगृहे लाभसहजौ भुजौ वा पार्थस्थौ सुखदशमभावो हृद-" यगौ ॥ प्रजाधर्मों क्रोडे रिपुनिधनभावी मुनिगृहं स्थितं नाभौ त्र्यंशे ह्युदयति तनोर्मध्यमगते ॥१७॥ .
भाषाटीकासमेत। (५९) भविष्य और शुभदृष्टि हो तो जन्महीसे होगा ॥ ६३ ॥ यदि शनि उक्तफलकारक हो तो पत्थरसे वा वायु विकारसे मंगल हो तो पत्थर ढेला यद्वा दीवार आदिसे गिर पड़नेका चिह्न होगा. चन्द्रमा हो जलचरजीवसे उत्पन्न अथवा फोडेसे यद्वा शींगवालेके चोटसे होगा. चरादिक्रम यहां सभीमें जानना ॥ ॥६॥इति श्रीमहीधरकृतायां जातकशिरोमणिभाषाटीकायां सूतिकाध्यायः पञ्चमः ॥५॥ अनियतं नियतं गणितागतं त्रिविधमायुरुशंति च योगजम् ॥ प्रथमतः कथयाम्यथ योगजं मुनिवरैर्गदितं तदरिष्टकम् ।। १॥ समाधभागे विपमापरार्दै दलोदये- स्तमये वेश्च ॥ पापा ग्रहाअंत्यनवांशसंस्था वदं- ति जन्तोमरणाय जन्म ॥२॥ पापाश्चतुर्घ केन्द्रेषु तदे- कत्र हिमद्युतौ । शुभग्रहवियुक्तेषु पुंसः स्याजन्म मृ- त्यवे ॥३॥ आयु (अनियत) जिसका कोई प्रमाण नहीं है नियत जो निर्याण, आयु आदि गणितसे मिलती है और योगके फल- से जो विदित होती है ये तीन प्रकारके आयु जाननेके हैं इनमें प्रथम ( योगज)जो ग्रह योगसे जानी जाती है और जिसको अरिष्टयोग कहते हैं उनका विस्तार पूर्वाचार्योक्त मतसे यहां कहता हूं॥१॥ सन्ध्याकालके जन्ममें यदि चन्द्रहोरा अर्थात् समराशिके पूर्वार्द्ध विषयके उत्तरार्द्ध में लग्न हो तथा पापग्रह अन्त्य नवांश में हों तो बालकका जन्म मर- णके ही लिये हुआ. अर्थात् होतेही वह शीघ्रही मर जायगा ॥२॥ चारों केंद्रोंमें पाप हों शुभयुक्त न हों और चन्द्रमा भी जातकशिरोमणि- युग्मे हकाणे यदि जन्म कंठादंगस्य भावे मिथुनाच्च- तुष्के ॥ शुभैः शुभं पूर्ववदेवं शेपं व्रणोपघात सकलैश्च पापैः ॥६॥ तृतीयभागे भवनस्य जन्म कंठेरधः कालशरीरराशौ ॥ पापैः शुभैः पूर्ववदेव सर्व वाच्यं तु विद्भिस्त्रितये विभागे॥ ६२॥ यदि लग्नके दूसरे द्रेष्काणमें जन्म हो और ३।४।५।६ राशियोंमें शुभग्रह हों तो कंठ आदि मध्य अन्य विभागों में से यथोक्त स्थानमें पुष्टचादि और पापग्रहोंसे व्रणादि घात कहना ॥ ६१ ॥ यदि लग्नके तीसरे द्रेष्काणमें जन्म हो तो पूर्व- वत् शुभग्रहोंसे शुभ पापोंसे व्रणादि कटिके नीचे यथास्थानमें पूर्वोक्तक्रमसे विद्वानोंने कहना ॥ ६२॥ कामाभिघातेन चतुष्पदेन चरादिराश्यंशगते दिनेशे ॥ ‘भावी व्रणः स्वालयगे नवांशे स्वभावजातः शुभदृष्टि- युक्ते ।। ६३ ॥ पापाणघातादथ मारुतोत्थः शनौ कुजे लोष्टकभित्तिपातात् ॥ चन्द्रे जलप्राणिभवो व्रणो वा चरादिगे शृङ्गिकृतोऽथवा स्यात्॥६॥इति श्रीपाठक- महादेवविरचितेजातकशिरोमणी जन्मविधिनामाध्या- यामंचमः॥५॥ द्रेष्काणविभागसे शुभग्रहोंसे तिलादिचिह्न पापोंसे प्रणादि तथा उस ग्रहोंके स्वराश्यादि गत होनेमें जन्म ही अन्यथा 'आगन्तुक दशादिकोंमें होगा यह पूर्वश्लोकोंका सार है अब विशेष कहते हैं कि जो सूर्य चरादिराशि अंशकोंमें हो तो द्रेष्काणोक्त स्थानमें काष्ठका चिह्न होगा अपने स्थानमें हो तो भाषाटीकासमेत। सितेऽह्नि रिपुरंधगते हिमांशौ पापावलोकिततनौ म्रिय- ते हि शीघ्रम् ॥ कृष्णे तथा निशि शुभैरवलोकितेऽपि वर्षेऽष्टमे शुभशुभैमरणं तदद्धम् ।। ९ ।। पष्ठेऽष्टमेपि शुभदा बलिभिश्च पापैदृष्टा भवंति यदि नाशमुपति मासात् ॥ लग्नाधिपे युवतिगे विजिते च पापैः सौम्यै- स्तथापि मरणं नियतं प्रयाति ॥१०॥ क्षीणे हिमां- शौ मरणं विलये विनाशकेंद्रेषु भवंति पापाः॥ विना- शजायाभवने शशांके प्रयाति मृत्युं यदि पापमध्ये ॥१३॥ पापयुक्त चंद्रमा ७ । १२ । ८1१ भावोंमेंस किसीमें हो शुभग्रह उसे न देखें तथा केंद्रोंमें न हो तो मृत्यु पावै ।।८।। शुक्लपक्षमें दिनका जन्म हो चंद्रमा ६। ८वें भावमें हो और लग्नको पापग्रह देखें तो बालक शीघ्र मरजायगा तैसे ही कृष्ण- पक्षमें रात्रिका जन्म हो और चंद्रमा छठे वा आठवें भावमें हा उसे शुभग्रह देखते भी हों तो भी आठवें वर्षमें मृत्यु पावेगा यदि चंद्रमा शुभपापोंसे युक्त वा दृष्ट बराबर हो तो ४ वर्ष बचेगा॥९॥यदि शुभग्रह छठे आठवे स्थानों में भी हों और उन्हें बलवान् पापग्रह देखें एक महीनेमें बालकमरजावैतथा लग्नेश सप्तमभावमें पापग्रहोंसे युद्ध में जीते हों अथवा शुभग्रहोंसे युद्धमें हारे हों तो भी निश्चय एकमहीने में मरण पावै ॥१०॥ क्षीणचन्द्रमा लग्नमें हो और अष्टमभाव केंद्रभावों में पापग्रह हों तो मृत्यु पावै तथा ७ वा ८ भावमें चन्द्रमा पापग्रहोंके बीचमें हो तो भी मृत्यु पावै ॥ ११॥ पापमध्यस्थिते लग्ने पापे सप्तमरंध्रगे ॥ अम्बया म्रियते सार्दै शुभैर्दष्टे स्वयं शिशुः ।। १२ ।। केंद्रत्रिको- णेषु भवंति पापाः शुभैस्तदान्यत्र गतैरहयाः ॥ चंद्रे (६०) जातकशिरोमणि- किसी केन्द्र में पापयुक्त हो तो बालकका जन्म मरनेकेही लिये हुआ जानना अर्थात् होतेही मरजायगा ॥३॥ वामं चतुर्थात्पुरतश्च मध्याचक्रस्य भागः प्रथमः परोऽ- न्यः॥ पापाः शुभाः प्रापरभागसंस्था कीटे विलग्ने मरणं प्रयाति ॥ ४॥तनौ पापद्वयांतस्थे यूने वा मत्यु- मानुयात् ॥ व्ययशत्रुगतैः पापैर्द्धनमृत्युगतैरपि ॥६॥ क्षीणे शशिनि रिष्फस्थे पापैरुदयरंध्रगैः ॥ केंद्रविको- णरहितैः शुभैः क्षिप्रं प्रणश्यति ॥६॥ विलग्नास्तगती पापी क्रूरयुक्तः शशी भवेत् ॥ शुभादृष्टो चिराद्रालो म्रियते नात्र संशयः॥७॥ कुण्डलीचक्रके चतुर्थ भावसे पूर्व दशमसे उत्तर वामभाग और दूसरी ओर दक्षिणभाग है पूर्वार्द्ध में पापग्रह उत्तरार्द्धमें शुभग्रह हो और कर्क वा वृश्चिक लग्न हो तो बालक मृत्युको प्राप्त होवै ॥ ४॥ लग्न पापग्रहोंके बीच में हो “यहाँ पापकर्त्तरी की विशेषता है" अथवा सप्तमभाव पापग्रहोंके बीचमें हो तो मृत्यु पाव. तथा बारहवां पापग्रह लग्नमें जानेवाला और छठा पापग्रह सप्तममें जानेवाला हो अथवा २ ॥ ८ भावों में पापग्रह हो तो भी मृत्यु पावै ॥ ५ ॥ क्षीणचंद्रमा व्ययभावमें पापग्रह लग्न एवं अष्टममें हो और शुभग्रह केंद्रत्रिकोणमें न हों तो बालकशीन मरजाव ॥ ६ ॥ लग्न सप्तममें पापग्रह हो चंद्रमा पापयुक्त शुभग्रहोंकी दृष्टिसे रहित हो तो निस्सं- देह वह बालक शीघ्रही मरजावे ॥७॥ स्मरांत्यमृत्युलग्नस्थः क्रूरयुक्तः शशी भवेत् ॥ केंद्रा- न्यगैः शुभखगर्नेक्षितो मृत्युमाप्नुयात् ॥ ८॥ पक्षे भाषाटीकासमेत। (६३) उडुपतिकृतरिष्टं भंगमायाति योगैः प्रथममिह यथाव- त्तानहं कीर्तयामि ॥ तदनुतनुविभागोत्पातजातं ग्रहण ब्रजति विलयभावं दीर्घकालोप्यरिष्टम् ॥ १॥ लग्ना- धिपे केन्द्रगते हिमांशुः पठाष्टमस्थो न हि मृत्यु हेतुः॥ पष्ठाप्टमस्था बुधभार्गवेज्या न मृत्यवे स्युः प्रभवाः कदाचित् ॥ २॥ पष्ठाष्टमस्थोऽपि शशी हकाणे सुरेंद्र- मंत्रीदुजभार्गवानाम् ॥ प्राप्तं शिशु मृत्युवशं प्रसह्य रक्षत्यवश्यं न हि संशयोऽत्र ॥३॥ अरिष्ट तीनप्रकारसे जानेजाते हैं पहिला ग्रह योगसे दूसरा द्रेष्काणसे तीसरा ग्रहों के उत्पानसे. इनमें पहिला प्रकार अरिष्ट हारकयोंगोसे नष्ट होजाता है इसलिये उनयो- गोंको प्रथम कहताहूं जिनसे दीर्घकालिक अरिष्टभी हट जाता है. अन्य दोप्रकारका खुलासा पीछे कहाजायगा ॥१॥ लग्नेश केन्द्रमें हो तो चन्द्रमा ६१८ भावमें भी मृत्यु नहीं करता तथा ६१८ भावोंमें बुध बृहस्पति शुक्र कभी पूर्वोक्त. योगोंसे मृत्यु नहीं करते ॥ २॥ चन्द्रमा बुध बृहस्पति शुक्रके द्रेष्काणमें छठा आठवां भी हो तो मृत्युके वशमें प्राप्तहुये भी बालकको अवश्य रक्षा करता है इसमें संदेह नहीं है ॥ ३॥ शुभराशिगतश्चंद्रः संपूर्णः शुभमध्यगः।।शुभशोरटभंग कुरुते नात्र संशयः ॥ ४॥ पक्षे सिते निशि शशी निधनारिसंस्थः कृष्णे तथाहनि शुभाशुभहश्यमानः॥ क्षीणोप्यरिष्टहर एव तथापि वालं मातेव रक्षति पितेव शिशं विपन्नः ॥५॥ संपूर्णमंडलश्चन्द्रो दृष्टः सर्वैः .
(६२) जातकशिरोमाणि-
गृहांत्ये मरणं प्रयाति लग्ने सुधांशौ मदने च पापाः ।।
॥ १३॥ ग्रस्ते सुधांशावशुभान्विते च मात्रा समं
नाशमुपैति भौमे ॥ विनाशगेहे तमसा गृहीते खो तु
शस्त्रेण वधस्तयोः स्यात् ॥ १४॥ स्वं वा गृहं तनुगृह
बलवाञ्छशांकः स्थानं गमिष्यति यदा मृतियोगकर्तुः॥
पापैर्विलोकिततनुर्मरणाय कालो वर्षेण यस्य समये
मुनिभिः प्रदिष्टः ॥ १५॥ इति श्रीपाठकमहादेवविर-
चिते जातकशिरोमणा रिटाध्यायः पष्ठः ॥६॥.
लग्न पापग्रहोंके बीच में हो पापग्रह सप्तम वा अष्टममें हो
तो मातासहित बालक मरे यदि शुभग्रहोंकी दृष्टि भी हो तो
बालक आपही मरे ॥ १२॥ केंद्रत्रिकोणोंमें पाप हों उन्हें
अन्यस्थानगत शुभग्रह न देखे और चन्द्रमा राश्यंतमें हो तो
मरण पावै तथा लग्नमें चन्द्रमा सप्तममें पाप हों तो भी वही
फल जानना ॥१३॥ चन्द्रमा ग्रहणकालका हो (पाप)मंगल
शनि से युक्त भी हो तो मातासहित बालक नष्ट होता है यदि
मंगल अष्टमस्थानमें हो और सूर्य ग्रहणकालीन हो तो
मातासहित बालकको मृत्यु शस्त्रसे होवै ॥ १४॥ अरिष्टयो-
गों में फल होनेका समय जहां मुनियोंने नहीं कहा है तहां
विचार है कि, चन्द्रमा जिसराशिमें है उसी में जब लौटकर
आवै अथवा लग्नराशिमें जब आवै अथवा मृत्युका ग्रहोंमें
जो बलवान् है उसकी स्थितराशिमें जब चन्द्रमा आवै उस
समय मरणकाल होता है. परंतु यह विचार एक वर्षके
भीतर होता है उप्रांत नहीं ॥ १५ ॥ इति जातकशिरोमणी
महीधरीभाषाटीकायामरिष्टाध्यायः पष्ठः॥६॥
भाषाटीकासमेत।
(६५)
पूर्णाशुजाले सुरराजपूज्ये केंद्रविकोणे दनुजेंद्रमान्ये ।।
बुधेथवारिष्टमुपैति नाशं पापं यथा याति सुरापगा-
याम् ॥ १० ॥ उदयति मुनावगस्त्ये जातो ह्युदये
'वशिष्टपूर्वाणाम् ॥ सकलारिष्टविमुक्तो जीवति पूर्णा-
युपं नियतम् ॥ ११ ॥ अजवृपभशशांकमंदिरस्थः
शशिर्वरी सहजारिलाभसंस्थः ।। शुभगगनविहारिदृष्ट-
'देहः समयति सर्वमरिष्टजातमाशु ॥१२॥ केंद्रत्रिकोणेषु
न यस्य पापास्तेष्वेव सौम्या निधनव्ययेभ्यः ॥ अन्य-
त्रसंस्थाः सकलाश्च पापाः सम्पत्स्थिरा तस्य चिरायु-
'पश्च ॥१॥ इति श्रीजातकशिरोमणावीरटभंगाध्यायः
सप्तमः॥७॥
बृहस्पति अस्तंगत न हो शुक्र केंद्रविकोणमें हो अथवा
बुधफेंद्र त्रिकोणमें होतोजैसे गंगामें स्नान करनेसे पापचले
जाते हैं ऐसे ही अरिष्टयोगोंका फलभाग जाता है ॥ १०॥ जो
बालक अगस्ति एवं सप्तर्षियोंके उदयमें उत्पन्न हो वह सम्पूर्ण
अरिष्टसे छूटके नियतपूर्णायुपर्यंत जीतारहता है ॥२१॥ मेष
वृष वा कर्कका राहु ३।६।११ भावोंमेंसे किसी में हो उसे
शुभग्रह देखें तो शीघही सम्पूर्ण अरिष्टजातिको शमित कर
देता है ॥ १२ ॥ जिसके लमसे पापग्रह केन्द्रत्रिकोणों में न हो
तथा ८॥१२ भावोंसे अन्यस्थानोंमें हों और केन्द्रत्रिकोणों में
शुभग्रह हों तो वह दीर्घायु होगा और उसकी सम्पत्ति भी
स्थिर रहेगी ।। १३ ॥ इति जातकशिरोमणी माहीधरीभाषा
टीकायामरिष्टाध्यायः सप्तमः ॥७॥
(६४)
जातकशिरोमणि-
खचारिभिः॥ अरिष्टहर्ता राजेव हिनस्ति टेपिणं रणे
॥६॥ संपूर्णों मित्रभागस्थश्चन्द्रः शुभनिरीक्षितः ॥
श्रेष्ठोरिष्टहृतां योगः श्वापदानां यथा हरिः॥७॥
चन्द्रमा पूर्णमंडल होकर शुभग्रहकी राशिमें शुभग्रहोंके
बीच एवं शुभग्रहोंसे दृष्ट हो तो निस्संदेह अरिष्टको भंग
करता है ॥४॥ शुक्लपक्षमें चन्द्रमा छठा आठवां हो और
रात्रिका जन्म हो तथा कृष्णपक्ष दिवा जन्ममें ६ । ८ में हों
शुभपाप उसे देखें तो वह चन्द्रमा क्षीण भी हो तो भी अरि-
टहारक होकर. बालकको मातापिताके समान अरिष्टोंसे
रक्षा करता है ॥५॥ पूर्णमंडल चन्द्रमाको समस्त ग्रह देखें
तो जैसे राजा रणमें शत्रुको मारता है तैसे ही यह भी
अरिष्टहर्ता होता है ॥ ६॥ पूर्णचंद्रमा मित्रांशकमें शुभग्रहोंसे
दृष्ट हो तो जैसे वनजंतुओंमें सिंह श्रेष्ठ है तैसे ही अरिष्ट-
हर्ता योगोंमें यह चन्द्रमा श्रेष्ठ है ॥ ७ ॥
प्रस्फुरत्किरणमण्डलोपगो लग्नगः प्रशमयेत्सुरमंत्री ॥
सूर्यपूर्वखगमण्डलोद्भवं रिटमाशु सकलं सुदुस्तरम्
॥ ८॥ लगाधिपोतिवलवान् व्ययमृत्युवाह्यस्थान-
स्थितो नवमपंचमकंटकस्थैः॥हएः शुभैरशुभदृष्टिविव-
र्जितोऽसौ मृत्युं विधूय विदधाति सुदीर्घमायुः ॥ ९ ॥
उदयी बृहस्पति लग्नमें हो तो सूर्योपरागसे उत्पन्न अति-
कठिन अरिष्टको शमित करदेता है॥८॥ लग्नेश अतिव-
लवान होकर ८।१२ भावोंसे अन्यस्थानोंमें हो तथा केन्द्र.
स्थ शुभग्रह उसे देखें पापग्रह न देखें तो मृत्युको उढायके
दीर्घायु देता है ॥९॥
भाषाटीकासमेत। (६७)
परमायु है घोडे गदहे और ऊँटोंकी ३२ वर्ष बैल आदिकोंकी
२४ वर्ष ४ बक्रेआदिकोंकी १६ और कुत्तेकी १२ वर्ष आय
कही है। यदि बृहस्पति स्थिर वा द्विस्वभाव राशिमें हो और
लग्न पूर्वोक्तग्रामचरराशियोंमेंसें हो तो उक्ताय नियत
होती है ॥ ३ ॥४॥५॥
गुरुरुदये रिपुराशिगतेकै सहजगृहे रविजे विदिवेशौ ।।
गृहगश्च सितो निधनान्यगतःशशभृहदहुजीवनमेति नरः
॥६॥ मीनोदये लग्नगतो भृगुश्चेदाये विवस्वान् शशि-
जोवरस्थः॥ केंद्रे गुरुः सौरिविधू स्नगेहे शरच्छतं
जीवति मानवेंद्रः ॥७॥ तृतीयगोर्को भृगुजो विलग्ने -
धीस्थो गुरुः षष्ठगतो महीजः॥ लाभे शनीन्दू नियत
मनुष्यो जातः शतं जीवति वत्सराणाम् ॥ ८॥ शशां-
कजीवौशशिधामसंस्थौरसातले मध्यगतौ शुमौस्तः॥
तृतीयलाभारिंगताश्च पापा शरच्छतं जीवति मान-.
बृहस्पति लग्नमें सूर्य शत्रुराशिमें शनि तीसरे भावमें बुध
सूर्यसे द्वितीयस्थानमें शुक्र चतुर्थ और चन्द्रमा अष्टमभाषसे
अन्य किसी में हो तो मनुष्य बहुत काल जीता है ॥६॥मीन
लग्न हो उसमें शुक्र बैठा हो ग्यारहवें भावमें सूर्य दशममें
बुध केन्द्र में बृहस्पति और शनि चन्द्रमा अपने अपने राशि.
योंमें हों तो मनुष्योंमें श्रेष्ठ होकर पूर्णा भोगता है ॥७॥
तीसरा सूर्य लग्नमें शुक्र पञ्चम बृहस्पति छठा मंगल और
लाभमें शनि चन्द्रमा हो तो मनुष्य सौवर्ष अर्थात् पूर्णायुपर्यन
जीता रहता है यहां "शत" पद पृर्णायवाचक है ॥८॥
(६६) जातकशिरोमणि- वर्गोत्तमे लग्नगतेझपस्य वृपेन्दुजे तिष्ठति तत्त्वलिप्ताम्।। स्वोच्चेषु तिष्ठत्स्वपरेषु पूर्णमायुः प्रदिष्टं मुनिभिः पुगणैः ॥ १॥ धनुर्द्धरस्यांत्यगते विलग्ने बुधे वृपे तत्त्वकलां प्रयाते॥शेषग्रहैः स्वोच्चपदप्रयातैः पूर्णायुरुक्तं मुनिभिः पुराणैः ॥२॥ देवालयानां सरसा पुराणां कूपस्य पापा णविनिर्मितस्य ॥ एषां परायुर्युगपत्प्रदिष्टं विचार्य गर्गादिमुनिप्रवय्यः ॥३॥ नृणां गजानां शरदां शतं च विंशाधिकं पञ्चदिनं परायुः। द्वात्रिंशदश्वस्य खरो- ष्ट्रयोश्च तत्त्वं वृपादेर्गदितं विरूपम् ॥ ४॥ अजादि- कानां नृपमायुरुक्तं शुनां तथा द्वादशभिः शरद्भिः॥ स्थिरद्विदेहोपगतोगुरुश्चेद्वामस्य लग्नेनियतं तदायुः॥६॥ आयुर्दाध्यायके आदिमें पूर्णायुयोग कहते है कि, मीनलग्न वर्गोत्तम हो चन्द्रपुत्र वृषके २५ कलामें हो अन्य सब ग्रह अपने अपने उच्चराशियों में हों तो पूर्णायुपर्यंत जीता रहता है ऐसा प्राचीन मुनियोंने कहा है ॥१॥ लग्नमें धनका अन्त्य नवांशक हो और ग्रह पूर्वोक्त प्रकार हो तो भी वही फल कहा है ॥ २॥ गणितके लिये परमायु अनियत है ग्रहबलानु सार आय होती है उसमें भी संयमादिक तथा दुष्कर्म सुकर्म के अनुसार घटबढ भी जाती है. जैसे योगाभ्याससे आयु बढती है उत्कट काँसे घटती है. परन्तु गणितके वास्ते इष्ट- माननेके नाई एक अंक अवश्य मानना चाहिये इसलिये पूर्वा- चाोंने इसप्रकार परमायु मानी है कि, देवालय, सरोघर, नगर, पत्थरका बनाया कृप, इनके आयुनानार्थ गणितसाध- नोपयोगी तथा मनुष्य और हस्तियोंकी भी १०० वर्ष ५दिन . भाषाटीकासमेत ।. मुनयस्तृतीयं वदंति यत्तत्फलनिर्णयाय ॥ प्रवर्त्तमाने वयसि स्वकीये सम्यक् फलं स्यात्सदसदशायाः ॥१४॥ सूर्यके १९ चंद्रमाके २५ मंगलके १५ बुधके १२ गुरुके १५ शुक्रके '२१ शनिके २० इतने वर्ष पिंडायुदशाके गणितार्थ हैं परमोच्चगतग्रह उक्तवर्ण पावता है ॥ १२ ॥ जो ग्रह परमनी- चमें है उस वर्ष आधे होजाते हैं जो उञ्च नीच बीच है उसके- लिये त्रैराशिकातुपात कहता है ॥१३॥ तीसरी निसर्गायु दशा फलनिर्णयकेलिये मुनिलोग कहते हैं अपनी अवस्था वर्तमानमें दशाका शुभाशुभ फल होता है ॥ १४ ॥ एक द्वयं नवकृतिधृतयः कृतिश्च पंचाशदिन्दुकुजबो- धनभार्गवानाम् ॥ देवेंद्रपूज्यविभास्करसंभवानां नैस- गिका.मुनिवरैः कथिता दशाव्दाः ॥ १५॥आय वय- श्चन्द्रमसा द्वितीयं कौज तृतीय वय इन्दुजस्य ॥ वयश्चतुर्थ भृगुजस्य जैवं परं वयः षष्ठमुशंति सौर्यम् ।। ॥ १६॥ सप्तमं रविसुतस्य वयोऽन्ये लमपस्य यवनाः, शुभमंत्ये । नो.वयः सहजवत्सराधिकं लग्नपस्य न हि जात्ववकाशः॥ १७॥ नैसर्गिकदशामें जन्मसे १ वर्षतक चंद्रमा २ वर्ष मंगल ९ वर्ष बुध २० तक शुक्र २० उप्रांत १८ तक गुरु तब २० तक सूर्य इसके आधे ५० तक शनिकी दशा होती है इनका योग १२० वर्ष होता है. यदि कोई'इतनेसे अधिक वचे तो उतने उतने सब दिन लग्नकी दशा होती है ॥ १५ ॥ इसका खुला. साभी यह है कि, प्रथम दशा वाअवस्था १ वर्ष चंद्रमाकी तब क्रमशः उक्तवर्षांपर्यंत मं० ० शु० गुरु० सू० श० ल० की [. e (६८) जातकशिरोमणि- चन्द्रमा बृहस्पति कर्कके हों तथा एक शुभग्रह चतुर्थमें एक दशममें और ३।६।११ भावोंमें पापग्रह हों तो मनुष्यों में श्रेष्ठ पूर्णायु भोगता है ॥ ९॥ त्रयीमयाद्भास्करत प्रसन्नात्रिकालजंज्ञानमवाप दैत्यः।। मयाभिधानो यवनोऽपि तस्माद्यज्ज्योतिपं ज्ञानमवाप सम्यक् ॥१०॥ वराहमिहिरद्विजो वरमवाप्य मार्तण्ड- तस्त्रिकालभवदर्शनं धरणिमण्डले ख्यातवान ॥ पराश- रमयादिभिश्च भुवि यत्कृतं ज्योतिपं विचार्य स च पौरुप परिचकार विस्पष्टकम् ॥ ११॥ त्रिकालबोधक ज्ञान मयदानवने त्रिगुणात्मा सूर्य नारा यणको प्रसन्न करके पाया । मयदानवसे यवनाचार्यने वह भूतभविष्य वर्तमान कालके जाननेका ज्ञान यह ज्योतिष सम्यक् प्रकारसे पाया ॥ १० ॥ तथा वराहमिहिराचार्यने सूर्यनारायणसे यही त्रिकालोद्भव ज्ञानदर्शन पायके पृथ्वीमें ख्यात भया उस वराहमिहिरने, पराशरमयदानवादिकोंनेजो ज्योतिष संसारमें किया था उसको विचारके पुरुषोपयोगी स्पष्टतर किया उसके अनुसार यहाँ भी आयुर्दायादि क्रम कहाजाता है यह तात्पर्य है ॥ ११ ॥ नवेंदवो वाणयमाः शरेंदू द्विभूमयो वाणभुवः कुदनाः॥ खवाहवः सूर्यमुखग्रहाणां पिण्डायुपादा निजतुंगगा- नाम् ॥ १२॥ एपां दलं स्यानिजनीचभागे नीचोच्च- मध्ये गणितेन वच्मि ॥ द्वे आयुपी पिंडनाशसंझे सदैव साध्ये गणितेन सद्भिः ॥ १३॥ निसर्गजातं भाषाटीकासमेत। (७१) मुणके भाग हारसे भागलेके दिन और पुनः उसी प्रकार ६० से गुणनेपर घटी पला मिलेंगी यह दशा वर्षादि होती है ऐसे सभी ग्रहोंके करना ॥२१॥ आयुः पिण्डे चक्रपातस्य हानिः कार्या विज्ञैरंशजे पिण्डजे वा॥ एकत्रस्थौ द्वौ त्रयो वा ग्रहाः स्युरेषामेको यो वली स्वांशहता ॥ २२॥ नित्यं शत्रुस्थानगानां त्रिभागेहानि कुर्यात्पूर्वयायिग्रहाणाम् ॥ नित्यं सर्वे नीचगा ह्यदहानि कुर्युः स्वीये पिण्डजेशजे वा॥२३॥ अंशायु वा पिण्डायुमें चक्रपातसे जो हानि होती है वह आयुपिंडमें ही करलेनी यदि एकस्थानमें २।३ ग्रह हों तो उनमें जो बली है वही घटायाजाता है सबही नहीं इस क्रमसे जब (आयुःपिण्ड ) समस्त ग्रहदशायोगमें घटायके शेषमें मिश्रविभागरीतिसे पुनः समस्तग्रहोंके भाग ही करते २२॥ सभीप्रकारोंमें शत्रुराशिगत ग्रहोंके तीसरे भाग करनी । जो नीचराशिमें हों उनका आधा घटायकी हम हानिक्रमकरके तब वृद्धिक्रम करना. यह विधि अशायु पिण्डायु दोनोंहीमें है ॥ २३ ॥ अस्तं गता व्योमचराः समस्ताः स्वादायुपोर्दै क्षपयति नित्यम् ॥ एकैव नीचास्तमितस्य हानि स्तंगयोर्भार्ग- वसूर्यसुन्योः ॥ २४ ॥ ताराग्रहाः शत्रुगृहाश्रयेण प्रतीय मार्गोपगतास्त्रिभागम् ।। स्वस्वायुपो नापहरंति नित्यं स्त्रोच्चस्थिता येपि न शत्रुहानिम् ॥ २५॥ वक्री ग्रहः स्वोचगतो ग्रहो वा यं स्वीयमायत्रिगुणं करोति ।। शानि (७०) जातकशिरोमणि- होती है १२० वर्षसे अधिक जो बचे उसकी लग्नदशा भी नहीं है ॥ १६ ॥१७॥ रवेरुच्चं व्योमादेशो रूपं रामा वियद्विधोः ॥ नवाया- विशतिव्योमविदः पंचशरेंदवः ॥ १८॥ गुरौ रामा-शरा व्योमरुद्राभानि वियद्धृगोः॥शनेरसाकृतियॊमरव्याद्या ध्रुवका अमी ॥ १९ ॥ छायादियंत्रैः प्रथमं विचार्य दिवानिशोर्जन्मघटीपलानि ॥ सिद्धांतमार्गेण सलग- खेटास्तात्कालिकाः स्पष्टतरा विध्यात् ॥ २० ॥ दशासाधनार्थ ग्रहोंके उच्च स्पष्ट सुगमार्थ यहां पुनरुक्तिसे कहते हैं कि, सू. ०। १०१ ० ० १।३ । ०० ९१ २८०० ५।१५१७६० ३१५१० शु०११। २० १ ० श०६।२०१० ये तम्ब ध्रुव कहे हैं इनमें ६ राशि जोडनेसे परम नीच होता है ॥ १८॥ १९ प्रथम छाया आदि यंत्रोंसे दिन वा रात्रिके टी पला विचारके सिद्धांतोक्तप्रकारसे लासहित ग्रहों के तात्का- लस्पष्ट करने ॥२०॥ निजोचेन शुद्धो ग्रहः पड्भहीनो भचक्राद्विशुद्धोऽथ पडूभाधिकश्च ॥ यथावस्थितस्तस्य लिता निजाब्दी हताश्चक्रलिप्ताभिराप्तः समादिः॥२१॥ जो ग्रह ६ राशिसे न्यून हो तो अपने उच्चमें हीनकरना यदि ६ से अधिक हो तो १२ में हीन करना. ऐसे यथावकाश उच्च नीच वा मध्यगत ग्रहका उच्चपात करके रादयादिका लिता पिण्डकरना महके दशा वर्षांसे गुणाकर चक्र १२ के लिसा २१६०० से भागलेना वर्ष मिले शेपको १२ से गुणाकर हारसे माग लेना महीना मिलेंगे.पुन: इसीप्रकार शेषको३० से भाषाटीकासमेत। (७३) इसीको स्पष्ट कहते हैं कि, लग्नमें पापग्रह हो तो बारहवा भाग घटता है यदि उसपरशुभग्रह की दृष्टि हो तो चौवीसवां भाग घटता है शुभाशुभ दोही देखे अथवा लग्नाशके समीप शुभग्रह हो तो उक्तहानि नहीं होती ॥ २८॥ यह जो लग्नगत पापग्रहोक्त हानि कही है यह पिण्डायुमें और निसर्गायुमें अथ- वा जीवशर्मोक्तायुमें करनी अंशायुमें नहीं ।। २९ ।। व्ययाद्विलोमं सकलं व्ययस्था दलं च लाभे दशमे त्रिभागम् ॥ चतुर्थभाग नवमोपगाश्च विनाशगाः पंच मभागहाराः॥ ३० ॥ पठं हि भागं क्षपयंति पापाः शुभास्तददै प्रतिवेश्म याताः ॥ अबै चतुर्थ रविभागकं च नागांशदिग्द्वादशमं च सौम्याः॥३१॥ और संस्कार है कि बारहवां पापग्रहपुरेसे ग्यारहवां आधा दशमतीसरा भाग नवम चौथा अष्टम पांचवां॥३०॥सप्तम छठा- भाग कमती होताह शुभग्रह हो तो उक्तका आधा घटाते जैसे १२ में आधा ११ में चौथाई दशममें छठाभाग ९ में अष्टमांश अष्टममें दशमांश सतममें द्वादशांश मात्र ।। ३१ ॥ पिण्डाव्दाः परमोच्चेपु प्रत्येकं परमायुपः॥ सप्तमशिधनो रूपं जातिवेदहुताशनाः ॥ ३२ ॥ वर्षादिकैरिमैरायुर्ग- दिता जीवशर्मणा ॥ पूर्ववच्चकपातादिहानिसर्गिकोपि च॥३३॥ एकादिग्रहराशीनां नव पट् त्रितयं नमः। विरावान्सवाणि सत्रिकोणादजादितः ॥ ३४ ॥ द्विशत्या भागलिप्ताभ्यो लब्ध्वा वर्षादिकं ध्रुवम् ॥ राशिवपेषु संयुक्तं द्वादशाव्दावशेपितम् ॥३५॥ अंशायु-
(७२) जातकशिरोमणि-
सकि निजद्वेपिगृहस्थितः सन्न व्यंशहर्ता स सुहनि-
जोचे ॥२६॥
अस्तंगत सवही मह अपनी आयुका आधा सर्वदा हीन
होता है ऐसे ही नीचवाला भी आधा घटताहै जो नीचमें
और अस्तंगतभी हो तो एक माधा घटे दोवार नहीं परंतु
इनमें शुक्र शनि अस्त भी हों तो भी आधा नहीं घटते नीच
हीमें घटते हैं ॥ २४ ॥ जो ग्रह शत्रुगृहमें वक्रगति होवें अपने
२ तीसरा भाग हरण नहीं करते अन्यथा शवराशिस्थ तीसरा
भाग घटता है मंगल शवराशिमें भी नहीं घटता तैसेही
उच्चगत गृह भी शराण्युक्त हानि नहीं पाते ।।२५ ॥ जो वक्री
और सञ्चगत ग्रह अपनी आयुको त्रिगुण करता ह वह शव
गृहमें बैठाहुआ क्या तीसरा भाग नहीं करता. यह फिसीका
मत है। मित्र एवं उच्च में भी ऐसा ही जानना यह भी मतीन-
रीय द्विरुक्ति है यहां लमदशामें लग्नेश यली हो तो राशि
तुल्य चाशग बली हो तो अंशतुल्य वर्ष होती है यह
टीकाटत मत है ॥२६॥
विभामापुत्राणामेकस्मिल्टनगे सति ॥ कार्याः पाप
ग्रहा हीनाः पिंडायपि न चांशजे ॥२७॥ सरलग-
विभागहानिहायुपां सौम्यविलोकितेदम् ॥ शुभा.
शुभौ चेदुदयोदितांगासने शुभे नास्त्यशुभेऽस्ति हानिः।।
॥२८॥ कार्यपा पापजा हानिः पिण्डायुपि निमगंजे ।।
जीवशमोदिते वापि नाशांयुपि व पापजा ॥ २९॥
सूर्य मंगल शनिमें एक भी लग्नमें दो तो पापप्रदीकी
हानि फग्नी यह पिंडायुमें होती है अंशायुमें नहीं ॥२॥
भाषाटीकासमेत। (७५) रना उतने ही वार न करना. ऐसही वक्री एवं उच्चस्थ प्रह तिगुना होता है परंतु यदि उच्च और वक्री भी हो तो एक वार त्रिगुण करना दोवार नहीं. और लग्नदशाकेलिये राशी बलवान हो तो जितनी मेषादिराशि भुक्ती हैं उतने वर्ष शेष अंशादियोंसे अनुपातक्रमसे मासादि लेने यदि अंशेश बल- वान् हो तो अंशतुल्यवर्षशेषसे पूर्वोक्त करना अंशपदसे यहां नवांश लेना ॥ ३६॥ ३७ ॥ ३८ ॥ इति जातकशिरोमणों माहीधरीभाषाटीकायामायुर्दायाध्यायोऽष्टमः ॥८॥ -- सत्याचार्यमतं वराहमिहिराचार्येण च स्वीकृतं सत्ये- नापि पराशरादिमुनिभिर्यत्स्वीकृतं स्वीकृतम् ॥ आ. यीषु च संहिताषु पुरुपग्रंथेषु चांशायुपं नृणां तल्ल- घुजातके बहुमतं पिण्डायुरप्याह सः ।।१।। विलग्नं शरीरं मनः शीतरश्मिर्विवस्वानथात्मा बयाणाम- थैक्ये ॥ नृणां जीवनं नित्यमेव त्रयाणामनैक्ये ध्रुवं देहपातस्तदा स्यात्।।शलग्नस्यशशिनो वापि प्रथमा भास्करस्य वा ॥ दशावलक्रमेण स्याकेन्द्रादीनां ततः परम् ॥ ३॥ प्रथमं केन्द्रगा दद्युमध्ये पणफरो- पगाः॥ वयसोन्त्ये ततः शेपा दशा दयुर्वलक्रमात् ॥ ॥४॥केन्द्रोपगग्रहाभावे दधुः पणफरोपगाः॥ तद- भावे तदग्रस्था नराणां फलमादितः॥५॥ सत्याचार्यका मत जो वराहमिहिराचार्यने अंगीकार किया यही यहां स्वीकार कियागया सत्याचार्यने भी.जो मत पराशरादि मुनियोंने अंगीकार किया था वही स्वीकार ।
(७४) जातकशिरोमणि- रेवं संसाध्यं वक्रपातादिशोधितम्।।वर्गोत्तमस्वराश्यंश- द्रेष्काणे द्विगुणं सकृत् ॥३६॥ वक्रोचयोनियुणितं द्वित्रिप्राप्ती त्रिभिः सकृत् ॥ अंशायुरेवं लग्रस्य साध्य यदि बलोन्वितम् ॥३७॥ राशितुल्याधिकं कार्य भागा- देरनुपाततः ॥ ३८॥ इति जातकशिरोमणावायुर्दा- याध्यायोटमः॥८॥ जीवशर्मा आचार्यने परमायु १२० वर्ष ५ दिनके बराबर ७ विभाग वर्ष १७मास १ दिन २२ घटी८ पला ३४ सभी ग्रहोंके कहे हैं जो उच्च में इतना नीचमें इतनेका आधा बीचमें अनुपातसे चक्रपातादिसभी होता. परंतु यह केवल जीवशर्माने अपनी ही युक्ति कही है इससे यह प्रकार संमत नहीं है॥ ३२ ॥३३॥ अब अंशाय साधन कहते हैं कि, तत्काल ग्रह लिप्तापर्यंत पिण्डकरके २०० से भाग लेना वर्ष मिले १२ से अधिक मिले तो १२ से शेप करलेने शेषको १२ से गुणाके ९०० से भागा लेना महीने मिलेंगे शेप ३० से गुणाकार २०० के भागसे दिन और ६० से गुणाकर २०० केभागसे घटी पुनः ऐसे ही पला भी मिलती हैं इसमें भीसंस्कार हे किदशागतवर्षादिकों को प्रथम ९से तप ६से पुनः ३से अलग अलगगुणदेने.तय विकला व फला स्थान में घटीपला६०सेदिन३०से मास से वर्ष से तष्टकरके उपर ठपरको चढ़ातेजाना. तय दशा वर्षादि सिद्ध होते हैं यह अंशायु दशामें अंशगणना मेषादि सत्रिकोण अर्यात नाशक क्रमसे है ३४३३५ इसमकार अंशायु साधनकरके चक्रपातादि संस्कार पूर्ववत् करना जो प्रह वर्गोत्तम, स्वराशि, स्वांशकी स्वरोकाणमें हो वह द्विगुण करना जोस्वराशिस्न शादि। ३ प्रकारोंसे द्विगुणता पावै तो यह एक ही बार द्विगुणका .
, भाषाटीकासमेत। (৩৩ भी समान हों तो जो ग्रह प्रथम उदयी है उसकी प्रथम होगी ॥७॥ अब अंतर्दशाकेलिये कहते हैं कि, दशापतिके साथ जो ग्रह है वह दशापतिके आयुका आधा छोडकर अपने दशा गुणके अनुसार अंतर्दशा पाता है जो दशा पतिसे त्रिकोणमें ९१५.है वह उसके तीसरे भागको छोडकर अपने दशागुणोंसे अंतर्दशा पाता है ।। ८॥ दशापतेः सप्तमगो ग्रहो यः स सप्तमांशं चतुरस्रसंस्थः॥ चतुर्थभागं सदसत्फलं स्वं सलग्नखेटाः परिपाच- यति ॥९॥स्थानेष्वथैतेषु दशापतिभ्यो योयोर्द्धहारा- दिपदस्थितश्च ।। हारं गुणाश्चापि च तस्य तस्य सवर्ण- नेनैव पृथग विदध्यात् ॥ १०॥ जो ग्रह दशापतिसे सप्तम है वह सप्तमांश जो ४८ भावमें हो वह चतुर्थाश छोडकर अपने दशागुणोंसे पाता है ॥९॥ इन स्थानोम दशापतियोंसे जो ग्रह आधा घटनेवाले आदि पदमें स्थित है उस उसके हार और गुणकके (सवर्णन) समच्छेद करके प्रत्येक अंतर्दशा जाननी अर्थात् जो अर्धा- दिक भाग है उनकी सवर्णना (समच्छेद ) करना कि समच्छे- दको छोडदेना और नये अंश जो उत्पन्नहुये उनकी गुणक- संज्ञा और गुणोंके योगको भागपर समझना दशाके वर्षादि अलग गुणकारोंसे गुणाकर हारसे भागलेकर जो वर्षादि मिलेंगे वह अंतर्दशा होगी ॥ १० ॥ रूपमर्दादिभागस्य तिर्यपत्त्या लिखेदुधः ॥ तदधः स्वस्वभागांकान् लिखेदुपं दशापतेः॥ ११॥ दशाप- तेरेकगृहस्थितस्य सर्वाईभाक् पंचमसंस्थितकः ॥ विभागहर्ता गुणभागहारादुद्देशकेऽस्मिन् विदधीत जातकशिरोमणि- किया था. जो मत ऋषिप्रणीत ग्रंथसंहितापौरुषेयग्रंथों में मनुप्पोंको अंशायु कही है वह वराहमिहिराचार्यने बृहज्जा. तक लघुजातकमें बहुसंमत कही है और पिण्डायु भी कही है ॥१॥ लग्न शरीर मन चन्द्रमा और आत्मा सूर्य है इन तीनोंके ऐक्यता होनेमें मनुष्योंका जीवन है इनके अलग होजानेमें देहपात (मृत्यु) होजाता है ॥२॥ उक्त दशा वर्षादि सभी ग्रहोंके निकालके प्रथम किसकी दशा चाहिये इस क्रमको कहते हैं कि, लग्न चन्द्रमा सूर्यमें जो बलवान हो वह प्रथम. तब केन्द्रगतकी ॥३॥ तब पणफरवालेकी तब आपोक्किमवालेकी होती है पहिली अवस्थामें केन्द्रगत. मध्यममें पणफरगत अंतिममें आपोक्किमस्थ फल देते हैं अन्य बलानुसार देते हैं ॥ ४ ॥ केंद्र में ग्रह न हो तो पणफर- स्थमें और इसके भी अभावमें आपोक्किमवाला ग्रह मतु- प्योंको प्रथम फल देता है ॥५॥ दत्तानि वर्षाणि पहूनि येन स्वल्पानि वातानि दशा वदति । केन्द्रादिगानां घुसदां वलस्य साम्ये दशादी बहुवर्षदातुः ६॥ केंद्रे पणफरादौ वा बलसाम्ये यदा स्थिताः ॥ प्राग्दशा तस्य भवति यश्च्युतो रविमण्ड- लात् ॥७॥ एकक्षगानां बलवान् ग्रहो यो दशाधि- नाथस्य दशाईभागम्. ॥ आदाय दद्यात्सकलं त्रिकोणे त्रिकोणभावं बलिनांवली यः॥८॥ पूर्वोक्तप्रकारसे लग्न सूर्य चन्द्रमेंसे मलीकी तत्पश्चात केंद्रादि गतवालोंकी प्रथम लिखके और भी विचार है कि केंद्रादिगत ग्रहोंमें पलमें भी समान हों तो जिसने बहुत वर्ष पाये उसकी प्रथम तदुत्तरोत्तर क्रमसे औरोंकी होगी ॥ ६ ॥ इसमें भाषाटीकासमेत। (७९) , स्यात् ।। तदा स्वाद्विशुद्धिर्गणानां हरस्य तथा चेद्वि- शुद्धिः पुननैव कुर्यात् ॥ १८॥॥ अंतर्दशोदाहरणार्थ ११ श्लोकसे १८ श्लोकका तात्पर्य उदाहरणसे दिखाते हैं कि, जब दशापतिके साथ कोई ग्रह है और पूर्वोक्त स्थानोंमें कोई ग्रह नहीं है तो वही १ अंश हारक होता है तो दशापति १ हारक १ अंश जो हरण होना है वह १ । २ ऐसा रूप है इनका न्यास ३३ छेद गुणा -किया तो ३३ यह समच्छेद भया इसमें छेद घटाया १।२ ये गुणक हुये इनका योग ३ यह भागहार हुआ दशापतिकी आयुवर्षादि ३ । 01010 यह २ से गुणा हारसे भाग लिया फल २ यह तो मूलदशा- पतिकी अन्तर्दशा हुई पुनः मूलदशापति ३। 01 01 0 एकसे गुणाकर हार ३ से भाग लिया फल वर्षादि ३।०।०। यह दशापतिके साथ जो ग्रह है उसने अन्तर्दशा पाई मूलदशा- पतिकी अन्तर्दशाका.आधा साथवालेने पाचक पाया दोनों का जोड वही ३1०1०1० दशाय होती है १ जब दशापतिस त्रिकोण स्थानमें ९ । ५ कोई ग्रह है ४।८।७ में नहीं है तथा साथमें भी कोई नहीं है तो न्यास छेदसे पर- स्पर गुणदिये ३, छेदहीन ३ । १ ये गुणाकार हुये इनका योग ४ भागहार भया मूलदशापति दशा वर्षादि४।०1010 यह इसे गुणा ४ से भागदिया फल ३ । । 0 1 0 यह मूल दशापतिकी अन्तर्दशा हुई उसकी दशा । 0 1 0 1 0 एक से गुणाकर ४ से भागलिया लन्धि ११०१०१० यह त्रिको- णवालेकी अन्तर्दशा विभाग छोडकर हुई २ जब दशेश- से ४ । ८ में कोई ग्रह है और १।९।५।७ में कोई नहीं है नो न्यास जब दशापतिसे ७ में कोई ग्रह हो और ११६ " (७८) जातकशिरोमणि- विद्वान् ॥ १२ ॥ तलस्थहारेण परस्परेण राशीनिह- न्यादुपरिस्थितांश्च ॥ आत्मीयारेण तलस्थितेन नैवं भवेयुर्गुणभागहारः ॥ १३ ॥ अधस्थद्वित्रिहा- राभ्यां हन्याद्रूपं दशापतेः ॥ विरूपाभ्यां दलोर्द्धस्थं न्यूर्द्धस्य विदुताडितम् ॥ १४॥ अंतर्दशामें उदाहरणार्थ कहते हैं कि एक था आधा आदि भागके अंक तिर्थीपंक्तिसे लिखना उनके नीचे अपने अपने भाग जो जो मिलते हैं उनके अंक और एक दशाप- तिका लिखना ॥ ११ ॥ इस उद्देशमें विद्वानने इसमकार करना कि, दशापतिके साथ जो ग्रह है वह आधा लेता है पंचम तीसरा भागहार गुण होता है ॥ १२ ॥ नीचे स्थित जोहार है उन्हें परस्परराशियोंको गणना जो उपर हैं उन्हें भी गुणना निजहार. जो सामने नीचे है टसीसे गृण भागहार नहीं होता समच्छेदकी रीतिसे ठीक होजाता है ॥ १३ ॥ जब नीचे २।३ हार तो दशापतिका एक गुणना ३१ में आधासे उपरिस्थ ३ के उपरिस्थपिंदुसे नाहन फरना ॥१४॥ दशापतिगुणाः पटू चवह्नयोशिमागिनःविभागहर्तु- श्च भुजी हारो हर्तुश्च योगतः ॥१५॥ दशापतेर्दशाब्दा- दीन्स्वगुणांकन ताडयेन विभजेरणयोगेन लब्धं वपी- दिकं स्वकम् ॥ १६॥ ततोड़हारादिगुणेन हन्यात्पृथ- क्पृथक पूर्वदशा समस्ताम् ॥ विभज्य वपादिफलं भवेद्य- सांतर्दशादिहरस्य ननम् ॥ १७ ॥ दशांतर्दशा यस्य वर्षस्य योगे कृते प्राग्दशान्दादितुल्यं यदा भाषाटीकासमेत। (८१) ख्याता महर्षिभिः ॥२१॥ अथमा मध्यमा पूज्या द्रेष्काणैरुभयोदय।।उत्क्रमांचरभे निष्ठा शुभा मध्या स्थिरे क्रमात् ॥२२॥ शुभानि पूर्णान्यवरोहिणी या फलानि नाशं नयति क्रमेण ॥ आरोहिणी वर्द्धयति ग्रहाणां पूर्णा दशा तिष्ठति वाथ रिक्ता ॥ २३ ॥ जो षडबलसे बलवान् तथा अपने उच्चांशकमें है उसकी दशा पूर्ण नामकी आरोग्य धनवृद्धि करती है। पूर्णबलसे थोडा हीन भी पूर्णा नामकी धनलाभवाली होती है जो ग्रह बल- रहित तथा नीचराशिमें है उसकी दशा रिक्ता नामकी धन हानि करती है ऐसेही नीचशत्रुराशिनवांशवालेकीभी अनिष्ट फल देती है ॥ १९ ॥ नीच शत्रुराशिगत ग्रह (शुभस्थान) उच्चमूल त्रिकोणमित्रक्षेत्र स्वक्षेत्रादिकभी हो तो उसकी दशा मिश्रफल जैसे रोग और धनलाभ भी देती है जो शत्रुनी. चादि राशियोंमें उच्चमूल त्रिकोणादि अंशकोंमें हों उनका भी ऐसाही मिश्रफल जानना शुभ, रिक्त, पूर्णमाध्य, मिश्र, अधम आदि संज्ञावाले जैसा नाम वैसा ही फल भी करते हैं ॥२०॥ परमोच्चसे उतरके परमनीच पर्यंत ग्रह अवरोही और परमनीचसे परमोचाशपर्यंत आरोही होता है अवरोही ग्रह अनिष्ट फल देता है परन्तु उच्चमित्रांशकादिकोंमें हो तो मध्यम फल देगा । ऐसे ही अवरोही शुभफल देता है परन्तु नीच शत्रआदि अंशकोमें हो तो मध्यम होजाताहे इस प्रकार संज्ञानुरूप फल महर्षियोंने कहे हैं ॥२१॥ लग्नदशाके हेतु कहते हैं कि, द्विस्वभाव लग्न हो तो प्रथम द्रेष्काणवाले की अधम दूसरे वालेकी कीमध्यम तीसरेवालेकी उत्तम. चरराशि लममें प्रथम द्रेष्काण हो तो उत्तम द्वितीयमें मध्यम तीसरेमें (८०) जातकशिरोमणि- ४१८में कोई न होतोन्यास आधे पूर्ववत करना ४जो दशा पति के साथ कोई ग्रहों ९ वा ५ में भी कोई हो और ४१८१७ में कोई न हो तो न्यास १ शेषपूर्ववत् ५ दशेशके १५४ वा ८ में हो ९.५३७ में न हो तो ३न्यास ६ जो दशेशके साथ ग्रह हो ७ में भी हो ९१५1७ में न हो तोन्यास ३७॥ ७ जो दशापतिसे ९ और ५ में भी हो और पूर्वोक्त में न हों तोन्यास १३८ जो दशेशसे ९ वा ५ में और ४१८ में भी हों और कहीं न हो तो न्यास ९इत्यादि त्रिविकल्प होते हैं जब दशेशके साथ कोई त्रिकोण भी हो और जगह ४१८१७ में न हो तो न्यास १३इत्यादि प्रकारसे सबका न्यास करके उक्तप्रकारसे पाचक बनते हैं समस्त विकल्प उक्त प्रकारसे ३३ होते हैं इसप्रकारसे कि दूसरे विकल्पके ४ भेद तीसरेके ८ चौथेके ९ पञ्चमके ७ छठेके ४ सातवेंका एकमात्र है जहां बहुत ग्रह पाचक है तहां प्रथम दशापति अन्तर्दशा पाचक उप्रांत जो क्रमदशा न्यासमें लिखा है वैसेहीरीतिस यहां अन्तर्दशामें भी क्रम लिखना एक स्थानमें बहुत ग्रह हों तो प्रथम बलवान् पीछे क्रमसे न्यूनयली लिग्बना ॥१५॥ १६॥ ॥१७॥२८॥ स्वे तुंगांशे परगवलिनस्तस्य पूर्णा दशा स्याद्विक्ता नानी भवति खलु सा वर्जिता नावलेन । नीचांशस्थे रिपुगृहगते नीचगेहेरिजाशे ज्ञेयानिष्टा जननसमये खेचरे यस्य पुंसः ॥ १९ ॥ नीचशत्रुनवभागसस्थिते खेचरे शुभगृहेषु मिथिता ॥ पूर्णमध्यपरनीचदशानां नामतुल्यफलमत्र जल्पितम् ॥२० ॥ दशावरोहिणी तुंगभ्रष्टस्यारोहिणी स्मृता। नीचांशतस्तयोमध्ये मध्या +na भाषाटीकासमेत। (८३) अस्तंगत हो तो जो तदुक्त (पापफल ) कष्टफल हैं उन्हें जाग्रत् करदेता है ॥ २५ ॥ मानार्थदात्रीस्वगृहे हिमांशौ कौजे स्त्रियादोपसुदाहरन्ति।। बौधे सुहृद्वित्तगुणप्रदात्री मानं सुखार्थान् विदधाति जैव ॥ २६॥ दुर्गारण्यगृहप्रवासकी सिंहेन्दी भृगुम- दिरेऽन्नदात्री ॥ कुस्त्रीदा महिपोष्ट्रदाथ वृद्धा दासीदा शनिमंदिरे दशेन्द्रोः॥२७॥ चंद्रमाकी दशा अपने घर ४ में मान धन देती है मंगल. केमें स्त्रीकरिके दोष कहते हैं बुधकीराशियोंमें मित्रसुख.धन. सिंह राशिस्थ चंद्रमाकी दशा किला वनमें निवास घरसे गुण देताह गुरुके स्थानमें मान सुख धन देती है.॥२६॥ अन्यस्थानमें गमन कराती है शुक्रके राशिमें हो तो अन्न देती है शनिके घरमें हो तो उसकी दशा कुस्त्री देती है तथा भंसा ऊंट औरंदासी देती है ॥ २७ ॥ दशालास्थिते चंद्रे स्वगृहे धनमानदः ॥ स्वस्येव सहजे भ्रातुः सुहृदो वेश्मनि स्थितः ॥२८॥ पुत्रमावेथ पुत्राणां जायाभावे च योपिताम् ॥ एवं रव्यादिगेहस्थे सहजादिषु कल्पयेत् ॥ २९ ॥ दशाप्रवेशसमये यदा- शिस्थः शशी भवेत् ॥ यद्भावे तत्कृतं तस्य सुखं वा यदि वासुखम् ॥३०॥ लग्नगत चन्द्रमा स्वगृही होवे तो अपनी दशामें धन तथा मान देता है ऐसे ही स्वगृही सहजभावमें हो तों (८२) जातकशिरोमणि। अधम स्थिरराशि लग्नमें प्रथम द्रेष्काण हो तो लग्नदशा अशुभ दूसराहो तो मध्यम तीसरा हो तो उत्तम इसप्रकार लग्नदशाके फल नामानुरूप हैं ॥२२॥ मतांतर है कि, अवरो- हिणी दशा पूर्णा भी हो तो भी क्रमसे फलनाश करती है और आरोहिणी रिक्ता भी हो तो भी शुभफलको बढाती है।॥२३॥ लग्ने पाकपतौ शुभे सुहृदि वा वर्ग सुहृत्सौम्ययोः पाकेशस्त्रिदशायपष्ठशुभदा प्रारम्भकाले दशा । पाके- शोच्च सुहत्रिकोणवनितालाभत्रिपददिस्थितश्चन्द्रः सत्फलदो सत्फलकरो यद्यन्यथा सम्भवः ॥२४॥ दशापतिः शत्रुमनीचसंस्थो दशाधिनाथापचयाल- यस्थः । ताराधिपः पापफलानि यानि प्रबोधयत्यस्त मितो विशेषात् ॥२५॥ जिस ग्रहकी अन्तर्दशाका प्रवेश है वह पाकस्वामी कहाता है, वह लग्नमें वा अपने पूर्वोक्त वर्गमें हो वा तात्कालिंक मित्र राशिमें हो तो उसकी दशा शुभ फल देती ह जो शुभ ग्रह लग्नगत है उसकी दशा भी शुभ फल देती है और दशेशतात्का- लिक लग्नसे ३ । १०।६।११ स्थानमें होतोदशा शुभ देती है शत्रु अधिशके राश्यादिमें अशुभ फल देती है अधिमित्र राशिमें अतिशुभ अन्यत्र सम जब किसी ग्रहका अंतर ४ वर्ष पर्यत रहता है तो तबतक क्या एकही फल होगा अत एवं कहते हैं कि दशेशके मित्र और उच्च तथा उपचय त्रिकोण सप्तम स्थानमें जब गोचरका चंद्रमा हो तो शुभ फल और नीच शत्रुराशिमें उससे अन्यत्र २।१।४।८।१२ में अशुभ फल होगा।२४ादशेश शत्रु वा नीचराशिमें हो उससे अंत. रेश (अपचय ) ३ १६ १० । ११ से अन्यमें मह हो विशेषतः भाषाटीकासमेत। (८५) . करितुरंगमपत्तिसमाकुलं कनकदण्डसितातपवाणरम् ।। ग्रहपतिः कुरुते निजतुंगगः पदगतो वसुधाक्लये परम् ॥३३॥ अरिपदेरिगृहे ग्रहनायके क्षतजरुग्गलरोग- समाकुलः ॥ निधननीचविरोधिगृहंमते चरणहस्त- गता खलु गर्दभी ॥३४॥ रिपुगृहेर्कदशानयनामयं शिरसि रुग्ज्वरकोष्टगता कृमिः।। निधनगस्य दशा पुरुष वर्धमयति स्वपदात्परितो भृशम् ॥ ३५॥ सूर्य अपने उच्चका हो तो स्वदशामें हाथी घोडे प्यादा- ओंसे युक्त तथा सोनेकी डंडीवाला श्वेतरंगका धूपहटानेवाला छत्र देता है. ऐसास्वोच्चगत सूर्य दशम स्थानमें होतो पृथ्वीमें पदप्राप्तिभी करता है॥३३॥यदि सूर्य शत्रु नवांशक शवराशिमें हो तो चोटलगनेसे रोग और गलरोगसे युक्त करता है जो अष्टम होवा नीचराशि. शराशिमें हो तो हाथ पैरों में कंडू दुदु सरीखा रोग हो यद्वा गदहीका पालन वा सवारी करनी पड़े ॥ ३४॥ शत्रुराशिगत सुर्यकी दशा नेत्ररोग, शिरमें रोग ज्वर, और पेटमें कृमि रोग करती है अष्टमभावगत सूर्यकी दशा पुरुषको अपने पदसे अत्यर्थ भ्रमण कराती है ॥३५॥ अथ चन्द्रदशा। राज्यं ददाति शशिनो निजतुंगगस्य नीचत्थितस्य निधने मरणप्रदात्री ॥ शवस्थितस्य निधनं रिपुतो. रिंगेहे मित्रालये स्वजनलाभकरी दशा च ॥३६ ॥ किरणहीनतनोरुदरामयः शिरसि रुग्ज्वरदा शशिनो दशाविषयभृत्यविहीनगृहं तदा भवति पीनसलोचनका -
(८४) जातकशिरोमणि-
भाईको चतुर्थ हो तो मित्रके अथवा उनसे धन मान देता है
॥ २८ ॥ तैसे ही पुत्रभावमें हो तो पुत्रोंका जायाभावमें
स्त्रियोंका सुख देता है इसीप्रकार सूर्यादिग्रहोंके राशिमें
प्राप्त चन्द्रमाका पूर्वोत्तप्रकारका शुभाशुभ फल भ्राताआदि
जिसभावमें बैठाहो उसको कल्पना करना ॥२९॥ तैसे ही
दशाप्रवेशसमयमें चन्द्रमा जिसराशिमें होवै जिसभावमें
हो उसके अनुसार सुख वा दुःख पूर्वोक्तप्रकारसे जानना३०॥
यः स्वोच्चे स्वनवांशके स्वभवने मित्रालये खेचरो दृष्टः
सौम्यसुहदहेण रविणा नो सुप्तरश्मिर्यदा।। ईदृग्योप्टक-
वर्गशोभनफलः सम्यक्फलांतर्दशा यावत्यः स्वदशा
समास्तदवधेराया जगुनिश्चयात् ॥३१॥ नीचे शत्रु-
नवांशहरिभवने यः पापडप्टो ग्रहः पप्ठे धामनि वाष्टमेऽ
ष्टककृतौ शून्यस्थितो जन्मनि ॥ अर्काक्रान्ततनुग्रहेण
विजितो युक्तोरिणा तदशा चिन्ताव्याध्यारघातपुत्रवनि-
तानासाध्वदात्री सदा ॥३२॥
जो अह जन्ममें अपने उच्च अपने नवांशक स्वराशि मित्र
राशिमें हो शुभ ग्रह अथवा मित्रग्रहसे दृष्ट हो अस्तंगत न
हो. और अष्ट्रकवर्गमें शुभफल दाता हो उसकी दशांतर्दशा
अपने वर्षांपर्यंत शुभफल देतीहे पेसा निश्चय करके पूर्वाचा-
योंने कहा है ॥ ३१ ॥ जो ग्रह नीचराशि शत्रुनाशक
शखराशिमें हो पापग्रहसे दृष्ट हो तथा छठे वा आठवें भावमें
हो अष्टकवर्गमें ८ शन्यवाला हो अस्तंगत हो अथवा ग्रह
युद्ध में हारा हो शत्रुमहसे युक्त हो उसकी दशा चिन्ता, रोग,
शविघात और स्त्री पुत्रसे बुराई अपने समयमें देतीहै ॥३२॥
भाषाटीकासमेत। भी मान प्राप्तहोताहै बुद्धिमानी होती है शरीरमें यह दशा पुष्टि करती है बलसे हीन चंद्रमाकी दशा आलस्य निद्रा करती है तथा कन्या जन्म देती है ॥४०॥ अपने कुलमें रोग पीडा शोकसहित करती है तिलान्नदेती है परिश्रम व्यर्थ जाताहै, (विषय) भोगादिका नाश होताहै यदि यह चन्द्रमा क्षीण, शत्रुराशिस्थ, नीचगत होवै तो उक्तफल विशेष करके देताहै ॥४१॥ अथ जन्मराशिफलानि । आताम्रवर्तुलं नेत्रं शाकभुक पाणिपादयोः ।। पद्मांकश्व चलद्रव्यस्तोये भीरुः प्रियारतः ॥ ४२ ॥ अग्रणीधी तृवर्गाणां मांसादः साहसे रतः॥ निमौसजानुसंधिश्व जातःशशिनिमेपगे॥४३॥ अब चंद्रराशिफल कहते हैं। जिसकी मेषराशि होवे उसके नेत्र तांवके रंगके और गोल हो (शाक) भाजी खानेवाला होवे हाथ पैरोंमें कमलका चिह्न होवै धन चंचल रहे जल में डरमाने स्त्रीमें आसक्त रहे ॥ ४२ ॥ अपने भ्रातृगणमें श्रेष्ठ होवै मांस खानेवाला होवै साहसमें तत्पर रहे जंघा तथा संधिस्थानों में मांस कम रहे ॥ ४३ ॥ कांतः सौभाग्ययुक्तो वृपसमनयनः पृष्टपार्थात्यलक्ष्म्या कन्यापत्योतिदाता पृथुकरखदनो हंसलीलाप्रचारः॥ मध्यांत्येभोगभागी मदनवशगतो दीप्तवह्निः ककुद्मान् पूर्व वैरं करोति स्वजनधनसुतैर्वजितो ग्लौ पस्थे।४४ चंद्रमा जन्ममें वृषका हो तो सौभाग्ययुक्त होवे बैल. केसे नेत्र होवें पीठ तथा बगलोंमें चिह्न होवें " इसमें भी (८६) जातकशिरोमणि- मला॥३७॥ नीचशचनिधनारिवर्जिते मन्दिरे शशिनि- पूर्णमंडले ॥ मंदिरं भवति पूरितं श्रिया जाययोत्तमश- रीरशोभया॥३८॥ अब चंद्रदशाके फल कहते हैं।चंद्रमा अपने उच्चमें हो तो उस- की दशामें राज्य देती है जो नीचमें हो और अष्टम भावमें होतोमृत्युदेती हे शत्रुराशिगत चंद्रमाकीदशामृत्यु तथा छठे- भावमें होवैतोशत्रुसे मृत्य देतीहै मित्र गृही होवैतो इसकी दशा अपने मनुष्योंसे लाभकारी होती है ॥३६ ॥ क्षीणचन्द्रमाकी दशा उदरसंबंधीरोगतथा शिरमें रोग और ज्वर देती है उसका घर (विषय )शृंगारादि (भृत्य) चाकरोंसे हीन होताहै तथा पीनसरोग कामलारोग होते हैं ॥ ३७ ॥ जय चंद्रमा नीच. शव, अष्टम, छठे भावोसे अन्यराशि भावोंमें हो तथा पूर्ण मण्डल हो तो उसकी दशामें घर लक्ष्मीसे पूरित होता है तथा उत्तम शरीर शोभावाली स्त्रीसे शोभायमान होताहै ॥३८॥ वलिनः शशिनो दशा यदाधनलव्धिजितोथ मंत्रतः।। सितवस्त्रसुगंधसेवनं मधुराणां पयसा तथाशनम्॥३९॥ प्राप्नोति मानं गुरुतोनृपाच मेधाविता पुष्टिकरीशरीरे॥ आलस्य निद्राजननी दशेन्दोर्वलेन हीनस्य सुता जनित्री ॥४०॥ कुलेमयाति कुरुते सशोकां तिलान रात्री च वृथा श्रमश्च ॥ क्षीणारिनीचास्तगतो विशपा- द्ददाति चन्द्रो विषयस्य नाशम् ॥११॥ बलवान् चन्द्रमाकी दशा जब होवै तब द्विजसे और मंत्र- से भी धनलाभ होवे तथा शुल्कवस्त्र सुगंधिका सेवन तथा मीठे और दूधका भोजन मिले ॥३९॥ और गुरुसे तथाराजासे , माषाटीकासमेत। (८९) राजमंत्री होवै सामोपायसे वशमें आवै मित्रोंका प्यारा शीन चलनेवाला, अच्छेवेषवाला होवे सजनोंमें प्रमाणिक, बहुत घरवाला जलको प्रियमाननेवाला अर्थात् जलक्रीडा- दिमें प्रसन्न भी रहे ॥ ४ ॥ पिंगाक्षो मांसभक्षी : पृथुवदनहनुमैदलोमा क्षुधावान् तीक्ष्णः स्वल्पात्मजन्मा विपिननगरुचिः स्त्रीरियुः पण्डितश्च ॥ विक्रांतो दानशीलः स्थिरविमलमतिः पीडितो दन्तरोगैर्मातुश्योर्कराशौ शशिनि गुरुरुजा पीडितो राजमान्यः ॥४८॥ सिंहराशिका चन्द्र हो तो मनुज पीले नेत्र. मांसभक्षी मुख और ठोडी स्थूल बारीक रोम,क्षुधावाला, तीक्ष्णस्वभाव सन्तान अल्प, वनपर्वतमें रुचि, स्त्रीका द्वेषी. पंडित, परा- क्रमी, दानदेनेको स्वभाववाला, और स्थिर निर्म लबुद्धि, दंतरोगोंसे पीडित माताके वशीभूत, बडेरोगसे पीडित और राजमान्य होता है ॥४८॥ कन्यायां शशिनि स्थिते प्रियवचाःशास्त्रार्थविद्यार्मिकः श्लक्ष्णः सत्यरतः कलासु निपुणो वाग्म्मी सुमेधा सुखी।। नम्रावसभुजौ प्रियश्च सुरते लीलागतिर्लजया कन्या- स्वल्पसुतान्वितः सुललितः स्वैरं प्रतापान्वितः॥४९॥ चन्द्रमा कन्यामें होवे तो. प्रियवाणी शास्त्रार्थजाननेवाला धर्मात्मा कृश, सत्यमें तत्पर कला कारीगरीमें निपुण, युक्ति पूर्वक बोलनेवाला, अच्छीबुद्धि, सुखी होवे, कन्धा और बाहु नम्रहोवें, सुरतक्रीडामें प्रिय, लजासे मंद और सजीली चाल चलनेवाला अल्पपुत्रोंसे युक्त, सुरूप अपने प्रतापसे युक्त अर्थात् स्वयं प्रतापी होवे ।। ४९॥
(८८) जातकशिरोमणि- विचार है कि चन्द्रमा क्षीणपापयुत नीचादिमें हो तो, दह वा दग्धादिऔर शुभवर्गादिमें हो तो तिलमशकादि जानना" कन्या उत्पन्न हो अति उदार होवें हाथमुख स्थूल ही हंस की गति चले पहिली और पिछली अवस्थामें अनेक भोग भोगे कामके वशमें रहे जाठराग्नि प्रदीप्त रहे, गर्दन मोटी ऊंची होवे, अपने पूर्वजोंसे वैरकरे अपने मनुष्य, धन, पुत्रों- से वर्जित रहे ॥१४॥ प्रियाभिलापी प्रियवाकलावान् प्रियाजितः कामकला विधिज्ञः ॥ हास्यप्रियः क्षाममुखोचनाशः पंढप्रियो युग्मगते हिमांशौ ॥४५॥ मिथुनका चंद्रमा हो तो नित्य प्यारीकी अभिलापा रहे पियवाणी कहे कलावाला होवै स्त्रीके घशवर्ती रहे कामदे- वकी कलाओंकी विधि जाने इंसीको प्रियमाने मुख माहा होवै नाक ऊंची हो और हीजडोंको प्रियमाने ॥ ४५ ॥ प्रासादवापीकरणानुरक्तःस्त्रीनिर्जितो ह्रस्वतनुः कृतज्ञः॥ क्षयी धनाढ्यः शशिवत्प्रजातः प्राकर्मवेत्ता खलु पीन कण्ठः॥१६॥ भूपालमंत्री वशमेति साम्ना सुहत्प्रियः शीघ्रगतिः सुवेपः॥ सतां प्रमाणः प्रचुरालयश्च कर्कसु- धांशी सलिलमियश्च ॥१७॥ कर्कका चन्द्रमा हो तो, मंदिर, बावडी, बनाने में तत्पर रहै खीका जीताहुआ रहे छोड़ा शरीर होवे ( कृतन ) कदर दान होवे, चंद्रमाकी कलाआके तरह कमी धनक्षयी कमी धनाढय रहे पूर्व कर्मका जाननेवाला वा कार्यका परिणाम प्रथमही जाननेवाला होवे यह निश्चय है कंठ ऊंचाहोय॥१६॥ - भाषाटीकासमेत। (९१) श्रुतावधारी कृशदीर्घगावः सौभाग्ययुक्तः सुमनोहरांगः॥ दारान्सुतान् लालयति स्वकीयान्सुलोचनः क्षामकटिः शिरालुः ॥५३॥ सदंभधर्माकुलवृद्धनारीरतोदयोनः परितोटनश्चासत्त्वाधिकःशीतसहः सुवेपोजातो मृगा- स्ये हरिणांकसंस्थे॥५४॥ चन्द्रमा मकरका हो तो श्रवणमासे धारण करे माडा और लम्बा शरीरहोवे, सौभाग्यवाला, सुन्दर मनोहर अङ्ग होवे, अपने स्त्रीपुत्रोंकाविशेषतर प्यार करे, सुहाउने नेत्र होवें कमर माडी होवै, शरीरमें नशी बहुत होवें ॥५३॥ धर्म दंभसे करे कुलमें श्रेष्ठ स्त्रीमें तत्पर रहे, दयारहित, चारातफ फिर- नेवाला भी होवे, बलवान् अधिक होवै, शीतसहारनेवाला, अच्छे वेषवाला रहे ॥५४॥ शिरालोष्ठग्रीवः पृथुजघनपृष्ठास्यचरणः परान्नी प्रेयस्यां सततनिरतो लोमशतनुः॥ भृशं पानासक्तः परसुतयुतः पापनिरतः कुनेत्रः शीतालुर्घटभृदियुते शीतकिरणे॥५५॥ चन्द्रमा कुम्भका हो तो शरीरमें नश बहुत होवें, ऊंटके समान लम्बी गर्दन होवै, जंधा तथा पीठ मुख चरण स्थूल होवे परान्नखानेवाला होवे, प्रिया निरन्तर तत्पर रहे, शरी- रमें रोम बहुत होवें, अत्यर्थ पानमें आसक्त रहे. पराये पुत्रसे युक्त रहे, पाप, तत्पर रहे, लेर कुरूप होवे,शीत विशेषरहा करे ॥५५॥ मुक्ताप्रवालसरसीरुहभोगकारी धारी महानिधिविभूप- णवाससां च ॥ दारानुरागविजितः समदेहतुङ्गनासो - (९०) जातकशिरोमणि- प्रांशुः सूत्रतनासिकः कृशवपुः प्राज्ञः प्रियानिर्जितः साधाह्मणदेवमाननपरः प्राज्ञः शुचिर्धार्मिकः ॥ साधू- नामुपकारकोथ कुशलो दक्षःक्रये विक्रये सद्भिर्बन्धुभिरु- ज्झितः शशधरे जूकस्थिते जन्मनि ॥५०॥ चन्द्रमा जन्ममें तुलाका होतो ऊंचा शरीर, ऊंची नाक, भाडा शरीर, प्राज्ञ स्वीका जीताहुआ साधु ब्राह्मण एवं देव- ताको माननेवाला, पवित्र धर्मात्मा, साधुजनोंके उपकार करनेवाला, और समस्त कार्यों में कुशल, व्यापारमें चतुर अच्छे बन्धुवर्गसे परित्यक्त होवै ॥५०॥ जनकगुरुवियुक्तो राजदपोतिमान्यः कनकरुचिरदेहः शैशवे व्याधितश्च॥ कुलिशकमललक्ष्म्या वर्तुले जानु जंघे गुरुयुवति रतः स्यादृश्चिके शीतरश्मौ ।। ५१॥ चन्द्रमा जन्ममें वृश्चिकका हो तो पिता एवं गुरुसे युक्त न रहे, रांजाके समान घमण्ड रक्खे, अतिमाननीय, सुवर्णके समान सुहाउना शरीर. बाल्य अवस्थामें रोगयुक्त रहे, हाथ पैरोंमें बज वा, कमलका चिह्न होवे जानु तथा जंघा सुडौल गोल हो. श्रेष्ठस्त्रीमें आसक्त रहे ।। ५१ ।। वक्ता कविर्वहुधनी वशमति साना वीर्यान्वितः कनक- वर्णशरीरयटिः ॥ त्यागी मुहत्सुतसुबन्धुयुतश्च जातः स्फीतः कविर्भवति सोश्वगते हिमांशौ ॥५२॥ चन्द्रमा धनका हो तो व्याख्याकरने वाला, कविता करने वाला, बहुत धनवान होवे, सामोपायसे वश होवे, पलवान रहे सुवर्ण समवर्ण शरीर होवे दाता, मित्र, पुत्र, अच्छेयांधयों से युक्त रहे समृद्ध कवि होवे ॥५२॥ , भाषाटीकासमेत। दृष्ट होवे अन्य ग्रहोंसेन होवै.समयपदसे बलवान होवै. राशि- नाथबलवान होवै तो उक्तफलका परिपाक पूर्ण होता है ऐसे ही चंद्रमाके तरह और ग्रहोंका विचार भी फलप्राप्तिकेलिये करना ॥ ५८ ॥ यदि जन्मलग्न बलरहित और उसका स्वामी बलवान होवै तो मध्यम फल जानना । यदि राशि तथा उसका पति भी निर्बल होवै तो. फलोंमसे सर्वपापफल फलित होते हैं ॥ ५९॥ आताम्रदृष्टिः शशिमेपयोगे कुजेक्षिते भूवलये नरेशः॥ चन्द्रस्य दृग्योगसमं विलग्ने राशीशभावोत्थफलं विशेषात् ॥६०॥ परस्परं राशिसुधांशुयोगे संयोगजातं ग्रहदिक्फलं वा लग्नस्य तद्राशिपयोर्वलेन धनादिभावा बलिनो भवन्ति ॥६॥ चंद्रमा और मेषराशिका योग होवै तो नेत्र तांबेके रंगके होवें यदि मंगलकी दृष्टि भी होवै तो समस्त पृथ्वीमें नरेश होवे लंगमें चंद्रमा दृष्टियोगके समान राशीश एवंभाव जनि- तफल विशेषतासे होते हैं॥६०॥ राशि एवं चन्द्रमाके परस्पर योग होने में संयोगसे उत्पन्न मिश्रफल होता है अथवा प्रहका फल पूर्ण पूर्ण होता है राशिका कम होता है लमका फल उसराशिके स्वार्माके बलके सदृश होता है ऐसे ही अपनी राशिके स्वामीके बलानुसार धनादिभाव भी बलवान होते हैं ।। ६१ ।। अथ मेषादौ चन्द्रे प्रष्टिफलानि ॥ तारानाथे नृपालो भवति धरणिजे नेक्षिते मेपसंस्थे प्राज्ञो विदृष्टगेहे सुरपतिगुरुणा राजतुल्यो नृपो वाम जातकशिरोमणि- धनी जलपतिस्तिमिगे सुधांशौ ॥५६॥ दाता शास्त्रार्थ वेत्ता बहुयुवतिरतो दानशीलो वपुष्मान् गेयज्ञो धर्म- निष्ठो जयति रणगतान् सत्कविर्वृत्तजंघाः ॥ ज्ञाना- सक्तः सुशीलो हितजनसहितो भूपसवी सुमुद्रो विख्यातः सत्त्वसम्पत्सलिलपति धनो मीनसंस्थो सुधांशौ।।५७॥ चन्द्रमा जन्ममें मीनका हो तो मोती, मूंगा और कम- लोका भोग भोगनेवाला होवै, बड़े निधिवस्तु, भूषण और वस्त्रोंको धारण करे, स्त्रीके प्रेमसे जीता रहै, शरीर सम ऊंची नाक होवें, धनवान्, जलस्थानका अधिपति होवै ॥ ।। ५६ ॥ दाता, शास्त्रार्थ जाननेवाला, बहुतस्त्रियों में आसक्त, दानदेनेके स्वभाववाला, अच्छे पुष्टशरीरवाला, मानज्ञा धर्मनिष्ठावान्, रणगत शत्रुको जीतनेवाला, अच्छा कवि होवे, जंघा गोल होवे, ज्ञानमें आसक्त रहे. सुशील होवे. मित्रजनोंसे युक्त रहे, राजसेवी, अच्छीमुद्रावाला, विख्यात, बलसे संपत्तिमा, वरुणके समान धनवान् होवे ।। ५७ ॥ अर्थतेषां फलानां प्राप्तिमाह । कथितफलविपाको जन्मराशौ बलिटे बुधगुरुपतियुक्ता. लोकितेनान्यखेटे|समयपदबलाढये राशिनाथे वलिप्टे शशिपदपरखेटाश्चिन्तनीयाः फलात्त्यै ॥ ५८॥ वलो- ज्झिते जन्मगृहे तदीशे बलान्विते मध्यफलं प्रकल्प्य। बलोज्झितौ राशिपती फलाभ्यां पापानि सर्वाण्युपयांति पाकम् ॥ ५९॥ अब उक्तफलोंकी प्राप्ति अप्राप्ति कहते हैं कि, जन्मराशि- बलवान होवे बुध बृहस्पति और स्वस्वामिसे युक्त होवे इन्हीसे , माषाटीकासमेत। (९५) गुणोंवाला, शुक्रदृष्टिसे भयरहितहोवै ॥६॥ शनिकी दृष्टिसे सूत बननेवाला, सूर्यदृष्टिसे धनहीन हो और अतिमिष्ठ भी होवे ।। ६५ ॥ स्वः ताराधिपे योथ कवितॊ धरणीपतिः॥ लोहजीवी नृपः प्राज्ञो वेक्षिते भूमिजादिभिः ॥६६॥ स्वराशिगत चन्द्रमापर सूर्यदृष्टि हो तो कवि होव. मं० पंडित. बु० राजा वृ०लोहासे आजीवन करनेवाला शुरुराजा श० पण्डित होवें ॥६६॥ हरौ ज्योतिपज्ञो धनाढयो नृपालः सुधांशौ बुधायैः शुभैापितश्च ॥ नृपो राजतुल्योऽर्कजारिदृष्टेऽनही- नस्तुरंगाधिपोरिदृष्टः ॥ ६॥ सिंहगत चन्द्रमापर बुधादि शुभग्रहों की दृष्टिक्रमसे फल कहें कि बुधसे ज्योतिषज्ञ, गुरुसे धनाढ्य, शुक्रसे राजा होता है उसपर पापदृष्टि भी हो तो हजाम भी होताहै, शनिदृष्टिसे राजा मंगलसे राजतुल्य, सूर्यदृष्टिसे अन्नहीन भौमदृष्टिसे घोडाऑका स्वामी भी होता है ॥ १७॥ कन्याराशिगते विधी नरपतिज्ञैनेक्षिते भूचमूनाथो वासवपूजितेन निपुणः शुक्रण दृष्टेऽशुभैः॥स्त्रीणामाश्र- यिणो भवन्ति मनुजा जूके वुधाद्यैः शुभैर्भूमीनाथसुवर्ण- कारवणिजो विज्ञाः क्रय विक्रये ॥ ६८॥ कन्याराशिस्थ चन्द्रमा बुधष्ट होतो राजा, गुरुसे पृथ्वीकी समस्तसेनाका नायक, शुक्रते विद्यानिपुण पापग्रहोंसे दृष्ट हो तो मनुष्य खियोंके आश्रयवाले होते हैं। तुलागत चंद्रमापर बुधादिशुम ग्रहोंकी दृष्टि हो
(९४) जातकशिरोमणि-
प्राज्ञो भूनाथमान्यो भवति निधिपतिः शुक्रदृष्टंकदृष्टे
निस्वः संग्रामकांक्षी भवति रविसुतेनेशिते चीर-
नाथः॥ ६२॥
अब मेषादिराशिगत चंद्रमापर ग्रहदृष्टिफल कहते हैं।
जो मेषके चंद्रमापर मंगलकी दृष्टिहोवै तो मनुष्योंका पालन
करनेवाला होता है बुधदृष्ट देह हो तो विद्वान. गुरुदृष्टि से
राजतुल्य अथवा राजा होता है शुक्रदृष्टिसे विद्वान,राजमान्य
निधिका स्वामी, सूर्यदृष्टिसे निर्धन और लडाई की इच्छा,
रखनेवाला और शनिदृष्टिसे चोरोंका राजा होता है ॥ ६२॥
निस्वचौरो राजमान्यो नृपालो द्रव्यस्वामी प्रेप्यनाथः
कुजायैः ॥ तारानाथे गोगृहे दृष्टमूतों गोभृत्याढयो
वीक्षितो भास्करेण ॥ ६३ ॥
वृषराशिस्थ चन्द्रमापर भौमकी दृष्टि हो तो निर्द्धन, मया
चोर होवै बुधदृष्टिसे राजमान्य, गुरुसे राजा शुक्रमे धनमा
स्वामी शनिसे भृत्योंका स्वामी सूर्यदृष्टिसे गौ एवं चाकमि
युक्त रहे ॥ ६ ॥
शस्त्राणां घटनविधौ प्रधानदो इंद्रस्ये शशिनि कुजे.
क्षिते नृपालः ॥ विष्टे विविधगुणी सुरेज्यदृष्टे भीहीनो
भृगुजनिरीक्षिते प्रजातः॥६॥ मिथुनस्थे सुपारमा
तन्तुवायः शनीक्षिते ॥ धनहीनोऽतिधमिष्टो दिवाक-
रसमीक्षिते ॥ ६॥
(९६) जातकशिरोमणि- तो क्रमसे ये फल हैं कि, दुधसे भूमिनाथ गुरुसे सुवर्ण करने वाला शुक्रसे क्रयविक्रयमें निपुण व्यापारी होते हैं। ६८ ॥ तुलराशिगते चंद्रेरव्यारार्किनिरीक्षिते ॥ग्रहराशिस्वभा- वेन जायन्ते पापभागिनः॥ ६९ ॥ तुलाराशिगत चंद्रमापर सूर्य, मंगल, शनिकी दृष्टि हो तो ग्रह तथा जिसराशिमं वह पापग्रह हैं उसके स्वभावानुसार मनुप्य पापफल भागी होते हैं ।। ६९॥ वृश्चिके शशिनिजारजोटनोरंगकारकविभुर्विगतांगः॥ वीक्षिते विधनपोनरपालश्चंद्रजादिगगनाविवासिभिः७० घृश्चिकराशिगत चन्द्रमापर युधकी दृष्टि हो तो जारग वा जारजोंके साथ फिरनेवाला गुरुसे रंग यनानेयाला शुक्रसे सर्वसामर्प शनिसे अंगहीन सूर्यसे निर्द्धन और मंगलसे राजा दोये ।। ७० ॥ ज्ञातीशो नृपतिर्जनक्षितिपतिश्चन्द्रे तुरंगस्थिते दृष्टे विद्ग- रुभार्गवेगगनगःप्रापैः सदंभः शठः ।। शुभ्राशी मकरे नरेशतिलको राजा गुणाग्रो धनी दारियोपडतो नृपो भवति ना हऐ बुधधिग्रहः ।।७१ ॥
भाषाटीकासमेत। (९७)
परापवादनिपुणोऽन्यत्रीरतः पापभाङ्मीने हास्य
रुचिर्नुपौ गुणपतिः पापैश्च पापास्पदः ॥ ७२ ॥
कुंभके चन्द्रमापर बुध गुरु शुक्रष्टिसे राजा वा राजतुल्य
पराक्रमी, धनदेनेवाला और पापग्रहोंकी दृष्टिसे दूसरेपर
कलंकलगानेमें निपुण, परस्त्रीगामी, पापी होता है मीनके
चन्द्रमापर वुधादिदृष्टि हो तो क्रमसे. ( हास्यरुचि) हंसी
दिल्लगीवाला, राजा, गुणोंका स्वामी होता है पापग्रहदृष्टि
से पापका घर जानना ॥७२॥
राशौ राशौ यथा चन्द्र ग्रहाणां हटिजं फलम् ।। तथा
होरादिवर्गस्थे हक्फलं चंद्रवद्हे ॥७३॥
जैसे यहां प्रत्येक राशि चंद्रमाके फल प्रत्येक ग्रहदृष्टिसे
कहेहे तैसेही होराद्रेष्काण सप्तांश नवांश द्वादशांशोंमें भी
प्रहफल होते हैं ।। ७३ ॥
अथ होराफलमाह।
विपभादिदलोपगतेस्तदुपगः कुमुदाकरवान्धवः ॥
शुभफलो गदितः किल वीक्षितोऽशुभफलो विपमे
स्वदले स्थितः॥ ७४ ॥समे स्वहोरासु गतः शशांक-
स्तत्स्थग्रहैर्वीक्षितविग्रहश्च ॥ शुभप्रदोसावशुभोकहो-
रागतः शशी को गदितः पुराणैः ॥ ५॥
जातकशिरोमणि- चन्द्रमा चन्द्रहोरास्थित ग्रहोंसे दृष्ट भी शुभ फल देता है यदि सूर्यहोरागत समराशिमें हो उसे सूर्य होरास्थित ग्रह देवे तो अशुभ फल देनेवाला पूर्वाचार्यांने कहा है ।। ७५ ॥ अथ होरादिपवर्गस्थे लग्ने चन्द्रवत्फलमांह । विषमभवनसंस्थः प्राग्दलं जन्मकाले तदुपगतखगेंद्रे- यत्र कुत्रापि दृष्टिः।। समभवनसमा तद्गतेः खेचरें- यदि भवति सुदृष्टं तच्छुभं जन्म विन्यात् ॥७६ ।। विपमसमगृहाई सत्फलं दृष्टिजातं भवति तदपसव्ये व्यत्यये सर्वमेतत् ।। भवनसमविभागे खेचरांशे सुधांशी खचरनयनजातं कल्पयेत्तुल्यमेव ॥७७ ॥ अयहोरा आदिपगंगतलनोंमें चन्द्रमाफे तुल्य फल पाहते ह। जन्मकालमें लग्न या प्रद विपमराशिके पर्षदल अर्थात सर्ग होरामें हो उसपर सूर्यहोरास्थित प्रह किसी स्थानसे देये तथा ममराशिके पर्यदल अर्थात् पन्द्रहोरास्धिनको पन्द्रहोरा गत मह किसी स्थानसे देगे तो .गुम जन्म जानना ॥१६॥ विषम या सम राशिके जिस दलमें है टमी दलगन रमे देखे तो शुभफल और टलटेमें एवं व्यत्ययमें यह पाल नहीं होना राशिक समषिमागमे प्रहाश पन्द्रमा पन्द्रमापर जमा इष्ट फल कहा है उसके तुल्य समी ग्रहोंका पर जानना ॥ ७ ॥ यस्व विभागे खलु गविनायो पिलोफिनग्तत्पतिनाव मित्रः॥ शुभप्रदो जन्मनि वा काणे तनाथहए शुभदं . विलग्नात ।। ७८॥
भाषाटीकासमेत। फल जन्ममें कहा है परंतु सभी जगह ऐसाही विचार करना चाहिये ॥ ७८ ॥ अथ रव्यादिनवांशकस्थे चंद्र ग्रहदृष्टिफलमाह । भौमांशके शशिनि भास्करदृष्टदेहे ग्रामे पुरेष्वधिकृतः खलु रक्षणायैः ॥ भौमेक्षिते नरपतिर्बुधवीक्षिते च युद्धे भुजस्य कुशलो गुरुणा नृपश्च ॥ ७९ ॥ जातो धनाढयो भृगुणाऽर्कजेन विकत्यनोज्ञो कलहान्वितश्च। मूर्खः सिताशे रविणा कुजेन परांगनाप्रीतिपरोऽर्थ- लुब्धः ॥ ८० ॥ बुधेक्षिते भारविकालिदासतुल्यः कवित्वे सुकविः सितांशे ॥ सत्काव्यकर्ता गुरुणा सितेन सुखाऽनुरक्तः शनिनान्यदासः॥ ८॥ अब सूर्यादिनाशगत चन्द्रमापर ग्रहदृष्टिफल कहते हैं। भौमांशकगत चंद्रमापर सूर्यकी दृष्टि हो तो ग्राम वा नगरमें रक्षा आदिके काममें अधिकारी. कोतवाल प्रधान आदिहोवे मंगलकी दृष्टिसे राजा बुधदृष्टिसे (बाहुयुद्ध) कुस्तीमें चतुर गुरु- दृष्टिसेराजा॥७९॥शुक्रसे धनाढ्य शनिदृष्टि से कलहवाला झूठी गप्प उडानेवाला तथा अज्ञ भी होता है शुक्र नवशिकगत चन्द्रमापर सूर्यदृष्टि हो तो मूर्ख मंगलकी परस्त्रीके प्रेममें तत्पर तया धनलोलुप ।। ८० बुध देख्ने तो भारवि वा कालिदास समान सुकवि होवे गुरुदृष्टिसे उत्तम काव्यरचनेवाला शुक्रसे मुखमें तत्पर और शनिदृष्टिसे दूसरेका दास बनारहै ॥८॥ समरभूमिचरो रविवीक्षिते धरणिगर्भभवेन च तस्कर। शिशिररश्मिजदृष्टतनौ विधौ भुवि कवीन्दपदं लभते नरः ॥ ८२ ॥ सुरगणार्चितदृष्टसधाकरे नृपतिमंत्रिपदे- (१००) जातकशिरोमणि- धिकृतो नरः ॥ भृगुजष्टतनौ कुमुदाधिपे हृदयहा- रिसुगीतपरो नरः ॥ ८३ ॥ शशिनि शिल्पनिधिः शनिवीक्षिते बुधनवांशगतेऽथ निजांशके ॥ परध- नाहरणो रविवीक्षिते कृशधनः क्षितिजेन सुधाकरे ॥ ॥८४॥ परद्रव्यलुब्धो बुधेनेक्षितेन्दौ तपोनिष्टमुख्यः सुरेज्येन दृष्टे ॥ सितप्रेक्षिते कामिनीपालितः स्वे न- वांशे स्वकृत्येपु शक्तः शनीक्षे ।। ८५॥ बुधनवांशस्थ चन्द्रमापर सूर्यदृष्टि हो तो रणभूमिमें फिर नेवाला होवे मंगलकी दृष्टिसे चोर, बुधदृष्टिसे संसारमें कवीन्द्रपद पावै ॥ ८२॥ यदि टस चन्द्रमापर गुरुदृष्टि हो तो राजाके मंत्रिपदाधिकारी होवे, शुक्रदृष्टिसे मनको हरण करनेवाले सुन्दरगीतमें तत्पर रहे । ८३ ॥ शनिसे दृष्ट हो तो शिल्पजन्य निधिवाला होवे । अब निजांशकस्थके फल कहते हैं कि, स्वनाशकी चन्द्रमापर सूर्यकी दृष्टि हो तो परधन लेनेवाला होये भौमदृष्टिसे मल्प धनी ॥ ८४ ॥ युधदृष्टिसे पराये धनफालालची, गुरुष्टिसे तपस्या निष्टारखनेवालोंमें मुख्य होये शुक्रदृष्टिसे ीसे पालिनग्हे शनिदृष्ट हो तो अपने कार्यामें आसक्त रहे ।। ८५॥ गुरुभवननाशे पारुपेप्प प्रसिद्धः समरसमयदेशव्यूहक- मोपदेशा ॥ सततहसनशीलो राजमंत्री विकामो रवि- मुखखगदृष्टे धर्मनिष्टः मुधांशी ।। ८६॥
70/) भाषाटीकासमेत। (१०१) स्वल्पप्रजोर्कजांशेन्दौ धनपूर्णोतिदुःखितः ॥ नृपस- न्मानगर्विष्टः स्वकुलोचितकर्मकृत् ॥ ८७॥ दुष्टनि- यासु निरतः कदयों विभवे सति ॥ सूर्यादिष्टे शशिनि भानोश्च शशिवत्फलम् ॥ ८८॥ "शनि नवांशकस्थ चन्द्रमापर सूर्यदृष्टि हो तो संतान अल्प होवें मंगलकी दृष्टिसे धनसे पूर्ण,बुधसे अतिदुःखित,बृहस्पतिसे राजसन्मानसे गर्ववाला, शुक्रदृष्टिसे अपने कुलके उचितकर्म- करनेवाला ॥ ८७ ॥ शनिदृष्टिसे दुष्टभार्याओंमें तत्पर और ऐश्वर्यहुयेमें भी कृपण होवै चन्द्रमापर सूर्यादिदृष्टिके इतने फल कहे हैं ऐसे ही फल सूर्यके भी तत्तन्नवांशकस्थ होनेमें प्रत्येक ग्रहके जानने ॥ ८८ ॥ शशिनवांशयुतौ ग्रहदृष्टिजं तदपि लगनवांशयुतैः फलम् ॥ रविसुधाकरयोग्रहदृष्टिजं समफलं प्रवदन्ति तनावपि ॥ ८९॥ चन्द्रमा और नवशिकके योगमें जो फल ग्रहदृष्टिके कहे हैं वही लग्न नवांशकके योगसे होते हैं तथा सूयचन्द्रमाके जो फल प्रहदृष्टिके हैं उन्हीके तुल्य फल लग्नमें भी होते हैं ॥ ८९।। भौमांशके चन्द्रयुतेकदृष्टे ग्रामाऽधिकार्यादिफलं यदु- क्तम् ॥ भौमेक्षिते घातरुचिः फलं यत्तचन्द्रदृष्टेऽर्ककु- जाशयोगे॥९॥ नवांशके दृष्फिलं शुभं यद्वोत्तमे तत्परिपूर्णमुक्तम् ॥ स्वाशे शशी.मध्यमतो फलस्य परांशके स्वल्पफलं शुभं स्यात् ॥९॥ परनवांशगते कुमुदाऽधिपेऽशुभफलं सकलं सफलं तदा ॥ स्वनवभा- गगते खलु मध्यमं गृहसमांशगतेऽथ फलं लघु ॥ ९२ ॥ है
(१०२) जातकशिरोमणि-
जो मंगलके नवांशमें सूर्यदृष्ट चन्द्रमाका ग्रामाधिकारी
आदि फल कहा है तथा मंगलकी दृष्टिसे घातरुचि फल जैसे
कहा है तैसे ही सूर्य नवांशगत मङ्गल मङ्गलनवांशगत सूर्यपर
चन्द्रमाकी दृष्टि होनेमेंभी कहना ॥ ९० ॥ जो नवांशकमें
शुभ फल दृष्टिका कहा है वह वर्गोत्तमांश होने में पूर्ण होता
है अपने अंशकमें चन्द्रमा हो तो फल मध्यम और शत्रुकें
अंशकमें होनेपर अल्प होताहै ।। ९१ ॥ चन्द्रमा शत्रुनवां
शकमें हो तो संपूर्ण अशुभफल सफल होता है अपने
नवांशकमें हो तो मध्यम. अर्थात् शुभफल तो नहीं
देता परन्तु स्वनाशकी होनेसे अशुभ भी नहीं देगा
समग्रहके राशिनर्वाशकमें हो तो अल्पफल देता है ।। ९२ ॥
मेपांशके ग्रामपुराधिकारी शुभं फलं घातरुचिस्तद-.
ग्र्यम् ॥ वर्गोत्तमे पूर्णफलं शुभं स्यात्तुच्छं यदन्यत्क-
थितं फलाप्त्यै ॥ ९३॥ नवांशनाथः परिपूर्णवीयों
बलेन हीनो गृहनायकश्च ॥ नवांशनाथो ग्रहदृष्टिरा-
शिफलं विनाश्यांशफलं ददाति ॥ ९४॥
मेषांशकस्थ चन्द्रमापर सूर्यदृष्टिसे ग्रामपुराधिकारी भौम-
दृष्टिसें घातरुचि आदि प्रत्येकमहके जो शुभाशुभ फल कहें
हैं. वे. चन्द्रमाके वर्गोत्तमांशकी होनेमें. शुभफल पूर्ण होता है
अशुभ फल भी ग्रहदृष्टिका हो तो नहीं होनेपाता और प्रकार
शत्रुनीचादि नाशकी हो तो शुभ फल तुच्छ होते हैं अशुभ
पूर्ण होतेहैं।९शानवशिश पूर्ण बली और राशीश निर्बल हो तो
नवशिश मह दृष्टिजन्य राशिफलको नाश करके अपना फल
देता है ॥ ९४॥
भाषाटीकासमेत। (१०३) भास्करादिनयो वित्तं ज्ञानधीनपुणं तथा ॥ अक्म मध्यमं पूर्ण केन्द्रादौ शशिनि स्थिते ॥ ९५ ॥ मूर्खा विशीलाश्चपला दरिद्रा केंद्र सुधांशी धनिनो द्वितीये॥ आपोक्किमस्थे गुणिनः सुशीला भवन्ति मा रवितः क्रमेण ।।९६॥ सूर्यसे चन्द्रमा केन्द्र में हो तो नम्रता धन. (जान) ईश्वर तथा ऐश्वरीय प्रपंचका जानना. (निपुणता) शास्त्रादि ज्ञात (धी)धारणादि शक्ति अधम होती हैं आपोक्किममें हो तो मध्यम और पणफरमें हो तो पूर्ण होते हैं ॥९५ ॥ इसीका खुलासा कहते हैं कि मूर्य से चन्द्रमा केन्द्र में हो तो मनुष्य मूर्ख, शीलरहित, चंचल, दरिद्री होते हैं पणफरमें हो तो धनवान् आपोक्किममें हो तो गुणवान् और सुशील क्रमले होते हैं ।। ९६॥ अथाधियोगः ॥ सौम्यायारिपुनिधनगैः संस्मृत- श्वाधियोगः ॥ सेनापालो भवति नृपतेमैत्रपालो नरेशः ॥ चन्द्रस्थानाद्विभवसहिंता रोगमुक्ताः सुखान्याः॥ सर्व संपत्सहितनिलया नष्टविपिणश्चा॥९॥ अधियोग कहते हैं कि, चन्द्रमासे ६ । ७।८ भावोंमें शुभ- ग्रह हों तो अधियोग होता है इसमें विशेषता यह है कि ६. ८ में से एकमें शुभग्रह हों तो सेनापति दोनोंमें राजमंत्री तीनोंमें हों तो राजा होता है और अधियोगवाले रोगरहित, सुखयुक्त संपत्तिसे पूर्ण घरवाले तथा शत्रुनाशी भी सभी होते हैं ।। ९७ ॥ + - (१०४) जातकशिरोमणि- चन्द्राहितीये मुनफां वदन्ति ग्रहेऽनफां द्वादशधाम- संस्थे ॥ द्विादशे दौरुधरां विनाकै योगास्त्रयोमी क्षितिपालसंज्ञाः ॥ ९८ ॥ चंद्राद्वितीयभवनं रहितं ग्रहेण रिष्फ तथा भवति केममहीरुहाख्यम् ॥ योगे नृपालकुलजा अपि दुःखभाजो नूनं भ्रमंति परितो वसनानहीनाः ॥ ९९ ॥ केन्द्रे सुधांशुम्रयुक्तकेंद्र केमद्रुमस्य प्रकरोति भंगम् ॥ सर्वैर्ग्रहएतनी सुधांशी तथापि तद्भगमुशति सन्तः ॥१०॥ चंद्रमासे दूसरे भावमें सूर्यरहित कोई ग्रह हो तो सुनफा, बारहवेंमें हो तो अनफा, दोनो तर्फ हों तो दुरुपरा योग कहते हैं ये तीनों योग राजयोग संज्ञक हैं ॥९८ ॥ यदि चन्द्रमासे २१ १२ स्थान ग्रह रहित हों तो केमद्रुम योग होता है इस योगवाले राजकुलमें भी जन्मे हों तो भी दुःख भोगने- वाले अन्नवस्त्रसे हीन होकर इधर उधर फिरनेवाले होते हैं ॥ ९९ ॥ केमद्रुममंग कहते हैं कि, चन्द्रमा केन्द्रमें हो कोई प्रह केंद्रमें हो तो केमद्रमभंग होता है यदि लग्न वा चन्द्र माको संपूर्ण ग्रह देखें तो भी इसयोगका भंग सजन कहते .हैं ॥ १०॥ मनोदुःखहीनोऽनफायां प्रजातः प्रभुः ख्यातकीर्तिनिरु- ग्देहयष्टिः ॥ विशालोरुवक्षः मुबाहुः मुनेत्रः कविवन्धु- पालो नृपालोऽथवा स्यात् ॥१०१ ॥ त्यागान्वितो धनविभूपणवाहनाल्यो भोगान्वितो दुरुपराप्रभवः सुभृत्यः ॥ केमहमे नृपतिवंशसमुद्भवोऽपि निःस्वः भाषादीकासमेत। (१०५) परानपरगेहनिवासदुःखी ॥ १०२ ॥ योगस्तृतीयः सुनफाऽनफाभ्यां भौमादिभिदौरुधराख्यभेदः॥ चंद्रा- दियोगे गदितस्तु पूर्वैः प्रभाकरं तवतु वर्जयित्वा॥१०३॥ जिसका जन्म अनफायोगमें भया वह मानसीदुःखोंसे रहित, सर्वसामर्थ्य, विख्यातकीति, निरोगशरीर, बढे करू बड़े वक्षस्थलवाला, सुन्दर नेत्र सुन्दर भुजावाला, कविता करनेवाला, बंधुवर्गका पालनकरनेवाला अथवा राजा ही होता है ऐसे ही सुनफावाला भी जानना ॥ १०१॥ दुरुधरा योगवाला, दाता, धनभूषण वाहनयुक्त, भोगवान और अच्छे सेवकोंवाला होता है केमदुमयोगमें राजवंशमें उत्पन्नहुआ भी निर्द्धन, परान्नभोगी, पराये गृहमें निवाससे दुःखी रहता है ॥ १०२ ।। जो सुनफा अनफासे तीसरा योग दुरुधरा संज्ञक भेद है भौमादिग्रहोंसे चन्द्रादियोगों में कहा है उसका भी अनफाके तुल्य फल जानना इनयोगोंमें सूर्य वर्जित है ॥ १०३ ॥ पंचैकेन दश द्वाभ्यां दशयोगास्त्रिभित्रिभिः ॥ योगा- श्चतुर्मिः पंचात्र एको योगश्च पंचभिः ॥ १०४॥ सुनफा संज्ञकास्त्रिंशत्तावतश्चानफाख्यकाः॥ विपरिदौ- रुघरका गदिताश्च पुरातनैः ॥ १०५॥ यावद्रिकल्पं विलिखेदधोधस्तदंततोत्युक्तममूर्द्धमाद्यात् ॥ उत्पाद्य- मायेन पुनः पुनस्तदंत्येन हीनःसुनफानफौ स्तः।।१०६॥ अनका सुनफा दुरुधरा योगोंके भेद कहते हैं कि एक योग भौमादि पांच ग्रहोंकरके पांच भेद दोनोंके पांच पांच होनेसे दश. तीनोंके १०१ १०१ चार ग्रहोंसे ५ और पांचोंसे जातकशिरोमणि- एक ये३१ भेद होते हैं ॥१०४॥ ऐसे ही सुनफाके ३१अनफाके ३१ हैं दुरुधराके १८० प्राचीनाचार्योंने कहे हैं॥ १० ॥ जितने विकल्प हों उतने ऊपर पहिला लिखके उसके नीचे नीचे क्रमसे लिखतेजाना। प्रथम विकल्पसे सभीको उत्पन्न करके पारंवार स्थापना करके अंतविकल्पघटाय देना ऐसे सुमफा छनफाके प्रस्तार होते हैं इनके पूरे विकल्प तथा प्रस्तारक्रम यहां ग्रन्थबढनेके भयसे नहीं लिखे. मेरी बनाई हुई बृहज्जातकमाहीधरी भाषाठीकाके चन्द्रयोगाध्याय श्लोक ४ विंशस्वरूपा इत्यादिमें पूरा पूरा विस्तार लिखा है पाठक देखलेवे ।। १०६ ॥ घरणिजसुनफायामुद्यमी शूरयुक्तः शशिसुतविहितायां नृत्यचित्रादिवेत्ता ।। भवति लिखनशिल्पी सर्वकार्येषु दक्षः परजनहितकारी कामचारी मनुष्यः ।। १०७॥ चन्द्रात्कुटुंबोपगते सुरेज्ये धनेन धर्मेण च सौख्ययुक्तः॥ महीशपूज्यो महनीयकीर्तिद्धमक्रियाप्येव धनव्ययी च।।१०८॥ प्रत्येक ग्रहकृत सुनफाके फल कहते हैं। मंगलकृत सुनका हो तो उद्यमी शूरत्व यक्त होव, बुधमें नाच, चित्रकारी जाने लिखनेका कारीगर हो समस्त कामोंमें चतुर होवे, दूसरे 'मनुष्य का भी हितकरे तथा,स्वेच्छाचारी मनुष्य होता है। १०७ चंद्रमासे दूसरा बृहस्पति हो तो धनते, धर्मसे मुखयुक्त रहे राजज्य पही फीतिकाला और धर्मकार्य में बनव्यय करने वाला होवे ॥ १०८॥ भृगौ स्वभावोपगतेऽतिलोलः प्रियामु कामेन धनेन पूर्णः ॥ सुखप्रियः स्पर्शसुगंधरूपरसानुरक्तो गणपूजि- भाषाटीकासमेत। (१०७) तश्च ।। १०९ ॥ परगृहपरवस्त्रवाहनानामुपभोक्ता पर- वैभवेन पूर्णः ॥ रवितनयगते कुटुंबराशौ परपरिवार- युतो गणेश्वरश्च ॥११०॥ चंद्रमासे शुक्र.दूसरे भावमें हो तो प्रियामें अतिलोलुप कामसे एवं धनसे परिपूर्ण सुखाभिलाषी सूंघने, देखने, सुनने छूने, स्वादलेने, जो ये ५ वर्गादींद्रियोंके गुण हैं इनमें आसक्त और बहुत मनुष्योंसे पूजाजावै॥ १०९॥ शनि हो तो पराये घर, वस्त्र, वाहनोंको भोगकरे पराये ऐश्वर्यसे पूर्णरहे पराये कुटुंबसे कुटंबी होवै. बहुतमनुप्योंका स्वामी भी होवे ।।११०॥ यावद्विकल्पं विलिखेदिलोमं पूर्णेन पूर्णेन परनिहन्यात्।। कृत्वादितं प्राग्गुणहीनयुक्तमेव विदुौरिधरप्रभेदान ॥ ॥११॥दारिद्योपहतस्य जन्म दिवसे दृश्ये शशी चेत्स्थिते लुप्तेः शशिनि स्थिते नरपतेरैश्वर्ययुक्तो भवेत् ॥ दृश्येर्दै हिमदीधितौ नरभवो रात्रौ यदैश्वर्य- युक् लुप्तेर्दै गलितः शशी निगदितो जातो दरिद्रो भवेत् ॥ ११२॥ इनयोगोंके जितने विकल्प हैं उलटे लिखके पूर्णसे पूर्णको हतकरना भाधाकरके पूर्व गुणितमें यथासंभव हीन वा युक्त करना इसप्रकार दुरुधराके भेद होते हैं ॥ १११ ॥ जिसके जन्ममें चन्द्रमा (दृश्याई ) चतुर्थसे उपर दशमके भीतर हो और जन्म दिनका हो तो दरिद्रसे पीडित रहे जो (लुप्ताई) चतुर्धके भीतर दशमके ऊपर हो तो ऐश्वर्यवान हो। रात्रिके जन्ममें चन्द्रमा दृश्यार्द्धमें हो तो ऐश्वर्यवान् लुप्ता में हो तो दरिद्री होवे ।। ११२॥
(१०८) जातकशिरोमणि- अथ धनवत्ताविचारः। दशविलाभारिगतः शुभाश्च महाधनो मध्यधनः शुभा- भ्याम् ॥ विलग्नतो वामृतरश्मितो वा शुभेन मध्यादध- नश्च कश्चित् ।। ११३॥ पापाः शुभा इव धनेन विव- ईयन्ति व्यायारिमध्यभवने शशिनोथ लगात् ॥ ते मध्यमन्दिरगता अपि वर्द्धयन्ति हित्वा फलं भुजगयो- गभवं विशेपात् ॥ ११४॥ चन्द्रमासे अथवा लग्नसे समस्तग्रह १०१३।१२६६भावों में हों तो महाधनी होवे यदिशुमअशुभ ग्रह हों तो मध्यम धनी यदि एक शुभ ग्रह हों तो मध्यधनी और कोई निर्द्धन भी होजाता है ॥ ११३ ॥ उपचय ३॥ १२॥ ६॥ १० स्थानों में लमसे या चंद्र- मासे पापग्रह शुभग्रहोंके जैसा शुभ फल देते हैं और घेही दशमभावमें भी होनेसे विशेष करके भुजगयोगका फल काट- कर धनबहाते हैं।॥ ११४ ॥ अथ चन्द्रमावफलम्। तनी चन्द्र प्रेप्यो भवति च जडो मृकबधिरः स्वगेहोचे तस्मिन्वहुसुतधनो द्रव्यभवने ॥ कुटुम्बी द्रव्याढयो भवति सहजे मारणपरः सुखे सौख्यासक्तो भवति तन- येऽपत्यसहितः॥ ११५॥ रिपी नकद्धेप्यो भवति मृदु कायानलमदः स्वभावेन कुरो भवति न पटुः कार्यक- रणे ॥ मदे कामेनाढयो भवति परसम्पत्स्वसंहनः सुबुद्धी रंधेन्दी भवति नियतं व्याधिसहितः ।।११६॥ भाग्ये सौभाग्ययुक्तो भवति गुणधनो बन्धुमिवान्म- भाषाटीकासमेत। (१०९) जाट्यः कर्मप्राप्ते सुधांशौ शुचिरतिधनधीसंयुतो धर्म- निष्टः॥ भावे लाभाभिधेये भवति गुणधनैः सुप्रसिद्धः सुवन्धू रिष्फे क्षुद्रोंगहीनो परिभवपतितो नेत्ररोगातु- रश्च ॥ ११७॥ चन्द्रभाव फल कहते हैं कि, लग्नमें हो तो दूसरेका दूत होवे और गूंगा, बहरा मूर्ख होवे, यदि वही लग्नमत चन्द्रमा स्वगृही वा अपने उच्चका होवे तो बहुत पुत्र बहुत धन होवै द्वितीयस्थानमें हो तो कुटुम्बी और धनाढय भी होवै. तृतीय हो तो मारणमें तत्पर रहे चतुर्थ हो तो सुखमें आसक्त रहे पंचम हो तो सन्तानवाला होवै ॥ ११५ ॥ छठाहो तो अनेक शत्रु होवें तथा शरीर, जाठराग्नि मंदं मृदु होवै स्वभावकरके क्रूर होवे कार्य करने में चतुर न होवे सप्तम हो तो कामसे युक्त सुबुद्धि तथा पराई सम्पत्तिको न सहारे अष्टम हो तो रोगयुक्त रहे ॥ ११६ ।। नवम हो तो सौभाग्ययुक्त गुणहीन धनवाला बन्धुमित्रोंसे युक्त, दशम होतो पवित्र बहुत धन बड़ी बुद्धिसे युक्त तथा धर्ममें निष्ठा रखनेवाला होवे ग्यारहवा हो तो गुण और धनोंसे सुप्रसिद्ध होवे अच्छे बन्धुवर्ग होवें बारहवां हो तो क्षुद्र, अंगहीन तिरस्कारसे पतित और नेत्र रोगसे रोगी भी रहे ॥ ११७॥ अथ चन्द्रदेष्काणफलम्। आत्महकाणेथ सुहहकाणे जातः शशी मंगलतुल्य- रूपम् ॥ गुणप्रशस्तं च समहकाणे कुलस्य शत्रौ गुण रूपहीनम् ॥ ११८॥ व्यालहकाणायुधभृकाणचतु- पदाख्याण्डजमे सुधांशी ।। हिंखोतनिन्यो गुरुतल्प- गामी परिश्रमं मार्गगतः करोति ॥ ११९॥ सिंहाजयो " (११०) जातकशिरोमणि- मध्यचतुष्पदाख्यौ कीटादिमौद्योभुजगहकाणौ।कर्का- श्वयोरादिमपक्षिसंज्ञौद्रेष्काणमध्ये यवनोपदिष्टौ।।१२०॥ चन्द्रद्रेष्काण फल कहते हैं। चन्द्रमाके अपने द्रेष्काण वा मित्रके नेप्काणगत होनेमें जिसका जन्म हो वह मंगल तुल्य. रूप, अर्थात् मंगलमूर्ति होता है समद्रेष्काणमें अपने कुलानुरूप गुणोंसे प्रशंसनीय और शबुद्रेष्काणमें गुण एवं रूपसे हीन होता है ॥१८॥यदि चंद्रमा, सर्पशस्त्रधारी, चतुप्पद अण्डजद्रेष्काणोंमें से किसी में हो तो पराई हिंसाकरनेवाला, अतिनिध'गुरुपत्नी गमनकरनेवाला होवे और मार्ग परिश्रम करनेवाला होता है ।। ११९ ॥ इन द्रेष्काणोंकी संज्ञा कहते हैं कि, सिंहमेषके मध्य द्रेष्काण चतुप्पद, कर्क वृश्चिकके पहिले २ भुजग. कर्क धनके पहिले पक्षिसंज्ञक द्रेष्काण यवनाचार्यने कहे हैं । यहाँ उक्त द्रेष्काणसंज्ञा अन्य प्रमाणप्रन्थोंसे ठीक नहीं मिलती प्रमाणादिक तो यह है कि, वृश्चिकके पहिला दूसरा कर्कके दूसरा तीसरा मीनका तीसरा ये सर्प द्रेष्काण हैं मेषका प्रथम तीसरा. मिथुनके द्वितीय तृतीय. सिंहके दूसरा तीस- रा कन्याका दुसरा तुलाका तीसरा धनका पहिला तीसरा मकरका तीसरा ये आयुधधारी.द्रेष्काण है मेषका दूसरा वृषके दूसरा तीसरा कर्क सिंहके पहिले कन्याका दूसरा धनका प्रथम ये चतुष्पद हैं मिथुनका दूसरा सिंहका प्रथम तुलाका दूसरा कुंभका प्रथम ये पक्षिद्रकाण हैं जहां चंद्रमा दो द्रेष्काणों में हो तहां फल भी दोही होंगे जैसे अपने और सर्प ट्रेकाणमें कर्कराशिमें हो जाता है ।। १२० ।। मेषादिनवांशस्थ चन्द्रफलम् । चौरो भोक्ता भवति गुणवान्द्रव्यपूर्णो नरेशः क्वीवःशूरो भवति नियतं याचको दासवृत्तिः ॥ पापासक्तो मलिन - भाषाटीकासमेत। (१११) वदनः प्राणिपाती मनीपी प्रागुक्तार्थे भवति तदधीशश्च वर्गोत्तमांशे ।। १२१ ॥ मेषादिनवांशगत चन्द्रमाके फल कहते हैं कि, चंद्रमा मेष नवांशमें हो तो चोर, वृषमें भोग भोगनेवाला, मिथुनमें गुण- वान,कर्कमें धनसे पूर्ण, सिंहमें नरपति, कन्यामेंनपुंसक, तुला में शूरमा,वृश्चिकमें भीख मांगनेवाला, धनमें गुलामवृत्तिवाला, मकरमें पापासक्त, कुंभमें मलिनमुख तथा प्राणिघाती, मीन में पंडित होवे वही चंद्रमा यदि वर्गोत्तमांशमें होवै तदुक्त फलोंका आधिपति होता है जैसे मेषके मेषांशमें हो तो चो- रोका अधिपति वृष वृषांशमें गुणवानोंकानायक इत्यादि१२१॥ द्रव्यस्वभावप्रतिरूपपण्यं परस्वदारासवपण्यवन्तम् ॥ जातं स वक्रः कुरुते हिमांशुर्यवाश्मकारं स दिनाधि नाथः ॥ १२२ ॥ सर्वार्थसूक्ष्मातियुतं सुधांशुः स्वपुत्र युक्तं प्रथितं मुशीलम् ।। करोति जातं प्रियवाक्ययुक्तं सौभाग्यवंतं सुयशोगुणान्यम् ॥ १२३ ॥ कुलप्रधान स्थिखुद्धिमन्तं वित्तश्वरं सेंदुगुरुः करोति ॥ सभार्गवः किंशुकरंगकारं क्रियाक्रियादौ कुशलं हिमांशुः॥१२॥ चंद्रमा भौमसहित होवे तो वस्तुके स्वभावके अनुरूप पापारी. परधन परस्त्री और मद्यका व्यापारी मनुष्यको करता है सूर्ययुक्त होवै तो यंत्र तथा पत्थरके काम करनेवाला करता है ॥ १२२ ॥ युधधुक्त हो तो सम्पूर्ण अर्ध तथा सूक्ष्म विचार वारीकी देखनेवाला, सुशील, विख्यात प्रियवाणी युक्त सौभाग्य, यश गुणोंसे युक्त करता है ॥ १२३ ॥ चंद्रमा वृहस्पति युक्त होवे तो मनुष्यको अपने कुलमें प्रधान. स्थिर बुद्धिवाला धनाधीश करता है शुक्रयुक्त होवै तो वस्त्ररगन-
(११२) जातकशिरोमणि-
वाला. करने न करनेके कामकी योग्यायोग्यता विचारने-
वाला करताहे ॥ १२४ ॥
परिणीताक्षतायां तु जायमानं सवर्णतः ॥ स सूर्यपुत्रः
शीतांशुः कुरुते च पुनर्भवम् ।। १२५॥ यद्यत्फलं द्विग्र-
हयोगजातं तन्वादिसंयोगफलं विचार्य । वाच्यं ग्रहाणां
खलु जन्मकाले ज्योतिर्विदैः श्रेष्टविचारदः ॥ १२६॥
शनियुक्त चंद्रमा हो तो विवाहिता अक्षतयोनिमें सवर्ण
सवर्णसे पैदा हो अथवा पुनर्भूको अपनी बनावे स्त्रीका हो
तो स्वयं पुनर्भू होवे ।। १२५ ॥ जन्मकालमें जो जो फल द्वि-
प्रहयोगोंके हैं उनमें लग्नादिभावोंके संयोग फलभी विचारके
युक्तिसे श्रेष्ठविचारमें चतुरज्योतिषियोंने ग्रहफल कहने ॥१२६॥
अथ भौमादि त्रिंशांशकस्थचंद्रफलम् ।
गुणोर्जितः स्याद्वधको धनान्यो बुधप्रियः सवजनेषु
नूनम् ॥ भौमादिभागोपगते हिमांशाविन्द्वयोरेकग-
योः फले स्तः।। १२७॥
त्रिंशांशफल चंद्रमाके कहते हैं कि, भाम विशांशम हो
तो गुणोंमें श्रेष्ठ होवै बुधले वधकरनेवाला, बृहस्पतिसे धना.
ढ्य, शुक्रसे.पंडित शनिकेसे सब मनुप्पोंका प्रिय होवे । चंद्र-
मा सूर्य एक ही त्रिंशांशमें हो तो यही शुभाशुभ दोही
फल होते हैं ॥ १२७॥
भाषाटीकासमेत। (११३) प्रमोपार्थगृहं सशोकम् ॥ गजाश्वचामीकरलाभसौख्यं वघोदशायां शशिनः करोति ॥१२९॥ अयत्नतो मंत्रि जनाद्विजादा नानार्थवस्त्राभरणानि जीवाददाति नीचा- रिविनाशभावमृतेऽन्यसंस्था शाशिनो दशायाम १३०॥ अन चंद्रदशामें अंतर्दशाफल कहते हैं कि,चंद्रमा अपनी अंत- दशामें राजकांतिवाला तथा धनवान् करता है यदि नीच निर्बल, शवगृहीत हो तो क्षयरोगसे पीडित करता है सूर्य के भी ऐसे ही फल है, चंद्रमामें इतना विशेष है कि,क्षीणादि हो तो अंगभंग भी करता है। १२८ ॥ मंगलमें, शस्त्र अग्नि और धन नाशका भय, तथा चोरका लूटा घर शोक साहित करता है बुध चंद्रमाकी दशामें हाथी घोडे सुवर्णके लामका मुख देता है ॥ १२९ बृहस्पति मंत्रीजनसे वा ब्राह्म- णसे विनाही प्रयत्नके अनेक प्रकारके धन, वस्त्र, भूषण देता है परंतु ये फल तब है जब नीच शत्रुराशि , और अष्ट- मभावमें न हो, इनभावोंमें विपरीत फल है ।। १३० ॥ नानाविचित्रांवरवाहनानां लाभं वरस्त्रीशयनाशना- नाम् ।। अन्तर्दशा यच्छति भार्गवस्य स्थिता दशायां रजनी करस्य ॥ १३१ ॥ म्लेच्छात्रिपादाब्यसनं महान्तं रोगाऽभिभूतं स्वजनस्य शोकम् ॥ करोति शोको रजनीकरस्य दशामुपेतोरिगतो विशे- पात् ॥१३२॥ नीचारिभांशास्तगतग्रहाणां दशोक्तयो- गग्रहदृएिजानि ॥ दशांतरात्मोत्थशुभं विनाश्य फला नि पापान्यपयांति पाकम् ।। १३३ ।। मित्रोचमूलस्त्र . ८ (११) जातकशिरोमणि- गृहोदितानां शुभानि सर्वाणि दशोकजानि ॥ फलन्ति पापानि समं ब्रजन्ति विचार्य सर्व सकलं ग्रहस्य १३४॥ इति श्रीमहादेवपाठकविरचिते जातकशिरोमणौ चन्द्र देशोऽध्यायो दशमः॥१०॥ चन्द्रदशामें शुक्रकी अन्तर्दशा अनेकप्रकारके विचित्र वस्त्र भूषणोंका लाभ श्रेष्ठ स्त्री, शय्या, भोजनोंका लाभ देती है ॥ १३१ ॥ चन्द्रदशामें शनिका अन्तर विशेषकरके शत्रुभवन गत, म्लेच्छ, निखादोंसे बडा ( व्यसन ) उपद्रव देती है, रोग होता है, अपने मनुप्यका शोक होता है ॥ १३२ । जो ग्रह नीच शत्रुराशिअंशमें तथा अस्तगत उनका दशोक्तयोग प्रहदृष्टिसे उत्पन्न तथा अपनी दशा अन्तर्दशाके फलोंको नाश करके पापफल फलित करते हैं।।१३३॥ मित्रराशि उच्चराशि, स्वगृहगत उदित ग्रहोंके दशोक्त फल फलते हैं। और पाप फल शमित होजाते हैं इसमकार ग्रहका विचार करके फल कहना ॥ १३४ ॥ इति श्रीमहीधरकृतायां जातकशिरोमणि भाषाटीकायां चन्द्रकलाऽध्यायो दशमः ॥ १०॥ अथ सूर्यफलविचारः। मित्रोचस्वगृहस्थितो दिनपतिः स्थानाद्विसक्तो भवेद्भू- पालाहवदंतिदन्तकनकव्याघ्रादिचर्मोद्रवैः ॥ द्रव्यैर्म- समुद्भत्रैश्च कुरुते स्वस्यां दशायां जनं पूर्ण तीक्ष्णमज. स्रमुधमरतं ख्यातं प्रतापाऽन्वितम् ॥ १॥नीचे शत्रगृ- हादिवर्गसहिते भानौ भवत्यापदो भूपालाहवशत्रतस्क- रमवाः पापानुरक्तः शठः ॥ भार्यापुत्रधनापदः परिभवा भाषाटीकासमेत। (११५) भृत्यादिभिर्वधुभिः स्थानत्यागकदन्नभोजनमहदुःखं भजन्ते नराः॥२॥ सूर्यफल विचार कहते हैं । सूर्य मित्र, उच्च, स्वगृहस्थित हो तो अधिकारी आदि स्थानादिकोंमें समर्थ होवे तथा सूर्य उच्चादिस्थ, स्वदशामें राजाओंका युद्ध, दन्तभूषादि वस्तु, सुवर्ण, व्याघ्रादिचाँसे युक्त द्रव्योंसे धर्मसे उत्पन्न वस्तुसे युक्त मनुष्यको करता है और तीक्ष्ण. वारम्बार उद्यममें तत्पर. विख्यात, प्रतापयुक्त करता है ।। १ ।। यदि नीच वा शत्रुगृह नवांशादिमें हो तो राजा, संग्राम, शस्त्र, चोरसे आपत्ति होती है पापमें तत्परता शठता होती है स्त्री पुत्र धनसम्बधी आपत्ति सेवकादिकोंसे बन्धुवर्गसे तिरस्कार मिलता है स्था- नत्याग होता है कोदों आदि कुत्सित अन्न भोजनको मिलते हैं बड़े दुःख मतुप्य भोगते हैं॥२॥ अथ रविराशिफलानि । ख्यातो रखौ मेपगतेऽटनश्च धनी स्वजीवी चतुरः स्व तुंगे ॥ सुगन्धवस्त्रक्रयविक्रयज्ञः स्त्रीद्धेपकृद्गोसाहिते सुगीतः ॥३॥ भानौ मिथुनराशिस्ने विद्याज्योतिप वित्तवान् ॥ परकार्यपरस्तीक्ष्ण कर्केऽस्वः पथि दुःख भाक्॥४॥ सूर्यके राशिफल कहते हैं कि, मेराशिका सूर्य हो तो. विख्यात और फिरनेवाला, भी होवे, मेषमें उच्चशिकी हो तो धनवान, धनव्यापारसे आजीवन करनेवाला और चतुर भी होवे वृषका हो तो सुगन्धिद्रव्प तथा वस्रोके खरीदने बेचने में अभिज्ञ, और स्त्रीद्वेषी होवै ॥ ३॥ मिथुनसे विद्या ज्योतिष धनसे युक्त होवै कर्कका हो तो पराया कार्य करने में तत्पर. तीक्ष्णस्वभाव निर्द्धन और मार्गमें दुःखभोगनेवाला हो । . " (११६), जातकशिरोमणि- सिंहे गोकुलशैलकाननरतः प्राज्ञो बलेनान्वितः कन्या- यां लिपिलेख्यवित्सुगणकः स्त्रीतुल्यदेहो खौ ॥ जूके मद्यकरोऽथ मार्गनिरतः स्वर्णक्रय विक्रये विज्ञः कीट- गते विपार्जितधनः क्रूरोत्रवेत्ता शठः ॥५॥ सिंहमें होवै तो गोकुल, पर्वत, बनमें प्रसन्न रहै बुद्धिमान तथा बलवान् भी होवे । कन्यामें हो तो लिखनेके काम जानने वाला, उत्तम ज्योतिषी और स्त्रीके तुल्य देह होवै, तुलामें हो तो मद्यबनानेवाला, रास्ताचलने में तत्पर, सुवर्णका व्यापार जाननेवाला होवै, वृश्चिकमें सूर्य होतो विपकर्म कमाये धन से धनी होवै क्रूरस्वभाव अस्त्रविद्याजाननेवाला तथा शठ होवे ॥५॥ शिल्पी रखावश्वगते धनी स्याटैपज्यकर्मा कुवणिक्च नीचः ॥ मृगेऽन्यदारानिरतोऽतिलुब्धो धनापहारी प्रथितः पृथिव्याम् ॥६॥ घटे रवौ भाग्यपरिच्युतोऽ स्वो नीचः सुतोनः खलु निंदितश्च ॥ मुक्ताप्रवालादि धनी झपस्थे कृतादरः स्यादहसुन्दरीभिः॥७॥ (अथात्र चन्द्रवत्फलकल्पना ) राशौ वलिप्टे गृहनायकेऽपि राशिस्थितार्कस्य . फलं यदुक्तम् ॥ पुष्टं द्वयोरेकतमे बलिप्ठे मध्यं फलं होनफलं न कस्मिन् ॥ ८॥ सूर्य धनका होवैतो शिल्पविद्याजानेधनवान् होवे, ओप- धिका कामकरे, निंद्यव्यापारी और नीचभी होवे मकरमें हो तो परखी में आसक्त, अतिलोभी, धनहरणकरनेवाला संसा- रमें विख्यात होवै॥६॥ कुम्भमें सूर्य हो तो भाग्यहीन, निर्द्धन नीच पुत्ररहित और निश्चय निन्दित भी हो मीनका हो तो - "
भाषाटीकासमेत। (११७)
मोती मूंगा आदिसे धनी होवे बहुतसी रूपवान् स्त्रियोंसे
आदर पावै ॥ ७ ॥ अब चन्द्रमाके तुल्यफल कल्पना है कि,
राशि और भावेश बलवान हों तो सूर्यका उक्त राशिस्थ फल
पुष्ट होगा दोनोंमेंसे एक बलिष्ठ हो तो मध्यम दोनों के बलही-
नतामें फल पूर्ण नहीं होता ।। ८ ॥
मेपादिराशी शशिनि स्थिते यव्यादिष्टे फलमुक्त-
मायः ॥ तदेव मेपादिगृहस्थिते चन्द्रादिदृष्टे फल-
मूहनीयम् ॥ ९॥ निःस्वोर्कदृष्टे क्षितिपः कुजेन मेप
स्थितेंदौ सति पूर्वमुक्तम् ।।अर्कादिदृष्टेन्दुफलानि यानि
तान्येव सर्वाणि खावजादौ ॥१०॥
जो मेषादिराशिगन चन्द्रमाके सूर्यादिं दृष्टिफल श्रेष्ठोंने
कहे हैं वे ही मेषादिगृहस्थित सूर्यमें भी चंद्रादिकोंके दृष्टिफल
जानने ॥९॥जैसा पहिले मेषगत चन्द्रमापर सूर्यदृष्टिसे निर्द्धन
भीमदृष्टिले राजा फल कहे हैं ऐसेही सूर्यादिकोंके जो जो फल
कहे हैं वैसे ही समान सूर्यमें मेषादिगतके जानने ॥ १० ॥
अथ सूर्यभावफलानि ।
शूरोकेलग्नेऽचिरकार्यकर्ता दयाविहीनो नयनामयी
च॥ मेपेर्कलमे सति नेत्ररोगी धनी निशांधो मृगरा-
जसंस्थे॥ ११॥ नीचोदयस्थे नयनोज्झितः स्या-
कर्कोदयस्ये सति पुष्पिताशः ॥ भूपालदंव्यो मुखरोग-
युक्तो द्रव्योर्जितोकें धनभावसंस्थे ॥ १२ ॥ तृतीयभावे
सति विक्रमाव्यः सुखोज्झितोद्विग्नमनाश्चतुर्थे । अप-
त्यभावे धनपुत्रहीनो विटेपिजेता बलवानरिस्थे॥१३॥
--- - (११८) जातकशिरोमणि- स्त्रीदुर्भगो भवति कामगते पतंगे हीनः श्रिया नृपतिवं- धनमार्गतप्तः ॥ स्वल्पात्मजो निधनगे विकलेक्षणश्च सबंधुशोकसहितोऽल्पधनोऽल्पजीवी ॥ १४॥ धनसु- तसुखभागी कामिनीटेपकारी द्विजगुरुपदयुक्तो मान- मित्रार्थयुक्तः ॥ प्रवलधनतुरंगो राज्यभावेऽथ लाभे वहुनिधिधनभोगी रिष्फगेऽगम्यगामी॥ १८॥ सूर्यके भावफल कहते हैं। सूर्य लग्नमें हो तो शरमा, यहुतकालपर्यंत कामकरने- वाला, निर्दयी, नेत्ररोगी होवे । लमगत सूर्य मेपका हो तो नेत्ररोगी, तथा धनवान हो । म्करका हो तो राज्यंध हो ॥ ११ ॥ नीचराशि ७ में हो तो अंधा, फर्कमें हो तो आंख में फूला होवै, धनभावमें हो तो राजपसे दंडपाये मुखरोगयुक्त रहे धनसे संपन्न रहे ॥ १२ ॥ तीसरा हो तो पराक्रमयुक्त, सुरयरहित, चतुर्थ हो तो मन उद्विग्न रहे पंचम हो तो धन और पुत्रोंसे हीन, छठा हो तो शउजीतनेवाला ॥ १३ ॥ सप्तम हो तो दुर्भगा खीवाला होवे शोमा यद्वा लक्ष्मीसे दीन राजद्वा. रके बंधन तथा मार्गसे सन्तप्त रहे अष्टम हो तो सन्तान धोडी, नैनकलारहित , अच्छे पंधुके शोकसे युक्त अल्पधन, अल्पा होवें ॥१४॥ नयम हो तो धन, पुरके सुन भोगे, स्वीकारे पकरमेवाला ब्राह्मण, गुरुके चरणयुक्त रहे, मान, मित धनम युक्तरदे, दशममें हो तो धन और घोहे बहुत होंग्यारहवा हो तो बदुतसे (निधि) उत्तम यस्तु, यदुतधनका भोगने वाला होष पारदवा हो तो अगम्या स्त्री, माता, गुरुपत्नी, भनिती आदि, यद्वा अपनेसे हीन वा में गमन करे ॥ १५ ॥ - - . भाषाटीकासमेत। (११९) अथ चंद्रादियोगफलम् । शत्रुदुर्गचतुरंगभंगकृयंत्रकृच्छशियुते दिननाथे ॥ भूसु- तेन बहुपापकारको विद्युते निपुणधीसुखयुक्तः॥१६॥ अन्यक्रियारतं कूरं गुरुणा भृगुणा युतः ॥ रंगायुधधनं सार्किर्धात्तुभण्डक्रियायुतम् ॥ १७॥ सूर्यके ग्रहयोगफल कहते हैं कि, सूर्य चन्द्रसहित हो तो शत्रुका किला, सेनाको भंगकरनेवाला होवे, मंगलयुक्त हो तो बहुत पापकरनेवाला, बुधयुक्त हो तो निपुणचुद्धि सुखी ॥ १६ ॥ गुरुसे अन्यके कामकरनेवाला, क्रूरस्वभावी शुक्रसे रंग आयुधसे धनी, शनियुक्त हो तो वर्तनवनानेवाला होवे ।। १७ ॥ अथ सूर्ययोगाः। विचन्द्रनगैवेशिर्वोशिळयगतैहैः ॥ उभयोपगतै- र्भानोरुक्तोभयपरी सदा ॥ १८॥ समकायस्थिरसत्त्वो धनपरिपूर्णो भवेदुभयचर्याम् ॥ संततिसुखं च विंदति नरपतिपूज्यो भवेद्रहः सवलैः ॥ १९ ॥ मन्दद्युति- जीवति विवभार्यों नम्रोर्द्धकायो बलवान्मनुष्यः॥ अधोनिरीक्षी परिपूर्णकर्मा ज्ञानानुरक्तः खलु वोशि- योगे ॥ २० ॥ स्तब्धोल्परक्सौर्ययुतः सुशीलो विवईमानोधमसत्वतः जातो मनुष्यः परिपूर्ण- कायः कुलाभिमानी खलु वेशियोगे ॥२१॥ सूर्ययोग कहते हैं, सूर्यसे दूसरे भावमें, चन्द्रमा छोडके कोई ग्रह हो तो वेशि, बारहवां हो तो वोशि और दोनों (१२०) जातकशिरोमणि- हों तो उभयचरी योग होते हैं ॥ १८ ॥ उभयचरीका फल है -किसमशरीर स्थिर प्राणादि, धनसे परिपूर्ण होता है, संत- तिका सुख भी मिलता है यदि योगकारक ग्रह बलवान हों तो राजपूज्य होता है ॥ १९ ॥ वोशियोगवाला मन्दकांति तथा स्त्रीपक्षसे दुःखी रहकर उमर व्यतीत करे कमरसे ऊप. रका भाग नम्र रहे बलवान्, पृथ्वीके ओर दृष्टि रखनेवाला यद्वा लज्जायुक्त सर्वकामोंसे परिपूर्ण ज्ञानमें अनुरागी होता है ॥ २० ॥ वेशियोगवाला घमंडखोर, अल्पदृष्टि, शौर्यवान सुशील, उद्यम और बल बढतेरहें परिपूर्ण शरीर और अपने कुलमें अभिमानी होवै ॥२१॥ बांधवजनाभिभूतं प्रेण्यं सविता स्वनीचगः कुरुते ॥ गर्दभरोगाः क्रिमयो नयनविनाशः पराभवः पुंसाम् ॥ ॥ २२ ॥ शवगेहे मृत्युभगते भानौ च नरो भवेत् ।। मृतदारो रोगतप्तो नीचे नीचांशके तथा ॥२३॥ अपनी नीचराशिका मूर्य मनुष्यों को बांधवोंसे तिरस्कृत, पराया दूत, गर्दभ रोग क्रिमिरोग, नेत्रनाश और भी देता है ॥ २२॥ शत्रुराशिका अष्टमस्थानमें हो तो स्त्री मरजावै रोगसे सन्तप्त रहे ऐसा ही फल नीचराशि नीचनवांशस्थका भी है।॥ २३ ॥ कुजाकिसूरिज्ञभृगूद्भवानां विंशाशकेजन्मनि खेटनाथे । शूरोऽसहः सद्गुणसंयुतश्वसुखी सुदेहो मनुजश्च जातः२४॥ सूर्यके त्रिशाशफल कहते हैं । भीम विशाशमें हो तो शरमा, शनिक में न सहारनेवाला, गुरुकेमें अच्छेगुणोंसे युक्त . वुधकमें सुखी शुक्रकेने सुन्दर देहवाला मनुष्य होता है ॥२४॥ , भाषाटीकासमेत। (१२१) अथान्तर्दशा। रिपुप्रतापशमनं निरुग्गाधनार्जितम् ॥ करोति नियतं चंद्रः पूर्णः सूर्यदशां गतः ॥ २६ ॥ मणिविद्रुमसंयुक्त भौमः संग्रामजित्वरम् ॥ प्रचण्डं साहसपरं करोत्यर्क- दशां गतः ॥ २६॥ दद्रूविचर्चिकापामाकुष्टायैर्हितं वपुः॥ करोति चंद्रजो वृद्धिं शत्रो रविदशां गतः ॥२७॥ अंतर्दशाफल कहते हैं कि, सूर्यकी दशामें पूर्ण चन्द्रमा शत्रुके प्रतापका शमन,निरोगता धनप्राप्ति निश्चय करता है२५ मंगल,मणि,मूंगासेयुक्त, संग्राममें विजयता,प्रचंडता,साहसमें तत्परता करता है ॥२६॥ बुध( दद्रू) दादरोग,वमन विरेचन, सुजली, कुष्ठादिसे शरीर निंद्य और शत्रुकी वृद्धि भी सूय- दशाके अंतर्दशामें करता है ॥ २७ ॥ अलक्ष्म्या शत्रुभिः पापैर्व्यसनैरपि सुच्यते ॥ भानोरंत. दशा प्राप्ते जीवे धर्मपरो भवेत् ॥२८॥ शिरःपीडा गंड- रोगश्चित्रकुष्ठयुतो भवेत्।।सशूलोर्कदशांतःस्थे देशाद्धष्टो भृगौ भवेत् ॥२९॥ विपक्षहतसामर्थ्य म्लेच्छराज्यपरा- भवम् ।। भृत्यादिनाशं कुरुते शनिः सूर्यदशां गतः॥३०॥ सूर्यदशामें गुरुका अंतर हो तो दरिद्र, शत्रु, पाप और व्यसनोंसे छूटजावे धर्ममें तत्पर होवे ॥ २८ ॥ शुक्रांतरमें शिरमें पीडा गंडरोग चित्रकुष्ठसे संयुक्त होवै शुलरोगसहित, अपने देशसे निकल जावै ॥ २९ ॥ शनिकी अंतर्दशामें, शत्रुसे अपनी सामर्थ्य मारीजावै म्लेच्छराजसे अपमान होवे, नोकर चाकरका नाश होवै ॥ ३० ॥ -- .
(१२२) जातकशिरोमणि- करितुरंगमपत्तिसमाकुलं कनकदंडसितातपवारणम् ॥ ग्रहपतिः कुरुते निजतुंगगः पदगतो वसुधावलये पदम् ॥३१॥ अरिपदेऽरिगृहे ग्रहनायके क्षतजमग्गल- रोगसमाकुलः ॥ निधननीचविरोधिगृहं गते चरणह- स्तगता खलु गर्दभी ॥ ३२ ॥ रिपुगृहेकैदशानयना- मयः शिरसि रुग्ज्वरकोष्ठगता कृमिः ॥ निधनगस्य दशा पुरुपं वर्धमयति स्वपदात्परितो भृशम् ॥ ३३ ॥ इति जातकशिरोमणौ रविदशाविचाराऽध्यायः ॥११॥ सूर्य उच्चका हो तो अपनी दशामें हाथी, घोडे प्यादा- ओंसे परिपूर्ण करता है, सुपर्णके दंडवाला श्वेतछत्र देता है यदि दशमगत भी हो तो संसारमें उत्तम पद देता है ॥३१॥ सूर्य शत्रुस्थ राशि अंशादिमें हो तोचोट लगनेसे उत्पन्न रोगसे तथा कंठरोगसे व्याकुल रहे, यदि अष्टमस्थान, नीचराशि शवराशिमें हो तो हाथ पैरमें निश्चय, गदही रोग होता है जो फोडेके रूपमें बहुत दिनपर्यन्त पकता रहता है किसीमें हड्डी भी निकलती है ॥ ३२ ॥ शत्रुराशिमें हो ता उसकी दशामें नेत्ररोग, शिररोग, ज्वर, पेटमें कृमिरोग होता है यदि सूर्य टम हो तो उसकी दशामें अपने स्थानसे चारों और अत्यर्थ भ्रमण करता है ॥३३॥ इति श्रीनातकशिरो- मणो माहीधरी भाषाटीकायांमेळदशाऽध्यायः ॥ ११ ॥ अथ मोमदशा। भवति कुजदशायां भूपभूम्याविकाजैविणमरिविमर्दःश- क्तियुक्तेमहीजे सुतसहजकलस्त्री।पिता सदरूणां भवति
भाषाटीकासमेत। (१२३)
विमुखभावोंमध्यमे भूमिपुत्रेम||संग्रामभंगो वरपित्त-
रोगा रोगाः परस्त्रीजनिता महीजे ॥ बलोज्झिते शस्त्र-
निपातभीतिव्रणाकुलः पापरतेश्च सख्यम् ॥२॥
भीमदशाफल कहते हैं। मंगल बलवान् हो तो उसकी
दशामें राजा, भूमि, भेड, बक्रीसे धनमिले, शत्रुपीडित
होवे मध्यबली हो तो पुत्र, भाई, स्वकुल, स्वीसे वैर होवे
संत गुरुजनोंसे भी विमुखता हो जावै॥ १ ॥ निर्बल हो तो
संग्राममें हारमिले ज्वर एवं पित्तसे रोग पैदा होवे परखी-
संसर्गसे रोग होवै शस्त्रगिरनेकी भय होवे फोडाओंसे क्लेश
पावै, पापमें तत्पर मनुष्योंके साथ मित्रता होवे ॥ २ ॥
अथ भीमराशिफलम् ।
सेनापतिः क्षततनुः सधनो वणिक्स्याद्भौमे निजाल-
यगते नृपसत्कृतश्च ।। स्तेनार्जितद्राविणपूर्णगृहोऽजसं-
स्थे कीटे वधाहितमतिप्रुतल्पगामी ॥ ३ ॥ चौधे
गृहेऽतिकृपणस्तनयान्वितश्च विद्वानभीर्मदनयुद्धविशा-
रदश्च ।। नित्यं जलपवधनो विकलः खलश्च प्राज्ञोऽर्थ-
वान्भवति भूतनये वरिष्टः॥ ४ ॥ वंचकोऽतिपुरुषः
सितगेहे कामिनीजितवलः परदारः॥ सिंहगे वनचरो
धनहीनः स्वल्पदारतनयो भयहीनः ॥५॥ जवे
नरेन्द्रसचियोऽल्पसुतःप्रसिद्धो भीवर्जितो बहुतुरंगरियू-
जिंतश्च ॥दुःखान्वितोऽनृतरतो विधनोऽतितीक्ष्णः कुंभे
मृगे नरपतिर्दनपुत्रवृद्धः ॥६॥
- , (१२४) जातकशिरोमणि- मंगलके राशिफल हैं कि स्वराशिगत हो तो, सेनापति, कटाशरीर, धनवान, व्यापारी होवे, राजासे सत्कारपावै मेषका हो तो चोरीके कमाये धनसे घर भरारहे, कर्कका हो तो जीवघातमें बुद्धि अच्छी रहे और गुरुस्त्री गामी होवै॥३॥ बुधके राशि ३।६ का हो तो, कृपण, पुत्रवान् भी विद्वान, निर्भय, कामदेवके युद्धक्रीडामें निपुण भी होवे और सर्वदा जलसंबन्धी कर्म नाव जहाज आदिसे धन कमावै,विकल रहे खल भी होवै, प्राज्ञ, धनवान् और श्रेष्ठ होवै ॥ ४ ॥ शुक्र- राशि २ । ७ का हो तो ठगनेवाला विशेष होवै स्त्रीसे बल उसका जीतारहे परस्त्रीगमन करे सिंहका हो तो धनहीन, स्त्री पुत्र थोडे और निर्भय होवै ॥५॥ गुरुराशि ९ । १२ में ही राजाका मंत्री, अल्पपुत्र, प्रसिद्ध, भयरहित, बहुतसे शव तथा घोडाओंसे युक्त भी रहै कुंभमें हो तो दुःखयुक्त, झूठयोलनेमें तत्पर, निर्धन,अतितीक्ष्णस्वभाव होवै मकरका हो तो मनुष्य राजा होवे, धन और पुत्र बहुत होवें ॥६॥ अथ भौमे रव्यादियोगफलानि । ', भौमे सूर्यसमागमेऽघसहितश्चन्द्रान्विते कूटवित् स्त्रीप- ण्यासवकुंभपण्यसहितो मातुश्च रिटप्रदः ॥ द्रव्यस्य प्रतिरूपमूललवणस्नेहादिपण्यैर्वणिक् ख्यातः सौम्य- युते सुरेज्यसहिते भूपः पुरीपालकः ॥ ७ ॥ परस्त्रीरतो गोपतिर्मल्लरूपः कुजे सासुरेज्ये भवेड्यूतकारी ॥ सशौरेऽतिदुःखी कुजे सत्यसंधो दशायामरिष्टं ददा- स्येव भौमः ॥८॥ प्रहयोगफल कहते हैं कि, मंगल स्र्ययुक्त हो तो पाप चन्द्रयुक्तसे झूट जाने तया नीव्यापार मद्यमके व्यापा.
-
भाषाटीकासमेत। (१२५)
रयुक्त और माताको अरिष्टदेनेवाला होवै बुधयोगसे द्रव्यका
यथायोग्य मूल्य जाने, लवण तेलका व्यापारी विख्यात हो
गुरुयुत हो तो नगरका पालन करनेवाला राजा होवै ॥ ७ ॥
शुक्रयुत.हो तो परस्त्रीमें तत्पर, गोधनवाला, मल्लसमान और
जुआ खेलनेवाला होवेशनियुक्त हो तो अतिदुःखी सत्यबोल-
नेवाला होवै तथा दशामें मंगल अरिष्ट भी देता है ॥८॥
अथभावफलानि ।।
तनौ भौमे शस्त्राहततनुरथो द्रव्यभवने कदन्नाशी रात्रौ
भवति सहजे विक्रमयुतः।।चतुर्थे सौख्योनो भवति सुतभे-
ऽपत्यरहितो रिपौ जेतारीणां भवति समरे शंसितबलः
॥९॥ स्त्रीदुर्भगो भवति कामगते महीजे हीनश्रिया
नृपतिबंधनमार्गतप्तः ॥ स्वल्पात्मजो निधनगे विकले-
क्षणश्च सद्वन्धुशोकसहितेऽल्पधनोऽल्पजीवी ॥ १० ॥
धर्मस्थे भूमिजे पापो राज्यस्थे तुरगाधिपः ॥ लाभे
धनी व्ययगते स्वकुलस्त्रीरतः सदा ॥११॥
मंगलके भावफल कहते हैं। मंगल लग्नमें हो तो शस्त्रसे
कटाशरीर होवे दूसरा हो तो रात्रि(कदन्न) कूदा कुलस्थी
आदि खानेवाला होय, तीसरा हो तो पराक्रमी चौथेमें सुख
रहित, पंचममें पुत्ररहित, छठेमें शत्रुजीतनेवाला, तथा संग्रा-
ममें प्रशंसनीय बलवाला होवे ॥ ९ ॥ सप्तम होतोधी दर्म-
गा होये, शोभाहीन, राजाके वन्यनसे और मार्गसे सन्तत
रहे अष्टम हो तो सन्तान अल्प, विकल नेत्र हो । तथा
अच्छे बन्धुका शोक मिले धन अल्प आय अल्प होये ॥ १०॥
नवम हो तो पापी, दशमहो तो घोडाका अधिकारी लाम
में धनवान व्ययमें अपने कुलकी स्त्रीका गमन करे ॥ ११ ॥
. (१२६) जातकशिरोमणि- अथ भौमे ग्रहदृष्टिफलानि । करोति भौमः स्वगृहेर्कदृष्टश्चौराधिपं चन्द्रसमीक्षितश्च ॥ कृशं सुहृत्प्रेष्यकर बुधेन दृष्टोजनाढयो पितृवत्सलं च ॥१२॥ जीवन दृष्टो नृपतिं करोति भृग्वीक्षित स्त्रीवध- बन्धमाईम्।।शौरेक्षितश्चौरविघातनं च परांगनेशं स्वज- नेन हीनम् ॥ १३॥ मंगल अपने घरमें सूर्यसे दृष्ट हो तो चौरोंका अधिपति करता है, चन्द्रष्टिसे भी यही फल है बुधाष्टिसें कृशारीर मित्रोंका दूत कामकरनेवाला, मनुप्योंसे पूर्ण और पिताका प्यारा भी करता है ॥१२॥ बृहस्पतिकी दृष्टिस राजा, शुक्रसे स्त्रीके मार बांधने के योग्य, शनिहाष्टसे चौरपीडित, परस्त्रीका स्वामी तथा अपने मनुष्योंसे हीन करता है ॥ १३ ॥ .वने गिरौ वासरतेऽर्कहऐ चन्द्रक्षिते स्त्रीबहुलः सितः ।। बुधेन दृष्टे कलहप्रियश्च शास्त्रार्यविन्मन्दधनप्रजश्च ॥ १४ ॥ वादिनसंगीतबुधः सुवन्युसौभाग्ययुक्तो गुरु- दृष्टमूर्ती ॥ भूपालमंत्रीवलनायकश्च प्रसिद्धनामा भृगु- वीक्षिते च ॥१५॥ पुराधिपः स्थानपतिश्च भौमे शौके गृहे शौरिसमीक्षितश्च ॥ चांद्रे गृहे पित्तरुगर्दितश्च सूर्ये क्षिते चंद्रसमीक्षिते च॥ १६ ॥ विरूपदेहो बुधवीक्षिते च क्षुद्रोषयुक्तो मलिनो विलजः ॥ त्यागान्वितो रोग- विवर्जितश्च जीवेन दृष्टे नृपमंत्रिमुख्यः ॥ १७ ।। स्त्री सङ्गतो नष्टधनो विपन्नः शुक्रेक्षिते सौरिसमीक्षिते च ॥
भाषाटीकासमेत। (१२७) - - - व्याचारमूर्तिः क्षितिपालनेता चन्द्रालयस्थे धरणी- सुते च ॥१८॥ शुक्रराशिगत मंगलपर सूर्यष्टि हो तो वन पर्वतोंके निवा- समें तत्पर रहे चन्द्रदृष्टिसेवीबहुत,युधसे कलहप्रिय शास्त्रार्थ जाननेवाला और अल्पधन अल्पपुत्र भी होवें ॥ १४ ॥ गुरु- दृष्टिसे गायनमें बाजे बजाने में पण्डित अच्छे बन्धुवाला सौभा- ग्ययुक्त होवे शुक्रष्टिसे राजमंत्री, सेनापति, प्रसिद्धनाम- वाला होवै॥१५॥शनिदृष्टिसे नगरका स्वामी स्थानका भी हो बुधके राशियों में मंगल सूर्य दृष्ट हो तो पित्तरोमसे पीडित रहे चन्द्रदृष्टिसे भी यही फल है । १६ ॥ श्रुधदृष्टिसे देह कुरूप क्षुद्रकर्मा, पापयुक्त, मलिन तथा निर्जज होवे । गुरुदृष्टिसे उदार, रोगरहित, और राजमंत्रियों में श्रेष्ठ होवे ॥ १७ ॥ शुक्रदृष्टिसे स्त्रीसंगति विशेषकरनेवाला, धनहीन, परायेशर- णागत होवै ॥ शनिदृष्टिसे आचाररहित शरीर, राजाका भी नेता हो, चन्द्रराशि ४ में मंगल हो तो भी यही फल बुधराशिके तुल्य जानने ॥१८॥ सिंहे कुजे गोकुलशैलचारी सूर्येक्षितः कोपयुतःप्रचण्डः।। कान्त्यायुतो बुद्धियुगिन्दुदृष्टे बुधेक्षिते काव्यकलालि- पिज्ञः ॥ १९॥ सान्निध्यवर्ती नृपतेः सुबुद्धि वशिते भूपचमुपनाथः ॥ स्त्रीभाग्ययुक् स्त्रीसुभगोऽतिहष्टः शुके क्षित यौवनदेहयुक्तः ॥२०॥ वृद्धाशतिः सौरसमीति- तारे मृगारिंगेहे परवेश्मवासी ॥ जैसे गृहेलोकनमस्कू- तश्च भौमेऽदृष्टे वनदुर्गवासी १२॥ चन्द्रकिने भूप- विरुद्धकारी बुधेशिते नैपुणशिल्पकार्ग। जीवनिने (१२८) जातकशिरोमणि- वित्तकलत्रयुक्तो व्यायामयुक्तः सुखसंयुतश्च ॥२२॥ शुक्रेक्षितेलंकरणाऽनुरक्तों दयाविहीनो नियंत सुता- याम्॥शनीक्षिते पापमतिः कुदेहः जैवे स्थिते भूतनये मनुष्यः॥२३॥ मंगल सिंहराशिमें सूर्यसे दृष्ट हो तो, गोष्ठ, पर्वत स्थानों में फिरनेवाळा, क्रोधी, प्रचण्ड होवै चन्द्रदृष्टिसे कांतिमान बुधसे काव्य, कला, लिखना इन कामोंको जाने ॥ १९ ॥ गुरुसे राजाके समीप रहनेवाला, सुबुद्धि, राजाका सेनापति होवे शुक्रस स्त्री, तथा भाग्यसे युक्त; अच्छे ऐश्वर्यवाला, तण प्रसन्न रहे देह सर्वदा जवानी में रहे ॥२०॥ शनिहाष्टिसे जवा. न भी बूढासा दीखे, पराये घरमें वास करे बृहस्पतिके राशि का मंगल सूर्यदृष्ट हो तो लोकोंके नमस्कारकरने योग्य और वन, किलामें रहनेवाला होवै ॥ २१ ॥ चन्द्रह ष्टिमें राजासे विरुद्ध काम करनेवाला, युधसे निपुण तथा (शिल्प ) कारीगरी जाने गुरुदृष्टिसे धन, खी, कसरत, और सुख युक्त भी होवै ॥२२ ॥ शुक्रदृष्टिसे भूषणोंमें प्रेम रक्खे, कन्यामें निश्चय दयाहीन रहे शनिदृष्टिसे पापबुद्धि कुरूपदेह मनुप्यका होवै ॥ २३ ॥ यमालये भूतनयेऽकदृष्टे कन्याप्रजो भोगयुतोऽतिशूरः।। चंद्रेक्षितश्चंचलमित्रमाढयं करोति भौमः शनिमंदिरस्थः ॥ २४ ॥ बुधेक्षिते कापटिकं करोति बुद्धचालयं स्त्रीकृतदोपदुष्टम् ॥ जीवेक्षितो राजगुणान्वितं च दीर्घायुपं शौरिगृहे करोति ॥ २५ ॥ स्त्रीपोपकारी शनिमे सुभोगी शुक्रेक्षिते भूतनये कृतज्ञः ॥ -
भाषाटीकासमेत।
"
-
शनीक्षिते कुंभगते महीजे क्रूरः कुवेपी मृगसंस्थिते च
॥२६॥ धराधिनाथः सधनः प्रतापो महीसुते पुत्रक-
लत्रहीनः ॥ चन्द्रार्कयोर्कमहीजयोश्च चन्द्रारयोर्यों
गसमुद्भवं च ॥२७॥ फलत्रयं तनियतं नराणामेवं चतुः
पंचविकल्पनाभिः ॥२८॥
शनिराशिके मंगलपर सूर्यदृष्टि हो तो कन्या ही सं-
तान होवै, भोगवान् अतिशुरमा भी होवै चन्द्रदृष्टि से
चञ्चलमित्रवालां, तथा धनवान् भी होवै ॥ २४ ॥ बुधदृष्टिसे
कपटी, बुद्धिका घर, और वीके कियेदोषसे दूपित करता
है गुरुदृष्टिसे राजावाले गुणोंसे युक्त तथा दीर्घायु करता
है ॥ २५ ॥ शुक्रदृष्टिसे स्त्रीका पालन करनेमें तत्पर
अच्छे भोग भोगनेवाला और कदरदान होवे । कुंभरा.
शिगत मंगलपर शनिदृष्टि हो तो क्रूरस्वभाव, निकम्मेवेष
वाला हो।२६॥मकरका होकर शनिदृष्ट हो तो राजा, धन-
वान् प्रतापी होवे परंतु स्त्रीपुत्रसे हीन होवे चंद्रमा सूर्य, सूर्य
मंगल, चन्द्रमा मंगल इनतीनोंके योगजन्य फल मनुष्योंको
नियत होते हैं इनके विकल्प सू० चं० १ सू० मं० २ चं सू०
३ चं० मं० ४ मं० चं०५म० सू० ६ एककी राशिमें दूसरेकी
दृष्टि इसप्रकार विकल्प होते हैं ॥ २७ ॥ २८ ॥
: भूवारितेजो मरुदंबराणां विदीन्दुशुक्रौ रविभूमिपुत्रौ ।
शौरिगुरुश्च प्रभवाः क्रमेण स्वस्या दशायां वितरति
शोभाम् ॥ २९॥ अथ तैजसी छायाअस्वच्छतानि-
मलताविवेकपरो मणीनां परवाससां च ॥ श्रीरगिजे यं
रविभौमयोस्तु दशाः वदंत्यत्र च हक्स्थलेन ॥३०॥
(१३०) जातकशिरोमणि- . सुवर्णरक्तांबुरुहाग्निवर्णाऽधृष्याप्रतापैः सह विक्रमैश्च ॥ जयाय जायाक्षितिभूदशायां धनं जयश्रीर्ललना विलासः॥३१॥ महाभूतछायासे दशाका ज्ञान कहते हैं कि, पृथ्वीनत्वका स्वामी बुध जलतत्त्वका चंद्रमा शुक्र अग्नितत्वका सूर्य मंगल वायुतत्त्वका शनि आकाशतत्त्वका बृहस्पति है अपनी दशा में अपनी उक्त शोभा देते हैं अर्थात् जिसकी दशाअंतर्दशा ज्ञात नहीं है उसकी सहाभूत कृतछायासे दशा जानी जाती है ॥ २९ ॥ जैसे आग्निछायाके लक्षण हैं कि, पृथ्वीकी छाया से अपवित्रता जलसे निर्मलता अग्निसे विवेकिता वायुसे मणि तथा उत्तमवस्त्रोंका विवेक आकाशसे शोभा यद्वा लक्ष्मी, होती है यहां ये लक्षण अग्नितत्त्वके सूर्य मंगलके दशाज्ञापक कहे हैं यह तत्त्व नेत्र स्थलानुमेय किसीके मत से कहा है ॥ ३० ॥ मंगलकी दशामें सुवर्ण, रक्तकमलं, अग्नि- वर्ण विक्रम सहित प्रतापोंसे अधृष्यता और जय, तथा स्त्री सुख विलासादिके वास्ते होती है ॥ ३१ ॥ राजसन्मानसंयुक्तं संग्रामजयपूजितम् ॥ नानाधना- गमानंद रखौ कुजदशांगते ॥ ३२॥ महानिधानसंयुक्तं बहुमित्रसमागमम् ॥ हिमांशुः कुरुते नित्यं सुखं भीम दशांगतः॥३३॥शष्टतो भयमाप्नोति चोरेण गृहमो- पणंम् ॥ प्राप्नोति परदासत्वं वुधे भौमदशांगते ॥३४॥ दानधर्मेण तपमा प्रसक्तःशुभकर्मणा ॥ गुरौ भीमदशां प्राप्त विरुद्धाचरणं नृपे ॥ ३५ ॥ व्याधिप्रवासव्यसनं धनापहरणादिभिः ॥ दुःखातिः संगरभयं शुक्रे कुज .
भाषाटीकासमेत। (१३१)
दशांगते ॥३६॥ व्यसनायसनं याति शोकाच्छोकसमु- ।
द्भवः॥ यत्नतोप्यशुभं चास्ति शनौ कुजदशां गते३७॥
इति श्रीजातकशिरोमणौ कुजदशाध्यायो द्वादशः॥१२॥
अंतर्दशा फल कहते हैं कि मंगलकी दशामें सूर्यका अंत-
रहो तो राजसन्मानसे संयुक्त होता है, संग्रामके विजयतामें
पूजा मिलती है, सुख भी होता है ॥ ३२ ॥ भौममें चंद्रमा
बडा (हंडेडा ) न्यासवस्तु मिलती है बहुत मित्रोंका समा-
गम और नित्यं सुख करता है ॥३३॥ मंगलमेंबुधहो तो शत्रुसे
भय होता है चोर घर लूटते हैं पराया दासत्व मिलता है
॥३४॥ मंगल में बृहस्पति हो तो दान, धर्म, तपस्या, शुभकर्म
करके शर्म होवै परंतु राजा विरुद्धाचरण होवे ॥३५॥ मंगलमें
शुक्रांतर रोग, परदेशवास, व्यसन, धनहानि आदिसे दुःख,
पीडा होवै संग्रामका भय होवै ॥ ३६ ॥ मंगलमें शनिदशा
हो तो एक व्यसनसे दूसरा व्यसन प्राप्त होवै एक शोकसे.
दूसरा शोक होवे यत्न करनेसे भी अशुभ हो ॥३७ ॥
इति श्रीजातकशिरोमणौ माहीधरीभाषाटीकायां भौमदशा
विचाराध्यायो द्वादशः ॥ १२ ॥
अथ बुधदशाविचारः।
द्विजगुरुकविदैत्यर्वित्तपूर्णोधनाशो लिखनपठनवेत्ता
वित्प्रशंसान्वितश्च ॥ कनकधरणिसौख्यो विदशायां
मणीशो भवति हसनवाक्यो गोहणेये बलिप्ठे ॥१॥
मध्यमे शशिसुते समाश्रितः कर्कशो हृदयशोकसंयुतः।।
चन्द्रजेवलिनि भीविवर्जिते रात्रिदोपसहितः खलो
पमः॥२॥
(१३२) जातकशिरोमणि- बुधदशाविचार है कि, बुध बलवान होवै तो ब्राह्मण, ६, कवि और दूततासे धनपूर्ण होवै, पापका नाशी होवे, ना पढना जाने, विद्वान होवै प्रशंसासे युक्त भी हो सुवर्ण भूमिका सुख होवै मणियोंका स्वामी तथा हॅसते वाणी बोले ये फल बलिष्ठबुधकी दशामें होते हैं ॥ १ ॥ बुधहीन मध्यबली होतो पराये आश्रयमें रहे कर्डी स्वभाव, शोकसे युक्त, निर्मय, रात्र्यंध, और खलोंके तुल्य होवै ॥२॥ दशाज्ञानाभावे वदति मिहिरो ज्ञानविपयं दशाभौमा- दीनां करणपथगैरात्मविषयम् ॥ यदा मयों गंधानु शरणगतश्चन्द्रजदशा तदा जाता छाया भवति पृथि- वीजा सुपुरुपे ॥ ३ ॥ शिरोरुहत्त्वङ्नखलोमदंता स्फिगवायुगंधाधरणीसमुत्था ॥छायार्थलाभाभ्युदया. न्करोति धर्मस्य वृद्धिं शुभविद्दशायाम् ॥ ४॥ जहां दशा ज्ञात नहीं है तहां वराहमिहिराचार्य (ज्ञान विषय) पंचतत्त्वलक्षणोंसे दशाज्ञान आत्माविषय संबंधी करणमार्गसे कहते हैं कि, जर मनुष्य गंधगुणके अनुसरण होता है नासिकेंद्रिय प्रबल होती है तो पृथ्वीतत्यकी छाया से यह गंधगुण होता है इस तत्वका स्वामी बुधहै उस समय बुधकी दशा सत्पुरुषको होतीहै ॥ ३ ॥ केश, त्वचा, नखन: दंत, मुक, वायु, पृथ्वीतत्वके प्रबल होनेमें गधवान होते हैं ऐसी बुधदशामें पृथ्वीकी इसप्रकारकी छाया धनलाभ, उदय, उन्नति और धर्मकी वृद्धि करती है ॥ ४ ॥ अथ मेषादिराशिफलानि । धरणिभवनसंस्थे चंद्रजे चौरनिस्वः कुयुवतिरतपा- पज्ञानपानानुरक्तः ॥ लिखनपठनशास्त्रज्ञानहीनो विस- भाषाटीकासमेत . + त्यो भवति जननकाले कूटवेत्ता मनुप्यः ॥५॥ आचा- यो बहुदारवान बहुसुतो द्रव्याजनेष्टो धनी शौके दान गुरुद्धिजार्चनपरा दाता बुधे मंदिरे ॥ वाचालश्चतुरः कलासु निपुणः सौख्यान्वितः शास्त्रविद्वस्थे शशिजे जलार्जितधनः कर्के स्वकीये रिपुः ॥६॥ मेषादिराशिफल है कि, बुध मंगलके राशिमें हो तो चोर, निर्द्धन, कुस्त्रीमें आसक्त, पापज्ञान, मयादिपानमें प्रेमरखने वाला, लिखना पढना शास्त्रज्ञानसे रहित झूठा और ( कर वेत्ता) जाली भी मनुष्य होवै ॥ ५॥ शुक्रराशिका हो तो (आचार्य ) गुरु वा अन्धकर्ता, बहुत स्त्री,बहुत पुत्रोंवाला धन कमानेमें श्रेष्ठ, धनवान होवे । बुधकी राशिमें, दान तथा गुरु ब्राह्मणके पूजनमें तत्पर होवै इसमें भी मिथुनका होतो वाचाल चतुर कलाओंमें निपुण, सुखयुक्त, शास्त्रजाननेवाला हो। कर्कका हो तो जलकर्मसे धनकमावै और अपने मनुष्योंमें शत्रु होवे ॥६॥ सिंहे बुधे विधनपुत्रसुखप्रवासी स्त्रीलोलुपश्च विवुधः स्वजनाभिभूतः ।। त्यागी सुखी विगतभीर्गुणधीः क्षमा- वान्कन्यास्थिते शशिसुते बहुयुक्तिवेत्ता ॥ ७॥ पावको द्विजगृहे ऋणवृद्धस्सामजे निधिपतिर्नुपमान्यः ॥राज्य- सत्कृतबुधः स्वजनाप्तश्चेन्झपे परिजनैरभिभूतः॥८॥ बुध सिहका हो तो धन, पुत्र, सुखसे हीन, परदेशवासी, स्त्रीमें लोलुप और विद्वान अपने मनुप्यासे अनादरित होवे। कन्याका होवे तो उदार, सुखी, निर्भय, गुणवान् बुद्धिवाला, क्षमावाला और बहुनप्रकारकी युक्ति जाननेवाला होवे ॥७॥ 4
"
( १३२) जातकशिरोमणि-
बुधदशाविचार है कि, बुध बलवान् हो तो ब्राह्मण,
कवि और दूततासे धनपूर्ण होवे, पापका नाशी होवे,
पना पहना जाने, विद्वान होवे प्रशंसासे युक्त भी होवै
सुवर्ण भूमिका सुख होवै मणियोंका स्वामी तथा हसते
वाणी बोले ये फल बलिष्ठबंधकी दशामें होते हैं ॥ १ ॥
बुधहीन मध्यवली होतो पराये आश्रयमें रहे कर्डी स्वभाव,
शोकसे युक्त, निर्भय, राज्यंध, और खलोंके तुल्य होवे ॥२॥
दशाज्ञानाभावे वदति मिहिरो ज्ञानविपयं दशाभौमा-
दीनां करणपथगैरात्मविपयम् ॥ यदा मत्यों गंधानु
शरणगतश्चन्द्रजदशा तदा जाता छाया भवति पृथि-
वीजा सुपुरुपे ॥ ३ ॥ शिरोरुहत्वङ्नखलोमदंता
स्फिगवायुगंधाधरणीसमुत्था ॥छायार्थलाभाभ्युदया-
हाता यमरा... हा.
अष्टम हो तो विख्यात, नवम हो तो निर्मल कीर्तिवाला
होव और १० । ११ । १२ भावोंमें बुधका भावफल सूर्यके
तुल्य जानना ॥१०॥
भाषाटीकासमेत। (१३३) त्यो भवति जननकाले कूटवेत्ता मनुष्यः ॥५॥ आचा- यो बहुदारवान बहुसुतो द्रव्याजनेष्टो धनी शौके दान गुरुद्विजाचनपरा दाता बुधे मंदिरे || वाचालश्चतुरः कलासु निपुणः सौख्यान्वितः शास्त्रविद्रस्थे शशिजे जलाजितधनः कर्के स्वकीये रिपुः ॥६॥ मेषादिराशिफल है कि, बुध मंगलके राशिम हो तो चोर, निईन, कुस्त्रीमें आसक्त, पापज्ञान, मद्यादिपानमें प्रेमरखा वाला, लिखना पढ़ना शास्त्रज्ञानसे रहित झूठा और (कट वेत्ता)जाली भी मनुष्य होवे ।। ५॥ शुक्रराशिका हो तो (आचार्य ) गुरु वा अन्धकर्ता, बहुत स्त्री,बहुत पुत्रोंवाला धन कमानेमें श्रेष्ठ, धनवान होवे । बुधकी राशिम, दान तथा गुरु साह्मणावजन्म पर भूगोभी मिथुनका होतो वाचाल चंद्रमा क्षयरोग, अंगहीनता, कुष्ठ, खुजली, अपची और राजकोपसे धननाश होता है ॥ १४॥ नानाक्लेशं शिरःशूलं ददाति धरणीसुतः ॥ सोमपुत्र दशायां तु ध्रुवमंतर्दशां गतः ॥१६॥ रिपुपापगदोन्मुक्तो नृपमंत्री द्विजप्रियः ॥शशिजस्य दशायां तु गुरावंत- गते सति ॥ १६॥ अतिथिगुरुपु भक्तो गंधपुष्पानुरक्तो वरशयनमणीनां मण्डलेशानुरक्तः ॥ विचरति भृगुपुत्रे सोमसूनोदेशाय यदि पति ननीयोनार्कगो नारि- संगः ॥ १७॥ बुधदशा में मंगल अनेकप्रकारके केश, शिरशल देता है यह निश्चय है ॥ १५ ॥ गुरुकी अंतर्दशा, शत्र, पाप, रोग " - (१३६) जातकशिरोमणि- इनसे छुटजाता है। राजमंत्री, तथा ब्राह्मणप्रिय होता है।।१६।। बुधमें बृहस्पतिकी अंतर्दशा होने में अतिथियों तथागुरुजनोंमें भक्ति रक्खे सुगंधि पुष्पोंमें प्रेम, श्रेष्ठ विस्तरके मणि अर्थात उत्तम स्त्री और छोटे राजासे प्रेम रहे ये फल तय हैं कि, जय वह शुक्र नीच, अस्तंगत और शत्रुयुत न होवे ॥ १७ ॥ लुप्तधर्मविपयार्थसुखार्त्तखंडकायसुखसंयुतो नरः ॥ भानुजो यदि करोति दशायां स्वां दशां शशिसुतस्य हि नूनम् ॥ १८ ॥ त्रिशाशके स्वे शशिजः करोति मेधाकलाकाव्यविवादयुक्तम् ॥ शास्त्रार्थयुक्तं कुलमान- वन्तं शिल्पालयं साहससंयुतं च ॥१९॥ इति श्रीजा- तकशिरोमणौ बुधदशाविचाराध्यायत्रयोदशः ॥ १३ ॥ जब शनि बुधकी दशामें अंतर्दशा करता है तो मनुष्यका धर्म लोप होवै, विषयके जो सुख है उसके अर्थ सुखमें भी पीडित ही रहे कामदेवका सुख भी खंडित होवे यह निश्चय है ॥१८॥और अपने विशांशकमें स्थित हुआ बुध मनुप्यकोमेधा (बुद्धि ) कला काव्य विवादसे युक्त, शास्त्रार्थसे युक्त, कुलमें मानवाला, शिल्पस्थानवाला, और साहससे युक्त करताहै१९॥ इति श्रीजातकशिरोमणी माहीधरीभाषाटीकायां बुधदशा- विचाराध्यायस्त्रयोदशः॥ १३ ॥ जैव्या स्वाध्यायगर्भवति धनचयो मंत्रनीतिप्रताप- माहात्म्यख्यातियुक्तोद्यमगुणमतिमिः संयुतः शक्ति- युक्त देवज्ये भूपमंत्री कनकहयचयः पुत्रमित्रांवरादयः शत्या हीनेऽथचिंतागहननिवसनं कर्णरुक पापवैरम् ॥
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भाषाटीकासमेत।
बलवान् धृहस्पतिकी दशामें अपने नित्यकृत्य वेदपाठादि
मंत्रोंसे धन बहुत होता है, बुद्धि,नीति तथा प्रतापसे महात्म्य
एवं ख्यातियुक्त होवे. उद्यम, गुण, अकिलसे युक्त होवे तथा
राजमंत्री होवे, सुवर्ण घोडाओंका समूह आवै पुत्र मित्र,
वस्त्रोंसे युक्त होव. यदि बृहस्पति निर्बल हो तो चिंतारूपी
वनमें पडारहे कर्णरोग और पापियोंके साथ वैर होवे ॥१॥
अथ महाभूतच्छायागुणः ।
मृदंगभेरीवशंखतंत्रीवंशस्वनानन्दपरो नरः स्यात् ।।
श्रीरांवरीयं श्रवणे करोति व्यक्ति दशायाः सुरपूजि.
तस्य ॥ २ ॥ स्फटिकरुचिररूपा श्रेयसे भाग्ययुक्ता
गगनतलभवा श्रीरीज्यजायां दशायाम् ॥ असितमल-
विगंधा वायवी श्रीः करोति गदवधधननाशं शौरिजायां
दशायाम् ॥३॥
अब बृहस्पतिकी महाभूतछायालक्षण कहते हैं कि, जब
गगनतत्व प्रबल होता है तब (मृदंग) पखावज, भेरीशब्द,
शंख, वीणा, बांसरीके आवाजके आनंदमें मनुष्य तत्पर होता
है वायु शब्दगुण आकाशमें है यह आकाशकी श्री कानोंसे
अनुभव होती है ऐसी अवस्थामें बृहस्पत्तिकी दशा होकरके,
जिसकी दशा मालूम नहीं उसकेलिने ज्ञात होती है ॥२॥ यह
आकाशतत्त्वकी छाया स्फटिकके रमणीयरूपा भलाईके
वास्ते होती है । मनुष्यको बृहस्पतिकी दशामें सौभाग्ययुक्त
करती है, ऐसे ही वायुकी श्रीसे शनिकी दशा अनुभव होती
है इसमें कृशता, मलिनता, दुर्गधता, रोग, मरण और
धननाश होता है॥३॥
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भाषाटीकासमेत।
द्रव्यात्यो नभसि स्थितेभवगते लाभान्वितांत्ये खलः६॥
गुरुके भावफल हैं कि, लग्नमें हो तो विद्वान् द्वितीय
सुवचन, तीसरेमें क्षुद्र,चौथेमें सुखी,पंचममें पुत्रवान् तथाधन-
वान्, छठेमें शत्रुसहित मनुष्य रहे सप्तममें, पितासे अधिक
अष्टममें नीच, नवममें तपस्वी, दशममें धनाढय, ग्यारहमें
लाभवान द्वादशमें खल, इसप्रकार फल बृहस्पतिके भाव-
स्थके हैं ॥६॥
अथ योगजफलानि।
देवेज्योर्कयुतो नरं जनयति ऋरान्यकार्ये रतं सेन्दुर्वि-
तकुलाधिपः स्थिरमतिः स्फीतं सक्को गुरुः ॥ पुर्या-
ध्यक्षपरं बुधेन सहितः संग्रामभूचारिणं विद्यादारगुणा-
न्वितं सभृगुजः सार्किश्च सन्नापितम् ॥७॥
बृहस्पति सूर्यसहित होवे तो मनुष्यको क्रूर एवं औरॉके
काममें तत्पर करता है, चन्द्रयुक्त धन तथा निजकुलका अधि-
पति, भौमसे स्थिर बुद्धि और संपन्न, बुधसे पुरके अध्यक्ष-
तामें तत्पर, शुक्रसे संग्रामभूमिचारी, विद्या, स्त्री, गुण इनसे
युक्त, शनियुक्त होनेसे हजाम होता है ॥ ७ ॥
अथ दृष्टिः।
जनयति रविदृष्टः कौजभे धर्मनिष्टं बहुयुवतिधनाढयं
भूमिपं चन्द्रदृष्टः ।। नृपतिपुरुषमयं वक्रदृष्टः सुदार
शशितनसमुदृष्टः सत्यपावं पिलोभम् ॥ ८ ॥ शुक्र-
क्षितो भवति वस्त्रसुगंधमाल्यमिष्टाशिनं युवतिभूषण-
वित्तवन्तम् ।। तीक्ष्णं सुसाहसपरं मलिनांवरादयं
शौरेक्षितः स्थिरसुहृत्सुतवित्तवन्तम् ॥ ९॥
(२३८) जातकशिरोमणि- गुरुराशिफलानि। भूरिद्रव्यविलासिनीतनयवान् दाता सुभृत्यः क्षमी जीवे भौमगृहे प्रतापबहुलः सेनापतिः पण्डितः ॥ त्यागी स्वच्छवपुः सुखी सुतनयो मित्रार्थयुक् शौको वौधे भूरिधनात्मजैहसुखैः साचिव्ययुक्तः सुखी ॥४॥ कर्के रत्नविलासिनीसुतसुहृत्प्रज्ञावलैरन्वितः सिंहे कर्कटवत्फलं सुरगुरौ सेनापतिर्वा नृपः ॥ देवेज्ये वलनायको नरपतिर्वा मण्डलेशः स्वके नीचे निःश्व- शुरो घटे सुरगुरौ प्रोक्तं च यच्चन्द्रभे ॥५॥ बृहस्पतिका राशिफल कहते है। भौमराशिमें हो तो यहु- तसे धन, स्त्री, पुत्रोंवाला अच्छे नौकरोंवाला होवे, शुक्ररा- "शिमें हो तो वडा प्रतापी, सेनापति, पंडित, उदार निर्मल शरीर सुखी, सत्पुत्रवान् मित्र तथा धनयुक्त होव, बुधकी राशिमें बहुत्तले धन पुत्र; सुख मंत्रित्वसे युक्त तथा सुखी होव ॥ ४॥ कर्कका होवे तो रत्न, स्त्री, पुत्र, मित्र, बद्धि पलसे युक्त होवै सिंहकेमें भी कर्कके समान फल हैं सेनापति अथवा राजा होना ये भी फल सिंहके हैं, अपनी राशिका होवे तो सेनापति वा राजा अथवा कुछ गाँवका राजा होवे (नीच ) मकरका होवे तो श्वशुररहित रहे और कुंभके बृहस्पति कर्कके तुल्य फल होते हैं ॥५॥ गुरुभावफलानि । विद्वॉल्लग्नगते गुरौ सुवचनः स्वस्थे कदयोंगे तुयें सौख्ययुतः सुते ससुतधीः शत्रौ सशत्रुः पुमान् ॥ जायास्थे पितृतोधिको निधनगे नीचस्तपस्वी शुभे -----
भाषाटीकासमेत। (१३९).
द्रव्याढयो नभसि स्थितेभवगते लाभान्वितांत्ये खलः६॥
गुरुके भावफल हैं कि, लग्नमें हो तो विद्वान्, द्वितीयमें
मुवचन, तीसरेमें क्षुद्र,चौथेमें सुखी,पंचममें पुत्रवान् तथाधन-
वान, छठेमें शत्रुसहित मनुष्य रहे सप्तममें, पितासे अधिक
अष्टममें नीच, नवममें तपस्वी, दशममें धनाढय, ग्यारहमें
लामवान द्वादशमें खल, इसप्रकार फल वृहस्पतिके भाव-
स्थके हैं ॥६॥
अथ योगजफलानि।
देवेज्योर्कयुतो नरं जनयति क्रूरान्यकार्ये रतं सेन्दुर्वि-
त्तकुलाधिपः स्थिरमतिः स्फीतं सबको गुरुः॥ पुर्या-
ध्यक्षपर बुधेन सहितः संग्रामभूचारिणं विद्यादारगुणा-
न्वितं सभृगुजः सार्किश्च सन्नापितम् ॥ ७॥
बृहस्पति सूर्यसहित होवे तो मनुप्यको क्रूर एवं औरोंके
काममें तत्पर करता है, चन्द्रयुक्त धन तथा निजकुलका अधि-
पति, भौमसे स्थिर बुद्धि और संपन्न, बुधसे पुरके अध्यक्ष
तामें तत्पर, शुक्रसे संग्रामभूमिचारी, विद्या, स्त्री, गुण इनसे
युक्त, शनियुक्त होनेसे हजाम होता है ॥ ७ ॥
अथ दृष्टिः।
जनयति रविष्टः कौजमे धर्मनिष्टं बहुयुवतिधनादयं
भूमिपं चन्द्रदृष्टः ॥ नृपतिपुरुषमयं वक्रदृष्टः सुदारं
शशितनयसुदृष्टः सत्यवाचं विलोभम् ।।८॥ शुके-
क्षितो भवति वस्त्रसुगंधमाल्यमिष्टाशिनं युवतिभूपण.
वित्तवन्तम् ॥ तीक्ष्णं सुसाहसपरं मलिनांवरादयं
शौरेक्षितः स्थिरसुहृत्सुतवित्तवन्तम ॥९॥
(१३८) जातकशिरोमणि- गुरुराशिफलानि। भूरिद्रव्यविलासिनीतनयवान दाता सुभृत्यः क्षमी जीवे भौमगृहे प्रतापबहुलः सेनापतिः पण्डितः॥ त्यागी स्वच्छवपुः सुखी सुतनयो मित्रार्थयुक् शौको वौधे भूरिधनात्महसुखैः साचिव्ययुक्तः सुखी ॥४॥ फर्के रत्नविलासिनीसुतसुहृत्प्रज्ञावलैरन्वितः सिंह कर्कटवत्फलं सुरगुरौ सेनापतिर्वा नृपः ॥ देवेज्ये बलनायको नरपतिर्वा मण्डलेशः स्वके नीचे निःश्व-' शुरो घटे सुरगुरौ प्रोक्तं च यञ्चन्द्रभे॥५॥ बृहस्पतिका राशिफल कहते हैं। भौमराशिमें होवे तो बहु- तसे धन, खी, पुत्रोंवाला अच्छे नौकरोंवाला होवे, "शिमें हो तो वडा प्रतापी, सेनापति, पंडित, उदार निर्मल शरीर सुखी, सत्सुत्रवान् मित्र तथा धनयुक्त होवे, बुधको राशिमें बहुतसे धन पुत्र, सुख मंत्रित्वसे युक्त तथा सुखी हो ॥ ४॥ कर्कका होवे तो रत्न, स्त्री, पुत्र, मित्र, बुद्धि पलमे युक्त होव सिंहकेमें मी कर्कके समान फल हैं सेनापति अथवा राजा होना ये भी फल सिंहके हैं, अपनी राशिका हो तो सेनापति वा राजा अथवा कुछ गाँवका राजा होवे (नीच ) मकरका हो तो श्वशुररहिन रहे और कुंभके वृहस्पनिमें कर्कके तुल्य फल होते हैं ॥५॥ गुरुभाषफलानि । विद्रॉलनगते गुरों सुवचनः स्वस्थ कदयोग्रगे तुयें सांख्ययुतः सुते ससुतधीः शत्रा सशत्रुः पुमान, जायास्थे पितृतोधिको निधनगे नीचस्तपस्वी शुभे शुक्ररा .
(१३९)
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भाषाटीकासमेत।
द्रव्याख्यो नभसि स्थिते भवगते लाभान्वितांत्ये खलः६॥
गुरुके भावफल हैं कि, लग्नमें हो तो विद्वान् द्वितीयमें
सुवचन, तीसरेमें क्षुद्र चौथेमें सुखी,पंचममें पुत्रवान् तथाधन-
वान, छठेमें शत्रुसहित मनुष्य रहे सप्तममें, पितासे अधिक
अष्टममें नीच, नवममें तपस्वी, दशममें धनाढय, ग्यारहवेमें
लाभवान द्वादशमें खल, इसप्रकार फल बृहस्पतिके भाव-
स्थके हैं ॥६॥
अथ योगजफलानि ।
देवेज्योर्कयुतो नरं जनयति क्रूरान्यकार्ये रतं सेन्दुर्वि-
तकुलाधिपः स्थिरमतिः स्फीतं सवको गुरुः ॥ पुर्या-
ध्यक्षपरं बुधेन सहितः संग्रामभूतारणं विद्यादारगुणा-
न्वितं सभृगुजः सार्किश्च सत्रापितम् ॥ ७॥
बृहस्पति सूर्यसहित होवे तो मनुप्यको क्रूर एवं औरक
काममें तत्पर करता है, चन्द्रयुक्त धन तथा निजकुलका अधि.
पति, भौमसे स्थिर बुद्धि और संपन्न, बुधसे पुरके अध्यक्ष-
सामें तत्पर, शुक्रसे संग्रामभूमिचारी, विद्या, स्त्री, गुण इनसे
युक्त, शनियुक्त होनेसे हजाम होता है ॥ ७ ॥
अथ दृष्टिः।
जनयति रविदृष्टः कौजभे धर्मनिष्ठं बहुयुवतिधनाढ्यं
भूमिपं चन्द्रदृष्टः ॥ नृपतिपुरुषमयं वक्रदृष्टः सुदार
शशितनयसुदृष्टः सत्यवाचं विलोभम् ॥ ८॥ शुक्र-
शितो भवति वनसुगंधमाल्यमिष्टाशिनं युवतिभूषण-
वित्तवन्तम् ॥ तीक्ष्णं सुसाहसपरं मलिनांवरादयं
"
शोरेक्षितः स्थिरसुहृत्सुतवित्तवन्तम् ॥ ९॥
(१४०) जातकशिरोमणि- दृष्टि फल है कि, मंगलकी राशिमें बृहस्पति सूर्य दृष्ट हो तो धर्ममें तत्पर रहे, चन्द्रदृष्ट होवै तो बहुत स्त्री तथा धनसे युक्त, भौमसे राजपुरुषोंमें श्रेष्ठ, बुधसे, सुन्दरस्त्रीवाला सत्य- वक्ता निर्लोभ होता है ॥ ८॥ शुक्रष्टिसे वस्त्र, सुगन्ध, पुष्प, मीठा इनका भोगनेवाला, स्त्री, भूषण, धनवाला, शनिदृष्ट बृहस्पति मनुष्यको तीक्ष्णस्वभाव, उत्तम साहसमें तत्पर, मलिनवस्त्रोंसे युक्त तथा अस्थिर मित्र, पत्र धनवाला करता है ॥९॥ सूर्येण दृष्टो भृगुमंदिरस्थो नरेंद्रसख्यं द्विचतुष्पदाढयम्॥ करोति जीवो विनयान्वितं च चन्द्रेण दृष्टो युवतिप्रियं च ॥ १० ॥ीवो वालविलासिनीशतपति प्राज्ञं कुजेनेक्षितस्तारानार्थसुतेक्षितोऽतिविभवंप्राज्ञं गुणाढ्यं ----सदा ।। शौच्या भूपणधारिणं बहुगुणं यानासनाढ्यं मृदुं दृष्टः सूर्यसुतेन विस्तृतगुणग्रामाधिकारान्वितम् ११॥ शुक्रराशिगत गुरु सूर्यदृष्ट होनेमें मनुष्यको राजाका प्रीतिपात्र, मनुष्य, पक्षी और चौपायोंसे युक्त करता है चन्द्रसे नम्र तथा स्त्रीप्रिय भी ॥ १० ॥भौमसे नवयौवना विहारज्ञ सौस्त्रियोंका पति, तथा बुद्धिमान, वृधसे अतिऐ- श्वर्यवान, प्राज्ञ और सर्वदा गुणयुक्त शुक्रष्टिमें भूपणधारी, बहुतगुणयुक्त, सवारी, शय्यासे युक्त, कोमल स्वभाव, शनि- दृष्टिसे बडा और गुणवाला मामका अधिकारी करता है॥११॥ ग्रामप्रवंधं धनधान्यवंतं सुयतितो देवगुरुश्वाधे।।चन्द्रे. शितो मातृहितं धनाढयं दारासुखान्यं वहुपुत्रवंतम् ॥ १२॥ कुजेनितोलब्धजयंक्षताढ्यं बुधेशितो ज्यो- .
भाषाटीकासमेत। (१४१) तिपवादवन्तम् ॥ प्रसाददेवालयकृत्यविशंसितेन सौरेण पुराधिपत्यम् ॥ १३॥ बुधराशिके गुरुपर सूर्यदृष्टिसे, मनुप्य ग्रामके प्रबंध धन- धान्यवाला करता है चन्द्रदृष्टिसे माताका हिती, धनाढ्य, स्वीसुखसे युक्त धनपुत्रवाला ॥ १२ ॥ भौमदृष्टिसे विजयप्राप्त, धाववाला बुधसे ज्योतिषशास्त्रके वादवाला, शुक्रसे, महल देवमंदिरके कृत्य जाननेवाला और शनिदृष्टिसे नगरका स्वामी करता है ॥ १३ ॥ जीवे सूर्यविलोकिते शशिगृहे यूथाग्रगामी भवेद्रव्यस्त्री- सुतमित्रसौख्यरहितः शास्त्रादिवादे रतः॥ भूमीशो बहु- कोशवाहनयुतश्चन्देक्षितः स्त्रीयुतो भूपुत्रेण कुमानदान- सहितो सत्कारभागी नरः ॥ १४॥ जनयति बुधदृष्टः पापहीनं सुबंधुंजननिहितधनाढयंग्रामपूज्यं जनाप्तम्।। भृगुतनयसुदृष्टो भरिदाराधनाढ्यं बलपतिनगरेक्षसौर- दृष्टः करोति ॥ १५॥ कर्कके चन्द्रमापर सूर्यदृष्टि हो तो समूहके अग्रगामी, धन स्त्री, पुत्र, मित्र, सुखसे रहित और शास्त्र जाननेवाला होवे, चन्द्रदृष्टिसे, भूमिका मालक, बहुतसे खजाना, सवारी, स्त्रियों से संयुक्त रहे. मंगलकी दृष्टिसे निन्द्यमान् दानवाला, तथा सत्कार भाग्य होवे ॥ १४ ॥ बुधदृष्ट होवै तो मनुष्य पापरहित अच्छे बांधवोंवाला, माताका हिती, धनवान्, ग्राममें पूजा- घोष, मनुष्काला, शुक्रष्टिले बहुतते धन, त्रियोंसे युक्त, शनिदृष्टिसे, सेनापति, नगरका पति करता है ॥१५॥ सिंहस्थे राजराजो भवति सुरगुरौ सत्मियः सूर्यदृष्टो जीवे शुभाशुदृष्टे वरयुवतिरतो धीधनाढयो नृमान्यः ।।
(१४०) जातकशिरोमणि- दृष्टि फल है कि, मंगलकी राशिमें बृहस्पति सूर्य दृष्ट होवे तो धर्ममें तत्पर रहे, चन्द्रदृष्ट होवै तो बहुत स्त्री तथा धनसे युक्त, भौमसे राजपुरुषोंमें श्रेष्ठ, बुधसे, सुन्दरस्त्रीवाला सत्य- वक्ता निर्लोभ होता है ॥ ८॥ शुक्रदृष्टिसे वस्त्र, सुगन्ध, पुष्प, मीठा इनका भोगनेवाला, स्त्री, भूषण, धनवाला, शनिदृष्ट बृहस्पति मनुष्यको तीक्ष्णस्वभाव, उत्तम साहसमें तत्पर, मलिन वस्त्रोंसे युक्त तथा अस्थिर मित्र, पुत्र धनवाला करता है ॥९॥ सूर्येण दृष्टो भृगुमंदिरस्थो नरेंद्रसख्यं द्विचतुष्पदाढयम्।। करोति जीवो विनयान्वितं च चन्द्रेण हो युवतिप्रिय च ॥ १० ॥ जीवो बालविलासिनीशतपति प्राज्ञ कुजेनेक्षितस्ताराना-05-गानं गणाढ्यं स्वगृहे नृपतिविरुदं जनयति जीवो निरीक्षितोरविणा॥ अतिसभगं युवतीनां दृष्टश्चंद्रेण मध्यधनं पुरुपम् १८॥ संग्रामशस्त्रक्षतविक्षतांगं भौमेन दृष्टः कुरुते सुरेज्यः॥ बुधेन भूपं नृपमंत्रिणं वा करोति जीवः सुतभाग्ययुक्तम् ॥ १९॥ भोज्यानपानांवरगेहशय्यासनोत्तमस्त्रीसहितं सुरेज्यः ॥ करोति दृष्टो भृगुनंदनेन भूपांवरस्त्रीसुखिनं गुणाढ्यम् ॥२०॥ अपनी राशि गुरुपर सूर्यदृष्टि हो तो राजाका विरोधी होवे,चन्द्रदृष्टि होवे तोखियोका अतिरसिक और मध्यम धन वान होवे ॥ १८ ॥ मंगलसे संप्राममें शस्त्रसे कटे अंग, बुधसे राजा अथवा राजमंत्री पुत्र तथा ऐश्वर्ययुक्त ॥ १९ ॥ शुक्रदृष्टि से भोजनके पदार्थ अन्न, पानेके वस्तु, वन, घर, शय्या, भाषाटीकासमेत। (१४१) तिषवादवन्तम् ॥प्रसाददेवालयकृत्यविशंसितेन सौरेण पुराधिपत्यम् ॥ १३॥ बुधराशिके गुरुपर सूर्यदृष्टिसे, मनुप्य ग्रामके प्रबंध धन- धान्यवाला करता है चन्द्रदृष्टिसे माताका हिती, धनाढय, स्त्रीसुखसे युक्त धनपुत्रवाला ॥ १२ ॥ भौमदृष्टिले विजयप्रात, घाववाला बुधसे ज्योतिषशास्त्रके वादवाला, शुक्रसे, महल देवमंदिरके कृत्य जाननेवाला और शनिदृष्टिसे नगरका स्वामी करता है ॥ १३॥ जीवे सूर्यविलोकिते शशिगृहे यूथाग्रगामी भवेद्व्यस्त्री- सुतमित्रसौख्यरहितः शास्त्रादिवादे रतः ॥ भूमीशो बहु- कोशवाहनयुतश्चन्द्रेक्षितः स्त्रीयुतो भूपुत्रेण कुमानदान- सहितो साoir सूयका टाटासगति बुधदृष्टः पोत हावै चन्द्रदृष्टि से गुरुजनोंका भक्त, अपने कुलेका सहारनेवाला होवै, भौमदृष्टिसे शूरमा, संग्रामभूमिका पति, रणवालोंको जीतनेवाला और गर्विष्ठ होवै, बुधी दृष्टिसे हीजहोंका सेवन करे, बहुत मतुप्योंका पति, सेनापति. श्रेष्ठपुत्रवाला, संग्रही होवे ॥ २१ ॥ शुक्रदृष्टिसे धन तथा बुद्धि से युक्त, सुभग और दीर्घायु होवै, शनिदृष्टिले राजाके देशका बडा आदमी, चौपाया, धनवाला और नगरका अधिपति होवे ॥२२॥ अथांशफलम् । धीमंतमार्य स्वनवांशकेज्यः कुजांशके झं सुदृढाभिमा- नम् ।। शुक्रांशके मंत्रिषु मानवंत बुधांशके काव्यकला सुविज्ञम् ॥ २३ ॥ सूर्याशके ख्यातमनल्पवित्तं शन्य- शके स्फीतधनं महान्तम् ॥२४॥ , . (१४४) जातकशिरोमणि- बृहस्पतिके अंशफल हैं कि, स्वांशका हो तो बुद्धिमान् तथा श्रेष्ठ होवे, मंगलकेमें पंडित, दृढ अभिमान युक्त शुक्रांश- में मंत्रियों में मानवाला बुधांशकमें काव्यकलाका अच्छा जान- नेवाला ॥ २३ ॥ सूर्याशकमें विख्यात तथा बहुत धनवाला, शनिक अंशमें बहुत धन और बडा आदमी होवै ॥२४॥ अथान्तर्दशा। गुरोर्दशायां सविता स्वमान्य मान्यं नृपाणां कलहाद्वि- मुक्तम् ॥करोति नित्यं परिवारयुक्तं पराक्रमस्थानसुखो- पपन्नम् ॥२५॥ अनेकनारीपरिवारवंतं करोति चंद्रो जितरोगशत्रुम् ॥ गुरोर्दशायां नृपतिप्रधानमन्तर्दशात्थः सुखभोगयुक्तः॥२६।। परप्रतापी भुवि लब्धकीर्तिः शूरोतितीक्ष्णो जयलब्धवित्तः ॥ महीसुते जीवदशामु- पेते प्रभूतसौख्यं लभते मनुष्यः ।। २७॥ सौख्यमित्र सहितो गुरुभक्तो रोगपापरहितो बुधमान्यः । चन्द्रजे गुरुदशामुपयाते बंधुमित्रसुतदारसंयुतः।।२८॥ धन नाशद्विपदुःखैरभिभूतो द्विजाश्रयी।शुक्रे गुरुदा प्राप्ते पुमान्भवति नित्यशः ।। २९ ॥ वेश्यारतो द्यूतपरो ऽथवा स्यात्सुरापरो वा धनभूवियुक्तः ॥ सौरे दशायां सुरपूजितस्य प्राप्ते जनः स्यात्स्वकुलानुसारात् ३०॥ इति श्रीजातकाशिरामणौ गुरुदशाध्यायश्चतुर्दशः।।१४।।
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भाषाटीकासमेत। (१४५)
अन्तर्दशाफल कहते हैं। गुरुदशामें सूर्यातर अपने मनु-
प्योंका तथा राजाओंका माननीय, कलहसे निर्मुक्त, नित्य'
परिवारयुक्त, पराक्रमसिद्धि स्थान सुखसे युक्त करता है॥२५॥
चन्द्रांतर अनेकस्त्रीपरिवार युक्त, शत्रु एवं रोग जीतनेवाला
राजमंत्री और सुभग करता है ॥२६॥ मंगलका अन्तर शत्रुको
सन्तापकरनेवाला, पृथ्वीमें कीर्तिवाला,शरमा, तीक्ष्णस्वभाव,
विजयसे धनलाम भी करता है तथा मनुष्य बहुत सौख्य भी
प्राप्त करता है।॥२७॥बुधान्तर में सुख तथा मित्रसहित गुरुभक्त,
रोगसे पापसे रहित, विद्वानोंका माननीय बन्धु मित्र पुत्रस्त्री
से युक्त होता है ॥२८॥ शुक्रांतरमें धननाश शवकृत दुःखों
से पीडित ब्राह्मणके आश्रयी भी मनुष्य नित्य होता है ।।२९॥
शनिकी अंतर्दशामें वेश्यामें तत्पर, जूआमें तत्पर अथवा
शरावपीनेवाला, धन भूमिसे रहित अपने कुलानुसार होवे
॥३०॥ इति श्रीजातकशिरोमणी माहीधरीमापाटीकायां
गुरुदशाध्यायश्चतुर्दशः ॥ १४ ॥
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शौक्यां वादिवगीतप्रियसुरतपरो वस्त्रमाल्यानुलेपैरास-
तो भक्ष्यपानरपि वरसुवधूहास्यलीलाविलासैः। नाना-
लंकाररत्नहयगजनिलयैः ख्यातियुक्तो नमद्भिमित्रः
सदन्धुपुलिनि भृगुसुते संगतः स्यान्मनुष्यः ॥१॥
कृषिप्रयोगैवलिवर्दभूमिजलाश्रयैर्गोमहिपादिभिश्च ॥
संयुज्यते मध्यवलेऽसुरेज्ये लाभो निधेरन्यपरिग्रहश्व
॥२ ।। नृपैर्निपादैः कुलवृन्दमुख्यैर्वरं विरुद्धाचरणं
नृपैश्च ॥ कुयोपिति प्रीतिपरः प्रियस्य शोकातुरोहीन
वले भृगौ स्यात् ॥३॥
(१४६) जातकशिरोमणि- . अब शुक्रदशा फल कहते हैं कि, बलवान् शुक्रकी दशा में बाजे, गीतको प्रियमाननेवाला, रतिक्रीडामें तत्पर वस्त्रपुष्प चंदनादि अनुलेप वस्तुओंमें आसक्त तथा भोजनके वस्तु पानके पदार्थो में भी आसक्त रहे, श्रेष्ठ सुंदर स्त्रीके साथ हंसी खेल विलासों करके अनेक अलंकार रत्न, घोड़े, हाथी, मका- नोंसे युक्त रहे, विख्यात होवे,नम्र होते हुये मित्र, अच्छे घंधु, पुत्रोंसे युक्त होता है ॥ १ ॥ बृहस्पति मध्यवली होवे तो दशामें खेतीवारीके काम करने में बैल,जमीन जलके आश्रयसे गौ भंस आदिसे भी संयुक्त होता है तथा उत्तम वस्तुका लाभ दूसरेसे गृहण करनेसे भी लाभ होता है ॥२॥ हीन बलीमें राजा, भील अपने कुलसमूहके मुखियाओंसे श्रेष्ठता मिले राजाओंसे विरुद्ध आचरण भी होवै दुष्ट स्त्रीमें प्रीति अत्यंत रहे प्रिय जनके शोकसे आतुर भी रहें ॥३॥ अथ छायाफलम्। यदा रसास्वादपरो मनुष्यो दशेंदुभृग्वोः शुभदा तदा- नीम् ॥स्वच्छां श्रियं हारिभवां मनुष्यः श्रेष्ठे च जिह्वा प्रकटी करोति ॥ ४॥ श्रीर्वारिजा तनुभृतां जननीव सौख्यं हृष्टा करोति तनुसौख्यमहार्थलाभम् ॥ सौभा- ग्यमार्दवकरी नयनाभिरामा नित्यं दशासु भृगुचंद्रम- सोश्च पुंसः ॥६॥ महाभूत छायासे शुक्र चंद्रदशाका अनुभव है कि, जब मनुप्य रसके पहिचानमें तत्पर होता है तब चंद्रमा शुक्रकी शुभफलदा दशा जाननी मनुष्य श्रेष्ठ में निर्मल शोभा जल तत्त्वकी जिहा प्रकट करती है ॥४॥जलतत्त्वसे उत्पन्न श्रीश- पीरधारियोंको प्रसन्नतासे माताके समान सौख्य, बडा धन -
भाषाटीकासमेत। (१४७)
लाभ, सौभाग्य, मृदुता, नेत्रोंको प्रसन्न करनेवाली शोभा
नित्य देती है जिसकी दशा ज्ञात न हो उसे ऐसे लक्षण प्रकट
होनेमें शुक्र चंद्रदशा जानीजाती है ।। ५ ॥
अथ राशिफलम् ।
कुजः परस्त्रीरतः स्यात्तदर्थे विवादैर्हतस्वः कुलांगार
रूपः ॥स्वभे राज्यपूज्योऽभयो बंधुनाथः सुबुद्धिर्द्धनी
भार्गवे वीर्ययुक्तः ॥ ६॥ राजकार्यकरणप्रयतात्मा
द्वंद्वगे भृगुसुतेऽर्थकलान्यः॥पष्ठराश्युपगतेऽधमकर्मा नी
चदारतनयोऽनययुक्तः ॥७॥
शुक्रकी राशिफल कहते हैं। मंगलकीराशिमें शुक्र होता
पराई स्त्रीमें आसक्त रहे. परस्त्रीके लिये झगडे में धन चला
जावे अपने कुलको दग्ध करनेके लिये अथवा मलिन करनेके
लिये (अंगार) कोयला जैसा होवै,शुक्र अपनी राशिमें होवे
तो राज्यपज्य, निर्भय बंधवगमें श्रेष्ठ सद्बुद्धि धनवान् तथा
(वीर्य) पराक्रमवाला भी होवै ॥ ६ ॥ मिथुनका होवे तो
राजकार्य करने को तनुसे तत्पर रहे धन तथा कलासे भरा रहे
कन्यामें हो तो नीच कर्म करनेवाला होवे स्त्री पुत्र भी
नीच होवें अन्यायी होवै ॥७॥
द्विभार्योर्थी भीरुः शशिगृहगते दानवयुरी हये पूज्यः
शश्वदणगुणिगणेनिसहितः ॥ प्रजापाले पूज्यो
रविगृहगते मंदनयनः स्त्रिया प्राप्तव्यः प्रबलबनिता
पूर्णतनयः ॥ ८॥ भृगुसुते शनिगेहगते नरः कुयु..
बती पुरतो विजितस्त्रिया ॥ भवति कंवलपण्यधनो-
थवा महिपवेसरविक्रयतो धनी ॥९॥
भाषाटीकासमेत। (१४९) वाग्मी धनी बहुगुणः स बुधे भृगौ स्यात् ॥ १२ ॥ गुरुयुते भृगुजे धनदारवान्वहुगुणो वहुकाव्यकलायुतः।। असितसंगभृगौ लिपिपुस्तयुधुवतिजीवनलब्धवनो नरः॥१३॥ योगफल कहते हैं। शुक्र सूर्ययुत होके तो मनुप्य रणने श्रेष्ठ होवै चंद्रयतसे वस्त्र आदि क्रियामें चतुर, श्रेष्ठभोग- भोगनेवाला भौमयोगसे चतुर परस्त्रीमें आसक्त व्यसनी बुधयोगसे चतुरवाणीवाला. धनवान गुणवान् होवे ।। १२ ।। गुरुसे धन तथा स्वीयुत रहै बहुतगुण बहुतस्त्री काव्यकलासे युक्त शनियोगसे लिखना पुस्तकपढना जाने तथा मनुष्य स्त्रीके जीवनसे धन पावै ।। १३ ।। अथ दृष्टिफलानि। विनष्टसारो वनितानिमित्तं कौजे भृगौ भास्करदृष्टदेहे। अनार्यकांतापतिरिन्दुदृष्टे मनोभवात्ततॊ मतिचंचलश्च ॥ ।। १४ । परापवादप्रयतोतिदीनः स्वसौरव्यसंमान- विवेकहीनः।। कुजेन दृष्टेऽसुरराजपूज्ये सुवेपदेहो भवति प्रसूते ॥ १५॥बंधूनां परिवादवाक्यसहितोमुखातिदुष्टः शो विदृष्टे भगुजे विहीनविनयो विद्याविहीनोऽलसः ।। पुत्राणां वहुभाजनःसुनयवान्देवेज्यदृष्टेसुखी स्वाधीनाः स्वजनादयः कुजगृहे सोरेक्षितऽस्वो भवेत् ।। १६॥ दृष्टिफलविचार है कि, मंगलके राशिस्य शुक्रपर सूर्यकी दृष्टि होवे तो स्वीके निमित्त अपना (सार) सब करामात खोव चंद्रदृष्टिसे अश्रेष्टस्त्रीका पति कामातुर और चंचलघुद्धि -
(१५०) जातकशिरोमणि-
होवै ॥ १४॥ जन्ममें शुक्रपर भौमहष्टिसे पराये ऊपर झूठे-
कलंकमें तत्पर रहे अतिगरीब अपने सौस्य सन्मान और
विवेकसे हीन रहे देहका सुंदर वेष बनायेरहे ॥ १५ ॥ बुध
दृष्टिसे बंधुको तिरस्कार वचन बोले मूर्ख, अतिदुष्ट, वंचक,
न्यायरहित, विद्याहीन, आलसी होवै गुरुदृष्टि से बहुत पुत्र-
वाला, नीतिवाला, सुखी होवै शनिदृष्टिसे अपने मनुष्य
आदि अपने आधीन रहें निर्द्धन होवै ॥ १६॥
स्वः स्त्रीधनभाजनो भृगुसुते सूर्येण दृष्टे धनी दारा-
सोख्ययुतो गुणीक्षिततनौ चंद्रेण भौमेक्षिते ॥ दुष्टस्त्रीर-
मणो बुधेक्षिततनौ सद्वित्तसौख्यान्वित्तो भव्यस्त्रीसुतवा-
'हनोथ गुरुणा सौरेण दुष्टां मतिः॥ १७ ॥ बौधे स्त्रीनृ-
पदारकार्यकरणव्यासक्तचित्तो धनी दुष्टस्त्रीरमणो विन.
एविभवः सद्धाहनः स्वान्वितः॥ ग्रामाश्चात्मजदारवस्त्र-
शयनालंकारसौख्यान्वितो दुष्टस्त्रीव्यसनादिनष्टविभवो
ख्यादिदृष्टे भृगौ ॥ १८॥
शुक्र अपनी राशिमें सूर्यदृष्ट होवै तो, स्त्री धनका पात्र
होवे चंद्रदृष्टिसे धनवान् स्त्रीसुखयुक्त गुणवान्, भौमदृष्टिसे
दुष्टस्त्रीको रमणकरनेवाला बुधसे अच्छी वित्त एवं सुखसे युक्त,
गुरुसे उत्तम स्त्री पुत्र वाहनयुक्त शनिसे दुष्टबुद्धिवाला
होवे ॥ १७॥ बुधके राशिगत शुक्रपर सर्यदृष्टि हो तो स्त्री.
राजस्त्रीके कार्यकरनेमें चित्त आसक्त रहे; चंद्रदृष्टिसे धनवान्
स्था दुष्टस्त्रीको रमणकरनेवाला भौमसे नष्टऐश्वर्य बुधस उत्तम.
वाहन उत्तमधनसे युक्त गुरुसे ग्राम घोडे पुत्र स्त्री वस्त्र
शय्या भूषणोंके सुखसे युक्त, शनिसे दुष्टके संसर्गादिव्यसनोंसे
ऐश्वर्य नष्ट होजावै ॥१८॥
भाषाटीकासमेत। चांद्रे प्रवासपथराजसुताप्तदारं सूर्येक्षितोभृगुसुतःशशि- वीक्षितश्चकन्याप्रजं बहुसुतं कुजवीक्षितश्च स्त्रीबंधुपो- पणपरं वनिताप्तदुःखम् ॥ १९ ॥ बुधेक्षितः पंडितदा- ननाथं गुर्वीक्षितः पुत्रधनादियुक्तम् ॥ करोति शुक्रः शनिवीक्षितश्च स्त्रीनिर्जितं वित्तसुखादिहीनम् ॥२०॥ चंद्रराशिगत शुक्रपर सूर्यदृष्टि होवै तो परदेशवासी, मार्गचलनेमें तत्पर, राजद्वार, पुत्रसे धन पावै स्त्री उत्तम होवे चंद्रसे कन्याही होवे, मंगलसे बहुत पुत्र तथा स्त्री बंधु- जनके पालनमें तत्पर और स्त्रीसे दुःख पावै ॥ १९ ॥ बुधसे पंडित, दानाध्यक्ष, गुरुसे पुत्र धनआदिसे युक्त शनिदृष्टिसें स्त्रीका जीताहुआ, और धनसुखादिसे हीन होवै ॥ २० ॥ सिंहे सूर्यविलोकिते भृगुसुते कन्यापदो द्रव्यदश्चंद्रेणापि नृपप्रधानपुरुषः स्त्रीवित्तसौख्यान्वितः ॥ स्त्रीदुःखी धनवान्कुजेक्षिततनो दृष्टे बुधेनार्थवान्पण्यस्त्रीसुखवि. त्तलालसमतिस्तत्प्राप्तिनित्योद्यमी ॥ २१ ॥ भार्गवे रविगृहे गुरुदृष्टे दारवाहनधनो वहुभृत्यः ॥ सौरिणा नृपसमो नरपोवा जायतेथ विधवादयितोऽपि ॥२२॥ सिंहके शुक्रपर सूर्यदृष्टि होवे तो कन्यांसंतति होवे, धन देनेवाला हो चंद्रदृष्टिसे राजाका प्रधान पुरुप हो। स्त्री तथा धनके सौख्ययुक्त होवे भौमसे स्त्रीसे दुःखी रहे धनवान् होवे बुधाष्टसे धनवान् तथा वारांगनाके सुख और धनकी इच्छामें युधिरहे इनके प्राप्तिके लिये नित्य उद्यम करतारहे ॥ २१ ॥ शुक्रपर गुरुदृष्टि होवे तो स्त्री, सवारी, धनही धन होवे सेवक बहुत होव राजाके समान अथवा राजा होवे और विधवाघीका मिय हो । २२ ।
(१५२) जातकशिरोमणि- विदेशगामी रविवीक्षिते च चंद्रेक्षिते राजपुमान धनाढयः॥कुजेन नानाविण्यान्वितश्च नानासुखाढयो बुधवीसिते च ॥ २३॥ सुगंधवस्त्राभरणाशनानांभोगा- न्वितो देवपुरोहितेनातुरंगगोधान्यधनान्वितश्च शनी- क्षिते पूज्यगृहे भृगौ स्यात् ॥ २४ ॥ गुरुके राशिमें सूर्यदृष्ट शुक्र होवे तो विदेश गमनकरने वाला होवे चंद्रदृष्टिसे राजपुरुष तथा धनाढ्य होवै भौमसे, अनेक विषयोंसे युक्त वुधसे सुखयुक्त होवै ॥ २३ ॥ गुरुदृष्टिसे सुगंधि, वस्त्र, भूषण, भोजनोंका भोगभोगनेवाला शनिदृष्टिसे घोडे, गौ, अन्न, धनसे युक्त रहे ॥ २४ ॥ सौरिगेहगभृगौ रविदृष्टे क्रोधनो नरपतिप्रतिमो वा ॥ द्रव्यरूपवपुपा सुभगो वा चन्द्रवीक्षितभृगौ सुखभागी ॥ २५॥ विरूपदेहो बहुरोगयुक्तः कुजेक्षिते प्राज्ञवि- धानयुक्तः ॥ दुधेक्षिते सत्यवतीयुतश्च गीतादिवाये गुरुणा प्रसिद्धः ॥ २६॥ धनान्वितो वाहनभृत्ययुक्तो भोगान्वितः श्यामशरीरयष्टिः ॥ सौरोशिते सौरिगृहे मलाक्तो भवेन्महादेव इव प्रसिद्धः ॥२७॥ शनिकी राशिगत शुक्रकी दृष्टिहोवै तो क्रोधी,और राजा अथवा राजतुल्य होवे, चन्द्रदृष्टिसे धन, रूप, शरीर सुन्दर- तासे पूर्ण तथा सुखभागी होवे ॥ २५ ॥ भीमदृष्टिसे शरीर विरूप बहुतरोगोंसे युक्त होवै, बुधदृष्टिसे पण्डितं, विधिज्ञ, गुरुदृष्टि से उत्तमस्त्रीसे युक्त तथा गीतवादित्र में प्रख्यात होवे ॥ २६ ॥ शनिदृष्टिसे धनवान् वाहन, एवं चाक,से युक्त, , भाषाटीकासमेत। भोगवान्, श्यामशरीर, मलसें लिप्त और महादेव जैसा प्रसिद्ध होवे ॥ २७ ॥ अथांतर्दशा। अतीसाराक्षिरुग्गण्डरोगसंघार्दितः पुमान् ॥ रवीं शुक्रदशां प्राप्ते तप्तो वा बंधनादिभिः ॥ २८॥ चन्द्रे शुक्रदशा प्राप्ते नखदन्तार्तिकामलाः ॥ जायते नियत तस्य शिरःशूलसमन्विताः ॥२९॥ पितामुक्क्षतरोगी स्याझौमे शुक्रदशांगते । बुधे मनोरथावाप्तिर्गुरी धीधर्मशीलता ॥३०॥ राज्यलाभं च शुक्र स्खे धन- दारात्मजान लभेत् ॥ राज्यादिलाभश्च भवेच्छनौ वृद्धांगनातयः ॥ ३३ ॥ इति जातकशिरोमणौ शुक्रद- शाध्यायः पंचदशः ॥१५॥ शुक्रके अंतर्दशा फल हैं कि, शुक्रदशामें सूर्यका अंतर होनेपर पुरुष अतिसार, नेत्ररोग, गंडरोगोंके समृहसे पीडित, रहे अथवा बंधनआदिसे संतप्तरहे ॥ २८ ॥ चन्द्रांतरमें, नखून, तथा दांतोंमें पीडा होवे और अवश्य शिरशूलसहित कामला रोग होते हैं ॥ २९ ॥ मंगलकेमें पित्तरोग, रुधिररोग घाव लगनेसे रोग होते हैं ॥३०॥ बुधमें मनोरथप्राप्ति, गुरुमें उत्तम चुद्धि तथा धर्ममें स्वभाव, राज्यादिलाम भी होता है शुक्रमें शुक्रका अंतर होवै तो धन स्त्री पुत्र पावै, और राज्यादिलाभ भी होवे शनिके अंतरमें बूढी बीका लाभ होवे ॥ ३१ ॥ इति श्रीजातकशिरोमणी माहीधरीभाषाटीकायां शुक्रदशाध्यायः पंचदशः ॥ १५॥ "
(१५४) जातकशिरोमणि-
अथ शनिदशा।
देशग्रामपुराधिकारकरणश्रेणीप्रधानो भवेदृद्धस्त्रीख-
खेसरोष्ट्रमहिपीदासीसमूहस्सदा ॥ सौरे पूर्णबलेथ
मध्यमवले श्लेष्मानिलेयान्वितो हीने भृत्यकलत्रभ-
निविपत्तंद्राऽटनव्यंगता ॥३॥
अब शनिदशाके फल कहते हैं कि, शनि बलवान हो तो
उसकी दशासे देश, ग्राम नगरके अधिकारी कामकरनेवाला,
समूहमें प्रधान होवे बूढ़ी स्त्री, गदहा, गोरखर वा खच्चरी
ऊंट, भैंस और दासियोंके समूह सर्वदा रहें मध्यवली होवै
श्लेष्मरोग वायुरोग तथा ईर्ष्यासे युक्त रहे हीनबली होवे तो
नौकर तथा स्त्रीसे झिडकना पावै, विपत्ति होवे, आलस्य,
व्यर्थ फिरना और शरीर में व्यंगता होवै ॥ १॥
महाभूतछायादशाज्ञानम् ।
कर्पूरकाश्मीरपरागबालवरांगनास्पर्शसुखाववोधम् ॥
श्रीर्वायवीयं प्रकरोति पुंसां स्वस्यां दशांयां रविजस्य
नूनम् ॥ २॥ आसितविमलगंधा वायवी श्रीः करोति
गदवधधननाशं सौरिजायां दशायाम् ॥ ३॥
जब मनुप्यको, कपूर, केसर, सुगंधि तथा नवयौवना
स्त्रीके स्पर्शका सुख अत्यन्त प्रिय अनुभव होता है तब वायु-
तत्त्वकी श्री जाननी इसके प्रकटहोने में पुरुषोंको शनिकी
दशा जाननी, जिसकी दशा ज्ञात नहीं है उसको ये लक्षण
दशा ज्ञापक हैं ॥ २ ॥ शनिदशामें इसप्रकार जब वायु श्री
प्रकट होती है तब कृष्णरंग निर्मलगंधपर प्रेम होता है तथा
रोग, मरण, और धननाश होता है ॥३॥
भाषाटीकासमेत। (१५५). शनिराशिफलानि। सौरे मेपेतिमूर्यो भवति गतसुहृदांभिको वृश्चिकस्थे हीनोदीनो विलनो भवति चकृपणो बंधभाक् क्लेशयुक्तः।। नित्यं सौख्यार्थहीनो भवति वितनयो रक्षकेशोऽथ लेख्यो मूल् मुख्याधिनाथो भवति रविसुते चन्द्रपु- त्रस्य गेहे ॥४॥गोस्थेऽगम्यांगनेष्टो भवति च कुल- दानायको वित्तहीनस्तुंगे द्रव्याधिनाथो भवति च नगरपामसेनाधिनाथः ॥ कके मूल् दरिद्रो भवति वितनयो मातृपुत्रैविहीनो भानोगेंहे विभायों विसुखसु- तसुहत्संस्थिते सूर्यपुत्रे ॥५॥ आजीवं सुखभाक् प्रतीतिनिलयः सत्पुत्रदाराधनो जैवे सूर्यसुते धनी नयबलग्रामाननेता भवेत् ॥ अन्यस्त्रीधनसंग्रहोर्थनि- पुणो यामाग्रणीमैददृक् स्वक्षेत्रे स्थिरसंपदो मलिनता भोक्ता च जातः पुमान् ॥६॥ मेषादिराशिगत शनिके फल कहते हैं, शनि मेपका हो तो अत्यन्त मूर्ख होवै मित्ररहित दंभवाला होब वृश्चिकका होवे तो हीन, दरिद्री, निर्लज, मूझी, बन्धनभागी, केश- युक्त, सर्वदा सौख्य तथा कार्यसिद्धिसे हीन,पुत्ररहित, रक्षा- धिकारियोंका स्वामी होता है, बुधराशिमें होवै तो लिख- नेका काम जाने परन्तु मूर्खतासे युक्त रहे श्रेष्ठ अफसर होवे ।। ४।। वृषका होवे तो अगम्या स्त्रीका प्रिय तथा कुलटा स्त्रीका स्वामी और वित्तहीन होवे अपने उच्चका हो तो धनका स्वामी, नगर, ग्राम, सेनाका स्वामी होवे कर्कका जातकशिरोमणि- -- होवै तो मूर्ख, दरिद्री, पुत्ररहित, अपने सहोदर भाइयोंसे हीन होवे, सिंहका होवे तो खीरहित, सुख, पुत्र तथा मित्रोंसे रहित रहे ॥ ५॥ गुरुके राशिमें होवै तो आजन्म सुख भोगे,प्रतीतिका घर होवै, अच्छे पुत्र स्त्रीधनोंसे युक्त रहे अपनी राशिमें हो तो धनवान् नीति, सेना, ग्रामका मुख्य नायक होवै पराये स्त्री, धनका संग्रह करे, कार्य साधनमें निपुण, ग्राममें मुख्य, मन्ददृष्टि, स्थिरसंपत्तिवाला और मलिनताभोगी भी होवै ॥ ६ ॥ शनिभावफलानि । लग्ने सूर्यसुतेऽलसो मलिनता बाल्ये गदव्याकुलोऽनं- गायत्तमतिर्दरिद्रसहितः स्वः नृपो वा समः ।। देशग्रा- मपुराधिकारसहितो विद्वान्सुदेहो धने सौरे द्रव्यवली तृतीयभवने जातः सदा विक्रमी ॥ ७॥ तुर्य मानसपी- डितः सुतगते पुत्रार्थहीनोरिंगे जेता शगणस्य सप्तम. गते स्त्रीदुर्भगो बन्धमाक।। स्वल्पापत्यधनः शनौ नय- नरुगंधे सशोको धनो धर्मे पुत्रधनान्वितो गुरुहितःस्त्री द्वेपकारी जनः॥८॥ वहुतुरंगधनो देशमे स्वमे पित- वियोगयुतो दशमाब्दतःभवगते निधिलाभमुदान्वितो व्ययगतेंत्यनितंविनितत्परः॥९॥ शनि लग्नमें होवै तो मनुष्य आलसी,मलिनतायुक्त बाल्या. वस्थामें रोगसे व्याकुल, कामदेवमें आसक्त बुद्धि, दरिद्री हो, यदि लमका शनि स्वराशिमें हो तो राजा वा राज. तुल्य होवे, देश, प्राम, नगरके अधिकारसहित, पंडित, सुन्दर देह होवै, दूसरा होवै तो धनसे "एन होत्र, तीसरा गई -4 भाषाटीकासमेत। (१५७) हो तो सर्वदा पराक्रमी होवै।॥७॥चौधे, मानसी पीडासे युक्त पंचममें, पुत्रधनसे हीन छठेमें शत्रुसमूहका जीतनेवाला सप्तममें स्त्री दुर्भगा होवै, बन्धन भोगे, धन पुत्र थोडे होवें। अष्टममें नेत्ररोगी, शोकसहित, निर्द्धन होवे, नवममें पुत्र, धन, गुरुजनसहित और स्त्रीसे द्वेषकारी होवै ॥८॥ दशम में अपनी राशिका होवे तो बहुतसे घोडे धन रहें अन्यराशि- योंमें दशमवर्षसे पिताका वियोग पावै ग्यारहवां हो तो उत्तम वस्तुलामी, प्रशान्ततायुक्त, बारहवा होवै तो अत्यन्तस्त्रीमें आसक्त रहे ॥९॥ अथ प्रहयोगफलानि । संग्रामशस्त्रधनभाण्डयुतोर्कयुक्तेऽसत्यादिदुःखसहितः कुजसंयुते च॥ ख्यातःपुनर्भवपदे शशिसौरियोगे माया पटुव॒धयुते तपनात्मजे च ॥ १०॥ नापितो भवति भास्करपुत्र देवपूज्यसहितेभृगुयुक्तचित्रलेखलिपिका- व्यवित्तमोजायते नियतमेव मानवः ॥११ शनिके साथ ग्रहयोगफल कहते हैं। शनि सूर्य सहित होवे तो मनुष्य संग्राम, शस्त्र, धन, वर्तनोंसे पुक्त रहे भौमयोगसे झूठ आदि दुःखयुक्त रहे चन्द्रयोगसे, पौनर्भव पदमें ख्यात होवे, बुधयोगसे, मायामें चतुर होवे ॥ १० ॥ गुरुयोगसे हजाम, शुक्रयोगसे अनेकरंगदंगके लेख, लिपि, काव्यजानने- में श्रेष्ठ निश्चयसे होवे ।। ११ ॥ अथ दृष्टिः। दृष्टः सूर्येण सौरो जनयति महिपीगोधनाढयं कुजः दृष्टश्चंद्रेण नीचंप्रकृतिचलमति चदारानुरक्तम् ॥ क्षुद्रं क्षुद्रांगनानामधरमधुपरं पानवंतं सयोपं दृष्टो भूम्यात्म-
(१५८) जातकशिरोमणि-
जेन द्रविणहरणकं दुष्टमांसाशिनं च ॥ १२॥ बुधेन
दृष्टः प्रकरोति सौरो नरं प्रधानं बहुतस्कराणाम्।।सुखेन
हीनं विभवन वापि पापास्पदं यन्न करोति तन्न ॥१३॥
सुखनिधिधनभागी राजमंत्री कुजज्ञे सुरपतिगुरुदृष्टे
सूर्यपुत्रे नृपो वा ॥ परयुवतिपरस्त्रीसंगसौख्ये विभोगो
भवति भृगुजदृष्टे सूर्यपुत्रे कुजः ॥ १४ ॥
शनिपर ग्रहष्टिफल कहते हैं कि,मंगलकी राशिगत शनि
पर सूर्यकी दृष्टि होवै तो, भैंस, गौधनसे सम्पन्न करता है,
चन्द्रदृष्टिसे नीचप्रकृति, चञ्चलबुद्धि, और नीच स्त्रीमें
आसक्ति, भौमसे क्षुद्र तथा क्षुद्रस्त्रियोंके अधरमधु पानमें
तत्पर, स्त्रीसहित मद्यपानमें आसक्त, चौरीमें निरत, दुष्टमा
सखानेवाला, होवै ॥ १२ ॥ बुधदृष्टिसे, चौरोंका श्रेष्ठ, सुख
एवं ऐश्वर्यसे रहित, और कुकर्म जो कुछ न करे वही कमी
है ॥ १३ ॥ गुरुदृष्टिसे सुख निधिवस्तु और धनका भोगने
वाला होवे, अथवा राजा होवे, शुक्रदृष्टिसे परस्त्री परधन
सनसे सुखी, भोगरहित होवे ॥ १४ ॥
सौरे सितः परवासचारी विद्वान् स्थिरो वाचि विनष्ट-
सारः॥ सूर्येण दृष्टे शिशिरांशुष्टे जायापरीवादपर-
प्रधानः ॥ १५॥ स्त्रीसेवकं हासरतं बुधेन दृष्टः शनिः
शुक्रगृहे करोति।।परापवादं परकार्यनिष्टं प्रियं च लोके
गुरुणा च दृष्टः ॥ १६॥ स्त्रीमद्यसौख्यं निधिभाजनं
च शुक्रेण
करोति। शौर्योंर्जितं भूपहितं
मा
दृष्टः॥१७॥
भाषाटीकासमेत । - शनि शुक्रराशिमें सूर्य दृष्ट होवै तो परदेशमें फिरे, विद्वान् स्थिरबुद्धि होवे वचनसार कुछ होवे चन्द्रदृष्टिसे, स्त्रीके अप- वादपरोंमें मुख्य होवै ॥ १५॥ बुधदृष्टिसे स्त्रीसेवक, तथा हंसीमें तत्पर गुरुदृष्टिसे दूसरेको कलंक लगानेवाला, पराये- कार्यमें तत्पर, और लोकोंमें प्रिय भी होवे ।। १६ ।। शुक्रदृष्टि से स्त्रीमद्यके सुखवाला, उत्तमवस्तुका पात्र करता है. भौम- दृष्टिले पराक्रमसे बढाहुआ, राजाका प्रिय और प्रसन्नयुक्त होता है ॥ १७॥ धनेन हीनं बुधमंदिरस्थः करोति सौरः सुकुमारमूर्तिम्।। चन्द्रेक्षिते राजसमं सुदेहं स्त्रीलब्धसत्कारसुखं धना: ढयम् ॥ १८॥ भौमेन दृष्टः कुरुते पुमांसं विख्यात मल्लं विधनं कुबुद्धिम् ॥धनान्वितं नृत्यपरं सुगीतं बुधेन दृष्टो भुजयुद्धशीलम् ॥ १९॥ नृपालये प्रत्ययपात्रतं गुणप्रधानं बहुगुप्तरत्नम् ॥ दृष्टः सुरेज्येन शनिः करोति सतामभीष्टं बुधमंदिरस्थः ॥२०॥ स्त्रीमन्त्रशास्त्रकु- शलं वुधमन्दिरस्थः स्त्रीणां हितं रविसुतो भृगुजेन दृष्टः 'योगागमज्ञमथ योगविदा वरिष्ठं कुर्यात्प्रधाननगरे दृढ- रक्षकं च ॥२१॥ बुधराशिगत शनैश्वर सूर्यदृष्ट होवे तो मनुष्यको धनरहित और (सुकुमार) नाजुक शरीर करता है चन्द्रदृष्टिसे राजाके तुल्य, सुन्दर देह खीसे प्राप्त सत्कार और धनाढय करता है mein मौमसे, प्रधान मल्ल निर्द्धन, कुबुद्धि, बुधसे धनवान नाचनेमें तत्पर, अच्छे गीत गानेवाला, और बाहुयुद्ध जान- नेवाला करता है ।।.१९ ।। गुरुदृष्टिसे, राजद्वारमें, प्रतीतिका (१६०) जातकशिरोमणि- पात्र गुणोंमें प्रधान, बहुत गुप्तरत्नोंसे युक्त और सजनोंको प्रिय करता है ॥ २० ॥ शुक्रष्टिसे स्त्रीरति शास्त्र, मंत्रशास्त्र में निपुण, स्त्रियोंका प्रिय योगशास्त्रज्ञ, योगमार्गजाननेवालों- में श्रेष्ठ और प्रधाननगरमें दृढरक्षक करता है ।। २१ ॥ वाल्ये शनिश्चंद्रगृहेऽकदृष्टः पित्रा विहीनं सुखदारही- नम् ॥ चंद्रेक्षितो भ्रातृवियोगयुक्तं मात्राविहीनं धन धान्ययुक्तम् ॥ २२ ॥ भौमेक्षितो राजसमर्पितः स्वं स्त्रीबंधुनाशं विकलांगयष्टिम् ॥ आचारहीनं बहुदांभि- कं च बुधेन दृष्टो रविजः करोति ॥ २३ ॥ जनयति गुरुपुत्रक्षेत्रभाजं मनुष्यं कनकधनमुदारं देवमंत्रीक्षित- श्च ॥ असुरगुरुसुदृष्टोनंगलावण्ययुक्तं कुलपतिमतिमा. नैश्वर्ययुक्तं मनुष्यम् ॥२४॥ चंद्रराशिगत शनि सूर्यदृष्ट होवै तो बाल्यावस्था में पितासे रहित, पीछे सुख और स्त्रीसे हीन मनुष्यको करता है चंद्र दृष्टिस भाईके वियोगयुक्त, मातासे रहित धन धान्यसे युक्त करता है ॥ २२ ॥ मंगलदृष्टिसे, धन राजाके अर्पण करे स्त्री तथा बंधुवर्गका नाश होवै शरीर विकलांग होव बुधसे आचारं रहित बडे दंभवाला करता है ॥ २३ ॥ गुरुदृष्टिसे पुत्र, गुरु, खेतीवाला, सुवर्ण धन उदार होता है शुक्रदृष्टिसे कामदेवकी कोमलता युक्त कुलमें श्रेष्ठ, मान ऐश्वर्य युक्त करता है ॥२४॥ सिंहेऽदृष्टो रविजः करोति प्रियान्वितं पापरतं कुभा- र्यम् ॥ धनेन सौख्येन विहीनगेहं पुत्रादिसौख्यं भृतकं मनुष्यम् ॥ २५॥ शिशिरकिरणदृष्टः सूर्यगेहेऽर्कजातो .
भाषाटीकासमेत। (१६१) जनयति युवतीनां भाजन कीर्तियुक्तम् ॥ विपुलबसन धान्यं वल्लभत्वं नृपाणां बहुधनगृहपालं शस्त्रपालं नृपा- लम्॥२६॥भायर्यापुत्रधनेन वर्जितगृहं भौमेन हष्टः शनिः कुर्यात्पर्वतदुर्गवासनिरतं देशाद्विदेशाटनम् ॥ स्त्रीकृत्ये निरतं मलीमसतनुं दीनालसक्केशिनं दृष्टश्चन्द्रसुतेन मर्यतनयो नित्यं प्रवासान्वितम् ॥ २७ ॥ सिंहे पुरया- मगणप्रधानं स्त्रीपुत्रलक्ष्मीपरिपूर्णगेहम् ॥ दृष्टः सुरेज्ये- न च भार्गवेण स्त्रीदेपिणं द्रव्यसुखं कविश्च ॥ २८॥ सिंहराशिगत शनि सूर्य दृष्ट होवै तो मनुष्यको प्रिया सहित करे पापमें तत्पर दुष्ट भार्या होवै घर धन तथा सौख्य से हीन रहे पुत्रादिका सुख मिले और पराया चाकर होवें ॥२५॥ चंद्रदृष्टिसे स्त्रियोंका पात्रं, कीर्तिमान् वस्त्र, अन्न बहुत, राजाका प्रिय, बहुतधन, घरका पालन करनेवाला शस्त्रोंका अधिकारी अथवा राजाही होजावै ॥ २६ ॥ भोम दृष्टिसे स्त्री पुत्र धनसे घर खाली रहे पर्वत किलाओंमें वास करे कभी देशसे विदेश फिरे स्त्रीके कृत्योंमें तत्पर, मलिन शरीर, गरीब, आलसी, क्लेशी होवै बुधदृष्टिसे नित्यप्रवासी रहे ॥ २७ ॥ गुरुदृष्टिसे नगर, ग्राम, जनसमूहमें प्रधान रहे स्त्री, पुत्र, धनसे घर भरा रहे, शुक्रदृष्टिसे स्त्रीका द्वेषी द्रव्य सुखवाला और कवि भी होता है ॥२८॥ परमतपितरं करोति सौरो गुरुभवनगतो खीक्षितश्च ।। शिशिरकरसमीक्षितःसुभार्याधनसुतशयनासनाऽन्वितः श्रा२९॥जनयति नृपमेकं सौम्यदृष्टोऽकपुत्रो नृपतिस: ममथाढचं स्वेन सौभाग्यवंतम् ॥ नृपसमनरनाथं मंत्रि, (१६२) जातकशिरोमणि- णं वा बलेशं सुरपतिगुरुदृष्टो वर्जितः स्याद्विपद्भिः ॥३०॥ वनादिचारी भृगुजेन दृष्टे द्विमातृकः स्याद्- रुगेहसंस्थे॥ द्विपैतृको वा पितरो विशीलः संपन्नकर्मा मनुजः सदा स्यात् ॥३१॥ गुरुराशिगत शनिपर सूर्य दृष्टि होवे तो पराये पुत्रका पिता हो अर्थात् किसीके पुत्रको गोद लेवै चंद्रदृष्टिसे, सुशी. ला स्त्री, धन, पुत्र, शय्या, भोज्यपदार्थासे भी युक्त रहे ॥२९ ॥ बुधदृष्टिसे शनि मनुप्यको राजा करता है अथवा राजतुल्य, धनवान् अपने कृत्यसे (सौभाग्य ) ऐश्वर्ययुक्त करता है गुरुदृष्टिसे राजाके समान बहुत मनुष्योंका स्वामी अथवा मंत्री, यद्वा सेनापति होवै और विपत्तियोंसे वर्जित रहे ॥ ३०॥ शुक्रदृष्टिसे वन पर्वतोंमें फिरनेवाला होवे दो माता होवें अथवा दो पिता अर्थात् एकसे जन्म, दुसरेका दायभाग पावै, शीलरहित होवे सर्वदा सब कामों में संपन्न रहे ॥३१॥ परानभोजी परवासशायी प्रवासशीलो बहुरोगयुक्तः ॥ सूर्येक्षिते सूर्यसुते स्वगेहे विरूपभार्यों भवति प्रजातः ॥३२॥ असत्यसंधश्चपलश्च पापः प्रियान्वितः काप- टिकः स्वबंधौ ॥ चंद्रेक्षिते सूर्यसुतेऽतिदुःखी चोत्पन्न कामश्च निजालयस्थे ॥ ३३ ॥ शुरो विख्यातरणो विख्यातपराक्रमो महापुरुषः ॥ भवति शनी कुजदृष्टे भारसहो नरेशकृत्यगुणः ।। ३४ ॥ जनरहितं परदेशरतं सुभगं वित्तपुत्रवतं वा ।। गुरुदृष्टो रविपुत्रोजनयति निज मंदिरे जातम् ॥ ३५ ॥ भारसहवाधिपतिविविधाचा .
भाषाटीकासमेत । (१६३) यो विशालबुद्धिश्च ॥ शोभनवित्तो मल्लः शनिभे बुध वीक्षिते सौरे ॥३६॥ उत्पन्नभक्षतुष्टो विजनः परदेशगः सुभगः ॥ भार्गवदृष्टे सौरे निजनिलये वित्तमुख भागी॥३७॥ शनि अपनी राशिमें सूर्यदृष्ट होवै तो पराया अन्न खाने वाला, परघरमें रहनेवाला परदेशमें बहुधा रहनेवाला, बहु- तरोगोंसे युक्त और विरूप स्त्रीवाला होवै ॥ ३२ ॥ चंद्रदृष्टि से झूठ बोलनेवाला, चंचल, पापी, स्त्रीवाला अपने बंधुवर्गमें कपट करनेवाला अतिदुःखी और कामासक्त रहे ॥ ३३ ॥ भौम दृष्टिसे शूरमा, रणमें विख्यात, विख्यात पराक्रम वह आदमी भारसहारनेवाला, राजाके कृत्यकरनेवाला, गुण. वान् होवै ॥ ३४ ॥ गुरुदृष्टिसे मनुष्योंसे रहित, परदेशवासी ऐश्वर्यवान् धन पुत्रवाला होवै ॥ ३५ ॥ बुधदृष्टिसे सहन धनका स्वामी अनेक कामों में आचार्य बडी बुद्धिवाला अच्छे धनवाला मल्ल हो ॥ ३६ ॥ शुक्रदृष्टिसे जो प्राप्त होवै उसीको भोजन करके संतोषी, मनुष्योंसे रहित परदेश जाने वाला, ऐश्वर्यवान् और धन सुख भागी होवै ॥ ३७॥ अथांशफलानि। स्वाशे शनौ स्त्रीधनवित्तवान्स्यात्कुजांशके पापरतो जिघांसुः । बुधांशके स्त्रीधनवान् स्वतंत्रः कुकर्मसंवृ धौगिरीशे ॥ ३८ ॥ शुक्रांशके स्त्रीस्थितकर्मशील: प्रेष्योगदानॊऽर्कनवांशसंस्थे ॥ चंद्रांशके स्त्रीजनसेवक: स्यात्ताभ्यां सदा वृत्तिमुपैति जातः ॥३९॥ , 1 + (१६४) जातकशिरोमणि- शनिके अंशफल कहते हैं, । शनि अपने नवांशमें होवै तो स्त्री, धन, वित्तवाला होवै भौमांशकमें पापमें तत्पर जीव घाती बुधांशमें, स्त्री धनवाला स्वतंत्र, गुरुके अंशकमें कुक- मोसे धनवान् होवै ॥ ३८ ॥ शुक्रांशकमें स्त्रियोंके करनेके कामोंको करे सूर्याशकमें पराया ( प्रेष्यं ) पर कर्म करने वाला, और रोगसे पीडित होवै, चंद्रांशकमें स्त्रीजनोंका सेवक होवै स्त्रियाहीसे गुजारापावै ॥ ३९ ॥ त्रिंशांशफलम् । स्वे त्रिंशांशे धरणितनये स्त्रीविभूपो बलाढयस्तेजो युक्तो भवति सहसा साहसे कर्मणीटः ॥ रोगग्रस्तो मृतयुवतिको दुःखपूर्णोन्यदारः स्वे त्रिंशांशे गतवति शनौ. पुत्रमार्याविनाशः॥४०॥ गुरौ स्वभागे सुख- बुद्धियुक्तस्तेजस्विता भोगयशो धनी स्यात् ॥ मेधावि- ताकाव्यकलाविवादशास्त्रार्थवेत्ता शशिजे स्वभागे ॥४१॥ बहुमुललितभार्यापुत्रसौभाग्ययुक्तः सुभगस- कलदेहो भार्गवे स्वीयभागे ॥ निहितकरणभोगस्तत्त- दर्थेपु नूनं भवति लघुसुतीक्ष्णो भाग्ययुक्तो [दारः॥४२॥ चिंशांशफल सभीग्रहोंके कहते हैं। मगल अपने प्रिंशांश- कमें होवे तो अच्छी स्त्री अच्छे भूषणयाला,पलवान, तेजस्वी, साहसके कामोंमें श्रेष्ठ होवे, शनि अपने विशांशमें हो तो रोगसे प्रस्त रहे श्रीमरजावै दुःखसे भरार परस्त्री घरमै रग्वे, स्त्री पुत्र हानि हो ॥ ४० ॥ गुरु अपने प्रिंशांशमें दोवे तो, सुखी बुद्धिमान, तेजवान् भोगमोगनेवाला, यशस्वी और ..ा होथे । बुध अपने विशांशमें होये तो हद्धिमान भाषाटीकासमेत। (१६५) . - काव्यकी कला, विवादशास्त्र, न्यायशास्त्रादि जाननेवाला होवै ॥ ११ ॥ शुक्र अपने त्रिंशांशमें होवै तो बहुत एवं सुन्दर स्त्री पुत्रोंके ऐश्वर्ययुक्त रहे, समस्त देह अच्छे होवें निश्चय योग्य ही काम करे न्यायआदिके योग्य अर्थमें दृढ होवे, हलका और तेजस्वभाव होवै भाग्यवान् तथा उदार भी होवै ॥४२॥ अर्थातर्दशा। रवितनयदशायां पुत्रदारार्थनाशो भवति भयमनौँ भास्करेंतर्दशास्थे ॥ जनयति मरणं वा स्त्रीहति बन्धुनाशं रवितनयदशायां संस्थितःशीतरश्मिः॥४३॥ देशभ्रंशं व्याधिदुःखोपघातं कुर्याद्भौमः सूर्यसूनोर्दशा- याम् ॥ मानं सौख्यं भाग्यसंग्रामलक्ष्मीयुक्तं चांद्रि - ग्यवंतं मनुष्यम् ॥४४॥ प्रामाधिकारनृपमंत्रिकल- पुत्रसंपत्तिसौख्यसहितः सुरराजपूज्ये ॥ अंतर्दशासु- पगते रविजस्य शुने पत्नीनिधानसुतसौख्ययुतो नरः स्यात् ॥ १५॥ इति महादेवपाठकविरचिते जातक- शिरोमणी शनिदशाध्यायः पोडशः॥१६॥ शनिअंतर्दशाफल कहते हैं। शनिदशामें सूर्यका अन्सर होने में पुत्र स्त्री धननाश होता है भय, तथा अनर्थ भी होता है चन्द्रांतरमें स्त्रीमरण, अथवा स्त्रीहरण, बन्धुनाश, करता है ॥ ४३ ॥ मङ्गल शनिदशांतरमें देश छुटाता है, रोगदुःख, चोटलगनेसे केश करता है, बुधमनुप्यको मान सुख, ऐश्वर्य संग्राममें विजय, धनदेता है भाग्यवान् करता है ।। ४४ ॥ गुरु (१६६) जातकशिरोमणि- अन्तर, प्रामके अधिकार, राजमंत्रिता, स्त्री पुत्र धन संपत्ति- मुख सहित देता है ॥ ४५ ॥ इति जातकशिरोमणों माहीधरी- भाषाटीकायां पोडशोध्यायः ॥१६॥ अथ दशारिष्टम् । पापग्रहः पापदशामुपेत्य करोति पुंसां विपदोऽरियोगे ॥ स एव नीचेऽस्तमितोऽरिंगेहे रेऽऽथवा मृत्युकरश्च पुंसः ॥३॥ क्रूरालये पष्ठगतोऽथ रंधे तयोरधीशेन च दृष्ट- मूर्तिः॥ पापग्रहः स्वस्य दशामुपेत्य ददाति मृत्यु पुरु- पस्य नूनम् ॥२॥ परस्परं सौरिकुजौ दशायामतर्द- शायां कुरुते विनाशम् ॥ दीर्घायुपं चापि न संशयोऽत्र रंध्रापि ये चैकतमे विशेपात् ॥३॥ लगाधिनाथस्य रिपुत्रहो यो मृत्युप्रदो लगदशामुपेत्य ॥ नीचो विर- श्मिनिधनारिसंस्थो विशेषतो मृत्युद एव पुंसः ॥ ४ ॥ आरटकर्ता यदि जन्मकालेरिटस्य भंगोपि यथाकथं- चित् ॥ अंतर्दशारिएकरी च तस्य प्रवेशकाले मरणं ध्रुवं स्यात् ॥५॥ शुभोपि पापग्रहवत्प्रकल्प्यो मृत्यु- प्रदो नीचविहीनरश्मिः ॥ पापारिंगेहे तु गतोऽथ रंधे रंध्राधिपो वा सति लक्षणेऽस्मिन् ॥६॥ दशारिष्टविचार है कि, पापग्रह पापग्रहदशामें होवै और शत्रुग्रह युक्त होवै तो मनुष्योंको विपत्ति करता है वही ग्रह नीचराशिमें हो, अथवा अस्तंगत, शत्रुगृही, यद्वा अष्टममा. वमें हो तो मृत्यु भी करता है ॥ १॥ पापग्रहकी राशिमें ६। ८ भावमेंसे किसी में हो और ६१८भावाधीशोंसे दृष्ट हो तो भाषाटीकासमेत। (१६७) वह पापग्रह अपनी दशामें निश्चय मृत्यु देता है ।। २॥ शनि मङ्गल परस्पर दशा अंतर्दशामें होनेसे विनाश करते हैं इन योगों में विशेषता यहभी है कि, मृत्युकर्त्ता ग्रह अष्टमेश तथा लग्नेश आप ही होवे तो दीर्घायु करता है इसमें संशय नहीं ॥ ३ ॥ जो लग्नेशका शत्रुग्रह है वह लग्नदशामें प्राप्तहों, नेमें मृत्यु देता है, यदि वही नीचगत, रश्मिहीन अस्तंगत होकर ८।६ भावमेंसे किसी में हो तो पुरुषको विशेषकरके मृत्यु ही देता है ॥४॥ जन्मकालमें अरिष्टकर्ता ग्रह किसी- प्रकार अरिष्टभंग भी करता होवै तो उसकी सारी दशा अरिष्टी नहीं होती किन्तु अंतर्दशा अरिष्टी होती है अरिष्ट- भंगकर्ता न हो तो प्रवेशकालमें ही निश्चय मरण देता है।।५।। जो ग्रह नीचका तथा हीनरश्मि, पापराशि शत्रुराशि अथवा अष्टममें हो यद्वा अष्टमेश होवै तो इनलक्षणोंसे शुभग्रह भी पापग्रहके तुल्य मृत्युका जानना ॥ ६ ॥ आरंभकाले बलवान्दशाया अंतर्दशायाश्च पतिग्रहो यः॥ शुभग्रहैर्वीक्षितविग्रहश्च रिटस्य भंगं कुरुते सदैव ॥ ७ ॥ क्रूरोपि सौम्यग्रहसंगमस्थस्तद्वर्गहग्योगगतो वलीयान् ॥ करोति नैवं मरणं न बंध नो वापमृत्यु पुरुषस्य नूनम् ॥८॥ अंतर्दशापतिश्चेत्केंद्रगतः सौम्यसं दृष्टमीक्षपयति समस्तरिएं प्रवेशगे जन्मसये वा ॥९॥ अब दशारिष्ट भंग कहते हैं कि, दशारंभकालमें दशा एवं अंतर्दशाधीश जो ग्रह है वह बलवान् होवै शुभग्रहोंसे युक्त दृष्ट होवै तो सर्वदा अरिष्ट भंग करता है ॥ ७॥क्रूरग्रह भी शुभग्रहके साथ हो यद्वा शुभग्रहके राश्यादिमें हो बलवान हो, तो मनुष्यको निश्चय, मरण, बन्धन, अपमृत्यु कुछ नहीं (१६८) जातकशिरोमणि- करता ॥ ८॥ अंतर्दशेश यदि केंद्रगत, शुभदृष्ट होवै तो समस्त अरिष्ट जन्ममें वा दशाप्रवेशमें भंग करदेता है ॥९॥ दशाधिनाथो बलवर्जितः स्यादतर्दशापो वलसंयुतश्च ॥ अंतर्दशारिष्टगणः प्रयाति प्राहुर्मुनीशा विलयं च नूनम् ॥३०॥अरिष्टभंगो यदि जन्मकाले दशाप्रवेशेऽपि च रिष्टभंगः ॥ अवाप्य कष्टं च शरीरयोगे रोगाद्वि- मुक्तो भवतीह मर्त्यः ॥ ११ ॥ दशांतरात्माधिपती ग्रहौ द्वौ कालेंतराया यदि संगतस्थौ ॥ शुभोदयी चे- प्रकरोति नूनं दशोत्थरिष्टस्य सदैव पुंसः॥१२॥ इति श्रीजातकशिरोमणौ दशारिष्टभंगाध्यायः सप्तदशः।।१७॥ यदि दशेश बलहीन और अंतर्दशेश यलपान हो तो अंत- दशोक्त रिटसमूह निश्चय नष्ट होता है यह मुनीश्वर कहते हैं॥ १० ॥ अरिष्टीदशा अंतर्दशामें यदि जन्म काल वा दशा प्रवेशकालमें अरिष्टभंगयोग होवै तो अरिष्ट पायकर शरीर रोगसे निर्मुक्त होजाता है ॥ ११ ॥ दशांतर्दशाधीश दोनों ग्रह यदि जन्म वा प्रवेशकालमें एकत्र होवें और वे शुभ, तथा उदयी हो तो सर्वदा पुरुपके दशाजन्य रिष्टका नाश करते हैं ॥१२॥ इति जातकशिरोमणी माहीधरीभापाटीका- यामारष्टभंगाध्यायः सप्तदशः ॥ १७ ॥ अजादिभवनोपगे शशिनि राशिजातं फलं क्रियादि- भवनोदये तनुभृतां समस्तं हितम् ॥ रविप्रभृतिष्टिजं तदपि वल्गितुं सृरिभिर्दासु शशिनो मया निगदितं च यद्योगजम् ।। १॥
भाषाटीकासमेत। " ग्रंथकर्ता कहता है कि, मेषादिराशिगत चंद्रमाके राशि- फल तथा मेषादि लग्नफल और प्रत्येक राशिगत सूर्यादिन- होंपर सूर्यादिकोंके दृष्टिफल जो विद्वानोंने कहेहैं तथा ग्रह- योगजन्यफल सब मैंने चंद्रदशाध्यायमें कहदिये हैं. इसलिये यहां दुबार नहीं कहे. उनकी आवश्यकता इसजगहपर है सो पाठक उसी चंद्रदशाध्यायसे यहां भी जानलेव ॥ १॥ उच्चत्रिकोणनिज़मंदिरमित्रगेहे तन्वादिभावसहितास्त- पनादयश्च ॥ पुष्णति भावजफलानि निजानि सर्वे निति नीचरिपुलुप्तकराः खगेंद्राः ॥२॥ अस्मिन्त्र) गर्गः--स्वनीचरिपुगेहस्थो ग्रहो भावविनाशकृत् ॥ उदासीनः सुहृत्स्वः स्वोचमूलत्रिकोणगः ॥ ३ ॥ पुष्णाति स्वस्वभावोक्तफलं नान विचारणा ॥ तथा च मिहिरः॥ सुहृदरिपरकीयस्वक्षतुंगस्थितानां फलमनु- परिचित्यं लगदेहादिभावे ॥४॥ सूर्यादिग्रह लग्नादिभावोंमें उच्च, मूलत्रिकोण स्वगृह मित्र- राशिमें होनेसे भावके उक्त निजफलको सभी पुष्ट करते हैं और नीचगत अस्तंगत ग्रह उनफलोंको नष्ट करदेते ह ॥२॥ इस अर्थको पुष्ट करनेवाला गर्गाचार्यका वाक्य भी है, अपने नीचराशि शत्रुराशिगत ग्रहभावका नाश करता है जो स्वराशि मूलत्रिकोण उच्चमें है वह अपना भावोक्त फलको पुष्ट करता है. वीचवाला ( उदासीन ) मध्यम फल करता है इसमें विचार नहीं। ऐसा ही वराहमिहिराचार्यका भी कहा है कि मित्र, शत्रु, अन्यराशिमें, तथा स्वराशि उच्चस्थित ग्रहोंका फल लग्नदेहादि भावों करके शुभाशुभ विचार करना ॥३॥४॥ - (१७०) जातकशिरोमणि- तथा च फलितार्थः। अपत्यभावे धनपुत्रहीनः स्त्रीदुर्भगः कामगते पतंगे । पुष्णाति भावोक्तफलं हि सर्व सूर्यः स्वतुंगादिशुभालयस्थः ॥५॥ सौख्यान्वितोथ तनये सुतविद्ययादयः शुक्रस्य पंचमगतस्य फलं यदुक्तम् ॥ नीचास्तशत्रुभवनोपगतो निति पुष्णाति तुंगनिजमि- त्रगृहस्थितश्च ॥६॥ इसीका फलितार्थ है कि, जैसे सूर्य पंचम होने में मनुष्य धन पुत्रहीन तथा सप्तम होने में दुर्भगा खीवाला होता है यही सूर्य उच्चादिमें हो तो धन पुत्र स्त्रीका सौख्य करता है यदि नीचादिमें हो तो अपने उक्तक्लेश फलको पुष्ट करता है ॥५॥ तथा शुक्रसे पंचम होनेमें जो पुत्र विद्यासुख आदि फल कहे हैं यदि शुक्र पंचम, नीच, अस्त, शत्रुराशिगत होये तो उक्तफलोंको नष्टकरता है. यदि उच्च मित्रादिराशिगत होवै तो उक्तफलोंको पुष्ट करता है ॥ ६॥ अथाश्रयफलम्। कुलस्य तुल्यः स्वगृहस्थितेन कुलस्य मान्यः स्वगृ- हस्थिताभ्याम् ॥ मान्यस्त्रिभिधुजनस्य जातो द्वित्रि- स्वगेहोपगतैः श्रियायः ॥७॥ धनी चतुर्भिः स मुखी सरूपैः पतिः क्षितीशः खलु राजराजः ॥ स्वगेहंगेः सप्तभिरेव तावरणान्विताः स्युग्रहसंख्यया च ॥ ८॥ आश्रययोगफल कहते हैं कि, जिसका एक ग्रह स्वरा- शिगत हो वह अपने कुलके (तुल्य) यथा योग्य होता है, दोस्वगृहीसे कुलमें मान्य. तीनसे बंधुजनका मान्य होता है तथा (श्री) शोभा वा धनसे संपन्न भी २ । ३ स्वग्रहगोसे भाषाटीकासमेत। (१७१) होता है ॥ ७॥ चार ग्रह स्वगृही होने में धनवान्, पांचमें सुखी, छ में राजा, सातमें राजराज भी होता है। और पेसेही प्रहसंख्या अधिक अधिक होनेमें मनुष्य उक्त गुणोंसे युक्त भी उत्तरोत्तर अधिक होते हैं ॥ ८॥ मित्रगृहाश्रयफलम् । पराश्रयी मित्रगृहस्थितेन परस्वपोष्यो मनुजः सुह. ध्याम् ॥ मित्रेण पुष्टस्त्रिभिरेव नित्यं पुष्णाति बंधून्सुह- दालयस्थैः ॥ ९॥ गणाधिपः पंचभिरेव मित्रैः पडिर्क लेशो नृपतिः सरूपैः । निःस्वो विसौख्यो जडभोगवं- धवधैः समेतो हरिनीचसंस्थैः।।१०॥ इतिजातकशिरो- मणावाश्रयाध्यायोदशः॥ १८॥ एक मह मित्रगृही होवै तो पराये आश्रयमें रहे दो होतो पराये धनसे पालन हो तीन हों तो मित्रसे युक्त, बारमें बन्धुजनका पालन करे ॥९॥ पांच ग्रह मित्रराशिगत होवै तो बहुत मनुष्योंका अधिपति, छः मह हों तो सेनापति सात हों तो राजा होवै, और ऐसे ही शत्रुराशि, नीयराशिमें एक ग्रह हो तो निर्द्धन, दोसे सुखरहित तीनसे मूर्ख, चारसे भोग रहित, पांचसे वन्धनयुक्त और छ: ग्रहोंसे बधपनसे युक्त होते हैं ॥ १० ॥ इति जातकशिरोमणी माहीधरीभाषाटीकायामा- श्रयाध्यायोप्टादशः ॥ १८ ॥ अथकारकयोगः।। केंद्रेपु मुलस्वगृहोच्चसंस्थाः परस्पर कारकसंज्ञकाः स्युः । कर्मस्थितो यः स्वगृहादिसंस्थः स कारकास्यः कथितश्च तेपाम् ॥१॥स्वोचस्थिताः सूर्ययमेज्यभीमा जन्मोदये कर्कटगे सुधांशी ।। परस्पर - , (१७२) जातकशिरोमणि- कारकनामसंस्था आज्ञांबुगश्चंद्रमसो न चन्द्रः॥२॥ लगकेंद्राद्वहिस्थस्य स्वत्रिकोणोच्चमंदिरे॥समस्य दशमे स्थाने स स्यात्तस्यापि कारकः ॥ ३ ॥ निसर्गतोपि मित्रं स्यात्तत्काले मित्रमार्गतः ॥ स यस्य दशमे खेटे स तस्यापि च कारकः ॥४॥ कारकयोग कहते हैं कि, केन्द्रोंमें कोई ग्रह अपने अपने मूलत्रिकोण, स्वगृह, उच्चमें होवै परस्पर कारक होते हैं उनमें भी जो स्वगृहादिस्थित दशमभावमें हों वह कारक संज्ञक उनमें होता है ॥ १॥ सूर्य शनि बृहस्पति मंगल अपने उच्च- राशियों में हों लग्नमें कर्कका चन्द्रमा हो तो परस्पर कारक होते हैं चन्द्रमासे १०१४ में भी ये ग्रह कारक होते हैं लग्नसे ४। १० में चन्द्रमा ऐसा होनेपर भी कारक नहीं होता ॥२॥ जो ग्रह लग्नही केंद्र के बाहर स्थित समदशमस्थानमें स्वत्रि- कोणोच्चमें हो, वह उसका भी कारक होता है ॥ ३॥ जो नैसर्गिक मैत्री से मित्र है और तत्कालमें भी मित्र हो और उसके दशममें हो वह उसका भी कारक होता है॥४॥ कारकसंज्ञाप्रयोजनम् । वर्गोत्तमे जन्म शुभं वदंति शुभं शुभा बेशिगृहे यदि स्यात् ।। केन्द्रेपु पूर्णेषु च कारकास्यैः शुभैश्च केंद्रोप- गतैः शुभं च ॥५॥ लग्नांवुयामिवनभो गृहस्थैर्यत्का- रकाख्या गदिताः पुराणेः ॥ सहप्टिवेधो बलवान हि मूलं तेषां पुराणा यवनादयश्च ॥६॥ अवंशजातोपि च कारकास्यः प्राधान्यायाति वदान्यताभिः॥ भूपाल- .
भाषाटीकासमेत। (१७३) वंशप्रभवा महीपा भवंति लक्ष्म्या सह कारकाख्यैः॥७॥ इति श्रीजा कारकयोगो नामोनविंशोध्यायः ॥ १९ ॥ । कारक प्रयोजन कहते हैं वर्गोत्तममें जन्म शुभ कहते हैं। सूर्यसे शुभग्रह वोशिग्रहमें हो, केंद्रोंमें कारक ग्रह हो तो भी 'शुभ फल होता है शुभग्रह केंद्रोंमें भी शुभ फल करते हैं ॥५॥ लग्न चतुर्थ सप्तम दशम स्थानोंमें जो पहिले आचार्योंने कारक कहे हैं उनके बलवान होनेका कारण दृष्टिवेध है यह प्राचीन प्रवनाचार्य कहते हैं ॥ ६॥ कारकसंज्ञकोंमें जन्म मनुष्य जो ताजवंशमें न हो वह भी अपने चातुर्यसे श्रेष्ठ होता है जो जवंशी हैं वे धनवान् राजा होते हैं ॥ ७॥ इतिजातकशिरो. पणो माहीधरीभाषाटीकायां कारको नामोनविंशोध्याय:१९ अथाष्टवर्गाः, तत्रादौ रवेः। अर्कः स्वात्रिसुतारिष्फरहितश्चन्द्रात्रिपट्खातिगोसौम्या त्स्वादिव धीशुभोपचयगः सोन्त्यः शुभश्चन्द्रजात् ॥ जीवाद्धर्मसुतायशवपु शुभः शुक्रात्स्मरांत्यारिंगःशौरा- स्वादिव मन्दिरोपचयगः स्वांत्यः शुभो लग्नतः ॥१॥ अब अष्टवर्ग गणना कहते हैं, प्रथम सूर्य अपने स्थानसे १२।४।७।८।९।१०। ११ में रेखा पाता है चन्द्रमासे ।६।१०।११ मंगलसे १।२।३।४।७।८।९।१० १ बुधसे ५।९।३।६। १० १० । १२बृहस्पतिसें.९।५।११ (शुक्रसे ७ । १२ । ६ शनिसे १ । २।४।७।८।९।१०।११ नसे ३ । ६। ११ । १० । १२॥ ४ में रेखा पाता है अन्यस्था- में शुन्य रखना यह सर्वत्र क्रम है ॥ १॥ अर्कात्साप्टमहीधरोपचयगःस्वात्सास्तचंद्रोपगः सद्यक्षा- कमहीसुतात्स्वसुततो धीच्याप्तिकेंद्रांकगः ।। जीवात्के- -- (१७४) जातकशिरोमणि- । द्रसुतव्ययाप्तिषु भृगोदिकिनन्दाश्वगः सायः सूर्य सुताविधीभवरिपौ पट् न्यायपट्सूदयात् ॥२॥ चन्द्राष्टकवर्गः सूर्यसे ८१७३१६ । १० । ११ अपनेसे ७११ ३।६१०। ११ मंगलसे ९।५।२।३ । ११ । १० बुधसे. ५।३११ । १।४। ७ । १०।९। गुरुसे १।४।७।१०१५ १२ । ११ शुक्रले ५।१०।३।९।७। ११ शनिसे ३।५।११। ६ लग्नसे १० १३ । ११ । ६ में रेखा अन्यभावों में बिंदु पूर्ववत् जानने ॥२॥ भौमस्तूपचयेविनात्रिरिपुगः सायः शुभश्चंद्रतः स्वा- केन्द्राष्टसुताप्तिगो बुधगृहात्पन्यायधीस्थः शुभः ॥ जीवाच्छन्दशादिगो भृगुसुतात्पल्लाभरिष्फाप्टगः शौरा- केंद्रशुभायमृत्युपु तनोख्याद्याप्तिधीपट्खगः ॥३॥ मंगलाष्टकवर्गमें सूर्यसे ३ । ६ । ११ । १० में चन्द्रसे ३ । ६ ११ अपनेसे १।४।७।१०।८।५।११ बुधसे ६।३।११ ५ गुरुसे ६ । १० । ११ । १२ शुक्रसे ६ ॥ ११॥ १२॥ ८ शनिसे १।४।७ । १०।९। ११॥ ८ लमसे ३।१।११।५।६। १० में रेखा अन्यान्य ॥३॥ बुधस्य। अर्कागोत्यसुखाय वैरिपुशुभः पळ्यायरंधाब्धिदिशा- तश्चन्द्रपदात्तुजाद्विनवदिशैलाटरूपाब्धिपु ॥ स्वा. द्भूमोनिदिगन्त्यधीभवरसो प्रात्यष्टषशांत्यगो देवेज्या- कुजवत्सितार्कतनयाल्लग्नाच्छुभश्चंद्रवत् ॥४॥ बधाष्टवर्गमें सूर्यसे ९१२॥४।१।६ चन्द्रसे ६१२।११ ८।४।१० मोमसे २।९।१०।७।४।१।८ अपनेसे ११९ .
भाषाटीकासमेत। (१७५) ३।१०।१२।५।११।६ गुरुसे ११ । ८।६। १२ शुक्रसे ६।२। ११ । ८।४।१० शनिसे भी ६।२।११।८।४।१० लग्नसेभी, ६।२।११।८।४।१० में ॥ ४ ॥ त्यक्त्वा रिष्फसुतारिमं दिनपतेः शन्धीदिलाभाद्रिग- श्चन्द्रादागृहदिनगाष्टसुकुजात् न्यूनार्कवत्स्वाद्गुरुः ॥ रूपयब्धिपडायधीदशगतो ज्ञात्सादिलग्नाच्छुभः शुक्रा- स्विदिशोप्तिगो रिपुगतो मन्दत्रिधीपडव्ययैः ॥५॥ गुरुके अष्टकवर्गमें सूर्यसे ।।२।३।४।७।८।९।१० ११ चन्द्रमासे ९।५।२।११७ मंगलसे १।२।३।४।१०॥ ७१८ गुरुसे १।२।४।७।८।९। १० । ११ बुधसे १।२। ४।६।११।५।२० लग्नसे ११२।४।६।११।५।१०७ शुक्रसे ५।२।१०।११।९।६शनिसे ३१५१६।१२ में रेखा अन्यस्थानोंमें बिंदु ॥ ५॥ शुक्रोर्काव्ययलाभमृत्युषु विधोराध्यष्टगोत्याप्तिगो भामा- ध्यन्त्यपडकंधीभवगतो ज्ञाव्यङ्कपड्धीभवे ॥ ईज्या- चष्कपञ्चमगतस्वा चन्द्रवदिग्युतो मन्दात्रिनयना- गगोत्रयगतो लग्नाच्छुभश्चन्द्रवत् ॥६॥ शुक्राष्टकवर्ग में सूर्यसे १२ ॥ ११॥ ८।०१।२ । ३ । ४। ५1८1९।११.। १२ मंगलसे ३।१२।६।९।५।११ बु० ३।९।६।५।११ वृ० ८।९।१०।११। ५ शनिसे ११२ ३।४। ८३५११० शनिसे.३।४।५।८१९१० । ११ । लग्न से १।२।३।४।५।८ में रेखा॥६॥ केंद्रायाप्टधनेष्विनादुपचये दिग्वर्जिते चंद्रतो भौमाहि- त्रितये सधीत्रयरिपौ नागादिपंचारिषु ॥ ज्ञानीवादि . (१७६) जातकशिरोमणि- पुलाभधीव्ययगतः शुक्राद्ययायारिपु स्वादायत्रिसुतारि- पूपचयगः सन्ध्यादिगो लग्नतः ॥७॥ शनिके अष्टकवर्गमें सूर्यसे १।४।७।१०।११।८।२ चंद्रसे ३ । ६। ११ । भौमसे १० । ११ । १२ । ५।३।६ बुधसे ८1९। १० । ११ । १२ । ६ गुरुसे ६ । ११ । ५। १२ शुक्रसे १२। ११।६ अपनेसे १२ । ३।५।६लग्नसे ३।६।१०। ११ । ४ । ११७ में रेखा अन्योंमें बिंदु जानने ७ सभी ग्रहोंके समस्त रेखा संख्या है कि, सूर्यके ३९ चं० ४७ मं ३९ बु० ५४ बृ० ५६ शु० ५१ श० ३९ समस्त होते हैं ॥७॥ दशारंभकाले ग्रहः पृष्टवर्ती दांते फलं दातृकामो जनेभ्यः ॥ दशादौ ग्रहः शीर्पलग्नादयस्थः प्रवेशे दशा- याः फलं स्वं ददाति ॥ ८ ॥ शुभाशुभमिश्रितमष्ट कृत्वा फलं ग्रहाणां प्रतिवेश्मजातम् ॥ चारक्रमादप्टक वर्गजं यत्तदंतरं सर्वखगेपु धार्यम् ॥ ९ ॥ यस्मिञ्छुभं वाप्यशुभं समंवा तन्वादि भावे तदशेपमेव ॥ चारक्रमा तत्र गतो धुगामी ददाति पुष्टं लघु मध्यम वा ॥१०॥ अष्टकवर्गफलविपाक कहते हैं कि, दशारंभसमयमें दशा- पति पृष्ठोदयी लग्नमें होवै तो फल दशाके अंत्यमें देता है शीपोदयमें दशारंभकालमें हो तो दशाप्रवेश समय अपना फल मनुष्योंको देता है ॥ ८ ॥ अष्टकवर्गके शुभाशुभ अर्थात रेखा बिंदुको जोडके प्रत्येक स्थानका शुभाशुमफल, अष्टक- वर्गमें (प्रहचारक्रम) गोचर विचारसे होताहै ऐसेही अंतर सभी अहोंमें जानना ॥ ९॥ जिसमें शुभाधिक, वा अशुभाधिक, भाषाटीकासमेत। (१७७) यद्वा सम जैसा रेखा, शुन्यगणनासे होवै वैसा लग्नादिभावोंमें गोचरचारक्रमसे उन उन स्थानों में प्राप्तग्रह पुष्ट, अल्प वा मध्यम फल देता है तात्पर्य यह जहांरेखा अधिक तहां शुभा- धिक शून्याधिकमें अशुभाधिक, सममें समफल देता है जिस भावमें रेखा अधिक हैं उसमें जब गोचरमें ग्रह होगा तब उस भावोत्य शुभाधिक होगा, ऐसे ही शून्याधिको अशुभा. धिक सममें सम जानना ॥ १० ॥ आदौ फलं सूर्यकुजौ विधत्ता मध्ये गतौ देवसुरारिपू- ज्यौ । गृहावसानोपगतौ शनीन्दू सुधांशुसूनुः फलदः सदैव ॥११॥ उपचयगृहमित्रस्वःतुंगालयस्थस्त्व- शुभफलनिहता पुष्टकारी शुभस्य ॥ अपचयगृहनीचा- रातिगो हंति चेष्टं द्विगुणमशुभरूपं राशिगं पाच- यति ॥ १२ ॥ इति श्रीमहादेवविरचिते जातकशिरो- मणावटकवों नाम विशोध्यायः ॥२०॥ सूर्य मंगलदशाके आदिमें बृहस्पति शुक्र मध्यमें शनि चंद्र अंत्यमें फल दशाका देते हैं अथवा आदि मध्यांतरा- शिस्थितमें जानना और बुध सभी फल सर्वदा ही देता है ॥ ११॥ जो प्रह उपचयस्थान मित्रराशि, स्वराशि, उच्चरा- शिमें हो वह अशुभ फलको नाश करके शुमफलको पुष्ट करता है और उपचयरहित स्थानमें, नीचराशि, शवराशि में हो वह शुभफलका नाश करके राशिजन्य अशुभको परि- शक करते हैं।१२॥ इति जातकशिरोमणी मादीवरीमार- टीकायामष्टकवर्गा नाम विंशोध्यायः ॥२०॥ होरेंदोर्दशमस्थितेन रविणा तातस्य वस्तन्वितो मातु- चैव सुधांशुना क्षितिभुवा द्रव्येण वैवैरिणः ॥ मित्र , (१७८) जातकशिरोमणि- प्रार्थनया धनंशशिसुतेनेज्येन वस्वान्वितो भ्रातुःस्त्रीध- नवत्सितेन शशिना भृत्यार्जनं वांछति ॥ १॥ लग्ना- भास्करतोपि वाशशधरान्मध्यस्थितो यो ग्रहस्तस्या- कांशकनायकस्य गदितं यत्कर्मणा जीवनम् ॥ आजी- व मनुजोऽर्जनं जनयति द्रव्यं च तत्कर्मणा सबै व्योम- चिरोदितेन विधिना द्रव्यागमं वांछति ॥२॥ कर्माजीवी कहते हैं कि, लग्न अथवा चंद्रमासे दशम सूर्य हो तो पिताके धनसे आजीवन करे, लग्नसे चंद्रमा दशम होवै तो माताके धनसे, लग्न वा चंद्रमासे मंगल दशम होवे तो शत्रुके धनसे, बुध होवै तो मित्रोंसे मांगे धनसे, गुरु हो तो भाइयोंके धनसे, शुक्र होवै तो स्त्रीके धनसे, शनि होवे तो नौकरसे आजीवन करे ॥ १॥ लग्न चंद्र वा सूर्य से दशमगत जो ग्रह हो वह जिसके नवांशकमें है उसके अनु- रूप कर्मसे मनुष्य आजीवन करता है, धन भी उसी कर्मसे कमाता है समस्त धनार्जन कथ्यमान ग्रह कृत्यसे करता है।॥२॥ अौशे कनकोणमेपजभिपकाष्ठैः सुगंधैस्तृणैश्चंद्रांशे वनिताश्रयेण जलजैर्मुक्ताप्रवालादिभिः ॥भीमाशे कन- कादिधातुनिवहैः शैलेयशस्त्रानभिः सौम्यांशे लिपि लेख्यकाव्यपठनव्यापारगन्धादिभिः ॥ ३ ॥जीवाशे पदगग्रहांशकपतौ विप्राझुधादा करैः काव्यांशे रजतादि पण्यमणिगोवाहादिसंवाहनः ॥ सौरांशे गमनागमे- रथवधैराखेटकायेद्धनं मित्रारिस्वगृहस्थितैरपि खगे- स्तत्तत्सकाशाद्धनम् ॥ ४ ॥ लगस्वायगृहस्थितैः शुभ
भाषाटीकासमेत। ( १७९)
खगैव्यार्जनं कर्मणा येनैवार्जयति स्वतुंगभवने सूर्य
स्वशत्यार्जितम्।। कांजीवनवांशराश्यधिपती नीचा-
स्तशवस्थितौ न प्राप्नोति नरस्ततो वहुधनं कृच्या
त्ततो जीवति ॥ ॥ इति जातकशिरोमणौ कमांजीवा-
ध्यायस्त्वेकविंशः॥२१॥
5
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लग्न चंद्रमा वा सूर्यसे दशमगत ग्रह सूर्यके अंशमें हो
तो सुवर्ण, ऊन, औषधि, वैद्यक काष्ठ, सुगंधिद्रव्य, तृणों के
कर्मसे आजीवन होवे । चंद्रांशकमें हो तो स्त्रीके आश्रय,
जलजवस्तु, मोती मुंगाआदिसे । भौमांशकमें सुवर्णआदि .
धानुसमूहसे तथा पर्वतजन्यधातु, शस्त्र, अग्निसे। बुधांशकमें,
चित्रकारी, लेख, काव्यपठन, व्यापार, गंध आदिसे आजी-
वन होवे ॥३॥ दशमगत ग्रहांशकपति यदि जीवांशकमें
होवै तो ब्राह्मण, पंडित, खानके कामसे । शुक्रांशको हावै
तो चांदीआदिके दूकान, मणि, गौ, वाहनआदिसे । शन्य-
शकमें हो तो चलने फिरनेसे, मारणके कामसे, शिकारखे-
लने आदिसे धन मिले। जो ग्रह मित्र, शत्रु, स्वगृह में होवे भी
उन उन ग्रहोक्त कर्मसे धन देते हैं ॥४॥ लग्न, धन, लाभमें.
जो शुभ ग्रह हों उनके उक्तकर्मसे धन मिलता है सूर्य अपने उच्चमें
हो तो अपनी सामर्यसे कमाया धन होवे यदि कर्माजीव
नर्वाशराशीश अंशेश नीच, अस्तंगत शत्रुराशिस्थ हो तो
मनुष्य उन कमासे भी बहुत धन नहीं पाता वही कठिनतासे
आजीवन करता है ॥५॥ इति जातकशिरोमणी माहीधरी-
भाषारीकायां कर्माजीवाध्यायस्त्वेकविंशः ॥२१॥
(१८०) जातकशिरोमणि-
अथ नाभसयोगा।
ख्यायैश्चरराशिस्थै रज्जुयोग उदाहृतः॥ स्थिरस्थैर्मु-
सलो नाम द्विस्वभागवतैनलः ॥ १॥रविभौमार्किक-
द्रस्थैः सो विद्रुभार्गवैः॥ माला तस्यां सुखं जन्म
दुःखितानां विलेशये ॥२॥ रज्वादयस्त्रयो योगा
आश्रयाख्याः प्रकीर्तिताः ॥ यक्वांडगोलायैः समत्वं
यांति कल्पिताः ॥ ३ ॥ केंद्रद्वयांतरगतैः कथितो
गदाख्यो लग्यास्तगेषु शकटः सकलग्रहेषु ॥पातालदेव-
पथगैर्विहगः प्रदिष्टः शृंगाटकं नवमलप्रसुतक्षसंस्थैः॥४॥
अब नाभसयोग कहते हैं। सूर्यादि सभी ग्रह चरराशि-
योंमें होवें तो रज्जुयोग कहा है। ऐसे ही स्थिरराशियों में
होनेसे मुसल और द्विस्वभावोंमें नलयोग होता है ॥१॥
सूर्य, मगल, शनि केंद्रों में हों तो सर्प, बुध, गुरु, शुक्रसे
मालायोग होता है, मालामें जन्म मुखीका, सर्पमें दुःखीका
जानना ॥२॥ रज्जु, मुसल, नल ये तीन योग आश्रय नामके
हैं यव, वज्र, अण्ड, गोलआदि योग भी इन्हीं तुल्यताको
कल्पना करनेसे प्राप्त होजाते हैं ॥ ३ ॥दोकेंद्रोंके बीच सभी
ग्रह हों तो गदा नाम योग, लग्न सप्तममें होनेसे शकट चतुर्थ
दशममें विहग और लग्न नवम पंचममें होनेसे शृंगाटक योग
होता है॥४॥
धनारिदशमस्थैश्च विक्रमद्यूनलाभगैः ॥ चतुर्थाप्टमरि-
प्फस्र्थहलसंज्ञ उदाहृतः ॥५॥ लग्नास्तसंस्थैर्वृधभा-
नवज्यै रव्याकि मर्दशमालयस्थैः॥ वज्रं तदा तद्विप-
रीतसंस्थैर्यवं विमित्रैः कमलं वदन्ति ॥६॥
मावाटीकासमेत।
(१८१)
दूसरे छठे दशमभावोंमें, यद्वा ३१७।११ में, यद्वा ।
१२ में सभी ग्रह हों तो हलसंज्ञक योग होता है ॥५॥ लम
सप्तममें बुध शुक्र गुरु, दशममें सूर्य शनि मंगल हों तो वन-
योग होता है। यदि ११७ वाले १० में १० वाले ११७। में
हों तो यवयोग, मिश्रित हो तो कमलयोग होता है ॥६॥
आस्तां कदाचिद्रुधभार्गवौ तु सूर्याच्चतुर्थोपगतौ तु
चारात् ॥ पूर्व यदुक्ताः कुलिशादयोमी नाचितुर्थे
बुधभार्गवो स्तः ॥७॥
कदाचित् चारसे बुध शुक्र सूर्यसे चौथे हों तब पूर्व कहे ये
वजादियोग होंगे परन्तु सूर्यसे चौथे स्थानमें बुध शुक्र भी
नहीं होते हैं ॥७॥
लग्नादिगृहगेपो हिबुकास्तंगतैरिपुः ।। जायादिव्यो-
मगैः शक्तिर्दण्डो व्योमादिलग्नगैः ॥ ८॥ लग्नात्सप्त-
गैर्लीः स्यात्कूटः सप्तसंगैः सुखात्॥छत्रं सप्तर्वगैरस्ता-
द्धनुर्दशमतः स्मृतम् ॥ ९॥
लग्नसे चतुर्थपर्यंत सभी ग्रह हों तो यूपयोग, ४ से ७ पर्यंत
हों तो बाण,७से १० पर्यंत हों तो शक्ति दशासे १ तक हों तो
शक्तियोग होता है ॥ ८॥ लग्नसे सप्तमपर्यंत हों तो नोयोग,
४ से सातभावोंमें कूट । सप्तमसे ७ भावोंमें छत्र और दशमसे
७ में हो तो चापयोग होता है ॥९॥
धनाचत्वारि केंद्राणि सहजाच चतुष्टयम् ॥ अव नावा-
दिभियोगैरर्द्धचन्द्र उदाहृतः ॥ १० ॥ धनाद्ययस्थे-
जलधिरकांतरगतैहैः ॥ विलनाट्रिपमर्मस्टरित्याक-
तिजसंग्रहः ॥ ११॥
(१८२) जातकशिरोमणि- धनभावसे ४ केंद्र अर्थात् २१५1८1११ में तथा तृतीयसे ३।६।९१२ में नौआदि योगोक्त ग्रह, जैसे २ से ५ तक ५ से ८ तक ८ से ११ तक इत्यादि क्रमसे हों तो अर्द्धचन्द्रयोग कहाता है ॥ १० ॥ धनभावसे १ । १ भाव छोडकर १२ पर्यंत हों तो समुद्रयोग और लग्नसे विषमभावों १।३।५11 ९।११ में हों तो आकृति योग होता है यह आकृतिजसं- ग्रह है ॥११॥ भावेषु सप्तसु विना विधिनापि संस्थै रव्यादिसप्तखच- रैश्च वदंति वीणाम् ॥ व्यादिपगृहगतेषु च दामिनी स्यात्पाशश्व पंचसु गृहेषु दिवाकरायैः॥१२॥केदारयो- गश्चतुरालयस्थैत्रिमंदिरस्थैर्भवतीह शूलम् ॥ युगं द्वि- गेहोपगतैश्च गोल एकालयस्थैश्च यथा तथेति ॥१३॥ पंचविंशतिसंख्याता योगा आश्रयसंज्ञिताः॥संख्यायो- गाश्च सप्तैते विहाय प्रथमोदितम् ॥१४॥ सूर्यादि सभी ग्रह विनाक्रमसे भी ७ स्थानोंमें हों तो वीणा, छःभावोंमें हों तो दामिनी, पांच पाश ॥१२॥ चारमें केदार,तीनमें शूल, दोमें युग,एकहीमें हों तो गोल योग होता है ॥ १३ ।। आश्रययोग २५ हैं और संख्यायोग पहिले कहे छोडके हैं सब आययोग ३२ हैं इनके भेद बहुत होते हैं ॥१४॥ अथैषां फलानि । विदेशनिरतो जनः परविभूतिमात्सर्ययुक् प्रियोश्वगमने सदा भवति रज्जुयोगोद्भवः ॥धनी च मुसलोद्भवोति- शयमानभृत्योर्जितो नलोद्भवनृणां स्थिराः सकलसं- पदो व्यंगताः॥१५॥ गुद्भवा भोगसमन्विताः स्यु - .
. भाषाटीकासमेत। (१८३) जंगजाता बहुदुःखभाजः॥ रज्जुत्रया यद्यपरैर्विमिश्राः फलैविहीनाः सकला भवंति ॥१६॥ आश्रययोगोंके फल कहते हैं कि, रज्जुयोगवाला परदेशमें तत्पर, पराये ऐश्वर्यसे युक्त, दूसरेकी भलाई में द्वेषमाननेवाला, घोडेकी सवारीको प्रिय माननेवाला सर्वदा होता है मुसल: योगवाला धनवान् अतिमान, बहुभृत्योंसे बढारदे । नलयोग- वाले मनुष्योंकी संपत्ति सागपूर्ण और स्थिर रहती है ॥१५॥ मालायोगवाले भागयुक्त सर्पयोगवाले दुःखके पात्र होते हैं ये रज्जु मुशल नल योग यदि अन्य उक्तयोगोंमेंसे किसीसें मिश्र होजावें तो इनका फल नष्ट होजाता है अन्यका ही प्रबल रहता है ॥ १६॥ यज्वागदोत्योर्जनतत्परःस्यात्सरुकुदार शकटे तदर्थी॥ संदेशहारी विहगेटनश्च शृंगाटके स्याचिरसौख्यभागी ॥ १७ ॥ हलाख्ययोगे कृपिकृजनः स्यात्सुखी वयोंत्ये प्रथमे च शूरः ॥ यवे क्योन्त्ये सुखितः सुवीर्यः पने यशः सौख्यगुणान्वितश्च ॥ १८ ॥ अचलतनुसुखी स्यादन्नदाता सरस्यो भवति यजन- वंशे जन्म यूपाख्ययोगे । क्रतुवरयजनेन ख्यातकीर्तिः प्रमादी धनभवननियुक्तो गुप्तिरक्षोथ वाणे ॥ १९ ॥ गदयोगमें उत्पन्न मनुष्य यज्ञकरनेवाला, धनार्जनमें तत्पर, रोगसहित कुस्त्रीवाला होता है। शकटयोगवाला भी उसी प्रकार होता है, विहगवाला दूत तथा फिरनेवाला भी और शृंगाटकवाला यहुत काल मुख मोगनेवाला होता है ।। १७ ।। हलयोगमें मनुष्य कृषिकरनेवाला, प्रथमअवस्थामें शुरमा, .
" - (१८४) जातकशिरोमणि- पिछलीमें सुखी, यवयोगमें पिछली अवस्थामें सुखी, अच्छे वीर्यवाला पद्मयोगमें यश, सौख्य और गुणोंसे युक्त होता है ॥ १८ ।। यूपयोगमें ( अचल ) दृढ शरीर, अन्नदाता, रसीली जवानवाला, यज्ञकरनेवालोंके वंशमें उत्पन्न होता है बाणयोगमें श्रेष्ठ यज्ञकरनेसे विख्यातकीर्ति, प्रमादी, धन और मकानके काममें अधिकारी कैदखानेकी रक्षा करनेवाला होता है ॥ १९॥ शक्त्याख्यजातः सुखवित्तहीनो नीचोलसो दण्डभवों- त्यवृत्तिः ॥ नौजः कदर्यश्चलकीर्तिसौख्यः कूटे नृती बंधनपश्च जातः॥२०॥ वयोत्यसौख्यः स्वजनोप- कारी छत्रोद्भवः कार्मुकजश्च शूरः ॥ प्रागंत्यसौख्यो वयसाईचंद्रे कीर्तिः प्रधानः सुभगश्च जातः ।। २१ ॥ शक्तियोगमें जन्मा मनुष्य सुख एवं वित्तसे हीन, दंडयोग- वाला, नीचकर्मा, आलसी, चांडालवृत्तिवाला होता है । नौ योगवाला क्षुद्र और चलायमानकीर्ति सुखवाला, कूटयो. गमें झूठा और कैदखानेका अप्सर होता है ॥ २० ॥ छत्रयोगवाला बुढापेमें सुखी, अपने मनुष्योंका उपकारकरने वाला । चापयोगमें शूरमा, पहिली पिछली अवस्थामें सुखी, अर्द्धचंद्रयोगमें कीर्तिवालोंमें प्रधान और सुऐश्वर्यवाला भी होता है ।।२१॥ तोयालये नरपतिप्रतिमश्च भोगी वीणोद्भवे निपुणधीः प्रियगीतनृत्यः ।। दाता च दाग्नि पशुपश्च परार्थकार्यः पाशे विशीलधनसंचयशीलवन्धुः ॥२२॥ केदारजन्मा कृपिकृत्प्रसिद्धः शूरश्च शूले विधनोर्जनातः ।। पाखं- + भाषाटीकासमेत। (१८५) डका विधनो युगे च गोले मलाक्को विधनोटनश्च ।। ॥२३॥ सार्दै फलैर्निगदिता इति नामसाख्याश्चित्या- दशासु नियतं सकलासु विज्ञैः॥ नूनं ग्रहाः स्वगृहमित्र निजोचशींचस्थिता गृहवशात्फलदानयोगाः॥२४॥ इति श्रीमहादेवपाठकविरचिते जातकशिरोमणौ नाभ- सयोगाध्यायो द्वाविंशः॥२२॥ समुद्रयोगवाला मनुष्य राजाके तुल्य तथा भोगवान्, वीणायोगमें निपुणबुद्धि, गायन,नाचमें प्रिय और दाता भी, दामयोगमें पशुका स्वामी पराये धन पराये काममें तत्पर, पाशयोगमें शीलरहित धनसंचयका स्वभाव न रहे,बंधुरहित होव ॥ २२ ॥ केदारयोगवाला मनुष्य(कृषि)खेतीकरनेवालोंमें प्रसिद्ध तथा शूरमा होवे । शूलयोगमें धनरहित और धन कमाने में दुःखी रहे युगयोगमै पाखण्डकरनेवाला, निर्द्धन होवे । गोलयोगमें मलसे भरा, निर्द्धन और फिरनेवाला होवै ॥ २३ ॥ इतने नामसयोग फलसहित जो कहे हैं ये सब विज्ञोंने अपनी अपनी दशाओंमें विचारने ग्रह जिसप्रकार स्वगृह, मित्रराशि, उच्च शत्रुराशि, नीचमेंसे जैसा हो 'उसीप्रकार निश्चय फल देते हैं ॥२४॥ इति जातकशिरोमणी माहीधरीभाषाटीकायां नाभसयोगाध्यायो द्वाविंशः ॥ २२ ॥ अथ राजयोगाः। रग्रहरुबगतै पालाः क्रोधाविला गां परिपालयति ।। कस्यापि पक्षे न भवंति भूपाः क्रूरग्रहः क्रूरधनार्जनेष्टाः ॥३॥ सुरगुरुभृगुचंद्ररुचसंस्थैरनस्तैर्भवति मनुजनाथः -- (१८६) जातकशिरोमणि- सर्वधोपसेवी ।. सकलजनधनाढयां शास्ति धर्मेण भूमि जगति जयपदाढयां राजलक्ष्मी भुनाक्ति ॥२॥ राजयोग कहते हैं, क्रूरग्रह उच्चमै हो तो क्रोधयुक्त होकर राजा बनके पृथ्वीका पालन करते हैं क्रूरमहोंके राजयोगासे जो राजा होते हैं वे किसीके पक्षमें नहीं होते और क्रूरतासे धनसंग्रहमें तत्पर रहते हैं॥ १ ॥ वृहस्पति शुक्र चंद्रमा उच्चमें हों अस्तंगत न हों तो समस्तधर्मीका सेवनकरनेवाला राजा होता है समस्तमनुष्य एवं धन, धनसे संपन्न पृथ्वीका शासन धर्मसे करता है तथा संसारमें जयजय शब्दयुक्त राज. लक्ष्मीको भोगता है ॥२॥ मुरुरविकुजौरैःस्वोच्चगैर्जन्मकाले जलनिधिरसनायाः स्वामितां याति भूमेः॥भजति समरलक्ष्मी तं नृपं संग- रस्थं करितुरगरथेश राजलक्ष्मीसमेतम् ॥३॥ वर्गोत्तमे जन्मनि यस्य लग्नं दृष्टश्चतुःपंचविचंद्रखेटैः ॥ वर्गोत्तमे वाशशिनि स्थिते च जातो महीपाल इति प्रसिद्धः॥४॥ जन्ममें गुरु,सूर्य,मंगल जन्मकालमें अपने २ चराशियों में हो तो समुद्रपर्यंत पृथ्वीका स्वामी होता है। तथा हाथी घोडे रोंके स्वामी राजलक्ष्मी युक्त हो उसराजाको युद्धलक्ष्मी सेवनकरती है ॥ ३ ॥ जिसका जन्ममें लनवगोत्तम हो उस लग्नको चंद्ररहित चार आदिग्रह देखें अथवा इसीप्रकार वर्गोत्तमांशगत चंद्रमाको दे तो प्रसिद्ध राजा होवे ॥४॥ कुंभे लगगतेकंजे शशिसुते पुत्रस्थिते सप्तमे देवेन्ये दशमस्थिते कुतनये जातो धरिचीपतिः ।। लग्ने मेपगते
भाषाटीकासमेत। (१८७)
रखौ सुरगुरौ सिंहस्थिते चंद्रजे इंद्रस्थे निधनाश्रिते
कुतनये भूपालपालो भवेत् ।। ५॥
कुंभलग्नमें शनि, पंचममें बुध, सप्तममें गुरु, दशममें मंगल
होवे तो राजा होवै, और मेषललग्नमें सूर्य, सिंहका
गुरु, कन्या बुध छठा और मंगल अष्टम होवै तो राजाओंका
भी पालनकरनेवाला होवे ॥५॥
गवि विलग्नगते मृगलांछने धनगृहे शशिजेस्तगने कुजे।।
सुरगुरौ सुहृदालयसंस्थिते भवति भूवलये वसुधाधिपः
॥६॥ कन्यायां रविसोमजौ सितयमौ जूकस्थितौ
मेपगे भूपुत्रे दशमालये सुरगुरौ कर्कस्थिते भूमिपः ।।
लग्ने तुंगगृहस्थिते शशधरे शेपा ग्रहाः प्राक्तनस्थान-
स्था वरुणालयात्तधरणी पात्येकपाटीमिव ॥ ७॥
वृषलग्नमें चन्द्रमा दूसरा बुध सप्तम मंगल और वृहस्पति
चतुर्थ में हो तो सारी पृथ्वीका राजा होवे ।। ६॥ कन्याके
सूर्य बुध तुलाके शुक्र शनि मेपका शनि और कर्कका बृह-
सति दशमस्थान में हो तो राजा होवे दूसरा योग है कि,
लग्नमें उच्चका चन्द्रमा हो अन्यग्रह पृर्वोक्तस्थानों में हों तो
समुद्रपर्यंत पृथ्वीका पालन एकपाटी जैसा करता है ॥ ७ ॥
धरासुते स्वोचगते ससौरे सेंदौ खो चापगृहस्थिते च ॥
धराधिनाथोन्यधराधिनाथः स्वोच्चे कुजे लग्नगते
सचन्द्रे ।। ८॥ स्वोच्चकलग्ने सुरराज्यपूज्ये धर्मस्थिते
सेन्दुयमेस्तसंस्थे॥धर्मध्वजो भूमिपतिः सतापा यस्याः
रियोपा वनगाश्चरंति ॥ ९॥
.
( १८८) जातकशिरोमणि-
मंगल शनि सहित मकरका चन्द्रमासहित सूर्य धनका
होवे तो राजा होवै मंगल अपने उच्चका लग्नमें चन्द्रमासहित
होवै तो दूसरेके राज्यका राजा होवै ॥८॥ सूर्य अपने उच्च
का लग्नमें, बृहस्पति नवम, चन्द्रमासहित शनि सप्तममें होवे
तो धर्मध्वज राजा होवे जिसके शत्रुकी स्त्रियां सन्तापसहित
वन वन फिरती रहें ॥९॥
वृषे सुधांशावुयेहिसंस्थे रखौ गुरौ वास्तगृहं प्रपन्ने ॥
कुंभस्थिते सूर्यसुते महीशः संपत्स्थिरातस्य चिरायुपः
स्यात् ॥१०॥मीनोदये भृगुसुते दशमे सचन्द्रे जीवे
मृगे कुतनये धरणीपतिः स्यात् ॥ कन्योदये शशिसुते
प्रथमोक्तखेटे प्रोक्तालये भवति भूवलयाधिनाथः ॥११॥
वृषका चन्द्रमा लग्नमें सूर्य अथवा बृहस्पति सप्तम और
शनि कुंभका होवे तो राजा होवै सम्पत्ति उसकी स्थिर रहे
दीर्घायु भी होवै ॥ १०॥ मीनराशिका शुक्र लग्नमें दशम
चन्द्रमा सहित गुरु, मकरका मंगल हो तो राजा होवे,
कन्याका बुध लग्नमें और ग्रह पूर्वोक्त स्थानोंमें हों तो पृथ्वी
का राजा होवै ॥ ११॥
बुधे कन्यालग्ने रविजकुसुतौ पंचमगती गुरौ सेंदो चापे
गतवति गृहं भार्गवसुते ॥ धरानाथो जायात्मलयहि-
मशैलांतरभुवः प्रतापाग्निज्वालाकवलितपरानीकग-
हनः ॥ १२॥ मीनोदये हिमकरे मकरे महीजे सिंहे
रखौ रविसुते घटभे नृपः स्यात् ।। लग्ने कुजे जनि-
लये हिबुके सुरेज्ये लग्नेथ वा क्षितिपतिर्गुणवान्
परोपि ॥ १३॥
भाषाटीकासमेत
(१८९)
कन्याका बुध लग्नमें, शनि मंगल पंचम, चन्द्रमासहित
गुरु होवै धनका शुक्र होवै तो मलयागिरि हिमालयके अंत
र्गतभूमिका ऐसा राजा होवै जिसके प्रतापरूपी अग्निमें शड
का सेनारूपी वन प्रास होजावै ॥ १२ ॥ मीनलग्नमें चन्द्रमा,
मकरका मंगल,सिंहका सूर्य,कुंभकाशनि हो तो राजा होवै
लग्नमें मेषका मंगल चौथा अथवा लग्नका बृहस्पति होवे तो
गुणवान् राजा होवै । अथवा शत्रु भी जिसका गुणवान् अर्थात्
गुणकारी होवै ॥ १३ ॥
मेषे दशमस्थिते सुरगुरौ लग्नस्थिते लाभगैस्तारा-
नाथसुधांशुनंदनसितैरासिंधुभूमीपतिः ॥ सिंहे भास्क-
रसंयुते मृगमुखे लग्नस्थिते भास्करौ कदौ मिथुने
बुधे भृगुसुते जूकस्थिते भूपतिः॥१४॥ बुधे लग्नगते
स्वोच्चे सजीवेस्ते निशापतौ ॥ भृगौ राज्ये भवेद्राजा
मन्दारी पंचमस्थिती॥१५॥
मेषका सूर्य दशम, लग्नमें बृहस्पति और लाभभावमें
वन्द्रमा बुध शुक्र हों तो समुद्रपर्यंत पृथ्वीका राजा होव सूर्य
सिंहका, शनि मकरका लग्नमें कर्कमें चन्द्रमा मिथुनमें बुध
तुलाका शुक्र हो तो राजा होता है॥ १४ ॥ अपने उच्चका
वुध लग्नमें हो तो गुरुसहित चन्द्रमा सप्तम, शुक्र दशम और
शनि मंगल पंचममें हो तो राजा होवे ॥ १५ ॥
ये पंचविंशति नृपाः प्रथमं प्रयुक्तास्तष्वेव नीचकुलजा
अपि राज्यभाजः ।। भूपालवंशजनराः किमु वक्ष्यमा-
गर्भूपालजा नृपतयः क्षितिपालयोगैः ॥ १६ ॥ स्वोच्च
मूलगृहगैर्बलयुक्तैख्यादिभिर्गगनगर्नुपजातः॥ स्युनपाः
परकुले चतुरायैर्निवर्द्धनयुतान भूमिपाः ॥१७॥
(१८८) जातकशिरोमणि-
मंगल शनि सहित मकरका चन्द्रमासहित सूर्य धनका
हो तो राजा होवै मंगल अपने उच्चका लग्नमें चन्द्रमासहित
होवै तो दूसरेके राज्यका राजा होवै ॥८॥ सूर्य अपने उच्च
का लग्नमें, बृहस्पति नवम, चन्द्रमासहित शनि सप्तममें होवे
तो धर्मध्वज राजा होवै जिसके शत्रुकी स्त्रियां सन्तापसहित
वन वन फिरती रहें ॥९॥
वृपे सुधांशाबुदयहिंसंस्थे खौ गुरौ वास्तगृहं प्रपन्ने ॥
कुंभस्थिते सूर्यसुते महीशः संपत्स्थिरातस्य चिरायुपः
स्यात् ॥१०॥ मीनोदये भृगुसुते दशमे सचन्द्रे जीवे
मृगे कुतनये धरणीपतिः स्यात् ॥ कन्योदये शशिसुते
प्रथमोक्तखेटे प्रोक्तालये भवति भूवलयाधिनाथः ॥१॥
वृषका चन्द्रमा लग्नमें सूर्य अथवा वृहस्पति सप्तम और
शनि कुंभका होवे तो राजा होवै सम्पत्ति उसकी स्थिर रहे
दीर्घायु भी होवै ॥ १० ॥ मीनराशिका शुक्र लग्नमें दशम
चन्द्रमा सहित गुरु, मकरका मंगल हो तो राजा होवे,
कन्याका बुध लग्नमें और ग्रह पूर्वोक्त स्थानों में हों तो पृथ्वी
का राजा होवै ॥ ११
बुधे कन्यालग्ने रविजकुसुतौ पंचमगतौ गुरो सेंदो चापे
गतवति गृहं भार्गवसुते ॥ धरानाथो जायात्मलयहि-
मशैलांतरभुवः प्रतापाग्निज्वालाकवलितपरानीकग-
हनः ॥ १२॥ मीनोदये हिमकरे मकरे महीजे सिंहे
रवी रविसुते घटभे नृपः स्यात् ।। लग्ने कुजे जनि-
लये हियुके सुरेज्ये लग्नेथ वा क्षितिपतिगुणवान्
परोपि ॥ १३॥
भाषाटीकासमेत। (१८९)
कन्याका बुध लग्नमें, शनि मंगल पंचम, चन्द्रमासहित
गुरु होवै धनका शुक्र होवै तो मलयागिरि हिमालयके अंत.
गतभूमिका ऐसा राजा होवै जिसके प्रतापरूपी अग्निमें शत्रु
का सेनारूपी वन पास होजावै ॥ १२॥ मीनलग्नमें चन्द्रमा,
मकरका मंगल,सिंहका सूर्य,कुंभका शनि हो तो राजा होवै
लग्नमें मेषका मंगल चौथा अथवा लग्नका बृहस्पति हो तो
गुणवान् राजा होवै । अथवा शत्रु भी जिसका गुणवान् अर्थात्
गुणकारी होवै ॥ १३ ॥
मेपेर्के दशमस्थिते सुरगुरौ लग्नस्थिते लाभगैस्तारा-
नाथसुधांशुनंदनासतरासिंधुभूमीपतिः॥ सिंहे भास्क-
रसंयुते मृगमुखे लग्नस्थिते भास्करौ कदौं मिथुने
बुधे भृगुसुते जूकस्थिते भूपतिः ।। १४॥ बुधे लग्नगते
स्वोचे सजीवेस्ते निशापतौ ॥ भृगौ राज्ये भवेदाजा
मन्दारौ पंचमस्थितौ ॥१६॥
मेषका सूर्य दशम, लग्नमें बृहस्पति और लाभभावमें
चन्द्रमा बुध शुक्र हों तो समुद्रपर्यंत पृथ्वीका राजा होवे सूर्य
सिंहका, शनि मकरका लग्नमें कर्कमें चन्द्रमा मिथुनमें बुध
तुलाका शुक्र हो तो राजा होता है ॥ १४ ॥ अपने उच्चका
वुध लग्नमें हो तो गुरुसहित चन्द्रमा सप्तम, शुक्र दशम और
शनि मंगल पंचममें हो तो राजा होवे ॥ १५ ॥
ये पंचविंशति नृपाः प्रथमं प्रयुक्तास्तेष्वेव नीचकुलजा
अपि राज्यभाजः भूपालवंशजनराः किमु वक्ष्यमा-
णे पालजा नृपतयः क्षितिपालयोगैः ॥ १६ ॥ स्वोच
मूलगृहगैर्बलयुक्तस्यादिभिर्गगनगर्नृपजातः॥ स्युनृपाः
परकुले चतुराद्यैर्निवलैर्द्धनयुता न भूमिपा॥१७॥
(१९०) 'जातकशिरोमणि-
जो पहिले पंचविंशति राजयोग कहे हैं इनमें नीचकुला-
त्पन्न मनुष्य भी राजा होते हैं जो राजवंशी हैं उनको तो
क्याही कहना है अब जो राजयोग आगे कहे जाते हैं इनमें
राजपुत्र ही राजा होसकते हैं अन्य मनुष्य अपने कुलमें
श्रेष्ठ होते हैं ।। १६ ॥ तीन आदि ग्रह उच्च, मूलत्रिकोण स्व.
गृहादिबलोंसे युक्त हों तो राजवंशीय राजा होते हैं अन्य
कुलवाले चार आदि ऐसे ग्रह होनेमें राजा होसकते हैं यदि वे
ग्रह परेबली न हों तो राजा नहीं किन्तु धनवान होते हैं।।१७॥
सेन्दोर्होदयगे रखावजगते भूपालजातो नपो राज्यस्थे
क्षितिजे घटे रविसुते धर्मस्थिते मंत्रिणि । स्वः भार्ग-
वनन्दने सुखगते धर्मस्थिते शीतगौ शेपैल भविलग्न
विक्रमगतैर्भूपालजातो नृपः॥ १८॥ शुभे शुभस्थे
सबले बुधोदये बलान्विते शेपनभश्वरेन्द्राः ॥धर्मार्थ
लाभारि नभस्त्रिसंस्था धर्मध्वजा भूपसुता नृपालाः१९॥
उदयकालिक सूर्य चन्द्रमा सहित मेपमें हो तो राजवं-
शीय राजा अन्य धनवान् होंगे, दशम मंगल, कुंभका शनि
नवम गुरु शुक्र स्वगृही चतुर्थमें, नवम चन्द्रमा अन्यग्रह ११
१। ३ स्थानों में हों तो राजपुत्र राजा होगा॥ १८ ॥ दशमः
भावमें शुभग्रह बलवान् युधलग्नमें, पलसहित अन्यग्रह ९१२
११।६।३भावोंसे किसी में हो तो राजपुत्र धर्मके ध्वज जैसे
राजा होते हैं॥ १९॥
लग्ने शशी धनगते दनुजेंद्रपूज्ये लग्ने पे क्षितिपजो
भवति क्षितीशः ॥बंधी गुरौ शशिदिवाकरसंस्थिताः
खे लग्ने गनी कुजसितेंदुसुता भवस्थाः ॥ २० ॥
भाषाटीकासमेत। (१९१) मेपूरणे शाशिनि लोभगतकपुत्रे लग्ने गुरौ भृगुरवी हि- युकालयस्थौ ॥ज्ञारौ कुटुंबभवने क्षितिपालवंशे जातः समुद्रवलयावनिराजमान्यः ।। २१ ॥ लग्नमें चंद्रमा दूसरा शुक्र और लग्नमें वृषराशि हो तो राजपुत्र राजा होता है चौथा वृहस्पति, दशममें सूर्य चंद्रमा लग्नमें शनि, मंगल शुक्र बुध ग्यारहवेंमें हों तो वही फल है ॥ २० ॥ दशम चंद्रमा, लाभमें शनि, लग्नमें बृहस्पति चौथे सूर्य शुक्र, दूसरे बुध मंगल हों तो राजवंशीय मनुष्य समुद्र पर्यंत पृथ्वीके राजाओंका माननीय होता है ॥२१॥ पाताले शशिनि स्थिते सुरगुरौ जायास्थिते धर्मगे दैत्येज्ये दशमालये दिनपतौ लाभस्थिते चंद्रजालग्न- स्थौ धरणीदिवाकरसुतौ भूपालवंशोद्भवो भूपालो रिपु वर्जितो वसुमती पात्यश्वसेनाधिपः॥ २२ ॥ स्वः लागते विधौ दशमगे जीवे बुधे सप्तमे पाताले भृगु- जे खौ रिपुगते वक्रार्कजौ विक्रमे ॥ योगेस्मिन्नृपजा भवेत्सितिपतिर्यस्यारियोपाजनैराकीर्ण वनितागृहं पुरवहिारस्थिताः शत्रवः ॥२३॥ चौथा चंद्रमा सप्तम गुरु नवम शुक्र दशम सूर्य लाममें बुध और लग्नमें मंगल शनि होतो राजवंशीय शरहित सेना घोडा सहित राजा होकर पृथ्वीका पालन करता है ॥२२॥ कर्कका चंद्रमा लग्नमें, बृहस्पति दशममें बुध, सप्तम चौथा शुक्र छठा सूर्य मंगल शनि तीसरे हों ऐसे योगमें राजवं. शीय पेसा राजा होताहे कि, जिसके मंदिर वैरियोंके स्त्रियों - (१९२) जातकशिरोमणि- से भरे रहैं और नगरके द्वारपर शत्रु खडे रहैं अर्थात् शत्रु जीतके उनके स्त्रियोंको मंदिरमें और उनको नगर द्वारपर रक्खे ॥२३॥ वृपेशशी लग्नगतोयदि स्यात्सिहेरविः सप्तमगः सुरेज्यः।। कुंभे शनिर्यस्य च जन्मकाले महेंद्रतुल्यो नृपजो मही- शः॥२४॥ मृगे मंदे लग्ने तिमियुगलगः शीतकिरणो रिपौ भौमे रंधे कमलवनवंधौ युवतिगे॥बुधे जुने शुक्र तुरगसहिते दैवतगुरौ धरानाथः पाथः पतिवलयभूमे- नृपतिजः ॥२५॥ यदि वृषका चंद्रमा लग्नमें, सिंहका सूर्य सप्तम गुरु कुंभका शनि जिस किसीके जन्ममें हो तो राजपुत्र इन्द्रके समान पृथ्वीका राजा होता है ॥२४॥मकरका शनि लग्नमें मीनका चंद्रमा छठा मंगल अष्टम चंद्रमा सप्तम बुध तुलाका शुक्र धनका बृहस्पति हो तो, समुद्रपर्यत पृथ्वीका राजा राज- वंशीय होता है ॥२५॥ अजे भौमे लग्ने सुरपतिगुरौ चंद्रभवने बुधे कर्मस्थाने तिमियुगलगे भार्गवसुते ॥ सुधांशौ धर्मस्थे रविरवि सुतौ लाभभवने धराधीशो जायात्सुरपतिसमादाप्तम- हिमः॥२६॥ स्वोच्चस्थिते देवगुरौ विलग्ने लाभोपयाता शशिभार्गवज्ञाः॥ रवी मृगारी दशमालयस्थेराजा भवे- दूपकुलाधिनाथः ॥२७॥ मेषका मंगल लग्नमें बृहस्पति कर्कका युध, दशममें मीन शुक्र नवमस्थानमें चंद्रमा सूर्य शनि लाभमें हों तो इन्द्रके समान प्राप्त महिमावाला राजा होय ॥ २६ ॥ टंचका गुरु , . भाषाटीकासमेत। लग्नमें चंद्रमा, शुक्र, बुध, लाभस्थानमें सूर्य सिंहका दशम में हो तो राजकुलका भी श्रेष्ठ राजां होवै ॥२७॥ मीने भृगौ लग्नगते स्वसंस्थे ज्ञकर्मगौ देवपुरोहितेंदू ॥ लाभापयातो वसुधामुतश्च भूपालवंश्यो वसुधाधिपः स्यात् ॥२८॥ बुधगुरुभृगुपुत्राः शत्रुभावोपविष्टा अथ निधनगृहस्थाः सप्तमस्थाः शुधांशौ ॥ यदि नरविह- तोत्रा जायतेत्राधियोगे भजति भुवनलक्ष्मीस्तं नृपं निर्जितारिम् ॥२९॥ बुधे कन्यालग्ने क्षितिरविसुतौ पंचमगतौ झपे सेंदौ जीवे शशिजगृहयाते भृगुसुते ॥ रखौ लाभे भूपो भवति सहसास्तोदयगिरी भुवौ यस्या स्तंभौ समरविजितद्वेपिशरणैः ॥३०॥ मीनका शुक्र लग्नमें दूसरा बुध दशम गुरु चंद्रमा ग्यार- हवां मंगल होवे तो राजवंशीय राजा होवै ॥ २८॥ बुध गुरु शुक्र शत्रुभावमें अथवा चंद्रमासे सप्तम वा अष्टम हों परंतु सूर्य हतकांति न हो तो इस अधियोगमें जिसका जन्म हो उस जितारि राजाको संसारकी लक्ष्मी सेवन करती है ॥ २९ ॥ बुध कन्याका लग्नमें मंगल शनि पंचम मीनका गुरु चंद्र सहित बुधके राशिमें शुक्र और लाभमें सूर्य हो तो ऐसा राजा होता है जिसके कारणमें जीतेहुये शत्रु शरणमें रहें और उदयाचल अस्ताचल जिसके जयस्तंभ होवें अर्थात उद यास्तका राजा होवें ॥३०॥ अजे लागते सुर्ये तुलास्थौ सोमसूर्यजौभाग्ये भाग्य- गृहाधीशे धर्मात्मा पृथिवीपतिः ।। ३३॥ रवौ मेषे मूर्ती - (१९४) जातकशिरोमणि- धनगृहगतौ चंद्रभृगुजौ शनौ लाभे भौमे निधनभवने ज्ञे सहजगे ॥ गुरौ धमै राजा भवति मनुजो यस्य विजिता द्विपाः पारे वार्धिं घटभवमुनेयोति शरणम् ॥३२॥ झपे वर्गोत्तमे लग्ने सुतस्थे सुरपूजित ॥ सयु- धे स्वगृहे सूर्य राजा वेशिगते भृगौ ॥ ३३ ॥ स्वाचे- दौ सगुरौ लग्ने त्रिकोणे भार्गवस्थिते ॥ स राजा राज धर्मण सप्रजा.पाति मेदिनीम् ॥३४॥ मेषका सूर्य लग्नमें तुलामें चंद्रमा शनि सप्तम, और नव- मेश नवममें हो तो धर्मात्मा राजा होवे ॥ ३१ ॥ मेषका सूर्य लग्नमें धनस्थानमें चंद्रमा शुक्र शनि लाभस्थानमें अष्टम मंगल तीसरा बुध नवम गुरु होवै तो मनुष्य ऐसा राजा होता है जिसके जीते शत्रु समुद्रके पार अगस्त्य मुनिके शरण जाते हैं अर्थात् समुद्रपर्यंत उनको शरण नहीं मिलती ॥ ३२॥ मीन मीनाशकलग्न, पंचम गुरु सिंहका सूर्य बुध सहित और शुक्र वेशिस्थानमें होवै तो राजा होवै ॥ ३३ ॥ चंद्रमा गुरु सहित वृपलग्नमें शुक्र त्रिकोण ५ । ९में हो तो वह राजा ( राजधर्म ) नीतिसे, प्रजासहित पृथ्वीका पालन करता है ।। ३४॥ एक एव ग्रहः स्वोचे परमांशगतो यदि ॥ असूर्यगः सुद्दष्टः स शास्ति निखिलां भुवम् ॥ ३५॥ आपूर्ण- मण्डलकलासहितं शशांक पश्यन्ति सोमसुतशुक्रसुरें- द्रपूज्याः ॥ वर्गोत्तमे द्वितनुमे तनुगे तदीशःशक्त्या- न्वितः क्षितिपतिर्यदि नोस्तनीचः ॥ ३६॥ वर्गोत्तमे
भाषाटीकासमेत। (१९५)
त्रिप्रभृतिग्रहेन्द्रा केंद्रस्थिताः सौम्यनिरीक्षिताश्च ।। क्रूर-
ब्रहालोकनयोगहीना राजात्र योगे महनीयकीर्ति॥३७॥
उच्चमें परमांशकगत एक भी ग्रह हो और अस्तंगत न हो
मित्रग्रह उसे देखे तो सारी पृथ्वीका शासन करता है ॥ ३५॥
पूर्णचन्द्रमाको बुध शुक्र गुरु देखें द्विस्वभाव लग्नवर्गोत्तम हो,
लग्नेश बलवान हो अस्त वा, नीचका न हो तो राजा होता
है ।। ३६ ॥ वर्गोत्तममें तीन आदि ग्रह केन्द्रगत शुभदृष्ट भी
हो पापग्रहों युक्त वा दृष्ट न हों तो इस योग बढी कौति-
वाला राजा होता है ॥ ३७॥
शीर्पोदयस्थाः सकला ग्रहेंद्रा नीचास्तवा जनयंति
भूपम् ॥ बुधेस्तगेहे गुरुशुक्रदृष्टे राजा भवेद्भूपतिचक्र-
वर्ती॥३८॥ संपूर्णः परमोच्चस्थाश्चन्द्रः शुक्रेण दृश्यते ।।
कुर्यान्महीपतिं जातं पापैरापोक्किमोपगैः ॥ ३९ ॥ सर्वे
ग्रहा रुचिररश्मिकलापयुक्ताः स्वस्वालयोत्तमनवांशव-
लोपपन्नाः ॥ उत्पद्यते जलधिसीमवती धरित्री भुक्त
स्वबाहुवलनिर्जितशत्रुवर्गः ॥ ४०॥
समस्त ग्रह शीर्षोदय राशियोंमें हों नीच तथा अस्त न
हों तो राजा करते हैं। बुध सप्तममें गुरु शुक्रसे दृष्ट हो तो
चक्रवर्ती राजा होवे ॥ ३८ ॥ पूर्ण चन्द्रमा परमोचगतपर
शुक्रकी दृष्टिही और पापमह आपोक्किममें हों तो राजा करते
हैं॥३९॥सम्पूर्ण ग्रह अस्तंगत न हों अपने अपने गृह उत्तम नवा-
शादि वलसहित हों ऐसे योगमें उत्पन्न मनुष्य अपने वाहुर-
लसे शत्रु जीतके समुद्रपर्यंत पृथ्वीका राज्य भोगता है ॥४०॥
जातकशिरोमणि- वर्गोत्तमे पूर्णकलः सुधांशुः कश्चिद्वहः स्वोच्चगतो वलान्यः ॥ नास्तंगतो नारिगृहस्थितश्च करोति जातं वसुधाधिपं च ॥४१॥ जन्मोदयलग्नपती बलसहितौ केंद्रगो हिमानीशः ॥ झपमृगकर्कटसंस्थत्रिकोणगो वा महीपालः ॥ ४२ ॥ स्वगृहे, मित्रभागेषु स्वाशे वा मित्रराशिपु ॥ अनस्तगा ग्रहाः कुर्युः सार्वभौमगुणा- न्वितम् ॥ ४३॥ यस्योदये मुनिवरो भगवान् वशिष्ठः । पूर्वे सुरेंद्रशचिवः क्षितिजोर्द्धसंस्थः ॥ भूयादटोद्भवमु- नावृदयं प्रयाते पश्चाद्गते भृगुसुते वसुधाधिनाथः॥४४॥ पूर्णकलावान् चन्द्रमा वर्गोत्तममें हो कोई ग्रह उच्चगत, बलवान् हो अस्तंगत शत्रुराशिगत न हो तो मनुष्यको राजा करताहै॥४१॥जन्मलग्न लग्नेश बलवान हों चन्द्रमा केंद्र वा त्रिकोणमें १२ । १०। ४ राशिमें हो तो राजा होवै ॥४२॥ स्वगृही,मित्रांशकी वा मित्रराशियों में विना अस्तंगती ग्रह हों तो गुणवान् चक्रवर्ती राजा करते हैं ॥ ४३ ॥ जिसके जन्ममें मुनिश्रेष्ठ वशिष्ठ उदयी हो बृहस्पति पूर्वोदयी हो मगल दशम हो अगस्तिमुनि उदय हो शुक्र पश्चिमोदयी हो तो राजा होवै ॥४४॥ शशी पूर्णः स्वाशे स्वभवनगतः स्वोच्चगृहगो गुरुः केन्द्रे जातो दितिजगुरुणा वीक्षिततनुः ॥ रविः स्वांशे लग्ने सुरपतिगुरुं पश्यति यदा महीनाथो यस्य क्षितिपरिपवःशैलशरणाः ||१५|| सकलगगनवासैरा- विनाथः सुकृष्टो यदि भवति न नीचे नारिवगें न रंधे।
भाषाटीकासमेत। भवति मनुजनाथोतीत्य केमद्रुमोत्थं त्वशुभफलसमग्र दीर्घजीवी हतारिः ।। ४६॥ उच्चाभिलापी भगवान्वि- वस्वास्त्रिकोणगः स्वगतो हिमांशुः । ककें यदि स्याद्भगवान्सुरेज्यः कुर्वति राजाधिपति प्रसन्नाः॥४७॥ पूर्ण चन्द्रमा अपने अंशकमें हो केंद्रमें बृहस्पति अपनी राशिमें वा उच्चमें हो शुक्र उसे देखे, और जब अपने अंश- कमें बैठा लमगत सूर्य उस बृहस्पतिको देखे तो, उसके शत्रु जितने राजा हो वे सब उसके डरसे पर्वतोंकी शरण लेवें ॥४५॥ चन्द्रमा समस्तग्रहोंसे दृष्ट हो परन्तु नीच, शत्रुरादित तथा अष्टमस्थानमें न हो तो केमद्रुम योग भी हो तो भी उसके फलको हटायके दीर्घायु, शत्रुविजयी राजा होता है ॥ ४६ । सूर्य उच्चाभिलाषी त्रिकोणमें हो चन्द्रमा बृहस्पति कर्कके हों, तो ये ग्रह प्रसन्नतासे मतुप्यको राजाधिराज करते हैं ॥४७॥ पटूस्वोच्चगाः प्रकुवैति मयूपपरिपूरिताः॥ भगीरथ- समं भूपं कुवैति कुलिशांकितम् ॥ १८॥ मित्रालये मित्रसमीक्षितश्च लग्नान्यकेंद्रेषु विलग्ननाथः ॥स शास्ति भूमि बहुरत्नपूर्णी न.नीचगो नास्तमितो यदि स्यात् ॥ १९ ॥.मेपांशकस्थः परिपूर्णमूर्तिः सुधाकरो वास्पतिना च हएः ॥ नीचे न चेनान्यनिरीक्षित प्राह क्षितीशं यवनाधिराजः॥५०॥ छ.ग्रह उच्चराशियोंमें हों परंतु अस्त न हों तो वजके चिव- घाला भगीरथके समान राजा करते हैं ॥४८॥ लग्नेश मित्र राशिमें मित्रमह दृष्ट, लग्नसे अन्यकेंद्र में हो, यदि नीच वा (१९८) जातकशिरोमणि- अस्तंगत न हो तो ऐसे योगवाला मनुष्य बहुत रत्नोंसे पूर्ण पृथ्वीका शासन करता है ॥ ४९ ॥ मेषांशकस्थ परिपूर्णमूर्ति चन्द्रमाको बृहस्पति देखे नीचमें न हो नीचगत ग्रहसे वा पापसे दृष्ट न हो तो राजा होता है यह यवनाचार्यने कहा है ॥ ५० ॥ तुंगांशगेहोपगतः समस्तैदृष्टः सुधांशुः परिपूर्णमूर्तिः ॥ ध्वजाकलापैनहि वाहिनीनां दृष्टिं विवस्वान्नृपतेः प्रयाति ॥ ११ ॥ मृणालगौरोपमबिंबधारी शशी नवांशे नलिनीप्रियस्य ॥ शुभाश्च केंद्रेन्यगताश्च पापा व्ययांत्यवर्ज वसुधाधिनाथः।।१२॥ एकोपि वर्गोत्तमके- संस्थः करोति भूपं बहुरत्नपूर्णम् ॥ समस्तसंपन्नवलो यदि स्यात्समस्तसंपन्नबलश्च भूपः ॥५३॥ मूलत्रि- कोणे तुंगे वा स्वराशिनिलये ग्रहः ॥ तुपारकिरणं पश्यन्निपादं कुरुते नृपम् ॥ ५४॥ स्वभगौ रविशीतांशू जनयेतां नराधिपम् ॥ उच्चस्थौ धनिनं ख्यातं स्वत्रि- कोणगतावपि ॥ ५५॥ पूर्णचन्द्रमाको उच्चराशिगत सभी ग्रह देखें तो उस राजाकी सेनाके ध्वजासमूहोंसे सूर्य भी नहीं देखाजावै ॥५१॥ पूर्ण- चन्द्रमा अपने नवांशक में हों शुभग्रह केंद्र में हों तथा पापग्रह केंद्र तथा १२ । ८ में न हों तो पृथ्वीपति होवै ॥५२॥ एक मह भी वर्गोत्तमांशगत केंद्र में हो तो समस्त रत्नोंसे पूर्ण खजानेवाला राजा होता है यदि वह ग्रह समस्तयलोंसे संपत्र होवै तो समस्तप्रकार सेना आदि राज्यांगोंसे संपन्न होता है H५३ ॥ कोई ग्रह अपने मूलत्रिकोण वा तुंगमें हो अथवा भाषाटीकासमेत। (१९९) स्वराशिमें बैठकर चन्द्रमाको देखे तो निषाद भी राजा होवे ॥५४॥ सूर्य चन्द्रमा स्वराशियोंमें हों तो राजा करते हैं, यदि उच्च हों तो धनवान् विख्यात राजा करते हैं ऐसे स्वमुलत्रिकोणमें भी फल करते हैं ॥१५॥ नीचस्थितोजन्मनि यो ग्रहः स्यात्तदुच्चतद्राशिपतिर्यदा वातौ केन्द्रगौ जन्मनि यस्य पुंसः सराजयो भवति 'क्षितीशः॥५६॥लग्नस्थितं पश्यति देवमंत्री स्वकं नवांश यदि तुंगसंस्थः ।। शीतांशुपुत्रो भवति क्षितीशो यदा न पापा निधने न केंद्रे ॥१७॥ एकोपि जीवेंदुजमार्ग- वानां भाग्ये गृहे शीतमयूपयुक्तः ॥ करोति भूपं बहुभाग्यंयुक्तं मित्रेक्षितश्चेत्सुरराजतुल्यः॥ ६८ ॥ जो ग्रह जन्ममें नीचका हो उप्तका उच्चराशीश, भावरा. शीश यदि केंद्रमें हो तो वह मनुष्य राजाओंमें श्रेष्ठ होता है ॥५६॥ लग्नमें गुरुका नवांशक हो उसे गुरु देख बुध उच्चका होवे और पापग्रह केंद्र तथा अष्टमस्थानमें न हों तो राजा होता है ।। ५७ ॥ गुरु बुध शुक्रमेंसे एक भी ग्रह चंद्रयुक्त नवममें हो तो बढे भाग्ययुक्त राजा करता है यदि मित्रग्रह दृष्ट भी हो तो इन्द्र तुल्य होवे ।। ५८ ॥ लग्रायस्य खगस्य भाग्यभवनं तुंगं तदीशेन युग्दृष्टं चेद्वति शिवरधिपतिः स्वोये स्थिती चेद्रहौ। मीनस्थ भृगुनंदने सुतगते जीवे सताराधिपेराजानीचकुलोद्भवो पिनियतं जायात्स्ववंशातिगः ॥ ५९ ॥ कुमुदवन विकाशी स्वसंगः स्वांशसंस्था बुधगुरुभृगुपुत्रा नाग- (२००) जातकशिरोमणि- लोकप्रविष्टाः ॥ धनभवनगतेन व्योमगेशेन दृष्टा भवति मनुजनाथः सार्वभौमो जितारिः ॥६० ॥ मार्तण्ड जे लागते तुलायां गुरोगृहे वा प्रसवे स्थितो वा ॥ क्षितीश्वरो माण्डलिकोथ वा स्यादन्यत्र लग्नोपगते गतायुः।। ६१॥ लग्नसे नवमस्थानमें जिसकी उच्चराशि हो उससे तथा राशि स्वामीसे नवमभावयुक्त वा दृष्ट हो तो राजा होवे यदि वे ग्रह अपने २ उच्चों में हो मीनका शुक्र पंचम वृहस्पति चंद्रयुक्त हो तो नीचकुल जन्मा भी मनुष्य अपने वंशसे अधिक राजा होता है ॥ ५९ ॥ चंद्रमा अपनी राशिम बुध गुरु शुक्र अपने २ अंशकोंके होकर चतुर्थमें हों धन दश मग भावेशसे दृष्ट हो शत्रु जीतनेवाला चक्रवर्ती राजा होता है ॥६० ॥शनि तुलाका लममें अथवा गुरुकी राशि पंचम भावमें हो तो राजा अथवा कुछ मुल्कका मालिक होथे, और राशिका लग्नमें हो तो अल्पायु करता है ।। ६१ ॥ गण्डान्तविष्टिगरवैधृतिपातजातः क्रूचिपः स उदये- पिच कृत्तिकायाः ॥ उद्यत्कृपाणफलकाहतवैरिना- र्यः संग्रामगाःस्वपतिशीर्पमृगायमाण्यः ॥६२॥ यदि पश्यति भार्गवं वुधं वा सुरमंत्री कुरुते धराधिपम् ॥ सर्वे वा सुरमंत्रिणं गुरुर्वा तान पश्यन् प्रकरोति राज- राजम् ।। ६३ ।। एक एव गुरुर्लग्ने करोति नृपति पर- म् ॥ यदि नीचं गतो न स्यान्मत्तेभपरिधारितम्।।६४॥ विविधगंडांत भद्रा, वैधृति व्यतिपात और कृत्तिकाके उदयमें जिसका जन्म हो उसके तलवारके फलसे कटे शड 1010 भाषाटीकासमेत। शिरोंको उनकी स्त्रियां रणभूमिमें ढूंढती हैं ॥ ६२ ॥ यदि बृहस्पति शुक्र अथवा बुधको देखे तो राजा करता है अथवा सभी ग्रह गुरुको यद्वा गुरु समस्त ग्रहोंको देखें तो राजराज होता है । ६३॥ एक बृहस्पति लग्नमें परम राजा करता है जो उन्मत्त हाथियोंसे परिवारित होते परंतु यदि गुरु नीचका नहो।। ६४ ॥ लग्नमुक्तान्यकेंद्रस्थः संपूर्णः शशिलांछनः ॥ विद धाति महीपालं चतुःसेनासमन्वितम् ॥ ६५॥ स्वो- चस्थितो लग्नपतिः सुधांशुं पश्यन् करोतीह नृपप्रधा- नम् ॥ गुरु गुर्या प्रकरोति पश्यन्स्योचे सुधांशु खलु भूमिपालम् ॥६६॥ स्वाशे वा मित्रमागे वा संपूर्णः शशिलांछनः ॥ गुरुणा दिवसे दृष्टः कुरुते स महीप- तिम् ।। ६७॥ लग्नछोडके अन्यकेंद्रमें पूर्ण चंद्रमा चतुरंगसेनायुक्त राजा बनाता है ।। ६५ ।। लग्नेश अपने उच्चमें बैठकर चंद्रमाको देखे तो प्रधान राजा करता है शुक्र अथवा गुरु उच्चगत चंद्रमाको देखे तो निश्चय राजा करता है । ६६ ॥ पूर्ण चंद्र- मा अपने अंशमें अथवा मित्रांशकमें हो उसे गुरु देखें और दिनका जन्म हो तो राजा करता है ॥ ६७ ॥ ये कारकमहभवा मनुजाधिनाथो ये चाधियोगजनिता- व भवंति योगाः॥ ये वा गणोत्तमविलमसुधांशुजा- तास्ते भूमिपा विगतरोगभया भवन्ति ॥६८॥ ये पाप- खेचरघरापतियोगजाता ये पापवंशनृपजा अपि राज्य भाजः ॥ आचारनीतिरहिताः सहिता वधादिदोपःप्रजा .
.
(२०२) जातकशिरोमणि-
क्षयकरा बहुदुःखभाजः॥ ६९ ॥ पुष्ये स्थितः कुमु-
दिनीदयितः करोति भूपं तथा दहनगोत्तमवर्गसंस्थः ॥
राजानमाशु विदधाति तुरंगयोनौ वर्गोत्तमे सकलभूव-
लयाधिपत्यम् ॥७॥
जो मनुष्य कारक ग्रहोंमें, जो अधियोगमें अथवा जो
वर्गोत्तमादि गुणयुत लग्नमें वा जो वर्गोत्तम चंद्रमामें जन्मते हैं
वे रोग भयसे निर्मुक्त राजा होते हैं ॥ ६८ ॥ जो मनुष्य
पापग्रहकृत राजयोगोंसे राजा होते हैं और जो पापवंशीय
मनुष्य ग्रह योगवलसे राजा होते हैं वे आचार नीतिरहित
एवं मारकूट आदि दोषों करके प्रजाक्षय करने वा बहुत
दुःखभोगनेवाले होते हैं ॥६९॥ चंद्रमा पुप्यनक्षत्रमें तथा कृत्ति-
कामें, यदि उत्तमअंशादिकोंमें हो तो राजा करता है यदि
धनराशिमें वर्गोत्तमांशकी हो तो शीघ्र ही सारी पृथ्वीका
अधिपति करता है ।। ७० ॥
उपचयगृहसंस्था व्योमगाः सर्व एव विधति नरपालं
राजलक्ष्मीसमेतम् ॥ दिनकरशशिजीवा विक्रमस्था
महीजो नवमसुतगृहस्थाः सार्वभौमं च कुर्युः ॥ ७ ॥
रविस्तृतीये भृगुजः सुखस्थो वुधस्य चान्ये यदि पञ्च-
मस्थाः॥ करोति नाथं वसुधाधिपस्य न नीचराशौ न
च शगेहे ।। ७२ ॥ सुधांशुगेहे शशिजो धनुर्द्धरगतो
गुरुः ॥ रविभूसुतदृष्टौ तौ कुरुतःस महीपतिम् ॥७३॥
स्त्रोच्चे गुरुः शशी मीने कुंभे शुक्रो बली यदा । तदा
राजा भवत्येव यद्यशोधवला मही॥ ७४॥
, भाषाटीकासमेत। (२०३) समस्तग्रह उपचयस्थानोंमें हों तो राजलक्ष्मीसहित राजा करते हैं सूर्य चन्द्रमा बृहस्पति विक्रमस्थानमें, मंगल ९१६ में हो तो चक्रवर्ती करते हैं।७१॥ सूर्य तीसरा, शुक्र चौथा और बुधके पंचममें अन्य ग्रह हों तो राजा करता है परन्तु यदि वे ग्रह नीच वा शत्रुराशिमें न हों ॥ ७२ ॥ चन्द्रमाके घरमें बुध, धनमें गुरु हो इन्हें सूर्य मंगल देखें तो राजा करते हैं।। ७३ ।। गुरु कर्कका चन्द्रमा मीनका और बलवान् शुक्र कुंभका होवे तो जिसके यशसे पृथ्वी श्वेत होजावै ऐसा राजा होवै ॥ ७४॥ तृतीयलाभारिंगताश्च पापा दृष्टाशुभै केंद्रगतैविशेषात्॥ कुवैति राजानमपूर्वकीर्ति यस्य प्रयाणोत्थरजोंधकारः ॥७९॥कुजः स्वगेहोपगतो रविजीवनिरीक्षितः॥ वृपे ज्ञो भृगुसंदृष्टस्तथापि नृपतिर्भवेत् ॥७६ ।। अमलवपु- रपापः पद्मसंकोचकारी स्वभवनमथवांशे स्वोच्चमंशं प्रपन्नः ।। यदि गगननिवासैः पंचभिदृश्यमानो जन- यति जगतीशं निर्जिताशेपशत्रुम् ।। ७७ ॥ इति श्री जातकशिरोमणीराजयोगाध्यायस्त्रयोविंशतितमः॥२३॥ पापमह ३॥ १११६ भावों में शुमप्रहोंसे दृष्ट हों विशेषतः केन्द्रस्थ शुभग्रहोंसे दृष्ट हों अपूर्वकीर्तिवाला राजा करते हैं जिसके गमनमें धूली उहनेमें अन्धकार होजावे ॥ ७५ ।। मंगल अपने राशिका सूर्य गुरुसे दृष्ट हो और वृषके बुधकों शुक्र देखे तो भी राजा होवे ।। ७६ ॥ पूर्णमंडल, निप्पांप चन्द्रमा अपनी राशिमें, अथवा स्वांशकमें, यद्वा उच्चशिकमें (२०४) जातकशिरोमणि- हो उसे पांच ग्रह देखें तो सम्पूर्ण शत्रुओंको जीतनेवाला राजा होता है ॥ ७७ ॥ इति श्रीजातकशिरोमणौ माहीधरीभाषा टीकायां राजयोगाध्यायस्त्रयोविंशतितमः ।। २३ ॥ । अथ राजयोगसमर्थनाय रश्मिविचारमाह । ये प्रोक्ता यवनादिभिर्नृपतयो रश्मिप्रधानाचते यावंतो ग्रहरश्मयो नरपतेः स्युर्जन्मकाले स्फुटाः॥तत्प्रोक्तं पृ. थिवीतलस्थितपुरग्रामाधिपत्यं भवेद्राज्ञामन्यकुलोद्भ- वस्य च ततो वक्ष्यामि तान्प्रस्फुटान् ॥१॥ सप्तव ग्रह- रश्मयः प्रतिखगं प्रोक्ता वशिष्ठादिभिभ्रष्टस्तुंगनिवासतः स्वकिरणात्प्रत्यङ्मुखास्ते ग्रहाः ॥ये नीचात्पतिताः स्वतुगनिलयं गंतुं प्रवृत्ता ग्रहाः रश्मीनामभिसंमुख प्रचलिता ज्ञेया महद्भिः सदा ॥२॥ अब राजयोगोंके समर्थन करनेको रश्मिविचार कहते हैं, जो यवनादि आचार्योंने राजयोग कहे हैं वे रश्मिप्रधान हैं जितने राजाके राजरश्मि जन्मकालमें ग्रहोंकी स्फुट होती हैं उनके उक्तानुसार पुर, प्राम, राजा अन्यकुलोद्भव भी होता है इसलिये उनरश्मियोंका विचार स्पष्ट कहता हूं ॥ १॥ वे रश्मि वशिष्ठादि आचार्योंने प्रत्येक ग्रहकी सात सात कही है जो ग्रह अपने उच्चसे उतर जाते हैं वे अपनी उच्चरश्मियोंसे विमुख होजाते हैं जो ग्रह नीच से उतरके अपने उच्च में जानेको प्रवृत्त होते हैं वे विद्वानोंने रश्मिमुख जानने ॥२॥ स्फुटग्रहानीचमपास्य केंद्र पड्भाधिकं चेद्भगणाद्वि- शोध्य ॥ पड्भोनकं यच यथास्थितं स्यात्कलीकृतं भाषाटीकासमेत। (२०५) राशिकलासमेतम् ॥ ३॥ खखाएरूपैविहृतं फलं यद्भू- पादिलब्धं गगने चरस्य ।। एवं स्फुटा खेचररश्मयः स्युः संस्कारमेषां कथयामि सर्वम् ॥४॥ रश्मि गणित हैं कि, ग्रहस्पष्टसे नीचस्पष्ट घटाना वह केंद्र होता है छः राशिसे अधिक हो तो १२ में घटाय देना छः राशिले कम हो तो यथास्थित रखना उसकी कला करनी एकराशिकी कला १८०० उसमें जोड देनी॥३॥ उसमें राशि कला १८०० का भाग देना जो एक आदिफल मिले वह ग्रह की रश्मि स्फुट होती है अब इसके उपरांत संस्कार सब कहता हूं ॥४॥ वैरिद्वादशभागो पोडशभागोनितास्तस्था नीचे॥ अस्त मितस्य विनष्टा ग्रहकिरणा न भार्गवाजजयोः॥५॥ वक्रीग्रहस्य द्विगुणा वक्रत्यागेष्टभागोनाःएवं रश्मिवि- धानं पूर्वाचायः समुद्दिष्टम् ॥६॥ पूर्वानीत स्पष्टरश्मिमें और संस्कार, कि, शत्रुराशिगत प्रहका बारहवां भाग, नीचवालेका सोलहवां अस्तमहके भी उतना ही भाग घटता है परन्तु शुक्र बुधका अस्तमें भी उक्त भाग नहीं घटता ॥५॥ वक्रीमहके द्विगुण हो जाता है मार्गमें अष्टमांश घटता है इस प्रकार पूर्वाचार्योंने रश्मियोंका विधान कहा है ॥६॥ एकादिपञ्चकिरणा यदि जन्मकाले दुःखान्विता अपि कुलप्रभवा नराः स्युः ॥ अन्यस्य तर्कनिपुणाः प्रथिता दरिद्रे नीचा भवति दशभिः किरणैर्महीपाः ॥७॥. यस्य पञ्चदश रश्मयः स्फुटाः सम्भवंति सुजनाः शुभ .
(२०६) जातकशिरोमणि-
युक्ताः॥ तस्य पुत्रवनिताधनसौख्यं जायते निजकुला-
नुसारतः ॥ ८॥ आविशतेईनयुताःप्रथिताः पृथिव्या-
मापंचविंशतिकराः कृतिनोऽपि भूपाः ॥ सम्मानदान
विधिना स्वजनाः प्रजाश्च तैर्मानिताः खलु भवंति नय
प्रवीणाः॥९॥
यदि जन्मकालमें एकसे पांचपर्यंत रश्मि हों तो, सत्कुलज
मनुष्य भी दुःखयुक्त होते हैं अन्यकुलवाले कलहमें निपुण
दरिद्रतामें विख्यात दश रश्मि होवें तो नीच राजा होते हैं
॥७॥ जिसकी स्पष्ट रश्मि १५ होवें सज्जन, भलाईसे युक्त
होते हैं और उस मनुप्यको पुत्र स्त्री धन स्वकुलानुसार ऐश्वर्य
भी होता है ॥ ८॥ वीसरश्मिवाले धनवान् पृथ्वीमें विख्यात
होते हैं पचीसवाले चतुर राजा होकर सन्मान, दानविधिसे
अपने मनुष्य एवं प्रजा भी उनके मान देनेसे निश्चय प्रवीण हो
जाते हैं ॥९॥
भूपालवंशमनुजा अत उत्तरेण चण्डा नृपाश्रितपदा
नृपलब्धसौख्याः॥आत्रिंशकं परकुलप्रभवा मनुष्यास्ते
राजपूजितपदाः सचिवं प्रयांति ॥१०॥ एकत्रिंशद्रश्मि-
भिभूमिपालः ख्यातो भुक्ते भूमिखण्डं सुराज्यम् ॥
द्वात्रिंशद्भिः संख्यया ग्रामपंच राजा भुक्ते तच्छतनं
सुखेन ॥ ११॥ ग्रामसहस्राधिपति त्रिंशत्प्रधिकं करोति
रश्मीनाम् ॥ त्रिंशच्छतं दशघ्नं ग्रामाणां भाजनं चतु-
स्त्रिंशत् ॥ १२॥ परतो मण्डलभाजो बहुकोशवाजिप-
रिग्रहाः सुकीर्तियुताः॥पभिः सहितास्त्रिंशद्भुक्ते लक्ष
तु नगराणाम् ॥ १३॥
भाषाटीकासमेत। (२०७) पच्चीस ऊपर रश्मि होने में राजवंशी मनुष्य प्रचंड राजाश्रय- पदमें नियुक्त राजासे सन्मान प्राप्त होते हैं ३० पर्यंत विना राजवंशोद्भव भी राजपूजित पाद होकर मंत्रिताको प्राप्त होते हैं ॥ १० ॥ प्रकत्रिंशत् रश्मिसे राजा होकर ख्यात होता है और अच्छे राज्यके टुकड़ेका राज भोगता है ३२ में पांचसौ ग्रामका राज्य सुखसे भोगता है ॥ ११ ॥ लेतीसर- शिमवाला सहस्र नामका राज्य और चौतीसमें तीसहजार ग्रामोंके राज्य भोगनेवाला होता है ॥ १२ ॥ पैंतीसरश्मिमें. (मंडल) जिलाका राजा बहुत खजाना बहुत घोडे तथा सुकीर्तियुक्त होते हैं ३६ रश्मिहोनेमें एक लक्ष नगरोंका राज्य भोगता है ॥ १३ ॥ चत्वारिंशदश्मयो यस्य राज्ञः श्रीखंडादेराहिमादि धरायामासेनानादैराकुला वैरिभूपा गंतुं भीता नोत्स- हेते कदाचित् ॥१४॥ एकत्रिंशत्प्रभृतिकिरणैः कीर्तिता भूमिपालाश्चत्वारिंशत्खचरकिरण यावदस्मात्समा- सात् ॥ एकद्वित्रिप्रभृतिकिरणा वर्द्धमाना यदि स्युस्तेपां राज्यं प्रभवति पर द्वीपखण्डे धरायाम् ॥ १५॥ इति श्रीजातकशिरोमणौ रश्मिविचाराध्यायश्चतुर्विंशति- तमः॥२१॥ जिस राजाके ४० रश्मि हॉउसके सेनाँके चलनेके शब्दोंसे मलयागिरिसे लेकर हिमालयपर्यन्तके वैरिराजे भयसे गमन- करनेको कभी नहीं चाहते ॥ १४ ॥ यहाँ ३१ से ४० पर्यंत किरणोंवाले सक्षासे भूमिपाल कहे हैं इनमें भी जहां ११२१३
(२०८) जातकशिरोमणि-
किरण बढते हों उनका परम राज्य द्वीपखण्डपर्यंत पृथ्वीमें
होता है ॥ १५ ॥ इति श्रीजातकशिरोमणौ माहीधरीभाषा-
टीकायां रश्मिविचाराध्यायचतुर्विंशतितमः ॥ २४ ॥
अथ राजयोगभंगाध्यायः।
ये वशिष्ठयवनादिसूरिभि पिता नृपतियोगसंभवाः ॥
यैरवंशजनरा अथो नृपाः सप्रभा यदि न भंगकारकाः॥
॥१॥नीचगाः कुजयमार्कसूरयो लग्नगा नृपतियोग-
भंगदाः ।। वृश्चिके यदि निशाकरो भवेच्छीर्यते नृपति-
योगसंभवः॥२॥
राजयोगभंग कहते हैं। जोराजयोगसंभव वशिष्ठयवनादि
आचार्य पंडितोंने कहे हैं, जिनसे अराजवंशीय भी राजा
होते हैं वे योगकर्ता ग्रह यदि कांतियुक्त अर्थात् अस्तपीडि-'
तादि न हों तो राजयोग भंग नहीं करते ॥ १॥ मंगल शनि
सूर्य वृहस्पति लपमें हो तो राजयोग भंग करते हैं चंद्रमा
वृश्चिकका हो तो भी राजयोग भंग होता है ॥२॥
चरस्य नवमे भागे द्विदेहाये स्थिरेटमे॥ क्षीणे न केन-
चिदृष्टो राजभंगकरः शशी ॥३॥ क्रूराः केन्द्रगता
नीचे वारिंगा न शुभेक्षिताः॥ शुभदा व्ययरंध्रस्था वा
भंगो नृपतेर्भवेत्॥४॥ लग्ने गुणाः केपि न संभवंति न
वा विलग्ने विहगे न दृश्यते।।नृपालयोगप्रभवोपि राजा
दरिद्रदोपोपहतोऽवलः स्यात् ॥५॥ कुंभोदये सूर्यगते
बृहस्पती विभिहेर्नीचसमाश्रितैर्वा ॥ न कोपि तुंगे
शुभकर्मभाने पापे नृपो वै विलयं प्रयाति ॥६॥
भाषाठीकासमेत। (२०९) •क्षीण चंद्रमा चरके पिछले नवांशमें, स्थिरके अष्टम यद्वा द्विस्वभाव आद्यशमें होउसे कोई ग्रह न देखे तोराजयोग भंग करताहै ॥ ३ ॥ क्रूरग्रह केंद्र में अथवा नीच यद्वा शत्रुराशिमें हों शुभग्रह उनको न देखे यद्वा शुभ ग्रह १२। ८ में हों तो राजयोग भंग करते हैं ॥ ४ ॥ यदि लग्नमें कोई भी उत्तम गुण वर्गोत्तमादि नहीं होते, न लग्नपर किसी ग्रहकी दृष्टि हो तो राजयोगसे भया राजा भी दरिद्रदोषसे हत और निर्वल भी होवै ॥ ५॥ लग्नमें कुंभराशि, बृहस्पति सूर्यके साथ हो अथवा तीन ग्रह नीच में हों, कोई ग्रह उन्चका न हो ९। १० भावों में पापग्रह हों तो राजयोग भंग होजाता है॥६॥ शुभग्रहेन्द्र रविमण्डलस्थैर्न वा शुभो वेशिगृहं प्रपन्नः॥ नीचस्थितर्वारिगृहं प्रयाग्रहश्चतुर्भिविलयं प्रयाति ॥ ७ ॥ शीतयुतावस्तमिते खौ तु स्वाशस्थिते पापविलोकिते च ॥ कृत्वापि राज्यं शुभदृष्टि- हीने दुःखी हताशो विलयं प्रयाति ॥८॥ अमृतकिरण- धारी शत्रुदृष्टो विलग्ने सहजरिपुभवस्था भानुभूपुत्र- मंदाः ॥ शुभगगननिवासा रश्मिहीना न केंद्रे नृपति- कुलसमुत्थो याति नाशं क्षणेन ॥ ९॥ पंचादिभिरस्त- गनिम्नं यातैश्च पंचभिःप्रियांति विलयं योगा भभुजा ये प्रकीर्तिताः ॥ १० ॥ परं नीचगते चंद्रे क्षीणे वा पायपीडिते ॥ नाशमायाति राजेव दैवविद्वागना- दरी॥११॥ शुभग्रह अस्तंगत हो अथवा शुभमह वैशिस्थानमें न हो अथवा नीच वा शत्रुराशियोंमें चार ग्रह हों तो राजयोग १४ (२१०) जातकशिरोमणि- नष्ट होजाता है ।। ७ ।। चंद्रमा अस्त हो, सूर्य अपने अंशमें पापदृष्ट हो शुभनद न देखें तो राज्यकरके भी दुःखी एवं हताशहोके क्षय होवै ॥ ८॥ चंद्रमा लग्नमें शत्रु दृष्ट हो ३।६। ११ भाषा में सूर्य मंगल शनि हो शुभग्रह रश्मिहीन केंद्रोंसे अन्यभावों में हो तो राजवंशीयका राज्य भी क्षणमें नष्ट हो जाता है ।। ९॥ पांच आदिग्रह नीच वा अस्त हों तो राजा ओंके उक्त राजयोग नष्ट होजाते हैं ॥१०॥ चंद्रमा परमनीवमें अथवा क्षीण यद्वा पापपीडित हो तो जैसे देवज्ञको अनादर वाणी बोलनेवाला राजाके तरह राजयोग नष्ट होजाताहै॥११॥ . जूकस्य दशमे भागे स्थितः कमलबांधवः ॥ अपि राजसहस्राणां भंगमेव करोत्यसौ ॥ १२ ॥ येषां जन्मनि जायंते चोका निर्घातनिस्वनाः ॥ केतवो दर्शनं यांति ते नश्यति नृपोद्भवाः ॥ १३॥ शुभग्रहा वाप्यशुभग्रहा वा पराजिता जन्मनि रश्मिहीनाः ।। रक्षा विवर्णा जनयंति विघ्नं राज्ञां हि योगस्य किलो. दितस्य ॥१४॥ सूर्य तुलाके १०अंश अर्थात् परमनीचपर हो तो हजार भी राजयोग हों उनका भंग करता है ॥ १२ ॥ जिनके जन्ममें उल्का पात, निर्यात शब्द, केतुदर्शन हो तो राजयोग नष्ट हो जाते हैं ॥ १३ ॥ जिसके जन्ममें शुभग्रह वा पापग्रह युद्ध में पराजित, तथा रश्मिहीन हो तो राजयोगवालोंको भी रूखे, कुवर्ण होते हैं रदिनयोगमें विन करते हैं ॥१४॥ केचित्स्वमन्दिरगताः केचिन्मूलगृहस्थिताः॥स्त्रोच्चगा अपि नीचस्थः सूर्यश्चैकोपि भंगदः ।। १५ ।। गुरुनींच- भाषाटीकासमेत। (२११) गतो लग्ने दुःखं नयति राजजान ॥ केमद्रुमेन चैकेन भ्रष्टश्चंद्रो विनाशकृत् ।। १६॥ कन्यायां पमिनीवंधु- स्तुलायां गुरुभूमिजौ।। मेषे शशी न दृष्टोऽन्यैः स राजा राजवंदितः ।। १७॥ इति जातकशिरोमणौ राजयो- गभंगाध्यायः पंचविंशतितमः ॥२५॥ यदि कोई ग्रह स्वगृही; कोई मूलत्रिकोणी और कोई उच्च भी होवै परन्तु एक सूर्य परमनीचका होजावै तो सभी शुभोंका भंग करदेता है ॥ १५॥ बृहस्पति लग्नमें नीचरा- शिका होवै तो राजपुत्रोंको भी दुःखमें प्राप्तकराय देता है तथा एक केमद्रुमसे भ्रष्ट चन्द्रमा राजयोग भङ्ग करता है ॥ १६॥ सूर्य कन्याका, गुरु मंगल तुलामें, मेषमें चन्द्रमा जो पापदृष्ट न हो तो राजाओंसे वन्दना करनेकेयोग्य राजा होता है॥४७॥ इति जातकशिरोमणी माहीधरीभापाटीकायां राजयोगभंगाध्यायः पंचविंशतितमः ॥२५॥ अध भाग्यविचारः। विचिंतयेद्भाग्यगृहं विहाय सर्व दशायं यदिह प्रयु- क्तम् ॥ भाग्यं विना दुःखसुखादिकस्य भवेद्विचारो न हि जातु किंचित् ॥ १॥ निशाकरायन्नवमं विलग्ना- द्भाग्यं विचार्य हितयोर्वलेन ॥ भाग्यक्षनाथो निल- येस्ति कस्मिन्को वा ग्रहो भाग्यगृहस्थितश्च ॥२॥ भाग्यभावविचार है कि, जो दशादि पहिले कहे हैं उनको छोडके प्रथम भाग्यका विचार करना क्योंकि भाग्यविचार विना दुःख सुखका विचार कदाचित् भी कुछ नहीं होता
(२१२) जातकशिरोमणि-
॥१॥ उसका विचार ऐसा है कि, चन्द्रमासे तथा लमसे
जो नवमस्थान है उसके बलावलके अनुसार भाग्य जानना
भाग्यराशिनाथ कौन है किसके घरमें है कैसा उसका बला-
बल है इत्यादि विचार प्रथम है ॥२॥
स्वनाथयुक्तक्षितभाग्यवेश्म स्वदेश एव स्वदशामवाप्य।।
स्तोकं महदा स्वफलं ददाति परोऽन्यदेशेशु दृग्युते च
॥३॥ विलग्नदुश्चिक्यसुतस्थितेन विलोकितं भाग्य-
गृहं यदि स्यात् ।। स भाग्यवान् भाग्यफलस्य भोक्ता-
न्यत्र स्थितेनेक्षितमल्पभाग्यम् ॥ ४॥ भाग्ये देवगुरौ
रवीक्षिततनौ मन्त्री नृपो वा समो भोगी चन्द्रविलो-
किते बहुधनो भौमेन सौम्येन च ॥ गोभिर्वाहनवस्त्र-
रत्ननिचयैर्युक्तः सितेनेक्षिते सौरेण त्रपुदासवेसरखर-
स्वामी कुलान्याधिपः॥५॥
भाग्यगृह स्वस्वामि शुभग्रहसे युक्त वा दृष्ट हो तो उसकी
दशामें अपने ही देशमें, उसके बलानुरूप थोडा वा बहुत
फल मिलता है, शत्रुयुक्त दृष्ट हो शुभस्वनाथयुग्दृष्ट हो तो
परदेशमें फल देता है ॥ ३ ॥ लग्न, दुश्चिक्य,
पञ्चमस्थित
उक्तग्रहसे भाग्यभाव यदि देखाजावै तो वह मनुष्य ऐश्वर्य
वान, भाग्यफलभोगनेवाला होताहै, अन्यभावों में बैठकर देखें
तो ऐश्वर्य थोडा होता है ॥ ४ ॥ नवम स्थानमें बृहस्पति सूर्य
दृष्ट हो तो मन्त्री, वा राजा अथवा राजनुल्य होता है
चन्द्रदृष्ट होवे तो भोगवान् भीमदृष्टि से बहुधनवाला बुधसे
भी यही फल है शुक्रदृष्टिसे गौ वाहन, वस्त्र, रत्नसमूहोंसे
युक्त होवे शनिदृष्ट हो तो राँगा, दास, बञ्चर, गदहोंका
स्वामी नीचकुलजोंका नायक होवे ॥५॥
" भाषाटीकासमेत । (२१३) चंद्राऽकदृष्टे धनदारपूर्णो रव्यारदृष्टे वहुवाहनाट्यः॥ बुधाऽर्कदृष्टेंबरभूपणाव्योज्ञः काव्यवित्कांतवपुः कलाज्ञः ॥६॥ उत्सवगोमहिपान्यो रविसितदृष्टे विनीतवेपश्च।। वेशपुरश्रेणिपतिर्गुणवानोकिदृष्टेज्ये ॥७॥ एकेन यद्योगफलं निरुक्तं द्वाभ्यां त्रिभिर्वा यदि योगदृष्टिः॥ तावत्फलं प्रोनफलेन युक्तं विचार्य सम्यग्विलिखेच्च विद्वान् ॥ ८॥ वही नवम गुरु चंद्र सूर्यसे दृष्ट हो तो धन और स्त्रीसे पूर्ण रहे सूर्य मंगलसे दृष्ट हो तो बहुत वाहनोंसे युक्त रहे बुध सूर्यसे, श्रेष्ठ भूषणोंसे युक्त तथा पंडित, काव्यज्ञ रमणीयशरीर कला जाननेवाला होवै ॥६॥ सूर्य शुक्रसे दृष्ट हो तो उत्स- वकृत्य, गौ भैंसयुक्त और नम्रवेष भी होवै, सूर्य शनि दृष्टिसे, सरोवर, ग्रामपंक्ति, पुरोंका स्वामी और गुणवान् होवें ॥ ७॥ एक ग्रह दृष्टिसे जो फल कहा है वही फल २।३ ग्रहोंकी दृष्टि होनेपर सम्यगू विचारना और विद्वान्ने लिखना ॥८॥ रूपान्वितोऽथ धनवान्सुभगोवलीस्यात्तेजोयुतो नरप- तिर्वहुधर्मकर्ता ॥ भाग्ये गुरौ सकलखेटविलोकिते वा जायात्कुलोचितकरो गुरुमंदिरेऽपि ॥९॥ बुधगुरुभ्यु पुत्रा भाग्यगेहोपविष्टा न रिपुगृहनिविष्टा निम्नगा जन्मकालभिवति बहुधनाड्यो धान्यधर्मैश्च जंतुर्भवति नृपतिमान्यो दीर्घजीवी सुबन्धुः ॥ ॥१०॥ भाग्ये गृहे पूर्णशशी यदि स्यात्प्रधानवीर्या बुधसौरवकाः॥
(२१४) जातकशिरोमणि- व्यस्ताः समस्ता मनुजाः प्रधानाः प्रधानवंशप्रभवाश्च तेषु ॥११॥ इति भाग्यविचारः ॥ नवम गुरु सभी ग्रहोंसे दृष्ट होवे तो मनुष्य रूपवान धन वान सौभाग्ययुक्त बलवान, तेजवान्, राजा, बहुत धर्म करने वाला और अपने चित कर्म करनेवाला होवै ॥ ९॥ बुध, गुरु, शुक्न यदि जन्ममें नवममें हों परंतु शत्रु नीचमें न ही तो जीव बहुत धनसे युक्त अन्नस, धर्मसे संपन्न होता है और राजमान्य, दीर्घायु, अच्छे बंधुवाला होता है ॥ १० ॥ नवमस्थानमें पूर्ण चंद्रमा और बलवान्, बुध शनि शुक्र हो तो समस्त मनुष्य इस योगवाले श्रेष्ठ प्रधान होते हैं प्रधा. नवंशमै उत्पन्नोंके ऐसे ग्रह होते हैं ॥ ११ ॥ अथ धनभावविचारः। धनभावे शनिभौमौ त्वग्दोपदरिद्रदौ ज्ञेयौ ॥ केवलो यदि सौरः स्यान्महार्थविभवो भवेत् ॥ १२ ॥ बुधद्द- ष्टस्त्रिदशगुरुर्द्धनभावस्थोऽति निःस्वतां कुरुते ।। शशि तनयोऽपि च शशिना दृष्टो बहुधा धनं इन्ति ॥१३॥ क्षीणो बुधेक्षितश्वद्रोधनस्थोधननाशकृत्॥पूर्वेणोपार्ज- तस्यापि किं पुनः स्वभुजोर्जितम् ॥ १४ ॥ शुक्रो बुधेक्षितो द्रव्ये द्रव्यदाता सदा भवेत् ॥ शुभालयगतो वापि स एव धनदः स्मृतः ॥ १५॥ धनभाव विचार है कि, द्वितीयस्थानमें शनि मंगल हों तो त्वचाके दोष, दरिद्रता करनेवाले जानने यदि अकेला शनि होवे बडा धन विभव होय ॥१२॥ धनमामें वृहस्पति
भाषाटीकासमेत । . (२१५)
बुधदृष्ट हो तो निर्द्धनता करता है बुध भी धनभावमें
चंद्रदृष्ट हो तो बहुत धनका नाश करताहै ॥१३॥ क्षीणचंद्रमा
धनस्थानमें बुधदृष्ट धननाश पिछलोंके कमायेका भी करता
है और अपनी मेहनतसे कमायेका तो क्या ही कहना है
॥ १४ ॥ बुधदृष्ट शुक्र धन भावमें सर्वदा धन देता है अथवा
शुभराशिम हो तो वही एक धन देने वाला कहाहै ॥ १५ ॥
अथ सहजपुत्रपत्नीविचारः।
सहजतनुजजायाभावसंस्था नवांशाः पतिशुभयुतदृष्टा
अस्ति भावार्थसंपत् ॥ शुभगगननिवासो लोकयोगेन
हीना न खलु भवति संपत् पापदृष्टैरनाथैः ।। १६ ॥
अंशराशिपतयो विरश्मयो नीचगा ग्रहजितारिग्रह-
स्थाः। तस्य तस्य न हि वृद्धि रिष्यते योशराशिरपि
पापरयुतः ॥ १७॥ नवांशवेश्माऽधिपतिर्निजोचे
प्रतीपगामी त्रिगुणो नवांशः॥ वर्गोत्तमात्मायनवांश
राशिद्रेष्काणसंस्थे द्विगुणोंशवर्गः॥ १८॥
भात, पुत्र, स्त्री, भावोंके नवांश स्वस्वामि शुभयुत दृष्ट
होवें तो इनमावोंकी संपत्ति करते हैं यदि पापग्रहोंसे युक्त
दृष्ट हों स्वामी शुभग्रहसे युक्त दृष्ट न हों तो वह संपत्ति
नहीं होती ॥ १६ ॥ अंशेश राशीश, रश्मि हीन, नीच,
नीचगत, युद्धमें पराजित, वा शत्रुगशिस्थ हो तो तथा
अंश और राशिभी पापयुत दृष्ट हो तो टन टन मायाकी वृद्धि
नहीं होती ॥ १७ ॥ यदि भावेश नशिश अपने उच्चोंमें हों
तो उस भावोक्त फलकी त्रिगुणसंपत्ति करते हैं वर्गोत्तम नवां-
श, स्वनवांश स्वराशि स्वद्रेष्काणमें हो तो द्विगुण संख्या
करते हैं।॥ १८॥
जातकशिरोमणि-
लनाचन्द्रमसस्तृतीयभवने पापैः समस्तैर्युतं न स्यु-
स्तत्सहजाः कथंचिदपि वा प्रोक्तांशशक्त्या काचित ॥
यावतः सहजेशका उदयिनो भौमेन शीतांशुना दृष्टा-
स्तत्समदारिकाश्च सहजा प्रायः शुभैः शोभनाः ॥१९॥
तत्र स्थितो रविसुतः क्षितिजेन दृष्टो जातं विनाशयति
शुक्रसुरेज्यदृष्टः ॥ पुष्णाति तस्य सहजाञ्छशिजः
कुजेन दृष्टश्च तद्भवनगो विनिहति जातम् ॥२०॥
लग्न वा चंद्रमासे तीसरे स्थानमें पापग्रह हों तो पाक्त
अंश बलतुल्यसंख्याक भी भाई उसके मुष्किलसे भी नहीं
होते तृतीयमें जिदितांश, शुभ स्वस्वामिसे दृष्ट होते हैं उतने
भाई होने हैं जितने मंगल चंद्रमासे दृष्ट हो उतनी बहिन
होती हैं ॥ १९ ॥ तीसरा शनि मंगलसे दृष्ट हो तो भाई नष्ट
करता है गुरु शुक्रसे दृष्ट हो तो भाइयोंको बढाता है तीस
रा बुध भौमदृष्ट हो नो भाईकी हानि करता है ।। २० ॥.
अथ पुषभावविचारः।
शुभालयः पंचमभावसंस्थः शुभग्रहैर्युक्तनिरीक्षितश्च ॥
अनस्तगैस्तस्य भवत्यपत्यं पापेक्षितं पापगृहेन
तत्स्यात् ॥२१॥ शुभराशौ गुरुवर्गे शुभदृष्टेज्ये सुतौ-
रसो ज्ञेयः॥लनाचन्द्रादथवा वलयोगात्पंचमः सदा
चिन्त्यः ॥ २२ ॥ बुधशनिक्गोंधीस्थश्चकेन युतो न
हएश्च ॥ क्षेत्रजपुत्रं जनयति दृपः पापेन वा तथा
वाच्यम् ॥२३॥
+
भाषाटीकासमेत।
पुत्रभावका विचार है कि पंचमभावमें शुभग्रहराशि, शुभ
ग्रहोंसे युक्त दृष्ट भी होवै शुभ अस्तंगत न हो तो उसको
संतान होती है पापराशि, पापयुग दृष्ट हो तो संतति नहीं
होती ॥ २१ ॥ पंचममें शुभराशि गुरुका अंशादिवर्ग बृह-
पति युक्त शुभग्रह दृष्ट हो तो औरसपुत्र होता है अथवा
ऐसेही लग्नसे वा चंद्रमासे, बलानुसार पंचम भाव सर्वदा
विचारना ॥२२॥ पंचममें बुध, शनिका वर्ग हो किसीसे युक्त
दृष्ट न हो तो क्षेत्रज पुत्र होता है पापग्रहदृष्टिसे भी यही फल
कहना ॥ २३॥
• सुतभवनं मन्दगृहं मंदयुतो निरीक्षिते शशी पूर्णः ॥दत्त-
कपुत्रोत्पत्तिः क्रीतः पुत्रो बुधश्चैवम् ॥ २४॥ पंचमे
यदि कुजस्य नवांशः सप्तमो रविसृतेन च दृष्टः॥ तस्य
कृत्रिमसुतेन पुत्रता नापरैर्गगनगैर्भवतीह ॥२६॥ वल-
वति सुतभावे सूर्यपुत्रार्कयुके धरणितनयदृष्टे जायते
तस्य पुत्रः॥ अधमकुलसमुत्थो वाच्यतां कामिनीनां
भवति जननकाले पाणिपीडेऽपि चैवम् ॥२६॥
पञ्चममें शनिकी राशि हो उसे शनियुक्त पूर्ण चन्द्रमा देखे
तो दत्तकपुत्र और इसीप्रकार शनिराशि सबुधचन्द्र दृष्ट हो
तो (कीत ) मोल लिया पुत्र करता है ।। २४ ॥ पञ्चममें यदि
मंगलका नवांश सप्तम शनि युत दृष्ट हो तो ( कृत्रिम) बना-
वटी पुत्र होता है परन्तु और ग्रह उसे न देखे तब यह फल
हैं ।।२५॥ पञ्चम भाव बलवान हो उसमें शनि सूर्य हो मंगल
की दृष्टि हो तो उसका पुत्र अधमकुलोत्पन्न हो जिसकी स्त्री.
'लोग भी निन्दा करें यह योग जन्ममें और विवाहमें भी यही
फल करता है ॥२६॥
(२१८) जातकशिरोमणि-
शशिनि कुजनवांशे धीस्थिते सौरिदृष्टे यदि भवति न
दृष्टः शेपखेटे हिमांशुभिवति कुलविवृदिस्तस्य गूढो-
वेन प्रथितकुलविशेपो जायते तेन नाशः ॥२७॥
सौरिनवांशगते .क्षितिपुने सुतभावेऽर्कविलोकितदेहे ॥
अपविद्धस्तनयो मुनिवचनं भवति न तच्च कदाचिद्धि-
फलम् ॥२८॥ पंचमे स्वनवभागगेशनौ सहिमांशौ
• रविभार्गवेक्षिते॥ पुत्रता भवति तस्य पुनर्भसंभवेन तनु-
जेन नान्यथा ॥२९॥ सूतौ यदार्कियुक्त दृष्टे वा पंचमे
चंद्रारविष्टेप्यथसहिते कानीनः संभवेत्तदा पुत्रः॥३०॥
चन्द्रमा मंगलके नवांशकमें पञ्चम ही उसे शनि देखे अन्य
ग्रह उसे न देखे तो उसके कुलकी वृद्धि गूढोत्पन्न पुत्रंसे होतीहै
श्रेष्ठ कुल विशेषका नाश इससे होता है ॥२७॥ पञ्चममें मंगल
शनिके नवांशकमें हो उसे सूर्य देखे तो अपविद्ध पुत्र होता
है यह मुनि वचन है कभी निष्फल नहीं जाता ॥ २८ ॥ पञ्चम
शनि अपने नवांशका हो चन्द्रमा उसके साथ हो सूर्य शुन्न
उसे देखे तो उसके पुनर्भू स्त्रीके सन्तानंसे पुत्रता होवे और
प्रकार नहीं ॥ २९ ॥ जन्ममें पंचम चन्द्रमा शनियुक्त हो सूर्य-
से युक्त वा दृष्ट हो तो कानीन पुत्र होता है ॥ ३० ॥
सुतभावे यदि पापमंदिरं बलिभिः पापखगैर्युतं भवेत् ॥
शुभसंयोगविलोकनोज्झितं पुरुपोऽपुत्र इतीरितो बुधैः
॥ ३१ ॥ गृहादिके वर्गगणे सुतस्थे शुक्रस्य शुक्रेण
निरीक्ष्यमाणे ॥ भवत्यपत्यानि बहूनि तस्य दासीसमु-
त्यानि सुधांशुतोऽपि ॥ ३२॥
भाषाटीकासमेत। (२१९)
पश्चममें पापराशि बलवान् पापग्रहोंसे युक्त हो शुभ युक्त
दृष्ट न हो तो पुरुष अपुत्र होवे ऐसा पंडितोंने कहा है ॥३१॥
पञ्चममें शुक्रके राश्यंशादिवर्गहो, शुक्र देखे तो दासीसे
उत्पन्न बहुत पुत्र हों ऐसाही फल ऐसे चन्द्रमाका भी है ॥३२॥
शशघरभृगुवगै पंचमस्थे विलग्राच्छिशिरकिरणतो का
युक्तदृष्टश्च ताभ्याम् ॥ युगलविपमवगैस्तत्समाः पुत्रक-
न्या यदि न तनुज भावः पापयुक्तेक्षितः स्यात् ॥३३॥
हिवुकभवनसंस्था भौमचन्दारिसौराःसुतभवननगतोऽ-
को भार्गवेऽस्ते शशी खे ॥ विवुधगुरुवुधाभ्यां पंचम
युक्तदृष्टं न भवति यदि मत्त्यों वंशहीनः प्रजातः॥३४॥
सुतधनसुखहीनः पंचमस्थैश्च पापैर्भवति विकल एवं
क्ष्मासुते तत्र जंतुः।। दिवसकरसुतेन व्याधिबंधाभितप्तः
सुरगुरुबुधशुक्रः सौख्यसंपज्जनाढयः ॥ ३५॥
लग्नसे वा चन्द्रमासे चंद्रमा वा शुक्रका वर्ग पञ्चम हो
इन्हींसे युक्त वा दृष्ट हो, यदि पापयुक्त दृष्ट न हो तो जितने
समवर्ग हों उतनी कन्या,
जितने विषम वर्ग हों उतने पुत्र होते
हैं ।। ३३ ।। चतुर्थस्थानमें मंगल राहु शनि हों सूर्य पंचम
शुक्र सप्तम चन्द्रमा दशम हों बुध बृहस्पतिसे युक्त दृष्ट न हों
तो मनुष्य वंशहीन होता है ॥ ३४ ॥ पञ्चममें पापग्रह हों तो
पुत्र धन सुख हीन होताहै मंगल पञ्चम हो तो जीव विकल
रहता है शनि पञ्चम हो तो रोग तथा बंधनसे सन्तप्त रहे यदि
बुध, गुरु, शुक्र, पंचम हों तो सुख, संपत्ति और मनुष्योंसे
।
युक्त रहे ॥३५॥
. (२२०) जातकशिरोमणि- अथ स्त्रीविचारः। लग्नाचंद्रमसो बलाच्छुभगृहं जायागृहे स्वामिना सौम्य युक्तविलोकितं च बलिभिः पार्न युक्तेक्षितम् ॥ दाराः स्युर्बहवो नवांशकवशात्पुंस्त्रीस्वभावान्वितः क्रूरः कूर नवांशकैः शुभखगैः सौम्यस्वभावाः स्त्रियः ॥३६॥ येशा लग्नस्योदिता जन्मकाले जायाभावे तत्समाना नवांशाः॥ वाच्या विद्भिस्तस्य जायानवांश याभावे राशिसंख्यादिकैर्वा ॥ ३७॥ स्त्रीभाव विचार है कि, लग्न वा चन्द्रमामें जो बलवान हो उससे सप्तममें शुभ राशि हो, स्वस्वामी शुभग्रहोंसे युक्त दृष्ट होवै स्वस्वामी शुभ भी बलवान हो पापग्रहोंसे युक्त' दृष्ट न हो तो स्त्री बहुन होवें नवांशकवशसे, विषममें पुरुषा- कार स्वभाववाली सममें सुशील होती है । क्रूरनवांशकोसे क्रूरस्वभाव सौम्यनाशकोंसे सौम्यस्वभावकी होती है ॥३६॥ लग्नमें जितने नवांश टदितह उदितभुक्तनवांशकोंको कहते हैं ) उतनेही सप्तममें भी उदित होते हैं, उनके अनुसार बला- बल देखके उतनी संख्या स्त्रियोंकी कहनी अथवा जाया भाव राशिसंख्या आदिसे ॥३७॥. यावत्संख्याः स्त्रीगृहे चोदितांशास्तत्तद्राशिः क्रूरयुक्तेक्षिः तश्च ॥ जायाभावे नो शुभो नैव दहिः सा स्त्री किष्टा या नवांशेन दत्ता॥३८॥ जितने. (हदित) भुक्तनवांश सप्तम भावमें होवें वे राशि रयुक्त दृष्ट हों, सप्तमपर शुभ दृष्टि वा शुभ योग न हो तो जो स्त्री नवांशवलसे पाई गई है यह कटोर हो ॥ ३८ ॥ । " भाषाटीकासमेत। (२२१) यूनेकिंज्ञौ तस्य जाया पुनर्भूश्चांद्रे वगै भार्गवे यानि संस्थे|ताभ्यां दृष्टं तस्य पत्न्यो भवंति बह्वयः सौम्याः शुक्रदृष्टे विशेषात् ॥ ३९॥ जायासंस्थे भौमे नित्य- वियुक्तः स्त्रिया पुरुषाम्रियते वा शनिदृष्टे योपिदवश्य शुभैनैवम् ।। ४० ॥ भृगुधरातनयौ युवतीगृहे विकल- दारमुशंति नरं तदा ॥ व्ययरिपूपगतौ शशिभास्करा- वथ दृशा रहितौ खलु दंपती॥४१॥ शनी लग्नगते द्यूने गण्डान्तस्थश्च भार्गवः ॥ वंध्यापतिः शुभैर्युक्तं नेक्षितं यदि पञ्चमम् ॥४२॥ सप्तममें शनि बुध जिसके हों उसकी ( पुनर्भू) दो घरकी होती है यदि चंद्रमाके राश्यादिवर्गमें शुक्र सप्तम होवे उसे शनि बुध देखे तो उसकी यहुत नी सौम्यस्वभावकी होती हैं,सप्तममें शुक्रकी दृष्टि होनेसे यह फल विशेष होता है॥३९॥ सप्तममें मंगल हो तो पुरुष सर्वदा स्त्रीसे जुदा रहे यदि सप्तम मंगलपर शनिदृष्टि होवै तो स्त्री अवश्य मरेगी शुभ दृष्टि भी होवे तो नहीं मरेगी ॥ ४० ॥ शुक्र मंगल सप्तम हो तो मनुष्यको विकलदार कहते हैं स्त्री जिसकी कलारहित हो उसे विकलदार कहते हैं चंद्रमा सूर्य साथ वा अलग६।१२ में हों तो स्त्रीपुरुष दोनोंके एक एक आंख काणी होती हैं । ॥४१॥ शनि लग्नमें हो और सप्तममें (चक्रसंधि) गंडांतस्था- नाशगत शुक्र हो तथा पंचममें शुभग्रह योग वा दृष्टिन हो तो उसकी स्त्री बांझ होती है॥ ४२ ॥ पापा लग व्यये चूने क्षीणे धीस्थे निशाकरे ॥ स्त्रीनरों भवतो नुनमपत्येन विवर्जितौ ।। ४३ ।। पापैः सुत-
(२२२) जालकशिरोमणि-
संसप्तस्थैर्न दृष्टेः शुभदैनहैः ॥ जाया भवत्यतिमृति
वारंवारं च नान्यथा ॥ ४४ ॥ एकादशगतैः पापैः
प्रथमोढानपत्यका ॥ मृतप्रजाता युग्हरैः शुभैः
पश्चाच पुत्रिणी ॥ ४५ ॥ इति जातकशिरोमणौ सह-
जपुत्रपत्नीविचाराध्याय पईिशः ॥२६॥
पापग्रह १।१२।७ भावों में हों क्षीण चंद्रमा पंचममें हो तो
स्त्री पुरुष पुत्ररहित हो ॥ ४३ ॥ पापग्रह ५७ में शुभग्रह
योगदृष्टिसे रहित हों तो वारंवार स्त्री मरती रहै इसमें
अन्य नहीं ॥ ४४ ॥ पापग्रह एकादशमें हो तो पहिली स्त्री
अपुत्रा होवे शुभग्रहोंसे भी युक्त दृष्ट हों तो पुत्र पहिलेके मरें
पीछेके जीते रहें ॥ ४५ ॥ इति श्रीजातकशिरोमणी
माहीधरीभाषाटीकायां सहजपुत्रपत्नीभावविचाराध्यायः प.
विंशः ॥२६॥
अथ स्त्रीजातकाध्यायः।
पुंसां जन्मविधौ फलं निगदितं यद्यद्रहादिभिः स्त्रीणां
जन्मनि यद्यदेव घटते तासां हि पुंसां फलम् ॥ पुंयो.
ग्यं सकलं फलं पतिपु तत्तासां वपुश्चितयेल्लग्नेन्दोनि-
धने धवस्य मरणं सौभाग्यमस्ते पतिम् ॥ १॥ वाल.
स्त्रीरमणस्त्रियो न घटते पाणिग्रहो वा पुननाशो वा
वृपणस्य नैव घटते पुंगुरकोनाथवा ॥ स्त्रीणां वा गुरु-
तल्पगो न पतनं मेहस्य न स्त्रीरतिस्तासांराज्यमपि
स्वयं ब्रजति वा स्त्रीप्रयोगं स्त्रिया ॥२॥
भाषाटीकासमेत। (२२३) अब स्त्रीजातक कहतेहैं पुरुषोंके जन्ममें जो फल ग्रह राश्या- दि करके कहे हैं वही स्त्रियोंके भी हैं परंतु जो फल त्रियों- पर घटते हैं वही मात्र उनको कहने जो फल पुरुषोंहीपर घट-. सकते हैं वैसे फलदायक योग स्त्रियोंके हों तो वे फल उनके पतियोंको जानने और लग्न वा चन्द्रमासे अष्टमभावमें पति मरण सप्तममें सौभाग्यका विचार करना ये दो बात पुरुषों- से अधिक हैं ॥ १ ॥ जैसे युवा स्त्रीरमण दूसरा आदिविवाह वृषणनाश अंडवृद्धि अथवा गुह्यस्थानहीन ध्वजमंगादिरोगसे शिश्नका गिरजाना अथवा गुरुपत्नी गमन प्रमेहरोगसे नपुंस- कता स्त्रीरति और स्वयं राजा होना वा मंत्री आदि होना ऐसे फल स्त्रियोको नहीं घटते ऐसे फल देनेवाले योगस्त्रियों- के हो तो इनके फल उनके पतियोंको कहने ॥२॥ युग्मराशिसहितावृदयेन्दू स्त्रीस्वभावसहिता वनिता स्यात् ॥ तौ शुभग्रहनिरीक्षितौ तु सच्छीलभूषणगुणा- न्विता सती॥३॥ विषमराशिगतावृदयेन्दु नरशीला- कृतिनीचकन्यका ॥ समभोक्तैः सुगुणैश्च वर्जिता यदि पापैर्युतवीक्षितौ सपापा ॥४॥ वोर्किजीवबुधभार्ग- वभागजाता कन्यैव भौमनिलये पुरुषप्रयोगम् ॥ आ- याति दास्यमपि याति च नीचकन्या तुल्यव्ययाय सहिता क्रमशो विभागे ॥ ५॥ भौमांशके कपटिनी बुधमे यमांशे क्कीवाकृतिगुरुविभागभवा सती च ॥ वौधेशके बहुगुणा भृगुभागजाता नायाति तोपमधिकं सुरते कदाचित ।। ६॥
(२२४) जातकशिरोमणि- लग्न चन्द्रमा समाशिमें हो तो वह स्त्री (स्त्रीस्वभाव) सौम्यस्वभावकी होवै यदि उनपर शुभग्रह दृष्टि भी हो तो अच्छे आचरण, अच्छे भूषण और अच्छे गुणोंसे युक्त होवे तथा प्रतिव्रता भी होवै ॥ ३॥ लग्नचन्द्रमा विषम राशियोंमें हो तो कन्या पुरुषस्वभाव पुरुषाकृति होवै समराश्युक्त सदोंसे वर्जित होवे यदि वे सपाप हो वा पापदृष्ट हो तो पापी होवै ॥ ४ ॥ मंगल शनि गुरु शुक्रके अंशकोंमें भीमगृह गत लग्नचन्द्रमा हों तो कन्याहीमें पुरुष संगम पावै और वह नीच कन्या दासत्वको भी प्राप्त होवे, फिर लौट आवै आय व्यय उसका बराबर रहे अथवा भीमराशिस्थ चन्द्रमा वा लग्न भौम आदि नाशकोंमें हो तो क्रमसे पुरुषप्रयोगादि फल जानने ॥ ५ ॥ बुधकी राशिमें भौमांशकी हो तो कप- टिनी, शन्यंशकमें हीजडेके आऋतिकी गुरुकेमें पतिव्रता बुधक में बहुगुणोंवाली शुक्र अंशकमें होतो रतिक्रीडा अधि. कमें भी सन्तोष न माने ॥६॥ दुष्टा भूमिभवांशके भृगुगृहे कन्या पुनर्भूः शनेत्रिंशांशे गुरुभागजा शुभगणा बौधे कलाज्ञा गुणैः ॥ ख्याता शुकविभागतः शशिगृहे स्वच्छंदगा घातिनी कन्यातीव गुणा क्रमेण कुजतः शिल्पिन्यसाध्वी स्मृता ॥७॥ नराचारा सिंहे भवति कुजभागेषु युवतिःशनेत्रिंशद्भागे शशिनि कुलटा राजदयिता ॥गुरोस्त्रिंशदागे शशिसुत- विभागे नरगुणा भृगोरंशे गम्यं व्रजति पुरुषं काम- विकला ॥८॥ शुक्रराशिगत चन्द्रमा मंगलके त्रिशांशमें हो तो दुष्टा होवे शनिक ( पुनर्भ) दूसरा पति करनेवाली गुरुकेमें शुभगुण- भाषाटीकासमेत (२२५) वाली बुधके कला जाननेवाली शुक्रकेमें गुणोंसे ख्यात होवै चन्द्रराशिमें मंगलके त्रिंशांशकमें हो तो अपने स्वतंत्र गमन- करनेवाली बुधकैमें जीवधातिनी गुरुकेमें अतिगुणवती शुक्र-- के में शिल्पज्ञा शनिकेमें अपतिव्रता कही है ॥७॥ सिंहका चन्द्रमा मंगलके विशांशकमें होवे तो स्त्री, पुरुषके समान आचारण करे शनिके त्रिंशकमें हो तो व्यभिचारिणी हो गुरुकेमें राजप्रिय, बुधकेमें पुरुषकैसे गुणवाली, शुक्रमें होतो कामदेवसे विकल होकर अगम्यपुरुषका गमन करे ॥ ८ ॥ जीवक्षेत्रगते विधौ बहुगुणा भौमांशजाता वधूः संतु- पाल्परतेन भास्करसुतस्यांशे गुणाढ्या गुरोः ॥ ज्ञानाढया बुधभागजा भृगुसुतस्यांशे सती सौरभे दासी नीचरता रता निजपतौ दुष्टासु तारादिषु ॥ ९ ॥ विशांशकानां शशिसंयुतानां स्त्रीजातके यत्फलमुक्त- माय्यः ॥ विलनशीतांशुबलाबलेन विचिन्तयेदुक्तफलं तयोस्तु.॥१०॥ गुरुराशिचन्द्रमा भौम विशांशकमें हो तो बन्धु बहुत गुणवती होती है, शनिकेमेथोडी ही रतिमें सन्तुष्ट होवै,गुरु- के गुणयुक्ता, बुधकमें ज्ञानयुक्ता, शुक्रकेमें पतिव्रता शनिमें दासी, नीचके रतिमें प्रसन्न, अपने पतिमें विरत दुष्टराश्या- दिकोंमें होती है ॥ ९ ॥ चन्द्रदिशांशकोंके जो २ फल श्रेष्ठ आचार्यांने कहे हैं वे, फल लग्नचन्द्रमाके बलाबल देखके कहने बलाधिकका प्रबल होता है ॥ १०॥ परस्परांशी बुधभार्गवौ द्वौ गतौ च हर्षि भृगुंजांशके वा॥ नरप्रयोगेण करोति शान्ति कामस्य वध्वा सह .
(२२६) जातकशिरोमणि-
घुमनस्का ॥११॥ अस्ते मंदबुधौ नपुंसकपतिः शून्ये
बले कुत्सितः सौम्यस्वामिविलोकनेन रहिते नित्यप्रवा-
सी चरे॥अस्तेर्के पतिरुज्झिता क्षितिमुते रण्डाल्पकाले
भवेदस्ते करविलोकितेकतनये कन्येव वृद्धा भवेत्।।१२॥
बुध शुक्र अन्योन्य अंशकोंमें परस्पर दृष्ट होवें अथवा
शुक्रांशकमें दोनोंही हों तो दूसरी स्त्रीसे पुरुषका भाव मनमें
धारण करके पुरुपके तरह कामक्रीडा करायके कामदेवकी
शांति करावै ॥ ११॥ सप्तममें शनि बुध हों तो पति नपुंसक
होवे, सप्तमभावग्रह शून्य वा वलरहित हो तो पति निन्य,
होवै स्वस्वामी शुभसे दृष्ट न हो तथा सप्तममें चरराशि हो
तो भर्ता सर्वदा विदेशमें रहे सप्तम सूर्य हो तो पतिसे त्यक्त
रहे मङ्गल हो तो थोडे ही समयमें रांड होजावे और पाप-
दृष्ट शनि सप्तम हो तो अनव्याहीमें ही बूढी होजावै ॥ १२ ॥
पापैः सप्तमराशिगैविधवता सौम्यग्रहावीसितैःसौम्यक्-
रसमाश्रितेऽस्तभवने कांता पुनर्भूर्भवेत् ॥ कौजेशे
भृगुजे कुजेन्यनिरता शुक्रांशके यूनगैस्तारानाथमही-
जभार्गवसुतैनाथाज्ञयान्यं गता ॥ १३ ॥ रविजकु-
जभलग्ने भार्गवे चन्द्रयुक्ते परपुरुपरता स्यात्साम्बया
पापहरे ॥ क्षितितनयविभागे सप्तमे सौरिदृष्टे भवति
सगदयोनिः सौम्यभागे सुयोनिः ॥ १४ ॥ युवति
भवनसंस्थे सूर्यजःशके वा भवति युवतिभातीव
मूखों जरादयः ॥ धरणिभवगृहांशे क्रोधनः सीयु-
लोलः सुखधनसुभगाढयो भार्गवांशे गृहस्ते ॥ १५॥
भाषाटीकासमेत । (२२७) सप्तममें पापग्रह शुभग्रह दृष्टिरहित हों तो वैधव्य देते है यदि शुभाशुभ मिश्रित हो तो स्त्री पुनर्भू होती है मंगलके अंशकमें शुक्र वा मंगल सप्तममें हो तो अन्यपुरुषमें आसक्त रहे सप्तममें शुक्रांशकी चन्द्रमा मंगल शुक्र हों तो भर्ताकी आज्ञासे दूसरा खसम करे ॥ १३ ॥शनि वा मंगलके राशि- लग्नमें चन्द्रमासहित शुक्र हो तो परपुरुषमें रत रहे उस- पर पापष्टष्टि हो तो भर्ताकी आज्ञासे परपुरुपररता होवे मंगलके अंशकमें सचंद्रशुक्रशनि दृष्ट हो तो योनिरोगसहित और शुभांशकमें हो तो सुयोनि होती है ॥ १४ ॥ यदिवही उक्त प्रकार शुक्र शनिके राशिवा अंशकमें होवै तो उसस्त्रीका भर्ती अतिमूर्ख और बुढापेसे युक्त होवे मंगलके अंशमें हो तो क्रोधी तथा स्त्रियों में लोलुप, यदि शुक्रशिकमें सप्तम हो तो मुख धनयुक्त होता है ॥१५॥ विद्वान्भोक्ता नैपुणश्चैव बौधे जैवे विद्वानिद्रियाणां विजेता ॥ कामासक्तचापटुश्चन्दभांशे कार्यासक्तः सौरिभाशे मृदुश्च ॥ १६॥ वुधेन्दू लग्नस्थौ सुखगुण- कलाब्यातिनिपुणा सपत्नी सेाढया भवति सुखसंप- परिवृता ।। ज्ञशुको लग्नस्थौ भवति सुभगा ख्यातसुगुणा त्रिभिः सौम्यैलेने बहुसुखधना चन्द्रसहिते ॥ १७॥ बुधांशकमें होवै तो भर्ता विद्वान् और निपुण होवै गुरु- के विद्वान् इन्द्रियोंको जीतनेवाला, चन्द्रराश्यंशमें काममें आसक्त और अविद्वान्, शानिराश्यक कार्यासक्त तथा कोमल स्वभाव होवै ॥ १६॥ बुध चन्द्रमा लग्नमें हो तो सुख, सुगुण, तथा कलायुक्त, अतिनिपुण, सपत्नीसे ईायुक्त, सुखसंप- तिसे युक्त होवै, बुध शुक्र लग्नमें हों तो सुभगा, विख्यातसु- - (२२८) जातकशिरोमणि- गुण होवै तीन शुभग्रह चन्द्रसहित लग्नमें हों तो स्त्री बहुत सुख बहुत धनयुक्त होती है ॥ १७ ॥ यस्यांशे निधनेश्वरो विधवता तस्यांतर्दशाया: मृती क्रूरे सत्सु धनस्थितेषु मरणं स्वस्यैव रंध्रे धने ॥ याता पापशुभौ प्रयाति मरणं कांतेन सार्द्धम्बधूर्यस्यांश धनरंध्रपौ प्रभवतः स्यात्तदशायां मृतिः ॥१८॥सोम्ये टमस्थे कन्या सा भर्तुः प्रागेव निश्चयात् ॥ पापेप्ट- मस्थे भर्ता प्राङ् म्रियते नात्र संशयः ॥ १९॥पाप सौम्ययुते तस्मिन्समकाले मृतिर्भवेता एवं नृणां विचा- रश्व जन्मलग्राष्टमे ध्रुवम् ॥ २०॥ अष्टमेश जिसके नाशकम हो उसकी अंतर्दशामें वैधव्य होता है जप वैधव्य योग पायाजाय तर उसका समय इस प्रकार कहना, अष्टममें पाप द्वितीयमें शुभ ग्रह हो तो अप ना ही मरण उस अंतर्दशामें होये, यदि । ८ मायाम पापशुभमिश्रित हो तो स्त्री मतांके साथ हीमो अधया धनेश अष्टमेश जिसके अंशकमें हो उसकी दशामें मृत्यु होती है ॥ १८ ॥ शुभ ग्रह अष्टम हो तो माथे पहिल यह कन्या मरेगी यदि अष्टममें पाप हो तो पहिले भर्ना मरे अर्थात् विधवा होवे टममें संदेह नहीं ॥ १९ ॥ यदि अष्टममें पाप शुम मिश्रित होनो दोनों तुल्यकालमें मरे हमीप्रकार पुरुषोंकि मी जन्म लग्नसे निश्चय विचार ॥२०॥ जाता विलग्ने विपमे बलस्थ रग्रहः पुकृप्रनिनं चेष्टा । सौम्येलस्यैः समाशिलग्ने स्त्रीब्रह्मशानाविचार भाषाटीकासमेत। (२२९) दक्षा ॥२१॥ पापेस्ते नवमे तथात्र युवतिः प्रामोति दीक्षा ध्रुवं भाग्यस्थस्य खगस्य सौम्यनिलये सौम्ये- पि वा सुस्थिराम् ।। उद्धाहे वरणे प्रदानसमये प्रश्नच यजन्मनि प्रोक्तं तत्सकलं विचार्य सुधिया वाच्यं शुभं वाशुभम् ॥ २२॥ इति श्रीमहादेवविरचिते जातक- शिरोमणौ स्त्रीजातकाध्यायः सप्तविंशतितमः ॥२७॥ जिसके जन्ममें लग्न विषम राशि हों पुरुष ग्रह बलवान् हों तो वह स्त्री पुरुषप्रकृति, पुरुषोंके सी चेष्टा विशेष करने वाली होवै जो शुभग्रह बलवान् और समराशि लग्नमें हो तो (ब्रह्मशास्त्र) वेदांतादि विज्ञानशास्त्र विचारमें चतुर होवे ॥२१॥ पापग्रह सप्तम वा नवममें हो तो उसके तुल्य दीक्षा पावै यदि भाग्यस्थ ग्रह शुभराशिमें, वा मुभग्रह हो तो निश्चय स्थिर दीक्षा पाती है जो फल जन्ममें कहे हैं वे विवाहमें, वरणमें, कन्यादान समय में और प्रश्नमें युद्धिमान ने समस्त विचार करके शुभ, वा अशुभ फल कहना ॥२२॥ इति श्रीजातकशिरोमगौ माहीधरीभाषाटीकायां स्त्रीजात- काध्यायः सतविंशतितमः॥ २७ ॥ अथ प्रत्रज्याध्यायः। मुरगुरुशशिराशी लग्नगे सौरिदृष्टे गुरुरपि शुभगेहे राज योगोत्र जातः ॥ नवमभवनसंस्थः सूर्यपुत्रो न दृष्टः सकलगगनवासर्दीक्षितः पार्थिवेन्द्रः॥ १॥ स्वोच्चे- निपरिग्रही स्वगृहगे शैलाश्रमी तापसास्तीरे वा सर- . (२३०) जातकशिरोमणि- सांवनाश्रयपरा मित्रालये वराः ॥ गायच्या जपिनो भवंति निलये शत्रौ रखौ भिक्षुका मूले वा सुरनिमगा तटगृहास्तीर्थाश्रयास्तापसाः॥२॥वीः प्रबजिता भवंति नियमावर्णानुमानात्खगैरेकस्यैश्चतुरादिभिग्रह- बलात्केचित्स्थिराश्चास्थिराः ।। सूर्योस्ताहतरश्मिाभर्ग- गनगैर्दीक्षापदात्प्रच्युता दीक्षाप्रार्थनमात्रतामुपगाता नो दीक्षितास्तत्पराः॥३॥ अब प्रवज्याविचार कहते हैं कि, गुरु वा चंद्रमाकी राशि लग्नमें हो शनि उसे देखे गुरु शुभराशिमें हो तो राजयोग है और नवगत शनिको कोई ग्रह देखे तो दीक्षित राजा हो अर्थात् किसी संप्रदायके अनुसार उपासना करे ॥ १॥ प्रवज्यायोगप्राप्तिमें सूर्य उच्चका हो तो साग्निक होके अपनही घरमें तपस्या करे अथवा पर्वताश्रममें सरोवरों- के तीरोंमें करे ( अथ वनके आश्रय ) घानप्रस्थाश्रममें रहे यदि मित्रराशिमें हो तो गायत्री जपमें श्रेष्ठ होके घरहीमें तपस्या करते है शरोशिमें हो तो संन्यासाश्रमी अथवा गंगातीरवासी, यद्वा तीर्थाश्रयी, तपस्वी होते हैं । २॥ चार आदि ग्रह एक स्थानमें होनेसे (प्रव्रज्या) फकीरी होती है यह ग्रहवर्णानुसार ब्राह्मणादिवाको होती है ग्रह बलाबलानुसार कोई उस फकीरीमें स्थिर कोई अस्थिर होते है प्रवज्या कर्ता ग्रह सूर्यके साथ अस्त होनेसे हतरश्मि हों तो दीक्षापदसे स्खलित होते हैं जैसे दीक्षाफी प्रार्थनामात्र करते दीक्षित नहीं होते न उस काममें तत्पर होते हैं ॥३॥ लिंगं शांभवमाश्रयति सवले चंद्रे च तृणे नराः कनि- त्लावकभस्मधूलिधवलाः कापालिका निष्टरा भाषाटीकासमेत। (२३१) केचित्पातकसंगिनो भगवतीसक्ताश्च शैवते केचि- संगविवर्जिताः शशधरे पूर्ण तदीशा नराः ॥ ४॥ बौद्धाश्रयं भौमवलेन केचिद्भवति केचिद्विशिखाश्च भिक्षवः ।। सुवाससो रक्तपटा जितेंद्रिया भवंति ते क्रोधनमारणात्मकाः॥५॥ प्रव्रज्याकारक ग्रहोंमें चंद्रमा बलवान् हो तो कोई तो शिवलिंगधारण करतेहैं कोई शीघ्र ही ज्ञानादि सुननेवाले होजातेहै कोई भस्म धूलीसे श्वेत, कनफटे, निठुर, खप्परधारी, कोई पातकियोंके संगी, कोई भगवतीमें आसक्त कोई शैवव्रती कोई संगरहित होते हैं। यदि चंद्रमा पूर्ण हो तो, उक्तकर्मी वालोंके स्वामी होते है।॥ ४॥ मंगल बलवान् हो तो कोई बौद्धमतवाले कोई मुंडी सन्यासी कोई सुंदर भगुआवाले कोई जितेंद्रिय कोई क्रोधी मारणवाले होते हैं ।।५।। केचिद्वैष्णवर्मिणः कुहकिनः केचिन्नरा दीक्षिताः केचि. द्वारुडतत्रिणो बुधवले तद्भक्तिगा वाऽवले ॥ दण्डॉस्त्री- नथ चैकमेव सवले जीवे कपायान्वितं धत्ते वाणमुपा- सते नियमितं सत्तीर्थसन्यासिनः ॥६॥व्रतेषु दीक्षासु च वैष्णवेषु नित्यं च ये पाशुपतव्रतेपु ॥ शुक्र वलस्थे चरकेषु ये च ते तापसा चेंद्रियधर्मपालाः॥७॥ बुध बलवान हो तो कोई वैष्णवधर्मी अज्ञानी कोई दीक्षित कोई ( गारुडतंत्र) गारुडी विद्या सावरवाले होते हैं। बुध बलरहित हो तो उक्तधर्मियोंके भक्त होते हैं। वृहस्पति बल- वान दो तो कोई त्रिदण्डी कोई एक दण्डी भगुवावाले कोई (२३२) जातकशिरोमणि- वाणोपासनावाले कोई नियमपूर्वक तीर्थसन्यासी होते है ॥ ६॥ शुक्र बलवान् होनेमें जी व्रतोंमें दीक्षामें वैष्णवधर्ममें तथा नित्य पाशुपत व्रतोंमें, चक्रांकितोंमें जो होवे इन्द्रियों के धर्म पालनकरनेवाले होते हैं ॥ ७ ॥ पाखण्डवतधारिणः क्षपणका आशाम्बराभिक्षवो मिथ्या श्मश्रुशिरोरुहस्य दलिनो मिथ्या च तदारिणः ।। केचि- सर्पविलासिनश्च नखिनामाश्चर्यविद्याविदस्तेस्युः सूर्य सुते बलेन सहिते हीने तदीशा नराः॥८॥ चन्द्रज्ञमार्ग- वयमैः सहितैस्तपस्वी भौमज्ञभार्गवयमैरपि तापसेंद्रः॥ चंद्रेज्यशुक्रशनिभिः फलमूलशाकै रिसेश्च पदवी- मुपयाति वन्धः ॥ ९॥ रविशशिकुजशुकैः सूर्यचंद्रा- रविज्ञ रविगुरुसितसौरेश्चन्द्रभौमेज्यशुक्रः ॥ शशिकुज बुधशुभैरेकवेश्मोपयांतर्भवति गिरिवनौकास्तापसः सर्व वन्धः ॥१०॥ शनि बलवान होवे तो पाखण्डवतधारी, भानमतीके खेल- षाले, नग्न, भिखारी झूटमूठ जटा दाढी मूंछ बढाने, कमी मुंडवाने वाले कोई संपेरा, कोई घोडे अथवा भालू, बिल्ली बन्दर आदिके आश्चर्य खेल दिखानेवाले होते हैं। यदि शनि वलहीन हो तो उनका नायक होता है ॥ ८॥ अप प्रवज्या- कारक चार ग्रहोंमें प्रत्येक योगके फल कहते हैं कि, चन्द्रमा बुध शुक्र शनि एकत्र होवें तो तपस्वी मं० यु० शुश० से भी तपस्वियोंम श्रेष्ठ चं० वृ० शु० श० से फल, जडी, शाकका आहारी होकर दूर्वारस पीनेवाले दुर्वासा ऋपिक पदवीको पहुंचता है वंदनीय होता है ॥९॥ १०० ० शु०१९०० , . भाषाटीकासमेत। (२३३) मं० बु० २ सू० बृ० शु० श० ३ ० भौ० वृ० शु०४ चं० म० बु० शु० ५ ये एकत्र होवे तो पर्वत, वा वनमें रहनेवाला तपस्वी और सभीका वंदनीय होवे ।। १० ।। चन्दारजीवसितभार्गवनंदनैश्च चंदारचंद्रजसुरासुरपू. जितैश्च सूर्यारसोमजसुरेन्यदिनेशपुत्ररेकसंगैयदि यति- बहुदुःखुदीनः ॥ ११ ॥ कुजज्ञवागीशसितार्कपुत्राः सूर्येन्दुभौमज्ञदिनेशपुत्राः ॥ रव्यादिपनिनिलयक- जार्जटाधरो वल्कलचीरधारी ॥ १२॥ एकस्मिन्म- बने भवंति सकला ख्यादयः सम्भव कुर्युस्ते मुनिना- यकं वसति स व्योमालये नित्यशः॥ये ये शक्तिधरा यथोत्तरबलात्प्राप्नोति दीक्षां ध्रुवं तां तां हीनबलस्य तेन समये दीक्षाच्युतिर्जायते ॥ १३ ॥ पश्चग्रहयोग कहते हैं कि, चं० मं० ० शु० श० १ ० म० बु०० शु० २ सू० म०. बु० ० श० ३ ये एकस्थानमें हों तो बडा दुःखी अति दीन यति होवै ॥ ११॥ मं० बु० बृ० शु० शनि १ सू० चंद्रमा मंगल बु० श० २ इनपंचमहसे तथा सूर्यादि छः गृह एकस्थानमें होनेसे, जटाधारी, (वल्कल) भूर्जपत्र सण मूजआदि धारणकरनेवाला होवै ॥ १२ ॥ एक- स्थानमें सूर्यादि सातौं मह जन्ममें हों तो मुनिश्रेष्ठ करते हैं वह (आकाशस्थान) ऊंचे पर्वत शिखारादिकों में रहता है उन- ग्रहों में जो जो बलवान् एकसे एक हों उनके अनुसार दीक्षित होते हैं जो जो हीनबली हों उनकी दशादिकोंमें दीक्षा भ्रष्ट होती है ॥ १३ ॥ प्रव्रज्येशोरश्मिहीनो न दृष्टः खेदीक्षा दुःखितां यात्य- वश्यम् ॥ दीक्षाकर्तुभक्तिमा प्रकुर्यान्मध्ये वीर्ये मध्य- - (२३४) जातकशिरोमणि- . भावं प्रयाति ॥ १४॥ द्रेष्काणसंस्थे रविजस्य चन्द्रे प्रयाति दीक्षां कुजसौरिदृष्टे ।। भौमांशक वा रविजेन दृष्टे चन्द्रे तपस्वी भवतीह नूनम् ॥ १६॥जन्माधिको भार्गवसूर्यदृष्टः शैपरदृष्टो यदि जन्मकाले ॥ आत्मी- यदीक्षां कुरुते ावश्यं पूर्वोदितं सर्वमथापि चिन्त्यम् ॥१६॥ चतुष्टये सूर्यसुतं वलस्थं जन्माधिपः पश्यति विह्वलांगः ॥ अभाग्यवान्प्रनजितो मनुष्यो विशेपतो हीनकुलेषु जातः ॥ १७॥ प्रत्रज्या करनेवालोंमें श्रेष्ठ ग्रह जिसके अनुसार प्रवज्या पाई गयी हो यदि रश्मिहीन, अन्य ग्रह दृष्टिरहित हो तो अवश्य दुःखित दीक्षा पावै, दीक्षककी भक्तिमात्र करे यदि मध्यवीर्य होवे तो मध्यमभाव पावै ॥ १४॥ चन्द्रमा शनिके द्रेष्काणमें मंगल शनिसे दृष्ट हो अथवा मंगलके अंशकमें शनि- से दृष्ट हो तो दीक्षित होकर निश्चय तपस्वी होजाताह॥१५॥ यदि जन्म में जन्मलग्नेश सूर्य शुक्र दृष्ट हो और कोई उसे न देखे अपने आपही दीक्षित होवे गुरु न करे इसमें पूर्वोक्त विचार भी करलेना ॥ १६॥ केंद्रगत बलवान् शनिको जन्मलप्रेश देखे तो ( प्रबजित ) फकीर हुआ मनुष्य विहल अंग तथा अभागीभी होता है विशेषतः हीनहाल जन्मा मनुष्य ऐमा होता है ॥ १७ ॥ गगनस्थो दिननायको गुरुवा हिमगुश्चोदयसंस्थितो यदा वा ॥ बलयुक्तो बलवर्जितो यदेको बलहीनेन निरीशितोकजेन ॥ १८॥ वलयुतरजनीशः प्रेक्षते
भाषाटीकासमेत। (२३५)
लग्ननाथं सकलबलविहीनं शुक्लपक्षेऽतिदीनम्॥ भवति
यदि तपस्वी दुःखशोकाभिभूतो धनजनपरिहीनो
कृच्छूलब्धानपानः ॥१९॥ वलान्वितः खेचरहष्टिहीनो
जन्माधिपः पश्यति सूर्यपुत्रम् ॥ जन्माधिपं चार्कसु-
तस्तपस्वी भवेद्रलोनं नियतं मनुष्यः॥२०॥ वियति
कुमुदवंन्धु विनवांशे वलिष्टं सकलबलयुतार्किः पश्यति
व्योमगो वा ॥ यदि निजनिजतुंगे पञ्च याताः खगेन्द्रा
भवति भुवननाथो दीक्षितः पार्थिवेदः ॥ २१ ॥ इति
श्रीजातकशिरोमणौ प्रव्रज्याध्यायोष्टाविंशतिः ॥२८॥
दशमस्थानमे सूर्य वा बृहस्पति हो वा लग्नमें चन्द्रमा हो,
इनमें कोई एक बलसहित हो वा बलरहित हो, उसे बल-
हीन शनि देखे तो वही फल जानना ॥ १८ ॥ समस्त बल-
हीन लग्नेशको शुक्लपक्षका बलवान् चन्द्रमा देखे तो तपस्वी
होता है परन्तु दुःखशोकसे दवारहे धनसे मनुष्योंसे हीनरहे
अन्नपानी भी कठिनसे मिले १९॥ जन्मलग्नेश ग्रह बलवान्
होकर सूर्यपुत्रको देखे और उसपर किसी प्रहकी दृष्टि न हो,
अथवा निर्बललग्नेशको शनि देखे तो निश्चय मनुष्य तपस्वी
होता है ।। २० ।। दशमस्थानमें बुधके अंशकका चन्द्रमा बल-
वान् हो उसे बलवान् शनि देखे, अथवा शनिमी दशम ही
होवे और पांचग्रह अपने अपने उञ्चराशियों में हों तो दीक्षित
महाराजा होवै ॥२१॥ इति श्रीजातकशिरोमणो माहीधरीभा-
पाटीकायां प्रव्रज्यायोगाध्यायोष्टाविंशतिः ॥२८॥
(२३६) जातकशिरोमणि- . अथानिष्टाध्यायः। जायास्थाने भृगुजशशिजौ सौरिवकावभार्य्यस्तौ वा पुंखीगगनगृहयोः सप्तमे सौम्यदृष्टे ॥ वृद्धा जाया वयसि पलिते पाणिपीडेन पुंसो जायेतां वा गलित- वयसी दंपती पुत्रहीनौ ॥१॥ रविविरहितपापैबंधु- संस्थैः खगेन्द्रमदनभवनयातो भार्गवो वंशहन्ता । बुधसहितहकाणस्तस्य राशौ सुदृष्टे भवति न खलु शिल्पी शौरिणा केंद्रगेन ॥२॥ अब अनिष्टाध्याय कहतेहैं, सप्तमस्थानमें बुध शुक्र हों अथवा शनि मंगल हों तो पुरुष स्त्रीरहित होवै, अथवा स्त्रीके हो तो पतिरहित होती है अथवा वे योग लग्न वा दशममें -हों तो भी वही फल है ऐसे योग हुयेमें सतममें शुममहदृष्टि भी हो तो वृद्धा स्त्री मिलै अथवा बडी उमरमें उनको विवाह होते हैं अथवा दोनों स्त्री पुरुष बुढापेमें पुत्रहीन होजावे ॥१॥ सूर्यसे अन्य पापग्रह चतुर्थ होंसतम शुक्र हो तोवंशहरण होता है बुधके द्रेष्काणमें, वा बुधकी राशिमें और बुधदृष्ट शनि केन्द्रमें हो तो शिल्पविद्या लिखने आदि नहीं आवै ।। २ ॥ दासीपुत्रो रिप्फगे सोरिमागे शुक्रन्दू सप्तमे सूर्यजेन।।. दृष्टौ जातो नीचकर्मात्मजो वा हित्वा कौल्यं कर्मका- रित्वमेति ॥ ३॥ सिंहस्थे कर्कटस्थे वा रवौ भौमेन सौरिणा।। दृष्टे दुर्नामरोगात्ततॊ दृष्टोपि बलवर्जितैः॥४॥ कर्कवृश्चिकयोरंशे शशांके पापडग्युते ॥ गुह्यरोगी पुमानातो भवत्येव न संशयः ॥५॥ दुश्चिक्ये रिपु- .
माषाटीकासमेत । (२३७) भावे वा जीवे मंदाशनो भवेत् ॥ अल्पपुंस्त्वालसो वापि जायते परिभूयते ॥६॥ बारहवें भावमें शनिके अंशका शुक्र सूर्य चन्द्रमा सप्तम हों उन्हें शनि देखता हो तो दासीपुत्र होगा, अथवा नीचकर्म व्यभिचार आदिसे उसकी पैदायश होगी और वह मनुष्य अपने कुलधर्म छोडकर नीचकर्मकरनेवाला होता है ॥३॥ सिंह वा कर्कटमें सूर्य हो उसे मङ्गल शनि देखें, बलरहितोंसे भी दृष्ट हो तो (दुर्नामरोग) कुष्ठआदि रोगसे पीडित रहता है।॥ ४॥ यदि चन्द्रमा कर्क वा वृश्चिक नवांशकमें हो पाप- प्रहोंसे युक्त वा दृष्ट हो तो पुरुषके गृह्यस्थानमें निश्चय रोग रहता है ॥ ५ ॥ तीसरा वा छठा बृहस्पति हो तो अल्प भोजनकरनेवाला होवे पुरुषार्थ भी अल्प होवै कभी पुरुषता होजावै कभी उसकाममें हारजावै ॥ ६ ॥ सिंहे सिंहांशके चन्द्रे पाण्डुरोगी भवेन्नरः ।। अष्टमे रविजे वापि पाण्डुरोगाकुलो भवेत् ॥ ७॥ कर्कस्थे धरणीपुत्रे दशायामंतरे विधोः ॥ रक्त पित्तं ज्वरं दाई लभते नात्र संशयः॥८॥ चन्द्रमा सिंहराशि सिंहांशकमें हो तो मनुष्य पांडुरोगी होता है अथवा अष्टम शनि हो तौभी पांडुरोगसे आकुल होता है ।। ७ ॥ मंगल कर्कमें हो तो चन्द्रमाके दशांतरमें जब आवै तब रक्तरोग, पित्तरोग, ज्वर, दाहरोग पाता है इसमें सन्देह नहीं ॥८॥ अथवातव्याधिः। लग्नात्सप्तमराशिगौ भृगुकुजी पापेभिती वातरुक्पीडा कर्कटगे रखौ च शशिना दृष्टेतिवातादितः।व्योमस्था- (२३८) जातकशिरोमणि- नगते रवौ च शशिना दृष्टे यदा सौरिणा जन्तुः सक्ष- तजेन मारुतरुजा युक्तो भिपनिष्क्रियः ॥ ९॥ चन्द्रेम्बरेऽवनिसुते युवतीगृहस्थे यद्यर्कजो भवति वेशिगृहस्थितश्च ॥ जातः पुमानिह भवेदिकलोंगराशौ कालस्य वातसहितेन गदेन नूनम् ॥ १० ॥ चातरोगके योग कहते ह लग्नसे सप्तममें शुक्र मङ्गल पार- दृष्ट हों ती वातरोगसे पीडाहोवै कर्कके सूर्यपर चन्द्रमाकी दृष्टि हो तो बड़े वायुरोगसे पीडित रहे दशम सूर्य हो उसे चंद्रमा देखे शनि भी देखे तो मनुष्य घावसे उत्पन्न वायुरोगसे पीडित रहे जिसकी क्रिया वैद्यसे भी न होसके ।।९।। चंद्रमा दशम मंगल सप्तम और शनि सूर्यसे वेशिस्थानमें हो तो जिसके जन्ममें यह योग हो वह वातरोगसे कालांगोक्तानुसार अंग विकल रहे ॥ १०॥ वातादितो भवति लग्नगते सुरेज्ये यूनेकजे कुजगुरू बुदयास्तसंस्थौ ॥ उन्मादवातसहितस्तनुगेकंपुचे धर्मात्मजे शितिसुतेऽस्तगते च तद्वत् ॥ ११॥ भीणे शशिनि रिप्फस्थे रविपुत्रममाश्रिते।। उन्मादवातमहितो जायते नियतं नरः॥ १२॥ लग्ने कुलीरवृपभाजगृहा- न्यसंस्थे चन्द्रे शुभेतरयुते च विलोकिते वा । उन्मत्त नीवविकलो बधिरश्चमको जातो नरो भवति कृष्णदले विशेषात् ॥ १३॥ लग्नमें गुरु सप्तममें शनि हो तो वातरोगमे पाहिन रहना मंगल वृहस्पति लग्न सप्तममें हो तो उन्मादयान विक्षिप्त होना हे लग्नमें दानि पंचम वा नवममें गनि दो अपशा सतममें हो .
भाषाटीकासमेत। (२३९)
तो उसीप्रकार फल है ॥ ११॥ क्षीण चंद्रमा बारहवेंमें शनि-
युक्त हो तो (उन्मादवायु,) बावलापनयुक्त मनुष्य निश्चय
रहे ॥ १२॥ लग्नमें ४।२।१ राशियोंसे अन्यराशिका चन्द्रमा
पापयुक्त वा दृष्ट होवे तो बावला, नीच, विकलांग, बधिर,
गूंगा होता है वह चंद्रमा कृष्णका हो तो मनुष्य उक्त फलोंवाला
विशेषतासे होता है ॥१३॥
कन्यायामुदये खौ रविसुते जायास्थिते दारहा पुत्राणां
मरणं प्रयच्छति धरापुत्रः सुतस्थानगः ॥जायेतां
नयनककेन रहितौ तौ दम्पती लग्नतो रिष्फे राहरिपौ
रिपोखगपतियो विवाहेथवा॥१४॥ सप्तमे नवमे पुत्र
शुक्राौं यदि संस्थितौकालांगराशितुल्यांगे विकलांगा
वधूभवेत् ॥ १९॥ यमे विलग्ने भृगुजे कलत्रे कुली-
रकीटा निमिपांत्यसंस्थे॥ वंध्यापतिः स्याद्यदि पुत्र-
भावो युक्तो न दृष्टः शुभखेचरेण ॥ १६॥
कन्याका सूर्य लग्नमें और शनि सप्तममें हो तो (दारहा)
स्त्रीमरयण योग होताह ऐसाही मंगल मीनका पंचम कन्याका
सूर्य हो तो पुत्रमरण होता है छठा सूर्य बारहवां चंद्रमा हो
तो स्त्री पुरुषके एक एक, नेत्र हो। अर्थात् दोनों काणे होवें
यह योग विवाहमें भी लगता है ६ । १२ में सूर्य चंद्रमा
यथा तथामें भी योग हो जाता है ।।१४॥ सप्तम नवम पंचममेंसे
किप्तीमें सूर्य शुक्र हों तो जिस राशिद्रेष्काणमें हों उसके
कालांगविभागानुसार अंग स्त्रीका विकल होता है ॥ १५ ॥
शनि लग्नमें शुक्र सप्तममें कर्क वृश्चिक मीनके अंत्यनवांशकमें
हो और पंचभाय शुभमहसे युक्त वा दृष्ट न हो तो उसकी स्त्री
वांझ होती है ॥ १६ ॥
(२४०) जातकशिरोमणि- लग्नव्ययास्तभवनं यदि पापखेटाः क्षीणे कलंकनि- लये सुतभावसंस्थे॥ पुत्रा भवति न हि तस्य न का कलत्रं भावद्वयं शुभखगर्न हि युक्तहष्टम् ॥ १७ ॥ चतुर्थे निधने वापि शुकात्पापग्रहो यदि ॥ जायावधो दहनजानीवतो न युतेक्षितः॥ १८॥ पापयोर्मध्यगः शुक्रः स्त्रीवधो भृगुपाततः ॥ सौम्यदृष्टौ न तो पापा वधो नार्यस्तु पाशजः ॥ १९॥ वकार्कसुतवर्गस्थे शुके ताभ्यां निरीक्षिते ॥ परजायारतः सेंदौ कामिन्या सह पुंश्चलः ॥२०॥ लग्न द्वादश सप्तम भावोंमें यदि पापग्रह हों क्षीण चन्द्रमा पंचम हो लग्न पंचम शुभग्रहोंसे युक्त दृष्ट न हो तो उसके घी पुत्र नहीं होते ॥ १७ ॥ शुक्रसे ४ । ८ स्थानों में पापग्रह हों तो अग्निसे खी मरे परंतु यदि बृहस्पतिसे युक्त दृष्ट न हों ॥ १८ ॥ शुक्र पापग्रहोंके बीचमें हो तो स्त्री ऊंचेसे गिरकर मरे वे पाप- ग्रह शुभ दृष्ट न हों तो तब यह योग पूरा फल करता है शुक्र पापयुक्त हो तो फांसीसे स्त्री मरती है ॥ १९ ॥ मंगल सूर्यके वर्गमें शुक्र हो उसे यही देखे भी तो परस्त्रीगामी होवे यदि वही प्रकारका शुक्र चंद्रयुक्त भी हो तो स्त्री पुरुष दोनहूं व्यभिचारी होते हैं अर्थात स्त्री परपुरुषगामिनी पुरुप पर- स्त्रीगामी होवै ॥२०॥ अथ क्षयरोगादयः। शशिजे कर्कराशिस्थे क्षयरोगी भवेन्नरः ॥ परिवेपगते चन्द्रे ससारे वा कुजेक्षिते ॥२१॥ चंद्रोदये खावस्ते भाषाटीकासमेत। (२४१) पापयोधनरिष्फयोः॥जायते मनुजावित्री विवर्णो दर्शने भवेत्॥२२॥ परस्परांशकगतौ रवीन्दू युगपत्स्थितौ ॥ लीकृशो वा क्षेत्र वा युगपद्वा पृथक् स्थितौ ॥२३॥ जठररदगदातः सिंहसंस्थे सुधांशौ शुभयुतिनयनोने दाहमू कुलः स्यात् ॥ अभिभवमभिपन्नः पित्तजैदी- पसंः कुजरविशनियोगे जायते गात्रभेदः ॥२४॥ बुध कर्कराशिका हो यद्वा शनियुक्त चंद्रमा परिवेषकालका हो उसे मंगल देखे तो क्षयरोगी होवै ॥ २१॥ चंद्रमा लग्नमें सूर्य सप्तममें हो २०१२ स्थानोंमें पापग्रह हों तो मनुष्य श्वेत. कुष्ठी और देखने में विरूप होता है ।। २२ ।। सूर्य चंद्रमा परस्पर अंशोंमें हों तो शुलरोगी अथवा कृश होता है अथवा सूर्यके राशिमें चंद्रमा चन्द्रमाकीमें सुर्य हो तो भी यही फल हैं दोनों ४ वा ५ में एकत्र होनेमें भी यही है ॥ २३ ॥ सिंहका चंद्रमा शुभग्रहोंसे युक्त दृष्ट न हो दाह मृ से आकुल रहता है केवल सिंहका चंद्रमा उदररोगसे पीडित करता है यदि मङ्गल सूर्य शनिसे युक्त हो तो हाराहुआ रहे तथा पित्तके अनेकरोगोंसे गात्रोंका स्फोटन होता है ॥२४॥ अवस्य पञ्चमनवांशगते सुधांशौ सौरारदृष्टियुतिगे ध्रुवमेव कुष्ठी ॥ काजमीनमृगभागगते हिमांशौ ताभ्यां युतेक्षिततनौ भवतीह कुष्ठी ॥२५॥ अलिवृष- भृगककैः पुत्रधर्मोपयातैरशुभसहितदृष्टैः कुष्ठरोंगाभि- भूतः॥ व्ययधनमृतिशत्रौ यत्र यत्रारचंद्रद्युमणितराणि- (२४२) जातकशिरोमणि- पुत्राः प्रोक्तरुग्दृष्टिहीनाः॥२६॥मेपांशके वाथ मृगांशके वा चन्द्रःस्थितोत्रैव हि पापदृष्टः॥कलंककुष्ठादिविनष्ट- देहः शुभेक्षितः कंडुविकारणं वा ॥२७॥ धनके पांचवें नवांशकमें चन्द्रमा शनि मङ्गलसे दृष्ट हो तो निश्चय कुष्ठी होगा, कर्क मेष मीन मकर नवांशकमें चन्द्रमा मङ्गल शनिसे युक्त दृष्ट हो तो कुष्ठी होवै ॥२५॥ वृश्चिक वृष मकर कर्कराशि पञ्चम नवममें पापयुक्त दृष्ट हों तो कुष्ठरोग होवै १२ । २।८।६। में जहां कहीं मङ्गल चन्द्रमा सूर्य शनि होवें तो कुष्ठी और दृष्टिहीन भी होवे ॥ २६ ॥ मेषांशकमें वा मकरांशकमें चन्द्रमा होवे पापग्रहसे युक्त वा दृष्ट होवै तो कलंक, कुष्ठसे देह नष्ट होवे यदि शुभ ग्रहसे युक्त या दृष्ट होवै तो दाद खुलजी रोग होवे पूरा कुष्ठ न होवे ।। २७ ।। नेत्रातुरो भवति जीववुधार्कयोगे शिल्पी च नीचलि- पिशास्त्रकलाविदग्धः ॥ वकार्कदेवगुरुभिः सहितकगेहे नेत्रातुरो भवति पूर्णधनः कुलीनः ॥ २८॥ आदित्य- शनिदैत्येज्यैः सहावस्थानमागतेः ॥ शीतपित्तार्दितो वा स्यात्कुष्टी वा क्षतजाकुलः॥२९॥ भीमदृष्टः सुरा- चार्यों हेमालंकारभूपितः॥ व्रणितांगः सुरेज्यारशशांक- चंडरोपणः ॥३०॥ निधनभवनसंस्थे सूर्यपुत्रेऽल्पजीवी भवति कितववन्धः कुष्टरोगाऽभिभूतः॥शशिरिपुशनि- भीमा जन्मकाले मृतिस्था नखचरणविहीनाः कुष्टरो- गैर्मनुप्याः॥३१॥ .
भाषाटीकासमेत।
(२४३)
बृहस्पति बुध साथ होवें तो नेत्ररोगी होवे तथा शिल्पज्ञ,
नीचाक्षर नीचशास्त्र और कलाओंमें चतुर होवे मङ्गल
सूर्य गुरु एकस्थानमें हों तो नेत्ररोगी तथा, धनसे पूर्ण और
कुलीनतावाला होवे:२८॥सूर्य शनि शुक्र एक भावमें हों तो
शीतपित्तरोगसे केशी रहे अथवा कुष्ठी यद्वा चोटलगनेसे आ-
कुलरहे॥२९॥बृहस्पति मङ्गलसे दृष्ट हो तो सुवर्णके अलंकारोंसे
भूषित रहे गुरु मङ्गल चन्द्रमा साथ हों तो किसी अङ्गमें व्रण
होवे और प्रचण्डरोगवाला भी होवै ॥ ३० ॥ अष्टम शनि
होवे तो अल्पकाल बचे धूतीका सर्दार होवे, कुष्ठरोगसे
दवारहे राहु शनि मङ्गल जन्ममें अष्टम हों तो कुष्ठरोगसे
नखून तथा पैर मनुष्योंके हीन होजाते हैं ॥ ३१ ॥
कुजभवनगते दिवाधिनाथे सितदृष्टे बहुदीनबांधवः
स्यात्॥अतिशयरिपुदुःखभादारोमनुजः स्यागतरूप-
कश्व कुष्ठी॥३२॥कुष्टव्याधिभगंदरेण सहितोरन्धस्थिते
भानुजे दृष्टे भूमिसुतेन चन्द्ररिपुणा दुर्नामरोगाकुलः ॥
सिंहस्थे नलिनीपतौ मृतिगृहे रोगान्वितो जायतेनीचे
वा तरणौ भवंति मनुजा कंहादिरोगाऽन्विताः ॥३३॥
सूर्य मंगलके राशिम शुक्र दृष्ट होवै तो उसके बांधव
अतिदीन हो अतिशयकरके शत्रुसे उत्पन्न दुःख भोगनेवाला,
दुष्टस्त्रीक, रूपरहित और कुष्ठी होवै ॥ ३२ ॥ शनि अष्टम
स्थानमें भौमदृष्ट तथा राहुसे युक्त वा दृष्ट हो तो, कुष्ठरोग वा
भगंदर रोगयुक्त रहे दुष्ट नाम रोगसे आकुल रहे, सिंहका
चन्द्रमा अष्टम हो तो रोगयुक्त रहे अथवा नीचका सूर्य होवे
तो मनुष्य खुजली आदिरोगोंसे युक्त रहते हैं ॥३३॥
(२४४) जातकशिरोमणि- 'निधनस्थे दिवानाथे भूसुतेन विलोकिते॥ विस्फोटकवि- साथैः क्विन्नाः स्युर्गात्रयष्टयः ॥ ३४ ॥ कीटस्थिते कर्कटके महीजे विलोकिते केतुखगेन नूनम् ॥ व्यये मृतौ वा विपबंधशस्त्रपीडाकरो भूमिसुतो झवश्यम् ॥ १॥३५॥ धने वा व्ययभावे वा त्रिकोणे वा समाश्रिताः।। पापा बन्धनमाप्नोति राशिप्राणिनिबन्धनम् ॥३६॥ हयवृपभमृगाजाश्चात्यकोणेषु संस्था अशुभखचरयुक्ता बन्धनं तस्य रज्जुः ॥ झपमकरकुलीरे बन्धनं वारि- जाले भवति हरिणशत्रौ दुर्गकारादिगेहे ॥ ३७॥ सूर्य अष्टम मंगलसे दृष्ट हो तो फोडे तथा दाद व्यूंछी आदिसे गात्र पीडितरहैं ॥ ३४ ॥ मंगल वृश्चिक वा कर्कका केतुसे दृष्ट १२ वा ८ भावमें हो तो यह मंगल अवश्यमेव विष, बन्धन, शस्त्रसे पीडा करता है ॥ ३५॥ पापग्रह २। १२ में अथवा ५।९ में हों जिसराशिमें है उसके प्राणीके अनुसार बन्धन होवे ॥ ३६॥ धन वृष मकर मेष १२॥ ५।९भावों में पापयुक्त हों तो रस्सीसे बन्धन मिलता है १२॥ १०॥४ राशिमें हों तो जालसे बन्धन मिलता है सिंहमें हों तो किला वा कैदखानेमें बन्धता है ॥ ३७॥ मिथुनयुवतियूके कुम्भराशौ नराणां भवति निगडबंधो रनवो काष्ठवंधः ॥भुजगनिगडपाशव्यंशकंजन्मकाले बलवदशुभदृष्टं व्यंशरूपेण वन्धः ॥३८॥टेकाण- राशियदि पापहष्टो दृष्टो हकाणो भवतीह नूनम् ।। कीटत्रिकोणांत्यधनेषु पापैर्गतादिके वन्धनमाहुराः३९ भाषाटीकासमेत। (२४५) मिथुन कन्या तुला कुंभराशि ५।९।१२। भावोंमें पाप- युक्त हों तो कैदखानेमें, रस्सी वा काष्ठका बन्धन मिले, सर्प, निगड, पाशद्रेष्काण जैसे बली वा निर्बली जैसे हों यद्वा जिस पापकी दृष्टि हो वह बलवान् हो उसके व्यंशके अनुसार बन्धन होता है ॥ ३८ ॥ द्रेष्काण राशि यदि पाप- दृष्ट और द्रेष्काण भी पापदृष्ट हो ४१८ राशियोंके ५१९। १२ भावों में पापग्रह हों तो बन्धन होता है यह श्रेष्ठोंका कहा है ॥ ३९॥ चन्द्राकांतनवांशपः शशिरवी देवाचितः संभवे नीचे सारिनवांशगा यदि नरा दासा भवंति ध्रुवम् ॥ तेषामे- कतमेन जीवनवशादासः ऋये नापरो द्वाभ्यां ते रिपु- नीचभागसहिता दासीभवा दासकाः॥४०॥ त्रिधीन- वमलाभगाः कुजयमार्कचन्द्रादयः शुभैरयुतवीक्षिताः श्रवणघातका जन्मनि ॥ तदा च रदवकृति विदधति- ध्रुवंजाप्यतांब्रजति शुभसंगमादशुभसंगमो योगतः४१॥ चन्द्र नवांशेश चन्द्र सूर्य, और गुरु जन्ममें नीच, शत्रुन- बांशकमें होवे तो निश्चय (दास) गुलाम होतेहैं इनमें एकही अह ऐसा होवे तो अपने आजीविकाके लिये दास होवे, दो अह होवें तो मोललिये जानेसे और सभी शनु वा नीचांश की हों तो दासीसे उत्पन्न दास अर्थात उसकी माता या पिता भी दास होंगे।॥ ४०॥ तीसरे पंचम नवम और लाभभावों में मङ्गल शनि सूर्य चन्द्रादि शुभ ग्रहोंकी दृष्टि वा योगरहित हों तो कान फूटते हैं और दांतोंमें भी विकार होता है यह निश्चय है शुभयुत दृष्ट हों तो उपाय साध्य होता है क्योंकि शुभसङ्गतिसे अशुभ भी शुभ होता है ।। ४१ ॥
(२४६)
जातकंशिरोमणि-
प्रस्तोदयेऽर्कशशिनोरशुभौ त्रिकोणे नेत्रातुरो रविवशा-
च्छशिना पिशाचैः ।। अस्तं वदन्ति मुनयः सकलाच.
पापा जाप्यं व्रजति कथिताः शुभयोगहवस्थाः ॥४२॥
इति श्रीजातकशिरोमणावनिष्टाध्याय ऊनविंशतिः२९॥
। सूर्य चंद्रमा प्रहणमें वा सूर्य चन्द प्रस्तोदय हों उनसे
त्रिकोणमें पापग्रह हों तो सूर्य प्रस्तसे नेत्र रोगी,चन्द्रसे पिशा-
चमस्त होता है ऐसा मुनि लोग कहते हैं, शुभग्रहोंसे दृष्ट युक्त
होनेमें समस्त पाप उपायसाध्य हो जाते हैं ॥ ४२ ॥ इति श्री
जातकशिरोमणावनिष्टाध्यायः ऊनविंशति ॥ २९ ॥
अथ निर्याणाऽध्यायः।
ग्रहविलोकनयोगविवर्जिते निधनधामनि तत्सहिते-
थवा ॥ भवति देहविपत्तिरथो यथा भवनखेटवलावल-
संभवा ॥१॥ निधनभवनसंस्थो यो वली वीक्षते वा ।
। मरणमुपगतः स्यात्तस्य धातुप्रकोपैः ॥ निधनगृहश-
• रीरे कालपुंसोरुजार्तिबहुवलिखगयुक्तालोकिते तत्म-
काशः॥२॥ सूर्येणामावंवुमनेन चंद्रे शस्त्राघातामि-
पुत्रेण मृत्युः । शीतलातादर्कपातान्निपातो ज्ञेन ज्ञेयो
मृत्युताथै यथोक्ता ॥ ३ ॥जीवेन रोगैर्जठरामयोत्यः
क्षुत्तविकार गुजेन मृत्युः । क्षुद्रामयैर्वा प्रियतेऽकंजेन
तत्तत्मकारैनिधनेन दृष्टे॥१॥
" भाषाटीकासमेत। (२४७), निर्याण विचारहै कि, अष्टमभाव, ग्रहदृष्टि योगसे रहित" हो अथवा ग्रह युक्त दृष्ट हो, उस ग्रह उस भावके बलाबलाऽनु: सार देहका मरण होता है ॥ १ ॥ जो बलवान ग्रह अष्टममें हो अथवा देखता हो उसके धातुके कोपसे मृत्यु होती है, अष्टममें ग्रह वा राशिकालांगविभागसे जिस अंगमें हो उसी में रोगपीडा होती है बहुत बलवान ग्रहसे युक्त दृष्ट हो तो उस धातुजन्य रोगका प्रकाशमान होता है विशेषकष्ट नहीं होता ॥ २॥ उक्तप्रकारका सूर्य हो तो अग्निमें चन्दमा हो तो जलमें डूबनेसे, मंगलसे शस्त्रके घातसे बुध हो तो शीत रोग सन्निपातसे मृत्यु जाननी ॥३॥ गुरुसे उदररोगोंसे शुक्र- से भूख प्यांसके विकारसे, शनिसे क्षुद्ररोगों करके इन प्रका- रोंसे ग्रहयोग दृष्टि अष्टममें होनेसे मृत्यु होती है ॥ ४ ॥ स्थिरे स्वदेशे निधनं परदेशे चरोदये ॥ भागै द्विदेहे निधनं राशिसंचारभूमिषु ॥५॥ जांगले ककिमकरऽ- नूपे मकरकीटयोः॥ गोमेपनरलग्नेषु जांगलानूपभूमिषु ॥६॥ सूर्यक्षोणिसुतौ खबंधुसहितौ शैलायतदातजः कूपे पातभवो यमेम्युनि विधौ चूने कुजे कर्मगे। कन्या राशिगतौदिवाकरविधू कूरेक्षितौबन्धुगे लग्ने पुष्पवतो- जलेपु मरणं क्रूराक्षिसंसक्तयोः ।। ७॥ उक्ल प्रह वा भावाशि स्थिर हो तो स्वदेशमें चर होवे तो परदेशमें और द्विस्वभाव हो तो मार्गमें मरण होता है इसमें विचार चाहिये कि उस राशिके संचारकी जैसी भूमि हो उसमें मृत्यु होगी॥५॥ कर्कमकर हों तो जंगलमें १०१८ हो तो अनूपमें वृष मेष और मनुष्यराशियोंमें जंगलके अनूप (२४८) जातकशिरोमणि- भूमियों में मरण होवै ॥६॥ सूर्य मंगल १०।४ भावोंमें हों तो पर्वतके शृंगसे गिरने वा उसके चोटसे शनि चतुर्थ चन्द्रमा सप्तम दशम मंगल हो तो कु में गिरनेसे, कन्याराशिमें सूर्य चन्द्रमा क्रूर दृष्ट चतुर्थ भावमें हों अथवा सूर्य चन्द्रमा लग्नमें पापदृष्ट हों तो जलमें मरण होवै ॥ ७ ॥ कर्के मृगे कर्मणि भानुपुत्रे जलोदरव्याधिकृता विपत्तिः॥ शस्त्रप्रजाताग्निमवाथ चंदौ कौजे गृह पापयुगांतरस्थे |युवतौ नलिनीरात्रौ पापमध्यगते सतिक्षितशोपभवो मुत्यु(वं भवति नान्यथा ॥९॥ पापद्वयांतरगते हिमगों यमः पापोद्भवा दहनरज्जुभवा मृतिः स्यात् ॥ पापौ शुभे शुभयुतावशुभेक्षितौ च मृत्युस्तथा भवति तस्य यथातथा वा ॥१०॥ कर्क वा मकरका, कर्मस्थानमें शनि हो जलोदररोगसे विपत्ति होवे चन्द्रमा मंगलके गृहमें दो पापोंके वीच हो तो अमिसे उत्पन्न रोगसे मृत्यु होवे ॥ ८॥ सप्तमस्थानमें सूर्य पाप प्रहाके मध्य में हो क्षतरोग शोषरोगसे मृत्यु निश्चय होवे इस में अन्यथा नहीं है ॥९॥ चन्द्रमा शनिके राशिम दो पाप- अहोंके बीच हो तो पापसे उत्पन्न अनिवा रस्सीसे मृत्यु होवे पापग्रह शुभराशियोंमें शुभयुक्त पापदृष्ट हों तो उन्हीं समौके धात्यनुसार जैसे जिसका कहा है उतनेही कारणांसे मृत्यु होती है ॥ १०॥ चंद्रे सपापे युवती युवत्या वंधेन जीवो मृतिमतिनूनम्।। अजे सिते सप्तमगे सपापे स्त्रीहेतुको मंदिर एव मत्युः भाषाटीकासमेत। (२४९) ॥११॥ सुखे भौमे खो वापि योनि क्षीणेंदुसूर्यजौ ।। पापास्त्रिकोणलग्नस्थाः शूलपोतान्मृति वदेत् ॥ १२ ॥ हिबुकेकै कुजे व्योनिक्षीणेदावर्कजक्षिते॥ काप्टेनाभि- हतो मत्या मृत्युमेति न संशयः ॥ १३॥ लयात्रिको- णगैः पापैः क्षीणेदुसहितैस्तथा ॥ नरो मृत्युमवाप्नोति शूलपोतो ध्रुवं तदा ॥१४॥ सपापचंद्रमा सप्तम हो तो खीके बंधनसे निश्चय मृत्यु होवे मेषका शुक्र पापयुक्त सप्तममें हो तो स्त्रीके कारण घरहीमें मृत्यु होवे ॥ ११ ॥ चतुर्थ मंगल अथवा सूर्य हो दशममें क्षीण चंद्रमा और शनि हो ९।५।१ भावोंमें पापग्रह हों तो शुलसे छिद्रकर मृत्यु हो ॥ १२ ॥ चतुर्थ सूर्य दशम मंगल और क्षीण चंद्रमा शनिदृष्ट हो तो मनुष्य काष्ठकी चोटसे मत्यु पाता है इसमें संदेह नहीं ॥ १३ ॥ लग्नस ९।५ में पापग्रह क्षीण चन्द्रमा सहित हों तो मनुष्य निश्चय शूलसे मरता है ॥ १४॥ लनाचतुर्थंगे भानौ दशमस्थे महीसुते॥विरश्मिशशिना दृष्टे शूलेन म्रियते नरः ॥ १६ ॥ काप्टेनाभिहतः प्रयाति मरणं छिद्रास्पदांगांबुगैः क्षीणेन्दूष्णकरारभा- स्करसुते धीधर्मतन्वंबरे ॥ सूर्यारार्किविरश्मिचंद्रसहि- ते धूमेन बंधन वा मृत्यु गच्छति वन्हिना निपतनाच्छ- स्त्रस्य घातेन वा ॥ १६॥ बंधौ कुजे युवतिगे तरणो वियत्स्थे सौरेग्निशस्त्रनृपकोपभवो हि मृत्युः । कर्म . (२५०) जातकशिरोमणि- स्थिते क्षितिसुते हिचुके सुधांशौ वित्ते शनी कृमिमवो भवतीह मृत्युः ॥१७॥ लग्नसे चौथा सूर्य दशम मंगल, रश्मिरहित चंद्रमासे दृष्ट हों तो शूलसे मृत्यु होवे ॥ १५ ॥ क्षीणचंद्रमा सूर्य मंगल शनि ८।१०। १ । ४ भावों में हो तो काष्ठकी चोटसे मरे ५। ९।१ । १० भावों में सूर्य मंगल शनि और रश्मिरहित चंद्र- मा हों तो धुआंसे वा, बंधनसे, वा आगसे, गिरनेसे अथवा शस्त्रसे मृत्यु होवे ॥ १६ ॥ चौथा मंगल सप्तम सूर्य दशम शनि हो तो शस्त्रसे वा राजकोपसे मृत्यु होव दशम मंगल चौथा चंद्रमा दूसरा शनि हो तो कृमि रोगसे वा कीडे पड- नेसे मृत्यु होवै ॥ १७ ॥ क्षितिपुत्रे तुलाराशौ रविजे मेपसंस्थिते ॥ चन्द्रे मंद गृहं प्राप्तेविण्मध्ये मरणं भवेत्।।१८ाभौमेन बलिना दृष्टे क्षीणेन्दौ रंध्रगेऽकजे ॥ गुह्मरोगेन कीटेन शास्त्रेण नियते नरः॥ १९॥ मंगल तुलाका शनि मेपका, चंद्रमा शनिक राशिमें हो तो विष्ठामें मरण होवै ॥ १८ ॥ क्षीण चंद्रमाको बलवान् मङ्ग- ल देखे शनि अष्टम होवे तो गुह्यस्थानके रोगसे या कीटों- से वा शस्त्रसे मनुष्य मरे ॥ १९ ॥ निधनभवनसंस्थे सूर्यपुत्र युक्त्यां सरविधरणिपुत्रे पक्षि- कृत्स्यादिनाशः ॥ वियति खगपती वा भूमिजे नाग- लोकेभवति मरणकालो यानपाताभिवातातारालग्ने रखौ कुजे छिद्रे सुते सौरे सरात्रिपे ॥शैलपातेन वज्रेण
भाषाटीकासमेत। (२५१)
मृत्युभित्तिभवेन वा ॥२१॥ युवतिभवनसंस्थे भूमिजे
क्षीणचन्द्रे घुमणिरविजलग्ने यंत्रपीडोद्भवः स्यात् ॥
वियति किरणहीने शीतगौ भूमिपुत्रे भुवि युवतिगतेकै
सर्वदा विस्मृतिः स्यात् ॥२२॥
अष्टममें शनि सप्तम सूर्य मंगल हों तो पक्षिसे मरण होवै
अथवा दशम सूर्य चतुर्थ मंगल हों तो सवारीसे गिरकर चोटसे
मरे ॥ २० ॥ लममें सूर्य अष्टम मंगल पंचममें चन्द्रमा सहित
शनि हो तो, पर्वतसे गिरकर अथवा वज्रसे यद्वा दीवालके
कारण मरे ।। २१ ।। सप्तम मंगल क्षीण चन्द्रमा लग्नमें सूर्य
शनि हों तो किसी यंत्रमें पिसकर मृत्यु होवै दशम चंद्रमा
रश्मिहीन, चतुर्थ मंगल सप्तम सूर्य हों तो नित्य भूलवाला
होवै ॥२२॥
जन्मद्रेष्काणतुल्यो निधनगृहगतः कारणं स्याहकाणं
तन्नाथो राशिनाथो जनयति मरणं स्वैर्गुणैयों बली-
यान् ॥ वह्वयाद्यैर्मृत्युगेहे भवनपनवमांशेशसंचारदेशे
प्राच्यादौ दिग्विमागे भवनपबलतो दूरनैकटयमार्गे
॥२३॥ पापत्रिभागे खलु पापयुक्ते शवोमिना भस्म
गतो प्रयाति ॥ सौम्यहकाणे शुभयोगदृष्टे शवो जले
क्लेदमुपैति नूनम् ॥ २४ ॥ सौम्यत्रिभागे परिशोषमेति
ध्रुवं शवः पापयुतोसते वा ॥ पापविमागेपि शुभत्रिभागे
शुभेक्षिते शोपमुपेत्यवश्यम् ॥२५॥
(२५२)
जातकशिरोमणि-
जन्मद्रेष्काणके तुल्यगणनामें अष्टम स्थानमें जो द्रेष्काण हो
वह मृत्युकारण होता है जन्म द्रेष्काणसे बाईसवां द्रेष्काण
ऐसा होता है उस राशिका स्वामी वा उस द्रेष्काणका स्वा-
भी जो बलवान् हो वह जैसी अग्निजलादि राशि हो उसके
तुल्य गुणोंले मरण देता है और अष्टमेश वा अष्टमगत ना.
शेशके संचार भूमिके उसीके अनुसार पूर्वादिशा विभाग,
तथा भावेशके बलावलसे दूर समीप वा मार्गमें कहना।।२३॥
उक्त ग्रह पाप नेप्काणमें पापयुक्तभी हो तो उस मनुष्यका
शरीर भस्ममें मिले यदि शुभद्रेष्काणमें शुमयुक्त हो तो
जलमें गलता है यह निश्चय है ॥ २४ ॥ सौम्यद्रेष्काणमें
पापयुक्त दृष्ट हो तो निश्चय उसका देह ऐसेही सूखता है
पापत्रिभागमें वा शुभत्रिभागमें शुभेक्षित हो तो निश्चय सूख-
ता ही है ।। २५॥
व्यालहकाणे यदि नैधनस्थे काकैः शृगालादिभिरयते
च॥शवो नराणां परिणाममित्थं प्रयाति चिंत्यं विदु-
पा पृथूक्तम् ॥ २६ ॥ पूर्वोकयोगा न हि संभवति नवा
ग्रहा नैधनगा भवंति संवीक्ष्यते व्योमचरेर्न रंधे निर्या-
णमुक्तं निधनेहकाणे ॥२७॥
यदि सर्प द्रेष्काण अष्टममें हो तो स्यार कोवे आदि रसके
शंवको खावें इसमकार स्थूल उक्ति शवपरिणाम विचारनी
॥ २६ ॥ अष्टममें कोई ग्रह न हो न पूर्वोक्त योगहों अष्टमको
कोई ग्रह भी न देखे तो अष्टमस्थ २२ वें ट्रेष्काणमें मरण
कहा ॥२७॥
भाषाटीकासमेत। (२५३) प्राङ्मेषजाते विषपित्तजातं द्वितीयभागे जलजं वनांत। कूपप्रपाताच तडागपातानिर्याणमंते गदितं हकाणे ॥ ॥२८॥ खरोष्ट्रजातं प्रथमे वृषस्य पित्तादिचौरादिकृतं द्वितीये ॥ तृतीयभागे गजवाजिपातानिर्याणमाहुर्नर- यानतो वा ॥ २९ ॥ कासश्वासजलोद्भवा प्रथमके द्वंद्वत्रिभागे मृतिर्देष्काणे महिषादृषादपि मृतिः स्यात्स- निपातादपि।। द्वंद्वाते निधनं शिलाग्रपतनाव्याघ्रशृगा- लादितोऽरण्ये वृश्चिकमूषकादिविहितं निर्याणमाहु- विदः॥३०॥ पहिले जो स्थूल फल कहे हैं उनको अब सूक्ष्मतासे प्रत्येक विभागके कहते हैं कि, मेषका प्रथम द्रेष्काण हो तो विष वा पित्तरोगसे दूसरेमें जलसे वनमें, तीसरेमें कूप, तालाबमें गिरनेसे मृत्यु कही है॥२८॥वृषके प्रथममें गदहा ऊंटसे दूसरेमें पित्तादिरोग वा चोर डाकू आदिसे तीसरेमें हाथी घोडे वा पालकी आदिके गिरनेसे मरण कहते हैं ॥२९॥ मिथुनके मथममें काश, श्वास, पाण्डसे दूसरे में भेंस बैल और सन्निपा- ततेतीसरेमें शिलाप्रसे गिरके अथवा वनमें बाघ, स्यार, आदि विच्छू चूहा आदियोंसे विद्वान् लोग कहते हैं॥३०॥ मद्रात्ययावाहकृतात्प्रपातात्स्वभ्रे विनाशः प्रथमे हकाणे ॥ कर्कस्य मध्ये विषयाभिषंगाच्छरीरपातं मरण
(२५४) जातकशिरोमणि-
प्रवदंति संतः॥३१॥ गुल्मप्रमेहादिकृतं विनाशं की-
तिम नधनगे त्रिभागे ॥ जलोद्भवात्प्राणिगणाद्विपत्ति
वदंति नित्यं यवनादयश्च ॥ ३२॥ जलानविपरोगतो
निधनमति सिंहायके नरो जलकृतामयैर्विपिनदेशजैर्म-
ध्यमे ॥ विपादिपमपानतो विषयभोजनाच्छस्त्रतो वदंति
निधनं बुधा मृगपतेस्त्रिभागेंतिमे ॥३३॥
कर्कके प्रथम द्रेष्काणमें (मदात्ययरोग) अतिमद्यपाना-
भ्याससे नाकूसे खाई में गिरनेसे विनाश होवे मध्यममें विषया-
सक्तिसे शरीर पतन होना सजन कहते हैं ॥ ३१ ॥ तीसरे
द्रेष्काणमें गुल्मरोग प्रमेहरोगादिसे तथा जल जंतुसे प्राण-
वियोग होना नित्य यवनाचार्यादि भी कहते हैं ॥३२॥
अष्टम सिंहका प्रथम द्रेष्काण हो तो जलसे उत्पन्न रोगोंसे
मध्यरेष्काण हो तो जंगली जीवोसे,तीसरे में विषसे, अनियत
मद्यपानसे, अनियत भोजनसे अथवा शस्त्रसे विद्वान् लोग
मरण कहते हैं ॥३३॥
न्यायाः प्रथमे व्यंशे शिरोरोगात्तथानिलात् ॥ मृत्यु-
गगिरिव्यालवाजिभ्यो मध्यमे मृतिः॥३४॥ कन्या-
वसाने निधनं दृकाणे शस्त्रस्य पातादभिशापतो वा ॥
स्त्रीवैकृतादनविकारतो वा खरान्निपातात्करभादितो
वा॥३५॥
कन्याके प्रथम देकाणमें शिरके रोग तथा अमिसे मध्य.
ममें किला पर्वत, सर्प घोडेसे मृत्यु होवे ॥३४॥ तीसरेमें
शखसे वा शापसे स्वीविकारसे, या अन्नविकारसे अथवा
गदहे दायीके बच्चेस गिरनेसे मृत्यु होवै ॥ ३५ ॥
भाषाटीकासमेत। (२५५) द्विपाददोषाच चतुष्पदाच्च स्त्रीदोपतोनधनमेति मर्त्यः।। यूकाद्यभागे जठरामयैश्च युग्मेतिमे व्यालपयोजजीवैः।। ॥३६॥ अलित्रिभागे प्रथमे विषास्त्रविपानपानादिवि- कारहेतोः ॥ मध्ये विभागे कटिवस्तिशूलैनिःसारतो वा गुदजश्च मृत्युः ॥३७॥ मृच्छैललोष्ठाभिहतेन मृत्यु- रलित्रिभागेतिमके नरस्य ॥ जंघास्थिभंगादिकृतोथवा स्यान्मृत्युनराणां गहने हतानाम् ॥ ३८ ॥ तुलाके प्रथम द्रेष्काणमें (द्विपद) मनुष्य पक्षिदोषसे तथा चौपायाके अथवा स्त्री दोषसे मृत्यु होवै मध्यमें पेटके रोगसे तीसरेमें सर्प तथा जलजीवोंसे मरण पावै ॥ ३६॥ वृश्चिकके प्रथम त्रिभागमें विष (अस्त्र) मंत्रविद्याके शस्त्रोंसे जहरीले अन्नपानादिविकारसे मध्यमें कमर, वस्तिशूलसे अथवा मलद्वार निकलजानेसे मृत्यु होती है ॥ ३७ ॥ वृश्चिकके पिछले त्रिभागमें मिट्टी,पहाड ढेलेकीचोटसे अथवा वनमें चोटलगनेसे जंघाकी हड्डी टूटनेसे मनुष्योंकी मृत्यु होती है ।। ३८ ॥ वाजिनः प्रथमे ज्यशे गुदजै रोगसंकरैः।मध्ये विषधरैर्जी- वैमृत्युनिलसंभवैः ॥ ३९ ॥ अंत्ये त्रिभागे जलजैन- राणां मृत्युः प्रदिष्टो जठरामयैर्वा ॥ मृगाननस्य प्रथमे हकाणे व्याघ्रानृपात्सूकरतो मृतिः स्यात् ॥ ४० ॥ अस्थिमंगैकशफोद्भवो वापयश्चरात्सर्पभवोऽथ मध्ये॥ अंत्येग्निचौरस्थ शस्त्रपातैवरामयैःसंभवतीह मृत्यु४१॥ धनके प्रथम ट्रेकाणमें गुह्यस्थानके अनेक रोगोंसे, मध्य विभागमें विषधर जीव सर्प वृश्चिकादिसे अथवा अग्नि जनित (२५६) जातकशिरोमणि- रोगसे मृत्यु होवे ॥ ३९ ॥ पिछले त्रिमागमें जलजंतुसे अथवा पेटके रोगोंसे मृत्यु होवे मकरके पहिले द्रेष्काणमें व्याघ्रसे, राजासे वा सूकरसे मरण होवै ॥ ४०॥ मध्यद्द्रेष्काणमें ऊपर भागकी हड्डी टूटनेसे अथवा एकखुरवाले घोडे गदहा आदिसे जलचर जीवसे वा सर्पसे पिछलेमें अग्नि चौर शस्त्र अथवा ज्वरसे मृत्यु होती है ॥ ४१॥ द्रेष्काणे प्रथमे घटस्यं मरणं स्त्रीभ्यो भवेजाठरैदोपैः शैलनिपातनादपि विपानृणां विनाशः स्मृतः ॥ मध्ये स्त्रीकृतदोपतो हि मरणं गुह्योद्भवैरामयैरते यानचतुप्प- देन मुख रोगविनाशो भवेत् ॥ ४२ ॥ मीनहकाणे गृहिणीप्रमेहगुल्मप्रकोपैयुवतीजनेभ्यः ॥ जंघाभिघा- तानलजातकोपैमृत्युर्जलग्राहकृतैश्च पुंसाम् ॥४३॥ जलेषु मृत्युर्जलयानभेदाद्वितीयके मीनभवे हकाणे ॥ अंते मृतिः कुत्सितदोपसंधैर्निर्याणमायः कथितं हकाणैः ॥४४॥ कुंभके प्रथम द्रेष्काणमें स्त्रीजनोंसे, उदररोगोंसे, पर्वतसे गिरके भी विषसे मनुप्योंकी मृत्यु होती है मध्यकाणमें स्त्रीके दोषसे गुहाद्रिय रोगसे. तीसरेमें सवारी चौपय्या, ओर मुखरोगसे मरण होता है ॥४२॥ मीनके प्रथममें संग- हिणी, प्रमेह, गुल्मरोग, स्त्रीजनोंसे तथा जांघटूटनेसे वार कोपसे जलमाहसे मरण होवे ॥ ४३ ॥ दूसरेमें, नाव जहाज आदिके टूटनेसे जलमें, तीसरेमें कुदीपसमूहोंसे मृत्यु पूर्वाचा. याने इसप्रकार रोप्काणोसे कही है। ४४ ॥ , .
भाषाटीकासमेत। (२५७) पुनर्विशेषः। आद्यत्रिभागे धनुषो विलने पाशेन बद्धो प्रियते एव- श्यम् । मेषत्रिभागे प्रथमे विलग्ने सण मृत्यु प्रवदंति सन्तः ॥ १५॥ मृगाधिपस्योदयगे हकाणे प्रांत मृतिः स्यानिगडेन बन्धात् ॥ द्वंद्वादिमे पांशकृते हि मृत्यु- गुंत्या हकाणैनिधनोदयस्थैः॥४६॥ इति श्रीजातकशि- रोमणौ निर्याणाध्यायस्त्रिंशः॥३०॥ द्रेष्काणोक्त निर्याणमें फिर भी विशेष कहते हैं कि लग्नमें धनका पहिला त्रिभाग होवै तो अवश्य फांसीसे वैधाहुआ मरे, यदि मेषका प्रथम विभागलग्नमें हो,तो सर्पसे मृत्यु होना सज्जन कहते हैं ॥ ४५ ॥ सिंहका पिछला द्रेष्काणलग्नमें हो तो कैदमें बन्धनसे मृत्यु होवै मिथुनका प्रथम द्रेष्काण हो तो गुप्तस्थानमें मरण होवे, ये विचार लग्नगत तात्काल द्रेष्काण और अष्टमगत वही बाईस २२:वे द्रेष्काणके विशेष हैं ॥४६॥ इति श्रीजातकशिरोमणौ माहीधरीभाषाटीकायां- त्रिंशोऽध्यायः॥३०॥ अथानूपशानमाह। पूर्वजन्मकृतकर्मविपाकोनूप इत्यभिहितः पृथुशास्त्रैः॥ देवलोकपितृतिर्यगादिके कर्मणैव भवतीह निवासः॥१॥ स्वकर्मपाकादिह लोकमेत्य, मनुष्यतिर्यनरंकादि योनौ।निवासमासाद्य कियंत्यहानि स्मरब्रिज जन्मनि
(२५८) जातकशिरोमणि-
तद्विनाशाशयस्य हकाणेऽकविधू बलान्यौ द्रेष्काण-
नाथस्य च यो हि लोकः ॥ तुङ्गे स्वमे लोकपतिश्च
नीचे तथैव वासः परलोकमेत्य ॥३॥
पूर्वजन्मके किये काँका जो फल है उसे बडे शास्त्र अनूप
कहते हैं देव, पित, तिर्यगादिलोकोंमें निवास कर्मसे ही
होता है जैसे कर्म करते हैं वैसे शुभाशुभ लोक मिलते हैं॥१॥
अपने कर्मफलसे इस मृत्युलोकमें आयके मनुष्य, पशु नरका:
दियोनियों में कितने ही दिनों निवास पायके अपने कर्मीको
स्मरण करते हैं तब उस शरीरका विनाश होता है ॥२॥जिस
"द्रेष्काणमें सूर्यचंद्रमा बलवान हों उस द्रेष्काणेशका जो लोक
है वह लोक परलोकमें मिलता है इसमें भी विचार है कि,
वह लोकपति उच्चराशि अथवा नीचमें जैसा हो उसके अनु-
सार उसलोकमें भी शुभाशुभ मिलता है ॥३॥
देवेंद्रमान्यः सुरलोकनाथः शुक्रोडुनाथी पितृलोक-
नाथौ ॥ नाथौ धरापुत्ररवी तिरश्चां मर्त्यस्य लोकस्य
पती यमज्ञौ ॥ ४॥ तुङ्गे गुरुः श्रेष्ठसुरस्य लोके च्युतः
स्वतुंगात्समदेवलोके ॥ निवास आसीत्तत आगतो वा
नीचेऽथवा नीचसुरस्य लोकाः ॥५॥
बृहस्पति इन्द्रलोकका, शुक्र चन्द्रमा पितृलोकके, मंगल
सूर्य तिर्यक्लोकके और शनि बुध मर्त्यलोकके स्वामी ॥४॥
बृहस्पति उच्चका हो तो इन्द्रका उत्तमलोंक देता है उबसे
उत्तरके अवरोही हो तो देवलोक और नीचका हो तो नीच
देवलोकसे आया अथवा शरीर परिणाम होनेपर वह लोक
मिलेगा ॥ ५ ॥
भाषाटीकासमेत। (२५९) स्वकर्मपाकादिह लोकमेत्य परेकुले मध्यमनीचयो । आसाथ जन्मास्य गतिर्यथास्यात्तथा प्रवक्ष्यामि मुनि- प्रणीतम् ॥६॥ रिपुयुवतिविनाशायहकाणाधिनाथा बलिन इह हि तत्स्था मोक्षमागै नयंति ॥ गुरुरपि रिपुकेन्द्रच्छिद्रगः स्वोचसंस्थो नयति झपभगोऽसौ सौम्यभागेथ मोक्षम् ॥ ७ ॥ नैर्याणिका निगदिताः किल येत्र योगा न स्युन वा निधनराशिडकाणनाथाः।। शतयुज्झिता भवति तस्य विमोक्षपंथास्तत्कारणं च कथयामि मुनिप्रणीतम् ॥ ८॥ अपने शुभाशुभकर्मके अनुसार इसलोकमें उत्तम, मध्यम, नीच कुलमें जन्म लेकर मरणानन्तर जैसी गति होती है वेसी मैं मुनियोंकी कही गति कहता हूं ॥ ६ ॥ ६।७।८ भावोंके जो द्रेष्काणोंके स्वामी हैं वे बलवान होकर उसीमें स्थित हों तो मोक्षमार्गसे लेजाते हैं बृहस्पति भी ६३१४७ १०१८भावोंमेंसे किसी में अपने उच्चका हो अथवा मीनका वा सौम्यांशकमें हो तो मोक्ष देता ||७ जो यहां नर्याणिक योग कहे हैं उनमेंसे कोई अष्टमराशिद्रेष्काणेशन हों तथा मलरहित हों तो उस मनुप्यका मोक्ष होता है इसका कारण भी मुनिप्रणीत कहता हूं ॥८॥ मोमहकाणाधिपती रविश्चेत्स्यानर्मदा मरणं हि तस्य॥ चंद्रस्तु शोणस्य कलिंदजायाः कूलं जले दक्षि- गमेति मृत्युम् ॥ ९॥ मोक्षद्रेष्काणनाथो भवति यदि (२६०) जातकशिरोमणि- कुजः शोणपश्चाईकूले पश्चाः नर्मदाया भवति हि मरणं वेत्रवत्याश्च पश्चात्॥कृष्णं मन्दाकिनी वा भवति हि निधनं प्राप्य गोदावरी वा फल्गू वा मोक्षदात्री सक लमुनिवरा मोक्षपंथानमाहुः ॥ १० ॥ मोक्षद्रेष्काणेश सुर्य होवे तो नर्मदाके बीच में मरण होवे चन्द्रमा होवै तो शोणभद्र नद वा, यमुनाके जलमें दक्षिण भागमें मृत्युको प्राप्त होवै ॥ ९॥ यदि मोक्षद्रेष्काणेश मंगल होवे तो शोणनदके पश्चिमतीरमें अथवा नर्मदाके पश्चिम तीरमें, वा वेत्रवतीके पश्चिम, अथवा यमुना, मंदाकिनी, गोदावरी, मोक्षदा, फल्गूको पाकर मरे इसप्रकार समस्तमुनि श्रेष्ठ मोक्षपंथा कहते हैं ॥ १० ॥ मोक्षस्याधिपतिव॒धो यदि भवेद्गार्द्धवारिप्रदो वाशिष्टी सुरनिनगां नयति वा गम्भीरकायां मृतिः ॥ कौशिक्य- ईफलप्रदाप्रभवति प्राच्यां चलौहित्यके पश्चासिंधुनदे ददाति मरणं मोक्षहकाणाधिपः ॥ ११॥ द्रेष्काणा- धिपतिर्भवेद्यदि गुरुः प्राक्सिधुभागे गतो मर्त्यः प्राण- गणं जहाति मथुरां यदा विपाशां गतः । स्वोच्चे केंद्रगतो गुरुर्नयति वा मोक्षाय वाराणसी गङ्गां द्वारवती रघूत्तमपुरी कांचीपुरी गोपतेः ।। १२॥ मोक्षद्रेष्काणेश बुध होवे तो गंगाके वीचमें, अथवा वाशिष्ठी गंगा, गंमारा कोशिकीके बीच, लौहित्यकाके पूर्व
भाषाटीकासमेत (२६१)
अथवा सिन्धुनदके पश्चिमसे मरण मोक्ष द्रेष्कागेश होनेसे
देता है ।। ११ । यदि मोक्ष द्रेष्काणेश गुरु होवे तो.सिन्धुके
पूर्व भागमें जायके प्राणोंको छोडे यद्वा मथुरा, विपाशामें
मरण होताहै गुरु उच्चमें हो तो मोक्षके लिये, काशी, मागी.
रथी, द्वारिका रामकी अयोध्यामें यद्वा कांचीपुरी मरणसम.
यमें लेजाता है ॥ १२ ॥
नयति दनुजमंत्री चन्द्रभागां वितस्तां नरमथ मरणाये-
रावती वा सती वा ॥ शानिरपि रिपुरंध्रव्यंशपः पश्चि
मायां नयति कुरुसरो वा तत्समे देशतीर्थे ।। १३॥जन-
नसमयलमान्नेधने यो हि राशिश्वरनगयुगदेहो यदिगी-
शोनयेताम्।। सलघुगुरुसमो वा तत्समे देशतीर्थे भवति
तनुविपत्तिर्मुक्तयेऽ मुक्तये वा ॥ १४॥ इति श्रीजातक-
शिरोमणौ गत्यनूपादिकथनं नामैकत्रिंशोध्यायः॥३॥
शुक्र हो तो चन्द्रभागा, वितस्ता इरावती सतीके तीर
पर मनुष्यको मरणसमयमें लेजाता है शनि भी ६८का
द्रेष्काणेश हो तो कुरुक्षेत्र अथवा उसके तुल्य देशतीर्थ में ले
जाता है ।। १३ ॥ जन्मसमय लग्नसे अष्टममें चर स्थिर द्विस्व-
भाव जैसी हो उसके समान तथा जिसदिशाकी वह राशि
है उस दिशामें और जैसी, लघु, गुरु वा समान हो उसके
समान देश वा तीर्थमें मुक्ति वा अमुक्तिके वास्ते मरण होता
है ॥ १४ ॥ इति श्रीजातकशिरोमणी माहीथरीभाषाटीकायां
गत्यनूपज्ञानाऽध्याय एकत्रिंशः ॥३१॥
(२६२) जातकशिरोमणि- अथ नष्टजातकम् । आधानकालो न हि जन्मकालो विज्ञायते जन्म वदेदिलनात ॥ प्राग्लनभागे मकरादिपट्के भानौ द्वितीये शशिभादिपटूके ॥ १ ॥ सौरास्फुजिद्भौ- मशशिज्ञजीवोदितहकाणैः शिशिरादिपके ॥ तेपूदय- स्थेषु तथार्तवः स्युर्गीष्मोर्कलग्ने सति नएजन्म॥२॥ द्रेष्काणलिप्ता प्रथमो परार्दै पूर्वापरे मासि वदंति जन्म।। द्रेष्काणलिप्ता दशभिस्तिथिस्यान्माघस्य शुक्लाहत- वस्तिथिश्च ॥३॥ अब नष्टजातक कहते हैं कि, जिसका आधान समय तथा जन्म समय मालूम न हो उसकी जन्मपत्री प्रश्नलग्नसे कहनी उसका क्रम यह है कि, प्रश्नलग्न पूर्वार्द्ध हो तो सूयके मकरादि ६ राशियों में और उत्तरार्द्ध हो तो कर्कादि राशियोंमें जन्म कहना ॥ १॥ लग्नमें शनि हो तो शिशिर शुक्र हो तो वसंत मंगल हो तो प्रीम चन्द्रमा, वर्षा, बुध शरद बृहस्पति हेमन्त में जन्म जानना यदि कोई भी लग्नमें न होतो लग्न जो तत्काल द्रेष्काणहै उसके स्वामीके ऋतुमें जब लग्नमें बहुत ग्रह हों तो उनमेंसे अधिक बली ऋतु जाननी सूर्यको ऋतु नीम ही है ॥ २॥ इसप्रकार प्रथम अयन तय ऋतुपायेमें महीना और तिथिके लिये कहते हैं कि, तत्काल प्रथम द्रेष्काण हो तो टस ज्ञात ऋतुका पहिला दूसरा हो तो दूसरा महीना जानना तीसरा हो तो उसके दो भाग करने प्रथम भागमें पहिला दूसरेमें दूसरा जानना जिस द्रेष्काणके पक्षमें वह भाग हे उस के प्रकारोक्त महीना कहना ऋतुमास सौरमानके लेने तिथिके लिये अनुपात है कि १० अंशकी ६०० कलाका एक ट्रेप्काण भाषाटीकासमेत। (२६३) है इसनी कलामें ३० तिथि होती हैं तो तत्काल द्रेष्काण कला- से ३० गुणकर ६०० के भागदेनसे जन्म तिथि मिलेगी, यहां तिथि कहनेसे सूर्यके अंश जानने क्योंकि यह काम सौरमा- नसे हैं यह वराहमिहिरका मत है यहाँ प्रन्यकर्त्ताने ऋतु और तिथि माघशुक्लपक्षसे कही हैं यह मन्थान्तर मत है प्रथ. मके दो श्लोकोक्त प्रकारसे अयन और ऋतु में फर्क पडे तो च० बु० ० में शु० मं० श० बदल देने ॥३॥ द्रेष्काणराशाउदितहकाणैज्ञात्वा गुरुं तद्भवनागराशेः।। वयोनुमानाद्गुरुराशिचाराद्गुणः प्रसाध्यः खलु वर्त- मानात् ॥ ४॥ गुरुद्वयांतर्गतराशिवरूनः शकाब्दः खलु वर्तमानः ॥ सैको निरेको भवतीह शाकः प्रष्टुर्व- यो द्वादशभिर्विकल्पम् ॥५॥ वर्षज्ञान कहते हैं कि प्रश्नलग्नमें प्रथम द्रेकाण हो तो उसी राशिके गुरुम, दूसरा हो तो पंचम राशिकमें, तीसरा हो तो नवम राशिकमें जन्म जानना, बृहस्पति १२ वर्ष १२ राशि घूमता है प्रश्नकर्ताकी अवस्था देखकर १२ । २४।३६॥ ४८ इत्यादि उमरका अनुमान करना इसप्रकार संवत् मिलता है ।।४॥ दूसरा प्रकार है कि, तत्काल लग्नमें प्रथम द्वादशांश हो तो लग्नराशिके गुरुमें दूसरा हो तो द्वितीयभावगत राशि केमें इत्यादि, इसमें भ्रम हो तो शकमें ऊपर वा नीचे किया जाता है विकल्प १२ । १२ वर्षका ही है ॥ ५ ॥ शुक्लः कृष्णः शुक्ल इत्यर्दयाम-पक्षो वाच्यः शुक्लपक्षेई- यामः कृष्णेप्येवं शुरुकृष्णक्रमेण पक्षप्रश्ने प्राप्तपक्ष- , (२६४) जातकशिरोमणि- प्रयोगः॥६॥ तत्कालचंद्राध्युपितो नवांशस्तत्संज्ञ- मासे प्रवदति जन्म ।। वृषादिमेषांतनवांशमासाः शुक्ला- दयः कार्तिकमासतश्च ॥७॥ पक्षप्रश्नमें द्रेष्काणके अनुसार ५१५ अंश करके शुक्लपक्षमें शुक्क कृष्ण, शुक्त कृष्णमें कृष्ण शुक्ल इस क्रमसे जानना ॥६॥ मासप्रकार दूसरे प्रकार चांद्रमानसे है कि तत्काल चन्द्रमा जिस नवांशकमें हो उसके अनुसार जो नक्षत्र मिले उस नक्ष. बमें पूर्णमासी जिस महीने में हो उस मासमें जन्म कहना जैसे मेषके ८ नवांशसे ऊपर वृषके ७ पर्यंत कार्तिक इसके उपर मिथुनके ६ पर्यंत मार्गशीर्ष इत्यादि मेपादिमपात नाशक मास शुक्कादि हैं यहां गिनती कार्तिकादि है ॥ ७ ॥ होरा नवांशप्रतिमे विलग्ने जातोऽथवा लागतहकाणात्।। यत्र हकाणे रविरस्ति तस्माहकाणसंख्यास्ति च तद्वि- लगम् ॥ ८॥रात्रिद्युसंज्ञेषु विलोमजन्मवेलाश्च लग्नो- दितभावतुल्यः ॥ विलग्नभावोदितकार्तिकाद्या मासा- स्त्रिभाः फाल्गुनभो नभस्याः॥९॥ जिस राशिका नाश तत्काल वर्तमान है उससे उतनी ही संख्याकी जो राशि है वह जन्मलग्न कहना जैसे सिंहलग्न १० । २२ अंश है तो चौथा नवांश कर्क है इससे चौथा तुला जन्म लग्न होगा अथवा प्रश्नके तत्काल द्रेष्काणसे सूर्यका वर्त मान द्रेष्काण गिनती में जितनी संख्याका हो उससे उतनी राशि जन्मलग्न जानना ॥ ८॥ प्रश्नलग्न दिवाबली हो तो रात्रिमें और रात्रि यली हो तो दिनमें जन्म कहना दिवाज- भाषाटीकासमेत (२६५) न्ममें दिनमानसे रात्रिकेमें रात्रिमान तत्काललग्नके जि- तनी चखा मुक्त हैं उनको गुणके स्वदेशीय लखंडाओं के भागलेनेसे, लब्धि जन्मसमयकी वेला मिलती है पूर्वो- क्त चांदमासमें विशेष है कि, उस नवांशमें कृत्तिकादि- नक्षत्रोंके अनुसार मास होते हैं कृ० रो० कार्तिक, मृ० आ० मार्ग, पु० पु० पौष, अ० म० माघ, पू० उ० ह० फालगुन,चि० स्वा० चैत्र,वि० अ० वैशाख, ज्ये० मू० ज्येष्ठ, पू० उ० आषाढ, श्र० घ० श्रावण, श० पू० उ० भाद्र, रे० अ० भ० आश्विन जानना ॥ ९॥ उजादितश्चन्द्रनवांशमासाद्विप्नाः सितादेस्तिथयश्च योज्यागायावत्रिभस्तत्समभं विदित्वा कृशानुतो भैरथ जन्मराशिः ॥ १०॥ चंद्राश्रितद्वादशभागतुल्यो विधोः पुरस्तात्खलु जन्मराशिः॥ रानौ दिवा वा गतकालतु- ल्येदिवानिशोर्व्यत्ययतोहि जन्म।।११॥योनटजातक- विधिणितेन पूर्वैरक्तो वराहमिहिरादिभिरत्र नोक्तम् ।। प्रश्नविलनवशतः स्फुटतोमयोक्तं चंद्रार्कयोः सुरगुरोश्च नवांशहक्कैः ॥१२॥ इति श्रीजातकशिरोमणी नएजात- काध्यायो द्वात्रिंशः ॥३२॥ चंद्रनवांशमास कार्तिकादिसे दूना करके शुक्लादि तिथि जोडनेसे वर्तमान वा जन्म नक्षत्र मिलता है नक्षत्र जानके कृत्तिकादिसे जन्मराशि वृषादि जाननी ॥ १० ॥ अथवा चंद्र द्वादशांशके तुल्य आगे जन्मराशि होती है दिनमें वा रात्रि गतकालतुल्य बदलीसे दिनरात्रि जन्म होताहै इसकासुलासा (२६६) जातकशिरोमणि- पहिले कहदिया हः॥ ११ ॥ ग्रंथकर्ता कहता है कि, जो नष्टजातकविधिगणितसे पुराने आचार्य वराहमिहिरादियोंने कहा है वह मैंने यहां गणित नहीं कहा है केवल प्रश्नलगते सूर्य चंद्रमा और बृहस्पतिके नवांशद्रेष्काणवशसे मात्र कहा. है॥ १२ ॥ इति श्रीजातकशिरोमणी माहीधरीभाषाटीकार्या नष्टजातकाध्यायो द्वात्रिंशः ॥ ३२॥ - राशिप्रभेदो ग्रहयोनिभेदोवियोनिजाधानविधानभेदाः।। भेदाश्च पुंजन्मविधेररिष्टभंगाश्च तेपां हि मुनिप्रणीताः ॥॥आयुर्विधानंचदशाविचारश्चांतर्दशादेश्च विचारणा च॥दशाविचारोऽर्कमुखग्रहाणामन्तर्दशारिटमथाश्रया- ख्यम् ॥२॥कारकाख्योप्टवर्गश्च कर्माजीवोथ नाभसाः।। राजयोगा ग्रहाणां तु रश्मीनां च विचारणा ॥ ३ ॥ राजभंगविचारश्च जन्मभाग्यविचारणा ॥ द्रविणस्य सहोत्यस्य विचारः पुत्रयोपितोः॥४॥ स्त्रीणां जन्म विचारश्च प्रव्रज्याशुभयोगयोः॥ नैर्याणिकं तथा मोक्ष- विचारों नष्टजन्मनः ॥ एषां द्वात्रिंशदध्यायैर्विज्ञानं कथितं मया ॥५॥ ग्रंथकी अनुक्रमणिका दाहते हैं कि, राशिमेद ग्रहयोनि- भेद वियोनिजन्म, आधान जन्म, अरिष्टयोग तटंग ॥ १ ॥ आयुर्दा दशाविचार, अंतर्दशादिविचार, दशाफल अंतर्द- शाफल अरिष्ट आश्रययोग ॥२॥ कारकयोग अष्टकवर्ग कर्मा जीवी नाभसयोग राजयोगरश्मिविचार ॥॥राजमंगविचार ---- भाषाटीकासमेत। (२६७) जन्मभाग्यविचार धनविचार भ्रातृविचार पुत्रस्त्रीविचार ॥४॥ ब्रीजातक प्रवज्यायोग अशुभयोग निर्याण मोक्षज्ञान नष्टजा- तक इतनोंका विचार यहाँ ३२ अध्यायोंमें मैने कहा है ॥५॥ मुहजनाः संति समानशीलास्तेभ्योजलिनौत्र सुदृष्टयः स्युः ॥ सदाप्यसद्वापि विचारणीया निवारणीयाः परितो विशीलाः ॥ ६ ॥ चतुर्वेदवेदेन्दुयुक्ते शकादे महादेवनामा द्विजो हारिवंश्यः । चकाराखिलं शास्त्र- मेतत्प्रशस्तं धरां शासति श्रीनृपे रामभद्रे ॥ ७॥ इति श्रीमहादेवपाठकविरचिते जातकशिरोमणावनुक्रमणि- काध्यायत्रयस्त्रिंशतितमः ॥३३॥ जो मित्रजन सबोंकी समानमाननेवाले हैं उनको मेरी प्रणति रूप अंजलि है कि, इस ग्रंथमें सुदृष्टिवाले होवें, जो अच्छा वा अयोग्य हो उसे विचारके अयोग्यता निवारण करें ॥ ६॥शकाब्द १४४४ में हरिके वंशमें उत्पन्न महादेव नामा ब्राह्मणने इस बडे शास्त्रको पूर्ण किया उस समय राजा श्रीरामभद्र राज्यशासन करतेथे ॥ ८॥ इति श्रीजातकशि- रोमणौ माहीधरीभाषाटीकायां अंधानुक्रमणिका कयनं नाम त्रयस्त्रिंशत्तमोऽध्यायः ॥ ३३ ॥ श्रीवक्रमेद्रिशरनन्दधरामितेव्दे पालेयदेशगतटीहरिरा- जधान्याम् ॥ श्रीकीर्तिशाहनरदेवनियोगवर्तिधर्माधि- कारिपधारिमहीधराख्यः ॥ १॥ ग्रन्थस्य जातक- (२६८.) जातकशिरोमणि-भाषाटीकासमेत। शिरोमणिनामकस्य सद्भापया विवृतिमस्य चकार धीरः ॥ सदालवोधनकरी कवयः क्षमध्यं यच्चापलं किमपि तत्सुहृदः सुशीलाः ॥२॥ श्रीविक्रमादित्य संवत् .१९५७ में हिमालयदेशांतर्वति टोहरीराजधानी में श्रीमान् कीतिशाह महाराजका नियोग- वर्ती धर्माधिकारीपदवाले पण्डित महीधरशर्माने इस जातक- शिरोमणि नामककी, सुबुद्धियालकोंके बोधकरनेवाली सरलभाषारीका रची है इसमें जो कुछ चापल्यता हो उसे निर्मलहृदयवाले सुशील विद्वान् क्षमा करें ।। १॥ २ ॥ ॥ श्रीरस्तु ।। पुस्तकमिलनेका ठिकाना- खेमराज श्रीकृष्णदास, "श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम्-यन्त्रालय-चंबई.