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Nayi Kavita Me Soindarya Bhodh Aur Any Nibandh

Gayatri · 2010/12

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नई कविता में सौन्दर्य-वोध
तथा
अन्य निवन्ध

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नयी कविता मे सौन्दर्य-बोध
तथा
अन्य निबन्ध
में गायनी वाय, एम.प., पोw.tt.
हिन्दा विमान
रामपान विश्वविणमय अपपुर
रोशन लाल जैन एण्ड सन्स
बोगीरा रास्ता
पगार
जयपुर

रोगमा सन्त
जपपुर ममबर
मूस्प पार रपया
प्रपमहान
बार रिर्ग मापुर

भामुख प्रस्तुत पुस्तक मेरे समय-समय पर मिरे नियों का सामन है। मशिला नि साहित्य पार समारकी पुणीम प्रवृत्तियों में संगपित है । पमी हास में हुए मापा पादोलन पर भी दो निकष इसमें समिठ है । साहिप के विधाी के सामाम्प मान के लिय दिल्ली परिवा के विकास पीपक मे नियंप में प्राचीन सुप से पारा शाम साहित्य की सामाम्प विपनामा पौर प्रवृत्तियों का मुन किन्तु रोषक परन च्यिा गया है। पाठकों को निपो के प्रस्तुतीकरण में मोतिता पौर कृम बीमता मिमी ऐमा मेरा पिपास है। प्रत्येक विषय में मेरी अपनी प माग्मनायें पौर पिसान्त रहे है. सम्म पाठक-पण उनसे सहमत न होरिन्तु मैंने विस प्रभार सोचा नहीं पापके सामने प्रस्तुत है। इन नियों से एप निरंप प्रामागवाणी के बरपुर के में प्रसारित हो पुरे है। पारागवाणी के पपिपारियों में रह मानित करने की अनुमति प्रान पी इसके लिये में उनकी परपम्त पामारी। उनु, पुणिमा १५ मस्त्रोदय

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क्रम
काम्प का मापार एवं प्रपोजन
१४ 'भापरिक हिम्मी फाप्य में समान'
२० मारी-तुलसी की दृष्टि में
८
'सादेस'को पमिता
१ प्रापनिक हिमी कायों में नारी सम्प
ve : 'मीरा' महाकाव्य की मीरा
५५ महारेपी वर्मा
चित्रमेता' की मर्म का
१६ सहानुभूति ही पार-मारवी
.४ : भारतेनुको 'बातीय संपती' योगमा
भेपेर बबिता' की बम्पा
भारती और भारतीयता के प्रमर पापड
१५ नयोषिता में सौरबोप
शिव विद्यालयों में हिमा
११२ पिए-मि
१२. : पापावारीकरिता पर पोरा प्रभाव
१२. रामापा हिमी के प्रति हमारा प्यपहार
१५४ मिमी-सरिता निविपास

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काव्य का आधार एव प्रयोजन
पाम्प मानव इस रे गमीर विपारा और मुगल पनुमको भी
अमिम्मति। मामागिन मापी हानक मारे मनुष्य जीवन और सत्र
मिन अनुभवां पर प्रभावामा मेयर प्रपन प्रमाण म परसा पहना
है मामालर में उनसरी प्रमिम्पतिही पायक पापार बननी है। मुग
पौर एप प्रम पोर प्रणा प मोर विचार र पारगारा मनुप्पा
माई मन्दि भरने पनरतम म गपालि महीर पानी । मानव मि
पतिविधिप मापनों पारा र मर्ग पर
प्रसाम्गि
मोर मन्नार अनुमर पता । माना पार हो मनिया पित्र पौर
मात पाहायला मिति के प्रतिस्प। मम्पमा मादि
पापा मनुष्य को माग प्रौर गाणी बालन नही पानापा
पार पपम दामन माग पर गिरनी भापम १
मिपासतापा। प्रति मी पादासोपारा
हो म मा मा पा । म म म मोर पदमा पीलिप
बोली रम मिय रिस्पर तो थी । पारमों की गार पर
रिसमी बीपमा उमे मय परामे पानी पी। न रिषि
भागापासान ममुष्प माला रामरों तमनापा । सामान
गिगुबारा भागमो प्रारन म पममपं होन मारण प
परमाता गार और गरी शुमा पा प्रारदाराला
सात परमाने मारापभिापति मामर मात्रा प्रारगिस
गुग। अमिततकी माना गुलम प्राति सरि बर मreat
नगर परिम्पयना मोहै-
FIन यो लिा मा सिर रोगार में माग
मार समिती बार प्रापयामा रानी!

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काव्य का आधार एव प्रयोजन
काम्प मानाय गंभीर विषारी पौर सुगर अनुभवों की
प्रमिम्मति है। गामागिर प्राणी हानेर माते मनुप्य पीवन और अगर
सिन पनुमयों पर प्रभारी रामयप अपने पन्नासग म ला रहना
उनी प्रमिष्यक्ति ही पाप का मापार बनती है। मृग
पौर पप्रम पार पणा हप मोर मिपार र प्रारमा को मनुष्य को
पोई गति पाने मनरतम म ममारित मही कर पानी । मानव पमि
पति के विरिप मापना द्वारा नरहे मरां पर प्रार पर ही पानि
और सम्मोप पनुमर करता है। माना प्रमर की मूनिया चित्र और
समनुप्प हायकी प्रनिति के प्रतिभा सम्पदा के पारि
पाप में मनुष्य को मापा और मागी पानी प्राण हमा
पारे अपम हसत माणों मार विपारा पाहो के माध्यम ग
ममिम्मतरता पा। प्राति करिमी मामाकाप को मारमद
ri मे मार मा पा 1 मूर्य मा सम प्रमाग और पाठमा निग्य
पौरली रम निरसप विमुपर ली थी। मामा की मगाए पौर
सिमी बीपमर म मय भार मागे पा ली थी। मरिधि
भारों पापामान मनुष्य कलोपारा मरों कारगरता पा । मरमान
मिशु पाली भाषी को प्राट पस में पसमर्थ हातपारण म
परपना रातो पौर शोर मानी गुपा या भयपट प्राररला
है। तार पर पाने
मामिपनि मालर मारामारिक
गुण है। पमित माना मुनम प्रति रिचम में किया
मुर पम्पियना की है -
nि f मना शिस बीगार में माग
नगर पमित मानर गुमनामी नाम।

३
।
-
"
मनुष्य की यही प्रवृत्ति काम्प का मूम मापार है। 'एकाने
पाप्याम् पी मारना मनुष्य को काम्प मृष्टि मिप प्ररित मानी।।
पाम्प उद्गमपी TE माग्यता म यह मंगय होता है कि परि
काम्प मामय हाय रे मारा मौर रिकारों की पमिपरित मात्रा
प्रापेर विसीम पर अनुमसी म्पति को पवि पीर माहियार
हामा पारिप frमनु लिएर म इम रिपरीत दिगाई देता है। जयन् के
पाय पसाप प्रापर मनुष्य मा प्रमालिकरने पर उनमी पभियक्ति
पी दगानी प्रायर मरिचमान गली रितु हम गोपि
पिने पुन पास ही रवि परको मुमोमिन र पात निपार बाणा
मेर सीमाले पौरोषी मारने पास्मीरिपनिरिकम
पौर रिमी ममी दगा हागा रय मिपार देगा हाया रिनु
बाम्मीकि मग मी
मा निर प्रतिहा स्वमगम गायतीममा ।
यत् और मिलारेकमधी पाममाहिनम्
पीपापमयी उक्ति गीर्ण हुई। मप्य यह है कि माष पौर
रिपार प्रापक मानव मरिचमान होते हुए भी अनुभूति पीटीना
महापता पौर मारना मला ममान मात्रा में प्राण नहीं होती पौर
नमारागी उमीदमरा पा प्ररटरले बीमा मो
पाती है। पुए प्रतिमाशीस म्पति ही पाने पनुमत मापा ।
रममयो पापी मार काने में मार्प हाते है। मारा पर गए ममान
प्रतितराने पर भी ना पा मारहो हम प्रसार गरिपन
पास मारमा पालिस परितु बानर
माहाप पाममान म पानिपरले रिपोर मामाग्म
अनुर में यही पना। पार गामीपं अनुमति की मौता पौर
पभिम्पटिपी सताराम मागपा मगर। पापा ममुप
नानी मिनाग ने पापा Tी मागे अनुमानित

कर पाता है जिनस यह स्पर्य प्रसारित है तो वही प्रात कवि है और रही सम्मी करिता है।' पपरि मापी प्रमिम्पति ही पाप का प्राचार है किन्तु सब प्रकार करा काम्प की सीमा में मही पाता, उप निर्ण रित नियम शिमके भनुमार पनिम्पक्ति होने पर ही महाप मोग उस पाम्प पी पोरि म परिपिठ परख । नियम-निरिए ही काम्प सहसाते है। पापा नियमाप में काम्प के सटारा प्रतिपारित कले हए एमारमरमा रो काम्प का पनिवार्य पुग्ण माना ? उनक मनुमार काई भी ऐमी रमापी गति काप्प का स्पबाण पर सस्ती है गिम भापको भामाषित करने की पमना । 'रम मनापर'कार परिमपन जमनार में मी रमणीप पर राप्रठिपादन कले पाले मममी पाम्र की कोटि म गिना है।काम्पमम हाने के निय पमिम्पत्तिा रमणीय होना मावस्या है। जिम ममों से में पामार पनुभव हारही गाम्य है। पशिना ने बाप में पसार और माय मोन्य पर पषिक बाल nिt रितु मनवार और मी हमाषा पाम्प के मीर हा मरते है भारमा मली। पनुभूतिमी मलाई पाम्प में एमपीयना पत मामानी से प्रभारी पोर भाषा सौन्दर्य पी रखनी पावसाता नहीं होती । परि गर्मा म- पा मापा मर्मात प्रेम बाहिर सौर। पाम र मापापरीसरे पौष । मापार सापारण पाहिहहाय पी महराई से पूर तो मानव मन की प्रापित परने के मिरे पानी मे भाय रिमी Adare port If they have the one to to methacret to 1 mtirepronomerce buttosurratourd in their Iredmuttrivrt of thirmaakor therai Turrent and there ord retretry Tuy on Pure l'actry HIND Drton Blurry २ गा मावाप्पम् मारिए

४
-
मापनपी पावश्याना मी। परिबर पतन यही बात साम्पमय मापा
मम प्रारी
तुम बान पर मरा पनमन म परे रिपार
बाणी मरी पपा तुम्हें चाहिप प्रमापार।
पाराग्य जिनामपाम्प लिय मापना तत्व साना ताप
पुटि तस्व मोर मनी र पार तथा को प्रापपा माना है। यदि ये
पागनाय पाप पारश्या गररण है कि पाइन गे शिमी
पापी पानता पाप्य में हो पाती हो बाप उत्पनरो गात
पाप म पनुभूति पोर पमिक्ति या ममान महत्व।। पनुभूति
मभाव और रिनपा प्रमिपत्ति में भैमी पौर पनामा गमावेग
होगा। मोहाय पी मनुनि तिनी तीन होगी उमी
पमिति गनीमा रमारपर मार मुगर होगी।
मापनि गमारामाणि पाय रविहाय
भूमिप्रति मात्रामा पाई मग मीले। •गर मन में
मापि मार रिमी मीनरी यातुपीपमप्यक्ति नहीं ला पाप मंगार
रे पारटन हीरापी पति के पारण पहले रिपरि
गायि मात्र परे भीतरी मारपी मनापाप्रा एमापी मापी
पमितिमा पर पट है Eि मुझे गारिप टिके पाने पार
हर पाने पापार रेसीप तणा मेल ममारणे मत होने की,
उमम मिनिमेनपीका पालनही।"
यह टी fr पार मार मार देरामा पोप
पनुमर पी गो पापार बनारसी परिपाता है।
लागी पनिम्पपिनियन प्रातिपली
Prसराह पाएन मा शाप परिवतियारमा पापार
भीतीमगानी। शिवापापा से प्रमाणिहार मी पाने
१ मानिरनिरा

हराम का रस उममें मिमाता है। संसार के विषिमाप उसय में
एक मीम विस्म की रचना कर देते हैं। यह मपमी रसना मृष्टि
सहारे संसार भी घोटी से पोटी वस्तु भोर कही से बड़ी समस्या की
हस्वाममाया ऐपता है। यह समारपी पपार्षता को अपनी प्रारमा
रस मिप्रित पर ऐमा बना दमा किन केवम उसकी भारमा प्रपितु
विश्वनी प्रारमा उममें सीन होरर पाना मनुमा करती है।
प्राविमापा पविकी टि में पपहर एक एमीरिक पुष्टिरी
सपना कर देते है पसर में प्रियतम के रर्शन होते हैं
पत्पर के टुगों में भी हो मिसता प्रियतम का मामास ।
चठा हरप पर एप मेवा करता ऐ जम उपहाम ॥
-प्रमाद
रमिरी मूम प्टि मोम की दरों में पशुपण पी भसर पाती है।
रमे पाषाम में मिममिसावे तारे मौन समेत परते प्रतीत होते हैं। पिपुर
पा सल्मा माना और छिपमा प्रागयिौनी के गैल-मा प्रतीत होता
है। बात यह कि पास प्रातिपदिरे पानतम वी महायता पौर
सातवा में पम्पत हर रािमी दुनियो बमा सैनी पोर रही
पमियातहारमामा पापार बनती है। पायाला रिपाम्प
ममा पारेरनों ही महत है-हाय पोर पनुभूतियों का महीनाम्प
पो गिनाम पर पारिवारिसे तौलना है।पेपत नाम मुष्टि
परोन करने पाना म्पति जानिर रतिरामार मा सररता हो माता
पनि गिरे मिमे प्रबर पर वार ( मार पौरपान )
दोनो के समन्वय भी सापना पाया है। पारी अपनारमा रचना
पुरि से पारसित मरी परती पोर पोरे मपान म हरया
गोगमाल पगारापी गनिप्रिय मि सपाली
राम र नमानिधार गरे में
मार
तुप गंगारस
frपापा है उमसे मतोरिलो सो पाप हो मावा एस

- पृत्तियों को की पहमी मही सुमती । वाम संमार को देखकर उसपर कवितका निर्मम रंग माने गापा ही प्रत कवि है।' बस्तु बम विचारों और भूम पनुभयों को पम देता है और अन्तर्वगत् मानों और मनुभूतियों की सूक्ष्म उपमारना करता है। इम रोनों पा समन्वय द्वारा कवि की कोई सृष्टि काम्प का प धारण करती है। काम के लिये दोनों का समान महल। पिस पुग म न दोनो में से किसी एक की प्रधानता हो पाती काम्प अपने पास्तपिक पर्ष को छोड़ देता है। हिमामीन कवियों ने माममदातामों की निम्म परने के लिये भाष मनुमामोरे विचित्र विचित्र पाल म्पन भौर पर किये उन्होंने यमाई जगत् मी मोर ध्यान नहीं विमा फमस्वरूप उनकी कविता कुछ इनिय मोनुप वितासी मोपों का ही मनोरंजन कर सकी सापारण पनता को उसमें कोई माफर्पण म मिला। इसी प्रकार बिपी मुम के काम्प में इतिवृत्तात्मता पा पाविषयमा तो एस्पबाव-मायागार के रूप में उसका विरोष प्रारमहापा। पायावाद मे के विपत मूक्ष्म पतिसूक्ष्म मानों की प्रभिम्पत्ति हुई। इसमें प्रस्त' प्रवृत्तियों का प्रभावन मान कवियों का सम्म पा। जिसके बिरोषसम्म काम्प में प्रगतिबाप ने बम्म मिया जिसका प्रधिको माग रोटी और भूरा की समस्या में उमझा हा है। इस प्रकार बब बब काम्प में किसी एक पम का प्राधान्पामा तुएव उसकी प्रविष्मिा में पूसरे प्रकार की रचनाएँ प्रारम्भ हो गई। प्रत पासवगत् का मायेप्टम मात्र काम्प की अभिव्यक्ति के लिए पर्याप्त नहीं है। काम्म मा प्रधान विपम माव! उसमें शान की प्रपेमा माग की प्रधानता रहती है। विहान गर्णन गरिरात पारिनाल पुर मान के विषय है, पौर काम्य के विपय भाग है। काम्म अपने पुरस में मानव हरप की उपब है उसमें बीवन पौर नगद की अनुभूतियों की १ कवि और काम्य मामिर म्पसमापी जाती है पद उमरा पापार म गाधरगद का पारेपम हैन मापिका राममंतिक व्यवस्था पौर म माया महोरप सज दमा मनोमिहान पर भाषारित मिया । यह तो मम भाव भूमि पर भापारित है। प्राचार्य रामजद सुगम सदों में मनुष्य गाति के बीच पिता इण्य के भागों का मेपर ही उठी । प्रेम उत्साह पारपर्म का प्राशि की बसना में मियही पाश्मि कलियों अपना लिए पोमा बा तब स भाग तक सेमार की प्रत्येक पारिता की वह म मामानुभूति पारमा की तरह बसनी मी माही है। काम्प में भार र पामम्मन रप में ही जगत् की रिमी परतुर पहरण हो सरता है पोर रितीप मही।' काम्प का प्रमोशन- भावभूमि पर पापारित होन मारण काप्प पा परम माय मनुष्य पी पमारमा प्रत्तियों का विस्तार पोर मनो भूतियां पा परिवोपन रजा है। मानव हृदय स्वम एम रहाम है। प्राग मनुष्य के हरप में प्रपन समय पार पतिपति ने अनुमार मिनिप मार्यो पा संगम होता ता है। एक ही नाम में सम्म मैने बाम मनुष्यों मार परस्पर मिलता है। पाम्प में भी निषिध मार्गांनी एक विधि रितु पापी प्रसनी मी उपस्पिा पती है। मारा मनुष्य एमरे रे हदय पौर विचारों में प्रवगत हाता है। राम्य यह माएम पिसम मितमित्र मानव हा में पाएपरिप मम्माप मूग स्पानि होता है-म प्रसारमा का परम पदय मर्च भूत को मारमा पौर पापभूत यो मई मनबनानाय द्वारा मनुष्य का मनुष्य हायपापिय प्राणालाई परितु मंपरार नगर के माप प्राना मामाप वा सना है। पुपानी में पाप बी परिमापा देवे हुए निगा , ग्लिा पर गापन है रिमारा पेप गृष्टि के माप मनुष रागारमा मनपरी रमा पौर उमा निषा । मापन पौर १ विनामरिय-शिवोम माग पाप म पमिम्परतासार।

फमा स्मन साम्म ! उसका कोई प्रयोगन नही है। जिस प्रकार हम मनुष्य की मुबरता देखकर मोहित होते हैं ममा की हीतमता पार स्निग्पता पर मुष होते है, और उसी प्रकार काम्प का सौम्पर्ष स्वत साम्म है उससे म्सिी माननीय प्य की पूत्ति नहीं होती। इस सित प्रमुख भनुमापी भी इसापन्द्र बोषी का कपन है कि 'कला का मुम मानम के प्रामार प्रपोजमातीत है। सुपर सबने से हमें प्रानान प्राप्त होता है उससे हमारा कोसा या प्रमोगत सिर नहीं हवा । मिर की इस अनन्त की तपसा मी प्रामर काही प्रकाप के भीतर मोति तत्व प्रपा पिता का स्थान नहीं । 4पकीसामीतर किसी तस्वकी लोग करमा सौम्पर्य बीके मभिर को कनुपित करता है। कुछ परिचमी पानोपकों का भी यही मत है। पास्कर पारा का कहना है कि सौन्दर्य की प्रतिमा कमा स्य मानवदापिमी होती है और कला में मही प्रानन्य अपेक्षित है और कुछ मही । धनोप तुममोपास की 'सान्त मुबार तुलसी कुमाष गामा' की रतिपामार पर कमाका प्रयोगन बनबीवन और समाज से संबंधित म मानकर बस स्मान्त सुपाय मानते हैं। उनके विचार कमाकार के लिये यह पावरमा नाही कि यह काम जीवन विषिष पामुपों पर प्रकाश गते पौर बैठार यह विचार करे कि किस प्रकार उसकी विरा अधिकाधिक मानवहित का सम्पावन हो। उपर्युक्त मत अंक विपरीत काम को सावन रुप में मानने पामे विद्वानों का मत है। उनके अनुसार काम का समय मानवसीवन से है पर ग्वमें प्रयोगन का होना पावस्यक है। मनुप्प कोई कार्य बिना रस्म के नहीं खा फिर काम्म ती उच्च वस्तु का उबप क्या निष्प्रयोगम हो सकता है? काम हमें पानम्द प्रदान करता है, हमारा मनो- न करता है किन्तु इसके अतिरिक्त काम का बोरम पार पपिक महान् पौर महत्व पूर्स है।काम्म मानव समाव की वस्तु है। मनुष्य की मनु भूषिमा पौर विचारममिपा ही उसमें ममिति पाती है। पर मामल

गारन में परे बाप्प सो अस्तित्व नहीं है। मामर की मृटि रेम्पहीन
मही हो सभी पाठ काम मा मतृप्प समार मिम उपमोगी हाना
प्रामपा है। गुनी पामि मिलान करते
A
मानन में समा पर्प ही
म्यामिनी करणे ममा को म्पर्म ही।
मी प्रमर मा प्रपारन बचाते हुए कहा है “मामि
हमारे पापन कम्मामाणिक पौर मुमर बनाता है। मरे गमों में इसकी
मा मा म हता है। यही उना मुम रमापी
पुनाव रा. माम मुन्दर पाम सवारी प्रमार द्विरी प्राधि
विद्वान् पापा भी मत है। मोग मानते है कि काम्प मापन
समान भी बन । मनुष्य की प्रवृलिया पर विचार पिमा ही उम
प्रमिल पाती है। पत्र मारपरीवन में पर काम्प दो पस्तिस्य
नहीं । प्रषिक्ष ममामाघर मग्यू मामा ने रविवारपीन की पाला-
पना पहा प्रभार Porty s made out offe.
belongs to life, eius for life.
निस्पतिमा मनुष्य सोना धिको पृट र म मामल
मान लीणि प्रामव स्वप प्रमोसन पहिली । मुहर
प्रति भारपल मनुप्पी स्वाभारिश ति है। मनुष्य दीपा दम
41 पी Or मागर्म प्रमी होते है। मेर्षो भपुर रस
पर मपूर परिमार हो मारने समता है। मीणा की नि पर परंप
मुपयुष रिमार साहै। बाप की भापर म भारत सरे सिर
हिमान नमा। मन को मुगमा पे पोषण पुरते मरती है। मा
मो गण पस्तुपा म मनुष्य का माहात हाता पस्वाभाविक नही
पिस्नु न पाहाल में मिशिर महता है। मा प्रपोयन
नल मा दश्य र प्रामम मनुष्य के समाप का पपुर पोर मरम
बनाant जीवन में मुग प्रान मरत बार या मुभीम एवं बाप

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तर उसका मूस्य कम हो जाता है। ऐसे काम में मानवता का मापक परुप समाहित नहीं हो पाता मत इसकी बरें भी बात पहरी नही होगी। काम्प मौर बोगम का पमिष्ठ संबंध है। ससार में हार कवि गो कुछ देखता सुनता मौर भनुमय करता है ही कासमा में प्रारर उसे काम पूष्टि मिमे प्रेरित करते हैं। प्रा कोई काम्प पीपन निरपेक्ष हो भी से सवा है? ममा पौर बीवन मा सबम मन्सर और पाएका है। वो कुछ भी नाम है ना मन्तर में समा सकता है और जो मन्तर है मामा के माध्यम से ही निर्मित हुमा है। हमारे मन्तगत् को समी भावनाएँ इसी पाए बगत् को प्रेरणा से बनी है। इस प्रकार कमा पौर बीमन में किसी प्रकार के दिन की संभावना नहीं रह पाती "" पर कलाकार जीवन की पमुभूतियों को हरम रस से सींचार काम्य का सरप प्रम परता है तो वह निमेश्य नहीं हो पाता है। रसमा प्रयोजन है भारमानुभूति का विस्तार बिससे मानर बीवन सरम और माननमय बनता है। १ पंपाप्रसार पापेप पतिप्राय विपि पौर उप स्वभाव मासे वे मये। सष्टि से पुर भागार में भी कोई न कोई प्रयोमा प्राय अन्तनिहित रहता है। 'मा कमा मिसिसात की विधमा कपए में. पाम मुम्बर पास में शिक्षा है "पनि मापो का काम खस भानन का है जो भी उस मसाधारण प्रानन्दको उत्पम करके हमारी भारनामों को पापरित पौर सित कर देती है। और गरि इस प्रकार हमारी भारतारों को प्रष्ट पार संमत बनाती तमा मा मत्सना हि को ती करती है वोहन नन्हें पारेयता दुत मसरमौर मा करें ?" इसी प्रकार के विचार मी प्रपना काम को निम पार स्वये साम्म मही मानते। उमका महै कि साहित्य की सर्वोतम परि भापा बीपन की मातोपना है और उसका रेप हमारी पनुपूठियों की वीडवा महामा' काम को पुर पौवर्य की रष्टि से देखने पार्मों से उनका कहना है कि मि सन्देह कला का गप प्रोतम प्रति की पुष्टि करता और यह हमारे पाप्यारिमह पामारी पर पैसा कोई परिणत मानसिक सपा मापारिमा मानना महीमो प्रपती उपयोगिता का पहसू न रखता हो । प्रामाद स्वत एक उपयोपिता युक्त वस्तु है।" इस राष्टिकोण से सवा के समंदर्य स्परप में कोई बाबा रही पाती। अन्तर मन ना ही है कि एक मोर बीवन निरपेक्ष सौम्दपार दूसरी मोर पीपम सापेक। बीवन सापेक्षता में कमा का सौदर्य भषिक स्वामी मोर पसोपी हो सकता है। जीवन से रहित बन सौन्दर्य मुन्दर सब समान बो पाचर्पण मी पेमा मपाबह अधिक है। पर काम अपना मूत मादार मामय के हरम पोर मार्यों को न बनाकर कोरीपना को बनाता है १ साझियानापन २ कुप विधार " र रसका मुस्प कम हो जाता है। ऐसे काम्प में मानवता का प्यापक पहप समाहित नहीं हो पाता प्रव इसकी बाई मी बार गहरी नहीं होती। काम्प पीर जीरन का मनिष्ठ संबंर है। संसार में पार कर हो इस देसवा सुनता पार प्रनुमन करता है नही काल्पना में प्राकर उसे काम्य मृष्टि में मिमे प्रेखि करते है। मत कोई काम्म जीवन निरपेम हो भी समया' मा मौर वीवन का सेवन अन्तर और बायका है। दोपुष मी नाम है या मम्वर में समा सकता है और गो अन्तर है मामास के माध्यम से ही निर्मित हमर है। हमारे अन्तरंग की समी भावनाएँ इसी बास बप की प्रेरणा से बनी है। इस प्रकार गमा पौर पीपन में किसी प्रकार विन्टर की माषना मही रह जाती।"" पर माकार पीपन की अनुभूतियों को एप रस से सींचकर काम का स्वरुप प्रदान करता है वह निरास नहीं हो सकता है। उसका प्रयोजन है प्रात्मानुभूति का विस्तार जिससे माना पीबन सरम मौर पानलमय बनता है। १ पंपाप्रसार पागेप 'आधुनिक हिन्दी काव्य में समाज' साहिम में सामाजिक बीवन मी पूर्ण पमिम्पत्ति मामुनिक हिन्दी कामको प्रमुख पिसेपता है। तो साहित्य और समार का पारस्प रिक संबन शाम्पत है साहित्य समाय को प्रेरणा मानन्द प्रान करता है और समाज विमिन परिस्थितियों से साहित्य को प्रभावित कसा परतु साहित्य में किसी युग विशेप को सम्पूर्ण मनोमृत्तियो स्तमे स्पष्ट रूप में रितमी कि हम प्राधुनिक हिन्दी काप्प में पाते है मिमना या कठिन है।हिली के मीरमापा-काम महिमाम मा त कान के काम्प मे समार के किसी एक पक्ष की प्रधानता है। वीरपामा काम म गौर सामंती जीवन के विष सामाग्य बन जीवन की मोर कवियों मे प्राच उठाने का मी प्रमलमही किया। मठिकास का प्रपिकाध काम्प स्मात मुबाप सपा विकाम का काम्म प्राय बन-हिवाम तिवा पया है। ऐसी मा में स्वाभाविक है कि प्रथम ( मठिकान ) में समाज से प्रतिपय विरक्ति मा स्विीय (0ठिकान ) में होन मासक्ति का प्रापाप हो। महुवन-हिवाय काम्य का निर्माण तथा उसमें समान की परमती विचार पायमों का विश्लेषण मिषन प्रामुनिक युग के काम्प साहित्य की बड़ी मारीन है। पिछले सौ बों की समाग सरिता में विभिन्न प्रकार की विनी भी साहित्यिक सामाणिक राममतिक पार्मिक प्राषिक तथा सांस्कृतिक परमों का पाषर्तन हुमा उन सबका असन हमें प्राधुनिक काम्म में स्पष्ट राष्टिपोबर होता है। इस सुप का कवि बन-बीवन से इतना संपृक्त पहा है कि यह समाज की प्रत्येक समस्या को बड़े प्रारमीयम से सोच-विचार है।

-
प्रथम साधीनता संग्राम ( १८५७t.) के पाचा भारतीय
पराधीनता मभोगति की सीमा तक पहुंच गई की। धियों से एक के
परन्तर पूसरे बासकों की दासता भगता में बैंपा हुमा भाख प्रपती
समस्त विभूतियों से हाथ धो बैठा पा क्षेप बी बम भरिमा प्रश्न
परम्परा भधिक्षामौर मशाल की सरंपासी मामा।
ऐसही समय में भाग्य प्रमहा दुर्भाप्प से रेत में विक्टोरिया का
मासन प्रारम्भ हुमा । विदेशी सम्पदा मा मिसाल का बीन प्रकार
हुमा ध में मार्मिक तमा सामाजिक भावोसों के प्रणेता महात्मामों
का पपिपि हमा । फमत पत्र प्राति की किरणे विकसित होने समी।
देश की उपयुक प्रगमन तथा मत रमा के मिमे मुसे स्वर हमें
माधुनिक हिनी काम्म में सुनाई देते हैं। रेम की तत्कालीन प्रयोपति
का चित्र भारखेनु हरिपका की इन पंक्तियों में प्रति है
मो पर बन रहेप बम जान नपाई।
बुद्धि बीता भी रवाह सूखा विताई
भान कामर पनो निरक्षमता प्रा घाई।
ही मूरता और परस्पर कमह मा ११
सब मिमि मासी माख प्रजा हम रसो अवमेव पर।
पागो गामा करणा मतन फेरि पागिही नाव का?
निष मारत भूमि में कमी न पाग्य की एमठा लिप कला
कोमल की पूर्णवा पी उसी रेप के मामों को भीख मायते देवकर पियों
काय पेरला से ताप रहा है। पं. भमिकावत पास रेशम पाप्त
पम्पकार से पार निराक्षा में प्राण छोड़ने तक को रापत है।
हाय हाय । महि तप्पो बात हम मम मारत ।
तमि हिम ममि प्रान यह हिप निरषय पारख ।
परिपरी यह परराहर सभी उतट पन दिव भी भावना से
भूत। मारला हसिषम ने सभी ऐमी की प्याएनता में समस्त

ममातियों को अपनी दुपमा पर पौमू पाने के लिये प्रामषित किया
या। देश के विकत बैनर की तुममा में वर्तमाम समात्र की निपट पपी-
गति देखकर परियों की निराला स्वामाविषयी।
मारठ में विक्टोरिमा का राम्य प्रारंभ होन रे पापात् समान म
हर्प की एक महर सी दौर पई थी। विविपशानिए मापनों से रेख
की स्थिति में सुधार होते दल बनना मी न समाई। स्मान स्थान पर
पाठमामामों पस्सनासो गर र परों की मुन्बर म्यवस्था पेरणी
परम की विभूति की फसव हिनी कपि पायी पम्प का पद
करतेए गारठ
मनव एम्प प्रमी देसह मात भूमि
मारी।
पमा राम्प को मन्म नाहि हि भारत मिा दुगारी॥
विस्टोरिया की प्रससा में कितनी ही प्रमस्तियो मिपौ मा । परन्तु
उस इपं पौर प्रथमा म मी एक पिता रेखा समार के मानस को पत्ति
र रही दी। पारिक संबट तथा बिरेली सम्पता को प्रोत्री धमाज पर
पुरी पहचावीमा ही मी। मरी हासन की मानिक मुख तुगि
पामा पर मुग्ध सवासियो ने उनी को सप्तति का परम प्रतीक समम्म
पा प्रत्येक क्षेत्र में ससका प्रधानुकरण पा। इन-सहन और साम
पान पर मोमपाल पाईननवाई, भाषा साहित्य सभी पर प्रेमी
पवा पमा । ऐटी के स्पाम पर पिस्ट मोती के स्थान पर कन्ट
परमाने इस्टम पर मातृभाषामान पर परेगी कामे बारम
पिरो रेलकनियो काप मागी मलिष्ट की पायंका काप मा।
सम्हनियम हास्य पारेप उपरेको द्वारा समाग को मिा।
प्रेमी मापी सोपों ये सम्होने विनय की
प्यारे होरे हिन्दुस्तानी बार मोजी मत बोस'
कोर पैन्ट पारियो को गहमि समझाया
सौर, पोको पठनून वापर पोरया ।

नमप्तिमिव पुतियों के भगीन पासवसन पर 'सभ्य बीयरी की
चिट्ठी' राप्म किया। भौर नपान फैशन की इक नारियों पर
'या फिरंगन बनाय नाही रेमो हास्ममय गीत मिव ।
इस प्रकार समाज के मामापरण काल में एक भारपियों में रेस
को मा प्रांमी से सचेत किया और दूसरी मोर पुरातम सम्पता के पर
साह को पिराकर नमे भारी + सिय भूमि तैयार की। मामिक
पार, बाति-पाति बास-विवाह, पर्दा प्रशिक्षा प्रादि कुरीतियों को
समाव से
करने के लिये करियों ने कविता के साथ प्रमक नाटकों की
भी रचना की।
सामाजिक बीबम के दूसरे पल भी पियों की दृष्टि से मोमस
मही है। प्राधिक विषमताएँ तमा पजनैतिक बीमनकी क्वाएँ
निरन्तर उनसमम समस्या बनकर खड़ी रही है। प्रजी पम्प में
पाम होने बामे विविष टस पी मार परों के मार से पिसी हुई मनवा
की काय पाहो तमा पाम्स एक्ट' पनिर प्रेस एक्ट' पारि पर
विकमन्बमों से बरही पपपीन पारमापों का मान भारतेनुमान
काप्प में पो स्फुट सर में पहुपा। होमी पावती मातीय समार
केप निमक पर्व है परन्तु पार्पिक कमियों में किस प्रकार ममता
को कष्टप्रद प्रतीत होने मगे ये इसका एक मि रामावरण पोस्वामी
परों में देखिये
है दुर्दशा म सोपे कहा हम घेतें होरी
पास रख दिवस समायौर पर पर मोरी।
तेस अनार का नाहीं मरत प्रणा सब ठोरी।
भोप ममित में भोप मा म पोरी ।
यहाँ पर यह कहना मनापापा महोमा f+ मारते राम के
पारियों में बना त प्रपनी पापार परिकासि पाला में पचाने में
लिये प्राय मोरमारा नौम्मीदों में ही पाप की गला भी।

उनके काम का कोष बनहित पा मत समान संषित सम्पर्ष काम्म उन्होंने बड़ी सरम सुबोध भाषा में सिवा है। १५वी पताम्दी समाप्त हाते पंच पौर समाग की परिस्थितियों में गत पन्तर हो पा । शिक्षा की प्रतिसाच पुपान भरिमा पन्च विस्वाप तथा पुरीतियां बीरे धीरे मोप होने समी। भर पामरयता बी भये पारतों की ममीन रीतिमीति की मबोन हाम्म मापा और मीन प्रकार के साहित्य की । ऐसे समय में मसीन पारों को पना * भिमे पुरावन प्रार्य सम्पवाये उत्प जोर निकाले गये निगम पर कमी भारतवर्ष में अमगुरु की उपापि प्राप्त की थी। प्राचीन पारपों में पानोक में सामानुमार मबीन पम्मता की पमा समान का पेम बर मया । पात २.बी मतानी के प्रारम्भिक काम्म में हमे पुण्तन पर की पूच मुमाई देवी है। साकेत' प्रियप्रवास 'प्रमति चिन्तामसि' 'मनोपरा पर पारि भनेक महाकाप्प म काम पौराणिक उपामानों पर ही मिले थे। इसके अतिरिक्त माविका परिकामों में पुरातन मन मोर प्राचीन पार परिमों का मुखपान या दरी भूमि पर राम कृपा में बम तिमा अपि मुनियों ने यही भान विस्तार विमा है। है या कोई ए यहाँ से शेन बिया। सपरेश पोप भी में यहाँ पिया है। करिता का मुख्म विपम बन गया। पुपवन मा ममीन स्पिति का तुलनात्मक चित्रसमूतन समारो पारयों का प्रबनोक्न पन* निये भी मैपिताबरण बुप्त में 'माण पारखी' की रचना की। पुप्तमी को इस पुस्तक का समाव पर रा प्रमाण पग। प्रायान पर हाप को इसने मपनी पोर प्राषित किया । राष्ट्रीय स्माधीमता के इतिहास में 'मारत माता का मी महतो महामाम्प विसर पर मोपते का है। ।

भाव वरिपारों के परिवर्तन र साम काम्यदी मापा में भी परिपर्वम पाएपक होगया है। बसमापा प्रपनी पार प्रधानता के कारण नवीन भायों के मान में सर्पदा मसमर्प सममी गई, मत उपहा म्पान बड़ी पोनी को रिमा यया। इस युग म कषि समाग हिप्स के प्रति चमे निप्याबाम ये कि राष्ट्रीम बदव भक्ति के मापोटोपन संसिपे उहनि तीन सोपोर पाहित्य संस्कार से परिमाणित पर मापा का मोह त्यापपर मनमड़ परप पकी मोसी को ही काम की मापा साकार किया क्योंकि सड़ी मोमी इस धमप मम प्रमित मापा भी। पापाप महावीर प्रसाद द्विरी बिमके मेतृत्व में बीसवी सरी का काम्प प्रमीय शहापा कवियों को उन अबतारों की मेणी में गिनवे पे को पीता के अनुसार 'धर्मसंस्थापनाय' वाम परख कर है। किसी युग के काम में बन हित का पर सबसे अचाहै। केवल काम के लिये काम्प की रपमा परने माते पपिया के मिपम में इस मुग की सामाम्म भारला पी:- देश की मसाई ममा पाई मो न होहि मन माहरु विताई कविताई में बयस पर्यो ? इस युग पाय तलामीम सामाजिक विचारों का पूर्ण प्रतिबिम्ब है।सम दो मार्यों की प्रथामवा है। ममम समान सुपार और रितीय राष्ट्र भक्ति । समान मुबारक शेत्र में प्रार्म सपा पट्रीय क्षेत्र में इस्पिन मेनन काभान्दोलनों नाकाम्प पर मापक प्रभाव पड़ा है। सामारिक बीबम में मम का महत्व र पारलोरिन मोर प्राप्ति स्थान पर मी मोर में मानव मात्र की या बारा मुक्ति की मापना पा प्रसार इस पुल में एमा। निशी मुपीन काम म म मागों की प्रतिमि हमें मुगाई पाती है। पिता के परमोफ पास पौर माई * बल लवन मरतु रो 'समीरत मानस के सिम मे म.

-
( २. )
मुना मरत भावी प्रबम बिमन हे मुनिनाप ।
हानि माम जीवन मरण पक्ष प्रपयन पिपिहाण ।।
किन्तु माम्प के स्थान पर प्रम मोर उत्साह के पमपाती मैपिमीमरस
गुप्त के पसिष्ठ भारत को कमम्पवा का पादेश देते हुए कहते-
भक उठो हे वत्सो धीरष भार
बैठते । बीर पया पहार'
धनु सर सम तुम हो यह घोर
पतन धर्म क्षेत्र हैनरमोक
मरण है प्रबकास पोषन काय ।
मोकसबा को ही हरिभक्ति समसार परमार्थ का मुपर पार्य
4 रामनरेश त्रिपाठी ने अपने काम्प 'मिसन में उपस्थित किया है।
रहनीकिक कम्पों से विमुख होकर मन में मुक्ति की सामना परनामे
मनुष्यों को उन्होंने बताया -
सिर मक्तिलोक सेवा एम पर्ष दो नाम
बन मे बस से हो सकता है मनुगोषित काम ।
अगती में सुख शातिमाना देकर निगमम हक्ति
मनुष्यता का प्रर्ष यही है मौर मही हरिभक्ति ।
समान मुमार के मेष म कमियों में स्थियों को उमति शिक्षा के
विस्तार र पारिवारिक बीवन को सुन्दर बनामे पर मिपेप बम दिया है।
काम्य मे राष्ट्रीय मावतामों की अभिव्यक्ति को प्रकार से हुई।
प्रमम पराधीनता के प्रति कटु प्राकोस केस में पूसरी पौन-नीम पमित
बर्ग के प्रति सहानुभूति केस में । पराधीमता पान को तोपर सर्वत्र
होने की प्रबत कामना सोहलतास शिवी निम्न मीठ में ममिय
-
हम मातृभूमि के पैनिक ! भागारी के मवगाते हैं,
पमि देवी पर स स करके निम पीप बढ़ाने पामे है।

सम्वान गर वीरों की है हम ाम नहीं कहलायेगे। माता स्वम हो पायये, मा रण मैं मर मिट जायेंगे। दोन-तीन रमित वर्ग में पकू पा किसानों के प्रति कवियों का मान सिप र छ प्रापित छपा है। पिप्रधान त्र में ग्राम और अपक ही राष्ट्र के वीपन पापार ।। रिम्नु उन्हीं को सर्मपित उपेक्षित पएपी बकर कमियों में यो मार्मिक सनों में उमड़ी पुरंधा चित्र पित किये है। प्रस मोति हिनदी सुमीन काप्प सामाजिक बीवन के अनेक पों को समेटार प्रादेना है। समार की मति परिवर्तनशील है। विपकर इस सानिक सम्पदा में उसकी प्रति प्रतिषित ही मही प्रतिपत परिचित हो ही है। भा एक पटे में मनुप्प सैकरों मीस की पूरी पार कर मैदा है यह मात में ही 4 पा मुहर प्रमेरिका और इंगमर के ममुप्यों से बातामाप कर सेवा है समा के अन्तस्वम पार पालास की छपाई तक पहुंचना रस मिसे पत्यात मुार हो गया है तब मानव महति में भी प्रतिपम परिवर्तन हो वामपा प्रारपये है। बीपी मवादी के दूसरे माममात्र मी परस्मा में गत परिपन होपमा । मामय ने देश मौर समान की मोटी परिपि को सागर विपके रिणाम प्रांगए में प्रमेश किया पीपन पारा पुराने गनों को तोड़कर मवीन भूमि पर संपरित हुई। पर आपारादी काम में स्थान पर मूम्म समूह के स्थान पर पति भी सान्त को घोर भगत की म्यत को पोर प्रम्पक को मा मुराको मोरार नोर्ग विधेप गप से होने भयो । काम्प में म्पटिगत ममापार्यो गा wिण प्रमुग बर मयाको सामायिक पनों से कोई पापितकाटिमायों समोसार मिी मरे फासनिक मोरपी पोर में निमम एन पगा। निराहा पर पुषकी पमिप्यक्ति - - । २२ ) पाप्प में विगए प सहुई। हरय की पनीभूठ पोरा पार पनपार, तपा 'भीर मरी दुध की बदमी' प में बाहर काम भूमि पर बगहने भगी। बाप मसार मे स्नेह पौर सौन्दर्य का प्रभाव पाकर करियों ने शवम म ही सौन्धर्म का धमार बमा मिपा। भूमियानन्दन पन्त मे सिता में मृष्टि एक रप हा नयस मापी मानर हि भीतर सौम्पर्य स्नेह उस्मास मुझे मिस सका मही पग के बाहर। मामय के बाए बगबनों के प्रति विद्रोह की उप भावना मकर करियर मन्चन मपुगामा मपुरामा स में समान को पुनौती री माम तरगों से अपनी मस्विर पिरजालम देवामय मैं तो गिरामी पम म मामब के दीपा निश्चय । जो पिनारे तट से पपुषित मनुग के बीवन को, में काट सों को गन पी किसका र मुझको में निर्भय । में पहा बहादूगी भए म पानों के गुर मा दुर्गय । हिन्दी का पायावारी व रहस्यबारी काम्प तलामान मपयुक पमान की धन पान्तरिक अनुभूतियों का प्रतिविम्म है जो पाट संसार की पटिमतानों की प्रतिक्रियास्वल्प उत्तम हुई है। पस्परादी प्रसिध कमयित्री महादेवी वर्मा ने अपने पिपय मे मिया "अनेक सामाणिक सड़ियों में रखे हुए निर्गीय संसारों का मार बोवे इए पौर विषिष पिपमतापों में सांस लेने को भी पबमा म पाते हए पीपन रेशान मे मेरे माव जगत् की पेरना को बहराई पर जीवन को भिमा यी है।" मिरामा पार पुष मानब के चिरस्थामो माय नहीं है। समम के साप इनमें अनिवार्य रूप से परिवर्तन होता पता है। पो से बड़ा कष्ट समय पाकर रहो पाता है, निराणा पाणा में परिणत हो जाती। प्राति सी नियम पनुसार काम्प म निराश की जाती पामों के मम्म माया की 'स्वर्ण किरण चमकने मगी। पैतिक परिपार

(२१)
की मा परिवा टोहर यामापारी कपि म्याप मानपता सपा मीर
पीपन दन की मोर मुो। काम्म में उन्होंने एस मावा मी म्पनना की
शिमके पापार पर समग्र संसार मुख, पति और प्रेम को दिम्मता ग्रहण
करसमा
इस समय समान का माम मसित कमामों के पुमररमाम सपा
भारतीय रानिक पाम्पारिमा पन्यों के पुनराम्ययन की पोर रिसेप
सस से प्राकषित पा । चित्र नाय संगीतादिमा रमति पर पी।
सनिपर, गीता दर दर्शन में प्रापार पर मीन रानिक सिसाठी
की रचना हो पी पी। स्वामी रामतीर्ष एमाण पिकानन्द
का पार्गमिक पावबाद तथा महात्मा गोपी मोमियर परविन्द का
पाप्यात्मिक पटिव पुप को प्रमापित कर पा पा। पापाबारी
कारियों ने इस नयीन सांसतिष रत्पान में पूर्ण सहयोग दिया ।
प्रसाद की कामापनो' निकर का 'पुरक्षेत्र', पन्त पौर निपमा का
जीवन ग युगपी सोसतिकतमा से मनुप्राणित है। इस वानिक
पुग में भर हि मनुष्य न पूर्व का रह गया । पौर म पश्चिम का तब
एक सममयमारी सरकति निर्माण की परम मानपयवा समम करियर
मुमित्रामम्बन पम्त ने 'म्पोस्ना' माय स्पक की रपना की। इसमें
चन्हनि पारधाम मामार की मांसप्त प्रतिमा में पूर्व पापात्म प्रकाम
की मारमा पर एवं पश्यात्मवार के मस्पि-पंचर में भूत या पर विमान
केप रेप मरकर मषीन युग की सापेमा परिपूर्ण मूर्ति का पार
परिपात स्मिा पान पिव सभ्यता के कुप पारेप सिद्धांत
पूणे यस पनि मे पासमान, सा मामय माना है समान।
निर मेमन मति भयानुहम सब फर्म निखी भेव भूम।
कुन मारही विश्व पुप्त सब एक पटक पाराम ।
यो अपनाकर प्रसाद कामना' नाटय एक में ही मितों
पी पि। रोन' में श्री रामपारी सिंह दिनकर स्मेह पौर
पतिशनको मानताका पादई बताया है.

( २४ ) स्नेह मिशान होंगे माप नरवा के एक परती मनुष्य की बनेगी पर्ग प्रीति से । सांस्कतिर पुनम्पाम के प्रमर प्रमिमापी इन कवियों की पवित्र एवं पार माय भूमि में बुनों की उपेक्षित मानपता स्ना के संबम से पुन मी उठी है। पतिता' परकीया येल्या विषा के स्प में समाग से उपेक्षित मारी को करियों में प्रेम और कम्मा केबस पर पुन पारमीयता प्ररान की है। निराला ने विषना को पसिला सी यात' 'पष्टवेग के मन्दिर की पूजा सौ से पवित्र पिटेपण प्रदान किये । मरेस शर्मा मे मेरमा को 'मामी रेपी' बमाकर माई का प्यार समर्पित किया है। नारी को इस युग के करियों ने पवित्रता मोर धौन्दर्य को साकार प्रतिमा सित किया है। घापाषाव के मनन्तर 'प्रगतिवारी काम पारा का प्रचार हुमा जिसमें समान की प्रार्षिक समस्यापों का चित्रण है। मार्क्सवादी सिवान्तों के मनुसार 'म' समावस्यवस्था का मून पामार है। मार्स के इस सिमान्त से प्रमाणित करियों ने समाज को पूजीपति पौर मगर गो बर्मों में विभक्त करके देखा है। काम में रोनों वर्गों के जीवन की विषमताों का गियर विषय मा ।। सामाम्मतया 'प्रगतिबाब' निम्न पौर मम्म पर्म के बम बीवन का काम्पहै। इस काम्प में सामाजिक बीवन की अभिम्पति नित्यप्रति विसाल प प्रहण करती गई, समाज और साहित्य का संबंध बतर होता मया। करिमण जीवन की प्रत्येक पिमा प्रतिक्रिया को काम में प्रतिकर उसकी सीमा कोम्पापक बनाने में प्रमलपीम हुये। मानव मात्र हो सुखी देखने की प्राकांपा में रत प्रगतिवादी कवि पाहवा वा- कोई म पनी प बाये कोई म पराि रिवाये पो काम करे सुख मोगे मह स्वर्ण मियम बन पाये। 'प्रतिवाद के बार प्रयोगवार तवा मई कषिता में कविगण प्राणु निक पीरन में पाटी हुई बौविस्वा पौर शानिकता का पिस्नेपरण करने

में समम ।। 'मयी कविता' प्राधुनिक योषिक बीवन का या पिण
है। पान मनुष्य जीवन में म तम रिसाई दी है न उत्साह । मोहक
भामा मी परमही रही। मार तो उसे केवल निमासा विमान के
नूतन माविकारों की तमा म विदेों की हार-बीत की। भारों मोर
पुरि सामाग्य मामा हुपा है । इस मौतिक युग की सर्वेसर्वा -सिर
कहिप नवमी कहिये धर्म-म्यान कुछ मी काहिम - मधीन है। मनुष्य उनका
एक पुर्गा मात्र सीसिये नया कषि कहता है-
वप पौर सापना से कोसों दूर
अपनी बनावट से मयूर
में ममीन युग काई मात्र एक छोटा यंग
-भारत भूपण भावात
मारपीवन की परिमापा बरस पई, सौदर्य के मान बरम गये हैं
मधुवन रे पाने' और 'प्रेम के राम' मिसमे का युग बीत गया है।
सपेपर और पमम भी पब कहाँ रिसाई रेते हैं। पनपट मोर बसत
की रंपरेनिया मी मही पी। प्रम पैला से मुम्प मापुनिक पीवन की
इस म्पस्ता और बोरिषता का मिम्पस करते हए कपि निपता है:-
प्रन पर पियोग कहाँ मेप हो।
कहाँ सन्देम कहा
विद्विी ने गत वरायान
पपरमे टेमीप्राम
मौर मिशन में भूम पाठे
रसों रिणामों में पर।
पर मिपात' प्रमपेपित 'भ्रमरगीत
पौर सर पूछो तो
स म्पस्त मुग मेरेमयिके
माय प्रपनोंदेदीप

( २१ ) प्रम के लिए के प्रासू बहाने की फुर्सत मी कहाँ है? -देवराय उपाध्याय 'नमी कविता' में मध्यम वर्ग के बीवन पर समाज की मानसिक मुठार्मों का निक स्पिति का विषण विशेष पप से हुमा है। पम्प प्रधान मी में इस युग की कविता ने समार की हासोग्मुखी प्रवृत्तियों को उग्मुस किया है। कला की ष्टि से नई मिता' में चाहे जितने पुण- दोप हो नई सामाजिक बैठना को सस्प देने में इसके महत्व को कोई मस्वीकार नही कर सकता।

नारी- तुलसी की दृष्टि में तुलसीपास की रामायण जिवनी पर पर प्रसिर है पवनी दी तुमधी की चोम यंगर मा पमु मारी ये सब जान के पपिपारी' पामी पापा प्रसिव है। यह एक ऐमी चौपाई है जिसके कारण तुमसी की मारी भावना का सदा पा की रष्टि से देखा जाता है पर सिके कारण उन्हें न पाने कितनी सरी खोटी सुनाई गई है। मारी की वर्षा विवेही या पौपाई तुराव मस्तिष्क में मा उपस्थित होती है पौर तर तुमसो मार्य विषयक विचारों पर मालि मांति के नई वितर्क प्रारम हो पाते है। पपा सपमुष तुमसीराम भारीको साना की प्रधिकारी सममले में? परि रामायण कीया मे चिमित माग्मिो परप्टिपातर इस मान कर सामाधान मासानी से हो सकेगा। भारतीय पास्यों में पौर भारतीय संस्कृति में नारी का स्माम बहुव है। मह सर पूमा के योग्य मानी पर । तुमसी मेरवारों के माता पे उन्होंने माना पुषण मिपमा पमाँ का पम्पपम किया पा र क्या नारी के इस माव से परिचित को उन्होंने पूगरपान पर मारी को वाहना की पविकारी बताया ? तुमसी ने विपप म हमारी ऐसी पारणा निश्चय ही हमारा मिप्यामान है। पत्नी की पोए प्रतारणा सहार भी मिस सात गावि ने एहस्पाथम मनुप्प भीषन । पाराम ही नहीं पनिवार्य मम माना हो और निसरे महल का ना भम्प चित्रण किया हो सिपहस्पापा से पित मनुप्प को गर, पूपर, न मी उपाधि की हो यह कपि भारी को बस साना की प्रपिकारी मानेगा यह पात पिसी भी प्टिकोण सकी मोदी र रीमही उतरती। पवा रमरम भी पोर में गमने हुए पाप रागमारा के योमर्य पर तुममी स्मय तो मुम्प पे ही मिन्तु पो

( २८ )
व्यक्ति इस सौन्दर्य पर मुग्ण हाना नहीं जानता तुमसी की प्टि में संसार
में उसका नाम मना दुपा है। कहते है -
पर रनि मधुबनी पनही बनही सर पर पानि लिये।
मरिका सग ऐसत रोतत है सरयू तट चौहट हाट हिये।
तुलसी मस शतक सौ महिनेह कहा यप गोय समापि किये।
गरते सर, पेपर, स्थान पाम कहो बप में पल कोन दिम।
तुलसी सम्त पनि सलिए उन्होंने मार्ग का विरस्कार किया
यह वारणा उनके इस पर से निर्भूत हो जानी चाहिये । उनि
प्रहस्पाभम की महिमा के समय पप जोग समापि को व्यर्थ बताया है।
सब बानते । -राइस्मापन का मन नारी है। 'बिन परली पर भूत
मारेरा बहायव प्रसिर ।। तुमसी ने पास्मापम को महत्व दिया
इसका तात्पर्य है कि उन्होंने मारी बात चा पान प्रदान पिया है।
यो मारी राम से पमतारीबासकको गोर में बिनाने का सौभाग्य
प्राप्त कप्ती है उससे बहार विषय में कोई भाप्पवान है तुमसी इसे नहीं
मानते।कह।
प्यापकमा निरंजन मिच्न विगत बिमोर ।
पो पर प्रेम भगति बस कौसल्या बोर॥
कोसम्मा बब पोतन पाई, दुमुक समुफ प्रभु न पराई।
निगम नेवि पि पन्त न पाया ताहि पर मनमी इठि पाया।
राम का महत्व पी है पहले उसमा महत्व है जिस माता ने है
बम्म दिया है। तुमसी ने नारी के इस मातृस्प की पवा मापना की
है। सम्पूर्ण रामायण में सम्होने माता को पिठण से पान दिया
है। राम माता को प्रणाम पहनेगर, पिता को उसके पार । राणा
यण मे पम को बौएप बनाम की मात्रा पी। कौशस्या
को इस पाशा के मर माहानेपा अभिभार।परावो राम
कोपन बाम से रोकोकि सम्मान पर माता का प्रधिकार पिता से
पाकर है। इसीसिप यह राम से कहती है

-
( २१ )
पो केमम पितु पायसु ताता । तो पनि राह मामिपा माता ।
मो पितु मातु कहेत मन मानावी कामन पत्त प्रबष समामा।
मारी के महत्व की इससे बड़ी पास्पा और क्या होगी ! यहाँ तुलसी
ने प्रकापम्तर में पितु सतमुरणा माता गौरवपातिरिम्मत के शास्त्रोक
मत की पुष्टि की है।
पुत्री पोर पुरा प में तुलसी ने नारी का बड़ा सम्मान दिया
है। मारीन स्पों के पर्थन में उमका हरिकोण पुरातन पापमों के
पनुहम है। मध्ययुगीन समान में नारी का स्थान बहुत गिर पया
पा। पर में कम्पा का परम भनुम मामा पाने सपा था। मध्यपुमीन
प्रेमाच्यानों में हम पर है.
का गए बरी मग माही । पुहिना सम पानाहीं ॥
परमितीस मो मयत म मामा मामठ पारसीत मुरतावा।
बाहोरिन बनमा पर मारी। माये मामि पहाई मारी।
पाव संसार में माता-पिता की सबसे बड़ी पा राया है। वह
निप्त रिन पर में पाम तीसी नि से माता-पिता का सिर नीमा
होगाणा है। किन्तु मुमसोस कामामुक हपय पुषियों के लिये ऐसे विचारों
की कल्पना भी नहीं कर पाता । यहाँने रामायण में सीवा मारि पुत्रियों
के लिये माता-पिता के प्रेम का पैसा पनुपम पिक उपस्पित किया है उसये
पत्थर महरय भी पिपल पाता है। पुधिरों को गिराई पसर पर
रारा पना पौर रानियों की मागुन एपटाहर ही मामिल है।
भारत पाने मी है यह मुमते ही रानियां इस प्रकार पाहस हो पा
मानो दौरे मन
मममी पपराती हो। पुत्रियों को बार-बार पौर
में रिठार मरे गले से मापीरती है-
होण संतत पिहिं पियारी। यि महिमान प्रमीय हमारी ।।
पास समुर पुर या को। पति एरा मति पापमु मनुस।।
पिन इतने पर भी मन नही मानता। पुम पुपियाँरोहरप हे

समाकर रोने सपती है और कहती है बझा ने संसार में स्मी माति की
रचना हीमों की है ? यी राम को अपनी प्राणाधिक प्रिय पुनियो को
सौपते हुए मातामों ने पो बिनय की है उसके एक-एक सम्र में मूर्तिमती
करणा विद्यमान है । समरे इन वचनों में हरय मिपटा पा पाता है-
गरि विनय सिम रामहि समपी बोरिकर पुनि-मुनि कई ।
पनि पाउँ तात सुमाग तुम मिति मति सबकी पह।
परिवार पुरजन मोहि पहिं प्रान प्रिय सिप पानिपी ।
'तुलसी' सुसीन समेह नसिनिय बिकरी परि मानियो ।
इसके बार पुगियों से मिपटकर माताएँ मिस प्रभार रोई उपाय
का बलन कठिन है । पुत्रियों से बार-बार मटती हुई मातापों को सपियों
पस प्रकार ममम पिया जैसे हाल की प्यासी ई माय को कोई यो
से मतवर
यह स्मिति मातामों की है। पिता बनर को भी पुभिर्यों से रियाने
इनसे कम नही है। रागा पना बो परम रापमान पहनावे
५ सीता को किरा हा देह मै घोर। तुमसी करते है-
सीम रिमोकि बीठा मामी। ऐ कहाक्त परम मियपी॥
भीमिप र नाप बानी । मिटी मा परमार मान को
पुषी प्रेम में राणा बन की शाम मवि एक मोर रती पपई।
कम्यामों के लिये इतना प्यार मारतीय परिवारों की परम्परा दी है।
तुनौ इससे नमी भांति परिचित पे मत पियों के पवन की समोर
स्पिति में मौ रहनि सस्तो परम्परा का पाप ग्रहण किया है। पम्होंने
परिवार में भी कम्मा का महान कम महौ रिवामा।
पुभयोम में नारी का महल तुमटी ने चौता प्रारियों के
हिये प्रमोध्या में पिये मप स्वागत-सत्ता पीर बास ससुर से प्राप्त
प्रेम म्यबहानाय प्रक्षित किया है। स्वामम मै पुष का स्थान
॥

उतना ही महत्वपूर्ण माना गया है रिवना पुत्र बाम का। चार पुत्री को पाकर पयोम्मा का राज परिवार निवना मानन्द मन हुमा मा पुषणामों को पाकर उससे अधिक भादित विणाया गया है। सीता मारि पुष बपुमो को देखकर कोसम्मा भारि माता मी प्रसप्त हुई मानो योगी ने परम तत्व पा लिया हो, रोगी मे ममृत पा लिया हो जन्म के पठिी को पारसमरिस मिम या हो प्रमेको मेर-साम मोर गंगे के मुस में परस्पती मानिएणी हो । एमा धाप उन्हें पुत्रियों के समाम प्यार किमा मौर यमियों को मादेप दिया- या मरदिनी पर मा पाई । एबहु ममन पसक की माई ॥ पदि बाएं छोटी है, अपरिचिव पर मैं प्राई है इस प्रकार प्यार पूर्वक रतना से मैत्री को पमरे रखती है। समुष कोपस्या में उन्हें इसी वि रपा । सीवा में उन्होंने कमी दीप की बती हटाने के मिरे भी नहीं मा। तुमसी की इस भावना में बनार्यस्तु पूम्पन्ते रमन्ते तत्र देवा" का मार निरित। रामामण की सम्भूभकपा में तुमसो मे मारी के इस सम्मान का मिप म्यान रखा है। वनिक तुमना पीरिये नमसी के नारी संबंधी रतिकोण की प्रेमास्पाम पणिव नारी की स्थिति से। प्रेमाख्यामकों में नारीको- तिरिया भूमि की बरी बीत यो खाग होरही। महारतुन्ध स्थान दिया पया है। वापसी में नागमती को दुनियों बार पाम्यारिमा मार्ग में विन सस्पा मामा। रमन नसे स्पष्ट पम्पों में रहता है तुम ठिरिया मति हीन तुम्हारी। भूरस सो पो म पर मारी।। समुराम के पबहारों का रिवना मुमर पलुन तुमनी में किया है ठीक रखो विपरीत प्रेमाश्यामों म पणित है। इनमें सर्वम प्रामों के कठोर पाहारा मन मिा परा है। विभावती में सपिया पिणा - ( ३२ ) बसी समम सास-ममर्दो के कोर भबहार का वर्णन करणी समुपम में पहन सारवान हमे भी पिमा देती है - कठिन पन समोर पाहै । तर ही समर पर चाई ।। बोलत झेच सामु वेह गारी । मनरी मीच मोप्त बहरी॥ इसी उपकी बहुत सी बातें इनमें कही गई है किन्तु मारी-सत्कार का को प्राव दुसष्ठी के मस्तिष्क में पा उसे सोने नहीं मही गिरन रिया। इससे हम अनुमान पर सस्ते है कि तुमसी मामारी के प्रति दृष्टिकोण मया पा? एक मोर सास-ननदों से प्रताडित पुर-बों का वर्णन है दूसरी पोर रामायण में पौसल्या पौर सीता का सुपर पावर्ग है जिसमें बन पाती सीता को पार कोसम्या प्रत्यन्त मपित हो कहती है नमन पुतरि करि प्रीत बाई। रामेट प्रान पामकिहि माई ॥ पनप रेमि चिमिमापि मामी । पीपि सनेह समिन प्रतिपानी ।। माता पुत्री पोर पुरुष के रूप में नारी के प्रति तुलसी विचारों सपवगत होने के उपरान्त पर पापे मारी परली प पर। पत्नी प में नारी का परम मिस प्रकार तुमसी ने किया है उस पर गत मामेप किये जाते है । रसका प्रमुख कारण है तुमसी द्वारा की गई पानिपत बर्म की विस्तृत पाया। पैसा कि पाप छात्रकारों ने माना है तुलसी ने उसी के अनुकूम नारी पर्म की व्याप्मा कप्त हुए सिप्पा है मातु पिता प्रात हिवारी 1 मित सुख-अर सुनु परकुमारी॥ ममित पन म कही। प्रथम सोमारि मो सेब म तेही ।। पर पेग बस पर बन होना । अब बधिर कोषी प्रति पीना ।। पेसा पति कर दिय प्रपमामा। मारि पाप यमपुर एस नाना । एपहि धर्म एक नेमा। काय बचन मन पविप प्रेमा । महन पपापनि भारि, पति सेमत सुममवि महे । पति के प्रति पत्नी की इस निष्ठा में पासव की पी भावमा टि गोपर होती है। ऐसा प्रतीत होता किमसी पुरप को बहुत मा - पद रेकर नारी को उसकी दासी बनाना चाहते है। किन्तु तुसपी की यह पारणा एक को पुरानी परम्परा पर पापारित है दूसरे सपन के पाश्विकपको मारकर मवि इसकी मर्पगम्भीरता पर मिपार किया पाय तो स्पष्ट प्रतीत होमा कि तुमसी मे नारी के कितने स्यापक हित को भ्यान में रखार पवित धर्म की उपर्युक्त माम्मा रचित समझी है। उस युम में हिन्दू समार के राम बगौ मे स्त्री के पुनर्विवाह की प्रभा रठ गई थी। पुस्प के सिने ही पिया मर विन्तु सामाजिक व्यवस्था में स्त्री पा एक मात्र प्रापार एमका पति था। पासिकार मारी अपने पैरों पर सही हो सके इसके मिये 'स्वीपूडानापीयताम्' की वोक्त मर्यारा में रोग ममापी पी। पति के बिना समान में नारी का कोई प्रावर पा पौर न कोई स्थान । यद्यपि तुमसी को रष्टि में एक पत्मीयत का भी वपना ही महल पा स्तिमा पवित्रत पम का उन्होंने राम के पीपन को प्रपनी नाका पापार ना ही इसलिये पा कि उनमें से सब पूण विचमान मिनकी एम मा समाव की स्मापना के लिये उदाहरण सरप प्रस्तुत करने की भाषमाया पी चिन्तु सहस्मामम म्यवस्था के लिये मौर समाग गतिक स्तर के मिमे मह परमाररमक मानते थे किलिमा हप्ता से पतिव्रत पम का पासन करें। पुरस की पमु ममृति मे मा समान की पुष्टि से भारी को पाने का एक मात्र सपास ये मी पर्म को मानते है । इसीमिये उगहोंने अपने धर्म से विमुरा हाने दामी मारोगे हमोर पौर परमार रोगों में भयंकर पास रिचापा है। इसमें पुष की महत्ता इतनी मही शिवनी मारी की मुरमा और समान पयरमा का म्मान एगा मया है। मार के हानिक युग में भी यहाँ नारी पुरप पाग बातो रिसाई रही है नारी के मिपे पुरुषमाप्रपा महाय बम नहीं हुपा । पापिक रष्टि से पर बह भने ही प्रपन पास्सर मारे विस्तु स्त्री के बापत में पुष्परा प्रभाव भार भी समा ही पपरर।पके मभान में जीवन की मपरिणत (४) समस्यायें मुंह फारकर सामने नही रिसाई देती है। इसीलिये तुमसी पमित रानि भा रही थम सामारि यो सेवन देही ।। इन पत्तियों में रासस्व का भाव उतना नही जितना बीरम में पतिरा प्राप्त सुविधामों+मिमे समता का झापम है। पति-पत्नी के मम्म समधि और मसूम का सबबन तभी होता है जब दोनो एक दूसरे के प्रति अपने अपने कम्पा रम्ता से पामन करें। सीता मे पवित्रत निमाया तो राम ने पत्नीबत का अमृत पादर्न प्रस्तुत किया । बासी मार स्वामी की भावना रसकर तुमसी ने मारी भर्म की इवनी विस्तृत म्याच्या पी। हमारी समाय मस्या इस प्रकार की कि महो मातृरूप में नारी का महत्व पविक मोर पतिस्प में पुस्प का । फिर भी तुमती पत्नी की प्रतिष्ठा का पूरा ध्यान रखा है। बारे स्त्री हो या पुरप पति हो या पली बोकोई अपने कर्तव्य पौर मर्यादा के विपरीत पाचरण करता है तुनमी मे सर्वन ससको निन्दा की है । पुस्म के प्रति चनका रिसेप पमपात हा ऐसा नहीं कहा पा सकया। रामण पुष्प है मौर मम्मोदरी का पति है। तुनधी मारीपर्म की सी प्याम्पा को रसके अनुसार रामण पाहे या पुपरय करे, यह पाहे परस्त्री का प्रपहारए ही योग करे, पर मम्वोपरीकाकर्तभ्म है कि यह पति का पपमान न करे और पपासमा रसकी हाँ में हाँ मिसाती रहे। किन्तु एसके विपरीत तुमटी ने मनोपरी द्वारा रावण को कमी भर्समा कई है। पुष्पल रे ग में पूर रावण को मार हारों मेती मदोरीकहती है:- समुझि मन महामविही। वोहम समर तुम्हहि रमुपविही ।। एमानुए रेल बचाई। मोउ महिमाबेहु पसि मनुसाई। पिप तुमताहि वितब संडामा । बारे इस मेरे या कामा । कौतुम सिंगु माथि सरकार भामर एपि गरी मम।

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रामपारे इति विपिन उगारा। देवत तोहि प्रचहि माय ॥
पारि सकम पुर पीन्हेसि धारा । कहा पाबन मई तुम्हारा॥
जनक समा पनिव भूपामा । एतुम्हन बस मतुम विसाला ॥
भनि मनुप बामको निमाही । तब सराम नि किन नाही ।।
सूपमला पति तुम रेली। ताहिम महिमाम मिसेली ।।
इसलिये प्रभया यही है कि
पर पति मृपा गाम बनि मारह। मार कहा का हश्य विधा ।।
मन्दोरी की पति के प्रति मत पक्त भावनामों में कितमा दु
पम्प निहित है। उसमे रावण को परीलोटी मुमाने में सर मही
घोड़ी पत्नी के वास्यों से सिममिमार मरि रावण कहता है
मारि मुभाउ सरय कमि काही । ममएन पाठ सपा सर रहही ।
साहस मन्ठ पपमता मापा । भप पविवेक प्रसौर पाया।
रिपु कर स्पसकम है गाया प्रति विसास मय मोहि सुनाया।
वा इसम नारी की निन्दा नहीं अपितु मतिप्रष्ट म्पति की अपनी
हीनता की तितमिलाहट है। इसका प तुमसी को देना उपपुल मही।
दुससी मे हो राम मेघ की मारियों की भी प्रसंसा की।
प्रमारणको
मुख पक्तियां ऐसी है बिना कारण तुमसी को माये
निमार का नाता है। ये 'माग पपापनि मारि पति सेपट मुममति
माहि, पपया मिमि स्पध होहि नियहि नारी' और 'रोल मबार
मापा मारी' पारि। हम परितयों को पा रुप से न देपर प्रया
मनुमार इन पर पाम दिया जाय तो इनका समाधान सत हो पाता
फिरभी तुलसी बारा इस प्रकार का वर्णन परिमापत्तियनको तो
समालोम परिस्पितियों की सम्भीरखा पी इस प्रकार रमों के सिप
रतरदायी है। हमनी के समय में समाया पा पार विगा
पातिक पान परम सीमा पर पा । स्त्रियो एपमारिणी होने ममी

पी। पतिवापाका पार पट हा पा मोर परस्मियों के प्रति पुरों का सगार पाने ममा पा। पमिम धर्म पोरकर विवाह किये जाते थे मिससे वर्णसंकरता म रही थी। समार की ऐसी पुसा से तुलसी की पारमाही म्पमित पी। 4 मर्यारा प्रेमी। बीवन में परिवार में समान में सब पहरे मोरा की रक्षा करना मनुष्य का परम कर्दम्प मानत। उमझी इष्टिम भावना से कत्तप्प सर पापा। पत पुष्ट पुस्प पीर पुराचारिणी स्त्रियों के परिषों की ताना दे मागपाही नही भनिनार्य मामकर बसे । समार सती और पतिता रोनों प्रकार की मारियों के प्रति तुमसी में अपना एप्टिकोण म्यस्त छिया है। सती मारी की पूरी पार पशु नारी की तारना से समारकी मैतिकता की रखा हो सकती है स मानन में किसी को शायर पापत्ति महीं होगी। कमी की पर कौन ऐसा साहपय पक्ति' चिमे मोष न पाता हो? अपने छ में असम परिवार का मिनाह किया। परि तुलसी फिर मी कोमीरा पप मेकर उसके हरम की सराहना करते तो कपा की एकरसता में भयंकर बापा उपस्थित हो पाती । रामायण पाठक पाय ममुभव करखे हपि कि भरवाए ककेसी पौर मम्मय को कहे गये कठोर रचनों से एप को कैसी तुष्टि प्राप्त होती है। मनवा मारीमुनम सार मग्गा और मर्यापा को स्पागकर मामण और राम को अपने साथ विवाह के लिये विमान करती हुई पूर्पणखा की नाक कटती रेड तिमी प्रसन्नता होती है। स्त्रियों के ऐसे स्प निन्दनीय और ये सब वारना की प्रपितारी। उनके स्वतम कर्म समान के लिये पातक सिर हो सकते है। तुलसी के मत में ऐसी स्त्रियों को स्वतन्त्रता रेना सचिव नही। मारोपी हदि से इस बात पर विचार न करके सामाजिक हित कीष्टि से मारी की पतम्भता पर विचार कीबिये ठो पिसी सीमा तक तुसमी की बात में पास यपाठा विणणाई देगी। हार्यत यह कि तुमसीम बम भक्त प्रौर म यस कमि। एक ऐसे साहित्य-परा पे बिहाने बीवन के व्यापक तत्वों को पुष्टि में (७) रचकर एक पारसे मानर समाज का सम्प हमारे सामने प्रस्तुत करने का भरसक प्रयास किया है । इस दृष्टि से तुमसी का भारी संबंधी इष्टिकोण बहुत म्यापक पौर मारतीय प्रादय सिये हुए है। उसमें नारी के देवी भौर रामपी सो स्मों की विवेचना है। दोनों को प्मान में रसकर ही तुलसी बीमारी मापना भी विपना करता उपयुक्त है।

'साकेत' की उमिला 'साकेत' महाकवि मैषिमीशरण गुप्त की महत्वपूर्ण ति है। साकेत' की महत्ता इसलिये अधिक नहीं है कि उसमें कोई नतट कोटि की काम्प पमा है अपितु इसलिए है कि उसमें गमि मे युमों से उपेक्षित मारीत्व और मातृत्व को युम पी जात भाषनामों के प्रमूक्रम स्थान प्रान किया है। सास्त' की कमा तुलसी की रामायण पी मावि सीता मौर पम की हो कया है किन्तु इसमें गमि में सीता राम के पौरव बान की अपेक्षा मिना की त्याग-तपस्मा पौर मिहोपना का प्रभिक विस्तार से वर्णन किया है। रामायण में बरं हम केवल इतना बानते है कि मामण की पत्नी का नाम समिमा वा महो साकेत' में समिमा ही कपा की फेन बिन्दु है। वही हमारी भरा पौर सहानुभूति का मापार है । 'साकेत' में राम के बन गमन पर हम उतने पित नहीं हत बितने कि राम के साथ बन पाने के सिरे उपत मम्मण को देखकर सौवा के पत्ये पर झर झर पोसू बहाती हुई मिना की कम्य पौर विप रक्षा पर । राम पिठा की पाना से बन गये सीता पति की पत्नी पी पति का समय पर राम के साप पई प्रौर मक्ष्मण राम की सेवा में ही बीवन की सफलता मानकर बन पये पर समिमा चारी केवल पति को प्रसमता के लिये १४ बर्ष तक महम में पीई मी तपस्विनी बनी ही। यह त्याग नही स्याम की परम सीमा है। चमिमा की तपस्या राम मामण और सीता के पाम से कम महत्वपूर्ण नाही है। कवि की सहायता मे इसका महत्व समझा है प्रत एम मासे कहलाया है तुम तो सहमर्मचारिणी + मी सर । पर्म स्थापन किया माम्पशामिनि इस भूपर ।

()
पति के साप हार पति के चरणों की सेवा ही एक मात्र पवित्रत
पर्म नहीं। अपितु पति को प्रममता के सिम उसके मनोनुकस म्पबहार
करना उसमी पापम है। उमिमा ने उसी महान् धर्म का पामन
पिया। सम्मए पाहो
परि तुम भी प्रस्तुत होगी, तो प्रकोप सोच रोगी।
प्रभूबर पाबमे घोड़ मुझे भी बामे ।
रहो पो हे प्रिये पो, यह भी मेरे सिमे महो।
मदमस इस संकेत मात्र पर समिता से अपमा कर्तम्म निर्मा-
रित कर मिमा पौर मुख से मन की बात महीं बही । मह पन्दर ही
पम्बर प्रपने मन को समझाती रही-
प्रिय-पथ का चिम बम
तू विरार से पूर्ण न हो और भार से पूण महो।
भाट कर मुषा परसे, भू पर स्वर्ग भाम सरये।
परि रमिमा के स्पाम मे संसार में प्रातृ-स्नेह का पारर्म परिपत
से संसार स्वर्ग भने, पति को प्रसनता हो सो समिमा इस वियोम के
मिमे सहर्ष पार है। भारतीय नारी के पीवन का यही पार है।
सीता पति के बाप म मई तमिमे पविणवामों की पिरोमणि है तो
पमिमा ने पति मिये पपने हास-बिमास गोष-मुस सब का परि
स्वाप पर पत्पिनी का पीयन म्पतीव किया मत पर सौता से भी
पपिक महान है।
सीता मे अपना मान मिया, पर इनो पह मी स्याम दिया।
गुप्त की भारी भीम महानता का प्रस्प मोकाई प्रत जीता
साप बनम बार पयोध्या में रमिमा रिपनप पीमा के दाम
पप बहावे शिपाई है।
पनिमा परिष में गुण पी भारतीय पुरातम मेसति पौर
मगीन मामिक संशतिरंसियों का समम्बर करो परमबीन मारी

।
( . )
सरप पंकित किया है। भारतीय पुरावन समति में सहनमीमता
कतम्यपरायणता मर्यारापामन मारमममर्पण-पारि बातों को प्रपानता
है। नारी भीषन मानो इन सबका मूर्विमान् सरप है। रमिना को
प्रारम्भ में हम मामण के साथ वार्तामाप म रतु पाते है। यह मपने
मारचातुर्य से लक्ष्मण को विमुग्ध कर मेती है। उनका दाम्पत्य जीरन
बड़ा ही मुखमय है किन्तु पवसर पाते ही बह मौन बनकर परिवार के
लिये पति के लिये संसार के लिये सब कुछ त्याग रेती है। पति के पाने
के बाद उसके मन में एड कर एक सी उठवी है कि यह उनके
माने के समय से क्यों पड़ी बेहोश होकर गिर गयो पही वह क्यों म
हसकी
हे नाव । साप दो प्राता का बम रहे मुझे उस माता का ।
प्रेम स्वयं कत्तप्प बड़ा बो बीच पा है तुम्हें बा।
मह प्रातृ स्नेह म मना हो तोगों के लिये ममूना हो।
समिना मानती है कि वो होना था पर तो हो एका प्रब तो उसके
बीमन का एमात्र प्रयसम्म है मन म पति द्वारा उसमरी स्मृति-
पापम्य युग्म के सोने पर, निस्तम निया के होने पर
तुम यार करोगे मुझे कमी तो बस फिर मैं पा की समी।
प्रवनम्र पाहे उसने लिया हो किस्तु मामय मन का ही होता
है। मान समझाने पर भी उसकी बायो हाप से छूट जाती है। ऐसी
मिति उमिना के बीवन में प्रमेक मार पाती है वह इस दुधमय गियोमी
बीवन पर कभी भी बड़ी बीच उठती है और कहती
यही माता है इस मन में
मोर पाम-बन बार में भी ए उसी बन में ।
पौर कमी हसी की राग्यापासा को-पिसने मह सब उसाव किया
कार छठवी -

हम राग्य मिमे मरते।
प्रम को निकामन मिमा मुझो कारागार ।
मृत्युप उन बात को राम्प तुमे मिलकार ।।
कमी प्रपनी विरामता पर भी होती हुई सवी मे कहती है
सनि । रोठामेण गाम
प्रिय तक मही पर पाती है उसकी कोई वान।
सरि विहर मई कमियो ।
म्ही पया पिय मुका मुफी में करने दरमिया।
रितु इस प्रयास में समिमा तम्म मूस मई हो ऐसी पास नहीं है,
सम में कभी कभी मामय को अपने पाय ला देसार रम्त
पृथती ।
प्रभु का पितु पपरा ?
कि मि लिये पा मुझे तमा
यह नहीं फिरे ? क्या तुम्ही फिरे ?
इम मिरे पहो । तो पिर गिरे
परिमीयम पार गदोपहन सौता तुम्हारे साथ नहीं माई तो क्या तुमें
उन्होंने गायर होकर भेग रिया अपना तुम मुझे दीम पानकर तीर
माप ? तब हो पा भारी धनपा-
पिका पाई समिना-प्यपा।
प्रभी समय है मामा मोट बापो। इस प्रकार अपना बन मप्ट मकरो.
तुम पवी हा में सो रहे।
इम प्रकार रिमोप में भी उमिता प्रपमा सम्म मसी मानिममती
है ? निर में बामप गरी प्रत्येद क्षीण पवस्था रेलकर मन ही मन
बोगी हाल है पोरसमा गो मोमो ए गोरा पर मि |
उसी महत्ता स्पीकरते हुए पर

बार में तनिक तपस्या करके ममने मुमको निर योम
भाभी की पमिमी तुम मी प्रर्प नही बम उपभोप ।
इसके पापात् मिसाई सीपम में एक पौर रस्य माता है यह
मामरा को पक्ति नमना। जिस समय उसने यह समाचार मुना या
बीर मामाणी तुरतपुर में पाने के लिये कटिपर होगाती है। मा सैनि
को तमकार हुए कहती है.
यसे यह में पम् कीति सी मागे-प्राम
मोमें अपने विपम कर्म-फर अपम प्रभागे ।
भरत पौर पम पममाने पर भी बह पर में एकर मामू बहाने
की अपेक्षा पुर भूमि में पाकर नियों की सेवा करना प्रपना परम
कत्तम्प समझ उनसे कहती है-
अपने हार्यों पाप मुम्हरे भोऊमी में
पानी दगी तुम न पान मर सोङगी में ।
गा पपनों की विनय पपेपर रोममी में।
१४ बर्ष म्पतीत होने पर ममण पर भौटते है। उमिना का पोरन रात
पुरानीवन का बार समाप्त हो गया। पब उसे भगार मचे मही
नगते । भर पा रानी नही पति की रासी मात्र एगई:-
पर पीपब पी प्रामि समिमा सनकी मी।
बह बरसों की बात पार हो गई पुरानी ॥
अब तो बन पा स्वामी भी बासी।
मै सासन की नहीं पान सेवा की प्यासी ॥
इस प्रकार चमिता के त्यागमय भ्यक्तित्वको प्रतिरोधि मैथिली
मरण गुप्त मे अपेक्षित नारी जातिको मौरव प्रदान किया है।

आधुनिक हिन्दी महाकाव्यों में नारी का स्वरूप पायसीके 'परमारत' और तुससी के 'रामचरितमान' से सांप पूर्ण महाकायों के पदबाद हिन्दी में प्रवन कायों की परम्पराबाट कास तक मुप्त सी ही। मति मुग के पति-युग की पिम्तमपारा २.. माँ व मुलक काप में ही प्रवाहित होती रही। पापा १६वी पानी में 60 हिन्दी अपने पुराने परिमानों को त्यागकर मरोन रूप में परसम्पर्क में पाई । किन्तु हम मुग में साहित्यकारों के समय मी विवि समस्या भी किये प्रथम काम्पों की रपमा को पोर म्यान' च। मत भादिकाम पार महाकापों की रचना २० पठाब्दी में द्वितीय से प्रारम्भ हुई। पानुनिक युग में भारत 'मियप्रवास' 'सी' 'बास कामायनी' 'शूरवहाँ सात-सन्त' सिवा FIयन पारंवी मारि भनेक महाकाम्प प्रकाषित हुए। यदि हम र रिमामुनिक युग के मधिकोश महाकाम्प नामिका प्रधान है जो प्रायुविधम शेगी वोरि विषय पौर नामकरण कौष्टि से यही सिट होता है। 'सारेत में उमिमा का और 'प्रिप-प्रबास में रामा का मस्तिय पम पार पण की भपेसा पति महमा लिए। बदेही पापाय मायनी मूरगहाँ, पार्वती' प्रारि भपने नाम से ही प्रार पर है कि नारीप्रधान महागप्प है। इन महापामारों में भारी को अपने काम्य भी प्रमुख मापिका बनाकर पामिक पुग में भारी हे स्वाप परिवलन तथा पर प्यस्मिरण की घोषणा की। पुनों से मित शिव और पीड़ित मारी साप भानुनिक महापामों में माने समान अनुप्प पो पार पप, निर्मन पोर परिशप में माटामा है। ममिमीपाए गुप्त में मिमा मयोपरा विपता तपा हरिपोप' मे परिरमता ही जैसी महिमामयी नारियों के स्पेक्षित पक्तित्वको काम का विषय बनाकरमारी के स्पाग पौर तपस्या का सपा मम्मकिन पिया है। साहित्य में भारी का सम्म सुम की प्राषिक सामायिक बनैतिक वमा बार्मिक म्पबस्पामों के अनुक्रम गरमारमक या है। भक्ति-युग पार रीति-युप में मारी विपयक कारियों को पारणा इसके प्रमाण | "तुम तिरिया मणिहीन पुम्हारी मूरख सो को मत पर भारी, 'भषमा नौकी मति मह रमनी की मति महमति" सी पक्तियाँ तत्कामीन मारी विपकमारणा को स्पष्ट करती है। किन्तु बर्ष मान सुम में समार के परिवर्तन के साथ नारी का स्वस भी परिणतित हो गया है। प्राय की मारी पुरप की मुलापेक्षी नहीं है, उसका पक्तित्व स्मान है। पुी पत्नी और माता के एप मारी का पस्तित्व समान की पेरुति और सम्मता का पोषक है। बीवन के प्रत्येक क्षेत्र में बह पुस्प की सहयोगिनी है और कहीं महीनो पुख्य को मपेमा मधिक महत्वपूर्ण कार्य कर सकती है। मारी पुस्स की पप बसवा हिंसा सा और पगुवा को मट करके मानवी सम्पवा की रक्षा करती है। कामायनी' की मा मनु की सरमिका सहायिका तमा मार्ग निधिकार है। मनु पर बर प्रपने रत्तयापित्तों से स्ववित होते है मी पया अपने भमीकि पुणो से बना मार्यप्रवर्तन करती है । मन पर निराला के गहन ग में बीवन को भार अममते। तभी था मा ममता मधुरिमा भौर प्रणाम दिपासा पहार देकर मपनी ममृतमयी पाणी से मनु क इप में मामा का पार करती ईकया है परे ! तुम इतने हुए मवीर हार है जीवन का बीयते मर कर मिसको पीर।

मौर यह क्या तुम मुमते नहीं
विधाता का मेमस बबाम ।
सक्तिशाली हो पियमी बनो,
गिल मे गूग या मह पान ।
इस माति कामामनी' की पगार देगा मनु को अपितु समस्त
सेतरा और बिपारमम मानव जगत् को धीतमता प्रराम करने वासी
है। कबिर परकर प्रसाद ने मारी के गुणों पर मुग्भ होकर मनु
ए पुम्प मात्र की मोर से प्राभार प्रवर्मन करते हुए कहा है।
तुम परत पर्पा साराम को और मेह को मपु मनी ।
निर प्रतृप्त बीवन यदि पा तो तुम उसमें संतोष बनी ॥
कितना है उपकार तुम्हारा, भाभित मेप प्रणय प्रभा
पिठमा पापारी हूँ ना बिन मम हाप हुपा ।
'पाठी महाचम्म के कपि रामानन्द तिवारी नारी के पिम्प परिष
का बड़ा ही मम्प स्वरूप मेकित किया है। जिस समय मामि देवतापों
की रक्षा करने मिमिन मनोक में बावे है तब देवताओं को पर
गोपन करणे हए कहते है कि किसी देश की संपति के नाम का मूम
कारण मार्ग का प्रपपान होता है। मारी को बम्पन में रखकर स्पर्य
पुरप स्वतन नहीं हो सपता । नारी पो भवता बनाकर पुरप भी निर्वत
बना ऐसा-नो रिपार में-
है संसति की धस्ति सरा संसद मारी"
मारी का मौसम पति-युगीन कवियों में बाहर माता सस्प मे
विपित किया था किन्तु मर्तमान महाकायों में मारी का सोमय पुरुष
काशिनास मोरयामनाको मनि में म पार पीतसता मा पाहार
प्ररान करने पाता है। नारीपाए और पाम्तरिक धौम्दर्य का पिष
पानी पनि म निम प्रों में प्रति लिया है।
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- बाणी के मंगम पीतों में मा मुखरित होते । पुम पपोपर रे सागर में विमण सनातन सोते । तग और तप से प्रकर को देवी रुप भवानी। घिर पौवन से पय इमोफरती मितकस्पाणी। माधुनिक महाकाम्पकारों में नारी के पत्नीस्प और मातृरूप को पूर्ण प्रविष्ठा प्रान की है। मदमस भक्तिरे पायेश में अपनी मव पिपारिता पल्ली को पोड़कर १४ वर्ष के लिये राम के साप बन अमे गये । मम्मण की यह भक्ति किसी युग में भने ही प्रपमा पारिपय रही हो किन्तु साकेत मा कवि पत्नी के प्रति नरमण के इस अपराध को सहन मही कर सका है। उसने मरमण को इस परित्याग का पमुताप करते हुए रिवाया है। विस समय नरमण पचपटी में “कोणम मिना रेखा मा कागा है या क्षेप उसी की पाया' का प्रयतोकन करते है तो स्वमूर होकर मिना के पैरों पर सिर पाते है पोर महते है बन में तनिक तपस्या करके बनने दो मुझनो निय योम्म । भाभी की ममिनी तुम मेरे पर्ष नहीं कपन उप मोम्प । मातृरूप में फसी के प्रपणका प्रमामम साकेत' की नवीनता है । सम्तान के प्रेम में पापन मा क्या नहीं कर सकती। राप की बाति के साप नारी के प्रम्प रूप भी कार्यों में रप्टिमोचर होते है। सूर की गोपिया गप्प के वियोग मे नियविन पासू बरसाया करती है और संवेगों से मापन के पूप भरा करती है किन्तु प्रिय प्रवास में रामा तपा धम्म योपिया पपने प्रियपरलौटने पर समाज सेविका बन पाठी । रामापूर रोपी रीन हीन नियस विषमा बमों की सेगा करके अपना दुध मुष पाती है। सपा के साथ पाय मोपियो भी बनभूमि में सोति का विस्तार करती दिखाई देती है। यह नारी-बन्ध रिपका पापम्म बन जाता है। साकेवी सीता अपने पक्का भों में प्रासपास की कोम मीन वियत सम्बापो को कामना पुममा सिधाती है।

यदि अपसर पड़ेपो मारी अपनी पति बोबरे पम्याचारों का
मम करके विश्व शान्ति स्थापित करने में भी समर्थ है। तारकासुर के
परपाचारों धारा रेत पीमित पा । 'वारक-महाशम्प मे दारण
पुषी पाता कमर सकर उसकी शक्तियों का हास करने में तत्पर
है।वारकासुर बारा पकती पाने पर पता बीर बाणी के स्वर में
प्रती
सेप मात्र मी मुझे नहीं भय है । दामर पठि तेप।
भूपयंग की कम्पा में अमित पराम मेप।
मिपट भकमी होकर भी रखती मक्ति प्रया।
गावम बीर पसी बिरामी सी मनमममी अनुमेया ।
रसिए मरेपों पर पा सरमामय साप सनकी मार
नियां भी पुर में स्टकर सामना करणी है। पहा मी यम बनकर
महापनियां लिप मे बुझे हुए बालों बारा पा एम में हाहाकार मचा
देती है। इसी प्रकार हनुमान हारा Bा में पुर का समाचार सुनार
'सातको मियो मुर में पान को तत्पर पाया है। नमिता मुख
रोष में वार वीरों पाया कोमोने पोर नमकी तमाम करने में
अपना पहोमाम समस्ती है। रहती है
अपने हागे पाम तुम्हारे पोऊ गी में,
पानी मी तुम्हें न पत मर मोरगी में ।
इस प्रसार माधुनिक महाकायों में मारी विविध भाग स्पों
पा पन हमा है। पपपि मुता कामों में पानी पिमर
कारितामों में भारी रित प्रसपके भी न होते है पो मानिए
सम्पदा और पातापरलो परिणाम है ये 'पन्चमी 'मापुमिका पार
निकारक सा का भारीमान्ति पीठ' पर महापामों में सर्वत्र
भारी पप सरपमी हो मानना हमारा म्पत्तिय पारियों
रेपपार व महान् पोरगीत समा गति का प्रयोग है।

( ४८ ) मारी को पुरप का बबन मोर माया का स्वरूप मानने बानी विचार पारा का इस मुम के निर्यो में तीन प्रभिकार किया है। 'नम नरेश महाकाम्प के कवि प्रतापनारायसा करिगल ने पाली को पति का सच्चा मिल पौर समिणी माना है। दमयन्ती मम को सम्बोधित करके ह में प्रापा प्रम तुम्हारा मेरे बिना कभी पुकाम । कर सकते तुम मद्दी ग्री पर सच कहती है बिपाम ! 'वही बनबास' में सीवा बर बन जाने को उप प कौमस्या मेरमा से प्यास होकर महती है कि तुम राम के सिये पक्तिसाप भी उसका पोपप तुमी पर पापित पा तुम्हीं उसकी सिविरापिमी पी पहिणी पी तुम्हारे पसे पामे पर उसका जीवन किस प्रकार कटेगा ?" इस माति पानिक महाकाम्मों म मारी बेस समाज पोर राष्ट्र के मिये मगतराविनी भवानी के रूप में चित्रित हुई है। पुत्री पत्नी माता भगिनी समी म्पों में बह मसति की सरमिका और विषम की माराया है। जीवन के सभी क्षेत्रों में इसका प्रयाप प्रदेस है।

'मीरा' महाकाव्य की मीरा प्रयस्थान की मरभूमि में भक्ति रस की अमर सुधा परणाने पानी प्रसिय मा कमि मीरा के मीत भारत के कोने कोने में दो मक्तिमान मोर पवा से पामे जाते हैं। मोग मीरा को गिरपर नामर के चरणों में पारम-विभोर होकर मारमे और गाने बामी मदिन के म्पम ही मपिक मानते है। उनके दास्पबाम मोबम चम्पारम्पा के विपय मैं मसापारण वमका कम पानती है। कापरी' कुसनासी' वैसे समो मानों से सपोषित पित्ये जाने पर भी मीरी बन-बम के हय में भक्ति रस उत्पन्न करने में समर्थ हुई मका यस्य पनके जीवन म ही माय निहित है। रारस्थान के मातिप्राप्त कमि थी परमेश्वर हिरेक भी।' महापाम्म में मीरा दी वास्यावस्मा वारप्स मोर पम्यावस्थाका मापुर पार मार्मिक पर्णन रिया है । मतिमा मीग मन्म से ही मेकर उत्तमई की। पर अनुक्रम परिस्थितियां पाकर पनप उठे। हिसी दूसरे की पादी राह का मुत्मन पर समी पोटेगों को पपनी पारी की गिमात्रा होती है और प्राम में माता-पिता में अपने मन के प्रश्न का मामे प्रमों में पूछ बैठते। और माता-पिता उन्हें रस्टे मीपे उत्तर कर बहश दिया करते हैं। मितु मीरा के जीवन में इस प्रारकी परमा प्रमिह पत्परको मीर बन गई पपन पी एक मापारण मी बाउ मे मीरा को बह रास्ता दिखाया पो रमः जीवन मिाल में पूण हा मिउहा। प्रपमे पडोम मर में मिी पर को माया देखकर मीरा ने बी उत्सुएला मे मपनी मां से पूछा पीर मोमो? पेग पर 4 किमकी पुहिन बनी पमर-

मो ने उममा मन रहमाने के लिये कर दिया कि तुमार पर
'गोपन सपनर । बस इसी समय से इस पत्रात प्रियतम के प्रति
मीर के हरय में अपार भक्ति और प्रेम बात हो उठा। इसी दिन से
या गोपाम को देखने पौर पाने के लिय म्याकुल हो उठी वा मा से
पूपती
मामौ पाहामबर मादर।
4 कौम कहाँ है इनका पर?
मा इतनी छोटी सी बानिका की नगन पर प्रारमयचकित पी।
उम्हनि प्रपनी गामिका की निशाणा सान्त करने के लिये कृष्ण के विविध
पोका परर्पन किया और बताया कि
रहते नागर सभाम रामा के साथ सरा नसाम ।
मापते मक्त सभी काम पर प्रतिपम ।
भावीमय एक सामुराण की मूर्ति मकर इनके पर पाया। इस
मूर्ति को रेचकर मौर्रा को पूरा विश्वास हो गया कि यही भीकम है।
उस मूर्ति मे मीरा के प्राण बस गये और बब तक उस मूर्ति को उनाने
प्राप्त कर लिया तब तक ामा पीना सब त्याग दिया। साधु मीरी
की पनप भक्ति पर मुग्प हो यया पौर नन्हे मा मूर्वि रे पमा। प्रब
मीरा के खेत-ए के सापी बही पण ममवान् बन पसे । म नन्हें मोम
ममाती बम्पन समाती पूजा करती पौर मये नये मीत पाठी। मीराक
बीवन की यह पटना उनके प्रन्तिम समय तक पप पटन पर किस पी
मौर इसीके भाचार और विश्वास पर बीवन पठिन सेठिन संकटों को
भी उनाने इस हंस पर सहन किया।
रागस्पान के बाहों में कम्मा का बम्म प्रभिधाप माना जाता मा।
क्योंकि
एक मात्र कम्पा विमाह म पिक पाता है हरा मय पर।
सब स्वाहा करने पर मी परमानो को स्वाद मही पर।
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परे मामूपरस ऐश में बीवन म्पर्य पमा राता है।
करमा पाने को पम पर पर, वारंवार धमा पाता है।
पम्ही कारणों से मीय के पिता उनकी भोर अधिक ध्यान न पत्रे
। मां के बहुत समभाने पर दिया करते पे
गया माफी भी प्ररे काम की
पीर पगये पर की प्रागिर
रस पिता मुबह शाम हो।
पिता का या उपेक्षा भाव मी से विधान वा । वह अपनी मो से
ही पपिक प्यार करती पी चिन्नु वयोय से मीरा की माता भी उन्हें
प्रमहाब मबस्याम मोपकर परमोग सिधार मचारी मीरा रा
गौरत पूम्प हा मया । मावे भागते मोदी
पुकार करती एजी
एक 'मा' 'या'का कम्पा पीत
यही मा प्रतिपन मारवार ।
मान्त निद्रा में मारब मम
होमई पी या या उपचार।
मीकि इस मूने बीपन में प्ण की मूर्ति और भी भाषा प्रार्पण
का गबन माह अपने भाई पपमम पार पम्म सहेलियों के साथ
अपा-गोपियों की पाय मिषानी के पासती मी 'करो पाकर
मिरपामा पा गीत गाठी और एमी पो दारानी से प्रपती
बद हैपया, रेसा पागार?
पापा मारार प्रचार?
ब्रह्म में ही होना आमीन।
प्प है दर पाचार निधार।
पानी मे माना प्रभार से सम्माते पर उन मानी पामिर पी बुद्धि
में सरदात घर मे नही बैठ पाती पोर मह मन ही मन म प्रार
प्रपनों में सभी एनी:-
-

मुस पाठी।
सोचती क्यों होता है बाम ?
मृत्यु क्यों ! कहाँ पूर्ण प्रबमान ?
परि बया या बन बीच ?
नही या है? पमा भगवान् ?
तरशो होने पर मीरा कप मे कुछ परिवर्तन हुमा । अब पपनी
पियाहिता सखी सोसियों से बातचीत करने में उसे पान पाने लगा
स्वनुपमय के पीहर प्राती
जितनी भी नव दुलहिन परिचित ।
उनके सम्मको में बह निव
प्रिय की अनुभूतिममी पाते।
सुन सुन र प्रविरम
अपने पमर माम की मना मापाठी का पूजन करती झातिक
में प्रात स्नान करती मंसिर में रीप बसावी। सपियो उससे कविता
मुनवी मीणा बसवाती पौर उसे मचाती।
सविना मी से हंसी मजा करती और करती कि इनके पर पो कामे
है।वो दुनिया से निराला ने निया से कोई मतलब नहीं होगा
मटयर मागर मोहन गिरकर
है बम्म बाम नपर।
पह तो उन पर ही मद्ध है।
बीरबीर या सर्ण दिन भी प्रापा बब मीरा पिमाहित होकर
अपनी ससुराम गिरा। मातृोन रातिका समुराम भाते समय फूट
फूट कर रो रही थी। सखिया गहें साहस रंगा रही पौ। समुपम पहन
कर काम का पूर्व सागपा। पितु 'मिरपर नागर' लिये
मीरा का प्रेम यही उपास का विषय बन गया। बेचारी मौरी प्रमो धुप
पी । मोबन की पराबबेहोश मीरा के पति कुपर मीमराय मौधिक
मोग-विमासा में मस्त। उनके बोबम का सित पा --

॥
-
पौर मुनो यौगन के गम में मत वप बाप मही है।
पम नही है कर्म नहीं है रिषद पाप नही
मामो भामो, यो न मगामी पौड़े से यौबन को।
घोरपमा पायेगा यों ही एक दिवस इस वन का।
मुनने में ये बातें पयो मगठी थी पर मीरी बीवन का
पाप पुषसरा पारबह मौतिक जीवन को नाबर समझती थी पत
पिरन्तम सत्य को पामे के लिये म्पा पटी पी। बहती पी
पदि भौतिकता ही बीचमी, नरपर्यो मर जाता है,
सराव साबन रहते फिरों' सोट नहीं पाता है।
हमने तो पौवन के भागी हब रोवे दवे,
पौर अन्त में पारिमा सुव में सप हावे देते हैं।
भी रिपर गोपाम' को ही इस दुनिया से अपा मामठी पी
पौर नम्हों का एक मात्र सरब समझती थी। एक रिन मोरी के पति में
मीराले विकार बनने का प्रापड किया पर मीरा सो पारती नारी
इस हत्या को कैसे सहन कर सम्वी पी । पसने पति को माना प्रकार से
समस्या पर उनकी समम में एक बाठ न पाई। बहरहने नग कि
साप संसार ही एक दूसरे की हत्या मे तीन है फिर हम ही पो रस
पर र?
मी पुन समभामा कि
मह मुग मांस का सम्मिमाप म्पमिर पापा करता है।
पीसतील गुपों पर विसर्स मुट पाया करता है।
मीरा सपों पर पति महोइप मस्मा उपौर मासे
पारी तो नरकी गमी र दुको पर पमती है।
मापित पर बीवन भर पपुलसीरीज्यों चमवी है ।।
सनी बात मुनकर पमिमानिनी मीरा स्वाभिमान राम रम।
एमाग पोप से भास हो गये। मामी-
-

(४)
मारी जिसमय पर पसायाम पयत् पहने है।
पर पम पतन रसका कितना उसको नर कामी पमते है।
बह कोष से माँ से रहकर पात पी पति से हाप पा मिया
पर मौरी प्रपना तिरस्कार सहन न कर सकी। उसने नारी की पक्ति
का पूर्ण विस्तार से वर्णन छिमा पौर पति को समझा पिया कि नारी
को पासी समममा पुस्प की पड़ी मारी पृम है।
पनि मीराबीवनमा यह प्रमिनवाप पस्पितार मा प्रधाम
माधुनिक हिबी महाकायों की शबना में एक पौर की मोदी है।

महादेवी वर्मा माधुनिक हिन्दी काम्प में श्रीमती महादेवी वर्मा का पापा स्थान है। हिन्दी की 'पापापारी और स्पबारी पाम्प पारा में पापका माम सर्वाधिक महत्व रखता है क्योकि पम्होंने प्रमुख रूप से एस्पबागी बाम्प की पना की है। एस्पबार का मोटे स्प में पात्पर्य है निर्मुस मस जीगारमा का भारम निबेदम । इसमें जीव परमात्मा से विनिय माषिक र स्थापित र रमसे पाम निरेग्न करता है। कभी सिर को माता बनाकर कमी पिता स्वामी मा सबा पौर प्रियतम बनाकर । महादेवी वर्मा ने सिर को प्रियतम मानकर अपने इएमपी म्ममा काम्प में पत की है। पम्मवाद में भिरका प्रिपरम प ही सबसे पवित मपुर होता है। महादेबीबी की महार' 'रश्मि जीरमा 'साम्पमीत' पौर 'दीपनि पारों प्रसिपमानों में बेहमा विय और पीडामपुर तम मान पक्त हुए है। इनकी कविापों में पीए का पेसा अद्भुत सामाग्य है कि पाठक यह सोचने के मिये बिनम हो गाजा कि कवियत्री की पहरमा मारिल या प्रतीकि। इनकी कवितामों को परमार ऐमा प्रमहोवा किलो पीपन में किमी न किसी प्रकार का दुन पा मार रहा है। किन्तु महादेवी वर्मा स्वयं और उनका जीवन विहम म बात को सिराने में सहायक नहीं होते। मरे परिवार में पोई पम्पा नहीं पीसी पूमा माउ मोर मान्यतामों के बाद पररान स्थापना गन्म हुमा । पर सम्पूर्ण परिवार का पमिन इमार है प्राप्त एमा।तो पिता थी गोरिद प्रमार वर्मा पूण मापन सम्पन्न मामी बरीम में । पुत्री को मुख भूपिणा म्होंमे पूप म्याम ला। मिमा धाप पाहे सिरसा भीर समीत तिला रिसाने का भी प्राप रिपा। महावी गर्मा गो वाम्माम में पिसी प्रसारमा प्रभार रहा हो मह प्रकम्पमीय है। वर्ष की उम्र में इनका विमा रा. सम्म नारायण से एमा। उस समय घाटी प्रपस्या के कारण विशाह क्या होता है इसकी इगतमा भीमबी। ससुराल वालों में वर्ष के मिये हे माता-पिता केही पर छोड़ दिया । यस बीच ये प्रामयन करती थी। बी ए में इन्होंने पनप्रास्त्र का प्रभ्भयन किया । ससमें महारमा पुर के जीवन और मिसान्तवों से ये स्वनी प्रभारित हुई कि इन्होंने मिभुणो बनगाने का निश्चय कर लिया और समुण्म माने से मना कर दिया। परिवार वालों में रहें मिगुणी तो नहीं बनने दिया किन्तु इनका समुपम न माना स्वीकार कर लिया। तब से महादेवी गर्मा शाब्दिक म में मिमुणी म हाते हुए भी मगमग भिक्षुणी का सा बीवन म्पतीत कर दी है। परीर पर स्खेत नाही की साड़ी पनी प्रेमभूपा है। पर में एक पोर सये महारमा पुर ईसा पांची पौर रसीम पिता पूसरी पोर सरस्वती पौर भीकृष्ण की मूर्तियाँ एक भाभम पी सी भनक प्रस्तुत करती है। तब कविता में म्यक्त इनकी पीड़ा और बेरमा का पस्य क्या है? मेरे विचार में से दुध पारमाएँ समाबत सांसारिकता विरक्ति का भाव मेकर बम्म मेती है, ससार के प्रपार मब भी उगे पाकपिट मही कर पाते है दूसरों की पीग और मेरमा से पमित पती! मी ही प्रमुभूति महादेवीगी के हरप मे विमान है । पनकाय इतना कोमम पौर पम्पापूरित कि बेपना उनका स्मभाव बन गई है। इमी में अपार मानन्द का मनुमब करतीकाती पपने इस मूने पनी म रानी मतवासी पाणोका रीप बनाकर करणी एती परीबाती। मेरी पाहें सोती है इम मोठों की पोटों में मेरा सर्वस्व क्षिा। इन पानी बोर्डो में। पुनाबम्बा में बम बमत् पौर प्रकृति के विषय में इन्हें कुप चेतना हुई तबारप में जो भाष ने उनका वर्णन करने हुए पम्होंने लिया है - -

-
किस भांति पर से थे, ये पग से परिषद के दिन?
मिपी पा पुन माता पा मन एते ही श्रीमूकन ।
अपनेपन को पाया तब रेली में मुकर मानस में
उसमें प्रतिविम्बित सपो सुख दुल सगठे पे अपने ।
प्रारम्भ से ही उपत् की पीड़ा मे महादेबीवी के इषप में असीम
पीड़ा को वाम रे पिया या। उस समय सारिणी के मन में पोमू और
हेसी एक विचित्र कीया सी हरखे पते थे। मन विस्मम मिमुग्म पा
और संसार पीए माम यहा पा ऐसी पीड़ा को दुसित प्रापियों को
यमे समा सके। पित्री के अनुसार में ससारो परस्पर विपरीत
घोर
मा दोनों दो पोरें भी सम्मति सी पिपरी की।
उस दिन मेरा दुध मा, मुम बिन पानुपमा ग्रही।
किसने पवनामे मार, यह मिमा पुरा भोलापन ?
रस पिस्मृत के सपने में पाया पर बीपन ।
महारेश वर्मा की कविता में जितनी बेदना प्रौर मम्सा है पीरम
में ये रतनी ही देवी से भापूर है। इसका भरण रम्होंने सय
सिवा है-
स्मित पर मार रहा है, अपना मए सुन पारी पर।
निमम खा बसों में महका दुग प्रा बनार ।
चनकी मो मो मुनी जीवन की साप है मार प्रमू मंमार के
इसी बीवम के प्रतीक है। पूप में प्रपती शिवती को पागा मे स्पिन
मन ति ए बारसों की प्रास में बात को रोने तार
रिती परंगों में पानू बहे पर अमित्रो पहेंला म विगमित
होपवीपी
भाषाकावावा सावरावामा मन,
मिपाकाला पिरपिर भावे भारत
-
-

(१८)
-
किरणों को देश पुरावे विभित पंचो की माया ।
पाम होती पी तितमी पर करने चाया।
इस भांति मनुष्य से मेकर समस्त का पतन प्रकृति कापिभी को
प्रवाह कम्पा के पात्र है। इस छोर निर्मम जगत के अनुरूप अपने
पापको पार ये अनुमदकरती।
पधुमय कोमस कहा तू भागई परदेसिनी ।
पेठा फरमामय फोमप्त इदय पार महादेपीगो निमें पह
असमाना कि समारो मिही सीमित मों में अपने पापको बय
कर पाती। रकीकरणा और पीका ने उनका सबप उस चिरन्तन
कए से बोर दिया बिसे पाकर ये 'प्रिय पिन ! सधि पास
स नबीन मागिनी मा पौरव प्राप्त कर सकी है। स एक
संबंध से संसार के पारेप सनके मिमे मपुर हापये। वमोन
मिता है।
'मपुर मुझको पो र मपुर प्रियही भावना के
किन्तु सा प्रियतम पाकर क्या रमकी देरना समाप्त होगई ।
महा-यह तो चिरस्थायी है क्योंकि सौमे तो प्रियतम की अनुभूति कराई
है इसीनियरहती है
पर गेप नही होगी यह मेरे प्राणों की पीड़ा
तुम को पीड़ा मे तुम में रमी पीड़ा।
पुस में भगवान को बना या उसका प्रामात पा सेमा तिमा
स्थामाषिक है। मोम पनी समूहम पस्तु प्रधान को पम घोश भी
से पाय पर से मिमन को प्राकोबा उने एती है मो इस रिस्त
केएलों व फूटकर मोक्ष प्राप्त कला पाहये है। किन्तु महारगी का
जीवन
हिसके विपरीत है। पाइती
मिलन का मत माम समि में पिए में रि"
.

-
ईयर से मिमम माहात्पर्य है प्रमरमोक की प्राप्ति रिसमे असम
पानन्य है। किन्तु बेवना और भगसाद हित भानब भी कोई पानम्द
है। इसीसे कवयित्री उसे अस्वीकार करती हुईमती है -
ऐमा पेग मोकदमा नहीं नहीं जिसमें पबहार।
बमना पाना नहीं, महीं जिसने माना मिटने का स्वाद ।
क्या प्रमरों का मोक मिमेमाहेरीकरण का उपहार ।
पहले दोहे देव । परे यह मेरा मिटने का अधिकार।
मिमी की प्रतीक्षा में रिल बिवाना गितमा मधुर है उतना उसकी
प्राप्ति का मुम मर नहीं होता है। दूसरों के लिए बसवे एना बीनन
का ममण है। महादेवी प्रपमै पीरम को बीपक की भाति बसते हमे
के लिये प्रेरित करती है।
ममुर मपुर मेरे पीपक जन ।
सुम सुम प्रतिदिन प्रतितास प्रतिपस ।
प्रियतम का
पष प्रामोक्ति र
सौरम मा विपुम पूप
मृाम मोम मा पुप्त रे मा वन
प्रकार का सिग्पु प्रपरिमिठ
प्रेरे पापन का प्रण पन पत।
इस प्रकार महादेवीगी की एस्य भावना परंपरापत एम्म भाषमा
से भिन्न उनले निजी अनुभूति पर मपवित है। यपि सम्म पस्य
वादियों की भांति प्रकृति मौम्पर्य में पहें भी प्रियतम मत होने
६ रस पीन संत रिपाई। पपा -
मुर हम से बेदना के नाग को
पोधनी बर मामुमों से रश्मियो
पीएमसी प्रमित के निदवान मू
पारितार्य पति घी मनगान भी

तब गुना पाता मुझे रस पार को दूर के बेमौत मा बह कौन है? कभी पीतम मन्द पयन पम्हें पूमर पिसी मधुमय बीवन का स्मरण कराती है जिससे प्रिय के मिसन के मिये उतापती दोरर सोमह पार समाग । किन्तु इस पस्म में बो मापुर्य है पौर पदना पीड़ा की पो नियम अभिव्यक्ति हुई हपा मम्मत्र मही मिमी। महादेवीमी के पौत पपमे माधुर्य मौर सहम प्रमिप्यक्ति के कारण ति सारिम में अपना बिग्रेप मौरण रखते हैं । मायरों की गहनता पौर मापा की बटि मता के कारण महादेवीगी की रचनायें बनसामाम्य की पहप से दूर (पितु जो उनके मर्म को समझते हैं ये उपमुक्त कठ से इनके गीतों की मर्मसा को है। इन्होंने साहित्य को ऐसी वस्तु प्रदान की दो सुमौ तक पमर देगी। इस समय पाप १५ वर्ष की है। हिन्दी बपत् मे मपनी इस काम्प को कमा के प्रति मार मार मार मुमन 'महादेवी अभिनन्दन प्रप' के रूप में पपित किये है।

'चित्रलेखा' की मर्म कथा में मित्रसेला 'विषया उपायास की नायिका । मरे नाम पर इस रपम्पास का मामकरण हमारे यह मेरे लिये गौरव की बात होती पाहिले पी किन्तु इममें सबसे पपिक म मेरे इदर को सपी है। मैं सत्य पासी हूं कि मैं स पम्यास की सबसे पपिड दुम पात्र पिभित की मईह-एसी दुर्वत को अपने जीवन में कमी किसी एक सिौत पर पिर नहीं प सकी है। सम में मेरे साथ ऐसा म्पबहार क्यों पिया' बात यह कि यह अपने एष गिमिष्ट पीमन fanti की पुष्टि के लिये किमी के जीवन को पपना सापन बनाना साहया वा। उसे बताना पासिंमार में पास कुम भी नहीं है पर मन मनुष्य के इष्टिकोण की भिन्नता का दूसरा नाम है । मनुष्प पपना स्वामी नहीं है। यह परतंत्र है पोर परिस्थितियों का रास है। क्या कोई भी पति बता मरता है कि यह क्या करने पापा ? मा करना चाहण है ? और क्या करपा मही। यही तो समय मही। एक पहात शक्ति प्रत्येक पति को पमाठीहै। मनुष्य की इम्पाको मूल्य नहीं। यह महीं है। सापम माम है। फिर पाप पोर पुष्प कैसा? उपप्त मत की पुष्टि के भिम उपन्यास में मेरा पीरन मापन रूप में प्रयुक्त हमा। मेषा ने मुझे अपनी सम्पमा मा ऐसा पिताना बनाया है निर्म र रमन पाहा मदिर की मूनि बनाएर पूग और घर पाहा निममा से उठार रिया है। यदि पाप पुष्पपी उमड़ी सर्व निर्धारित समोटी सम्या के समी पानों पर मान गप मे सामू पीपा होती वो मुझे ममममम मा मम्तोप एका किसह मेरे जीवन मही नाही गमा प्रपितु सबसे नगर्ने समय पर न गिमाया।

( १२ ) किन्तु पारपर्य यह है कि पम्म पात्र परिस्पितियों के बा में फैसकर भमा बुरा करने पर भी किसी न किसी प्रकार पारों की महानुभूति पामे या स्वयं को निर्णाप सिह करने में समर्थ हुए एक में ही ऐसी पप्सहाय घोड़पी गई है। विट पास अपने घरों का कोई प्रति कार मही । प्रत्येक पक्कि मुझे ही पोपी बताकर मुझे पिकारता हमा पिपाया गया है। मेयर ने मुझे भव-विमास की मदिरा में निमम पासना की ऐसी पुतली बनाया है पिसके जीवन का मूमन प्रविकम काम पिपासा है बो कमी पान्त मही होती मौर गो अपने आप सौन्दर्य से योपियों का योग प्रष्ट करने में समर्थ है। मारी का या गित रूप विनित करते करते पुष्प पम प्रभी तक पता नहीं है। कौन ऐसी स्वाभिमानिनी नारी होमी पिसे अपना यह रूप प्रिय हो मवमा जो किसी को अपने जीवन से पिसमा करने मिय इस प्रकार सम्म बोर? मुझे बुर है कि सामन्त बीरसुप्त की प्रिय नर्तकी होने के नाते से पौवन का सारा मनुप मुम पर भोपकर उपन्यास में भूठे सो पौर मियपार सिमांतों की पुष्टि का प्रश्न किया गया है। बात प्तमी भी हि महाप्रभु रानाम्बर के दो सिप्प स्खेतार पौर विधामदेव मानना चाहते कि पाप क्या है? नुम्मेष स्वयं इस कठिन प्रम का समाधान मही कर पाये पत उनि पाप का पता लगाने के सिप गोनों सिप्यों को ससार के विगास मेष मे छोड़ दिया। पम्पमन से यह मिपम जाममा पठिन पा सके लिये अनुमन की प्रारम्पकता पौ। खेतानको राम्होंने बीमगुप्त का सिप्प बनाया क्योंकि पानमुप्त का बीवन मापमय था उसके बीवन का सारा मुखरल-बटित मरिण के पात्रों में पापौर पसका प संसार की समस्त बासनामों का निवास स्थान था। पही पार पाप का अनुभव करना परख पा। विणामदेव को प्राचार्य ने कुमागिरि का निप्प बनाया क्योकि मारपिरिने समस्त बासनापों पर पिसम प्राप्त करती दौ । पासनामों के कारण मनुप्प पाप करता है। गुमाएगिरि पापों से बातएर तप और संयम का पोवन स्पतीत करते थे। कुमारगिरि के पास पार पाप की नहीं पुष्प की जानकारी प्राप्त हो सकती पी।रो पुष्प नही वह पाप है। उब इसकी बामकापयामि पी? मिस धमय मेताक बीजगुप्य के भवन में प्रापा, बीरगुप्त में उसे स्पष्ट प से बता दिया कि पिनलेसा मेरी पत्नी के बराबर है प्रत' पा तुम्हारी सामिनी है। मुझे उस ब्रह्मचारी की स्वामिनी बमने म गौरव का भमुमम हमा। मैं उस समय यह नहीं समझ पाई पी हि इसमे भी मेर है । मुझे बार में माप पा कि मैं बताएकी स्था मिनी समिय बनाई गई कि मैं उसे पाप की वामधारी करा सई से मदिरा पीमा सिमा सा और उसे मनुमबकरा या कि मारी के सौम्पर्य पौर मारी है स्पर्म में क्या मावस्या है। बह २५ वर्षका मुमा सयपारी मेरी पारसे पर छोड़ा गया जिसस बह मादस्ता, जम्मा और पासमा का पाठ सीव सके। उसे मेरे से मरिण पिमाकर मुझे बीमगुप्त आप इन पदों में समाई विमाई गई "हमारी पार पहें मतको मे दीक्षा दी है इसके उपमप में में पित्र नपा को पाई पेवा है। बीमगुप्त की इस पाई में कितना म्यम्प मितिया में नहीं समझती ! पवार बीममुप्ता भनों पर पौर रखा है उसकी मोह निता एमपम अंग होती है और उसके स्वय मानी प्रतिक्षिा होती माया म बह मैण्हाप पकार मुझ पूपता है कि भार तुमने मेरी माषना पूरपूर पसी । तुमन यह पर्यो रिया ? तुमने मेरे हृदय में सामा प्रमसित कर दी है। रिम मिये मेरे जीवन में तुम बगर बनकर एकाएक नयों मा पट्टी " पलाम के प्रम्न पा मेरा यी पाना है कि तार की गिपा पार ए कि ग्यत पुपरी पर पुम पीने पाम को ही होग नही तो पिसानेपामा क्याप पर पारपर्य| मेपर मम पिपरीत पुझे तार के मामले पपराधी हार समा मापने के लिय बाम्प लिया है। एक पनगान प्रदोष बागा पौरन पी मारकता का शिकार बनाने के लिये मुझे स्पर्य म्पषित होते विवामा मया है। तारका मरिरापीमा पर-स्वी का म्पर्म करना और उससे प्रेम करना अनुचित नहीं बताया गया क्योकि इसमें सेतोक का होप नहीं परिस्पितियों का दोप है । सो बौयगुप्त मे सांत्वना दी कि तुमने कोई अपराध नहीं किया। अपराध कर्म में होता है विचार में नहीं | जरा इस तर्क दो मुझ पर पा कर देखिये। मुझमे कर्म कराया गया है विचार नहीं तर या इस कपन का यह तात्पर्य नहीं कि अपराधी में हूँ। एक बार एक अपराम मुझसे कराया गया है और सर्वत्र मुझे उसके मिमे मम्मित किया मना है। मेरे दृश्य में कमी इतना रोप उत्पा मही किया गया है कि मैं इसका प्रतिकार कर सडू पार सच्चे पपपपी को मुहतोड़ जवाब दे सक्त । मानो मेरा इपय रक मास का बना इप नहीं काठ का ऐसा टुसा है जिसे काट-पोट कर कही मी किसी प्रकार भी प्रयुक्त किया जा सकता है। जीवन के प्रारम्म से मैंने अपने साप मेना का यही व्यवहार पाया है। मैं नर्तकी यों बनी । इसका पस्य बस मामा कि मेरे पास बीविका के सामन नहीं। १८ वर्ष की पिषमा स्त्री को संसार मे फुसनाने बहमाने बामे बाव होते! फिस्तु उसके पालन-पोपण की चिन्ता किसी को नहीं होती। विपक्षता में मुझे नकी बनना पग। पर मेलामो क्या पकी यो सत्य कहे। उसे तो अपने मत की पुष्टि करती है। इसीलिये उसने मेरे बारे में बताया कि मोबन के उमार मे मेरा संयम टूट गया। मन कृष्णादित्य नाम के युवा से प्यार किया गर्भवती होने के कारण घर से निकाम पी पी पीर ठर एक नर्तकी ने मुझे प्राभय दिया । फिर मैंने बीयमुप्त से प्रेम च्यिा पौर नमकी पत्नी के समान बनकर रही । क्या मर्तकी होने का तात्पर्य केयम यी है कि पुरुषों के जीवन से से और उन्हें अपमें रुपमाम में फैमाकर बोषा? उपम्पास में मुझे कितने पुम्पों के जीवन का प्रमि साप बनाकर विज्ञाया गया है। बीमपुप्त के बाद स्मेवार नेताको बार कुमारगिरि पौर सुमारगिरि के बाद पुन बीमगुप्त के साथ मेरे पासमारमक संबन विचार मुके पनन्त वासनामयी चित्रित करने के अतिरिक सम्पूर्ण उपग्मास में पौर पिमा ही पा गया है। योपी कुमारगिरि, जिनके पापम में निमातदेव पाप की मोग म गमा वा बहुत पमी विलामे पपे है। वे संसार से बहुत ही उठ पुणे है। दोन पिशामदेव से कहा है कि 'मयम पीर नियम से पाप दूर एवा। मेरी कुटिया में तुम्हें संयम से एना होगा। यहां मी मेवाने बीरगुप्त के साथ मेरा मनावश्यक प्रमेय करा के मुझे मारगिरि के पचन का पारण बनाया है। कुमारमिरि मुचकर प्रारम्भ में एसे मोठे से उन्हें दिन में एक मार दिया हो । मेरा अपमान करते हुये बीरगुप्त से कहते है-'पविपि । मैने इस पुटी में स्त्री को प्राथम ने मैं सोम्मिा पाइसमिये किसी प्राकार मोह, माया है सामना है। मान पामोडमय सार में स्त्री का काई स्थान नहीं। कुमारमिरिस कमन पर एक साधारण स्त्री को भी रोप मामा स्वाभाविक है किन्तु इतनी अपमानित होकर भी को सी सी पुरुष से प्रेम करने के लिये मासाबित हो सके बीबम को शिकार है। मेरे पौर मारपिरि के बीच इसने भरे पार पासनात्मक प्रेम का परसन पर मेने पपनी गित पविका परिचय दिया है। सम्राट् पारमुप्त परमार मारनिरिको मेरे शाम पौरई में प्रभावित विताना तो एप बाहाना है। उमड़ी पार मे गो बात यह दिखाना चाहता है यह पर कि मैं पुजा कुमागिरि + सौन्दर्य से पापित ए मौर बीमा मने के बहाने उसके प्रत्पम्त निकट प्रामा पाइसी । बीरगुप्त मैं मेरी पोर मेका रमा पौर विवाह के मामले मेरे मुग मे ही मारगिरि के प्रति मेरे प्रेम की स्वीकृति रामा पे रोना तय समात साती है कि मेरी बासना कुमारपिरि को पपप्रट करने सिप भातुर है। इसमें मरेह नहीं मेरे साप मारपिरि की मामना को भी दूर पर होते नापा गया है रितु मरे निप मेया ने ऐमा वातावरण तयार किया है कि जिसमें पाठप कुमारगिरि को दोपी, मानकर मुझे ही उसके पतन का मुमहारण मानते है। स्त्री का सम्पर्क किसे नही पपवित कर देता ? पाठकों की हएि में कुमारगिरि के पतन को परिस्थिठियों का बोप बताने में मेजर ने उमरठा नहीं रखा। उसे ना उठाने के निम पास ही मेसो उसके मुख से काहमा दिया है नर्तकी तुमें पीसा बने के पर्व होते हैं पिरला मार गिरमा । कही' मारे ही मीचे महाँ पन्त हो नही । मैं तु मानता प्रौर में पपने को मी भानता । तुमे उपर पाना कठिन है, सय मीचे गिरता सरत है। यदि मेरे परिष की रमा के लिये मेकर मुमसे भी नहीं इस प्रकारकहना देता तो मायब उसकी भावनामों पर रेस ममती । मुझे तो उसने मारगिरि पर से प्रानन्द का मनुक करते रिसापा है। को कोई इसमें पारा रामता है उस पर मुझे सपिणी की भांति फुफमारते हुए शिक्षित किया है। मेरे बीरम को इस प्रकार मनमाने रंग से बदनाम करने की मेकने प्राधिकार पटा की है। निश्चय ही यह मेरे मार भम्पार है। मैं मानती है कि एक या दो स्थान पर मुझे कुमारगिरि के प्रभाव पदप पौर सामना की पोर पापित होते रितामा है किन्तु सब बानते है कि या मार्पण जिवना अस्थाई है। कुमार पिरिनियम में सामने गा मोस पीयूष की मावि एमक पाता है। रिस समय कुमारगिरि पर मेय रोप प्रकट करते हुए मेरे मुख से से पासना की ! मौष । रे पगु । मावि मो नामों से संबोभित कराया गया तब मह मममना कि मेहक मे मेरे प्रति सहानुभूति प्रकट की निर्वात प्रम है। वह माँग इसलिम रचा बवा है कि मेरे पवम की प्रमी एक पौर सीमे रिखाना बानी है। कुमारमिरि को अपना अपमाम प्रसर हा प्रत बहड़ा होकर पीने कमा पानी मकी 1 मुझे तुम्हारी मायापरवा मी तुमने मुझे गिराया पौर तुम मुझे उठा मी पी हो। तुमने सिर्फ मुझे पराजित किया-मने भी तुम परामित किमा। तुम मुमसे क्या कहती हो। पहले पपने को देखा ।

मापन मुख पर पामविष्ठा की धापा को देखने में तुम ममप मही हो सकोणी-दमा मैं मानता हूँ बाभो अपने साप प्रपना प्रमिलाप सेठी बापो । कुमारपिरिवारा ही नहीं उसके शिष्य विश्रामदेव से भी मुझे प्रवाहित कराया गया है। विधामदेव की पया इस्ती है जो यह मुझे कहे देवि विषमेशा । तुम्हारी उपस्थिति इस दुटी भी सम्मपूर्स पाम्ति को मष्ट कर रही है में प्रार्थना करता हूँ तुम हम मोर्मों पर रमा कगे।" पर सेशक है तो पामों को मुमै प्रवाहित करने के लिये ही गहा है। फिर यह ऐसा क्या न करे! विशातोष की माठ के उत्तर में दो प्रम मेरे मन से कहलामे पपे हमारे उपम्पास मचित्रित परे परिपको स्पष्ट करम में सबसे पषिक पपयुक्त रहेगा सकते । उसमे मुफ मे पहनाया है मा ? जिस पर मा करने को कह रहे हो पौर किससे पा करने को कहा तुम बधिक से दया की पापा से हो तुम महारसा से निर्माण कराना चाहते थे। चूमते हो। भूतते हो। पर तो पाठक समम मममे किस उपम्पास पर म गौरव पनुभव कर हिरप में प्राप्त पेरमा मोर पाकोश के भार है मपना ममा पोट। एष पार पाठप है मिमे कहे बिना का पूरी नहीं होगी। यह है रपरमास में मेरे और बीमपुपा परिष का सुमनारमक परिचय ! मोगगुप्त मोपी है उमाय म ममस्त बासनामों का निरास बताया पा है।बह नास्तिक मी है । मदिरा । मनम्प पुनारी है। इन सब कमगोगियों के हम ए भी यह अपने प्रेम में एकनिष्ठ दिलाया गया है। मृतश्प मासक प्रयल पर रिपपनी पम्या समोरा का विवाह बीमपुण से कर। रितु बीयनुप्त उनसे पर रहता है-'मास की रटिस में परिवाहिक पर वास्तव में में विवादित ! । मरा पौर पिप्रपा का मप पनि-पली का सा है। में प्रम में विश्वास करना। निजामा पो मेरे प्रमकी प्रमिकारिणी इमरी स्त्री मी हा मली। रितमा मुम्रपाल है! परि समोपा पर मेरे एप और एक पाने में बीरगुप्त को पापा पाताना मार गिरा रेखा (१८) है मा मनोपरा के मोमेपन पौर देसी सरप पर मन ही मन मुग्प भी है, पितु फिर भी उसका इपय गवाही नहीं देता किमह मुमे घोरपर पोषरा से रिपार करे। मेरे भाव सममाने पर भी वह यही उत्तर देता है 'मैंने अपने पीपन में बम तुमसे प्रेम किया है और साप हो तुम्हारे सिमा किसी से प्रेम नही कर सकता। मेरा विवाह मसम्भव है। प्रेम की इस एकनिधता में मेरे प्रेम का रूप रेबिये दो बीरगुप्त पोर कुमार गिरि दोनों को एक साथ धोखा दे पाई। कुमारगिरि से अपना प्रेम चिपाती में बोयनुप्रा से कहती हूं प्रियतम । कुमारपिरि मोपी । और मूर्य है । रसकी पारमा मर चुकी है। प्रियतम असार में कोई भी पहिम रोगों के बीच नही पा सकता। पूसरी मोर कुमारमिरि से कहती है-'मैं पापको पोखा मही दे सकती । बहुत सम्भव में बीमपुप्त को धोखा दे पीहूँ। मेरे इस पसनामय प्रेम का कोई मत है । मर्पणता की माति एक बार दूसरे पौर दूसरे के बाद पहने को अपना प्यार पपित करते रिखाकर सनक ने मुझे रामसी रूप प्रसन दिया है। जीवन की या विम्बना पिसे सब होगी ! बीरगुप्त को पाठकों के हरप में तिमा पा स्थान रिमाया यया है। किसके मूल्य पर मेरे ही म? मेरी समस्त मानवीयता मेरी माबमा मेरा मारील और सबसे उपर मेरा चरित्र महकरके मेवर मसे ही किसी नये पाद को स्थापना में फुला म समाया हो फिन्तु मेरी मम म्पपा-एक मारी की मर्म म्यपा- उसे कमी ममा मही करेगी।

सहानुभूति की पात्र-मांडवी ग्रमायण के समी नारी पाम सहानुभूति पार संगमा के पात्र है क्योंकि समा का बीपन एक पौर बेपना की मम्मी कहानी है। मावा कौसल्या कण्य से पूछिये जिसका एकमात्र पुन उनकी पूजा अस्मा में १४ वर्ष की मम्मी प्रबमि के मिये बन मा पया यह भी किनी अपराप के कारण नहीं केवम सपरनी की या । १४ वर्ष बार पम के सौरमै पर कौसस्या उनका मुल देवतगी पा नहीं चम बिपाया पानता पा । इसी प्रकार मुमित्रा पार कमी १४ वर्ष के सिपे प्रपने पुषों से विमुक्त हो गई। मरत भने ही पयोमा मन्दिग्राम में हो कि केपी पे उनका माता सा पाया। इसके अतिरिक्त यदि भरम इस पी पुण्यामों पर दृष्टिपात तो हप की सारी महानुभूति और बेदना उनके दुम मैं तुम्म दिलाई मी। हमें ऐसे बहुत कम उपाहरण मिग विममें किधी को पगाम में पमी में माही हुई रारा गनर की गुमम सी कोमल राम कुमारियों के समान पाम भर बेरमा में धापना पहा हो। सीता भाम्प में मानो मुल पर ही म पा । को पररानी होने काही पी ससे पारी में बना पा पात्पर र सोमा परमिमा मे पति की प्रतीक्षा में १४ पप ता रो-रोकर अपने पीवन का मुमहरा समय दो दिया । उसके पीबन पा पार्पण ही समाप्त हो गया। तीमरी पाल भरत की पहली मtert।सहा मील पनो नरो बनौ म मी ज्यादा महकर है। रिस्तु कपियों की महिमा रेपिये मिस मेरी . लिये उन्होंने सहानुभूति पो गम ही नही मिरी । नुपमी पौर स्मीति में तो रमिमापी मी स्पेसितमररिया पा चिन्तु मैरिपीगरण पुग में सार्वजमि नमिता दुग में सहानुभूति भमुभा र रमाना पौर राहत को मारमा प्रदान की है। मेरारी मोरनी ही पपा प्रमी 6 पुष मह पारष पुम को सबसे उपेक्षित पुण्यभू है। मोरबी का स्पाम माता पौर उमिमा से किसी प्रकार कम महीपौर मेरे विचार में तो उन दोनों से अधिक है बोकि सीता राम के हाप पी रमोन केबल पति का नाता पा मानकर अन्य सबमा तोर दिया। सीताको पति क सार कुटिया में एबमबन का सा मानन प्राप्त था। मिसा को एक हारा पानि उसके पति पात र एम की सेवा में पुष्पान कर पेसम्मण एम की सेवा के लिये अपना मातम के कारण बन पये इसलिये उनका महत्व सबकी पाबों मया बा। कौसममा मोर मुमित्रा दोनों ही मिमा को सहानुभूति भी हष्टि से देखती पी पिस्तु मारपी की रमा म सबसे विपरीत है। उसके पति के सिर पर मक है पद पात्मग्लानि से ये दिन रात गमते रहो है। भरत कारण सरगुल मे यो सत्पात हुपा उसकी हानि से मरत का मोबन गम्प सा होगया था। कर्तव्यबहार्पर से पीमित अवस्य पे किन्तु सनकाय दूट का पा। ममें माता पत्नी भाई परिवार किसी की चन्ह चिन्ता पी तो मही कि उनके सर पो मापन गरि सो पम्म मेकर भी उसका प्रायश्चित्तमरमा पड़े तो कम है। रेनम्तिाम में राम लक्ष्मण सभी प्रपिकठोर पतकर एहेपे। ऐसी स्थिति में मोदीकी गाबीपना कीरिमे । उसपी मा उस पक्तिके समान मिसे मारा पाय मौर रोमेन रिया जाय। पति की भांति रखने सब मुबों को तिमानिये । हापों में पार पूरी और मामें पर सिन्दूर की रैमा मगारा मन ही मन प्रपने मुद्राम की कामना करती है। उमे कहीं से सहानुभूति प्राप्त नहीं। महममें पती हुई भी मह बनवामिमी है। कौसल्या मुमिका पौर नमिता पाटि पर माली पर पम्ती होगी तो वह निश्चय ही उनकी पांचो से माती उपेमा से तिममिसा रखी होगी । पुष या साप नही रेता at मावा मे लिये पुषबबू मी पिप सी बन जाती है। मोरनी के लिये कोयो एप में - कोई महानुभूति होमी ऐसी पाधा नहीं होती। मरत रससे कुप ही र मन्दिाम में एपे है किन्तु मारली से ये इवनी ही दूर पे बिकन मदमण उमिता से। प्रिय के प्रति से प्रोमम हो जाने पर वियोग की पीड़ा हिसी न किसी प्रकार सहन हो जाती है कि पांस के सामने हो मम को समझाना गा कठिन होता है। माग्गी मे १४ प तक इस कठिन स्थिति का सामना किया। बह नित्यप्रति मोजम बकर मरिणाम माती है किन्तु दोपड़ी मैठकर पति पात महीं कर पाती। एक परिचारिका के समान बाती पौर मार पाती है। भोजन का नाम रसार सौटते समय मध्विी की प्रतिों से सावन मारों की मी ममी कम पाती होगी। विधाता मे उसे भी क्या माम्प पिया है। सापो सेवा में रत एना पार भाबर ही भम्पा भामू पीना उसके भाम्प में मिला है।परम सास पार बहन की सेवा का मार उसी पर है। बही कठिनाईस पनुनय-विनय करके सबको मोगन बिताती है। यदि किसी दिन हमिमा पति-वियोग में पारा भी होकर कामा शो देती है तो मोदी को भी उसके पाप भूना एना पाता है। मिमा के पासू देलार माली का मन होता है पृषी पट जाप और बह सममें समा जाय। उसे ऐसा प्रतीत होता है माना कि सरतमा कारण यही है । अव उसे एम परी एक पर पैन महीं मिलता। सारो प्रसन्न करने की चेष्टा में उसकी निगी लुगी समाप्त होना । ऐसी सामी गपू के पिपर में साहित्यकारों का मान या प्रापर्वार। करिमा इयती पहन सबेपनात्मक होता है पर महिनी के विषय में बास्मीकि और तुलसी की अपेदना क्यों पापत महोई पार है। सपा का भार भागा हो जाता है यदि सहानुभूति में कोरो पर मह रेखा पितु यदि कोई पूमने मामा महा पापा मार मनुष्य से पोस गमता पर सहानुभूति के प्रभाव में घिर भतप्ता निमाई देवी है। पति पुन प्रसार माता-पिता की पौर में भी मारली गोमहानुभूति नही मिली। सोठा मौर मिनापीम्पपा जनक पौर चमनी रोश्यारा म्पषित की है क्योंकि उन कामों के पति बनमासी है। सीता राम के सा प्रपश्य है किन्तु उसके सरीर पर मस्त रेवार पार गम संगम मटर देवार माता की प्राईकरणा से भर पाई। विस सीता मे दीपक बाती भी कभी उनीम की हो पागत के हर सहन करवीपा ऐसार कौन सहरम है गोरोन पाया। पति वियोग में नित्पप्रति सर्त हुई मिमा की पीड़ा से बना-मममी मिाय ही म्पपित थे। किन मरिया के प्रति सबकी सहानुभूति रेस हो। उसके पति को सम्म मिमा है बह राबरामी बनने वा पी रसके प्रति सहानुभूति सी ? मुष में पहानुभूति किसे मिलती है? पर मरिषी को बता मुब मिमा पसे कौन नही मामला । उसकेप में मरते हुए हाहाकार को सुनने पीर देखने का मकान फिसको पा । यह पति म पौर पिता कुत योगों पौर से उपेक्षित ही। बहनों ने भी सहानुभूति के दो पर उसके प्रति प्रकट नहीं किये । उमिमा के लिये सौता, सहानुभूति से प्रतना तो मार भाग्य को मेप पर मौहमा महादेय। रामम भरमण तुम हो तपस्पृही में गम में भी पापही । पनवासी है निर्मोही हुए पस्तुत तुम रोही ॥ माहकर अमिमा के त्याग की प्रसंसा की। किन्तु मारली की पोर किसी की टि महो । भरत की पहंसा में एमापन के पृष्ठ मरे हुए है पर उनकी बमपल्ली में रनको कठोर त सापना में फिदमा मोप पिया इसे किसी ने नही देशा । यदि सी की तरह मारयो नी भरत महारती कि तुम्हें राम करना ही पोगा पिता का बयान हाती तो मरक मिमगा मेरा काना नहीं मानो तो में प्रास रेगी तब मरत क्या कणे ? सारी तपस्या परी पाती। तुमती की रामायण का पनुष मार ही हवा । मीवा में बनाने का हठ पिया तो राम को मानना ही पड़ा । पदि मारकी मी पसा हि कराठी सो शायद भरखको राग्य स्वीकार करना पड़ता और ऐसी स्थिति में पुस्पों के सब भाव रखे रह पाते । पलियों के स्पाम पोर तपस्या से पुरों में समान में दो स्थान प्राप्त किया है यदि उसका मूस्पोकन पिया गाय वो पमस्त नारी वग पग और सम्मान के सर्वोच्च पासन पर पासीन हाने योग्य है। रामायण की मा में सचमुच मारवी का स्थान बहुत महत्वपूर्ण है। राम के वनवास और पसरप की मृत्यु के बाद पयोध्या के राम-कुस कीम्पमस्या का सारा मार उसी में समाता है। सबभोर से उपेक्षा और पुणा सान करके भी उसमे सबको प्रसग्म रमन ा भरपूर प्रयास किया। पयम की यह उपमित का हम सब की सहानुभूति पी पान है। कवियों की सहानुभूति प्राप्तकर जिस प्रकार कैसी उर्मिला पशोपरा विष्णुप्रिया पारि देवियों की पमा सबकी सहानुभूति का विषय बन पा है, उसी प्रकार मारली की म्पमा मी किमी सहाय ममि की पापी बाप मुखर होकर सहानुभूति प्राप्त करेगी।

मारतेन्दु की 'जातीय सगीत' योजना भारतम्य युग उन कोटि की साहिरिया रपनामों के प्रभाव में भी हिन्दी साहित्य के इतिहास में गौरवपूर्ण पर पर पासीन है इसका प्रषि काप तयुगीन साहित्यकारों के उस रएिकोण को बिसरे नाराये माहित्य और समाज के परस्पर संबंध को परिचित बनाना चाहते। मारतेन्दु युगीन पाम्म ही सर्वप्रपम म्पत्ति पौर मम की संकुषित परिषि स निकलकर बनता और समार की विस्तृत भूमि मे बनविताय प्रयुक्तहमा पपपि भारतेन्दु गुम का भभिकगि काम्प (माटों को धोकर) पुरानी परिपाटी पर सिवित गारिक है किन्तु वे बनाएं, जिनमें करियों में लातीन जीवन की विविध समस्मार्मोमा प्रकन किया है साहित्य के इतिहास के लिये नवीन है पौर देस उपा धमार के लिए मत्यन्त हिवार सिरहा। कपिता या नाटकाएगीतकामीन सामानिम पवनतिक तपा प्राषिपदमा का निरपरण पपा भविष्य के लिये उन्नति का मार्ग प्रश्न करके इस पुम के कापियों में रेप की वर्तमान बागति और स्व म्यता प्राप्ति में पड़ा महत्वपूर्ण योग प्रान किया है। पेशहित र सिप रचित काप्य में भारतेन्दु बाहरिरापन्न की चातीय मयोत' योजना सर्वाधिक महत्वपूर्ण है । सामाजिक नबोधन में इस सुम नाटकों में भी यह कार्य नही किमा पो साधारण दोनबाम की माषा में मिक्षित मुचारपारी गातो मे किया है। माप्ते के समय में सर्वसाधारण बनता में करती तुमरी माम्हा जापनी पारिगगारिक मरहीम गीती का इतना पषित किरन समझ म मलाग्य को कोई मुनता पापौर म कोई मास्थित

उपदेश मापसों भादि की पोर मान देता मा। वकालीन बना
की पति का पक्ष भनुमान कवि उदेस के निम्न पर से दिया था
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पतिरित्तन की बात है नएम की
जपा-मात, फिन्त वाम माने को।
कहा 'उदेस' भरें सदर मत सबै
ती ठेग-वाहिन को बना ना भयाने को।
पार र वाहियात के वचन को
तमि के पूपन बैद परम के बाने को।
पुरि गवार 8 पदे रिलकि देत
पासा पगाको रुपमा रोगबाने को।
स्प भारतेन्दु मसी की तत्कालीन सोप्रिया पप में
लिया है-
सो माख पर सीई कसरी
मिटि पुर में सपेदी सब पाई थी।
पुरबेरकी मन मोह माई कसरी
उप-पन मार पार माई कसरी।
ऐमी परिस्थिति में भारतेषु ने पनादय से इस पुराने गीतों का
मोहरकरने वाबनवा में मत्साहित्य के प्रतिपिपार सात्विर उम्मत
भानमामी का प्रसार करने के लिये पुपो मीठों की जैसी पर नवीन
मुपारपारी मीयों की रचना बीड़ा उठाया । रम्होंने समपम मिशानों
तपा साहित्यकारों के सम्मुग अपनी मोरना का इस मप में प्रस्तुत मिया
भारत की नमति केजी पनेक पाय महात्मागां प्रारकम
मोष ऐ ! म एक पौर मी उपाय होने की पावरपरता है। इस
पिय योगो मग मौर सम्म प्राप्ति होते है शिर ममापा
रख रेप्टियोपरमही हाले । मोलुमने सारा गाय मयात

सब उपनगर मार मसीरी वा मुमा वीर। मरि मरि यमुमा उमा चमतल मयनम के तीर ।। हवस की अनेक प्रकार की अनुमतियों से युक्त पूर की गोपियों का विरह पपन पाप में अनूठा है। सब के समक्ष गोपियों मे पम्प पौर हास्पममी जैसी गतिमा ही है सनमें कारी माम्बिवापता नहीं अपितु हम की बह मम्तिक पीड़ा छिपी है जिसके कारण रिन-रात एक पन रम् बन नही मिनवा ।एम पर हसरा हो बाता मदि कोई रसे मुनम । गोपियों ने उसको म्टो सीपी मुनाकर अपने स्प का पर्व हतका किया है। प्रेम दिवानी मीरा का दिइ सबसे प्राप्त है। यह उनके प्याकुल एप की निजी पमिष्यक्ति है। उनके रस का बर्ड सम सिमाम कोई नहीं पामता । यह विपिरहिणी। बर से होड संभाना पण के पिए में पागल बनकर मोम्साग ह मर्यादा समको विमोचती रेपी। सब प्रकार के कष्ट सहे परनामी सही फितु प्रबिरिया सपा से मावा नही होगापासीवन रामके विप में उपती रही । मीरा के प्रेम मौत मतों पर प्रेमियों छहार बन गये है। इन पीता मे मारी स्वय मार्मिक प्यथा मूर्विमती रिसाई देती है। मत्तिलाम के बार रीतिमुग में नापिकामों के लिए का व्यापक वर्णन हुमा किन उसका स परिवर्तित हो गया । मयू के प्रभाव से नारी की मागुता कोममता परियों का सितबार बन गई। अनूठी रक्तियों पर मारा नायिका पिए का तापमान मात्र देना उनका कप्प होगया । इन नापिकामों का विक ताप मा प्रषिक कि माह पूस भी ठी वो म मासे को पार कर भी एसियां उनके पास जाने का साहस नही कर पाती। बोतनों का गुसामगत गिए संतप्तमापिका भी लास माप बमकर रह जाता है- प्रौपाई सीसी मुमति दिए परत मिमसाठ । विष ही मूग गुमाव प्यौ घीयौ घुयोन मात ।

. पपाकर की मापिका तिमी चकमक है कि यम स्वास के झोकों से मोम के समाम मुस बाती है। रीतियुग में सर्वम इसी प्रकार की मां मई कम्पमामोरा पिए का वर्णन हपा है उसमें कही इपय यो गंभीरता समेदना पौर मामिाता के दर्सन नहीं होते। रीतिमुगीन गायिकामों की मिला मर्मश पाठों का बम-साई करने में मसमर्ष। माधुनिक युग में समय मौर विचार परिवर्तन के साप पिए के स्प में पुन' परिवर्तन हुमा । मापुनिक माम्म में पणित नारी का विरह मौखिक पिट पौर स्वाभिमान की भावना लिये हुए है। हरिपोप के 'प्रिय प्रवास' की विरहिणी रापा के मियोप में पेटी । सेतप्त होती है फितुरन रोने में ही बीमन प्पतीत मही पर देवी वह पए क प्रेम में पिर पुमारी पार पपव-हित का व धारण करके महती है प्यारे जीरे बमहित करे मेहबारे म मा । मेरे श्री में हदय पियमी विस का प्रेम आमा । णीय गाति के इस युग में कषियों ने विरहिणी नायिकामों को यहित कापों सपा परोपकार में समन दिखाया है। विरहिणी राषा लियो म्पमा मुमार दीन दुनियों की सेवा में संसम्म दिलाई ती है। मरोंपी हेरा में सप्त मिसन पा पानन्द प्राप्त होगा। 'साकेत'दो मिना तपा 'पभोपारा पो पगोषरा का हिर्गम परम्परा ने मिन है। दोनों गायों में मंपिमीमराम पुप्त में भाभु मिक मुगमनाम नायरे मारों को प्रमिप्यता निमा है। पगापरा पुर की पहली है।पुर की स्याप तपस्या का पोरस पापों में पा इतिहास में बहुत अपर मै पात हुमा रिमा लिहिणी याापरा कुपी हुए परमानों पर बात हुए पोमुपों पा स्पति रिमी ने मही पिया । पुप्तरी ने मारी हुम दीम मना । प्रममा

(११८ )
पौर काम्प द्वारा से पमिम्मफिरी। पुर पमोपरा को मोती पोरकर
चले गये । पामने पर पशोपरा का संसार सुट गया पर भरेमी रह
गई, एक दो महीने या बो सिये नहीं सा सरा के लिये । मा
पा छोटी बात थी? पहोपपके इषय पर इसका बिना प्रामात
हुमा उससे अधिक रसके स्वाभिमान पो ठेस पहुंची। मारी की पावन
की बाबा समझकर गुपके से गुरु का बना बाना पचोर पसी पति
प्राणा स्त्री के लिये बो अपमान की बात पी। वह इस पामात से
विममिमा कर समि से कहती है
सिवितु स्वामी गये यह गौरव की बात ।
पर चोरी चोरी गये यही का म्यामात ।
सचिये मुफ से कहर जाते।
तोकामा मुझको अपनी पप बापा हो पाते ।
मारतीय मारी पति की प्रसमता में प्रपनी प्रसन्नता माननी है।
महाणिया पतियों को सुनी-मुसी पुर मिये सगा कर रख में भेज
देवी पी फिर भारी इवना दुराम क्यों ? यसोपए इसे नहीं सहन कर
पाती। यह नियोपिनी मन होपई हो पिताप के स्वाभिमान में
उसके पटिय को मिटने नहीं दिया । वह कहती है.
सिरि मार्च की पाबा मारी दो उसकीया मति है।
में भी नहीं प्रमाव बपत् में मेरा भी प्रभु पति है।
दुस पर सिद्धि प्राप्त करके लौटे तो मामिनी यगोषरा उनके स्वायत
के लिए मही पाईप में मिमन को प्रारक्षिा बारभाटे की भांति
उमा पी। किन्तु गा पुर मे उसे विदा करने का पौरप नहीं दिया
तो पाउनका म्यामत से परे। यह मन को एममाती है -
१ मम माग पगमारी।
पिनती करती हूँ मैं तुमसे बात न बिमड़े मेरी ।

-
हारकर पुर उमः परवाये पर प्राते है और पहले है
मानिनि ! मान मो मो ही तुम्हारी बान ।
दामिनि । भाया म्पयर पर यह दव वन-मपान ।
निय विपामारी का यह सरप अपने प्रकार का अनूटा है।
मापुनिक युग की नारी भावना प्राचीन युग से नितान्त मिप विरह
में भी उसके पौरप की पूरी प्रतिष्ठा दी यई है।
'पामायनी में मनु पा को रेखम इममिये छोड़कर पो गाते है
पिबह मय मिमु को चिन्ता में मीम है उसे पति की चिन्ता नहीं है
मोग गिलास में पर मनु का साप महीं देती। पुरपस्व के प्रभिमान में
मनु मारी की सत्ता भून गाते है
मनु तुम बड़ा को गये मूम ।
तुम भून मयं पुम्पत्त मोह में एम सवा है नारी की।
समरमता है मंबंध बनी अधिकार और प्रधिकारी की।
मग मनु लिए बहुत म्पषित पी पिन्तु मनु के जीवन में
पासपमार उमस ज्या स्टार है। मेर-दर की सफा पाने
हए अन्त में परापी परण में पारा ही पनि प्राप्ण मरते हैं।
वियोमिनी परामा तन-मन पानम्ब से भरपूर हो पाता है। यहां भी
रियाणा में कपि ने मारी के स्वर पति की मठिण भी।
पिएम पुर्षों की विरहिणी माविरापों की मानि मायक रियोग में
मा पस्तित्व ममान नहीं हो जाता। पारा साहिरपसार नारी के
लिए पर्णन म पोरी मारमा पा पाय न मकर रमप पों पर
गितार रखा है और मुक्तिनमत ओम उमा विषेषन परा।
पर रिएपीपपषित म सामों पणन मी प्रपना गरि मय ढंग
में नापिका को पिएमा प्रस्तुत करत।। मम मापना पौर
कौसिमा हाममान पान है।

छायावादी कविता पर रवींद्र का प्रभाव रबीन माप टेगोर की बहुमुखी प्रतिमा ने मारतीय कला पौर साहित्य में एक नवीन युम की मृष्टि की है। साहित्य संगीत विषकमा पर्म रन सभी मेमों में उनकी प्रबार पति पी ! हिन्दी पाहित्य के पायावादी सुप पर उनकी कना और विचारों का प्रमाण प्रत्यक्ष नमित होता है। चापावासी काम्प को मापा जैमी विपय भाष कमा समी पर रखीवनाप टैगोर को स्पष्ट छाप । यो पो २.नी तादी के प्रारम्म से ही मना साहित्य और साहित्यकारों में हिन्दी को प्रभावित करना प्रारम्भ कर दिया था किन्तु सम् १९११ में टैगोर की 'गीवास्ति' पर 'नोबस पुरस्कार' में नवीन कवियों का ध्यान विषेप रुप से इस पोर प्राकर्पित किया। बहुतों मे तो 'पीवासति को अपना भाव मानकर उसी की रचनायें हिन्दी में को। विनेरी-पुन की इतिवृत्तात्मकता तथा मैतिकता से मकर वायापारी कमियो मेकाप्प में बिस प्रकार की गोवारमा और मभिम्बनारमा पेसी को अपनाया उसकी पृष्ठभूमि में रखीन का महत्वपूर्ण मोम है। पापावारी काम्प में नारी सौप प्रेम प्राविको म्पसमा का प्राचाम्प रसीपा परिणाम है। मारी के विपस मे रबीनके विचार बड़े पावतमा कोमस । भारी को ईस्वरकी विभूति पा सृष्टि की रमशीयतम मस्तु मानते थे । उनके विचार मे मारी सौवर्ष प्रम करमा ममता की पासात मूर्ति है। उन्होंने 'उर्मसी' प्रेमेर अमिपैक गुस्मा चिया' 'मानसी' प्राधि पितामों में अपने नन्ही मात्रों को प्रस्ट किया है। प्रापावारी प्रमुप कषि प्रसार पम्त निरासा पादिपी मारी पिपया कषितामों में उसके

( १२१ )
उपाइरए प्रभुर मात्रा में मिमी है। रवीण की नमी के दुष भाष
'पन्त की 'भावी पत्नी की इन पक्तियों में प्र!ि-
संक्ति मोल्ना सी चुपचाप
गति सममित पतर पाव
पास बप पाम सकोगी प्राण!
जपकर प्रसार कौ'देवबामा'धीपैड पिता में भारी को पवित्रता
पौर मधुरिमा का चित्रण सममम उसी प्रकार का है.
मुरसरीमो मा बिमल पाप
स्नेह-गम पी यह मपम वाप है।
प्रीम-निमिया र मोती है।
मपुरिमा हवनी कही होती है।
प्रेम पौर सौन्दर्य को उपासमा तपा स्पबारी मारना समापार की
प्रमुप विगेपता है और यह विशेपवा रवीन्द्र की समाप्रियता मोर विचार
से प्रभावित है। परन्त के प्रति निमामा निग्रया पार मिसन का मा
मार रबीम की निम्न पतियों में है -
जाने कितनी मुगद धाम मैंने तुमारी पगपनि मुनी है और तुम्हारे
मेरे हाय में भाकर मुझे निहित रूप से पुकारा
केबत में ही प्रतीक्षा में रोश और म्पम की प्राणायाम तिम-विमरने
पपमा हपय बनाता एमा पमा तुमने उसकी मौत पगपनि
नही नुनी पर माता पाना ही क्या है। प्रतिषण प्रतियुग प्रतिनि
पौर प्रनिराठ
पही माप महापी की रपमापों में ममित होते है। प्रियो
पियोग में मा विमोगिनी पौर प्रगा मुहापिनी रनकी 'मुपाता
भोग मरा नाम सा प्रिय भाने वाले है सबा 'म मीर भरी दुगनी
बानी' पारि पलायें इसी प्रकार की है। परपी'मान निमपए
पारिवरिलायों में पम्परारी मार प्रति है।
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( १२२ )
दुध पोर पणा इस दुनो करियों का प्रधान मिएम है। रोम
पप पिस प्रकार एक पियापिनी मारी विधमान पत्री पीकर
भी विरही होपा पाता का भाव मेकर बने हैं।
इसके अतिरिक्त पायावादी कविता की मापानी पर भी एपीन्द्रका
प्रमाण है। पीठ मौवमाटर भागना मादि रचना कुष सीमान
समी का परिणाम है। इस एप के काम में देयता मापा में
भागमा पर्यो का प्रचलन भी पविक है। पगाबाद कपि भारतीय पौर
पापात्म संसति के समन्वय का प्राय यही सिवात कर मेमो
रवीन का पापा। पंत की 'ग्योलमा' वा प्रसारको कामना'
इसका उत्तम उदाहरण है। बस माति प्रापापापी युग की पात्र
पाहणी है। उन्होंने साहित्य में नवीनवर भीपणे कसे
प्रम्प भाजीय मापाों को मय भिमान का संदेश दिया गप्टीय
मामा पार साहित्य पर सोमनाथ मोर के पुपान्तरकारी व्यक्तिल
की भिर पाप है।

राष्ट्रभाषा हिन्दी के प्रति हमारा व्यवहार सन् १९५० में भारतीय सविधान में हिन्दी को स्वतम मारत को रापमापा बनाने का निणय होगमा पा । उसी समय यह निश्चय हामया पा किसपिान का यह निर्णय १५ बप बार भाद् २६ बनबरी मम् १९५५ से कार्यरूप में परिणत किया जायेगा । इस नियमपी उस समय पुप धोनों के वापि ममी हिन्दी में मह सामर्प नहीं है कि बह एकरम अंग मो को मपरस्म कर प्रमापा मार मार अपमे ऊपर मे सके उसमें पारिमापिक रामौका भमाय बिमान सम्बम्पी दिपपों का प्रयापन हिम्दी द्वारा नहीं हो सकता हिन्दी का वारिप मी पाव ऊँचा और विस्था नहीं है शिण भारतीय लोगों को उसे समझने पार प्रयोग करने में करिनाई होती है, मारि मारि । १५ वर्ष की इस प्राधि में हिन्दी की उपर्युक्त कम्निाायों को दूर करने का प्रयत्न पिया नायगा पौर पर हिन्दी णमापा के रूप में म्यगाव हो सकेगी। उस समय मई १५ बर्ष को या सम्मी प्रबपि किसी भी प्रकार हिन्दी हित में सिर नही हुई। मौके कारण परमापा के प्रमार में कर प्रारकी पाप उपस्थित ह । किमी भाषा का प्रमार पा मियार उम निरन्तर प्रयोमारा होता है। यदि समके स्थान पर पा समो माप-माष इमरी पिसी भाषा प्रयोम पपता है तो उसमें कमी यह समता मी पाती हिसारम प्रमानि पारों के निर पपगा मपा पण पारमारिफमगार लिए उपयुक्त पिर हो सके। ठि माई महारही मि प्रसार मनुष्य में पापसमता पाती है उसी प्रकार निरन्तर पगार में ही भाषा पासपम पम पाती है। रस मिलाया मीनों की प्रापिपी मायामा नहीं होती। राइटी पूर्ण भाषण - ( १२४ ) बोमवेबोसते स्तबाप रचना करने मगता है। उसे म्याकरणारिकी पपेक्षा नहीं होती। किसी भाषा के प्रसार में उसका निरन्तर प्रयोग विना महत्वपूर्ण होता है इसका उदाहरण सैर में अंग्रेजी का प्रचार है। १वी पवामी के पूर्वाय तक इमर में सम्पूण प्रशासनिक कार्य फ्रेंच और लेटिन मापा में होता था। गासों को मापा चपी । पन मापा होने पर भी परेची को इमर्मर में मयमग पही स्थान प्राप्त पा को भारत में भारतीय मापामों को है। यहाँ सोग अपनी मातृभाषा घोर कर फॅप पढ़ना गौरव समझते थे। सम्म सोनोंदी भाषा में मानी बाती भी प्रत को परिवारों के बने फ्रेंच फर्मों में पाते थे और पगी बासना अपना अपमान समझते थे। इस मानसिक पासता से फुटकारा पाने के लिये सन् १३५२ में पार्मिपार्मेट ने एक अधिनियम बनाकर प्रप्रेमी का प्रयोग वामू किया । किन्तु अनिवार्य म होने के कारण मोरों ने प्रेमी की मोर काई म्मान नहीं दिया। सत्तापारियौ तमा पुमौन बरानों में भरेगी विमानामा प्रकार के वरेकर च की सत्ता बनाये रखने की थी तोड़ कोशिश की। तब सन् १-०१६ में पूसरा पपिनिमम बना जिसमें प्रप्रेजी का प्रयोग न केवल अनिवार्य कर दिया पया अपितु प्रोत्री के प्रतिरिक्त प्रम्य भाषामों में प्रयोग पर बम विकास किया गया। इसके बाद भगेगी प्रपनी पूर्व स्थिति में चाहे जैसी भी अधिकसित मापा पी अनिवार्य प्रयोग से उसमें सब प्रकार के प्रशासनिक मार्य का सुधार रूप से घमाने की धमता प्रागई। पारे जाकर गान बेगम रंगमर की प्रपितु रेस वियों को एपमापा बनने का भी मारण प्राप्त कर सकी । कहने का तात्पर्य यह है कि भापामों का विपस्स मुम्प माषा पी स्पिति को नियत बनाता है पा रसके प्रचार पौर प्रसार में सावट गपा रहा है। दिनी १५ वर्प के पाकार भी गमापा होने के लिये उपयुक्त सिद्ध नहीं हो पी है इसका एकमात्र कारण पगी को उसकी सह-मापा बनाना है। यदि प्रारम्भ से हिंदी का प्रयोग ।

( १२५ ) पामू कर दिमा नाता ता मापा की यो समस्पा पार सम हुई, कमी नहीं होती। इस दृष्टि से १५ बो की मषि हिन्दी के प्रचार में सावट निरहुई। इन १५ वर्षों में मप्रेमी प्रपाम मापा बनी पी पौर हिन्दी उसकी सहमापाप में या हिप नहीं के बयर प्रयुक्त हुई। प्रांवों में विपि प्रांतीय मापार्यो का प्रथमन हो सकता है किन्तु को पापा सम्पूर्ण या का प्रतिनिषिल रखी हो मा गो देश की एकता की प्रदीप हो यह एक ही होनी चाहिये । रेम का सारा काम तमी में होना पापश्यक है। पुमरी हानि पो म पनि के कारण हरे पर यह किस ममे कान में रेन में मापा को मनिवार्यता र महन्प रम पम होता पया । १५ बों में रेम का बातावरण बन पमा । एक सो हुये माता- पण मोरार्य प्रामानी में सम्मान हो जाता है समय बीतने पर उसमें भाग रिण मस्पिट हो जाते है । 'मुभस्म भीग्रम् का सिंबांत इसीलिये प्रतिर है। पुम पार्य में देरी ठीक नहीं । स्वपिता प्राप्ति के गार पपपोत का पावापरणाममा हुमा मा । देशवासियों म एक मनोना उत्साह और पेन मिप बुध करने की साप पी। मन पोपता की भावना लिएमान भी । म समय पनि दिलीका पोम पारन हो पाता तो पिसी को इसमी पापति म होती । सोग रैम के प्रति अपना रत्तम मानकर मे स्वीकार करने । शिन्तु १९ वर्षों में देशा को पिपति पर पान पई। पार मा मापापापी वापरला पौर प्रांतीया पा विर्षमा पावावराणा प्माण है । नाप तापपार मापना महम सोश हो पपा है । सानपतो म पभार मोपों को राहीम महब मन बात तुप पोर ने दिमाईल मग मस्तिान के प्रति भी जनता की प्रास्पा पहनही है गो पार में १५ पर्प पूर्व पी। ऐसी स्थिति में राष्ट्रमापा रा बह ११ बप पुराना मेरम मार होने की परत निरवर करना ना ऐमा गिमाना बनाया फारिसने नाम मनपात पिसवा कर ऐपुष कोष पार पी

( १२६ )
परछे कि हिन्दी किसी पर पोपली नही पाहिसे परे-धीरे उसका
प्रयोग हीरिये । एप कहते है जब तक माहिती मापी स्वयं स्वीकार
करें, हिन्दी के लिये पनिवार्य नहीं होनी चाहिये । पिए मुनेश
कपपम नेता पी प्रलापुरा माइते है कि बर तक संविधान में स्वागत
१४ मापा मापा बन कार्य तब प्रोगी हो समनापा के
रूप में बारी यनी चाहिये।
ऐसे मिमनभिन्न विषाराम सोगों के माँ को स्वीकार कर दि
एमापा के प्रम को सुनाया बाप तो अमबत तानियों तर या
समस्मा इन महीं हो सठी । बो मोम हिन्दी से मुगार १५
पर्प में या बाम बग्मांतर भी हिन्दी नही सीख सकते । मनमा को १४
वर्ष में हिन्दी का नाम मही प्रप्त पर सके में पामे प्राप्त कर सईम एटमी
भी गया पारटी है ! सत्य बात यह है कि हिन्दी मापा की कठिनाईमा
भामाहा उसे स्वीकार करने में कार नहीं है अपितु मास्सरिक हा
पर-राममतिक सांसाविक प्रांतीय और न पर्वो की समस्यायें।
पहा पर मलयालम पापामों में समय तने समक
प्रान्तों को पिली सौरमे में परिक कठिमाई नही होगी परन्तु कोई सीलमा
पाहे तम! याद तोगों का नाकि भापा का यह प्रायोजन
पो २९ बनवरी बारा भाग पौराणि पाठियों का ...
पुरामा ममा परि हिदी से हो सका विरोध होता ठोणीय
पर का अपमान को प्रोमा पुस्तकालय को बताते
और विचारमा पत्तों को क्यों 'पपनाते ? को भी दो ११ वर्ष की
अपि ही पदमापा भाम्पोजन की रतरदामी है।
बह सब होते हुए भी यदि सरकार को वाम्म होएर १५ वर्ष
बीपि परमापारे प्रयोग के लिये रेनो पीबी पो ससका कसम्म पा
किसरिया में मार त्रिम पार दोष्ठ कार्य कपी । हिन्दी प्रमार
तिम मुखी प्रपल करला सकारता दोनों का परम कर्तम
पाकिस्नु पनि ममापि में हिनी प्रचार प्रार शिकाम के

(१२७) लिये किमी प्रकार का समुचित प्रयल नहीं हुमा । बिरेमी भाषा की सता से मुक्ति रिमाने में सरकार की पूर्ण उपेमा हो । ममता के १५ वर्षे बार ममता ने यह मो प्रमुमय नहीं किया कि देम में पागावी पाई पौर विदेसियों से उमें मुक्ति मिमी है। भाषा सपा सानपान एन-महन, पाचार-प्पपहार पार पठन-पाठन अंग्रेजी पग्य के बाद और अधिक प्रति भारत में फैली है। अंग्रेजी एरप में बच्चों के मिपे पवने पीगी तस नही तिने स्वतन्त्र भारत में पुमे । मोम भए उठाकर पेट काटकर भी पपिक फीस माम अंग्रेजी स्कूलों में अपने बों को पाने के लिये विगत हो गये हैं क्योंकि मानते है कि भारत मैं रनों का प्रग्या मनिप्य मप्रेरी पर निर्भर है। पसीनीकी * पर अंग्रेजी पामने नामों को मिमता है भारतीय मापाय पोर विधिप कर हिली पार मा भविष्य को बिगारा पाय ? पवनवा के मार हिली की रितनी उपसा हुई। पहले कभी नहीं हुई थी। सता संपूर्ण मोन विदेशी गासों को मापा से पणा परत और अपने बों को हिनी संसव पाना पोरस की बात समझते पे किन्तु सता भारत में हिन्दी में पड़ना पड़ाना मोसना पोर सिसना हीनता का पर्यायवाची पर गया है। हिन्दी हीन मनोवृत्ति की मूप मामी जाने सगी है। प्रत बोमोम सभी हिली पान पर गिनें उसके साहित्य का सम्मा बाम मी हिली में ऐम स्वराते है मामों हिन्दी बोलना सम्पदा रा मयण पा मूर्पता की निगानी है। बहुत मे नोों की तो यह धारणा है पिता पी एपमार सौटी मोनी है। पिवनी प्रतिभा निवना मान विपत्र में यह मा पानी भीमपाती मो इससे घर पर प्राम्य है सूर्ग और समय की गति पर है। मे सोग हिन्दी के नाम पर मुंह नान पोर राम नाहिस्प भी मी गाने है। पारपर्य तो पा दिगि हिमा मि मी भान नहीं भी दिली माहिप पौर दिनी परी प्राति सोम प्रधिभार में दुर्गा मानों में ही सरस्सीक बार पुषहै।

( १२८ ) संसार में भारत के अतिरिक्त भायर कोई ऐसा सपन देख नहीं मिनेगा यहाँ की रणभापा कोई विदेशी भाषा हापौर भारत के प्रतिरिक्त ऐसा भी कोई देश नहीं होगा जिसे मिया मापा से इतना प्यार और देखीय मापामों से इतमी पपा हो । संसार में सम्मता पौर संसति का मानोक कमाने वाला देश भापा के लिये परमुगापेक्षी हो यह सी टिम्बना है। जिस देश की सस भाषाको विश्व की प्रविधि मापामों की जननी होने का पारष प्राप्त हो उसके निवासी किसी विदेशी मापा पो मापा बनाने के लिए हिंसात्मक परोिजन करें, भार उपार मचाये पताका पारण के संविधान का अपमान करें, देश की एक्ता मम करने का पट्पन्न र इससे पाकर मारपर्य और क्या हो सकता है ? यह एक स्वता देश के गौरव के पमुस्म कार्य नहीं है। राष्ट्र का सम्मान प्रत्येक देशवासी का सम्मान है। उसे किसी भी मूम्प पर गिराना भयंकर मविक अपराप । राष्ट्राोह है। यदि भारतीय मापामों में से किसी एसी भाषा को राष्टभापा का पर दिया जाता जो इस पोम्म महोती तो बनता का किसी मात्रा में विरोप रचित भी पा किन्तु हिम्बी राष्ट्र की प्रवियत बनता की मापा है। उत्तर से रमिस तक पूर्व से पश्चिम तक भारत का कोई ऐसा पोना नही पहा हिन्दी बोमी पौर समझीम पाती हो । सन्त विनोबा मारे में स्वीकार किया है कि हिन्दी के माध्यम से ही ये समस्त भारतवासियों को अपने विचारों से प्रयत करा सके हिम्मीक बिना पनकी पश्यामा पौर पनका भूरान भादोलन असफल सिर होता। यही एक ऐसी मापाई जिसके बानने वालों की समा भारतवर्ष में सबसे पपित है। हिन्दी किसी प्रान्त पिरोप की भाषा मही है। उसकी प्रवृत्ति बनमारमक है। बह बात मासामी से सीसी मार पड़ी पा सकती है। इसके अतिरिक्त हिनी सतत पी मौरस पुत्री है। भारत की प्रम्प सब भापामो में संस्कृत मम विद्यमान! प्रा प्ररपेक मापा मापी के लिये इसे पाना और सीमना सर्वाधिक सरस है - । ( १२६ दूसरी गत हिन्दी ने की बहुत बड़ी सेवा की है। बता संकाय में देश के एक कोने से दूसरे कोने तक रामय मापनार्मों को फसाने मामी भाषा हिन्दी है । पराम मान, मुगपत वमा दक्षिण के मेवामों में इसे बराबर महत्व दिया । सबमे इसरा म्पबहार स्मिा पौर पचासंगम के प्रचार का प्रपल मिया । महारमा गांधी ने मुगराती हए मी देश की एकता और भारतीयता की रक्षा तिपे अपने भादोसन में हिन्दी को प्रमुख स्थान दिया। बाद में लिपीन ममे हो रेप में सवा बने रहें किन्तु अंग्रेजी भापा धीम से सौर इस दस से निराहो बानी पहिल। अंग्रेजी में रामता पी गम है और परिषमी सम्यता की संभामा बीमा ।। या पवासियों को देश के प्रति ईमानदार नहीं बनने देती। मप्रेमी भीम का कितना पहित किया है इम पर मरि सुमे इस रिचारपरंतो पायेंगे किसी कारण देश का मिपा स्तर नित्य प्रति पिणा पाया है। विद्यार्थी को प्रपेशी पाती नहीं से मारने के प्रयास में उसके प्राय लिपप गरेपित ए पाते। भिसा स्तर गिरने की पौर पर पानापारी पाने में परिम होने की मिकापत सब भोर से मुनाई देती किन्तु रोग का से भान भी उस पार से पाल मावाली मातीप्रतियत प्रेमी मानवामों में अपमे मिति सामी पूति में देगी सम्पवा असति, परपीप योगनापों भाषिक मोर सामाविरों में देश की बहुत प्रपिक हानि पी है। भारत की एक प्रविगत पमवा निस मापा ममममती हा रममे शासन पार्य पनाने माती ससारो मन रम पिठनी प्रगति की। यह भारत की बत्तमान स्थिति को रेसर व परमातूम हो पाता है। बीन मारमण से भाण पर है मोगामे बात चारापे रससमय परवीना महाप माने या रितुप्त हो गया ! म निसरीमापा नीति परम परिणतित होगई पौ। पापावाली मात्रा में उन दिनों हिली रोग प्रब करितामा भानुभूमिरी ( १३.) प्रशस्तिों भारतीय मसतिपौर बीरता संबंधी हिन्दी बार्तामोपी धम मबी रहती भी। वम समम हिन्दी मारतीय एकता का प्रतीक बनई भी के प्रति उत्तम्प का पाद्वान हिन्दी में किया पाता पाहिन्दी बार्तामों और हिली पितामों में उस समय च में पैसा बातावरण बनापा पह किसी से छिपा हुमा नही ।। देह पर बनिन होने से मिले हिन्दी में मारे ममते । पौर पर की परों का प्रश्न पाता है तब मप्रेमी की अन्तयिता की पुहार देकर सामान्य बनता के परमाम TT पिये पाते है। मापा के सरा में सरकार की पहारी मीतिमी भवान। इसमें तनिक भी सम्मेह मही कि जब तक अपेगी भात पर पाई ऐगी न मारत में पंजानिक प्रगति होगी पौरन भारत की किसी भापा का समुचित विकास होगा। हमारी पपीव पोजनायें क्यों सफल रही होती ? प्रमी के कारण । प्रसंगी मे देसपासियों में से देशप्रेम की भावना बा मूल से दिनप्ट करती है। दोनों में रारें पाती। क्यों? इसनिये कि हमें रेस से प्रेम नहीं पैसे में प्रेम ! हम अपनी मातृभूमि की समाति में तत्पर नही हमें यहाँ की भूमि से प्यार महीं ! प्यार ससिपे नही कि हमें इसकी शिक्षा नहीं मिलती। हम इतिहास पर अम्मर का हम पाहिएप पर प्रबो का तिकता मोर धर्म बुधि से कोती रखमा कपके लिये प्यार कहाँ से सत्ता हो? माठ की वर्षमान पीको एमावण और महामारण बेर पोर पुराण के नाम से पन भि हमरावण में मन-पुर्पोपन में प्रस्तर माही पानती यह भारत की मरिया पहाड़ों के नाम नही मानती। तब रेप विकास में उसाय पोर घरीर से त हो! अन्तर्राष्ट्रीयता पसर में हमारी राणीयवा नित्पपति गिनती बारही है और हम इस मोर से मसावधान है। एक राष्ट्रमापा पीई राष्ट्र में बहुत से प्रश्न संसम्म है। यह हमारी सम्पता मोर समतिमा प्रस्ताव प्रति प्रेम और कम की भावना का प्रश्न विमा सरका पपीय मोबनामों का मौर सामारिक स्पिति का प्रथम है। सही में प्रानिक प्रति घबर पर है पोर यही बस भाव के पुप में सबसे प्रागे बरे हुए हैं जिनमें घी मापामो पो सोपरि स्थान मिमा है। इस वासियों को अपमो मापा से बहुत प्यार है। बापाम बीन मादि दंगों में सारा कार्य उनकी अपनी भाषा में होता है। दूसरे के मद को रेलकर अपने को हीन समझने की भावना इममें नहीं है। भी ये निरन्तर प्रपतिधीन।पी का साहित्य सुन्दर है, यह प्राप्ीिप मापा है इसमय पपनी भाषा महत्वहीत! यह सापना भारत मे स्वाभिमानी स्मक परे मिमे सामनीय नही है । मोमोम प्रवेगी साहित्य पर मुगाप्रसमापूर्ण समका पम्पमन करें। ममें से किसी प्रकार की कावट नही होनी चाहिये किन्तु राए कमिपे उसकी सपोपिया सिर करनेमा प्रयत्न उणे नही करमा काहिने। रेगरे स्वाभि पान की माके मिये गारतीय मापा ही प्रभाषा होनी पावस्यक है। राष्ट्र का मोरगी में है। पी एममोपानाचार्य को माग चिनी पनि ति कारणों से हर हिन्दी बिरामी बन गये। बहर अपय तक एिकीको पदमापा बनाने के प्रथम पारापाती हैं। उन्होंने स्मतंत्रता से पूर्व पोर स्पषतामार बराबर इस पाठ परमोर रिया पापही राष्ट्रमापा हिली हामी बाहिय । मार्च १९२९ में होने भएपरिर्स एसोसिएसन सम्मेलन में भापण करते हुए कहा था- "एपमैविक, सास्तविक, सामाश्रितपा म्यापारिक समाप्टियों मणि रक्षिण भारत के सुमो पालामा एक अनिवार्य भंग होनी चाहि mmmmsमी शिल कामो का हिन्दी मौखमी पारिस पोष्ट्रि भारत में रिनी भी प्रावी परतोकि सरकार बनेसी दो हिन्दी ही रेरस परीय पापा हो उनी।" उमी दिनों पर सन् १९२९ म रामामी ने रिनी दूरदरिता से हिमी मी मागगमा पनुमय से दो यह नो निम कपल से स्पष्ट होता है। पर मेगनम परोपिप' मामा मापा मारो में ( १३२ ) “पपेशी पारत की रामकीय भापा तभी तक रह सकती है पर तक प्रमेय यहाँ । बा रामसत्ता भारतीय मोगा के हाम प्रायेपी पब प्रमेवीकोबारी रखने से मेतामों और पधिकारियों पर जनता का निर्म पण कमजोर पा शायमा पोर सवापारी वर्ग ससा बन बैठेगा"।। "बणतंभीय शासन प्रणाली में एक पन्धी सरकार के भिमे मह मावस्या है किस अधिकारी जनता से समस्यापित करें। इसके लिये भारतीय सरकार को कोई भारतीय भाषा जुनी पाहिपे । मम तो नहीं कि हिन्दुस्तानी मा हिन्दी ही इसके मिप जुनी मानी चाहिमे पही एक ऐसी भाषा है वो भारत में मर्माधिक सम्पा में मोती और समझी जाती है। पही भारत की जनमाषा है।' मागी मप भारतीय मापापों का विवरण देते हुए कहा पा कि हिली ही ऐसी भापा है रिसे बेगानी मराठी पुनपणी और इसी प्रकार के प्रम्प भापा-मापी नोपसी पासानी से सौस एक चाहते कि बक्षिस माठ में पनिवार्य हिम्पी योगना धातूपी पानी पाहिये । इस एप्टि से देखने पर पदभापा को भनिवार्यता मोर उसमें हिन्दी पी प्रमुखता स्वत स्पष्ट हो जाती है। रागावीही नहीं बच के प्राव पमी मेलामा तपा देश के उन्नायकों ने राष्ट्रमापा हिन्दी का समर्थन किया है। प्राण हिन्दी के विषय में नेवायों को इतनी मिमा i Lagtub ototherily the language of the drains tradon mo foox La conducted by English. But when power le tandlerred to the people of the country the cotinuat of Eorteh rould w to make the control of the people over thdr reperco tard and urmat and an exclum porty to cut of mandation It u total of good portocomte detracto form that the thorities should be in touch with the people. We mot door mome Indian langur oths Languer of Connement of lodu. It is obvious that the choses must be Hradostue. Hladatel the Langue polto und updattood by the brret Dunbart lodin, kod is on a lo atrendy the linge France (m) पौर इसना संभोग क्यों है? मापा के प्रश्न पर इतनी हीम क्यों दी जायही १? मह प्रश्न केवल भारत में ही नही देश विदेशों म पर्चा का विषय बम पया। विदेसी मोय हिन्दी सम्मपी माम्बोलनों से पिछ है। ये समझ नहीं पाते कि रेप में हिन्दी का इतना निरोप पयों है? पर दूसरे एप्ट हिनी के मिमै पृषक विभाप गोम ऐ हिन्दी कपिों और भवनों पर छोर कार्य कर रहे है तब भारत में English ever Hindi ncrer के नारे क्यों समाये ना हे ? बनता को हिन्दी विषयों महकाया जा रहा है? भाषा की मह सचयात्मक स्थिति घीघ्र समाप्त होमी वाहिये। देस से पिसी की रासता चौघ्र समाप्त हो हमें इसका प्रयत्न करता पाहिले । राष्ट्र पोरण सो मे है कि हमारी राष्ट्रभाषा पपने रेस की मावा हो । बिना किसी सी भाषा को राष्ट्रभाषा का स्थान दिये हम पौरपानी रंगों में पपमी परगना मही कर सकते। हमें अपनी राष्ट्र मापा हिनी का पिसे संविधान में रेस उपाहीति के नेतामों में पारर प्राण किया सम्मान करना चाहिये । इसी मापा के माध्यम से हम सम्पूर्ण मारत में मापनारमा एकता समापित करने में समर्थ हो सकते हैं। इसी हमारी मानिक माविक दाणिक और सामाणिक प्रगति हो सपथी। दिदी शिकाम से प्रग्य मारणीय मापार्यो को भी प्रोत्साहन मिमेया। देश की उन्नति सिमे हमें सिखना ही बड़ा स्याम पौ फरला पो उसके लिये सच तयार पहना होगा। गुर स्वापों के पसीभूत हो रेप की एपता को नष्ट करना भयंकर मपण्पहै। हम परस्पर मिमकर प्रणभिपने निज पबहार तपा मम्य कार्यों में पदमापा हिनी प्रमोप पर मोर रहे निवामी हिम्स के हम हमें । मुगारी हिली' 1 - हिन्दी कविता के विविध काल रिसी मापा के साहित्य का अध्ययन करने से पूर्व उस भाषा की उत्पत्ति पौर विकास का सामाम्प शान साहित्य के विधानी के लिये पायस्पर होता है। मापा की प्राप्ति पर माप को पाने विमा उसके साहित्य का पूरा पामम्द मदी सिया मा सम्ता । मापारे विसास में ससति बलराम, नई मातियों का सम्पर्क रहन सहन तपा रिमिम्म परिस्थितियों का सा हाप एता है। प्रत्येक भाषा की उत्पत्ति भोर विकाम की एकदी परपरा होती है। हिन्दी भाषा को बत्तमान समाप प्राप्त करने में पुगों की मम्मी परम्पप पार करनी पड़ी है। परिक और मौक्षिक संस्कृत हिन्दी का प्राचीनतम पबमेरकी ऋचार्यों में प्राप्त होता है। यही भारत की प्रापि मापा श्रीगो कि संसार कमाती है। पारे उचा भारत में पाया की साहित्यिक मापा पही मोपवे की इस रिक संसर' प्रप्तिरिमत सामाग्य बनता में बोमधाम की बोनापा प्रचलित भी पा 'सौकिक समत' ही माती पी। या मापा साहिरप की मापा की अपेक्षा प्रषित परम पी। बोमपास की मापा कमी एकसरप में स्थिर नहीं पती उसमें निस्तर परिवर्तन होता रहता है। पप्पो भिपायों तथा सन्चारण स्थानों में परिवर्तन हो पानामौसि साल भी मी नियम के अनुसार परिवर्तित होती रही । सातरी पाठनों पती ईसा पूर्व में पाणिनि मे म्याकरण के नियमों द्वारा परिवर्तन के इस प्रथा को रोकने का प्रयत्न किया। इस प्रमरन के फलस्वम्म भाषिक संसहत' भ्याकरण होकर साहित्य को मापा बन गई रियमें शानिवास मारी भाभूति पापि ने उन्म काटि के साहित्य की रपना को पर पनका बीपबोनीबाम माली मापा का सरप अपबर सपना मया ।

प्राकृत भाषा
विधा! पापनित इस परिवर्तित मापा को प्राणमाम रिया।
प्राात भाषा सामाम्म मा प्राय जानी मापा पी। प्राहल मापा का
जनता में प्रषिक प्रभार देवार महात्मा बुर ने अपने उपाइसौ भापा
में रिमे । भागे पसार तोमरी मी मा पूर्व में प्रपोक ने अपने पिसामेन
भी रसो मापा म मिपराये। इस प्राा मापा का नाम 'पानी' है। धीरे
धीरे मही पामी' साहित्य की मापा बन पा पार पपिकप बोर साहित्य
इसी में मिण मया । साहिरिपर मापा बनने पर 'पानी' को भी पाकरण
परकर रिया पया लिनु मनमापा उमी मप में परिवर्तित होती पी।
बहा पपिर दो भूमाग की मापा होने के कारण प्रालि' में अमवायु
वपा मिनिम्न प्रान्नो की परिस्पितियों के अनुमार कृघ भेर रिपाई ने
मगे सिमे विशानी में चार भेर किम ।
(1) मागभी प्रात
(१) गौरसेनी प्रारत
(२) पर मामी प्रात (" महाराष्ट्री प्रार
प्रपा मापाय
ही भारत भापार्यों से प्रामे पार पार पसरपी परम
मापापो की उत्पत्ति हुई। मापपी-पाप्रेम प्रर्प-माममी-पपप्रम
नोरमेनी-परपर पार महाराष्ट्री-प्ररप्रेग । पप्रा का प्रर्प है पर
मर या शिकत । प्रिनुपा में पड़ी गम मापापा पोउन गया।
पाग में भी साहिपसी पना हाने सपी । बसमानी मिझेरा
माहिप इसी भाषा में लिया हपा है। बों और बेनों के पर
पाणि माहिप की मी यही मारा।म मापा का समय :... से
१....तर है।
मामुनिर भारतीय मार्य भाषा
माती मत पापुनिए पाप मापापों की पत्ति प्रग स
हुई है। मापपी-माग समा गया पाठामी पार पिए (पही

मैषिमी भोगपुरी) मापापों का नाम हुमा । मसमागमी से पूर्वी ल्दिी (पबपी बसेमी बत्तीसपदी) का मग्म पा । चौरसेनी-अपप से पश्चिमी हिन्दी (बडीयोमी अपमापा बुन्देमबाणी) परस्थानी गावी मुबराती भारि की उत्पत्ति हुई। महाराणा प्रपश से मराठी निकली। इस मांति भारत की समस्त पार्य मापापों की पननी अपभ्रंप को अपने पूर्व मे सरकत की पुत्री है। इस पम्परा में सन्त को ही सब मापापों का मून उद्गम माना पाता है। मौरसेगी मपप्रम , घसा परिचमी हिम्दी पौर प्रमामधी मपप्रंग से गत्पर 'पूर्षी हिन्वी' की तीन मापार्यों में लिया पया साहित्य हिनी मापा साहित्य में परिगसित होता है । “परिचमी हिनी सोबती रोती रमापा पार गुम्देनमीन तीन मापापों में से बड़ीयोमी पर भाषा साहित्यिक मापारी है। पूर्वी हिनी' में पानी बोती बत्तीधी इन तीन मापामों में से प्रसपी साहिरिया पापा है। मनापा में सूरदास पपा उनके समकालीन महापापियों में हप्णमपित की ही मुगर रचना की है। मपी में वापसी र तुममीपर ने कमर पद्मावत' और 'एमपरितमानस' से अमर महाकायों की रसना की है। बड़ीबोली माधुनिक युग की साहित्यिक मापा है। इसमें पायाम वृहर मात्रा में शाहिरप निमा बा पाहै। इसी पापा को राष्ट्रभाषा होने का पौरप प्राप्त है। उपयुक्त विकास के अनुसार हिन्दी भाषा का उत्तपिटास १.... माना मया है। इस बार ही इसमें साहित्य की रचना प्रारम्भ गई। पिता १....से पब तक रचित वाहिल को पार कानों में बिमल किया है- (१) प्रारिकाम-संबत् १... से १४..तक (२) भक्तिकात - संवत् १४.. १...तक (1) ऐतिम - सरत् १०.११.. तक (४) पानिक काम-सबत् ११..से पार तक (१७) मारिकास प्राय देपा बा कि प्रत्येक भाषा की प्रारम्भिक सपना पच पर होतो ।। हिन्दी की प्रारम्भिक पनायें पद है। माधुनिक मुम पर पचा विकास पार विस्तार हुमा तभी पच पोर पर दोनों में बना होने समी। हिन्दी का प्राविहान पुसत पचमा है। इस पुप में माण में सी पपान्ति पी। महमूर परनयी वा सार पुपीन पारी के पात्रमय सी पुप में ए । उनके बाद स्माम बर्माण ममियों में भारत को समृषि से मार पिरपसे यह शासक बनने की मामा से तमापर्म प्रचार करने के लिए समर पाश्मए किये । राजपूत मरियपीर इन रिशी प्रामपकारियों से बेस की रमा के मिमै मुसखे रहने में किन्तु मापसी पूट मौर सगठित पति के पमा मन भारान्तामों पर विजय प्राप्त कर सके। मारत पर तपो नया। इस समय सामायिक मिति भी दी शबागेम पो । म भनेक पोटे-पोटे पम्पों में पिमत हो गया था। रेसी एरा पापसी कमह में एक दूसरे से यूर करते रहे ।सयमरों में अपनी पति का मान एक मानी पटना बन गई थी। पीरों का नाम दौरता का पोगमा प्रार्थनमात्र ए नया पा। बहामही सिी सुन्दर या का पता मपणा नही ये प्राप्त करने के लिए मुरपाते। इस प्रकार हिन्दी भाषामा यह पारिसान पुर मौर मगार का मुग पार मुस में पोर पोर गार रमपी पनार्य ही हो सकती थी। पुर दो गर तास रामाों है प्रापित परिक्षण मी बीर-रस से पूर्ण पोपरी पसाय करत पे । स्वमाबत गप में परमावापों और दोर रम प्रपान पाम्मों रा पापिय हो गया। इसीलिए इस बात को धीर पापा पानापाता। म चुप परिणाम कपि चारण मौर भाटप यो राणामों के प्रापम मे एवेरे परि रणभूमि में पर्ण रिप नाममा एए उत्साह देने के पिमै भौम भरी रिलापों में अपने पापमपातामों का मगोगान का हिनी क पारिकाम के प्रसिइ कमि पन्दबरदाई रिमाने 'पीराम रामों की पनाको पृषीराम चौहान के सामन्त र सत्ता है। पुर में पृषीराव माप सश्यि माग मेवे । पृप्यार रामा' में गाने पुरका का मीय पौर भागस्ती परमन पिया है। इस साध्य में पसपूत पौरों के विविध मुरों का एतिहाहिक वणन है पितु परपरसाई ने जिन युरो पौर परमानों का वर्णन इस काम्प में किया है विशाम की विधि के अनुमार और नहीं उतरती । इस ग्रन्थ की नापा पी की प्रभारी पड़ इतिहासकार इस प्रबको नामी मानते है। इम पम्प की मापा रापानको गित मापा यो प्रपन के बार विकसित हो पी की। माराम पसों के अतिरिक्त इस युग की पम्प प्रथाम रचना 'बोमनरेर रामा' 'नुमान पसा' 'पषम प्राप' 'समय-स-पत्रिका पारिसमी पाप बीर रम से परिपूर्ण । बीससदेव रासो' की रचना मरपति नाम्हने की है और 'नुमान पो कवि रमपति विमप। पनि कवि रचित 'पाहावा' भी प्रमिर वीर रचना है। पीरयामा काम मा पादिकाम मी मापा में अपमंस गिम मपिता पर कहीं-कहीं पड़ीवामी का प्रयोग किया मया त कान में सड़ीयोमी के रन प्रमौर तुमरो की पहतियों पौर मुकरियों में होते पिचापति में मषित मापा में रचना की है। यह मापा का विकास माम पा पपप से सिमित होकर हिली नये म्प में परिवर्तित हा पी की। प्रत इस पुप समस्त मम्मों में कई प्रकार की मिमित मापा कम होते है। पर पास में पापड़ी कपित प्राधियों का प्रयोग दिया (१९) पारि कान का माहिम सामन्ती साहित्य है जिसमें सत्तासीन पर बीपन समान का कोई पिकही है। पिपण प्रपन प्रापयतामा को प्रधान करने के लिए सही की प्राम्पियो गाना भपता कतम्य समध्ये * दीप पनता दी पोर सम्होंने मान नहीं दिया। इसी युग पनि विपापविम कोरपना की गगार रस से परिपूर्ण है उसमें भी न पित प्राममा मिमते । इस पा मापा विकास की दृष्टि से परिक महत्प। भक्तिकाम सं० १४०० से १५०० पृपारामकी परामरबार पोरे-धीरे उत्तरी भारत पर मुखसमानों का पापिपरय हो पया । परब विस्तार के सार म्होंने पमै प्रचार का कार्य भी प्रारंभ कर दिया । ऐसी परिस्पिति में पमप्राण हिन्दू समता पर पारा घोर निराण और पारम पा नमे । उनकी पुकार मुमने बामा दीमापु मपान् + सिबाय को म रहा । राजपूत सपियों की पति सील हो गई। रनकी और मामला परतता में तिरोहित धीहो गई। पिपों परयापय उमा मये । मिस पर्मी होने के कारण हिन्द्र मुमनमानी का मती ममस्म कामगा । हिमाको मृत्यु प्रपा धर्म परिवर्तन के सिराय कोई तीसरा माप मही दिगाई रेडा था। ऐमी पुपर परिस्थिति से गुपारा पाने के निये ममवान रामायय ही एक मात्र उपाय पाम पर राय के समस्त दुर्गा की पुधर ममपात कर की बामे सपा । परी परिस्थितियों के मद्यपी साहिस्प रमाने तसी समय पर रम की रसमा महाकर मक्तिमार पी रपमा होने मी साहिाय में प्रतिभावरी प्रपामता के काम म मुनगो भनियम' हा पपा है। भक्तिनगरपनापों को सम्म पौर मिण मति प्रापार पर मानों में रिमनपा पपा । पुन ममुग्ण मति में रामोपासक कापसामानोपमा प्रापार पर मामन्ति मारा तरा 'पापति मागा मेरा व पिस मप मी प्रार सगुण मति मिनुस भक्ति में शाम पार प्रेम मपी भक्ति प्रापार पाभावामपी पौर 'प्रेमापपी पो भक्ति पारायें प्रवाहित । इस भाति भक्तिकाल की रचनायें चार मापों में विभक्त हो गई। मिगुण भकि (१) भानामयी शाखा (1) रुप्समक्ति पारा (२) प्रेयाययी नामा (२) राममति बारा उपर्युक्त भार प्रकार की भक्ति रचनाओं में कपियों मे देध कान के पाम पनता को भक्ति की पोर प्रेरित किया । भक्ति मुग प्रपम करिबीर है। मामाचपी पावा-मठिकी शाकामयी पाखा के प्रवर्तक पन्त समीर पीर ने हिल-मुतनमानों में प्रेममान तप्त करने के लिये बोनों धर्मों के पास पारी की प्रासाचना करके भगवान के लि- कार पकी पासना पर बस रिया। उन्होंने पर्म के उम साह पौ कालाम च्यिा को दोनों पारियों के बीच मनमुटाब उपा करते पे। पैसे हिमों की जातिपाति व्यवस्था प्राणों के पोषी पन्ने पप माना विमा पापे सीयात्रा पार पारि पौर मुखसमानों को नमार कुरान हिंसा, रोगा पारि । कबीर ने बताया कि राम पौरपीम में कोई मेव महा है। ये तो सिर बाट नाम सर तलव एक ही है। यह सब में समान माप से मावा इपा है। उसी को सन्तान है। पनीर के परों, बानियाँ सासी पारि मे बनी मागेकी प्रमिम्बना है। वीर की इस मक्ति पदवि की पोर बनवा भापित हुई भोल्दि मुमममानों के बीच काफी हद तक एकता का माप उत्तम हुपा। हानायनी पाबारे प्राय सन्त करियों में सा, रास नामदेव नानक सुन्दरबास मारास प्रादि नाम प्रधिर । कपि प्रमियरमाचा पाठि में ये जिन्तु उतम भकिमार तथा साहित्य रचना के कारण पर्यापारण पमहा में पूग्य का पसे ।

निमुमक्ति की शानाममी मापा की प्रमुख विशेषता निम्म
(१) इस साबा विहार के पार पर सिर सम्पापी
पकी भक्ति उपासना पर बस देते है।मा पार्टी
.
(२) इस पापा के सब करियों में गुरु की महत्ता का प्रतिपारन
किया है क्योकि गुरही मनुष्य को परमारमा + पहुंचन
का मार्म दिलाता है।
(१) इनकरियों में माया-मोह की मिमा म संसार को प्रसारता
काको प्रमाणपूर्व एम्दों में परम मिा है।
न मत करियों की मापा मैं पेसायी, रामस्मामी म घड़ी
मोनी, परपी उई पारसी धमी मापाों के प्रमों का प्रयोग दिया गया
रासका कारण हलिये कमि प्रमण परखे रह रे भौर जिस
त म बाते नही की भाषा के हम इनकी मामी में या बाते थे।
मिपित मारा पारस हमको मापा समुही' या विषयी मापा
पहनाती है। सीरको मापा मे रिमित प्रमी मापार्यों के शमों का
प्रयोग मिलता है।
मातापदी सन्त रवियों ने अपनी रला 'सायी पौर 'सबों में की
है। 'सासी हे पाद में मार सबर पदों में ।
सम्त करियों में परिणाम ऐसे ये गिनाने 'यसि सरकार मी
ही माया पारितु सन्नी मनुवृति के पास ला परों में सामारिष
सोमय है। पगार, पनुमाम हित होने पर मो रनमें माधुर्य प्रार
प्रमश्मिपुटा है। और निम्न पर पिने भार पूर्स है.
माती प्राप देगा परिपन परीपुरा।
मी पुन नई बाद मारोबार ॥

(१४) सगुणोपासप पबियों ने दुभी पीड़ित पौर निराम जनता को स्थिर के उस स्प के मन परामे मो मुखमुखका सापी है, बो भापतिकान में रक्षक है भो मक्तों की पुकार पर दौड़ा चमा प्राताई पो बहुठ मुम्बर पौर पत्तिमानी है। इस मोककी समस्त बाबा पस मवान् के स्मरण मार से नष्ट हो जाती है। राममक्कि व कृष्णमक्ति काम्प के मूत मापार वाम्मीकि रामायण पीर थीममामयत है प्णमक्ति पाया में सबसे अधिक प्रपिट कपि सूरपास है । ये भी बस्समाचार्य के पिप्य थे मौर उन्हींकाने पर होने की बाम पपिरमार का वर्णन किया है। ये भीमाष जी के मंदिर में निरस एक नया पर बनाकर पाकी मीमा का कीर्तन करो थे। इस भौति पण मीता पामन में इन्होंने सपा पार पाँकी रचना की। इन सभा भाव परों में से प्रारकत पाच हबार नममग पद प्राप्त है। इन परो का संण 'सूरसागर' में किया गया है। मूर के पात्सस्प और पगार वर्णन की तुलना में भार तक प्रग्य कवि नहीं दिलाई ताण + बास्यकाल को मपुर, मनाजानिक मौर सामाषिक मि इनके पदों में परित ।। माता गणेश का पारसस्पप्रेम मूर मे गिन एमों में परिणत श्मिा । एनसे मातृ-नगर की मूम्म से भूक्ष्म मावना पय मावि प्रकाश में भाई है कि माता मोरा कृष्ण की माता ही मी पगामाता हो गई। मोरा नाम के साप मात्र हरप निपटा सा पाता है। इसी प्रकार कृष्ण की बाम बप्टा संसार में प्रत्येक बामक को चेप्टा, भाषों का एक मनोशामिक प्रमिक विकास पा उपस्थित रखी है। पण-करहेपा प्रत्येक वा प्रतिस्प है। तमी पातोपकों मे सूरपास्साय पौर मारपर्सन की मुक्त प्रसा करते हुए पन्हें सूर (पूर्व)मा पर प्रदान किया है, पपा -

(१m)
मूर सूर तुनती पपि गुगन केनगास ।
प्रग्म कपि लपोत सम हह करत प्रकास ॥
तस्व स्व सूरा सी तुलसी कड़ी अनूठी ।
पषी तुची परिप ही पौर कही सब भूठी ॥
किषों मूर को सर सम्पो किमी मूर पी पीर।
पिपी सूर को पद सपो तन मम धुनत सरीर।।
सत्य ही मूर के बारसस्प-परणन 'मम्म कपियन की भक्ति मोहि
माने भूठी पान मूली मूरदास की' की शक्ति पूणवया मपा है।
पारसस्य की भांति मूर का गार पर्णन (संयोम मियाग) भी
सप बोटिका है । संयोग में गण की रप मापुरी मोपिमा स परिषम
मुरमी पारन पसनीमा पनघट सीता, म विहार, पि-मातम पोप
पारिका मनोहारी भएन । पौराण के मयुरा पर जाने पर माता
मगोरा और मोप-गोपियों का पिए परन भी प्रपूर्व है। प्णाप भेगे
मसे निगुए मान के संदेश पर पोपी हदय के मारपर्णन में मूर ने अपनी
प्रविमा का पाव चमत्तार दिसापा है। मओ के प्रति कही गई पोपियों
पी सखियों में पापिपता और मामिकता है।
वात्सम्म गमार पतिरिकमूर ने ममपान्प्ण को सवा मानकर
गाय से लिप-गरों पी रखना भी है। इनपरों में भक्ति भाव बीप की
रीनता पिए है। मुरी मक्ति पण को सगा मानने पारण
सम्ममारी परमाती है।
मूरजी मापा र मापा है। मोनि रसव पौर विधापति को
गीत पति पर पीतों की रपतापी है। पदों में संगीत से प्रपानता है।
मापापही सरल भाषाही है। पगारों रामरपपिर प्रयोग होने पर
भी भाषा में गटिमता नहीं पाई।
पप्प भक्ति पाठ पनि महपाप के माम से प्रसिर । नरवियों
के मार-मरराम गुमनाम मदराम परास पीठम्मामी,

-
पोनिबास पतुर्मुबास परमानन्ददास । उपक पाठौँ करियों में से
साहित्य में सूरदास मानन्ददास विप प्रसिर ।
भएमाप रे प्रतिरिक्तरप्यक्ति के माय करियों में रहीम रसवान
पौर मीरा का नाम विधेप गलेखनीय है। होम और रसमान जाति से
मुसलमान पे किन्तु रुपएमक्ति में उनकी रचनाय गदी परस पार मायक्ति
पूर्ण है। रसमान दो पर भी ममियों करीतों पर अपना सर्वस
ग्याचार करने के लिये उपटानको निम्न पठिया
मानुस ही पो नही रसमान' बसी त्रयोकुम पनि के मारन।
भो पमु हाँ तो कहा बस मरो परी निव मम्द की अनु ममाल ।
बड़ी प्रसित है। रहीम के दोहों में कही-कही पड़ी भी भावना
म्यक्त से
मप्युत परन गिनी शिय पिर मामवि मान
हरिन बनायो पुरसरि कौगो हब मान ।
पोहे में पंमा के प्रति पारर मान मात्र किया है। नीचे की पखिया
प्पपत्ति की है-
'हीम' मम पापुनों कीनों बाप कोर
निप्ति वासर नाप्यो रमणपणको पोर।
रहिमन कोई का कर सारी पोर मगर
को पत राखन हार है माखन-पालन हार।
मुसत्तमान होते हुए भी एक्त दोनों कपियों के भाव तिने मक्तिपूर्व
पौर पर है।
मीरा की प्रा भक्ति मापुर्य भाव की है।नि परमार पोपर
कृष्ण को प्रपना तन मन पम पपित कर दिया था। को ही
प्रपना पति मानती थी मत उनकी वा प्रर्षमा दमा मक्ति में प्रारम
चिोर हो नापने हमती पीनाप्प के विरह में मौरी में अपने
।

मानों को मार्मिक प म पकरिया है। उनका एक-एक पर 'प्रम की पीर' का उमड़वा सागर है। इन परों में कोई बनावटमकोई धमापट स्वाभाविक होने के कारण ही ये मन हार्यों की पाती है। मौरी की 'माधुर्म मार' की भक्ति का पाये प्रग्य ष्णमत पारियों ने भी अनुसरण किया। मीरी के पद समस्त भारतवर्ष में से प्रेम से गाय पाते है। सम्पूरस प्णमति साहित्य गेम पो में लिया गया है। इस घासा के गिसी फरिने प्रवासाम्य भी पता नहीं की। एमक्ति में कमियों मे प्राप' सौम्पर्प पा पात पाहो मन विमा है उनकी बठि, पौरप दानरबमन मानसोप-हितकारी स्पोरा पर्थन करम में पकरियों की रपिमहीं है। पारिप परों के पापिय से मागे पाकर निकास में कृष्ण पौर रापा के नाम पर पोर परमास गपारिक रचमा कमियों की। रापा पौर पण मामाम्प नापस नायिकामों के कप में पति यि गये। प्ररपेक ईन रमिक पुरप प्स और प्रत्यक समधीमी स्त्री 'पा माम से पंभित हुई। प्यमक्ति साहित्य पा यह पाप सीमा तक मोहितहारी होने की अपेगा शनिकर पिय हमा गितु तक मूर सपा मम्म प्ररमाप परियों को पनामों में पण पीवामन पा वर्णन है वह मनता के गुप्फ मों में एसपारा पहाने में पूर्ण मरस हुई। मूर रिलयप तो जनता भयहार बने मरे । पप्पमत पियों की भाषण मापा है। एपहिवा-हिन्दी साहिरप के मतिमतीबीपी माया राममक्ति मासाहै। इस पापा के पवियों ने भगवान राम मर्यात पुरपोतम पग पापार र जनता के समापन पाला प्रतिपादन रिया। रामक्ति मप्र मार दी है और रामति सप भाव पी। रामनतररियों में राम मार पम पी पापना पी है।

( १४८ ) पम सो बोकीन पोटो कौन मोदो। राम सोहरोह कौन सोटो कौन मोसो। की भावना से पपने बय को समस्त म्पबा राम के चरणों में रम दी । सार भगवान् एक म एक दिन पा करेले हो । राम का परिण मर्यादावादी है। इसमें मापुर्य पौर मार रस का सेष रतना प्यापक नहीं गितमा प्णि के चरित्र में कपियों ने निकामा पा। प्रत इस यात्रा में मिने पुने कपि । रामभक्ति के सर्मोन कवि मोस्सामी तुलसीदास है। इसका परित्र म्पतिलकाम्य कौत इतमा महान् बा कि प्रम्प रामभक्त परियों की रचनायें प्रसिद्धि प्राप्त कर सरी । 'तुमधीराम' का 'रामप्ति मानस' साहित्य का पिरोमणि है। इसकी तुमना में प्रमी तक हिन्दी में दूसरा प्रवासाम्प मही निता पया। इस प्रत्य में तुमसी ने नोकधर्म की बड़ी सुन्दर स्थापना की है। पप के परिज वर्णन में गहनि समाप के घोट बोनीच गर्मी-पपर्मी गृहस्पी-सयासी सभी माँ के लिये प्रभूत सामग्री प्रदान की है। मुगल काम की निरासामयी रजनी में ममपान् पम के तोक रतक सरप का सूर्य प्रकाशित हुपा जिसमें समस्त मग्नकार विलीन हो पया। माशा उत्साह हर्प पार मानम की निर्भरिणी फूट पड़ी मंपन प्रभात हमा। तुमसी का 'पमचरित मानस' उत्तरी भारत की जनता का संहार है। इस प्रन्च में हिंदू धर्म के समस्त पावणेका बर्सन है किन्तु यह स्प पारमक महोकर रसारमक है। इसमें राम के पीत पीबई मौरपतिका महा हपपाही स्वरूप प्रकित है। पमापण की एक-एक चौपाई एक धर्म प्रम्प का सम है। माता-पिता मुख्यमों की भाशा पाचन सन्तान का पर्म है तुमसी ने इस धर्म की व्याख्या निम्न प्रकार से की है - ममुक्ति पित विचार तरि में पानहि पितु न भावन सुग सुपा के वसहि अमर पुर ऐन ।

सहर मुलर मुख स्वामि सित
पाँमानि।
सो परिवार पपाम र भवसि होग हित हमि ।
परा-नगा संबच पर रन्होंने निमा।
मामु पम प्रिय प्रभा मारी। सोनप पसि नरक समिधारी॥
यमावण में भाई-भाई, पिता-पुष माता-पुत्र पति-पत्नी पुर-पिप्य
सामीसेरा परा प्रमा सभी समायों करा पादणे चित्रण एमा।
रामायण की मापा साहित्पर भरनी है ता पर हे भार
चौपाई।। दुसमीरास - रामपरित मानस के अतिरिक्त अनेक
अंगों की मापी है जिनमें प्रपती पोरम रोमों मापामों का प्रयोप
पिया है। दोनों मापामों सार पुप की प्रसित सभी काम्य परतियों
सा मी म्होंने प्रमोम किया है। मकि क्षेत्र में तुमसी मोर दूर का
स्थान एक धमान है । र मोर तुमसी हिनी नापाका प्रमासमान
पूर्णमा
रामनकि पावा प्राव विमानादास प्राणपरोहान,
पपवास हरयम धनदास पारित
राममति साहित्य का जनहित की ष्टि से अपएमति साहित्य
की परेवा पपिक महत्व है। इस साहित्य में पनवा व धमार को कि
रससा पपोत कौ पोर मी सव पिया। समार में
परम से रवाना हुई।
राममति परम्परा में माणिकषि मंपनीमा पुप्त मी तुमसी
समान मर्यादा र पारसनावी है।
रोतिकाम (१७..-१६..)-
रिम्दी में महिमाम सर्व पुरे पापा विधमा
माम हुपा पनि पाम्प गास्त्र सिवात } rस पुप में
परियों सामण पोर रगणा वीरपना भपिशवपा
जापानामित पर्शन, नगग वन मादित्री प्रधानाम
-

( १५.) समय तक मुगस सासर भारत में प्रमग्री प्रकार बम ममे थे। देश में मान्ति स्पापित हो पई पी। हिल-मुसलमान परस्पर हिम-मिन मये । भक्ति भाव की रचनामों से भेर मारमा पुष सीमा पर हो गई पी। पान्ति के समय मासकों में बिमासिता का प्रादुर्भाव एक स्थामाषिक वृत्ति । मुगन भासक सुरा सुन्दरी प्रेमी थे। उनका पावन मन बिमास + सम्पूर्ण साधनो से भरा-पूरा पा । सुपीत कसा साहित्य पारि प्रति उन्हें प्रेम पा। अपने पासरोका पनुकरण पर बसी रामामों में भी इन प्रवृत्तियों का विकास हो पाया। पपने मनोरंजन के लिये बोबो संगीवों कमाकारों तपा कवियों को पपने दबारी में पामय ते पे। ये पामित कलाकार पौर अपि अपने पामयपातामों की प्रसमता के लिये उनकी चि के भनुम रचनामें किया करते थे। स्पमामत ये सपना मग पौर भय-वितास के चिों से परिपूर्ण है। इन सपनामों में नायक-नापिका के पृमार का उनके मन-मन का विस्तृत वर्णन है। फषियों की सारी साम्प प्रतिभा पहा विपयों तक सीमित है। इस पुग में दो प्रहार कपिएको यो काम नसण निबार उपाहरण के लिये कवित्त उयों की रपमा पसे दूसरे पो रामामों के मामय में एकर उनके मनोबना मुगारिक रचना करते थे। मव-विनाधी पासकों के मम्म रहने पामे इन कमियों में सामाम्य गरीब जनता की पोर म्यानम रेकर मनमाने तौर पर पिता के साप विमबार किया है। इन कवितामों में या तो मुममुमी गिलमों महमो, पायाभूपों मुनरी मासिकामों दूठियों माधि का वर्णन है या किसी नायिका हार भागों का प्रतिरमित वर्णम है। परीर एक- एक मामूपण मौर एक एक अंग दी मोमा पर्सम में हजारों पर सिसे मये है। ममार की प्रपिता के कारण ही बहुत है पासोपों में 'विरान' को 'भू गारिक काम' कहा है।

(१) जैसा कि पीछे बताया था कि भक्ति के अमर्यादित पृगार मन में पागे भाकर 'रापा' को सामान्य मापर नायिका मात्र बना दिया। विकास के पपियों 'एमा प्ण मुमिरन को महानो पण प्रभा के नाम पर पोर प्रासीम रसनामों की मृष्टि की है। पूरे २.. पं तक साहित्य में गारिक नापी भूम पी। सैकड़ों कमियों ने एक पिसी परम्परा के मापार पर अपनी परित पति का पोरसा प्रदर्शन किया है । सम्पूर्ण रचनायें एक ही संप में रमी हुई है। नमें मपमा निगी म्पत्तिल नहीं है। पितु इन सबका तात्पय यह नहीं कि 'रीतिकान में उतष्ट कोटि कगियों या भाषपूर्ण पनामों का प्रभाव है। इस पुप के कुछ वियों के माम साहित्य के इतिहास में सबन ममर रहेंगे । देव मविराम विहारी मानद ठाकूर, भूपण पपभाकर, बीनायाममिति गिरपापम पादि इस युग के प्रसिस कमि है। रपयुक्त परियों में दागियर विहारीसास का माम सोपरि है। बिहार के नाम से न केवल हिन्दी पाठक अपितु भाप महत से नोम परिषित है। इनरी हिरी सस विधामा सर्वोत्तम माम्प पेप है। इस एक पम्प से ही बिहारी की नीति अमर हो गई है। बिहारी से पर एक गई पर अमपुर मरेप समिट में एक-एक मर्फी मिलती भो। म पन्थ में रीविकासदी ममी निरोपतामों का समावेश है। हे से छोटे कामे पार रस भाव विमान प्रमुभाष संचारी मारि भारों पर पूर्स परिपार है। अगर हम गति के उत्तम आहरण इन रोहों में रिपमान है। ममर्गात प्रसंसार मा विरोमामास बिहारी का प्रिय धर्मसार । एसरी पपना दही-हीत ही मुम्बर । पपा - या पनुनी पिठनी पति समु महिमोय । गर्यो यो पाप रम पापों सरसोप। (पिपेपाभाम)

( १९२ )
रस उरमर टाटुम्ब पुरत पतुर चित प्रति।
परति पाठ पुरणम हिरे मई यह रीति ।
(पसंगति)
संसोम र वियोग गगार केबो उत्तम भाव कहीं-कहीं पनि पक किये
है। परन्तु कहाँ व्या को अपनाया है महो मस्यामाथिकवा पा गई है
मे किसी वियोमिनी नायिका की दुर्वमा र मह मित्र
६० पावधिपति भावपत पनी साहाय।
की हिंगेरे से दी मारि उमासन साप ।
पमा म र यह प्रतियोखिमूल बरन
पमा ही विपि पाइने पापरके बह पास ।
मित प्रति पून्पोईई भानम मोर उपास ।
रोहे घर की छोटी सी परिपि में बिहारी मिन भारों को पक्त
रिमाप्रम्प कनि उसी भारको क या पाठ पंकिपपब सरा
मित्त सईया से बड़े व में भी सप्ट नही कर पाये है। इसीलिए
बिहारी बोहे भागर में पागर' माने पामे को मारे। किसी
TOसया के दोहरे श्यों मापाती।
रेकन में पोर हा पारकर बाबीर ।
समाई का प्रर्प है सात सौ परों का काम्प । 'बिहारी सपा में
सात सी दोहेला मनुषण कर रस बुम में प्रम्ब सतसई मी
नितीमा।
गतिकामी गमारिफ पारा पेपीर रस की रमा करी पाने
मुपए कवि का नाम बिसेप स से मस्सेसनीय है।
"भूपण' पहने तिवारी और पिर महाराज पाधाम के पाभित
कपि पे किन्तु पन्होंने अपनी सेवानी का उपयोग रागानों के मारिए

के लिए न करके रेस पोर पाति को सतायता के लिए पूरा करने बामे
पीर विमानी पार पचास की पूरवीरता के पम्न में किया है। इसकी
कविता का मुम्प रिपय पीरो मा कीर्तिमान पार पुर पर्सन है। नोंने
अपनी रचनापों द्वारा हिन्दु महिलू समति का पौरव दामा । भूपण
ने अपने मुम की परंपरा के अनुन एक प्रकार पम्प रिसा नाम है
'गिवाबावनी' की पना की है किन्तु ससम मी र मिनामी पी पीरखा
पा पखेन है । रनको पविता र मापा मेंनिसका एक गहरण
प्रस्तुत
चकित पावापोषिौकि उठेगार बार,
हिस्मी एसति चि पाहि परपति है।
विमणि बन बिमवर विरपुर-पति
पिरत फिरपनि की मारी फरमति है।
पर-कापत साहि पोनगा,
हरि सम पूर-जोर मारुति है।
या सियममारल की पाक मुनि
को बारसाहस की पाठी भरमति है।
प में विकास के मुम्स विषय प्रेम पोर पार है। मान
मुबस पारिभामि इस समपाद सपान युग की कविता
सब से प्रारी मात्र है। प्राप सब कपि दरबारी र सिन्होंने
बोरिसा प्राप्तिरीमानसा में पपन पापपदाताओं का प्रतिनपोखिपूर्ण
मुरुमान मिया घामाम्य बनवा के मिरा न परिया में कोई
पारमें सस्पित नहीं मिा। रीतिसमरी कविता में मापा की
मागानी है भावों प्रति परियां का अनुपम नहीं है। पिता में
वापटोपन है।
इन मारपीमापा ममापा मोर कति माया दरा
पारित प्रापराम की रपना इस युग में प्राप गरी हुई।

महान् परिवर्तन माधुनिक कास (सं० १९.०६० से अब तक)-- हिम्बी का माधुनिक काम प्रारम्भ होने से पूर्व रेड की रापनतिक स्थिति में हए। मुगम-पागों की पितासिता पौर पापसी पिपिने पम्प की बौखोसमी कर दी। सारे भारत में फूट का बास विध गपा । एक दूसरे से पति इषियाने में मारपद्यम होने नगे। पापसी महा-भगो ये माम उमकर मुदर परिचम भाई हुई विदिए पाति ने भारत पर पविकार कर लिया । मुमत सामाम्प ममाप्त मा पौर पर बी साप्राम्य पापित एमा। प्रपेन पासकों के प्रायमन के देत ही परनैतिक सामायिक पार्मिक भाविक सभी सितिों में अभूतपूर्व परिवर्तन हुमा। कुच शिपों में रेप ने की प्रपति की और उप पत्रों में से भारतीय रहन-मान शान-पान, पैति-रिवाब पारि मैं वियों का मन्वामुकरण हमा। कुछ मिनल मुपारमों में भारत की गोस परिस्थिति का अध्ययन कर पुप के भनुम सुधार मारोता पान पिसे । राजा राममोहमराप का पाए प्रमाण सामी पपानम का 'पार्म समारो बड़ी प्रबम नपारपारी संस्थाओं ने परम लिया। १८९५ में एग्रेिस की स्थापना हुई। पण पासकों ने अपने देश को समृर करने के लिए भारतीय पपोमचोको पीपट र दिपा। यहां की कारीगरी धीरे-धीरे समाप्त हो । विदेशी वस्तुएं बहानों पर बकर भारत पाने नगी पौर भारत पानरसोना लवकर विदेश जाने लगा। देश की प्राषिक स्थिति विपाया। गरीवी पाई। किन्तु इसरी पोर ममेरे पासन की मुविधा र सुम्पपस्या के लिए रेच वार, गड प्रेस बिजली पारि का प्रबन्ध यिा। यह मा त कानेग सुत पसे । अंग्रेजी भाषा का प्रचार पड़ा। शिक्षा का माध्यम प्रोगी हो गया। देश में मनमागरण हुमा । विपी ससति पौर शिमा के प्रभाव से देशवासियों में नर वना माईन पतिसमता का पाप बात भा।

मारतेमु पुग - - ऐषी परिस्थिति में रेपी रागार्मों के मामित पियों के मापार ग्गा मये। सामासी युम गाव ममा पतिकामीम'पारिक कविता को मुमने मामों को सम्मा भीरे-धीरे समाप्त होमे भयो । देश की परियतित पाषा में ऐसे साहित्य की प्राणायाचा अनुभव होने समी गोपनवा में भात विज्ञान संचारकर सके जो देश की प्रबम्बा का मान ममता को करा सके। पारस्पाया पनुस इस पुर में मारतेषु हरिवण से मासिकार का बम हमा। उन्होंने अपने युग की परिस्थितियों का तपा पाहिय परम्परामों का पहन पम्पयन किया और युग के पास काम्प की रचना प्रारम्भ की। भीम युग में पीवीसी गट विकास वो हमा किन्तु पिता की मापा गमापा ही पी। भालेन्दु परमापा मैं रोग भी भाषिक सामानिक तपा मैविक स्थिति प चित्रण करके देशवासियों काभ्मान पपने देश की दुर्दधा की पोर पापित किया । पमा - पावर सब मिमि रोग मात माई। हाहा। भारत पुरंगा रेखिम पाई। भनेवी राम्प की प्रशंसा करते हुए भी भारत को प्राधिक रंगा पानिज इन्होंने प्रस्तुत पिया परेको राग मुम सान सर्व सा मारी। 4 पर रिदेश बम गाठ यह प्रतिमारी। मानेर एपिषमा की पुपातपारी प्रतिमा मै साहित्य में पनीरन बीता नागवा पिप परिमत हपा । साहित्य 7 राबरणारों की भोपिय परिपि से हटकर पनता निपान मुसे प्रांगण में प्रवेग हपा। मारदे में समतिरपना की सपा पपने सहयोगी समको से च पुष कार्य नि प्ररित रिया। पं. प्रवानापपण मिम भमिारत पाम THER भट्ट बोपरी बडीनारायण प्रेमपम पानि परियामागे मोरविापों द्वारा रेप कोषमाने पर प्रसान रिया।

निसरी पी ने अपने मनोमस साहिप की रपमा के लिए युग के प्रतिभा समम पियों पार बों को प्रोत्साहित किया। उनकी सत्प्रेरणा पाकर कवियों ने युग की पापस्मता के मम रेपप्रेम सरेस मक्ति, भाख का प्रतीत मन स्त्री शिक्षा समाचार, शिक्षा प्रचार, वीरों की प्रचारित पगतिक रेतमा पादि विपों पर विस्तृत काम्प रचना की। हिरीबी मेम बस कवियों को विषय समापी सुमार ही दिम अपितु म्हेनि मापा की सुम्यवस्था, कविता के लिए परमापा का परित्याग गार रस की मामी की मिना भारि केरा पाहिम का नवीन मार्ग प्रशस्त किया। वहीं बाहों से इस पुष को 'दिवेरी युग' हिरी युग में भी मपिनीचरण गुप्त, पयोम्यामिह उपाप्पाम ब. गोपालतरणसिंह पमनरेग मिपाठी पयाप्रसार मुक्त सनहीं, नापूराम कर से रन्चकोटि कमियों में काम्प रचना करके साहित्य की भौगरि की है। कवियों के प्रविरिणत इस पुष में पं. रामधन गुमन, मा. श्याम मुम्बर पास मिमा बा• मुनावराप से पासोरपगच सेवक मी हुए । पपपकर प्रसार प्रविपि नाटकों को ना इसी काम में हुई। पी मैधिनीमरण पुप्त पार प.मयोप्यासिंह उपाध्याय रिपरी युग की दो महान् विभूतिया है। हरिमापनी ने प्रपक परिभम करके बड़ी योनी में प्रिय प्रगाव' महाकाव्य की रचना की। होबोमी में परमापा पैसो मधुरता नहीं पी प्रत प्रारम्भ में कुछ लोग नहीवोमी में कविता करने के प्रस्पन्ध विमान तो समोसी के अपने परहीम मापा में पर्याप्त प्रमिम्पसमा शक्ति पी प्रत इस युग में पड़ीयोती में काम रचना करमा मासान काममा किन्तु प्रयोप्मासिंह माम्मान मे संस्कर बोको मेकर 'पाप' के पिर परिषित काम पिपय पर पड़ीयोमी में पना करके एक प्रामुत बस्तिका परिचय दिया । 'प्रिय प्रशासकी भापा नई हिन्दी में सात पसका प्रयोग मयाण को मानव सप में सपा रापाको समायसेविका के प में प्रस्तुत करना नया है पण के समस्त पतौफिक कार्यों को पुलिसमव म्पाम्मा ममीन है पौर प्रति का भासम्बन रूप में पुन प्रयोग तथा 'मयमा मस्तिो देसमति में परिवर्तित करना नवीन है। इस भाति 'प्रियप्रयास' हिदी युग ना एक सभा मासिक प्रेम है। इस ग्रंप को देखकर बड़ीवोमी में पाया रखना होने नमी । पं. रामचरित उपाध्याय ने 'रामपरित चिन्तामणि प्रबम्पकाम की रचना की और पपिसीकरण गुप्त ने 'सामेन्ट पैसा सुन्दर प्रापराम्प मिसा। हिनी साहित्य में 'साकेत' की रपमा अपने प्रसार का मगीन पपोप है। इसकी कसाबस्तु रामचरित ही है जिस पर तुमसीदास का गौरम मामी महाकाम्म 'रामचरित मानप' सिता गया है किन्तु 'सात' की क्या में भाष पोर जैसी दोनों ही टिमों से बहुत मित्रता है । साकेत के पन पार्ग पुरप पम, भगवान् मही सीता पार्म पत्नी होने के साप सार परिमममीन सावलम्बिनी मारी। अंगम में कामह मूब पालती है, मोती पित मीम बाताों से परिषय बहाती है। सामेत की सबसे महत्वपूर्ण घटना है मामण की पत्नी चमिमा की विएना का विस्तृत पर्सन । उमिमा ने सीवा से मी पषित स्पाम किया। यह पौर वर्ष तक सरमण की स्मृति में पामू बहावी पी किन्तु मिनी रवि मिना के लिए एक रो पति भी नहीं सिपी । मानिए युग में भारी सम्मान या उसे रोम-हीन अवता न समझकर पानी उमापर पति माना जाने लगा पर सभी पेपित मारिमों का पहिरन राम में रमरा । बुर की परली पयोपरा मम की पत्नी ममन्ती मूरगहाँ पामापती मारिमारियों पर काम्प सपनाएं हर। विसीशरण गुप्त में भारत में रमिता पौरदिपीके पापों को नये में पिषित पिया है। रेपी के मामापनी पुती में सपना की है। यह सब पापातार मी पमि में पतकर प्रेममयी मावा बनमा मोर पस से परमारने पी पापना करली है।

द्विवेदी युग 'सात' में पुग की समस्याओं का मी पिण है। इस पत्र में पुरानी परिपाटी के काम्य लक्षणों का पूरी तरह पातन म परफेकषि ने नौसियों को अपनाया है। सारे का भयम वनसम्पूर्ण काप का प्राण है। लड़ीबोनी में कास्य रचना दिदी युग की प्रमुख विशेषता है। भापा को परिमाणित एवं सुम्पपस्थित करने का पेय हिवदी भी की है। 'सरस्वती' पारिकारे सम्पारक स्प मे पम्हनि हिन्दी साहित्य की कमी मारी सेवा की। . कुप उन कोटि कषिों की रचनाओं का साहित्य में गाचा स्पान है। स्मामनाराम पाणे को पीररसपूर्ण रचना "हसीबाटी' मुमारामारी चौहान की मांसी की रामी गुरुमसिंह की 'नूरण रामनरेश त्रिपाठी के 'स्वप' मिमन' पपिळ' ठाकुर गोपासवरसिंह की मानकी' सिपापमशरण पुरे भाई' 'विषार' 'पाय' और पी सोनसान हिका सेवाग्राम' प्रारि काम सुम्बर और साहित्यिक रचना है। 'सेवापाम' में दिदी बी को पत्रीय पपिता संकनिव। पापाबाग (१९२५-१९३५) बीचमी पवाबी के दूसरे पक्ष में अंग्रेजी विमा संसति पौर रितारों का ममता पर पूर्ण प्रभार पाने सया। भारत की पुरानी परम्परा पीरे-धीरे टूटने मी या उनके प्रति भये मोगों में प्राषि उत्पन्न हो गई। सामाणिक प्रगतिक पार्मिक समीनों में देश का हरिकोण परिवर्तित हो गया । फलसम्म साहित्य में भी माष पौर मापा संक्षेप में मानता का समावेश मा । मिरी युग के कवि मैतिकता समाजसुधारणापता प्रावि विपयों को मेकर रपमा करते जिनमें पाहित्मिकता कम रुपये प्रधिर होते थे। या साहित्म निजी मापों की पमिम्पत्ति होकर देख पाम पार समार की पावरपक्ताओं के अनुमान - सिपा पया। पत सा परिकार माग प्रपायरमा परि रविवात्मक है। इसमें सरसता र मपुरता का प्रभाव है। मारीसौन्दर्य प्रेम कल्पमा बिमाम सर मार प्रकाशन मादि विपदी युग में परिव से । पम्ही सब बातों के विपरीत मये मुग क मय कवियों न भति की। पापागादी पाप की मापा भान मसो मनमा समी में गोवि है। बायाबारी काम्प के मुम्म विषय है सौम्पर्य और प्रम र मय कपियों में अपने हरय भागों को प्रतिक माध्यम से पतम्मिा है। मामबन प में भी प्रालि पसंत पमावादी कपियों का प्रिय विपर है । छायाबारी कविता में मिरा पौरख के मार पपिर पर किये गय है। रेममार की परिम ताओं में पाराकर नम मे र प्रति भी गोर मे मा प्राकार बौदर्य में नो पाका पाहते। इस काम्पमा पर बंगपा माहित्य पौर अंग्रेजी साहित्य का पधिक प्रमाण होम के कारण मापा मक मगीन माणिकता मनकारों का मवीन प्रोम गीतात्मकता भारि मुग्ग भागय है । इत्यादी प्रतिमा भी इस पुम म पुन प्रभावन मा । पायापार पम प्रारम्म मन रमानों को दिया गया जो मस्पर पौर पम्पावहारिक की पौर 'मीवायमि' की मरम में मिनी मई की। पटु पापोषना भी की गई पिस्तु मीरे पीरे मावा को मुमता नापा-ममी मी मामता पौर मामुप के पारण पायागर' म मरीम पारधारा लिए ही प्रयोग पिपा पाने समा। मान रत्तम पनापा पौर परम कोटिपियों के पार पायावा तमाराम का पण सुप पहनावा है। इस पुसरे प्रमिरपरि अगर प्रमार मुमित्राना पा महा स्पी बर्या मूर्यकान्त रिपारी 'निरामा रामामार बर्मा हरिवगराप पापा मगरनीचरण वर्मा, रामनाप मुमन मोहनमान महतो रियामी प्रारिरानमे प्रथम पार रवि मुर पारावारी मान गये है। प्रमारी कामापमो प्रबग्गाम और मानू मुता बाम मादिपरिपूनि । नामामी म पनि प्रालि मानए मनु पोर परा की पौराणिकपाको मेकर नरोन भाषा की मुष्टि की है। इसमें परा का महत्व मतिपादित किया गमा। मापा और सैनी को हष्टि से 'कामायनी' अपने युम का उत्तम काम्प है। मुमित्रानन्दन पन्त को पनाएं यायावारी प्रवृत्तियों की घधिम उराहरण है। मुखदुख पाशा-निराशा माों को इनकी नामों में पी मदर पभिरना हुई। पंत की भाषा में सामणिस्ता मधुरता पौर प्रम्पारमकता है। पापको सपनामा में प्रमात्म मा बान के समम्बय की पेण तथा माधुनिक युग भनुम मये समान की रचना की कामना व्यक्त की गई है। प्रस्मो के प्राविक सौवर्य में इसको प्रति की पोर रिअप रप से पापित किया है पत काम्म में प्रकृति विषय पी प्रधानता है । युग के महापुरप पैसे मांधी पारगिल पारि प्रति पापको पूर्ण प्रमा है। पन्त ने राष्ट्रीय विपर्यो पर मौ रचना की है। महारेरी का प्रया पारी मुग की मीरा ! | मापके पीत मम्मरमपापी भाषमाओं से युक्त है। परमारमा के लिए में पारमा की मातबरला काही मापने पर पित किया है। पापावार की इस्पबादी प्रवृत्ति के वन प्रीत सम्पूर्ण पर भष्टा समापी भवान् के पंप बीन की पटीम के प्रति माफि पिए मिडासा प्रादि का चित्रण सर्राधिक महादेवी की पनामों में ही हुमा । मसी पान भी ई मदुमारी रामिनी मी हूँ सपा में मार परी दुरु की बरी' मारि पनार्य एहस्य भावना से पूर्ण है। 'पामा पापका प्रतिस पाप है। माषा मे संगीत और माधुर्म है। 'निपना' युग के सबसे पपिक मंतिकारी कपि है। मौन निर्मय होकर समार की सदियों का पान किया है। मापने परों सम्पनी कविता को मुक्त किया । 'पायावार पुम को प्रशस्त मौर उन्नत बनाने में पापा का हाप है। निरामा की 'तुमसोपस' या 'मी पति प्रा पिता ग्रेप रचना है। सारगुता' बना' पारि नयों में पूंजीपतियों के प्रति तीन पात्राय है। ये पायापारी होने के -साय युग की प्रापिक विषमतामों से भी पूर्ण समेत पे। इनकी मियारी' टोपी पत्थर' 'माहाबाद के पथ पर पारि कविताएं ही बालों को व्यक्त करती है। इतनी समत रखना करम पाना रवि अपने मन्तिम दिनों में म्यापि - पीडित हो एप विक्षिप्त सा हो मया पा। सन् १२ में मम्मी बीमारी पार पनका देहावसान हो गया। पापापादरी पुग के प्रम्प कवियों में स. एमपुमार वर्मा का नाम सिर । महारेपी की माति पापने भी रहस्यमाची रचना की है। मो वाताण पर्मा नबीन' , ममबतीवएम रर्मा का काम्प कुप मिम कारा। इसमें प्रेम प्राधिक गिरोह के मार पपिक। होने ही भोगती मापी में शान्तिमापीरपना भी की है। पी पमपारीसिंह 'दिनकर' 'नरेग मर्मा मौ सौ पापनि किनकी रचनायें 'पापावारी प्रवृत्तियों से भी नहीं है पम्हनि स्वतन ममी में स्तन माग प्रारपि।रिगराप बन्न की मधुरामा' 'भगाना मारियाम्प सेपासमता में दो सिर । इन परिवारों के कारण लोगों में हाला पार'माम से एक नया गार हो प्रचलित पर दिया । 'एकान्त संगीत भामा निमन्त्रण, पा मुक्त कार्यों में 'पम्पन' के प्रपने मनोमानों को मुदर पोर प्रमावगामी रूप में सात मिपा है। की भाषा सरत रितु पारमयी है। सर में 'पायापारी पापपारापि पाने प्राप, मोन हार तिमी आगोही राम स मे प्रकार करते हैं। अपने मुण्-दुग परे रहे गगत्पी रिम्हा मही पी। पारागरे तापमान सागर गौ तह, पप्पामुम जितनी र पहा हे मषित भारनित से पे बमुप्प रम । पापा पापितरोग वामपस्सना की मिति पर पा है। मौपिए नौमतीमारिरोष प्रारम्भ मा पौर पमता के मुम ।

- - दुम को बागी पो मुमरित करने बामी 'प्रपतिबारी बाराका प्रचार हमा। प्रगतिवार (१९३५ १९४५) प्रबति पा सामाग्य प्र है मागे बढ़ना बोकाय अम-बीवन हो किसी रप में मापे पाने की प्रेरणा देता है यह प्रगतिमीत है। इस पर्प में प्रत्येक मुम की मपिता अपने पिएमे युग से किसी न किसी रूप में प्रपतिथीम होती है। पुरानी परंपरामों मोरपारकर बाम्य में पर किम्ही ममे विपर्यो नये भायों पर नई मी का प्रतिपादन होने लगता है तभी कषिता प्रमविनीम हो जाती है। किन्तु हिदी की प्रगविवारी काम्प माप प्रगतिक उपमुष्ठ सामाग्य पर्प को धारण करती गई मी एक मित्र प्रकार की प्रगति का मक्ष्य मकर माम्म हुई प्रत इसी को 'प्रगतिवारी सभा री गई। 'प्रगतिवारी म प्रगति का पर्व है मार्स को मारमा मावि पि से जगत् को बेसना गर्ग संपर्प को दी करमा सोपितों का पर मना पीर बर्ष विहीन समाग मी स्पापमा करना। प्रगति के इस मर्म को रष्टि में रखकर को बनाये गये पगतिवारी कावा। इसके पिपरीत विन झपियों में हम सिखातों से प्रभावित होकर भी इन्ही पिपनों वक पपने को पीमित नरसकर वर्ष सामान्य रुप से समाज को प्रपति की मोर से बाने बानी बनावें दो प्रपतिचीत कहनायी । इस प्रकार 'प्रमतिवारी और प्रगतिशीस गावियों में से मिस वर्ष माने जाते है। भारत भूपण पपास मारमाव पानात रामविलास शर्मा मरेम पर्मा निरमपतसिह सुमन पारसी प्रसारसिह मचम बममीर भारती विप पर पारिपारियों ने प्रारम्भ में प्रगतिवादी रचना की पौर मुमिमा मदन पन्त निरामा निकर, बम बामपएममा 'मबीन' पारिमें प्रगविगीत । किन्तु धीरे-धीरे यह पम्तर मिरता गया। भाग सभी कवि प्रविधीत । प्रगतिवादी पारा सुप्त प्राय हो गई है । सन् १, बाद से ही इसमा प्रभाष पौण होने मपापा।

सन् १९२.२ पापात् हिन्दी में जिस प्रकार छामावादी पितामों
की
पूम पी गिसमें प्रत्येक मबापुबरु कपि रिमी कल्पित या वास्तविक
तिमा के लिए म प्रामू बहाना पाहे मरना और रवनी वारे, मौका
दादनी पारिसे मन हमामा पाइपयक सममता पा उसी प्रकार
सम् १५ के बार हिली में प्रगतिवारी रबमामा की बम मधी जिनमें
प्रत्येक प्रगतिवादी कपि भोपों के मिये पुरसा प्रफ्ट कला होपितों की
अम्तिमा एम गामा, साम्पवादी सिमान्तों का प्रचार करमा तपा हसिया
हपीड़ा और माम रस माम निगान पारिका प्रयोग करना अनिवार्म
मानने लगा पा रसारण के लिये प्रगतिवादी कपियों की मुख कविता
पहाँ सहमहाती प्रेती पर भारि मायदे मा
समी पास कीरी पर मासा पी पात मगातेमा।
मार गुपये ही मनमानी गई सीम पयानों की
मास वन मापियो सब मगर पिसानों की।
मात स्म का दरमम मापी रमन सब इन्मानों का
दुश्मन है सब मगद का पमन भी पितामों मा।
-परेन मर्मा
पुर्पोपी सदी मतियों को अपमती,
पहर महर सो माजी मघमती
अंधेरी निपा म मसामों सी असती
पनी गारदो है सी माम मैना ।
ममारी विषमता पी मी मिटाती
परीयों की दुनियम बोरस जगाती
प्रमौरों पी मोने की संरा पसाठी
चमी मापीपी मान सेना।
-शिवमयमिद मुमन

- हमें हा समता है? मोहे की सीमार हमारी इम हिना सवान। काटो बाटो काटो कापी, मारो मारो मारो हपिया। दारनाथ मवान समस्त प्रपतिकारी माप में इसी प्रकार के विपर्यों की प्रपामवा है। पिम्प को अपने मत प्रचार का सावन मामले मत इमकी पापा-मी में नायित्व कम बहरता और सरलता अधिक है। नको रममा पर्णनात्मक विनमें किसानों मजदूरों का सम्म निम्न गर्म रे बसा बीबर पिमित है। इस प्रकार के विपर्यों के मिसे रह प्रकारों से मग्मित पापा की मारावस्ता नहीं होती। अपपिपाणी विचार पारा की मोर परमुख होते ही हावापानी भाषा पर + नमक थी मुमिकामनन पन्त को मह कहने लिये मिस्त होना पग । तुमपान र षको बामन में मेरे विचार, पाली मग पा एम पाहिले भकार प्रपतिवारी कामपामारल का काम है। इसके मापक प्रचार के लिये मापा 9 सरसा प्रतीकों की भीमता रुपमा और परका में परिवर्तन परम पावलापानकारियों से बासामारण में प्रति प्रामीस बों को अपनाने का प्रमाल किया। श्री बना पना पापुर, बात माइत विसरला पारि । उपमामों में की मनीमता है! - (१) तेती बड़ी ही प्रति । तारनाथ (२) कोपले पान सी बरनी पी पी -मियपष (१) महू से बनते है दिमती के बस्व भूमी मागे पर माल-माल | रामविमार शर्मा (४) से मातरेन से नयन दीन । -मुठियोग - ( १५७ ) इस कापारा में मन मीन संगम पारिको उपमा अनुमा साविकी प्रतीक मानी गई क्योंकि इम से निकर्म ज्यादा परिचित । परीर, मयूर मही। मनरादरी काम्प में रन पस्तुमों मी उपमा दी पानी पाहिले यो दिन रात पानों के सामने राती है या जिनसे हमारा पिर परिषर है पपया पो हमारी पन मानसिक मारनामों को परिवर्तित करने में समर्थ । प्रगतिवादी कविता में सौन्दर्य के मान भी परिवतित हो मये । इस तुम भी तोपर्य भावना पनहित पर प्रारारित है। पुरातम सम्पर्य के स्पान पर समस्त समुन्दर मौर मरेस कही वाने गाती मस्तुों में प्रगति पानी कपि की टि मे सौरव सोगा। प्रगतिरारी काम्प को मुम्स रिपता है सामयिक पर पीरन की पभिम्पत्ति । पचपि पम्म पुगों में भी समार की विविध समस्यामा पा पिस लिया गया है किन्तु निम्न मम्म वर्ग के पवने म्यापक हित को रष्टि में कर काम्प रपना इससे पहले नहीं हुई। तामासिक प्रगतिक मापिस पामिड सपी विषयों पर बड़ी मारमा पर पुमती हई रमास पाप करियों में दी है। पति से कमि केवल मामी विचारों से प्रमाणित होकर गुरपामारी रष्टि से काम्प रपमा करते वोला महत्व साहिरप में सबसे सराहा गर्योटि मापा, माप लिपप पीर गैसी पौष्टि से मह काम्प पाठकों को सापिस सध्या को पापित करने में समर्प है। बौद्धिक पौर हानिक विकास के साप म्पेप्प पार हास्य की प्रति मे मपूर इस काम्प की पपपोमिता कम मही है। सवा पूर्व पोर मत्रता के पा प्रपतिवारी काम्प में गीबात मे तपा मग्याप पौर प्रत्याबारे विएर पापार साने में मपनीय बाय स्पिा है। भारत पी ससासरे पापा मनों पर मोरगीत मी वर्ग में म्पिा हा यह मम्प पिवमा पुमा हमा है - - माने पाया है पुमा हुमा सरकार हमारी मांगी में। भारका करता है राम राम्मा प्यार तुम्हारी प्रांसो में । मोरा जपता प्रम काता बार तुम्हारी मात्रा में। घि प्राधिकापी रिपो मे समस्त भारतीय परंपराओं को मिटा कर मासबारीम पर नये समाव की पबना का मनोचा भी इस भूमि के मिये प्रमुपयुक पा । मोहों को इस प्रकार को पत्र मिनी से इसे सुने एप से मही अपना सके। दूसरी बात पाकिकाम्प में माप्त सामयिक समस्यापों का पपाप विप ही महत्वपूर्स नही होता उसकी सारेका सम्पूर्स पोरन को अपनाकर बनने में हती है। रोटी पार भूत का राम मनुष्य को कार समय पर मुम्बर भम सकता है सरा इसका राम करन्टु प्रतीत होने मचा है। एकवीहीमा में माहित होने के कारण पो समय पापा मनविणारी काम्यशरा सम सन सोल होती गई। धामावादी दाम्प के से प्रवीको पोर निराशात्मकमा मेवनारमा मानों की पुनरावृत्ति से पाक ने मप में सी ही स्थिति प्रमविवादी शप की। भोपितों के प्रति प्रमिम्पत विशे की बौशिक महानुभूति का रेम गार दिनों तक स्थाई महींप सका। उसकी प्रतिकिया मारम्म हुई। काम में पन्न स्थानों की भमिम्पतिबियों का प्पेस मनी पौर नित्य नये प्रयोग प्रारम्ब हुए। प्रयोगबार मई कविता (१९४५ से पब तक)- प्रविमार साब हो हिन्दी में एक और नई कामपाएका प्रादुर्भाव हया बो भोपकार' के नाम से प्रतिक है। प्रारम्भ में विषम बस्तु की दृष्टि से इस सम्म में कोई रिमेय सीमा नहीं की, इसके प्रमुख कापि प्राय वही ने नो प्रतिवादी रचना कणे किती की पर्याप्त मदीनवा के साए इसको पृषः नाम दिया पपा। गारमें यह पारा मात्र काम के रूप में मानी गाने मपी । सन् १९१ में 'मम बी मे पकरियों की पनामा में नमीन मिर्मो का मापार पास एक सह 'तरषप्त के नाम से प्रकाशित यिा। इसकी भूमिका में पनि सिमा कि- "सपाहीत कवि समी ऐसे हरि ना पिता को प्रयोग का विषय मामतेको मह मामही करणे कि काम का सत्य उन्होंने पा लिया है वम प्रवेपी हो मपने को मानते हैं।" इस कपन प्रमुख प्रमोष' मम्मो प्रपोप मामी में रचना करने पामे कवि प्रयोगवादी हमारे पौरमकी रचनायें पयोमबार प्रकार माय भयोमगार के अपम प्रारम्म कर्वा कमि पार पामोरा माने जाते है। प्रथम 'सप्त' में गिन प्रयोपबाहरी कमियों की रपमा संगीत र गतके माम है, गगानम माग मुहिरोष नैमिषार और भारतभूषण प्रपनाम प्रभाकर मापये ग रामबिलात मर्मा 'पाय' पोर गिरिजाकुमार मापुर। भशापी पदों में इनकरियों में "भापा को अपर्याप्त पाकर विपम मतों से रो और सीपी हिरछी कारों से पोरे पो टाइप से बीय या उमरे मसरों से मायो चौर स्थानों के नामों से, मरे पापों से-सभी प्रकार के वर सापनी से" यह पप्टा पो कि 'अपनी गमी हुई सबैमा की दष्टि को पापों तक पपप्ण पहुंचा पाई। करियों में इस प्रकार से प्रयोग करने का प्रारम्भ म्पेिस निमासा मा स्पष्टीकरण एवं समापान करखे हुए प्रमपी में भूमिमा लिगा कि बहुत मे माग हम बात से भून पर दिकवि भापुनिक पनी एक बहन समस्या का सामना कर पा है-भाषा परी समय सदुषित हाती हुई सातापी गुम प्राकर उनमें गया, प्रतिमापा पपिए मार-गमित परं परमाता-पार पहुंभार पारण नही पनि किरमरे मीवर इमपो मारी मांग पनि मनिये मितिबायको म्याप सरप बनाने सनातन रखरापिम प्रा भी निगहना चाहता है पर देलनामापारी

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भाषा से ही मरकर पौर बमकर मुख होमई है प्राण संचार का मार्ग
उनमें नहीं है।
एक नमे प्रयोगवादी कपि ने पम्पों के पुराने पो को अपने पम्तर
में कुममाठी हुई नई प्याकुसता पोर देना की पभिम्पत्ति में प्रप्सम
पागर हिसा
प्राण प्रमिम्पतिका
मिम 1
किसी मर्मस्सी कम से
या पिया से
मेरे मावों पमानों को मेरो
प्रेरणा दो।
प्रसहाय ।।
पमिम्पतिवीन !"
मावों प्रभावों के पार्टी में पड़ा एमा
एकाकी ने-सा
कब तक बीता एमा?
सतह कमरे के बाहर पो हुए गई बोरे सा
बीवन का पाम पोगा।
परक निबयो की नई पीवा ईमा
प्रस्न पपिभ्यक्ति का मित्र !
ऐसा करो
यो मेरे मन में कुमामाता।
बाहर पाबाये।
पाविद्या बाये।
-दृष्यम्त मार

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अभिपति के इस प्रल मे फपियों को भये प्रयोगों, मिय विषय
दिया। उनके सम्म करिता मो से नयी पसिम्मक्सि पोर मये
पर्ष पाने के लिये प्रावमा भरते.
पम्म मामपारी
सारे के सारे पुराफ, प्रौर पौ मानक
एक तुम्हारे एपित की रहे प्रतीक्षा
पाई विपर मोर
कोई रगर नहीं है-
मंसी भीषी पहों में
पा न समिपों में
यहाँ पी का गुजर नहीं है
सन्नि मनिम का पहला दो, पोकारिता मो!
पिसीपम में दाम
पियका पिनादो मोमिता भी।
भूम पूसरित
हम फितुम्हारे ही बात है
हमें निहारो।
पर बिठामो,
हिमामो मोपविता मा।
दप्यम्त मार
रपिता मो में मानो हम प्रयोगगरी करियों के 'मने पी
पार मुमकर रहें मपे सरप पोर नये प्रयों में प्रयोग करने की
प्रेरणा है। इसीलिये यह रामपारा अपनी पूर: कामरामों
सेमिनोंरेम प्रयोग से पर्ष मये पार और पेसमेकर
पाई। समाप में मापा मी पानीमता ती मिस्तु
पौर निवारनी में मी ममता पौर प्रायझोनना है। प्रपोषपाती
पिन, परसरात सी पर सोचना विसरला दौरा

प्रवृत्तियों में प्रवर विद्यमाने है किन्तु किसी साहित्य विभिने प्राधिक
पौर विकसित स में पो अन्तर होता है प्रार हो अन्तर प्रयोमवार
पौर नई करिता में है। सेनों मित्रता काम तमामता परिक है।
प्रमोपमा कवि ही प्रब नये दिहमा है।
मई कपिवा की पिप प्रवृत्तियो । पक्तिलार मिराजापार
मण मा प्रतियोगिता पमानों की पीना मरेशा पिस पार
तीपण पंग्य-हास्प।
नये युग की शामारिक माषित हानिक राउमैतिक पार्मिक सम
स्पामों में मनुष्य की प्रास्था मिलासा कोमा मन से पिनष्ट कर लिया
हैदर के में अपने पाप को प्रयोग प्राधि पाता है। इसीमिरे
पार का कपि करिता में रिवरित मानब मुस्पों का पिन प्रधिकता से
खामगीर भारती मारते है
हम सब के रामर पर बाप हम सब को मारमा में भूग
इम सबके मारे पर पर्म हम सबहानों में दूरी तनमा की मूठ।
कविवर मारापरण अपने बीचन को पामह में फसे प्रमिमा
।
मेरे हाथ में टूय मा पहिया 'वाल पर टूटा कर
सारी देहयत निक्षत
मनिराम यस पर्व में टु पाप पसई पर
बोरिगीमाम पराप पया।
माँ उपमामों माना और ममे प्रयोगों के बिस हो गई कपिठा
पाधि है। फरियों ने ऐसे-ऐसे प्रयोग किये है बिहे सापारीकरण
होठा होया महाँ गरि की तुम और ममत्वारिक बुद्धि पर हसी अपरण
पासाठी पपमानो सहरम प्रस्तुत है
--

{ ११) (१) कमरे के मैन्ध-सी है प्रा बुझी हुई दिगो समय मागास्पीकर से जिनके निस्सम गुमे ।। (२) रेलसो पर रख तिना माह में पापरेका वार पहम्मतिब मेरा पीमकी दीवार यह पस्तित्व मेरा। (३) पार का नाम से ही बिपतीका स्टोप सी को एक रम मुहोबाती। (v) र शिठिन पर महुपों पीपर पड़ी है। जिस पर पाकर मूरज का संतान पोरा (५) पाट पिस्से मीनारोपहर नपपरकी समानोंnata मोमपी में भी मया कषि पर मपे प्रयोग पापी माया होयोटी परितरों पर नही गिराम स्तिों पपने पार पाठकों तक पहुंचाना चाहता है। हर मापीन र है।पारिप- बत पी प्राचीनताएँ बाप पानी पर मरण का एक राग । इम प्रपरे मी पुरानी पोरनी को पर पाही पर मये पुपरी किरण -हरिनारायण बार मी करिता केप पोर रिपन दोनों पर ही महब बसेमही मम्मीर विनाएं हो हो।पार पानोपना माएिपन विषनापों में

भरपूर दिखाई देता है। नई कविता मा भविष्य पया है या तो
बतामेगा किन्तु इस में सम्देह नहीं कि प्रयोगमा मा नई कवित
सामाग्य की पाठ्य सामग्री न होकर एक बम विरुप को बस्तु
है। इन में म्पक्त भार प्राय प्रस्पष्ट होते है। कवि अपनी ।
कांट पोट अधिक न करके सरस साहित्य रचना की मोर प्रषिक
तो मा साम्य पारा अधिक उपयोगी पौर वीर्ष बीवी हो सकर
मा पारिता के प्रसिस कवि है-
सन्निदानव हीरानव बास्सायन प्रमेय मुक्ति मोप प्रभाकर
पर्मबीर मारती कुत माथुर, गिरगाकुमार मापुर नामान
प्रसाद मिम कुबरनारायण भारतभूपए प्रपमाम बारमार प्र
देवराम ग. रामविलास धर्मा मरेश मेहता विनयनापमण रेख
दुप्पामा, पारि।

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मरपूर दिखाई देता है। माकरिता का भविष्य क्या है यह समम
बतायेगा रिस्तु इस में सा नहीं कि प्रयोपदार या पिता
सामाग्य की पाल सापनी न होडर एक वर्ग विशेष को पस्त बन गई
इस मत मात्र प्राप' प्रापर होते है। विप्रपनी रिकी
कार पर किम करके सरस साहित्य रचना की और मधिक ध्यान
को पहफाप पाप पिक उपयोगी पार पीर्ष बीपी हो सकी है।
नई कविता प्रविश कमि।
सगिरामरहीमन मास्थापन प्राय मुक्ति योग प्रमार माचरे
भर्ममार भारती समापुर, गिरगामार मामुप नापा- भवानी
प्रसाद मिष माराया भाराभूपण भागात बालाप भपकाम
पर ग. रामविलास शर्मा नरेगा मेहका विजयनारायण देव साही
गुप्तकुमार, मादि।

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Nayi Kavita Me Soindarya Bhodh Aur Any Nibandh

Author
Gayatri
Title
Nayi Kavita Me Soindarya Bhodh Aur Any Nibandh
File name
Nayi Kavita Me Soindarya Bhodh Aur Any Nibandh
Text
OCR done
Citation
1965
Published
2010/12
Publisher
Jaipur,roshan Lal Jain And Sanj
Language
Sanskrit
Pages
144
Library
Bhartiya Vidya Mandir Shoudh Pratisthan,bikanerbhartiya Vidya Mandir Shoudh Pratisthan,bikanerbhartiya Vidya Mandir Shoudh Pratisthan,bikanerbhartiya Vidya Mandir Shoudh Pratisthan,bikanerbhartiya Vidya Mandir Shoudh Pratisthan,bikanerbhartiya Vidya Mandir Shoudh Pratisthan,bikanerbhartiya Vidya Mandir Shoudh Pratisthan,bikanerbhartiya Vidya Mandir Shoudh Pratisthan,bikanerbhartiya Vidya Mandir Shoudh Pratisthan,bikanerbhartiya Vidya Mandir Shoudh Pratisthan,bikaner
Classification
Literature
DLI number
514938
Barcode
4990010022605.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
Q6mWXoNHU9J
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