Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
Hindusthan Desh Ki Yatra
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Sheet हिन्दुस्तान देश की यात्रा।
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नगरो को देखें और माना लिखनेहारा पढनेहारे के सग समस्त ताभी हिन्द के वासी न जाने हमारे देश देश की यात्रा करता है और वे दोनो मानो में कौन २ स्थान है जो देखने योग्य है। सत्य एक सग हिन्द के नगरो को देसके मन बह- है कि सैकडो घरस से हिन्दवासियो का यह लायेगे। हा यह बात सत्य है कि यदि सघ दस्तर है कि कितने स्यानो की जिन्हे पवित्र स्याना का वर्णन किया नाता जो हिन्दुस्तान समझते तीर्थयात्रा करते चले आये है और पान- में देखने योग्य है तो यह पुस्तक बहुत बड़ी कल रेल गाड़ियों के द्वारा से घटोझी बहुत अधिक और बडे माल की हो जाती सो दक्खिन और फिरा करते है तोभो अब लो बहुत है जिन्हो बीच के हिन्दुस्तान आदि के बहुत स्यान जहा ने हिन्दुस्तान की सैर फिई अथवा उस के बडे २ और प्रसिद्ध नगर कम है इस में वर्णित बडे २ नगरी को देखा हो। करोडो ऐसे हिन्दू नहीं है। हुगली नदी। जय विलायती याची कलकत्त के मार्ग से छोडकर हुगली नदी के मुंहाने में आता है। हिन्दुस्तान में भाता है तो घडे समुद्र को नघ मानी को और दृष्टि करता तो देखता क्या -- हिन्दुस्तान देश की याया। है ។ - दलदल भरे तो समुद्र कि पानी का रग जो समुद्र में नीला था अब में जायेगी जैसा अब नदी के काटने से जाती देख पड़ता है। पहिले जहान उस प्रकाश । यो प्रगट है कि धरती बराबर और भी नहाज की ओर चलेगा जो धरती से कुछ दक्विन दिशा को बढती जाती है और सत्य र अगुवाई करने के लिये है। यह कलकत्ते है कि पूर्वकाल मे जहाज कलकत्ते से बोस एक सौ बीस मील दूर समुद्र के किनारे मे कोस और भी उत्तर को, पार जहा अब जा क छोटी नौका में बंधा रहता है और उस नही सकते जाया करते थे। पहिली जमीन । समीम वही नौका फिरा करती है जिस में जिसे बटोही देखेगा सौ सागरटायू है और से माझो रहते है जो वाट दिखानेवाले हैं यह उस देश का भाग है जिस को लोग सुन्दर- चौकि हुगली नदी में मार्ग पाना बहुत कठिन बन कहते है। परन्तु वह भाग जो पहिले और बिना पैलट अर्यात पत्यदर्शक कलकत्ते दिखाता है कुछ भी सुन्दर नहीं है। वहां । पहुंचना कठिन है। ज्यो २ बटोही घरती काली २ नदियां बहा करती जिन के बीच मे समीप आता त्यों २ देसता कि पानी बहुत जंगल और है। इन धनों मे दिला अर्थात मिट्टी से मिला हुआ है क्योंकि बाघ बहुत फिरा करते और बेचारे मनुष्यों दी सदा भूमि को काटती और उस की मिट्टी को घेरा करते हैं। इस स्थान के समीप गाव में ले जाया करती है। ज्ञानवानों नहीं मिलते परन्तु कङ्गाल लकडी काटनेहारे वहा लकडो को बटोरा करते हैं। साल में एक बार वहां गङ्गासागर नाम एक बडा मला होता है क्योंकि लोगो मे कहानी यह है कि नब सगर नाम महाराजा के ६००00 पुत्र कपिल ऋषि के साप से नाश किये गये सब उन्हें तारने के लिये गडा स्वर्ग से उतरकर इस स्थान में आई। पूर्वकाल में यह डरावनी रीति प्रचलित थी कि हिन्दू स्त्रिया अपने बालको को गङ्गातट पर छोड देती थीं मिस्ते मगरमच्छ उन को खाया करे परन्तु आजकल सरकार ने इस वुरी रोति को बर्जित किया है। इस स्थान में हुगली नदी ऐसी चौडी है कि उसके दोनो तट बटोही को एक सग दिखाई नहीं देते परन्तु भागे बढके उस की चौडाई कम क्षेती गई है। पहिला गृहली देखने मे आता सो वह दोपस्तम है जो सागर ने सोचा है कि यदि गङ्गा में १५०० ऐसे जहान टापू पर जहाना को प्रकाश देता है। डैमण्ड नको लाट लाटके उसे प्रतिदिन हारयर अर्थात हीराबन्दर जहाजों के लिये - हिन्दुस्तान देश की यात्रा । के मार्ग से एकतिस मील और नदी के मार्ग मकान और गिरजाघर और मदिर दिखाई से ४0 मील दूर है। आगे बढके थोडी दूर देते है यहा लो कि बटोही वेवस हो अवश्य पर एक डरावना स्थान मिलता है तो जेम्स- कहता कि अहा हा यह सचमुच भवनो को एन्ड मेरी नाम से प्रसिद्ध है क्योकि दो नदियों बस्ती है। से अर्थात दामोदर और नारायण के हुगली मे वहां मिल जाने से पानी ऐसा उथला हा गया है और ऐसा डरावना बालू का ढेव बन गया है जो जहानवाला के लिये बड़े कलकत्ता का वर्णन । जोखिम का स्थान है क्योकि धारा वहा इतने कलकत्ता जो समस्त हिन्दुस्तान का मुख्य जोर से बहती है कि यदि जहाज कुछ भी नगर है हुगली नदी के पूरबी तट पर और बालू को छूको रुक जाये तो घारा उसे झट समुद्ग से ४० कोस दूर पर है। उस का प्राचीन उलटा कर देती और बालू में घसा देती है। नाम कालीघाट है जो उस मदिर के नाम से ऐसा है कि माघ घटे के बीच मे बडे २ है जो कालो के नाम पर उस नगर के दक्षिन लहान बालू मे धसके गुप्त हो गये है। जब भाग मे बना है। सन १६८६ ईसवी मे चार्नक वटीही वहा से आगे बढ़ता तो हुगली नदी साहिब और कितने और अगरेजी व्यापारी में अगणित नाव और नाना प्रकार के जहान हुगली नदी को जो कलकत्ते से २३ मील उत्तर देखता है। साई पाल के सहारे से चलते और है छोडके सतनती नाम एक स्थान में और कोई अग्निवाट क्षेकर भाफ के सहारे से आ बसे जो अब कलकत्ते में एक भाग है। जाते है। फिर भूसे लकड़ी चादि से लदी हुई बढते २ उन्हो ने कालीकट गोविन्दपुर आदि बहुत सी देशो नौका रहती है और ज्यो हम स्याना को घसाया। सन १६९६ में उन्हो ने कलकत्ते के समीप पहुचते त्यो बहुत सी नौका एक गढ बनाया वह विलियम नाम से जो मिलती जिन मे ईटे भरी हुई है। ज्यों २ उन दिनों में अंगरेजों का बादशाह था कद- हम आगे बढते त्यो २ जमीन और भी मन-लाया। चार बरस पोछे उन्हो ने रुपये देके भावन होती जाती है। बहुत से गांव दिखाई प्राजिम राजकुमार से जो औरगजेय वादशाह देते जिन को समीप घान के खेत और फल का बेटा था इन तीन गावा को मोल लिया। धगीचे दिखाई देते है। बास और ताड के सन १९४७ ला कलकत्ता मन्दराज के अधिकार पेड़ हर कहीं दिखाई देते है परन्तु विशेषकर में रहा परन्तु उस समय से अलग पा । सन जय बटोही कलकत्ते में पहुचता तो मन घडत १०४२ में वहा के निवासी मरहटा लोगों को मगन होता है। इधर तो अनेक जहाज पाति चढाई से जो हर कही लूटमार की प्राति नदी में बंधे हुए पडे है और भय साते थे सो अपने बचाव के लिये उन्हो उन के साम्हने घरती में अच्छी २ हवेलिया ने बडी नहर सोदी जो माल लो मरहठी पनी है और रग घिरा से चमकती है और के गडहे नाम से प्रसिद्ध है। सन १०५६ में मैदान के बीच में गढ को पक्को २ भी दिखाई सिराजुद्दौला ने जो यगाल का नवाय था कलकत्ते देतों और उन के पीछे वडे २ भवन और पर चढाई करो उसे अपने वश में कर लिया। फरते रहे यात + हिन्दुस्तान देश की यात्रा। 1 -- वह समय है जो इस बात मे स्मरण किया बन्द किये गये जिन मे से सवेरे को २३ प्रादमी कि १४६ कैदी एक कोठरी मे रात भर जीते निकले । एक साल पीछे क्लाइव साहिव ने नगर को फिर अपने वश मे कर लिया और प्लासी के मैदान मे एक बड़ी लडाई हुई जिसके कारण से बंगाल देश का अधिकार प्राज लों अगरेजो के हाथ में है। क्लाइव साहिब विलि यम नाम गढ को फिर बनवाने लगा और वह सन १७०३ में समास हुआ। उसी साल में वारन हेष्टिङ्ग हिन्दु स्तान का वायसराय हुमा और कलकत्ता उस का मुख्य नगर था और उस समय से प्राज लो उस नगर की बड़ी उन्नति और बढती हुई है यहां लो कि जहां पहिले मोपडियों के भरे तीन गान थे आजकल एक बहुत घनवान नगर हो गया है। सन ईसवी १८९१ मे कलकत्ते मे ८,४०,१३० निवासी थे और हुगली नगर जो नदी के उस पार है कलकत्ता । वडा और WI १,३०,000 निवासी है और बीच मे नाव का पुल बन्या हुआ है और हिन्दुस्तान देश की यात्रा। उन लोगो को छोड जो नगर में बस्ते है बहुतेरे है और बीच मे कम्पनीबाग से विभूपित है। इस और भी है जो दिन को वहा आकर काम मैदान मे पच्छिम और विलियम गढ दिखाता करते पार फिर साम को अपने २ गाव को है। उस की पूरब और चौडिङ्गो सडक है चले जाते है। जिस की वैलिया ऊची चार पक्की बनी हुई कलकत्ते के समीप कितने स्थान हैं ना है। उस के दक्विन और वह बडा गिरजा देखने योग्य है। दक्षिन मे गार्डन रीच नाम घर है नो लाट पाद्री विलसन साहिब से एक स्थान है जिस मे वह भवन बना है जिस में बनवाया गया है और एक कौतुकशाला भी है अवध का महाराजा वल्वे के पीछे रहा करता था। जिस मे नाना प्रकार के पशु पक्षी और नाना उस से उत्तर ओर चलकर एक बडामैदान हुगली देशो को देखने योग्य बस्तु पाई जाती है। नदी के तट पर है जिस में बहुत सी सडके बनी मैदान की उत्तर और वेलसली साहिब ने वह 10 4m प कलकत्ते का हाईकोर्ट । बडा गृह बनवाया जिस में लार्ड साहिब रहा| और स्वाड नाम एका सडक धनी है कि जिस करते है उस के समीप बहुत से अच्छे २ सर. मे महानना के और व्यापारियों के लिये एक कारी गृह बने हुए है जिन मे एक वह है कि और बडी २ दूकाने और दूसरी और नाका जो हाईकोर्ट के लिये बना है। इस का चित्र से मार उतारने के लिये घाट बने है इस के यहां छापा जाता है। फिर मैदान की उत्तर समीप एक चाडो सडक है निस पर डाकघर हिन्दुस्तान देश की यात्रा। . और सरकार के बहुत बड़े २ मकान है। उत्तर बहुत मरते थे। पानकल नगर में अच्छा पीने और चित्पार सड़क बहुत प्रसिद्ध है जो का जल पाया जाता है और हर साल अच्छे । नगर के उस भाग में बनी है जहा देशी मकान बनाये जाते है। लोग बस्ते है और उस में रात दिन अगणित कलकत्ते में पक्की सड़कों का बनानी कठिन मनुष्य चला करते हैं, उस के घरों मे बहुधा है क्योकि कही पचास कोस मे प्रत्यर की नीचे दूकान है और ऊपर लोग रहा करते खान पाई नही जाती से लोग पक्को ईटे है। उस के समीप और भी पूरय की ओर तोड़कर बहुधा सडक बनाते है। कई सड़को कालिज सडक और कार्नवालिस सड़क चौडी में लोहे के मार्ग धने है तिन को ट्रामवे और प्रसिद्ध है जिन मे बड़ी २ पाठशालाये और कहते है। लोग ठीका गाड़ियों को बहुत काम कालिन पाये जाते है और वहां एक नामी में लाते है और साम को जब महाशय और औषधालय भी पाया जाता है । कलकत्ते का साहिब लोग मैदान की सड़कों में हवा खाने दक्खिन भाग चौडिगी नाम से प्रसिद्ध है। के लिये फिरा करते हैं तो नगणित अच्छी २ यह वह स्थान है जहां विशेषकर अगरेज गाडियां और घोड़े देखने मे आते है। लोग रहा करते हैं। वहां की सड़के चोडी व्यापार मे कलकत्ता बहुत प्रसिद्ध है समस्त और अच्छी और सीधी बनी हुई है परन्तु हिन्दुस्तान के लेनदेन की एक तिहाई कल- नगर के और स्याना में सडकें तंग और टेढ़ी कत्ता के द्वारा से किई जाती है। वह व्यापार तिरछी बनी हुई है यहां लो कि लोग बताते जो वहां परदेशो से किया जाता है से है कि हर कही हवेलिया साम्हने और झोप-५६,00,00,000 रुपिया साल का हुआ करता है। डिया पीछे दिखाई देती है क्योकि देशी लोग कलकत्ता वह नगर है जिस मे पहिले अधिक करके बस्तियों में रहते है और सत्य अंगरेजी विद्या हिन्दुस्तान मे पढ़ाई गई बरन पूछो तो यह झोपडिया की वस्तियां है। सत्य आजकल उस के कालिज स्कूल प्रादि अगणित है कि घोड़े ही दिनो मे नगर की बड़ी उन्नति और विख्यात है। यह बात पादरी डफ हुई है। जहा अब वलिङ्गटन चौक है तहां साहिब के परिश्रम से बहुत बढ़ाई गई। सर- एक बहुत गंदी नदी बहती थी। सन ईसवी कार के भो और पादरियों के भी और देशी १७८६ में बन और दलदल आदि पाये जाते गो के भी बहुत सी पाठशालाये और कालिज थे जिन में बनपशु और डकैत फिरा करते घे है और इनारो लडके विदा प्राप्त करने मे कालीघाट के मदिर के समीप जहां अब साहिवो परिश्रम कर रहे है। यदि সুজ্ঞা के अच्छे २ घर बने है । उस मैदान मे नहा सब पढाने का कैसा फल प्राप्त हुआ तो इस महामंदिर अब खड़ा है उन दिनों मे जगल बात का कहना पड़ता है कि १00 बरस के था निस में वारन हेटिङ्ग ने बन्दूक से वाघो यता से वह लाभ न हुआ जिस को पाना को मारा । बड़े मैदान की हर साल यही चाहिये था और जो इस विद्या के प्राप्त करने दशा रहती थी कि तीन महीने लो हुगली से और देशो में पाया गया है। यह बड़े शोक का पानी उस पर चढ़ा रहता था । बस्तियों की बात है। इस के विषय डाकटर महेन्द्रा मे लोग मेला पानी पीके हैना आदि रोगों से लाल सरकार जो कलकत्ते के ज्ञानी लोगो में जाये कि इस पन्दुस्तान दश को याश। - - प्रसिद्ध है या कहते है कि अब सौ बरस से उचित है। पूर्वकाल में ऐसी बेश्या लोग अंगरेली विद्या हमारे बीच में पढाई गई है। कालिजी के समीप भाके बसती थों परन्तु परन्तु उस का वह फल लिस का पासरा हम पानकल ऐसे स्यानो से दूर किई गई। बगाली विशेप रीति से रखते घे से प्राप्त न हुघा लागत में यह बात बहुत पाई जाती है कि अर्यात हमारे लड़कों को उन्नति और सुघराव माचीन रीति ध्योहारों पर चाहे अच्छे चाहे मास न हुआ घरन मेरी समझ मे वह सिघाई, बुरे से बहुत मन लगाते और सोचते है पार नीति नी पूर्वकाल मे हमारे लडकों को किया स्वदेश की प्रीति करना है। हां ज्ञान शोभा देतो थो मे कुछ न कुछ बिगड गई है। के प्रकाश से दो एक रीति छुटाई गई जैसा पाप लोगो ने देखा होगा कि प्राजकल हमारे कि पूर्वकाल मे कलकत्ते के हिन्दू लोग जब उन भाई लोग कितनी बातो के विषय में पोछे की माताये विधवा हो जाती थी तब उन्हे की और हटते चले जाते है और इस घटाव चिता पर रसको नीवते हो फूक देते थे के कारण से हमारे देश की बड़ी हानि हो और भी रीतें है जिन्हें याही मिटाना लाभ- जायेगी। यह बात विशेषकर इस में दिखाईदायक होगा। चाहिये कि वहा के निवासी देती है कि जहा पर लोग भूल और अधर्म नई और पुरानी रीतो को ताले और जितनी को दशा से लज्जित होके अब प्रकाश में पाने युरो और बिगाडनेहारी ठहरे उन को त्याग चाहते है तो हमारे भाई लोगो की यह इच्छा दे । एक बुरी बात यह है कि विदा के है कि फिर अघियार के समयों को पार फिर पढाने मे धर्म का उपदेश और ईश्वर की नाये और उन में फूल जाये । पूर्वकाल के प्रति और परलोक को तैयारी बहुत कम पि मुनि को अज्ञानता इमारी समझ मे पूरी पाई जाती है। दूसरी बात यह है कि बगाली सत्य ठहराई जाती है और यदि कोई ज्ञान समाचार पत्रों में बहुत निन्दा और दुसक्ति पाकर उन पुरानी बातों के अनुसार न चले पाई जाती है जिस से किसी का लाभ नही तो लोग उस की निन्दा करते है। चाहे वह हो सकता है। विदा प्राप्त करके जान जाये कि वह प्राचीन पानकल बगाल देश में कितने पम्मी. बातें मूठी है तौभी उन्हें छोड़ने नहीं पाते पदेशक है निन्दो ने अपनी अपनी समझ के है। परन्तु बहुत लोग यह कहेगे कि चाहे अनुसार स्वदेश भाइयों के सुधारने का बहुत यत्न विद्या की बातें ऋषि मुनि की बातो से विरुद्ध किया। राम मोहन राय ने सोचा कि हमारे हो तौभी विदना नाश हाय और ऋषि मुनि देश की विशेष हानि मूर्तिपूना से है सो उस की बातें स्थिर रहे। ने अपने लोगो को इस दस्तूर से छुटाने मे एक बुराई कलकत्ते में यह पाई जाती है जो बहुत परिश्रम किया बरन वह काम जिस को और स्यानो में देखने में नहीं आती अर्थात उस ने प्रारंभ किया आजकल औरो के द्वारा बगाली नाटकशालाओं में दस्तूर यह है कि से किया जाता है। बाबू केशवचन्द्रसेन पहिले ऐसी स्त्रिया लो प्रत्यक्ष वेश्या है सांग दिसाती यह उपदेश दिया करता था कि लोग पान है और यो बहुत से जवान उन से मोहित देवताग्रा को त्यागकर केवल ईश्वर ही को होकर भ्रष्ट होते है । इस कुरीति को मिटाना भजे परन्तु पोछे जब रोग के कारण से निचल 3 १० हिन्दुस्ताने देश की याचा + होने लगा तब उस को मति मे कुछ बिगोड में कहानी यह है कि शिव काली की लाथ हुई और प्रभु के औरि हिन्द की माता के नाम को हर कही लेके फिरता था व लों कि में वह नये 'प्रकार का चर्म चलाने लगा अन्त को विष्णु ने चक्र डालके उस लोध को जिस में बहुत धम्मी की मिलावट पाई जाती बावन टुकडो मे काट न डाला और यह टुकडे थो । सन १८८४ मे बाबू, साहिब मरे और लहा कही गिरे तहा पवित्र तीर्थस्थान धन तब से ब्रम्होसमाज में बड़े २ झगडे उत्पन्न गये। कहते है कि काली की गलियों में से हुए कि जिस से बह निर्वल हो गया। उस एक यहा गंगा किनारे गिरो और इस के समाज से सन १८८६ ई0 मे साधारण ब्रम्हा- कारण से यहो ३०० बरस हुए काली घाट का समाज उठा जिस के मानेहारे कहते है कि प्रसिद्ध मंदिर बनाया गया। जो ब्राह्मण पहिले हमारा धर्म परमेश्वर हो का भजना है। उन उस तीर्थ का महत ठहराया गया उस के बश का इण्डियन मेसिजर नाम एक समाचार पत्र इलदर नाम से प्रसिद्ध है और तोर्थ का धन है जो बहुत कुरीतों को निन्दा करता है। उन के हाथ मे जाता है। विशेष पूजा का समय यह कहना चाहिये कि जहां लो यह दो दुर्गापूजा के दूसरे दिन को हुमा करता है समाजवाले परमेश्वर हो को भजते है तहा ला कि जिस में अगणित यात्री वहा एकट्टे होते प्राचीन हिन्दू मत की अपेक्षा बहुत ही अच्छे है जहां काली को डरावनी मूर्ति काले रंग ठहरते है परन्तु प्रगट है कि वह समाज अभी को और भयकर सांपों से लिपटी हुई मुण्ड- हिन्ददेश का धर्म न बन सकेगा। माला लटकाये और लहू टपकाते अपने पति पर नाच रही है। वह देवो नही घरन भूत की नाई दिखाई देती है । कहावत है कि जैसी देवी तैसा पुलेरी और हा प्रगट है कि मंसी पूना से कभी किसी का भला न होगा। 36 1 कालो का विलय कालो घाट उस स्थान पर है जहां गहाँ नदी प्राचीन काल में बहती घो। हिन्दुओ फाली की पूजा छलकत्ता वगाल देश का मुख्य नगर है हिन्दुस्तान दश का याग। म । - सो या चाहिये कि इस देश का थोड़ा सा सन्तानो से ज्ञानी है और विदया को सहज से वर्णन किया जाये प्राप्त करते है। उन के पहिरावे में एक बात यह है कि पानकल वे नड्डे सिरफिरा करते है। बगालो भाषा एक प्रार्य अर्थात उत्तरीय হল ঈ আ মা । भाषा है उस में बहुत से सस्कृत शब्द मिले बगाल के लफटिनेन्ट गवर्नर के अधिकार हुए है। अक्षर नागरी से निकाले गये है परन्तु में उस के चार भाग अर्थात बंगाल डोसा नागरो को अपेक्षा सहज से लिखे जाते है। बिहार और छोटा नागपुर हैं। इन चारो में वगाली वचनो ओ शब्द बहुत पाया हिन्दुस्तान का वह भाग पाया जाता है जो सच जाता है जैसा कि मनु को मोनु कहते है। उन से बहुत फलदायक और धनवान और बडा महम्मदिया में नो वगाल मे रहते है एक है जिस में अधिक निवासी भी पाये जाते है। मिली हुई बोली है अर्थात उर्दू परबी बगाली कई एक. देशो राज्यों को मिलाकर नो उम को मिलावट निस को मुसलमानो बगालो के संग है उस में दो लास वर्गमील नमोन है कहते है । जिस में 0१,00,00,000 निवासी है। यदि हम बगाल देश में विशेष पूना काली वा दुर्गा समस्त हिन्दुस्तान को नो भागो में वाटे तो एक भाग इस लफटिनेन्ट गवर्नर के अधिकार डरावनी है। वे गगा को भी बहुत पूजते है को होतो है जो समस्त हिन्द के देवताओं में में पाया जाता है। और बहुत लोग चैतन्य पडित को कृष्ण का अवतार करके मानते है। बंगाल में प्रादि निवासी हिन्दू थे। घगाल का धान । बगाल का इतिहास या है कि पूर्वकाल बंगाल नाम विशेप कर उस जमीन का है में वह देशो रालामा के वश में था । उन जो बगाल समुद्र और हिमालय के बीच में है। दिन में दो भारी नगर गोड और नदिया यह जमीन एक बड़ा मैदान है जिस में दो थे । सन ई० १२०३ में महम्मदी लोगो ने भारी नदिया अर्थात गगा और ब्रम्हपुत्र बहती लक्ष्मणसेन महाराना पर विनय किया और है और यह दोनो नदिया समुद्र पाम पहुचने नदिया की सन्तो मे गौड को मुख्य नगर बनाया से पहिले यहुत सो नदियों में बाटी जाती हैं। और उस समय से पाज लो वगाल के देशो इस मैदान में ममस्त हिन्दुस्तान का प्राधा भाग राना स्वाधीन न हुए । पोछे ढाका और अर्थात ०५,000 वर्ग मील भूमि है। वहां के मुरशिदाबाद मुसलमाना के मुख्य नगर हो रहनेहारे वगालो नाम से प्रसिद्ध है। उन की गये । सन ई0 १०६५ में शाइ पालम ने बगाल गिन्ती ४,00,00,000 होगी। उन का भोजन देश की दीवानी । अर्थात कर उगाहने का विशेष: कर चावल है और वहा को बडो घूप अधिकार अगरेनो को दिया और बगाल का गिलाई के सग होती है इस कारण शरीरले पहिला लटिनेन्ट गवर्नर सन ई० १८५३ में वे निर्वल है परन्तु यत परिश्रमी और पार स्थापन हुआ। - -- .
१२ हिन्दुस्तान देश की याया। A में और लोगों का खड़ा होना कठिन है पर वे सहज से उस में फिरा करते है। जब कि खेतों में पानी भरा रहता है तब लोग घान को वो देते है और बहुधा उन की अच्छी कटनी भी होती है। नदिया पार नालियों में अगणित मकलियां पकडी नाती है और लोगो को बहुधा भाजन अच्छी रीति से प्राप्त होता है। जब पानी घरती के ऊपर चढ़ जाता है तब नावो के विना इधर संघर जाना कठिन होता है। नाव में चढके मजूर मजूरी करने को और लड़के स्कूल को जाते है । जब पानी सूखने लगता तब ऐसा समय प्राता निस में इघर उघर फिरना और भी कठिन हो जाता कलकत्ता से २२ मील उत्तर की ओर हुगली है क्योकि नाव के लिये पानी कम रहता है नदी के तट पर चाण्डरनगार नाम एक नगर और कीचड के मारे पैदल चलना कठिन है जिस मे फ्रान्सीसी लोग सन ई० १६७३ मे होता है। बसने लगे। अंगरेजों ने इस नगर को कई बार लड़ाई के दिन में ले लिया परन्तु पोछे उन को फिर सौप दिया। सायडरनगर। 1 बगाली गांव और डेगी। पूरवी बङ्गाल। बंगाल का वह भाग लो कलकत्ते की परय और है सो गंगा और ब्रम्हपुष नदियों से नो शाखा निकली कटा हुधा है और बरसात जव उन का पानी चढ जाता है तब जमीन एक बडी मील के समान देख पड़ती है जिस मे बहुत से गाव दिखाते है । जहा जमीन मिट्टी खोदने और भर देने से ऊंची किई जाती है। इन गावो मे घर पास २ बनाये जाते है और उन के बीच मे बहुत से फोले सुपारी ताड नारि- यल आदि मेड उगते है। बचपन से लोगो • बगाल देश मे बहुधा दस्तूर यह है कि का जीवन मानो पाघा स्थल में और आधा लोग नगरी में नही बरन गांव मे बस्ते है। बडी . जल में बीतता जाता है और वे पेड़ के घड बस्तियों बहुत कम मिलती है। पूरबी बंगाल में से ऐसी डोगी काटके और कोलके बनाते जिस ढाका मुख्य नगर है । वह उस स्थान के पास दश्य का १३ - इलझा गगा और व्रम्हपुष नदिया एक टुमरे के किई तिस के पीछे अहम नाम एक सन्तान समीप पाती है। बारहों सदी में मुसलमान पूरब से भाकर उन पर विजय पा गया। इस राना वहा रहता था और उसके निवासी के पीछे ब्रम्हा देश के निवासी उन से लड़ने उन दिनो में बहुत हो गये थे। वह इस यात और वन का विनाश करने लगे सो उन्हो में विख्यात था कि वा महीन २ सई के ने अगरेजो से सहायता मागी। इन चढाइयो कपडे बनते घे जो देखने मे सुन्दर परन्तु पीर लडाइयो मे यह बुरी दशा हो गई थी पपिन्ने के योग्य न घे क्योकि उन के पहिने कि असाम को बहुत जमीन उजाड हो गई से देह न छिपती थी। पोछे ढाका के निवासी थी और वैरियों के मारे कोई उस में रहने कम हो गये परन्तु अाजकल फिर पढने लगे न पाता था । पूरबी वगाल में भी यह दुर्दशा है । अब हवडा नगर को छोड वह उस देश हुई थो पार कम से कम इन दो देशो में तीस की घडी घस्ती । हनार वर्ग मील जमीन छोडो गई थी क्योकि सत्रहवी सदी में यहां के निवासी डकैतो कोई उसे जीत न सका । सन ई० १८२४ मे को घढाई से यहुत सताये जाते थे। डकैत असाम देश सरकार को अमलदारी मे आया लोग नावो और डोगियों में सवार होयो इन परन्तु कितने दिन लो सरकार को उस से अगणित नदियों पार नालों से उन के कुछ भी लाभ न पहुचा क्योकि जितने रुपये गाव के पास पहुंचते थे और घरो को फूक महसूल में प्राते थे उस से अधिक बनपशुयो कर लोगो को लूट मार करते अथवा दूर के दूर करने में व्यय किये जाते थे । असाम ले जाके दास दासी होने के लिये बेचा इतना बड़ा है जितना प्राधा बगाल अर्थात करते थे। उस मे ४६,000 वर्ग मील नमोन है परन्तु उस मे केवल ५५,00,000 निवासी है। अब लो धान वक्षा की विशेष वस्तु है जो वहा उत्पन्न असाम देश का वर्णन । होती है। पहिले घाम की बारी जो हिन्दु- सन १८०४ ई० में असाम बंगाल से अलग स्तान मेरोपी गई सो असाम देश मे लगाई गई। किया गया और एक कमिश्नर साहिब के शिल्लाग उन का मुख्य नगर समझा नाता है जो अधिकार में सौपा गया। पीछे सिलहट भी काशी पहाडी में बना है। पहिले चेरापूनी मिलाया गया। वह पूरबी वगाल से लगा मुख्य नगर था परन्तु लोगो का बहा रहना हुपा है और इस लिये उस का वर्णन यहा कठिन है क्योकि समस्त संसार मे सब से किया जाता है। सिलहट एक लया निचान भारी बरसात वहा हुआ करती है। वा है जिस मे ब्रम्हपुत्र नदी बहती है। वह बहुधा साल भर मे ४३ फुट पानी गिरता है। पुराने हिन्दू कामरूप राज्य का एक भाग असामी लोगों की बोली बंगाली भाषा से पन्द्रहवीं सदी में महम्मदियो को कर सेना बहुत मिलती है। असाम की उत्तर और ने पछिम से पाकर उस देश को उनाड कर चार पहाडी स्थान है जो नागा जैतिया काशी दिया तिसके पीछे कोच नाम एक जंगली और गारो नाम से विख्यात है। यह बन से सन्तान ने उत्तर से पाकर उन पर चढाई ढमे हुए है। और इन बनो में ऐसे नगली १४ हिन्दुस्तान देश की यात्रा। - । सन्तान रहा करते है जो रूप रड में कुछ ताड की पत्तियों पर लोहे को कलम से लिखते चीनी लोगो के समान देख पडते है। सिल है और इस लिये ऐसे गाल अक्षरो का बनाना इट काशी पहाडी क्षे दक्विन और है और सहज है। उस देश मे शिष्टाचार जैसा कि उस मे , वगाली लोग अधिक बस्ते है। वहा चाहिये तैसा फैला नही है। बहुत गावो मे को नारंगिया प्रसिद्ध है। सिलहट को पूर्व और यदि कोई गाड़ी पातो तो लोग उसे अद्भुत बाछार है जिस मे बहुत चाह की बारियां माई बस्तु समझते। गांववाले बहुत प्रज्ञान और जाती है। ढोले और अविश्वासी है परन्तु आजकल उन की कुछ उन्नति किई जाती है। इस उडीसा देश । सन्तान के बहुतेरे निवासी कलकत्ते में प्रा. उडीसा देश कर नौकरी करते है। पहाडियों में बहुत पूर्व बगाल की दक्खिन निवासी रहते है जो बहुत जंगली लोग है। पच्छिम और को उन मे खोड आदि सन्तानो का दस्तूर यह और समुद्र तोर था कि जमीन के नाम पर नरमेघ लिया करते लगा है। वह सुवर्ण- थे क्योकि सोचते थे कि जब लों पृथिवी को रेखा नदी से लेकर मनुष्य के रक्त से न सोचे तय लो अन्न उत्पन्न चिलका झील लो न होगा । उडोसा को दो तिहाई महाड़ी भूमि फैिला हुमा है और है पर यह देशो राजाओं के हाथ मे है परन्तु भागनाथ की मूर्ति । ( उस में २४,000 वर्ग समुद्र तोर तीन जिले है अर्थात उत्तर मे बाला मोल जमीन है और उस में ५०,00,000 निवासी सोर बीच में कटक और दक्खिन मे पुरो। पाये जाते है। बीच में बडे २ वन है जिन मे बनपशु फिरा करते है और पहाड़िया : है जहां काश्तकारी नहीं किई जाती। कहते है कि पूर्वकाल मेयहां ओडरसतान रहा करता था जिनके नाम से यह जमीन ओड्र देश अर्थात उडीसा कहलाया। प्राचीन काल मे उस का नाम उत्कल देश प्रसिद्ध था। सन ई० १०५१ मे वह मर. इठा लोगों के हाथ मे दिया गया परन्तु सन १८०३ मे अगरेनों के बश मे पाया। , ओड़िया लोग जो समुद्र के समीपरहते हैंऐसी वोली बोलते नो बगाली भापासे बहुत मिलती है परन्तु उसे गोल प्रक्षरी से लिखते है जैसा दक्खिन के लोग काम में लाते है। इस का कारण यह होगा कि पुरी का मेला। an ~ L ।
हिन्दुस्तान देश को याचा। १५ - उडीसा मे अर्थात पुरी नगर मे जगन्नाथ का देवी का रंग लगाये हुए और हाथ में लाठी मदिर है जो समस्त हिन्दुस्तान मे विख्यात है लिये हुए चले जाते है। और हण्टर साहिब ने उस तीर्थ का वर्णन यों कही २ भोडो के बीच में वैलगाड़िया किया है कि जगन्नाथ का नाम हर साल हिन्द दिखाई देती है। किसी मे बगाल को छोटे देश के सैकड़ों स्याना से यात्रियों को पुरी ने बैल और किसी में उत्तर हिन्दुस्तान के पडे रेतिलस्यान में खीचा करता है। तीर्थों को बैल जुते रहते है और यह गाडिया स्वियो याचा झरनो एक बात है जिस से हिन्दू लोग से भरो रहतो है। उन गाडियो में जो उत्तर बहुत माहित होते है। दिन रात साल के हिन्दुस्तान से आई है मुसलमानो के राज्य धारहो मास बटोहियों की भोडे पुरी में चलो के दिनो का यह चिन्ह दिखाई देता है कि भाती है और उडीसा की बडी सडक मे तीन हर एक गाडो ऊपर से ढपी रहती है परन्तु सौ मील दूर लो हर एक गाव मे टिकनेवाले वगालो लोग अपनी स्त्रियों को प्रसन्न करने पाये जाते है। इन भोडो मे २० से लेके ३०० के लिये ऊपर के आढने में कहो २ छेद बनाते मनुष्य लो पाये जाते है। जव बडे मेले है जिस मे से पत्नी वा लडको की काली २ दिन समीप आ जाते है तब यह भीडे अधिक प्रांखे झाकने में दिखाई देती है। उन के हो और माना कई मोल लो एक हो बीच में कोई रवी रगीन मायनामा पहिने हो जाती है। वे क्रम २ से और आज्ञाधीन हुए छोटे टटू पर सवार चलो प्रातो है और होके चली जाती है और हर एक झुण्ड का उस का पति दास की नाई उस के पोछे पैदल कोई अगुवा रहता। हर एक छ यात्रियों में चलता है भार एक लौडी गगाजल और मैले से पाच स्त्रिया होती। इधर तो बहुत सी कपडे की गठरी लादे हुए उस के पीछे चली छोटी २ और पतली २ स्त्रिया श्वेत घस्व पाती है। फिर कलकत्ते का कोई महानन चली आती और हम उन्हे पहि-वा साहूकार अपने घर को स्वियो सहित चानते कि यह तो वगाल देश से आई है। पालकियों में सवार हुए दिखाई देता है। उधर उन से बड़ी और बलवान स्त्रिया रग मै ने किसी महाजन की भीड देसी जिस में रग के कपडे पहिने और नाक कान मे गहने /४0 पालकिया ३२० कहार और पचास बोझ पहिने मुसो पर गोदने से चित्र बनाये हुए उठानेहारे थे। और गाना रात को अधियारे मैले कपडो की गठरी उठाये में दूर तक सुनाई देता था। इस से पढकर गाती घजाती चली आती है और हम उन्हें किसी राजा की धूमधाम थी जो हाथो ऊट पहचान लेते शि उत्तर हिन्दुस्तान से यह गाडिया घोडे और घुडचढों सहित किसी आई है। इन बटोहियो में से बहुतेरे पाव २ दूर स्थान से चला पाता था। वह वेचारा चलते है और इधर उधर उन के बीच में अपनी पालकी में बैठा हुआ इस सब लोगो सन्यासी भी देह पर राख लगाये हुए हुल्लड और धूल और हडबडो के बीच में सोचता नगे फिरते है। उन के बाल यहुत लघे बहुत अप्रसन्न देस पडता था परन्तु यढाये हुए और पीले रंग से रंगे रहते था कि पुण्य के लिये यह कार्य करना ही है । गले में माला लटकाये माधों पर इष्ट पडता है। - - हाथ मुह
हिन्दुस्तान देश को यात्रा ।
फा मन्दिर।
মূত্র।
३
इन यात्रियों में से अगणित लोग रोगी हा पुरी में रहते तब लो, उन को कोई टिकने का
जाते और बहुत भर भी आते है। जब लो अच्छा स्थान नहीं मिलता और उनका मानन
हिन्दुस्तान देश की याया। १० - -- भी खाने के योग्य उस में से कुछ भी फेकनो अनुचित है । सो वे नहीं मिलता । इस बासी भोवान को याचियों को खिलाते है। उम को कारण यदि भले चगे और बलवन्त मनुष्य येतो यह है कि पंडे बस्तु को खावे तो रोगी हो जाने का बहुत लोग उन्हें यह डर है परन्तु बटोही बहुधा मार्ग के दुखों सिखाया करते है से कुछ न कुछ रोगी होकर वहा पहुंचते है सीधे को जाना। कि इस पवित्र सो यह प्रमाद उन के लिये बिप ठहरता है। तीर्थस्यान में अपने लिये भोजन पकाना बटोहियो को छोड सैकडो भिखमङ्गे वहां उचित नहीं है। वे चाहते है कि हर कोई रहते और वे भी सडे हुए भोजन को खाया देवता का प्रसाद खाया करे जिस से पडे करते है। जो मिठाइया वेहा विकती सो लोगो को लाभ प्राप्त होता है। या होता है इतनी शीघ्र नही विगडतो तौभी यह अच्छी कि यह सारी भीडे मंदिर के रसोई घर रीति से अर्थात सुथराई से नहीं बनती और का पकाया हुमा भोजन खाया करती है। जब यावो लोग लौटते समय उन्हें मोल नेते यह भोजन विशेषकर भात है जिस में दाल और घर को ले जाते है तो यह भी रोग चना घी चीनी और नाना प्रकार की और का कारण हो जाता है। बस्तु मिलाई और यमाई जाती है। यह भोजन बडे मेले के दिनो को छोड और दिन ससता बिकता है अर्थात दो माटमी का भोजन एक पाने मे बिकता है। मेले के दिनो मे दाम बढाया जाता है। जब खाना पक चुकता तब उसे मदिर के बाहर की कोठरी में ला रखते है और यो मूर्ति के आगे लाये जाने से वह पवित्र प्रसाद समझा जाता है। निस दिन यह प्रसाद पकाया जाता कदाचित अच्छा भोजन होगा पर बहुत मे यात्री उस पर यह टोप लगाते है कि अच्छी रीति पकाया नहीं जाता है। परन्तु शोक की बात यह है कि वह कुण्डा नाम काला मदिरा भोजन बघा वामोराया जाता है क्योकि पडे बुरे भोजन को छोड और भी कारण है कि लोग कहते है कि यह महापवित्र यस्तु है और जिन से यात्री को रोग उत्पन्न होता है। पुरी ॥ । 5 हिन्दुस्तान देश की यात्रा। का मैदान नीचा है और नगर और समुद्र के प्रगट नहीं कि किस कारण जगन्नाथ का बीच में बलुही भूमि है सो नगर का मैला मन्दिर बनाया गया अथवा लोग किस कारण पानी अच्छी रीति से समुद्र की ओर नही उसे तीर्थस्थान माने लगे। इस के विषय लोगों घहता है सो पुरी एक बहुत ही मैला नगर मे नाना प्रकार की कहानिया प्रचलित है। है। यह रोति है कि घर चार फुट ऊंचे चबू- एक कहानी यह है कि जब कृष्ण मारा गया तरों पर बनाते है और चबूतरे के बीच में एक तब उस की हड्डियां एक वृक्ष के तले पड़ी रहों पनाला रहता है जिस के द्वारा से घर को जब लो पीछे किसी ने उन्हें बटोरकर पिटारे काली २ कोच बाहर गली मे बह निकलतो मे न रक्खा । इन्द्रधुम्र नाम एक राजा को है। चबूतरा भाप धोरे २ इस मैल को सोख यह आज्ञा मिली कि इन हड्डियों को लेके एक लेता है और प्राधे साल मे जब गर्मी अधिक मूर्ति बना और हड्डियों को उस के भीतर होतो है तो घर में मेसो दुर्गन्धो हवा रात दिन रख। राजा ने इस काम के करने में विश्व- निकलती है कि आश्चर्य की बात देख पडती कर्मा की सहायता मांगी। विश्वकर्मा ने कहा कि आदमी ऐसे स्थान में कैसे जोते रहते है। कि भला यदि कोई मेरे पास न आवे तो मैं फिर यात्री लोग अशुद्ध पानो पोके वहां ऐसो मूर्ति को बनाऊंगा। राजा ने मान लिया बहुत क्रोशित होते है। पुरो नगर में जो ताल परन्तु १५ दिन के पीछे उस ने कहा कि मैं सुदे है बहुत पविच समझे जाते है परन्तु जाके देखूगा कि विश्वकर्मा क्या कर रहा उन का जल बहुत हो मलीन और पोने में है। परन्तु देखता क्या है कि केवल एक कुडोल अयोग्य है और पडे लोग उन्हें सिखाते है कि कुन्दा है जिस में न हाथ न पैर है। बहुधा इन का जल पीना धर्म है घरन बहुतो को जहां जगन्नाथ की मूर्ति घरी है तहां दो पार बुरी गैति यह है कि पहिले ताल मे लान अर्थात उस के भाई वलराम को और उस की करते और उस का पानी गन्दला कर देते है बहिन सुभद्रा की मूर्ति भी रक्खो रहती है। और तब उस में से पीने लगते है। इस मदिर के बाहर भीतों पर ऐसे चित्र काढे हुए है जो अति अशुद्ध और मन के बिगाडनेवाले है। गिनाथ के मदिर से बहुत से पंडे सबन्ध रखते है जो समस्त हिन्दुस्तान मैं फिरा करते और हर कहीं भोले लोगों से विनती करते है कि प्राओ पुरी का जो स्वर्ग का द्वार है दर्शन करो। इस तोर्थ से नाना प्रकार की बड़ी २ प्राशीप तुम को मिलेगी। वे कहते है कि पुरी में जमीन की धूल सोने की है और जब उन से बताया जाता कि देसो भाई जैसी और सब धूल है वैसी यह भी है । । यात्री। ।
हिन्दुस्तान देश को यात्रा तो वे उत्तर देते है कि हां वालियुग के पाप चलती है। बटाहो रेल में सवार होके गडा के कारण से ऐसी ही दिखाई देती है। इन तोर जाते है जहा अग्निबाट उस पार पहुंचाता पडो के बहकाने से बहुत सी भोलो स्विया है और वहा रेलगाडी में फिर सवार होके अपने २ पुरुपो की आज्ञा बिना इन पडो के सिलीगुरी मे जो पहाडी के बगल में है पहु- पोछे २ पुरी की जाती है। अगणित मार्ग को चता है। फिर वहा से दार्जिलिङ्ग लो बडो घकाहट से मर भी जाती है। बड़ी २ सडको चढाई है परन्तु हलको रेलगाड़ो बहुत धूम- में उन को हड्डिया बहुत दूर दूर लो बिधराई धाम से उसे ऊपर लो पहुचाती है। हिमा- हुई है। पूर्वकाल में वौद्धवालो का एक तीर्थ- लय पहाड के साम्हने तराई नाम एक बडा स्यान भी पुरी में था। वे कहते थे कि बौद्ध बन है जिस मे दलदल बहुत है और जिस मे का एक दात वहा रक्खा हुआ है और उस तम भी बहुत हुआ करती है । लार्ड केनिङ्ग के पूजने के लिये बड़ी भोडे वहा नाया करती साहिब को मेम साहिया उस तराई में एक थी। पीछे वह दात लका में पहुचाया गया रात सो गई बस उन को ऐसी तप चढो कि और उसकी पूजा भो वहा को उठ गई। मर गई परन्तु जो रेलवे के द्वारा से चलते है कुण्डार्क मे जो पुरी से १६ मील दूर है बहुत शीघ्र और कुशल से तराई के पार एक टूटा फूटा मदिर है जो सूर्य को पूजा जाते है। के लिये बनाया गया था। पुरानी पोथियो लार्ड बेनटिक साहिब ने सन ई० १८३५ से जाना जाता है कि छ सौ बरस बीते मे दार्जिलिङ्ग को जमीन को सिकिम के राजा बनाया गया और उस की दीवारों पर भी से मोल लिया। पोछे उस मे कुछ और भी बहुत घिनौनी लंपटता के चित्र काढे हुए है। जमीन नोडी गई । बहुत से हिन्दू वगाल यह मदिर समुद्र से अच्छी रीति दिसाई देता है से पाकर वहां बसे है परन्तु निवासी बहुधा और नाविक लोग उस को देखकर अपने पूर्वकाल के पहाडी सन्तानी में से है। इन जहाज चलाते है। पहाडो लोगो के चपटे मुद्दों से प्रगट है कि वे चीन के निवासियो से सबन्ध रखते है। दार्जिलिङ्ग पहाड पर गेहू आलू भुट्टा वाजरा प्रादि वस्तु होती है और पहाड के दार्जिलिङ्ग पहा । नीचे बहुत घान उत्पन्न होता है। दानि- गगा नदी के वर्णन वारने से पहिले उचित लिङ्ग में एक विशेष वस्तु नो साहिय लोग। है कि हम उस स्थान का वर्णन करें जहा कि के इन्तिजाम से उत्पन्न शेतो है सो चाह है। कलकत्ते के बहुतेरे रोगो लोग शान्ति पाने पहिले चाह को पारी सन ई० १८५६ में लगाई जिन के लिये जाते है और कहा बहुत साहिब लोग गई और १८०५ मे १२० ऐसे यगोचे गरमी के दिनो मे टिकते हैं। वह दार्नि- मे २४,000 मजूर काम करते थे। वह बहुधा लिङ्ग पहाड है। वगाल का गवर्नर साधि नेपाली लोग थे। सन १८६२ ६० में सरकार वहा प्राधे साल रहता है। वह कलकत्त से ने सिमोना का बगीचा लगाना प्रारम किया। ३६४ मील दूर है और योच मे रेल की गाड़िया यह वह पेड है जिस के छिलके से तप को
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हिन्दुस्तान देश की यात्रा
अरष्ट पर्यत जैमा दार्जिलिङ्ग से दिशाता है।
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हिन्दुस्तान देश को याषा)। २१ सब से अच्छी औपधि अर्थात कुनाइन वनती दक्खिन सीमा पर सरकार की जमीन है। नेपाल है। पानकल वह बहुत पैदा होती है। दार्जि- देश मे ५8000 वर्ग मोल जमीन है क्योकि वह लिङ्ग के पोछे के हिमालय पहाड़ कभी २ देखने ४६० मील लबा और १५० मील चौड़ा है। उसमें में अति सुन्दर मालूम होते है परन्तु बहुधा वे २0,00,000 निवासी है। नैपाल बड़ा पहाडि- बादलों और कुहासे से छिप जाते है। इस स्तान देश है। ना पहाड एथियो भर मे सबसे चित्र में उन मे जो सब से ऊचो पहाड की ऊचे है सो उस में पाये जाते है। उस को समस्त चोटी अर्थात प्रवरप को दिखाई देती है निस उत्तरवाली सीमा ऐसी ऊंची है कि उस पर पर साल भर पाला पड़ा रहता है जो ऐसा पाला साल भर पड़ा रहता है वहा के निवासी श्वेत है कि उस पर दृष्टि करके आखे तिल- न रूप न रङ्ग मे न बोलचाल में न धर्म में न मिलाती हैं। इन श्वेत चोटियों के साम्हने रीति व्योहार मे हिन्दुओ से मिलते है परन्तु बहुत सी' और पहाडियों की श्रेणिया है ना वे नाना प्रकार के तातारो सन्तानों से सवन्य बहुधा उन बादलों से जो उन पर रहते रखते है। उन में गोरखा लोग पानकल अघि छिप नाती हैं। कार रसनेहारे है। वे शेटे आदमी है परन्तु लडाई करने में बहुत ही शूरवीर है। उन की कितनी पल्टने पानकल सरकार की सेना नेपाल का बर्यान। में पाई जाती हैं। काठमाडू नो नेपाल देश का मुख्य नगर के सो समुद्र से ४000 फुट ऊंचा है और उस में 10,000 निवासी रहते है। महाराजा का भवन नगर के बीच ही मे बना है। उस में से एक भाग बहुत प्राचीन है और पूर्वकाल के मंदिरी के समान बना है और उस पर बहुतेरे कुडोल चित्र काढे हुए है। नगर में बहुतेरे मदिर है ना देखने में अच्छे बने हुए है। वे कई महलो में बने है और चिप काढने और रङ्ग लगाने और सोन्हले काम से विभूषित है । उन की छतो में सोन्हला पीतल तांया लगाया गया है और छत के किनारी पर छोटी २ घटिया है जो इवा के चलने से बनती है। एक पौर प्रकार का मदिरला पत्थर का कुछ ऐसा बना है जैसा हिन्दुस्तान के मदिर। दार्जिलिङ्ग को मच्छिम और नेपाल नाम काठमांडू नगर के गली कूचे बहुत ही तग हैं एक घडा स्वाधीन देशो राज्य पाया जाता है। और बहुत ही मैले रहते हैं। भवन से उस की उत्तर सीमा पर तिब्बत और उस को हाथ दूर एक बडा गृह है जो कोट गोरसा सोग। - 6
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काठमाण्डू नगर ।
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4 1 - प्राधमाकरमान . बिन्दुस्तान देश को, याचा प्रसिद्ध है। यह वह स्थान है,कि निस मे के पडे लामाकहलाते है । घे.समझते है कि सन १८ई में देश कि इतने बड़े २ रईस घात किये गये । चौत ऐसोहुई कि किसी की दुष्टता से देशका महामधी वध किया गया था चार महारानी चाइती थी कि इस अपराध को बदला लिया जाये तो जग वहादुर नेनो उन दिनो में सेनापति था कहा कि मै ही इस का. चंदला लगा । सो, उस ने ऐसा किया कि भवन में वडे ३ प्रधाना और रईसों की सभा बटोरी, और जब वे सव, एकटे हुए. तवा सेनापति ने एकाएका एक पल्टन लेके उन पर चढाई किई और एक इस मई के पढ़ने में बड़ा प्रताप है कि प्रोम् २ को मार गिराया। इस काम के करने से मनी, पढ़े ग्राम । अर्थात ओम् पट्स फूल, में जंगबहादुर देश का महामधी हो गया और गहना, है। वहा के निवासी इस बात को बड़ी इस के मरने के दिन: लो (समस्त अधिकार चिन्ता करते है कि हम बिन धर्मकार्य किये लिस के हाथ मेंरिहा तिस में पीछे उस देश अर्थात बिन दोड धूप उठाये और परिश्रम में और भी झगडे लडाइयां.और अदलबदल किये धर्म का फल कैसे प्राप्त करे। उन्हो ने हुए है। सोचा कि जब इस ओम् मंत्र के पढ़ने में इतना 11.75 प्रताप है तो उस को एक पहिया-पर लिखके उस पहिया को घुमाना बही प्रताप,होगा और काम बहुत सहन -मे होगा और शीघ्न किया नायेगा।फिर औरो ने सोचा कि इन , प्रार्थना की पहियों को अपने हाघो से घुमाना 1 क्या अवश्य है। Em) काठमाण्डू को एक सदक, : उन्हें ऐसे स्थान में नेपाल को धर्म वाटुमत है और वह देश रस देते हैं नहा कोई नदी पहाड, से,यपके उस मत के मदिरोसेि भरा हुआ है। वहा उन को घुमा देवे;। सो यो रात दिन जब वह T - हिन्दुस्तान देश की याचा । श्रीदमीसतानागता है उसकी प्रार्थनां गंगा की सैर करतादहिने हायपर यारिक होती जाती है और उस का प्रताप चढता पुर नगर को देखेंगा जहां सरकार की छावनी जाता है। कभी ऐसी पहियों को वहा लगा है और नहा लार्ड साधि के लिये एक देते हैं जहा पवन के चलने से वे घूमती है दिहातो घर बना है। नदी के उस पार उस नौ यह भी न हो तो इस मंत्र को किसी झंडे के साम्हने श्रीरामपुर नाम एक नगर है जो पर लिख देते हैं और झडा ऊंचे पर सड़ा पहिले डेन लोगों के अधिकार में था।यह किया जाता और प्रवन से उड़ता रहता है वह स्थान है जिस में प्राचीनकाल में केरी तो माना मन पढ़ा जाता है। यों वे प्रार्थना मार्शमेन और वार्ड नाम तीन प्रसिद्ध पादरी को ठट्ठों मे उड़ाते है क्योंकि पाप का अंध- रहते थे जिन से हिन्दुस्तान देश को बहुत कार.उन के मनों पर छाया हुआ है। सत्य लाभ प्रा हुआ है । और भी ऊपर चढ़के प्रार्थना मन की सत्य अभिलापा है। ईश्वर बांये हाथ पर चन्द्रनगर दिखाई देता है से प्रेम से ऐसी बातें करनी चाहिये जैसा पुत्र जिस को फ्रासीसी लोगो ने बसाया ! उस के पिता के संगवात करता है से मंचो पर अगाडी हुगली नगर है' नहीं अंगरेजो ने भरोसा रखना और मान देवा का नाम लेना वगाल देश में पहिला स्थान पाया । उसकी व्यर्थ और निष्फल है। नव सन ई० १६४० में डाली गई। जब दिल्ली के महाराजा की प्यारी रानशुमारी रोगो वैाटन साहिब के परिश्रम से गगा नदी की सेर। वह चगी हुई सो महाराजा ने आनन्दिताहो अनिकल लेब कोई दूर स्यानो की याघा इस जमीन को उसे दे दिया। करने चाहता है तो रेलगाड़ी पर सवार होके गंगा का अधिक पानी पद्न नाम एक बडे सहन से जाता है परन्तु हम जो कलकत्ते शाख के द्वारा से समुद्र में पहुंचता है। पन्न से चलकर देश को सैर करेगे सो गंगा नदी के से दो शाखे निकलती निस को भागीरथी मार्ग से चलेंगे क्योकि नदी के समीप कितने और जलंगी कहते है। नदिया नगर के समीप स्थान है ना देखने योग्य है कारण इस का यह दो शासे मिल जाती और वहां से जा यह है कि पूर्वकाल मे यात्री बहुत करके नदी समुद्र की ओर बहतो है सो हुगली नौकाओं में सवार होकर जाते थे। उन दिनो नाम से प्रसिद्ध है । पूर्वकाल में नदिया मैं नाना प्रकार की नौका चलती थी और के बहुत से सस्कृतटोल अर्थात पाठशाले घनवान बटोहियो के लिये ऐसी बनती घों विख्यात थे परन्तु आजकल लोग देखते है कि कि जिनके ऊपर छप्पर डालके मानो कोठ- संस्कृत के पढ़ने में कम लाभ प्राप्त होता है रिया बनाते थे और इन बडो नौकाओं को सो उसे छोड़कर अगरेनो पिया पढ़ते है, लोग गुन के द्वारा तट पर से चलकर खोंचा नदिया के समीप पलासी नाम एक बडी लडाई करते थे और जब अच्छी हवा चलती थी तब हुई परन्तु जहां लडाई का मैदान था तहां पील-लगाकर नौका को चलाते थे। अाजकल भीगीरथी नदी बहती है पर इस - इस रीति नौका पर सवार हो यदि कोई नदी के इधर उघराबहने से और अपने स्थान हुई तय डाकृर . -- -- हिन्दुस्तान देश की यापा छोडने से मल्लाद लोगों को बहुत कष्ट पहुंच-दायक है परिगंगा नदी ने उसे दी बराबरभागे ता है। ri. ...Fमें घाट दिया है। वगाल,की अपेक्षी उसकी नदिया.को उत्तर-और भागीरथी नदी जमीन आधी से कम है और उस के निवासी पच्छिम तट पर मुरशिंदापादानगर घना चाधे से अधिक हैं। हर एक वर्ग मील में 10 सन ई० १००४ में दीवान मुरशिदाशुलौं खाने आदमी मिलते हैं। हिन्दुस्तान भर में ऐषो उसे अपना मुख्य नगर घनाया था और अपने समीन न होगी जो मनुष्यो से इतनी भरी नाम से उस का नाम रखा, प्राक्षकल नवाब हुई है। जमीन दक्खिन पूरब को छोड धमर्टी नातिम वहा रहता है. भारत उसे में उस की और मैदान है और उस में पानी कम घरमता। सुन्दर भवन है। उस को मिट्टी से बहुत सा शोरा बनता है। वहां धान गेहू जी बहुत उत्पन्न होते हैं। अफीम भी बहुत उत्पन्न होती है। बिहार के बिहार देश का वर्णन। निवासो हिन्दी उर्दू और कही २ सन्ताली भाषा वोलते है। सन्ताली वही काम में लाते जो उन पहाड़ी में रहते जो दक्विन पर्व में है। वहां से पानी और हवा के कारण से निवासी बगालियो से बडे और बलवन्त है। पिहारा उस गृह का नाम है जिस में पूर्वकाल के दिनों चौहमत के ससारत्यागी बस्ते थे और इस से इस देश का नाम विहार कहलाया क्योकि ៥ទូក पाये जाते थे। पूर्व काल में बिहार के संग मगध राज्य सवन्य रखता था और इन दोनो मे वौद्धमत विशेषकर प्रचलित था। तेरहवी सदी मे बिहार मुसल- माना के हाथ पाया | बंगाल के नवाब के हाथ में उस समय से ३ सूधा रहे जिन मे से एक सपा बिहार था । सन ईसवी १०६५ में बिहार सरकार अगरेज के हाथ में पायाचौर बगाल में मिला दिया गया। - । फिर भागीरथी मे चढ़कर हम वहा पाले सा है जहा नदी गगा नाम से प्रसिद्ध है। दहिने हाथ पर मालदा जिला दिखाई देता है वहा मुरशिदाबाद को छोड़कर हम बगाल के पहिले गोड नाम बगाल देश का मुख्य नगर Pा भाग किो जो बिहार नाम से प्रसिद्ध गगा की एक शाखा पर धना था निस में प्रय पाते है बिहार घडा देश गरि बहुत फल पानी नहीं घंहता है। उस में अगणित मसजिद वहा से गृह । भ गामे माय पान > 7 हिन्दुस्तान देश को याबी बार मुसलमानों के गूद बनाये गये। सन ई० चटान गगा को बीच में टापू को नाई दिखाई २२08 में गोह मुसलमानों के हाथ में मायाँ देता है। केवल यह एक स्थान है जहां नदी गौरविद्या ३०० घर लो वे बंगालकाारीज्य कामानी चटीनों से फिराया जाता एक करते रहे परन्तु पीछे अर्थात सोलहवीं सदी में घटान: का नाम देयोनाय है जिस के बगल उप स्थान में शैमा रोग फैला कि उस स्थान में मूत्तै फाढी हुई है और चटान के ऊपर को छोड़ना पड़ा और वई अब उजाड पड़ा हिन्दुओं का मंदिर बना है'! कालगाग से हे-घरन वहां बड़े वन हो गये है। |२० मील आगे पढके भागलपुर पाया जाता इससे धागे बढके हम राजमहल पहाडी है जो उस जिला का मुख्य नगर है । 4 + के 7 सन्ताल लोगो का एत्तान्त । भागलपुर के समीप पूर्व निवासियों का एक सन्तान पाया जाता हैलो वर्णन करने योग्य है उन का नाम सन्ताल है और वे गगा से लेके वैतरणो नदो लो अर्थात ३५० मोल लयो एक जमीन में पाये जाते है। उन बनो में नो इस जमीन की पच्छिम और पाये जाते है वे अकेले रहते है অন্ত और स्याना में वे हिन्दुओं से मिलेजुले रहते गंगा महामा । उन की गिन्ती ग्यारह लाख है। को दहिनी और देखते है जिन के कारण से हिन्दुओं की हड्डियों की अपेक्षा सन्तालो को गंगा नदौ धूमो है। यह पहाड कुछ बहुत हड्डियां कुछ बड़ो और बलवन्त है उन का बडे नहीं है। उन में जो सघ से बडा है माथा ऊंचाई मे कम और चौडाई मे अधिक केवल २000 फुट ऊचा है । राजमहल नगर है और उन के होठ कुछ बड़े हैं। उन की जो अव बना है विशेषकर झोपडियो की यस्ती वाली उत्तर देशो की बोलियों से और पच्छिम है और नहा मुसलमानों की बनी हुई प्राचीन देशो की बोलियों से भी भिन्न है। उनका बस्ती थी वहां महाबन • पाया जाता है। व्याकरण बहुत ठोक है। उन लोगों के पास मानसिह ने जो अकबर बादशाह का सेनापति विशेष प्रक्षर नहीं थे परन्तु पानकल उन को था उसे बंगाल का मुख्य नगर बनाया । ३० भाषा नागरी और रोमन में छपती है। बरस बोते की बात है कि गगा नदो ने जो सन्ताल किसी देवता को जो भलाई करने नगर के समीप यहतो धो उस स्थान को छोड हारेको माशीप देता है नहीं जानते है दिया। अब वह ३ मील दूर पर बहती है। परन्तु यह मानते कि बहुत से भूत प्रेत राजमहल से ४० मोल आगे बढ़के कालगांग पिशाच रातदिन मनुष्य की बात में लगे - - - हिन्दुस्ताने देश को यामा। २० - 1 रहते निस्ते गाय बैल में मरी भने अथवा सन्तालो और हिन्दुओ में लेन देन होने लगा अनान को खेत में सुखा दे और नाना प्रकार तब हिन्दू बनिये पहाडो में जाने लगे और को हानि कर दे। और अवश्य है कि मनुष्य उन भोले सन्तोलियो को अपने वश में लाने लहू बहाने और चढावा चढ़ाने से उन को लगे इसका यिह फल हुआ कि ५० बरस मनावे । पहिले मनुष्य जिस ने सन्ताल लोगो के बीच में बहुत से सन्तालो" ऋणो होकर में शिष्टाचार सोसना प्रारभ किया लोब-यनियों के दास दासी हो गये। यह धमकी लेण्ड साहिब था। यह एक जवान 'कलकर देकर कि हम तुम्हें दूर के बन्दीगृह में डलवा था जिस ने उन को भलाई की बड़ी देगे वे उन्हें ऐसे डरवाते थे कि जो चाहे उने चिन्ता किई । सौ बरस हुए यह दशा यो से करवाते थे । सन ई० १८५५ में दक्खिन कि सन्तोल लोगों और हिन्दुओ में जो उन के सन्ताल इस दुर्दशा से यहां लो घपरी के समीप रहते थे घडा झगडा रहता था। गये कि उन की यह इच्छा हुई कि हम सब सन्ताला के प्रधान कमट से मारे जाते थे और के सय एकट्टे होलार्ड साहिप के पास धायेगें वे इस कपट का बदला क्रूरता से लेते थे। और उस से अपनी दुर्दशा वर्णन करेंगे। साँ जो मैदान पहाडी के नीचे थे सूनसान हो ३०.000 मनुष्य एक? ो धनुप धाण हाध में जाते थे क्योकि लोग वहा रहने से डरते थे। लिये कलकत्ते को और सिधारे । पहिले वे लोवलेण्ड साहिब ने यह उपाय किया कि सोधे मार्ग ठीक से चलते थे परन्तु कलकत्ता जितने सन्ताल के प्रधान पहाडी से उतरके दूर था पादमी मिन भोजन के नहीं रह उस पास पाते थे उस ने उन का बड़ा प्रादर- सकता सो उन मे और हिन्दुमो में मागडा सन्मान किया और उन्हें अच्छे २ इनाम दिये । लडाई होने लगी। कहों लूट मार होती थी जो सन्ताली नौकरी चाहते थे उस ने उन्हें और उन से और सरकार से बलवा हो गया धनुर्धारो बनाया और राजाओ के बहुत से सो उन को रोकना और अपने देश में लोटा नातेदारों को उस ने अफसर बनाया। वह देना पडा । शोक की बात है कि इन लडा. उन अध्यक्षो को जिन के द्वारा से दुष्ट लोग इयों में बहुत से सन्तालो मारे भी गये परन्तु पकडे और न्यायस्यान में पहुंचाये जाते थे इस बलवे से एक बडा लाम यह निकला कि मासिक दिया करता था। और जब प्रधान सरकार ने उन की दुर्दशा धूमो और उन के लोग न्याय को सभा में बैठने के लिये एकटे लिये नया इन्तिनाम किया गया सो उस समय होते थे तय साहिब सभा के लिये सभोजन से लेके मान लो सन्ताली फुशल से रहते करवाता था । लोवलेण्ड साहिब २९ बरस की वरन उन की उन्नति और सन्तानो को अपेक्षा उमर में मर गया तभी उस के नाम का अधिक हुई प्रादर मान लो पटुत किया जाता है और लोगो ने उस के नाम में एक मकबरा बनवाया और उन लोगो के लिये शिष्टाचार का पारंम गगा की मेर का पिक यन। यो हुआ । ताभो शिष्टाचार के सब फल भागलपुर से २० मोल पच्छिम पोर मुंगेर अच्छे नहों है । अव कुशल के दिन पाये और नाम एक पुराना गढ है तो गगा नदी के तट । - हिन्दुस्तान देश की यात्रा पर बना हुआ है। फिर पटनी नार गंगा तट पकी हवेलियां भी हैं । एक,सहक चौड़ी और पर बना हुआ है जो बिहार देश का सब अच्छी है परन्तु,और हर सो गली, कूध, तंग बडा नगर है। उस में १६८000 निवासी मार तिरछा है। जब पानी बरसे तो. कीचड़ है। पटना बहुत ही प्राचीन नगर है। अधिक है और धूप पडे तो बड़ी धूल उड़ती है। प्राचीनकाल में उस का नाम पाटलपुछ था पटना कालिन एक अच्छा पर घर है और एक पौर मसीच मेरि प्रेरस पहिले यूनानी लोग अद्भुत गृह पुराना सरकारी गोला है। पटना से का एक राजदूत : मगध में महाराजा चद्रगुप्त तीन मील पूरव और वह स्थान है जक्षा सरकारी के पास “वहां आया और: राजदूत नगर को अफीम बेचने के लिये तैयार किई जाती है। मालीनीया नाम देते थे। उन दिनो में यह पटना से ५ मील मच्छिम और बाकीपुर है जहां बौद्धवालों का मुख्य नगर था,और असक साहिब लोग यसते है और छ. मील और आगे महागला जो 'चद्रगुप्त का पाता था चौद्धमत'दानापुर है जहा सेना की छावनी है। के फैलाने में बहुत तीन था। उस ने इतने बिहारे अर्धात ससार स्यागियों के लिये धर्मशाले धन- वाये कि उस को देश आज लों बिहार देश प्रसिद्ध है। जब वौद्ध- वालों को तीसरी महासभा हुई तो वह पटना में एकट्ठी हुई। असोक ने हिन्दुस्तान के दूर २ स्थानों में खभों को खडा किया और उन पर पारा चटानों पर सपनी माताये-लिखवाई कि.कोई जीव- इत्या न करे और उसने बौद्धमत फैलाने हेतु , उपदेशको को दूर २ देशो में भेजा। दो बडे शोक की बातें पटनी नगर में हुई अर्थात सना ई० १०६३ में मीर कासिम ने विहां के साहिब लोगों को कपट से घात किया और फिर १८५७ मे दाना- पुर की-छावनी मे सिपाहियों ने बलवा किया। पटना नगर य त करके मिट्टी के घरों से बना है-- योद्धगया का मदिर। जिन की छतोसंपरैल की है परन्तु बहुत सी धाकोपुर से यदि कोई रेल पर सवार होक - + " हिन्दुस्तान देश को याषा ५० मील गगा मे मरना। दक्विन की ओर चले तो गया में पहुंचेगा जो हिन्दुमो का तीर्थ- स्थान है। वहां के मंदिर प्रादि पहिले बोदवालो के हाथ में थे परन्तु जब वह मत हिन्दुस्तान से दूर किया गया तय ब्राह्मण लोग उन्हें अपने काम में लाये। गया विशेष स्थान है जहां हिन्दू लोग श्राद्ध का व्योहार करते है वरन वे कहते है कि दिन का श्राद्ध गया नी में दिया जाता है उन के प्रात्मा सोधे वैकुठ में चले जायेगे। परन्तु इन श्राद्धो के करने में अत्यन्त व्यय होता है क्योकि गया ही में पैता- अनुसार नहीं परन्तु मेरे श्राद्ध के करने के लीस पविष स्थान है और कहते हैं कि एक २ में अनुसार होगा तब बहुत लोग यह विचार किमी देवता का पदचिन्ह ई पोर एक २ में वहा करेंगे कि हम जीवन भर कुकर्मी रहेगे और के पडे को दान देना पडता है। एक २ में तर अपने पुत्र के हाथ मे रुपये छोडके जायेगे ज्यो याची पिण्डा रखता त्यो ब्राह्मण कुछ और वह मेरा श्राद्ध करके मुझे मेरे पापा के सस्कृत सुनाता है। इस नगर के पड़े तो बुरे फलो से छुडावेगा और मुझे वैकुठ में गयावाल कहलाते सो यात्रियों के लूटने में पहुंचावेगा । और वे यह सोचते है कि जो प्रसिद्ध है । कोई महाजन वहा जाये तो यिना मनुष्य बिन पुत्र के मरे वह पुत नाम नरक में हजारों रुपये दिये उन के हाथ से न छूटेगो । डाला जायेगा। यह सब शिक्षा झूठी है। श्राद्धा । इस श्राद्ध को यात के मानने से पाप बहुत से न मरे हुओ का भला न वेरा होगा क्योकि बढाया जाता है क्योकि जब आदमी सोचता भादमी का न्याय उसके जीवन के कर्मा के है कि मेरा परलोक मेरे कुकर्म सुकर्म के अनुसार किया जायेगा। जैसा कहते है जैसी करनी तैसी भरनी। परन्तु केपटी लोगों ने धनवानो के लूटने के लिये श्राई को शिक्षा चलाई। पटना की उत्तर और गगा पार तिरहुत देश' है जिस को पूर्वकाल में मिथिला राज्य कहते थे। उस के दो भाग अर्थात दरभङ्गा और मुनफरपुर विख्यात है। दरभङ्गा में एक महाराजा रईता है जो बहुत धनवान है और जिस को बडी जमीन है। तिरष्टुत वह देश है जिस में नील विशेषकर उत्पन्न होती + 8 11 हिन्दुस्तान देश की यात्रा। है। वर्धा को मिट्टी से बहुत शोरा भी बनाया जीवो को खिलाये और वैल कुत्ते बिल्ली आदि नाता है। वे मिट्टी से पानी टपकाते और तब के लिये रोगशाला बनाये । वे इस को पाप उस पानी को उबालकर शोरा बनाते है और समझते है कि कोई पिस्स खटमल प्रादि मारे तब उसे महाजनों के हाथ वेचते जो उसे शुद्ध और बहुत धनवानो की यह रोति है कि करवाते है। तिरहुत की रेलवे ने दरभङ्गा और पहिले किसी कङ्गाल को अपनी खटिया में मुजफरपुर को गगा के सग जोड़ दिया है। मोवाते है जिस्ते खटमल पहिले उसी से,पेट भरे और तब खाट का स्वामो शान्ति से सो छुटिया नागपुर का वर्णन । सकता है। इस मत से यह लोग बहुत हो बिहार और नब्बलपुर के बीच में एक घमंडो बन जाते है कि हम भले है और र पहाडीस्थान है जो बिहार देश के बरायर लषा लोग जो कोडों को नहीं बचाते बड़े पापी है। चौडा है परन्तु उस मे केवल पचास लाख छुटिया नागपुर देश में और भी कई एक निवासी पाये जाते और वह भी बहुत करके सन्तान है जो अलग २ बोलिया बोलते है। जगलो सन्तान के है। वहा को बहुत जमीन सन्तालो मुडारी और कोल लोगो को भाषायें समुद्र से २000 वा ३००० फुट अची है। मरहठा कुछ मिलती है। जड़ लोग ऐसो भाषा बोलते लोगो की चढ़ाइयो से वह बहुत उजाड़ किई नो तामिल भापा से कुछ मिलती है। यह बडे गई है और बहुत स्थान बनो से ढपे है। परिनमो लोग है और उन मे से बहुत कलकत्ते पारसनाथ पहाड़ ना ४५० फुट ऊचा है जैन मे आकर सफाई का काम करते और घांगर लोगो का विख्यात तीर्थस्थान है। जैन लोगो नाम से प्रसिद्ध है। जुआंग नाम एक सन्तान का मत बौद्ध मत से बहुत मिलता है। वे है जो बनों मे रहता और बहुत जगलो है। नास्तिक है परन्तु ऐसे मनुष्यों को पूजते जिन वे न सूत बनाना न कपडा बिना न बर्तन के विपय कहते है कि वे जब सर्वज्ञानी हुए बनाना जानते है। अब थोड़े दिन को बात तब नाश हुए। वे कहते है कि इन ज्ञानियों है कि वे लोहे को काम मे लाने लगे है। उनकी मे से एक पारसनाथ नाम ने इस पर्वत के स्वियां कुछ भी कपडा नहों पहिनती थीं ऊपर प्राण त्यागा सो वहां पूजने जाते है। केवल आगे पोछे कुछ पत्तिया नोड़कर टागती पहाडो को चोटी पर कितने मन्दिर बने हुए थी कोकि उन में यह मिथ्या समझ थी कि है। जैन लोगों में एक विशेष शिक्षा यह है| यदि हम वस्व पहिने तो बाघ हमे खायेगे। कि जीवहत्या न कर । उचित है कि पडे आनकल सरकार उन को कपड़ा पहिनातो लोग मुह पर रुमाल बाधे रहे ऐसा न हो और यह बात उन्हें बहुत समझातो कि नगा कि अकस्मात कोई मक्खो सास मे आकर फिरना बहुतही अनुचित है। मारी जाये। उन्हे चाहिये कि छोटो माड़ लिये फिरे और नहां पाव डाले तहा पहिले उत्तर पच्छिम देश का वर्णन । झाडू दे न हो कि चिउटी आदि पांव के गगा से आगे बढ़के उत्तर पच्छिम देश मे नीचे दब जाये। वे इस को धर्म कार्य सम- हम पहुचते है। यह एक बहुत फैला हुआ । झते हैं कि प्रादमो चिउटी कबूतर आदि मैदान है जिस मे गगा यमुना और उन के - मिन्दुस्तान देश को याधा। साथ की नदियां बहती है। प्रवध के साथ| मझायरा बदल कर एक नई भापा चलाने लगे यह बहुत बड़ी अमलदारी है जिस में १,०६,000 पार यो महम्मदी लोग और नगरयासोहर कहीं वर्ग मील जमीन और उस में 8,00,00,000/ उसे बोलने लगे। पानकल २,५०,00,000 उर्दू निवासी माये जाते है। सन ई० १००५ में भाषा के बोलनेहारे होगे। उम के लिखने में बनारस सरकार प्रगरेन के हाथ में पाया लोग अधिक परयो फारसो अक्षरों को काम में चौर भय की सदी के प्रारम में कितने पार लाते है परन्तु पानकल बहुत उर्दू रोमन मिले उस में जोड दिये गये। मन १८३३ ई० अक्षरों में लिखी जाती है इस देश में पाठ में नार्थ वेस्ट माविन्सस बंगाल से अलग किया मनुष्यों में एक मुमलमान है और याकी लोग गया और सन १८०० में अवध उस के संग यहुधा हिन्दू है। पटना से पागे यढके हम नोड दिया गया । यह नमोन उत्तर पच्छिम गंगा तीर के दहिने हाथ पर गानोपुर को नाम से इस लिये प्रसिद्ध नहीं है कि हिन्दु- देसने है यह वह स्थान है जहा अफोम स्तान का उत्तर पच्छिम कोना है परन्तु इस बेचने के लिये तैयार किई नाती है। यहाही लिये कि बंगाल से उत्तर पश्चिम ओर है। सन ई० १०५ में लार्ड कार्नवालिस साहिब लंबाई चौड़ाई में बंगाल से कुछ यहाई पर्थात मरे। गाजीपुर से ४० मोल उत्तर पच्छिम और में ८२,००० वर्ग मील भूमि है और उस हिन्दू लोगों का पावन नगर मिलता है। के निवासी ३,३०,00,000 से अधिक है। इस काशी का वर्णन । देश में लोग अधिक गेहूं खाते है और माडे के दिनों में ठढ अधिक होती है सो बगालिया को अपेक्षा यहा के निवासी देह में बलवान है। वे हिन्दुस्तानी कहलाते है। निवासी हिन्दी उर्दू भाषाओ को बोलते है। हिन्द को समस्त भापापो को अपेक्षा लोग अधिक हिन्दी बोला करते है। ज्ञान- वान कहते कि 9,00,00,000 हिन्दी के बोलने हारे है परन्तु परयो और पच्छिम को हिन्दी में कुछ भिन्नता है। हिन्दी बहुधा नागरी अक्षरों में छपती है। महालन लोग कैथो को काम में लात कयोकि वह लिखने में सहज है। उर्दू भाषा नगरो में अधिक बोली जाती है। उर्दू का अर्थ छावनी है और कहते है कि यह नाम इस लिये प्रसिद्ध हुआ कि यह बाली पहिले मुसलमानों के योद्धाओ के बीच मे उत्पन्न हुई कि वे हिन्दी को अपनी अरवी फारसी शब्दो के संग मिलाकर और उन का HTHAHHAL हिन्दुस्तान देश की यात्रा । - 1 हिन्दुस्तान के समस्त और नगरो की अपेक्षा समझते है। जैसा हर एक मुसलमान अपनी हिन्दू लोग काशी को चाहते है । वे उस की पाखों से मक्का नगर को देखने चाहता है जमीन को उस के कुओं और नदियों को उस वैसाहो हर एक हिन्दू कभी काशी का दर्शन के मंदिरों और घाटो को बहुत हो पविध | शिया चाहता है। काशी गंगा तट पर बसी है और रेलवे जो वहां से कलकत्ते की बनी है सो ४०६ मील लंपी है। नगर की लंबाई नदो के उत्तर वाले तीर पर ४ मील है। वहां गंगा की चौडाई मील की एक तिहाई होगी। उत्तर वाला तोर १00 फुट ऊचा है और ऊपर से नीचे लो नाना प्रकार के पत्थर के घाटों से शोभित है जिन के ऊपर अगणित मदिर प्रार मसजिद और भवन और हवेलिया दिखाई देती है। अगले दिनो में गगा पार होने के लिये नाव का पुल था परन्तु पानकल रेलवे का बहुत अच्छा पुल बनाया गया है। जब साहिब लोगो ने इस को बनाने चाहा तब बहुत से हिन्दू यह गर्व करते थे कि गगा माई कभी अगरेजो के बश मे न पायेगी न -काशी। शाखमेध - ।
- । हिन्दुस्तान देश को याधा। उन के लोहे के पुल को सह लेगी पर जय और देखने योग्य है। सन १७६१ में सरकार उन्हों ने देखा कि पुल सहज से बनता है ने काशी में एक सस्कृत कालिज को स्थापन तो उन्हो ने यह मूठ उड़ाया कि सरकार किया परन्तु पानकल संस्कृत को अपेक्षा अगरेज ने नरमेघ करके महिले गंगा जी को अगरेजी विदया का पढना अधिक काम प्राता मनाया और तब पुल बनाया और बहुत है। छोटे २ मदिरो को शेडकर काशो में १५०० से अज्ञानी लोग ऐसी बातो को अब लों मदिर और २०० मसतिदे होगी। नगर की मानते है। दक्खिन और दुर्गामदिर है जिस में हर मङ्गल यदि कोई नदी को और से दृष्टि करे तो को जानवर चढाये जाते है। वह मदिर बन्दरो औरगजेघ की भसनिद और उस के दो ऊंचे २ के मंदिर नाम से प्रसिद्ध है क्योकि बहा मीनार बहुत सुन्दर दिखाते है । जैसा कि ३१ अगणित बन्दर मदिर के आंगनो मे झुण्ड के पृष्ठ के चित्र में देख पडते है। इस स्थान पर विष्णु मुण्ड रहते है और लोग पुण्य की से का बडा मदिर खड़ा था और औरंगजेब ने उसे उन्हें खिलाया करते है। यदि कोई बटोही ढा दिया और उस के पत्थरों को लेकर इस एक पाना का दाना ले और आगन मे विध- मसजिद को बनाया। ना कोई इन मोनारी राव तो चारो दिशा से बन्दर दौडे आते और मर चढे सो भली भाति नगर को और पास-अपने भाग के लिये लड़ते झगडते है। इन पास की जमीन को देख सकता है । २०० बरस से मनुष्यों को इतनी हानि हुई कि कई बार कि राक्षा जैसिंह ने एक तारागृह ज्या- वे वहा से दूर किये गये है। एक और मदिर तिपियों के लिये बनवाया जो अब लो देखने है निस में बेचारी गाय पाली जाती है वहा योग्य है। उन दिनो मे लोग दूरधीन अर्थात बडी वेचैनी मे पडो रहतों और लोग उन की दूरदर्शक यन्व नही रखते थे सो ऐसे तारा पूना करते है और तौभी हिन्दू लोग अपने गृहों को काम में लाना पड़ा। ज्ञान और समझ पर फूलते है। काशी के बहुत गली कूचे ऐसे तग है कि वह मदिर निस का लोग अधिक पादर- उन में गाडियां चल नही सकती और उन सन्मान करते है वह है कि जो विश्वेश्वर मे से बहुधा बहुत टेढे तिरछे भी है। बहुत और शिव का सुन्हले मदिर नाम से प्रसिद्ध से घर पत्थर के बने हुए है और उन में ऐसे है। लोग कहते है कि शिव काशी का नाथ । है जो पंचमहले छ महले तक मचे है। कहीं २ और कि नगर उस के त्रिशूल की नोक पर ऐसे गृह है कि जो सडक के ऊपर हो ऊपर उठाया हुआ है। मदिर कुछ देखने योग्य नहीं नाड दिये गये है। नाना प्रकार की वस्तुन है चमकोला गुयज परन्तु के लिये काशी में दूकाने है और उसके है क्योकि रजीतसिह नय रोगो हुमा तप उस पीतल के बर्तन जो बहुत सुदरता से काढे ने उस की छत को ताये की चद्दरो से मढवाया हुए रहते है और उस के कपडे जो सोना और इन घट्टरी पर पतले २ साने के पत्तर चादी से सुदर रीति विभूपित हैं बहुत प्रसिद्ध चढाये हुए है जिस से उस को घमक है। है। गवर्नमेन्ट कालिन सन ई० १८५३ में राजा की इच्छा यह थी कि इतना बनाया गया। वह पत्थर का बना हुआ करने से मै चगा हो नाङगा परन्तु उस का कोट और 8
हिन्दुस्तान देश की यात्रा।
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प्रन्दरों का मदिर।
i - हिन्दुस्तान देश को यात्रा लाम न पा । आंगन में बहुत सी पुरानो धा शोशे बाधके उसे अपने घरो को ले नाते प्रतिमाये और मूर्त है । यह उस मंदिर की हैं। पडे लोग गगा और काशी का महात्म थो जिस को पारगजेब ने गिरा दिया। मंदिर बहुत बढाके कहते है। वे कहते है कि गगा के समीप ज्ञानवापी नाम एक कुप्रा है जिस तट और मंचकोशो सड़क के बीच में जितनी में लोग कहते है कि शिव का निवास है सो जमीन है सो ऐसी पविध है कि उस में जो उस देवता पर चढाने की इच्छा से फल फूल कोई भरे चाहे हिन्दू अथवा मुसलमान अथवा को यहा लो कुएं में डालते कि उस का जल ईसाई हो सीधे बैकुठ को चला जायेगा । चाहे बहुत ही दुर्गन्धो हो गया है । इस से भी वह धर्मो अथवा अधौ हो चाहे अशुद्ध आदर योग्य मणिकर्णिका कुपा माना जाता और पापी और खूनी हो तौभी उस को मुक्ति है क्योकि कहते है कि विष्णु ने अपना चक्र मिलेगी। इस का फल यह है कि जो जीवन डालकर उस को खादा और जब पानी भर बड़े कपटी और छली और उपद्रवी थे न मिला तब अपनी देह के पसीने से इस सो मरते समय यदि काशो तक पहुंचे तो को भर दिया। इस को देखकर वह प्रसन्न समझते है कि बस मेरा अर्थ सुफल हुमा प्रय हो नाचने लगा और उस के कान से एक मेरे लिये कुछ डर नहों में स्वर्गघाम को गहना कुए में गिरा जिस से उस का नाम जाऊंगा । अब सोचिये कि ऐसे भूठे भरोसे प्रसिद्ध हुआ। यह वह स्थान है जहा याची के रखने से कितनो के पाप बहुत बढ गये पहिले जाते क्योकि उन का भरोसा है कि और कितना का विनाश हो चुका है। जो इस दुर्गन्धी जल में इतना प्रताप है कि उस हिन्दू ज्ञानवान है सो जानते हैं कि ऐसा से बरसा का पाप मिटाया नायगा और भरोसा रखना व्यर्थ है। शुद्धितत्व के एक अर्ड इस लिये अज्ञान लोग उस का मुक्ति क्षेत्र श्लोक में यो लिखा है। नाम देते है। एक और स्थान है जहां यात्री कुर्यात् पुन पुन पाप न च गगा पुनाति त । जाते जिसको दशाश्वमेघ घाट नाम देते है। कोकि कहते है कि ब्रम्हा ने वहा दस घोडा जिस का अर्थ यह है कि जो कोई र २ पाम करे उसे गगा भी पवित्र नहीं करेगो। का चढावा चढाया । यह प्रारगजेब को मलिद के पास एक स्थान है और हिन्दू लोग लोक। मानते है कि वहां पाच नदियां मिलती गगातोयेन कृत्स्नेन मुहारैय नगापमै । है और इस लिये उस को पंचगगाघाट नाम श्रामृत्या स्नातकश्चैव भावदुष्टा न शुध्यति । देते है परन्तु सत्य पूछो तो केवल एक गगा जिस का अर्थ यह है कि जिस का मन वहा दिसाई देती है। पाम करने से मलीन है चाहे मिट्टी के पहाड़ साल भर याषियो की बडो भोडे काशी में से देह को मले और समस्त गंगा के जल से पाया जाया करती है और त्योहार के समयो अपने को धावे तौभी वह मलीनता न जायेगी। मे बहुत बडी भोड हो जाती है। लोग समस्त और यह यात देखने में भी पातो है क्योकि हिन्दुस्तान के २ गाओ से पाते है और देखिये काशी में कितने धनिये दुकानदार उन में से बहुत कावरो पर गगाजल के दो घड़े प्रादि है जो रोज गणा में नहाते और नोधन ।
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हिन्दुस्तनि देश की यात्रा।
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काशी के कितने मन्दिर ।
भर पंचकोशी के भीतर रहते है और तभी
जीवते मरते छली और उपद्रवी रहते है और
गगापुत्र जो विशेष काशी महात्म के सिखाने-
हारे है और जिन का विशेष काम वहा की
पूजा स्नान दान पुण्य करना कराना है सो
बडे लालची लोभी प्रसिद्ध है। जो बेचारे
यात्रियों पर बडी निर्दयता करते है सो काशी
से मुक्ति कहा पा चुके है।
कई सौ 'बरस लो काशी बौद्धवालों का
नगर था। सारनाथ मे ना उस के समीप है
SMITH
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माझव।
हिन्दुस्तान देश को याषा। ३० सन ई० से ५०० परम पपिले गौसम अपनी घडा व्यापार होता था परन्तु अब वह व्यो। शिक्षा देने लगा। यह स्थान जहा यह रहा पार और नगरी को उठ गया है । मिरलापुर घा परिण का रमणा कहलाता था। योद्ध-के जिले के दक्खिन में पदाडिस्थान है और मत के गृश के अगणित पत्थर पर लो वा ऐसे यन हैं कि जिन में बाघ फिरा करते है। - प्राचीन नगर ।। काशी कलकत्ते से ४०६ मोलह और रेल पर तीसरे दर्न का टिकट ६ रुपये को मिलता इलाहायाद का वर्णन है। यह यम्पई में ६४५ मौत दूर ६ पार रेल इलाहाबाद नो पूर्वकाल में प्रयाग नाम का टिकट यारहरुपये पद्रव पाने में मिलता। से प्रसिद्ध था वहा बना है जहा गगा यमुना मन्दराज से १५५० मोल दर दे धार रेल का नदिया मिली है। प्रयाग बहुत टिकट तेईस रुपये तेरह पाने में मिलता है। महाभारत मे बहा की भूमि यारणावतो काशी में २,२२,५०० निघामो है। कहलाती है और कहते है कि जय पाडव लोग अपने देश से विदेशी किये गये तो यहा प्राके रहे। सय से प्राचीन लक्षण नो प्रय मिलता है सो बा ४२ फुट ऊचा सभा है जो पानकल किले में दिखाई देता है निस को महाराना प्रसाका ने २४० बरस मसीह से पहिले खडा किया। सन ई० ११६४ में इलाहा. घाट पठानो के वश में पाया। मन ई० १५२९ में यावर वादशाह ने उमे पठानों के हाथ से छीन लिया और सन ई० १५०५ में अलवर (बादशाह ने किले को नो पर है बनवामा गौर नगर का इलाहाबाद नाम रक्खा । सन |१८०१ ई० मे अवध के नवाब ने इलाहाबाद को सरकार अगरेज के हाथ में दे दिया और बलवे के पीछे अर्थात सन ई० १८५८ में वर गुलमो पूना शिमाली मगरबो का मुख्य नगर हो गया। फिर गगा नदी चढके हम दक्विन तीर नगर की सड़के बहुधा तंग और टेढी तिरछी पर धुनार नाम एक प्राचीन गढ को देखते है । नक्षा साहिय लोग रहते है तहा की है। उस के समीप अच्छे पत्थरो को खान है|सडक चौडी पोर अच्छी है और उन बहुत और यहा से पत्थर खुदके दूर २ नगरो को से वृक्ष छाया के लिये लगे हुए है। नगर भेने नाते है। चुनार से बीस मील पच्छिम की छावनी और स्टेशन सहित इलाहाबाद, पार गगा के उसी तीर पर मिरजापुर नगर फैला हुआ है अर्थात कुछ पाठ है। रेलवे सुलने से पहिले यहा अन्न का और ६ मील चौडा है। - -- 10 1 idl
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हिन्दुस्तान देश को यात्रा ।
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प्रयाग का गळ।
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हिन्दुस्तान देश को यात्रा
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सुरुस्याग के मशयो।
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४० हिन्दुस्तान देश की याया। PINTER - J २ अपाययट-प्रयाग। र ना बनाती है और जब कोई यात्री करे कि कोई सीसरी नदी नही है। पंडे लोग बताते है कि देखो मन्दिर भोतें कैसी गीली रहती है। इस मन्दिर सक और पूना की बस्तु वह अक्षयबट जिस को बताते कि १५०० बरस से अब हरा है और लोग उसकी पूजा करते पर उस के समीप दान दक्षिणा लेने लिये पंडा बैठा रहता भार उस के दीप जलता रहता है । सत्य पूछो तो व वृक्ष का एक टुकड़ा है जो छिलका या रक्खा नाता और जब सड़ने लगता तो पडे लोग चुपके से उसे बदल देते है और कितने और अच्छे २ पत्थर के बने हुए एक साहिब ने अपनी उंगली के नख से गृह है। इलाहाबाद की यूनीवर्सिटी और को परस लिया और उसे सूखा पाया । कौसिल अर्थात् राजसभा दोनो सन ई० १८८० मन्दिर में एक मकुन्द नाम मनुष्य की मे स्थापन किये गये । खुसरुवाग एक स्थान है जिस के विषय कहते है कि यह देखने योग्य है जो कैखुसरू जहागीर बाद- परमहस था परन्तु एक बार जब दूध शाद बेटे के नाम से कहलाता है। छाने पो लिया तब पाकस्मात गाय का स उस में तीन मकबरे पत्थर के बने हुए दिखाई बाल निगल गया सो इस को महापाप सम देते है। बीच का मकबरा जो ऊचे चबूतरे पर के उस ने अपने प्राण को त्यागा । बना है खुसरू का है। चित्र में उस को माता का हिन्द्र लोग पिबेणो को सान के लिये मकबरा बाये हाथ पर और उस के छोटे भाई स्थान समझते है। वहा के मेले मे हर का मकबरा दहिने हाथ पर दिखाता है। इनारी यात्री एकटे होते है । पहिले जब कोई नौका पर सवार हो गगा नदी पर यह कुरीति प्रचलित थो कि यात्रो ५ चलता है तो इलाहाबाद का गढ अच्छी रीति में डूबके प्राण त्यागते थे इस आसरा से से दिखाई देता है । जहा गगा यमुना मिली ऐसा करके हम सीधे बैकुंठ को चले जायेगे है तहा कुछ ऊंची जमीन थी जिस के ऊपर दस्तूर यह था कि याचो कई ब्राह्मणो के किला खडा है। किले के भीतर चलो तो जो नाव में सवार होते नदी पर बैठाया असोका के खम्म के समीप एक स्थान है जिस था। उस का एक हाथ घड़े मे बाधा मे हिन्दुओं का एक मन्दिर जमीन के नीचे था और दूसरे हाथ मे कटोरा रहता पाया जाता है । यह शिव का मन्दिर है पहिले जब घड़ा खाली था तब उस और कहते है कि वहां तीसरी नदी अर्धात को पानी मे सभालता था। नब वह धीरे सरस्वती गंगा और यमुना मे मिलकर त्रिवेणी कटोरा लेके घड़े को भरता जाता था - - - . - L - हिन्दुस्तान देश की याया। । छ मोल INDIA -MAN 4- भीत में घिरी थी। नाना साहिए जो मरहठा ब्राह्मण था कानपुर से बिठूर नाम एक स्थान में रहता था। वह साहिब लोगो से बडो मित्रता करता था और उन के सग पाखेट किया करता था और अपने घर में उन को चार २ नेवता देता था । उस के उसकाने से सिपाहियों ने होलर साहिब पर चढाई किई । होलर साहिब बोस दिन तक उस स्थान की रक्षा के लिये बडी मोरता मे लडता रक्षा परन्तु पोछे जब बहुत गोरे गगा में प्राय त्यागना । लोग मारे गये और साहिब पाप घायल घडा उसे पानी के नीचे खींच लेता था। यहुपा और जब नाना साहिब ने कपट से बचन अंधार न जानते थे कि अपने प्राण का नाश दिया कि मै तुम सभी को नाकाओ में सवार करना पुण्य नहीं घरन महापाप है। इलाहा- कराके इलाहायाद को भेज दूगा तब हीलर बाद नगर के निवासी १,९०,000 है। साधिय ने उस के बचन को महण किया। इलाहाबाद से पच्छिम १२० मोल पर गगा पर ज्योंहों प्रारेज नौकाओ में सवार हुए नदी के तट पर कानपुर नगर मिलता है। यह त्योंहों उन पर तोप चोर बन्दूके छोडो गई नगर नया है। पवध के समीप होने के कारण चार वे घिन सहायता के मारे गये। एक से सरकार ने वहा एक छावनी बनाई और तब नाका उस प्राफत से बच निकलो परन्तु सिपा- से दो तीन रेलवे भी वहा मिली है। वहा के हियो ने उस का भी पोछा किया और वह लोगो को गिन्ती आजकल बहुत बढती जाती है। नदी के बीच में डुबाई गई। नो पुरुष स्त्रिया उस मे बहुत धूल उडा करती है कोकि बहुत पकड़े गये सो नगर के एक घर में उन धन्युनो ककर की सडक बनी है जिन की धूल हवा के सग तो फतहगढ से पाये थे बंद किये गये । से बहुत उडाई जाती है। सन ई0 १८८१ में इतने में चावला साहिय गोरे लोगो की निवासियों की गिन्ती १,८२,000 थी। यह वह मेना सहित झानपुर की ओर आगे बढ़ते स्थान है निस में १८५० ई० में नाना साहिब जाते थे। इस बात को सुनकर नाना साहिब ने कपट से सैकहा साहिबो को घात किया । ने अपने सिपाहियों को प्राज्ञा दिई कि माओ बात यह थी कि नो देशी पल्टने वहा थी उन बन्धुवे साहिब लोगो को घात करो। उन्हो ने बलवा किया और सरकारी खजाने को सिपाही लोगो ने कहा कि हम घातक नहीं लूट लिया और बन्दीगृह को सोल दिया और है। हम यह न करेगे । सो उस ने नगर के साहिय लोगो के घरो में भाग लगाई। हीलर कसाई लोगो को बुलवाया और ऐसी प्राज्ञा साहिब १५० बलायती योद्धाओ को और ३३०/ उन्हे दिई । उन्हो ने ऐसा किया और मृतकों मेमशादियों और पालकों को सग लेके ऐसे को समोम के एक बुर में डाल दिया और स्थान मे गये नहा दो वारिके ५ फुट ऊचो नघ गोरे लोग कानपुर में पहुच गये तो देखते 7
हिन्दुस्तान देश की याया।
फासपुर के पाम गगा पर रेलवे का पुस ।
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हिन्दुस्तान देश की यात्रा । ४३ - कपट और क्या फि वह स्थान जहा पन्यु पडे थे यान लिटरेत्यरः सोसैटी मी अर्थात वह प्रय घिनौनी रीति से लोहूलुहान है। इस सोसैटो जिस के यन से यह पुस्तक छापी जाती भारता से नाना साहिप को जाति है स्यापित हुई। उस सोसैटी का मनोरथ यह में कुछ कलंक न लगा परन्तु यदि किसी है कि हिन्दुस्तान के लोग मसीही धर्म का माधिय के लड़के के हाथ से निर्मल जल जान पाकर मान ले कि यह धर्म हमारा 'यो लेता तो उसकी लाति बिगड जाती । बेरी नहीं है वरन इस से हमारे दोनो लोक का लाम है। गगा प्रारभ F अवध का वर्णन । कानपुर के समीप एक लबा लोहे का पुल रेलवे के लिये बना है। उस को द्वारा पार नाकर हम ावध देश में प्रवेश पाते है। अवध एक स्थान है जहां प्राचीन काल में हिन्दु प्रो का अधिक शिष्टाचार पाया गया । वहां कोशला राज्य था जिस का मुख्य नगर प्रया- ध्या था जिस की महिमा रामायण में पद्धत रोति से गाई जाती है। रामायण में हम पढते है कि उन दिनों में अयोध्या नगर का कैसा ऐश्वर्य और उस के राजा दशरथ मरे हुप सादियों का मकय । का कैसा अधिकार था। ज्ञानयान यह बता क मुह, पर उन लोगो के स्मरण नही सकते है कि रामायण का वृत्तान्त कहां के लिये ना वक्षा मारे गये एक गृह पत्थर का लो सत्य है और कहा ला काव्यरचको ने लोगो बनाया गया जैसा इस चित्र में दिखाई देता के मनो के बहलाने के लिये इन अद्युत पाता है। यह प्रतिमा स्वर्गदूत रूप बनी है जिस के को रचा है। हा अयोध्या नाम नगर और हाथ में ताड की पत्तिया अर्थात विजय के दशरथ नाम उस का राना दुपा होगा परन्तु चिन्ह है और नीचे, यह लिखा है कि यह यह हम मान नही सकते है कि इनूमान नाम उन लोगो के सदा के स्मरणार्थ है जो मसीही कोई धन्दर था जो चटाना को सिर पर उठा लोग और विशेषकर स्वीपालक,कर नाना सकता था और सूर्य को बगल में दबा सकता धोधूपन्य के सेवको से जुलाई की तारीख १५ था और यह जो लंका के विषय लिखा है को सन ई० १८५० में, बडो क्रूरता से घात कि सोने का टापू, है जिस में राक्षस निवास किये गये और जीवते मृतका के संग इस कुए करते है सो विलकुल मूठ है । लका बहुत में डाले गये।। दिन से सरकार अगरेन के वश में है और उन-दिनो के बलवा के कारण से खोष्टि- उस के निवासी ऐसे लोग हैं जैसा हिन्दुस्तान उस कुए - - 1 " हिन्दुस्तान देशको यात्रा J 1 लयमऊ का एक फाटक । मे रहा और तब, 11 . - मे रहताहजिससे अंगटाहै कि रामायण का वृत्तान्तामन बहलाने की कहानी है। कौशला, देश वह स्थान था कि जिस में पूर्वकालामेवाद्वमत | ... विशेप रीति से फैला गया । बह-कितने हिन्दू रानामा कैश में सने ई० ११९४ तक रहा। और तब मुसलमानो ने उस पर चढाई किई। सन ई० १७३२ में सादत अलीखा नाम एक फारसी महाजन अवध का सूबेदार बनाया गया और राज्य बहुत दिन लो उस के घराने के बश में रहा । सन १८५६ ई० मे अगरेजा ने राज्य को ले लिया, और सूबेदार को कलकत्ते मे मिन्शन दिई सन १८८० में वह मर गया। अवघ, १८०० लो एक : कमिश्नर के अधिकार नार्थ-वेस्ट प्राविन्सन में मन्दराज की गिन्ती के समीप है। कहते हैं मिलाया गया। कि इस स्थान पर लक्ष्मण राम के भाई ने अवघा इतना बड़ा है जितना लका प्रर्धात उस मे २४ हजार वर्ग मोल जमीन है । उस केवल दूसरी सदी से चला आया है। जब गाव बनवाया परन्तु अब का जो नगर है में एक बड़ा मैदान है जो गगा और समुद्र याची दूर से लखनऊ को देखे तो सेसा देख की ओर झुका हुआ है उस मैदान की दक्खिन- पड़ता कि बडा मुन्दर नगर है कि उस के वाली सीमा, गगा नदी है और उस में तीन ऊंचे ऊचे श्वेत २ गृह दूर से चमकते है और नदियां अर्थात गोमती घाघरा रापतो बहतो ऊचे २ गुम्बज और मोनारे भी दिखाई देते है,। अवध की मिट्टी बहुत फलदायक, जब हम पास पात तो जाना जाता और "उस मे कसर , जमीन कम है। उस में है कि यह श्वेत पत्थर के नहीं बने-पर १२,५०,900, निवासी है अर्थात ५२ प्रादमी चूने से फेरे हुए घर है और बहुत से बड़े २ हर-एक वर्ग:मील में है और हर दस आद घर बहुत कच्ची रीति से बने हैं। एक बहुत मियों मे से ना हिन्दू है। बडा इमामवाडा प्रसिद्ध है जो सन ई० १९८४ मे बडे काल में बनाया इस मे एक बड़ा भारी कमरा है। जो पानकल 'लडाई को लखनऊ का वर्णन साममो से भरा हुआ है। गोमती के तट लखनऊ अवघे का मुख्य नगर है और उस पर छचमजिले नाम एक बडा महल है जिस के और कानपुर के बीच ४८ ‘मोला रेलवे के ऊपर सुनहला छाता धूप मे चमकता है। वह गोमती नदी के तट पर बना है। है। बाये और पर दो मकबरे है और उन लखनऊ प्राचीन वस्ती नही है तोभी उस में के समीप केसर बाग है जो पिछला भवन २२०३,००० निवासी है अर्थात उस को गिन्ती है जिसे अवध के सूबों ने बनवाया था। है परन्तु -- -- -- . । " . ܢ 7 हिन्दुस्तान देश की याया। ४५ लखनऊ के समीप मार्टिनियर नाम एक बडा भवन है निस को मार्टिन साहिब ने बनवाया। मार्टिन एक फ्रासीसी योद्धा था जो हिन्द मे पाक ननरैल हुआ और बहुत धनवान भी हो गया। उसके मरने पर वह भवन स्कूलघर घनाया गया जिस मे प्रतिवर्ष १२० लडके पाले और पढाये नाते है। लखनऊ से बडे २ बाग और रमणे और वारी प्रसिद्ध है।रेजी डेन्सी नाम एक स्थान है जो इस कारण से सखनऊ का एक भवन । ला बहुत विख्यात है कि बलवे के दिनो मे वहां बहुत दिन लो लडाई होती रही और सन ई० १८५० मे एक इमार अमेज स्वी वालक और देशी नोकरी सहित रक्षा के हेतु वहा पाये। उन की सहायता के लिये सर हेनरी ला- रन्स और ५०० गरि शाहमजिल वह स्थान है जहा अवध के सूबे और इतने देशी सिपाहो मी तो सच्चे निकले अपने दस्तूर पर धनपशुओ को लडाते थे। छ महीने लो अगणित येरियो से लडसे 12 M हिन्दुस्तान देश को याधा। और उस स्थान को बचाते रहे। बैरियो गये इवलाक साहिब भी मर गया। मरते ने जमीन में सुरंग खोद खोदकर घाहा कि समय उस ने एक मित्र से कहा कि ४० घरस भीती को बाहत से गिरा दे और चारों ओर से मै ने अपने जीवन को ऐसा सुधारा कि से रात दिन उन पर बन्दूक और तोप छोड़ते जिस्तै काल के समय में न घबरा जाऊ । वह रहे तोभी उन्हें उस स्थान से निकाल न स्थान जहा इन लोगो ने ऐसो धीरता दिखाई सके । स्वी बालक और जो घायल किये थो प्राजकल बहुत टूटा फूटा पड़ा है । गये सा तहखाना मे रक्वे गये। एक दिन अयोध्या जो पूर्वकाल में मुख्य नगर था एक छोटी लड़की भीतर के प्रांगन मे खेलनी सो लखनऊ से साठ मील पूर्व और है। वह थी और एक गोली उस के सिर में लगी घाघरा नदो के तोर पर बना था परन्तु और वह मर गई । सब लोग भूख प्यास अाजकल केवल जंगल में पुराने रोडो के ढेर से बहुत सताये गये । सर हेनरी लारन्स जो पडे है। प्रगट है कि एक समय में वह एक बहुत लार्ड जान लारन्स का भाई था एक कोठरी मे ही बडा और देखने योग्य नगर था । पान- खाट पर पड़ा था कि वहां गोली से घायल कल दो नगर उस स्थान पर पाये जाते है हुआ और वह मर गया। उस ने कहा कि मुझे अर्थात अयोध्या और फैजाबाद । यदि बटोही दफनाके मेरी कबर के पत्थर पर यह लिख लखनऊ को छोडके गंगा पास लौट आवे और देना कि यहां हेनरो लारन्स को कबर है जिस नौका पर सवार होके आगे बढे तो कानपुर ने अपना यथोचित कर्त्तव्य करने चाहा । उस से 00 मील दूर वह नदी को शेड़के चार के मरने के तीन महीने पोछे देवलाक साहिब मोल खेतो में चलेगा तब कन्नौज देखने में प्रायेगा जो काली नदी के पच्छिम तीर पर बना था। पूर्वकाल में गगा वहां नगर के पास बहती थी परन्तु अाजकल चार सील दूर हट गई है। पूर्वकाल मे कन्नौज एक बड़े राज्य का मुख्य नगर था और वहां गुप्त नाम महाराजा लोग हिन्द के दूर २ स्थानों तक अधिकार रखते थे। वे महारानाधिराज की पदवी रखते और बहुत से राजा उन के बश मे थे। प्रगट है कि मसीह से पहिले ६०० बरस उन का अधिकार अधिक था। सन ई० १०१८ मे महमद गननवी ने नगर को ले लिया परन्तु उसे न लूटा । सन १९९४ में वह महम्मद गोरी के घश में पड़ा । आजकल उस के पुराने खडहर पांच गांव के खेतो में दिखाई इन लोगों की रक्षा करने के लिये प्राया परन्तु देते है। प्राजकल उस नगर की बहुत दुर्दशा जिस दिन कि वे लोग उस स्थान से निकल है कि निवासी पुराने गृहों को ईटी से अपने + । देवलाफ साहिव।
हिन्दुस्तान देश को याषा। लिये भोपडियां बनाकर रहते है। पूर्वकाल न घरसे और इस लिये कही २ भारी अकाल में ब्राह्मण लोगो का मानाज में बहुत आदर पड जाता है। सौ बरस हुए कि लोग यह सन्मान किया जाता था और कहते हैं कि सोचते थे कि हा परमेश्वर ने नल न दिया वहां से पाच ब्राह्मण कलकत्ते में गये और कि तो इमें कुछ करना नही है। जमीन से कुछ पानकल जितने ब्राह्मण बगाल में पाये जाते | उत्पन्न नहीं होता और लाखो पशु और मनुष्य है सो इन पाचो के बश में है। कानपुर से मर जाते है और उन की कुछ सहायता करनी १०० मील दूर फरक्साशाद एक नगर है जो अथवा उन के लिये कुछ उपाय करना अन- प्राचीन नहीं है और उस के ममोप फतहगढ होनी बात है। पिछली सदी में बगाल देश नाम एक छावनी है। पिछली सदी में एक में एक ऐसा अकाल पडा कि जिस का वर्णन नवाय वहा बहुत अधिकार रखता था परन्तु किसी देखनेहारे ने यो किया है कि वरसात घल के दिनों में उस ने सरकार अगरेज का में पानी न पडा सो जाडे में और गरमो में साम्हना किया और लडाई में भगाया गया। तंगी बढती गई। कगाल लोग बिन सहायक भसों मरते थे। किसान लोग अपने गाय गगा की नहरी का वर्णन । वैलो को बेचते थे क्योकि उन्हें खिला न सकते थे। वे अपनी गाडियो और हलो और काम करने की समस्त साममी को बेच डालते थे। जो अन्न बाने के लिये रक्खा गया उसो को खाते थे। वे अपने बालको को बेचते थे पर कोई मोल न लेता था। वे जमीन की घास और वृक्षो की पत्तियो को खाने लगे उस से पहिले कि एक दूसरी बरसात के दिन प्रावे और कलकत्ते में यह सन्देश पाता था कि ऐसे स्थान है जहा बेचारे कगाल लोग मृतको को लायो को खाते है। कौन कह सकता है कि उन धापत्ति के दिनों में मनुष्य को क्या २ कष्ट हुप्रा । इस प्रकाल के दो बरस पोछे वारन हेसटिङ्ग ने उस देश की सैर झिई और उस ने यह हिसाब किया कि तीन निवासियों में से एक अकाल में नाश हुमा यदि वह लेखा ठीक हो तो सौ लाख प्रादमी अकाल से मरे । तिस के उन्नीस बरस पोछे हिन्द देश के काश्तकारो को इस बात से जब लार्ड कार्नवालिस ने वगाल में सैर किई बहुत कष्ट है कि जल के बरसने में ठिकाना तघ उस ने कहा कि मेरी समझ में बगाल नहीं है। एक साल घरसे और दूसरे साले को एक तिहाई जमीन उस अकाल के मारे PMENT - अकाल के मारे फगला लोग। - ४८ हिन्दुस्तान देश की यात्रा। - उजाड़ पड़ी है और उस में बनपशु फिरा बड़ा तीर्थस्थान है। यह वह स्थान है जहां गगा करते है। पहाडी से निकलकर मैदान में बहने लगती सन १८३० और १८३८ मे उत्तर हिन्दुस्तान में है । विष्णु के और शिव के पुजेरियो में झगड़ा भारी अकाल पडा यहा लो कि बहुत बरसे है क्योकि एक कहता कि यह हर का द्वारा तक जब किसी दिहाती ,से उस की अवस्था और दूसरा कि यह हरि का द्वारा है परन्तु पूछो जाती थी तब कहता था कि मै बडे सत्य पूछो तो उन दिनो मे जब न शैव न वैष्णव अकाल के इतने बरस पहिले वा पीछे उत्पन्न जैसा अब है पाये जाते थे तब भी हिन्द लोगो हुआ। इस अकाल के मारे सरकार ने बेचारे ने इस को तीर्थस्थान मान लिया। विशेष स्नान लोगो के प्राण बचाने के लिये नहर खुदवाना करने की जगह वह घाट है ना गंगाद्वार प्रारंभ किया। सन १८४२ ई० मे वह गङ्गा की नाम मन्दिर के आगे बना है। उस घाट की नहर को खुदवाने लगी और सन १८५४ मे वह ऊपरवाली भीत में एक पदचिन्ह प्रत्यर में खोल दिई गई थी। सन १८६६ ई० मे उस खुदा हुआ है और लोग इस को विष्णु चिन्ह की एक बड़ी शाख प्रारंभ हुई। ऊपरवाली नाम देके पूजते है । जब कि स्नान करने का नहर हरद्वार के समीप गङ्गा नदी का प्राधा ठीक समय आ पहुचता है तब हर एका यात्री जल लेके उसे उस जमीन मे जो गङ्गा यमुना यह चाहता है कि मै हो पहिले जल मे पहुंचू नदियों के बीच मे है खेत सोचने के लिये और इस इच्छा से बहुत लोग एक दूसरे से फैला , देती और कानपुर मे फिर गड्डा से लडते और एक दूसरे को दबा देते है । सर- मिल जाती है। नीचेवाली नहर राजघाट कार ने वहा कान्सटिबिल रक्ो है निस्ते कोई से पानी लेती और दोआबा के बड़े भाग को अपने भाई की हानि न करे परन्तु कभी सोचती है । इन दो नहरों मे १०० सिपाही भी भीडो को रोक नही सकते हैं। मोल नहरों के और ४,४00, मील रजयहो के सन १८१६ मे बडी भीड थी और चार सौ तीस पाये जाते है और कहते है कि हर साल के आदमी दबके मर गये जिन मे कितने सिपाही सिंचवाने से 8,00,00,00 रुपये का अन्न उत्पन्न भी थे जो भीड़ को रोकने चाहते थे। इस होता है। जब पानी के न बरसने से चारो आपद के कारण से सरकार ने सो फुट चौडा ओर की भूमि सूखी पड़ी है. तब यहा की एक पक्का घाट बनवाया है। वहा का मेला भूमि अन्न से लहलहाती है । जगत भर में बैसाख के पहिले दिन मे होता है क्योकि हिन्दू सो अच्छी और लाभदायक नहरे न होंगो लोग कहते है कि उसी दिन गङ्गा जी और से एक और लाभ यह होता है कि आकाश से उतरी थी। वहा वारह बरस के पीछे इन मे बहुत सी नौकाये चलती जो भाडो कुम्भ का मेला होता है जिस मे बड़ी भी और यात्रियों के पहुचाने में काम आती। एकट्ठी होती है। गंगा तीर पर रडको नाम एक सरकारी कालिज है जहां बड़े २ कारखाने है जो नहर गगा का वर्णन।। को खुदवाने आदि कामों मे लाभदायक है। प्रय इमारा बटोही समस्त गंगा नदी को । हरद्वार गंगा नदी पर हिन्दू लोगों का देख चुका है उस स्थान से लेके जहा सागर । न - . . - ।
जिन्दुस्तान देश को याषा ४९ A+Me AVM- है वहा से हरद्वार लो बहुत ढालू है। हरद्वार में वह २०२४ फुट ऊंचा है। काशी में वह ३५० फुट ऊचा है। गगा को लबाई १५६० मील है परन्तु ག་• जन मिसिसिप्पी आदि कितनी बार नदिया उससे लबी पाई जाती है। ग्राम जन की लगाई गगा की लगाई से दूनी अर्थात ४,000 मील है। सब देशो में यह रीति पाई जाती है कि अनपढे लोग जिन्हें ईश्वर का कुछ ज्ञान नहीं है ऐसी बस्तुन को जिन्हें लाभदायक समझते है पूजने लगते है । मिस देश मे नील नदी बहुतही के निकट वह समुद्र मे ना बहती और हर-लाभदायक थी वरन इस के बिना समस्त द्वार लो जहा वह पहाडिस्तान से निकलती देश उनाड हो जाता क्योकि वहा यहुतही है। यदि कोई गगा के सोते को देसने चाहता थोडा पानी बरसता है सो वहा के निवासी है तो पहाड पर चढना पडेगा। वहा गड्ढोत्तरी नदी को देवता करके मानते थे। हिन्दुओं नाम एक मदिर बना है और उस के समीप में यह दस्तूर है कि हर एक यस्तु को चाहे हिम का बहुत ढेर लगा हुआ है जिस के नीचे स्वर्ग में चाहे पृथिवी में हो पूजने को चाहते से गगा का सेता वहता है । उस स्थान पर है यहा लो कि बढई अपने पसले को पार उस का सेोता मागोरथी कहलाता है। वहा स्वो अपनी हाडी को पूजेगी से कुछ आश्चर्य के ब्राह्मण लोग उस सोते के जल को शीशिया की बात नही है कि गगा को बहुत लाभदा; में भर देते चार, शप लगाते और याचियो यह जानकर पूजते है के हाथ से दूर २ स्याना में पहुचा देते पेदो में गगा, का नाम केवल दो बार है। उस गोत्तरी के समीप भागीरथी नदो पाता है। उन दिनो मे उम्स का इतना में दो और नदिया अर्थात नान्यो और पादरसन्मान नहीं किया। माता घा क्योकि अलकनन्दा मिली है तीना से गगा नदी मार्य लोग जो उत्तर से पाये थे गगा, तट धनती ,गगा का सौता १३,८00 फुट ऊंचा तक न पहुंचे थे। उन को समझ में इण्डस हार का घाट। - . 13 हिन्दुस्तान देश की यात्रा। । कवित्त। . गोतरी का मन्दिर। नदियों की रानी थी और सरस्वती जो उन तोर पर मरे और वहां भस्म किया जाये से को पूर्वी वैरियों से बचाये रखती थी उन को सीधे वैकुट को जाता है । जो कोई १०० को देवी कहलाती थी। वह अद्भुत कहानिया दूर हो और गगा २ नाम पुकारे तो उस जो गंगा के विपय कही जाती है सो पहिले तीन जन्म के पाप कट जायेगे। यह कहा महाभारत और रामायण में पाई जाती है निया केवल अज्ञानी लोग मान सकेंगे। और पीछे पुराणो मे बहुत बढाई गई यहा लो कि गगा एक देवी और हिमालय की घढ गजराज चतुरगिणी समाज सग जीति बेटी बताई गई है। पुराणो मे लिखा है कि बितिपाल सुरपाल से सजत है । बिदा अपार भाति गंगा विष्णु के पग की उगली से बहती है। पढि तीरथ अनेक करि यज्ञ और दान बहु से करत हैं। तीन काल मे नहाय इन्द्रियन के दूसरे मे लिखा है कि वह आकाश से गिरतो बश लाय करि बन वास विषय वासना तजत है और गिरने की चोट को कम करने के हेतु योग और यज्ञ जप तप को अनेक कर. दिन- शिव अपने सिर की चोटी पर उसे महण भगवन्त भक्ति भय ना तरत हैं। करता है। तीसरे मे लिखा है कि गगा गोमुख श्लोक। से बहती है। फिर कहते है कि जो गगा में गगातोयेन कृत्स्नेन मृहारैश्च नगापमै । नहाता विशेषकर बडे त्योहारों के समय मे आमृत्यो. स्नातकश्चैव मावदुष्टो न शुध्यति ॥' सो अपने माप को घोता है। तो उसके जिस का अर्थ यह है कि जिस का दुष्ट हिन्दुस्तान देश को यात्रा। भाव है सो तो पर्यंत के समान मिट्टी से वहा जाके देख सकता है और उस के जल में शरीर को मानके मृत्यु लो गंगाजल में स्रान कुछ भी पविषता नही है। यदि कोई ईश्वर को करे तौभी शुद्ध न हो लायेगा। त्यागके पाप पाप काटने की इच्छा से गगा गगा और सब नदियों के समान हिमालय की पूजा करे तो केवल अपने पाम को बहुत पहाड के खाते से निकली है लिसे याधी ही बढा देता है। हिमालय पहास का वर्णन। पहाडा की पाती पाई नही जाती है। उस के नाम का अर्थ यह है हिम का निवास क्योकि उस की बहुत सी चोटिया पर हिमसाल भर पडा रहता है। उस का रूप धनुप का सा है और वह देश के बड़े भाग की उत्तर सोमा १५०० मोल लो अर्थात इण्डस नदी से लेके व्रम्हपुधा नदी लो घेरता है। उस की माती की चौडाई कुछ २०० मील होगी। उस की दक्खिन और छोटी २ पहाडिया है जो इण्डस और गगा के मैदान से उठतो है और उत्तर और तिब्बत देश की ऊची जमीन है ना कि समुद्र से कहीं दो वा तीन मील ऊची है। जब कोई मैदान पर खडा होके हिमालय की ओर देखता ऐसा दिखाता है कि साम्हने की चोटियों पर बनवाली पहाडियों के ऊपर श्वेत २ मासप की एफ सडक । बादल दूर लों दिखाई देते है जगत भर में हिमालय के धरायर कोई परन्तु जब हम समीप पहुचते तो इन छोटो - - ५२ हिन्दुस्तान देश की यात्रा । है जहा लिङ्ग है। यह वह स्था दारजि शिमल मंसरी नैनीता मादि स्थान जहां साहिब लो गरमी के दि काटते है। श्री भी ऊपर चढ़ा त फूल वृक्ष आदि हिन्दुस्तान के नही पवाडिया विमानय के साम्दने । विलायत के स पहाडियों के कारण से हिमालय दिखाई नहीं देख पडते है। गूजवेरी स्ट्राबेरी प्रादि फल देता है जब लो इन छोटी पहाडियो के ऊपर न जो नीचे उत्पन्न नही होते वहा बहुत माय चढे। हिमालय के साम्हने बीस मील चौडा एक जाते है। मैदान है जिस को तराई अर्थात गोला मैदान इन पहाड़ी के बीच में गर्म नीचान भी कहते है। पहाडो का जल वहा बहुत एकट्ठा पाये जाते जिन में धान बहुत उत्पन्न होता रहता है और उस पर बहुत धूप पडती है जिस है। पहाडिस्तान की ऐसी जगहो मे नहा ठढी के कारण से बहुत मोटो २ जगली घास उगती हवा कम पहुचती और जो १२,000 फुट ऊचे है जो नपशुओ का विशेष निवास है । तराई है वृक्ष उगते है। ऊपर चढते २ वृक्ष बहुत मे रहकर मनुष्य को बहुत तप कृपा करती छोटे होने लगते फिर झाडिया भी नही है सो उस मे गाव बहुत कम पाये जाते है। मिलती और जब १६,000 फुट ऊचे पर चढा तराई के प्रागे ३,000 फुट ऊंची पहाडियो को तो न वृक्ष न घास है केवल काली घटानी एक श्रेणी है जिस मे से अच्छी २ लकडो काटो पर श्वेत २ हिम साल भर पड़ा रहता है। जाती है। इन पहाडिया के पीछे दून नाम बाघ और बन्दर ११,000 फुट कचे पहाड़ी पर कितने नोचान है जिन मे अन्न बहुत उपजता कही २ पाये जाते है और इस से भी ऊचे है क्योकि यह वह अच्छी मिट्टी है जो पहाडों चीता हिरन भान पाये जाते है । पहाड़ी लोग पर से बह पाती है। इन नीचानो मे धान भेड बकरी को बहुत पाला करते है न केवल बहुत उपजता और पानकल चाह की बहुत मास और कपड़े की लालसा से परन्तु इस वारियां वा लगाई गई है। इन नीचाना के इच्छा से भी कि उन के द्वारा माल असबाब पोछे साम्हनेवाले हिमालय पर्वत दिखाई देते को पहाड के घाटो पर पहुंचा देवे क्योकि है। यह कुछ ८००० फुट ऊचे है और उन में इन पर भार बहुत लादते है। तिव्वत मे वृक्ष घास तरकारी आदि अच्छी रीति से उगती याक नाम एक प्रकार का, भैसा है जिस के हिन्दुस्तान देश की याचा हिमालय पदाटी मे दिम की नी। - चलना भो कठिन है क्योकि हवा ऊचाई के कारण से ऐसी पतली है कि सास लेना कठिन लवे बाल होते है और वह वहा के निवासियो । थोडा सा परिश्रम करे तो याची पडे २ बहुत काम आता है। बीस हजार फुट हाफने लगते है । पहाड की श्रेणी एक सम अंचे पर कितने स्थान है नहा यात्री हिमा- नही है परन्तु बडे २ गहिरावो और नोचाना लय के उस पार जा सकते है परन्तु वहा से कटी हुई है और इन नीघानो मे छोटी २ का मार्ग बहुत ही कठिन है जिस मे बहुधा नदिया बहती और ऊपर से हिम को नदिया किसी नदी के किनारे २ चलना पडता है जहा घोरे २ चलो पाती है। हिमालय की ऊचाई ठोकर. को चटान अगणित है और दोनो ओर १८,००० फुट बताई जाती है परन्तु उस में पहाड की वगले बहुत ढालू हैं और ऊपर से बहुत सो चोटिया है जो इस से कहीं अधिक पत्यर बहुत गिरा करते और कभी २ पहाड जवो है। २३,000 फुट ऊची ४८ चोटिया गिनी का बडा भाग ऊपर से फिसलता है और गई है। सब से अचा पहाड एवरट है जो नेपाल ममस्त मार्ग को एक दम मे मिटा देता है की उत्तर सीमा पर है उस को कंधाई २८,000 यहा लो कि यात्री किसी रीति से प्रागे नहीं फुट है और जगत भर में कोई दूसरा इस जा सकते है। बराबर जचा नहीं है। फिर किना न केवल मार्ग, बहुत कठिन है परन्तु यह पघाड है ना पहाड नैपाल की पूर्वी - हिन्दुस्तान देश की याचा - - गर है व २८,१६० फुट ऊंचा है। फिर काशो लय पर्वत की ओर दृष्टि करता है तो उन का से उत्तर और धौलागिरि नाम पहाड है जिस रूप रंग बहुतही सुन्दर दिखाई देता और सदा की ऊचाई २६,८२६ फुट है। यमुनोत्तरी के बदलता रहता है । साम को नय सूर्य डूबने यहाड जहा यमुना नदी बहती है २१,१५५ लगता तो कभी ऐसा देख पडता कि समस्त फुट ऊंचे है । वह स्थान उत्तर की बगल में श्रेणो मे आग लगी है और सब लाल होकर जहा तक दिम बराबर पड़ा रहता सो १६,000 जल रही है फिर वैगनी रंग चढने लगता फुट ऊचा है परन्तु उत्तर की बगल मे और उस के पीछे गुलायो। जब अधियारा १०,४00 फुट ऊचे तक पड़ा रहता है। इस होने लगता तो खाकी रग छा जाता है। को भिन्नता इस कारण से है कि पूर्व की ओर हिमालय पर्वत से हिन्द देश को नाना बहुत अधिक घाम रहता है । हिमालय प्रकार का लाभ पहुंचता है । वे उन पहाड की श्रेणी सघ से ऊंची है परन्तु वह सब शीतल पवनो को जो उत्तर की दिशा से से पुरानी नहीं है क्योंकि ज्ञानवान कहते है पाती बहुत रोकते हैं। फिर जो हिम उन कि उन सीपो से जो उस को मिट्टी मे मिली पर पड़ता है सो सूखे के दिनो मे गलता हुई है प्रगट है कि यह पहाड किसी और नदी बनकर दूर २ मैदाना को जाके समय मे पानी के नीचे थे और पीछे ऊंचे पर सोचता है सो नदियो मे जल उस समय जब हो गये। उन के उठने का द्वारा वह पिघलाये अधिक प्रयोजन होता भरा रहता है। बहुत हुए पत्थर होगे जिस को ज्ञानवान माणित देशो मे अज्ञानी लोगो का यह विचार है कहते है। जब माणित नीचे से बढ़ाया गया कि हमारे देवते पर्वतों को उन चोटिया में तब उस ने जो पत्यर ऊपर थे ऊचे पर उठा नहा मनुष्य कठिनता से चढ सकता है रहा दिये । यह माणित बहुत स्थानों में दिखाई करते है। यूनान देश में प्रालिम्पस यहाड देते है। यमुनोत्तरी के पहाड के पास कई सब से ऊंचा था सो अन्नानी लोग कहते स्थान है जहां नीचे की गरमी दिखाई देती थे कि जुपिटर देवताओं का पिता अपना है क्योकि जो पानी के सोते भूमि से निकलते दरबार वहां करता है। हिन्दू लोग ऐसेही है सो विचार से हिमालय पर्वत की ओर दृष्टि बहुत जब यात्री हिमालय पर चढता है तो कभी २ करते है। पुराणो मे लिखा है कि हिमालय यक्ष , बहुत सुन्दर बात दिखाई देती है कि पर्वत मेरु पहाड की दक्खिन और है। परन्तु बादल पाव के नीचे, पडे रहते है। कभी २ जाना जाता है कि कोई मेरु पहाड नहीं है वे शान्ति के समुद्र की नाई देख पडते जिन तो हिमालय कहा रहा । फिर लिखा है कि मे से पहाड़ की चोटिया, टापू समान निकल पच्छिम मे कैलास नाम चादी का बना हुआ प्राती हैं। कभी २ ऊपर जहा हम खडे रहते वह पहाड है जहा शिव का निवास है। मान- तहां बडा चैन रहता है और नीचे बड़ी प्रान्धी कल बहुत से हिन्दू लोग यमुनोत्तरी गङ्गोत्तरी उठती और बादल गरजता और विजलिया प्रादि तीर्थी के दर्शन करने के लिये बडी चमकती है। दौड़ धूप उठाते है और यह नहीं जानते जब कि कोई मैदान पर खड़ा हो हिमा- कि परमेश्वर ऐसे दूर स्थानो मे नही बरन गर्म है। - - हिन्दुस्तान देश को यात्रा । ५५ - कुशल से बैठे सत्य भक्त कामन में निवास करता है। यदि यमुना नदी का वर्णन । हम सत्य मन से उसे भले तो अपने घर में हुए उस को भजे । वह हम से इलाहाबाद में हम देखते है कि यमुना दूर नही है क्योकि उस में हम जीवते और नदी पाझर गगा में मिली है और मिलने का चलते फिरते पार पानन्द करते है। जहां स्थान पिबेणी नाम से एक तीर्थस्थान प्रसिद्ध कहीं इम है तथा वह हमारी प्रार्थना सुन्ने है। पिबेणी के समीप एक बहुत सुन्दर रेल को तैयार है तो दौड धूप करके पहाडो पर पुल लोहे का बना है। यदि बटोही चढना क्या जबर है। नौका मे सवार हा यमुना नदी पर चले तो उसे कई एक देखने योग्य स्थान मिलेगे । का प्रागरा का वर्णन । घगरपद भरा मेठिया। नान्यान्य। धोकार, (राजपूताना) भागाका गठ। आगरा यमुना नदी के पच्छिम तीर पर के तट पर पागरे का प्रसिद्ध गढ बना है। वना है और उस में और इलाहाबाद मे २८० प्रागरे का इतिहास यह है कि पूर्वकाल में मील की रेल है । उस के निवासियो इस स्थान पर लोदी नाम राजामी का निवास की गिन्ती इलाहाबाद की गिन्ती से कम है था परन्तु उन का नगर यमुना पार बना था। परन्तु बडा नगर है। उस स्थान पर यमुना जय यावर ने सन ई० १५२६ में नगर को अपने पूर्व दिशा को घूमती है और इस फोने में नदी वश में कर लिया तय उस ने पुराने हिन्दभवन - VE हिन्दुस्तान देश की याया। था परन्तु म सो दिल्ली को अधिक चाहत्ता उसके बेटे अकबर ने यहा लौटकर पा के नगर प्रागरा को नदी के पच्छिम तौर पर बनवाया और उसे, अपना मुख्य नगर किया । उस ने गढ को बनवाया और उस मैं के भवनों का प्रारभ किया। उस का बेटा महागीर उस के पीछे गद्दी पर बैठा पार पिता का मकबरा कन्दरा में प्रसिद्ध है बनवाया। परन्तु सब से उत्तम गृह जो आगरे मे पाये लाते है सो जहांगीर के पुत्र शाहजहा के बने हुए है। औरग- जेब जो शाहनहां का चौघा पुभ 'था उस ने दिल्ली को मुख्य नगर फिर बनाया और पीछे के दिनों में प्रागरे का बहुत अदल बदल हुगा । सन ई० १८०३ मे जब वह मराठा लोगो के वश में था तब मे वास किया। चार बरस पोछे वह वहा लार्ड लेक साहिब ने उन्हे जीत लिया और मरा और उस की, लाथ काबुल में पहुचाई नगर को ले लिया। सन ई० १८३५ मे वह नार्थ, गई । हुमायून बादशाह जो उस का पुत्र था वेष्ट प्राविन्सन का मुख्य नगर शिया गया यमुना परी पर ताजयोथी का रोया। जो अब AMERBAR हिन्दुस्तान देश को यात्रा ५७ उस की परन्तु विलये के पीछे सरकार फिर इलाहाबाद बनवाया वह पत्थर के चबूतरे पर ऊँचा में लोटकेचली गई।"DE: HTTधना' हुपा है और उस के तीन श्वेत Troo TACTसंगमरमर के गुम्बज दूर से चमकत है।भातर वह दांतो से तीन भागों में घाटी हुआ है और यह दात मनभावन रीति से बने और काढे हुए है। परन्तु ताजबीबी का रोजा वह गृह है जो समस्त हिन्दुस्तान का मुकट है। सुन्दरता का कोन वर्णन कर सकेगा। इस के समान कोई दूसरा कही नही मिलता । उस को ताजमहल भी कइते है और वटोही दूर देशो से उस को देखने पाते है। इस को शाहजहा आगरे में कितने स्थान है जो बहुत देखने ने अपनी प्यारी रानी के स्मरणार्थ घनवाया। योग्य है । वहा का गढ ऊचा और दृढ पत्यरों मुसलमान बादशाहो के मकबरे बहुधा एक का घना हुआ है। उस को भीत ४० फुट रोति से बनाये जाते थे। दस्तूर यह था कि ऊंची है और उस के बीच में वही भवन बादशाह आप अपने जीते जी में उस को प्रादि है जो मुसलमान बादशाहों के काम पांरभ करता था और ऐसा मनवाता जैसा मैं पाते थे जैसा दीवान खास दोवान पाम उस को पसन्द होता था। वे किसी घाग को मसजिद आदि गृह है और यह श्वेत संग कची भीत से घेर लेते और उस के बीच में मरमर के बने हुए और ऐसी सुन्दरता से चबूतरा उठाते थे जिस के ऊपर मकबरा कोढे 'हुए है कि उन को देखकर मन मोहित बनाया जाता और जब लो धादशाह जीता हो जाता है। फिर उन भवनो पर चढ़के रहता था तवाला अपनी रानिया और बालकों यमुना पार की' और पासपास की जमीन बही और मिषो सहित इवासाने के लिये सोम सुन्दरता से दिखाई देती है। एक नहाने की को वहा जाया करता था । कोठरी है जिसकी भीती में हजारों छोटे २ शाहजहा की रानी जिसका नाम मुम- दर्पण लगे हुए है। फिर मोतीमहल है जिस तालमहल विस्यात था सन ई० १६२९ में मरी को बादशाह शाहनहा ने सन ई० १६५8 में और तानमाल का मायरा शोघ पारम साबमालकी कार । . 15 हिन्दुस्तान देश की यात्रा - या गया और यह १६४८ में समाप्त हुआ। उम चबूतरा श्वेत सगमरमर का बना हुआ.१५ बनवाने में विशेषकर दो प्रकार के पत्थर फुट ऊचा और ३00 फुट लंबा चौडा है। इस र्थात नैपुर के.श्वेत संगमरमर और फतेहपुर के किनारों पर १00 फुट ऊंचे श्वेत मीनार करी: कोलाल पत्थर लगाये गये हैं। कहते खड़े हैं और बीच में मकबरा सडा है कि उस के बैनघाने पार बिभूपित करने मकबरा १८६ फुट लंबा और इतना चौडा है , २,00,00,000 रुपये लगाये गये है। और उस का गुम्बन २०० फुट ऊंचा है और + IAN Mara सक्रवार कामल । यह मशवरा आगरा से कोस- भर दूर समस्त भीतो पर बहुमूल्य पत्थरों में मेसे फूल यमुना तोर पर बना है। बारी का फाटक काढे हुए है कि अहा हा इस सब सुन्दरता मो एक ऊंचा पत्यरको बना हुअा गृह.३ । को देखकर मन मोहित हो जाता है। फिर फाटक में प्रवेश करके एक सुन्दर धारो साम्हने बहुत स्थानों में कुरान के वचन पत्यर में खुदे मिलती है जिस कावीच में फव्वारो की श्रेणो हुए है।। लगी है और उसके दोनों पार अच्छे २ फल प्रागरा से कितने रेलवे सयन्य रखते, है। फूल के वृक्ष लगे हुए है। पारी के उस पार ईए इण्डियन रेलवे यमुना पार ढूंडले में है मास" नदो कोकिनार, पर एक वडा-लाल सो १४ मोल लया छोटा रेलवे, उसे आगरा पत्थर का चबूतरा है योसा फुट ऊचा और नोड देता है। प्रागरा में अन्न, को बिक्री hinालया। इस चबूतरे के ऊपर दूसरा बहुप्त है। वहा पत्यर-का नडा काम भली हिन्दुस्तान देश की यात्रा) - + - प्रागरा को मोसो मति। - . भाति से किया जाता है। सिकन्दरा मे जो हुए है सो प्राकाश के नीचे रक्खा हुमा प्रागरा से ६ मील दूर है अकबर का घडा और चारो ओर संगमरमर की भीतें अद्भुत मकयरा है जो 'अकवर से प्रारंभ किया गया रोति से काढो हुई पौर शोभादायक प्रत्यर और-उस के बेटे से ,समास, हुआ । यह एक के काम यने हुए है । प्रायर मोगल याद- पारी में बना है, जो कचो भोता से घिरी, हुई शाहो में उत्तम था। यह न्यायकत्ता और है,। मकबरा १०० फुट कचा और ३०० फुट मा को भलाई को चिन्ता करता था और लषा चाडा हैं। ऊपरवाले महल नीन्नेवाला चाहता था कि जैसा मुसलमान में सैसा दिन्ट से कुछ छोटे बने है, और सब के अपर छत से भलाई करे। नहीं लगो, परन स्मरणार्थ, पत्थर सगमरमर : फतेहपुर सीकरी एक छोटो पहाडी का है जिस पर ईश्वर के निनानवे नाम काढे से २३ मोल मच्छिम भार है। पयर 7 -
६०
हिन्दुस्तान देश की यात्रा
1-
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4
प
फरोधपुर सीकरा का पचमला।
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कि मै इस को अपना मुख्य नगर बनाऊं से दांत बताते है । फतेहपुर सीकरी अच्छा रहने
उस ने वहा पत्थर के बडे २ भवना को बनाया का स्थान नहीं था क्योंकि वहा नदी न थो
और पहाड़ी को ५ मोल लषी भीत से घेर निस के द्वारा से माल को इधर उघर पहुंचा
लिया। वहां उस ने बड़ी मसनिद भी बनाई दें और बन्ने के पचास बरस पीछे बादशाह
और उस के समीप बहुत ही सुन्दर एक मक- का दरबार दिल्ली में लौट गया।
बरा शेख जी का बना है क्योकि अकबर ने
सोचा कि इस की दुहाई से मुझ को बेटा .
मिला और पान लो स्वी लोग जो पुष चाहती
है, उस, के मकबरे में जाकर पूजा करती है।
मथुरा का वर्णन
एक गृह जो फतेहपुर सीकरी मे बना था सो
आगरा से ४० मील और आगे बढ़के मथुरा
वह पंचमहला था जो इस चित्र में दिखाई यमुना नदी के पच्छिम तौर पर बना है और
देता है और दूसरा वह जिस मे अकबर ६ मील और आगे बढ़के बृन्दाबन ' नगर
को रानिया आंख मिचौली खेला करती थी। मिलता है। आसपास को नमोनं ६ कोम
भीत के बाहर हिरनमीनार 60 फुट ऊंचा लो ब्रजमण्डल कहलाती और हिन्दू उसे
एक गृह है जिस के बाहर ऐसी बहुत सी बस्तु अति पविष जमीन समझते है क्योकि कहते
लगी हुई है जिन
गांववाले सत्य हाथो है कि कृपथ वहा गायों को चराता और १६,000
-
।
. हिन्दुस्तान देश की यात्रा गोपियाकोसंगरासमण्डलामें नाचता था। मागरा की पच्छिम पार पनाप को दक्खिन घालवालो के दिनो में मथुरा वाढवालों का और राजपुताना नाम एक देश है जो हिन्दु- नगर हो गया था जिस के पीछे महमूद गजनवी स्तान के इतिहास में बहुत विख्यात है। इस ने उसे घेर लिया और लूटा। बहुत से और मे अठारह देशी राज्य है और ऐसी कुछ जमीन मुसलमान राताओं ने इस स्थान पर चढाई भी है जो सरकार को अमलदारी में है। वह किई और यहा के मंदिरों को लूटके उजाड इतनी बड़ी जमीन है जितनी मदराज पौर किया। सन १०५५ ई० में मथुरा पर घडो आपत्ति उस मे १,२0,00000 निवासी पाये जाते है। पड़ी क्योकि उस समय प्रहमदशाह अबदाली अरावली नाम पहाड इस देश को दो भागो २५,000 अफगानी घुडचढे सग लेकर त्योहार में घाट देता है। पच्छिम को और बहुत नमीन के दिन मथुरा में, दौड़ पडा जब कि नगर बालूमय और मरुभूमि है जहा घालू चारो और बेचार यात्रियों से भरा था। मदिरो में उसाधियो से उड़ाई जाती है। वहा नल पाना ने गायो को बघ किया और उन के लोहू कठिन है और कुओं को २०० वा ३00 फुट गहिरा से उन को अशुद्ध किया। उस ने नगर को खोदते है परन्तु और भी स्थान है जो अच्छे फूक दिया और हमारी स्वियों और लडको और फलदायक है । राजपूत लोग कहते है पार जवानो को कैदी करके ले गया। मधुरा कि हम क्षघी जाति के है परन्तु सत्य पूछो और वृन्दावन में कृष्ण के नाम में प्रगणित तो गूनर आदि जातियों में बहुत मिले मदिर बनाये गये है और यह पुरी पूना वहां है । इण्टर साहिब कहता है कि आजकल बहुत प्रचलित है। हमारी प्रांखो के साम्हने ऐसे प्रधान नो पार लडाकू सन्तानो के थे राजपूत और क्षत्री बनते राजपुताना का वर्णन । नाते है। उस देश में विशेषकर हिन्दी भापा है और महम्मदी देखने में कम अाते है। रानाश्री मे टोक के नवाब साहिब को छोड सब हिन्दू है। बारहवीं सदी में राजपूत लोगो ने अपनी वडी सामर्थ्य दिखाई। वे बोरता में प्रसिद्ध हुए परन्तु उन का यह दस्तूर था कि अफीम के नशे में लडते थे। स्वो और लडकियो का घात करना और कितनी और भी कुरीत उन में प्रचलित थी। बच्चो के मारने का कारण यह था कि उन लोगो मे विवाह का व्यय बहुत अनुचित रीति से बढ़ाया गया था सो पितामा ने सोचा कि पुची को घात करना मला है। फिर उन लोगों मे लडने का यहां लो दस्तूर र रामपरी सोग । पाकि'नय कोई राजपूत कहो जाता या तो 1- । i 16 हिन्दुस्तान देश की यात्रा। - - . ढाल तलवार लेके जाता था। उस देश के बीच नहर जलसे भरी हुई है और भीत मे कहीं में भील मिना आदि नाम के कितने जगली बुर्ज और कोट बने हुए है। लार्ड लेस सन्तान फिरा करते है जिन का सुधारना साहिब ने सन १८०५ ई० में उसे लेने चाहा पर कठिन है। महम्मदी चादशाहों ने राजपूत ले न सका परन्तु राना ने थोड़े दिन पीछे अंग- लोगों का बहुत बल घटाया और जब रेनों से नियम बाधा । सन १८२७ ई० मे लाई मोगला का राज्य टूटने लगा तब उन पर कामबरमोर ने नगर को घेरा और अपने बश दूसरी बिपत्ति पड़ी कि उन दिनो मे मरहठा मे कर लिया। घुडचढी का बल बहुत बढ़ा जाता था जो उन के नगरो को लूट लेते और उन से शुल्क लिया करते और नाना प्रकार से उन को अलवर का वर्णन सताते थे। सन ई० १८१० मे लार्ड हेष्टिन ने पिण्डारी लोगों को मारा और मरहठा भरतपुर की उत्तर पच्छिम और अलवर लोगो को राजपुताना देश से दूर किया । नाम एक देशी राज्य है। अलवर नगर राज्य सिन्धिया ने सरकार अगरेज को अजमेर दे के बीच मे है और नगर के पास ऊंचा पहाड दिया और राजपुताना के सब रानाओं के संग है जिस के ऊपर कोट बना है। जब याची नियम वांधा गया। उस देश मे कई एक स्थान पहाड पर चढे तो दूर लो जमीन को अच्छो हैं निन का कुछ वर्णन करना योग्य है। रोति से देख सकता है। महाराजा का भवन पहाड के नीचे बना है। सन ई०१७७६ मे अल. वर भरतपुर के राज्य में था सो सरकार ने उसे लिया। इस,सट्टी के प्रारभ में अलवर के महाराजा बखतावरसिद्ध ने मरहठा लोगो से लडते समय सरकार अगरेज से सहायता मांगी और उन मे नियम बांधा गया । लसवारी के मैदान में जो अलवर से १० मील पूरब और है सिन्धिया को सेना और लार्ड लेक के बीच में बड़ी भारी लडाई किई गई। भरतपुर का वर्णन। - मरतपुर गढ का काटक। - जेपुर का वर्णन। पलघर की दक्चिन पच्छिम बार अपुर भरतपुर नगर आगरा से ३३ मोल पच्छिम है जो समस्त राजमुताना राज्यों में धनवान और है वह द्वढ नगर है और पाठ मोल लबो है और जैपुर नगर हिन्द के सुन्दर नगरी में भीत से घेरा हुआ है और जिस के बाहर बडी विख्यात है। थोडी दूर पर अम्बेर नाम । ।
हिन्दुस्तान देश को यात्रा - महाराजा यक्षतायरसिद का धारदरा-मलयर । पुराना मुख्य नगर था परन्तु लोगो में यह गास की रोशनी से प्रकाशित होता है। राना कहानी थी कि यदि यह राज्य ६०० घरस से जैसिह ज्योतिपविया को बहुत चाहता था अधिक एक स्थान मे रहे तो उस पर विपत्ति और पाच नगरी मे बडे २ तारागृहो को पडेगी से पिछली सदी में सिद्ध महा-बनवाया जिन मे सब से बड़ा वध है जो राजा ने अम्बेर को जो बहुत दिन से मुख्य अपने नगर लैपुर में बनवाया था। नगर में नगर था छोड दिया । सन १७२८ में राजा कालिन और कौतुकशाला और कितने और सिंह ने अब के नगर को नेव डाली और देखने योग्य गृह बने है। नैपुर की पच्छिम उस के नाम से जैपुर कहलाता है। उस के पार साम्भर नाम एक बड़ा ताल है निस में बीच में राजा का भवन बना है। नगर इस इतना लोन मिलता है जो चारी पोर से बात में प्रसिद्ध है कि उस की सड़के सीधी नगरी में बिकता है अर्थात साल में 5,00000 र चौडो है और प्रत्यग से पटी हुई है मन निमक धनता है। और उस में बहुत से मदिर पोर मसजिद भार पक्को हवेलिया धनी है और रात को नगर १ ६४ हिन्दुस्तान देश की याया। । सन्तानो को बहुत दुख देते थे। उन का यह अजमेर का वर्णन दस्तर था कि लूट मार करने के लिये प्रासपास यदि बटोहो आगरा मे रेल पर चढे और के गाव पर बडी फुर्ती से चढाइयां करते थे २३६ मोल पच्छिम और जाये तो वह अजमेर परन्तु शीघ्र अपने पहाड़ों में भागके लोट नगर मे पहुंचता है। तारागढ नाम एक पहाड़ जाते थे और कोई उन्हें दण्ड न दे सका । है निस के ऊपर कोट बना है और पहाड राजपुताना के राना लोगो ने वार २ उन्हें दण्ड के बगल मे अनमेर नगर पाया जाता है । वह देने चाहा परन्तु उन का कोई उपाय न चला पत्थर को भीत से घिरा हुपा है जिस मे पांच कहों मायर लोगो को सेना साम्हने न पाती' फाटक लगे हुए है। लोग कहते है कि यह थी कि जिस से लडे और चाहे कोई उन का बहुत प्राचीन नगर है और कि उस की नेव गढ तोड जाये अथवा गाव भस्म कर जाये सन ईसवी १४५ मे डाली गई। अकबर वाद- इस से उन को कुछ हानि न होतो थो वरन शाह ने नगर के बाहर भवन और गृह बन- वे पोछे क्रूरता से उस का बदला लेते थे। वाया । जहागीर के दिनो मे कई घरस लो उन लोगो मे डकैती और लूट मार जीविका अजमेर मोगलों का मुख्य नगर था । पिछली के मुख्य द्वारा थे वरन उन में से बहुत ਰੇ सदी मे मरहठा लोगो ने अजमेर को अपने थे जो और देशो में डकैती करके इस को बश मे लिया और सन ई० १८१८ मे सिन्धिया शरणस्थान समझके मा बसे । ऐसे लोगों में ने उसे सरकार अगरेज के हाथ दे दिया। नाना प्रकार की दुष्टता हुआ करती थी नर अनमेर से घोडो दूर पर पुष्कर नाम एक इत्या करने से उन को कुछ चिन्ता न हाती ताल है जिस के विपय लोग यह कहानो घो। वे कभी अपनी कन्याओं को मार डालते कहते है कि व्रम्हा ने वहा एक बडा चढावा और कभी अपनी माता को दासो होने के लिये चढाया जिस के कारण से इस ताल का इतना बेच डालते और निरे निर्लज्ज और निर्दय पुण्य प्रताप हो गया कि जो पातको उस मे हो सब प्रकार को दुष्टता करते थे जब कि-यह नहाता से स्वर्गवासो हो जाता है। लोगों नमोन सरकार अगरेज के वश मे आई तब मे कहावत है कि ग्रम्हा के दुष्कर्मी के कारण भी वैसो दुर्दशा रही । योद्धा इथियार लिये से उस को पूजा उठ गई है और कि इस हुए इधर उघर फिरा करते थे और कभी २ पुष्करवाले मंदिर को छोड समस्त हिन्दुस्तान पहाडा के मार्गी को बन्द कर रसते थे । सर- में ब्रम्हा की पूजा के हेतु कोई दूसरा मदिर कारी नौकर पकडे गये । सरकारी कैदी बन्दी पाया नही जाता है। गृह से चुराये गये और मार्गी मे चलना नोखिम की बात थी। हाल साहिब ने जो सरकार का एजण्ट था अच्छा उपाय निकाला। मेडवारा का बर्णन उस ने सोचा कि यदि ये लोग युद्ध करने से अजमेर से दक्विन पच्छिम और एक प्रसन्न है तो सरकार के लिये क्यो न युद्ध करे। पहाडिस्थान है निस में सैकडो बरस लो ऐसे सो उस ने मैडवारो को एक पलटन बनाई जंगलो निवासो पाये जाते थे जो आसपास के यह पलटना बहुत अच्छो निकली और उन्हों - - . " ।
१५ हिन्दुस्तान देश की यात्रा । के द्वारा से डकैती वहां के सन्तानों में से चाहेगे से साहिब ने नया नगर नाम एक स्थान मिटाई गई। बनवाया। मायर लोग उस से प्रसन्न न थे क्योकि मायर लोगो मे न्याय करने के अद्भत उपाय कहते थे कि यदि बनिया लोग सावेगे तो प्रचलित थे कभी २ जब कोई किसी पर दोप हमे ठगेगे और बनिया भी उस नगर में लगाता था तब अपने २ मियों के साम्हने दोनो रहने न चाहते थे न हो कि मायर लोग कोई तलवार लेकर आपस में लड़ते थे और जो दिन हम को लूट के मारे । परन्तु उन्हो ने कहा जीते उस की बात पक्की होती थी। परन्तु शोक कि यदि हमारी रक्षा के लिये नये नगर में की बात यह थी कि पिता के झगडे पर वेटे भीत बनाई जाये तो हम वहा पा रहेगे। पति भी लडते थे। कभी यदि किसी पर दीप सो नया नगर भीत से घेरा गया और दो लगाया जाता था तब अपनी सफाई प्रगट हजार घराने उस में आगे रहे। करने के लिये अपने हाथ को उबलते हुए यो धीरे २ यह जगली लोग सुधारे गये। तेल में डालता था अथवा तप्त लोहे को हाथ सन १८२८ मे हाल साहिघ ने कहा कि मे लेता था। हाल साहिब ने उन्हे समझाया इन लोगो को इतनी उन्नति है कि अपनी कि इस से भला यह है कि सब दोपो पर तुम पुत्रियों को अब घात नही करते न अपनी पचाइत करो और जैसा जिस का अपराध हो स्वियो को बेच डालते है। आनशल लोग उस को दण्ड देना। | पहिले के समान पहाडो की चोटियों पर हल जोतनाविशेषकर उन लोगो में शिष्टाचार नही रहते बरन अपने सेता के समीप घर का द्वारा था। सन ई० १६६५ में डिकसन साहिब वा गाव बनाकर वहा कुशल से रहने लगे है हाल साहिब की सन्तो मे एजण्ट हुआ। उस और बटोही उन के अच्छे कपडे और हस- समय लोवहा कास्तकारी करना कठिन था। मुसो को देख से कहेगा कि शिष्टाचार पाने से कभी पानी बरसता कभी नही बरसता था और उन को बहुत सुख प्राप्त हुमा र यदि बरसे भी तो पहाडियो में शीघ्र बहके अच्छी बात होतो कि जिस मेम और हित नाता था परन्तु डिकसन साहिब से साधिय लोगो ने नगलो मायर लोगो को ने उन्हें समझाया कि कही २ वान्य नीचाना मलाई किई इतने हित और प्रेम से देश के में बनाकर उस पानी को रोक सकते और जमीन्दार लोग और राना और महाजन सूखे के समय में खेतो को सीध सकते हो अपने भाले हिन्दू भाइयों की भलाई घाइते । बरन साहिब ने कहा कि ऐसे बान्धो के बनाने के लिये मै पेशगी रुपये तुम्हे दूगा पार सुन्दर पदिनी का वर्णन । जव अन्न पैदा हो तब तुम इस पेशगी को लौटा देना। इस से बहुत लोग प्रसन्न हुए प्रार प्रनमेर पार मेडवारा की टक्सिन पश्चिम डमैती को त्यागकर कास्तकारी करने लगे। और मेयवार नाम एक राज्य है तो उदयपुर डिकसन साहिब का दूसरा उपाय यह था कि नाम से भी कहलाता है और राना लोग मानते वणिज व्यापार को उस देश में स्थापन करे क्योकि है कि समस्त राजपूत के राज्यों में यही उसम यदि लोग भन्न को उत्पन्न करे तो उसे बेचने भी पार प्राचीन है। यरन कहते है कि मुख्य यह क्याहो चला 17 हिन्दुस्तान देश की योषा । । - सूर्यवंशी येही राजा है। उस का महाराजा मरवा डालूगा । परन्तु राना ने न माना। उदयपुर का राना कहलाता है और कहते जब इस बात का सन्देश पदिनी के पास गढ हैं कि यह रामचन्द्र के घराने के है । जब मे पहुचा तब उस ने कहा कि मैं अपने पति मुसलमान हिन्द को रानाओ को जीतते थे के प्राण बचाने के लिये बादशाह के पास तो उदयपुर मुख्य करके उन का साम्हना नाऊगी । सो उस ने सन्देश भेजा कि मैं करता था और बड़ी घोरता से उन से लडता अपनी सहेलियो सहित वादशाह को छावनी था और वहा के लोग इस बात पर बहुत में आती हू । सो बहुतसी पालकिया तैयार फूलते है कि जैसा और राना लोग अपनी करके उस ने सहेलियों की सन्ती उन में हथि रानवान्याओ को मुसलमान बादशाहो को यारयन्द योद्धाओं को भर दिया और बाद विवाह में देते थे उदयपुर ने वैसा कभी न शाह ने इन सघ मालकियो को छावनी में किया बरन एक राना और उस को सुन्दर प्राने दिया। जब राना रानी से मिलने के पत्नी के विषय माज लों एक कहानी लिये पाया तब यह कपट के योद्धा पालकियों प्रसिद्ध है। से निकले और राना रानी को सग ले उन्हे कहानी यह है कि घिलनी घराने का नगर मे पहुंचाया। इस कपट से बादशाह अलाउद्दीन पहिला मुसलमान बादशाह था और भी क्रोधित हो दूसरी इस से बड़ी सेना जिस ने दक्खिन हिन्दुस्तान पर चढाई किई । लेके चढ आया और चित्तौर को फेर घेरा। यह बात सन ई० १२९४ में हुई। बादशाह ने राना फिर बहुत घिस्मित हुश्रा सुना कि विमसी नाम चित्तौर के राना की रात कोई स्वम मे उस पास पाया और कहा पद्विनी नाम रानी बहुतही सुन्दर है सो उस कि यदि राजघराने मे से बारह नन न मरे न राना पास या कहला भेजा कि पट्दिनो मुझे तो राज्य जायेगा । राना के बारह सूरबीर दो नही तो चित्तौर पर चढाई करूगा । राना लडके थे। उन्हो ने कहा कि मिता और बहुत घबडा गया परन्तु उस ने सोचा कि राज्य के बचाने के लिये हम प्राण देगे । सो चाहे राज्य जाये मै कभी रानी को न देऊगा। हर एक दिन एक राजकुमार मारा जाता बादशाह ने बडो सेना लेके चित्तौर को घेर था और पिछला ना राना का प्यारा पुष एक लिया तौभी वह उसे न ले सका । एक दिन बचा सो राना न चाहता था कि यह भी बादशाह ने राना को या कहला भेजा कि मै ना मारा जाये से उस ने कहा कि तुम भागकर रानी की प्रतिमा को दर्पण मे देसूं तो सन्तुप बच निकलो मै आप मगा। हाके चला जाऊंगा। ऐसाही किया गया और उस समय के राजपूत लोगो मे एक डरावनी जब बादशाह छावनी की ओर लौटा नाता रीति यह थी कि जब लडाई मे हार जाते थे था तब राना उस के पादरसन्मान करने को तब ऐसा न हो कि उन की स्त्रियां मुसलमानों फाटक के बाहर निकला बादशाह के सेवको के हाथ मे पडे सो वे पहिले अपनी समस्त ने कपट से राना को पकड लिया और वाद-स्त्रियो को घात करते और तब लडाई शाह ने जब देखा कि अब राना मेरे वश मे के मैदान मे दौड़के मरने तक लडते थे। है तब कहा कि पट्दिनी मुझे दे नही तो तुझे चित्तौर नगर के भीतर बडी, २ गुफाये धों क्योकि एक - ।।
हिन्दुस्तान देश की यात्रा। सो राना ने आज्ञा दिई कि इन गुफाओ में पनाब जो पाच नदिया से नाम पाता है प्राग लगाई जाय और तव उन मे सुन्दर आजकल हिन्दुस्तान का उत्तर पच्छिम भाग पनिनी और सैकडो और स्त्रिया भेजो - गई है। उस मे १६,000 वर्ग मील जमीन है सो चार गुफा के मुह घद किये गये और यह इतना बड़ा है जितना नार्थ वेष्ट प्राविन्सन सब स्त्रिया भयभर मृत्यु से मरी। राना अवघ के साथ है। उस के उत्तर और पच्छिम आप अपनी इच्छा से मार डाला गया और की सीमा पहाडिस्थान है। परन्तु पनाब तब फाटक खोल दिये गये और चित्तौर विशेषकर एक बड़ा मैदान है तो दक्खिन के सूरबीर लडते २ मर गये । जब बादशाह पच्छिम की ओर झुका हुआ है। वह पाच चित्तौर मे पहुच गया और जान गया कि नदियो से सोचा जाता है जो सब इण्डस मे सुन्दर पद्दिनो और और सब स्त्रिया मरकर मिल जाती है । निवासियों की गिन्ती मेरे हाथ से छूट गई तो बहुत क्रोधित हुआ २,१0,00,000 है। इस देश मे हिन्दो उर्दू और उस देश मे बहुत क्रूरता दिखाई । कहते भाषा कुछ बोलो जाती है परन्तु बहुधा लोग है कि उस दिन से लेके प्राज लो वह गुफे पनायी को जो हिन्दी से कुछ मिलती है वोला खोले नही गये बरन राजपूत लोग उन्हें करते है। जो अफगानी सीमा के समीप पवित्र स्थान समझते है। रहते है सो पश्तू को जो कावुल की वाली है बोला करते है। - पजाब का वर्णन। पजाव का इतिहास। प्रगट है कि जब प्रार्य लोग उत्तर से आकर हिन्दुस्तान मे पाये तो पहिले पजाय में उन का निवास हुप्रा । पोछे फारस के लोगो ने पजाब का कोई भाग अपने वश मे कर लिया। मसीह से पहिले ३२० वर्ष सिकन्दर प्राजमलो | मकदूनिया का राना था पनाय में पाया और पोरस महाराना से बडो लडाई धारके उसे जीत लिया। पारस उस युद्ध घायल किया गया और जब वह पकडा गया और सिकन्दर के आगे पहुचाया गया तप सिकन्दर ने पूछा कि मै तुम से कैसा सलक करू । तब पारस ने उत्तर दिया कि जैसा रामामा से करना योग्य है। इस उत्तर से सिकन्दर प्रसन्न छुपा और उसने राज्य का बडा भाग उसको लौटाके दे दिया। नय कि सिकन्दर के योद्धा । राधमीनार-दिल्ली।
हिन्दुस्तान देश की याचा। । ३॥ कहते थे कि हम आगे हिन्दुस्तान मे और का फल यह हुआ कि सिक्ख लोग सतलज नदी न बढेगे तय सिकन्दर ने झोलम नदी में के पार अपने देश में लोटाये गये। अंगरेजी नोका लगाके सेना को सवार किया और ने पंजाब का एक भाग अपने वश में कर उत्तर के मार्ग से फारस मे लौट गया । १00 लिया और दिलीपसिह नो रनीतसिह का बरस पीछे पनाब प्रसोका के हाथ मे जो वाद्ध- छोटा पुष था राना मान लिया गया । सन मतावलबी का 'मगध का राजा था आ गया । १८४८ में फिर युद्ध हुआ क्योंकि दो अगरेजी सत्रहवी ई० सदी मे मुसलमान लोग पनाव अध्यक्ष मुलतान मे कपट से मारे गये और मे चढाई करने लगे और धीरे समस्त देश तिस पर सिक्स लोगो ने उठके चाहा कि उन के बश मे आ गया । सन ई० १००५ में अपने अधिकार को फिर स्थापन करें। उन में गुरु गोबिन्द ने यह इच्छा किई कि मै समस्त और अगरेजो मे दो भारी लडाइया हुई निन सिक्ख लोगो को माना एक सेना बना रक्यू । का फल यह हुआ कि समस्त पजाब देश इस अर्थ से उस ने सिक्वमत को जैसा अब अगरेजो के वश मे पाया और महाराजा है स्थापन किया। रजीतसिह के दिनो मे दिलीपसिह को पिन्सन दिई गई। यह सन सिक्ख लोगो की सामर्थ्य अधिक हुई और १८५६ मे हुआ। सन १८५८ में दिल्ली पजाब जब रजीतसिह जो १०८० मे उत्पन्न हुआ के सग मिलाई गई और सब अधिकार एक उन का अध्यक्ष था तब अफगान के बादशाह लफटीनेण्ट गवर्नर के हाथ मे किया गया। उस ने उसे लाहौर का अध्यक्ष बनाया । उस ने ओर के कितने नगरी की चर्चा होगी निन सिक्लो मे से एक सेना बनाई और साहिव को बटोही उत्तर की ओर चलकर देखेगा। लोगो की सहायता से उन्हे रणशिक्षा भली भाति सिखाई। इस सेना के द्वारा से उस की सामर्थ्य यहां ला बढी कि समस्त पजाब दिल्ली का वर्णन और काश्मीर भी उस के वश में आ गया। वह सन ई० १८४८ मे मरा और उस का बेटा खड्ग दिल्ली यमुना नदी के पच्छिम तौर पर सिह पंजाब की गद्दी पर बैठा । एक साल के बनी है कलकत्ते से रेल पर सवार होके वह पोछे वह मर गया बरन लोग कहते है कि ५४ मील दूर ठहरती है। दिल्ली हिन्दुस्तान उसे विप खिलाया गया था। उस के मरने के बहुतही विख्यात नगरी में है और उस पर पंजाब मे बडी गडबडी हो गई क्योकि का बहुतही प्राचीन इतिहास पाया जाता राजा राजा से झगड़ा करते थे। अगरेज जो है । प्रगट है कि जब आर्य लोग उत्तर से योद्धाओं को सिखाते थे सो दूर किये गये हिन्दुस्तान मे आये तो उन के प्राचीन मुख्य और कोई सेना को बश मे न ला सका। वे नगरो मे यह एक है बरन जब वटोही दिल्ली बिल्कुल स्वाधीन हो गये । सन ई० १८४५ मे के मैदान में खड़ा होता तो प्राचीन नगरों के वडी सिक्लसेना ने अंगरेजो की जमीन मे खंडहर चारों ओर दूर लो दिखाई देते है। सक चढाई किई और उन में और अगरेजो की प्राचीन दिल्ली नगर इन्द्रप्रस्य नाम से प्रसिद्ध सेना मे चार बडी बडी लडाइया हुई जिन था । महाभारत में लिखा है कि माच - हिन्दुस्तान देश की यात्रा। पुरानी दिल्ली का फाटक। पाडव भाई नो गगा तीर के हस्तिनापुर नाम ने पृथुराज से लडकर उसे जीत लिया । नगर से आये थे सो इन्द्रप्रस्थ की नेव डालने थानेसर के मैदान में उस ने बडी क्रूरता हारे थे और युधिष्ठिर जो पहिला राना था प्युराज को घात किया । उन दिनों में दिल्ली उस के वश को तोस पोढ़ी दिल्ली की गद्दी पर कुतबुद्दीन के हाथ में छोड दिई गई यो पौर बैठो। दिल्ली नाम पहिली सदी के पोछे इति- वह पोछे बादशाह बन गया और उस ने हास में पाया जाता है। उस समय से बहुत दिल्ली को अपना मुख्य नगर बनाया। कुत- बर्षा लो हिन्दू राना वहा अधिकार रखते बुट्टोन जन्म से दास था परन्तु उस से दिल्ली थे। चौथो सदी में कहते है कि राना ध्रुव बहुत से बादशाह उत्पन्न हुए ने उस लोहे के सम को खड़ा किया जो पान के कितने बडे २ गृह उस ने बनवाये। एक लो कुतुध के पास खडा है जो ५० फुट उस का चिन्द वह स्तभ है नो दिल्ली से दस सदा १६ इच मोटा है। सन ई० ०३६ में मील दूर है और जो उस के नाम से कुतुब राजा अनगपाल ने दिल्ली को जो बहुत बरस मीनार कहलाता है। वह २३८ फुट मचा है से उजाड और सूनसान पडो थो फिर बनवाया यरन पहिले इस से मचा था क्योकि सन ई० और तामी उन दिनो में उस के अधिक १८०३ के भूचाल में उस का ऊपरवाला माग महाराजा लोग दिल्ली में नहीं धरन कन्नौज गिर पडा । कुतबुद्दीन के वश के पोछे वह में रहते थे । सन ई० ११८३ में महम्मद गोरी बादशाह पाये जो तुगलक कहलाते है। उन का के पार नगर 18
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हिन्दुस्तान देश की यात्रा।
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दिल्ली की घडो समशिद का फाटक ।
हिन्दुस्तान देश को याचा १ पहिला धादशाह गयामुद्दीन तुगलक नाम था अपनी इच्छानुसार बेधारे नगरवासियों को पर उसने वहा एक नगर तुगलकाबाद नाम का लूट मार करते रहे । कहते है कि दिल्ली की धनवाया। यह दिल्ली में चार मोल पूरब और है कितनी सडको मे मृतको की लाथे ढेर को ढेर परन्तु पीछे लोगो ने यह वस्ती छोड दिई । उस के हो गई यहा लो कि कोई उन में चल न पुष महम्मद तुगलक ने तीन बार चाहाकि दिल्ली सकता था। इतिहासरचक कहते है कि ऐसी के समस्त निवासियों को एक दकिसनी स्थान में क्रूरता कहीं दिखाई न गई कि मृतको के तो देवगिरी नाम से प्रसिद्ध है ले पहुधा कटे हुए मस्तको से ऊचे सभ उठाये गये और सन १३८८ मे तैमूरलग को प्रसिद्ध चढाई। उन के घड चोल्हो और गोदडो फो खिलाये - - - रामा ध्रुध का लोहे का सभा । हिन्दुस्तान मे हुई । उस ने दिल्ली की भोता गये । वे नगर को न केवल लूटते बरन भस्म के साम्हने महम्मद तुगलक से लडाई थिई भी करते थे पार लो निवासी बच गये सो और उसे जीतकर दिल्ली को अपने घश में दास और दासी होने के लिये बेचे गये यहां कर लिया। पांच दिन लो तैमूर ने अपने सेना- लो कि समस्त नगर उनाड किया गया। पतियो को घडे सभालन में खिलाया पिलाया सन १५२६ ई0 में बायर जो तैमूर से छठवीं और इसने दिन लो उस के क्रूर योद्धा लोग पीढी का था से पानीपत को लडाई में ७२ हिन्दुस्तान देश को यात्रा। है । . इब्राहीम लोदो से लड़ा और उसे जीत लिया और दिल्ली को अपने वश मे कर लिया परन्तु उस ने आगरा को अपना । मुख्य नगर बनाया । उस का पुष हुमायू दिल्ली से अधिक प्रसन्न हुआ और उसका मकबरा मान लो देखने योग्य है। अकबर और जहागीर वादशाह नो घे सो दिल्ली मे नही घरन आगरा लाहार और अजमेर में अधिक रहा करते थे शाह- नहा ने दिल्ली को ऐसा बनाया जैसा , आजकल दिखाई देती है। और उस को अब की भीतों से घेर लिया। जुमान मसजिद और बड़ा भवन जो अब है सो भी उसके बनाये चांदनी चौक-दिल्ली। दुमाय का मकबरा-दिल्ली । -- सन ई० १९३६ मे नादिरशाह ने जो फारस फारसी लोगों को मारने लगे तिस पर नादिर. का बादशाह था मोगल बादशाह को जीत शाह ने ऐसे स्थान में सडा होके नहां से बड़ी लिया और दिल्ली को उस के हाथ से ले लिया। सड़कों को देख सके योद्धाओ को माज्ञा दिई दो दिन पोछे यह झूठ बात लोगो मे फैल कि सब नगरवासियों को मार डालो और गई कि नादिरशाह मर गया है से नगरबासी एक ही दिन मे ३०,000 पुरुप स्विया बालक ०३ हिन्दुस्तान देश की यात्रा । टुकड़े,२ किये गये । ५८ दिन लो नादिरशाह दिल्ली मे बड़ा दरबार किया गया जिस में के योद्धा लोग नगर के घरो को लूटते रहे। महारानी विकोरिया का नाम इम्प्रेस आफ कितने लोग कहते है कि उन्हो ने ६,00,00,000 इण्डिया मशहूर किया गया । रुपये की साममो लूट लिई । दूसरे लोग दिल्ली के गली कूचे तग है परन्तु घर कहते है कि यह नही वरन ३0,00,00,000 बहुधा ईट से अच्छे बने है और दो तीन रुपये की हानि हुई । उस समय ताऊसी सडके जिन मे लेन देन और पाना नाना सिहासन जो अद्भुत रीति रत्तो से विभूपित अधिक है अच्छी और चौडी है। इन में चादनी था फारस में पहुचाया गया। पिछली सदी चौक प्रसिद्ध है जिस के बीच मे वृक्ष लगे हुए है के तेरहवे वरस के बीच में अफगानी लोगो जैसा कि ०२ पृष्ठ की तसवीर मे देखने मे पाता की पाच चढाइया हुई जिन मे भयंकर रीति है। दिल्ली का गढ बहुत मनभावन है। उस में से दिल्ली निवासियो पर बडी क्रूरता दिखाई कितने गृह है जो तराशे हुए पत्थरो और रत्नो गई । एक समय दिल्ली के फाटक अफगान से विभूपित हो देखने योग्य है। इन मे दीवान की सेना के लिये खोल दिये गये और वे मित्रो खास बहुत सुन्दर है बरन घनानेहारो ने उस को रीति पर ग्रहण किये गये परन्तु महीना की भीतो पर ऐसा बचन लिख दिया कि यदि भर सेनावाले अपनी इच्छानुसार नगर में लूट ससार भर में फिरदौस हो तो यही है । सत्य मार करते रहे और इतने में अफगानियो के यही है परन्तु के बहुत से रहनेहारो को घुडचढ़े दिहात मे फिरा करते थे और बहुत वह स्थान फिरदौस अर्थात बैकुठ न ठहरा। से गाव को फूकते और निवासियों को घात बडी मसजिद के बराबर हिन्दुस्तान भर में करते थे। एक विशेष प्रानन्द उन का यह कोई दूसरी मसजिद न होगी। वह बहुत बड़ी था कि हिन्दुओं के पविषस्थानो को गाय का और संगमरमर और लाल पत्थर से बनी रक्त छिड़कके अशुद्ध करते थे। है और ऊचे पर है और उस में चढने के सन १०८८ ई० में दिल्ली मरहठा लोगो के लिये पत्यर की घडी और चौडो सीढिया वश में आई बरन मोगलो का बादशाह बनाई गई है। दिल्ली से दो मील दूर पर हुमायू सिन्धिया के हाथ में कैदी के समान रहा परन्तु का मकबरा देखने योग्य है । वह ताजमहल सन ई० १८०३ मे अगरेजो ने दिल्ली को ले लिया के समान एक बडी बारी के बीच में राडा है। और मरहठा लोगो को दूर किया। उस समय दिल्ली के लोग गिन्ती में १,६३,000 है। से ५०. बरस लो नगर मे बडा चैन रहा परन्तु ईपइण्डियन रेलवे एक बडे लोहे के सन ई० १८५२ मे उन सिपाहियों ने जिन्हो ने द्वारा से जमुना पार जाती है और दिल्ली में मेरठ में बलवा किया था दिल्ली मे प्रवेश किया प्रवेश करतो हे घरन कई एक और रेलये दिल्ली पातिवं नितने अगरेन नगर में थे पुरुप स्वी में मिलती हैं। वहा एक विशेष कारीगरी बालक मारे गये। दो तीन महीने के पीछे बूटेदारी है अर्थात सोना चान्दी से सुन्दर दिल्ली सरकार गरेन के वश मे फिर पाई और चमकीला यस्व यनाना है । मोगली के राज्य मोगल यादशाह जिस ने सरकार से वैर किया के जाते रहने से यह काम कम किया जाता धा रडून में भेजा गया। सन १८०० ई० में है परन्तु उस की सन्तो में नये २ उदयोग उस - ។ - - 10 खींचते है। - हिन्दुस्तान देश की यात्रा । उत्पन्न होते जाते है और कितनी रीति से अम्बाला से ३० मोल दूर है ना पहुंचता और बगर की उन्नति होती जाती है। यह पहाड़ के बगल मे है। यदि यात्री पुराने दिल्ली से ६० मोल उत्तर और पानीपत मार्ग से चले तो शिमला कालका से ४0 मील म एक बहुत प्राचीन स्थान है। कहते है दूर है परन्तु वह मार्ग ऐसा ऊंचा नीचा है के जब युधिष्ठिर और दुर्योधन लडाई करते कि उस में गाड़िया नही चल सकती। अाजकल ये तो उस ने यह पत अर्थात स्थान दुर्योधन ५० मील लयो एक नई सड़क बनी है निस से मांगा । पानीपत के मैदान मे तीन मे तांगा नाम गाडी चल सकती है यह एक बार बड़ी लड़ाइया हुई जिन के कारण इलको दो पहिये को गाडी है जिस को दी से उत्तर हिन्दुस्तान का राज्य जीतनेहारे टट्टू को मिला। पानीपत से २५ मील उत्तर पच्छिम और थानेसर नामएकवस्ती सरस्वती नदी के तट पर बनो है। हिन्दुस्तान के सब से प्राचीन नगरो मे एक यही है। महाभारत की कहानियो मे उस का नाम कई बार मिलता है बरन कुरु- क्षेत्र का मैदान जो महाभारत में प्रसिद्ध है इस बस्ती के समीप है। सन ई० १००१ मे महमूद गजनयी ने एक बार इस स्थान पर चढाई किई। वहां का एक ताल विख्यात है लिस में स्नान करने के लिये याधी दूर से भाते है बरन हिन्दुओं में यह कहानी प्रचलित है कि जब सूर्यग्रहण होता है तो समस्त और पवित्र तालों का जल इस ताल में आकर शरणागत होता है सो नाकाई ऐसे समय में यहा स्नान करे तो मानो उसी क्षण मे समस्त तीर्था में सान कर चुकता है और कौन সুল कर सकता कि इस एक-सान पुण्य कहां ली उत्पन्न इतिा है। अम्बाला एक बड़ी छावनी ई.जो, सन ई० शिमला पहाड़ को पुरानो सडक । १८१३ में सरकार अंगरेज के हाथ में पाई। सन १८१६ ई० में एक साहिब ने पहिले उस में और दिल्ली में १३६ मील की रेल.बनी उसे स्थान में नो अब शिमला नाम, से प्रसिद्ध है। यह वह स्थान है जहा यात्री रेलवे को है एक घर बनाया। उस समय से बहुत से छोड़कर शिमला पहाड़ की और नाता है। घर वहा बन्ने लगे । सन १८२० ई0 में लार्ड वडाकगाड़ी में सवार होके कालका में जो एमहर्ट साहिब कई महीने ली वहां रहे प्रताप - 1 हिन्दुस्तान देश की यात्रा । ०५ और लार्ड लारन्स के दिनो से लेके अब लो सरकार अगरेज के हाथ में आया लुधियाना वह छ महीने लो हिन्दुस्तान का मुख्य सरकार की बडी छावनी था क्योंकि सीमा नगर ठहरता है। के पास था और सिक्ख लोगो और सर- शिमला 0,000 फुट ऊंचा है कारी सेना में कितनी भारो लडाइया लुधि- बरसात मे बहुत पानी घरसता और बहुत याना के समीप किई गई । लुधियाना से ३२ बादल घरी पर पडे रहते है। वहा से मोल आगे बढकर जलघर नाम एक बड़ी हिमालय के बड़े २ पर्बत कम दिखाते है शवनो है और उस से ५२ मोल आगे बढके परन्तु यदि कोई समीप के पहाडी पर चढे अमृतसर है जो सिक्ख लोगो का पविध तीर्थ तो श्वेत चोटियां भलो भाति दिखाई देती है। स्थान है। अम्बाला से यदि याघी रेल पर सवार शिमला पहाट. - होके उत्तर पच्छिम और चले तो लुधियाना सिपल लोगो का दर्शन । शहर मिलेगा जिस में नाना प्रकार के अच्छे बहुत दिनो तक सिक्ख लोग मायके कपडे धनते है उस से पहिले जप मनाथ देश अधिकारी रहे। सिक्ख शब्द का अर्थ शिष्य हिन्दुस्तान देश की याचा। 1 अधात चला है क्योकि यह लोग विशेषकर लडनेहारे सन्तान हो जाये। उस ने नाति के अपने गुरुग्री को माना करते थे । नान्हक भेद मान्ने को वर्जित किया और लोगो को जिस ने इस मत को प्रारभ किया सा सन समझाया कि अपने नाम में सिह शब्द नाड़ ई० १४६मे लाहौर के समीप उत्पन्न हुमादे पर लवे केश रक्खे और तरवार' वाघे उस का मत विशेषकर कबीर की शिक्षा से फिरे । गोविन्ट के दिन भगडी में कटे और निकाला गया। वे दोना यह विचार करते थे पीछे किसी ने उस को कपट से घात किया। कि जब हिन्दू मुसलमान एक संग रहते है पटना नगर में एक मदिर उस के नाम से तो चाहिये कि उन का एक मत हो जाये । वना है । जव गोविन्द बूढ़ा हुआ और लोग वह सोचता था कि उस मत की नड़वाली कहते थे कि बताओ तो कि पाप के पीछे बात यह हो सकती है कि दोनों सन्तान गुरु कौन होगा तो उस ने उत्तर दिया कि"- एक ही परमेश्वर को भने परन्तु सत्य पूछो नधी मेरे मरने पर गन्य साहिय आप तुम्हारा तो नान्हक यह नहीं मानता था कि परमेश्वर गुरु होगा जो कुछ बूझने चाहते हो उस एक है बरन यह मानता था कि वह सब पुस्तक से पूछना और वही तुम्हें बतायेगी। कुछ । वह यह सिखाता था कि इरी नाम अब थोडे दिन हुए कि ट्रम्प साहिय ने आदि जपने से मुक्ति मिलती है और कि वह और अन्य को अगरेजी भाषा में उल्था किया परन्तु किसी द्वारा से न मिलेगी। नान्हक इधर उधर वह पुस्तक पढने मे अच्छी नहीं है क्योकि बहुत यात्रा करता था बरन लोग उस के विषय एक ही बात बार २ दूसरे शब्दों में लिखकर अद्भुत प्रकार की कहानियां कहा करते थे । दोहराई जाता है और पढ़नेहारा थक जाता वे कहते थे कि जब वह चाहता था तब हवा है । सिक्ख लोग इस बात पर फूलते है कि में चिडियों के समान उड़ सकता था और हिन्दुओ के समान हम मूर्तिपूना नही करते जब किसी स्थान मे जाने चाहता था तब उस है । परन्तु सत्य पूछो तो मन्थ की पुस्तक उन स्थान को अपने पास बुला सकता था। यह को मूर्ति है । जैसा हिन्दू अपनी मूर्ती से करते भी कहते है कि एक बार मक्का में जाकर इज्ज है वैसे वे मन्थ को पहिनाते और सुलाते किया और जब वहां था तब रात को काबा और पंखा करते और सब बातों में ऐसा करते की और पैर फैलाके से गया। किसी ने उसे है जैसा हिन्दू कृष्ण की मूर्ति से करते है। निन्दा करके जगाया कि अरे दुष्ट क्या उस सिक्ख लोग जाति के भेद को मानते है और स्थान की ओर जहां ईश्वर है तू अनादर से हिन्दू रीति व्यवहारो पर चलते है सो गुरुओ पाव फैलाता है। वह बोला बता दो भाई को शिक्षा बहुत बातों में व्यर्थ ठहरी है वरन कि ईश्वर किधर नहीं है, और मैं उघर को बहुत मिथ्या बाता में जैसा कि गाय के पूजने पांव फैलाऊंगा। में हिन्दुओं से अधिक मूर्सता उन में पाई जाती सन ई० १५३६ में जब 90 बरस की अवस्था है। पंजाब में ऐसे दिन हुए जिन में अपनी पुत्री में था तब नान्हक'मर गया परन्तु उस के का घात करना छोटा पाप और गाय को पोछे सिक्ख लोगों के बहुत गुरु उठे। गोविन्द घात करना महापाप समझा जाता था। इस ने जो दसवां गुरु था चाहा कि सिक्ख लोग का कारण यह था कि गाय के विषय उन में । 1 . - - 09 - हिन्दुस्तान देश की यात्रा। और मुसलमानो मे बडा झगडा रहता था और उस बडे ताल को खुदवाया जिस से नगर और मुसलमान जप कभी उन को अवसर का नाम विरयात है और ताल के बीच में मिलता तो हिन्दुओं पर विजय करके अपने मदिर भी बनवाने लगा जो उस के बेटे से विनय के प्रगट करने के हेतु बहा गायों को समाप्त हुआ। सन ई० १०६२ मे अफगानियो घात करते थे। और सिक्ख लोग हस्से क्रोधित और सिक्ख लोगो मे बडी लडाई हुई जिस हो सब उन्हें विनय मिलता था तो मुसल- मे अफगानियो को विजय प्राप्त हुआ सो उन्हो मानो को मसजिदो में सुपरो को बघ करते ने अमृतसर नगर को उजाड दिया और थे। नान्हक की इच्छा यह थी कि हिन्दू और बारूद लगाकर मदिर को गिरा दिया और मुसलमान एक हो जाये परन्तु प्रान लो ताल को मिट्टी से भर दिया और पवित्रस्थान पलाय मे उन मे बडा बैर रहता है। सिक्व को गाय के रक्त से अशुद्ध किया । पोछे सिक्व लोगों में एक बात यह है कि मद पीना लोगो ने उस नगर को फिर बनवाया और वर्जित नही है परन्तु कोई तमा न पीये सन ई० १८०२ में वह स्थान रजीतसिह के नहीं तो उस का समस्त पुण्य प्रताप जाता हाथ में पाया उस ने उस का बडा प्रादर- रहेगा । सिक्ख लोगो में एक बुरा मत यह है सन्मान किया और मदिर पर बहुत रुपये जो प्रकाली नाम से प्रसिद्ध है वे कहते है, लगाये । उस ने उस की छत पर ऐसे ताबे के कि हम निष्काल ईश्वर को भनते है और पत्र लगाये निन के ऊपर सोने का मुलम्मा किया कि हमें उचित है कि अपने मत के वैरिया हुआ था जिस से मदिर धूप में चमकता है को मार डाले । वे ऊची पगडी बाधते है और इस से उस का नाम सोन्हला मदिर जिन में स्यात के चक्र लगे रहते है। विस्यात भी हुा । उस ने गोविन्दघर नाम सिक्व लोगो की गिन्ती १८,00,000 है। नगर के समीप एक बडा गढ भी बनवाया । उन के समान अगरेज किसी सूरघोर सन्तान अमृतसर का सोन्हला मदिर देखने योग्य से हिन्दुस्तान मे न लडे परन्तु पानकल वे, है । नीचे वह श्वेत सगमरमर का बना और सरकार की बड़ी मित्रता करते है और बलवे ताजमहल के समान रतो से सवारा हुआ है। के दिनो मे उन्हो ने सरकार की बड़ी उस में इस प्रकार की पूजा हुमा करती है सहायता किई। कि भीतर की घडी कोठरी मे गुरु जी बैठते है और मन्थ की पुस्तक उस के पागे सुली रहा करती है जिस मे से गुरु और उस के अमृतसर का वर्णन । सहायक बाजाओ के सहित गाके सुनाते है लाहौर को छोडके अमृतसर पनाब का और पुजेरी उन के सन्मुख प्रा उन के साम्हने सब से बड़ा नगर है। वह रावी और दान दक्षिणा डाला करते और तय प्रणाम व्यास नदी के बीच में बना है। प्रकवर कर चले जाते है क्योकि यन्य को पुस्तक वादशाह ने रामदास को जो सिक्स लोग पूज्यवस्तु सममो नाती है। अमृतसर के गली का चौथा गुरु था यहा नगर बनाने के लिये कूचे टेढे तिरछे और तग है परन्तु पानकल जमोन दिह । उस ने नगर को नेव डाली कुछ सुधारे गये है। अमृतसर में लेन देन + , । 20 C हिन्दुस्तान देश को यात्रा। है और और व्यापार बहुत बहुत काश्मीरी नगर के गृहो में अलिकानड्रा' नाम लड़कियों लोग जो उस में रहते दुशाले बनाते है । की पाठशाला अच्छी है। १ लाहौर का वर्णन। -- । - लाहौर नगर । अमृतसर से ३२ मील और पागे बढके गृह वहा बनवा दिये परन्तु पीछे वैरिया की लाहार नगर देखने में आता है । यह पजाब चढाइयो मे नगर वो सुन्दरता जाती रही का मुख्य नगर पौर रावी नदो से मील भर वह माना ईटो का ढेर हो गया जिन के धीच दूर है। इस स्थान के अदल बदल बहुत हो मे सिक्ख लोगो के दो कोट बने रहे और चुके है। तीन सौ बरस ला वह माना महम्म- बाहर चारो ओर तोडे हुए घरो के चिन्ह दियो को चढाइयों के रोकने के लिये दृढ दिखाई देते थे। रजीतसिह के दिनो मे लाहौर गढ था परन्तु दसवी सदी के अन्त में सुध- की उन्नति हुई परन्तु उस ने मुसलमानो के कतगीन ने जो गननी का सुलतान था जैपाल मकबरी से पत्थर निकलवाकर अमृतसर के नाम लाहौर के महाराजा को जीत लिया मदिर को धनवाया । रनोतसिह का धौरहरा सा जैपाल ने निरास हो अपने को प्राग से अच्छा बना है । उस में हिन्दू और महम्मदी भस्म किया। सालादार गजनी सुलतानो का दोना प्रकार की बनावट दिखाई देती है। मुख्य नगर हो गया पोछे मोगलों के बादशाह धौरहरा के बीच मे सिक्व मत को पोथी वहा रहने से प्रसन्न हुए। अकबर जहागीर रक्सी हुई है। ग्यारह मट्टी के चौरे है जिन शाहजहा औरगजेब क्रम २ करके कुछ में रंजीतसिह को ग्यारह रानियो की राख दिन ला वहा रहे और एक २ ने अच्छं २ रक्लो हुई है जो कि रमीतसिह के लिये सतो % 34 - - हिन्दुस्तान देश को यात्रा 6 परन्तु मागलों के समय के बहुत अच्छे २ गृह दिखाई देते है और उन को छोड पजाब यूनी वर्सिटी मेयो हास- पिटल और रेलवे का टेशनघर पाल- कल के बनाये अच्छे गृह है। लोगों की गिन्ती १,००,000 है यह अमृतसर की गिन्ती से कुछ बडो लाहार से घोडी दूर मिया- मीर नाम अगरेजो को बडो छावनी है। 'सातारक महाराज का भयन । कागहा का बर्यान । " पजाब देश के उत्तर पूरय कोने में कागडा नाम एक पहाडिस्तान है नो हिमालय के उम पार अर्थात सियत लो पहुचता है। पूर्वकाल में यह राजपूत राजानी के राज्य TAMAULI का एक भाग धा। थों । नगर में घर कचे और सड़के तंग कांगडा गढ़ जो एक अलग पहाडी को चोटो पर और इस कारण से सडक अच्छी नहीं है |यना या जैसा अगले पृष्ठ के चित्र में दिखाई देता । जलघर के . -- ८२ हिन्दुस्तान देश की याया। - । - । उस नोचान पार करके । के कारण से पानी में एक जोखिममय भवर जो अकबर बादशाह के दिनों में उन की चो. उठता रहता है। ये दो चटान कमलिया और टिया पर से गिराये गये थे परन्तु जब से रेल का जलालिया दो नास्तिको के नामों से कहलाते है पुल बना है तब से नदी पार चलना सहन है। अटक से ४६ मील बढके पेशावर नगर मिलता हैजा काबुल नदो के नीचान में चना के पच्छिम सिरे पर सैबर नाम वह दुर्ग मार्ग है जिस के द्वारा से लोग पहाडों को काबुल जाया करते है। पूर्व वाले सिरे पर सिन्ध नदी है। यह नीचान स्वाधीन पठानी वा अफगानी सन्तान से घिरा हुमा है जो वहा के निवासियो को बहुत कष्ट दिया करते है। पेशावर में अगणित लड़ाइया हो चुको जिन का यहा वर्णन करना अवश्य नही है। सन १८१८ ईसवी मे सिक्व लोगो ने इस नमोन को पहाड़ो तक अपने वश मे कर लिया और कितने बर्ष पोछे वे उसे बसाने लगे।सनईसवी १८४८ मे वह अगरेजो के हाथ मे आई। पेशावर नगर। साता
हिन्दुस्तान देश की यात्रा ।
३
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अलीमसविट र दुगमार्ग में ।
पेशावर नगर में घर बनाने का यह दस्तूर उठाते है और पोछे उन को छोटी २ ईटी
है कि पहिले लकडी के चौखटे की भीते वा मट्टी से भर देते है। गली कूचे घवधा
हिन्दुस्तान देश की यात्रा . में एक बहुत - । गये है। लदाख देश के निवासी और सतान देख पडते है। उनका चीनवाला का सा है। पानकल काश्मीरवासियो को भूचालो से बहुत दुःख पहुंचा है। काश्मीर के निचान प्राचीन हिन्दू राज्य था। वह इस बात मे विख्यात था कि यह अकेला हिन्दू राज्य या लिस का पूर्वकाल का लिखा हुपा इतिहास पाया जाता है। चौदहवीं सदी मे मुसलमानों का राज्य यहा स्थापित किया गया। सन ई० १०५२ में अहमदशाह नकाश्मीर को जीत लिया और वंहासन . १८१९ तक अफगानी 13 लोगाके वश में रहातष सिक्ख लोगों के वश में पायाला अगरेजों से सिक्ख लोगों की लड़ाई हुई तब ५ लास रुपये के देने पर काश्मीर गुलाब सिंह के हाथ में स्थिर किया गया। शेते है। वहा से पाकर कितने काश्मोरी काश्मीर के राज्य मे बहुत उपद्रव रहता था। ब्राह्मण हिन्दुस्तान के बहुत नगरो में बस महाराजा हिन्दू घे और देश के निवासी प्रथा शाश्वमादा को मसविद-धीनगर 1- - ३
हिन्दुस्तान दे की याया।
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हम्मदो। सो प्रना को नाना प्रकार का दु ख तट पर वह है। वहा आठ स्तभवाला पुल
हुंचता था । पिछले राना के मन मे यह पाया धना है जिस के द्वारा याची मोलम के
के. मेरा पिता मछली का जन्म ले चुका है सो पार जा सकता है जैसा इस घिन मे देसने
स ने मछलियों का पकडना बनित किया में प्राता है।
सा न हो, कि कोई. पिता को खा नाय ।
[ब वह राजा मरा और दूसरा गद्दी पर।
ठा तब भी देश की बुरी दशा रही यहा
सिन्ध देश को यात्रा।
in कि सकार ने कुछ दिन लो राज्य कार्य लाहौर में लोटकर यापी रेलगाडी" में
कसी प्रतिनिधि के हाथ में सौप दिया । सवार होके मुलतान नगर को ना ३१० मील
FA
धारामता मोर मोसम नदी।
धारामला उस नगर का नाम है, जो वहा दर है जा सकता है । यह पति प्राचीन
वना देना झीलम नदी पहाडों के बीच में नगर है। सिकन्दर महान ने में घेर लिया
से पहले निधान को ोड देती है। ऊचे २ पार कठिन लडाई करके उसे वश में लाया
पहाड पास है और न के नीचे नदो के परन्तु उस युद्ध में पाप घायल हो गया।
to हिन्दुस्तान देश की यात्रा। 1 . बहुधा खेती बारी करते है। बस्तियों मे बहुत सिन्धो लोग एक ऊंची अद्भुत रूप की टोमो से हिन्दू लोग बाणित व्यापार करते है। बहुत पहिनते हैं।' ऊपरवाले सिन्ध मे एक स्थान ३ + जहां सिन्ध नदी चटानों में कटे हुए दो सकर मार्ग बहती है। बीच में एक टापू है जिस पर भक्कर नाम एक गढ़ बनाई। पछि वाले सीर पर सकर नाम बस्ती बनी और पूरबवाले तीर पर रोडो नगर है। इस स्थान में नदी पर रेलगाडो के पार उतरने के लिये एक अच्छा पुल बना है। 'सक्कर । के। प्रागे रुक नाम एक गाव है नहा से दूसरी रेलवे पारम्भ हुई है जो बलूचिस्तान के केटा नगर अर्थात् १५६ मील दूर तक बनी है। यह रेल बालन नाम मसिद्ध दुर्ग मार्ग के द्वारा से पहाडोके उस पार पहुचाई जाती है। घोलन का दुर्गमार्ग ६० मील लषा. घोलन दुर्गमार्ग। । , । ~ . P - प - ४ नगर में हिन्दुस्तान देश की यात्रा और कितने स्याना में इतना सकरा है,कि हुमायू यहा होके कावुल को नाता था तब तीन चार सवार कठिनता से एक संग चल उस का बेटा जो पीछे अकबर बादशाह सकते है। परन्तु जब वहां को नदी में बाढ प्रसिद्ध हुआ यहा उत्पन्न हुआ। बढ़सो सब मार्ग बन्द हो जाता है। दुर्गमार्ग सिन्ध को दक्षिण पूरव और कच्छ नाम एक को सबसे बड़ी ऊचाई ८५०० फुट है और लवी धनुष प्राकार जमीन है और उस मे ऐसा न हो कि कोई वैरी, इस मार्ग के द्वारा और सिन्ध के बीच मे एक लवी खारे पानी उत्तर से प्राधे सकार ने सन १८७६ में केटा की झील है जिस को लोग कच्छ का महारण्य में छावनी बनाई तब से यहां की दशा कुछ कहते है। कच्छ की जमीन बहुत ऊसर। और अच्छी हो गई। बटाहो तो इस मार्ग से चलते निष्फल है। पहाडिया की दो पातिया पूर्व है से अधिक रक्षापाते है और लेनदेन अधिक से पच्छिम लो उस में है। उस देश में नगलो बढ़ता जाता है। गदहे बहुत पाये जाते और घोडे बहुत पाले जब याची में जहाज पर सवार हो जाते है। कच्छ का महाराजा राव नाम से चार २२५ मील समुद्र की ओर चले तो कतरी प्रसिद्ध है और उस के अघोन २00 सदार है। पहुचता है और वहा से रेलवे दक्खिन भुल नाम मुख्य नगर देश के बीच में है। पच्छिम को पार कराची लो बनी है। कतरी सन ईसवी १८१६ मे एक बडा भूचाल वहा से तीन मील दूर नदी पार एक पथरीली हुआ कि जिस से भुज बहुत उलट गया और पहाडो उस पर हैदराबाद नगर बना है | वहा बालू का एक धडा ढेर उठ गया जिस जो पहिले अमीर लोगो का मुख्य नगर था। को वहा के लोग अल्लाहबाघ नाम देते है। वहा के सुन्दर वर्तन और बूट काढे कौशाम्बर समीप की एक जमीन उस समय बैठ गई और के कपड़े प्रसिद्ध है । वह वह बडे २ बर्तन बडो झोल बन गई। भी बनाये जाते है जिन्हें इण्डस नदी के वह रन जिस की चर्चा ऊपर हुई एक मछुवे नाल के पार घेड़े के सभालने लिये बालूमय निधान है जिस पर समुद्र का जल काम में लाते है। बरसात मे घढ जाता है और दूसरे समयो कराची नो पच्छिम सीमा पर बना है में नल सूख जाता और जमीन पर लोन हो सिन्ध देश का सबसे बडा नगर है। पान-माता है इस कारण से वह अरण्य अर्थात कल सकार के यने से उस का बहुत अच्छा मरभूमि कहलाती है। रन में कितने टापू कोल बन गया है और पंजाब का अधिक पाये जाते है परन्तु जगली गदहो और लेन देन जो और देशो से होता कराची मक्खियो को छोड कोई जीव वहा नही के द्वारा किया जाता है। पूर्वकाल की अपेक्षा रहता। कच्छ देश की पूर्वी सीमा पर सक अब नगर को बड़ी उति है। समुद्र के और छोटा रन पाया जाता है। समीप होने से यहा गर्मी कम होती है। सिन्ध की दक्षिण पूरब भार एक घडा सा हैदराबाद की पूरन और वन पहाडियों के प्रायद्वीप है लिस का नाम पूर्वकाल में सुरक्षा समीप नोमामि को सीमा पर है अमरकोट था और मालकल काठियावार है जिसमें नाम एक बस्ती है। सन ईसवी १५४२ मे जब दो धार तीर्थस्थान पाये जाते है। द्वारिका - -- - - २ हिन्दुस्तान देश की यात्रा - ना उत्तर पच्छिम के कोने पर है वह स्थान दर्शन करने के लिये हजारो यायो इरसा है जहा कहते है कि कृष्ण कुछ दिन तक रहा जाया करते है। इस पहाड के समीप पलि था और सोमनाथ नाम एक प्रसिद्ध मन्दिर ताना नाम एक नगर भी है। है जो दक्षिण के समुद् तीर पर बना है निस 'काठियावार देंश १८० अलग राज्या के समीप कृष्ण मरा था और उस को लोथ फूकी बाटा गया है जिन मे से ६६ अगरेजी में गई थी। सन १०२५ ईसवी में महमूद गजनवी अमलदारी मे है और 50 बडोदा के गायकवा ने सेना सहित पाकर इस मन्दिर को लूट को कर देते है और बाकी जो है सो कु लिया । सोमनाथ को उत्तर और एक जगलो कर नहीं देते है। सारो के लडको के पढा पहाडिस्तान है जिस का गिर नाम है। एक के लिये एक राजकुमार कालिन उस देश पहाडो गिरनार कहलाती है उस के बगल बना है। उस मे भाव नगर सब से बलवन ऐसे पत्थर मिलते है जिन पर सन २५० मसीह राज्य है और उस में राज्यकार्य भी भले से पहिले असाका बादशाह ने अपनी प्राज्ञाये भाति किये जाते है और हिन्द के देशी राज्ये लिखवाई। गिरनार जैन मतवालो का विख्यात मे यही पहिला था जिस ने राज्य के रुपयो तीर्थस्थान है और उस पहाडी की चोटो पर एक रेलवे बनवाई। वहा के कितने और राजा कितने सुन्दर मन्दिर उस मत के बने है। लोग प्रजा के सुख को अधिक चिन्ता करते हैं इस के पच्छिम और शत्रुजय पहाड है जहा याघी भाव नगर के पास नहाल पर सवार होके अगणित जैन मन्दिर बने है और जिस के समुद्र के मार्ग से बम्बई मे पहुच सकता है। - 7 - बम्बई प्रेसीडेन्सी का वर्णन । - . - पाईका कॉल हिन्दुस्तान देश की यात्रा -- - बहुत लकड़ी बम्बई प्रेसिडेन्सी मे सिन्ध देश का बडा पच्छिमा घाट के समाप बहुत पानी बरसा भाग है । वह एक लम्बा देश है जो समुद्र तीर करता है। वहा के खेतो मे गेहू और सई वहा से दक्षिण पार फैला हुआ है। उसकी पूर्थी अधिक उत्पन्न होता है। समुद्र तोर पर नारि- सोमा ये है मैसूर और निजाम का राज्य और यल के वृक्ष बहुत है। पहाडी में वृक्ष के हिन्द के बीचवाले राज्य । वह मन्दरान को महायन है जहा से साख पादि प्रेसिडेन्सी से कुछ छोटी है अर्थात उस मे प्राप्त होती है। बबई प्रेसिडेन्सी में तीन १,२४,000 वर्ग मील जमीन है और उस मे भाषाये प्रचलित है अर्थात कबई के समुद्र १,६०,00,000 निवासी है। फिर बम्बई की के पास गुजराती और बीच में मराठो पार धमलदारी में कितने देशी राज्य है जिन मे दक्षिण मे कनारी। लोग बघा हिन्दूधर्म 98,000 वर्ग मील जमीन और अस्सी लाख को मानते है पर पाच निवासियों में एक निवासी है। वह जमीन जो समुद्र तीर पर मुहम्मदी है और जैन और पार्टी और मसीहो बहुत कंची नीची और असम है और उस भी है। बबई प्रेसिडेन्सी का अध्यक्ष गवर्नर में और दक्षिण की ऊची जमीन में पहाडी कहलाता है और दो राजसभा राज्यकार्य में की वही पाति जो पछिमी घाट कछलासी उस को सहायता करती है। है पाई जाती है। धम्बई के उत्तरवाले भागो में चार नदियां बहती और कम्बई के समुद्र मैं जा गिरती है यह सब रायती पार माही बम्बई के इतिहास का एत्तान्त । चौर सापती और नर्वदा नदिया है। सन ई० १५३२ में घई नाम एक छोटा टापू पाटुंगाली लोगों के हाथ में पाया है। सन १६६१ में नय इङ्गलिस्तान के चार्लस दूसरे ने एक पाटुंगाली राजकन्या को बिवाह लिया था तय यह टापू स्वोधन को रीति पर उसे टिया गया । परन्तु टापू चार्लम पादशाह न पाया सा सन १६६८ में उस ने तसे से रुपये के किराये पर को काम सम्पनी बहादुर दिया। परन्तु उसो साल में मजोराके नवाब ने मोगलो के बातो का सदार था टापू को घेरा। सन १00 में सकार स्विटप-बम्ब 21 ,
हिन्दुस्तान देश को यात्रा।
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प्राया को पस सड़क
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१
A - को 'हिन्दुस्तान देश को याची की अमलदारो घगाल मन्दराल और बबई इन तर्फ बाघ बाघा गया है। फिर नगर के पीछे सोन प्रेसिडेन्सियों में बाटी गई । उस बडी वह पहाड दूर से दिसाई देते है नो पच्छिमी लडाई के दिनों में जो मरहठा लोगो से घाट कहलाते है। कि गई पास सन ईसवी , १००8 से लेके बम्बई का टापू एक नीचे मैदान मे है जो १०८२ तक सालमट पादि कितने टापू और ११ मील लषा और ३ मील चौडा है और तानना नगर बम्बई की प्रेसिडेन्सी मे जोडे उस मे छोटी पहाडियो की दो पाति पाई गये। सन १८१८ में पेशवा का अधिकार जाती है। इन में से एक का सिरा कोलाया उलट दिया गया और तप से बम्बई नगर पहाडी है नो टापू की जमीन को पूर्षा और बहुत बढती होने लगी और वह एक लहरो के जोर से बचाती है। दूसरी पाति बडो जमीन का मुख्य नगर पा। उसः का के सिरे पर मलाधार, पहाडी है और वह कोल समस्त हिन्द के और कोला से अच्छा निचान जो उन के बीच में है से वाकये और वह हिन्द के और नगरी से भी घडा कहलाता है वहां से लेके काल के तोर लो क्योकि उस में ८,४0,000 निवासी है निन कुछ जमीन ऊची है, और उस पर बम्बई का में से ६००००० हिन्दू (२००000 मुहम्मदी और गढ बना है। और उस के पास बस्ती बसाई बहुत से पारसी है। गई है। माजशल गढ को भी गिर गई बम्बई हिन्द कोनगरी में इन दो चौता के और उन को नेवा के ऊपर महाजनो के बडे २ विषय प्रसिद्ध है कि चारो ओर देखने योग्य बैठक बने है। स्थान है और किपर स्थाना से बढकर सन ईसवी १८६१ में नया अमरीका में भारी वहा- वणिज व्यापार करने के लिये अच्छा लडाई हुई सब हिन्द में रुई की , बिक्री अवसर मिलता है। पानकल रेलवे से लेके बहुत अधिक बढ,गई और यह विको विशेष 'घरतो तक घाघ यांधा गया है से टापू माना कर, बम्बई के द्वारा से हुई सोविधा के ब्यो- अब टापू नारहा । सो यापी समुद्र से कोल पारी शीघ्र धनवान होने लगे और घने मे पाता, उस, के भागे मनभावन, रगभूमि केवढने से बड़े २ सकारी गृह वहा बनने चारो और दृष्टि माती है। साम्हने चौडे लगे । एक , घास मेगबम्बई कलकत्ते और 'कोल का पानी है जिस में इधर उधर टापू मन्दराज से बढकर है अर्थात कि गृहो के पाये जाते हैं और अगणित देशी नाका इघर बनवाने के लिये अच्छे २ पत्यर -समीप माप्त उधर जाती है और बहुत से विलायती होते है।सो उन्हें ईटो से बनाना नही पडता जहान, लगर डाले हुए रक्षा पाते है उन के है। सिनेट होस अच्छा बना हुआ घर है जैसा पीछे घरती पर नगर है जिस में बहुत से २३ एष्ठ के चित्र में दिखाई देता है। रेलवे कचे नीचे घर मन्दिर आदि दूर से दिसाई का एक बहुत घडा ट्रेशन घर भी है और देते है। समुद्र किनारे बडे २ गोदाम वह घरनायूनीवर्सिटी के लिये बनाया महाननो, के सौदा चरने के लिये और जहाजा गया है देखने योग्य है । उस घडे चित्र से के मरम्मत करने के स्थान बने हुए है प्रगट होता है कि घम्बई की सडको का कैसा और लहरो के, रोकने के लिये पाच, मील रूप है। ".. - - - ९६ हिन्दुस्तान देश की यात्रा। । बम्बई में एक विख्यात घर पिजरापोल विलायता के अग्नियोट भी इस काल मे पाते कहलाता है जिस को जैन लोगों ने बनवाया जाते है । सो नगर की सड़को में नाना प्रकार है इस अर्थ से कि वधा ऐसे बूढ़े बैल बिल्ली के बहुत परदेशो लोग फिरा करते हैं यहा फुत्ते मुर्गी पादि लोब जिन का कोई मालिक लो कि दिन रात अप्त तमाशा देखने में नही मरण दिन ला पाले जावें क्योकि वे पाता है। ऐसे जीवो का पालना दया धम्म चार बडे बम्बई नगर मे नकल एक प्रकार पुण्य की बात समझते है। किसने जैन लोग लोग बहुत विख्यात है जो मवान बम्बईवाने इधर उधर फिरकर बिउटियो की बिलो कहलाते है माना कि और सब नगरवामी पर मिस्री डाला। करते और कपातो को बूढे पार निर्बुद्धि है और यही जवान अकेले खिलाया करते है क्योंकि इस को धर्मकार्य समझनेहारे और नई विद्या के पानहारे है। जानते है। जो वे मनुष्य जाति पर इतनी सत्य पूशे तो ये जवान अगरेजी स्कूलो मे दया करते और लले लंगडों को पालते तो पढे हुए है और वे बहुत बातों में सेसा विचार क्याही भला होता । काठियावार देश में जन नही करते जैसा उन के मुरखे करते थे तभी सी बेचारी लड़किया घास किई जातो वे अद्भुत रीति से पुरानो लोको पर चलनेहारे थों तो जैन लोग इस कुरोति को न रोकते है सौ उन के सोच और उन के काम थे पर जब कोई मांस खाने की लालसा से पार है। कहते कुछ और करते कुछ और भेडी को वहा मारने चाहता था तब इस है सो हलकेपन का दोष उन पर लगाया बहुत रोकते थे। ऐसी उलटी समम जाता है। कितने लोगो की हो जाती है। एक हिन्द को सैर नाम पुस्तक में भोला- मलावार पहाडो वह विशेष स्थान है जहा नाथ बोस साहिब ने इन जवान बम्बई वाला घम्बई के धनधान साहिब लोग रहने चाहते के विषय में यो कहा है कि हमारे लोग, है। नीचे से ऊपर तक उन को बहुत सी प्रारभ से यह न जानते थे कि स्वाधीन होना कोठियां बनी हुई है। और चोटो पर लार्ड क्या बात है न इस को जानना चाहते थे। साहिब का भवन है और पहाडी के ऊपर से जो राजा चाहे सोही बात, ठीक है सो प्रव नगर और समुद्र भली भाति दिखाई देता किस अर्थ से राज्यकार्य मे हाथ डालने वहा से याची गाडी मे सवार होके और चाहते है। पाच मील चलके समुद्र तट पर वह स्थान वार्डसवर्थ साहिब जो हिन्दू लोगों के देखेगा जो अपालो बन्दर नाम से प्रसिद्ध है विशेष मिप है इन विद्यार्थियों पर यह दौम जहां जहाजों का माल बहुत करके घरती लगाते है कि हमारे हिन्दू भाइयों में एक पर उतारा जाता है। अति बुरी रीति यह है कि वह कन्या जिस बम्बई वह नगर है कि जिस से सब डाक का बर बचपन मे मर साय सी कभी विवाह के जहाज जाते है और घर जहान भी पाते करने नहीं पाती धरन जोवन भर क्लेश उठाती आते कि जिन के द्वारा गोरे लोग हिन्दुस्तान रहती है परन्तु जब लों बच्चों के विवाह करने में पाते और विलायत बाते है और सब को कुरोति मिट न जाय तब लो इस कुरोति घामको . - - - & परन्तु प्रय मै लान । गात परन्तु हिन्दुस्तान देश की यात्रा। का मिटाना अनहोना है। कौन देश है अति भ्रष्ट और कुकर्मी ठहराते है। और जिस मे शिष्टाचार कुछ फैलने पर भी सेसा देशो में स्त्रिया बहुत सकोच और लज्जा अनुचित दस्तूर चले । जब मै पहिले हिन्द शोलता से रहती है और कोई नहीं कहता देश में पाया तब विचार करता था कि है कि उन्हें बचपन में विवाह करना अवश्य जितने हिन्दू ज्ञानवान है सो इस बुरे दस्तूर है तो हिन्द की स्त्रियों के लिये ऐसा क्यो से लज्जित ागे और विशेष करके वह जवान न अवश्य हो। केवल इतनी बात है कि ये हिन्दू नो अगरेजी विदा पढे हुए है वे इस लोग प्राचीन लीको पर मोहित है और को कुरीति जानकर चाहेगे कि ऐसे जंगलीपन सुघर जाने को नहीं चाहते है । से अपने देश को शुद्ध करे फिर ये जवान घम्बईवाले कहते हैं कि गया कि वे भी जो ज्ञानी कहलाते है इस उत्तम हिन्दू हम ही है क्योकि स्वदेश को मूर्खता को छोडने नही चाहते है घरन जो भलाई हम ही ढूढते है। सुबोधपत्रिका अपने को अगरेजो समान राज्य करने योग्य नाम एक हिन्दी समाचारपघ मे इस यात समझते है वे भी ऐसे अन्याय के विचार से के विषय मे यह लिखा है कि इन लोगो की छूट नही गये है। जब उन से पूछा जाता कि बहुत कच्ची स्वदेश प्रीति है । वे हर यात में क्या यह बुरी और उपद्रव को यात नही है अपने पुरखो की स्तुति जानते कि वह वेचारी लडको जिस का केवल नाम नही कि पुरखे कौन और कैसे थे। फिर में माच का विवाह हुमा और जिस ने पति को अगरेजो को हर एक रीति को कितनी अच्छी कभी न जाना सा जीवन भर दुसित रहे क्यो न होवे बुरो कहते है। वे यह भी कहते और क्या ईश्वर इस से क्रोधित न होगा है कि अगरेनो मे साई ज्ञान और विद्या ऐसी परन्तु यह लोग नाना प्रकार का वहाना नही है जिस को हमारे पुरखे न रखते थे करके इस बुराई को छिपाना चाहते और घरन यह भी कहते है कि हमारे पुरसे लज्जित होने के विरुद्ध इस दस्तूर को अच्छा ससार को बातो को ऐसी भली भाति जानते कहते और स्थापन करने चाहते है। थे कि नब जी चाहे तप जल घरसा सकते " यह भी कुरोति इन पढे हुए हिन्दुओ में थे । यदि ऐसो कोई विद्या रखते थे तो वह पाई जाती हैं कि जब उनमें से कोई ज्ञानी क्योकर खो गई और यदि हिन्दू पगिडतो पण्डित कोई पुराने दस्तूर को जो अशुद्ध मे इतना महात्म ई तो क्यो उस शक्ति को और हानिकारक है शुद्ध किया चाहे तो ये फिर प्राप्त नहीं करते है। लोग उस पण्डित को बैरी जान उसे बदनाम हिन्दू समाचार पप में या लिसा है कि इस कर देते और उस सुघराय को रोकने और प्राधीन लोक को चिन्ता विशेषकर पूना नगर में प्राचीन लोक पर चलने चाहते है और यह पाई जाती है क्योकि यह वह स्थान है जहा बहाना करते है कि जो हमारी लडकिया अगरेजी राज्य का घेर बहुत उत्पन्न होता है। वधान में षिवाही न जातो तो उन्हें पतियता यहा ब्राह्मणो का अधिकार अधिश है पोरन रखना अनहोना है और यह नहीं सोचते कि का यह विचार है कि पुरसो के दिन अच्छे थे। ऐसे कहने से हम अपने देश के भाइयो को . । 25 हिन्दुस्तान देश की यात्रा। - X - की और द्रष्टि करो तो दो चार गिद्ध उ पारसी लोगो का दत्तान्त । के ऊपर बैठे हुए लोथ की बाट नाह बम्बई मे पारसियों की गिन्ती बहुत नही दिखाई देंगे, जब लोथ वहा घरी जाती है है पर उन के बराबर कोई धन बटोरनेहारा पक्षी फट उस पर झपटते और उसे टुकड़ा सन्तान हिन्द देश मे पाया नही जाता है। करने लगते है और जब पेट भर जाता है अगले दिनों में जब। मुसलमानों का राज्य फिर अपने स्थान को उड़ जाते है। फारस देश मे प्रबल हुआ और वे वहां के कितने पारसी महाजन इस बात में कि अप लोगो को दु'स देने लगे तब बहुत निवासी धन से बहुत दुखियो को सुख दे विख्यात हुन वहां से भागकर बम्बई मे मा बसे और वहां है जैसा कि सर नमसतनी लोली भाई साहिः वे बहुत सुभाग्य हुए और उन में से बहुत हुए है फिर उन मे मलाबारी साहिब हैं ले बडे महाजन बन गये है। वे हिन्दुओ के देश की उन्नति की बड़ी चिन्ता करते श्री. समान जाति की बात नही मानते है सो रीति व्योहारो को सुधारने मे वडा परिश्मा पिन राक हर कही चल फिर सकते और कर रहे है वे भी पारसिया में से है। पर शव और देशो को सैर करके धन प्राप्त कर सकते की बात है कि अब बहुत से जवान पारसियो वे है। वे अपने बालकों को अधिक पढाया भी विषय यह सुन्ने मे आता कि वे अधिक सुख. करते है और इस से भी उन को बहुत लाभ बिलास करने लगे और मदिरा अधिक पिया करते और नाच तमाशो में अधिक जाया करते उन का धर्म यह है कि जरतुश्त गुरु है। चाहिये कि जो उस सन्तान मे महाशय के चेले है और उन का शास्व अवस्ता नाम समझे नाते है सो ऐसी कुरीतों को रोके । से प्रसिद्ध है। कहते तो है कि हम एकही परमेश्वर को मानते है तामी चार पदार्या हिन्द देश के पहाडी मे फटे हुए मन्दिर । को अर्थात आग पवन मिट्टो जल का बड़ा प्रादर सन्मान करते है। हिन्दुओं की नाई वे हिन्दुस्तान मे एक अद्भुत प्रकार के प्राचीन गाय के पविध जानते है। वे इस मन्दिर पाये जाते है जो पहाड़ों वा घटाना बहुत को निरग नाम से प्रतिदिन सवेरे घर में लाया मे काट काटके बनाये गये थे। इतने करते और अपने हाथ पाव मुह पर अपने और इतने बडे खोदे हुए मन्दिर किसी और को शुद्ध करने के हेतु थोडा सा लगाते है देश में पाये नहीं जाते है और ये मन्दिर घरन बडी पूजा मे घोडा सा पी भी लेते हैं। बहुधा यम्बई प्रेसीडेन्सी में है। कहते है कि उनके मन्दिरी में एक प्राग सदा जलती रहती वह समय कि जिस में लोग ऐसे मन्दिर खोदते है। वन में और हिन्दी में एक भिन्नता थे सो मसीही सन २५० से लेके अर्थात यह है कि वे अपने, मृतकों को भस्म नही बौद्धमत के फैलने से लेके ८00 वर्ष तक करते बरन उन को वे एक प्रकार के गर्गन मे अर्थात सन ईसवी १०५० बर्ष तक था। जिस को शून्य गर्गज कहते रख देते जिस्ते गिद्ध ऐसा एक मन्दिर एक 'टापू में जो आदि पक्षो उन को खा जाये। जब २ तुम उस बिंबई से केवल तीन कोस दूर है। पार्दुगाली पहुचता है। मतको ।
हिन्दुस्तान देश की यात्रा। - - । असाफायटा मन्दिर। - लोग उस टापू को अलाफाण्टा नाम देते थे जब यात्री साम्हने के फाटक से प्रवेश इस कारण से कि उस घाट के समीप नहा करता है तो देखता कि भागे को एक धिमूर्ति जहालवाले उतरते है एक पत्थर का हाथो नाम मूर्ति १६ फुट ऊची सडी है। दोनो खडा था। उस टापू के पच्छिम तौर पर एक बगलो मे १२ फुट ऊचे दो बड़े पत्यर के पहाडी है पार उस पर २५० फुट की ऊचाई द्वारपाल रक्खे हुए है। पिमूर्ति के समीप पर एक कटो हुई बड़ी गुफा दिसाई देती है। मन्दिर की पावन कोठरी अर्थात गर्भ है। यह एक मन्दिर है नोकडे चटान में कटा उस की चारो पोर एक २ द्वार है और एक - हुआ है उस का यडा फाटक उत्तर की ओर द्वार के पास पत्थर का द्वारपाल बना है। है और जैसा इस चिघ में दिखाई देता वह यह गर्भ सादा चौकोन और १६ फुट लक्षा दो सभी और दो अघखभा से समला हुआ चौडा है । उस के बीच में वेदी बनी है जो है लिन के बीच में तीन सुले स्थान है अर्थात १० फुट लबी चौडी और ३ फुट कची है और बडो कोठरी बांध में और दोनो बगलो मे उस के ऊपर लिगमूर्ति घरी है। त्रिमूर्ति के छोटी कोठरिया है जो पहाडी के भीतर चलो पूरब और एक कोठरी है जिस में शिव की घडी भारी १० फुट की ऊंघीमूर्ति है निस को बडा मन्दिर देखने योग्य है वह १३० फुट अर्धनारी अर्थात प्राधा स्वी पाघा पुरुष लषा और इतनाही चौडा है। उस में २६ कहते है और उस को चारों ओर बहुत सी खभे और १६ अखको संभालते है प्रतिमा धनी हुई है। पिमूर्ति के पछिम परन्तु आजकल उन में से खभे टूटे पडे है। और तीसरी कोठरी है लिस में शिव पार्वती मन्दिर को ऊचाई कही १५ फुट और कहीं पाटि को मूर्त घरी है। इस वर्णन से प्रगट होता है कि चार गई है। - । १९
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हिन्दुस्तान देश की याया।
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त्रिमूर्ति-अलाफाण्टा मन्दिर में ।
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वाहमतवालों ने इस गुफे को सुदवाया तोभी। ज्ञानवान सोचते है कि यह मन्दिर पाठवी
शैव लोगो ने उसको बिलकुल अपनाया, है । सदी में तैयार किया गया होगा। इस से
हिन्दुस्ताने देश की यात्रा - १५० फुट पुराने चटान के घड़े २ मन्दिर सालसट के गाय बैल पाये जाते है । 40000000 आदमी टापू मे और कार्लो में नो घंबई पोर पूना गुजराती भाषा बोलते है। वह हिन्दी के के बीच में और अनन्ता में जो निनाम के समान है पर उस में पारसी शब्द अधिक राज्य में है देखने में पाते है और फिर मिले हुए हैं। वे उसे ऐसे अक्षरों से जो कुछ पल्लोरा में जो अनन्ता के समीप है तीना कैथो की रीति पर है लिखा करते है। प्रीत बौद्ध जैन और हिन्दू मतों के गुजरात के निवासी बडे परिश्रमी मन्दिर चटानी में सुदे हुए है। उन में है और उन के बनिया और महानन बडे कैलाश नाम एक अद्भुत प्रकार का मन्दिर है चतुर है परन्तु घर्म की बातो में वे जो पहाड में खोदा गया चार अलग खडा अज्ञान है। उन बल्लभाचार्य का एक है क्योकि चारी पार पहाड काटके अलग अति घिनौना मत प्रचलित है जिस मे चेले किया गया है। यह प्रति भारी मन्दिर यह मानते कि हमारे गुरु लोग विष्णु के है वाच में उस का नाप २४० फुट लया और अवतार है निन को तन मन धन से पूजना चौडा पार कही २ उस को ऊचाई धर्म है। यह बुराई यहा लो फैल गई है १०० फुट है । कैलाश शिव का मन्दिर कि कितने बबई के महाजन अपनी स्त्रियो समझा जाता है पर विष्णु प्रादि देवताओ की और कन्याओं को इन दुष्टो के पास भेजते है मो मूर्त उस में पाई जाती है। लोग कहते और इस कुकर्म को धर्म कार्य जानते है। है कि पाठवीं सदी में इलिचपुर के ईदू नाम हाय ऐसे कुबुद्धियो पर । हिन्द के और भागो किसी राना ने यहां के एक सोते से नल पिया की अपेक्षा जैन मतवाले अधिक गुलरात मे और किसी भारी रोग से चगा हुआ सो प्रति पाये जाते है । उस देश में कितने देशी राज्य मगन हो उस ने कैलाश को बनवाया । पाये जाते है और बहुत नमीन सर्कार को वंबई देश का उत्तरवाला भाग नो कपई अमलदारी में भी है। उस मे कितने बडे सागर के समीप है सो गुजरात देश कहलाता नगर है जिन का कुछ वर्णन यहा लिसा है। इस को दक्षिणवाली सीमा दमन है जो नाता है बंबई से ११० मील दूर है और उत्तर की ओर वह राजपुताना तक फैला हुमा है। उस में सूरत एक नगर है जो बबई से १६० मोल 10,000 वर्ग मील जमीन है। काठियावार दूर पर तापती नदी के तट पर बना है। भी कभी इस हो का भाग समझा जाता है। यह बहुत प्राचीन नही है । पहिले मंग- तापतो नर्वदा माही प्रादि नदिया इस देश रेन तो हिन्द में आके वसे सो सन ईसवी मे बहकर वबई के सागर में जा गिरती है। १६१२ में यहा बसाये गये । सन १६ में गुजरात वाहत ऐसी अच्छी जमीन के शिवाजी ने उस को लूटा और उस के पीछे कि लोग उसे हिन्द का बगीचा कहते है। मरहठा लोगों को चढाइया कई वरम लो महा काला २ मिट्टी है तहां अच्छी सई यहा होती रही। सन १६६५ में उस के बराबर उत्पन्न होती है। वहां अच्छा बानरा भी हिन्द के किसी और नगर में धणित व्यापार लगता है। उत्तरवाले गुजरात में बहुत पच्छे नहीं होता था । सन १०५ मे यर सकार के . 'सूरत का वर्णन । - 26 १०२ हिन्दुस्तान दश का यात्रा। हाथ में पाया। पर्वकाल में यह विशेष स्थान कि सकार ने उसे यह धमकी दिई कि ऐसी घा जहां से रुई विलायत को भेजी जाती चाल चलने से यह अवश्य होगा कि दूसरा घो। जब से वंबई की घढती हुई तब से राना बड़ोदा की गद्दी पर बैठाया नाय । सूरत घट गया है तोभी इस प्रेसीडेन्सी में मल्हरराव नही सुधरा पर कुछ दिन पीछे वह चौथो बस्ती गिना जाता है। यह दोष उस पर लगाया गया कि उसने ब्रोच का बर्णन। रेजीडेण्ट सारियो पिप पिलाने का यन ब्रोच नाम एक नगर है जो नर्वदा तीर किया सो वह दूर किया गया और एक प्रति पर सूरत से ३० मोल उत्तर को है और नदी उत्तम राजकुमार जो खण्डेराव की विधवा के मुहाने से २० मील दूर है। यह बहुत का लेपालक पुत्र था गद्दी पर बैठाया गया। पुरानी बस्ती है और १८०० बर्ष बीते वह यह जवान हिन्द के पार राजाओ को बहुत पच्छिम हिन्दुस्तान का एक विशेष नगर था। बातों में अच्छा निदर्शन दे रहा है। वह सिन्धिया महाराजा के हाथ में पड़ा पर अरमदाबाद का वर्णन । सन ईसवी १८०३ में अगरेजों ने उसे उस से अहमदाबाद एक नगर चर्मण्यतो नदी ले लिया। कहते है कि ग्यारहवी सदो में के तट पर ६२ मील बड़ोदा से उत्तर पच्छिम पारसी लोग ब्रोच में बसने लगे। पूर्वकाल में और को बसा है। यह बंबई मेसीडेन्सी का बहुत सा, कपड़ा यहा से और देशों को भेजा तीसरा नगर और गुजरात देश में सबसे बडा नगर है । उस का नाम इस लिये है बड़ोदा का वर्णन । कि सन ईसवी १३१४ मे अहमद शाह ने उस बडोदा नो ब्रोच से ४४ मोल उत्तर और की नेव डाली । गुजरात के और नगरी के है सो गायकवाड महाराजा का मुख्य नगर सग वह सन १५०३ में अकबर बादशाह के । प्रगट नहीं कि महाराजा के घराने का वश मे पाया। ईसवी सोलहवी और समयों कम से प्रारंभ हुआ केवल इतना जाना जाता सदियों मे वह पच्छिम हिन्द के सघ से उत्तम है कि वह एक मरहठा घराना है और सन ई० नगरों में गिना जाता था। सन १९५० में १०२० से विख्यात होने लगा। सन १८५० के मरहठा लोगो ने उसे बश में कर लिया और बलवे के समय मे खण्डेराव ने जो गायकवाड़ सन १८१८ में अगरेजो ने उसे ले लिया। था सकार से मिघता किई पार इस सुकर्म मुसलमाना के कितने अच्छे मकबरे श्री से उस का, राज्य बढाया गया परन्तु उस के मसजिदे अहमदाबाद में है परन्तु यह बहुधा मरने पर उस का भाई मल्हरराव जो भाई हिन्दू प्रकार को बनावट के है। उन मे, को बिप पिलाने के दोष से अपराधी ठहरके सी खिडकिया देखने योग्य है जिन मे पत्यर । बन्दीगृह में एक बार डाला गया था मो गद्दी की मझोन २ जालियां कटी हुई है। पूर्वक्षाल में पर बैठाया गया। वह इस योग्य नहीं था तीन प्रकार के कपडे बहुतही अच्छे इस नगर परन्तु नाना प्रकार से मजा को दु ख देके सोने में बनते थे अर्थात किमखाय और कौशाम्भर' चादो की तोपे बनवाने भादि अंज्ञानता के और सई के कपडे यहा लो कि वहा यह कम्मों में अपने रुपयों को उडाने लगा यहां लो कहावत सुन्ने में पातो. थो कि अहमदाबाद जाता था। - 1 ३ । हिन्दुस्तान देश की यात्रा। १०३ का मुभाग्य तोन सूतो पर लटका रहता है कर प्रबल था और इस लिये यहां को स्विया पीत कौशाम्पर सोना चार रुई के सूतो पर। और हिन्दू स्त्रियों से परदे में कम रहती है। पानकल इतनी कारीगरो वहा नहीं है तभी कहते है कि पहिलो ईसवी सदी में महा- पगणित नगरयासी कपडे बनाने से जीविका राष्ट्र देश का महाराजा शालिवाइन था तो पाते है । बहुत कागज और मिट्टी के बर्तन अम्हार का बेटा था पौर निस का मुख्य नगर मो वहां धनते थे। पेतून था जो गोदावरी नदी पर बना था। नो लोग नर्वदा नदी के दक्षिण और रहते है सो पान तक उस के राज्य के प्रारम से अर्थात सन महाराष्ट्र देश का वृत्तान्त । ईसवो ०७ से सन गिनते है। इस घराने के मरहठा लोग एक पिकोण देश में रहते पीछे और बश के लोग यहा की गद्दी पर बैठा हैं। नीचे की सीमा परय का सागर है और करते थे। जय कि मुसलमानो की पहिली चढाई उसको नाक धमई से 000 मोल दूर दक्षिण दक्षिण में हुई अर्थात सन ईसवी १२६४ में तब में है और पाटुंगालो लोगो के दो देश अर्थात उन्हो ने यह पाया कि देवगिरि अर्थात दौलता- दमन पार गोमा उत्तर और दक्षिण वाले याद के राना लोग महाराष्ट्र के अधिकारी थे। बालो में है। उस में कोकण नाम एक भाग दक्षिण में पहिला महम्मदो राज्य नो स्वाधीन है नो समुद्र तोर पर यहुत ऊधा नोचा और स्थापन किया गया सो वहीं था जो बहमनी असम १ क्योंकि उस में बहुत सी सारो राज्य कहलाता था जिसका मुख्य नगर गुलबर्गा गलियां घाट के पहाडी को और गई हैं। था। जब यह राज्य टुझडा २ किया गया तब पूरय पार ऐसा मैदान मिलता जो 2000 फुट पाच राज्य इन टुडे। । से स्थापन हुए ঘাষ ऊंचा उठा हुपा है। कहीं २ इस मैदान में बीजापुर पार अहमदनगर और इलिचपुर पढे,२ चटान निकले हुए है पर प्राचीनकाल और गालझान्दा और योदरपुर। सोलहवीं सदो बहुता के ऊपर कोट बनाये गये थे। के बीच में मुसलमान लोग निर्वल होने लगे मराठी भाषा कुछ हिन्दी की नाई है पर चार शिवाजी की योरता से मरहठा राज्य फिर वत में संस्कृत शब्द अधिक मिलाये गये है। उस देश में स्थिर किया गया । वे उसको नागरी अक्षरा से लिखते है पर शिवाजी एक कोट में उत्पन्न हुमा कोटो दो चार अक्षरी का रूप बदलते है। वे याभी के द्वारा से उस का जोर बढा और एक कोट इन अक्षरो को बालमोध नाम करते है। में वह मर गया इस लिये औरगजेब बादशाह साधारण लोग एक प्रकार का लिखना निस उसे ठट्ठो में उड़ाके कोट का चूहा कहता को मोदी का काम में लाते है। था । परन्तु वहा के लोग विशेषकर शिवानी मरहटा लोग छोटे होते परन्तु दौडधूप का गुण गाते है उस बिस्वासघात के कर्म के बडे - उठाने हारे है। बंगाली लोग बहुत से जिस से उस ने अपने वैरी को कपट से नगे सिर फिरा करते परन्तु मरहठा लागा मारा। नम उस ने देखा कि .अफजलखा के बड़े २ सेले प्रसिद्ध है। हिन्द के और पर मेरा यश नहीं चलता तब उस ने छल भागों की अपेक्षा मुसलमानो का राज्य यहा से उस से भेट करने चाहो । तब उस भेट - 408 'हिन्दुस्तान दे की यात्रा। - - के लिये शिवाजी ने बड़ी तैयारी किई । सेना के सदार पना ग्वालियर गुजरात बिरा 'उस ने पूजा पाठ किई और अपनी माता गौर तंजार में राज्य करते थे। फिर राज से पाशीप मांगी। तब लोहे के मिलम के वनकर भी अपने लूट मार करने के दस्तू ऊपर उस ने स्वेत कपड़ा पहिना दहिनो को छोड नहीं देते थे । पुरखों की रीति मन धास्तीन में एक खजर छिपा लिया और खाये चलना उन का धर्म था। पुरखे डाकूहु हाथ मे बाघ के नख की नाई ऐसी बस्तु थी को ऐसा होना पड़ा। जितने देश उन जिस मे तीन छूरियां लगी हुई थीं। अफजल सीमा के समीप थे से बहुत सताये गये खां के सन्मुख आके उस ने डरने का बहुत नब उन के डंको का बजना सुन्ने मे पात बहाना किया से उस के सन्देह का दूर करने तब किसान लोग अपने पैसों को कमर में के लिये अफजलखां ने अपने सेवको को दूर बांध घान की गठरी काधे पर डाल । पन किया तब कपट का प्रणाम करके शिवाजी बालक संग ले जंगल पहाड मे भाग छिप जात ने अफजलखां के पेट में ऐसा मारा कि वह थे । बहुत रानाओ ने बन्दोबस्त किया कि फट गया' यहां लो कि वह मर गया। इस यदि तुम खेत की कटनी को, लूट न लान वापट के कारण से मरहठा लोग पानकल तो हम हर साल महसूल दिया करेंगे। वह शिवानी की बड़ी प्रशंसा करते है मानो उस वेचारा जो हिन्द का बादशाह कहलाता थ निबड़ा धर्म कार्य किया। अपना अपमान न जानकर डाकुओं को ऐसा बहुत योद्धा सदा शिवानी के झण्डे का महसूल दिया करता था। एक मरहठे सर्दी पीछा करते थे कयोंकि उस का बचन यह था ने दिल्ली के ऐसे समीप अपनी छावनी लगाई कि गो ब्राह्मण के लिये लड़ता हूं और उस कि नगरबासी छावनी को आग देख सकते के सिपाहियों को बराबर यही प्रासरा होता थे । दूसरा हर साल अनेक घुडचढों के बहुत सो लट इमे मिलेगी। मकाली सहित वगाल के गावों को लूटा करता था साहिब ने उन चढाइयों को जिन्हें वे दूर २ अंगरेजों का पाना इस दुर्दशा में हिन्द को देशो पर करते थे यो बर्णन किया है। बचाने का कारण हुआ। उन पहाडी से जो पच्छिम के घाट कहा सन ईसवी १८१० में बाजीराव ने जो मर-- लाते है ऐसा कर सन्तान निकला कि जिस हठों में महाराजा समझा जाता था पूना पर के साम्हने हिन्द के सब महाराजा कांपते थे चढ़ाई किई पर वहा हराया गया। पीछे और जिन को केवल अगरेज दबा सकते थे। वह अंगरेजों के बश में आया और उन्होंने औरंगजेब,बादशाह के दिनों मे ये लोग अपने उसे रहने के लिये बिठूर नाम एक गांव पहाड़िस्तान से उतरके पहिले डकैती करने कानपुर के समीप दे दिया और सालियाना लगे और उस के मरने पर समस्त हिन्द पिन्शन आठ लाख रुपिया कर दिया। उस का मरहठी सेना का नाम सुनके घरथराता था। लेपालक पुत्र वही नाना साहिब था जिस ने बहुत। राज्य उन से उलट दिये गये बहुत कानपुर के साहिब लोगों को घात कियां से नगर लूटे गये। उन का अधिकार दक्षिण जैसा ऊपर वर्णन हो चुका में लो फैल गया। उन की .. - था कि + - J - F ।। १ हिन्दुस्तान देश की यात्रा। १०५ यम्यई को रेलवे। - रेलये का भार घाट पर घटना । - पेनिनसुलार M - बंबई की विशेष रेलवे मेट इण्डियन का पवन अच्छा है। विशेष बस्तु जो वहा नाम से प्रसिद्ध है । नगर से ३४ धनतो सो कपडा और मिट्टी के बर्तन और मोल दूर वह दो भागो में बाटी जाती है पीतल ताबे लोहे की चीजे है। जिन में से उत्तरवाली कलकत्ते को और इतिहास में पूना को पहिलो चर्च। यह दक्षिणवाली मन्दरान हो जाती है। दोनो मिलती है कि सन ईसवी १६०४ में अहमद से स्यानो में जहा घाटी के पहाड २००० फुट नगर के सुलतान ने यह बस्ती मलानी राजा कचे है उन पर चढ जाती है। वहा सडक को जो शिवानी का दादा था दान कर दिई । । को देखकर यात्री भय खाता है क्योकि अपर सन १८१८ मे लब पेशवा साहिब दूर किया 'पहाड को चटाने झूम रही है और नीचे ऐसे गया तब पूना अगरेना की एक बड़ी छावनी निचान हैं जिन में गिरने का डर होता है । मनाया गया । अब वह प्रेसीडेन्सी मे दूसरी पूना जो ११६ मोल बमई से दक्षिण पूरब बस्ती है क्योकि उस मे १६०००० निवासी है। ओर से दक्षिण को बड़ी छावनी है और अहमदनगर सीना नदी के मैदान में लाई साहिब भी कभो २वहा रहा करते है। वह १३० मोल बमई से पूर्व और को है । सन ई० मुप्ता नदी के तट पर बसा और समुद्र से १८५०/१४६४ मे बहमनी बादशाहो के एक सार फुट ऊचा है। इस अचाई के कारण से वहा अहमद निजाम शाह नाम ने इस नगर यो 27 १०६ हिन्दुस्तान देश की याषा । नेव डाली परन्तु कहते है कि प्राचीनकाल नासिक नाम नगर ना हिन्दुओ का तीर्थ- से बिजनोर नाम एक हिन्दुओं की बस्ती इस स्थान है से गोदावरी नदी की दोनो पार जगह पर थी। पानकल नगर मिट्टी की उस स्थान पर नो समुद्र ਚੇ ੩੦ मील भीत से घिरा हुआ है पीर कहते है कि सन बना है। यात्रियों को वहां खोंच लाने के १५६२ में यह भीत उठाई गई । वहां का जो लिये ब्राह्मणों ने बहुत अद्भुत कहानियां इस राज्य था सो सन १६३६ मे शाहजहा बादशाह स्थान के विषय बनाई है। कहते है कि राम से उलट दिया गया परन्तु उस सर्दार ने जो ने उस की पवित्रता का बर्णन गौतम ऋषि वहा मुगल बादशाहों की ओर से अधिकार से किया। अज्ञानी लोग यह मानते है कि रखता था उस ने बेईमानी करके सन १७५६ गोदावरी और गगा एकही सोते से निकलती मे नगर को पेशवा साहिब के हाथ में सेोप है परन्तु गोदावरी सैकड़ो कोस जमीन के दिया। सन १८०३ मे वेलस्ली साहिव ने नीचे छिपी हुई बहती और तब निकलतो अगरेजी सेना लेकर नगर पर चढाई किई है सो उस के जल मे नहाना सब से बडे और दो दिन की लडाई के पोछे नगर उस पापा को धाता है। जैसे गगा तीर बारहवे २. के वश में पाया । थोडे दिन पीछे अगरेजो साल मे कुम्भ मेला होता है वैसाही गोदावरी ने उसे पेशवा को दे दिया पर सन १८१८ मे तीर बारहवे २ बर्ष में एक पुष्कर नाम बड़ा वह फिर अगरेजी के हाथ मे पाया। वहा मेला होता है और उस समय के नहाने पर निवासी ४0,000 है। लोग बडा भरोसा रखते है। मासिकमार और गोदावरी नदी १०७ 7 L हिन्दुस्तान देश को यात्रा। ब्राह्मण लोग कहते है कि गोदावरी होती है पर दक्षिण भाग अधिक ठढा और से बढकर नर्मदा प्राप्त सुखदाता नाम एक फलदायक है। और नदी दे जो पच्छिम और कम्बाई सागर महारान रानी पहिले पेशवा का जूती- मेमा यही है। वे कहते है कि यह रुद्र देवता यार था उस से सिन्धिया का के पसीने से हुई है। यहा के ब्राह्मण लोग स्थिर किया गया । वह सन ई० १०५० में मर गगा को अपेक्षा इस नदी का अधिक गुण गया। घढते २ यह राज्य हिन्द के बीच मे गाते है कि गगो के एक दिन स्नान करने से बहुत फैल गया परन्तु जब सारी सेना ने सकल पाप छूट जाता है पर नर्मदा के केवल बार २ मरहठी सेनाओं पर विजय किया तब देखने हो से सकल माप मिट नाता है। फिर वह फिर घटाया गया। ग्वालियर और एक बात यह भी है कि मृतक की लाथ लश्कर नाम पुराने पीर नये नगर है और केवल गगा की उत्तर और भस्म हो सकती उन के समीप एक पहाड़ी पर एक बहुत परन्तु नयंदा के दोना तोरी पर भस्म दृढ गढ बना है। हो सकती है सो नर्वदा श्रेष्ठ ठहरती है। पिछला महाराजा पुरानो लोको पर पक्का चलनेहारा था । वह राज्यकार्य से निश्चिन्त रहता और अपने सेवको को तग करके धन बटोरा करता था। वह अपनी सेना से बहुत हिन्दुस्तान के बीच के देश । प्रसन्न रहता और उसे पाला करता था तभी हिन्द के बीच में एक देश मेन्ट्रल हगिडया नब वह मर गया तब उस के भवन में साढे नाम से प्रशिद्ध है। उस में ८८,000 वर्ग मील पाच कोटि रुपये पाये गये । उस का मरना जमीन है अर्थात उत्तर पछिम नाविन्स से इस प्रकार से हुआ कि लय वह रोगी था कुछ बडा है और एलएट साहिय नी इन्दौर तब किसी ज्योतिषी ने उसे बताया कि यदि '' में रहता है उस पर अधिकार रखता है। पाप अमुक नदी में नहानोगे तो अच्छे होगे उस में ११ राजा हैं लिन को रक्षा सर्वार परन्तु इस के विरुद्ध जब महाराना ने वहा करती है और निवासी एक करोड है। उन सान किया तो उस का रोग बढा और वह में जो सब से बड़े राज्य है सो ये है अर्थात शोध मर गया। पुरम में सेवा और वुदेलखण्ड उत्तर मे सिन्धिया अर्थात ग्वालियर दक्षिण में इन्दौर और भूपाल । इन में दो तोन का कुछ वर्णन इन्दार के राज्य का वर्णन । यहां लिखा जाता है। सिन्धिया का राज्य इन सब में चलघान है। उस की जमीन इस राज्य के अलग २ भाग नर्वदा नदी चम्बल और नर्वदा नदियों के बीच मे की दोनो ओर पाये जाते है। राज्य में ८४00 है और उस में लाना है। वर्ग मील जमीन और दस लाख निवासी है। उत्तर के भाग में ऐसे स्थान है तो पत्त्यरोले उस में अफीम बहुत उत्पन्न होती है। हालकर और बालूमय है और विक नाम घराना एक किसान के वश से घाना + १०८ हिन्दुस्तान देश की यात्रा। जगली लोग वहां के प्रादि निवासी है। उन में गाड जो महाडी लोग हैरी पर प्रबल हुए और उन से देश का नाम गोड़वाना हुमा । उन की भाषा को कभी लिखो न गई थी तामिल तेलगू आदि भाषाओ से कुछ मिलती थी। यह देश फलदायक है और बहुत सी रुई और गेहू और घान वहा उत्पन्न होते है वहा का मुख्य नगर नागपुर ५ निजाम के राज्य का वर्णन । इन्टर का भयन । सब से बड़ा देशी राज्य जिसका सकार सन १३ मे नन्मा और लडते २ एक बडा सहायक है सो हैदराबाद वा निजाम का और प्रसिद्ध मरहठा सार बन गया। उस कहलाता है। वह इतना बड़ा है जितना घराने मे से एक प्रधान ने बहुत से डाकुओ सेन्ट्रल प्राविन्सेस है और उस मे एक कडोर को एकट्ठा करके यमुना तोर के गांवों को लूटा पगह लाख निवासी है। उस की सीमा यह है और सताया जब लो कि लार्ड लेक साहिब ने उत्तर पूरय और सेन्ट्रल प्राविन्सेस दक्षिण में उसे हराके भगा न दिया। पिछला महा- मंदराज प्रेसिडेन्सो और पच्छिम मे बबई प्रेसि- राना' होलकर बडा लोभी था। उस'ने प्रजा डेन्सो। निवासी दो प्रकार के है अर्थात पूरब पर बडा महसूल लगाया और वणिज व्यापार मे तेलगू लोग और पच्छिम मे मरहठा लोग। के करने से रुपये 'कमाने चाहे । महाराजा राज्य को उत्पत्ति यह है कि वही सूबेदार की सेवा मे दो एक प्रसिद्ध मत्री हो चुके है नो मोगल बादशाहो से दक्षिण में अधिकारी जिन्हो ने राज्य कार्य को सुधारने का बड़ा स्यापन किया गया और निजाम अर्थात राज्या यत्न किया परन्तु उन का अर्थ भली भाति कार्य निपटानेहारा नाम दिया गया था उस सिद्ध न हुपा। न औरगजेब के मरने पर अपने को स्वाधीन, किया। इस देश मे प्रजा की बहुधा बुरी दशा हुई परन्तु सर सालारजङ्ग जो बड़ा ज्ञानो सेन्द्रख माविन्सेस का वर्शन । मयो था उस ने कुछ दिन लों अच्छा इन्ति- सेन्ट्रल प्राविन्सेस उस देश का नाम है नाम किया। जिस का लाभ अब लो कुछ, जो निजाम के राज्य और छोटे नागपुर के प्रगट है हैदराधाद नाम मुख्य नगर कृष्णा बीच में है। वह कितने देशी राज्यों से घिरा नदी को एक शाखा के तट पर एक बड़ी बस्ती हुमा है। उस में ८,000 वर्ग मील जमीन घनी है। और एक करोड निवासी है जिन में से बीस 'लाख गाड आदि जंगली सन्तान है। ये . 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हिन्दुस्तान देश की यात्रा। १०९ मन्दराज प्रेसिडेन्सी का वर्णन । के सागर में जा गिरती है। मन्दराज मे और मन्दराज के दो भाग है अर्थात हिन्द के विशेषकर पूर्वी तीर पर गर्मी अधिक होती प्रायद्वीप का नो दक्षिण है और वगाल सागर है परन्तु न इतनी गर्मी न इतनी ठण्ड को तट जो एक लम्रो जमीन है। उस को तीन पाई जाती जितनी इलाहाबाद में होती है। और समुद्र सीमा है। वह बम्बई मेसिडेन्सी देश के उस भाग में जो घाट के ऊपर है कुछ बडा है क्योकि उस में १,३४,000 वर्ग पानी कम बरसता है परन्तु मच्छिमी भाग में मोल जमोन है। उस के दक्षिण पच्छिम में बहुत पानी गिरता है। कोचीन और घावनकोर नाम दो बड़े देशी मन्दराज प्रेसिडेन्सो में निवासी३,६०,00,000 रान्य है। दक्षिण का ऊचा मैदान कुछ मन्द- है जो बहुधा हिन्दू है । सोलह श्रादमी मे राज में गिना जाता है पर बहुधा उस की एक मुसलमान है और हिन्द के और भाग जमीन घाट के पहाडो और समुद्र के बीच मे की अपेक्षा ईसाई लोग वहा अधिक है । देश है। पूर्वी तोर में मैदान अधिक है पर और मे वहो भाषा बोली जाती है जो द्राविडी वा भागों में पहाडी को तीन पाति अर्थात पूर्वी दक्षिणी कहलाती अर्थात दक्षिण पूरन में घाट पच्छिमी घाट और नीलगिरि पाई जाती तामिल उत्तर पूरब मे तेलगू उत्तर पच्छिम । उस मे तीन बडी नदिया है अर्थात में कनारा और दक्षिण पच्छिम मे मलायलीम गोदावरी और कृष्णा धार कावेरी जो बगाल बोली जाती है। - - मन्दराज नगर का वर्णन । बंगाल सागर के तट पर बना है। प्रगट नहीं कि मन्दराल नाम कहा से प्राया है। उप्स का देशी नाम चेनापट्टन ६ क्योकि वही चेन्नापा निस ने उसकी नेव डालो से वहा के राना का भाई था। सन ई० १६३६ में चन्द्रागिरि के राना ने देय साहिय को वही नमीन दान मन्दरान नो मुख्य नगर पार दक्षिण कर दिई जहा भय नगर धना है। हिन्दुस्तान को सबसे बड़ी बस्ती है सो वहा गढ बनवाया गया तब निवासी मन्दराब के कालका काठामाम। लय 28 ।
११० हिन्दुस्तान देश की यात्रा। - नाम था। व अधिक बसने लगे। उन के रहने का देता है दो तीन भारी लकडिया एकस स्थान कालो बस्ती कहलाता था और सन रस्सियो से बधो रहती है और इन पर है १६८० में उस की रक्षा के लिये मिट्टी को तीन आदमी बैठ सकते है। भीत उठाई गई। गढ कुछ दृढ था. क्योकि काली बस्ती की दक्षिण और समुद्र त १०४१ मे मरहठा लोगो ने उसे घेर लिया पर पर एक खुला मैदान दो मील लया है। उसे ले न सके । दो साल पीछे गढ बढाया जिस मे गढ़ और लार्ड साहिब की कोर्ट पौर और भी दृढ दिया गया तभी १०४६ मे पार कितनी बडी हवेलिया है। इसके मासोसियों की सेना ने उसे ले लिया। दो दक्षिण भार चिपलीकेन है जहा नवाब साहि साल के पीछे वह फेर अगरेनी के हाथ में का भवन है। उस के समीप पाटुंगालो लार पा गया। सन १७५८ मे फ्रासीसी सेना ने ने सन १५०४ मे थामा नाम एक गढ़ को बन उसे फिर घेर लिया पर अगरेजी युद्ध के वाया । यह १७४६ में अगरेजो से वश मे आया जहाजा पाने से उन्हे भागना पड़ा । सन इन सम्घ स्थाना को लोडकर मन्दराज बर्ड १०८७ मे गढ ऐसा बन गया जैसा अाज तक जमीन मे अर्थात २० वर्ग मील जमीन में फैल है और नार्ज नाम उसे दिया गया क्योकि हुआ है पर इस बीच मे २३ अलग गाव श्री उस समय अगरेजो के बादशाह का यही कितने खेत चार बारिया है। वह सडा निस मे अधिक आना जाना है मिण्ट रोड जब यात्रो जहाल पर सवार हो नगर को सड कहलाती है शितनी जगह में अक्ष ओर दृष्टि करता है तो बस्ती को जमीन ऐसी अगरेजी घर बडे २ हातो मे बने हुए है नीची है कि केवल वही सकारी गृह महासाना कम नदी नगर के बीच में बहतो है पर के दफतर प्रादि जो समुद्र तट पर है दिखाई बरसात को छोड वह बहुत सूख जाती है देते है। गौर सम उन के पीछे छिपा है । मन्दरान मे बहुधा गर्मी रहती है पर समुद्र कालो बस्ती वह स्थान है जहा अधिक वणिज से अच्छी हवा बहती है। कोल अच्छा नही व्यापार किया जाता है। वह तीन मील लमी और बहुत प्राधिया वहा माती' है जो जहाजी कूम नदो को उत्तर को फैली हुई है और की बहुत हानि करती है । सन १०४६ में न उस मे अगणित घर छोटे और निकम्मे बने फ्रासीसी युद्ध के महान वहा लगर डाले है। काली बस्ती को साम्हने वह कोल है जहां घेत ऐसी आधी चली शि उन में से पांच जहाजबाले उतरते है। पूर्वकाल में यहा कोल बडे जहान डूब गये और १२०० नाविज्ञ लोग नही था और जहाजों को तट से दूर लंगर नाश हुए। फिर सन १८०२ में ऐसी प्राधी डालना पड़ता था और याची ऐसी नौकाग्रो बहो कि वां नो अगरेजी नहान धरती पर मे उतरते थे जिन की तरिक्षयां डोरिया में फेके गये । वधी रहती थी ऐसा न हो किटकर साके मन्दरान में ४,५0,000 निवासी है, अर्थात टूट जाये। वहा के मछुवे लोग एक अद्भुत हिन्द के बड़े नगरी में यह तीसरा है। वहा प्रकार की नौका रखते थे शिम को काठामडॉन कोई विशेष कारीगरी वा व्यापार प्रसिद्ध नहीं, कहते है। इस मे जैसा इस चिप में दिखाई है। और, लोग मन्दरानवासियो को रानियस्त 1 - हिन्दुस्तान देश की यापा। १११ अर्थात ज्ञानहीन करते है और लोग कहते कालिज जिस के प्रिन्सिपल डाकर मिलर है कि यदि बहा के लोग अचानी न होते तो साहिब है हिन्द सब से प्रसिद्ध कालिना -वे लोग जो थोप्रासफो नाम कपटी मत को में है और कि मन्दरान मे रोसे बडे बडे चलाने घाइते घे सो मन्दराज में अपने काम विदाधान जैसा दीवान बहादुर रघुनाथ को क्यो कर सकते । इस के विरुद्ध ' यह राय साहिय पाये जाते है जो देश का लाभ कहना चाहिये कि मन्दराज का क्रिष्टियन और उन्नति बहुत ढूढा करते है। - तेलगू लोगो का वर्णन। वृत्तान्त प्रगट है। उस समय में वार गल उस का मुख्य नगर था। सन ई० १३०६ में मुसलमाना ने उसे जीत लिया पर पीछे वह फिर स्वा- घीन हो गया। सन १३१२ और १५४३ को बीच मे येवादा कृष्णा नदी पर। यहाकी नमीन तेलगू उस भाषा का नाम है जो मन्दरान गालकान्दा के राज्य में जोडी गई। सन १९६५ के उत्तर और कोचिकाकोल लो जहा लोग में वह भाग जो समुद्र तोर थे सो अगरेजी से उडिया बोलते और हिन्द देश के भीतर ही हाथ में आये नव कि उन्हो ने निनाम को नीत और लो वोली नाती है। वह तामिल की अपेक्षा लिया। मृदुयाणी कहलाती है और उस मे बहुत पूर्वकाल में दो बडो नदियों अर्थात गोदा. पोथिया लिखी गई है। १,००,00,000 पादमी वरी और कृष्णा के द्वारा से बहुत सा जल इस भाषा को बोला करते है। पूर्वकाल मे उस निलीम वाल सागर में डाला जाता था का नाम तैलग कहा जाता था और संस्कृत परन्तु अब बडे २ घाघ वाघे गये है जिन से बोलनेहारे उसे अप्रभापा कहते थे। कहते पानी रोझा जाता और नहरी में पधाया है कि विक्रमादित्य उज्जैन का राजा जिम जाता है। इस उपाय से १०,00,000 बोघा का सबत् सन ई० के ५६ बरस पहिले से हैं नमीन इन नदियों से सीधी जाती है और अत्र लोगों में से था। इस देश का प्राचीन हर साल मन की बढती इस सोचने से एक -
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हिन्दुस्तान देश की यात्रा।
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कोटि रुपयों से कम की न होगी। इस चित्र सन १६२० में बसने लगे और मन्दरान में वेसन
में हम देखते है कि वेजवादा नगर के पास कृष्णा १६३६ में रहने लगे। गोदावरी नदी के उत्तर
नदी का जल एक बांध के ऊपर बह रहा है। वाले मुहाने के समीप कोनादा नाम एक कोल
इस देश में सागर तोर पर कितनी अच्छी पाया जाता है।
वस्ती पाई जाती है। जैसा मन्दराज से २०० गोदावरी की उत्तर पर विजिगापट्टम नाम
मील उत्तर पूरब और को मसूलपत्ताम नाम एक जमीन है जहां कितने बडे २ जमींदार
मगर है ना कृष्णा नदी के एक मुहाने के पाये जाते है । उस में विजियान माम का
समीप थना है । उस के काल में बहुत सी महाराना सम से धनी है। विलिगापट्टम
देशी नाकारं पाती जाती है। यह वह स्थान नगर सागर तोर बना है और वहा नाना
है नहा अगरेज पूरय तोर पर पहिले अर्थात प्रकार के गहने और सुन्दर बस्तु बनती है।
तामिल लोगो का वर्णन ।
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MONTIARD
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मामी का रहा का मेदो पर।
वर या मैदान ना कर्नाटक नाम से प्रसिद्ध ३ तामिल लोगो का विशेष निवार
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हिन्दुस्तान देश को यात्रा। ११३ - -- । FES है। पुलीकाट नो मन्दराज से २० मोल उत्तर इन लोगो में दो प्राचीन राज्य विख्यात है वहा से लेके विवानद्रम लो जो सागर थे अर्थात चोला का राज्य उत्तर मे जिस का तोर है यह मैदान फैला हुआ है। उस को मुख्य नगर काजोवराम था और दक्षिण में पच्छिमी सोमा घाट के पहाड है। लका के पाड्य का राज्य जिस का मुख्य नगर मादुरा उत्तरवाले भाग मे भी लोग तामिल भाषा था । कालीवराम जिस को हिन्दू लोग काचो- बोलते है। वह १,३०,00,000 भादमियो की पुर कहते है ४६ मोल मन्दरान से दक्षिण भापा है। पच्छिम और है। वह हिन्द देश के सात तीर्धा मे एक गिना जाता है घरन लोग उसे दक्षिण की काशी कहते है। सातवी सदी मे वैद्धि मत यहा पहुत प्रबल हुप्रा । एक सौ परस पीछे जैन मत यहा बहुत फैल गया और माज लो नैनो कही २ पाये जाते है। सबसे ब्राह्मण लोगो ने अपना धर्म या फिर स्थिर किया है। दो भारी मन्दिर तो अब सन १५०६ में कृष्णा राना से बनवाये गये। ডাঃ মিনা চাদা राज्य सन १६४४ में उलट दिया गया तप गोलकान्दा फे राहा यहा अधिकारी में ਬਬ ਬਸਧ ਚ ਜਾ ਸਕੇ। ने उसे वश में कर लिया पार पाट छा नवाय या रान्य करने लगा। सनतारा मदान दक्थिान का एक मन्दिर ch 29 १५४ हिन्दुस्तान देश की याया। है । । - IBITOL थिय का मन्दिर-सनमार मे। - से २१० मील दक्षिण पच्छिम और है और है। वह मन्दराज मेसिडेन्सी का दूसरा नगर कावेरी नदी के मुहाना के बीच में बना है और बडी छावनी है। वह शमत अर्थात बीड़ी सो हिन्द के दक्षिण की सघ से फलदायक और गहने बनाने के लिये प्रसिद्ध है। इतिहास जमीन है। यह चोलराज्य का पिछला मुख्य मे उस का नाम बार बार पाता है क्योकि नगर था और पीछे एक नायक नो विजयनगर कितने बैरो उसे घेर चुके है। गढ के बीच से भेजा गया यहां अध्यक्ष हुआ । सन १६०८ में विचिनापल्लो नाम चटान है ना मैदान के में वेनकानो ने जो शिवाजी का भाई था बीच मे से २०३ फुट की ऊंचाई तक पहुची उसे ले लिया पार तनजोर के राजा लोग उस है। ऊपर चढने के लिये चटान मे सोढी को वंश से थे। सन १७७६ में राला साहिब ने कटी हुई है। और ऊपर एक शिवाला और नगर और आसपास को थोड़ी सी जमीन को बिलकुल चोटी पर एक छोटा सा गणेश का रसके और सघ जमीन सकार के हाथ मे साप मन्दिर बना है। हर साल चटान के ऊपर दिई और वह सन १८५५ मे अगरेजो के हाथ मेला होता है और बड़ी भोडे चढ जाती है। मे आई क्योकि राजा बिन पुत्र के मर गया। सन १८४६ में भाड़ भय खाके भाग गई और तनजोर मे एक प्रसिद्ध घडा शिवालय है जिस २५० प्रादमी दबके मर गये । इस नगर के में पत्थर की बडो भारी नन्दी की मूर्ति है। देश समीप कावेरी नदी के बीच मे एक टापू है के और मन्दिरो की और घी आगे मिलेगी। जिस मे एक विख्यात विष्णु का मन्दिर है विचिनापल्ली एक और नगर है जो तन- जिस के बराबर हिन्द में कहीं बडा मन्दिर जोर से ३० मील दूर कावेरी नदी के ऊपर बसा नहीं है। टापू का नाम श्रीरंग है। - -
हिन्दुस्तान देश की यात्रा।
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दक्खिन का एक मन्दिर।
मादुरा नाम एक नगर है नौ मन्दरान है कि मसीह/ २०० वर्ष पहिले पाय लोग
से ३४४ मोल दूर दक्षिण पच्छिम र वैगई मादुरा
करते थे और उन का राज्य
नदो के सट पर बसा है। यह हिन्द के मा-ग्यारहयों/
के अन्त लो बना रहा। सग
चीन पर विख्यात नगरो में एक है । प्रगट | से पिछला वही सुन्दर पाड्य वा गुणपाय
1- ૧૧૯ हिन्दुस्तान देश की यात्रा Airror Bhmi तक राज्य करता था उस ने माद नगर को बहुत सुन्दर २ गृहो से वि पित किया परन्तु उस के भरने राज्य टुकडा २ हाने लगा। सन १६ में मादुरा चन्दा साहिब के हाथ में और १८०१ मे कर्नाटक के नवाब ने अगरेजों के हाथ मे दे दिया। मादुरा की पाठशाला प्राचीनका मे प्रसिद्ध थो पर लोग उस के वित अद्भुत कहानियां कहा करते थे । कहानी यह थी कि शिव ने पाठशा को एक हीरे का बना हुआ बैठक दिः निस का यह गुण था कि अपने बढाने योग्य शिक्षको के लिये जग देता था पर जब कोई कपटी शिक्ष मादुग के मन्दिर का गोपाराम । बैठा चाहता था तब आप से पाप व समिटकर उसे ढोल देता था। पाठशा था जिस ने जैन मत को देश से निकाल के समाप्त होने की यह कहानी कही नाती दिया और चाल के राज्य को जो पडोस था कि तिरुवल्लुवर जो अजाती लोगो का एक पंड जोत लिया परन्तु पीछे किसी सेना ने उत्तर और अति उत्तम काव्यरचक अर्थात दक्षिा से आकर उस के अधिकार को उलट क्षा तुलसीदास था जब वह उस पाठशाले दिया। शिक्षक बनने चाहता था तब लो ब्राह्मर अब विजय नगर का हिन्दू महाराक्षा शिक्षक थे सो बहुत क्रोधित और कहाँ प्रबल हुआ तब मादुरा उस के घश में प्रा घे क्या वह कुजाती हमारे सग बैठेगा। इतने गया। सोलहवी सदी में उस ने विश्वनाथ में तिरुवल्लुवर को पुस्तक उस बैठक मे रक्खी का मादुरा का अध्यक्ष बनाया । उस के वश गई और वह झट इतना सिकुड गया कि सक से नायक नाम राजाओ का घराना निकला ब्राह्मण शिक्षक गिराये गये इस अमान से और उस ने १२ प्रघाना को नागोर इस छोड वे सब यहा लो लज्जित हुए कि समीप के पर दिई कि लडाई के समय में उन से ताल मे डूबके मर गये तत्र पाठशाले का सहायता पावे। ये लोग पालिगार वा पलाय अन्त हुधा । मादुरा में दो विशेष गृह ये है करन नाम से कहलाते थे और उन में से अधात शिव का महा मन्दिर और तिहमल शितने घराने पान लो अपनो नमोन रखते नायक का बनाया हुआ भवन । है । मादुरा के राजाओ में तिरूमल नाम मादुरा की दक्षिण पूरव और रामेश्वर एक विरयास थाली सन १६२३ से लेके '१६५ नाम एक शेटा टापू है वो हिन्दुओ का एक . -
हिन्दुस्तान देश की याया।
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विचिनाण्लो की पटान।
१
साल का मन्दिर-मादुर
तीर्थस्थान है। वहा एक प्राचीन
मन्दिर है और लोग कहते है कि
राम ने पाप उसको नेव डाली।
वही स्थान है जहा हिन्दू लोग
बताते है कि हनुमान ने पत्थर
और चटान और पहाड डाल
डालकर लका मे पहुचने के लिये
पुल बनाया । परन्तु सत्य पूछो
तो पत्थरो की सन्ती में
वाल का
उठाया हुआ बाघ है पर पुल तो
नही है।
मन्दरान 'का दक्षिण
तिनीली नाम से प्रसिद्ध है जहा
लोग प्राचीनकाल में
भूत
पिता को
।
भाग
30
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११८ हिन्दुस्तान देश को यात्रा। , %3D f पापनाशन करना-सिनोचल्ली देश । - . - अधिक पूनते थे परन्तु प्रानकल मसोही जिस मे मूर्ति घरी रहती सो छोटी औ धर्म उन लोगो मे फैल गया है। वहा पच्छिमी निकम्मी रहती है। श्रीरंग के मन्दिर में सा घाट मे पहाड बहुत देखने मे पाते है। इस प्रागन एक दूसरे से घिरे हुए है। उस चित्र में हम देखते है कि पापनाशन नाम जो भीतर की कोठरी के समीप है व एक नदी घाट के ऊपर से गिरती है और गृह है जो हमार खभी का वैठका नाम हिन्दू लोग कहते है कि जो कोई इस झरने विख्यात है। यह खभे १२ फुट ऊचे है जो के जल मे स्नान करे से अपने पापा को एक दूसरे से दस २ फुट दूर है। हर एक धावेगा । कामारिन अर्थात राजकुमारी नाम एकही पत्थर का बना हुआ और घोडा बहुत बालू का एक अन्तरीप है जिस की नोक पर एक चित्रकारी से विभूषित है। इस के बाहर चार कालो चटान है सो हिन्द का अन्तस्थान है। प्रांगन है जो मन्दिर के सेवको और ब्राह्मणे। के लिये है और लोग कहते है कि इन में १0,000 लोग बसते है। सब से बाहर का भागन एक धर्मशाला और बाजार इनहा याची लोग दक्षिण हिन्द के बठे मन्दिर । टिकते और भोजन पाते है। बाहर की भीत माघ मोल'से अधिक लघोफाटक की उत्तर हिन्दुस्तान के मन्दिरो की अपेक्षा चौसटे ४० फुट ऊषी एक २ पत्थर की बनी है दक्षिण के मन्दिर बहुत बडे है। बहुधा वे और वह पत्थर लिन से छत पटी हुई हैं २४ चौसोण बने है और दोनो और बडे ऊंचे फुट लवे है । बडे फाटकों के ऊपर नो बुर्ज पत्थर के फाटक हैं पर वह बीचधालो कोठरी है सो कभी समाप्त न हुए। T - हिन्दुस्तान देश की याचा। ११९ 7 स्त्रीयली पुत्र का साल- -सिनोवेली में। देखने मे दक्षिण के कितने मन्दिर अच्छे घरन समझते है कि उन्हो ने धर्मकार्य किया है पर बहुतो में एक कुरीति है जिस से है । देखिये कि मूर्तिपूना से प्रादमी कैसे चाहिये कि पण्डे लोग लज्जित हो अर्थात जड मूर्ख बन जाते है। सन ई० १८८१ को मन्दिर को सेवकाई में वेश्या लोग रहती है लोकगिन्ती से यह प्रगट हुमा कि मन्दरान जो देवदासो कहलातों और याषिया से कुकम्म प्रेसिडेन्सो के मन्दिरो के पास ११५०३ ऐसी करती है। ये बचपन से इस कुचाल को देवदासिया पाई गई । कुछ आश्चर्य नहीं सीखी और नाना प्रकार की जातो से कि लोग मन्दराज को प्रकार का देश नाम पाती है। यह धुरा दस्तूर है कि कभी २ देते हैं। सोचिये कि नय लोग इस रीति से माता पिता किसी बालक के उत्पन्न आने से महापाप को पुण्य समझते पार कुकर्म का पहिले यह सकल्प करते है कि यदि लडकी धर्मसेवा बताते है और कुचाल से अपने उत्पन्न होतो हम उसे मन्दिर में देवदासा होने मन्दिरी को भी भए करते है और इस के लिये भेज देगे पार इस महापाप के करने युराई को देसमें पण्डित और ज्ञानी लोग से लोग माता पिता को निन्दा नहीं करते चुप रहते अथवा इन कुरीता को सुप्ति 1 1 । हिन्दुस्तान देश की यात्रा। महाराजा का ताला माना। - साहिब प्राप थोड़ी देर के लिये कहार बन- खाने पाता है। बावनकार में जाति का बडा कर कहारो के सा ब्राह्मणों की पालकी विचार किया जाता है। भाज्ञा है कि पुला- को ले चलता है तब उस जल को जिस मे यन अर्थात नीच लोग तो है सा ब्राह्मण से ब्राह्मण ने पांव धाया है पाप पी लेता है । ६६ कदम दूर रहे जो ताडो के बेचनेहारे है महाराजा जाति का शूद्र सोने की सो ३६ कदम दूर रहे बरन नायर लोग भी गाय के पेट में पैठ के निकलता तब द्विन बनता जो शूद्रोंमे उत्तम समझ जाते है सो ब्राह्मण है। उस मूर्ति की तौल इतनी रहती है जितनी को छूने न पावे। परन्तु पाजकल यह व्यवस्था कि महाराजा की होती है और पीछे वह मूर्ति कम मानी जाती है। विधानद्रम में नो मुख्य ब्राह्मणों को दिई जाती है। चिध में हम देखते नगर है एक घडा कालिन पाया जाता है। है कि मूर्ति के बनाने के लिये सोना तोला जाता और दूसरे पलडे मे महाराना बैठा है। दिन बनने के पीछे महाराना अपने घराने के लोगों प्राचीन और नयीन हिन्दुस्तान की दशा।' के संग भोजन नहो खाने पाता बरन जब सानी लोग जानते है कि माधीन हिन्दुओ 'नाक्षण लाग खाना खाते तब उन्हे देख की अपेक्षा मानकाल के हिन्दवासियों की सकता और अपना भोजन वन के सन्मुख अच्छी दशा है परन्तु साधारण लोग इस - हिन्दुस्तान देश को याचा । १२३ - . उन्नति को नही जानते है । और देशो में वे काव्य की रचना को चाहते थे और कथा भी यह दस्तूर पाया जाता है कि लोग पूर्व कहानियों को जैसे रामायण महाभारत विष्णु काल को सोने का युग अर्थात सुख का समय पुराण आदि है बहुत सुनते थे परन्तु यह 'पार पान के दिन को कलियुग अर्थात पाम वूझना कि यह बातें कहा तक सत्य और कहा का राज्य बताते है । एक कारण यह है कि तक झूठ है अथवा यह पूछना कि उन दिनो अब के खो को भली भाति जानते है की सच्ची दशा कैसी थी ऐसी बात किसी के परन्तु प्राचीन सो को जो बढकर थे कुछ मन में न पाई । सो प्राचीन दशा को ऐसी नहीं धूझते हैं। वैसाधी बूढो का दस्तूर है समझते है जैसी कि काव्यरचको की मनमता कियह कहा करते है कि हमारी जवानी में से गाठी गई है। विनाम बहुत अधिक था पर अब विपत्ते यहा दो चार लामा का वर्णन होगा जो बहुत है। इस प्रकार के घचन को सुलेमान सर्कार अगरेज के यत्नो से हिन्द को प्राप्त हुए है। महाराना ने अर्जित किया कि यह न कहना १-महिला लाभ यह है कि अघ राजा कि प्राचीनकाल अच्छा था क्योकि ऐसी राजा से लडने नहीं पाते है जैसा पूर्वकाल मे समझ मज्ञानियों की समम है। लडा करते थे। जैसा कि लार्ड डफरिन साहिब ने अजमेर मे कहा कि सकार अगरेज के पाने से पहिले हिन्द की दशा लडने की दशा थी घोडे साल हुए निन में हिन्द की जमीन अपने निवासियो के सघिर से कही सोची न गई । घरन ऋगवेद के पढने से जाना जाता है कि प्राचीनकाल में भी यह लडना झगडना होता रहा । उस में प्रगट है कि पार्य्य लोग सदा दस्यु लोगो से युद्ध करते रहे और केवल यह नही घरन एक पायं प्रधान दूसरे से लडता था। उन में ईपी और वैर और द्वेप बहुत रहता था और सब अपनी अपनी बडाई चाहते थे सो झगडा करने से बहुत कारण थे। फिर सैकडो वर्ष लो प्रार्थ लोग उत्तर से प्राकर दक्षिण की ओर बढ़ते लार्ड साहसडेन । नाते थे और आदि निवासियों को अपने वश 'हिन्दवासी इस बात में इस कारण अधिक मे करते थे। धोखा खाते है कि पूर्वकाल की दशा को सत्य है कि उन दिनो का ठीक इतिहास बिलकुल नहीं जानते है। एक संस्कृत के नहीं मिलता है परन्तु उन प्राचीन कहानियो शिक्षक ने कहा है कि पूर्वकाल के हिन्दू से जो पब लो है प्रगट है कि उन दिनों में लोग इतिहास का नाम तक नहीं मानते थे। हिन्द में बडी गड़बडी होती रही नेहा एक - 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।२४ हिन्दुस्तान देश की याया। कहानी में यह है कि परशुराम ने एक्कोस इस के विरुद्ध मानकला के सुखचैन को बार क्षधी लोगो को नाश किया और उस ने देखिये । नप से सकार अगरेज यहा प्रबल उन के रुधिर को बटोरकर पाच घडे ताला हुई तब से किसी बाहर के बैरी ने हिन्द में का भर दिया। फिर महाभारत की पुस्तक प्रवेश नहीं किया न कोई राना राना से लड़ने घडी भारी लडाइयो से भरी है कि जिन से पाता है। सन १८५७ के बलवे को छोड़ देश- दोनो वैरी की सेनाए नाश हुई । यह भी बामी चैन से रहे हैं । पजाय कायुल धमा जाना जाता है कि पूर्वकाल मे देश छोटे २ प्रादि मे अगरेना का कुछ झगड़ा हुआ है राज्य में बाटा गया था जो सदा आपस मे परन्तु ऐसा नहीं कि जिस से हिन्दवासियों लडते मगडते थे। फिर एक ही राज्य मे एक पर विपत्ति पडे। हम चैन की रोटी खाते घराना गद्दी से दूर किया जाता और दूसरा है और वह सकार की सेना जिस से यह सुख बिठाया जाता था। बचाया जाता है कुछ बहुत बडी नही है। फिर सोचिये कि बाहर से हिन्द देश पर यदि उस का समस्त व्यय जैसा सन ई० १८८३ कितनी चढाइयां शिई गई और उन मे में होता था सो सप हिन्दयासियों में वाटा कितने लाखों बेधारे घात किये गये । नब जाता तो हर एक को मासिक केवल एक महमूद गजनवी बार र सेना सहित हिन्दुस्तान पाना दो पाई देना पडता माना हर एक में आता था तब देश की कैसी दुर्दशा रही। चौकीदारी के लिये इतना देता है। जब तैमूरलग और नादिरशाह और अफगानी २-दूसरा फल यह है कि डकैती ठगाई प्रधान बार २ उत्तर से धावा करते थे तब चोरी आदि पहुत रोकी जाती है और देशो हिन्द देश कैसा दुःसित हुभा। में चार पाये जाते हैं परन्तु हिन्दुस्तान में फिर बाहर के वैरियों को छोड भीतर एक अद्भुत बात यह है कि जैसा योद्धामा भी ऐसे दुए पाये गये जिन के झगड़ी से देश की नाति और व्यापारियों की जाति है इसी की बड़ी हानि हुई जैसा कि एक बार जब गुल- रीति से सो नाति ऐसी है जिन के लोग घर का सुलतान मोहम्मदशाह विजयनगर जन्म से चोरी उगाई को अपना उद्योग सम- के महाराजा करने लगा तब उस ने मते है। ये लोग पूजा करके अपने काम को कुरान पर किरिया खाई कि नब लो एक निकलते घे और जब किसी को लटते मारते लाख काफिरो को बध न करू तय लो तला तब कहते कि हमारी देवी की प्राशीय इम, बार को काठी मे न रक्यूगा । और मोहम्मदी पर हुई इमारी देवी हमारे काम से प्रसन्न इतिहासरचक इस बात पर नय जयकार है । जब लूट मार करने में नरहत्या हो जाती करते है कि उस युद्ध के समाप्त होने से थी तो वे निश्चिन्त रहते थे बरन वे पीछे से पहिले पाच लाख काफिर मुसलमानो के हाथ इन पापों का ऐसा वर्णन करते थे जैसा कोई मे मारे गये पीर सैकडो वर्ष तक कर्नाटक शिकारी बर्णन करता है कि मैंने कितने धन- उनाड और सुनसान पड़ा रहा। फिर ऊपर पशुओ को मारा है। इन जाति के चारो के वर्णन मि मरहठा लोगो के प्रयल होने उपरान्त और भी बहुत से लोग थे ना चोरी से देश की कैसी दुर्दशा हुई। डकैती करते थे। इन लोगों के डर के मारे 1 . AnurahatranamainamrakaMAL हिन्दुस्तान देश की यात्रा। यह दस्तूर हो गया था कि जिस किसी के और देश में तैयार न पास सोना चादी होता तो वह गाडके जमीन हिन्द के किसान बहु में छिपा देता था। पर इस से भी घन न है परन्तु इस का काम 'बचता था क्योकि डाफू लोग मालिक को कितने लोग कहते है। अत्यन्त दुख देके उस से पूछते थे कि तू ने होता सो विलायत के अपने धन को कहा गाड दिया है। कारण से किकिसान है परन्तु कारण यह खेता पर कम बरमत' पर नहीं घरसता है कि इस विपत्ति से व प्रच्छा उपाय यह है कि नाये पर कि बहुत उन के जल को नहरो इधर उधर खेतो में पहुं मील नहरोके और हिन्दुस्तान में बन चुके अपेक्षा अव कुए और त यो हर साल करोडो रु यह बात सत्य है कि कोई लेग चोरी को उत्पन्न होता है और ना बिलकुल नहीं रोक सकते है। कभी २ दुष्ट तब लाखो प्रादमियों के लोग बडी दुष्टता करते है। पर सर्कार ने ४-चौपया लाभ यह है ऐसा इन्तिजाम किया है कि चोरी डकैती सहज से भ्रमण कर प्रय हिन्द देश में बहुत कम है यरन और इतनी पक्की सड़के और भी कम होती जाती है। सन १८६० की अपेक्षा और इतने अग्निनोट चर सन १८८७ में घन्दीगृह के कैदी एक चौधाई की याचा सहन हो गई है कम हो गये और निवासियों की गिन्ती बहुत की अमल्दाती में लय को बढ गई। फिर पोलिस का व्यय बहुत अधिक चाहता था तो बाधा पाल नही होता है। सन १८८२ मे पोलिस की मैं वा टट्ट पर सवार है। गिन्ती १,३०,३०० यो तिस का व्यय साल में यदि वह न मिले तो पैदल २,३०,८१,४३३ रुप्रिया होता है अर्थात इर एकमा सडक नहीं थी तह हिन्दवासी को दो पाई मासिक इस प्रकार वा कटी पर लादक भेजते ठगी का चित्रा हिन्दुस्तान देश की यात्रा -- पाया। नहों था और यो लाखों पादमी भख से मर ज्ञानवान कहते है कि पिछले सौ वर्ष जाते थे। अब सकार से १८,000 मील रेलवे बीच में चार सौ करोड रुपयो का सोना चांदी के गार १,४0,000 मील सडको के बन चुके है विलायत से अाकर हिन्दुस्तान मे एकट्टा और हर साल और भी बनते जाते है और किया गया है। इस मे से एक बडे भाग को हर साल ११,00,00,000 पादमी रेल गाडी में लोग शहना बनाकर अपने घरी में रखते है। सवार होकर यात्रा करते है अर्थात इतनी पर कई बप से यह दस्तूर हो गया है कि रेल की टिकट हर साल बिकती है। सागर समस्त माने की जो ससार भर की साना से तीर के सब कोली मे अगियोट चलते है निकाला जाता है चौथाई और समस्त चादी और यात्री बबई से सोलह रीज में इङ्गलिस्तान की तिहाई हिन्दुस्तान में पाके रहती है। में पहुच सत्ता । बडी २ नदिया मे ६-छठवा लाम यह है कि आजकल लोगो जैसी गगा यमुना इण्डस प्रादि पर पुल को भला चगा रखने के लिये बहुत : उपाय बाघे गये है और पूर्वकाल की अपेक्षा याची किये जाते है जैसा यह कि कितने बडे नगरी का बडा घिनाम मिलता है के घासियो को अब नल का पानी पिलाया ५-पाचवा लाभ यह है कि हिन्दयासी जाना और इस से हैना का डर कम रहता बहुत माना चादी को बटारा करते है। फिर कुनैना तप रोग की सत्र में अच्छी ।
हिन्दुस्तान देश की यात्रा १८७ - पौषध है अब सस्ती पिकती है और सकार करते थे। पानक्षल ऐसे लोग अधिक पढाये -उस वृक्ष को जिस से यह पौषध प्राप्त होती जाते है और अधिक मासिक मिलता है सो घहुत लगवाती है फिर टीका लगाने से अन्याय कम किया जाता है। हां कभी अगणित लोग शीतला रोग से बचाये जाते अन्याय किया जाता है निस को सकार रोक पार नगर बस्ती में हर मही अस्पताल नही सकती पर बहुत करके न्याय से रक्षा और ग्रीषधालय खुल गये है बरन स्त्रियों को भरने में बड़ी उन्नति है। सहायता के लिये अस्पताल अब बहुत है । हण्टर साहिब ने कहा है कि यदि कोई इन उपायों से कितना के प्राण बचाये जाते है। हिन्दू जो सो बर्ष पहिले मर गया फिर | लीवता हो सकता और पानकल हिन्द की सैर कर सकता तो कैसा पाश्चर्य्यित होता। लय इस बात को देखता कि सैकडो वर्ग मील जमीन जो उन दिनो में जङ्गल और धनपशुओ से भरी हुई घो अब अच्छे खेता और बारिया से लहलहाती है और जहां बडे २ दलदल थे जिन से ऐसो बुरी हवा निकलती थी कि जिस से बहुतो को तप रोग हो जाता था अब सुखाये गये और मनुष्य काम में लाये गये है और बडी महाड की श्रेणिया जो भीत की नाई एक देश को दूसरे से अलगाती थी अब सड़कों और रेल -सातवा लाभ यह है कि अब बहुत से के द्वारा से मिलाई गई है और लोग सहज स्कूल माठशाले कालिज प्रादि खोले गये है। से पार जा सकते है और बडी २ नदिया जो पूर्वकाल में लोगो सा पढाना राजकार्य समझा उन दिनो में यात्रियों को रोकती थी और न जाता था परन्तु सकार गरेन इस को कमी २ बाढ के द्वारा बहुत जमीन को लाभदायक कार्य समझती है और इतने स्कूल बिगाडती थों सो अध पुल के बाधे जाने से कालिज आदि सोले गये है कि सन १८६० मे बटोही को नही रोकती और नहरो के द्वारा इन में छतीस लाख लडके लडफिया पढाये से उन का जल खेती में पहुंचाया जाता है। जाते थे। पर एक और बात इन से बढके उस का ८-पाठवा लाभ यह है कि प्रजा के अद्भुत देस पडती अर्थात यह कि मना'मान- मिश्राम के लिये प्रब अधिक्ष चिन्ता किई कल कैसे चैन से रहती है। उन दिना में जाती है। पूर्वकाल में सकारी सेवक क्षोतवाल प्रधान से ले किसान ली हर एक मनुष्य थानेदार प्रादि लोगो की मासिक कम दिया हथियार लिये फिरता था परन्तु मानकल जाता था और लोगो को तग करके वे अधिक कठिनता से कोई सलवार वा बन्दुक देसने फमाते थे। उन मे से बहुत अन्याय से लिया में पाती है। नय देशी राज्यों में हाक लेवानेधारे। - .
१८ हिन्दुस्तान देश को यात्रा। । करके नहा उन दिनो मे राजा राना से लडा' करता उपन विलायत भेकी जाती है सो देश धनहीन अाजकल क्या देखेगा कि वे आपस मे सुख होता जाता है। परन्तु इस बात के बहुत से लेन देन करते और सड़के और रेलवे और से प्रमाण हो सकते है कि हिन्द धनहीन डाक और तार मानो प्रेम की डोरियो से नहीं बरन धनवान होता जाता है, और इस उन्हें एक मे जोड देते है। फिर वह देखेगा धन की बढ़ती उन साहिबों के द्वारा से होती कि न केवल बहुत सी प्राचीन बाते बदल गई है जो प्रजा को सुखचैन में रखते है और बरन बहुत सी नई बातें प्रचलित हो गई है। उन्हे लडाइयो के कष्टो और लुटेरी के धावा सब बड़े नगरो मे नये प्रकार के बडे २ गृहा से बचाते है । सत्य है कि लोग बहुत को देखेगा न वह बता सकेगा कि यह किस धनहीन है परन्तु स्मरण करो कि प्रारम्भ में अर्थ से बने है क्योकि पूर्वकाल मे कही ऐसे उन की यह दुर्दशा होती आई है और केवल गृह हिन्दुस्तान में दिखाई न देते थे। यदि आजकल उन को घोडी सी छुट्टी होने लगी पूछे कि किस राजा ने उस सुन्दर बारादरी है। न हिन्दुओ के राजाओ मे न मोगल को अपने विनाम के लिये बनाया है तो उसे पठान के बादशाहो में कोई ऐसा था जो यह उत्तर दिया जायगा कि वह गृह महाशयो उन्हें इतना सुख दे जैसा वे अब पाते है। के सुख के लिये नही बरन दुःखिया के विश्राम इस का एक प्रमाण यह है कि पूर्वकाल के लिये बना है क्योकि वह अस्पताल है जहां मे लोग बहुधा ऐसे कङ्गाल थे कि वे पैसों में बङ्गाल और भिखारी भी रोगी होकर जा नहीं बरन कौडियों से अपना लेनदेन करते सकता है। यदि कोई पूछे कि वह जचा २ थे । लाखो रुपयों की कौडिया हर साल देश मन्दिर किस देवी के नाम पर बना है तो में लाई जाती और लोगो के काम में आती यह उत्तर दिया जायगा कि वह किसी देवी थो। अाजकल लोगो की इतनी उन्नति हुई के लिये नही धरन नगर के लडको के पढाने कि कोडी अवश्य नही वरन, पैसा से बहुधा के लिये कालिन धना है। जहा गढ और काम चलता है। कोट पूर्वकाल मे बने घे तहा पानकल कचहरी पाई जाती है। ऐसा अदल बदल देखझे उस काल से हिन्दू का मन क्याही घघरा जाता। . - चीन का काशा हिन्दवासियो की दरिद्रता का क्या कारण है। आनकल कितने हिन्दू सकार अगरेज की निन्दा यह कहके करते है कि हिन्द के चीन देश के निवासियों की भी घडी दरित निवासियों की बड़ी दरिद्रता हो गई बरन द्रता है और गाव २ में काश नाम एक प्रीतल बढती भी जाती है और इस का यह कारण की वस्तु निस में छेद रहता जिस के द्वारा बताते कि साहिय लोगों को बडे २ मासिक व पिराई जाती है पैसे के काम में पाती दिये जाते है और इस कारण से हिन्द की है। बडे २ नगरो में डालर अर्थात दो संपिया - 1 - H । का सिक्का चलता है परन्तु दिहात में जाकर के कारण से भेजे नाते अर्थात उन रुपयो के डालर की सन्ती काश को काम मे लाना पडता सूद के लिये जो वहा से उधार लिये नात है और ये ऐसे सस्ते है कि दो चार डालर और उन सेवको के मासिक के लिये जो हिन्द 'के काश एक मजूर का बोझ होता है अर्थात १000 देश की रखवालो के लिये परिश्रम करते है। वा १२00 एक डालर की सन्ती मिलते है। इस पिछले व्यय के विषय में यह विचार वे कैसे कङ्गाल लोग है जिन के पैसे ऐसे है । करना उचित है कि यदि समस्त यूरपवाले सत्य है कि यदि राजकार्य अगरेजो के चाहे साहिय हो चाहे सिपाही को हिन्द को हाथ में नहीं चरन घगालियों के हाथ में छोडके चले जाये तो एक २ हिन्दबासी का छोडा नाता तो मासिक कुछ कम देना पडता महसूल केवल एक पाना मास घट जाता परन्तु सब ज्ञानवान जानते है कि उन से और इस घोडे पचाव का यह फल होता कि रानकार्य ठीक न चल सकेगा और कि देश देश मे वही लडाइया फिर हो जाती ला की फिर वैमो दुर्दशा हो जाती जैसी उन पूर्वकाल मे थी। गडबडी के दिनों में थी । और जो अगरेनी नाति के बन्धना कारण से और काला पलटन न हो तो हिन्द देश को रुस लोगो पानी के डर से हिन्दू लोग परदेश की यात्रा के उपद्रवी राज्य से कौन बचा सकेगा और जो करने से रुके रहते है और इस लिये धीर विपत्ति भी न पड़े तौभी पहिले की नाई सन्ताना के समान वे परदेश का व्यापार करके हिन्दू मुसलमान देश के अधिकार के लिये धनवान नही हो जाते है। फिर जाति के लडने लगते । क्या ऐसे झगडो के बीच में कारण से हिन्दू लोग नये २ उदयोग कम । प्रजा अधिक धन कमा सकेगी। इस बड़े निकालते और बहुत करके वही उदयोग करते बचाव का व्यय यात थोडा होता है क्योकि जो उन के पुरखा के घे और इस लिये धन यदि यह व्यय समस्त हिन्दवासियों में बाटा कम कमाया नाता था परन्तु पालकल लोग जाता तो केवल दो रुपया साल हर एक को इन बेडिया को हानिकारक समझके तोड देना पड़ता। उन देशो में ना शिष्टाचार फेकने लगे है सो पासरा है कि योस एक फैला हुआ है ऐसा कोई नहीं है नहा इतना वर्ष में देश को यडा लाभ होगा। घोडा महसूल मालियाना लगता है। मान्स राना सर माधवराव ने जो धर्म देश के निवासियों में से एक एक को इस का तक दो बडे देशी राज्यो का मबी घा हिन्द. अर्थात ४८ रुपया साल महसूल यासियो की दरिद्रता के विषय यो कहा कि देना पडता है । इटाली देश के लोगो को १३ गुना जितना अधिक सोच विचार करता पार अर्थात २६ रुपया इङ्गलिस्तान के लोगो को हिन्द देश को दशा को जानता हू उतना १२ गुना अर्थात २४ रुपया और रूस के लोग अधिक यह बात प्रत्यक्ष हो नाती कि सकल को ६ गुना अर्थात १२ रुपया साल महसूल देना नगत में ऐसा देश नहीं है कि जिस के पड़ता है। निवासी सझार से इतना कम कर पाते और फिर सोचना चाहिये कि जो रूपये इग. इतना बहुत दुस अपनी करनी में माम करते लिस्तान में यहा से भेजे जाते है तो दो बातो जैसा कि मेरे हिन्द्र भाई उठाते हैं और नम चौबीस गुना 33 ।३० हिन्दुस्तान देश की यात्रा। वे पाप अपने खो को बढाते तो यदि नी चाहिये बरन किसी प्रकार की कारीगरी वा चाहे तो उन्हे घटा भी सकते है। इण्टर काश्तकारी करने में उद्योग करना चाहिये साहिब से बढकर कोई पादमी हिन्दुस्तान अर्घात सानेदार नहीं बरन उत्पन्न करनेबारे की ठोक दशा नहीं जानता है और उस की हो जायेा थोडे ऐसे लोग अवश्य चाहिये ना साक्षो यह है कि हिन्दुस्तान की दरिद्रता के सकारी नौकर और वकील धादि हो परन्नु उपाय हिन्दधासियो के हाथों में है अर्थात यह सोचे कि ये लोग बहुत करके देश के उन की दरिद्रता के कारण ऐसे है जिन को धन को नहीं बढाते वरन केवल उसे व्यय वे अपनी शक्ति से मिटा सकते है। करते है सो जब उनकी गिन्ती बढनाती तब देश धनहीन बन जाता है। 1 किसान . देश की भलाई के लिये सकारी उपाय । हम यह समझते है कि इस पिछले सौ बर्ष के बीच में देश की भलाई के लिये सकार अंगरेज से इतना किया गया है जितना देशो राज्यो के जमाने में इजार बर्ष के बीच में किया गया था और यह उन्नति अभी समाप्त नहीं हुई। मीर हिन्द के लाभ के लिये और भी बहुत उपाय निकालेगी परन्तु स्मरण करो कि यदि प्रना सार को बैरी और उपद्रवी समझे और हर एक नई बात और नये दस्तूर को चाहे वह कितना ही लाभदायक हो, शक्ति भर रोके और समस्त उन्नति से लडती रहे तो सार लाचार होगी। २-दूसरा उपाय यह है कि लोग अनर्थक वे लोग जो सकार में और प्रना में बैर और व्यय विवाहा और श्राद्धों के लिये न किया संदेह और द्वेप उपजाते है स्वदेश के मित्र करें। लब लो इस रीति अपने रुपयो को, नहीं है। स्वदेशमिष उन ही को कहना निलाभ वातों मे उडाते रहे सबलों देश की चाहिये जो हर बात में अपने लोगों की दरिद्गता किसी रीति से न जायगी। उन्नति चाहते है। ३-तीसरा उपाय यह है कि देश के निवासियो को पूर्व दृधि भरना अर्थात प्रागे की चिन्ता करना उचित है। बहुत ये उपाय जो हिन्दबासी अपने देश की बालको के समान है। ना कुछ हाथ लगे उन्नति के लिये कर सकते है। पान को खा पी जाते गौर नही सोचते कि १-पहिला उपाय यह है कि लो हिन्दू कल उस का और भी प्रयोजन होगा। धे, विद्यार्थी है, उन्हे धारिष्टर वकील प्रादिशेनान यह नहीं सोचते कि वह दिन प्राता कि खिम - -- . -- Shras - मे रुपये' अवश्य होगे न कुछ पा रखते बराबर था और यह हिसाब ठोक होगा सो अघ वह दिन प्राता तब धनिये के पास क्योकि छ घर्ष में अर्थात सन १८८१ से लेके जाना और बडा सूद देना पडता है सो १८८६ तक ६१ करोड पात साना २२ करोड करोडों रुपये नियोजन बनिये और महा- ५० लास रुपये का और चांदी ३८ करोड १७ जन लोगों के हाथ में दिये जाते है। लाख रुपये की हिन्दुस्तान में प्राई । इस धन '-चौथा उपाय यह है कि अगणित का सूद नो हिन्दवासियों को मिलता तो उन सोनार नो है सो लाहार वा यढई हो जाये । को क्या हो बडा लाभ होता । - पिछलो लोकगिन्ती में हिन्द देश में ४,०१,५८२ सोनार पाये गये और केवल ३,८४,000 लोहार पाये गये । यदि एक २ सोनार घट बढ़के लेखे से छ. रुपया मास कमाता हो तो साल में २८९ लाख रुपया उन्दों को दिया नाता है। इतने सोने चादो के गहने किम पर्थ से बनाये जाते है। ५-पाचवा उपाय यह है चाहिये कि लोग उस सोना चादी को जो अब घर में छिपा रखते है किसी रीति से काम मे लाये निस्ते उस के सद से लाभ उठाये। ज्ञानवान कहते है कि हिन्दयासियो के घरो में दो से करोड के गहने रक्खे हुए है। यदि सालियाना १२ रुपया सैकडे के सूद पर इतना धन दिया जाता सो जमीन के महसूल की अपेक्षा दिन्यू स्तियां के गहने । जा सकार को दिया जाता अधिक प्राप्त होता। ६-छठवा लाभ यह है कि हिन्दू लोग बहुत लोग ने। रुपयो को उधार देते सो सूद विवाह करने में सावधानी करे। उन का के लिये साल में १२ वा २४ रुपया सैकडा बचपन में विवाह करना विशेषकर एक भूल प्राप्त करते है परन्तु गहनों का सूद पर देना से सबन्ध रखता है। भूल यह है कि वह कठिन है सो विलायतो लोग जो गहना से जिस का पुष न हो ना पिता का श्राद्ध करे मोक्षित नहीं है इस सूद को प्राप्त करते है । सो पुप्त नाम नरक में डाला जायगा। यह एक देशो समाचारपत्र में यह लिखा है कि बात प्रसत्य है वह जो घर्मी है चाहे घिन इस सदी में इतना सोना चादी हिन्दुस्तान पुध मरे मुक्ति पावेगा और वह लो प्रधर्मो में पा चुका है नो ४,४२,८३,८६,२00 रुपये के है चाहे उस के दस पुष हो से अपने पापा । - 1 14 ३२ 1 हिन्दुस्तान देश की यात्रा। . r - - का फल भोगेगा । बच्चा का विवाह करना जो पीछे रह जाते है बहुत लाभ होता है । हा एक कुरीति है जो और देशों मे बहुत ब्राह्मण लोग सेसा न हो कि लोग हमारे घश से कम पाई जाती है और देशवाले यह विचार कुटे सभा को जो विलायतकोनाते सापित वता करते है कि जब लो लडका स्याना न हो येतोभो लोगो को सांचनाचाहिये कि किस बात और अपने घराने की रोटी कमा न सके तम से हमारा लाम हो सकता है और यदि कोई को लो बिवाह करना उचित नही है। और जब कि मैं हिन्दं देश के बाहर न जाऊंगा तो भला, लो लड़का लडकी स्याने न हो और ऐसे भारी हिन्द के भीतर भी कितने स्थान है नहा प्रादमी' कार्य के कर्तव्य को न समझ सके तध लो कम है उन्हो को ढूढो पार काम मे लाओ। विवाह करना धर्म नही है। फिर जलदी ८-पाठवा उपाय यह है कि जब जाति विवाह करने से और इस की चिन्ता न की जजोरे तुम्हे किसी लाभदायक काम से करने से कि ये लोग बालक को पाल सकेगे वा रोकती है तो उन जजोरी को उतार फेको। नहो लोगों को गिन्ती अधिक बढ़ जाती है कितने काम ऐसे है कि जिन से जीविका और लोग अवश्य करके दरिद्र हो जाते है। भली भाति मिल सकती है भली भाति मिल सकती है. परन्तु लोग उन्हें 8-सातवां उपाय यह है कि नघ लोग नीच ठहराके उन से अलग रहते है । परन्तु अपने स्थान में जीविका नही पा सकते तोकही सोचो कि पाप को छोड कौन बात नीच है। चलकर काम ढूढना चाहिये । और देशी मे लोग ऐसो चतुराई करते है कि नब एक देश मे रोटी न मिले तो दूसरे देश को नाते है पर बेचारे हिन्दू अपने देश में पडे २ भूखा मरना उचित समझते है। जब एक ही वर्ग मील नमीन मे ५०० वा ८00 आदमी बसते है तो जमोन इतना के लिये राटो उत्पन्न नहीं कर सतो तो यदि बहुत लोग परदेश चले जाये जहाअधिक रोटी हा तो उनके लिये जो नाते और उनके लिये भूदेव पूषा। F ।
हिन्दुस्तान देश की यात्रा । १३३ - -नवा उपाय यह है कि पिन्दयामी अपनी कर सकते उन को कुछ देना उचित है परन्तु बुद्धि और ममम को काम में लावे । यात भले चगो का सेत घी खिलाना अच्छा नहीं है। करके लोग यह नहीं पूछते है कि कौन यात सन १८८१ की लोकगिन्ती मे घारह लाख से मकी है घरन यह पूछते है कि दस्तूर क्या अधिक बैरागी और भिखारी हिन्द देश में वे लाकरोति से जो जितनी बुरी क्यों न पाये गये और परिश्रमो लोगों को उन्हें पालना हो प्रसन्न होस है। क्या पर बात मे पुरसा पड़ता है। क्या आश्चर्य है कि लोग बहुधा ' को लीक पर चलना धर्म है। यदि ई तो धनधीन रहते है। श्वर ने वृथा हम को चैतन्य बनाया ११-यारहवा उपाय यह है कि लोग मांग है। नय कि लोग समझ बूझने काम नहीं धतूरा अफीम मा प्रादि को न पिया करे । फरते यरन ज्योतिपियों से पूछक करते और ठगड देशो की विशेष कुरीति यह है कि वहा शुभ अशुभ समयों का विचार करते पार के लोग यहुत रम वैन ब्राडो प्रादि को पिया कोवा छिपकलियों गदो से लक्षण वूमो करते है और इस से बहुत घराने बिगड जाते पगुवाई पाते है तो उन की दुर्दशा अवश्य है। यदि यह कुरीति गर्म देशो मे भी फैल होगी। ईश्वर ने हमारे हिन्दू भाइयों को जाय तो घडे शोक की बात है और डर है अच्छी समझ बुद्धि दिई है ताभो इस को काम कि यह कुरीति हिन्दुस्तान में फैली नाती । मे न लाफर ये शगुन ढूढते और ज्योतिपिया है । सन १८७४ में प्राधकारी का महसूल पढाई को बुलाते और पपने बहुत कामो को बिगाड करोड रुपया था और १८८५ में चार करोड था देते हैं । इस धेतु से हो और सन्तान ज्ञान से बहुत बढती हुई और जो कुछ इन वस्तुन से चलते सो उन से आगे बढ़ जाते है। के लिये दिया जाता से लाभ के लिये नहीं १०-दसवा उपाय यह है कि भिखारियो घरन हानि के लिये दिया जाता है। का पादर न करना। और देशो में भी भिखमगे १२-मारहवा उपाय यह है कि हर कोई है परन्तु इस लिये कम है कि लोग भीख यह सोचे कि मै अपने लाभ के लिये क्या कर मागना अपमान को यात समझते है पर यहा सकता हू औरा के भरोसे से नही बरन अपने कठिन घात तो यह है कि जब कोई मोटा परिश्रम से कमाई प्राप्त होती है। बहुत ताला आलसी जन ऐसा सुस्त पार सुखभागी लोग जब अपनी सुस्ती और निश्चिन्तता से हो जाता कि उदयोग करने से थक नाता तब दु सी हो जाते तब कहते है कि मेरो किस्मत योग वैराग करने लगता और लोग कहते है युरी थी धा यह विपत्ति मेरे कर्म मे लिखी कि साधू नी पाये है उन को खिलाना चाहिये। थो सो वे उस विपत्ति से छूटने के लिये कुछ ये छुडार देश की कमाई को खाते है।'न भी यन नहीं करते है । यह बडी मूर्खता है। केवल यह पर ना धन सुस्ती से प्राप्त होता चार लोग अपने दुखों का दीप सकार पर सो बहुत करके कुचाली में जाता है। ये लगाते है परन्तु हमारी समझ में नम प्रमा वैरागी लोग कुकर्म में प्रसिद्ध है और भाग श्राप परिश्नम न करेगी और चतुराई से न धतूरा आदि के पोनहारे उन में बहुत है। चलेगी और कुरीतो को न त्यागेगी तो किसी तो लूले लगडे अन्ये है और परिश्रम नही रीति से सर्कार से सुखी न हो सकेगी। , + - ३६ हिन्दुस्तान देश की यात्रा * . - 1 मस्त हिन्दुओ को एक ही जाति से बताया। जब ब्राह्मणों ने देखा कि इन को पूना उस को मत के प्रचारनेहारे दूर २ स्थान लो मिटती नहो तब उन्हो ने इन दिहाती देव. वले गये । यहा लो कि सैकडो वर्ष ला काशी में ताओ को शिव विष्णु प्रादि के अवतार पार यह मत स्थापन हुआ और प्रियादासो अर्थात रूम बताकर उन को माना अपनाया और प्रसोका बादशाह ने जो इस मत को मानता था | इस से प्राजकल की पूना में बड़ा गडबड है अपना राज्य बहुत पैलाया और वह मत लङ्का क्योंकि कोई मानता पार और कोई मानता नेपाल ब्रह्मा सिमाम चीन जापान आदि देशो पर और दोनो कहते है कि हमारी बात में पहुचाया गया। पीछे को ब्राह्मणों का मत पक्की है। राम और कृष्ण जो पहिले राना फिर प्रबल होने लगा बरन यहा लो बढ़ गया और शूरवीर माने जाते थे धीरे २ दैवते और कि बौद्धमत देश से निकाला गया केवल विष्णु के अवतार माने गये - और उत्तरी जैनमत ना उस से निकला है सो हिन्द के हिन्दुस्तान मे उन ही के नाम , अधिक मजे पच्छिम भागो मे प्रचलित रह गया है। जाते है। पुराणो मे नो धर्म पर्णित है सो वेद के धर्णित धर्म से कितनी बातो मे भिन्न पार नये हिन्दूधम्मी का स्थापित होना। ज्ञानवान कहते है कि उनकी रचना वेदो धीरे २ हिन्दू लोग बेद को शिक्षाओं को की अपेक्षा बहुत नई है अर्थात उन में जो छोडके ऐसी लोक पर चलने लगे जिस में पान तक चलते है। घोरेश्वेदके देवताओं की पूना जाती रही और नये देवताग्रा के नाम साधारण लोगों में सुनाये गये। नान- মান হুন নিমিত্ত की पूजा का आरभ हिन्दुओं मे कुछ २४ सवर्ष बीते से हुआ। सन ई०६०० मे वैष्णव लोग हिन्द देश में बहुप्त होने लगे तामी दिहातवाले अपने गाव की देवी देवता को बहुत पूजते थे। भी का बनाना। 2017 साशा
हिन्दुस्तान देश की यात्रा।
सब से प्राचीन है पाठवीं ई० सदी में और घासी अधिक्ष करके विष्णु और उस के अवतारो
धन में जो भय से नये है सो चार सौ वर्ष को पूजते और मन्दराजवाले अधिक शिव को
धोते रचे गये । पानकल उत्तर हिन्दुस्तान के पूजते और बङ्गालयासी दुर्गा को पूजते है।
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मतों की पिको।
महम्मदिया के धर्म का हिन्द मे पोलना।
महमूद गजनवी लो सन ई० १००० के लगको तुडवाके उस के पत्थरो को लेके उस
भग राज्य करता था पहिला मुसलमान था बडो मानिद को धनवाया ना माज ला है।
जा हिन्द मे प्रबल हुमा । परमधाला की फिर उन के राज्य में मुसलमानो को नाना
कितनी चढाइया इस से पहिले हुई पर उन प्रकार का लाभ होता था जिन की लालसा
का यश न चला । पर महमूद के पीछे मुसल- से बहुत से हिन्दू उस धर्म को ग्रहण करने
मानी ने धीरे २ समस्त देश को अपने वश लगे। बहाल को पूर्व भागा में मार सिंघ
में कर लिया। उन में पहुत थे जो अपने नदी के समीप मुसलमान बहुत मिलते है पर
धर्म के फैलाने में सीन थे। बारगजेश याद-मन्दराज की और और दक्षिण में घोडे है।
शाह ने कितने हिन्दुओ का पीरो से सतना
करवाया । उस ने काशो के विशेष मन्दिर
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- १३८ हिन्दुस्तान देश को यात्रा। पादरी केरी साहिब सन १८०० में श्रीरामपुर मसीही धर्म का हिन्द देश मे पाना'। मे उपदेश देने लगा। पादरी लोग पच्छिम पहिलो मसीही सदियों मे मिस्र देश का हिन्दुस्तान मे सन १८१३ मे काम करने लगे। सिकन्दरिया नगर सफल जगत मे विख्यात था लड़कों का पढ़ाना विशेपकर उस समय से जहा बणित व्यापार अधिक होता था। मार्क मेरित जो मसीह का एक शिष्य था कई साल लों वहा रहा और उस के बहुत चेले ज्ञानवान कहते है कि कितने हिन्दू व्यापारी उन दिनो मे मोतियों और कौशाम्बर के चापडो-दो बेचने के लिये मिस्त्र मे जाया करते थे और प्रगट है कि उन्हो ने वहां इस बात का सुसमाचार पाया कि यीशु मुक्तिदाता ससार मे अवतार लेके आया है। दूसरी सदी मे सिकन्दरिया नगर के विशप के पास यह बिन्ती भेनी गई कि हमारे पास उपदेशक भेजिये जो यीशु तारणहार का सन्देश देवे । इस विन्ती के अनुसार पन्तनुस नाम एक मसीही पंडित हिन्द मे भेना गया। प्रगट नहीं कि उस से पहिले कोई पादरी हिन्द की स्त्रिया। हिन्द मे पाया वा नही। धूमा प्रेरित का दक्षिण हुमा जब डफ साहिब ने सन १८३० में हाई मे पाना बर्णित है पर जाना नही जाता कि स्कूल कलकत्ता में खोला। उस समय से यह बात ठीक है वा नहो । चौथी सदी मे मसीही पादरी समस्त हिन्दुस्तान मे फैलने लगे सुरिया देश से कितने मसीह के चेले पाये और अब अगरेजी और अमेरिकन और नर्मन पार मलावार मे बसे चार उन के बश के पादरी साहिब लोग सब घडे नगरी में पाये लोग अब तक वहा पाये जाते है। जाते है । प्राटण्ट देशी मसीही लोग जव्यर नाम एक प्रसिद्ध रोमनकाथलिक पानकल हिन्द मे बहुत है । लोकगिन्ती में पादरी था जो सन ई०, १५४२ मे मात्रा में उन की बढ़ती इस रीति से लिखी गई है। *६१०६२ प्राके उस मत-को प्रचारने लगा और बहुत सन ई० १८५१ मे उन की गिन्ती थी ... से हिन्दु उस के चेले होने लगे । आनकल १८६१ ឱខ្លួនខ្ញុំខុ हिन्द में पद्रह लाख रोमनकाथलिक मसीही १८७१, ...२२४२५८. १८६१ 8१०३०२ पधिले प्राटएण्ट मसीही पादरीना हिन्द 'सब प्रकार के मसीहियों की गिन्ती को में पाये सो सन ई० १००६ में मन्दराज देश जोडकर हिन्दुस्तान में 20 लाख मसीह के के घायनकोर में प्राके रहने लगे। बगाल में चले है और उनकी गिन्ती शीघ्र बढ़ती बातों Son- । . - -- " 11 . + हिन्दुस्तान देश की याया। ૧૨ १ जैसा इस पुस्तक - । है। न केवल यह घरन उन के यता से हिन्द तुर्किस्तान काबुल बलूचिस्तान फारस अफ- जान बढ़ता जाता है या लो कि बहुत रीका तातारिस्तान सभा पर बड़ा अन्ध. से हिन्दू पपना पूजापाठ नेमधर्म से अप्रसन्न कार छा गया है और कोई विद्यार्थी एक को हो उसे सुधारने का यत्न करते है और इस किसी प्रकार की विद्या के माम करने के से इस देश में ब्रह्मो आदि समान उत्पन्न हुए लिये न ढूढेगा । ऐसे दिन थे निन में वैौद्ध- के भारभ में वर्णित हुआ। मत न केवल हिन्द में स्थिर था परन्तु उस एक बडे सोचने की बात यह है कि कोवल के उपदेशक दूर २ देशो मे जाकर उस धर्म धही शिष्टाचार जो मसीही धर्म से संपन्य को प्रचारते थे बरन कितने देशो मे वह मत रखता है सो स्थिर बना रहता और बढता प्रगल हुमा । अव सैकडो वर्ष से जितने देश जाता है। पूर्वकाल में मिस देश मे अद्भुत इस मत को मानते थे जैसा नेपाल ब्रह्मा मकार का शिष्टाचार था। वे और लोगो से सिआम आदि शिष्टाचार पाने मे एक गये पधिक ज्ञान और विना रखते थे परन्तु और जय लों मसीही धर्म उन में प्रबल 'मिस्री सत्य धर्म को न मानते थे गौर उन का न होवे तप लो उन की दुर्दशा रहेगी। तीन देश निकम्मा हो गया। ऐसे दिन थे जिन मैं हनार घर्ष हुए चीन देश मे शिष्टाचार भली बाबुल और निनवा पार सूर और फारसभाति होता था पर सत्य धर्म का ज्ञान उस देशों का ऐश्वर्या और महिमा दूर दूर देश के साथ नहीं मिला था सो अब चीन बहुत सुनाया नाता था आज कोई नही पूछता देश के पीछे रहा जाता है। कि ये कौन और कैसे है । यूनान चिष्टाचार निदान सहर भर मे नयां कही इम में यहां लो बढा कि पान लो ज्ञानी लोग देखते उसी देश मे नक्षा मसीही धर्म फैलता उस का वृत्तान्त पढकर प्राश्चर्या करते है नाता है लोग पागे बढते जाते है। मसोही परन्तु वे लोग उस ऊचाई से गिराये गये । धर्म सूर्य के समान है । नय सूर्य उदय सम देश कैसरी के दिन में अपने को नगत हाता तप आदमी अपने काम पर निकलता का स्वामी समझता था जिस का साम्हना है। जम सूर्य्य डूब गया तब लोग सोचते है कोई नही कर सकता था परन्तु जगली कि अब अधियारा हुआ अब सो जाना सन्ताना ने उस अद्भुत राज्य को पायो तले चाहिये । वह नई २ कलें कि जिन से ससार रोदा । वेद के दिनो मे पण्डित लोग भारी २ का काम सहन किया जाता है और जिन बातों का विचार करते थे और बहुत प्रकार से दूर २ स्थान मानो समीप किये जाते है के ज्ञान मे पढते जाते थे परन्तु पीछे उस जैसा रेलवे और अग्निवोट और तार और ज्ञान पर अन्धकार छा गया। मुसलमान लोग माफ की कल और सिलाई की कल' पार अगले दिनो मे ज्ञान और विद्या पर अधिक फोटोग्राफ ये सब मसीही लोगों के बीच में मन लगाते थे और अरविस्तान और हिस्सा चलाये गये । मूर्तिपूनको में इतना ज्ञान नहीं निया मे उन का चिपाचार प्रसिद्ध हुपा परन्तु है कि इतनी लाभदायक वस्तु बनावे । जो पीछे वह शिष्टाचार घटने लगा या लो कि जड वस्तुन की पूजा करते हैं सो जड़युद्धि अथ जितने महम्मदी राज्य है परविस्तान हो जाते है। r १४० हिन्दुस्तान देश की यात्रा । 7 - । अच्छा राज्य उसी को कहना चाहिये कि निस मे प्रना का बिनाम और देश की हिन्द देश का आनेवाला घर्म । भलाई सोची जाती है और नहा इस बात ज्ञानवान बताते है कि न केवल हिन्द की चिन्ता किई जाती कि सब पाच्छी बातो मे देश के आर्य लोग बरन यरप देशो के निवासी राजा प्रजा की बढती होवे । मसीही देशा बहुधा उन आर्य लोगो के बंश है जो हजारो सो शेड़ ऐसे अच्छे राज्य जगत में कहां घर्ष बीते एसिया के बीच में रहते थे। नम पाओगे। मसीही अध्यक्ष को छोड कोन अध्यक्ष हिन्द के प्रार्य वहा से निकलकर दक्षिण की प्रजा की भलाई की चिन्ता रात दिन किया और चलने लगे और जब यूरपवाले वहां से करता है। और न केवल सांसारिक बातो निकलकर पच्छिम की ओर बढ़ने लगे तो में बरन आत्मिक बातो मे भी मसीही देशो अपने स्वर्गीय पिता परमेश्वर को भूलने लगे। मे उन्नति होती है। उस से परमेश्वर की पहिले वे दौः अर्थात पितर करके भजते आराधना ठीक किई जाती परमेश्वर का थे पर दोनों पीछे को उस को बिसराके पान बचन पादर से सुना जाता है । उस में पाप देवताओ को भनने लगे। हिन्दुओ में तेंतीस काटने और मन शुद्ध करने और परलोक कोटि देवते प्रसिद्ध हुए। और समी यूनानी बनाने का अच्छा उपाय किया जाता क्योकि प्रादि यूरप के सन्तानो मे देवपूजा बहुत उस मे प्रेम अवतार का सन्देश मिलता जो बढ गई यहां लो कि उनके अथेनी नाम जग के मुक्तिदाता होने के लिये आया है एक नगर में यह कहावत प्रचलित थी कि और जब कि कोई मनुष्य भीतर की और हमारे नगर में देवता पाना सहज पोर प्रादमी बाहर की बुराई से लड़ने चाहता है तो पाना कठिन है। फिर यूरपवालो के देवते केवल इस धर्म से पूरी सहायता प्राप्त कर ऐसे कामी क्रोधी लोभी थे जैसा हिन्दुस्तान सकता है। सत्य है कि उन मे जो नाम के मे पूजे जाते थे और वे पापस में झगडत मारते मसीही हैं बहुत से दुष्ट जन पाये जाते है कुकर्म करते जैसा यहां के देवताओं ने । परन्तु इस का कारण यह है कि वे नाममात्र भी किया। इस धर्म को मानते है। जो वे मसीह के पहिला मसीही पादरी जो यूरप में भेना । सत्य चेले होते तो भलाई के मार्ग में वे उस गया सो एसिया से भेना गया और उस का के पीछे हो लेते वह नो मसीह की शिक्षा नाम पावल था। वह यस्ती २ मे उपदेश विरुद्ध चलता है सो मसीही नही है। ग्लाड-देता हुअा फिरता था। जब अधेनी नगर हान साहिब ने ठीक कहा है कि मैं इति- में पहुचा तो उन दिनों में ज्ञान और दिा हास में देखता हूँ कि अय पंद्रह सौ वर्ष से में बहुत प्रसिद्ध था तब अपने पहिले उपदेश मसीही देश सारी भलाई में और देशो की में उन से यह कहता था कि वे अथेनियो मै अगुवाई कर रहे और हर प्रकार के लाम' की पाप लोगो को सर्वधा बडे देवपूजक देखता बातों को काम में ला रहे हैं। हू क्योकि जब मै फिरते हुए पाप लोगो की पूज्य बस्तुओ को देखता था तब एक ऐसी वेदो भी पाई जिस पर यह लिखामा था कि - - - । 7 -- कि हाथ हिन्दुस्तान देश को याधा। १४१ अनजान ईश्वर की। सा जिसे आप लोग के लिये तैयार करता है। उस समय समो बिन जाने 'पूजते है उसी को कथा मै आप राज्य उन सब देशो में नो रूमसागर के समीप लोगों को सुनाता हू । ईश्वर जिस ने जगत थे स्थिर किया गया लिस का फल यह हुमा और सब कुछ जो उस में है बनाया से स्वर्ग कि दूर २ देशो तक अच्छी सडके बनाई गई और पृथिवी का प्रभु बनाये हुए और बटोहियो के लिये अच्छा इन्तिनाम मन्दिरी में यास नहीं करता है और न किसी किया गया सो मसीही उपदेशक सहल से वस्तु का प्रयोजन रसने से, मनुष्यों के हाथों इधर उधर यात्रा कर सकते और सत्य धर्म की सेवा लेता है क्योकि वह आम ही सभा को प्रचार कर सकते थे फिर बहुत देशो में को जीवन और स्वास और सब कुछ देता यूनानी भाषा फैलाई गई चोर उपदेशको को है। उस ने एक ही लोहू से मनुष्यों के सब नई २ भापा सोसना न पड़ा। जातिगण सारी पृथिवी पर वसने को बनाये है और ठहराये हुए समयो को इस लिये पानकल परमेश्वर सत्य धर्म के फैलने के लिये वैसी तैयारी हिन्ददेश में करता है। बाधा है कि वे परमेश्वर को ढूढे क्या जाने उसे टटोलके पावे और तौभी वह हम में से पूर्वकाल मे जब राजा राजा मे लडता था और किसी से दूर नधी है क्योकि हम उसी से जब डकैत और ठग लेाग बटोहियो को लूट तीते और फिरते और होते है जैसा प्राप मार करते थे तब हिन्दुस्तान मे भ्रमण करना लोगो के यहां के कितने कवियों ने भी कहा पेशावर से लेके मन्दराज तक जा सकता और जोखिम की बात थी। अब बटोही कुशल से है कि हम तो उस के वश है। सोनो हम ईश्वर क्षे वश है तो यह समझना कि ईश्वरत्वयाम के लिये पक्की सडक मुल रेलगाडी कोई उसे दुख नही दे सकता। परन उस के साने अथवा रूपे अथवा पत्थर के अर्थात मनुष्य की कारीगरी और कल्पना को ही अगियोट आदि बहुत सी बस्ते अध मिलती हुई वस्तुन के समान है हमे उचित नही है। फिर हिन्द के सब नगरी में अगरेजी भाषा जो पूर्वकाल मे कही पाई न जातो थों। इस लिये ईश्वर अज्ञानता के समया से मानाकानी करके अभी सर्वन सब मनुष्यों को पढ़ाई जाती अगरेनो पुस्तके छापी जाती अगरेजी विद्या सिखाई जाती है सो नाना पश्चात्ताप करने की माज्ञा देता है क्योकि प्रकार से उपदेशक का काम सहल किया उस ने एक दिन ठहराया है जिस में वह उस लाता है। यह ईश्वर का काम है और वह मनुष्य को द्वारा जिसे उस ने नियुक्त किया है अपने अर्थ को समय पर सिद्ध करेगा। धर्म से नगत का न्याय करेगा और उस ने उस मनुष्य को मृतको मे से उठाके सभी को जैसा यूरपनिवासी अपनी देवपूजा त्यागयो निश्चय कराया है। ईश्वर की और फिर गये है वैसे हिन्दबामो फिर सोचने की बात यह है कि जैसा भी कोई दिन करेंगे। जैसा जुपिटर और उन दिनो मे ईश्वर ने यूरप को मसोहीधर्म देाना प्रौर थार और ऐसिस के मन्दिर पोलने के लिये आगे से तैयार किया वैसाही सूनसान पडे है और कोई उन का नाम नहीं अाजकल हिन्द देश को उस धर्म के फैलने लेता ऐसा हो राम और कृष्ण और दुर्गा - १४२ हिन्दुस्तान देश की याचा । प्रार्थना। और शिव के मन्दिर खाली पड नायेगे और को त्यागके उस मुक्तिदाता को ग्रहण करके कोई उन की पूजा न करेगा। हिन्दू भो ईश्वर के भक्त हो जाये। समम लेगे कि देवी देवते स्वम समान है और कि ईश्वर मूर्तिपना से क्रोधित है । वे समग लगे कि नाति का घमंड जिस से देश हे ईश्वर जिस ने एक ही लोहू से मनुष्यों का बिगाड है एक भूठी मनमता है और के सब सन्तानों को पृथिवी पर 'बचने को सकल मनुष्य भाई है क्योकि ईश्वर ने धनाया है और जिस ने अपने प्रिय पुत्र प्रभु एक ही लाहू से सब सन्तानों को सूक्षा है| यीशु मसीह को प्रेम के सुसमाचार सब सो काले और गारे उत्तम जन और अधम लोगों मे सुनाने को भेना है यह पाशीप दे नन एक हो माता पिता के वश है। कि हिन्द के सब निवासी तुम को ढूढे और एक ही ईश्वर सत्य है उस के सन्मुख तुझ को दयालु और कृपाल पावे सब उस कोई दूसरा नहीं है। एक हो धर्म सत्य है मुक्ति के उपाय को ग्रहण करे जिसे तू ने और सब कल्पित है। एक ही पापी लोगो अनुगह करके किया है और हे स्वर्गीय पिता का तारणहार है जिस पर विश्वास करने से उस दिन को जल्दी भेन जिस का बचन तू मुक्ति मिलती है । ईश्वर के घी लोगों के ने दिया है जिस मे योशु मुक्तिदाता के पुण्य लिये एक ही स्वर्गधाम है और सब ना उसे प्रताप से धर्मात्मा का दान सकल ससार प्यार करते और उस की आज्ञापो पर चलते को दिया जायगा। हम मुक्तिदाता के नाम से सो सदा लो मानन्द करेगे। हम सब पक्षपात मागते है। मामीन । ? - 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। - - हिन्द का वृत्तान्त जैसा सन् १८८१ की लोकगिन्ती मे लिखा है। । सकारी अमल्दारी की जमोन और निवासी की गिन्ती। वर्गमील निवासी - अनमेर प्रासाम घगाल ময় बंधई ब्रह्मा (निचला भाग) .. .. २,०११ ४६३४१ १,५०,५८८ १०,०११ १,२४,१६२ ८०,२२० ८४,४४५ १,५८३ १,३०,500 १,०६,१११ १,०६,६३२ ४,६०,०२२ ४८,८१,४२६ ६,६६,६१,४५६ २६,०२,६०३ १,६४,८६,२०४ ३०,३६,००१ (८,३८,०६१ १,०८,३०२ ३,०८,६८,५०४ ४,४१,09,८६ १,८८,५०,४३० . सन्दल माविन्सेस कुर्ग मन्दरान उत्तर पच्छिम और अवध पंजाब - फुल और छोटे भागो को नाडकर ८,६८,३१४ १९,८०,६०,८५३ बडे देशी राज्यों की जमीन और निवासी की गिन्ती । नाम वर्गमील निवासी । बडादा भोपाल भरतपुर ८,५०० ६८०४ १,९०४ २१,८५,००२ ६,५४,६०१ ६,४५,५४० १४४ हिन्द का वृत्तान्त । वर्गमील निवासी .. - काश्मीर कोचीन ग्वालियर हैदराबाद इन्दौर जयपुर जोधपुर कोल्हापुर मैसूर उदयपुर पटियाला रीवा স্নানা ०६,०८४ १,३६१ २६,०६० ८१,८०० ८४०२ १४,४६५ ३०,000 २,८१६ २४,०२३ १२,६०० ५,८८० ११,३२४ ६,०३० ३,०२४ १५,३०,000 ६,00,२०८ ३१,१५,८५० २८,४५,५६४ १०,५४,२३० २५,३४,३४० १०,५०,४०३ ८,00,१८६ ४१,८६,१८८ १४,६४,२२० १४,६०,४३३ १५,१२,५६५ २४,०१,१५८ ६,८२,९२६ .. - । ॥ पालवर कुल और छोटे राज्यो को नाडकर कुल देशी और सारी . .. ५,०६,०३० ५,५१,६१,०४२ r जोडकर . १३,०८,088 २५,३६,८२,५६५ हिन्द के विशेप धर्मा के माननेहारे । । प्राचीनकालवाले I बौद्ध ३४,१८,८९५ हिन्दू मुसलमान मसीहो सिख १६,०६,३०,४३६ ५,०१,२१,५६४ १८,६२,६२६ १६,५३,४२६ १२,२१,८५५ पारसी यहूदी और धर्मवाले १२,००६, ६,३२,०३६ । कुल २५,३८,९१,८२१ हिन्द का वृत्तान्त। १४५ हिन्द देश की भापाओ के वोलनहारो की गिन्ती । . हिन्दी और उर्दू बंगाली तेलगू मरहठी मनापी तामिल गुजराती कनारी उडिया मलायलिम ८४३,००,९४५ ३,८६,६५,४२८ १,00,00,000 १,७०,४४,३६४ १,५०,५४,०५३ १,३०,६८,२७६ ६६,२०,६८८ ८३,३०,०२० ६१,१६,११२ ४८,४८,४९० वर्मा सिन्यो प्रासामी कोल सन्ताली गोडो पश्तो करिन २१,११,४६९ ३०,१८,९६१ १३,६१,०५६ ११,४०,४EE ११,३०,५०६ १०,०६,५६५ ६,१५,०१४ ५,५३,८४८ ४,४६,०११ ३,८८,६०६ २,०२,६२० .. कछारी अनी विशेप वस्तुन का हिसाव जो सन १८८५ मे हिन्द मे लाई गई। नाम रुपये रुपये १,३४,२०,८६० १,२६,०२,१३० सई के बने कपडे सई का बना हुपा सूत चादी साना चीनो मिश्री प्रादि २१,१६,०४,१४० ३३६,०४,२०० ६,११,००,२५० ४,०७,८१,०२० २,१४,०८,३८० २,00,00,१८० २,०१,४६,०६० १,५९,२६,२०० १,४८,४१,२४० कौशाम्बर के कपड़े कायला जन की धनी हुई घस्ते नाना प्रकार के तेल मदिरा भानन इघियार पुस्तके और कागव ताया १,३,४३,800 १,२२,८४,८६० १,२१,०८,२१० १,१०,३३,२१० ८४,४५,५२० ६६२४,०१० - लोहा रेलवे की बस्तु । नाना प्रकार के कल । कुल (कितनी और बस्तुनको जोडकर) ६०,०२,८१,३०० 37 a १४ हिन्द का वृत्तान्त । विशेष वस्तुन का हिसाव जो सन १८८५ में हिन्द से परदेश में भेजी गई। . नाम रुपये रुपये .. " .. अफीम घोन चावल और दाल २,00,00,00 १,५४,३८,000 १,२८,०६,००० । सई के कपड़े,.. छालटी काफी कन चीनी मीसी आदि लाख .. .. गहू .. १३,२९,५१,२४० १०,८८,२६,०६० १०,७५,२८,५४० २,१६,२३,२६० ६,३१,६०,१८० ४,९३,६५,१०० ४,६६,१३,६८० ४,१३,०३,५१० ४,०६,८६,000 २,५७,६६,१०० चमड़े जूद चाय लकडी . ०६,१३,६३० ५९,६८,८२० ५८,२०,११० ५६,४०,४६० ।। ५०,६३,२२० 1 । ।। नाना प्रकार के तेल .. कौशाम्बर .. सई का सूत . . कुल (कितनी और बस्तुन को जोडकर) ८५,०८,०८,५८० 1 | विशेष कामों के करनेहारो का हिसाव । 1 पुरुपो को गिनी हिसाब हिमाय पुरुपो की गिन्ती ५,१०,८६,०२१ 0,05,६९ किसान इघर उपर के काम करनेहार : मजूर रुदे के काम करनेद्वारे लेनदेन करनेदार .. ঘং নানা गायक अधिकारी - गड़रिया भादि २ पिलानेदार राज ईट बनानेदार पादि गाडीवान वा कदार मोहित पार मालवी ४,८०,६४,१६५ ०२,४८,४९० २६,००,५०६ ८,८६,१४८ ८,०८,०१२ 4,३५,४२ 4.0१,१६४ ५.६५१८ .. २१,४८, .. नोकर चाकर .. यस्त बनानधारे पसारी प्रादि .. '०,५४,३१२ -- - 1 हिन्द का वृत्तान्त। १४६ पुरुषो की गिन्ती हिसाय पुरुपो की गिन्ती हिसाव .. धनिया महानन गाद लाख बटोरनहारे सोनार लोहार बांस बेत के बनानेहारे ४,८८,६१८ ४,५९,१५७ ४,५४,५५५ ४,०३,३५० मल्लाह सेना चमार आदि गाने बनानेहारे शिक्षक ३,२२,६८० ३,११,००० २,६३,०५६ १,८०,६९६ १,६६३५६ - स्तियो की गिन्ती। ८,६१,३५,६१० बस्व के काम मे ०,३३,०८६ घर वालिया काश्तकारी करने वा लिया मजरिन मई के काम में कुंलडिन गोद लाद के काम में कुम्हारिन १,८८,६३,०२६ ५२,४४,२०१ २८,०७,८०६ १०,१६,५६३ २,०३,१६९ २,५६,८३६ चाकरी के काम में मास के काम में मिट्टी पत्थर के काम में बास बेत के काम में बिघवा ४,४६,२०५ ३,५४,०२१ २,७०,३०५ २,१०,00,000 हिन्द के बड़े नगरो के निवासी । जैसे सन १८८१ और सन १८६१ की लोकगिन्ती में पाये गये। नाम १८८१ मे १८९१ मे सागरा अहमदाबाद इलाहाबाद अमृतसर घगलोर बरेली ११,६०,२०३ १,२०,६२१ १,४०,५४० १,३१,८६६ १,५५,८५० -१,१३,४२० १,१८,०१० १,४५,880 १,०६,८०० १,२६,५०० 1,०८,६०० १,२१,८०० + FI Tric [I हिन्द का वृत्तान्त । १८८१ मे १८६१ मे r A . बडोदा बनारस भागलपुर बबई कलकत्ता कानपुर ढाका दिल्ली गया बडा वैदराबाद इन्दार जयपुर नवलपुर लाहार ग्वालियर लखनऊ १,०१,८१८ १,९६,000 ६८,३८ ७,७३,१९६ ०,६६,२८९ १,५१,४४४ ०६,००६ १,०३,३९३ ७६,४१५ १,०५,२०६ .. .. - .. १,१६,४६० २,२२,५२० ६८,०८० ८,०४,४७० ८,४०,१३० १,८२,३१० ८३,०६० १,५३,५८० ७९,६८० १,२६,500 ३,१२,३६० ६२,१०० १,५८,८६० ८४,५६० १,०६,०२० ८५,०४० २,७३,000 ४,४९,९५० ८०,४२० १,१८,०६० ४,५१० १,१०,६१० १,६०,५१० ८३,६३० १,६०,४६० ०३,५३० १,८१,२१० ७०,६६० १,०८,000 ९६,०३० ०६,२०० . .. .. ७५,४०१ १,४२,५०० ७५,००५ १,४६,३६६ ८८,०६६ २,६१,३०३ ४,०५,८४८ ०३,८०० ६,५६५ ६८,६०४ ९८,२६९ १,00,६५४ 8,पर १,२६,०५१ ०४,२५० १,३४,१७६ ०४,८३० १,०६,८४४ ८४,४४९ .. .. मादुरा मेरट मुलतान नागपूर पटना पेशावर पूना रामपुर रंगून शाइनहांपुर सूरत विचिनापल्ली - - । ] .. - .. . ।