Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
Kalika Puran Vol-1
Front matter
दो शब्द भारत ने पापिक माहित्य मे अठारह महापुराणों के अतिरिक्त जिन उप पुगणों की गणना की जाती है, उन्हीं में से एक "पालिका पुराण" भी है। यद्यपि इममें भी शिव पार्वती के चरित और देवी- माहात्म्य की चे ही घटनायें दी गई हैं, जो विभिन्न पुराणों में मिलती है, फिर भी इसमे कुछ अपनी विदोपना है। इसका प्रारम्भ कामदेव की उत्पत्ति से होता है, उमने मबमे पहरे यपने निर्माता यहाजी पर ही मदनास्त्र चलाया, जिसमे उनकी बडी विडम्बना हुई । फलस्वरूप उन्होंने युपित होकर समे मम्म कर दिया। इस प्रकार शिवजी से भी पहले ग्रह्माजी द्वारा "मदन-दहन" अभी तक विमी ग्रन्य में हमारे देखने मे नहीं आया। इसी प्रकार "मती की क्या" और "दक्ष-यज्ञ" को न करने का क्यानक भी बहुत भिन्नता युक्त है।'जैमा अन्यय जिवा है किमती ने दक्ष के यज्ञ में जाकर वही के अग्नि कुण्ट में प्राण त्याग किया, वैमा "कालिका पुराण" में नहीं है। इसके अनुमार मती ने जब यह मुना कि क्पाली बहकर रक्ष ने शिवजी को थामचिन नहीं किया है, तभी क्रोधित होकर अपने निवाम म्यान में प्राण त्याग दिये और यह देखकर शिवजी ने स्वय जाकर यज्ञ भन किया। पार्वती के विवाह मे मप्न ऋपियो का दूतत्त्व, वरात, विवाह-विधि वर्णन नहीं है, वरन् शिवजी म्वय उमकी परीक्षा लेने आये और मन्तुष्ट होकर पाणि ग्रहण करके उसे माय ले गये । वाराह अवतार के चरित्र में उनके तीन पुत्रो तथा स्वय उनका परभ रूपी शर से युद्ध का वर्णन बड़ा अमृत है। दो ईश्वरीय विभूतियां मित्र-माव सम्बते हुए जान-बूझकर ऐमा घोर मग्राम करें यह आदि का कुछ बपना अनोपी की वही जायगी। पर अगन् दिपिए यारा' भगवान् ने स्वयं अपनी मृत्यु का आवारन दिया और जी मे पद पर अपना अन्त करने से प्रेरित पिया गह पना भी महाना मा प्रदर्शन करने वाली है। वहा गया है कि या में देवगण मनुष्ट होते है और यज्ञ में ही गय र प्रतिष्ठिन है। या रे द्वारा दी गयी धारण की जाती है और यज्ञ ही प्रजा या दग्ण विया करता है। अन्न के द्वारा प्राणी जीवित रहा करने और उम अन्न की उत्पनि मधो के द्वारा होती है। ये मेघ यतो मे हा करते हैं। इणि यह मभी रछ यस मे ही परिपूर्ण है। यह या भगवान् शम्भु द्वारा विदीर्ण किये हए वराह के शरीर मे ही उत्पन्न हया था।" भारतीय धर्म की मान्यता के अनुसार यह ममम्त विश्व और उसके मचालन के निमित्त होने वाली विभिन्न घटनायें यज्ञ रूप ही हैं। जगत के निर्माण और उसको जीवित-जायन रखने के निमित्त सभी देवी और प्राकृतिक प्रक्रिया ईश्वर के यज्ञ वाराह रूप मे ही उत्पन्न होती है. यह इस रूपक वा सार है। इमलिए जो लोग वाराह को कोई भौतिक शकर ममयते है अथवा हास्य-विनोद के लि मे एक मल भक्षण करने वाला जीव बतलाकर अपनी अमता का परिचय देने हैं, वे इन नथ्यो को शीघ्र हृदयगम न कर मकेंगे। पर "कालिका पुराण" के लेखर ने बाराह का अर्थ पृथ्वी के निर्माण करने वाले देवी तत्व को ही बतलाया है। हिरण्याक्ष आदि को क्या की चर्चा उममें वही नही मिलती। वाराह और पृथ्वी के सयोग से उत्पन्न नरकासुर की क्या भी इमो पुराण में विस्तार के साथ मिलती है। यद्यपि "भागवत महा- पुराण" मे "प्रागज्योतिषपुर" के इस नरेश का कुछ वर्णन आया है और यह भी लिया है कि भगवान कृष्ण ने इमको मारकर सोलह हजार राज कन्याओं का उद्धार किया था, पर इसका "इतिहाम" आदि से अन्त तब कालिया पुराण मे ही मिराता है।
मत्स्य अवतार के मम्बन्ध में कहा गया है fr पृथ्वी पर जान प्रलय होगे का शाप महानि कपिल ने म्वायम्भुव को दिया था। उममे ीनो लोमो की रक्षा करने के लिये उन्होंने भगवान् विष्णु की आराधना की । उसमे मत होकर भगवान् ने मरम्य साधारण करके पृथ्वी की रक्षा का वचत दिया और एक बड़ी नाव बनाकर ममन्न भौतिक पदार्थों के बीजो को उममे रक्षित रखने की विधि बनाई। उन्होंने बग- 'है मनदेव । जब तक जत्र का जावन रहे तब तक मूरक्षित रहने के उद्देश्य से प्राप क मी बडी नौका बनाये जो दायोजन विम्नार वाली और नीम योनन नौनी होवे । वनौ योजन ऊंबी हो। जन प्लावन के ममय उस नौका मे मा वीजीओ, समस्त वेगे और गानापियो को पिटाकर स्वय भी विराजमान हो जायें। जन जानन होने पर मैं शाप पाग आऊंगा और उस नाव को अपने मीग में बांधकर हिमालय के ममीत ले जाऊँगा। जल के मूखने पर आप उसी स्थान पर उतरकर फिर जीव भूतिको रचना का उपाय करिये।" 'जल प्रलय" की यह कथा वो अदभुत है, क्योकि यह भारतीय पुराणों मे ही नहीं, ईमाडो की बाइबिल और अन्य अनेक जातियो के प्राचीन माहित्य में भी इमी से मिलने-जुलते रूप मे मिलती है। उन लोगों का इमकी मचाई पर परा विश्वाम है, और वर्ष पहले हमने एक अङ्गजी मामिक पत्र मे एक नेत्र पढ़ा था कि कावेशम (रूम) के एक हिमाच्छादित पर्वत शिखर पर वह नाव मिल भी गई है। कुछ भी हो इमसे इसना विदित होता है कि मत्स्य अवतार की कथा प्राचीन काल मे ही दूर तक फैन गई थी । माथ ही कूद ऐतिहामिक प्रमाणो तथा चनानिक खोज द्वाग कई लेखकों ने यह भी अनुमान लगाया है कुिछ हजार दपं पहले पृथ्वी पर गनमुच ऐसा जल प्लावन हुआ था जिसमे एक बडा भरापूरा देश नाट हो गया था। इमी यो योरोप वाने 'नूर की प्रलय" कहते हैं। इन कई मजह्वो के धर्म - ग्रन्यो में गिा ग गया गाना तिमिरा यातही है । "मालिया पुराण" रे अनुसार प्राय का गमप ममाण जाने पर पुन मृष्टि म ने गाय में भगवान ने आदेश दिया था- "हे स्वायम्भ- मन पार पृथ्वी में मव यौनीबान कीजिये और यह पृथ्वी गभी ओर म्यों गे परिपूर्ण हो जाये । गमन औषधियां पक्ष. नता और यल्लियो का गभी ओर आप पुरोहण करें रेम्वायम्भर यह मठात् शत् फलों को प्राप्त हो जायें नय प्राप दक्ष प्रजापति और गातो मुनियों के माय या के द्वारा भगवान वी अचंता करें। इमी यन द्वारा दक्ष गृष्टि रचना का विस्तार करें।" यह तो सभी जानते है कि पुराणों में जो कथायें दी गई है उनका उद्देश्य सर्वमाधारण को धर्म, नीति. मदामार आदि की शिक्षा देनी है। ये बातें धर्म पात्रो में भी कही गई हैं पर उम गम्भीर विषय को पढ़ने और समझने वाले थोडे ही होते हैं। इमतिय प्रतिभाशाली मनीषियों ने उन तथ्यों का कथा पहानियो के स्प में ऐमा रोचक वर्णन किया जिमे अधिक्षित व्यक्ति भी मन लगाकर सुने और ममझ सकें। इन क्यानको के सम्बन्ध मे यह विवाद पडा करना कि ये यथार्थ है अथवा काल्पनिा व्यर्थ ही है। जन-ममह में जो दन्त कथायें और जन-थ तियां संक्डो-हजागे वर्षों से प्रचलित चली आई हैं, उन्ही मे मे कुछ का समावेग पुराणो मे कर दिया गगा है । इमी आधार पर विद्वान लोग पौराणिक वर्णनो मे बुछ रोनिशामिक तथ्यों की खोज करते रहते हैं। इस तरह की ऐतिहामिक बातें चाहे जिननी विवादपूर्ण हो पर हम चाहें तो पुगणा की शिक्षाओं से अवश्य उठा सकते हैं। इम विचार मे हमने "कालिका पुराण" को अपने नियमानुभार मशोषित और सरल रूप मे सरह वरके प्रकाशित किया है। हमे आगा है कि पाठको को इसमे बहुत-सी नवीन सामग्री प्राप्त होगी। -प्रकाशक कुछ नाम विषय-सूची २ २० २० ४७ ६० દ૨ १०३ ११६ १ काम प्रादुर्भाव वर्मन ब्रह्मा मोह वर्णन मदन दहन वर्णन ४ यमन्त आगमन वर्णन कानी स्तुनि पणन ६ याग निद्रा स्तुति ७. मदन वाक्य वर्णन ८ मतीको उत्पत्ति ६ हरानुनयने वणन १० सती से विवाह प्रस्ताव ११ नीनो देवी का एक्स्व प्रतिपादन १२ तीना दवा का अनन्यत्व हवापापगमन वणन १४ गिव मनी विहार वजन १५ हिमाद निवास गमन १६ मनी दह त्याग वान द। यक्षनग वणन १८ विजया सखी क शोकाद्गार १६ सन्ध्या तपश्चरण वर्णन २० चन्द्रमाकाशाप वर्णन २१. चद्रमा का शाप विमोचन २२ अरन्घती जन्म-वचन २३ मिष्ठ अग्नी विवाह ६४ २०८ २२२ २७१
...
..
..
...
२४ महार-मथन
२५ वाराह-गर्ग वर्णन
२६ मृष्टि-कथन (१)
२७ सृष्टि-कथन (२)
२८ सारासार निरूपण
२६. वाराह-शकर मम्वाद
शरभ-वागह युद्ध वर्णन
३१ वराहतनी यज्ञात्पत्ति वर्णन
३२. मत्स्य रूप क्थन
३३ अकाल प्रलय कथन
३४. पुन मृष्टि रचना क्थन
शरभ काय त्याग कथन
३६. घरा दु स विमोचन क्थन
३७. नरव जन्म कथन
३८ नरवाभिषेचन वथन
...
४१८
४२८
४४२
४६०
४७०
४८१
कालिका पुराण ॥ काम प्रादुर्भाव वर्णन ॥ यद्योगिभिर्भवभयातिविनाशयोग्य- मासाद्र वन्दितमतीवविविचित्ते । तद् व पुनातु हरिपादमरोजयुग्म- माविनंवत् नमविलाडि तभूभव व ॥१ मा पातु व मदनयोगिजनम्य चित्ते- विधातमिनतरणियंतिमुक्ति हेतु । या चान्य जन्तुनिवहस्य चिमोहिनीति माया विभोर्जनुपि शुद्ध-शुद्धिन्त्री ।।२ ईश्वर जगतामाद्य प्रगम्य पुरुपातमम् । नित्वज्ञानमय वक्ष्ये पुगण कालिकाह्वयम् ॥३ मार्कण्डेय मुनिप्ट स्थित हिमधरान्तिक । मुनय परिपप्रच्छु प्रणम्य कमठान्य ॥४ भगवन् सम्यगाम्यात सर्वशास्त्राणि नत्वत । वेदान् मन्निया सागान् सारभून प्रमथ्य च ।।५ सर्ववेदेषु शाम्नेषु यो यो न समयोऽभवन् । स स च्छिन्नम्त्वया ब्रह्मन् सविनय तमश्चय ॥ जैवातृवाग्रय भवन प्रसादाद्विजसत्तम। नि माया वय वाता वेदे गाम्ने च सर्वधर ६ १० [ कालिका पुराण पूर्ण रूप में एक हो म निष्ठा रखने वाले हृदय से समन्वित योगियो के द्वारा सासारिक भय और पीडा के विनाश करन क योग्य को प्राप्त करके वन्दना किये गये है ऐसे भगवान हरि के दोनो चरण कमल क्रम से विलघित भूभुव स्व को प्रकट करत हुए सर्वदा आप मबकी रक्षा करें।॥१॥ जो समस्त योगिजनो के चित्त में अविद्या के अन्धवार को दूर हटाने के लिये सूर्य के समान हैं तथा यति गण की मुक्ति का कारण स्वरूप है--विद्य के के जन्म में शुद्ध-कुबुद्धि के हनन वरने वाली है और इस जन्तुओ के समुदाय को विमोहित कर देने वाली है वह माया आपकी रक्षा करे ॥२॥ समस्त जगतो के आदि काल मे विराजमान पुरुषोत्तम एश्वर को जो नित्य ही शान से परिपूर्ण हैं प्रणाम करके मैं कालिका नाम वाले पुराण का कथन करूंगा ।। ३ ।। हिमवर के ममीप म विराजमान मुनियो म परमाधिक अंध मावण्डेय मुनि के चरणा मे प्रणिपात करवे उनमे कमठ प्रामृति मुनिगण ने पूछा था ॥४॥ है भगवन् । आपने तात्त्विक स्पगे ममस्त शास्त्रो को और अङ्गो के राहित सभी वेदो या भली भांति प्रमथ फरवे जो दुछ भी सारस्वरूप था वह सभी भली भांति से वर्णन कर दिया है ॥५॥ हे ब्रह्मन् ममस्त वेदा म और सभी शास्त्रो म जो-जो भी हमको सशय हुआ था वही-वह थापने सूर्य के द्वारा अन्धकार के ही समान विनष्ट कर दिया है ।। ६॥ हे द्विजो मे सवछ । वातृकाग्रय आपके प्रसाद अर्थात् अनुग्रह से हम सब प्रकार से पदा और श स्त्रोम सशय से रहित हो गये हैं अर्थात् अर हमरो किसी में कुछ भी संशय नही रहा है 11७11 वृत्यवृत्या वय ग्रह्म स्त्पत्तोपधोत्य समन्तत । सरहस्य धर्मशास्त्र यदवादि स्वयम्भुवा ।।८ भूतम्यच्छोतुमिच्छामो हर बाली पुरा पथम् । भोयामास यतिन सतीम्पेण घेश्वरम् ।। गर्वदा ध्याननिलय यमिन यतिना वरम् सक्षाभयामास पय ससारविमुप हरम् ॥१० - ११ काम प्रादुर्भाव वर्णन ] मती वा क्थमुत्पन्ना दक्षदागसु शोभना । कथ हरो मनश्चने दारग्रहणकमणि ।।११ क्य वा दक्षकोपेन त्यक्तदेहा मनी पुरा। हिमवत्तनया जाता भूयो वा क्थमागता ।।१२ कमर्द्धशरीर साहरत् स्मररिपो पुन । एतत् मर्व समाचक्ष्व विस्तरेण द्विजोत्तम ।।१३ नान्योऽस्ति सशयच्छेत्ता त्वत्समो न भविष्यति । यथा जानीम विप्रेन्द्र तत् कुरुष्वैतवात्मविन ॥१४ हे ब्रह्मन | जो ब्रह्माजी ने कहा था वह रहस्य के महिन धर्म- शास्त्र आपमे सब ओर से अध्ययन कर हम सब नत्य अर्थात् मफ्ल हो गये हैं ।।८।। अब हम लोग पुन यह श्रवण करने की इच्छा करते हैं कि पुराने समय म काली देवी ने हरि प्रभु को जो परम यति और ईश्वर थे क्मि प्रकार म मती के स्वरूप म मोहित कर दिया था ॥६॥ जो भगवान् हर सदा ही ध्यान म मग्न रहा करते थे यम वाले और यतिया म परम श्रेष्ठ थे तथा ममार से पूर्णतया विमुख रहा करते थे मक्षोभित कर दिया था ॥ १०॥ अथवा प्रजापनि दक्ष की पत्निया म परम शोभना सती विम रीति से समुत्पन्न हुई थी तथा पत्नी के पाणि- ग्रहण करने मे भगवान् शम्भु न अपना मन किया था? ॥११॥ प्राचीन समय म निम कारण से तथा किस रीति स दक्ष प्रजापति के कोप से सती ने अपने देह का त्याग कर दिया था। अथवा फिर वही सती गिरिवर हिमवान् की पुत्री के रूप म कस समुत्पन्न हुई और यही समा- गत हुई थी ? ॥ १२॥ फिर उस देवी ने भगवान् कामदेव के श्री शिव का आधा शरीर आहत कर लिया था ? ह द्विजश्रेष्ठ। यह सभी क्या आप हमार ममक्ष मे विस्तार में माथ वर्णित कीजिए॥ १३॥ हे विप्रेन्द्र । हम यह जिम प्रकार से जानते हैं कि आपरे समान अन्य कोई भी मशयो का छेदन करने वाला नहीं है और भविष्य में भी होगा मो यह अब आप आत्मविन् करन की कृपा कीजिए ॥१४॥ शत्र १२ [ यालिया पुराण शृणुध्व मुनय सर्वे गुह्याद् गुह्यतर मम । पुण्य शुभकर सम्यग् ज्ञागदं ज्ञामद परम् ॥१५ एतद् ब्रह्मा पुरोवाच नारदाय महात्मने । पृष्टस्तेन तत सोऽपि वालखिल्येभ्य उक्तवान् ।।१६ वालखिल्या महात्मानस्तत आचक्षिरे पुनः । यवीताय मुनये स प्रोवाचासिताय च ॥१७ असितो में समाचप्ट एतद्विस्तरतो द्विजा । अह व कथयिष्यामि कथामेतां पुरातनीम् । प्रणम्य परमात्मान चक्रपाणि जगत्पतिम् ॥१८ व्यक्ताव्यक्तस्वरूपाय सदसदव्यक्तिरूपिणे । स्थूलाय सूक्ष्मरूपाय विश्वरूपाय वेधसे ।।१६ नित्याय नित्यज्ञानाय निर्विकाराय तेजसे । विद्याविद्यास्वरूपाय कालरूपाय व नम ॥२० निर्मलायोमिपटकादिरहिताय विरागिणे । व्यापिने विश्वम्पाय सप्टिस्थित्यन्तकारिणे ॥२१ मार्कण्डेयजी ने कहा-आप समस्त मुनिगण अब श्रवण करिए जो कि मेरा गोपनीय में भी अधिक गोपनीय है तथा परम पुण्य-शुभ करने वाला अच्छा ज्ञान प्रदान करने वाला तथा परम कामनाओ को पूर्ण करने वाला है ।। १५॥ प्राचीन समय ब्रह्माजी ने महान आत्मा वाले नारदजी से कहा था। इसके पश्चात् पूछे गये नारदजी ने भी बाल खिल्वो के लिये बताया या ॥ १६ ॥ उन महात्मा वात खिल्यो ने यव क्रीत मुनि से कहा था और यवकोत मुनि ने अमित नामक मुनि को यही बताया था ॥ १७ ॥ हे द्विजमणा । उन असित मुनि ने विस्तार- पूर्वर मुझको बताया था मैं अब परम पुरातन कथा को आप सब लोगो पा श्रवण कराऊगा। इसके पूर्व म में इस जगह के पति परमात्मा भगवान चक्रपाणि प्रभु वो प्रणिपात करता हूँ ॥१८॥ परमात्मा व्यक्त ..और अव्यत्त स्वरूप वाले हैं-गत् और असत् वी व्यक्ति के रूप मे मम काम प्रादुर्भाव वर्णन ] ग्विन हैं उनका स्वस्प स्थुल है और मूक्ष्म पि वाला भी है-वे विश्व के म्वरूप वाले या हैं-वे परमेश नित्य है और उनका स्वरूप नित्य है तथा उनम ज्ञान भी नित्य है-उनका तज निविकार है--व विद्या और अविद्या के स्वरूप वाले है ऐम दान रूप उन परमात्मा क लिय नमस्कार है ।।१६-२०॥ परमश्वर निमन है नया उमिपटक स रहित है--विगी हैं. व्यापी और विश्वरूप वाले हैं तथा नृष्टि ( राजन ) स्थिति ( पाउन ) और बन्न ( महार ) के करने वाले हैं उनके लिय प्रणाम हैं ॥ २१ ॥ योगिभिश्चिन्त्यते योमो वेदान्तान्तगचिन्तक । अन्तरन्त पर ज्योनि स्वस्प प्रणमामि तम् ।।२२ तमेवाराध्य भगवान् ब्रह्मा लोक पितामह । प्रजा ससर्ज सक्ला मुरासुरनरादिका ॥२३ सृप्टवा प्रजापनीन दक्षप्रमुखान् स यथाविधि । मरीचिनति पलह तथैवाङ्गिरस तुम् ॥२४ पुलस्त्यञ्च वशिष्टञ्च नारदञ्च प्रचेतसम् । भृगुञ्च मानसान पुत्रान यदा दश ससर्ज स । तदा तन्मनमो जाता चाररुपा वरागना ।।०५ नाम्ना मन्ध्येतिविख्याता मायमन्ध्या यजन्ति याम् । न तारशी देवलोवेन मत्ा न ग्यातले। कालत्रयेऽपि भविता मम्पूर्णगुणशालिनी ।।२६ निसर्गचारुनीलेन क्चभारेण राजते । मयूरीव विचित्रण वासु द्विजसत्तमा ॥२७ आरक्तगौरमलिन माकर्णान्त तथालये । रेजे मुराधिपधनुश्चारुवालेन्दुसन्निभम् ॥२८ जिसका योगियो के द्वारा चिन्तन किया जाता है योगीजन वेदान्त अन्त पर्यन्त चिन्तन रन वाल है जो नरार-अन्तर म १४ { पालिका पुराण ज्योति के रूप है उन परमेश प्रमु के लिये प्रणाम करता ह ॥ २२ ॥ लोगो के पिताम: भगवान् ब्रह्माजी ने उनकी ही गमाराधना परवं गमस्त सुर-असुर और नर आदि की प्रजा वा सृजन किया था।२३॥ उन ब्रह्माजी ने दक्ष जिनमे प्रमुख थे रोग प्रजापतियो वा मृजन करके परीचि--अत्रि--पुरह-आगिरस-~-ऋतु-पलम्य-मि-~नारद प्रचेतम-भृगु इन सब दश-दश मानस पुत्री का उन्होंने वजन किया था। उमी ममय में उनके मानम से सुन्दर रूप वाले वराङ्गनाओ की समुत्पत्ति हुई थी ।। २४.-२५ ।, वह नाम से सन्ध्या विख्यात हुई थी उमका माय सन्ध्या का यजन किया रते है । उम जमी अन्य कोई भी दूसरी राङ्गना देवलोक मर्त्यलोक और रसातल मे भी नहीं हुई थी। ऐमी ममस्त गुण गणो की शोमा मे सम्पन्न तीनो कालो में भी नहीं हुई है और होगी ॥ २६ ॥ वह स्वाभाविक सुन्दर और नीले के शो के भार से शोभित होती है । हे द्विज हो । वर्षा ऋतु में भय की ही भांति विचित्र केशो के भार से शोभाशालिनी थी।। २७ ।। आरक्त और मणिक तथा वर्णों पर्यन्त अलको से इन्द्र के धनुप और बाल चन्द्र के सदश शोभायमान थी ।। २८ ।। प्रफुल्लनीलनलिनश्यामल नयनद्वयम् । चकाशे चकितायास्तु दुरग्या सदश चलम् ॥२६ निसर्ग-चंचल चारु भू युग्म श्रवणायतम् । मोनाङ्ककोदण्डसम नील तस्या द्विगोत्तमा ॥३० ध्र मध्याधोनिम्न भागादायत-प्राशु-नासिका। लावण्यानि द्रवतीव ललाटात्तिलपुष्पवत् ।।३१ तद्वक्त गोणपद्माभ-पूर्णचन्द्रसमप्रभम् । विम्वाधरारुणिम्नाभोरेजे रागि-मनोहरम् ॥३२ मौन्दर्यलावण्यगुणरापूर्ण वदन पुन । अभितश्चिवुक यातुमुद्यताविव तत्कुचौ ।।३३ राजीवकुटमलाकारी पीनोत्तु गौ निरन्तरौ ।
काम प्रादुर्भाव वर्णन ] १५ श्यामास्यो तत्कुचौ विप्रा मुनीनामपि मोहनौ ॥३४ वलिमाजि क्षीणमध्य मुप्टिग्राह्यमिवाशुक्म् । तन्मध्य ददृशु सर्वे शक्तितुल्य मनोभुव ॥३५ विकमित नील कमल के समान श्याम वर्ण मे सयुत दोनो नेन चकित हिरनी के ममान चञ्चल हैं और शोभित हो रहे थे ॥२॥ हे द्विज हो । कानो तक फैली हुई स्वामाविक चञ्चलता से मयुत परम मुन्दर दोनो भौहे थी जो मीनाक अर्थात् कामदेव के धनुप के सदृश नील थी ॥३०।। दोनो भौंहो के मध्य भाग से नीचे निम्नभाग से विस्तृत और उन्नत नासिका यी जो माना ललाट से तिल के पुष्प के ही समान लावण्यो को द्रवित कर रही थी ।।३१।। उसका मुख रक्त कमल की आभा वाला और पूर्ण चन्द्र के तुल्य प्रभा से समन्वित यो जो विम्ब फ्ल के सदृश अवरो को अरुणिमाओ से रागी और मनोहर शोभित हो रहा था ॥३२॥ सौ सूय और लादण्ग के गुणो मे परिपूर्ण मुख था। दोनो ओर से चिवुक (ठोडी) के सपोप पहुँचने के लिये उसके दोनो कुच मानो समुद्यत हो रहे थे। तात्पर्य यह है कि उसके दोनो कुच ऊपर की ओर उठे हुए थे ॥३३॥ हे विप्रगणो | उस सन्ध्या देवी के दोना स्तन राजीव (कमल) की कलिका के समान आकार वाले थे-पीन और उत्तुङ्ग निरन्तर रहने वाले थे। उन कुचो के मुख श्याम वर्ण के थे जो वि मुनिया के हृदय को भी मोहित करने वाले थे ॥३४॥ सभी लोगो ने कामदेव की गक्ति के तुल्य ही उस सन्ध्या के मध्यभाग को देखा या जिसमे व लयाँ पड रही थी तथा मध्य भाग ऐसा क्षीण था जैसे मुठ्ठी मे ग्रहण करन के योग्य वस्त्र या ।।३।। तश्याचोरुयुग रेजे स्थूलोड़ करभायतम् । आनमद्वारणकरप्रतिम मृदुमन्थरम् ।।३६ स्थलाम्पुजारुण पादयुग्म सत्पाणिराजिनम् । अगुलीदलसकीर्ण कुसुमायुधवाणवत् ।।३५ [ पालिका पुराण ता चारदर्शना तन्वी तनुरोमावलीवृताम् । रास्वेदवदना दीर्घनयना चारहामिनीम् ॥३८ चारवाणयुग्मा वान्ता त्रिगम्भीग पडुग्रताम् । दृष्ट्वा धाता समुत्थाय चिन्तयामारा हृद्गतम् ॥३६ दक्षादयस्ते सप्टारो मरीच्याद्यास्तु मानसा । दध्यु ममुत्सुका सर्वे ता दृष्ट्वा परवणिनीम् ॥४० कि कर्मास्या भवेत् सप्टो क्स्य वा परवणिनी । भविष्यतीति ते सर्वे चिन्तयामासुरुत्सुका ॥४१ एवं चिन्तयतस्तस्य ब्रह्मणो मुनिसत्तमा । मनस पुरुषो वल्गुराविर्भूतो विनिसृता ॥४२ उसके दाना ऊरओ का जाडा ऐसा गाभायमान हो रहा था जा स्वभाग में स्थूत था और परभवे सदृश आयत ( विस्तृत ) था और योडा झुका हुआ हाथी की मूड के समान मृदु एव मन्थर था ।। ६।। सत्पाष्णि से शोभित स्थल कमल के समान अरुण दोना चरणा का जाडा था जो अगुलिया के दल से सकुल कुस्तुमायुध अथाव कामदेव के दिखलाई दे रहा था ।।३७।। उस सुन्दर दशन वाली-शरीर की रामा लि स वृत्त – मुख पर जिसके पसीन वी बूंद झलक रही थी-जो दीघ नयनों दालो-चारह स स सर्मावत-तन्वी अर्थात कृश मध्यभाग वाली-जिसके दोनो कान परम सुन्दर थे-तीन स्थला म गम्भीरता मे युक्त तथा छै स्थानो म उन्नत उसको देखकर धाता उठकर हृद्रत का चिनन करने लगे थे ॥३८॥३॥ वे सृजन करने वाले दक्ष प्रजापति आदि और मानस पुन मरीचि आदि सब उस नर पणिनी को देखकर समुत्क्षुक होपर चिन्तन मरने लग थे ॥ ४०॥ इम सृष्टि में इसका क्या कम होगा अथवा यह किसकी वर वणिनी होगी--यही वे सभी बडी ही उत्मुक्ता मे मोचन ला थे ॥११॥ हे मुनि सत्तमो | इस तरह से चितन करते हुए उन ब्रह्मा जी के मन से दरगु पुरुप आविर्भूत होकर विनि मन हागया था ॥४२॥ तुल्य ही
काम प्रादुभाव वर्णन ]
काञ्चनीचूर्णपीताभ पीनोरस्क सुनासिक ।
सुवृत्तोरकटोजयो नौलवेप्टिकशर ।
लग्नभ्र युगलो लोल पूर्णचन्द्रनिभानन ॥४३
कपाटविस्तीर्णहवि रोमराजिविराजित ।
शुभ्रमातङ्गकरवत् पीननिस्तलवाहुक ।
आरक्तपाणिनयनमुखपादकरोद्भव ।।४४
क्षीणमध्यश्जारुदन्त प्रमत्तगजकन्धर ।
प्रफुल्लरनमत्राक्ष केशरमाणतर्पण ।
कम्युग्रीयो मीनक्तु प्राशुभकरवाहन ॥४५
पञ्चपुप्पायुधो वेगी पुप्पकोदण्डमण्डित.।
कान्त कटाक्षपातेन भ्रामयनयनद्वयम् ॥४६
सुगन्धि मरुता भ्रान्त शृ गाररससेवितम् ।
त वीक्ष्य तादृश दक्षप्रमुखा मानसाच ते ॥४७
मरीच्याद्या दश ततो विस्मयाविष्टचेतस ।
औतसुक्य परम जग्मुरापुर्ववारिक मन ॥४८
स चापि वेधस वीक्ष्य स्रप्टार जगता पतिम् ।
प्रणम्य पुरुप प्राह विनयानतकन्धर ॥४६
वह पुरप मुदण के चूण के समान पीली आभा से सयुत पा--
परिपुष्ट उसका वक्ष स्थल था--मुदर नासिका थी-सुन्दर सुडौल
करु जघाआ वाला या-नील वष्टित केशर वाला था-उसको दोनो
भौह जुडी हुई थी-चञ्चल और पूण घद्र ५ महश मुख से समर्मावत
पा ॥४३॥ कपार के तुल्य विशाल हृदय पर रामावली से शोभित
या-शुभ माता की मूद के समान पोत तथा निस्तल वाहुआ स
सयुत था-ईपत् रक्त हाय-लाचन, मुस, पाद और रा के उद्रव
वाला था ॥४४॥ उस पुरुष का मध्य भाग क्षीण अथाव कृश था-
मुदर दातावली थी बौर वह मदमस्त हायो के सदश र धरा से समन्दिन
१८ [ कालिया पुराण था। विकसित दमल के दत्तो के समान उमक नेत्र तया पेशर प्राण से तर्पण था-कम्वु वे समान ग्रीवा से युक्त-मौन के फेतु वाला-- प्राशु और मकर वाहन था ॥४५॥ पांच पुष्पो ये मायुधो धाता-वेग युक्त और पुष्पो के धनुप से विभूपित था। कटाक्षा के पात के द्वारा दोनो नेत्रा को भ्रमित करता हुआ परम यान्त था ॥४६|| सुगन्धित वायु मे प्रान्त और शृङ्गार रस से सेवित उस प्रकार के उस पुरुप भो देखकर वे सब मानस पुत्र जिन दक्ष प्रजापति प्रमुख थे मरीचि आदि दश फिर विस्मय मे आविष्ट मन वाले होते हुए अत्यधिक उत्सुक्ता को प्राप्त हुये थे और मन विकार का प्राप्त हो गया था ॥४५॥ वह पुरुष भी जगतो के प्रति और सृष्टि की रचना करने वाले ब्रह्माजी का अव- लोकन करके विनम्रता सतीच की बार अपनी कन्धरा को झुकाकर प्राणिपात परत हुये बोला ॥४॥ किं करिष्याम्यह वर्म ब्रह्म स्तन नियोजय । मा न्याय्ये पुरुषो यस्मादुचिते शोभते विधे ।।५० अभिधान च यदयोग्य स्थान नीच या मम । तन्मे कुरुष्व लोकेश व सप्टा जगता यत ॥५१ एव तस्य वच श्रुत्वा पुरुषस्यात्मन । क्षण न किंचित् प्रोवाच स्वसृष्टविपि विम्मित ॥५२ ततो मन सुमयभ्य सम्यगुत्सृज्य विस्मयम् । उवाच पुरुष ब्रह्मा तत्कर्मोद्देशमावहन् ॥५३ अनेन चारुर पेण पुप्पवाणश्च पन्चभि । मोहयन् पुरुपास्त्रीश्च कुरु सृष्टि सनातनीम् ॥५४ न देवो न च गन्धर्वो न विन्न महोरगा । नासुरो न च दैत्यो वा न विद्याधर-राक्षमा ॥५५ न यक्षा न पिशाचाच न भूता न विनायका । म गुह्यका त वा सिद्धा न मनुप्या न पक्षिण ||५६ काम प्रादुर्भाव वर्णन ] पुरष ने कहा है ब्रह्मन् ! मैं बद क्या कार्य करू? जो भी आप कराना चाहते हो उमी वर्म मे मुपे नियोजित चोजिए । हे विद्य! वह कम न्यायोचित होवे जिम करने में शोभा होती है ॥ ५० ॥ है लोको के ईय! वयोकि याप तो जयतो के तृजन करने वाले हैं। यतएव जो भी योग्य अभियाम हो स्थान हो चोर जो मेरी स्त्री ही वही मेरे लिये कीजिये ॥५१॥ मार्कण्डेय मुनि ने कहा-उप महान् वारमा वाले पुरष के इस रीति पाये वचन वा श्रवण करके अपनी वी दुईष्टिम भी यत्यन्त विस्मित होकर प क्षण उक मुष्ट भी ब्रह्मात्री ने नहीं कहा था ।। ५२॥ इनव बतन्नर ब्रह्माजी न अपने मन को मुमैयमित करके योर विस्मय का परित्याग बरसे उस वर्म के उद्देश का यावहन करते हुए उन पुरप से कहा था ॥५६॥ ब्रह्माजी ने कहा- इस मुन्दर रूर के द्वारा और पांच पुष्पो के पापो के द्वारा पुरपा तथा स्त्रिया यो मोहत करते हुए इस सनातनी शष्टिका सुजन करो ॥५४॥ न तो देव-न गन्धर्ष न विन्नर और महोरम न मसुर दैत्य- 7 विद्याधर और न राक्षस-न यस-न पिचार--न मून-न विना- यक-न गुह्यक अथवा न सिद्ध और न मनुष्य तथा पक्षीगा ये मब तेरे शर के लम्य नहीं होग ॥५५-~-५॥ पशवो न मृगा. कीट-पतङ्गाजलजात्र थे। नते सबै भविष्यन्ति न लक्ष्या ये गरम्य ते ॥५७ अह वा वासुदेवो या म्यापुर्वा पुग्पोत्तम । भदिप्यामस्तप व पिमन्य, प्राणधार्गिम ॥५८ प्रच्छन्नध्पी जन्तूना प्रविशन हृदय ना। सुषहेतु म्वय भूत्वा कुरु मृष्टि सनातनीम् ।।५६ त्वत् पुप्पवापस्य सदा मुम्न लक्ष्य मनोज्नु तत् । मपा प्राणिना नित्य मदमोररी भवान् ।। इति ते कर्म कयिन मुष्टि प्रावतंक पन । नामापिच गदिप्यामि यते योग्य भविष्यति ॥६१ २. [ पालिका पुराण इत्युक्त्वाथ सुरथेप्ठो मानसाना मुखानि च । आलोक्य स्वासने पद्म सूपविष्टोऽभवत् क्षणात् ॥६२ जो भी पशु-मृग-कीट-पतङ्ग और जल म उत्पन्न होने वाले जीव है वे सभी जो कि तेरे शर में लक्ष्य होते हैं वे लक्ष्य नही होगे ॥ ५७॥ मैं अथवा वासुदेव स्थाणु अथवा पुरुषोत्तम ये सभी तेरे वश में हो जायेंगे अन्य प्राण धारियो की तो वात ही क्या है ॥५७--५८।। प्रच्छन्न रूप वाला होकर सदा जन्तुओ के हृदय मे प्रवेश करते हुए स्वय सुख का हेतु बनकर सनातनी सष्टि की रचना करी ।। ५६ ।। सदा ही तेरे पुप्पो के बाण का वह मन मुख्य लक्ष्य होवे। आप सभी प्राणियो के लिये नित्य ही मद और मोद के करने वाले है ॥ ६॥ यही तुम्हारे लिये कम मैंने कह दिया है जो कि पुन सृष्टि करने का प्रावर्तक है । अब मैं आपका नाम भी बतलाऊँगा जो कि आपके योग्य ही होगा ॥ ६१॥ मार्कण्डेय मुनि ने कहा—इसके अनन्तर यही कहकर सुरथे छ मानसो के सुखो का अवलोकन करके क्षण भर में ही अपने पद्मासन पर उपविष्ट हो गये थे ॥२॥ ॥ ब्रह्मा मोह वर्णन ॥ ततस्ते मुनय सर्वे तदभिप्रायवेदिन । चस्तदुचित नाम मरीच्यत्रिमुखास्तदा ॥१ मुखावलोक्नादेव ज्ञात्वा वृत्तान्तमन्यत । दक्षादयस्तु सप्टार स्थान पनीञ्च ते दद् ॥२ ततो निश्चित्य नामानि मरीचिप्रमुखाद्विजा । ऊच सगतमेतस्मै पुरुषाय द्विजोत्तमा ॥३ यस्मात् प्रमथ्य चेतस्त्व जातोऽस्माक तथा विधे । तस्मान्मन्मयनाम्ना त्व लोके प्यातो भविष्यसि ॥४ ब्रह्मा मोह वर्णन ] २१ जगत्सु कामरूपस्त्व त्वत्समो नहि विद्यते । अतस्त्वं काम नाम्नापि ख्यातो भव मनोभव ॥५ मदनान्मदनाख्यस्त्वं शम्भोदंपच्चि दर्पकः । तथा कन्दर्प नाम्नापि लोके ख्यातो भविष्यति ॥६ 'त्वदाशुगानां यद्वीयं तद्वीर्य न भविष्यति । वैष्णवानाञ्च रौद्राणां ब्रह्मास्त्राणाञ्च तादृशम् 11७ मार्कण्डेय मुनि ने कहा--इसके अनन्तर उन के अभिप्राय के ज्ञान रखने वाले सब मुनिगण उस समय में उसका उचित मरीचि- अत्रि प्रमुखों के नाम रक्या था ॥१॥ सृष्टि के सृजन करने वाले दक्ष प्रभृति ने मुख के अवलोकन से ही अन्य से वृत्तान्त का ज्ञान प्राप्त करके उन्होंने स्थान और पत्नियों को दे दिया था। इसके उपरान्त मरीचि प्रमुख द्विजों के नामों का निश्चय करके हे द्विजोत्तमो! उस पुरुष के लिये सङ्गत कहा था ॥३॥ ऋषियों ने कहा-क्योकि तुम हमारे विधाता के चित्त का प्रमथन करके समुत्पन्न हुए हो अतएव तुम मन्मथ नाम मे ही लोक में विख्यात होओगे ॥४॥ जगतो में तुम काम रूप हो और ऐसा तुम्हारे समान अन्य कोई भी नहीं है अतएव हे मनोभव ! तुम काम नाम से भी हो जाओ। मदन करने से तुम मदन नाम वाले भी हो 'और द से शम्भू भगवान के दर्पक हो इसीलिये तुम लोक में कन्दर्प नाम से भी प्रसिद्ध होओगे। ॥६॥ तुम्हारे आशुगो अर्थात् वाणो का जो वीर्य अर्थात् पराक्रम है वह वैष्णवों का-रोद्रों का ब्रह्मास्त्रों का भी पराक्रम उस प्रकार का नहीं होगा ॥ ७ ॥ स्वर्ग मत्त्यै च पाताले ब्रह्मलोके सनातने । तव स्थानानि सर्वाणि सर्वव्यापि भवान् यतः । किं वाचातिविशेपेण सामान्ये नास्ति ते समः ॥८ यन्न यत्र भवेत् प्राणी शादलास्तरवोऽथवा । तत्र तत्र तय स्थानमस्त्वाब्रह्मसदोदयम् ॥
२२
[पाखिया पुराण
दक्षोऽयं भवन: पत्री स्वयं दास्यति गोमनाम् ।
आद्य: प्रजापतियों हि यथेष्ट पुरुषोत्तम ॥१०
एपा च कन्यका चारुम्पा ब्रह्ममनोभपा।
सन्ध्यानामेति पिल्याता सर्व लोके भविष्यति ॥११
ब्रह्मणो ध्यायतो यस्मात् सम्यगजाता दरागना ।
अत सन्ध्येति लोकेऽस्मिन्नस्या' प्यातिर्मविष्यति ॥१२
इत्युक्त्वा मुनय सर्वे तूष्णीं तस्युदिजोत्तमा. ।
अवेक्ष्य ब्रह्मवदन विनयावनता पुर. ॥१३
ततः कामोऽपि कोदडमादाय युसुमोद्भवम् ।
उन्मादनेति विख्यात कान्ताध तुल्य-वेल्लितम् ॥१४
स्वर्ग में-मय॑तोक मे-पाताल में और सनातन ब्रह्मलोक में
तुम्हारे सभी स्थान है क्योकि आप सर्व व्यापी हैं । अत्यधिक विशेष रूप
से वचनो मे क्या कहा जावे सामान्य रूप मे प्रापके समान कोई भी
नहीं है ॥८॥ आब्रह्म सदोदय मे जहां-जहां पर भी प्राणी हैं, शाद्वल हैं
अथवा वृक्ष हैं वहाँ-वहाँ पर ही आपका स्थान है ॥६यह दक्ष आपकी
पत्नी को स्वय ही देगा जो कि परम शोभना है । हे पुरुपोत्तम । जो
यह आदि में होने वाला यथेष्ट प्रजापति हैं ।।१०।। और यह कन्या
ब्रह्माजी के मन मे समुत्पन्न शतरूपा है जो मन्ध्या-इम नाम से सभी
तोक मे विख्यात होगी ।।११।। क्योकि ध्यान करते हुए ब्रह्माजी से भली
भौति यह वराङ्गना समुत्पन्न हुई है इसीलिये इस लोक मे साध्या---इस
नाम मे इसकी ख्याति होगी ।।१२॥ मार्कण्डेय मुनि ने कहा-हे द्विजो-
त्तमो | यह कह कर मब मुनिगण चुप होकर सस्थित होगये थे। उनने
ब्रह्माजी के मुख का अवेक्षण किया और उनके ही समक्ष मे विनय से
अवनत होर स्थित हो गये थे ॥१३॥ इसके अनन्तर वामदेव भी
कुसुमो उद्भूत अपने कोदण्ड (धनुष ) को ग्रहण करके कान्ता के
ध्र ओ ने मदृश वेलित वह धनुप था तथा वह उन्मादन-इस नाम से
विख्यात हो गया या ॥१४॥
ग्रहमा मोह वर्णन ] कोमुमानि तथाम्बाणि पञ्चादाय द्विजोत्तमा । हर्षण रोचनास्वन्च मोहन शोपण तथा ॥१५ मारणञ्चेति सज्ञाभिमुनिमोहकराण्यपि । प्रच्छन्नरूपी तत्रैव चिन्तयामास किश्चयम् ॥१६ ब्रह्मणा मम यन्कार्य समुद्दिष्ट सदातनम् । तदिहव करिव्यामि मुनीना मन्निधौ विधे ॥१७ तिष्ठन्ति मुनयश्चार स्वयञ्चापि प्रजापति । एषा सन्ध्या वरखी च दक्षोऽप्यन प्रजापति ॥१ एते शरव्यभृता मे भदिप्यन्त्यद्य निश्चयम् । सन्ध्यापि ब्रह्मणा प्रोक्तमिदानीमेव यद्वच ।।१६ अह विष्णुर्हग्श्चापि तवास्तवशतिन । किमन्यजन्तुभिरिति तन्सार्थ करवाण्यहम् ॥२० हे द्विजोतमो । उमी भांति पांच कुमुमो मे विनिर्मित अस्त्रो को यहण किया था जिनके निम्नाक्ति नाम है-हर्षण,रोचन, मोहन, शोषण बौर मारण इन मज्ञा वाले वे वाण या अस्त्र हैं जो मुनियो के भी मन को मोह उत्पन्न कर देने वाले हैं। उस कामदेव ने जो कि प्रच्छन्न स्वरूप से संयुत था वही पर निश्चय के विषय में सोचने लगा था। 1॥१५॥१६॥ ब्रह्माजी ने जो मुझे सदानन कार्य समुद्दिष्ट किया है उसे यहीं पर विधि को सन्निधि में तथा मुर्गियो को सन्निधि में कर डालूगा ।।१७।। और यहा पर मुनिगण सस्थित है तथा स्वयं प्रजापति भो हैं, यह वरस्वी सळ्या उपस्थित है और प्रजापति दक्ष भी विद्यमान हैं ॥१८॥ ये सब आज मेरे शरथ भूत अर्थात निशान होंगे--यह निश्चित है । इसी समय में सन्ध्या भी लक्ष्य बनंगी-ब्रह्माजी ने जो वचन कहा था ।१३। उन्होंने यही कहा था कि मैं-भगवान् विष्णु और यो गेराज भगवान् शम्मु भी तुम्हारे अस्त्रों के दशवर्ती होगे। अन्य साधारण जन्तुओ की तो बाद ही क्या है-ऐसा जो कहा या सो उसे [मिका पुराण में सार्थक रू तात्पर्य यही है कि उस वयानो अयं पुत बना सलू ॥२०॥ इति सञ्चित्यमगता निश्चित्य च मनोभत्र । पुष्पज्या पुप्पचापस्य योजयामास भागंणं ॥२१ आलीढस्थानमामाद्य धनुराप्य यनत । चकार वतयापार कामो धन्विवरस्तदा ॥२२ सहिते तेन वोदण्डे मारताश्च मुगन्धय । वस्तत्र मुनिष्ठा सभ्यागाह्लादकारिण ॥२३ ततस्तानथ धावादीन साने च मानसान् । पृथक पृथक् पुप्पशरमोहयामास मोहन ॥२४ ततस्ते मुनय सर्वे मोहिताश्चतुरानन । मोहितो मनसा किचिदिकार प्रापुरादित ॥२५ सन्ध्या सर्वे निरीक्षन्त सविवारा मुहुमुहु । आसन् प्रवृद्धमदना खी यस्मान्मदद्धिनी ॥२६ तत सर्वान स मदनो मोहयित्वा पुन पुन । ययेन्द्रियविकारास्तै प्रापुस्तानकरोत्तथा ।।२७ उदीरितन्द्रियो धाता वीक्षाञ्चन यदाय ताग । तदैव ा नपञ्चाशदभावा जाता शरीरत ॥२८ भाकण्डेय मुनि ने वहा~मनोभव (कामदेव ) ने यह मन से सोचकर और निश्चय करके पुष्पो के धनुष की पुप्पो की ज्या (धनुप की डोरी) कणों के द्वारा योजित किया था ।।२१।। उस समय में आलीढ स्थान को प्राप्त करके तथा अपने धनुष को खीच कर धनुष धारियो मे परम निपुण कामदेव यत्न पूर्वक उसे वलय के आकार वाला पर लिया था ॥२२॥ हे मुनिश्रेष्छो । उस कामदेव के द्वारा दो दण्ड (धनुप) को सहित करने पर भली भांति आह्लाद के उत्पन्न करने वाली परमाधिक सुगधित वायु वहन करने लगी यी ।। २३ ।। इसके -- मनन्तर मोह कर देने वाले बामदेव ने उन धाता आदि को और सभी ब्रह्मा मोह पेन ] ०५ मनुप्यों को पृथक्-पृथा पुष्पो के गरी से मोहित कर दिया या अर्याद मोह में डाल दिया था। इसके उपरान्न सभी मुनिगण और चतुरानन (ब्रह्मा ) भी मोहित हो गये थे और बादि मे लेकर मन के द्वारा कुछ विवार को प्राप्त हो गये थे ।।२४-२शा मभी सन्ध्या को निरी करते हुए बारम्बार विकार मुन मन वाले हो गये ये बात सबके मन मे विकार उत्पन्न हो गया था। क्योकि स्त्री तो मद के वर्द्धन करने वाली होती ही है सब बढे हुए मदन वाले अर्थात अधिक मकाम हो गये थे।२६ ॥ फिर उन मदन अदि कामदेव ने पुन: - पुनः सचको मोहिन कराके तथा उन मदको ऐमा कर दिया था कि वे मव इद्रिय के विकारों को जिम रीति से प्राप्त हो गये थे ॥ २७॥ जिम ममय में उदीरित इन्द्रियों वाले धाता उसी दीक्षा दी थी उमी ममय मे उनचास भाव शरीर मे समुत्पन्न होगये थे॥२८॥ दिव्वोकाद्यास्तथा हावास्तुः पप्टिकलाम्लया। कन्दशिरविद्धायाः सन्ध्याया अभवन् द्विजाः ॥२६ सापि तान्यमाणाथ कन्दर्पशरपातजान् । चक्रे मुहुर्मुहुर्भावान् कटाक्षावरणादिकान् ।।१० निसर्गमुन्दरी मन्ध्या तान् भावान् मदनोद्भवान् । कुर्वन्त्यतितरा रेजे स्वर्णदीव तनूमिभिः ॥३१ अथ भावयुता सन्ध्या वोक्षमाण. प्रजापतिः। घम्भिः पुस्तितनुरभिलापमयाकरोत् ।।३२ अहो ब्रह्मस्तव कयं कामभावः समुद्गत.। दृष्ट्वा स्वतनयां नेतद्योग्य वेदानुसारिणाम् ॥३३ यथा माता तथा जानिर्यथा जामिस्तथा सुता। एष वै वेदमार्गस्य निश्चयस्त्वन्मुखोतयित । कयन्तु काममानेण तते विस्मारितं विधे ॥३४ धेयें जगदिदं ब्रह्मन् समस्तं चतुरानन । कयं क्षुद्रेण कामेन तत्ते विघटितं विधे ॥३५ २६ [ वालिका पुराण हे द्विजो' वियोव आदि हाव तथा चौसठ कलाएं कन्दर्प ( कामदेव ) के शरो मे विधी हुई सन्ध्या के हो गये थे ॥ २६ । उन मवके द्वारा देखी गयी वह भी कन्दर्प के शरो के पात मे समुत्पन्न फ्ट आवरण आदिक भावो पो वारवार करने लगी थी ॥३०॥ म्वाभाविक रूप से परम सौन्दर्य शातिनी सन्ध्या मदन के द्वारा उद्भूत उन भावो को करती हुई तनु अभियो के द्वारा स्वर्ग की नदी ( गङ्गा) की भाँति अत्यधिव गोभायमान हो रही थी ।। ३१॥ इसके अनन्तर भावो से समन्वित उस सन्ध्या को देखते हुए प्रजापति धर्माम्म अर्थात पसोने मे परिपूर्ण शरीर वाले होकर उन्होने भी अभिलापा की थी। तात्पर्य यह है उनके शरीर में पसीना आ गया और उनकी भी इच्छा हुई थी ।। ३२ ।। ईश्वर ने पहा- हे ब्रह्मन् । बडे आश्चर्य की बात है आपको यह काम भाव से उत्पन्न हो गया है जो कि अपनी पुत्री को हो देखकर काम के वशीभूत हो गये हैं । यह तो वेदो पे अनुसरण करन वालो के लिए योग्य नहीं है ॥ ३३ ॥ आपके ही मुख से कहा हुआ वेदो के मार्ग का निश्चय है कि जैमी माना होती है वैसी ही जामि होती है और जैमी जामि होती है वैसी ही सुना हुआ करती है । हे विधे। कामदेव वे ही प्रभाव में आपने यह सब कमे भुला ॥ ३४ ॥ हे विव । हे ग्रह्मन् । हे चतुरानन यह समस्त जगत् पर्व मे हैं फिर से इस क्षुद्र काम के द्वारा वह सब विटित कर दिया है ॥ ३५ ॥ एकान्तयोगिन यस्मात् सर्वदा दिव्यदर्शना । मथ दक्षमरीच्याया लोलुपा खोपु मानसा ॥३६ वय वामोऽपि मन्दात्मा प्राप्नकर्माधुगेव तु । युप्मान, शरधान, कृतवानकालज्ञोल्पचेतन ॥३७ धिगस्तु त मुनिश्रेष्ठ यस्य यातागनो हहाद् । यंमाप्य लोर येषु मग्गयत्यपि तन्मन ॥३८ दिया है ब्रह्मा मोह वर्णन ] इसि तस्य वच. श्रुत्वा लोकेशो गिरिशस्य च । बीडया द्विगुणीभूतस्वेदाद्रों पभवन क्षणान् ।।३६ ततो निगृह्यन्द्रियकं विकारं चतुराननः । जिघृक्षुरपि तत्याज तां सन्ध्यां कामरूपिणीम् ॥४० तच्छरीरातु धर्माम्भो यत् पपात द्विजोत्तमाः । अग्निप्वात्ता वहिपदो जाताः पितृगणास्ततः ॥४१ भिन्नाजननिभाः सर्वे फुल्लराजीवलोचनाः । नितान्त-यतयः पुण्याः संसारविमुखाः पराः ॥४२ एकान्त योगी सर्वदा दिव्य दर्शन वाले किस कारण से और कैसे दक्ष मरीचि आदि मानस पुन स्त्रियो मे लोलुग हो गये थे ? १३६॥ मन्द बात्मा वाला अभी कर्म को प्राप्त करने को उद्यत हुआ कामदेव भी कैमा थोडी बुद्धि वाला है और समय को नहीं जानता है कि उसने आप लोगो को ही अपने शरी का लक्ष्य बना डाला ॥३७॥ हे मुनि अंध! उसके लिए धिक्कार है जिसकी कान्ता गण हठ पूर्वक धर्य का आकर्षण करके चञ्चलताओ मे उसके मन को मज्जित कर दिया करती हैं ॥ ३८ ॥ मार्कण्डेय मुनि ने कहा-उन गिरिश भगवान के इस वचन का श्रवण करके लोको के ईश लज्जा से एक ही क्षण में दुगुने पसीने से भोगे हुए हो गये थे । अर्थात उनको द्विगुणित पसीना आ गया था 1३६॥ इमके उपरान्त चतुरानन ब्रह्माजी ने इन्द्रिय सम्बन्धी विकार को निगृहीत करके ग्रहण करने की इच्छा समन्वित होते हुए भी उस काम रूप वाली सध्या का परित्याग कर दिया था ॥४०॥ हे द्विजय हो ! उसके शरीर से जो पसीना गिरा था उससे अग्निप्याज्ञ वहिपद पितृगण समुत्पन्न हुए थे ॥४१॥ ये सब भित्र हुए अञ्जन के सदृश थे और विकसित कमल के समान इनके नेत्र थे। ये अत्यन्त अधिक सति-परम पवित्र तथा संसार से परमाधिक विमुख हुए थे ।४२॥ सहस्राणां चतुःपष्टिरग्निवात्ता. प्रकीर्तिताः । पडशीतिसहस्राणि तथा वहिपदो द्विजाः ।।४३ २८ [ कात्रिमा पुराण धर्माम्म पतित भूमो यदक्षस्य शरीरत । समस्तगुणसम्पन्ना तस्माज्जाता वराङ्गना ॥४४ तन्नगो तनुमध्या च तनुरोमावली शुभा । मृदगी चारुदशना तप्तवाञ्चनसुप्रभा ।।४५ मरीचिप्रमुखै पड्भिनिगृहीतेन्द्रियनिया। ते ऋतु वशिष्ठञ्च पुलस्त्याङ्गिरसौ तदा ।।४६ कत्वादोना चतुर्णाञ्च यो भूमौ निपपात ह । तत पितृगणा जाता अपरे द्विजसत्तमा ॥४७ सोमपा आज्यपा नाम्ना तथैवान्ये मुकालिन । हविर्भुजस्तु ते सर्वे कन्यवाहा प्रवीतिता ॥४८ जतोस्तु सोमपा पुत्रा वमिष्ठस्य सुकालिन । आड्यापाड्या पुलस्त्यस्य हविष्मन्नोऽङ्गिर सुता ॥४६ अग्निस्वात्त सौसठ महस्र कीत्तित किये गये हैं। हे 'द्वजगण।। छियासी हजार वहिपद बताये गये है ।। ४४ ॥ दक्ष के शरीर से ओ धामभि अर्थात् पसीना भूमि पर गिरा था उससे सम्पूर्ण गुण गणो मे मुसम्पन्न वराङ्गनायें उत्पन्न हुई थी ॥४४॥ वे वराङ्गनायें तम्बङ्गी क्षीण मध्यभाग वाली और परम शुभ शरीर की रोमावली से सयुत थी जिनका अङ्ग अत्यधिक कोमल था तथा परम सुन्दर दशन पक्तियां थी और तपे हुये सुवर्ण के ही तुल्य उनके शरीर को कान्ति थी । ४५ ॥ मरीचि जिन : प्रधान थे ऐस मुनियो ने अपनी इन्द्रियो को निया को निगृहीत कर लिया था। उस समय मे अतु-वसिष्ठ पुलस्त्य और अङ्गिरस के बिना ऋतु आदि चारो का जो जो प्रस्वेद भूमि पर गिरा था उसम हे द्विज श्वेप्ठो । दूसरे पितृगण समुत्पन्न हुए थे ।।४६॥४७॥ सीमय-आज्यय नाम से तथा अन्य सुवाती थे। वे सभी हविभुक थे जो क्व्य वाह प्रोत्तिन हुए थे ॥४८॥ सोमप जो थे वे ऋतु वे पुत्र --सुवालिन वसिष्ठ मुनि के पुत्र हये थे-जो आइथप नामर थे
पाम प्रादुर्भाव वर्णन ]
२६
वे पुलस्त्य मुनि के पुत्र थे और हविष्मन्त अङ्गिरा मुनि के सुत हुये
थे ॥४॥
जातेपु तेषु विप्रेन्द्रा अग्निप्वात्तादिकेप्वय ।
लोकाना पितृवर्गेषु कव्यवाहा. समन्तत. ॥५०
सर्वेषामेव भूताना ब्रह्मा भूत. पितामहः ।
सन्ध्या पितृप्रसूर्भूता तदुद्देशाद्यतोऽभवत् ॥५१
अथ शङ्करवाक्येन लज्जित- स पितामह ।
कन्दीय चुकीपाशुभ्र कुटीकुटिलाननः ॥५२
पुरव तदभिप्राय विदित्वा सोऽपि मन्मथः ।
स्ववाणान सहाराशु भीत. पशुपतेविधेः ॥५३
तत. क्रोधसमाविष्टो ब्रह्मा लोक-पितामह ।
यच्चकार द्विजेन्द्रास्तच्छृणुध्व सुसमाहिता. ॥५४
हे विप्रेन्द्रो ! उन अग्निप्वातादिक के उत्पन्न हो जाने पर इसके
अनन्तर लोको के पितृ वर्गों मे सब और कन्यवाह थे। समस्त प्राणियों
के ब्रह्माजी ही पितामह हुए थे और सन्ध्या ही पितृ प्रसू हुई थी क्योकि
उसके ही उद्देश से हुआ था ॥५०॥५१॥ इसके अनन्तर भगवान् शङ्कर
के वचन मे वह पितामय बहुत लज्जित हुए थे और शीघ्र ही कुठित किए
हूए मुख से सपुत ब्रह्माजी कामदेव के ऊपर अत्यन्त कुपित हो गये थे।
॥५२॥ यह कामदेव भो पहिले ही उनके अभिप्राय पा ज्ञान प्राप्त करके
उसने गशुपति विधि से डरे हुए ने शीघ्र ही अपने वाणो को समेट लिया
था अर्थात् वा मा छोडना वन्द कर दिया था ॥५३.) हे द्विजेन्द्रो !
इसके अनन्तर लोको के पिता मह ब्रह्माजी ने अत्यन्त क्रोध में समविष्ट
होकर जो कुछ भी किया था उसका आप लोग परम सावधान होकर
अब यवण कीजिए ॥५४॥
[ यासिका पुराण
॥ मदन दहन वर्णन ॥
ततः कोपममाविष्ट पद्मयोनिजंगत्पतिः ।
प्रजज्वालातिवलवद्दिधक्षुरिव पावकः ॥१
उवाच चेश्वरं कामो भवतः पुरतो यतः ।
पुप्पेषुभिर्मामभजत तत्फलस्थाप्नुयाधर ॥२
तव नेत्राग्निनिर्दग्धः कन्दर्पो दर्पमोहितः ।
भविष्यति महादेव कृत्वा कर्मातिदुष्करम् ॥३
इति वेधाः स्वयं कामं शशाप द्विजसत्तमाः ।
समक्ष व्योमकेशस्य मुनीनाञ्च यतात्मनाम् ।।४
अथ भीतो रतिपतिन्तत्क्षणात् त्यक्तमार्गण. ।
प्रादुर्वभूव प्रत्यक्ष शापं श्रुत्वातिदारुणम् ।।५
उवाच चेदं ब्रह्माण सदक्ष समरीचिकम् ।
तथ्यञ्च गद्गदं भीत्या भीतिर्हि गुणहानिकृत् ।।६
मार्कण्डेय महर्षि ने कहा-इसके उपरान्त समस्त जगतो के पति
पद्मयोनि ब्रह्माजी अत्यन्त बलवान् दाह करने वाले पावक (अग्नि )
के ही समान कोष्ठ में समाविष्ट होकर प्रज्वलित हो गये थे 1१॥ और
उन्होंने ईश्वर से कहा था कि जिस कारण से आपके ही समक्ष मे काम
देव ने पुष्पो के वाणो से मुझे सेवित किया है अर्थात् मुझे अपने कुसुम
वाणो का लक्ष्य बनाया हैं हे हर ! उसका पल अब आप प्राप्त करिये ।
|२|| यह दर्य मे विमोहित वामदेव आपके नेत्रों की अग्नि से निर्दग्ध
होगा। हे महादेव । क्योकि इसने अत्यन्त दुप्कर कर्म किया था ||३||
हे द्विजो में परम श्रेष्ठो | इसरीति से ब्रह्माजी ने भगवान् व्योम केश
(भम्भु) के और मतात्मा मुनियो के समक्ष में स्वय ही कामदेव को शाप
दिया था । इसके अनन्तर डरे हुए रति के पति कामदेव ने उसी क्षण
में अपने वाणो को छोडना परित्यक्त कर दिया था। और इस परम
दारुण शाप का श्रवण करके प्रत्यक्ष में ही प्राहुभूत अर्थात् प्रकट होगया
मदन दहन वर्णन ] था ॥५। और फिर मरीचि आदि के सहित समवास्थित ब्रह्माजी स कहा था जो ब्रह्म दक्ष के भी माथ वहा पर थे। वह काम्देव डर स मति गद् गद् हाकर तथ्य वचन बह्न लगा था निश्चय ही यह भय तो 'गुणों को हानि को करने वाला होता है ।।६।। ब्रह्मन किमयं भवता शप्तोऽहमतिदारुणम् । अनागस्तव लोकेश न्यायमार्गानुसारिण ||७ स्वयंवोक्तन्तु तत् कर्म यत्तु कुर्यामह विभो । तत्र योग्यो न शापो यतो नान्यन्मया कृतम् ।। अह विष्णुस्तथा शम्भु सर्वे त्वच्छरगोचरा । इति यद्भवता प्रोक्त तन्मयापि परीक्षितम् ।। नापराधो ममास्त्यत्र ब्रह्मन, मयि निरागसि । दारण शमयस्वना शाप मम जगत्पते ॥१० इति तस्य वच श्रुत्वा विधाता जगता पति । प्रत्युवाच यतात्मान मदन सदय मुह ।।११ आत्मजा मम सन्ध्येय यस्मादतत्सकाशत । लक्ष्यीकृतोऽह भवता तत शापो मया कृत ॥१२ अधुना शान्तरोपोह त्वा वदामि मनाभव । भवत शापशमन भविष्यनि यथा तथा ।।१३ त्व भस्म भूत्वा मदन मर्गलोचनवह्निना। तस्यैवानुग्रहान् पश्वाच्छरीर समवाप्स्यसि ।।१४ पदा हरी महादेव कुर्याददारपरिग्रहम् । तदा स एव भवत शरीर प्रापयिष्यति ।।१५ कामदेव ने कहा-हे ब्रह्माजी । किसलिये मुझे बत्यन्त दारण शाप दिया है ! मैंने थापवा कोई भी अपराध नहीं दिया है। हे लोको के स्वामिन् । आप तो न्याय मार्ग का अनुसरण करने वाले हैं ॥७॥ हे विभो । म जो करता हूँ वह सभी आपके ही द्वारा रहा हुआ करता [ कालिका पुराण हूँ। वहाँ पर मुझे शाप देना उचित नहीं है क्योकि मैंने अन्य कुछ भी वार्य नहीं किया है । आपने स्वय ही मुझ से कहा था कि मैं तथा भगवान विष्णु और भगवान शम्भु ये सभी तेरे शरी के गोचर है अर्थात तेरे वाणो के लक्ष्य होंगे। यह जो कुछ भी आपने ही मुझसे कहा था। उसी आपके कथन की परीक्षा मैंने को थी । अर्थात् मैं ने जाँच की थी कि आपका वचन कहां तक सत्य है । हे ब्रह्माजी इसमे मेरा कोई भी अपराध नहीं है । हे जगत् के स्वामिन् ! निरपराध मुझमे जो यह परम दारण शाप दे दिया है अब इस शाप का आप शमन कीजिये ॥१०॥ मार्कण्डेय मुनि ने कहा-समस्त जगतो के पति ब्रह्माजी ने उम कामदेव के इस वचन को सुनकर उस यतात्मा कामदेव से पुनः दया से से युक्त होकर यह प्रत्युत्तर दिया था ॥११॥ ब्रह्माजी ने कहा- यह सन्धया तो मेरी बेटी है क्योकि इसके सकाश से ही आपने मुझको अपने वाणी या लक्ष्य बना लिया था। इसी कारण से मैंने तुमको शाप दिया था ॥१२॥ इस समय में अब मेरा क्रोध शान्त हो गया है । हे मनोभव अर्थात् वामदेव ! अब मैं तुमसे कहता हूं कि आपके शाप का जो मैंने दिया था जिस किमी भी तरह से शमन हो जायगा ॥१३॥ तू भगवान् शङ्कर के तीसरे नेत्र की आन से भस्मीभूत होकर भी फिर उनकी हो कृपा से पुन अपने शरीर की प्राप्ति कर लेगा ॥१४॥ जिस समय म भगवान् हर महादेव अपनी पत्नी का परिग्रह करेंगे उस समय में ये हो स्वय तुम्हारे शरीर को प्राप्त करा देंगे ॥१॥ एवमुक्त्वाथ मदन ब्रह्मा लोकपितामहः । अन्तर्दधे मुनीन्द्राणा मानसानाञ्च पश्यताम् ।।१६ तस्मिन्नन्तहिते शम्भु. सर्वपाञ्च विधातरि । यथेष्टदेश गतवान ब्रह्मा मारतरहसा ॥१७ वेधरयन्तहिते तस्मिन गते शम्भो निजास्पदम् । दाः प्राहाय बन्दर्प पनी तस्य निदर्शयन ॥१८ मदन दहन वर्णन ] ३३ मद्देहजेय कन्दर्प यद् प-गुणसयुता। एना गृह्णीप्य भार्यार्थ भवत सदृशी गुणे ॥१६ एपा तव महातेजा सर्वदा शहचारिणी । भविष्यति यथाकाम धर्मतो वशवतिनी २० मार्कण्डेय मुनि ने कहा-लोको के पितामह ब्रह्माजी ने वामदेव से इतने ही वचन कहकर मानस पुत्र समस्त मुनीन्द्रो के देखते हुये व अन्तहित होगये थे ॥१६॥ मचके विधाता उन ब्रह्माजी के अन्तर्धान हो जाने पर भावान् शम्भु भी वायु के समान वेग से अपने अभीष्ट देश वो चले गये थे ।। १७ ॥ उन ब्रह्माजी के अन्तहित हो जाने पर भगवान् शम्भु के भी अपने स्थान पर चले जाने के पश्चात् प्रजापति दक्ष उसकी पत्नी को निदाशित हुए कामदेव से वोले-1 १८ ॥ दक्ष ने कहा-हे कामदेव । यह मेरे देह में समुत्पन्न हुई मेरे ही रूप और गुणगण में समन्वित है यह आपने ही सहश गुणो से युक्त है सो अव तुम इसको अपनी भार्या बनाने के लिये ग्रहण करलो ॥ १६॥ यह महान तेज से युक्त सर्वदा आपके ही माथ चरण करन वाली और इच्छानुसार धर्म से चशम वर्तन करने वाली हागी ॥२०॥ इत्युक्त्या प्रददौ दक्षो देहस्वेदाम्वुसम्भवाम् । कन्दपायापन कृत्वा नाम कृत्वा रतीति ताम् ।।२१ ता वाश्य मदनो रामा रत्याच्या सुमनोहराम् । आत्माशुगेन विद्धोऽसौ मुमोह रतिरञ्जित ॥२२ क्षणप्रभावदेकान्तगौरी मृगदृशो सदा। लोलापाग्यय तस्यैव मृगीव सदृशी वभौ ॥२३ तस्या भ्र युगल वीक्ष्य सशय मदनोऽकरोत् । उन्मादकृन्मे कोदण्ड किं धाना स्यान्निवेशितम् ॥२४ कटाक्षाणामाशुगतिं दृष्ट्वा तस्या द्विजोत्तमा । आशुगत्व निजास्त्राणा श्रद्दधे न च चारुताम् ॥२५ ३४ [ दालिका पुराण तस्या स्वभावसुरभि धोर श्वासानिल तथा। आघ्राय मदन श्रद्धा त्यक्तवान् मलयानिले ॥२६ पूर्णेन्दुसदृश वक्त्व दृष्ट्वा भ्रलक्ष्मलक्षितम् । न निश्चिकाय मदनो भेद तन्मुखचन्द्रयो ॥२७ सुवर्णपद्मलिकातुल्य तस्या कुचद्वयम् । रेजे चुचुकयुम्मेन भ्रमरेणेव सेवितम् ।।२८ माक्ण्डेय महपि ने कहा-दक्ष प्रजापति ने यह कहकर अपनी देह के पसीने से उत्सन्न हुई उसको कामदेव के लिए उसके आगे करके दे दिया था और उसका नाम "रति" यह कहकर ही प्रदान किया था ।। २१ । कामदेव भी उस परम सुन्दरी रति नाम वाली वराङ्गना को देखकर उस रति म अत्यधिक अनुरक्त होकर अपने ही बाण के द्वारा विद्ध होरर मोह को प्राप्त हो गया था ।। २२॥ क्षण मात्र में होने वाली प्रभा के ही ममान वह एकान्त गौरी और मृगी के समान लोचनी पाली तथा चन्चल अपाङ्गो से समन्वित मृगी की भांति उसके ही तुल्य परम शोभित हुई थी ॥ २३॥ उस रति को दोनो भोही को देखकर वामदेव ने गशय किया था कि क्या विधाता न मुये उन्माद वाला बनाने क लिए यह गोदण्ड (धनप ) निवाशित किया है २४ ॥ हे द्विात्तमो। उम रति के बटाक्षो की शीघ्र गमन करने वाली गति यो देवर अर्थात सीन ही हृदय को दिद कर दने वाली चाल को दवत हुए अपो अम्बा को शीघ्रगामिता और गुन्दरता पर उमकी थक्षा नहीं रह गयी थी। तात्पर्य यही है कि उसवे ( रति) कटाक्षो की गनि मामने अपने यार्णा यो गति वामदेव को तुच्छ प्रतीत होने लग गयी पी ।। २५॥ उस रात की स्वाभाविक रूप गे गुगन्धित धीर श्वासो वायु वा आमाण परये पामदय न ममय पर्वत की गन्ध को लाने पानी वाय म पसा वा त्याग कर दिया था ! पथन का अभिप्राय यही है िमसप मारत भी उपः श्यागामिल 4 सामन हेय प्रतीत हो रही पी॥२६॥ पूर्णचन्द्र व ममान भौहा निन्ह ग मशिन उगवे मुख मदन दल वर्णन को देखकर कामदेव ने उसके मुख और चन्द्र में किसी प्रकार के भेद का निश्चय नही किया था ॥२७॥ उम रति के दोनो स्तनो मर जोडा सुनहरी कमल की पलिका के जोडे के ही समान था। उन स्तनो के ऊपर जो कृष्ण वर्ण से युक्त चूचक थे ( कालो धुण्डियाँ ) वे ऐसी प्रतीत हो रही थीं मानो अमल की कलिकाआ पर भ्रमर बैठे हुए रसपान पर रहे होंगे ॥२८॥ दृढपीनोन्नतधन-स्तनमध्याद्विलम्विनीम् । आ नाभितो रोमराजि तन्वी चार्वायता शुभाम् ॥२६ ज्या पुष्पधनुप. काम पट्पदावलिसम्मृताम् । विसस्मार च यस्मात्ता विगृह्यना निरीक्षते ॥३० गम्भीरनाभिरन्ध्रान्तश्चतुप्पावत्वगावृताम् । आननाब्जेक्षणद्वन्दमारवतकमल यथा ।।३१ क्षीणामध्येन वपुपा निसर्गाष्टपदप्रभा। रत्नवेदो ददृशे कामेन द्विजमतमाः ॥३२ रम्भास्तम्भायतस्निग्ध तदुरुयुगल मृदु । विजशक्तिसम कामो वीक्षान्च मनोहरम् ॥३३ आरखतपाणिपादानप्रान्तभाग पदद्वयम् । अनुरागमय चित्र स्थित तस्या मनोभव ॥३४ तस्या. करयुग स्तनखरः किंशुकोपमः । वृत्ताभिरह गुलिभिश्च सूक्ष्मानाभिर्मनोहरम् ॥३५ अत्यन्त दृढ (कठोर ) पोम ( स्यूल) और उन्नत स्तनो के मध्य भाग स नीचे की ओर जाती हुई नाभि पर्यन्त रहने वाली- तन्वी सुन्दर-आयन और शुम रोमो की पक्ति को कामदेव ने भ्रमरो की पंक्ति रहा मे मम्मन ( सयुत) पुष्प धनुप को ज्या ( डोरी) को भी विस्मृत कर दिया था क्योकि उसका ग्रहम परके इमको ही देखता रहता है ।। ३०॥ पुन उसके ही मुन्दर स्वरूप का वर्णन करने हुए कहते हैं कि उसकी गम्भीर नाभि के रुघ (छिद्र) | कालिका पुराण के अन्दर चारों और त्वचा से वह आमृत थी। उसका मुख कमल पर जो दो नैनी का जोडा था वह ऐमा प्रतीत होता था मानी घोडी लालिमा से युक्त कमत हो ॥ ३१ ॥ हे द्विज हो । जिसका मध्य भाग क्षीण था ऐसे शरीर से वह रति निमर्ग अष्टपद को प्रभा वाली थी। उतको कामदेव ने रत्नो द्वारा विरचित वेदो के ही समान देखा था।३२॥ उसके उरुओं का युगल अत्यन्त कोमल और कदली के स्तम्भ के समान आयत एव स्निग्ध (चिकना) था। कामदेव ने उसको अपनी शक्ति के ही तुत्य मनोहर देखा था ॥ ३३ ॥ थोडी रक्तिमा से युक्त पाणि पादान प्रान्त भाग से गयुत दोनो पदो के जोडे को कामदेव न उसमे स्थित अनु- राग मे परिपूर्ण चिन देखा था ।। ३४ ।। उस रति के दोना हाथो को जो ढाक पुष्पा के समान लाल नाखूनो से युक्त थे और परम सूक्ष्म सुवृत्त अगुलियो मे परम मनोहर थे देखा था ॥३॥ इति दृष्टवा स्मरो मेने ममास्वैद्विगुणीकृत । मा मोहयितुमुविद्यक्ता किमेषा द्विजसत्तमा ॥३६ तहहयुगल कान्त मृणालयुगलायतम् । मृदुस्निग्ध रराजानिकान्ति तोयप्रवाहवत् ॥३७ नीलनीरदसङ्काश केशपाशा मनोहर । चमरीयालभारवद्विभाति स्म म्मरप्रिय ॥३८ ता वीदय मदनो देवी रनिमतिमनोहराम् । कान्तितोगैघसम्पूर्णा कुचवक्ताजकुड्मलाम् ॥३६ वक्तृपद्मा चारवाहु-मृणालीशक्लान्दिताम् । भ्रू युग्मविश्नमद्रात-तनूमिपरिराजिताम् ॥४० कटाक्षपातमङ्गोधा नेवनीलोत्पलान्विताम् । तनुलोमालिशवाला मनोद्रुमविशातिनीम् ॥४१ निम्ननाभिहदा दक्षप्रानेयाद्रिसमुद्भवाम् । मनागिद महादेवो जग्राहोन फुरललोचन ॥४२ मदन दहन वर्णन ] ३७ जोडा मृणाल उवाच च तदा दक्ष कामो मोदभरान्वित । विस्मृत्य शापच्च तदा विधिदत्त मुदारुणम् ॥४३ हे हिज मतमो। यह देखकर कामदेव ने यह मान लिया था कि मेरे अत्रा मे द्विगुणित हुए अम्त्री द्वारा या यह मुझगे मोहित करने के लिये उपर हो रही है। ।।३६ ।। उनको दोनो बाहुओ का के जो समान नायत अधिक मुन्दर था। वह अत्यन्त कान्नि मयुत जल के प्रवाह में समान मृदु और म्निग्ध शोभित हो रहा था ।। ३७॥ उसका देशो का पाश अधिर मनोहर नील वर्ग वाले मेष के मदृश था और कामदेव का पिर यह चमगे गो के पूछने वालो के भार के ममान विमात होता है ।। ३८ 11 उम अत्यधिक मनोहर रनि देवी का कामदेव अवलोकन करके दिमित नोपनो वाला हो गया था। उसी रनि की विशेष म्वरूप शोमा का वर्णन करत हुए कहते हैं कि वह रनि देवी अपनी कान्ति रूपी जल बोध ( समूह ) मे सम्पूर्ण थी--बह अरने कुचो के मुख कमल की कलिका वालो थी-पम के सदृश मुख में ममदिन थी-मुन्दर वाहूमी मुणालीश ( चन्द्र को कला मे सयुत थी---यह रति देवो दोनो भौहो के युग्म के विभ्रमो के समूह से नमियों मे परिराजित यी--पर कटाक्ष पानरूपी भ्रमरो के ममुदाय वाली थी- वह नेत्रम्पो नील कमलो मे ममन्वित थी--वह शरीर को लोमालि के शैवाल मे युक्त थी वह मनरूपी द्रमों के दिशातन करने वाली थी-- वह रति गम्भीर नाभिरूपी हद मे युक्त थी-वह दक्षरूपी हिमालय गिरि मे ममुत्पन्न हुई गङ्गा की भांनि महादेव की तरह कुल्ल लोचन ने ग्रहण किया था । ३६-४२। उस समय में मोद के भार से युन आनन वाले कामदेव ने विधाता के द्वारा दिये हुए मुदारुण शाप को पर प्रजापनि दश मे बहा या॥४३॥ भनया सहचारिण्या सम्यक् मुन्दरस्पग। ममोंमोहिनु शम्भु किमन्यजन्तुभिविभो ॥५४
१८
। कालिका पुराग
यन यन मया लक्ष्य नियते धनुपोऽनघ ।
तत्रानयापि चेष्टव्य मायया रमणावया ॥४५
यद, देवालय यामि पृथिवी वा रसातलत् ।
तदैपाप्यस्तु सध्रीची सवदा चारहसिनी ॥४६
यया पद्मालया विष्णोर्जलदाना यथा तडित् ।
तथा ममंपा भविता प्रजाध्यक्षसहायिनी ॥४७
इत्युक्त्वा भदना देवी रति जग्राह सोत्सुक ।
सागरादुपिता लक्ष्मी हपोकेश इवोत्तमाम् ॥४८
रराज स तया साई भिन्नपीतप्रभ स्मर ।
जीमूत इव सन्ध्याया सौदामिन्या मनोज्ञया ।।४६
इति रतिपनिरचर्मोदयुक्तो रति ता
हृदि परिजगृहे या योगदशीव विद्याम् ।
रतिरपि पतिमग्रव प्राप्य तोपच्च लेभे
हरिमिव कमलोतया पूर्णचन्द्रोपमास्या ।।५०
वामदेव ने यहा-हे विभो । मलो भांति परमाधिक स्वरूप
नावग्य में मन्वित इम गहमारणी के द्वारा में भगवान शम्मु को
मोहिन परने की क्रिया में समर्थ हो मगा पिर अन्न गन्तुओ गे या
प्रयोजा है ॥४४॥ हे अनप अर्धा निष्पाप । यहाँ-जहाँ पर मेरे द्वारा
अनुप पा सदय दिया जाता है यही-यही पर दे द्वारा भी रमण
नामब माया में पटापी जायगी।॥ ५४॥ जिस समय में देवों के
भानप यदि रगं ग जा, अथवा पृथिवीम या रगातरा में गमा
पिपासा उगी गम्य ग पर मनीपो भी गर्वदा पाहाग वाली
गाया बोगी। शिग प्रकार गप:मी ये गाय गमा परने वाली होती है
और मेरे गाथ विदाग हामी मी माति यह मेरी प्रजाध्यक्ष
गायिनी होगी 11-10॥ माय मृति ने पहा-बामदेव ने
Ar पररर मादयोगी बात ही उपुला प हित
--
वसल आगमन वर्णन ] होकर ग्रहण किया था जिस प्रकार मे सागर से समुत्थित उनमा लक्ष्मी को भगवान हपोकेश ने ग्रहण कर लिया था ॥४८॥ भिन्न पीत प्रभा वाला कामदेव उम रति के माथ शोभित हुआ था जिस प्रकार मे मन्ध्या के ममप में परम मनोहर सौदामिनी के साथ मेघ को शोभा हुमा करती है ॥४६॥ इस रीति ने बहुत ही अधिक मोद से युक्त रति का पति कामदेव ने उस रति को अपने हृदय में विद्या को योगदर्शी के ही समान परिग्रहण किया था। रति ने भी परम श्रेष्ठ पति को को प्राप्त करके परमाधिक सन्तोष को प्राप्त किया था अर्थात् अत्यन्त सन्तुष्ट हो गई थी। कमल से समुत्पन्ना पूर्ण चन्द्र के समान मुख वाली लक्ष्मी भरवान् हरि को प्राप्त करके से सन्तुष्ट हो गयी थी ॥५॥ ॥ बसन्त आगमन वर्णन ॥ ततः प्रभृति धातापि यदैवान्ततिः पुरा। चिन्तयामास सततं शम्भुवाक्य विपादितः ।।१ फान्ताभिलापामावं मे दृष्ट्वा शम्भुरगयत् । मुनीनां पुरतः कस्मात् स दारान् संग्रहीप्यति ॥२ का पा भविनी तज्जाया का च तन्मनसि स्थिता। योगमार्गमवष्टभ्यः तस्य मोहं करिष्यति ॥३ मन्मथोऽपि समयों नो भविष्यत्यस्य मोहने । नितान्तयोगी रामाणां नामापि राहते न सः ॥४ अगृहीतेपु दारेयु हरेण कयमादितः । 'मध्येऽन्ते च भवेत् सृष्टिस्तद्वत्तो न न्यकारितः ।।५ केचिद्भविप्यन्ति भुवि मया वाध्या महाबलाः ।। केचिदिप्योरिणीयाः कैपिच्छम्भोरुपायतः ॥
शम्भु [ वानिया पुराण ससारविमुये शम्भो तर्धकान्तविरागिणि । अस्माइते न धर्मान्यत् वरिष्यति न संशय ७ महर्षि मार्कण्डेय जो न कहा-तभी से गेपर प्रह्माजी भी निस ममय मे ही पहिले अन्तहित हये थे ये शम्भु भगवान के वाक्य म्पी विष मे अदित अर्थात् परिपीडित होकर चिन्तन विया करते थे ॥१।। भगवान ने मेरी केवल कान्ता के प्रति अभिलापा को ही देख कर मुझे बुरा वह दिया था वही शम्भु अव मुनिगणों के ही समक्ष म दागभी को विम तरह मे ग्रहण करेगे ॥२॥ अथवा फोन मी नारी उन शम्भु की पत्नी होगी। और कौन सी नारी है जो उनके मन म स्थान बनाकर अवस्थित हो रही है जो याग के माग का अवष्टभ्य करके उसके मोह को बरेगी ॥३॥ उनके मोहन करने में कामदेव भी समर्थ नहीं हो सकेगा। वे तो नितान्त योगी हैं वे वराङ्गनाआ के नाम को भी महन नही किया करते हैं ११४५ मध्य और अन्त म सृष्टि होती है उनका वध अन्य कारित नहीं है अर्थात् अन्य किसी के भी द्वारा नहीं दिया जा सकता है ॥५॥ इस भूमण्डल में कोर्ट ऐसे होगे जो महान् वत्तवान मेरे द्वारा वाध्य होवें । युछ भगवान् विष्णु के वारणीय है और उपाय से कुछ शम्भ के हैं ॥६॥ इस मासारिक भोगो ने सुखो मे विमुख तथा एवात विरागी भगवान शम्भु से मिषय मे इससे अन्य कोई भी वम नही घरेगा--मम सपाय नहीं है ॥७॥ चिन्तयिन्नित लोवे शो ब्रह्मा लोकपितामह । पुनदर्ददर्श भूमिष्ठान दक्षादीन वियति स्थित ॥८ रतिद्वितीय मदन मोदयुक्त निरीक्ष्य च । पुनस्तम गत प्राह सान्त्वयन पुप्पसायकम् ॥ अनया महचारिण्या राजसे त्व मनोभव । एपा च भवता पत्या युभता सशोभते भृशम् ॥१० यथा श्रिया हुपीवेशो यथा तेन हरिप्रिया। क्षपदा विधुना युक्ता तया युक्तो यया विधु ॥११ वमन्त बागमन वर्गन] ११ तथंव मुक्यो शोभा दाम्पत्यञ्च पुरस्कृतम् । अनस्त्व जगत केनुविश्वकेतुर्भविन्यास ॥१२ जगद्धिताय वन न्य मोहयत्व पिणाविनम् । यथा मुखमना शम्भु कुर्याद्दारसरिग्रहम् ॥१३ विनने स्निग्धदेश च पर्वतेषु सरित् मुच। यन यत्र प्रयातीगन बानया यह ॥१४ लोकों के पितामह लोवेश ब्रह्माजी यही चिन्नन करते हुए विपन अर्यात यावाश में स्थित होते हुए उन्होंने भूमि में स्थित दक्ष नादि को पुना आदि को देखा था ॥८॥ ति माय मोह में ममन्दित काम- देव को देखकर ब्रह्माजी फिर वहां पर गये और वामदेद को गान्त्वना देत हुए उममे वोले ॥६॥ ब्रह्माजी ने पहा-हे मनोभव अर्थात् वाम- देव । बाप इम अपनी मह चारिणी पत्नी रति के माय म शोभायमान हो रहे हैं और यह भी माप पनि के माय मस्त होकर बन्यधिक शामिन होनी है ॥१०॥ जिन रीति मे लक्ष्मी देवी मे भगवान् हपोकेश और जिन प्रकार ने हरिप्रिया उन भगवान् विष्णु मे शोभायुक्त होती है । जमे चन्द्रमा मे रात्रि और निगा में पन्द्र युक्त शोभायमान होता है ठीक उसी भांति आप दोनों की शोभा होती है और बापका दा पत्य पुर हैन होता है । अतएव आप जगद् वे मे तु हैं और विश्व केतु हो जायेंगे । ॥११॥१२॥ हे वत्म । यद तुम इस ममन्न जगत् के हित सम्पादिन करने के लिये पिनाकधारी भगवान प्रस्नु को मोहित बन्दो मिमे मुख के मनवाले भगवान् शम्भु दारा का परिग्रह कर लेद ॥१३॥ क्मिी भी विजन देश में स्निग्ध प्रदेश में--पर्वतो पर और मरितालों में जहाँ. जहां पर देश गमन कर वहाँ-वहाँ पर हो इसके साप उनको मोह युक्त कर दो ॥१॥ मोह्यस्व यतात्मान वनिताविमुख हरम् । त्वहते विद्यले नान्य कश्चिदम्ब विमोहक ॥१५
[ पालिया पुराण
भूते हरे मानुगगे भवतोऽपि मनोभव ।
गापोपशातिर्मविता तस्मादात्महित कुरु ।।१६
सानुरागो वरारोहा यदीच्छति मनोगव ।
तदा तवोपभोगाय म त्वां सम्भावपिप्यति ॥१७
तस्माज्जगद्विताय त्व यतस्व हरमोहने ।
शिवस्य भव वेतुस्त्वं मोहयित्वा महेश्वरम् ॥१८
इति श्रुत्वा वचस्तस्य ब्रह्मण परमात्मनः ।
उवाच मन्मथस्तथ्यं ब्रह्माणं जगतो हितम् ॥१६
करिष्येऽह तव विभो वचनाच्छम्भुमोहनम् ।
किन्तु योषिन्महास्न मे तत्र कान्ता प्रभो सृज ॥२०
मया सन्माहिते शम्भौ यया तस्यानुमोहनम् ।
कार्य मनोरमा रामा ता निदेशय लोकभृत् ॥२१
तामह नहि पश्यामि यया तस्यानुमाहनम् ।
कर्तव्यमधुना धातस्तत्रोपाय तथा कुरु ॥२२
इन वनिता से विमुख भगवान हर को जो कि पूर्णतया मयत
आत्मा वाले है मोहित कर दो। तुम्हारे विना अर्थात् वेवल तुमको
छोडकर अन्य कोई भी इन भगवान् शम्भु को विमोहित करने वाला
त्रिभुवन में नहीं है ॥१५॥ हे मनोभव । भगवान हर के सानुराग रो
जाने पर अर्थात् दाम्पत्य जीवन के सुखभोगो के अभिलापी होने पर
आपरेशाप की भी उपशान्ति हो जायगी। इस कारण से आप इस
ममय मे अपना ही हित करो ॥१६॥ हे कामदेव । अनुराग मे युक्त
होकर जब शम्भु वरारोहा की इच्छा करें तो उस अवसर पर तुम्हारे
उपभोग के लिये वे तुमरो सम्भावित अवश्य ही करेगे ॥१७॥ इमलिये
जगत की मलाई करने के लिय तुम भगवान हर के मोहन करने के कर्म
म पूर्ण यल करो । महेश्वर को मोहित करके आप शिव के यत्तु हो
॥१८॥ मार्कण्डेय मुनिवर ने कहा-परमात्मा ब्रह्माजी वे इस
वमन्त आगमन वर्णन ] वचन वा श्रवण करके कामदेव ने ब्रह्माजी मे जगत् का हितकर जा तथ्य था वह कहा था-कामदेव ने कहा-हे विभो । मैं आपकी याज्ञा वचन से अवश्य ही शम्भु का मोहन करूंगा किन्तु हे प्रभो । पोपिन रूपी महान अस्त्र जो है उस पान्ता को मेर लिय आप सृजित पर दीजिये ।।१६।२०।। मेरे द्वारा शम्भु के सन्मोहित करने पर जिसके द्वारा उसका अनुमोन करना चाहिये हे लोक्मत् । उम परम रमणीय रामा का आप निदेशन वीजिये ॥२१॥ उम प्रकार की रामा को मैं नहीं देख रहा है जिसके द्वारा उन का अनुमोहन होवे। बव हे धाना । रत्तं व्य यही है कि उसम कुछ उसी तरह का उपाय करे ॥२२॥ एव वादिनि कन्दर्प धाता लोकपितामह । कुर्या मन्मोहनी योपामिति चिन्ता जगाम ह ।।२३ चिन्ताविष्टस्य तस्याथ नि श्वासो यो विनि मृत । तस्माद्वसन्त सजात पुप्पन्नातविभूपित ॥२४ चूताकुरान मुकुलितान् विभ्रझमरसहतिम् । विशुकान् सारसान् रेजे प्रफुल्ल इव पादप ॥२५ शोणराजोवसकाश फुल्लतामरसेक्षण । सन्ध्योदिताखण्डशशिप्रतिमात्य मुनासिक ॥२६ शखवच्छ्यणावर्त श्यामकुञ्चितमूर्द्धज । सन्ध्याशुमालिसदृश कु डलद्वयमडित ॥२७ प्रमत्तमा तङ्गगतिविस्तीर्णहृदयस्तन । पोनस्थूलायतभुज कठोरकरयुग्मन ॥२८ माकण्डेय मुनि ने कहा-कामदेव के इस प्रकार से बोलने पर लोको वे पितामह ब्रह्माजी ने यही चिन्ना की थी कि मुझे ऐमी सगे- हनी पोया (नारी) करनी चाहिय ॥२३॥ इम चिन्ता म समावि ट उन ब्रह्माजी के जो इसके अनन्तर निश्वाम विनि स्न हुआ या उसी से वसन्त ने जन्म धारण दिया था जो वि पापा के समुदाय म विभूषित [ वालिका पुराण था ||२४॥ भ्रमरो की मंहति (ममह ) को धारण करने वाले मुख लित आम्र के अंकुरो को-सरस किंशुको ( ढाक के पुण्य ) को माथ लिये हुये प्रफुलिन पादप (वृक्ष ) की भांति शोभित हुआ था ॥२५॥ उसी वसन्त को स्वरूप-शोभा का वर्णन करते हुये कहा जाता है कि वह रक्त कमल के मटशथा तथा विकमित तामरस के ममान उसके मेन थे-मन्ध्या की वेला मे उदीयमान अखण्ड चन्द्रमा के समान उमका मुख था और उसकी परम सुन्दर नासिका थी ॥२६॥ शख के सदृश श्रवणो के आवतं वाला था तथा श्याम वर्ण के कुञ्चित (घराले ) मोणो से शोभिन था सन्ध्या के समय मे अ शुमाली के तुत्य दोती कुण्डलो मे विभूपित था ।। २७ ।। उसकी गति मदमस्त हाथी के समान थी और उमका बक्ष स्थल विस्तीर्ण था तथा पीन स्थूल और नायत भुजाओं से मस्त पा एव उसके दोनो करो का जोडा जीव व ठोर था ॥२८॥ सुवृत्तोरुकटीजघ कम्युग्रीवोन्नतासक । गूढज पोनवक्षा सम्पूर्ण. सर्वलक्षणे ॥२६ तागेश्य समुत्पन्ने सम्पूर्ण युसुमारे। वो वायु. स-सुरभि. पादपा अपि पुप्पिता. ॥३० पिकाश्च नेदु शतश पञ्चम मधुरस्वरा । प्रफुल्लपचा अभवन् सरस्य पुष्टपुष्करा. ॥३१ तमुत्पन्नमवेक्ष्याय तया ताइसमुतमम् । हिरण्यगर्भो मदन जगाद मधुरं वच ॥३२ एप मन्मय ते मित्रं मदा सबरो भवेत् । आफूल्य तव ते सर्वदैव परिप्यति ॥३३ यथाग्ने पदमनो मित्र मर्वत्रोपर रोति च । तथा नवतो मित्र मदा वामगुयाम्यनि ।। ३४ बगतेग्न्तवादवगन्नान्यो भवत्वयम् । गयानुगमन वर्म नया मोरारजनम् ।।३५ वमन्त आगमन वर्णन ] 1 उराके उम्-कटि और जयायें मुवृत्त अर्थात मुडौन थे—उसकी ग्रीवा कम्बु के तुल्य थी एव उसको नासिका उन्नत थी-वह गूढ जजुओ वाला-रथूल वक्ष स्थल से युक्त था। इस रीति से समस्त लक्षणो से वह सर्वाङ्ग सम्पूर्ण था ॥२६॥ उसके अनन्तर उस प्रकार के सम्पूर्ण कुसुमाकर (वमन्त ) के ममत्पन्न हो जाने पर सुगन्ध स सयुत वायु वहन करन लगी और सभी वृक्ष पुष्पित हो गये थे ॥३०॥ कोयलें मधुर स्वरो स समन्वित होती हुई मंकडो वार पञ्चम स्वर म वोलन लगी थो- विकसित कमलो वाली सरोवरें पुष्पयुप्कगे से युक्त हो गयी थी ॥३१।। इसके अनन्तर हिरण्य गभ अर्थात् ब्रह्माजी उस प्रकार के अतीव उत्तम उसका समुत्पन्न हुआ देखकर कामदेव से मधुर वचन वाले ॥ ३२ ।। ब्रह्माजी ने कहा-हे कामदेव | यह आपका मित्र उत्पन्न होकर समुपस्थित है जो कि सर्वदा ही तुम्हारे ही साथ सञरण करने वाला रहेगा और यह तुम्हारे लिये सर्वदा ही अनुकूलता का व्यवहार करगा ।।३३।। जिस रीति से अग्नि का मिन वायु है जो उसका सभी जगह पर उपकार किया करता है उसी भांति यह आपका मित है जो सदा ही आपका ही अनुगमन करगा ॥ ३४ ॥ बसति अन्त ना हेतु होने से ही यह वसन्त नाम वाला होगा। इसका पर्म यही है कि मदा आपना अनुगमन करे तथा लोकाना अनुरजन किया कर ॥३५॥ असो वसन्त गारो वमन्ते मलयानिल । भवन्तु सुहृदो भावा सदा त्वद्वशवतिन ॥३६ विवोकाद्यास्तथा हावाश्चतु पष्टिकलास्तथा । कुर्वन्तु रत्या सोहद्य सुहृदस्ते यया तव ॥३७ एभि सहचरं काम वसन्तप्रमुखैभवान् । अनया सहचारिण्या त्वयुक्तपरिवारया ॥३८ मोहयम्ब महादेव कुरु सृष्टि सनातनीम् ।
[ कालिका पुराण
यथेष्टदेश गच्छ त्व सर्व सहचरर्वत ।
ग्रह ता भावयिष्यामि यो हर मोहयिप्यति ।।३६
एवमुक्तोऽय मदन सुरज्येष्ठेन हर्पित ।
जगाम सगणस्तत्र सपल्यनुचरस्तदा ॥४०
दक्षं प्रणम्य तान् सर्वान् मानसानभिवाद्य च ।
यनास्ति शम्भुर्गतवास्थान मन्मयस्तदा ॥४१
तस्मिन, गते मानुचरेऽथ मन्मथे
शृंगारभावादियुते द्विजोत्तमा ।
प्रोवाच दक्ष मधुर पितामह
साद मरीच्यत्रिमुर्यमुनीश्वर ॥४२
यह वमन्त शृङ्गार है और वसन्त में मलयानिल बहन रिया
परता है । आपने वश मे ही वत्तं न करने वाले भाव सदा गुहृद हो ।
॥ ३६ ॥ विश्वौक आदि हाय तथा पौमठ कलाएं जिम प्रकार गे आपके
मुहार । यगे हो रनि देवी के भी मौहार्द भाव को करेंगे अथवा विमा
परे ॥३७॥ हे यामदेव । अब आप डा महाचरो के साथ जिनमें
यमन प्रधान है और तुम्हारे ही उपयुक्त परिवार स्वरूप ग राहदा-
रिती पनि ये गाय मिरर अय महादेव को मोहित करो और सनातनी
गरिवी रखना पर हामी। इन ममम्न गहघरो पे गाथ जो भी इस
होगी देश पसे जायो मैं उगो भाक्ति वहंगा जो हरियो
माहित पा देगी ।। ६ ।।दा रीति मे मुगे म गयमे यो प्रह्माजी में
दागरे गरे पामदेव परम पित होकर पो गणो में गहित तथा
पो और अनुपरी गाय रग समय म यही पर पपा गया था 1.1
सपना मा गमान मानगो को अभियान ये उग
गमय म समय कही पर पाया था परी पा भगवान
१॥५॥3॥ अनुषांचे हित वामदेष पो जाने पर जो कि
सुतार भाप भाग गयुत पा है हितमो' नामह ने दस
काली स्तुति वर्गन ] प्रजापति से मरीचि-अनि प्रमुख मुनीश्वरो के साथ म रहा था॥४२॥ ॥ कालो स्तुति वर्णन ॥ अथ ब्रह्मा तदोवाच दक्षाय सुमहात्मने । मरीचिप्रमुखेन्यश्च वचनञ्चेदमजमा ॥१ भविनी शम्भुपन्नी का का त मन्मोहयिष्यति । इति सञ्चिन्तयन् कान्ता न स्थिरीकर्तुमुत्महे ॥२ विष्णुमायामृते दक्ष महामाया जगन्मयीम् । नान्या तन्मोकी स्यात् सन्ध्यासाविन्युमामृते ॥३ तन्मादह विष्णुमाया योगनिद्रा जगत्प्रसूम् । स्तौमि सा चारुम्पेण शकर मोहयिष्यति ॥४ भवास्तु दक्ष तामेव यजना विश्वरूपिणीम् । यथा तव मुता भूत्वा हरजाया भविष्यति ॥५ एव वचनमाकर्ण्य ब्रह्मण परमात्मन । उवाच दक्ष स्त्रष्टार मरीच्यादिभिरीरित ॥६ ययात्य भगवस्तय्य त्व लोक्श जगद्धिनम् । नत् करिप्यामहे मभ्यम् यथा स्यात्तन्मनाहा १७ तथा तथा भविष्यामि यथा मम सुता स्वयम् । विष्णुमाया भवेत् पत्नी भूत्वा शम्मोहात्मन ॥८ मार्कण्डेय मुनि न कहा-इमके अनन्नर उम समय म ब्रह्माजी नै सुमहान् आत्मा वाल दक्ष के लिए और मरीचि प्रमुख मुनियो से यज्जसा यह वचन कहा या ॥१॥ ब्रह्माजी ने कहा-~भगवाम् शम्भू की पत्नी होन दालो कोन है और उनका माहित कर देगी इगी का चिन्तन वरन् हुए उन्होंन शिव की कान्ता के विषय में स्थिर करने का [ पालिका पुराण उत्साह नही किया था ॥ २ ॥ हे दक्ष जगन्मयी-महामाया-विष्णु की माया विना तथा सन्ध्या-सावित्री और उमा के अतिरिक्त अन्य कोई भी उनका सम्मोहन कर देने वाली नहीं है ।।३।। इसी कारण से मैं इम जगत् को प्रसूत करने वाली भगवान् विष्णु की माया योग निद्रा का स्तवन करता हूँ क्योकि वही अपने सुन्दरतम स्वरूप स भगवान् शङ्कर को मोहित करेगी || हे दक्ष । आप ता उसी विश्व के स्वरूप वाली का यजन करो जिसके करने से वह आपकी पुत्री ह कर भगवान् हरि की पत्नी होगी ॥५॥ मार्वण्डेय मुनि ने कहा-इस प्रकार के परमात्मा ब्रह्माजी के वचन का श्रवण करके मरीचि आदि के द्वारा ईरित दक्ष ने सृजन करने वाले ब्रह्माजी से कहा था ।। ६ ।। दक्ष प्रजा. पति ने यहा-हे लोको के ईश ! हे भगवन् । जो परम तथ्य और जगत् वा हितकर कहा है वह मैं भली भांति करूंगा जिससे उसके मन को हरण करने वाली समुत्पन्न हो जावे ॥७॥ मैं ठीक उसी भांति का हो जाऊंगा जिम-जिस प्रकार से मेरी पुत्री स्वय ही महात्मा शम्भु की पत्नी होवर विष्णु की मापा हो जाये ।।८।। एपमेवेति रक्त मरीचिममुखैस्तदा । यष्टु दक्ष समारेभे महामाया जगन्मयीम् ॥६ क्षीरादातरतीरस्यस्ता कृत्या हृदयस्थिताम् । तपम्नप्नु समारेभे द्रष्टु प्रत्यक्षतोऽम्विकाम् ।।१० दीव्यवर्पण दक्षोऽपि सहस्राणा त्रय समा । तपश्चचार नियत सयतारमा दृढव्रत ॥११ मारनामो निराहारो गलाहारी च पर्णभक् । एव निनाय सत्याल चिन्तयस्ता जगन्मयीम् ॥१२ गते दक्षे तप पतु ग्रह्या सर्वजगत्पति । जगाम मन्दराभ्याम पुण्यात्पुण्यतर वरम् ॥१३ तत्र गत्वा जगदात्री विष्णुमाया जगन्मयीम् । नुष्टाय यागभिरभिरेलान शत समा ।।१४ पाली स्तुति वर्णन ] मार्कण्डेय मुनि ने कहा- उस बेला में मरीचि जिन में प्रमुख थे उन सभी ऋपियो ने इमी प्रकार होवे यही कहा था फिर प्रजापति दक्ष ने जगत से परिपूर्ण महामाया का अभ्यर्चन करना आरम्भ कर दिया था 11 क्षीरोद के उत्तर म नीर में स्थित होकर उस देवी को अपद हृदय में विराजमान करके अर्थात् उसका अपन मन म पूर्णतया ध्यान करके प्रत्यक्ष रूप मे अम्बिका के अवलोकन करने के लिए तपस्या का समाचरण करने के लिये भारम्भ वर दिया था ॥१०॥ निद्यत होर सयत आत्मा वाले और सुदृढ व्रत म सयुत हाते हुए तप किया था। उस तप करने के समय म आरम्भ म पवन वायु का थाहार फिर विना आहार किये हुए और जल का ही केवल आहार तथा पत्तो का आहार करने वाला वह दक्ष रहा था। उस तप करने के समय का उस जगत्मयी उमका चिन्तन बरत हुए ही व्यतीत किया था ।। ११, १२ ।। दक्ष को तप करने के लिये चले जान पर समस्त जगत् व पति ब्रह्माजी परम पवित्र सभी पवित्र तम परम । मन्दराचल के समीप म चला गया था। वहाँ पहुँच कर जगत् के धात्री जगत्मयी विष्णु माया का वचतो के द्वारा और अध्यों से एक तान होदर सौ वर्ष तक रतवन वियर था।।१३-१४॥ विद्याविद्यात्मिका शुद्धा निरालम्बा निराकुलाम् । स्तोमि देवी जगद्धात्री स्थूलाणीय स्वरूपिणीम् ॥१५ यस्या उदेति च जगत्प्रधानाध्य जगत्परम् । यस्यास्तदपभूता त्वा स्तौमि निद्रा सनातनीम् ॥१६ त्व चिति परमानन्दा परमात्मस्वरुपिणी । शक्तिमत्व सर्वभूताना त्व सर्वेपा च भावनी ।।१७ त्वं सावित्री जगद्धानी व सन्ध्या त्व रतिधुति । त्व हि ज्योति स्वस्पेण ससारस्य प्रकाशिनी ||१८ तया तम स्वरूपेण च्छादयन्तो सदा जगन् । स्वमेव सृप्टिस्पेण ससारपरिपुरणी ।।१६ ५० [ कालिका पुराण स्थितिरूपेण च हरेजंगता च हितपिणी । तथैवान्तस्वरपेण जगतामन्तकारिणी ॥२० त्व मेधा त्व महामाया त्व स्वधा पितृमोदिनी । त्व स्वाहा त्व नमस्कार-वपट्कारी तथा स्मृतिः ॥२१ ब्रह्माजी ने कहा-विद्या और अविद्या के स्वरूप वाली-शुद्धा बिना आलम्ब वाली –निराकुला जगत् की घात्री और स्थूल और अणीय स्वरूप से समन्विता देवी का स्तवन करता हूँ ॥१५॥ जिससे यह जगत उदित होता है जो प्रधान नामक और जगत से पर है। जिससे उसी के अशभूता सनातनी निद्रा आप हैं ऐसी आपका मैं स्तवन फरता हूँ॥१६॥ आप परमानन्द स्वरूपा चिति है, आप परमात्मा के स्वरूप वाली हैं--आप समस्त प्राणियो की शक्ति हैं और आप सबको पावन परने वाली है ।। १७॥ आप मावित्री हैं-आप इम जगत की धात्री है-आप हो सन्च्या, रति और धृति है और आप ही ज्योति के स्वरूप के द्वारा इस समार में प्रकाश करने वाली है ॥ १८॥ तथा आप अपने तम के स्वरूप से मदा ही इस जगत् का छादन करती हुई स्थित रहा करती हैं। आप ही सृष्टि के सूजन के स्वरूप से इस संसार यो परिपूर्ण करने वाली है ॥ १६॥ आप मेधा हैं-आप महामाया हैं---आप पितृगणो मोह देने वाली स्वधा है--आप स्वाहा है तथा नम- स्कार और वपटवार एव स्मृति है ।२०-२१।। त्व पुष्टिस्त्व धृतिर्मनी वरणा मुदिता तया। त्वमेव लज्जा त्व शान्तिस्त्व वान्तिर्जगदीश्वरी ॥२२ महामाया त्वच म्वाहा स्वधा च पितृदेवता। या सृष्टिशक्तिरम्माक स्थितिशक्तिश्च या हरे ॥२३ अन्नविनयशानी गा व शक्ति सनातनि ॥२४ एका त्य द्विविधा भूत्वा मोक्षसमारपारिणी। विद्याविचारवम्पंण स्वप्रकाशाप्रकाशन ॥२५
५२
[ वालिया पुराण
त्व नित्या त्वमनित्या च त्व चराचरमोहिनी ।
त्व नित्या त्वमनित्या च त्व चराचरमोहिनी ।
त्व सन्धिनो सर्वयोग सागोपागविभाविनी ॥३२
चिन्ता कीतियतोना त्व त्व तदष्टांगसंयुता ।
त्व खडिगनी शूलिनी च चक्रिणी घोररूपिणी ॥३३
त्वमीश्वरी जनाना त्व सर्वानुग्रहकारिणी।
विश्वादिस्त्वमनादिस्त्व विश्वयोनिरयोनिजा।
अनन्ता सर्वजगतस्त्वमेवकान्तकारिणी ॥३४
नितान्तनिर्मला त्व हि तामसीति च गोयसे ।
त्व हिंसा त्वमहिंसा च त्व काली चतुरानना ॥३५
जो मूत्ति वितता मधरित्री और क्षिति का धारण करती हुई
है, है विश्वाम्भरे ! वह लोग में मदा शक्ति और भूति का प्रदान करने
वाली आप ही है ।। २६॥ आप लक्ष्मी चेतना यान्ति और सनातनी
पुष्टि हैं। आप बाल गन हैं-माप मुक्ति है आप शान्ति-प्रज्ञा और
स्मृति है ॥ ३० ॥ ४ गय और मोक्ष के प्रदान करने वाली । बाप इस
मगार म्पी महान् सागर से उत्तरण व रन के लिये तरणी अर्थाद नौका
स्वरूपा है । आप प्रसन्न होदय ' शप समस्त जगतो की गति एव
मति है जामदा ही रहा परती है ॥३१॥ आप नित्या हैं और आप
परा परी को मोहित बरन वासी अमिस्या भी है । भाप सब योगो ने
गामी यिभावा यरन वाली सन्धिती है । आप यतियो की चिन्ता
और वीति । और बापही उगर आठ अङ्गो से गमन्विता है। आप
गानी, शमिनी परिणी और पार रूप दासी ॥३२-३३॥ भाप
बाबीईभरी है -~या गय पर पद परा वाली है । आप इस
पिया यादि , भाप यानि पर्यापार मी जिमाकोई
माहिती नहीं। आपग चिनीया विश्व में उत्पन्न
पायी है और भार स्वयं आयातिता अर्थात आपरे गमुत्पन
कालो मनुल वर्णन J करने वाला कोई नहीं है। आप अनाता है अर्थात् ऐमी है जिनका कोई अन्त ही नहीं है । आप सब जगतो यो एकालमारिणी हैं यदि समम्न जगतो की रचना करने वाली हैं ॥३४॥ आप नितान्त निर्मला है और आपको ताममोमा गाया जाना है। आप हिमा और महिमा है नया आप नार मुखो में मंयुत वाली हैं ।।३५॥ त्व परा सर्वजननी दमनी दामिनी तथा। त्वय्येव लीयते विश्वं भाति तत्त्वंतदिति च ॥३६ त्व सृष्टिहीनां त्वं सृष्टिस्त्वमकर्णापि सध्रुतिः । तपस्विनो पाणिपादहीना त्वं नितरां ग्रहा ॥३७ त्वं द्योस्त्वमापस्त्वं ज्योतिर्वायुस्त्वा च नमो मन. । अहंकारोऽपि जगतामष्ठधा प्रकृतिः कृतिः ॥३८ जगन्ताभिर्मेरहपधारिणी नालिकापरा। परापरात्मिका शुद्धा माया मोहानिकारिणी ॥३६ कारणं कार्यभतञ्च सत्यं शान्तं शिवाशिवे । म्पाणि तव विश्दा रागहरफलानि च ॥४० नितान्त ह्रस्वा दोर्धा च नितान्ताणुवृहत्तनुः । सूक्ष्माप्यखिललोकस्य व्यापिनी त्ल जगन्मयी 11४१ मानहीना विमानाति-विमानोन्मानसम्भवा । यदष्टिव्यष्टिसम्भोगरामादिगलिताशया। दत्ते महिम्नि नद्रूप तव भ्रान्त्यादिकं च यत् ॥४२ आप सदमे परा जननी है तथा माप दामिनी हैं । आप ही में यह विश्व लय होता है और दिमात होता है। आप तत्त्व स्वरूपा हैं तथा सवको विभरण क्यिा करती हैं ॥३६॥ आप सृष्टि से हीन है याप सृष्टि है । आप कप रहिल होही हुई भी श्रुति सम्पना हैं । आप तपस्विनी हैं तथा कर चरणो से रहित है, आप नितरा महान हैं ।१७ आप द्यो हैं--आप बल हैं: -~~आप ही ज्योति तथा वायु हैं। आप नभ- - ५४ और वृहत् - [ कालिका पुराग मन और महबार भी है । आप जगतो की आठ प्रकार की प्रकृति तथा कृति है ॥ ३८ ॥ आप जगत् की नाभि और परा मेरु रूपधारिणी है । आप परानानिकट है । आप परायणात्मिवा अर्थात् पर और अपर स्वरूप वाली है । आप शुद्धा-माया और अति मोह वे करने वाली हैं ॥३६॥ आप कारण और कार्यभूत हैं । हे शिवाशिवे | आप सत्य और शान्त हैं । आपके स्प विश्व के अर्थ म राग, वृक्ष और 7 हैं। ४० ।। आप नितान्त छोटी और दोध है । आपका स्वरूप नितान्त अणु है । आप गूदमा होती हुई भी सम्पूर्ण लोक म व्याप्त रहने वाली हैं- आप जगत से परिपूर्णा है ॥४१॥ आप मात्र से होन-विमाता- अति विमाना और उन्मान से समुद्भूता है । आप ऐसी है जो अष्टि- व्यष्टि-सम्भोग और राग आदि से गनित आशय वाली रहती है। वह आपली महिमा में आपकी जो प्रान्ति आदिव हैं वह आपका हो स्वरूप है ॥४२॥ इष्टनिष्टाविपावमा यथेष्टानिष्कारणम् । गर्गादिमध्यान्तमय निग्न स्प तथैव च ॥४३ विचाराष्टाङ्गयोगेन मम्पाद्यव मुहम्मुह । या चिरीमियते तत्त्व सत्ते म्प मनातनम् ॥४४ याधावाय गुरा दुःख नानाशाने लयानयो । उपमापनया शानिर्भूतिम्त्ना जगत पते ॥१५ यम्या प्रभागा नो वक्तु सपनोनि भवनमये । तम्या मम्मोहागेमा म निस्तयगे मया ॥४. योगनिमा महानिमा मोरनिद्रा जगन्मयी। विष्णुगाया प प्रकृति पररया स्तुत्या विभावयेत् ॥४७ मम दियो भारम्प या यपुरनारिमा। म्या प्रभारी यो दा गृपान् घेत्तु प प क्षम ॥४८ प्ररामनामोमिन्दम्पागग्गांग। विमेव जगमायावा पागोपरा :
T' काली स्तुति वर्णन ] ܝܚܐܚ 1 प्रसीद सजगतां जननी स्त्रीस्वरूपिणी। विश्वरूपिणि विश्वेशे प्रसीद ल सनातनि ५० आप इष्ट और यनिष्ट के विपाक के ज्ञान रखने वाली है और यथेष्ट नथा अनिष्ट वा कारण है। यापमदि-मध्य तथा अन्त में परिपूर्ण हैं और जमी भांति आपाप निम्न है ॥४३॥ विचार आठ अङ्गो वाले योग में वारम्वार टम प्रफर मे सम्पादन करके जो तत्व स्थिर किया जाता है वह ही आपका सनातन स्प है ॥४४॥ वास्य और अवाय मे मुन्न तथा दुःख-ज्ञान और अज्ञान-लप और बलय-उप- ताप और शान्ति आपही जगत् के स्वामी की है ।।५।। जिसके प्रभाव को तीनो लोको में कोई भी करने की शक्ति नहीं रखता है अर्थात किसी के द्वारा भी प्रभाव नहीं कहा जा सकता है वह भाप उमका भी मम्मोहन करने वाली हैं ऐसी आपका मेरे द्वारा क्या स्तवन किया जा सकता है ॥४६॥ आप योग निद्रा-महानिद्रा~-मोहनिद्रा -जग- न्मयो-विष्ठमाया और प्रकृति है ऐसी आपको कौम स्तुति के द्वारा विभादित करे ॥४७॥ जो मेरे--विष्णु भगवान् और शङ्कर भगवान के वपु के वहन करने की (वरूप वाली है उसके प्रभाव का क्थन करने को और गुणगण का ज्ञान प्राप्त करने के लिये कौन समर्थ हो सकता है अर्णा कोई भी ऐसी क्षमता नहीं रखता है ॥४८॥ प्रकाश वरण ज्योति. स्वरूप के अन्तर में गोचर होने वाली भाप ही जगम म स्थय रूपा एक वाह्य गोचर है ॥४६॥ समस्त जगतो को जननी रत्री रूप वाली आप प्रमान होइये । है विश्व रूपिणि? हे विपदेशे ! हे सनामि ! आप मुझ पर प्रसन्न हो जाइये ॥५०॥ एना सस्तूयमाना सा योगनिद्रा विरिञ्चिना । आविर्गभूव प्रत्यक्ष ब्रह्मणः परमात्मनः ॥५१ स्निग्धाञ्जना तिचारुरूपोतुङ्गा चतुर्भुजा। सिंहस्था खड्गीलान्जहस्ता मुक्तकचोत्करा ॥५२ [ पालिका पुराण समक्षमथ ता वीक्ष्य स्रष्टा सजगद्गुरु । भक्त्या विनध्रतु गासस्तुष्टाय च ननाम च ।।५३ नमो नमस्ते जगत प्रवृत्तिनिवृत्तिप्पे स्थितिमर्गस्पे। चराचराणां भवती च शक्ति रानातनी सर्वविमोहनीति ॥५४ या श्री सदा केशवमूर्तिमाया विश्वम्भरा या सकल विमति । ह्रोर्योगिनी या महिता मनोज्ञा सा त्व नमस्ते परमात्मसारे ॥५५ यामादिपर्वे हृदि योगिनो या विभावयन्ति प्रमितिप्रतीताम् । प्रकाशशुद्वादियुता विरागा सा त्व हि विद्या विविधावलम्बा५६ मार्कण्डेय मुनि ने बहा--विरन्जि (ब्रह्मा) के द्वारा इस प्रकार से स्तवन की हुई वह योग निद्रा परमात्मा ब्रह्मा के सामने आविर्भूत (प्रक्ट) होगयी थी ॥५१॥ उस प्रक्ट हुई देवी योग निद्रा का स्वरूप का अब वर्णन किया जाता है वह स्निग्ध अन्जन ची क्रान्ति के समान धति वाली थी---उमका स्वरूप परम सुन्दर था-वह उन्नत थी- और उसकी चार भजायें थी। वह सिंह के उपर सवार थी-उसके हाथों मे खड्ग और नील कमल था-उसके केश पाश पुले हुये थे ।५२) सृष्टि ये सृजन करने वाले गगा गुरु ब्रह्माजी ने अपने समक्ष मे समु- पस्थित उस देवी का अवलाकन कर उन्होने अपने उन्नत कन्धो को विनम्र कर बटे ही भक्ति के भाव से उन देवी की स्तवन किया और प्रणिपात किया था ।।५३।। ब्रह्माजी ने कहा-हे जगत् की प्रवृत्ति और निवृत्ति के रूप वाली । हे स्थिति और सग (रचना) के स्वरूप से समन्विते । आपके चरणार विन्दो मे मेरा वारम्वार नमस्कार है। घर और अचरो की आप शक्ति है आप सनातनी और सबका विमोहन पान वाली है ॥५४॥ जो थी सदा ही भगवान केशव की मूर्ति की माया है जो विश्वम्भरा है और मयका विभरण क्यिा करती है-जो हो योगिनी महिता और मनोज्ञा हैं वह आप ऐसी है हे परमात्म मारे । म मेरा नमभार है ॥५॥ हे यामादि पूर्वे। जिसको योगिनन
वालो म्नुनि वर्णन ]
सपा हदय म प्रमिति के द्वारा प्रनीन का विभावन दिया करत है
वह वाप प्रकाश शुद्ध आदि म मयुठा है-वह आप राग रीता
है। बाप निश्चित प म विधि (ना) अवलम्बा कली विद्या
है 111
पूरस्थमव्यक्तमचिल्य म्प व विजनी वालमय जगन्नि ।
विवारवीज प्रगेपि नित्य प्रत्लानि यत्नान्यत्र मध्यमानि ।।५७
सत्व रजोज्यो तम इत्यभोपा विकारहीना समपम्यिनिर्या ।
सा त्व गुणाना जगदेव हेतु ह्यान्तराल भवनोव याति ॥५८
भोपजगता वीजे शेयज्ञानम्वपिणि ।
जगद्विताय जगता विष्णुमाये नमोन्नुते ॥५६
इत्यावण्यं वचस्तस्य काली लोरविमोहिनी।
ब्रह्माणमूचे जगता यष्टार धनशब्दवन् ॥६०
ब्रह्मन् विमर्थ मवता सुनामवधारय ।
उच्यना यदपृष्योऽम्नि तच्छोन पुरता मम ।।६१
प्रत्यक्ष मयि जाताया मिद्धि पायल्य निश्चिता।
तम्माते वाञ्छित व हि यत् परिप्यामिकाविता ॥६२
आप यूरम्य-अयन-पित्य पिकानमय ना धारप बग्ने
गानी है अर्थात् मर, करनी हैं नत्पर्य यह है जगती ना विभरण
परने वाली है । आप रिम विकार वीज वा बरती है जाप्रबरन है,
ग्यूई और मध्यम है ॥५॥ नव-17 और तमागुण
इन दिवारी
ग पाप हीन है और जो ममम्मिनि म्या है। वह भाप गुणा को
जगार हतु है-याहिर और सनराम म मदनी को भौति गमन रिया
रगी है ॥५८11 है अगेप जाना को दी। मेय (जमान के
पोग्य ) और ये म्यम्प वानी । हेजा को दिन मा । जग्गा
पनि बामा आपरे कि नमवार है ॥५६॥ माय महरिने
पहा-गदापोसार विभोहन रन पानी की
५८ [ कालिरा पुराग ने मेघ की गर्जना के ममान अर्थात् अजीव गम्भीर ध्वनि मे जगतो के सुजन करने वाले ब्रह्माजी से बोली ॥६०11 देवी ने कहा-हे ब्रह्मन् आपने रिस प्रयोजन का सम्पादन करने के लिये मेरी स्तुति की है । इसका अवधारण करो और बतलाओ जो भी अधृष्य होवे- यह मेरे मामने शीघ्र ही कहो ॥६१।। मेरे प्रत्यक्ष हो जाने पर कार्य की सिद्धि निश्चित ही होती है। इस कारण से आप अपना जो मनोडाभिलपित हो उमे शीघ्र ही कहो जिसको मैं भाविता कर दूंगी ॥२॥ एकश्वरनि भूतेशो न द्वितीया समोहते । त मोहय यथा दारान् स्वय स च जिघृक्षति ॥६३ त्वदृते तस्य नो काचिद् भविष्यति मनोहरा । तस्मात्त्वमेकरूपेण भवन्य भव मोहनी ॥६४ यथा धृतशरीरा त्व लक्ष्मीरूपेण केशवम् । आमोदयसि विश्वस्य हितायंत तथा कुरु ॥६५ कान्ताभिलाषमात्र मे निनिन्द वृषभध्वज । पथ पुन म वनिता स्वेच्च्या सग्रहीप्यति ॥६६ हरे गृहीतकान्ते तु कथ सृष्टि प्रवर्तते । जाद्यन्तमध्यहेतो च तम्मिन्छम्भौविरापिणि ॥६७ दति चिन्तापरो नाह त्वदन्यं शरणन्त्विह । लब्धवास्तेन विश्वस्य हितायतत् पुस्म्व मे ।।६८ न विष्णु रम्य मोहाय न लक्ष्मीनं मनोभव । न चाप्यह जगन्मातस्रस्तस्मात् त्व मोहयेश्वरम् ॥६६ योतिम्त गर्वभूताना यथा त्य ह्रीयंतात्मनाम् । यया विष्णो प्रिय का त्व तया सन्मोहयेश्वरम् ।।७० अय ब्रह्माणमाभाप्य वाली योगमयी पुन । यदुवाच महाभागास्तच्छृण्वन्तु द्विजोनमा ॥७१ वहानों ने बरा-भूनो में ईश भगवान शम्भु एप ही अर्धात "गे ही विद्याप पिया करते है और दूसरी अाए जाया की इसा ही
काली स्तुति वर्णन ]
नहीं रखते है। आप उनको मोहित करदो और वह स्वय ही दारा
ग्रहण कर लेवे ।।६३॥ आपके विना अर्थान् आपको छोडकर उनके मन
को हरण करने वाली कोई भी नहीं होगी। इस कारण से आप ही एक
स्वरूप से भगवान् शम्भु को मोहन करने वाली हो जाओ ॥६४। जिस
प्रकार से आप लक्ष्मी वेम्वरप मे शरीर धारण करने वाली होकर
भगवान् के शव को आमोदित विया करती हैं विश्व के हित सम्पादन
करने के लिये उमी भांति इनको करिये ॥६५।। वृषभध्वज शम्भ मेरी
कान्ता वी अभिलापा मात्र को ही बुरा कहते थे फिर किस रीति से
वे वनिता को अपनी ही इच्छा से ग्रहण करेंगे ॥६६॥ कान्ता के ग्रहण
र करने वाले हर होने पर यह सृष्टि कमे प्रवृत्त होगी आदि--- अन्त
और मध्य ये हेतु स्वरूप उन शम्भु के विगगी होने पर यह कैसे हो
मकेगा ।।६७॥ इस चिन्ता मे मग्न मैं हू आप मे अन्य मेरा यहाँ पर
रक्षर कोई नहीं है। वह मैंने प्राप्त कर लिया है अतएव विश्व की
भलाई के लिए आप यह करिये जो कि मेग ही एक कार्य है ।। ६८ ॥
इनये मोह करने के लिये न तो विष्णु समथं हैं और न लक्ष्मी तथा
कामदेव ही समर्थ हैं । हे जगत् को माता । मैं भी उनको मोहित करने
की क्षमता नहीं रखता हूँ। इस कारण से थाप ही महेश्वर को मोहित
परिये । समस्त भूतो की कीति है वैसे ही आप यनात्मालो की-ही
हैं । जिस प्रकार से भगवान विष्णु की एक प्रिया है वैमे हो आप
महेश्वर की होवे ||६६७०॥ मार्कण्डेय मुनि ने कहा-इसके अनन्तर
पाली देवी ने ब्रह्माजी से कह पर उम योगमयो ने फिर जो पहा या हे
द्विजोत्तमी । हे महाभाग वालो । उसका श्रवण परिये ॥७२॥
६०
[ मालिका पुराण
॥ योग निद्रा स्तुति ॥
यदुक्त भवता ब्रह्मन् ममस्त सत्यमेव तन् ।
महते मोहयित्रीह शकरस्य न विद्यते ॥१
हरेऽगृहीतदारे तु सृष्टि पा सनातनी ।
भविष्यतीति तत् सत्य भवता प्रतिपादितम् ।।२
मयापि च महान् यत्नो विद्यतेऽस्य जगत्पते ।
त्वद्वाक्यादिवगुणो मेऽद्य प्रयत्नोऽभूत्सुनिर्भर ॥३
अह तथा यतिप्यामि यथा दारपरिग्रहम् ।
हर करिप्यत्यवश स्वयमेव विमोहित ।।४
चार्बी गूर्तिमह धृत्वा तस्येव वशवतिनी।
भविष्यामि महाभाग यथा विष्णोर्हरिप्रिया ॥५
यथा सोऽपि ममंवेह वशवर्तो सदा भवेत् ।
तथा चाह परिप्यामि य तरजन हरम् ॥६
प्रतिपर्गादि मध्य तमह शम्भु निराकुलम् ।
स्वीपेणानुयास्यामि विशेषेणान्यनोविधे ।।
देवी ने यहा--हे ब्रह्माजी । आपने जा भी कहा था वह सम्पूर्ण
मत्य ही है । मरे विना यहाँ पर शङ्कर को मोहत पग्ने वालो कोई
अन्य नही है ॥१॥ भगवान हरपे दाग घेन ग्रहण करन पर यह
गनातनी ष्टि नहीं होगी- यह तो मापन मर्पधा गन्य प्रतिपादित पिया
है। मेरे दाग भी इम जगत पे पति पा महान् यत्न है। आप
पायर में आग दुगुणा मुभिर प्रया हा था ॥३॥ मैं उस प्रकार स
पान पर गोदि भगवान हर अवश हार म्वप ही विमाहा होपर
दारा वा परिपा पग सा परम गु दर मति बनाम में उसकी वश
यगिनी हा जागी मा भाग । जिम मरहम भगवान विष्णु
पगनिनी हरि प्रिया रहा बरगी है ॥११॥ जिग तरह म यह भी यही
TRE गस नगी । जाये। और उगी माह में कारगी और
मानिद्रा स्तुति हर वो अपना वशवर्ती बना लूगी जैस अन्य साधारण जन का पर लिया जाता है ||६ प्रतिसगं के आदि-मध्य उन निरकुश शम्भु का है विद्ये । विशेष रुप में अन्यन स्त्री रूप से उनके ममीप म जाऊगी ॥७॥ उत्पन्ना दक्षजायाया चाररपेण शकरम् । जह मभाजयिप्यामि प्रतिसर्ग पितामह ।।5 ततस्तु योगनिद्रा मा विष्णुमाया जगन्मयीम् । शरीति वदिप्यन्नि रुद्राणीति दिवोक्स : उत्पन्नमान सतत मोहये प्राणिन यथा। तथा सन्मोहयिष्यामि शकर प्रमथाधिपम् ॥१० यथान्यजन्नुग्वनौ वर्तते वनितावशे । ततोर्यात हरो वामावशवर्ती भविप्न ॥११ विभिद्य भुवनाधीना लोना स्वहृदयान्तरे। या विद्यान्च महादेवो मोहान् प्रतिग्रहीप्यति ॥१२ इति तस्मै समाभाप्य ब्रह्मण द्विजमत्तमा । वोक्ष्यमाणा जगन्स्रष्ट्रा तवान्तर्दवे तत ॥१३ तस्यामनहितायान्तु धाता लोक-पितामह । जगाम तत्र भगवान् स्थितो यन मनोभव ॥१४ हे पितामह । दक्ष प्रजापति की स्त्री म बहुत ही सुन्दर स्वरूप मे उत्पन्न हुई प्रतिसगं समाजित हाऊँगो इमरे अनन्तर देवगण जगत्मयी विष्णुमाया मुझका स्ट्राणो-शङ्करी-इम नाम स कहो।। ८,६॥ उत्पन्न मात्र ही निरन्तर जिस प्रकार स प्राणी को मोहित करू ठोक उसी भांति से प्रमथो के स्वामी भगवान् शङ्कर को सम्मोहित कर नगो ॥ १०॥ भूमण्डल में जैसे अन्य साधारण जन वनिता के वश में हा जाया करता है उसम भी आघर भगवान् शम्भु मेरे वश म वर्तन करने वाले हो जायग 11 ११॥ विभेदन करके अपने हृदय ६२ [ पालिका पुराण म लीन और भुवनाधीन जिस विद्या को महादेव मोह से प्रतिग्रह्ण कर लेंगे ॥ १२ ॥ इसके उपरान्त मावण्डेय मुनि ने कहा-हे द्विजसत्तमो इस प्रकार से ब्रह्माजी से कहवर जगत् के स्रष्टा के द्वारा वीक्ष्यमाण होती हुई वह देवी फिर वही पर अन्तर्ध्यान हो गई थी।॥ १३ ॥ इसक अन्तर्ध्यान होने पर लाको के 'पतामह धाता वहां पर गये थे जहां पर भगवान् कामदेव सस्थित थे।॥१४॥ मुदिनोऽत्यर्थमभवन्महामायावच स्मरन् । कृतकृत्य तदात्मान मेने च मुनिपु गवा ॥१५ अथ दृष्ट्वा महात्मान विरञ्चि मदनस्तथा । गच्छन्त हसयानन चाभ्युत्तस्थौ त्वरान्वित ॥१६ आसन्न तमथासाध हर्पोत्पुरलविलोचन । ववन्दे सर्वलोकेश मोदयुक्त मनोभव ॥१७ अथार भगवान् धाता पोत्या मधुरगद्गदम् । मदन मोदयन् सूक्त यद् देव्या विष्णुमायया ॥१८ यदाह वाम शयस्य मोहने ल पुरा यच । अनुमाह नानी ग ता सृजेति मनाभा ॥१६ तदर्थ गस्तुमा दया योगनिद्रा जगन्मयी। पपतान मनमा मया मन्दरवन्दरे ॥२० म्ययमेव तया वत्स प्रत्यक्षीभूतया मम । तुष्टयागोगा गम्भुमोदनीया मपति ने ॥२१ गया च दक्षाभवास समुत्पन्नया हर । मोहिनीयस्तु न चिगदिति गन्य मनोभव ॥२२ मांगनिद्रा नुन ] ६ नन्दिन होकर उनके लिये यम्युलार किया या ॥ १६॥ इम डा. गन्त उन ब्रह्मा ने अपने नमीप ने आरे हुए प्रापये पन्न हप ने नियमिन लावनी वाले कामदेव ने मोह में दुन ममन्त लोकों के म्दानी द्यावी अभिदान किया था ।। १०॥ इन अनन्तर मन- वान ब्रह्मा ने प्रोति ने मधुर और गन्द् वचनों में कानदेव को हपिंद करते हुए जो विशु मायादेवी ने कहा था करी हा या ॥ १८ ॥ यात्री ने कहा है दलको माने पहिले न मान न्वं के दिपम ने वचन कहा था कि बाप ब्नुमोत्न वग्ने दाली जो भी हा उनी रजन वगे।। १६॥ है वामदेव । उनी गई पो सम्पादित करने के लिद मन दगममी योगनिद्रा देवी का मन्दारचन की कन्दरा म एक मात्र मन के द्वारा मन्दन पिया या ॥२०॥ है बत्न वह स्वय ही नेर मानने प्रत्यक्ष ः यी जोर अत्यन्त प्रसन्न होकर उसने यह बीगर कर लिया था कि मेरे द्वारा जन्म न मोन दिया जागा हे कामदेव । दक्ष प्रजापति दे मन में उत्पन्न हुने उस द्वारा सम्म मोहन का मं किया ही नायगा और वह मात्र ही उनका मोहित किया जापा-यह न्दंया नत्व है ॥२१॥ ब्रह्मन् का योगनिद्रति विख्याता या जगन्मयो । क्य तन्या हरो दग्य कार्यम्तपनि सन्धित ॥२३ विम्प्रभावाय ता देवो का वा ना कुन सन्पिता। तह श्रोतुमिच्छामि बत्तो लोकपितामह ।।२४ यच त्यतममाधेनु न क्षण दृष्टिगोचरे । सक्नुभोपि वय यानु त कन्मान् मा विमोहन ॥२५ ज्दलदग्निप्रकाशाक्ष जटारातिरातिनम् । लिन बौक्ष्य व म्यातु कलन् शक्नोति तवपुर ॥२% तन्य ताहन्दपन्य मम्य- मानवाच्या । मयाभ्यपन ता पोतुमहमिच्छामि तन्वत ॥२७ ६४ [ कालिका पुराण कामदेव ने कहा-हे ब्रह्माजी ? जो कि जगन्मयी है वह कौन है जो योग निद्रा- इस नाम से विख्यात हुई है। जो शङ्कर सदा ही तप मे मस्थित रहा करते है वे उसके द्वारा कसे वश्य होगे? ॥२३॥ उस देवी का क्या प्रभाव है~~-वह देवी कौन सी है और वहाँ किस स्थान में स्थित रहा परती है ? हे लोक पितामह । यह सभी मैं आपके मुख कमल से श्रवण करने की इच्छा करता हूँ ॥२४॥ जो अपनी समाधि वा त्याग करके एक क्षण मात्र भी प्टिगोचर नही हुआ करते है। उनके समक्ष मैं हम भी स्थित नहीं हो सकते हैं यह फिर उनको कसे मोहित करेगी ॥२॥ हे ब्रह्माजी । उनके नेत्र जलती हुई अग्नि के प्रकाश के समान है तथा वे जटा जूट के समुदाय से विकराल स्वरूप वाले हैं। ऐसे विशूलधारी शिव को देखकर उनके सामने यौन सी क्षमता है जो कि स्थित हो सके ॥२६॥ उस शम्भु का उस प्रकार या स्वरूप है । उनको मोहित करने की इच्छा मे मैंने भी स्वीकार किया था। अब मैं उस देवी के विषय म तात्त्विक रूप से श्रवण करने की इच्छा रखता हूँ ॥२७॥ मनोभवस्य वचन त्याथ चतुरानन । विवानपि तद्वाक्य श्रुत्वानुत्साहवारणम् ॥२८ शर्मस्य मोहो ब्रह्मा चिन्ताविष्टो भवन्नहि । समयों मोहयितुमिति निशश्वास मुहुर्मुहु ॥२६ निश्वासमारवातस्य नानारूपा महायला । जाना गणा लोलजिह्वा लोलश्चाति भयंवरा ॥३० तुरगयदना पेचित् य चिद्गजमुशास्तथा । मिहव्याघ्रमुराश्चान्ये श्ववराहवरानना ॥३१ प्रक्षमारियदना शरभास्या शुपानना । प्नवमीमाय वक्ताश्च सरीसृपमुखा परे ।।३२ गोन्पा गानुया पेचिराथा पशिमुखा परे। महादीर्घा महाहस्वा महारयूला महारशा ॥३३ योगनिद्रा स्तुति ] पिंगामा विरालाक्षाश्च त्र्यक्षकाक्षा महोदराः । एककर्णास्त्रिकर्णाश्च चतुष्कस्तिया परे ॥३४ एककर्णा महाकणां बहुकर्णा विकर्णकाः । दीक्षिाः स्यू लनेत्राश्व सूक्ष्मनेत्रा विदृष्टयः ।।३५ मार्कण्डेय मुनि ने कहा- इसके उपरान्त ब्रह्माजी ने कामदेव के वचन को सुनकर बोलने की इच्छा पाला होकर भी अनुत्साह के कारण स्वरूप उसके दाक्य का श्रवण कर भगवान् शङ्कर के मोहन करने ने चिन्ता से समाविष्ट होते हुए कि मैं शङ्कर को मोहित करने में समर्थ नहीं हूँ--इमरीति से उन ब्रह्माजी ने बार-बार निःश्वास लिया था । अर्याद चिन्ता से श्वास छोड़ा या ।।२८, २६ ॥ उनकी नि:श्वास की वायु से अनेक रूपो वाले महा बलवान् चञ्चल जिह्वा वाले अतीव भयङ्कर और अत्यन्त चञ्चल गण समुत्पन्न हो गये थे ॥ ३०॥ उन गणो में कुछ तो घोड़े के समान मुख वाले थे तथा कुछ हाथी के मुख जमे मुखो वाले थे। अन्य मिह तथा वाध के सदृश मुखों वाले थे। कोई-कोई कुत्ता-मूअर योर गधा के समान मुखो वाले थे ।३१। कुछ गण रीछ और मार्जार के जमे मुखो मे संयुत ये तो कोई-कोई शरभ तथा शुक के मुखो वाले थे। कुछ पनद और गो मायु मुख के सदृश मुख वाले थे। तथा कोई सरी सूप के मुख के समान मुखो में समन्वित थे ॥ ३२॥ कुछ उन गणो मे गो रूप ये तो कुछ गाय के ममान मुखो से सयुत थे। कोई-कोई पक्षी के सहश मुखों से सयुत थे । कुछ बहुत विशान तो कुछ बहुत ही छोटे शरीर वाले थे। कोई-कोई महान् स्थूल थे तो कुछ बहुत ही कृश ये ॥ ३३॥ उन गणो के भनेका- नेक स्वरूप बनाये जा रहे हैं-कुछ पीली आँखो बाले-कुछ विडाल के तुल्य नेत्रो वाले तो कुछ गर्थकाक्ष ये और कोई २ महान उदर से युक्त थे । कुछ एक पाम वाले- कुछ तीन कानों वाले तथा दूसरे चार पानो मे युक्त थे ॥ ३४ ॥ स्थूल कानो वाले–महान् कानो बाले-
[ कालिका पुराण
बहुत कानो वाले और कुछ तीन बानो वाले थे। उनमें कुछ बडी आँखो
वाले तो कुछ स्थल नेत्रों से मयुत थे। कुछ मूक्ष्म लोचनो वाले और
कुछ तीन दृष्टियो से समन्वित थे ।।३।।
चतुष्पादाः पञ्चपादास्त्रिपादकपदास्थ ।
हस्रपादा दीर्घपादा स्थूलपादा महापदाः ॥३६
एकहस्ताश्चतुर्हस्ता द्विहस्तास्त्रिशयास्तथा।
विहस्ताश्च विरूपाक्षा गोधिकाकृतय परे ॥३७
मनुष्याकृतयः केचिच्छुशुमारमुखास्तथा ।
यौञ्चाकारा वकाकारा हंससारसरूपिणः ।
तणैव मद्गुकुरर-क्ककाकमुखास्तथा ॥३८
अर्द्धनीला अर्द्धरक्ता कपिला. पिंगलास्तथा।
नीला शुक्लास्तथा पोता हरिताश्चिनरूपिण ॥३६
आवादयन्त ते शयान् पटहान् परिवादिन ।
मृदङ्गान् डिडिमाश्चंव योमुखान् पणवास्तथा ॥४०
मर्वे जटाभि पिंगाभिस्तु गाभिश्च करालिता ।
निरन्तराभिविप्रेन्द्रा गणा स्यन्दनगामिन ॥४१
शूलहस्ता पाशहस्ता खड्गहस्ता धनुर्द्धरा ।
शवत्यकुशगढावाण-पट्टिशप्रासपाणय ॥४२
उन गणो को कोई २ चार परो वाले–बुछ पांच पैरो से
युक्त-कोई तीन चरणो वाले तो कुछ एक ही पद वाले थे। कुछ के
यहत छोटे पर थे-बुछ लम्बे पैरो वाले थे-कुछ के पर बहुत स्थूल
थे तो कुछ महान् पदो ग सयुत थे ॥३६॥ योई २ एक हाथ वाले-
पुछ पार हापा गे युक्त-कोई दो हाथों वाले तो बोई सीन करो वाले
थे। पुछ के हाप थे ही नही तो विस्पा थे तथा कुछ गोधिया की
आतियो याम थे ॥३७॥ उनमे मानवीय आवृति से मुक्त ये योई
२ गुणमार ६ मुष ये समान मुपी वाले कोई कौच के आकार
मे तो कुछ गुमा के आधार पामे एवं कुछ हम और सारस थे रुप
योगनिद्रा स्तुति ] वाले थे। कुछ मुङ्ग कुरर-वर और पाक के तुल्य मुखो वाले थे ॥ ३८ ॥ अव उन गणो के वर्ण बताये जाते है उनमे कुछ आधे नीन-आधे साल-कपिल तया कुछ-पिंगल वर्ण वाले थे । नील-शुक्ल-पीत--हरिम और चित्र वर्ण वाले ये ॥३॥ वे गण शखा को घण्टो को वजा रहे थे तथा कुछ परिवादी थे । कुछ मुदङ्ग- डिमडिम-गो मुख तथा पपवी को बनाने वाले च ॥४०॥ वे सभी गण पीली और उन्नत जटाओ से मयुन अत्यधिक पराल थे। है द्विजेन्द्रो । वे मभी गम स्पन्दन () क द्वारा गमन करने वाले थे । के द्वारा गमन करने वाले थे ॥४१॥ उनम कुछ हायो में शूल लिये हुये थे तो कुछ पाश-राग और धनुप यर में ग्रहण किये हुये थे। कुछ शक्ति-अकुश-गदा-वाग-पट्टिश तथा प्राग अपने घरो में लिये हुये ॥४२॥ नानायुधा महानाद कुर्वन्तस्ते महावला मारय च्छेदयेत्यूचुंह्मण पुरतो गता ॥४३ तेपान्तु वदता यत्र माग्य छेदयेत्युत । योगनिद्रा प्रभावात् स विधिर्वक्तु प्रचक्रमे ॥४४ अब ब्रह्माणमाभाप्य तान् दृष्ट्वा मदनो गणान् । उवाच वारयन् वक्तु गणानामग्नत स्मर ॥४५ कि कर्म ते करिष्यन्ति कुन म्यान्यन्ति वा विधे । किन्नामधेया एते वा नतान् विनियोजय ॥४६ नियोज्यतालिजे कृत्ये स्थान दत्वा नाम च । वृत्वा पश्चान् महामागप्रभाव कययम्व मे ॥४७ अय तद्वाक्यमाण्य मनोरपितामह । गणान् ममदनानाह तेपा कर्मादिक दिशन् ॥४ उन गणों के पास गनर प्रयार रे आयुध से और महा बनवान देवा मारी गौर करने वाले थे। वे मार हानो-दो-एमा पर्ने वाने घे और ब्रह्माजी के गामने स्पित हो गये थे ॥४३॥ वे जहाँ
६८
[ वालिका पुराण
पर मार डालो-द डानो-ऐमा बोलने वाले थे योगनिद्रा के प्रभाव
से अब विधाता मे कहना आरम्भ किया था ॥४४॥ इसके अनन्तर
ब्रह्माजी से कह कर कामदेव ने उन गणो का अवलोकन करके गणो के
आगे स्थित होते हुए वारण करते हुए बोलना आरम्भ किया था ॥४५॥
कामदेव ने कहा-हे ब्रह्माजी । ये आपका क्या कर्म करेंगे अथवा कहाँ
पर सस्थित होगे अर्थात् रहेगे ? इनके क्या-क्या नाम हैं ? वही पर
इनका आप विनियोजन वीजिये ॥४६॥ अपने कार्य मे इनका नियोजन
करके इनको स्थान देकर इनका नाम रखिये। यह सब कुछ करके
इसके पश्चात् महामाया का जो भी कुछ प्रभाव हो उसे मुझे यतलाइए।
॥४७।। मार्कण्डेय महर्षि ने कहा- इसके उपरान्त समस्त लोको के
पितामह ब्रह्माजी ने उस कामदेव के वचन को सुन कर उनके काय
आदि के विपय में आदेश देते हुए कामदेव के साहत उन गणो से
एत उत्पन्नमात्रा हि मारयेत्यवदस्तराम् ।
मुहुर्मुहुरतोऽमीषा नाम मारेति जायताम् ॥४६
मारात्मकत्वादप्येते मारा सन्तु च नामत ।
सदा विघ्न करिष्यन्ति जन्तूनाञ्च विनार्चनम् ॥५०
तव'नुगमन कम मुख्यमेपा मनोभव ।
यत्र यत्र भवान् याता स्वकर्मार्थ यदा यदा।
गन्तारस्ता यौते साहाय्याय तदा तदा ॥५१
चित्तोङ्क्रान्ति वरिप्यन्ति त्वदरत्रवशवर्तिनाम् ।
शानिना ज्ञानमार्गञ्च विघ्नपिप्यन्ति सर्वदा ॥५२
यया सासारिक वर्म सर्व कुर्वन्ति जन्तव ।
तथाचते परिप्यन्ति सविघ्नमपि सर्वत ॥५३
इमे स्थास्यन्लि सवंत्र वेगिन पामरूपिण ।
त्वमेयंपा गणध्यक्ष पचयज्ञाशभोगिन ।
नित्यनिपावता तोग-भोगिनो वै मन्त्यिति ॥५४
वहा ॥४८॥
। योगनिदा स्तुति ] ब्रह्माजी ने कहा-ये मव उत्पन्न होने के साथ ही निरन्तर "मार डालो"- यह बहुत बार बोले ये । बारम्बार इसे यही वचन कहे गये थे अतएव नाम 'मार'~यह होवे Irell मारात्मक होने से ये नाम से भी मार ही होवे । विना अर्चना के ये सदा ही जन्तुओ के लिये विघ्न ही किया बरे गे ॥५०॥ हे वामदेव । इन गणो का प्रधान कम तुम्हाग ही अनुगमन करना होगा। जिस-जिस समय में जब- जब भी आप अपने कार्य के सम्पादन करने के लिये जायगे वहीं-वही पर भी उसी-उसी समय में तुम्हारी सहायता के लिये ये गण जाने वाले होंगे ॥५१॥ तुम्हारे अस्त्र रे वश वर्ती ज्ञानियो के चित्त की उद्भान्ति परे गे और सर्वदा शान के मार्ग को विघ्न उत्पन्न बरे गे ॥५२॥ जिस प्रकार से मव जन्तुगण सांसारिक पमं दिया करते हैं ठीक उसी भौति ये गय भी मन ओर से विघ्नो के सहित को भी करे में ॥५३॥ रेसी जगह पर पाम रूप पाले और येग से समन्वित स्थित होंगे। बाप ही इन ममने गणाध्यक्ष हैं । य पञ्च यज्ञो वै अम भोगी और नित्य प्रिया वाली ये तोय भोगी होवें ॥५४॥ इति श्रुत्वा तु ते सर्वे मदन सविधि तत । परिवार्य ययाकाम तस्यु. भूत्वा निजा गतिम् ॥५५ तेपा वर्णयितु शक्यो भुधि कि मुनिसत्तमा । माहात्म्यञ्च प्रभावञ्च ते तप.शालिनो यत ॥५६ नेपा जाया न तनया नि समीहा. सदव हि । न्यासिनोऽपि महात्मान सर्वे त ऊद्धं रेतरा. ॥५७ ततो ब्रह्मा प्रसन्न स माहात्म्य मदनाय च । गदितु योगनिद्राया सम्प, समुपत्रा मे ॥५८ अव्यक्तव्यक्तरूपेण रज सत्त्ववमोगुण । मविभज्य यायं कुरते विष्णुमायेति मोच्यते ॥५६- या निम्नान्तस्यलॉम्भस्या जगदण्डकपालतः। विभग्य पुरषं याति योगनिद्रति सोच्यते ॥
[ पारिता पुराण
माण्डेय महपि ने कहा-वै सय यह प्रवण वरखे ब्रह्माजी के
सहित कामदेव को परिवादित करके इच्छानुमार अपनी गति को मुन
कर समवस्थित होगये थे ॥५॥ हे मुनि सत्तमो । उनके विषय म
क्या वर्णन किया जा सकता है उनके माहात्म्य और प्रभाव का क्या
वर्णन किया जाये क्योकि वे सब तप शाली थे ॥५६॥ उनले न तो
जाया थी और न कोई सन्तति ही थी वे तो मदा ही ममीहा से रहिन
थे। वे न्यासी होते हुए भी महान् आत्माओ वाले थे और वे मभी कर्म
रेता पुरप थे ।।५७। इसके अनन्तर वे ब्रह्माजी परम प्रसन्न होते हुए
योगनिद्रा का माहात्म्य वामदेव को वहने के लिये मली मांति में उपक्रम
करने वाले हए थे ॥५॥ ब्रह्माजी ने कहा-रजोगुण-मत्त्वगुण
और
तमोगुणों के द्वारा जो अव्यक्त और व्यक्त रूप से मविभाजन करके अर्थ
को किया करती है वही विष्णु माया-इस नाम मे कही जाया करती
है ॥५६॥ जो निम्न स्थल वाले जल मे स्थित होती हुई जगदण्ड कपान
मे विभाजन करके पुरुष के समीप गमन किया करती है वह योग
निद्रा-इम नाम से पुरारी जाया करती है ॥६०।।
मन्त्रान्तर्भावनपरा परमानन्दरूपिणी ।
योगिना सत्वविद्यान्न सा निगया जगन्मयो ॥६१
गर्भान्तर्ज्ञानसम्पन्न प्रेरित सूतिमास्तै ।
उत्पन्न ज्ञानरहित कुरुते या निरलरम् ।।६२
पूर्वातिपूर्व सन्धातु सस्कारेण नियोज्य च ।
आहारादौ ततो मोह ममत्व ज्ञानसशयम् ॥६३
बोधोपरोधलोभेषु क्षिप्त्वा क्षिपत्वा पुन पुन ।
पश्चात् कामे नियोज्याशु चिन्तायुक्तमहनिशम् ॥६४
आमोदयुक्त व्यसनासक्त जन्तु करोति या।
महामायेति सा प्रोक्ता तेन सा जगदीश्वरी ॥६५
महारादि ससक्त सृष्टिप्रभवभाविनी।
योगनिद्रा स्तुति ] उत्पत्तिरितिलो सा कथ्यतेऽनन्तरूपिणी ॥६६ मन्त्री के अलभावन म परायणा और परमाधिक आनन्द के स्वरूप वाली जो योगियो सत्त्व विद्या का अन्त है वही जगन्मयी- नाम म कहने के योग्य होती है ॥६१॥ गर्भ के अन्दर रहन वाले को मान से सम्पन्न (नात्पर्य यह है कि जब-तक यह जीवात्मा माता के गर्भ में रहता है तब तक अपने आपको पूर्ण ज्ञान रहा करता है) और प्रसव की वायु से प्रेदित होता हुआ जब यह जन्म धारण कर लेता है तो वह सभी ज्ञान को भूल कर ज्ञान रहित हो जाया करता है ऐसा जो निरन्तर ही किया करती है ॥६२॥ पूर्व से भी पूर्व का सधान करने पे लिये मवार से नियोजन करके आहार आद मे फिर मोह-~ममत्वभाव और ज न म मशय को करती है तथा क्रोध-उपरोध और धोभ मे वार वार क्षिप्त कर-करके पोराम नियोजित परेप्रो चिन्ता से युक्त परती है जो चिन्ता रात दिन रहा परती है जो इस जन्तु को आमोद से युक्त और व्यस11 म आमत पिया परती है वहीं महामाया--इस नाम मे कही गयी है इमो मे यह जगत् को स्वामिनी है ।। ६३ ।। ६४॥ ॥ ६४ ।। अहङ्कार आदि मे ससक्त सृष्टि के प्रभव को करने वाली उत्पत्ति है-यही लोको ये द्वारा वह जनन स्वरूप वाली यही जाया परती है ॥६६॥ उत्पन्नमकुर वीजाद् यथापो मेघसम्भवा । प्ररोहयति सा जन्तूस्तयोत्पन्नान् प्ररोहयेत् ॥६७ सा शक्ति सृप्टिस्पा च सर्वपा ख्यातिरीश्वरी । क्षमा क्षमावना नित्य करुणा सा दयापताम् ॥६८ नित्या सा नित्यम्पेण जगद्म प्रकाशते । ज्योति स्वरूपंण परा व्यक्ताव्यवनप्रकाशिनी ॥६६ सा योगिना मुक्तिहेतुविद्याम्पेण बंष्णवी । सासारिवाणा ससारवन्धहेतु विपर्यया ||७० [ मालिका पुराण ७२ लक्ष्मीरूपेण कृष्णस्य द्वितीया सुमनोहरा । त्रयोपेण कण्ठस्था सदा मम मनोभव ॥७१ सर्वत्रस्था सर्वगा दिव्यमूर्ति- नित्या देवी सर्वरूपा पराख्या। कृष्णादीना सर्वदा मोहयित्री सा स्वीस्पं सर्वजन्तोः समन्तात् ॥७२ बीज से ममुत्पन्न हुये असुर को मेघौ से समुद्भूत जन जिस प्रकार से प्ररोहित किया करता है ठीक उसी भांति वह भी जन्तुओ को जो उत्पन्न होगये हैं प्ररोहित क्यिा वरती है ॥६७॥ वह शक्ति सृष्टि के स्वरूप वाली है और सबनी ईश्वरी ख्याति है वह जो क्षमाधारी हैं उनकी क्षमा है तथा जो दया वाले हैं उनकी (वरणा) क्या है ॥६८।। यह निम स्परूप गे नित्या हैं और इम जगत के गर्भ में प्रवाशित हुआ धरती है। वह ज्योति ये स्वरूप मे व्यक्त और अव्यक्त का प्रवाश करने धानी पग है ॥६६ वह योगाभ्यासियो वो मुक्ति वा हेतु हैं और विद्या थे रूप वाली वैष्णवी है । जो सामारिव पुरष है उनको गसार के बन्धन हेतु वा दिपर्पया है १७०।। लक्ष्मी के रूप मे वह भगवान गृष्ण द्वितीया अर्धाङ्गिनी परम मनोहरा है। हे कामदेव । त्रयी अर्थात वेद यी के रूप मे गदा मेरे पट में गस्थिता है ।।७१॥ वह गभी जगह पर स्थित रहने वाली और सब जगह गमन करने वाली है। वह दिव्य मूति को गन्धिता है-निग्या देषी गयवे स्वरूप वाली और परा-इस नाग वामी है। वह वृष्ण आदिवा गर्वदा सम्मोहन मरने वाली है और ग्मी र स्वाप गे गभी और गमो पन्तुओं को मोहन करने वासी मरन वाक्य वर्णन } ७३ ॥ मदन वाक्य वर्णन ॥ अथ ब्रह्मा महामाया-स्वरूप प्रतिपाद्य च । मदनाय पुन प्राह युक्तासी हरमोहने ॥१ विष्णुमाया महादेवो यथा दारपरिग्रह्म । परियति तथा कर्तुमगोकार पुराकसोत् ॥२ सावश्य दक्षतनया भूत्वा शम्भोमहात्मन । भविष्यति द्वितीयेति स्वयमेवावदत् स्मर ॥३ त्वमेभि स्वगण साद्ध रत्था च मधुना सह । यथेच्छति तथा दारान् ग्रहीतु दुरु शकर ॥४ शम्मी गृहोतदारे तु कृतकृत्या वय स्मर। अविच्छिपना सृष्टिरिय भविष्ययति न संशय ॥ तथा वीद्दिवजश्रेष्ठा भोके शाय मनोभव । मधुर यत् कृत तेन महादेवस्य मोहो ॥६ माण्डेय मुनि कहा-इसके अनन्तर ब्रह्माजी ने महामाया के स्वरूप का प्रतिपादन करके कामदेव से उन्होंने फिर कहा था कि यह भगवान शङ्कर के सम्मोहन करने म युक्ता है ।।१।। ब्रह्माजी ने कहा-विष्णु माया नै पहिने ही यह स्वीकार कर लिया है जैसे महादेव दारा का परिग्रह करेंगे । वह ऐमा करना अङ्गीकार कर चुकी हैं ॥२॥ है मामदेव । उनने म्बय हो ऐसा कहा था कि वह अवश्य ही प्रजापति दक्ष की पुत्री के रूप म जन्म धारण कर महात्मा शम्भु को द्वितीया अर्थात् पत्नी हो जायगी ॥३॥ तुम भी इन गणो के साथ सहयोग करके तथा अपनी पत्नी रति और अपने मखा वसन्त के माथ मिलकर वैसा ही चम्म परो जिमसे भगवान शम्भु नाराओं का ग्रहण करने की इच्छा पर नेवें ।। ४ ।। भगवान शकर के द्वारा दारा के ग्रहण किये जाने पर हम मृत कृत्य नर्यात मपन हो जायो और फिर यह ष्टि अविछिन्न अर्याद बीच में न टूटने वालो हो जायगी-टममे नेशमात्र भी [ वानिका पुराण का अवगर ही नहीं है ॥ ५ ॥ श्री मापण्डेय मुनि ने कहा--हे दिन श्रष्ठो 1 कामदेव ने लोको के ईश ब्रह्माजी से उसी भांति मधुरता पूवर वहा जो भी कुछ महादेवजी को मोहित करने के लिये उसने किया था ॥६॥ शृणु ब्रह्मन यथास्माभि क्रियते हरमोहने । प्रत्यक्ष वा परोक्षे वा तस्य नदगदतो मम ॥७ यदा समाधिमाश्रित्य स्थित शम्भुजितेन्द्रिय । तदा मुगन्धिवातेन शीतनेन विवेगिना । त वीजयामि लोकेश नित्य मोहनकारिणा ।। स्वसायपास्तथा पञ्च गमादाय शरासनम्। भ्रमामि तस्य सविधे मोहपस्तद्गगानहम् ॥६ सिद्धद्वन्द्वानह ता रमयामि दिवानिशम् । भाया हावाश्च ते मवें प्रविशति च तवे ।।१० यदि प्रविष्ट मविधे शम्भो प्राणी पितामह । या वा न पुरन हद भाव तन मुहुमुहु ।।११ मम प्रवशमात्रण तथा स्यु मज तव । न शम्भुन वृषस्तन्य मानसो विनिया गतो ॥१२ पदाहि भवत प्रम्य म याति प्रमथाधिप । पत्र गता तदेवाह गरनि गमधुबिधे ।।१३ पामा प्रयाप यदा या नाटयश्वरम् । पंगाम या पदा माशिसत्र गच्छामह वदा ।।१४ २-६हमारी । आप अपयण पौत्रियों मी TERMमानामपियात्रा-- PROMशप्रससभी विपा पाहा. बसमान Pyrr Run मा भाग माग and frममय में गमाथि गापर पहप से मदन दहन वर्णन ] ७५ स्थित थे उसी समय म विशुद्ध वेग वाले अर्थात् मुमन्द और मुगन्धित तथा शीतल वायु के द्वारा हे लोकेश । जोकि नित्य ही मोहन वे करने वाली है उससे उन शम्मु को बीजिन पगा ।।८वि अपने शरासन का ग्रहण करके अपने वर्षण मामको (वाणो ) वो मैं उनके गणों को मोहित करते हुए उनके ममीप में प्रमित कागा l मैं वहाँ पर सिद्धो ये द्वन्द्वी को अनिश रमण यराता हूँ और उनमें निश्चय ही हाव और भाव सब प्रवेश किया करते हैं ॥१०॥ है पितामह । यदि सम्मु के समीप में प्रविष्ट होने पर कौन मा प्रापी बारम्बार वहाँ पर भाव को नहीं किया करता है ॥११॥ मेरे केबल प्रवेश के होने ही में मभी जीव-जन्तु उम प्रकार के हो जाया करते हैं न तो भगवान् शम्भु और न उना वृषभ मानमिक विकार को प्राप्त ये ॥१०॥ निश्चय ही जिम ममय में वे प्रमथाधिर यापरे प्रम्य का गमन करते हैं तो उसी समय में मैं वहीं पर हे बाजी। अपनी पत्नी रति और मित्र वमन के माय चला जाऊंगा ॥१३॥ यदि यह मे पर चले जाते हैं और अथवा जिम समय में नारकेश्वर में पहुंच जाते या कलाम गिरि पर गमन करते हैं तो उम ममय मे में भी वहीं पर चना जाऊंगा ॥१४॥ यदा त्यक्तसमाधिस्तु हरस्तिष्ठति वै क्षणम् । ततम्तस्य पुरश्चरमिधुन योजयाम्यहम् ॥१५ तच्च युगल ब्रह्मन् हावनावयुत मूह । नानाभावेन कुरते दाम्पत्य-ममुत्तमम् ॥१६ नीलकण्ठानपि मुह मजापानपि तनपुर । सन्मोहयामि सविधे मृगानन्याश्य पक्षिण. ॥१४ विचित्रभायमामाद्य यदा दयुग्ते गतिम् । मयूरमिथुन वीक्ष्य तत्तदा को नचोरगुण ॥८- मृगाश्च तन् पुरम्बाश्व स्वजावामिल अनुर्वन रुचिर भाव नाय पार..
[दारा पुराण अपश्यन् विवर नास्य पदाचिदपि मच्छर । निपात्य स यदा देहे यन्मया सर्वलोक्धृत् ॥२० वहुधा निश्चित ज्ञात रामासगाइते हरम् । अल च सन्मोहयितु ससहायोऽपि निष्कलम् ॥२१ जिम अवसर पर भगवान हर अपनी समाधि का परित्याग करके एक क्षण को भी स्थित होते हैं तो फिर मैं उनके ही आग चक्रवार के दम्पति को योजित कर दूंगा ॥१५॥ हे ब्रह्म जी । वह चक्रवाक का जोडा बार बार हाव-भाव से सयुत अनेक प्रकार के भाव से उत्तम दाम्पत्य के श्रम को करेगा ।।१६। उनके आगे फिर जाया के सहित नील कण्ठो को भी समीप ही मे मैं सम्मोहित करूंगा और समीप में ही मृगो को तथा अय पक्षियों को भी मोह युक्त कर डालु गा ॥१७॥ ये सब जिस समय मे एक अति अद्मुत भाव को प्राप्त करके परस्पर में में रति सुख का उपभोग करे गे तथा मयूरो के जोडे को देखकर कौन सा प्राणी है जो उस समय में उत्सुकता स रहित वना रहे अर्थात कोई भी चेतन नहीं है जिसे उत्सुकता न हो ।।१८।। और उनके ही आगे मृग अपनी प्रणायिनिया के साथ उत्सुकता वाले हो जाते हैं और उनके पाश्व म तथा समीप म अतीव रुचिर भाव करते है तो मेरा शर कदाचित् भी धमके विवर को नहीं देखता है। जिस समप में वह देह में गिराया जाता है जो कि मेरे ही द्वारा पैका जाया करता है आपतो सभी लाको के धारण करने वाले हैं अर्थात यह सभी कुछ का ज्ञान रखते हैं ॥१६॥ ॥२०॥ प्राय यह निश्चित ही ज्ञात होना चाहिये वि रामा के सङ्ग के बिना हर को मैं मसहाय भी निप्पल सम्मोहित करने के लिये समथ एव पयाप्न हूँ और पह सपन ही है ॥२१॥ मधुश्च पुरते कम यद्यतस्य विमोहने । तच्छृणुष्व महाभाग नित्य तस्योचित पुन ॥२२ चम्पवान् वेशरानाम्रान् वरुणान् पाटलास्तथा। गवेशर पुन्नागान् विशुधान नेतान धवान् ।।२३ ७७ मदन वाक्य वर्णन ] माधवीमंत्लिका पर्णधारान् कुरुवकास्तथा। उत्फुल्लयति ततस्य यन तिष्ठति वै हर ॥२४ मरास्युत्फुल्लपद्यानि वीजयन, मलयानिले । सुगन्धाकृतवान् यत्नादत्तीव शकराश्रमम् ॥२५ लता सर्वा सुमनस फुल्लपादसचयात् । वृक्षान, रुचिरभावेन वेष्टयन्ति स्म तन वै ॥२६ तान् वृक्षाश्चारपुप्पोधास्तं सुगन्धि समीरणं । दृष्ट्या कामवश यातो न नन मुनिरप्युत ॥२७ तद्गणा अपि लोकेश नानाभाचे सुशोभने । वसनि स्म सुपा सिद्धा ये ये चातितपोधना ॥२८ मेरा मित्र मधु अर्याद पसन्त तो जो-जो मी उनके विमोहन को क्रिया करने में कर्म होगे वह दिया हो परता है। हे महाभाग जा नित्य हो उसके लिये उचित है उसका पुन थाप श्रवण कीजिये ॥ २२ ।। जहाँ पर भी भगवान शङ्कर स्थित होकर रहें। वही पर वह बसन्त मेरा मित्र चम्पको को-केशरी को-आम्रो को-बरुणो को- पाटलो को-नाग येसर पुन्नागो को-दिशुको को-धनी को-माधवी को-मल्लिका को-पर्णधारो को-स्वको को इन सबको वह विक- सित कर दिया करता है ॥२३, २४ ।। समस्त सरोवर ऐसे कर देता है कि उनमें कमल पूर्ण विकसित हो जाया यरत हैं और वह मलय की ओर से आवाहन करने वाली परमाधिक सुगन्धित वायु से वीजन करते हुए यत्नपूर्वय भगवान शङ्कर के आश्रम को सुगन्धित पर देगा ।। २५ ॥ यहाँ पर सभी लताएँ मिले हुए पुष्पा से समन्वित हो जायेगी। और समस्त वृक्षों का समुदाय विकसित हो जायगा । वे सताएँ परम चिर भाव से दाम्पत्य प्रणय को प्रकट करती हुई वहाँ पर वृक्षा को वेष्टित परेंगी अर्थात वृक्षो से लिपट जायगी ।। २६ ॥ पुणा के ओप वाले उन यो यो उन मुगाँधा समीरणो म सयुत देयकर वहाँ पर मुनि भी - [ पालिका पुराण कामक्ला के वश म आ जाया वरत है जो अपनी इन्द्रिमा का दमन किये हुए हैं ॥ २७ ॥ हे लोको ये स्वामिन् अनेक परम शोभन भावी के द्वारा उनके गण-मुर और सिद्ध तथा परम तपस्वी गण भी जो- जो भी दमनशील है व सभी वश मे आ जाया करते है ॥२८॥ न तस्य पुनरस्माभिप्ट मोहस्य कारणम् । भावमान न कुरुते कामोत्यमपि शकर ॥२६ इति मवमह दृष्टवा ज्ञात्वा च हरभावनाम् । विभुखोऽह शम्भुमोहान्नियत मायया विना ।।३० इदानी त्वद्वच श्रुत्वा योगनिद्रोदित पुन । तस्या प्रभाव श्रुत्वाथ गणान दृष्ट्वा सहायवान् ॥३१ मया शम्भोविमोहाय नियते मुहुरुद्यम । भवानपि त्रिलोकेश योगनिद्रा द्रत पुन । भवेद् यथा शम्भुजाया तथंव विदधात्वियम् ॥३२ यमाना नियमानाञ्च प्राणायामस्य नित्यश । आसनस्य महेशस्य प्रत्याहारस्य गोचरे ॥३३ ध्यानस्य धारणयाश्च समाधेविघ्नसम्भवम् । मन्ये क्तुं न शक्य स्यादपि मारशतैरपि ।।३४ तथाप्यय मारगण करोतु हरस्य योगागविकारविन्नम् । यदेव शक्य विमुवा समर्थ समक्ष मन्यस्य न कर्तु मोज ।३५ उनके आग हमने मोह का कोई भी कारण नहीं देखा है । भगवान् शङ्कर तो काम से उस्थित केवल भाव को भी नही किया करते हैं ॥ २६॥ मह सभी कुछ मैंने देखरर और भगवान् शङ्कर की भावना या सात प्राप्त करके मैं नो शम्भु को मोहित करने की क्रिया से विमुख हा गया हूँ। यह नियत ही है कि विना माया पे यह काय कभी भी नही हा मवता है ॥ ३० ॥ इतना तो मैं सब कुछ पर चुका हू किंतु भु मोहा ये शार्य म मैं विफल ही रहा हूँ विन्तु अब पुन आपये - गती वी उत्पत्ति ] वचनादेश को श्रवण करके जो योगनिद्रा के द्वारा उदित है । उस योग- निद्रा का प्रभाव सुनकर तथा गणो को सायक सहित देखकर मेरे द्वारा शङ्कर के विमोहन करने के लिय फिर एक बार उद्यम किया जाता है । कृपा कर यापकी हे विलोवेश योगनिद्रा को पुन शीघ्र ही जिस प्रकार से वह शम्भु की जाया ( पत्नी) हो जावें वसा ही कीजिए। ।। ३१, ३२ ।। शम्भु के यम-नियम और नित्य ही होने वाले प्राणा- याम तया महेश के बासन और गोचर म प्रत्याहार-ध्यान- धारणा और समाधि म विप्नो पा सम्भव हाना मैं तो यह मानता हूं कि मैं ता क्या मुझ से माता के द्वारा भी नहीं किया जा सकता है ॥३३, ३४॥ तो भी यह कामदव के गण भगवान् शङ्कर के योग के यम-नियमादि उपर्युक्त अङ्गा में विकार स्पो विघ्न कर। जो भी किया जा सके अधिक क्या कहा जावे इन समक्ष म बोज करने में समर्थ नहीं होता है । ३५॥ ॥ सती की उत्पत्ति ॥ ततो ब्रह्मापि मदनमुवाचेद वच पुन । निश्चित्य योगनिद्राया स्मृत्वा वाक्य तपोधना ॥१ अवश्य शम्भुपत्नी सा योगनिद्रा भविष्यति । यथाशक्ति भवास्तत्र करोत्वस्या महायताम् ।।२ गच्छत्व स्वगण मदि यत्र तिपति शकरः। द्रुत मनोभव त्व च तत् स्थान मधुना सह ॥३ राप्रिन्दिवस्य नुशि जगन्मोहय नित्यश । भागत्रय शम्भुपाश्वे तिष्ठ सद्धि गणं सदा ।।४ इत्युक्त्वा सर्वलोवेशस्तनवान्तरधीयत । सम्मो सकाश मदनो गतवान, मगणस्तदा ॥५ ८० [ पालिका पुराण एतस्मि नन्तरे दक्षविर काल तपोरत । नियमैबहुभिर्देवीमाराधयत मुदत १६ ततो नियमयुक्तस्य दक्षस्य मुनिसत्तमा । योगनिद्रा पूजयत प्रत्यक्षमभवच्छिवा ।।७ माकण्डेय मुनि ने कहा-इसके अन तर ब्रह्माजी न भी पुन वामदेव से यह वचन कहा था। हे तपोधनो । ब्रह्माजी ने योगनिद्रा के वाक्य का स्मरण करके और निश्चय करके ही यह कहा था ॥१॥ ब्रह्माजी ने कहा-यह योगनिद्रा अवश्य ही भगवान् शम्भु की पत्नी होगी। जितनी भी आपकी शक्ति हो उसी के अनुसार आप भी इस योगनिद्रा की सहायता करिये ॥ २॥ आप अब अपन गणो के साथ ही वही पर चले जाइए जहाँ पर भगवान शड्वर समवस्थित हैं । हे काम देव ! आप भी अपने सखा बस त के साथ वहाँ पर शीघ्र ही गमन करिये जिस स्थान पर शम्भु विराजमान है और अहर्निश के चतुर्थ भाग मे नित्य ही जगत् का मोहन करो और शेष तीन भाग म गणो के साथ सदा भगवान शम्भु के समीप सस्थत रहो ।। ३ ४ ॥ माकण्डेय मुनि ने कहा-इतना कहकर लोको के स्वामी ब्रह्माजी वही पर अतर्धान हो गये थे और कामदेव अपने गणो के सहित उसी समय मे भगवान् शम्भु के समीप में चला गया था ॥५॥ इसी बीच में प्रजापति दक्ष चिरकात तक तपस्या में रत होता हुआ बहुत प्रकार के नियमो से मुदर व्रतधारी होकर देवी को समाराधना में निरत हो गया था। । ६ । हे मान सत्तमो । फिर नियमो मे युक्त और योगानद्रा देवी का यजन करने वाले दक्ष प्रजापति के समक्ष मे चण्डिका देवो प्रत्यक्ष हुई थी॥७॥ तत प्रत्यक्षतो दृष्ट्वा विष्णुमाया जगन्मयोम् । पृतकृत्यमथात्मान मेने दक्ष प्रजापति ।। सिंहस्था कालिया कृष्णा पोनोतु गपयोधराम् । चतुभुजा चारवक्ता नो नोत्पधरा शुभाम् ॥६ मनी की उत्पत्ति J ८१ वरदाभयदा सुडगहम्ता सर्व णान्विताम् । आरक्तनयना चारमुक्तकेशी मनोहराम् ।।१० दृष्ट्वा दक्षोऽय तुष्टाव महामारा प्रजापति । प्रीत्या परमया युक्तो विनयाननन्धर ॥११ आनन्दरूपिणी देवी जगदानन्दकारिणीम् । सृष्टिस्थित्यन्तस्पा ता स्तौमि लक्ष्मी हरे शुमाम् ॥१२ सत्त्वोद्रेकरकाशेन यज्ज्योतिस्तत्त्वमुत्तमम् । स्वप्रकाश जगद्धाम तत्तवाश महेश्वरि ।।१३ रजोगुणानिरेकेण यत् कामरय प्रकाशनम् । रागतरुप मध्यस्य तत्तशारा जगन्मयि ॥१४ इम जन तर प्रजापति दक्ष ने प्रत्यक्ष रूप से जगन्मयी विष्णु- माया का दर्गा प्राप्त मात्र पो आपको कृपयत्य अर्थात् पूर्णतया मपन मानने लगा था ॥८॥ अब भगवती के पम्प का दर्णन पिया जाता है कि वह देवी वालिया परम स्निग्ध-कृष्ण वर्ग में मयुना- पीन (म्यूल ) और उन्नत नगे वाली थी । उमकी चार भुजाएं थी तथा परमाधिका मुन्दर उसया मुग था और गेल मन को धारण मरन वाली परम शुभ थी । वरदान नया बभपदागदी चाली- हाय म सङ्ग धारण करती हुई सभा गुणा ग ममन्विता थी। उनक नयन पोडी रक्तिमा लिये हुए थे और गुन्दर और धुले हुए क्शा वाली थी एव परम मनोहर पी ॥१०॥ प्रजापति दक्ष न उनका दर्शन प्राप्त परवे परम प्रीति मे युक्त होर विनम्रता से थरनत वन्धी वाले ने उस देवी वी स्नुते की थी ॥११॥ दक्ष ने पहा-जानन्द दे म्वरूप वाली और मां नगन् पा मानन्द करन पानी सष्टि पाला और महार के स्वरूप में मंयुत-परम शुभा भगवान हरि की लक्ष्मी देवी का मैं सावन मला है ॥१२॥ हे महेवरि । मत्त्व गुण के उद्रे व प्रकाश में जा उत्तम ज्योनि वा तत्त्व है जो म्ब प्रकाश जगा का धाम है वह थापा [वालिया पुगण ही अश है ॥१३॥ रजोगुण को अधिवता से जो काम का प्रकाशन है वह हे जगन्मयि | मध्य में स्थित राग वे स्वरूप वाला आपके ही अश का अश है ॥१४॥ तमोगुणातिरेकेण यद्यन्मोहप्रकाशनम् । आच्छादन चेतनाना तत्त चाशाशगोचरम् ॥१५ परा परामिका शुद्रा निर्मला लोकमोहिनी । त्व त्रिरूपा त्रयी कोतिर्वार्तास्य जगतो गति ।१६ विति माधवो धात्री यया मूर्त्या निजोन्थया । मा मूक्त्स्तिव सर्वेषा जगतामुपकारिणी ॥१७ महानुभावा त्व विश्वशक्ति सूक्ष्मापराजिता । यदूधिोनिरोधेन व्यज्यते पवने परम् ॥१८ तज्ज्मोतिस्तव मात्रार्थे सात्तिवक भावसन्मतम् । यद्योगिनो निरालम्व निष्फल निर्मत परम् ।।१६ आलम्वन्ति तत्तत्त्व त्वदन्तर्गोचरन्तु तन् । या प्रसिद्धा च कूटस्था सुप्रसिद्धाति निर्मला ॥२० सा ज्ञप्तिस्त्वन्निप्प्रपञ्चा प्रपञ्चापि प्रकाशिका। त्व विद्या त्वमविद्या च त्वमालम्या निराश्रया। प्रपञ्चरूपा जगतामादिशक्तिस्त्वमीश्वरी ।।२१ तमोगुण के अतिरक से जो मोह का प्रकाशन है जो कि चेतनो पा आच्छादन करने वाला है वह भी आपके अ शाशमा गोचर है ।।१५।। आप परा है और परास्वरूप वाली है-आप परम शुद्धा है--निर्मला हैं और लोका का मोहन करने वाली हैं । आप तीन रूपो वाली-त्रयी (वेदश्यो)-पोत्ति-वार्ता और इस जगत् की गति है ।। १६ ॥ जिस निजोरप मूत्ति पे द्वारा माधव धात्री विभरण वरते हैं वह आपकी है मूत्ति है जो समस्त जगता ये उपकार परन वाली है |१७|| आ' महान भावों वाली सूदमा और अपराजिता विश्व की शत्ति है ज ।
सतो की उत्पत्ति ] जव और अध के निरोधक द्वारा पवना में पर का व्यक्तीकरण दिया जाता है ।।१८। वह ज्याति थापर मात्राय म भाव ममत सात्विक है जिसका यागीजन विना आलम्व वाली-निप्पल-परम निर्मर आलम्बन क्यिा करत हैं वह तत्व आपके हा बलर गाचर है । जा प्रमिदा--- घटस्था--अति प्रसिद्धा और निर्मला है ॥१॥२०॥ वह अप्ति आपकी निप्प्रपञ्चा और प्रपवामी प्रकाशिका है आप विद्या है और आप अविद्या है आप आलम्बा हैं और बिना आश्रय वाती हैं । बार प्रपञ्च रूप स मयुत जगता की आदि शक्ति हैं और बाप ईश्वरी ॥२१॥ ब्रह्मकण्ठालया शुद्धा वाग वाणी या प्रगोयत। वेदप्रकाशनपरा सा त्व विश्व प्रकाशिनी ॥२२ त्वमग्निम्त्व तथा स्वाहा व स्वधा पितृभि सह । त्व नभस्त्व कालम्पा त्व काप्ठा त्व वहि स्थिता ॥२३ त्वमचिन्त्या त्वमन्यक्ता तथानिदेश्य पिगी। त्व कालरानिस्व शान्ता त्वमव प्रकृति परा ॥२४ यस्या ससारलाबाना परित्राणाय यहि । म्प जाननि धानाद्यास्तत्त्वा ज्ञान्यनिक पराम् ॥२५ प्रसीद भगवत्यम्बे प्रमीद योगमपिणि । प्रसीद घोरस्प त्व जगन्मयि नमोस्तु ते ॥२६ इति स्तुता महामाया दक्षेण प्रयतात्मना। उवाच दक्ष ज्ञवापि स्वय तस्येमित द्विजा ॥२७ जा ब्रह्माजी व क व आलय वाली और गुद्धा पारवाणी गायो जाती है वह वदार प्रकाशन म परायणा तपा वित्र का प्रकाशित बरन वाली बाप ही है ।।२२।। आप अग्नि है तया स्वाहा हैं । थाप पितृगमा व माय स्वधा है। बाप नम है और आप बाल स्पा है गए दिशायें है और आप वाहर स्थिना है ॥२३॥ याप चिनन करन व अयाग्या बाप अध्यक्त हैं तया आप आपका रूप बनिग्य है । बापही काल ४ । [ कालिका पुराण रात्रि हैं और आप हो परम शान्त परा प्रकृति हैं ॥२४॥ जिमका मसार और लोको के परित्राण के लिए जो स्प वाहिर धापाद्य आपको जानन है अन्यथा परा आपको कौन जानेग ॥२॥ हे भगवति । आप प्रसन होइए-हे आबे । हे योग रूपिणि । आप प्रसन्न होइए । हे घोर रूपे । आप प्रसन्न होइए । हे जगन्मपि । आपके लिए मेरा नमवार है ॥२६।। माकण्डेय मुनि ने कहा-इस रीति से प्रयत आत्मा वाले दक्ष के द्वारा स्तुति की गयो महा माया हे द्विजो । दक्ष से बोली यद्यपि उस दक्ष के अभीष्ट को स्वय जानती हुई भी थी तथापि देवी ने उससे पूर्ण था ॥२७॥ तुष्टाह दक्ष भवतो मद्भक्त्या ह्यनया भृशम् । घर वृणीष्व चाभीप्ट तत्ते दास्यामि तत् स्वयम् ॥२८ नियमेन तपोभिश्च स्तुतिभिस्ते प्रजापते । अतीव तुष्टा दास्येऽह वर वरय वाञ्छितम् ॥२६ जगन्मथि महामाये यदि त्व वरदा मम । तदा मम सुता भूत्वा हरजाया भवाधुना ॥३० ममैप न वरो देवि केवल जगतामपि । लोकेशस्य तथा विष्णो शिवस्थापि प्रजेश्वरि ॥३१ अहं तव सुता भूत्वा त्वज्जायाया समुद्भवा । हरजाया भविष्यामि न चिरात्तु प्रजापते ॥३२ यदा भवान्मयि पुनर्भवेन्मन्दादरस्तदा। देह त्यक्ष्यामि सपदि सुखिन्यप्यथ वेतरा ॥३३ एप रत्तस्तव पर प्रतिसर्ग प्रजापते । अह तव सुता भूत्वा भविष्यामि हरप्रिया ।।३४ तथा सन्माहयिष्यामि महादेव प्रजापते । प्रतिसगं यथा मोह सम्प्राप्स्यति निराकुलम् ।।३५ भगवती ने कहा-हे दक्ष ! अत्यधिय इस मेरी भति से मैं भापरा परम प्रगान । अव तुम वरदान या वारण परलो जो भी मती की उत्पत्ति ] आपका अभीप्सित हो वह मैं स्वयं ही तुझे दे दूगी ॥ २८ ॥ हे प्रजा- पते । आपके नियम से-तप से और आपकी स्तुतिणे मे मैं बहुत ही अधिक प्रसन्न हो गयी हूँ। आप वरदान वा वरण करो मैं उसी वर वो दे दूंगी ॥ २६ ॥ दक्ष ने कहा है जगन्मयि हे महामाये ! यदि थाप मुझे वरदान देने वाली हैं तो आप ही स्वग मैरी पुनी होकर भगवान शङ्कर की अब पली बन जाइये ॥ ३०॥ हे देवि ! यह वर केवल मेरा ही नहीं है अपितु समस्त जगतो का है । हे प्रजेश्वरि ! यह वर लोको के ईश ब्रह्माजी का है तथा भगवान् विष्णु का है और भग- वान शिव का भी है ॥ ३१॥ देवी ने कहा-हे प्रजापन ! मैं आपकी पुत्री होकर आपको जाया ( पत्नी ) मे जन्म धारण करने वाली होऊँगी तथा भगवान् शकर की पत्नी हो जाऊंगी और इममें विलम्ब नहीं होगा शीघ्र ही होऊँगी ॥ ३२॥ जिम समय में जाप फिर मेरे विषय मै मन्द आदर वाले हो जाओगे तव में सुखिभी भी अथवा तुरन्त ही अपने देह का त्याग कर दूंगी।. ३: ।। हे प्रजापते । यह वर प्रतिमर्ग में आपको दे दिया है कि मैं आपकी मुता होरर भगवान् हरि पी प्रिया होऊंगों ।। ३४ ॥ हे प्रजापते ' मैं महादेव को उम प्रकार से मम्मोहित करूंगी कि वे प्रतिमर्ग में निराकुल मोह को मम्प्राप्त करेगे॥३५॥ एवमुक्त्वा महामाया दक्षं मुख्यं प्रजापतिम् । अन्तर्दधे ततो देयी सम्यग दक्षम्य पश्यतः ।।३६ अन्नहिताया नायाया दक्षोऽपि निजमाश्रमम् । जगाम लेभे च मुदं भविष्यति मुनेति मा ॥३७ अय चक्रे प्रजोत्पादं विना श्रीसंगमेन च । मंकल्पाविर्भवाम्यान्तु मनमा चिलनेन च ॥३८ तत्र ये तनया जाना बहुगो द्विजसत्तमाः । ते नारदोपदेगेन भ्रमन्ति पृथिवीमिमाम् ॥३६ सङ्गम ने उहोने प्रजा का उत्पादन किया था। मङ्कल्प-आविर्भाव [ कालिया पुराम पुन पुन सुता ये ये तस्य जाता सहस्रश । ते सर्वे भ्रातृपदवी ययुर्नारद वाक्यत ॥४० पृथिव्या सष्टिकर्तार सर्वे यूय द्विजोत्तमा । पश्यध्व पथिवी कृतस्नामूपान्तप्रान्तमायताम् ॥४१ इति नारदवाक्येन नोदिता दक्षपत्रका । अद्यापि न निवर्तन्ते भ्रमन्त पथिवीमिमाम् ॥४२ मार्कण्डेय मुनि ने कहा- इस प्रकार से मरय प्रजापति दक्ष महामाया ने कहकर इसके उपरान्त वह देवी भली भांति दक्ष के देखने देखते ही वही पर अतहत हो गई थी ॥३६ ।। अन्तर्धान हो जाने पर प्रजापति दक्ष भी अपने आश्रय को चले गये भी उन्होंने परम आनन्द प्राप्त किया था कि वह महा माया उनकी पुत्र होकर जन्म धारण करेगी।॥ ३७॥ दमके अनन्तर बिना ही स्त्री उस महामाया के द्वारा तथा मन मे और चितन के द्वारा ही प्रजोत्पादन किया था ॥ ३८ ॥ हे द्विज श्रेष्ठो । वहा पर उनके बहुत-मे पुत्र समुत्पन्न ये और ये सब देवपि नारदजी के उपदेश से इस पृथ्वी पर भ्रमण कि: करते हैं ॥ ३६॥ बार बार जो पुत्र उनके उत्पन्न हुए थे वे सभी अप भाइया से ही मार्ग पर नारदजी ने वचन से चले गये थे॥४०॥ हे द्विजे तमो ! आप लोग मभी पृथिवी मण्डल मे सृष्टि रे करने वाले है। गापूर्ण पृथिवी उपान्त-प्रान्त म आयत देखो ॥४१॥ यही देवा नारदजी या वाक्य था। जिम द्वारा दक्ष के पुत्र प्रेरित किये गये थे वे आज तक भी इस पृथिवी पर भ्रमण करते हुए वही वापिस । हैं ॥४२॥ नत समुत्पादयितु प्रजा मैथुनसम्भवा । उपयेमे वीरणस्य तनया दक्ष ईप्सिताम् ।।४३ बोरिणी नाम तस्यास्तु असक्नीत्यपि सत्तमा । तम्या प्रथम राबरपो यदा भूत प्रजापते ॥४४
सती की उत्पत्ति ]
८७
सद्योजाता महामाया तदा तस्यां द्विजोत्तमाः।
तस्यां तु जातमात्रायां सुप्रीतोऽभून् प्रजापतिः ।
संवपेति तदा मेने तां दृष्ट्वा तेजसोज्ज्वलाम् ॥४५
वभूव पुष्टवृष्टिपच मेघाश्च ववृपुज्जलम् ।
दिशः शान्तास्तदा तस्यां जातायाञ्च समुद्गताः ॥४६
अवादयन्तस्पिदशा: शुभवाद्य विपद्गताः ।
जज्वलुश्चाग्नयः शान्तास्तस्यां सत्या नरोत्तमाः ॥४७
वीरिण्या लक्षितो दक्षस्ता दृष्ट्वा जगदीश्वरीम् ।
विष्णुमायां महामाया तोपयामास भक्तितः ॥४
इसके अनन्तर मन में समुतान्न होने वाली प्रजा का मम्पादन
करने के लिये प्रजापति दक्ष ने वीरण पी पुत्री के साथ विवाह किया
था जो कि परम ईमित पया यो ॥४३॥ है मतमो ! उसका नाम
वीरणी था और अमिती यह भी था। उममे जव प्रजापति वा प्रयम
मङ्कल्प हुआ। हे द्विमोत्तमो ! ठम समय में उममें मद्योजाता महामाया
हुई। उनके जन्म होते ही प्रजापनि अत्यन्न प्रसन्न हुआ था। उगयो
तेज में उग्ज्वला देखकर उम ममय में उमने ( दक्ष ने) मह यही है-----
[ बालिया पुग ६५ या प्रोच्यते विष्णुमाया ता नमामि सनातनीम ॥४६ पया धाता जगत्सृष्टी नियुक्तम्ता पुराफरोत् । स्थितिञ्च विष्णुरकरोयन्नियोगाज्जगत्पति ॥५० शम्भुरन्त ततो देवी त्वा नमामि महीयसीम् । विकाररहिता शुद्रामप्रमेया प्रभावतीम् । प्रमाणमानमेयारया प्रणमामि सुखात्मिकाम् ॥५१ यस्त्वा विचिन्तयेहेवी विद्या विद्यात्मिवां पराम् । तस्य भोग्यच्च मविश्च सदा करतले स्थिता ॥५२ यस्त्वा प्रत्यक्षतो देवी मन पश्यति पावनीम् । तम्यावश्य भवेमक्तिविद्याविद्याप्रकाशिकाम ॥५३ योगनिद्रे महामाये विष्णमाये जगन्मयि । या प्रमाणार्थसम्पन्ना चेतना मा तवात्मिमा ५४ ये सुवन्ति जगन्मातर्भवतीमम्विति । जगन्मयोति मायेति सर्व लेया भविष्यति ॥५५ दश प्रजापति ने कहा था- शिया--शान्ता-महामाया-योग- निद्रा-~-जगमयी जो विष्णु माया पती जाती है उस सनातनी देवी में नि नभम्यार यरता है || || जिगये दाग धाता (प्रा) इम जग भी ष्टि पा मगा परने ये पार्य में निगत पिया गया था और पनि उग मुष्टि की रचना उगने की थी और भावान विष्णु ने उग गशिपी पिचति अर्थात परिणाम दिया था। जिग नियोग गे जगर पनि ने बस अपात शिपामार पिया था । उसी गरीयसी यो आपस में प्रणाम करता है। आप विवारी में रहत है-शा है-या पर्यापमा परमेये योग्य-प्रभा यानी --आप प्रमाप मे नाम वापी और गुप वापणी है ऐगी आगो माम मामा.., १॥ पाप देयो आपका पिता को भी पkिar aer मी पराग ये गुगो का गाम
मनी की उत्पत्ति ]
CE
1
भोग्य और मुक्ति मदा ही बरतल मे स्थित रहा करती है ॥ ५२ ॥ जो
पुष्प थाप देवी का प्रत्यक्ष स्प मे परम पावनी का एक बार भी दर्शन
प्राप्त कर लेता है उम पुरुप को अवश्य ही मुक्ति हो जाया करती है
जो कि विद्या-अविद्या को प्रकाशिया है 1५ ।है योगनिद्रे ! हेमहामाये!
हे जगन्मयी ! हे विष्णुमाये । जो प्रमाणार्थ मम्माना चेतना है वह तेरे ही
स्वरुप वाली है ॥ ५४॥ हे जगन्मान । जो पुरप थापा अम्बिका कह
फर स्तवन पिया करते है, जो जगन्मयी और माया-इन नामो का
उच्चारण परफे आपको स्तुति क्यिा परते है उनका मभी कुछ अभीष्ट
सम्पन्न हो जाया करता है ||५||
इति स्तुता जगन्माता दक्षेण मुमहात्मना ।
तथोवाच तदा दक्ष यया माता शृणोति न ॥५६
सन्मोद्य गर्व तन्त्रम्यं यथा दक्षः शृणोनि तत् ।
नान्यः शृणोति च तथा माययाह तदाम्विका ।।५७
अहमाराधिता पूर्व यदर्थ मुनिमत्तम।
प्मितं तय मिदं तदवधारय माम्प्रनन् ।।५८
एवम्वत्या नदा देवी दक्षच निजमायया ।
अम्पाय णेशवं भाव जनन्यन्ते रुरोद मा १५६
ततानां चोरिणो यत्नान् मुनस्कृत्य यथोचितम् ।
शिशुपालन विधिना तम्य स्तन्यादिकं ददौ ।।६०
पालिता साय वोरिण्या दक्षेण मुमहात्मना ।
बवृधे प्रक्लपक्षन्य निशानायो ययान्वहम् ॥६१
तन्यान्त मद्गुणा म विवगुद्धिजगतमा ।
शेगवेपि यथा चन्द्र कला गर्वा मनोहग ॥६२
रेमेसा निजमावन गम्दीमध्यगता यदा।
तदा लिपति भर्गम्य प्रनिमामन्वहं मुह ॥६३
माटेप मानिने रहा-गुमान आग्या दाने दस के दाग
। पालिका पुगण इस रीति से स्तुति को गयो जगन्नाता उम अवसर पर उमी भौति दस प्रजापनि मे बोली जमे माता सुनती ही नही हो ॥५६॥ यहाँ पर स्थित सबको सम्मोहित करके जिस तरह से दक्ष वह सुनता है उम प्रकार अन्य माया से नही श्रवण करता है उस समय मे अम्बिका ने कहा ।५७ देवी ने कहा - हे मुनि सत्तम। जिसके लिये पूर्व में मेरी आराधना की थी वह आपका अभीष्ट कार्य सिद्ध हो गया है यह अव अवधारण कीजिए 1५८६ मार्कण्डेय मुनिने कहा-इस प्रकार से वहबर उस समय मे देवीते अपनी माया से दक्ष को समझाया था और फिर वह शंशव भाव में समास्थित होकर जननी के समीप रोदन करन लगी थी ॥५६॥ इसके अनन्तर वीरणी ने वड हो यल से यथोचित रूप से सुसंस्कार करके शिशु के पालन की विधि से उसको स्तन आद को दिया था अर्थात् स्तन का दुग्ध पिलाया था ॥६०॥ इसके अनन्तर वीरणी के द्वारा वह पारित की गयी थी तथा महात्मा दक्ष के द्वारा शुक्ल पक्ष का चन्द्रमा जिस तरह से प्रतिदिन वृद्धि वाला हुआ करता उमी भौति वह बडी की गयी थी। ॥६१॥ हे द्विज थेठो । उम देवी में मव सद्गुणो ने प्रवेश कर लिया था। जिस तरह से चन्द्रमा मे शैशव मे भी समस्त मनोहर क्लायें प्रवेश किया करती है ॥६२॥ वह निजभाव से जिस समय में सखियो वे मध्य गमन परके रमण करती थी अर्थात् अपने मन का रन्जन किया परती थी उस समय मे प्रतिदिन यर २ भर्ग की प्रतिमा पो लिखता है॥६३॥ यदा गायति गीतानि तवाल्योचितानि सा। उग्र स्थाणु हर रद्र सम्मार स्मरमानसा ॥६४ तम्याश्चक्र नाम दक्ष सतीति द्विजसत्तमा । प्रशस्ताया. मर्वगुणं सत्त्वादपि नयादपि ।।६५ ववृधे दक्षवीरिण्यो. प्रत्यह वरणातुला । तस्या वाल्येऽपि भक्ताया तयोनित्य मृहु हु ।।६६ मती की उत्पत्ति ] वह जिस समय में गीता का गान करती है जो कि बचपन के लिये समुनित थे उस समय मे स्मर मानसा वह उप-स्थाणु-हर और रद्र---इन नामों का स्मरण किया करतो थी। स्मर मानसा- इसका तात्पर्य है काम वासना को मन मे धारण करने वाली ॥६४॥ है द्विज सत्तमो दक्ष प्रजापति ने उग वालिका स्वरूप में स्थित देवी का 'सती'-यह नाम रक्खा था। जो वि समस्त गुणो के द्वारा सत्य से भी और नय से भी परम प्रशस्ता थी ॥६५॥ दक्ष और वीरणी दोनो की प्रतिदिन अनुपम करणा वह रही थी। उन दोनो दक्ष और वीरणी की करणा की वृद्धि का कारण यही था कि वह मती बचपन में ही परम मता थी अतएव उन दोनो को धारम्वार नित्य पणा की वृद्धि हो रही नरोत्तमो । वह समस्त परम सुन्दर गुणो से समाक्रान्त थी और मदा ही नप शालिनी थी अतएव उसने (मनी ने) अपने माता- पिता को परमाधिक तोप दिया था। अर्थात वे अतीव सन्तुष्ट थे इसके अनन्तर एक बार ऐसी घटना घटित हुई थी कि उस सती को अपने पिता दक्ष के पार्श्व में समय स्थित हुई को ब्रह्मा-नारद इन दोनो ने देखा था जो कि इस भूमण्डल मे परम शुभा और रन्न भूता थी ॥६॥ ॥६७॥६॥ सर्वकान्त गणाकान्ता सदा सा नयशालिनी । तोषयामास पितरों नित्य नित्यं नरोत्तमा.६७ अगेकदा पितः पाय तिष्ठन्मी ता सती विधि । नारदश्च ददर्शाय रत्नभूत्तां क्षितौ शुभाम् ।।६८ सापि तो वीक्ष्य मुदिता विनयावनता तदा। प्रणनाम सती देवं ब्रह्माणमथ नारदम् ॥६६ प्रणामान्ते सती वोक्ष्य चिनायावनता विधिः । नारदश्च तथैवाशोदिमेतमुवाच ह ।।७० स्वामेव यः कामयते य त्व कामयसे पतिम् । समाप्नुहि पति देव सर्वज्ञ जगदीश्वरम् ।।७१ १२ [ पानिया पुराण यो न्नान्या जगृह नापि गृह्णाति न ग्रहोप्पति । जाया स ते पति यादन यसदृश शुभे ॥७२ इत्युक्त्वा सुचिर तौ तु स्थित्वा दक्षाथये पन । विसष्टी तन सयातौ स्वस्थान द्विजसत्तमा ७३ वह सती भी उन दोनो का दशन प्राप्त करके सुप्रम न हुई थी जोर उम समय में विनमता से अवनत हो गयी थी । इमवे अउ तर उस सती ने देव ब्रह्माजी को और देवपि नारदजी वो प्रणाम किया था ॥६६॥ प्रणाम करने के अन्त में ब्रह्माजी ने उम सती को विनय मे अवनत अर्थात् नीचे की ओर झुकी हुई देखकर और नारद जी न भी उसका अवनत म्वरूप का दर्शन किया था। तव नारदजी ने उस सती को यह आशीर्वाद कहा था ॥७०॥ तो तुम्हारी प्राप्ति की कामना करता है और जिसको तुम अपना पात बनाने की वामना किया करती हो उन पवज्ञ--जगदीश्वर देव को अपने पति के स्वरूप में प्राप्त वरो ॥७१।। जो अय किसी भी नारी वो ग्रहण करने वाले नहीं हुये थ और न ग्रहण करते है तथा अन्य जाया को ग्रहण करे ग भी नहीं । हे शुभे । वही आपके पति होवें जो अनय गरश हैं अर्थात् जिनदे' सरीखा अय कोई भी नहीं है ।।७२।। इतना कर वे दोनो ( ब्रह्मा और नारद) पिर दक्ष प्रजापति वे आश्रय म स्थित होकर हे द्विज सत्तमो । उमा दक्ष के द्वारा विदा दिये गय थ र वे दोना अपने स्थान म पले गय थ॥७३॥ ॥ हरानुनयो वर्णन ॥ वात्य व्यतीत्य सा पाप यौवन शोभन तत। अतीव रूपेणागेन सर्वाङ्गमुमनोहा।। सा वीक्ष्य दक्षो सोवेश प्रोदभ ना तवंश यिाम् ।
हरानुनयने वर्णन ] चिन्तयामास मर्गाय कश दास्य इमा सुताम् ॥२ अय सापि स्यय भग प्राप्तुमैच्छत्तदान्वहम् । आराधयामास च त गृहे मातुरनुनया ॥3 आश्विने नन्दकाख्याया लवणे सगुडोदने । पूजयित्वा हर पश्चाद्ववन्दे सा निनाय तत ॥४ कार्तिकस्य चतुर्दश्या सापूपै पायसहरम् । समाकीणे समाराध्य सस्मार परमेश्वम् ॥५ कृष्णष्टम्या मार्गशी सदिल सययोदन । पूजयित्वा हर नोल निनाय दिवस पुन ॥६ पोये तु कृष्णसप्तम्या कृत्वा जागरण निशि। अपूजयच्छिन प्रात कृमरान्नेन सा सती ॥७ मार्कण्डेय महाप ने कहा-उन सती देवी ने अपना पचपन व्यतीत करके वह फिर परमाधिप शाभन पौरन का प्राप्त हो गयी थी और अत्यधिक स्प लावग्य न सुनम्पन्न अपन अङ्ग से वहम मस्त अङ्गा के द्वारा सुमनोहर अर्थात् बहुत ही आधर मन को हरण करने वाली मुन्दरी भो ॥१॥ दक्ष प्रजापति न जा लामो का ईश था उस सती को देखा था कि वह प्रोभिन्न अन्तवय म मस्थित है अर्याद यौवन म सुस- मपन्न पूर्ण युवती हो गई है तब उसन यह चिन्ता को थी कि इस अपनी पुत्री को भर्ग के लिये टिन प्रकार ग प्रदान करें ॥२॥ इसके बनन्तर वह मती भी प्रतिदिन स्वय हो भगवान् शम्भु को प्राप्त करने की इच्छा रसने वाली हाग्यो थी। उस सती न अपनी माता की आज्ञा से भगवान् शम्नु यो समाराधना की थी जो अपन घर में स्थित होकर की गमी घी ॥३॥ आश्विन माम म नन्द वाघ्या म गुड और बादन के सहित लवमा मे हर का यजन वरखे इसके पश्चाद उसने वन्दना की थी। उपन जन प्राप्त किया था। कार्तिक मास को चतुर्दशी तिथि मे पूओ के महित पावसा (खोर) स भो ममाकीप ध भगवान हर को समा- ६४ [ वासिवा पुराण राधना करके फिर परमेश्वर प्रभु शम्भु वा ग्मरण दिया था ॥५॥ मार्ग शीप माम में कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि में तिलो के सहित यव और ओदमा स भगवान् हर का पूजन करके फिर नीला के द्वारा दिवस को व्यतीत करती थी ॥६॥ पौष मास में कृष्ण पक्ष की सप्तमी तिथि के दिन में रात्रि मे जागरण करके प्रात काल म शिव का उस सती ने कृसरान्न के द्वारा यजन किया था ।। ७ ।। माघस्य पौर्णमास्यान्तु कृत्वा जागरण निशि । आर्द्रवस्त्रा नदीतीरे ह्यकरोद्धरपूजनम् ।।८ नानाविध फलं पुष्पं सम्यक् तत्कालसम्भने । चकार नियनाहार त मास हरमानसा ॥६ चतुर्दश्या कृष्णपक्षे तपस्यस्य विशेषत । कृत्वा जागरण देवा विल्वपत्रैरपूजयत् ।।१० चैत्रे शुक्ल चतुर्दश्या पालाश कुसुमै शिवम् । अपूजयद्दिवारात्रौ त स्मरन्ती निनाय तम् ।।११ पैशाखस्य तृतीयाया शुक्लाया सयवोदने । पूजयित्वा हर देव हव्यास चरन्त्यनु । निनाय सा निराहारा स्मरन्ती वृषवाहनम् ॥१२ ज्येप्ठस्य पूणिमारात्रौ सम्पूज्य वृषवाहनम् । वसन हतापुष्पंनिराहारा निनाय ताम् ॥१३ आपाढस्य चतुर्दश्या शुक्लाया कृत्तिवासस । वृहतीकुसुमै पूजा देवस्याकरि नै तया ॥१४ माघ मास की पौर्णमासा म रात्रि म जागरण करके गीले वस्त्र धारण करती हुई नटी के तट पर भगवान हर का पूजन करती थी ।।। उस पूरे मास म भगवान् शम्भु में मन वाली ने नियत आहार किया था जा अनेक प्रकार के फ्लो और पुप्पो से ही किया गया था जो भी उस बाल म समुत्पन्न होन बाले थ ॥l माघ मास में विशेष रूप से हरानुनयने वर्णन ] कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी मे गति मे जागरण करके देव का बिल्व पत्री * द्वारा यजन किया करतो यो ॥१०॥ चैत्र मास में शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी में पलाश के पुष्पो से भगवान शिव की पूजा की थी और दिन तथा रात में उन का स्मरण करते हुए उप्त को व्यतीत किया था। वैशाख मास में शुक्ल पक्ष की तृतीया के दिन मे यवो के सहित ओदनो के द्वारा देव शम्भु का यजन करके द्रव्यो के द्वारा पूरे मास का अनुचरण क्यिा करती थी । वृप गहन प्रभु का स्मरण करती हुई उस सती ने निराहार रहकर उस समय को व्यतीत किया था ॥११॥ १२१] उसने निराहार ही रह पर ज्येष्ठ मास की पूर्णिमा तिथि में वृप गहन देव का यजन करपे वसनो से और पुप्पो के द्वारा उसको पूर्ण पिया था ॥१३॥ आपाढमास की चतुर्दशी तिथि में जोकि--शुक्ल पक्ष की थी कृत्ति वाला देव का नृहती के पुष्पो के द्वारा यजन करके उसने उसी भांति किया था ॥१॥ श्रावणस्य सिताप्टम्या चतुर्दप्याञ्च सा शिवम् । यज्ञोपवीत सोभि पवित्ररप्यपूजयत् ॥१५ भाद्रे कृष्णत्रयोदश्या पुष्पर्नानाविधं फल । सपूज्याथ चतुर्दश्या चकार जलभोजनम् ॥१६ इति व्रत पदारब्ध पुरा सत्या तदैव तु । साविनीसहितो ब्रह्मा जगामाथ हरान्तिकम् ॥१७ वासुदेवोऽपि भगवान् सह लक्ष्म्या तदन्तिकम् । प्रस्थ हिमवत शम्भु स्थितो यत्र गण सह ॥१८ तो तु दृष्ट्वा ब्रह्मकृष्णौ सस्त्रीको सगतो हर । ययोचित समाभाप्य पप्रच्छागमन तयो ||१६ तथाविधास्तु तान् दृष्ट्वा दाम्पत्यभावसयुतान् । कानिदोहाञ्च मनसा चक्रे दारपरिग्रहे ॥२० अयागमनहेतु न कथयध्वञ्च तत्वत । विमर्गमागता यूय कि कार्य वोत्र विद्यते ॥२१ । जमान [ पालिका पुराण इति पृष्टोच्यम्बकेण ब्रह्मा लारपितामह । उवाच च महादेव विष्णुना परिचादित ॥२२ श्रावण मास शुक्लपक्ष की अष्टमी तिथि के दिन म और चतुर्दशी म उसने पवित्र यज्ञोपवीता तथा वस्त्रा के द्वारा दव का पूजन किया था ।। १५॥ भाद्रपद मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी म नाना भाति वे फ्लो तथा पुप्पा के द्वारा भली भांति देवया भजन करके चतु- दशी में जल का ही भाजन दिया था ॥ १६॥ इस प्रकार से जा पूर्व मे व्रत सती ने आरम्भ किया था उसी समय म सावित्री के सहित ब्रह्माजी भगवान् शम्भु के समीप में गये थे ॥ १७॥ भगवान् वासुदेव भी अपनी लक्ष्मी देवी के सहित उनके सन्निधि म गये थे । जहाँ पर भगवान शम्भु हिमालय गिरि के प्रस्य पर अपने गणो के सहित विरा- ।। १८ ।। भगवान् शम्भु ने उन दानो ब्रह्मा की ओर भगवान कृष्ण को देखकर जो अपनी पत्तियो क साथ सङ्गत हुए वहां पर प्राप्त हुए थे जैसा भी समुचित शिष्टाचार था उसी के अनुसार उनसे सम्भा- पण करके उनके यहां पर समागमन का कारण शङ्कर प्रभु ने पूछा था ॥१६॥ उस प्रकार के उन दानो का दर्शन करके जो दाम्पत्य भाव स सङ्गत ये शम्भु न भी दारा के पारग्रह करने की इच्छा मन में की थी ॥ २०॥ इसके उपरान्त तात्विक स्पस अपन आगमन का कारण कहिए कि आप लोग यहां पर किस प्रयोजन को सुम्पादित किये जाने के लिये समागत हुए हैं और आपका यहाँ पर क्या कार्य है ? ।। २१ ॥ इस रीति से भगवान् शम्भु के द्वारा पूछ गये वे दोनो मे से लाका के पितामह ब्रह्मानी ने भगवान विष्णु के द्वारा प्रेरित होकर महादेवजी से पहा था ॥२२॥ यदर्भमागतावावा तच्छृणुस्व त्रिलोचन । विशेपश्च देवार्य विश्वार्थञ्चवृनध्वज ॥२३ अह सृष्टिरत शम्भो स्थितिहेतुस्तथा हरि । अन्तहेतुर्भवानस्य जगत प्रतिसकम् ॥२४ हरानुनयने वर्णन ] तत्कर्मणि सर्दवाहं भवद्भयां सहितो झलम् । हरिः स्थितावपि तथा मयालं भवता सह । त्वमन्तकारणे शक्तो विना नावां भविष्यमि ॥२५ तस्मादन्योन्यकृत्येषु सर्वेषां वृषभध्वज । साहाय्यं नः सदा योग्यमन्यथा न जगद्भवेत् ॥२६ केचिद्भविप्यन्त्यसुरा मम वध्या महेश्वर । अपरे तु हरेवंध्या भववोऽपि तयापरे ॥२७ केचित्तद्वीयंजातस्य केचिन्मेशभवस्य वं। मायायाः केचिदपरे वध्याः स्युर्दैववैरिणः ॥२८ ब्रह्माजी ने कहा-हे त्रिलोचन! जिस कार्य के सम्पादन कराने के लिये यहाँ पर हम दोनो ही आये हैं उसका अव आप श्रवण कोजिए। हे वृपमध्वज ! विशेष रूप से तो हम दोनो का आगमन देव अर्थात् आपके ही लिये है और सम्पूर्ण विश्व के लिए भी है ॥२३॥ है शम्भो ! मैं तो केवल सूजन करने के ही कार्य में निरत रहता और यह भग- वान हरि उम तुष्टि के पालन करने के कार्य में संलग्न रहा करते है और आप इस सृष्टि का संहार करने में रत हुआ करते हैं यही पति- मग में जगत् का कार्य होता रहता है ॥ २४ ॥ उम कर्म में सदंव में आप दोनो के सहित ममय है। यह हरि मेरे और आपके महयोग में पालन करने में समर्थ है । आप संहार करने में हम दोनों के सहयोग के विना गम नहीं होते हैं। इस कारण मे हे वृपभध्वज ! परस्पर के कृत्यों में ममी की सहायता बावश्यक है। हमारी साहायता सदा योग्य ही है अन्यथा यह जगत नही होता है ।। २५-२६ ॥ है महेश्वर ! पुछ असुर हैं जो मेरे वध करने के योग्य है दूसरे हरि के वध्य होते हैं। तया दूसरे ऐसे भी हैं जो आपके हो द्वारा वध करने के योग्य होते हैं ॥२७॥ घुछ ऐसे हैं आपके वीर्य से समुत्पन्न होने वाले के द्वारा बघ के योग्य है और मेरे अंश मे समुत्पन्न के दाग बघ के लायक होते - [ कालिका पुराण हैं। दूसरे में है जो मापा के द्वारा देवी के बैरी अमुर वध के योग्य होते हैं ॥२८॥ योगयुक्तेत्वयि सदा रागद्वेषादिवजिते। दयामायकनिरते न वध्या असुरास्तव ॥२६ अदाघितेषु तेप्दीश कय सप्टिस्तथा स्थितिः । अन्तश्च भविता चुक्तं नित्यं नित्यं वृषध्वज ॥३० सृप्टिस्थित्यन्तकर्माणि न कार्याणि यदा हर । गरीरभेदमम्माक मापायाश्च न युज्यते ॥३१ एकस्वल्पा हि ययं भिन्ना कार्यस्थ भेदतः । कार्यभेदो न मिद्धश्चेद्रपभेदोऽप्रयोजन: ॥३२ एक एय विधा भूत्वा वय मिन्न स्वरूपिणः । भूता महेश्वर इति लत्त्व विद्धि सनातनम् ॥३३ मायापि भिन्नरपेण कमलाख्या सरस्वती । गावित्री चाप मध्या च भूता कार्यस्य भेदतः ॥३४ प्रवृत्तनुरागस्य नारी मूल महेश्वर । रामापरिग्रहात पक्षान पामक्रोधादिकोदभवः ॥३५ हराननयन दन] . हाते है । यदि काया कादम्दि नहीं होता है नो बहसों का भेद मो प्रयाउन ने रहित ही है ।।३३॥ वैएक ही दोनों न्यों में होकर हन दिमिल दम्प दाने दाद है । है महम्वर । वर्ग मनातन क्याँद गुदा ने बना आना बत्व है-इमर्ग जान नौमि ॥२३॥ यह माया भी मिन्नम्मों ने बना नाम दाली यदि तपनी-मुम्दती बौर सावित्री तपा पुल्या कार्यों हे मेद में ही भिन्न हुई है ॥ ३१ ॥ है नहेबर! बनुगर की प्रवृति का मुल नारी ही है। राना के परिप्रहले ही पो काम-कात्र आदि समय (अन्न) हाडा है ॥३५॥ जनुरागे तुमचाते कामचोधादिकारा। विरागहेतु यत्नेन गन्वयन्तीह जन्तवः ॥ मग प्रथम एवम्बादागजात पल महत। तम्नान् सन्तयते काम नमान् कौवन्नतो भवेत् ॥3 रान्पच निवृत्तिरच शासवानाविनगदपि । अनारविमुख हेतुरचनरच दातन ॥३८ दया वत्र भन्नित्य गानिकापि महेश्वर। अक्षिा च उपः शान्निनिमागांनुवाधनम् ॥ वपि वानपोनि विगिनि दयापुढे । अहिंसा व तया गालि उदा तव भविष्यति ॥e ततो गुतदिनी यन्नन्नव वनाद्विष्यति । जहते दूपम पद्मत्तन गर्न नविन तब ॥४१ नम्माद्विश्वहिताव ल देवानान्च कमन्यते । परिश्मीप्व भापयि वामामेका उद्योमनाम् ॥४२ यथा पद्मालया विनो सावित्री च पया मम । दया सब शम्नार्या स्यात्व गृहम मुन्नति ॥ कान काध आदि के बारपदानुराग के होने पर यहाँ पर उन्तु 7 दिराम में हतुगत पूर्वक मान्दन किया करते है १०० [ मारिया पुराण ॥३६॥ जनुराग व वृक्ष मन ही गवं प्रथम महान् पर होता है। उसी मन मे वाम को गमुत्पत्ति हुमा वरती है- वाम मे क्रोध उत्पन्न होता है ॥ ३७॥ स्वाभाविप मान में भी वैराग्य और निवृति होतो है। संसार की विमुपना म मनातन हेतु असङ्ग ही होती है। हे महेश्वर । यहाँ पर दया नित्य ही हुआ करती है अर्थात् जो ससार से विमुख है उममे नित्य ही दया या होना आवश्यर है। और दया के साथ २ शान्ति भी होती है। अहिंसा और सप- शान्ति ज्ञान मार्ग का अनुसाधन है ॥ २६ ॥ आपरे तपोनिष्ठ-विसङ्गी अर्थात् सङ्ग रहित तथा दया से सयुत होने पर अहिंमा तथा शान्ति आपको सना ही होगी॥ ४० ॥ फिर सुखोपभोग की विधि मे आपका यत्न किससे होगा ? इसके न करने पर जो-जो दोष हैं वे सभी आपको बतला दिये गये है ॥ ४१ ।। हे जगत्पते । इस कारण से आप विश्व के और देवी के हित के लिए भार्या में एक परम शोभना वामा का परि- ग्रहण कर ॥४२॥ जिस प्रकार स लक्ष्मी भगवान विष्णु कोपरनी हैं और सावित्री मेरी पत्नी है उसी भांति शम्भु को जो भी सहचारिणी होवे उसका अब ही आप परिग्रहण कीजिए।४॥ इति श्रुत्वा वचस्तस्य वह्मण पुरतो हरे । सदा जगाद लोकेश स्मितादितमुखो हर ॥४४ एवमेव यथात्य त्व ब्रह्मन विश्वनिमित्तत । न स्वार्थत प्रवृत्तिम सम्यग् ब्रह्मविचिन्तनात् ।।४५ तथापि यत्करिष्यामि तत्ते वक्ष्ये जगद्धितम् । नच्छृणुष्व महाभाग युक्तमेव वचो मम ॥४६ या मे तेज समर्था स्याग्रहीतुमिह भागश । ता निदेशय भार्यार्थ योगिनी कामरूपिणीम् ॥४७ योगयुक्ते मयि तथा योगिन्येव भविष्यति । कामासक्ते मयि पुनर्मोहिन्येव भविष्यन्ति । तां में निदेशय ब्रह्मन् भार्यार्थ वरवणिनीम् ॥४ भरानुनयने वर्णन ] यदक्षर वेदविदो निगदन्ति मनीपिण.। ज्योति स्वरूप परम चिन्तयिष्ये सनातनम् ॥४६ मार्कण्डेय मुनि ने कहा-इस तरह से हरि के आगे ब्रह्माजी के वचन का श्रवण कर मन्द मुस्स राहट मे हित मुख वाले हरि ने उस समय में लोकों के ईश ब्रह्माजी में कहा था ॥ ४४ ॥ ईश्वर ने कहा- जो आपने कहा है वह इसी प्रकार मे तथ्य है । हे ब्रह्माजी। यह विश्व के ही निमित्त में होना ही चाहिए किन्तु स्वार्य से भली भांति ब्रह्म के विचिन्तन करने से मेरी प्रवृत्ति नहीं होती है ॥४५॥ तो भी वह मैं करूगा जो जगत् की भलाई के लिये आप कहेंगे। सो हे महाभाग। आप श्रवण वीजिए जो मेरा परम युक्त वचन है ।। ४६ ॥ जो मेरे तेज को सहन करने में भागश समर्थ हो यहाँ पर भार्या के ग्रहण करने म उसी को आप वतलाइये जो योगिनी और कामरूपिणी दोनो ही होवे। ।। ४७ ॥ जब मैं योग मे युक्त होऊ उम अवसर उसी भांति वह भो योगिनी हो जावेगी और जिस समय में काम वामना मे आमक्त होऊ तो उस अवसर पर मोहिनी ही होवेगी। हे ब्रह्माजी । भार्या के लिए उमी को आप वतलाइये जो वर वणिनी होवे ॥४८॥ वेदो के ज्ञाता महामनीपोगण जो अक्षर को जानते हैं अर्याद जिस अक्षर का ज्ञान रखते हैं उसी परम ज्योति के स्वरूप वाले को जो सनातन है मैं चिन्तन पलंगा ।।४६॥ तचिन्तापां सदा शक्तो ब्रह्मन् गच्छामि भावनाम् । तत्र या विघ्नजननी न भवित्रीह सास्तु मे ॥५० त्व वा विष्णुरह वापि परब्रह्मस्वरूपिण । अगभूना महाभाग योग्यं तदनुचिन्तनम् ॥५१ तच्चिन्तया विना नाह स्थास्यामि कामलासन । तस्माज्जाया प्रादिशस्व मत्कर्मानुगतां सदा ॥५२ इति तस्य वच श्रुत्वा ब्रह्मा सर्वजगत्पति.।।
१०२ [ कानिरा पुराण सस्मित मोदितमना ऽद वचनमब्रवीत् ॥५३ अस्तीदृशो महादेव मागिता यादृशी त्वया ॥५४ दक्षस्य तनया याभूत् सतीनाम्नी सुशोभना । सैवेशी भवद्भार्या भविष्यति सुधीमती ॥५५ ता त्वदर्य तपस्यन्ती तत्त्राप्ति प्रतिकामिनीम् । विद्धि त्य देवदेवेश सर्वप्वात्मसु वर्तसे ॥५६ हे ब्रह्माजी | मैं उसी की चिन्ता में सदा शक्त होता हुआ भावना को गमन किया करता हू अर्थात् भावना मे निमग्न हो जाता है। उस भावना मे जो विघ्न डालने वाली हो वह मेरी होने वाली वामा न होवे ।५०। है महाभाग । आप अथवा विष्णु भगवान् या में भी सब पर ब्रह्म के स्वरूप वाले है और एक दूसरे के अद्भूत हैं । जो योग्य हो उसका ही अनुचिनन करो ॥५१॥ हे कमलामन । उसको चिन्ता के बिना में स्थित नहीं रहेगा। इस कारण से ऐसी हो जाया को बतलाइये जो सदा मेरे कर्म के ही अनुगत रहने वाली होवे ॥५२॥ मार्कण्डेय मुनि ने कहा--सम्पूर्ण जगतो के स्वामी ब्रह्म जी ने यह उनके वचन का श्रवण कर स्मित के सहित प्रसन्न मन वाले ने यह वचन कहा- ब्रह्माजी ने कहा-हे महादेव ! जैसी आपने मागित की है वैसी ही एक है जो प्रजापति दक्ष वो तनया (पुत्री) हुई है जिसका नाम 'सतो' है और वह परम शोभना है। वह ही ऐसी सुधीमतो आपको भार्या होगी ॥५३-५५ ।। उसी को जो आपको पति के रूप मे प्राप्त करने के लिये तपस्या पर रही है । और वह आपकी प्राप्ति के लिए कामिनी है । उसको आप जान लीजिए । है देवदेवेश्वर । आप तो सभी आरमाओ में वर्तमान रहने वाले हैं ॥१६॥ अथ ब्रह्मवच शेषे भगवान् मधुसूदन । यदुक्स ब्रह्मणा सर्व तत् कुरुष्वेत्युवाच सः ॥५७ करिप्य इति तेनोक्ते स्वेप्ट देश प्रजग्मतु । हरिह्मा च मुदिती सावित्रीकमला-युतौ ॥५८
सुनी मे विवाह प्रम्नाव ]
१०३
कामोऽपि वाक्यानि हरस्य शुस्वा चामोदयुक्तो रतिना समित्रः ।
शम्भु समासाद्य विविक्तरूपी तस्यो वसन्त विनियोज्य शश्वना५६
मार्कण्डेय मुनि ने कहा-इसके अनन्तर ब्रह्माजी के वपन के
उपरान्त भगवान् मधुमूदन ने कहा जो कुछ भी ब्रह्माजी ने कहा है वह
मब आप करिए ॥ ५७ ॥ उन शङ्कर प्रभु के द्वाग में वही कहेंगा--
ऐसा कहने पर वे दोनो ( ब्रह्मा बार विष्णु) अपने २ आश्रमों को
चले गये थे। ब्रह्माओ और हरि भगवान बहुत ही प्रसन्न हुए जो कि
सावित्री और पमला में मयुन थे। ५८॥ रामदेय मो महादेपनी के
वचन का श्रवण करके अपने मित्र (वमन) के सहित और पली रति
के साथ म आमोद से युक्त होगया था। उसने विविक्त रूप वाला होकर
शम्भु
को प्राप्त कर निरन्तर वमन्त को विनियोजित कर वही पर स्थित
होगया [.५६॥
। सती से विवाह-प्रस्ताव ॥
अय सत्या पुनः शुक्लपक्षेऽष्टम्यामुपोपितम् ।
आश्विने मासि देवेशं पूजयामाम भक्तितः ॥१
इति नम्दाव्रते पूर्ण नवम्यां दिनभागत. ।
तस्यास्तु भक्तिनम्रायाः प्रत्यक्षमभवदरः ॥२
प्रत्यक्षतो हरं वीक्ष्य सामोदहृदया सती।
ववन्दै चरणो तम्य लज्जयावनता नता
अय प्राह महादेवः सती तद् यतधारिणीम् ।
तामिच्छन्नपि भार्याय तस्याश्चर्यफलप्रद्रः ।।४
अनेन त्वद्वतेनाहं प्रीतोस्मि दानन्दिनि !
वरं वरस दास्यामि यस्तवाभिमतो भवेत् ॥५.
१०४ [ वालिया पुगण इस नन्दा के जानन्नपीह तद्भाव महादेवी जगत्पतिः । ऊचेऽय वग्यस्वेति तद्वाक्यश्रवणच्छया ॥६ सापि पासमाविष्टा नो वक्तु हृदये स्थितम् । शशाव वालाभोप्ट पत्लज्जयाच्छादित यत ॥७ मार्कण्डेय महर्षि ने कहा-इसके अनन्तर मतीन पुन शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि म उपवास किया था और आश्विन मास में देवेश्वर का भक्ति भाव से पूजन किया था ॥१॥ इस तरह अत के पूर्ण हो जाने पर नवमी तिथि मे दिन के भाग में भक्ति भाव से परमाधिक विनम्र उस सती को भगवान हर प्रत्यक्ष मे हो गये थे अर्थात मतो के समक्ष में प्रत्यक्ष रूप से उपस्थित हो गये थे ॥२॥ प्रत्यक्ष रूप मे हर का अवलोकन करके सती मानन्द युक्त हृदय वाली हो गयी थी। फिर उस सती ने लज्जा से अवनत होते हुए विनम्र होकर उनके चरणो में प्रणाम किया था ॥३॥ इसके अनन्तर महादेवजी ने उस व्रत के धारण करने वाली सती ने कहा था। शिव स्वय भार्या के लिए उसकी इच्छा करने वाले होत हुये भी उसके आश्चर्य के फल के प्रदान करने वाले हुये थे ॥ ईश्वर ने कहा हे दक्ष की पुत्रि | आपके इस व्रत से परम प्रसन्न हो गया है। अब आप वरदान का वरण करलो जो भी आप को अभिमत होव ।।५।। माकण्डेय मुनि ने कहा- जगव के स्वामी महादेव उसके भाव यो जानते हुए भी उस सती के वचनो के श्रवण करने की इच्छा स वरदान मांगलो--यह बोले थे ॥६॥ वह सती भी लज्जा से समाविष्टा होती हुई जो कुछ भी हृदय में स्थित था उसके बहने में समर्थ न हो सकी थी। क्योवि वाला का जो भी मनोर भीष्ट था वह लज्जा से समाच्छादिस हो गया था अर्थात् लज्जा वश उस अभी- क्षित को मन में ही रखवर छ भी न बोल मनी थी ॥७॥ एतस्मिन्नन्तरे काम साभिनय हर तदा। वामापरिग्रहे नेन-वक्तव्यापारलिगितम् ॥
सती में विवाह प्रम्नाव ]
सम्प्राप्य विवरचाप सन्दधे पुष्पहेतिना।
हर्षणेनाथ वाणेन विव्याध हृदये हरम् ॥६
ततोऽसौ हपिन शम्भुर्वीक्षाञ्चक्रे सनी मुहु ।
विस्मृत्य च पर ब्रह्म चिन्तन परमेश्वर ॥१०
सन पुनर्मोहने वाणनन मनोमव ।
विव्याध हपित शम्भर्मोहितश्च तदा भृशम् ॥११
ततो यदासौ मोहस्य हर्षम्य च द्विजोतमा ।
भाव व्यक्तीचकारंप माययापि विमोहित ॥१२
अथ नपा स्वा सस्तश्य यदा प्राह हर सती ।
ममेष्ट देहि वरद वरमित्यर्थकारकम् ।।१३
तदा वाक्यस्यावसानमनपेक्ष्य वृपध्वज ।
भवस्व मम भाति प्राह दाक्षायणी मुहु ॥१४
इमी वीच म बामदेव उम समय म आभप्राय के सहित हर को
नेन मुख और व्यापार से चिन्हित प्राप्त करके विवर चाय का पुष्प हेति
के द्वारा सन्धान करने वाला हो गया था। इसके अनन्तर हपण वाण
के द्वारा उस (वामदेव ने) हरके हृदय वेधन किया था ॥६॥ इसके
उपरान्त हर्पित शम्मु ने फिर एक बार सती को देखा था । उग समय म
परमेश्वर शिव ने पर ब्रह्म के चिन्तन को एक दम भुता ही दिया
या ॥१०॥ फिर इस कामदेव न मोहन वाण के द्वारा भगवान् हर को
वेधित किया था। तव हपित होकर शम्म उस अवसर पर बहुत ही
अधिक मोहित हो गये थे ॥१॥ हे द्विजोत्तमो । जब इनने मोह और
हप को व्यक्त कर दिया या तो यह माया के द्वारा भी विमोदित हो गय
थे ॥१२॥ इसके अनन्तर सती ने अपनी लन्जा को सस्तम्भित करक
जिस समय म हर से वह वोली थी-हे वरद । मेरे अमोष्ट वर---
इस अथ के करने वाले वा प्रदान गरिये ॥१३॥ उस समय में सती के
वाक्य के अवसान की प्रतीक्षा न करके ही वृष ध्वज ने दाक्षायणी स
पून - मेरी भार्या हो जाओ'-यह कह दिया पा ॥१॥
१०:
[पालिका पुराण
एतच्छुत्वा वचस्तस्य साभीष्टफलभावनम् ।
तुग्णी तस्थौ प्रमुदिता घर प्राप्य मनोगतम् ॥१५
सवामस्य हस्याग्र तत्र सा चारुहासिनी।
अकरोन्निजनावाश्च हावानपि द्विजोत्तमाः ।।१६
स्वस्य भावान् समादाय शृगाराख्यो रसस्तदा।
तयोविवेश विप्रेन्द्रा कलहो वा यथोचितम् ।।१७
हरस्य पुरतो रेजे स्निग्धभिन्नाञ्जनप्रभा ।
चन्द्राभ्यामेऽङ्कलेखेव स्फटिकोज्ज्वलवर्मण ||१८
अय सा वमुवाचेदं हरं दाक्षायणी मुहु ।
पितुर्मे गोचरीकृत्य मा गृह्णीप्व जगत्पते ॥१६
एव स्मितं वचो देवी यदोवाच सती तदा।
मम भायां भवेत्यूचे पुन कामेन मोहित ॥२०
अर्थतद्वीक्ष्य मदनः मरति सससो मुदा ।
युक्तो वभूव शश्वच्च आत्मानञ्चाभ्यनन्दयन् ॥२१
हरपे यह वचन मुनकर जो अभीष्ट ये फान या भावन से युक्त
पा वह मती मनोगत वर की प्रापि पर परम प्रभुदित होती हुई
मौन होगर स्थित होगयी थी ॥१५॥ हे दिजोत्तमो । पाम वासना से
समन्वित महादेव जी आगे यहाँ पर ब्रह्म पार हाग वाली सती ने अपने
हावों और भावों से बिया पा ॥१६॥ उग गमय मे अपने भावो पा
आदान परगङ्गार मामर रस ने उन दोनों में प्रवेश पिया था।
विप्रेटो ! भपका पयोचित समह हो गया था 11१७॥ भगवान हर
माग स्निग्य भिन्न अञ्जन प्रभारी ममान प्रमा पाली पटिकाये
समान उग्बम वाम यासे हर मामने पन्द्रमा गमीप में मा सिधा
पीतए राति ई यो ॥१॥इमा धनम्तर दासापणी या पा: उन
महादेवी ग मोमी धी-है मगत्पते ! मेरे पिता पामने गोचर होगा
मुझे परम पि 10 उस समय में देवी सती ने प्रकार से
मती में विवाह प्रस्ताव ] १०७ जो स्मित युक्त वचन कहा था पुन कामदेव मे मोहिन होने हुए " मेरी भार्या हो जाओ"यह महादेव ने कहा था ।२०1 इमके अनन्तर कामदेव ने यह देखकर रति के महित और अपने मित्र वसन्न के साथ प्रसन्नता से युक्त हो गया था और निरनर अपने आप में अध्यनन्दिन किया था ॥२१॥ अथ दाक्षायणी शम्भु समाश्वास्य द्विजोत्तमा.। जगाम मातुरभ्यासं हर्ष मोहसमन्विता ॥२२ हरोऽपि हिमवत्प्रस्थं प्रविश्य च निजाश्रमम् । दाक्षायणी वित्रलम्भदृ खाद् ध्यानपरोऽभवत् ।।२३ विप्रलब्धोऽपि भूतेशो ब्रह्मवाक्यमयास्मरत् । जायापरिग्रहस्यायें यदुक्त पायोनिना ।।२४ स्मृत्यंव ब्रह्मवाक्यस्य पुरा विश्वामतः परम् । चिन्तयामास मनना ब्रह्माण वृषभध्वज ॥२५ अय सचिन्त्यमानोऽमो परमेष्ठी विशूलिनः । पुरस्तात् प्राविशतूर्णमिष्टमिद्धिप्रचोदितः ॥२६ यन्नायं हिमवत्प्रस्थे विनलब्धो हरः स्थितः। सावित्री सहिनो ब्रह्मा तव समुपस्थितः ।।२७ अथ त वीक्ष्य धातारं माविनीसहितं हर । सोत्सुको विप्रलब्धश्च सत्यर्थे तमुवाच ह ।।२८ है द्विगोत्तमो ! इसके अनन्तर दाक्षायणी ने शम्भु को समाश्वा- मित करके हर्प और मोह से समन्विता होती हुई वह सती माता के ममीर में गयी थी ॥२२॥ भगवान हर भी हिमालय के प्रत्य में प्रवेश करके जो कि उनका यायम था दाक्षायणी के विपुलम्म (दियोग) के दुख से ध्यान में परायण हो गये थे ॥२३॥ इसके उपरान्त विप्रलब्ध भी अपद वियोग से युक्त होते हुए भी उन्होंने ब्रह्माजी के वाक्य का स्मरण दिया था जो कि जाया के परिग्रह दे मयं में पद्म योनि ने १०८ [ पालिका पुराण के (ब्रह्माजी ने ) कहा या ॥२४॥ पहिले विश्वाम से ब्रह्म वाक्य पर का स्मरण करके ही वृषमध्वज ने मन से ब्रह्माजी का चिन्तन करने लभ घे ॥२॥ दमके अनन्तर चिन्तन किये हुए यह परमेष्ठी (ब्रह्मा) त्रिशूली के आगे शीघ्र ही इष्ट की सिद्धि से प्रेरित हुए प्रविष्ट हुए थे।२६॥ जहाँ पर हिमालय पे प्रस्थ में गह विप्रलब्य (विद्या भी) भगवान शम्भु विराजमान थे। मावित्री के सहित ब्रह्माजी वहाँ पर ही समुपस्थित हो गये थे ॥२७॥ इस के उपरान्त भगवान् हर ने सावित्री के सहित धाता को देखकर बडी ही उत्सुक्ता के साथ विप्रलब्ध शम्भु सती के अर्थ मैं उनमे बोले ॥२८॥ ब्रह्मन विश्वार्गतो दारपरिग्रहवृतौ च यत् । त्वमात्य ततसार्यमिव प्रतिभाति ममाधुना ॥२६ अहमागधितो भक्त्या दाक्षायण्याविभक्यितः । तस्या वरमह दातु यदायात प्रपूजितः ॥३० तन्मकाणे तदा कामो मा विव्याध महेपुभिः । मायया मोहितश्चाह तरप्रतीपारमञ्जसा । नशक्त यतुमभीतः पुराह पमलारान ॥३१ तस्याश्च गञ्छित ग्रह्मन्नेतदेव मयेक्षितम् । यदह स्या विमो भा प्रतभक्तिमुदायुतः ॥३२ तस्मात्रय मुरव विश्या मदणे च प्रजापते । सो यया मामामन्य सुता दाता सपा दतम् ॥३३ गच्छरव दक्षभवन पपयस्व पचो मम । पथा गीवियोगम्य भग. स्यात् रद तथा पुर ॥३४ भरने महा-हे मात्री वि अथं जो दाग परिया को पनि मापने सोश पावर पद गुरे उग गावीही भांति जीरा ॥६॥ अपन्न भक्ति में दाक्षायनीजग मेरी था. पनामीण समय में अगर हाराषित पदार
मनी में विवाह प्रस्ताव ]
१०६
देने के लिए गया था। उसके समीप मे कामदेव ने मेरे दुओ से अर्थात्
विशाल धाणो से वेध दिया था और मैं माया से मोहित हो गया था
कि मैं उसका प्रतीशर शीघ्र ही करने में असमर्थ हो गया है
कमलासन् ! मैं पहिले अमीत था ॥३०॥३१॥ हे ब्रह्माजी ! उस
देवी का वाच्चिन मैंने यह भी देखा था हे विभो ! कि व्रत की भक्ति से
प्रसन्नता मे समन्दित में उसका भर्ता हो जा ॥३२॥ इससे हे प्रजा-
पते ! अब आप विश्व के लिये और मेरे लिये ऐमा करें कि दक्ष प्रजापति
मुझे आमन्त्रित करके अपनी पुत्री को प्रदान मुझे शीघ्र हो कर देखें।
॥३३॥ बाप दक्ष के भवन में गमन कीजिए और मेरा वचन उनसे
कहिए जिस प्रकार सती का वियोग भस्म हो जावै वैसा ही पुन: आप
करें ॥३४॥'
इत्युदीयं महादेवः सकाशेऽस्य प्रजापतेः ।
सावित्री वीक्ष्य सत्यास्तु विप्रयोगो व्यवद्धत ॥३५
त ममाभाप्य लोकेशः कृतकृत्यो मुदान्वितः ।
इदं जगाद जगता हितं पथ्य च धूर्जटेः ॥३६
यदात्य भगवञ्छम्भो तद्विश्वार्य सुनिश्चितम् ।
नास्त्येव भवतः स्वार्थों ममापि वृषभध्वज ॥३७
सुताञ्च तुभ्यं दक्षस्तु स्वयमेव प्रदास्यति ।
अहन्चापि वदिप्यामि त्वद्वाक्यं तत्समक्षतः ॥३८
इत्युदीर्य महादेवं ब्रह्मा लोकपितामहः ।
जगाम दक्षनिलयं स्यन्दनेनातिवेगिना ॥३६
अय दक्षोऽपि वृत्तान्नं सर्व श्रुत्वा सतीमुखात् ।
चिन्तयामास देयेय मत्सुता शम्भवे कयम् ॥४०
थागतोऽपि महादेव: प्रसन्न. सञ्जगाम
पुनरेव क्य मोऽपि सुतार्गेऽत्यर्थ मीप्सितः ।।४१
प्रस्याप्यो वा मया तस्य दूतो निकटमजसा ।
ननयोग्यं न गृहणीयाद् यी ना विभुरात्यने ५४२
[ कालिया पुराण ११० मार्कण्डेय मुनि ने कहा-इन प्रजापति में सकाश मे महादेवजी ने यह इतना कहकर उन्होने सावित्री का अवलोकन विया या ता उनको सती का विप्रयोग विशेष बढ गया या ॥३५॥ लोगो के ईश ब्रह्माजी न उनसे सम्भाषण करके वे आनन्द से सयुत वृत कृत्य अर्थात् सफल हो गये थे और उन्होंने जगतो का हित तथा शिव का हितकर यह वचन कहा था ॥३६॥ ब्रह्माजी ने कहा है वृषभध्वज ' हे भगवन् । हे शम्भो । जो आप कहते हैं उसमे विश्व का अर्थ तो सुनिश्चित ही है। इसमे आपका स्वार्थ नहीं है और न कोई मेरा स्वार्थ है ॥३७॥ दक्ष तो अपनी पुत्री को आपके लिए स्वय ही दे देगा। और मैं भी आपके वाक्य को उसके ही समक्ष मे कह दूगा ॥३८॥ मार्कण्डेय मुनि ने कहा-लोक पितामह ब्रह्माजी ने यह महादेव जी से कहकर अतीव वेग वाले स्पन्दन के द्वारा वे दक्ष प्रजापति के निवास स्थान पर गये थे। ३। इसके अनन्तर उधर दक्ष भी सम्पूर्ण वृत्तान्त सती के मुख से सुनकर यह चिता कर रहा था कि यह मेरी पुत्री शम्भु को कैसे दे दी जावे ॥४०॥ आय हुये भी महादेव परम प्रसन्न होते हुए चले गये थे वह भी पुन ही मुता के लिए कैसे ईक्षित हैं ॥४१॥ अथवा मुझे उनके निकट शीघ्र ही बोई दूत भेजना चाहिए- यह योग्य नहीं है कि यदि विभु अपने लिये इसको न ग्रहण करे तो एक अनुचित ही बात होगी ॥४२॥ अथवा पूजयिष्यामि तमेव वृषभध्वजम् । मदीयतनयाभर्ता स्वयमेव यथा भवेत् ॥४३ तथैव पूजित सोऽपि वाञ्छन्त्यातिप्रयत्नत । शम्भुभवतु मद्तत्येव दत्तञ्च तेन तन् ॥४४ इति चिन्तयतस्तस्य दक्षदस्य पुरतो विधिः । उपस्थितो हसरथ सावित्रीसहितस्तदा ।।४५ त दृष्ट्वा वेधस दक्ष प्रणम्यावनम स्थित । आसनञ्च ददो तस्मै समाभाप्य यथोचितम् ॥४६ सती से विवाह प्रस्ताव ] १११ । ततस्त सर्वलोकेश तत्रागमनकारणम् । दक्ष पप्रच्छ विनन्द्राश्चिन्ताविष्टोऽपि हर्पित ॥४७ तवात्रागमने हेतु कथयस्व जगद्गुरो। पुत्रस्नेहाव कार्यवशादयवाश्रममागत ॥४८ इति पृष्ट मुरथप्छो दक्षेण सुमहात्मना । प्रहसनवीद्वाक्य मोदयस्त प्रजापतिम् ॥४६ अथवा उन्ही वृपभध्वज की पूजा करूंगा कि जिस तरह से वह म्वय ही मेरी पुत्री के स्वामी हो जावें ॥ ४३ ॥ वे भी उसी के द्वारा अत्यन्त प्रयत्न के साथ अतीव वाच्छा करती हुई स पूजित हुए है । शम्भु मरे भर्ता हो और इस प्रकार से उनने उगे वर भी दिया है ॥४४॥ इस रीति से दक्ष चिन्तन कर रहे थे कि उसी समय मे ब्रह्माजी उसके मागे समुपस्थित हो गये । वे हसी के रथ मे मावित्री के साथ ही विराजमान थे ।। ४५ ।। प्रजापति दक्ष ने ब्रह्माजी को देखकर उनका प्रणिपात किया था और वह विनम्र होकर स्थित हा गया था। उसने उनको आमन दिया था और यथोचित रीति से सम्भाषण किया था ।। १५ । इसके अनन्तर उन सब लोको के ईश स वहाँ पर आगमन का कारण दक्ष ने पूछा था । हे विप्रेन्यो । वह ददा चिन्ता से आविष्ट भी या विन्तु हपित हो रहा था ॥४७॥ दक्ष ने कहा-हे जगतो के गुरुवर । यहाँ पर आपके आगमन का कारण बतलाइये स्नेह से अथवा किसी कार्य के वश से इस आश्रम म समागत हुए है ? ॥४८॥ मार्कण्डेय मुनि ने कहा- इस प्रकार से महात्मा दक्ष के द्वारा पूछ गये सुरछ ( ब्रह्माजी) ने उस प्रजापति दक्ष का आनन्दित करते हए हराकर यह वाक्य कहा था॥४६॥ शृणु दक्ष यदर्थ ते समीपमहमागत । तल्लोक्स्य हित पप्य भवतोऽपि तदीप्सितम् ॥५० तव पुश्या ममाराध्य ममादेव जगत्पतिम् । माप पुत्र --
११२
[ कालिका पुराण
यो वर प्रार्थित. सोऽद्य स्वयमेवागतो गृहम् ॥५१
शम्भुना तव पुत्र्य त्वत्सकाशमह पुन. ।
प्रस्थापितोऽस्मि यत् कृत्य श्रेयस्तदवधारय ॥५२
वर दातु यदायातस्तावत्प्रभृति शकर ।
तत्सुताविप्रयोगेण न शर्म लभतेऽजसा ॥५३
तब्धच्छिद्रऽपि मदनो निचखान तदा भृशम् ।
सर्वं पुष्पकरर्वाणरेकदव जगत्प्रभुम् ।।५४
स वाणविद्ध कामेन परित्यज्यात्मचिन्तनम् ।
सती विचिन्तयन्नास्ते व्याकुल. प्राकृतो यथा ॥५५
विस्मृत्य प्रस्तुता वाणी गणा विप्रयोगत ।
क्व सतीत्येव गिरिशो भापतेऽन्यकृतावपि ॥५६
प्रहह्माजी ने कहा- हे दक्ष । सुनिए जो कि मैं जिस तुम्हारे
कार्य के लिए यहाँ पर समागत हुआ हूँ वह कार्य लोको का हितकर है
तथा पप्य है और आपका भी अभीक्षित है ॥५०।। तेरी पुत्री ने जगत
वे पति महादेव को मगराधना परवे जो वर प्राप्त करने को उनसे
प्रार्थना पो थी वह आज स्वय ही मृद मे समागत हुए हैं ॥५१॥ शम्भु
ने आपकी पुत्री के लिए आपरे समीप में मुझे पुन प्रस्थापित किया है
जो पस्य परम येय है उमा अवधारण गरिए ॥५॥ जिस समय में
परयान देने को घे आये थे तभी से सेवर आपको पुनो ये वियोग से
शीम ही पल्याण की प्राप्ति नहीं कर रहे हैं ॥५३॥ छिद्र को प्राप्त
परसे वाले वामदेव ने भी उस समय में अत्यधिष वेधन किया था उस
जगारे प्रभूषा वेध गभी पुष्पवर पाणो गे एक ही माप किया था
॥१४॥ मारामदय द्वारा पाणा से विद होपर पारमा मा परि
चिन्तन त्याग पर बंगे मोई गामाग्य बन हो उसी भाति मतीय प्याल
गती मीही पिना परते हुए गमपस्थित
॥५५॥ वे प्रस्तुत
पी) भूमार प्रियाग गे गणो में आगे भाय कृति में भी गिरिश
HP-4ही बीमार
मती स विवाह प्रम्नाव ] ११३ मया यद्वाञ्छित पूर्व त्वया च मदनन च । मरीच्याद्य मुनिवरस्तत् सिद्धमधुना सुत ॥५७ त्वत्पुत्र्याराधित शम्भु मोपि तस्या विचिन्तनात् । अनुमोदयितु प्रेप्सुदर्तत हिमवगिरी ॥५८ यथा नानाविधभाव सत्या नन्दावतेन च । शम्भुगराधितम्तेन तथवाराध्यते सती ॥५६ नस्मात्त्व दक्ष ननया शम्भ्वर्गे परिकल्पिताम् । तस्मै दाविलम्बेन तेन ते कृतकृत्यता ॥६० अह तमानयिष्यामि नारदेन त्वदालयम् । तस्मं त्वमेना सयच्छ तदर्थ परियल्पिताम् ॥६१ एवमेवेति दक्षम्तमुवाच परमेष्ठिनम् । विधिश्च गतवास्तव गिरिशो यत्र सस्थित ॥६२ गते ब्रह्मणि दक्षोऽपि सदारननयो मुदा । अभवत् पूर्णदेहस्तु पीयूपरिव पूरित ॥६३ मैंने जा पूर्व म चाहा था और आपन तथा कामदव न इच्छा को पी एव मरीचि आदि मुनिवरा न जिसकी इच्छा की थी ह पुत्र । यह कार्य अव सिद्ध हो गया है ॥ ५७ ॥ आपकी पुत्री य द्वारा शम्भु को आराधना को गयो यो और द भी उस तुम्हारी पुत्री विचिन्तन स हिम वगिरी म अनुमोदन करने के लिये प्रेप्सु अथाव इच्छुक हैं ॥१८॥ जिस प्रकार गे अनक प्रकार के भावाद्वारा मतीन नदाब व्रत स शम्भु की धाराधना की पो ठीक उमी भांति उमर द्वारा मनी की आराश्ना की जा रही है ॥ ५६॥ इमनिय हे दा । शम्मुर निए परिकल्पित अपनी पुत्री मती को विना विलम्ब पिय हुए उनका द दो उसी से आपकी तपता अर्यात सफ्लता है ॥६॥ मैं उनको वारद मे द्वारा आपरे यालय म ने माऊँगा। उसके लिए भाप भी इस सती सो जाति उही के लिय परिकल्पित है दे दो ॥६१॥ माकण्डेय मुनि ने
११४
[ कालिका पुगण
कहा-दक्ष ने ऐमा ही होगा-यह दक्ष ने ब्रह्माजी में कहा था और
ब्रह्माजी भी वहाँ में उमी स्थान पर चले गये थे जहाँ पर भगवान
शम्भु विगजमान थ ॥ ६२ ॥ ब्रह्माजी के चल जाने पर दक्ष प्रजापति
भी अपनी दारा और तनया के साथ यानन युक्त हो गया था और
पीयप से परिपूरित की ही भांति पूर्ण देह वाला हो गया था ॥६३।।
अथ ब्रह्मापि मोदेन प्रसन्न. कमलासन. ।
आससाद महादेव हिमवगिरिसस्थिनम् ॥६४
त वीक्ष्य लोक्स्रष्टारमायान्त वृषभध्वज ।
मनसा सशय चक्र सतीप्राप्ती मुहुमुहुः ॥६५
अथ दूरान्महादेवो लोकेश सामसयुतम् ।
उवाच मदनोन्माय. विधि स स्मरमानस ॥६६
किमवोचत् सुरश्रेष्ठ सत्यर्थे त्वत्सुतः स्वयम् ।
कथयस्व यथास्वान्त मन्मथेन न दीयते ।।६७
वाधमानो विप्रयोगो मामेव च सतीमृते ।
अभिहन्ति सुरथेप्ट त्यक्त्वान्यान् प्राणधारिण. ॥६८
सतीति सतत वेनि ब्रह्मन् कार्यान्तरेऽप्यहम् ।
मा यथा हि मया प्राप्या तद्विधनस्व तथा द्रुतम् ।।६६
सत्यर्थे यन्ममसुतो वदति स्म वृपध्वज ।
तच्छृणुप्त निज साध्य सिद्धमित्यवधारय ।।७०
इसके अननर कमलासन ब्रह्माजी भी मोद से प्रसन्न होकर
महादेवजी के ममीप मे प्राप्त हो गये थे जो दि हिमालय पर्वत पर
मस्थित थे ।६।। दृपा ध्वज ने उन बात हुए लोको के स्रष्टा को दबकर
वं सतो की प्राप्ति में बारम्बार मन में मशय कर रहे थे ॥६५।। इसके
अनन्तर दूर हो से से गामन्वित ब्रह्माजी यो महादेव जी ने जो माम
बागना को भस्म में धारण किए थे और कामदेव के द्वारा उन्मदित हो
गए पहा था ॥६६॥ ईधर ने महा-हे ब्रह्माजी ! आपके पुर
। मनी मै विवाह प्रस्ताव ] ११५ से । (दक्ष) ने सतो के अर्थ में स्वय क्या कहा या? आप मुझे वालाइए जिससे काम देव के द्वारा मेरा हृदय विदीणं न किया जावे ॥६॥ वाधमान विप्रयोग सती के विना मुझको हनन कर रहा है है मुरश्रेष्ठ ! । यह कामदेव अन्य मव प्राणियो का त्याग कर मेरे ही पीछे पडा हुआ है ।। ६८॥ है ब्रह्माजी ! निरन्तर में सभी-यही जानना हूँ चाहे किसी दूसरे काम में भी क्यों न मंलग्न रहूँ। वह गती जिस तरह भी मुझे प्राप्त हो जाये वही आप शीघ्र ही करिए ॥६६॥ ब्रह्माजी ने पहा- हे वृषभध्वज ! मती के अर्थ में जो मेरे पुत्र (दक्ष ) ने कह दिया था उसको आप मुनिए और अपना माध्य सिद्ध हो गया-यही अवघारित कर लीजिए 113011 देया तस्ग मया पुत्री तदएँ परिकल्पिता। ममापीष्टमिद कर्म त्यद्वाक्यादधिक पुनः ।।७१ मत्सुत्ल्याराधितः शम्भुरेतदर्थ स्वय पुनः । सोऽप्यन्विच्छति तां यस्मातस्माद्दे या मया हरे ॥७२ शुभे लग्ने मुहूर्ते च समागच्छतु मेऽन्तिकम् । तदा दास्यामि तनया भिक्षायें शम्भव विधे १७३ इत्यवोचन्मुदा दक्षस्तस्मात्व वृषभध्वज । शुभ मुहूर्ते तद्वेश्म गच्छ.तामनुयाचितुम् १७४ गमिप्ये भवता साद नारदेन महात्मना। द्रुतमे जगत्पूज्य तस्मात्त्वन्नारद स्मर ७५ मरीच्यादीन् दश तथा मानसानपि सस्मर । तः माद दक्षनिलय गमिपेन्ह गणः सह ॥७॥ ततः स्मृतास्ते कमलामनेन सनारदा ब्रह्ममुता मनोजवाः। समागता यत्र हरो विधि तत्रागताः काममवेत्य चिन्ताम् ।।७. उसने कहा था कि मुझे मेरी पुत्री उन्हीं के लिये देने के योग्य है और उनके निाही वा परिपिता है । यह मंनो मने भी [ पापिया पुराण ! अभीष्ट था ही किन्तु अब आपके वाश्य में पुन, अधिक अभीप्ति हो गया है ।। १ ।। मेरी पुत्री द्वारा शिव ममाराधित किये गये हैं और इमो लिये उगने म्वय ही ऐगा दिया है और वे शिव भी उमकी इच्छा करते हैं अर्थात गती वो भार्या के रूप में माना पाते हैं । इसी कारण मे मुझे इसको हरि के ही लियं देना चाहिए। अर्थाद मैं उन्ही को दूंगा ।। ७२ ॥ वे शिव स्मिी शुभ मुहूतं और शुभ लग्न में मेरे समीप मे आ जावे। हे ब्रह्माजी उसी समय में मैं भिक्षा में शम्भु के लिए अपनी पुत्री सनी को दे दूंगा ।। ७३ ॥ हे वृषभध्वज ! दम ने यही प्रसन्नता के माय कहा था इसनिये आप किसी परम शुभ मुहूतं मे उस मती की अनुयाचना करने के लिये उन ( दक्ष ) के समीर में गमन कीजिए ॥७॥ ईश्वर ने कहा-मैं आपके साय तया महारमा नारद जी के साथ ही यहां गमन करूंगा ! हे जगतो के द्वारा पूज्य ! इम कारण मे आप शीघ्रातिशीघ्र ही नारदजी का म्मरण गरिए ।। ७५ ॥ मारोचि आदि दश मानम पुत्री का भी स्मरण करिए उन सबके ही माय में अपने गणों के महित मैं दक्ष के निवास स्थान को जाऊँगा ।। ७६ ।। इसके अनन्तर कमलासन प्रभ के द्वारा के सब स्मरण किये गये थे जो मन के समान वेग वाले ब्रह्माजी के पुत्र नारद के ही सहित थे। वे सब हार और निधि जहाँ पर थे वही पर कामपूर्वक चिन्ता का ज्ञान करके थागत हो गये थे ।।७७॥ ---Ot:- ॥ तीनों देवों का एकत्व प्रतिपादन ।। तत. ममागता. सर्वे मानसाश्च सनारदाः । विधेः स्मरणमात्रैण वातेनेव विनोदिता. ॥१ ते. साधं ब्रह्मणा शम्भुः सगणो दक्षमन्दिरम् । जगाम मोदयुक्तोऽय काले तत्वमयोगिनि ॥२ नोनो देवा कार व प्रतिपादा ] गणा शवाच पट्हान् डिण्डिमाम्नूर्यवशकान् । चादयन्तो मुदायुक्ता अनुगच्छन्ति शकरम् ।।३ वैचित्ताल करतल कुर्वन्तोघ्रितलम्वनम् । विमानरतिवेगं स्वरनुयान्ति वृपध्वजम् ॥४ कोलाहल प्रकुर्वन्तम्नथा नानाविधान वान् । गणा ओकाकृनय शब्दयोगेन नियंयु ॥५ नतो देवा मुदा युवता गन्धर्वाप्परमा गया । वाद्यं मोदस्तया नृत्यरन्वीयुगमध्वजम् ।। तेपा शब्देन विप्रेन्द्रा गन्धर्वाणा गगेयमाम् । गणानाञ्च दिश मा पूरिता च वसुन्धग 15 मार्कण्डेय मुनि ने कहा-पिर वहां पर देवपि नारदजी के महित ममो मानन पुत्र ममागत हो गये थे। वे मर ब्रह्माजी के द्वारा किये हुए केवल स्मरण ने ही बान के द्वारा दिप प्रेग्नि जमे होवे बेमे हो मन वहाँ ममुपस्थित हो ग य ॥ १॥ उन माय और ब्रह्माजी के माय मे अपने गपो को माथ में लेकर भगवान् शम्भु मोह में मयुत होत हुए दक्ष निवाम मन्दिर में गये थे। इसरे अनन्नर उनक कर्म के योगी नाल के जाने पर मनो न व-पटह-डिपिडद-सूर्य दशी को चादिरिया था और मानन्द में युन होड हुए दे सब मङ्कर वा अनु- गमन करने हैं ।। २, ३ 1 कुछ ताल वा रहे थे और कोई करतलो के दाग अघितल को ध्वनि कर रहे में। वे सन अपने अति देग वाने विमानों के द्वारा दृपभम्बर वा अनुगमन करते हैं 10 अनेक वरद को यानियो वाल गण मारो कोलाहल करते हुए तथा बहुत तरह भी ध्वनि पोरने वाले गम्दी के योग में हो वहीं में मर्यात शिव के आश्रम से निर्गत हा ॥५॥ इसरे उपराल आनन्द ने युन देव- गन्धर्व और अप्पराओं के गण वाद्यों के द्वारा मोर को करते हुए तपा नृपों से ममन्दित हुए वृपमवत्र मा अनुगमन र रहे ॥६॥ है [पालिका पुगण ११८ विप्रेन्द्रा । गरीयान् गधों में तथा गण! क उस शब्द स मवदिशाए तथा समस्त वमुन्धरा परिपूरित होगय ये अर्थात वह ध्वनि सर्वत्र फैल वर भर गई थी ॥७॥ कामोऽपि मगण गम्भु मशगाररमादिभि । मोदयन् मोहयन कायमन्वियात स समक्षत 11 हरे गच्छति भार्याथें तदानी सकला सुरा । ब्रह्माद्या स्वयमेवाशु वाद्य चक्रुर्मनोहरम् ॥३ दिश सर्वा मुप्रसन्ना वभूवुद्धिजसत्तमा । जज्वल श्चाग्नय शान्ता पुष्पवृष्टिरजायन ॥१० ववुर्वाता सुरभयो वृक्षाश्चापि सुपुष्पिता । वभूत् प्राणिन स्वस्था अस्वस्था येऽपि वेचन ११ र समारसकादम्वा नील कम्युश्च चातका । चुऋशुर्मदुरान् शब्दान् प्रेरयन्त इवैश्वरम् ।।१२ भुजगो व्याघ्रतिश्च जटा चन्द्रकला तथा । जगाम भूपणत्वञ्च तेनापि एरिदीपित ॥१३ तत क्षणेन वलिना वलीवर्दैन वेगिना। सब्रह्मनाग्दाद्यश्च प्राप दक्षालय हर ॥१४ वामदव भी अपन गणा ये मरत शृङ्गार रस आदि पै माय अमक्ष में नाम या मोहित और मोदित करता हुआ अनुगत हुआ था। ॥८॥ भार्या के लिए भगवान हर के गमन धरने पर उम समय में ममस्त मुर ब्रह्मा आदि स्वयही मनाहा वादन कर रहे थे । हे द्विरप्टो! मभी दिशायें मुप्रसन्न हुई थी। परम शान्त अग्नियों प्रयासत हा गयी थी और आकाश म पुष्पों की वृष्टि हो रही थी। • मुर्गा धन वायु यहन पर रही थी घोर नृक्ष भी पुष्पों से समन्धित होगए थे। तो कोई भी मायस्थ भी पद भी मभी प्राणी स्वस्थ होगए ५॥११॥ एम और सारसोगमृदाय-नौन मम्य और पान पर -नीनां देवों का मरन्ध प्रतिपादन } को प्रेरणा करते हुए के हो ममान परम मधुर गादो को कर रहे थे। ॥१२॥ शिवमी वो मुजङ्ग (स)--वाघम्बर–जदादूट-चन्द्रकला भूषणता को प्राप्त हुए थे इन भ्पयो ने भी वे अधिक दीप्तित हो में ये ॥ १३ ॥ इसके अननर एक ही मन में बलवान् और देग वाले दलोबदं (बल) के द्वारा वरमा बोर नारद आदि के माहित जिव दक्ष के निवास म्यान पर प्राप्त हो गए थे ॥१४॥ ततो दक्षो महातजा अन्यत्याय त्वयं हरम् । ग्रह्मदीश्चाददौ तेपामासनानि यथोचितम् ।।१५ कृत्वा ययोचिता तेया पूजा पाद्यादिभिस्तया । चकार संविद दक्षो मुनिभिमानमः पुनः ।।१६ तत: शुभ मुहूर्ते तु लग्ने च द्विजसत्तमाः । मतो निजमुतां दक्षो ददी हग भन्मदे ।।१७ उद्वाहविधिना मोऽपि पाणि जग्राह हपिनः । दाक्षायण्या वरतनोन्तदानी वपमध्वजः ॥१८ ब्रह्माय नारदाद्याश्च मुनयः सामगीतिभिः। ऋचा यजुभिः सुधान्यस्तोपयामासुरीश्वरम् ॥१६ वाद्यं चक्र गंगाः मुर्वे नन तुश्चाप्सरोगणाः । पुष्पवृष्टिश्च मम्जुमेधा गगनसंगताः ॥२० अथ शम्भुमपागत्य गरुडेनानिवेगिना । माघ कमलया चैदमुवाच गरुडध्वजः ॥२१ इसके उपरान्न महान तेजवी प्रजापति दक्ष में म्ब निववा वायुत्थान करके ब्रह्म आधिक के लिए उनके प्रमे मीचित आमन दिए थे ॥१॥ उमी मानि अप-बार आदि में उन मदको समुचित पूजा करके जंगी भी योग्य योपिर दम ने माना भनिनों के माप मंदिद चिया था ॥१॥ हे द्विव मतमो! इसके उपरान्न गुममुहूर्त और . नाग में प्रजापति दा ने डेही हर्ष में अपनी पुत्री मती को सम्म
१२०
। वालिया पुगण
भगवान के लिए प्रदान किया था ॥१७॥ उसने भी अर्थात शम्म ने भी
उद्वाह की विधि से हपित होकर सती का परिग्रहण किया था।
वृषभध्वज ने परम श्रेष्ठ वाली दाक्षायणी उस समय
पाणि का
ग्रहण किया ॥१८|| ब्रह्मा और नारद आदि मुनियों ने सामवेद को
मानिया म~-ऋचा श्री मे तथा मुश्राव्य यजुर्वेद के माया म ईश्वर को
तोपित किया था man मब गणो न वाओं का वादन किया था और
अप्सराओ के गणो ने नृत्य किया था। आकाश मे मङ्गत मेघो ने पुष्पा
की दृष्टि की थी ॥२०॥ इमके अनन्तर भगवान् गरुड ध्वज कमला
(लक्ष्मी) के माथ म अत्यन्त वेग वाले गरु के द्वारा भगवान शम्भु
ममीप में उपास्थत होकर यह वचन बोले थे । २१॥
स्निग्धनीलाञ्जनश्याम शोभया शोभसे हर ।
दाक्षायण्या यथा चाह प्रातिलोम्येन पाया ।।२२
कुरु त्वमनया माधं रक्षा देवस्य वा नृणाम् ॥२३
अनया सह ससारमारिणा मगल सदा।
पुरु दस्यून् यथायोग्य हनिप्यसि च शकर ॥२४
य एवंना साभिलाषी दृष्ट्वा च त्वाथवा भवेत् ।
त हनिप्यसि भतेश नान कार्या विचारणा ॥२५
एवमस्त्विति सर्वज्ञ प्रोवाच परमेश्वरम् ।
प्रहृष्टमानस प्रीत्या प्रसन्नवदनो द्विजा ॥२६
अथ ब्रह्मा तदा दृष्ट्वा दक्षजा चारुहासिनीम् ।
म्मराविष्टमना वक्त वोक्षाचके तदीयकम् ॥२७
मुहमुंहस्तदा ब्रह्मा पश्यति स्म मतोमुखम् ।
तदेन्द्रियविकारश्च प्राप्तवानश पुन ॥२८
श्री भगवान ने कहा है हर | आप जिस प्रकार से लक्ष्मी के
माप प्राति सोम में शोभायमान होता है टौर उमी प्राति स्निग्ध नीम
मन्जन गमाग श्याम शोभा में समन्वित दामायणी साप शोभा
तीना - कात्व प्रतिपादन ] का प्राप्त हो रह हैं ॥२०॥ आप इम मती के साथ म विराजमान हाकर देवा की अयवा मानवों की रक्षा करा। इस मती के माय सफार सार वाता का सदा मङ्गल कगे। है शङ्कर । यया योग्य दस्युना का हनन कर ग ॥२४॥ अभिलापा के महत जा ही इमयो दबर वयवा श्रवण पर होवेगा। हे भूतेश । सबा हनन का इनम कुछ भी विचारणा नहीं है अर्थात इसम कुछ मा संशय नहीं है ॥२४॥ मार्वग्हेय मुनि ने कहा है द्विजा । प्रीति से प्रसन्न मुख वाले सवा प्रभ ने प्रहर मन वाले परमेश्वर से "रेमा हो हावे'--यह वहा था। ॥२६॥ इसके मनन्तर उम समय से ब्रह्माजी ने चार (मुन्दर) हास वाली दल की पुत्री मती का दर्शन करने वामदेव माविष्ट मन वाल हात हए उमके मुत को देखन लग थे ॥२७॥ उम ममय म ब्रह्माजी शारम्बार मती के मुख का अवलापन दिया था और फिर बवाल हान हुए उस गमय म इन्द्रिया विकार वा प्राप्त हुए प ।। २८ ।। अथ तस्य पपाताशु तेजो भूमी द्विजोत्तमा । तज्जलहहनामास मुनीना पुरतस्तदा ॥२६ ततस्तस्मात ममभवम्तोयदा शब्दसयुता । सम्वर्तश्च तयावर्त पुष्करो द्रोण एव च । गजन्तश्चाय मुञ्चन्तस्तोयानि द्विजसतमा ३० नत्तु सन्छादिने व्योम्नि तेषु गज्जत्सु गर । पश्यन् दाक्षायणी देवी भृश कामेन माहित ॥३१ मोहितोऽप्यय वामेन तदा विष्णुवच म्मरन् । इयंप हन्तु ब्रह्माण मूलनुद्यम्य शकर ॥३० मम्भुनोमिते शूले विधि हन्तु द्विजोत्तमा । मरीचिनारदाद्यास्त चाहाहाकृति तदा ॥३३ दक्षो मैव मवमिति पाणिमुद्यम्य शक्ति । वारपामास भूतेश क्षिप्रमेत्य पुरोगन ॥३४ ૧૨ [ पालिका पुगण अथाग्रे मोलित वीक्ष्य तदा दक्ष महेश्वर । प्रत्युवाचाप्रियमिद स्मारयन् वैष्ण गिरम् ।।३५ हे द्विजोत्तमो ! इसक अनन्तर उनका तेज शीघ्र ही भूमि पर गिर गया था जो कि मुनि के आगे उस समय मे वह जल दहन वो आभा वाला था ॥ २६॥ हे द्विज सत्तमो । इमके उपराल उमसे मेघ शब्द से सयुन हो गय थे। अब उ7 मुसज्जित मेघो के नाम बतलाय जाते हैं---सम्वत --आवत-पुष्कर-द्रोण गर्जना करते हुए और जलो को मोचित करने वाले थे ।।३१॥ उन मेघो के द्वारा आकाश के मच्छादित हो जाने पर अर्थात् सर्वत्र अपाण मेघो के द्वारा घिरा हुआ हो जाने पर भगवान् शङ्कर काम बामना से मोहित होते हुए दाक्षायणी देवी को अनीव देखते हुए कामदेव के द्वारा मोहित होते हए भी इसक उपरान्त उस समय म भगवान् विष्णु के वचन का स्मरण करते हुए शङ्कर ने शूल को उठाकर ब्रह्माजी का हनन करन वी इच्छा को थी। ॥ ३१, ३२ ॥ हे द्विजोत्तमा । शम्भु के द्वारा ब्रह्माजी को मारने के निये निशूल के उद्यमित करने पर अर्थात् उठाये जाने पर मरीचि और नारद आदि सबने उस समय में हाहाकार करने लगे थे ।। ३३ ।। प्रना- पति दक्ष ऐमा मत करो-ऐसा मत करो यह कहते हुए शदित होते हाथ को उठाकर शीघ्र ही आगे समागत होकर भूतेश्वर प्रभु का निया- रित किया था। इसके उपगन्त उस समय में महेश्वर ने दक्ष को मिलिन देखबर भगवान् विष्णु की वाणी या स्मरण दिखाते हुए यह प्रिय वपन बोला था ॥३४-३५॥ नारायणेन विप्रेन्द्र यदिदानीमुदीरितम् । मयाप्यगीकृत क्तुं तदिहैय प्रजापते ॥३६ एना य सामिलाप सन वोधाते त हनिप्यामि । इति वाचन्तु सफनमेन हत्वा करोम्यहम् ॥३७ साभिलाप. माय ब्रह्मा सती समवलोकयत् । अभवत्परततेजास्तु ततो हन्मि कृतागसम् ॥३८ तीना देवा का पत्र प्रतिपादन ] १.२ तमेव वादिन विष्णु क्षिप्र भूत्वा पुर मर । इदमूचे वारयस्त हन्तु सर्वजगत्प्रमु ॥३६ न हनिप्यासि भूदेश स्रष्ट्रारं जगता वरम् । अनेनव सती भायो भवदर्थं प्रपिता || प्रजा स्रष्टुमय शम्भो प्रादुर्भूतश्चमुख । अस्मिन् हते जगनस्रष्टा नास्त्यन्य प्राकृतोगुना ॥४१ सृष्टिस्थित्यन्तकर्माणि करिप्याम. कय पुन । अनेनापि मया चैव भवता च समजपम् ।।४२ एकस्मिन्लिहतेऽमीपु कस्तनकर्म करिप्यति । तम्मान्न वध्यो भवता विधाता वृषभध्वज ॥४३ ईश्वर ने कहा है विप्रेन्द्र नारायण ने जो इस ममय में कहा या है प्रजापते वह यहाँ पर ही मैंने भी अङ्गीकार किया था ।। ३६ ।। जो भी इस गती को कामबासना की अभिलापा म युक्त होते हुए देखना है उसको आप मार डालेंगे । मैं इस वचन को इसका हनन करके मफ्ल करता हू ॥ ३७॥ ब्रह्माजी ने अभिलापा अर्थान् वामवासना की इच्छा मे समन्वित होकर क्यो सतो का अवलोकन किया था। वह तेज के त्याग करने वाला हो गये थे इमो मे उमका मैं हनन करता हूँ क्योकि वे अपराध (पाप) करने वाले हैं ।। ३८ ।। मार्कण्डेय मुनि ने कहा--- इम रीति में बोलने वाले उनके आगे स्थित होकर भगवान् विष्णु ने पडी सीता की थी गमस्त जगत् के प्रमु ने उनको मारने का निवारण बरते हुए यह वचन वहा था-॥ ३६॥ थी भगवान ने कहा है भूतेश्वर । जगतो के सृजन करने वाले और परम अंट ब्रह्माजी या हनन नही करोगे क्योकि इन्होंने ही आपको भार्या के लिए सती की परि- बल्पित विमा पा 11४०॥ हे गम्भो । यह चतुर्मुख (ब्रह्माजी) प्रजाओ के मनन करने के लिये प्रादुर्भूत हुए थे। इनके मारे जाने पर जगत् मा मनन करने वाला बन्य बोई अब भारत नहीं है ।।११॥ पिर हम १२४ [ कालिरा गण किस तरह से सूजन-पालन और सहार के कर्मों को करेंगे क्योकि इनके द्वारा मेरे आपके द्वारा ही समञ्जस ये कर्म हुआ करते है ॥४२।। एक के निहित हो जाने पर इनमे कौन हैं जो उस कर्म को करेगा। हे वृषभध्वज 1 इस कारण से आपके द्वारा विधाता वध करने के योग्य नहीं है ॥४३॥ प्रतिज्ञा पूरयिष्यामि हत्वनं चतुराननम् । अहमेव प्रजा' स्रक्ष्ये स्थावराणि चराणि च ॥४४ अन्य स्रक्ष्ये विधातारमयवाह स्वतेजसा । स एव सृष्टिकर्ता स्यान् मवंदा मदनुज्ञया ॥४५ हत्वंन विधिमेवाह प्रतिज्ञा पालयन् विभो । स्रष्टारमेकं प्रक्ष्यामि न वारय चतुर्भुज ॥४६ इति तस्य वव श्रुत्वा गिरिशस्य चतुर्भुज । स्मितप्रसन्नवदनः पुनममितीरयन् ॥४७ इत्युवाचाभिवदनमीश्वरस्य द्विजोत्तमाः ॥४८ ततः पुन शम्भुरूपे फयमात्मा विधिर्मम । लक्ष्यते भिन्न एषाय प्रत्यक्षेणाग्रत. स्थित ।।४६ अथ प्रहस्य भगवन् मुनीना पुरतस्तदा। इदमूचे महादेव तोषयन् गरुडध्वज ॥५० ईश्वर ने पहा-मैं इन चतुरानन ब्रह्मा को भार पर अपनी प्रतिमा पो पूर्ण बहंगा। रही प्रजा सूजन की बात सो मैं अकेला हो प्रगानों का जो भी स्थावर और जङ्गम हैं सजन पर देगा ॥४४॥ मैं भाग्य विधामा का मजन पर दूंगा अथवा में ही अपने तेज से कर दूंगा और मेरे द्वारा निर्मित एवं सृजित विधाता सष्टि करने वाले होगे जो पदा मंगे अन्ना में ही परेगा ॥१५॥ हे विभो । मैं ही इगयो मार पर भी मसा का वध कर अपनी प्रतिमा वा पालन करते हुए पर एक नमन गर ने वाले वा गजन महंगा । माप मुझे [ कालिका पुराण का ज्योतिर्मय का मेरा भाग आप दोनो है और मैं अंशक हूँ ॥५२॥ कोर तो आप हैं --कोन मैं हूँ-कौन ब्रह्मा है ये तीनो ही परमात्मा मेरे ही अश है । सृजन-पालन और सहार के कारण ये भिन्न होते हैं ॥५३॥ आप अपनी आत्मा से ही अपने आपका चिन्तन करिए और आत्मा मे ही सस्तव बगे। ब्रह्मा-विष्णु और शम्भु को एकत्रित हुए हदग करो ॥५४॥ जिस तरह मे एक हो धर्मी के शिर-ग्रीवा आदि के भेद से अङ्ग होते है। हे हर ! ठीक उसी भांति मेरे एक के ही ये तीनो भाग हैं ॥५५॥ जो ज्योति सबसे उत्तम है, जो अपने और पराये भवाश स्प है-कूटस्थ-अव्यक्त और अनन्त रूप से युत हैं और नित्य है तथा दीर्घ आदि विशेषणो से हीन तथा वह पर है उसी रीति से हम तीनो भिन्न हैं ॥५६॥ एतच्छु त्वा वचस्तस्य महादेवो विमोहित.। जानन् म चाप्यभि नव सद्विस्मृत्यान्यचिन्तनात् ॥५७ पुन. प्रपच्छ गोविन्दमनन्यत्व विभेदिनाम् । ब्रह्मविष्णश्यम्बकानामेकस्य च विशेषकम् ॥५८ ततो नारयण. पृष्ट. कथयामास शम्भवे । अनन्यव्व निदेवानामेकत्वञ्च व्यदर्शयत् ।।५६ थत्वा ततो विष्णुमुखाजकोशादनन्यता विष्णुविधीशतत्त्वे ।। दृष्ट्वा स्वरूप च जघान नंन विधि मृड. पुष्पमधुप्रकाशकम् ॥६० मार्कण्डेय मुनि ने बहा-उन भगवान् के ग वचन का श्रवण जाणे महादेव निमोहित हो गये थे। वह अभिन्नता का ज्ञान रखते हुए मो अन्य पिलन में रादमी विस्मृति होने में ही उनको अभिन्नता पा मान नहीं रहा पा ॥ १७ ॥ उन्होंने फिर भी गोविन्द से निभेदियो की अभिनता को पूछा था। ब्रह्मा-विष्णु और ध्यम्बकों का और एर मा विशेषर को पूधापा ।। ५८ ॥ गरे मनमर पूछे गपे मारायण व ग मा पा और नीनो देयो मा अनन्यता भौर एक्सा को प्रदभित ने
तीनो देवा का अनन्यत्व
१२७
किया था ॥५६।। इसके उपरान्त विष्णु भगवान के मुख कमल के कोश स
अनन्यता का श्रवण करके तथा विष्णु-विधि और ईश के तत्व मे
स्वरूप को देखकर मृड (शिव) ने पुप्प-मधु से प्रकाश विधाता इसको
नही मारा था ॥६०11
। तीनो देवो का अनन्यत्व ।।
अनन्यत्व त्रिदेवाना यज्जगाद जनार्दन ।
शम्भवे तद्वय श्रोतुमिच्छामो द्विजसत्तम ।।१
एकत्व दर्शयामास कथ वा गरुडध्वज ।
नत् समाचक्ष्व विप्रेन्द्र पर कौतूहल हि न ॥२
शृणुध्व मुनयो गुह्य परम प्रयत परम् ।
त्रिदेवानामनन्यत्व तथैवक्रत्वदर्शनम् ॥३
हरेण पृष्टो गोविन्दस्त समाभप्य सादरम् ।
इदमाह मुनिठा अभिन्नप्रतिपादकम् ॥४
इद तमोमय सर्वमासीद्भुवनवर्जितम् ।
अप्रज्ञातमक्ष्यञ्च प्रसुप्तमिव सर्वत ॥५
न दिवारात्रिभागोऽत्र नाकाश न च काश्यपी।
न ज्योतिर्न जल वायुर्नान्यत किंचन सस्थितम् ॥६
एकमासीत् पर ब्रह्म सूक्ष्म नित्यमतीन्द्रियम् ।
अव्यक्त ज्ञानरूपेण नहीनविशेषणन ॥७
ऋषिगणो ने कहा-भगवान् जनार्दन ने तीनो देवो की जो
अनन्यता को जो कहा था। हे द्विज सत्तम । शम्भु के लिए उस दृद्वय
के प्रवण करने की इच्छा रखते हैं ॥१॥ अथवा गरुड ध्वज ने कसे
एकत्व को दिखाया था। हे विप्रेन्द्र । उसको बतलाइये । हमको बहुत
ही अधिद कौतुहल है 100 माण्डेय मुनि ने वहा-हे मुनिगणा'
१२० | कालिका पुराण आप लोग श्रवण करिए यह तीनो देवो की अनन्यता अर्थात उनके एक्त्व का दर्शन परम गोपनीय प्रपत और पद है ३ । भगवान् हर ने भगवान् गोविन्द से पूछा था और बहुत ही प्रादर के माय सम्भाषण करके ही पूछा था। हे मुनिश्रेष्ठो। इन्होंने उनको अभिन्नता का प्रतिपादन करने वाला यही कहा था ॥४॥ श्रीभगवान् ने कहा-यह सब भुवन वजित तमोमय अर्थात् नम से परिपूर्ण था यह अप्रजात- अलक्ष्य और सभी ओर से प्रसुप्तं वे ही तुला था ॥५॥ यहाँ पर दिन. रात्रि का भाग नहीं है--न आकाश हे और न माश्यपी ही है। न ज्योति है--न जल है और न वायु है अन्य किञ्चित सस्थित नहीं है । ॥ ६ ॥ परम ब्रह्म एक ही था जो सूक्ष्म-नित्य और इन्द्रियो की पहुँच से परे है-~वह अव्यक्त है और ज्ञान रूप से द्वैत से होन विशेषण है ॥७॥ प्रकृति पुरुषश्चैव नित्यो द्वौ सर्वसहितो । स्थित कालोऽपि भूतेश जगत्कारणमैककम् ।। यदेक परम ब्रह्म तत्स्वरूपात् परं हर । रूपत्रयमिद नित्य तस्यैव जगत पतेः ॥६ कालो नामापर रूपमनाद्यतत्तु कारणम् । सर्वेषामेव भूतानामवच्छेदेन समत. ॥१० ततस्त् स्वप्रकाशेन भास्वद्रूप प्रकाशते । पुरा सृष्ट्यर्थमतुल क्षोभयन् प्रकृति स्वयम् ॥११ सक्षुब्धायान्तु प्रकृती महत्तत्त्वमजायत । महत्तत्त्वात्तत पश्चादहकारस्त्रिधाभवत् ।।१२ अहकारे तु सजाते शब्दतन्मात्रतस्तत.। आकाशमसृजद्विष्णुरनन्त मूर्तिवजितम् ॥१३ ततस्तु रसतन्मात्रादप सृष्ट्वा महेश्वर । निराधार स्वय दधे ताम्तदा निजमायया ॥१४
सोनो देवो का अनन्यत्व ]
१२६
प्रति और पुम्प य दाना सव सहित नित्य है । ह भूतश ।
काल भी स्थित है जा एक ही जगत् या कारण है ।। ८॥ ह हर ।
जा एक परम प्रहम है वह स्वरुप म पर है उमी जगत के पति
के
यह तीना रूप नित्य है ॥६॥ काल नाम वाला दूसरा स्प
है जा अनाद्य है और वह ता कारण है वह सब भूता का अवच्छन्द
स सगत हाता है ॥ १०॥ फिर वह अपन प्रकाश स भास्वद्रूप
वाला प्रकाशित होता है । पहिल सष्टि की रचना करने के लिय
अतुल प स स्वय प्रति क्षोभ मृत काता हुना था ॥ ११॥ प्रति व
मक्षुब्ध हो जान पर महत्तत्व की उत्पत्ति हुई थी। पीछ महत्तत्व म
तीन प्रकार का सरकार समुत्पन्न हुआ था ।। १२ ।। अहङ्कार क ममु-
त्पन हाने पर शब्द तन्मात्रा म विष्णु म आकाश का सृजन दिया था
जा आकाश अनन्त है और मूति गे रहित है अर्थात् मापाश की नाई
भी मूत्ति नहीं है ।।१३। इसके उपरान्त महेश्वर ने रमतन्माना स जल
का सृजन किया था। उस समय म वह अपीमाया से निराधार न स्वय
ही धारण किया था ।१४
ततस्त्रिगुणसाम्यन सस्मिता प्रकृति प्रभु ।
पुन सक्षाभयामास सृष्टवथा परमश्वर ॥१५
तत सा प्रकृतिस्तासु वीज त्रिगुणभागवत् ।
अप्सु समर्जयामास जगवीज निराकुलम् ॥१६
तद्धि वृद्ध क्रमेणय हैममण्डमभूमिहत् ।
जग्राहाप समस्तास्ता गर्भ एव तदण्डकम् ॥१७
अप्सु स्थितामु हैमाण्डगर्भ विष्णुस्तदण्टकम् ।
स्वयैव मायया दधे ब्रह्माण्डमतुल पुन ||१८
वारिणा वह्निभिश्चव वायमिनभसा नया ।
चाहिस्तदण्डव छन सवपाश्र्वे समन्तत ॥१६
सप्तसागरमानेन तथा नद्यादि मानत ।
ब्रह्माण्डाभ्यन्तरे तोय तदन्यत्तु वहिगतम् ॥२०
१३० [ कालिका पुराण तदन्त स्वयमेवासौ विष्णुव्रह्मस्वरूपधृक् । देव वर्षमूपित्वैव प्रविभेद तदण्डकम् ॥२१ इसके अनन्तर प्रभु ने तीनो गुणो की अर्थात सत्त्व-रज- तम इनकी समता ने सस्थित प्रकृति को परमेश्वर ने पुन सृष्टि की रचना के लिये सक्षोमित किया था ॥१५॥ इसके पश्चात् उस प्रकृति ने उन जलो मे त्रिगुण के भाग वाले निराकुल जगत् के बीज स्वरूप वीज को भली भांति सृजन किया था॥ १६ ॥ वही निश्चित रूप से क्रम से ही वृद्ध महान् सुवर्ण का अण्ड हुआ था। उस अण्ड ने गर्भ में ही उस सम्पूर्ण जल को ग्रहण कर लिया था। और अण्ड के गर्भ में जल के स्थित हो जाने पर भगवान् विष्णु ने उस अण्ड को आपकी ही माया से इस अतुल ब्रह्माण्ड को धारण कर लिया था। जल से-अग्नि मे- वायु मे तथा नभ से वह अण्डव बाहिर सब पार्श्व में और सभी ओर छन्न हो गया था ।। १७-१६॥ सात सागरो के मान से जैसे नदी आदि के मान से ब्रह्माण्ड के अन्दर जल है उससे अन्य वहिर्णत है ॥२०॥ उसके अन्दर यह भगवान वि णु स्वय ही ब्रह्म के रूप धारण करने वाले हैं। एक वर्ष तक निवास करते ही मैंने उस अड का भेदन किया था । २१॥ तस्मात् समभवन्मेरुत्पत्रोऽस्मिन् महेश्वर । जरायु पर्वता जाता समुद्रा सप्त तज्जलात् ॥२२ तन्मध्ये गन्धतन्मात्रात् पृथिवी समजायत । ईश्वरेण प्रवृत्या च योजिता त्रिगुणात्मिका ॥२३ प्रागेव पर्वतादिभ्य समुत्पन्ना वसुन्धरा । ब्रह्माण्डसण्डमयोगाढा भूता तु मा मृशम् ॥२४ सस्यामेव स्थितो ब्रह्मा गर्वलोकगुरु स्वयम् । यदा ब्रह्माण्डमध्यस्यो ब्रह्मा ध्यक्तो न चाभवत् । सदैव म्पतनामात्तेज गम्यगजायत । २५ १३२ [ वालिरा पुराण अभवत्तदधोभाग पचवक्तश्चतुर्भुज । स्फटिकाभ्रसम शुक्ल स कायश्चन्द्रशेखर. ॥३१ इतस्ततो ब्राह्मकाये सृष्टिशक्ति न्ययोजयत् । स्वयमेवाभवत् स्रष्टा वह्मस्पेण लोकभृत् ॥३२ स्थिनिशक्ति निजा माया प्रकृत्याख्या न्ययोगयत् । महेशो वैष्णवे काये ज्ञानशक्ति निजा तया ।।३३ स्थितिकर्ताभवद्विष्णुरहमेव महेश्वर ।।३४ सर्वशक्तिनियोगेन सदा तद्रूपता मम । अन्तशक्ति तथाकाये शाम्भवे च न्ययोजयत् ॥३५ उसका जो उर्वभाग था चतुर्मुख और चतुर्भुज हो गया था। पद्म केशर के समान औरङ्ग काया वाला ब्रह्म महेश्वर था । उसका जो मध्य भाग था वह नीले अङ्गो वाला-एव मुख से युक्त चार भुजाओ वाला था। शख-चक्र-गदा और पद्म हाथी मे लिये हुए वह काम वैष्णव था ।। २६-३० ॥ उसका अधोभाग पाँच मुखो से समन्वित चार भुजाओ वाला था। वह स्फटिक के तुल्य शुक्ल था और वह काम चन्द्रशेखर था ॥ ३१॥ इधर-उधर ब्रह्म के कार्य मे सृष्टि की शक्ति नियोजित किया था और वह लोकभूत ब्रह्म के रूप से सृष्टा हो गया था ॥ ३२ ॥ महेश ने वैष्णव काम में अपनी ज्ञान की शक्ति को हे महेश्वर मैं ही स्थिति अर्थात् पालन का करने वाला विष्णु हो गया था ॥ ३३-३४ ॥ सर्व शक्तियो के नियोग से मेरी सदा ही तद्रूपता है तथा सहार करने पो को शम्भु काम मे नियोजित किया था॥३५॥ अन्तभिवच्छम्मु. स एव परमेश्वरः । ततस्त्रिपु शरीरेषु स्वयमेव प्रकाशते ॥३६ ज्ञानरूप पर ज्योतिरनादिर्भगवान् प्रभु. । सप्टिस्थित्यन्तवरणादेका एव महेश्वर ॥३७
१३४
पातिरा पुग्द
मायाञ्च प्रति पार पचमय बिनो।
ज्ञाता त्व ध्यानयोगेन एम्माद्वमानारो भव ॥४३
मायया मोहितो यस्मादधुना त्वम्मदीयया।
ततो विस्मृत्य परम ज्योनिहि नितान्त ॥५४
अधुना योपयुक्तमत्व विम्मृत्यात्मानमात्मनि ।
या पृच्छमि प्रकृत्यादिम्पाणि प्रमथाधिप ॥४५
ततस्तत्र महादेव श्रुत्वा वाक्य मुनिश्चितम ।
मुनीना पश्यता योगयुक्ती ध्यानपरोऽभवन् ॥४६
आसाद्य वन्ध पर्यः निनिमीलितलोचन ।
आत्मानचिन्तयामास तदात्मनि महेश्वर. ।।४५
पर चिन्तयतस्तस्य शरीर विवभौ शुभम ।
तेजोभिरज्वल द्रप्टु नशेमुनयस्तदा ॥४८
तत्क्षणात् ध्यानयुक्तश्च शम्नु स विष्णुमायया ।
परित्यक्तोति विवभी तपस्तेजोभिज्ज्वल ॥४६
थी भगवान् न कहा--आप ही सदा ध्यान में समवस्थित होर
परमेश्वर को देखा करत हैं जो आत्म मे आत्म स्वरूप है और वह
ज्योति
के रूप वाला सहक्षर है ॥४२॥ हे विभो । माया को--प्रकृति को-
काल को और पुरुष को आप स्वय जानने वाले हैं अब आप ध्यान का
भोग करते हैं तो उसी के द्वारा ज्ञाता हैं इसीलिये आप ध्यान मे तत्पर
हो जाइये ॥४३॥ क्योकि इस समय में आप हमारी माया मे मोहित हो
रहे है। इसी कारण से आप निश्चय ही पर ज्योति का विस्मरण करके
बनिता म निरत हो रह है ॥४४॥ अद आप कोप से युक्त है अतएक
आत्मा मे आत्मा को भूलकर हे प्रमथो के स्वामिन् । प्रकृति के आदि
रूप जिसको आप पूछ रहे हैं ॥४५॥ माण्डेय महषि ने कहा-पिर
तो वहाँ पर महादेव जी ने इस परम मुनिश्चित वाक्य का श्रवण कर
समस्त मुनियो के देखते हुए ये योग मे युक्त हो कर ध्यान मे परायण
तीनो देवो का अनन्यत्व ] । 11५० हो गये थे ॥४६॥ उम समय मे पथ्यं वन्ध का अमादन करके निनि- मीलित लोचनो वाले महेश्वर ने तव आत्मा मे आत्मा का चिन्तन दिया था ॥४७॥ परम पुरुष का चिन्तन करते हुय उनका शरीर बहुत त्यधिक कान्ति युक्त होकर चमक रहा था । तेज मे उज्ज्वल उनको देखने के लिए उम ममय मे मुनिगण भी समर्थ नहीं हुए थे । उसो क्षण मे जब वे शम्भु ध्यान मे मुन हा गए तो भगवान विष्णु की माया ने भी उनका परित्याग कर दिया था उस समय में तप के तेज से अतीव उज्ज्वल वे कालिमान होकर चमक रहे थे ॥४॥ ये ये गणास्तदा तस्यु सेवया शकरान्तिके । न तेऽपि वीक्षितुक शकर वा दिवाकरम म्वमेव तदा विष्णु ममाधिमनसो भृशम् । प्रविवेश शरीरान्तज्योतीस्पेण पूजंटे ॥५१ प्रविश्य तस्य जठरे यया मृष्टिक्रम पुरा । तथैव दर्शयामास स्वय नारायणोऽव्यय ॥५२ न स्थूल न च मूक्ष्मञ्च न विशेषणगोचरम् । नित्यानन्द निरानन्दमेकं शुद्धमतीन्द्रियम् ॥५३ अदृश्यं सर्वद्रप्टारं निगुणं परम पदम । परमात्मगमानन्द जगत्कारणकारणम् ॥५४ प्रयम ददृशे शम्भुरात्मान वनस्वरूपिणम् । तम प्रविष्टमनसा बहिनिविजित. ॥५५ तस्येव म्प प्रकृति सृप्टव भिन्नता गताम् । ददर्श तस्यवाभ्यामे पृथग्रभूतामिवंकिकाम् ॥५६ जो-जा भी गण उस अवसर पर सेवा करने में लिये गदर के समोप में स्थित रहवे वे सब भी उन शङ्कर अथवा दिवाकार के देखने मे ममर्प नहीं हुए थे अर्याद उन्हें नहीं देख गरे घे ॥५०॥ उस काल में स्वयं ही भगवान विष्णु समाधि में मन लपान वाले गिव के शरीर - १३६ [ यात्रिमा पुगण ये अन्दर ज्योति के माप में प्रविष्टदा थे ॥५१॥ उन शङ्कर वे जठर में प्रवेश वरखे जैसा पहिले प्रष्टिया म पाटीर उसी भौनि स्वय अव्यय नारायण ने दिना दिया था। वह न तो स्यूत है और न मम -न विशेषण के गोनर है --यह नित्य आनन्द प है--निगनन्द है--एक है-शुद्ध है और इद्रियों की पहुँच वे बाहर है वह अदृश्य है और मय या दृष्टा अर्थात देखने वाला है-वह निर्गुण हैपर पर है परमात्मा में गमन करने वाला बानन्द है और जगत के कारण या भी कारण है । सबमे प्रथम शम्भु ने तत्स्वरूपी आत्मा को देखा या । वहाँ पर प्रविष्ट हुए मन में वाहिर में ज्ञान में विवजित उमी के रूप प्रकृति वो जो सृष्टि की रचना के लिये भिन्नता को प्राप्त हुई थी। उमी वे ममीप में एक उमको पृथक् भूल हुई की भौति देखा था ॥५६॥ पुरुषाश्च ददर्शामो यर्थव वसतस्तत । अग्नेरिव कथात स्थूलादजस्र द्विजसत्तमा ॥५५ तदेव कालम्पेण भासते च महमहु । सृष्टिस्थित्यन्तयोगानामवच्छेदेन कारणम् ॥५८ प्रकृति पुरुषश्चैव कालोऽपि व महुमुहु । अभिन्नान् भापमानाश्च सार्थे भिन्नता गताम् ॥५६ पथगभूतानभिन्नाश्च ददृशे चन्द्रशेखर । एकमेवाद्वय ब्रह्म नेन नानास्ति किञ्चन ।।६० सप्रधानस्वरूपेण कालरूपेण भासते । तथापुरुषरूपेण ससांरार्थ प्रवर्तते ॥६१ फिर इनने जिम रीति से वास कर रहे हो पुरषो को देखा था। हे द्विज सत्तमो । जैसे स्थूल अग्नि ये कण से निरन्तर होवे । वह ही पार के रूप से बारम्बार भासित होता है सृष्टि-पालन और संहार में योगो का अबच्छेद से वारण है ॥५७॥५८॥ प्रवृति और ही- काल भी जो अभिन्न पे और मर्ग के लिये भिन्नता को प्राप्त हुये भी पुरुष नीना देवी का अनन्यत्व ] १३७ समान में । इन मरो पर भूत और अभिन्न चन्द्रशेपर प्रभू न देखा था । एक ही ब्रह्म है जो द्वैत से दिन है और यहां पर कुछ भी नाना स्प वाला नहीं है ।।६०॥ वह ही मप्रधान रूप में और काल क स्वरुप से भामुमान होता है तथा पुष्प रूप में नमार के लिए प्रवृत्त हुआ करता है ॥६१॥ भोगार्थ प्राणिना वगैरेच प्रवर्तते । मंव माया या प्रति मा मोह्मनि शक रम् ||६२ हरि तया विरिञ्चिच तयौवान्यजनुर्भवान । मायान्या निर्माता जन्नु मन्मोयत्यपि ॥६३ सा स्वीपेण च मदा लक्ष्मीभूता हरे प्रिया । सा सावित्री रति सन्ध्या या मती मंव वौरिणी ॥६४ शुद्धिरपा न्वय देवो चण्डिकेति च गोयने। इति स्वय ददशु ध्यानमार्गगतो हर ॥६५ महदादि प्रभेदेत तथा मष्टिनमन्वयम् ।।६६ दर्शयित्वा हरि काल प्रकृति पुरुपान्नथा। नयान्यदर्शयामास तन्न्रीरं द्विजोत्तमा ॥६७ भोग करने के लिए निम्न्लर दह प्राण धारियां शरीर में प्रवत्तित होता है। वह ही माया या प्रकृति है जो शङ्कर भगवान को मोहिल करती है ।।६२॥ वह ही हरि को और ब्रह्मात्री को मोह युक्त करनी है। ठीर उनी भांति में आप अन्य जन्म वाले हैं। भाषा के नाम वाली प्रति जात हुई और जन्तु को मम्मोहित भी किया करती है। यह मदा स्त्री के ग्वाप में नरमी मता हुई हरि मादान की प्रिया है। वह ही मावित्री-रनि-मघ्या-मनी और वैरिणी है ॥६५॥ वह देवी स्वय बुद्धि के स वाली है जो चण्डिका -इम नाम से मान की वाया करती है-यह ध्यान के मार्ग में गमन वियए मगवान हर ने मीन म्बर ही देगा पा ॥६५॥ महत्तव आदि भेद मे पिर ष्टि Iलिका पुराण के क्रम को स्वयं देषा पा ॥६६॥ हरि भगवान ने पाल-प्रति तथा पुरपो दो दिखला कर हे द्विजोत्तमो ! उसी प्रकार से उनके शरीर को अन्य दिखलाया था ॥६॥ ॥हरकोपोपशमने वर्णन ।। ततो ब्रह्माण्डसंस्थान दर्शयामास गम्भवे । वधे तोयराणिस्थ ब्रह्माण्डञ्च ययापुरा ॥१ तन्मध्ये पद्म भ ब्रह्माणञ्च जगत्पतिम् । ज्योती रूपं प्रकाशार्थ सृप्ट्यर्थच पृथग्गतम् ॥२ शरीरिणञ्च ददृशे ब्रह्माण्डान्तर्गत मुहु । चतुर्भुज प्रकाशान्त ज्योतिभि. कमलासनम् ॥३ तत्रैव च विधाभूत वपुर्वाह्मय ददर्श सः । अर्द्धमध्यान्तभागैश्च ब्रह्मविष्णुशिवात्मकम् ॥४ यथोधंभागो वपुषो ब्रह्मत्वमगमत्तदा । मध्य यथा विष्णुभूत ददर्शान्यस्य शम्भुताम् ॥५ एकमेव शरीरन्तु विधाभूतं महुमुहु । हरो ददर्श स्वे गर्भे तथा सर्वमिदं जगत् ॥६ कदाचिद्वैष्णवं काय ब्राह्म काये लयं वजेत् । ब्राह्म तथा वैष्णवे च शाम्भवे वैष्णवं तथा ॥७ मार्कण्डेय मुनि ने कहा-~इम अनन्तर हरि भगवान् ने शम्भ के लिये ब्रह्माण्ड का मस्थान दिपलाया था जिस प्रकार से पहिले ब्रह्माण्ड जो जल की राशि मे स्थित होता हुआ धढ़ा था 11911 उमके मध्य मे पदम गर्भ की आभा वाले जगत के पति ब्रह्मा को जो ज्योति स्प वाला प्रकाश के लिए और मष्टि की रचना करने के लिये पृथक
१४०
[ कालिया पुराण
प्राप्त
मेघाश्च चन्द्र सूर्यञ्च वृक्षान वल्लीस्तृणानि च ।
सिद्वान विद्याधरान, यक्षान, राक्षसान,
किन्नरास्तथा।।१४
शम्भु का शरीर विष्णु के वमु मे अथवा ब्रह्मा का वपु शम्भु
वे शरीर मे लीनता को प्राप्त होता हुआ तथा बार-बार एकता
होने वाला शम्भ भगवान् ने देखा था । वामदेव भी भिन्नता को अप्राप्त
पृथक्गन -परमात्मा में गमन बरते हुए अर्थात् तीनता को प्राप्त होने
हुये उसके वपु को स्वयं देखा या ॥ ८॥ ॥६॥ शम्भु ने उसके मध्य
मे जल मे वितल अर्थात् विस्तृत पृथ्वी को देखा था। जो महान् पवतो
के मघातो से विरल और म्यगत है ॥१०॥ फिर उनने आदि से सर्ग
को रचना करते हुए ब्रह्माजी को देखा था तथा अपने आपको पृषाभूत
और गरड पर आसने वाले विष्णु को देखा था ॥ ११ ॥ वहाँ पर ही
प्रजापति दक्ष को और उमी भौति अपने गणो वो-मरीवि आदि दशो
वो वैरिणी कोमती-मन्या-रतिबन्दर्प-वसन्त के सहित
शृङ्गार --हाबो वो-भावो को-मार्ग को--ऋषियो दो-देवो
यो-गएड गणो को देखा था ॥१२॥१३॥ मेघो को चन्द्र--सूर्य
वृक्षगण-वल्ली और तृण-सिद्ध-विद्याधर-~-यक्ष-राक्षस और वि
निरीवो देखा था ।।१४।।
मानुपाश्च भुजगाव ग्राहान्मन्स्याश्च पच्छपान् ।
उल्बानिर्धातवेतृ श्व पृमियोट पतगवान ॥१५
पाश्चिद्ददर्शवनिता द्वन्द्वभाव प्रकुर्वतीम् ।
उत्पन्न मुत्पद्यन्तच विपन्नश्च पञ्चन ॥१६
हमती रमत काश्चित पाश्चिद्विलसतस्तथा ।
धावतचापरायम्भोदंदर्श परमेवर ॥१
दिव्यालंकारमन्ना माता पन्दनपच्चिता ।
वीक्षाध्य पानिरे पेपिच्छन्भुना पीडिता मह ॥१८
म्तुवन्त प्रस्तुवन्तश्च सम्म विष्णु या विधिम् ।
हरकापोपशमन वणन ] १४१ केचिद्दद्दशिरे तन मुनयश्च नपोधना ॥१६ तपासि चरत कवितदीतीरे तपोवने। स्वाध्यायवेदनिरता पाठचन्तश्चैव केचन ॥२० तथैव सागरा सप्त नद्यो देवसरासि च । तथैव पवतस्थोऽसी ददृशे शम्भुना स्वयम् ॥२१ मनुष्यों का-भुजगा को~ ग्राह--मत्स्य---कच्छप- उल्का निपति वेतुआ का-कृमि कीट और पतङ्गा को देखा था। वहाँ पर किसी वनता को देखा था जो हद भाव को कर रही थी। विसी को उत्पन-उत्पत्ति को प्राप्त होत हए--बिपगुस्त को देखा था ।। १५-- १६ ।। कुछ लोगा का हास विलास करत हुए और कुछ को विलाप करत हुए--तथा कुछ दौड लगात हुआ को परमश्वर ने देखा था जो वि शम्मु की भोर ही भाग रहे थे ॥१७॥ कुछ लोग दिव्य अलद्वारा स सच्छल थे--कुछ माला और च दन स चर्चित हुय थे--कुछ लोग दीक्षा करत थ और कुछ पुन शम्भु क साथ क्रीडित थ ॥१८॥ कुछ लोग स्तुति कर रह थे-~-कुछ शम्भ, का स्तवह करत हुए-~-विष्णु और ब्रह्मा का स्तवन करन वाले थे। उनय द्वारा कुछ मुनि आर तपस्वी गण भी दख गये थ । कुछ लोग नदो के तट पर तपावन म तपस्या करत हुए देखे गय थ । कुछ लाग स्वाध्याय तथा वेदा म रत देख गय पढाते हुए देखे गय थ । वही पर सात सागर-नदिया और दवसरावर दख गय थे । वहीं पर यह पर्वत पर स्थित थे-ऐसा स्वय शम्भु द्वारा देखा गया था ॥ १६॥ २० ॥२१॥ मायालक्ष्मीस्वरूपेण हरि सम्मोहयत्यलम् । सतास्पा तयात्मान मोहयन्तीति शकर ॥२२ सत्या साध स्वय रेमें क्लास मेरुपवते । मन्दरे दवविपिन शृगाररससवित ।।२३ सतादेह तथा त्यक्त्वा जाता हिमवत सुता। थ और
[ बालिका पुराण
१४२
-
यथा प्राप पुनस्तान्तु यथा चंवान्धवो हत ॥२४
कार्तिकेय समुत्पन्नो यथास्तारवाह्वयम् ।
तत्सर्व विस्तरात सम्यग् ददर्श वृषभध्वज ॥२५
हिरण्यकशिपुर्जध्ने नरसिंहस्वरूपिणा।
यथा हत काल नमिहिरण्याक्षो यया हत ॥२६
विष्णुना यादृश युद्ध दानपौषं पुराकृतम् ।
यथा ये ये च निहतास्तत्सर्व दृष्टवान हर ॥२७
जगत्प्रपञ्चान, ब्रह्मादीन्नक्षनग्रहमानुपान ।
सिद्धविद्याधरादीश्च दृष्ट्वा दृष्ट्वा पृथक् पृथक् ॥२८
यह महालक्ष्मी के स्वरूप से भगवान् हरि को पर्याप्त रूप से
मोहित किया करती है। मती के स्वरूप वाली उसी भांति आत्मा को
अर्थात् अपने आप को मोहित करती हुई शङ्कर ने देखा था ।।२२।। ये
स्वय सती के साथ मेरु पवत कैलास मे रमण करते थे। तथा मदर
म-देव विपिन में जो शृङ्गार रम से मेवित था ।।२३।। वह देवी सती
के स्वरूप का पारत्याग करके हिमवान् को सुता होकर समुत्पन्न हुयी
थी। जिस प्रकार मे पुन उसने उम मनो को प्राप्त किया था और
जैसे अ धक मारा गया था ॥२४॥ जमे कात्तिकेय समुत्पन्न हुए और
जिस तरह से तारस नाम वाले का हनन किया था--यह सब विस्तार
पूर्वक भली भांति वृषभध्वज ने देखा था ॥ २५ ॥ जिस रीति से नर
सिंह के स्वरूप धारण करने वाले के द्वारा हिरण्यय शिपु मारा गया था
और जिम प्रकार म हिरण्याक्ष और काले नेमि यक्ष हुआ था तथा जैसे
पहिले दिया हुआ दानवा ये समुदाय के साथ विष्णु भगवान के द्वारा
युद्ध हुआ था तथा जो जो भी यहाँ पर हित हुये थे—यह सभी कुछ
भगवान हरा देखा था ॥२६॥२७।। जगत् वे प्रपञ्च रूप ब्रह्मा
आदि
ना-प्रद और मनु प-गिद्ध और विद्याधर आदि को धन २
देव बर ॥२८॥
रकोपोपशमने वर्णन ] १४३ आत्मानं तान, सहरन्त ददृशे शम्भुरीश्वरः । संहारान्ते ददशासौ ब्रह्मविष्णुमहेश्वरान ।।२६ शून्यं समभवत्सर्व जगदेतच्चराचरम् ।।३० शून्ये जगति सर्वस्मिन्, ब्रह्मा विष्णुशरीरगः । लोन शम्भुश्च तस्यैव शरीरं प्रविवेश ह ॥३१ एकमेव ददर्शासौ विष्णुमव्यक्तरूपिणम् । नान्यत्किचिद्ददर्शासौ तदा विष्णुमते हरः ।।३२ अथ विष्णुश्च ददृशे लयं त्व परमात्मनि । भासमान परं तत्वे ज्योतीरूपे सनातने ॥३३ ततो ज्ञानमयं नित्यमानन्दं ब्रह्मणः परम् । केवलं ज्ञानगम्यञ्च ददर्शान्यन्न किंचन ॥३४ एकत्वञ्च पृथक्त्वञ्च जगतः परमात्मनि । ददर्श स्वशरीरान्तः सर्गस्थित्यन्तसायमान् ॥३५ ईश्वर शम्भु ने उन सबका संहार करते अपने आपको देखा था। इनने फिर सहार के अन्त में ब्रह्मा-विष्णु-महेश्वरी को देखा था ॥ २६ ॥ यह सम्पूर्ण चर और अचरो से समन्वित जगत् शून्य हो गया था । ३० ।। इस समस्त शून्य जगत में ब्रह्मा, विष्णु के शरीर मे गमन करने वाले तथा शम्भु लीन होते हुए उसी के शरीर में प्रवेश कर गये ये ॥ ३१ ॥ इन्होने एक ही अव्यक्त रूम वाले विष्णु को देखा था और इनने अन्य कुछ भी नहीं देखा था जो उस समय में विष्णु के बिना होवे ॥३२॥ इसके अनन्तर विष्णु भगवान को देखा गया था। परमात्मा मे लय को प्राप्त--भासमान पर तस्व-सनातन ज्योति के रूप वाले परतत्त्वा देखे गये थे ॥३३॥ इसके अनन्तर ज्ञान से परिपूर्ण-नित्य- आनन्द मय-ब्रह्म से पर-केवल ज्ञान के द्वारा ही जानने के योग्य को देखा था और अन्य कुछ भी नहीं देखा था ॥३४॥ परमात्मा में इस १४४ [वालिया पुरान जगत् का एवरत्व और पृथान-अपन गरीर के अन्दर सर्ग-स्थत-और सयमो को देखा था ॥३॥ प्रवाश परमात्मान शान्त नित्यमतोन्द्रियम । एकमेवाद्वय ब्रह्म ददर्शान्यन्न किञ्चन ॥३६ को वा विष्णुहर का वा को ब्रह्मा किमिद जगत् । इति भेदी न जगृहे शम्भुना परमात्मन ॥३७ एव सम्पश्यतस्तस्य शरोभरायन्तराहि । नि ससाराथ मायादि प्रधिवेश वृषध्वजम् ॥३८ अनन्यत्व पृथक्त्वञ्च दर्शयित्वा जनार्दन । शम्भवे तच्छरीरात्तु बहिर्भूतस्तस्तो द्रुतम् ॥३६ अथ त्यक्तसमाधेस्तु हरस्य चलितात्मन । सती मनो जागामाशु मोहितस्य च मायया ॥४० ततो मुहुर्हरो वक्त दाक्षायण्या मनोहरम् । प्रबुद्धकमलाकार वोक्षाचके द्विजोत्तमा. ॥४१ ततो दक्षमरीच्यादीन स्वगणान् कमलासनम् । विष्णुञ्च तन्न सवीक्ष्य शकरो विस्मितोऽभवत् ।।४२ अथ त विस्मयाविष्ट महादेव वृपध्वजम् । स्मिनप्रफुल्लवदन हरमाह जनार्दन ॥४३ प्रकाश रूप-शान-नित्य और इन्द्रिया की पहुंच से परे परमात्मा को देखा था कि ब्रह्म एष ही पर है । जो अद्वय अर्थात् द्वंत में रहित है। इसके अतिरिक्त अन्य कुछ भी नहीं देखा था ॥३६॥ मौन भगवान् विष्णु है-पौन ब्रह्मा है अथवा क्या यह जगत है शम्भ द्वारा परमात्मा का यह भेद ग्रहण नहीं किया गया था ।। ३७ ।। इम प्रकार से देखते हुय उनके शरीर के अभ्यन्तर से वाहिर माया आदि निक्रष्टत हुये थे और वृषम ध्वज ( शिव ) में प्रवेश कर गये थे । ॥३८॥ जनार्दन प्रभु अनम्यत्व और पृथक्व दिखलाकर शम्भ ने रकोमोपशमने प्रतिपादन ] लिए उमके शरीर मे शीघ्र ही फिर वाहिर हो गये थे॥३६॥ इसके उपरान समाधि के परित्याग करने वाले चलित बाग से -युक्त शिव का मन सती की ओर गया था जो पिर माया मे मोहित हो गये थे। ॥ १० ॥ हे द्विजोत्तमो ! फिर भगवान् हरि ने दाक्षायणी के मनोहर और विकसित कमल के आकार वाले मुख को देखा था ।।११।। इस के आगे दक्ष मारीचि यादि मुनियो को-अपने गणो को-कमलासन (ब्रह्मा ) को और भगवान विष्णु को वहाँ पर देखकर भगवान शङ्कर अत्यन्न विस्मित हो गये थे।॥ १२॥ इमकै बनन्तर विस्मय में मविष्ट स्मित ( मन्द मुस्कराहट) से प्रफुल्लित मुख मे मंयुन वृपध्वज महादेव हर में भगवान् जनार्दन ने कहा ।।४।। यद्यत् पृष्टं त्वयकत्वे भिन्नतायाञ्च शंकर। त्रयाणामथ देवानां तनातमधुना त्वया ॥४४ प्रकृतिः पुरुषश्चय कालो माया निजान्तरे। त्वया ज्ञाता महादेव कौशास्ते च के पुन: ॥४५ एक ग्रह्म सदा शान्त नित्यञ्च परम महत् । तन् कथं मिन्नता जात दृप्ट तत् क दृश त्वया ॥४६ इति पृष्टो भगवता भगवान् वृषभध्वजः । जगाद हरये तय्यमेतद्वाक्य द्विजोत्तमाः ॥४७ श्री भगवान् ने कहा-हे महूर ! जो-जो भी आपने एक्त्व में और भिन्नता म देखा है बब आपने तीनो देवी का स्वरूप जान लिया है ॥४४) मापने अपने बतर में प्रकृति-पुरुष-काल और माया को अच्छी तरह से जान लिया है। हे महादेव ! फिर किस प्रकार वाले हैं ? ॥४५॥ ब्रह्म एक ही है और वह मदा शान-निन्य--परम महद है। वह किस तरह से भिन्नता को प्राप्त हुआ और वैसा है यह आपने देख लिया है ॥४६॥ मार्कण्डेय मुनि ने कहा-इस रोदि भगवान् वृषभध्वज जब भगवान विष्णु के द्वारा पूछे गये ये है द्विजोत्तमो ! हर ने हरि के लिए यह नथ्य वचन कहा था १४६ [ बासिषा पुराण एक शिव शान्तमनन्तमच्युत ब्रह्मास्ति तस्मान्नहि किंचिदीराम्। तस्मादभिन्न मक्ल जगद्धरे वालादिरूपाणि च सृष्टिहेतु ॥४६ समस्तभूतप्रभव निरजा वयश्च तम्यव सदाशमपिण । सृष्टिस्थिति सयमन तदीरित रूपनय तस्य विभाति भेदत ॥४ नाह न च त्व न हिरण्यगों न कालम्प प्रकृति न चान्यत् । तत् प्रेरणा कमल च किञ्चिद्विनापि रूप सदपीह तस्य ॥५० इतितत्त्व त्वया प्रोक्त ज्ञातन्च वृपमध्वज । तदशभूतास्तु वय वृह्मविष्णुपिनाकिन ॥५१ तस्मात् त्वया न बध्योऽय विरिञ्चिस्तव चेद्भवेत् । एकता विदिता शम्भो ब्रह्मविष्णुपिनाविनाम् ॥५२ इति तस्य वच श्रु त्वा विष्णोरमिततेजस । न जघान महादेवो विधि दृष्टवाथ चकताम् ॥५३ इति व कथित विष्णुर्यथानन्यत्वमादिशत् । शम्भवे प्रस्तुत तद क्थयामि पुनर्द्विजा ॥५४ इश्वर ने कहा-एक शिव परम शात अनन्त-अच्युत ग्रहम है और उनस अय ऐसा कुछ भी नहीं है। उनसे अभिन सम्पूण जगद हरि के क्ला आदि के रूप से सृष्टि की रचना का हेतु होता है ॥४८॥ वह समस्त प्राणिया का प्रभव है और निरञ्जन है। और हम सब उसब ही सदा अश स्वरूप वाले है । सृष्टि-स्थिति ( पालन ) और मयम व ( सहार ) उमके द्वारा कथित भेद मे तीन रूप शोभित होते है ॥४६॥ न तो मन आप और न हिरण्य गभ-न काल प- प्रकृति और अय उमकी प्रेरणा करने के लिये ममथ है । यहाँ पर कुछ रुप विना भी उसका सच भी है ॥५०॥ श्री भगवान ने कहा-हे वृषभवन ' यह तत्व बापने कहा और जान लिया है। हम ब्रह्मा- विष्णु और पिनाको ( शिव ) उसके अशभूत ही हैं ॥ ५१ ॥ इस कारण आपके द्वाग ब्रह्मा वधो याग्य नहीं है। यदि आपको एकता शव मनी विहार वर्णन ] १४३ विदित है जो कि है शम्मा 1 ब्रह्मा-विष्णु और पिनाकधारी शिव फो होती है ॥ ५२ ।। माकण्डेय मुनि ने कहा-यपरिमित तेज के धारण करने वाले भगवान् विष्णु के इस वचन का श्रवण करके महादेव जो न सबकी एक स्वस्पता को दरखकर ब्रह्मा का हनन नहीं दिया था ॥५३॥ भगवान् विगुन बिस रोवि से एक्का का जादिर किया था वह सब मैंने आपको बतला दिया है । है द्विजो। वह जा गम्भु रे लिए प्रस्तुत है उमे पुन बापको वनलाता हूँ ॥ ॥ -000- ॥ शिव सती विहार वर्णन ।। जलदेवय गर्बतसु महादेव सतीपति । विसृज्य विष्णुप्रभृति जगाम हिमवगिरिम् ॥ आरोप्य वृपभे तु गे सतीमामोदशालिनीम् । जगाम हिमवत्प्रस्य रम्य कुञ्जसमन्वितम् ।।२ जय सा शकराभ्यासे सुदती चारुहासिनी। विरेजे वृषभम्याति चन्द्रान्ते कालिकोपमा ॥३ यादयश्च ते सर्वे मरीच्याद्याश्च मानसा । दक्षोऽपि सर्वे मुदिता अभवन् ससुरासुरा ॥४ केचिक्छखान् वादयन्त कचित्तालान् मुमगना । केचिदाम्य प्रकुर्वन्तो अनुजग्मुर्व पध्वजम् ।।५ विसृष्टा अपि ब्रह्माद्या शम्भुना पुनरेव ते। अनुजम्मु फियडू र मुदा परमया युता ॥ तत शम्भु समाभाप्य बृह्माद्या मानसाश्च ते । स्व स्व स्थान वा जग्मु स्यन्दनराशुगामिभिः ॥७ मार्कण्डेय मुनि ने कहा-इसके अनन्तर मेघो के गर्जन करने पर धो महादेवजी मतो व पति ने विष्णु भगवान् प्रति मुवनो बिदा [ कालिका पुराण तो । करके अथवा त्याग करके वे हिमवान पर्वत राज पर चले गये थे ॥१॥ उस परमाधिक आमोद की शोभा वाली देवी सती को अपने अत्युन्नत वृपा पर समोरोपित कराके हिमालय के प्रस्थ को गमन किया था जिसमे परम रम्य कुञ्जो का समुदाय था । २ ॥ इसके उपरान्त वह सुन्दर दन्त--पक्ति वाली चारु हास से समन्वित सती भगवान शङ्कर के समीप में शोभायमान हुई थी वृषभ पर स्थित भी वह चन्द्र के मध्य मे कालिका के समान ही थी ॥३|| वे सब ब्रह्मा आदिक और मरीचि आदि मानम पुत्र-~-दक्ष प्रजापति भी मभी सुर और असुर परम प्रसन्न हुए थे अर्थात् उस अवसर पर सभी को अत्यन्त हर्ष हुआ था ॥ ४॥ जो सब भगवान् शङ्कर के साथ मे गमन कर रहे थे उनमे शखो को बजा रहे थे और कुछ सुमङ्गल करने वाले तालो का वादन कर रहे थे। कुछ हास्य ही कर रहे थे। इसी रीति से सबने वृषभध्वज का अनुगमन किया या अर्थात् शिव के पोछे-पोछे गये थे ॥ ५॥ फिर ब्रह्मा आदिक ये वे भी सब शम्म के द्वारा विदा कर दिये गये थे। वे सब परमाधिक आनन्द से कुछ दूर तक शिव के पीछे २ गये थे। ॥६।। इसके उपरान्त बह्मा आदि और मानस पुत्रो ने शम्भु के साथ मम्भाषण करके आशुगमन करने वाले रथो के द्वारा समय में अपने २ आयमो को चले गये थे ॥७॥ देवाश्च सर्वे सिद्धारच तथवाप्सरसा गणा.1 यक्षविद्याधराद्याश्च ये ये तत्र समागता. ।। ते हरेण विसृष्टास्तु गतवन्तो निजास्पदम् । बभूवगमोदयुताः कृतदारे वृषध्वजे ॥६ ततो हरः सस्वगणः सस्थान प्राप्य मोदनम् । बलास तव पभादवतारयति प्रियाम् ॥१० ततो विरुपाक्ष मां प्राप्य दाक्षायणी गणान् । म्बीयान् विमनंगामाम नन्दादोन गिरिकन्दगत् ।।११
शिव मती विहार वर्णन ]
१४६
उवाच शम्भस्तान् सर्वान् नन्यादीनतिसुनृतम् ।
यदाहं वः स्सराम्यन्न स्मरणाच्चलमानसाः ।
समागमिष्यथ तदा मत्पाव भोस्तदा तदा ॥१२
इत्युक्ते वामदेवेन ते नन्दिभैरवादयः ।
महाकोपी-प्रपानाय जग्मुस्ते हिमवदगिरी ॥१३
ईश्वरोऽपि तया साधं तेषु यातेपु मोहित.।
दाक्षायण्या चिरं रेमे रहस्यनुदिन भृशम् ।।१४
समस्त देवगण-सिद्ध और उमी भांति अप्सराओ के समुदाय
और जो-जो भी वहां पर यक्ष विद्याधर आदि समागत हुये थे वे सभी
भगवान हर के द्वारा विग किए हुए अपने निवास स्थानो को चले गये
थे। तथा वृपम ध्वज के दारा के ग्रहण करने पर सभी आमोद से
समन्वित हुए थे ॥६॥६इसके अनन्तर भगवान् शिव अपने गणो
के महित आनन्द देने वाले गम्थान पर पहुँच कर जो कि कलाम गिरि
के नाम वाला था। वहां पर शिवने अपनी प्रिया को वृपा से नीचे
उतार लिया था ॥१०॥ फिर निरुपाक्ष प्रभु ने इस दाक्षायणी सती की
प्राप्ति करके अपने गणो की जो नन्दी आदिक. उस गिरि की मन्दरा
से विदा कर दिया था ॥११॥ भगवान शम्भु ने नन्दी आदि मे बहुत
ही मधुर वाणी में उन सबसे रहा था कि यहां पर जिस समय में भी मैं
आप सबका स्मरण करूं उमी समय मे स्मरण में चल मानस वाले
भाप लोग मेरे समीप में तब-तब हो ममागमन करणे ।।१२।। इस प्रकार
मे वामदेव के द्वारा क्यन करने पर वे नन्दी भैरव आदिक मद महा
कोपी के प्रपात के लिये दे हिमवान् गिरि पर चले गये थे ।।१३।। उन
सबके चले जाने पर भगवान् ईश्वर भी उम मतो के माय मोहित होगये
पे। हर मी एकान्त में प्रतिदिन उस दाक्षायणी के साप चिरकाल
पच्यन्त बहुत ही अधिक रमण नरने वाने होगये ये अति विशेष रूप से
रमण दिया था ॥१५॥
कालिका पुराम
कदाचिद वन्यपुष्पाणि समाहृत्य मनोहरीम् ।
मालां विधाय सत्यास्तु हारस्थाने न्ययोजयत् ॥१५
कदाचिद्दर्पणे वक्त वोक्षन्तीमात्मनः सतीम् ।
अनुगम्य हगे वक्त स्वोयमप्यलोवकयत् ॥१६
कदाचिन कुन्तलास्तस्या उल्लाम्योल्लासमागतः ।
यध्राति मोचयत्येवं शश्वतसन्मार्जयत्यपि ॥१७
मरागौ चरणावस्या यावकेनोज्वलेन च ।
निसर्गरक्ती पुरुते सरागो वृषभध्वजः ।।१८
उच्चरपि यदाख्येयमन्पेषां पुरतो मुहुः ।
सत कर्णे कथयत्यस्या हरो स्प्रष्टुतदाननम् ॥१६
न दूरमपि गत्वासो समागम्य प्रयत्नतः ।
अनुबध्नाति सामक्षिण पृष्ठदेशेऽन्यमानसाम् ॥२०
अन्तहितस्तु तव मायया अपभध्वजः ।
नामासिलिंग भीरया मा चकिता व्याकुलाभवत् ॥२१
किमी गमय में यन मे स्वाभाविक रूप से गमुत्पन्न हुए पुष्पों
राममारणा उनी एक अतीय मनोहरण पर पाली मृन्दा
मामा पो रमना पाये उन्होंने मती में हार घे स्थान में नियोजित रिया
पा ॥१५॥ विगी गमप में पंज में अपने मुए ना अगोरत करने
वाली गमी रामनुगमन पर भगवान् भृ ने भी अपना
मन मुटको दवा से पे॥१॥ किमी ममय में उगमली।
मृतलो गो उत्पगित पर उस्लाम गाये हुए गिय बांधाबले में
अपामा प्रसार मापन विधामा और पराया उनमा
भारत र ची मरने जा भमुराग में निमान
घरी स्वाभानिमामिमा म ए दोनों थानो को am
निम जरिवाने को गो भाई
चार से रमन मानेर यो हात सी पी को
गती में विचार प्रस्ताव ] १५१ भी भगवान हर सती के मुन का स्पर्श करने के विचार से उनके कान में कहा करते थे ॥१६॥ विशेष दूर भी न जाकर यह शम्भु किसी समय मे प्रयत्न पूर्वक समागत होकर पीछे के भाग में थाकर अन्य मन वाली इस सतो की आंखो को बन्द कर दिया करते थे ।।२०।। वृषभध्वज अपनी माया से वहाँ पर ही अन्तर्धान होकर उस मतो का आलिङ्गन किया करते थे। वह भय मे चकित होकर अधिक व्याकुल हो जाया करती थी ॥२१॥ तस्मिन् प्रविष्टे हिमवतपर्वते वृषभध्वजे । कामोऽपि सह मित्रेण रत्या च प्रजगाम ह ।।२२ तस्मिन् प्रविष्टे कामे तु वसन्तः शंकरान्तिके। विततान निजाः श्रीश्च वृक्ष तोये तथा भुवि ॥२३ सर्वे सुपुष्पिता वृक्षा ललाश्वान्याः सुपुप्यिताः । अम्भांसि फुल्लपद्मानि पद्धेषु भ्रमरास्तथा ॥२४ प्रविष्टे तत्र सुरतो प्रवदुमलयानिलाः । मुगन्धिपुष्पगन्धेन मोहितच पुरन्ध्रयः ।।२५ मुनीनामपि चेतांसि प्रमथ्य सुरभिस्तदा। स्मरः सारं समुदधे तक्रौपादाज्यवत्कृती ॥२६ सन्ध्यादचन्द्रसंकाशाः पलाशा विरेजिरे। कायास्त्रवत्सुमनसः प्रमोदायाभवत् सदा ॥२७ वः पकजपुष्पाणि सर.सु सकलं जनान् । सम्मोहयितुमुयुक्ता सुमुखीवाम्बुदेवता ॥२८ उम हिमालय पर्वत में नृपमध्यन के प्रवेश किये जाने पर काम- देव भी अपने मित्र मत के तपा अपनी पत्नी रति के साथ वहीं पर चला गया था ॥२२॥ उस कामदेव के प्रविष्ट हो पाने पर वमन्त ने भगवान शहर के समीप में अपनी गोमा का वृक्षों में जल में और भूमि में विस्तार कर दिया था ॥२६।। वहाँ परमभी दृश्य १२२ [ शामिया पुन मयुत होकर पुष्पित हो गये थे और अन्य सताप भी पुष्पित हो गई थी। सब सरोवरो के जल खिले हुये ममनी मे युक्त हो गये थे तथा उन वमनो पर प्रमर गुजार कर रहे थे ।२४। यही पर मुर्गा प्रविष्ट । जाने पर मलय को आर स आन वासी वायु वान पा रही थी। म धित पुष्पों के साथ योग हो जाने से सुरधिया मोहित हो गई थी। ॥२५॥ उस समय में उम सुरभि ने मुनिया भी मनी का प्रमथन पर दिया था। तक के समूह स घृत वे ही ममान नी कामदेव ने सार वा ममुद्धरण किया था ॥२६॥ पलाश सन्ध्या काल में आधे चन्द्रमा के सहश शोभित हुए थे। पुष्प कामदेव के अस्त्र के हो समान सदा प्रमोर के लिए हा गए पे ||२७it सरोवरो मे कमल के पुष्प शोभित हो रहे धे जो सुमुखी अम्बु देवता के ही समान मद जनों को सम्मोहित करन करने के लिए उद्य क्त थे ॥२८॥ नागकेशरवृक्षाश्च स्वर्णवर्णप्रसून । वभुर्मदनक्रेत्वाभा मनोज्ञा शक्रान्तिके ॥२६ चम्पकास्तरवो हैमपुष्पत्व प्रकट मुहुः । कुर्वन्त प्रचुर पुष्पं सम्यग्रेजुस्तथास्फुटं ॥३० प्रफुल्लपाटलापुप्पंदिश स्यु पाटलाशव । यथा तथा पुप्पिताल पाटलाख्या महील्हा ॥३१ नवगवल्लीसुरभिर्गन्धेनोद्वास्य मारुतम् । सन्मोहयति चेता भृश कामिजने पुरा ॥३२ वासन्तीवासितास्तत्र वल्वजा किल रेजिरे। तद्यगन्धलुन्धभ्रमरा रतिमिथा मनोहरा ॥३३ चारु पावकवचस्वि शिखराश्चूतशाखिन । वभुर्मदनवाणौध-पर्यकवदनावृता ॥३४ अम्भासि मलहीनानि रेजु फुल्लकुशेशय । मुनीनामिव चेतासि प्रव्यक्तज्योति रुद्गमात् ॥३५ शिव मती विहार वर्णन ] १५३ नाग केशर के वृक्ष स्वणं वणं वाले पुषा में शकर के समीप मे मदन (कामदेव) के केतु को आभा वाले परम मुन्दर गोभित हो रहे थे ॥२६॥ चम्पक के वृक्ष बार-बार हैम पित्व को याद सुनहले पृष्पो को प्रकट करते हुए विवामित प्रचुर पुप्पो मे भली भौति शोभायमान हा थे ॥३०॥ विकमित हुए अदि खिले पाटला के पुष्पो से दिशायें पाटलाशु हो गई थी। जिस किसी तरह से वे पाटत नाम वाले वृक्ष पुष्पित हो रहे थे ।। ३१ ।। लवङ्ग वल्ली को सुरभि गन्ध के द्वारा वायु को उद्वासित करके कामी जन में पूर्व चित्तो को बहुत ही अधिक सम्मोहित सरती है ॥३२॥ वामनी से शामित ल्वन शोभित हो रहे थे रमको गन्ध दे पातची भ्रमर मनोहर रति मिथ थे ॥ ३३ ॥ सुन्दर पावक के वर्चम वाले आन वृक्षो के शिखर कामदेव के पाणो के समूह मे पर्यडू वदना वृत होते हुए शोभा युक्त ॥ ३४ ॥ सरोवर तथा जलाशयों का जल फूले हुए कमलों के द्वारा शोभित हुए थे जो प्रत्परत ज्योति के उद्गम से मुनि- गणों के चितों के ही तुल्य ५॥३५॥ तुपाराः सूर्यरश्मीना संगमादगमन् क्षयम् । ममत्वानीव विज्ञानशालिना हृदयात्तदा ॥३६ नि.शकाः कोकिलाः शब्द तन्वते म्म तदान्वहम् । प्राणिव्यधनपुप्पेषु पुष्पज्याशब्दवन् भृशम् ।।३७ चकू जुर्भमरास्तत्र वनान्तर्गतपुष्पगा. । कान्तालीलावुभुक्षोस्तु स्मरव्याघस्य शब्दवत् ॥३८ चन्द्रस्तुपारवभानुनंचंता सकला. कलाः । क्रमादभार मोहाय जनाना कुशल भुवि ॥३६ प्रसन्नाः सह चन्द्रेण निस्तुपारास्तदाभवन् । विभावर्यः प्रियेणेव कामिन्यः सुमनोहरा ॥४० तस्मिन् काले महादेव सह सत्या घरोतमे। रेमे अ मुचिरं नो निजेप दरोप च ॥४१ १५४ [पानिरा पुगत मूर्य की किरणों के सङ्गम से तुपारक्षय को प्राप्त हो गये थे। उस समय मे उन तुपारी या क्षय विज्ञान शाली पुरपी के हृदय से ममन्द की ही भांति हुआ पा ॥३६॥ उम ममय में प्रतिदिन योयने नि.शा होकर अपनी मधुर ध्वनि का विस्तार कर रही थी। जो प्राणिव्यान पुष्पो में बहुत ही अधिक पुष्पो की ज्या (धनुप को डोरी ) के शब्द की ही भांति था ॥३७॥ वहाँ पर भ्रमर वनो के अन्तर्गत पुप्पी में गमन करने वाले प्रमर कान्ता को लीला की भूख वाले कामदेव रूपी व्याघ्र की ध्वनि की ही भांति बजन कर रहे थे ॥३८॥ चन्द्र तुपार की भांति था और भानु सकल कलाओ वाला नही था । यह क्रम में जनों के मोह के लिये पुशलता पूर्वक इन कलाओ को धारण करता था ॥३६॥ उम समय में चन्द्रमा के माथ प्रसन्न और तुषार से रहित विभावरी मुमनी- हर कामिनिया प्रिय के साथ की भांति ही हो गयी थी।॥४०॥ उस समय मे महादेव उत्तम धरा में अभबा धरा म उत्तम मे सती के साथ बहुत समय तक दरियो में और कुञ्जो मे छन्न होकर रमण करते थे ।। ४१॥ ॥ हिमाद्र निवास गमन ॥ कदाचिदथ दक्षस्य तनया जलदागमे । जगदाद्रेः शिखरिण. प्रस्थथं वृषभध्वजम् ॥१ पनागमोऽयं सम्प्राप्तः काल परमदुःसह । अनेकवर्णमेघोस्थगिताम्वरदिचयः ॥२ विवान्ति वाता हृदयं दारयन्तोतिवेगिनः । कदम्बरजसाधौतपायोलेशादिवषिणः ॥३ मेघानां गजितरच्चंर्धारासारं विमुचताम् ।
हिमाद निवाम गमन ] विद्युतपताकिनान्तोदं . क्षन्ध कस्य न मानसम् ॥४ न सूर्यो दृश्यते नापि मेघाच्छन्नो निशापतिः । दिवापि रात्रिबद्भाति विरहिव्यत्ययाकरम् ॥ मेघा नेका तिउन्जो ध्वनन्त पवारिता । पतन्त इव लोयाना दृश्यन्ते मूनि शबर १६ वाताहना महावृक्षा नत्यन्त इव चाम्बरे । दृश्यन्ते हर भीरुणा त्रासका कामुकेमिता १७ स्निग्धनीलाञ्जनश्याममुदिरोधस्य पृष्ठत । पलाकाराजि भत्युिच्चयमुनाघूटनिवन् 115 मार्कण्डेय मुनि ने कहा-इसके अनन्नर किमी ममय म दक्ष की पुरी सती ने जलदो के बागम में यदि (पर्वत) भियगे के प्रस्य में मस्थित वृषभध्वज में बोली पी ॥१॥ सती ने कहा-मेघों के ममागम का समय प्राप्त हो गया है। यह शाल पाम मह होता है। अना वर्णों वाले मेघों के समुदाय में आराम और दिशायें गव स्थगित बर्षात छन हो गये हैं ॥२॥ अत्यन्न देशबानी दायु हृदय को विदो करती हुई वहन करती है। जो वापु दम्ब र पुमो पराग मे धौत परायो- सा आदि यो वर्षा वाले हैं । ॥ विद्यदमी पनामा बाल मेपो की केपी और तोर गर्जना मे जो मेघ धाग मारग मोचन पर रहे हैं मिरे मन शुरध नहीं होते हैं अर्पा सभी मन म सोम उत्पन्न हो जाया गया है. इन समय में मूर्य दिपलाई नहीं पता है और मेपो में सन्दमा भी माल हो गया था। और इस समय में दिल भी रात्रि को प्रांति प्रतीत होता है। पर ममय विरोही जनों को रहत ही सपा पर दाना है ॥५॥ है मप एक जगह पं स्थित नहीं रहा करने है। ये गर्जनको प्वनि करते हुए पवन से गित अदि प्रति एवं पनापमान होते हैं। है गद्दार । ऐमें प्रतीत होते है मानों मोगोरे माई पर गिर रहे हों ऐम ही रिवनाईदिदा कसं ६ बायु मेहन [ पालिका पुन हुए वृक्षत भावाश म नृत्यसा परते हुए दिखलाई दिया परत हैं । ह हर । ये कामुक पुरुषो के ईक्षित है और भोरओ को वाण दरें दान हैं ॥७॥ सिग्ध नील अगम के गमान श्याम मुदिरों के योग को पीछे मे वलाकाओं को पते यमुना में घुष्ट फेन व ही समान शोभा देवी है ।।८।। क्षण क्षण चचलेय हायते कालिका गता। अम्बुधाविष सन्दीप्त पावका वडवामुख ॥६ प्ररोहन्ति हि शस्पानि मन्दिरमागणेष्वपि । किमन्यत्र विरुपाक्ष शस्पोद्भूति वदाम्यहम् ॥१० श्यामल राजते पक्षविशदोऽय हिमाचल । मन्दराश्रमवृक्षौघपत्रर्दुग्धाम्बुधिर्यथा ॥११ कुसुमधीश्च कुटज भेजे मास्याय किंशुकान ! उच्चावचा कलौ लदमीयथा सन्त्यज्य सज्जनान, 1१२ मयूरा स्तनीयलूना शब्देन हर्षिता मुहु । केवायन्ते प्रतिवन सतत वृष्टिसूचका ॥१३ मेघोन्मुखाना मधुरश्चतकाना स्वनो हर । श्रू यतातिमत्ताना वृष्ठिसन्निधिसूचक ॥१४ यह गत कालिका क्षण-क्षण में चन्चल है ऐसी दिखलाई दिया करती हैं । जैसे सागर में मन्दीप्त वडवा मुख पावक होता है । " मन्दिर के प्राङ्गणी म भी शस्य पुरूद होते हैं । हे विरूपाक्ष । अन्य स्थान में मैं शास्त्री की उदभूति ( उत्पत्ति ) को क्या बतलाऊँ ॥१०॥ श्यामल और राजत पक्षो से यह हिमवान विशद हो रहा है जिस तरह से मन्दर अचल के वृक्षो के समुदाय के पत्रो मे क्षीर सागर होता है। ॥११॥ यह कुमुमो की थी इसके कुटज का सेवन करती है। इसके अनन्तर उच्चावर विशुको का सेवन दिया करती है जिस तरह से हालियर में सभी सरजनों वा त्याग र दिया परती है ||१२॥ मयूर हिमाद निवास यमन मेयो की ध्वनि से बार-बार परम हर्षित होते हैं और वे निरन्तर वृष्टि दी मूचना देने वाले हर एक वन में अपनी वाणो को दोला करने हैं ॥ १३॥ हे हर ! अत्यन्न मत्त मेयो की ओर मुख किये हुए घातको ध्वनि का आप प्रवण करिए जो कि दृष्टि को समीपना की सूचना देने वाला है ॥१४॥ गगने शकचापेन कृतं साम्प्रतमास्पदम् । धारासार-शरस्ताप भेत्तु प्रति ययोद्गतः ॥१५ मेघानां पश्य भार्गेह दुर्नय करकोत्करः । यतारयन्त्यनुगतं मयूरं चातकं तथा ॥१६ शिखिसार गयोदृष्ट्वा मिनादपि पराभवम् । हंसा गच्छति गिरिश विदूरमपि मानसम् ।।१७ एतस्मिन् विपमे काले नोडं कारा कोरकाः । कुर्वन्ति त्वं विना गेहात् कथं शान्तिमवाप्स्यसि ॥१८ महती वाचते भीतिमा मेगोत्या पिनाकवृक् । यतस्व तस्माद्वासाय मा चिर वचनान्मम ||१६ कैलासे वा हिमाद्रो वा महाकोप्यामय क्षिती। तवोपयोग्यं त्वं वासं कुरुप्व वृषभध्वज ॥२० एवमुक्तस्तदा शम्भुर्दाक्षायण्या तया सकृत् । इपज्जहास शार्पस्यचन्द्ररश्मिसिताननः ।।२१ अयोवाच सती देवी स्मितभिन्नोप्ठसम्पूरः। महात्मा गवंतत्वज्ञस्तोपयन् परमेश्वरीम् ॥२२ इम ममय में आकाग में इन के अनुप मे अपना म्यान बना लिया है अदि इन पनुप दिखलाई देता है। जिस प्रकार से धारा के गरों से ताप रा भेदन करने के लिये मानो यह उद्गन हुमा होदे ।१५। मेघों के अन्याय को देखिए जो किपटको बर्याद बोलीमा उलट उसो त जाता और अनुमान स्पार को ताक पल रहा है।
१५८ [ कानिका पुग ॥१६शिखी (मयूर ) और सारङ्ग का पराभव मित्र से भी दावर हे गिरिश । हस बहुत दूर देश म स्थित मान सरोवर यो गमन किया करते हैं ॥१७॥ इस विषय काल में कण्टक और कोरव अपने घौंसलो को की रचना क्यिा करते हैं । आप बिना गैह के किस प्रकार से शान्ति को प्राप्त करते हैं । १६ ।। हे पिनाक धनुप ये धारण करने वाले । यह विशाल मेघो से उठी हुई भोति ( डर ) मुसको बाघ कर रही है । अतएव मेरे कहने से आप शीघ्र ही निवास स्थान के लिए यत्न करिए ॥१६ ।। हे वृषभध्वज | कैलाश मैं अथवा हिमालय गिरि में--माह कोपी मे या भूमि में आप अपने योग्य निवास स्थान को बनाइए ।२०। उस दाक्षायणो के द्वारा एक बार ही इस प्रकार से कहे हुए शम्भु ने उस समय मे थाडा हास किया था जो शम्भु अपने मस्तक में स्थित चन्द्रमा की रश्मियो ससित आनन (मुख । वाले ये । २१ ।। इसके अनन्तर महान आत्मा वाले सभी तत्त्वो के ज्ञान से सुसम्पन्न-मन्द मुस्करा हट से अपने होठो के सम्पुट का भेद न करने वाले शिव परमेश्वरी देवी को तुष्ट हुए उम देवी से बोले थे ॥२२॥ यत्र प्रीत्यं मया कार्यों वासस्तव मनोहरे । मेघास्तत्र न गन्तार कदाचिदपि मप्रिये ॥२३ मेघा नितम्वपर्यन्त सचरन्ति महीभृत । सदा प्रालेयधाम्नस्तु वस्विपि मनोहरे ॥२४ कलासस्य तथा देवी यावदामेखल घना.। सचरन्ति न गच्छन्ति तस्मादूध कदाचन ॥२५ सुमेरोर्वारिधेरूधं न गच्छन्ति वलाता । जानुमूल समासाथ पुष्करावर्तकादय ॥२६ एतेषु च गिरीन्द्रपु यस्योपरि तवेहते । मन प्रिये निवामाय तमाचक्ष्व दुत मयि ।।२७ करते हिमार निवास गमन ] स्वेच्छाविहारैस्तव कोतुकानि सुवर्णपक्षानिलवृन्द। शकुन्तवर्ग मधुरस्वनस्ते सदोपदेयानि गिरौ हिमोत्थे ॥२८ ईश्वर ने कहा- हे मनोहरे ! आपकी प्रीति के लिये जहाँ पर भी मुझे निवास करना चाहिये है मेरी प्यारी । वहां पर मेप कभी भी गमन करने वाले नही होगे ।।२३। इस महीभूत अति पर्वत के नितम्द के ममीय पर्यन्त ही मेघ मशरण किया करते हैं । हे मनोहरे ! वर्षा ऋतु मे भी इम मातेप के धाम गिरि के अन्दर मदा मेघों की गति वही तक है ॥२४॥ उसी भांति कैलास को जहां तक मेखला है वही तक मेघ सारण करते हैं । उसके ऊपर वे कभी भी नहीं गमन किया करत हैं |२५|| सुमेरु के वारिधि के ऊपर वलाहब (मेघ) नही जाया करते हैं । पुष्कर और आवर्तक प्रभृति उसके ज'नुओ के मूल तक ही रहते हैं। ॥२६॥ इन गिरी-द्रो पर जिसके भी ऊपर आपकी इच्छा हो। हे प्रिये ! जहाँ पर भी आपका मन हो वही थाप मुलको शीन ही यतला दीजिए। । २७॥ सस हिमोत्य गिरि मे स्पंन्छा पूर्वक विहारी के द्वारा आपके योतुक उपदेय है जहां पर मुवर्ण पक्षों के द्वारा अनिलो के वृन्दो से और मधुर ध्वनि धाले पदियो से तुम्हारे कौतुर होगे ॥२८॥ सिद्धागनास्ते मयिता सनातनीमिच्छन्त्य एवोपकृति सकौतुकाम् । स्वेच्छाविहारमणिकुट्टिमे गिरी पुर्वन्त्य एप्पन्ति फलादिदानकः ॥२६ या देवकन्या गिरिकन्यकाश्च या नागकन्याश्च सुरंगमुख्य. । सर्वास्तु तास्ते सतत सहायता समाचरिष्यन्त्यनुमोदविभ्रमः ॥३० स्प तवेदमतुल वदनं सुचाए दगना निजवपुनिजकान्तिसंघम् । हेला निजे वपुषि रूपगुणपु नित्य कतरि इत्यनिमिपेक्षणचारपाः ॥३१ या मेनका पर्वतराजजाया रूपगुपः स्यातवती त्रिलोये । सा चापि ते तत्र मनोनुमोद नित्य परिप्यत्यय मूचनाय. ।।३२ १६० [ शामिमा पुगन पुरन्ध्रिवर्गगिरिराजवन्ध प्रीति वितन्यदिभरदाररूपाम् । शिक्षा सदा ते स्वकुलोचितापि कार्यान्वह प्रीतियता गुणोपं. ॥ यिचित्रकोकिलालापमोदकुञ्जगणावृतम् । मदा वसन्तप्रभवं गन्तुमिच्छसि कि प्रिये ॥३४ मवंकाम प्रदेवृक्ष शाहलं कल्प सशक । सञ्छन्न यस्य कुसुमान्युपयोदयसि तत्र वै ॥३५ सिद्धो यी अङ्गनाएं आपके साथ मखिता की अर्थात मनातनी मखी की भावना को इच्छा परने वाली होती हुई म्वेच्छा पूर्वक विहारों के द्वारा मणि कुहिम पर्वत पर कौतुक के सहित आपका उपरार भरती हुई फल आदि दानो के सहित महाँ पर आयेगी ॥२॥ जो देवों की कन्याऐ है और जो गिरि की कन्याऐ है जो तुरङ्ग मुखी नागो की कन्यकाऐ हैं वे सभी निरन्तर आपकी सहायता करती हुई अनुमोद के विभ्रमो के द्वारा समाचरण करेगी ॥३०॥ आपका यह अतुल अर्थाद ऐसा है जिमकी तुलना न हो, रूप है । आपका मुख परम सुन्दर है। अङ्गला अपने शरीर की कान्ति के संघ को देखकर अपने वपु मे और रूप गुणो मे खेला करे गी इसमे निनिमेष ईक्षण से चारु रूप वाली है । ॥३१॥ जो मैंनका अप्सरा पर्वत राज की जाया के रूप और गुणो से तीनो लोको मे ख्याति वाली हुई यो वह भी सूचनाओ से आपके मन का अनुमोदन नित्य ही किया करेंगी ॥३२॥ गिरि राज के द्वारा वन्दना करने के गोग्य पुरन्ध्रि वर्गों के साय उदार रूपा प्रीति का विस्तार करतो हुई उनके द्वारा सदा अपने कुल के लिए उचिता भी गुणों के समुदायों से प्रीति से समन्वित प्रति दिन आपको शिक्षा करने के योग्य है ।।३३।। हे प्रिये । अतीव विचित्र कोमलो के सताप और मोद से कुञ्जो के समुदाय से समावृत होने वाले और जहाँ पर और सदा ही वसन्त का प्रभाव विद्यमान रहता है क्या वहाँ श्राप नयन करना चाहती हैं ? २४ा समस्त कामनाओ के प्रदान करने वाले वृक्षो से और कल्प सज्ञा हिमाद्र निवास ममन चाल गाद्वंला म ा मच्छन्न है वहां पर जिमुक कुमुना का उपयाय कपी ॥३॥ प्रगान्तश्वापदगण मुनिगियंनिभितम् । देवालय महामागे नानामृगगणव तम् ॥३६ म्फटिकम्वर्णवद्याथै राजतं विराजिनम् । मानसादिसरोवगैरभिन परिशोभितम् ॥३॥ हिरमन्यं रत्ननालं पकर्जमुकुलवृतम् । शिशुमारंस्तथा शवं कच्छप कर संप । नियेवितमजुलश्च तथानीलोत्पलादिनि ॥१८ देवीशतस्नानमक्तसर्वगन्धंच कु कुम । विचित्रनगगन्धजलंरापूर्ण स्वच्छकालिभि ॥३६ शास्तभिस्तुगस्तीरस्यस्पशोभित । नृत्यद्भिरिद शाखांचंयंजयन्त स्वसाभवम ॥४० कादम्ब सारसमंत्त वनागग्रामशोभित । मधु गरादिभिर्मोदकारिभिद्ममरादिभिः ॥४१ वासवस्य कुवेरसर यमस्य धरणम्य च । अग्ने कोणपराजस्य मारतस्य हरस्य च ॥१२ पुरीभि मोमिशिरूर मेरुमुच्च गुरालयम् । रम्मागचोमेनकादिरम्भोरगगणनेवितम् ॥ फित्वमिच्चसि सर्वेषा सारभून महागिरिम् ।।१३ है महाभाग ! जहाँ पर श्वापद गा परम प्रशान्त है-जी मुनि योर यतिया स सेवित या मकी है मनर प्रकार न म ग स समा• वृत है-हेमा देवा का बालप है ॥३६॥ मटिर वेवण सपुत व वादि स योर रात ( चांदी के निमित) स विराजित है-जो मानस सरावरा में दो सदानो मार परि शमा वाताहै।। ३७ ।। जा हिरण्मय रत्नों नाम वाले पड़ी तपा मुरली में प्रादृत्त है तपा १६२ [ कानिका पुगर देवी में शिशुमार-शख-कच्छा-मकर-सपी के द्वारा निविन और मञ्जुल नीलोत्पल आदि में ममन्विन है ॥३॥ मैकडो स्नानो से सक्त मम्पूर्ण गन्धो वाले कुकमों में युक्त-विक्षेत्र मालाओ के गन्ध में युक्त जलो से अपूर्ण एवं स्वच्छ कान्ति वाले शाद्वलो से--तमओ से जो तोर पर स्थित थे उनसे उपशोभित-मानों नृत्य करते हुए शास्त्रो के समुदायो से अपने सम्भव का व्यञ्जन करते हुए कादम्ब-सारस-मत्त चकाङ्गो के ग्राम ( समुदाय) से शोभित, मधुर ऑन करने वाले--मोद को करने वाले भ्रमर आदि से युक्त- इन्द्र-यम -कुवेर-- ---वरुण की पुरियो से शोभान्वित देवो का आलम भेरु को जो उन्नत है जो रम्भा, शची मेन का आदि रम्भोगण सेविन है। क्या आप सबके सारभून महा गिरि की इच्छा करती है ? ॥३६॥ ॥४०॥४१॥४२॥४३॥ तत्र देवीशतयुता साप्सरोगण सेविता। नित्य चरिष्यति शची तव योग्या सहायताम् ।।४४ अथवा मम कैलासमचलेन्द्र सदाश्रयम् । स्थानमिच्छसि वित्तंशपुरीपरिविराजितम् ॥४५ गगाजलौघायत पूर्णचन्द्रसमप्रभम् । दरीपु सानुयु मदा यक्षकन्याभिरोहितम् ॥४६ नानामृगगणर्जुष्ट पाकरशतावृतम् । सवैY पैश्च सदृश सुमेरोरिव सुन्दरि ॥४७ स्थानेप्वेतेपु यत्रास्ति तवान करणस्पृहा । सद्भुतं मे समाचक्ष्व वास कर्तास्मि तत्र ते ॥४८ वहाँ पर रोक्ड़ी देवियों से समन्वित भारागणों के सहित मंदा को हुई शची ( इन्द्राणी ) आपके लिए समुचित सहायता का यहाँ पर ममाघरण करेगी ॥४४॥ अयवा मेरे फैलास अचसो के शिरोमणि यो मापुरषो का आश्रय और विजेणे कशेर की पुरी में परिगणित हिमाद्र निवाम गमन ] क्या ऐमे म्यान प्राप्त करने की इच्छा करती हा ॥शा है सुन्दरि ! गङ्गाजल के ओद्य मे प्रपत--पूर्ण चन्द्रमा को प्रभा के समान प्रभा मे मंयुन-दरियो म और सानुओ में (शिवगे मे ) सदा यक्ष की कन्याओं से सभीहित अनेक मृग गणा में ममेषित-संक्डो पद्मावरी से समावृत जो सभी गुणगणों से सुमेरु को तरह ही तुल्य है ॥४६॥ ॥४७॥ इन स्थानो मे जहाँ पर भी आपके अन्तकरण की म्यूहा हो उमे शीघ ही मुझको वनलाहो यहाँ प ही में आपका निशम म्यान बना दूंगा ॥४॥ इतोरित शकरेण तदा दाक्षायणी शनं । इदमाह महादेव श्लदणं स्वेच्छाप्रकाशकम् ॥४६ हिमाद्रावेर वसतिमहमिच्छे नया सह । न चिरात् कुरुवास त्व तस्मिन्नेव महागिरी ॥५० यय तद्वाक्यमाकण्यं हर. परममोदित । हिमाद्रिशिखर तुङ्ग दाक्षायप्पा सम यमौ ॥५१ मिद्धाङ्गनागणयुक्तमगम्य मेधपक्षिभि । जगाम शिखर तुज मरीच वनराजितम् ॥५२ मार्कण्डेय मुनि ने कहा---इस प्रकार में भगवान् शकर के द्वारा पहने पर उस अवसर पर दाक्षाय जी ने धीरे से महादेवजी में परम ल- पण तथा अपनी इच्छा का प्रकाशित घरने वाला यह वचन दहा था । ॥४६सती न वहा-इस हिमालय म ही में अपना निवाम बापके साप चाहती हूँ। आप शीघ्र ही इस महागिरि म ही निवास बरिया५॥ मार्कण्डेय महाप ने कहा- इसके अनन्तर उम देवी सती में वाक्य का श्रवण पर भगवान शकर परमाधिर प्रसल हुए और उस दाक्षायणी के साय उन्नत जा हिमवान की गिखर यो उस पर चले गए पे ॥५१॥ यह हिमालय का शियर सिद्धो की अङ्गनाओ मतों से युक्त था और मैप एव पक्षियों के लिए भी अगम्य या । अर्यात वहाँ पर मेध तथा पक्षी १६४ [ यातिया पुराण । भी नहीं जा सकते थे। उसके परमोन्नत तया मरीचक्न म मुगामिन शिखर पर उन्होंने गमन किया था ॥५२॥ 060 ॥ सती देह त्याग वर्णन ।। विचित्र कनक स्प्य शिखर रत्नकर्तुरम् । वालाकसदृश तुङ्ग माससाद सतीसख १ स्फटिकाश्मलय तस्मिन् शाद्वलद्रुमराजिते । विचित्रपुष्पवल्लीभि सरसीभिश्च सयुते । प्रफुल्लतरुशाखाग्रगुञ्जभ्रमरभूपिते ॥२ पकेरहै प्रफुल्ल नीलोत्पलचयस्तया । शोभिते चक्रबाकीधै कादम्बहसमद्गुभि ॥३ प्रमत्तमारसं क्रौञ्चीलकण्ठंश्च शब्दिते । मोक्लिास्वानमपुर गमेविते ।।४ तुरगवदन मिद्धरप्सरोभि मगुह्यक । विद्याधरीभिर्देवीमि किन्नरी विहारित । पुरन्प्रीभि पार्वतीभि कन्याभिश्च समन्विते ।।५ विपञ्चौतन्त्रिकामन्द्र मृदगपटहस्वन । नृत्यद्भिरप्सरोभिश्च कौतुषोत्यै सशोभिते ॥६ देवोलताभिदिव्याभिर्गन्धिनीभि समावृते । ऊदप्रफुल्लवुसुमंनियुजैरुपशाभिते ॥७ माण्डय मुनि ने कहा-वह कनका से सपा से रन पर गिपर पावर शिवर वाम गूप के समान उन्नत था। उग शिखर मा सती या शियन प्राप्त किया था ।।१।। उसम जास्फटिक पापाण राया और शाम एव इ.मी मे गजित या विचित्र पुणो की
मीदाग वर्णन ]
मतामा म तया अगवग ने मयुन था, जिनमे प्रहल्लिन वृक्षो की
शाखाओं की टहनियों पर गुजार करत हुए प्रमरों के द्वारा परम
मोमा हो रही थी ॥२॥ विकसित कमलो के द्वारा तया नील कमलों के
समुदायों के द्वारा-चकवाना नगृहाँ मे और कादम्ब हममद्गुणे से
शोभिन था ॥३॥ प्रमत्त माग्न-ौच और नीकल इनसे जो
भन्दायमान या एव पुरोपितों की मधुर धनियों म नया मृगो से
मंदित था तुरग के मनान मुखों वाले मिदों में अप्सराओं ने और
गुह्मों मे--विद्याधरा मे-देवियो मे नया किन्नरों के द्वारा विहार किया
हुआ था । पर्वतीय पुरन्धियों मे बोर न्यायो मे वह ममन्दित है |
विपन्थी शन्त्रिका मन्द-मृदङ्ग-पटह की ध्वनियो म और नृत्य करती
हुई कौतुक ने ममुत्यन यष्पराओं के द्वारा सुमित ॥६॥ देवी-दिन्य
और गन्ध युक्त लताजो मे ममावृत- प्रफुल्ल कुमुमा से तपा
निकुन्त्रों में शोभायमान न्यान है ।।
जलराजपुरान्याने शिवरे वृपमध्वन ।
सह मत्या चिर रेमे एवम्भूने शुशोमने II
तस्मिन वर्गममे स्थान दिन्यमानन शकर।
दश वर्षनस्राणि रेमे सन्या मम मुदा Ils
सक्दाचित्त ततम्यानात लास याति शकर।
कदाचिन्मेरशियर देवदेवीवृत पुरा ||१०
दिक्पालाना तयोद्यान वनानि वसुधाउलम् ।
गन्वा गत्वा पुनन्तत्र में तेभ्य सतोनख ११
न जाम दिवारान ब्रह्म न तप-शनम् ।
मत्यालिमना शम्भु प्रोतिमेव चकार ह ॥१०
एक महादेवमुख मनी पन्यति सवंग।
महादेवोऽपि मर्वत्र नदादासीन मोमुखम् ।।१३
एवमन्योससदिनुरागमहीरहन् ।
वयामामतु शम्भुसत्यो भावाम्बुमेचनं ॥१४
१६६
[ बानिया पुराण
गैलराज के पुर व ममा म जा शिखर है उमम दृषभध्वज न
इस प्रकार से समन्वित एव मुशामन म सतो व माथ चिरसाल पयन्त
रमण किया था। उस स्वग व सहश स्थान म भगवान शार न
दिपमान में दश हजार वप नद आनद सहित मता देवी के माथ रमा
किया था ॥ ६ ॥ पहिल यह शङ्कर भगव न विमी ममय म उस स्थान
स कलाम पर चल जाया करत है। किसी समय म देवो और देवियर
से समावृत मेरु पवत की शिखर पर चले जाते हैं ॥ १० ॥ उसी भाटि
दिक्पालो के उद्यान म-वनों मे और वसुधा तल म जा जाकर पुन
वहां पर सती को माथ में लिये हुए उनमे रमण किया करते थे ।११
उन्होंने रात दिन को नहीं जाना था-न तो व ब्रह्म का चितन करते
थे-म तप और शम का ही समाचग्ण विया करते थे। सती के अदर
आहित मन वाले शम्भु न केवर प्रीति ही की थी ॥ १२॥ मती सभी
ओर म केवल एक महादेवी व ही मुख को देखा करती थी और महा
देवजी भी निग्नर सभी जगह म सवदा सती के ही मुख का अवलोकन
किया करत ये ॥१३॥ इस रीति स परस्पर म एक-दूसर प समग से
अनुराग रूपी वृक्ष को सती और शम्भु ने भावरूपी जल के सेवन के
द्वारा वधित कर दिया था।१४)
एतस्मिन्नन्तरे दक्षो जगता हितकारक ।
महायज्ञ समारेभे यप्टु व सर्वजीवनम् ॥१५
अष्टाशीति सहस्राणि यत्र जुह्वति ऋत्विज ।
उद्गातारश्चतु पष्टिसहस्राणि सुरर्षय ।
अध्वयंवोऽय होतारस्तावन्तो नारदादयः ।।१६
अधिस्याता स्वय विष्णु सह सर्वमरुदगण ।
स्थय तनाभवद् ब्रह्मा यी विधिनिदर्शक ॥१७
नर्थव सर्वदियपाला द्वारपालाश्च रक्षका ।
उपनस्ये स्वय यश स्वय वेदी घराभवत् ॥१८
ननी देह काग यन ] तनूनपादपि नि पम्प सहनशः । हविपा ग्रहणायागु तस्मिन् यजमहोत्सवे ॥१॥ आमच्याशु मरीच्याद्याः पवित्रधारिणः। सर्वत्र सामिधेन्या ते ज्वालयामामुरच्चिपम् ।।२० मप्तय: मामगाया कुर्वन्ति म पृथक पृथक् । गान्दिशो विदिशः मञ्च पूरयन युतिम्वरः ॥२१ इसी बीच में पनों हिम को करने वाले प्रजापति दर ने पर महान् पत्र के मत काटेका समारम्भ किया था वो शिम- जीरन था ।१५। जहाँ पर बयासी हवार ऋत्विा हवन करते है । है गुरपियो ! उसने चीनट हमार उदगाना । उदने हो बस बाद धौर नारद यादि होदामन में 1१६॥ समस्त मदनकों ने माप विष्णु भगवान न्वय ही अधिहाला ए म । ब्रह्माजी म्बर वहाँ पर सो को विधिस्य निदर्शन ।१५। उनी भांति मर दिवान उम्रे द्वारपार और रक्षा से वहां पर यम व उपस्थित हुआ था और घरा म्दर वेदी हुई पी अोइ वो न ही म्बम देवी का दिप धारप रिपा पा मनुनाद ( अग्नि) ने मी अपना प महनों प्रकार का बना लिया या। अग्नि नं ठग मन के महमद में हविदों के मीर हम मरने रेग्दि ही अपने अनेक स्वरुप धारण विगै ॥१६॥ जोहो मगेनि मादिको बामग्मित पर जो पवित्र धारण करने वाले पे वही पर दुलारा था और उन्होंने मामिनी कोलिन रिसा पा॥२०॥ मनपि मन परपर समापार में गरि अनियों में दरों में पृषी को-मित्रो को कोर विदिशानी को एवं यासरायकोपरित रहे न वृतास्वन मागेप दोग मुनमामना ! न येचिपनो देवा न मनुप्या न पक्षिणः । नोदिनदो न तृपं वापि पशवो न मृगान्तया ॥२२
[ कालिका पुरा
गन्धर्वविद्याधरसिद्धसधानादित्यसाध्यपिंगणान् सयक्षान् ।
सस्थावरान्नागवरान् समस्तान को स दक्ष सुमहाध्वरेषु ॥२३
कल्प मन्वन्तरयुग वप मास दिवा-निशा ।
क्ला-काष्ठानिर्मपाद्या वृता सव समागता ।।२४
महर्पिराजर्पिसुपिसवा नृपा सपुत्रा सचिव ससंन्यः ।
वसुप्रमुख्या गणदेवता या सत्रा वृतास्तन गता मख तम् ॥२५
कोटा पतगा जलजाश्च सब सवानरा श्वापदविघ्नघोरा ।
मेधा सशंला सनदोसमुद्रा' सरामि वाप्यश्च गता वृतास्ते ।।२७
सर्वे स्वभाग हविषा जिघृक्षत्र ऋतु प्रजग्मु ढयज्विनस्ते।
पातालवासा असुरा समागता नागस्त्रियो देवसभा समस्ता ॥
महात्मा दक्ष ने वहाँ पर यागा मे किन्ही को भी वृत नहीं किया
था। न भा कोई ऋपिगण-न देवगण-न मनुष्य और न पक्षीगण-
न उभेद - तण न पशु और न मग ही वृत किये गये 2 ।। २२ ॥
उस दक्ष सुमगध्वरो में गर्मा-विद्याधर --सिद्धो के समुदाय
आदित्य-साध्य-ऋषिगण-यक्ष-समस्त स्थावर नागवर घृत नहीं
रिया था ।।२३।। वल्ल-मन्व तर युग-वर--मास-दिन-रात्रि---
वला-पाठा-निमेष आदि सब वृत किये हुए वहाँ पर सव समागत
हए थे ॥ २४ ॥ उस दस के द्वारा वृत किय गए महपि-राजपि--
मुरपि सप-पुत्रा माहत नृप पण देवता य मब उस मख यागत
हुए प॥२५॥ पोट-पतङ्ग-सब जल में समुत्पन्न जीव-भानर---
श्वापद-धार विघ्न-~मघ-और-नदियाँ और समुद्र-सरोवर-
पापी वृत हुए थे और सब गय पं ॥२७॥ सभी हविया में अपने भाग
को ग्रहण करन की इच्छा वाल थे। वे दृद यज्चीवतु म गमन करन
वाले हुए ५। पाताल म निवास परन वाला असुर भी यहाँ पर
ममागत हुए थे। नागों की स्त्रियों और समस्त दवो की सभा आई
भी॥२८॥
गती देह त्याग वर्णन ]
जगद्वत्यस्ति यविचिच्चतनावेतन पुन ।
सर्व वृत्वा समारंभे यन सर्वम्वदक्षिणम् ॥
तस्मिन यने दृत शम्भुनंदक्षेण महात्मना ।
क्पालीति विनिश्चिन्य तन्य यमाईता न हि ।।३०
पालिमायेदि मनी दयितापि मृता निजा।
नाहूता या विपये दक्षेण दोपदचिना ॥३१
ध्रुत्वा सवौ तथा वन तातेनारगुतमम् ।
कपालिभाति वृता नाहमित्यपि तत्वन ॥३२
उच्चरच्कोप दक्षार रागानना तदा ।
शशापेन दक्ष दयु च मनश्चक्रेनदा सा ॥३३
पोपाविटापि सा पूर्वनमय न्मृतवचमुम् ।
मनमेनि विनिश्चिन्य न पशाप तदा मतो ॥३४
प्रल शापेन ने पूर्व सुदृढ ममय त ।
अस्तीति मय्यवहाया प्राणान् मोक्ष्ये ध्रुव पृन ।।:५
जो पुल भी इस चगा ने वर्तन करने वाले थे चाहे चेतन हो
या अचेतन होने सदमें दरण कर इस इवम्ब दक्षिणा वाले यज्ञ का
समार दिया था ॥२३] उम रज में महात्मा दस ने मावान् शन्भु
का वरण नहीं किया या बर्याच शम्मु मे आमन्त्र नहीं दिया था:
शम्भु कपाल धारण करने वाले हैं अतएव उन पन व सम्मिलित होन
की भोग्यता ही नहीं है- ऐसा ही निनय करे मन मे निमन्त्रित
नहीं दिया गया था ॥३०॥ सती मी पदार परमार अपनी पुत्री को
किन्तु क्योंकि वह मी माती मिवरीमा है बटएम उमो मो वृत
नहीं दिया था क्योंकि यज्ञ में विपर मटक्षनोपा का विवाद कर
लिया था ॥३१॥ नती ने यह अवर वर कि पिता ने एक उत्तम
पज करने का बारम्भ किया है किन्तु वदावि में पालधारी की मार्ग
है इमो निरे वास्तव में मुगको नहीं दुलाया गर है ॥३२ । दह सनी
[ यामिरा पुग अत्यात क्रोधित होगयी थी जो कि अपने पिता दक्ष के ही पर उनको हुआ था। उस अवसर पर उनका मुख और नेत्र शोध में पाल हो गये थे। उसी समय में सती ने शाप के द्वारा दक्ष प्रजापति यो दाध करने के लिये मनन किया था ॥३३॥ यद्यपि वह मती ग्रोथ में आविष्ट थी तो भी इम पूर्व समय का उमने स्मरण किया था। मनसे ऐसा निश्चय करके उस समय मे सती ने शाप नहीं दिया था ॥३५॥ शाप नहीं दिया जावे क्योकि मैंने पहिले दृढ प्रतिज्ञा की है। मेरी अवज्ञा होने पर मैं फिर निश्चय ही अपने प्राणो का परित्याग कर दंगी ॥३५॥ यदा स्तुताहं दक्षेण सुचिर तनयार्थिना । तदैव समयो मेऽयं शापेनालंकरोमि तम् ॥३६ इति सञ्चिन्त्य सा देवी नित्यरूपमयात्मनः । सस्मारातुलमत्युग्र निष्फल तु जगन्मयम् ॥३७ पूर्वरूप स्मरन्ती सा योगनिद्राह्वय हरेः । एवं संचिन्तयामास मनसा दक्षजा नदा ॥३८ ब्रह्मणोदितदक्षेण यदर्थमहमीडिता । तकिञ्चिदपि नोज्ञात शकरोऽपि न पुत्रवान ॥३६ इदानीमेकमेवाभूत् कार्य देवगणस्य च । यच्छंकरः मानुरागो मत्कृतेऽभूच्च योपिनि १४० मत्तो नान्या पुनः शम्भो राग वर्धयितु पुनः । शक्ता न कापि भविता स नान्या संग्रहीष्यति ।।४१ तथा यह तनुत्यक्षे समयान पूर्वयोजितात् । हिताय जगता कुर्या प्रादुर्भाव पुनगिरी ।।४२ जिस समय में दक्ष ने बनया की इच्छा वाला होते हुये बहुत समय तक मेरा स्तवन किया था उसी समय में मैंने यह प्रतिज्ञा की थी कि मैं उरावो शाप नहीं दूंगी ॥३६॥ इसवे अनन्तर आपने नित्य पपा मम देवों ने चिनन करके अत्यन्त उप-निष्फल और जगत मी देह त्याग वर्णन ] १७१ से परिपूर्ण का स्मरण किया था ||३|| उम ममी ने हरि की योग निद्रा नाम वाले पूर्व स्वरूप का स्मरण करती हुई उम समय में दक्ष को पुत्री ने मन के द्वारा इस प्रकार से चिलन रिया था ॥३॥ ब्रह्मा पे द्वारा उदित दक्ष प्रजापनि जिम्दै निरा भेगे स्तुति की थी वह कुछ भी नहीं जाना था और भगवान शम भी पुत्रवान नही हुए हैं । ॥३६॥ इम ममय म ददगण का एक ही कायं मम्मन्न हुआ है कि भगवान भाकर मेरे लिए स्त्री में अनुगग वने व 7 हो गए थे ॥४०॥ मेरे अतिरिक्त अन्य कोई भी शम्मु व अनुराग यी बद्रि करने के लिये ममयं नहीं थी और न कोई होगी क्योकि अन्य किसी को भी शर ग्रहण ही नहीं करेंगे ।।४३॥ तो भी में पूर्व या न समय से पूर्व ही अपने शरीर का त्याग कर दूगी और जगत की भलाई के लिए फिर गिरि अर्थात् हिमवान में अपना प्रादुर्भाव करूंगी ॥१२॥ पुरा हिमवत प्रस्थे रम्ये देवगृहोपमे: शम्भु साधं मया रतु मुचिर प्रीतिसयुत १४३ तत्र या मेनरा देवी चावंगी चरितव्रता। सुशीला सा पुरस्त्रीणमुत्तमा पार्वतीगगे ।।४४ सा मां मातृवदाचष्ट सर्वकर्मसु नमकम् । तम्या मेऽन्यनुरागोभूत सा म माता भविष्यति ॥४५ पन्याभिश्च पावंतीभित्र वात्पीडामह चिरम् । कृत्वा कृत्वा मेनकायाः करिस्य मोदमुत्तमम् ॥४६ पुनश्चाह भविप्यामि शम्मोर्जायामिवल्लमा । हरिप्ये देवकार्याणि तदुपामादमशयम् ॥४३ इति सचिन्तपन्ती सा पुन. कोपनमावृता। जग्वात ददातनया दक्षाणयमंणा। मोधरवतेक्षणा तन तनुपष्टिस्तदा सती। स्फोटचमार द्वाराणि सर्वाप्यावृत्य योगत ४६ [कातिरा पुराण पूर्वकाल म हिमवान् के सुरम्य एव देवो के गृह के सदृश प्रस्थ मे शम्भु ने प्रीति से सपुत मेरे साथ रमण करने वो बहुत समय तक मुझसे प्रेम किया था ।। ४३ ॥ वहाँ पर जो मेनका देवी है वह सुदर अङ्गो वाली और व्रत का समाचरण करने वाली है। वह परम सुशीला और पुर स्त्रियो मे अत्युत्तमा है जो कि पावती के गण है उनमें श्रष्ठ है ।४४। उसमे मेरे साथ एक माता की ही भांति चष्टा की थी जो कि मभी यमो मे यथोचित थी। उसमे भरा अनुराग हो गया था और वह अनुराग ऐसा ही था कि वही मेरी माता होगी ॥४५॥ पवतीय कन्याओ के साथ मैं वचपन की क्रीडा चिर काल पय-त कर करके मेनका की उत्तम प्रसन्नता को उत्पन्न करूंगी ॥४६॥ मैं फिर भगवान शम्भु अत्यन्त प्यारी जाया ( पत्नी) होऊँगी। फिर मैं उनके उपाय से विना विसी समय के देवो के कार्यों को करूंगी ।।४।। इस प्रकार मे चिन्तन करते हुई वह फिर कोप मे ममावृत हो गयी थी। वह दक्ष की कन्या दक्ष प्रजापति वे अति दारण कम से प्रज्वलित होगयी थी। ॥४८॥ वही पर क्रोध में लाल नेत्रो वाली उस समय म अपने शरीर को योग के द्वारा समस्त द्वारो को आवत पर सन्तान स्पोटित कर दिया था ॥४६॥ तेन स्फोटेन महत्ता तस्यास्तु प्राणवायव । निभिद्य दशमद्वारमात्मनस्ते वहिर्ययु ॥५० त्यवनप्राणान्तु ता दृष्ट्वा देवा सर्वेऽन्तरिक्षगा । हाहाकार तदा चा शोव्याकुलितेक्षणा ॥५१ ततस्तु सत्या भगिनीसुता ता द्रष्टुमागता । चुलोम शोवाद्विजया मृता दृष्ट्या मती महु ॥५२ हा सती पव गतासोति हा सती तव पिन्विदम् । हा मातृप्वमरित्युच्चस्तदा शब्दो महानभूत् ।।५३ विप्रियप्रयणादेय प्राणास्त्यरतास्त्वया राति । अह पपन्तु जीवामिाप्टेयग्यिप्रिय हदम् ।।५४ - सती देह साग वर्णन ] पाणिना वदन सत्या मार्जयन्ती मुहमहु । करुण विलपन्तोन्म मुख जिघ्रति मा तदा ॥५५ सिञ्चन्ती नेत्रजस्तोय सत्या सा हदय मुखम् । केशानुल्लास्य पाणिग्याँ वीक्षन्ती वदन मुहु ॥५६ उस महान् म्फोट से उस मती की प्राण वायु आत्मा के दशम द्वार का निर्मदन करके वे वाहिर चली गयी थी ॥५०॥ सब ऋषिगणा ने प्राणो का परित्याग करने वाली च्मको देखकर आकाश म स्थित उन्होंने हा हा पार किया था और वे शोक से व्याकुलित नेत्रो वाले हो गये थे ॥५१॥ इसके अनन्तर उम सती के वहिन की पुत्री वहाँ पर उस सती को देखने के लिय ममागत हुई थी और उस सती को मृत दखकर शोक से पुन विजया ने रुटन किया था ॥ ५२ ।। हा मतो तुम कहां गयी । हा । सती, आप का यह क्या हुआ हा । मौसी ।--इस प्रकार का उस समय म महान् क्रन्दन का शब्द हो गया था |॥५३॥ हे मति । विप्रिय श्रवण करने ही से तुम म अपने प्राणा का परित्य ग कर दिया है। अब मैं ऐसे सुदृढ विप्रिय को दखकर वसे जीवित रहूँ । उस समय मे अपने हाय से सती के मुख का दार-बार माजन करती हुई उसने करणा पूर्वक विलाप करती हुई ने उम सती के गुख को मूघा था ॥५४॥५५।। वह अपन नेत्रो स निकलते हुए जलो से उम मती के हृदय और मुख का सिञ्चन करती हुई हाथो स उसके केशा को उल्लासित करने बार-बार मुख को देख देख रही थी ॥५६॥ ऊपि कम्पितशिरा शोक्व्याकुलितेन्द्रिया। हदय पञ्चशाखाभ्या विनिहन्नी तथा शिर ॥५७ इद च वचन साश्रुक्ण्ठा सा विजयाववोत् । श्रुत्वा ते मरण माना वीरिणी शोकपिता ॥५८ धारयन्ती कय प्राणान् सद्यस्त्यक्ष्यति जीवितम् । स तथा निरनुकोश फरकमा पिता तव 11५६ ?
१७४ [ पालिका पुरा प्रमीता भवती श्रुत्वा कथ धास्यति जीवितम् । विचिन्त्य नून धर्माणि स्वीयानि भवती प्रति । वृतानि स नृशसानि दक्ष शोकाकुतस्तदा ॥६० यज्वा स च ज्ञानहीन क्य यज्ञे प्रवर्तते। नि श्रद्धस्त्यक्त बुद्धिश्च क्थ वा स भवेत् क्रती ॥६१ हा मातर्देहि वचन रदन्त्या वालवन्मम । भवत्या निर्दया शोकाद्धिये शल्यसमानसून ॥६२ त्व कि स्मरसि मे शम्भोविहितस्य यदाचन । तेनाम वश प्राप्ता माता दिन्न भापसे ॥६३ ऊपर और नीचे नी बोर कम्पित शिर वाली शोक से व्याकुल इन्द्रियों से समवित हुई पांचो अगुलियो अपने वक्ष स्थल दो और शिर को पीट रही यो ॥५७॥ उस विजया न अशुओ से युक्त कण्ठ वाली होती हुई यह वचन कहा था। माता वीरणी तेरे मरण का श्रवण करक शोक से कर्पित हो जायेंगी ।।५८।। वह माता कैस प्राणो को धारण करने वाली होगी । वह तो तुरन ही जीवन को त्याग देगी। उसके द्वारा कर कर्म करने वाले आपके पिता निरनुमोश होगे आपको मृत सुनकर से अपना जीवन धारण करेगा 11 आपके प्रति निश्चय हो अपने कर्मों का विचिन्तन करके उस समय मे शोक से ब्याकुल दक्ष ने बहुत ही फू र एव कठोर म किए थे ॥६०11 और ज्ञान ये हीन वह यजन करने वाला होकर कैसे ऋतु के करने म प्रवृत्त हो रहे हैं क्योकि वह श्रद्धा से रहित और बुद्धि का त्याग कर देने वाला है ॥६१॥ हा वालक को भौति रुदन करती हुई मुझे कुछ उत्तर तो दो। भक्ति से दया शून्य मैं शोक स यपन शल्य के ही समान धारण कर रही है ॥६२॥ हे माता ' क्या किसी समय म गम्भु के द्वारा विहित का स्मरण कर रही हो? उससे अमर्प के वश मे प्राप्त हुई मुझसे कुछ भी नही भाषण वरती हो ॥६॥ ये माता । .
मतो देह त्याग वर्णन ] १७५ तदेव वचन चक्षुर्मुखं सा नासिका तव । एतेपा क्व गता सर्व विभ्रमा हसित क्व च ॥६४ ननु ते विनमहीन नेत्रयुग्म सुनासिकम् । स्मितहीन च वचन दृष्ट्वा सोढा कथ हर ॥६५ का सुधासम्मित वाक्य हराश्रमसमागतान । सुन्तं त्वामृते मातवंदिप्यति मुहमहु ॥६६ श्रद्धावती बान्धवेषु पत्युर्भाववशानुगा । सवलक्षणसम्पूर्णा तत्समा का भविष्यति ॥६७ त्वदते देवि देवेश शोकोपहतचेवन । दुखितात्मा निरुत्साहो निश्चेष्टश्च मविप्यति ॥६८ एव तपन्ती भृशदु खिता सती मृता समीक्ष्यातिशय सुचाहता। पपात भूमौ विजया विराव वितन्वती चौधंभुजा प्रवेपती ॥६६ भापका की वचन-धु-व और नासिरा ये सभी हैं। इन सबके सब विभ्रम इस समय मे वहां चले गय हैं और आपका वह हसित भी कहाँ चला गया है ॥६॥ वे भगवान शम्भु आपी विप्रमो में होन मुन्दर नासिका से युक्त--नेत्री से में युग्म बाले-मन्न हास से रहित आपरे मुख को देखकर से यहन परेमेशा ह माता मापके बिना हर वे थायम में समापन हुमा यो चार-चार सुधा ये तुल्य मुरत याक्य मौ दोन बहेगी ॥६६॥ पान्धवो में श्रद्धा वाली योर पति में भायो के वग मे अनुगमन करने वाली सुलक्षणों से पूर्ण उसके गमान पर फोन होगी ॥६॥ है देवि । अब आपके बिना देवेश्वर मम्म गा' म उपहत चेतना पाने होर दुहिन मारमा से युक्त-निर- हमार और पेष्टा हिमहोबायो ॥६इस शनि से दिशेप रूप में दुधिन होरर सती रे नि पिसाप करती हुई विनमा मतो की मृत देवर अरधि में साइन हो गयी थो-कपर मो ओर मुजाओं १७६ [ वालिया पुराण वाली विशय क्रन्दा करती हुई पम्प से सयुत हाती हुई भूमि पर विर गयी थी ॥६६॥ ॥ दक्ष यज्ञ-भङ्ग वर्णन ॥ एतस्मिन्नन्तरे शभु शोभने मानसे ह्रदे। समाप्य सन्ध्यामायात स्वमाश्रमपद प्रति ॥१ आगच्छन्नेव सराव विग्याया धृपध्वज । शुश्राव दारुण तीव्र चक्ति ततोऽभवत् ॥२ तत उदन्वा बलवता मनोमारुतर हसा । स्वमाश्रमपद शर्व आससाद त्वरान्वित ॥३ आसाद्य देवी दयिता तदा दाक्षायणी हर । मृता दृष्ट्वापि न जहाँ मृतेऽतिप्रियभावत ॥४ ततो निरीक्ष्य वदनमामृज्य च पुन पुन । पत्रच्छ कस्मात् सुप्तासीत्येव द्राक्षायणी मुहु ॥५ ततो भर्गवच श्रुत्वा तदा तद्भगिनी सुता। विजया प्राह निधन दाक्षायण्या यथा तथः ॥६ मार्कण्डेय महर्षि ने कहा-इसी बीच मे भगवान शम्भु परम शोभन मानस हुद मे सन्ध्या वन्दना को समाप्त करक आश्रम की ओर ममा पात हुये थे ॥१॥ वृषभ ध्वज ने विजय के परम दारुण और तीव्र मराव अर्थात रुदन की ध्वनि का आते हुए ही श्रवण किया था और फिर वे चक्ति हो गये थे ॥२॥ इसके अनन्तर भगवान शम्भु यलवान मन और मारत के वेग से स्वरावित होकर शीघ्र ही अपने याधम के स्थान पर प्राप्त हो गये थे ॥३॥ उस समय में हर ने प्यारी सायणी देवो यो मृता देखकर भी अन्यधिक प्रिय भाव म मृत होने इस यज्ञ-भङ्ग वर्णन ] १७७ पर भी त्याग नहीं किया था। इसके उपरान्त मुख को देखकर और बार-बार आमृजन करके यह सोई हुई है-इसी प्रकार से दाक्षायणी में बार-बार कैसे पूछा था | इसके उपरान्त भग के वचन का श्रवण करके उसकी वहिन पुनी विजया ने जिस मिस रीति मे दाक्षायणी का निधन कहा था।॥६॥ दक्ष. कतुकतु शम्भो देवान सर्वान, सवासवान् । आजुहाव तथा दैत्यान राक्षसान, सिद्धगुह्यकान् ॥७ ब्राह्मणानय गोविन्दमिन्द्रादीनपि दिक्पतीन् । देवयोनिस्तथा सर्वान साध्यविद्याधरादिकान ।। नाहूतानि तो तेन यानि सत्त्वानि शकर । तानि दक्षेण नो सन्ति समस्तभुवनेप्दपि ।। एव प्रवितत यज्ञ थ त्वंपा वचनान्मम । विमृप्यवत्यनाव्हाने हेतु शम्भोरथात्मनः ॥१० चिन्तयाना तथाह ता सती ज्ञात्वा यथाथु तम् । उक्तवत्यस्मि भूतेश यज्ञानाहानकारणम् ॥११ शम्भुः कपाली तद्जाया तत्ससर्गाद्विगर्हिता। अत. शम्भु. सतो चापि नावरे मे मिलिप्यत ।।१२ इत्यनाह्वानहेतुम श्रुतपूर्वः पुरा मुखान् । दक्षस्य वोरिणी श्वलक्ष्णा गदतस्तस्य मन्दिरे ।।१३ एतच्छुत्वा मम वचः सा विवर्णमुखी क्षिती। उपविष्टा न मा किचिदृक्ता कोपपरायणा ॥१४ विजया ने महा-हे सम्भो! प्रजापति दक्ष ने पक्ष करने के लिये इन्द्र के सहित सभी देवो को बुलाया था तथा दैत्यो को, राक्षसो पो, सिद्धो को ओर गुपको को भी बुलाया या ॥७॥ ब्राह्मणों को श्री गोविन्द को और इन्द्रादि दिक पवियो यो भी उस यन में सम्मिलित होने के लिये बुलाया था। तथा देव योनि को और समस्त साध्य तथा १७८ i वालिया पुराण के विद्याधरो को भी बुलाया था ॥८॥ हे शकर | जो सत्त्व थे उसने उनको आहूत नही किया था जो कि समस्त भुवनी में भी हैं ॥६॥ यह दाक्षायणी इस प्रकार से प्रवर्तित यज्ञ के विषय में श्रवण करके बो कि मेरे वचन से ही श्रवण दिया था उसने भगवान् शम्भु का और अपने न बुलाने का हेतु के विषय मे विचार किया था ॥१०॥ मैंने जैसा भी सुना था उसी के अनुसार चिन्ता करती हुई उसी सती या ज्ञान प्राप्त करके हे भूतेश मैंने ही यज्ञ मे न बुलाने का कारण वहा था ।। ११॥ वह कारण यही था कि दक्ष ने सोचा था कि भगवान शम्भु कपाल धारण करने वाले हैं और उनकी पत्नी भी उनके ही सङ्ग होन के कारण से विशेष गदिता हो गयी है । अतएव शम्भु और सती भी मेरे यज्ञ मे नही शामिल होगे ॥१२॥ यही न बुलाने का हेतु मैंन पहिले ही अपनी पत्नी वैरिणी को उसके मन्दिर में बोलते हुए दक्ष षे मुख से ही सुना था ।१३। यही मेरे वचन का श्रवण करके वह सती कातिहीन मुख वाली होवर भूमि में बैठ गई थी। वह कोप मे परायण होती हुई मुझमे भी कुछ नही बोली थी॥१४॥ वभूव वदन तस्वास्तत्क्षणात् सरुप हर । भृकुटीकुटिल श्याग यथा ख धूमकेतुना ॥१५ सा मुहूर्तमिव ध्यात्वा स्फोटेन महता तत । प्राणानुदसुजच्चपा भित्त्वा मूर्धानमात्मनः ॥१६ इति श्रुत्वा वचस्तस्या विजयाया वृपध्वजः । अतीव कोपादुत्तस्यो दिधक्षरिव पावक. ।।१७ तस्य कोपपरीतस्य कर्णनासाक्षियक्तुत ! पोरा जलन्त्य कणिका राजन्त्योऽग्ने महारवम् । तल्या विनि सृता बढ्य. कल्पान्तादित्यवर्चसः ॥१५ अय तन जगामाशु दक्षो पत्र महातपाः । 'पशचके हरो गत्वा यज्ञवाटाढहिःस्थितः ।।१६ -भयन मग दर्शन ] त यस ददृशे मर्ग कोपेन महतावृत । महाधनसमापन्न पानयुपादिभिर्वतन २० हुनाज्याहुतिमवृद्ध दोप्नदलिपिराजिनम् । ययास्थानस्थितान सान् दिक्पालान नायधध्वजान्॥२१ हे हर । उनी क्षण म उसका मन काम युन्न हो गया था और उसकी गटयाँ देती हो गई थी त्या ममा मुख मा श्याम पड गरा या मा पि घूमरेप माग जाया वग्ना है ॥१५॥ वह घोड़ी ही देर तक घ्याा उनन महान सोट ने अपन मन्नर का भेद करके अपन प्रिय प्राणा का उत्तजन कर दिया या भयात् मृत गई थी। १६ ।। मापण्डेय मुनि न बनावृषभध्वज न विजया व इन वचन का श्रवण करणे व त्वरित मापन प्रदलित अग्नि कही भांति उन्चत हो गर या१७ सत्ताधक वाप न लाकुल उन वान्ता- चक्षु-नागिना और मुख म अग्नि यी महती ध्वान का सृजन करती हुई परम घार बनी हुई शिकाएँ निकली थी। पल्प के अन्त म मादित्य के वर्षम् वाली बहुत सी उल्काएँ विनि त हो गई थी।१८। इसर अनन्नर व शम्भू वहाँ पर यहत ही शीघ्र चले गय ५ जहां पर महान तपस्वी दक्ष विद्यमानय और चन कर रह य । भगवान शम्भ वहाँ जाकर या वार वाहिर ही स्थित हो गय थे।॥ १६॥ महान् पाप मे आवृत होकर भय ने उस यज्ञ वा यवलापन क्यिा या जो महान धन के वैभव स मुसम्मन्न या और पात्र तपा धूप आदि मे युक्त था ।।२०।। वह यन हवन पिय हुए आप स वृद्धि पत्त या तया दीप्त हुई वन्हि म विरारित हो रहा था। शम्भु न समुचित म्याना पर सस्मिन यायुयो और बजार युक्त सद दिक्पाला को दवा पा।।२११ विघातार तथा विष्णु यज्ञमध्ये व्यवस्थितम् । ददर्श कुपित गम्मृतान् दृष्ट्यावीव सोपत-11 १८० [ कालिरा पुराण भग सूर्य तथा सोम भार्याभि सह सवृतम् सहस्राक्ष गोतम च पूर्व भागे व्यवस्थितम् ॥२३ सनत्कुमारमय भार्गव विनतासुतम् । मरुद्गणास्तथा साध्यानाग्नेय जातवेदसम् ॥२४ काल च चित्रगुप्तञ्च कुम्भयोनि सगालवम् । विश्वेदेवास्तथा सर्वान कव्यवाहादिकान, पितृ.न ॥२३ अग्निष्वात्तादिवान, सर्वान, भूतग्राम चतुर्विधम् । भौम प्रेतगणान सिद्धान दक्षिणाशा व्यवस्थितान ॥२६ रक्षासि च पिशाचाश्च भूतानि मृगपक्षिण । जव्यादान क्षुद्रजन्तू श्च तथा पुण्यजनेश्वरम् ॥२७ महर्षि मौद्गल राहु नै त्या किन्नरास्तथा । महोरगास्तथा नकान, मत्स्यान ग्राहाश्च कच्छपान । समुद्रान सप्तसिन्धश्च नदीस्तीर्थानि गुह्यकान ॥२८ उस यज्ञ के मध्य मे बिधाता को और व्यवस्थित भगवान विष्णु का भी अवलोकन किया था। उन सबको देखकर अतीव कोप से शम्भू कुपित हो गये थे॥२२॥ अपनी-अपनी भार्याओ के सहित भग-भूय-- सोम--सहस्राक्ष-गो तम-पूर्व भाग मे अवस्थित सनत्कुमार-- आत्रेय-भार्गव-विनता सुत-मरुद्गण-साध्य-आग्नेय जातवे। को देखा था ।। २३-२४ ॥ काल -चित्रगुप्त-कुम्भयोनि-गालव-- समस्त विश्वेदेवाकव्य वाह आदि पितृगणो को देखा था ॥ २५ ॥ समस्त अग्निप्वात्त आदिक वो और चारो प्रकार भौम-प्रेतगणो को-दक्षिण दिशा म अवस्थित मिद्धो को देखा था ॥ २६ ॥ वहाँ पर गम्भ ने राक्षसो को-पिशाचो को-भूतो को- मग पक्षियो को-कव्यादो को-क्षुद्र जन्तुओ को तथा पुण्य जनेश्वर को देखा था ।२७महपि मौद्गल को-ऋत्य दिशा में राहु को तथा किन्नरो को-महारगो को-नको को-मत्स्यो को-ग्राहो को- भूतग्राम क्ष यश भङ्ग वर्णन ] १८१ कच्छपो को --सात समुद्रा को-सिन्ध को नदियों को तीर्थों को और गुहाको को देखा था (२८१ मानसादि हृदान सर्वान, गगाजम्बूनदी तथा । काम मधु वसन्त च वरणञ्च सहानुगम् ।।२६ शनैश्चर गिरीन् सर्वान् पश्चिमाशाव्यवस्थितान । प्राणादिपचवाय श्च सगणञ्च समीरणम् । कल्पद्रुमान, हिमाद्रिञ्च वश्यपञ्च महामुनिम् ॥३० वायव्या कमलाबात फलानि च कलानिधिम् । नानारत्नानि हैमानि मनुष्यान् पर्वतास्तथा ॥३१ हिमाद्रिमुख्या यक्षाश्च स्थूणकर्णादयो धा । नलकुवेरेण सहितो यक्षरान्नरवाहन ॥३२ ध्रुवो धरश्च सोमश्च विष्णुश्चेवानिलोऽनल । प्रत्यूपश्च प्रभासश्च कोवेरी सस्थितानिमान ॥३३ वृपध्वज विना सर्वान, रुद्रान, जीव मनूस्तथा । विविधान् बाहुजान् वैश्यान शूद्रानपि समन्तत ॥३४ ऐशान्य विविधान्नानि व्रीहिनपि तिलानपि । ऐशानीपूर्वयोर्मध्ये ब्रह्मर्षीन, सशितप्रतान् ।।३५ मानस आदि मव-हदो को- तथा गङ्गा जम्वू नदियो को- कामदेव को--मधु को-वसन्त को और अनुगो के सहित वरुण को देखा पा ॥२६॥ शनैश्वर को-समस्त परतो को जो पश्चिम दिशा में व्यवस्थित थे। प्राणादि पांचो वायुओ को और गणों के सहित समीरण को-कल्पद्रुमो को-हिमवान् पर्वत को और महामुनि कश्यप को देखा ॥३०॥ वायव्य दिशा में कमला बात को और फलो को तथा कला निधि को-अनेक रत्नो को-हैमो को-मनुप्या को तथा पर्वतो को देखा था ॥३१॥ हिमाद्रि जिनमें प्रमुख या-और यक्ष-स्थूल वर्णादि बुध-नल कुबेर के सहित नरवाह यक्षराज-५३-घर और मोम-
और पूर्व दिशा के मध्य में सशित व्रतो से सयुन ब्रह्मर्पियो को देखा
पा! नात्य और पश्विम दिशा के अन्त स्थित आनन्त श्वेत पर्वतको
[ बालिका पुष
विष्णु-अनिल और अनल-प्रत्यूप-प्रभाग इन सबको मोवेरी दिश
मे समवस्थित हुए देखा था ॥३.-३३॥ मृपमध्वज ये दिना मात
रद्रो को जीव को तथा मनुयायो-विविध बाहु म सान देशका
पा और मभी और शो को देखा था॥2शानी दिशा में विदेश
भांति के अन्दो वो वीदियो को-तिलो को भी देखा था। रने
था।३५॥
महश्चितुरो वेदानवेदांगानि तथव पट् ।
नात्यपश्चिमान्तस्यमनन्त श्वेतपर्वतम् ॥३६
काद्रवेयसहस्रण सहिता सप्तभोगिनः ।
केतु तत्रैव कुप्माण्ड डाकिनीगणसयुक्तम् ॥३७
तथा जलधरानन्यान्नानावर्णान् मविद्युतान् ।
दिगगजानपि तत्रम्यान रावतमुखान् हर ॥३८
यथास्थानस्थितान सनिदिक्करिण्या च सयुतान ।
नमेव द्रतो दृष्ट्वा यज्ञवाट महाधनम् ।
वीरभद्रावय पूर्ण प्रेपयामाम तं प्रति ॥३६
वीरभद्रोऽपि वहुभि सवृतो विविभंगण ।
व्यध्वसयत्ततो यज्ञ दक्षस्य सुमहात्मनः ॥४०
विकुर्वन्त महायज्ञ वीरभद्र समीक्ष्य वै ।
वारयामास वैकुण्ठ सर्वदेवगणावृत ॥४१
त वार्यमाण दृष्टव बोधमरक्तलोचन. ।
स्वय विवेश त यज्ञ ध्वसयामास चेश्वर ॥४२
चारों महपियो हो- देदो को और छ वेदो के बगो को
दंषा
देखा या ॥३६॥ महन्न का ट्रयेप के सहित सात भोगियो को-कहा।
पर हो केतु को और हापिनियो से समन्वित पृष्माण्ड यो देशा
. दक्ष यज्ञ मङ्ग वर्णन] १६३ 1 ३७ ।। तथा नाना वर्गों मयुत तथा विद्युत के महित अन्य जलधरो को-दही पर स्थित दिग्गनो को जिम्म रेरावत प्रमुख या भगवान हर ने देखा था ३८॥ यया स्यान पर दिन परिणी से समन्वित सबको देखा या। महान धन मे मयुन उम यज्ञ वार को दूर ही में देखकर शिव ने वीरभद्र नामक गण को शा ही उसकी ओर प्रेषित किया या ३६। वह वीरभद्र महागण भी बहुत स बनव गणा मवृत होता हुआ था। सन महारमा दक्ष क यश का पिर ध्वस पर दिया था। उस महान यज्ञ ने विध्वस करत हुए वीरभद्र का देखनर नमरत देवगणो से बादृगभगदान बंदुष्ठ ने दारण वियापा।११। उन्को निवारण करते हुए देखकर ही ईश्वर क लाचन द्रोध न लाल हा गय ८ फिर ईश्वर स्त्रय ही उन महायज्ञ म प्रदिष्ट हा गय थे और उम मन का ध्वस कर दिया या ॥४॥ विशन्नमेव त यो प्रथम पुरतो भग । वाहू वितत्य नूनेशमानसाद त्वरान्वित ॥४३ तमागतमभिप्रेदय भगोऽपि भृशरोपित । अगुल्यग्रप्रहारेण तस्य नेने जघान ह ।।४४ हीननेत मग हप्वा विस्पाक्ष दिवाकर । स्पर्द्धमानस्तत सर्वमामसाद स्वरान्वित ॥४॥ तत सूर्य महादेव पाणो धृत्वा करेण च । दुरीकृत्यातिकुपितो यनमेवाम्यधावत ॥४६ मार्तण्डा हसन वेगाद्वितत्य विपुलो भुजौ । एहि योग्य त्वयेत्युपाया तमग्रे प्रत्यवारयत् ॥४७ हमतस्तस्य सूर्यस्य बोधेन वृषभध्वजः । दन्तान करप्रहारेण शातयामास वक्तत ॥४८ विदन्त मिहिर दृष्ट्वा होनगेत्र भग तथा।
[ पालिका पुराण म देवाश्च ऋषयो ये चान्ये तत्र दुद्रुवुः ॥४६ भग आगे ही उस यज्ञ मे प्रवेश करते हुए उनको सर्व प्रथम देखकर अपनी वाहुओ को फैला कर भग त्वरा से सयुत होकर भगवान् भूतेश के पास पहुंच गया ॥४॥ उसको सामने आते देख कर भगवान भर्ग भी अत्यन्त कुपित हो गये थे और अपनी अगुलि के अग्र. भाग के प्रहार से उन्होंने उस भग के नेत्रो का हनन कर दिया था 1४४। नेत्रो से हीन विरुपाक्ष भग को देखकर दिवाकर त्वरा से युक्त होते हुए स्पर्धा करने वाले होकर भगवान् शर्व के समीप मे आये थे ।।४।। इसके उपरान्त महादेव ने सूर्य को करसे पकड कर हाथ से दूर होकर अत्यन्त झोध युक्त होकर उस यज्ञ की ओर ही धावमान हो गये थे। ॥४६॥ और मातंण्ड (सूर्य) हसते हुये बडे वेग के साथ दोनो वाहुओं को फैलाकर कर्ने लगा 'आओ, मैं तुम्हारे साथ युद्ध करूंगा- इतना कह कर मूर्य ने उन शिव को आगे चलकर पुन रोक दिया था ।।४।। हसते हुये उस मूर्य के दांतो को वृपभध्वज ने क्रोध युत होकर हाथ के ही प्रहार में मुख मे गिरा दिया था ॥४८॥ इस प्रकार से सूर्य को बिना दांतो व ला तथा भग को हीन मन्त्रो व.ला देखकर समस्त देव गण-पिलोग और जो भी वहां पर अन्य थे वे सब भाग गये पे ॥४॥ विद्राव्य सर्वान, देवादीन हर परमकोपन । मृगम्पेणाण्यान्त यज्ञमेवान्वपद्यत ॥५० यज्ञोप्याकाशमार्गेण ब्रह्मस्थान विवेश ह । वृपध्वजोऽपि युपितो ब्रह्मस्थान जगास ह ।।५१ ब्रह्मण मदनाद् यजो भीतो भर्गादयातरत् । यवतीयं सतीदेहं प्रविवेश स्वमायया ॥५२ भर्गोऽपि दक्षदुहिततुनाया नियर्ट गतः । प्रन्यगच्छत्तदा य ददर्श च सतीशवम् ।।५३
दक्ष यज्ञ भने वर्णन ]
१९५
मृता हप्ट वा तदा देवी हरी दाक्षायणी सतीम् ।
विस्मृत्य यज्ञ तत्प्रान्ते स्थितो वाड शुशोच ताम् ॥५४
वहुविधगुणवृन्द चिन्तयञ्छूलपाणि-
ललितदशनपनि वक्तमजप्रकाशम् ।
अरुणदानवस्त्र भ्रयुग वीक्ष्य नस्या
खरतरपृथुशोकव्याकुलोऽसौ रुरोद ॥५५
भगवान सब देवगण आदि को भगावर परमाधि कोप वाले
होते हुए वे मृग के रूप म अपमान करत हा सम यज्ञ को ही पकडने के
लिये पीछे दौडे ये ॥५०॥ वह यज्ञ भी आकाश के मार्ग के द्वारा ब्रह्म
स्थान म प्रबर कर गया था। वृपध्वज भी उस के पीठ ने कुचित होत
हुए ब्रह्म स्थान को गगन कर गये थे ॥५१॥ भगं से डरा हुआ यज्ञ
ब्रह्मा के सहन से नीचे उतर आया था और अनलि होरर अपनी
माया मे सती पे देह म प्रवश कर कर लिया या ॥५२॥ भगवान् भर्ग
भी मृत हुई दक्ष की दुहिता के निपट चले गये थे उस समय म भग
पीछे हो गये थे और वहाँ पर यज्ञ को तथा सती के शव का उन्हान
देख लिया था ॥५३|| उस समय म भगवान् हर से दाक्षायणी देवी
सती का मृता देखकर यज्ञ को भूल कर उसके समीप में स्थित होन हुए
उन्होने बहुत अधिक उस मतो के विषय म शोक दिया था ॥ ५४ ॥
शूलपाणि भगवान् शम्भ गे अनेक प्रकार के मनी क गुण गणो का चितन
करत हप उनदेवी सतीको परमाधिक सुन्दर दांतोषी पत्तिको-कमल के
ममान प्रकाशित मुख को-अरुण दान वन्त्र उमझी दोरा भृकुटियों के
जोड को देखकर बहुत हो तीव्रतर शार भ न्यायुल होकर यह शम्भु
रुदन करने लोगे ॥५५॥
[ मानिका पुगम
॥ विजया सखी के शोकोद्गार ।।
दाक्षायणीगुणगणान, गणयन, गोरङ्गस्तदा।
विललापानिदुःखातों मनुज प्राकृतो यथा ॥१
विलपन्त तदा भर्ग विज्ञाय मकरध्वज ।
रतीवसन्तसहित आससाद महेश्वरम् ॥२
त शुचातिपरिभ्रष्ट युगपत् स रतिपति ।
जधान पचभिर्वाणं रुदन्त भ्रएचेतनम् ॥३
शोकाभिहतचित्तोऽपि स्मरवाण समाकुल ।
सकीर्णभावमापन्न शुशोच च मुमोह च ।।४
क्षण भूमो निपतति क्षणमुत्थाय धावति ।
क्षण भमति तनव निमीलति विभु पुन ॥५
ध्य यन दाक्षायणी देवी हसमान कदाचन ।
परिप्वजति भूमिष्ठा रसभावैरिव स्थिताम् । ६
सती सतीति सतत नाम व्याहृत्य शकर ।
मान त्यज वृपेत्येवमुक्त्वा स्पृशति पाणिना ।।७
पाणिनापरिमाज्यनामलवारान् यथास्थितान ।
तस्या विश्लिष्य च पुनस्तवानुयुयोज च ॥८
मारण्डेय महर्षि ने वहा–स अवसर पर भगवान् शिव दाक्षा-
यणी के गुणगणा का परिगणन करते हुए अत्यधिक दुख मे प्रपोडिन
होकर प्राकृत मनुष्य की ही भांति शोनाकुत होगये थे ॥२॥ उम समय
म विलाप करते हुए शिव को जानवर अर्थात् मती के वियोग म एम्भु
को रुदन करते हुए देखकर कामदेव रति और वरा त के सहित महेश्वर
प्रभु के ममीप म प्राप्त हो गया था ॥२॥ उस रति के पति कामदेव
ने प्रोक से अत्यन्न परिभ्रष्ट उन शम्भु को जो प्रष्ट चेतना वाले और
रदन करने वाले थे एक ही साथ अपने पांचो वाणो से प्रहार दिया
पा ॥३॥ शोष वारण अभिहत चित्त वाले भी शम्भु कामदेव के
विजया सपो के शोकोद्गार ] १८७ एक क्षण में बाणो के प्रहार से समाकुल होकर अत्यन्त हो सवोर्थ भाव का प्राप्त हा गये थे और उन्होने बहुत शो किया था और वे मोह को भी प्राप्त हो गये थे । अर्थात् शोक के वेग से वे मूच्छित होगये थे।४। ता शोकाकुल होपार भूमि पर गिर जाया बसे थे और एक क्षण हो म उठ कर दौड जगात थे। ए ही आग में वे भ्रमण करने लगा थे अथवा चक्कर काटा बग्न थे। और फिर विभ वही पर अपने नेता को निमीलित कर लिया करते थे ॥५॥ किसी ममय में देवी दक्षायणी का ध्यान करत हुए हास करने वाले हो जात थे अर्थात् खूब अधिक हँसते रहा करते थे। किमी समय म भूमि भ लेटी हुई उस सनी का आलिङ्गन किया करते थे मानो वह रम २ भ वा से युक्त ही स्थित होवे ॥६॥ भगवान शङ्कर हे मती-हे सती ---इस प्रकार से निरन्तर सती के नाम का कथन परके ऐसा कह करत थ -अब इम व्यर्थ य किये हुए मान का परित्याग कर दो-सा कहकर अपने हाथ से उरा सनी के शव का स्पर्श किया करते थे ॥ा शम्भु भगवान् अपने हाथ से इस सती का परिमार्जन करके उसके यथा स्थित अलङ्कागे विश्ले- पित करने अर्थात शरीर से दूर नरके फिर उन अलङ्कारों को वहाँ पर ही अर्थाद उस सनी के मृत शरीर पर अनुयोजित पिया करते थे। तात्पर्य यह है कि कभी तो आभूषणो को सती के मृत शव से दूर हटा लेत थे और उस सती को सजीव समझ कर आभूपणो वो उसके अङ्गो मे धारण कराया करते थे ॥८ एव कुर्वति भूतेथे मृना नोपाच किञ्चन । यदा सती तदा भर्ग शोकादगाढ रुरोद हर रुदतस्तस्य पततो वाप्पान वीक्ष्य तदा मुरा । ब्रह्मादय पग चिन्ता जग्मुश्चिन्तापरायणा ॥१० बाप्पा पतन्तो भूमौ चेदहेगु पृथिवीमिमाम् । उपायस्तत, कार्य इति हाहेति चुरशु ॥११ १८८ { कालिया पुराग ततो विमृप्यते देवा ब्रह्माद्यास्तु शनैश्चरम् । तुष्वुटुर्मू ढभर्गस्य वाप्पधारणकारणात् ॥१२ शनैश्चर महाभाग लोकानुग्रहकारक । भूलशक्तिममुद्भूत नमस्ते सूर्यसम्भव ॥१३ नमस्ते शूलहस्ताय पाशहस्ताय धन्विने । तथा वरदहस्ताय तमश्छायात्मजाय ते ॥१४ भूतेश्वर भगवान शम्भु के इस प्रकार से विलाप कलाप करने पर भी जिस समय मे वह मृत हुई सती ने कुछ भी नहीं उत्तर दिया था तो उस समय म भगवान् शिव श्रोत को उद्गाढता पूर्वक अत्यधिक रदन करने लो थे। जब वे रुदन कर रहे थे तो उनके आनू नीच गिर रहे थे । उस समय म देवगण ने उनको देखा था और वे ब्रह्मा- दिक देव धिना मे परायण होते हुए अत्यधिक चिन्तातुर हो गये थे। ॥१०॥ भूमि पर गिरे हुए ये वाह्य अर्थात् आमू यदि इस पृथिवी का दाह कर देंगे तो वहां पर क्या उपाय करना करना चाहिए अर्थात् इन आमुश्री के द्वारा पृथ्वी के दाह वा क्या प्रतीकार होगा-इससे वे सभी हा हा पार करने लग गये थे ॥११॥ इसके अनन्तर ब्रह्मादिक देवो में धन भर से साप विचार किया था और उन्होने भावान पम्भु के जो मोह पे वशीभूत हो गए थे वाप्पो को धारण करने के हेतु शनंधर का नवा दिया पा ॥१२॥ देवगण में कहा है महाा भाग्य वाले । है गर्नश्नर दर । आप लोग पर भगुग्रह करने वाते हैं। है मूष शक्ति में ममुतान्न होने वाले । आपरा जन्म तो सूर्यदेव मे ही हुआ है। आप लिए हमारा नमस्सार समर्पित है।१३६ हाय में शूल धारण करने वाती पाश को धारण करने वाले और धनुर्धारी आपरा नमस्तकार है मापास्त वरदान देने वाला है और भाप तमपी छाया ये आरमग है-ऐसे आपको नमसार है॥११॥ मीममेध-प्रतीपाश भिन्ना जनचयोपम ।
विमा सखी के शावोद्गार ] १८६ नमस्ते सर्व लोकाना प्राणधारणहेतवे ॥१५ मृध्रध्वज नमस्तेस्तु प्रसीद भगवन हदम् । वाप्पेभ्य. शोकजेभ्यश्च पाहि भगस्य नः क्षितिम् ।।१६ यथा पुरा शत वानवजग्राह वर्षणम् । भवानेव तु मेघेन्यस्तया कुरु हराम्पुनि ।।१७ तव चापा ग्रह दृष्टवा मेघास्ते पुष्करादय । मुमुचु सतत वर्ष महेन्द्रस्य किलानया ॥१८ आकाश एव वाम्भस्तत्मर्व भवता पुरा। विनाशित यया वाप्प तथा नाशय शूलिनः ॥१६ न त्वामृतेजन्य शलोऽस्ति हरवाप्पनिवारगे। दहेत् सदेवगन्धर्वब्रह्मलोकान् मपर्वतान् । पृथिवी पतितो वाप्पस्तस्माद्धारय मायया ॥२० है नीले मेघ के महा! आप पिसे हुए अजन के तुन्य हैं । समम्न लोकी के प्राणी के धारण करने म कारण म्वरूप आपके लिये प्रगाम है ॥१५॥ हे नृन राज जापरी नमस्कार होवे । हे भगवन् ! आप हडना पूर्वक प्रसन्न हो जाइये । भगवान शम्भु के शोर मे समुत्सन्न हुये वाप्यो (आंसुओं) से हमारी इस पृथ्वी की रक्षा करो ॥१६॥ जिस प्रकार में पुरातन समय में वर्षों तक वृष्टि का अवरोध किया था और आप ही ने मेघो मे होने वाली दृष्टि को रोक दिया था बव चमो मांति भगवान् हरके शोक से गिरे हुये बाप्पा के जल में भी कीजिये । अर्थात् इन आमुओं के जल को भी रोक दीजिये ॥१७॥ बापके द्वारा सोना ग्रहण करना देखकर पुष्कर आदिक उन मेघो ने महेन्द्र की बाना से निरन्तर वर्षा को छोटा था अति सतत वृष्टि करत रहे थे ॥१८॥ आपने पहिले पूर्व समन म उम समूा वर्षा के जल को आकाश ही में विनष्ट कर दिया था अब उमी भांति भावान् शूलो के आंसुओं के जल को भी नष्ट करने के लिये प्रयत्न अवश्य कीजिए ॥१६॥ भगवान् शिव १६० [ वालिया पुराण के वाप्पो के निवारण करने के कार्य में अन्य कोई भी आपके विना सामर्थ्य रखने वाला नही है । यह शिव के शो से समुत्पन्न आंसुओं का जल देव गन्धर्वो के सहित तथा पर्वतो के सहित ब्रह्मलोको का दाह कर देगा। ऐसी ही इन आंसुयो के जल मे दाहक शक्ति विद्यमान है। यह वाप्पो का जत इस भू मण्डल मे गिरा है इसलिये आप अपनी माया मे इसको धारण करो ॥२०॥ इत्येवम्भाषणमाणेपु देवेषु मिहिरात्मज । प्रत्युवाच स तान, देवान्नातिहृष्टमना इव ।।२१ करिप्ये भवता कर्म यथाशक्ति सुरोतमा । तथा किन्नु विदग्व हि न मा वेत्ति यथा हर ॥२२ दुखशोकाकुलस्यास्य समीपे वाप्पधारिण । कोपान्नश्येच्छरीर मे नियत नात्र संशय ॥२३ तस्माद् यथा मा भतेशो न जानाति सतीपनि । तथा कुरुध्व नेत्रेभ्यो हरलोतकधारिणम् ॥२४ ततो ग्रह्मादयो देवास्ते सर्व शकरान्तिकम् । गत्वा हर सन्मुमुहु सांसार्या योगमायया ॥२५ शनैश्चरोऽपि भूतेशमासाद्यान्तहितस्तदा । वाप्पवृष्टि दुराधामवजग्राह मायया ॥२६ यदा स नाशकद्वाप्पान, सन्धारयितुमकंज । तदा महागिरो क्षिप्ता वाप्पास्ते जलधारके ॥२७ माण्डेय महर्षि ने कहा-समस्त देयो द्वारा इस प्रकार से भाग किय जाने पर सूर्य पुत्र गोश्वर ने अत्यन्त प्रसन्न मन वाला होरर उन देवो को प्रत्युत्तर दिया था ॥२१॥ शनश्चर ने कहा-हे मुरा म थे हो । अपनी शक्ति के अनुसार ही मैं आपका कार्य यरूंगा रितु ऐगा ही होगा पाहिए कि दाह परो वाले मुद्दाको भगवान् शम्म न जान पंवें ॥२२॥ महान् दुःए और शोर से अतीय घ्यावुल बाप्पा [ मालिका पुराण लोकालोक पर्वत के समीप म जलधारा बाप्प वाल गिरि है जो पुष्कर द्वीप के पृष्ठ मे स्थित है । वह तोय सागर के पश्चिम में हैं ।२३। वह सब प्रमाण से मेरु पर्वत के मदृश है। उम समय में असमर्थ शनैश्चर ने उस पर ही वाप्पो को विन्यस्त कर दिया था ॥२६॥ वह पर्वन भी शम्भु के उन वा पो को धारण करने में समर्थ नहीं हुआ था। उन वाप्पो के समुदायो से वह पर्वत्र विदीर्ण हो गया था और शीघ्र ही मध्य भाग म भग्न हो गया था ॥ ३० ।। उन वाप्पो ने उस पर्वत का भेदन करके वे फिर ताय सागर में प्रवेश कर गये थे। वे वाष्प अतीय खर थे कि वह सागर भी ग्रहण करने में समर्थ नहीं हुआ था ॥३१॥ इसके अनन्तर सागर को मध्य मे भेदन करके वे वाप्प सागर की पूर्व मे रहने वाली वेला पर समागत हो गये थे तथा स्पश मात्र से उन्होंने उस वेना का भेदन कर दिया था 1॥३२॥ पुष्कर द्वीप के मध्य में गमन करने वाले ने वाप्प बेला का भेदन करके बैतरणी नदी हो गये थे और पूर्व सागर मे गमन करने वाले हो गये थे।३३। जलधार के भेद से और सागर के ससर्ग से कुछ सौम्यता को प्राप्त होकर फिर उन्होने पृथ्वी का भेदन नहीं किया था।३४॥ वैवस्वतपुरद्वारे योग्नद्वयविस्तृता। अद्यापि तिष्ठत्यपगा हरलोतकसम्भवा ।।३५ अथ शोकविमूढात्मा विलपन, वृपभध्वज । जगाम प्राच्यदेशास्तु स्कन्धे कृत्वा सतीशवम् ॥३६ उन्मत्तवद्दगच्छनोऽस्य दृष्ट वा भाव दिवौक्स । ब्रह्माद्याश्चिन्तयामामु शवभ्र शनकमणि ||३७ हग्यात्रस्य सस्पर्शाच्छवो माय विशोणताम् । गमिप्यमि पथ तस्मादस्य भ्रशो भविष्यति ॥३८ इति सञ्चिन्तयन्तते ब्रह्मविष्णुशनैश्चरा । सतीशवान्तविविशुरश्या योगमायया ॥३६
विजया सवा के शासनगार ]
१६३
प्रविश्याय शव देवा खण्डमस्त सतीशवम् ।
भूतले पातयामासु स्याने न्याने विशेषत ॥४०
देवीन्टे पादयुग्म प्रथम न्यपतत् क्षिती।
उड्डीयाने चोरुयुग्म हिताय जगता तत ॥११
पंचम्वनपुर के द्वार न दा यातन पर्यन दिनार वाली हरलो
तक म गमुत्पन्न नहीं बान भी स्थित है ।।१५।। इसा बनन्दर शाका
में विमून जात्मा वाल शम्भु विलाप पर हुए उन मृत सनी प्रव
(मृन देह) को अपन कन्य पर रखकर प्राच्य दना का चल गन ५ ।३६.
एक उन्मत की भांति गमन करन वाल इन शहर माव गदवाणो
न देखार ब्रह्मा जादि दवगण शव क नंगन हान के कर्मक विपर म
चिन्ना करन ला थे।।३७॥ नगवान शङ्कर कीर के स्वर्ग म यह शव
विशोर्णा को प्राप्त नहीं होगा चिरमिरीनि म उन वृषभध्वज व
पन्चे से इस शव का भ्रश होगा ॥३८॥ ही चिन्तन करते हुए व ब्रह्मा
विष्णु और शनैश्वर योगमाया से अदृश्य होत हुए सती के शव के अन्दर
प्रवेश कर गये थे ॥३६॥ देवा न इसन उपरान्त सती के शव म अन्दर
प्रवश करके उन्होंने उस सती के शव के खण्ड-खण्ड कर दिये थे और
विशेष रूप स स्थान-स्थान म उन खण्डा को भूतल म गिरा दिया था
॥४०॥ देवीकूट म दोना चरणो को मवस प्रथम भूमि म नियतित किया
था। उड्डीमान म दोनो ऊरओं के युगको जगतो क हितर लिए भमिपर
उसरा डाला था।४११
कामस्पे कामगिरी न्यपतन्योनिमण्डलम् ।
तव न्यपयभूमौ पर्वते नाभिमण्डलम् ॥४२
जालन्धरे स्तनयुग स्वर्णहारविभूपितम् ।
अशग्नीव पूर्णगिरी कामपा त्तत शिर ॥४३
यावद्भुव गतो भर्ग समादाय मनीशवम् ।
प्रान्चेपु यालिको देशस्तावदेव प्रवीतित ॥४४
[ वालिया पुराण
अन्ये शरीरावयवा लवश पण्डिता. सुरैः।
आकाशगगामगमन् पवनेन समीरिताः ।।४५
यत्न यन्नापतन् सत्यास्तदापादादयो द्विजाः ।
तत्र तत्र महादेव. स्वय लिंगस्वरूपधृक् ।
तस्थौ मोहसमायुक्तः सतीस्नेहवशानुगः ॥४६
ब्रह्मविष्णुशनिश्चापि सर्वे देवगणास्तथा
पूजयाञ्चक्रुरीशस्य प्रीत्या सत्या पदादिकम् ॥४७
काम गिरि कामरूप में योनि मण्डल गिरा था। और वहाँ पर
ही पर्वत की भूमि मे सती के शव का नाभि मण्डल गिरा था ॥ ४२ ।।
जालन्धर मे सुवर्ण के हार से विभूपित स्तनो का जोडा गिरा था-
पूर्ण गिरि में अस और ग्रीना पतित हुए और फिर काम रूप से शिर
पतित हुआ था ॥४३॥ भगवान शङ्कर जितने भूमि के भाग मे सती
के शव को लेकर गये थे उतना ही प्राच्यो मे याज्ञिक देश कोत्तित हुआ
था ॥४४॥ अन्य जो सती के शव के अवयव थे वे छोटे-छोटे टुकडो मे
देवो के द्वारा खण्डित कर दिये गये थे। फिर वे सब वायु के द्वारा
समीरित होते हुए आकाश गङ्गा मे चले गये थे ॥४५॥ हे द्विजो !
जहाँ-जहां पर भी सनी के पाद आदि पर्यन्त शरीर के अवयव गिरे थे
वहाँ-वहं पर ही महादेव स्वय लिङ्क के स्वरूप धारण करने वाले होगये
थे । और चे मोह मे समायुक्त होकर सती के प्रति स्नेह के वशीभूत
होकर स्थित हो गये थे १४६। ब्रह्मा-विष्णु और शनैश्चर ने भी समस्त
देवगणो ने परम प्रीति के माथ सती के पद आदि शरीरावयवो की और
ईश की पूजा की थी।४७।
देवीकूटे महादेवी महाभागेति गीयते ।
सतीपादयुगे लीना योगनिद्रा जगत्प्रभु. ॥४८
पात्यायनी घोड्डीयाने कामाख्या कामरूपिणी ।
पूर्णरवरी पूर्णगिरौ चण्डी जालन्धरे गिरौ ॥४६
।
विजया सखी व शावादगार ]
१६५
पूर्वान्ते कामरपम्य देवी दिक्करवासिनी ।
तथा ललितकान्तेति योगनिद्रा प्रगीयते ॥५०
यव पतित सत्या शिरस्तन वृपध्वज ।
उपविष्ट शिरो वीक्ष्य श्वसञ्छापरायण ॥५१
उपविप्टे हरे तन ब्रह्माद्यास्ते दिवौक्म ।
समीपमगमस्तस्य दूरत सान्त्वयन हरम् ॥५२
देवानागच्छनो दृष्ट्वा शोक्-लज्जाममन्वित ।
गत्वा शिलात्व तव लिंगत्व गतवान् हर ॥५३
हरे लिंगत्वमापन्वे ब्रह्माद्यास्तु दिवोक्स ।
तुष्टुवम्म्वक तत्र लिगस्प जगद्रम् ॥५४
वोकूट म महादवी महाभाग-~-इम नाम स गान की जाया करती
है । जगन् क प्रभु योगनिद्रा सती क दाना चरणा म लीना है ।। ४८ ॥
उड्डीयान म कात्यायनी है और कामरूप वाली कामाख्या है। पूग-
गिरि म पूर्येश्वरी है तथा जालन्धर गिरि म चण्डी इस नाम स विख्यात
है ।। ४६॥ कामरूप क पूवान्त म दवी दिकूर वासिनी है । तथा ललित
कान्ता-इस नाम स यागनिद्रा का गान किया जाता है ।।५० । जहा
पर ही सती का शिर गिरा था वहा पर वृपध्वज उस शिर वा व
नोक्न करक लम्बा श्वास लत हुए शान म परायण हारर उपविष्ट हा
गय थ ॥५१॥ भगवान् शङ्कर के उपविष्ट हो जान पर वहा पर ब्रह्मा
मादि ददगण दूर सही शिव को सान्त्वना दत हुए उनके समीप म गप
प॥५२॥ भगवान् शङ्कर न आत हुए दवा का बदतोक्न करक शाक
भोर सज्जा स समान्यत हात हुए वही पर शिवस्त का प्राप्त हार
निङ्ग के स्वरूप का प्राप्त हो गय थ ।। ५३ ।। भगवान् शङ्कर व लिङ्ग
का स्वरूप प्राप्त हो जान पर ब्रा यादि दवगणा न उन लिङ्ग
स्वम्प वाल जगत् म गुरु स्यम्दा भगवान का वा परी स्तवन निया
या ॥५४॥
१६६ [ कालिका पुराण महादेव शिव स्थाणुमुग्र रुद्र वृपध्वलम् । श्मशानवासिन भर्ग सर्वान्तकरण हरम् ॥५५ त्वा नमामो वय भक्त्या शकर नीललोहितम् । गिरीश वरद देव भूतभावनमव्ययम् ॥५६ अनादिमध्यससारयोगविद्याय शम्भवे । नम शिवाय शान्ताय ब्रह्मग लिंगमूर्तये ॥५७ जटिलाय गिरिशाय विद्याशक्तिधराय ते । नम शिवाय शान्ताय ब्रह्मणे लिंगमूर्तये ॥५८ ज्ञानामृतान्तसम्पूर्णशुद्धधदेहान्तराय च । नम शिवाय शान्ताय ब्रह्मणे लिगमूर्तये ॥५६ आदिमध्यान्तभूताय स्वभावानलदीप्तये । नम शिवाय शान्ताय ब्रह्मणे लिंगमूर्तये ॥६० प्रलयार्णवसस्थाय प्रलयस्थिति हेतवे । नम शिवाय शान्ताय ब्रह्मणे लिंगमूर्तये ॥६१ देवगण ने कहा-महान् देव-शिव-स्थाणु-उग्र-रुद्र- वृपमध्वज-श्मशान म निवास करने वाले-सवका अन्त करण-पर- भर्ग को हम भाक्त भाव से नील लोहित शङ्कर को प्रणाम करते है जो गिरीश-वरदान दन वाले–भूत भावन और अव्यय देव हैं ॥ ५६ ।। अनादि -मध्य और ससार की योग विद्या वाले शम्भु पे लिये नमसार है जो परम शिव--शान्त-ब्रह्म और लिङ्ग मूत्ति हैं उनके लिये नमस्कार है ।। ५७ ॥ जटिल अर्थात् जटाजूट वाले-गिरिश-विद्या की शक्ति में धारण करने वाले-शिव-शान्त-ब्रह्म और लिङ्ग की गृत्ति वाले आपके लिये नमस्कार है ।। ५८ ॥ ज्ञानरूपी अमृत के अन्त तथा सम्पूर्ण शुरु दहान्नर-शिव-शान्त-ब्रह्म और लिङ्ग- मूत्ति के लिय नमस्सार है ॥५६आदि और मध्य तथा अन्त स्वरूप- Fभाय अनल यी दीप्ति वाले -शिद-शान्त-ब्रह्म और लिङ्गभूति विजया ममी के मायादगार ] यात के निय नमम्मार है ॥६॥ प्रम के पांव में विराजमान- प्रय और स्विति के पारण-मिव-गा-ब्रह्म और मिशन के जिये नमम्बार है ।।६१॥ य परेन्य परम्नम्मात् पगय परमामये । नम शिवाय शान्नाय ब्रह्म निगमूर्तये ॥६२ ज्वालामानावृतागाय नमले विश्वापिणे। नम शिवाय जन्ताय ब्रह्मणे निगमूर्तये ॥ *नम परमार्याय नानदीपाय वेधमे । नम शिवाय मान्लाय ब्रह्मणे निगमृतये ॥६४ नमो दाक्षायगीतान्न मृड सर्व महेश्वर । नमन्नं नवंमृतेग प्रमीद नगन्स्यि ॥६५ नगोय त्वयि लाभ रेष्टमान महावा। मुग ममाता म नम्मा थोर परियज 15E नमा नमन मृतेग नवरात्पन्न। वनोद रस न मान्यत मो नमोनुने,
[ कालिका पुराण
के ईश ! आपको नमसार है- नमस्कार है। हे मव कारणो के भी
कारण प्रसन होइए। हम सबकी रक्षा कगे और शोष का त्याग कर
दवें । आप लिए नमस्कार है।६७।
इति सस्तूयमानस्तु महादेवो जगत्पति ।
निज रूप ममास्थाय प्रादर्भूत शुचाहत ॥६८
त शुचा विह्वल दृष्टवा प्रादुभूत विचेतसम् ।
शोवापर विधि साम्ना तुष्टाव वृषभध्वजम् ॥६६
हिरण्यवाहो ब्रह्मा व विष्णुस्त्व जगत पति ।
मृष्टिस्थिति विनाशाना हेतुस्त्व केवल हर ७०
त्वमष्टमूतिभि सर्व जगद्व्याप्य चराचरम् ।
उत्पादय स्यापकश्च नाशकश्चापि विश्वकृत् ॥७१
त्वा माराध्य महादेव मुक्ति याता मुमक्षव ।
रागद्वेषादिभिस्त्यक्ता ससारविमुखा बुधा ॥७२
विभिन्नवाय्वम्निजलौघजित न दूरसस्थ रविचन्द्रसयुतम् ।
विमानमध्यस्थमनुप्रकाशक तत्व पर शुद्धमय महेश्वर ॥७३
मावण्डेय महपि न पहा-इस प्रकार से भली भांति स्तवन
विए गए जगत व पति मगदेव अपन रूप मे समास्थित होते
में भारत प्रादुर्भूत हय ५ ॥६॥ उनको शोप से विह्वल और बिना
पेन वाने अर्षाद बय मनस्व प्रादुर्भूत हुय देशवर देवो ने गोव में
अपहरण परन वारे विधि नृपभध्वज की स्तुति की थी ॥६६॥ ब्रह्माजी
नबहा- हर
आप ही हिरण्य बाहु ब्रह्मा हैं और आप ही जगत
पनि विष्णु है । इस जगत् को सष्टि-स्थिति और विनाशा वे आप ही
तुहान ७०॥ आप अपनी भष्ठ मूतियों के द्वारा इस गम्पूण घरा-
पर जगतम साप्त तोवर इमरे उतार-स्थापक और नाशप भी है
विधान पार हो ॥७१॥ महादेव । आपकी बागधना पर
मिल पान पीछा वाम पुष्प मुक्ति को प्राप्त हो गये हैं। ये गग---
गोष
विजया सखी वे शोपोद्गार ] १६६ ऐप आदि वन्धन के कारणो से छुटे हुऐ है और बुध पुरप मयार से विमुख होते हैं ॥७२॥ हे महेश्वर । विभिन्न वायु--अग्नि और जल वे ओघ से रहित-मूर्य और चन्द्रमा से युक्त-इम रीति गे मे भी स्थित नहीं है अर्थान मनिपट मे ही यमान है-तीन भागों में मध्य मे मस्थित है और अनु प्रकाशक है -गरम शुद्ध मय सत्त्व है ॥७३॥ यदष्ट शायस्य तरो प्रमून चिदम्-सुवृद्धस्य समोपजस्य । तपश्छद मरथगितन्य पीन मूक्ष्मोपग ते वशग सदैव ।।७४ अध समाधाय समीरण स्वन निरुध्य चोद निशि हममध्यत । हृत्पद्यमध्ये सुमुखीकृत रज परन्तु तेजस्लव मवंदेदयताम् ॥७५ प्राणायाम पूरक स्तम्भव रिक्त विनोदन यत्सराम्यम् । पृश्याश्य योगिभिस्ते प्रपन्चा गुद्ध वृद्ध तत्त्वतस्तेऽन्ति लब्धम् ॥७६ सूक्ष्म जगद्व्यापि गुणोधपोन मृग्यम्वृधे साधनसाध्यापम् । पारसनोजित नव नोत वित्त तयास्यर्थहीन महेश 11७७ नकोपेनन घोकेनन मानेन न दम्मत । उपयोज्य तु तद्वित्तमन्ययेय विवर्धते ॥ मायया मोहित शम्मो विस्मृत ते हदि स्थिनम् । माया भिन्न परिक्षाय धारयात्मानमात्मना ।।७६ २०० [ कातिका पुराण हस जो ज्ञान रूपी जन के द्वारा धित-समीप मे ही समुत्पन--- तप रूपी पनो मे सम्थगित-आठ शास्त्र रूपी तरु का पुष्प है उसका मूक्ष्म उपगम करने वाना-पीत पराग सदा ही आपके वश मे गमन करने वाला है ॥७४॥ समीरण (वायु) को ध्वनि को नीचे की ओर समाधान करके और रानि मे ऊपर की ओर निरुद्ध करके के मध्य से हृदय के पद्म के मध्य में रज सुमुखी कृत है परन्तु आपका तेज सर्वदा देखिये ७५॥ पूरक अथवा स्तम्भक प्राणायामो मे रिक्त चित्रो मे जो पर नामक प्रेरण हैं-- वे प्रपञ्च योगियो के द्वारा दृश्य और अदृश्य हैं-तात्त्विक रूप मे शुद्ध और वृद्ध आपके द्वारा लब्ध हैं ॥७६।। मूक्ष्म जगत् में व्याप्त और गुणो के समूह से पीन मृग्यम्बुधि के साधन-- साध्य रूप वाला हे महेश । चोर गौर रक्षको के द्वारा न तो उप्झित है और न नीत ही है अर्थान लिया हुआ है ऐसाही आपका अथ से हीन वित्त है ।।७७॥ वह पित्त कोप से-~शोक से--मान से और दम्भ से भी व्यय नहीं होता है। वह वित्त तो उपयोग करके अन्य प्रकार से ही वढता रहा करता है ॥७॥ हे शम्भो | आप माया से मोहित हैं इसीलिए आप हृदय में स्थित को ही आपने विस्मृत कर दिया है। माया वो भिन ममझ पर अपनी आत्मा के द्वारा ही आत्मा को धारण करो ॥७॥ मायास्माभि स्तुता पूर्व जगदर्थे महेश्वर । तया ध्यानगत चित्त वहुयत्नं प्रसाधितम् ॥८० गोर शोपच लोभश्च कामो मोह परात्मता। ईप्यांमानो विचिकित्सा कृपासूया जुगुप्सता ॥८१ द्वादशते दिनाशहेतवो मनसो मला । न त्यानियेव्यन्ते शोर त्यज ततो हर ।।२ इति गाम्ना स्तुत गम्भु गस्मृत्यापि स्ववाच्छितिम् । नावद तदारमान गोयात् सत्या विनात ॥५३ विजया सखी के शोकोद्गार ] २०१ अधोमुख स्थित वीक्ष्य ब्रह्माण स शनैरिदम् । प्राह ब्रह्मनायतिग वद किं करवाण्यहम् ।।८४ हे महेश्वर | जगत के हित के सम्पादन करने के लिये हमने पूर्व में ही माया का स्तवन किया था उसके द्वारा ध्यान म मलग्न चित्त बहुत मे प्रयलों के द्वारा प्रसाधित है ॥२०॥ शोक-क्रोध-लोभ- काम-मोह-परात्मता-ईर्ष्या मान-मशय-~कृपा--असूपा-जुगु-- प्सता-ये बारह मन के मल होते हैं जो बुद्धि के नाश करने के हेतु हैं । आप जैसे महा पुरुषों के द्वारा इन बारह मानम मतों का सेवन नहीं किया जाया करता है । है हर आप शार का पारत्याग पर दीजिए।८१॥ 11८२॥ मारण्डेय मुनि न कहा-इम रीति से माम के द्वारा स्तुति वै द्वार स्तुति किए गए शम्भु ने अपने वांछित का सस्मरण करके भी सती दे शोक मे विनायत हुए शिव न उम समय म आत्मा का यव धारण नही किया था 11८३॥ नीष की ओर मुख को किए हुए समपस्थित अस्माजी को देखकर उसने धीरे में यह पहा पाहे ब्रह्माजी । कुछ अतिक्रमण करने वाली बात कहो--बातल ओ अब मैं क्या कह ॥४॥ इत्युक्तो वामेदेवेन विधाता मयंदवत । इदमाह तदेशस्य शोव विध्वसक चच १८५ त्यज शोक महादेव सस्मृत्यात्मानमात्मना । नत्व शोरस्य सदन पर शोकातवान्तरम् ॥५६ सशोपे त्वयि भूतेश देवा भूता समावसा । भ्र शयेज्जगती कोप शोष सवांश्च शोषयेत् ।।८७ त्वद्वाप्पच्याला पुथ्वी विदीर्णा स्यान्नच्छनि । अवजग्राह ते वाप्प सोऽपि वृष्णोऽभवद् हठात् II या देवा सगन्धर्वा सदा जीडन्ति सोनुवा । मुमेरमहशो योमो मानत सर्वोत्तम II २०२ [पारिका पुराण यस्मिन प्रविश्य शिशिरे पद्मनालनिभे घना । उतपिवन्ति स्म तोयानि पुष्करावर्तकादय ६० मन्दरात् सततं यत्र कुम्भयोनिमहामुनि । गत्वा गत्वा तपस्तेपे हिताय जगतो हर ॥६१ : माकण्डेय महर्षि ने कहा-इस प्रकार से वामदेव और समस्त देवो के द्वारा कहे हुए विधाना (ब्रह्मा) उस समय म महेश्वर के शोक का विनाश करने वाला यह वचन कहा था ॥८॥ ब्रह्माजी ने कहा हे महादेव ! अपनी आत्मा के द्वारा ही अर्थात् अपने आप ही अपनी आत्मा अर्थात् अपने वास्तविक स्वरूप वा सस्मरण करते शोर का परित्याग करदो। आप शोक करने के स्थान नहीं है । शोक से आपका परम अतर होगया है ॥८६॥ हे भूतेश्वर | आपके शोर स युक्त हो जाने पर मभी दवगण अत्यत भयभीत हो गए है । आपका क्रोध और शोक जगतीतल को भ्रश कर दगा और आपका शोक मवका शोषण कर देगा ॥५७ । आप के वाप्पो अर्थात अश्र पात से यह सम्पूण पृथ्वी व्याकुल होकर विदीण हो जाती यदि शनि आपके वाप्पो को अवग्रहण नहीं करता। वह शनि भी हठ से कृष्ण हो गया है ।।८८॥ जहाँ पर गायों के सहित सव दवगण सदा उत्सुकता मे युक्त होकर क्रीडा किया करते है। जो यह सुमेरु पवत के सदृश मान से उत्तम पवत है-जिसम पद्मनाल के तुल्य म शिशिर ऋतु मे मेघ प्रवेश करके जो कि पुष्कर-आवत्त व आदि हैं जलो का पान किया करते थ-जहाँ पर जा जा करके महामुनि कुम्भ योनि मादर पवत से निरतर जगत् के हित तपस्या का तपन किया करते थ । यस्मिन् स्थित्वा गिरौ पूवमगस्त्यस्तोयसागरम् । पपो तपोवलान् कृत्वा वरमध्यगत क्लि ॥६२ शनैश्चरेण ते वोढुसमर्थन लोतव । क्षिप्तर्विदारितस्तेऽसौ जलधाराह्वयो गिरि १६३ HEE६१॥
विजया सखी के प्रोकोद्गार ] विभिद्य पर्वत शम्भो वाप्पास्ते सागरं ययु । भित्त्वा तु मागर शीघ्र भीताण्डजसंकुलम् ।।६४ जग्मुस्ते पूर्वपुलिन तस्य तद्विभिनुश्च ते । भित्त्वा वेलां तत पृथ्वी यिभिद्याशु तरंगिणीम ॥६५ चतरणी नान्मा पूर्वसागरगामिनीम् । न नावा न विमानेन दोण्या म्यन्दनेन च ॥१६ ततुं शक्या सा तु नदी तप्ततोयातिभीपणा। दुखेन तान्तु पृथिवी विमति महताधुना १६७ सदा चोर्द्धगतर्वाप्पविक्षिपन्ती नभश्चरान् । तस्यास्तूपरि नो यान्ति देवा अपि भयातुरा 180 जिस पर्वत में भगवान शम्भु स्थित होकर पूर्व मे जल के सागर को हाथ के मध्य में रखकर तप के वल में पी गए थे ॥३२॥ शनश्चर के द्वारा आप के वाप्पो को सहन करने में असमर्थ होते हुए क्षिप्त लोतको से यह जल धारा नाम गिरि विदारित हो गया था ॥३॥ हे शम्भो ! मापके वाप्प पर्वत का विशेष रूप से भेदन बर सागर में चले गए ये। वे प्रभीत अण्डो में मकुल सागर का शोन ही भेदन करने व वाप्प उगके पूर्व पुलिन पर चले गए और उन्होंने उग पुगिन का भी भेदन कर दिया था। वेला वा भेदन कर फिर पृथ्वी का मदन विया या और उन्होंने एक नदी को बना दिया था | उन्होंने उस वैतरणी नाम वाली नदी को बना दिया था जावं गागा की और गमन करने वाली थी। वह नदी गर्म जल के होने का असर भीषण थी जो किमी भी नौका--विमान-दोषी और 14 मी तरुण वरने के योग्य नहीं हो सकी थी। पृथिवी BIPI गाय अब उसको धारण किए हुए थी ll ३ मा कागढ अर्थार कार की ओर जाते हुए वाणी सेना का करती हुई यो और उसके ऊपर मे देवगा भी मना कर गमन बरे
२०४
[ कालिका पुराण
यमद्वार परावृत्य योजनद्वयविस्तृता ।
निम्ना वहति सम्पूर्ण भीपयन्ती जगन्वयम् ||६६
त्वन्नि श्वासमरुज्जातंय॑स्ता पर्वतयानना ।
समाकुलद्वीपिनागा नाद्यापि प्रतिशेरते ।।१००
तव नि श्वासजो वायु पीडयन् जगतः सुखम् ।
नाद्यापि प्रशम याति वाधाहीन सनातन ॥१०१
सतीशव ते वहत शोर्यमाणा पदे पदे ।
नाद्यापि व्याकुला पृथ्वी व्याकुलत्व विमुञ्चति ॥१०२
न क्वर्गे न च पाताले तत्सत्त्व विद्यतेऽधुना।
यत्ते क्रोधेन शोकेन नाकुल वृपभध्वज ॥१०३
तस्माच्छोकममर्पचत्यक्त्वा शान्ति प्रयच्छ न ।
आत्मानञ्चात्मना वेत्थ धारयात्मानमात्मना ॥१०४
सती च दिव्यमानेन व्यतीते शरदा शते ।
सा च त्रेतायुगस्यादी भार्या तव भविष्यति ॥१०५
यमराज के द्वार से परावत्तित होकर दोनो जा के विस्तार
वाली निम्न होती हुई वह सम्पूर्ण तीनो भुगो को भय उत्पन्न करनी
हुई वहन किया करती है || आपके शोक संतप्त निश्वासो की
वायुओ से समस्त पर्वत और कानन व्यस्त हैं और समाकुल द्वीपी नाग
आज तक भी प्रतिशयन नही किया करते है ॥१०॥ आपके सतप्त
नि श्वामो से समुत्पन्न वायु सम्पूर्ण जगन् के मुख को पीडित करता
हुआ वह वाधाहीन और सनातन आज तक भी शमन को प्राप्त
नहीं होता है ॥१०१॥ सती के शव अर्थात् मृत शरीर को वहन करने
वाले आपके पद पद में यह पृथ्वी शीर्यमाण हो रही है और वह परम
पाकुल पृथ्वी अपनी व्याकुलता का माचन नहीं कर रही है ॥१०२।।
इम समय न तो पाताल म और न स्वर्ग मे दर मत्त्व विद्यमान है जो
आपने क्रोध से और शोर मे हे वृषध्वज । व्याकुल न हावे ॥१०३।।
विजया सखी के शाशेद्गार ]
२०५
इसी कारण स आप शोक और अमप को परित्याग करकेद्रम सव को
शान्ति का प्रदान करो। अपनी आत्मा के द्वारा ही अपनी आत्मा को
जानिए । अर्थात् स्वय ही अपने आपके स्वरूप का ज्ञान प्राप्त कीजिये।
और आत्मा से ही आत्मा को धारण करिए ||१०४॥ और वह सती
दिव्यमान से मौ वर्षों के व्यतीत हो जान पर नेता युग के आदि म वही
मनी आपकी भार्या होगी ।।१०।।
इत्युक्तो वेधसा शम्भुस्तूष्णी ध्यानपरायण ।
अधोमुखस्तदा प्राह ब्रह्माणममितौजसम् ॥१०६
यावद ब्रह्मन्नह शोकादुत्तरामि सतीकृतात् ।
तावन्मम सखा भूत्वा कुरु शोकापनोदनम् ।।१०७
तस्मिन्नवसरे यत्र यत्र गच्छाभ्यह विधे ।
तन तन भवान् गत्वा शोकहानि करोतु मे ॥१०६
एवमस्त्विति लाकेश प्रोक.वा वृषभवाहनम् ।
हरेण साधं कैलास गन्तु चक्रे मनस्तत ॥१०६
ब्रह्मणा सहित शम्भु कलाशगमनोत्सुकम् ।
समासेदुर्गणा दृष्ट्वा नन्दि गिमुखाश्च ये ॥११०
तत पर्वतसकाशो वृषभ पुरतो विधे ।
उपतस्ये सिताभ्रस्य सहको गरिको यथा ।।१११
वासुक्याद्याश्च ये सर्प यथास्थानञ्च ते हरम् ।
भूपयाचनुरुद्गम्य शिरोवाहादिपु द्रुतम् ।।११०
मार्कण्डेय मुनि ने महा-ब्रह्माजी के द्वारा इस रीति से कहे
हुए शम्भू नीचे की ओर मुख वाले-ध्यान म परायण होकर अमित
ओज वाले ब्रह्माजी से वोले-ईश्वर ने कहा-हे ब्रह्मन्
। जब तक मैं
सती के द्वारा किए हुए शोक मे उत्तीर्ण होऊ तब तक आप मेरे राखा
हा व शाप का अपनोदन करिए । हे ब्रह्माजी । उस अवसर में मैं जहाँ
जहां पर भी गमन करूं वहाँ-वहाँ पर ही आप भी गमन करने मेरे इस
२०६ [पालिका पुराण दुस्सह शोक को हानि वरिप । तात्पर्य यही है कि मेरे साथ ही मवदा आप रहकर जहां पर भी में जाऊ यही पर मर शोर या विनाश करन की धृपा करे ॥१०६-१०८॥ लोकेश व्रह्माजी न ' ऐसा ही हाव यह वृषभ वादन स कहकर अर्थात् में आपने माय म सर्वत्र रहकर आप के शोक का विनाश करूंगा फिर ब्रह्माजी ने भगवान शम्भु के ही साथ मे कैलास गिर पर जाने वा मन किया था ॥१०६। ब्रह्माजी के साथ भगवान् शम्भु को कैलास पवत की ओर गमन करने के लिए उत्सुक देखकर जो नन्दि और भृङ्गि आदिगण ये व भी यह देखकर वहां प्राप्त होगये थे ॥११०॥ फिर एक विशाल पर्वत के ही समान वृषभ विधाता के सामने उपस्थित हो गया था जिस तरह से सिताभ्र के साश गैरिक होवे ॥१११।। वामु कि आदि जा म थे उन सवने यथा स्थान पर भगवान शम्भु को बहुत शीघ्र वहा आकर शिव के शिर और वाहु आदि मे उनको विभूपित कर दिया था। कथन का अभिप्राय यही है कि वायु कि प्रभृति सब सर्प वहाँ आकर शिव के वरादि अङ्गो के आभूषण बन गये थे ॥११२॥ ततो ब्रह्मा च विष्णुश्च महादेव सतीपति । सर्वे सुरगण मार्क जग्भु प्रालेयपर्वतम् ॥११३ ततस्तानीपधिप्रस्थान् नि सत्य नगराग्दिरि । सर्वैरमात्य सहित उपतस्ये सुरोत्तमान् ॥११४ तत सम्पूजितास्तेन सुरौघा गिरिणा सह । सचिव पौरवर्गश्च मुमुदुस्ते सुरर्पभा ॥११५ ततो ददर्श तव गिरीन्द्रस्य पुरे हर । विजयामोपधिप्रस्ये सखीभिगतिमात्मजाम् ॥११६ सापि सर्वान, सुरवरान, प्रणम्य हरमुक्तवान, । चुनोश मातृभांगनी पृच्छन्ती गिरिश सतीम् ।।११७ क्व सती ते महादेव शोभसे न तया विना । विस्मृतापि त्वया तात मद्ध,दो नापसपति ।।११८ विजया सखो के शोकोद्गार ] २०७ ममाग्रे सा पुरा प्राणान यदा त्यजति कोपतः । तदव ह शोकशल्यविद्धा नाप्नोमि वै सुखम् ॥११६ इत्युक्त्वा वदनं वस्त्रप्रान्तनाच्छाद्य सा भृशम् । रुदन्ती प्रापतद्भूमौ कश्मलञ्चाविशतदा ।।१२० इसके अनन्तर ब्रह्मा-विष्णु और सती के पति महादेव समस्त देवो के समूह के साथ हिमवान् पर्वत पर चले गये ये ॥११३॥ इसके पश्चात् गिरि अपने नगर से निकलकर उन योपधियों के प्रस्थो को समस्त अपने अमात्मो के सहित मुरोत्तमो के सामने उपस्थित हुए थे। ११४। इसके अनन्तर उस गिरिराज के द्वारा वे सभी मुरगण पूजे गये थे और सबका एक ही साथ अभ्यर्चन किया गया था। वहां पर उस देवो के यजन करने में सभी सचिव और पुरवासीगण भी सम्मिलित थे। वे सुरगण बहुत ही प्रसन्न हुये थे ॥११॥ फिर वही पर उस गिरीन्द्र के नगर में भगवान हरने उस योपधियो के प्रस्थ पर मखियों के माध गौम को आत्मजा विजया का अवलोकन किया था। ॥११६।। उसने भी उन समस्त मुखरी को प्रणिपान करके हरमे कहा था । गिरिश से अपनी माता की भगिनी मती के विषय में पूछती हुई ने क्रोध पिया पा ॥११॥ हे महादेव ! आपकी वह सती कहाँ पर हैं उनके विनात्मे आप शोभित नहीं हो रहे हैं । हे तान ! आपके द्वारा भी वह विस्मृत हो गई हैं अर्थात् आपने तो उस सनी को भुला ही दिया है तथापि मेरा हृदय अपमपित नहीं होता है अर्थात मरे हृदय से दुख दूर नहीं हट रहा है ।।११८॥ मेरे ही आगे पहिले समय में उमने जिस समय में कोप में प्राणां को स्यागती है उमी समय में शोक रूपो शल्य से विद होकर सुग को प्राप्त नहीं करती हूँ ॥११६इतना वहार वस्त्र के छोर से मुप को ढक कर यह बहुत अधिक रदन ती हुई भूमि पर गिर पड़ी थी और वहन टुप को प्राप्त हो गई थी ॥१२०।।
२०८ [ मालिका पुराण ॥ सन्ध्या तपश्चरण वर्णन ।। ततस्ता पतिता दृष्ट्वा तदा दाक्षायणी स्मरन । न शशाक ह सोढु शोकमुद्वंगसम्भवम् १ भ्रष्टधर्यस्तत. शम्मुर्वाप्पव्याकुललोचन. । पश्यता सर्वदेवाना चिन्ताध्यानपरोऽभवत् ॥२ अथाश्वास्व तदा धाता विजया शोककपितान् । हरमाश्वासयन् सान्त्यपूर्वमेतदुवाच ह ॥३ पुराणयोगिन्, भगवन्न शोकस्तव युज्यते । परधाम्नि तव ध्यानमासीत् कस्मात् स्त्रियामिह ॥४ प्रभविष्णु. पर. शान्त. सूक्ष्म स्थूलतर. सदा। तव स्वभावश्च कय शोकेन वहुधाकृत ।।५ निरञ्जन ध्यानगम्य यतोना परात्परं निर्मल सर्वगामि। मलोन रागलोमादिमियंत तत् ते म्प त्वद्भूत गृह्ण बुद्ध्या ॥६ मार्कण्डेय महर्षि ने कहा-इसके पश्चात् उस समय मे दाक्षायणी का स्मरण करते हुए उसको भूमि पर गिरी हुई देखकर उस समय मे शोक से समुत्पन्न उद्वेग युक्त रज को शिव सहन न कर सके थे ॥१॥ जिनका धीरज एक्दम ही नष्ट हो गया था ऐसे भगवान् शम्भु वाप्पो से व्याकुल लोचनी वाले हो गये ये अर्थात् उनके ने नो से अविरल अश्र, प्रवाह घलने लग गया था। सभी देवो के देखते हुए वे भगवान शिव चिन्ता के ध्यान मे तत्पर हो गये थे ॥२॥ इसके अनन्तर ब्रह्माजी ने शोव में वर्थित विजया को ढादम बंधाकर फिर भगवान् शङ्कर को समाश्वासन देते हुए सान्त्वना के साथ यह वचन कहने लगे थे ।। ३ ।। * ने कहा-हे भगवन आप पुराने योगी है। आपको ऐसा करना युक्त नही प्रतीत होता है। आपका ध्यान था पर धाम में मच्या तपश्चरण वर्णन ] २०६ ही था फिर यहाँ पर सती में वैसे हो गया है ? ॥ १ ॥ आप तो प्रमा विष्णु-पर---शान्त-मूक्ष्म तथा सदा ही स्थलतर यौर आपका स्व. भाव रिस तरह से शोक के द्वारा बहुत प्रकार का बन गया है ? ॥५॥ आप तो निरन्जन है और आप बडे २ पतियों के ध्यान में जानने के योग्य हैं। आप पर से भी पर है--आपका स्वरूप निर्मल है तथा आप सर्वत्र गमन के स्वभाव एव शक्ति मे समन्वित हैं । जो राग और लोभ आदि मन है उन मला मे माप विहीन रहने वाले है। ऐसा ही यापका स्वरूप है उसे ही आप अपनी बुद्धि मे ग्रहण कीजिए ।।६।। शोको लोभ क्रोधमोही च हिंसा मानो दम्भो मदमोहप्रमोदा: । ईप्यसियाक्षान्तिरमत्यता च चतुर्दश माननाशा हि दोपाः ।।७ ध्यानेन त्वा योगिनश्चिन्तयन्ति त्वं विष्णम्पी जगता विधाता। या ते महामोहकरी मतीति तवैव सा लोक्मोहाय माया ।। या सर्वलोकाजननेऽय गर्म विमोयन्ती पूर्वदेहम्य गुद्धिम् । विवाश्य वाल्य कुरते हि जन्तो- विमोहयत्यद्य सा त्व सशोकम् ॥ सतीसहस्राणि पुरोज्झितानि स्वया मृतानि प्रतिकल्प मेवम् । हिाय लोकन्य चराचरस्य पुनर्गहीता च तथा त्वयेयम् ॥१० भवान्तरं ध्यानयोगेन परय सतीमहन्नाणि मृतानि यानि । पया तथा त्व परिवजितश्च यथास्ति सा वा दृपराजक्तो।।११ २१० [पालिका पुराण यत समुत्पद्य मुहुभयन्त सा प्राप्स्यतीश निदर्शदुरापम् । पुनन्च जाया यादृशी ते भवित्री तत्तत् सर्व ध्यानयोगेन पश्य ॥१२ प्राणी के अन्दर रहने वाले ज्ञान के विनाश करन वाले निम्न दर्शित चौदह दोप हुआ करते हैं । वे ये हैं-शोष-लोभ-क्रोध- मोह-हिंसा-मान-( मैं बहुत ही महान हू-ऐसा मान मन म रखना) तम्भ अर्थात् यापणु-मद मोद-प्रमोद-ईर्ष्या-अमूया--अक्षान्ति और असत्यता । ७ । आप तो विष्णु के ही स्वरूप वाले जगतो के विधाता है अर्थात् जगतो की रचना करने वाले हैं । जो भी आपको महान मोह पर देने वाली सती है । यह तो आपको ही लोको के मोह के लिये माया है ।८। जो समस्त लोको को जनन मे और गर्भ में पूर्व देह की बुद्धि को विमोहित करती हुई विनाश करके वाल्य अवस्था मे जन्तु का किया करती है आज वह ही शोक के सहित आपको विमोहित कर रही है ।६। प्रत्येक कल्प मे पहिले आपने सहस्रो सातया का त्याग किया मृत हो गई थी। इस प्रकार से इस चर-अचर लोक के हित के ही सम्पादन करने के लिये उसी भांति आपके द्वारा यह सती पुन ग्रहण की गयी थी ॥१०॥ हे वृषराज केतो | आप ध्यान के योग द्वारा देखिये, दूसरे जन्म मे जो सहस्रो सतियां मृत हुई हैं आप यथा तथा पारजित हैं अथवा जैमी वह है ॥ ११ ॥ क्योकि वह पुन समुत्पन्न होकर हे ईश। आपको ही प्राप्त करेगी जो आप देवगणो के द्वारा भी दुष्प्राय होते हैं । और फिर वह जैसी जाया आपकी होने वाली है। यह सभी कुछ आप ध्यान के योग द्वारा दख लीजिए ।१२। एव वहुविध ब्रह्मा व्याहरन् साम शवरम् । गिरिराजपुराजपुरात्तस्माद्गमयामास निर्जनम् ।।१३ ततो हिमवत प्रस्थे प्रतीच्या तत्पुरस्य च । था जो वह सन्ध्या तपश्चरण वर्णन ] ૨૧૧ शिप्रं नाम सरः पूर्ण ददृशुहिणादयः ॥१४ तद्रहस्यानमासाद्य ब्रह्मशकादय सुरा । उपविष्टा यथान्यायं पुरस्कृत्य महेश्वरम् ।।१५ तं शिप्रसज्ञ कासार मनोज्ञ सर्वदेहिनाम् । शोतमलजल सर्वंगुणेनिससम्मितम् ।।१६ दृष्ट्वा क्षण हरस्तस्मिन् सोत्सुकोऽभूदवेक्षगे । शिप्रां नाम नदी तस्माग्नि. सृता दक्षिणोदधिम् । गच्छन्तीञ्च ददर्शासी पावयन्ती जगज्जनान् ।।१७ तत्सरः पूर्णमासाद्य चरतः शकुनान् बहून् । नानादेशागताञ्जम्भुर्वीक्षाञ्चके मनोरमान् ।।१८ मार्कण्डेय महर्षि ने कहा--इस रीति से ब्रह्माजी ने बहुत प्रकार के साम को भगवान् शकर से कहा था। फिर उम गिरिराज के नगर मे उनको निर्जन स्थान में गत कर दिया था ॥ १३॥ इसके उपरान्त मिवान् के प्रस्थ में और उसके नगर के पश्चिम दिशा में द्रहिण आदि ने शिम नाम वाला परिपूर्ण एक सरोवर देखा था ॥१४॥ उस परम एकान्त स्थान को प्राप्ति करके ब्रह्मा और इन्द्र आदि देवी ने वहां पर उपवेशन दिया था अर्थात् वहाँ पर बैठ गये थे और जैसा भी न्याय था उसी के अनुमार उन्होंने महेश्वर को अपने आगे बिठा लिया था ॥१५॥ वह शिप्र नाम वाला सरोवर बहुत ही सुन्दर या जो सभी देहधारियो के मन को हरण करने वाला था। उसका जल ठण्डा और निर्मल था। वह सरोवर अपने सभी गुणो से मानस सरोवर के ही तुल्य था ॥१६॥ भगवान शम्भु उस सरोवर को देखकर एक क्षण पर्यन्त उसके देखने में उत्सुकता से सयुन हो गये थे । उसी सरोबर से एक शिप्रा नाम वाली नदी निपली है और वह दक्षिण सागर को जा रही थी-जो जगत के जनो को पावन कर रही थी ऐसा उनने वहाँ पर देखा था ॥१७॥ उम पूर्ण मरोवर के पास प्राप्त होकर अनेर देशो मे समागत हुए परमाधिक २१२ । पालिषा पुराण सुन्दर चरण करते हुए बहुत स पक्षियो यो शम्भु न अवलोकन किया था ॥१८॥ गम्भी रपवनोदधुतिसम्पन्नेषु विराजित । कोक्द्वन्दास्तरगेषु ददर्श नृत्यतो यथा ॥१६ मद्गुचञ्चुपू सम्पृक्तास्तरगान् स पृथक् पृथक् । वीक्षाञ्चक्रे यथा तोयादुत्पनपतगान् मुहु ॥२० कादम्ब सारसहस श्रेणीभृतस्तटेतटे। भगीकृतयथा शख सागरस्तादृश सर २१ महामीनाहतिक्षुब्धस्तोयशब्दोत्यसाध्वस । पक्षिमिविहत शव्दस्तन तत्र मनोहरम् ॥२२ प्रफुल्ल पकजेश्चैव क्वचिर्जालमनोहरै । सरोरेजे यथा स्वर्गो नक्षत्र स्थूलसूक्ष्मकं ॥२३ महोत्पलाना मध्येपु विरल नीलमुत्पलम् । रेजे नक्षत्रमध्येपु नीलनारदखण्डवन् ।।२४ वहाँ पर विराजित होकर उन्होन गम्भीर वायु से उद्धृत एवं सम्पन्न तरङ्गो में चक्रवाक के जोडो को नृत्य करते हुए देखा था ।१६। उन शम्भु भगवान् ने चञ्चुओ मे सम्पृक्त तरङ्गो को पृथक्-पृथक देखा था जिस तरह से जल से पुन उत्पतन करते हुए पशियो को देखा हो ॥ २० ।। प्रत्येक तट पर श्रेणी में आवद्ध हुए कादम्ब सारस और हसो के द्वारा भङ्गीकृत शखो से सागर जैसा हो वैसा ही वह सरोवर पा। जिमको शिव ने देखा था । २१ ।। वडे २ मत्स्यो की आति से अर्थात् वही मछलिया के उछालो से क्षोभ को प्राप्त हुए जल के शब्द से भय उत्पन्न होने वाले पक्षियों के द्वारा विहित शब्द वहाँ पर हो रहा था। वहां पर उस मन के हरण करने वाले दृश्य का अवलोकन किया था ॥२२॥ विवाग का प्राप्त हुए कमला स और कही पर मनोहर जती ग यह मरोवर परम शोभित हो रहा था। जिस तरह से स्थूल
राध्या तपश्चरण वर्णन ]
२१३
और मुक्ष्म नक्षत्रो से स्वर्ग शोमायमान हुआ करता है ॥२३॥ बडे वटे
कमला के मध्य में विरले हो नील कमल उमम दिखलाई दे रहे घ और
वह ऐसे ही शामा मे मयुत थे जमे नशनो के मध्य म नीले मेप का खड
शोभित
हुआ करता है ।। २४ ।
पद्मसधात-मध्यस्था हसा कश्चिन्न सस्तुता ।
प्रफुल्लपक्जभ्रान्त्या निश्चला स्वगवामिभिः ॥२५
द्विधा दृष्ट्वा शोणशुक्ले पो फुल्ले विधि स्वके ।
कायेऽणत्व फुल्लत्व स्वासनाज निनिन्द च ॥२६
फुरल महात्पल वीक्ष्य सरसम्तस्य शकर 1
मौलोन्दुवान्तिमलिन हस्तस्थ नान्पल गमे ।।२७
हरे. स्वचक्रमूर्या शुपफुल हस्तगाताम्चुगम् ।
सर पमन्च मदृश मेने वीक्ष्य समन्तत ॥२८
मत्सरो वीव्य सम्पूर्ण नानापक्षिसमाकुलम् ।
पद्मिनीशतसन्छन्न नीलोत्पलचयं तम् ।।२६
देवदारतरणाञ्च तटस्थाना प्रसूनज ।
परागर्वामित जल हृदयानन्दवारकम् ॥३०
तोरे तोरे महावृक्षं शादत परिवारितम् ।
दृष्ट्वा शम्मु क्षण तत्र मोतम शोव वर्जित.॥३१
पद्मा के समूह के मध्य म मम्पिन हम विन्ही के द्वारा मस्तुन
नहीं हो रहे थे क्यों कि उनम भी विकसिन कमलों की प्रालि होनी यो
अर्थात उन हमो का भी जा रमला के बीच म स्थित थे। खिले हुए
कमल हो ममता जा रहा था। वे स्वर्ग वामियों के द्वारा निधन हो
दिखाई दे थे 10 दो प्रकार के शाण और गुक्ल विमित पदमी
को देवार ब्रह्माजी न अपन आमन के कमल दे काम म उत्फुल्लत्व
पौर अरणत्व की अर्याद विकास और लालिमा की निन्दा की थी।६।
महादेवजी न उम मरोदर के विमिन महोत्पन का अवलोकन कर
उन्होंने हाय में स्थित समाना कुछ भी मान नहीं किया था क्यानि
[ कालिका पुराण वह हाथ के कमल की यान्ति मस्तव में स्थित चन्द्रमा की दान्ति मे मलिन हो गया था ॥२७॥ भगवान हरि के अपने सुदर्शन चक्र के सूर्य की किरणो मे विमित हाथ मे रहने वाला यमल को और सरोवर के पद्म को मव ओर देखबर सदृश ही माना था ॥ २८ ॥ उम सगे- वर को जो नाना भांति के पक्षियो में समाकुत--सम्पूर्ण-मैकडो ही कमलिनिओ से मच्छन्न (ढा हुआ ) और नीलोत्पलो के समूहो से युक्त था, देखा था। वह सगेवर तट पर स्थित देवदार के वृक्षो के प्रमूनो मे रहने वाले परागो मे सुगन्धित जल में समन्वित था और देखन वालो के हृदय यो महान आनन्द को उत्पन्न करने वाला था। १॥३०॥ उम मगेवर के प्रत्यक तट पर महान् विशाल वृक्ष थे और वह शाद्वलो से भी परिवारित था अर्थात उमके किनारे शाद्वलो से चारो ओर घिरे हुए थे। ऐसे उस सुन्दर मगेवर की शोभा को देखकर शम्भु क्षण भर के लिये उत्सुक्ता से युक्त तथा शोक से रहित हो गये थे। तात्पर्य यही है कि उस सरोवर की सुषमा से शम्भु का शोक मिट गया था और एक विशेष उत्सुक्ता उनके हृदय में उत्पन्न हो गई धी॥३१॥ शिप्रामालोकयामास नि सृता सरसस्तत । यथेन्दुमण्डलाद् गगा मेरोर्जाम् पुनदी यथा । तथा दृष्ट्वा महेशेन शिप्रा शिवाद्विनि सृता ॥३२ शिप्राह्वय क पासार' कथं शिप्रा तत सृता। कोदृशोऽस्य प्रभावश्च तत् समाचक्ष्व विस्तरात् ।।३३ शृण्वन्तु मुनयः सर्वं यथा शिप्रा नदी सृता। गिप्रस्य च महाभागा प्रभाव गदतो मम ।।३४ वसिप्ठेन यदा देवी परिणीता वरुन्धती। तदा वयाहियस्तोय शिप्रासिन्धुरभदिना ॥३५ स समागत्य पतिता शिप्रे सरसि शासनात् । यया मन्दाविनी विष्णुपादादब्धौ शिवोदया ॥३६ मन्ध्या तपकरण वर्णन ] २१५ ब्रह्मविष्णुमहादेवस्तोय सिक्न तयो पुरा । विवाहे शान्तिविहितं गायत्रोद्रुपदादिभि ।।३७ एकीभूतन्तु ततोय मानसाचलकन्दरान् । तन् मर्व पतित शिप्रे कामारे सागर।पमे ॥३८ भगवान् महेश्वर ने उप मगेवर गे निबनी हुई शिप्रा नदी का अवलोकन किया था जिस प्रकार से इन्द मण्डत स भागीरथी गङ्गा और मेरु पर्वत म जाम्बु नदी निकलती है । उमी भांनि देखकर भगवान शम्भु ने शिप्र से शिप्रा को पिनि हत दिया था।॥ ३२ ॥ "पियो ने पहा-णित नाम वाला मरोवर कौत मा है और विग प्रकार में उसमे शिप्रा नदी सत हुई थी ? इसका प्रभाव किस प्रकार का है --यह सभी पुछ आप विस्तार पूर्वर वर्गन कीजिय ।३३) माकपडेय मुनि ने कहा- हे मुनिगणों । अब आप लोग श्रवण कीजिए कि जिम प्रकार से शिप्रा नदी सूत हुई थी। हे महाभागो | यह भी मुनिए कि उस शिप्न का क्या प्रभाव है क्यो में मैं यह सभी बार लोगों को बतला रहा हूँ ॥३४॥ जिम समय में मिष्ठ जी ने देवी अग्न्धती का विवाह किया था। हे द्विजो उमी ममय मे वैवाहिक जलो से शिप्रा नदी समुत्पन्न हुई थी।३५। वह समागन होकर शामन में णित्र सरोवर म गिरी थी जिस प्रकार मे भागीरथी गङ्गा भगवान् विष्ण के चरणो में शिव जल वाली मागर म पनित हुई थी ।। ३६ ।। ब्रह्मा, विष्णु और महादेव-इन्होंने पहिले उन दोनो का जन विवाह गायत्री मे पदादि मे शान्ति विहिल सिक्त किया था ॥३७॥ वह एक स्वत्य म होने वाला जल मान मानसाचन के कन्दर मे वह सम्पूर्ण ग्ल मागर के ही समान शिन सरोवर प परित हुआ था ॥३८॥ देवानामुपभोगार्थ पुरा धारा विनिर्मितम् । सर शिप्राह्वय सानो प्रालेयस्य गिरेमहत् ॥३६ 1 २१६ [ कालिया पुराण तवाद्यापि मुनासीर महितश्चाप्मरोगणे । शचीमहायो रमते प्रमन्ने मालिते शुभे ॥४० तव सर्वदा यत्नाद्रक्ष्यतेऽद्यापि रत्नवत् । न तत्र मानुष कश्चिद यातु शक्नोति योऽमुनि ॥४१ तप प्रभावान्मुनय प्रयान्ति सरसी शुभाम् । शिप्राध्यान्तु महायत्नात स्नातु पातुञ्च तज्जलम् ॥४२ 'तम स्नात्वा च पीत्वा च मनुप्या दैवयोगत ! अवश्यममग्त्वाय गच्छन्त्यविक्लेन्द्रिया ॥४३ वृद्धि गच्छति वर्षामु मरो नैतदद्विजोत्तमा । न ग्रोप्मे शोपता गति सर्वदा तद्यथा तथा ।।४४ तत्र नन पनित तोय वमिप्ठोद्वाहसम्भवम् । ब्रह्मविष्णुमहादेवकरपदमरदीरितम् ॥४५ पहिने गमय मे देवों के उपयोग वरने के लिये ही धाता रे गरा विशेष निर्माण किया था जो हिमवान के शिखर पर एक महान गि नाम वाना गरोवर है ॥३॥ वही पर आज भी अप्परागणों महित इन्द्र देव अपनी शची को माप मे लेवर उम परम शुभ अम में रमण या वरते on आज नर भी वह देवों के नाग रन वीही भौति सर्वदा यत्न ये माय रक्षित हुआ परता है। यहां पर कोई भी मनुष्य जो मुशि नही है जा नहीं बना है ॥११॥ पहा पर नपरे प्रभाव में मुनिपग परम शुभ मरोवर में गमन पिया पर । महान् परागही वे सोग निया नाम वाले मरोवर में उपये कार में ग्नान पाने के लिए नया पान वाने को जायापले १२॥ art पर मनृप है व योग मे मो नम मा सान तपा पान पसे वाम दियो शान हो ए यायही देव के विकास प्राली गया ! निगमो। पर गेषा वर्षा ऋतु में भी लमही होतापमान माग्यो
मन्ध्या तपश्चरण वर्णन
२१७.
-
के समान यह सरोवर का जल नही वा करता है। और यह गर्मी की
ऋतु म शोपण को भी प्राप्त नहीं हुआ करता है। यह ता सर्वदा ही
जमा है वैसा ही रहा करता है। न घटता है और न कभी बढता ही
है ॥४४॥ वहाँ पर वसिष्ठ मुनि के विवाह मे जम प्राप्त करन वाला
वह जल जो पतित हुआ था ब्रह्मा-विष्णु और महादेव के वर कमला
के द्वारा उदोरित है ।।४५शा
ववृधे शिप्रगर्भस्थमन्वह द्विजमत्तमा ।
तन वृद्धन्तु तत्तोयञ्चक्रेण च हरि पुरा ।।४६
गिरे शृग विनिर्मिद्य लोकाना हितकाम्यया।
पृथिवी प्रेरयामास कृत्वा पुण्यतमा नदोम् ॥४७
परिवृत्य महेन्द्र सा पुनाना स्नानकारिण ।
दक्षिण सागर पाता फलदा जाह्नवी समा ॥४८
शिप्राय्यान सरसो यस्मान्नि सृता मा महानदी।
अत शिप्रेति तन्नाम पुरव ब्रह्मणा कृतम् ॥१६
कार्तिक्या पौर्णमास्या तु तम्या य स्नाति मानव ।
स याति विष्णुसदन विमानेनातिदोप्यता ॥५०
कानिक सरल मास म्नात्वा शिप्राज ने नर ।
प्रयाति ब्रह्ममदन पश्चान्मोक्षमोक्षमवाप्नुयात् ॥५१
वसिष्ठेन कथ देवी परिणीता स्वरुन्धती ।
कम्य मा तनया ब्रह्मन्नुत्पन्ना वा वदस्व न ॥५२
हे द्विज श्रेष्ठो शित्र के गर्भ के मध्य में स्पिन जल प्रतिदिन बढ़ता
था। वहाँ पर उस वढे हुए जल का पहिल भगवान् हरि ने अपने चक्र
के द्वारा लोको की भलाई करने की कामना से गिरि की शिखर का
भेदन करके नदी का परम पुग्यतम करने पृथ्वी की ओर प्रेरित कर
दिया या ॥४६।। जाह्नवी गङ्गा के ही समान फल देने वाली वह नदी
स्तान करने वालो की पवित्र करती हुई दक्षिण सागर को चली गयी
२१८ [ वालिका पुराण थी ॥४८॥ क्याकि वह नदी शिप्र नाम वाले सरोवर से ही ममृत्पन्न हुई थी अर्थत् वह महा नदी शिप्र से निकली थी अतएव उसका शिप्रा. यह शुभ नाम पूर्व मे ही ब्रह्माजो ने रक्खा या l जिसमे कात्तिक मास की पूर्णिमा तिथि के दिन जो भी कोई मनुष्य स्नान किया करता है वह मनुष्य अत्यन्त देदीप्यमान विमान के द्वारा भगवान् विष्णु देव के लोक मे गमन किया करता है। तात्पय यही है कि इस महा नदी में कात्तिक मास की पौण मासी मे स्तवन करन का ऐगा पल हुआ करता है कि वह सीधा विष्णु लोक को प्राप्त कर लिया करता है ॥५०॥ पूरे कात्तिक माम में शिप्रा नदी क जल म जो भी मनुष्य स्नान किया करता है वह मोधा ही ब्रह्माजी के लोक को चला जाया करता है और कुछ समय तक वहाँ दैविक सुखा का भोग करके पीछे समार के जम और मृत्यु के निरन्तर आवागमन से मुक्त होकर मोक्ष की प्राप्ति कर लिया करता है ॥५१॥ पिगणो ने कहा--महामुनि वमिष्ठ जी ने किस प्रकार मे अरुन्धती देवी के माथ विवाह किया था ? हे ब्रह्मन वह अन्धती विसकी पुत्री समुत्पन्न हुई थी---यह मभी आप कृपा करके हमको वर्णन करके समझाइये ॥५२॥ पतिव्रतासु प्रथिता त्रिषुलोरेप या वरा। भतूंपादौ विनान्यत्र या न चक्षु प्रदास्यति ॥५३ यस्या स्मृत्वा क्थामान माहात्म्यसहित स्त्रिय । प्रेत्येह च मतीत्व वं प्राप्नुवन्त्यन्यजन्मनि ।।५४ आसन्नकालधर्मों या न पश्यति तथा शुचि । पुरुप पापपारी च तस्या जन्म वदस्व न ॥५५ शृणुध्व सा यया जाता यस्य वा तनया शुभा। यथायाप रसिष्ठ सा यथाभूता पतिग्रता ॥५६ या मा सन्ध्या ब्रह्ममुता मनोजाता पुराभवत् तपम्नप्रवा तनु त्यक्त्वा मंय भता त्वन्धती ॥५७ सध्या तपश्चरण वर्णन २१६ मेधाति सुता भृत्वा मुनिथेष्ठस्य सा सती । ब्रह्मविष्णुमहेशाना वचनाच्चरिखता। वरो पनि महात्मान वसिष्ठ सशितव्रतम् ॥५८ वह परम श्रेष्ठा देवी अन्यतो तीनो लोकों में पतिव्रता नारियो मे बहुत ही अधिक प्रसिद्धा हुई थी। वह ऐमी ही पतिव्रता नारी थी कि अपने पतिदेव के चरणों के अनिरिक अन्य विसी भी स्थान में अपने नेत्रो मे नही देखा करती थी ॥५३॥ जिस देवी अरधनी की केवल कथा का ही श्रवण करके जो कि माहात्म्य के सहित है स्त्रियाँ स्मरण करके यहाँ सतीत्व को प्राप्त करती हई मर वर भी अन्य जन्म में भी सतीत्व को प्राप्त किया करती हैं ॥५४|| कालधर्म को समामन्न होने वाला पुरुप जिसका दर्शन नही किया करता है तथा जो भी शुचि होता है वह पुरुष पापकारी होता है। उस देवी का जन्म का वर्णन आप हमारे समक्ष में करने की कृपा करिए ॥५५॥ मार्कण्डेय महर्षि ने कहा था- आप लोग भली भांति श्रवण कीजिए जैसे वह ममुत्पन्न हुई थी। और जिस प्रकार मे उस देवी ने अपन पति के स्वरूप में वरिष्ठ मुनि को प्राप्त किया था और जैसे वह परम प्रसिद्ध पति व्रता हुई थी ॥५६।। जो सन्ध्या पहिले ब्रह्माजी पुत्री मन स ही समत्पन्न हुई थी उसने तपस्या का तपन दिया था और वही शरीर का त्याग करके पीछे अरु- 'धती नाम वाली हुई थी ॥५७॥ वह मेधातिथि की पुत्री होवर वह मती ब्रह्मा-विष्णु और महेश के वचन मे चरित व्रत वाली मुनियो मे श्रेष्ठ की सती हुई थी। उगने ही यशित व्रतो वाले महात्मा वसिष्ठ का पनि के स्वरूप में वरण किया था अर्थात् स्वप ही वसिष्ठ को अपना पति बनाना स्वीकार किया था ॥५॥ कथ तया तपस्तप्त किमयं कुन्न सन्ध्यया । कथ शरीर सा त्यक्त्वा भूता मेधातिथे सुता ॥५६ कथ वा गदित देवव्रह्मविष्णुशिवं पतिम् । - २२० [ वालिया पुरण वमिष्ठ सुमहात्मान सा वने सशितव्रतम् ।।६० तन्न मर्व समाचदव विस्तरेण द्विजोत्तम । एतत्र श्रीप्यमाणाना चरित द्विजसत्तम । अरुन्धत्या महासत्या पर कोतुहल महत् ॥६१ ब्रह्मापि तनया सन्ध्या दृष्ट्वा पूर्वमथात्मन । कामाय मानसञ्चक्रे त्यक्ता सा च सुतेति वै ।।६२ कामस्य तादृश भाव मुनिमोहकर मुहु । दृष्टवा सन्ध्या स्वय तत्र नपामायाति दुखिता ॥६३ ऋपियो ने कहा- उस ज.ध्या ने किस प्रयोजन की सिद्धि के लिये कहाँ पर किस प्रकार से तप किया था? फिर क्यो अपने शरीर का परित्याग किया था और वह मे मेधातिथि की पुत्री होकर समु- त्पन्न हुई थी ? मे ब्रह्मा-विष्णु और महेश दवो के द्वारा कहे हुए परम मशित वाले मुन्दर महात्मा वसिष्ठ मुनि को उसन' अपने पति के स्थान म वरण किया था ? ॥५६॥६०॥ हे द्विजोत्तम | इस धरित को थपण परन की इच्छा वाले हमको यह सब विस्तार के साथ कहने की कृपा कीजिए। महा सती अरुन्धती देवी के चरित के सुनने के लिये हमारे हृदय मे वडा भारी कोतूहल हो रहा है ॥६१।। मार्कण्डेय महषि ने कहा-ब्रह्माजी ने भी पहिले अपनी पुत्री सध्या को देखकर काम वामना के लिए अपना मन किया था और फिर उस मुता का त्याग वर दिया गया था ॥६॥ काम ये उम प्रकार व भाव को जो मुनियो व हृदय म भी मोह के परने वाला है यहाँ पर उसको सन्ध्या ने स्वय ही देखा था वह परम दुखिना होकर लज्जा को प्राप्त हो गई थी अर्यात म्यय हा सम्जा आ गई थी ॥६॥ ततस्तु ब्रह्मणा शप्ते मदने तदनन्तरम् । अन्तर्भूत विषो शम्भो गते चापि निजास्पदम् ॥६४ अमर्षवशमापन्ना सन्ध्या ध्यानपराभवत् । .
सध्या तपश्चरण वर्णन ]
२२१
घ्यायन्ती क्षणमेवाशु पूर्ववृत्त मनस्विनी १६५
करिप्याम्यम्य पापस्य प्रायश्चिरूमह स्वयम् ।
मात्मानमग्नी होप्यामि वेदमागानुमारत. ॥६६
किन्त्वेका स्थापयिष्यामि मर्यादामिह भूतले ।
उत्पन्नमात्रा न यया सकामा. स्यु शरीरिण. ॥६७
एतदर्थमह कृत्वा तप परमदारुणम् ।
मर्यादा स्थापयित्वंव पञ्चात्त्यक्ष्यामि जीवितम् ॥६८
यस्मिन्छरीरं पित्रा में हभिलाप. स्वयं कृतः ।
भ्रातृभिस्तेन कायेन विचिन्नाम्ति प्रयोजनम् ॥६६
येन म्वन शरीरेण ताते च सहजे स्वके ।
उद्भाविन. कामभावो न तत्सुकृतसाधकम् ॥30
इति सञ्चिन्य मनसा सन्ध्या शैलवर ततः ।
जगाम चन्द्रभागाच्य चन्द्रभागा यतः सूता 133
तया स शल समधिष्ठित तदा
मुवर्णगोर्या मुममप्रभामुना ।
सोमेन मन्ध्यासमयोदितेन
ययोदयाद्रिविरराज पश्यन् ।।32
को
२२२
[ पालिका पुगण
परमाधिक दारण अर्थात् कठिन हद वय का समाचरण कर मर्यादा
को स्थापना परके ही इसके पश्चात अपन जीवन का त्य ग वरूँगी १६७।
जिस मेरे शरीर मे मरे पिता ब्रह्माजी ने अपने मन की अभिलाषा स
समन्वित स्वय दिया था उस शरीर म भाइयो के साथ कुछ भी प्रयोजन
नही है ॥६॥ जिस अपने शरीर के द्वारा सहज स्वीय तात मे काम
का भाव उद्भावित कर दिया गया था वह शीर कभी भी
सुकृत
साधना करने वाला नहीं है ॥६क्षा इस प्रकार से सन्ध्या ने मन के
द्वारा भली भाँति चिन्तन करके वह परम श्रेष्ठ पर्वत पर चली गयी
थी जो चन्द्र भाग नाम वाला था और जिमसे चन्द्र भागा नाम वाली
नदी निकली थी ७०|| सुवर्ण के समान गौर और सुसमान प्रभा के
धारण करने वाले-गन्ध्या के समय मै समुदत चन्द्र से जिस रीति से
उदय पर्शत निरन्तर शोभित हुआ था ठीक उसी भांति उस सन्ध्या के
द्वारा वह पर्वत उस समय मे रामधिष्ठित हुआ और शोभित हआ था
॥७१-७२॥
॥ चन्द्रमा को शाप वर्णन ॥
अथ त प गता दृष्टया सन्ध्या गिरिवर प्रति ।
तपमे नियतात्मान ब्रह्मा प्राह स्वव सुतम् ॥१
वरिष्ठ सशितात्मान गर्वज्ञ ज्ञानियोगिनम् ।
समीपे मुगमासीन वेदवेदागपारगम् ॥२
वसिष्ठ गच्छ पा गाध्या याता मनस्विनी।
रापगं धृतवामा गा दीक्षम्वनां यथाविधि ॥३
मन्दाक्षमभवत् नम्या पुरा हवह समुपान् ।
युप्मान माच्च नपारमान मामान मुनिसत्तम ॥४
चन्द्रमा का शाप वर्णन ] २२३ अयुक्तरुप तत्कर्म पूर्ववृत्त विमृश्य सा । अस्माकमात्मनञ्चापि प्राणान् सन्त्यक्तुमिच्छति ॥५ श्रमर्यादेषु मर्यादा तपसा स्थापयिष्यति । तप कर्तुं गता साध्वी चन्द्रभागाय साम्प्रतम् ॥६ न भाव तपसरतात सा तु जानाति कञ्चन । तस्माद्ययोपदेश सा प्राप्नोति त्वं तथा कुरु ॥७ मार्कण्डेय महर्षि ने कहा- इसके अनन्तर उस पर्वत की ओर गमन की गयी सन्ध्या को देखकर जो कि तपश्चयां करने के लिये नियत आत्मा वाली थी ब्रह्माजी ने अपने मुत से कहा था ॥१॥ वह पुत्र पसिष्ठ मनि थे जो बसिष्ठ सशित आत्मा वाले-सब कुछ के ज्ञान रखने वाले --ज्ञान योगी-समीप मे ही सुममासीन और वेदी नथा वेदो के अङ्ग शास्त्रो में पारगामी थे ॥ २॥ ब्रह्माजी ने कहा-हे वसिष्ठ । आप जाइये जहा पर मनस्विनी सन्ध्या । गमन क्यिा है। वह सन्ध्या तपस्या करने के लिये इच्छा रखने वाली है। आप जावर इमको विधि के अनुमार दीक्षा दीजिए ॥ ३।। पहिले यहाँ पर कामुको वो देखकर उसको लज्जा हो गई थी। हे मुन श्रेष्ठ । उसने आपको-मुझको और अपने आपको मयाम ही देखा था अर्थात् सभी के अन्दर काम- वासना का अवलोकन किया था ॥ ४॥ पव में होने वाले आयुक्त रूप से सयुत उस कर्मी को विचार करके वह हमारे और अपने भी प्राणी का भली भांति परित्याग करने की इच्छा करती है ।।५।। इस प्रकार मे जो मर्यादा मे हित पुरुप हैं उनमें वह तपश्चर्या द्वारा ही मर्यादा की स्थापना करेगी वह साध्गी तपस्या करने के ही लिये इस समय चन्द्र भाग पर्वत पर गई है ।। ६ ।। हे तात | वह तपस्या के विमी भी भाव को नही जानती हैं इस कारण से वह जिस प्रकार से उपदेश को वा प्राप्त कर लेवे आप वैसा ही करिये ॥७॥ इद स्व परित्यज्य स्पान्नर पर भवान, ।
२२४ 1 पालिका पुराण परिगृह्यान्तिको तस्यास्तपश्चर्यान्निदेशतु ॥८ इद स्वरूप भवतो दृष्टया पूर्व यथा प्रपाम् । तथा प्राप्य न पिचित सा त्वदने व्याहरिप्यति ॥६ परित्यज्य -स्वक रुप रूपान्तरोधरी भवान् । तस्मात सन्ध्या महाभागामुपदेष्टु प्रगच्छतु ।।१० तयेत्युक्त्वा वसिष्ठोऽपि वर्णी भूत्वा जटाधरः । तरुणश्चन्द्रभागाय ययौ सन्ध्यान्तिक मुनिः ॥११ तत्र देवसर पूर्ण गुणर्मानससम्मितम् । ददर्श स वसिष्ठोऽथ सन्ध्या तत्तीरगामिनीम् ॥१२ तीरस्थया तया रेजे तत्सर कमलोज्ज्वलम् । उद्यदिन्दुसनक्षत्र प्रदोपे गगन यथा ॥१३ ता तनहष्ट्वाथ मुनि. समाभाप्य सकातुकः । बीक्षाञ्चो सरस्तत्र वृहलोहितसज्ञकम् ॥१४ आप भी अपने इम वर्तमान पका परित्याग करके अन्य रूप का परिग्रहण करके उसक समीर मे तपश्चर्या का निदेश कीजिए ॥८॥ आपके इस स्वरूप को देखकर पूर्व मे जसे लज्जा को प्राप्त हुई थी उसी भौति अब भी लज्जा को पाकर आपके आगे वह कुछ भी नहीं कहेगी। ॥६॥ आप अपने रूप का त्याग करके ही अन्य रूप वाले बन जावे फिर उस महाभाग वाली सन्ध्या के लिये उपदेश देने को गमन करें ॥१०॥ माण्डेय मुनि ने कहा-~-ऐसा ही होगा-यह कहकर वशिष्ठ भी जटा- घारी ब्रह्मचारी बन कर जो एक्दम तरुण था वह मुनि वसिष्ठ चन्द्रभाग पर्वत पर उस सन्ध्या के समीप मे गये थे ॥११॥ वहाँ पर देवसर परि- पूर्ण था जैसे गुणों से मानसरोवर ही होवे। इसके उपरान्त उस वसिष्ठ मुनि ने उस सरोवर के तट पर गमन करती हुई उस सन्ध्या को देखा था ॥१२॥ वह यमलो से समुज्ज्वल मरोवर तट पर समस्थित जगरे द्वारा उसी मोति गोमायमान हो रहा था जैसे प्रदोष के समय में चन्द्रमा को शाप वर्णन ] २२२ उगे हुए चन्द्रमा और नक्षत्रो मे युक्त आकाश शोभित होता है ।।१३॥ वहाँ पर उसको देखकर कौतुक के सहित मुनि ने सम्भापण किया था। वहाँ पर वृहल्लोहित नाम वाला सर देखा था ॥१४॥ चन्द्रभागा नदी तस्मात् कासाराद्दक्षिणाम्बुधिम् । यान्ती निभिद्य दहशे तेन सानुगिरेमहत् ॥१५ निभिद्य पश्चिमं सानु चन्द्रभागस्य सा नदी। यथा हिमवतो गगा तथा गच्छति सागरम् ।।१६ चन्द्राभागा कथ सिन्धुस्तत्रोत्पन्ना महागिरौ। कोदृक् सरस्तद्विप्रेन्द्र वृहल्लोहितसज्ञकम् ।।१७ कर स पर्वतश्रेष्ठश्चन्द्रभागाह्वयोऽभवत् । चन्द्रभागाह्वया कस्मान्नदी जाता वृपोदका ॥१८ एतन्नः श्रोप्यमाणा ना जायते कौतुक महत् । माहात्म्य चन्द्रभागाया. कासारस्य गिरेस्तया ॥१६ श्रू यता-चन्द्रभागा या उत्पत्तिमुनिसत्तमाः। युप्माभिश्चन्द्रभागस्य माहात्म्य नामकारणम् ॥२० हिमवगिरिससक्त. शतबाजनविस्तृत.। योजनप्रिंशदायाम. कुन्देन्दुधवलो गिरि. ॥२१ उम मरोवर से चन्द्रभागा नदी दक्षिण सागर की जाती हुई थी जो उस पवत के महान् शिखर का भेदन पर ही जा रही थी वह उनके द्वारा देखो गयी थी ॥१५॥ वह नदी चन्द्रभाग के पश्चिम शिखर भा भेदन करके ही वहन कर रही थी जैसे हिमवान् पर्वत से गङ्गा सागर को गमन करती है ॥१६॥ ऋषियों ने कहा-है विप्रेन्द्र ! चन्द्र भागा नदी उग महा गिरि में कैसे समुत्पन्न हुई थी। वह सर भी कैसा था जिसका नाम वृहल्लोहित है ।१७। वह पन्द्रभाग नाम याला पर्वता में श्रेष्ठ कैसे हुआ था और चन्द्रभागा नाम वाली वृपोदया नदी किमसे उत्पन्न हुई थी ? 11१८॥ इम सबके यवण करने की इच्छा वाले होते २२६ [ कालिका पुराण हुए हमारे हृदय मे वडा भारी कौतुक है। हम चन्द्र भागा का माहात्म्य तथा गिरि के का सार का महत्त्व भी सुनना चाहते हैं 1981 मार्कण्डेय मुनि ने कहा- हे मुनि सतमो । अब आप लोग चन्द्रभागा को उत्पत्ति और चन्द्रभाग का माहात्म्य तया नाम का कारण भी श्रवण कीजिए ॥२०॥ हिमवान् पर्वत से ससक्त अर्थात् लगा हुआ-सो योजन के विस्तार वाता और तीस योजन आयाम अर्थात् चौडाई वाला एक कुन्द तथा इन्दु के समान धवल (श्वेत) गिरि है ॥२१॥ तस्मिन, गिरी पुरा वेधाश्चन्द्र शुद्ध सुधानिधिम् । विभज्य कल्पयामास देवान्न स पितामहः ॥२२ पिनर्थञ्च तथा तस्य तिथिवृद्धिक्षयात्मकम् । कल्पयामास जगता हिताय कमलासन ॥२३ विभक्तश्चन्द्रमारतस्मिन, जीमूते द्विजसत्तमा । अतो देवाश्चन्द्रभाग नाम्ना चक्र पुरा गिरिम् ॥२४ यज्ञभागेपु तिष्ठत्सु तथा क्षीरोदजेऽमृते। किमर्थमकरोच्चन्द्र देवान्न कमलासन ॥२५ तया फव्ये स्थिते कस्मात पित्र) समकल्पयत् । तिथिक्षये तया वृद्धौ कयमिन्दुरशूद्गुरो ॥२६ एतन्नः संशय ब्रह्मञ्छिन्धि सूर्यो यथा तम । नान्योऽस्ति सशयस्यास्य छेत्ता त्वत्तो द्विजोत्तम ।।२७ उस पर्वत मे पहिले विधाता ने शुद्ध सुधा का निधि चन्द्रमा का विभाग करके उस पितामह ने देवान्न कल्पित दिया था ॥२२॥ ममल के .सन वाले ब्रह्माजी ने उसी भांति पितृगण के लिये तिथियों की क्षीणता वृद्धि के स्वाप दासा जगद के हित-सम्पादन के लिए कल्पित दिया पा ॥२३॥ है दिन श्रेप्टो ! उस जी भूत म चन्द्रमा विभक्त दिया गया था। इसीलिए देवों ने पहिले गमय मउग गिरिको नाम मे पदमाग दिया था ॥२४॥ ऋषियों ने पहा-यशो के भागों में स्थित
चन्द्रमा को भाप वर्णन ]
था
रहने पर तथा क्षीर मागर से समुत्पन्न बमृत के रहने पर कमलासन
(ब्रह्मा) ने फिसलिये चन्द्र को देवान रिया या॥२५॥ उनी भनि
क्रम के रहते हुए किम कारण ने पितृगण के लिए उसे कल्पित किया
गया था? हे गुरो। चन्द्रमा तिथियों के क्षय बोर वृद्धि में कैसे हुआ
॥२६॥ हे ब्रह्मन् । यह हमको वडा मशय हो रहा है। उसका
बाप हमको मूर्य की ही भांनि छन करिए । हे द्विजोत्तम ! आपके
अतिरिक्त अन्य कोई भी इससे शेप वा छेदन करने वाला नही
है।। २७ ।।
पुरा दक्ष बननया अश्विन्याद्या मनोरमाः ।
पड्विति तथैकाञ्च सोमायादान प्रजापति. १२८
समस्तास्तास्तत सोम उपयमे यथाविधि ।
निनाय च स्वक स्थान दक्षस्यानुमते तदा ।।२६
अय चन्द्र समस्तासु तासु कन्यामु रागन ।
रोहिण्या मामवसरतोत्सवक्लादिभि ॥३०
रोहिणी भजते रोहिण्या मह मोदते ।
विनेन्दू रोहिणी शान्ति न काञ्चिल्लभते पुरा ॥३१
रोहिणातत्पर चन्द्र वीक्ष्य ता सर्वकन्यका ।
उपचारंबहुविधमंजुश्चन्द्रमस प्रति ।।३२
निवेव्यमापोऽनुदिन यदा नेवाकरोद्विवः ।
तामु भाव तदा सर्वा अमपंवशमागता. ॥३३
ययात्तराफाल्गुनीति नाम्ना या भरणी तथा ।
कृतिका मघा व विभासोत्तरभाद्रपत् ।।३४
तथा ज्येष्ठोत्तरापाडे नवंता. कुपिता. भृशम् ।
हिमाशुमुपसंगम्य परिव समन्ततः ॥३५
माण्डेय महारि ने रहा~प्राचीन ममय में प्रजापति दक्ष ने
परम मुन्दगे गत्ताईम अधिनी आदि अपनी पुनिको को मोम में निरे
[ पालिका पुराण २२८ प्रदान की थी। उन समस्तो को ही विधि के साथ गोम ने अपने माथ विवाह लिया था। उस समय मे दक्ष के अनुमत में वह मोम सवो अपने स्थान में ले गया ।।।८-२६॥ इमके अनन्तर चन्द्र उन समस्त कन्याओ मे राग मे रोहिणी के ही साथ निवास करता था और रतोत्म व कला आदि के द्वारा रमण किया करता था ।३०। वह सोम केवल रोहिणी का ही सेवन किया करता था और रोहिणी के साथ ही आनन्द मनाया करता था। रोहिणी के विना सोम पहिले कुछ भी शान्ति की प्राप्ति नही किया करता था।३१। रोहिणी ही में परायण रहने वाले वाले चन्द्र को देखकर उन सब कन्याऐ अनेक प्रकार के उपचारो के द्वारा चन्द्रमा की सेवा करने लगी थी ॥३२॥ प्रति दिन उनके द्वारा निपेवित होते हुए भी चन्द्र ने उनमे कुछ भी भाव नहीं किया था तो उस समय मे वे सव अमर्प के वश में समागत हो गयी थी ॥ ३३ ॥ इसके अनन्तर उत्तरा फाल्गुनी नाम वाली-भरणी-कृत्तिका-आर्द्रा-- मद्या-विशाला-उत्तरा भाद्रपद- ज्येष्ठा और उत्तरापाढा ये नौ बहुत ही अधिक कुपिता हो गयी थी। वे सब चन्द्र के समीप मे जाकर चारो ओर से कहने लगी थी ॥३४, ३५।। परिवार्य निशानाथ ददृशू रोहिणी नतः । वामाकस्था तस्य तेन रममाणा स्वमण्डले ॥३६ ता वीक्ष्य तादृशी सर्वा रोहिणी वरवणिनीम् । जज्वल श्वातिकोपेन हविपेव हुतशन ॥३७ ततो मधान्त्रिपूर्वाश्च भरणी कृत्तिका तथा । चन्द्राकस्था महाभागा रोहिणी जगृहुर्हठात् ॥३८ कचुश्चातीव कुपिता. पुरुपं रोहिणी प्रति । जीवन्त्यां त्वयि दुष्प्राज्ञे नास्मानिन्दुस्तु भावभाक् ॥३६ समुपंप्यति कस्मिश्वित्समये सुरतोत्सुकः । यणोना क्षेमवृद्ध्यर्थं ता हनिप्याम दुर्मतिम् ॥४० चन्द्रमा को शाप वर्णन] २२६ न वा हत्वा चवेत् पापमम्माकमपि विचन । प्रजनघ्नी बहुस्त्रीणमिन्तौ पापकारिणीम् ॥४१ यम्मिन्नर्थ पुरा ब्रह्मा व्याजहार सुत प्रति । नीतिशास्त्रोपदेशाय तन मश्रुतमम्ति वै ॥४२ निशानाय को परिवृत कर फिर उन्होंने रोहिणी को देखा था जो उम चन्द्र के वाम अङ्क में स्थिना थी और उसके द्वारा अपने मण्डल में रमण करने वानी यो ॥३६॥ उन सबने उस वर गिनी रोहिलो को नप्रबार पी देखर वे मुव हदि मे हुनाशन को ही भांति क्रोध स अधिर डर गयो यो ।। ३७ ॥ इमरे अनन्तर जिसमें तीन पूर्व में है गनी मघा बर्थात पुनर्वनु पुष्प और आपलेपा के सहित मघा--भरपी कृत्तिका चन्द्र की गाद मन्वित महाभागा रोहिणों को हम पर पर ग्रह पर निया था ॥३८॥ और वे सब पढीव गुपित हाती हुई रोहिणी र प्रति कठार वचन पहन लगी यो। हे पुरो बुद्धि वाली ! नेर जीवित रहत हुए चन्द्र गोगा म विन्दुम भी अनुराग नहीं भरता 11६1 जब भी किसी नाच म यह चन्द्र मुरत में उरनुर होरर समु- पन्थिन हागा तभी बहती व क्षम पी वृद्धि के निप हम रन दुष्ट दुद्धि यानी वा हनन कर दे॥ ४० ॥ तुका मार कर हमको कुछ पानी हो। क्योंकि नू चव मी स्त्रिया प्रजनन ना हनन करने बाली नया बिना ही ऋतुकान के पाप करने वाली है ॥ ११॥ जिन अयं के विषय मे पहिले ब्रह्माजी ने अपन पुर के प्रति वहा था। नीति परे देश के लिये वह निश्चय ही हमारा सुगम है ॥४॥ एपन्य यत्र निधने प्रवृत्ते दुष्टवारिण । वदनां भवनि क्षेम गम्य पुप्यप्रदो वय ॥2 स्वमग्नेयो मुगपत्र ब्रह्महा गुस्तपा। आरमान पानदयम्नु तन्य पुष्पप्रनो यमः ।।
[ वानिका पुराण तासा नाहगभिप्राय उदा -प्ट्वा च धर्म च । भीता च रोहिणी इष्ट वा प्रियामतिमनोरमाम् ॥४५ आत्मान चापराध च तदसम्भोगज मुहुः । विचित्य रोहिणी भीता तासा हस्तादमोचयन ॥४६ मोचयित्वा च वाहुभ्या सम्परिप्वज्य रोहिणीम् । वारयामास ना सर्वा कृत्तिकाद्या स भामिनी ॥४७ तदेन्दु वारदन्त्यस्ता कृत्तिकाद्या मघान्नका । साम्यमूचुमनस्विन्यस्ता वीक्ष्यन्त्याऽथ रोहिणीम् ॥४८ न ते नपा वा भीतिर्वा पापतोऽस्मान्निरस्यत । सजायते निशानाथ प्राकृतस्येव वतत ॥४६ दोपयुक्न कम करने वाले किमी एक दुष्ट के निधन पं जहाँ पर प्रवृत्त हो जाने से यदि बहुतो का क्षेम होता है तो उसका बध पुण" ही प्रदान करने वाला हुआ करता है वहां किसी भी पाप के होने का प्रश्न ही नहीं हाता है ।। ४३ ॥ जो सुवर्ण की चोरी करने वाला है-- जो मदिरा का पान करने वाला है-जो ब्राह्मण की हत्या करने वाला है-जो गुरुपत्नी के साथ सङ्गम करने वाला है और जो अपना आपा घात करने वाला हो-इन सबका वध कर देना पुण्य ही प्रदान गरने वाला होता है ॥४४॥ मार्कण्डेय मुनि ने कहा-उन सबके उस प्रकार घे अभिप्राय को समय पर और वर्म को देखार तथा भय से डरी हुई रोहिणी को देखकर जो उसकी अत्यधिक प्रिय और मन को रमण करने वानी परम सुन्दरी थी-उस सबवे सम्भोग को न करने से उत्पा अपने आपया अपराधी सोचकर उस डरी हुई रोहणी फा उनके हाथ मे मोचित वर दिया या अर्थात् धुड़ा लिया था ॥ ४५-४६ ॥ उस घद्र ने रोहिणो को छुधाकर अपनी दोनो बाहुओ से उसका (रोहिणी) भली भांनि आलिङ्गन रखे उस चन्द्र ने जो वृत्तिया भादि भामिनियाँ थी उन रायका वारण कर दिया था ॥४७॥ उसी भांति इन्दु वा वारण २३२ । कालिया पुराण जो कि आप मत्पुरुषों के द्वारा निन्दित और धर्म में हीन वमं को आप कर रहे है ॥५१॥ धर्म-शास्त्र के अर्थ को गमन करने वाले कर्म को यथोचित रीति में करने वाली और उद्वाहित अर्थात् व्याही हुई पत्नियो का आप केवल मुख को भी नहीं देखते है ॥५२॥ हे निभापते ! पूर्व मे कहते हुए पिता के मुख मे नारद के लिए जो सुना है उम दक्ष प्रजापति के धर्म-शास्त्र के असं का आप श्रवण कीजिए ॥ ५३ ॥ जो पुरुप बहुत सी दाराओ वाला हो और गग के वशीभूत होकर उनम से किसी भी एक ही स्त्री का गेदन किया करता है वह पाप का भागी होता है और स्त्री के द्वारा जित भी हुआ करता है तथा उसका आशौच मनातन अर्थात् मर्वदा ही बने रहने वाला हुआ करता है।५४। हे विधी स्त्रियो को जो स्वाम्य सम्भोगत दुख हुआ करता है उस दुख के समान अन्यत्र कोई भी दुख नहीं हुआ करता है ।। ५५ ॥ जो पुरषी में अधम परम सती और ऋतुकात वाली पत्नी का सङ्ग नही किया करता है ऋतुकात के शुरु होने पर भी उसके सङ्ग मे रहित होता है वह भ्रूण ही होता है । भ्रूण गर्भ में रहने वाले शिशु को करते भार्या स्यायावदात्रेयी तावन काल विवोधनम् । तस्यास्तु सगमे किंचिद्विहितञ्चापि नाचरेत् ॥५७ वहुभार्यस्य भार्याणामृतुमैथुननाशनम् । न किचिद्विद्यते कर्म शास्त्रेणापि यदीरितम् ॥५८ तोषयेत सतत भार्याविधिवत्पाणिपीडिता । नासा तुष्टया तु कल्याणम् कल्याणमतोऽन्यथा ॥५६ सन्तुष्टो मायंया भर्ता भया भार्या नथव च । यम्मिन्नेतत्युले नित्य करयाणं तत्र वै ध्रुवम् ॥६० यया विरुध्यते स्वामी मौभाग्यमदहप्तया । सपत्नीगंगमं तु सा स्थाढेश्या भवान्तरे ॥६१ वारिका पुग यरमान्मम पुग्धोग्राग्नीक्षणा वाय गमागिता: ॥६६ भयनीभिश्चतिरायिस्मिन् गनिमादिभिः । ऊग्रास्नीक्षणा इति न्याति प्राप्तम्या विदशेयपि ॥६७ नम्मादेवविधानेन नवंता वृत्तिपादय । यात्राया नोपयुक्ता हि भयिप्यध्व दिने दिने ॥६८ युप्मान् पश्यन्ति देवाचा मनुप्याचा च ये क्षितौ । यात्राया तेन दोषण तेवा यात्रा न चेष्टदा ।। अथ सर्वास्तदा शाप तस्य चत्वातिदारणम् । चन्द्रस्य हृदय नात्वा शापाच्चातीव निग्म् !!७० मायंण्डेय महर्षि ने कहा- दहन बाधव पटोर वचन इमरीति में उनके द्वारा वहने पर चन्द्रमा रोहिणी के मुख की यानि को मापन देखकर यहुत ही अधिक कुपित हुये थे ॥६४॥ उग ममय म राहणी ने भी उन सबकी उग्रता यो वारम्बार देखकर वह भी भय-शोष और लज्जा से समाकुल होकर कुछ भी नहीं बोली थी ॥६५॥ इमो अनन्तर परमाधिक क्रोधित हुए चन्द्र ने उसी समय म उन मय स्त्रियों को शाप दिया था क्योकि तुम मयने मेरे ही आगे अतीव उग्न और तीक्ष्ण वचन कहे है । इन तीनो भवनों में वृत्तिका आदि आप को उग्र और तीक्ष्ण- यही खगति देवगणो में भी प्राप्त वरोगी ॥६७॥ इस कारण मे ये नो कृत्तिका प्रभृति दिन-दिन म मात्रा में उपयुक्त नहीं होगी ॥६॥ तुम राबको देव आदि और क्षिनि म मनुष्य आदि देखत हैं तो उसी दोष से यात्रा में उन पुस्पा की याना अभीष्ट के प्रदान वाली नही हुआ करती है ॥६६|| इसके उपरान्त उन सबा ने उमके अति दारण शाप को मुनकर इस शापके देने से चन्द्रमा के हृदय को बहुत ही अधिक निष्ठर जान लिया था ॥७॥ जग्मु सर्वास्तदा दक्षभवन प्रत्यमषिता । ऊचुश्च दक्ष पितरमश्विन्याद्या सगद्गदम् ।।७१ चन्द्रमा को भाप वर्णन ] नोमो वसति नान्नामु रोहिणी भजते सदा । मेवमाना न भजते मोम्मान् परवधूरिव ।।७२ नावस्याने नावसाने भोजने श्रवणे तया । विनेन्द्र रोहिणो शान्ति नभठे नहि काचन ।।७३ रोहिण्या वभतम्तस्य ममोप दोन ते मुताः । यान्ती. मोन्यत्र नयनमाधाय नहि वोलते॥ मान्त्वन्य स्वामिमद्भावो मुखमात्र न वीक्षते । अस्मिन् वन्नुनि यनकार्य तदस्माभिनिगधनाम् ।।७५ अम्मानिरेतत्समयेऽनुरद्रत चन्द्रमा । मततने ततश्चान्मापं तीव्र उदाकरोत् II दारूपालातिनीटपाश्च लोके वान्यन्वनाय च । यात्रिया भविष्यध्व यूपमित्युक्तवान् विध: 13 उन समय में वे नव मनि बपिन होवर देस प्रजापति के भवन वो चनो गयी थी और वहां पर अग्दिनी आदि में गदगदता के साथ अपने पिता दश में कहा पा 1991 मार हमारे मार निवास नहीं बग्ने । और वे गदाही एहिली का ही वन विमा वन्ने हैं हम मोग ममी उत्यो मेवा भी करती है तो मोदे गई वधू पी ही भांति हममे अनुरागन पर हमारा मेवन नहीं किया करते है ॥३२॥ अय- म्यान में अदनान में या-मोचन में और मन में चन्द्रदेव रोहिणी दिना को भी सन्ति वा प्राग्निनही नितान्ते ॥३॥ गेरिपी रे माप निवान बने हमें मीर में भारी पुत्रियों को देदार वह बदम्पान गमन करती हुई वा देवर नपन राजाधान करके नहीं देयापरने 111 मामीण वन्य सद्भाव न होवे। यह मुग पो नहीं देगने है। इस वन में जो भी गुजरना चाहिए पर हमारे द्वारा चन्द्र बनिरहुए है उन समय नमनं उमेरे नि हमारी नीरमा उम मन में सिपा ARE देव ने कहा पा
२३६
[ कालिका पुराण
कि आप लाग अत्यन्त दारण और तीक्ष्ण हाती हुई लोव मे वाच्यत्व
को प्राप्त करके बिना यात्रा वाली हो जाओगी ॥७७।।
श्रुत्वा वाक्य स पुत्रीणा ताभि साधं प्रजापति ।
जगाम यत्र सोमोऽभूद्रोहिण्या सहितस्तदा ।।७८
दूरादेव विधुई प्ट्वा दक्षमायान्तमासनात् ।
उत्तस्थावन्तिके प्राप्य ववन्दे च महामुनिम् ॥७६
श्रथ दक्षस्तदोवाच कृतासनपरिग्रह ।
सामपूर्व चन्द्रमस कृत-सवन्दन तथा ।।८०
सम वर्तस्व भार्यासु वैषम्य त्व परित्यज ।
वपम्ये वहवो दोपा ब्रह्मणा परिकीर्तिता ॥८१
रतिपुत्रफला दारास्तासु कामानुवन्धनात् ।
कामानुवन्ध ससर्गात ससर्ग सगमाद्भवेत् ॥८२
सगमश्चाप्यभिध्यानाद्वीक्षणादभिजायते ।
तस्माद् भार्यास्वभिध्यान कुरु त्व वोक्षणादिकम् ।।८३
यद्यव नंव कुरुपे मद्वचो धर्मयन्त्रितम् ।
तदा लोक्वचोदष्ट पापवास्त्व भविष्यसि ।।८४
मार्कण्डेय मुनि ने कहा- उस प्रजापति दक्ष ने अपनी पुत्रियो
का वाक्य सुनकर वह उनको ही माथ मे लेकर वही स्थान पर गये थे
जहाँ चन्द्रदेव रोहिणी के माथ उस समय में वर्तमान थे ॥७॥
चन्द्रमाने से आते हुये दक्ष को देखकर अपने आमन से वे उ० खडे
हुए थे और समीप जावर उन महा मुनि के लिये प्रणिपात किया था।
॥७६। इसके अनन्तर उस समय मे अपने आसन वो ग्रहण करने दक्ष
प्रजापति ने भली भांति बन्दना बरने वाले चन्द्रमा से सामपूर्वक मह
वहा पा ॥८॥ दक्ष ने कहा-आप अपनी भार्याओ मे समानता का
ही व्यवहार परिए और विषम व्यवहार का परित्याग कर दीजिए।
में ब्रह्माजी ने यहत में दोष परिवोत्तित दिये हैं ॥१॥
चन्द्रमा को शाप वर्णन ]
२३७
दाराओ मे काम के अनुव-धन स वे दारारति और पुत्र की कला वाली
होती हैं । काम का अनुबन्ध ससर्ग से ही होता है और वह ससर्ग सङ्गम
हुआ करता है ||८२।। और सङ्गम अभिध्यान स और वीक्षण स ही
समुत्पन्न होता है। इस कारण से आप भार्यानो म अमिध्यान और
वीक्षण आदि करिए ॥८३|| यदि इस मेरे धम से नियन्त्रित वचन को
आप नही करते हैं तो उस समय में आप लोक के वचनो से दाप युक्त
और पाप वाले हो जायग [[८४॥
एतच्छ्रुत्वा वचस्तस्य दक्षस्य सुमहात्मन ।
एवमस्त्विति चन्द्रोऽपि न्यगदद्दक्षशक्या 1८५
अथानुमन्य तनयाश्चन्द्र जामातार तथा ।
ययो दक्षो निज स्यान कृतकृत्यस्तदा मुनि ॥८६
गते दक्षे ततश्चन्द्रस्ता समासाद्य रोहिणीम् ।
जग्राह पूर्ववद्भाव तासु तस्या च रागत ॥८७
तव रोहिणी प्राप्य न काश्चिदपि वीक्षते।
राहिण्यामेव वसते ततस्ता कुपिता पुन १८८
गत्वा ता पितर प्राहुदोभाग्याद्विग्नमानसा ।
सोमो वसति नास्मासु रोहिणी भजते सदा ॥८६
तवापि नाकरोद्वाक्य तस्मान्न शरण भव ॥६०
उद्वेग कोपसयुक्त उत्तस्थौ तत्क्षणान्मुनि ।
जगाम मनसा ध्यायन् कर्तव्य निक्ट विधो ॥६१
माकण्डेय महापि ने कहा-महात्मा दक्ष के उस वचन वा श्रवण
परके चन्द्रदेवो भी ऐसा ही होगा-यह दक्ष की गका से कह दिया
था ॥८॥ इसके अनन्तर दक्ष प्रजापति ने अपनी पुनिया को तथा
जामाता इन्द्र को अनुमत्रित परपे उस समय म वह मानकृतकृत्य होकर
अपने आश्रम वो चले गये थे ॥८६॥ दक्ष के चले जाने पर फिर
घद्रमा । उस रोहिणी के पास प्राप्त होगर उसम और उन शप
२३८
। कालिका पुराण
पत्नियो मे पूर्ण जैसा ही भाव ग्रहण किया था क्योंकि रोहिणी म उसका
अनुराग था ||७| वही पर रोहिणी को प्राप्त करके अन्य किन्ही को
भी वह नही देखता था। वह सदा रोहिणी ही में निवास किया
करता था। फिर वे सब पुन कुपित हो गयी थी ॥८॥ वे सब अपने
क्षौर्भाग्य कारण उद्विग्न मन वाली होती हुई पिता के समीप म
जाकर उन्होने कहा था कि सोमदेव हम लोगो मे निवास न करते हैं
और वे सदा ही रोहिणी का सेवन क्यिा करत हैं ॥८६॥ उसने भी
आपके वाक्य का नही किया था। अतएव आप हमारे रक्षक होयो ।
Ho|| उसी क्षण मे मुनि दक्ष उद्वेग और क्रोध से सयुक्त होकर उठ
खडे हुये थे और मन में वियु के समीप में जाकर क्या करना है-इसका
ध्यान करते जा रहे थे ॥६१।
उपगम्य तदा प्राह वचश्चन्द्र प्रजापति ।
सम वर्तस्व भार्यासु वैपम्य त्व परित्यज ॥६२
न चेदिद वचोऽम्मान मौख्यात् त्व माव बुध्यसे ।
धर्मशास्त्रातिगायाह शप्स्ये तुम्य निशापते ॥६३
ततो दक्षभयाच्चन्द्रस्तत्व प्रति तत्पुर ।
अगोचकारातिभयात् कार्यमव मुहुस्त्विति ॥६४
सम प्रवर्तन रतु भार्यास्वगीकृते तत ।
विधुना प्रययौ दक्ष स्वस्थान चन्द्रसम्मन ॥६५
गते दक्षे निशानायो रोहिण्यास हितो भृशम् ।
रममाणो विमस्मार दक्षस्य वचनन्तु स ०६६
मेवमानाश्च ता सर्वा अश्विनाद्या मनोरमा ।
नाभजच्चन्द्रमास्तामु अवज्ञामेव चावरोत् ।।६८
अवज्ञातास्तु ता मर्वाश्चन्द्रण पितुरन्तिकम् ।
गत्दयार्तस्वराश्चाता रमन्त्यश्चेदम वन् ॥६८
उग गमय में प्रजापति दक्ष पन्द्र में गमीप में पहुँच पर यह
चन्द्रमा को शाप वर्णन ] वचन उन्होंगे चन्द्रदेव से कहा था रि अपनी भार्याभो म समानता का ही व्यवहार करिये तथा उनके प्रति जो भी कुछ विपमता की भावना होवे उसका आप अव परित्याग कर दीजिए ॥६२॥ यदि आप हमारे वचन वा मूर्खता से नहीं समझत है तो हे निशापत । मैं धर्मशास्त्र के में अतिक्रमण करने वाले आपके लिए शाप द दूंगा ॥३३॥ माकण्डेय मुनि ने कहा-इसके अनन्तर चन्द्र देव न उस प्रजापति के गामन बसा हो करने के लिये स्वीकार किया था क्योकि उनको दक्ष से अत्यधिक भय था। इसी प्रकार से किया जायेगा ऐसा पुन बङ्गोकार कर लिया था ॥६॥ फिर अपनी भायात्रा के विषय म समान ही व्यवहार धरन के लिए पन्द्र के द्वारा अङ्गीकार विर्य जाने पर दक्ष चन्द्र से सम्मत होकर अपने स्थान को चले गये थे ॥६शा दक्ष के गमन करने पर निशा नाय चन्द्र फिर अत्यधिर रूप से रोहिणी के ही साथ म रमण करता हुआ उसने उस प्रजापति दक्ष के वचन को मुला ही दिया था वि' मैं सब भार्याओं म एक सा व्यवहार करुमा ॥६६वे आश्विनी आदि सभी मनोरमा उनकी सेवा करने वाली हुई थी विन्तु चन्द्र न उनका भी सेवन नही दिया था और वह वा उन मी यवज्ञा ही किया करता था ये चन्द्र दव वे द्वारा अवमा मयुन होकर अपने पिता के समीप में जाकर आत्त स्वर म अत्यन्त आत्तं होपर रदन बरता हुई अपने पिता स यह वाली थी ॥६॥ नाकरोद्वचन सोमस्तवापि मुनिसत्तम । अवना पुरतेस्मासु पूर्वतोऽप्यधिक स च ६E तमसत् सोमेन न कार्य न विचिदपि विद्यते । तपस्विन्यो भविष्यामस्तपश्चर्या निदेशय ॥१०० तपसा शोधितात्मान. परित्यक्ष्याम जोदितम् । विमस्माया जीवितेन दुभंगाना द्विजोत्तम ॥१०१ इत्युक्त्या तास्तत सर्वा दक्षजा वृत्तियादयः ।
२४०
[ कालिका पुराण
कपोलमालम्व्य कररूरुदुविविशु क्षितौ ॥१०२
तास्तु दृष्ट्वा तथाभूता दुखव्याकुलितन्द्रिया ।
अतिदीनमुखो दक्ष कोपाज्जज्वाल वह्निवत् ॥१०३
अथ कोपपरीनस्य दक्षस्य सुमहात्मन ।
निश्चनाम तदा यक्ष्मा नासिकाग्राद्विभीषण ॥१०४
दष्ट्राकरालवदन कृष्णागारसमप्रभ ।
अतिदीर्घ स्वल्पकेश कृशो घमनिसन्तत ॥१०५
उन्होंने कहा था कि हे मुनि श्रेष्ठ । आपके वचन को भी सोम-
देव ने नही किया है और वह तो अब पहिले से भी अधिक हमारे विषय
मे अवज्ञा किया करते हैं ॥६६॥ सोम के द्वारा हमारे विषय मे जो भी
करना चाहिए वह कुछ भी नही होता है । अतएव अब हम तो सब
तपस्विनी हो जायगा । आप अब हमको वही निदश कोजिय ॥१०॥
तपस्या क द्वारा अपनी आत्माआ का शोधन करके हम अपना जोवन ही
त्याग देंगी। ह द्विजात्तम । आपही विचार कीजिए कि ऐसी दुर्भाव्य
मालिनी हमका जावन रखने म क्या लाभ है ।।१०१॥ माकण्डेय मुनि
गे कहा-फिर यह इतना कहकर वे सभी कृतिका प्रभात दक्ष को
पुत्रियो अपन करो स कपोलो का आलम्बन करके विवश होती हुई
भूमि पर रुदन करन लगी थी॥१०२॥ अतीव दुख मे व्याकुल इन्द्रिया
वाला उस प्रकार स स्थित उन सबका देखकर अत्यन्त हा दीन मुख
वाले प्रजापति दक्ष कोप से वाह्न केही समान ज्वालत हो गय थे।
॥१.३। इसव मनन्तर पोप स व्याप्त महात्मा दक्ष की नासिका ये
अग्रभाग स बहन ही भीषण यक्षमा निरल पडा था ।।१०।। वह
पदमा दादी सररास मुख वाला था और कृष्ण वर्ण वाल अङ्गार
समान वा-यह बहुत ही सम्ब विशाल गरीर वाला था-उसपेश
बहन ही पार थे-यह पैग अनीय तप और धमनियों से गतत
पा॥१०॥
चन्द्रमा को शाप वर्णन ]
अधोमुखो दण्डहस्त: कास विश्रम्य सन्ततम् ।
कुर्वाणो निम्ननेत्रश्च योपासम्भोगलोलुप ॥१०६
स चोवाच तदा दक्ष कस्मिस्थाम्याम्यह मुने।
किंवा चाहं करिप्यामि तन्मे वद महामते ॥१०७
ततो दक्षस्तु त प्राह सोम यातु द्रुत भवान ।
सोममत्तु भवान्नित्य सोमे त्व तिफ स्वेच्छया ॥१०८
इति श्रुत्वा वचनस्तस्य दक्षस्याय महामुने ।
शन: शनस्तत: सोममामसाद गद स च ।।१०६
मासाद्य स तदा मोम वल्मीक पन्नगो यथा।
प्रविवेशेन्दुहृदय छिद्र प्राप्य महागदः ॥११०
सस्मिन् प्रविष्ट हृदये दारुणे राजयक्ष्मणि ।
मुमोह चन्द्रस्तन्द्राच विपमा प्राप्तवाश्च स ॥१११
उत्पद्य प्रथम यस्माल्लीनो राजन्यसो गद।
राजयक्ष्मेति लोकेऽस्मिन्नस्य ख्यातिरभूदिवजा ॥११२
उमका मुख तो नीचे की ओर पा-उसके हाथ में एक दण्ड
था-वह वियाम करके निरन्तर काम (साँसी) को करता जा रहा
या--उमके नेत्र नीचे की ओर बैठे हुए थे तथा वह स्त्री के साथ
गम्भोग करने के लिए अत्यल लालायित रहता पा ॥१०६|| उस
यामा ने दक्ष प्रजापति में कहा था कि हे मुने ! मैं अब विग स्थान
में स्थित रहेगा। अयया मुझे क्या करना होगा- है महामत
मुझे यह अब यतनाइए ॥१०॥ तब ती प्रजापति दस ने उम यदमा
मे पहा या रि आप बहुत शीघ्र सोमदेव के समीप में जाइये । आप
गोमदेव का भक्षण परिप और उमी सोम में म्बला में सदा मस्थित
रहिये ॥ १०८ ॥ मार्कण्डेय महर्षि ने कहा-इगरे अनन्नर स
महा मुनि दक्ष के इम वचन का प्रवण करने वह धीरे-धीरे
ग्रोमदेव गमीप म गया था और वह मोम का पद (रोग)
हो पा ॥ १०६॥ उग समय में वह मोम के समीप में इसी
! आप
२४२
1 कालिका पुराण
भौति प्राप्त हुआ था जैसे सर्प अपनी पांवी में प्रवेश क्यिा करता है।
वह महागद अर्थात विशाल रोग चन्द्रमा के हृदय मे छिद्र को प्राप्ति
करके प्रवेश कर गया था॥११०॥ उस दारुण राजयक्ष्मा के उस सोम के
हृदय मे प्रविष्ट हो जाने पर चन्द्रदेव मोहित हो गये थे अर्थात् उनको
मोह हो गया था और उसने बहुत बडी विपम तन्द्रा को प्राप्त हो गया
या ॥१११॥ क्योकि यह रोग प्रथम उत्पन्न होकर उस राजा मे लीन
हो गया था। हे द्विजो। इसी कारण से उस रोग को लोग में "राज
यक्षमा" इस नाम से प्रसिद्ध हो गयी थी ॥११२।।
ततस्तेनाभिभूत स यक्ष्मणा रोहिणीपति ।
क्षय जगामानुदिन ग्रोप्मे क्षुद्रा नदी यथा ।।११३
अथ चन्द्रे क्षीयमाणे सर्वोपध्यो गता क्षयम् ।
क्षय यातास्वोपधिषु न यज्ञ समवर्तत ॥११४
यज्ञाभावात्तु देवानामन्न सर्व क्षय गतम् ।
पर्जन्याश्च ततो नष्टास्ततो वृष्टिर्नचाभवत् ॥११५
बृष्ट्यभावे तु लोकानामाहारा क्षीणता गता. ।
दुभिक्षव्यसनोपेते सर्वलोके द्विजोत्तमा ॥११६
दानधर्मादिक किचिन्न लोकस्य प्रवर्तते ।
सत्त्वहोना प्रजा सर्वा लोभेनोपहतेन्द्रिया ।
पापमेव तदा चक्र कुकर्मरतयश्च ता. ॥११७
एतान् दृष्ट वा तदा भावान् दिक्पाला सपुरन्दरा ।
जम्मु क्षोभ पर देवा. सागराश्व ग्रहास्तथा ॥११८
ततो दृष्ट्वा जगत्सर्वं व्याकुल दस्युपीडितम् ।
ग्रह्माणमगमन् देवा मवें शक्रपुरोगमा ॥११६
इम अनन्तर वह सोम रोहिणी का पति उस राजयक्ष्मा नामक
गेग रे द्वारा अभिभूत हो गया था। और वह प्रति दिन ग्रीष्म ऋतु में
शुर नदी की ही भौति सय को प्राप्त होने लगा था ॥११३॥ इसके
चन्द्रमा को शाप वर्णन ] अनन्तर उस चन्द्र के क्षीय माग हो जाने पर समस्त ओपधियाँ सय को प्राप्त हो गयी थी। उन ओषधिया के सय को प्राप्त हो जाने पर यज्ञ नही प्रवृत्त होते थे ।।११३॥ यज्ञों के अभाव हो जाने से देवी का सब ही बन्न क्षय को प्राप्त हो गया था । तव तो सभी मेष नष्ट हो गय थे और वृष्टि का एक दम अभाव हो गया था। अर्थात् फिर वर्षा नही हुई थी ।।११।। जब वृष्टि का ही अभाव हो गया तो लोगो के आहार क्षीण हो गये थे। हे द्विजोतमो । भिक्ष (अकाल) और उसके मारण से होने वाले व्यसन (दुख) मे समु पेरा समस्त लोग हो गय में १११६॥ तत्र तो लोगों का दान देना और धर्म के कृत्य करना सभी पुछ लोक के लिये प्रवृत्त नही होता है। समस्त प्रजा सत्व से हीन हो गई थी और सब लोम से उपहत इन्द्रियो वाले हो गये थे। वे सभी प्रजाये कुक्मों मे रति रखने वाली हो गई थी तपा सभी उस समय म पाप ही करते थे ॥११॥ उस समय में इन भावनाओ को देखकर इन्द्र के सहित सभी दिक्पाल परम क्षोभ को प्राप्त हो गय थे तथा सभी सागर भी सुमित हो गये थे ॥११८ इसके अनन्तर जगत् को अधिक व्याकुल और दस्युओ ( चोर लुटेरो) से प्रपोडित देखकर इन्द्र को अपना नापक बताते हुए सब देवगण ब्रह्माजी के गमोप मे गये और ग्रह थे ।।११६॥ उपसगम्य देवेश त्रधार जगता पतित । प्रणम्याथ यथायोग्यमुपविष्टास्तदा सुरा ।।१२० तान् म्लानवदना सर्वान् विक्ष्य लोक पितामह । अभिभूतान् परेणव हृतस्वविपयानिव । पानच्छ सम्मुखीकृत्य गुरमिन्द्र हुताशनम् ।।१२१ स्वागत भो सुरगणा किमर्थ यूयमागताः । दुखोपहतदेहाश्च युप्मान् म्लानाश्च लक्षये ।।१२२ निरावाधान्निरातकान् युप्मान सर्वाश्च कामगान् । कृत्वा स्वविषये न्यस्तान् कथ पश्यामि दुखितान् ।।१२३
२४४
[ कालिका पुराण
लोको
यद्वोऽभवद् खवीजं युष्मान् वा यस्तु वाधते ।
तत्कय्यतामशेपेण सिद्धञ्चाप्यपधार्यताम् ॥१२४
ततो वृद्धश्रवा जीवः कृष्णवत्मां च लोकभृत् ।
उयाचात्मभुवे तस्मै सुराणा दुखकारणम् ॥१२५
इम सष्टि की रचना करने वाले जगतो के स्वामी देवेश्वर
ब्रह्माजी के पास पहुँचकर उन्होने उन को प्रणाम किया तब वे सब यथो-
चित स्थानो पर उपविष्ट हो गये थे अर्थात् बैठ गये थे
१२०॥
के पितामह ब्रह्माजी ने उन सब देवो को मलिन मुख वाले देखकर जो
कि ऐसे प्रतीत होते थे मानो किसी दूसरे के पराभून हैं और अपने विषयों
को अपहृत किए हुये से दिखाई पड रहे थे। तब तो ब्रह्माजी ने देवो के
गुरु वृहस्पनि इन्द्र और अग्नि को अपने सामने विठाकर उनसे पूछा
था ।। १२१ ॥ ब्रह्माजी ने कहा-हे देवगणो! आपका मैं स्वागत
करता हू । अर्थात् आपका यहां पर समागमन परम शुभ मैं मानता हूँ।
आप लोग अब यह बतलाइए कि आप सब किस प्रयोजन को सुसम्पन्न
करने के लिये यहाँ आये है ? मैं देख रहा हूँ कि आप सभी लोग किसी
महान दुख से उपहत देहो वाले है और आप अधिक स्नान हो रहे हैं ।
॥१२२॥ आप सबको वाधाओ से रहित--आतङ्क से होन तथा इच्छा-
नुसार गमन करने वाले बनाकर और अपने विषय मे विन्यस्त करके
आज मैं आप लोगों को, परम दुःखित कैसे देख रहा हूँ ॥१२३॥ जो
भी कुछ आप लोगो के दुख का वोज अर्थात् हेतु होवे अथया जो भी
कोई आप लोगो का बाधा पहुंचाता होघे वह सभी आप लोग पूर्ण रूप
से मुझे वनलाइये और यही समझ लीजिये कि वह आपका कार्य सिद्ध
हो हो गया है अर्थात् उसका मैं निवारण भरके आपको सुख सम्पन्न
ही बना दूंगा-इसमे कुछ भी सशय न समझें ॥१२४! मार्कण्डेय मुनि
ने कहा-इसके अनन्तर वृद्ध श्रवा-जीव और लोको का भरण करने
पाले कृष्ण वरमी नै उन ब्रह्माजी से देवो के दुख का कारण बतलाया
१ ॥१२॥
चन्द्रमा को शाप वर्णन ]
२४५
शृणु मर्व जगत्कर्तस्त्वा येन वयमागता ।'
यद्वास्माकं दुखवीज यतो म्लानथियो वयम् ।।१२६
न क्वचिन सम्प्रवर्तन्ते यज्ञा लोके पितामह ।
निराधारा निरातका प्रजा सर्वा क्षय गता ॥१२७
न च दानादिधर्मश्च न तपासि क्षितौ क्वचिन् ।
नव वर्पनि पर्जन्य. क्षीणतोयाभवन् क्षितिः ।।१२८
क्षीणा' मस्तिथोपध्य शस्या लोका ममाकुला ।
दस्युभि पीडिता विप्रा वेदवाद न बुवंते ॥१२६
अन्नवैकल्यमामाद्य म्रियन्ते व प्रजा ।
क्षीणेषु याभागेषु भोग्यहीनास्यथा वयम् ॥१३०
दुर्वलास्तु श्रियाहीना नंव शान्ति लभामहे ।।१३१
रोहिण्या मन्दिरे चन्द्रो वजगत्या चिर स्थित ।
वृपरागी म च क्षीणो ज्योत्स्नाहीनश्च वर्तते ।।१३२
यदेवान्विप्यते देवश्चन्द्रो नेपा पुर मर ।
कदाचिदपि देवाना ममा वा भवद्विधे ॥१३३
देयों ने कहा है जगत की रचना करने वाले । आपरे ममीप
में जिम कार्य के मम्पादन लिए हम लोग ममागन हुए हैं उगा
जाप धरण परिए जो कि हम लोगो रे दुयका बौन है और जिसके
होने में हम लोग मर म्लान श्री वाले हो रहे हैं ।।१२६॥ हे पितामह'
यही पर भी नौर में या मम्प्रवर्तित नहीं हो रहे हैं अदि कोई भी
रिमी जगह पर मौष मे यह नहीं कर रहे है । समान प्राइम गमय
म निरान और निराधार होरप से प्राप्त होगी। ।। १२.
भूमारन मे न तो दान देता है और न कोई धर्म गम्यायो रमरमा
हैन तर अति कोई भी तपस्या भी नहीं पर गा है। पनीर
में वर्षा को ले-गमा पृषी माल जल वानी हो गयी थी।
॥१२॥ मगो प्रोरधि शीगहो पपी:-शम्य भी सर को प्राप्त
२४६ [ बालिका पुगन हैं और लोग गभी ममापुन है। विप्रगण दस्युओं के द्वारा पीडित होत हुए वेदा के वाद म निरत नही हो गई ।।१२३॥ अन्न की विकलना को प्राप्त करके महत-मी प्रजा मा रही है। यश भागों में क्षीण हो नाने पर हम सभी नाग भोगन के योग्य पदायों न हीन हो रहे हैं। ॥१३०॥ हम बहुत ही दुर्वा हो गये हैं और हमारी झालि नष्ट हा गई हैं। हम कही पर भी शान की प्राप्ति नहीं कर रहे हैं ।।१३१॥ चन्द्रदेव तो रोहिणी के ही मन्दिर मे सदा वक्र गति से चिरपाल पयन्त स्थित रहा करते हैं और वृष राशि में वह क्षीप होमर ज्योत्स्ना (चाँदनी ) से हीन रहते हैं ।। १३२ ॥ देवों के द्वारा जिस समय में भी चन्द्र का अन्वेषण किया जाता है तो वह कभी भी इनके आगे स्थिति वाला नहीं हुआ करता है। वह किसी समय में भी देवों के समाज मे अथवा आपके समीप में उपस्थित नहीं हुआ करता है ॥१३॥ क्दाचिद्रोहिणी त्यक्त्वा नव क्वचन गच्छति । यद्यन्य कोऽपि न भवेत्तदा चन्द्रो वहिर्भवेत् ॥१३४ दृश्यते स कलाहीन कलामानावशेपव । इति सर्वत्र लोकेश वृत्त कर्मविपर्यय ॥१३५ त दृष्ट्वा कान्दिशीकास्तु वय त्वा शरण गता । पातालाद्यावदुत्थाय कालक्जादयोऽसुरा ॥१३६ नास्मान लोकेश वाधन्ते तावन्नस्त्राहि साध्वसात् । अय प्रवर्तते कस्माज्जगता वा व्यतिक्म । न जानीमस्तु तत्सर्वं विप्लवे वापि कारणम् ॥१.७ एतत् सुराणा वचन दिव्यदर्शी पितामह । श्रुत्या क्षणमभिध्यायन निजगाद सुरोत्तमान, ॥१३८ शृण्वन्तु देवता सर्वा यदर्थ लोकविप्लव । प्रवर्ततेऽधुना येन शान्तिस्तस्य भविष्यति ।।१३६ चन्द्रमा वो शाप वर्णन ] २४७ मोमो दाक्षपणी. कन्या सप्तविंशतिसंग्यकाः । अश्विन्याद्या वरवधर्भार्यार्थ परिणीतवान् ।।११० वह किमी समय में भी रोहिणी का त्याग करके वहीं पर भी गमन नहीं दिया करता है। यदि कोई भी अन्य नहीं होता है तभी चन्द वाहिर हो जाया करता है ।। १३४ ।। वह चन्द्र समस्त कलाओ से हीन केवल एक ही कला वाला रह गया है। मर्यात केवल एक ही पला उसमे शेप रह गई है । हे लोको के ईश ! यही सर्वत्र लोक में पर्म का विपर्यय प्रवृत्त हो रहा है। तात्पर्य यही है कि सभी कर्म विपरीत हो रहे हैं ॥१३शा यह ऐसा है उसको देशकर हम सब कान्दि- शीक हो गये हैं अर्थात किम और जाद-मे कर्तव्य विमूड होकर हम सव आपकी ही शरणापति में प्राप्त हुए हैं । जब तक पाताल लोक से उठकर कान कजादिक अमुर हे लोरेश्वर ! हमको बाधा पहुंचाते हैं तब तक थाप भव मे हमारी रक्षा करिए ॥१३६॥ यह जगतो का मतिकम किम कारण मे होगया है-यह हम नहीं जानते हैं। इस विप्लव पा का कारण है-यह भी हम नहीं समजते हैं ।। १३७ ॥ मावंण्डेय मुनि ने यहा-दिव्यदर्णी पितामह ब्रह्माजी ने देपो के इस वपन का प्रवण परके एक क्षण पर्यन्त ध्यान करते हुए मुरोत्तमो मे कहा- ॥१३ब्रह्माजी ने कहा-हे देवताओ । जिम कारण से यह लोको फा विप्लव हो रहा है उमवा आप श्रवण करिए । दैव मोम ने दाक्षा- पणी सत्ताईम संख्या वाली अश्विनी यादि को श्रेष्ठ वधू के म्प में भार्या बनाने के लिए उनके माथ परिणय पिया पा॥१४॥ परिणीय स ताः सर्वा रोहिण्यां सततं विधुः । प्रावर्ततानुरागेण न ममस्तामु वर्तते ॥१४१ अश्विन्याद्यास्तु ता सर्वा दौर्भाग्यज्वरपीडिता । पविशतिर्वरारोहा पितरं प्रस्थिताः स्वकम् ।।१४२ प्रवर्तते निशानायो रोहिण्यां रागतो यथा ।
२१८
[ मालिका पुरण
तमान तामु भजते तदक्षाय न्यवेदयत् ।।१४३
ततो दक्षो महा द्धि साम्ना सस्तूय विट्पतिम् ।
वहुसुनृतमाभाप्य पश्ययें चान्वरोधत ॥१४४
अनुरुद्धो यथाकाम दक्षेण सुमहात्मना ।
सम प्रवर्तितु तामु समय वृतवान, विधु ॥१४५.
सममगीकृते भाव तासु र हिमाशुना।
स्व जगाम तत स्थान दक्षोऽपि मुनिसत्तम ।।१४६
गते दक्षे मुनिश्रेप्ठे वैपम्य तासु चन्द्रमा ।
जही न भाव ता शश्वत् कुपिता. पितर गता ॥१४७
उस सोम ने उन सबके माय परिषय परके वह चन्द्र रोहिणी
मै ही निरन्तर अनाग मे प्रवृत्त हुआ था और अन्य सबमें वह
अनुराग नहीं किया करता था ॥ १४१॥ वे सब अश्विनी आदि
कन्याएँ दौर्भाग्य के ज्वर से प्रपीडित थी। वे छब्बीस घर आरो-
हण वाली कन्याएं अपने पिता मे ममीय मे गयी थी ।। १४२ ॥
जिस प्रकार से निशानाय अनुराग से रोहिणी में प्रवृत्त होता
रहता है उस भांति उन मदका सेवन नहीं किया करता है-यह सब
उस प्रजापति दक्ष से निवेदन कर दिया था ॥१४३॥ इसके अनन्तर महा
बुद्धिमान दक्ष ने सोम के द्वारा चन्द्रदेव की स्तुति करके और बहुत
अधिका सूनृत वचनो से सम्भाषण करके अपनी पुत्रियो के लिये उससे
अनुरोध किया था 11१४४॥ यथेच्छ या महात्मा दक्ष के द्वारा अनुरुद्ध
होकर चन्द्र ने उन सबमे समान ही प्रवृत्त होने की प्रतिज्ञा की थी।
॥१४॥ चन्द्रदव ने उन सब म समान भाव रखने की बात स्वीकार
करने पर वह मुनि श्रेष्ठ दक्ष भी अपने निवास स्थान को चला गया
था ॥ १४६ ।। उम मुनि श्रेष्ठ दक्ष प्रजापति के चले जाने पर चन्द्र ने
उनम विषमभाव का त्याग नहीं किया था और वे फिर निरन्तर क्रोधित
होकर अपने पिता के समीप मे गयी थी ॥१४७।।
पद्रमा को शाप वणन ]
नना दश पुनश्चन्द्रमनध्य मृतान्तरे ।
ममा वृत्ति प्रतिश्राव्य वचन चदमनवीन ॥१४८
न सम वर्तते चन्द्र सर्वाम्बासु भवान् यदि ।
तदा दाप्ये त्वह तुभ्य तम्मान कुरु ममजमम् ।।१४६
ततो गर्ने पुनई क्षे न सम वतंत यदा।
तामु चन्द्रस्तदा दा पुनर्गत्वाद्र वन पा १५०
न ते वच सत्कुरले नवास्मासु प्रवनते ।
वय तपश्चरिणाम म्याम्यामश्च तवान्तिक ॥१५१
तामामिति वच श्रुत्वा कुपित म महामुनि ।
धायाय चन्द्रस्य पुन शापायात्नुवना गत ॥१५२
शापायाद्य क्नममनम कुपितस्य महामुने ।
छाया नाम महारागो नासिकानाद्विनिगत ॥१५३
प्रेपित स च चन्द्राय दक्षण मुनिना तत ।
प्रविष्टश्च तता दह दायितस्तेन चन्द्रमा ।।१५४
इमर अनन्तर पुन दा न दूसरा भूत आ व विपर म अनुराध
दिया था और समान पवहार रमन की प्रतता करार उमन यह
वचन रहा था कि ह चद्र । याद अप ममान व्यवहार नही कर ग
और आप इन मवहा म अनुराा याद न हा रगता में आपदा गाप
द-गा। इन पारप म जा समअम क्या समुचिन हा वहा आप
व्यवहार राभा बात सारए ॥१८॥ इमा अरान्त व दान चल
जान पर उम चरन समान बग्नाव नहीं दिया ता पुन दपक समीप
म जापर कार व साथ बहन लगी शा ।। १५०11 वह पदव यापन
वपिन वचना वा मन्कार नहीं करत हैं और व हम मरन प्रवृत्त नहीं
हात है अयान हम सबका भवन कभी भा ना किया करत है। बनाएव
अब हम सब तपश्चया बरगी और आपर गै ममा म म्पिन "हा
करगी ।। १५१॥ उन अपनी पत्रिरा व इस कचरा या रस
२५० । कालिया पुराण महामु न दक्ष परम क्रोधित हो गये थे और पिर चन्द्रदेव के क्षय करने के लिये शाप देने को उत्सुक हो गये थे ॥ १५२ ।। हे महामुने ! शाप देन के लिए उद्यत मन वाले और महान युपित हुए उन दक्ष प्रजापति की नासिका व अग्र भाग से क्षय नाम वाला एक महान् रोग निकल पड़ा था ॥१५३॥ उम महारोग को चन्द्रदेव के लिए प्रेपित कर दिया गया था जा कि मुनिवर दक्ष के ही द्वारा भेजा गया था। वह महारोग चन्द्रदेव के देह मे प्रवेश कर गया था और उसने चन्द्र को क्षषित कर दिया था ।।१५४।। क्षीणे चन्द्रे क्षय याता ज्योत्स्नास्तस्य महात्मनः । क्षीणासु सर्वज्योत्स्नासु सर्वोपध्य क्षय गता ॥१५५ औपध्यभावात्लोकेऽस्मिन 7 यज्ञ सम्प्रवर्तते । यज्ञाभावादनावृष्टिस्तत सर्वप्रजाक्षय ॥१५६ यज्ञभागोपभोगेन होनाना भवता तथा । दर्बलत्व समुत्पन्न विकारश्च स्वगोचरे ।।१५७ इति व कथित सर्व यथाभूल्लो विप्लव । येनौपायेन तच्छान्तिस्तच्छृण्वन्तु सुरोत्तमा ॥१५८ चन्द्रमा के क्षीण हो जाने पर उम महात्मा की ज्योत्स्ना (चाँदनी) भी क्षय को प्राप्त हो गयी थी। ज्योत्स्ना के क्षीण हो जाने पर समस्त ओपधियाँ भी क्षय को प्राप्त हो गयी थी ॥१५५।। ओषधियो के अभाव मे हो इम लोव मे यज्ञो की सम्प्रवृत्ति नहीं हुआ करती है। यज्ञा घे न होने ही मे नृष्टि का अभाव हो रहा है और तमस्त प्रजाओ का क्षय हो रहा । यम ये भागो के उपयोग स हीन आप लोगो की दुर्बलता ममुप न होगई है और स्वगोचर में विकार हो गया है ॥१५७॥ यही गम्पूर्ण हमन आपरो वतला दिया है जिस रीति से लोकी मे विल्पय हो हो रहा है। हे सुरोत्तमो । अव यह भी आप लोग श्रवण कर लीजिए विजिम उपाय में इस पिल्पर की शान्ति होगी ॥१५८॥ 828 है
टमा का शाप विमोचन ]
२५१
। चन्द्रमा का शाप विमोचन ।।
गच्छन्तु भो सुरगणा दक्षास्य सदन प्रति ।
प्रमादयन चन्द्राय म त्र पूर्णो भवेद्यया ॥१
पूर्णो चन्द्रे जगत्सर्व प्रवृतिन्थ भविष्यति ।
युप्माकच भवेच्छान्तिगेपधोना-चसम्भव ॥२
इति ब्रह्मवच श्रुत्वा देवा शपुरोगमा ।
प्रययुहट मनमानदा दक्षानिवेशनम् ॥
यथान्ययमुपस्याय सर्वे मुनिवर सुरा ।
प्रोचु प्रजापति दक्ष प्रणम्य श्लक्ष्णया गिरा ॥४
प्रसीद सोदता ब्रह्मनस्माव वहुदु खिनाम् ।
उद्धरम्व महायुद्धे त्राहि न शाकसागरात् ।।५
यद्रुप ब्रह्मसन्तु सृष्टिकृत परमात्मन ।
तदशस्त्व पर ज्योतिषिप्रम्प नमोस्तुते ॥६
रक्षणात मवंजगता अजापालनकारणात् ।
दिक्ष प्रजापतिश्चेति यागशस्तनमा वयम् 11७
ब्रह्माजी न वहा-है मुरगणो । अब आप मब लोग दक्षा प्रजा
पति के गृह का चले जाइये और उनको प्रसन्न वाग्य कि चन्द्रदेव पर वै
कृपा करे और वह जमे भी किमी तरह से पू हो जा जान उनके
क्षीण होने का महागेग दर हो जावे ॥१॥ चन्द्रदेव के परिपूरी हो जाने
पर सम्पूर्ण जगत प्रकृति में स्थित हो जायगा और आपको भी शान्ति को
प्राप्ति हो जायगी तथा समस्त आपधियो को सम्पत्ति भो हो जायगी।
॥२॥ मार्कपडेय महर्षि ने अहा--ब्रह्माजी ने इस वचनामृत का श्रवण
करके ममस्त देवगण जिन म इद्रव सवे आग चलन वाले मायक ये
परम प्रमन्न मन वाले हात हैए उस ममय म दक्ष प्रजापति के सदन
अर्थात् निवास स्थान पर गय ५ ॥३॥ दहा पर सब सुरगणो ने नीति
-
२५२ [ पालिका पुराण अत्यन्त दुखित हमारे के अनुमार उपम्यान करके मुनिवर प्रजापति दक्ष को प्रणाम करके बहुत ही श्लक्ष्ण अर्थात् विनम्रता सयुत मधुर वाणी से उन्होंने कहा ॥४॥ देवो ने कहा ॥४॥ देवो ने कहा-हे ब्रह्मन् ऊपर प्रसन्न होइए -प्रसाद कीजिए । हे महा बुद्ध । हमारी इस शाक के सागर में रक्षा कीजिये और उद्धार कारये ॥।॥ दृष्टि की रचना करने वाले परमात्मा का ब्रह्मा सज्ञा वाला जो रूप है उन्ही के अश आप पग्म ज्योति हैं । ह विप्ररूप। आपके लिए हमारा नमस्कार है । समस्त जगतो की रक्षा करने से और प्रजा के पालन करने के कारण मे दक्ष और प्रजापति आप योगश है उन आपको हम प्रणाम करते है ॥७॥ दक्षाय सर्वजगता दक्षाय कुशलात्मनाम् । दशायात्महितायाशु नमस्तुम्य महान्मने ।।८ मतत चिन्त्यमानस्य योगिभिनियतन्द्रियै । सारस्य सारभूतस्त्व दक्षाय परमात्मन ।।६ योगिवृत्तिरनाधृष्य पारगाणा परायण । आद्यन्तमुक्त सहसा तस्मं नित्य नमो नम ॥१० इति तेपा वच श्रुत्वा दक्षो यज्ञभुजा तथा । प्राह प्रसन्नवदन शनमाभाष्य मुख्यत ।।११ कुत शक महावाहो भवता दु खमागतम् । दुखहेतु वद विभो श्रोतुमिच्छाम्यहन्तु तम् ।।१२ ममास्ति वा कि वर्तव्य भवना दुखहानये । तदह यदि शक्नोमि रिप्यामि हित समम् ॥१३ नच्छ त्वा वचन तस्य ब्रह्मसूनोमहात्मन । जगाद वाक्पति शो वोतिहोतोऽथ त मुनिम् ॥१४ गमस्त जगता ये दक्ष के लिये और कुशल आत्मा वालो के दक्ष -पे मिा तया मारमा पे हित में दक्ष के लिए महात्मा के लिए शीघ्र चन्द्रमा का शाप विमोचन ] आपके लिये नमस्कार है 1८॥ नियत इन्द्रियो वाले योगियों के द्वारा निरन्तर चिन्तन किए हुए सारवा भी आप सार भूत है । ऐमे परमात्मा दक्ष के लिये नमस्कार है ॥३॥ योगियो की वृत्ति को अनाधृष्ट करके पारगामियो मे परायण सहसा ही आद्यन्त कहा गया है उनके तिए नित्य ही नमस्कार है नमस्कार है ॥१०॥ इस प्रवार से कहे हुए उन यज्ञ के भागो का सेवन करने वालों के वचन को मुनकर दक्ष प्रसन्न मुख वाला होकर मरय रूप से इन्द्रदेव को सम्बोधित करके बोले ॥११।। दक्ष ने कहा-हे महावाहो । हे इन्द्र देव । आपको यह महान दुख कैसे प्राप्त हो गया है ? हे विभो । आप इस दुख का हेतु तो बतलाइए । मैं उसके श्रवण करने की इच्छा कर रहा हूँ ।। १२॥ आप लोगो के दुख को हानि करने के लिए मेरा क्या कर्तव्य होता है । उसको यदि मैं कर सकता हूँ तो समहित अवश्य ही करूंगा ॥ १३ ।। मार्कण्डेय मुनि ने कहा-उस महान् आत्मा वाले ब्रह्माजी के पुत्र के बचन का श्रवण करके नीति न वाकपति इन्द्रदेव ने उस महा मुनि से कहा था ॥१४॥ क्षयी जातो निशानाथस्तस्मिन् क्षीणे क्षय गता । सौंपध्यो द्विजश्रेष्ठ तद्धानिर्यजहानिकृत् ॥१५ यजे विनष्टे सकला प्रज क्षद्भयकातरा । वृष्ट्यभवान्महदु ख प्राप्य नष्टाश्च काश्चन ॥१६ ज्ञयोध्य रात्रिनाथस्य यस्ते कोपात् प्रवर्तते । स सर्वजगतो ब्रह्मनभावार्थमुपस्थित ॥१७ नाधुना तत् निभुवने यन्न क्षब्ध नु किंचन । विप्लुत वास्ति विप्रन्द्र स्थावरा पतगाश्च वा ।।१८ न यज्ञा सप्रवर्तन्ते न तपस्यन्ति तापसा । आहारदुखान्निश्रीका प्रजा क्षीणा भयातुरा ॥१६ एव प्रवृत्ते विप्रेन्द्र विप्लवेऽस्मात् रसातलात् । दत्या न यावदुत्थाय वाधन्त तावदुदर ॥२० २५४ [ दालिका पुराण प्रसीद दक्ष चन्द्रस्य त पूरय तपोवलात् । पूर्ण चन्द्रे जगत्सर्वं प्रकृतिस्य भविष्यति ॥२१ गोष्यतिशक नीति हो त्रो ने कहा- निशानाथ चन्द्र क्षयी अर्थात् क्षय होने वाला हो गया है। उसके क्षीण हो जाने पर सभी ओपधियाँ क्षय को प्राप्त हो गयी है । हे द्विज थी उसको हानि यज्ञो की हानि करने वाली है 1१५॥ यज्ञो के विनाश हो जाने पर सम्पूर्ण प्रजा क्षधर के मय से कातर होगई हैं । कुछ तो प्रजा वृष्टि के अभाव से महान दुख को पाकर नष्ट हो गई हैं ।।१६।। यह निशा नाथ चन्द्रमा का क्षय जो है वह आपके ही कोप मे प्रवृत्त हुआ है । हे ब्रह्मन् । वह क्षय समस्त जगत् के अभाव के ही लिये उपस्थित हो गया है । अर्थात् इस क्षय से पूरे जगत् का ही विनाश हो जायगा ॥१७॥ इस समय मे ऐसा कुछ भी नहीं है जो क्षोभ से युक्त न होवे । हे विप्रेन्द्र ! अथवा मभी विल्पत हैं चाहे स्थावर हो या जगम होवे या पतग ही होवें ॥१८॥ इस समय मे न तो यज्ञ सम्प्रवृत्त हो रहे है और तापस गण करते हैं। भाहार के अभाव के कारण होने वाले दुख से समस्त प्रजा क्षीण और भय से आतुर हैं ॥१६॥ हे विप्रेन्द्र ! ऐसा प्रवृत होने पर इस रसा तिल से जब तक दैत्य उठकर बाधा नहीं पहुँचाते है तभी तक आप उद्धार कीजिए । २०॥ हे दक्ष ! चन्द्रदेव पर प्रसन्न होइए और अपने तपके बल से पूर्ण बना दीजिए । चन्द्रदेव के परिपूर्ण हो जाने पर सम्पूर्ण जगत् प्रकृति में स्थित हो जायगा ॥२१॥ इति तेषां वचः श्रुत्वा प्रनापतिसुतस्तदा । उवाच तान् सुरगणान् हृदयाच्छल्यमुद्धरन ॥२२ यन्मे वचो निशानाथे प्रवृत्त शापकारणम् । न केनापि निदानन मिय्या कर्तुं तदुत्सहे ॥२३ फिन्तु मदचग यस्मान्नैकान्तेन मृषा भवेत् । चन्द्रोऽपि वर्धते यस्मात्तद्गायमुदक्षत ।।२४ तपश्चर्या किया चन्द्रमा का शाप विमोचन ] तत्राप्यपमुपायोस्ति मासार्ध यातु चन्द्रमा । क्षय वृद्धिच्च मासाध सम भार्यासु वर्तताम् ॥२५ तस्य तद्वचन श्रुत्वा त प्रसाद्य प्रजापतिम् । सर्वे सुरगणास्तन्न गता यत्रास्ति चन्द्रमा ।।२६ एवमुक्ते तु वचने दक्षेण मुनिना द्विना । जय चन्द्र सामादाय भार्याभि सहित तदा । जग्मुक्ने ब्रह्मभवनं मुदिता सुरसतमा ॥२७ तर गत्वा महाभागा यया दक्षेण भापितम् । तत्सर्वं कथयामासुब्रह्मणे परमात्मने ॥२८ मार्कण्डेय महर्षि ने कहा-इस प्रकार से उनके वचन का श्रवण करके उस समय में प्रजापति के सुत उन सुरगणो से हृदय स शत्य का उद्धार करते हुए बोले ॥२२॥ दक्ष प्रजापति ने कहा-जो मेरा वचन निशानाथ चन्द्र में शाप का कारव्यसन कर प्रवृत्त हुआ है उसको किसी भी निदान के द्वारा मैं मिथ्याभूत करने का उत्साह नहीं करता हूँ । ॥२३॥ किन्तु मेरा वचन भी एकान्त स्प से जिससे वृथा न हो और चन्द्र भी वढना हो जिरारो वही उपाय देखिए ॥३४॥ उसमे भी एक उपाय है कि जो चन्द्रमा माम के आधे भाग म क्षय और वृद्धि को प्राप्त होकर भार्याओं में समान बरताव कर ॥२५॥। उस प्रजापति को प्रसन्न करके उसके उस वचन का श्रवण करके समस्त देवगण वहाँ पर गये थे जहाँ पर चन्द्रमा रहता है ॥२६॥ हे द्विजो दक्ष मुनि के द्वारा इस प्रकार से वचन के कहने पर इसके अन्तर उस समय में भार्याओं के सहित चन्द्रमा का समादान करके वे परम प्रसन्न सुरश्रेष्ठ ब्रह्माजी के भवन में गए ये ।।२७॥ हे महा भागो । वहाँ पर पहुँच कर जैसा दक्ष प्रजापति ने कहा था वह सभी परमात्मा ब्रह्माजी से उन्होंने कह दिया था ॥२८॥ ब्रह्मा दक्षवच श्रुत्वा देवाना वचनात्तदा । चन्द्रभाग महाशैल जगाम सहित सुरै ॥२६ २५६ [पामा गत सय गत्या मुग्ध प्रजागा नियाम्पया। म्नापयामाग शुग्रायर लीहिलमा ॥३. भूतभयभयजमान पूर्यमेव पिनामर । एतदयंचयाग मर पूर्ण गगरा :१ तत्र रनातम्य जन्तोग्तु नोरोगत्य प्रजायते । चिरापुष्टयञ्च मतग यह नोस्तिमाये ॥३२ तपस्नातस्य चन्द्रम्य शरीरातत्क्षण गद । राजयक्षमा नि गमार पूर्वम्पो ययादित ॥३३ नि सृत्य राजयक्ष्मापि ग्रह्माणच जगत्पतिम् । प्रणम्याह वि परिप्ये क्व गच्छामीत्युवाच तम् ।।३४ स्थान पत्नोञ्च लोपेश कृत्य मम सनातनम् । निदेशयानुरूप मे स्रष्टा त्व जगता यत ॥३५ उम समय में ब्रह्माजी देशो ये मुग से दक्ष प्रजापति ने उन या श्रवण करके वे फिर मय मुरो के साथ चन्द्र भाग नामक पर्वन पर जो वि एक महान् पर्वत था चले गये थे ॥२६॥ वहा पर सुरो मछ ने जाकर प्रजाओ की हित की कामना से वृहल्लोहित पुप्पर म चन्द्र- देव को स्थापित कर दिया था ॥ ३० ॥ पितामह पूर्व म ही भूत भव्य और भवत् अर्थात् वर्तमान के ज्ञान से सयुत थे अतएव इमके ही लिए जगद्गुरु ने सरोवर को पूर्ण कर दिया था ॥३१। उस सरोवर में स्नान करने वाले जन्तु को नोरोगना हो जाया करती है। वृहल्लोहित नाम वाले में स्नान करने से प्राणी चिरायु अर्थात् बड़ी उम्र वाला हा जाया करता है ॥३२॥ वहां पर स्नान किये हुए चन्द्र के शरीर से उसी क्षण मे रोग निकल गया था जिसका नाम राजयक्ष्मा था जैसा कि पूर्व रूप कहा गया है ॥३३॥ राजयक्ष्मा भी निकलकर जगत् के पति ब्रह्माजी को प्रणाम करके उनसे बोला था कि मैं क्या वरगा और कहाँ पर जाऊगा ॥३४॥ क्याकि आप इस सम्पूर्ण जगत् के सृजन करने वाले चन्द्रमा का शाप विमोचन ) है अतएव हे लोकेश ! मेरा सनातन कृत्य-स्थान और पत्नी का मेरे ही अनुरूप निदेश कीजिए ॥३५॥ ततो ब्रह्मापि त पुष्ट निरोक्ष्येन्दुसरीरंगः । अमृतस्तेनातियुक्त क्षोणञ्चापि निशापतिम् ॥३६ दोभिः स्वय त्वं गृहीत्वा गिरी निप्पीड्य वै मुहु । अमृतं गालयामास शरीराद्राजयक्ष्मण ॥३७ अमृतानि च यान्याशु गालितानि तदा जने। क्षीरोदस्य स चिक्षेप मध्ये हमि लोकभृत् ॥३८ तस्मादस्यामृतादिन्दो कलाः क्षीणास्तु याः पुरा । तासा जग्राह लवशश्चूर्णान् क्षीरोदसागरात् ।।३६ फलामावावशेषप्य सतर्गादाजयक्ष्मण, । क्षीणा. कलाः पचदश या पूर्वममृतात्मिकाः ॥४० ता राजयक्ष्मगर्भस्थाश्चूर्णीभूतास्तु पीडया । तेजोज्योत्स्ना सुधाभिस्तु निवद्धं यत् कलापतेः ।।४१ शरीरं तत् निधा भूत गर्भस्थ राजयक्ष्मण. ॥४२ मार्कण्डेय मुनि ने कहा--इसके अनन्तर चन्द्रमा के शरीर में स्थित अवियुक्त अमनो से परिपुष्ट उसको देखकर और शीण हुए चन्द्रमा पो देखकर उन्होने स्वय ही हाथों से उसका ग्रहण करके गिरि में पार- म्यार निष्पोडिन दिया था और जरा राजयक्ष्मा के शरीर जग अमन को गालित किया था ॥३७॥ उस समय में जो शीघ्र ही अमन जल में गणित पिच गये गे। लोक मृत् ने शीर मागर के मध्य में एशान्त में प्रक्षिप्त पर दिया पा॥३८॥ यो पहिले इसके उप अमृत से पन्द्र की पलागे कोण हो गयी थी उनपे चूर्णो दे क्षोरोद मागर मे सर मे ग्रहण पिया था ॥३६॥ राजपदमा के मार्ग गे एक पना मात्र ही गेप वाले दगी क्षीण पन्द्रह यताएं जो पूर्व में अमृत से परिपूर्ण यो ॥१०॥ वे गजधमा के गर्भ में स्थित पी बोर पीड़ा में तपो भून घों वे २५८ [ वालिका पुराण जोत्स्ना के अमृता से जा नापति या निवद्ध शरीर था वह राजयष्टमा के गभ म स्पित तीन प्रकार का हो गया था॥१-४२।। ज्योतिश्चूणमभून् ज्यास्ना लीना राजदि मणि । प्रवीभूता सुधा सवा गभ रागस्य च म्यिता ॥१३ यदा निर्यालयामास सुधा ब्रह्मा यक्ष्मान्तरात् । तदा ज्योत्स्नासुधाज्योति सर्व तस्माद्वहिगतम् ॥४४ क्षीरोदसागरे क्षिप्त तत् सव विधिना तदा । देवान गिरौ परित्यज्य स्वय गत्वा द्रुत तत ॥४५ ततोऽमृतानि प्रक्षाल्य कलाचूर्णानि वारिभि । ज्योत्स्नाञ्चाप्याजगामाशु गृहीत्वा तत्त्रय गिरिम् ॥४६ क्षीरोदागिरिमासाद्य चन्द्रभाग तदा विधि । देवमध्ये कलाचण सुधाज्योत्स्ना न्यवीविशव ॥४७ सस्थाप्य तत्त्तय ब्रह्मा देवाना मध्यन स्थित । जगाद राजयन्माण तत् स्थानादि निदेशयन् ॥४८ वह ज्योति से परिपूर्ण हो गया था और ज्योत्स्ना राजयक्ष्मा में लोमा हो गई थी और रोग के गर्भ में स्थित सम्पूण सुधा दृढीभूत हो गई थी ।। ४३ ॥ जिस समय मे ब्रह्माजी ने राजयक्ष्मा के अतर से सुधा को निगलित किया था उस समय मे समस्त ज्योत्स्ना की ज्योति उमसे वााहर गत हो गई थी ॥४४॥ उसी समय में विधाता के द्वारा वह सम्पूण क्षीरोद सागर म प्रक्षिप्त करदी गयी थी। सब देवो को उस पवत म पारत्याग करके वह स्वय वहा से शीघ्र ही गमन कर गए थ ॥४५॥ इसके उपरात कला चूण अमृतो को जन से प्रक्षालित करके उन तीनो को ग्रहण करके शीघ ही ज्योत्सना का भी प्रक्षालन वरव उम गिरि पर समागत हा गए थ ॥४६॥ उस समय में विधाता क्षीरोद से चन्द्र भाग पवन पर पहुँच कर देवो के मध्य म सुधा ज्योत्मना पलाआ व चण म प्रविष्ट हा गयी थी ॥ ४७ ॥ ब्रह्माजी ने उन का मस्यागिन कर व व दवा के मध्य म सस्थित हो गए थ। उसके सुधा
चन्द्रमा का माप विमोचन ]
म्यान आदि के विपयन निर्देश करते हुए उन्होंने राज यक्ष्मा मे यहा
था॥४E1
मवंदा यो दिवारान सन्ध्याया वनितारत ।
मेवते मुरल तस्मिन राजयदमन वमिप्यसि ॥४६
प्रतिश्याय श्वागपास-सयुक्तो मयुन चरेत् ।
म ते प्रवेश्य मनन श्लेष्मणश्च याविध १५०
वृष्णाच्या मृत्युपुत्री या भवत मदशी गपं ।
सा तेऽस्तु भार्या मतत नवन्तमनुयाम्यति ॥५१
क्षीणत्व भवत वृत्य ततस्त्व विपय कुर।
द्रुत गच्छ यथाफाम चन्द्रान् व विमुखो भव ।।५२
एव विमृष्टो विधिना राजयक्ष्मा महागद ।
पश्यता सवंदेवानामन्तर्धान जगाम है ॥५३
अन्तहिते महारोगे ग्रहा लोर पितामह ।
चन्द्रं समग्रयामास पलापञ्चदधितम् ।।५४
तेन क्षीरोदधौतेन मुधापूतेन चात्मन् ।
मज्योनम्नस्तु कलाचूर्ण पूर्ववच्चाकरा द्विधुम् ।।५५
म पोडगमतापूर्ण. पूर्वदिवभो यदा ।
चन्द्रग्नदा सर्वदेवा मुमुदुन्तस्य दर्शनात् ॥५६
अय चन्द्रम्तदा पूर्ण. प्रणिपत्य पितामहम् ।
उयाचेद मुरमदोमध्यपणे नाति हपिन. १५७
प्रमाणे में बता-है रात्र यामा । गदा ही सात दिन
सध्या समय में निगा रहा पसा है और उसमे मुरत का
नेपन रिग यसा है यहाँ पर ही प्राविम परगे ll
अनिदार ( उगमगदी ) भाम और राम गमन्वित होला भी
मन पर माममायाप free मा मोर स्नेप्मा (पर) का
মা যা না বলাও যা না ঘাটি।
२६० { कालिका पुराण ॥५०॥ जो वृष्ण नाम वाली मृत्यु की पुत्री है और आप गुणो के ही तुल्य है वही आपकी भार्या होवेगी जो निरन्तर ही आपका अनुगमन क्यिा करेगी ॥५१॥ आपका कम भी यही है कि क्षीणता करे उसी को आप अपना विषय वना लेवे । अब आप बहुत ही शीघ्र चले जाइये और आप चन्द्र से विमुख ही हो जाइए ।।५२।। मार्कण्डेय महापि ने कहा- इस रीति स विधाता के द्वारा विदा किये हुए महान् रोग राजयदमा ममस्त देवगणो के देखते हुए ही अन्तर्धान का प्राप्त हो गया था ॥५३॥ उस महान् रोग के अन्तर्धान हो जाने पर तोको के पितामह ब्रह्माजी ने चन्द्रमा वो पन्द्रह कलाओं के द्वारा समृद्ध पूर्ण कर दिया था ॥५४॥ फिर ब्रह्माजी ने सुधा से पूत और क्षीरोद मे धौत उसके द्वारा तथा ज्योत्स्ना के सहित बलाआ के चूर्णों मे पूर्व की ही भाँति चन्द्रदेव को कर दिया था ॥५५॥ जिस समय में मोलही कलाओं से परिपूर्ण चन्द्र पूर्व की ही भांति शोभित हुआ था उस समय मे ममस्त देवगण उसके दर्शन से बहुत ही अधिक प्रसन्न हुये थे ॥५६॥ इसके अनन्तर उस पूर्ण चन्द्र न पिता के लिये प्रणिपात किया था अत्यन्त हर्षित न होते हुए मुरो ने सभा के मध्य में सम्थित होते हुए यह वचन रहा था ॥५॥ न श्याम पूर्ववद् ब्रह्मन्छशरीरे मम वर्तते। न वोर्य वा तयोत्साहो निपीदन्त्यगसन्धय ॥५८ गोत्महे पूर्ववच्चेष्टा विधातु सुतरामहम् । चेष्टाहीनस्त्वनुदिन वतेंय फेन लोककृत् ।।५६ ग्रस्तरय यक्ष्मणा सोम यदभदगसन्धय । पूर्व विशीर्णा भयतस्तत्पूर्णमभवन्नहि ॥६० अधुना भवतो देहनूर्ण नि मारिल मया । शरीगन् मामृतज्योत्स्नमम्जसा राजयक्ष्मण. ॥६१ सपा प्रक्षालनविधी तवशो यस्थित जले । ग्यानपनायाश्च गुधाताश्च तेन तीनों भवान् यत. ॥६२ मह पन्द्रमा का शाप विमोचन ) ततोऽङ्गमन्धयो राजस्तव मीदन्ति साम्प्रतम् । तस्योपायं विधाम्यामि चया नाति लभेद्भवान ॥६३ मोम देव ने कहा-ह ब्रह्माजी । मेर शरीर में पूर्व की ही भौति श्यामना नहीं है और न तो वैमा पराम ही बीर न वसा उत्साह ही है। मेरे अड़ की मन्धियां निपोदित है ॥५८, मैं पहिली ही भांति चेष्टाय करने के लिये मुतग अर्थाद वपन आप ही उत्साहित नहीं होता हूँ। हे लोक कृत् I में निरन्तर चेष्टा मे हीन होता हुआ पिम वारण से रहता हूँ ॥५॥ ब्रह्माजी ने कहा-है नाम यष्टमा के द्वारा ग्रस्त आपको जो अङ्गवी मन्धियाँ हो गई हैं वे पूर्व म विशीर्ण हो गई है और अब यह पूर्णता को प्राप्त नहीं हैं ॥६०॥ अब इम समय में मैंने पाप गे देह का चूर्ण निशन दिया है। राज यक्ष्मा के शरीर से अपन पी ज्योत्गना श्रीन ही निकाल दी है ॥ ६१॥ उनके मक्षालन की विधि ग जा लत्र के रूप म र म स्थित है क्योकि आप ज्योमा म और मुगा ने उमी म हीन हैं ।। ६२ ।। दसव उपरात आपकी बङ्ग मन्धियां हे राजन् । दा मगय में सीदिन हो रही है । पाय भी मैं वगा जिसमें पाप चिनी पीटा को प्राप्त न दोवे ॥३॥ प्राजापत्य पुरोडाशो हवनीय पुरोवरे । रोन्द्रस्ततोऽनु चाग्नेय प्रदेय मर्वत कती ॥६४ सतो न भवतो भागपुरोटाशो मया कृत । तेन भागेन भुक्तेन नित्य यज्ञश्तेन हि । पूर्ववत् ते समुत्साह श्याम वीर्य भविष्यति ॥६५ ये चामृतपणास्योये क्षीरोदस्य स्थितास्तव । रचूर्ण वा यत्ते ज्योत्स्नाञ्चापि ये लवाः ।।६६ तत् मर्व भवतो ज्योत्स्नायोगादनुदिन विधो । वृद्धि मान्यति मतत क्षीरसागरगर्मगम् ॥६३
{ पालिका पुराम
स्वारोचिपेऽन्तरे प्राप्त द्वितीये शंकराशज ।
दुर्वासा भविता विष प्रचण्ठश्चण्ड भानुवत् ॥६८
स देवेन्द्रस्याविनयाच्छाप दत्वा सुदारुणम् ।
करियनि निभुवन नि श्रीक ससुरासुरम् ॥६६
श्रिया हीने ततो लोके भविता लोकविप्लव ।
यया तव क्षयात् सोम प्रवृत्त सर्वविप्लव.॥७०
पुर के अध्वर म पाज पत्य पुरोडाम का हवन करना चाहिए।
इसके उपरान्त ऐन्द्र और गीधे आग्नेय मभो ऋतुओं म देना चाहिए।
॥६४॥ इस अनन्तर आपका भाग पुगेधस मैंन किया है । उस
भाग के भोग करने वाले औनित्य ही यज्ञ के द्वारा कृत है पूर्व की ही
भांति आपका उत्साह और श्याम वीर्य हो जायगा ॥६५॥ जो आपके
अमृत के दणक्षी के जल मे स्थित हैं अथवा आपके शरीर का चूर्ण
और ज्योत्सना के जो तव है। हे विधो । वह सब आपकी ज्योत्सना
योग मे अनुदिन वृद्धि को प्राप्त होगा जो निरन्तर क्षीर सागर
को गर्भ म गमन करन वाला है ॥ ६७ ॥ द्वितीय स्वरोचिप वे
अन्नर ये प्राप्त होने पर शङ्कर के अन्श में जापमान दुर्वासा विष
मूर्य की ही भांति प्रचण्ड और चण्ड होगा ॥६॥ उसने देवेन्द्र के अवि-
नय में मुदारण शाप दे दिया था सुर और असुरो के महित तीनो भुवनो
को विना श्री बाला वर देगा ॥६६फिर लोक के थी से हीन होने
पर रोक मे विपत्व हो जायगा । है मोम । जिस तरह ये आपवे क्षय
होने मे गववा विपल्व प्रवृत्त हो गया था ।।७।।
तन्मानुपप्रमाणन तृतीये तु कृते युगे ।
भविष्यति स्थास्यति च यावद् याचतुष्टयम् ।।७१
नतश्चतुर्थ मन्त्राप्ते सह देव कृते युगे ।
क्षीरोद निर्मविप्याम शम्भुर्विष्णरह तथा ॥७२
मन्यान मन्दर यत्वा नेय कृत्वा तु वासुकाम् ।
यसभागेपुलीनेषु देवान्नाथं वय तत ।
चन्द्रमा का शाप विमोचन ]
मथियाम नम देव भीगेद नह दानवै ॥
त्वच्छगेरामृतमिद यनश्चित श्रीन्मागरे।
तन् प्रमथ्य ग्रहीप्यामो रागोभूत नथा भयम् ।।
सर्वोपध्यन्तरे कृत्वा लच्छरीर नदा क्यन् ।
शेष्यामःमागरजले शरीराय दिघो नव ॥७५
निर्मम मागर पश्चान् ममुद्रारं यदामृतम् ।
तदा नव वपुलन्मिन् पूर्ववत् नम्नविष्यति ।।७६
ओजोबीयांन मान्नमक्षयच धान्नकरम् ।
दृटागनन्धिक चार मविप्यति वपुन्न ।
वह मानुष के प्रमाग में नोरे नाम होगग गैर पद तक
चागे
युग होधित न्देला ॥१॥ दन जन्न्ना देवो दे माय चतुर्थ
तन्न वे नत्राप्त होने पर मैं-गन्नृ और वा मोर्गरवा नियन
परेंगे ॥७॥ मन्दगचल की मन्धान का अर्थान मयन वरन का
गायन वनारर गिर वामुनि मई को नेत्र दना। या भागों में लोन
होने पर देवान्न के लिए हम फिर हम देवों में तथा दानवों के नाम
मिनकरीद का मन्धन बने 12 साप गरी वा यह बमन
गे और माग में स्थित है टनों प्रकरनगर नगगिन तया
सरको पहल परेंगे ॥३४ननमय में हम आपके शरीर का
मात्रियों के अन्तर न वाद विधी आपरे पगर नि नागर
से उन म प्रक्षित कर देंगे ॥३५॥ वापर का विन्यन करके और
पो जब अस्तु का ममुरर करेंगे तो उस समय में आपका दपु पूर्व
की मति नमन होला ॥5॥ कर और बीच में जमृत--
वाद-भय जोर नुधान्मर पांव नशा में परिपट बन की
सन्धिपो दाना आपा नगर पस मुन्दर हो वाया 31
मुधाशुभेवनामाप्य ब्रह्मा लोकपितामह ।
विधो. क्षयाय मामा वृद्धय बनवानभूत् ।।55
२६४ | कानिका पुराम यथा दक्षण गदित मासार्च यातु चन्द्रमा । क्षय वृद्धि च मासाघ यत्न तत्रापरोद्विधि ॥७६ तत पोडशधा चन्द्र सुरज्येष्ठो विभक्तवान् । विभज्य च सुरान, सवान, समुवाचेदमुत्तमम् ।।९० कला पोडश चन्द्रस्य तत्रका शम्भुमूर्धनि । तिप्टत्वद्यावधि परा क्षय क्षान्तु क्षय विना ८१ क्षयेण यदि रोगेण मामा दक्षवाक्यत । क्षयाय पीडयते चन्द्रा नोपशान्तिस्तदा भवेत् ।।८२ कित्वस्य या कला शम्भौ ज्योत्स्ना गच्छनु ता प्रति । चतुर्दशकलासस्था प्रतिमास सुरोत्तमा ॥८३ चतुर्दशक्लासस्थान्यमृतानि पिवन्तु वै। प्रतिपत्तिथिमारभ्य भवन्तस्ता चतुर्दशीम् ॥८४ मार्कण्डेय मुति न पहा-लोका के पितामह ब्रह्माजी ने इस प्रभार से मुधाशु (चन्द्रमा म कहकर चन्द्र के क्षयके लिये और आधे मास तर वृद्धि के लिय यनो वान हुए थे ॥ ७८ ॥ जैसा प्रजापनि दक्ष ने वहा था कि चन्द्रमा आध माम तक क्षय और वृद्धि का प्राप्त होवै उम मागाधं में विधाता न यन किया था ॥७६ ॥ फिर मुरों में ज्येष्ठ ने चन्द्रमा यो मानह प्रकार रा विभक्त किया था। और ऐमा विभाग करवे ममस्त देवों से व यह उत्तम वचन बोले थे।1८० । चन्द्रमा यो मोलह बनाएँ हैं उनमे एक भगवान शम्भु ये मस्तव में आज की अवधि पवन स्पिन है और परालय के बिना ही क्षय को प्राप्त होवें । दारे वाक्य मे यदि अय भेग मे मामाघं तर सर के लिए पद साहित किया जाता है नो उम ममय म उपशान्ति नहीं होगी। किन्तु इमली जो ना गम्भु में है ज्योत्स्ना उगये ही प्रति गमन परे। गुरोरामो । प्रति माग में पौदह पसाओ पी मंस्था है ॥१३॥ थाप मोग प्रतिपदा तिथि मे आरम्भ करथे पतुदंशी पयंत चतुर्दश समाधी मंम्चित अभनपा पान पर।८४
भन्मा का शाप विमोचन]
तेजोभोगा सूर्यविम्य चतुर्दशतिथी क्रमात् ।
मविशन्तु क्षय त्वेव कृष्णपक्षे विधोर्भवेत् ।।८५
यातु शेपा कला दर्श हरित्पत्रं पलायिता।
तिष्ठतु प्रथमे भागे तिथौ तस्या निशापते ॥६६
द्वितीये दर्शभागेतु रोहिण्या यातु मन्दिरम् ।
तृतीये तु सरस्वत्या स्नात्वा समस्थितो विधु ।।८७
चतुर्थे वलसम्पूर्णस्तिथिभागे विभावसो ।
मण्डल यातु चन्द्रोऽय सविम्बस्थघोटक II
यावत् कालिन हि कला प्रथमा क्षयमाप्नुयात् ।
एवमेवे कृष्णपक्षे तावत् सा प्रतिपद् भवेत् ।।८६
द्वितीयादौ कृष्णपक्ष वृद्रि-हासस्तथाविध ।
तिथीना वृद्धिहेतुश्च शुक्ले कृष्णे तथा भवेत् ॥६०
तत पुन शुक्लपक्षे यायत पूर्वकलोदिता ।
वृद्धि नैति भवेत्तावन प्रनिपत्तितिथि दित १६१
तेजो के लोग चतुर्दशी तिथि मम से सूर्य के विस्य में प्रवेश
परें । इस प्रकार मे कृष्णपग में चन्द्र या भय होता है ।।८५ ॥ शेष
पना हरिपत्र में पनायित दशम जावै । उम तिथि में नशापति के
प्रथम भाग में स्थित रहे ॥६॥ द्वितीय दर्श-भाग में रोहिणी मन्दिर
मे गमन परे। तीसरे भाग में ना मरम्मनो पे म्नान गरी चन्द समु.
स्थिर होता है। विभावस्तु के नतुर्य निविभाग में बह वन मे
मम्पूर्ण होता है। पिम्ब में स्थित घोटन में महित यह चन्द्रमा मण्डल
में जावे॥४८॥ जितने समय पर्यन्त प्रयमा रता क्षय को प्राप्त होने
मी प्रचार से कृष्णापत्र में तब तक वह प्रतिपदा होती है।
द्वितीयादि में वृष्ण प म उसी प्रपार का वृद्धि तथा हास होता है।
तिथियो यो पृद्धि या हेतु गुपन और कृष्ण में उगी भौति होता है।
UE00 गये अनार पिर शुक्ल पक्ष में अब तक पूर्व कसा उदित
है॥१॥ | कालिया पुराण होती है तब तक वृद्धि को नहीं जाती है और आदि स प्रतिपदा तिथि ततो द्वितीयभागस्य या ज्योत्स्ना हरमूर्धनि । स्थिता या वै क्ला यातु गता सापुनरेप्यति । युप्माभिस्तु भवेत् पेयममृत यद्दिने दिने ॥१२ तद्वितीयादितिथिभि पूर्णान्ताभि सदैव हि । स्वयमुनपनस्यते चन्द्रो ज्योत्स्नायोगात सुरोत्तमा ॥६३ यथा दिने तिने भागा क्षय यान्ति तथा विधो । वृद्धि गच्छन्त्यनुदिन शुक्लपक्षेऽन्वह सुरा ॥६४ तेजोभाग सूर्यविम्बान पुनरेव समे'यति । प्रयास्यति कृष्णपक्षे यथा भागनम तथा ॥६५ ज्योत्स्ना हरशिरपचन्द्रात् प्रत्यह पुनरेप्यति । तेजोभाग मूयविम्बादमत वपति स्वयम् ॥६६ एव वृद्धि शुक्लपक्षे मुधाशो सम्वविध्यति । पक्षेयो शुक्लकृष्णत्व चन्द्रवृद्धिक्षयाद्भवेत ।।६७ यावत् कालन यो भाग क्षय वृद्धि च यास्यति । तावत् कालमभिव्याप्य तिथि स्यास्यति सा पुन ॥६८ इस अनवर द्वितीय भाग की जो ज्योत्स्ना भगवान् हर मस्तक म है और ना स्थिता है वह जाव और गयी हुई वह पिर आ जायगी। जाप द्वारा दिन दिन म अमृत पोने के योग्य होता है ।६२॥ है मुरोत्तमा ! वह पूण अन्त वाती द्वितीया आदि तिथिया से सदा ही घद्र स्वय ही उत्पन्न होगा क्योदि वहाँ पर ज्योत्स्ना का योग होता है उमो स उसकी समुत्पात्त होगी ।।६३।। जिस प्रकार स दिन दिन म भाग क्षण को प्राप्त हात है व अनुदित चन्द्र की वृद्धि का प्राप्त हात हैं । ह मुरो ! शुक्लप र म भी प्रात दिन वृद्धि को प्रप्त हुआ करत है M६४॥ भूप विम्ब स तज वा भाग पुन ही समागत होगा। जिम प्रसार में वृष्ण पक्ष म उसी भौमाग रे क्रम या प्राप्त होगा। के पन्द्रमा का पाप विमान ॥६॥ भावान मनु मत म म म्यत चन्द्रमा में ज्योत्सना प्रनि- दिसपुत आयगी। सूर्य के विम्ब म तजौभाग स्वयं ही अमन गो वा परता है ॥६६॥ इसी प्रकार म पाम चन्द्रमा की वृद्धि होगी। दानो पक्षो मगो शुपनत्व और कृष्णाव व नाम है य पन्द्रमा १ सय atr क्षि से ही हमा यन है । जय चन्द्र वृद्धि पा प्राप्त होता तर उग गुक्त पा रहा जाता है और जब क्षय या प्राप हाना 1 नाम TM • पुरा आया करना HI जिनन बालक दाग जा भागधा और को प्रात: उन ही नाम का अभि- वाप्नोतिय शिधिन रहगी ॥८॥ चिरेण वृद्धियदि या क्षयो वा द्रुतन वृद्धियंदिया भयो वा । इतात्तिभोनानु पदा क्षय म्याच्चिरानु द्धिनियि प्रमेश 105 व्य व्यञ्च चन्द्रण विना न मम्मविष्यति । त-मारायो प्रपद्वयर्ष चन्द्र रन्तु देवता ॥१०० आस्वादनीय शुनाशु शेषनुमामन । अमावास्यापगधे न पितृमो रोगिणीगृह ॥१०१ सम्मंगमादनाय वृदियानि वामहम् । तेन यन्यन पिति याम्यान्ति पगम् ॥१०२ तन अगाणा मयँ यथोरा विधिना तया। नरोहितार्याय चन्द्रन्याप परे॥१०३ मादयोऽपि चन्द्रार्य स्वाप परमामन । जग्रार देवविधिना शिरमा धितो मम् ॥१०१ निज नियमनमपसमायम् । गायरा चन्द्राला शानु धय गता ।।१०५ सिर म द प रा प्रता में अपना काम पनि सामागमामा और पिन Trai , neप और NEET मा गन्मा17 AT [कालिया पुराण के लिये हे देवताओ | आप लोग चन्द्रदेव की रक्षा करे ॥१०॥ अनुमास से कला शेप चन्द्रदेव का आस्वाद करना चाहिये । अमा• वास्या में अपराध काल मे तो वह पितृगणो के साथ रोहिणी के मन्दिर मे रहता है ।१०१॥ उसके ही आस्वादन से प्रतिदिन कला की वृद्धि हुआ करती है । उस कव्य से पितृगण भी परा तृप्ति को प्राप्त होंगे ॥ १०२॥ माकण्डेय महर्षि ने कहा-इसके अनन्तर सभी सुरगण जैसा भी विधाता ने यहा था वैसा ही उन्होंने चन्द्र की क्षय और वृद्धि के लिए लोक के हित पे सम्पादन की कामना की थी ॥१०३॥ महादेवजी ने भी परमात्मा के स्वरूप च द्रमा के अध भाग को देवों मे महिन विधिपूर्वक अत्यन्त क्षुधित होरर शिर मे ग्रहण किया था। ।।१०४॥ जा तज पर-नित्य-अज-अव्यय और अक्षय है उस म्यरूप वाली ही चन्द्रमा को पता है जो शाप मे ही क्षय को प्राप्त हो गई थी॥१०॥ प्रविशति यदा ज्योतिरानन्दमजर परम् । योगिनस्तु तदा तेपा चिन्तन लीनमेप्यति ।।१०६ महादेवशिर सस्थे लीने चिरो सुधानिधौ । चन्द्रद्वारा भवेन्मुक्तिरित्येय वैदिकी श्रुति ॥१०७ एतज ज्ञात्वा महादेव क्षयवदयविनावृतम् । हिताय सर्वतोपराना जग्राह शिरमा विधम् ॥१०८ चन्द्रज्योनस्नासमायोगादोपध्यो याति वृद्धये । गर्वोपधिप वदामु प्रवर्तन्ते ततोवरा ॥१०६ अध्वरेषु प्रवृत्तेप स्वान् स्यान भागाम्न देवता । परिगृह्णन्ति पितरतथा पच्यागि भूरिश ॥११० अमृत ग्रह्मणा मष्ट यद् देवेभ्य पुरातनम् । नेन गप्यन्ति होना ये हव्यमागेन देवसा ॥१११ यानाप्यायि तच्च योनामिदिमेति ये । गायो ग्गा दिनाया गच्च म्याक्षणमायया ॥११२ २७० [ कारिका पुराण जाया करता ब्रह्मणा पवंतर्थ प्ठे यथा तच्चन्द्रभागत. ॥११७ यज्ञभागे स्थिते यस्मादेवानमकरोद्विधुम् । कव्ये स्थितेऽपि पिअन्न तिथिवृद्धि-क्षया यथा ।।११८ इद पुण्यतमाय्यान य शृणोति सकृन्नर । राजयक्ष्मा तस्य कुले न पदाचिद् भविष्यति ॥११६ यक्ष्मणा परिभूतो य शृणाति वचन विधे ॥१२० इद स्वस्त्ययन पुण्य गुह्याद गुह्यतम शुभम् । य शृणोत्येकचित्त सन् स महापुण्यभाग भवेत् ।।१२१ अतएव यज्ञ के अमृत का पारण भी चन्द्रमा ही स्वय होता है अतएव दक्ष प्रजापति के शाप से रक्षा लिए चिकीपित होता है । ॥११३॥ आज भी कृष्ण पक्ष में मुरगणों के द्वारा चन्द्र वा पान किया । तेज तो सूर्य देव को चला जाता है और चन्द्र का अर्धभाग तथा उसकी ज्योत्सना भगवान् शम्भुदव के समीप भ चले जाया करते हैं ॥११॥ और पिर शुक्ल पक्ष मे शेष कला उदित हुआ करती है। ज्योत्सना का दूसरा भाग और द्वितीय तेज का भाग और अन्य भी शिव के मस्तक मे सस्थित चन्द्रमा से और क्रम से सूर्य के विम्व से चन्द्र की सोलह कलाये है उनमे एक भगवान् शम्भु के मस्तव में रहा करती है ॥११६॥ शेप कलाओ के सित और असित अर्थात शुक्ल और कृष्ण ये दोनो पक्ष उदय और क्षय वाले ही होते है। यह सब मैंने अ.पको बतला दिया है जिस प्रकार से भी चन्द्रमा का विभाग किया गया है जिस रीति से ब्रह्मा के द्वारा उस श्रेष्ठ पर्वत में चन्द्रमा समागत हुआ था ॥११७॥ जिस कारण से यज्ञ भाग के स्थित होने पर विधु को देवो वा अन्न किया था। जिस तरह से कव्य के स्थित होने पर भी पितृगण का अन्न तिथियों का क्षय और वृद्धि होता है ॥११॥ इस परम पुण्यतम आख्यान को जो भी कोई मनुष्य एक वार भी श्रवण कर लिया परता है उस के पुस म राज यक्ष्मा या महारोग कभी भी अरुन्धती जन्म-ययन ] गयी थी। उस समय में सागर ने भी महा नदी चन्द्रगागा भार्या को उस जल के प्रवाह से उसको अपने भवन में ले गया था ॥६॥ इसी रीति से उसमे चन्द्रभागा नाम वाली नदी समुत्पन्न हुई थी । वह चन्द्र- भाग महान शैल में अपने गुण गणो के द्वारा भदा गङ्गा के ही समान यी १जा नदियाँ और सब पर्वत स्वभाष से ही दो रूपो वाले सदा हुआ करते है । नदियो का रूप तो उनका जल ही होता है तथा शरीर दुसरा ही हुआ करता है ।।११९ पर्वतो का रूप तो स्थापर ही होता है और उनका शरीर दूसरा होता है। जैसे शुक्तियो का और कम्यो पा अन्गत तनु होता है ॥१२॥ स्वरूप तो बाहिर होता है और वह सर्वदा हो प्रवृत्त हुआ परता है। इसी प्रकार से जल तथा उस समय में नदी और पर्वत का स्थावर होता है ॥१३॥ उनका काम तरे यन्तर में वास किया करता है और निरन्तर उपपन्न नहीं होता है ॥ १॥ आप्याय्यते स्थावरेण शरीर पर्वतस्य तु ! तथा नदीना कायस्तु तोयनाण्याय्यते सदा ॥१५ नदीना फामरूपित्व पर्चताना तथैव च । जगत् स्थित्य पुरा विष्णुः कल्पयाचास पत्नतः ।।१६ तोयहानी नदीदुःख जायते सतत सुरा. । विशोणे स्थावरे दुख जायते गिरिकायम् ।।१७ तस्मिन् गिरौ चन्द्रभाये वहल्लोहिततीरगाम् । सन्ध्या दृष्ट्वा पप्रच्छ वसिष्ठ. सादर तदा ॥१८ किमर्थमागता भद्रे निर्जन तु महीघरम् । मस्या वा तनया गौरि कि वा तव चिकीर्षितम् ॥१६ एतदिच्छाभ्यह श्रोतु यदि गुह्य न ते भवेत् । वदन पूर्णचन्द्राम नि श्रीक वा कथ तव ॥२० एतच्छु त्वा वचस्तस्य वसिष्ठस्य महात्मनः ।
२७४ [ बालिका पुराण । दृप्ट वा च त महात्मान ज्वलन्तमिव पावकम् ।।२१ शरीरधृगब्रह्मचर्य सदृश त जटाधरम् । सादर प्रणिपत्याथ सन्ध्योवाच तपोधनम् ॥२२ पर्वत का शरीर तो स्थावर द्वारा ही आप्यायित होता है। उसी भांति नदियों का शरीर जल के द्वारा ही सदा आप्यापित हुआ करता ॥१॥ नदियो वा तथा पवतो का कामरूपी होना भगवान् विष्णु ने यत्न पूवक पहिले जगत् की स्थिति के लिय ही वल्पित किया था ।। १६ ॥ हे सुरगणो । जल को हानि होने पर या निर तर ही नदिया को महान् दुख हुआ करता है और विशीण हो जाने पर स्थावर गिरि के शरीर म जात उत्पन्न होता है ।।१७।। उस पर्वत पर जो कि चन्द्र भाग नाम वाला था वृहल्लोदित के तट पर गमन करने वाली सन्ध्या का अवलोकन किया था और वसिष्ठ मुनि ने उस समय मे बड़े हो आदर पूर्वक उससे पूछा था ॥१८॥ वसिष्ठ जी ने कहा- हे भद्रे । आप इस निजन महान् गिरि पर किस प्रयोजन के लिए आयी हैं । हे गौरि । आप किसकी पुत्री हैं ? और आप का क्या चिकीपित हे अर्थात् क्या करने की इच्छा रखती हैं ॥१६॥ यदि आपकी कोई भी गोपनीय वात म हा तो मैं यही सुनना चाहता हूँ। आपका मुख तो चन्द्रमा के समान परमाधिक सुन्दर है किन्तु इस समय में वह नि श्रीक सा क्यो हो रहा है ? ॥२०॥ उन यहास्मा वहिष्ठ मुनि के इस वधन का श्रवण करखे उन महात्मा का अवलोकन किया था जो प्रज्वलित अग्नि के ही ममान थे । व उस समय म ऐम ही प्रतीत हो रहे थ मानो शरीरधारी ब्रह्मचय व ही राहश हा । उन जटाधारी का बहुत ही आदर पे साय प्रणिपात कर इसन पश्चात उम सन्ध्या ने उन तपोधा रो कहा पा ॥२२॥ पदर्थमागता शैल सिद्ध तन्मे द्विजोत्तम । तव दर्शनमात्रेण तन्मे से स्या अन्धनो जन्म-क्थन ] तप कर्तु मह ब्रह्मन्तिर्जन शैलमागता। ब्रह्मणोऽह मनोजाता सन्ध्या नाम्नाच विश्रुता ।।२४ भोपदेशमह जाने तपसो मुनिसत्तम । यदि ते युज्यते गुह्य मा त्व समुपदेशय ॥ एतच्चिकोपित गृह्म नान्यकिञ्चन विद्यते ॥२५ अज्ञात्वा तपसा भाव तपोवनमुपाश्रिता । चिन्तया परिशुप्येऽह चपने च मन सदा ॥२६ आकण्यं तस्या वचन वसिष्ठा ब्रह्मण सुत । स्वय स सवतत्त्वज्ञा नान्यकिचन पृष्टवान् ।।२७ अथ ता नियतात्मान तपसे तिघृतोद्यमाम् । वसिष्ठा मन्त्रयाञ्चक्र गुरुवाच्छप्यवत्तदा ॥२८ सन्ध्या वाली-जस प्रयाजन की मिद्धि क लिय में इस पैल पर समागत हुई थी वह मरा काय सिद्ध हो गया है । ह द्विजात्तम । ह विभो । आपक दशन मात्र सही अथवा वह काय पूर्ण हो जायगा । ॥२३।। है ब्रह्मन् । मैं तपश्चर्या करने के लिय ही इस निबन पवत पर आई थी। मैं ब्रह्माजी क मन में समुत्पन्न हुइ हू और मैं सोक म सन्ध्या-इस नाम स प्रसिद्ध हूँ ॥ २४ ॥ हे मुनिथप्ठ । मैं तप का उपदश भी कुछ नहीं जानती हूँ। यदि आपको कुछ गोपनीय युक्त होता हो ता आप मुयका उपदेश दीजिए । यही मरा परम गुह्य चिकोपित है और दूसरा कुछ भी नहीं है ॥ २५ ॥ तपस्या के भाव का ज्ञान न प्राप्त करक ही मैंने इस तपोवन का उपाश्रय ग्रहण किया है। मैं चिंता से परिशुष्क हो रही है और मरा मन रादा ही कांपता रहता है ॥२६॥ मापदेय मुनि ने कहा -ब्रह्माजी के पुत्र वमिष्ट जीन उस सन्ध्या क वचन को मुनवर न स्वय ही सम्पूर्ण तत्व के माता मुनि न उसत बन्य बुछ भी नहीं पूछा था ॥२७॥ इसक अनन्तर उस समप म बसिप्त मुनि न उम नियत आत्मा वाली और तप ५ लिय अत्यन्त उद्यम धारम २७६ [ कालिका पुराण करने वाली उसको शिष्य को गुरु के ही समान वसिष्ठ न मत्र दीक्षा दो थी ॥२८॥ परम यो महत्तज परम यो महत्तप । परमो य समाराध्यो विष्णुमनसि धीयताम् ॥२६ धर्मार्थकाममोक्षाणा य एक्स्त्वादिकारणम् । तमेक जगतामाज्ञ भजस्व पुरुषोनमम् ॥३० शयचगदापद्मधर कमललोचनम् । शुद्धस्फटिकसदाश क्वचिन्नीलाम्बुदच्छविम् ॥३१ गरुडोपरि शुक्लाजे पद्मासनगत हरिम् । श्रीवत्सवक्षस शान्त वनमालाधर परम् ।।३२ केयूरकुण्डलधर किरीटमुकुटोज्वलम् । निराकार ज्ञानगभ्य साकार देहधारिणम् ॥३३ नित्यान द निरालम्ब सूयमण्लमध्यगम् । मन्त्रणानेन देवेश विष्णु भज शुभानने ॥३४ ॐ नमो वासुदेवाय ओमित्यन्तेन सन्ततम् । तपस्यामारभन्मौनी तनताग्नियमान् शृणु ॥३५ यनिष्ठ मुनि न कहा-जो महान तेज परम है जो परम महान् तप है जो परप समाराधना करने के योग्य है उन भगवान विष्णु को हो अपने मन म धारण गरिए ।।२६। जो धम-अथ-बाम और मोग-इन परम पुरपार्यों या एक ही आदिपारण है उन जगतो ये धाच पुग्पातम प्रभु एक का ही यजन परो ॥०॥ जो भगवान विष्णु गाय पन-गदा और परम यो धारण करने यार है भार उनय सोधन पगमा पकी ममान परम मदर है-उनमा वण शुर पटिर के गुर है और यही पर उनकी यि ना मप ये सटश ही है ॥३१॥ गए पर मुगल समय पर पदमामा गविराजमाथी बरा पाया स्पम में मन वास-परमाता । और यामासा + धारा हरि ।
अन्धनी जन्म-क्थन ] ૧૨૭૭ भजन करो ॥३२॥ जो वेयूर और कुण्डलों यो पहिने हुए हैं--जो किरीट और मुकुट मे समुज्ज्वल है---जो बिना थापर वाले के बल ज्ञान के द्वारा हो जानने के योग्य है-जो आकार के गहित देहधारी हैं-नित्य बानन्द स्वरूप-विना अवलम्वन वाल और मूर्य मण्डल के * मध्य में सस्थित हैं ऐसे देवेश्वर विष्णु की इस मन्त्र के द्वारा ही हे शुभ । आनन वाली । माप यजन करो ॥३३॥३४॥ वह मान 'ओम् नमा वासुदेवाय ओम्" यह है । इसी मन्त्र के जाप के द्वारा निरन्तर मौनी होपर तपश्चर्या का समारम्भ करो। उमम कुछ नियम हैं उनका नव श्रवण करो ॥३५॥ स्नान मोनेन कर्तव्य मौनेनैव तु पूजनम् । द्वयो पर्णजलाहार प्रथम पप्ठवान्यो । तृतीये पष्ठकाले तु उपवास परो भवेत् ।।३६ एव तप समाप्तौ तु पळे काले क्रिया भवेत् । वृक्षवल्कलवासाश्च काले भूमिशयस्तथा । एव मौनी तपस्यास्या वतचर्या फलप्रदा ॥३७ एव तप समुद्दिश्य काम चिन्तय माधवम् । म ते प्रसन्न इष्टार्थ न चिरादेव दास्याति ॥३८ उपदिश्य वसिष्ठोऽथ सन्ध्ययाय तपस क्रियाम् । तामाभाप्य यथान्याय तत्रैवान्तर्दधे मुनि ॥३६ सन्ध्यापि तपमो भाव नात्वा मोदमवाप्य च । तप क्तुं नमारेभे वृहल्लोहिततीरगा ॥४० यथोक्तन्तु वरिप्ठेन म.व तपसि माधनम् । व्रतेन तेन गोविन्द पूजयामास भक्तित ॥४१ एकान्तमनसस्तस्या कुर्वन्त्या मुमहत्तप । विष्णो विन्यस्तमनसो गतमेक चतुर्युगम् ॥४२ नित्य स्नान मौन होकर करना चाहिये और मौन व्रत के गाथ ही पूजन करे। प्रथम तो छट दोना यातो म पण और फ्लो का करने की क्रिया का उपदेश देकर और उसमे न्याय के अनुसार सम्मा- पण करके मुनि वही पर अन्तर्धान हो गये थे।॥३६॥ वह तपस्या के भाव का ज्ञान प्राप्त करके और परम आनन्द प्राप्त करके उमते वहरलोहित के तौर पर स्थित होकर तपश्चर्या करने का आरम्भ कर २७८ । कालिका पुराण आहार करे और तीसरे षष्ट काल में उपवाम परायण ही होना चाहिए । ।।३६।। इस प्रकार मे नप की समाप्ति मे पष्ठ बाल की क्रिया होती है । वृी के छालो के वस्त्र धारण करें और ममय पर भूमि में हैं। शयन करै । इम गैति से मौनी रहे और यह तपस्या नाम वाली बता चर्या फल के प्रदान करने वाली होती हैं ॥३७॥ इस तरह से तप का उददेश करके इच्छापूर्वक माधव भगवान का चिन्तन करो। वे प्रसन्न होकर आप अभी को शीघ्र ही प्रदान कर देग ।। ३८ ॥ मार्कण्डेय मुनि ने कहा-इसके अनन्तर वसिष्ठ जी ने उस सन्ध्या के लिये तर - दिया था ॥४। उसने वासिष्ठ मानिने जैसा कहा था उस मन्त्र को तथा सप के माधन को करके उमी यत में भक्तिभाव के द्वारा गोविन्द का पूजन किया था ॥ ४१।। परम एकान्त मन वाली वह सुमहान तप का समाचरण करती हुई और भगवान् विष्णु में विन्यप्त मन वाली को चारो ( गत्य-त्रता-द्वापर-कलियुग ) युगों का समर्म व्यतीत होगया ॥४२॥ न कोऽपि विम्मय नाप तस्या दृष्ट्वा तपोऽन्दुतम् । न ताहशो तपश्चर्या मविप्यति च वरयचित् ॥४३ मानुपेणाथ मानेन गते त्वेक्चतुर्युगे । अन्तर्वहिस्तथाकाणे दर्शयित्वा निज वपुः ॥४४ प्रसन्नम्तेन रूपेण यद्रप चिन्तित तया । पुर प्रत्यक्षता यातस्तस्या विष्णुर्जगत्पति ॥४५. अथ मा पुरतो दृष्ट्वा मनसा चिन्तित हरिम् । शपचक्र गदापपधारिण पद्मलोचनम् ॥४६ अन्धनो जन्म-वयन] केयूरखुण्डलधर किरीटमुकुटोजवनम् । तादयन्य पुण्डरीकाक्ष नीलोत्पलदलच्छविम् ॥५७ ममाध्वसमह वक्ष्ये कि क्य लौमि वा हरिम् । इति चिन्तापरा भूत्वा न्यमोलयन चक्षुपी ॥४८ निमीलिताक्ष्यास्तम्याग्नु प्रविश्य हृदय हरि । दिव्यं ज्ञान ददौ तस्य वाच दिव्य च चपी ॥४॥ दिव्य ज्ञान दिव्यचक्षुदिव्या वाचमवाप सा । प्रत्यक्ष वीक्ष्य गोविन्द तुटाव जगता पतिम् ।।५० उमने इस अद्भुत तप का देववर वाई भी निम्म्म को प्राप्त नगै हुना था । उम नाह को नपक्रया अन्य किसी की भी नही होगी 1१३। इमरे अनन्तर मनुष्यों में मान म चागे युगो की 4 चौकरी ध्यतीत हो गयी यो। फिर अन्दर-याहिर और जामा म अपना व दिधला वर उम रूप से परम प्रसन्न हुए जिन म्प को उभने चिन्तन किया या । वही उपवे सामने प्रत्यक्षता को प्रात हा गरे थे जो भगवान विनइम जगन के स्वामी पे ॥५५॥ इम अनलर अपने मामने अपन मन ने दाग चिन्न किये गये हरि को देख कर बहुत ही प्रसन्न हुई। उनका स्थापन-चक्र-गदा बौर पमरे धारण करने वाला पा गया वे मिगेट और मुकुट में परम समय न थे। पुडरोब वे नमान उन नेग में और गार पर विराजमान । उनी हदि नील यमा गमान थी ॥४॥ मैं भय के गाय यश नगी अथवा दिन प्रसार में भगवान का स्तवन राइगी चिन्ना म परापप होरर मने अपने नेत्रो यो मूद लिया था ॥ ४ ॥ मूलए नोचनो वानी में हरि भगवान् ने प्रवेश दिया था और उनमें उम मध्या पो परम दियभान को प्रदान किया था और उगगे दिन मापी बोलने पोगा दी पो नया दिव्य घायु भी प्रदान कर दिये थे ॥ ४॥ यह शि परम दिमान-दिव्य नोरा और हिरवागो को जाम करने २८० वालिका पुरा बाली हो गई थी। उसने प्रत्यक्ष में हरि वा दर्शन कर उसका स्वल किया था ॥५॥ निराकार ज्ञानगम्य पर यन्नव स्थूल नापि सूक्ष्म न चोच्च । अन्तश्चिन्त्य योगिभिर्यस्य रूप तस्मै तुभ्य हरये में नमोऽस्तु ॥५६ शिव शान्त निर्मल निर्विकार ज्ञानात्पर सुप्रकाश विंसारि। रविप्रख्य वालभागात् परस्ताद रूप यस्य त्वा नमामि प्रसन्नम् ।। एक शुद्ध दीप्यमान विनोद चितानन्द सत्वज पापहारि नित्यानन्द सत्य भूरिप्रसन्न यस्य श्रीद रूपमस्म नमोऽस्तु ।।५.२ विद्याकारोभावनीय प्रभिन्त सत्वच्छन्ना ध्येयमात्मस्वरूपम् । सार पार पावताना पवित्र तस्मै रूप यस्य चेय नमस्ते ॥५४ नित्यार्जव व्ययहीन गृणोघ- रष्टायश्चि त्यते योगयुक्त । तत्त्व व्यापि प्राप्य यजज्ञानयोगे पर याता योगिनस्त नमस्ते ॥५५ यत्सावार शुद्धम्प मनोज्ञ गरुत्मस्थ नीलमैवप्रयागम् । शय चा पद्मगर्दै दधान तस्मै नमो योगयुक्ताय तुभ्यम् ।।५६ मध्या न पहा-या विा आवार पाले है-जी शान मेरी मरन्धती जन्म-वयन ] २८१ द्वारा जानने के योग्य है--जो सब मे पर हैं जो न तो स्थूल है और न सूक्ष्म ही हैं तथा जो उच्च भी नहीं है-जिनका रूा योगियो । द्वारा अन्दर ही चिलन करने के योग्य है उन आप भगवान् श्री हरि के लिए मेरा नमस्कार है।५१। जिनका म्बस्प शिव अर्याद रल्याण स्वरूप है-जो परम शान्त-निर्मा-विकारोन रहित-ज्ञानसे भी पर सुन्दर प्रकार से युक्त विमारी-रवि प्रख्य ध्वान्त (अन्धवार) भाग स परहै उन परम प्रसन्न आपके लिये मैं प्रणाम करती हैं।५२१ जो एक शुद्ध दैदीप्यमान विनोद, चित्त के लिए बानन्द मत्त्व मे ममुत्पन्न पापो का हरण करने वाला, नित्य ही आनन्द रूप, गत्य और बहुत ही अधिक प्रसन्न जिसका श्री का प्रदाता यह सा है उन प्रभु के लिए मेरा नमम्बार है ॥५३॥ विद्या के आकार मे उद्भावना करने के यो य प्रकृष्ट ५ मे भिन्न- मत्त्व से छन्न-ध्यान करने के योग्य-आत्म स्वरुप से ममन्वित- मार-पार और पावनी को भी पवित्र करने वाला जिनका स्प है उनके निये मेरा प्रणिपात है ॥५४॥ योग मार्ग मे युक्त पुरुषो के द्वारा गुणा ये ममूह आठ अङ्गो वाले योग से जो नित्यार्जन और व्यय मै हीन का चिन्तन किया जाता है जिसको योगीजन अपने ज्ञान योग में व्यापी नत्व को प्राप्त करके पगत्पर को पास हुए हैं उस माय के लिए मेरा नमसार है ।।५।। जो आवार म मयुत है, जो शुद्ध रूप वाले हैं और जो मनोन है, जो गाड पर विराजमान हैं जिनका प्रकाश नील मेघ ये ममान है जो शव-चक-गदा और पदम वो धारण करन वाले हैं उन याग स युक्त आपके लिए मेरा प्रणास समर्पित है ॥५६॥ गगन भूदिशश्चंच सलिल ज्योतिरेव च । वायु कालश्च पाणि यस्य तस्मै नमोस्तु ते ॥५७ प्रधानपुरपो यस्य कार्याङ्गत्वे निवतस्यत । तस्मादव्य तरूपाय गोविन्दाय नमोऽस्तु ते ॥५८ य स्वय यश्च भूतानि य स्वय तद्गुण पर ।
२८२
हैा ममि, रिसाद, गूर्य, चन्द्र, माा जर बहिन, गुण माभि में
[ कालिका पुराग
य स्वय जगदाधारस्तस्मं तुभ्य नमोनम ॥५६
पर पुराण पुरुष परमात्मा जगन्मय ।
अक्षयो योऽव्ययो देवस्तस्मै तुभ्य नमो नम १६०
यो ब्रह्मा कुरुते सृष्टिं यो विष्णु कुरुते स्थितिम् ।
सहरिष्यति यो रुद्रस्तस्मै तुभ्य नमो नम ॥६१
मो नम कारणकारणाय दिव्यामृतज्ञान विभूतिदाय ।
समस्त लोकान्तर मोहदाय प्रवाशरूपाय परात्पराय ॥६२
गस्य प्रपञ्चो जगदुच्यते महान क्षितिर्दिश सूर्य इन्दुमनोजव ।
पह्निमुखान्नाभितश्चान्तरीक्ष तस्मं तुभ्य हरये ते नमोऽस्तु ।।६३
जिसका गगन-~-भूमि-दिशायें जल ज्योति-बायु और कार
ररूप है उनके लिये मेरा नमस्यार है ॥५७॥ जिनके कार्यो के अगले
में प्रधान और पुरुष निवाम किया करते हैं उन अव्यक्त रूप वाले गोविंद
मै तिये नमस्कार है। जो स्वय हैं और जो भूत हैं -जो स्वय उसके
भुनो मे वर है-जा म्वय ही इस जगत् या आधार है उन आपके लिए
भावार है । तथा बारम्बार प्रणाम है जो मवसे पर तथा
पुण है-जो पुराण पुग्प और जगन्मय परमात्मा है-जो अदाय और
व्यथा से रहित है उमदव के लिये बारम्बार नमस्कार है ॥६०11 जो
अहा का स्वरूप धारण वरचे इम सृष्टि वो रचना रिया परत है और
जो विष्णु प बाप । इम जगत का परिपालन करते हैं तथा जो रह
के प महाक दम जगत् वा गहार किया परत है उग आपली संवा
मागवार मेरा प्रणिपात गमगित है ।।६१॥ यारणा पे भी पारण
रिप अमृत-शान और विभूति से प्राता, ममस्त अन्य लोवा को
मानदाता उन प्रभाग Arए वाल रात्पर बलि बारम्बार
गएर ॥२॥ जिगपा महान परज जगत महा जामा परता
अति है न मावा आपरेसिंग पार है ||६||
मगन्गी जन्म दथन ]
२८३
त्व पर परमात्मा च त्व विद्या विविधा हरे ।
शब्दब्रह्म परब्रह्म विचारणप रातपर ॥६४
पस्य नादिर्नमध्यन्च नान्तमस्ति जगत्पते ।
कय स्तोप्यामि त देव वामनोगोचराहि ॥६५
यस्य ब्रह्मादयो देवा मुनयश्च लपोधना ।
न विवृण्वन्ति रूपाणि वर्णनीय क्थ म मे ॥६६
स्त्रिया मया ते कि ज्ञेया निणस्य गुणा प्रभो ।
नैव जानन्ति यद्रुप मेन्द्रा अपि सुरासुरा ॥६७
नमस्तुभ्य जगन्नाथ नमस्तुभ्य तपोमय ।
प्रमोद भगवस्तुभ्य भूयोभूयो नमोनम ॥६८
अथ तस्या शरीरन्तु बरक्ताजिनसवृतम् ।
परिक्षीण जटाबात पविनमूनि गजिनम् ॥६६
हिमाणी तजिताम्भोजसदृशवदन नया ।
निरीक्ष्य कृपयाविष्टो हरि प्रोवाच तामिदम् ।।७०
आप पर परमात्मा हेहरे आप विविध विद्या है, आप
मान्द ब्रह्म, पर ब्रह्म और विचार में पर ने भो पर है ॥६॥ जिम
जगत् के पते पान तो आदि है-नमध्य है और न अन्त ही होता है
उन देव यो में किस प्रकार में नवन यरू जो देव वापी मन के गापर
गे भी बाहिर अाइ पर हैं ॥६॥ जिनके स्वरुपी वा ब्रह्मा आदि देव-
गण तपा तप के हो धन वाले मुनिगण भी विवरण नहीं किया करते हैं
उनरे रूप मेरे द्वारा किस प्रकार में वर्णन करने के योग्य हो सकते हैं ?
॥६६॥ उन निर्गुण प्रभु ने गुण मुय स्त्री जाति कली द्वारा से
जानने ये योग्य हो सकते हैं। जिन रयम्प मो
धादि
मृर
यमुर भी नही जानते है ॥६७! हे जगत् के नाप आपके लिए
गरम्पार है। हे ता से परिपूर्ण । आपो लिए TERT है। हे भग
बन्
जाप प्रगान होइए आपके लिए पारम्बार नमामार है ॥ ६ ॥
२६४ i पालिका पुराण माकण्डेय महपि न यहा--इसके अनन्तर उपका शरीर वल्लल और अजिन ( मृगचर्म ) स मवृत था तथा बहुत ही क्षीण और मस्तक पर पवित्र जटा-जूटो से राश्रित या अर्थात् परम शोभित था ॥६६॥ मादिनी मे सर्जित कमल के सदृश मुख का देखार भगवान् हरि कृपामे समाविष्ट होकर उस सध्या से यह वाले ॥७॥ प्रीतोऽस्मि तपसा भद्रे भवत्या परमेण वै। स्तवेन च शुभप्रशे वर वरय साम्प्रतम् ॥७१ येन ते विद्यते कार्य वरेणास्ति मनोगतम् । तत् करिष्यामि भद्रन्ते प्रसन्नोऽह तव व्रतं ॥७२ यदि देव प्रसन्नोऽसि तपसा मम साम्प्रतम् । वृतस्तदाय प्रथमो वरो मम विधीयताम् ।।७३ उत्पन्नमाना देवेश प्राणिनोऽस्मिन्नभस्तले । न भवन्तु क्रमेणव सकामा सम्भवन्तु वै ।।७४ पतिव्रताह लोक्षु त्रिप्वपि प्रथिता यथा । मविप्यामि तथा नान्या वर एको वृता मम ॥७५ सकामा मम दृष्टिस्तु कुत्रचिन्नपतिष्यति । ऋते पति जगन्नाथ सोऽपि मेऽति सुकृत्तर ॥७६ यो द्रक्ष्यति सकामो मा पुरुपस्तस्य पौरुपम् । नाश गमिप्यति तदा स त क्लीवी भविष्यति ।।७७ श्री भगवान न पहा-हे भद्रे । आपकी इस परम दारुण तप- श्चर्या से मैं अधिक प्रसन्न हो गया हूँ हे शुभ प्रज्ञावाती । मुझे आपकी स्तुति मे अधिक प्रसन्नता हुई है । अब आप मुझसे वरदान जो भी अभीष्ट उसे प्राप्त करलो ॥७१॥ जिस वर मे आपका मनोगत कार्य हो में उमको घर दूंगा-तुम्हारा प्रत्याण होवे-मैं तुम्हारे इन प्रतो से परम हर्षित हो गया हूँ ॥७२॥ सन्ध्या ने कहा-हे देव ! यदि आप मन पर परम प्रमन हैं और मेरी इस तपश्चर्या गे आपको आहाद हुआ
अल्धती जन्म पयन ]
है तो अब मैंने प्रथम वर वृन दिया है उमी यो आप मरने की कृपा
कीजिये ।।७३ । हे देवेश्वर । उत्पन्न मात्र ही प्राणी इस नभस्तल में
क्रम से हो सकाम न होवें वे मम्भव होवें ।।७४।। मैं तीना लोको म
परम पतिव्रता प्रथिन हो जाऊंगी जैसी कोई दूमरी न होवे । मैंन यह
एक वर वृत रिया है ।। ७५ ।। काम वामना स मयुत मेरी दृष्टि कही
पर भी न गिरेगी । हे जगत् के स्वामिन् । पति को छोडकर ही पर
मेरो साम दृष्टि नही होवे । यह भी मेरा परम मुद्रत होगा ।। ७६ ।।
जो भी कोई पुरुप कामवासना से युक्त हावर मुझे दये उसका पुरपरव
विनाश को प्राम हो जावेगा वोर वह बलीव अर्थात् नपु सर हा
जावेगा ।। ७७॥
प्रयम. शैशवो भाव कौमाराख्यो द्वितीयक ।
तृनीयो यौवनो भावश्चतुर्थों वाढेकस्तथा ।।७८
तृतीये त्वथ सम्प्राप्त वयोमागे शरीरिण. ।
मकामा. स्युद्वितीयान्ते भविष्यन्ति यवचित्र क्वचित् ।।
तपसा तव मर्यादा जगति स्थापिता मया ।
उत्पन्नमात्रा न यथा सफामा स्यु शरीरिण ८०
त्वन्च लाके सतीभाव तादृश समवाप्स्यसि ।
त्रिपु लोकपु नान्यग्या यादृश मम्भविष्यति ।।१
य पश्यति सयामरवा पाणिग्रहमृते तव ।
स सद्य क्लीवता प्राप्य दुवलत्या गतिप्यति ।।२
पतिस्तव महामागस्तपोम्पसमन्दिनः ।
सप्ताल्पान्जीवी च भविष्यनि मह त्वया ॥
इति येते वरा मत्त प्रार्थिताम्ते वृता गया।
अन्यच्च ते यदिप्यामि पूर्व यन्मनगि पिम् ।।८४
यो भागन ने पहा-प्रथम तो भंगव भाव ना करता है और
गरा गोमार माग थाना भाव होता है-तोरा पोरन का भाव ।
२८६ [ कालिदा पुराण और चतुर्थ वाद्धं क भाव होता है। तीसरे भाव अर्थात् योवन के भाव को सम्प्रास हो जाने पर जो एक शरीर धारी की अवस्था या भाग है मनुष्य उसमे ही काम वासना से समन्वित हुआ करते है । कही-वही पर द्वितीय भाव के अन्त में भी हो जाते है ।।७।। मैंने आरके तप से जगन् में मर्यादा स्थापित कर दी है कि उत्पन्न होते ही शरीरधारी मकाम नहीं होगे ||८०11 और आप लो लोक मे उम प्रकार का भाव प्राप्त करे गी कि तीनो लोको मे अन्य रिसी का भी ऐमा भाव नहीं होगा ।।८१॥ जो भी कोई विना आपके पाणिग्रहण के किये हुए काम- धासना से युक्त होकर आपको देखेगा वह तुरन्त हो क्लीनता अर्थात नपु सक्ता को प्राप्त कर अतीव दुर्बलता वो फलेगा 11८२|| आपका पति तो बहुत बड़े भाग्य वाला होगा जो सुन्दर स्प लादण्य से और तप से समन्वित होगा । वह आपके हो साथ रहकर सात कल्पी के अन्त पर्यन्त जीवन के धारण करने वाला होगा ।। ८३ ।। ये जो भी वरदान आपने मुझम प्रापित किये थ व सब मैंन पूर्ण कर दिये है । और अन्य भी मैं आपको बतलाऊँगा जो कि पूर्व में आपके मन में स्थित था ॥४॥ अग्नी शरीरत्यागस्ते पूर्वमेव प्रतिश्रुत । स च मेपातिथेयने मुनेदशवापि ॥८५ हुत प्रज्वलिते वह्नौ न चिरान कियता त्वया । एतच्छलोपत्यकामा चन्द्रभागानदीत ॥८६ मेपातिथिमहायज पुमते तापसाश्रमे ॥८७ तत्र गत्वा स्वय छन्ना नुनिभिनोपलक्षिता । मत्प्रसादाहिनजाता नाय पुत्रो भविष्यमि ।।८ पररवया वाञ्छनीयोम्ति रवामी मतियश्चन। सनिधाय निजम्यान्ते त्यग यो यपु स्वयम् ।। यदा त्वं सरोगसम्बरगि पर्वते । 1 अन्यती जन्म-क्यन २८७ यावच्चतुर्युग तस्य व्यतीते तु कते युगे ॥६० प्रताया प्रथमे भागे जाता दक्षस्य कन्यका । स ददौ कन्यका सप्तविंशतिञ्च सुधाशवे ।।६१ जापन पूर्व में ही अग्नि में अपने शरीर के परित्याग करने की प्रतिज्ञा को थी वह प्रतिज्ञा वारह वर्ष तर होन वाले मुनिबर मेघातिथि के यज्ञ में की थी । हुत से प्रज्वलित अग्नि म शीघ्र ही आप करें। इम पर्वन की उपत्यकामचन्द्र भागा नदी के तट पर तापसो के आश्रम में मेधा तिथि महा यज्ञ कर रहे हैं ।।८। वहाँ पर जाकर स्वप छन होती हुई जिसको मुनियों ने भी रही दखा है, मेरे प्रसाद स वह्नि से जाल आप उसकी पुत्री हागी ॥८॥ जा भी अपन मन के द्वारा अपन मन के द्वारा अपने पति होने की थी वह जा भी कोई हो उसको अपन मन में धारण करके अपने शरीर का त्याग वहिन में कर दो ॥८६॥ हे सन्ध्ये ! जय माप इस परम दारण पर्वत म तपश्चर्या कर रही हो उस तप का करते हुए चारो युग व्यतीत हो गए हैं तथा कृतयुग के व्यतीत होने पर प्रेता के प्रथम भाग में दक्षी उत्पन्न हुई पी। उस प्रमापति दक्ष ने मत्ताईस अपनी क्न्यानो को चन्द्रदेव के लिए दे दिया था ॥६॥३१॥ तासा हेतोयंदा शप्तश्चन्द्रो दक्षण कोपिना । तदा भवत्या निकट सर्व देवा ममागता ॥२ न दृष्टाश्च तया सन्ध्ये देवाश्च ब्रह्मणा मह । मयि विन्यस्तमनसा त्वञ्च दृष्टा न तं पुन ॥६३ चन्द्रस्य श.पमोक्षार्थ चन्द्रभागा नदी यथा । सृष्टा धात्रा तदंवाव मेधातिधिरपम्पिनः ॥६४ तपसा तत्समो नास्ति न भूतो न भविष्यति । तेन यन. ममारब्धी ज्योतिष्टोमो महाविधि 11६५ तन प्रज्वलितो वाहनस्तस्मिस्त्यज वपु स्वयम् ॥६६
२८८
[ पालिका पुराण
एतन्मया स्थापित ते कार्यार्थ भोस्तपस्विनि।
तत् कुरुष्व महाभाग याहि यज्ञ महामुने ।।६७
उन कन्याओं के लिए जिस समय मे क्रोधयुक्त दक्ष के द्वारा चन्द्र
देव को शाप दिया गया था उम समय में आपके समीप में सभी देवगण
समागत हुए थे 11६२॥ हे साध्य । उमषे द्वारा ब्रह्मा के साथ देवगण
नही देखे गये थे। क्याकि आपने मुझ मे ही अपना मन लगा रक्खा था
अत आपभी उनके द्वारा नहीं देखी गयी थी ४६३|| चन्द्रदेव का दिए
हुए शाप के छुटकारे के लिए जिम प्रकार से विधाता ने चन्द्रभागा नदी
की रचना की थी उसी समय मे यहाँ पर मेधा तिथ उपस्थित हो गया
था ।।६४॥ तप से उसके समान कोई भी अन्य नहीं है और न अब तक
कोई हुआ ही है तथा भावप्य मे भी कोई ऐसा तपस्वी नहीं होगा।
उस मेधा तिथि न महान विधि वाला ज्योतिष्टोम नामक यज्ञश
आरम्भ किया था ।। ६५ ।। वहाँ पर जो वहित प्रज्वलित है उसी में
अपन शरीर का त्याग करो।। ६६॥
तपास्वनि । यह मैंने तुम्हारे
ही काय के सम्पादन करन क लिय स्थापित किया है । हे महाभागे !
आप वह करिए और उस महामुनि व यज्ञ भ गमन करिए ।६७।
नारायण स्वय सन्ध्या पस्पर्शायाग्रपाणिना ।
तन पुरोडाशमय तच्छरीरमभूत क्षणात् ।।६८
महामुनेमहायज्ञ तस्मिन् विश्वापकारिणि ।
नाग्नि कच्यादता याति त्वतदय तथा कृतम् ॥६६
एवं कृत्वा जगन्नाथस्तवान्तरधीयत ।
सन्ध्याप्यगच्छत्तत्सम यम मधातिथिमुनि ॥१००
अथ विष्णो प्रसादन वनाप्यनुपलक्षिता।
प्रविवेश यदा या सन्ध्या मधातियमुन ॥१०१
वसिष्ठन पुरा सा तुवर्णाभूत्वा तपस्विनी ।
उपदिष्टा तपश्चर्तुं वचनात् परमप्टिन ।।१०२
।
२६०
[ कालिका पुराण
सर्यो द्विधा विभज्याथ तच्छरीर तदा रथे ।
स्वके सस्थापयामास प्रीतये पितृदेवयो ॥१०७
यदूधभागस्तम्यास्तु शरीरस्य द्विजोत्तमा ।
प्रात सन्ध्याभवन सा तु अहोरात्रादिमध्यगा ।।१०८
यच्छेपभागस्तस्यास्तु अहोरात्रान्तमध्यगा।
मा सायमभवत् मन्ध्या पितृप्रीतिप्रदा सदा ॥१०६
सूर्योदयात्तु प्रयम यदा स्यादरुणोदय ।
प्रात सध्या तदादेति देवाना प्रीतिकारिणी ॥११०
अस्त गते तत सूर्ये शोणपद्मनिभा सदा ।
उदेति मायसन्ध्यापि पितृणा मोदकारिणी ॥१११
तस्या प्राणास्तु मनसा विष्णुणा प्रभविष्णुणा।
दिव्येन तु शरीरेण चक्रिरेऽथ शरीरिण ॥११२
वह्नि ने उसके शरीर का दाह करके पुन भगवान विष्णु की
ही आज्ञा से शुद्ध को सूर्य मण्डर म प्रविष्ट कर दिया कर दिया
था ॥१०६॥ सूर्य का दो भागो विभाग करके उसके शरीर को उस
गमय में रथ मजा अपत्रा था पितृगण और देतो पी प्रीति के लिये
सस्थापित कर दिया था ॥ १०७ ॥ उसका अध भाग हे द्विजोत्तमो!
अर्थात् उसके शरीरमा आधा हिस्सा प्रात सन्ध्या होगई थी जो अहोरात्र
आदि ये मध्य म रहन वाली थी ॥१०॥ उसका शेष भाग था ओ
अहोरात्रात व मध्य म रहन वाली थी वह साय सध्या हो गयी थो
जा सदा ही रिगणा को प्रीति वा प्रदान करने वाली थी ।।१०।।
गूयोदय मे प्रथम को अरण पा उदय जिस समय म होता है प्रात गमा
उगी ममय म उदित हुआ करती है जा दवगणों को प्रीति यो परन
वाली है ।।११०।। गूर्य देव के अस्ताचर गामी होन पर गोण (रस)
पदम रे गटग शाती है वह माप गप्या भी गदित मा परती है जो
पितृगला व गोरप परन वाली हमाराती है ॥१११॥ उगरे प्राणी
ममतो जन्म कपन ] २८१ को प्रभ विष्णु भगवान् विष्णु के द्वारा शरोरी के दिव्य शरीर से हो विये थे ।। ११२॥ मुनेत्रावसाने तु सम्प्राप्ते मुनिना तु सा । प्राप्ता पुत्री वह्निमध्ये तप्तकाश्चन सप्रभा ॥११३ तो जग्राह तदा पुत्री मुनिरामोदसंयुत. । यज्ञार्थतीयः सस्नाप्य निजकोडे कृपायुत. ॥११४ अरुन्धतीति तस्यास्तु नाम पर महामुनि । शिप्य. परिवृतस्तत्र महामोदमवाप च ॥११५ न रणदि यतो धर्म सा केनापि च कारणात् । अतस्थिलोकविदितं नाम सा प्राप सान्वयम् ॥११६ यशं समाप्य स मुनिः कृतकृत्यमाप- मागाय सम्पदयुतस्तनयालम्भात् । सस्मिन् निजाश्रमपदे सहशिष्यवर्ग- स्तामेव रान्ततमसो दयते महपि. ॥११७ महामुनि के पास के अवगान के अवसर 2 मास हो जाने पर मुनि के द्वारा तपे हुए सुवर्ण को प्रभा के तुल्य पुत्री बहिन के मध्य में प्राप्त हुई यी ॥११॥ उग समय में उन पुनो को मुनि ने बामोर मे समन्वित होय र ग्रहण कर सपा था। उस पुत्री को यहाथ जल री मनपन व राकर पा से युत होते हुए अपनी गोद में रक्या पा। और उगमा नाम भरघो-यह महामुनि नै रपया था। वे गियो मे परि- गृत होते हुए वहाँ पर महान मोर को प्राप्त हुए थे ॥११४-~-११५॥ सि पिगी भी कारण से धर्म या रोध नहीं करती पौ बाएष रिलोको में दिदित मान्यय नाम उसने प्रास रिमा पा भाद यह भेगा पानी पीना ही अन्न नाम यो प्राति उगने की पौ ॥११६॥ जग मुनि ने यो गमावसे तय भार मां प्राप्त पिया पा और धनवा के प्रनम्म में थे गम्मद नए । उम माने आश्रम के
[ कालिका पुराण
२६२
स्थान मे अपने शिष्य वर्गों के सहित यह महर्षि उसी अपनी तनया
को प्यार किया करते थे। और निरन्तर उसी को प्रिय बना लिया
था।११७)
॥ वसिष्ठ-अरुन्धती विवाह ॥
अथ सा ववधे देवो तस्मिन् मुनिवराश्रमे ।
च'द्रभागानदीतीरे तापसारण्यसज्ञके ॥१
यथा चन्द्रकला शुक्लपक्षे नित्यं विवर्धते ।
यथा ज्योत्स्ना तथा सापि द्राप वृद्धिमरुन्धती ॥२
सप्राप्ते पञ्चमे वर्षे चन्द्रभाई तदा गुण ।
तापमारण्यमपि सा पवित्रमकरोत् सती ॥३
तत्र तीर्थ महापुण्य मेधातिथिनिपेदितम् ।
श्रीडास्थाउमरन्धत्या पूत वाल्योचित कृतम् ॥४
अद्यादि तापसारण्ये चन्द्रभागानदीजले ।
अरुन्धतीतीर्थतोये स्नात्वा याति हरि नरः ॥५
कार्तिक सफल मास चन्द्रभागानदीजले ।
स्नात्वा विष्णुगृह गत्वा ह्यन्ते मोक्षमवाप्नुयात् ॥६
माधे मागि पौर्णमाम्याममाया वा तथैव च ।
चन्द्रभागागले स्नान यस्तु पुर्यात् मकृत् सत् ।।
मार्गण्डेप महर्षि ने महा-गवे मनन्तर वह देवी उन मुनियर
घे आश्रम में यड़ी हो गयी थी जो रिदमागा नदी के तट पर ताप
मार नाग याला पा ॥१॥ जिग प्रसार में पद्रमा यी वसा शुरु
पक्ष मनिष ही प्रतिभा परती है जो ज्योरगा यदा मरती है उसी
भांति यह अपनी भी वृद्धिको प्राप्त हुई थी ॥२॥ उग गमय
में
- अमिष्ठ-अरन्धती विवाह ] पांचवां वर्ष के मम्प्राप्त होने पर गुण गणो के द्वारा उन सती चन्द्रभागा ने भी उग ताप मारण्य को भी परम पवित्र कर दिया था ॥३।। वहाँ पर मेधातिथि द्वारा निषेवित महा पुण्य वाला तीर्थ था जो अरुन्धती को क्रीडा का स्थान था और उस आन्धती ने वाल्योचित कृत मे पूत किया या ॥४॥ आज भी ताप सारण्य में चन्द्रभागा नदी के जल में मनुष्य 'अल्पती तीर्थ के जल में स्नान करके अन्न महरि की प्राप्ति किया करता है ॥५॥ कात्तिक के पूरे माम मे चन्द्रभागा नदी के जल में स्नान परके विष्णु भगवान के लोक में प्राप्त होगर अन्त मे मोदा की प्राप्ति पिया करता है ॥६॥ माय मास में पौर्ण मामी में अथवा अमावास्या में उमी भांति चन्द्र भागा के जल मे जो स्नान करता है और एक-एक पार ही किया करता है ॥७॥ तस्य वशे राजयक्षमा न कदाचिद् भविष्यति । देहान्ते चन्द्रभवन गत्वा याति हरेराहम् 15 पुण्यक्षयादिहागत्य वेदज्ञो ब्राह्मणो भवेत् । चन्द्रभागाजल पीत्वा चन्द्रलोकमवाप्नुयात् ॥६ यकृत् स्नात्वा तु विधिवद्वाजिमेधायुत लभेत् ॥१० चन्द्रभागागले स्नात्वा नीडन्ती वाल्यलीलया। पितुः समीपे तत्तीरे कदाचितामरुन्धतीम् । गच्छन्नाकाशमागंण ददर्श मलासन ॥११ अथावतीयं भगवान् ब्रह्मा लोकपितामह । जरुन्धत्यास्तदा कालमुपदेशे नदर्श ह ॥१२ अयोवाच तदा ब्रह्मा मुनिभिः परिपूजितः । मेधातिथिप्रभृतिभिरुचितं तं नहामुनिम् ।।१३ उम पुरुष के वंश में रार यक्ष्मा या महा रोग कभी भी नहीं होगा। देह वे यन्त में वह पुरष चन्द्र भवन को जापर फिर वह भगवान हरि यो लोक में चला जाया करता है । ५। जद पुष्य वा क्षय हो जाना [ पालिका पुराण है तब भी यहाँ ममर में आकर अर्थात् पुन जन्म ग्रहण करके वेदो का ज्ञाता ब्राह्मण होता है। चन्द्र भागा नदी का जल पीकर वह मनुष्य चन्द्र लोक को प्राप्त किया करता है 10 विधि के साथ एक बार स्नान करके अयुत ( दश हजार ) वाजिमेध यज्ञ के पुण्य को प्राप्त किया करता है ॥१०॥ चन्द्रमामा के जल मे स्नान करके वाल्य लीला से क्रीडा करती हुई - पिता के समीप मे उसके तट पर किसी समय में उस अरुन्धती को आकाश माग से जाते हुये ब्रह्माजी ने देखा था ॥१२॥ इसके अनन्तर लोकों के पितामह ब्रह्माजी ने अरुन्धती को उस काल में उपदेश म देखा था ।१२। इसके उपरान्त उस समय में मुनियों के द्वरा परिपूजित जो कि मेधातिथि आदि थे ब्रह्माजी में उन महामनि से समु. चित कहा था ॥१३॥ उपदेशस्य कालोऽयमझन्धत्या महामुने । तस्मादेना सतीनान्तु स्त्रीणा व कुरु सन्निधिम् ।।१४ स्त्रिभिस्त्रियश्चोपदेश्या काचिदन्यन विद्यते । वहुलायाश्च साविन्या पुत्री त्व स्थापयान्तिके ॥१५ तयो ससर्गमासाद्य पुत्री तव महामुने । महागुणश्चर्पयुता मा चिरात तु भविष्यति ॥१६ मेधातिथिर्वच श्रुत्वा ब्रह्मण परमात्मन । एवमैपेति प्रोवाच त तदा मुनिसतम ॥१७ ततो गते सुरश्रेप्ठे पत्री मेधातिथिमुनि । समादाय ययौ सूर्यभवन प्रति तत्क्षणात् ॥१८ ददर्श तत्र सावित्री सूर्यमण्डलमध्यगाम् । पद्मासनगता देवीमक्षमालाधरा सिताम् ।।१६ दृष्टा मा तेन मुनिना नि सृत्य रविमण्डलात् । बहुला सा गता तूर्ण प्रस्थ मानसभूभृत ॥२० प्रयह सत्र सावित्री गायत्री यहुला तथा।
यमिष्ठ-अरुन्धती विवाह } सरस्वती च द्रुपदा पञ्चैता मानसाचने ॥२१ ब्रह्माजी ने कहा-हे महामन । यह अपती के उपदेश का माल है । इस कारण से इसको मती स्त्रियों के मध्य में सन्निधि वाली करो। १४ । तीनों के द्वारा निशे को उगवेग देना चाहिए। कोई अन्य स्थान म विद्यमान है । बहुला और सावित्री के ममीप मे आप पुत्री को स्थापित करिये । १५ । हे महामुने । आपकी पुनी उन दोनों का नमर्ग प्राप्त करके महान गुण गण और ऐश्चर्य से सयुक्त शीघ्र ही हो जायगी ॥१६॥ परमात्मा ब्रह्माजी क बचन का श्रवण करके मेधा- तिथि ने उस ममा म ऐमा ही होगा- यह मुनि येप्ट ने कहा था । 1१७ ! इसके असर सुर श्रेड के नरे जाने पर मेधातिथि मुनि अपनी पुत्री को लेकर उमी क्षण म मूर्य भवन के प्रति गमन किया था। वहाँ पर मूर्य मण्डर के मध्य में विरारमान मावित्री को देखा था। जो कि पद्म के आमन पर मम्यित थी और यह देयो अक्षो की माला का धारण करने वाली एव सिनवर्ण वाली थी 11211 राव के मण्डल में निवन कर उगन मे द्वारा वह देखी गयी थी। वह बहुला शीघ्र ही मानस पर्वत के प्रस्थ पर चली गयी थी ।२०। वहां पर प्रतिदिन सावित्री-~वायत्री नमा बहुला- सरस्वती और द्रुपदर में पांचो मानस बनल पर थी ॥२१॥ धर्माख्यानस्तथा साध्वीः कथा. कृत्वा परस्परम् । स्व ख स्थान पुनर्याति लोकाना हितकाम्यया ॥२२ मेधातिथिस्तु ता सर्वा दृष्ट्वं कन तपोधन । मातृ. सर्वस्य लोकम्य प्रणनाम पृथक पृथक् ।।२३ जवाच च स ता सर्वा ऋपि श्लक्ष्ण तपोधन । ससाध्वसो विस्मितश्च तासामेक्न दर्शनात् ।।२४ मात. सावित्रि बहुले मत्पुत्रीय महायशा । कालोऽयमुपदेशेऽस्यास्यास्तदर्णमहमागत ॥२५ [ बालिका पुराण जग सप्ट्रा समादिष्टा प्रयातु तव शिप्यताम् । एपा तेन भवनपावमानीता पुत्रिका मम ॥२६ सौचारित्र्य यथास्या रयात्तथैना वालिमा मम । युवा विनयत देव्यो मातर्मातर्नमोऽस्तु वाम् ।।२७ अथोदाच तदा देवी मावित्री मनिसत्तमम् । स्मितपूर्व बहुलया सहिता ताञ्च वालिकाम् ॥२८ वहाँ पर लोगो की हित --कामना से परस्पर मे धर्माख्याओं के द्वारा साध्वी क्याओं को रहकर फिर अपने-अपने स्थान को चली जाया करती थी। २२ । तप ही जिनका धन था ऐमे परम तपस्वी मेधा तिथि ने उन सबको एक ही स्थान में देखकर कहा था-है माता ! आप तो समस्त लोको की माता हैं मैं आपको पृथक् पृथक् प्रणाम समर्पित करता हू । २३ । उस तपोधन ऋपि ने उन सबमें परम लक्षण वचन कहा था। और वह उन सवयो एक ही स्थान में सम्मिलित हुई यों का दर्शन करके बहुत ही भयभीत और विस्मित हुआ था। । २४ । मेधा निथि ने कहा- हे माता म विनि हे माता बहुले ! यह मेरी महान् यश वानी पुत्री है। अब इसके उपदेश करने का काल आगया है। उसी के लिये मैं यहाँ पर गमागत हुआ हूँ । २५ । यह- जगत् वे मृजन करने वाले के द्वारा आज्ञा प्राप्त बरने वाली हुई है कि यह अपनी शिष्यता को प्रात परे अर्थात् आपरी शिष्य हो जाये । इसी पारश मे पह मेरी पुत्री आपके समीप म लायी गई है । २६ । जिस प्रकार से इमयी सुचरित्रता होवे उसी प्रकार से इस मेरी पलिवा वा आप दोनो देवियां बना देवें । है माताओ । जाप दोगो के लिये मेरा प्रणाम अपित है ॥२७॥ इसके उपरान्त उस समय में देवी सावित्री मन्द मुस्कराहट के माथ बहला वे साहत उस मुनियो मे थेठ में कहा था और उग वालिवा से भी यहा था ॥२८॥ ग्रह्मन् विष्णो. प्रमादेन सुचरित्रा भवत् मुता।
पनि अरमधनी विदाह ]
पुन ॥२६
पूर्वमेव मुने भूता तदुद्देशेन वि
कि वह ब्रह्मवाक्येण बहुला च महासती ।
दिनप्यावस्तव सुता धीरा स्यान्नचिगद यथा ॥३०
ग्रह्मण पृर्वहिता भवतस्तु तपोवलात् !
तथा विष्णो प्रमादेन मुता तेऽभूदरुन्धती ॥३१
कुल पुनाति भवत सत्यसो वधंपियति ।
लोकानामथ देवाना शिवमेषा करिप्यति ॥३२
अथ नाभिविसृष्ट ग मुनिभधातिथि मुताम् ।
आश्वास्यासन्धती नत्या ना स्वस्थान जगाम है ।।३३
गते तस्मिन मुनिवरे सह ताभ्यामरन्धती।
मातृभ्यामिव निर्भीता पालिता मोदमाप सा ॥३४
कदाचित् मह साविन्या रागों याति वेहम् ।
तथा बहुलया वाति शमगेह कदाचन ॥३५
उन दातो दवयो न कहा ह ब्रह्मन् । भगवान् विष्णु के
प्रमाद ने आपण पुनी वहन ही नग्नि दाली है । हे गुने
यह तो
पहिले हो ऐमी मुयोग्य हुई है फिर इसका उपदश द स क्या लाभ है ।
तात्पर्य यही है कि जो यह आपकी पुत्री पहिले ही स परम योग्या है
तो फिर इसको उपदेश देने की बाई भी आवश्यकता ही नहीं है ।०३।
किन मैं और महा मनी बहला ब्रह्म वाक्य के होने से आपकी धैर्य
वाली भुता को बिनीत बनायेंगो अर्थात यदुपदेशो के द्वारा परम विनीत
ऐसे ढङ्गम कर देगी कि उमम विशेप बिनम्य नहीं होगा ॥३०॥ यह
पहिले ब्रह्माजी की पुत्री थी आपके तपा बल व कारण स तथा भगवान्
विष्णु के प्रमाद से यह अरुन्धती आपली मुता हुई है ॥३१॥ यह सती
आपके को पवित्र करती है और उसकी वृद्धि भी करेगी। यह लोको
का और देवा का क्ल्याप तरी करेगी । ३२ । मार्कण्डेय मुनि न कहा-~~
इस पर वह मेघा तिमि मुनि उनके द्वारा दिदा किया हुआ होकर
२६८
[लिका पुगत
उसने अपनी पुत्री आन्धती को आश्वासन दिया था। और फिर उनको
प्रणाम करये यह अपने आश्रम पो धमे गये थे।३१। उन मुनिवर ये
चले जाने पर अगन्धती उन दोनोरे गाय माताओं पीही भांति निडर
पाली गयी थी और उसने भी आनन्द प्राप्त किया था । ३४ किमी
समय म रात्रि म मावित्री के साथ यह-रविदेव के गृह यो जाया
परती थी। और विमी समय में बहुत्य थे गाय इन्द्रदेव ये पर मे जाती
थी ।।३५॥
एव ताम्या सम देवी विहरन्ती सुरालये।
निनाय दिव्यमानेन सा मप्त परिवतमरान् ॥३६
ताभ्या तथोपविष्टा सा खीधर्ममचिरात सती ।
सर्व ज्ञातवती भृता मावित्री बहुलाधिका ॥३७
अथ तस्यास्तदा वाले सम्प्राप्त उचितेऽभवत् ।
शोभनो योवनोभेद पद्मिनीना रुचिर्यथा ॥३८
उदभूतयौवना सा तु वसिष्ठ मानसाचले।
विहरन्ती ददर्शका चारुतेजस्विन मुनिम् ॥३६
दृष्ट्वा तमिच्छयाञ्चक कामभावेन सा सती।
बालसूर्यप्रभ चारुरूप ब्रह्मथिया युतम् ।।४०
अथ सोऽपि महातेजा वसिष्ठो वरवणिनीम् ।
दृप्टैवोद्भूतमदनो वीक्षाञ्चने त्वरुन्धतीम् ।।४१
तयो परस्पर दृष्ट्वा ववृधे हृच्छयो महान् ।
अमर्याद द्विजथे प्ठा प्राकृते मदनो यथा ॥४२
इसी रीति से वह देव उन दोगे के माथ
सुरा
के आलय में
अर्थात् स्वर्ग लोव मे विहार करती उसने दिव्यमान से अर्थात् देवो की
गणता के हिसाब से सात परिवत्सर व्यतीत कर थे ॥३६11 उन
दोनो के साथ ये वैठी हुई उस सती ने शीघ्र ही स्त्री के धर्म सम्पूर्ण को
जान गयी थी अर्थात् स्त्रिया का पूरा धर्म या ज्ञान उसने प्राप्त कर
पसिष्ठ-अस्पती विवाह ] लिया था। और यह सावित्री तथा बहला भी अधिक ज्ञान क्ती हो गयी थी । ३७ । इसके अनन्नर उमको उस समय में यमुचित काल के सम्प्राप्त होन पर यौवन का ढेह हो गया था जानु यौवनावस्या के चिह्न प्राट होगी थे जिन प्रकार में पदिमनीयो की रचि हुआ करती है ५३८॥ उद्मन योवन वाली उसने मानस अदलम विहार करती हुई ने अकेली ही ने सुन्दर तेज वाले वसिष्ठ मुनि को देखा था 13an उस मती ने उस समय म उन मुनि का अवलोकन करके काम वासना की भावना से वाल मूर्य के तुल्य प्रभा दाले-नुन्दरतम रूप मे नयुन ब्राह्मण पोथी में समन्वित उमको इश की थी अर्थाद उसे प्राप्त करने की सालसा उसा होगई थी ॥॥४०॥ इमने उपरान महान् तेज बाले उन वसिष्ठ मुनि ने भी उम वर वणिनी का अवलोकन कर उन काम वाला होते हुए उम पन्धती को देखा था ॥४१॥ है हिज यलो। इस ऐति में परम्पर म एक दसरे का अपलोन करके महान काम की वृद्धि हो गयी थी जिस तरह म किसी प्रात अर्यात साधारण व्यक्ति को बिना ही मर्यादा र कामदेव समुत्पन्न हो जाया करता है। तात्पय यह है कि सामान्य जन को ही भाँनि काम वासना उद्भूत हो गई थी ॥४२॥ अथ धैर्य समालम्व्य तथा मेधातिथे मुता। आत्मान धारयामान मन मदनेरितम् ॥४३ वसिष्ठोऽपि महातेजा घेर्यमालम्ब्य चात्मन । मन सस्तम्भयामास मदनोन्मत तत ॥४४ अरुन्धती तती देवो विहाय मुनिसन्निधिम् । जगाम यत्र सावित्री निन्दन्ती स्व मनोथरम, ॥४५ वाध्यमानातिदुखेन मानसेन महासतो। सतीभाव परित्यक्तश्चिन्तयन्तो मयेति वै ४६ तल्या मनोगदु उन विवर्णमभवन्मुखम् ।
[ वालिया पुराण शरीर मबल म्लान गतिश्च वलिताभवत् ॥४७ इद विममृपे साच गर्हयन्ती स्वक मन । मृणालतन्तुवन् सक्ष्मा छिन्ना व तरक्षणादपि ॥४८ स्थिति सतीनामस्पेन चापल्येनैव नश्यति । इति स्त्रीधर्ममध्याप्य मामाह चरितव्रता ॥४६ इसके अनन्तर उस प्रकार स उस मेधा तिथि को पुत्री ने धीरज का आलम्बन लिया था और अपनी आत्मा को तथा मदन ( कामदेव ) से प्रेरित मन को धारण किया था अर्थात् अपने आपके मन को सयत रक्खा था ॥ ४३ ॥ महातेजस्वी वमिष्ठ मुनि ने भी अपनी आत्मा में धैर्य रखकर कामवासना से उन्नथित मन को स्तम्भित किया था ।४४॥ इसमे अनन्तर देवी अरुन्धती न मुनि की सन्निधि का त्याग करके अपने मनोरथ की बुराई करती हुई जहा पर सावित्री थी वहाँ पर ही वह चली गयी थी ॥४५॥ वह महा सनी मानम दुख की अधिकता से वाध्यमाना होती हुई मैंने सती भाव का परित्याग कर दिया है-यही वह चिन्तन पर रही थी ।।१६।। उमका वाम वासना के द्वाग समुत्पन्न दुख मे मुख कान्तिहीन हो गया था-- उनका मम्पूर्ण शरीर भी म्लान हो गया था और गति भी मकिन हो गयी थी ।। ४७॥ और उमने यह विचार किया था और अपन मन की गहणा ( बुराई ) करती थी कि यह मनकी वृत्ति गणरव तन्नु के ही समान परम भूक्ष्म है और उस क्षण म छिन्न हो जाया करती है ।। ४८ । मतियो की स्थिति जतान्त अल्प चपलता मे ही विनष्ट हो जाया नती है। यही गती में धर्म पो पढाकर मुग चरित व्रत दातो सावित्री ने कहा था ॥४६॥ मादित्री मारमेतद् हि मतीधर्मस्य चोवृतम, तदद्य नाशित पुसि परवीय मनोरयम ॥५० वद्ध यन्त्या तदा कि मे परग्रह भविष्यति । इति मञ्चिन्तयन्तो मा पुत्री मेधातियेस्तदा ॥५१ -- वसिष्ठ-अल्धती विवाह ] दुःखार्ता बहुला देवी सावित्री चाससाद है। तथाविधान्तु ता दृष्ट्वा विवर्णवदना गतीम् ॥५२ ध्यानचिन्तापरा भूषा मावित्री विममर्प है। विमृप्य दिव्यज्ञानेन सर्व ज्ञातवती सती ॥५३ वसिष्ठेन वहन्धत्या ययाभूदर्शन तथा । यथा तयोः सम्प्रवृद्धो मनोजशातिदुःराह. ॥५४ मुखवैवर्यहेतुश्च सावित्री दिव्यदशिनो। अथ मेधातिय. पुत्र्या मूनि हस्त निवेश्य सा ॥५५ इदमाह महादेवी सावित्री चरितव्रता । पासे तब सुख कस्माभिन्नवर्णमभूदिदम् ।।५६ सावित्री देवी ने रनी धर्म को यह सार उद्भुत किया था अर्याद मुझे वनलाया था वह आज परकीय पुरप में मनोरथ ने नष्ट कर दिया है। तात्पर्य यह है कि दूसरे पुरुष मे यम के जाने ही से वह नष्ट हो गया है ।। ५० ॥ उस समय उम मेधा तिथि की पुत्री अरुन्धती क्या यहाँ पर पराए में मेरा मन होगा-इसी विचार को बढाते हुए, यही वह चिन्तन कर रही थी ।। ५१॥ दु.ख रो आर्त वह पहला और सावित्री देवी के समीप पहुँच गयी थी। उस प्रकार से परम चिन्तित होती हुई कान्तिहीन मुख वाली उम सती को देखकर ध्यान के चिन्तन में परायण होकर सावित्री ने विचार किया था और दिव्य ज्ञात के द्वारा विचार करती हुई उस सती को पूरा ज्ञान हो गया ॥ ५३ ।। जिस प्रकार से वसिष्ठ मुनि के साथ महन्धती का अवलोकन हुआ था और असा उन दोनों मे अत्यन्त दुसह काम वासना प्रवृद्ध हई यौ ॥ ५४ ।। दिव्य दर्शन करने वाली सावित्री ने अरुन्धती के मुख की कान्ति की हीनता का हेतु भी जान लिया था। इसके अनन्तर उस मावित्री मै मेधा तिथि की पुत्री के मस्तक पर हाथ रखकर उस महादेवी ने जी वरित व्रत गली माविनी पी यही कहा था- हे वेटो ! विस कारण में तुम्हारा मुष भिन्न वर्ण वाला हो गया है ? ॥५५---५६।।
३०२
[ वालिका पुराण
छिन्ननाल यथापय सूर्याशुपरितापितम् ।
कथ शरीरमभवत् म्लान ते गुणवत्तमे ॥५७
यथा निशापतेविम्व तनुकृष्णाभ्रसवम् ।
अन्तर्मनश्च ते भद्रे सचिन्तमिव लक्ष्यते ।
तन्मे कथय ते गुह्य नंतच्चेदु स्वकारणम् ॥५८
अथ साधोमुखी भूत्वा विचिन्नोवाच लज्जया ।
सावित्री मातर गुरू तथा पृष्टाप्यरुन्धती ॥५६
यदा मोक्तवती किचित्तदा मेधातिथे सुता।
स्वय प्रकाश्य सावित्री तामुवाच तपस्विनी ॥६०
वत्से योऽसौ त्वया दृष्टो मुनिर्भास्करसन्निभ ।
स वसिष्ठो ब्रह्मसुतस्तव स्वामी भविष्यति ।
तव तस्य च दाम्पत्य पुरा धात्रव निर्मितम् ॥६१
अतस्तव सतीभावो न हीनस्तस्य दर्शनान् ।
यद्वा तवाभूदृदय सकाम नस्य दर्शनात् ।।६२
न तद्दोषकर पुति मनोदुख ततस्त्यज ।
त्वया पर तप कृत्वा पूर्वजन्मनि शोभने ॥६३
वृत स एव दयित सकामस्तेन स त्वयि ।
शृणु पूर्व त्वया वत्से वसिष्ठोऽय वृत. पति ।
यया तप कृत तत्र येन भावेन सन्ततम् १६४
है गुणवत्तमे । जिस प्रकार से नाल के छिन्न होने वाला पद्म
जो मूर्य के ताप मे नापित हुआ होता है उसी भांति तेरा शरीर कैसे
म्लान हो गया है ।। ५७ ॥ जिम तरह से चन्द्र का विम्ब छोटे से काले
बादल के द्वारा मवृत होकर मलिन हो जाया करता है वैसे ही तुम्हारा
मुष हो गया है । हे भौ । तुम्हारा मन या आतरिक भाव भी चिन्ता
युक्त गेमा लक्षित हो रहा है । इसलिये तुम मुझे जो भी गोपनीय
हम्प की बात हो और जो भी दम दुख का कारण हो उसे बतलायो।
मे
वसिह जम्न्धनो विवाह ] ॥६॥ माकण्डेय मुनि न कहा-सा अनन्नर वह नीचे की आर मुख बालो हार लग्जा स कुछ भी नहीं वाली थी जबकि बडा माना मावित्री के द्वारा वह पूक्षी भी गयी था तब भा वम लग्ना न कुछ भी नहीं वाली यी ॥५६॥ जव मघा तिाप की पुनी रन्धती न उस समय म कुछ भी नहीं कहा था ता मनास्विनी सावित्री न स्वम प्रकाश करक उसस कहा था ।। ६० ॥ ह वस । जा तुमन सूर्य के समान प्रभा स समन्वित मुनि को दखा या वह ब्रह्माती क पर वनिष्ठ मुनि है जो कि तरा स्वामी हामा । तरा और उसका दाम्पत्य भाव का हाना तो पहिल ही विधाता न निर्मित कर दिया है ॥६१।। उस लिय आपका जा मती भाव है वह उस मनि २ दशन म हीन नहीं हुआ है अथवा जा उनक दशन स बापका हृदय कामवासना म मयुन हा गया है इमम भी सती भाव का विनाश नहीं हुआ है ॥६२॥ ह पुती । वह कुछ भी दोप करन वाली वान नहीं है । अएव जा तुम्हारे मन म दुःख है उसका परित्याग कर दो। हे शामन ' तुमन पूर्व जन्म म परन दारुण तप करक ही उसी मुनि का अपना पात बनाना वृत दिया था। दगी कारण से वह भी तुम्हार लिय सकाम हा गय । ह बसे । तुम श्रवण करो कि बापन ही इस वसिष्ठ मुनि का अपन पान के स्थान म वरण किया ग जाति वहा पर ITH भाव म निरन्तर आपन तप क्यिा था ॥१४॥ इत्युत्त्वा सा च साविनी यथा सन्ध्याभवत् पुरा ॥६५ कृत तपो यदर्थन्तु चन्द्रभागाह्वये गिरी। वसिष्ठेन यथा पूर्व वणिस्पेण वेधस ॥६६ वचनादुपदिष्टा सा तपश्चर्या दुरत्ययाम् । यथा प्रसन्नो भगवान् विष्णु प्रत्यक्षता गत ।।६७ वर यया ददौ तस्य मर्यादा स्थापिता यथा। यथा वा वान्छिन स्वामी वसिष्ठ स तया मुनि १६८ [ यात्रिया पुराण मेधातिथेर्यथा यज्ञे वह्नौ त्यक्त त्यया वपु । यथा तत्तनया जाता तस्यतद्विस्तरात् तदा ॥६६ सावित्री कथयामास माद् वहुलया सह ।।७० मार्कण्डेय मुनि ने कहा-और उस माविधी में यह कह कर जैसे पहिले सन्ध्या हुई थी और उसन चन्द्रभागा ये तट पर पवन में जिसके लिये तप किया था जिस तरह से ब्रह्मचारी के रूप से बमिष्ठ मुनि ने वोधा के वचन स उपदेश को हुई उसने पर महुरत्यय तपस्या की थी और जैसे भगवान विष्णु प्रसन्न होकर प्रत्यक्ष रूप में प्रकट हुय थे ।॥६५॥६६॥६७॥ जिस प्रकार म उसके लिए वर दिया था और जैसे भर्या ही की स्थापना की थी अथवा जिस प्रकार से उसके द्वारा वसिष्ठ मुनि को अपना पति होना चाहा था ॥६८। जिस प्रकार से मेधातिथि ने यज्ञ किया था और जैसे तुमने अपने शरीर का त्याग किया था। और जिस रीति से उसकी पुनी न जन्म ग्रहण क्यिा था उस समय में उसको यह विस्तार पूर्वक कम से वहुला के साथ सावित्री ने कहा था ॥६६७०॥ अथ तस्या वच श्रुत्वा यदभूत् पूर्वजन्मनि । तच्छुत्वा वै तदा ज्ञात मम सर्वं मनोगतम् ॥७१ इत्यतीवत्रपा प्राप्य सातीवाभूदधोमुखी। सावित्रीवचनाद्भूता पूर्वजन्मस्मरा च सा ॥७२ तथैवाधोमुखी भूला यवृत्त पूर्वजन्मनि । तस्य सर्वस्य सस्मार दिव्यज्ञारुन्धती तदा ॥७३ पूर्व विष्णुप्रमादेन सा भूत्वा दिव्यदशिनी। अधुना वात्यभावेन प्रच्छन्ना दिव्यदर्शना ।।७४ सावित्रीवचनाच्छुत्वा वृत्तान्त पूर्वजन्मन । प्रत्यक्षमिव तत् सवं पूर्वज्ञानमवाप सा ॥७५ अवाप्य पूर्व शान तद्यद्दत विष्णुणा पुरा।
वशिष्ठ-अरन्धती विवाह ] वसिष्ठोऽय यत स्वामी मया वै पूर्वजन्मनि ॥७६ इति ज्ञातवती देवी सामोदारुन्धती स्वयम् । वसिष्ठदर्शनद्भूते पूर्व तम्यास्तु हच्छये ।।७७ इसके अनन्तर इसके वचन पा श्रवण परके जा भी पूर्व जन्म म हुजा था। उस समय में यह सुन करके मेरे मन म जो था वह मैन जान लिया था।।७१॥ इम रोति स वह अत्यधिक सज्जा को प्राप्त कर के नीचे की ओर मुख वाली हो गई यो योर सावित्री के बचन से यह पूर्व जन्म के स्मरण वाली हो गई थी॥ ७२ ॥ उसी भाँति अधोमुखी होकर पूर्व जन्म मे जो भी हुआ था उस समय मे उस दिव्य ज्ञान वाली अरुन्धती सब घटनाओ का स्मरण किया था ।। ७३ ।। पहिले भगवान् विष्णु के प्रसाद से वह दिव्य दर्शनी होकर इम ममय म वह दिव्य दर्शन वाती वाल्य भाव के द्वारा प्रच्छन्न हो गई थी॥ ७४ | सावित्री के वचन का श्रवण करके पूर्व जन्म मे वृत्तान्त यो मबसो प्रत्यक्ष की ही भाँति वह सम्पूर्ण पूर्व ज्ञान को प्राप्त करन वाली हा थी। ७५॥ पूर्व ज्ञान की प्राप्ति करके जो पहिले भगवान विष्णु ने दिया था कि मैंने पूर्व जन्म भ इन्ही वसिष्ठ मुनि का अपने स्वामी पे स्थान मे वरण किया था ।। ७६ !! इस ज्ञान में रखने वाली वह देवी अरुन्धती स्वय ही परम थामोद से समन्वित हो गई यो और वसिष्ठ मुनि के दर्शन से पूर्व म उमको काम वासना के उद्भूत होन का भी पूर्ण ज्ञान हो गया या ॥७॥ यथातक. समुत्पत्पन्न सतीत्वस्य निवारणे । तञ्च स्वय सातत्याज तदा मेधातिथे सुना 105 त्यक्तचिन्ता ततस्तान्तु विज्ञायारु धती सतीम् । सावित्रो सूर्यभवन तया साई जगाम ह ॥७६ अरुन्धती निवेश्याय सावित्री सूर्यमन्दिरे। जगाम ब्रह्म भवन सर्वज्ञा सा सतीवरा 120 । कालिका पुराण अथ प्रणम्य ब्रह्माण पृष्टा तेनैव तत्क्षणात् । इद जगाद सावित्री ब्रह्माणममितौजसम् ॥८१ भगवन् जगता नाथ वसिष्ठ भवत सुतम् । मानसस्य गिरे सानौ ददरुिन्धता सती ॥८२ तयोदशनमात्रण ववृधे हृच्छयो महान् । परस्पर तो स्पहयाञ्चक्रतुश्च प्रजापते ॥८३ ततो घर्यात्तु सस्तभ्य मनोज तो सुदु खिता। विमनस्कौ गतौ स्थान लज्जितौ तौ स्वक स्वकम् ॥८४ जिस प्रकार से उसके मन मे सतीत्व के निवारण करने म आतङ्क समुत्पन हो गया था उस समय मे उस मेधातिधि की पुत्री ने उस समय मे उस आतङ्क को स्वय ही त्याग दिया था ॥७८ ।। इसके उपरात पिता को त्याग देने वालो उम अरु धती सती को समझ कर तव सावित्री उसके ही साप सावित्री सूर्यदेव के भवन को चली गई थी ।।७६॥ इसके अन तर सावित्री अरु धती को उस सूर्यदेव के मंदिर म विठापर वह सवज्ञा और धष्ठ सती सावित्रा ब्रह्माजी वे भवन को चली गई थी। ८०। वहाँ पर ब्रह्माजी को प्रणाम किया था और उसी क्षण में ब्रह्माजी के द्वारा पूछी गई उस सावित्री से अमित ओज वाले ब्रह्माजी से यह कहा था । ८१ । हे भगवन् । आप तो समस्त जगतो के स्वामी हैं । थापने पुत्र वसिष्ठ मुनि को मानस पर्वत के शिखर पर उस सती अरघना ने देखा था ॥५१-१२॥ फिर उसके केवल अव लोकन करने ही से महान अधिन कामदेव की वासना बढ गई थी। दोना परस्पर म ह प्रजापत ! वे दोनो ही स्पृहा करने वाले हुए * ॥ ८३ ॥ वे दोनो ही ने बड़े ही धीरज से बहुत ही दुखित होकर पाम की वासना का स्तम्भन दिया था। व दोना ही अय मनस्य होकर अथवा उदग होत हुए परम सज्जित होकर अपने अपने मान को चले गये ८४॥
दमिष्ठ-अन्यतो विवाह ] एवम्प्रवृत्ते यदयोग्य तदा त्वेतद्विधीयताम् । आयत्याञ्च सुरफ लोकाना हितकाम्यया १६५ इति धृत्वा वचस्तय्या ब्रह्मा मर्वजगद्गुरु । ददर्श दिव्यज्ञानेन प्रवृत्ति भाविकर्मण ॥५६ इदञ्च स्वागत प्रोचे तदा लोकपितामहः । तयोर्दाम्पत्यभावस्य वालोज्य समुपस्थित ॥६५ अतो लोकहितार्याय यास्याड् तद्प्रवृत्तये । इति निश्चत्य मनसा सावियोमहितो विधि । जगाम मानमरस्य यवाभूदर्शन तयोः ।।८८ पितामहे तत्र याते शर्वः सुरगणयुतः। नन्दिमृ गिप्रतिभि. समायाता वृपध्वनः ।। भगवान् वासुदेवोऽपि ब्रह्मणा परिचिन्तितः । भक्त्या सोऽपि जगन्नाथ. शस्खचक्रगदाधर । स्थिती ब्रह्माहरी यन तव स्वयमागत. ॥६० अथ ते जगता नाथा ब्रह्मविष्णुमहेश्वरा. । नारदं प्रेषयामामुत मेधातिथि प्रति ॥६१ हे सुर श्रेष्ठ ! ऐसा हो जाने पर जो भी कुछ समुचित होने जस समय में यही आप कोलिए । थापती मे बाद भविष्य वाल की भलाई म लोको की हित- -कामना से वही वाप करें जो मुनासिव हो २५ । समस्त जगती के गुरु ब्रह्माजा ने यह उसके वचनो का श्रवण करके आगे होने वाले कर्म की प्रवृति का दिव्य ज्ञान के द्वारा दर्शन दिया था मर्यात् समझ लिया था कि भविष्य में क्या होने वाला है । १९६॥ उस अवसर पर लोक पितामह ने इसका स्वामत हो रहा था योदि उन दोनों के दाम्पत्य भाव ससमय यह उपस्थित हो गया था। 1८७। इसी लिये लोगों के हित के लिये उसकी प्रवृत्ति के लिये मैं ववश्प हो जाऊया ! ऐमा मन के द्वारा निधय ररके सावित्री के माध ३०६ बालिका पुराण याहि द्रुत ब्रह्माजी ने गमन दिया था। और व मानस गिरि के प्रत्य पर गय थे जहाँ पर कि उन दोना का दर्शन हो जावे 1८८1 पितामह के वहाँ चले जाने पर शिव समस्त सुरगणों से सहित होकर नन्दि प्रभूति गणो के साथ वृषभध्वज वहाँ पर समायात हो गये थे अर्थात् आ गये थ 1८६ । भगवान् वासुदेव भी ब्रह्माजी के द्वारा परिचिन्तित होकर वहीं पर आ गये थे जो कि जगत के साथ वह भी भक्ति की भावना से शख चक्र गदा के धारण करने वाले थे। जहाँ पर ब्रह्म और शिव स्थित थे वे भी वहाँ पर स्वय ही आ गये थे 1६० । इसके अनन्तर जगतो के स्वामी ब्रह्मा-विष्णु-महेश्वर इन तीनो ने मेधातिथि के समीप म देवपि नारदजी को दूत बना कर भेजा था ॥६॥ त्व चन्द्रभागाह्वय गिरिम् । मुनिस्तस्योपत्यकायामास्ते मेधातिथि पर ॥२ तमानय यथाकाममस्माक वचनात् स्वयम् । मेधातिथि समादाय भयानागच्छतु द्रुतम् ।।६३ ब्रह्मादीना वच थु त्वा नारदोऽपि द्रुत ययौ । मेधातिथि समानेतु महाकार्यस्य सिद्धये ॥3 मेधातिथि समाभाप्य देवाना वचनस्तत । मेधातिथि समादाय ययौ मानसपर्वतम् ।।६५ सेन्द्रा देवगणा सव मुनयश्च तपोधना । माध्या विद्याधरा यक्षा गन्धर्वाश्च समागता ॥६६ देवाश्च सर्व देश्यश्च य देवानुचरास्तथा । ते मर्य मानसप्रस्थ याताश्चान्ये च जन्तव ६७ अय पृते समाजे तु देवाना फमलासन । मेधातिथि मुनि पापयमिदमाहातिदेशन ॥६८ उन्होंने नारदजी से महा-हे नारद । आप शीघ्र ही पन्द्रभाग मामा पर्वत पर चले जाइए। वहां पर उग पर्यत दी उपत्यका में परम घमिष्ठ-अरुन्धती विवाह ) थेष्ठ मुनि मेधातिथि विराजमान हैं ॥३२॥ आप उनको हमारे वचन से यथा काम स्यय ही हमारे पास ले आइए । आप स्वय ही मेधातिथि को गाय में लापर शोध हा यहाँ पर आ जाइए ॥६॥ ब्रह्मा आदि के वचन का श्रवण वर नारद जी शीघ्र ही चले गये थे और सब कार्य की मिद्धि के लिये वे मेधातिथि का वहां पर लाने के लिये प्रस्थान कर गए थे | उस देववि ने मेधा तिथि से सम्भाषण करके देवी के वचनों में मेधातिथि को अपने माथ लापर मातम पर्वत पर चले गये गे। ६५ । वहाँ मानस पर्वत पर ममम्न देवगण इन्दु के सहित और सव तपोधन मुनिगण-साध्य-विद्याधर-यक्ष और गन्धर्व भी वहाँ पर समागत हो गय।६६ मा देव और ममता देवियां और जो देवो के अनुचर थे तथा जो अन्य जन्तुगण वे मभी मानस ये प्रस्थ यो समा- यात हो गये थे ।१७। इसरे पश्चात् देवो के समाज के सम्पन हो जाने पर मामलामन ने मेधातिथि मुनि से अतिदेश करते हुए यह बधन महा या ॥६॥ मेधातिथे वमिष्ठाय पुनी ते चरितव्रताम् । देहि ब्राह्मण विधिना समाजे त्रिदिवौकसाम, ॥६६ वपूबरत्यमनयो पूर्व सृष्ट मयेव हि । हरिणा चाप्यनुज्ञात कर्म चंतत् समञ्जसम् ॥१०० एक वृते तव कुले भविष्यति महदयश । हिल च सर्वभूताना देहि त्वा मा चिर कृथा ।।१०१ ततो ब्रह्मवच श्रुत्वा ह्यतिप्रमोदितो मुनि । एवभस्त्विति चोवाच नत्वा तान सुरगु गवान् ।।१०२ एपा तु वचनान पुत्रीमादायारुन्धती मुनि । ध्यानस्थस्य वसिष्ठस्य देवं राह जगाम ह ।।१०३ गत्वा वसिष्ठनिकट देव परिवृतो मुनि । साथिया दीप्यमान ज्वलन्तमिव पायकम् ।।१०४ ३१० [ कालिका पुराण धर्मार्थकाममोक्षेषु धृत बुद्धि पृथक् पृथक् । ददर्श मुनिमासीन मानसाचलकन्दरे ॥१०५ वसिष्ठनोजस्विवर वालसूर्यमिवोदितम् । अथ पुत्रोमग्रगता कृत्वा मेधातिथिम नि । वसिष्ठ नियतात्मानमुवाचारुन्धतीपिता ॥१०६ ब्रह्माजी न कहा-हे मेधातिये | आप अपनी सुचारित व्रत वाली पुत्री अरुन्धती को इस देवों के समाज में ब्राह्म विधि से दें दीजिए ।१६। मैंन इन दोना का कर और वधू होना पहिले ही सृजित कर दिया है। भगवान हरि ने भी इस परम समुचित कर्म के विषय में आज्ञा प्रदान कर दी है ।१०। ऐग समाचरण करने पर आपके कुल मे बडा भारी यश होगा और इसमे समस्त प्राणियों की भलाई भी होगी। अतएव शीघ्र ही दे दीजिए और इस क्र्म में विलम्ब नहीं कीजिए ।१०१ पिर ब्रह्माजी के इम वचन का श्ववण करके वह मुनि बहुत ही अधिक प्रसन्न हुये थे । और उन्होंने वहा था- -'ऐमा ही होगा फिर उसने समस्त दवों को प्रणाम किया था । १०२। उस मुनि ने इनके वचन का श्रवण करके वह अपनी पुत्री अरन्धती को ले आये थे । ध्यान मे स्थित वसिष्ठ मुनि के समीप में देवी के साथ चले गये थे 1१०३ । देवों के द्वारा परिपत मुनि ने वसिष्ठ जी के समीप मे पहुँच पर जो मुनि ब्राह्म श्री म दे दीप्यमान थे और प्रज्वलित अग्नि के ही समान कान्ति बाले थे । १.४। उनने पृथक्-पृथक् उम मानस पर्व तप की पन्दरा म धर्म-अर्थ-काम और मोक्ष में वृद्धि को धारण किए हुए ममामीन मुनि का दर्शन किया था। १०५. वहाँ पर अरुन्धती ये पिता न ओजस्वियो म परम अंक-उदिल वाल मूय 4 रामान-नियत भारमा वाले वमिष्ट मुनि से अपनी पुत्री अब्धती को आगे करपे मेधा निथिन रहा था । १०६ । भगवन् प्रह्मण. पुत्र पुत्री मे चरितव्रताम् । ।
पमिठ-अल्धनी विवाह ] ११ - दता प्रनिगृहाणना मया ब्राह्मण धर्मन् ।।१०७ यर ययायमे ब्रह्मन् स्लेच्छ्या नियमिप्यसि । त्वद्भक्त्येपा भविगी च छायेवानुगना तव ॥१०८ तत्र तत्रैव मे पुनो ममानव्रतधारिणी। पतिनता दरारोहा शुधपा ते करिष्यति ।।१०६ ति थत्वा वसिष्ठम्तु मुनेमॅधानियेर्वच । दृष्ट्वा ममागतान देवान ब्रह्मविष्णु शिवादिकान ।।११० अवश्यमेतद्भावीति निश्चित्य दिव्यचक्षुषा । ब्रह्मण मम्मत पत्री तदा मेधातिपने । वसिष्ठ प्रतिजग्राह वाटमिन्युक्नवाश्च ह ।।१११ गृहीतपाणि मा देवों वमिप्न महात्मना । पत्युः पादयुगे चक्षुयुग न्यस्तवनी मती ॥११२ मेधा तिथि पि ने कहा- हे भगवन् । ब्रह्माजी के पुत्र मेरी चरित प्रत दालो पुती को ग मेरे द्वारा गई है इनका नाम घा मे भाप ग्रहण कीजिए । १०७ । जहाँ-जहां पर भी ह ब्रह्मन् बाप बपनी इच्छा में निवास कवी पर ही यह अपने परम भक्ति मे अयुत होने वाली होती हुई आप अनुगत छाया ही नमान रहगी। 1 १०८। वहां-वहां पर ही समान व्रतो व धारण करन दाली यह मरी पुत्री ओ बरागेहा है और परम पति बना है आपदीदा क्यिा करेगी। मार्कण्डेय मुनि ने कहा-वामा मुनि न इस मेधा तिथि के वचन का श्रवण करके योर ब्रह्मा-विष्णु-शिव आदि देवो या वहाँ पर आयें हुयै देखकर दिव्य चक्षु से यह यवश्य ही होन वाला है यह निश्चय करके ब्रह्माजी के द्वारा सम्मन होने पर वमिष्ठ भान ने म मभर में मेधातिथि मुनि को पुत्री का 'बाठम्' अर्थात् बहुत बच्छा है-यह वह बरसे प्रति बहण कर लिया था 1 ११0 1 १११1 महात्मा वसिष्ठ ३ द्वारा पाणि मा की हुई ब्रह्म देवी मती ने अपने पति वशिष्ठ जो वे दोनो चरणों - ३१२ [ कालिका पुराण मे अपनी दोना आंपो को न्यस्त कर दिया था अर्थात् वपन दोनो लोचनो को पतिदेव क चरणा मे लगा दिया था । ११२। ततो ब्रह्मा च विष्णुश्च रुद्रश्चान्ये तथामरा । विवाहविधिना तो तु मोरयाञ्चरुत्सर्व ॥११३ सावित्री प्रमुखा देव्यो देवाश्चेन्द्रादयस्तथा । दक्षाद्याश्यपाद्यास्तु मुनयोतितपोधना ॥११४ उन्मुच्य ब्रह्मवचनाद्वत्कञ्याजिन जटा । मन्दाकिनीजरानाशु स्नानपयित्वा सुत विधे ।।११५ जा बुनदस्तथा दिव्यभूषणेश्च मनोहर । वसिष्ठ भूपयाचक्रुस्त वारुन्धती सतीम् ।।११६ भूपयित्वाथ तो तन समाप्य मुनिभिविधिम् । विवाहावभृयचास्तयोविधि-हरीश्वरा ॥११७ निधाय सर्वतीर्थांना तोय जाम्बुनदे घटे। आशीर्वादकरमन्त्रैर्गायत्र्या द्रुपदादिभि ॥११८ स्वय तौ स्नापयाञ्चक्रव्रह्माविष्णुमहेश्वरा । ततो महर्पयवान्ये तथा देवर्षयश्च ये ॥११६ इसक अनन्तर ब्रह्मा--भगवान विष्णु तथा रुद्रदेव और अन्य देवगण ने विवाह की तिथि के द्वारा उन दोनो को उत्सवो से परम मोदित (हर्षित) किया था । ११३ । सावित्री जिनमें प्रधान थी ऐसी देवियों ने और चन्द्र प्रभृति देवो ने सा आदि और कश्यप आदि अति तप के धन वाले मुनियो ने ब्रह्माजी के क्थन से वल्कल वस्त्र तथा मृग चर्म एव जटा जूटो का उन्मोचन करके विधाता के पुत्र ( वसिष्ठ मुनि) को शीघ्र ही मदागिनी के पावन जल से स्नपन कराकर सुवर्ण विर- पिन परम दिव्य एव मनोहर आभूषणो से वसिष्ठ मुनि को विभूषित दिया था और उमी भौति सती अरन्धती को भी समलकृत वर दिया -..पा । ११४–११६ । मुनियों के द्वारा उन दोनो वर वधू को भूपित वमिष्ठ-जन्मनी विवाह ] परके वहाँ पर पिधि को सुसम्पन्न कर उन दोनों या विधाता-हरि भगवान और ईश्वर ने विवाह के अवभृय को दिया था ||११९९ सुवर्ण रचिन घट म ममम्न तीयों के जल को रख पर आशीर्वाद करन वात मन्त्री मे-गायत्री म और पदादि मन्नों से ब्रह्मा-विष्णु और महेश्वर ने स्वयं ही उन दोनो का स्नान किया था। इसके अनन्तर अन्य महपियो न और जो देवपियों न शान्ति की थी ॥११॥ ते सर्वे ऋग्यजु सामवेदभागमहाम्वर । गगादि सरिता तोयश्चन शान्ति तयोमुंह ।।१२० भुवननयसञ्चारि विमान सूर्यवचंसम् । अव्याहतगति ब्रह्मा मतोयन्च कमण्डलुम् ।।१२१ ताम्या दाय ददो विष्णर्दुस्पाप स्यानमुत्तमम् । यद सर्वदेवाना मरीच्यादे समीपत ॥१२२ मप्रकल्पान्तजीवित्व म्द्र प्रादात्तयोवरम् । अदिति कुण्डलयुग ब्रह्मणा निर्मित स्वकम् । दो स्वकर्णादाकृष्य पुत्र्य मेघातियेस्तदा ॥१२३ पतिव्रतात्व माचिनी वहुला वपुत्रताम् । देवेन्द्रो वहुरत्नागि धनेशेन सम ददौ ॥१२४ एव देवाश्च मुनयो देव्यश्चान्ये च ये स्थिता । दस्तन यथायोग्य दाय ताभ्या पृथक् पृथक् ॥१२५ एव विवाह्य विधिवत् सौवर्ण मानसाचले। अरुन्धती वसिष्ठस्तु मोदमाप तया सह ।।१२६ उन सबने महान स्वर ममन्वित - यजु और साम वेदो के मन्त्र भागो द्वारा गङ्गा आदि मारताओ के जलो से उन दोनों को फिर शान्ति की थी । २० । तौनी भुवनों मे सञ्चरग करले वाला--सूर्य वो समान वर्चसू वाला विमान जो अव्याहत गति से समन्वित या और जल व सहित कमण्ड उन दोनो के लिए ब्रह्माजी ने हाप दिया था।
३१४ [ पालिका पुराण भगवान् विष्णु न दुधाप उत्तम स्थान दिया था जो मरीचि आदि के समीप में सब देवो का ऊवं था । २१ । २२ । भगवान् रुद्रदेव ने उन दोनो के लिए मात कल्पो के अन्न पर्यन्त जीवित बने रहने का वर दिया था। अदिनि न कुण्डलो का जोडा दिया था जो ब्रह्माजी के द्वारा अपने ही निर्माण किय गय थे। उस समय म मेधातिथि ने अपने कानो में निकालकर पुत्री के लिए दिए थे ।२३। मावित्रा ने पतिव्रता होगा और वहला ने बहुत पुत्रा वाली होना दिया था। देवेन्द्र ने बहुत से रत्ना का समूह कुबर प ही ममान ही दिया था ।१२४। इस रीति से देवगण ने-मुनियों न-दवियो न और जो भी अन्य जग यहाँ पर उपस्थित थ मबने यथा याग्य दान उन दोनों के लिय पृथर पृथर दिया था । १२५ । इस प्रकार म विवि पूर्व विवाह पर सुवणं ये मानस पर्वत पर बमिट और आन्धनी रहे थे और वरिष्ठ जी ने उग अरन्धती माप परम प्रगत पिया पा ॥१२६॥ नयानि नोप मानमाचलकन्नरे। विवाहावयार्थाय शान्त्यं च मुराहृतम ॥१२७ ग्रहमयिापमहादेवपाणिभि गमुदीरितम । मनोय मत्धा भत्वा पतिन मानमापलान ॥१२८ हिमाद्रे यन्दो मानौ मरम्यान पृथक पृथर । नतीय पतित मिले देवभोग्ये सरोघरे ।।१२६ नेन मित्रानद जाता विष्णना प्रेरिता धितो। महावोपरी प्रपाले त पहारि पनित तये ॥१० पौपिनी नाम मा जाला विश्वामियतारिता। उमापन पति सोप तन महानदी ।।११ पानाम गा जामा मना पामगरम मृता। महापाने गरम पतित गरजा गिरे.॥१३२ हिगा पापागे तु दक्षि जगधिो।
वमिष्ठ-अन्वती विवाह ] गोमतो नाम तर्जाता नदी गोमदुदीरिता ॥१३३ विवाह के अवभृव्य के लिये और शान्ति के लिये जो सुरो के द्वारा लाया हुआ जल या वहा पर वह जल मानस पर्वत को बन्दरा में गिरा था । १२७ । ब्रह्मा-विष्णु और महादेव के हाथो से समु- दीरित वही जल सात भागो म विभक्त होकर मानस पर्वत से गिरा या । १२८ । हिमालय की कन्दरा म-शिखर मे और सरोवर म पर पृथव पिरा हुआ वह जल फिर दवा के भोग के योग्य और शिप मरोवर में गिरा था । २२६ । उसमे शिप्रा नदी समत्पन्न हुई थी जो भगवान विष्णु के द्वारा भूमण्डल में प्रेरित की गयी थी। महा कौपी के प्रपात में जो जल पतित हुआ था उससे कोपिकी नाम वाली नदी उत्पन्न हुई थी और जो विश्वामिन नपि रे द्वारा अवतारित थी। उमा के क्षेत्र म जो जल गिरा था उसस महा नदी समुत्पन्न हुई थी जो महापाल नामक सर किती है । सरा मठ महाकाल में गिरि वह जल पनित हना था ।१३०-१३२ । हिमवान् पर्वत के पार्वभाग म भगवान् शम्मु को सन्निधि म जा जल गिरा था उससे गामती नाम पाली नदी ममुत्पन्न हुई यो जो गामद स उदौरित है ॥१३३॥ मनाको नाम य पुत्र शैलराजस्य तत्सम । तस्मिन् सानो समुत्पन्नो मेनकोदरत पुरा ॥१३४ यत्तन पतित तोय तेन जाता महानदी। देविकारया महादेवप्रेरिता सागर प्रति १३५ यत्तोय सगत दर्या हसावतारसन्निधौ । तेनाभूत सरयूर्नाम्ना नदी पुण्यतमा स्मृता । १३६ यान्यम्भासि महापावें खाण्डवारण्यसन्निधौ। हिमवतकन्दरे याम्ये इराया हदमध्यत ॥१३७ इरावती नाम नदी तांता च सरिद्वरा । एता सर्वा स्नानपानसेवनर्जाह्नवी यथा ॥१३८
३१६
[ पावित्रा पुराण
फल ददति माना दक्षिणोदधिगा सदा।
धर्मार्थकाममोक्षाणा वीजभूता सनातना ॥१३६
महानद्यस्तु मप्तता सर्वदा देवभोगदा ।
एव नद्य मप्तजाता सदापुण्यतमीदवा ॥१४०
मैनाक नाम बाला जो पुन मौल राज के ही समान था पहिले
वह उसी शिखर में मेनका के उदर से ममुत्पन्न हुआ ।१३४. यह जल
वहा गिरा था उसका शुभनाम देविका था जो महादेव के द्वारा सागर
की ओर प्रेरित की गयो थी । १३५ । जो जल हसावतार की सन्निधि
मे दरी मे सङ्गत हुआ था उससे सरयू नाम वाली नदी उत्पन्न हुई
थी जो परम पुण्यतम कही गयी है । १३६ । जो जल खाण्डव वन की
सन्निधि में महा पावं मे गिरे थे जो कि हिमवान की कन्दरा मे याभ्य
मे पतित हुये थे वहा दरा के द्रद के मध्य मे इरावती नाम वाली नदी
ने जन्म धारण किया था जो मरिताओ में परम श्रेष्ठ है । ये सभी
मरिताये स्नान-पान और सवन से जाह्नवी गङ्गा के ही तुल्य हैं ।
ये
सब सदा दक्षिण सागर म गमन करने वाली मनुष्या को फल दिया
परती है। ये नदिया धर्म -अथ-काम और मोक्ष की सनातन धीज
भूता हैं अर्थात पुष्पा चतुष्टय की प्राप्ति के लिये कारण स्वरूप ही है ।
1१३६। ये सात महा नदियों मर्वदा देवो के भोगो को प्रदान करने
याली हैं । इस रीति म मात नदिया समुत्पन्न हुई थो जो सदा ही
पुण्य जल वाली थी ।।१४०॥
अरन्धत्या वसिष्ठम्य विवाह देवसन्निधौ ॥१४१
एव विवाह स तदा वसिष्ठस्वामरुन्धतीम् ।
देवदत्त सदा स्थान विमानेन जगाम है ।।१४२
ब्रह्म-विष्णु-महेशाना वचना मुनिसत्तम !!१४३
हिताय सर्वजगता त्रिपु लोपु नवंदा ।
यस्मिन् यस्मिन् युगे यादव वीणा भवति ताशम् ॥१४४
वसिप-अरधनी विवाह ] २१७ देश भाव शरीर च कृत्वा धर्म नियोजनम् । विचरत्येप लोकात्रीनप्रमत्त प्रसनधी ।।१४५ एव पुरा वसिष्ठेन परिणीतात्वरुन्धती । सा हितार्थाय जगता देवाना वचनात् पुरा ।।१४६ य ईद शृणुयान्नित्यमाख्यान धर्मसाधनम् । सर्वकल्याणसयुक्त चिगयुविनवान् भवेत् ।।१४७ दवा की सन्निधि म अन्धनी का और वमिप्य मुनि का विवाह हो जान पर इस प्रकार स उम अरुन्धती के माय विवाह करके उस अवसर पर वे धमिष्ठ मुनि उस अरुन्धनो को लकर दवो के द्वारा किए हुए स्थान म उसी समय मे वसिष्ठ मुनि श्रेष्ट वहह्मा-विष्णु और महेश के वचन से ही उस पूर्वोक्त स्थान पर चल गये थे । व समस्त जगता के हित के सम्पादन पल के लिय तीना भूथना म सर्वदा शिस जिस युग म स्त्रिया को स भो हैं वैस ही हा जात हैं । १४४ । देश- भाव और शरीर का धम मनियाजन करक यह परम प्रमन्न बुद्धि वाले-प्रमाद से रहित होत हुए नीनो लोका म विचरण किया करत हैं ।१४५) इसी रीति से मुनि वसिष्ठ न पहिो अरुन्धती के साथ परिणय किया था जो कि देवो के हित क लिए ही देवो । पहिल पचन से ही परिणीत की गयी थी । १५६ । जो पुरुप इस धर्म के माधन स्वरूप आत्यान मा नित्य ही श्रवण किया करता है वह सब प्रकार के कल्याणो से युक्त हाकर विरामु और धनवान् हुआ करता है ॥१७॥ या स्त्री शृणोति सततमरुन्धत्या कथा मिमाम् पतिव्रता सा भूत्वेह परन स्वर्गमाप्नुयाम् ।।१४८ इद पर स्वस्त्यानमिद घमप्रद परम् । आख्यान सर्वदा कीतियश पुण्यविवधनम् ॥१४६ विवाह पुसि यात्राया य श्राद्ध श्रावयेत्तथा ।
३१७
[ कालिका पुराण
स्थैर्य पु सवन सिद्धि पितृप्रीतिश्चजायते ।।१५०
इति व कथित सव वमिष्ठस्य महात्मन ।
अरुन्धती यथाभूता भाया वापि पतिव्रता ॥१५१
यस्य या तनया जाता ययोत्पन्ना च यत्र च।
यथा ब्रह्महरीशाना वचनान स वृत पति ॥१५२
एतत् व सवमाययात गृह्याद्गृह्यतर परम् ।
पुण्यद पापहरणमायुरारोग्यवधनम् ॥१५३
इति विपुलवृपौधक्षेमवारीनिहास
गर्दास मवृदपाह यावयद्या द्विजानाम् ।
म भवति नुपौधहीनदेह समतो
मुनिवरणहयया प्रेत्य गीर्वाण एव ।।१५४
महार-वयन ]
१५३ ॥ यह बहुत वर्षों के ओघ या क्षम वरने वाला इतिहास है।
इसरी ममा में द्विजा को कोई एक बार भी श्रवण करा देता है वह
मनुष्य क्लुपा दे ममूह मे हीन इह वाला हो जाता है और साथ मरह
पर मुनिवरा वी सहचर्या प्राप्त कर लेता है और मन हान पर वह
देवता ही हा जाना है ।।१५४॥
॥ संहार-कथन ॥
ततो हिमवत प्रम्थे गिरे शिप्रसर स्तोरे।
उपविष्टो महादेवस्तारोऽपश्यदन्निये ॥१
पुन पुन प्रेप्यमाणा ब्रह्मणा हरिणा च स ।
ध्यान क्तुं तन मन स्थिर कृत्वा दृटात्मवान् ॥२
आत्मानमात्मना द्रष्टुमात्मन्येव विशेषत ।
परम यत्नमकरोद्ध्यानेन स्मरशासन ॥३
ध्याने प्रविष्टचित्तन्तु त दृष्ट्या द्रुहिणादय ।
हरे प्रविष्टा मायाच्या तुष्टुपुर्यतमानसा ॥४
मायया मोहितो भर्ग सतोशोकाकुलो भृशम् ।
विलपत्येव ता तस्मिन् मोहहेतु जगत्प्रसूम् ॥५
स्तुत्वा शम्भुशरीरात्तु नि मार्यना निराकुलाम् ।
शम्भुचित्त करिप्यामो ध्यानासक्न निरन्जनम् ॥६
यावत् सती पुनदेह होत्वा हरभामिनी।
भवितो तावदेवप विशोको ध्यातु निप्पलम् 110
इति संचिन्त्य गनसा ब्रह्माद्यास्त्रिदिवौकस ।
योगनिद्रा महामाया स्तोतुनेव समारभन् ।।८
मान्डेय महर्षि न दहा-इसके उपरान्त हिमालय पर्वत के
मस्य पर शिम मरोदर के तट पर उपनिष्ट हुय महादवजी स
३२०
[ कालिका पुराण
उस सरोवर का अवलोकन कर रहे थे ॥१॥ वारम्बार ब्रह्मा और
हरि के द्वारा प्रेप्पमापा वह ध्यान करने के लिये मनका स्थिर करके हद
आत्मा वाले हुये थे । आत्मा के द्वारा आत्मा को आत्मा मे ही विशेष
रूप में देखने के लिये कामदेव को शामन करने वाले शिव ने ध्यान के
द्वारा परम यत्न किया था ||३|| दुहिण प्रभृति ने ध्यान प्रविष्ट चित्त
वाले उन को देखकर यतमानस होते हुये हर म प्रवेश की हुई माया
नाम वाली का स्तवन किया था ॥४॥ माया मे मोहित हुये शिव बहुत
ही अधिक सती के शोक स व्याकुल है और वह उसी के लिये विलाप
किया करते हैं उसमे मोह के हेतु जगत्प्रमू की स्तुति करके शम्भु
के
शरीर से इस निराकुला को निकाल कर ध्यान म आसक्त निरञ्जन
शम्भु के चित्त म कर देग 1५। ६ । जव तक सती पुन शरीर का
ग्रहण करके शिव की भामिनी होव तब तक यह विगत शोक वाले
होकर निकल का ध्यान करे ॥७॥ ब्रह्मा नादि देवगण यही मन से
चिन्तन करके महामाया योग निद्रा देवी की स्तुति करने का समारम्भ
उन्होंने कर दिया था |
श्रीशक्ति पावनी तान्तु पुष्टि परमनिष्कलाम् ।
वय स्तुमो महाभक्तया महदव्यक्तरूपिणीम् ।।
शिवा शिवकरी शुद्वा स्थूला सूक्ष्मा परावराम् ।
अन्तविद्यामविद्याख्या प्रीतिमेकाग्रयोगिणीम् ।।१०
त्व मेधा त्व धृतिस्त्व होस्त्वमेका सर्वगोचरा ।
त्व दीधिति सूर्यगता सुप्रपचप्रकाशिनी ।।११
या तु ब्रह्माण्डसस्थान जगद्वीजपु या जगन् ।
आप्यायति ग्रह्मादीस्तम्वान्तान् या त्वमापगा ॥१२
य एक सयंजगता प्राथभूत सदागति ।
देवानाञ्च य आधार. स नभस्वाम्तवाशवः ॥१३
एव विसारि यत्तेज सव समिध्यते ।
रहार क्थन ]
०२१
तत्ते म्प जगद्वोज बहुधा यच्च दृश्यते ॥१४
देवा न यहा- उस श्री शक्ति पावनो पुष्टि और परम निष्पता
का जा महान व्यक्त हप वाली हैं हम लोग महतीभक्ति की भावना स
स्तुनि वरत है । ६। वह परम शिवा है--शिव ान कल्याण के करने
वाली हैं शुद्धा-म्यूना- मूश्मा-परावरा अनदिद्या-अविद्या नाम
वाली--प्रीति और एकाग योगिनी है । १० । आप ही महा है- आप
धति हैं ही हैं और आप एक सयदे गोचरा है-जाप हो धिति है---
सूय २ गता है और सुप्रपन्च के प्रकाश करन वाली हैं । ११ । जा
ब्रह्माड समधान है जा जगत् के वीजा मजाद है जो आप आपणा ब्रह्मा
स आदि लेबर स्तम्ब के बत पयन्त साप्यापित क्यिा करती है । १२ ।
जा समस्त जगता का प्राणभूत सदागति और दया का आधार है वह
नम भी आपका ही एक अशभूत है १३ । इस प्रकार स विसारी जा
तज है वह सवत्र ही भली भाति जायगा वह आपका रूप जगद का वीज
हे और जो प्राय दिखाई दिया करता है । १४ ।
या ब्रह्मलोक्पावालसान्तरालगता सदा ।
सा स्व वियन्मध्यवहिव ह्याण्डस्य च सर्वत ॥१५
अचलाचलचण यन्त्रिता या प्रपञ्च ।
चगद्धात्री लोकमाता सा च त्व माधवी क्षिति 11१६
त्व बुद्धिस्त्व तद्विपया त्व माता च्छन्दसा गति ।
गायत्री व वेदमामा व सावित्री सरस्वती ।।१७
व वार्ता सर्वजगता व नयी कामरूपिणी ।
स्वहि निद्रास्वदपेण प्राणिनो निर्जरादय ।
ये स्यद्यिोकस सर्वान् सुखयन्ती प्रमोहसि 11१८
व लक्ष्मी पुण्यकीणा पापिना व हि यातना ।
तथा नीतिमृता श्रीश्च सुखदानंशिकी धृति ।१६
त्य शान्ति सर्वजगता व कान्तिश्चन्द्रगोचरा ।
३२२ [ वालिका पुराण त्व धावी सर्वभूताना लक्ष्मीस्त्व विष्णुमोहिनी ॥२० त्व तत्त्वरूपा भूताना पचानामपि सारयत् । त्व मिलोपी महामाया व नोतिर्मोहबारिणो ।।२१ जो ब्रह्मलोक पाताल और सदा अन्तरात्मगता है वह आप वियत् ( आकाश ) के मध्य म और वाहिर और ब्रह्माण्ड में सभी ओर हैं । १५। जो अचल चल चक्र स यन्त्रित प्रपञ्च को उत्पन्न करने वाली हैं। आप इस जगत् की धात्री- लोक माता है और आप माधवी क्षिति है । १६ । आप बुद्धि है और आप ही उसा विषय है --आप मात' हैं और छन्दा की गति है । आप गायत्री-वद माता और आप सावित्री तथा मरस्वती है । १७ । आप ही सब जगता की वार्ता है और आप कामरूपिणी त्रयी हैं। आप निद्रा के स्वरूप पे द्वाग प्राणी हैं तथा निर्जर आदि है । निजर देवो का नाम है । जो स्वर्ग आदि के स्थान वाले हैं उन सबको अरप मुख दती हुई प्रकृष्ट रूप से मोह युक्त किया करती हैं । १८ । आप पुण्य कार्य करने वालो के लिये लक्ष्मी हैं और जो पाप कर्म किया करत हैं उनके लिए साक्षात् यातना हैं । उसी भांति जो नीति के धारण करने वाले पुरुष है उनके लिये श्री है और नैतिनी धृति सुख देने वाली हैं । १६। आप मब जगतो की शान्ति है और आप चन्द्र म गोचर होने वालो कान्ति हैं। आप समस्त प्राणियो की धात्री है और आप विष्णु को मोहन करने वालो लक्ष्मी हैं । २० । आप भूतो की तत्त्व रूप वाली है और आप पाचो भूतो की सार करने वाली । आप त्रिलोकी महा माया हैं । आप मोह करने वाली नीति हैं । २१ ससारचक्रे प्यारोप्य सर्वभूत महेश्वर । भ्रामयन्नस्ति च यथा सा त्व माया महेश्वरि ॥२२ जयन्ती जययुक्ताना हीविद्या नीतिरुत्तमा । गीतिस्त्व सामवेदम्य प्रन्थिस्त्व यजुषा हुति ।२३ - महार-क्थन ] ३२३ गमस्तगीर्वाणम्य शक्ति- स्तमोमयी सत्त्वगुणक दृश्या । रज प्रपचानुभवककारिणी या न स्तुता भव्यकरीह सास्तु ।।२४ ससारसागरकरालतरदुख- निस्तारकारितणिश्चितिरोतिहीना । याटागल्पपरपानलगीत- विक्षेपकारिणी गिरी प्रणनाम ता व १२५ नामाक्षिवक्तृभुजवक्षसि मानमे च धृत्वा सुखानि विदधाति सदैव जलो । निद्वति यातिसुभगा जगती मवाना सा न. प्रसीदतु तिम्भृतिवृत्तिस्पा ॥२६ सृष्टिस्थित्यन्तप्रपा या सृष्टिस्थित्यन्तकारिणी। सृष्टिस्थित्यन्तशक्तिर्या सा माया न प्रसीदतु ॥२७ भगवान महेश्वर सर्वभून को ममार चको म समारोपित करके जैसे भ्रमण कराते हुए हैं हे महेश्वरि । वह आप ही माया हैं । २२ । याप जय रो युगो की जयन्ती-ही-विद्या-उत्तमा नीति हैं, आप मामवेद की गीतिका , आप यजुर्वेदी की प्रन्यि और दुति हैं ।। २३ ।। आप ममस्त देवों के समुदाय को तपोमयी शक्ति है जो सत्त्वगुण की एक दश्या है, माप रजोगुग के प्रपञ्च की एक ही करने वाली हैं। जो स्तुत नहीं हुई वह आप यही भन्य दे वरने वाली होवे ।। २४ ॥ दम गमार रूपी महा गागर को महान् परास तरङ्गो के दुयो मे विस्तार करने वाली तरणि हैं जो म्पिति को रीनि से हीन है । जो यहाद परम पावन लिमीत रे विशेष परने वाली हैं पर्वत में उमरो निश्चय ही हम प्रणाम करते हैं ॥२॥ पाप नागिया--ने मुग- मुजा और वस स्थल म मोर मानग में मुयोको महार-ययन जम्न को शान्ति लिये ही उनके अन्दर प्रदेश क कल्य ३प में ऐसे हो गये थे और अच्युत प्रनु ने हि स्थिति और अन्त दो देना हो दिखा दिया था ॥२-३०॥ जिम रोनि म उनी मनी नाया हुई चौर वह जो जिसकी पुत्री हुई थी नया जैसे मनी युक्त देह वालो हुई शी वह सभी दिखला दिया था।२१। वाहिर न व्यक्त हा प्रपञ्च चौर वन रजोगुण जार पर ज्यान या दिवा कर फिर सम समय म उनका गत पित्त वाला बर दिया था। गिर पवान् गङ्कर ने भी अनर वार उन समन प्रपन्चो वा न म ममय म उन्हें नि मार मानकर मार दस्तु म ही चित्त का नियमित विया पा ॥२३॥ स्म समय में ब्रह्मा जादि ददों की मात्रा उनव द्वारा परिटुन होवार और पतंव्य की प्रतिज्ञा कर वहा पर शीघ्र निर्धान हो गई थी ॥ ३४॥ वैकुण्ठ नाथ भगवान् भी पद पर ने भगवान जन्म के चित्त सामयमिन दर रवि मपटल में गजा की हा भाल परीर म निकल गये। नत्यान्तदा देवा ब्रह्मनारायणाय । म्य व न्यान ययु नियुतास्त्या वा हर गिगे ॥२६ ध्यानामत महादेव प्रणम्यन्द्रादय मुरा। विनाप्य मौनिन देव जग्मु प्यान स्वपम् 1123 यातेपु तेषु देवेषु कपर्दी उपवाग । महर दिव्यमानन दध्या ज्योति पर ममा ॥ रथ मधुरिपु मम्मो प्रविश्य हदपेजमा । पल्पे कल्पे स्थिति गष्टिं सपमन्याप्यदर्गय ३६ या जगतमपचाय रजमा जाती गना । নি স্যৰনাৰ না বলিনা মাৰিল । चिन्नु माग्वा गुह्य पर ज्योति मनातनन् । दणित तेन नत् सत्यमापदय द्विजननन ।११
[ वालिका पुराण
सदा ही जन्नु का किया करती है जा ससार में होने वालो सुभगा'
निद्रा
है- एरो जाया करता है वही आप हमारे ऊपर धृति-स्मृति और
वृत्ति रूप वाली प्रसन्न हावे ।। २३-~२६ ।। जो सृष्टि-स्थिति और
अन्त के रूप घाली अथवा सृजन-पालन और सहार करने वाली
हैं, जो सृष्टि-स्थिति आर अन्न की शक्ति हैं वह माया हम प्रसन्न
पर होवे ।। २७ ।।
योगनिद्रा महामाया सस्तुतेय तदा सुरं ।
हरस्य हृदयात् क्षिप्र नि ससार तदाञ्जसा ॥२८
विनि सृताया तु तस्या विवेश मधुसूदन ।
शम्भोरत्न स्वय तस्य शान्तर्थ विश्वम्पवृक् ।।२६
प्रविश्य हृदय तस्य कल्पे को यथाभवन् ।
सृष्टि स्पितिस्तथैशन्तस्तथादर्शयदच्युत १३०
यथा सनी तस्य जाया भूता सा या च यत्सुता ।
तत् सर्वं दर्शयामास मुक्तदेहा च सा यथा ॥३१
पहिर्व्यक्त तु नि सार प्रपच रजस बहु ।
दर्शयित्वा पर ज्योतिर्गचित्त तदाकरोत् ॥३२
ततो हरोऽपि तान् सर्वान् प्रपञ्चान् वीक्ष्य चासकृत् ।
नि साराश्च तदा मत्वा सारे चित्त न्यवेशयत् ।।३३
ब्रह्मादीमा तदा माया देवानां तै परिप्टुता ।
प्रतिश्रुत्य च कर्तव्य तत्रैवान्तर्दधे द्रुतम् ११३४
भगवानपि वैकुण्ठ शम्भोश्चित्त पदे पदे ।
रायम्य निसृत पायाद्राजेव रविमण्डलाद ॥३५
मावण्डेय मुनि ने कहा -महामाया याग निद्रा यह उस समय
में के द्वारा मस्तुता है यह शीघ्र ही भगवान् हर ये हृदय रे
मिक्स गयी थी।२६। उगने विनि सप्त होन पर उराम मधुसूदन
ने
'वा रियाया। विश्व के रूप को धारण वाले भगवान ने स्वय उन
महारययन
सम्मृती शान्ति के लिये ही उनके बदर प्रदेश पर दस-क्लाम
ऐसे हो गमे ये और अच्युत प्रभु ने ष्टि स्थिति और अन्त वो वैसा ही
दिखला दिया था ॥२०॥ जिम रोनि में उनकी मती जाया हुई
और वह जो जिपी पुत्री हुई थी तथा जैसे मनी युन देह वाली हुई
थो वह मभी दिखला दिया था। वाहन व्यक्त हुना प्रपञ्च
और बहन रजोगुण जौर पर जाना दिवा पर कि उस समय म
उनोभन दित्त दाला कर दिया था ॥ १२॥ फिर भगवान जङ्कर ने
मी भनेर बार उन समन प्रपत्रीका पक्षण सेम नमर म उन्हें
नि मार मानकर मार दस्तु म ही चित्त का निति निया या ॥६३||
उस समय म प्र आदि देवो भी माया उनक द्वारा परिरग होर
और वत्तव्य की प्रतिज्ञा कर वहाँ पर ही शीघ्र अन्तर्धान हो गई थी
।। ३४॥ वैकुण्ठ नाय भगवान भो पद पद में भगवान् शम्भू ये नित
का ममिन करवे रवि मण्टन म गजा को हो भाति गरीर म निकल
गया
तत्यान्तदा देवा ब्रह्मनारायसादय ।
त्य न्द न्यान ययु प्रीतियुतस्त्यावा हर गिर्ग ३६
ध्यानासक्त महादेव प्रणम्यन्द्रादय मुरा ।
विनाप्प मौनिन देव जन्म स्थान स्वरम् 1134
यातेपु तेषु देवेषु पपी वृषवाहा ।
सहा दिश्यमानेन दम्यां ज्योति पर नमा ||३८
म मधुरिपु शम्मो प्रविश्य हदरेजसा ।
कल्पे वल्पे स्थिति मष्टि सापगन्याप्यदर्शन
यथा जगत्प्रपचाय रजना जगती गना ।
नि मागता पपा दगिता भारिणा ॥१०
चिन्नु मान्तर गुह्य पर ज्योति मनावनम् ।
दगिन वेन ना सत्यमाचल्य द्विजननम ॥४१
[ कालिया पुराण थोतुमिच्छाम इति ते मुनीन्द्राद्भुतमुत्तमम् । विस्तरादिदमाख्याहि धर्म नि यस परम् ।।४२ उम समय में ब्रहा और नारायण प्रमृति समस्त देव कृतकृत्य अर्थात् सफल हो गय थे और प्रीति से युक्त होकर गिरिपर हर को छोड कर अपने अपने स्थान का चले गये थे ॥३६॥ ध्यान में समासक्त महा- देव जी को प्रणाम करके इन्द्र आदि सुरगण मौनधारी देव को विज्ञापन करके अपने अपन स्थान वो चले गये थे ॥३७॥ उन देवों के चले जाने पर वृपप के बारन वाले शम्भु दिव्यमान से एक सहस्र वप पयन्त पर ज्योति ध्यान म सलग्न हो गये थ ।। ३८ ॥ पियो ने कहा- भग- वान मधुरिपु न स सम्भु के हृदय म शीघ्र प्रवेश करके क्स्प वल्प म सृष्टि-स्थिति और मयम को दिखलाया था ।। ३६। जिस तरह से रजोगुण के द्वारा जगत के प्रपञ्च के लिये जगती तल मैं गये थे। फिर कैटभारि ने उनकी निमारता को विस प्रकार से दिखलाया था ॥४०॥हे द्विज थे। उहोने फिर मारतट---गोपनीय-मनारन पर ज्योति को दिखलाया था ? वह मत्य बतलाइये ।। ४१॥ यही हम सब थयण करने की इच्छा करते हैं । यह अतीव अद्भुत है उसे हम आप मुनीन्द्र के मुप मे ही सुनने के इच्छुक हैं। आप इमको विस्तार पूर्वक कहिए क्योकि यह परम नि श्रेयस धम है ।।४।। आदिसर्गमह वक्ष्ये पागह द्विजसतमा । वल्पे वल्पे यथा सृष्टिवरािहे याशो भवेत् ।।४३ आदिष्टि दर्शयित्वा प्रतिसगं तथा हरि । शम्भवे दर्शयामान प्रतयादीन् निवाधत ।।४४ प्रलय प्रथम वक्ष्ये सर्गमादि तत परम् । प्रतिमर्म ततो विप्रा वाराह विनियोधत ॥४५ निमेपो नाम पालाशो नेत्रोन्मेषविनक्षित । तरष्टादपि पाटामाटामा विशता वला ॥६६ सहार-चपन ] कलाभिस्तावती भिस्तु क्षणाप्य परिकीर्तितः । क्षणदिशभि प्रोक्तो मृहूर्तस्तंस्तु त्रिशता ॥४७ मानुप स्पादहोरात्र पक्षस्ते दश पञ्च च । पक्षाम्या मानुषो समा पितृणा तदहनिशम् ॥४८ मारोदशभिर्वर्णो देवाना तदनिशम् । कृष्णपक्ष पितृणा तु कर्मार्थ दिवसो मत ॥४६ मार्कण्डेय मुनि ने कहा-हे द्विज हो । मैं आदि सग वाराह या वर्णन करूगा जिस तरह से कल्प-- वरुप म वाराह में जमी सृष्टि हुई थी । ४३ । भगवान हार ने प्रतिसर्ग म उमी भौति आदि सृष्टि को दियलार भगवान शम्भु के लिये प्रलय आदि को दिखलाया था - ममझ लो 1४४ । मरमे प्रथम में प्रलय का वर्णन पगा। उमरे पोछे भादि मर्म को बालाऊँगा। हे विप्रो । प्रति मग में फिर बाराह पा मान प्राप्त रखो। ४५। काल के एक अश को निमेप वहा जाता है जो नेत्रों के उन्मेप मे विशेष लक्षित हुआ परता है। उन अठारह निमेपो में एक वाटा होती है और तीय वाडाओ को एक कला है । १४६ । उननी ही अर्धार योस पापा स एर क्षण नामय बहा गया है। पारह क्षणा म एर मुहूतं हा गया है तथा तीम ! मनुप्या वा अहोरात्र होता है । और पन्द्रह अहोरात्र मा एक पक्ष होता है । गमो से मनुष्यों में य होते हैं जो कि पितृगणो वा एप अणि हुआ करता है । ४७ । ४५ 1 बारह मागोवा पर वर्ष होता है मा देय। पार महोराय ही है। पितृगणो ये वर्म के लिये कृष्ण पक्ष ही दिन माना गया है। स्वप्नार्थ शुक्लपक्षस्तु रजनी परिणीतिता। देवाना तु दिन प्रोक्त पामासा उत्तरायणम् ॥५० रानि स्वप्नाय देवाना पण्मामा दक्षिणायनम् । दाभ्या दाम्यान्तु मामाभ्यामपं गान्यामृतु स्मृत 11५१
३२८
[ पालिका पुराण
ऋतुभिश्चायन प्रोक्न निमिस्तन्मानुष मतम् ।
ऋतुभिर्वत्सर पड भिन्ताश्च शृणु पृथक् पृथक् ॥५२
चंगादि-मासयुगले सजाभेदाद् द्विजोत्तमा ।
वसन्तश्चंतवैशाखो ग्रीष्मो ज्येष्ठ शुचिस्तथा ।।५३
प्रावृट नभोनभस्यौ तु शरत् स्यादिप-कातिके ।
सह पोपौ च हेमन्त शिशिरो माधफाल्गुनौ ॥५४
पडिमे ऋतव प्रोक्ता यज्ञादौ विहिता पृथक् ।
नृणा माग्न दशभिर्लक्ष सप्तभिरुत्तरै ।
अष्टाविंशतिमाहस्र मनि कृतयुगस्य तु ॥५५
मन्ध्या चतु शतानीह वर्षाणामनरालत ।
सन्ध्याशस्तावता प्रोक्तस्तदन्तर्गत ईप्सित ॥५६
म्वप्न अर्थात् शयन करने के लिये शुक्ल पक्ष होता है गौ रजनी
कही गयी है। उत्तरायण मूर्य के होने पर छ माम देवो वा दिन कहा
गया है । ५० । दक्षिणायन के , मास देवो की रात्रि शयन करने की
हुआ करती है । मूर्य स ममुत्पन्न दो-दो मामो से नातु वहा गया है ।
। ५१। तीन ऋतओं का एक अयन होता है जो मनुष्यो का माना गया
है। छ ऋतुआ का एप बत्मर ( वर्ष ) हाता है और उनको आप
त्थर पृथर गुनिये । ५२ । हे द्विजोत्तमो । गज्ञा के भेद मे चत्र आदि
दो मामो मे तु को ममझिये। चत्र और वंशाग दो माम में वमन्न
जान होता है । येष्ठ और आपाढ़ दो मामा मे ग्रीष्म त हुआ करता
है । ५३॥ माग और भाद्रपद- दा मागोभ वर्षा भानु हुआ
करता है । आश्विन और पात्तिक मागी म शरत् पातु हुआ परता है।
धाहा और पोप में हेमन्त ऋतु होता है तथा माघ और पारगुन मासो
में गिर पातु होता है।५५। ये ऋतुयें की गयी हैं जो यज्ञादि
मे
पर विहित विपं गये हैं। माशे मान मे गहमा है और
रटाईम महया मान ताग या।। राम में अनि पुगो
[ वालिया पुराण
को इन सवी मध्या या अन्य हुआ परता है जो वि उम साध्याश में
मयुत है । ६३ ।
देव दिन वनसरेण मानुपेण सरायकम् ।
एव म गणित्वा तु मानुपीयश्चतुर्युगे ।
देव द्वादशसाहस्र वत्सराणा प्रकीर्तिम् ॥६४
देवादशसाहस्रवतसरैदैविक युगम् ।
तद्वै नतुर्युग पूर्णा गध्या सध्याशमयुतम् ॥६५
देवाना तु कृते वैताद्वापरदिव्यवस्थया ।
न युगव्यवहारोऽस्ति न च धर्मादिभिाता ॥६६
किन्तु चातुर्युग नार भवेद वयुग सदा ।
दैविकरेकमप्नत्या युगैर्मन्वन्तर भवेत् ॥६७
दैवयुगमहस्र द्वे ब्रह्मण स्यादहनिशम् ।
चतुर्युगमहस्र द्वे नृणा मानेन तद्भवेत् ॥६८
एपस्मिन् बाह्म दिवसे मनव स्युश्चतुर्दश ।
एव ब्राह्मण मानेन दिवसंस्तु त्रिभि शतै ।
स पप्टिभिर्वनमर स्याद् ब्राह्मो वर्षो नृणा यथा ॥६६
ब्राह्म पञ्चशता वर्षे परार्घ परिकीर्तित ।
तदीश्वरस्य दिवसस्तारती रानीरीज्यते ॥७०
यात्रियों के हित देवो का दिन मतुप्यो का एक वत्सर होता
है। इस प्रकार म क्रम की गणना करवे मनुष्यो के चारो युगा मे देवो
पे बारह सहस्त्र वप कीतित किय गये है । ६४ । देवो के बारह सहस्र
वर्षों का दैविक युग हुआ करता है । वह मनुष्यो के चार युग है जिसमें
मन्ध्या और म-ध्याश की सम्मिलित होता है । ६५ । देवो के कृतयुग
मे प्रेता-द्वापर की व्यवस्था से युग व्यवहार नहीं है और धर्म आदि की
भिन्नता भी नहीं है।६६॥ विन्तु मनुष्या या चतुर्या अर्थात् चारो
देवो का युग होता है । इकहत्तर देवोर युगोसे एक मन्वनर हुआ करता
है।६७ । देवो के दो महस युगो का ब्रह्माजी वा एक अहोरात्र हुआ
युग सदा
३३३
महार-न]
है। मनुष्यों नान दो नव वारा नहीं है ।
र मार्ग दिल द ननु हो। है । इस प्रकार द्रा
मार दीन नोटिनों में नालीने दर होता है मनुष्यों है
बैन हो दया क. वर्ष होता है। अपद दहा के पाच नो
वर्षों में जागरं गाना रिता गया। दह इंभरका दिदम है और
उदनी होगी दी गती है 12।
गतेन ब्रह्मपो वर्षों बाल न्यापिराईज ।
पगपंडित तीते द्राण प्रलपोमवेत् ।।१
अलीने ब्रह्माणि परेजगता प्राहनो लय ।
नमन्जगदावान्मन्यय या परापरम् ।।७२
तन्य ब्रह्मन्वन्पन्य दिवानन्द पद् भवेत् ।
पर न तन्याई पराधमभिधीयने ।।३
जगतम्बम्पी नगवान् पन्मानासयोऽव्यय ।
भूतात् स्यूनतम मूक्ष्माद् वस्तु नूपमतमो मा ।
न तस्याप्ति दिवानबिब्यवहारा न वइनरः ॥७४
किन्नु पौरापिक. पूर्वगन्नाभिरपि ताहन ।
सृष्टियलयबोधार्य कल्प्यते तदहनिशन् ।।७५
म एव रात्रि.स दिवा नवयं
म व क्षिनि मृष्टिपरो हरश्च ।
न दिणम्पो पुरप पुराणः
तन्मिन् समनच्च विभाति तन्न Iss
तनो ब्रह्माणि लीने नु पग्माननि शाश्वते ।
जगन् नवं नेगव न पत्वाय गच्छनि ॥3
प्रयाबोरे एवात वर्ष का वान दमरा परार होता है । द्वितीय
पानीन हो जाने पर जो ब्रह्मा का है प्रनय होता है
पर रक्षा के नीन हो जाने पर रातों का प्रावृत नरहना
३३२
[ कालिका पुराण
जो समस्त जगता का आधार-अव्यय और पर से भी पर है । ७२
उम ब्रह्मा के स्वरूप क दिवा रात्र का जो होता है उमस पर नाम
उमका आधा पराध कहा जाता है । ७३ । जगई के स्वरूप वाले
भगवान् परमात्मा अक्षय और अव्या हाता है । जो स्थूल से स्थूलतम है
और जो सूक्ष्म से भी सूक्ष्मतम माना गया है। उसका दिवाराणि वा
व्यवहार नहीं होता है और वत्सर ही है । ७४ । कि तु पूर्व पौराणि
को के द्वारा और उस प्रकार के हमारे भी द्वारा तृष्टि और प्रलय के
ज्ञान प्राप्त करने के लिये अहनिश कल्पित किया नाया करता है । ७५ ।
बह ही रात्रि है-वही वप है और वह क्षिति है तथा सृष्टि के करने
वाग हर है-वह विष्णु के रूप वाले पुगण पुरुष हैं उसी म यह
ममस्त उसी की भौति विभान होता है। ७६ । यह शाश्वत परमारमा
ब्रह्म के लीन होन पर या सम्पूर्ण जगन् क्रम से ही उसरे रूपल के
निय गमन विया परता है अया। उमी या म्वरूप वन जाया करता
है ।। ७ ।।
वृह्मण शतवपाते रद्ररूपी जनादन ।
जगदन्त म्वय कृत्वा परमे लीनमेति व । ७८
प्रथम मविता सर्व स्थावर जगम तथा।
नी कर शापयित्वा जल मर्व ग्रहोप्यति ।।७६
शुप्या वृक्षास्तृणगणा प्राणिन पर्वतास्तथा ।
चर्णीरत्वा विशां म्युदिव्यवपशतेन तु 10
तता द्वादशसूयम्य रश्मय प्रवना भृशम् ।
अभवन द्वादशादित्या जगाग्याप हिना ।1८१
रश्मिद्वारण मरनाम्याने मवनानि च ।
अशन पृथिवा घास मेदिनी नागना गता !!२
नता विनष्ट गया स्थावर जगमे तथा ।
आदित्यरश्मिता देवा रुद्ररपी जनार्दन ॥३
नि मृत्य प्रयम यान पाता HTT.TY ॥४
महार क्यन]
स्थावर
यादित्य
ब्रह्मा के मौ वर्ष के जल में ददव पाप वाले भगवान्
जनार्दन स्वप दम नगत् का अन्न र परम म्प में नीनना को प्राप्त
हो जाते है । ७८1 मबमे प्रथा को मदिता अपनी परम नीण किरणों
और
जगम मम्पूर्ण जगत् के जन का शोषण करके स्वय ग्रहण
लेंगे 11 ७६ ॥ गुप्त वृक्ष-तृप गम-प्राणी तथा पर्वत चूर्ण हावर
दिव्य सौ वर्ष में विशीण हो जाये 1100 फिर वारद मूर्यों की बढ़त
ही अधिक प्रबल किरण टुटे और जगह के माग्य में उपदिन द्वारा
॥१॥ ये सब सूर्य की रिरणों के द्वारा सुदनो मा
दाह पर देते थे। द्यौ और मेदिनी उजता पो प्रान हो गये थे ।।२।।
इसके उपरान्त सम्पूर्ण म्यादर और जगम के विनष्ट हो दान पर बादित्य
की किरण में न्द्रस्पी देव जनार्दन निकतार उन्नत हो पाताल नदी
यो प्राप्त होगय घे ॥?~rn
सप्तपातालसंस्थास्तु नागगन्धर्वराक्षमान् ।
देवानृपीश्च शेपञ्च जघान वरपूलवृक् ।।८५
एव स्वर्ग च पाताले पृथिव्या वागरेषु च ।
ये प्राणिनम्नान् ममस्तान् जघान म जनार्दनः ॥६६
ततो मुखान्महावायु दश्च कृप्टवान् स्वयम् ।
सोव्याहतगतिगांठ ससार भुवननये ॥3
यावद्वपंशतं वायुनं मन भुवनगर्भग.)
सर्वमुसारयामास यन् किचित्तुलाराशिवन् ।
समस्त तत् समुदसायं जगदति समन्ततः ।
विवेश द्वादशादित्यान् स वायुनंदनाधिकः ।।८६
प्रविश्य मण्डल तपा तेजोनि सह मारतः ।
महामेघान ममारंभे देग प्रतियोजितः ॥३०
ततत्वे प्रेरिता मेघास्तेन वातेन देगिना ।
देणाप्यनिरौद्रण पर्यावन नमित्तलम् ।।३१
[ कालिका पुराण सात पाताल के संस्थानो को -नाग, गन्धर्व और राक्षमो को- देवो को-ऋपियो को और शेष को नर शूल के धारण करने वाले ने हनन कर दिया था ॥ ५५ ॥ इमी प्रकार से स्वर्ग में--पाताल मे-- पृथिवी मे और सागरो मे जो भी प्राणधारी जीव थे उन प्रभु जनार्दन ने उन सबको मार गिराया था ॥ ८६ ॥ इसके पश्चात मुख मे महा. वायु का रुद्रदेव ने म्वय सृजन किया था। वह अव्याहत गति वाला वायु दृढता से संसार के तीनो भुवनो मे भुवन के गर्भ में गमन करने वाला सौ वर्ष तक भ्रमण करता हुआ जो भी कुछ था उस सवको तुला राशि के हो ममान उसको उत्सारित कर दिया था ॥८७-८८॥ सभी ओर जगत् में रहने वाले सम्पूर्ण को समुत्सारित करके वेग मे अत्यधिक वह वायु बारह आदित्यो मे प्रवेश कर गया था ॥८६॥ उनके मण्डल में प्रवेश करके उनके तेज के साथ वायु गुरुदेव के द्वारा प्रति- योजित होते हुए महान् मेघो का उसने समारम्भ कर दिया था ॥३०॥ फिर प्रेरित हुए वे मेघ जो उस वेण वाले वायु के द्वारा ही प्रेरित किये गये थे अतिरौद्र रुद्र के द्वारा मेघो ने नभस्तन को भेर लिया था।" सवर्ताख्या महामेधा भिन्नाजनचयोपमा.। केचिधूम्रा.शोणवर्णाः शुक्लाश्चित्राश्च भीषणाः ।।६२ केचिच्च पर्वताकाराः केचिन्तागसमप्रभाः । प्रासादसदृशाः केचित् कोञ्चवर्णाविभीपणाः ।।६३ गर्जन्तस्ते महामेघा वाणामधिक शतम् । ववृपुषीनथो लोकान् प्लावयन्तो महास्वनाः ॥६४ अथ स्तम्भप्रमाणेन धारापातेन वै दृढम् । धारासारेण महता पूरितं भुवनत्रयम् ।।६५ आध्र यस्थानमासाद्य तोयराशी स्थिते ततः। स मुपादसृजद्वायुरद्ररूपी जनार्दन ॥६६ महार-जयन] ममान थे। उनमे कुछ शुक्ल और वर विशाल प्रामाद के तेनीघवायुनाभिता मेघा नवत्सरान्छतम् । अव्याहतगतनाशु विध्वम्ना अभवन्तत ॥६७ नष्टेषु तेषु मधेपु जनताकादिक पुन । रुद्रस्त्वाब्रह्मभुवन ध्वसयामास निर्दय ||६८ सम्वतं नाय पाले महामेष जो भिन्न अन्नन के तो धून दर्ग दाते थे- चिन विचित्र वर्ष वाले महा भीषण थ ॥ ३२ ॥ कुछ मेघ पर्वत क तुल्य मापार मे युक्त थे-कुछ नाग के समान प्रभा म समन्दिन ये-कुछ ममान ये और लौच के वर्ग वाले महान् भीषण ॥ ॥ वे महामेघ गर्जन करते हुए गौ वर्ष से भी अधिक समय तर महान गन्द करने वाले वे मेघ तीनो सांगे वा प्लावन करत हए वषी हुए वर्षा करते थे ।। ६४ ॥ इसके बननर नम्भ (सम्मा) के प्रमाण वाले घाराजा के पास में नृप हट घागनार ने जो वि बहुत ही महान् घी तीनो मुदनो को पूरित कर दिया था 18 ६५ ॥ आधुव- स्थान को प्राप्त करके उल नमूह में स्थित होने पर उन रद्ररूपी प्रभु जनार्दन ने अपने मुप से वाय का जन क्यिा या॥६६॥ न दायु के योप में लिप्त मेघ मौ वर्ष तक अन्याहत गति वाले वायु में द्वारा फिर ध्वस्त हो गये ॥७॥ उन मेयो विनष्ट हो जान पर फिर दया से रहित ददेव ने ब्रह्म भुवन ना उन नोक आदि का विध्वय कर दिया था। विध्वम्तेषु समस्तेषु भुवनेषु विशेषव. । विनप्टे ब्रह्मलोके च द्रोडगाइद्वादशारणान् ॥६६ स गत्वा द्वादशादित्यान् वेगेन महता हरि । अग्रमच्चानिजज्बाल तंगत्यदिवाकरः ॥१०० ततो वह्माण्डमासाद्य रुद्र कालन्तवोपमः। चूचिकार सक्ल मुष्टिपेप महाबल. ॥१०१
[ कालिका पुराण
चूणीवुर्वस्तु ब्रह्माण्ड पृथिव्यपि विचूर्णिता ।
तोयानि च समस्तानि स दध्र योगता हरि १०२
यद वह्माण्डादहिस्तोय स्थित पूर्व समन्तत ।
यद्वाभ्यन्तर्गत तोय तत् सर्वञ्चकता गतम् ॥१०३
एकीभूतेषु तोयेषु सर्वव्यापिषु सर्वत ।
बृह्माण्डखण्डपूर्णाध प्लवन्नासीत् स नौरिव ।।१०४
तत पृथिव्या सारन्तु गन्ध तन्मायक प्रमात् ।
अम्भा जग्राह मकल विनष्टा पृथिवी तत ॥१०५
समस्त भुवनो के विध्वस्त हो जाने पर और विशेष रूप से
ब्रह्मलोक पे विध्वस्त होने पर गुरदेव द्वादश अरुणो के समीप गय थे ।
1६६। वे हरि महान वेग के माध द्वादश आदित्यो के समीप म पहुँचे
थे और उनको ग्रसित कर लिया था फिर उन गर्भ मे स्थित दिवारो
के द्वारा अत्यन्त प्रज्वलित हो गए थे । १००। इसके उपरान काला-
न्तर के समान महान बलवान् रद्रदेव ब्रह्माण्ड में प्राप्त हुये थे और यह
सब को मुष्टि पेप घूर्ण कर दिया था । १०१ । ब्रह्माण्ड को चूर्ण करते
हुये उन्होंने पृथिवी को भी चूणित कर दिया था। उन हरि ने योग के
बल से गमस्त जलो पो धारण घर लिया था । १०२। जो जन पूर्व
में मब और ब्रह्माण्ड से वाहिर स्थित या अथया जो अभ्यन्तर म रहने
वाला गस था वह सब एप रूपता को प्राप्त हो गया था । १०३ । राब
ओर गवं व्यापी जलो वे एकीभूत हो जान पर ब्रह्माण्ड के पण्डो से
पूर्णोध पर गोवा की हो भौति प्सया रते हुए १ । १० । राधे
अनन्तर गृषिधी ना गार गन्ध तन्मात्रय ग ग ग जल मे प्ररण पर
सिपापा और गम्पूर्ण गृषिधी विषष्ट हो गई थी ।१०५॥
पुन स रदस्तेगागि गर्भधानि श्ययायत ।
नि मारयामाग पुन पुगोमूतानि भीषण ||१०६
सानि जागि गपापं जगहु गवंत स्थितम् ।
सहार-यन ] ३३० अन्तबंहिश्च व्रह्माण्डात्तेजो यच्चान्यतो गतम् ।।१०७ जगद्गत सर्वतेजो गृहीत्वा चंपतो ज्वलन् । रौद्रब्रह्माण्डखण्डानि तेजोऽय न्यदहनजले ॥१०८ दग्ध्या ब्रह्माण्डवृर्णानि तेजास्युज्ज्वलितानि च । जलेभ्यो रमतन्मात्र सारभूत ततोऽग्रहीन । गृहीतमारास्ता आप प्रनष्टास्तेजसा तत 11१०६ अप्मु नष्टासु तत्तेज प्रविश्याय सदागति । एकोभृतो महाभाषो स्प तन्मानमत्रहीत् ॥११० गृहीते स्पतन्मान्त्र तेजासि सरलान्यय। विनष्टानि ततो वायु प्रवलोभदवारित ॥१११ महास्वन ततो वायुमासाद्याग्निरिवज्वलन् । रुद्र. मक्षोभयामास तदाफाश स्वय ततः ।।११२ फिर उन रद्रदेव ने गर्भ में स्पिन तेजो का बपने शरीर में निकाल दिया था। पुन भीषण रूप में वे पुजीभूत हो गए थे।१०६॥ उन तेजी ने सब बोर स्थित मवको ग्रहण कर लिया था और भीतर- बाहिर ब्रह्माण्ड से जो तेज पा तथा अन्य से गया हुआ था। सबका ग्रहण किया था ।। १०७॥ जगत् में रहन नाले सम्पूर्ण तेज का प्रहग कग्यै एक ही म्यान में रखते हुए ने गैर ब्राह्माण्ड के सग्डो वो जन में विध कर दिया था ॥ १०॥ ब्रह्माण्ड के चूगों का दाह करये वे तेर उज्यालित हो गये थे फिर जसो से जो उनरी रम तन्माना थी मारभूत पो उगरा महण कर निया था। जिन मार ग्रह्म पर रिया गया वे निस्गार चन तेज द्वारा प्रविनष्ट हो गये थे।१०। जो विनष्ट हो जाने पर दरारे अनन्तर मदा गान ने तेज में प्रकम किया था और वह महा भाग एवीभूत होरर ५ को सन्मात्रा को महल पर निया पा॥ १०॥ एतन्मात्रा ग्रहण पिग जान पर सम्पूर्ण तेज विनट हो पर्व थे। और अनादित वायु प्रदत हो गया जो कि ।
। कालिका पुराण
था ।।१११। इसके अनन्तर वायु महान शब्द वाले को प्राप्त करके
अग्नि की भाति प्रज्वलित होते हुए रुद्रदेव सक्षुब्ध हो गये थे और उस
समय म आकाश वो गया था 1११२स
तेन सक्षुब्धमाकाशमग्रहीन्मरुतस्तत ।
तदगत स्पर्शतन्मात्र ततो नष्ट प्रभजन ॥११३
नप्टे वायौ ततो रुद्र आकाशात रासमग्रहीत् ।
शब्दतन्मात्रक तस्मिन गृहीते विगत वियन् ।।११४
नप्टे नमसि रुद्रोऽसौ काये ब्राह्मे तदाविशत् ।
वाम तदाकुल काय निराधार निरा कुलम् ।
विवेश वैष्णवे काये शखचागदाधरे ।।११५
तत शौरिर्महातेजा काय तत् पाचभौतिकम् ।
शखचा गदाशाङ्गवरासिधरमच्युतम् ।
म्वशक्त्या गजाहाराशु सारमादाय सर्वत ॥११६
निराधार निराकार नि सत्त मिरवग्रहम् ।
आनन्दमयमद्वत देतहीनाविशेषणम् ॥११७
उमग मक्षुब्ध आकाश को वायु ने ग्रहण कर लिया था। उरारे
अन्दर रूप की त.मात्रा को लेकर फिर वापु भी नष्ट हो गया था।
॥११३॥ वायु प नष्ट हा जान पर रद्रदेव ने भावाश से रारा या ग्रहण
पिया था। उगम शद मम्माषा ग्रहण करन पर आयाश विगत हो
गया पा ।। ११४॥ आकाश नष्ट हा जान पर यह रद्रदेव उस समय
म ब्रह्मा र शरीर म प्रधश कर गय प । उस अवसर पर ग्राह्य पारीर
आपुष-निराधार और निराम हो गया था। पिर गंप, धन और
गदा प धारण पण वान भगवान विष्णु प शरीर म उगने प्रवेश दिया
था । ११ ॥ E उपरात महान् तावा भगवान् कृष्ण अपा
पाय भोगितमा यमुन और शव, पक्र तथा गदाधारण
वामा पा गयम मारा पादान परम धागतिक वारा
महार कथन ।
शीघ्र हो त्याग दिवा था | ११६ !
जो दिता आधार वाना तथा
प्राशर से रहित-नि मत्त और नियग्रह था ! जा आनन्द में परि-
पूण-लीत-द्वैत महीन और विना विशेषण वाला पर उसका गाय
कर दिया था 1११७॥
न स्थूल न च सूक्ष्म यजज्ञाय नित्य निर जनम् ।
एमामोन पर ब्रह्म म्वप्रकाश समन्नत ॥११०
नाहो न राजिनं वियन्त पृथ्वी
नासीत्तमो ज्योतिर मूत्रवान्यन् ।
श्रोवादियुद्धवाद्युपलम्ममेक
प्राधानिक ब्रह्म पुमानदामो ॥११६
एव यावतस्थिता सृप्टिस्तायात पालमसप्टिकम् ।
आमोदन पर तत्त्व तत मष्टि प्रवर्तते ।।१२०
प्रकृती सस्थितो पस्मान सर्वनन्मानसचा ।
अहकार महत्तत्व गतो यत् प्राो लय १२१
प्रती राग्थित व्यक्तमतीनप्रनयन्तु तत् ।
सस्मात प्राकृतसाजोऽयमुध्यते प्रतिसन्चर ।।१२२
अय व कथितो विपा प्रायुतायो महालय ।
आदिसप्टि शृणवेमा पथ्यमाना मया पुन ॥१२३
को न ता न्यून है और न गुम हो है जिसका मान नित्य एवं
निरजन है । वह ए हो परराहम है जागभी ओर मे अपन द्वारा ही
माग याला है ॥११८ ॥ भान तो दिन है और न रात्रि ही है।
आराम है और न पृथ्या है। वह तप भी नहीं था और नव ज्योति
भी भी था । गोत्रादि और बुद्धि आदि म उपनम् एव प्राधानिर ब्रह्म
है। गमय म पुयान या ११ दम प्रचार में जब तर यह सष्टि
रिया या तर नर हो यष्टि यास बात या एक ही परतत्व पा पिर
मग मष्टि प्रवृत्त होती है ।।१२०॥ यानि मी त मायानापामार
[ कालिका पुराण
प्रकृति म सास्थत था। जो प्राकृत लय था उसम अहवार और महत्तत्व
गत होगये शो१२१। जो अमीत प्रलप वाला अव्यक्त था वह भी प्रकृति म
मस्थित था इसी कारण से प्रत्यक यह सञ्जा प्राकृत सज्ञा बाला है और
ऐसा कहा जाया करता है ।। १२२ ।। हे विप्रो | यह प्राकृत नाम वाला
महान् तप आपको वतला दिया है। मेरे द्वारा पुन कम्पमान इसका आदि
तृष्टि का आप लोग धवण कीजिए।१२३।
--X--
॥ वाराह-सर्ग वर्णन ॥
कालो नाम स्वय देव सृष्टिस्थित्यन्तकारक ।
अविच्छिन्न स प्रलय स्तेन भागेन केनचित् ।।१
लयभागे व्यतीते तु सिसृक्षा ममजायत ।
ज्ञानरूपस्य च तदा परमब्रह्मणो विभो ॥२
ततोऽस्य प्रकृतिस्तेन सम्यक्सक्षोभिता धिया ।
सक्षुधा सर्यकार्यार्थमभूत् सा त्रिगुणात्मिका ॥३
यथा सन्निधिमात्रण गन्ध क्षोभाय जायते ।
मनसो लोक्पर्तृत्वात्तथासौ परमेश्वर ॥४
स एव क्षोभको ब्रह्मन् क्षोभ्यश्च परमेश्वर ।
स सपोचविवाशभ्या प्रधानत्वेऽपि च स्थित ॥५
इच्छामात्रेण पुरुप शृष्ट्यर्थ परमेश्वर ।
तत सक्षोभयामास पुनरेव जगत्पति ॥६
गुणसाम्यात्ततस्तम्मात् क्षेत्राधिप्तिात् तत ।
गुणव्यजनसभूति सर्गवाले वभूव ह ॥७
माण्डेय मुनि ने कहा-यह पास नाम शाला स्वय देव ही है
मा गगन-पालन और गहार ग वास है। उम पिसी भाग से
वाराह-मग वर्णन १ वह मलय अविच्छिन्न है ॥ १॥ जय रे भाग में व्यतीन हो जाने पर नान करने की इच्छा समुत्पन्न हुई यो । औ शान के स्वरूप वाले स समय में परम विभु को ही बदन की सदा सत्पन्न हुई थी ॥२॥ इस अनन्तर उसके द्वाग प्रति दिन ही भली भांनि पी के द्वारा मनोभिन हुई थी । यह मजुन्य होगर निगुण स्वरूप वाली (यन्व-~तम ये तीन गुण है। वह प्रवृति सभी कार्य करने के यि दूर थी १३॥ विमार में मनिधि मार मै ही गन्ध सीम के हुआ करती है उसी भांनि लोबारे पता होन से यह परमार मन वा होता है ॥ ४ ॥ हे ब्रह्मन् । वह ही शाम को करने वाला है और वही क्षोभ दग्न योग्य होता है। वह मकान और विकास घे प्रधान होने पर भी स्थित है। ५॥ परमवर प्रभु जा पुराण पुष्प यानी चिन दा के करने हो म नटि गो रचना कान ने लिय कारण दुना करना है। इसरे बन्नर उन जगता के स्वामी न फिर भी भशीम किया था ॥ ६ ॥ पिर गुणों के अपात मत्व-~रव और तन इन गुणों के साम्य होने में और क्षेत्र में माता म अधिष्ठित थे उस म्बर्ग अयोन कान के पात्र में गुणों से व्यञ्जन को उत्पत्ति हो गई 1 भो ॥७॥ प्रधाननत्वाइन तमीपवरेच्छासमोरिलात्। महतत्व प्रथमतप्तन् प्रधान ममावृणोत् ।। प्रधानावनातम्नादहतारो व्यजायत । वैवारिकतंजमश्च भूतादिश्च तामरा 13 विविधोयमहकारो यो जालो महतोऽग्रत । भूतानामिन्द्रियागाञ्च स वै हेतु सनातन ॥१० म महाम्नमहार जातमान ममामोत् । तन्मात्राणि तत पर निरऽम्मान समावृतान 110 घम शन्दामात्र स्पर्णन मारमतरम् ।
यहवार [ पालिका पुराण तृतीय रूपतन्मात्र रसतन्मानमेव च ॥१२ पञ्चम गन्घतन्मानमेतानि क्रमशोऽभनन् । प्रत्येक सर्वतन्मान महकार समावृणोत् ।।१३ ससर्ज शव्दतन्मात्रादाकाश शब्दलक्षणम् । शब्दमान तथाकाश भूतादि स समावृणोत् ॥१४ ईश्वर की इच्छा से समीरित प्रधान तत्त्य से प्रथम ही उद्भूत महत्तत्त्व के प्रधान को ममावृत किया था ॥८॥ प्रधान के द्वारा नावृत उम महतत्त्व स अनदार उत्पन्न हुआ था। यह अहड्वार कादिन- तंजम और तामस भूतादि था 181 मवसे आगे अर्थात् पहिले जो समुत्पन्न हुआ था वहीन प्रकार का था। वह सनातन भूनादिको वा और इन्द्रियो का हेतु १०। उस महान ने अर्थात महत्तत्त्व ने उत्पन्न होत ही अहङ्गार का समावृत कर लिया था। उस समावृत अहङ्कार से पाच तन्मापारे समुत्पन्न हुई थी ॥५१॥ मवमे पहिले शब्द तन्मात्र और उसके अनन्तर स्पश सन्मान समुत्पन्न हुए। तीसरी रूप त मात्रा और फिर रसनन्माना एवं पाचवी गन्ध त-माभा कम से ही समुत्पन्न हुई थी। उन सभी न मात्राओ मे प्रत्येक तन्मात्रा को अहङ्कार ने समा- वृत कर लिया था ॥ १२–१३ ॥ फिर उन परमेश्वर प्रभु ने शब्द ये लक्षण वाने आवाश वा शब्द की त-मात्रा में सृजित किया था। उस प्रकार से गन्द मात्र आकाश को उम भूनादि ने समावृत कर लिया भा॥१४॥ शब्दतन्मात्रसहितात स्पर्शतन्माततस्तत । वायु समभवत् म्पशगुण शब्दसमन्वित ॥१५ आकाशवायुसयु क्ताद्रूपतन्मानतस्तत । तेज सममवद्दीप्त सर्वतम्तदवर्धत ॥१६ तच्छन्दवत् स्पर्शवच्च रूपवच्च व्यजायत । ततो वियद्वायुतेजोयुक्तातोय ससर्ज ह । रमतन्मात नम्पर तेन व्याप्त ममन्त. ।।१७
३४३
वाराह-मर्ग वर्णन ]
तोयान्याधारशक्तिर्या विष्णोरमिनतेनमः ।
सा दधेय निराधाराप्यनितान्दोलितानि दे॥१८
तेषु बीजं प्रथमत: मनजे परमेश्वर ।
सदण्डमनदहेम सहनासमप्रमम् ।।१३
महादादिविशेपार्लराध मर्वतो दृतम् ।
बाविद्गनिलाकामतमो भूतादिना यहि ।
वृतं दशगुणरण्ड भूतादिमंहता तया ॥२०
वीजं यथा वाह्यदलंयोप्तमस्ट टया पुन ।
तोयादिभिन्नया व्याप्त ब्रह्माण्डमतुन द्विजा. १२१
मन्द तन्मात्रा व नहित मर्ग नम्माना में मन्द में नमन्वित
स्वर्ग गुग वाला वायु नमुत्पन्न हुआ था । १५ । आपाश और वायु ने
मयुन म्प नन्माना में दीपमान वेन हुमा था जो भी जार में
नम्बधित
हमा पा 1१६। वह गद वाला~र्ग वाला मार म वाला
समुत्पन्न हुना था। इन मराल वायु सेज ने युक्त विपद ने जल की
उत्पत्ति हुई थी। वह रन तन्माली भांति सभी ओर से उनके
द्वारा व्यास हो गया था 1१1 चलोगे का अपारमित वाले भगवान्
विष्णु की भाधार शनि है। उसने निराधार और अनिल के द्वारा
जान्दोलितों को धारण किया था 1१1 बने प्रपन परमेश्वर प्रभुन
उनन वोन का वन दिया था। वह रोज हेम जाड हो गया था रिस
कट की पमा नरमाणु केही समान थी । १६। महत्तद ने आदि
नेवर विशेष के अन्द पर्यन्त मन में नमादृत होपर आरम्भ किया था।
वादि इन-अग्नि-अनिल----तम चार भूतादि में नमाद
दिन नरद म महान् ने भूतादि होते हैं वह बन्ड दस गुणो से सात
था। जिम गेनि से वात्य दोन जियाराता है टीम
मानि में है रिली! यह तो दिनुव बहाद माता
वदण्डमध्ये स्वयमेव विष्णु
न्यप दिनिधाय पापम् ।
। कातिका पुरम दिव्येन नानेन स वर्षमेक स्थितोऽग्रहीद्वीजगण स्वाध्या ॥२२ ध्यानेन चाण्ड स्वयमेव कृत्वा द्विधा स तस्थौ क्षणमात्रमस्मिन् । तदेव तन्मात्रगण समस्तै- गन्धोत्तरभू रमुनव सृष्टा ।।२३ स्पर्शम्य शब्दम्य समस्तरूप- गृणम्य गन्धस्य रसस्य चंपा। आधारभूना सक्लै कुता य- तन्मात्र वगैरसिला धरित्री ॥२४ जातस्तदुत्थ कनकाचलोऽसौ जरायुभि पर्वतमचयोऽभत् । गर्भादिक सहपयोधयस्तु म्कन्धद्वयन निदशालयोऽभूत् ।।२५ स्व धनापरदेशजेन सप्नाभवन्नागगृहाणि तानि । पातालसशानि महापानि यन्त्र रचय रयान परतो महेश ॥२६ नेगोगणात्तग्य वभय लोगो योगो मोति शुतोभा । जनावयोभारतीय गर्भाद ध्यानात्तपातोपवगे बभूव ॥२७ अण्डोधगम्यागमतत्तु सत्य महाण्डयनपरि विष्णग। परे पद यन्निगन्ति धारा पानगम्य पटि॥२८
वारा:-मग वन ]
1
उमबारदे मध्य में भगवान विशुन्नर ही वहा त्वरूप
दाने गरीर को नु कर दिव्यमान में वह एक वर्ष पनि स्थित होकर
उन्होंने अपनी बुद्धि ने बीवल्प को प्रहह्म दिया था ।२॥ ध्यान के
मागस अपद गेन्वय हो दो भागों में से वह एक बार उनम
मम्भिर रहे । उनी समय में इसी के द्वारा नष्ट गन्धोत्तर ममम्म
नमानी के नम्ह हुए थे। २३ । और यह सगं-द-मनन
पपत्र और ग्म को आधार भूत यो और नमन उम तन्मात्राओ
ने समुदाय में गम्मा पृथ्वी आधार में गयी पी । २४ । उनमे उस्थित
हनों मे यह वनका चा मनुपन हुआ था और जटापुओं में पर्वतो या
का सञ्चय हुमाया। गन्धोदनों से मात मागर हुए और दो स्वचा मे
विदालय अात् देवों के निवाया न्यान हुआ पा 1 २५ । दूसरे देश
में उत्पन्न हो मलों में वे मात नागों को गृह हो ये। जिनकी नदा
पानगर बौर जो महान मुन प्रद है वहां पर पहेग म्दय रहते हैं।
1 २६ । मरे तेजों के समूह में यह नाक उतान्न हुआ था जो दि
मदोर-ट्स नाम में इन हुआ था। गर्भ में मत उन नो नाम
काला गया। और ध्यान में परम तरोनार स्पन्न ना था।
120 टन बन्द की अब मन मन्द नार ममुत्पन्न हुआ था। उस
प्रसार र मनवान रघुत दिन है दिनकी पीर पुरुष
परस पर कहा करते है और समान के हो द्वारा जानन में सरोग्य तथा
पन्निहित में समदिन है 10511
एवं विधाय प्रथम वभव
विप्न्वघ्पी म्यिनये म एच ।
म्ययं समद्भानुतोष
म्वनिति यानिवार विष्णु
तवोमवत् पनवगहम्पी
पिय प्रौद्धनाय पोन ।
। कालिका पुराण निमज्जमाना पृथिवी स मध्ये भित्वा गतो धर्तुमधोतिऽवेगात् ।।३० दष्ट्राग्रदेशे विनिधाय पृथ्वी म उद्गत सर्वमतीत्व तोयम् । ततोऽभवत् सप्तफणाण्वितोऽय- मनन्तमूर्ति पृथिवी विधर्तुम् ।।३१ प्रसार्य शेषोऽपि फणा स वैप मध्ये निधायकफणा धरित्रीम् । दधार तोयोपरि तोयसस्थित- स्ततोऽत्यजद् यज्ञवराह उर्बोम् ॥३२ प्रसारिता फणा स वास्तासामेका तु पूर्वन. । अपरा पश्चिमाया तु दक्षिणोत्तरयो परे ॥३३ एका गता फणैशान्यामाग्नेय्यामपरा दिशि । पृथ्वीमध्ये स्थता चैया नसत्या तस्य वै तनु । शन्या दिग्वायवी तत्र ततो नम्रा स्थिता क्षिति ॥३४ म तु दीर्घतनुस्तौये यदानन्तो न चाशक्त् । धर्मम् पी तदा भत्वानन्त कावमधाद्वरि ॥३५ इग गति में गयम प्रथम विष्णु के स्वरूप दाते हुये थे और ये ही स्थिति अर्थात् पाताये लिये हुए थे। क्योकि ये स्वय ही गमत्पन्न शरीर वाले थे अर्थात नवी उत्पत्ति स्वयं अपनी इच्छा गेही हुई थी और इनको विगी ने उत्पन्न नही दिया था। अनएर उग भगवान् विष्णु ने स्वभू - यह प्रमिद्धि प्राप्त की थी । २६। इगये अनन्तर भगवान विष्णु या व राह पधारी जा भूगि में गमुतरण परम पिय परमाधि पीन थे। उन वगा 4 पधारी प्रभु ने मध्य निन हाती गपृथ्वी पानंदन कप अन्यधिक ग स सादर घरे पर । ३० । पानी दादप भाग म पृषी पाएपर ये गपूर्ण
वागह-पगं वर्ग
जल का अनि क्रमण करके पर आमत हो गये थे। इसके अननर यह
मान फलों में मयुन अनन्न की मूत्ति होकर इम पृथ्वी को धारण करने के
लिये प्रकट हो गये थे 1३१। शेषनाग ने भी अपने फन को फैलाकर
और उसने एक फर पर धरिती को धारण करके जल में मंस्थित होते
हुए जन के ऊपर उमको रख दिया था और यज्ञ व राह ने भी पृथ्वी
को त्याग दिया था ।३२। उन शेष ने सभी फनो को फैला दिया था।
उनमें में
एक फन तो पूर्व दिशा की ओर था दूसरा पन पश्चिम मे था
और दूसरे पन दक्षिण और उत्तर दिशा की ओर थे । उनका एक फन
ऐलानी दिशा में और दूमग फन आग्नेय दिशा में था। एक फन पृथ्वी
के मध्य में था और उसका ननु नैऋत्य दिशा में था। वहां पर वायव्य
शून्य
थी। फिर नम्र मि स्थिन थी। वह दीघं ननु जल मे पा
जिमको अनन न धाएर मके थे। उन ममय में हरि कूर्म के स्प
वाले हो गये थे और अनन्न के काम को उन्होंने धारण किया था ।
अघी बहाण्डखण्ड स पद्भिराक्रम्य कच्छप. ।
ग्रीवान्वितम्य वायव्या पृष्ठेन्नन्नमधारयत् ।।३६
अनन्नः कूर्मपृष्ठे तु नवनिप्टनम्तनुम् ।
निधाय पृथ्वी द मुखेनेय महातनुः ॥३०
ततः फणास्वनन्तस्य चलन्तो पृथिवी न्यिता।
वराह. कर्तुमचलामचलामकरोद्द,टाम् ॥३८
मेर पुरप्रहारेण प्रहृत्य पृथिवीतलम् ।
न्यसनत म विवेशाय पृथ्वी भित्वान्तरं ततः॥३६
योजनाना महस्राणि पोदर्शद रमातलम् ।
प्रविवेश महाशंलो वराहाघ्रिप्रहारतः ॥४०
हाविशत्त महस्राणि योजनाना तु विस्तृतम् ।
मेरो. शिरोऽभवत्त न प्रहारेण द्विजोत्तमाः ॥४१
मयांदा पवंतनायम्य पावं पोत्री तदापरोन् ।
३४८ [ कालिका पुराण यदा चलति नैवैप पर्वत वृथिवीधरः ॥४२ उम कच्छप ने अपने चरणो से नीचे ब्रह्माण्ड खण्ड का आक्रमण करके वायथ दिशा में ग्रीवान्वित के पृष्ठ मे अनन्त को धारण किया था। ३६ । विशाल शरीरधारी भगवान् अनन्त देव ने कूर्म के पृष्ठ पर नौ वेष्टनो (लपेटो) से अपनी शरीर को देखकर सुख से ही पृथ्वी को धारण किया । ३७। उमके अनन्तर अनन्त देवका फन पर चलती हुई पृथ्वी स्थित हुई थी वराह भगवान ने इस पृथ्वी को अचल बनाने का प्रयत्न किया था और उमको अति सुदृढ अचलायमान पर दिया था। । ३८ । मेरु पर्वत वो अपने सुरों के द्वारा प्रहत करके पृथ्वीतल में गाड दिया था। फिर उसका भेदन करके वह पृथ्वी के अन्दर प्रवेश कर गये धे । ३६ । वराह भगवान के चरणो के प्रहारो मे वह महान पर्वत मोलह महस पोजन तक रसातल में प्रवेश पर गया था । ४० । हे द्विजोत्तमो | मेपर्यंत या शिर उससे यत्तीस हजार योजन के विस्तार पाला हो गया था । ४१। उग अवगर पर उग पवंतो के नाथ भैरवी पौत्री मर्यादा पी थी। यह पृथ्वी पर पर्यंत जब यह नही पलता है ॥ ४२ ॥ हिमवत्प्रभृतीनाच भाग भाग मपचकम् । पदा शित्यन्तरं च तदुच्छायप्रमाणतः ।।४३ तनो यत्या वराहाय नमस्कृत्य महोजसे। अर्धनारीश्वर पायाद् देवदेव व्यगायत ॥४४ प्रयम जातमात्र मप्रररा महान्यन । निरोदिशीनिस प्रत्यारन्त प्रत्यवाय ॥४५ नाग देतीति त गोज्य प्रत्यवान माश्यरः । पनामा गेदनात मा गतीगत माशय ६ एबमुम पुन गोप गप्नवागन गदग । मणिनामानि गप्त प्रमागत गुण ॥४
वाराह-मग वर्णन ]
शवं भवं च भीमञ्च महादेव चतुर्थकम् ।
पञ्चम चोग्रमीशान पष्ठ पशुपति परम् ॥४%
मया चया विभक्तस्त्व तथात्मा म्वो विभज्यताम् ।
त्वयापि भूरिसृप्टवर्थ भवाश्चापि प्रजापति ॥४E
उम उच्छाय के प्रमाण म हिमवान प्रमृतियों में सपना
भाग-भाग दो पद में क्षिनि के अन्दर कर दिया था ।४। इसके
उपरान्त ब्रह्माजी ने महान् ओन वाल वराह भगवान का प्रणाम निया
पा मोर देवो के देव बध नारीश्वर का गरीर स ममुपल किया था।
१५५ । पहिले ही उत्पन्न होन क माथ वह महान् ध्वनि वात व रुदन
वरन लगे ये । ब्रह्माजा न उन स कहा था कि तुम वो ग रहे हा ।
उन महेश्वर ने उत्तर दिया था कि उनका नाम रक्खा। रुदन परन स
वे स्ट्र नाम वाले हुये थे। उन ब्रह्माजी न कहा-हे महाशय
आप
रुदन मत करा ४६। इस प्रकार में न्ह हुए वे द मान चार रोप
थे । अर्थात् सान बार उन्होंने रुटन दिया था। पिर ब्रह्माजी ने इसने
उपरान्न सात दुसरे नाम दिये । ४७ । गर्व-व-भीम और
चौथा नाम महादेव दिया था। पांचवा नाम उप्र-४४ा नाम दंशान
और पर पशुपति ये नाम क्यि थे । ४.1 ब्रह्मा जी ने कहा- मेरे
द्वारा जिम प्रकार से आपका विभाग किया गया है न ही आप अपने
मापसे विभक्त वारि । याप भी बढ़त हाट के ही लिए है और बाप
भी प्रजापति हैं । ४६1
ततो ब्रह्मा द्विघा भूत्वा पुस्पोधन सोम्भवन् ।
अर्धन नार, तम्या तु विराजममृजत् प्रभु.॥५०
तमा भगवान् ब्रह्मा कुरु सृष्टि प्रजापते ।
तपनस्तपत्वा विराट् मोऽपि मनु स्वायम्भय तव ॥५१
समज सोऽपि तपमा ब्रह्माण पर्वतोपयन् ।
तोपिनस्लेन मनसा दक्ष राष्टय समजं स. ॥५२
[ कालिका पुराण
सृप्टे दक्षेऽय दशधा प्रपातो मनुना विवि ।
पुनरेव सुतानन्यान ससर्ज दश मानसान ॥५३
मरीचिमत्र्यगिरसौ पुलस्त्य पुलह ऋतुम् ।
प्रचेतस वसिप्ठच्च भृगु नारदमेव च ॥५४
एतानुत्पाद्य मनसा मनु स्वायम्भूव पुन ।
यूय सृजध्वमित्युक्त्वा लोवे शाऽन्तर्दधे पुन ।।५५
इसके अनन्तर ब्रह्माजी दो भागा म विशक्त हो गए थे ।
अपने आधे भाग में पुरुष हए थ और आधे भाग म नारी हो गए थे।
और उमम प्रभु ने विराज का सृजन किया था । 101 उसको भगवान
ब्रह्माजी न कहा था-हे प्रजापते | गृष्टि की रचना करो। उस विराट
न भी तपश्चर्या का तपन करके उसन स्वायम्भू मनु का सृजन किया
था । ५१ । उस स्वायम्भू मनु ने भी तप करके ब्रह्माजी को परितुष्ट
कर दिया था। उसके द्वरा तुष्ट हुए ब्रहमानी ने सृष्टि की रचना करने
के लिए अपन मन से दक्ष का सृजन किया था अर्थात् दक्ष को मन से
हो उत्पन कर दिया था । ५२ । दभ के सृष्ट हो जाने पर मनु
द्वारा दश वार ब्रह्मा प्रणत इए ये और फिर भी और दश मानस पुत्री
की गृष्टि की थी। ५३ । उन पुत्रा के नाम य हैं--मरीचि-अत्रि--
अङ्गिरा-पुनस्त्य-पुराह -क्रतु प्रचेता-वसिह-मगु और नारद ।
। १४ । इन सबका उत्पादन करव जो कि मन वे ही द्वारा हुआ था
पिर स्वायम्भू मनु स उन्हान कहा या दि आप गृजन करो-यही वह
पर साकाये ईश बह्माजी अनर्धात हागप थे । ५५ ।
वराहोऽप्यथ पोत्रेण नित्वा सप्तसागरान् ।
पृथिव्या वलयाकारान् ससर्ज परभेश्वर ॥५६
सप्तधा भ्रमणनामो सृष्ट्वा सप्ताथ सागरान् ।
गप्तदीपानवधिय पृथिव्यन्त ततो गत ॥५७
सोपालोपावर शेल दृश्या पृष्ट्यास्तु रष्टनम् ।
में
सृष्टि कथन (१)]
३५१
लक्षद्वयोच्छित माना योजनाना समन्तत ।
मुहट म्यापायामास भित्तिप्रान्ते यथा गहम् ॥५८
आदिसप्टिरिय विप्रा यथिता भवता मया ।
प्रतिसर्गमह वक्ष्ये तच्छृण्वन्तु महर्षय ॥५६
वराह भगवान ने इसके अनलर पोत्र के द्वारा सान सागरा को
खोद कर परमेश्वर ने पृथिवी म उनको वलय के आवार वाले बनावर
मजन किया था । ५६ । दराने उपगत इहाने मात वार प्रमण बरन
के द्वारा सात सागरों की रचना करक मात द्वीपो को अवच्छिन करके
वे फिर पृथिवी ने अन्दर चले गए थे । ५७ । लोकालोव पदत का इस
पृथ्वी का बटन वना करके स्थित कर दिया था जो महान् शैल मान स
दो लाख योजन ऊंचाई वाला था मा वि सभी ओर स भा। उसको
मुटढ रूप स भित्ति प्रान्त में गृह की ही भांति स्थापित कर दिया था।
1५८ । हे विप्रगणो । मैंने आप लोगा वे समक्ष म यह आदि सृष्टि
का वर्णन कर दिया है । हे महर्पियो । प्रति सम म मैं इसको यतला-
ऊँगा उस आप श्रवण करिए १५६||
॥ सृष्टि कथन (१)॥
पाराहोय श्रुत सर्गो वराहाधिष्ठितो यत ।
प्रतिराग श्रुत सर्वदक्षाय पृत पृथक् ।।१
रुद्रो विराप्मनुदक्षो मरीच्याद्यास्तु मानमा ।
य य सर्ग पृथक् वा प्रतिसगश्च स स्मृत ॥२
विराट, सुताऽजद्वश्यान्मनून् यवितत नगत् ।
मनु सप्त मनून सृष्ट्वा चकार बहुश प्रजा ॥३
[ कालिवा पुराण प्रजा सिसृक्षु म मनुर्योऽसौ स्वायम्भुवाह्णय ! असृजत् प्रथम पड वै मनून सोऽथ पगन् सुतान् ।।४ स्वारोचिपश्चौत्तमिश्च तामसो रैवतस्तथा। चाक्षुपश्च महातेजा विवस्वानपरस्तथा ॥५ यक्षरक्ष पिशाचाश्च नागगन्धर्वकिन्नरान् । विद्याधरान-सरस सिद्धान् भूतगणान् वहून् ॥६ मेधान् सविध तो वृक्षान लतानुल्मतृणादिकान • मत्स्यान् पशू श्च कीटाच जलजान् म्थलजास्तथा ॥७ माकण्डेय महाप ने कहा- यह आप लागो न वराह सगं का श्रवण कर लिया है क्योकि यह वराह से ही अधिहित है। आप सवन प्रतिमर्ग का भी श्रवण क्यिा है ओ दक्ष आदि के द्वारा पृथन किया गया था ॥ १॥ विराट--रद-मनु-दक्ष और मरीचि आदि मानस पुत्री ने जिस-जिस सर्ग को पृथक् किया था वह प्रतिसगं भी कहा गया है । ॥२॥ विराट सुत ने यश म हान बाल मनुओ का सृजन किया था जिनके द्वारा यह जगत् वितत किया गया है । मनु ने सात मनुआ की रचना करके बहुत सी प्रजा को बना दिया था। अर्याद बहुत अधिक प्रजा की सृष्टि करदी थी । ३ । प्रजी वो सुष्टि करने की इच्छा वाले मनु ने जो स्वायम्भव नाम वाली थे। उन्हाने दूसरे गुत छ मनुओ का सजन दिया पा॥४॥ उन ; मनुमा के नाम ये हैं-स्वाचिप- औसमि-तामरावत-चारुप और महान तेज मे सयुत विवस्यान् ॥५॥ स्वायम्भू मनु ने यक्ष-राक्षस-पिशाच-नाग--गन्धर्व--- विन्नर-विचाधर---अप्सराए -सिद्ध भूतगण-मप जो विद्युत सहित पे-स-ससा---गुरम तृण आदि-मत्स्य-~-पशु-पीट-उस में समुत्पन्न होने वाले और स्थरा म गगुरपन्न-इन मयको रपना पी पी ॥६॥७॥ एताहशानि गर्वाणि मनु ग्यायम्भुव. गुतं । राहिल. गगजे गोऽन्य प्रतिया प्रबोनित ॥८ [ कालिया पुराण दैत्य और दानव सभी उत्पन्न हुए थे। यह उसका सर्ग कीर्तित हुआ था ॥१४॥ अबेर्ने त्रादभूच्चन्द्रश्चन्द्रवशस्ततोऽभवत् । तेन व्याप्तं जगत सर्व सोऽस्य सर्गः प्रकीर्तित ॥१५ अथर्वागिरसा पुत्रा पोत्राश्च वरशोऽपरे । मन्त्रयन्नादयो ये वै ते सर्वेऽङ्गिरस स्मृता. ॥१६ आज्यपाख्या पुलस्त्यस्य पुत्राश्चान्ये च राक्षसा । प्रतिमर्ग पुलस्यम्य वलवेगसमन्विता ॥१७ काद्रवेया गजा अश्वा प्रजा वहुतरास्तथा । ससृजे पुलहेनंप सर्गस्तस्य प्रकीर्तित ॥१८ कनो पुत्रा वालखिल्या सर्वज्ञा भूरितेजसः । अष्टाशीति-सहस्राणि ज्वलद्भास्करसन्निभा ।।१६ प्रचेतस. सुता सर्वे ये वै प्राचेतसा स्मृताः। पडशोतिसहसाणि पावकोपमतेजस ॥२० सुकालिनो वसिष्ठस्य पुत्राश्चान्ये च योगिनः । आरुन्धतया पचाशद्वासिष्ठ सर्ग उच्यते ॥२१ अवि पि के नेत्रों से पन्द्र देव ने जन्म धारण किया था और तभी से यह चन्द्रवश हुआ था। उग चन्द्रधश से यह सम्पूर्ण जगत् व्यास है और वह इगया ही गर्ग कोक्तित किया गया है। १५ । अथर्वाङ्गिरस बहुत मे दूरारे पौत्र हए । जो भी मन्त्र और तन्त आदि ६ गव अङ्गिग वहे गये है । १६ । पुलस्त्य में आज्यप नाम वाले पुत्र हुए थे और अन्य राग भी हुए थे। यह पृगस्त्य वा प्रति सर्ग है जो दस और वैग मे गन्धित पा1१७ पाइवेय-गज-अध आदि पहन यधिर ना हुई थी। पर गां प्रगह न पिया था अर्थात् गरी यष्टि वो थी। पतएर यह इगमा हो मर्ग वहा गया है । १८ । प्रतु ऋषि वार नि पो गभी कुछ गान ग्यने वाले और परमा. म पुत्र
मष्टि-क्थन [१) ]
धि तज मे मयुत थे । ये अट्ठामो हजार थे जो कि जाज्वत्यमान सूर्य
पे ही समान हुए थे 1981 प्रचेता के जो मव पुन हुए थे वे सब प्राचेतस
इम नाम से प्रथित हुए थे। य लियासी हजार सध्या म थे और अग्नि
के महशतजस्वी
हुए थे १२०६ वयिह सुपि के मुकाली सुत हुए ये और
दूसरे योगी थे। ये अमन्धती म नमुत्पन्न पचास बारभनय कहलाय
थे। यह यामिष्ठ अर्थात् वरिष्ठ मुनि का मग पा जाया परता
भृगोश्च भार्गवा जाता ये च दत्यपुरोधस ।
क्वयस्ते महाप्राज्ञारतातमखिल जगत ।।२२
नारदात्तारका जाता विमानानि तथैव च ।
प्रश्नोतरास्तथैवान्ये नत्यगीत च कौतुवम् ॥२६
एते दक्षमरीच्याद्या वृतदारान पहून् सुतान् ।
उत्पाद्योत्पाद्य पृथिवी चि च समपूरयन् ॥२४
तेपा सुतेभ्यश्च मुतास्नपुप्रेन्य परे सुता ।
गमुत्पन्ना प्रवर्तन्ते ह्यद्यापि भुवनेषु वै ॥२५
विष्णोस्तु चापो सूर्यो मनसावन्मा स्मृत ।
श्रोत्राद्वायु ममुदभूतो मुखाग्निरजायत ।।२६
प्रतिसाहाय विष्णुस्तया चापि दिशो दश ।
सृष्टयर्थ चन्द्रमा पश्चादनिनवादवातरत् ।
भास्तार रश्यपारमानो भायया च ममन्वित ।।२७
भगु पि गे जा उत्पन्न हुए व भार्गव ये जो देत्या पुरोहित
५य पाय योर यहा विशाल युद्धि वाल हुए थे। उनम यह मम्पून
जगत् ग्यास है । २२ । नारद म सारसा ने जन्म प्राप्त रिया था तथा
दिमान हुए थे एवं अन्य प्रश्नोत्तर ग-नृत्य-गी और मौतुर हुए
६१२३ 11 दश और मरीचि आदिम दारामा
बार गे पुत्रा पा मम्पादन बर-रये इस पृषी को भौर ।।
प्रहम ररन वाले
[ कालिका पुराण को पूरित कर दिया था । २४ । उनके सबवे पुनो के भी पुत्र हुए और फिर उन पुत्रों के भी पुन हुए थे। ये समुत्पन्न पुत्र आज भी भुवनो मे प्रवृत्त हो रहे हैं । २५ । भगवान् विष्णु की आँख से सूर्यदेव और मन से चन्द्रमा बताया गया है। श्रात्र से वायु समुद्भूत हुआ था तथा भग- वान विष्णु के मुख से अग्नि ने जन्म प्राम किया था। २६ । यह प्रति सर्ग विष्णु है उसी भांति दश दिशाऐ भी हुई थी। पीछे सृष्टि की रचना करने के लिए चन्द्रमा अग्नि नेत्र मे अवतरित हुआ था। भगवान् भुवन भास्कर कश्यप से समुत्पन्न हुए थे जो भार्या के सयुत थे ।२७। रुद्राश्च वहवो जाता भूतग्रामाश्चतुर्विधा । श्ववराहोष्टम्पाश्च प्लवगोमायूगोमुखा ।।२८ क्षमार्जारवदना सिंहव्यामुखा परे । नाना शस्त्रधरा सर्वे नानारूपा महावला ॥२६ एप व प्रतिमर्गोऽपि कथितो द्विजसत्तमा । दैनन्दिन च प्रलय शृणुध्व कल्पशेपत ॥३० बहुत रा रुद्रा उत्पन्न हुए थे और चार प्रकार के भूत माम हुए । श्वा-वराह और उष्ट्र रूप वाले प्लव-गोमायु-गोमुरा--रोछ मार्जार के मुख वाले थे तथा दूगरे सिंह और व्याघ्र के मुख थाल थे। मभी अनेक प्रकार के शस्त्रो के धारण करने वाले प तथा विभिन्न और अनयो ए वाले थे एव महा बल रो युक्त ये ॥ २५-२६ ।। है दिन छा। यह प्रति रार्ग आपो वतला दिया गया है। अब दैनन्दिन अर्थात दिना दिन गे होने वाली प्रलय को यल्प शेषस आप लोग श्रवण पोजिए।
मुष्टि क्थन (२)
॥ सृष्टि कथन (२)॥
मन्वन्तर मनो कालो यावत् पालयते प्रजा ।
एको मनु स कालस्तु मन्यन्तरमितिश्रुतम् ॥१
तदेकसप्ततियुगदेवानामिह जायते ।
तेश्चतुर्दशभि कल्पो दिनमेक तु वेधस ॥२
दिनान्ते ब्रह्मणो जाते सुपुप्सा तस्य जायते ।
योगनिद्रा महामाया समायाति पितामहम् ॥३
नाभिपद्म प्रविश्याथ विष्णोरमिततेजस ।
सुख शेते स भगवान् ब्रह्मा लोकपितामह ॥४
ततो विष्णु स्वय भूत्वा रुद्रम्पी जनार्दन ।
पूर्ववन्नाशयामास स सर्व भुवनत्रयम् ।।५
वायुना वहिनना सार्घ दाहयामाम वं यथा ।
महाप्रलयकालेपु तथा सर्व जगन् त्रयम् ।।६
जन यान्ति प्रतापार्ता महलोक निवामिन ।
प्रैलोक्यदाहममये पोडिता दारणाग्निना ॥७
मायण्डेय मुनि ने कहा-यह मन्वन्तर मनु या काल होना है
जिन पर्यन्त वह मनु प्रजाओ का पलाया परता है । यह एक ही
मनु होता है और वह पान मन्वन्तर---इस नाम म प्रसिद्ध होता है
॥१॥ वह देवो के दरुहतर युगों ग यहाँ पर होता है । तात्पर्य यह
है कि एर मार म अर्थात् पर ही मनु के नाम म देवगणो ये इष.
स्तर युगा का समय हुआ पर है। ऐगे चौदह मन्वन्धरा पा एक
पन्न होना है जो ब्रह्माजी का एक निहुमा करता है ।।२। ब्रह्माजी
दिन ये अन्त में उनको मोन पी इछा उत्पन्न होती है और फिर
महामाया पांगनिद्रा प्रमाजी रिट भा जाया करती है ॥३॥ मरे
अनन्तर ये लोगो में पितामह ग्रह्माजी न अमामत तक याने
३५८ ! कालिका पुराण विष्णु के नाभि के पद्म में प्रवेश करके वे सुख से शयन किया करत हैं ॥ ४ ॥ उसके पश्चात भगवान् विष्णु स्वय रद्ररूपी जनार्दन होकर उन्होने पर्व की ही भांति सम्पूर्ण तीनो भुवनो दा विनाश कर दिया था ॥ ५॥ वायु वे माघ वहित ने महा प्रलय कालो मे जैसे हो वैसे ही सम्पूर्ण तीनों जगतों का दाह पर दिया था ॥ ६ ॥ प्रताप से आत होकर महाव के तिवामी जन जनलोक को प्रयाण किया करते हैं क्योकि जब तीनों लोको के दाह होने के समय मे उस दारण अग्नि से जन प्रपीडित हो गये ॥९॥ तत कालान्तक धैर्नानावणैर्महास्वने । समुत्पाद्य महावृष्टिमार्य भुवनत्रयम् 115 चलत्तरगंस्तोयोधैराध्रु वस्थानसगतं । निधाय जठरे लोकानिमाधीन स जनार्दन । नागपर्यकशयने शेते म परमेश्वर ॥ शायान नाभिकमले ब्रह्माण स जगद्गुरु । सस्थाप्य त्रीनिमाल्लोकान दाध्वा जग्ध्वा श्रिया सह ।।१० शेते म भोगिशय्याया ब्रह्मा नारायणात्मक । योगनिद्रवश जातस्त्रलोक्यनासहित ॥११ लोक्यमपिल दग्ध यदा वालाग्निना तदा। अनन्त पृथिवी त्यक्त्वा विष्णारन्तिक्मागत ॥१२ तेन त्यक्ता तु पृथिवी क्षणमायादधोगता । पतिता पूर्मपृष्ठे च विशीर्णव तदाभवत् ॥१३ पूर्मोऽपि महतो यत्नाच्च लन्ती पृथिवी ले। ब्रह्माण्ड पद्भिरात्र म्य पृष्ठ दधे धरा नदा ॥१४ गरे आता पाना तक महामेधो जिनकी गजन यो महाध्वनि थी, गमुत्पादित वर्ष महा वृष्टि में तीनों भुवनी या बापूरित परी पपती तरी याले उनी ये गहो ग जो प्र.य पान पर्यत यानिका पुगन तालवृन्तं तदा च सशेप पश्चिमा फ्णाम् । स्वपन्त वीजयामास शेपरूपी जनार्दनम् ॥२० शष चा नन्दवासिमिपुधी द्वे महावल । ऐशान्ययाथ फणया स द गरुड तथा ॥२१ ब्रह्माण्ड के खण्डा संयोग स यह पृथ्वी चूर्ण हो गयो थी- इससे भगवान् कर्म रूप धारी जनार्दन ने उसको परियहीं। कर लिया ॥१५॥ चलते हुए जल के समूह से ससर्ग से चलती हुई धरा से उम समय मे कूमं पृछ वहुनर करण्डो से विती मत अर्थात् विस्तृत कर दो थी। १६ । सात भगवन् उम समय में क्षीरोद सागर में गये थे वहा पर उन्होंने देखा था कि भगवान् जनादन प्रभु अपनी श्री के साथ शयन कर रहे थे । १७ । मध्य म रहने वाले फन से लोक्य के पास से उप वृहित को धारण कर रहे थे। महान् वल वाले ने पहिले फन को चौडा कर ऊर्ध्व भामे पद्म बनाकर उन शेप नामधारी ने परमेश्वर भगवान् विष्णु को समाच्छादित कर दिया था । १८ । अनन्त ने अपने दाहिने पन को उनका उपधान तकिया बना दिया था। महान् बलवान उनने उत्तर पन को चरणों की ओर तकिया बना दिया था , १६ उस समय मे उन शेप ने पश्चिम फन को ताल वृत कर दिया था। शेष रूप धारी न शयन करते हुए जनार्दन प्रभ पा व्यजन किया था। । २० । महान बलधागे उनने ऐशानी फन से शख~-चक्र-नन्दन भमि और दो इप्टुधीयों को और गरुण को धारण किया था ॥२१॥ गदा पद्म च शाङ्गश्च तथैव विविधायुधम् । यानि चान्यानि तस्यासनाग्नेथ्या फणया दधौ ॥२२ एव कृत्वा स्वर काय शयनीय तदा हरे । पृथ्वीमघरपायेन मग्नामाक्रम्य चाम्भसि ॥२३ लोक्य ब्रह्मसहित सलक्ष्मीक जनादनम् । सोपासग जगद्वीज जगन्धारणवारणम् ॥२४ मष्टिवयन (२) नित्यानन्दं वेदजयं ब्रह्मण्य परमेश्वरम् । जगत्कारणकार जगत्कारणकारगम् ॥२५ भूतभव्यभवन्नाथं परावरगति हरिम् । धार शिरमा तन्तु स्वयमेव स्वकां तनुम् ॥२६ एवं ब्रह्मादिनस्यव प्रमाणेन निशां हरिः । सन्ध्यां न यमभिव्याप्य ते नारायणोऽव्ययः ॥२७ यस्मादयन्तु प्रलयो ब्रह्मग स्वाद दिने दिने। नम्मद् दैनन्दिनमिनि व्यापयन्ति पुराविद ॥२८ गदा-पदम-जागं घप नया अनेक आयुधों को जो भी अन्य नरे ये उनको आग्नेय दिशा दाल फन में धारप दिया था । २२ । उस समय में भगवान् हरि के अयन अर्याः शय्या के लिये अपने वीर शरीर को दनावर जन में मग्न पृथ्वी को जबर काम में आक्रमण करने भित्र हाथै ॥३॥ लोय ब्रह्मा के महित-तया नक्ष्मी में मन्दिर-मोमामह-जगत् के वीर स्वरूप और उगत् पारा २ मा बाप जनान प्रानो धारण किया था ॥२४॥ वे जनादन प्रभु नित्य आनन्द बाप है- देश में परिपूर्ण हैं- प्राय है 'गर के बाद भी कारण है-जगत् के कारण और बना है-परमेश्वर है-भूत-भन्म और म नाप हैं- पायर गति में प्रयुत है मे हरि को गिर मे धारण विमा या और नगर कभी धारण कर लिया था ।२५।२६। इमरीनि में अव्यय नागया हरि भगवान ब्रह्माजी ने निकै प्रभाग में निगा और गया वो अभियान करते नरिया लग्न है। यह पनर रिम बह्मा के दिन-दिन पे होनी है। इसी कारण में माता मन रमको मन्दिन सापित विमा ररने है। भाइ पहा रे पुरानन्य । करते हैं। व्यतीतायां निकायां तु ब्रह्मा लोकपितामहः ।
[ पालिका पुराण त्यक्त्वा निद्रा समुत्तस्थौ स पुन स.प्टये हित ॥२६ त्रैलोक्य तोयसम्पूर्ण शयान पुरुषोत्तमम् । निरीक्ष्य वैष्णवी मायां महामाया जगन्मयीम् । योगनिद्रा स स्तुष्टाव हरेर गेचसस्थिताम् ॥३० चितिशवित निर्विकारा परब्रह्मस्वरूपिणीम् । प्रणमामि महामाया योगनिद्रा सनातनोम् ।।३१ त्व विद्या योगिना देवि त्व गतिस्त्व मति स्तुति । त्व स प्टिस्त्व स्थित स्वाहा स्वधा त्वमिह गीतिका ।।३२ त्व सामगीतिस्त्व नीतिस्त्व ह्री श्रीस्त्व सरस्वती । योगनिद्रा महामाया मोहनिद्रा त्वमीश्वरी ॥३३ त्व कान्ति मवशक्तिम्त्व त्व ननुर्वैष्णवी शिवा । त्व धात्री सर्वलोकानामविद्या त्व शरीरिणाम ॥३४ आधारशक्तिस्त्व देवी त्व हि ब्रह्माण्डधारिणी। त्वमेव मर्वजगता प्रकृतिस्त्रिगुणात्मिका ॥३५ उस निशा के व्यतीत हो जाने पर लोको के पितामह ब्रह्माजी निद्रा का त्याग वर पुन दृष्टि की रचना के लिए समुत्थित हो गये थे। अर्थात् जाग कर स होगये थे । २६ । उन्होने देखा था कि तीनो लोक जम मे परिपूर्ण भरे हुये है और भगवान् पुरुषोत्तम शपन किये है । भगवान् विष्णु की जगन्मयी महामाया माया वा ग्नने निरीक्षण किया था। पिर ब्रह्माजी ने भगवान् हरि ये अङ्ग म विगजमाना रोग निद्रा पी स्तुति पी थी। १० । ब्रह्माजी ने कहा-चन शक्ति अर्थात ज्ञान की शक्ति रूपा-विवारी में रहिन पर नहा में स्वरूप वाणी--मनातनी महामाया योग माया यो मैं प्रणाम यरता हूँ । ३१ । हे देवि । आर योगियों को विद्या हैं-आपही गति–मति और स्तुति रूपा हैं । आप सृष्टि-स्थिति-स्वाहा-स्वधा और आप ही गीतिका है । ३२ । आप गामवेद की गीति है. नीति है और आप ही, श्री और सरस्वती है ।
भृष्टि-वयन () } ३६३ आप महामाया याग निदा~माह निद्रा और आप ईश्वरी हैं । २३ । आप शान्ति हैं-सर्व शक्ति है और माप वणवी शिवा तनु हैं । आप समस्त नोदो वी घाती है और आप शरीर धारियों को अविद्या है। । ३४ । नाप आधार शक्ति देवी है और आप हो इम ब्रह्माण्ड को मारण कस वाली हैं। आप ही समस्त जगतो को तीन गुणा में स्वरूप वाया अर्थात् सत्त-रज और तम से सामुन प्रकृति है । ३५ । स्त्व मावित्री च गायत्रो सौम्यासौम्मातिशोभना । त्व सिसृक्षा हरेनित्या मुषुप्ता व मुपृप्तिका ॥३६ पुष्टिसंज्जा क्षमा शान्तिम्त्व धृति परमेश्वरी। त्वमेव क्षितिम्पेण ध्रियसे सचराचरम् ॥३७ वमापस्त्वमपा माता सर्वालगनचारिणी। स्तुति स्तुत्या च स्तोनी च स्तुतिशक्तिम्वमेव च ।।३८ त्वामह किन्नु स्तीप्यामि प्रमोद परमश्वरि । नमस्तुम्य जगन्मात प्रवाधय जनादनम् ॥३६ एव स्तुता महामाया ब्रह्मणा गोक्कारिणा। नेवास्यनासिका-वाहु दयान्निर्गता हो । राजसी मूर्तिमाश्रित्य मा तरयो ब्रह्मदर्शने ॥४० तनो उनादती भोगिशयनानिद्राया क्षणात् । परियत ममुलस्यो मृष्टये चारोन्मतिम् ॥११ ततो वराहम् पेण निमग्ना पृथिवी जले। मग्ना समुद्दधाराशु न्यधाच्च सलिलोपरि ४२ आर नावित्री और गायत्री हैं तथा आप मौम्य और मौम्य में भी यात्यधिर गोमन हैं। आप नित्य भगवान् हरियो सुजन की इच्छा हैं । माप नुपुप्पा अपात शयन यसै वो हटा है और माप मुक्ति हैं ॥३६॥ आप पुष्टिलानारामा-गालि है और आप परमेश्वरि पति हैं । भाप हो भमि ये पर रोग सम्पूर्ण घराघर को धारण बिया परती
[ कालिका पुराण
मे
है । ३७ । आप आप अर्थात् जल हैं और अन्य जलो को जन्म देने
घाली माता हैं । आप सबके अन्दर रहवर सञ्चरण करने वाली हैं।
आप स्तुति-स्तुत्य और स्तोत्री
तथा आप ही स्तुति की शक्ति हैं ।
। ३८ । मैं आपकी क्या स्तुति क्रू गा हे परमेश्वरि । आप प्रसन्न हो
आइए । हे जा की माता | आपको नमस्कार है अब आप भगवान्
जनार्दन को प्रवोध वग दो अर्थात् उनको जगा दीजिए ।३३। इस प्रकार
से लोको को रनना पगने वाले ब्रह्माजी के द्वारा महामाया की स्तुति
पी गयी थी। फिर उम्की नामिका-मुष-वाटु हरि के
निकले थे और मो गजमो मत्ति ला समाश्रय ग्रहण मर वह ब्रह्माजी
वे दर्शन में स्थित हो गई थी । ४० । इसके उपरान्त भगवान् जनार्दन
मेप की शय्या पर निद्रा लेते हुए पे उम निद्रा से एक ही क्षण में उठ
पर पड़े हो गये पे और पिर नृष्टि की रचना करने की वृद्धि पी पी।
। ४१ । पिर वराह ये परप मे जन मे गिमान हुई पृथ्वी को शीघ्र
ही गमुदत पर उममा जल के ऊपर रख दिया था । ४२ ।
तम्योपरि जोधस्य महती नौरिव स्थिता ।
वितात्वा देवाय न मही यानि मतवम् ।।४३
ततो हरि क्षिति गत्वा तोयराशि स्वमायया ।
गहन्य गन्तुस्थितये प्रवृत्त स्वयमेव हि ॥४४
अनन्तोऽपि यथापूर्व तथा गत्वा क्षितेस्तलम् ।
पृथिवी धारयामाग यम्योपरि मशित ॥४५
तनो ब्रह्मा गमनपाच गयीय प्रगापतीन् ।
जगतपादयामाग गवं गोपपितामह ॥१६
अस्मा लाग्ने गृष्टि यदाग वापि पुदी ।
पायात प्रजापाया स्वपमेय तदिया |
पायावती य गोगलानि माननम् ।
प्रानिानाति गाभवानि पग ॥१८
। वानिया पुराण
की इच्छा के अनुसार अष्ट गचय अधिष्ठान पुष्प से अनुगृहीत किया करत
है । ४६ । पुरपो के अधिष्ठान स और महा भूना के गण के सी भां त
से मह दर्गदको का और महात्मा काल के अधिष्ठान से तथा प्रधान के
अधिष्ठान मे जा कुछ ममुत्पन्न होता है । ५० । स्थावर अर्थात् अचर
और जङ्गम अर्थात् चतन स्थिर अथवा अद्भुत ह द्विज श्रेष्ठो | सभी
कुछ इस अधिष्ठान में उत्पन्न होता है । ५१ । जमा ही पूर म दिखाया
था वह सब आपको बतला दिया है जो भगवान हरि ने भगवान् हर
लिये सृष्टि महार कल्प किया था । ५२ । जिस प्रकार स इस जगत्
के प्रपञ्च की परा असारता दिखलाई थी और जहाँ पर सार दिखलाया
है हे द्विजो । वह जब आप मुसमे श्रवण परिय । ५३ ।
--X -
॥ सारासार निरूपण ॥
जगत् सर्व तु नि सारमनित्य दु खभाजनम् ।
सत्पद्यते क्षणादेतत् क्षणादेतद्विपद्यते ।।१
तथैवोत्पद्यते सारान्नि सार जगदन्जसा ।
पुनस्तस्मिन् विलीयन्ते महाप्रलयसङ्गमे ॥२
उत्पत्तिप्रलयाम्या तु जगन्नि सारता हरि ।
शम्भवे दर्शयामास भावेन जगता पति ॥३
एक शिव शान्तभनन्तमच्युत
परात्पर ज्ञानमय विशेपम् ।
अद्वैतमव्यक्तमचिन्त्यस्प
सार त्वेक नाम्ति सार तदन्यत् ॥४
यस्मादेतज्जायते विश्वमग्रघ
यस्मात्लीन स्यात्तु पश्चात स्थितञ्च ।
मारामार निरूपण }
३६७
आकागवन्मघजालन्य वृत्त्या
यद्विश्व व ध्रियते तत्वसारम् ॥५
जष्टागयोगैयंदवान्तुमिच्छन्
योगी पुनात्यात्मस्प नदेव !
निवर्तते प्राप्य य नेह लोके
ती भार सारमन्यन्न चास्ति ॥६
मार्कण्डेय मुनि न कहा-यह मम्पूर्ण जगत् सार हीन है-
अनित है और महान् दुखो वा पार अथात् माघार है । यह एप ही
क्षम मे तो उत्पन्न होता है और एक ही क्षग में विपन्नता को प्राप्त हो
जाया करता है । १। यह निम्मार गत पीघ्र ही उमी भांति मार मे
उत्पन्न होता है और फिर महा प्रलय
मङ्गम में उमम विलीन हो
जाया करते हैं । २ । भगवान् हार न उत्पनि और प्रलयो मे जगत्
की नि सारता सम्मु के लिए माद म जगतोके पनि न दिखनाई थी।
1३। एक शिव-शान्त-अनन्त-अच्युत–पर में भी पर-ज्ञान
से परिपूर्ण-विशेष अवतजव्यक्त और बाचन्त्य रूप एक ही मार है
उसस अन्य सार नहीं है । ४ । जिमम यह उत्तम जगत् अर्थात् विश्व
उत्पन्न होता है जिससे महा स्थिति को प्राप्त होता है और पीट लीन
हुआ करता है। मेयो के जाल का आराम की ही भांनि वृत्ति से जो
इम विश्व पो धारण किया जाना है दर तत्त्व मार है । ५ आठ अङ्गी
वाले योगो के द्वार! योगी जिसकी प्रामि के लिए इच्छा करता हुआ सदा
हो आत्म रूप को पवित्र किया करता है और जिसको प्राप्त करके वह
रिवृत्त हा जाया करता है । इस लोक में वह निश्चय ही सार नहीं है
और अन्य सार नहीं है । ६।
सारो द्वितीयो धर्मस्तु यो नित्यप्राप्तये भवेन् ।
यो व निवतंको नाम तत्रासार प्रयतंकः 113
धर्म ग गन्चिनुयाद्वन्मीको मृत्तिया यथा ।
[ कालिका पुराण सहायार्थ परे लोके पूर्वपापविमुक्तये ।।८ एको धर्म पर श्रेय सर्वससारकर्मसु । इतरे तु त्रयो धर्माज्जाय तेऽर्थादयऽपरे ॥६ वर प्राणपरित्याग शिरसो वाथ कर्तनम् । न तु धर्मपरित्यागो लोके वेदे च गर्हित ॥१० धर्मेण ध्रियते लोको धर्मेण ध्रियते जगत् । धर्मेणव सुरा. सर्व सुरत्वमगमन् पुरा ।।११ धर्मश्चतुस्पाद्भगवान् जगत् पालयतेनिशम् । स एव मूल पुरुषो धर्म इत्यभिधीयते ॥१२ द्वितीय सार धर्म है जो नित्य ही प्राप्ति के लिये होता है । जो निवत्तक नाम है वहाँ पर असार प्रवर्तक है । ७ । धर्म का धीरे-धीर सञ्जय करना चाहिए जिस प्रकार स वल्मोक मिट्टी का सञ्चय क्यिा करता है । इस धम का सञ्चय परलाक. म सहायता क लिये और पूर्व मे दिये पापो की विमुक्ति क लिए हाता है। ८ । ससार के समस्त पो म एव धर्म ही परम धेय होता है और दूसरे तोनो अर्थात् अर्थ- काम और मोक्ष धर्म से ही समुत्पन्न हुआ करते है । तात्पर्य यही है कि धर्म ही सदगे अधिन एव प्रमुख हाता है ॥ ६॥ प्राणो वा त्याग पर देना थेट है तथा शिर का घाट देना भी अच्छा है विन्तु धर्म का परित्याग करना उचित नहीं है। ऐसा करना लोर और वेद में युग होता है । १० । धर्म म ही लोन यो धारण किया जाता है धौर धम्म में जगत् पो धारण किया जाना है। धर्म पे द्वारा ही सग गुग्गण पहिले गुरव प्राप्त हुए थे ।११। चार परणी वाला भग. पान धर्ग निरन्तर ग जगत् का पालन किया परसा है वह ही पुरप भूष है जो धर्मग नाम ग ना जाता है ।।१२॥ मयं धरति नोऽम्मिन् धर्मो नैव पुनो भवेत् । पदियो न वियतति स एवाक्षर उच्यते ॥१३ एतद धिर्म मार नि मार सघन जगत् ।
वागह पर मम्बाद ] यथा म्बय ददर्शासौ शम्भुर्ज्ञानेन स्वेऽग्रे ।।१४ एतद्वं दर्शयामास स विष्णुजंगता पति । म्बय जग्राह मनमा ध्यानेनात्मनि शकर ।।१५ मार तत्त्व परम निप्कल य- न्मूल होन मूर्तिमान धर्म एप । मारो न्याऽसौ सारहीन तदन्यज्- जात्वत्थ याति नित्य महाधी ॥१६ इम लोक म सभी कुछ क्षरित हो जाया परता Aryal कभी भी व्युत नहीं हुआ करता है जो पुरुष प्रम से पीltran हाता है वह हो 'अक्षर' ----यह कहा जाता है। परो यापरी सार वतला दिया है और यह सम्पूर्ण जगत् सार जिस प्रकार मे भगवान् शम्भु ने अपने भार भे शापा । १४। जगना के पति भगवान विष्णु ने यही लिया भागार मेल म ही ध्यान के द्वारा मन से भास्मा में प्रण मिया ) । १५ । लो मार-सत्व-परम--निपल है और गति होगद मसीहत. मान धर्म है। यह अन्य सार है और राम मनिlen wri Ram है। इसी प्रकार स इसका मान प्रा से महा Raman गमन किया करते है।१६। ॥ पाराह-शंकर सम्पाद ॥ ये सृष्टा यम्भुना पूर्व भूतप्रामाश्गतुर्विधा । विमर्ष ते समुत्पन्ना क्य पानेररूपता ॥१ शरीरमदं वाराहमद दन्तावल तया। सिंहल्याघ्रशरीराच्च ।
वाराह-शङ्कर मम्बाद पहा था । १५ । मलिनी के माय गति में समुत्पन्न यह आप का अनिष्ट करने दात दुष्ट है। हे लोकेश । इस वाराह के कामुा परप या आप त्याग कर दीजिए। १३ । आप ही लोगों के भाव न करने वाले हैं और सृष्टि-स्थिान और महार के दरन वाले हैं और पाल प्राप्त होने पर सृष्टि-स्थिति और महार को परगा । १७ । ह महा वनवान, आप लोकों के हित ये मम्पादन रन के लिए इस शरीर का त्याग करने पुन समय मप्राप्त होन पर अन्य काम का पोत्र करेंगे । १८ । मारण्डेय महर्षि ने पहा-महान आत्मा वार भगवान, शकर इस चचन का श्रवण परके वराही मूक्ति को धारण करने वाले भगवान ने महादेव जी मे वहा श्री भगवान ने कहा-ह पहेश्वर 1 जैसा बाप कह रहे हैं इस वचन का मैं पूर्णतया पाला रहेगा और इस यज्ञ वराह के शरीर या मैं त्याग कर दूंगा। उमममेण गात्र भी मशय नहीं है । 1१६।२०) ममय ये प्राप्त हो जाने पर फिर में अन्य उत्तम वाराष्ट्र के म्प को धारण नगा जो प्रत्यन्त दराप है और लोगों के भावन पन्ने के लिये है।
[ मालिका पुराण वथ ते या गणा रा कि भोगास्ते महौजसः । एतत् सर्व वय श्रोतुमिच्छामो द्विजसत्तम ॥३ शृण्वन्तु मुनय सर्वे यथा शम्भुगणाभवन् । यदर्थ त समुत्पन्ना यस्मात्ते नेकरू पिण ॥४ एतद्ध परम गुह्यमिद धर्मार्थकामदम् । एतद हि परभ तेज सतत परम तप ॥५ इद थुत्वा महाय्यान परत्रेह न सोदनि । यशस्य धर्म्यमायुप्य तुष्टिपुष्टिप्रद परम् ॥६ आदिसर्गेऽथ वाराहे सम्पूर्ण मुनिसत्तमा । शकर प्राह सर्वेश वाराह जगता पतिम् ।।७ ऋपिया न कहा--जो भगवान् शम्भु के द्वारा पूर्व मे चार प्रकार के भून ग्राम सृष्ट किये गये थे अर्थात् जो चार तरह के भूत ग्रामो का पूर्व म सृजत किया गया था वे किस प्रयोजन की सिद्धि के लिये समुत्पन्न हुए थे और विस तरह से उनकी अनेक रूपना हुई थी । १ । उनका आधा शरीर तो वराह का है और आधा दन्तावल है कुछ-कुछ गणो के अधिय तो सिंह-व्याघ्र के शरीर मे हुए थे । २ । वे गण किस कारण से महान कर थे और महान् ओज वाले वे दिन भोगो वाले थे—यह सब हम लोग श्रवण करने की इच्छा करते है हे द्विज श्रेष्ठ हमारी ऐसी ही इच्छा है । ३ । मार्कण्डेय महपि ने कहा-हे मुनियो । अब आप लोग श्रवण कीजिए कि जिरा रीति स भगवान् शम्भु के गण हुए थे और जिसके लिये वे समुत्पन्न हुए थे और जिस कारण से वे एक रूप वाले नहीं थे ४ । यह विपम वहुत ही अधिक गोपनीय है और यह धर्म-अर्थ और काम के प्रदान करने वाला है। यह परम संज है और निरन्तर परम तप है । ५। इस महान् आख्यान का श्रवण बरके पुरप इस लोक मे और परलोक मे दु.ख नहीं प्राप्त किया परता है। यह आप्यान यश देने वाला है- धर्म मे युक्त है-आयुवी वृद्धि -
३७२
[ कालिका पुराण
द्वारा स्थापित शैला के सघाता से यन्त्रित यह पृथ्वी है । ११। इस
कारण से हे जगतो क स्वामिन् | इस वाराह के शरीर को त्याग
दीजिए। यह गन से प रपूण-जात के रूप वाला और जगत के
कारणो का भी कारण है । १२ । हे विभो । आपके वाराह के शरीर
को धारण करने मे अन्य कौन समथ हो सकता है ? विशप रूप से
आपके द्वारा ही यह सकाम पृथ्वी जल मे र्पित हुई है। यह स्त्री के
रूप वाली ने आपके तेजो स दारुण गम को धारण किया था । १३ ।
हे जगत्पते । रजस्वल! इस ने ममर्थ होती हुइ जिस गम को धारण
क्यिा था । उससे जो तनय होन वाला है वह भी दुभश का आदान
करेगा १४ ।
एप प्राप्यासुर भाव देवगन्धर्वहिसक ।
भविष्यतीति लोकेश प्राह मा दक्षसन्निधौ ।।१५
मलिनीरतिसजात दुप्टन्तेऽनिष्टकारकम् ।
कामुक त्यज रलोकश वाराह कायमीदृशम् ॥१६
त्वमेव शृष्टिस्थित्यन्तकारको लोकभावन ।
काले नाप्ने स्थिति सृष्टि सहार च करिष्यसि ॥१७
तस्माल्लोकहितार्याय त्यक्त्वा पाय महाबल ।
काले प्राप्ते पुनस्त्वय काय पोत्र करिष्यसि ॥१८
इति तस्य वच श्रुत्वा शकरस्य महात्मन ।
वाराहमूर्तिभंगवान् महादेवमुवाच ह ।।१६
परिप्येऽह नव वचस्त्व ययात्थमहेश्वर ।
इम तु यज्ञवाराह वाय त्यक्ष्ये न सशय ॥२०
याने प्राप्ते पुनस्त्वन्यं काय वाराहमुद् मुतम् ।
परिप्येऽह दुराधर्ष लोकाना भावनाय वै ॥२१
यह अगुरों के भाव को प्राप्त करके ही देव। और गन्धर्वो की
हिंगा कल वाना होगा। यह सोश न मुझम दक्ष की सन्निधि म
बाराह-शङ्कर मम्वाद ] कहा था । १५ । मलिनो के साथ रति मे ममुत्पन्न यह नाप का अनिष्ट करने वाम दुष्ट है । हे लोकेश ! इस वाराह के कामुक स्वरूप का आप त्याग कर दीजिए । १३ । आप ही लोगो के भादन करने वाले हैं और सृष्टि-स्थिति और महार के करने वाले हैं और पाल के प्राप्त होने पर सृष्टि-स्थिति और राहार को करेगा । १७ । ह महा बलवान माप गोको के हित के मम्पादन करने के लिए इम शरीर का त्याग करके पुन, ममय के मप्राप्त होने पर अन्य काम को पोत्र करेंगे । १८ । मार्कण्डेय महषि ने कहा-महान आत्मा या भगवान शकर के इस बचन का श्रवण करके बराह की भूति को धारण करने वाले भगवान ने महादेव जी से वायी भगवान ने कहा हे महेश्रार । जैसा आप कह रहे हैं रम वचन का मैं पूर्णतया पालन करगा और इस यज्ञ वराह के शरीर का मैं त्याग कर दूंगा । उसमे लेश मात्र भी संशय नही है । 1१६।२०। ममर के प्राप्त हो जाने पर फिर मैं अन्य उत्तम बाराह के रुप को धारण करूगा जो प्रत्यन्त दुराधर्ष है योर लोगों के भावन पग्ने लिये है।०१। इत्युक्वा म महाकायस्तवान्तरधीयन । जगत्गुरुर्जगतसप्टा जगदाता जगतपतिः ॥२२ तस्मिन्नन्तहिते देवे देवदेवो महेश्वरः । निज स्थान देवगण स्वगणच जगाम ह ॥२३ वाराहोऽपि स्वय गत्वा लोकालोकाय गिरिम् । वाराह्या मह रेमे म पृथिव्या चारुरूपया ॥२४ स तया रममाणन्तु सुचिर पर्वतोत्तमे। नावाप तोएं लोकेश पोनी परमकामुक ॥२५ पृथिव्या' पोतीरूपाया रमयन्त्यास्ततः मुता । तो जाता द्विज श्रेष्ठास्तेगां नामानि मे शृणु ।।२६ सुवृत्त कनको घोर सर्व एव महावना ॥२७ ३७४ कामिमा पुग ये शिशवस्ते मेरुपृष्ठे पाचने वप्रसस्तरे। रेमिरेऽन्योन्यसमरता गोप सरसु च ॥२८ इतना कहकर महान वाय गले व यहाँ पर ही अन्तर्ध्यान हो गए थे जोस जात गुरु हैं और इस जगत् रे गगन करने वाले हैं - जो जगत् के धाता है और जान दे दामी हैं । २२ । उन देव के अन्तर्धान हो ज ने पर देवो के देव महेश्वर प्रभु देवगणो ये तथा अपन गणो के साथ ही अपन स्थान को गमन कर गये थे । २३ । मापात, वाराह भी लोग लोक नामक पन पर म्वर चले गये थे। और वहा पर वे अपनी पत्नी बागही के साथ रमण वरने लग पे जो कि परम सुन्दर स्वरूप वाली पृथ्वी थी । २४। वह उस उत्तम पर्वत म बहुत लम्बे समय तक रमण करते हुए वह लोकेश पोनी और परमाधिव कामुक तोष को प्राप्त नहीं हुए थे । अर्थात् रमण करने पर भी उनको मन्तोष नहीं हुआ था । २५ । पोत्री में स्वरूप वाली पृथ्वी के साथ रमण किए जाने वाली से जोन पुत्र समुत्पन्न हुए थे। हे द्विजोत्तमो । आप अब उनके नामो का भी श्रवण करिए । २६ । वै मुवृत-फनक और घोर नामो वाले थे जो कि सभी महान वल से समन्वित थे ।२७॥ वे शिशु ही मुवर्ण वे मेरु पर्वत के पृष्ठ पर व प्रसस्तर मे गहरो गे और सरोवरी मे परम्पर में मसक्त हुए रमण करते थे । २८ । स ते पुनै परिवृती वाराहो भार्यया स्वया । रममाणस्तदा वायत्याग नवागणद्धिजा ॥२६ कदाचिच्चिशुभिस्तु सश्लिष्ट क्र्दमान्तरे । चकार कर्दमनीडा भार्यया च महावल ॥३० सपक्लेप शुशुभे वराहो मधुपिंगल । सन्ध्याधनो यथातोय क्षरस्तोय नथाविध ॥३१ स पुत्रं परमप्रीतो मार्यया च पृथिव्यया । विमज घरणी रेमे मध्य निम्नाय माभयत् ।।३२ ।
दाराह-मादुर सम्बाद ]
करने का कुछ
अनन्तोऽपि समात्रम्य कूर्म स पृथिवीतले ।
हरि वहन मुग्नशिरा सातकोऽभूतप्रपोडया ॥३३
सुवृत्तेन स्वर्णवप्र घोरेण कनकेन च ।
विदारित पोत्रधात म्वर्ण-भरनाकृत समम् ।।३४
मेरुपृष्ठे यानि यानि मोवानि द्विजोत्तमा ।
रचितानि सुरर्यतात्तानि भग्नानि तत्सुते ।।३५
हे द्विजो । वह वाराह उन पुनो रो पारवृत अपनी भार्या के
साथ रमण करने वाले थे और उस समय म उन्होन शरीर त्याग
भी ध्यान नहीं किया था । २६ । बिसी रामय मे महान्
चलवान वह कदमो में अन्नर मे शिशुया के साथ मश्लिष्ट होवर भार्या
के साथ कर्दम क्रीडा किया करता था । ३० । कोच के लेप स सयुत
मधु पिङ्गल वराह शोभित हुए थे। जिस प्रकार से सध्या का मेघ जल
या क्षरण क्यिा पता है उसी भात वह भी जल का क्षरण करने
वाले 4 । ३१ । यह पुत्रों के सहिन और पृथिवी भार्या के साथ परम
श्रीत होकर रमण निया परते थे। दिएज धरणी से रमण किया था
और वह मध्य म निम्न हो गयी था । ३२ । वह अनन्त भी पृथिवी के
उल से बम का मजमण यरके यर हरि का वहन बस हुए पोडा से
भुग्न शिर काले बात से समन्वित हो गये थे । ३३ । सुवृत्त ने और
घोर तथा कनय ने सुवप के व प्रपोन पो से वितरित कर दिया था
और स्वर्ग के भान हाने मे सम कर दिया था । ३४ । हे द्विजोत्तमो ।
मेर पर्वत के पृष्ठ भाग पर मुरो रे द्वारा जो-जो मेरे सुवर्ण द्वारा
रचित हुए थे उमके पुत्रो ने यत्न पूछ उनको भग्न कर दिया
था । ३५.
मानसादीनि देवाना सरासि शिशवोऽथ ते ।
आबिलानि तदा चक्र पोत्रधात समन्तत ॥३६
पृथिवीवनितारूपा रमयामाम पोत्रियम् ।
[ वालिया पुगम
स्थावरेण तु रूपेण दुषमाप्नोति व दृढम् ॥३७
सागराश्च सुवृत्ताधरवगाह्य समन्तत ।
विकीर्णरत्न पात्रोधे सर्व एवाकुलोकृताः ॥३८
इतस्ततश्च शिशुभि क्रीडदिभ पोनिभिस्तदा ।
जगन्ति तत्र भग्नानि नद्य कल्पद्रुमास्तथा ॥३६
जानन्नपि जगभर्ना वराह स्वयमेव हि ।
जगत्पीडा सुतम्हारयामास नंव तान् ।।४०
सुवृत्त कनको घोरो यदागच्छति वै दिवम् ।
तदा देवगणा भीता प्राद्रवन्ति दिशो दश ।।४१
एव सुतर्भार्यया यज्ञपोत्री
कीडस्तुष्टि नाप काचिन् कदाचित् ।
नित्य नित्य वधते तस्य काम
वाय त्यमतु नंच्छदेष प्रदिष्ट ॥४२
मानस आदि जो रेवो के सरोवर थे उस समय मैं उसबै पुत्री
ने अर्थात् शिशुओ ने पौन धात्रो से सव ओर आविल अर्थात, यतिन पर
दिये थे। १६ । वनिता के पल्प वाली पृथिवी के पोत्रिण से रमण
किया था और स्थावर रूप मे सुदृढ दुख को प्राप्त किया करती है
1 ३७ । सुवृत्त आदि के द्वारा सभी ओर मागरो का अवगाहन करके
पोत्रोद्यो के द्वारा विकीर्ण रा वाले सब हो आकुली कृत हो गये थे।
। ३८ । उम समय में इधर-उधर गौडा परने वाले पोत्री शिशुआ
के द्वारा वहाँ पर जगतो या श नदियों को और वल्प द्रमो को भग्न
कर दिया था।३६। जगत के भरण करने वाले वराह ने स्वयं ही जगत,
की पीड़ा को जानते हुए भी सुगो के स्नेह से उनका निवारण नहीं किया
था। ४०। मुवृत पनर और घोर जब दिवलोक में आमगन करते हैं
उम अवसर पर देवो का समुदाय परम भीत होकर दशों दिशाओ में
भाग जाया करने हैं। ४१। इस प्रकार ने अपने पुत्रो वे तथा भार्या के
शरम-वाराम युद्ध वर्णन ]
३७७
माय जो यज पौत्री या क्रीडा करना हुआ भी दिमी भी समय म कोई
तुष्टि के प्राप्त करने वाले नहीं हुए ये बात उनको मनोप नहीं हुआ
था। नित्य-नित्य ही उनको काम वामना वटती ही जाती है और ऐसा
प्रदिष्ट हो गये थे कि वह अपन शरीर का त्याग करने की इच्छा नही
स्सिारते थे। ४२॥
॥ शरभ-वाराय युद्ध वर्णन ।
ततो देवगणा सर्वे सहिता देवयोनिभि ।
शण सहिना मन्त्र चक्र, सम्यग्जगद्वितम् ॥१
ततो निश्चित्य ते मर्दे शमाद्या मुनिभि मह ।
शरण्य शरण ज मुर्नारायणमज विभुम् ।।२
त रामासाद्य गोविन्द वासुदेव जगतपतिम् ।
प्रणम सर्व निदशास्तुम्टागरुडध्वजम् ॥३
नमस्ते देव देवेश जगाकारण कारक।
का म्वपिन भगवन प्रघानपुरुपात्मक ॥४
स्कूल सूक्ष्म जगद्व्यापिन परेश पुरुषोत्तम ।
त्व कर्ता सर्व भूताना त्व पाना व विनाशकृत् ॥५
त्व हि मायाम्बोण मन्मोमि वै जगन् ।
यद्भूत यच्च वै भाव्य यदिदानी प्रवर्तते ॥६
तत् सब परमेशत्वन्यावर जगम तथा।
अार्थिना त्वमर्थन्तु काम कामाथिना तथा ।।
मार्कण्डेय महपिन कहा-इम अनन्तर स्व देवगणो ने देव
योनियों के साथ और इन्द्रदव व महित मिलकर भली भांति जगत्
हित के लिये मलाह को यो ॥ १॥ पिर मुनियों मधट्र (इन्द्र)
३७८
[ यालिका पुराण
गरुडध्वज का म्वनन
।
आदि उन सबने निश्चय करके शरण्य-विभु- अज भगवान नारायण
की शरणागति मे गय थ ॥२॥ उन गोविन्द-व मुदव जगत् के स्वामी
के ममीप म पहुँच पर मब देवो ने प्रणाम किया था और फिर भगवान
क्या था ।।३।। देवो ने वहा-ह देवेश्वर ।
हे देव । हे जगत् के वारण को करने वाले | हे काल व रूप वाले |
हे प्रधान और पुरुष के स्वरूप वाले । हे भगवन् । आपकी सेवा म
हमारा सबका प्रणिप 7 ममर्पित है ।। ४ ॥ हे म्यूल और मूक्ष्म । हे
जगत् व्यास रहने वाले ' हे परेश । हे पुरपोतम ! आप ही समस्त
प्राणियो के कर्ता है अर्थात् सवक। मुजन अप ही व द्वारा हुआ करता
है--और वही सवका पालन करने वाले रक्षक है तथ बाप ही सबका
विनाश करने वाले है ।।। आप अपनी माया के स्वरूप के द्वारा इस
जगत को सम्मोहित दिया करते है जो भी कुछ हो गया है --जो इस
समय म हो रहा है और जो भ वष्य मे हाने वालाहै । ६ । हे परमेश ।
वह सब स्य वर हा या जङ्गम हा आप ही है। आप अथ वे' अथियो
के अथ है तथा अप जा भी काम के इच्छुक है उनके काम है । ७ ।
त्व हि धर्माधिना धर्मोमोक्षो निर्वाणमिच्छताम् ।
त्व कामुकम्त्व मेवार्थों धार्मिकस्त्व सदागति ॥८
स्वक्ताद ब्राह्मणा जाता वाहुजा क्षत्रियास्तव ।
ऊर्वो वैश्यास्तथा शूद्रा पादाभ्या तव निगता ॥६
सूर्यो नेत्रात्तव विभा मनोजश्चन्द्रमास्तव ।
श्रवणात पवनो जातो दश प्राणास्तयापरे ।।१०
ऊर्ध म्वर्गादिभुवन नव श दिजायत ।
तव नाभेस्नयावाश क्षिति पादतलादभूत् ।।११
पणीम्या ते दिशा जाता जठरान माल जगत
त्व हि मायाम्वापेण सम्मोहयमि वं जगत् ।।१२
निर्गुणो णवाम्त्व हि शुद्ध पय परात्पर ।
शरुभ-वारराय युद्ध वर्गग ३७६ उत्पत्तिस्थितिहीनस्त्व त्वमव्युतगृणाधिक. ॥१३ आदित्येवमुभिर्देवं माध्ययक्षमरुद्गणे । त्वं चिन्त्यमे जगन्नाथ मुनिभिश्चमुमुक्षुभिः ।।१४ आप धर्म के चाहने वालो के लिये धर्म है और जो निर्वाण पद के चाहने वाले हैं आप ही मोक्ष है । आप कामुक हैं --आप ही अयं हैं और आप दी मदा गति धम्मिक है। । बाआपके मुख मे ब्राह्मण ममुत्पन्न ए है और आपको वाहुमो में क्षत्रियों ने जाम ग्रहण किया है --आपके अरओ में वैश्यों की उत्पत्ति हुई है नया आपके कामो में शूद्र निकले हैं अर्थात् आप ही के भिन्न-भिन्न अङ्गो से चारो वर्णों का समुरपादन हुआ है । है । हे विभो ! सूर्यदेव आपके नेत्रों से समुत्पन्न हुए हैं तथा नन्द्रमा बापके मन मे जायमान हुआ है। आपके पान से वायु की उत्पत्ति हुई है नथा दूसरे दश प्राण भी आप ही में हुए है। घायु के प्राण अपान मादि दश बस्प होने है १०। ऊपर की ओर जो स्वयं आदि भुवन हैं ये मव आपने मन्तक से ही उत्पन्न हुए हैं । आपको नाभि से जाना ने जन्म लिया है तथा आयके याद तल से पृथ्वी समदभुत हुई है। ११ । र पके कानों मे सब दिशाये उत्पन्न हुई हैं । आपके जठह ( उदर ) में यह सम्पूर्ण जगत प्रादुर्भूत हुआ है। आप ही माया के स्वरूप में निश्चय ही इस जगत को मम्मोहित किया करते हैं । १२ । आप गुणी मे हित होते ये भी गुण गण से समन्वित है। आप परम शुद्ध--एक और घर में भी पर है। आप उत्पत्ति और स्थिति से रहिन है और आप अच्युत भयाव क्षोण न होने वाले गुणो से अधिक हैं । १३ हे जगत् के स्वामिन् ! आप ही आदित्यों के द्वारा- वसुशो के द्वारा--देवो के-मातयो के-कक्षों के मरुदगणो के द्वारा मुनियो के द्वारा और मुमुमो के द्वारा चिन्तन किये जाया बसे हैं। अर्थात मभी के चिलन करने का विषय माप ही केवल होने हैं । १४ । त्वां व चिदानन्दमयं विदन्ति विशेपविज्ञा मुनयो विभोगा ।
[ पालिका पुगण त्वमेव ससार महीरहस्य वीज जल स्थाममथो फल च ॥१५ त्व मद्मया पद्माकरो विभामि वरासिचक्राव्जधनुर्धरस्त्वम् । त्वमेव ताः प्रतिभासि नित्य म्वर्णाचले तोययुतो ययाब्द ।।१६ त्वमेव पीताम्बरशकराजजा. स्त्व सर्वमेतन्न च किंचिदन्यन् । न ते गुणा न परिचिन्तनीया विधेर्हरस्यापि दिशा पतीनाम् । भीतेन भक्त्या शरण प्रपन्ना गता वय न. परिरक्ष विष्णो ॥१७ इति स्तुतो देवदेवो भूतभावनभावन । सेन्द्रवर्णरूचे तान् सर्वान्मेनिस्वन १८ यदर्थमागता यय यद्वा भयमुपस्थितम् । तत्र यद्वा मया कार्य तद् देवास्तूर्णच्यताम् ।।१६ शीर्यते यमुधा नित्य कौडया यज्ञपोत्रिण । लोकाश्च सर्वे सक्षुब्धा नाप्नुवन्त्युपशान्त्वनम् ।।२० शुष्क तुम्वीफल घातैर्यथा जर्जरता गतम् । वराहक्षुरधातेन तथा जर्जरिता निति १२१ विशेष विज्ञान वाले विगत भाग से संयुत मुनिगण चित् (ज्ञान) और आनन्द मे परिपूर्ण आप को ही समझते अर्थात् जानते है । आप ही इस ममार रूपी वृक्ष के बीज है-जल है -थान है और फल है । ।१५। आप पद्मा मे पद्मावर विभाा होने है । आप वरदान- बङ्ग-चक्र-वभल और धनुप के धारण करने वाले हैं । आप ही नित्य तादर्य प्रत्तिभात होते हैं । जिम प्रकार मे वर्णाचल पर जल से शरभ बाराय युद्ध वर्णन ३८१ समन्वित शन्द हुआ करता है । १६ 1 आपही पीताम्बर शङ्कर कमल स समुत्पन्न हैं। यह सब आप ही हैं और अन्य कुछ भी नहीं है । आपक गुण गण हमारे द्वारा चिलन न के योग्य नहीं है। विधाता-हर और दिक्पाला के गी गुण चितन करन के योग्य नहीं हैं । भय म और भक्ति स हम आपकी शरणागति म प्राप्त हुए हैं । हे विष्णो । आप हमारी रक्षा करिए । १७ । मारण्देय मुनि न कहा- इस प्रकार स देवो के भी देव--भूता के भावन करन वाला के भी भावन इस रीति से स्नुनि किय गय य जो इन्द्रदव के गति देवगणा द्वारा स्तवन किये गय थे । मघ के समान प्वनि वाले प्रभु न उन सवम कहा था । १८ । श्री भगवान् ने कहा--जिस प्रयोजन की सिद्धि क लिए भाग लोग यहाँ पर समागत हुए हैं अयवा जा भी कुछ भय आपको हुआ है। अथवा वहां पर जो भी कुछ काय मुझे करना चाहिय ह देवो । वह शीघ्र ही बतलाइये । १६ । देवो ने कहा-यज्ञ पोती अर्थात् यज्ञ बाराह के क्रीडा स यह वसुधा अथात पृथ्वी नित्य विशीण हो रही है और सभी लोक विशेष रूप से क्षुब्ध हो रह हैं और वे उपसात्वना प्राप्त नहीं कर रहे है । २० । जिस प्रकार स सूखा हुआ तुम्बी का फ्ल पाता से जजरता को प्रास हो जाता है ठीक उमी भाति यह भूमि यज्ञ वाराह के धुरा के प्रहारों से जगरित होगई है । २१ । तस्य ये वा त्रय पुरा कालाग्निसमतेजस । सुवृत कनको धारस्तश्चाप्याधातित जगत् ॥२२ तेपा कदमलीलाभि सरामि जगता पते । मानसादीनि भग्नानि प्रकृति यान्ति गधुना ।।२३ भग्नास्तर्देवतरवो मन्दराद्या महावले । देव नाद्यापि रोहन्ति फल पुष्प दल च वा ॥२४ यदा विकूटमारुह्य ते सुवृत्तादयस्त्रय । प्लुत कृत्वा महावाहो पत्ति लवणाणवे।
३८२ [ कालिया पुरण तदा तत् क्षुब्धोयोघे प्लाव्यते सक्ला मही ॥२५ उत्प्लवन्ति जना सर्वे प्रयान्ति च दिशो दश । जीवित रक्षमाणास्ते प्रयान्ति च दिशो दश ॥२६ यदा त्रिविष्टप यान्ति यज्ञवाराह-पुत्रका । इतस्ततस्तदा भग्ना देवा शान्ति न लेभिरे ।।२७ सर्वे ते पर्वता पुनराहस्य जगत्पते । भीडभि शिखरे नीता भूरिभागमधोगतिम् ।।२८ एन विक्रीडता तेपा नीडाभि सकल जगत् । नाशमायाति नैकुण्ठ तस्माद्रक्ष जगत्प्रभो ॥२६ अथवा उसके जो तीन कालाग्नि के तज के समान पुत्र है जिनके नाम मुवृत्त-कनक और घोर है उनके द्वारा भी यह सम्पूर्ण जगत आपातित हो रहा है । २२ । उनको कर्दम तीलाओं से हे जगतो के पति | मानस आदि सब सरोवर भग्न हो गये हैं और अभी भी प्राकृतिक स्वरप को प्राप्त नहीं होते है । २३ । महान् वल वाले उनके द्वारा मन्दार आदि देवो के तरु भग्न कर दिये गये है। हे देव ! वे आज तक भी प्ररोह को प्राप्त नहीं हो रहे हैं और उनम फल, पुष्प और दल भी विकसित नहीं हो रहे हैं । २४ । जिस समय ने वे मुवृत्त प्रभुति तीनो त्रिकूट पर्वत पर समारोहण किया करते हैं । हे महावाहो । वहाँ से वे प्लुति परके क्षार सागर मे गिर जाया करते है। उस समय में क्षोभ को प्राप्त हुए मागर के जल के समुदायो से यह सम्पूर्ण भूमि प्लावित हो जाया करती है । २५। उस समय मे सभी मनुष्य उत्प्लवन को प्राप्त हो जाते हैं अर्थात् जल म निमग्न हो जाया करते है और दशो दिशाओ में जहाँ कही भी जीवन की रक्षा करते हुए प्रयाण करने लगते हैं।२६। जिस समय मे यज्ञ वाराह के पुत्र प्रिविष्टप अर्थात् स्वर्ग को गमन परते हैं उस अवसर पर मग्नहुए देव इधर-उधर जाकर शालिको प्राप्त विया करते थे ।२७ हे जगत्पते ! सभी पर्वत उस वाराह के पुत्रो
भरभ-वागय युद्ध वर्णन ]
ने शिखर पर क्रीडा करते हुए उसका बहुत अधिक भाग नीचे की ओर
गया हुआ कर दिया था 10८। इस प्रकार में विशेष क्रीडा करने
उनकी क्रीडाओ से यह सम्पूर्ण जगत् है वैकुण्ठ । नाश के भाव को प्राप्त
हो जाता है हे जगत् के प्रभो ! उमसे आप रमा कीजिए । २६ ।
इति तेपा निगदता श्रु त्वा वाक्य जनार्दन ।
उवाच शकर देव ब्रह्माण च विशेषत. ॥३०
पतकृते देवता सर्वा प्रजाश्च सकला इमाः ।
प्राप्नुवन्ति महदु ख शीयते सकल जगत् ॥३१
वाराहं तदह काय त्यक्तुमिच्छामि शकर ।
निवशशक्त त त्यक्तु स्वेच्छया न हि शक्यते ।
त्व त्याजयस्व त काय यत्नाद्वा शकराधुना ॥३२
त्वमाप्यायस्व तेजोभिवान स्मरहर मुहु ।
आप्यायन्तु तथा देवाः शकरो हन्तु पोत्रिणम् १३३
रजस्वलाया. रासहिमाणा मारणात्तथा ।
कायः पापकरो भूतस्त त्यक्तुयुज्यतेऽधुना ॥३४
प्रायश्चित्तेरपंत्यन प्रायश्चित्तमहं ततः ।
चरिप्यामि तदर्य मे तनुयत्नेन शाम्यताम् ॥३५
मार्कण्डेय महर्षि ने कहा--भगवान् जनार्दन प्रभु ने इस प्रकार
में नहीं हुए उनके दाग्य का श्रवण पर भगवान ने देव शबर से लार
विशेष रूप से ब्रह्माजी से कहा । ३०। जिस के लिए सभी देवगण और
पे समस्त प्रजा महान दुख को पा रह है और यह सम्पूर्ण जगत् शीर्ण
हो रहा है । ३१ । ह शकर ? मैं उस वाराह के शरीर का त्याग करने
की इच्छा कर रहा हूँ। निवेश म शक्त उसका त्याग करना स्वेच्छा से
से नहीं राक । हे शार! अथवा अब आप यल से उस
त्याग कराइए । ३२ । हे ब्रह्मन ! आप भी अपने नेत्रो से पन. स्मर
के विनाशक शिव को नाप्यापित कीजिए। तथा सव देवगण भी शकर
[ कालिका पुराण
वा आप्पादित कर किय इस पोत्रो का हनन करने को उद्यत
जावें । ३३ । रजस्वला रे समग से तपा विप्रगण 2 मारने स यह
शरीर पापा व करने वाला हा गया है। इस समय म उम्का त्याग
परना युक्त होता है । ३४। यह पाप प्रायधितो व द्वारा ही दूर होता
है। अतएव मैं प्रायश्चित्त यो वरगा। उमप लिए मेरा शरीर मत्न से
माम्यता पा प्राप्त हाव ।३५ ।
प्रजा पाल्या मम मदा सा हि सीदति नित्यश ।
मत्कृते प्रत्यह तस्मान् त्यभ्ये काय प्रगाते ॥३६
इत्युक्ती वासुदयन तदा तो यह्मशवरा।
त्वया यथोक्त तत्वावमिति गोविन्दभूचतु ॥३७
वागुदेवोऽपि तान् मर्वान् विमृज्य विदशास्तथा ।
वाराह तेज आतुं ग्वय ध्यानपरोऽभवत् ।।३८
मन गर्नेयंदा तेज आरत्येष माधय ।
तदा दतु वाराह मरय हीनमजायत ।।३६
तेजोहीन यदा देह सात सय म्तदामर ।
आगगाद तमा दयो यावाराहमाम् ।।४०
ब्रह्माचास्त्रिदमा सय महादेवमुमापतिम्
आममुम्नदा तज आधातु मरणामी ॥४१
मत गर्देवगण ग्वं ग्वजा वृपध्वजे ।
आधे सेन यमपा गोलीय रामनाया ।।४२
।
गरभ वाराम युद्ध वर्णन ]
३८५
५ ४२
१३७ १ भगवान् वासुदेव न भी उन मब देवगणा को विदा करस वाराह
न तब का आहरण करन क लिय व पिर ध्यान म परायण हो गर य
। ३८ । जव धीर धीर माधव प्रभु उस तन का अपहरण करत है ता
उम समय म वह वाराह या दह सत्त्व सहान हा गया था। ३८ । जब
सनी दवा न न देह वा जि म हीन समय लिया था उसी समय म
देव अनुत यज्ञ वाराह ६ - य प्राप्त हुए थे। 20 1 ब्रह्मा आदि
ममम्न दव मा मम्मामा महादव द ममी म गय थरि टम समय
म उस तज का मदव के शमन करन क ालय जाधान कर । ४१।
फिर इस अन तर सभी दवा व समुदाय न अपना-अपना तज भगवान्
दृषभवज म आद्यान कर दिया था उसम व भगवान शम्भू बहुत ही
अधर बलवान् हागव
तत शरभम्पो स तत्क्षयान् गिरिशोऽभवत् ।
ऊर्धाधाभागतश्चाप्टपादयुक्त सु भैरव ॥४३
द्विलक्षयाजनानाय साधलक्षकांवस्तृत ।
ऊच वाराहकायन्नु लक्षयाजन विस्तृत ॥४४
लक्षाधविस्तृत पाश्व वधमानस्तदाभवत् ।
तत शरभरूप र महादवमुमापतिम् ॥४५
ददर्श यजपानी स स्पृशन्त शिरसा विधुम् ।
सुदाधनातानखर कृष्णामारसमप्रमम् ॥४६
दाघवत महाकायमप्टदष्ट्रासमन्वितम् ।
विभ्रत समट तुच्छ दापकर्ण भयानवम् ॥४७
चतुर पृप्त पादानधरे चतुरम्तया।
कुवन्त धारमारावमुत्पतन्न पुन पुन ॥४८
तमायान्त तता दृष्ट्वा क्रोधाधावन्तमन्जसा।
सुवृत्त कनका धार प्रासद नोधमूच्छिता ॥६८
इमक अननर शरभ प वाल व उसी क्षण म गिरिश
३८६ [ कालिका पुराण । गये थे। वे ऊपर और नीचे के भाग से आठ पादो से युक्त अत्यन्त भैरव हो गये थे । ४३ । वह वाराह का शरीर दो लाय योजन ऊंचाई वाला था और डेढ लाख योजन के विस्तार से युक्त था । ऊपर की ओर वह वाराह का शरीर एक लाख योजन के विस्तार वाला था। आधा लाख योजन पार्श्व मे विस्तृत था। उस समय में ऐसा वह वाराह शरीर वर्धमान हो गया था। इसके अनन्तर उस यज्ञ पोनी ने शिर पर चन्द्र का स्पर्श करने वाले शरभ के रूप वाले उमापति महादेव का दर्शन किया था। उनका स्वरूप लम्बी नाक और नखरो वाला था तथा काले अङ्गार के ममान प्रभा से युक्त था ॥४३-४६॥ उनका मुख दीर्घ था---महान् शरीर से समन्धित था और उसमे आठ दाढ़े थी-सटाएं धारण करने वाली पूंछ थो तथा लम्बे कानो वाला परमाधिक भयानक स्वरूप था। ४७ । उसके चार पद थे पृष्ठ भाग में थे तथा चार अधर मै थे । वह महान घोर शब्द कर रहे थे तथा बारम्बार उछाल खा रहे थे (४५। इसके अनन्तर आगमन करते हुए उनको देखकर जो तुरन्त ही क्रोध से दौड लगा रहे थे सुवृत्त-काक और घोर वहां पर क्रोध से मूर्छित होते हुए प्राप्त हो गये थे।४६। तमासाद्य महाकाय शरम भ्रातरस्त्रय । उच्चिक्षिपुस्ते युगपत् पोत्रघातर्महाबलाः॥५० यावत् प्रमाण शरभस्तत्प्रमाणास्तदाभवन् । शरभोत्क्षेपसमये मायया पोत्रिणस्त्रयः ।।५१ तेपा पोत्रप्रहारेण प्रोत् क्षिप्त. शरभस्तदा । पपात पृथिवीप्रान्ते गन्भीरे तोथसागरे ॥५२ तस्मिन् निपतिते तत्र सागरे मकरालये। उन्पत्य से अय. पेतुः क्रोधात्तस्मिन् महोदधौ ॥५३ गुवृत्त करके धोरे पतिते सागराम्भसि । बराहोऽपि सुतस्नेहान् बोधाच्च द्विजसत्तमाः ।
शरम वाराय युद्ध वर्णन ]
उत्प्लाविता प्रजा सर्षा क्षणाजग्मु क्षय ततः।
प्लवमाना प्रजास्तोये नियमाणा समन्तत ॥६५
हा पितस्त्वथ हा तात हा मातीं सुनेति च ।
विलपन्ति स्म करुण भीताश्वार्तामुमूर्षद १६६
यस्मिन् देशे निपतितो वराहे शरभ राह ।
तथवाधोगता भूमि पादत्रेगेन दारिता ॥६७
अपर पृथिवीशान्त उस्थित पर्वते सह ।
ससर्ज जनलोकेषु चला तेपा प्रभजन ॥६८
जनलोकेषु सयुक्ता पृथिवीं शरभस्तदा ।
नि श्रेणीमिव सम्बद्धामचलामपि पोनिमि ।
ददर्श विस्मयाचिष्ट म भीत प्रान्तपीडित ॥६६
उतस्ते युयुधु सर्व पोनापातेन पोत्रिण ।
खुरप्रहारट्राभित्रिोपेश्च दारुणे ।।७०
एक ही क्षण में सब में सब सागर बिना जत बाले से हो गये
पं योनि वे सब जार की राशियां समुक्षिप्त होरर पृथिवी तल में
ममागत हो गई थी।६। उत्प्लाधित हुई इमस्व प्रजा एक ही क्षण
में क्षय को प्राप्त हो गई थी। प्लवमा हाती हुई अर्थात् दुचवियाँ
पाती हुई प्रजा राणी ओर से प्रियमाण हो गई थी। ६५ । उस समय
में बहुत ही अधिक परण दृश्य हो गया था मरने वाले लोग परस्पर में
विलाप कर रहे थे। कुछ लोग यह रहे थे हा पिता, हा माता । हा
तात' हा मुत | इस प्रकार से बहते हुए परम भीत और यार्त मनुष्य
परणापूर्वक विलाप कर रहे यो६६। जिस देश में वागहों वे साथ शरम
नियतित हुआ या यहाँ पर ही अधोमाग में गईई पृथ्वी पादो के वेग
मे विदारित हो गई पो । ६७ दूसरा पृथियो वा प्रान्त पर्वतों के साथ
বিন
हुआ था जन लोगों में उनकै प्रभन्नी माया सूजन किया
था। ६६ । उस समय में शरम ने जन लोकों में संयुक्त पृथिवी को
[ कालिका पुराण केचिला पर्वते पतिता पुनरेव ते ॥५६ विमृद्य वृक्षान जन्तश्च निपेतुश्च पुन पुन । कंचित पर्वतापातत्यमाना महीतले ॥६० वभञ्जुरचलाश्चापि वजन्तो वहुश प्रजा । पर्वता समदृश्यन्त वातवेगेन भूतले ॥६१ सचट्टमानास्तभ्योऽन्ये व्रजन्त इव तेञ्चला । अम्भोनिधो पतिद्भस्तर्वाराहै शरभेण च ।।६२ पर्वतश्च महातु गरुक्षिप्तास्तोयराशयः । तपा प्रपातवेनन क्षिप्तपु जलराशिपु (१६३ हे द्विज श्रेष्ठो । नक्षत्र विमान से महीतल मे पतित हो गये थे । वे सव ज्वालाओ की मालाआ से समाकुल दिखलाई दे रहे थे। ५७ । उनके उत्पतन मे जा वेग था वह बहुत ही अधिक दारुण था। उससे अत्यधिक वेग वाला वायु उत्पन्न हो गया था जो बहुत ही अधिक दारण था । ५८ ! उस वायु से प्रेरित हुए पर्वत पृथिवी तल मै गिर गये थे और कुछ पर्वत पुन ही पवतो म पतित हा गये थे। ५६ । उन्होन वृक्षो को और जन्तुओ का विदित करके बारम्बार नियतित हो गये थे। युछ नो पर्वता के आधाता से महीतल म भुत्यमान हो रहे थे 1६०। उन पवंतो ने गमन करते हुआ ने बहुत सी प्रजाओ यो भग्न पर दिया था । वायु ये वेग से भूतल से पर्वत दिखलाई दिये थे । उन गे गवरमान होते हुए अर्थात् रगड़ पाते हुए अन्य पवत गमन करते हुए मे प्रतीत हो रहे थे। जो अम्मोनिधि म पतित हुए वाराहो से और गरम म दिवाई द रहे थे ६५-६२॥ महान चे पर्वतो रो जग बी शियाँ उशिरा हो गई थी जय पिउनये प्रपात ५ धेगम समस्त जा नाशियां उक्षिप्त रा गई थी। ६३ । निस्सोया व सजाता क्षण व सर्वसागरा । सं गदर क्षिप्त पथियोतलमागते १६४ शरम वाराय पद्ध वर्णन ] उनप्लाविता प्रजा मर्वा क्षणाज्जग्मु क्षय तन । प्लवमाना प्रजातोये भ्रियमाणा समन्तत ॥६५ हा पितस्त्वय हा तात हा मातहीं मुतेति ।। विलपन्ति स्म करुण भौताश्चार्तामुमूर्पव ।।६६ यस्मिन् देशे निपतितो वराह शरभ तह । तरवाधोगता भूमि पादवर्गन दारिता ।।६७ अपर पृथिवीमान्त उत्थित पवतं सह । ससर्ज जनलोकेषु चला तपा प्रजनै ॥६८ जनलोवेपु मयुक्ता पृथिर्वी शरमन्तदा । तिश्रेणी मिव मम्वद्वामचलामपि पोनिभि । ददर्श विम्मयाविष्ट म भीत भालपोटित ॥६६ ततस्ते युयुधु सर्व पोनाघातेन पोनिण । खुरप्रहारर्दष्ट्राभित्रक्षेपश्च दारुण १७० एक ही क्षण म मब म सब सागर विना जल वाले से हो गय ये वयानिधे गब जन को राशियां समुत्सित होपर पृथिवी तल मे समागत हो गई थी । ६४ । उत्प्लावित हुई ममस्त प्रजा एक ही क्षण म क्षय वा प्राप्त हो गई थी। पवमाा हाती हुई यर्थात् हुववियाँ खाती हुई प्रजा सभी ओर मे प्रियमाण हो गई थी । ६५ । उम समय में बल ही यधिर वरण दृश्य हो गया था गरन वाले लोग परस्पर में विलाप कर रहे थे। कुछ लोग कह रहे थे हा पिता, हा माता | हा तान हा मुरा। इस प्रकार से यहते हुए परम भीत और सारी मनृप्य पाणापूर्वक विलाप कर रहे थो६६। जिस देश में वाराहो के माय शरम हुआ था यहां पर ही अधोभाग में Tई दुई पृथ्वी पादो के वेग मे पिदारित हो गई थीं। ६७ दुसरा पृथिवी का प्रान्त पर्वतों के माध उत्यित हुआ था जन लोको मे उनके प्रमजा चा या सृजन किया या । ६८। उस समय म शरभ ने जन नोकाम सयुक्त पृथिवी को - नियतिन
i कालिका पुराण
पोत्रियो कचला भी सम्बद्धा को निश्रेणी की ही भांति देखा या। वह
विस्मय से आविष्ट हुआ भीत-- भ्रान्त एव पीडित था । ६६ । इसके
अनन्तर पोत्रीगण वे मव पोनाघात से युद्ध करने तगे थे। तथा उन्होंने
पुरो के प्रहार के द्वाग-दाढो से और महान दारण गात्र के ६.पो से
ही युद्ध किया था। ७० ।
शरभोप्यथ दप्ट्राग्रे खम्तीक्ष्ण खुरैस्तथा ।
लागुलस्य प्रहारम्त तुण्डघातैर्महास्वन ।।७१
चतुभि पोविभिन्तन्तु म एक शग्भो महान् ।
एकान्त योधयामाम गहम परिवनसरान् ॥७२
सपा प्रहारगश्च भ्रमणश्च गतागतं ।
आस्फोटितन्तथारानैदेहपातं पृथक पृथक् ।
पाताले पन्नगा सर्ने विनेशु कद्रुजे नह । ७३
ततस्ते सागर त्यक्त्वा पृथिवोमध्यमागता ।
परम्पर युध्यमाना ततोऽभूत् पृथिवी समा ॥७४
शेपोऽपि महता यत्नाद्वलेनाष्टम्यवच्छपम् ।
दधार पृथिवी दुखर्भग्नशीर्ष प्रतापिता ॥७५
अनन्ते वामनीभूते समत्या पृथिवीतले ।
गनोभिश्चलदिभश्च पर्वते सर्गजन्तुषु ॥७६
नप्टेप युध्यमानेषु त्रिपोधिशोषु च ।
गागरं गप्लुने मर्गजगत्यापोमये हरिम् ॥७७
चिन्ताविष्ट मुरज्येष्ठ उपासाथ पितामह ।
भगयन भुवन गर्दा समुरागुरमानुपम् ।।७८
गरे याना एप ही उग माग गरम उन पाणपोनियो में
मायब महापं पर वामम दादो में अब भागोगे-नीश
मोग-पुणे मे-मागम प्रसादाम और महा गरम पार्म
नापानी म पारी उन पारियों में गाए मा अर्थात गर्ने पुरु
शरभ-बाराय युद्ध वर्णन ] ३६१ दिया था ॥७१-७२ ।। उनके प्रहरी मे-देगों मे-भ्रमणो से और गमनागमनो से-वास्फोटितो से-तथा आरावो से-पृथक-पृथक् देह पे पाती से पाताल में ममम्त पन्नग कट्ठजो के माथ विनष्ट हो गये में । ७३ । इसके उपरान्त वे सव मागर का परित्याग करके पृथिवी के मध्य मे समागत हो गये '1 ये परस्पर में युद्ध करते हुए रहते थे फिर यह पृथिवी सम हो गई थी। ७४ । शेष भगवान भी बडे भारी यल से वल के द्वारा कच्छप को अवब्ध करखे भग्न शीर्ष वाले प्रत्यपित होते हुए बडे दुखो के माथ इस पृथिवी को धारण करने वाले हुए थे अर्थात् वडी कठिनाई म उन्होने पृथिवी को धारण किया या । ६५ । अनन्त के वामनी भूत होने पर और पृथिवी तल के समत्व को प्रास हो जाने पर सागरो के और पर्वतो के चलायमान होने से ममस्त जन्तुओ के विनष्ट हो जाने पर त्रियोति शरभो के युद्ध मान होने पर सागरो के द्वारा सम्पूर्ण जगत् के आप्लुत होने पर उस समय में जलमय मे चिन्ता मे समाविष्ट सुर श्रेष्ठ पितामह भगवान् हरि से बोला । हे भगवन् । मुर---असुर और मनुष्यो के महित समस्त भुवन विध्वस्त हो गया है.-- यह पृथिवी विशीर्ण हो गई है और स्थावर तथा जङ्गम (चेतन) नष्ट हो गये हैं ॥७६-७८॥ विध्वस्त पृथिवी शीर्णा नष्टा स्थावरजगमा । देवदानवगन्धर्वा दैत्याश्चापि सरीसपा । विध्वम्ता जगता नाथ मुनयश्च तपोधना ७६ स्व पालकोऽसि सर्वेपा त्वमेव जगत प्रभु । तस्मात् पालय न सर्वान् पृथिवी च जगत्पते ।।८० त्वमेव काय वाराह स्वयमेवोपसहर । सस्थापय महावाहो पृथिवी च चराचरं ॥८१ इति तरय वच श्रुत्वा ब्रह्मणोऽथ जनार्दन । यत्न चक्रे तदा सर्व सस्थापयितुमच्युत ॥८२ -
{ पालिका पुराण
ततो हरी रोहितमत्स्यम्पी
भूत्वा मुनीन सप्त तदा सवेदान् ।
जधाच्छ ते रक्षणतनपगे जगद्-
हिताय सर्वच तिकोविदावरान ।।८३
वसिष्ठमवि त्वथ कश्यप च
विश्वादिमित्र च मगोतम मुनिम् ।
महातपस्थ जमदग्निमय
तथा भरद्वाज मनि तपोनिधिम् ॥ ८४
निधाय पप्ठे म हितोयमध्ये
स्थितो महानोप्रवरे मुनीन्द्रान् ।
तत शिर माल्वयितु जनार्दनो
जगाम यस्मिन ययधे स पोनिभि ८५
[ कालिका पुराण - देखकर जो समागत हुए ये वागह ने पूर्व मे होने वाली नृसिंह भगवान् की मूत्ति का स्मरण किया था । ८६ । उनके द्वारा स्मरण किए हुए वराह के सखा वराह के हित मे भगवान् नृसिह समागत हुए थे । उस अमर पर आए हुए उन भगवान नृसिंह का वीक्षण करके उनके कामो को अपने ही तेज में ले लिया था । ८७ । वाराहो के साथ शरभ ने देखा था कि वह तेज सबके तुल्य विष्णु भगवान के अन्दर प्रवेश कर गया था। तज मे रहित भगवान नृसिंह का ज्ञान प्राप्त करके वराह ने नि श्वासो के ममूह को छोड़ा था । अर्थात् वे बहुत कुछ नि श्वास लेने लग लग गय थे । ६६ । 'फर ता बहुत स वाराह समुद्भूत हो गये थे जिनका वहुत प्रमाण था और अद्भुत एव तीक्ष्ण दाढो वाले थे। वे वराह शरभगिरिश माया धारी और भय रहित हान हुए पीडित करने वाले थे ।८६ । उम समय म भी मिह भगवान के साथ युद्ध किया था और यहुन अधिर गिारश का मदन किया था। एक क्षण मे तो पक्षियो के ममान स्वरूप वाल थे और क्षण म गोरे - तुरग और मनुष्य हो जाते थ । ६० । 17 ही क्षण ग नृसिंह और वराह के रूप वाले से और वे रिमी क्षण म गोमायु (गाल ) और वैकृतिक अर्थात बिगडे जाते थे। उस युद्ध मे वराही म अनेक भांति में महा भयङ्कर म्वरूप वितन्यमान वियथ६१ । निरीक्ष्य भगर निपीडित तरयासदमाधवस्त गिरीशम् । पस्पशं विष्णुगिरिश करेण नेजो न्यधात्तम निज पुन सा६२ अथ सम्पृष्टमान म विष्णुणा प्रभविष्णुणा । अतीव मुदिनो इष्टो बलवान् समचायत ॥६३ अथोच्चं शरभो नाद ननाद बलवदहम् । आपूग्निानि येनंतद्भवनानि चतुदंश ।।१४ नदतम्तम्प यदनाच्छोकग ये विनि गता। नतो गणा ममभयन् मरपाया महोगरा ॥६५ भरभ-वालय युद्ध वर्णन पया वराहनिश्वासान्नानास्पधरा गणा । वराहास्तादृशा एते ततोऽप्यतिवला. पुनः ।।६६ श्ववराहोप्ट्ररूपाश्च प्लवगोमायुगोमुखाः । प्रक्ष मार्जारमातगशिशुमारस्वरूपिणः ॥६७ सिंहव्याघ्रमुखा केचित कोधिः सर्पाखुमूर्तयः । हयग्रोवा हयमुखा महिपाकृतय परे ॥६८ उस अवमर पर भगको जनके द्वारा रिपीडित देख कर उन गिरिश के ममोप में भगवान माधव आ गये थे। भगवान् विष्णु ग अपने कर कमल से गिरिश या स्पर्श किया था और फिर उनने अपना तेज पुन. उनमे निमापित कर दिया । ३२ 1 इसके अनन्तर प्रभा विष्णु भगवान् विष्णु के घर में स्पर्श होते हुये ही वे अत्यधिक प्रसन्न हष्ट और बलवान हो गये थे। इसके अगलर शरभ ने बहत ऊचा-~-बल- वान् और दृढनाद (गर्जन की ध्वनि) किया था जिससे ये नौदह 'भुवन भर गए थे अर्थात् चोदह भवनों में फैल पर पहुंच गया था ।६४। इस रीति मे नाद करने वाले उसके मुरा ये जो भी मीकर अर्थात जल के कण निकले थे उनसे महान शगैरो मे धारण करने वाले तथा विशाल ओज से समन्वित समुत्पन्न हो गये थे । ६५ । जिस प्रकार से वराह के नि.श्वास से नाना पो के धारण करने वाले गण हुए थे । ये वैसे ही घराह थे प्रत्युत उन मे भी अधिक वन वाले थे । ६६ । श्वान, वराह के रूप वाले--प्लव, गोमायु और शोके मुख से सयुत-छ, मातङ्ग, माजीर और शिशु पार के स्वरूप बारी-कुछ सिंह और व्याघ्र के के समान मुख वाले थे-हस की सी ग्रीवा से युक्त और हय के समान मुख वाले तथा दूसरे महिप के समान आकृति वाले थे । ६७/६८1 अन्ये तु मनुजाफारा मृगमेषमुखाः पुन.। कावन्धा हीनपादाश्च विहस्ता वहुपाणय. ॥६६ उष्ट्र मुख वाले और कुछ सर्प और [ कालिका पुराण केचित्त शरभाकारा वृकलाममुखा परे। मत्स्यवक्ता ग्राहवक्ता ह्रस्वा दीर्घाग्ला कृशा ॥१०० चतु पादाप्टपादाश्च निपादा द्विपदा परे। एकपादा भूरिहस्ता यक्ष पुरुषोपमा १०१ पश्वाकारा पक्षयुक्ता लम्बोदरा महादरा । दीर्घोदरा स्थूलक शा बहुकर्णा विनणका ।।१०२ स्थूलाधरा दीघदन्ता दीघश्मश्रु धरा परे । ये सन्ति प्राणिनो विप्रा भुवनेषु समन्तत ॥१०३ चतुर्दशसु ते देपा रूपेण समता गता । नेहास्ति भुवो जन्तु स्थावरो वा जगन् पुन ॥१०४ यत्त ल्यरूपेण गणो न जात शकरस्य च । ते भिन्दिपाल र.डगश्च परिपस्तोमरैस्तथा ।।१०५ दूसरे मनुष्य के समान आकार वाले थ और पिर मृग तथा मेप के मदृश मुरा म पमन्चत थे। कुछ केवल क्वाध हा थे जिसके मुख नही थे---- चिना हाथा वाले और 4 बहुन हाथो स युक्त थे 1६६। उनम छम के मटश प्राकार वाले थ और दूसरे कृपलाम मे मयत थे। इछ मत्स्य के मदृश मुख से युन थे और कुछ ग्राह के ग मुख वाले थे-कुछ बहुत छोटे--कुछ बहुत बड़ बल वाले तथा कुछ कृण ये । १००। कुछ ऐसे थे जिनके चार पैर थे- कुछ बार पैरो गया और कुछ तीन एव दो परो दाले थे । कुछ एक ही पर वार थे और वृछ वहत अधिय हाथो म सयन थे। पुष्ट यक्ष तथा विपुस्पो के समान थे ॥१०१ ।। कुछ पशुओ के समान आवार वाले थे तो कुछ पलो मे मयुन थे । युछ लम्वे उदर वाले थे तो वछ मगन उदर में मयुक्त ये । कुछ से थे जिनरे दर दीर्घ थे नया छ म्यल वेशा मे मन्वित एव कुछ बटन काना दारी तथा पुछ विरा ही बावाने थे । १०२। कुछ 37 में मे थे जिनके स्थूल अपर ये ना कुछ दीपं दाना म गमवित थे और दूगर वढी गम्बी दादी के जैमें मुख 2 -
[ कालिका पुराण
थे जैसे रुद्रदेव ही होदें 1१०८।१०६। कुछ तो अपने मुन्दर स्प से तथा
मोहने वाले स्वरूप से कामदेव के तुत्य थे जो वनिताओ समुदाय
साथ रति करने मे समुत्सुक थे । ११० । सभी आकाश मे चरण करने
वाले थे और सभी स्वतन्त्रता से गमन करने वाले थे। उनमे कुछ
नील कमल के मदृश श्याम वर्ण वाले थे तो कुछ शुक्ल और लोहित
थे ।१११। कुछ रक्त पोत तथा विचित्र वर्ण से सयुत और दूमरे हरित
एव कपिल थे । कुछ आधे पीत--अ ध रक्त-अध भाग में नील और
दूसरे धवल थे। ११२ ।
सकृष्णपीता शुक्लेन कृष्गेनाधन रन्जिता ।
एकवर्णा द्विवर्णाश्च त्रिवर्णाश्च तथापर ।।११३
चतु पटपचवर्णाश्च केचिद् दशगुणा द्विजा ।
डिण्डिमान् पटहान शखान भेर्यानकसकाहलान् ॥११४
मण्डूकान् झपराश्चद अझश्चि समर्दला ।
वीणास्तन्नी पचतन्त्री शकटान् ददरास्तथा ॥११५
गोमुखानानकान कुण्डान् सता नकरतालिकान ।
वादयन्तो गणा सब हसनश्च मुहुर्मुहु ।।११६
वराहाभिमुखा भूत्वा तस्युस्ते हृष्टमानसा ।
सान् सर्वाना शरभो भगवान् वृषभध्वज ॥११७
निघ्नततान् वराहस्य गणान् वै क्रूरकर्मभि ।
करदृष्टया रयुद्ध मरा भूत्वा महाबला ||११८
ततस्ते वंगणा सव नानाकार वरायुधा ।
साधं वराहस्य गणयुयधु में रदशना ॥११६
कुछ कृष्ण और पीत वर्ण से युक्त थे तथा कतिमय अयं कृष्ण
और
शुक्न वर्ण मे रजित थे। कुछ एक ही वर्ण वारा-पतिपय दो
वर्णो गे मयुक्त सपा दूमर तीन वर्षों से समवित थे। ११३ । बुछ
पोर यों स युन थे और हे दिनो । कुछ दश गुणा वाले
.
।
गरभ वाराह युद्ध वर्णन ] थे। मभी गग वादन करने वाले थे जिन म कुछ डिण्डिम---पटह- शब-भेरी-आनर-सकल -गोमुस-~का~ -~मण्डूक-- झझर--- झर्जरी ममदल-वीणा-त-त्री--पञ्च नन्नी--शकर और ददर- कुण्ड-मताल कर तालिकाओ को वादन करत हुए सभी गण वार वार हंसने वाले थे । ११४ -११६ । वे मव वराह की ओर मुख वाले होते हुए स्थित हो गए थे। उन मव मे वृपभध्वज भगवान् शरभ ने कहा 1 ११७ । इन वराह के गणो का विहनन कर दो। ये निश्चय ही अपने क र कर्मों के द्वारा-रूर दृष्टि मे-कर युद्धो के द्वारा कर होकर महान बल वाल थे ।। ११८।। इसके अनन्तर वे सव गण अन आकार धारो और नाना श्रेष्ठ आयुआ से समन्वित थे। उन कर दिखलाई देन वातो न बराह के गणो के साथ युद्ध किया था ॥११॥ आकाशचारिण रावें जलपूर्ण जगत्त्रयम् । ते परित्मज्य युयुधुवियत्येवोभये गणा ॥१२० तत क्षणाद वराहास्य गणान मर्वान् महावलान् । हरस्य प्रमथा जनुमहावाता इवाम्बुदान् ।।१२१ हतेषु तेषु वीरपु वाराहेषु गगप्वय । दध्यौ वराह किमिति प्राक पश्चावृत्तमास्थितम् ।।१२२ अथ चिन्तयतस्यस्य स्वान्त गत्वा जनादन । तत् सव ज्ञापयामास वगहवपुपो हितम् ।।१२३ ततो देह-परित्याग कर्तुं समयतस्तदा । नतो दप्ट्राग्रघातेन नरसिंह महावल ॥१२४ शरभो भगवान् भर्गो द्विधा मध्ये चकार है। नरसिंहे द्विधाभूते नरभागेण नस्य च ॥१२५ नर एव समुत्पनो दिध्यरूपो महान्ऋपि । तस्य तञ्चास्यभागेन नारायण इतिश्रुत ॥१२६ भ-बाराय वर्णन ] - जहि मा त्व महादेव त्यक्ष्ये कायमसशयम् । हिताय सर्वजगता देवानामपि अत्विज्ञाम् ॥१३२ मम देहातीकोधैर्यज्ञ यूप प्रकल्प्य च । पृथक् पृथक् महाभागा मणमित्र भुवादिकम् ।।१३३ वह महान तेज वाले महामुनि जनादन हो गये थे। नर और रायण ये दोनो महतो मति वाले इस राष्टि के हेतु हा गये थे । १२७॥ दोनो वा प्रभाव बहुत ही दुर्घर्ष था और णास्त्र मवेद ५ लार सो में सब उनका प्रभाव महन करने के योग्य नहीं था। मत्स्य मूर्ति सर के स्वरूप वाली नौका में उन दोनों को निधापित किया था और र वाराह हरि देव भरम के समीप में प्राप्त हुए थे। मुझे ममस्त गतो ये हित के सम्मादन करने के लिए वपु का त्याग अवश्य ही रना चाहिए ॥ १२८-१२६ ॥ यह पूर्व म मैंने प्रनिजा बी वो उनी लिये यह समुद्यम किया जा रहा है। यह समुद्यम भगवा र हरि के ग-शम्भु के द्वारा और ब्रह्मा के द्वारा किया जा रहा है ।। १३० ।। सा मली भांति चिनन करने उस समय म परमेश्वर शूवर ने शरभ हान बलवान् देव महादेव से वहा या । १३५ । ह महादेव में परित्याग कर दी। मैं बिना किसी सशय के इस शरीर का त्याग । गा यह मेरे धारोर वासात समस्त जगतो व और दवा तथा दिनों के हित के सम्पादन करन के हो लिय है । १३२ । और दह 'प्रतीयों के समूहों से यज्ञ का यूप कल्पित करके हैं महाभाग' पृथा- पर शामिन वे महित स वा आदि की कल्पना यी है । १३३ । ततस्ते तान् बिभि. पुविधध्य जगता हिते । पनवेन सुवृतेन पोरेण च जगन्मयोम् ।।१३४ यमाद् देवा. प्रज्ञाश्चंव यज्ञादनान नियोगिना । मई यज्ञान् सदा भावि सर्व यज्ञमय जगत् ।।१३५ यमिम पृथिवीगर्भमाधत्त मलिनी पुन. । . 1 श्राप ४०२ [ कालिका पुराण तमुत्पन्न स्वयं देवी चिर सगोपयिष्यति ॥१३६ प्राप्ते काले यदा देवी तदायुप्मान् सुभापते । वधस्तस्यातिमारार्ता तदंदन हनप्यथ ।।१३७ भारती पृथिवी मग्ना यदाधाः शतयोजनम् । शृ गिवराहस्पेण प्रोद्धरिप्ये तदा विमाम ॥१३८ कृतकृत्य तु त काय त्याजयिष्यति ते सुत. । या भावी देवसेनानी मुद्रात् पाण्मातुरावय. ॥१३६ एव यज्ञवराहे तु भाषमाणे महावले । निसृत्य सुमहत्तेजो ज्वालामालातिदीपितम् ।।१४० इसके अनन्तर तीन पुत्रो के द्वारा वे उनका जगतो के हित के लिये निवध करे 1 इस जगह से परिपूर्ण को सुवृत्त-घोर और कनक से रक्षा करो। १३४ । यज्ञ से देव और प्रजा-यज्ञ से अन्य नियोगी यह सभी कुछ यज्ञ से ही सदा होने वाले हैं। यह सब जगद यज्ञो से परिपूर्ण है । १३५ । यातिनी पृथिवी पुन जिसने इस गर्भ को धारण किया था वह देवी स्वय उस समुत्पन्न पुत्र का भली भांति रक्षण करेगी। १३६ । जिस समय मे काल प्राप्त होता है उसी समय में देवी आयुष्मान् वोलती है । उसके वध के विषय मे जब काम से अत्यन्त आत होती है तभी इसका वध करेगी। १३७ । जिस समय मे भग्न हुई भारती पृथिवी को नीचे की ओर सौ योजन भृङ्गी वराह के रूप से उसी समय में इसका उद्वार करूगा । १३८ । तब आपका पुत्र आपके शरीर को कृतकृत्य अर्थात सफल समझ कर उसका स्वाग कर देगा। जो कि आगे होवे देवो की सेना का सेनानी पाप्मा तुन्गम वाला रुद्रदेव से समुत्पन्न होगा। १३६ । इस प्रकार से यज्ञ वराह के कहे जाने पर जो कि बलवान थे एक महान तेज जो ज्वालाओ की महा मालाओ से दीस या निप्पल था। १४०। सूर्यकोटिप्रतीकाश वराहवपुषस्तदा। अपने
[ वालिका पुरण
गरीर का भेदन करके उसे जल में गिरा दिया था। १४६ । उसका
प्रथम परतन करके उसी भांति सुवृत्त-कनक और घोर पो वण्ठ भाग
म भेदन कर करवे हनन कर दिया था। १४७ ।
त्यवतप्राणास्तु ते सर्व पेतुस्तोये महार्णवे।
जले शब्द वितन्वाना पालनलसमत्विप ॥१४८
पतितेपु वराहेपु ब्रह्माविष्णुहरस्तथा ।
सृप्ट वर्थ चिन्तयामासु पुनरेव समागता ॥१४६
हरस्य तु गणा मवे तदा भग समागता ।
उपनस्तुर्महाभागाश्चतुर्भागेन भाजिता ॥१५०
पत्रिंशत्तु सहस्राणि प्रमथा द्विजसत्तमा ।
पत्रंकत्र सहवाणि भागे पोडश सस्थिता ॥१५१
नानारूपधरा ये वै जटाचन्द्रार्धमण्डिता ।
ते सर्वे सकलैश्वर्ययुक्ता ध्यानपरायणा ॥१५२
योगिनो मदमात्सयदम्भाह कार वजिता ।
क्षीणपापा महाभागा शम्भो प्रीतिकरा:परा ॥१५३
न ते परिग्रह राग कांक्षन्ति स्म कदाचन ।
ससार-विमुखा सर्वे यतयो योगतत्परा ।।१५४
प्राणा के परित्याग कर देने वाले वे सब महार्णव के जल मे
गिर गय थे। जल मे पात करने के अवसर मे घोर ध्वनि का विस्तार
करते हुए कालानल के समय कान्ति वाले हा गय थे । १४८।।
वाराहो में पतित हो जान पर ब्रह्मा-विष्णु तथा हर
फिर समागत
होकर सृष्टि की रचना करने के लिये चिन्तन लगे थे । १४६। उस
अवमर पर हर के समस्त गण भर्ग के समीप म समागत हो गये थे। वे
महाभाग चार भागो म विभाजित होवर उपस्थित हुए थे । १५० । हे
द्विज मत्तमो । वे प्रथम छत्तीम सहस्र थे । वहाँ पर एक भाग मे सोलह
गत्य गम्यिन हुए थे । १५१ । जा निश्चित रूप से बने स्वरूपो के
४०६
[ बालिका पुराण
-
व्रत वाले थे वे सोलह करोड कहे गये हैं । वै मर सिंह और व्याघ्र
आदि के समान रूप वाले थे और अणिमा आदि सिद्धियों के द्वारा मयुत
थे । १५७ । अन्य कामुक शम्भु के नर्मम चिव वांद पणय विधान
वे मन्त्री थे जो कि ऐमे कहे गये थे। वे विचित्र स्वरूप वाले आभूषणो
मे विभूपित थे । १५८ । भगवान हरके हो ममान रूप से वे वृषभध्वज
विशद हो रहे थे । तथा वे उमा देवी के तुल्य मुन्दर स्वरूप वाली
प्रमदाओ से समागत थी। १५६ । विचित्र माल्यो के आकारणों से
युक्त थी तथा हिम सब की गन्ध मे मण्डित थी उमा देवी की सहायता
से सयत और क्रीडा करते हुए भगवान् शम्भु के पीछे भूधित होती हुई
अनुगमन कर रही थी । १६० । शृङ्गार और वेल के भाभरण वाले
वे आठ करोड गण थे। उनमे अन्य अधं नारीश्वर थे जो अर्ध नारीवर
हर के समीप थे । १६१।
ध्यानस्थं प्रविविशस्ते तुल्यरूपा हरस्य ये।
उमासहायो हि यदा रमते ससुख हर ॥१६२
अर्धनारीशरीरास्तु द्वारपाला भवन्ति ते ।
आकाशमार्गे गच्छन्तमनुगच्छन्ति नित्यश ॥१६३
ध्यानस्थ परिचर्यन्ति सलिलादिभिरीश्वरम् ।
नानाशस्त्रधरा शम्भोगणास्ते प्रमथा स्मृता ॥१६४
प्रमथ्नन्ति च युद्धेषु यध्यमानान महायलान् ।
ते वै महावला शरा सख्यया नव कोटय ॥१६५
अपरे गायनास्तालमृदगपणवादिभि ।
नृत्यन्ति वाद्य वुर्वन्ति गायन्ति मधुरस्वरम् ।।१६६
नानारूपधगस्ते व मख्यया पोटयस्त्रय ।
मततं चानुगच्छन्ति विजरन्त महेश्वरम् ॥१६७
म मायाविन मूरा सर्वे शास्त्रार्थवारगा।
मवें मवंत्र सर्वज्ञा रायें सर्वप्रगा सदा ।।१६९
[ वालिया पुराण वराहगणनाशार्थं हिताय जगता तथा । शकरम्याथ सेवाय ममुनपन्ना इमे गणा ॥१७४ वराहस्य गणान दृष्टवा नरसिंह तथा हरिम् । स्वय शरभरूप सन ध्यायन्नाद नदाकरोत् ॥१७५ वै मब मुहूर्त प्रान मे सम्पूर्ण भुवन में जाकर फिर गति के द्वारा पुन भव को प्रास हो जाया करते थे। वे मघ महान वल में युक्त थे तथा अणिमा महिमा आदि आठौ प्रकार के ऐश्वर्यो से समन्वित थे। १६६ । दूसरे रद्र नामौ वाले जरा और अर्ध चन्द्र से मण्डित थे । वे देवेन्द्र के आदेश से सदा ही स्वर्ग में रहा करते हैं । १५० । उनकी मख्या एक करोड थी और वै मब विशेष बलवान थे । वे सदा ही हरके गण भगवान शम्भु पी सेवा किया करते हैं । १७१ । बै जो महान पापिष्ठ थे उनको विस्मित किया करते हैं तथा जो धर्मिष्ठ है अर्थात् धर्म का समादर करने वाले हैं उनका पालन किया करते हैं । जो पाशुपत व्रत के धारण करने वाले हैं उनमे ऊपर निरन्तर अनुग्रह किया परते है । १७२ । जो प्रपत आत्माओ वाले यागी जन है उनके विघ्नो का निरन्तर हनन किया करते हैं । ये भगवान हर के गण जो कि समस्त में मख्या में छत्तीस करोड थे । १७३ । ये गण वाराह के गणो के नाश करने के लिये तथा ममस्त जगतो के हित--मम्पादन करने के लिए और भगवान, शङ्कर को मेवा के लिये समुत्पन्न हुए थे । १७४ । वराह के गणो को देखकर तथा मरगिह हरि को अवलोक्ति बरखे स्वय शरम के स्वरूप वाला हाता हुआ और ध्यान करते हुए उस समय में माद किया था ॥१७॥ तच्छीन्वराद्यतो जातास्तत्तेपा बहुरूपता । व रदृष्ट्या जरयुद्ध मरवृत्यरिमान् गणान् । वराहस्य घनतेत्येव यन प्रोक्न वपदिना ॥१७६ अतम्ते रचर्माण प्रमाताश्च भयवरा ।
शरम-वाराह युद्ध-वर्णन ] न सदा करकर्माणि ते कुर्वन्ति महौजसः ॥१७७ दृष्टिमात्रस्य ते करा ऋ रास्ते न तु कार्यत । फलं जलं तथा पुप्प पव मूल तथैव च ॥१७८ निवेदितानि च भुञ्जन्ति वनपर्वतसानुम् । आहृत्यापि च धज्जन्त्रि पत्र मूल पुष्पादिक च यत् ॥१७६ भवेभर्गम्य योग्य तदभोगास्ते महौजस । आमिपाणि च नाश्नन्ति हित्वा चैत्रचतुर्दशीम ।।१८० तत्रामिपं हरो भक्ते चतृदंश्या मधौ सदा । तत सर्वे गणास्तत्र भुजते पललान्यपि ॥१८१ उनके शीकरो मे (जल कणो मे ) जो उत्पन्न हुए थे इमी कारण मे उनके स्वस्प भी वहन थे। कर दृष्टि से करगति से-- कर युद्धो से-कर कृत्यों से वराह के इन गणो का हनन करने वाले थे क्योकि भगवान कपर्दी (शिव) ने कहा है । १७६ । अतएव वे कर कर्मों के परने वाले और भयङ्कर समुत्पन्न हुए थे। वे महान बोज वाले मदा कर कमों को नहीं निया करते हैं । १७७ । दृष्टि मात्र मे ही ये झूर हैं ये कार्यों से कर नही थे । वे फल-पुप्प~जल-पत्र तथा मूल को भोग करते हैं । १७ । वनो~पर्वतो की शिखरों में पलादि जो निवेदित किये जाते हैं उनका प्रक्षण करते है और माहरण घरके भी जो पत्र पुष्पादिर हैं उनवा अशन दिया परते हैं । १७६ । भर्ग का जो मोग होता है उसी भोग वा रे वे महान् भोज वाले भी थे। यंत्र की चतुर्दशी को छोड कर वे अमिषो का अशन नहीं किया करते हैं । १८० । यहाँ पर भगरान हर मधु मे चतुर्दशी मे सदा अमिय (मौस) का मगन क्यिा करते हैं । पिर मव गण भी वहां पर अभियो का उपभोग किया करते है । १८१ हते वराहम्य गणे भगमामाद्य ते गणाः । चतुर्मागा स्वय भूत्वा भूतक्मति व जगु ।
४१० [ वालिका पुराण भूतत्वमभवत्तेपा चतुर्भागवतो तदा ॥१८२ वचनात् पायानेस्तु भूतनामस्ततो मत । यो लोकोविदित पूर्व भृतग्रामश्चतुर्विध । यतस्तेभ्योऽधिको यत्तद्दभूतग्राम स उच्यते ॥१८३ इति व कथित सर्व भूता शम्भुगणा यथा। यदाहारा यदाकारा यत्कृत्यास्ते महौजस १८४ य इद शृणयान्नित्यमाख्यान महदद्भुतम् । स दीर्घायु सदोतसाही योगयुक्सश्च जायते ।।१८५ वराह के गणो के निहत हो जाने पर वे गण मार्ग के समीप में पहुँच कर म्वय चारो भागो वाले होकर भूत कर्म का गान करते थे। चार भाग वाले उनका भतत्व उस समय में हो गया था । १८२ । भग- वान् पद्म योनि के वचन से फिर भूतग्राम माना गया था। जो पूर्व में लोय और वद मे विदित भूतग्राम चार प्रकार वा था। क्योकि यह उनसे भी अधिक था अतएव वह भूतग्राम कहा जाया करता है ।१८३। यह सब आपको बतला दिया है जिस तरह में शम्भु के गण भूत हैं । जो भी आहार वाले है-जैसे आवार वाले हैं और जो कृत्य करने वाले हैं वे महान् ओज से युक्त हैं । ८४ । जा इस महान, अद्भुत आख्यान का नित्य श्रवण किया करता है वह दीध आयु वाला-सदा उत्साह मे सम्पन्न और याग गे युत्त होता है । १८५५ वे ॥ वराहतनौ गजोत्पत्ति वर्णन ॥ पथ यज्ञवराहस्य देहो वज्ञत्वमाप्तवान् । प्रेतात्वमगमन् पुत्रा वराहम्य पथ त्रय ।।१ आलियोग्य प्रलय पम्माद् भगवता वृत ।
वाराहतनो यज्ञोत्पत्ति वर्णन 1 ४५१ जनक्षयो महाघोरो वराहेण महात्मना ॥२ क्थं वा मतस्यरूपेण वेदास्त्राताश्च शाङ्गिणा। कय पुनरभूत सृष्टि केन चोर्वी समुद्धता ॥३ ईश्वर शारम काय त्यक्तवान वा कथ गुरो। कोटक प्रवृद्य तददेह तन्नो वद महामते ॥४ एतेपा द्विजशार्दूल भवान् प्रत्यक्षदर्शिवान् । तन्नोऽद्य श्रीप्यमाणाना कथयस्य महामते ॥५ शृणुध्व द्विजशार्दूला यत्पृष्टोऽहमिहाद्भुतम् । शृण्वन्त्ववाहिता सर्वे सर्ववेदफलप्रदम् ॥६ यज्ञेषु देवास्तुप्यन्ति यज्ञे सर्व प्रतिप्ठितम् । ग्रनेन घ्रियते पृथ्वी यज्ञम्नारयति प्रजा ॥७ ऋपियों ने वहायज्ञ वराह का देह यज्ञत्व मे प्राप्त हुआ या। और वराह के तीन पुत्र होनात्व से प्राप्त हुए थे? ॥१॥ यह आवानिव प्रलय भगवान ने कैसे किया था और महात्मा वराह ने महान घोर यह जनो वा क्षय मे किया था ॥२॥ विस प्रकार में भगवान माझंधारी मत्स्य के स्वरूप के द्वारा वेदो का प्राण किया था अर्थात् वेदो को गुरक्षा करके उनको सुरक्षित रखमा था? फिर दुवारा यह सष्टि की रचना कैसे हुई थी और इम भूमि को किमने समुदत दिया था ॥३॥ है गुरदेव । ईश्वर ने शरभ का देह कैसे त्याग दिया था ? यह देह बगे प्रवृत्त हुआ था~यह मव हे महामते ! हमको पालाइये ॥ ४॥ हे द्विज शार्दूल । इन मयमा हाल आपने प्रत्यक्ष रूप में देखा था 1 है महती मति वाले ! आज हम सब इगरे थवण करने वाले हो रहे हैं । अतएव हमको बाप बनाने की कृपा पीजिए ॥५॥ माण्डेय मुनि ने कहा है द्विज मानो । जो मैं यहाँ पर एक अदभुत सजा दिया पा उमको मुनिए । आप सर परम मावधान हो जाइये और हम ममरत वेदोरे पल को प्रदान करने वाले ४१२ [ पालिका पुराण को मुनिए ॥ ६ ॥ यज्ञो म देवगण सन्तुष्ट होते है । और यज्ञ मे मभी कुछ प्रतिष्ठित है । यज्ञ के द्वारा ही पृथ्वी धारण की जाती है और यज्ञ ही प्रजा का वरण किया करता है ।। ७ ।। अन्नेन भूता ज वन्ति पर्यन्यादन्नसम्भव । पर्जन्यो जायत यज्ञात सर्व यज्ञमय तत ।। स यज्ञोऽभूद्वराहम्य कायाच्छम्भु विदारितात् । यथाह कथये तद्व शृण्वन्त्ववहिता द्विजा ॥६ विदारिते वराहस्य काये भर्गेण तत्श्रणान । ब्रह्मविष्णुशिवा देवा सर्वेश्च प्रमथ सह ।।१० निन्युर्जलात् समुद्धृत्य तच्छरीर नभ प्रति । तदभिदु शरीप तन विष्णोश्चक्रण खण्डश ॥११ तस्यागसन्धयो यज्ञा जाताश्च वै पृथक् पृथक् । यस्मादगाच्च ये जातास्तच्छृण्वन्तु महर्पय ॥१२ भ्रूनासामन्धितो जातो ज्योतिष्टामो महाध्वर । हनुश्रवणसन्ध्योस्तु वह्निष्टोमो व्याजायत ।।१३ चक्षुभ्रुवो सन्धिना नु व्रात्यप्टोमो व्यजायत । जान पौनर्भवप्टोमस्तस्य पोयोप्ठसन्धित ॥१४ अन्न पे द्वारा प्राणी जीवित रहा करते है और उस अन्न की उत्पत्ति मेघो पे द्वारा होती है। वे मेघ यज्ञो मे हुआ करते है । इगलिये यह सभी कुछ यज्ञ मे ही परिपूर्ण है । ८ । यह यन भगवान शम्भ के द्वारा विदीर्ण किये हुये बगह ये शरीर से ही हुआ था। हे द्विजा । जंगा भी मैं आपको पता है उमो आप लोग परम मावधान होपर प्रवण पीजिए । मम द्वारा वराह ये गरी विदाग्नि होने पर उगी क्षण में ममम्त प्रमथो ये माहित बना- गा ने जप गे गमुटन पर उम शरीर यो वे आकाश में प्रति से गये थे। उगो भदन पर वारा भगयान, विष्णु पे पन पे दाग यह शरीर -विष्णु और शिव देव-
या ।१४।
वगतनी यनोत्पत्ति वर्णन ]
४१३
खण्ड-खण्ड कर दिया गया था। १०६ ११। उनके अङ्ग को सन्धियां
जो यो वै सन पृथक्-पृथन्, समुत्पन्न हये थे । ह महपियो ! जिम सङ्ग
में जो ममुन्यन्न हुये ये उनका अब आप लोग श्रवण कीजिये । १२ ।
भ्रू मर्यान् भौंह और नामित की मन्धि में महान् अम्बर अांद यज्ञ
योनि पोम नाम वाला उत्पन्न हुआ था। दोदी-कान की मन्धि से
वलिप्टोम नामक यन मगुद्भुत हना था । १३ । चक्ष और भौंहो की
मन्धि के द्वारा बात्यष्टोम नाम वाला यजु उत्पन्न हुआ था। उसके पोत्र
और ओहो की गन्धि मे पौरभंवष्टोम नाम वाला मल समुत्पन्न हमा
वृद्धष्टोमवृष्टोमा जिह्वामूलादजायताम् ।
अतिराव नवराजमघोजिह्वान्तरादभूत् ॥१५
अध्यापन ब्रह्मया पितृयनस्नु तर्पणम् ।
होमो देवोलिमीतो न्यनोऽतिथिपूजनम् ।।१६
स्नान तर्पणपर्यतं नित्ययनाच मवशः ।
कण्ठमध्धे समुत्पन्ना जिबातो विधयस्तथा ।।१७
वाजिमेध महामेधो नरमेधन्तयंव च ।
प्राणिहिसाकरा येऽन्ये ते जाता पादसन्धित ॥१८
राजमूयोर्थ कारी च वाजपेपल्लव च ।
पृष्टयन्घो ममुतपन्ना ग्रहयनास्तथव च ।।१६
प्रतिष्ठोत्सर्गयज्ञान दानधाद्वादयस्तथा ।
हृतमन्धितः समुत्पन्ना सारियोयज्ञ एव च ॥२०
सर्ने सास्कारिका या प्रायश्चित्तकरात्र ।
ते मेट्सन्धितो जाता पनान्तम्ब महात्मनः ॥२१
जिह्वा में मूल में रोम और वृहत्प्टाम दा पा उत्पन्न हदे
में। नीचे रिहा अन्तर्भाग में निराम बोर मुवैराज नाम वाले
यज्ञो न जन्न ग्रहण दिया था। १५ । अध्यापन, वन क्ष-पितृ
सर-नांगहोम-देश वति-मौत-मन-अतिमि पूजन स्नान
४१४ [ पालिका पुराण और तर्पण पर्यन्त नित्य यज्ञ सर्व कण्ठ मध्धि मे समुत्पन्न हुए थे तथा समस्त विधियां जिह्वा मे उत्पन्न हुई थी । १६ । १७ । वाजिमेध- महामेध–तथा नरमेध ये तथा जो अन्य हिंसा के वरने वाल यज्ञ हैं वे सब पादो की सन्धि से समुत्पन्न हुये थे । १८ । राज मूप यज्ञ अर्थ कारी तथा वाजपेय यज्ञ पृष्ठ को मन्धि म समुद्मृत हुय थे और उसी भाँति जा ग्रह यज्ञ थे वे भी उत्पन्न हुए थे । १६ । प्रतिष्ठा सर्ग यज्ञ से तथा दान श्रद्धा आदि यज्ञ हृदय की सन्धि से पैदा हुये थे इसी तरह सावित्री यज्ञ भी उत्पन्न हुआ था ॥२०॥ समस्त सासारिक अर्थात् सस्कार करने वाले अथवा सस्कारो से सम्बन्ध रखने वाल यज्ञ और जो यज्ञ प्रायश्चित करने वाले है (पापो की शुद्धि के लिये जो भी व्रत- दान-होमादि दिये जाने है वे प्रायश्चित कहे जाते है ) वे सब भेटू की सन्धि से उत्पन्न हुये थे जो कि उन महात्मा के मेटूकी सन्धि थी।२१। रक्ष सन सर्पसत्र सर्वचवाभिचारिकम् । गोमेधो वृक्षयागश्च खुरेभ्यो ह्यभवन्निमे ॥२२ मायेष्टि परमेटिश्च गीपतिर्भोगसम्भव । लागुलसन्धी सजाता अग्निष्टोमस्तथं व च ॥२३ नैमित्तिकाश्च ये यना समान्त्यादौ प्रकीर्तिता । लागुलसन्धौ ने जातास्तथा द्वादशवार्षिकम् ॥२४ तीर्थप्रयोगसामोज यज्ञ सङ्कर्षणस्तथा। आर्कमायर्वणश्चैव नाडीसन्धे ममुद्गता ॥२५ ऋचोत्कर्ष क्षेत्रयज्ञा पचसर्गातियोजन । लिंगसस्थानहेम्वयज्ञा जाता व जानूनि ॥२६ एवमप्टाधिक जात सहस्र द्विजसत्तमा । यज्ञाना सतत लोका यर्भाव्यन्तेऽघुनापि च ।।२७ स्र गस्य पोषात सजाता नासिकाया खु चोऽभवत् । अन्य स्त्र वय वभेदा ये ते जाता पोत्रनासयो ॥२८ वराहतनों यज्ञात्पत्ति वर्णन ] ४१५ रक्ष सत्र अर्थात राक्षम यन-राप सत्र--और सभी जा भी अभिचारिक यज्ञ है अर्थात अन्य प्राणियों के मारणात्मन हैं तथा गोमेध एव वृपया गय सभी उनके धुरा से हुए थे ॥ २२॥ माया- --इष्टि, परमेष्टि-गोप्यति F~भाग सम्भव तथा अग्निष्टोम यज्ञ लागुल की सन्धि में समुद्भूत हुए थे ।। २३ ।। जा नैमित्तिव यस हैं जिनको कि सङ्कानि आदि पर्वो पर कोतित किया गया है व और द्वादश वार्षिक मधी लागुल सन्धि म समुत्पन हुए है ॥ २४ ॥ लोय प्रयोग सामो-सद्धषण यज्ञ-- आ --आण यज्ञ य ममम्न नाडिया वी मन्धि मे उत्पन्न हुए यो२५॥ ऋचोत्कर्ष-क्षेत्र यज्ञ-पञ्चसर्गा तिपोजन--लिग सस्थान रम्य यज्ञ-ये सब जानु म समुद्गत हुए थे ।। २६ ।। हे द्विज सत्तगे। इस रीति से एक सहस्र आठ समुद्भूत हुए थे। निरन्तर यज्ञो के लोक जिनके द्वारा इस समय म भी विभावित किय जाते हैं उत्पन्न हए थ। ॥ २७ ।। इसके पोत्र से सक् उत्पन्न हुई थी और नासिका से सव हुआ था । अन्य जा भी म्र और स व क भेद प्रभेद हैं वे पोन और नासिका स समुद्भूत हुए थे ॥२॥ ग्रीवाभागेण तस्याभृत् प्रागवशो मुनिसत्तमा । इप्टापूर्तिर्यजुधर्मो जाता श्रवणरन्ध्रत ॥२६ इष्टाभ्या ह्यभवन यूपा कुशा रामाणि चाभवन् । उद्गाता च तथाध्वयु होता शामित्रमेव च ॥३० अग्रदक्षिणवामाग पश्चात् पादेषु सगता । पुरोडाशा सचरवो जाता मस्तिष्क्सचयात् ॥३१ क्सू नत्रद्वयाज्जाता यशक्तुस्तथा खुरात् । मध्यभागोऽभववेदी मेढ़ात कुण्डमजायत ॥३२ रेतोभागात्तर्गवाज्य स्वधामन्त्रा समुद्गता । यज्ञालय पृष्ठभागाद्हृत्पाद्ययज्ञ एव च । तदात्मा यज्ञपुस्पो मुजा क्यात्ममुद्गता ॥३३ ४१६ [पातिका पुराण एव यावन्ति यज्ञाना भाण्डानि च हवीपि च । तानि यज्ञवराहस्य शरीरादेव चाभवन् ॥३४ एव यज्ञवराहस्य शरीर यज्ञतामगात् । यज्ञपेण सक्लमाप्यायितुमिद जगत् ।।३५ हे मुनि सत्तमा । उमवे ग्रीवा के भाग म प्राग्वश समुद्भत हुआ था। इष्टा पूत्ति-यजु धम्म श्रवण के छिद्र स उत्पन्न हुए थे। । २६ । दाढो से यूप--वुशा-और रोम समुत्पन्न हुये थे। उद्भाता-~- अध्वर्यु --होता-और शामित्र न जन्म ग्रहण किया था । ३० । ये अम ---दक्षिण ---वाम अङ्ग-पश्चाद पादो मे सङ्गत हैं । पुरोद्धाश चरु के सहित मस्तिष्क क सञ्चय से समुद्गत हुए थे । ३१ । क दोनो नेत्रा से उत्पन्न हुई थी तथा पुर से यज्ञ केतु न जन्म ग्रहण किया था। मध्य भाग से वे ही हुई थी। और मेडू से कुण्ड का उद्भव हुआ था। १३२॥ रेतोभाग से आज्य और म्वधा मन्त्र समुद्गत हुए थे भय का आलय पृष्ठ भाग स और हृदय कमल मे यज्ञ समुत्पन्न हुआ था। उसकी आत्मा या पुरुष है-उसकी भुजायें ५ मे समुद्भूत हुई थी । ३३ । इसी प्रकार से जितने भी यज्ञो क भाण्ड हैं और हवियाँ है वे सभी यज्ञ वराह के ही शरीर से हुए थे। ३४। इस रीति से उन यज्ञ धाराह का शरीर यशता को प्राप्त हुआ था। यज्ञ के स्वरूप से यह सम्पूर्ण जगत को आप्यायित करने के लिये धा ॥३५॥ एव विधाय यज्ञ तु ब्रह्मविष्णुमहेश्वरा । सुवृत्त कनक घोरमासेदुर्यत्नतत्परा १३६ ततस्तेपा शरीराणि पिण्डोकृत्य पृथक् पृथक् । त्रिदेवारित्रशरीराणि व्यधमन्मुखवायुभि ॥३७ सुवृत्तस्य शरीर तु व्यधमन्मुखवायुना । स्वयमेव जगत् स्त्रष्टा दक्षिणाग्निम्ततोऽभवत् ।।३८ क्नवस्य शरीर तु ध्मापयामास के शव ।
चराहतनो यनात्पत्ति वमन }
४१७
ततोभूद्गार्हपत्याग्नि पनवतानभोजन :
घारम्य तु वपु शम्मुर्मापयामास वै स्वयम् ।
तत आहवनोयाग्निस्तत समजायत ॥४०
ब्रह्मा-विष्णु और महेश्वर न इस प्रकार में यज्ञ का गरम व
फिर यला म तपर होत हुए सुवृत्त-कनर और पार क ममी म
पास हुए थ । ३६ । इस अनन्तर उ शगरा वा पिण्ड बनावर
पृथक् पृथक् तीना दवा न तीन शरीरा का मुख की वायु म वथात् फक
लगा कर विशप रूम मधमन किया था। स्वय ही जगत् व सृजन
परन वाल फिर दाक्षणाग्नि हा गये थ । ३७ । ३८ । भगवान् कावन
क्नक व शरार का धमन किया था। पिर पञ्च देतान क भोजन
करने वाला गाहपत्याग्नि हुआ था । ३६ । घार का शरीर था उसका
भगवान् शम्भु न स्वय हा धमन किया था। फिर आहवनीय अग्नि उसी
क्षण में समुगल हा गया था । ४० ।
एतस्तिभिजगद्व्याप्त त्रिमूल सकल जगत् ।
एतद् यत्र त्रय नित्य तिति द्विजसनमा ॥४१
समस्ता दवतास्तन वसन्त्यनुचरं सह।
एतद्भद्रपद नित्यमतदव वयात्मकम् ।।४२
एतत्नयोविधिस्थानमेतत् पुण्यकर परम् ।
यस्मिन् जनपद चते हूयन्ते वयस्नय ॥४३
तस्मिन् जनपद नित्य चतुर्वर्गो विवधत।
एतद्व पथित सर्व यन् पृष्टोऽह द्विजोत्तमा ॥४४
यथा यज्ञवराहस्य दहो यज्ञत्वमरतवान् ।
यथा च तस्य पुत्राणा देहतो वह्नयाऽभवन् १४५
इन तीना म सम्पूर्ण जगत् व्यात हा गया था और यह समस्त
जगत् तीन मूला वाला है। ह द्विज श्रेष्ठो ' जहाँ पर य तीना नित्य
हा स्थित रहत हैं वहा पर समस्त ददगण अपन अनुचरा माथ निवास
४१५
[ पालिका पुराण
किया करते हैं । यह तीनो का स्वस्प नित्य ही कल्याण का स्थान है
और यही तीनो का स्वरूप है ॥४१-४२ ।। यह प्रयी की विधि का
स्थान है और यह परम पुण्य का करने वाला है। जिस जनपद में ये
तीनो वह्नियो का हवन किया जाता है। उम जनपद में नित्य हो चतु
वर्ग विद्यमान रहा करता है चारो का वर्ग धर्म-अर्थ-काम और मोक्ष
होते हैं । हे द्विज श्रेष्ठो | जो मुझसे आपने पूछा है वह मैंने सब ही
आपको वतला दिया है जिस प्रकार मे यज्ञ वाराह का देह यज्ञत्व को
प्राप्त हुआ था और जिस तरह से उसके पुत्रो के देह से वह्नियां हुई
थी । ४३-४५।
X -
॥ मत्स्य रूप कथन।
आकालिकोऽय प्रलयो यतो भगवता कृत ।
तच्छण्वन्तु महाभागा वाराह लोक्सझयम् ।।१
यथा वा मत्स्यरूपेण वेदास्त्राताश्च शानिर्णा ।
तदह सप्रवक्ष्यामि सर्वपाप प्रणाशनम् ॥२
पुरा महामुनि सिद्ध कपिलो विष्णुरीश्वर ।
साक्षात् स्वय हरिगर्गोऽसौ सिद्धानामुत्तमो मुनि ॥३
घ्यायत सिद्धमित्येव सर्वं जगदिद स्वत ।
यतो जातो हरे कायात् कपिलस्तेन स स्मृत. ॥४
स एवंदा पुरा भूत्वा मनो स्वायम्भुवेऽन्तरे ।
स्वायम्भुव मनु वाक्य मुनिवर्योऽयवीदिदम् ॥५
स्वायम्भुव मुनिश्रेष्ठ ब्रह्मरूप महामते ।
मभवगीप्मितार्थ व देहि प्रार्थयतोऽधुना ॥६
जगत्सर्व तवैवेद त्वया च परिपालितम् ।
त्वया गर्व जगा सप्ट त्वमेव जगता पति ॥७
मम्य रुप क्यन यापता माकण्डय महपिन कहा-~-जिम कारण से नगवान न बार। लिए यह प्रलय किया था हे महाभागा । स वाराह लात मक्षय वा आप श्रवण कीजिए ।। १॥ अथवा जिस तरह म भगवान् माङ्गधागे न मत्स्य व स्वस्पद द ग ददार नाम याद रक्षा को था वह मैं सब पापा विनाश बरन वारा बाम्ध्यान साप वाया पो वनलाऊंगा ॥२॥ प्राचीन ममय म इश्वर भगवान् विष्णु महामुनि सिद्ध कपिल हुए थ जा स्वयं साक्षात हर थे और सिद्धा म उत्तम मुनि हुए थ ॥ ३ ॥ इस प्रकार से सिद्ध का ध्यान करत हुए यह सम्पूण जपर स्वत ही समुत्पन हुआ था या यह भगवान हार के शरीर स समुद्गत हुआ था इसो वारण स वह कापल कह गय हैं । ४ । वह एक बार स्वायम्भूव मनु के यन्तर म हार मुनि श्रेष्ठ इनम स्वायम्भुव मनु स यह वाक्य कहा थर ॥ ५॥ पिल दव ने कहा- स्वायम्भूध मुनिया में बहुत ही अधिक श्रेष्ठ है । है महामत | आप ता ब्रह्मा का हो रुप स समाधन हैं इस समय म आप प्रायना परन वाल मर ही प्रभाव का मुन प्रदान करिए ॥ ६ ॥ यह मम्पूण जगत् आपका हा हैं और पापक दाग ही परिपालिन है । आपन हा इस मपूर्ण जगत् की रचना का है और अपी इन जगता क स्वामी है। स्वर्गे पृथिया पाताल देवमानुपजन्तुपु । त्व प्रभवरदा गाता त्वमवंक सनातन ॥ त्व व धाता विधाता च त्वहि सर्वेश्वरेश्वर । स्वयि प्रतिप्ठिन सर्व सतत भुवनत्रयम् ।।६ तपस्यता तबसम प्रतिभास्यति सानुगम् । पायकारणतत्त्वोध-महितानि जगन्ति वै ॥१० तन्म देहि रह स्थान निपु लाक्पु दुलभम् । पुण्य पापहर रम्य ज्ञानप्रभवमुत्तमम् ॥११ अह हि सम्भूताना भूत्वा प्रत्यक्षदर्शिवान । उद्धरिप्ये जगजात निमाय नानदीपिकाम् ।।१२ ४२० । कालिका पुराण अज्ञानसागरे मग्नमधुमा सकलं जगन् । ज्ञानप्लव प्रदायाह तारयिष्ये जगत्त्रयम् ॥१३ एतम्मिन्मा भवान् सम्यगुपपन्न मिहेच्छति । त्वन्नो नाथश्च पूज्यश्च पालकश्च जगत्प्रभो ॥१४ इत्येवमुक्त स मनु कपिलेन महात्मना । प्रत्युवाच महात्मान कपिल सशितव्रतम् ॥१५ स्वर्ग मे-पृथिवी मे और पाताल मे-~-देव- --मनुष्य और जन्तुओ मे आप ही स्वामी हैं--वरदान देने वाले है-रक्षा करने वाले है और आप ही एक सनातन है अर्थात् सर्वदा से चले आने वाले हैं ।। आप ही धाता-विधाता है और आप ही सब ईश्वरो के ईश्वर हैं । आपमे हो सव कुछ प्रतिष्टित है जो कि यह तीनों भुवन हैं वे निरन्तर आप ही मे स्थित रहा करते हैं ।।६।। तपश्चर्या करते हुए आपके सम वह अनुग के प्रात गमन करेगा। निश्चय ही जगत् कार्य-कारण के तत्त्वों के ओधो के सहित है ॥ १०॥ इस कारण से आप कृपा करके एकान्त स्थान प्रदान करिए ना तीनो लाको म महान दुर्लभ होवे ।। ११ ।। मैं समस्त प्राणियो मे होकर प्रत्यक्ष दर्शी हूँ। मैं ज्ञानरूपी दीपिका का निर्माण करके इस जगत जात का अर्थात् पूरे जगत् का उद्धार करूंगा ॥१२॥ इस समय मे अज्ञान रूपी सागर में मग्न इस सम्पूर्ण जगत् को नानरूपी प्लव अर्थात् सन्तरण का साधन प्रदान करके मैं तीनो जगतो का तारण करूंगा ॥ १३ ॥ इसमे यहाँ पर आप मुझको सम्यक् उपपन्य चाहते हैं । हे प्रभो ! आप हमारे नाथ है-पूजा योग्य हैं और जगत् के पालक हैं ॥१४॥ महात्मा कपिल के द्वारा इस रीति म कहे गये उन मनु ने फिर उन मशित व्रती बाले महात्मा अपिल घो उत्तर दिया था।१५॥ यदि त्वयापिलजगदितार्थ ज्ञानदीपिकाम् । चिकीर्पूणा यतः यायं कि स्थानाधनया तव ॥१६
मत्स्य स्प क्थन ।
४२१
हिरण्यगर्भ सुमहत् तपस्तेपे पुरादभुतम् ।
स मे ययाचे तपसे स्थान कम्न च द्विज ॥१७
शम्भु सम्भोगरहितो देवमानेन वत्सरान् ।
अयुतानि तपस्तेपे सोऽपि स्यान न चैक्षत ॥१८
देवेन्द्रो वीलिहोत्रश्च शमनो रक्षसा पति ।
याद पतिमतिरिचा धनाध्यक्षस्तथव च ।।१६
एते तेपुस्तपस्तोव दिक्पालत्वमभीप्सव ।
स्थान न मार्गयामासु किंचनापि महामुने ॥२०
देवागाराणि तीर्थानि क्षेत्राणि मरितम्तया।
बहूनि पुण्यभाज्यत्र तिष्ठन्ति कपिज क्षिती ॥२१
तेषामेकतम त्व चेदासाद्य कुश्ये तप ।
स्थान ब्रह्म स्लप सिद्धिर्न भविष्यति तन किम् ॥२२
मत्त स्यानार्थना तावत् केवल ते विकत्यनम् ।
अय विकत्थनो धर्मो युज्यते न तपस्विनाम् ॥२३
मनु ने कहा -यदि बाप समस्त जगम की भलाई करने के लिए
ज्ञान दीपिका के करन की इच्छा वाले हैं तो फिर आपको इम स्थान
को प्रार्थना मे क्या करना है ॥१६॥ पहिले हिरण्य गर्भ ने
सुमहान
अद्भुन तप का तपन किया था जो बहुत ही अद्भुत स्वरूप वाला था।
है द्विज । उसने मुयम किमी भी स्थान के लिये याचना नहीं की थी
जहां पर तपश्चर्या की जावेगी ॥ १७॥ भगवान् शम्भु तो सम्भोग से
सर्वथा शून्य हैं उन्होंने देवों के भाव से वर्षों तक अर्थात् दश हजार वर्षों
तक तपश्चर्या की थी किन्तु उनने भी स्थान की कभी इच्छा नहीं की
था।।१८।। देवेन्द्र-नौतिहीन-~शमन-रासमो का स्वामी यादवों
ये पति---मातरिश्या तथा धनाध्यक्ष कुवर इन सवन उनम तीव्रतम नप
किया था जो दिकपाल के परकी इच्छा रखने वाला थे अर्थात् दिक्पालो
के पद की प्राप्ति के हो लिये इन सबन तपस्या की थी। है महामुने ।
[ वालिका पुराण
उन्होने भी किमी भी स्थान के अनुसन्धान करने की इच्छा नहीं की थी
१९१६-२०॥ हे कपिल । देवों के आलय-तीर्थ स्थल-क्षेत्र तथा
पवित्र सरिताऐं बहुत से पुण्य परिपूर्ण स्थान इस भूमि मे स्थित हैं।
उनमे से आप किमी भी एक स्थान की प्राप्ति वरवं तपश्चर्या करते है ।
हे ब्रह्मन् । क्या वहाँ पर तपश्चर्या की सिद्धि नहीं होगी फिर मुझ
मे किमी भी स्थान की प्रार्थना करना केवल आपका विक्त्थन ही
है। यह ऐमा विक्थन करना तपस्वियो का धर्म युक्त नहीं होता
है। २१-२३ ।
एतच्छत्वा वचस्तस्य मनो स्वायम् वस्य तु
चकोप कपिल सिद प्रोवाच च तदा मनुम् ।।२४
त्वयि विश्रम्भमाधाय तपस सिद्धतेऽचिरात ।
स्थान मया प्राथित ते नन्मा क्षिपसि हेतुमि ॥२५
अनेनाव्यग्रवचमा तर्ववाह न चक्षमे ।
म्वय त्रिभूवनाध्यक्ष इति ते गर्व ईदृश ॥२६
अक्षम्य ते वचो मेऽद्य प्रार्थनाया विकत्थनम् ।'
यत त्व वदमि तम्य त्व घलमेतदवाप्नुहि ॥२७
इद त्रिभवन मर्व सदेवामुरमानुषम् ।
हतप्रविध्वम्तमचिरेण भविष्यति ।।८
मार्कण्डेय महपि ने कहा-स्वयम्भुव मनु के इस वचन का
श्रवण परके सिद्ध कपित वहन अधिक कुपित हो गये थे और उस समय
उहोंने मनु
मे पहा । २४ । कपिलदेव बोले-आर मे विश्वाम वरखें
तपस्या की थी शीघ्र ही मिति प्राप्त करने से ही लिये मैंने आपसे स्थान की
प्रार्थना की थी किन्तु आप तो बहुन गे हेतुओ के द्वारा ही पर
या कर रहे हैं ॥ २५ ॥ आप इस अत्यन्त उग्र वचन वो मैं सहन
परने में अगमयं हैं। आप म्वय तीनी भुवनो ये अध्यक्ष है-यही आपला
गर्व है ।। २६ ॥ आज मुग आपसा यह वचन क्षमा करने के योग्य
मत्स्य स्थ क्यन]
४२३
नहीं है कि आप मेरी को हुई प्रायना का निकृत्य न कह रहे हैं । एमा
जो आप कहते है उसका यह पर बाप प्राप्त बगिए ॥ २७॥ यह तीनो
भूवन जिनमें देव-अमुर और मानव निबार क्यिा वरत हैं हत-प्रह्न
और विध्वम वह ही शीघ्र हो जायगा । २८॥
येनेयमुद्धता पृथ्वी येन वा स्थापिता पुन ।
यो वाम्या अन्नक्र्ता स्याद्यो वास्या परिरक्षक ॥२६
त एव सर्वे हिंसन्तु सकल सचराचरम् ।
नचिराद्रक्ष्यसि मनोजलपूर्ण जगत्त्रयम् ।
हतप्रहतविध्वस्त तव गर्वविशातनम् ॥३०
एवमुक्त्वा मुनीन्द्रमौ कपिलस्तपमा निधि ।
अन्तर्दधे जगामापि तदा ब्रह्ममदो मुनि ॥३१
कपिलस्य वच श्रुत्वा विषण्णवदनोमनु
भावोति प्रतिपद्याशु मनुनॊवाच विचन ॥३२
तत स्वायम्भुवो धीमान्तपसे धृतमानस ।
हिताय सर्वजगता दिदृशुगरुडध्वजम् ॥३३
विशाला बदरी यानो गगाद्वारान्लिव खल् ।
नत्र गत्वा ज्गदर्ता मनु स्वायम्भव स्वयम् ।
ददर्श बदरी तत्र पुण्या पापप्रणागिनीम् ।।३४
सदा फ्लवती नित्य मृदुशाहलमजरीम् ।
मुच्छाया मसृणा शीर्णशुष्क्पप्रविजिताम् ॥३५
जिमने इस पृथ्वी का उद्धार रिया या लया जिसके द्वारा यह
पुन स्थापित की गयो यो-जो इसका बलकत्ता है जथवा जो इनकी
परिरमा करन वाला है व मव इस सम्पूर्ण चराचर की हिंसा करें
हे मनुदेव' नाप शीन ही इन तीनो भुवना को जब से पूर्ण दसँग ।
आपरे गर्व का विशातन यह सब हत-प्रहन और विध्वस्त हो जायगा
(२६-३०१ द तपा को निधि मुनीन्द्र मापिलदेव ने यह वचन कह कर
४२४
[ कालिका पुराण
वही अन्तर्धान होगये थे और फिर वे मुनि उसी समय ब्रह्माजी के स्थान
को चले गये थे ।३१। कपिलदे। वे इम वचन को सुनकर मनु का
विषाद से युक्त हो गया था। यह होनहार है-ऐसा समझ कर
उन मनु ने कुछ भी नही कहा या ॥ ३२॥ इसके अलर परम बुद्धि-
मान् म्वायम्भुव मनु ने तपस्या करने के लिये ही मन मे धारणा की
पी। वे ममस्त जगतो की भलाई के लिये भगवान गडध्वज पे दर्शन
प्राप्त करने की इच्छा वाले हुए थे । ३३ । वे गङ्गा द्वार के समीप मे
परम विशाल बदरी दो गमन कर गये थे। वहां पहुँच कर जगत् के
धर्ता स्वायम्भुव मनु ने म्वय ही पापो के विश करने वाली पुण्यतया
बदरी का वहाँ पर दर्शन पिया था।। जो मदा फलो वाली थी
और नित्य ही कोमल शादान की मञ्जरी मे ममन्वित थी-जो सुन्दर
छाया वात्री-- ममण और मूगे हए यन्त्रो मे रहित थी। ३५ .
गगातोयोधसमिक्त-शिवामूलाण्तराखिताम् ।
उपायमाना गलत नानामनितपोधन ॥३६
ततग्यान मवंतो भद्र नानाम गगणान्वितम् ।
पल्लारविन्टसलिन रमणीय वपप्रदम् ।।३७
प्रविश्य तपमे यन्नम गेलोवभावन ।
म मत्वा नियनाहार परमेण ममाधिना ॥३८
आराधयामाग हरि जगतपारणवारणम् ।
मर्वेषां जगा नाथ नीनमेधाजनप्रभम् ॥३६
भगवनगदापधार कमललोचनम् ।
पीताम्बरधर देव गाष्टोपग्गिस्थितम् ॥४०
जगामय पोषनाथ व्यापकतम्यापिणम् ।
जगदी माया महायगिरम प्रमुम् ।।४१
गर्दध्यापिनमापार नारायणमा विभा।
पतवार मन्त्र गर्दवेदमप मा २
मत्स्य रूप कथन ] ४२५ वह गङ्गा के जल पी राशि मे मसित शिखा मूल और सम्पूर्ण मध्य भाग से समन्वित थी-जो निरन्तर अनेक मुनियो और तपस्वियो के द्वारा उपासना की गई थी । ३६ ।। वह स्थान मभी प्रकार से परम शुभ था और नाना मृगो के समुदाय ये मयुन था जिसके जल में विक. मिन कमल थे-वह परमाधिक रमणीय और उपप्रद था। ३७ । उम स्थान में प्रवेश करके लोगो के भावन करने वाले मनि ने तपश्चर्या करने के लिये यन पिया था। ये वहां पर नियत आहार वाले परम ममाधि मे मैयुत हो गये थे ॥३८ ।। वहां पर उन्होंने भावान् हरि की ममा- राधना की थी जो जगत के कारण के भी कारण हैं तथा ममस्त जगतों के नाथ है और नीले मेघ तथा अन्जन को प्रभा के समान प्रभा में युक्त थे। ३६ । मन ने जिम भगवान के स्वरूप का ध्यान दिया था उमी का वर्णन किया जाना है-देशप, चक्र, गदा और पद्म के धारण करने वाले हैं--कमल के सदृश लोचनो मे युक्त है-पीत वर्ण के वस्त्र के धारण करने वाले हैं और जो देव गण के ऊपर विराजमान । ४० । जो जगत् परिपूर्ण हैं-लोयो के नाय है तथा व्यक्त और अव्यक्त म्वरूप वाले है जो हम जगर के बीज हैं और सहन नेत्रों वाले तथा महम मिगे मे मन्वित प्रभ है. जो मय में व्यापी -सबके आधार-अज- विभु और नारायण है । मनु ने मवं वेदों में परिपूर्ण इम परम मन्त्रा जाप किया था । ४१।४२ 1 हिरण्यगर्भपम्पप्रधानान्यवतम् पिगे। ४ नमो वासुदेवाय शुदनानम्वपिगे ॥४३ इति जप्य प्रजपनो मनो स्वायम्भवस्य तु प्रसमाद जगमायः केशवोनचिरादय ॥४४ ततः क्षद्रझपो भूत्वा दर्वादलममप्रमः । क' रकलिकायुग्म-नुस्यनेयुगोरग्वनः ।।४५ तपस्यन्तं महात्मान मनु स्वायम्भुवं मुनिम् । 1 ४२६ [ कालिका पुराण आमसाद तदा क्षुद्रमत्स्यरूपी जनार्दनः ॥४६ उवाच त महात्मान मनु स्वायम्भुवं तदा । मुसन्त्रस्त स कारुण्ययुक्त भीतिसगद्गदम् ।।४७ तपोनिधे महाभाग भीत मा त्रातुमर्हसि । नित्यमुद्वेजित मन्स्यविशालभंक्षितुप्रति ।।४८ प्रत्यह मा महाभाग मीना धावन्ति भक्षितुम् । समन्ततोऽधिकाहन्तु त्व नाथ गोपितु क्षम. ॥४६ उस मन्त्र का अर्थ यह है-हिरण्य गर्भ पुरुष-प्रधान अव्यक्त रूप वाले--शुद्ध ज्ञान के स्वरूप वाले भगवान् वासुदेव के लिये नमस्कार है । ४३ । इस प्रकार के मन्त्र का जाप करने वाले स्वायम्भुव मनु के ऊपर जगत् के स्वामी भगवान् केशव शीघ्र ही प्रसन्न हो गए थे । ४४ । अब जिस रूप से भगवान् मनु को दर्शन जाता है --फिर एक क्षुद्र झप ( मत्स्य ) होकर वे सामने प्राप्त हुए जो दूर्वादल के समान प्रभा से युक्त थे--जो क्पूर कलिका के जोडे के तुल्य नेत्रो के युगल से परम उज्ज्वल थे। ४५। उस समय मे एक बहुत छोटे मत्स्य के स्वरुप म युक्त भगवान जनार्दन तपस्या करते हुए म्वायम्भुव मुनि मनु के मामने प्राप्त हुए थे जो मनु महान आत्मा वाले धे । ४६ । वे प्रभु उस समय मे महान आत्मा वालेयारण्य से युक्त-सन्त्रस्त अर्थात् भय युक्त-भीति (भय ) से गद्गदता से ममन्वित उन म्वायम्भुव मनु मे बोले । ४७ । हे तपो वे निधि । हे महाभाग ! आप डरे हुए मेरी रक्षा करने के योग्य होते हैं । विशाल मरम्पो से मैं परम भीत ( डरा हुआ ) है जो मुझे कही भक्षित म पर जावें इसी लिये मैं नित्य ही उद्वेग वाला रहता हूँ । ४८ । हे महा. भाग! प्रतिदिन ही बडे-बडे मत्म्य मुग्ने खाने के लिये मेरे पीछे दौड समाया करते है। मभी ओर से अधिक संख्या में वर मत्स्य मुझे पाने लिए आया करते हैं. हे नाथ ! आप मेरी रक्षा करन के लिये समर्थ RAJIVER था उसका वर्णन किया थे ।
४२८
[ कालिका पुराण
इस अनेक वचन का श्रवण करके स्वायम्भुव मनु परमाधिक कृपा से
समन्विन होकर उनसे बोले थे कि मैं आपकी रक्षा करने वाला हूँ।
फिर करके तल मे जल लेकर उस उस मत्स्य को उसमे निधापित करके
समक्ष मे उस परम क्षुद्र मत्स्य के विहार का अवलोकन करने लगे थे।
। ५४ । इसके अनन्तर परम दयालु मनु ने सुन्दर स्वरूप वाले उस
मत्स्य को जल से पूर्ण विपुल योग वाले अलिजर मे रख दिया था।
। ५५ । वह मत्स्य उस मणिक में दिन-दिन मे बढता हुआ वह मत्स्य
सामान्य रोहित के शरीर वाला शीघ्रा ही हो गया था । ५३ । वह
महात्मा प्रतिदिन दश घट जल से परिपूर्ण उस मणिक को बढाते रहे
थे । और मत्स्य को वर्धित कर दिया था। अर्थात वह मत्स्य बडा
होता चला गया था। और व? २ नेत्रो वाला वह बालक मत्स्य थोडे
ही समय म उस मणिक व जल के मध्य म तोमो से पीन देह वाला हो
गया था।५७
॥ अकाल प्रलय कथन ॥
त तथा पीवरतनु दृप्टा मत्स्य मनु स्वयम् ।
गृहीत्वा पाणिना फुलनालिनी सरसी ययौ ॥१
सत्भरस्ता वितुल पुण्ये नारायणाश्रमे ।
एक्योजनविम्तीर्ण मार्पयोजनमायतम् ।।२
नानामीनगणोपेत गोतामलजलोतकरम् ।
सदासाद्य मगे मतस्य विनिधाय मनुस्तदा ।।३
पालयामाग गुतवन् कृपया परया युत ।
गोपिरणव पालन पोनो धमारिणोऽभवत् ।।४
न ममौ तत्र मरसि तत्वान् दिजसत्तमाः ।
अकाल प्रलय क्थन ] ४२६ स एकदा महामत्स्य पूर्वापरतरद्वये ॥५ शिरः पुच्छे निधायाशु तु गदेह समुच्छित । स्वायम्भुव महात्मान चुक्रोश त्राहि मामिति ॥६ तं तया च मनुत्विा कोशन्त स्थूलपुच्छकम् । आयसाद तदा मत्स्य जग्राह च करेण तम् ॥७ मार्कण्डेय महपि ने कहा- -स्वायम्भुव मनु ने उस प्रकार से स्थूल शरीर वालो 3रा मत्स्य का अवतोक्न स्वय करके उसको अपने हाथ मे ग्रहण करके वे विकसित कमली से सयुत सरोवर को चले गये थे । १। वह सरोबर वहां पर परम पुण्य नये नारायण के आश्रम में बहुत विस्तृत था । वह एक योजन के विस्तार वाला तथा डेढ़ योजन आयत था।२। उममे अनेक मीन गण थे तथा ठाडे-निर्मल जल के समुदाय करता था उस मरोवर में उस मत्स्य को ग्रहण करके उस समय मे गनु ने वहाँ पर निशापित कर दिया था । ३१ । उस यत्स्य का उन्होंने अपने पुत्र को ही भाँति परम अनुग्रह से युक्त होकर पालन किया था। वह मत्स्य बहुत ही थोड़े समय में परमाधिक स्थूल और घसारी हो गया था । ४ । हे श्रेष्ठ द्विजो ! वह भत्य उस सरापर में भी समाया नही था। क्याक बहुत हा वडा हा गया था । वह मत्स्य एक वार पूर्व और अपर दोनो किनारा पर अपना शिर ओर पूछ रख कर केचे शरीर वाला समुच्छित हा गया था अथात अत्यन्त उच्च हा गया था। फिर वह स्वायम्भुव महात्मा स चिल्लाकर वाला-मेरी रक्षा करो ! ५।६। मनु ने उसको स्यूल पूछ वाला तथा कोश ने वाला समक्ष कर वह उस समय म उस महामत्स्य के समीप पहुंचे और अपने हाथ के द्वारा उसका उन्होंने ग्रहण किया था। ७ । न शक्नोम्यहमुद्धर्नु पृथरोमाणमद्भुतम् । इति सचिन्तयन्येव प्राधार करेण तम् ॥ भगवानपि विश्वात्मा मत्स्यरूपी जनार्दनः ।
[ कालिका पुराण
स्वायम्भुवकरं प्राप्य लधिमानमुपाश्रयत् ।।६
तत कराम्यामुद्धत्य स्कन्धे कृत्वा द्रुत मनु ।
निनाय सागर तत्र तोये च निदधे तत १०
ययेच्छमत्र वर्धस्व न कोऽपि त्वा अधिष्यति ।
अचिरेणव सम्पूर्णदेह त्व समवाप्नुहि ।।११
इत्युक्त्वा स महाभाग सर्वप्राणमृता वर ।
लधुत्व चिन्तयस्तस्य विस्मय परम गत ॥१२
मत्स्योऽपि नचिरादेव पूणकायस्तदा महान् ।
सर्वत पूरमामास देहाभोगेन सागरम् ।।१३
त पूर्णकायमालोक्य व्यतीत्याम्भा. समच्छ्रितम् ।
शिलाभिनि स्फीत मानसाचलसनिभम् ॥१४
में विपुल रोमो वाले अतीव अद्भुत आपका उद्धार करने के
लिये समर्थ नहीं होता हूँ --- ऐमा भली भांति चिन्तन करते हुए ही
उन्होंने हाथ में उसको धारण कर लिया था । ८ । विश्व के आत्मा
भगवान् जनार्दन भी जिन्होंने मत्स्य वा स्वरूप धारण कर रखा था
स्वायम्भुव मनु के घर को प्राप्त करके फिर छोटे स्वरूप का उपाश्रय
ग्रह्ण कर लिया था।६। फिर मनु ने परो से उसको उठाकर अपने
पन्धे पर धारण किया था और शीघ्र ही उसे सागर में ले गये थे और
पिर वहाँ जल म उगको रख दिया था । १० । उन्होंने उस मत्स्य से
बहा पा-आप अपनी इच्छा में अनुमार बाढ़ए । यहाँ पर कोई भी
आपका वध नहीं करेगा और आप गोत्र ही गम्पूर्ण देह की प्राप्ति
परिए । ११। यह पहार ममम्त प्राणधारियो म परम घोह यह
महान् माग वाले ने उगको पता ( छोटेपन ) या चिन्तन परत हुए
ही परमानि विस्मा को प्राम हो गरे । १२ । वर मरस्य भी तुरन्त
ही उग गमय में महान पूर्ण शरीर वाने हो गये थे और अपने देशाभाग
नागभी और मे जग महा मार को उन्होंने भर दिया था।
काल प्रलय क्थन ]
तात्पर्य यह है कि उनने इतना अधिन अपन शरीर को बढा लिया या
कि
वह पूरा सागर उमने भर गया था । १३ । उस महा सागर के जल
को भी अतिक्रमण करके अत्यात उन्नत पूर्ण शरीर वाले का अवलोकन
वर जो कि शिकाओं में घिर हुए--लम्बा चौडा मानसाचल के तुल्य
था । १४॥
रुन्धन्त सागर पर्व देहाभोगचलीकृतम् ।
स्वायम्भुवो मनुधीमान मेने मतस्य न त तदा ।।१५
तत पप्रच्छ तं साम्ना मत्स्य स्वायम्मुवो मनु ।
विचिन्त्य लघिमान च पश्यन् मूर्ति तदाद्भुतम, ॥१६
न त्वा मत्स्यमह मन्ये कम्त्व मे दद सत्तम ।
महत्व लधिमान ते चिन्तयन् मुमहत्तर ।।१७
त्व ब्रह्माथवा विष्णु शम्भु मीनरूपवृक् ।
न चेद्गृह्य महाभाग तन्मे वद महामते ॥१८
आराध्योऽह त्वयानित्य यो हरि मनातन ।
तवेष्टकामसिद्धयर्थ प्रादुर्भूत ममाहित ॥१६
यत् त्वमिच्छसि भूतेश मत्तम्त्व मोनभूतित ।
तत् करियेऽद्य ला मृतिमिमा विद्धि मनो मम ॥२०
इति तस्य वच श्रुत्वा विष्णोरमिततेजस ।
ज्ञात्वा प्रत्यक्षतो विष्णु मनुस्तुप्टाव केशवम, ॥२१
सम्पूर्ण सागर को रोक्न वाले बौर अपन दह क विस्तार से
अचल करके धोमान स्वायम्भुव मनु न उम ममय म उनको मरस्य नहीं
माना था । १५। उस बदमर पर स्वायम्भुव मनु न उन मत्स्य से
फिर शानि पूर्वक पूछा था जब कि उनको अद्भुत मूत्ति का दर्शन किया
था और उनके छोटेपन को देखा था । १६ । मनु ने कहा- हे परम
श्रेष्ठ ! मैं आपको केवल मत्स्य ही नहीं मानता हूँ। आप कौन हो-
यह मुझे स्पष्ट बतलाने की कृपा करिये । है मुमहत्तर । मैं
४३२
[ कालिका पुराण
-
महत्त्व को और छोटेपन का चिन्तन करत हुए ही थापको सामाय
मत्स्य ही नहीं मानता हू । ५७। आप ब्रह्मा है अथवा विष्णु है या
आप शम्भु है जि होन यह मत्स्य का स्वरूप धारण किया है । यदि
इसमे कुछ गोपनीयता न हो तो हे महा भाग ' हे महामते । मुझे यह
स्पष्ट बतलाने की कृपा कीजिए । १८ । मत्स्य भगवान ने कहा-आपके
द्वारा मरी नित्य ही आराधना करनी चाहिए जो सनातन हरि भगवान्
है वही मैं हू । इम ममय म आपको कामना की सिद्धि के ही लिए मैं
समादित हारर प्रक्ट हुआ हूँ । १६ । हे भूता के स्वामिन् | आप जो
भी मुझ मीन की मूत्ति वाले में जो भी कुछ चाहते है वही आज
हंगा। मरी इस मूत्ति को मन त ममझिए । २०। माकण्डेय महर्षि
न कहा--अपरिमित तज धारण करन वाले भगवान विष्णु के इस
वचन का श्रवण करके और प्रत्यक्ष रूप म वेश भगवान विष्णु का
ज्ञान प्राप्त मरव मनु बहुत ही प्रसन्न हुए थे । २१ ।
नमस्ते जगदव्यक्तपरापरपते हरे ।
पाववादित्यशीताशु ननत्रयधराव्यय ।।२२
जगत्वारण सवज्ञ जगद्धाम हरे पर।
परापरात्मरूपात्मन् पारिणा पारकारण ॥२३
आत्मानमात्मना धृत्वा धरारूपधरो हर ।
विपि सक्लान् लापानाधारात्मस्त्रिविक्रम ।।२४
सयवदमयष्ट धामधारणपारण ।
मुरोधपरमेशान नारायण गुरेश्वर ॥२५
अयोनिस्त्य जगद्यानिरपादस्व सदागति ।
स्व तेज स्पशहानश्व मवशररयमनीश्वर ॥२६
रवमनादि समरतादित्य नित्यानन्तरोन्तर ।
पगमण्ट जगता वीज ब्रह्माण्डसहितम॥२७
तबीज भजात्य पोषत ससिलेषु च।
अकाल प्रलय क्थन J सर्वाधारो निराधारो निहंतु सर्वकारणम् २८ स्वायम्भुव मनु ने कहा-हे हरे । इस जगत् के पर बोर अपर आप स्वामी हैं । आप अवेगमी है तथा अग्नि-सूर्य और पन्द्र इन को ही तीन नेत्रो को धारण करने वाले हैं। अपकी सेवा म मेरा प्रणि पात निवेदित है । २२ । हे सर्वद । आप अगत् के कारण हैं-~-जगत के धाम है, हे हरे | आप पर हैं। थाप पर और अपर स्वरूप वाले हैं तथा जो पार जान वाले हैं चतको पार पहुंचाने के कारण रूप हैं। । २३ । यपनी बात्मा म ही आत्मा को धारण करके हे हर आप धरा का रूप धारण करन वाले हैं । हे त्रिविक्रम । आप आधार स्वरूप धाले हैं और आप समस्त लोको का भरण किया करत हैं । २४ । ह सुरेश्वर । थाप समस्त वेदों से परिपूर्ण एव श्रेष्ठ हैं । धाम के कारण के भी आप कारण हैं । आप देवो के समुदाय के परम ईशान हैं और नारायण हैं । २५ । आप का कोई भी जन्म दाता नहीं हैं और आप इस जगत् की योनि अर्थात् उत्पादक है । आप पाद रहित है तो भी सदा गति वाले है । आप तज है और स्पर्स से रहित है । ह ईश्वर । आप सभी के स्वामी है । २६ आपका कोई भी आदिकास नही है और बाप ही सदके आदि है । आप नित्य अनन्तर तथा अन्तर है जो हेम का अण्ड है और इस सब जगतो का वीज है और ब्रह्माण्ड की सजा से युक्त है । २७ । उस ब्रह्माण्ड के वीज आपका ही तज होता है। उस जल मे बापही ने कहा है। आप ही सबफे आधार रूप है और आप स्वय विना आधार वाले है । आप स्त्रय तो विना हेतु बाले है किन्तु सबका कारण स्वरूप है । २८ । नमो नमस्तै विश्वेश लोकाना प्रभव प्रभो। सृष्टिस्थित्यन्तहेतुस्त्व विधिविष्णुहरात्मवृक् ।।२६ यस्य ते दधशा मूर्तिरूमिषट्कादिवजिता। ज्योति पतिस्त्वमम्भोधिस्तस्मं तुभ्य नमो नमः ॥३० [ कालिरा पुराम कस्ते भावं वक्तुमीश परेश स्थूलात्स्यूलो योऽणुरूपोर्णवर्गात् । तस्मै नित्य मे नमोऽस्त्वद्य योऽभू- दादित्यवर्ण तमस परतास्त् ॥३१ सहस्रशीर्पा पुरुष सहस्रपात् सहस्रचक्षु पृथिवी समन्तत । दशागुल यो हि समत्यतिष्ठत् स मे प्रसीदत्विह विष्णुरुप ॥३२ नमस्ते मीनमूर्ते हे नमस्ते भगवन् हरे । नमस्ते जगदानन्द नमस्ते भक्तवत्सल ।।३३ स्वायम्भुवेन मनुना सस्तुतो मत्स्यरूपधृक् । वासुदेवस्तदा प्राह मेघगम्भीरनि स्वत ॥३४ हे विश्व के स्वामिन् । हे प्रभो ! आप ही समस्त लोको के प्रभव अर्थात् ज म स्थान हैं अथवा जन्म देने वाले हैं। आप सृष्टि- स्थिति और सहार के हेतु हैं । आप विधाता-विष्णु और आत्मा के धारण करने वाले हैं। आपकी सेवा मे बारम्बार नमस्कार है ॥ २६ ॥ आपकी मूत्ति दश प्रकार की है और वह मूत्ति ऊमि पट्क आदि से रहित है । आप ज्योति के स्वामी हैं, आप ही अम्भोधि अर्थात सागर हैं उन आपके लिये बारम्वार प्रणाम समर्पित है ॥ ३० ॥ हे परेश । मौन हैं जो आप भाव का वर्णन करने में समर्थ हो अर्थात् ऐसा कोई भी नहीं है जो आप स्थूल से भी स्थूल हैं और अर्थ वर्ग से भी अणु रूप वाले हैं । जो तम से परे आदित्य के वर्ण वाले थे आज उनके ही लिए मेरा नित्य नमस्कार है । ३१ जो पुरुष सहर्ष शीर्षों वाले हैं तथा राहा परणो वारो हैं-महस्र चक्षुआ से युक्त हैं और इस पृथ्वी के सभी ओर हैं--जो दश अगुल के समान प्रमाण वाले स्थित थे वहीं उग्र भगवान विष्णु यहाँ मेर ऊपर प्रसन्न होवे । ३२ । हे भगवन् । आप -
अकाल प्रलय कयन }
मीन की मूत्ति धारण करने वाले हैं। है हरे | आपको नमस्वार है
हे जगत के आनन्द स्वरूप गले आपको नमस्कार है। हे भक्तो के ऊपर
प्रेम करने वाले आपको मेवा म मेरा प्रणाम है । । ३३ । माकण्डेय
महान ने कहा--स्वायम्मुद मतु के द्वारा वे भगवान् मरम्य पे स्वरूप
धारण करने वाले प्रमु की इम रोति से स्तुति भली भांति को गई थी।
उस अवसर पर भगवान घायुदेव मेघों के सदस परमगम्भीर ध्वनि से
सयुत होकर चोले थे। ३१ ।।
तुप्टोऽस्मि तपमा तेऽध भवत्या चापि स्तुतो मुहु ।
सपर्यया च दानेन वर बरय सुप्रत ॥३५
इप्टार्थ सम्प्रदास्यामि तुभ्य नात्र विचारणा ।
चरयस्वेप्सिताच कामान् सोकाना वा हित च यत् ।।३६
यदि देयो वरामेऽद्य लोकाना यो हितो भवेत् ।
तन्मे देहि वर विष्णो त बक्ष्यामि शृणुप्व मे ॥३७
शशाप कपिल पूर्व मदर्थे भुवनवयम् ।
हताहत विध्वस्त सकल ते भवेदिति ।।३८
येनेयमुद्धृता पृथ्वी येनेय प्रतिपालिता।
सहरिष्यति यस्त्वेना तेऽधुना प्लावयन्त्विमाम् ॥३६
ततोह दीनहृदय स्त्वामेव शरण गत ।
न यथेद निमुवन भविष्यति जलप्लुतम् ।
हताहत विध्वस्ते तथा त्व देहि मे वरम् ॥४०
न मत कफ्लिो भिन्नस्तया न कपिलादहम् ।
यदुक्त तेन मुनिना मयोक्त विद्धि तन्मनो ४१
तस्माद यदुदित तेन तत्सत्य नान्यया भवेत् ।
चरिष्ये तत्र साहाय्य स्वायम्भुव निवोध तत् ॥४२
श्री भगवान ने कहा-आब मैं आपको इस तपश्चर्या से परम
प्रसन्न हूँ और आपके द्वारा बडे ही भक्ति की भावना से वारम्बार मेरी
स्तुति भी की गयी है । मुझे आपकी पूजा से और दान से भी
[ कालिका पुराण भी , सन्तोप हुआ है। हे सुव्रत ! अब आप वरदान मांग लो। ३५ । आपका जो भी अभीष्ट अर्थ होगा आपको उसको में दूंगा- इसमे कुछ विचार करने की आवश्यकता नहीं है। आप अभीष्ट कामनाओ से बर- दान प्राप्त कर लेवें और जो भी कुछ लोको के हित की बात हो उसको भी प्राप्त कर लेवे । ३६ । स्वायम्भुव मनु ने कहा-हे विष्णो | आज यदि मुझे कोई वरदान देना है जो कि लोको की भलाई करने वाला हो तो आप मुझे वरदान देवें । उसको मैं बतलाऊँगा उसे आप मुझसे श्रवण कीजिए । ३७ । पूर्व मे कपिल मुनि ने मेरे लिये शाप दिया था कि सम्पूर्ण जगत् अर्थात् तीनो भुवन हत-प्रहत और विध्वस्त हो जावेगा । ३८ । जिसने इस पृथ्वी को उद्धृत किया है और जिसके द्वारा यह पृथ्वी प्रतिपालत की गयी है और जो इसका संहार करेंगे उन्ही के द्वारा इसका इस समय मे प्लावन होवे । ३६ । इसके उपरान्त में दीन हृदय वाला आपकी ही शरणागति में प्राप्त हुआ है । जिस रीति से यह निभुवन जल से प्लुत ( डूबा हुआ ) न होवे एवं हत-महत और विध्यस न होवे आप वही वरदान मुझे प्रदान कीजिए । ४० । श्री भगवान् ने कहा-हे मनुदेव ! मुझसे कपिल कोई भिन्न नहीं हैं और उसी भौति में भी कपिल से भिन्न नही हूँ । जो भी उन मुनि ने कहा है उसको मेरे द्वारा ही कहा हुआ समझिये । ४१ । इस कारण से उनने जो भी कुछ कहा है वह सर्वया सत्य ही है। इसमे कुछ भी अन्यथा नहीं है। मैं आपकी सहायता करूगा । हे स्वायम्भुव ! इसको भाप रामा लीजिए । ४२॥ हताहतविध्वस्ते तोयमग्ने जगत्त्रये । श्यामलेनाथ शृगेण त्व मां ज्ञास्यसि वै तदा ॥४३ यावज्जलप्लवस्तावद्यथा कार्य त्वया मनो। तन्मे निगदतः पथ्य शृणुप्वावहितोऽधुना ।।४४ रायशियकाप्ठोपरेका नौका विधीयताम् ।
अकाल प्रलय कथन तामह ढयिष्यामि यथा नो भिद्यते जल ॥४५ दशयोजनविस्तीर्णा निशद्योजनमायताम् । धारिणी सर्ववीजाना भुवनायवधिनीम् ॥४६ सर्वजियवृक्षाणा भूरिवल्वलतन्तुभिः । नवयोजनदीर्धातु व्यामश्यमुविस्तृताम् ।।४७ कुरुष्व त्वं मनो तूर्णं वृहतीमीरिका वठीम् । जगद्धात्री जगन्माया नोकमाता जगन्मयी। द्रढयिष्यति ता रज्जु न त्रुत्यति यथातथा ॥४८ सर्वाणि वीजान्यादाय सवेदान् मप्त वै ऋपीन । तस्या नावि निपण्णस्त्व वर्तमाने जलप्लवे ॥४६ दन तीनो भुवनो के हत-प्रहत बीर विध्वस्त होने पर एव जल में निमग्न हो जाने पर मैं श्यामल भृङ्ग से समन्वित होऊंगा और आप उस समय में मुझको जान लेंगे अर्थात् आपको मेरा ज्ञान प्राप्त हो जायगा । ५३ । हे मनुदेव । जब तक यह जल का प्लावन रहे तभी तक जो भी कुछ आपको करना चाहिए वह अब मन कहने पाले से आप परम सावधान होकर श्रवण कोजिये जो कि परम पथ्य अर्थात् हितकर है वहीं मैं कह रहा हूँ। ४४ । सव यज्ञ सम्बन्धी कारों के समूह वे द्वारा एक नौका का निर्माण कराइये। उस नौका को मैं ऐमो परम सुदृट बना दूंगा जिसमें कि जलो मे वह भिदी हुई न होवे । ४५ । वह नौका ऐमी होनी चाहिए कि वह दश योजनों के विस्तार से युक्त होवे और तीस योजन पर्यन्त आयत अनि चौटी होटे-मो सम्पूर्ण बीजो के अर्थात् बोन के स्वरूप में रहने वालों के धारण करने वाली हो और तीनो भवनो के वर्धन करने वाली होवे । ४६ 1 समस्त यनों मे सम्बन्ध रखने वाले वृक्षो की बहुत वत्दल तन्तुओ से निमित की जावे। जो नौ योजन तक दोध होवे तथा व्याम य तक विस्तृत होने अति तीन व्यामों के विस्तार से युक्त हो । ५७ । हे मनुदेव ' आप । पालिका पुराण । शीघ्र ही बृहनी ईरिका वटी को करिए जो जगत् की धात्री जगत् को माया-लोको को माता और जगतों से परिपूर्ण वह उस रज्जु (रस्सी) को सुदृढ कर देंगी जो जिस किस प्रकार से भी त्रुटित न होवे । ४८ । इस वर्तमान जल के प्लवन होने के समय में उम नौया में सब वीजो को अर्थात् वीज स्वरूपो को रखकर तथा ममस्त वेदों को और सात ऋषियों को विठावर आप भी उसमे निषण्ण हो जाइये। ४६ . दक्षेण सह सगम्य स्मरिष्यसि मनो मम। स्मृतोह तर्णमायास्ये भवतो निकट प्रति । श्यामलेनाथ शृगैण त्वं मां ज्ञास्यसि वै तदा ॥५० यावत् प्रहतविध्वस्त-हत स्याद्भुवनत्रयम् । तावत पृष्ठेन ता नाव वोढाह नात्र संशय ॥५१ जहालते तु मम्पर्णे शृगे मम च तां तरीम् । त्व तदा वटीरिकया सन्धानिष्यसि वै दृढम् ।।५२ बदायाँ नावि में शुगे देंवमानेन वनसरान । सहस्र प्रेरयिष्यामि ता नाव शोषयन जलम् ॥५३ तत शुष्क तोयेष प्रोत्त गे शिखरे गिरे । हिमाचलस्त वद्रवाह वस्मिन्नामह मनों ॥१४ अहमाराधितो येन जप्येन भवता मनो। सर्वमिदिर्भवेत्तस्य यस्तोषयति तेन माम, ।।५५ हे मनुदेव आप द में माथ मिलकर मेरा स्मरण करेगें उसी समय में स्मरण किया हुआ मैं आपके समीप में आ जाऊंगा। मैं श्यामल शृङ्ग में समन्वित होऊँगा। उसी समय में आपको मेरा ज्ञान प्राप्त हो जायगा । ५० । जिस समय पर्यन्त यह तीनो भुवन हत- प्रहत--विध्वस्त रहेंगे तभी तक मैं अपने पृष्ठ भाग के द्वारा उस नौका में वहन करने वाला रहूंगा इममे नेश मात्र भी मंशय का अवसर नहीं ।११। मेरे मङ्ग जल में पुल हो जाने पर उस नौरा को उस
४४०
[ कालिका पुराण
वाले अन्तर्धान हो गये थे । ५६ । स्वायम्भुव मुनि भी भगवान हरि के
अन्तर्धान हा जाने पर भगवान् हरि ने जैसा भी पूर्व में कहा था वैसी
ही नोका और रणु या निर्माण कराया था । ५७। उस समय में स्वा.
यम्भुव मुनि ने समस्त यज्ञो मे सम्बन्धित वृक्षो का छेदन कराकर
उनको उद्धन करके वास्यादि के द्वारा इनने नौका वा निर्माण कराया
से
था। २८ । उन वृक्षों के वल्ल (छल) से समुद्भूत मूओं के समूहो
पूर्व म कथित प्रमाण मे मनु नै वरीमिा की रचना कराई थी । ५६ ।
उसके अनन्तर बहुत अधिक काल में भगवान यज्ञ बराह विष्णु का--
गरभ का और हर वा महान अदक्षत यद हुआ था । ६० । इस
उपरान्न जल मे प्यावन होने पर तथा तीनों भुवनों के विश्वस्त हो
जाने पर उसी समय में रज्जु मै नौरा से धन से गम्पूर्ण वीजो का
आदान पर मनु ने वेदो दो और पियो को जो सत्रह थे सावर उस
नौमा मे गमाधान पर अर्थात् माव में रप पर घराचर राको जल
में मग्न हो जाने पर जमी अवसर पर मनदेव ने भाव म स्थित होते
हा मरस्य मूत्ति भगवान रिया स्मरण किया था। इसके भन तर
मिर मे गत पन हो गदस जनों के आर भगवान, मत्स्य संगा-
तोगये।१-६।
उदिनएपण विष्णस्यस्वर पथा।
आगतग्नन गभिराधयत्रास्ते तरिणा मनु ॥६४
तग्मिागय विषो तोपरागी भयपरे।
यावचनापल नोय तायन पसरित्ययात् ।।६५
असे प्रतिमापन शृगे वाया यटोरिणाम ।
ता नाय नोदयामाग गह्म यवतमराव ॥६६
ग्य नायतर देधार परमेश्वा ।
प्रोगनिदा जगदात्री गानोटीरिवाम ॥६७
गर गांगांना गोर गनि विगत् ।
अकाल प्रलय कथन ] ४४१ पश्चिम हिमवच्छग सुमग्न तोयमध्यत ६८ द्वे सहस्र योजनानामुच्छितस्य हिमप्रभो । पञ्चाशतु सहस्राणि शृग तत्तस्य चोच्छ्रितम् ॥६६ तस्मिन शृगे नतो नाव बध्वा मनस्यात्मग हरि । जगाम शोषणायाशु जलाना जगता पत्ति । एव हि मनस्यरूपेण वेदास्त्राताश्च शाङ्गिणा ७० कपिलस्य तु शापेन कृत माकालिको लय । अकालिकोऽय प्रलयो यतो भगवता कृत । इति व कथित सर्व यथावद्विजमत्तमा ७१ मत्स्य का स्वरूप धारण करने वाले भगवान विष्णु एक भृङ्ग से समन्वित वही पर ममागत हो गये थे और तनिक भी विलम्ब नहीं किया था जहां पर नाव से मनु देव सस्थित हो रहे थे।६४। उस महान, ही विस्तत बल के समुदाय में नौका पर समारूढ होकर जब तक जल बलाचल था नभी तक उस जल के पृष्ठ भाग पर नौवा को निधापित कर दिया था। ६५१ जल के प्रकृति में समापन्न होने पर वगैरिका को शृङ्ग मे बांध कर एक सहस्र देवो के वर्षों तक उस नौका को सम्प्रेरित किया था । ६६ । परमेश्वर प्रभु ने अपनी नाव को अवष्टन्ध करके धारण किया था । जगल की धात्री योग निदा उस वटीरिका मे ममासीन हो गयी थी । ६७ । फिर धीरे-धीरे चिरकाल में जल के शोषण हो जाने पर उस जल के मध्य मे पत्रिम हिमालय पर्वत का शिखर सुमग्न हो गया था । ६८ 1 हिमालय प्रभु के जो दो सहस्र योजन ऊंचा था उसके पचास सहस्र उच्छिष्ट (ऊँचा) शृङ्गभा १६६१ फिर उस शृङ्ग मे उस नाव को बांध कर मत्स्य के स्वरूप को धारण करने वाले हरि जो जगतो वे स्वामी थे उन जलो के शोपण करने के लिये तुरन्त ही गये थे। इसी गैति से भगदान शाङ्गधारी विष्णु ने मत्स्य के स्वरूप के द्वारा वेदो की रक्षा वी थी । ७०1 मार्कण्डेय भयङ्कर और ४४२ [ कालिका पुराण महर्षि ने कहा-कपिल मुनि के शाप म यह आपालिक लय किया गया था। क्योकि यह अकालिक लय भगवान के द्वारा ही किया गया था। हे द्विज सत्तमो ! यह सब जैसा हुआ था वैसा ही हमने आपको वर्णन करके बतला दिया है ॥७१॥ ॥ पुन सृष्टि रचना कथन ।। यथा पुनरभूत सृष्टिरवालप्रलये गते । येन चैवोद्धता पथ्वी तच्छणन्तु द्विजोतमा ॥१ व्यतीते प्रलये विष्णु धर्मरूपी महावल । पृष्ठे निधाय पथ्वीमद् त्याथ सपर्वताम् । समाचकार सकला पूर्ववतपरमेश्वर ॥२ शरभस्य वराहस्त तत्पुत्राणा पदक्रम । यन्न भूमिविशोर्णाभूत्ता ना समा कमठोऽकरोत् ।।३ कृत्वा समा ततो भूमि पूर्ववत् परमेश्वर । अनन्त धारयामाम पथिवीतलसश्रितम् ।।४ ततो ब्रह्मा च विष्णुश्च हरश्च परमेश्वर । नावोदरस्थान मप्तमुनीन्मनु स्वायम्भुव तदा । नरनारायणी चोमौदक्षजोचु समागता ॥५ शृण्वन्तु मुनय सर्वे नरनारायणौ तथा । दक्षस्वायम्भुवमनौ वय व मोऽधुना च यत् ॥६ सृष्टिर्नप्टा वराहस्य शाभम्य च सगरात् । अतोऽस्माक ययावार्या सृप्टिरावणयन्तु तत् ॥७. माण्डेय महर्षि ने कहा-इरा अकाल प्रलय पे होने के पधाद पुन जिम प्रकार से सष्टि की रचना हुई थी। हे द्विजोत्तमो ! जिसने म पृथ्वी का उदार दिया था उमका अब भाप लोग श्रवण पौगिए ।
पुन मृष्टि रचना वधन ] ४४३ 1१1 उम प्रनय ने अतीत हो जाने पर महान बलवान, वाम वे स्वरूप वाने विष्णु भगवान ने पर्वतों के महिन पृथ्वी को दत करके अपने पृष्ठ भाग पर धारण कर लिया था । और परमेश्वर ने पूर्व की ही भांति सम्पूर्ण पृथ्वी को ममान वर दिया था 101 परम और वराह का गेर उनके पुत्रो मे पद क्रम में जो भी भूमि विशीर्ण हो गई थी दमठ देव ने उसको भी मार दिया था । 2) परमेश्वर ने पूर्व की ही भांति पृथ्वी को यम कर पिर प्रथ्वी के तलै म मन्यित बनन भगवान को धारण किया था ॥५॥ इमने अनन्ना ब्रह्मा-विष्णु और हर परमेश्वर ने वहां पर ममागत होकर नौका के बीच में विराजमान सात मुनियो को-म्वायम्भव मन को और दोनो नर नागयों को और दक्ष से कहने लगे थे। ५। मभन्न मनि गण-नर नारायण-दक्ष और स्वायम्भूद मन आप मच लोग प्रवण परिये जो भी कुछ इस समय म हम बोलते हैं। ६ । वगढ़ और परम के युद्ध मे सम्पूर्ण वृष्टि विनष्ट हो गरी है। अनाव हमको जिम रीति में मष्टि की रचना करनी चाहिए उमे आप लोग श्रवण करि ॥ ७॥ नरनागवणवेतो मष्टवर्थ ममुपस्थितौ । सम्थापनाथ देवाना परम नप्यना नप 10 अप्याय्य तपमा चोभौ जनलोकगतान सुरान् । आनयन्त्दपराजश्वन मयजन्तु गणान वहून् । नक्षत्राणि ग्रहाश्व तेपा स्थानानि वै मुने एतयोस्तपमा यान्तु स्थिरता पूर्ववन्मनो १० सूर्यस्य रथमस्थान तथा चन्द्ररथस्यितिम् । करोत्त्रय महाभाग स्वयमेव जनार्दन ॥११ पृथिव्या सर्ववीजानि स्वायम्भुवमनी त्वया । उप्यन्ता सर्वत शस्यपूर्णा भवतु मेदिनी ॥१२ प्ररोह्योषधोवृक्षान् लतावल्लीश्च सर्वत ।
[ कालिका पुराण - से स्वायम्भुव महान्येतत् प्राप्तान्यतुफलानि च ।।१३ दक्ष सप्तमुनीन्द्रस्तु यज्ञेन यजता हरिम् । वराहपुत्रदेहोत्थमग्नित्रयमिद यजन ॥१४ ये दोनो नर और नारायण सृष्टि की रचना करने के ही लिये समुपस्थित हो गये है । देवो को सस्थापना करने के लिए परम तप का तपना करें 11 जन लोक मे रहने वाले देवो को ये दोनो आप्या- पित करके अपरो को यहां पर समानीत करे और निरन्नर बहुत गणो का भली भांति सृजन करे 11 हे मुने । हे मनो । नक्षत्रो की-ग्रहों की और उनके स्थानो का सृजन करे। इन दोनो की तपश्चर्या मे पूर्व की ही भांति स्थिरता को प्रास होव ।१०। यह महाभाग जनार्दन प्रभ सूर्यके रथका मस्थान तथा चन्द्रमाके रथ की सस्थिति को स्वय ही यह करें।११। हे स्वायम्भुव मनु आप पृथिवी मे मब वीजो का वयन करे और यह पृथ्वी सभी ओर शस्यो से परिपूर्ण हो जावे । १२ । समस्त ओष- धिया वृभ-लता और वल्लियो पा सभी ओर आप पुरोहण करे । हे स्वयम्भुव | यह महान ऋतु फलो को प्राप्त हो गय है ।। १३ ।। प्रजापति दक्ष सह मुनीन्द्रो के साथ यज्ञ के द्वारा भगवान, हरि का अभ्यचन करे । और वराह के पुत्रो मे समुत्थित इन तीमा अग्नियो का भी यजन करे । आहवनीय आदि तीन अग्निया होती है ॥१४॥ असौ यज्ञो वराहस्य देहाज्जातस्तु सृष्टये । अनेनैव तु यज्ञेन दक्ष सृष्टि तनोत्विमाम् ।।१५ नरनारायणाभ्यातु मुनिभि सप्तभिस्तथा । दक्षेण भवता चापि यज्ञेनभिस्तथाग्निभि । सम्पूर्यतामिय सृष्टि स्वर्ग भुवि रसातते ।।१६ वय च सृष्टिमाप्याप्य यथा सम्पद्यते स्वियम् । यतिप्यामम्तया नित्य यूय कुरुत सर्जनम् ॥१७ पुन सृष्टि रचना कयन ) ४४५ तत सम्पद्यता सृप्टियंया पूर्व यथैव च । प्रयम त्वन्तु वीजानि प्ररोहय मनोऽधुना ।।१८ इत्यादिश्य महाभागा विधिविष्णुवृपध्वजा । पगास्थान म्यापयितु पर्वतान् प्रययुस्तन 11१६ मेरुमन्दरकलासहिमवतप्रभृतिप्वय । पुराणि सर्वदेवाना ते वै च पृथक पृथक् ।।२० परित्यज्य ततो नावमय वसुन्धराम् । स्वायम्भुव क्षितौ वीजान्यवपत् सर्वसम्पदे १२१ यह यन सृष्टि की रचना के ही लिय वराह भगवान के देह से समुद्भूत हुआ है। इसी यज्ञ के द्वारा दक्ष इस सृष्टि की रचना का विस्तार करे ॥१५॥ नर और नारायण स तथा सात मनिया स--दक्ष और आप मे भी-यन से तथा तीनो अग्निया से इस सृष्टि का स्वर्ग- पाताल बार भूमि म सम्पूर्णता का प्राप्त हाव १६|| और हम सछि को आप्यापित करके जिम प्रकार स भी यह सुसम्पन्न हो जाव, यल उसी भांति का करेगे । माप नित्य ही सूजन का काय करिए । १७ । इसके अनन्तर यह सृष्टि जसो पाहले यी ठीक वैसी ही सुसम्पन्न हा जावे । हे मनुदेव । म प्रथम आप इस समय में वीजा का प्ररोहण करे । १८, माकण्डेय महाप ने कहा- इस रीति स महाभाग विधाता विष्णु और वृषभध्वज ममस्त पवता को यया स्थान पर स्थापित करन के लिए यह आदेश देकर फिर चल यय थ॥ १६॥ उन्हान मह- मदर--कैलास और हिमवान आदि पवता में समस्त दवो के पुरा का पृथक्-पृथक कर दिया था । ६० 1 इमद अनन्तर उस नौका का परि- त्याग करके और वसुन्धरा को अवघृत करके स्वायम्भुव मनु ने सम्पूर्ण सम्पदा के लाभ के लिए भूमि म बोजाका वपन किया था।२१॥ ततो वृक्षलनावल्लीगुल्मानि च वनानि च । वालशन्यानि धान्यानि तथैवोषधय समा ।।२२
[ पालिसा पुगण
वीजकाण्डप्ररोहाश्च प्रताना जलजानि च ।
प्रफुल्लानि विकोशानि फलकन्ददलानि च ॥२३
वभुवुः शाद्वलान्येव सर्वेपा प्राणवृद्धये ।
पृथिवी शस्यसम्पन्ना वृक्षास्ते शाद्वलाः शुभाः।
दृष्टाः पूर्वं यथा तस्मान्मनुनाचित्तहर्पिणा ॥२४
ततो नरो महायोगी तपस्तपे महत्तमम् ।
नारायणश्च देवाना भावनाय महामतिः ।।२५
नारायणो नरश्चोभी परमावृषिसत्तमी ।
तपसाराध्य परम तेजोमयमनामयम् ॥२६
आनिन्याते जनगणान् देवान् देवपिसत्तमान् ।
ये मृता अमराः पूर्वं गणशस्तान् पृथक् पृथक् ।
तपोवलेन महता सर्जयामासतुमुनी ॥२७
सूर्याचन्द्रमसौ देवो दिक्पालाश्च तथा दश ।
जनार्दन स्वय चक्रे पातालतलवासिनः ॥२८
इसके अनन्तर वृक्ष-अता---वल्ली-गुल्म और वन-वाल
पास्य-धान्य उसी भांति ओषधियां-वीजकाण्ड प्ररोह-घ्रतान और
जलज अर्थात् कमल-प्रफुल्ल अशोक और फल-कन्द तथा दल एव
सबके प्राणो की वृद्धि के लिये शादल ही हुए थे। सम्पूर्ण पृथ्वी शस्यो
मे सम्पन्न थी वे वृक्ष और शुभ शादल जिस प्रकार के पहिले देखे थे
जो कि चित्त मे हर्ष वाले मनु ने अवलोकन पहिले किया था ।। २२---
२४॥ इसके उपरान्त महायोगी नर ने महत्तम तप का तपन किया
था और महामति वाले नारायण ने देवो के भावन के लिये तपश्चर्या
की थी । २५। नारायण और नर ये दोनों ही परम ऋषियो के समान
थे। इन्होंने अनामय अर्थात् आमय से रहित तेज से परिपूर्ण परमेश
की तप के द्वारा आराधना की थी। २६ । वे जनगणो को-देवो को
और देवषियो हो को लाये थे जो पूर्व मे मृत हुए अमर थे उनके गणो
४४६ [ कालिका पुराण था। कश्यप-अत्रि-वसिष्ठ-विश्वामित्र-गौतम-जमदग्नि और भरद्वाज ये अमल सात ऋपि थे ॥३०॥ ब्रह्मा के पुत्र दक्ष प्रजापति ने इन पर्वोक्त सप्त ऋषियो के द्वारा स्वय द्वादश वर्ष पर्यन्त मज्ञा यज्ञ करने का समाचरण किया था ॥३२॥ हे द्विजोत्तमो । वहां पर ही तीनो अग्नियो मे वारम्वार हवन किये जाने पर और उस समय मे द्विजो के द्वारा यज्ञ स्वरूप वाले वराह के अभ्यर्चन किये जाने पर उस यज्ञ से ही चार प्रकार की प्रजा समुत्पन्न हुई थी ॥३३॥ इसके अनन्तर प्रजापति दक्ष के परम पुण्य स्वरूप तरह पुत्रियाँ समुत्पन्न हुई थी जो रूप लावण्य से सुसम्पन्न थी और सृष्टि की रचना करने के लिए अमित प्रजा वालों थी ॥३४॥ दक्ष ने उन तेरह पुत्रियो को महान् आत्मा वाले कश्यप मुनि के लिए प्रदान कर दिया था। उनसे बहत सी सन्ततिया समद्भून हुई थी जिनसे यह सम्पूर्ण जगत् व्याप्त हो गया था ॥३५॥ स सर्वासा प्रजाना तु कश्यपो जनको ह्यभूत् । निश्चित द्विजशार्दूला कश्यपात् सकल जगत् ।।३६ तासा नामानि तज्जाता प्रजा सर्वा. पृथक् पृथक् । शृण्वन्तु मुनय सर्व सभ्यक् क्थयतो मम ॥३७ अदितिदितिर्दनु काला दनायू सिंहिका मुनि । मोधा प्रधा वरिष्ठा च विनता कपिला तथा ॥ कटू स्त्रयोदशसुता एता दक्षस्य कीर्तिता. ॥३८ सजातो दक्षिणागुष्ठान्मनसा घ्यायतो विधे । तेन देवमनुप्येपु दक्ष इत्येय कथ्यते ॥३६ ग्रह्मणो मानसा पुत्रा दश पूर्व प्रकीर्तिता. । तेषा पट्सृप्टिवतारी व्यतीतेऽस्मिन् जनक्षये ॥४० मपीचिरन्यगिरसौ पुलस्त्य. पुलह ऋतु । मरीचेस्तनयो जात याश्यपो लोकभावन ॥४१ अस्यय दक्षकन्याम्य प्रजा जनेभ्य भूरिश । अरय जायाप्रजाताना नामतो विनियोधत ॥४२ पुन: सष्टि रचना कथन ] ४४ उन समस्त प्रजाओ का वश्यप मुनि ही जन्म प्रदान करने वाले जना हुए थे। हे विज शार्दूलो ! यह निश्चित है कि कश्यप मुनि से ही यह सम्पूर्ण जगद समुत्पन्न हुवा था ॥३६॥ उनके नाम और उनमें समुत्पन्न होकर पृथक्-पृथक् गर प्रजाओ को आप रामस्त मुनिगण मय अव श्रवण कीजिए जिनको मैं भली भाँति कह रहा हूँ, मुझसे ही आप उनका ज्ञान प्रात करिये ॥३७॥ अब उन तेरहो कन्याओं के नामो को बतलाया जाता है अदिति-दितिदनु-काला-दना--सिंहिका- मुनिकोडाप्रथा-वरिया-विनता-कपिला और का- दक्ष प्रजा पति को तेरह पुत्रियाँ कीतिन को गयो थी ॥३८६ ध्यान करने वाले विधाता पे दक्षिण अंगुष्ठ से मनु से यह समुत्पन्न हुआ था इसी पारण से देवो और मनुष्यों में यह दक्ष-इम नाम से कहा जाता है। ॥३६॥ ब्रह्माजी के मानस अर्थात् मन से समुत्पन्न हुए पुत्र दश पूर्व में हो वणित किये गये हैं। उनमें सृष्टि की रचना करने वाले थे जवकि यह जनो का क्षय व्यतीत हो गया था ।३४०उनके नाम ये हैं-मयेषि-अधि-अहिरा-पुलस्त्य--पलह-कातु । मरोचि का पुष लोक मावन कश्यप उत्पन्न हुआ पा ॥४१॥ इसको ही दक्ष की कन्याओं से वृहत-~मो का उत्पन्न हुई थी। इसकी जाया से समुत्पन्न हुई प्रजाओ को अब आप नामो का ज्ञान प्राम कर लो ॥१२॥ घाता मियोऽयमा को वरुण. सोम एव च । भर्गो विवस्वान् पूपा र सवितृत्वदृषिप्णवः ॥४३ अदितेादशमुता आदित्यास्ते प्रकीर्तिताः । एपा कनीयान् गुणवान् रादा मस्तपति प्रजा. ॥४४ सवै क्शकरो मुल्यो गद्यते वो दिवाकरः । एक एव दिते. पुनो हिरण्यकशिपुवंलो ॥४५ प्रत्यारमात्य तनमा हृष्टा मदवलान्विताः। प्रल्हादो ह्यय सरहादो वाप्कल: शिविरेव च ॥४६ ४५० [ वालिया पुराण प्रल्हादस्य त्रय नास्तेपामापुद्यो विरोचन । कुम्भो निकुम्भो बलवास्त्रय प्रालादय स्मृता ॥४७ विरोचनसुतो जातो दानशौण्डो वलिमहान । वलेश्च पुत्रो विदितो वाणो नाम महाबली ॥४८ शम्भोरनुचर श्रीमान् महावालाह्वयश्च स । वाणस्य च शत पुना कुसुम्भमपरादय ॥४६ धाता-मित्र-अपमा--शक-वरुण-मोम--भर्ग-विव. स्वान् –पूपा---सबिता-त्वष्टा-विष्णु हुए ॥ ४३ ॥ अदिति के ये द्वादश मुत हुए थे। जो आदित्य इस माम मे कीर्तित हुये थे इनम जो कमियान् अर्थात् छोटा था वह गुणवान था जो सदा प्रजाओ को तप देता है ॥ १४ ॥ वह ही आपका मुख्य वश के करने वाला कहा जाता है जो कि दिवाकर है । दिति का एक ही पुत्र था जो महान वलवान् हिरण्य कशिपु नाम वाला हुआ था । ४५ । उस हिरण्य कशिपु के चार पुत्र हुए थे जो परम हृष्ट और मद तथा बल से समन्वित थे। उनके नाम प्रह्लाद-सलाद-वाक और शिवि थे । १६ । प्रह्लाद के तीन पुत्र हुए थे उनमे जो सबसे आदि मे हुआ था उसका नाम विरोचन था। कुम्भ--निकुम्भ-बलवान ये तीनो ही प्रह्लादि कहे गये थे । ४७ । विरोचन के एक सुत समुद्भूत हुआ था जो दान देने में परम श्रेष्ठ एव विख्यात था उस महान् का नाम वलि था। और जो वलि का पुत्र हुआ था वह महान् बल वाला बाण नाम से कहा गया था। ४८ । वह श्रीमान् शम्भु का अनुचर हुआ था। और वह महाकाल नाम बाला था। उस वाण के एक सौ पुत्र हुए जो कुसुम्भ मकर आदि नाम वाले थे । ४६ । चत्वारिंशदना पुत्रा विप्रचित्तिपुर सरा । शम्वरो नमुचिश्चव पुलोमा च तथैव च ।।५० असिलोमा तथा केशी दुर्जयोऽय शिरास्तथा । अश्वशीर्पो क्षय शकुर्वियन्मूर्धा महावल ॥५१ । थे पुन दृष्टि रचना कथन ] वेगवान् केतुमाश्चैव स्वय स्वर्भानुरेव च । अश्वो ह्यश्वपति कुण्डो वृषपर्वाजकस्तथा ॥५२ अश्यमोवश्च सूक्ष्मश्च तुरुण्डुर्माण्डलस्तथा । ऊर्धवाहुरचकचत्रो विरूपाक्षो हराहरौ ॥५३ नियन्त्रश्च निकुम्भश्च कूपटश्चपटुस्तथा । सरभ सुलभश्चंव सूर्याचन्द्रमसोतथा ॥५४ अन्यावेतो दनो पुतौ सूर्याचन्द्रमसौ तथा । दिवाकर-निशानाथौ तावन्यौ देवपु गवा ॥५५ एपा पुश्च पौत्रश्च तत्पुत्रश्चैव भूरिभि । जगद्व्याप्तमिद सर्व वलवीर्यसमन्वितं ॥५६ दनु क चालीस पुत्र हुए थे जिनम चित्र चित्ति आगे होने वाले थे। उनके नाम बतलाये जाते हैं-शम्बर-नमुचि-प्रलोमा-असि-- लोमा--केशी--दुर्जय--अप--शिर -अश्वशीप-क्षय.--शकु-वियामूर्धा-- महा वस- -- वेगवान के तुमान--स्वर्भानु-अश्व-अश्व पति-कुण्ड- वृप पर्वा-जक---अश्व मोवा--सूदम-तरण्ड-माण्डल-कार्य बाहु- एक चक्र-विरु पाक्ष-दर-आहर-नियन्त्र-निकुम्भ-मूर्य- चन्द्रमा-अन्य य दोनो दनुव पुनथे तथा मूर्य योर चन्द्रमा-दिवाकर निशानाथ-उतने दोनों देव पुङ्गव थे। उनके पुत्र और पोत्र तथा पुत्र जो से थे। इन सबमे यह जगत् श्याप्त हो रहा है जो कि ये सब वल और वीर्य से समन्वित थे ॥५०-५६॥ दनायूपोऽभवन पुनाश्चत्वारो वलवतरा । वीरभद्रो विक्षरश्च वत्सो वृत्तस्तथैव च ॥५७ एपा चतुर्णा वहव पुत्रा जाता द्विजोत्तमा.। म्पसत्ववलोपेता एककस्य शतशतम् ।।५८ कालयास्तनया जाता कालेया इति विथ ता । विख्यातास्ते महावीर्याश्चत्वारो दानावाधिषा ५६ उनके ४५२ [ कालिका पुराण विनाशनश्च क्रोधश्च क्रोधहन्ता तथैव च । जोधशकस्तथा चैते कालापुत्रा प्रकोतितो ॥६० सिंहिकाया सुतो जातो राहुश्चन्द्रार्कमर्दन । सुचन्द्रश्जन्द्रहन्ता च तथा चन्द्रविमर्दन ॥६१ वेगवान् केतुमान् चैव अय सुर्भानुरेव च । अश्वोद्यपति कृष्टुरष्ष्टपर्वाजुरुस्तथा ॥६२ क्रोधायास्तनया जाता क्रूरकर्मकरास्तथा । सिंहिकाचैव क्रोधा च द्वे सुते क्रूरिके सदा ।। ताभ्या च प्रभवो वशो ह्यत क्रूरतर स्मृत ।।६३ दनायु के विशेष बलवान् चार पुत्र हुए थे। उनके नाम य हैं- वीर भद्र, विक्षर, वत्स और वृत्त ॥५७॥ हे द्विजोत्तमो ! इन चारो में बहुत से पुत्र समद्भूत हुए थे जो सब ही रूप एव बल से समन्वित थे और इन एक एव वे सौ-सौ पुत्र समुत्पन्न हुए थे ॥५८|| काला के जो थे वे सब कालेय -इस नाम से प्रसिद्ध हुए। वे चारो दानयो के स्वामी महान वीर्य-पराक्रम वाले और परम विख्यात हुए। ॥५६॥ विनाश-क्रोध-तथा क्रोध हन्ता और क्रोध शक ये काला पुत्र बताये गय हैं ॥६०॥ सिहिया वा पुत्र राहु उत्पन्न हुआ था जो चन्द्र और मूर्य मर्दन करने वाला है। सुचन्द्र-चन्द्र हन्ता-पान विमदन-वेगवान-येतुमान-अय – मुर्भानु-अश्वोद्यपति--ऋष्ट--- अष्टप-जुर ये गय पुष हुये पे ॥६॥६॥ क्रोधा थे जो पुत्र हुए वे करना परने वाले थे। सिंहिता और क्रोधा ये दो पुत्रियों हुई थी जा गदा ही रिवाये थीं। उन दोनों से जो पा समुद्भूत हा पा इगोमिए गर तर कहा गया है ॥३॥ एप एय गुने पुत्रो चात शुष्ठ पविमहान् । देरपदानवायप्रभृतीनां सदा गुरु ॥६४ घरवारमतस्य तनया गाता गुरयाजपा । पुत्र पैदा पे पुन सृष्टि रचना क्थन ] त्वप्टावरस्तथानिश्च सौकलश्चेति वाग्मिन ॥६५ तेजसा सूर्यपदृशा ब्रह्मलोक-प्रभावना । असुराणा सदत्याना कालेयाना तथैव च ॥६६ क्रोधात्मजानाञ्च तथा सिहिकातनयस्य च । सूतिसूतिभि सर्व जगद्व्याप्त चराचरम् ॥६७ तेपा तु यान्यपत्यानि धितानि क्रमाद्विजा । तेपा बहुत्वात् सध्यातु चिरेणापि न शक्यते ॥६८ नायचारिष्टनेमिश्च अनूरुगरुडस्तथा । आरणिर्वारुणिश्चैव विनतातनया स्मृता ॥६६ शेपो वासुकिराज तक्षक कुलिकस्तथा। कूर्मश्च सुमनाश्चेति कादया प्रवीतिता ॥७० एक ही मुनि वा पुत्र उत्वन हुआ था जो शुक्र नाम वाना या और महान कवि हुआ था। यह दंत्य-दानव और कालेय आदि या चह मदा ही गुरु या ॥६॥ उसके चार मुत समुत्पन्न हुए थे जो अमुरो यो पजन परान वाले थे। उनके नाम त्वष्टावर-त्रि--सोरल और वाग्मी थे ॥६५॥ ये तेज म मूर्य रे ही महश हुए थे। च असुरो - दैत्यों को और पालेया के ब्रह्मलोर पे प्रभावन हुए पं ।।६६ क्रोधात्मजो वे तथा मिहिका के पुत्र को सूति और प्रमूहियों के द्वारा यह मम्पूर्ण घराचर जगत् व्याप्त हो रहा है। प्रांत इन पोर प्रोत्र आदि इतने अधिन थे कि यह सब जगत् उनमे च्याप्त हो गया था।६५। है द्विजो ! उनरें जामुन्ततियो कम से की थी उनकी अत्यधिर सस्या थी कि यह समय नगापर मो उसकी गणना नहीं की जा सकती है ॥ ६॥ पिनिगा ये पुनारिष्ट नेमि-भर-ms-आरणियाणि-- ये सर समुत्पन्न हुये थे। जो विनिता के पुत्र रहे गये हैं ॥ ६ ॥ मेष--वामुनिराज-तार बुजिन-कर्म-गुमना- सभी पायेय नाम मे रहे गये हैं। १० ॥
। कालिका पुराम
भीमसेनोग्रसेनश्च सुपर्णो गरुडस्तथा ।
गोपतिधृतराष्ट्रश्च सूर्यवर्चाश्च वीर्यवान ॥७१
अर्कदष्ट प्रयुक्तश्च विश्रु त सुश्रु तस्तथा।
भीमश्चित्ररथचव विख्यात सर्वविद्वली ॥७२
शालिशीर्पश्च पर्जन्य कलिर्नारद एव च ।
इत्येते देव गन्धर्वा मुनिपुना प्रकीर्तिता ॥७३
अनवद्या सानुरागा स वरा मार्गणा प्रियाम् ।
असूया सुभगा भीमामिति कन्यामसूयत ॥७४
प्राधा सर्वगुणोत्थानान कश्यपात्तु तपोधनात् ।
विश्वावमु सुचन्द्रश्च सुपर्ण सिद्ध एव च ॥७५
वहिं पूर्णश्व पूर्णागो ब्रह्मचारी रतिप्रिय ।
भानुश्च दशमश्चैते प्राधापुत्रा प्रकीर्तिता ॥७६
इत्येते देवगन्धर्वा सन्नत पुण्यलक्षणा ।
प्राधामत महाभागा देवी देवपिसत्तमात ॥७७
भोममेन-उग्रमेन-मुवर्ण-गरुड-गोपति-पतराष्ट्र-सूर्य
वर्चा-वीर्यवान्–अयं दृष्ट-प्रयुक्त -विश्वन-मुश्र-भीम-चिन
रप-विख्यात-गवविद्-वली-शानिशीपं-पर्जन्य- कलि-नारद •
ये मय देव-गन्धर्व और मुनि पुत्र कीर्तिन दिये गये हैं ॥१॥
11 ३२११७३।। अनवद्या-गानुरागा--मवग-मागंणा--प्रिया-अमूया-
मुमाग और मीमा इन कन्याओ को प्रमूत दिया था ॥७॥ समस्त गुणों
गमुत्पान स्वरूप मप में ही धन वाले कश्यप मुनि मे प्राधा ने विश्वा-
पगु-गचन्द-गगणं-गिट-वहि-पूर्ण-पूर्णाग-ब्रह्मचारी-रति
प्रिय और भानु ये दश पुत्रों को जन्म दिया था जो कि प्राधापुत्र बहे
गये है १७४।७६॥ ये गय दे। गन्धर्व जो निरन्तर पुण्य पाणी
बाने । महा भागाप्राधाने देवर्षियों में परम पर मे देवी जो मय
हिपापा ॥१७॥
पुन मृष्टि रचना वपन ] अलम्बुधा मिश्रकेशी गामिनी व मनोरमा । विध पन्नानधारम्भा धरणा रक्षितातुला ॥७८ सुबाहु सुरता चव मुरजा सुप्रिया तथा । वपुस्तिलोत्तमा चेत्ति मुख्या अप्सरस स्मृता ॥७६ अतिवाहुस्तुम्बुरुश्च हाहा हूहूस्तथैव च । गन्धर्वाणामिमे मुख्या देवनुल्या प्रकीतिता ||८० अमृत ब्राह्मणा गावो मुनयोऽप्मरसम्तथा । कपिलातनया प्रोक्ता महाभागा महोत्सवा ६१ इति दक्षसुताना ये कश्यपात्तनया स्मृता । तैरिद सकल व्याप्त जगतस्थावरजगमम् ॥८२ एवं यज्ञवराहम्य यज्ञरूपस्य पातनात् । निभ्योऽग्निभ्यो मनोस्तस्मान् स्वायम्भुव महात्मन ।।८३ गुनि म्यश्व सप्तम्य कश्यपादिभ्य एव च । नरनारायणाभ्यातु व्यतीतेऽकालिके लये। पुन प्रजा पुरा सप्टा हरिणानेवरूपिणा ॥४ एव पुनरभूत् सष्टि सृष्टिस्थित्यन्तकारिण । हरेस्तस्य प्रसादेन नरनारायणात्मन ८५ अलम्बुपामियर शो-गामिनी-मनोरमा-विय पन्ना- अनधा-रम्मा-अरुणा- रक्षिना---भतुला--मुवाह- मुरता-मुरजा---- गुप्रिमा--यपु--तिलोतमा ये गय प्रमुग अप्सरायें कही गयी है ॥७॥ 11 ७६ ।। अति वाहु-तुम्बर-हा हा हू है. ये सब गन्धवा म मुन्य हुए हैं जो देवो पे ही सुन्न पोतिन पिये गये हैं ।। ६० ।। अमृत-बाह्मण-गोरे-मुनिगण-अप्सरायें ये पिता तनय कहे गये हैं जो महान मागागने और महान उत्मयो वाते हैं। ।।८१॥ इस प्रकार में ये दर प्रजापति को मुरायो वे पुष एसप पि मे गमुभूत हुए बताय गये हैं। उन बारा ही यह मम्पूर्ण स्थावर--
[ कालिका पुराण
जङ्गम अर्थात जड़-चेतन जगत् व्याप्त हो रहा है ॥५२॥ इस प्रकार
से यज्ञ के स्वरूप वाले यज्ञ वराह ये पातन से ती| अग्नियों से उन
महात्मा मनु का स्वायम्भृय हुए थे ॥३॥ सात मुनियों मे और कश्यप
आदि से नर-नारायण मे अबालिक लय के व्यतीत हो जान पर पुन
पहिले अनेक रूप वाले हरि के द्वारा प्रजा का सजन किया गया था।
॥४॥ उन नर-नारायण ये स्वरप वाले तथा सृष्टि-स्थिति और महार
के करने वाले भगवान हरि के प्रसाद से पुन यह सृष्टि हुई थी 11८11
॥ शरभ काय-त्याग कथन ।।
ईश्वर शारभ काय यथा तत्याज यत्नत ।
तन्मे निगदतो भूय शृणुध्व द्विजसत्तमा ॥१
हते यज्ञवराहै तु ब्रह्मा लोकपितामह ।
उवाच शरभ गत्वा सामयुक्त जगद्धितम् ॥२
देहाभोगेन भवत पूरित भूरियोजनम् ।
उपसहर तस्मात् त्व काय लोकभयकरम् ।।३
तव युद्धेन सकल प्रणष्ट भुवनत्रयम् ।
आकाश गन्तु त्वा दृष्टवा विभेत्यद्य जनार्दन ।
तस्मात् त्वमूर्धलोकाना हिताय त्यज वै तनुम् ॥४
ततस्तस्य वच थत्वा सुरज्येष्ठस्य शकर ।
तत्याज शारभ काय तोयोपयेव तत्क्षणात् ।।५
त्यक्तस्य तस्य देहस्य शकरेण महात्मना ।
अप्टो पादा अप्टमूर्तस्तेषु चाप्टसु भेजिरे ॥६
आद्यन्तु दक्षिण पादमाकाशमगमद्रुतम् ।
वद्वाम मिहिर भेजे पश्चाद् दक्षिण विधौ ॥७
परभ काय त्याग कथन J---सुरो में सबसे माईण्डेय महर्षि ने कहा है द्विज यहा! ईश्वर ने शारम गरीर को यत्न पूर्वक जिस तरह से परित्याग किया था उसे कहने वाले मुझसे पुन. आप लोग श्रवण कीजिए 191 यज्ञ वराह के निहत हो पर लोको के पितामह ब्रह्माजी शरभ वे समीप में जाकर साम मै युक्त अर्थात् परम भान्ति पूर्वक जगद के हित को वातद ही यो। २। ब्रह्माजी ने कहा था कि आपके देह के बाभोग अर्थात विस्तार से बहुत मे योगन तक यह स्थल पूरित हो गया है । इस पारण मे आप लोवो को भय देने वाले शरीर का उपमेहरण कीजिए । ३ । आपके युद्ध ही यह मम्पूर्ण तीनो भुवन नष्ट हो गये हैं। आप को आकाश में गमन करने के लिये उद्यन देखा। आज भगवान जनार्दन भयभीत हो रहे हैं । इन कारण से आप ऊपर के लोगो की भलाई के लिये इस गरीर पा परियाग पर दीजिए । ४ । मारण्डेय महर्षि ने कहा--- चंदे ब्रह्माजी के इस वचन का श्रवण करके भगवान् शङ्कर ने उसी क्षण में जल के ऊपर ही शारभ शरीर को त्याग दिया था । ५ । महात्मा शङ्कर ने त्याग दिये हुए उस देह के आठ पाद अष्ट मूर्ति के आठो मे गेषित किए थे 151 मवमै आदि में होने वाला दक्षिण पाद शीघ्र ही आकाश की चला गया था । उमरे वाम पाद को मिहिर ने सेवित पिया था और पोछे दक्षिण विधि में रहा था ॥३॥ वामन्तु ज्वलनं भेजे पृष्ठान पद्गत क्षितिम् । पृष्ठावाम सलिल तत्पश्चाद दक्षिणं तथा ॥८ पयो वामपद भेजे होतारं मर्वतोमुखम् । एवं तस्याप्टमूर्तरतु अष्टमूर्तिषु तनक्षणात् । अष्टा पादास्तया भेजुः स्वं म्व तेजो ययुः पदम् ॥६ मध्यं तु शारभ कार्य शंकरस्य महात्मन । फपाली भरवो भूतश्चण्डरूपी दुरासदः ॥१० मस्तिष्कमेदसा युक्तं माम जुह्वति ते शुचौ ।
[ पालिका पुराण
ब्रह्मकपालपानस्थ सुराभिर्देवपूजनम् ।।११
वलिर्मनुष्यमासेन पान तु रुधिर सदा ।
सुरया पारण यज्ञे कपालोद्भटधारणम् ॥१२
व्याघ्रचमपरिधान समल त्रिवलीवृतम् ।
एव कुर्वन्ति सतत पालव्रतधारिण ॥१३
क्पाली भैरवस्तेषा देव पूज्यस्तु नित्यश ।
श्मशानभैरवो मोऽसौ यो महाभैरवाह्वय ॥१४
वाम पाद ने ज्वलन का मेवन किया था। पदगत पृष्ठान ने
क्षिति का मेवन किया था जो पृष्ठ का अग्र वाम था उसने सलिल का
सेवन किया था। इसके पश्चात दक्षिण को गया था । ८ । वामपाद ने
सर्व तो मुख होता का मेवन क्यिा था। इस प्रकार से उम अष्टमूर्तियो
मे उसी क्षण मे आठ पादो ने उसी भाँति सेवन किया था और अपने-
अपने तेज ने पद को प्राम किया था ।। मध्य जो शाग्भ काय का
था वह महात्मा शङ्कर का चण्ड स्वरूप वाला परम दुरामद कपाली
भैरव हो गया था । १०। वे अग्नि मे मस्तिष्क भेद से युक्त मास का
हवन करते है । ब्रह्मक पाल के पात्र में स्थित मुराओं में देव पूजन
किया करते है । ११ । मनुष्य के मास से वलि देते है और सदा रुधिर
का पान किया करते है । यज्ञ मे मुरा से पारण करते है तथा कपालो
द्भर को धारण करते है । १२। व्याघ्र चर्म का परिधान और त्रिवली
वृत समल करते है। ये कमाल व्रत के धारण करने वाले हैं वे इसी
भाति निरन्तर किया वरत है । १३
उनका पाली भैरव देव नित्य
ही पूज्य हुआ करता है । जो यह श्मशान भैरव है और महा भैरव के
नाम वाला है । १४ ।
वालसूर्यसमोद्योत सदाप्टादशयाहुभि ।
विभ्राजमानो रक्ताझ सर्वदा नायिकाबजै ।।१५
पालीप्रचण्डाप्रमुख क्रीडमानस्तु निरयश ।
सम्म वाय त्याग क्यन । सद्योदग्धनमामाशी गलल्गेललद्भुज ॥ लोहिताहारविधन प्रेतागनगन मदा । स्यूलवक्त्रोऽय मम्बोष्ठो ह्रस्वस्थलपदालय । विनोदी वादनो लोके माटटहामलु भैरव ·1१७ एव म च महादेवो महाभैरवरूपवृक् । मध्यशाग्मकायेन कायं दध्र महाभज ॥१८ म जगाम ततो देवा हरम्य अमयान प्रति । गणं याचं तथाकाशे विडनिम भैरव ॥१६ वह भैन्य कम स्वरुप वाले हैं-यही बतलाने हैं उनका वाल सूर्य के समान प्रकाश होता है-मदा अठारट वाटुओं से विभ्राजमान रहते हैं-उन ने रक्त वर्ण वाले है. पवंदा नाभिकाओं के समूहों में माय नित्य क्रीडा पिया करन है जिनम पाली और प्रचण्डा मुगर है- व तुरन्न ही दग्ध नरके माय का बशन किया करते हैं और गत्तन पर लोल अर्याद चंचन मुजारी मे शोभित है । १५ १६ । लोहिह्न बाहार करने वाले और मदा प्रेत के मन पर विराजमान रहा करते हैं। उनका मुम्ब म्यूल रहा करते हैं। उनका मुख म्यून होता है तथा ओष्ठतम्ब हैं और हव स्थल पद के बाल वाले हैं। वे परम विनोद करने वाले तथा लोक मे वादन वाले और अहसान में युक्त भैरव हुआ करते हैं । 1१७। और वे महादेव इन प्रकार मे भग्व स्वम्प को धारण करने वाले हैं। महान मुनाओ वाले वै मत्र्य प्रारभ गाय के द्वारा काम को धारण करते थे ।१८। वह देव फिर हर प्रमयो की और गये थे। वह भैरव अपने गमों के माय आकाश म क्रीड़ा किया करते है ॥१६॥ स महाभैरवो देव पूज्यमानो जगज्जन । अद्यापि कुरुते नित्यमिप्टकामस्य साधनम् ॥२० चैत्र-शुक्लचतुर्दश्या मध्यामवपय फलं: ।
[ कालिका पुराण भासमत्स्यै मरुधिरै सकृद्यो भैरव यजेत् ॥२१ स सर्वकामान् ससाध्य भोगान् भुक्त्वा यथेप्टत । प्रयाति शम्भुभवमारुह्य वृषभ वरम् ॥२२ एतद्व कथित सर्व यत्पृष्टोऽह द्विजोत्तम । भवदिभर्यच्च वोऽन्यद वा रोचते पृच्छ मा तु तत् ॥२३ वह महा भैरवदेव जगत् के जनो के द्वारा पूज्यमान होता है और आज भी वह नित्य ही अभीष्ट कामनाओ वी साधना किया करते हैं । । २० । चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि म मधु आसव पय और फ्लो के द्वारा जो भी कोई मास मत्स्य और रुधिरों से एक बार भी भैरव का यजन किया करता है वह अपनी समस्त कामनाओ की ससिद्धि प्राप्त करके और यथष्ट भोगो का उपभोग करके परम श्रेष्ठ वृषभ पर समारूढ होकर भगवान् शम्भु के भुवन मे प्रयाण किया करता है ।२१ । २२ । द्विजोत्तमा के द्वारा जो भी कुछ भुषसे पूछा गया था वह यह सब मैंन आपको कथन करके वतला दिया है और जो भी आप लोगो को मझसे पूछना हो या जो आपको रुचता हो उसे भी आप लोग मुझस पूछिय ॥२३॥ -000- ॥ धरा दुख विमोचन फथन । पथ वराहपुत्रोऽसौ नरको नाम वीर्यवान् । सजातो असुरसत्व स देवदेवीमुतोऽपि सन् ॥१ चिरजीवी कथं मो भूत् किमर्थमुदरे चिरम् । पृथिव्या न्यबसन्जात कुन वा स महाबल ॥२ मोऽमुराणा क्यं राजा पुरं नस्य विमाह्वयम् । मलिनीरतिसजात ग पितो पोत्रिणस्तथा ॥३ घरा दुख विमोचन क्थन ] श्रूयते मुनिशार्दूल कथ भूतस्तथाविध । एतत्सर्वमशेयेण पृच्छता व वदस्व न ॥४ त्व नो गुरुश्च शास्ता च सर्वप्रत्यक्षदशिवान। कथ लन्धवरो भूतो ब्रह्मणा प्रभविष्णुणा ।।५ शृण्वन्तु मुनय सर्वे यत् पृष्टोऽह द्विजोत्तमा । यथा स नरको जातो धरासुतो महासुर ।।६ रजस्वलाया गोत्राया गर्भ वायण पोत्रिण । यनो यातस्ततोभूतो देवपुत्रोऽपि सोऽमुर ।।७ प्रपियो ने कहा-वराह का पुन यह नरक नाम याला कसे बडा वीर्य वान् समुत्पन्न हुआ था। वह असुर सत्व वाला था और देव तथा देवी का पुत्र भी था । ११ वह बहुत समय पर्यन्त जीवित रहने वाला कैसे हुआ था और वह किस प्रयोजन के लिये बहुत समय तक उदर में रहा था। वह महा पलवान कहाँ पर रामुत्पन्न हुआ था जो कि पृथ्वी पर निवास करता रहता था वह असुरो का राजा कैसे हो गया था और उसके पुर का क्या नाम था । वह मलिनी की रति से समुत्पन्न हुआ था तथा वह भूमि पर पोत्रिण या । ३ह मुनि शार्दूल । यह कैसे उस प्रकार का भूत सुना जाता है ? इस सवको पूर्ण रूप से पूछने वाले हमारे सामने आप कृपा कर वर्णन कीजिए। आप हमारे गुरु हैं शास्ता हैं और आप सभी कुछ प्रत्यक्ष रूप से देखने वाले हैं। १४॥ ५। वह प्रभु विष्णु ब्रह्माजी के द्वारा वरदान प्राप्त करने वाला करने वाला कैसे हो गया था। ५ । मार्कण्डेय मुनि ने कहा---हे द्विजो- तमो । आप समस्त मुनिगण अव श्रवण करे जो भी आपने मुझसे पूछ है जिस प्रकार से वह धरा का पुत्र नरक महासुर समुत्पन्न हुआ था। ॥६॥ रजस्वला गोवा के गर्म मे वीर्य के द्वारा क्योकि वह गया था इसी से वह पोयिण देवपुत्र होता हुआ भी वह महासुर हो गया था ! ७ ॥ गर्भसरथ महावीर ज्ञात्वा ब्रह्मादय सुरा ! ? ।२२
४६२
। कालिका पुराण
वराहपुत्र दुर्घर्ष महावलपराक्रमम् ।।८
गर्भ एव तदा देवा शक्त्या दध्र श्चिर दृढम् ।
यथा कालेऽपि सप्राप्ते नो गर्भाज्जायते स च ॥
तसम्त्यक्तशरीरस्तु वराहस्तनयं सह ।
अतीव शोकसन्तन्ता जगदाव्यभवत् क्षिति ॥१०
शोकाकुला सा व्यलपच्चिरकाल मुहुर्मुहु ।
प्रकृतिस्था क्षिनिर्भूता माधवेन प्रबोधिता ।।११
तत कालेऽपि सप्राप्ते देवशक्त्या यदा धृतः ।
न गभं प्रसव याति तदाभूतू पोडिता क्षिति. ॥१२
कठोरगर्भा सा दवी गर्भभार न चाशक्त् ।
यदा वोढु तदा देव माधव शरण गता ॥१३
शरण्य शरण गत्वा माधव जगता पतिम् ।
प्रणम्म शिरसा देवी वाक्यमेतदुवाच ह ।।१४
उग महासुर का गम म स्थित हए या ज्ञान ब्रह्मा आदि सुरो
नं प्रास पर रि वराह पुत्र महान् बलवान तथा पराक्रमी और दुध
है ॥८॥ तब तो देवों ने उसको दृढ़ता से बहुत बाल पर्यन्त शक्ति स
गर्म में ही धारण परा दिया था। तात्पर्य है कि देवा ने ऐसा ही किया
पाकि वह अधिक समय तर गर्भ म ही बना रहे । प्रसव का समुचित
गमय प्रात हो जाने पर भी यह गर्म से बाहिर जन्म लेकर नहीं आये
॥६॥ पिर वराह रे पोरे गाय शरीर को रयाग करने वाली
भायाधर गोर गे गतप्त जगत् वी धात्री शिति हो गई पो ॥१०॥ गोर
गं पाम पर पृथ्वी बार-बार पिसाप पर्यन्म विमाप पर रही थी।
पर भगाम मपब में उमरा प्रवाधित रिया तो वह पृथ्वी प्रकृति में
परिपाई पी॥११॥ पिर गई भानामपर प्रालि होन पर भी
पोरीजन्ति मे धरण किया गया पाबरगर्भ प्रगावाम
होगा है उग गमप पर ती महत पीड़ित हो गई थी ।।२।।
घरा दु.ख विमोचन क्थन ] ४६३ कठोर गर्भ वाली वहदेवी गर्भके भारको सहन न कर सकी थी। जब वहन करने में भूमि असमगं हो गई तो वह भगवान् माधव वी शरणागति में प्राप्त हुई थी। १३1 जो परम शरपद है अर्थात् रक्षक है ऐम जगनों के स्वामी माधव के समीप जाव र देवी ने शिर को झुका कर प्रणाम किया पा और यह वाक्य बोली ॥१४॥ नमस्ते जगदव्यकाप कारणकारण। प्रधान पुरुषातीत स्थित्युत्पत्तिलयात्मक ।।१५ जगन्नियोजनपर स्वाहाभोगधरोत्तम । जगदानन्दनन्दात्मन् भगवन् जगदीश्वर ॥१६ नियोजको नियोज्यश्च विधाजन् विष्णुरव्यय । नमस्तुभ्य जगद्धातस्त्रिलोकालय विश्वकृत् ।।१७ यः पालयति नित्यानि स्थापयत्येव तत्पर. । त्व त्वा नियमस्पेण नमामि जगदीश्वर ॥१६ त्व माधव. प्रवेकश्च काम: कामालयो लयः । प्रसूतिच्यत्रिहत्वर्थ-प्राणकारणमीश्वर ॥१६ न यस्य ते क्लेदाय स्युरापो नोप्मा तयोप्मने। नशीताय भवैच्छीत तस्मै तुभ्य नमोनमः ॥२० न समुद्रः प्लवकरो न सोपाय दहात्मकः । न मृत्यवे यस्य यमस्तमं तुभ्य नमोनमः ॥२१ यच्चिदा योगिभिः शान्तहेहै रुन्मार्गाणां यात्यरिध्येयकृत्यम् । नित्य गद्रपमार्गावमुक्त स त्वं पाहि प्राणमिच्छन् धरियाम् ।।२२ पृथिवी ने कहा-हे जगत् के अध्यन स्वरुप आए कारण कारण है । बाप प्रधान और पुरष में पर है तथा उत्पत्ति स्पिनि लय के स्वरूप का है भापको मेरा प्रणाम अपित है ।१५ ४६४ [ वानिया पुराण जगत् के रियोजन म पर-स्वाहा भोग धरा म उत्तम है आप जगत क आनन्द के नन्दात्मा हैं । हे भगवन् । आप जगत् के ईश्वर हैं । १६ । आप नियोजक और नियोज्य है । आप विशेष रूप से भ्रजित है आप अब्धय विष्णु है । आप जगत् के धाता है –तीनो लोको के आलय अर्थाद आधार हैं और आप विश्व की रचना करने वाले है आपके लिये मेरा नमस्कार है । १७। जो रित्या का पालन करत है और तत्पर होकर जो स्थापन किया करता है । आप ऐमे है उन आपको हे जग दीश्वर | मैं प्रणाम करती हूँ । १८ । आप माधव है और पवेक है - काम-~काभालय और लय है । हे ईश्वर | अप प्रसूति,च्युति और हेतुके लिये प्राण करने के कारण है 1१६आपको विरून वरन म जल समय नहीं है और उष्मा ओज को ऊष्ण बनाने की शक्ति रखती है---शीत आपको शीतल करने में असमथ है एसे उन आपकी सेवा मे बार-बार नमस्कार अपित है । २० । महा मागर प्लवन करने वाला नहीं होता है और अग्नि शोषक नहीं है । यमराज जिसको मृत्यु करने वाला नहीं है उन आपको बारम्बार प्रणाम है । २१ । जो शान्त चित्त वाले योगियो के द्वारा चित् धारण करने के योग्य है जो उन्मार्गी है उनके लिय अरियों को ध्येय कृत्य को प्राप्त हाते है जो नित्य ही यद्रूप माग में अवसक्त है वह बाप त्राण की इच्छा करते हुए इस धरित्री की रक्षा पीजिए ।॥२२॥ इति स्तुतो हृपीके शो जगद्धाच्या तदा हरि । प्रार्दुभूतस्तदा प्राह धरित्री दीनमानसाम् ॥२३ कथ दीनमना देवि धरिनि परिदेवसे । तव वा वि वृता पीडा वेत्तुमिच्छामि तामहम् ।।२४ मुप से परिशुप्प तु शरीर कान्तिवजितम् । आकुल नयनद्वन्द्व भ्रूविभ्रमविवजितम् ।।२५ ईश तय स्प तु दृप्टपूर्व कदापि न ।
परा दुख विमोचन ग]
रूपस्य तु विपर्याम दुखवीज च भापये र
एतच्छत्वा वस्तस्य माधवस्य जगत्पते ।
विनयावनता देवी पृथ्वी प्राह सगद्गदम् ।।२७
मार्कण्डेय महर्षि ने कहा उस समय म जान् की यात्रा में
द्वारा इस प्रकार से नवच किये गये भावान् हपोकेम प्रकट हा गय
और पार भूत होकर उन्होंने परमाधिर दोन मन बाली धारिसी से
कहा-थी भगवान् ने कहा- देवि ! हे धरिधि ! बाप क्सि कारण
से ऐसी दीन पन वाली होती हुई विलाप कर रही हैं अथवा मापको
विमके द्वारा पीडा री गयो है उसको मैं वव बानव सी इच्छा रखा
हार यापका मुख एक्दम मूखा हुआ है और मापके गरीर की कान्ति
सोण हो गई है यापके दोनो वत्र परम व्याकुल हैं जो कि घओं के
विभ्रमो से रहित हैं । २५ । बापका इस तरह का स्वरूप पहिले कभी
भी नहीं देखा गया था। इस रूप के विपर्यान में कुछ न कुछ दुख
अवश्य ही प्रतीत होता है । वह दुख का दोज क्या है इसे बतलाइ
॥ २६ ॥ उन जगत् के पति माधव प्रभु के इस वचन का श्रवण
परके विनय से अवनत हाती हुई देवी पृथ्वी गद्गदता के साथ यह
वोसी ।२७॥
न गर्भभार सवोटु माधवाह क्षमाधुना।
मृश नित्य विपदामि तस्मात् त्व नातुमर्हसि ॥२८
त्वया वराहरूपेण मलिनी कामिता पुरा।
तेन कामेन कुक्षी मे यो गर्भोध्य त्वयाहिन, ॥२६
काले प्राप्तेऽपि गर्भोऽय न प्रध्यवयि माधव ।
कठोरगर्भा तेनाह पीडितास्मि दिने दिने ॥३०
यदि न त्राहि मा देव गनंदु साज्जगत्पते ।
न चिरादेव याम्यामि मृत्योर्वशमसभयम् ॥३१
कयापि नेदृशो गर्भ पूर्व माधव व धृत ।
[ वालिका पुराण योऽचला चालयति मा सरसीमिव जरः ॥३२ एतच्छ् त्वा वचस्तस्या पृथिव्या पृथिवीपतिः । आलादयन् प्रत्युवाच हरिस्तप्ता लतामिव ॥३३ न धरे ते महदु ख णिरस्थायि भविष्यति । शृणु येन प्रकारेण चानुभूतमिद त्वया ॥३४ मलिन्या सहसगेन यो गर्भ. सन्धृतस्त्वया । सोऽभूदसुरसत्वस्तु घृष्टे पुत्रोऽपि दारुण. ॥३५ पृथ्वी देवी ने कहा-हे माधव । इस समय मैं गर्भ के सभार को वहन करने में समर्थ नहीं हैं। मैं नित्य ही अत्यधिक उत्पीडित हो रही हूँ। इस कारण से आप मरो रक्षा करने के योग्य होते है । २८ । आपने वराह के रूप से पहिले मलिनी से काम वासना की थी उसी काम से मेरी युक्षि मे जो यह गर्भ आपने आदित किया था । २६ । हे माधव । प्रसव के काल के सम्प्राप्त होने पर भी यह गर्भ प्रच्यवन नहीं करता है । उसी से मैं परम कठोर गर्भ वाली हूँ और प्रतिदिन बहुत पीडित हो रही हूँ। ३० । हे जगत्पते । यदि आप हे देव मेरी रक्षा नहीं करते हैं तो मैं शोघ्र ही विना किसी सशय के मृत्यु के वश मे चली जाऊंगी । ३१ । हे माधव । पूर्व में इस प्रकार का गर्भ किसी भी नारी ने धारण नहीं किया था जो कि गर्भ मुझ अचला का भी सरोवर को हाथी की ही भांति चालित कर रहा है । ३२ । पृथिवी के स्वामी ने इस उस पृथिवी के वचन का श्रवण करके तपो हुई लता को ही भांति उसको आह्लादित करते हुए भगवान हरि ने उत्तर दिया था। 1 ३३ । श्री भगवान ने महा-हे घरे ! आपका यह महान दुख चिर- काल पर्यन्त नहीं ठहरेगा आप सुनो जिस प्रकार से आपने इस महा दुध का अनुभव दिया है । ३४ । मलिनी पे साथ सङ्गम से जो गर्भ बापन धारण किया है वह धूष्टि का पुत्र भी महान दारण असुर सत्त्व गया है । ३५।
धरा दुख बिमोचन यन ।
जात्वा तस्य च वृतान्त गर्नन्य दुहिनादय ।
देवीभि. शास्तिमिदंदलव कुक्षौ तु वन् परः ॥३६
मर्गादौ यदि जावेव भवत्यान्ताहन त ।
ब्रायन मालान लोपाखीनिमान् मनुरासुगन् ।
अतस्तम्य बल वीर्य बात्वा ब्रह्मादय मुन ।
प्रारमृष्टिकानं ते गर्भ तथा धूळगता कृन ।।३८
अष्टावितितमे प्राप्त आदिसर्गाचतुर्युगे ।
प्रतायुगस्य मध्ये तु मुन व जनपिप्यान
यावत् सत्ययुग याति प्रताधं च वरानने ।
तावद् वह महागनं दत्त कालो मया तव ॥४०
नपावग्जायते धात्रि गर्मस्ते ह्यविदाम्प ।
तापद् गर्मवती दुख न त्व प्रम्पनि भामिनी ॥४१
४६८
[ कालिका पुराण
इत्युक्त्वा भगवान् विष्णु पृथिवी गर्भिणी तदा।
नाभौ पस्पर्श दयिर्ता शखाग्रेणातिपीडिताम् ॥४२
सा स्पृष्ठा विष्णुणा पृथ्वी शरीर लघु चासदत् ।
गर्भेऽपि लघिमान सा प्रापातीव सुखप्रदम् ॥४३
अगर्भा यादृशी नारी तादृशी माप्यजायत ।
धृतगर्भापि मुदिता सा वभूव जगत्प्रसू ॥४४
तत पुनरिद वाक्यमुक्त्वा स भगवान् क्षितिम् ।
पुन प्रसादयामास सामभिर्वहुभिश्च ताम् ॥४५
जगद्धात्रि महासत्वे त्व धृतिर्धारणात्मिका ।
सर्वेपा धारणा वि त्व धात्रीति प्रगीयसे ॥४६
क्षमा यस्माज्जगद्धतुं शक्ता क्षान्तियुतात्र यत् ।
सर्व वसु त्वयि न्यस्त यस्माद्वसुमती तत ॥४७
मार्कण्डेय महर्षि ने कहा-भगवान् विष्णु ने उस समय में
गर्भिणी पृथ्वी से यह कह कर उस अत्यन्त पीडित दयिता की नाभि में
अपने शख वे अग्र भाग से स्पश किया था। ४२ । भगवान विष्णु के
द्वारा स्पर्श की गयी ब्रह्म पृथ्वी ने अपने शरीर को हलका हुआ प्राप्त
किया था। उसने गम मे भी हलकापन को प्राप्त किया था जो कि अतीव
सुख प्रदान करने वाला था।४३। जैसे कोई नारी बिना गर्भ वाली होवे
वैसी होवह भी होगई थी । गर्भ धारण करने वाली भी वह जगत् को
प्रमव देन वाली परम प्रसन्न हो गई पी। ४४ । इसके अनन्तर उन
भगवान ने यह वाक्य पृथ्वी से कहार फिर बहुत सान्त्वना देने वाले
वचनों रो उसको प्रसन्न कर दिया था। ४५ । हे जगद्धाति आप तो
महान मत्व वाली हैं और आप धारण करने ये स्वरूप यालो धृति हैं।
हे ददि! आप गवये धारण करन ही से धात्री--इस नाम से गायी
परती है 1१६ । आप जो सान्ति से युक्त है इसीलिये इस जगत
तालिका पुरा
नरक जन्म कथन ।
अथ काले वहुतिथे व्यतीते द्विजसत्तमा ।
विदेहविपये राजा जनको नाम वोर्यवान 14
सर्वराजगुणयुक्तो राजनीतिविधित ।
सत्यवाक् शीलवान दक्षो ब्रह्मण्य प्रयत शुचि ॥२
देवद्विजगुरूणा च पूजामु निरत सदा ।
वभूव सर्वलोकाना पितेव परिपालक ॥३
तस्य राज्ञ सुतो नाभूत प्राप्ने कालेऽपि वै सदा ।
तदा स विमना भूत्वा चिन्ताध्यानपरोऽभवत् ।।४
एकदा सोऽथ शुश्राव नारदम्य मुखान्नृप ।
अपुत्रो नृपतिर्वृद्धों नाम्ना दशरथो महान् ।।
पुवान लेभे महामस्वारध्वरेण महापति ।
अयोध्याया नगर्या तु ऋष्यशृगपुरोगमै ॥६
मुनिभिविहितैर्यज्ञर्लब्धवान् सभूप मुनान् ।
राम च भरत चंद शत्रुघ्न लक्ष्मण तथा 10
मार्कण्डेय महपि ने कहा- हे द्विज सत्तमो । वहुत दिनो वाले
काल ये व्यतीत हो जाने पर विदेह देश में बहुत ही मोर्य--पराक्रम
वाला राजा जन हुआ था ।१। वह राजा सभी सदगुणो से मयु
और राजनीति म परम विष्णात था। वह राजा सत्य बोलने वाला-
गोल मे युक्त-दक्ष-शरण्य-प्रपन और शुचि था ।।२। वह राजा
देवो और दिगो एय गुरओं की पूजा मे मदा निरत रहा करता था।
यह सभी लोगों या एक पिता ही धेगमान परिपालन करने वाला था।
1३। यहृत काल व्यतीत हो जाने पर भी उग बोई पुत्र नही हुआ
पा। उग गमय मे उदास होर चिन्ता के ध्यान में परायण हो
गया था | उमरामा ने एप चार विपिनारदजी मुप मे प्रवण
मरख जन्म वपन ] ४७१ विया पावि राजा दशरथ परम द हो गया है फिर भी यह महान् राजा पुष मे हीन ही है । ५। उग मी मी पाने राजा ने पाये मारा महान सत्व पाले पुनो की प्राति की थी। अयोध्या नगरीम मुनियों के द्वारा जिन में ऋष्प गुग प्रधान तथा नापा घे-frए हुए गों के द्वारा उस राजा ने पुत्रो यो प्राप्ति थी। उन पुगो मे शुभ नाम ग्मी राम-भरत-सदमण और शत्रुघ्न थे ॥७॥ महासत्वान् महावीरान् देवगर्भापमा-भान् । तच्चस्या जनो राजा प्रविश्यान्न पुर रवान। भार्याभिगन्त्रयामा यशार्थ पुषगन्मने । मन्त्रयित्वा तदा राजा मरिपीप्रमुत्य स्वयम् । चतसृभिस्तु भार्याभियंमा दीक्षितोभयार तत पुरोधरा राजा गौम मुनिगत्तमम् । तत् पुन पगलानन्द पुरोधायोपरोन्मस्वम् ।।१० दो पुत्रौ तस्य गगातो यश नमो गनारी। एषा व दुरिगा नायी म-पानमा गुमा ।।११ नारदम्योपदेशेन काभूमि नो नृप । न दारगामाग याबाटायधिश्वपम् 13 सदभूमिमागीतामा भा पन्या गपिकाम्। देगा रक्षणगस्ताम् ॥१३ माया मालाया पधिपा गया। emailMITHun 100
। पालिका पुराग
थे। और
स्वय अपनी चारो रानियों में साय यज्ञ पर ये लिये दीक्षित होगया
था । ६ । इस के अनन्नर राजा ने मुनिश्री 8 गौतम को पुरोहित बना
कर और उनके पुत्र शत्रानन्द को आगे करके यज्ञ किया था।१०।
उस यज्ञ भूमि मे परम मनोहर उसके दो पुत्र समुत्पन्न हुए
एक परम साध्वी-शुभा और भूमि के अन्दर गयी हुई सुता उत्पन्न हुई
यो ।११। देवर्षि नारदजी के उपदश से फिर राजा ने यज्ञ भूमि को
हल के द्वारा दारित किया था जो भूमि यज्ञ बार की अवधि मे थी
स्वय ही राजा ने उनम हल चलाया था ।१२। उस भूमि में जात
सीता मे परम शुभ ममुत्थित कन्या को राजा ने प्राप्त किया था जो
सभी शुभ लक्षणो से समन्तित थी। राजा बहुत ही प्रसन्न हो गया था।
११३। उसके उत्पन्न होते ही वह स्वय पृथिवी के अन्तर्हित थी पृथिवी
नै यह वचन नृप-गौतम और नारद से कहा था । १४ ।
एपा सुता मया दत्ता तव राजन मनोहरा।
एना गृहाण सुभगा कुलद्वयशुभावहाम् ॥१५.
अनया मे महाभारस्तत्त्वतो हेतुभूतया ।
क्षय यास्यति भाराति मोचयिष्यामि दारुणाम् ।।१६
रावरणाद्या महावीरा कुम्भकर्णादयोऽपरे ।
नाश यास्यति दुघर्षा कृतेऽस्या राक्षसा परे ।।१७
त्वच मोद दुराधपं दुहितृकृतिज नृप ।
अवाप्स्यसि सुराणा च पितृणामृणशोधनम् ॥१८
विन्त्वेक समय वार्यस्त्वया मम नरोत्तम ।
तमह ते प्रवक्ष्यामि पुरो नारदगौतमौ ॥१६
निहते रावणे वीरे भाराति-रहिता सुखम् ।
सुपुत्र जनयिप्यामि यज्ञभूमावह तव ॥२०
त पुत्रवत् पालयिता भवान् नृपतिसत्तम ।
पावद्ध्यतीतवाल्य सन् भविता तनयो मम ।।२१
नरक जन्म कथन ४७३ व्यतीतवाल्य तमह पालयिप्ये स्वय नृप । तस्य स्यान्मानुषो भावो यथा स्व तत्कारिप्यामि ॥२२ पृथ्वी ने कहा-हे राजन् । यह पुनी मैंने आपको दी है जो बहुत ही मनोहर है । इमका ग्रहण आप परिए । यह परम सुभगा है मोर दोनो ही कुलो के शुभ का आवाहन करने वाली है 1१५ । सात्त्वि रूप से हेतु भूता इसके द्वारा मेरा महान भार क्षय को प्राप्त हो जायगा और मैं भार की पीडा का मोचन करूंगी जो कि इस समय में मुझे बहुत ही दारुण प्रतीत हो रही है । १६ । इसके लिये रावण आदि महान वीर तथा दूसरे कुम्भ र्णा आदि जो बहुत ही दुर्घर्ष है एव अन्य भी राक्षस गण नाश यो प्राप्त हो जायगे । १७ । आपकी दुहिता की वृति (प्रयत्न ) स समुद्भूत दुराधप मोह को प्राप्त करे गे और सुरी या तथा पितृगणो का ऋग वा मोचन होगा। अर्थात् शोधन हो जायगा । १५ । हे नरोत्तम मिन्तु आपको एक समय (प्रतिज्ञा) मुझमे करनी चाहिए । उनको मैं नारद और गौतम के आगे नही । । १६ । बीर रावण के निहत हो जान पर मैं मार की पीड़ा से रहित होती हुई मुख पूर्वक आपकी इमो यज्ञ भूमि में में गुपुत्र को जन्म प्रहण पराऊँगी ।२०। हे मप श्रेष्ठ । आप उसको पुत्र को ही भांति परि- पालन परने वाले होंगे। व्यतीत ध्याल्य काल पाना हावा हुमा मेरा तनय होगा। जव उसका वाल्य काल व्यतीत हो जायगा तो मैं उसका म्वय ही परिगलन बहंगी। जिस प्रकार से उसका मानुप भाव हो वे वैसा ही साप करे ग 1२१। २२ । इति पृथिव्या वचन थत्वा राजा तदा मुदा । प्रणम्य पृथिवी प्राह साम्ना सजनकाहुवय. ।।२३ यत् त्व यू पे जगद्धात्रि करिष्ये तद्वचस्तव । ममापीप्ट प्रयच्छस्व प्रसीद परमेश्वरि ॥२४ देवि प्रत्यक्षतोम्प द्रष्टुमिच्छाम्यह तय ।
[ कालिका पुराण शक्तिस्त्व लोकजननी त्वा नमामि प्रसीद मे ।।२५ इति तस्य वच श्रुत्वा जनस्य तदा क्षिति । मुनीना सन्निधौ रूप दर्शयामास भूभृते ॥२६ नीलोत्पलदलश्यामामक्षमालाजधारिणीम् । वाहुयुग्मेन शुभ्रण मृणालायतशोभिना । सुन्दरी लोकधात्री ता दृष्ट्वा शश्वत् नपोऽनमत् ।।२७ तत सा पृथिवी देवी सीता जाता नृपात्मजाम् । परेण शश्वत् सस्तृश्य वचन चेदमब्रवीत् ॥२८ मारंण्डेय महर्षि ने कहा- इस पृथिवी के वचन का श्रवण यरवे उस अवसर पर राजा परम आनन्द से मयुत हुआ और वह जनम नाम: धारी राजा ने पृथियी को प्रणाम करके बहुत ही माम पूर्वक कहा- हे जगत् की धाप । जो भी आप कहती हैं उस सापके वचन को मैं गहंगा । हे परमेश्वरि । आप प्रसन्न होइए और जो भी कुछ मेरा अभीष्ट होवें उमयो प्रदान गरिए । २४ । हे देवि । मैं आप प्रत्यक्षा स्वरूप में दर्शन करने की इच्छा रखता है। आप लोको यो जनन परन वाली शक्ति है । मैं आप यो प्रणाम करता है। आप मुझ पर प्रमन्न होदए । २५ । उम समय म भूमि ने उस राजा जनक के इस वचन का श्रवण परके मुनियो की मतिधि मे उरा रागा को अपना स्वरूप का अवलोकन कराया था । २६ । अय उम पृथ्वी चे स्वरूप का वर्णन किया जाता है. वह भूमि लाल यमन के रामान स्यामा यी और हायो म यह मामामा तया पर दो धारण करने वालो को। उगको वाहनो का जोश परम गुध्र और गृणाग ये गश आया और गांमा समन्वित पा। उग परम मुग्दरी गौरी पी धात्री उगवा दी साईराने नितर उमप लिए प्रणिपार दिया था ।२७। गर परान इस देशे पृषी ने कामदभूत ई नृप को मारमा गीता को निरादर पर में मार गिराया था नामी २१
[ पालिका पुराण
गमन करके एक परम वीर पुत्र को प्रसूत दिया था जहां पर पहिले
सौता हुई थी । ३२ । ३३ । उम समय मे पुत्र के जाम ग्रहण
करने पर
जगत को धात्री धरित्री देवी जगत् के प्रभू विष्णु का स्मरण किया था
यो पहिले होने वाले समय का स्मरण कर रही थी । ३४ । उसी समय
में केवल स्मरण करने से ही देव ने समय का प्रतिपालन किया था और
जहाँ पर क्षिति का पुत्र उत्पन्न हुआ था वहाँ पर ही वे प्राहुभूत हो
गमे थे अर्थात् प्रकट हो गये थे ।३५॥ उस अवसर पर प्रादुर्भाव को प्राप्त
हुए परमेश्वर देवी ने प्रणाम किया और बहुत ही वाणी से निरन्तर
उनकी स्तुति करके जगत् के प्रभु से वह पृथ्वी यह बोली । ३६ ।
एष ते तनयोजात सुकुमारो महाप्रभ ।
सस्मरन् समय पूर्व त्वमेत प्रतिपालय ॥३७
अय ते तनयो देवी महावलपराक्रम ।
भविता मानुप भाव तन्वान सुचिर बुध ॥३८
यावन्मानुषभाव ते तनयो भावयिष्यति ।
नावत् कल्याणभागभ त्वा चिर राज्य करिष्यति ।।३६
स्यक्तमानुपभावस्तु यदा चाय विचेष्टते ।
तदा तु नास्य सुचिर जीवित सम्भविष्यति ॥४०
सम्प्राप्त पोडशे वर्षे राज्यमासादयिष्यति ।
धनरत्नगश्वर्ययक्तोऽय रथसचयं ।
आसाद्य महती नित्य श्रिय भोयति वीर्यवान् ॥४१
यस्मिन् यस्मिन् युगे भावो यो वा भवति व नृणाम् ।
त भाव तथवाय करिष्यति तथा कुरु ।।४२
पृथ्वी ने कहा-यह वढी प्रभा से समन्वित एव भुतुमार यह
पुत्र आपर्व हुआ है अर्थाद पुद्र ने जन्म ग्रहण रिया है । अब आप पूर्व
समय का मस्मरण करते हुए आप इसका प्रति पालन कीजिए । ३७ ।
"भगवान् ने पहा है देवी । यह आपका महान बल और परावम
नरक र वथन] वाला पन होगा। यह दूध दहन अधिक ममय पपान मानुप भाव का विस्तार करने वाला हागा।३८ । निसन ममय पयन्न आपका पुत्र मानुप भाव को भादित करेगा तब तक कल्याण का भागी हाकर पिर काल यथाव बहुत अधिक समय तक राज्य शासन परगा।६६। मानुप भाव का परित्या करन वाला यह जित समय म विशष चेष्ठा किया करना है उग समय म ता इनरा नीधित मुचर वाल तक नहीं सम्भव होगा । ४०1 सानहर्वे वप र सम्प्राप्त हान पर यह राज्य का शस करेगा नव यह रथा र समूहा स और धनरल-ज नादिक एचयाँ म युन हागा । यह वायवान् नित्य हो वही भारी अधिक थी को प्राप्त कर उसका उपभाग परगा । ११ जिस जिस युग म अथवा जो भाव मनुष्या का होता है टमी भात यह उसा भाव का करेगा-- वैमा ही करो ॥४२॥ एतम्य निभृत राज्य यत् प्राग्ज्योतिषसनकम् । पुर तन चिर मास्ता राज्यमेप सुतस्तव ॥४३ इत्यूक्त्वा पृथिवी विष्णु समाभाप्य जातपति । दृश्यमानम्नया क्षिप्र तत्रवान्तदंचे प्रभु ॥४४ प्रसूय पृथिवी पुन मध्यरान महाधुनिम् । जनक ज्ञापयामाम रहन्य पूर्वमोरितम ॥४५ विदेहराजो ज्ञावव पथिवीजनित सतम । नाव यजवाट स रात्रावागात् वृननिय ४६ गच्छन्त पशवाट त हप्ठ्या सर्वसहा नदा । नोक्त्वा चिन त शश्वदन्तधान गता नपम् ॥४७ अय गत्वा तदा तन्त्र विदहाधिपति सुतम । धराया दहशे कान्त्या चन्द्राकंज्वलनोपमम ॥४ पदन्न बटुश स्निग्ध चलदहस्तपदद्वयम् । वपुष्मन्त श्रियादीप्त कातिकपमिदापरम् १४८ । कालिका पुराण इमका निभृत राज्य वही है जो प्राग् ज्योतिष सज्ञा वाला है। वहाँ पर पुर है--यह आपका पुत्र चिरकाल पर्यन्त राज्य का शासन करने वाला होगा। ४३ । जगतो के स्वामी भगवान् विष्णु ने यह वह कर कर पृथ्वी के साथ मम्भाषण किया था। फिर उम भूमि के द्वारा दृश्यमान ( दिखताई देने वाले ) होकर प्रभु शीघ्र ही वहां पर ही अन्तर्धान हो गये थ । ४४ । पृथ्वी ने मध्य रात्रि मे महती युति वाले पुत्र का प्रसव करके राजा जनक से पूर्व मे समीरित रहस्य विज्ञापित किया था । ४५। विदेह राज ने पृथिवी के द्वारा जन्म दिये हुए सुत का ज्ञान प्राप्त करके ही वह राजा अपनी क्रियाओ का करने लाला होकर वही पर यज्ञ वाट म रात्रि में गया था। ४६। उस समय मे सबका सहन करन वाली पृथ्वी ने यज्ञ वाट म उसको गमन करते हुए देखकर स नप से कुछ भी नहीं कहा था और शश्चत् अन्तर्धान को प्राप्त हो गई थी। ४७ । इसके अनन्तर वहा पर विदेह के अधिपति ने गमन करके वहाँ कान्ति से चन्द्र--मूय और अग्नि के तुल्य पुत्र को धरा मे देखा था । ४८। वह बालक अत्यधिक रुदन कर रहा था--स्निग्ध था और अपने दोनो हाथ पैरो को हिला रहा था-~-वह वपुष्मान था। श्री से देदीप्यमान था और दूसरे स्वामी कात्तिकेय के ही तुल्य था । ४६ उद्गच्छन् स रुदन् वालो यज्ञम व्यतीत्य च । क्यिदूर जगामाशूत्तानशायी महाद्युति ॥५० मनुप्यस्य शिरस्ता मृतस्य प्राप्य वालय । स्वशिरम्तन विन्यस्य रुदस्तस्थो क्षण तदा ॥५१ ततो विदेहराजोऽपि मागंमाण क्षिते सुतम् । व्यतीत्य यज्ञभमि तमाममादाजसा वहि ॥५२ आसाद्य वालव दीप्त प्रदीप्तमिव पावकम् । पान्त्या च द्रमसस्तुल्य तेजोभिर्भास्वरोपमम् ॥५३ नरव जाम वयन ] शरमध्यगत पूर्व पावकि पावको यया । न्वय जग्राह त राजा पृयिन्या ममय स्मल् ॥५४ उद्गृह्णन् तच्छिरोदेश ददृशे मानुप शिर । शशराचाचिर शार्प मानुप गौतमाय न ॥५५ अथ वार समादाय प्रविश्यान्त पुर स्वकम् । महिप्यं कथयायाम प्राप्त पुत्र गुहापमम् ॥५६ यह गिशु ऊपर की लार गमन करता हुना और रदन करता हना यन भूमि को व्यतीत करखे कुछ दूर तर चला गया था और वह महनी युति वाला सीघ्र ही उत्तानभायी हा गया था। ५० वहाँ पर उस वान ने एक मृत शरीर का शिर प्रात परसे अपन शरीर को उन पर रखकर उम समय म रोता हुआ एक क्षण पर्यन्त स्थित हा गया या। ५१। इसने मनन्तर विदेह राजा भो भूमि के पुत्र को खाता हुआ पन भूमि को व्यतीत परव शीघ्र ही वाहिर उसरे समीप में प्राप्न हा गया था। ५२। दम देदीप्यमान और पावर की हो भांति प्रदीप्न वार के पास पहुंच पर जा वान्ति न चन्द्रमा के तुल्य या और तेज से सूर्य के समान पा--रावे मध्य म गव जिस तरह मे पावन न पाववि को प्रप दिया था उसी भांनि राजा ने से पूर्व पृथिवी के समय का स्मरण करते हुए स्वर ही उसे पहप वर लिया था । ५४ । समका कपर पी आर प्रहा करते हुए उस शिरो- भाग में मनुष्य का गिर देवा या। सन फिर गौतम लियं हो मनुष्य क गिर के विषय में कहा था । ५५। इसके जननर उन राजा न दाल का समादान बरसे बोर अपन मन्त. पुरम प्रवेश कर उस मुह रे तुन्द प्राप्त हुए पत्र के विषय म पनी महिपी से बहा पा ॥५६॥ सात दृष्ट्या विशालाक्ष सिंहसन्ध महाभुजम् । विस्तोगहृदय वान्न नीलोत्पलदलच्छविम् ।
[ पालिका पुराण मुमोद पालनीयोऽय मयेति न्यवदत् नृपम् ॥५७ ता राजापि तत प्राह पुत्रोग्य मम सुन्दरि । यज्ञभूमो समुत्पन्न स्वच्छन्द पाल्यतामयम् ।।५८ यत् पृथिव्या रह प्रोक्त न तद्देव्यै न्यवेदयन् । सत्यसन्धो नृपयेष्ठ प्रियाया अपि भापितम् ।।५६ मम सुतसुतवशान पाल यित्री धरेय. मिति नरपनिवर्यो मोदवास्तद्दिने च । सुरतनयसमान पुनमासाद्य देवी। जितरिपुरतिधीमान् स्यादयञ्चेत्यमोदत् ।।६० उस महिपी न उस बडे बडे नेत्रो वाले–सिंह के समान स्कन्ध से सयुत-महान् भुजाओ वाले पुत्र को देखकर जो विशाल वक्ष स्थल वाला था-परम कान्त था तथा नीले कमल के दल के समान छवि वाला था। वह बहुत ही प्रसन्न हुई थी और उसने रागा से यह निवे- दन किया था कि यह तो मेरे द्वारा पालन करने के ही योग्य है । तात्पर्य यह है कि मैं तो इसका प्रतिपालन करूंगी । ५७। राजा ने भी उससे कहा था कि हे सुन्दरि । यह तो मेरा ही पुन है । यह यज्ञ की भूमि मे समुद्भूत हुआ है इसका आप स्वतन्त्रता पूर्वक पालन कीजिए । ५८ ॥ जो पृथिवी के द्वारा रहस्य कहा गया था उसे उस देवी मे निवेदन नहीं किया था। उस सत्य प्रतिज्ञा वाले राजा ने प्रिया के भापित को भी नहीं कहा था । ५६ । मेरे सुतो के सुतो के वश को भी यह धरित्री पालन करने वाली है। इसलिये उस दिन मे नृपति श्रेष्ठ परम हर्षित हुआ था। देवी भी देवा के पुत्र के समान सुत का समासादन करके यह शत्रुओ का जीतने वाला और अतीव बुद्धिमान होगा इसलिये परम प्रसन्न हुई थी । ६०।
वरपामिरेदन स्थन
नरकाभिषेचन कयन ।
अप तप नाथजी गौतन महर्षित्रा।
सकार गरयामान विधिना मानुगण १११
नरम्य श स्वशिरो निधार यिनवान यन।
तस्मात्तन्य मुनिया नाक नाम वै मात्र
अपगन वानसस्ताराव क्षात्रय विधिना मूनि ।
पेशन्तावधि वचन अग्य मारमन्नर ॥३
चवे तस्य सदन नरवा नाम भूसुत ।
दिनदिन घृतान्यथा घरदार निधार र
म राजा तनदा भावमानुपयाजवन् न्वयम् ।
गौतमन्य मुतनाय शतानन्दन धीमता ।
चाहामात्र तलिप क्षार भाव च मानुपम ॥५
तथेच पृथिवा दवा धान्नावपणन सुतम् ।
नियन ग्राहपामाय मानुर चरिन शुभम् ॥
यदव पुत्र उत्पनस्तदव पृथिवान्वयम् ।
मायामानुपपण पान पुरमावि 113
४८२ [ पालिका पुराण योजित करता हुआ उसन गौतम मुनि क पुत्र बुद्धिमान यतानन्द के द्वारा उसको नित्य ही क्षात्र और मानुष जाव ग्रहण कराया था । ५ । उसी भांति पृथिवी देवी ने धात्री (धाय) के वेप से उस पुत्र को नियत रूप से शुभ मानुप चरित को ग्रहण कराया था ।६। जिस समय में ही पह पुत्र समुद्गत हुआ था उसी समय मे पृथिवी स्वय माया के द्वारा मनुष्य के स्वरूप को धारण करके वह उस नृप के अन्त पुर के अन्दर प्रविष्ट हा गई थी ॥७॥ प्रविश्य तत्र सा देवी नृपस्यानुमतेऽभवत् । धात्री तस्य द्विजश्रेष्ठा कात्यायन्या ह्यवस्थया ।।८ यावत् पोडशवर्षाणि तस्य वालस्य भावी नि । तावत् स्नय पालयन्ती ग्राहयामास सनयम् ॥६ स वर्धमानाऽनुदिन नरक पृथिवीसुत । अत्यकामत् सुतान् सर्वान् जनकस्य महात्मन ||१० शरीरेणाथ वार्येण रूपेण वलवत्तया। धनुषा गदया वीरो हत्यकामन् नृपात्मजान् ॥११ स शास्त्रवादकुशलो धनुर्वेदे च काविद. । व पाडभिभूतो वार रन्यदुरासद ।।१२ विदेहाधिपतिई प्ट्वा महावलपराक्रमम् । ततो न्यून्यान् स्वपुत्राश्च नातिहष्टमनाभवत् ॥१३ निरस्यासौ च मत्पुत्रान् मम राज्य ग्रहीष्यति । काले प्राप्ते महावीरो मत्तिस्तस्याभवत् पुरा ११४ प्रवेश करके वह देवी राजा के अनुमत में हो गयी थी । हे द्विज थेष्ठो । वह वात्मायनी अवस्था से उसकी धात्री (घाय) हो गई थी। ।८। जब तक उस वालप क आगे होने वाले सोलह वर्ष थे तब तक स्वम उसका पालन करती हुई उसे भली भांति नय ( नीति ) अथवा विनय ग्रहण कराया था अर्थात् नप की शिक्षा दी थी। आय दिन नवाभिपेचन क्प चहा होकर उस पृथिवी फे पुत्र नरक ने महात्मा जनक के अन्य सभेरे पुत्रो का अतिक्रमण कर दिया था । अर्याद यह सभी से दडा हो गया था । १० । समस्त नृप के पुत्रों को परर--वीय सेरूप से- बलवत्ता में-धनुप स बौर पदा के द्वारा वह वीर बतिक्रार कर पया था । अर्थात् सभी बालों में दह अन्य नृप पूनों में वही अधिक वर पपा था 1११ । वह शास्त्रों के बाद में परम प्रयोग या वीर धनुर्वेद में भी महा पण्डिन था। यह मालह वर्षों में ही अन्य वोरो को दुरासह हो परा या । १२ । विदेह से अधिपनि ने उसके महा दन और परा- क्रम को देख कर और अपने पुत्रों का उसमें न्यून भवसरोक्न करके वह राज अत्यन्त प्रसन्न मन वाला नहीं हुआ था । १३ । यह तो मेरे पुत्रों पा निरसन करके मर राज्य को पदप कर सेमा उकि यः काल प्राप्त होगा तो उस समय में यह महावीर ऐसा ही बरपा पहिले उसकी मति हुई यो । १५ अन्नपुरे यदा पुत्रान् सर्वान् लपते नमः । तदा तु नरकं वीक्ष्य हां प्राप्नोति नाधिकाम् ॥१५ तस्य तव॒युधे देवी नृपस्याय बमुन्धरा । महिषी विस्मय पो तस्मिन् भाव तु मभृतः ।।१६ स्थकदा महादेवी जनकम्य महात्मनः । पप्रच्च नृपतियो विदेहाधिपति पतिम् ॥१७ नाय पृच्यामि ते किचिद्रहम्यं यदि नो तव । तदा मा तदस्व त्वं कृपा चेदविद्यते मयि ।।१४ यदेव तमयाः सर्वे विहरन्ति पुरस्तष । तदेव नरकं रष्ट्वा विशोणं इव लक्ष्यमे ।।१६ तन्मे रामिन्दिर बाई विन्मयः प्रतिवर्यते। मगच मय चैव न जहाति व मा मदा ॥२॥ रूपवान वीर्यवानंप नये व दिनये तमा।
४६४ [ कालिया पुराण कुशल प्रति युद्धश्च पुत्ररतव महावल ॥२१ न सभाजयसे कस्मात् पुत्रमन्यैर्दुरासदम् । तदह जातुमिच्छामि यदि तथ्य वदस्व मे ॥२२ जिम अवसर पर राजा अपन अन्त पुर में सब पुत्रो को रमण पराता है उस समय मे नरम को देखकर वह अधिक हप को प्राप्त नही क्यिा करता है । १५ । इसके अनन्तर यह हुआ कि वसुन्धरा देवी उस नृप वे भाव वो समझ गयी थी और महिपी राजा के उस प्रकार के भाव म विस्मय क्यिा करती थी । १६ । इसके अनन्तर एक बार महात्मा जनय की महादेवी ने नृपतियो म परम श्रेष्ठ विदेह के अधिपति अपने पति से पूछा था । १७ । हे नाथ | मैं आपस पूछती हू यदि आप का इगम कुछ रहस्य नही हो तो आप मुझे वतलाइए यदि आपकी मुसा पर परम कृपा है । १८ । जिस समय म ही ये सब पुम आपके आगे विहार-कोटा क्यिा करत हैं उसी समय म आप नर का अवलोकन कर विशीणं यो हो भांति दियलाई दिया करते है । १६ । सो यह महो रात दिन विस्मय बहुत अधिर प्रतिबंधित हुआ घरता है। यह मशय और भय रादा ही मुझे होता रहता है और घटता नहीं है । २० । यह आप वा पुत्र सवाना है-वीर्य से म गुत है तथा नय और विनय म परम पुशल है। यह पुत्र प्रति वृद्ध और महान बलवान है पिर क्या कारण है कि अन्या मदुरामद इगवा आप समागिन नहीं किया वरत हैं है.यही में जानना चाहती है यदि राम पुछ भी तथ्याश हो तो आप मो बतलान की वृपा वर । २१॥ २२॥ दति तग्य यच थ.त्या प्रियाय पृथिवीपतिः । तणी भृत्या क्षण देवामिद पनाममयीत् ॥२३ पयिष्य प्रिय तत्व यन् पृप्टोह स्ययाधुना। मागाये व्यगीमे तु गमय प्रतिपालय ॥२४ निगद धिताल देवरय गमयों गम।
नरपाभिचन क्थन
तेनाधुना न किचित्ते कथायध्यामि तदह ॥२५
राज्ञो ह्यय सभायस्य सवादोऽभवदन्तिके ।
मानुपी पृथिवी धानी त शुश्राव यदा तदा ॥२६
श्रुत्वा तयोस्तु सवाद महिपीभूपयो क्षिति ।
मासत्रयेण समय दत्त देव्यै धरामृता ॥२७
तत्काले विमनस्क च भूप नरव सज्ञया ।
निमिर्मासंयंतीत स्यादस्य पोडशवतसर ॥२८
मार्कण्डेय मुनि ने कहा--उस पृथिवी पति ने अपनी प्रिया के
इस वचन का श्रवण करके एक क्षण के लिये मौन रहकर फिर देवी से
यह वचन कहा था। २३ । राजा ने कहा-हे प्रिपे। मैं तत्व को
कहूगा जो इस समय में आपने मुझसे पूछा हैं। माम तीन के व्यतीत
होने तक समय का प्रतिपारम परो। २४ । यहाँ पर कोई देव श समय
मेरे लिये निगूढ़ हैं। इमी से अव मैं आपको वह रहस्य कुछ भी नहीं
कहूँगा १८५। मार्कण्डेय महर्षि ने कहा-मार्या के स हत राजा का
यह सम्वाद ममीप में होता था। जब तय मानुषी धानी पृथिवी ने इस
का श्रवण किया था। अर्थात मनुष्य देह धारिणी धाय के रूप में स्थित
पृथ्वी ने सुना था । २६ । मिति ने उन दोनो महिषी और राजा के
सम्वाद को सुना था कि राजा ने देवी को तीन माम वा समय दिया
है । २७ । उस समय मे नरक के नाम से विमास्क अर्थात् उदाग भूप
है तीन मास व्यतीत हो जाने पर इसके गोलह वर्ष होंगे । २८ ।
ततो नपो महिप्यास्तु कथयिष्यति तद्रह ।
ततो मम रहस्य तु विदित सम्भविष्यति ॥२६
चिन्तयित्वति सा देवी जगद्धाती सुत्र प्रति ।
निश्चित्येद तदा कृत्य प्रातकालमचेप्टत ॥३०
ततो रहसि भूपत समासाद्य मगौतमम् ।
इदमाह जगद्धामी स्वपुप्रार्थ यशस्विनी ॥३१
। बालिका पुरान यो मया समयो दत्त पालित स त्वयानघ । पुत्रश्च पालितो मेऽय नरको विनर्ययुतः ॥३२ सम्प्राप्तयौवन पुत्रो योजित त्वया नये । तव प्रसादात पत्रो मे सुखी वृद्धो गहे तव ॥३३ तमहं पूर्वसमयान्नयिष्यामि स्वमात्मजम् । अनजानीहि मद्र ते नरकस्य गति प्रति ॥३४ रक्षित व्यश्च भवता समय सपुरोधसा। छनमेव नयिष्यामि भपते मा कृथा व्यथाम् ॥३५ इसके उपरान्त ही नृप महिपी को यह रहस्य बतलाये गे फिर मेरा रहस्य भी विदित हो जायगा । २६। उस देवी ने यह चिन्तन करके वह जगत् की धानी सत के प्रति यह निश्चय करके उस समय में काल प्राप्त हो जाने वाले कृत्य की चेष्टा की थी । ३० । इसके उपरान्त एकान्त मे उम राजा को गौतम मुनि के भहित प्राप्त करके यशस्विनी जगद्धात्री ने अपने पुत्र के लिये यह कहा था । ३१ । है अनघ । जो मैंने समय दिया था वह आपने पूर्ण रूप से पालित कर दिया है। और यह मेरा पुत्र भी आपने पालित किया है जो यह नरक विनय से सम- वित है । ३२ । यौवन को प्राप्त हो जाने वाला यह पुत्र आफ्नै नय में भी योजित कर दिया है। आपके प्रसाद से यह मेरा पुत्र बडा-- मुखी आप पर मे हो गया है । ३३ । अब उसको अपने पुत्र को पूर्व ममय के अनुसार ले जाऊंगी। आपदा परम मङ्गा हो-~अब आप इम नरर को गमन करने के लिये अपना आदेश प्रदान कीजिए ।३॥ भापो पुगेहितजो दे सहित समय को रक्षा परनी चाहिए । हे भूपते ! में इसको छिरे हुये स्वरूप में ही ले जाऊँगो~आप कुछ भी प्यार पीजिए । ३५॥ इश्युक्त्वा जगतां धात्री विदेहाधिपति नृपम् । तत्रैव पश्यता तेषामन्तर्धानमुपागमत् ॥३६
नकाभिषेचन क्यन
५८७
नृपोऽपि तस्यास्तद्वाश्यमगीकृत्य शिनि प्रति ।
तस्या प्रत्यक्षत स्थान जगाम मपुरोहित ॥३७
अर्थकदा धरा देवी मायामानुपापिणी ।
उपाशु नरक प्राह धात्री तस्य महात्मन ॥३८
त्वया सम महावाही गगा यातु मनौ मम ।
यदि त्व यामि चास्यामि रयेनाद्य व पुत्रक ॥३६
न पितुर्वचन यास्य विना मातस्त्वया समम् ।
अनुनाप्य रथेनाह यास्य गगा त्वया ममम् ॥४९
मार्कण्डेय महर्षि ने कहा-जगता की धानी न यह वचन
विदेह के अधिपति नृप मे बहर वह वहो पर ही उनकै दम्बत हुए
अन्तर्धान को प्राप्त हो गयी थी । ३६ । राजा ने भी क्षिति प्रति
उसके उम वावय को अङ्गीकार करसे प्रत्यप स से उनके स्थान को
पुरोहित २ महित गमन कर गये थे।३०। इसके अन्तर एर पार
माया मे मनुष्य के स्प वाली परा दवी न जो उग महात्मा को पानी
थो उपाणु नरक से बोली-1३८ । हे महाबाहो । आपके साथ म
मेरा मन गङ्गा पर गमन करने वा होता है । यदि तुम जाते हो तो
हे पुत्र । आज ही रथ के द्वारा प्रयाण करगी । १६ । नरस ने कहा-
हे माता पिता के वचन के विना मैं तेरे भाय नहीं जाऊंगा। अनुना
प्राप्त से हो मैं रय के द्वारा मापने साए गमन बहंगा ४११
न ते पिताय जनको य सर्वजगता प्रभु ।
स ते पिता त गगाया पश्य मत्वा मया सह ॥४२
अय पिता पालक्स्ते न राज्य सम्प्रदास्यति ।
यस्ते वयिता तात तमासादय पुत्र ॥४३
अत्र पद्म तद् गगायामेव पुतक।
क्ययिष्याम्यह सर्व रहोभगस्ततोऽन्यया ! ४४
जातसम्प्रत्ययो धान्या वचमा नरसस्तथा !
४८८ [ कालिका पुराण - विहाय यान छन्दैन पझ्या गगा ययौ तदा ॥४५ अथ गगा समासाद्य सस्नाप्य विधिवत् सुतम् । आत्मान दर्शयामास पथिवी स्वसुताय व ॥४६ मायामानुपमूर्ति ता विहाय जगता प्रसू । नोलोत्पलदलश्याम सर्वलक्षणसयुतम् ॥४७ सर्वागसुन्दर चारु नानालकारभूपितम् । पुत्राय दर्शयामास नरकाय वसुन्धरा ॥४८ कथामेताञ्च पूर्वस्मिन्नुभता पृथिवी तदा। वथयामास पुत्राय प्रतीति गयिते यथा ॥४६ धात्री ने कहा-यह तेरे जन्म देने वाले पिता नही है । जो समस्त जगतो वा प्रभु है वही आपके पिता है । उनको मेरे साथ जावर गहा म ही अवलोवित करो। ४२ । यह आपके पारान करने वाले पिता ही है । यह तुमको राय नहीं देंग। हे तात । जो आपके वर्धन वरन वाले है हे पुत्र । उनको ही अब प्राप्ति करो । ४३ । इसमे जो भी कुछ रहस्य है हे पुत्र अन्यथा रहस्य या मन हो जायेगा। ४४ । माण्डेय महर्षि ने पहा- धात्री के वचन से सम्प्रत्यय समुत्पन्न हो जाने वाले नरव ने उस प्रकार मे रय मे यान मा परित्याग करके स्वतन्त्रता से उस समय में पैरों ही मे गगा को गमन दिया था ॥ ४५ ॥ इमवे अनन्तर गङ्गा पर पहुंध पर वहाँ विधि पूर्वव पुत्र को स्नान मरायर पिर पृथिवी में अपने सुन पेरिये अपने स्वरूप वो दिपना दिया पा। ४६ । उस धरिपी ने माषा मे जो मनुष्य की मूर्ति थी उसपा परित्याग पर जग जगत में भगव परल वासी पृथ्वी ने अपना सुन्दर स्वरूप धारण किया था। मोल पमान में ममान पयाम-गभी शुलक्षणा से गमवितभी अङ्गों गुदर-पार और ओर अगवारा से विभूषित रूप को वमुघरा ने पत्र मार को दिवाया था ॥७~१|| उम् गमय म पृथ्वी ने पूर्व वह राब मैं गङ्गा मे ही बतलाऊँगी।
नरकाभिषेचन कयन ]
४८६
म समुद्भूत क्या दो पुत्र के लिये कह दिया था जिमसे उसे पूर्ण प्रतीति
हो जाये । ४६।
मम गर्ने यथा पर वर्धसे त्व दिने दिने ।
ब्रह्मादयरतदा देवा आलोक्य स्वयमेव ते ।।५०
मलिनीक्षितिसजात पनो विष्णोर्महात्मन ।
आसुर भावमाम्धाय सर्वानस्मान हनिप्यति ॥५१
इति चिन्तापरा देवा कृमन्त्र चकिरे तदा।
अय नोनपाता गर्नाद्गर्भ तिप्ठत्वय मदा ॥५२
ततो मम भवान् गर्भ सुबहूनि युगान्यथ ।
अवम खवान पन्न देवाना च सुमन्त्रत ॥५३
मृतकल्पाभवमह भवतो धारणात मुत ।
ततोऽह शरण पाता भगवन्त सनातनम् ॥५४
नारायणस्य वाक्यात तु भवानुनपन्नवास्तत् ।
इति सत्य मम वच पन जानीहि निश्चितम् ॥५५
पृथिवी ने कहा-हे पुत्र । मेरे गर्भ में जिस प्रकार में तुम
दिनो दिन वदित होत हो उस यवनर घे ब्रह्मा आदि देवगण स्वय ही
अवलोकन करके फि यह महान् आत्मा वाले भगवान विष्णु से मलिनी
क्षिति से समुद्गत हुआ पुत्र आसुर भाव में समास्थित होकर हम सबका
हनन कर देगा ।। ५०-५१ n इसी चिता मे तत्पर होते हुए देवो ने
उस अवसर पर यह मन्त्रणा की थी कि यह गर्भ से उत्पन्न हो न
होने और सदा इमो गर्भ में स्थित रहे । ५२ । इसीलिये माप मेरे गर्भ
मे यहुत-से युगो पर्यंत आपने हे पुत्र। मेरे गर्भ मे ही निवास किया
था और यह निवास देवो के ही कुमन्त्रणा के कारण ही हुआ था।
1५३ । है सुत । आपको गर्भ में ही धारण किये हुए मैं मृत में ही
समान हो गई थी। तव में सनातन भगवान की शरणागति में प्राप्त
हुई थी। फिर भगवान नारायण के वचन मे ही आपने जन्म ग्रहण
[ मालिका पुराण
किया था। यह मेरा वचन हे पुत्र । सर्वथा गत्य है यह निश्चित रूप से
आप समझ लेवें ॥५४-५५॥
अथ यावन्नपत्रस्य विस्मय समपद्यत ।
तावदेव स्वय देवी प्रोचे पनमिद वच ॥५६
यथा विदेहराजस्य यज्ञभूमावसूयत ।
विदेहराजेन सम यादृश समयोऽभवत् ॥५७
यथा भानुपरूपेण धात्री सा समपद्यत ।
तत् सर्वं कथयामास नरकाय महात्मने ।।५८
अथ ता पृथिवी प्राह नरक पुनरेव हि ।
पृथिव्या वचन श्रुत्वा स्वल्पसशयसयुत ॥५६
यद्यव मे पिता विष्णुर्माता व पृथिवी शुभे ।
आगच्छतु जगन्नाथो ममैवाभ्युपपत्तये ॥६०
स एव सर्व लोकेशो यदि मा भापतेऽच्युत ।
पिताह ते त्विय माता श्रद्धधे नदह शुमे ॥६१
त्वया मानुषरूपेण धात्र्याह प्रतिपालित ।
तद्र प द्रष्टुमिच्छामि यदि तेरू पमीदशम् ॥६२
मार्कण्डेय महपि ने कहा-इसके अनन्तर जव तक अपत अर्थात
पुत्र से रहित को विस्मय हुआ था तभी तक स्वय देवी ने यह वचन पुत्र
से कहा था । ५६ | जैमे विदेह राज को यज्ञ भूमि मे प्रसूत हुआ था
विदेह राज के साथ जैसा समय हुआ था वह सब कुछ महात्मा नरक से
कह दिया था । ५८। इसके अनन्तर नरक उम पृथ्वी से पुन बोला था
क्योकि पृथ्वी के इस वचन का श्रवण करके वह नरव थोडे सशय से
सयुत हा गया था । ५६ । नरक ने कहा-हे शुभे । यदि यह भगवान
विष्णु मेर पिता है और आप मेरी माता है तो वे जगत् के नाथ मेरी
अभ्युत्पत्ति के लिये ही समागमन करे । ६०! वे ही सब लोको के
स्वामी है। यदि मुझस वे अच्युत पहत है कि हे शुभे । मैं तरा पिता
नम्माभित्रन थन है और गे माता है ता में प्रया॥१॥ तुनी मधुमके से धात्री द्वारा मग प्रनिपानतिमा है में मीसके दर्शन गरने की इच्छा करता है कि यदि नरागमा ही रू है ॥१२॥ रहं ते जननी नान मग नानोऽनि पुनर। पविश्य जगद्वानी भद्रप मृन्मपन्विदन ॥ पिता तव महाबाहो प्रमागरपोऽव्ययः । अभ्यतो जाता धाता महात्मा शकरात्मा ॥३४ तेनाहितन्न्द मदगर्भ नुचिर त्व पुरावनः । मप्राप्त समय जान पालितावेह भूभृता ॥६५ इनि तन्य वच धृत्वा हर्षशोकाकुतता। नरक परिवी देवोमिदमाह धनुर्धर ॥६ न माता विदिता पूर्व मानाहमिनि भाससे। विष्ण पितेति च वचो न पिता विदितो मम ॥६५ जानामि पितर चाह विदेहाधिपति नृपम् । तम्य भार्या सुमत्याख्यामह जानामि मातरम् ॥६८ भ्रातरस्तसुता सर्वे मीता मे भगिनी शुभा । मुमतिर्मम मातेति लोपो जानाति सन्ततम् ॥६६ कात्यायनी च धात्री मे याधुनैव कृता त्वया। एतत् सर्व त्वया मिथ्या शशित मम साम्प्रतम् । यथा तत्वाहं तनय सत्यमाख्याहि तन्मम ॥७० पृथ्वी ने कहा है तात ! मैं तेरी जननी हैं। है पुष । मेरे द्वारा आप ज्ञात हो । मैं पृथिवो इस जगत् को धात्री हूँ और मेरा स्वरूप मृत्तिका से परिपूर्ण है । ६३॥ हे महा बाहो । भापके पिता अविनाशी प्रभु नारायण है। ये अच्युत हैं इस जगह के धाता है और महात्मा भूकर की आत्मा अर्थात स्वरूप को धारण करने वाले हैं ।६४. उन्ही के द्वारा आप को मेरे गर्भ में समाहित किया गया था 1 ४२ [ बालिका पुराण मेरे गम मे बहुत समय तक पहले निवास किया था। समय के प्राप्त होने पर ही आपने जन्म ग्रहण किया था और यहाँ पर आप परिपा लन भूभृत् ने ही किया था । ६५ । मावण्डेय महाँप ने कहा- इस उनके वचन का श्रवण करके वह हर्ष और शाप से इस ममय में समा कुल हो गया था । उस धनुर्धारी नरक ने उस पृथिवी देवी से यह कहा था । ६६ । नाक ने कहा-पूर्व म माता का ज्ञान नहीं था और आप कहती है कि म माता है। और पिता विष्णु भगवान है-यह वचन भी कि मरे पिता है मुझे विदित नहीं है । ६७ । मैं तो विदेह के अधिपति को ही अपना पिता जानता हूँ । उनको भाया सुमति नाम वाली को मैं अपनी माता जानता हूँ । ६८ । उमके सब पुन मरे भाई हैं और मेरी शुभा वहिन मीना हैं मेरो माता मुमति है-यही सम्पूर्ण लोक निरन्तर जानता है । ६६ । और कात्यायनी मरी धात्री है जो आप ने अब' ही की है। यह मब कुछ आपने मिथ्या हो रहा है अब मुपे जैसा भी मैं तनय है वह मुझे सत्य बतलाओ ॥७॥ पुषस्य वचन चेति श्रुत्वा सर्वसहा तदा । सव तत् पूववृत्तान्त तनयाय न्यवेदयत् ।।७१ यथा मलिन्या सम्भोगो वराहस्याभवत् पुरा यथा गर्ने धृतो देवैयेन वा कारणेन स ॥७२ यथा च गर्भदुखार्ता माधव शरण गता। यथा तेन प्रदत्तश्च समयो जनक प्रति ॥७३ पिमर्थ समयो दत्तो विष्णुणा प्रभविष्णुना । निहते रावगे वोरे रामेण सुमहात्मना ।।७४ भविष्यति मुतस्ते वं तत्र न सशयो महान । एतान् त्व सशयान् छिन्धि गुरो शास्तासि न सदा ॥७५ भारार्ता रावणादीना पृथिवी मासभोगिनाम् । अधागता योजनानि पचवे द्विजगत्तमा ॥७६ मरकाभिषचन क्थन ] था भोर रह अप वराहवीर्येण जातो गर्भ क्षिते पुन. । असावपि महाराजो दशग्रीवो यथाभवत् ।।७७ माकण्डेय महर्षि ने कहा-यह पुत्र के वचन का यवण करके उस समय में सर्व सदा अर्थात पृथ्वी न वह सभी पूर्व वृत्तान पुत्र को निवेदिन कर दिया था ।७१। पहिले जिस प्रकार से मनिनी के साथ वराह का सम्भोग हुआ था और जैसे देवो के द्वारा गर्भ में धारण किया जिस पारण से धारण पिया गया या १७२। जिस रीति से गर्म दुख में अत्पन्न उत्पीडिन होकर वह भगवान् माधव की शरणा- गति मी थी और जैसे उसने जनक के प्रति समय दिया था-यह सभी बतला दिया था । ७३ । ऋपियो न कहा प्रमु विष्णु भगवान विष्णु नगि लिये समय दिया या वीर रावण के महान् आत्मा वाले श्री राम के द्वारा निहत हो जान पर आपका मुत होगा-वहाँ पर हमको बड़ा ही मशय होता है। अब आप इस गशया का छैदा करने की कृपा से आप को सदा ही हमारे कारन करने वाले गुरु हैं ७॥ १७५१ मायदेव मयि ने कहा---मास का भाग करन वाले रावण आदि ये भार मे पृथ्वी मात हो गयी थी। ह द्विग हो । निश्चय ही यह पांच योजन नीने वीनार चली गयी 1931 फिर यह वराह के वीर्य से शिति के गर्भ म गत आ 4 यह भी महाराज दावीद जैस हुआ था 130 अपो पास्यति गागर्ता मातोव थियो स्विति । समयो दत्तवान विष्णू गवणे निस्ते सति । धराय भारविहतियाजेन द्विजगतमा 15 रखपूर्वकप हष्टया व वचनाच्च जगदगुरो । जानश्रदो महामागे न्यायामि समये तव ॥७६ पुनस्य वचन थत्वा पृथिवी प्रथम तदा। मायामानुपपतन प्रनिग्राद तनपुर ॥८० [ कालिकापुराण यथा कात्यायनीरूप येन रूपेण पालित.। नरक सा तु तद्गृह्य तत्याज पथिवी तनुम् ॥८१ अथ दृप्टैव नरको धात्री कात्यायनी तदा । पप्रच्छ पूर्व वृत्तान्त यवृत्त नपमन्दिरे ।।८२ सा तथा कथयामास यथा सम्प्रति पालितः । यद्वृत्त पूवतो गेहे नपस्य जनकस्य तु ॥८३ जातसम्प्रत्यस्तन नरक. समपद्यत । पृथिवी च पुनदेवीरूप स्व जगृहे तदा ॥८४ यह पृथिवी अतीव भार से पीडित होती हुई नीचे की ओर चली जायगी। रावण के निहत हो जाने पर भगवान विष्णु ने समय दिया था। हे द्विज सत्तमो । भार के विहित के व्याज से ही धरा के लिए ममय दिया गया था । ७ । जगत् के गुरु के बचन से आपके पूर्व रूप का अवलोकन करके हे महाभागे । मुझे श्रद्धा समुत्पन्न हो गई है और अब तुम्हारे समय मे में स्थित रहूँगा । ७६ । पृथ्वी ने उस समय में पुत्र के प्रथम वचन का श्रवण करके उसके आगे ही उस माया से मनुष्य के स्वरूप को ग्रहण कर लिया था । ८०। जैसे का त्यायनी का रूप था जिससे ( स्वरूप स ) पालन किया था। अर्थात् नरक को पाला था। उसने उसका ग्रहण करके पृथ्वी ने अपने तनु का परित्याग कर दिया था । १८१। इसके अनन्तर उस समय मे नरक ने कात्यायनी धात्री बो देखवर उसने पूर्व में होने वाला सब वृत्तान्त पूछा था जो भी कुछ नृप के मन्दिर म घटित हुआ था । २२। उसने उसी भांति से सब पह दिया था जिस प्रकार अब पालित किया था। जो भी पर में पूर्व में घटित हुआ था । ९३। उसमे नरक को पूर्ण विश्वास हो गया था और पृथ्वी ने उग समय मे पुनः अपना देवी का स्वरूप प्रण पर लिया था ॥४॥ नृप जनक के
नरका भिवचन कथन ]
अथ सस्मार पृथिवी जगन्नाथ हरिप्रभुम् ।
समये पूर्वविहिते प्रणस्य शिरसा मुहुः ॥८५
स्मृतमानस्तदा क्षित्या माधवो गरुडध्वजः ।
प्रसन्नो जगता नाथ. प्रत्यक्षत्व गतस्तदा ॥६६
त दृष्ट्वा पृथिवी देवी देव गरुड़वाहनम् ।
नोलोत्पलदलश्याम शंखचक्रगदाधरम् ॥८७
पीताम्बर जगनाथ श्रीवत्सोरस्वामव्ययम् ।
प्रणनाम महाभक्त्या पस्पर्श शिरसा महीम् १८८
परमेश जगन्नाथ जगत्कारणकारण।
प्रसीदेति वचश्चापि तदा प्रोचं जगतप्रसः ।।८६
नरकस्तु हरि दृष्ट्वा निमील्य नयनद्वयम् ।
तत्तेजसा चाभिभूस्तदा भूमावुपाविशत् ।।६०
उपविष्टे तदा देवी तनये नरकाहये ।
प्रसादयामास तदा पुत्राय वरणिना ॥६१
इसके अनन्तर पृथिवी ने जगन्नाथ प्रभु हरि का स्मरण किया
था जो पूर्व विहित समय था । उसन पुन. शिर से प्रणाम दिया था।
1 ८५ । स्मरण करते ही मात्र से उस समय में जो क्षिति के द्वारा
किया गया था गरुडध्वज माधव जा समस्त जगतो के नाथ है परम
प्रसन्न होत हुए प्रत्यक्ष रूप में प्रकट हो गये थे । ६६ । उस पृथ्वी देवी
ने गरुड वाहन देव का अवलोकन किया था। जिनका स्वरूप नील
कमल के दल के यहा श्याम था-शष चक्र और गदा के धारण किये
हुए थे ।१७। पीत उनका वस्न था-श्री वत्स को दक्षः स्थल मे धारे
हुये थे ऐसे जगन्नाथ को महती भक्ति से प्रणाम किया था और शिर से
यही का स्पर्श किया था । ८८ । उस समय जगत् के प्रसव देने वाली ने
यह वचन कहा था- हे परमेश ! आप तो जगत् की रचना करने वाले
कारण के भी कारण है--आप जगत के स्वामी हैं, आप प्रसन्न होदए ।
४६६ [ कानमा पुराण । ८६। नरव न हरि भगवान का दश रखे अपन दाता न य मीनिन कर लिये थे । वह उनने तज से पराभूत हा गया था और उमो समय में वह भूमि पर बैठ गया । ६० । नग्य नाम पाले अपने पुत्र क उपविष्ट हो जाने पर उस समय म वर पणिनी दवा न अपन पुत्र के लिय उनका प्रसन्न क्यिा था ॥१॥ प्रसाद्यमानो धग्या हरिणारायणोऽव्यय । शखाग्रण तदा पुत्र पस्पश नरवावयम् ।।३२ स्पृष्टमात्रोऽथ हरिणा नरकोऽभूत् सुदर्शन । दृष्टयोत्साहवाश्चय वतवान् समपद्यत ।।६३ तत उत्थाय नरको हरि नारायण प्रभुम् । भक्त्या प्रणम्य गोविन्द सष्टाय च मुरुमुहु ॥६४ ननाम पृथिवी वारो जातसम्प्रत्ययस्तदा । प्रणम्य च महाभागा भक्त्या परमया युत ॥६५ प्राज्जलि परतम्नम्पो नोक्त्वा क्चिन व भिया । ततस्तदर्थे पथिवी मावव समयाचत ।। प्रसीद देवदेवेश समय परिपालय। त्वयाह तन या दता मम सर्व जगत्पते । एतदध प्रतिज्ञात यदत्त प्रतिपालय 11८७
नरकाविपचन कयन ।
महा चाता है । ६५ । उस समय में परम विवस होते हुए उस वीर
न पृथ्वी को भी प्रणाम किया था। पर माधिक भक्ति स समन्वित
होरर महा चामा वा प्रभाम दिया था। वह दाना हाथा को
गोड कर मार डा हो गया था और भय रो उसन कुछ भी नहीं कहा
था। इसक यनन्तर पृथिवी न उसी के सिर भगरान माधव स याचना
की थी 1६1 है दवा क भी दावर बार प्रस न होइए और समय
का प्रविपादन कीजिए । ह जगात । आपण हो मुये तनय दिया है
और मुये सब कुछ दिया है यापन इसके लिय प्रतिज्ञा की थी जो भी
भी दिया है अब उसका प्रतिपादन कीजिए ।६७ ।
भवती यत्पुसुत्रायें मामयाचत पुरा ममा।
नत् सर्व तव त दत्त र राज्य दत्त च त्वत्सुते ॥६८
इत्युक्त्वा भगवान् विष्णुरादाय नरकाह्वयम् ।
साई पृथिव्या गगाया ममज्ज नगता प्रभु MEE
निमज्य क्षणमात्रण प्राग्ज्यातिपपर गत ।
मध्यग कामास्पस्य कामाख्या यन नायितरा ||१००
स च देश स्वराज्यार्थे पूर्व गुप्तश्च शम्भुना ।
विरातलिभिरपि च वासित ॥१०१
रुक्मस्तम्भनिभास्तर किरातात् ज्ञानजितान् ।
अनथमुण्डितान् मद्यमासाशनैक्तत्पुरान् ।।१०२
ददर्श विष्णु गुपितान् विष्णु दृप्ट्या द्विजर्षभा ।
तेषामधिपतिस्तर घटको नाम वीर्यवान् ।
रुखमम्तन्मनिमस्तत्र प्रदीप्त इव पावर ॥१०३
सोधाच्चतुरगेन वरोन महता युत ।
आमसाद जगन्नाथ नप च महावलम् ॥१०४
आसाय शरवर्षण ववर्ष प्रभुमव्ययम् ।
किरात सहितो राजा घटकास्य किरातराट् ॥१०५
श्री भगवान् ने कहा-आपने सुपुन ये हान लिय पहिल
मुझस याचना की थी। वह मैंन आपको सब द दिया और
वन
४८ [कालिका पुराण के लिये राज्य भी दे दिया हैं । ६८। यह द्रुतमा कह कर उस नरक नामक को लेकर जगतो के प्रभु पृथिवी के साथ ही गङ्गा मे मज्जित हो गये थे और एक ही क्षण विमजन करके प्राग्ज्योतिष पुर को गमन कर गये थे। जहां पर मध्य में काम रूप की कामाख्या नायिका है । । १००। वह देश भगवान् शम्भु ने पूर्व में गुप्त ही अपने राज्य के लिए रक्खा था । वह स्थल बलवान किरनो के द्वारा तथा कार और अज्ञा के द्वारा वासित था । अर्थात् ऐसे ही लोग वहाँ पर निवास किया करते थे। । १०१ । वहा पर सुवण के स्तम्भो के तुल्य-ज्ञान से रहित-मद्य और मास के अशन करने मे तत्पर---अनर्थ मुण्डित किरालो को जा कुपित हो रहे थ। भगवान् विष्णु ने देखा था हे द्विज हो । भगवान विष्णु को देखकर वहा पर उनका अधिपति बहुत वीय-पराक्रम वाला सुवर्ण के खम्भ क सदृश घटक नाम वाला अग्नि के समान प्रदीप्त था। । १०२ । १०३ । वह क्रोध से बहुत बडी चतुरङ्गिणी सेना से समन्वित हावर भगवान जगन्नाथ और महान् वलवान नरक के समीप में आ गया था । १०४। उमने आगर उन अविनाशी प्रभू के ऊपर वाणो की वधा की थी। वह पटन नाम वाला दिरातो स सयुत किरातो का राजा था ॥१०॥ माधवोपि तदा पर नरव वीर्यवत्तरम् । प्रेसयामास युद्धाय विरातनृपतेस्तदा ।।१०६ नरको धनुरादाय सह तबलवत्तरै । युयुधे मुचिर तत्र शस्त्रास्त्रैर्वहुधेरितं ॥१०७ ततोमा भत्लमादाय योजयित्वा धनगुण । शिर पिरातराजस्य चिच्छेद नरयो चली ॥१०८ मुग्यान, मुख्यान पिराताश्च यहून, सेनाधिपास्तया । जपान युपिता वीर शरीव मतगजान ॥१०६ स्तव्य न पतो येथित पलायनपरायणा । frराता मंचा पनर शरण गता ॥११० निम्त्य युध्यमानास्तु गरक्ष्य शरणं गतान । गय पितर गत्वा प्रणम्याथ न्यवेदयत् ।।१११
मरवाभिचन क्थन ।
हतस्तात किरातानामधिपो घटको गया।
सेनाधिपाय तस्यान्ये किमन्यत् करवाण्यहम् ।।११२
उम मनमर पर भगवान् माधव ने भी अधिक बलवान पुत्र
नरव यो विराता वे राजा स युद्ध करने के लिय भेज दिया । १०६ ।
उम नरम ने धनुप लेवर अधिक वल शाली उगरिरातो के साथ वहुन
अधिक गमय तर बहुधा शस्त्र-अरना के द्वारा युद्ध किया था। १०७ ।
दमये अन तर इमने मासा मेकर धनुप के गुणा गे योजित करवे वल
यान, नरक न वि राता के गजा का शिर का छदन कर दिया था अर्थात्
शिर काट दिया था। १०८ । परमाधिक कुपिन इस बीर ने मलङ्गजा
का सिंह की ही भांति मुख्य २ किराता और सेना के अधियों का
हनन पर दिया या । १०६ । राजा के निहन हो जान पर कुछ किरात
ना वहाँ से भागने ग मय ये और कुछ पुन नरको शरणागति में
प्राप्त हो गये थे ।११० जो युद्ध कर रहे थे उनका विहनन करके और
शरण म आय ए विरीता वा मरक्षण वरखे नरव ने पिता के समीप
म पहुँच कर प्रणाम दिया था और सर निवदन पर दिया था ॥११११
नगर ने कहा-हे तात । मैंने किराता के राजा यो मार गिराया है
जिसका नाम घटव था और उगरे अय जो सेना के अधिप थे उनको भी
मार दिया है। अब में क्या गई।११२।
पिरानान जहि यावत्त्व देवी दिक्करवासिनीम् ।
पलायमानान विद्राव्य पालय परण गतान् ॥११३
तत म नरको वोर समारा सित गजम् ।
चतुदन्त महाकाय विराताधिपवाहनम् ॥११४
ऐरावतसम वीर्य वेगेन गरडोपमम् ।
पिरातान् द्रावयामास यावदिवारवासिनोम् ॥११५
पितर पुनरागत्य वचन चेदमत्रवीत् ।
विद्वाविता किरातास्ते सागरन्त ममाश्रिता ॥११६
हनश्च पटयान्यो हि पिराताधिपतिमहान् ।
। बालिका पुगण 1 वेगिन गजमारुह्य ऐरावतसम गुण । यदन्यत् करणीय मे तदाज्ञापय सम्प्रति ॥११७ करतोया सदा गगा पूर्वभागावधिश्रया। यायल्ललिनकान्तास्ति तावदेव पुर तव ॥११८ अन देवी महाभागा योगनिन्द्रा जगन् प्रसू कामाख्यारूपमास्थाय मदा तिष्ठति शोभना ॥११६ श्री भगवान ने कहा-नुम दिवार वामिनी देवी की ओर भागते हये किरातो को विदानित करके किंगता को छोट दो और जो तुम्हारे शरण मे आये है उनकी रक्षा करा अर्थात् उनका पालन करो । ११३, मार्कण्डेय महपि ने वह इसके अनन्तर वह वीर नरक सफेद हाथी पर समारूढ होकर चला था पो गज चार दौमा पाला--विशाल शरीर मे मम वन और किराता के राजा का वाहन था। वह वत-वीर्य में ऐरावत के समान था और वेग मे गाड के ही महरा था। उस नरक ने किरातो को दिक्कर वासिनी तक भगा दिया था और फिर पिता के पास समासादित होकर यह वचन बोला था। नरक ने कहा- वे सभी विराल विद्राबित कर दिये गये है और वे सागर के अन्त मे जाकर ममाश्रित हो गये है। ११४-११६। जो विरालो का महान अधिपति घटक नाम वाला था उमो मार दिया है मैंने इस ऐरावत के ममान गुणो वाले वेग मे युक्त गज पर समारोहण करके ही यह सब किया है। अब अन्य जो कुछ भी मुझे करना है उसके लिय मुये आप आज्ञा प्रदान कीजिए । ११७ । श्री भगवान ने कहा पूर्व भाग की अवधि तक समा- थय वाली परलोमा गङ्गा सदा वहन करती है वह जब तक ललित कान्ता है वहाँ तक ही आपका पुर है । ११८ । यहाँ पर सम्पूर्ण जगत को प्रमूत करने वाली महा भाग वाली योग निद्रा परम शोभन होकर कामाख्याये स्वरूपम गमास्थित होकर सदा सस्थित रहा मरती है।११६॥ अनास्ति नदराजोऽय लोहित्यो ब्रह्मण सुत । श्रव दशदिक्पाला स्वे स्वे पीठे व्यवस्थिता ॥१२० अग्र स्वयं महादेवो ब्रह्मा चाह व्यवस्थित । चन्द्र मूर्यश्च सतत वमतोष च पनप ॥१२१ ५०२ [ कालिका पुराण द्विजातीन् वासयामास तर वर्णान् सनातनान ॥१२८ वेदाध्ययनदानानि सतत वर्तते यथा । नथा चकार भगवान् मुनिभिर्वासयन, विभु ॥१२६ वेदवादरता सर्वे दानधर्मपरायणा । नचिरादभद्देश कामपाबयस्तदा ॥१३० ततो विदर्भराजस्य पुत्री मायाह्वया हरि । पनार्थे वरयामाम् नरकस्य समा गुणं ॥१३१ तामुद्वाह्य हृषीकेशस्तस्मिन् पुरवरे स्वयम् । तया सम स्वतनय राजत्वेनाम्यपेचयन् ।।१३२ सुगुप्ता च परी चक्रे गिरिदुर्गेण माधव । जलदुर्ग सर्वनो भद्र देवैरपि दुरामदम् ।।१३३ इसके पश्चात् ललित कान्ता के देश का पुन अवधि बनाकर जहाँ तक करतोया नहीं है वहाँ कामाख्या का स्थान है । १२७। उस स्थान में वेदो और शास्त्रो के अतिक्रमण करने वाले वहुत-मे किरातो को हटा कर वहाँ पर सनातन वर्णों वाले द्विजातियो यो निवासित किया था। १२८ । विभु भगवान ने जिस प्रकार से वेदो का अध्ययन और दान निरन्तर होवें उसी प्रकार से मुनियो के साथ निवास कराते हुए विया था । १२६। उम समय मे काम रूप नाम वाला देश शीघ्र ही गेमा हो गया था कि उसम मब लोग वेदो के बाद मे रति रखने वाले और दान तथा धर्म म परायण गये थे । १३० । इसके उपरान्त भगवान हरि न विदर्भ देश के राजा को माया नाम वाली पुत्री को पुत्र के लिय वरण किया था जा गुण गणा से नरक के ही समान थी। । १३१। उसके माथ उद्वाह पर भगवान हृषीकेश स्वय उस थेठ पुर मे उसी के साथ अपन पुत्र को राजा व स्वरूप से अभिषिक्त किया था। १३२ । माधव गिरि व दुर्ग म पुरी को परम गुप्त पर दिया था। जल का दुर्ग सयमे थे और भला था जो देवो के द्वारा भी दुरासद अपात दुष्प्राज्य था ।।१३३॥ गत किरातराजस्य चतुर्दन्ता सुन्तिन । पर्यायतिमाया महामार्थयुता ॥१३४