Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner

Mushtafa Kamal Pasha

Pt. Kartikay Charan · 2011/01

PDF Proofread

Front matter

No text on this page.

मुस्तफा कमाल पाशा
نماي شمللی کمال پاشا
लेखक-प० कार्तिकेयचरण मुलोमा
ran Prest, Calcutta

No text on this page.

कमालपाशा महावीर गाजी मुस्तफा कमाल पाशाका सचिन जीवन चरित्र । लेखक पं० कार्तिकेयचरण मुखोपाध्याय । प्रकाशक रामलाल वर्मा, प्रोप्राइटर- "यर्मन प्रेस" और "आर० एल० वर्मन एण्ड को०," ३७, अपर चीतपुर रोड, कलकता। . भगा गुस्स डात >मार्गशीर्ष, सं० १६७६ वि०८- प्रथम सस्मरमा २०२० प्रनि ] [ मूल्य १), रशमी चिल्द ।।) ,

मुद्रक
লাল নী
धर्भन प्रेस,
कलकाता

SAD वर्तमान युग स्वाधीन साधनाका युग है। इसमें ससारके सारे परd सन्त्रदेश अपनी-अपनी मोह-निद्राको भङ्गकर, सदियोंसे पडी गुलामीको दिया तोडकर, युद्धको भेरी बजाते हुए, अपने उन शसुभोंसे लड रह रहे हैं, जिन्होंने उनको सार स्वरूपिणी स्वतन्त्रता अपहरण करने का पाप किया है। स्वाधीनता या स्वतन्त्रता जीव, जाति और देशका ममस्थल हैं। इस पर हाय दिया, कि प्रलय उपस्थित होभायेगा। थाप किसी आदमीकी हत्या कर पालिये , पर उसे परतन्त्र भूलकर भी न बनाइये । यदि बनायेंगे, तो वह जिस दिन भी अपने स्वरूपको समझेगा, जिस दिन भी अपने अधि- कारोंको पहचानेगा,उसो दिन प्रापका प्राण शत्रु हो उठेगा। आप उसे हरचन्द दवायेंगे, पर वह किसी तरह भी न दवेगा। यदि धाप उसमे अधिक शक्तिमान हैं और इसलिये उसे प्रायदण्ड देंगे, तो वह मरकर भी आपको मार देगा। क्योंकि आपने उसे परतन्त्र बनाकर उसीसे शमुता नहों को, वरन् सबको समान अधिकार प्रदान करनेवाले प्रकृति और पर मात्मासे भी शस्ता की है। जो रामगण स्वार्थ मदसे मत्त होकर क्सिी जाति या देशके भोग्य अधिकारोंको स्वय गपक वठते हैं, उसकी स्वाधीनतासे स्वय लाभ उठाते हैं, एक दिन उस जाति द्वाराहो का नामोनिशान मेट दिया जाता है। उस दिन यूरोपमें रणभेरी बजो थी। विश्व विजय की उचाकाक्षाको छासोमें छिपाये जमन सम्राट ने अखिल परोपसे युद्ध ठान दिया था। जिन राष्ट्रोंको उसकी शक्ति-सामर्थपर अचल विश्वास था, व भी अपने हिते- पियाँके हित वाक्योंकी अवहेलनार उसके साथी हो लिये थे। कि तु पाशा उल्टा पड़ा । जो जाति समारके मुंहसे कामिल जादूगर सायिन हो पकी थो, उसने अपमो चालोंसे जमनीको पहाड दिया। साथ ही साथ उसके साथी भो पराजित माने गये। अप प्रामो पराजितोसे क्षति-ग्रहणकी बारी। किन्तु विजेताओंने न्याय S । T नकारा पोटते हुए भी,ति लेते समय यन्यायकीही पराकाष्ठा कर दी। करने गये थे क्षति पूत्ति,पर कर बैठे अपने स्वार्थकी उदर-दरीकी पूर्ति । पराजितोंमें मुसल्मान जगत्का धर्म गुरु तुर्कीगा। विजेतामोंने ससे अपनो क्षतिपूर्ति करते समय,इसका सारा साम्राज्यही गपक लिया। क-सन्नाट सरल थे, इसलिये फूट नीतिफे पुतले मित्र राष्ट्रोंकी चालोंको नरा न्याय समझकर उन्होंने उस नुक्सान-नामेपर स्वीकृति दे दी। किन्तु -नका यह काम तमाम तुर्को को अनुचित जान पडा, अतएव ये उस स्वीकृति का विरोध करने लगे। विजेतामोंने इस विरोधको विपदृष्टिसे देखा। कन्तु करही क्या सकते थे? साहस और शक्ति पहलेसे लालेही पढे हुए ने। यासिर जादूसे काम लिया गया। धन-बल होम य नानको ईम-पट्टी कर तुर्कीसे भिड़ा दिया गया। तुर्कों में बहुत दिन पहलेसेही एक युगावतारिक पुरप राजतन्त्रमें दोष देख,प्रजातन्त्र स्थापन या शासन-सुधारके लिये क्रान्ति करनेका उपक्रम कर रहा था। इस पुरुपका नाम था "गाजी मुस्तफा कमाल पाशा!" कमाल पाशाने पहलेसेही प्रभुत शक्तिका सन्चय कर रखा था,प्रतएव उन्होंने अपनी जाति और अपने देशका गौरव बनाये रखनेके लिये, आत्म त्यागका समय उपस्थित देस, शलुओंका बड़ी वोरताके साथ सामना किया। शत्रु न टिके और अधिकृत देशोंको छोड़ प्राण-लेकर भाग गये। कमालको करामातसे तुर्की तुर्कियोकाहो रह गया। यदि अाज तुर्क-त्राता गाजी मुस्तफा कमाल पाशातुर्की न रहे होते,तो सुर्क-साम्राज्यके संसारसे नेश्तनाबूद होनेमें बाकीही क्या रहा था ? उन्होंने जिस अद्भुत कौशल द्वारा अपने देश और अपनी जातिका गौरव बनाये रखा, यह ससारके समस्त परवन्न देशोंको स्वतन्त्र वननेका सुन्दर सपक है । ऐसे महावीरकी महिमामयी जोवन-कथा लिसकर, स्नेहाम्पद पण्डित कार्तिकेयचरण मुखोपाध्यायने हिन्दी जगतका महान् उपकार किया है। यगाली होकर भी हिन्दीके लिये उनका यह प्रयत्म वास्तवम प्रशसनीय है। हमने इस पुस्तकको सायन्त पढा है और पढ़कर हम यह कहे मिना नहोरह सकते,कि कमालको कथा लिखकर कार्तिक यायने अपनो कलमको हसायहो नहीं किया, परन् साहित्यमें एक सुन्दर सामग्री उपस्थित को है। कजकता, २५-२२-२२ नरोत्तम व्यास।

निवेदन - . - हम স্থল जसे कई घर्षपहले गाजो मुस्तफा कमाल पाशाका नाम गर भारतवासियोंको विदित नहीं था और न टर्कीके लोगही यह बात जानते थे, कि इस सामान्य सैनिक अधिकारीमें, इस मामूली तुर्फ युवकमें, पतनोन्मुख तुर्क-जातिको दासत्वकी गहरी गारमें गिरनेसे एकाएक यचालेनेको शक्ति भरी हुई है। परन्तु जर, समय आया,-परीक्षाका अवसर उपस्थित हुआ, तब उसी सामान्य मनुष्यने दुनियाको दिखा दिया,कि स्वतन्त्रता- प्रिय वीर तुर्क जाति अब भी सर्वथा निर्धार नहीं हुई है- आज भी उसके अस्ताचल गमनोन्मुख भाग्याशुमालीको अपने पराक्रमसे पुनरावर्तित करनेवाला वीर विद्यमान है। प्रस्तु इस वीर तुर्क युवकको जीवन विषयक बातें जानने के लिये भारतवासियोंके मनमें इच्छा उत्पन्न होना विस्कुल स्वाभाविक है। अत अपने देशवासियोंकी इसी इच्छाको पूर्तिके लिये हमने यह छोटीसी पुस्तक लिखनेका प्रयास किया है। इस काममें हमें लाहौरसे निकलनेवाले दैनिक 'आफताध' के विद्वान् सम्पादक मौलवी वजाहत हुसैन साहवको उर्दू में लिखी “मुस्तफा कमाल पागा"को जीवनीसे तथा हाफिज अब्दुस्समद साहव 'बनारसो से बडी सहायता मिली है, जिसके लिये हम उन्हें हृदयसे धन्यवाद देते हैं। साथही सुप्रसिद्ध देनिक पत्र "भारत- 4 .

No text on this page.

मस्तका
कमालपाशा
NA
WM
इरल्लाम-साम्राज्यकी स्थापना
-
- प्रारम्भिक इतिवृत्त -
इस्लाम या मुहम्मदी धर्मके संस्थापक पैगम्बर मुहम्मद
साहबके पूर्व, एशिया महाद्वीपके दक्षिण पश्चिम भाग,
अर्थात् वर्तमान अरव, ईरान,
टकी, फारस,
सीरिया, अमें
निया, अफगानिस्तान आदि देशोंका समाज शरीर सुसङ्गठित
और सुश्पृट्वलित न था। इनके शासनका कोई सुव्यवस्थित या
निश्चित स्वरूप नहीं था। इन देशोंके आदिम निवासी समावत'
बढे बलशाली होते थे। लोग दल घाँध-यांधकर घूमा करते थे।
एक सानपर स्थायी रूपसे जमकर रहना पसन्द नहीं करते थे।
ऊँटों, घोडों और सागर अपना माल असपाप लादकर और
I

मुस्तफा कमाल पाशा अपने बाल-बच्चोंको साथ लेकर, अधिकतर लोग देश-विदेशोंमें भ्रमण किया करते थे। वे जहाँ जाते, वहीं तम्बू-खेमे खड़े करके कुछ दिनोंके लिये ठहर जाते। उस प्राचीन समयका इतिहास दुर्लभही नहीं, अप्राप्य भी है। संसारके सभी देशवासियोंका प्रारम्भिक इतिहास इसी प्रकार दुर्लभ है और सभी जातियोंको प्रारम्भिक दशा प्रायः ऐसीही रही है। चीन और यूनान आदि देशोंके कुछ भ्रमण शील इतिहास-लेखकों तथा मुसल्मान-धर्मकी स्थापना-कालके वृत्ता- तोंसे उस प्राचीन समयकी परिस्थितिका थोडा-बहुत हाल जाना जाता है। उनके धर्मके विषयमें भी यद्यपि विशेष कुछ हाल नहीं मालूम होता, तथापि मुसलमान-धर्मकी खापनाके कारणोंसे ही यह बात स्पष्ट रूपसे जानी जाती है, कि वहाँ मूर्ति-पूजा, किमी-न-किसी रूपमें, अवश्य प्रचलित थी। सम्भव है, हिन्दू धौद्ध, जैन आदि भारतवर्षीय धर्म-सम्प्रदायोंके प्रचार और प्रावल्यके कारणही इन देशोंमें मूर्ति-पूजाकी प्रथा प्रचलित हो गयी हो। क्रमश जन-संख्याकी वृद्धि, सभ्यताका विकास आदि स्वाभा- विक तथा प्राकृतिक कारणोंसे लोग निश्चित रूपसे एक-एक स्थानपर बसने लगे। कभी-कभी जीवन निर्वाहके लिये मावश्यक वस्तुओंका संग्रह करने, व्यवसाय करने अथवा ऐसेही कामोंके लिये वहाँके लोग दल वाघ-बांधकर निकलते थे। परन्तु अब घूमते-फिरते रहनेपर भी वे अपघा एक निश्चित और स्थायी, , Pur ram मुस्तफा कमार पाशाजा) आवास स्थान बना चुके थे। क्रमश बसनेवाले लोगोंमें मुखिया या सरदार होने लगे। ऐसे मुखिया या सरदार अपने दलवा. लोंमें सर्वापेक्षा अधिक शक्ति सम्पन्न और प्रभावशाली होते थे। प्रत्येक दलवाले अपने मुखियाकी बात मानते और उनके कहे अनुसार काम करते थे। ज्यों ज्यों इन दलोंका परस्पर मेल होता गया, त्यो-त्यों इनका आकार और पल भी बढ़ता गया। अन्तमें येही मुखिया राजा और शासकके रूपमें आ गये। बहुतसे दलोंके एकत्र मिल जानेसे समाज-संगठन तथा राज्योंकी स्थापना होने लगी और धर्म भाव भी बलवान रूप धारण करने लगा। 99 इस्लाम-धर्मकी स्थापना - लोगोंमें तात्कालिक धर्मभाव (बुत परस्ती)की उत्तेजना संव- र्द्धित होने के कारणही पैगम्बर मुहम्मद साहबको, इस्लाम धर्मकी स्थापना और प्रचार में, बडी बडी कठिनाइयों और विघ्न बाधा- ओंका सामना करना पडा , परन्तु उसकी स्थापना हो चुकनेपर, कुछही दिनोंके अन्दर, अरव निवासियोंके जातीय चरित्र, चाल- ढाल, रीति-नीति, आचार-व्यवहार आदिमें बहुत परिवर्तन हो गया। साथही उनमें नव स्थापित इस्लाम धर्मका विशेष रूपसे समावेश हुआ। इसके पहले अरब, ईरान आदि देशोक निवासियोंका कोई जातीय धर्म नहीं था। पैगम्बर मुहम्मद साहयनेहो उन्हें एक धर्म सूत्रमें बांधा। अपने अनुयायियों को उन्होंने राजनीति और धर्म-नीतिकी एक मजबूत डोरीसे घाँध.

en कमुस्तफा कमाल पाशा कर एकत्र किया। उन्होंने अपनी इस एकीकरण प्रणालीको किसी स्थान-विशेष या देश विशेपमें सीमावद्ध करके नहीं रखा था। उन्होंने उसे संकुचित रूप न देकर वडाही व्यापक रूप दिया था। इस धर्मकी स्थापनाके साथही अरव-वासियोंकी सामा- जिक, राजनीतिक और नैतिक अवस्था बहुत उन्नत होने लगी। अरब वासियोंके पूर्वजोंकी जो दल-चन्दियो थों, उनमें जो भेद- भाव था, जो मत-मतान्तरके झगडे थे और जो विद्वेष-वैमनस्य चलता था, उसे मुहम्मद साहवने केवल दूरही नहीं कर दिया, बल्कि उनके स्थानपर एक राष्ट्रीय धार्मिक भाव स्थापितकर,वहाँके भिन्न-भिन्न समाजों, सम्प्रदायों और जातियोंकी समस्त शक्ति- योंको एक नवीन स्रोतमें बहा दिया । केवल अरववालोंकोही नहीं, आस पासके उन अन्य देशवासियोंको भी, जिन लोगोंने इस्लाम धर्मको कवूल किया, मुहम्मद साहबने समानताकी दृष्टिसे देखा और समानताके समस्त अधिकार दिये। समस्त इस्लाम धर्मावलम्वियोंमें मुहम्मद साहबने जिस ऐक्य- सूत्रके बलसे एकता उत्पन्न की, वह आज भी हम कुरान शरीफमें देख सकते हैं, " إنما المؤمنون إح. وة واصلحوا لیں آحو يكم » अर्थात्- इस्लाम धर्मपर विश्वास रखनेवाले सभी श्रेणोके मनुष्य परस्पर भाई-भाई हैं, इसलिये हे धर्मनिष्ठ! तुम ऐसी चेष्टा करो, कि तुम्हारे अन्दर फूटका धीज किसी प्रकार घसने न पाये।"

मुस्तफा कसाल पाशा
“मनुष्यके नैतिक चरित्रको अध पातसे यचाने और उसे
सदेव गुढ बनाये रखनेके लिये उनका कहना था,
"
"إن اکرمکم عند الله أتقاكم
अर्थात्-"ईश्वरकी इष्टिमें, तुम लोगोमें, वही सर्वाधिक प्रिय
और श्रेष्ठ है, जो ईश्वरसे सर्वापेक्षा अधिक डरता है।"
जातिगत विद्वेष भावको मिटानेके लिये, जातीय अहंकार
को चूर्ण विचूर्ण करनेके लिये तथा उच्च वंशमैं उत्पन्न होनेका
मद मानव हृदयपरसे धो डालनेके लिये उन्होंने कैसा उत्तम उपाय
स्थिर किया था और मानव हृदयकी फुण्ठा तथा संकोचको
निकालकर उसे विशाल और उन्नत बनाने के लिये उन्होंने मनुष्यके
सम्मुख कैसा उच्च आदर्श स्थापित किया था, इसका पता उनके
इस वापसे अच्छी तरह लग सकता है
لاقل عرفي على عمي ولا لعجمي على عربي إدعم أبناء آدم
अर्थात्-“हे मनुष्यो । ईश्वरने तुम्हारी सारी ऐंठ छीन ली है।
तुम्हारे उच्च चंशोद्भव होनेका सारा गर्व और मद हरण कर लिया
है। तुम सभी आदमको सन्तान हो और आदम स्वयं पृथ्वीकी
सन्तान थे। कोई भी अरव निवासी, यदि वह धर्म-भीर नहीं
हो, तो उसे बाहरवालोंसे अपनेको किसी अशमें भी श्रेष्ठ सम.
भनेका कुछ भी अधिकार नहीं है।"
हिन्दू शास्त्रकारोंके मतानुसार जैसे मनुसे मनुष्यको दृष्टि मानी
जाती है, उसी प्रकार इस्लाम धर्मानुसार भादमसे भादमीको परि
मानी जाती है।

मुस्तफा कमाल पासा मुसल्मान धर्ममें-मुसल्मान जातिमें एक बड़ी विशेषता है। वह यह कि जातिका जो व्यकि धर्म-गुरु होता है, वही उस जाति या समाजका शासक और राजा भी हुआ करता है। प्राचीन भारतवासियोंमें धर्माधिपतिका दर्जा शासनाधि. पतिकी अपेक्षा मी ऊँचा माना गया था। स्वयं राजा लोग भी उनकी पाद-पूजा करते थे। परन्तु मुसल्मान- -धर्मकी स्थापनाके समयसेही उसका धर्ग-गुरु और शासक एकही व्यक्ति हुआ करता है। इसका कारण यह है, कि मुसल्मान-धर्म का प्रचार करनेकेसाथ ही-साथ पैगम्बर मुहम्मद साहबने मदीनेमें एक सम्पूर्ण खतन्त्र राजनीतिक सम्प्रदायके कर्णधारका भार अपने ऊपर ले लिया था। तभीसे इस्लाम-धर्म एक राजनीतिक सम्प्रदायका धर्म समझा जाने लगा। धर्माधिपति जव किसीको इस्लाम-धमेकी दीक्षा देते थे, तब वे शासकको हैसियतसे उसे समाजकी शान्ति और सुन्यवस्था स्थापित रखनेका उपदेशभी दिया करते थे । जो लोग मुसल्मान धर्मका अवलम्बनकर चुके थे, उनका कहना था, कि “ईश्वरके दूत यानी पैगम्बर और अन्यान्य धर्माधिकरणोंकी आशाका पालन प्रत्येक मुसल्मानको सशे दिलसे करना चाहिये।" खलीफाकी आवश्यकता gora इस तरह देखा जाता है, कि अरब देशके आदि निवासियों जैसे असभ्य, विश्वलित और धर्म शान शून्य भी मुहम्मद साहयने कुछही वर्षों के अन्दर धा।

- मुस्तफा कमाल पाशा उत्पन्न कर, उनके समाजका स्वरूप ऐसा सुन्टहलित बना दिया, कि जिसकी आशा भी नहीं की जा सकती थी। समाज संगठन होचुकनेके बाद उनके तमाम अनुयायी उनके उपदेशोंको 'पुदा तालाका हुक्म' या 'ईश्वरदत्त आदेश' समझने लगे। कुछ कालके अनन्तर स्वाभाविक रोतिसे इस यातकी आवश्यकता हुई, कि उनके प्रत्येक काममें सहायता करनेके लिये एक सहकारी नियुक्त किया जाये। निश्चित हुआ, कि जो आदमी इस पदपर नियुक्त किया जाये, यह समाजके लोगोंके न्याय-अन्यायका विचार करे, सर्व साधारणके लिये ईश्वरा- राधनामें मुखिया या प्रधानका कार्य करे और इस्लाम-धर्मकी रक्षाके लिये उसके विरोधियोंसे संग्राम करे। मुहम्मद साहयके जीवन-कालमें स्वयं मुहम्मद साहवको आशासेही सर काम-काज होते थे, पर उनकी मृत्युके बादसे उनके स्थानपर रहकर उनके प्रतिनिधि स्वरूप कार्य-संचालन करनेवाले खलीफा कहलाने लगे। पैगम्बर साहवकी मृत्युके पश्चात् ऐसे योग्य व्यक्तिके चुनाव- का प्रश्न उठा, जो जनताको धार्मिक, सामाजिक और राजनीतिक मागाँका प्रदर्शन करा सकता हो। इस प्रकारका प्रश्न मुहम्मद साहयके मनमें कमो उठा नहीं होगा, यह नहीं कहा जा सकता, बल्कि इसका प्रमाण पाया जाता है, कि उन्होंने जान घूझकर इस प्रश्नको इस्लाम धर्मावलम्बियोंके विचाराधीन छोड दिया था। मुसल्मान जगत्में यह किंवदन्ती बहुत दिनोंसे प्रचलित .

En गाजी मुस्तफा कमाल पाशा है, कि तुफैलका पुत्र अमीर एक बार मुहम्मद साहबके पास गया और उसने उनसे पूछा,-"जनाव! अगर मैं मुसल्मान. धर्मका अवलम्बन करूँ, तो आप मुझे किस कोटिमें स्थान देंगे? क्या आप अपने पश्चात् इस धर्म-सम्प्रदायका शासनाधिकार मुझे प्रदान कर सकते हैं ?" मुहम्मद साहबने अमीरके इस प्रश्नके उत्तरमें कहा था, "यह कुछ मेरी व्यक्तिगत सम्पत्ति तो है नहीं, कि मैं इसे उठाऊँ और आपके हाथोंमें दे दूं।" इस वाक्यसे उनके हृदयको महत्ताका पूर्ण परिचय मिलता है। ८ जून सन् ६३२ ई०को पैगम्बर मुहम्मद साहब इन्तकाल कर गये। उनकी मृत्युके पश्चात् उनके इष्ट-मित्रोंने किसी व्यक्तिको उन- के उत्तराधिकारीके पदपर अभिपिक्त करनेके लिये एक सभा की। इस सभा सर्व सम्मतिसे मुहम्मद साहबके अत्यन्त विश्वासपात्र हजरत आबू बकर सिहीक उनके उत्तराधिकारी निर्वाचित हुए। यह मुसल्मानी सल्तनत, जो मदीनेमें कायम हुई, किस तरह तुकोंके हाथोंमें आयो, इसका कमसे कम संक्षिप्त विवरण जाने पिना, पुस्तकके मुख्य विषयकी ओर अग्रसर होनेसे, सब बातें स्पष्ट समझमें नहीं आ सकी। इसलिये यहाँ इस्लामी सल्तनतके इति. हासको कैचल बहिरेखाका दिग्दर्शन मात्र करादेना उचित और आवश्यक जान पड़ता है। . - O चार ऐतिहासिक कालांश- प्रथम कालांश- सन् १३२ से मुसल्मान इतिहास-लेखकोंने मुहम्मद साहबके सन् ६६१ तक पश्चात्की ऐतिहासिक घटनाओंको, चार कालाशोंमें विभक्त किया है। इनमें पहला कालाश सन् ६३२ ई० से आराम्भ होकर सन् ६६१ ई० में समाप्त होता है। इस कालाश- में जो व्यक्ति खलीफा होता, वही धर्मगुरु और राजा या शासक- का काम भी करता था। इन तीस वर्षों में पैगम्बर मुहम्मद साहबके पश्चात् चार खलीफा हुए-(१) आबू पफर सिद्दीक (२) उमर विन सत्ताय (३) उस्मान् विन अप्फान और (४) अली पिन अवी तालि। ये लोग सुलफा-ए-राशदीन कहलाते थे। इस्लामके इतिहासमे यह समय सर्वाधिक पवित्र और सर्वोच आदर्शतक पहुँचा हुआ था। परन्तु यह परिस्थिति बहुत दिनोंतक स्थायो रूपसे रह न सकी। इस अवधिमें जितने खलीफा हुए, वे प्रत्येक धार्मिक प्रथा और धार्मिक क्रियाका यथारीति पालन करते रहे। घेदीना- दपिदीन प्रजाजनके समान जिन्दगी बसर करते थे।। विला. सिता और भोगेच्छा उनके पास फटकनेतक न पाती थी। . ग

मुस्तफा कमाल माशा
अमीर-उमरा और अबिस्तानके घाहरवाले जव कमी खलीफाको
देखने आते, तो घेसलीफा और सर्वसाधारणको वेश-भूषामें
कोई अन्तर न देखकर बढे अचम्मे में पड़ जाते थे। इतिहास.
लेसकोंका कहना है, कि ये शहरके बाहर, एक एकान्त स्थानमें
मोपदेके अन्दर रहते, जमीनपर केवल साधारणसी चटाई पिछा
कर सोते-बैठते और मामूली कपडे पहनते-ओढते थे। उनकी यह
सादगी और फकीराना चाल-ढाल अपतक मुसलमान जगत्का
आदर्श समझी जाती है। आज भी मुसल्मान-ससार अपने उन
त्यागकी प्रतिमूर्ति-स्वरूप धर्माचार्योको शत-मुखले प्रशंसा
करता और आंसू बहाता है।
298 द्वितीय कालांश
इस्लाम राज्यकी यह परिस्थिति मदोनेके अन्तिम
मन् १०५८ तक सलीफा अली साहबके समयतक हो रही।
उनके यादही अर्थात् सन् ६६१ ई० सेही अवस्था यहुत कुछ बदलने
अर इस्लाम सत्ताका दूमरा कालाश पारम्भ हुआ।
सन् १२५८ के अन्ततक इस कालाशकी अवधि मानी गयी
। इस अवधिमें इस्लाम जगत्को पथ-प्रदर्शन करनेका भार
मनिस्तानके एकाधिपत्य शासकके हाथों में आ गया। खलीफाका
पद पर वशगत अधिकारीको मिलने लगा खलीफा पहले
जिस प्रकार न्याय-अन्यायके विचारक और परम स्वार्थ त्यागी
फकीर होते थे, अय वह बात न रही। इस वशके पहले खलीफा
सन् ६६१ से
लगी।

मुस्तफा कमाल पाशा मोआवियाह यिन-अवी सुफियान ये*। सबसे पहले इन्होंनेही अपने जीवन कालमें अपना उत्तराधिकार खलीफाका पद अपने पुत्र मजीद बिन मोमानियाको प्रदानकर खलीफा निर्वाचनकी प्रथाको सदाके लिये तोड दिया । इस समयके खलीफोंमें प्राचीन खलीफा उमरको तरह सादगी और अलीकी तरह दयालुताका भाव न रहा। अव विदेशी मुसल्मानोंको समानताका अधिकार देना बन्द कर दिया गया। यद्यपि इस्लाम-धर्मके सिद्धान्तोंमें यह वात मौजूद थी, कि कोई व्यक्ति, चाहे वह किसी देशका निवासी क्यों न हो,यदि उसने मुसल्मानी धर्म कुबूल कर लिया है, तो उसे भी वे सब अधिकार मिलने चाहियें,जो अरव निवासियोंको प्राप्त होते हो। प्रत्येक देश, जानि और राष्ट्रकी उन्नतिको एक सीमा होती है। उस सीमातक पहुंचकर उसका पतनोन्मुख होना प्रकृतिका एक अटल नियम है । इतिहास इसका ज्वलन्त प्रमाण है । अर- योकी उन्नति भी जर चरम सीमातक पहुँच गयी, तर वे भी धर्म विगहित काय करने लगे और लक्ष्य भ्रष्ट पथिकको तरह अग्र सर होने लगे। कहते है, "प्रभुता पाई काहि मद नाही"। अर- विस्तानमें जिस विश्व-व्यापक अद्वैत वादके प्रचारके लिये, मनुष्य जातिको समानताके अधिकार देनेके लिये, भ्रातृ-भावके विस्तारके लिये और शासनमें प्रजाको अधिकार देनेके लिये 9 यह खानदान मन् उमंया कहलाता है, इस सानदाम १४ शासक हुए। भन्तिम सप्तीफाका शासन सन् ७४४० तक रहा। - मुस्तफा कमाल पाशा इस्लाम-सल्तनतकायम हुई थी, अरव-निवासियोंने अब अपने उस उच्च आदर्शको भुला दिया। वे इस राज्यको अपनी निजी सम्पत्ति समझने लगे। सुतरां जिस उच्च आदर्शको अपना लक्ष्य बनाकर अरव-निवासियोन इतना वडा साम्राज्य स्थापित किया था और वे इतने शक्ति-सम्पन्न हुए ये, अन्तमें उसी लक्ष्यसे भ्रष्ट होना उनके नाराका कारण बन गया। इसी दूसरे कालाशमें, अरविस्तानके बनू उमेया राजवंशके ध्वंस होनेके याद, फारस देशवालोंकी सहायतासे, अब्वासिया खानदानके एक योग्य व्यक्ति खलीफा बनाये गये। इस खानदानके पहले खलीफा अबुल अब्बास सफ्फाह हुए। उन्होंने सन् ७४६ ई० में शासन-भार अपने हाथमें लिया। इससानदानके ३५ खुलफा गद्दीपर बैठे। इस खानदान वालोंने इस बातका सदा खयाल रखा, कि यह राज-सिंहासन उन्हें फारसवालोंकी सहायतासे मिला है। इसलिये ये फारस देशवालोंको अपने शासनमें ऊँचे-ऊँचे पद दिया करते थे। यद्यपि इस अभ्यासिया खानदान घालोंमें बहुतसे दोष मौजूद थे, तथापि इसमें बहुतसे सद्गुण भी विद्यमान थे। इस वंशके अधिकतर खलीफा उदार हृदयके हुए । इनके शासनमें मुसल्मान-साम्राज्य फिर एक बार उन्नतिके शिखरपर पहुंच गया। इतिहास-लेपकोंका कहना है, कि इनके समयमें मुसल्मान संसारमें भौतिक विज्ञानकी घडी उन्नति हुई थी। नाना प्रकारके बैज्ञानिक यन्त्रादिका आविष्कार हुआ था। म्यापार-वाणिज्य भी बहुत उन्नत अवस्थातक जा पहुंचा था।

मुस्तफा कमाल पाशा SAGE दीन दुखियोंकी सहायताके लिये जगह-जगह दातव्य औषधालय, विद्यालय और अन्न-सत्र आदि यनाये गये थे। स्वतन्त्र रियेकके मनुष्योंका इन खलीफोंके यहाँ यथेष्ट आदर-सरकार होता था। मानवी शक्तियोंके विकासके लिये खलीफाकी मोरसे यथेष्ट सहायता दी जाती थी। सोमान्त प्रदेशोंमें शत्रुओंको घुसने न देने के लिये फडी किलेयन्दी रहती थी। अगर कभी कोई शत्रु सीमाके अन्दर प्रवेश करनेका साहस भी करता, तो उसका घडी दृढताके साथ सामना किया जाता था और आक्रमणकारियोंको उनके वल तथा सुमगठिन सैन्य दलसे हार खानी पडतो धी। मुसल्मान जगत्ने इस समय केवल राजनीति विज्ञानमेंही उन्नति नहीं की थी, यह अध्यात्म-विद्या, गणितशास्त्र, चिकित्सा- शाल आदिमें भी आगे बढा हुआ था। इस समय प्राय सारा यूरोप अज्ञानान्धकारसे ढंका हुआ था। इस वशके अन्तिम खलीफाका नाम 'अल मुस्तासम विल्लाह' था और इस वंशके हाथोंमें सन् १२६० के मध्यतक शासनाधिकार रहा। परन्तु सन १२४३ से १२६०ई० तक इनका शासनाधिकार किसी सुव्यवस्थित रूपमें न था। वास्तव में इस समय इस्लाम- साम्राज्यका प्राय सम्पूर्ण शासनाधिकार मिश्रके मामलुक सुल्तानों तथा मिश्र देशके कई अन्य राज-शोंके हाथों में भा गया था । । मन्बामिया खानदानके खलीफोंने अपनी राजधानी 'वागदाद' नामक स्थानमें घनायी थी। आजकल यागदादको 'धगदाद' कहते .

. गाजी मुस्तफा कसाल पाशा है। परन्तु वास्तवमें इसका नाम 'यागदाद' अर्थात् 'न्यायकी वाटिका' था। सन् १२५८ ई० में हलाकू- नामक एक तुर्क सरदारने दल-बल सहित वागदादपर आक्रमण किया। इसने कई दिनोंतक यागदादमें कत्लेआम जारी रखा, तमाम शहरको तहस-नहस कर डाला। बडी-बडी इमारतोंमें आग लगा दी। अन्तमें लूट-मार करके जो कुछ हाथ लगा, उसे लेकर वह फिर अपने घर लौट गया। इतिहास-लेखकोंका कहना है, कि इस भीषण आघातके कारण इस्लाम जगत्की जड हिल गयी। कुछ इतिहास- लेपकोंका कहना है, कि हलाकूके इस आक्रमणसे इस्लाम साम्राज्य की जो भयङ्कर क्षति हुई, वह आज भी पूरी नहीं हो सकी है। भारतका धन वैभव देखकर जिस प्रकार पठानों, मुगुलों,, तातारों और तुर्कोने बार-बार आक्रमण किया और वे भारतको शान्तिकोभन करके, राजधानियों और तीर्थ-स्थानोंपर आक्रमण करके, जो कुछ हाथ लगा, उसे लेकर फिर अपने घर लौट गये थे, उसी प्रकार इस्लाम साम्राज्यका धन-वैभव भी विदेशियों और विजातियोंको आंखोंमें गडने लगा था और कितनीही धार अपने लोभको संवरण नकर सकनेके कारण उन्होंने मुसल्मान-साम्राज्य पर आक्रमण भी किया था,पर उनके आक्रमणोंसे मुसलमान जगत् का विशेष कुछ नुकसान नहीं हुआ था; परन्तु अन्तमें हलाकूके इस आक्रमणसे—जिसका जिक्र ऊपर किया जा चुका है- मुसल्मान साम्राज्यका मेरुदण्ड टूटसा गया। वह इस भयङ्कर आपातको सह न सका। - * । - ।

मुस्तफा कमाल पाशा 8 तृतीय कालांश सन् १२६१ से इसके बाद इस्लाम साम्राज्यके इतिहासका तीसरा सन् १५१७ तक कालाश प्रारम्भ होता है। इसकी अवधि तीन सौ वर्षोंकी अर्थात् सन् १२६१ ई० से लेकर सन् १५१७ ई० तक मानी जाती है। इस कालाशके प्रारम्भमें खलीफोंके हाथमें शासनाधिकार केवल नाम मात्रका रह गया था। यद्यपि उस वंशका सर्वथा नाश नहीं हुआ था और न वे मुसल्मान जगत्- के आदर्श पदसे गिरे ही थे, तथापि सन् १२५८ वाले पागदादके कतलेआमसे उनकी सारी शकि क्षीण हो गयी थी। इस बीचमें मिथके मामलुक सुल्तानों तथा कई राजवंशों द्वारा मुसलमान-जगत्का शासन होता रहा । बेइवार्स* नामक माम- पेइमा प्रथम और हवार्स द्वितीय नामके दो मिश्रो शासक हुए थे। वेइयार्स प्रथम "वाहरी मामलुक" नामक सम्प्रदाय विशेषका नेता था। सलादोन नामक कोई मिश्री राजा था। ये याहरी मामलुक सम्प्रदायवाले पहले इसी सलादोनके उत्तराधिकारी रामायके परीररक्षकका काम करते थे। यह तुर्किस्तानसे लाये हुए गुलामोंका एक पल था। पेइयार्सन धर्मद्रोहियोंको परास्त किया। इसके यार इन्होंने मुटूज नामक एक राजाको मारकर उसकी गद्दी छोन ली। अन्तमें अपने अधीनस्य सैनिकों द्वारा वह राजा यनाया गया । इसने शासा दरष्ठ ग्रहय करके सबसे पहले सोरिया में होनेवाले एक अन्तरग झगडेको दयाया। फिर इसोने चंगेजलाप पौत्रके प्राक्रमणले मुमदमान-ससारको रक्षा को। इसी पेइयाप्त प्रयमकी बात यह लिम्वी गयी है। २

गाजी
मुस्तफा कमाल पाशा Sum
लुक सुलतानको जब पता लगा, कि मवासिया खानदानके
लोग अब भी जीवित हैं और अपने कुछ थोडेसे अधिकारोंके
साथ सीरियामें मौजूद हैं, तब उन्होंने उनको बुलानेका
विचार किया। उनकी इच्छा थी, कि अबालिया वंशके जो
खलीफा आज भी जीवित हैं, उन्हें घुलाकर उन्हेंही पुन, मुसल्मान
साम्राज्यका शासन-भार दिया जाये। चेही मुसल्मान जगत्के
सिरमौर माने जाने योग्य व्यक्ति है। बेइवार्सकी यह भी इच्छा
थी, कि उन्हें खलीफाके पदपर अभिषिक्त कराके आप उनसे
हार्दिक आशीर्वादोंके साथ विधिवत् सुलतानकी उपाधि
प्रहण करें।
अनन्तर सीरियासे अबासिया खानदानके खलीफा ' अहमद
ताहिर वडी शान-शौकतके साथ मिश्रको तत्कालीन राजधानी
कैरोंमें घुलाये गये। उनके कैरो पहुँचनेपर वहाँके सुल्तान राजो-
चित वेश भूषा और सैन्य-सामान्तोंके साथ उनकी अगवानीके
लिये आगे आये। राज-दरबार में पहुंचनेपर वे बडे सम्मानके
साथ उच्चासनपर बैठाये गये। खलीफा अहमद ताहिरने खतवा
पढ़ा और उन्हें मुस्तन्सिर विल्लाहको उपाधि प्राचीन विधिक
अनुसार दी गयी और वेहो मुसरमान साम्राज्यके खलीफा माने
गये। अनन्तर खलीफाने बेइवार्सको इस्लामके विरुद्ध लोहा
लेनेवालोंके साथ समाम करनेका अधिकार प्रदान किया।
कुछ दिनों बाद किसी मुगलने इस्लाम साम्राज्यपर आक्रमण
किया। खलीफा मुस्तन्सिर विल्लाह उसका प्रतिरोध करने के
२५-

मुस्तफा कमाल पाशा
लिये आगे बढे पर इस धर्मयुद्ध में वे मारे गये। उनकी मृत्यु-
पश्चात् येइवार्सने उग्नी अमालिया वंशके एक और व्यक्तिको
लाकर खलीफाकी गद्दीपर बैठाया और उनकी अधीनता स्वीकार
की। वे धर्म-गुरु और शासककी तरह पूज्य समझे जाने लगे
पर शासनाधिकार प्रत्यक्ष रूपसे मिश्रके मामलुक सुल्तानोंके
हाथों ही रहा। तीसरे कालाशमें खलीफाकी गद्दी मिश्र देशके
कैरो स्थानमें रहो और यह वंश'अन्यासिया-प मिश्र' खानदान
कहलाता था। इस वशके १६ खलीफे हुए और सन् १५०६ ई०
तक इनका शासन माना जाता है।
8 चतुर्थ कालांश
इधर इस्लामकी शक्ति इस समय जिस
वर्तमान समयतक
प्रकार अत्यन्त क्षीण हो गयी थी, उसी
प्रकार उधर टर्कीके राजाका चल रहुत बढ़ गया था। सन् १५१७
ईमें सलीम प्रथमने मिश्रके मामलुक सुल्तानोंको हराकर मिश्रपर
अधिकार किया। मिश्र देशपर अधिकार करनेके पाद सलीम
प्रथमने अधासिया-ए मित्र खानदानके अन्तिम खलीफा अल
मोतनकेल अलेल्लाह इब्न उमर उल-हकीमके हाथोंसे यह उपाधि
प्रहण को,-"सुलानेस् सलातीन घ हाकिमुल-उ हनाकीम,
मालिकुलपहरेन व घररैन हामीदीन, खलीफा रसूल-अल्लाद,
समीर-उल मोमिनीन।"
इस प्रकार सलीम प्रथम उसमानिया प्रानदानके पहले
सन् १५१७ ई० से
1

an गाजी मुस्तफा कमाल पाशा खलीफा हुए। ये जगद्विख्यात विजयी मुहम्मदके पौत्र थे, इन्होंने एशिया महादेशके जिन अशोंमें रोमन साम्राज्य कायम हुमा था, उन्हें अपने अधिकारमें करके किस्तानी शासनके बदले इस्लामी सल्तनत कायम को। उनके समयमें जितने मुसल्मान शासक थे, उनमें सुल्तान सलीम खां सबसे अधिक बलशाली थे । यद्यपि उन्होंनेसलीफा होनेका अधिकार और उपाधिअब्बासिया-ए ह-मिश्र खानदानके अन्तिम सलीफाके हाथोंसे पायी थो, तथापि समस्त मुसल्मान-जगत्में उनके खलीफा होनेपर एक वडीखलवली मची। कितने ही मुसल्मानोंकी यह आपत्ति थी, कि ये हमारे धर्म-गुरु म्पलीफ़ाके पदपर नहीं बैठाये जा सकते हैं और साथही दूसरे पक्षवालोंका कहना था, फि ये खलीफा होनेके सर्वथा योग्य हैं और सब तरहसे खलीफाके पदके अधिकारी होनेका उनको हक है। लगातार दो-तीन वर्षों तक यह झगड़ा चलता रहा और बढेवढे आलिम फाजिलों और उलमाओंकी वहसके बाद वे सर्वसम्मतिसे पलीफा माने गये। तबसे अवतक किसीने टी सुल्तानके खलीफा होनेके विषयमें कोई प्रश्न नहीं उठाया। सलीम प्रथमनेखलीफाकी उपाधिपानेपर निर्वाचन प्रथानुसार मिश्र देशकी राजधानी फेरोके उलेमाको अपने यहाँ बुलवाया और उनके तथा टर्की के उलेमाके द्वारा आयूयकी मस', म्पलीफा निर्वाचित किये गये। इस प्रकारको निर्वाचन-प्रथा-प्रचलिद सुल्तानको राज्याधिकार पानेपर मुस्तफा कमाल पाशा सम्मति और शैपुल-इस्लामसे हजरत अली साहनकी पवित्र तलवार ग्रहण करनी पड़ती है। इसके साथही इस्लाम धर्मके संस्थापक पैगम्बर मुहम्मद साहबफे स्मृति चिह स्वरूप उनका अंगा, 'हजरत अली साहबके स्मृति चिह्न स्वरूप उनके हाथकी तलवार और विजय पताका तथा कई और वस्तुएँ ग्रहण करनी पड़ती है । कहते हैं, वागदादके हत्याकाण्डके समयले वेसर वस्तुएँ मिश्रकी राजधानी फेरोंमें लायी गयी थीं और जन सलीम प्रथमने मिश्रपर 'अधिकार करके खलीफाकी उपाधि प्राप्त की थी, तभीसे ये चीजें टकोंकी राजधानी कुस्तुनतुनियामें सुरक्षित रखी गयी हैं। 'लेन पोल' नामक एक विख्यात इतिहास लेखकका कहना है, कि सोलहवीं सदीमे प्रारम्भमें, मिश्र-विपयके बादसेही सलीम प्रथमकी सत्ताको फारसके सिया सम्प्रदायके मुसलमानोंने भले- ही स्वीकार न किया हो, परन्तु भारतवर्ष, अफ्रिका, जावा, सुमात्रा, चीन, मलाया आदि सब देशों और द्वीपोंमें, जहां कहीं मुसल्मान थे, सरने उनको सत्ता स्वीकार करली थी। भारतवर्षमें रहनेवाले सारे मुसलमान राजाओंपर टोंके सुल्तानका प्रभाव कितना शीघ्र और कितना जबर्दस्त पडा था, इसका एक ऐतिहासिक प्रमाण दे देना अनुचित न होगा। उपर सन् १५१७ ई० में सलोम प्रथमने खलीफाकी उपाधि प्राप्त की थी और इधर भारतमें मुगल साम्राज्य स्थापित हो चुका था। दूसरे मुगल सम्राट् हुमायू भारतका शासन करते थे। मन् १५३३ ई० में हुमायू ने गुजरात के मुसल्मान राजा बहादुर शाह- - मुस्तफा कमाल पाशा र चढाई की। मुगल सम्राट्की चढ़ाई करनेकी खबर पाकर हादुरशाहने टीके सुल्तान सुलैमानके पास अपनी रक्षाके लिये सहायता करनेकी प्रार्थना की। सुल्तानने वहादुरशाहकी सहायता के लिये अपनी नौसेनाके ८० युद्ध-पोत भेज दिये थे। इस बातसे यही मालूम होता है, फिटकोंके सुल्तानका प्रभाव भारतवासी मुसलनानोंपर बहुत अधिक पडा था और सुल्तान अपने शासना धिकारकी सीमाके वाहरवाले मुसामानोंको भी सहायता प्रदान करनेको प्रस्तुत रहते थे। इसी प्रकार इतिहासमें इस बातके भी कितनेही प्रमाण हैं, जिनसे मालूम होता है, कि टर्कीके सुल्तानका प्रभाव जावा, सुमात्रा आदि देशोंपर यथेष्ट पडा था। इस तरह हम देखते हैं, कि पैग़म्बर मुहम्मद साहब द्वारा जो इस्लाम साम्राज्य कायम हुआ था, उसकी राजधानी पहले मदीनेमें, फिर दमस्कमें, फिर बागदादमें, तर कैरोंमें और अन्तर्म कुस्तुनतुनियामें रही। इसी कुस्तुनतुनियाका साम्राज्य रूम साम्राज्य कहलाता है। इसके सुल्तान या खलफा उसमानिय वंशके कहलाते हैं। , रूम साम्राज्य प्राकृतिक विभव रुपैगम्बर मुहम्मद साहय द्वारा स्थापित इस इम्लाम साम्राज्य- को टोंके मुल्तानोंके हाथमें आये आजचारसी उपाँसेमी अधिक हुए। टकोंके सुल्तानोंके हाथमें जिस समय मुसल्मान साम्राज्यका शासन-सूत्र गाया था,उसके कुछ फाल बाद यूरोपके भिन्न भिन्न देशोंके शासकोंकी ओरसे एशिया आदि महादेशोंके सिन्न भिन्न देशोंमें कितनेही आदमी व्यापार-वाणिज्यके लिये भेजे जाने लगे थे। पहले पहल पश्चिमी यूरोपनाले अफ्रिका महा- देशके किनारे किनारे होकर महीनोंकी लम्बी समुद्र यात्रा करके हिन्दुस्थानमें आये थे। यहांका धन वैभव देखकर वे यरायर यहाँ आने-जाने और व्यापार करने लगे। परन्तु आने-जानेका मार्ग इतनी दूरका था और ऐमा कठिन था, कि वे दूसरा मार्ग ढूंढने लगे। होते होते उन्होंने भूमध्यसागरका रास्ता ढूंढ निकाला। पीछे स्वेजकी नहर कटवाकर यह मार्ग सरल बनाया गया। तरसे घे इसी मार्गसे आने जाने लगे। इस जलमार्गसे आते-जाते समय जहाँ जहाँ यहे वडे नगर मिलने लगे, वहाँ-वहाँ भी पश्चिम यूरोपनाले अपने व्यापारी अद्वे यनवाने लगे।

गाज
मुस्तफा कमाल माशा
पर चढ़ाई की। मुगल सम्राट्की चढ़ाई करनेकी खबर पाट
वहादुरशाहने टीके सुल्तान सुलैमानके पास अपनी रक्षाके लि
सहायता करनेफी प्रार्थना की। सुल्तानने यहादुरशाहकी सहाय
के लिये अपनी नौसेनाके ८० युद्ध-पोत भेज दिये थे। इस बार
यही मालूम होता है, कि टीके सुल्तानका प्रभाव भारतवा-
मुसलनानॉपर बहुत अधिक पड़ा था और सुल्तान अपने शासन
धिकारकी सीमाके वाहरवाले मुसल्मानोंको भी सहायता प्रद
करनेको प्रस्तुत रहते थे। इसी प्रकार इतिहासमें इस बातके
कितनेही प्रमाण हैं, जिनसे मालूम होता है, किटक
सुल्तानका प्रभाव जावा, सुमात्रा मादि देशोंपर यथेष्ट पडा था
इस तरह हम देखते हैं, कि पैगम्बर मुहम्मद साहब द्वारा
इस्लाम साम्राज्य कायम हुआ था, उसकी गजधानी ॥
मदीनेमें, फिर दमस्कमें, फिर बागदादमें, तब कैरोंमें और अ
कुस्तुनतुनिया में रही। इसी कुस्तुनतुनियाका साम्राज्य
साम्राज्य कहलाता है। इसके सुल्तान या सलफा उसमा
वशके कहलाते हैं।
।
।

रूम-सामाज्या प्राकृतिक विभव - पैगम्बर मुहम्मद साहब द्वारा स्थापित इस इस्लाम साम्राज्य. फो टोंके मुल्तानोंके हाथमें याये आजचारसी वर्गासे भी अधिक हुए। टकोंके सुल्तानोंके हाथमें जिस समय मुसल्मान साम्राज्यका शासन सूत्र गाया था,उसके कुछ फाल बाद यूरोपके भिन्न भिन्न पेशोंके शासकोंकी ओरसे एशिया आदि महादेशोंके भिन्न मिन्न देशोंमें कितनेही आदमी व्यापार वाणिज्यके लिये भेजे जाने लगे थे। पहले पहल पश्चिमी यूरोपवाले अफ्रिका महा- देशके किनारे किनारे होकर महीनोंकी लम्बी समुद्र यात्रा करके हिन्दुस्थानमें आये थे। यहाँका धन वैभव देसकर घे रायर यहाँ आने-जाने और व्यापार करने लगे। परन्तु आने-जानेका मार्ग इननी दूरका था और ऐमा कठिन था, कि वे दूसरा मार्ग ढूँढने लगे। होते होते उन्होंने भूमध्यसागरका रास्ता ढूंढ निकाला। पीछे स्वेजकी नहर कटवाकर यह मार्ग सरल बनाया गया। तरसे वे इसी मार्गसे आने जाने लगे। इस जलमार्गसे आते-जाते समय जहाँ जहाँ बडे बडे नगर मिलने लगे, वहाँ-वहाँ भी पश्चिम यूरोपनाले अपने व्यापारी अड़े रनवाने लगे। ----२६- । मुस्तफा कसाल पाशा इधर पूर्वीय यूरोपवाले अर्थात् रूसवाले भी अपने व्यापार विस्तारके साथ-साथ साम्राज्य विस्तार करने लगे। होते-होते इन यूरोपीय देशोंका व्यापार मध्य एशियाकी ओर भी बढ़ने लगा। लसवाले अपना व्यापार वाणिज्य उत्तर सागरकी राहसे जाकर नहीं कर सकते थे, क्योंकि उधर शीत इतना अधिक पडता है, कि उत्तर सागरका जल वारहों महीने वर्फ घना रहता है। इसलिये चे भी उन्हीं जल-मार्गों से आने-जाने लगे, जिन मार्गासे होकर पश्चिम यूरोपवाले आया-जाया करते थे। - व्यापार-मार्ग 85- इस तरह रूस और पश्चिम यूरोप अर्थात् ग्रेट ब्रिटेन, पुर्तगाल आदि देशवालोंके बीच व्यापारिक प्रतिद्वन्द्विता उत्पन्न हुई और क्रमश इस प्रतिद्वन्द्विताके फल-खरूप रूस और ग्रेट ब्रिटेन आदि देशोंमें परस्पर विरोध-वैमनस्यका भाव जमने लगा। पश्चिम और मध्य यूरोपवालों तथा रूसियोंका मध्य एशियाके साथ व्यापार- वाणिज्य करनेका एकमात्र जल मार्ग कृष्णसागर है। मध्य यूरोपसे विस्तृत डेन्यूब नदी भी आकर इसी समुद्रसे मिलती है। अत सारे पूर्वी और पूर्व-दक्षिण यूरोपका वाणिज्य इसी मार्गसे हो सकता है। कृष्णसमुद्रको सागर कहनेकी अपेक्षा बहुत बडी झील कहना अधिकतर उपयुक्त होगा। यह यूरोप और एशियाकी भूमिसे प्रायः घिरा हुआ है। इसका उत्तरी तट यूरो- पीय रूसके दक्षिणी प्रान्तोंसे घिरा हुआ है। JI । मुस्तफा कमाल माशा मसके सबसे अधिक और प्रदेश इसी समुद्रके तटपर हैं। रूसी गला ओडेसा आदि इसी तटके बन्दरोंसे संसारके अन्य देशोंमें जा सकता है। संसारसे माल मंगानेका मार्ग भी रुसके लिये यही है। यहीं रूसको मुख्य जल-सेना भी है। इसके पश्चिमी तटपर रूमानिया और बुलगेरिया है। दक्षिण-पश्चिम और पश्चिमी तट यूरोपीय टक्री और एशियाई टर्की कहाता है। पूर्वी तट आरमीनिया तथा द्रास काकेशस प्रान्तसे घिरा है। कहना नहीं होगा, कि चारों ओरके इन देशोंका वाणिज्य इसी समुद्रकी राह हो सकता है। प्राकृतिक दुर्ग इस इतने बहे और महत्वके समुद्रको गहरी भूमध्यसागरसे मिलानेवाली दो तन जल प्रणालियाँ हैं और दोनोंही यूरोपीय तथा एशियाई टकों के बीचसे गया है। इन दोनों प्रणालियोंके दोनों तटोंपर अच्छी पहाडियां हैं। इनके कारण इन तटोंपर राज्य करनेवालेके लिये अल्प सेना और कुछ पहाडी तोपोंको सहायतासे कालासमुद्रका सारा व्यापार चन्दकर देना बायें हाथ- का खेल है। पानीके वम अगर इन प्रणालियोंमें डाल दिये जायें, तो बडे बहे भयङ्कर लडाऊ जहाजभी भीतरआनेका साहस नहीं कर सकते। इन तटोंके अधिकारो कृष्णसागरके तटपत्ती समस्त यूरोपीय देशोंका चाणिज्य चौपट कर सकते हैं, उनकी जल सेनाको चूहेकी तरह पिजडेमें बन्द कर दे सकते है। न वे - Waमुस्तफा कमाल पाशा अपनेको आप बचा सकते हैं और न बाहरी शक्तियां उन्हें कुमुकही पहुँचाकर बचा सकती हैं। इन जल-प्रणालियोंके नाम वासफोरस और रक्षनियाल हैं। वासफोरस प्रणाली कृष्ण-सागरको मारमोरा समुद्र से मिलाती है। इसके यूरोपीय तटपर कुस्तुनतुनिया और एशियाई तटपर स्कुटारी है। कुस्तुनतुनिया और स्कुटारीकी गोलावारी बचा कर कोई जहाज वासफोरस दरवाजा पार नहीं कर सकता। भारमोरा समुद्र भी कृष्णसागरकी तरह है, पर उससे बहुत छोटा पील है, जो चारों ओरसे, इन दो जल-प्रणालियोंके सिवा, यूरो पीय और एशियाई तुर्कीसे घिरा हुआ है। इस समुद्रसे भूमध्य- सागरमें जानेकी राह दर्रे दानियाल है। यह जल प्रणाली बास- फोरसकी अपेक्षा लम्बी और तन है। इसके यूरोपीय तटपर भयकर पहाडोंसे मरा हुआ गैलीपाली प्रायद्वीप है और पश्चिमी तटपर एशिया तुर्कोके चानक आदि, सैनिक दृष्टिसे बढे महत्वक स्थान हैं । इन जल-मार्गोके अधिकाश तटपर बहुत दिनोंसे टर्कीके सुल्तानोंका अधिकार और नियन्त्रण रहा है। तमाम यूरोपीय राष्ट्र इसी कारण रूम साम्राज्यार बडी तोत्र द्वष्टि रखते थे। कितनीहो धार कितनेही यूरोपीय राष्ट्रोंने इसे अपने अधिकार, करनेकी चेष्टा मो की, पर कोई फल न हुआ। इसके बहुतेरे कारणोंमें यह भी एक कारण है कि यदि कोई राष्ट्र रुम साम्राज्य पर अधिकार करना चाहता,तो अन्य यूरोपीय राष्ट्र तुर्कीका पक्ष लेकर उसके विरुद्ध पदे हो जाते और फिर उस राष्ट्रको दवा मुस्तफा कमाल माशा देते। इसी लिये कुस्तुननुनिया सदा इस्लाम साम्राज्यका के स्थान घनफर सुरक्षित रहा है। इसके अतिरिक्त कुस्तुनतुनिय को प्राकृतिक परिस्थिति भी ऐसी हद है, कि कोई भी आक्रमण फारी इसपर सरलता-पूर्वक अधिकार करना तो दूरकी यात चढाई भी नहीं कर सकता। राजनीतिक अवस्था 8- सलीम प्रथमके पुत्र, मुलेमानने सुल्तानके अधिकार अपने हाथोंमें लेतेही येल्ग्रेड रोड्स आदिपर कब्जा कर लिया औ- मारिद्रयाके कई प्रान्तोंपर भी अधिकार कर इस्लाम धर्मका प्रचार करना आरम्भ किया। उनके इस कार्यक्रमको देख, समस्त ईलाई राष्ट्रों के हृदयमें आतङ्क घुस गया। इस समय सुल्तान सल्तनत केवल यूरोपीय देशोंकी ओरही बढती नहीं थी, बरिष उन्होंने इसी समय अफ्रिका महादेशका उत्तरी भाग भी अपने अधिकाग्में कर लिया था,जिससे समस्त भूमध्य सागरपर इनका प्रभुत्व स्थापित हो गया था। सुलेमान द्वितीयका शासन सन् १५२० से सन् १५६६ तक रहा। २६ वीं सदीके अन्तिम भागमें तथा १७ ची सदीके प्रारम्भमें अर्थात् मुराद तृतीय, मुहम्मद तनीय और अहमद प्रथम नामक दुर्चल सुल्तानोंके समय रूम-साम्राज्यकी अवस्था बहुत कुछ खराब हो गयी थी। मुहम्मद चतुर्थफे शासन कालमें उसके पग्म नीतिनिपुण वजीर मुहम्मदके अपूर्व युद्धि-बलसे रुम-साम्राज्य

।
.
मुस्तफा कमाल पाशा
रूम-सम्राज्यके भीतरही बहुतले प्रजाजन वागी बन गये। इस
अन्तरग कलह और बगायतका परिणाम यह हुआ, कि सुरतान
सलीम तृतीय सन् १८०७ ई में और मुस्तफा चतुर्थ सन् १८०८
ई०में मार डाले गये * अनन्तर मुहम्मद तृतीयने इस वगावतको
रोक देनेके लिये बढे उत्साहके साथ प्रवन्ध किया। उन्होंने
अपनी सेनाको यूरोपियन प्रणालीसे सामरिक शिक्षा देना आरम्म
किया। इसमें उन्हें बहुत कुछ सफलता भी प्राप्त हुई और उनका
सैन्य सगठन और सचालन बहुत अच्छे रूपमें आ गया। परन्तु
उन्होंने यूनानियोंके साथ जो कठोर वर्ताव किया, उससे
प्राय समस्त यूरोपियन राष्ट्र सम साम्राज्य के विरुद्ध पहे हो
गरे। सन् १८२७ ई० में नैवारिनों स्थानमें रूम साम्राज्यको नौ
सेनापर आक्रमण किया गया और उसे बहुत कुछ बाद करके
सन् १८२६ ई० में रूस अपना साम्राज्य विस्तार करते हुए
आडियानोप्लतफ पहुँच गया। सन् १८२६ ई० की १४ वीं
सितम्बरको आस्ट्रिया, रूस तथा रूम-साम्राज्यों के बीच एक
सन्धि हुई। इस सन्धिकी शतांके अनुसार सर्विया और
के निकटस्थ प्रान्तोंके अधिकार निश्चितकर दिये गये का
सम्पूर्ण स्वाधीनता स्वीकार की गयी।
मिश्रियोंकी स्वाधीनता
इसके वाद सुल्तानने अपने साम्राज्यको और
नेलसन्स एनसाइक्लो पोडियाफे अनुसार
4
-

मुस्तफा कमालपाशा
उसकी नींव सुद्दढ करनेकी चेष्टा की, तो उसका परिणाम यह
हुआ, कि मिश्र भी अपने राजनीतिक अधिकारोंको लेकर स्वतन्त्र
हो गया। सुल्तान मजीदके शासनाधिकार ग्रहण करनेपर
कई यूरोपीय शक्तियोंकी सहायता द्वारा रूम-साम्राज्य
मिधवालोंके आक्रमणसे बचाया गया था। सन् १८४०ई०
की लण्डनकी सन्धिके अनुसार यह निश्चय हुमा, कि वासफोरस
और दरें दानियालमें कोई युद्ध पोत चाहे वह किसी राष्ट्र का
हो-जाने न पाये। सन् १८२३ ई० में टर्की और कसके बीच
एक और लडाई हुई। इस लहाईका कारण यह था, कि
सम्राट् निकोलासने सुल्तानके पास कहला भेजा था, कि पेले.
स्टाइन (फिलस्तीन ) पर सच ईसाइयोंका धार्मिक अधिकार
है, मतपत्र हमारे अधिकार वहाँ रक्षित रहे। परन्तु सुल्तानको
यह यात स्वीकार नहीं थी। इस लडाईमें तुर्कोने बडी यहादुरी-
के साथ रूसियोंका सामना किया ओर डेन्यूबपर उनको सेना-
को, रोक अपनी रक्षा की। इधर पश्चिम यूरोपवाले राष्ट्रोंने
रूसियोंको कीमियामें दगा रमा-आगे चढने न दिया।
2 रूम और रूस
सुल्तान अब्दुल अजीजके शासनकालमें कम साम्राज्यको
उन्नति और श्रीवृद्धिको बडी आशाएँ की गयीथीं, पर उनके सुयोग्य,
राजनीति फुशल मन्यो फौमाद और अली पाशाकी असामयिक
'मृत्युके कारण रूम साम्राज्यको उन्नतिके विषयमें जो आशा की

गाजी
मुस्तफा कमाल पाशा
गयी थी, उसपर सहसा पानी फिर गया। कुप्रबन्धके कारण
साम्राज्यका खर्च इतना बढ़ गया था, कि सन् १८७५' में
साम्राज्यका खजाना खाली हो गया। यह बात बाहरवालोंको
भी मालूम हो गयी और रूस-जो अवतक तीखी नजर गडाये
मौका देख रहा था-फिर टोंके विरुद्ध. उठ खडा हुआ। रूम.
साम्राज्यके प्रजावर्गने ग्वयाल किया किकसके इस प्रकार बार-बार
आक्रमण करनेका मुख्य कारण सुल्तानकी कमज़ोरी तथा प्रधान
मन्त्रीकी अयोग्यता है। कुछही दिनोंमें प्रजावर्गका यह ग्वयाल
इतना दृढ़ होगया,कि उसने मुलान अजीजको ३० मई सन् १८७६
को गद्दीसे उतरनेके लिये बाध्य किया और उनके गद्दीसे
उतरनेपर सुल्तानके पदपर मुराद पञ्चम अभिषिक्त किये गये।
इसके प्राय एक वर्ष बाद उसने फिर रूमपर आक्रमण
किया। इस बार भी तुकाको विवश होकर रूसवालोंसे सन्धि
करनी पड़ी। यह मन्धि सन् १८७८ ई० को ३ री मार्चको सैन
स्टेफानोमें हुई थी। इस सन्धिके अनुसार सुल्तानको रूमानिया
और सर्वियाको पूर्ण स्वतन्त्रता देदेनी पडी। इस समय अब्दुल
हमीद द्वितीय सुल्तान थे।
कसको इस प्रकार बलवान होने देस, और घरावर पूर्वको
मोर अग्रसर होनेकी चेष्टा करते देप, इङ्गलैएडने टर्कीको
सहायता करना स्वीकार किया , क्योंकि इसमें उसका भी स्वार्थ
था। इङ्गलैएहके सहायता देनेको सड़े होनेपर रूसने हाय
रोक लिया।
--
T
-

मुस्तफा कमाल पाना सन् १८७८ ई० में घर्लिनमें तमाम एशियाई प्रश्नोंका स्थायी रूपसे नियटारा कर देने के लिये एक विगट काप्रेम हुई। इस काग्रेसमें सभी संश्लिष्ट राष्ट्रोंकी ओरसे प्रतिनिधि उपस्थित हुए। इस काग्रेस द्वारा आन्ट्रोया, वलगेरिया और टोंको .' राजनीतिक सीमा निर्धारित कर दी गयी। इसी समयमें यूनानने अपने सीमान्त प्रदेशोंको थाहरी आक्रमणोंसे बचानेके लिये सुरक्षित कर लिया। यद्यपि इस विषय में टफीफा विरोध था, तथापि अन्य राष्ट्रोंके मताधिक्यसे यूनानने अपनेको सुरक्षित बना लिया और योसनिया तथा हर्जेगोविना आष्ट्रियाके शासनके अधीन कर दिये गये। सन् १८८१ ई० में सुल्तानको थेसाली और पार्टी प्रान्त भी ग्रीसके हवाले करने पड़े। १ टकी और जर्मनी १८८० में जर्मनी के सामरिक अधिकारिवगने रूम साम्राज्यको सेनाको नवीन यूरोपीय प्रणालोके अनुसार शिक्षा देने तथा उसका सगठन करनेका भार लिया। उन्होंने साम्राज्यभरकी सेनाके सगठन करने के नियम तैयार किये । १८८७ ई० से ये नियम काममें लाये जाने लगे । अनन्तर दस घों तक सुल्तानने बडी घुद्धिमत्ता. के साथ शान्ति स्थापित रखी। लडाई भागडेकी नीतिसे विल्कुल काम नहीं लिया गया। साथही सुल्तानने अपनी एक विशाल सेना चक्क जरूरतके लिये तैयार कर रखी थी। प्रिन्स अलेग. जेएटरने पूर्वीय स्मेलिया अपने राज्यमें मिला लिया पर सुल्तान- । . में मुस्तफा कमाल माशा ने उनके इस कामका विरोध भी नहीं किया। परन्तु सन् १८६७ ई० के अप्रेल महोनेमें जब यूनानवालोंने जबर्दस्ती तुर्कों से लडाई छेडी, तब सुल्तानको उस सञ्चित शक्तिका दुनियाको पता लगा। आदमपाशाने बडी आसानीसे यूनानियोंको हरा दिया। केबल कई सप्ताहोंमही इन्होंने यूनानियोंसे प्रायः सम्पूर्ण येसालीले, अपने कब्जेमें कर लिया, परन्तु मध्य तथा पश्चिम यूरोपबालोंने यूनानको बचा लिया। अन्तमें सन् १८८७ ई० की ४थी दिस- म्बरको कुस्तुनतुनियामें सन्धि हुई। 8 अन्तरंग विप्लव 88- इसके बाद रूम-साम्राज्यको अन्तरङ्ग कलहका सामना करना पडा , शासनका प्रवन्ध विगड जानेके कारण साम्राज्यके अन्त र्गत खदेशकी दुरवस्था देखकर कितनेही नवयुवकोंमें स्वदेश- रक्षाका भाव जागृत हो आया। उन्होंने "नवीन तुर्क" नाम देकर एक संघ स्थापित किया। इस संघमें रूम-साम्राज्यके नयीरोशनी. के कितनेही अधिकारी भी सम्मिलित होगये। रूम-सरकारने सन् १९०१ ई० में इन्हें बागी समझा और उनके साथ वैसाही सुलूक किया, जैसा वगाचत फैलानेवालोंके साथ किया जाता है।-वे दवा दिये गये। उसके कुछहो दिनों बाद यलगेरियावालोंने मेसेडोनियाकी स्वतन्त्रताके लिये आन्दोलन करना शुरू किया। परन्तु कई राष्ट्रोंके टीके पक्षमें होनेके कारण सन् १९०५ ई० में यह झगड़ा -४०- गाजी मुस्तफा कमाल पाशा शान्त होगया। सन् १९०६ ई० में फ्रान्सके साथ टीका झगडा आरम्भ हुआ। इसका कारण यह था, कि टीने ट्रिपोलीके जेनत नामक मोएसिस पर * अपना अधिकार स्थापित करता चाहा था। फारसको पश्चिमी सीमापरके कई स्थानोंको भी टर्कीने अपने अधिकारमें करना चाहा। इसके कारण फारस- वालोंसे भी टी की लडाई होने लगी। सन् १९०८ ई० से “नवीन तुर्क" सघनालोंने सलोनिकाको अपना केन्द्र स्थान बनाया। टर्कीकी सेनामें भी कुशासनके कारण विद्रोहकी अग्नि सुलग चुकी थी। “नवीन तुर्क" संघनाले तत्का- लीन रूम-साम्राज्यकी सरकारको शासनसे अलगकर नयी सरकार-नया मन्त्रिमण्डल बनाने के लिये उतावले होरहे थे। होते होते २४ जुलाई सन् १९०८ ई० को नयी सरकार कायम हो गयी और पुरानी सरकार शासनधिकारसे हटा दी गयी। २७ वी दिसम्बरको नगीन तुर्क" सपके प्रधान नेता अहमद रजाके सभापतित्वमें एक निराट् सभा हुई। इसी सभामें नयी पार्लि. यामेण्टका उद्घाटन हुमा। पर यह व्यवस्था भी स्थायी रूपसे न रही। चारही महोने बाद अर्थात् २४ अप्रेल सन् १९०६ को मैसीडोनियावालोंकी फौजने पलपूर्वक फुस्तुनतुनियामें प्रवेश किया। २६ ता को मन्त्रिमण्डलने शासनकार्यसे इस्तीफा दे दिया। २७ तारीपको राष्ट्रीय समा. मरुभूमिमें कहीं-कहीं कानोंक निकम्न मानेसे जो स्थान उपजाऊ हो जाता है, उसे श्रोएसिस कहते हैं। -४१-

मुस्तफा कमाल पाशा Eom
की एक गुप्त बैठक हुई। इस सभामें अब्दुलहमीदको सुल्तानके
पदसे अलग कर देना सर्व-सम्मतिसे निश्चय हुआ। उनके छोटे
भाई मुहम्मद पञ्चम सुल्तान बनाये गये। सन् १९१० के अप्रैल
महोने तकके लिये कुस्तुनतुनियामें 'मार्शलला' जारी किया गया।
अप्रेलमें इस फौजी कानूनकी अवधि फिर एक धर्षके लिये बढा
दी गयी। इस समय तमाम रूम-सामाज्यमें बड़ी भारी खलबली
मच गयी थी~अवस्था डॉवा डोल होरही थी।
सन् १९११ ई० का वर्ष टीके लिये बडाही बुरा था।
मार्च के महीनेमें कुस्तुनतुनियामें फिर फौजी कानून जारी किया
गया। इसी सालके सितम्बर मासके अन्तमें इटालीने टी के
सुल्तानके पास एक पत्र भेजा, जिसमें लिखा था, कि "ट्रिपोलीमें
तुर्को ने बडा उपद्रव मचा रखा है। तमाम अशान्ति और अरा-
जकता फैल रही है। इसलिये यदि ऐसाही हाल रहा,
ट्रिपोलीपर सामरिक अधिकार कर लेगे। इसपर सुल्तानने
जो जवाब दिया, वह सन्तोष जनक नहीं समझा गया। अन्तमें
२६ सेप्टेम्बरको टर्की और इटलोके दान युद्ध छिड गया।
ट्रिपालीकी सीमाओंपर सेनिक धैठा दिये गये और ५धी अ
बरको इटालियन सेना ट्रिपाली नगरमें प्रवेश कर पागयी। इसके
वाद इटालियनोंने भौर भी कई बन्दरगाहोंपर आक्रमण किया।
तो हम

टर्कीकी हीनावस्था
8 यूरोपीय महासमर 88-
इस प्रकार हम देखते हैं, किटकीको अवस्था क्रमश
अत्यन्त शोचनीय होती चली आती है। चारों तरफ
चलवान् शत्रु अपना जमर्दस्त पाँव जमाये आगे बढ़े चले आते हैं।
उत्तरसे रूसी भालू रूस सम्राट् जारके आदेशानुसार टकीको
निगलनेके लिये चला आरहा है। पश्चिमसे इटलो और ग्रीसवाले
उसका गला दबाये जारहे हैं। दक्षिणसे समुद्र नट-वती स्थानों
तथा चन्दरगाहोंपर भी उसके प्रगल शत्रु अपना अधिकार जमाते
चले जारहे हैं। कोई राष्ट्र उसका सथा सहायक नहीं दिखाई
देता। सभी अपना-अपना मतलर गांठनेको तैयार है।
ऐसी अवस्थामें सन् १९१४ ई० में यूरोपीय महायुद्ध छिड
गया। इस युद्धमें प्राय सभी यूरोपीय राष्ट्रोंने भाग लिया।
टीफा कुछ अंश यूरोपमें है और कुछ अंश ऐशियाम है।
इसलिये वह भी इस महायुद्ध में शामिल हुए बिना नहीं रह
सका। जर्मननि उससे सहायता मांगी। यद्यपि टर्की पहले
पहल इस युद्ध में शामिल होनेको प्रस्तुत न था, तथापि उसे पाई
अनिवार्य कारणोंसे शरीक होनाही पडा।

मुस्तफा कमाल पाशा EM किन उपायोंसे टकाको दयायाचाहते थे, इन बातोंको ये लोग बड़े गौरसे देख रहे थे और जिन लोगोन रूम-साम्राज्य के प्रतिनिधि हो। कर सेवर्स के सन्धि पत्रपर हस्ताक्षर किये थे, उनकी कमजो. रियोंको भी दूरदर्शी लोग भली भांति जानते थे। इन्हीं कारणोंसे घे लोग उस सन्धि पत्रको एफ रद्दी कागजके टुकडेसे अधिक मूल्यवान् नहीं समझते थे।

गाना मुस्तफा कमाल पाशा। arman Press, Calcutta

No text on this page.

टीका उद्धारकर्ता जन्म और वाल्यकाल - कोंके गम्भीर विवेचक, दूरदर्शी आशावादी लोग जिस 'मचे देशोद्धारक घीरको प्रतीक्षा कर रहे थे, वह अन्तमें कार्यक्षेत्रमें उत्तरही तो गया । या सुप्रसिद्ध मुसल्मान लेखक और राजनीतिम याकूर फदरीके शब्दोंमें टकीका यह सथा सपूत सचमुच 'तुर्क जातिके पुनरद्धारके इस नवीन युगके लिये ईश्वरका एक नया अवतार है। इस तुर्क युवकका नाम 'मल गाजी मुस्तफा कमाल पाशा' है। आज समस्न संसार इस तुर्क चोरफे नामसे पूर्णतया परिचित है। सारा मुसल्मान जगत् आज इनकी ओर आशा और विश्वास की दष्टिसे देख रहा है। इनके पूर्वज स्मेलियाके रहने वाले थे। इनके पिता टर्की सरकारके चुगी विभागमें एक साधारण कर्म- चारी थे। वे अपने कार्यवश सपरिवार सलोनिकामें रहते थे। वहीं सन् १८८० ई० में मुस्तफा कमालका जन्म हुआ। पिता माताका लाड प्यार और आदर-यन पा, पालक कमाल दिन दिन बडा होने लगा। प्राय सभी आदमी पाल्यकालमें चचल स्वभावके होते हैं -४६- , गाजी मुस्तफा कमाल पासा परन्तु बालक कमालमें उतनी चंचलता नहीं थी। वह आरम्म• सेही अपने भविष्य जीवनके गम्भीर कार्योंकी सूचना देनेके लिये ही मानों, स्थिर, गम्भीर और धीर-भाव धारण किये रहता था। चालक किसी छोटीसी चीजके लिये भी जो उसको भा जाती है, मचल पड़ते हैं, पर बालक कमालमे यह बात न थी। वह उसी समयसे सामान्य वस्तुओंको स्पृहा नहीं रखता था। 88 शिक्षा-प्राप्ति पिता-माताने जब देखा,कि वह पाठाभ्यास करने योग्य हुआ है, तब उसे सलोनिकाके एक प्राथमिक शिक्षा दी जानेवाली पाठ- शालामें भर्ती करा दिया। पढ़ना-लिखना सोखने में उसका विशेष अनुराग उत्पन्न हुआ। चालक कमालके पिता उसे अत्यन्त छोटो अवस्थामही छोड, इस संसारसे विदा हो गये। वे न तो ऐसे ऊँचे पदाधिकारीही थे और न मोटी तनखाहही पाते थे, जो अपनी मृत्युके पश्चात् अपने परिवारवालोंके लालन पालनके लिये कोई मोटी रकम छोड जाते। इस निराश्रय, नि सहाय अवस्थामें थालक कमालके पढाने लिखानेका भार कौन लेता? परिवार- वालोंके पाने पीनेका खर्च किसी तरह तो चल भी सकता था। पर उस बालकको पढाने-लिपानेका खर्च कहाँले चलता? . परन्तु 'जापर जाकर सत्य सनेह,सो तेहि मिले न कछु सन्देह के अनुसार चालक कमालके अध्ययनके मार्गमें रुकावटें होनेपर मुस्तफा कमाल पाशा भी उसने उसे प्राप्त करके छोडा। पढने लिपनेमें उसका इतना द्रुढ अनुराग था,उसमें ऐसे-ऐसे आकर्षक गुण विद्यमान थे, कि जो कोई उसके संसर्गमें आ जाता, वही उसे प्यार करने लगता। अध्यापकोंने उसकी अध्ययन-शीलता देप, उसे नि शुल्क शिक्षा देनेकी व्यवस्था कर दी। कमालकी बुद्धि यडी प्रखर थी। पाठ- शालामें अपने साथ पाठाध्ययनमे प्रतियोगिता करनेवालोंसे वह हमेशा ऊपर रहकर भी उनके साथ अपनी मञ्चो सहानुभूति रखता और उन्हें अपना मित्र वता लेता था। * शस्त्रास्त्रोंकी शिक्षा - प्रारम्भिक शिक्षाशालाका अध्ययन समाप्त होने भी न पाया था, कि एक दिन उनके किसी सहपाठीसे लडाई हो गयी । अध्या- पकने इसपर उन्हें मारा-पीटा। दूसरेही दिनसे इन्होंने पाठशाला जाना छोड दिया। इसके बाद फमालने माताकी भाशाके विरुद्ध छिप छिपकर मोनास्तरकी माध्यमिक सैनिक-शिक्षा-शालामें अध्ययन करना आरम्म कर दिया। प्रत्येक विश्वविद्यालयकी भिन्न भिन्न परीक्षाओंमें सम्मिलित होनेवाले विद्यार्थियोंकी उम्रकी एक सीमा होती है, अर्थात् अमुक परीक्षामें सम्मिलित होनेके लिये विद्यार्थीकी उन्न कम से कम कितनी होनी चाहिये, इसका एक निर्धारित नियम रहता है। बालक कमाल प्राय समी प्रकारकी सैनिक परीक्षागों में निर्धारित - । 1 मुस्तफा कमाने पाशा STAGEM उम् पूरी होनेके पूर्वही सम्मिलित हुआ और सदा परीक्षोत्तीण होता गया। इस प्रकार प्रारम्भिक शस्त्र-विद्याका अध्ययन समाप्तकर नवयुवक कमाल शस्त्र विद्याकी उच्च शिक्षा प्राप्त करनेके अभिप्रायसे कुस्तुनतुनियाके सैनिक महाविद्यालयमें । भी हुए। - - इनकी माताकी वडी इच्छा थी, कि कमालको मुसल्मान- धर्म गुरु और उपदेशक बनायें, परन्तु कमालको इच्छा वीर योद्धा घनकर सचा युग धर्म-गुरु बननेकी थी। अपनी इस इच्छाको पूर्ण करने के लियेही इन्होंने सामरिक शिक्षा प्राप्त करना आरम्म किया। यहां इन्होंने वढे आग्रह और चावके साथ शस्त्रास्त्रोंका प्रयोग तथा युद्ध के लिये सैनिक कवायद सोखी। यहीं इन्होंने प्रैजुयेटकी उपाधि प्राप्त की। ॐ विशेषताएँ प्रायः एक वर्ष हुआ, मैडेम वर्थी जार्जेस गालिस नामक सुप्रसिद्ध लेखिका मुस्तफा कमाल पाशाके पास गयी थीं । कमाल पाशाके व्यक्तित्यकी विशेषताका वर्णन करते हुए उन्होंने लिखा है, कि कमाल पाशामें कितनीही विचित्रतापूर्ण शक्तियां होनेकी बातें सुनने में आती हैं। वे अपनी अत्यन्त वलपती इच्छाको भी अपने हँसते हुए, शान्त और चित्ताकर्षक चेहरे के अन्दर इस तरह छिपाये रख सकते थे, कि किसीको उनका मनोभाव मालूमही नहीं हो

मुस्तफा कमाल पाशा DOGY
सकता था। उनके साथी-समाजी 'सभी उन्हें इतना मानते
और उनकी अधीनता इस प्रकार स्वीकार करते, मानों वे
उनके कोई अफसर हों, परन्तु वे खुद किसीपर हुकूमत करनेका
भाव नहीं दिखलाते थे। इसका प्रत्यक्ष कारण उनमें सर्वाधिक
योग्यताका होना था।
चे खुद नेता होने का भाव नहीं रखते थे, तो भी लोग उन्हें
अपना नेता समझते थे। अध्ययन कालमें वे जिधर जाते,
उधरहो उनके पीछे-पीछे उनके साथी सहपाठी लगे रहते और
उनके साथ-साथ फिरा करते थे। वे जिससे जो कहते, उसे
माननेको वह तुरत तैयार हो जाता था।
विज्ञान और गणित शास्त्र में वे अपना सानी नही रखते थे।
कहते हैं, इनके गणिताध्यपकका नाम भी मुस्तफा था। वे
यालक मुस्तफाकी गणित शास्त्र में असाधारण व्युत्पत्ति और
योग्यता देखकर बडे प्रसन्न रहते थे। एक दिन गणितका एक
उलझन सुलझा देनेपर वे इनपर इतने प्रसन्न हुए, कि उन्होंने
मुस्तफाके नामके साथ 'कमाल' शब्द जोड दिया। उसी दिनसे
ये
मुस्तफा कमाल कहलाने लगे।
मुस्तफा कमाल कभी कभी बडोही ग्स पूर्ण कविताओं की
रचना किया करते थे ; परन्तु उनकी कविताओंमें शृङ्गार, हास्य
आदि मधुर रसोंका समावेश नहीं होता, बल्कि वीर और करुण
रसही अधिकाशमें पाया जाता है। उनके हृदयमें स्वदेशके प्रति जो
'अगाध प्रेम था, उसीके आवेशमें माफर वे कविता लिखा करते
M

M . । मुस्तफा कमालपाशा थे। स्वेच्छाचारी राजाफे अत्याचारोंके विरुद्ध चे वडीही उत्ते- जनापूर्ण कविताएँ लिखा करते थे। अध्ययन कालमेंही स्वतन्त्रता, विश्वजनीन प्रेम तथा जीवन और मरणके सङ्गीत गा-गाकर उत्साह हीन, निराश तुर्को के हृदयोंमें आशा और विश्वासका सञ्चार करते, सोये हुओंको जगाते और मृतवत् पड़े हुओंमें जान डालते हुए फिरा करते थे। प्रौढावस्था प्राप्त होनेतक साधारणत सभी मनुष्योंमें कुछ-न- कुछ अनुकरण-प्रियता दिखाई देती है । इस अनुकरण प्रियतासेही कहीं कहीं लाभ दिपाई देता हो, पर वह लाभ बहुतही सामान्य है, बल्कि इसकी मात्रा बढ़ जानेसे प्राय सर्वथा हानिही होनेकी सम्भावना रहती है। इससे मनुष्यका जितना लाभ होता है, उसकी अपेक्षा कई गुनी अधिक हानि यह होती है, कि मनुष्य क्रमश केवल दूसरोंका अनुकरणही करने लग जाता है गौर अपने स्वतन्त्र विवेकसे काम नहीं लेता। इस प्रकार वह अपनी खास शक्तियोंको विकसित तो करही नहीं सकता , साथ- ही उसकी उपयोगिताको भी भूल जाता है। कमाल पाशाके विषयमें उनका कोई घनिष्ठ से घनिष्ठ मित्र भी यह वात दावेके साथ नहीं कह सकता, कि उन्होंने कभी किसी यातमें--किसी- का अनुकरण किया हो। बाल्यकालसेही स्वावलम्बी होनेके कारण उनकी बुद्धि इतनी स्वतन्व-गामिनी थी, कि उनपर कभी किसी- का प्रभावही नही पडता था। जबतक उनकी स्वतन्त्र विवेक बुद्धि किसी यातको तर्क-युकियों द्वारा ठीक न समझ लेती, तक ore मुस्तफा कमालपाशा रव ६ उसे दूसरे किसीकी बातोंसे प्रभावान्वित होकर ठीक मान लेनेको तैयार नहीं होते थे। 800 विभिन्न-संवाद - मुस्तफा कमाल पाशाके अध्ययन-कालिक जीवनके विषयमें अबतक भिन्न-भिन्न विलायतीसमाचार-पत्रोंके कई विभिन्न लेखकों और संवाददातामो द्वारा जो यातें जानी गयी हैं, उनमें कुछ पार्थक्य दिखाई देता है। कुछ लोगोंका कहना है, कि 'जय चे सलोनिकामें अध्ययन कर रहे थे, तब किसी दिन अपनी कक्षाके एक सहपाठी विद्यार्थीसे लड पडे। इसपर जो अध्यापक इनके क्लासमें पढ़ा रहा था, उसने इन्हें काफी सजा दी और इन्होंने भी उसी दिनसे स्कूलमें जाना छोड़ दिया और उनका पढना चन्द हो गया। दूसरी ओर मैडेम गालिस जो १०-१२ महीने पहले मुस्तफा कमाल पाशासे मिलने गयी थीं, लिखती हैं, कि 'सलोनिकाके स्कूलका अध्ययन समाप्त करनेपर इन्हें इनकी तीन बुद्धि और योग्यताके लिये छात्र वृत्ति मिली और उसीकी सहायतासे वे मोनास्टिरकी माध्यमिक शिक्षाशालामें शिक्षा प्राप्त करने लगे। इसके अतिरिक्त उपर्युक्त लेखिकाका यह भी कहना है, कि 'मुस्तफा कमालमें एक विचित्र आकर्षिणी-शक्ति है और क्या स्कूलमें, क्या घरमें मपत्र घे अपनी इस अद्भुत आकर्षिणी शक्तिसे ४

॥जी
मुस्तफा कमाल पाशाUG
काम लेते हैं।' सुतरा किसी सहपाठीसे उनकी लड़ाई-भिडाई
होनेकी बात अस्वाभाविक जान पडती है
इसी प्रकारके और भी कई विभिन्नता-पूर्ण समाचार प्राप्त
हुए हैं , पर हमें वर्तमान मुसत्मान-जगत्के एकमात्र आधारस्तम्भ,
टर्कीके प्राता, गरीबोंके रक्षक, दीनजनोंके सहायक, अत्या.
चारियोंके संहारक और शान्तिके विधायक गाजी मुस्तफा
कमाल पाशाके महान और विशद जीवनसे जो शिक्षा ग्रहण
करनी है, उसमें इन सामान्य पार्थक्योंसे कुछ आता-जाता नहीं
है। अतएव हम इन सामान्य बातोंकी ओर यदि ध्यान न भी
दें, तो कोई विशेष क्षति नहीं है।
बोलशेविक रूसके अधिष्ठाता और नेता मोशिये लेनिनके
विपयमें भी ऐसे कितनेही पार्थक्यपूर्ण सवाद आया करते थे।
मोशिये लेनिनके विषयमें तो यहांतक देखा गया है,कि एकही दिन,
एकही तारीस और एकही समयकी घटनाका उल्लेख करते हुए,
विलायतके चार समाचार-पत्रोंके सवाददाताओंने चार विभिन्न
स्थानोंसे सवाद भेजा है, कि मैंने आज लेनिनको अमुक स्थानपर
व्याख्यान देते देखा। यही नहीं, उन्होंने अपने व्याख्यानमें क्या
कहा, यह भी लिप मारा था।
महात्मा गांधीके विषयमें भी भारतवर्ष में ऐसी कितनीही
अफवाहें नासमझ लोगोंने उडादी थीं, परन्तु वे तो अफवाहें थीं।
उनपर कोई विश्वास करता या नहीं करता
कोई प्रमाण तो
नहीं था। पर मोशिये लेनिनके विषयमें जिन संवाददातागोंने
.

मुस्तफा कमाल पासा Steprmy ऐसी बातें लिखी और वे समाचार-पत्रोंमें प्रकाशित भी कर दी गयी, उनका अन्तमें जव भण्डा-फोड हुमा, तव चारों या कम से. कम उनमेंसे तीनकी सचाईका तो दुनियाको पता लग गया। साराश यह, कि इस तरहके कितनेही भ्रान्ति-उत्पादक तथा झूठे समाचार संघाद-पत्रोंकेसवाद-दाताओंकी गलतीसे प्रकाशित हो जाते हैं। परन्तु सत्यका सूर्य मिथ्याके बादलोंकी आडमें तभीतक छिपा रह सकता है, जनतक सत्यताको प्रकट करनेवाली तेज हवाका झकोरा उसे उडाकर दूर न हटा दे। अवतक मुस्तफा कमाल पाशाक जोवनके विषयमें जो सवाद भारतवर्षमें आये हैं, उनके भेजनेवाले सर टीन शेड, मि० चेयर प्राइस, मैडेम यर्थी जार्जेज गालिस और फुस्तुनतुनियाके एक सुप्रसिद्ध दैनिक पत्रके सम्पादक और कोलम्बिया युनिवर्सिटीके प्रेजुयेट मुहम्मद अमीन साहव आदि कई बडे-बडे नामी और यश- स्यो लेखक हैं। मुस्तफा कमाल पाशाके आश्चर्यजनक कार्यों का समाचार पाठ करके उनके जीवन के विषयमें जाननेकी इच्छा प्रत्येक मनुष्य को हो सकती थी। यह मित्कुल स्वाभाविक था। सज्जनोंके द्वारा हम भारतवासियोंको मुस्तफा कमाल पाशाके जीवनके विषयके वे संघाद प्राप्त हुए हैं, घे हमारे धन्यवादकेही भाजन हैं। उनको भिन्न भिन्न रिपोटों में सामान्य विभिन्नता मागयी है सही मोर उस विमिन्नतासे अनायासही भ्रान्ति भी उत्पन्न होती है, पर यह भ्रान्ति भी समय आनेपर मापही आप अत जिन पाजी गुस्तफा कमाल याशा Gorn दूर हो जायेगी और दुनियाके आगे मुस्तफा कमालके सन्वे जीवनका चित्र जिंच जायेगा। शरीरका गठन मुस्तफा कमालपाशाका शरीर सुन्दर और सुडौल है। इनका शरीर न तो स्थूलही है और न अत्यन्त कृश। सव अग हष्ट- पुष्ट और पेशियाँ गठी हुई हैं। चेहरेपरकी हलियां उभरी हुई है। आँने नीली और नुकीली हैं। इनके वाल साफ-सुथरे, कोमल और भूरे रहफे हैं। मूछे छोटो और सुन्दरता पूर्वक उँटी हुई हैं। इनका कद न बहुत छोटाही है, न बहुत लम्बा , शरीरके मुताविक और मझोला है। भुजाएँ लम्बी और उँगलियाँ पुष्ट है। 8 सामरिक प्रवृत्ति - 'होनहार विरवानके होते चिकने पात' वाली कहावतको अक्षरश सत्य प्रमाणित करनेके लियेही, मानों कमाल पाशा में धाल्यकालसेही सामरिक प्रवृत्ति देखी जाती थी। अपने बचपनसेही वे बहे चीर पूजक थे। कहते हैं, ये जव आठ दस वर्षके सुकुमार बालक थे, तभीसे गलियों में रास्तोंमें खेलते समय जव तुर्क-योद्धाओं, सैनिकों और खासकर सैनिक अफसरोंको देखते थे, तो उनकी वीर वेश भूपा देख-देखकर ये मन ही मन मुग्ध हो जाते थे। इनकी इच्छा होती कि मैं भी ऐसाही . ८

am
सुमुस्तफा कमाल पाशा
धनूं। दुनिया देख रही है, कि वे जैसा बनना चाहते थे,
सचमुच वैसेही बन गये हैं।
आज
- स्वदेश-प्रेम -
जव चे कुस्तुनतुनियाके सैनिक-विश्वविद्यालयमें भर्ती हुए,
तभीसे उन्हें अपने देशको राजनीनिक परिस्थितिका ज्ञान उत्तरो-
त्तर वृद्धि-प्राप्त होने लगा। शासनके दोप दिखाई देने लगे।
शासकोंको बद-इन्तजामी और लापरवाहोसे देश किस भयङ्कर
सङ्कटके समीप पहुँचता चला जारहा है, यह रात भी उन्हें मालूम
होने लगी।
मनुप्यके हृदयपर किसी रडे से बड़े नेता और उपदेशकके
उपदेशोंके या बड़े से बड़े विद्वान् द्वारा लिखित पुस्तकोंके अध्य.
यनसे जो असर नहीं पडता, यह स्वानुभव द्वारा पडता है।
स्वदेश प्रेम और स्वदेशका उद्धार करनेका भाव भी मनुष्यके
हृदयमें अपने ऊपर कष्टों और मुसीबतोंके आनेसे जिस मात्रामें
उद्दीपित होता है, उस मात्रामें किसी बड़े भारी स्वदेश प्रेमीके
व्याख्यानोंसे नहीं होता। कमाल पाशा पाल्यकालसे मुसीयतोंकी
गोदमें पले हुए थे , इसलिये देशकी परिस्थितिको वे भली भांति
समझ रहे थे।
--
808 क्रांतिकारी विचार
क्रमश जर इन्हें अपने देशकी दुरवस्थाका और उसपर आने-
-

, मुस्तफा कमाल पाशा वाले भावी सङ्कटका सम्यक् शान हो गया, तब उसका प्रतिकार करनेके लिये उपाय सोचने लगे। ऐसी अवस्था में मनुष्यको स्वमा. वत जो क्रान्तिकारी उपाय समता है. वही इन्हें भी सूझा । उन्होंने क्रान्ति-सम्बन्धी कई पुस्तकें भी पढी थीं। कई जन्त की हुई पुस्तकोंके साथ साथ 'वतन' नामक एक नाटक भी पढ़ा था। इस पुस्तकका इनपर घडा असर पड़ा । अन्तमें अपने देशमें भी क्रान्ति करनेपर वे आमादा हो गये और अपने अभीष्टकी सिद्धिके लिये कान्ति करनेका क्षेत्र तैयार करने में लग गये। इस समय सुल्तान अब्दुल हमीद खां द्वितीयका शासन था, यह हम पहलेही कह आये हैं। प्रजावर्ग शासकों और अधिका- रियोंकी स्वेच्छाचारितासे आरो आ गया था। प्रजापोडक साम्राज्यवादी शासक अपने विरोधियोंका दमन करनेके लिये जो उपाय करता है, सुल्तान अब्दुल हमीदने भी वैसेही उपाय रच रखे थे। क्रान्ति और जन सत्ताके इस वर्तमान युगमें वे अपनी एक- छत्र शक्तिको कायम रखना चाहते थे। सुल्तान अब्दुल हमीद भी, उन अहम्मन्य सत्ताधिकारियोंकी तरह, जो वर्तमान युगके बढते हुए प्रवाहकी ओरसे अपनी आय मूंदकर गये-गुजरे जमानेके खम देखते हैं, यह समझते थे, कि वे अपने गुप्तचरोंकी सहायतासे टीमें क्रान्ति और जन-सत्ताकी लहरको रोक लेंगे। परन्तु जब किसी देशमें स्वदेश प्रेमकी जागृतिको नदीम आजाती है और लोकमतका प्रवल प्रभजन . - गुस्तफा कसाल पाशा om देता है, तब फिर उसे रोकनेके लिये कौन आगे बढनेकी हिम्मत कर सकता है ? जो कोई उसके मार्गमें विघ्न डालनेके लिये आ खडा होता है, वह करारपरके वृक्षको तरह जड मूलसे उखड कर सदाके लिये विनष्ट हो जाता है। रूसके अत्याचारी जारकी जो दशा हुई, वह ससारकी आंखोंके सामने इस बातका एक प्रत्यक्ष प्रमाण है-एक तरोताजा नजीर है अस्तु ; सुल्तान अब्दुल हमीदने भी इस प्रतिघातिनी शक्तिको अन्यान्य स्वेच्छाचारी शासकोंकी तरह दया देनेकी चेष्टा की थी। तमाम टीमें उनकी खुफिया पुलिसका जाल फैला हुआ था, तथापि क्रान्तिके भावोंको फैलानेवालोंके उद्योगको दबानेमें वह असमथही रहा। ।

क्रान्तिकारी कमाल
हक
।
* अध्ययन-कालके कार्य
स्तफा कमालका कुस्तुनतुनियाके विद्यालयका अध्य
अयन अभी समाप्त नहीं हुआ था। प्रेजुयेट होने और
दिप्लोमा पाने में अभी और कुछ दिन वाफ़ी थे। इसी समय मुस्तफा
कमालने अपना फ्रान्तिकारो विचार दृढ कर लिया और उसके
अनुसार काम शुरू कर दिया। उन्होंने यह संकल्प कर लिया,
कि पड्यन्त्र करके टकीकी वर्तमान सरकारको पलट दिया जाये।
उद्देश्य स्थिर हो जानेपर उन्होंने कार्यमें हाथ लगाया।
सबसे पहले उन्होंने अपने कई मित्रोंसे अपना इरादा जाहिर
किया। इनके साथी समाजी और मित्रोंपर पहलेसेही इनकी
धाक जमी हुई थी। वे इनकी वही इज्जत करते थे। अत घे
इनकी वाते मान गये।
सवको रायसे एक गुप्त सस्था स्थापित की गयी। इस
संस्था द्वारा सर्व-साधारणमें स्वतन्त्रता और प्रजा-सत्ता आदि
का भाव जागृत करनेके लिये, लोकमत अपने पक्षमें बनानेके
लिये, प्रजा और राजाके अधिकार समझानेके लिये, प्रजाके
स्वत्वपर शासकोंकी दस्तन्दाजी करनेकी बातें प्रकट करनेके लिये

किमुस्तफा कमाल पाशा और प्रजा सत्तात्मक शासन स्थापित करनेके उपाय बतानेके लिये एक समाचार-पत्र प्रकाशित किया। इस गुप्त सस्थाके सभापतित्व तथा उसके मुख पत्रके सञ्चालक और प्रधान सम्पादकका कार्य भार मुस्तफा कमालने स्वय ग्रहण किया। कुछ दिनोंतक यह कार्य बहे जोरो से चलता रहा। सर्वसाधारणमें इस समाचार पत्र द्वारा एक नवीन जागृतिका भाव आने लगा। इधर मुस्तफा कमाल अपनो कार्य-सिद्धिके लिये अपना कार्य बडो योग्यता और सफलताके साथ कर रहे थे। उधर सुल्तान- के गुप्तचर इस गुप्त सस्या और उसके मुख-पत्रके संचालकों और लेखकोंको खोजमें फिर रहे थे। मुस्तफा कमाल इन खुफियोंका हाल अच्छी तरह जानते और सदा अपने कार्य बडी सतर्कता और सावधानताके साथ करते थे। चालाक और सतर्क थे तो, ये खुफिये भी बडे काइयाँ थे। उन्होंने पता लगाकरही छोडा। पर पहले कोई गिरफ्तार नहीं किया कमाल अगर जा सका। कुछ दिनों याद सरकारकी बोरसे स्कूलके अधिकारियोंके नाम एक चेतावनी आयो, कि 'स्कूलके कुछ लहके राज विद्रोहा- त्मक कार्यमें सम्मिलित हो रहे हैं, अतएव उन लडकोंका पता लगाया जाये और पता लगनेपर उन्हें दण्ड दिया जाये।' सायही भविष्यमें ऐसा आचरण करनेवाले विद्यार्थियोंको कठोर दण्ड देनेकी धमकी भी दी गयी थी। -

.
प्रगामी
मुस्तफा कामाल पाना Var
यह सब कुछ हुआ, परन्तु मुस्तफा कमालका काम इन
धमफियों और चेतावनियोंसे भला कय रुकनेवाला था? उन्होंने
और भी सतर्कताके साथ अपना काम जारी रपा। उनके अदम्य
उत्साह और अवाधित गतिमें कौन रुकावट डाल सकता था ?
अध्ययनके पश्चात्
रूमकी राजधानो कुस्तुनतुनियाके सैनिक विश्वविद्यालयने
मुस्तफा कमालको सेना नायकका पद प्रदान किया। सेनामें वे
"लेफ्टिनेण्ट" बनाये गये। इस समय उनकी अवस्था केवल २२
वों की थी। सेनामें प्रवेश करनेपर भी इन्होंने अपना गुप्त
आन्दोलन जारी रखा। अपने अध्ययनकालमें इन्होंने जो गुप्त
समिति स्थापित की थी, अब स्तम्योलमें उसका सदर मुकाम
कायम करके काम करना शुरू किया।
खुफिया विभागवाले पहलेसेही इनके पीछे पड़े हुए थे। उन.
मेंसे एक इनके साथ हो लिया और वरावर इनके साथ रहकर
सय कामोंको अच्छी तरह देख लिया। इसी खुफियाने इन्हें
तथा उस गुप्त समितिके कई अन्यान्य सदस्योंको एक दिन गिर
फ्तार करा दिया।
कहते हैं, जिस दिन इन्हें विश्व विद्यालयका डिप्लोमा
अर्थात् सैनिक शिक्षामें उत्तीर्ण होनेका प्रमाण पत्र मिला, ठीक
उसो दिन यिल्डीजसे एक सरकारी पत्र भी मिला। इस पत्र द्वारा
मुस्तफा कमाल यिल्डीज बुलाये गये और यहीं उनपर, मामला
-
म
-

, उद्देश्यले यिरत नहीं हुए। यहाँ भी उन्हें अपनेही समान उद्देश्यों. मुस्तफा कमाल पाशा चलाया गया। इनके राजद्रोही साबित होनेपर ये जेलमें ठूस दिये गये। यहाँ ये एक काल कोठरीमें बन्द कर दिये गये । इसी काल कोठरीमें इन्हें लगातार तीन मासतक रहना पड़ा। इस परिस्थितिमें यदि मुस्तफा फमालके बदले और कोई आदमी होता, तो सम्भव था, कि वह अपना विचार बदल लेता। पर मुस्तफा कमालका मस्तिष्क इन कठिनाइयोंसे डावा. डोल होनेवाला न था। वे जैसी दृढताके साथ पहले कार्य करते थे, अब भी-फारागारमें आवद्ध होनेपर भी-उसी प्रकार- को स्थिरमतिसे अपने पूर्व निर्दिष्ट अभीष्टकी सिद्धिकी ओर अग्रसर - निर्वासित अवस्थामें - अस्तु ; तीन महीनेतफ फाल कोठरी में आवद्ध रपकरही टी-सरकार शान्त नहीं हुई। उसने सन् १६०२ में उन्हें देश- निर्वासनका दण्ड देकर सीरियाके एक एकान्त प्रदेशमें भेज दिया और समझ लिया, कि अरबला टल गयी । परन्तु युवक कमाल जैसे “कार्य यासाधयेम् शरीर वा पातयेम्" की नीतिके अनुसार चलनेवाले टूढ प्रतिज्ञ मनुष्यके सहायक जगदीश्वर हुआ करते हैं। यहाँ, उस एकान्त सुदूर विदेशमैं भी, मुस्तफा कमाल अपने होनेको प्रस्तुत - . फा एफ भादमी मिल गया। यह यादमी भी राजनीतिक अप- गाजी । मुस्तफा कमाल पाशा Gram वहाँके गवर्नरसे तो विशेष कुछ सहायता नहीं मिली, पर इतना अवश्य हुआ, कि ये कुछ दिनोंतक वहाँ गुप्त भावसे रह सके। प्रायः आठ महीनेतक इनपर किसीकी दृष्टि नहीं पडो। जिस समय ये सैलोनिका पहुंचे, उस समय वहाँ टर्कीकी सरकारको वदलदेनेके लिये बहे जोरोंका आन्दोलन चल रहा था। कुछ राज-विप्लवो नवयुवकोंको सहायता पाकर इन्होंने यहाँ भी अपना काम जारी कर दिया , पर इस बार भी ये अधिक दिनोंतक अपना कार्य न कर सके। क्योंकि गुप्त भावसे कवतक रह सकते थे? अन्तमें भेद खुलही गया और इन्हें सैलोनिकाका काम स्थगित रखकर वहाँसे हट जाना पड़ा। परन्तु इसी समय इनके कई मित्रोंके वीच विचाचमें पड जाने- के कारण इनके अपराध क्षमा कर दिये गये और इन्हें फिर अपना सेना-नायकका पद भी मिल गया। अब ये कुस्तुनतुनिया, रहने लग गये। यहाँ ये “अन्जुमने इत्तहाद व तरकी" अर्थात् "ऐक्य और उन्नति" नामक सम्थामें मिलकर कार्य करने लगे। कहते हैं, कमाल पहले इस मस्याके विरुद्ध थे, पर अपना काम बनने देख, वे अपना पूर्व-विरोध भूलकर इसी सस्थाके साथ सम्मिलित होकर कार्य करने लगे। परन्तु मुस्तफा कमाल अपने लक्ष्यसे, कभी-किसी अवस्थामें भी-च्युत होनेवाले न थे। एक बार वे जिस कामको करनेके लिये खडे होजाते, करके ही छोडते थे। इसो “अन्जुमने इत्तहाद व तरकी," नामक संस्थाको सहाय- उले पूरा w गाजी मुस्ताफा कमालपाशा तासे सन् १९०८ ई० की राज्य क्रान्ति हुई थी। यह राज्य क्रान्ति "रक्त शून्य-क्रान्ति' कहलाती है। इस क्रान्तिमें, अनवर पाशा, जमाल पाशा और 'फतही वे भी सम्मिलित थे। इस क्रान्तिका परिणाम यह हुआ, कि सुल्तान अब्दुल हमीद द्वितीय सुल्तानके पदसे अलग कर दिये गये और एक प्रकारको राष्ट्रीय पालीमेपटकी संस्थापना हुई। अब्दुल हमीदके छोटे भाई मुहम्मद खामिस (पांचवे) सुल्तान बनाये गये। यद्यपि' इस क्रान्तिके द्वारा राष्ट्रीय पार्लमेंटकी स्थापना हो गयो, तथापि उससे मुस्तफा कमालके विचार पूर्ण नहीं हुए, उनका अभीष्ट सिद्ध नही हुआ। इसका कारण यह था, कि अय टकी के शासनकी याग-डोर सुल्तानके हाथोंसे निकलकर अनवर पाशाके हाथमें आगयी। मुस्तफा कमालका जो अभीष्ट या, वह सिद्ध नहीं हुआ और अनवरने शासन सूत्र अपने हाथोंमें लेलिया। इस कारण स्वभावत अनवर पाशा और मुस्तफा कमाल पाशामें बनती नहीं थी। अनवर प्रधान युद्ध सचिर हुए। वे जो चाहते, कर देते। अनवरकी तूतो इस प्रकार घोलनो देस, मुस्तफा कमाल अत्यन्त दुःखित हुए। पर वे निराश होनेवाले जीव न थे, यतघे अपने उद्योगसे विरत नहीं हुए।

सेनापति कमाल - योग्य सेना-नायक 88- जक योग्य सेनापतिमें जितने गुणोंकी आवश्यकता होती है, वे सब मुस्तफा कमालमें पूर्ण मात्रामें विद्य- मान है। सेनापर शासन करते समय उसे किस प्रकार अपने कर्तव्यका ज्ञान कराया जाता है, स्वदेश-प्रेमकी उत्तेजना किस प्रकार प्रत्येक सैनिकके हृदयमें भर दी जाती है, किस प्रकार प्रत्येक सैनिक द्वारा अपने नायककी आज्ञाका पालन कराया जाता है और सेनाके अन्दर क्या-क्या दोप होते हैं तथा उन्हें दूर करनेके लिये कैसे उपायोंका अवलम्वन करना चाहिये-ये सब बातें कमाल बहुतही अच्छी तरह जानते हैं। इसीसे इनके अधिकारमें जर जो कुमुक या सेना-विभाग दिया गया, नव सबसे पहले इन्होंने उसे सब प्रकार योग्य और कार्य-कुशल बनानेपर विशेष लक्ष्य रपा । जव सरसे पहले इन्हें सेना विभाग शिक्षा देनेके लिये मिला, तर इन्होंने पहले उसके समस्त दोषोंको निकाल डाला और तब उससे काम लिया। सन् १६०८ की राज्य क्रान्तिके समय मुस्तफा कमालने अपने सैनिकों द्वारा जो आश्चर्य जनक कार्य कर दिसाये, उन्हें देखकर-टकीके --00-

मुस्तफा कमाल पाशा।
मनापति कमाल।
Burman trans, Calcutta

ا मुस्तफा कमाल पाशाको यडे-बूढ़े सेनापतियोंने भी दांतों उँगली फाटी थी। इनकी योग्यता, दृढता और वीरताको देखकर इनके विरोधियोंको भी इनकी प्रशंसा करनी पड़ी थी। सन् १९१० में टकोंके समर-सचिरकी आमा पाकर ये फ्रान्स गये थे। यहाँ इनके मित्र फतही रेटकोंकी ओरसे सैनिक राज- । मुस्तफा कमाल यहाँ सैनिक परामर्श-दाता होकर गये थे। इस पदपर भी उन्होंने अपनी योग्यता प्रदशित की थी। मडेम गालिम उनकी स्मरण शक्तिको प्रशंसा करती हुई कहती है, कि 'ये उस समय केवल तीन महीनेतक फान्सफी राजधानी पैरिसमें रहे, परन्तु इन्हें आज भी फान्नके लोगोंकी रहन सहन, उनके खयाल आदिको यातें पूय याद है। सेना नायकके लिये यह भी एक अत्यावश्यक गुण है। - तरावलीसके कार्य - यूरोपीय महायुद्धके भारम्भ होनेके प्राय ३ वर्ष पहले अर्थात् सन् १६.१ ३० में इटलीने तरावलोस (ट्रिपोली ) पर चढाई की। तुर्कीको सरकारने अर्गे और वहां रहनेवाले तुर्कोकी रक्षाके लिये अपने यहाँसे कुछ सेना और कई सैनिक अफसर भेज दिये । इन फौजी अफसरोंमें मुस्तफा कमाल भी एक थे। उस समय ये मुस्तफा कमाल ये कहलाते थे। मुस्तफा कमालने देसा, कि टीसे जितने सैनिक थाये

read
।
A
.
-
मुस्तफा क्रसरूपाशा
है, वे भी अधिक दिनों तक यहां नहीं रह सकते। इसलिये
उन्होंने यह विचार किया, फि अयोको ही एक अच्छी शिक्षित
सेना तैयार कर दी जाये। यह विचार फर उन्होंने माँको एकत्र
फरना आरम्भ कर दिया और कुछही दिनोंके अन्दर अोंकी
इस नव संगठित सेनाको कवायद सिपायी, नवीन अस्त्र-शस्त्रोंका
प्रयोग सिखाया और युद्ध-नीति की शिक्षा दी।
इस प्रकार बहुतही अल्प समयके भीतर, उन्होंने अशिक्षिन
अलंकी इस सेनाको वर्तमान सामरिक शिक्षा देकर ऐसा
सुशिक्षित और सुसंगठित बना दिया, कि सब लोग उसे देखकर
हैरतमें आ गये। इनकी इस अद्भुत संगठन-शक्तिको देख, टर्कीकी
सरकार तथा अन्यान्य युरोपीय देशोंने मुक्त कण्ठसे इनकी
योग्यताको प्रशसा की।
जवतक यहांकी सेना अशिक्षित रही, तबतक तो इटली
वाले अर्थीको दबाते गये और बहुतसे अशॉपर अपना अधिकार
जमाते गये; परन्तु जब वही सेना मुस्तफा कमाल द्वारा सुशि
क्षित बना दी गयी, तय इटलीको पद-पदपर कठिनाइयोंका
सामना करना पड़ा। यहांतक कि अन्तमें उसे पीछे हटना पडा
और कई अधिकृत स्थानोंको गली भी कर देना पडा।
-08दर्रे-दानियालके कार्य gram
सन् १९१४ में यूरोपीय महासमर आरम्भ हुआ।,
जर्मनी
बीच-बीच में टीकी सहायता करता आरहा था। इस लिये जव
।

K । मुस्तफा कमाल पाशा उसने टर्की से इस युद्ध में सहायता मांगी, नो टकी को उसकी सहायता करनी ही पड़ी। मुस्तफा कमाल पहलेसेही इस युद्धमें टकी के शरीक होनेके निरुद्ध थे, क्योंकि ये इससे रूम-साम्राज्यकी कोई भलाई नहीं देखते थे। वे टकों का निरपेक्ष रहनाही श्रेयस्कर समझते थे। इस समय अनवर पाशा टकों के प्रधान युद्ध सचिर थे। वे रूमको लेकर जर्मनोके पक्षसे महायुद्धमें शरीक हुए । मुस्तफा कमालने उन्हें बहुत मना किया। जर उन्होंने मुस्तफा कमालकी वात न मानी, तो उन्होंने रहे कडे शब्दोंमें उनके इस कार्यका विरोध किया बलकान युद्धके वादहोफतही '' सेनापतिका काम छोडकर सोफिया टर्की के राजदूत होकर चले गये। मुस्तफा कमाल भी उनके साथ मामरिक परामर्श दाता होकर सोफिया गये थे। तबसे असतक वे सोफियामें ही थे। मुस्तफा कमालने जर देवा, कि मेरे विरोध करनेका कुछ फल न हुआ, तब उन्होंने अपने पदसे इस्तेफा दे दिया गौर कुस्तुनतुनिया लौट आये। यहां आनेपर अनवर पाशाने, उन्हें दरैदानियालमें सेना संगठन करने और मोर्चावन्दी कायम रखनेकी माज्ञा देकर रैदानियालके युद्ध क्षेत्रमें भेज दिया। इस विषयमें कुछ अंगरेजी पत्रोंके संवाद दाताओंका कहना है, कि अनवर पाशा, मुस्तफा कमालको देख नहीं सकते थे। वे चाहते थे,कि कितो तरह मुस्तफा कमाल मर फट जाये । इसीसे .

son
मुस्तफा कमाल माशा
दरें-दानियालकी कठिन किले वन्दीके कामपर उन्होंने मुस्तफा
कमालको उनकी इच्छाके विरद्ध भेज दिया। परन्तु कुछ मुसल.
मान पत्र सम्पादकों और विद्वानोंका कहना है, कि यह घात.विल
कुल गलत है। वे कहते हैं, कि अनवर पाशा और कमाल पाशामें
भलेही किसी विशेष वातका मतभेद हो, पर वे एक दूसरे के
दुश्मन नहीं हैं। अनवर पाशाने मुस्तफा कमालको -दानियाल.
के उस कठिन मौकेपर इसलिये भेजा था, कि वे यह बात अच्छी
तरह जानते थे, कि सिवा कमालके और कोई उन कठिनाइयोंका
सामना नहीं कर सकता है।
दरे-दानियालके इस युद्धमें जर्मन जनरलों और अनवर
पाशाकी एक राय रहती थी, पर कमालकी राय इनसे नहीं
मिलती थी। जर्मन जेनरलों और अनवर पाशाकी राय थी, कि
मित्र राष्ट्रोंकी सेनाको आगे बढ़ने दिया जाये और जब वे धीचमें
आजाये, तब उनपर घेरकर आक्रमण कर दिया जाये। परन्तु
कमाल ऐसा करना उचित नहीं समझते थे। वे अपनी वातपर
अड गये और उन्हें शुरूमें ही रोक दिया।
जर्मन सैनिक अधिकारियों और अनवरके लाख कहनेपर
भी वे अपनी यातसे नटले। इसपर जर्मन अधिकारी तथा अनवर
उनसे विगड पढे हुए, परन्तु उनकी अधीनस्थ सेनाने उनका
माथ न छोडाघे बरावर उन्हींकी बात मानते रहे।
मुस्तफा कमालने यहाँ अनारकोटा स्थानमें अंगरेज फौजको
इस बहादुरीके साथ हराया, कि अनवर और जर्मन अधिकारी

मुस्तफा कमाल माशा com
लोग हैरतमें आगये । इस युद्ध में इन्होंने यह एक विशेषता
दिखायी, कि इनकी ओरके बहुतही कम सैनिक काम आये और
अँगरेज फौजको बुरी तरह हार खानी पड़ी।
इस युद्धमें उन्होंने अपने सैनिकोंकी जाने वडी खूपीके साथ
चचायी और उनकी निगगनी बराबर इस तरह करते रहे, जैसे
पिता अपने पुत्रकी देख-भाल करता है।
इसी कारण तमाम सैनिकोंमें उनकी प्रशसा फैल गयी।
सन सैनिक सदा मुस्तफाकोही चर्चा करने लगे। पहले मुस्तफा
कमालने यह बात छिपा रपी , परन्तु उनके कुछ न कहनेपर भी
भला यह बात छिप कैसे सकती थी ? तमाम तुर्की सवाद पत्रोंमें
उनकी इस वीरताकी बातें प्रकाशित हो गयीं। तभीसे मुस्तफा
कमालको अंगरेजी सवादपन "डिफेण्डर आफ-दी डार्डेनलीज"
अर्थात् " दरें-दानियालके रक्षक" कहने लगे।
इस युद्धमें मुस्तफा कमालके अधीन १६०००० सैनिक थे।
जो सेना-नायक इतने सैनिकोंको सुचार रूपसे अपनी आशाके
पशवी बनाये रख सकता है, जो इस प्रकार शत्रुओंको हराकर
भी अपनी प्रशसाकी परवा नहीं करता है, वह कोई मामूली
सेनापति नहीं गिना जा सकता।
११ रूसियोंसे
मात्म प्रशंसी जर्मन सेनाध्यक्षों तथा अनवर पाशाने जब देखा,
कि दरेंदानियालकी जैसी कठिन लडाईमें और अपनी जिद्द कायम
युद्ध -

मुस्तफा कमालयाशा
रखकर भी मुस्तफा कमाल विजयही प्राप्त किये जारहे हैं, तव
उन्हें वहाँसे हटाकर टीके उत्तरी भागमें, ककेशियन सीमापर
रूसियोंके साथ लडने भेज दिया।
परन्तु कमालकी तकदीरने वहाँपर भी उसका साथ न
छोडा छोडती कैसे? जो आदमी अपनी तदवीरोंसे अपनी
तकदीरको, जिधर चाहे उधर घुमा देनेकी ताकत रखता है,
उसके पास तो तकदीर येचारी हाथ बांधे पडी रहती है !
वहां पहुंचकर उन्होंने बडी सफलताके साथ रूसियोंका
सामना किया। वहां जाकर उन्होंने मुसल्मान फौजका अच्छी
तरह सङ्गठन किया और पीछे हटते हुए रूसियोंको और भी
पीछे हटाकर अपना पाया मजबूत कर दिया।
सद पद-त्याग
महायुद्धके समय जर्मन-प्रधान सेनापति वान फालकेनहेन
तुर्को की सहायताके लिये टर्की आया हुआ था। इसने शाम.
में तुर्कीकी रक्षाके लिये सेनापतिका पद ग्रहण किया। इसकी
युद्ध नीति मुस्तफा कमालको पसन्द न थी। वह जिस चालसे
चलता था, उसका परिणाम टीके लिये अच्छा न था, यह बात
मुस्तफा कमाल अच्छी तरह जानते थे।
वान फालकेनहेनने
अँगरेजोंसे वागदाद पुन छीननेका हठ फिया
पाशाने
उसकी बात मान ली। यह देख, कमालसे ग.
पहले इसका विरोध किया. पार उन

am
न कमुस्तफा कमाल पामा
अनवरने उनकी एक भी न मानी। उन्हें फिर एक बार अपनेको
नीचा देखना पड़ा
उनके मनमें घडी ग्लानि उत्पन्न हुई।
उन्होंने अपने पदसे इस्तीफा दाखिल कर दिया।
अनवर पाशाने, जो इस समय टीकी सरकारका हर्चा कर्ता
हो रहा था, मुस्तफा कमालके पद-त्याग पत्रका भी कुछ
खयाल नहीं किया। बल्कि उन्हें अलप्पोंमें जाकर रहनेका हुक्म
दे दिया। यह भी एक प्रकारका निर्वासन-दएड था।
र भविष्यवाणी
२० सितम्बर सन् १९१७ ई० को अलप्पो स्थानसे ग्राण्ड घजीर
तलात पाशा और समर-सचिव मनपर पाशाके पास मुस्तफा
कमालने जो रिपोर्ट भेजी थी, उसमें उन्होंने टर्कीको परिस्थितिका
इस प्रकार वर्णन किया था
"इस महासमरमें टीके शरीक होनेके कारण टर्कीको
आन्तरिक परिस्थिति दिन य-दिन खराब हुई चली जा रही है।
शान्तिप्रिय और साधारण प्रजाजन टकीको सरकारसे अत्यन्त,
असन्तुष्ट हो रहे हैं और वे सरकारसे कोई सम्बन्ध रखना नहीं
चाहते। बाहरवाले, जो रूम-साम्राज्यके अन्दर आकर बस गये
है, घे भी तरह कर उठे हैं। उनके बाल-बच्चों और धूढोंको
भोजन मुहय्या नहीं किया जारहा है। प्रजाजन सरकारकी इस
बदइन्तजामीसे उसके विरुद्ध पडे होनेको तुल गये हैं।
"असैनिक सरकारका दृढ होना नितान्त आवश्यक हो रहा
-७७--

,
मुस्तफा कमाल पाशा orm
रखकर भी मुस्तफा कमाल विजयही प्राप्त किये जारहे हैं, तब
उन्हें वहांसे हटाकर टीके उत्तरी भागमें, ककेशियन सीमापर
रूसियोंके साथ लडने भेज दिया।
परन्तु कमालकी तकदीरने वहाँपर भी उसका साथ ने
छोडा। छोडती कैसे? जो आदमी अपनी तवीरोंसे अपनी
तकदीरको, जिधर चाहे उधर घुमा देनेकी ताकत रखता है,
उसके पास तो तकदीर येचारी हाथ बांधे खडी रहती है।
वहां पहुंचकर उन्होंने बडी सफलताके साथ रूसियोंका
सामना किया। वहाँ जाकर उन्होंने मुसल्मान फौजका अच्छी
तरह सङ्गठन किया और पीछे हटते हुए रूसियोंको और भी
पीछे हटाकर अपना पाया मजबूत कर दिया।
की पद-त्याग
महायुद्धके समय जर्मन प्रधान सेनापति वान फालकेनहेन
तुर्को की सहायताके लिये टर्की आया हुआ था। इसने शाम.
में तुकीकी रक्षाके लिये सेनापतिका पद ग्रहण किया। इसकी
युद्ध-नीति मुस्तफा कमालको पसन्द न थी। वह जिस चालसे
चलता था, उसका परिणाम टकके लिये अच्छा न था, यह बात
मुस्तफा कमाल अच्छी तरह जानते थे।
घान फालकेनहनने
अँगरेजोंसे वागदाद पुन छीननेका हठ किया। अनवर पाशाने
उसकी बात मान ली। यह देस, कमालसे रहा न गया। उन्होंने
पहले इसका विरोध किया, बहुत तरहसे उन्होंने समझाया, पर
।

गाजी
गुस्तफा कमाल पाशा
वीचमें भण्डाफोड करते रहे । वे नहीं चाहते थे, कि जर्मन सेना-
पतियों द्वारा तुर्कोके उर्वर प्रदेशों और तीर्थस्थानोंकी रक्षा हो,
क्योंकि ऐसा होनेसे भविष्यमें टकी के लिये बुरा परिणाम
होनेकी सम्भावना थी।
4 ग्राण्ड ड्यू कसे सामना -
जर ये रूम साम्राज्यके पूर्वीय स्थानोंकी, रूसियोंके हाथोंसे
रक्षा करनेके लिये भेजे गये थे, तब इन्होंने रूसियोंके अधिकारसे
मौच और विटलिस नामक स्थान ले लिये थे। यहां रूसी सेना
ग्राण्ड ड्यू क निकोलास द्वारा परिचालित होती थी। ग्राण्ड
ब्यू क बहे जबर्दस्त सेनापति समझ जाते हैं, पर उन्हें भी
मुस्तफा कमालके आगे हार खानी पडी।
SON
-
-
-
१

गाज
मुस्तफा कमाल पाशा
है। जो परिस्थिति हो रही है, उसे सम्पूर्ण अराजकता कहना भी
अनुचित नहीं होगा। अर्थ-सङ्करको वातसे समस्त प्रजा
जनकी मति डाँवा-डोल होरही है। यदि अब भी युद्ध जारी रखा
गया, तोपरिणाम बहुतही बुरा होगा। टर्कीकी सल्तनत सदाके
लिये मटियामेट हो जायेगी। उसका नाम भी मिट जायेगा।
“अँगरेज लोग फ़िलस्तीनमें ईसाई राज्य स्थापित कर लेंगे।
जिसका फल यह होगा, कि मिश्र, स्वेज नहर और लाल समुद्र
पर भी उनका यथेष्ट अधिकार और प्रभाव रहेगा। हमारी
समस्त उपजाऊ जमीन और तीर्थ-स्थानोंपर उनका अधिकार
कायम हो जायेगा और अन्तमें टकी समस्त इरलाम-जगत्से
अलग कर दिया जायेगा।"
मुस्तफा कमालने यह भविष्य-धाणी उस समय की थी,
जव कि संसारके किसी बडे-से-बडे सेनापति या दुरदशी व्यक्तिको
भी यह परिणाम दिखाई नहीं दिया था। मुस्तफा कमालने
ये बातें इस तरह कही थी, मानों उन्हें ये परिणाम स्पष्ट दिखाई
दे रहे थे। मित्र राष्ट्रोंको विजय मानों उनको आँपोंके आगे
नाच रही थी, वे परिस्थितिको पूर अच्छी तरह समझ रहे थे।
वे देप रहे थे, कि किस तरह की शक्ति दिन-ब दिन क्षीण
होती चली जाती है।
मुस्तफा कमाल घरावर इस यातपर जोर देते रहे, कि हमारे
तीर्थ स्थानों सैनिक तुर्फ सेनापतिके अधीन रहें। साथहो धे
जर्मनीके सेनापति धान फालकनहेनके उद्देश्यका भी धीच.
--७८-
--

गामी मुस्तफा कमाल पाशा बीचमें भण्डाफोड करते रहे । वे नहीं चाहते थे, कि जर्मन सेना- पतियों द्वारा तुर्कोके उर्वर प्रदेशों और तीर्थस्थानोंकी रक्षा हो, क्योंकि ऐसा होनेसे भविष्यमें टकी के लिये बुरा परिणाम होनेकी सम्भावना थी। र ग्राण्ड ड्यू कसे सामना - जर ये रूम साम्राज्यके पूर्वीय स्थानोंकी, रूसियोंके हाथोंसे रक्षा करनेके लिये भेजे गये थे, तर इन्होंने रूसियोंके अधिकारसे मोच और रिटलिस नामक स्थान ले लिये थे। वहां इसी सेना ग्राण्ड ड्यू फ निकोलास द्वारा परिचालित होती थी। प्राण्ड ब्यू क बडे जमर्दस्त सेनापति समझ जाते हैं, पर उन्हें भी मुस्तफा कमालके आगे हार खानी पडी।

T
रस्वतन्त्र सेनापति
6 h
स्वातन्त्र्य-प्रियता
मस्तफा कमाल अपनी स्वदेश भक्ति, अपने स्वदेश प्रेम
और अपनीयोग्यताके लिये समस्त तुओंके हृदयमें घर
कर चुके थे। तमाम तुर्क उन्हें अपना वास्तविक नेता मानने लगे
थे और अपनी वीरताके लिये वे पहलेसे ही प्रसिद्धि पा चुके थे।
अलप्पोमें अपनी सरकार द्वारा निर्वासित होकर वे चुपचाप
बैठ रहनेवाले जीव नहीं थे । वहां उन्होंने कुछ नौजवान तुकोंकी
सहायतासे जर्मनोंके वारुदखानेपर एक दिन हमला किया
क्योंकि शीघ्रही वे आक्रमणकारी अगरेजोंसे मिडना चाहते थे ।
इस प्रकार उन्होंने यह दिखा दिया , कि वे न तो जर्मनोंकी
सहायता चाहते हैं और न मित्र राष्ट्रोंसेही पनाह मांगना चाहते
हैं। ये चाहते थे, कि तुकों की रक्षाके लिये खय तुर्क ही लडें ।
तुर्की के बाहरवालोंका तुर्की के अन्दर आना भी वे अच्छा नहीं
समझते थे।
चे चाहते थे, कि तुर्क अपनी स्वाधीनताको रक्षा आपही
करें, और वे किसीकी नकल करना न सीखें, न। कसीपर
भरोसा ही करें।
।
.
1

गुस्तफा कमाल पाशा
५ बर्लिन-यात्रा
मुहम्मद पांचवे, कुछ दिन पहले, जब वे टकी के युवराजकी
हैसियतसे चर्लिन गये थे, तब मुस्तफा कमाल भी उनके साथ हो
लिये थे। मुस्तफा कमालने उन्हें अपनापरिचय दिया और प्रधान
मन्त्री तलात पाशा और समर-सचिव अनवर पाशाके अधिकार
परिमित कर देने और स्वेच्छाचारिता रोकनेके लिये कहा था।
फिलस्तीनको
रण-यात्रा
इधर मुस्तफा कमाल अलगही अपना कार्य बडी तत्परताके
साथ कर रहे थे। तुर्कोंमें वास्तविक स्वदेश प्रेमकी शिक्षा देते
फिरते थे और इस तरह अपनी स्वतन्त्र शक्ति बढा रहे थे।
उधर जर्मनीकी सामरिक शक्ति क्रमश क्षीण होती चली जाती
थी। अनवर पाशा, तलात पाशा और जर्मन सेनापतिकी एक
भी न चलती थी। निरुपाय होकर उन्होंने मुस्तफा कमालकी
सहायता पानेके लिये एक और उपायका अवलम्बन किया।
जर्मन सेनापति और अनयर दोनोंने अनवरके पास पत्र भेजे
और उन पत्रोंमें उनके स्वदेश प्रेमकी बडी लम्बी चौडी प्रशंसाएँ
की और उन्हें फिर लौट जानेका भाग्रह किया। अलप्पोसे लौट
मानेपर वे फिलस्तीनके रण क्षेनमें भेज दिये गये।
पर इस समयतक फिलस्तीनपर अंगरेजोंके पैर जम चुके
थे। अव वहाँ योडीसी सेनाके साथ जाकर कमाल क्या कर
-८१-

गाजी
-
-
1
मुस्तफा कमाल पाशा
वह अपनीलाल-लाल आँखें दिखलानेसेवाज़ नहीं आया । कुचला
हुआ और बलोंसे छिदा हुआ सांप मौतके पास पहुँचकर भी
जिस प्रकार फुफकार मारना नहीं छोड़ता है, जर्मनी भी उसी
तरह फुफकार मार और फन पीट रहा था।
आस्ट्रिया हार मानकर बैठ गया था अत: उससे जो कुछ वन
पडा था, उसे मित्र राष्ट्रोंको दे-दिलाकर वह सिर झुकाकर चुप
हो गया था।
वाकी रह गया, धूढा,खुर्राट टी-वह टर्की, जिसपर तमाम
यूरोपीय साम्राज्यवादी राष्ट्र बहुत दिनोंसे आँस गडाये देख रहे
थे! आज वह भी काबूमें आगया है। फिर भला उसे छोड देना
कैसा न्याय है?
उसके भी जो प्रदेश मित्र राष्ट्रोंके हाथ आगये थे, अब उनके
वाट वपरेका सवाल खडा हुमा। मित्र-राष्ट्रॉमें ब्रिटिश सरकार के
हाथही यढिया माल लगा था। फ्रान्स और इटलीको भी अगर
मक्खन नहीं, तो कमसे कम मठा तो जरूर मिला । फिरमाथा !
मुस्तफा कमाल इस समय कुस्तुनतुनिया में ही थे ।
चे
पहलेसेही-फुस्तुनतुनियाएर मित्र राष्ट्रोंके पांव जमतेही-उनका
अभिप्राय समझ गये थे। जो आदमी टकोंफे युद्ध में शरीक होने-
का परिणाम इतने दिनों पहले कह सकता था, जब कि उसका
भविष्य निल्कुल अन्धकारमें था, वह भला मित्र राष्ट्रोंका यह
भाव कैसे नहीं समझता ?
अतएव उन्होंने झट इनका मतलब ताड लिया और सुल्तान
।

नी
मुस्तफा कमाल माशा)SSIGIm
को खुद समझाया; पर उन्होंने मुस्तफा कमालको वात न
नी। वे मानही कैसे सकते थे, जब कि उनका मन्त्रिमण्डलही
कमालके विपक्षमें था।
मुस्तफा कमालने इसी समय कुछ दिनों के लिये अपने कामसे
ट्टी लेली। धूर्त अँगरेज जासूस मुस्तफा कमालको हरकतों-
र नजर रखने लगे। वे हर समय यह देखते, कि कमाल क्या
कर रहे हैं, उनका क्या उद्देश्य है, वे कहाँ जाते हैं और किससे
मलते हैं। उन लोगोंने जो कुछ देखा सुना, उससे अंगरेज
लोगोंको बडी चिन्ता होने लगी। उनलोगोंने देखा, कि यदि
पह तुर्क युवक यहाँ रहेगा, तो सब बना-बनाया खेल गिाड
देगा। इसलिये उन लोगोंने एक और तरकीय निकाली। तुर्की
सरकारके प्रतिनिधियोंसे उसे किसी उपायसे फुस्तुनतुनियासे
बाहर हटा देनेके लिये कहा।
उनकी यह तवीर कारगर होगयी। दामद फरीदके मन्त्रि.
मएडलने देसा, कि इस मौकेपर इसे हटानेसे यह गोंदी नहीं
इटेगा। यह सोचकर उसने मुस्तफा कमालको पूर्वीय सेनाओं-
का इन्सपेर बनाकर भेज दिया।
१५ वी मई सन् १९१६ ई० को मुस्तफा कमाल सामसीर
पहुंचे। इनके पहुंचनेके ठोक २४ घण्टे पहले यूनानियोंने स्म में
प्रवेश किया था। मुस्तफा कमाल्ने ज्योंही यह यात सुनी,
स्योंही उन्हें घटा मोघ चढ आया। उन्होंने यूनानियोंने युद्ध
करने और उन्हें भगानेका निधय कर लिया। मायही उन्होंने
-

गाजी
।
मुस्तफा कमाल पाशाslrm.
तमाम राष्ट्रवादी कुस्तुनतुनियासे निकल कर मुस्तफा कमालके
पास मनातूलियामें आये। उनका सञ्चा सहयोग पाकर मुस्तफा
कमालका बल और भी बढ़ गया।
मुस्तफा कमाल पहलेसेही यूनानियोंको कई जगह शिकस्त
देचुके थे और अब उनका बल बढ जानेपर उन्होंने बड़ी सफलता
के साथ यूनानियोंपर महा भयंकर धावा बोल दिया। अब तमाम
अनातूलिया में उनका प्रभुत्व जम गया और प्रायः समस्त तुर्क
जाति उनकी ओर आशा-भरी निगाहसे देखने लगी।
88 संगठन-कार्य
टर्कीकी समस्त जनता-जो अब बड़ी-बड़ी कठिनाइयोंने
घिर रही थी, त्राहि-त्राहिकी पुकार मचा रही थी और अपनी
रक्षाके विविध उपाय ढूँढ रही थी—सहसा मुस्तफा कमाल
को इस प्रकार अपना रक्षक, सहायक और माता पाकर उनसे
आ मिली।
ऐसी परिस्थितिमें मुस्तफा कमाल समय नष्ट करनेवाले न थे।
उन्होंने एफ तरफ यूनानियोंको दयाना और दूसरी तरफ अपना
सङ्गठन-कार्य करना आरम्भ कर दिया। जिस पातको धे बहुत
दिनोंसे सोच रहे थे, जिस कामको करनेके लिये वे व्याकुल
हो रहे थे, आज वही वात, वही काम, उनके सामने खयं
उपस्थित हो गया है। उन्होंने तुरन्त राष्ट्रवादियोंका सङ्गठन
आरम्म कर दिया।
।
-कार्य
A.C

मुस्तफाम सालमाशा - राष्ट्र-वादियोंकी कांग्रेस कुछही दिनोंके अन्दर उन्होंने ऐसा उत्तम संगठन कर दिया, जिसे देखकर मित्र राष्ट्र भी भीतर ही भीतर घयराने लगे। जुलाई सन् १९१६ ई० में मुस्तफा कमालकी रायसे तुर्क राष्ट्रवादियोंकी काग्रेसकी अर्जेरूममें एक असाधारण बैठक हुई। इसमें राष्ट्रवादियोंने टर्की को सरकारसे पृथक् होकर अपने देशको रक्षाके उपायोंपर विचार किया। रिफत थे, अली फीआद और मुस्तफा कमालने कार्य क्रम सिर किया। यह कार्यक्रम केवल सभामें एकत्र होकर लेक्चर देने, प्रस्ताव पास करने और समा-मण्डपके याहर आतेही सन भुला देनेका कार्यक्रम नहीं था। यह देशके जीवन और मरणका कार्यक्रम था। हजारों सैनिकोंके खूनकी दरिया बहानेका कार्यक्रम था। मुस्तफा कमालफे सामने इस समय कई अत्यावश्यक विचार णीय प्रश्न उपस्थित थे। एक तरफ अगर थूनानियोंको खदेड भगाने और अर्मेनियोंको दवा रखनेका प्रश्न था, तो दूसरी ओर मित्र- राष्ट्रोंकी प्रपल शक्तियों के साथ सामना करनेका प्रश्न था। साथही यदि वे इस परिस्थितिम चुप रह जाते, तो टफी की चिरकाल ध्यापिनी शान्ति और स्वतन्त्रता सदाके लिये दूर हो जाती। इसके अतिरिक्त टकों की सरकार भी मित्र राष्ट्रोंके पशपती हो चुकी थी। उससेकुछ सहायता पाना तो दूर रहा, उल्टे यह राष्ट्रवादियोंफे विरुद्ध पडी होनेको तैयार थी। ऐसी परि-

गाजी
--
T
3
मुस्तफा कमाल पाशा Glim
स्थितियोंसे घिरकर भी अपना मस्तिष्क ठीक रखना और अपने
निश्चित मार्गसे विचिलित न होना, कोई मामूली बात न श्री !
परन्तु मुस्तफा, कमाल जो कुछ निश्चय कर लेते थे, उससे
विमुख होना तो वे जानतेही न थे।
इसी अर्जेकमको काग्रेसके साथ-साथ टकी की राष्ट्रीय
पार्लमेएट-तुर्कों की कौमी सरकारको भी नींव डाली गयी।
तुर्कों की नयी सरकार कायम होनेकी घोषणा भी कर दी गयी।
- सिवासकी कांग्रेस
इसके केवल कई महीने बाद राष्ट्र वादियोंकी इस नयी काग्रेस
या पार्लमेण्टकी एक और बैठक सिवासमें हुई। अर्जेज्मकी
काग्रेसमें जो बातें तय हुई थीं, यहाँ उन्हीं वातोंकी विस्तार पूर्वक
मालोचना की गयी।
इसके सिवा यहां यूरोपीय साम्राज्यवादी राष्ट्रोंकी दुरङ्गी
चालोंकी भी बडी कडी और तीत्र आलोचना की गयी।
अमे
रिकाके राष्ट्रपति प्रेसिडेण्ट विलसनकी १४ शर्तों के मित्र राष्ट्र
द्वारा पालन न किये जानेकी बात भी कही गयी और साथही
अमेरिकाको निरपेक्ष बताया गया।
तुकों के तमाम तीर्थस्थानों और अधिकारियों के पास मुस्तफा
कमालने अपनी अपील भेजी। समस्त बाहरी राष्ट्रोंके पास भी
गपनी स्वतन्त्रताका घोषणापत्र भेजा।
इन अपीलोंमें, जो मुस्तफा कमालने टर्कीकी विलायोंमें
-

AM मुस्तफा कम्मरूपाशा भेजी थीं, यह यात स्पष्ट रूपसे समझा दी गयी थी, कि राष्ट्रवादी तुर्क एक सरकारके कायम रहतेहुए, मी एक नयी सरकार कायम करना क्यों चाहते हैं ? स्म पर यूनानियोंका अधिकार करना और उससे होनेवाली भयङ्कर हानियों और उनके द्वारा किये गये अत्याचारोंका हाल, उन्हें दण्ड देनेकी आवश्यकता,दामद फरीद- की सरकारकी गलतफहमी और उसके अनुचित कार्य आदि सब बातें इन अपीलोंमें समझा दी गयी थीं। साथही वर्तमान परिस्थितिमें तुओं को अपनी स्वतन्त्रता कायम रखनेका उपाय क्या हो सकता है, यह भी बताया गया था। 88 सुल्तानसे अन्तिम अपील इन राष्ट्रवादी तुर्को ने १५ जुलाई १९१६ को सुल्तानके पास एक अत्यन्त आवश्यक अपील भेजी। इस अपीलमें मुस्तफा कमालने लिखा था "तुर्क राष्ट्र चादियोंने अपने, देशकी अपनी कोमकी आजादीको कायम रखने के लिये अपना सर्वस्व अर्पण कर देनेका निश्चय किया है। परन्तु अपना कार्य आरम्भ करनेके पूर्व, अपने स्वदेशकी रक्षाके लिये, स्वदेशके नामपर हम आपसे यह प्रार्थना करना चाहते हैं, कि आप स्वय इस विषयमें हस्तक्षेप करे और अपने शत्रुओंके बिगड़े हुए दिमागको राहपर लानेके लिये पहे हो जायें अथवा आपका जो विचार हो, उसे तार द्वारा हम लो- गोंको सूचित कर दें, ताकि हम अपना कर्तव्य निश्चय कर लें।

am । 1 जो लोग तार देनेके लिये आये थे, वे बडी देर तक सुल्तानके मुस्तफा कमाल पाशा "हम लोग आपके प्रत्युत्तरकी प्रतीक्षामे 'तार-घर के पास ठहरे हुए हैं। आप कृपाकर शीघ्र हमारी मातोंका जवाब देदी जिये। यदि हमारी उचित और न्यायसंगत आकाक्षाएँ और अभिलापाएं पूर्ण नहीं को नायेंगी, तो हम वर्तमान सरकार और मन्त्रिमण्डलके उत्तर दायित्वका खयाल छोड देंगे और अपना कार्य प्रारम्भ कर देंगे, साथही हमलोग यह भी समझ लेंगे, कि हमलोग जो कुछ करेंगे, उसके लिये टर्कीकी सरकारहो जिम्मेवर है। “हमलोग तमाम दुनियाको यह दिपा देंगे, कि उसमानिया सल्तनत या तुर्क कौममें कितना साहस, कैसी शक्तिऔर कितनी जवर्दस्त खवेशभकि भरी हुई है।" जब यह अपील तार-द्वारा सुल्तानके पास भेजी गयी, तब - - - । उत्तरकी प्रतीक्षामें तार-घरमही बहे रहे । परन्तु सुल्तान तो इस समयतक मित्रराष्ट्रोंके हाथमें आ गये थे! जवाव कौन देता। अत' निश्चित समय बीत गया। सुल्तानका कोई जवाब नहीं आया। उस, फिर क्या था ? 'या नसीव या किस्मत , या तख्त या तण्ता'-यही अन्तिम निश्चय हो गया। - सरकारी हुक्म टकींकी सरकार मित्र राष्ट्रोंके हाथों में थी। वे जो चाहते, करते। पर मुस्तफा कमालपर उनका कोई प्रभाव नहीं था। . १२- .

. NOVE मुस्तफा कमाल पारा तथापि मुस्तफा कमालके कार्याको देख देखकर माधर्यमें आते और भीतर ही भीतर घबराते थे। उन्होंने सुल्तानके द्वारा मुस्तफा कमालपर यह माना जारी करायी, कि मुस्तफा कमाल या तो कुस्तुनतुनिया लौट आयें या सेनाध्यक्षका पद छोड दें। अबतक मुस्तफा कमाल धर्माचार्यके खयालले सुल्तानका सम्मान करते थे, परन्तु अब उन्होंने उस सम्मानके भावको धा- रण करना व्यर्थ समझा ; क्योंकि अरवे सुस्तान या मुसल्मान. धर्मके गुरु नहीं, बल्कि गैर मुसल्मान राष्ट्रोंके हाथोंके कठपुतले हो रहे थे। उन्होंने सुल्तानकी वह आशा न मानी। मुस्तफा कमालके अधीन जो सैनिक थे, घे भी उन्हींकी तरफ रहे। उन्होंने अब मुस्तफा कमालकोही अपना धर्म और कर्म गुरु समझा। इसके कारण भी यथए थे। वास्तवमें इस समय मुस्तफा कमालही मुसल्मानोंके युग धर्मके रक्षक और भाचार्य- का काम कर रहे थे। - राष्ट्रीय समझौता - इसी समय तुर्क राष्ट्रवादियोंकी इस नवीन संस्थाके २० सदस्योंने एक "राष्ट्रीय समझौते" का मसौदा यनाकर टीकी पार्ल मेएटमें पेश करने के लिये दामद फरीदफे पास भेजा। टी. पाल मेएटमें जो सदस्य थे, उनमें अधिकतर लोग मुस्तफा कमा- लकी रायसे मिले हुए थे। यह देखकर उन लोगोंने समझा, कि . -६३-

गाजी
ena
.
मुस्तफाकामालपाशा
राष्ट्रवादियोंका यह समझौता टकींकी पार्लमेण्ट शायद स्वी
कार कर लेगी। यही सोचकर उन लोगोंने टकीकी पालमेण्टको
भी तोड दिया और उसके कितनेही मेम्बरोंको माल्टामें निर्वासित
कर दिया।
कुस्तुन्तुनियाके कितनेही पत्र-सम्पादक, नेता और व्याख्याता
आदि फिर भी इस समय कुस्तुनतुनियासे निकाल याहरकर
दिये गये । इस प्रकार जितने लोग निकलते थे, सब आ भाकर
मुस्तफा कमालके साथ मिलते गये।
इस प्रकार मुस्तफा कमालका दल क्रमश. बढताही गया।'
।
r
-

अंगोरा सरकार
60
फ
वह
नगरका दृश्य
वर्जेरूम और सिवासमें राष्ट्रवादी तुर्कों की जो कांग्रेस
हुई, उसके निश्चयके अनुसार अड्डोरामें तुर्कोको राष्ट्रीय
पार्लमेण्ट संगठित की गयी। एक पत्र-संवाद-दाताने
घर्त्तमान अङ्गोराका एक अत्यन्त रोचक वर्णन किया है, जिसे यहाँ
दे देना अनुचित नहीं मालूम होता। संवाददाताका फाहना है -
“अहोरा एशियाई-टकीका एक बहुत पुराना नगर है ।
पहाडोंपर, समतलसे ५०० फीटकी ऊँचाई पर बसा हुआ है।
उसका पुराना नाम अन्सीरा था लेफिन भय उसे अनोरा कहते
हैं। यहाँके निवासी प्राचीन प्रथाओंके अनुयायी हैं। पशिया-
माइनरके अन्य नगरों, यथा देवोजोन्द और समासौनपर यद्यपि
पूरोपीय सभ्यताका काफी प्रभाव पडा है, परन्तु अङ्गोरा ज्यों-
का त्यों ही बना हुआ है।'
अडोरामें घुसतेही सबसे पहले उसके करिस्तान नजर आते
हैं। ये कनिस्तान अत्यन्त प्राचीन और विशाल हैं एवं नगरके
चारों ओर फैले हुए हैं। एक अर्द्ध-गोलाकार रूपमें बढ़ते
हुए अन्तमें पहाडकी चोटियोंमें विलीन हो जाते हैं। इन
-१५
-

Gim
,
मुस्तफा कमाल मासा
फ़ब्रिस्तानोंसे घिरा हुआ नगर एक छोटे गांधकासा दिखाई।
देवा है, जिसके मस्तकपर एक दुर्ग शोभायमान है। इस दुर्गको
सफेद-सफेद मीनारें नगरकी प्राचीनता और रमणीयताको प्रकट
करती हुई दृष्टिगोचर होती हैं। नगर लगभग १००० वर्षका
पुराना है।
“यह प्राचीन रोमन और यूनानी नगरोंके खण्डहरोंपर बसा
हुआ है, जिनके चिद अब भी कहीं-कहीं दृष्टि-गोचर होते हैं।
जहाँ कहीं, स्तूप, खम्भे तथा गढे हुए पत्थर मिलते हैं, उन सब ।
पर प्राचीन रोमन अथवा लैटिन लेख पुदे हुए हैं , अभी हालमें
ही नगरके जिस हिस्सेमें आग लग गयी थी, उसमें एक रोमन
मन्दिरको छोडकर और कुछ नहीं बचा। यहां यूरोपीय पोशा
कमें याहुत कम लोग मिलते है।
“बाजारों में बडी भीड रहती है। खधरोंके कारण गलियोंमें
और भी अधिक गडबड बढ जाती है, क्योंकि कोई भी तुर्क
विना खञ्चरके नहीं चलता। एक ओर सौदागर, कारीगर, नाई,
नानवाई इत्यादि आवाज लगा लगाकर लोगोंको अपनी-अपनी
मोर खींचते हैं। दूसरी ओर लुहार लोग खच्चरोंके नाल तैयार
करनेके लिये धन कूटते हैं। कहींपर कुछ लोग वेलनसे ऊन
फैलाते मिलेंगे, तो कहींपर कुछ सफेद-सफ़ेद पदार्थो का हलवा
तैयार करते मिलेंगे। एक स्थानपर छोटेसे बाज़ारमें नीलाम
होता देप पढेगा, जिसमें एक हृष्ट पुष्ट तुर्क जोरसे चिल्लाता
मुला फर्श नीलाम करता मिलेगा।
।

* मुस्तफा कमाल माशा "याजारमें कहीं कहीं सैनिकोंके झुण्ड मिलेंगे। उनकी पोशाक सर प्रकारकी होती है-जर्मनी, अंग्रेजी, फ्रान्सीसी, रूसी इत्यादि। इसी प्रकार उनके जूते भी विभिन्न प्रकारके होते हैं। कोई-कोई तो अनेक कारतूसोंकी पेटियां यांचे मिलेंगे, परन्तु सवके मुपसे आप यूनानियोंको मार भगानेकी वात विना सुने न रहेंगे। "व्यापार-घणिज्य अत्यन्त साधारण रूपमें होता है। यद्यपि कुछ लोग विलायती सामान भी बेचते पाये जायेंगे, परन्तु मधि- कतर दूकानदार भोजन सामग्री, मोजे, जीन, पीतलके वर्तन और सस्ते गहने बेचते मिलेंगे। इनके यहांसे विशेषत सैनिक लोगही सौदा खरीदते हैं। पश्चिमीय सभ्यताकी सस्थाओंने अभी अपना महा इस शान्त, प्राचीन और पवित्र नगरमें नहीं जमा पाया। “यहाँपर फ्लप, पुस्तकालय, पुस्तक भण्डार अथवा थियेटर नहीं हैं । सार्वजनिक मतका संगठन यहाँपर गलियों और तन्दूरों- पर होता है और मौलवी लोगही सर्वसाधारणके प्रतिनिधि समझे जाते हैं। इन मौलवियोंका प्रभाव और वल अभीतक ज्यों-का त्यों- ही है । सन्ध्या होतेही बाजारों और गलियों में निस्तब्धता छाजाती है । इस निस्तधताको गलियों में घूमनेवाले फुचेही भङ्ग करते हैं।' इसी शान्तिप्रिय छोटेसे नगरमें राष्ट्रवादियोंकी पार्लामेण्ट- का बदस्तूर दफ्तर बनाया गया। महासभाका यह दफ्तर बहुत घडा नहीं है, तथापि वह परम पवित्र है, क्योंकि वह स्वतन्त्रताकी वेदी है-तुर्कों के लिये एक महान् तीर्थ स्थान है।

गाजी
मुस्तफा कमाल माशा,
.
अर्जेरूमके गवर्नर -
२५ फरवरी १९२० के बटरके एक तारसे जाना जाता है, कि
इस सुप्रीम नैशनल ऐसेम्बलीकी स्थापनाके याठ तुर्क राष्ट्र-वादि-
योंने मुस्तफा कमाल पाशाको अर्जेरुमके गवर्नरके पदपर अमि
पिक्त किया है।
व राष्ट्रवादियोंका वल *
इस समय तुर्क कौम परस्तोंका वल कितना बढ गया था, यह
लण्डनके 'टाइम्स' पत्रके एक संवाददाताके उस पत्रसे मालूम
होता है, जो उसने ८ मार्च सन् १९२० को लिखकर प्रकाशनार्थ
भेजा था। उस पत्रमें मि० वेस्टनने तुर्क राष्ट्रवादियोंके 'वल,
मुस्तफा कमाल पाशाकी अद्भुत सगठन-शक्ति और राष्ट्रवादियों
की एकताकी आलोचना करते हुए लिखा था, कि आजकल
टर्कीकी असल हुकूमत फुस्तुनतुनियामें नहीं, अंगोरा या सिवास
में है। उन्होंने यह भी लिखा था, कि यदि ब्रिटिश मन्त्रिमण्डल
या मित्र-राष्ट्र टी की सरकारसे किसी वातका निवटारा करना
चाहते हैं, तो वे पहले मुस्तफा कमालसे निपट लें।
इस पत्रसे यह स्पष्ट प्रमाणित होता है, कि कुछही दिनोंके
अन्दर राष्ट्रवादियोंका प्रभाव और यल यहुत बढ गया था
और थाहर वालोंको भी इसका अच्छी तरह अनुमव होने
।
,
लगा था।
--
-१८-

मुस्तफा कमाल पाशा र राष्ट्रीय कोष और सेना - अंगोरा सरकारके पर-राष्ट्र सचिव चक्र समी ये जव हालमें "लएडन कानफरेन्समें सम्मिलित होनेके लिये विलायत गये थे, तव लण्डनसे निकलने वाले "इस्लामिक न्यूज' नामक संवाद- पत्रके सम्पादक उनसे मिले थे। उनके पूछनेपर समीयेने कहा था, कि “अंगोरा सरकारको आर्थिक अवस्था अन्छी है, परन्तु व्यय भी यथेष्ट है। अभी ५॥ करोड पौण्डकी (अर्थात् ८२ करोड ५० लाख रुपयेकी) आय है।" सेनाका परिमाण पूछनेपर उन्होंने कहा था, कि-"वहाँ चालक, युवा और वृद्ध सभी सैनिक कार्य करना सीख रहे हैं और सदा सैनिक सहायताके लिये तैयार रहते हैं। अभी दो लाप घेतनिक और अनैतनिक सैनिक है, जो अपने प्राणोंको त्यागनेके लिये सदा प्रस्तुत रहते हैं। आशा है, शीघ्रही ऐसे सैनिकोंकी संख्या ढाई लाप तक पहुँच जायेगी, क्योंकि जहाँ जहाँ सैनिक भर्ती करनेके अड्डे कायम किये गये हैं, वहाँ- वहाँ नित्यही चीसों सैनिक स्वेच्छासे, खदेश प्रेम और राष्ट्रीय खतन्त्रताकी बलवती प्रेरणासे प्रेरित होकर भी हो रहे हैं। kr शस्त्रागारपर आक्रमण - क्षणिक मन्धिके यादसेही राष्ट्रवादी तुर्कोने असाधारण उत्साह और शक्ति के साथ काम करना आरम्म कर दिया। धीर,

1
+-
मुस्तफा कमालपाशा
स्वतन्त्र तुर्क फोम, जो वरावरसे आजादीकी हवा में सांस लेतो
चली आ रही थी, आज उसे गुलामीकी जझीरमें बाँध रखना
भला कैसे सम्मष था ? इन लोगोंने सबसे पहले मित्र राष्ट्रोंके
गैलीपोलीवाले शस्त्रागारपर छापा मारा।
यद्यपि इस स्थानपर पहलेसेही मिन-राष्ट्रोंका सैनिक पहरा था
और वे पहलेसे सतर्क भी थे, तथापि राष्ट्रवादी जवान उसपर
छापा मारकर सफल-मनोरथ हो गये ! यह कुछ कम आश्चर्य की
वात न थी, उनके इस पहले कामने मानों उनकी भावी विजयकी
सूचना उसी समय दे दी थी।
शस्त्रागारपर छापा मारकर यहाँसे ये लोग ८० हजार
चन्दूकें, ५ लाख कारतूस और तैतीस मेशीन-गनें उठा तथा
बहुतसा युद्ध सामान ले आये।
र ब्रिटिशोंकी धारणा •
११ मार्च सन् १९२० ई० को लाड कर्जनने अपने एक भाप
णमें कहा था, कि ब्रिटिश सामरिक अधिकारियोंका खयाल है,
कि मुस्तफा कमाल पाशाकी सेनाका जो परिमाण वताया जाता
है, यह बेहद तवालतसे भरा हुआ है। इस समय लण्डनमें सर्व
साधारणकी धारणा थी, कि मुस्तफा कमाल पाशाका मामना
करनेके लिये यूनानी फौजही काफी है। तुर्क राष्ट्रवादियों को
शक्ति, जो चारों ओर निखरी हुई है, अकेली किस-किस तरफ
जायेगी और किस-किसका सामना की।
।

सुतराचे धार्मिक न्यायानुसार :
सम्बन्ध विच्छेद
१२ मार्च १९२० को मिश्रा कि टन मैनिक अधिकारित
योन, जो इस समय कुस्तुननुनिया में पोर जमा चुके थे, यह
सम्भावना भी न रहे।
निश्चय कर लिया, कि कुस्तुननुनियाको डाक और तारकी
इमारतॉपर अधिकार कर लिया जाये, ताकि की सरकार
और मुस्तफा कमाल पाशाने परम्पर मवादेकि मादान यदानकी
इसी निधयके अनुस५० मार्च ११२० को मित्र राष्ट्रनि
कुस्तुनतुनियाको तमाम के और तारकमान्तोंपर अधिकार
कर लिया और इस प्रकार मुस्तफा कमाल और काफी सरकार
टकी के बाहर रहनेवाली सपमान जननाये हुदयमें इन
तुर्क राष्ट्र वादियों के प्रति, जिसमें मनानुभूतिका
होने न पाये, इसकी भी यथेष्ट वा की गयी। संसारके मागे
भी मित्रराष्ट्रोकी आवाजके साथ पहली याचार मिला दी।
बामसार गये। टको सरकारले
अपने धर्माचार्य खलीफाकी आमाका मीर
'राष्ट्रवादी तुर्कीपर किननेहो
प्रकार सबने मिलकर एक
का सम्बन्ध विच्छेद कर दिया
।
से राष्ट्रवादियोंपर इल्जाम
।
स्खा
गष्ट्रवादी
नहीं

-
Saमुस्तफा कमालयाशा
ध्येयतक पहुँचनेका मार्ग भूल सकते थे १ अन वे अपनी नीति
पर दृढ रहे।
सबसे पहले उन्होंने टी की सरकारकी ओरसे भेजे
गये सैनिकोंके दवा दिया। टर्की सरकारके दब जाने वाद अव
उन्हें सामना करना रहा, अर्मेनियों, यूनानियों, ब्रिटिशों और
फ्रान्सोंका।
अर्मे नियोंसे युद्ध र
१७ फरवरी १९२० के एक तारसे जाना जाता है, कि उन
दिनों राष्ट्रवादी तुर्को ने सलेशिया प्रान्तमें ७००० अर्मेनियोंको
कत्ल कर डाला था। अर्मेनियन प्राहि-त्राहिकी पुकार मचाते
हुए भाग रहे थे।
इसके बाद भी कई महीनेतक राष्ट्रवादी तुर्कोंकी जमायतोंके
अर्मेनियोंको वरावर खदेडते जानेकेही समाचार आये ; पर
अन्तमें ११ अक्तूबर १९२० के एक तारसे जाना गया, कि अर्मे-
नियोंने अपने यहाँ सेना भर्ती करनेका काम बड़े जोरोंसे करना
आरम्भ कर दिया था। साथही उसने अंगोरा सरकारके साथ
युद्ध करनेकी घोषणा भी कर दी थी।
२१ अकूबर १९२० के तार-समाचारसे मालूम होता है, कि
रूसी गोलशेविकोंने भो अर्मेनियोंको एक अलटिमेटम दिया था
और यह कहा था, कि 'तुम हमारे जाने के लिये रास्ता साफ कर
दो, ताकि हम तुर्क राष्ट्रवादियोंसे मिल सके।'
-१०४---

मुस्तफा कमाल पाशा १ नम्बर १९२० के एक तारमे पता चलता है, कि घोल- शेषिक अर्मेनियनोंफी ओर बढ़ रहे है और राष्ट्रवादी तुर्कोकी फौजें अलेगजेण्डियाकी ओर अग्रसर हो रही हैं। इसके याद जेनेवाके एक तारसे मालूम होता है, कि राष्ट्र- घादी तुफाने अर्मेनियाकी राजधानी भरीवानपर अधिकार कर लिया है। १० और ११ नवम्बरके कई तारोंसे मालूम होता है, कि अर्मेनियनोंने तुर्कोके साथ सन्धि फरनेकी प्रार्थना की है। अन्तमें दिसम्बरके आरम्भमें मुस्तफा कमाल पाशाकी सरकार- के साथ अर्मेनियनोंने सन्धि करली। * फ्रान्सीसियोंसे युद्ध - अर्मेनियावाले सन् १९२० ई० के अन्ततक परास्त कर दिये गये । राष्ट्रवादी तुर्कों की विजय हुई। परन्तु इससे यह न समझना चाहिये, कि तुकों की या अंगोरा सरकारकी सारी शक्ति इस सालके अन्दर अर्मेनियनोंको मगानेही सर्च होती रही। इसी समयमें तुर्क फौजोंने फ्रान्सवालोंसे भी लडाई शुरू कर दी थी। के लएडनके एक तारसे मालूम होता है, कि सलेशियामें फान्सीसियोंकी जो फौजें छावनीडाले पडी है, शायद उनपर भी राष्ट्रवादी तुर्क आक्रमण करनेकी तैयारी कर रहे हैं। ४ अप्रैलका तार है, कि सलेशियाकी परिस्थिति अच्छी नहीं दिखाई देती। फिर २८ अप्रैलके पैरिसके एक तारसे जाना जाता है, मार्च १९२० - । कना मजूर गाजी मुस्तफा कमालपाशा ram मुस्तफा कमाल पाशाकी फौजोंने फासीसियोंके ' सैनिक पडावोंको घेर लिया है। इसके बाद युद्ध होने लगा। युद्धमें फासीसी दब गये और वे भागनेको उतावले होने लगे। पहले फासीसियोंने यह चेष्टा की, कि अपना बचाव करते हुए, पीछे हट जायें। पर वे यह भी न कर सके अन्तमें फासीसियोंने मुस्तफा कमाल पाशासे लडाई रोकनेके लिये प्रार्थना की। मुस्तफा कमालने कुछ शर्तीपर लडाई से किया। झासवालोंने उनकी शतों को खीकार कर लिया और लडाई बन्द कर दी गयी। परन्तु विजेता राष्ट्र होकर एक सामान्य पराजित जाति द्वारा अपनो हार माननेको भला वह इतनी आसानीसे कैसे तैयार हो सकता था ? सम्भव है, अपना मतलब सिद्ध करनेके लिये ही उसने मुस्तफा कमालकी शर्ते स्वीकार कर लो हों, पीछे जय उसे कुछ और सहायता मिल गयी, और उसने अपनेको मुस्तफा कमालकी फौजी ताकतको दवा देने योग्य समझा, उसने फिर लडाई छेड दी। इस बार मुस्तफा कमालने अपनी और भी ताकत लगाकर फ्रान्सीसियोंपर आक्रमण किया और सलेशियाका बहुतसा अंश खाली करा लिया। उनकी कितनीही तोपें भी राष्ट्रवादी तुर्कों ने छीन ली। अन्तमें फ्रान्सीसियोंको सलेशिया खाली कर देना पड़ा। इसपर फ्रान्स सरकारने मित्र राष्ट्रोंपर इस बातके लिये जोर दिया, कि सेवर्सको सन्धि बदल दी जाये। इस ग

गाजी
Amala मुस्तफा कमाल पाशाSumm
प्रकार फासीसियोंके साथ तुर्क राष्ट्रवादियोंकी लडाईका अन्त
हुमा।
- यूनानियोंसे युद्ध
यूनान
और टोंके बीच बहुत दिनोंका पुराना शत्रु-भाव था,
पर यूरोपीय महासमरमें यूनानने भाग नहीं लिया था। उसने जब
देखा, कि टी महा-शक्तियों द्वारा पराजित होकर हतबल हो
गया है, तब झटसे स्म पर अधिकार कर लिया और तमाम
मुसल्मान जनतापर अत्याचार करना आरम्म कर दिया।
यूनानियों के इन अत्याचारोंसे तमाम मुसल्मान-जगत्में घड़ी
भयङ्कर पलरली मच गयी। यदि कोई विजेता सा पर
अधिकार कर लेता, तो मुसल्मान-जगत् शायद इतना अन्दो-
लित न होता।
यूनानका यह अनुचित और अनधिकार आक्रमण भला मुस्तफा
कमाल कैसे देख सकते थे? उन्होंने उसे पदेडकर टकीकी
सीमाके याहर कर देनेका विचार किया और विचार स्थिर होते
ही उन्होंने यूनानके विरुद्ध लोहा उठा लिया।
२४ जून १९२० के एक तारसे ज्ञात होता है, कि राष्ट्रवादी
तुर्को ने यूनानियोंपर आक्रमण करना आरम्भ कर दिया है। कई
स्थानोंपर तुर्क फौजोंने यूनानियोंको हौलना शिकस्तें दी है।
दो दिनोंतक तुर्क फौजने अङ्गोरा सरकारके चीर सेनापति इस्मत
घे के नेतृत्वमें यूनानियोंपर ऐसा भयङ्कर आक्रमण किया है, कि

गाजी
शिकस्तें देते और उनके भाग जानेपर उनकी युद्ध सामग्रियों
मुस्तफा कमाल पाशा
यूनानो बदहवास होकर वरावर भागते गये है। इस आक्र
मणमें यूनानियोंकी कितनीही तोपें, बन्दूकें, गोले-बारूद आदि
युद्ध-सामग्री तुर्कों के हाथ लगीं।
तुर्कों का कहना है, कि यूनानियोंके चार हजार मैनिक इस
युद्धर्म मारे गये और चार हजार तीन सौ जवान घायल हुए।
तुर्क इस प्रकार सफलता प्राप्त करते, यूनानियोंकी फौजोंको
*-
1
-
इकट्ठी करते हुए आगे बढ़ने लगे।
इसी बीचमें लण्डन कानफरेन्सके कारण कुछ दिनों के लिये
लड़ाई बन्द रही। परन्तु कानफरेन्सका परिणाम आशा प्रदन
होनेके कारण तुर्को ने फिर यूनानियोंपर आक्रमण किया ।
४ अप्रल १९२१ के फुस्तुनतुनियाके एक तारसे मालूम
होता है, कि यूनानियोंपर तुर्कों की एक बहुत बड़ी सेनाने आक्र.
मण किया है। इस सेनामें प्रायः वीस हजार तुर्क सैनिक है ।।
इनके पास गोले-बारूद वगैरह लडाईके सामान भी यथेष्ट
परिमाणमें हैं। १६ इञ्च गोलाईकी तोपें भी बहुत
इसी तारीखके एक और तारसे जाना जाता है, कि यूनानी
पीछे हटते चले जा रहे हैं और तुर्क उनको पदेडते जा रहे हैं।
२४ अप्रेलके तारसे मालूम होता है, कि यूनानियोंने खेत
छोड दिया और ये बिल्कुल बदहवासीकी हालतमें भागे।
सितम्बर के महीने में यूनानको अन्य सश्लिष्ट, अधिक शक्ति
शाली राष्ट्रोंकी सहायता मिली। उसने फिर सिर उठाया । इस
1

गाजी मुस्तफा कमाल माशा १५ मार्च १९२० के एक तारसे मालूम होता है, कि 'टाइम्स' पत्रको समाचार मिला है, राष्ट्रवादी तुकांकी एक जमायतने अस्म दके पासकी रेलवे लाइनके एक पुलको डिनामाइटसे उड़ा दिया है। इस पुलके उडा दिये जानेके करीव-नीन चार मिनट पहले एक गाडी गुजरी थी, जिसपर अंगरेज सैनिक अफसर और सेना थी। २० मार्चका एक तार है, कि ब्रिटिश कण्ट्रोल-अफसर कैप्टेन फारेस्ट मुस्तफा कमाल पाशाके हुक्मसे गिरफ्तार कर लिये गये है। २८ मईके लन्दनके एक तारसे जाना जाता है, कि मुस्तफा कमाल पाशाके हुक्मसे फर्नल रालिनसन अभी तक अर्जेरूममें नजरबन्द हैं। कैप्टेन कैमेल भी अर्जेरुम शहरमें रखे गये हैं। दोनों अच्छी तरहसे हैं। शहरमें सैर कर सकते हैं। रेज लेफ्टिनेण्ट मि० मण्टको भी फौम परस्तोनि अदायाजा स्थानमें रोक रखा था, पर पोछे इन्हें छोड दिया है। ३ जनवरी १९२१ को 'कलकत्तेके 'स्टेटमैन' पत्रका एक संवाददाता लिपता है, कि "राष्ट्रवादी तुर्फ फुस्तुनतुनिया और उसके आस-पासकी फौजोंसे ऐसा यार करने लगे हैं, कि लण्डनमे मन्त्रि-मएडल और समर-निमागके अधिकारियोंको उनकी ओर ध्यान देनेकी आवश्यकता जान पड़ने लगी है। एक और अंग- ।

। . दूसरा कारण माजी मुस्तफा कमाल पाशा Sam अपना प्रभाव जमाते देखकर भी अंगरेजोंकी ओरसे खुल्लम-खुल्ला कोई घोर घमासान नहीं किया गया! इसके कई कारण हो सकते हैं। पहला कारण सम्भवतः यह है, कि लगातार ५ घर्षा के यूरोपीय महासमरमें उसने अपनी अपरिमित शक्ति और सम्पत्ति खर्च कर डाली थी। इस अवस्थामें इङ्गल एडसे फौज लाकर सुदूर एशियामें युद्ध करना उसके लिये कोई साधारण काम न था।। यह हो सकता है, कि महासमरफे समाप्त होतेही ब्रिटिश साम्रा ज्यके अन्तर्गत कई स्थानोंमें हल-चलसी मच गयी थी। आय लैंएड और मिश्र अपनी-अपनी खतन्त्रताके लिये यदि अपना गला कटानेको तैयार हो गया था, तो भारतवर्ष में भी खिलाफत और पक्षावके हत्याकण्डोंसे एक नया झगडा खडा हो रहा था। तीसरा कारण यह हो सकता है, कि विलायतमें टीके प्रश्नॉपर दो प्रकारके मत वाले हो गये थे। थे और दूसरे यूनानियोंके पक्षका समर्थन करते थे। सम्भव है, पन्हीं कारणोंसे त्रिटिश अधिकारी लडनेको तैयार न हुए हों। यद्यपि राष्ट्रवादी तुर्कोंके साथ अंगरेजोंका कोई विशेष युद्ध नहीं हुमा, तथापि समय-समयपर जहाँ कहीं दोनोंका सामना । होगया है, उनका तारोंसे इस प्रकार मालूम होता है १ मार्च १९२० के लन्दनके एक तारसे जाना जाता है, राष्ट्र- वादी तुर्को ने कुस्तुनतुनियासे ५५ मील पश्चिम अंगरेज फौजको अस्मदसे हट जानेकी धमकी दी है। , एक मत वाले टीके पक्षम - ।

मुस्तफा कमालपाशा १५ मार्च १९२० के एक तारसे मालूम होता है, कि 'टाइम्स' पत्रको समाचार मिला है, 'राष्ट्रवादी तुकांको एक जमायतने अस्म दके पासको रेलवे लाइनके एक पुलको डिनामाइटसे उड़ा दिया है। इस पुलके उड़ा दिये जानेके करीब-तीन चार मिनट पहले एक गाडी गुजरी थी, जिसपर अंगरेज सैनिक अफसर और सेना थी। २० मार्चका एक तार है, कि ब्रिटिश कण्ट्रोल-अफसर फैप्टेन फारेस्ट मुस्तफा कमाल पाशाके हुक्मसे गिरफ्तार कर लिये गये हैं। २८ मईके लन्दनके एक तारसे जाना जाता है, कि मुस्तफा कमाल पाशाके हुक्मसे कर्नल रालिनसन अभी तक अर्जेरूममें नजरवन्द हैं। कैप्टेन केमेल भी अर्जेरुम शहरमें रखे गये हैं। दोनों अच्छी तरहसे हैं। शहरमें सेर कर सकते हैं। एक और अंग- रेज लेफ्टिनेण्ट मि० मण्टको भी फौम परस्तोंने अदावाजा स्थानमें रोक रखा था, पर पोछे इन्हें छोड दिया है । ३ जनवरी १९२१ फो कलकत्तेके 'स्टेटमैन' पत्रका एक संवादाता लिपता है, कि "राष्ट्रवादी तुर्क कुस्तुनतुनिया और उसके आस-पासकी फौजोंसे ऐसा बर्ताव करने लगे हैं, कि लण्डनके मस्त्रि-मएडल और समर-निमागके अधिकारियोंको पुन उनकी ओर ध्यान देनेकी आवश्यकता जान पड़ने लगी है। साथही तुर्कों के द्वारा यूनानी फौजका एशियाए कोचकौ खातमा होनेका फरीना है। "मुस्तफा कमाल पाशा दिन दिन अपना सैनिक और - मुस्तफा कमाल पाशाSIGN V , FL दूसरा कारण अपना प्रभाव जमाते देखकर भी अगरेजोंकी ओरसे खुलममबुल्ला कोई घोर-घमासान नहीं किया गया। इसके कई कारण हो सकते हैं। पहला कारण सम्भवतः यह है, कि लगातार ५ वर्षा के यूरोपीय महासमरमें उसने अपनी अपरिमित शक्ति और सम्पत्ति खर्च कर डाली थी। इस अवस्थामें इङ्गल एडसे फौज लाकर सुदूर एशियामें युद्ध करना उसके लिये कोई साधारण काम न था यह हो सकता है, कि महासमरके समाप्त होतेही ब्रिटिश साम्रा ज्यके अन्तर्गत कई स्थानोंमें हलचलसी मच गयी थी। आय लैण्ड और मिश्र अपनी-अपनी स्वतन्त्रताके लिये यदि अपना गला कटानेको तैयार हो गया था, तो भारतवर्ष में भी खिलाफत और पसावके हत्याकण्डोंसे एक नया झगडा खडा हो रहा था। तीसरा कारण यह हो सकता है, कि विलायतमें टर्कीके प्रश्नॉपर दो प्रकारके मत वाले हो गये थे। एक मत वाले टीके पक्षमै थे और दूसरे यूनानियोंके पक्षका समर्थन करते थे । सम्भव है, । इन्हीं कारणोंसे ब्रिटिश अधिकारी लडनेको तैयार न हुए हो। यद्यपि राष्ट्रवादी तुर्ककि साथ अंगरेजोंका कोई विशेष 'युद्ध नहीं हुआ, तथापि समय समयपर जहाँ कहीं दोनोंका सामना होगया है, उनका तारोंसे इस प्रकार मालूम होता है मार्च १६२० के लन्दनके एक तारसे जाना जाता है, राष्ट्र- वादी तुर्को ने फुस्तुनतुनियासे ५५ मील पश्चिम अंगरेज फौजको अस्मदसे हट जानेकी धमकी दी है।

मुस्तफा कमाल पाशा
देशोंमें) सदा लडाईकी आग सुलगाते रहनेका एक स्थायी कारण
हो रही है।
"इनसे जो आग वधफेगी, वह चढते-बढते तमाम बलकानमें
फैल जायेगी। अतएव इस बातकी अत्यन्त आवश्यकता है, कि
यह सन्धि-पत्र एक रद्दी कागजका पुर्जा समझकर फाड डाला
जाये। टीके विपयका फिरसे नया बन्दोवस्त करनेकी कोशिश
की जाये। इस विषयका स्थायी रूपसे निर्णय होना तभी सम्भव
है, जब कि यूनानके द्वारा अधिकृत टीके स्थान टर्कीको लौटा
दिये जायें। यूनान उन स्थानोंपर न तो अपना अधिकार रखनेके
योग्य है और न न्यायत उन स्थानोंपर उसका कोई अधि
कारही है।"
।

+
--
मुस्तफा कमालपाशा GIN
आर्थिक बल बढ़ाते तथा अपने मोर्चीको जबर्दस्त किये
चले जारहे हैं।
"खबर मिली है, कि ब्रिटिश मन्त्रिमण्डलके कुछ सदस्य
मित्र राष्ट्रोंपर यूनानी फौजकी मदद करने के लिये ज़ोर दे रहे हैं।
परन्तु बहुमत इस पक्षमें है, कि मित्र-राष्ट्र शायद फिर इस नयी
एशियाई लडाईमें शामिल होनेको तैयार नहीं होंगे। इन्हीं
लोगोंका मत है, कि सेवर्सकी सन्धिकी शर्तों पर फिरसे विचार
किया जाये । श्रेस और स्म को यूनानके हवाले करनेकी जो
शर्त है, वह बिल्कुल निकाल दी जाये।
“खयर है, कि लार्ड कर्जन सुप्रीम कौन्सिलकी ओरसे एक
कानफरेन्स करानेका विचार कर रहे हैं, और ऐसा इन्तजाम कर
रहे हैं, जिसमें यूनानी तथा तुर्क प्रतिनिधि भी वहां उपस्थित हो
तथा उनका एक मेल-मिलाप हो जाये।"
र सेवर्सकी सन्धिपर लोकमत
इस समय विलायतका लोकमत सेवर्सकी सन्धिके विषयों
क्या खयाल करता था, यह वहाँके सुप्रसिद्ध पत्र "डेली एक्सप्रेस
की उस टिप्पणीसे मालूम हो सकता है, जो इसने इसी समय
लिखी थी।
"डेली सप्रेस" कहता है, कि-"सेवर्सकी सन्धिकी शर्ते
निकट पूर्वमा एक न एक लडाई पैदा करती रहेंगी।
शर्ते एक प्रकार निकट पूर्वमें (अर्थात् यूरोपकी पूर्वीय सीमार्फ
.
-११२-

- मुस्तफा कमाल पाशा M मङ्गोरा सरकार मित्र राष्ट्रोंकी किसी कानफरेन्समें शामिल होनेके लिये अपने प्रतिनिधि तमी भेजनेका विचार कर सकती है, जब कि वे स्वयं प्रत्यक्ष रूपसे हमारी सरकारको निमन्त्रण देंगे और अपने यहाँसे प्रतिनिधि तमी भेज सकती है, जब वे नीचे लिली शर्ते मयूर कर लेंगे (१) टर्कीके जिस प्रान्तमें या जिन स्थानोंमें गैर तुर्क सर- कारोंन अपना अधिकार कर रखा है,उसे चे फौरन खाली करदें। (0) उसमानिया सरकार किसी राष्ट्र को लडाईकी क्षति पूर्तिके रूपमें कोई रकम देनेके लिये पाध्यन की जायेगी। (३) कुस्तुनतुनियाका मन्त्रिमण्डल फौरन इस्तीफा दे दे, क्योंकि वह खुदमुख्तारी कर रहा, और उच्छृङ्खल हो रहा है। (४) सुल्तानके रहनेका स्थान स्तम्बोल हो। (५) टकीसे तमाम गैर-मुल्कोंकी फौजें हटाली जायें।" युद्ध स्थगित मुस्तफा कमाल खामखाह खूरेजी करना नहीं चाहते। वे शान्तिप्रिय हैं , परन्तु अत्याचारियोंका अत्याचार उनसे सहा नहीं जाता है। वे स्वयं जैसे स्वतन्त्र विरेकके आदमी है, स्वतन्त्रताके लिये जैसे वे अपना सर्वस्व अपण फर देनेको तैयार रहते हैं,वैसे- ही वे दूसरोंकी स्वतन्त्रताको भी कायम रखना चाहते हैं । इसी अब उन्होंने देखा, कि हमारे स्वत्वोंकी रक्षा यदि सद्भावसेही ये.तो भगटा बढानेसे क्या लाभ ? यही सोचकर उन्होंने सन्धिका आरम्म हाफ , . टर्कीको निमन्त्रण - जनवरी १९२१ की२१ तालको लन्दन कानफरेन्समें अपने 'प्रतिनिधि भेजनेके लिये टीको निमन्त्रण दिया गया। R ३० जनवरीको टर्की सरकारने इस निमन्त्रण परका यह जवाब दिया, कि 'हमें यह निमन्त्रण स्वीकार है, परन्तु राष्ट्रवादी तुर्कोसे परामर्श किये बिना प्रतिनिधियोंका चुनाव नहीं हो सकता है। माशा है, अगोरा सरकार और फुस्तुनतुनियाके बीच तार । समाचारोंके आदान-प्रदानकी व्यवस्था शीघही हो जायेगी और वहांसे जवाव आनेपर आपको खपर दी जायेगी।' टर्कीकी सरकारने इस विषयमें अहोरा सरकारको जो पत्र लिखा था, उसका जवाब देते हुए मुस्तफा कमालपाशाने राष्ट्र चादी तुर्कों की इस नवस्थापित सरकारके सभापतिको हैसि यतसे लिखा "अगोराकी यह सरकारही इस समय तमाम टीकी एक- मात्र स्वतन्त्र और सर्वजन सम्मत सरकार है। राष्ट्रने तुर्क कौमने इस सरकारका सभापति होनेका गौरव प्रदा नकिया है। - मुझे टीके मुस्तफा कमाल पाशा अड्डोरा सरकार मित्र राष्ट्रोंकी किसी कानफरेन्समें शामिल होनेके लिये अपने प्रतिनिधि तभी भेजनेका विचार कर सकती है, जर कि वे स्वयं प्रत्यक्ष रूपसे हमारी सरकारको निमन्त्रण देंगे और अपने यहाँसे प्रतिनिधि तभी भेज सकती है, जब वे नीचे लिखी शर्ते मञ्जूर कर लेंगे (१) टीके जिस प्रान्तमें या जिन स्थानोंमें गैर तुर्क सर- कारोंन अपना अधिकार कर रखा है,उसे वे फोरन खाली करदें। (0) उसमानिया सरकार किसी राष्ट्र को लडाईकी क्षति पूर्ति के रूपमें कोई रकम देनेके लिये घाध्य न की जायेगी। (३) कुस्तुनतुनियाका मन्त्रिमण्डल फौरन इस्तीफा दे दे, क्योंकि वह खुदमुख्तारी कर रहा, और उच्छृङ्खल हो रहा (४) सुल्तानके रहनेका स्थान स्तम्बोल हो । (५) टकींसे तमाम गैर-मुल्कोंकी फौजें हटाली जायें।" * युद्ध स्थगित मुस्तफा कमाल खामखाह पूरेजी करना नहीं चाहते। वे शान्तिप्रिय हैं, परन्तु अत्याचारियोंका अत्याचार उनसे सहा नहीं जाता है। वे स्वय जैसे स्वतन्त्र विवेकके आदमी हैं, स्वतन्त्रताके लिये जैसे वे अपना सर्वस्व अर्पण कर देनेको तैयार रहते हैं,वैसे. ही वे दूसरोंकी स्वतन्त्रताको भी कायम रखना चाहते हैं । इसी लिये अय उन्होंने देखा, कि हमारे स्वत्वोंकी रक्षा यदि सद्भावसेहो हो जाये, तो झगडा बढानेसे क्या लाभ ? यही सोचकर उन्होंने है - ।

.
T
मुस्तफा कमालयाशाजा
राष्ट्रवादी तुर्को को हुक्म देदिया, कि जबतक सन्धिकी यह थात
चीत चल रही है, तबतक सलेशियामें फान्लीसियों के साथ और
इराके अरबमें अँगरेजों के साथ किसी प्रकारकी लड़ाई-भिडाई न
की जाये। इस प्रकार उन्होंने अपनी तमाम फौजको लड़ाई
करनेसे रोक दिया।
६ फरवरी १९२१ को अड्डोरा सरकारके पर-राष्ट-सचिव वक्र
समी येने सुल्ततानके पास इस आशयका एक पत्र भेजा, कि
यदि मित्र राष्ट्रोंको तथा टकींकी सरकारको हमारी शर्ते.
स्वीकार हों,तो हम अपने यहाँसे प्रतिनिधि भेज सकते हैं। हमारी
सरकारकी ओरसे जो प्रतिनिधि जायेंगे, वे तमाम तुर्क कोमके
प्रतिनिधि-स्वरूप भेजे जायेंगे और लण्डनकी कानफरेन्समें वे अपने
खयाल कौमकी भलाई और स्वत्वोंकी रक्षाके लिये प्रकट करेंगे।
28 प्रतिनिधियोंकी विदाई
मित्र-राष्ट्रों और कुस्तुनतुनियाकीसरकारोंने मुस्तफा कमाल
की सरकारकी उपर्युक शर्तो मेंसे अधिकाश शतों को स्वीकार
कर लिया और अगोरा सरकार भी इस कानफरेन्समें खतन्त्र
रूपसे निमन्त्रित की गयी।
७ तारीपको टोंकी सरकारने अपने यहाँसे तीन प्रतिनिधि
योंको कानफरेन्समें सम्मिलित होनेके लिये भेज दिया । मुस्तफा
कमाल पाशाकी अहोरा सरकारने भी अपने प्रतिनिधि भेजने की
सूचना कानफरेन्सको देदी।
-

मुस्तफा कमल पाशा) More ६ फरवरी १९२१ को जन । राष्ट्रवादियोंके प्रतिनिधि अङ्गोरासे विदा होने लगे, उस समय नगरका दृश्य अत्यन्त मनो- मोहक होरहा था। तमाम इमारतों और बुजों पर राष्ट्रीय विजय- पताकाएँ पडी की गयी थीं। नागरिकोंको घडी भारी भीड, जिसमें स्त्री-पुरुप, धूढे-जवान सभी शरीक थे, उन्हें विदाई देनेके लिये एकत्र हुई थी। "अलविदा" कहते समय मुस्तफा कमाल पाशाने प्रतिनि- धियोंसे कहा, "भाइयो । तुम जिस कामके लिये जा रहे हो, यह तुम्हारा अपना नहीं, फोमफा है । तुम्हारे ऊपर अपने देश, जाति और राष्ट्रके खत्वोंकी रक्षा करनेका भार दिया गया है। तुमसे मेरा अन्तिम वक्तव्य केनल यही है, कि तुम अपने मुरकको आजादीको कायम रखनेके लिये अपनी बातोंपर पहाडकी तरह अटल रहना प्रतिनिधियोंके चले जानेपर सन्ध्याको नमाज पढी गयो और प्रतिनिधियोंकी सफलताके लिये ईश्वरसे प्रार्थनाएँ की गयीं । . और लण्डन कानफरेन्स - सन् १९२१ के फरवरी महीनेमें अन्तके मित्र राष्ट्रोंकी एक परिषद् हुई थी। इस परिषदमें मुख्य विचारणीय विषय दो थे। उनमें पहला यह था, कि जर्मनोसे हर्जाना कैसे वसूल किया जाये और दूसरा विषय यह था, कि टकी के साथ जो सन्धि हुई है, उसमें किन किन बातोंका सुधार किया जाये। इङ्गलैण्ड, फ्रान्स और इटलीके प्रधान मन्त्री अपने अपने साम-

।
-
।
मुस्तफा कमाल पाशा
Hin
रिक तथा साम्पत्तिक परामर्श दाताओंके साथ परिषदमें उपस्थित
थे । यूनानके प्रधान मन्त्री और नीति-निपुण एम० वेनिजेलीस मी
वहां मौजूद थे। कुस्तुनतुनियाके सुल्तानके वजीर और अकोरा
सरकारकी ओरसे भेजे गये प्रतिनिधि सभी वे आदि भी उप
स्थित थे।
इस कानफरेन्समें मित्र-राष्ट्रोंकी ओरसे अडोरा सरकारके
प्रतिनिधियोंका विशेष आदर-सत्कार किया गया। मित्र-राष्ट्रनि
पृथक् पृथक् अपनी खास बातें भी की। इटलीकी सरकार
तथा मासकी सरकारोंने इनसे एक प्रकार समझौता भी कर
लिया। परन्तु ब्रिटिश सरकार के प्रधान मन्त्री मि० लायड जार्ज
यूनानको सम्हाले रखनेका वन्दोवस्त कर चुके थे। इसलिये
उनकी परिस्थिति डांवाडोल थी। परन्तु लायड जार्ज जैसे राज
नीतिज्ञ भला ऐसे मौकोंपर कैसे चूक सकते थे ?
कई दिनोंतक इस कानफरेन्सकी बैठकें होती रही। यूनानके
मुख्य मन्त्रीने कहा, कि सेवर्सकी सन्धिकी जो शर्ते निश्चित
हुई हैं, वे ज्योंकी त्यों रहें। कोई परिवर्तन नहीं हो। परन्तु
फ्रान्सके प्रधान मन्त्री इसके विपरीत थे। उन्होंने कहा, कि यह
ठीक नहीं है, कि तुर्कों के स्थानोंपर यूनानी अपना अधिकार
जमायें। तुर्कों के अधिकृत प्रदेश उसे लौटा दिये जायें।
के प्रतिनिधिने भी ऐसीही राय दी।
फलत स्थिर हुआ, कि कुस्तुनतुनियाके आस-पासके
यूनानको नसौंपकर सार्व-राष्ट्रीय बनाये जायें और
-११८-
।

कमुस्तफा कमाल पाशाSUrmy में एक बडी सेना रखनेके लिये तुकों को अनुमति दे दी जाये, इधर केवल स्मा नगरपर प्रीसका अधिकार कायम रखकर शेष प्रान्त तुर्कों को वापस कर दिये जायें। परन्तु स्मर्ना नगर- सेतुकों का खामित्व विल्कुल नष्ट न किया जाये । अर्थात् उसका बन्दरगाह तुर्की व्यापारके लियेपुला रहे । ८० से १० हजारतक सेना कुस्तुनतुनियामें रखनेको आज्ञा दी जाये और विदेशी लोग तुकी न्यायालयको सत्तामें रहें। सेवर्सकी सन्धि शर्तों में इसी प्रकारके कई और परिवर्तन करनेके लिये मित्र-सरकारें तैयार हुई, परन्तु अहोरा सरकारफे प्रतिनिधिोंने उसके उत्तरमें यही कहा, कि 'हम अड्डोरा जाकर वहाँकी सरकारसे पूछेगे, कि शर्ते उसे स्वीकार हैं या नहीं।' इसके बाद अंगोरा सरकारके प्रतिनिधिमार्चकेतीसरे सप्ताहमें वहाँसे अंगोरेके लिये रवान हुए और ११ अप्रेलको अँगोरा पहुंचे। अंगोरा सरकारने मित्र राष्ट्रोंकी उक्त शर्तीको स्वीकार नहीं किया। मित्र राष्ट्रोंका रङ्ग-दङ्ग देखकर राष्ट्रवादी तुर्को के सर गरोह-अंगोरा सरकारके समापति-मुस्तफा कमालपाशा खून अच्छी तरह समझ गये, कि अनातूलियाके इस मसलेका फैसला मेल मिलाप और सौजन्य सदभावसे नहीं हो सकता।। - तलवारसे होगा - इसी समय मुस्तफा कमाल पाशाके सभापतित्वमें राष्ट्रवादी तुर्काको पालमेण्टको एक विशेष बैठक आगेका कार्यक्रम निषित E- 1-1

।
।
क
-
-
-
।
।
विजयी कमाल पाशा
7 CCD
और यूनानियोंपर आक्रमण :
स, फिर क्या था? मुस्तफा कमालके सैनिकों, सेना
हस्पतियों और सेना-नायकोंमें चौगुना जोश था गया।
मुस्तफा कमालकी आशा पाकरही वे अतक लड़ाईसे हाथ खाँचे
हुए बैठे थे। उनके दिलोंमें यूनानियोंको उनके कियेका दण्ड देनेकी
प्रगल क्रोधाग्नि तो पहलेसेही प्रज्ज्वलित थी। अत अव उनकी
आक्षा पातेही उनकी छाती दूनी-चौगुनी हो गयी।
विजयी सेना-दल लेकर मुस्तफा कमाल फिर एक बार
यूनानियोंका ध्वंस करने और अँगरेजोको टकी से हटाने के लिये
निकल पड़े। इनकी विजयो सेना बे-रोक, चालसे यूनानियोंकी
और बढी। यूनानी सेनाएँ बुरी तरह शिकर
छोड स्म की ओर भागी।
।

O पुस्तुनतुनियामें तुर्फ लोग विजयके उपलक्षपर मुस्तफा कमाल पाशाका चित्र लेकर जुतुम निकाल रहे ह ।

No text on this page.

Faमुस्तफा कमाल पाSOUTH इसो समय अगरेजी फौजके अफसर कैप्टेन थेसिगारने तुर्क सेनाध्यक्षोंको सूचना दी,-"यूनानो रम से निकलकर माग आप लोग मर अगर शान्तिसे स्म के अन्दर दाखिल होंगे, तो प्रजावर्ग में किसी प्रकारका आतङ्क या डर नहीं छायेगा। घे शान्तिसे रहेंगे।" गये हैं। र यूनानियोंकी दुष्टता मुस्तफा कमालके विजयी सेना इलने केप्टेन लिगाएकी बात मान ली। वे बडो शान्तिके साथ स्म में प्रवेश करने लगे। रास्तेमें उनके सेनापतिपर फिसी आर्मेनियनने एक यम फेक दिया। उससे वे बुरी तरह घायल हुए , परन्तु इतना होनेपर भी उनका सैनिक दल शान्तिमान पारण किये रहा ,-कहीं किसी प्रकारका गोलमाल नहीं हुआ। दो दिनोंतक तुर्क सैनिक दलोने स्म में शान्ति और सुन्य- वस्था स्थापित रखी। इसके बाद शहरमें आग दिखाई दी। देखते देखते उस अग्निने महा प्रचण्ड रूप धारण किया। नगर- वासी अर्मेनियों और यहूदियों मादिकी जान और मालपर आफत आ गयी। वे जान बचानेके लिये शहरसे बाहर निकल. कर भागने लगे। साथ ही साथ मर दोप तुर्कोंके मत्ये मढनेकी चेष्टा की गयी। इस महाभयङ्कर अग्नि काण्डके दोही दिन बाद यिला- यतके "टाइम्स" पत्रके सवाद दाताने लिपा,-"The town

No text on this page.

गुस्तफा क्रमालपाशा SE अगरेज़ आगे बढ़े अंगरेज लोग चौक पहे, क्योंकि समान में अंगरेजोंकी जिस पूजीसे कारवार होते हैं, उनका परिमाण ७५ करोड रुपया है। जिस साकरी जल प्रणालीके ऊपर गैलीपोलीमें महा- समरके समय अंगरेजोंको पूरी तरह मुंहकी पानी पड़ी थी, फिर उसी प्रणालीके भीतर उन्हें तटस्थ देशोंकी रक्षा करनी पड़ेगी। अँगरेज लोग अब चुप न रह सके। उन्होंने अन्यान्य देशों और राष्ट्रको सम्मतिकी भी प्रतीक्षा नहीं की। लडाईके लिये पुन ब्रिटिश साम्राज्यको तैयार होनेको घोषणा कर दी गयी। एक विज्ञप्ति निकलो-- "Great Britain is prepared to do her part in maintaining the freedom of the Straits and the existence of the neutral zones अर्थात्--"ग्रेट विटेन अपने उपनिवेशोंकी रक्षा ओर देख- भाल करने तथा निरपेक्ष देशवासियोंका अस्तित्व कायम रखनेके लिये तैयार होगया है।" इसीलिये जेनरल। हैरिङ्गटनकी सेना बढानेकी व्यवस्था की गयी। भूमध्य सागरमें बेडोंपर हुक्म जारी किया गया । भारत- के सिवा घिटिश साम्राज्यके अन्तर्गत ओर सय देशोंको लडाईके लिये तैयार होनेको कहा गया। इसका कारण 'टाइम्स' पत्रके सवाददाताके मुंहसेहो सुन " re aram 1 करोड -- मुस्तफा कमान्य माशा was given over to fire, Billage and mås-acre" ऐसी भी अफवाहें उडायी गयीं, कि हवा मुताविक न होनेके फारणही दो दिनोंतक तुर्याने शहर में भाग न लगायी-टूट-भार नहीं की और न कत्लेआम मचाया। एथेन्ससे अफ़वाह उडी, कि करीब १ लाख ८० हजार मादमी मार डाले गये हैं। एक अमेरिकन जहाजपर भागकर १ हजार ८ सौ यूनानियों और अर्मेनियोंने अपनी जान बचायी है। यह भी बताया गया, कि इस महान् अग्निकाण्डमें २२ ५० लाख रुपये मूल्यकी वस्तुएं जलकर भस्म हो गयी हैं । 'स्टर'- का अधिकार केवल सवाद देनेका है , पर उसने अपने अघि कारकी बात भूलकर उसपर अपनी ओरसे यह टिप्पणी भी जोड दी,-"The Turk is unfit to govern any ope but himself" अर्थात्-"तुर्क केवल अपनेही देशपर शासन कर सकता है, दूसरोंपर शासन करनेकी योग्यता उसमें नहीं है।" परन्तु साँचको आँच कहाँ ? अन्तमें जो सची वात थी, निकलही आयी। दुनिया जान गयी, कि स्म के अग्नि- काण्डके लिये कमाल पाशाका सेना दल जिम्मेवर नहीं है । यूनानीही भागते समय शहरमें आग लगाते गये थे और आरमे नियोंने भी शहरमें आग लगाने में उनकी मदद की थी। पीछेसे यही यात स्पष्ट शब्दों में यह कहकर स्वीकार की गयी,- "burning towns and villages in theire retreat." -१२४- वह गाजा मुस्तफा कमाल पाशा Glim 8 अँगरेज़ आगे बढ़ - अंगरेज लोग चौंक पहे, क्योंकि स्मान में अंगरेजोको जिस पूजीसे फारसार होते हैं, उनका परिमाण ७५ करोड रुपया है। जिस साकरी जल प्रणालीके ऊपर गैलीपोलीमें महा- समरके समय अंगरेजोंको घुरी तरह मुंहकी पानी पडी थी, फिर उसी प्रणालीके भीतर उन्हें तटस्य देशोंकी रक्षा करनी पडेगो। अँगरेज लोग अब चुप न रह सके। उन्होंने अन्यान्य देशों और राष्ट्रोंको सम्मतिकी भी प्रतीक्षा नहीं की। लडाईके लिये पुन ब्रिटिश साम्राज्यको तैयार होनेको घोषणा कर दी गयी। एक विज्ञप्ति निकलो -- “Great Britain is prepared to do hei part in maintaining the freedom of the Straits and the existence of the neutral zones अर्थात्-"ग्रेट घिटेन अपने उपनिवेशोंकी रक्षा और देख. भाल करने तथा निरपेक्ष देशवासियोंका अस्तित्व कायम रसनेके लिये तैयार होगया है।" इसीलिये जेनरल हैरिङ्गटनकी सेना बढानेकी व्यवस्था की गयी। भूमध्य सागरमें पेडोंपर हुक्म जारी किया गया । भारत- के सिवा विटिश सामाज्यके अन्तर्गत ओर सब देशोंको लडाईके लिये तैयार होनेको कहा गया। इसका कारण 'टाइम्स' पत्रके सवाददाताके मुंहसेहो सुन "

am
मुस्तफा कमाल पाशा
लीजिये। वह कहता है,-"मुस्तफा कमाल जब विजयी हुए हैं,
तव बहुत सम्भव है, कि वे मित्र राष्ट्रोंको दरैदानियालके उस
पार चले जानेको कहेंगे और कुस्तुनतुनियाको रक्षाके लिये जब
वे मामोरा समुद्रमें अपनी नौ सेना रखेंगे, तो प्रणालीके अन्दर
मित्र राष्ट्रोंके बेड़े न रहने देंगे।"
, १६ वीं सितम्बरको अंगरेज-सरकारकी फिर एक विज्ञप्ति
निकली। इसके यादसेही रङ्ग दङ्ग बदलने लगा। फान्स सर
कारने विना सलाह परामर्श कियेही इस विज्ञप्तिसे अपनी उदा.
सीनता प्रकट की। यह देख, मामला गडवड़ाया समझकर
फ्रान्सको अपने पक्ष समर्थनके लिये मिलाने के उद्देश्यसे लाई
कर्जन पैरिस भेजे गये। यहाँ फिर एक परामर्श परिषद् की
जानेकी वात तय पायी।
- अगरेज़ नर्म पड़े -
टर्कीके विपयमें कितनीही यार, कितनीही तरहकी अफवाहे
उडायी गयीं हैं, यह सभी जानते हैं । यूरोपकी पेटीके भीतर एक
एशियाई जातिको-तुर्कों को रहने देना यूरोपीय राष्ट्रॉको
पसन्द नहीं है यह भी किसीसे छिपा नहीं है। शायद इसी
उद्देश्यसे तुकों के ऊपर स्म के कत्ले आम और उस महान
अग्निकाण्डका इल्जाम लगाया गया हो, तो कोई आश्चर्य नहीं।
मित्र-राष्ट्रॉफी पैरिसकी परिपद भी व्यर्थ थी। मुस्तफा
कमाल शान्तिके मार्गसेही अपना अपहत राज्य वापस पाना
-१२६-
॥

me
मुस्तफा कमाल पाशा m
चाहते थे। उन्होंने बाध्य होकरही तलवार उठायी थी। अगरेज
सरकारने कहा था, कि एशिया माइनर, थूस और फुस्तुनतु-
निया तुर्कों को लौटा दिये जायेंगे, पर उन्होंने ऐसा नहीं किया।
ब्रिटिश सरकारके प्रधान मन्त्री मि० लायड जार्ज और लार्ड
कर्जनने अपनी उन यातोंको कायम न रखकर यह समझा होगा,
कि हमने अपने देशको-अपनी जातिकी भलाईही को है , पर
वास्तवमें भलाईके बदले उन्होंने अपनी जातिके ऊपर कलङ्क ही
लगाया है। यहुत लोगोंका तो यह खयाल है, कि मि० लायड
जार्जफे इशारेसेहो यूनानियोंने इस प्रकार उपद्रव करनेकी हिम्मत
की थी और यहांतक कहा था , कि हम फुस्तुनतुनियातक दपल
कर लेंगे, जो चिल्कुल असम्भव था।
जो हो, फ्रान्स और इटालीने ग्रीसका साथ देना और उसकी
ओरसे तुर्कों के साथ लडाई करना स्वीकार नहीं किया। इस
प्रकार फान्सीसियों और इटालियनोंके पीछे पांव खींच लेनेपर
अंगरेजोने शान्तिका मार्ग अवलम्बन करनाही अपने लिये
मङ्गल जनक समझा।
मुस्तफा कमाल जबर्दस्ती लडाई छेडना नहीं चाहते, यह भी
मालूम होगया। उन्होंने सर्वाधिकृत देशोपर हस्तक्षेप न करनेकी
अपनी सम्मति प्रकट की। साथही उन्होंने यह भी कह दिया,
कि हमारी फौजोंने सर्वाधिकृत भूमिपर कमी पैर नहीं रखा,
ऐसा कहना भी नहीं कह सकते।
तुर्क सैनिकोंने चानकके पास सर्वाधिकृत प्रदेशमें पहुंचकर

मुस्तफा कामाल यासा15) तीन स्थानोंपर आक्रमण किया। इसके बाद तुर्को'ने ब्रिटिश सेनाध्यक्षोंको सूचित किया, कि मुस्तफा कमाल नहीं चाहते, कि 'खामखाह अंगरेज़ोंके साथ लडाई करें। उस समय भी वारूदके अम्वारपर आगको चिनगारियां दिखाई दे रही थीं-युद्ध या सन्धि करना तोपोंके गोलोंके चलने या बन्द हो जानेपर निर्भर करता था। तो भी इसी बीचमें मि० लायड जार्जने मन्त्रि-मण्डलकी गोरसे लार्ड कर्जनको परिसकी परिपद्में कृत-कार्य होनेके लिये बधाइयां भेज दी, मानों उन्होंने किसी किलेपर फतहयावीही हासिल कर ली है।। उसी समय वचन दिये गये, कि अहोरा सरकारको कुस्तु नतुनिया,आडियोनोप्ल और थुस दे दिये जायेंगे। २५ सितम्बरके तारोंसे जाना जाता है, कि तुर्क घुड सवार फौजें चानकके पास सर्वाधिकृत प्रदेशों में प्रवेश कर गये हैं और जेनरल हेरिङ्गटनने तुके सेनापतिसे अपनी फौज हटा लेनेका अनुरोध किया है.-- has requested their withdrawl" जेनरल हेरिङ्गटन यदि चाहते, तो उस समय राष्ट्रवादी तुर्कों के साथ युद्ध करनेकी घोपणा कर सकते थे , परन्तु ऐसा नहीं किया, बल्कि युद्ध न करनेकी ही चेष्टा की। इसी समय यूनानियोंने जेनरल हरिङ्गटनके इस व्यवहारके विपयमें कहा,"The Entante's capituletion to Katmai Pasha" अर्थात् मित्र-राष्ट्रोंने कमाल पाशाके आगे आत्म- समर्पण कर दिया है। परन्तु जेनरल हैरिङ्गटनने स्थिर भावसे -१२८- उन्होंने

उन्होंने मुस्तफा
साथ
मुस्तफा कमालपाशा, m
कहा,-"जर तक हम तुर्को की पोजके पोछे पीछे तोपोंका ले
जाना न देखेंगे, तरतक हम उनपर आक्रमण नहीं कर सकते।"
फमालको
सूचना दी, कि विना हमारो आशाके
पिटिश सैनिक तुर्क फौजपर आक्रमण नहीं कर सकते।
हो उन्होंने यह भी कहा, कि मुस्तफा कमालके साथ हम इन
विपयोंपर यात-चीत करनेको तैयार हैं। मुस्तफा कमाल पाशाने
उनकी बात मजूर कर लो।
इस समय मुस्तफा कमालकी सरकारने अपने पुनरधिकृत
स्थानोंमें शरावकी खरीद-फरोख्त वन्द करा दी थी। इसीपर
"डेली टेलीग्राफके एक सवाददाताने यिटिशोंको उभाडनेके लिये
लिख भेजा था,-"Kamal desires to force humiliation
on Britain, disgracing us in the eyes of the world"
अर्थात्-“कमालकी सरकार हम अगरेजोंको दुनियाके सामने
अपमानित करके हमें नीचा दिपाना चाहती है।"
< मुदानिया कानफरेन्स
ऐसेही अवसरपर जर कि युद्धकी पूरी पूरी सम्भावना
दखाई देती थी, मुस्तफा कमालने फान्सीसी दूतके कहने सुननेसे
मुदानियाकी सन्धि परिपद्में उपस्थित होना स्वीकार किया
३ री भक्तयरको इस मुदानिया सन्धि परिषद्को बैठकका आरम्भ
होना स्थिर हुआ। तुकों ने अब सर्वाधिकृत प्रदेशमें आगे बढना
चन्द कर दिया।
-95-

मुस्तफा कमाल पाशा अगोरा सरकारके प्रतिनिधियोंके इस कानफरेन्समें सम्मि लित होनेके पहले मित्र राष्ट्रोंमें यह प्रश्न उठा, कि सका क्या होगा? वहाँ अव यूनानियोंके रहनेका कोई उपाय न देखकर मित्र राष्ट्रोंने यह निश्चय किया, कि सन्धि परिषदका निर्णय प्रकाशित होने तक तुर्क सर्वाधिकृत प्रदेशपर आक्रमण न करें। यदि तुर्क यह बात खीकार कर लेंगे, तो यूनानियोंको थुस छोडकर चला जाना पडेगा , इसके पहले वे ही थुसपर अधिकार किये रहेंगे। उस समय तुर्कों के विरुद्ध दो भिन्न-भिन्न शक्तियों द्वारा काम लिया जा रहा था। एक तरफ 'डेलीमेल' आदि अंगरेजी पत्र कहते,—"तुर्कों की मांगें बहुत जियाद हैं। “दूसरी तरफ यूनानके भूतपूर्व मन्त्री वेनिजेलिस 'टाइम्स' पत्रमें अपनी चिड़ियाँ, प्रकाशित कर यह कह रहे थे, कि 'अगर तुर्क लोग अभी थेसपर अधिकार कर पायेंगे, तो वे वहाँकी ईसाई आवादीको नष्ट कर डालेंगे। यही नहीं, वे तो यहांतक कहते थे, कि 'यूनान थुस- पर अपना अधिकार कायम करनेके लिये युद्धकी तैयारियां कर रहा है', जो बिल्कुल असम्भव था। इसी समय विलायतमें मनोरा सरकारफे प्रतिनिधिने वेनिजेलिसकी वातोंको असत्यता. को प्रमाणित कर दिया। इधर मित्र शक्तियोंकी ओरसे यह तय पाया, कि तुर्काको थेस दे दिया जाये और कुस्तुनतुनियाकी शासन समा राष्ट्र वादी तुर्कों को भी अधिकार दिया जाये। तुर्क लोग सर्वाधिरत स्थानोंको छोड़ दें। परन्तु फमाल पाशाको साफारके प्रति- -१३०-- न मुस्तफा कमलमासा निधियोंने कहा, कि सन्धि परिषद्में रूसकी सोवोट सरकारके प्रतिनिधिका आना भी आवश्यक है। अन्तमें बहुत वाद-विवादके बाद अँगरेज फ्रान्स और इटा. लियन सबकी सम्मतिले निश्चय (१) यूनानी लोग थुस छोडकर चले जायें और मित्र राष्ट्र उसपर अपना अधिकार कर ले। (२) इसके बाद एक महीना बीत जानेपर उसपर टों सरकार अधिकार करेगी। इसके बाद भी इसी प्रकारको कितनीहो वाते होती रहीं। इसो समय जेनरल हैरिङ्गटनने अगोरा सरकारके प्रतिनिधिसे लडाई बन्द करनेके लिये धन्यवाद देते हुए कहा था “Your goal is with in your reach and it will be entirely within your hands in 45 days and your 7dministrativu will be established satisfirctorily अर्थात्-"आपका अभोष्ट आपको प्राप्त हो गया और आजते ४५ ३ दिनसे आपका शासन सन्तोष जनक रीतिसे स्थापित हो जायेगा।" इसके बाद अन्तिम सन्धिका शर्त ये रखा गयीं (१) यनानो एक पक्षके भीतर शुस छोड़कर चले जायें । (0) टकॉकी जो फौज यहाँ रहेगी, उसकी संख्या ८ हजार से अधिक नहीं हो। -१३१- मुस्तफा कमाल पाशा ram (३) मरिदजा नदीके पश्चिम किनारे मित्र राष्ट्रोंकी सैनिक छावनी ( Covering force ) रहेगी। (४) सर्वाधिकृत स्थानोंकी सीमा पहलेकी तरह नहीं रहेगी। नयी चांधी जायेगी। ११ वीं अक्तूबर १९२२ के दिन मुदानियामें शामके ६॥ बजे अस्थायी सन्धिकी उपर्युक्त शतोंपर हस्ताक्षर हो गये। रण- चण्डीका विसर्जन हुआ। तुर्क वीरोंके शरीरमें जिस चीर-भावका सचार हुआ था, वह आगे न बढकर वहीं स्थिर रह गया। बिना युद्धकेही विजयश्री उनके पांवपर लोट गयी। मुदानियाकी सन्धि परिषद्के निश्चयके अनुसार यूनानियोंने थेस प्रान्त छोडना शुरू कर दिया। रातको यूनानी सेनाने थुसको अन्तिम प्रणाम किया, दो वर्षीसे वह अधिकार जमाकर बैठी थी। इसी समय तुर्क पुलिसके दल प्रवेश करने लगे। ज्यों-ज्यों यूनानी सेना प्रदेश खाली करके जाने लगी, त्यों-त्यों तुर्की सेना अपना अधिकार प्रसारित और स्थापित करती हुई आगे बढने लगी। इस प्रकार स्थायी सन्धि परिपका मार्ग घुस खाली करके साफ कर दिया। इस प्रकार यूनानियोंके चले जानेपर और तुर्कोंके अपने अपहृत देश पुन प्राप्त करनेपर प्रिटिश मन्त्रि-मण्डलको मुंहकी सानी पडी। मि० लायड जार्जने प्रधान मन्त्रीके पदोस्तीफा दे दिया और अब हम देखते हैं, कि आज समस्त एशिया माइनर, १५ तारीखकी आधी 'जिसपर - मुस्तफा कमाल पाशा pra स्मा, यस और कुस्तुनतुनिया तकपर मुस्तफा कमाल पाशाका विजयी झण्डा फहरा रहा है। 8 लासेन कानफरेन्स अब यह प्रश्न उठा, कि सन्धिकी शौका स्थायी रूपसे निश्चय करनेके लिये परिपकी बैठक कहाँ हो ? इलैण्ड, फ्रान्स और रुम अपने अपने देशोंमें परिषद्की बैठक करनेके लिये जोर देने लगे । अन्तमें यह निश्चय हुआ, कि अब जिन बातोपर परिपद्को विचार करना है, वह कोई विशेष विवाद-ग्रस्त प्रश्न नहीं है, इस- लिये किसी निरपेक्ष देशमें इस वारकी बैठक हो। इस प्रकार खिजरलैण्डके लासेन नगरमें परिषद्को बैठक निश्चित हुई । इसी पीचमें ब्रिटिश मन्ति-मण्डलका निर्वाचन कार्य आरम्भ हुआ। मि० लायडजार्जने प्रधानमन्त्रीके पदसे इस्तीफा देदिया । इसी कारण परिपक्री घेठ ६ नवम्बरसे न होसकीं। उधर इटली में भी विद्रोह हुआ। यहाँ नया पक्ष अधिकार पानेके लिये व्याकुल होने लगा। यूनानमें राज-विप्लव हुआ। इन्हीं कारणोंसे सन्धि-परिषद्को बैठकमैदेर होने लगी, अन्तमें फान्सने घेठक आरम्म होनेकी तारीख २५ नवम्बर निश्चित की। एक और प्रश्न अभी धाफी रह गया। वह यह, कि इस परि- पदमें किन किन राष्ट्रों के प्रतिनिधि सामन्वित किये जाये । यह प्रश्न भी विवाद-ग्रस्त था। कमाल पाशा पहलेसेही इस विषय- पर जोर देते भाते थे, कि रूसकी सोवीट सरकारके प्रतिनिधि

।
कमाल और कोलशेविक
GOOD
ॐ मित्रताका प्रारम्भ 88-
-
"
1
।
-
।
रन् १९२० के आरम्भसेही रूटरके तारों तथा बाहरी
समाचार पत्रोंसे मालूम होने लगा, कि रूसकी सोवीट
सरकार और राष्ट्रवादी तुर्कों में मेल-मिलाप होने लगा है।
४ फरवरी १९२० को विलायतके 'टाइम्स' पत्रका एक संवाद
दाता लिखता है
“सिवासमें राष्ट्रवादी तुर्कों की एक विराट् सभा हुई। इसमें
बाहरी मुल्कोंके भी कई प्रतिनिधि आये थे। सभापतिका आसन
राष्ट्रवादी तुर्कों के प्रधान मुस्तफा कमालपाशाने ग्रहण कियाथा।
"इस सभामें रूसकी सोवीट सरकारकी ओरसे भी एक प्रति-
निधि आया था। सभाको बैठकमें राष्ट्रवादी तुकों और सोधीट
सरकारके पीच मित्रता स्थापित करनेका प्रस्ताव उपस्थित किया
वोलशेविक पहलेसेही राष्ट्रवादी तुर्कों के साथ सहानु
भूति रखते थे, यह वात रूसी प्रतिनिधिके भाषणसेही मालूम हो
गयी। उसने कहा, "मैं उसकी सोवीट सरकारकी ओरसे प्रति
निधि होकर आपकी सभामें उपस्थित हुआ हूँ। सोवीट सरकार
राष्ट्र यादी तुर्कों के साथ हार्दिक सहानुभूति रखती है। हमारी
गया
---

मुस्तफा कमाल पाशा सरकार समझती है, कि टीमें आपलोग जैसी सरकार स्थापित और संगठित करना चाहते हैं, उससे तमाम मुसल्मान सलतनतें एकताको एक मजवून डोरीसे बंध जायेंगी और रूसने, यूरोपकी पूंजी सत्तावादी सरकारोंके विरुद्ध जो आन्दोलन आरम्भ किया है, उसमें उसे सहायता मिलेगी। "इसके बाद उस रूसो प्रतिनिधिने मुस्तफा कमाल पाशाके सम्मुख यह प्रस्ताव उपस्थित किया, कि यदि राष्ट्रवादो तुर्क मित्रराष्ट्रोंको फोजोंसे लडनेको तैयार हों, तो सोचोट सरकार उनकी मदद करनेको तैयार हो सकती है।" मुस्तफा कमालने तुर्को की ओरसे सोवीट सरकारको धन्य- बाद दिया और कहा,-"सोवोट सरकारने केवल रूसकी जारशाहीकोही नष्ट भ्रष्ट नहीं किया है और न केवल कसमेंही प्रजासत्ताका आदर्श कायम किया है, यरिक उसने तमाम ससार- के साम्राज्यवादी राष्ट्रोंके लिये एक पातडका कारण उपस्थित कर दिया है। इसके बाद मुस्तफा कमालने अपने प्रतिनिधि मास्कोमें भेजकर सोवीट सरकारसे स्थायो रूपसे मेल कर लिया है। फई महोनेके बाद ६ नवम्बर १९२० के एक तारसे मालूम हुआ, कि योलशेषिक अर्मेनियाकी ओर बढ़ रहे हैं और सम्भव है, वे राष्ट्रवादो तुओं की ओरसे अर्मेनियोंपर आक्रमण भी करें राष्ट्रवादी तुर्को द्वारा स्थापित अड्डोरा सरफारके सभापति- को हैसियतसे मुस्तफा कमाल पाशाने सोचीर सरकारके पर राष्ट्र

-
[
।
लिये जो वहादुरी दिपायी है, उसके लिये हमलोग हृदयसे उनके
मुस्तफा कमालयाशालीom
Im
सचिवको जो पत्र भेजे थे और सोची सरकारकी ओरसे उनको
जो पत्र मिले थे, उनसे भी यह मालूम होता है, कि दोनोंमें पूरा
मेल है और उनका मत भी एक दुसरेसे मिलता-जुलता है।
और मोशिये लेनिनका पत्र
राष्ट्रवादी तुर्फ जव सफलता प्राप्त करते हुए अपने अभीष्टको
ओर बढ़ने लगे और जब वे यूनानियों और अर्मेनियोंको कड़ी
शिकस्तें देने लगे, तब सोवीट सरकार के प्रधान मोशिये लेनिनने
मुस्तफा कमाल पाशाको इस आशयका एक पत्र भेजा था -
"आपकी सफलतापर मैं आपको हृदयसे धन्यवाद देता है।
आप अपने यहाँके तमाम राष्ट्रवादी तुर्को को मेरा यह सन्देशा
सुना देने की कृपा करें, कि उन्होंने अपनी आजादी कायम रखने के
आभारी है।

( मुस्तफा कमाल पाशा (१) राष्ट्र धादी तुर्क रूम साम्राज्यकी राजधानी कुस्तुन- तुनियाको गैर-मुसल्मान राष्ट्रोंके पजेमें जकडा हुआ समझते है, इसलिये वहाँसे जितने आशा पर आते हैं, उन्हें वे धर्मतः और न्यायत पालन करने योग्य नहीं समझते और न टकी सरकार के सन्धि शर्तों को स्वीकार करनेकाही राष्ट्र घादी तुर्को की दृष्टि- में फुछ मूल्य है। *(२) तुर्क राष्ट्रवादियोंने यह निश्चय कर लिया है, कि ये. चाहे जैसे हो- अपने खत्वोंकी रक्षा करेंगे और केवल ऐसी. ही सन्धिको स्वीकार करनेको तैयार हैं, जिसमें सम्मान और समानताका पूरा पूरा खयाल रखा जायेगा। “(३) तुर्की कौम अपनी इस संस्था प्रतिनिधिके सिवा और किसी गैरको मित्र राष्ट्रोंके साथ सुलह करनेका कोई भी अधिकार देना नहीं चाहती। "(४) ईसाई, यहूदी या कोई दूसरे देशवासी अथवा दूसरी जातिके लोग जो रूम साम्राज्यके अन्तर्गत रहते हैं उन्हें तुर्क राष्ट्र की सत्ता खीकार करनी होगी और वे ऐसा कोई भी काम नहीं कर सकेंगे, जिससे राष्ट्रका अहित हो। आशा है, तुर्क कोमकी इन मांगोंको आप न्याय सङ्गत और उचित समभेंगे। मैं आपको विश्वास दिलाता है, कि मैं आपका अनुगृहोत सेवक है। "तुर्क राष्ट्र सङ्घकी स्वीकृति तथा उसके सभापतिको आशा -] ...( हस्ताक्षर ) "-मुस्तफा कमालपाशा।" -१४१- - .

मुस्तफा कमाल माशा कामोंको प्रकट कर दूं, जो मित्रराष्ट्राने युद्ध समाप्त होनेके बाद किये हैं और जो हम मुसल्मानोंकी दृष्टिमें हमारे धार्मिक और राष्ट्रीय अपमानके द्योतक हैं। पुस्तुनतुनिया हमारा धार्मिक पीठस्थान है। उसे हम गैर मुसल्मानोंके द्वारा अधिकृत होते नहीं देख सकते हैं। “मित्र राष्ट्रोंकी पुलिस और सेनाने राष्ट्रीय तुर्क नेताओको खींच खींचकर कुस्तुनतुनियासे निकाला। तुर्क फौजी अफसरों, न्यायालय के विचारकों, सवाद-पत्र सम्पादकों, लेपकों और व्याख्यान दाताओंको गिरफ्तार कर लिया और उनके हाथोंमें हथकड़ियाँ और पैरोंमें पेडियां डालकर उन्हें अपने घर और नगरसे बाहर निकाल दिया। "हमारी सरकारी और सार्वजनिक इमारतोंपर सङ्गीनके ज़ोरसे अधिकार कर लिया गया। "तुर्को ने अपने स्वत्वोंको इस प्रकार अपहृत और अपनी कौमकी इतनी लाञ्छना होते देख, इसका प्रतिकार करनेके लिये एक कार्यकारिणी सभाका सगटन किया है। यह संस्था राष्ट्र । वादी तुओं की पार्टमेण्टको कार्यकारिणी सरकार है। “राष्ट्रवादो तुर्कों ने मुझे इसी कार्यकारिणी सरकारका सभा- पति निर्वाचित कर मुझे सम्मानित किया है। "उपर्युक्त वातोंको तथा राष्ट्रवादी तुर्को ने २६ जून १९२० को अपने जो विचार प्रकट किये हैं, उन्हें मैं आपके सामने प्रका- शित करना चाहता है। वे इस प्रकार है १४०- मुस्तफा कमाल पाशा भ(१) राष्ट्रबादी तुर्फ रूम-साम्राज्यकी राजधानी कुस्तुन- तुनियाको गैर-मुसल्मान राष्ट्रोंके पजेमें जकड़ा हुआ समझते हैं, इसलिये वहाँसे जितने आशा पन गाते हैं, उन्हें वे धर्मत और न्यायत पालन करने योग्य नहीं समझते और न टकी सरकार के सन्धि शर्तो को स्वीकार करनेकाही राष्ट्रवादी तुर्कों की दृष्टि- में कुछ मूल्य है। "(२) तुर्क राष्ट्रवादियोंने यह निश्चय कर लिया है, कि ये- चाहे जैसे हो- अपने स्वत्वोंकी रक्षा करेंगे और वे केवल ऐसी. ही सन्धिको स्वीकार करनेको तैयार है, जिसमें सम्मान और समानताका पूरा पूरा पयाल रखा जायेगा । " (३) तुर्की कौम अपनी इस संस्थाके प्रतिनिधिके सिवा और किसी गैरको मित्र राष्ट्रोंके साथ सुलह करनेका कोई भी अधिकार देना नहीं चाहती। “(४) ईसाई, यहूदी या कोई दूसरे देशवासी अथवा दूसरी जातिके लोग जो रूम साम्राज्यके अन्तर्गत रहते हैं उन्हें तुर्क- राष्ट्र की सत्ता स्वीकार करनी होगी और वे ऐसा कोई भी काम नहीं कर सकेंगे, जिससे राष्ट्रका अहित हो । फोमकी इन मांगोंको आप न्याय-सङ्गत और उचित समझेंगे । मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ, कि मैं आपका अनुगृहोत सेवक है। [तुर्फ राष्ट्र सङ्घकी स्वीकृति तथा उसके सभापतिको आशा से प्रेपित] (हस्ताक्षर ) " मुस्तफा कमालपाशा ।" आशा है, सुर्क गाजी मुस्तफा कमालयाशा । अझोरेका भापण - कुस्तुनतुनिया सरकारके सन्धिकी शपर अपनी स्वीकृति- का हस्ताक्षर कर देनेके बाद, राष्ट्रवादी तुकोंकी एक महती समामे, जो अङ्गोरेमें हुई थी, मुस्तफा कमाल पाशाने जो व्याख्यान दिया था, वह इस प्रकार है "मेरे प्यारे भाइयो! हमारी जातिके सिवा संसारमें कोई भी ऐसी दूसरी जाति नही है, जिसे इस बातका गौरव हो, कि उसने दूसरे धर्मके अनुया- थियोंके खत्वोंकी रक्षा की है। हमारे पूर्वजोंने अन्य देशोंपर बहुत- वार विजय पायी है , परन्तु अधिकृत देशोंके निवासियोंके धार्मिक स्वत्वोंकी उन्होंने सदा रक्षाही की है। सुल्तान मुहम्मद जन कुस्तुनतुनियामें आये, तब उन्होंने यहां के निवासियोंके धर्म- पर, उनके धार्मिक भावोंपर आघात नहीं पहुँचाया , वरिक परा: जित देशवासियोंके धर्म गुरुओंको सपूर्ण धार्मिक स्वतन्त्रता दे दी थी और इस प्रकार इस वातको प्रमाणित कर दिया था, कि हम तुर्क जिस प्रकार अपने चमेका खयाल रखते हैं, उसी प्रकार अन्य धर्मावलम्बियोंके धर्मका भी सम्मान करते हैं। हम उन्ही तुर्कोकी सन्तान हैं, जो सदा अपनी तरह दूसरोंको समझते थे। "सन्धि-परिपने शायद हमारे दुश्मनोंकी वातोंपर विश्वास कर लिया है, जिनमें हमपर निरर्थकदोप लगाये गये हैं-कितनी- ही झूठी यातें उडायी गयी है, लेकिन, प्यारे भाइयो! याद -१४२- फातेह -

Saमुस्तफा कमाल पाशा in
रखिये, कि सच-सचही है और घह कभी छिपकर नहीं रह
सकता। सच्ची बातको कोई दवाकर नहीं रख सकता!
"फरीद पाशाने अपने सरकारी वयानमें अर्मेनियाके विपयमें
घातें करते हुए पैरिसमें कहा है, कि पश्चिममें कोहिस्तान तारसमें
हमारी सरहद् मानी जा सकती है, लेकिन उन्हें शायद यह बात
याद नहीं रही, कि तारसकी पश्चिमी सीमातक-तारससे अना-
ताकियातककी अर्जी घोलनेवाली आवादीमें एक हजार वर्षांसे
तुर्कों का खून दौड रहा है।
"हमारे ऊपर यह तोहमत लगायीगयी है, कि तुर्को का भूत.
काल ऐसा अन्धकारपूर्ण है, कि इनके वर्तमान और भविष्यका
कुछ भी पता नहीं लगाया जा सकता। ऐसीही तोहमतें लगा
कर हमारे स्वत्योंका अपहरण किया जारहा है।
"परन्तु, भाइयो । उनलोगोंको याद रखना चाहिये, कि वीर
तुर्क जाति स्म पर किये गये अत्याचारों को देखकर भी
चुप होकर बैठी नही रह सकती। हमें अव चाहिये, कि हम
अपनी कमर कसकर पढे हो जायें, तलवारफे जोरसे अपने
स्वत्वोंकी रक्षाके लिये निकल पडे । शान्ति और मेल माफकतसे
अब काम निकलनेकी कोई आशा नहीं दिखाई देती।
र एक और भापण -
इसके कुछ दिनों बाद राष्ट्रवादी तुर्कों की एक और सभा हुई,
उसमें भाषण करते हुए मुस्तफा कमाल पाशाने कहा
-१४३-

-
Hax मुस्तफा कमाल पाशा Sm
"प्यारे भाइयो! अर्जेरूम और सिवासमें हमारे जो कौमी
जलसे हुए थे, उनका मकसद यही था, कि दारल'
खिलाफतकी
आजादीझायमरपनेकी किसीभीकोशिशसे हम बाज नहीं आयेंगे।
"जो जाति अपने प्राणोंपर खेलकर अपने देशके गौरव और
अपने राष्ट्र-सिद्ध अधिकारोंकी रक्षा नहीं करता, वह वास्तवमें
एक निहायत जलील कौम कहलाने योग्य है।
"जय किसी देशके आदमी पृथक्-पृथक् रहकर अपने स्वत्वों
की रक्षा और प्रवन्ध करने योग्य नहीं रहते हैं, तब वहाँ जमायत
कायम होती है और वह जमायत जिधर चाहती है, उधर भिन्न
भिन्न आदमियोंको लगाकर काम कराती है। उस समय सब
लोगोका भविष्य उस जमायतके हाथोंमें आ जाता है। इस प्रकार
वह जमावत अपना अभीष्ट पृथक्-पृथक् व्यक्तियोंकी शक्तियोंको
साह करके सब लोगोंका कल्याण-साधन करती है। हमें भी
चाहिये, कि अपनी इस जमायतको, अपनी अपनी भिन्न-भिन्न
शकियाँ प्रदान कर इसे पूर्णत शक्ति सम्पन्न बनाये और इसीके
द्वारा अपना उद्धार-साधन करें।
"सज्जनो! हमारी इस जमायतकी भूत और वर्तमान अवः
,
।
।

मुस्तफा कमाल पाशा
गते हाँका करती थी, उन्हें छोड चुकी हैं। उन्हें अब अपनी
डी वडी माशाओंपर पानी फिर जानेका भय होने लगा है।
"मित्रो! यह परिणाम है- हमारे स्वदेश प्रेमका | उसीकी
प्रेरणासे हम अपमानित होकर जीना नहीं चाहते। इस समय
हमारा कत्तव्य है, कि हम अपने मार्गपर वेधड़क, बेखौफ होकर
चलते जायें और हमारे रास्ते में जो रोटे मिलें उन्हें पीसकर
धूल करदें।
,
-
"अहोरा सरकारको पार्लमेण्टको भी चाहिये, कि वह अपने
काम खूब सावधानतापूर्वक करती रहे , क्योंकि योग्य शासकों
और सैनिक अधिकारियोंपर ही हमारी सफलता निर्भर करती
है और येही कौमकी भलाई या धुराईके लिये जिम्मेवर हैं।
"मेरी वातोंका साराश यह है, कि हम शान्ति और धैर्यसे
च्युत न हों, अपनी स्वतन्त्रताको हाथसे जाने न दें और तुर्क
कौमको गुलाम न बनने दें
"मुझे ईश्वरकी सहायताका पूरा भरोसा है। मेरा गुढ़
निश्वास है, कि हम तुर्फ अवश्यही अपनी अभीष्ट सिद्धिमें सफलता
प्राप्त करेंगे। परन्तु क्या आपने देशको स्वतन्त्र बना लेने और
शान्ति तथा सुशासन करलेनेसेही हमारा काम खत्म हो जायेगा?
नहीं। भविष्यमें हमें बहुत बडे-यहे उत्तरदायित्वपूर्ण काम करने
है। हाँ, यह जरूर है, कि अभी हमें अपनी अन्तरङ्ग परिस्पितिको
ही पहले सम्हालना है, ताकि दुनियापर रोशन हो जाये, कि हम
एक जिन्दः फोम है।
--

No text on this page.

गाजी मुस्तफा कमाल पाशा "मैं किसी प्रकारको सन्धि करने या न करने के लिये जिम्मेवर नहीं है। प्रत्येक विषयका निश्चय अहोरेकी राष्ट्रीय सभा करती है। यह राष्ट्रीय सस्था उन अन्याओंपर विचार करनेके लिये स्थापित हुई है, जो यूरोपीय साम्राज्यवादी राष्ट्रोंने तुर्क कोमके साथ उसका अस्तित्वतक लोप कर देनेके लिये किये हैं। इस सभाके सङ्गठन और उद्देश्यके विषयमें समय-समयपर सूचनाएँ और विज्ञप्तियाँ प्रकाशित करा दी गयी हैं। सभाका स्पष्ट उद्देश्य यह है, कि वह कौमी सरहदके अन्दर कौमी आजादी. की पूरी तरह हिफाजत करे और पलीफेकी सल्तनत मुसल्मानों- के हाथमेंहो रहे। बस, इससे अधिक इसका और कोई उद्देश्य नहीं है "तुर्क जाति केवल इतनाही चाहती है, कि उसके स्वत्वोंकी रक्षामें कोई गैर कोम हस्तक्षेप न करे । "इस समाका विश्वास है, कि वह यूरोपीय साम्राज्यवादी सरकारों के पन्जेसे तुर्को को छुड़ा लेगी और उसे स्वतन्त्र यनाये रोगी और राष्ट्रीय सरकारकी फिरसे स्थापना करेगी। "इसी मभाके नियमों और आदेशोंके अनुसार एक सुम- गठित सेना तैयार की गयी है, जो कोमको हर तरहके अत्याचार उत्पीहनोंसे रक्षा करेगी और जो तुर्कों के मार्गमें रोटे मट- कायेगे, उन्हें दण्ड देगी। "यए समा एक नयी सरकारको स्थापना करके अपनी कौमकी हिफाजत करनेका यन्दोवस्त करेगी।" .

ram I गाजी मुस्तफह कसाल माशा सल्तनतकी स्वतन्त्रतामें वहा आये और न हमारे आपसकी बरा वरीमेंही फर्क आये। "हमें तुर्क लोग अपने पादशाह या खलीफाको किसी गैर- मुसल्मानके अधीन देपना नहीं चाहते। साराश यह, कि हम अपनी फौमको गुलामीको जिलतसे बचानेके लिये अपना सब कुछ कुर्बान करनेको तैयार हैं। तुर्क कौम जबतक अपना अभीष्ट सिद्ध न कर लेगी, तबतक वह चैन न लेगी। “भाइयो ! यह समय हमारी परीक्षाका है। हमें इस परीक्षा- के समय अपनी स्वतन्त्रताको रक्षा करके और अपने देशमें शान्ति और सुव्यवस्था स्थापित करके यह दिपा देना चाहिये, कि हम वास्तवमें शासक होनेके योग्य हैं या नहीं।" -१५०-

No text on this page.

No text on this page.

सल्तनत और खलाफल फ -कमालका सम्मान कोको जिस दिन अपने अपहृत स्मा, यस आदि प्रान्त वापस मिले,उस दिन तमाम टर्कीमें महान् आनन्दोत्सव मनाया गया। जिन सुल्तान वहीद उद्दोनको विजयके पादसे शासनके कार्य भारसे मुक्त कर दिया गया था, वे भी इस राष्ट्रीय आनन्दोत्सवमें लम्मिलित हुए थे और उन्होंनेभीमसजिदमें जाकर ईश्वरको अपनी कौमको सफलतापर धन्यवाद दिया था। कुस्तुनतुनियाके लोगोंने जिस प्रकार गाजी मुस्तफा कमाल पाशाके प्रति अपनी आन्तरिक श्रद्धा प्रकट की है, वह वास्तनमें एक असाधारण यात है और कमालके लिये ऐसीही श्रद्धा शोभा भी पा सकती है। इस प्रकारकी श्रद्धा केवल वेही पाते हैं, जो अपनी जातिकी,अपनी मातृ-भूमिकी दुर्दशाके समय उसके उद्धार- के लिये कमर कसकर खड़े हो जाते हैं और उसके कल्याण के लिये अपना अस्तित्वतक उसीमें मिला देते हैं। कुस्तुनतुनिया में लोगोंने मुस्तफा कमालका एक वृरत् चित्र लेकर जुलूस निकाला। मसजिदके पास अपने देशके त्राता और रक्षकके प्रति अपनी आन्तरिफ श्रद्धा और भक्ति प्रकट करने तथा उनके दीर्घ जीवन- *11 पिजी am । । । । । मुस्तफा कमाल पाशा लाभके लिये ईश्वरसे प्रार्थना करनेको लोगोंकी एक बड़ी भारी भीड इकट्ठी हुई थी। अङ्गोरा सरकारके सेना-दल शृङ्खला-बद्ध होकर तमाम गश्त लगा रहे थे। - शासनमें सुधार ४ राष्ट्रवादी तुर्क पहलेसेही इस वातकी आवश्यकताका अनुभव कर रहे थे, कि टोंकी शासन-पद्धतिमें संस्कार करना प्याहिये। इसका कारण यह है, कि आजतक एकही व्यक्तिके हायमें धार्मिक और राजकीय सत्ता रहती थी। एकही व्यक्ति खलीफा और सुल्तान हो सकता था। अतएव एकही मनुष्य दो काम करे, यह वडा कठिन हो जाया करता था। पीछेके इतिहासके पन्ने उलटकर देखा जाये, तो मालूम हो जायेगा, कि राजकीय सत्ता खलीफाके हाथमें होनेसे उसका दुरुपयोग किया गया है। अब्दुल हमीद जब सुल्तान और खलीफा ये, तब उन्होंने तुर्को से भिन्न मुसल्मान नौकरशाही नियत करके तुर्कोको बुरी तरह तग किया था। अतएव तुर्को को खलीफाकी राजकीय सत्तासे घृणा हो गयी थी। महासमरके पहले दोनों सत्ताएँ अलग-अलग कर देनेका प्रयत भी हुआ था। इस पद्धतिको जड-मूलसे बदल न सकनेके कारणही 'नवीन तुर्फ संघ'वालोंकी अभिलापा अभीतक पूर्ण नहीं हुई थी। इस पद्धतिके परिचालक खुद सुल्तान थे। इसीलिये विजयके बाद नुर्को ने उनसे शासनके कार्य-भारसे मुक्त होनेके लिये कहा था, साथही उनका यह भी कहना था, कि सुल्तान अपने धार्मिक -१५२- .

मुस्तफा कमाल पाशा अधिकारोंके साथ मुसल्मान-जगत्के धर्माचार्य अर्थात् प्पलीफा पने रहें तो हमें कोई दुख नहीं है। सुल्तान के साथ इस विषय- में परामर्श करने तथा इस विषयका निर्णय करनेके लिये अङ्गोरा सरकारकी ओरमे रिफत पाशा सुल्तानके पास भेजे गये थे। सुल्तान तथा रिफत पाशामें इस विषयमें करीब चार घण्टेतक पाते हुई और सुल्तानने रिफत पाशाकी बात मान ली। इस प्रकार उनको स्वीकृति लेकर उन्हें केवल धर्माचार्यका कार्य भार सौंपा गया था और यह भी स्थिर हुआ था, कि भवि- प्यमें खलीफाकी गद्दोपर उसमानिया सानदानके लोगही बैठा करेंगे। सुल्तानने भी यह बात मान ली थी, परन्तु पीछे वे आप हो-आप अगरेजोंके शरणापन्न होनेके लिये देश छोडनेका विचार करने लगे। अन्तमें अगरेजोंने उन्हें अपने युद्ध पोतमें सवार कराकर मादा पहुंचा दिया। इसके बाद अब तुर्कोने सुस्तान अब्दुल मजीदको पलीफा निर्वाचिन किया है। सुल्तान या पलीफाके इस निर्वाचन कार्य मुसल्मान धर्मग्रन्थोंके आदेशोंका पालन भी किया गया है। साराश यह, कि खिलाफतके लिये मुस्तफा कमाल और रिफत पाशाके हृदय में बहुत सम्मान है । पर अभी अभी कायरकी तरह भाग छूटनेवाले सुल्तान वहीद उद्दीनके विषयमें उनके हद- यमें जरा भी आदर नहीं है। उनका दृढ विश्वास है, कि उक्त सल्ताननेही तुकों का सर्वनाश किया है। अतएव तुर्को- का द्वेष पलोफा नामक व्यक्तिके विषयमें है-खिलाफतके

No text on this page.

'बर्मन प्रेस' कलकत्ताकी सत्रमा पुरतकं । । कोहेनूर - मी सिद संचिा ऐतिहासिक उपन्यास M गोचर कियापारी होता भवभ्य पदिय समयदर सुन्दर पांचषित। पाठकसम विवापरा में एक ऐसे मयानिक चौरको नारवाक्षिाहार लिखा गया २, कोबो यह तुरवर जासूमौकी प्रामि पल डालकर दिन घसि एकवार माराडारठा था और सम छोग उसे एन्ट्रनाविक दहाई देखते देखते लाखों अपयका माननहा ले साता घो। उसकी पोरि और सममाने मग मर्म पिन भी। दाम पर शपया।। पता- प्रबल, पामगरका ३७१ अपरजीतपुर रोड,कलकता। मूल्य केवल RAJ. मवित्र जासूसी उपन्यास। यदि चापकी गणपूर्ती और इसवमाको मया . +11.. भा से, यदि आप ठोर-चोर "गोदाम और ममार भोगा" लिदास प्रमित भोप #am- का रसास्वादन करना पाहता पदि पापदयपुर युवराज "अमर- मि" को वीरता, धोरता और पति ‘পাজা খুব গরিখ মাখা পাই रों, यदि पाप"पगपती धपाया" होने पाले नधार्षिक वालिय वोरा और हाम्त - सम्मानका घोर 'भपाम दिया पारा, यदि पाप घोर शिरोमणि। "कासा पहाइ" गनकमार सिर" पादि महो र बलिय पोरोका प्रसंग सुमन আৰী বাঘ আর্যগন্ধ তি' 1 . - पटनापूरी चालाकं चोर 'तर्मन प्रेस' फलकत्ताफी सर्वोत्तम पुस्तक। + । उपन्यास। इस उपन्यासमें अधरम-जातिको पारसरिक अनुताका बड़ा हो पुन्हा चित्र खींचा गया पेमतोक नामी एक सम्मान গী জিন্ন জাৰ মাষ্ট सताये लाकर अपनी माहितीष सन्दरी स्वोझिोपेटा" शित भारतवर्षमै माग पाये, प्रकार उनके प्रसु-दलने भारत भी उनका पीछा न छोहा, किस प्रकार भारतके सरकारी जासूस कानो रघुपन्न" ने अनुमान हाथसे वारम्बार उनकी रथा को किस प्रकार शोंक पासूस सार पेमयोको दाई नोकरी तकमे बुन गये, किस प्रकार ठोंके षड्यनार पाडे पेमद्रोकको 'मयानक खूनी मामले में, गिरफ्तार को इलैक पाना पड़ा, किस प्रकार राखेमें प्रयुओंको नशामने उनपर आक्रमण किया। किस प्रकार उनको सो “सिनोपैट्रा समुद्र में फेक दी गयी, किस प्रकार भासुर र पराने समुद्र में याद कर उनकी स्त्रीका सवार किया, किस प्रकार पड़े पई पासोको मदद लाई पेममोक" को अदालतसे रिहाई मियो- नादि मैकड़ों दियचस्प घटनापोका वर्णन है।दाम ), सचित्र जासूस उपन्यास। । एस उपन्यासविसायतके सुप्रसिद्ध जासूस मिटर रावट बुकको ऐसी पर जारासियां दी गयी कि मारे ताजपके दांतो उगलो,काटनी पडती सुन्दर सुन्दर पिल भी है। दाम सिर्फ परेशमी जिल्द २) - और.एल, बर्मन एण्ड को०, ३७१ अपर चीतपुर रोड, कलकर H जासूसके घर खून . 1414 "यम्न प्रेस' कलकचाकी सर्वोत्तम पुस्तकें। शीशमहल 1 सचित्र ऐतिहासिक उपन्यास । इस उपन्यास भारत सम्राट अकयर" के समयको कितनों को मन कि घटनाओंका मधिरा पणन किया गया है। उखाट प्रकपरको पाचासे सेनापति “एसान्दर" का एप्त · भावसे दलगढ-दुर्ग' पर पढ़ाई करना, भयानक अधेरी रातके रामय चुपचाप टुगंपर अधिकार जमा कर दुर्गाधिपति 'सोधानी' को कर करनेको चटा करना, सोहनीशी धौर-पत्नो गुसमन" के अपूर्व रूप खावययन सुग्ध हो कत्तव्य विमुख होना, पतिमता गुलशनका सक्षन्दरको धोखा देकर पति सहित दुगरी निक्षल भागना, पुस्कन्दरका पौछा करना, सोहानीका पादाब- धे गिर कर पाया त्याग करना, गुतानको फरियाद पर प्रकवरके दरबारसे इसकन्दरको फांसोका एक मिखना, गुखशाको सहायतासे। इस्कन्दरका कारागारसे निकल भागना माखदाधिप्रति “वागवहादुर" को ग्रह घातकको प्राक्रमायस पंचाना, पाप पारमा पस्कन्दरको सन्मान सहित घर लेजाना, पान वहादुरको सन्दहो काम्या कविधा" पर इस सन्दरका मोषित होना, दानमि विवाद होना पाकि तहो पपुवा घटनायें दो गयो हैं । मूल्य २४, रेशमो निल्द २) स. जासूसी कहानियां यह उत्तमोत्तम मासूमो उपन्यासोंका गड़ा ही अपूर्व सग्रह है। इसमें ५ उपन्यास दिन गर) साढ पाठ खून, (२) सतोका बदला, (३) नोलाम-घरका राज, (8) घुड़दौडका घोडा (4) चौर भोर पर दाम सिर्फ My आना। पता-पार पलायामन पाट झो०,३७१चोतपुर रोड, कलकदा 1 - । . 4 । F 'धर्मन प्रस' पालकत्साकी सवत्तिम पुस्तक। चित्र जासूसी (उपन्यास। जन पाठक। हम दाधे माध करत विभाजनक पापा ना हो सन्दर जासूसी कुत्ता 1 । , न पढ़ा होगा। साया | "मा एक खामि-भक्त को एक सम्मान्त करामाते दिखाई प्रकार पार्श स्वामीको लाईपनी अहितीय यह पा दिया है, क्षिीपेटा" मर्पित फड़क उठती है, भाये, विस उपन्यास यच शिक्षा दलने मारत सकती है कि मनुष्य कोडा, किस परिश्रमके बलपर कोरकारी बारस कर सकता। ने अनुमति प्रमुरोध, कि यहिनकी रपा की, ग्यासाम छ मो सांके जाम्स या मौ माप इरी अध्यापढ़ें,"समें भूस *বাবা না, জি ফুধ भाग्य-परिवत्तनका दिसा सन्दर चिन अडित किया गया है, कि मकर निकम्मे माष्य भी कुछ दिनों अपनी पत्ति कर सकते है। इस कोटीके सन्दर सुन्दर चित्र भी दिये गये है। मूल्य 13, रेशमी जिन्ट राई A महेन्द्रकुमार ऐय्यारों और तिलिस्मका अन्ठा उपन्चासे।' ऐय्यारी और तिलिस्रो खेलसि भरा हुआ, पाश्चर्य व्यापारों, और लोम अवश्य घटनामास इबा हुआ यह अनूठा उपन्यास पढने छौ योग्य । उपन्यासमें ऐसी ऐसी ऐय्यारिया सेलो गयी हैं, यि पढकर पाठक पडः पठेंगे। इस उपन्यासक पढते समय पाठकका खाना, पीना, मोना,मैंठन सक भूल जायगा। इस पर भी .... पेणक बड़े पोधेका दाम, सिर्फ ५) , एल, धर्मान पण्ड को०, ३७१ अपर चीतपुर रोड, कलकत्ता .

Harमन प्रेस फलशचाको सम्पांचम पुस्तकें। ५ दुर्गादास । + इस उपन्यासन-पूर्ण सचिन ऐतिहासिक नाटक । पिन , घटना जिस नाटकको धूम मच गयी थी, पा-मापा पिक किया गया है। नाटकको अनेकौं सम्करण हापा पाशा सेमापन हाय पिक गये थे, कश्यकता प्रप्त -भावले वाला थियेटरों में निम नाटक पढ़ाई करना खेलते समय दर्शकोंको बार समय चुपचाप मिलना कठिन हा जाता फार हुर्गाधिप वही सुहवुहाता हुआ बोर र करनेकी -वैध प्रधान ऐतिहासिक नाटक और-पत्नो दौमें छपकर तय्यार । धारार कम लावण्यात में यह नाटक नाटकाका संकट विपुखराम "औरङ्गवेध महाराणा राजसिह,भोमसिंह, राग्या पक्ष्यसि जोके पुर्व महाराष्ट्राधिपति "मानी और शाइनाद अकबर, भाषा तथा कामवखा प्रभृतिक इतिहास प्रसिद्ध भीषण युद्धका वर्णन पड़ी से भोजस्विनी भाषामें किया गया है।। मुगलनमणियों और राजपूत खलनायक परिसका खाका बडी हो माओकोसे खौंपा गया है। इस पर और खेलकर पाठक इतने खुश होंगे, कि फिर नित्य एमे दो नाटक देखा और पढ्नो लिये सोजत फिरेगे। पहलीयारको छपी कुल कापियां मिय २ जानेपर 'हमने इसे इसरो धार बडी सज-धजसे छापा है और हाफटो. फोटोके छपे कितने ही सुन्दर सुन्दर रङ्गीन चित्र भी दिया है जिहें देखा भाप फड़क उठेगे। दाम सिर्फ ११), रेशमी निल्द व धोका ) रुपया। - खूनी औरत .. इसमें एक डाकरो मेसमेरिणम पा भौतिक-विद्याका वयन एसो पिषित तारी किया गया कि पढ़का रोगटे पड़े हालाते हैं। दाम सिफ .. पता-पार, एल, सम्मन एएडको०, ३१ अपर चोतपुर रोड, फलकमा 1 'धर्मनि प्रेस फलकत्ताकी सबतिम पुस्ताकें। डबल जासूस सचित्र जासूसी उपन्यास :- इसमें नरेन्द्र और सुरेन्द्र नामक एक ही सूरत-शामके दो नामो सासूसाको सोही पाश्चर्यमनक कारवाइयोका पचन किया गया है, जिसके पढ़नसे गिटे खड़े हो जाते हैं। यह उपन्चास पठनाका खजाना, कौतुकका भागार चौह पासूसी करामातीका मण्डार १। दोनों जासूसनि दिन पसादनीसे गोरा, दगाबाजों और पूनियाँको गरफ्तार कर "सुशोला और मनो- मा" नानी दो सधान्त बमगिर्याको चाया है, कि सुइसे 'वाद या 'मकल पाती है। कलकतिया धोरकि, सवमी प्रडई का अद्भुत रहस्य, नाथ पर जासूस और पोगेका भयानक ग्राम, कम्पनीयागमें भीषण तम- पाणी, एक वीरान खषहरमें दृष्टोंक पलको विपिन गिरफ्तारी, मुर्दाघरमें येनामी लाशका अनूठे टससे पहचाना गाना, नदी के किनारे दो असलो और दो नकली जासूझेका इन्द्र युद्ध पदि पातें पढ़कर भाप दा नरहवाय तो बात हो या ई? इसमें 'सुमोला हाम्रो सुन्दरीका एक तिनरजा पिन देखने की योग्य है। इसके अलावा र मी सुन्दरामुन्दर चिन दिये गये हैं। दामः ॥ निल्द यधीकार) मायामहल 'सम को पुलपाकी अपूर्व-ऐयारियों, पायजनक तिलिस्माता, मया बहाश्यों पीर पवित्र प्रेमका बड़ाही सन्दर चित्रं शोचो गया है, दाम र गता-भार, पल, बम्मन पराह को ३७१ अपरें चीतपुर रोड, कलकत्ता वर्मन् प्रेस कलकत्तापी सर्वोत्तम पुस्तकें। मचित्र उपन्यास पाठक महोदयो! आपने शायद पुराने जमानेके भयानक ठगोपा हाय 'सुना होगा। 'इष्ट पुष्ष्यिा कम्पनी' राचरुवकाक्षी एन ठगीका महादी और दौरा था ! माँ की चोर- शुल्मसे उस समय मरकार और प्रजा दोनों की सईया 'गची धौं । ठगोंके बड़े बड़े दस गात मोठाठ-बाट से दौरा किरकफरत थे और उनके गोडनेहमसाफिर्गेको यरगखा (पशका) कर अपने गरीष ले भात थे फिर "ठग सोग विचिम ढमा कमाल यो झटकेस वातको पातम उद फासो देकर सारा धन लूट लेते थे। यह उपन्यास नहा धो रोचक और शिक्षाप्रद है और हाफटोन फोटोको पड़ी बढी कई तस्मोरे लगाकर सूबछी सला दिया गया है। शाम सिर्फ up 11 कैदीकी, करामात TH यह एक पड़ाही रहस्यपूर्ण सचिनु डिटेकटिम उपन्यास रेलगानको मशहर पासूस मिलावट बनेकने फासले प्रसिंह विद्रोहो और डाकू “हेनरौ गैरक" को कितनी ही योर पडो यहादरीके साथ गिरफ्तार किया था, पर फिर? मी गैरक बराबर उनको पाखोमै धूल झोके भागता रहा। इस धाकून गारे यरोपमें हलमाल मचा रखो थो,यहासक - कि स्वयम् मिष्टर बोकको भो कई यार-इससे लांछित होना पडा । अन्त में से कने किस तरह से , पकर कर मजा दिनवाई यह पढ़कर आप दर होनायेंगे-दाम ,महिलंद ) नकली, रानी- इसमें एक डाक स्त्रोको योग्ता सधिमानो, नालाको और दिलरी प्रादिका पणन : वृद्धी हो यारोकी, से किया गया है। सदर सुन्दर कर पिनाभी, दाम सिफ १७. पता-मार, पलपमन पूण्ड कोमपर चीतपुर रोड, फलकता, - - तहस-नहस तिमि और, परिवार । . आदर्श चाची, शिक्षाप्रद सचित्रं गार्हस्थ उपन्यास MAH - . पड़े सुखो, राजनिअनसे यड • 'यम्मत प्रेस'कलकलाकी सासमा पुस्तक। हिन्दी-संसारमें यह पहला ही उपन्यास छपा, शिससे समाज वा देशका वास्तविक उपकार हो सकता है। स्त्री, पुरुष, बूट, यच्च , पभो इस उपन्याससे मनोरञ्जनको पाप हो साथ प्रादर्श शिक्षा, मी माप्त कर सकेंगे। प्राय देखा गया १, कि खियोको परे पाप बेटेरो 4 ITI फूट गया ३, भाई भाई में घिरगुता हो गयो , है, पाधा भतोने में और छा गया, है और..पना बनाया पाखका घर खाकमै . मिल गया १। यह उपन्यास एसो प्रकारको पटनाओं को सामने रखकर लिखा गया है।' एकवार इस उपन्यासको पढ़ ने पास के वर-भाव और हुराग्रह-६ का नाश हो जाता है। मून्य केवल रेमो जिद २७ इसमें हरगोन चित्र हैं। उपन्यास। इसमें वोर-शिरोमणि महागारासिंह और सम्राट औरणनेवर नौषण युडका वणन है, जिसमें लक्ष्याधिक योगेको प्राणाहुति हुई थी। महायुद्ध में रामसिंहने हुद्दान्त औरवको यो नधारी परास कर में गर कौरोष-कन्या चश्वन-कुमारों की रक्षा की थी। इसमें बाप- मात्री और भाजपूतो घरानोको बिटियोंका बरंगे को देखकर तषियत फड उठती दाम रिमीमाजिद शरमभी जिद कोषा पता-आर, पल, धम्मन एण्ड को, ३७१मिपर बीतपुररोड राजसिंह सचित्र ऐतिहासिक ।

धर्मन प्रेस' कलकत्ताको सात्तम पुस्तः । १ , घटनापूर्व सचित्र जासूसो उपन्यास 1. सन् १८५७ ई. जिस भयानक "गदर" (वलय) ने एका हौ दिन, एक हो समय और एक ही खग्नमें सारे "भारतवर्ष में प्रपद्य विद्रोहाग्नि फेला दौ घो, जिरा गदरअपनो मोषणतासे बडे या प्रशापौ पोरों दिल दहला दिये थे, जिसने दिडी, कानपुर विठूर, मेरठ, जागो और बकार भादिको सुविशाल 'भमर- “नेत्र' में परिणत कर दियाघा,लिम नमारत-सरकारको अधिकाश त्रिी फौगों को विद्रोही बना दिया था, 'जिस भारतीय प्रतण्ड विद्रौपाय को विकट ह कारने सुदृरव्यापी "इङ्गलैण्ड" में भी भयानक इसपर मषा दी थी, उसी प्रसिद्ध “गदर" या "सिपाही विद्रो" का इसमें पूरा हाल दिया गया है। साथ ही पदर-सम्बन्धी सम्दर सन्दर, निर भी है। दाम ), मुनघलो जिल्द २) . सचिन ऐतिहासिक उपन्यास। या स्पग्याम लखन'रईय' प्रख्यात नामा लेखक मिटर नाम विलिगमरमासका लिखाने पोतलको मूर्ति नामक भयानव तिरिका अद्भुत रइय, रोमन कैथलिक पाड़ियोंकि मेयर प्रत्याचार, मेंग, होमियां, टकौं, पडामा पानीको भीषण छदारया, "माया और “तानी' का विषय मेद ताम और भाष्टिया सबाटका पावरस्य जनकाबुष, भादिमा महो तोसे विखी गई है, साथ भी बड़े पो मानपूर्वाचिन मीदिये गये दाम मागोमा मि पनिमद ३) प्रता-माद, एल, यमन एण्ड को०१३१ अपरचीतपुर रोड, फलकला पीतलकी मूर्ति वर्मन सा फलकत्तीकी सवत्तिम पुस्तका । भीषण डकैती F Pr- यह उपन्यास या साहित्यके गौरवस्तम्भ, जासूसी उपन्यासोंके एक मात्र कर्णधार श्रीयुत 'वाबू पाचकोडी दे की , विचित्र लेखनीका सजीव प्रतिविम्ब है। समें "मिष्टर रोटले गड" नामया एक अमेरिकन पासूसको अपवं कारंवाइयां- का ऐसादर,पिन सौंपा गया है, कि एतक एकयार छठाकर फिर छोडनेकी पछा ही नहीं होतो। इस उपन्यारवी प्रत्येक परिष्दा प्रत्येक पृष्ठ, प्रत्येक पैराग्राफ, प्रत्येक पति भौर प्रत्येक शब्दमें दिखचसो और मनोरणकाता कूट कूटकार मरो गयी है। साथ ही अन्दर सुन्दर चित्र भी दिये गये हैं। इसमें इस उपन्यासको मथान नायिका 'मिसेस तोरायणी' का पक ऐसा अपूर्व तिनरमा पिन दिया गया है, कि देखते ही मन साथसे निकल पाता है। दाम सिफै १ सजिलद . सचित्र जासूसो उपन्यास - इसमें लण्डनके विख्यातनामा • अस्त-चिकित्सक, अद्भुत क्षमताशाली 'हाकर का' को उस मोषण रसायन-विद्याका, चमरकार है, लिसके द्वारा पर बातको यातमें, जिन्देको 'मुर्दा और मुदको 'जिन्दा बनाकर अपना प्रणित'मतलब गांठ लेता था इस डाफरके गुप्त अत्याचामि सारा परीक पिस्त उठा था और इसे सोग "लादू-विद्याभूत-विद्या" आदि समझने की पन्तम वहाँक विलक्षण प्रतिभालो समसिहालास्स मिटरक किस प्रकार उसका रहस्य-भेदकर उडातर को गिरफतारविवार पर पढ़नेही योग्य सन्दर सदा दो पिन मी दिये गये। दाम सिंका पताम्मआरएल, धर्मेन एण्ड कोपरचीतपुर रोडकलकता . डाक्टर साहब - ।

'धर्मन प्रस' कलकत्ताको सर्वोत्तम पुस्त। chutreuranrataruttoranraniumanParentinuper *-*-* जासूसी चक्कर नामक एक धनाडा শস্ত্র जापली उपन्यास लिखकनै स उपन्यासमें बम्बाको पारमी-समाजका बड़ा ही निषित रहस्य खोचा दिन हुए पपी इरमसनो पारसौ पचानके शाम विपिन रूपसे एक लाखको गोरा हो गयो, साध ही दुखो सडकपर भार बाड़ी में एक 'पारसीयुषक जानसे मार डाला गया दून दोनों घटनाको लेपार पपईम यही लचल पर गयी। पन और चोरीको नाममे "वम्तमयो” नामक 'एक पारसी गिरफतार धुभा। इन दोनी घटनाओंकी लाध निये सका। रको पोरसे बड़े बड़े ४ लासूस छोई गये। जान मधामसे होने 'संगी, फिर पार दर जासुसीने सुन्दरी 'रतनवाई की सहायतासे पंतालगाया, निरपराध रसमणीने अदालत एटकारा पाया, नकली विवाह के समय भीषण व्यक्ति धऑरपो गिरफ्तार किया गया,आदि घटनाये इस खूपोमालिखो गया है, वि.दिना समाप्त किये भखक कोडनेको का नहीं होती। खन, पोरी, लाल, शुभा-चोरी, सभी मासे विखलाई गयी है। चापटौनका चित्र मो, इ. मध्य । मनिल्द P+ सचिव गो-पालन शिक्षा इसमें गौ वडोको पहचान, पासुन दबाये और दृध बट्टान तथा धरी जनानेवाले पदार्थोंको बनाने के ऐसे माल रोक लिखे गये हैं, कि मनुष्य कुछ गोदिनाम मालामाल पो.जा सकता है। गाय आदि पासीवालीको रस एषय पौदना पापियर पियामी दिय।। टाग के वध) प्राना। बताभार, पलायर्मन पण्ड को ३१ मारधीतपुर रोड ३ - 'यमन प्रेस फलफचाकी सवोत्तम पुस्तकें। - 1. . Pun -- در सचित्र नराधम जासूसी उपन्यास। इसमें एक मिन्द्रोडी डाफरको स्वार्थ-परताका बड़ा हो सन्दर, पाका चौपा गया है। डाकरका मित्रको स्त्री गृप्त-प्रेम कर अन्तम उमका न करना, पपनोसरी प्रेमिकासे खनको नात चोत करते समय सांकरके मिलक्षा छिपकर घनना और फिर उसे धमकाना,डाकर और उसलो प्रेमिकाका मित्रको धोखा देकर फासौंपर लटकाना, मिनकी वाण का एकाएक गायप हो जाना, दा पोरोंका मेंद, खोफ नेका मय दिख. डाकर डाफरको धमकाना, डाकरकों एकको महोमें मोककर मार डासना। परदा खाशका एकाएक निन्दा की जाना, आदि, घडो, प्राशय जनक पातें लिखी गयो १, दाम सिर्फ 15, जिलद व धोका १॥). शिक्षाप्रद जासूसी उपन्यास। इसमें एक मञ्चरिया स्त्रोने किस पतरता, यक्षिमता और दूर-दभिता अपने कुपथगामी खामो और कितनेही मनुष्योंको सपथगामी बनाया पर पढते पढ़ते जो फडक,उठता है। कुमारस्वामीका तिलिस्मी मठाजोगिनीको अद्भुत चातुरी, धीरसेनको विलक्षण वीरता, शिवाखाको अषितीय सन्दरता पादिका हाल पर्टकर श्राप अवाक रह जायगे यह शिक्षामद उपन्यास मी, मुरुष, यूर्ट ग सभौके पढ़ने योग्य है। दाम सिर्फ n आना। जासूसी पिटारा- इसमें बड़े हो रहस्य जनक जासूसो उपन्चासे है-(१) गुजारमहल, शेपूल-वेगम, (३) विषिर्ष'जोहरी, ७) अस्सी इनारको पारी, खोपा गोदाम ) पिता-मार, एलपर्मन एण्डको०,३७४ामपर बीतपुर रोग, कलकता। 16 । A . * शशिवाला * प 'बर्मन प्रेस' कलकत्ताकी सवत्तिम पुरतर्फ । २ + ऐय्यारी' और मशहुर तिलिस्मका उपन्यासी पर चन्द्रसिंहको अपने पय्यार होराधिक साय शिकार पैलने जाकर "पतलोमहल" नामक तिलिममें गिरफ्तार से जाना, शिलिमको बहुत सी कोठरियोको तोडना, तिलिस्मो दारोगाफी माजीका राजमारपर मोहित सोजानाराजकुमारको खोलमें उनके और पार पाराफा तिलियामें पर चना, तिलिस्मी शैतानका, एकाएक जमीनसे पैदा होकर राजकुमार बगेरहको 'तिलिस्म जालन्धर' में कैद कर देना। राजा द्रसि इका मायापूरपर पढ़ाई करना।, दोनों ओरको. बेशुमार फौजोका भयानक बडापया, राणा धोरेन्द्रसिपको विजय, कुमारक मसुर देवरिइपर दुश्मनों को पढ़ाई, पनघोर सग्राम ।। किले के पिछले हिस्सेवा एकाएदा उड थाना। पदौके पौधोबोच लडाई होना, इत्यादि । दाम चारो नागका सिप) रुपया न + , गुलबदन शियेद्रिकल उपन्यास . 11 'प्रेम-रघका इससे अशा उपन्यास हिन्दी में अपतक दूसा नी छपा। मन्दाय सफदरजा और जगभेदको भयानक लडाहया, दो दो प्रादमियोंका पचपदनके फिराक में नो-मासे कोशिश करना, गुलनार और ईदरका बोध माधा देना।..जमशेदका गुलबदनको उड़ा लेजाना, पुषका टूट जाना और पखवदनका नदोमें गिर पड़ना, आदिमाते लिखी गयी है । दाम सिर्फ १ सचित्र ऐतिहासिक उपन्यास। यदि भार्प महाराष्ट्र-जुल मूषण छत्रपति शिवाजी और सम्राट और जप मा.तिहास प्रसि भीषण संग्रान देखा पाइरी हो यदि पाप महाराज मिपाणीक कैद होने और विलक्षण दस किले निकट भागनका अगुरा समाचार बानमा पाहत हों, यदि आप महाराष्ट्र-रमणियोंकी चोरता, इस्मिता और धार्मिकताका भादर्श परित्र पढ़ना चाहते हो, यदि भार बोरावके दवारका गृहराय जाननाचाईत हो, यदि पाप गगनीतिको पद भोर रहस्यजनक बातें सुनना चाहते हो तो इसे अवश्य पदिय । दाम, 1 पवा आर. पल. यर्मन एण्ड को०.३७१ अपर चीतपुर, 'यमन प्रस' फलकवाफी सर्वोत्तम पुस्तके। TERRORधामाख्य armera सच्चामिल जिन्देकी लाश। - । यह उपन्यास घडाही रहस्यमय, भाडा शिक्षाप्रद और हत्यमाही है। इसमें ०क सोमिनका यपूर्व स्वार्थ त्याग, कुटिलोंकी कुटिलता, पातितकी महिमा भौर मुरदेका जो उटना, मादि पढी बहुत घटनायें लिखी गयी हैं। दाम ॥ जीवनमुक्त-रहस्य ८ शिक्षाप्रद सचित्र सामाजिक नाटक । र शान, भक्ति, वैराग्य, राजनीति, धम्मनीति और समाज-नीतिसे भरा हुआ, ईसाइयोंकी पोल खोलनेवाला, फुटिलों, बेईमानो और जालसाजोंका भण्डा फोदनेवाला, पातिग्रत धर्मको रक्षा करनेवाला और स्वार्थ-यागका उज्वल उपदेश देनेवाला यह नाटक इतना मनोहर, दयग्राही, शिक्षाप्रद और भन्ठा है, कि एक पार इसे पढ लेनेसे मनुष्य सैकडो तरहकी सांसारिक सुराइयोंसे सावधान हो जाता है,, अवश्य पढिये। वामाविना निन्दपक रमोन जिदद बंधीका रुपया। 1 वीर-चरितावली ." इसमें निमलिखित वीर-योराङ्गनाओंको वीर-कहानियां दी गयी है, (१) गूनौ दर्गावती. (२) रानी लक्ष्मीबाई आवाहर थाई, (8) कमदेवी (1) वीर पाती पन्ना, (६) वीर-बालक और पौर-नारी, (७) राजकुमार पण, (८) पृथ्योराण, (e) बादलचन्द, (१०) रायम सिख धीर-रणजीतर्सि (१२) इग्मोर, (१३) महाराणा प्रतापसिंह, (18) छत्रपति शिवाजी, (१५) राणा पंगामसिह, (१६) राजा उम्म दसिंह प्रभृति । सन्दर सुन्दर, चिट भी है।) - टिकेन्द्रजितसिंह, 7 पाठको। उनीसवीं सदीधी अतमें "टियोन्द्रजितसिंह" जैसा वौर-कमरो भारतवर्षौ दसरा नौलमा। इस दौरने अपने वाहुबलसे सैकड़ों सिप पार और अनेक युद्धोंमें जय पाई। अन्त में यह योर अरजोसे युद्धम पराय हो, पाडो वीरता इंसते हसते फासोापर पद गया। दाम बि ). पता-आर, एल, धर्मन एण्ड, को, ३७१ अपर चीतपुर रोड, कलकता।

चिर्मनाइस' कलकत्ताकी लोत्तम पुरुषों। २५ uture , महाराजा सचिन रण जीनन चरिना इसमें सिक्स-धमक नेता "गुरु नानक साहब" "गुरु गोविन्दसि इ" और महाराजा रणजीतसिह का जीवनचरित्न यो पूमोके साथ लिना गया है। धन्दर सुन्दाचित्र देकर पुस्तकको शोभा और मी, वहादी गयी है। दाम ) सचिन यूरोपीय महायुद्धका इतिहास। । जिस महायुहने सारे संसारमें लचल मचा दी था, पिच महायुध प्रमियाके मारे कारवार चौपट कर दिये हैं,उसो महायुधमा अपित प्रतिधार हमारे यहा दो भागोम छपकर तय्यार हो गया है। इसमें युद्ध सम्बन्धी बड़े पर • पिट तथा यरोपका नकमा दिया गया,ई।, दाम दोनों भागका ) नव-रत्नः । शिक्षाप्रद कहानियोका पूर्व संग्रह। इसमें वर्तमान कालको सामाजिक घटनामापर ऐसी सदर, 'शिक्षाप्रद, भावे पूर और दृदयमाही कहानियां लिखी गयी हैं, कि जिन्हें पढ़कर मन मुग्ध हो जाता है. और मनुष्य अपने घरोंसे उन पुराइयोंको दूरभर सन्चे ममार-ससका अजुभव करने लगता है। श्री, पुरुपं, पहें,पञ्चे, सभीफे पढने योग्य है,दाम सिर्फ ॥ - सचित्र लोकमान्य तिलक जीवनी - । भारतको राष्ट्र स्वधार देश सय ४ नेता, गगनौतिके प्रागाय पण अवतार, ग्रामोंके भादश, लोकमान्य सव-पूज्य पीर परम धात्मत्यागी वदेशमा ५० थाम्न गगाधर तिलकको यह सचिन जीवनी प्रत्येक देशमात्र क पढ़ने योग्य है। इसमें उनके जीवनको सास्त मुख्य-मुपथ घटनामाका वर्णन है और प्रारम्भमें उनका एक दशनीय सिनरगा पिट दिया गया है। 'उनको सामगोका भो चिन दिया गया। पहली बारकोछपो २०० कापियों सार्थोदाथ विक पानपर दूसरी बार फिर छापी गयो है। इस पार बहुत यात बढ़ा दी गई उस ग्ल्यासमो.निएट धोका ) रुपया पसा-मार,पल, बम्मन एण्ट फो०, ३७१ अपर चीतपुर रोड, ।। 'यमन प्रेरफलकचाली सम्योत्तम पुस्तकें। " साहसी-सुन्दरी समुद्री डाकू • रहस्यमय सचित्र जासूसी उपन्यास । r । मासूम सम्राट मिष्टर ग्लेको जासूमी घटनाओंसे भरे उपन्यास सारे संसारमें प्रमिद हैं और लोग उन उपन्यासोंको ऐन्द्रजालिक उपन्यास पताते हैं। पास्तवमें पह पात ठीक है, क्योकि जो व्यक्ति पकनार उनका कोई उपन्यास पदनेके लिये छठा लेता है, यह पढता-पढ़ता नन्मयहो जाता है और पिना पूरा पर छोखही नहीं सकता। यह उपचास भी मिः प्लेकको प्राधयानक जासूमियोंसे भरा हे। इसमें साहमी सुन्दरी अमेलिया पैसे भयानक ममुद्रो दाको 'और अजय सायं क्लापोंका एल है, कि जिसके कारण फेवल पृटिय सरकार ही नहीं, बल्कि मान्स, जर्मनी और अमेरिकाकी सरकारें भी तग यागयी थी। उसी साहसी एन्दरीके भीपम टाकू-जहाजको समुद्रों-समुद्रों धूम और बारम्यार यी नयी विपत्तियोंमें पलभर जासूम मन्त्राट मि म्लेकने किम सफाईसे गिरफ्तार किया है, कि पटकर दातों उंगली काटनी पड़ती है। चोरी, पदमायी, डकैती, जालसाजी, खुन पारावी आदि अनेक रोएसडेकर देनेवाली घटनाएं इसमें प्रादिसे अन्ततकभरी हैं। साथही रग विरगे सन्दर सुन्दर ६ चिन भी दिये गये है। दाम १५, सजिल्द २५) ។ * लाल-चिट्टी सचित्र ऐतिहासिक जासूसी उपन्यास । " आश्चर्यजाक व्यापारोसे भरा और लोमहर्पण भीपण काण्डोंमें दूनी हुमा पह उपन्यास इतना दिलचस्प, हृदयवाही और बनता है, कि.पढते पडते कभी पाश्चर्यान्वित कभी रोमाञ्चित और कभी पुलकित हो जाना पड़ता है। इसमें सम्राट अम्बरके शासन कालका एक ऐसा भीषण पद्यन्त्र लिखा गया है, जिसक- कारण स्घय मम्राट प्रकयर, राजा धीरवत और रोज्य प्राय समीयते-बड़े कम। पारी धारा उठे थे। "लाल चिट्ठी"का ऐसा है अङ्गज परस्य खोला गया है। कि आप भी पड़पर चकित, स्तम्भित और विमोहित होजाइमेगा सन्दर-सुन्दर रङ्गीन चित्र भी दिये गये हैं। हाम, विना जिन्द रेशमी जिल्दबंधी,२७है। पता-आर, पल, यमन, एण्ड को०, ३७१ अपर चीतपुर रोड, कलंकचा।

रमणी-रह-मालाका १ला रत
हिन्दी-साहित्य-संसारमें युगान्तरकारी-
सावित्री-सलवानर
11
10
१३रगीन चित्रोंस सुशोभित होकर लोगोंको मुग्ध कररहा है।
सावित्री-सत्यवान श्री पुरुषों, यार्सा-योसिकायो योर बटे-
चूदाई पहने योग्य, सपूत, शिक्षाप्रद सचिम
और सर्वोत्तम सत्य रखा है।
सावित्री सत्यवान में सती थिरोमणि सावित्री देवीको यही
पुण्यमय पवित्र का है, जो युग पुगान्तरसे
सती रमझियाको मादर्थ मानी जाती है।
नि -सत्यवान
की थी इतनी मनोरंजना दमाही और
विज्ञामद है, कि जिसे पढ़ा खियोंका
"मन प्राय पनि हो जाता है।
सत्यवाना में पैसे ऐसे अन्दर मनोहर और वर्णनीय
१३ रंग यिरंगे चित्र दिये गये हैं, कि जिन्हें
देखकर माखें तृप्त हो जाती है।
सावित्री-सत्यवान
को प्रंशसा क्तिनेही नामी नामी समाचार
पनि अपने काम काल रंगगले ।
और मध्य तया यु-प्रदेश निशा दिमा
गौने स्कूली सामरियाम रसने भार बालबालिकामाको पारितोषिक
देने के लिये मजूर किया धाम यिना जिद), रेशमी मि jiv
पता-पार एल. बर्मनाएंण्ड को.
Now ,२७१, अपर चीतपुर रोड, कलकता।
p

------ रमणी-रस-मालाकार रामर महिला-मनोरञ्जन साहित्यका सिरमौर- OG N + नल दमयन्ती -नरक्षरा-चिरगे चित्रों सहित छपकर तैयार है १ नील-दमयन्ती -दमयन्ती परम धार्मिक रागा मल और सती शिरोमदि 'दमपन्तीको पड़ोही दियमाही पवित्र कया है। दमयन्ती रमशी रस पुस्तक मालाकी शोभा है। जिस पर में गह पुस्तक नहीं, उसकी भी योमा नहीं। नान-दमयन्ती में बालक बालिका, स्त्री-पुरष और बूढ-बच्चे सबके Forलिये मनोरंजन और पिंक्षाको प्रचुर सामग्री है। नल-दमयन्तीपयुकर पुरुष बीर, धीर, संयमी मौर सदाचारी होंगे a पौर नियां पवित्रता तथा धर्म-परायणा बनेगी। ल-दमयन्ती भाव, भाषा, छपाई, सफाई और चित्रोंकी बहुताके . विचारसे हिन्दी में मयो वयापूर्व पुस्तक है। बाल-दमयन्ती में क्षेत्रको ऐसी उपसंता दिखीयी है, कि पाठकै बिना पुस्तक समाध किये होदही नहीं सकते ल-दमयन्ती का मूख्य फेरल १] - रंगीन जिल्दवालीका १ और एनरी रेशमी जिन्दगीका रुपमा पताधार एलबर्मना एण्ड : ur Frt २७१, थपर चीतपुर रोड, कलकत्ता । . T को Tra- M माला" का तीसरा रक्ष Ny- RE अद्भुत घटा और अनूठे रंग-ढंगसे छपकर तय्यार हो गयी! सीता-रिन्दू-मालक-बालिकाओं और गहलाश्मयों के पडने योग्य पो संगका पहला भौर सर्वोत्तम प्रन्य है। सीता-सारी रामायक्षका सार, उत्तमोत्तम शिक्षाभोंका भारदार धौर हिन्दी साहित्यशालसित भंगार है। 'सीता-की भाषा तथा रचनामेली पति सहन, सरस, सललित और करिताकी भाँति मनोहर है।" सीता- परोसे एकही साथै इतिहास पुराव, कामे,माटक, उपन्यास और नीति-अन्यका यानन्द भाता हैit 'सीता-प्रत्येक दिन्यू-रमणीके दाथमे रदो योग्य पुस्तकों और पिली बिदामोंका भनुकरण उनके लोरपरलोकको मनानेवाला है। सीता-राजनीति, धम्मगीति, समाननीति और गाईस्थ्यनीतिकी जी है। इसे पढनेसे घर-धरम स-शान्तिका निवास होता है। सीता-रात्र पाई और चित्राको यदुलको इटिस हिन्दीधी भडि- तीम पुस्तक । इसमें १० बहुरो और करगे दिन हैं। सीता--बेटियो-और-पासक बालिकानाको उपहार ऐने लोग उन्दर अमूल्य,गन्य रन। सीता का मुख्य केरल २) रंगीन जिवद ) और दवारी रेसमी परेको विवद पपीका पेस-३) पता-प्रार• एलवर्नान एण्ड को, NEET-मपर चीतपुर रोड, बलता द

रगपी रन-माला-का. या का
साहित्य-संसारका सर्वोत्तम शृंगार!
सारे जगतसे प्रशंसित और रंग-विरंगे चित्रोंसे सुशोभित
बिला
...अनूठी सजधजलें छिपकर, तय्यार है ।
शकुन्तला
ससार-प्रसिदहाफवि कालिदासक जगद्व्यापी संस्कार
नाटकका उपाख्यात स्पमें हिन्दी-मापान्तर हाला
को पढरहर जर्मनी महानि गटी" मुफकाठसे
शकुन्तला कहा है कि यदि स्वर्ग और मयकी समस्त योभाग
एकही स्थानपर देखनी हो तो, "कुस्तमा पढ़ो
शकुन्तला-गलास परिपूर्ण जसे पढ़ते पढ़ते विततन्मय होजाता है।
उपाख्यानकी एक एक पक्ति कवित्वा और करपता को-
शकुन्तला -दाम्पत्य स्नेह, नारी कर्तव्य, सती-धर्म-चौर विश्व
प्रेमका जगमगाता हुआ उज्य और भमूल्य रत्न है।
-हिन्दी साहित्यकासवाग-सुन्दर मन्य । इससे उपन्यास,
एकसाय प्रास
शकुन्तला-योग्य भनारजक, दयाहा और शिक्षाप्रद पुस्तक है।
प्रत्येक पालक-बालिका, स्त्री-पुरुष और वन-बूटोंके पढ़ने
में ऐसे ऐसे सुन्दर, भावपूर्व रंगीन चित्र लगाये गये।
बायस्कोपकी भाँति मालकि सामने नाच भगती है।
इतमामोधर मी मूस्य) रंगीन जिस्व) औररेखमी निगरानी
पर पता-श्रीर० एल० वर्मन एण्ड को०,
३७१ अपर चीतपुर शेर, कोलकता)

रमणीरामाला' का ५धा रत
हिन्दी महिला साहित्यकी मुकुट-मणि
पतित्रता रमणियोंकी प्यारी पुलफ:
चित
T
'अनेक तिनरंगे, दुरंगे'और' एकरंगे चित्रोंसे
है सुशोभित होकर प्रकाशित हुई है।
चिन्ता-देवलोक और मंत्र्य-नोकका प्रत्यक्ष चित्र दिखजानेवादी
चिन्ता में सती-शिरोमणि "चिन्ता और न्यायपराया धर्मात्मा
पति श्रीवत्स" की समयमय कथा-पटकर मनुष्यको सबके
समय आनन्द और दुल समय याति प्रा होती है।
को कस्मत कथा उनकर धर्मराज युधिष्ठिर को चिन्ता"
जादूर हुई, मनमें धैर्य बना और वासका दुख मध्यापा।
- अपूर्व धम्मानुराग उज्वल सतीत्व भौर अविचल धैर्यको
RTE या पडकर यात्मा अलौकिक बसका सञ्चार होता है।
की अद्भुत कथा प्रत्येक पनिषता यह वेटो, कुर्श नारी और
कमारी कन्या पदने तथा अनुकरण करने योग्य है।
भाषा नहीं हो रसीलो पीर ऐसी सरल निधो-धोटे
को भोर कर्म पी लियो त्रियाँ भी उसे समझ सकेती है।
नमूल्म 'गीन निदका ii) स्पयो और
नारीमा करका जिलदेवी रूपयो ।
पता-भार एलबम्मन एण्ड कोच,
इन पर प्रीतपुर रोड, कलकता।..
चिन्ता
swatikrektroces
TAITIZERASE

उमणीरता-मालाका ६टा रखा है शङ्कर-प्रिया, गणोश-जननी, भगवती- PARI.RAT.. TanajuTRAITARETTIT १२ याने चित्रों सहित ब्रटी सज-धजसे छपकर तय्यार है। सती-पार्वती में शहर प्रिया, गणेश-जननी मती थिरोमणि भगवती पती पार्वती" के दोनों तारोंकी क्या बढ़ीही सरल, सरस, सुन्दर और समधुर मापामें लिखी गयी है। स्मृती-पार्वती के पहले अवारमं सतीका बाल्यकाल सतीको शिना सती तपस्या, सतीका शिव-दर्शन, सतीका स्वयकर, सतीका विराह, दक्षप्रजापति यज्ञमैं सती शरीर त्याग, गिवके तो द्वारा पर विध्वस भौर निवको शोक प्रेकार्थ यादि कथाएं है। साती पार्वती के दूसरे गवतारमें "पाती" यो जन्म, पार्यतीका वाल्यकाल पार्वतीका जिन पूजन,मदन भष्म,पार्वतोको संपल्या, पावतीको प्रेम-परीक्षा, शिव पार्वतीको विवाह और गणेश तयों कार्तियको उत्पत्ति'यादि कथा विस्तार पूर्वक लिखी गई है। रस्ती-पार्वती-शिवपुराण, देवीभागवत, कुमारसम्भव और पद्म- पुराण थादिके याधारपर लिखी गयी है और उत्तमो- तम घटना पूर्ण १२ चित्र देकर इसकी शोभा सौगुनी बठा दी गयी है। सती-पार्वती-पालक चालिकामा भऔर यह पटियोको उपहारम देने क्या कन्या-पाट्यालायोमें पढ़ाने योरथ भपूर्व पुस्तक है, क्योंकि इसके पढ़नेसे स्त्री-धर्मको पूरी थिक्षा मिलती है। मूल्य देवन २], रंगीन जिन्दगी और उनहरी, रेशमी जिन्दा है। पता,आर० एलवमन एण्डको ३७१ अपर चीतपुर रोड कलकत्ता।

रमणी-रन-मालाका७ौरन सती बेहुल 1 - 11 १३.रण विरङ्गे चित्रों सहित छपकर तैयार है। समें मारतवर्षके भूतकालको दो,सतियोंके पविन चरित्र,यदीही सुन्दरताफे माय लिखे गये है। इनमें पहली सती, मनसा देवी" है, जो देवादिदेव महादेवकी मानसिक पुरी, महपि जरत्कारको धम्म पानी और नाग-तोककी 'गासन-कती है इनकी फठिन तपस्या, प्रगाढ पति-भक्ति और अद्भुत प्राम स्याग देसकर यवाक रह जाना पड़ता है। दूसरी सती-इम उपाख्यानकी प्रधान नायिका "सती येहुला है, जिनका जीवन वृत्तात विद्रोही अन्ठा, भारवय्ये-जनक, कौव्हल-वधक, करुणा पूर्ण और चित्ताकर्षक सती थिरोमणि सावित्री की भाँति येहुलाने भी अपन भर दुए पतिको जिला लिया था। परन्तु "सावित्री" और बेहुला की कार्य प्रणाली में पहुत अन्तर है। "सापिसी देवी", अपने कठोर पातिव्रत धमके प्रतापसे एकही रातमें स्वयं', यमराजको परास्तकर अपने पत्रिका प्रागा-बान पायो था। और बेहुला" पो मृत पतिका परीर कदली सम्भके पेपर रख, मदीमें - बहती यहती घ महीने यार स-थरीर-स्वर्ग में पहुंची थी और यहाँ उसने लेसीस कोटि देवतायोको अपने अद्भुत नाच गारो प्रसन्नकर पतिकी प्राय भिजा पायी थी !- नदीमें गहते-हते उसके पतिकी लाय, सड़ गयी थी, उसमें की पड़ा,गो और भन्तमें मांसल गलकर गिर गया था! परन्त इतनेपर भी "येहुला " से न छोड़ा। उसने पतिकी नियाँ धो पोकर अधि- समें माधनी पौर अन्तमें देव-सोक्ने प्रतिको निपाकर लौटी। यही नहीं,परिक हमपने पहले के मरे हुए जेठोंको भी मिला पायी और हम प्रकार उसने अपनी छहों विधवा निशानियोंको पुन सधया या-दिया। जिस स्त्रीने ऐसी 'मदान सतीश सम्मिल भरिनसे भी गितान प्रहरा की, उसका सीपनही बर्थ है। ग बिरगे १३ भियभीन्द्रामगाम जिरव रेगसी जिर पता -आर. पल पम्मन एण्ड यो अपर पोतार A रमणी-रल-मालाका ८ चौरज* I हिन्दी साहित्य संसारका गौरवारवि हारे शव्या (r" उत्तमोत्तम १६ रंग बिरंगे चित्रों सहित छपकर तैयार है। हरिश्चन्द्र-शैव्या हिन्दुभोला कोति-स्तम्भ, सती रमगियोंको 'भाग्य सूर्य मौरपालक-यामिकामाको शिक्षा गुर है। हरिश्चन्द्र-शैक्या में परम प्रतापी, सत्यवादी, राजा हरिश्चन्द्र" और सती शिरोमरि शव्या की प्रेसी सुन्दर, विदाप्रर्द, कथा लिपी गयी है, जैसी मानसक किसी पुस्तक नहीं निकली। हिरिश्चन्द्र-शैव्या "मैं हरिचन्द्र के पूर्व पुरुषोंका पूरा हाल, राजर्षि विज वामिनको घोर तपस्या, महाराज सत्य तानिश) को सारीर स्वर्ग गमन प्रादिकाए यसरी खोजकेसाय लिखी गयी हैं। हरिश्चन्द्र-शैव्या में राजा "हरिश्चन्द्र और रानी 'या'का बॉलव जीवन, पुत्र प्राप्ति, विश्वामित्रका कोप, हरियन्द्रका सर्वस्व-दान, हरिचन्म शेन्याका पुत्र सहित भिखारी काशी जाना; व्याका मोहाय हाय और राजा रिकाडालक होय विकका विमिनकी दक्षिणा चुकाना मनातसे रोहिताश्व- को मत्या पूर्वका मृतक परीर लेकर रानी व्याका भरपंटपर जाना, सत्पता हरिश्चन्द्रका उससे धाफिनमांगना सहसा होद विधा मित्रे और विधिको प्रकट होकर रोहितारको जिलामा और हरिध- मसे क्षमा भागकर उन्हें पुन राज्यपालिका वरदान देना मादि धाएं पसी सगो लिखी गयी किपढ़तेही बनता सायही सन्दर-सुन्दर विवि देकर पुस्तकको पूर्ण पायकोपयना दिया गया है। STigल्व ) का रंगीन जिस्वी औरणमी जिल्द) भारम्पल. वन पैण्डपी०३०१ अपर चीतपुररोड, कलेकस E , *आदर्श-प्रन्य मालाका १ला मेयर हिन्दी-काव्य-जगत्का उज्ज्वल बनन- वाद-प 1 बीरनसम्पूर्ण शिक्षाप्रद सचित्र परित-काव्य है। वीर-पञ्चरन यही धपूर्व, उन्दर, सचिन और मुदीमें भी भयी जा वासनेपाला शिक्षाप्रद चरित-काव्य-अन्य है, जिसकी समता हिन्दी-ससारने मुफमएसे स्वीकार की है। वीर-चरन की प्रत्येक कविता देय शक्ति, धम्म-नीति और नैतिक ताकी सर्वोच्च शिक्षा देनेवाली है। इसकी कपिताएँ क्या , गिरे हुए देशको उठानेवाली भुजाएँ हैं। बीर-पञ्चान के पहले रत्नमें माता स्मरणीय, वीरे फेयरी, क्षत्रिय- धूल-तिलक "महाराणा प्रतापसिंह" की पीरता, दक्षता और स्वदेश हितैपिताका जीता-जागता चित्र है।" व दूसरे रत्नमें पीर-प्रालिकों, तीसरमें वार-अन्नाशियों चौधे धीर-माताओं और पाँचयमें "पीर-पत्नियोंकी Arieीरता, धीरता और भादशायर्याको गुणगान है। वीर-पञ्चरत्नदीपकमात्र ऐसी पुस्तक है, जिसे पड़ेकर देशका प्राचीन Tirir से सध्य-पथमें प्रवृत्त होनेसे उत्साहित करता है। वीर-पचरन में मोटे ऐन्टिक पेपर पर छपे हुए ३२६ घरग-बिरंगे २१ चित्र और वीर-चीरागनाओंके २६ जीवन-चरित हैं। वीर-प्रचारमभूप बिना जिन्द-Dee, रगीन जिन्द) और विकरी गमी निन्दबंधीका रुपया मृता-पार. एल. वर्मन एण्ड को. .३01 अपरीतपुर रोड-कसया। वीर-प्रवरव- Nur caracasadavushdasasuna ESADAS43D4ADASOSLA Prern- दर्श ग्रन्थ-गालाका २ रा अन्य 1 हिन्दूजातिका गौरव-स्तम्भ, सचित्र, हिन्दी 7 " - २२ रेल-बिरंगे चित्रोंने सुशोसित होकर हिन्दी-संसारको विमोहिन कर रहा है। महाभारत का यिप परिचय देना व्यर्थ है, क्योंकि यह हमारा प्राची इतिहास है,हिन्दू-जातिका जीवन-साहित्य नीतिशास्त्र, धम्म-ग्रन्य है और पञ्चमवेद । "महाभारत) की विशेष तारीफ करना सूर्यकों कीपक दिवाना है, क्योंकि जगत् भरके साहित्य-सागरको, मन सालिये, पर कहीं भी ऐसा अनुपम खान मिले। महाभारत) के अटारही पार्टीका सम्पूर्ण कथा-भाग इसमें बसी ही सरल, सरस, इन्दर, हृदयमाही और मनोरंगा भाषार्म उपत्यासके दंगपर लिखा गया। महाभारतर)का, इतना सुन्दर, सरल, सचिनं और संजीला संस्काय- भाजनक नहीं, छपा । इसीसे समस्त दिन्द्री-संसारने मुक्त कराने इसकी प्रशंसा की है। महाभारत) में ऐसे रेसे गन्दर दयपाही और भावपूर्ण २२ चित्र नगारे गो हैं, कि जिन्हें देखकर "महाभारत" का माना भानस्योप'की, माति मांसाफ मांगने माया है। मुश्प रगीन निरद ) रुप मौर रेशमी जिमद पता-भारवर्मन गड, को, 1382, अपर चीतपुर रोड, कमला। U - 05 ६ ACD आवर्स ग्रन्थमालाका ३रा ग्रन्यास -हिन्दी-उपन्यास-जगत्का मुकुट-मणि N क्षि ११ रंग-बिरंगे चित्रों सहित छपकर तय्यार है के.पहाल के द्वितीय,यदिमचन्न स्वनामधन्य पाय दामोदर मुखोपाध्याय सर्वश्रेष्ठ, सामाजिक उपन्यास घाला 'कर्मक्षेसर का सरल, सुन्दर और मनोमुग्धर हिन्दी अनुवाद है। कई श्रीमद्भगवद्गीताके चुने हुए उस मादर्शोपर लिसा गया --- है, मत ये सामाजिक कुरीतियाका उधार, सेवा-धम्म- + का प्रचार, गाईस्थ्यजीवाका चमत्कार, श्रादर्य चरित्राका मागवार और उत्तमोत्तम शिक्षामोका अनुपम श्रागार है। कति में कुटिलोंकी कुटिलता, राजीतिका गूढत्य, अदालतो की बुराइयाँ, सरकारी कर्मचारियोंकी ब्वेच्छाचारिता, rin सूदखोरोंकी चालबाजियां प्रादिका पूरा दिग्दर्शन कराया गया है। तको एकबार आद्योपान्त पर्व लेने से मनुष्यको अन्त- रात्मा शुद्ध होजाती है और नीचसे नीच मनुष्य भी उच्चमावापन होकर समाजका सया सेवक बन जाता है। रजक और हदयनाही अपूर्व टपन्यास है।-रंग बिरंगे • सन्दर-सन्दर ११ चिन्न देकर इसकी शोभा सौगुनी या दी गयी है। 17 दामाबिना जिलद ३)ह, सनहरी रेशमी कपड़ेको जिल्द शाद -पता-आरएल वर्मन एण्ड को | TREATM ३७१, अपर चीतपुर रोड, फलकत्ता। Katrixtainirurtal .

आदर्श-न्य-मालाका ४था अन्य र हिन्दी साहित्यका सर्वोत्तम ग्रन्थ रख- - ३० रंग बिरंगे चिमों सहित नये. और गनठी सज-धजले छपकर तयार EFFWF पोराम-चरित में सारी चारमीकि रामायणको कथा, हिन्दीकी पट्टीही सरल, सरस, सन्दर और रामधुर भाषामें उपन्यासके गार पक्षीही मनोरंजस्ता साध लिखी गयी है। श्रीरामचरिकको एकयार पायोपान्त पंढ लेने, फिर किमी पामायण पढ़नकी जरूरत नहीं रहती,पयोंकि इसमें भगवान रामचन्द्रका भौदिसें लेकर अन्ततर्फको जीवन- चरिन एम धान धान और विस्तारके साथ लिखा गया है। श्रीरामचरित हिन्दी गय-साहित्यको सर्वोत्तम गारभक्तिका 'द्वार, निको भयदार और उत्तमोत्तम उपदशाका थागार है। इसमें काव्य, उपन्यास, नाटक, इतिहास, नीति- पा मोरं जीवन-चरिन, सर्यका घानन्द एक्साय मिलता है। श्रीरामचरित मालक मालिका, सी-पुरुषा -यो-सनकै बस्ने घोग्य अनुपम ग्रन्य-रन है और इसमें ऐसे ऐसे 11- गरिरगे ३० चित्र दिये गये हैं, कि प्राधीन फालके मनोहर दाम कर एककर बायस्कोषको मानिमालसामने नाचौ सपते हैं। श्रीराम भारत की संख्या है और मूल्य रंगीन जिदका कवली सुनहरी रेशमी जित्दका), पतामआर०एल० Firghir १७२, अपर चीतपुर रोए - rt श्रीकृष्णा-चरित्र उपदेश, प्रनिन्द्धका विवाह, रक्मी-बंध थोर सत्यताको संसार विज्ञपिनी शक्तिका भादर्श प्रन्यमालायाचा प्रय [ लेखक 'भारतमित्र-सम्पादक' १० लक्ष्मणनारायण गर्दै । -+Hot- इसमें भगवान् श्रीकृष्णचन्द्रमा सम्पूर्ण जीवन-वरित, हिन्दोको सास पन्दर भौर समधुर भाषामें बदेही भन्छे इंगसे लिसा गया है । यह अन्य १६ अध्यायोम विभक्त किया गया है। पहले अध्यागमें कृष्णावतार पूर्वकी राय- कान्ति, कसकी दमन-नीति, श्रीकृष्यका पथ-परिचय, श्रीकृष्ण का जन्म, कृष्णा- । बलरामका बाल्य जीवन और राक्षसोंके उत्पात मादिका वर्णन है। दूसरे अध्याय अवतार-कार्यका पारम्भ, पंड्यन्नोंका प्रारम्भ, कस वध, उग्रसेनका राज्यारोह और श्रीकृष्ण-बलराम गुरुकुल प्रमास सकको कया है। तीमर और पाये अध्यायमें पदयन्त्रोंकी धम, जरासन्धका याक्रमण, कृष्णा-यामरामका सात-बास, जरासन्धका मान मर्दन, द्वारका नगरीको प्रतिष्ठा, रुक्मिणो स्गवरकाल ययनरी चढाई, रुक्मिणी-हरया, स्यमन्तक ममिकी, कथा, जामवन्तीको प्राति पाण्डव मिलन,,उभद्रा हरणायौर कृल्य, उदामा मम्मिलनका घणन है । पाँचवेसे आठवें अध्याय तक श्रीकृष्णका दिग्विजय, जरासन्ध, शिशुपाल और गाल्व वध, कोरवोका पड्यन्त्र, जएका दरमार, मोपदी बस हरण, पाण्डाका वन-यास और धमसम्यापनकी तय्यारीका वर्णन है। मौवें, दसवें अध्यायमें कौरवो पाण्डवोके । युद्धको तय्यारी, श्रीकृष्णको मध्यस्थता और सन्धि-सन्देशी कथा है। ग्यारहवे अध्यायमं मम्पूण अठारहा मध्याय श्रीमनग्वदगीता पटीही सुन्दरता और सरल सा साय संक्षिप्तरूपमें लिखी गयी है। यारहवें अध्यायमा महाभारत युद्धका बडाही मनोरंजक दृश्य दिखलाया गया है। रहवें अध्यायम धम्म राज्यको ध्यापना, प्रात्मीयोंग उपकार, रच्या गायी महात्मा भीष्मका अन्तिम विगद पणन के चौदहवाध्या में विलासिताका विषमय परिणाम भव-पान- महोत्सव और पादाको रोमावारी घटाए । पन्द्रहवें अध्याय में भक्सार-समातिका दम विदारक म्यादिखलाया गया है । इसके बाद बहुत पदा असहार है, जिसमें श्रीर-चरित्रको महत्व मालोचनात्मक से लिया गया। । साशय सादन-कालका समा मुख्य गुल्य घटाए. को खोजक सालिली गयी है।- मामीनिषकारो-शामदभोग पिला मित्र भी दिये गये दाम राम जि और रेपमी जिद ) पा-मार, पल, वार्मन एण्ड " - . + अभर ७ गान्धी-प्रन्थावली ०१ महात्मा गान्धीका सर्वोत्तम जीवन-चरित्र- अनेक चित्रों सहित बडी सज धजसे छपकर तय्यार हैं। गान्धी-गौरव में भारतफे सर्वमान्य नेता महात्मा गान्धीका विस्तृत 'जीवाचरिरा पडीसोजके साथ लिखा गया है।' गान्धीजीसा इवा का जीवन चरित्र किमी भापीमें नहीं धपों।' गान्धी-गौरव में महात्मा गान्धीफेजन्मसे लेकर याजनकी समस्त 'लिखी गई है, कि सारा गान्धी-चरित हस्तामलक हो जाता है 'गान्धी-गौरव में महात्मा गान्धीको अलौकिक प्रतिभा, 'अद्भुत क्षमता, पूर्व स्वार्थ त्याग और अंटल प्रतिज्ञाका ऐसा सुन्दर चित्र खींचा गया है, कि श्राप पढकर मुग्ध हो जाइयेगा। गान्धी-गौरव में दक्षिण अफ्रिकाको घटनायें, सत्याग्रहा इतिहास- 7.., कागड, खिलाफनकी समस्या, कांग्रेसको विजय और श्रमायोको ... उत्पत्ति प्रादि विपय एम विस्तारपूर्वक लिसे गये हैं ।- गान्धी-गौरव में महात्मा गान्धीसे महात्मा लाइकरगम, यात्म- वीर मेजनी, वीरवर वाशिङ्गटन और लेनिनकी तुलना फी गयी है, जिसमें महात्मा गान्धी' हो सर्वश्रेष्ठ प्रमाणित हा है।' इसे पढकर,याप पूरे,गान्धी-भक्त बन जावेंगे। इतनेस भी लगभग - ४०० पेज वाले वृहद् ग्रन्थका मूल्य फेवल ३), रेशमी मिल्दका शी) है। र पता--आर० एल० वमन एण्ड को, ३०२, अपर चीतपुर रोडे, कलकत्ता। गान्धी-गौरव को बरसेडा, चम्पारनका उद्धार, पञ्चायका हत्या 12 +

askavreo, SAALOLD
इतिहास प्रन्थ मालाका, १ला प्रन्थ
वीर-विदुपी १२ मुसल्मान वर्गमोंका चरित्रागार
লিঙ্গ,
महिला
Trग, चिरंगे-१३ चित्रों सहित छपकर तय्यार है।
शस्लिम महिलारल एन्दरियोंका स्वराज्य, यसरायोका 'अपादा,
" भारतीय मुसलमान-ललगायोंका लोला निकेतन है।
मुस्लिम महिलारत में बताना रजिया बेगमा मल्का चांद थीयो; नरः
जहां और बोरकी घेगमके पडेहो भनटे चरिख लिचे,
EPTETये हैं, जिन्होंने अपने शौर्य, साहम, पराम्म और
वीरत्वमे सारे मुगन-पान्नाज्यम हलचल मचा दी थी।
मुस्लम महिलारस में वोर-पवी गुतायन, हरवती येगम जहाँनयारा,
रौशनगार और जेनिसा बेगमफे ऐसे मोरनक,
Pror
चरित्र लिखे गये हैं, जिनकी पति भक्ति,पितृ मधि,
द्वत्ता औरषुद्धिमत्ता समारमरमें परिदो नुकी है।
मुस्लिम महिलारन में नजोन्निसा, फलजानी और लतपन्निमा बेगम
मासे, ऐसे पयित यरित्र सदाशित हुए हैं, जिन्होंने
अपने पातिन्यको पराकाष्टा कर दिपाई थी।
लिम महिला र पुर रग विरगे ६ चित्र भी दिये गये हैं
'निमसे उपरोक्त पारदो धैगनोंका रिलागार वाय
}" की भांति अलिकि आगे, लगता है।
सामासिगोन निरन रेगमी निद
आरन वा डको अपरं चीतपुररोड, पलकली
Yaar RASHIRPFNTAGE
-
17

राष्ट्रीय-साहित्यकासत्तिम् ग्रन्थ गाछी-गीता रंग-विरंगे १५ चित्रों सहित छपकर तैयार है। TG REPORTRACT जि 'स प्रकार महामारतके युद्ध में 'कर्तव्य-विमुख अर्जुनको भगवान् कृष्णाने 'गीता'का दिव्य उपदेश देकर कर्तध्य-परायम बनाया था, उसी प्रकार इस बीसी सदीफे स्वराज्य-युद्ध कपि-विमुख भारतको कर्तव्य-परायण बनानेके लिये महात्मा गान्धीने जो समय समयपर दिव्य उपदेश दिये है, यह ग्रन्थ उनीफे प्राधार और गीतासी लीपर लिखा गया है। इसकी मापा प्राजाल, वर्गान-क्रम औपन्यासिक या शब्द-विन्यास यहा मधुर है। 'पुस्तकके प्रारम्भमें प्राय पचास पृष्ठोंमें श्रीकृष्णके युगस् लेकर माजतकको राजौतिक प्रगतिको घढा,ही अनूठा और क्रमबद्ध इति हास दिया गया है। सारांश यह कि, पुस्तक इस युगके लिये बढी हो उप योगी हुई है, जिन्होंने इसे देखा है, वे इसे मुक्त कराठसे भारतको राष्ट्रीय गीता स्वीकार कर चुके हैं। जनतामें इसका आदर भगवद्गीताको हो भांति हो रहा है। अनेक राष्ट्रीय विद्यालय, देशी पाव्याला त्या पुस्त कालयोंने इसे पाठा पुस्तक और उपहारके लिये निर्वाचित किया है। पाई सफाई और कागजके लिये मत धिये ।। १३, रग-विरगे चित्र देकर पुस्तक को खूध सजाया गया है। जिसपर भी मूल्य सर्वसाधारणके लिये क्षेत्रल २), रगोन जिद) और रेशमी जिल्द का) हे रखा गया है। पता-पार० एल० बर्मन एण्ड, को, अपर चीतपुर रोड, मलपाता। 1

No text on this page.

मुस्लिम महिला-रत्न
क एक बहुरंगे चित्रका नमूना
Ashurme
इस पुस्तकमें रजिया, चांदबीवी, नूरजहाँ, बीदरकी बेगम आदि १२ मुस मानवी
विदुपी रमणियोंकि सचित्र जीवनचरित्र वडी मधुर भाषा और उपन्यासके ढंगपर लिट
m

No text on this page.

Mushtafa Kamal Pasha

Author
Pt. Kartikay Charan
Title
Mushtafa Kamal Pasha
File name
Mushtafa Kamal Pasha
Text
OCR done
Citation
1909
Published
2011/01
Publisher
Barman Press Calcutta
Language
Sanskrit
Pages
186
Library
Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
Classification
Literature
DLI number
546427
Barcode
4990010024903.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
QCVc8YWZpl3
Download PDF

Mushtafa Kamal Pasha