Acharya Shri Vinaychandra Gyan Bhandar, Jaipur

Rasdeerghika

Vidyaram, Kavi · 2011/08

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राजस्थान पुरातन ग्रन्थमाला राजस्थानराज्यद्वारा प्रकाशित सामान्यतः अखिल भारतीय तथा विशेषतः राजस्थानदेशीय पुरातनकालीन सस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश, राजस्थानी, हिन्दी आदिभापानिबद्ध विविध वाङ्मयप्रकाशिनी विशिष्ट प्रन्थावलि प्रधान सम्पादक पुरातचाचार्य, जिनविजय मुनि [ॉनरेरि मेंवर ऑफ जर्मन ओरिएन्टल सोसाइटी, जर्मनी] सम्मान्य सदस्थ भाण्डारकर प्राच्यविद्यासंशोधनमन्दिर, पूना; गुजरातसाहित्य सभा, अहमदाबाद विश्वेश्वरानन्द वैदिकशोधनप्रतिष्ठान, होशियारपुर; निवृत्त सम्मान्य नियामक- (ऑनरेरि डायरेक्टर) भारतीय विद्याभवन, बम्बई ग्रन्थाङ्क ४१ कवि विद्यारम विरचिता रसदीर्घिका प्रकाशक राजस्थान राज्याज्ञानुसार संचालक, राजस्थान पुरातत्त्वान्वेषण मन्दिर जोधपुर (राजस्थान) कवि विद्याराम विरचिता रसदीर्घिका सम्पादक- श्रीयुत् पं० गोपालनारायण बहुरा. एम. ए. प्रकाशनकर्ता राजस्थानराज्याज्ञानुसार संचालक, राजस्थानपुरातत्त्वान्वेषणमन्दिर जोधपुर ( राजस्थान) विक्रमाब्द २०१५] भारतराष्ट्रीय शकान्द १५ [ खिस्लाद १६५९ प्रथमावृत्ति १००० मूल्य २० मुद्रक-श्री बालचन्द्र यन्त्रालय, दुर्गापुरा, जयपुर ।

राजस्थानपुरातनग्रन्थमाला के कुछ ग्रन्थ प्रकाशित ग्रन्थ संस्कृतभापाग्रन्थ-१. प्रमाणमारी--तार्किकचूडामणि सर्वदेवाचार्य, मूल्य ६.०० । २. यन्त्रराजरचना-महाराजा सवाई जयमिह मूल्य १९७५ । ३. महर्षि कुलवैभवम्-म्य० श्रीमधुसुदन श्रोझा मूल्य १०७५ (४. तर्कसंग्रह-पं० आमाकल्याण मूल्य ३०० ।५. कारकमबन्धोद्योत-प० रभमनन्दि मूल्य १.७५ । ६. धृत्तिदीपिका प० मीनिकृष्ण मूल्य २०० । ७. शब्दरत्नप्रदीप मूल्य २.०० १८. कृष्णगीति-कवि .सोमनाथ मूल्य १७५। ६ शृङ्गारहा- रावलि-हर्षकवि मूल्य २.७५ । १०. चक्रपाणिविजयमहाकाव्य-पं० लक्ष्मीधरमट्ट मूल्य ३५० । ११. राजविनोद-कवि उदयराज मूल्य २२५ । १२. नृत्तसंग्रह मूल्य १७५ । १३. नृत्यरत्नकोश, प्रथम भाग-महाराणा कुंभा मूल्य ३.७५ । १४. उक्तिरत्नाकर-पं० साधुमुन्दर गणि मूल्य ४.७५ । १५. दुर्गापुष्पाजलि-पं. दुर्गाप्रसाद द्विवेदी मूल्य ४२५ ॥ १६. कर्ण कुतूहल तथा कृष्णलीलामृतं- मोलानाथ मूल्य १५०-11-१७. ईश्वरविलास महाकाव्य, श्रीकृष्ण भट्ट, मूल्य ११.५० । १८' पद्यमुक्तावली-कवि कलानिधि श्रीकृष्णंभ मूल्य ४.०० । १६. रसदीर्घिका-विद्याराम भट्ट मूल्य २.००। राजस्थानी और हिन्दी भाषा ग्रन्थ-१. वाहडदे प्रबन्ध-कवि पद्यनाम मूल्य १२.२५ । २. क्यामग्वारासा-कवि जान मूल्य ४७५ । ३. लापारासा-गोपालदान मुल्य ३.७५ । ४. वाकीटामरी ख्यात-महाकवि बाकीदास मूल्य ५५० । ५. राजस्थानी साहित्यसंग्रह भाग १, मूल्य २२५ । ६. जुगल-विनास-कवि पीथल मूल्य १.७५ । ७. क्वीन्द्रकल्पलता-कवीन्द्राचार्य मूल्य । २001 प्रेसों में छप रहे ग्रन्थ संस्कृत भाषा ग्रन्थ-~१. त्रिपुराभारतीलधुस्तव लघुपडित । २ शकुनप्रदीप- लावण्यशर्मा । ३. करुणामृतप्रपा-ठक्कुर मोमेश्वर । ४. बालशिक्षा व्याकरण-ठक्कुर मग्राम- मिद । ५. पदार्थरत्नमञ्जूषा, प० कृष्णमिश्र । ६, काव्यपकाशसंकेत-भट्ट सोमेश्वर । ७. वसन्तविलाम फागु।८. नृत्यरत्नकोश भाग २६. नन्दोपाख्यान । १०. रत्नकोश । ११. चान्द्रव्याकरण । १ . स्वयछंद-स्वयंभू कवि । १३. प्राकृतानंद-कवि रघुनाथ । १४. मुग्धायबोध श्रादि योक्तिक मग्रह । १३. कविकीस्तुभ पं. रघुनाथ मनोहर । १६. दशकण्ठवधम्- प. दुर्गाप्रमाद । राजस्थानी और हिन्दी भाषाग्रन्थ-१. मुहता नेणमीरी ख्यात-मुहता नेगसी । २, गोगवादल पदमिशी चऊपई-कवि हेमरतन । ५. चन्द्रवंशावली -कवि मोतीराम । ६. राजस्थानी दूहा सग्रह । ७ धीरवाण-दादी बाटर । इन अन्धोके अतिरिक्त अनेकानेक मस्कृत, प्राकृत, अपभ्रश, प्राचीन राजस्थानी और हिन्दी भाषा में रचे गये अन्धोंका मशोधन और सम्पादन किया जा रहा है ।

- - सञ्चालकीय वक्तव्य राजस्थान एवं गुजरात, मालवा आदि प्रदेशों में प्राचीन हस्तलिखित ग्रन्थों के बिखरे हुए एवं जीर्णशीर्ण दशा में जो संग्रह प्राप्त होते हैं उनमें संस्कृत्त, प्राकृत, अप- भ्रंश एवं प्राचीन राजस्थानी और गुजराती भाषा में रचित छोटी बड़ी ऐसी सैकड़ों ही साहित्यिक कृतियां उपलब्ध होती है जो अभी तक प्राय अज्ञात और अप्रसिद्ध है। विद्वानों का लक्ष्य प्रायः अभी तक उन्हीं सुप्रसिद्ध और सुज्ञात ग्रन्थों के अन्वेपण एवं सशोधन की तरफ रहा है जो यत्रतत्र यथेष्ट परिमाण में उपलब्ध होते हैं । अन्यों के संपादन और प्रकाशन के विषय में भी प्रायः यही प्रथा चली आ रही है। सुप्रसिद्ध और सुज्ञात ग्रन्थों के सिवाय छोटी छोटी एवं प्रकीर्ण रचनाओं के विपय में विद्वानों का विशेष लक्ष्य नहीं जाता है और इसलिये अभी तक ऐसी रचनाओं के सम्पादन- प्रकाशन का मुख्य प्रयत्न प्राय: नहीं सा हुश्रा है । हमारे प्राचीन इतिहास एत्र सांस्कृ- तिक सामग्री की दृष्टि से इन फुटकर रचनाओं में जो ज्ञातव्य छिपे पड़े हैं उनकी तरफ हमारा लक्ष्य बिल्कुल नहीं गया है, ऐमा कहा जाय तो कोई अत्युक्ति नहीं होगी। राजस्थानपुरातत्त्वान्चेपणमदिर का कार्य प्रारम्भ करते समय हमारा मुख्य लक्ष्य इस प्रकार के प्रकीर्ण साहित्य का अन्वेपण, सग्रह, संरक्षण, संशोधन एवं प्रकाशन आदि करने का रहा है और तदनुसार राजस्थान पुरातन ग्रन्थमाला द्वारा ऐमी अनेकानेक साहित्यिक रचनाओं को, सुयोग्य विद्वानों द्वारा शोधित, सम्पादित फराकर आकाश में रखने का प्रायोजन हमने किया है। राजस्थान पुरातन ग्रन्थमाला के ४१ वे पुष्प के रूप में विद्यापमरचित "रम- दीर्घिका" नाम की कृति का प्रकाशन किया जा रहा है। यह एक छोटी भारगर्भित महत्त्वपूर्ण सुन्दर कृति है। इसमें साहित्य-शास्त्र के रस, अलंकार, भाव,वृत्ति, नायक नायिका भेद, गुण दोप आदि सभी अंगों पर सुन्दर रीति से विवेचन किया गरा है । विक्रम की अटारहवीं शताब्दी में जिसे हिन्दीसाहित्य के इतिहास की दृष्टि से विद्वानों ने रीतिकाल का नाम दिया है, मंस्कृत के कुछ विद्वानों ने भी रीति- कालीन कवियों की शैली से प्रभावित होकर वैसे ही ग्रन्थ लिखे थे। इन ग्रन्थों में रम-मम्प्रदाय के प्रन्थों की ही भांनि रस, अलकार, गुण दोप श्रादि के वर्णन के माथ माथ नायक नायिका भेद पर भी पूरा पूरा विचार किया गया है। संस्कृतसाहित्य के. पुराने अन्यों की धनियादी श्रीर नाट्यवादी भिन्न दोनों धारायें इम काल में रचित प्रन्थों में एक जगह श्राफर मिल गई है। हिन्दी काव्यप्रन्यों की इस कोटि में प्राचार्य केशवदाम निर्मित "कविप्रिया" और "रसिक-प्रिया" को इम प्रकार के उदाहरणरूप में लिया जा मकता है । इस शैली के अनुरूप ही विद्वद्वर विद्याराम ने प्रस्तुन "रस- दीर्घिका" की रचना की है।

"रसदीर्घिका" के कर्ता विद्याराम नागरज्ञातीय भट्ट अरटंक युक्त वीसलनगरा ब्राह्मण थे। इनके पिता का नाम वेणीगम और प्रपिता का नाम ब्रजनाथ था। ये बह- मदा गद के पास “पसुजा" नामक ग्राम के रहने वाले थे और बाद में उदयपुर चले आये । वहां से आजीविका के लिये कोटा पहुंचे, जहाँ रहते हुए ही इन्होंने उक्त ग्रन्थ की रचना विक्रमीय संवत् १७०६ मे की । इस कृति एवं कर्ता के नाम का उल्लेख सबसे पहले पी० पीटर्सन ने अपनी तीसरी रिपोर्ट में बम्बई गवर्नमेंट के लिये खरीदे हुए ग्रन्थों की सूची में किया है। पूना के भांडारकर श्रोरियंटल रिसर्च इंस्टीट्यूट में वह प्रति मंगृहीत है। राजस्थानपुरातत्त्वान्वेपणमंदिर के सन् ५४१५५ में खरीदे हुए ग्रन्थों में हमे इसकी एक प्रति प्राप्त हुई थी जो यहां की ग्रन्थसंख्या ४३२७ पर अंकित है । उक्त कृति को हमारे महकारी श्री गोपालनारायण जी बहुरा ने जब हमें दिखलाया तो यह हमें पुरातनग्रन्थमाला में प्रकाशित करने के लिए उपयोगी प्रतीत हुई। हमने इस सम्पा- दित करने के लिये कहा । श्री बहुरा जी ने पूना के ग्रन्थ भंडार से प्रति मँगाकर यहां की और पूना की प्रति के आधार पर सम्पादित प्रति तैयार की जो विद्वानो के समक्ष प्रस्तुत रूप में प्रकाशित हो रही है । इस रचना का निर्माण राजस्थान में ही हुश्रा इसलिये इसका हमें और भी विशेष महत्त्व मालूम पडा । हमारे ख्याल में का इतः पूर्व कहीं मुद्रण नहीं हुआ है और न इम ग्रन्थकार की अपररचना का ही पता लगा है । जैमा कि ग्रन्थकार ने स्वयं लिखा है, यह बालबोध के लिये सारपूर्ण छोटी मी अच्छी रचना है और साहित्य-शास्त्र में प्रारम्भिक अभ्यास करने वाले विद्यार्थियों का तो इमसे अच्छा उपकार हो सकता है। संस्कृतसाहित्य के लब्धप्रतिष्ठ विद्वान और कवि, जयपुरवास्तव्य भट्ट श्री मथुरानाथजी ने इसकी प्रारंभिक भूमिका लिखकर और भी उपयोगिता बढ़ा दी है तथा विद्वान संपादक ने भी अपने प्रास्ताविक-परिचय में इस कृति का पूरा परिचय देते हुए इसके महत्त्व पर अच्छा प्रकाश डाला है। श्राशा है, विद्वानों को यह कृति आदरणीय प्रतीत होगी। राजस्थानपुरातत्त्वान्वेपणमन्दिर, मुनि जिनस्जिय जोधपुर, ता. १ जनवरी, १६५६ ई. संमान्य सञ्चालक इम रचना श्रीः प्राराम्भकं किञ्चिद्वक्तव्यम् कान् पृच्छामः-सुराः स्वर्ग, निवसामो वयं भुवि । किं वा काव्यरसः स्वादुः १ किं वा स्वादीयसी सुधा ? ॥ १ संस्कृतवाङ्मये काव्यबन्धस्य महती प्रतिष्टा। पाव्यमिदं, तन्निबन्धा कविश्व, संस्कृतसाहित्ये महता गौरवेण समुपश्लोक्यते साहित्यसारसंग्राहकैः सबैरेव । किं बहुना, यो हि सकल ब्रह्माण्डस्य सपा प्रजापतिर्ब्रह्मा, सोपि कविरिति गौरवतो गीयते स्म । कविनिर्मिता रचना अमृततोऽप्यापिका, सर्वत. स्वादीयसी च परिगणिता नूनम् । काव्यमिदं हृदयशालिनो विवेकिनः प्रात्मपोष्णकरं महौषधमिव । नेयं काव्यभक्तिः केवलं संस्कृतसरस्वतीसेवकानामेव, यवनादिभाषाऽनुरागिणोऽपि काव्य- मिदम् 'श्रात्मनो भोग्यम् बाहुः । आदितः प्रारभ्य अद्यावधि काव्येन सा सिद्धि- रधिगता या हि अन्यान्यैः शिक्षाशास्त्रै धुनाऽप्युपरभृष्टा। नीति-धर्म-शास्त्रादि- मिर्मार्मिकान उपदेशान्दत्वाऽपि ये विनेयाः शिक्षाफलं नोपनीताः, तेऽपि कान्तासंमितो- पदेशदायकैरेतैः काव्यरञ्जसा सुनीतिपथमुपनीताः । अतएव हि संस्कृतसाहित्ये तत्ताहशाः कवयः, तत्प्रणीताः काव्यबन्धाश्च तादृशाः सन्ति यानिमान् न केवलमेतद्दे. शीया एव, अपि तु सप्तसमुद्रपारवासिनो वैदेशिका अपि प्रकम्पितमस्तकं प्रशसन्ति । काव्यानामेपामात्मस्थानीयं साराऽऽधायक किमस्ति हि तदान्तरिक तत्वं येन हि एतावद् गौरवमधिगतं काव्यगुम्फरेभिः १ एतद्विपये काव्य-साहित्यमार्मिकारण भवेयुः पुरा कानिचिद् भिन्नभिन्नानि मतानि 'वक्रोक्ति, ध्वनि, अलंकार' प्रभृतीनि नूनम् । परं यथा यथा मार्मिकमालोचनं प्रवृत्तम् , यथा यथा च उत्तरोत्तर सारतोऽपि सारपरिग्रहणस्य पन्थाः प्रसृत., तथा तथा चरमसिद्धान्तरूपेण 'रसस्य' एव काव्य- जीवितत्वमुत्तरभाविषु साहित्यनिबन्धेषु समर्थितमभूद् भूयसा । मार्मिकमालोचन- मेव चेदं साहित्यस्य अमृताऽऽधायकं शाश्वतं तत्त्वम् । यथाहि प्रोक्तम् प्रामाणिकै. पुरा- संगीतमथ साहित्यं सरस्वत्याः स्तनद्वयम् । एकमापातमधुरमन्यदालोचनाऽमृतम् ॥ काव्यजीवितस्य रसस्याऽस्य स्वरूपं. भेद-प्रभेदाच माहित्यप्रन्येषु महता चिन्ता रेण मंनिरूपिता नूनम्। किन्तु ते इमे प्रन्या गहना , प्रौढया च भाषया विनिबद्धाः । १-रूह की खुराक'। भी साधार्य विरचन्द्र ज्ञान भण्डार * जयपुर २ , सर्वतोऽन्तिमः प्रामाणिकश्च रसविनिर्णायक श्राकरमन्थः 'रसगङ्गाधरः' । सुविशदः, मार्मिकनया तत्त्वविवेचकोऽपि सोयं प्रौढया भापया विनिबद्ध.। अत एव हि रमविवे- चनाविपये गवेषणापराणां बहूनामेव भवत्यत्र प्रवृत्तिः । किन्तु ते काठिन्यभयभुग्ना इतस्ततः पर्यटन्ति । ये च केचित्साहित्यपण्डिता रसविपयिणी मीमांसामुपस्थापयन्ति जिज्ञासूनां मंमुखे, तेऽप्यविकलं साहित्यग्रन्थानां पाठमेय अाम्रोडयन्ति । न तेन बहूनां नवोनजिज्ञासूनामान्तरिको जिज्ञासा प्रशममेति । अत एव साहित्यप्रन्थेषु रसस्वरूपम् तेषां प्राचीनं संप्रदाय, वास्तवं रहस्य च सर्वतोऽपि जिज्ञासवः परिपच्छन्त्येव साहित्य- गोप्ट्याम् । समयश्च तादृशोऽयमुपस्थितो यत्सरलया भापया, स्वल्पेनैव चांऽऽयासेन, गभोरगभीरग्रन्थगतं रसस्वरूपम् , तद्विपयकान् . भेदोपभेदांश्च, सर्वे एव साधारणतया संप्रति बोद्ध मिच्छन्ति । मा भून्मार्मिकमीमांसा, किन्तु रसलक्षणम् , भेदान , तदङ्ग- गतान पदार्थान् , नामतश्च सर्वे एव परिज्ञातुमभिलपन्ति, समयेऽस्मिन्,, येन हि. काव्येषु प्रतिपदमुपस्थितान रसादीन् स्थूलतया बुद्धावानेतु श युजिज्ञासवः । ॐ रसदीर्घिका एतामेव -सामयिकीमावश्यकता बुद्धी निधाय- अनायासेन बालानां, रसास्वादनहेतवे । विद्यारामः करोत्येतां मनोज्ञां रसदीपिकाम् ।। इयं हि प्रकरणानुसारमुदाहरणानि समुपस्थाय, तेषां निदर्शनेन रस-भावा- दीना लक्षणानि संगमयति । अत एव हि अवसरसमुपस्थितेषु उदाहरणेषु सहजमेव शक्याः सबोद्ध रस-भाव-तदगादयः पदार्थाः । श्राह विद्याराम:- 'स्वकल्पितोदाहरणैः सलक्ष्यविरच्यते या रसदोधिकपा । इच्छास्ति येषां रसरूपयोधे तैः शर्मणा मा सुगमाञ्चयोधा ।। ४.' भरतेन हि साहित्यस्य 'मूलभूतास्ते 'इमे रसभावादय. प्रथमतयाऽभूवन्निरू- पिताः। किन्तु परस्ताद् भाविभिः भामह-दण्डि-लोल्लटादिभिर्विविच्य नानाभेद प्रमेदादिभिविस्तरत: अपश्चिताः ।। हन्त, अनन्तकालान्नानादेशीयैरधिकृते भारते. ऽस्मिन् विज्ञानसर्वस्वभूता, प्राचीनास्ते अस्मद्ग्रन्था बहुशो विलुप्ताः। भूरिशश्चापहृत्य तत्तत्प्रत्यन्तेषु नीताः, संप्रति स्मरणतो ऽपि विप्रकृष्टाः संवृत्ताः । अत एव हि काव्य- मूलभूतस्य रसस्य य 'संप्रदाया' पुरा मर्वतोऽपि संप्रायनन्त ते मप्रति गवेषणसीमा- नमप्यतिक्रान्ताः । काव्यप्रकाश-रसगङ्गावरादिपु येषां स्थूला सूचना संप्राप्यत, तेऽपि संप्रदायाः पाठ्यक्रमस्य अनन्तकालात्परिवर्तनेन मंप्रति नाममात्रतो निर्देश्या एव । रससंप्रदायस्य य परमाचायोः, या च तेषां परम्परा, सा संप्रति गवेपणातोऽपि विप्र- कृष्टा । केवलमास्तिकानामन्वेषणा यत्-'श्रलंकारशास्त्रे' तिप्रथितस्य साहित्यस्य मूलम् 'अग्निपुराणे बहुशोऽधिगम्यते । तत्र रसविषयो यथा- । .

३ 'रत्यादिभाववर्गोऽयं यमाजीव्योपजायते ।। आलम्बनविभावोऽसौ नापकादिभवस्तथा ।। विभाव्यते हि स्त्यादिर्यत्र येन विभाव्यते । विभावो नाम स द्वधा ऽऽलम्बनोद्दीपनात्मकः ॥' [ ३३६ अध्याये ] इत्यादि । किन्तु अग्निपुराणविपये नवीनानां वहुशो विप्रतिपत्तयः । ते हि पुराणमिदं बहुभ्यो ऽन्येभ्यो ग्रन्येभ्यो ऽर्वाचीनं ममर्थयन्ते । यतो ह्यस्मिन् साहित्यस्य तत् स्वरूपमधिगम्यते यद्धि विकासकाले संभाव्यते । अस्तु यत्किञ्चिन् ,साहित्यशास्त्रम, सदन्तर्गता रमसंप्रदायाश्च वर्तमानकाले गवेपणाविषयाः संवृत्ताः । मध्यकाले ध्वन्यालोक- काव्यप्रकाश-साहित्यदर्पणादिभ्यो ग्रन्थेभ्यो यात्रान् रसविपयो -ऽधिगन्तुं शक्या, मोऽपि गहनभापया निबद्धत्वात्तेषां ग्रन्थानां नाऽम्मिन् ममये साध्यः । अतएव कठिन- तामिमां बुद्धी मंघाय, रस-भाव-तंदङ्गादिविषये यत्किल स्थूलरूपेण संवोध्ये, तदेव मरलया भापया निबद्ध विद्यारामेण । साहित्यनियन्येषु सर्वतोपि मरलनया सुनिवद्धं रससामान्यस्य लक्षणं-"पूर्वत एब वासनारूपेण स्थितः रति-हाम-शोकादिः स्थायी, काव्यद्वारा उपस्थितैः शकुन्तला बिदृषक-मृतव्यक्त्यादिभिः आलम्बनकारणैः चन्द्रादिभिरुद्दीपने., अश्रुपानादिभिः "अनुभावैः (कार्यः), चिन्तादिभिः मंचारिभिः (महकारिकारण:) मः संभूय [अर्थात् व्यञ्जनास्यस्य अलौकिकन्यापारस्य प्रादुर्भावकार्ये संगत्य ] व्यञ्जनात्यः अलौकिको व्यापारः प्रकटीक्रियते । तेन व्यञ्जनाव्यापारेण-आत्मनः आनन्दस्य श्रावरणम् अज्ञानं दूरीक्रियते । ततश्च निवृत्ताज्ञानेन मामाजिवन स्वस्वरूपम् ग्रानन्दः [श्रात्मनः साक्षात् स्वरूपभूतः आनन्दः ], तथा तेन (श्रानन्देन) मह गोचरीक्रियमाण: रनि-हास-शोकादिः स्थायी एव शृङ्गार-हास्य-करुणादिरसो भवति"। मयतोऽन्तिमस्याऽऽकरग्रन्यस्य रसगङ्गाधरस्याऽतराणि-'समुचितललित- सनिवेशचारुणा काश्येन समपितः सहृदयहृदयं प्रविष्टः तदीयमहृदयतामहतन भावनाविशेपमहिम्ना विगलितदुप्यन्तरमणीत्वादिभिरलौकिकविभावानुभाषव्यभि- चारिशब्दच्यापश्यः शकुन्तलादिभिरलंयमारली, चन्द्रिकादिमिरहीपनकारणैः, अश्रुपातादिभिः कार्य, चिन्तादिभिः सहकारिभिश्च, मंभूय प्रादुर्भावितेनाऽलौकिकेन' व्यापारेण तत्कालनियनिताऽऽनन्दांशावरणाऽज्ञानेना ऽन एवं प्रमुष्टपरिमितप्रमातृ. त्यादिनिजधर्मेण प्रमात्रा स्वप्रकाशतया वास्तवेन निजस्वरूपानन्देन सह गोचरी- क्रियमाणः प्रागविनिविष्टयामनारूपो रत्यादिरेव रसः।' विशदनया सुनियद्धनया च गद्य न निरुपितं तदेतदपि लवणं नाऽधुना बहूनां योधगम्यं भवेदिति सर्वस्य चूर्णिकारूपेण दीर्घिकायां लक्षणमाह विद्यारामः- ४ 'भायैस्तैस्लैहि यश्चित्ते पूर्यमाणः समन्ततः । उद्विक्त: कोपि निर्यायान् भावः सान्द्रो ( साङ्गः ) रसः स्मृतः ॥६' रस्यते ऽनुभवं स्वस्या ऽऽनीयते यः स वा रसः । रसत्वं नाम जातिर्वेत्ये केपा- मस्ति निर्णय. ॥ १२' 'य: स्वस्य अनुभवम् श्रानीयते स रस.' इति हि लक्षणं किं दार्शनिक-गोष्ठ्यां स्वीक्रियेत ? पूर्वदृष्टो यः कोपि वृत्तान्तः अग्रे गत्वा स्वयमनुभवगोचरीक्रियते, तर्हि सोऽपि किं रसपदव्यपदेश्यो भवेत् ? अस्तु, स्थूलस्थूलोऽपि साधारणतया यो ऽर्थो ऽवगम्येत, सोऽपि काव्येषु रसबोधमीमनि सामाजिक प्रापयेदिति रसदीर्घिकानिर्मातु- विद्यारामस्य तात्पर्यम् । रसस्वरूपबोधन हि सर्वेष्वपि ग्रन्थेषु प्रायः कठिनमिव । किं हि वराको विद्यारामः कुर्वीत किंतु साधारणस्थलेषु सुसरलमाह विद्यारामः । यथा रति (स्थायिभावम् ) आइ- 'यूनोरन्योन्यसंस्नेहः प्रगाढो रतिरुच्यते । इतरेपु रतिर्या स्यात् सा भाव इति कथ्यते ।। द्वि० सो० २' नायिकानायकयोः परस्परं यः प्रेमा सा रतिः । इतरेषु देवता-पुत्र-गुर्वादिषु यः प्रेमा, स हि भावनाम्ना व्यपदिश्यते, न सा रसस्थायितां गच्छतीति तात्पर्यम् । एवं किल रस-भाव-रसाभासादीस्तु दीपिकायामस्यां निवघ्नात्येव कविः, किन्तु रसाश्रयस्य काव्यस्य रीति-वृत्ति-अलङ्कार-गुण-दोपादीनामपि निरूपणं याव- च्छक्यं करोति । यथा हि ग्रन्थस्याऽस्यानुक्रमणिकायां प्रोक्तमेतेनैव- 'निरूपणं ततश्चात्र रीतिवृत्योः सुविस्तरात् । ततः काव्यव्यवस्थायां शब्दार्थविनिरूपणम् ।। ५२ ॥ संदर्भोक्तिस्ततो मादिगणरूपनिरूपणम् । अलंकारा गुणा दोषास्ततश्चोक्ता अनुक्रमात् ।' एपु फुत्रचिस्थलेषु प्रन्थकारस्याऽस्य साहित्यमार्मिकताऽप्यनुभूत। दोपलक्षण- प्रस्तावे यहुप्वेव माहित्यनिबन्धेषु दोपलक्षणे कृतेऽपि-यहुविस्तरे दर्शितेऽपि, तत्त्वतः परिज्ञानं न भवति यद् दोपेऽस्मिन् दुपकताबीजं किमस्तीति । तथा के नाम नित्या दोय, मे.यलित्पा, इति । किंतुविधासमा समिदं साम्प, सनया, रलिपगलि- 'दोषाणां हि रसोत्पत्तिप्रतिवन्धकता यदा तर दोपता तेषां सा न पेन तदा हि सा ॥ रमप्रतीनिविधानपतेव दोपाणां दपकताबीजम् । ततश्च यत्र रमप्रतीतिपर्यन्तं पिघातकना न भवति, तत्र तेषां दुष्टत्वमपि नाऽवगम्यते । एतेन हि-नि यानित्यदोप- ५ :- व्यवस्थापि साधु संपद्यते-यो हि रसप्रतीतिप्रतिवन्धको न भवेत् सः शब्द-अर्थ- अलंकारगतोऽपि दोपतया नाऽवभासितो भवतीत्यदोप. 1 एवं किल गुण-दोप-अलं- काराणां स्वरूपाण्यपि सारल्येन वोधयेदेपा दीपिका । "अनायासेन पालानां रसास्वादनहेतवे ।" इत्यारम्भ, तथा 'रसादिष्यप्रयत्नेन वालव्युत्पत्तिसिद्धये । इत्यन्ते च येयं कविना प्रतिज्ञा कृता, सा हि स्थाने स्थाने पूरितेव महात्मनाऽनेन । 'विलासः' स्त्रीणां शृङ्गारजासु चेष्टासु साधारणतया सर्वत्र परिचीयते नूनम् । किन्तु अपरिज्ञातं पदार्थ वालेभ्यः कथंनाम योधयेदिति 'वर्णिका' रूपेण सूचयतीय विद्यारामः- 'प्रियस्य दर्शनाचयों विशेपो गमनादिषु । कश्चिदुत्पद्यते हृयो विलासः स निगद्यते ॥८१॥' यथा रणद्धहसकोद्दामचञ्चत्पदाब्ज- धु तिर्धाजमानस्थलं संचरन्ती। कटाईलसद् विभ्रती वक्त्रमञ्चद्- झुवैर्वीक्षिता सुन्दरी ते कृतार्थाः ||८२॥ साहित्यदर्पणे विश्वनाथेन करुणरसस्य करुणविप्रलम्भस्य च पृथक पृथक् स्वरूपं स्थानं च निरूपितम् । अन्यैर्निबन्धकारैः करुणरसो दर्शित एंव' केवलं विप्रलम्भः शृङ्गारः । अत एवास्य स्थायिभावो रतिः। तेन चाऽयं शोकस्थायिभावात्करुणरसा- सदूरं विप्रकृष्टः । विद्यारामेणापि विप्रलम्भस्य प्रवास-मानादयः चत्वारो भेदा दर्शिताः। तेषु विप्रलम्भ. करुणोऽप्येकः परिगणितः । इदानी करुणरस-करुणविप्र- लम्भयोर्यो मिथो भेदः प्रदर्शयितव्यस्तत्रापि सरला पद्धतिरभ्युपगता विद्यारामेण । स ह्याह- 'यूनोरदर्शनेऽकस्मादेकस्याज्ञातहेतुके । प्रलापो यो भवेद् दुःखाद स-प्रोक्तः करुणात्मकः॥१०६ 'अच्छेदे जीविताशाया यूनोरन्यतमस्य यः । प्रलापः करुणात्मासी, छेदे तु करुणो रसः ॥१०७ करुणात्मा तु रामस्य सीताया हरणेऽभवत् । रासेऽन्तर्षी मुकुन्दस्य बजवामदृशां तथा ॥१०० अथवा- १ 'अन्यतरस' इति स्यात् । मन्ये लेखकप्रमादोऽत्रा भवेत विस्मयस्थायिभावोऽद्भुनो रमः सर्येप्येय प्रानिबन्धेषु निरूपितोन्यः साहित्य- सर्जकैः, किन्तु विद्यारामेण- 'प्रत्युक्तिरच भ्रमोक्तिश्च विरोधाभासकम्तथा ॥ चित्रोक्त्याचारच विज्ञेया अद्भुता एव सर्वशः ।।८६ - इति वदता अत्युक्त्यादिपु अद्भुतो रसः स्वीकृतः । 'लोकोत्तरार्थयुक् वाक्य- मंदर्भोऽय धनागमः। अद्भुतस्य विभागोयमिन्द्रजालादिकं तथा ॥ ८.' इति हि अत्युक्त्यादिपु लोकोत्तरार्थयुको बाच्यसंदर्भः अवश्यमस्ति । किन्तु तेन वासनारूपेणा- ऽवस्थितो 'विस्मयः' स्थायी तथैवाऽभिव्यक्ति याति यथा अर्जुनाय विश्वरूपदर्शने भगवद्- गीतायाम् ? निर्निमेपनेत्र बीक्षणम्, स्पर्शप्रहणम, रोमाञ्चो, वेपथुः, स्वरभद्गश्च किम अनुभावतया तथयोत्पद्यते ? इति हि पृच्छयतां काव्यपाठकानां हृदयमेव । तंत्र हि प्रच्छन्नरूपेण हृदये सर्व एव काव्यपाठकोऽनुभवति यन् सैपा कविकल्पनैव केवलम्, नात्र मत्यत्याऽवभासः, एवं सत्यपि प्रतिबन्धकताभाने, किं तादृशस्थायिभावस्य विस्म- यस्य तथैपाभिव्यञ्जना भवति ? 'क्याऽसौ मन्दोद्यमः क्वेदं दुष्करं द्रविणार्जनम्' । अथवा 'अपीता अध्यमूः पीना गानस्तत्र जलाशये' ।। ६६ (पृ०६४)। इति विरोधा- भामप्रभृतिपु निर्निमेपनेत्रता, रोनाश्च , वेपथुस्वरभङ्गादयश्च तथैवोत्पद्यमाना दृश्यन्ते लोके ? याचं नास्ति, तर्हि कवयः किं न जल्पन्ति किं न खादन्ति वायसाः' इत्यादि पूर्वत एवं प्रसिद्धिं गताः कवयः कि मुधा समाकृष्यन्ते ? अस्तु वा तथा, वयं तु कवीना- मुक्ति लोकोत्तरामेव निदर्शयितुमिच्छामः । विप्रलम्भशृङ्गारभ्य शाप-प्रवाम-मानप्रभृतिद्वारा अपभेदता स्वीकृता- आकर- ग्रन्थेषु । यत्र च प्रवासरूपो भेदस्तत्र-प्रवासस्य भूत-भविष्यद्-वर्तमानावस्थाभिः प्रोषितपतिका---प्रवत्स्यत्पतिका-प्रवसत्पतिकाख्यास्त्रयो भेदा अङ्गीकृताः । किन्तु विद्याराममहाभागेन व्याकरण गलहस्तयित्वा 'प्रोपित्पतिकाख्यो नवीन इव भेदः म्वीकृतः । लक्षणं चास्या:-“सा प्रोपित्पतिका यस्याः- प्रियो देशान्तर शतः।" 'गतः' इति भूतकालानुरोधेन सेयं प्रोपित: (प्र-उपितः, प्रवासं गतः) पतिर्यस्याः, इति प्रोपितपतिका स्यात् । किनु अनुष्टुप्छन्दोऽनुरोधेन "विरहोत्कण्ठिता प्रोपित्पतिका खण्डिना तथा । मा प्रोपित्पतिका यस्याः प्रियो देशान्तर गतः।' इत्यादि मुहुर्मुहुरुच्यते। यदीद लेखकप्रमादेनैव संपन्न चेद् भविष्यति तदिदं मंशोधनीयमेव, किन्तु छन्दः ? अस्तु, किं नाम पारोभाग्येन ?

.. ,ग्रन्थान्ते श्लोकसख्याऽत्र ६२४ इति संकलिता संपादकमहामागेन । ततश्च एतायन्मात्रेणेव ग्रन्थेन यदि साहित्यस्य सपूर्णोऽपि मारभागः संगृह्यते ताई जिज्ञासूना कुतो वा न स्यादुपकारः । प्रन्थकारोऽयम राजस्थानीयः । श्रासीदस्य पूर्व पारम्परिको निवासः उदयपुरराजधान्याम् । ततो जीविकावशात्कोटानगर आगमनम, तत्रैव चास्य ग्रन्थस्य प्रणयनमिति ग्रन्थान्ते कविना स्वयमुपनिवद्धम् । राजस्थाने राज्ञां गुणग्राहिए। तया वहय एत्र असामान्यगुणसपन्ना विद्वांसः, कलाकाराश्च समादर महान्तमाश्रयं च लेभिरे । तत्रैव सुस्थिरप्रतिभास्ते तादृशानि कार्याणि चक्रर्यानि न केवल राजस्थानस्य, न वा केवलमस्य भारतवर्पत्येव, अपितु संपूर्णस्यैव मानवजगत. सार्वदिककल्याणाय समभूवन, भवेयुश्च । जयसिंहमहाराजेन ग्रहगणिते समागच्छन्तमन्तरं दृष्ट्या समरकन्द,प्रभृतिपु प्रत्यन्तदेशेषु विदुपः प्रेपयित्वा 'सारणी' निर्मापयामासे, यस्या नाम तात्कालिकभारतशामकस्य मनःप्रसादनार्थम् 'जीज़ मुहम्मदशाही' इत्यकल्पयन सः । ग्रहाणां प्रत्यक्षपरीक्षाये कोशी-जयपुर देहल्यादि ज्योतिपयन्त्रशाला निर्माप- यामास, याः प्रेक्ष्य विवेकिनः पाश्चात्या अपि विस्मयन्ते । महाराजा जयमिहो भारते तत्कार्य समपादयन यद्धि पोपग्रेगरी (त्रयोदश.) युरोपे सपादयामास [ के. ऑस्ट्रो. नोमिकल् श्रॉब्जरवेटरी श्राफ् जयसिंह-पृ०२, १५, ४१, ६८ । वेव करमीज श्राय द हिन्दूरटेट्स श्राय राजप ताना, पृ० ७२ टिप्पणी २] सम्राजगन्नाथेन यूक्लिडस्य सम्पर्ण रेखागणितमारव्यमापान: मंस्कृत- भापायामनृदितम् 1 Claudius ptolemy इत्यस्य ( Almagest ) प्रन्थस्य पार व्यभाषानुवादाधारेण सिद्धान्तकौस्तुभो व्यरच्यत । सम्राड्-जगन्नाथेन तृतीयो ज्योतिष अन्यः 'सम्रासिद्धानाः' व्यरच्यत ! जयसिंहनेव 'विभागसारणी', 'मिथ्यानीवासारणी', डी० ला हीरे इत्यस्य प्रहगणितसारण्या अाधारण जयपुरस्य रेखांशोपरि मस्कृत हक्पक्षसारणी' 'दृक्पतः' इति अन्थद्वयं च निर्मापितम । पुण्डरीकरत्नाकरेण प्रततिथीनां निर्णयविषये 'जमिहकल्पद्र मो' नाम महा- विशालो प्रन्यो निर्मितः । एवमन्यान्य विदुपा द्वारा राजस्थाने बद्दबस्ते ग्रन्था निर्मिनाः, यान समप्रमपि शिक्षितजगत्ममन्यते । अन्तु, किं नाम विस्नरंण। श्रम ममयों राज्ञां विप्रतीपः, किन्तु प्राचीनराजस्थानेन भृयमी लोकमेवा मंपादिता, या हि नवीन. शामकैरपि न कदाचिद् विस्मनव्या । साम्प्रतमपि राजस्थानसर्वकारेण मंस्थापित राजस्थानपुरातत्त्वमन्दिर नाम प्राचीनानां हस्तलिम्धिनपुस्तकाना मंग्रहं विदधानि । पामते चास्य मन्दिरस्य मा.

लका मुनिश्रीजिनविजयमूरिमहोदयाः । एषां मुनिमहोदयानां सम्मान्यसञ्चालकत्वे
'पुरातनप्रन्थमालाअपि' प्रकाश्यते चानेन मन्दिरेण । तदन्तर्गतोयं ग्रन्थरूपेण प्राकाश्य
नीनः करतलमधिगतो विद्यते सहदयानां विदुपामिति ।
श्रस्तु, एतद्ग्रन्थसम्पादकस्य वहुरा श्रीगोपालनारायण M. A. महोदयस्य
परिश्रमं मन्ये जिज्ञासयो जनाः समर्थयेरन हृदयेन । प्रवर्द्ध तामस्य महाभागस्य एवं-
विधेषु कार्येषु लोकोपकारकारकः समुत्माइ इति संवर्द्धयाम्याशीभिः ।
'अस्तु प्रस्तुततचस्यपरिज्ञानाय सारतः ।
स्थूलार्थप्रणिधानाय पानाय रसदीपिका ।। १
इत्यावेदितवान् वस्तु प्रस्तुतग्रन्थसंगतम् ।
मञ्जुनिकुञ:-
भट्टश्रीमथुरानाथशास्त्री
जयपुरालयः॥२
२५८५८
विषय-तालिका
सञ्चालकीय वक्तव्य
प्रारम्भिक किञ्चिद्वक्तव्यम्
प्रास्ताविक. परिचयः
रसदीर्घिका
परिशिष्ट
१-७८.
७६-८०

॥ श्रीः ॥ प्रास्ताविकः परिचयः पुण्यपत्तनस्थ-ऐफिन्स्टनविद्यालयस्य प्राध्यापकेन विपश्चिता पिटर्सनमहाश- येन स्वकीये हस्तलिखितग्रन्थानां तृतीये गवेपणाविवरणे* कविविद्यारामविरचिताया रसदीर्घिकायाः समुल्लेखः कृतः । सोऽयमुल्लेखः पत्रिंशदुत्तरत्रिशतसख्यान्वितानां (३३६) तेषां हस्तलिखिनप्रन्थानां विवरण वर्तते, ये खलु १८८४-८६ ईसवीयवत्सरेपु सर्वकार ( सरकार ) कृने क्रीता आसन् । पुस्तकस्यास्य विवरण तत्रैवं दत्तम्-पत्राणि ६६ ; पतयः प्रतिपन्नम् ; अक्षराणि २८ इति । श्री पी० बी० काणेमहोदयेनापि स्वीयेऽलङ्कारशास्त्रस्येतिहासे परिशिष्टेषु अलङ्कारग्रन्थानुक्रमणिकायां रसदीर्घिकाया विद्यारामस्य च सूचनं विहिनम् । सेयं सूचनापि तदेवोक्तविवरणमवलम्बते इति सम्भावये। राजस्थानपुरातत्त्वान्वेपणमन्दिरस्य हस्तलिखितग्रन्थसाहकृते १९५५-५६ ई. वर्पयोः सङ्ग्रहीतग्रन्थानां सूचीपत्रस्य सम्पादनसमये मत्सहयोगिना श्रीमल्लक्ष्मीनारा- यणगोस्वामिमहाशयेन रसदीर्घिकायाः पुस्तक प्रति मामकीनमवधानमाकृणम् । पुस्तक- मिदं परिपूर्ण विवरणश्चास्यैवं वर्तते, आकारः १०१"४४३" पत्राणि ४८, पंक्तयः प्रति. पृष्ठम् १०, प्रत्येकपंक्ती २८ अथवा २६ अक्षराणिसन्तीति । कृतरस्या' पुष्पिकावलोकनेन विज्ञात भवति यत् कविविद्यारामस्तस्मिन् समये अर्थादादशशतान्या साहित्यविद्या- र्थिना कृते सर्वेषामेव ज्ञातव्यविपयाणां मारल्येन दोघनाय तामिमां रसदीर्घिको विरचितवान् । यथा हि तेनैव प्रतिज्ञानम्-- "अनायासेन पालानां रसास्वादनहेतवे । विद्यारामः करोत्येतां मनोज्ञां रसदीपिकाम् ।।१-३ * A Third Report of Operations in Search of Sanskrit Sanuscripts in the Bombay Circle, April 18S4 March 1889 by Prof. Peterson (Journal of the Bombay Branch of the Royal Asiatic Society, 1887 ) २ । प्रसङ्गेन मयेनत्कृतिविपये पुण्यपत्तनस्थमाएडारकरप्राच्यविद्याशोधसंस्था- नस्य संग्रहाध्यताः समादरणीयाः श्रीपक गोडेमहोदयाः पत्रद्वारा पृष्टाः । तैरिदमुत्तर लिखितम्-"कृतिरियमतीव दुर्लभा ( rare ) ऽस्ति । पिटर्सनमहोदयेन क्रीनं यद्धि पुस्तकमस्माकं संग्रहे वर्तते तदुर्भाग्येनापूर्णमेव । पत्राणि चास्य ३३ तः ५० पर्यन्तम- प्राप्तानि सन्ति" इति । तदनन्तरमह मदीयविभागाध्यक्षान् सम्मान्यमञ्चालकान् श्रीमुनिजिनविजय- महानुभावान पुरातत्त्वमन्दिरसंग्रहे. प्राप्नं रसदीपिकायाः पूर्ण- पुस्तकं पर्यदर्शयम् तत्सम्बन्धे श्रीगोडेमहोदयस्याभिप्रायं चापि निवेदितवान् । ततस्ते कृपया तामेतां कृति द्वयोरपि पुस्तकयोराधारेण सम्पादयितु मां नियुक्तं कृतवन्तः । पूर्व पुरातत्त्वमन्दिरीयपुस्तकस्य प्रतिलिपिः कृता, ततः पुण्यपत्तननो भाण्डार करप्राच्यविद्याशोधसंस्थानस्य पुस्तकमानारय पाठमेलनमनुष्ठितम'। गथाशक्यमुमय- पुस्तकाभ्यां संगतः शुद्ध एव च पाठः संगृहीतः । पादटिप्पणीपु.पूर्व पुस्तकं क' प्रति नाम्ना अपरच.'ख' संकेतेन निर्दिष्टम् । लिपिकाले उभयत्राप्यनुल्लिखिते. क. पुस्तकमपेक्षाकृतं प्राचीनं शुद्धपाटयुतश्च विद्यते । पूर्वपुस्तके, लिपिस्थानस्याप्युल्लेखो नास्ति,परन्तु 'ख' प्रतिलिप्यां तद्वर्तन एव । पुस्तकमेतत् जयपुरनगरे लिखितमस्ति । अस्य लिपिकर्ताऽ मररामो गौडब्राह्मणः महानन्दपाठकस्य पुत्र श्रासीत् । अयं हि "द्यासा' प्रामे निवसति स्म'। द्यौमायाम. जयपुर-देहली-मार्गे' जयपुरादेकोनविंशतिकोशमितः स्थितः । अत्रैवःपूर्व । जयपुरमहाराजैः स्वीया राजधानी संस्थापिताऽऽसीन। द्वयोरेव पुस्तकयो: यत्रकुत्रचित् शब्दार्थाः लघुटिप्पण्यश्च प्रदत्तास्ताः पादटिप्पणीपु पुस्तकेऽस्मिन् यथावत् समाविष्टाः, तेषां पुरस्तात् 'क' अथवा'ख' पुस्तकस्य सङ्केतश्चापि विहितः । कस्यचिः द्वि- मशब्दस्यार्थस्याथवाऽन्यमंसूचनस्य यथावसरं। सम्पादकेन स्वपक्षात् टिप्पणी प्रस्तुता; तदप्रे 'सं०' इनि सङ्केतितम् । रसदीर्घिकानिर्माता कविविद्यारामः खलु अहम्मदाबादनगरान्तिका सुजाख्य- ग्रामस्य निवामी समवति। तदनन्तरमसावुदयपुरमागत्य वसतिञ्चकार । ततश्चाजी- विकायै कोटाऽमिधाने नगरे समागतः, तत्रैव च ' ग्रन्थमनं व्यरीरचत् । उक्तं हि स्वयं तन-- "पसुजाख्ये ग्रामे प्रथमममदाबादनिकटे निवासो यस्यासीत्तदुदयपुरेऽनन्तरमथो ।

ततश्व श्रीकोटामिधनगर आजीवनवशा-- दिमं विद्यारामः स किल सुभगं ग्रन्थमकरोत् ॥" श्रीवेणिरामात्मजोऽयं विद्यारामो विसलनगरीयो गुर्जरभट्ट आसीत् । एतज्जा- तीयानां ब्राह्मणानां वसतय इदानीमप्युदयपुर-जयपुर-कोटाप्रभृतिनगरेषु वर्त्तन्ते । कवेः पितामहस्याभिधेयं व्रजनाथइत्याम.त् । अस्य महाभागस्य पिता पितामहश्चोभावपि स्वस्त्रसमयस्य प्रकृष्पण्डितावास्ताम् । रसीर्घिकाया रचनाकालविपये कविः कथयति-- "पडव्योमाद्रिमही मिताइगणिते संवत्सरे वत्सले ज्येष्ठस्यासितसप्तमीभृगुदिने कोटाभिधाने पुरे । एनां सजनरञ्जनाय परितः पूर्णा रसर्दीपिका विद्यारामकविः स्वयं सुललितां पर्याप्तरूपां व्यधात् ।।" एव १७०६ वैक्रमाब्दीयेयंरचना त्रिशत (३००) वर्षेभ्यः प्राक्तनीति सिद्धयति । इतोऽधिको वृत्तान्तो न कर्जीवनविपये विनायते न चैतन्महाभागेन विर- चितोऽन्यः कश्चिद् ग्रन्थ एव समुपलभ्यते । एवं हनुमीयते यदयं कवि सील्लब्ध- राज्याश्रयः, अन्यथेतरकवीनामिव तात्कालिकपरम्परानुमारं च तेनापि स्वस्याश्रयदातुः प्रशस्तिरवश्यमेव निजकृती टङ्किता स्यात् । विद्यारामस्तु केवलं विद्यानुरागी भगवतः श्रीकृष्णस्य च भक्तोऽभवत् यथाहि प्रकटीभवति ग्रन्थस्यास्य मङ्गलाचरणेन समाप्ती च रचनायाः श्रीकृष्णाय समर्पणेन । परिशिष्टे उद्धृतां मङ्गलाचरणस्य प्रथमपद्यस्य संदर्भकथां मह्य विक्रमपुर- (बीकानेर) निवामिनो वयोवृद्धा विद्वांसः श्रीमन्तो भगीरथगोस्वामिमहाभागाः मूचितयन्तस्तदर्थमह तेपामाभारभारं बहामि। गुरुवर्या माहित्यशास्त्रविचक्षणः कविशिरोमणयो भट्टश्रीमथुरानाथशास्त्रिमहानुभायाः सारगर्भितां भूमिका बिलिख्य मामुपकृतवन्तः, लघुपुस्तिकायाश्चास्याः समुपयोगितां समेधितवन्त इति श्रीगुरुचरणेभ्य प्रणतिपुरस्मरमनेशो धन्यवादान् साधुवादांश्च समर्पयामि । पुरातत्त्वमन्दिरस्य मम्मान्यमञ्चालकैः प्राप्तान्तर्देशीयप्रतिष्ठः पुरातत्लाचार्यमुनि- श्रीजिननिजयमहाभागमदीयं प्रयाममिमं मन्दिरद्वारा प्रकाशयिष्यमाणपन्थमालायां स्वीकृत्य यदहं भृशमनुगृहीनोऽस्मि मम्पादनकार्ये च समये ममये दर्शितमार्गोऽस्मि तदर्थ श्रद्ध यान् महानुभावान् सान प्रति पनि पुन्येन कृतज्ञताप्रकाशनं तु मदीयं -

४
फर्तव्यमेय । प्राप(प्रूफ)संशोधनादिकार्ये मम सहयोगिसुहृदो श्रीमल्लक्ष्मीनारा-
यणगोस्वामि--विश्वरद्विवेदिमहोदयौ सोत्साहं यत्साहाय्यं कृतवन्ती तदर्थ तावपि
सहर्ष मया धन्यवादरभिनन्द्यते।
प्राशासे राजस्थाने प्रणीताया अद्यानध्यप्रकाशितायाश्चैतस्याः कृतेः प्रकाशनेन
संस्कृतसाहित्यम्यानुसन्धानार्थिनो विद्वांसो लाभान्विता बोभवेयुरिति विनिवेदयति
बहुरोपाह्वो
दीपावली, २०१५ नि०
}
विनयपरायणो
गोपालनारायणः

यारसरूपबाधेतैःप्रामणासासुगमावगाह्यायेिसाजन्यपयोधयाका
Im
लयस्तस्पतिसष्टिकालसंरत्तःपलयाकल्पत्पमाराया
Mom
याम्मेपण
मन्दिर
में
सुरक्षित
रसदीर्घिका
के
श्रादि
-
पृष्ठ
का
चित्र
राजस्थान पुरातन ग्रन्थमाला
ग्रन्थाङ्क ४१
॥श्रीगणेशायनमः क्रोउन्मुग्धवधूहसनिशिमुहूरासेहरंतहवातायने
शचविलोक्यसमनाकश्चगमन्युशकोत्वसाधलॉमुष्यधिारतलेंहतिता
नि:शोणितपातयत्वावेतन्माणमन्दिमातुवःश्रेय तंत्रायतिःni
कल्याणकमलाकुंचव्यतिकरसोरटदीप्ततिनियंकेटनविविषावि
तिनुत्तात्कंगस्वतः कास्तुनः केल्यातेकलन कुलस्पजगतःधीशस्तव
कोनिलस्यत्सारणतानिसस्तुरमितायस्मात्स्फुलिगाइअिनाया
सिनबालानारसास्वादनहतवा विद्याराम करात्येतामनोज्ञारसदाधिकार
पा स्वकल्पितादाहसलत्यावश्यतयारसदाधिकाइिलास्ति

ग्रन्थाङ्क ४१
राजस्थान पुरातन ग्रन्थमाला
गुणमएमप्युडविता: केप्युचस्तरमनिकुर्वतहिसंतःपरोपकारीय
यानिबधामनोरमायारसदाकयाविनिर्मितीपात्सुकतैयदस्यास्तदस्तुली
परगनक्षयquch तिरसदार्विकायोकांयव्यवस्थानिरूपांना
मपंचमेसोपान समातोययः ग्रंथस्पास्वालोकसंख्या १२ ॥
राजस्थान पुरातत्त्वान्चेपण मन्दिर में सुरक्षित रसदीर्घिका के अन्तिम पृष्ठ का चित्र

- घि का ।। श्री गणेशाय नमः ।। कवि विद्याराम विरचिताः र स दी र्घि क्रीडन्मुग्धबधूईसनिशि मुहू रासे हरन्तं हठात् ता यक्षेशचरं विलोक्य -स-मनाक्:शुग्मन्युशङ्कात्वरः। धृत्वाऽमुप्य शिरस्तलं प्रहतितो निःशोणितं पातयन् भ्राने तन्मणिमर्पयन् दिशतु वः श्रेयःशतं श्रीपतिः ॥१॥ कल्याणं कमलाकुचव्यतिकरणोन्मृष्टदीप्ता ति- नित्यं कैटभविद्विषो विवनुवाद कण्ठेस्थितः कौस्तुमः । कल्पान्ते (१) कलनाकुलस्य जगतः श्रीशस्य वस्त्रानिल- स्पर्शात् प्राणभृतो निसन रमिता यस्मात् स्फुलिंगा इव ॥२॥ अनायासेन बालानां रसास्वादनहेतवे । विद्यारामः करोत्येतां मनोज्ञा रसदीर्घिकाम् ॥३॥ स्वकल्पितोदाहरणैः (२) सलक्ष्यै विरच्यते या रसदीपिकपा । इच्छाऽस्ति येषां रसरूपयोधे तैः शर्मणा सा सुगमाऽवगाहा ॥४॥ ये सौजन्यपयोधयः कृतधियः पूर्णाः सदृश्य (३) गुण- आतारः कवितारहस्यरचनामोल्लसत्कर्मणाम् | • पद्यस्याम्य भागवतीसन्दर्भकया परिशिष्टे ऽवलोक्नीया । (सं०) १. कल्पः प्रलयस्तस्य अन्ते सटिशाले संवृत्तः । प्रलयः कल्प इत्यमरः । (ख) प्रलयान्ते सृष्टिकाले, कलना रचना । २. स्वकल्पितोदाहरिति (क) प्रती। ३ (ख) सदस्य । सहरिनि साधुः पाटः 'दृग्नु(पा. स. ६.३.८८) इत्यत्र 'दृक्षे चेति' मार्तिकचनादनुक्तोऽपि कमः कल्प्यते-इनि त्यदादिषु (३. २. ६) इत्यत्र भाष्यप्रटीपोयोनकाः। (सं.)

२] कवि विद्याराम विरचिता तेपामेप पुरो मया विरचितो याश्चाञ्जलिमको ग्रन्थोऽयं विरसोऽपि कोमलधिया स्वीकार्य एवेति यत् ॥शा दोपः कदाचिद् भविताऽत्र कश्चिद् गुणज्ञदृष्टस्तु गुणः स भावी । स्पर्शाद किल स्पर्शमणे व तिष्ठेल्लोहस्य लोहस्थितजातिमञ्चम् ॥६॥ भरतोक्तानुसारेण संक्षेपादिह कथ्यते । विशेषापेक्षणं येषां तैरन्यत्रावलोक्यताम् ॥७॥ रसो च स इति श्रुत्या रसस्य विष्णुरूपता । अतो विष्णुमयं विश्वं यथा रसमयं तथा ॥३॥ तन्त्र रसत्वं नाम- भावैस्तैस्तैहि यश्चिचे पूर्यमाणः समंततः । उद्रिक्तः कोऽपि नियात् भावः२ सान्द्रो रसः स्मृतः ।।६।। भावो रसानुकूलोऽन्यो विकारः स निगवते... शृङ्गारस्यानुगत्वेन रसाः स्वारस्यमाप्नुयुः ॥१०॥ रस्यतेऽनुभवं स्वस्थानीयते यः स.या रसः । रसत्वं नाम जात्वित्येकेपामस्ति निर्णयः ॥११॥ प्राचां मते तु--- विभावैरनुमायैश्च साचिकैयभिचारिभिः । आनीयमान उत्कर्ष ६ स्थायिभावो रसः स्मृतः ॥१२॥ नवधा स रसो ज्ञेयः शृङ्गारादिप्रभेदतः। शृङ्गारस्तेषु मुख्योऽस्ति यथा देवेषु केशवः ॥१३॥ - 1 १ (क) त्वथा । २ चित्तवृत्तिविशेषः ३ (ख) सातो | ४ (ख) मनसः ५ (ख) जातिवत्येकेशा (पा) मस्ति निर्णयः । ६ (क) उत्कर्षः।

. रसदीपिका. [३ --- ते रसा यथा-- शृङ्गारहास्या करुणश्च रौद्रो वीराभिधधाथ भयानकश्च । वीभत्सनामाऽद्भुतशान्तसंजी रसा नवैते कथिताः कवीन्द्रः॥१४॥ रसानां सूक्ष्मरूपाणि स्थायिभावाश्च सम्मताः । स्थायित्वव्यापदेशोऽत्र स्थायित्वाद्रसरूपवः ॥१५॥ रसप्रकाशे तु- - सजातीय विजातीयैर्भावये त्वतिरस्कृताः । क्षीरादिवन्नयन्त्यन्यं+ स्वात्मचं स्थायिनो हि ते ॥१६॥ रतिश्च हासश्च तथा च शोकः क्रोधस्तथोत्साहमये जुगुप्सा। निवेद' युविस्मयकोष्टमयते स्थायिभावाः क्रमतो रसानाम् ॥१७॥ स्थायिभावा यथासङ्ख्यं नवानां नवसम्मताः। लक्षणानि पदिष्यन्ते रत्यादीनां यथारसम् ॥१८॥ विभावाश्यानुभावाश्य यस्य यस्य रसस्य ये । संभवन्ति वदिप्यन्ते तेऽपि तत्तद्रसोक्तिपु ॥१८॥ (१६) कारणानि विमावास्तु रसानां परिकीर्तिताः । अनुभावावर कार्याणि येऽन्ये ते सहकारिणः ३ ॥१६॥ • निर्देशो । ४ ररूपेणेत्यर्थः । + मावं (ब) * वैराग्यं (ल) १ (ख) ये मनन्ति । २ (ख) अनुमावास्न । ३ मचारिणः ।

कवि विद्याराम विरचिता साचिका अथ हावाश्च भावा ये व्यभिचारिणः । एतेपां नियमो नास्ति युगपत्सकलोद्भवे ॥२०॥ कुत्रचिद् द्वौ त्रयो वाऽपि चत्वारः क्यापि पञ्च च । पद सप्त क्यापि चाष्टौ चा न समग्रा न चैकलाः ॥२१॥ अथ विभावादीनां सामान्यतो लक्षणानि-- उत्पादयन्ति ये चैतान विभावास्ते द्विधा मताः । आलम्बनाभिधश्च कस्त्वन्य उद्दीपनाभिध ॥२२॥ आलम्ब्योत्पद्यते यं वै रस पालम्बनं हि सः | उद्दीपयति यो वै तं स उद्दीपनकः स्मृतः ॥२३॥ श्रालम्बनविभावस्तु रसानां नायको मतः । सामान्यतो हि सर्वेषां शृङ्गारस्य विशेषतः । ॥२४॥ ज्ञापयन्ति रसोत्पत्ति तेऽनुभावाश्च कीर्तिताः । स्वेदादयः शरीरस्य धर्माः साचिकसंज्ञकाः१ ॥२॥ निवेदग्लानिशङ्काधार भावाश्च व्यभिचारिणः । धर्मा ये मनसः प्रोक्ताश्चैते सर्वरसानुगाः ॥२६॥ रसेवितस्ततो यस्माचरन्त्येते तथाभिधाः । स्त्रीणां शृङ्गारजा चेटा हावा लीलादयः स्मृताः । शृङ्गारस्यानुगार्थ ते नेतरेषामिति स्थितिः ॥२७॥ श्रथ सात्त्विका भावा यथा- स्तम्भः स्वेदोऽथ रोमाञ्चः स्वरभङ्गश्च वेपथुः । वैवर्यमश्रु प्रलय इत्यष्टौ साचिका मताः ॥२८॥ # नायक इत्युपलनण मर्ने प्राणिन इति । , सत्त्वे देहे भवाः माविकाः । २ (ख) निर्वेदज्ञानशकाद्या । ३ व्यभिचारिनामानः । x'क' प्रती २७ तमः श्लोकः श्रर्धालित्रयात्मकः । 'स्व' प्रती २७ श्लोकस्य पूर्वपक्तिरेवं वर्तते- "हावा श्रीराविका नृगा ज्ञेयाः स्त्रीणां समावजाः।"

रसदीपिका [५ प्रथैपां लक्षणानि- . गतेनिरोधास्तम्भः स्यात्स्वेदोऽङ्ग सलिलोद्गमः रोमोत्थानञ्च रोमाञ्चः स्वरभङ्गः स्खलगिरः ॥ २६ ॥ वैवर्यमन्यथाभावो वर्णस्य प्रकृतस्य यः । विकारजनितं चतुःसलिलं कथ्यतेऽश्रु वे ॥ ३० ॥ चेष्टारोधः शरीरस्य प्रलयः परिकीर्तितः । इति माविकभावलक्षणम् ।। अथ व्यभिचारिभाषाः यथोक्ताः काव्यप्रकाशे- निर्वेदग्लानिशङ्काख्यास्तथाऽनयामदश्रमाः । श्रालस्यं चैव देन्यञ्च चिन्ता मोहः स्मृति तिः ॥ ३१ ॥ ब्रीड़ा चपलता हर्प यायेगो जड़ता तथा । गर्यो विपाद श्रीत्सुक्यं निद्रापस्मार एव तु ॥ ३२ ॥ सुप्तिवियोधोऽमर्पश्चाप्यवहिस्थमथोग्रता । मतिाधिस्तथोन्मादस्तथा मरणमेव तु ॥ ३३ ॥ ग्रामचव विवश्व विज्ञेया व्यभिचारिणः । रसेवते समा भिन्ना विभावाचानुभावकाः ॥ ३४ ॥ श्रथैपांचम्पलक्षणानि- हेयत्वबुद्धिः मंसारे निषेदः स्वावमाननम् । रत्यायामादिभिग्लानिः कर्मशथिन्यगुज्यने ।। ३५ ॥ इटहानावनिष्टस्य प्राती शहाविचारणा । परोकर्मामहिष्णुन्यमाया परिकीर्तिता ॥ ३६ ।।

६] कवि विद्याराम विरचिता परानिष्टाचिकी वाऽमया दौर्जन्यकादिजा । हर्षात्को मदः पानाधु भूतो यश्च चेतसि ॥ ३७॥ तत्रोचमस्य निद्रा स्याद्धसितं मध्यमस्य च । रोदनन्त्वधमानां हि त्रिविधं मदचेष्टितम् ॥ ३८ ॥ पराभवस्त्वथायासप्रभवः श्रम उच्यते । उत्थानाधक्षमचं यत् तदालस्यं श्रमादिना ॥ ३९ ॥ दुःखातिरेको दैन्यं स्याद् दारिद्रयविरहादिजः । चित्त काग्रयात्मकं ध्यानं चिन्तात्विष्टायनाप्ति' ।। ४० ॥ कार्याकार्यापरिच्छेदो मोह इत्यभिधीयते । ज्ञानं संस्कारजन्यं यद्विविधं सा स्मृतिःस्मृता ॥ ४१ ॥ द्विविधं च प्रत्यभिज्ञारूपं स्मरणरूपं च- ज्ञानशक्त्यादिभिर्यः स्यात् सन्तोषः सा धृतिर्मता । म्वच्छन्दकर्मसंकोचो ब्रीडा दुश्चरितादिभिः ॥ ४२ ॥ क्रियायाः शीघ्रता या सा ज्ञेया चपलता बुधैः । चेतःप्रसादो हर्षः स्यात् प्रियप्राप्त्यादिसम्भवः ॥ ४३ ॥ संभ्रमः सहसावेगस्त्वप्रियश्रवणादिजः । जडता व्यवहारस्य सर्वस्य त्याग उच्यते ॥४४॥ सर्वाधिकत्वधीः स्वस्मिन् सर्वस्मिन्त्वधमत्वधीः । चलैश्वर्यादिजनिता स गर्व इति कथ्यते ॥ ४५ ॥ १-[ख] दुःखाधिक्यम् । २-[व] सर्वस्मिन्नधमत्पधीः ।

[" रसदीर्घिका आरुधकृत्यानिर्वाहात्१ सङ्कटादिष्टसंशयात् । चितोत्साहक्षयो यः स्याद्विपादः स त्रिधा मतः ॥४६ ॥ सहायान्वेपणोपायचिन्ताद्या उत्तमस्य तु । चैमनस्यादयो भावा मध्यमानां भवन्ति च ।। ४७॥ ध्यानमुद्धापनं वस्त्रशोपनिःश्वासकादयः । अधमानां भवन्त्येते भावा निद्रादयस्तथा ॥ ४८।। कालासहिष्णुतात्सुक्यं प्रियस्मृत्यादिसम्भवम् । निद्रा त्वचिर समावेशो मनसोऽन्येन्द्रियैः सह ॥ ४६॥ चित्तदोभस्त्वपस्मारो ग्रहाधावेशजः स्मृतः । सुप्तिर्मनःप्रवेशो वै नाड्यां पुरीततः स्मृता ॥ ५० ॥ इन्द्रियाणां प्रकाशो य अायो निद्रात्यये भवेत् । विवोधः स हि विज्ञेयो जृम्भाच्युन्मर्दनादिभिः ॥ ५१ ।। पराहङ्कारशमनोत्समीहामर्ष उच्यते । अवहित्थमथाकारसङ्गोपनमुदीरितम् ॥ ५२ ।। उग्रता निर्दयत्वं यत् तस्करोत्ताडनादिए । मतियथार्थविज्ञान शास्त्रसञ्चिन्तनादिभिः ।। ५३ ।। --(ब) निवांदः । २-(व) बनवनाडिकाया त्वक ३-(ब) नन्द्रिय. मह । ४-(त्र) पुरि । नत्र पुरी तत् इत्यमा पुगतती । स्वने पुरीततीनाइयां प्रविशति मनः (म०) ५-(प) यथार्थगन स्यात् ] कवि विद्याराम विरचिता व्याधिजरादिविकतिः क्लेशाऽजीर्णादिसम्भवा । विना विचारमाचार उन्मादः परिकीर्तितः ॥ ५४॥ वित्तनाशादिनो हासनल्पनाद्यात्मको वृथा । प्राणनिष्क्रमणी देहान्मरणं परिकीर्तितम् ॥ ५५ ॥ विक्षोभी मनसस्त्रासः करालपक्षणादिजः २ । विचारपूर्वक क्षोभो भौतिराकस्मिकस्तु सः ३ ।। ५६ ।। वितर्वस्तु विचारास्याचतुर्धा संशयादिकः ४ । संशयात्मा विचारा]त्मा तथानध्यवसायकः ५ ॥ तुर्यो विप्रतिपत्यात्मेत्येवं तर्कश्चतुर्विधः ॥ ५७ ॥ नतेषां ग्रन्थभूपस्त्वादवोदाहरणोक्तयः । संक्षेपतः स्वरू तु बालबोधाय दर्शितम् ॥ ५८ ॥ यद्यवस्तुभिरेतेपां ६ समुत्पत्तिः समुद्भवेत् । तेप्यन्यत्राबलोक्या वे नानोक्ता विस्तराभयात् ॥ ६ ॥ हावाः शृङ्गारजा भावाः शृङ्गारस्यानुगामिनः । तस्मादने वदिष्यन्ते शूझारस्य निरूपणे ॥ ६० ॥ इति रसीपिकायां रसपरिभाषा नाम प्रथम सोपानम् ।। -(ब) प्रागनिकमगम् । ----(वि) क्गलमे क्षणादिभिः (गङ्गदर्शनादिजः)। ३-(प) पिचापको यो मनमो पित्तोमः म नु भयम् । श्राम शीमन्याम इत्यर्थः। -~-14) गयादिमिः। ५-~-(ग) उत्तरकोटिर. मरा-भ्यरमायाः। --) परमिता।

[. रसदीपिका [द्वितीयं सोपानम् ] अथ शृङ्गार:- शृङ्गारः प्रथमं तत्र मुख्यत्वात् सकलेप्वपि । स्थायिभावादिसंयुक्तः संक्षेपाद्धि निरूप्यते ॥ १॥ स यथा, शृङ्गारस्य स्थायिभावो रतिः, सा च- यूनोरन्योन्यसंस्नेहः प्रगाढो रतिरुच्यते । इतरेपुर रतिर स्यात् सा भाव इति कथ्यते ॥२॥ सा रतिर्यथा- गुरुसन्निधिसन्निविष्टयोस्त्रपया शक्नुवतोर्न भापितुम् । अनुरागभरं३ विलासिनोविवृणोति व्यतिवीक्षणं मुहुः ॥३॥ शृद्धारलक्षणं तु- रतिभावश्च सम्पूर्णः शृङ्गारः परिकीर्तितः । आनन्दानुभयो वा यो यूनोयोगे परस्परम् ।। ४ ॥ संयोगो दर्शनाद्यैर्यत् सुरां यूनीरुदीरितः । विप्रलम्भो वियोगे यत् तयोरन्योन्यतोऽसुखम् ।। ५ ।। अथास्य दैवतं विष्णुवर्णः श्यामः स्मृतो बुधैः । स्थितः स्त्रीपुंसयोरेप उद्दिश्यान्योन्यमिष्टयोः ॥ ६ ॥ सम्भोगशृङ्गारो यथा- पादेन पादं च कर फरेण संयोज्य कायेन मिथश्च कायम् । निपीडयन्ती स्ववनू युवानौ कुर्वात श्रात्मैक्यमिकवित्तौ ।। ७॥ १. पदार्थेषु (ख)। २. प्रीतिः (ख)। ३. (ख) अनुरागकला । ४. संमोगो । (क)। ५. (क) यात्मकं ( देहेक्यम् ) ।

कविविद्याराम विरचिता १०] अथ शृङ्गारविभवः आलम्बन-विभावोऽस्य नायिकानायको मिथः । उद्दीपनविभावस्तु ऋतुमाल्यादिकं स्मृतः ॥८॥ तत्र नायकविपयिकङ्गारस्यालम्बनविभावो नायिका- साच- पूर्णेन्दुवदना पद्मपत्रनेत्रा नितम्बिनी। स्वर्णवर्णा विदग्धेटग्विधा या नायिका तु सा ॥ ६ ॥ सामान्यतस्त्रिया ज्ञेया नायिका रसकोविदः । स्वकीया परकीया च सामान्या चेति भेदतः ॥ १०॥ तत्र स्वकीया- विवाहिता विधानेन सच्चीलादिगुणान्विता । स्वामिन्येवानुरक्ता या स्त्रीया सा परिकीर्तिता ॥ ११ ॥ मुग्धा मध्या प्रगल्भेति स्वीयापि त्रिविधा मता। ईपत्कामा रतौ वामा मुग्धेपद्यौवनोदया ॥ १२ ॥ चल्लभेन सह स्पष्ट पृष्टा व्रते न लजया । सापराधे प्रिये तूणी केवलं रोदिति स्थिता ॥ १३ ॥ अज्ञातयारना ज्ञातयौवना द्विविधापि सा। समानलजामदना मध्या सा परिकीर्तिता ॥१४॥ यथवा सतृष्णा सुरतस्वाद मध्या यौवनशालिनी। विधा मानदशायां सा धीराऽधारोमयात्मिा ॥१५॥ --(ग) माया परियाना।

[११ रसदीर्घिका सनिश्वासं प्रियं धीरा वक्रोक्त्या वक्ति सागसम् । बल्लभं मचनैः क्रूरैरधीरा तुदति कुधा ।। १६ ।। सवाप्पं वक्रवचन(राधीरा वदेत् प्रियम् । ज्ञेयो ग्रन्थान्तरादासामुदाहरणविस्तरः ॥ १७ ॥ प्रगम्भा पूर्णकन्दप पूर्णयौवनजोन्मदा । रतौ गाढं प्रियस्याङ्ग विलीनेत्र रसाभवेत् ॥ १८ ॥ रतिकेलिकलाभिज्ञा सुतरां सुरतप्रिया । रतेवानन्दसन्दोहान्मूच्छितेव भवत्यसौ ॥ १६ ॥ प्रगल्भाऽपि त्रिधा माने धीराधीरादिभेदतः। औदासीन्यन्तु धीरायाः प्रगल्भाया भवेद्रते ॥ २० ॥ प्राकारगोपनं स्वस्या मिथ्यादरविचेष्टितैः । अधीरा निष्ठुरा प्रष्ठं पीडयेत्तर्जनादिभिः ।। २१ ॥ धीराधीरा प्रगल्मा तु द्विविधैस्तैगुणैर्युता। एवं भेदाः स्वकीयायाश्चतुर्दश परिश्रुताः ।। २२ ॥ तथा हि- मध्या प्रगल्भा प्रत्येकं त्रिधा धीरादिभेदतः । ताः प्रत्येक द्विधा ज्येष्ठाकनिष्ठाभिधभेदतः ।। २३ ।। भतुर्या वल्लभाऽत्यन्तं ज्येष्ठा सा परिकीर्तिता । हीनस्नेहा कनिष्ठास्ति न विवाहकमस्तयोः १ ॥ २४ ॥ .. १. ज्येचा निष्टत्वयोः (ब)।

१२] कवि विद्याराम विरचिता मुग्धा तु द्विविधा चैवं सा चतुर्दशधा मता। अस्त्यासां रसमञ्जर्या विस्तरेण निरूपणम् ॥ २५॥ ॥ इति स्वकीया।। अथ परकीया- परकीया परेणोढा सती याऽन्यरता भवेत् । परोढा कन्यका चेति द्विविधा सापि सम्मता ॥ २६ ॥ अनूढा कन्यका रूढयौवनाऽपि पितु है । . पुरुषाकाङ्क्षिणी स्वान्तर्मुग्धा तुल्यविचेष्टिता ।। २७ ॥ कन्यायाः परकीयात्वं भविष्यत्पत्यपेक्षया । पुरुपान्तरगामित्वात् सिद्धमेवेति निश्चयः ।। २८ ॥ परोढा वञ्चयित्वा स्वं पतिं जाररता तु या। लक्षिता मुदितेत्येवं परोढा विविधा मता ॥ २६ ॥ ॥ इति परकीया।। अथ सामान्ययनिता- सामान्या द्रव्यदानाद्या सर्वेषां वनिता भवेत् । त्यक्तनीचोचभावा सा वेश्या वित्त कवल्लभा ॥ ३० ॥ कदाचित् सा विना द्रव्यं गुण रक्ता भवेद्यदि । तदा गुणवती प्रोक्ता यथा सा कामकन्दला ॥ ३१ ॥ सामान्यवनितायां तु शृङ्गारो वर्ण्यते हि यः। तस्या द्रव्यैकचित्तत्त्वाच्छृङ्गाराभास एव सः ॥ ३२ ॥ ॥ इति सामान्यबनिता ॥ म्यकीयाद्या इमाः सर्वाः प्रत्येकमष्टधा मवाः । घिरहोकपिटता प्रोपित्यतिका खण्डिता तथा ।। ३३ ।।

[१३ रसदीर्घिका विप्रलब्धा च कलहान्तरिता चाभिसारिका । स्वाधीनपतिका वासकसजाटाविमाः स्मृताः ॥ ३४॥ बिलम्बे सति कान्तस्यास्टस्यागमनं प्रति । योत्सुकानेकसंकल्पा विरहोत्कण्ठिता तु सा ॥ ३५ ॥ सा प्रोपित्पतिका यस्याः प्रियो देशान्तरं गतः । मालिन्यं जागरः कार्यमस्याश्चेष्टाऽनवस्थितिः ।। ३६ ॥ रात्रौ स्थित्वा परागारेर तत्सम्भोगाङ्कचिह्नितः । प्रियो यस्या गृहं प्राज्ञतिस्त्वागच्छेत् सा हि खण्डिता ।। ३७ ॥ निश्वासमोचनं चिन्ताऽस्फुटालापोऽनुमोचनम् । तूप्णीभावादयश्चेष्टाः खण्डिताया भवन्ति हि ॥ ३८ ॥ . अप्राप्त कृतसंकेते प्रिये या व्यथिता तु सा विप्रलब्धाऽश्रुनिःश्वासचिन्तायस्या विचेटितम् ।। ३६ ॥ सख्यग्रे पादपतितं तिरस्कृत्य रुपा प्रियम् । पश्चातापं तु या कुर्यात् कलहान्तरिता हि३ सा ।। ४० ।। संतापो हृदये मोहो निःश्वासच तथा ज्वरः । प्रलापः मुतरामस्याओंटाचता भवन्ति हि ॥ ४१ ।। कन्दर्पाकुलचेतस्का संकेतस्थलसंस्थितम् । स्वयं याऽमिसरेकान्तं भवेत् सा त्वमिसारिका ।। ४२ ॥ १. (स) विलम्ये सति बान्तस्यागमनं प्रति योन्मुश । ...नेमक्या विरहोकपिटता तु सा ॥ ३५ ॥ २. (ख) परागेहे । ३. (ब) तु ।

१४ कवि विद्याराम विरचिता शुक्लाफप्णादिभेदेनानधास्त्यभिसारिका । चिन्तासंतापशङ्कायाश्चेष्टावास्याः समीरिताः ॥ ४३ ।। स्वाधीनो दयितो यस्याः सदा तिष्ठति सनिधौ । हृष्टपुष्टमनाः स्वस्था? सोक्तार स्वाधीनभव का ॥४४॥ आकल्पकल्पनं३ पानक्रिया क्रीडा जलादिपु । कामपूजोत्सवाघाश्चाप्यस्याश्चेष्टाः प्रकीर्तिताः ॥ ४५ वासकः कथ्यते स्त्रीणां यस्तु सम्भोगवासः । स्त्र कान्तं समेप्यन्तं निथियात्मगृहं प्रति ।। ४६॥ सञ्जीकरोति याऽत्मानं मुहुभूपादिसाधनैः । केल्यालयं लगायः४ सा ज्ञेया घासकसज्जिका ॥४७॥ सखीविनोदश्वौत्सुक्यं प्रियमार्गेवणं मुहुः । अस्याश्चेष्टास्तथा भोगसंपत्संभालनं मुहुः ॥४८॥ ।। इति नायिंकानिरूपणम् ।। इंग्विधा नायिका नायकविषयिकगारस्यालम्बनविभा यथा- पद्म लिम्बफलं सुधारसमयं स्वर्णस्य वल्यां तथा भृङ्गस्तोकनिवितानविलसत्सद्वीजपुरद्वयम् । गम्भीराहदतच धूमवितति या बहिनिर्गता घातुः सृष्टिरपूर्वरूपरचना केयं समुज्जृम्मते ॥ ४६ ॥ । पपन्ना। २-(प) सोका । ३. श्राभूएरणम् (स) १. (प) सगन्धा या घागरसम्ना। ५. (प) पेलाभनं । ६ भरतीमानि (ल) [१५ रसदीपिका इयमम्पुजपत्रपेशलाऽखिलसौन्दर्यपयोधिरेय सा । मम विष्टमिहान्यथा कथं विनिमग्नं नितरां मनो भवेत् ॥ ५० ॥ मथ नायिकाविपयिकशृङ्गारस्यालम्बनविभावो नायकः, सच- नायकस्तु महामाम्यस्थैर्यादिगुणवान मतः 1 धीरोदात्तादिभिर्मेदैः सोयं बहुविधः स्मृतः ।। ५१ ॥ साधारणास्ते सर्वेऽत्र शृङ्गारे तु त्रिधा हिसः । पतिश्योपपतिश्वाथ वैशिश्चति भेदतः ॥ ५२ ।। तत्र पतिर्यथा- यो हि शास्त्रोक्तविधिना परिणीतः पतिस्तु सः । स चतुर्धाऽनुकूलथ शठो धृष्टोऽथ दक्षिणः ।। ५३ ॥ तत्रानुकूल: स्वरमण्यां भृशं रक्तो योऽन्यदारपराङ मुखः । अनुकूलः स विज्ञेयः सीतायामिव राधरः ॥ ५४॥ श्यर्थ शठ:- कामिनीवञ्चनोपायपण्डितो विविधैः छलः२ । यः स्वार्थसाधकः स स्याच्छठो गूदापराधकृत् ॥ ५५ ॥ अथ धृपः- शातेऽपराधे यः कोधात्कान्तयाप्यवमानितः । तदने निर्भयोऽलजस्तिष्एस्तु सः स्मृतः ।। ५६ ॥ १. कोमला (स) २. (प) विविषयलः ।।

१६] कवि विद्याराम विरचिता अथ दक्षिण:- बबीनां वल्लभस्तासां युगपद्रञ्जनक्षमः । कामकेलिकलादक्षो दक्षिणः स निगद्यते ।। ५७ ।। ॥ इति चतुर्विधः पतिः ।। अथोपपति:- यः स्त्रिया कामचारिण्या स्वीकृतः स्वेच्छया भवेत् । स्वपतेरितरः स स्याजास्थोपपतिस्तथा ॥ ५८ ॥ श्रथ वैशिकः- हावभावकलाभिज्ञः स्वरशास्त्रविशारदः। यो वा स्याद्व्यसनाद्वेश्यासंसक्तः स तु वैशिकः ॥ ५६|| ॥ इति नायकाः ।। उत्तमो मध्यमो नीचस्त्रिधासौ नायकः स्मृतः उत्तमो निपुणः स्निग्धो मनस्वी मृदुलः शुचिः ॥१०॥ न हृष्टो नापि क्रुद्धः स्यान्मध्यमः स्वार्थसाधकः । रतमात्ररतो मूढो नीचो नीचगुणः स्मृतः ॥ ६१ ।। विरक्तायां सरोगायामन्यासक्तावपि स्त्रियाम् । निर्लजः कामतो यायानीचो वा क्रोधनो हठी ।। ६२ ।। ॥ इति नायकनिरूपणम् ॥ अथ नायकसहाया:- पीठमर्दो विटचे टो विदूषक इति त्यिमे । सहाया नर्मसचिवा? नायकस्य प्रकीर्तिताः ॥ ६३ ।। १. (स) प्रधानाः।

रमदीर्घिका तत्र पीठमईः- नायकस्य गुणैरीपन्न्यूनो भक्तोऽस्य चानुगः । सद्यः प्रसाद] कृत् क्रुद्धस्त्रियोऽसौ पीठमर्दकः ॥ ६४ ।। नापकेनित्तचित् कामप्रपञ्चचतुरो विटः । चेटरस्त्रीपुसयोर्दक्षः संघाने रतिकलिपु ॥ ६५ ॥ भावर्विदूपकोऽनेकविकृतों बिहासकः । एतेषां च गुणादेशाधु चिताभाषणादयः ॥ ६६ ॥ यथोक्ता रसप्रकारो- "देशकालाला भापा माधुर्य च विदग्धता । प्रोत्साहने कुशलता यथोक्तकथनं तथा ॥ १॥ निगूढमन्त्रतेत्याधाः सहायानां गुणा मवाः।" इति । नायका अपि संक्षेपादित्यमत्र निरूपिताः। रसप्रकाशे चैतेपामतिविस्तरवर्णनम् ।। ६७ ॥ ॥ इति नायकसहायनिरूपणम् ॥ एवंविधो नायको नायिकाविपयिकशृङ्गारस्यालम्बनविभावो? यथा- मुमागः मखि नन्दनन्दनो मम दृष्टो हृतान् मनः किल । कथमस्य विलोकनादथ कृतिमूढेवर भवेयमन्यथा ॥ ६ ॥ शृङ्गारस्य उद्दीपनविभावा ऋतुमाल्यादयो यथा- विधाय श्रीपुष्पैः परित इव वपन विधि प्रदोषे सम्पाद्याऽमृतकरमपारात्रिकमयो। गृहीत्वा अखण्डं च्यजनमिय मन्देन मस्ता वसन्तः कन्दर्प परिचरति सः स्वेप्टमधुना ।। ६६ ।। १. वारणम् (स) । २. कार्यढा (ब) । ३. चन्द्रः (म)।

114] फाषि-विचाराम-विरचिता थानुभायाः- अनुभावयन्ति ये भावा रसं निष्पन्नमिङ्गितैः ।। अनुभावाः कदाक्षायाः शृङ्गारस्य स्मृता बुधैः ॥ ७० ॥ ! ते च- चनुरास्यप्रसादेन स्मितमिष्टविभापणैः । धृतिप्रमोदयास्यान्तर्भुजक्षेपादिभिस्तथा ।। ७१ ॥ अन्यैश्च विविधैरङ्गविकारैरनुभाषकैः ।, इत्येतैरभिनेतव्यः शृङ्गारो रसवेदिभिः ॥ ७२ ॥ यथा- -- प्रेमस्फुरन्नयनसस्मितवल्गुजप- विश्वास्य पाहुपरिचालनचेष्टया च । अन्तः प्रमोदभरभंगुरहन्मृगाक्षी एक्कोणवीक्षणशरेण जधान कान्तम् ॥ ७३ ॥ साविकभावा यथा- अङ्ग जलेन परिपिच्य गतिं निरुद्ध्य हत्वेपिकाभिरनुपध्य च वाक्प्रचारम् । तेजोपहत्य परिकम्प्य च रोदयित्वा कामेन कामिमिथुनं व्यथितं रहस्ये ॥ ७४ ॥ अथ शृङ्गारे व्यभिचारिभाषा निदादयो यथा- निर्विद्य तेऽत्यनुनयेन चिरं प्रखिनो यातः सकम्प इन कि स्मयसे स चण्डि ! सन्द्रां विमुच्य६ कृपणं परिचिन्तयस्त्र मुग्धे स्मरिप्यसि यचो मम चेन्न पश्चात् ॥ ७५ ॥ इत्यादि अपव्यम ।। १. शापयन्ति (फ,प) 1 २. हर्षः (ख) ३. (१) दृक्पात । ४. गलाभिः । पिकात्यक्षिकूटक मित्यमरः (म) ५. वेगग्य प्राप्य (a) ६. (ग) पिमुध । ..

নীলিম
. !
अथ छात्रा:-
स्त्रीणां शृङ्गारजाश्चेष्टा हावा लीलादयः स्मृताः ।
ते च-
--
लीला विलासो विच्छिनिर्विनमः किलकिञ्चितम् ।
मोट्टायितं कुट्टमितं विश्वोको ललितं तथा ।। ७६ ।।
विहतं चेति विज्ञेया दश हावास्तु योपितः ।
चतुष्कमाघमेतेपां शारीरं ललितं तथा ।। ७७ ।।
मोट्टायितं कुट्टमितं विव्वोको विहतं पुनः ।
श्रान्तराण्युभयस्थं च विजेयं किलकिञ्चितम् ।। ७८ ॥
तत्र लीला नाम
सरीपु कौतुकावैशात् प्रियस्य परिहासतः ।
प्रिपोक्तिपणादीनां लीलेत्यनुकृति विदुः ॥ ७९ ॥
यथा-
पिच्छगुच्छमुपधाय कौतुकाद्राधयालिपु च रास थाहतः ।
कोयमित्युपगतो वने च तां संवृतां हरिरवेक्ष्य सिस्मिये ।।८०॥
अथ विलासः-
प्रियस्य दर्शनाद्य यों विशेपो गमनादिपु ।
कश्चिदुत्पद्यते हृयो पिलासः स निगद्यते ॥ १ ॥
यथा-
रणद्धंसकोदामचञ्चत्पदाञ्ज.
घु ति जमानस्थलं मंचरन्ती।
कटालसविभ्रती वक्त्रमञ्चद्-
भ्र वैर्वी चिता सुन्दरी ते कृतार्थाः ॥ २ ॥

२०] कवि-विधाराम-विरचिता अथ विच्छित्तिः सौन्दर्यादिस्मयेनाथ मन्युना मानजेन? यः । अल्पभूपणविन्यासो विच्छितिः सेति कथ्यते ॥ २३ ॥ यथा- हारो न चारोपित श्रात्मकपठे धृतानि नात्याभरणानि चाङ्गे । एकं पुनः कजलमेव तन्व्या तेने दृशोविश्वविमोहनाय ।। ८४ ॥ अथ विभ्रमः - नियस्यांशुकभूपाणां विपर्यासोऽथ कौतुकात् । मदप्रेमोत्कटत्वाद्य क्रियते स हि विभ्रमः ।। ८५ यथा- निधाय हारं दयितस्य निर्गता स्वपक्षसि स्त्रीयधिया निशात्यये । निगृह्य तेनाकुलमेप मे न ते मुञ्चेत्यनचे हसता नितम्बिनी ॥ ६ ॥ अथ किलकिञ्चितम्- श्रमहर्षामिलापाणां स्मितगईभपक्रुधाम् । संकरो यौवनोदभेदचाञ्चल्यात् किलकिञ्चितम् ।। ८७ ॥ यथा- द्रवस्मितसुधारमं भृकुटिवल्गुनन्धोधुरं अपाम्नमिवपदमकं विकसितोरुगलस्थलम् । मनोमवमरालसं चकितचञ्चलप्रेक्षणं वरं वरतनोर्मुखं जयति यौवनस्योद्गमे ।। ८८ ॥ १. गगग (ग)। २. मिश्रीमाः (ख)। ३. मन्दरं (प) 1 ४. लना (ख) ।

२१] रसदीपिका अथ मोट्टायितम्- सपल्यादिमयेनाथ लजया या प्रियस्य या । निभृतं दर्शने भूयः स्पृहा मोट्टायितं तु वत् ॥ ८६ ॥ यथा- पादाङ्गुलीयकमितः पतितं ममेत्थं सव्याजमाप्रतिनिवृत्य चतुष्पधेषु । स्वैरं निजप्रियतमान्तिकमेत्य मन्दं बनाम वामनयना जनताकुलेषु ॥ १० ॥ अथ कुट्टमितम्- नखक्षतादिमिर्गा स्पात्सीत्कारादिर्मुधा रते । सुखेषु दुःखजा चेष्टा तद्धि कुट्टमितं विदुः ॥ ११ ॥ यथा- कान्ते कुची स्पृशति सीत्कुरुते मुधैव नीबीगतं करमिवेच्छति रो मस्य । आनन्दसम्प्लुतमनाः सुरतेऽपि तन्वी मा माग्लमस्मि न सहेति मुघा ब्रवीति ॥ १२ ॥ श्रथ विव्योकः- मदगर्वाभिमानोत्यो विकारोऽनादरात्मकः । वियोकः स हि विजेयः प्रियाऽगारसम्भवस्तथा ॥६३ ॥ यथा- दामोऽस्मि ते नियतमे ननु देहि वाच- मित्यं प्रियोऽकुस्त४ चाटुशतं पुरस्तात् । वश्वेन्दुमिन्दुवदना तु विधाय तिर्यक् तूम्णी ततान तिलकं स्वसखीकपोले ॥ १४ ॥ १. मिप्या (स) । २. अपराधः (१) । ३. प्रियः (द) । ४. श्रात्मनेपदप्रयोगः (सं)।

0] कवि-विद्याराम-विरचिता अथ ललितम्- प्रेष्टस्यात्यनुरागायातिसौन्दर्याय चात्मनः । समग्राङ्गसमीचीनविन्यासो ललितं विदुः ॥ १५ ॥ यथा- मञ्जीरे पदयोनिधाय करयो रत्नोज्ज्वले कङ्कणे हारं वक्षसि कुण्डले श्रवणयोनॆत्राब्जयोरञ्जनम् । वीटी वक्त्रपुटे कपोलफलके काश्मीरपत्राङ्कुरं वासो वासकसजया स्ववपुर्वि प्रेये प्रियस्यान्तिके ॥६६॥ अथ विहतम्- स्वाभिलापस्य सम्पूर्ती व्याजलजाकृतं भवेत् । अन्यथा चेष्टिता यद्विहतं तदिहोच्यते ॥ १७ ॥ व्याजकृतं यथा- नीवीं प्रिये परिविमोक्तुमभिप्रवृत्ते सेयं किलान्तरुदयत्प्रमुदायताक्षी। ताम्बूलयाचनमिपेण चकार तस्मि- नाकारणं परिजनस्य विधा [य] विघ्नम् ।। ६८ ॥ लजाकृतं यथा-- वक्षोजयोगमदेन विधाय चित्रं गच्छामुनाधर सपदीत्थमुरः प्रियस्य । श्रालिङ्ग्य चित्रय किलेत्युदिते स्वसख्या स्नेहान्मृगीगनुदकरपल्लवैस्ताम् ।। ६६ ॥ ॥ इति हावाः सम्भोगशृङ्गारश्च ।। १. प्राप्तं (प)। २. (स) गच्यामुनाद्य ।

[२३ - रमदीपिका श्रथ विप्रलम्भशृङ्गारः यो भवेत् स्निग्धयोयू नोरनवाप्ती परस्परम् । अन्तर्दुःखात्मको भावो विप्रलम्भः स कथ्यते ॥ १०० ।। प्रवासोऽथ च मानात्मा तथा च करणात्मकः । पूर्वानुरागकरचेति विप्रलम्भश्चतुर्विधः ॥ १०१ ।। तत्र प्रवामः देशान्तरस्य गमने परितापो वियुक्तयोः । हृदये जायते यूनोः स प्रवासाभिधः स्मृतः ।। १०२ ।। यथा- ग्रहविद'मनुकूलं पृच्छति प्राणनाथे गमनदिनमरेऽवस्थितायाः प्रियायाः। तनुरतितनुरासीत् तत्क्षणाई कपोलो मृदितमृदुविशुष्यत्केतकीपत्रपिङ्गः ॥ १०३ ॥ अथ मानः- अपराधे परिजाते या स्याद्रु एतयार स्थितिः । नायिकायो विशेषेण स मानः परिकीर्तितः ॥ १०४॥ यथा- कान्ताः सुकान्ताः किल कोटिशस्ते प्रयोजनं पामरया मया किम् ? प्रियं प्रियाख्याग्रहणे स्खलन्त- मुक्त्वेति मुत्क्वा शयनं जगाम ॥ १०५ ॥ १. ज्योतिर्विदम् । २. दुश्तया ।

२४] कवि-विद्याराम-विरचिता अथ करुणाख्यो विप्रलम्भ:- यूनोरदर्शनेऽकस्मादेकस्याज्ञातहेतुके । प्रलापो यो भवेदुःखात् स प्रोक्तः करुणात्मकः ॥ १०६ ॥ अथवा अच्छेदे जीविताशाया यूनोरन्यतमस्य यः । प्रलापः करुणात्मासौ छेदे तु करुणो रसः ॥ १०७ ।। करुणात्मा तु रामस्य सीताया हरणेऽभवत् । रासेऽन्ती मुकुन्दस्य ब्रजवामदृशां तथा ॥ १० ॥ यथा- क्वेशंः जनकनन्दिनि दुःखे मां निधाय गतवत्यसि कान्ते ! त्वं पिधाय तनुपेर तनुमारात्क्ष्वेलिकां क्षयति मे तबुरेपा.॥ १०६ ॥ अथ पूर्वानुरागः - परणिग्रहणतः पूर्वं श्रवणादर्शनाद्भवेत् । पूर्वानुरागो योऽन्योन्यं गाढासक्तः समुद्भवः ॥ ११० ॥ नलस्य दमयन्त्याश्व मालत्या माधवस्य च३ । पूर्वानुरागः प्रागासीत् पाणिग्रहणतो मिथः ।। १११ ॥ माघवस्य यथा- सम्भूयेव सुखानि चेतसि परं भूमानमातन्वते यत्रालोकपथावतारिणि रति प्रस्तौति नेत्रोत्सवः । यद्बालेन्दुकलोचयादवचितैः सारैरिवोत्पादितं तत्पश्येयमनङ्गमङ्गलगृहं भूयोऽपि तस्या मुखम् ।। ११२ ।। १. (ख) क्वेशे। २. करोपि (स) ३, मालतीमाधवनाटके ।

[२५ रसदीपिका विनलम्मे हि सर्वे ते भवन्ति व्यभिचारिणः । इमाः पूर्वानुरागेर तु दिशावस्था विशेषतः ॥ ११३ ।। ता दिशाऽवस्था यथा- अभिलापोऽथ चिन्ता च स्मृतिश्च गुणकीर्तनम् । उद्वेगोऽथ प्रलापः स्यादुन्मादो व्याधिरेव च । जडता मरणञ्चैव दशावस्था इमाः स्मृताः ॥ ११४ ।। तत्र- अभिलापो निजेप्टाप्ती संकल्पोर यस्तु सोधमः । चिन्ता तत्संगमोपायचिन्तनं विविधं तु यत् ।। ११५ ॥ स्मृतिस्तदेकलग्नत्वं मनसोऽनन्यभावतः । तद्र पादिगुणश्लाघा खत्रोक्त गुणकीर्तनम् ॥ ११६ ।। उद्वेगो मनमः कम्पः प्रलापस्तच्छ्रिता गिरः । उन्मादस्वन्मयत्वेन वीक्षणं जगतस्तु यत् ॥ ११७ ।। व्याधिस्तत्संगमाभायात्संतापो यो भवेभृशम् । यत्तु तद्ध्यानयोगेन नैश्वल्यं जडताऽत्र सा ॥ ११८ ॥ तस्तस्पायर्न स्याच्येत्सर्वथा तत्समागमः । तदाऽसह्यस्मरावेगैः कृतः स्यान्मरणोधमः ।। ११६ ।। नात्रोदाहरणाद्युक्तिविस्तरत्रासतः कृता । श्रतो ग्रन्थान्तराज्ञयो विस्तारो यो एपेक्षितः ।। १२० ।। इति रसदीर्घिकायां शृङ्गारनिरूपणं नाम द्वितीयं मोपानमः- १. विप्रलम्भशनारे (ब)। ३. मनोग्यः १३. क. प्रती ११७ तमश्लोकस्य नोपलन्धिः ।

२६ ] विद्यारामकवि-विरचिता [तृतीयं सोपानम् ] अथ हास्यरसः ।। हास्यरसस्य स्थायिभायो हास: म घ- विकारर्या वचोवेशचेष्टादीनां कुतूहलात् । मनसो विकृतिहासः पूर्णो हास्यरसच सः ॥ १ ॥ श्वेतो हास्यस्य वर्णोऽस्ति दैवतं प्रमथास्तथा । विभावो विकृतार्थाख्या वाग्वेशाचारभूपणम् ॥ २ ॥ विकाशोऽषणोश्च नासायाः स्पन्दनं च तथोष्ठयोः । गल्लोल्लासोऽनुभावोऽस्य दशनानां च दर्शनम् ॥३॥ स्वनिष्ठः परनिष्टश्य हास्यस्तु द्विविधोऽपि तौ। प्रत्येकं च त्रिया मेदैररुत्तमाघममध्यमः ॥ ४ ॥ स्वनिष्ठश्वेत् स्वसम्भूतैर्विकारेईसति स्वयम् । परनिष्ठः परोद्भतेर्हसत्येतेश्च चेत् परम् ॥ ५ ॥ स्वनिष्ठः पवियोप्येवं परनिष्ठोऽपि पड्विधः । इति द्वादश विज्ञेया भेदा हास्यस्य सूरिभिः ॥६॥ तथा हि- स्मितं च हसितं तत्र चोत्तमानां प्रकीर्तितम् । मध्यमाना विहसितं तथोपहसितं मतम् ॥ ७॥ नीचानां चापहसितं तथाऽतिहसितं स्मृतम् । सनिष्ठं परनिष्ठश्च ज्ञेयं सर्वं यथातथम् ॥ ८॥ n-+ १. (स) बदनीष्ठयो। २. (स) त्रिभिभेदैः।

रमदीपिका ..... श्रथ स्मितादीनां लक्षणानि- गल्लस्येपद्विकाशेन चाध्यक्त्या दशनावलेः । उत्तमानां स्मितं ज्ञेयं स्वनिष्ठं च परस्थितम् ॥ ६ ॥ ईपसंलचितेर्दन्तरुत्फुल्लास्यं विकाशितैः । कपोलैलतितं चैतद्धसितं कथयो विदुः ॥ १० ॥ कालोचितपुर कम्पमाञ्चितमुखं तथा । जातास्यराग मध्यानां क्षेयं विहसितं बुधैः ॥ ११ ॥ उद्यद्भुतं माले कम्पभूपिष्ठमुत्स्वनम् । अदोपडसितं ज्ञेयमधमानां विचक्षणैः ॥ १२ ॥ उत्फुलनासिकं वक्रदृष्टिकञ्चिशिरोघरम् । मस्वनं चोपहसितं मध्यमानां विचक्षणः२ ॥ १३ ॥ पहलाश्रूत्स्फुटारा लिएपार्वजनं तथा । सहस्तवालमत्युच्चैः सन्तोऽतिहसितं विदुः ॥ १४ ॥ स्वनिष्टोत्तमहासो यथा- वासः कृत्तिरहिविभूषणमथ स्वग्मुण्डमालोज्ज्वला भूतिवाङ्गविलेपनं च पूपभो युद्धस्तथा वाहनम् । अन्न धृत फलं गृहं पिटवनं पात्रं करोटि स्त्विदं स्वंगार्हस्थ्यमवेक्ष्य शम्भुरहसद् गौरीप्रियंर भाजुकम् ।। १५ ।। १२ श्लोकः (क) प्रती नोपलभ्यते । २. (ख) प्रकीर्तितम् । ३. 'उन्मत्तः कितवो धूनों पक्ष र: कनकाहप' इत्यमरः । (स) .. शिरोस्थति फरोटि: स्त्री' त्यमरः । (म) ५. श्रीनिकरं ।

२६ ] विगारामकपि-विरचिता [तृतीयं सोपानम् ] श्रय हास्यरसः ॥ हास्यरसस्य स्थायिभायो हासः म च- विकारर्या वचोवेशचेष्टादीनां कुतूहलात् । मनसो विकृतिहासः पूर्णो हास्यरसश्च सः ॥ १ ॥ श्वेतो हास्यस्य वर्णोऽस्ति दैवतं प्रमथास्तथा । विभावो विकृतार्थाख्या वाग्वेशाचारभूषणम् ॥ २ ॥ विकाशोऽक्षणोश्च नासायाः स्पन्दनं च तथोष्ठयोः । गल्लोल्लासोऽनुभावोऽस्य दशनानां च दर्शनम् ॥ ३ ॥ स्वनिष्ठः परनिष्ठच हास्यस्तु द्विविधोऽपि तौ। प्रत्येकं च विधा मेदैररुत्तमाधममध्यमैः ॥ ४ ॥ स्वनिष्ठश्वेत स्वसम्भूतैर्विकारसति स्वयम् । परनिष्ठः परोद्भ तैर्हसत्यतैश्च चेत् परम् ॥ ५ ॥ स्वनिष्ठः पड्विधोप्येवं परनिष्ठोऽपि पड्विधः । इति द्वादश विज्ञेया भेदा हास्यस्य सूरिभिः ॥६॥ तथा हि- स्मितं च हसितं तत्र चोत्तमानां प्रकीर्तितम् । मध्यमानां विहसितं तथोपहसितं मतम् ।। ७ ॥ नीचानां चापहसितं तथाऽतिहसितं स्मृतम् । स्मनिष्ठं परनिष्ठश्च ज्ञेयं सर्व यथातथम् ॥ ८ ॥ १. (म) पदनोष्ठयोः । २. (स) त्रिभिदैः।

रमहीपिका अथ स्मितादीनां लक्षणानि- गल्लस्येपद्विकाशेन चाव्यक्त्या दशनावलेः । उत्तमानां स्मितं ज्ञेयं स्वनिष्ठं च परस्थितम् ।। ६ ।। ईपसंलचितैर्दन्नरुत्फुल्लास्य विकाशितैः । कपोलैलचितं चैतद्धसितं कवयो विदुः ॥१०॥ कालोचितमुरःकम्पमाकुञ्चितमुखं तथा । जातास्यगणं मध्यानां ज्ञेयं विहसितं घुधैः ॥ ११ ॥ उद्यदअद्भुतं मीले कम्पभूयिष्ठमुत्स्वनम् । अदोपहसितं ज्ञेयमधमानां विचक्षणैः ।। १२ ।। उत्फुवनासिक वक्रदृष्टिकुञ्चिशिरोघरम् । सस्वनं चोपहसितं मध्यमानां विचक्षणः२ ॥ १३ ॥ पहलाश्रूत्स्फुटारा लिएपार्वजनं तथा। सहस्ततालमत्युच्चः सन्तोऽतिहसितं विदुः ॥ १४ ॥ स्वनिष्टोत्तमहामो यथा- नामः कृत्तिरहिविभूमग्रामथ सम्मुण्डमालोज्ज्वला भूतिवाङ्गपिलेपनं च धूपभो पृद्धस्तथा बोहनम् । भन्नं धूर्त पल्लं गृहं पिबन पात्रं करोटिमित्वदं स्वंगार्हस्थ्यमवेक्ष्य शम्भुरहसद् गौरीप्रियं भावुकम् ॥ १५ ॥ १२ श्लोकः (क) प्रनो नोग्लम्यते । २. (ग) प्रकीर्तितम् । 'उन्मतः क्तिवो धूों धत् र कनकाइय' इत्यमरः । (सं) गिरोस्पनि फरोटिः स्त्री' त्यमरः । (म) ५. प्रीतिकरं । ३. .

२८] फविविद्याराम-विरचिता परनिष्ठो यथा- स्कन्दे कति कण्ठलीनमुरगं पर्याणबध्नीकृते स्वाखोः कारयितुच बन्धनकृते कीलं तथा भूलाम् । खट्वाङ्ग हरति त्रिशूलकमथो नाथे गणानां शिशो संस्पन्दन्मृदुगलकोप्ठपुटकः स्मेरो हरः पातु नः ॥ १६ ॥ मध्यमानां उभयविधो यथा- भुक्त्वाज्यस्य गृहे द्विजो निजगृहान् गच्छन्ननल्पाशना- नष्टज्ञानतया तन्जमतनु स्कन्धस्थितं विस्मृतः । अन्विष्यन्प्रतिसद्मसद्मनि विशन् स्मृत्वा शिशोः क्रन्दनान् मुर्दाघातरजुपो जहास जनताप्युच्चैस्तदालोकनात् ॥ १७ ॥ उभयनिष्ठः पृथक् यथा वा- मुखं क्व चास्पोमयतोऽस्ति पुच्छं वृहद्वपुर्लबविलोललिङ्गः । धुरो न वोढा विफलोऽयमित्थं कृषीवला व्युजहसुगजेन्द्रम् ॥ १८ ॥ स्वनिष्ठो यथा- मुधार विधात्रा वृपणी कृतो चेत् ताभ्यां कृता किं नु न शिश्नद्धिः । इत्याकलय्य३ स्वयमुत्थनादं जहास जाल्मः सुरते कशाङ्गः ॥ १६ ॥ अथाऽधमानां यथा- वेश्यावेश्म त्रियाडवालयधियाऽविश्याध्वर्गवैदिकः सिद्धान्नोऽभ्युपयाचिते भगमिति प्रत्युतरं प्राप्य च । तैलेनोत घृतेन पक्वमिति ताः पृष्टे पुनः प्रस्खलद्- वेणीमाल्यमुदसमुद्धतरवं हास्यं सतालं व्यधुः ॥२०॥ १. (ख) मूाधान। २. मिथ्या (स)। ४. (ख) वेश्यावश्मनि बाढवालयरिया । ३. विचार्य (ख)।

रसदीपिका इत्यादि ज्ञेयम- हास्ये ग्लानिविबोधाश्रस्वरभङ्गविवर्णता । श्रमस्वेदादयो भाषा ज्ञेयाः सञ्चारिणोऽपि ते ॥ २१ ।। इति हास्यरसः ।। अथ करुणः । करुणरसस्य स्थायिभावः शोकः । स यथा- इप्टविश्लेपजनितो रत्यनालिङ्गितो मितः । विकारश्चेतसः शोकः स पूर्णः करुषो रसः ॥ २२ ॥ अाशाविनाशे सर्वेपामिन्द्रियाणां क्लमोऽथया । दुःखस्यानुभवोऽत्यन्तं करुषः स निगद्यते ॥ २३ ।। कपोतचित्रितो वर्णो वरुणश्चास्य दैवतम् । स्वनिष्ठः परनिष्ठश्च द्विविधोऽसावपि स्मृतः ॥ २४ ॥ स्वनिष्ठः स्योद्भोदुखैः परदुःखेक्षणात् परः । विभावोऽस्वेष्टनाशय व्यसनं क्लेशबन्धनम् ॥ २५ ॥ निःश्वासो रोदनं मोहः प्रलापः परिदेवनम् । अनुभावो वपुर्यातः करुणस्याऽऽस्यशोपणम् ॥ २६ ॥ सर्वे च सात्विका भावाः स्वेदसंस्तम्भनादयः । स्वल्पं वाप्यथ भूयिष्ठं भवन्ति करणे रसे ॥ २७ ॥ ग्लानिनिर्वेदजाव्यानि दीनताऽलस्पविस्मृती । मोहव्याध्यादयोऽप्यत्र करणे व्यभिचारिणः ॥ २८ ॥ १. दुःखम् (ख)। २. विलापः (ख) कवि-विद्याराम-विरचिता स्वनिष्ठः करुणो यथा- अयि नाथ विमुच्य मामनाथां किमगम्यावनि हैकला प्रयातः । इति कामवधूलिप्य गाढं हृदयं ताडयति स्म सा कराभ्याम् ॥२६॥ परनिष्ठो यथा- हा सीते जनकात्मजे क्य नु गतेत्येवं लपन्तं मुहु- मुह्यन्तं च मुहुः स्खलन्तमभितो रोरूयमाणं बने । दृष्ट वेत्थं रघुनन्दनं जनकनाविश्लेपरदुःखाकुलं विश्व स्थावरजङ्गमं व्युदसृजद्वाप्पौषमुच्च स्तराम् ॥ ३० ॥ अथ रौद्ररसः। रौद्रस्य स्थायिभावः क्रोधः, स यथा- अवज्ञादिकृतो मोदप्रतिकूलो मितस्तु यः। मनोविकारः सक्रोधः सम्पूर्णा रौद्रसंशकः ॥ ३१ ॥ अथवा- शस्त्राघातादिभिश्चित्तज्वलितेऽसहनोद्भवम् । सर्षेन्द्रियाणां चौद्धत्यं रौद्रो रस इतीर्यते ॥ ३२ ॥ वर्णो रौद्रस्य रक्तोऽस्ति दैवतं विनतासुतः । स्थायिभावस्तथा क्रोधो निश्चयो विदुपामयम् ॥ ३३ ॥ खड्गाद्यभिभवः शत्रोदर्शनोद्भर्त्सनादिकम् । रौद्रस्यायं विभावोऽस्ति तथाऽत्यन्तमसक्रिया ॥ ३४ ॥ दन्तसङ्घट्टनं चौष्ठदशनं भुग्नता भ्र वोः । प्रकोष्ठोन्मर्दनं गावप्रकम्पः शस्त्रधारणम् ॥ ३५ ।। हतोऽसीत्यादिवचनाऽऽडम्बरश्च सहुकृतिः । अनुभावोऽस्य विज्ञेयो रौद्रस्येत्यादिविक्रिया ।। ३६ ॥ १ हा एक्लः (स)। २. रु शन्दे । अतिशयेन शन्दं कुर्वन्त (म) ३. वियोगः (ख)। ४ गरुडः (ब)।

रसदीपिका [३१ गावेगौ तथाऽमर्पमोहानया मदादयः। स्वेदकम्पातिरागाद्या रौद्र सञ्चारिणो मताः ।। ३७ ॥ यथा- मो भो शृण्वन्तु सर्वे भवतु सुरसभा किं न सर्वा सहाया शस्त्रास्त्रौधः स्वयं वाऽभिभवतु सकलः किं न संभ्य किन्तु । रवृत्त क्षत्रमेतत्समभविश्यव्याकुलो भार्गवोऽहं सद्योऽद्य वानियातोदलितवसुमतीमूल आवेशयामि ॥३॥ यथा चा- दन्तप्रोद्दष्टदन्तच्छदमतिकुटिल स्फरनेत्ररागं प्रोन्मुक्तोन्मत्तरा द्रुतगतिपयनोद्ध तम मजालम् । दोईण्डोदण्डयातः समितिर च दशनोद्घनं निम्नतोऽरीन् भीमस्यानिप्रहारैस्त्रिपुरविजयिनोऽस्येव कोप्येप कोपः ॥३६॥ अथ वीररसः। वीररसस्य स्थायिभार उत्साहः । स च शौर्यदानदयामध्ये निर्मितोऽन्यतरेण यः । मितो विकारो मनसो [सः] स उत्साह इति स्मृतः ॥ ४० ॥ शस्त्पादादि तार्थाय: सुप्रशस्तेषु कर्मसु । मानसी सचरा वृत्तिरुत्साहः परिकीर्तितः ॥ ४१ ।। उत्साहः परिपूर्णश्च वीरो रस इति स्मृतः । म.पामिन्द्रियाणां वा प्रहों वीर उच्यते ॥ ४२ ॥ युद्धदानदयाभेदैर्वीरस्तु विविधो मतः । गोरो वीरस्य वर्णोऽम्ति दैवतं विदशाधिपः ॥ ४३ ।। १. वर्धा (ख)। २.भभाया।

कवि-विद्याराम-विरचिता उत्साहो युद्धवीरे तु प्रतापान्तर्वलादिजः । दानवीरे पुननसामर्थ्यादिसमुद्भवः । श्रा भावादिसम्भूतो दयावीरेविति स्थितिः ।। ४४ ॥ उत्साहोऽध्यवसायश्चाऽविपादोऽविस्मयो बलम् । विविधार्थविशेषोऽस्य विभागो चिनयोऽथ मुट् ॥ ४५ ॥ शाय धीयं च धैर्य च प्रभावोन्लासविक्रमाः । वाक्यान्यातेपयुक्तानि विनयो दानसूनृतम् ॥ ४६ ॥ हृदः प्रवणताऽऽश्वासवचनानि विशेषतः । अनुभावोऽस्य विज्ञेयो वीराख्यस्य रसस्य हि ॥ ४७ ।। इति त्रिविधवीरसामान्यलक्षणम् ॥ विशेषस्तु- हों गर्वस्तथाऽमर्पः स्थैर्याचा व्यभिचारिणः । युद्धबारे भवन्त्यन्ये भीताश्याप्सादयोऽपि च ।। ४८॥ प्रहपथतिमत्याया दानवीरेऽभिचारिणः । प्रसन्नवीक्षणं मापा स्मितपूर्वाऽतिदाता ॥ ४६ ॥ दचा चाननुशोचो न गुणागुणविचारणा । इत्याद्या दानवीरेन्याटा अप्युद्भवन्ति हि ॥ ५० ॥ धृतिमत्यादयो भावा दयावीरेऽभिचारिणः । यपि सर्वव्ययेनापि प्रयत्नः सकलस्तथा ॥ १ ॥ विपदादिसमस्तस्य परित्राणस्वभारता। त्यर्यमारवासनोक्त्यादिर्दयावीरे भवन्त्युत् ।। ५२ ।। (२) '' ति सातपाटः । “गुत भौतिः प्रमदीपः प्रमोदानगटसम्मदा' इत्यमरः । (1) (२) ननता (स)

Prit
इसदीपिका
त्रयाणामपि क्रमेणोदाहरणानि ।। युद्धवीरो यथा-
शस्त्रास्त्रेषु पतत्सु विष्वगरिपु प्रत्यनु भञ्जत्सु च
स्वीयेषु प्रथमानधैर्यविभवः प्रत्यङ् प्रयुध्यनय ।
स्फूजस्तूरकृपाणिकाभिरभितः प्रत्यर्थिनः पातयन्
धीर: कोपि रणाङ्गणेऽञ्चतितरां संबद्ध मानोत्सवः ।।५।।
दानवीरो यथा-
विनयादभिगम्य सप्रणामं पुलकोभेदपरिप्लुताङ्गयष्टिः ।
गृहमागतमर्चति प्रकामं धनदारात्मभिरथिनं महात्मा ।। ५४ ॥
दयावीरो यथा-
उपप्लुतं गोकुलमम्बुवाईप्ट्वा भावाकुलितोऽतिदीनम् ।
सप्ताहमाहारमपोह्य धीरो गिरिं दधारककरेण कृष्णः ॥ ५५ IT'
.
इति वीरः।।
अथ भयानकः । भयानकस्य स्थायिभावो भयम् । तद्यथा-
विकृतारावविकृतसत्लादिभ्योऽपराधतः ।
या मिता नित्तविकृतिस्तभयं परिकीर्तितम् ।।
घोरालोकादिजनिवाऽनिष्टशङ्काथवा भयम् ॥ ५६ ।।
भयस्य पग्पिोपस्तुर भयानक इति स्मृतः ।
सर्वेन्द्रियाणां विनोमो भयानकरसोऽथवा ।। ५७ ।।
श्यामो भयानकस्यास्ति वर्णो चै देवतं यमः।
स्थायिभावो भयं चासौ स्वनिष्टश्च परस्थितः ।।
स्वापराधास्वनिष्ठस्तु घोराऽलोकादिजोऽपरः ।। ५८ ।
:
.
१-गच्छति (1)। २-(4) परितोषस्तु ।

३४] कवि-विद्याराम-निरपिता घोरसच्चावलोकश्च विकृतारावसंश्रुतिः । सङग्रामारण्यगमनं प्रवेशः शून्यवेश्मनि ॥ ५६ ॥ गुरुस्वेशापरायश्च बन्धुपन्यादभिश्रुतिः । श्मशानस्पर्शनाद्य च विभावोऽस्य प्रकीर्तितः ।। ६० ॥ सर्वाङ्गानां प्रकम्पोऽथ शुष्कताबोष्ठकण्ठता । रोमाञ्चस्वरभेदास्पषैवपर्यस्तब्धतादयः । भयानकस्यानुभावः कविभिः परिदर्शितः ॥ ६१ ॥ संत्रासमरणावेगमोहचापलदीनताः । अत्रापस्मारशङ्काया भवन्ति व्यभिचारिणः ॥ २ ॥ पलायनं स्वसंगोपः परावृत्यावलोकनम् । उत्क्रोशः शरणान्वेपाननशोपादयोऽपरे ।। ६३ ॥ स्वापराधकृतः स्वनिष्ठो यथा- दनाममदृपदा विभिन्न दृष्ट वा निजां मातरमात्तयष्टिम् । म्नानाननः कम्पितगात्रयष्टिस्त्रस्यन्मुकुन्दोऽपससार गेहाद ॥६४॥ विकृतसत्त्वदर्शनात् परनिष्ठो यथा- गच्छन्तमुच्च स्तरमत्तनागं दासेरका सन्निहितं निरीक्ष्य । कृतात नादं निसृतोऽप्रजिह पलायनं सोत्प्लुतमाचचारः ॥६५॥ १. (ख) परिकीर्तितः । २. "माण्ड पात्रामत्रं च भाजन" मित्यमरः । (सं) ३. मयो महाङ्गो वासन्तो दिककुदुर्गलद्धनः भूतघ्न उष्ट्रो दासेरो रवणः कण्टकाशनः ।। १२५४ (अभिधानचिंतामणौ तिर्यकार:.) ४. (ख) सोत्प्लुनयाचार।

- रमदीर्घिन [३५ विकृतनादाम परनिष्ठो यथा- गोप्ठे निशायां निकटे निनादं श्रुचोत्थितं पञ्चमुखस्य गावः । श्रा स्वनोर्ध्वश्रुतिकम्पमाना विवभ्रमुः श्वाससमाचलास्पाः ॥६६॥ इति भयानकः ॥ मथ वीभत्मः वीभत्सस्य स्थायिमावो जुगुप्सा । सा च - अद्यार्थीपसंस्पर्शदर्शनस्मरणोद्भवा । मिता विकृतिर्मनसः सा जुगुप्सा स्मृता दुधैः ।। ६७ ।। परिपूर्णा जुगुप्सा च वीभत्साख्यो रसो भवेत् । सकलेन्द्रियसंकोचो बीभत्सो या प्रकीर्तितः ॥ ६ ॥ नीलवर्णश्वर बीभत्सो महाकालोऽस्प दैवतम् । जुगुप्सा स्थायिभावश्च स्वनिष्ठः परनिष्ठकः ॥ ६ ॥ स्वावधरदर्शनस्मृत्याधु भवः स्वप्रतिष्ठितः। परावाद्यवेक्षायः परनिष्ठः प्रकीर्तितः ॥ ७० ॥ श्रमेध्यानामहृद्यानां वथानमिमतात्मनाम् । वस्तूनां स्मृतिसंथावौ गन्धस्पर्शादिपणम् । पीभत्सस्य विभावोऽन्ये तथा चोगकारिणः ॥ ७१।। मुखनासापिधानं चाऽनननेत्रविघूर्णनम् । अव्यक्तपादपतनं गतिः शीघ्राङ्गकूणनम् । अनुभावोऽस्य विनेयः कुन्सा निष्ठीवनं तया ।। ७२ ।। १. "सिंदो मृगेन्द्रः पञ्चायो हर्यक्ष: केमरी हरि" रित्यमरः ॥ () २. (ब) नीलवर्ण ३. "कुसूयकुन्मितावदरोटगद्माणकाः ममा" इत्यमरः (सं) ८. मोचन।

বিয়াণদিবা टन्मादमाहारस्मारजानिचापलदीनताः । गविगविपादाया बीमन्से व्यमिचारिणः । नामापासानं बहरामात्रायाथ विशियाः ।। ७३ ॥ म्यापप्रदर्शनम्नः म्यनिष्टी यथा- छन्वायमप्यन्यतरं प्रमादाहिन्यमानाः मुतरां महान्तः । जानानुनापं हदि बिग्धिगित्यं स्वस्य स्वयं गर्हगमाचरन्ति ॥ ७४ ॥ अहाश्रवणदानादितः परनिष्टो यथा- क्रुध्यनःसनोविकृतकिलकिलाशब्दसंवामितेम मदोस्क हिमांसमझान्त्रनिचयनिचितक्षोणिपूद्धानमानः । . रक्तदुःशासनस्य प्रहितगुस्वादामिन्नवक्षस्थलस्य प्रोस्तितत्वशिरोम्यो रुघिरपरिचितःप्रापिभीमसेनः ॥७॥ यथा था- सयः प्रोत्कृत्तकाठप्रविगलदसुगालिप्तवस्ताऽविकायः पर्यस्तैश्वास्थिकान्तत्वगुरुखिलचयैः सर्वतो व्याप्तरूपे । विक्रप्याच्यपुञ्ज रधिकमुपचिते काटिकावासमार्गे नासां विप्राः पिघाय त्वरितमथ मुखं प्ठीवमानाःप्रयान्ति॥७६॥ इति बीभत्सः- अथागुतः । अनुतस्य स्थायिभायो विस्मयः ।। स च- चमत्कृतपदार्थानां स्मृतीक्षास्पर्शसंश्रयैः । विकारोऽपरिपूर्णो यो मनसो विस्मयस्तु सः ॥ ७७ ॥ विस्मयः परिपूर्णोऽसाबद्भुताख्यो रसो मवेत् । पणऽद्भुतस्य पीतोऽस्ति देवतश्च पितामहः ॥ ७ ॥ १. कये प्रसारितं जय्यमित्यमरः । () २. सिमः पौषिय मामिक समं प्रयमिरपार (स) ३. (ख) सभ्रमः।

। [ ३० रसदीपिका सनिष्ठः परनिष्ठश्चाप्यद्भुतो द्विविधो मतः । स्वावदानः स्वनिष्ठश्च परनिष्ठः परस्य तैः ॥ ७६ ॥ . लोकोत्तराणि कर्माणि शिल्पं रूपं तथाविधम् । लोकोचरार्थयुक् वाक्य सन्दर्भोऽथ धनागमः ! अद्भुतस्य विभागोऽयमिन्द्रजालादिकं तथा ॥ २० ॥ निनिमेपेक्षणं स्पर्शग्रहणीलासहुङ कृतिः । साधुवादश्च रोमाञ्चः स्वरभेदोऽथ वेपथुः । अनुभावोऽद्भुतस्यायं गद्गदाभाषणादि च ॥ १ ॥ स्वेदाथपुलकावेगहया व्यभिचारिणः । चेष्टा च नेत्रविस्कारशिरःकम्पादिकाद्भुते ।। ८२ ।। स्वनिष्ठोऽद् तो यथा- चीरः सदाचाररतः कुलीनो गुणाश्रयो भाग्यत एप लब्धः । इत्थं भवन्तं प्रतिपय कीर्तिहत् प्रफुल्ला प्रससार लोके ।। ८३ ॥ परनिष्ठो यथा- स्निग्धानरस्फुटपिपल्लवनोज्वलार्था- 'ऽलङ्काररीतिरसत्तिविशोभमानाः । वाचा: (चां) सुगुम्फनकलाः किल सत्कवीनां कुर्वन्ति कस्य न विचित्रतराः स्म चित्रम् ॥ ८४ ।। यथाया- स्वच्छाः ममृद्धान्तरनज्यसभा गम्भीरतामप्यविमुञ्चमानाः । स्वसम्पदा जीविजीरलोकाः सन्तः समुद्रा व दुर्विभाव्याः ॥ ५ ॥ १--(ज)माया ३०] कधि विद्याराम-विरचिता अत्युक्तिथ भ्रमोक्तिथ विरोधाभासकस्तथा । चित्रोक्त्याद्याश्च विख्या अद्भुता एव सर्वशः ॥८६॥ इति अद्भुतरमः। अथ शान्तरसः॥ शान्तरसस्य स्थायिभावो निवेदः । स च आत्मज्ञानेन विषयेष्वौदासीन्यं तु यद् भवेत् । निर्वेदः स तु सम्पूर्णो भवेच्छान्ताभिधो रसः ।। ८७ ॥ कामक्रोधादिदोपाणां शमः शान्तोऽथवा रसः । वर्णः कपायः शान्तस्य परं ब्रह्माथ दैवतम् ॥ ८ ॥ दोपालोको विरक्तिश्च विषयोद्भवकर्मणि । सत्सङ्गः शास्त्रसद् (ज) ज्ञान विभावोऽत्र निरूपितः ।। || अनुभावो गृहत्यागः पुण्यकान्तस्थलाश्रयः । आत्मसञ्चिन्तनं देहायनपेक्षणमक्रिया ॥ १० ॥ स्वेदहोश्रुपुलकस्तम्भा गद्गदवार तथा । आनन्दाविर्भवो मोह इत्याद्या व्यभिचारिणः ॥११॥ शान्नो यथा- संसारस्य विचिन्त्य दुःखजलनि:सारतामात्मनो देहापत्यकलनकोशनिचयान् ज्ञात्वैव तान् गत्वरान् । त्यक्त्वा गेहमपोधर सङ्गमभितो पृन्दावनेऽधस्तरोः प्रेम्णा श्रीपुरुषोत्तमस्य चरणी घ्यायन्ति धन्या रहः ॥ २॥ स्त्रीसङ्गो निरयो विषं धनरयस्तद्गारखं वं बन्धो बन्धुजनस्तथा च विषयाविष्टान्धयोन्या गृहाः । इन्येवं निजमानमें कलयतः म समं पश्यतः श्रीकृष्णं म्मरतोऽनिशं मधुवने निर्यान्तु मे वामराः ।। ६३ ।। यथाया- इति शान्तरमः॥ १-(म) मोरमोद 'पाहावानु निपानं स्यादुपापड लागये । पुरसयान्धुः प्रदिप उत्पानं पुमि कायमः। (म) :

रसदीर्घिका [१ . यथा निवृत्ती शान्तरसस्तथा प्रवृत्ती माया रस इति प्रतिभाते तथा हि माया रसस्य स्थायिभावो मिथ्याजानं । त- प्रगाढरागः संसारे मिथ्याज्ञानं प्रकीर्तितम् । मिथ्याज्ञानं तु सम्पूर्ण मायारस इति स्मृतः ॥ ६४ ।। अनादिवासना माया वाऽविद्या कामकर्ममा । वर्णो नीलो सवर्णोऽस्य दैवतं निऋतिस्तथा ॥ १५ ॥ मांगारिकानां भोगानामुपार्जनसमुद्यमः । विषयाभिनिवेशश्च गृहे रागो हस्तथा ॥६६॥ यो मायारसस्यायं विभावोप्यतिमूढतार । अनुभावन्तु निर्वन्धो लौकिकवेव कर्मसु ॥ १७॥ लोभोऽनृतं कलिहि मा हेपः स्तन्यं रुपस्तथा । स्त्रीपुत्रद्रविणायपु प्रगाढाभिनिवेशनम् ॥ ८॥ हपः स्तम्मो मदोनया मोहो ग्लानिर्भमस्तथा । भालस्याया मयन्त्यत्र कतिचिद्व्यभिचारिणः ॥ BE || मायारमो यथा- कान्ताः कान्तागन्ताः शशिफारधरसा राप्रयस्ता: समीरा: धीग रम्या क्लम्यो मधु च मुमधुरं सम्मताः सम्पदोऽन्याः । एतत्सर्व धरिव्यां त्रिदशपतिपदं जीवनस्यैकलामः पश्चात् मन्ते सुरपतिपरिषद्गारवं रोरयं वा ।। १०० ॥ १-(च) नैतिस्तथा । २-(ब) विमावोऽपातिमदता ।

२८] कवि विद्याराम-विरचिता अत्युक्तिव भ्रमोक्तिश्च विरोधाभासकस्तथा । चित्रोक्त्याद्याश्च विज्ञेया अद्भुता एव सर्वशः ।। ८६ ॥ इति अद्भुतरमः। अथ शान्तरसः ।। शान्तरमस्य स्थायिभावो निर्वेदः । स च श्रात्मज्ञानेन विषयेष्वौदासीन्यं तु यद् भवेत् । निर्वेदः स तु सम्पूर्णो भवेच्छान्ताभिधो रसः ।। ८७॥ कामक्रोधादिदोषाणां शमः शान्तोऽथवा रमः । वर्णः कषायः शान्तस्य परं प्रमाथ दैवतम् ॥ ८॥ दोपालोको विरक्तिश्च विपयोद्भवकर्मणि । सत्सङ्गः शास्त्रसद् (ज) ज्ञानं विभावोऽत्र निरूपितः ॥ ८६ || अनुभावो गृहत्यागः पुण्येकान्तस्थलाश्रयः । आत्मसञ्चिन्तनं देहाधनपेक्षणमक्रिया ॥६॥ स्वेदहश्रुपुलकस्तम्भा गद्गदवाक् तथा । श्रानन्दाविर्भवो मोह इत्याद्या व्यभिचारिणः ॥११॥ शान्तो यथा- संसारस्य विचिन्त्य दुःखजलधेनिःसारतामात्मनो देहापत्यकलत्रकोशनिचयान् ज्ञात्वैव तान् गत्वरान् । त्यक्त्वा गेहमपोह्य सङ्गमभितो वृन्दावनेऽधस्तरोः प्रेम्णा श्रीपुरुषोत्तमस्य चरणो ध्यायन्ति धन्या रहः ॥ ६२॥ स्त्रीसङ्गो निरयो विषं धनरयस्तद्गारवं रावं बन्धो बन्धुजनस्तथा च विपयाविष्टान्धयोरन्धा गृहाः। इत्येवं निजमानसे कलयतः सर्व समं पश्यतः श्रीकृष्णं स्मरतोऽनिशं मधुग्ने निर्यान्तु मे वासराः ।। ६३ ॥ इति शान्तरमः॥ १--(स) मोदमपोय । 'श्राहावस्तु निपानं म्यादुपपजलाशये। पुस्यैवान्धुः प्रदिप उदपानं तु पुमि वा।' इत्यमम । (म) यथाया- क [३६ रसदीर्घिका यया निवृत्ती शान्तरसस्तथा प्रवृत्ती माया रस इति प्रतिभाते तथा दि माया रसस्य स्थायिभायो मिथ्यानानं । तत्र- प्रगाढरागः संसारे मिथ्याज्ञानं प्रकीर्तितम् । मिथ्याज्ञानं तु सम्पूर्ण मायारस इति स्मृतः ।। ६४ ।। अनादिवासना माया वाऽविद्या कामकर्मजा । वों नीलो सवर्णोऽस्य दैवतं निऋतिस्तथा ॥ १५ ॥ मांसारिशना भोगानामुपार्जनसमुद्यमः । विषयाभिनिवेशव गृहे रागो युद्धस्तथा ॥ ६६ ॥ ज्ञेयो मायारसस्यायं विभावोप्यतिमूढता । अनुभावस्तु निर्बन्धो लौकिकेवैव कर्मसु ॥ १७ ॥ लोमोऽनृतं कलिहिंसा ढेपः स्तन्यं रुपस्तथा। स्त्रीपुत्रद्रविणायपु प्रगाढाभिनिवेशनम् ॥८॥ हर्पः स्तम्मो मदोमया मोहो ग्लानिर्भमस्तथा । श्रालस्याद्या भपन्स्यत्र कतिचिद्व्यभिचारिणः ॥ ६ ॥ मायारमो यथा- कान्ताः कान्ताहगन्ताः शशिकरधवला राप्रपस्ताः समीरा: धीग रम्या बलभ्यो मधु च सुमधुरं सम्मनाः सम्पदोऽन्याः । एतत्स धरियां त्रिदशपतिपदं जीवनस्यैकलामः पश्चात् रमन्ते सुरपतिपरिपद्गारखं रोरयं वा ।। १०० ॥ १-(4) नैतिस्तथा। २-(स) विमावोऽपातिमदता ।

पर-विचाराम-विरचिता नातालपीबदनमुचतुरङ्गमवाहनम् । ननिर्मितः किमपरं सुरलोकमुखं गतः ॥१०१॥ 6 मरने नति मायारमाभारम्नथा प्रवृत्ती मायारसे सति यमन करन्यनर एय रसः धितो नयरमा इत्युपम ।। मल्लल नादेऽनी रसाः सर्वेऽद्भुताभिधाः । ताप या इत्या कविनिर्णयः ॥ १०२ ॥ इति रमडोपिंग नवरमनिरूपणं नाम तृतीय सोपानम। [मतुर्थ मोपानम् ] रसदीपिका ६४६ ननु रतिर्देवादिविषया मात्र इत्यभिधीयत इति प्राचीनलक्षणाद्विरुद्ध ईश्वरे एवं दृढःप्रेमा भाव इति भारलक्षणं कथमुच्यते इति चेत् श्रूयतां रतिर्देवादिविपया भार इत्यत्र देवादिसाधारणपदप्रयोगात् स भावोऽपि साधारणः से भक्तः स्थायिभात्रो न भवति तत्र विषयाभ्यासनिवृत्तरभारात् । अतो विपयाध्यासनिवृत्तिपूर्वकं निजेश्वरे दृढप्रेमाख्योऽसावारणो भाव एव भक्तः स्थायिभावो न सावारणोऽत एवमुच्यते यत्-- विषयाध्यासमुन्मुच्य दृढप्रेमा य ईश्वरे । स भाव इति विज्ञेयः पूर्णो मक्तिरसस्तु सः ॥ ति तदेकतानतात्यर्थ स प्रेमा परिकीर्तितः। भक्तिर्या सेन्द्रियस्यैकवानता मनसः प्रभो ॥ ३ ॥ वर्णो भक्त घनश्पामो देववं पुरुषोत्तमः । भाषाख्यः स्था.यभावोऽस्ति देवो जीवोऽवलम्बनम् ॥ ४॥ पूर्वपुण्योचपः साधोः सङ्गतिस्तीर्थसेवनम् । सच्छास्त्राभ्यसनं चास्य विभावः परिकीर्तितः ॥ ५ ॥ भनुभावस्तु विश्वासो दृढः२ स्वोपास्पदैवते । तत्कर्मकरणे श्रद्धा तत्कथायां महारुचिः ॥ ६ ॥ अनन्यचित्तताभीक्ष्णं तदीक्षणनमस्क्रिया । प्रेम्णा संशोलनं भोगस्तनिवेदितवस्तुनः३ ॥ ७ ॥ प्रतिपर्वोत्सवस्तस्य क्षेत्रपात्रानुकालतः । सदर्थ मन्दिरारामनिपानादि विनिर्मितिः ॥ ८ ॥ नर्तनं वादनं गानं मुक्त्वा लजां तदग्रतः । ज्ञेया भक्तिरसस्यतेऽनुमावाः स्मरणादयः ॥ ६ ॥ १. (म) प्रती पद्येऽस्मिन् पंक्ति विपर्ययः । २. (ब)ट । ३-(ब) निवेशितवस्तुनः । ४. 'पाहावस्तु निपानं स्यादुपपजलाराये' इत्यमरः । (5)

४.]
ऋषि-विद्याराम-रिरचिता
यथा चा-
विधुमुखीमुखसम्भृतबारुणीस्वदनमुचतुरङ्गमवाहनम् ।
विविधभोगविधिविधिनिर्मितः किमपरं सुरलोकसुखं ह्यतः ॥ १०१।।
इति मायारसः॥
यथा निवृत्तौ शान्तरसे सति मायारसाभावस्तथा प्रवृत्ती मायारसे सति
शान्तरसाभाव एवमन्योन्याभावेन द्वयोरन्यतर एव रसः श्रितो नवरमा इत्युक्तम् ।।
अानन्दरूपा नायऽमी रसाः सर्वेऽद्भुताभिधाः ।
परनिष्ठाः परं ज्ञेया इत्येवं कविनिर्णयः ॥ १०२ ॥
इति रसदीर्घिकायां भवरसनिरूपणं नाम तृतीय सोपानम !
[पतुर्थ सोपानम्
श्रथ भक्तिरस:-
सर्वोपासनमार्गीयसम्प्रदायानुरोधतः ।
भक्त्यायो रसश्वाथ दशमः परिकीर्तितः ।। १ ।।
.
ननु भक्तिः शान्तरसेऽन्तर्भवति न ततो भिन्ने ति चेत् सत्यम। परन्तु निर्वेदस्थायिनि
पान्तरसे सर्वतो निर्वेद एव, भाती वहिकामुष्मिकमुखास्वादनोत्तरायां न तथा निर्वेदोऽतो
भतिभिन्न योच्यते । तथा हि-भक्तिरमस्य स्थायिभानो मायः, स च-
विषयाध्यासमुन्मुच्य दृढ मा य ईश्वरे ।
स भाव इति विनयः पूर्यो भक्तिरमातु मः ॥२॥

.. रसदीपिका [४६ ननु रनिर्देवादिविषया भाव इत्यभिधीयत इति प्राचीनलक्षणाविरुद्ध ईश्वरे एव दृढःप्रेमा भाव इति भावलक्षणं कथमुच्यते इति चेत् श्रूयता-रतिर्देवादिविपया भाव इत्यत्र देवादिसाधारणपदप्रयोगात् स भावोऽपि साधारण: से भक्तः स्थायिभावो न भवति तत्र विपयाध्यासनिवृत्त रभारात् । अतो विपयाध्यासनिवृत्तिपूर्वकं निजेश्वर दृढप्रेमाख्योऽसाधारणो भाव एव भक्तः स्थायिभावो न साधारणोऽत एवमुच्यते यत्- विषयाध्यासमुन्मुच्य दृढतमा य ईश्वरे । स भाव इति विज्ञेयः पूर्णा भक्तिरसस्तु सः ॥ इति तदेकतानतात्यर्थं स प्रेमा परिकीर्तितः। भक्तिर्या सेन्द्रियस्यैकतानता मनसः प्रभो ।। ३ ॥ वर्णो भक्तर्घनश्यामो दैवतं पुरुषोत्तमः । भावाख्यः स्था.यभावोऽस्ति देवो जीवोऽवलम्बनम् ॥ ४ ॥ पूर्वपुण्योचयः साधोः सङ्गतिस्तीर्थसेवनम् । सच्छास्त्राभ्यसनं चास्य विभावः परिकीर्तितः ।। ५ ।। अनुभावस्तु विश्वासो दृढः२ स्वोपास्यदैवते तत्कर्मकरणे श्रद्धा तत्कथायां महारुचिः ॥ ६ ॥ अनन्यचित्तताभीक्ष्णं तदीक्षणनमस्क्रिया । प्रेम्णा संशीलनं भोगस्तनिवेदितस्तुनः३ ॥ ७ ॥ प्रतिपर्वोत्सवस्तस्य क्षेत्रयात्रानुकालतः । सदर्थ मन्दिरारामनिपानादि विनिर्मितिः ॥ ८॥ नर्तनं वादनं गानं मुक्त्वा लजां तदग्रतः। जेया भक्तिरसस्यैतेऽनुमात्राः स्मरणादयः ॥ ६ ॥ १. (ख) प्रती पोऽस्मिन् पंहित विपर्ययः । २. (ख) हरः । ३-(ख) निवेशितपस्सनः । ४. 'श्राहायस्तु निपानं स्यादुकृपजलाशये' इत्यमरः । (स) - ४२] कवि-विद्याराम-विरचिता हवेगौर तथा स्वेदः पुलकः प्रेमसंप्लवः । स्तम्भाश्रुमतिमोहाद्या भक्तौ तु व्यभिचारिणः ॥ १० ॥ मामान्यतो भक्तिरसो यथा- हत्किर्षवंशादुदश्चदलघुस्वेदप्लयाद्रीभय- द्रोमाञ्चोचयचिह्निताङ्गविषया बाप्पायमाणेक्षणाः । वाचा गद्गदभापिणः कतिचन प्रोद्ध तकम्पाकुला दृष्ट वा श्रीगिरिराजधारिणमिति प्रेम्णा भवन्त्युत्तमाः ॥११॥ भेदा भक्तिरसस्योक्ता नवादि कविसत्तमैः । श्रलौकिकरसाभिः श्रवणस्मरणादयः ॥ १२ ॥ तदुक्त श्रीभागवते- "श्रवणं कीर्तनं चैव स्मरणं पादसेवनम् । अर्चनं चन्दनं दास्यं सख्यमात्मनिवेदनम्" ।। १३ ॥ इति। तत्र श्रवणं नाम- 'रागात् स्वेष्टगुणोघानां श्रुतिस्तु श्रवणं मतम् ।' यथा- श्रुत्वा मुकुन्दगुणगानमतर्किताप्त- पीयूपपानमिव हृष्टतरा विधाय। सन्तो विकुञ्चितशिरोनिमीलिवाक्ष- मुद्यद्धनाश्रुपुलकं स्तिमिता भवन्ति ॥ १४ ॥ श्रथ कीर्तनम्- स्वेष्टस्यानन्यभावेन कीर्तनं गुणकीर्तनम् ॥ १५ ॥ १. (ख) हों वेगस्तथा।

-रसदीपिका
- ४३
यथा-
इस्तेक्षणायपवचेष्टितमचितार्थ
स्निग्धस्वराभिनवमञ्चितवर्णबन्धम् ।
श्राविर्भवत्प्रणयवैगपिकम्पिताङ्ग
हृष्यचची हरिगुणान् कृतिनो गृणन्ति ।। १६ ।।
अथ स्मरणम्-
तत्पादपद्मयोानं स्मरणं परिकीतितम् ।
यथा-
परिकलितदृढासना विविक्त प्रणयपरिप्लुतमानसाः स्थिराङ्गाः ।
हृदि हरिचरणारविन्दयुग्मं सरसिहासनवत् स्मरन्तिधन्याः ॥१७॥
अथ पादसेवनम-
परिचर्या समग्रा या तदुक्तं पादसेवनम् ॥ १८ ॥
यथा-
नित्यं प्रभातसमये छ [श] यनावसानं
संत्यक्तविश्रमणमप्यधिकादरेण ।
सांद्रप्रमोदपरिविस्मृतलोकतन्त्रा
यत्नात् परं परिचरन्ति हरिं पवित्राः ॥ १६॥
अथाऽर्चनम्-
अर्चनं निगमोक्तन मार्गेणेशस्य पूजनम् ।।
C
यथा-
सूक्तेन तेन महता फिल पारुपेण
पभिस्तथा दशयुतैरुपचारमेदैः ।
अदाभरोचरमुपार्जितपुण्यपुजा-
स्त्वर्चन्त्यनन्यमनसो हरिमादरेण ॥ २०॥

४४] कवि-विद्याराम-विरचिता अथ पन्दनम्- अष्टभिर्दण्डवत्स्वाङ्गः प्रणामो वन्दनं स्मृतम् ॥ २१ ॥ .. यथा-- पश्यन्तो हरिमीक्षणेन विधिना सम्पूज्य संस्तुत्य तं जन्पन्तो नम इत्यथ स्वमनसा मन्त्र जपन्तोऽमलम् । पाणिभ्यां शिरसा च भूमिमुरसा पद्भ्यां स्पृशन्तस्तथा जानुभ्यामभिवन्दनं प्रणयतः कुर्वन्ति धन्या हरेः ॥ २२ ॥ अथ दास्यम्- इष्टोपभुक्तवस्तूनां सर्वेषां नियमात् सदा । दासबचोपभोगो यस्तद्दास्यं परिकीर्तितम् ॥ २३ ॥ यथा- अन्नानि वस्त्राणि च माल्यगन्ध- पानीयपर्णादिकमत्र ययत् । सर्व हि दामोदर भुक्तमुक्त भुञ्जन्ति भव्या हरिदासपर्याः ।। २४ ।। भय सख्यम्- सम्पाद्य वस्तुसाराणि यत्नात् प्रेम्णा निजेशितुः । सासवधात्प्रियाधान सरसरूपंपारिकार्तितम् ।। २५ ॥ स्वस्यायवा सर्वजनस्य पद्यत् प्रियं तथा दुर्लभमत्र वस्तु । तेन प्रयत्नादुपपादिवेन धिन्वन्तिधन्याः सखियन्मुरारिम् ।। २६ ॥

रसदीपिका
[४५
अथाऽऽत्मनिवेदनमू-
समात्मादिकं सर्व प्रभये गुर्वनुज्ञया ।
सेवेत चिन्तया हीनस्सदात्माभिनिवेदनम् ।। २७ ।।
व्यथा-
देहेन्द्रियादिधनपुत्रकलत्रका
मन समर्प्य हरये हरिमृग्रपुण्याः ।
सत्पोपणप्रभृतिकर्मणि मुक्तचिन्ता
मूल्याप्तगोवदनिशं परिशीलयन्ति
इति भक्तिरसः ॥
अथ रसानां तद्भावानां च व्यवस्था निरूप्यने-
रमत्वं तु तदेवपां यदाचिन्येन वर्णनम् ।
अनौचित्यप्रवृत्ताश्चेद्रमा (भासा ?) भवन्त्यमी ॥ २६ ॥
न च शृङ्गाराङ्गत्वेनैव हास्यादीनां रसत्त्वं नान्यथेति वाच्यम् । यतो युद्वरमातिनिमग्न-
मनसो महावीरस्य तदा शृङ्गारलेशोऽपि न दृश्यते नापि स न रस इत्यपि वक्तुं न शक्यने ।
लोके कीडगस्यात्र रम उत्पन्नोऽस्ति पश्यतेत्युक्त धूयमाणत्वात् । लोकश्च रसवं बिना रमु-
शब्दोच्चारं न कुर्यात् । रूदिरपि न निर्मूला भवति । ननु तत्रापि सुरललनाममोन्यून
शृङ्गारोस्तीति चेन्न तदौत्सुक्यस्य मरणानन्तरं भावित्त्वात् । तदात्त्वे (तत्काले) तु श-
भवभयामानलबालायलोवलीढनातिमूढमनम, केवल तत्प्रतिकत्त' युद्धरम पर
वेशो नेतरत्र । तस्मात शृङ्गाराङ्गत्वनैतेषां मम्यगतिस्यादुत्वं भवनीति मुग्वेन धारमा
स्लेपां तदङ्गत्वेनय रसत्वं नान्ययेत्यनिनिवन्धनीयमिति दिक् !
याचित्यमतोऽमीषां क्रियते वर्णनं यदा ।
तदेव रमता सम्यग्रसभङ्गोऽन्यथा भवेत् ॥ ३० ॥

४]
कवि विद्याराम-विरचिता
घिरोधिनोऽथ मित्राणि केचित्केचिद्रसा मिथः ।
तेषां यथातथं कार्य मन्दर्भपु निरूपणम् ॥ ३१ ॥
तत्र मित्राणि यथा---
शृङ्गारहास्ययोमैत्री रौद्रस्य करुणस्य च ।
चीराद्भुतौ मिनो मित्रे वीभत्साख्यभयानको ॥ ३२ ।।
अलङ्कारशेखरे तु-
"शृङ्गारहास्यौ करुणवीभत्सौ वीररौद्रको ।
मयानकाद्भुतौ मित्रे मिथः शान्तो न कस्यचित्" इति ॥ ३३॥
अप्येषां जन्यजनकभाको मैत्र्यैऽस्ति कारणम् ।
पूर्यः पूर्वोघ जनको जन्य उत्तर उत्तरः ॥ ३४ ।।
यथोक्त भरतेन-
"शृङ्गारात्तु भवेद्धास्यो रोद्राच कल्यो रसः ।
धीरात्स्यादद्भुतोत्पत्तिर्वीभत्साच भयान" इति ।
रसानां मिथो विरोधे भरतः
"शृङ्गारवीभत्सरसौ तथा वीरभयानको।
सेंद्राद्धती तथा हास्यकरुणा वैरिणी मिथः" ॥ १ ॥
धनाचित्ये भवन्त्येते मित्राण्यपि हि शत्रवः।
शवोऽपि च मित्राणि यदौचित्यं प्रवर्तितम् ॥ ३५॥
युगपच्चैकाविपये न ज्याद्वौरिणो रसान् ।
न वैरिस्थायिभावं न विभावं नानुमायकम् ॥ ३६ ॥

. रसदीपिका ४० वैरिसञ्चारिभा वा न वदेव कदाचन । अतोन्यथा प्रवृत्तिश्चेद्रसहानिस्तदा ध्रुवम् ।। ३७ ॥ अनौचिस्ये प्रवर्तनायां अवैरे वैरं, रसहानिर्यथा- रप्ट्यैकान्तगृहे बरो नववधू' च्यामारोप्य च संश्लिष्याननमाविचुम्ब्य पुलावेदादिभावाकुलः । श्रागच्छन्तमदरतो गुरुजन रष्ट्याथ मुक्त्वाच वा तूप्णीमास समातसर्वमदनव्यापारवद्विक्रियः ।। ३८॥ अत्र गुरुजनान्निमर्यादत्वापादनशङ्कयात्युकसापनपभयोत्सत्ती शृङ्गार- भङ्गः ।, अतः शृङ्गारभयानकयोरवरे पैरं, शृङ्गारे भयानकविभाववर्णन मत्रानीचित्यम् । औचित्ये तु न विरोधो नापि रसदानिः । यथा- दयितेन रसावेशाद्दष्टे गाढं प्रियाघरे । सुतं च प्रसृतं तत्र रक्तं लाक्षारसायितम् ॥ ३६॥ अत्राचिस्यात् शृङ्गारबीमत्सयोर्न विरोधो नापि रसभङ्गः।। भिन्न तु सति देशे न विरोधो वैरिणोरपि । पटस्य भूतले यद्वद्भावाभावकयोस्तथा ॥ ४० ॥ रसानामेकस्मिन्थले युगपद्वर्णनेऽपि स्थलाग्यरभेदे सति न विरोधो. न घरमहानिर्भवति । यथा- धनुः करवले धृतं जनकजामुखे चक्षुपी स्मितं भृगुपतेः पराक्रममवेक्ष्य चाविष्कृतम् । मनस्तु कृतमुद्धतद्विजगतेनिरोधे क्रुधा श्रुतिः पितृवचः श्रुतावपि च रामभद्रण ठत् ।। ४१ ॥ भत्र करनेत्रादिदेशभेदेन वीर रङ्गारहास्यरोदातानां युगपनिवन्धनेऽपि न विरोधो न रमहानिः ॥

कवि विद्याराम-पिरचिता विरोधिनोऽथ मित्राणि केचित्कंचिद्रसा मिथः । तेषां यथातथं कार्य मन्दर्भपु निरूपणम् ॥ ३१ ।। तत्र मित्राणि यथा-- शृङ्गारहास्ययोमैत्री रौद्रस्य करुणस्य च । चीराद्भुतौ मिथो मित्रे वीभत्साख्यभयानकौ ॥ ३२ ।। अलङ्कारशेखरे तु-- "शृङ्गारहास्यौ करुणबीभत्सौ वीररौद्रकौ । भयानकाद्भुती मित्रे मिथः शान्तो न कस्यचित्" इति ।। ३३ ।। अप्येषां जन्यजनकभावो मैव्यैऽस्ति कारणम् । पूर्यः पूर्वोत्र जनको जन्य उत्तर उत्तरः ॥ ३४ ॥ यथोक्त भरतेन- "शृङ्गारात्तु भवेद्धास्यो रौद्राच फल्यो रसः । चीरात्स्यादद्भुतोत्पनिर्वीभत्साय भयानक" इति ।। रसानां मिथो विरोधे भरतः- "महारबीमत्सरसी तथा वीरमयानको । रद्राद तो क्या हास्यकरुणा वैरिणी मियः" ॥ १ ॥ अनौचित्ये मयन्त्यते मित्राएपपि हि शत्रयः। शत्रयोऽपि च मित्राणि यदौचित्यं प्रवर्तितम् ॥ ३५ ॥ युगपञ्चविषये न नया रियो रसान् । नवरिस्थापिमा न विमा नानुमारकम् ।। ३६ ॥

रसदीपिका वैरिसञ्चारिभा वा न वदेव कदाचन । अतोन्यथा प्रवृत्तिश्चेद्रसहानिस्तदा ध्रुवम् ॥ ३७ ॥ अनाचिस्ये प्रवर्तनाग्रां श्रवरे चैरं, रसहानिर्यथा- रट्वकान्तगृहे वरो नववधूचाङ्कमारोप्य च संश्लिप्पाननमाविचुम्व्य पुलकस्वेदादिभावालः । श्रागच्छन्तमदूरतो गुरुजनं दृष्ट्वाय मुक्त्वाच तां तूप्णीमास समाप्तसर्वमदनव्यापारवद्विक्रियः ॥ ३०॥ भत्र गुरुजनान्निमर्यादत्वापादनशयात्युत्कसापत्रपमयोत्सत्ती शृङ्गार- भङ्गः । अतः शृङ्गारभयानकयोरवरे बैरं, शृङ्गारे भयानकविभाववर्णन मत्रानौचित्यम् । औचित्ये तु न विरोधो नापि रसहानिः । यथा- दयितेन रसावेशाद्दष्टे गाढं प्रियाघरे । सुतं च प्रमृतं तत्र रक्त लाक्षारसायितम् ।। ३६ ।। अत्रौचित्यात शृङ्गारबीभत्सयोन विरोधो नापि रसभङ्गः।। भिन्न तु सति देशे न विरोधो वैरिणोरपि । घटस्य भूतले यद्वद्भावाभावकयोस्तथा ।। ४० ॥ रसानामेकस्मिस्थले युगपवर्णनेऽपि स्थलावययभेदे सति न विरोधो. न चरमहानिर्भवति || यथा- धनुः करतले घृतं जनकजामुखे चनुपी स्मितं भृगुपतेः पराक्रममवेक्ष्य चाविष्कृतम् । मनस्तु कृतमुद्धतद्विजगनिरोधे क्रुधा श्रुतिः पिठ्वचः श्रुतावपि च राममद्रेण तद ॥ ४१ ।। भत्र करनेत्रादिदेशभेदेन धीरङ्गारहास्यरोदाइ तानां युगपग्निबन्धनेऽपि न विरोधो न रसहानिः ।।

४८] कवि-विद्याराम-विरचिता 'काले भिन्नेऽपि नो हानियुगपत्तनिरूपणे ।' एकस्मिन् स्थलेऽपि भिन्नममयतया युगपन्निरूपणे न दोपः ॥ यथा- सेनान्या सह धूर्जटेः किल मया विद्यानवद्यार्जिता प्रोन्मथ्यार्जुनमर्जुनीर पितृपदे प्रत्यर्पिताऽऽनीय च । क्षानं चौद्धतमानिहत्य बहुशस्तच्छाणितातर्पणे- भूयिष्ठ परितर्पिताः स्वपितरः प्राप्तोऽपको हरेः ॥ ४२ ॥ अत्र तत्तत्समयभेदादभूतबीररौद्रवीभत्सशान्तानामेकत्र युगपनि-- यन्धने न विरोधो न रमभङ्गः । श्रङ्गाङ्गीभावापन्नानामेकत्र युगपञ्च यः । ममावेशो हि शारल्यं रसानां परिकीर्तितम् ॥ ४३ ।। रमशवलतायामणि 'धनुः करतले धृत'मिति तथा 'सेनान्या मह धूर्जटेरितिश्लोकद्वयमेवोदाहरणम् ।। अनौचित्यात्तु सर्वत्र शृङ्गारे त्वेककाश्रयात् । रसाभासस्तथैकस्य बद्धासक्त्याऽव्यवस्थया ॥ ४४ ॥ शृङ्गारादिषु सर्वत्र सुहृदोऽप्यन्तरा पुनः । अतिप्रमगादन्यस्य रसाभासस्तदा तथा ।। ४५ ॥ अवायं निष्कर्ष :-- सर्थाचित्यमेयात्र रसतां प्रति कारणम् । इति निष्कृष्टमिद्धान्तः कृतः पूर्वः कवीवरः ॥ ४६॥ (१) तदा। (२) 'अर्जुन्यपन्या रोहिणी स्यादुत्तमा गोषु नैचिकी' त्यमरः । (सं)

रसदीधिका
४]
अथ रमदोपाः ॥
स्वस्वशब्दैरुपादानं भावस्य च रसस्य च ।
कष्टप्रकल्पनीयत्वमनुभावविभावयोः ॥ १॥
प्रक्रान्तरसरित्वं तेषां व्यक्तिविपर्ययः ।
अनौचिती च सर्वत्र रसदोपाः स्युरीदृशाः ॥ २ ॥
अन्येऽपि रसभावानां सन्ति दोपा गुणा अपि ।
ते चान्यग्रन्थतो ज्ञेया नात्रोका ग्रन्थविस्तरात् ।। ३ ॥
इति रमव्यवस्था ॥
अथ भाव व्यवस्था-
यथा रसास्तथा भावा औचित्याद्भावतामियु:।
भावानामपि शान्त्याया व्यवस्था: कविभिः कृताः ।। ४७ ।।
नदुक्त काव्यप्रकाशे-
'भावस्य शान्तिरुदयः सन्धिः शबलवा तथा' इति ।
तत्र भापशान्तिर्नाम-
उत्पन्नस्याथ भावस्य प्रशमः सुखतो भवेत् ।
केनचिद्ध तुनाऽकस्माद्भावशान्तिस्तु सा मता ॥ ४८ ।।
अनुत्पन्नस्य चाकस्मादुत्पत्तिरुदयो मतः ।
भावयोयुगपत्मन्धिः समावेशः प्रकीर्तितः ॥ ५६ ।।
एकत्र युगपञ्चपा ममावेपो (शो ऽविरोधतः ।
ज्ञेयं तद्भावशारल्यं रसभावविचनणैः ॥ ५० ॥

. ५.. कवि-विद्याराम-विरचिता अथैषां क्रमेणोदाहरणानि-भावशान्तिर्यथा- प्रियेणोक्ता प्रत्यागमन दिवसादय सकलो । व्यतिक्रान्तो मासस्तदपि सखि नायाति स कथम् । इति क्षीण चिन्ताततिभिरबधार्यागत इति प्रियस्ते सा पुष्टामृतसरसि मग्नेव समभूत् ।। ५१ ॥ अत्र चिन्तावितर्कयोः शान्तिः ।। भावोदयो यथा--- मा मा मैवमपत्रपाकरमिदं धर्म्य न चैवं प्रिया नीवीं मोचयितु हठं कृतवति प्रष्टे ललाप क्षणम् । पश्चादुद्भवदुत्करस्मरवशादस्वस्थचेतस्तया भर्तारं न निपेखुमप्यपगतां नीवी न वद्ध क्षमा ॥ .५२. 1. . अत्र मोहजाड्ययोरुदयः ॥ अथ भावमन्धिर्यथा, नूनं निर्गतवेद्यकान्तरमहानन्दामृतस्यन्दिनः काव्यस्य प्रविनिर्मिती दृढतया सक्त यथा मे मनः । तबच्चालयितुं ततम्तदधुना वामभ्र वो विभ्रमाः केप्यत्युच्चसुधातिरागपटवोऽप्यन्तःप्रविष्टा बलात् ॥५२॥ अत्र विषादीत्सुक्ययोः सन्धिः। विपादश्चात्र प्रारब्धकार्यानिशात अथ भावशबलता, यथा-- कि तुद्र रिभिश्वमृश्च मकला भग्नाऽस्मदीया रिपून निष्प्राणान विदधामि इन्त निहतः मर्यो जनो नः परः। श्लाघ्यो मृत्युरिहेदृशः प्रतिभटाः फराः कृतास्त्रोऽप्यह श्रान्तोऽश्यः प्रहरामि सत्त्वरमही क्षात्रं करालं व्रतम् ।। ५३ ।। अत्र गर्वविपादामर्पदेन्यमनित्रासधृतिचिन्ताचपलतारितकाणा भावानां सार्यात् भावशनलता, यथा या- रसदीर्घिका स्थास्याम्येव विना तया कथमिह क्वार्थः प्रवास विना तस्यास्तद्वचनं मुधैव हृदयं स्थेयं विधाय स्थिरम् । अारले सुदृशः कदा पुनरहं प्राप्स्ये किमाशंसनै- सेतो विक्लवतां त्यज प्रणयिनी कस्यापि नताशी ॥५४॥ अत्र दैन्यमतिस्मृतिधृत्यौत्सुक्यविषादहर्षाणां सायम् । इति भाकव्यवस्था । अथ रीतयो वृत्तयश्च ॥ चैदाद्या रसानां धै चतस्त्रः सन्ति रीतयः । रीत्या संदर्भणं चैपां कुरुते हिं चमत्कृतिम् ॥ ५५ ॥ यथारीति यथावृत्ति संदाः काव्यसम्पदः । विशेषतो रसाचाभिर्वर्णनीया यथातथम् ॥ ५६ ।। श्ररीत्या कथनेनापि रसाभासा भवन्त्यमी। रीत्या विपर्ययेणापि प्रोक्ता पुष्णंति नो रसम् ।। ५७ ।। लोकेऽपि रीत्या क्रियते कर्म नो चेन शोभते । उपहामपदं चैतन् यधरीत्या कृतं भवेत् ।। ५८ ।। रमाश्च रसभावाश्च रीतयो वृत्तयस्तथा । याचिन्यं निबद्धाश्चेत् सचमत्कारकारिणः ॥ १६ ॥ नत्र रीनित्य नाम, वृत्तित्त्व नाम । इतिकर्तव्यता सर्वकर्मणां रीतयः स्मृताः । वृत्तायो वर्तनं तामों याथातथ्येन कर्मसु ।। ६० ॥ रीनयश्च । वैदर्भी मागधी गोडी पाञ्चाली चेति रीतयः । चतम्रो युनायोऽप्यामां चतम्रो हि यथाक्रमम् ।। ६१ ।।

५२] कविविद्याराम-विरचिता कैशिकी भारती चाय तथवारभटी परा ! मान्यती चेति पिनेयाश्चतस्रो वृत्तयोऽप्यमः ।। ६२ ।। वैदाः कैशिकी पृचिर्मागध्या भारती तथा । गांच्याश्चारमटी वृत्तिः पाञ्चाल्याः सात्वती मता ॥ ६३ ।। अत्युदण्डाक्षरयुक्ता छन्दोभिश्च तथाविधैः । बृहत्समासा तुच्छार्था गौडी घोरेपु कर्मसु ।। ६४ ॥ ईपन्मृद्वक्षरा किश्चिन्मृदुच्छन्दास्तथापदा ।- ईपन्लघुसमासा [च] मागधी सर्वतः समा ॥ ६५ ॥ किञ्चित्प्रोढार्थसन्दर्भा किञ्चित्प्रौढपदा तथा । ताइक्समामा पाञ्चाली मागध्यां सा मिलत्यपि ।। ६६ ॥ केपाञ्चिद्रीतयस्तिस्रो मते सन्त्यथ वृत्तयः मागध्यां सत्र पाञ्चाल्यास्तवृश्च प्रवेशनम् ।। ६७ ॥ वृत्तीनां स्वरूपलक्षणम् । कैशिकी मृदुसन्दर्भा किञ्चिन्मृद्वी च भारती । उद्दण्डाऽरभटी जेया किञ्चित्प्रौढाऽथ सात्वती ।। ६८ ॥ अथासां क्रमेणोदाहरणानि। तत्रातिमृदुसन्दर्भा स्निग्धपदा सघुसमासा ललिता अतिसुन्दरा वैदर्भी रीतिर्यथा- तयादि लोलाक्षि मृगाक्षिजिचरं वचश्च पीयूपपराजयक्षमम् । वपुरछविः कामवधूप्रपाकरी गतिमरालानगर्नहारिणी ।। ६६ ॥

रसदीर्घिका यथा या- सन्त्यत्र नाम यहवः कवयः प्रगल्भाः' कुर्नन्ति ये निजकृतैः स्वयमेव कीर्तिम् । ते दुर्लभाः सुकवयः किल यत्प्रवन्धान पीयूपवत्परिनिपीय परे स्तुवन्ति ॥ ७० ॥ अपि च- श्रुचा सत्पुरुषाः स्तुवन्ति सुतरां वाचः कवीनां सती- दोपादोपविचारपूर्वकमयो मध्या वदन्ति स्फुटम् । दोषांस्तासु विएश्तेऽथ कुटिलास्तेभ्योऽतिदुष्टाः खला- स्ते किञ्चिन्न वदन्त्यनादरतया शृण्वन्ति नो पामराः ॥७१।। इयं रीतिः शृङ्गारकरुणयोः मन्दर्भ योजनीया । अथ ईपस्निग्धा ईपल्लघुसमासा किञ्चिन्मृदुयना मागधी यथा- उज्जम्भन्नवनीलनीरजवनोद्गच्छन्मिलिन्दावली प्राग्भारप्रतिमप्रगल्भनयनप्रान्तेक्षणाख्येषुमिः । विध्यन्कामिकुरङ्गकस्य हृदयं सम्मोद्य मञ्जीरक- स्निग्धाच्यक्तरण गच्छति वधू व्याधो न एयेऽध्यान ॥७२॥ इय रीतिहास्य शान्ताद् तानां प्रबन्धे योजनीया । अथ अत्युद्दण्डाडम्बर प्रदाऽतिलम्बायमानममामा अतिकपोशाराक्षरा उद्दण्डवृत्ता गोही यया- प्रावारीकृतनागचर्मकठिनप्रान्तप्रबद्धोद्धर- ग्रन्यिव्याप्तविशालमस्मविलमद्वतःम्यलव्याकुलः । पाया अरकालकूटकणिकाजबालकालीकृत- ग्रीवाऽश्लिष्टराजगभोगवलपरचएडीश्वरो वश्विरम् ।। ७३ ।। -घटा ।

५४] कवि-विद्याराम-विरचिता इयं रीतिस्तु रोद्रवीभत्सयोः सन्दर्भ योजनीया । अथ ईपत्प्रौढा अतिगम्भीरपदा अनतिविस्तृतसमासा किश्चित्प्रीतच्छन्दा किञ्चित्प्रौढाक्षरसन्दर्भा पाञ्चाली यथा- गुर्थीज्ज्वलसत्प्रवन्धरचनाविज्ञानलेशाविदा दृष्टादृष्टिकयैव केवलपदावल्याः ममुद्गुम्फिनाम् । नो काव्यानि तथा प्रियाणि रसवकाव्यज्ञराज्ञां यथा ग्राम्याणामितरोऽन्य एव हि पुरस्त्रीणां दृशोर्विभ्रमः ॥७४।। इयं रीति रिभयानकयोः सन्दर्भ योज्या ।। अथ रसानां रीतिच्यवस्था- अत्यन्तमृदयोऽत्यन्तप्रोढाश्चापल्यपेशलाः । ईपत्यौदा रमाश्चापि सन्त्येतानामतो वे ।। ७५ ॥ श्रृङ्गारकरुणौ चोभारत्यन्तमृदुलो रसौ । अतिप्रौढौ तु भवतो रौद्रवीभत्ससंज्ञको ।। ७६ ॥ ईपत्प्रौढौ तु विज्ञेयावुभौ चीरभयानको । ईपन्मृदुनिसर्गाश्च शान्तहास्याद्भुता रमाः ।। ७७ ।। वेदा वर्णनीयौ तो श्रृङ्गारकरुणावतः । तत्र चैकैव वृत्तिः स्यात् सन्दर्भश्चातिपेशलः ॥ ७८ ।। रौद्रवीभन्मको गोड्या रीत्या सन्दर्भमर्हतः । तत्र चारभटी वृत्तित्तं च स्रग्धरादिकम् ।। ७६ ॥ हास्पशान्ताद्भुता रीत्या मागध्याहन्ति वर्णनम् । यत्तिर्वं भारती तत्र सन्दर्भाऽपि मनाङ मृदु ॥ ८० ॥ पाश्चाल्या वर्णनीयौ तौ रसी वीरभयानको । ईपत्प्रौढोऽस्ति सन्दर्भो निस्तत्र तु सात्वती ॥१॥ ܘܚܝ रमदीपिका [५५ लौकिक कर्मापि रील्या एच कर्त्तव्यमित्युक्त तद्यथा- बैदा कर्म कर्च व्यं रीत्या वैवाहिकादिकम् । वाणिज्याद्य तु मागध्या पाश्चाल्या राजसेवनम् ॥ ८२ ॥ कर्म यचाभिचाराद्य घोरं गौड्याऽभिसाधयेत् । एवं लोकेऽपि कर्गव्यं रीत्या कर्म विचक्षणः ।। ८३ ।। विवाहादिकं ममस्तमकारकर्म अतिमृदु अस्ति तन्मृळ्या पैदा रीत्या कर्मव्यम् । तथा वाणिज्यकृप्यादिक ईपन्मृदुकठिनं तादृश्या मागण्या रीत्या कर्तव्यम् । तथा राजसेवादिकं ईपतपीढं मृदु तत्तादविधया पाञ्चाल्या कार्यम् । तथा च प्राभिचारकलहादिकं अति ऋरं अस्ति तदाता यूरया गाड्या रीन्या कर्त्तव्यम ।। एवं श्लोकपठनेऽपि ज्ञावव्यम । श्ररीत्य- न किञ्चिन करणीयमित्यर्थः।। दुनि रमदीपिकायां भक्तिरमभावव्यवस्थारीतिनिरूपणं नाम चतुर्थ मोपानम् ॥ पञ्चमं मापानम् प्रय कान्यस्य रमोपजीव्यत्त्वात सोपान तत्स्वरूपं निरूप्यते ।। रसानां वर्णनं काव्ये क्रियतेऽन्यत्र नो यतः । अतः मंपतः काव्यव्यवस्थापि निरूप्यते ॥१॥ नत्र काव्यं नाम- यस्तु शब्दाघसन्दर्भश्चमत्कारकरोऽनघः । काव्यं तद्गुणश्चान्यकाव्याभाममुदीयते ॥ २ ॥ अत्र चमत्कारकरत्व रमालदारयुक्त्वं अनयत्वं दोपरहिनत्वं गुण- यदिनि गुणयुकन्यम् ।। कीन्यादिफलदं काव्यमिति पूर्वविदो विदुः । काव्यस्य करणे हेतुचतेऽर्थाः संगता मताः ॥ ३ ।।

कधि-विद्याराम-विरचित
ते यधा-
देवतोपासनं पूर्वसंस्कारम्तीनवुद्धिता ।
द्विवव्याकरणज्ञानं त्रिचतुःकोशसंस्वयः ॥ ४ ॥
शास्त्रज्ञानं सर्वलोकव्यवहारप्रवीणता ।
काव्यावलोकः काव्यज्ञशिक्षयाऽभ्यास उत्कटः ।। ५ ।।
प्रातःकालादिकः कालस्तकासक्तचित्तता।
एते सम्मिलिताः काव्यहेतुळस्ता न कहिचित् ॥ ६ ॥
तच काव्यं विधा मेदैरुत्तमाधममध्यमैः ।
उत्कृष्टो यस्य व्यङग्योऽर्थो वाच्यस्तत्काव्यमुत्तमम् ॥ ७ ॥
वाच्योऽर्थो व्यङग्यतो यस्य श्रेष्ठस्तन्मध्यमं स्मृतम् ।
शब्दार्थाऽडम्बराव्यङ ग्यं चित्रकाव्यं तथाऽधमम् ॥ ८ ॥
उत्तमं यथा-
स्वच्छाः समृद्धान्तरनल्पसच्चा गस्भीरतामप्यविमुञ्चमानाः ।
स्वसम्पदा जीवितजीवलोकाः सन्तः समुद्रा इव दुर्विभाव्याः ।।६।।
अत्र स्वच्छा इत्यनेन दयादाक्षिण्यादिकान्तगुणाश्रयत्वेनाभिगम्यतया लोकरञ्जकत्वं
च्यज्यते, तथा ममृद्धान्तरनल्पसत्वा इत्यनेन चलशोर्यादिभीमगुणाश्रयत्त्वेनाप्रधृष्यतया
तेजस्वित्त्वं व्यज्यने । गम्भीरतामध्यविमुञ्चमाना इत्यनेनातुन्छस्वभारत्त्वेन लोकपूज्यत्त्वं
व्यज्यते । तथा स्वसम्पदा जीवितजीवलोका इत्यनेन स्समम्पदः मर्योपभोग्यत्वेन यशस्वित्त्वं
न्यज्यते । तथा समुद्रा इवेत्यनेन मर्यादास्थित्त्वेन पुण्यात्मत्त्वं व्यज्यते तथा च दुर्विभाज्या
इत्यनेनाप्यशक्यविभावनत्त्वेन लोकोत्तरपुरुषार्थत्वं व्यज्यने इति व्यङ्ग्यार्थः । स च श्लोकस्य
प्रदश्यमानाद्वाच्यार्थीदुतोऽन इदमुत्तमम ।
मध्यम यथा-
तमाम लोलाक्षि मृगाक्षिजित्व
वचश्च पीयूपपराजयदमम् ।
पपुश्चविः कामवधूत्रपाकरी
गतिमरालाञ्चनगर्नहारिणी ॥ १० ॥

रसदीर्घिका अन तवाक्षि इत्यादिनाऽक्षणोपिशालत्वचञ्चलत्त्वे व्यज्यते । तथा बचश्च पीयूपेत्यादिनायचसो मधुरत्त्वं व्यज्यते (तथा चपुच्छविरित्यादिना यपुपोऽतिसुन्दरत्वं व्यज्यते । तथा च गतिमरालाश्चनेत्यादिना गते- मान्द्यललितत्त्वं व्यज्यते । इति व्यङ्ग्यार्थात् श्लोकगतवाच्यार्थश्चमत्कृतो. ऽस्ति अत इदं मध्यमम् । अथाधम चित्रकाव्यं तच्च शब्दचित्रार्थचित्रभेदाद्विविधम् । तत्र शब्दचित्रं बहलानुप्रासादियुक्त यथा-- भावारीकृतनागचर्मकठिनप्रान्तप्रबद्धोधुर- प्रन्थिन्याप्तविशालभस्मविलसद्वक्षस्थलव्याकुलः । पायादुर्जरकालकूटकणिकाजबालकालीकृत- ग्रीयाश्लिष्टभुजङ्गभोगवलयश्चएडीश्वरो वचिरम् ॥ ११ ॥ अत्र न कश्चिद्व्यङ्ग्यार्थः । अर्थचित्रं अतिशयोक्त्युत्प्रेक्षादिप्रतिपादि- साातिशययुक्त यथा- पशःप्रवापी किल यस्य धात्रा कृत्वा जगत्प्रे बरे निधाय । वयोः शिशुक्रीइनके इवेमी वस्योपरीन्दूष्णकरौ निपद्धौ ॥ १२ ॥ इदमधमम् । अथ शब्दार्थसन्दर्भः साध्यमित्युक्त, तन शब्दो नाम- शब्दः सुप्तिसमुत्पन्न वर्णवन्दं तु शक्तिमत् । विधिसङ्केतितस्तेषु योऽर्थः शक्तिस्तु सा मता ॥ १३ ।। अथार्थस्वरूपम्- चाच्यो लक्ष्पस्तथा व्यङ न्यः शब्दस्यार्थस्त्रिधा मतः । तिसृभि तिमिर्पस्माच्छन्दस्य प्रतिपादितः ॥ १४ ॥ शक्तिश्च लक्षणा चैव व्यञ्जना चेति धृत्यः । प्रसिद्धार्थस्य गन्देषु शक्तिर्विज्ञानकारिणी ॥ १५ ॥ - ..] कवि-पिधाराम-विरचिता लक्षणा लतितार्थम्य व्यञ्जना व्यजितस्य च । याच्या प्रसिद्धः शब्देषु योऽर्थः स्फुरति तत्क्षणात् ।। १६ ।। समिहिान बाल्योऽयों विषये स्वे प्रवाधितः । पत्म्यमम्बन्धिनं लग्नो लक्ष्यमा हि लक्षणा ॥ १७ ॥ जहन्याऽजदत्स्वार्था चोमयार्या च सा विधा। गहायां पोप इन्यत्र जहत्म्याधिगम्यताम् ।। १८ ।। इन्ताः प्रविष्टा इत्पत्राऽजहत्स्वार्या च सम्मना । मनाः कोशन्ति चन्यत्रोमयस्वार्था प्रशीतिता ॥ १६ ॥ निमणाम युनादरणं यथा-- कालिन्यामुदयविभूपणचन्डीनरयावली पर्यन्त निरीवगाप परिवस्तिष्ठनिमानापली। गोपीनां सह महिलेन महता प्रारम्परासीत्सरो साम्पन्मे (प) घिपोन्मुगीस्तानः पापाग नः संशयः ॥२०॥ भानियामित्यनेन मराटे या मागिन्यनेन REr. पहल गायनाममा जलारा या विमानान कर स्पंदपाल विमानानां निवासम्मरमानमा विमानानामरि. प्पा । उन्गुनीयान या नगन मपूरम मेकरांननो. गीभवनमार्गमा दिए। मनपनापनामदानेन्पप्रमागिताः । पोगों नपा प्रातःग सम्पति पण ॥ २१ ॥ पापामा पासोमा भन्सामगिरः। यागिन्यापमा पकजना मना ॥ २२ ॥ HIST. गम्मानारामारामा प रसदीपिका [H व्यञ्जना विविधा ज्ञेया मोचनी कामिनी क्रिया । प्रस्तुतेप्रस्तुतस्फूतिर्यया सा मोचनी स्मृता ॥ २३ ॥ प्रस्तुतस्य तु याऽन्यार्थ व्यञ्जयेत्सा तु कामिनी । प्रस्तुताऽप्रस्तुवावन्यों करोति स्फुरिती क्रिया ॥ २४ ॥ प्रभूता व्यञ्जनामेदास्तेप्यन्यत्र अपश्चिताः । ध्यजनाव्यजितो योऽर्थः स ध्यग्य इति हि स्मृतः ॥ २५ ॥ इति शब्दार्थयोः स्वरूपम् ।। श्रय यदुक्त शब्दार्थसन्दर्भः काव्य, तत्र सन्दी नाम- छन्दोभिर्गुरुना तेषां सन्दर्भः परिकीर्तितः । छन्दोमि गणवृत्तानि गायत्र्यादीनि सन्ति हि ॥ २६ ॥ मगणादिर्गणो वर्णत्रयात्माऽटविधो मतः । गुरुश्च लघुसंज्ञश्च वर्णोध्न हिविधः स्थितः ।। २७ ॥ चर्चा विसर्गसंयोगानुस्वारपरको गुरुः । दीर्घोऽथ सरलो हस्यो विमर्गा बिना लघुः ।। २८ ।। यर्णस्यास्य त्रिकं यत्तु स गणः परिकीर्तितः । शब्दजालं गणैर्व्याप्तं ते चाप्यष्टारिमे यथा ॥ २६ ।। मगणो यगणश्चैव भगणो नगणस्तथा । रगणः सगणवायो गणो जगमोऽटमः ॥ ३० ॥ चचारोऽमीपु येत्वाचा मादयो मङ्गलप्रदाः । अन्याम्तु रगणाया ये दे धमद्रकलादाः ।। ३१ ।। मयोमनावतो अन्यप्रारम्भ प्रथमं शुभो । सन्दर्भमहतस्वा तु न रसी न वजी तथा ३२॥

कवि-विद्याराम-चिरचिता रस्तजा देवभद्रादिवाकै निभिर्यदा।। निबद्धाः प्रथमं दोपो न तदेति विनिश्चयः ॥ ३३ ॥ अथाऽगरणस्वरूपम्--। त्रिगुरुमंगणो ज्ञेयो भूमिरस्यास्ति दैवतम् । निबद्धः प्रथमं पद्य श्रियं दिशति पुष्कलाम् ॥ ३४ ॥ लघ्वादिर्यगणो युद्धाता पानीयदेवतः । कीर्तिदो भगणश्चाद्यगुरुश्चन्द्रोऽस्य दैवतम् ।। ३५ ।। त्रिलघुर्नगणो नाकदैवतश्चायुपः प्रदः । रस्तु मध्यलधुर्वह्निदैवतोऽन्तप्रदः स्मृतः ॥ ३६ ॥ सगणोऽन्त्यगुरु/युदैवतोऽय प्रवासदः । लध्वन्त्यो व्योमदैवत्यस्तगणो धननाशकृत् ।। ३७ ॥ रोगकृज्जगयो मध्यगुरुश्चवार्कदैवतः । एमिर्याप्तमिदं सर्व गणैर्वाङमयमस्ति यत् ॥ ३८ ॥ पद्धान्यार्यादिकान्येभित्तानि पिङ्गलादिभिः । वृत्तरत्नाकरे तानि द्रष्टव्यानि विचक्षणैः ।। ३६ ॥ अवश्यं काव्यनिर्माणे छन्दोज्ञानमपेक्षितम् । तन्न विस्तरसंत्रासाद्विस्तरेणात्र दर्शितम् ॥ ४० ॥ इति सन्दर्मव्यवस्था। श्रथ रसालद्वारयुतत्त्वं चमत्कारित्वमित्युक्त तत्र रसास्तु पूर्वमुक्ताः, अथाऽलद्वारा उच्यन्ते- अलङ्कारास्तु काव्यस्य सच्छोमाकारकाः स्मृताः । यथा हारादिका मषाः कुरूपस्यापि रूपदाः ।। ४१ ॥

[६१.
रसदीपिका
अलङ्करोति योऽत्यर्थं सोऽलङ्कारः प्रकीर्तितः ।
सच्चमत्कारकारित्वं वाऽलङ्कारस्य लक्षणम् ।। ४२ ।। .
तेऽलङ्कारा द्विघा भेदाच्छब्दस्यार्थस्य चोमयोः ।
शब्दाऽलङ कृतयस्तत्राष्टानुप्रासादयो-मताः ॥-४३ ॥ .
ते यथा-
अनुप्रासश्च वक्रोक्तिश्चित्रं गूढं प्रहेलिका ।
श्लेपः प्ररनोचरं शब्दालङ्कार यमकं वथा ॥ १४ ॥
सत्र-
अनुप्रासो वर्णसाम्यं लाटश्छेकश्च स द्विधा ।
मावृत्तिश्चैकवर्णस्यासकृल्लाटाभिधो हि सः ॥४॥
यथा-
कामकेलिकलाकालकोविदः किल कामुकता
कामिनीकामुकः कामी चक्रे. कायं कलं निशि ॥४६॥
सकृत्साम्यमनेकस्य स छेको व्यञ्जनस्य यत् ।
उनी धराधरैगुर्वी फणाग्रेणाधरकणी ॥४७॥
अन्याभिप्रायकथित वाक्यमन्येन चान्यथा ।
निपियवेऽर्थमुत्पाद्य वक्रोकिः सा प्रकीर्तिता ॥४॥
यथा--
.
कोऽयं द्वारि स्थितः स्थाणुर्वनादुपगतः कथं ।
इरोऽई चौर्यवाहि जागHभ्यर कुवचिन् ॥४६॥ .
चित्रं कौतुककारीह छत्रबन्धादिकं बहु ।
वच भापकिरावादिकान्येप्वस्ति प्रवर्णितम् ॥५०॥

१२] कवि-विद्याराम-विरचिता खड्गयन्यो यथा- देवसेवन वरिष्ठविश्वप प्राप्तपूर्ण परमार्थदायकः। का कृपां तव कृपान्तवर्जितो तर्जितो तनुत नूतनानना ॥५०॥ कत कर्मक्रियालिङ्गगुप्ताघ गृढमुच्यते । कोऽमलं वचनं वक्तुं क्षमो नाम हितं हि तम् ॥५१॥ अत्र कः ना इति कर्तृगुप्तम् ॥ च्युतदत्ताक्षरायन सकृत्प्रश्नः प्रहेलिका। गृह्णाति कठिनौ कान्ताकुचौ गाढं न को नरः ॥५२॥ अत्र नकारस्थाने मकारे दत्ते रेफरथाने लकारे कृते कोमल इत्युत्तरं भवति ॥ श्लेपः शब्दस्य वाक्यस्य नानार्थाश्रयता मतः । स द्विजो महनीयो चै योऽध्वरे बलिमागहृत् ।।५३|| अत्र द्विजो भामरणः पती च महनीय श्रमहनीय पदच्छेदादर्थद्वयं भवति । द्विधा प्रश्नोत्तरं तद् या पहिचान्तश्च लापिका ।। फार्यक्षमोज कः शूरः कीदृशः शास्त्रभृत् पुमान् ॥५४॥ अत्र शास्त्रभृदित्युचरं उत्तरं एकत्र शास्त्राणि अन्यत्र शस्त्रसमूहः । चहिलापिका यथा- सम्बोधनं काय किमत्र कः स्यात् क्षीणः स्त्रियां किं च किमः' सुरूपम् । को गर्नयुक्तो मनुते न सर्व कः कामिनी कामयते निकामम् ॥५५॥ १-'किम्' शन्दस्य।

[६३ रसदीपिका कामी इति प्रत्युत्तरम् । अत्र कस्य नाम प्रजापतिवाचकस्य क शब्दस्य सम्बोधनं, हे क ! तथा क: नरः क्षीणःस्यादिति अस्योत्तरंथमी नाम रोगी तथा स्त्रियां किम् शब्दस्य कीदृशं रूपं इत्यस्योत्तर का इति तथा गर्वयुक्तः कः सर्व न मनुते इत्यस्योत्तरं मो नाम मा लक्ष्मीस्तद्वान् । तथा कामिनी क: कामयते इत्यस्योत्तरं कामी। अत्र व्यस्तपदानि ! क श्रमी कामी ममस्तं कामी इत्येकं पदम्। द्विरुक्तिर्यम के तुल्यस्वरव्यञ्जनसंहतेः । मम ता ममताहेतुः सम्पदोऽसम्पदोऽस्थिराः॥५६॥ इति शब्दालकाराः ॥ अथाऽर्थालङ्काराः-- अर्थालड कृतयो शेयाश्चतुर्दश बुधेरिताः । उपमारूपकोत्प्रेक्षाप्रमुखा मुख्यतां गताः ।।५७॥ ते यथोक्ता अलङ्कारशेखरे- उपमारूपकोत्प्रेक्षाः समासोकिरपद्धतिः ।। समाहित स्वभावश्व विरोधः सारदीपको ॥१८॥ सहोक्तिरन्यदेशवं विशेपोक्तिर्विभावना । एवं स्युरालङ्काराचतुर्दश न चापरे ॥५६॥ तत्र उपमा नाम- द्वयोः पदार्थयोर्भेदे साधर्म्यमुपमा स्मृता । गङ्गाम्भ इस ते शुभ्रं यशो लोकत्रयं गतम् ॥६०॥ प्रमेदा दश सन्त्यस्यास्ते चान्यत्र अपश्चिताः । मिन्नयोरतिसाम्येनाभेदारोपरतु रूपकम् ।। थास्यं सुधांशुरेवास्या वारसुधामभिवर्पति ॥६॥ १ १-(ख) रूपाः ।

१२] कवि-विद्याराम-विरचिता खड्गबन्धो यथा- देवसेवन वरिष्ठविश्यप प्राप्तपूर्ण परमार्थदायकः। कः कृपां तव कृपान्तजितो तर्जितो तनुत नूतनानना ॥५०॥ फत कर्मक्रियालिङ्गगुप्ताद्य गूढमुच्यते । कोऽमलं वचनं वक्तुं क्षमो नाम हितं हि तम् ॥५१॥ अत्र कः ना इति कर्तृगुप्तम ॥ च्युतदत्ताराधन सकृत्प्रश्नः प्रहेलिका। गृह्णाति कठिनों कान्ताकुची गाढं न को नरः ॥५२॥ अत्र नकारस्थाने मकारे दत्ते रेफस्थाने लकारे कृते कोमल इत्युत्तरं भवति ।। श्लेपः शब्दस्य वाक्यस्य नानार्थाश्रयता मतः । स द्विजो महनीयो वै योऽध्वरे बलिभागहत् ॥५३॥ अत्र द्विजो ब्राह्मणः पक्षी च महनीय श्रमहनीय' पदच्छेदादर्थद्वयं' भवति । द्विधा प्रश्नोत्तरं तद् या बहियान्तश्च लापिका ।। कार्यक्षमोऽत्र कः शूरः कीदृशः शास्त्रभृत् पुमान् ॥५४॥ अत्र शास्त्रभृदित्युचरं उत्तरं एकत्र शास्त्राणि अन्यत्र शस्त्रसमूहः । बहिलापिका यथा-- सम्बोधनं कस्य किमत्र कः स्यात् क्षीणः स्त्रियां किं च किमः' सुरूपम् । को गर्नयुक्तो मनुते न सर्ग कः कामिनी कामयते निकामम् ॥५॥ १-'किम्' शब्दस्य ।

रसदीपिका कामी इति प्रत्युत्तरम् । अत्र कस्य नाम प्रजापतियाचकस्य क शब्दस्य सम्बोधनं, हे क ! वथा क: नरः क्षीणःस्यादिति अस्योत्तरश्रमी नाम रोगी तथा स्त्रियां किम् शब्दस्य कीदृशं रूपं इत्यस्योत्तरं का इति तथा गर्वयुक्तः कः सर्व न मनुते इत्यस्योत्तरं मी नाम मा लक्ष्मीस्तवान् । तथा कामिनी कः कामयते इत्यस्योत्तरं कामी। अत्र व्यस्तपदानि ! क श्रमी कामी ममस्तं कामी इत्येकं पदम्। द्विरुक्तिर्यमकं तुल्यस्वरव्यञ्जनसंहतेः । मम ता ममताहेतुः सम्पदोऽसम्पदोऽस्थिराः॥५६॥ इति शब्दालङ्काराः ॥ अथाऽर्थालङ्काराः- अर्थालङ कृतपो ज्ञेयाश्चतुर्दश युधेरिताः । उपमारूपकोत्प्रेक्षाप्रमुखा मुख्यतां गताः ॥५७।। ते यथोक्ता अलङ्कारशेखरे- उपमारूपकोत्प्रेक्षाः समासोक्तिरपगु तिः । ममाहितं स्वभावश्च विरोधः सारदीपको ॥५८|| सहोक्तिरन्यदेशत्वं विशेपोक्तिर्विभावना । एवं स्युरालङ्काराचतुर्दश न चापरे १५६ ।। तत्र उपमा नाम- द्वयोः पदार्थयोमेंदे साधर्म्यमुपमा स्मृता । गङ्गाम्भ इव ते शुभ्र यशो लोकत्रयं गतम् ॥६०॥ प्रभेदा दश सन्त्यस्यास्ते चान्यत्र पश्चिताः । मिन्नयोरतिसाम्येनाभेदारोपस्तु रूपकम् थास्यं सुधांशुरेवास्या वासुधामभिवर्षति ॥६१॥ १-(ख) रूपः । १ कवि-विद्याराम-विरचिता रूपकं पञ्चधा व्यस्तसमस्तादिप्रभेदतः । ग्रन्थस्य गौरवाद् भेदास्ते तु नात्र प्रदर्शिताः ।।६२॥ . उत्प्रेक्षा वस्तुनः सत्ता कल्पनं चासतः सति । कुसुमं किल चन्द्रोऽयं त्वद्यशो वल्लरीभवम् ॥६३॥ प्रस्तुतेऽप्रस्तुतस्फूतिः समासोक्तिस्तु सा मता। लोकोद्वगं करोत्येपः क्रूरचण्डकरः करैः ॥६४॥ अत्र प्रस्तुते सूर्यवृत्तान्ते राजवृत्तान्तं स्फुरति ॥२ अपगु तिरपल त्य किञ्चिदन्यार्थदर्शनम् । प्रदशन्मेऽधरं गाढं प्रियः किं न हि षट्पदः ॥६॥ प्रारब्धाभिमुखाऽकस्मात्सहायाप्तिः समाहितम् ।। यावन्मे मदनोद्र कस्तावत्कान्तः समागतः ॥६६॥.. स्वभावालङ कृतिर्वस्तुस्वभावाख्यानमुच्यते । गांवो हुंमारच नसानाह्वयन्ति दिनात्यये ॥६७।। विरुद्ध भासते यत्र विरोधालङ्कः, तिद्विधा । अविरोधेऽपि तद्भानं विरोधाभास इत्युमौ ॥६८॥ उमी यथा- स्वासौ मन्दोद्यमः क्वेदं दुःकर द्रविणार्जनम् । अपीता अप्यमू: पीता गावस्तत्र जलाशये ॥६६॥ साराख्यालङ कृतिर्यत्र श्रेष्ठोक्तिश्चोत्तरोत्तरम् । हंसः श्वेतस्ततश्चन्द्रस्तस्मादपि च ते यशः ७०॥. १-(स) गजचान्तस्फूर्तिः । २-(ख) अप्यमी।

i रसदीर्घिका युगपत्सर्गवाक्यानामन्त्रयो विविधक्रियः । दीपकं तरूच विज्ञेयमनन्तं भूरिभेदतः ।।७।। यथा-- कुर्वन्ति मार्गणा दैन्यं प्रशंसन्ति पठन्ति च । रातुः पुरो निबध्नन्ति तन्मुखे च तथा दृशः ॥७२॥ पूर्वोत्तगेषकार्योपकारकश्रेणिका तु या । तन्मालादीपकं प्रोक्त दीपकस्यैव तद्भिदा ॥७३।। उभयं यथा- पाणिं भूपयते दानं तन्न यस्तं तथाश्रु तम् श्रुत्या श्रद्धा तयाऽचारस्तेन सत्कुलता भवेत् ॥७४॥ श्रत्र पूर्वार्द्ध पूर्व पूर्व प्रति उत्तरोत्तरस्योपकारत्त्वं तथा उत्तरार्दै उत्तर उत्तरं प्रति पूर्वपूर्वस्योपकारत्त्वम् । सहोक्तिस्तुन्यकालत्यकथनं वस्तुनोः क्वचित् । ग्रीप्मे सह विशुष्यन्ति जलानि कमलश्रिया ॥७॥ हेतुः कार्यासमानाधिकरण्यमन्यदेशता । त्वं पद्भ्यां गतवांस्तत्र खेदो मां समुपागतः ॥७६।। यत्र हेनुकार्ययोरसमानाधिकरण्यं भवनि स अन्यदेशत्वं नामालङ्कारः। उत्तरार्द्धमुदाहरणम् ॥ विशेषोक्तिस्तु कार्यस्याभावः सत्यपि कारणे । कृतेऽपि शीतलोपाये तापः शान्तो न सुभ्र वः ॥७८ विनापि कारणं कार्यसमुत्पत्तिर्विमावना । अप्यनामरणं माति वपुर्वामशः किल ७६।। • ७. तमश्लोकम्य प्रतिद्रयेऽप्यनुपन्धिः ।

. -- ६६ ] कवि-विद्याराम-विरचिता भेदा विभावनायास्तु वहयोऽन्यत्र दर्शिताः । एवमन्येप्यलङ्काराः केचिदेप्पसंगताः ।।८०|| वालानामवयोधाय सुखेन मृदुवर्त्मना । एते प्रोक्तास्त्वलङ्कारशेखरस्यानुसारतः ॥१॥ इत्यलङ्कारनिरूपणम् ॥ अथ गुणा निरूप्यन्ते- काव्यस्य महनीयत्वाधायकाः सम्मता गुणाः । गुणींनो हि विक्षिप्तः सालङ्कारोऽपि कथ्यते ॥२॥ सामान्यतो गुणा: प्रोक्ता द्वधा शब्दार्थयोः स्थिताः । तेष्वन्यान्तः प्रवेशेन द्वयो पञ्च तथाऽब्धयः१ ॥३॥ गुणा द्विविधाः शब्दगुणा अर्थगुणाय । तन्त्र वेपु वक्ष्यमाणेषु अन्य- .गुणानां प्रवेशेन शब्दगुणाः पञ्च अर्थगुणाश्चत्वारः, ते यथोक्ता अलङ्कार- शेखरे- 'संक्षिप्तत्वमुदासत्वं प्रसादोक्तिसमाधयः । अत्रैवान्यसमावेशात् पञ्च शब्दगुणाः स्मृताः ।। इति ।। तत्र संक्षिप्तत्वं नाम- संक्षिप्तचं तु भूयोर्थकथनं स्वन्पपर्णतः । दचाऽशिपो गृहीत्वार्थ नचा सर्वान् स निर्ययौ ॥४॥ विशेषणानां यत् श्रेष्ट्यमुदात्तत्वं तु तत्स्मृतम् । लसत्पावनाकीणं जलं वियोततेऽमलम् शा प्रसादो यत्र पठनादर्थः स्फुरति तत्क्षणात् । मामणान् भोजयामास स भक्त्या घृतपायसः ॥८६॥ उक्ति पणचातुर्य तापवियोधकम् । ननु कार्ये स्त्वयं दतो भुङ सम्यक् सदा सकृत् ॥८७|| १-चत्वार. (स) ..

६७
रमदीपिका
अत्र दक्षत्त्वे पृष्टे सति दक्षोऽस्ति वा नास्ति इत्युत्तरे कर्त्तव्येऽसकृन्
भुक्त इत्युक्तिचातुर्याभोजने एव दत्तो नान्यत्रेत्यर्थोऽवबुद्धयते ।
समाधिधान्यधर्माणामन्यत्राऽरोपणं स्मृतः ।
तीला नीलाम्बुजस्यास्या गादत्ताननं विधोः ॥८॥
भत्र ग्रहणात्मकश्चेतनधर्मः अचेतनयोईगाननयोरारोपितः।
इति शब्दगुणाः॥
अथार्यगुणाः । यथाऽहुः-
'भाविकचं सुशब्दत्वं पर्यायोक्तिः सुधर्मिता ।
चचारोऽर्थगुणाः प्रोक्ताः परे त्वत्रैव सङ्गताः ॥ इति ॥
.
भाविकत्वं स्वयंदात्यं स्वाभिप्रायप्रकाशकम् ।
पान्य ! विश्रान्तिकालोऽयं विष्ठ शून्येऽत्र कानने ।।६।।
सुशब्दचं तु तज्ज्ञेयं रेऽर्थेऽङ्करशब्दता ।
स तु देवातिथि तोऽप्यन्यो भवितुमुद्यतः ॥९॥
अत्र मृत इति वक्तव्ये देवातिथिरिलि सुशब्देन कथनम् ।।
पर्यायोक्तिस्तु सा तत्तत्क्रमाख्यानं हि वस्तुनः ।
प्रादौ रक्तस्ततः पीतः श्वेतश्योधनभूच्छशी ॥१॥
सुमिता विशेष्यस्य लामो यत्र विशेषणैः ।
उदश्चति तमो मिन्दन्नयं कुमुदशोककृत् ।।२।।
इति अर्थगुणाः ॥
अथ दोपनिरूपणम्-
दोपाः काव्ये परित्याज्यास्ते रसप्रतिबन्धकाः ।
त (य) था हि कर्करै मिश्रं न भक्त स्वदते मृदु ॥३३॥
गुणवानपि दोपाणां बाहुल्यादगुणो भवेत् ।
गुणो मुख्यः स एवास्ति दोपाभावः किलात्र यः ॥१४॥

६] । + कवि-विद्याराम-विरचिता पददोपा वाक्यदोपा अर्थदोपाश्च ते विधा। पदे कटादयोऽन्यत्र न्यूनाद्या विरसादयः ॥६॥ अन्यत्रेति वाक्ये न्यूनादयः । अर्थे विरसादय इत्यर्थः । ते यथोता अलङ्कारशेखरे । तत्र प्रथमं पददोपा यथा--- 'असाप्रयुक्त संदिग्धव्यर्थाश्लीलाऽप्रतीतिकाः । असाध्ववाचकौ दोषाः पदेऽष्टादेव नाऽपरे' ।। इति ।। तत्र कष्टं नाम- कप्टं कर्णकटु ज्ञेयं दुःकरोचारवर्णवत् । अम्माउHथ गृहं श्रेशं काय येन हि द्रवः ॥६६॥ अत्र सम्मामि श्रेशं कार्ताय द्रवै इत्यादिपदानि कष्टानि अग्नयुक्त बुधैर्युक्तमपि कापि न चाहतम् । यं भवान् भजने हन्ति देवतो मेऽस्त्यसौ परः ।।६७| अत्र हन्तेर्गत्यर्थो दैवतशब्दस्य च पुल्लिङ्गप्रयोगः शास्त्रसिद्धोऽपि कुत्रापि कविभिर्नाहतोऽतो न प्रयोक्तव्यः । सन्देहं कुरुते यत्तत् संदिग्धमिति कथ्यते । न येन प्रापसे तात सहसार्थः किमस्यते ॥६॥ अत्र न येन सहसार्थः इति सन्दिग्धपदम् । हे तात ! त्वं येन सह न प्रापरे नाम न गच्छसि ते तस्य सार्थः किं नाम स्मिर्थमित्यर्थः । पादसम्पूर्तये उक्त र व्यर्थ यचाप्रयोजकम् । सुकविस्तु पदं व्यर्थ नैव बध्नाति हि ध्रुवम् ॥६६॥ अत्र तु वै हि ध्रुवमिति पदानि व्यर्थानि । निन्द्यामद्रादिभानं यत्तदश्लीलं पदं मतम् । दुःखसंतानहंत्र्यस्य यत्र विष्टाधिपस्य हक् ॥१०॥ अत्र संताननीति विपाधिपस्येत्यश्लीलम् ॥ अत्रैवं व्याख्या । अस्याधिपस्य दृक् यत्र प्रविणा भवति तस्य दुःखसमूहनाशका भवतीत्ययः ।। १-(ख) लिया। २--() युक्त।

रसदीधिस [६६ शास्त्रमात्रमसिद्ध यदप्रतीतं तदुच्यते । पायात् खाटविपाटाटनगारि पभाट कुलम् ॥१०१॥ अत्र खाटः सूर्यः विपाटः विष्णुः श्रटमगारिरिन्द्रः दृपभाट् शिवः इत्यादयः शब्दाः शास्त्रमावासिद्धाः न प्रयोक्तव्याः।। बच्छास्त्रोक्तविरुद्धं तदसाधु प्रविकीर्तितम् । तस्याश्चञ्चलकपातात्कामं मे पद्धति क्षणात् ।।१०२।। अत्र काममिति कामशब्दस्य नपुंसकता तथा पर्द्धतौति बर्द्ध (वृधु ) थातोः परस्मैपदता शास्त्रविरुद्धा। अवाचकं तु तज्क्षेपमप्रकृतार्थवाचकम् । स्मराम्यश्चद्वपुः कान्ति लक्ष्यां तां वामलोचनाम् ॥१०३|| अत्र लक्ष्यामिति प्राम्यस्त्रीवाक्कादप्रकृतार्थवाचकः लतितुं योग्या लक्ष्या दर्शनीया इत्यर्थः । प्रकृतार्थस्तु तिरोहितः ।। इति पदोपाः ।। अथ वाक्यदोपाः । तत्र सामान्यतो वाक्यदोपास्तु- पादादी न प्रयोक्तव्या हिस्मवैनुचवाकिला: 1. फुल्यवेवायो नाक्य तथा दुर्जेयकार्थता ॥१०॥ विशेपदोपा ययोक्ता अलङ्कारशेखरे-- न्यूनं विसन्धिव्याकीणं समाप्तपुनरातकम् । भग्नक्रमयतिच्छन्दो वाक्यगर्भमरीतिमत् ॥१०॥ अविमृष्टविधेयांश समुद्रापार्यवर्जितम् । विरुद्धमतिकद्वाश्ये दीपा द्वादश कीर्तिताः ।।१०६॥ इति ।। न्यूनं तत्रान्ययज्ञानविधायि पदशन्यता । गृहं त्यक्त बने रकं नक्तं भुक्तं मुदुःखिनाः ॥१०७|| १-(ब) वाचकाः।

७० कवि-विद्याराम-विरचिता अत्र गृहं त्यक्तमित्यादौ अस्माभिरिति नत मुक्तमित्यस्यान्ते इति वयमिति पदानि अपेक्षितानि तदभावान्न्यूनमिति दोषोऽस्ति । विसन्धिः सन्ध्यभावोऽथ विरुद्धः सन्धिरेव च। द्विविधः प्रथमस्तत्र स्वैच्छिकरच प्रगृह्यजः ॥१०८।। ऐच्छिकः सन्ध्यभावस्तु सकृदप्यतिदोपकृत् । प्रगृह्यादिकृतस्त्वेप बाहुल्येनैव दोपकृत् ।।१०६।। विसन्धिविविधः सन्धेरभाषस्तथा विरुद्धसन्धिः तत्राद्योऽपि द्विधा, कविना स्वेच्छाकृतः। अथ प्रगृह्यादिकृतः नाम प्रकृतिभावादिकृतः । तत्र स्वेच्छाकृतस्तु एकवारमपि कृतोऽतिदुष्टः, प्रकृतिभावादिकृतस्तु वारं वारं कृतो दुः। उभयोरप्युदाहरणम्- तात एकेन इपुणा भिन्धि एनं समुद्धतम् । पश्य प्रौढा इभा उच्चा अमी एतेन पातितमः ११०॥ "मैदा विरुद्धसन्धेस्तु चत्वारः सन्ति विश्रुताः । अश्लीलकप्टोपहृतविसर्गातविसर्गकाः" ॥१११॥ विरुद्धसन्धिश्चतुर्विधः, अश्लीलः, कष्टः, उपहतविसर्गः लुप्तविसर्गश्च, चतुर्णामप्युदाहरणम- प्रातरिन्दुरिवास्यास्यं भूयुद्धान्तो भयादसी। कथं ते रभसा यातो धीरा वीरा भटा हि ते १ ॥११॥ व्याकीणं च्यवधानेन दूरगो यस्य चान्ययः । वृन्दावनं हरि शीघ्र गत्या प्रीत्याधुना भज ॥११२॥ अत्र वृन्दावनं गत्या, हरि भजेत्यन्वयो व्यवहितोऽस्ति । १-(ब) मटायते।

[७१
रसदीपिका
समाप्तौ मुख्यवाक्यार्थबोधे जातेऽपि यत्पुनः ।
उपा तद्धि विज्ञवं समाप्तपुनरात्तकम् ॥११३॥
वाक्यसमाप्तौ मुल्यवाक्यार्थबोधे सत्यपि पुनस्तद्वाक्यस्यैव पदोपादानं
समातपुनरातकनामा दोपः।
यथा-
रमणीयतमं सर्वमस्या मृगशो वपुः ।
अहो विधातुर्विज्ञानशिन्यं परिणतं चिरात् ॥११४॥
अत्र चिरादिति समाप्तपुनरात्तकम् विधातुर्विज्ञान-शिल्पं परिणतमिति
मुख्यसमातापि पुनरादानात् ।
भग्नक्रममुपक्रान्तकमत्यागोऽपरक्रमः ।
भूरिदानं प्रयच्छास्मै प्रतापस्ते रवः समः ॥११॥
यत्र उपक्रान्तशब्दक्रम वार्थक्रम मुक्त्याऽन्यक्रमोपादानं स भग्नक्रमाख्यो
दोप । तदुदाहरणमत्रोत्तरार्द्धम् ।
यतो शब्दविभागो यत्तद्भग्नयतिकं स्मृतम् ।
नमस्तस्मै सदा नारायणाय कुरुसत्तम ॥११६॥
भग्नछन्दस्तु तज्ज्ञेयं यच्छन्दोभङ्गसंयुतम् ।
वंदेऽहं श्रीजानकीशं रुक्मिणीनाथमन्वहम् ॥११७॥
अत्र जानकीशमिति जा इति पञ्चममक्षरं लघु भवितुं योग्य 'सर्वत्र लघु
पञ्चममि' त्यनुशामनान् ।।
असमाप्तस्य वाक्यस्य मध्ये वास्पान्तरस्य यः ।
प्रवेशस्तन विज्ञेयं वाक्यगर्भ कारवरैः ॥११॥
पोऽयं तव शक्तिरचेद्रनं नीयते मया ।
यशसा ते निरी (च) स्त्र जगद्व्याप्तं पराचरम ॥१२॥

७२ ] कधि-विद्याराम-विरचिता अत्र वाक्यमध्ये तत्र शक्तिश्चेद्रनैनमिति तथा च निरीक्षस्नेति यात्यान्तरप्रवेशन वाक्यगर्भम् ॥ मुक्त्वा गतिमुपक्रान्तां प्रवृत्तिस्तदरीतिमत् । मेधा वर्षन्ति तडितश्नत्तन्ति स्निह्यते मया ॥१२०॥ सकारतां रीतिं मुक्त्वा यान्यरीत्या प्रवृत्तिस्तत् अरीतिमत् यथा मेघा वर्षन्ति इत्यादी प्रथमान्तकन्युपक्रम मुक्त्वा मयेति तृतीयान्तकर्तृ ग्रहणं श्ररीतिमत् । प्राधान्येन विधेयस्य निर्देशो पत्र नो भवेत् । अविमृष्टविधेयंशाभिधानं दूपर्ण हि वन ।।१२१॥ यथा- वचोऽमृतेन ते तुल्यं दृष्टिः स्नेहेन सम्भृता । पुप्पतुल्यस्वभावचं सुतरां तब वर्गते ॥१२२॥ अत्र पुष्पैस्तुल्यः स्वभावस्ते इति वक्तव्ये समस्तपदं यत्कृतं तत् अवि- मृष्टविधेयांशम् ।। स्वभावमुद्दिश्य पुष्पतुल्यत्त्वं विधेयं तच्च समासप्रयितया प्राधान्येन न निर्दितम् ।। 'विरुद्धोक्तिस्तु प्रस्तावात् समुदायार्थवर्जितम् । यथा- नृत्यन्तं स्वागणे मिनु' जीर्णपकलपादुक्म् । थपृच्छत् कामुकः श्रीमन् ! हिंग्याः कोऽर्थोस्ति वारिपु ॥१२३।। विरुद्धां कुरुते बुद्धि विरुद्धमतिकृत तत् । अकार्यमित्रं कृष्णोसावेको गाण्डीवधन्वनः ॥१२४॥ अवाकार्यमिति निर्व्याज मित्रमित्यर्थे अत्यमित्रमिति विरुद्धबुद्धिं च फरोतीदं यास्यम् ।। इति याम्यदोपा ।। १-(स) रीनिमुपान्तामतिम्तदरीतिमत् ।

[७३ रंसदीधिको यथार्थदोपाः, ते च तत्रैवोक्ताः, यथा- अष्टार्थदोपा विरसग्राम्यव्याहतखिन्नताः । हीनाधिकासहक्साम्यं देशादीनां विरोधि च ॥ इति तत्र- विरोधिरससन्दर्भाद्विरसं रसहानिमत् । रुदन्ती पुत्रनाशार्चा प्रियोऽचुम्बन्मुखे प्रियाम् ॥१२॥ अन कमणशृङ्गारयोविरोधाद्विरसम् ।। ग्रामीणजनवद् योक्तिस्तद्ग्राम्यं परिकीर्तितम् । उत्क्षिप्य चरणौ वाले दर्शय स्वास्ति कण्टकः ।।१२६।। व्याहतं तद्धि विज्ञेयं यदुपात्तविरुद्धकम् । कमलं निर्मलं कान्ते त्वच्चतुरिव शोभते ॥१२७॥ अत्र कमलं यद्भवति तनिर्मलमिति विरुद्धकथनं व्याहतम् ॥ अपुष्टं खिन्नमित्युक्तं साधारणनिरूपणात् । भुजे खड्गोऽस्ति ते तुल्यः तितौ शूरो परो न तत् ॥१२८|| अत्र भुजे खड्गस्तु सर्वेपा भवत्येव एतावता किमधिकशूरत्वम् । हीनोपमं तु तन्नेयमुत्तमस्याघमोपमा । त्वयेश पालिता लोकाः कुकु दैनैव तत्वुलम् ।।१२६।। तत्युसं कुफुटकुलम् । हीनस्योत्तमसाम्यं यज्ञयं तदधिकोपमम् । ऐरावत? इसाऽभाति तवाङ्गणगतः खरः ॥१३० ॥ असादृश्योपमानं तत् यत्किलासदृशोपमम् । सस्फुलिङ्गो विभात्यग्निमेंघः शीकरवानिव ॥१३१।। १-(ब) उच्चैःश्वा ।

७४ ] कवि-विद्याराम-विरचिना देशकासययोऽवस्थाप्रभृतीनां प्रतीयते । मेदो यत्र विरोधेन तद्देशादिविरोयिकम् ॥१३२॥ यथा- चैत्रे रबौ चएडकरे हिमाम्भः कणोमभावे मरुपल्लऽम्भः । पातुं गतं बालकमत्तनागकुलं तटस्थाः शमिनो निननुः ॥१३३॥ अत्र चैत्रे इति कालस्य, मरुपल्वले इति देशस्य, मत्त इति वयसः,शमिन इति अवस्थाया विरोधः॥ इत्यर्थदोपाः ।। दोपाणां हि रसोत्पत्तिप्रतिबन्धकता यदा। तदेव दोपता तेषां सा न चेन तदा हि सा ।।१३४॥ सा नाम रसोत्पत्तिप्रतिबन्धकता चेन्न तर्हि तेषां दोपाणां सा नाम दोपता न भवतीत्यर्थः ।। तदुक्त हि- अलङ्कारे गुणे दोपे रसे या काव्यसम्पदाम् । प्रतीतिरेव विदुषां प्रमाणमवसीयते ॥१३॥ दोषाणामप्यदोषच केचिद्विपयेपु हि । कविभिः कथितं पूर्वैरन्यतस्तनिरीक्ष्यताम् ।।१३६|| यथोक्त हि--- "अनुप्रासेपु नौ कष्ट रलेपादौ नाप्रयुक्तता । मिपस्तुती न संदिग्धं न व्यर्थ यमकादिपु ॥ १ ॥ नाश्लील भगवत्यादौ तद्विद्य नाप्रतीतिकम् । नासाद्यनुकृता नापि लक्षणायामवाचकम् ।।२।। इति पददोपेषु ॥ १-मैव विद्या यस्य तस्मिन् ।

[७५ रसीर्घिका . अथ वाक्यदोपेपु- प्रतीत्यत्राधान्न न्यूनं पदमेदैविसन्धि न । न व्याकीणं तु साकांक्षे नान्यवास्ये समाप्तता ॥ ३ ॥ समस्ते यतिमङ्गो न बावादा' नार्थवर्जितम् । विरुद्ध न तथा वाच्ये विरसं न प्रधानके ॥ ४ ॥ न व्यर्थ नर्मणि ग्राम्यं रसहानेरयोगतः । तत्र तत्रामिधातव्ये तथानुकरणादिपु ॥ ५ ॥ उन्मत्ताद्यमिधाने च कोऽपि दोपो न विद्यते । तथा- तदर्थातिशये शैघ्ये दैन्ये कोपेऽवधारणे । विपादे विस्मये ह पुनरुक्तं न दूप्यति ॥ ६ ॥" इति दोपनिरूपणम् ।। शब्दार्थयोः सममलङ कृतिमिः स्वरूप संक्षिप्तमित्यभिहितं गुणदोपयोश्च । काव्यस्य निर्मितिविधेषिधिरस्ति योऽभ्यः सोऽन्यत्र वीच्य सुधिया स्वधिया विभाव्यः ॥१३७॥ अप्यन्यः काव्यनिर्माणसम्प्रदायोऽस्ति विस्तृतः । सोऽन्यग्रन्थेषु वालोक्यः कविकल्पलतादिपु ॥१३॥ संक्षेपतो हि पालानां श्लोकनिर्माणहेतवे । इति प्रसङ्गतः काव्यव्यवस्थापि निरूपिता ।। १३६ ॥ दृति काव्यत्ययस्थानिरूपणम् ।। रमादिप्वप्रयत्नेन चालव्युत्पत्तिहेसवे । विद्यारामेण विमला कृतेयं रसदीपिका ॥ १४ ॥ १-यातरोगादि उपमुष्टे श्रादि शहाद्विग्हादयी प्राधाः ।।

७६ ]
कपि-विद्याराम-विरचिषा
मुखावरोह रमणोपयन्धः
सोपानकैः पञ्चभिरच्छपद्य:।
विनिर्मितायां रसदीपिकायां
रसान् सुखं सत्पुरुषा रसन्तु ॥ १४१ ॥
पसुजाख्ये ग्रामे प्रथमममदाबादनिकले
निवासो यस्यासीचदुदयपुरेग्नन्तरमथो ।'
ततश्च श्रीकोटाभिधनगर आजीवनवशा-
दिमं विद्यारामः स किल सुभगं ग्रन्थमकरोत् ॥१४२।।
अपि च-
तातो यस्याभिजातः सहृदयहृदयो वेणिरामाभिधानो
गीर्वाणाचार्यदेश्योव्रजपतिरिति यत् तात्तातोऽथ चाभूव।
भट्टो यस्यावटको विशलनगरजब्राह्मणेपु प्रसूति-
विद्यारामेण तेनोदयपुरगृहिणा निर्मिता दीपिकेयम् ।।१४३॥
पड्व्योमाद्रिमहीमिताङ्कगणिते संवत्सरे वत्सले
ज्येष्ठस्यासितसप्तमीभृगुदिने कोटाभिधाने पुरे।
एनां सज्जनरञ्जनाय परितः पूर्णा रसर्दीपिका
विद्यारामकविः स्वयं सुललितां पर्याप्तरूपां व्यधान ॥१४४।।
अणुमपि गुणजालं ये प्रहप्यन्ति दृष्ट्या
सुनियतममुना ते हमेष्यन्ति सन्तः ।
मम किमु विधुरं चेत्पामरा न प्रसन्नाः
प्रकरति तु पुरैपां दुजनत्वं हि तेन ॥१४॥
अपि च-
इममभिनयबन्धं मत्प्रवन्धं निरीक्ष्य
सहृदयसुहृदो ये ते भविष्यन्ति हृष्टाः ।
न यदि पुनरस्यादुपिताश्चेत् प्रसन्मा-
स्तदपि भवति तेषां यावदाश्चर्यमन्तः ॥१४६॥

[७७
रसदीपिका
श्रथास्य प्रग्यस्यानुक्रमणिका-
मङ्गलाचरणं पूर्व प्रतिज्ञा प्रार्थना ततः ।
ततश्च रससामान्यलचर भावलक्षणम् ॥ १४७ ॥
स्थायिभावविभावानुभावानां लक्षणान्यतः ।
स्वरूपलक्षणाद्य क्तिः सात्यिकव्यभिचारिणाम् ॥ १४८ ॥
शृङ्गारे रतिमायोक्तिर्नायिकामेदवर्णनम् ।
नायकानामथो भेदकयनं हाववर्णनम् ।। १४६ ।।
विप्रलम्भस्य कथनं दशावस्थानिरूपणम् ।
ततो हास्यादिमायान्तरसानां वर्णनं क्रमात् ॥ १५० ॥
ततो भक्तिरसस्योक्तिर्व्यवस्था रसभावयोः ।
निरूपणं ततश्चात्र रीतिवृत्योः सुविस्तरात् ॥ १५२ ॥
ततः काव्यव्यवस्थायां शब्दार्थविनिरूपणम् ।
सन्दर्भोक्तिस्ततो मादिगणरूपनिरूपणम् ॥ १५२ ।।
अलङ्कारा गुणा दोषास्ततश्चोक्ता अनुक्रमाद ।
नामनामादिकथनं तातज्ञात्योस्तथा कवेः ॥ १५३ ।।
समाप्तः कयनं पश्चाद्वर्षमासादिकोक्तिमिः ।
सज्जनस्याथ दुष्टस्म स्वभवोक्तिस्ततः परम् ॥१५४॥
अनुक्रमोक्तिरेतस्य ग्रन्यस्यात्रास्त्यबन्तरम् ।
प्रार्थना विदुषां पश्चात् कृष्णायवत्समर्पणम् ॥ १५॥
एते ग्रन्येध घृचान्ता वर्गन्ते विनिरूपिताः ।
संपादप्रयत्नेन घालव्युत्पचिहेतवे ॥ १५६ ॥

७] " कवि-विद्याराम-विरचिता युक्तं स्याद्रचितमिहावाप्ययुक्त सोढव्यं तदखिलमेव सूरिभिमें । अन्येषां गुणमणुमप्युदुच्चचिंताः केप्युच्चैस्तरमभिकुर्वते हि सन्तः ॥१५७|| परोपकाराय मया निबद्धा मनोरमा या रसदीषिकेयम् । विनिर्मितौ स्यात् सुकृतं यदस्या-. स्तदस्तु कृष्णार्पणमक्षयं मे ॥१५॥ इति रसदीर्घिकायां काव्यव्यवस्थानिरूपणं नाम पञ्चमं सोपानम् ।। समाप्तोऽयं ग्रन्थः ग्रन्थस्यास्त्र (स्य) श्लोक संख्या ।। ६२४ ।।* * (ख) इति श्रीरसदीपिकायां च्या (काव्य) च्यवस्थानिरूपण नाम पंचमं मोपानं ॥ समाप्तोयं ग्रन्थः ॥ लिखितमेत पुम्नं द्यौ साविवासिना गोडवाहणेन मुधिया- ऽमररामेण महानंदपाटकस्य पौषकृष्ण चतुर्ध्या सोमवासरायां ।। जयपुरमध्ये ॥ ॥ श्रीर्मवतु ।। ॥ ॥

परिशिष्टम्
श्रीमद्भागवते .दशमस्कन्धान्तर्गता ३४ अध्याये
शङ्खचूडयक्षकथा
कदाचिदथ गोविन्दो रामश्चाद्भुतविक्रमः ।
विजयने राज्यां मध्यगौ व्रजयोंपिताम् ॥२०॥
उपगीयमानी ललितं स्त्रीजनैद्धसौहदैः ।
स्त्रलङ कृतानुलिप्ताङ्गो स्रग्विणी विरजोऽम्बरे ॥२१॥
निशामुखं मानयम्ताबुदितोडपतारकम् ।
मल्लिकामन्धमत्तालिजुष्टं कुमुदवायुना ॥२२॥
जगतः सर्वभूतानां मनः श्रवणमङ्गलम् ।
तो कल्पयन्तौ युगपत् स्वरमण्डलमूर्च्छितम् ।।२३।।
गोप्यस्तद्गीतमाकण्यं मूछिता नाचिदन् नृप ।
संसद्दुकूलमात्मानं सस्तकेशस्त्रजं ततः ॥२४॥
एवं विक्रीडतोः स्वैरं गायतोः सम्प्रमत्तवत् ।
शङ्खचूड इति ख्यातो धनदानुचरोऽभ्यगात् ।।२।।
तयोनिरीक्षतो राजस्तनाथं प्रमदाजनम् ।
क्रोशन्तं कालयामास दिश्युदीच्यामशङ्कितः ।।२६।।
कोशन्तं कृष्ण रामेति विलोक्य स्वपरिग्रहम् ।
यथा गा दस्युना प्रस्ता भ्रातरावन्यधावताम् ॥२७॥
मा भप्रेत्यभयारावी शालहस्ती तरस्विनौ ।
थासेदतुस्तं तरसा त्वरितं गुह्यकाधमम् ॥२८॥

201
परिशिष्टम्
स वीक्ष्य तावनप्राप्ती कालमृत्यू इयोद्विजन् |
विसृज्य स्त्रीजनं मूढः प्राद्रवज्जीवितेच्छया ।।२६।।
वमन्वधावद् गोविन्दो यत्र यत्र स धावति ।
जिहीपुस्तच्छिरोरलं तस्थौ रक्षन् स्त्रियो बलः ॥३०॥
अविदूर इवाभ्येत्य शिरस्तस्य दुरात्मनः ।
जझर मुष्टिनैवाङ्ग सहचूडामणि विभुः ॥३२॥
शङ्खचूडं निहत्गवं मणिमादाय भास्वरम् ।
अग्रजायाददात् प्रीत्या पश्यन्तीनां च योषिताम् ॥३२॥

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Rasdeerghika

Author
Vidyaram, Kavi
Title
Rasdeerghika
File name
Rasdeerghika
Text
OCR done
Citation
1959
Published
2011/08
Publisher
Jaipur, Durgapura, Shri Balchandra Yantralay
Language
Sanskrit
Pages
110
Library
Acharya Shri Vinaychandra Gyan Bhandar, Jaipur
DLI number
314054
Barcode
99999990312206.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
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