Adarsh Library, Jaipur
Ek Chithda Sukh
Front matter
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एक चिथड़ा सुख
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एक चिथड़ा सुख निर्मल वर्मा
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There is always a part of man that refuses
love. It is the part that wants to die. It is
the part which needs to be forgiven.
प्रल्बेर काम्यू
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एक ਚਿਧਵਾ
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१ "ग्राउ सुबह के वक्त कोई नहीं पाता था। यह उसे अच्छा लगता था। वह अपने कपडे उतार देता–सिर्फ अण्डरवियर पहनकर छत पर चला आता । लेट जाता। लम्बी-लम्बी सांसें खीचने लगता । हवा उमके फेफडो में घूमने लगती। रात की बची-खुची नीद उन सांसो में वह जाती। "तुम फिर नंगे बैठे हो !" भीतर मे प्रावाज सुनायी देती। 'मैं वजिश कर रहा हूँ।" ।" पता नही चलता, वह सोते हुए कह रही है या सचमुच जाग गयी है । मजाक मे वह उसे 'प्राइ,' कहती थी-जव उसकी बेवकूफियो से तग आ जाती थी। छत पर नगे लेटना सचमुच पाड पन था। पर उसे यह अच्छा लगता था। वह लेटा रहता और भीतर सन्नाटा छाया रहता। वह रात को देर मे लौटती थी। कभी अकेले, कभी दोस्तो के साय । लेकिन वे ज्यादा देर नहीं ठहरते थे । अपना थियेटर का सामान कोने मे रख देते, खडे- सडे कॉफी पीते-फिर अंधेरे मे गायब हो जाते । वह सो रहा होता था। बीच में जाग जाता, फिर सो जाता। कभी-कभी डरी भी आते थे, डायरेक्टर, लेकिन सब उन्हे डेरी कहते थे, वह उसके माथे पर हाथ रखते और तकिये के पास बैठ जाते। उनकी लम्बी दाढी उसे सपने में भी दिखायी देती थी। वह उससे वोलते थे और वह ऊंघता हुआ हूँ-हाँ करता रहता । वह सबसे बाद में जाते थे-विट्टी उन्हे नीचे जीने तक पहुँचाने जाती थी। फिर दरवाजे की सांकल चढाई जाती, फिर डरी अपना स्कूटर स्टार्ट करते। बहुत दूर तक यह उसकी इंजन की गडगडाहट मुनता रहता। सबसे छुट्टी पाकर विट्टी कमरे में पाती। कमरे में प्राते ही उसे चूमती थी, उसके मुंह को-और फिर उसके बालो को-और तब उनै गुदगुदी-सी होने गती और वह हंसने लगता । विट्टी कपड़े उतारकर उसके पास ही लेट ज बरसाती का दरवाजा खुला रहता-हवा में हिलता रहता। वे मार्च के दिन थे और हवा दिन-रात चलती थी। "पता है, कितना टाइम हुआ है ?" वह दरवाजे पर आकर खड़ा हो गया। "सव पता है, मुझे सोने दो।" "वाद में मुझसे मत कहना कि जगाया नहीं।" वह ज़रा-सी हिली। नींद की यात्रा में वह घिसटते हुए अपने बिस्तर से उसके बिस्तर तक चली आती थी। जब वह यहां आया था, तो उसे काफी धक्का-सा लगा था कि विट्टी फर्श पर सोती है । इलाहावाद के घर में सबके अलग अलग पलंग थे। सिर्फ नौकर फर्श पर सोता था। अव वह खुद फर्श पर सोने लगा था । अव उसे कोई परेशानी नहीं होती थी। . . अभी नहीं उठेगी, उसने सोचा । वह उसके उठने के आसार जानता था। उठते ही आधी नींद में वह रिकार्ड लगाती थी-कोई-सा भी रिकार्ड जो बहुत धीमा हो-फिर तकिये के नीचे से सिगरेट का पैकेट निकालती थीं। वह भाग- कर रसोई से माचिस लाता था। हर रोज़ धड़कते दिल से पूछता था-"विट्टी, मैं जलाऊँ ?" और वह उसका हाथ पकड़ लेती थी और तब तक पकड़े रहती थी जब तक तीली की लो उसकी उँगलियों तक नहीं सरक आती थी । वह उसे वहीं छोड़ किचन में भाग जाता था। वह एक छोटे कद का लड़का था, दुबला-पतला, विट्टी का कज़िन । विट्टी के दोस्त उसे इसी नाम से बुलाते थे । जव स्टूडियो में रिहर्सल खत्म हो जाता और शाम खाली होती तो उनमें से कोई जरूर कहता था, "लेट अस गो टुक कज़िन्म ।" और वे विट्टी को वरसाती में चले पाते, बियर पीते, काफी शो मचाते और तब तक जमे रहते जब तक विट्टी उन्हें बाहर नहीं निकाल दे थी। वह किचन में चला पाया।"स्टूल पर खड़ा होकर बाहर देखने लगा।
1 - . क्षण कुछ भी दिखायी नहीं दिया। मार्च को हल्की धुन्ध पर सिर्फ एक गुम्बद दिवायी देता था-पेडो के ऊपर अटका हुआ । वह उन खंडहरों का हिस्सा था, जो मकानों की पीठ से पीठ लगाये दूर तक चले गये थे। पहले दिन जब यहाँ पाया था तो उसे बहुत हैरानी हुई थी । दिल्ली भी कंमा शहर है । मुर्दो के टीलों तले लोग जिन्दा रहते हैं। पानी उबलने लगा । उसने जल्दी से केतली नीचे उतार दी, पती डाली और स्टूल मे नीचे उतर आया। पीछे मुडा, तो बिट्टी बैठी थी, चीज़-क्यूव को कुतर रही थी, गिलहरी को तरह । प्राख भी उसी तरह घूम रही थी। "मुनो..." उसने कहा, "मैं आज हो तुम्हे इलाहाबाद भेज दूंगी।..." "क्यों?" "ऐसे ही । मैं अकेले रहना चाहती हूँ। तुमसे तंग भी आ गयी हूँ।" वह उसके पास आया, उसके हाथ मे चाय का कप दिया और अपना कप लेकर वहीं बैठ गया, फर्ग पर, मिट्टी के पैरो के 'दया मैंने तुम्हें जगा दिया? कल से मैं वजिश गुमलवाने मे करूंगा।" विट्टी उमके वालों में सेल रही थी । ध्यान कही और था, उँगलियां कही और । निगाहे कही न थी। वह उसकी छुअन से जान गया कि यह उमे नहीं सुन रही । वह अधिकांश समय नहीं सुनती थी। कई बार ऐमा होता था कि दोनो चुपचाप किचन में बैठे रहते थे । गरमाई में सिकुड़े हुए। विट्टी की वरसाती मे रमोई ही एक ऐसी जगह थी, जो इलाहाबाद की याद दिलाती थी। "माज क्या करोगे?" बिट्टी ने पूछा। "तुमने कहा था, मुझे रिहर्सल में ले चलोगी।" "माज बहुत लम्मा चलेगाऊब नहीं जायोगे ?" "मैं बाहर घूमता रहूंगा।" उसने कहा। वह घर में अकेला नहीं रहना चाहता था। दिन-भर विट्टी के साथ घिसटता रहता था, स्टूडियो मे, बंन्टीन में • जहाँ-जहां विट्टी जाती थी, वहां- वहाँ वह भटकता रहता । कभी मन उस जाता तो घर लौट पाता। विट्टी उसे चाभी दे देनी। किन्नु सीधा घर जाने के बजाय वह मकबरे के बाग में बैठ जाता। उन लड़कों को देखता रहता, जो घाम पर बैठे परीक्षाओं की तैयारी में जुटे रहते । अंधेरा होते ही चिमगादड उहने लगते-और वह जल्दी-जल्दी घर लौट प्राता। ताला बन्द रहता। कभी-कभी उमके बीच कागज का पुरजा फंसा होता ।
. ."मैं प्रायी थी-तुम नहीं थे । खाना बना दिया है-अगर देर से लौटी तो... खाकर सो जाना, बस । वह आखीर में 'वस' लिखना नहीं भूलती थी। वह विना दरवाजा खोले टैरेस पर लेट जाता। उसे कोई परीक्षा नहीं देनी थी। जब इलाहावाद में था, तो वाहर भी नहीं निकलता था। छाती के भीतर घुमड़न-सी होती थी-रात के वक्त सांस चढ़ जाती और वह औंधा होकर बैठा रहता। वावू मालिश करते तो धीरज मिलता । सांसें पटरी पर लग जाती। फिर विट्टी की चिट्ठी आयी थी---"इसे दिल्ली भेज दो। जब स्कूल नहीं जाता, तो जैसे वहाँ, वैसे यहाँ-कोई अन्तर नहीं।" नहीं, अन्तर वहुत था। यहाँ विट्टी मालिश नहीं करती थी। न रात को सांस चढ़ती थी। घर बहुत दूर था और विट्टी, जो इतनी पास थी, उसे अकेला छोड़ देती थी। उसे यह अच्छा लगता था कि कोई उसके आसपास नहीं मंडरा रहा-हालांकि वे एक ही बरसाती में रहते थे; फिर भी उसे पता नहीं चलता था कि वह क्या कर रही है, क्या सोच रही है। उन्होंने कमरे को दो देशों में बाँट लिया था-वीच में मूढ़ों का फरन्टियर था-एक तरफ विट्टी का विस्तर, दूसरी तरफ उसका । वे एक-दूसरे को देख भी नहीं सकते थे। वे सिर्फ सुन सकते थे । वल्कि यह कहना ठीक होगा कि वह विट्टी को सुनता था। वह अपनी सरहद में घूमती जाती और बोलती जाती-ऐसे शब्द, जो उसने पहले कभी नहीं सुने थे। कभी-कभी उसे भ्रम होता कि वह किताव पढ़ रही -किन्तु जब वह मूढ़ों के बीच झांककर देखता तो वह विस्तर पर लेटी दिखायी देती, छत की तरफ ताक रही होती, जैसे कोई आदमी ऊपर वैठा है और वह उससे बात कर रही है-बोल रही है, एक-एक शब्द को हवा से निकालकर खींच रही है-वह अपना सिर अपनी सरहद में खींच लेता । लेट जाता। "कैसा लगता है ?" विट्टी हमेशा पूछती थी। "तुम चीखती बहुत हो।" "मेरी आवाज़ आखिरी सीट तक जानी चाहिए।" "विट्टी- तुम जब स्टेज पर जाती हो, तो घबराती नहीं-इतने लोगों के सामने?" "मैं उन्हें देखती नहीं।" "किसी को भी नहीं देखती?" उसने कुछ हैरानी से पूछा । विट्टी सोचने लगती-और सोचने का मतलव होता-सचमुच सोचना, जैसे वह अपने भीतर के अंधेरे में बाहर का उजाला ढूंढ़ रही हो । एक छाया चेटरे १२ / एक चिथड़ा सुख । , बैठ जाती। उसने कभी किसी को ऐसे सोचते नहीं देखा था। न मां को, न बाबू को! वह सहम-सा जाता और अपना मुंह मोड लेता। एक बार वह सचमुच प्रातकित हो गया था। उस दिन उसे हल्का-सा बुखार चढ़ पाया था। दो कम्वलो मे लिपटकर वह ऊँघ रहा था। यों भी बुखार मे उमे सोने और जागने के बीच कुछ भी पता नही चलता था। तब सहसा कम्बल के अंधेरे में उसे एक कौध दिखायी दी थी--एक आवाज,न तेज, न धीमी- किन्तु एक जिद्दी-मी लय में जकडी हुई जैसे कोई धीरे-धीरे बारे में लकही रेंद रहा हो। कुछ देर सन्नाटा घिरा रहा। फिर उसने दुवारा वही आवाज सुनी- इस बार बिल्कुल पास से । एक गोल और गीली प्रावाज, पहिये की तरह घूमती हुई । यह रेंगता हुआ दूसरी सरहद तक सरक पाया -मूहों के बीच देखा-और देखता रहा। विट्टी अपने घुटनो पर बैठी थी । सामने एक डेस्क था जिस पर उसके हाथ थे, मुट्ठियो में भिने हुए । माथा डेस्क पर टिका था, वह उसका चेहरा नही देख सकता था। "विट्टी,..." उसने कहा। कुछ देर तक उसका सिर डेस्क पर टिका रहा-गर्दन पर भूरे बाल हवा में उड़ते रहे--फिर उसने अपना सिर उठाया। उसकी प्रौखें--प्रांखो के नीचे कपोल-चमक रहे थे । एक भीगी रोशनी में, जो सिर्फ पानी था-किन्तु चेहरे पर ढरककर जो रोदानी-सा दिखायी देता था। "तुम रो रही हो।" उसने कुछ ऐसे कहा, जैसे स्वय बिट्टी को उसके रोने की सूचना दे रहा हो। बिट्टी ने सिर हिलाया। "सचमुच नहीं।" विट्टी ने कहा, "मेरे पार्ट में रोना वदा है।" उमका ऊपरी होठ जरा-सा सिकुड़ गया, जैसे वह आधा मजाक हो, प्राधा सच.. "फिर क्या तुम्हारे भासू असली नही थे?" "तुम्हे वे बनावटी लग रहे थे ?" "बनावटी की बात नहीं लेकिन अगर तुम पार्ट में रो रही थी, तो वे असली कैसे हो सकते हैं ?" "यह मुश्किल नहीं है। मैं कोई बात मोचने लगती हूँ और वे अपने-प्राप चले माते हैं।"
। "कौन-सी वात?" "कोई भी।"उसने कहा। "क्या घर के बारे में?" वह उसकी ओर देखने लगती, जैसे वह किसी दूसरे ग्रह का प्राणी हो "कहाँ जा रही हो?" वह अपना विस्तर समेट रही थी। "मैं किचन में सोऊँगी।" जाने दो, वह सोचता, अगर इतनी-सी गत पर वह भन्नाकर जा सकती तो जाने दो। वह मिन्नत नहीं करेगा। लेकिन जब बिट्टी सचमुच अपना विस्तर एक हाथ में और कितावों का थैला दूसरे हाथ में लेकर जाने लगती, तो उसका दिल डूबने लगता। उसे एक और दुपहर याद आने लगती ; सदियों की धूप और इलाहाबाद का स्टेशन, जब वे उसे छोड़ने आये थे। वे सब वहाँ मौजूद थे, उसके पिता और विट्टी के मां-बाप, जिन्हें वह चाचा-चाची कहकर बुलाता था। सब प्लेटफार्म पर खड़े थे। तब दिल्ली सिर्फ एक दूर का शहर था, एक नाम,जहाँ विट्टी जा रही थी। वह अलग-थलग खड़ी थी । सलेटी रंग का कुर्ता और नीली,जीन्स पहने, एक ब्राउन खुला स्वेटर जो घुटनों तक आता था "भिखारियों से कपड़े पहनती है" पीठ पीछे चाची कहती थीं । भिखारियों की तरह ? नहीं, उसे इसकी कोई खबर नहीं थी । वह सबसे बेखवर खड़ी थी, एक हाथ में स्लीपिंग-बैंग का वण्डल, दूसरे में सूटकेस । वह कभी कुली नहीं लेती थी, चाहे प्लेटफार्म पर कितनी दूर ही न घिसटना पड़े। आज उसे लगता है, यह कभी बहुत पहले हुआ था, किसी पिछले जन्म में- इलाहावाद की दुपहर, स्टेशन, विट्टी का सूटकेस- और चाची-वह विट्टी की आँख बचाकर रो रही थीं। । । । - वह बाहर लेटा था। बिट्टी गुसलखाने में थी। पानी आ रहा था। वह कपड़े धोने का दिन था। जब बुखार नहीं आता, तो वह खुली छत पर चला आता था। असली छत भी नहीं-सिर्फ हथेली-भर का टैरेस, जो वरसाती के मुंह से एक लम्बे दाँत की तरह निकला रहता था। वहाँ तीन-चार वेंत की कुर्सियाँ पड़ी रहती-जिन पर सेमल के फूल झरा करते थे। पेड़ की डालें मकबरे पर झूला करती-लाल १४ / एक चिथड़ा सुख सुख-~-जमे कोई प्राग की लपट हवा में लहरा रही हो। उसकी ग्रांसें खुल गयी-इतना सन्नाटा । गुसलमाने में कोई आवाज नहीं थी-नकपड़े धोने की, नपानी बहने की। वह रसोई मे ग्राया, तो देखा, गैस पर कॉफी का पकॉलेटर रखा था। उमने बन्द गुमलखाने का दरवाजा खटखटाया-- "विट्टी ?" "यरा?" "पानी उवल रहा है।" वह टव के ग्रागे वैठी थी । हाथ साबुन में मने थे लेकिन बाद नंगी थी -पानी मे मफेद मछलियो-सी पसरी हुई। नल रह-रहकर खांसने लगता था, लेकिन पानी की एक बूंद बाहर नहीं पाती थी। उमने मिर उठाया-माथे पर पसीने की बूंदे चमचमा रही थी। "धुखार देखा?" उसने अपना भीगा हाथ उसके माथे पर राम दिया। "अाज विल्कुल नहीं है।" उसने कहा। वह उसकी ओर देखती रही। "जरा मावुन डालो" " उसने कहा । उमने मर्फ का डिव्या उठाया और टब के पानी में उलटा कर दिया । पाउडर झरने लगा, कुछ कपड़ो पर, कुछ उसके हायो पर और वह कपड़ो को रगडने लगी, उसकी धनियाने और जांघिये, विट्टी के ब्रा और रूमाल और अण्डरवियर । वह टय के सामने ऐसे बैठनी थी, जैसे वह लडाई का मैदान हो-कपड़े दुश्मन हो, उनका मैल काला सून, जिमे वह आखिरी बूंद तक निचोह लेती थी। "वम 1" उमने कहा । फिर उसकी ओर देखा, "मेरे हाथ गन्दे हैं-तुम कॉफी बनानोगे ?" वह हिचकते हुए कहती थी इसलिए नहीं कि वह छोटा था, या युखार मे था-बल्कि एक अलग कारण से""और वह कारण हमेशा अंधेरे में छिपा रहता था। उसने पर्कोलेटर उतारा गम बुझा दी और दो प्यालो में पानी डालता हुग्रा खिडकी के बाहर देखने लगा-गुम्बद के ऊपर दो चोले उह रही थी, दुपहर के सन्नाटे को गहरात हुए-एक चुप उडान-जो उसके भीतर एक कुमा-मा खोदने लगती थी। भीतर माया, तो नल गडगड़ाता हृमा वह रहा था। उसने चौकी पर प्याले रख दिये । "ठण्डी हो रही है।" उसने कहा ।
. । "बस-~-एक मिनिट।" उसने कुहनी से अपने वालों को पीछे किया-तो तिकोना सफेद चेहरा वाहर निकल आया-गालों पर दो सुर्ख गोलियां चमक रही थीं। वह पटरे पर उकड़ बैठी थी, जिसके कारण जीन्स के पांवचे ऊपर खिंच आये थे, और घुटनों की सीवन एकदम कस गयी थी। उसने अपना कप घुटने पर ही रख लिया। वह हमेशा ऐसे ही कॉफ़ी पीती थी-जव कपड़े धो रही होती। वह सबसे सुखद घड़ी होती थी। गुसलखाने के प्राधे-अंधेरे में वे आमने-सामने बैठ जाते थे, धीरे-धीरे कॉफी पीती थे। धुले हुए कपड़ों से एक तीखी, नशीली-सी गन्ध ऊपर उठती थी और कॉफ़ी में सावुन का स्वाद आता था। "अाज नहीं पढ़ोगे ?" विट्टी ने उसकी ओर देखा। "तुम्हें देर तो नहीं हो जायेगी ?" "अाज रिहर्सल शाम को है," उसने कहा, "निकालो अपने हन्टर साहब को! मिस्टर हन्टर, यह असली नाम नहीं था, वे हँसी में कहते थे। एक आयरिश मिशनरी, जिन्होंने अपने संस्मरणं कुमाऊँ जंगलों के बारे में लिखे थे । स्वयं विट्टी का बचपन घूमते हुए बीता था। चाचा रेलवे में थे, हमेशा एक शहर से दूसरे शहर तबादला होता रहता था। बाद में जब वह स्कूल जाने लगी, तो उसे नैनीताल के एक होस्टल में रहना पड़ा। उन दिनों हिन्दुस्तानी अफसर अपने बच्चों को किसी कान्वेंट में जमा करके छुट्टी पा लेते थे। विट्टी की यह किताव उसी जमाने की थी-द मैमोयर्स ऑफ ए मिशनरी-ऐसे मिशनरी, जिनका ज्यादा समय परमेश्वर की खोज में उतना नहीं, जितना पशुओं की तलाश में गुज़रता था। वे भी उनके साथ भटकते थे। जव कपड़े धोने का दिन प्राता, वह गुसल- खाने में किताब लेकर चला पाता, वह कपड़े धोती रहती और वह पढ़ने लगता। Last night the panther came... बिट्टी का सिर कुछ टेढ़ा-सा हो जाता और गर्दन की नसें चमकने लगतीं, जैसे वह भी अल्मोड़ा और रानीखेत के जंगलों में चली गयी हो; हन्टर साहब के पीछे-पीछे; चारों तरफ सिर्फ पेड़ दिखायी देते, पेड़, घास और झाड़ियां और पैरों के नीचे पत्ते चरमराने लगते और उसके नीचे सब कुछ दव जाता, नल का वहता पानी, साबुन और मल की गन्ध, पिटते कपड़ों की कराहट-सिर्फ हवा सुनायी देती, हवा और घास और अँधेरे के बीच चार पैर और दो चमकती १६ / एक चिथड़ा सुख प्रांखें...Last night the panther came and my dog whined for a long time. . "ह्वाईन का मतलब ?" उमने अांखें ऊपर उठायी। "रिरियाना," बिट्टो ने कहा। "रिरियाना?" "रोना" सुवक-सुवककर रोना।" विट्टी के हाथ टब मे निश्चल पड़े थे। वह हवा में ताकही थी। "सुना तुमने ?" "क्या?" वह विट्टो को देखने लगा। "कोई दरवाजा खटखटा रहा है।" "कोई नहीं--हवा है।" वह अव भी जंगल मे घूम रहा था। दुवारा सटसटाहट हुई, तो कोई भ्रम नहीं रहा । उसने किताब बन्द कर दी और उसके साथ पन्थर की चमकती आँखें भी मुंद गयी। वह वाहर चला माया । जीने का दरवाजा खोला। "पाप?" जीने की सबसे ऊपरी सीढी पर हरी सड़े थे। "कहाँ थे तुम लोग?" उन्होंने कहा, "मैं दस मिनट से दरवाजा पीट रहा हूं।" "हम बाथरूम में थे।" उसने कहा, "विट्टी कपड़े धो रही है।" वह अपनी दाढी को खुजलाने लगे। उन्होंने एक नीली कमीज पहन रखी थी, पास्तीने ऊपर चढा रखी थी, जिनके नीचे बांहो के बाल बाहर झांका करते थे। कन्धे पर एक थेला लटका था, गर्म और भूरा, जो एक तिब्बती झोलामा दिखायी देता था। वह भागता हुमा भीतर पाया। "हरी आये हैं।" उसने भीतर झांककर कहा। "कौन ?" विट्टी ने टब से सिर ऊपर उठाया। उसे जवाब नहीं देना पड़ा, क्योंकि इस बीच डेरी कमरे में प्रा गये वह वाथरूम की देहरी पर खडे थे, जेब से रूमाल निकाला था, वह अपनी ऐनक के शीशे साफ कर रहे थे। बिट्टी ने सिर उठाया । होंठ खुल गये थे-हंसी में या विस्मय मे वह जान नहीं सका।
हाँ से पा रहे हो?" इरा से-उसने फोन किया था।" होस्टल में ?" "और कहाँ ?" उन्होंने ऐनक दुवारा पहन ली-वह बहुत थके दिखायी देते थे । दाढ़ी पर की हल्की-मी परत चिपकी थी। वगलों में पसीने के दायरे प्राधे-चाँद से पर पाये थे। "कॉफ़ी पियोगे-अभी बनायी है ?" विट्टी नल के पानी में हाथ धोने लगी। डेरी ने उसके कन्धे को छुग्रा- "कैसी तवीयत है ?" "ठीक।" उसने सिर हिलाया और कपड़े समेटने लगा। एक-एक करके वाल्टी में डालने तगा। अब वे उसकी पीठ के पीछे थे और वह उन्हें नहीं देख सकता था। विट्टी ने गैस पर पानी रखा था और वह स्टूल पर बैठ गये थे । रसोई की खिड़की खुली थी -वाहर सन्नाटा था । दुपहर की डूबती घड़ी का मौन, जो हर मकान की चौखट पर सुस्ताने बैठ जाता था । मन में आया, कमरे में जाकर लेट जाये .-फिर वैठा रहा। गुसलखाने के शान्त, शीतल अधरे में। "कुछ खाने को है ?" डैरी का स्वर सुनायी दिया। "तुमने अभी तक कुछ नहीं खाया?" "मैं सुबह ही घर से निकल आया था।" उन्होंने कुछ और कहा-लेकिन वह नहीं सुन सका । गैस पर कॉफ़ी का पानी सिरसिरा रहा था। वह कपड़ों की वाल्टी लेकर छत पर आया, तो विट्टी की छाया दिखा - दी । । "तुम वैठो-मैं और डैरी सब टाँग लेंगे।" उसने कहा। तुम जानोगी नहीं ?' "अभी नहीं।" उसने वाल्टी उसके हाथ से लेकर कोने में रख दी अण्डे की भुजिया बना रही हूँ"डरी को भूख लगी है।" मन में आया, कहे, वह हमेशा भूखे रहते हैं । उनकी भूख और फ को देखकर कभी-कभी बहुत दया पाती थी। कोई अनुमान भी नहीं लगा १८ ! एक चिथड़ा सुख था कि वह अमल में कौन हैं, कहाँ रहते हैं । जब उगने दिट्टी से पूछा था, तो यह काफी देर तक हंसती रही थी। उसने सोचा था, वह कोई वेरोजगार किस्म के आदमी हैं, जो थियेटर करते हैं । "तुम्हें नहीं मालूम, अकबर रोड पर इनके पिता का बंगला है-बहुत बडा लॉन है, जहां कभी-कभी हम रिहर्मल करते है।" तब भी उसे कुछ समझ में नहीं पाया था। उन दिनों उसके लिए जैसा अकबर रोड-वैसा वावर रोड-कोई खाम अन्तर नहीं दिखायी देता था। अन्तर आया था तो सिर्फ देखने में- अब वह कभी आते थे, तो वह उन्हें बहुत ध्यान से देखता था- अचानक क्षणों में जब वह बिट्टी से बात- चीत करते थे । वह अचानक बडे-से दिखायी देने लगते थे, जब वह बोलते थे- लेकिन चुप्पी के क्षणों में महसा छोटे हो जाते थे- जैसे यह कोई जादू का खेल हो ! खेल नहीं, यह सच था। उनकी उम्र हमेगा घटती-बढती रहती थी लेकिन वे सुद एक जगह ठहरे-से दिसायी देते थे। वह ठहरी हुई जगह कही ऊपर थी उसे हमेगा सिर उठाकर डरी को देखना होता था- और तब उसे प्रकार भ्रम होता था, जहां डरी है, वहां से दुनिया बिल्कुल विचित्र दिखायी देती होगी... क्या बिट्टी ने उम दुनिया को देखा था ? वह अपने बिस्तर पर आकर बैठ गया। वहां मे सब दिखायी देता था- डेरी चुपचाप सा रहे थे । टोस्ट और अण्डे की मुजिया। दूसरे हाथ में वह हन्टर की किताब के पन्ने पलट रहे थे। बाहर सेमल का पेड़ सांय-सीय सरसरा रहा था। "मेरी एक छोटी बहिन है..." डेरी ने उसे देखा, "मैंने उसे तुम्हारे बारे में बताया है ?" "मुझे मालूम है ।" उसने कहा। - "बिट्टी ने कहा था।" हेरी अपनी दाढी पर चिपके टोस्ट के टुकडे हटाने लगे। "तुम उसमे मिलना चाहोगे?" वह चुप रहा । उसकी कोई इच्छा नही थी लेकिन वह यह वात हरी से नहीं वाहना चाहता था। "कुछ दिनों मे हम रिहर्सल बाहर किया करेंगे."विट्टी ने कहा, 'तब यह भी मा मकता है।" "तुमने नित्ती भाई से बात की थी ?" डरी ने पूछा।
- नाराज़ हैं ।" विट्टी ने कहा, "वह सी-गलं का सेट बनाना चाहते थे। व नक्शे वना लिये थे।" तने ऐक्टर कहाँ से आयेंगे ?' डैरी अपने टोस्ट से तश्तरी साफ कर रहे वह कुछ और भी कह रहे थे।" विट्टी उसके पास विस्तर पर बैठ गयी - क्या ?" डैरी ने उसकी तरफ देखा। "कहते थे-तुम डिक्टेटर की तरह काम करते हो-जब तुमने स्ट्रिनवर्ग तो किसी से पूछा भी नहीं।" "इरा को मालूम था, उसने उन्हें नहीं बताया ?" "इसीलिए वह नाराज़ थे । कहते थे. हर बात उन्हें तीसरे आदमी से पता लती है।" डैरी वेसिनी के ग्रागे खड़े हो गये-नल खोला-लेकिन हाथ धोने के रजाय पाईने में देखने लगे, जहाँ विट्टी विस्तर पर बैठी थी। "मैं उनके दप्तर जाता हूँ-वहाँ पता चलता है, वह किसी साइट पर गये हैं: "घर में होते नहीं-इरा के होस्टल जाता हूँ, तो पता चलता है, वे दोनों कहीं बाहर गये हैं.. फिर कहते हैं-मैं उनसे मिलता नहीं।" उनकी आवाज़ नल की धार में खो-सी गयी। वह मुंह धो रहे थे। तुमने रिकार्ड छाँट लिये हैं ?" उन्होंने पीछे मुड़कर देखा। कौन-से रिकार्ड ?" "मैंने तुमसे कल कहा था।" वह तौलिये से मुंह पोंछते हुए कमरे में चले आये । कोने में रिकार्ड-प्लेयर रखा था-वह वहीं फर्श पर बैठ गये। "तुम कपड़े सुखा लो-मैं छाँट लेता हूँ।" विट्टी अपनी जगह पर बैठी रही। कमरे में हल्का-सा अंधेरा घिर आया था -क्षण-भंगुर --वाहर कोई वादल सूरज को ढक गया था। मार्च की दुपहर ढलने लगी थी। "इरा ने क्यों बुलाया था ?" विट्टी का स्वर बहुत धीमा-सा हो पाया। "पागल है !" डरी चुपचाप रिकार्डो को पलट-पलटकर देख रहे थे। 'कहती थी-इस प्ले के बाद वह लन्दन लौट जाना चाहती है।" "इसमें पागलपन क्या है ?" . २० / एक चिथड़ा सुख VIS डरी के हाथ रुक गये-विट्टी को देखा।' "तुम्हे सब ठीक लगता है ?" "सब तुम्हारे जैसे नहीं हैं।" विट्टी का स्वर कुछ ऊपर सिंच पाया। "क्या मतलब ?" "अगर मैं इलाहाबाद लौट जाती हूं तो तुम मुझे भी पागल समझोगे." हैरी कुछ नहीं बोले, सिर्फ हंस दिये। "तुम सबको मक की निगाह से देखते हो।" बिट्टी ने कहा। "शक की निगाह से ?" "जव से तुम लौटे हो, तुम्हे..." "विट्टी !"डरी ने उसे बीच में ही रोक दिया। फिर दोनो ने सहसा एक साथ उसकी मोर देखा। वह विस्तर पर लेटा छत को ताक रहा था । वे लड़ रहे थे । वे ऐमे ही वात-बात पर लडने लगते थे । उमे हमेशा विट्टी पर आश्चर्य-सा होता था। पता नहीं, कौन-सा गुस्मा उमके भीतर दवा रहता था, जो जरा-सा छूते ही मवाद की तरह बहने लगता था... बिट्टी गुमलखाने में चली गयी लेकिन डरी वहीं बैठे रहे-चारो तरफ विखरे रिकार्डों के बीच । क्या वह उनसे कुछ कह सकता है ? वह कहां गये थे? कहाँ जाकर वापिस लौट आये थे? अचानक हवा का एक झोका पाया और दरवाजा खुल गया। बाहर की रोशनी भीतर पा रही थी, भूरा-सा पालोक, जो मार्च के दिनो मे चमकीली चांदी-सा झरता था। बिट्टी तार पर कपडे टांग रही थी। वह माफ और खुली शाम थी। विट्टी के बाल भी खुले थे। हवा में फडफडाता हुआ कोई गोला कपडा उसके चेहरे पर लिपट जाता, उसको देह को ढक लेता था। वह हल्के-से सिर को झटका देती और चेहरा बाहर निकल आता [-खले हुए वालो के बीच एक सफेद, नंगी फांक जैसा-और वह आगे बढ जाती, बाल्टी से एक दूसरा कपडा निकालती, और जब तक उठाती, बाकी कपडे फड़फड़ाते हुए उसमे लिपट जाते... यह मुझे याद रहेगा, उसने सोचा, यह में अपनी डायरी में लिखेंगा, "विट्टी कपडे टांग रही थी, कमरे में पोला-सा अंधेरा था। डरी दीवार के सहारे बैठे थे, बाहर विट्टी को देख रहे थे । और मैं..." वह अपने बिस्तर पर लेटा था । कितनी बार वह यह खेल अपने से खेलता - । - ह दुनिया को कहीं बाहर से देख रहा है, शाम, छत, विट्टी और डैरी नहीं जानता। वह उन्हें पहली बार देख रहा है। उसके ड्राइंग नास में कहते थे-देखो, यह सेव है। यह सेव टेवुल पर रखा है। इसे दखो । नीधी आँखों से-एक सुन्न निगाह सूई की नोक-सी सेव पर ती । वह धीरे-धीरे हवा में घुलने लगता, गायव हो जाता । फिर, फिर नक पता चलता-सेव वहीं है, मेज़ पर, जैसे का तैसा-सिर्फ वह अलग है, कमरे से, दूसरे लड़कों से, मेज़ और कुसियों --और पहली बार । नयी निगाहों से देख रहा है । नंगा, सावुत, सम्पूर्ण इतना सम्पूर्ण कि यभीत-सा हो जाता, भयभीत भी नहीं-सिर्फ एक अजीव-सा. विस्मय लेता, जैसे किसी ने उसकी आँखों से पट्टी खोल दी है। "मास्टर साहब, कहना चाहता, "आप जो दिखाना चाहते हैं, क्या यह वही चीज़ है ?" कौन-सी चीज़? कैसी चीज़? यह शाम, यह विट्टी की बरसाती, छत पर फड़फड़ाते हुए कपड़े, यह अंधेरा, ह उठते बुखार के चमकते चबच्चे, जिसमें वह धंसता जाता। "मुन्नू-मैं जा रही हूँ।" विट्टी का चेहरा दिखायी दिया। वाल बंधे थे। माथा खाली था, न विन्दी, न कुछ । विल्कुल खाली। "कब लौटोगी?" "अाज रिहर्सल देर तक चलेगा. मैंने तुम्हारा साना बनाकर रख दिया है ।" "एक काम करोगी?" उसे कुछ याद आया, और वह उठकर बैठ गया। "मेरी एक चिट्ठी डाल दोगी?" विट्टी उसे देखती रही। "कैसी चिट्ठी ?" "वावू को लिखी है।" उसने कहा। वह अपनी रैक के पास गया, जहां उसकी किताबों का गट्ठर था। अपनी नोटबुक से एक लिफाफा बाहर निकाला और बिट्टो के सामने रख दिया। विट्टी एक क्षण लिफाफे को देखती रही, फिर उसकी ओर देखा। "सुनो -अगर तुमने यह लिखा है, कि तुम इलाहावाद लौटना चाहते हो, तो यह मैं तुम्हारे सामने फाड़ दूंगी।" कमरे के धुंधलके में दोनों एक-दूसरे को घूरते रहे। २२ / एक चिघड़ा सुख
"जानते हो. चाचा ने क्या कहा था?"
विट्टी का स्वर एकाएक वहृत कोमल-मा हो पाया।
"क्या कहा था?"
"जब तक तुम बीमार हो, मेरे पाम रहोगे।"
"सुनो विट्टी..." उमने रंधे स्वर मे कहा, "मुझे अब बुखार नहीं पाता।"
वह हंसने लगी-अजीव-मी हंसी-जिसका न उससे, न इलाहावाद से, न
उसके बुग्धार में कोई ताल्लुक था । फिर वह अचानक उसके पास आकर बैठ
गयी, दोनो हाथों से उनके गालों को ममेट लिया।
"पोर अगर मैं हूँ तो?"
"तुम?"
"हां, अगर मैं बीमार हूँ, तो तुम एक जानोगे?"
नीचे हरी की अावाज मुनायो दी । वह मोटर-माइकिल का हार्न बजा रहे
वह खडी हो गयी। अपना पर्म उठाया और जाने लगी। फिर एक क्षण कमरे
की देहरी पर टिटक गयी।
"मुझे देर हो गयी, तो जागना मत । साना खापर मो जाना।"
२ - .. काफी ऊँची हवा रही होगी। तार पर सूखते कपड़े वेतहाशा फड़फड़ा रहे थे । छतों पर पीली धूल की छत थी और आकाश कहीं न था। नीचे कुत्ते भौंक रहे थे। मकान की मालकिन मिसेज़ पन्त लहँगा पहनकर पेड़ों के नीचे घूम रही थीं, कुत्तों के पीछे दौड़ रही थीं, उन्हें अपने पास बुला रही थीं । वे बदहवास-से होकर कभी फाटक की ओर भागते थे, कभी पेड़ों की तरफ-जैसे आंधी कोई हमलावर हो, जिसे वे मकान की सरहद पर रोक लेंगे, दाँतों में भींचकर टुकड़े-टुकड़े कर देंगे। किन्तु हवा उन्हें चिढ़ाती हुई पेड़ों पर चढ़ जाती, भडाभड़ घर के दरवाजे खोल देती, सहसा मुड़कर बरामदे में लपक पाती और पत्तों के साथ पागल-सी धूमने लगती। उसके साथ कुत्ते भी घूम रहे थे, कभी-कभी अचानक ठहर जाते, हैरानी में मिसेज़ पन्त के लहँगे को देखने लगते, जो हवा में गुब्बारे-सा फूल रहा था-और वे अाँधी को छोड़कर खुद अपनी मालकिन पर भौंकने लगते । वह मार्च की हवा थी। उसमें कोई बोझ नहीं था, जैसा गर्मी के अन्धड़ में होता है। वह धूल के साथ नहीं आयी थी, स्वयं धूल उसका सहारा लेकर ऊपर उठी थी। वह जल्दी-जल्दी तार से कपड़े उतारने लगा-एक ठंडी-सी बूंद उसके गालों पर गिरी- तो उसने ऊपर देखा, बादलों के बीच तारे टिमटिमा रहे थे। कुत्ते सहसा शान्त हो गये थे, हवा में झरती बारिश की अफवाह को उन्होंने भी सूंघ लिया था। उसने दरवाजे बन्द कर लिये । रसोई की खिड़की खुली रहने दी । उसके पीछे रोशनियों का एक द्वीप अंधेरे पर टिका था---एक लाइट-हाउस की तरह। वह निजामुद्दीन का स्टेशन था। कभी-कभी कोई ट्रेन अँधेरे की कोख से बाहर निकलती, आसपास के खंडहर चमचमा जाते, और फिर अपनी नींद के गूदड़ में लिपटकर गायव हो जाते। वह ठिठुरने लगा। वह कांप रहा था। बुखार नहीं था, न ठण्ड थी, फिर भी - - । २४ | एक चिथड़ा सुख । सरीर में कंपकपी-सी दौड रही थी। खिडको के भीशो पर पानी वह रहा था, भूरा और मटियाला; उसे याद अाया, बहुत दिन पहले उसने ऐसा ही पानी देखा था। वे वारिश में भीग रहे थे, भीगते हुए भाग रहे थे। दुकानो की रोशनियाँ गंदले चहबच्चों में चमक रही थी। वे शुरू-शुरू के दिन थे। वह इलाहाबाद से पाया था। ड्रामे के रिहर्सल अभी शुरू नहीं हुए थे और बिट्टी खाली थी। वे सारा दिन घूमते रहते थे-कुतुव और जामा मस्जिद, हुमायूं का मकबरा और पुराने किले में वह जीना भी, जहाँ हुनायू बादशाह गिरे थे। बिट्टी और उसके दोस्त उसे हर जगह ले जाते थे। लेकिन उस दिन वे कही न जा सके । कनॉट प्लेस पहुंचते ही बारिश गिरने लगी; सदियों को सफेद और महीन झडी, जिसे वे दोनो गलियारे से देख रहे थे । बिट्टी ने एक लम्बा, ग्राउन स्वेटर पहन रखा था, गले में काला मफलर लिपटा था. कन्धे पर चमडे का थैला था, जिसमें उसने दिल्ली का नक्शा ढूंस रखा था। वह हमेशा नवशा लेकर बाहर निकलती थी। अंधेरा होने लगा, तो वारिश ओझल हो गयी। सिर्फ लम्पपोस्ट की रोशनी में पता चलता था कि बूंदें अव भी झर रही हैं। वे प्रोडियन सिनेमा के पीछे चले पाये । वहाँ बहुत-से रेस्तरां और ढावे थे फुटपाथ पर मेजें लगी थी। हवा मे एक तीखी गन्ध उठ रही थी, जिसमे गीली मिट्टी और मुनते मास का मिला-जुला स्वाद चिपका था। अचानक विट्टी ने उसका हाथ खीच लिया। "साना खायोगे?" "कहाँ ?" "यही," विट्टी ने कहा, 'देखो, कितने लोग बैठे हैं।" मन में हिचक हुई, इस फुटपाथ पर? लेकिन बारिश रुक गयी थी, दिन-भर घूमते रहने के कारण वह निढाल-सा हो गया था। अगर विट्टी वहाँ बैठ सकती है, तो वह भी बैठ सकता है। वे एक साली मेज के पास चले पाये । फुटपाथ के नीचे वारिश का पानी वह रहा था, जिसमे खाने को जूठन, पतलें और अखबार के कागज एक-दूसरे का पीडा कर रहे थे लेकिन खाने में जुटे लोग उसे नहीं देख रहे थे। .बिट्टी भी कही और देख रही थी। बीच सड़क पर कोई मोटर माती, तो उमकी हैडलाइट का घूमता हुआ दायरा उसके चेहरे पर थिर हो जाता"वह शायद अपनी गलती महसूस कर रही थी, लेकिन वेटर पहले ही आर्डर लेकर जा - - - - चुका था। अव वे चाहते, तो भी उठकर जाना असम्भव हो जाता। उसके लिए यह एक विस्मयकारी एडवेंचर था-इस तरह बाहर बैठकर खाना । भट्ठी जल रही थी, सिकती रोटियों की गन्ध, आग का सेक, भागते हुए वेटर''वह असीम कोतूहल में सबकुछ देख रहा था, और तव अचानक उसकी भटकती आँखें ढावे की छत्ती पर अटक गयीं । वहां एक कतार में लोहे की सलाखें लटक रही थीं, हर सलाख पर मुर्गे लटक रहे थे--पैर ऊपर, धड़ नीचे- उन जांघियों की तरह जिन्हें सुखाने के लिए तार पर टांग दिया जाता है। छोटे- छोटे सफेद मांस के लोथ, जो सूली पर लटकते हुए भी जीवित जान पड़ते थे।" उसने जल्दी से आँखें हटा लीं। वह शुरू फरवरी की शाम थी और लोगों ने अभी तक सर्दियों के कपड़े पहन रखे थे । ढावे से भट्ठी का सेक आ रहा था। जब वह इलाहाबाद लौटेगा, अपने दोस्तों से कहेगा, कैसे लोग अपनी मोटरों में आते हैं, फुटपाथ की मेज़ों पर खाते हैं, अंधेरे में तारों के नीचे-और तारों पर मुर्गे लटके रहते हैं । "क्या सोच रहे हो ?" विट्टी ने उसे देखा । मेज पर खाना रखा था। रोटी और मीट की गन्ध में पहली बार उसे अपनी भूख पता चली । वे दोनों इतने भूखे थे कि कुछ देर तक चुपचाप खाते रहे-न कुछ बोले, न एक दूसरे की तरफ देशा। लेकिन कुछ देर बाद उसने देखा, विट्टी खा नहीं रही है-एकटक आँखों से ढावे की भट्ठी को देख रही है । भट्ठी के नीचे राख और कोयले और जूठे वर्तनों का ढेर लगा था । पास में दो लड़के बैठे थे-~-बीच में एक बच्ची, जो मुश्किल से पाँच वरस की रही होगी। वे चुप बैठे थे। भट्ठी के मैले आलोक में उनकी चुप्पी उनके अधनंगे शरीरों से कहीं अधिक बड़ी दिखायी दे रही थी। उनकी निगाहें पासवाली मेज़ पर गड़ी थीं-छह चमकती यांखें । वेटर विल लेकर पाया था और वे लोग पैसे निकाल रहे थे। बच्ची जरा-सी हिली और उसके हिलते ही दोनों लड़के खड़े हो गये। वे एक साथ उठे थे, जसे उन्होंने कोई सिग्नल देखा हो। वे धीरे-धीरे उस मेज़ के पास सरकने लगे, जो अभी-अभी खाली हुई थी। वेटर पैसे गिन रहा था। कोई हलचल नहीं। न कोई छीना-झपटी । आँख झपकते ही सबकुछ हो गया। जूठी प्लेटें अव साफ पड़ी थीं, खाली और साफ । सिर्फ जल्दी में बच्ची की कुहनी से एक गिलास गिर गया था, मेज़पोश पर से बहता पानी नीचे बूंद-बूंद टपक रहा था। वे लौट गये थे । वे दुवारा भट्ठी के नीचे दुवक गये थे और अपनी लूट का २६ / एक चिथड़ा सुख ।
माल राख के ढेर के पास जमा कर रहे थे।-प्राधी चवाई हुई गड्डियां, गोश्त के टुकड़े जिन पर इक्के-दुक्के चावल सफ़ेद चीटियों से चिपके थे। लड़की ने अपनी फ्राक में प्रत्यूमिनियम का वर्तन छिपाया था, जिसमे से गोरवा नीचे बह रहा था, उसकी नंगी, धूल-सनी टांगों पर एक लम्बी सुर्ख लकीर खीचता हुमा, बूंद-बूंद टपकता हुआ । किन्तु उन्हें उसको चिन्ता नही थी। वे मुस्करा रहे थे। वे निश्चिन्त ये। उन्हें कोई जल्दी नही यो, जैसे कोई जंगली जानवर अपने शिकार को पंजे में दबाकर वैफिक्र हो जाता है, अपने आहार के अलावा चारों तरफ देखने लगता है। वे देख रहे थे-विट्टी की तरफ और उसकी तरफ एक निरासक्त ठण्डी प्रतीक्षा में; अब उनकी वारी थी। विट्टी उठ खडी हुई । उसका चेहरा भट्ठी की प्राग में दहक रहा था।-- रास-सा सफेद । "चलो," उसने कहा और वह जड पुतले-सा उठ खडा हुआ; उमे कुछ पता नहीं चला, कब वे ढाव से बाहर आये, कब विट्टी ने बिल चुकाया। जब याद करता है तो सिर्फ वे प्रासें याद पाती हैं, भट्ठी के नीचे में उनकी पोर निहारते हुए, एक अन्तहीन कोतूहल मे, वारिस के गीले अंधेरे को भेदनी हुई, उनका पीछा करती हुई। वस-स्टैण्ड, फायर ब्रिगेड की बिल्डिंग, स्टेट्समन का चौराहा, जलती-बुझती ट्रेफिक लाइट...। विट्टी चलती जा रही थी, और वह उसके पीछे भाग रहा था, हाक रहा था और तय उसे लगा, जैसे यह मसली दुनिया नहीं है, यह कोई स्वप्न है, ये गीली सड़कें, ये भीड़, ये बारिश के चहबच्चे, बारहखम्भा रोड के पेड... कुछ भी वास्तविक नही था। सिर्फ होपती हुई सांसें सही है, विट्टी को सिसकियो से बंधी हुई, जिन्हें वह कीचड़ में भागते हुए अपने साथ घसीटे ले जा रही थी.. वे पेडों से बाहर निकल पाये। ऊपर प्रकाश दिखायी दिया-बारिश में घुला दिल्ली का प्राकाश-जहाँ बहुत-से तारे एक साथ निकल माये थे । चलते- चलते वह महसा बीच फुटपाथ पर ठिठक गयी, जैसे प्रागे पाव बढाना निरर्थक हो । वह एक रोड-साइन के सहारे खडी हो गयो-टॉलस्टॉय मार्ग का सफेद बोर्ड, जो बारिश में भीगा अलग कोने मे खड़ा था। "बिट्टी," उसने कहा। "विट्टी," उसने दुवारा कहा। "विट्टी, विट्टी, विट्टी..." वह उसे हिला रहा था। सड़क पर चलते लोग एक क्षण उन दोनों को देख लेते थे-बोर्ड पर टिकाये एक लड़की और उसे झिमोड़ता हुमा एक लड़का । वे टिक ने ।
- से उन्हें देखते और आगे बढ़ जाते। विट्टी..." उसका स्वर रुत्रांसा हो पाया, "लोग देख रहे हैं।" सने सिर उठाया, मफलर से चेहरा पोंछा, जैसे वह किसी गहरी स्याह से जागी हो। "चलो," उसने कहा । वह एक क्षण उसका चेहरा देखता रहा, सपाट और --अजीब-सा कठोर, जैसे एक दिन इलाहाबाद के स्टेशन पर देखा था, वह सबसे अलग अपना सूटकेस लेकर खड़ी थी। वे कुछ दूर चले होंगे, कि सहसा विट्टी को कुछ याद आया। "ज़रा ठहरो," उसने पर्स से दो रुपये निकाले। "मेरे लिए सिगरेट ले पायोगे ?" उसने पैसे लिये, और दौड़ता हुआ सप्रू हाउस के आगे चला आया। वहां हमेशा एक ढिवरी की रोशनी में पान-सिगरेटवाला बैठा करता था। वह पैकेट लेकर लौटा, तो बिट्टी कुछ कदम आगे बढ़ गयी थी, एक संकरी अँधेरी गली में झांक रही थी। "इधर प्रायो।" उसने पीछे मुड़कर उसे बुलाया। दोनों तरफ झाड़ियां थीं, ऊपर ईंटों की एक दीवार, जो किसी मकान का पिछवाड़ा थी। बीच में बजरी की सड़क, जिस पर वारिश का पानी चमक रहा था। "तुम्हें कुछ याद आता है ?" वह उसकी तरफ देखने लगा। "क्या ऐसा नहीं लगता, हम कहीं इलाहाबाद में हैं और गली पार करते ही अपना घर आ जायेगा !" उसने पहली बार देखा, विट्टी की आँखें गीली हैं, लैम्पपोस्ट के आलोक में चमकती हुईं, जैसे वारिश के बाद वह गली दिखायी दे रही थी। ढावे की उस रात के बाद उसमें विचित्र परिवर्तन हुअा था। वह कभी कभी मुंडेर पर घण्टों खड़ी रहती, और वह कमरे में बैठा उसे देखता । कुछ लो अपने अकेलेपन में काफी सम्पूर्ण दिखायी देते हैं-उन्हें किसी चीज़ की ज़रू महसूस नहीं होती। किन्तु विट्टी में कोई ऐसा मुकम्मिलपन नहीं दिखायी देता था वह जैसे कहीं बीच रास्ते में ठिठकी-सी' दिखायी देती थी, जबकि दूसरे लोग बढ़ गये हों। बीच में जो लोग ठहर जाते हैं, उनमें अकेलापन उतना नहीं, जि अधूरापन दिखायी देता है- जैसे वे सड़क पर कुछ देख रहे हों और यह भी चलने का ही हिस्सा जान पड़ता था। - - २८ / एक चिथड़ा सुख पता नही, वह क्या देखती थी। उसकी नीद बहुत हल्की थी, जरा-सा खटका सुनते ही वह जाग जाता था। लेकिन उस रात उसे कोई खटका नहीं सुनायी दिया था, फिर भी वह हवड़ा. कर उठ बैठा था। खटके से नही, सन्नाटे से, जब पासवाला व्यक्ति भी जाग जाता है और दोनों के बीच अंधेरे की दीवार ढह जाती है। सिर्फ सांसें मुनायी देती हैं, गूंगी, साफ और अकेलो, एक के बाद दूसरी, तीसरी, मूखो और तरसती "मुन्नू" तुम जाग रहे हो?" "क्या बिट्टी ?" वह उठकर बैठ गया-मूढों के बीच देखा, सिर्फ विट्टी का भाषा पढ़ दिखायी दिया, भुटनों के बीच उसका सिर, दरवाजे की तरफ उठा हुमा । "तुमने उन्हें देखा ?" उसका स्वर बहुत धीमा हो पाया, जैसे वह किमी से छिपकर उसके कानों में फुसफुमा रही हो। "वे दरवाजे पर खडे थे।" "कौन कौन खड़े थे?" वे हंस रहे थे।" "विट्टी ! "वह बच्ची भी!" बिट्टी ने कहा, "वे तीनो ।" उसे अचानक ध्यान पाया, विट्टी पागल है, उसे मालूम था, लेकिन अब कोई सन्देह नहीं रहा था। उसने बीच के मूढे हटा दिये और विट्टी के विस्तर को तरफ झुक पाया। "बिट्टी -क्या बात है ?" वह कुछ देर चुपचाप अंधेरे में उसे ताकती रही। "मुन्न, हमें यह सब छोड़ देना चाहिए।" वह उसकी ओर देखता रहा । "क्या छोड़ देना चाहिए?" उसने चारों तरफ देखा, विट्टो की बरसाती, किताबें, रिकार्डप्लेयर-यह उसको गृहस्थी यो । इसे छोड़कर वह कहो जाना चाहती थी? क्या प्रश्नों के जवाव होते हैं ? यह हमेशा सच नहीं होता। आधी नीद की बुडवुड़ाहट में हम कितना कुछ पूछते हैं, साली दीवारें उन सब प्रश्नों को सोख लेती हैं । द्रुमरे दिन-मुबह की चकमकाहट मे-कुछ भी याद नही रहता; हम - T GOT YOL , . सोचते भी नहीं, पिछली रात कौन-से शर्म और पछतावे ने सिर उठाया था। वह उस रात विट्टी के साथ न होता, तो शायद पता भी नहीं चलता, उसने क्या पूछा था, वह क्या जानना चाहती थी? वह कोशिश करता तो भी शायद कुछ नहीं समझ पाता। उसकी उम्र भी ज्यादा नहीं थी''वह बिट्टी से सिर्फ सात-आठ साल छोटा था लेकिन छोटी उम्र में यह अन्तर भी बहुत होता है। वह सिर्फ झलकें सी पाता था; रेगिस्तान में मरीचिका के टापू चमकते थे-वह उनके पीछे भागता और देखता, जहाँ पानी की चमक थी, वहाँ रेती का चूरा है। वह लौट आता था । विस्तर के अपने हिस्से पर लेट जाता था। वहाँ से दीवार पर एक बहुत बूढ़ी औरत का फोटो दिखायी देता था। विट्टी से पता चला, वह कोई मदर टेरेसा हैं, कलकत्ता में कोढ़ियों और भिखारियों के बीच रहती हैं । लेकिन फोटो में वह मुस्करा रही थीं, दो बंगाली लड़कियों के पास बैठी थीं। विट्टी ने वह चित्र किसी अखवार से काटकर दीवार पर चिपकाया था। जव वाहर हवा चलती, फोटो फड़फड़ाने लगती; अंधेरे में आँखें मूंदे वह चुप- चाप उसकी फड़फड़ाहट सुनता रहता, जैसे कोई चिमगादड़ बार-बार उड़ता हुमा दीवार से टकरा जाता हो। - ३०/एक चिथड़ा सुख किन्तु उस रात कोई हवा नही थी। धूल का मक्कड़ बहुत जल्दी उड़ गया। उसने दरवाजे-खिडकियाँ सोल दी, बारिश के बाद तारे निक्स आये थे, बिल्कुल साफ और घुले हुए । अांधी एक धोखा थी, अब उसका कहीं पता नहीं था। सेमल का पेड़ सीधा खडा था और उसकी टहनियां पानी में भीगो हुई चाँदी की झालरो-सी चमक रही थी। वह लेट गया । बहुत देर तक नीद नहीं प्रायो, लेकिन वह जाग भी नहीं रहा था, नोंद के हाशिये पर धूम रहा था, जहां इलाहाबाद की चीजें दिल्ली में और दिल्ली की घटनाएं इलाहाबाद में लेन-देन करती थी; नीद की सीमा पर स्मृतियो की यह स्मगलिंग उमे हमेशा अजीब जान पड़ती थी"न कोई रोक- टोक, न कोई सिपाही, न पासपोर्ट की परेशानी; वे एक सरहद से दूसरी सरहद पार करती रहतीफिर दरवाजे पर सटसटाहट सुनायी दी और वह फैसला नहीं कर सका, यह सपने की खटखटाहट है या असली; वह पाखें खोल- कर प्रतीक्षा करने लगा, जब तक उसे दुवारा खटखटाहट सुनायी नही दी । सिर्फ विट्टी हो सकती है, उसने सोचा। वह अक्सर दरवाजे के चाभी ले जाना भूल जाती थी। उसने बत्ती जलायी और बाहर छत पर चला पाया। जीने पर बहुत-मी आवाजें सुनायी दे रही थी। नोचे डेरी की मोटरमाइकिल खड़ी थी। उसकी जलती हुई हैडलाइट में पड़ोस के मकान जगमगा रहे थे । इंजन अंधेरे में धुर- घुरा रहा था। सीढियों में कोई लडकी हंस रही थी। उसने दरवाजा खोला तो सबसे ऊपरी मोदी पर नित्ती भाई दिखायी दिये। उनका चेहरा नही, उनकी टांगें । वह इतने लम्बे थे कि जीने की रोगनी उनकी हाफ-पेट और पैगावरी चप्पलों पर गिर रही थी, जिन्हें देखकर ही उसे पता चल गया, वह कौन है, हालांकि उनका चेहरा अंधेरे में छिपा था। एक चियड़ा मुख/३१ "माफ करना, हमने तुम्हें जगा दिया।" वह मेंप गया, दरवाजे से हट गया। वह बहुत दिनों वाद घर आये थे, इसलिए पाइप के तमाखू की गन्ध विल्कुल नयी जान पड़ी । वह गन्ध हमेशा उनकी देह से चिपकी रहती थी। "बुखार कैसा है ?" उन्होंने नीचे झुककर अपने दोनों हाथों से उसके गालो को समेट लिया गुनगुने से हाथ, जिन पर हमेशा पसीने की नमी रहती थी। "अब ठीक हूँ," उसने कहा। "कौन है पर?" जीने से इरा की आवाज सुनायी दी। वह हाँपती हुई पर पायी थी। उसके दोनों हाथों में बड़े-बड़े थैले थे, दोनों ही अटापट भरे थे। रात के समय जब वे आते थे, तो अपने साथ हजारों चीजें ले आते थे, सलामी, चीज़, मासेजेज, वियर, और ब्राउन डबलरोटी, जो उसे सबसे अच्छी लगती थी। "मुन्नू, ज़रा इन्हें संभालो!" इरा ने दोनों थैले उसे पकड़ा दिये; फिर उसे रोक लिया, एक थैले से अपना पस निकाला, चेहरे को स्माल से पोंछा, फिर उसकी ओर देखा, "कसी तबीयत । - है ?" उसने सिर हिलाया। "सिर हिलाने से पता नहीं चलता, बोलते क्यों नहीं ?" "ठीक हूँ।" उसने कहा। "ठीक हो-तो बाहर क्यों नहीं निकलते?" "कहाँ ?" उसने उत्सुकता से इरा को देखा। वह आगे कुछ नहीं कह सकी । नीढ़ियों पर बहुत से लोग पर पा रहे थे। वह दरवाजे से हट गया, रसोई में ग्राफर साँस ली । दोनों थैलों को मेज के नीचे रख दिया । विट्टी के दोस्त जव भी पाते, वह जल्दी से जल्दी अपने कमरे में चला आता। वे एक ऐसी दुनिया से प्राते थे, जिसका उससे कभी वास्ता नहीं पड़ा था। वे उससे हंसी-मजाक भी करते तो भी लगता यह भ्रम है, यह सतह है। उसके नीचे गढ़हा-सा दिखायी देता, जहाँ पहुँचते-पहुँचते उसका धीरज छूट जाता। वह मुड़ जाता; उनके सामने से हट जाता; ऐसे मौकों पर उसे हमेशा 'इनविजिबल मन' की कहानी याद आ जाती; क्या ऐमा नहीं हो सकता, कि जब चाहे वह भी 'अदृश्य हो सके; वह सबको देखें, लेकिन कोई उसे न देख सके ? उसने कमरे की बड़ी वत्ती दुझा दी; सिर्फ टेबिन-लैम्प को जलते रहने दिया। वे नोचेंगे, वह सो गया है और भीतर नहीं पायेंगे। किन्तु उसकी नींद । - ३२ / एक चिथड़ा मुख । बिल्कुल उड़ गयी थी; वह अपने बिस्तर पर बैठ गया और बाहर देखने लगा। वह कोई चांदनी रात नहीं थी, किन्तु छत पर एक उजला, पीला-मा उजाला फैला था। दिल्ली में मार्च को राते ऐसी ही होती थी, अंधेरे में भी सबकुछ दिखायी देता था। पता नहीं कितने लोग ये, लोग ज्यादा नही, गोर ज्यादा था; एक पतले झीने परदे पर उनकी परछाइयां घूम रही थी। वे प्रकार रिहर्सल के बाद यहां पा जाते थे। वैसे सबके अपने-अपने ठौर-ठिकाने थे, लेकिन विट्टी की वरमाती सबसे सुरक्षित जगह थी। यहां कोई रोक-टोक करनेवाला नहीं था। मिसेज पन्त बहुत जल्दी सो जाती थीं; वैसे भी छन इतनी ऊंची थी कि ऊपर की आवाजें नीचे जाते-जाते भर जाती थी। मिर्फ हवा मे एक हल्की-मी फुसफुसाहट- सी रह जाती थी। लेकिन कमरे से उन्हें साफ-माफ सुना जा सकता था। वह अंधेरे में लेटा और अनुमान लगाता, कौन-मी आवाज़ किसकी है। कभी-कभी, कोई मिल्कुल अपरिचित स्वर सुनायी दे जाता और वह अपनी उत्सुकता न दवा पाता; दये पांव देहरी तक प्राता, बाहर झांकता, कही कोई अजनवी दिखायी दे जाता, लेकिन अक्सर वही लोग होते थे, जिन्हें वह पहचानने लगा था; इरा मुंडेर के सहारे बेटी होती, प्राधी लेटी-सी; डरी और नित्ती भाई पानी की टकी के पास, जहाँ वे अपने गिलास जंगले पर रख देते और मिट्टी-वह कभी एक जगह दिखायी देती, कभी दूसरी जगह और उसे लगता, वह हर जगह है, जगल वी उन पारमानों की तरह जो हवा में उडती हुई हर कोने में पहुंच जाती हैं। किन्तु उस रात बहुत देर तक विट्टी दिसायी नहीं दी। उसके भीतर एक कांटा-मा कसकने लगा-उसे शायद चिट्ठी की बात लग गयी थी; वार-बार उसका वाक्य सुनायी दे जाता, अगर मैं बीमार हूँ तो? शायद वह उसे डराना चाहती थी "यह चेचन-सा हो गया। वह छत पर जाकर उनसे पूछेगा, विट्टी कहाँ है; किन्तु तभी वाथरूम का दरवाजा खुला और वह किचन में दिखायी दी. वह नहाकर पायी थी । काड़े भी बदल लिये थे, ढीला-ढाला सफेद कुर्ता पोर खद्दर का पायजामा। बाल खुले थे और वे भी भीगे-से दिखायी देते थे। मोको मौके बिट्टी कभी इतनी सुन्दर दिखायी देती, कि वह मॉम रोके एकटक उमे देखता रहता। "तुम आज फिर चाभी भूल गयी।" उसने कहा। "मुझे नहीं मालूम था, इतनी देर हो जायेगी ।" वह तौलिये में अपने गीले बालो को भा रही थी, पानी को बूंदें बार-बार उडकर उसके चेहरे को छू टूडियो से निकलते ही आंधी ने पकड़ लिया"यहाँ भी आयी होगी।" रिश भी हुई थी।" उसने कहा। उसे खुशी हुई, शाम का विषाद अब हरे पर नहीं था; वह बहुत हल्की-सी दिखायी दे रही थी। उसने वाला में कस दिया और उसके विस्तर के कोने में आकर बैठ गयी। मैंने तुम्हारी चिट्ठी डाल दी।" उसने कहा। 'पढ़ी थी?" , । . "हां, मैंने भी कुछ लाइनें जोड़ दी हैं।" "क्या लिखा है ?" "यही कि तुम्हें बुखार रहता है 'अभी दो-तीन महीने तुम्हें और रुकना ड़ेगा।" "कोई तुम्हारे झूठ पर विश्वास नहीं करेगा।" उसने हंसते हुए कहा। वह उठ खड़ी हुई, "सुनो, अव तुम सो नहीं सकते, कुछ मेरी मदद करोगे?" वह उसके साथ रसोई में चला आया। थैलों से चीजें निकालकर बाहर रखने लगा। विट्टी ने बीच में उसका हाथ रोक लिया- "यह सब मैं कर लूंगी, तुम बाहर दो चटाइयां विछा आयो।" वह वाहर चला आया। धूल और अन्धड़ के बाद तारे निकल आये थे और वे इतने चमकदार थे कि लगता था जैसे हवा में एक सुनहरा-सा चूरा झर रहा है न रोशनी न अंधेरा, बीच की कोई चीज़ ; अंधेरे को देखो तो वह रोशनी-सा बन जाता, रोशनी को देखो तो अँधेरा-सा । कभी-कभी कोई पक्षी मकवरे से उड़- कर छत पर फड़फड़ाने लगता; लोगों की आवाजें उसके पंखों तले दव जाती। और जब वह दुवारा हवा में उड़ता, तो बातों की कतरनें फिर आपस में जुड़ जाती, जैसे कुछ हुआ ही न हो; हवा में सिर्फ एक थरथराहट-सी कांपती रहती। उसे अपने कन्धे पर हाथ का स्पर्श महसूस हुआ। वह मुड़ा तो डर दिखायी दिये। दाढ़ी पर वियर के झाग छितर आये थे। ऐनक के भीतर दो यकी अधमुंदी-सी आँखें उसे घूर रही थीं। "बिट्टी कहाँ है ?" "रसोई में.."अभी पाती होगी।" वह दो मुड़ी हुई चटाइयों के पीछे छिप-सा गया था। "मुझे दो, इघर सूखा है।" उन्होंने अपना गिलास नीचे रख दिया और उसके साथ चटाई ३४ / एक चिथड़ा सुख तगे; फिर खुद ही रेपोदार "क्या करते हेर" "मुझे वुसार माता ने हर हरदा घा, वह चुपचाप सुन लेते थे; रोग रोटेनहरे रिट्टाड वह बिट्टी से बिल्युत टेरे, महारेशना दी छौ; जबकि वह ऊपर रहते मारे गएरेन्ट वाचे जाते हैं, वे कपर पाकर जागो सहेनत चुप रहते थे। वह पटोन टों में एक वही थे, जिनके साय चुनी गन्नास "बिट्टी ने तुम्हें रिकार्ड दिला "नहीं"कब लाये?" "इस इतवार को।" उन्होंने कहा- रा सस्ते में मिल गये।" वह मुस्कराने लगा। उन्दै देशका :- पागल हैं। हर इतवार को जान-पटक रिकाडौं और किताबों की दुकानों का कर्म- जैसे कोई खजाना सोदकर नहीं। जिसका चीजों में इटना हादर, मटर छोडकर भाग निकने ये; निन्ददर में कभी कोई चर्चा नहीं करते हैं। क्या इसीलिए वह इदनाना। "तुम कभी घर नहीं :" मुहर "बिट्टी हमेशा बाहर रहती है ।' मले बा ! " तब आऊंगा।" "बभी नही..न में कमी माना "घर के दाहर?" "और कहां?" उन्होंने दियरा सा उत्साह छलछलालाना। "हमारे लॉन र यंदा रिसल करते हैं।" उमने मोबा, यह मानापदिष्टर!
"परदा कहाँ लगाते हैं ?" "उसकी कोई जरूरत नहीं; तुम आओगे, तो खुद देखोगे "सिर्फ पेड़ और झाड़ियों से ही काम चल जाता है।" उसे यह चमत्कार-सा जान पड़ा, बाहर हवा में चलता-फिरता नाटक, जैसे वे यहाँ छत पर बैठे हैं, खुले आकाश के नीचे। हवा ऊपर उठी थी और सेमल का पेड़ सरसरा रहा था। छत के दूसरे कोने से आवाजें तिरती हुई उनके पास चली आती थीं। मकबरे के पीछे जंगल से गीदड़ों की रिरियाहट सुनायी दे जाती, फिर वे अचानक चुप हो जाते और खामोशी के क्षणभंगुर दायरे में ट्रेन की सीटी सुनायी दे जाती और तव उसे इलाहाबाद की याद हो आती, वह छत, वह रात, उन लोगों के पीछे छिपी एक टिमटिमाती रोशनी और वह उसे अपने भीतर के भुलावे में दवोच लेता, चारों तरफ देखता, कोई उसे देख तो नहीं रहा ? नहीं, कोई नहीं। सब अपनी बातों में मगन बैठे थे। सिर्फ नित्ती भाई खड़े थे, टंकी के नीचे मुंडेर के पास, अपनी वुझती हुई पाइप बार-बार जला लेते थे। अचानक उनकी नजर उस पर पड़ी और वह हवा में हाथ हिलाने लगे, जैसे यह उनके वीच कोई पुराना सिग्नल हो। "मैं अभी आता हूँ", उसने डैरी से कहा, किन्तु इस बीच विट्टी उनके पास आकर बैठ गयी थी। वह दीवार से सिर टिकाकर बैठी थी और डैरी उससे कुछ कह रहे थे और उसकी आँखें उनके चेहरे पर टिकी थीं और तव न जाने क्यों, जाने से पहले भीतर एक कमीनी-सी ईर्ष्या उमड़ने लगी, विट्टी का डेरी के इतने पास बैठना, सफेद कुर्ते का ऊपरी बटन खुला था और उसकी नंगी गर्दन एक साफ-सफेद डंठल की तरह ऊपर उठी थी और गीले बालों के जूड़े से कुछ बाल उसके कानों पर झूल रहे थे और वह डैरी को एकटक देख रही थी और तब वह ईर्ष्या एक धुंधली-सी पीड़ा में बदल गयी और वह पीड़ा भी बहुत कमीनी थी। वह ठहरा नहीं। वह गिलासों और वोतलों से बचता हुआ नित्ती भाई के पास चला आया। , किन्तु नित्ती भाई तब तक उसे भूल गये थे। वह वहस के किसी ऐसे कोने में मुड़ गये थे, जहां उसका होना-न-होना वरावर था। थियेटर की दो लड़कियाँ और एक लम्बा-सा हिप्पी लड़का उन्हें घेरकर बैठे थे और वह उन्हें समझा रहे थे, किस तरह हिन्दुस्तान में कम खर्च पर इतने मकान बन सकते हैं, कि किसी आदमी को फुटपाथ पर न सोना पड़े। वह जब से इंग्लैण्ड से लौटे थे, इस एक - •~ ३६ / एक चिथड़ा सुख विषय पर बोलते थे, किन्तु इतने धीमे, शालीन अंग्रेजी उच्चारण में कि पता नहीं चलता था, कि यह विषय उनका एकमान पैशन है और वह पीकर बोल रहे हैं।''वह इंग्लण्ड में बरसों माक्सवादी आर्किटेक्टम के बीच रहे थे, किन्तु हिन्दुस्तान लौटने पर एक दिन अचानक उन्हे पता चला, कि गाधी सबसे ज्यादा रेडीकल आदमी थे; यह बोलते हुए बार-बार अपनी पाइप सुलगाते थे, और तब उन्हें देखते हुए सहसा उसकी पीड़ा बुझ गयी, ईर्ष्या भी, इलाहाबाद का अकेला- पन भी। नित्ती भाई की बातें सुनते हुए उसे हमेशा अपने दु.ख छिछोरे जान पडते, शायद इसलिए कि वह इतने अद्भुत ढंग से अधूरे थे; कुछ लोग इतने सम्पूर्ण ढंग से अधूरे होते हैं, कि अपना अधूरापन पोगा-सा जान पड़ता है। उनकी हाफ-पंट, नंगी, घने वालों से ढंकी टांगें, उनकी पेशावरी चप्पलें एक तरफ--उनका माफ, स्वच्छ आक्सफोर्ड उच्चारण दूसरी तरफ-बीच में वह सुद एक असंगत-मे अजीव आदमी-जो चेखव के सी-गल को स्ट्रिनवर्ग के किसी नाटक से भी ऊंचा मानते थे और डरी से लड़ते थे, वह खडा रहा। उसे बुरा नहीं लगा, कि वह उसे बिल्कुल भूल गये हैं। वह एकटक उन्हे सुनता रहा, हालांकि उसे समझ मे कुछ भी नहीं आ रहा था। नित्ती भाई को अचानक महसूस हुआ, कि वह लगातार उनकी तरफ धूर रहा है । वह आधे वाक्य के बीच रक गये, उमके कन्धे पर हाथ रखा, "मुन्नू बेटा, देखो सबके गिलाम खाली पड़े हैं उन्होंने प्यार मे उसकी ओर देखा, लेकिन उनको आँखो मे कुछ इतनी अशान्त-सी वेचनो थी, कि वह जल्दी से मुड गया, उसे मालूम था, वह क्या चाहते हैं, किन्तु उनके हाथ को अपने कन्धे से छुड़ाना असम्भव जान पड़ा। उसने किसी किताब में 'दिल की झाड़ियो' के बारे में पढा था। कुछ लोगो के भीतर झाडिया उगने लगती हैं और उनका दिल धीरे-धीरे दुनिया से डरकर झाडियों मे दुवक जाता है, वही छिपा रहता है; नित्ती भाई जहाँ भी हो, जैसे भी हो, उसे हमेशा झाड़ियों से घिरे दिखायी देते थे.."उसने धीरे से उनका हाथ अपने कन्धे से अलग कर दिया और रसोई की तरफ चलने लगा। उसे मालूम था, वह क्या पी रहे है। छत लांघते हुए वह एक क्षण ठिठक गया। चारों तरफ देखा, मव लोग अलग-अलग गुच्छो में सिमट आये थे, एक-दूसरे से बेखबर। रात की पार्टियों में हमेशा एक क्षण आता था, जब किसी को कुछ नही मालूम होता था, बाहर-भीतर क्या हो रहा है। वातों के झिलमिले में बाकी दुनिया भर जाती थी। सिर्फ एक हल्का-सा शोर अदृश्य लहरों-सा ऊपर उठता था, नीच गिरता था, एक सफेद - - - - तलछट-सा छोड़ जाता था। ऊपर चाँद निकल आया था, वहुत छोटा, एक सफेद कटे हुए नाखून-सा । अव पहले जैसा धुंधलका नहीं था, न कोई परदा, न परछाई, न धुन्ध; हर चीज़ अपने में अकेली, ठोस खड़ी थी; गमले, कुर्सियां, दरियों पर बैठे लोग। वह सबके वीच रास्ता टटोलता हुमा रसोई में चला आया। वाल्टी के ठण्डे पानी में सिर्फ वियर की बोतलें डूबी थीं। वह नित्ती भाई की 'चीज़' ढूंढने लगा। नीचे आलमारी का दरवाजा खोला, तो खट् से आवाज़ हुई। "कौन है ?" वह ठिठक गया। कमरे के भीतर झांका, तो इरा दिखायी दी। उसे वहाँ देख- कर उसे कुछ हैरानी हुई; वह उसके विस्तर पर लेटी थी; रिकार्ड-प्लेयर खुला था। वाकी कमरे में अँधेरा था, सिर्फ टेवुल-लैम्प का प्रकाश उसके चेहरे पर गिर रहा था। वह जिज्ञासा-भरी आँखों से उसे ताक रही थी। "क्या ढूंढ़ रहे हो?" "व्हिस्की," उसने कहा। "कौन मांग रहा है ?" वह एक क्षण झिझका, फिर साहस बटोरकर कहा-"नित्ती भाई ने मांगी थी।" एक हल्की-सी छाया इरा के चेहरे को लांघ गयी। "वह अब भी पी रहे हैं ?" उसने कुछ इतने धीमे-से कहा, कि वह समझा नहीं, वह उससे पूछ रही है या अपने से कुछ कह रही है। "वहाँ और लोग भी हैं।" उसने कहा। किन्तु उसने शायद सुना नहीं। वह विस्तर पर लेटे हुए सिर्फ छत को ताक. रही थी। "तुम वाहर नहीं आओगी?" उसने कहा । "बाहर ?" उसने कुछ चौंककर उसकी ओर देखा, "नहीं, मैं यहाँ ठीक ।" वह हमेशा इरा को 'तुम' कहा करता था। विट्टी के दोस्तों में वह सबसे छोटी जान पड़ती थी। उसने शायद ही कभी उसे साड़ी पहने देखा हो; वह हमेशा भूरे रंग की कार्ड राय की पैंट और बहुत ऊँचा खाकी कुर्ता पहने रहती थी। उम्र का भेद सिर्फ आँखों के नीचे झाइयों पर अटका था, किन्तु जब कभी वह - ३८/एक चिथड़ा सुख हंसती, तो वह भी झर जाता था। "तुम्हे जल्दी है ?" उसने सिर उठाकर उसे देसा। "नही, क्यों?" १॥ "मालूम है, विट्टी की सिगरेटें कहां हैं ?" "ठहरो, मैं अभी देता हूं।" वह किताबो की रैक के पीछे चला आया; वहाँ अंधेरा था। यह पुत्र देर चुप खडा रहा । डेरी का कोई रिकार्ड होगा, जज नही, कोई दूगरा, एक शारा, धीमी आवाज ऊपर आ रही थी, ठंडी और साफ, बाहर की आवाजों से भाग, किन्तु उनके साथ-साथ एक पहाडी नाले की तरह चलती हुई, किगी गुरंग में रास्ता भूलकर दुबारा बाहर निकलती हुई "अचानक एक गहरी उदासी उसे घेर लिया, उदासी भी नहीं, सिर्फ एक धुंधली-मो चाहना, जो गसे राम लबालव भर आती है, न भीतर जाती है, न बाहर निकल पाती है... "कहाँ हो तुम इरा की आवाज सुनायी दी और यह गभरत गया; किताबो के पीछे से विट्टी का पैकेट और माचिस बाहर निकाली और पूदी में आगे चला आया। "तुम कुछ भी नहीं पी रही?" उसने कहा। वह मिगरेट सुलगाकर बाहर देखने लगी। "मेरे बदले में वह पी रहे हैं।" उसने कहा। "तुम गुस्मा कर रही हो।" वह हंसने लगी उसका हाथ खीचकर अपने पास बैठा लिया। कभी- कभी उसे लगता था, इरा जो कुछ दूसरो से नहीं रह माती, उममें बह गनी है। वह खुद भी उससे ऐसी बातें कह देता था, जो कमी विट्टी में करना असम्भव जान पड़ता था। इस क्षण भी यह स्वाभाविक दान परा, किये गबंग अलग एक दूसरे के साथ भीतर बैठे हैं; इरा के माय ने नन्ना था, वह पृष्ठ बड़ा हो गया है और शायद इरा को लगता था, वह कुछ छोटा हो गयी है। ये अनजाने में बराबर हो जाते थे। "किमका रिकार्ड है यह ?" उमने पूछा। "हाइन का" मैंने इसे पहली बार लन्दन के मन में मुना था।" "तुम बोली जाती थी?" वह कुछ देर कुछ नहीं वोली, फिर दोनों आंकार मागे “निती भाई के साथ ।” उसने कहा, "मैं जद तक जने नहीं निगयो पूछा। - कहीं भी अकेले जाते हुए डरती थी।" उसे लगा, उसकी उदासी बहुत कम हो गयी है, हालांकि रिकार्ड का स्वर वैसे ही अँधेरी गुफाओं के भीतर बँटता हुआ ऊपर आ रहा था" "तुम लन्दन में ही रहती थीं ?" उसने "और कहाँ ?" उसने कौतूहल से उसकी ओर देखा। "नहीं, ऐसे ही," वह कुछ झेंप-सा गया, "इंग्लैण्ड में दूसरे शहर भी तो हैं।" "जैसे?" "मैनचेस्टर," उसने कहा । "यार्क शायर"। "रीजेन्ट पार्क ?" उसने कहा। "वह कोई शहर है ?" वह हंसने लगी, "हम उसके सामने रहते थे। मैंने पहली बार शेक्सपियर का नाटक वहाँ देखा था।" "पार्क में?" "गर्मियों में..." वह ठहर गयी, चुपचाप सिगरेट पीती रही, एक अजीब-सा खयाल उसके चेहरे पर चला आया। "वे वाग में कुर्सियाँ विछा देते थे। हर सीन के वाद स्टेज घूमता था और मैं सोचती थी, पेड़ भी घूम रहे हैं, लेकिन वे एक जगह खड़े रहते थे।" "तुम वहुत छोटी थीं?" "मैं उन्हीं दिनों हिन्दुस्तान से आयी थी।" उसने कहा । "मैं सोचती थी, सारा इंग्लैण्ड रीजेन्ट पार्क में फैला है।" रिकार्ड का स्वर बहुत धीमा हो गया था-सिर्फ वायलिन की एक अकेली लकीर ह्वा में घूम रही थी 'लन्दन, रीजेन्ट पार्क, गर्मियों के दिन, दिल्ली की वरसाती में ये सब किसी दूसरी दुनिया की चीजें जान पड़ती थीं। उसे कुछ हैरानी-सी हुई कि विट्टी के कितने दोस्त अपनी आधी जिन्दगी वाहर गुज़ार- कर लौटे थे। इसीलिए वे अजीव-से कोनों में पड़े रहते थे. 'नित्ती भाई का दफ्तर, जहाँ वह सोते थे और इरा, वह सबसे छिपती रहती थी, होस्टल से स्टूडियो और स्टूडियो से होस्टल-सिवा उन रातों के, जो वह विट्टी की बरसाती में विताती थी... "तुम्हें यहां काफी अजीव लगता होगा,” उसने इरा को देखा। "अजीव कैसा?" "तुम इतने साल बाद हिन्दुस्तान लौटी हो।" ४० एक चिथड़ा सुख "पहले लगता पा," उसने पारने कहा, अब पिटर में पता भी नहीं पाता, कहां हूं।" वह क्षणभर स्ली, जैने नानी बांसों मेरमको शामा को पाह से रही हो, "जब मैं लन्दन में यी, तो हनेगा इंटी में रहती थी कि हमें अपने देश सोरना चाहिए और वे कहते थे, इस उम्र में जन्हें कौन नोकरी देगा, और तय मुझे • काफी डर लगता था कि मैं नी एक दिन की तरह वापिस नही मौट सकूँगी... मैं बहुत जल्दी में दी।" उसने कहा। "इरा, तुम्हें पछतावा है ?" "पछतावा कमा?" "यहाँ आने का?" "नहीं, पछतावा नहीं, लेकिन..." वह एक क्षण रुकी और अनाना हसने लगी, "मुझे लगता नहीं, मैं हिन्दुस्तान मेंहूँ।" "फिर कहाँ हो?" "थियेटर मे..." वह अब भी हंस रही थी, "अपने होस्टल के कमरे में, यहाँ तुम्हारे पास..." "मेरे पास?" वह सचमुच उसके इतने पास बैठी थी कि हाप यहाकर वह उसका चेहरा छू सकता था; दो चोटियो के बीच एक पीला पुला हुआ घेरा, जो उमका मुंह था, झूठी हंसी में खुला हुआ। ऊपरी होंठ पर पसीने की एक बूंद आ टिकी थी और पाखें दरवाजे पर थिर थो, निश्चल, एकटफ किसी को देराती हुई; हठात् वह पीछे मुड़ा, तो वह दिखायी दिये; वह टेबिल-लम्प के पीछे पड़े थे, इसलिए शुरू में पता नहीं चल सका, कि वह यहां कितनी देर से खड़े थे; यह कुछ आगे आये, तो रोशनी मे उनका चेहरा दिखायी दिया। उनके हाथ मे साली गिलाम था और वह मुस्करा रहे थे। "कहां गायब हो गये तुम उन्होने धीरे से उसके बालों को झिंझोड़ दिया। "मैं आ रहा था।" वह उठने को हुआ, कि अचानक उसे अपने कन्धों पर एक ठण्डी-सी गिरफ्ता महसूस हुई। इरा ने उसे बिठा दिया, सुद खड़ी हो गयी। नित्ती भाई के पारा आयी, और तब उमे लगा, वह उनके सामने बहुत छोटी दिखायी देती है, उसका मिर उठा था, नित्ती भाई को छाती को छूता हुआ। "सुनो, अब हमे चलना चाहिए।" उसने कहा। उराका स्पर पीप में सूसा "मुन्नू, यत था, किन्तु किनारे एक अजीव आत्मीयता में भीगे थे। उसमें आग्रह तो बरसों एक-दूसरे को जानने पर आता है। "चलते हैं। इतनी जल्दी क्या है ?" नित्ती भाई ने कहा । वह दीवार से सटे खड़े थे; टेविल-लैम्प का मद्धिम आलोक उनके चेहरे पर रहा था."और तव पहली बार उसे उनकी उम्र का सफेद तितीरीपन खायी दिया; सुबह की शेव कव की खत्म हो गयी थी, उसकी जगह, गालों पर वासी, नीली छायाएँ उग आयी थीं। आँखों पर चकाचौंध-सा भाव था, जोपी ने पर दूसरे लोगों पर भी आता है, किन्तु नित्ती भाई पर वह पुरानी बर्फ-सा जम गया था। थोड़ी-सी लाओगे?" उन्होंने अपना खाली गिलास आगे बढ़ाया, तो इरा ने उसे पकड़ लिया। "तुम और नहीं लोगे?" "क्या बात है ?" उन्होंने अजीव कौतूहल से इरा को देखा । "मैं बिल्कुल ठीक हूँ।" "मुझे मालूम है, तुम कितना ठीक हो।" "तुम्हें सव मालूम है।" वह एक क्षण रुके, अपने चेहरे पर हाथ फेरा और दुबारा कहा, "तुम्हें सब कुछ मालूम रहता है ?" इरा का चेहरा पीला-सा पड़ गया, सिर्फ एक तह तक गुजरता हुआ, फिर वह शान्त हो गयी। उसने विस्तर से अपना पर्स उठाया और गिलास उनके हाथ में वापिस दे दिया। "तुम बैठो, मैं चलती हूँ।" "सुनो..." नित्ती भाई ने कहा। वह उनके पास आयी, उनके चेहरे को हल्के से सहलाया; "जल्दी नहीं है मैं वाहर बैठी हूँ।" वह चली गयी, और वह चुप खड़े उस खाली जगह को देखने लगे, जहाँ देर पहले वह खड़ी थी, और तव उन्हें देखते हुए एक अजीव-सा डर उसके भी उठने लगा-वह उन्हें नहीं, बल्कि उसे देख रहा है, जो उन दोनों के बीच चुका था मौर जिसे वह कभी नहीं जान पायेगा, न कभी उसे देख पायेगा आनेवाला है क्योंकि जो कुछ होनेवाला है, वह पहले से ही कहीं घट चुर वह कहीं वीच में है, न इधर, न उधर, जहाँ इस क्षण नित्ती भाई खड़े हैं कुछ अपने लिए कर सकते थे, न वह कुछ उनके लिए कर सकता था ४२ / एक चिथड़ा सुख - “साली गिलास उठाया और बाहर चला आया। वे अब काफी जोर-शोर से बोल रहे थे; वह हिप्पो-सा दीखनेवाला लड़का छत पर लेटा हुआ कुछ गा रहा था और उसके पास बैठी लडकी बार-बार हंसने लगती थी, उन्हें कुछ पता नहीं है, उमने सोचा, उन्हें कभी कुछ पता नहीं होता। कुछ देर बाद जद वह गिलास लेकर कमरे में लौटा, तो नित्ती भाई वहाँ नही थे । वाथरूम भी खाली पडा था । वह किचन में आया, सिंक का नल खोला और बहते पानी में भरे हुए गिलाम को उँडेलने लगा। ऊपर एक हवाई जहाज जा रहा था, साफ अंधेरे मे एक जुगनू-सा रंगता हुआ, नीचे की आवाजों से बेखवर, छतों के ऊपर एक चमकीली-मी पुरै-धुरं करता हुआ। उसके भीतर धूल-मी उड़ने लगो, न माफ, न धुंधली, सिर्फ एक जिद्दी-सी गर्द जो मन के भीतर एक तम्बू-सा तान नेती है। उसकी इच्छा हुई, वह उनके पीछे छिपकर खड़ा रहे, किसी को पता भी नहीं चलेगा, वह कहाँ है, कहां गया, कहां छिपा है। विट्टी का कजिन ! उसे अपने पर गुम्सा और हेमो और शर्म-मी आने लगी । वह दर्शक-माखडा रहता है और वे दीवार पर फिल्म को छायाओंसे एक क्षण ठिठककर गुम हो जाते हैं, अंधेरे में गायब हो जाते हैं, मिर्फ दीवार खड़ी रहती है, जिन पर न उनकी हंसी, न पीड़ा, न बीता हुआ ममय, नाखूनों को एक खरोंच भी दिसायी नहीं देती, सिर्फ दो आँखें बची रहती हैं, तम्बू के बाहर झांकती हुई, अकेले में उन्हें लोलती हुई जो अभी उसके पास थे, और अत्र जा रहे हैं." वे सचमुच जा रहे थे। जीने के पास एक छोटी-सी भीड़ जमा हो गयी थी। किसी ने टक्मी मंगवायी थी और उसका हानं बराबर रात के सन्नाटे में चीन रहा था। मिसेज़ पन्त के कुत्ते जाग गये थे और वे भी बराबर हानं का माय दे रहे थे। छत के दूसरे कोने में, जहां सेमल का पेड़ था, बिट्टी कुछ कह रही थी, नित्ती भाई से, कुछ बहुत याग्रह के साथ, जैसे अक्सर वह बोलती थी, एक अजीब तात्कालिकता मे, जमे यह घडी कोई आखिरी पड़ी है किन्तु वह एक शब्द भी नहीं सुन पा रहा था; बीच छत पर कांच के गिलास, प्लेटें. बोतलें अकेले में चमक रहे थे। वही उमे इरा दिखायी दी, मुंडेर के माय सटी हुई, और उसे अजीब-सी खुशी हुई, वह अब भी वहां है वह भागता हुमा रमोई में गया, दोनों साली . - ले उठाये, जिन्हें वह अपने साथ लायी थी; वह हमेशा कोई-न-कोई चीज, छ भूल जाती थी। वह मुंडेर के पास आया, धीरे-से इरा का हाथ खींचा, वह एकदम चौंक गयी, मुड़कर उसे देखा। "तुम इन्हें भूल गयी थीं।" उसने कहा और तव उसने देखा, उसका चेहरा आंसुओं से भीगा है। सारा चेहरा। उसने थैला उसके हाथ से लिया एक छोटी-सी मुस्कराहट में होंठ खुल गये, कुछ कहा नहीं, सिर्फ एक क्षण उसकी ओर देखा और फिर सीढ़ियां उतरने लगी। वह कमरे में लौट आया । कुछ देर बाद टैक्सी के जाने की आवाज़ सुनायी दी, फिर सन्नाटा हो गया। सिर्फ हवा चलने से कभी-कभी छत पर पड़ी किसी दरी या चटाई की सरसराहट सुनायी दे जाती। फिर सेमल का पेड़ हिलता और उसकी छांह वियर की बोतलों पर डोलने लगती। विट्टी का विस्तर खाली पड़ा था। वह लेट गया। वह रिकार्ड अव भी डिस्क में लगा था, जिसे कुछ देर पहले इरा सुन रही थी। क्या नाम बताया था, उसने-हाहडन या हैंडल ? पता नहीं कितनी देर बाद डैरी की मोटरसाइकिल की घुरघुराहट सुनार्य दी । वह जा रहे थे; चाँद सरकता हुआ मकवरे के गुम्बद पर आ अटका था। सार छत सूनी पड़ी थी; सिर्फ विट्टी मुंडेर के पास खड़ी नीचे झांक रही थी। ... ४४ / एक चिथड़ा सुख ४ 1 रात बीत गयी। दिन आया और फिर दूसरी रात । पन्थर की आँखें खुलती- और मुंद जाती । वह दिन-भर मिस्टर हन्टर के साथ जंगलो में भटकता रहता। अँधेरा होते ही चांद निकलता---एक-एक इंच बढ़ता हुआ-मार्च के मखमली आकाश पर एक चमकीले कीड़े-सा-छतो पर रेंगता हुआ- और जब आधी रात आँख खुलती, तो वहीं चौद निजामुद्दीन के स्टेशन पर दिखायी देता, पीला और निष्पाप; वह अपने बिस्तर पर लोट आता । तकिये पर सिर टिकाता, तो कागज की चिप्पियाँ कराहने लगती, विट्टी को स्लि, जिन्हें वह हर सुबह स्टूडियो जाने से पहले उसके सिरहाने रख देती, "मैं आज देर से लौगी, तुम खाना खाकर सो जाना । मेरी इन्तजार मत करता।" कागज की हर चिप्पी पर उसका एक खाली दिन चिपका रहता-उसके अकेलेपन का कैलेंडर-जिसे वह अपने साथ इलाहाबाद ले जाना चाहता था। लेकिन इलाहावाद अभी दूर था, दूर की ट्रेनें आती थी और अलसाये-ऊंघते स्टेशन को एक पल झिंझोड़कर आगे बढ जाती थी। वह अकेला छत पर खड़ा उन्हें देखता था, विल्कुल अकेला नही, नीचे फाटक के आगे मिसेज पन्त भी खड़ी रहती थी । हाथ में ट्राजिस्टर, दोनो तरफ कुत्तै, उनके सफेद बाल हवा में उड़ते रहते । छत से वह बुढ़िया नही, गुड़िया-सी दिखायी देती थी, नीला लहेंगा, शोख रेशमी दुपट्टा और छोटे-छोटे गुजराती स्लीपर । जब ट्रेन गुजर जाती तो वह सिर उठाती, जैसे उड़ते हुए धुएं को अपनी निगाहो से नाप रही हो-और तब उनकी आंखें उस पर ठिठक जाती। "हाऊ आर यू?" वह जोर से चीखती। वह हमेशा अंग्रेजी मे चोखती थी, अपने कुत्तो पर, नौकरो पर, किरायेदारो पर। वह सिर हिलाता। "सिस्टर ऐट होम ?" वह दुवारा सिर हिलाता।
"माल ऐलोन ?" वह एक हाथ में ट्रांजिस्टर पकड़कर दूसरे हाथ को घुमाने लगती, जिसका मतलव होता, क्या विल्कुल अकेले हो..? जैसे उन्हें विश्वास न हो कि उनकी तरह कोई दूसरा इतना अकेला हो सकता है। दोनों कुत्ते भी सिर उठाकर सन्देह से उसकी ओर देखने लगते "और वह जल्दी से मुड़ जाता; छत की दूसरी तरफ चला आता, जहाँ मिसेज़ पन्त की चील-दृष्टि नहीं पहुंच पाती थी। । । वह घर का पिछवाड़ा था। मकवरे की दीवार से सटा हुआ-इतनी पास -कि वह उसे हाथ आगे बढ़ाकर छू सकता था। कभी-कभी छूता भी था। पुराने, पीले, गर्म पत्थर, जिनके बीच घास के तिनके निकले रहते। कभी-कभार कोई छिपकली दिखायी देती, जिसे देखकर लगता, वह भी मुग़लों के ज़माने की है, जब मकबरा बना था; वह विना हिले-डुले मूच्छित-सी लेटी रहती, धूप के नशे में बेहोश, जैसे पत्थर पर चिपका कोई पत्थर हो-वह मुंह आगे करके हल्के-से फूंक मारता, और तव छिपकली अपना सिर उठाती, अपनी हरी आँखें उस पर गड़ा देती, धीरे-से फूत्कारती आल एलोन? अँधेरा होते ही वह अपने कमरे में लौट आता; वह रिकार्ड-प्लेयर खोल देता। वह हमेशा एक ही रिकार्ड वजाया करता था, जिसे डैरी कभी कवाड़ी की दुकान से लाये थे। उसमें एक नीग्रो लड़की पथरायी आवाज में गाया करती थी; क्या गाती थी, उसे कुछ समझ में नहीं आता था, लेकिन उसकी आवाज एक आरे की तरह उसे चीरने लगती और वह अपने विस्तर पर लेट जाता। कपड़ों की रस्सी भी खाली हवा में झूलती रहती। वह ऊँघने लगता । लड़की का स्वर फटा-फटा-सा वाहर रेंगने लगता जैसे बदली के दिन पीला-सा सूरज वाहर निकलता है, न रोशनी देता हुआ, न अंधेरा ढंकता हुआ; वह आँखें मूंद लेता, और रिकार्ड की सुई किसी सुर्ख, सूजे हुए फोड़े को कुरेदते हुए बूंद-बूंद दर्द वाहर निकालती, धीरे-धीरे उसके नींद के हाशिये पर आकर रुक जाती। विस्तर के इर्द-गिर्द चक्कर लगाती रहती, धीरे-से फुसफुसाती, आल एलोन ? वह करवट बदल लेता-और फिर सव कुछ शान्त हो जाता; मिसेज़ पन्त के कुत्ते, हवा में डोलती रस्सी, नीग्रो लड़की की आवाज़ ; जब रात की आखिरी ट्रेन आती, तो वह नींद के परे होता, लेकिन रेल के पहिये बहुत दूर तक चलते रहते, नोंद और पीड़ा की जुड़वां पटरियों पर घुरघुराते रहते । फिर एक दिन चमत्कार हुआ। - - - ४६ / एक चिथड़ा सुख वह बहुत देर तक सोता रहा था। जब आँख खुली, बिट्टी जा चुकी थी। वह मुंह धोने वाथरूम में गया, तो देखा, बेसिनी के शीशे पर कुछ अक्षर उसे ताक रहे थे : आज दुपहर में स्टूडियो में रहूंगी- तुम जरूर आ जाना। वह कभी-कभी अपनी बिन्दी को रोली से इस तरह के सन्देश लिखा करती थी। वह कभी उन्हे देख लेता था, कभी नहीं "यह विल्कुल किस्मत का खेल था। इन गोपनीय सन्देशों के पीछे न कोई नाम लिखा रहता था, न कोई तारीख । वे किसी दूसरे ग्रह के बुलावे जान पड़ते थे। "तुम आओगे?" उसे मालूम था, वह उमे क्या बुलाती थी। उसे डर था, वह ऊब रहा है। वह अकेला बुखार में घूम रहा है। उसे डर था, वह किसी ऐसे ही दिन अपना वोरिया-बिस्तर उठाकर इलाहाबाद की तरफ चल देगा। वह पागल थी। उसे नहीं मालूम या, वह किनना व्यस्त है। एक क्षण की छुट्टी नहीं। वह डायरी लिखता है; मिशनरी साहब को बन्दूक और वूटों की छाया मे जंगलों को छानता है; विट्टी के दोस्तों के बीच अपने पंन्थर के लहूलुहान पजो को देखता है, जिसकी छाप आनेवाले दिनों पर छप-छप गडती जाती है... नही, वह कब नहीं रहा; वह गुनगुना रहा था। उसने अपना सिर नल की धार के नीचे छोड़ दिया था। सामने एक लम्बा कारीडोर था। वह दबे कदमो से आगे बढा। दोनों तरफ बन्द दरवाजे थे। वह यहां अनेक बार आया था, हर बार स्टूडियो का दरवाजा भूल जाता था। शायद ही यहां कभी सूरज की किरण आती हो-दिन के समय मे भी अंधेरा छाया रहता था । लम्वे-काले गलियारे मे सब दरवाजे एक जैसे ही जान पड़ते थे। उमे लगा, वह चलता जायेगा, गलियारे के अन्तिम छोर तक, जहां दुपहर की मलिन छाया रोशनदान से गिर रही थी। लेकिन बीच में फटाक से एक दरवाजा खुला, एक हाथ वाहर आया, झुकी हुई गर्दन से बँखियाती-सी आवाज वाहर आयी। "कौन है ?" नेकीराम का स्वर था। उसे ढाढम बघा "जल्दी से कहा, "मैं हूँ, क्या बिट्टी भीतर है ?"
1 "हिश नेकीराम ने उसका हाथ पकड़कर भीतर खींच लिया। "धीरे बोलो, रिहर्सल चल रहा है।" एक क्षण के लिए उसकी आँखें झिपझिपा गयीं। वह सचमुच एक तहखाना था-नेकीराम का क्यूविकल-जहाँ वह रिहर्सल के दौरान वैठा रहा करता था। लेकिन वह थियेटर का गोदाम भी था, जिसमें दुनिया भर की चीजें विखरी रहा करती थीं, पुराने नाटकों की रंग-बिरंगी पोशाकें, कार्डवोर्ड के हैलमेट, मास्क, पेण्ट और पाउडर के डिब्बे-और एक लम्बा आदमकद शीशा-जिस पर धूल की मोटी परतें जमा होती गयी थीं। नेकीराम ने उसका हाथ पकड़कर स्टूल पर बिठा दिया। यह उसकी दुनिया थी। पता नहीं, उसने कितने नाटक देखे थे। नेकीराम सबसे परिचित था। हर नाटक के वाद उसकी राय पूछी जाती थी। चपरासी से लेकर नाटकों में लाइट बदलने तक की जिम्मेवारियां उसे निभानी पड़ती थीं.---जव नाटक में कोई विपत्ति या दुःख का सीन आता था, चाहे वह रिहर्सल में ही क्यों न हो-उससे वर्दाश्त नहीं होता था। वह उस मरीज की तरह आँखें मोड़ लेता था, जो इंजेक्शन की पीड़ा जानता हो, किन्तु सुई को नहीं देख सकता था। वह उस समय तक आँखें मोड़े रहता था, जब तक सीन खत्म नहीं हो जाता था और जब दुबारा आँखें स्टेज पर उठाता, तो गहरे आश्चर्य में, मानो सोच रहा हो, इतने बड़े भूकम्प के वाद कैसे हर चीज ज्यों-की-त्यों कायम है। पहले दिन उसे देखते ही उसने पूछा था, "तुम विटिया के भाई हो?" "नहीं, मैं उसका कज़िन हूँ। मैं इलाहावाद से आया हूँ।" वह एक साँस में कह गया। "इलाहावाद से ? वहाँ तो रामलीला देखते होगे?" वह हंसने लगा। "यहाँ कबसे हो?" "एक महीने से।" वह कुछ देर गम्भीर, गहरी आँखों से उसे देखता रहा। "दिल्ली का चिड़ियाघर देखा है ?" "नहीं"क्यों ?" उसने आश्चर्य से नेकीराम को देखा। "फिर तुम्हें यह नाटक कुछ समझ में नहीं आनेवाला।" नेकीराम ने सिर हिलाया। "कभी वक्त मिले, तो जाकर देखना। वहाँ एक चीता है, दिन-रात पिंजरे के चक्कर काटता है।" ४८ / एक चिथड़ा सुख उसने नेकीराम को ध्यान से देखा; कही वह ठिठोली तो नहीं कर रहा है? भला चीते का नाटक से क्या रिश्ता? किन्तु उसकी बूढ़ी, गमगीन आंखों को देखकर वह चुप्पी साध गया । अगर कुमाऊँ जंगलों का पन्थर उसके सपनों में आ सकता है, तो जू का चीता क्या बिट्टी के नाटक में नहीं आ सकता? उस दिन ज्यादा बात नही हुई–नेकीराम ने उमे आडिटोरियम की पिछली सीट पर बिठा दिया था। छोटा-सा हाल, धुंधली, पीली रोशनी में भीगा स्टेज-- स्टेज भी नही– कुर्मियो के आगे एक खाली-सा प्लेटफार्म जहां विट्टी और उसके दोस्त आते थे, वातें करते थे, सिगरेट पीते थे। वह काफी निराश हुआ था। उसे लगा, वह कोई स्कूल का क्लास-रूम देख रहा है, थियेटर नहीं। उसके मस्तिष्क में थियेटर की कल्पना कुछ दूसरी थी-जगमगाती वत्तियां, चमचमाता स्टेज, तड़क-भड़क पोशाकें पहने ऐक्टर-लेकिन यहां किस्सा ही कुछ निराला था। विट्टी और उसके दोस्त उन्ही मले-पुराने कपडो मे स्टेज पर घूम रहे थे, जैसे वह उन्हे हर रोज़ देखता था। हरी के हाथ मे एक नोटबुक थी। वह एक लम्बे, हृष्ट-पुष्ट युवक को कुछ समझा रहे थे। विट्टी स्टेज के एक कोने में कुछ अनजाने लोगों के बीच घिरी बैठी थी। बीच-बीच में कोई चिल्लाने लगता, "मेकीराम जी, एक कप चाय, नेकीरामजी, पानी।" सहमा पाताल मे नेकीराम प्रकट हो जाता, चाय-पानी देकर दुबारा अपने क्यूविकल मे गायब हो जाता। किन्तु आज वह नेकीराम के क्यूबिकल मे बैठा था। यहां उसे कोई नहीं देख सकता था, जबकि वह दरवाजे के चौड़े सुराख से सब कुछ देख सकता था। एक नंगा स्टेज और छत के नीचे डोलता हुआ विजली का बल्ब, जिसकी रोशनी कोने में बैठे एक आदमी पर गिर रही थी। वह उसका चेहरा नही देख सकता था लेकिन उसकी आवाज सुनायी दे रही थी। वह मिर मोडकर कोने में बैठी एक लड़की से कुछ कह रहा था। वह लडकी एक कुर्सी पर बैठी थी, सिगरेट पी रही थी, आदमी की बातों से बेखबर, बिल्कुल येखबर नही, क्योकि उसकी आँखें बार-चार आडिटोरियम की तरफ उठ जाती थी और तब अचानक बत्ती का प्रकाश तेज हो गया और वह एक कोंप में पहचान गया-सिगरेट पीती हुई लड़की कोई और नहीं, इरा थी। सहसा वह आदमी पीछे मुड़ा और इरा भी कुर्मी से उठ खड़ी हुई । आडिटो. रियम की सीढ़ियो से कोई भागता हुआ नीचे आ रहा था, वीच स्टेज पर, रोशनी के दायरे में एक हांफती हुई औरत, जिसने वरसाती पहन रखी थी, बाल माथे पर विखर आये थे-~-सफेद बाल-पानी मे लिथड़े हुए-और तब उसका मुंह सूख.
- - गयो, उसने नेकीराम का हाथ कस के पकड़ लिया। एकाएक उसे विश्वास नहीं हो सका कि बारिश में भीगी, हांफती हुई वह अधेड़ महिला और कोई नहीं- विट्टी थी। वह आगे सरक आया। दरवाजे के सुराख पर अपनी आँख गड़ा दी। वह सचमुच विट्टी थी, किन्तु उसकी कज़िन नहीं, वरसाती में वह जिस लड़की को दिन-रात देखता था, वह लड़की नहीं। स्टेज की नंगी, तेज रोशनी में उसे लगा जैसे कोई दूसरी आत्मा विट्टी की पुरानी देह से बाहर झांक रही है, हालांकि चेहरा वही था, कपड़े भी वही थे, वरसाती के नीचे सलेटी रंग का खादी का कुर्ता, कुर्ते का पहला बटन खुला था, जिसके ऊपर उसकी नंगी, तपी हुई गर्दन स्टेज के उजाले में बहुत निरीह-सी दिखायी देती थी। बिट्टी उस आदमी की तरफ आगे बढ़ी, जो स्टेज के कोने में खड़ा था, किन्तु इस बीच सिगरेट पीती हुई लड़की ने सिगरेट फेंक दी, अपनी सैण्डिल के नीचे कुचल दी (क्या वह सचमुच इरा थी ?) और भागते हुए विट्टी के रास्ते पर आ खड़ी हुई । उसका हाथ पकड़ लिया, घुटनों पर झुकते हुए कुछ कहा, मानो वह उससे कोई भीख मांग रही हो; किन्तु विट्टी ने उसे देखा भी नहीं, जैसे वह सोते हुए चल रही हो, असीम, नीली धुन्ध में; उसने इरा को धक्का देकर हटा दिया और कोने में खड़े आदमी के सामने चली आयी। एक क्षण उसकी ओर देखा, जैसे वह अचानक जाग गयी हो, सिर्फ एक क्षण के लिए, किन्तु वह क्षण भी कितना लम्बा था, उन खुली आँखों में न जाने कितना गुस्सा था--कितना पछतावा, कितना आक्रोश और वितृष्णा उनमें छिपी थी। आदमी ने अनायास हाथ आगे बढ़ाया, विट्टी को रोकने के लिए, या शायद अपने को बचाने के लिए। किन्तु विट्टी ने झटककर उसके दोनों कन्धे पकड़ लिये, उसे हिलाने लगी। और वह आदमी जड़वत-सा होकर डोलने लगा--कभी आगे, कभी पीछे-और तब उसने वह आवाज सुनी, साफ, तीखी, विट्टी की आवाज, साफ और चमकीली, चाकू की चमकीली धार की तरह किसी भीतर के मौन और अँधेरे को काटती हुई, स्वयं उसकी अपनी देह को काटती हुई और वह पसीने में लथपथ ठिठुरने लगा, बार- वार अपने को समझाने लगा कि यह सिर्फ ड्रामा है, असली ड्रामा भी नहीं, सिर्फ एक खाली दुपहर का रिहर्सल, जिसका असली दुनिया से कोई लेना-देना नहीं, लेकिन मालूम होना एक बात है, आदमी के कन्धे पर झूलते हुए विट्टी के बदहवास चेहरे को देखना दूसरी वात--वह एक ऐसी जगह चली आयी थी, जहाँ इलाहाबाद का घर था, वह वीच कमरे में खड़ी थी, चाचा गुमसुम-से खड़े उसे ताक रहे थे, ५०/एक चिथड़ा सुख - , चाची कोने में बैठी रो रही थी और उसे आश्चर्य हुआ कि विट्टी चाची के आंसुओ को नही, अपने पिता के सुन्न चेहरे को देख रही थी, जैसे उनसे क्षमा मांग रही हो, फिर उसने अपना सूटकेस उठाया और बाहर चली आपी, घर के बाहर, स्टेज पर, पीली रोशनी के दायरे में, जहाँ वह एक अजनवी आदमी के कन्धों पर सिर टिकाये चीख रही थी, बाहर और भीतर की देहरी पर सिर पटकती हुई, एक ऐसी दुनिया में, जहां दुपहर हमेशा दुपहर रहती है, जो न असली है, न नकली, इमीलिए इतनी भयानक है, क्योकि वहां किसी सीन को नही टाला जा सकता, किसी को नहीं बचाया जा सकता.' लेकिन यह क्षण टिका नहीं-हरी स्टेज पर आये और सब ठिठक गये-- ठिठका हुआ ममय बहने लगा। वे मव डैरी के इर्द-गिर्द जमा हो गये जैसे मैदान में खिलाडी ट्रेनर के आगे-पीछे खडे हो जाते है, उत्सुक और उत्तेजित, क्या कोई चीज छूट तो नहीं गयी? क्या वे उसे पकडने मे सफल हो पाये थे जो मुद्दत पहले किसी लेखक ने अपने अकेले कमरे मे खोजा था? डरी कुछ बोल रहे थे, समझा रहे थे, किन्तु अब वह नही सुन रहा था। उसकी दिलचस्पी सहसा खत्म हो गयी थी। स्टेज पर खडे लोग अव हास्यास्पद-मे दिसायी दे रहे थे, जैसे उनके भीतर कोई कीमती आलोक शर गया था, मुरझा गया था, उन्हे नगे ढूंठ की तरह अकेला छोड़ गया था। उसे विश्वास नहीं हो सका कि स्टेज पर खड़ी, इरा वही लडकी थी, जो अभीवुछ देर पहले फटी-फटो आँखो से विट्टी को देख रही थी और वह लडकी कहाँ थी, जो वारिश में भीगते हुए आयो थी, अंधेरे में चीख रही थी? पता नहीं, वे लोग कौन थे, कहाँ से आये थे, कहां गायब हो गये थे? "सो रहे हो क्या ?" नेकीराम ने उसके कन्धों को झिझोडा। वह चौंक गया, खिसियानी मुस्कराहट मे उस बूढे आदमी को देखा, जो पाताल के जिन-जैसा बैठा था। "क्या खत्म हो गया ?" उसने पूछा। "नाटक कभी खत्म होता है ? आज वे इमी सीन को दुहरायेंगे।" उमने अनन्त गहराई में जाकर जम्हुआई ली। नेकीराम जाने के लिए खड़ा हो गया था। वह उसके उठने की प्रतीक्षा कर रहा था। लेकिन वह नही उठा। वह उस जादू को नही खत्म होने देना चाहता था, जो उसने अभी अपनी आँखों से देखा था। लोग कैसे बदल जाते हैं ? अचानक उसके मन में एक पुरानी स्मृति कौंध गयी-इलाहाबाद में, जब वह जी के साथ नुमायश देखने गया था। कितने साल गुजर गये ! उसने कभी नहीं सोचा था, स्टूडियो के उस क्यूविकल में अतीत का एक टुकड़ा सावुत-का-साबुत बाहर निकल जायेगा। मैं उसे कभी अपनी डायरी में लिखूगा, उसने सोचा--और तव क्यूविकल का दरवाजा खुला। शीशे में विट्टी की छाया झाँक रही थी। मैं अब भी उसे देख सकता हूँ। उसने हाथ-मुंह धो लिया था। वरसाती उतार दी थी। पसीने में विखरे वाल अव एक ढीले जूड़े में सिमट आये थे और माथा- वह माफ और ऊँचा दिखायी दे रहा था। यह सब मैंने क्यूविकल के शीशे में देखा था । वह मेरे पास नहीं आयी, मैं ही उठकर उसके पास चला आया। वह मुस्करा रही थी। "कैसा लगा ?" मेरे पास पूछने को ढेरों सवाल थे लेकिन उस समय मैंने सिर्फ इतना ही कहा, "मैं तुम्हें पहचान भी नहीं सका।" "वस, इतना ही ?" "क्या सिगरेट पीती हुई लड़की इरा थी ?" "और कोन होगा?" उसने अपना चमड़े का बैग उठा लिया, "जल्दी चले आओ, वे बाहर खड़े हैं।" हम बाहर आये, लेकिन गलियारे में कोई दिखायी नहीं दिया-स्टूडियो के भीतर से आवाजें सुनायी दे रही थीं। विट्टी ने कुछ दूर चलकर एक दूसरा दर- वाजा खोला। वह स्टेज का पिछवाड़ा था। दोनों तरफ छोटे-छोटे केविन थे, नेकीराम फर्श पर झाड़ लगा रहा था। मुझे देखकर उसने मुस्कराते हुए आँख दवायी-फिर विट्टी से कहा कि वे सब तीन नम्बर में हैं। मुझे लगा, मैं किसी भूल-भुलैया में आ फैसा हूँ। आधे-अंधेरे कमरे में एक लम्बा-सा लड़का अपने सूटकेस में कुछ कपड़े ठूस रहा था, विट्टी से दो-चार वातें करके वह फिर अपने काम में जुट गया-और तब मुझे अचानक याद आया कि यह वहीं लड़का है, जिसके कन्धे को पकड़ कर विट्टी चीख-चिल्ला रही थी। वह हिप्पी-सा दीखनेवाला लड़का, जिसे उस रात बरसाती की छत पर देखा था, - - - ५२ / एक चिथड़ा सुस मुझे हैरानी हुई, उम्र मे वह कितना छोटा था, जबकि स्टेज पर वह कोई अधेड़ उम्र का बिगड़ा हुआ अफमर दिखायी देता था। हाल के कोने में डेरी दिखायी दिये-वह टेपरिकार्डर के साथ जूझ रहे थे। पास ही एक घंला पड़ा था, जिसमें पता नहीं, कितने कागज-पत्तर ठुसे थे। कुछ देर तक उन्हें पता नहीं चला कि हम उनके सिर के ऊपर खड़े हैं। "तुम अभी यहां हो?" विट्टी ने धीरे-से उनके बालों को सीधा। उन्होंने अचकचाकर सिर उठाया। "मैं इसे साथ ले जा रहा हूँ-" उन्होंने टेप-रिकार्डर की तरफ इशारा किया। "घर ले जाओगे?" "नही, इमे नित्ती भाई के घर छोड़ देंगे-कल यहां आते हुए ले लेंगे।" इस बार उनकी आंखें मुझ पर पड गयी, "क्या हाल हैं ?" उन्होंने हँसकर हाथ आगे बढाया- वह हमेशा मुझसे हाथ मिलाते थे, जो शुरू में मुझे बहुत अजीब लगता था, लेकिन चूंकि वह मेरे साथ थोड़ा मजाक भी करते थे, मुझे वह ज्यादा खलता नहीं था। "रिहर्सल देखा?" वह फिर टेप-रिकार्डर पर झुक गये थे। "हाँ," मैंने कहा। "जानते हो, यह नाटक किसने लिखा है ?" "स्ट्रिनवर्ग।" "गुड," उन्होंने सिर ऊपर उठाया- आधी रोशनी में उनकी दाढी चमक रही थी। "मालूम है, वह कौन थे ? पागल एसेल्यूटली मंड !" "डरी!" बिट्टी ने कहा। "क्या नहीं थे ?" हैरी ने गम्भीर जिज्ञासा से विट्टी की ओर देखा। "तुमसे ज्यादा नहीं।" बिट्टी ने कहा । "इरा कहां है ?" "निती भाई के घर-जरा देखो।" हैरी फर्श पर ही बैठ गये-यले से कुछ कागज निकाले और बिट्टी को दे दिये। "मैंने कल रात बनाये ये ।" बिट्टी कागजों को पलटने लगी-मैं भी देखने लगा । पेंसिल मे ड्राइंग्स खींची गयी थी, हर ड्राइंग के नीचे पहला सीन, दूसरा सीन, लिखा था। "बहुत काम करते हो?" विडीने डरी को देखा-उसमें अजीब-सा स्नेह - - - . और लगाव भरा था। डैरी अपनी दाढ़ी खुजलाने लगे। "कल रात नींद नहीं आ रही थी-मैंने सोचा, चलो, सेट्स के बारे में ही कुछ सोचा जाये।" विट्टी एक-एक करके पेंसिल के स्केच देखने लगी; कभी-कभी डेरी भी कागजों पर झुक जाते, उससे पूछते, कौन-सा दरवाजा कहाँ रखना ठीक होगा, दो कुर्सियों के बीच कितनी स्पेस छोड़नी होगी, विट्टी कहीं आपत्ति करती या सलाह देती तो वह चुपचाप सुनते रहते, पेंसिल निकालकर कुछ लिखने लगते। मुझे लगा, वे मुझे भूल-सा गये हैं, जैसे मैं वहाँ हूँ ही नहीं; फिर मुझे महसूस हुआ कि जैसे वे एक-दूसरे को भी भूल गये हैं। नहीं, भूले उतना नहीं, जितना खो गये हैं, असली का खोना नहीं, बल्कि ऐसा, जब हमें मालूम हो दूसरा कहाँ छिपा है और हम खोकर भी दूसरे के साथ जुड़े रहते हैं (मैं इस नोटबुक में उसे नहीं समझा सकता)। विट्टी के वालों की लट कभी ढीली होकर डैरी के गालों को छूने लगती, और वह उसे छूने देते, ड्राइंग्स पर कुछ समझाती हुई डैरी की अंगुलियाँ कागज पर थमे विट्टी के हाथों पर ठिठक जातीं और-विट्टी उन्हें ठिठके रहने देती, यह नहीं कि इसका उन्हें पता नहीं था, किन्तु इस पता होने का सुखयदि उसे सुख कहा जा सके- ऊपर नहीं आता था, बातों की रौ के नीचे चला जाता था, उसे साफ और चमकीला बना देता था और जब वे कागजों से अपनी आँखें उठाकर एक-दूसरे को देखते, तो सुख नहीं, इस चमक को देखते थे, जिसमें एक अजीव-सी उदासी और विस्मय छिपा रहा करता था। उन्हें खयाल आया, मैं भी वहाँ हूँ। और तभी शायद यह खयाल भी आया- :: कि वे एक-दूसरे के साथ थे । वे अलग हो गये, हालांकि वे एक ही जगह बैठे थे। विट्टी ने कागजों का पैड डैरी को वापिस कर दिया : "क्या इन्हें नित्ती भाई को दिखाया था?" "आज वहाँ चलेंगे, तो दिखाऊँगा "मुझे मालूम है, वे इन्हें फोड़कर फेंक देंगे।" डरी ने कहा। विट्टी हमने लगी...~धीरे-से अपना हाथ डैरी की बाँह पर रख दिया, "क्या वे अव भी तुमसे नाराज हैं ?" "मुझसे नहीं-स्ट्रिनवर्ग से।" डैरी ने ऐनक उतारी और उसके शीशे अपनी कमीज के स्लीव से साफ करने लगे। वह कुछ सोचने लगे थे। एक बोझिल-सी परेशानी उनके माथे पर . ५४ , एक चिथड़ा सुख था, । सिकुड़ आयी थी। "विट्टी--क्या तुम इधर नित्ती भाई से मिली हो?" "नही–क्यो?" "वह पन्द्रह दिन से अपने फ्लेट में हैं-विल्कुल बाहर नहीं निकलते।" "घर नही जाते ?" "लगता नही, पिछले कई दिनो से वहां से गुजरता हूँ, तो उनकी बत्ती जलती दिखायी देती है।" बिट्टी कुछ सोचने लगी और मुझे याद आया, शुरू के दिनो मे जब हम भटकते हुए थक जाते तव अचानक विट्टी कहती, चलो, नित्ती माई के पास चलते हैं। तीन मंजिल सीढियां चढ़कर उनका पलट जो उनके आफिस के काम में भी आता था। वह मजाक में उसे अपनी वर्कशाप कहते थे । दिन में दो- तीन आर्कीटेक्ट मित्रों के साथ वहां काम करते थे, लेकिन जब वे चले जाते, तो यही वर्कशाप उनके 'घर' में बदल जाती, जहां वह देर शाम तक काम करते रहते थे। पहले दिन जब मैं उनके फ्लंट से लौटा था, तो मिट्टी से यह जानकर बहुत आश्चर्य हुआ था कि यह नित्ती भाई का असली घर नहीं है वह माल रोड में रहते थे, अपनी पत्नी और बच्चो के साथ--- --यहां सिर्फ अपने काम के लिए आते थे। मुझे मिर्फ इतना मालूम था लेकिन उस दुपहर स्टूडियो में मुझे लगा, जैसे भी मालूम नहीं है। कुछ देर तक बिट्टी खाली आंखो से डरी को देखती रही और डेरी अपने टेप-रिकार्डर, टेप्स, रिकार्डों और कागजी को समेटने में जुटे रहे । मुझे लगा, वह किसी कारण से अपने को विट्टी को नजरों से बचा रहे हो । लेकिन क्यों ? वह क्या है, जिसे वह छिपा रहे हैं ? क्या अपने दोस्तो के दुख एक हद के बाद शर्मनाक से बन जाते हैं, जिन्हें छिपाना ही बेहतर है ? "इराने तुमसे कुछ कहा था?" विट्टी ने कहा। "कब?" डेरी ने आंखें ऊपर उठायी। "उसने तुम्हें अपने होस्टल में बुलाया था।" "कुछ नहीं।" डेरी फिर अपने काम में जुट गये। "उमे मनन अनी- कहती थी, इस नाटक के बाद वह इंग्लण्ड जाना चाहती है।" "तुमने क्या कहा ?" हरी ने सब चीजें समेटकर कोने मे रख दी-सिर्फ नारद रिकार्डर उठाकर खड़े हो गये। "चलो...?" उसने विट्टी को देखा। मुझे कुछ विट्टी बैठी रही। "तुमने क्या कहा ?" "मैंने कहा-यह सबसे बड़ी वेवकूफी होगी-तुम नहीं सोचती ?" इस वार उन्होंने कुछ विश्वास के साथ विट्टी को देखा, "सुनो, तुम्हें उसे कुछ मझाना चाहिए। इस तरह वे लोग नहीं चल सकते।" वे लोग; इरा और नित्ती भाई ? विट्टी की आंखें ऊपर उठीं, एक अजीव ताशा में । सव चल सकते हैं; चल रहे हैं; न तुम उन्हें रोक सकते हो, न वापिस बुला सकते हो। वापिस, अपने पास; उसे कोई खयाल आया और वह मुस्कराने लगी, "डरी, सब लोग तुम्हारे जैसे नहीं होते।" उसने कहा। "मैं कैसा हूँ?" डैरी ने विट्टी को देखा। "जैसे भी हो, तुमने अपने को पा लिया है। सव लोग तुम्हारे जैसे सौभाग्यवान नहीं होते।" पता नहीं, विट्टी के स्वर में व्यंग्य था या सिर्फ एक कोरा वक्तव्य, लेकिन डैरी के हाथ टेप-रिकार्डर पर ठिठक गये। उन्होंने सिर उठाकर विट्टी को देखा, "मैंने क्या पा लिया है ?" "तुम सोचते हो डैरी, दूसरे लोगों की तकलीफें झूठी हैं।" विट्टी अजीव ढंग से मुस्करा रही थी, "सिर्फ तुम्हारा काम असली है।" "तुम मुझसे तकलीफों की बात मत करो," डैरी ने कहा, "वरसाती में रहकर तकलीफें पता नहीं चलतीं।" "नहीं, सरकारी बंगले में रहकर पता चलती हैं..." विट्टी का स्वर एकदम बदल गया, "लेकिन तुम विहार के गांवों में भी घूमे हो वहाँ लोगों के बीच रहे हो; अब तुम पर कोई अंगुली नहीं उठा सकता।" डैरी ने विट्टी को देखा, जैसे वह कोई अजनवी लड़की हो, जिसके बारे में उन्हें कुछ भी नहीं मालूम । और विट्टी ? वह अजीव हैरानी से डैरी को देख रही थी, क्या वे इतनी नीची सतह पर उतरकर एक दूसरे को यातना दे सकते हैं लेकिन अभी कुछ देर पहले वे एक-दूसरे के साथ बैठे थे, बिट्टी उनके डिजा देख रही थी और उनके हाथ विट्टी को छू रहे थे. इन दस मिनिट में क्या हुन् कि अचानक दोनों एक-दूसरे से इतना दूर छिटक गये हैं, कि सारी दुनिया उ वीच से निकल सकती है। हम दूसरों की तकलीफों के बारे में क्या इसलिए ल हैं. क्योंकि अपने सुख का कहीं पता नहीं होता? विट्टी अपना बैग लेकर उठ खड़ी हुई। ५६ / एक चिथड़ा सुख "चलो," उसने मुझसे कहा, डरी भी उठ खडे हुए। लेकिन एक क्षण के लिए दोनो ठिठके रहे, जैसे कोई चीज पीछे छूट गयो है, स्टूडियो के वासी, बोझिल धुंधलके में; कोई घाव, कोई खून की खरोच, जिसकी पीड़ा वरसों बाद सिर उठाती है, माफी-सी मांगती हुई, जबकि उसका कोई फायदा नहीं था। बीती हुई स्मृति आनेवाली पीड़ा को कभी माफ नहीं करती, यह उसने बरसों बाद जाना था। इसीलिए मां न यह नोटवुक मुझे दी थी। कहती थी, देखते हुए हम जो भूल जाते हैं, लिखते हुए वह एक बार फिर याद आ जाता है। लेकिन 'याद करना देवना नहीं है। वह अलग करना है, जैसे अव नोटबुक पर मैं बिट्टी की हैरानी और डेरी की चौंको-सी आँखें देख रहा हूँ, और वह स्मृति मफेंद पन्ने पर अचानक मबसे अलग हो गयी है, वह अपने मे अकेली है, समूची दुनिया से अलग, कागज पर चिपकी हुई एक तितली की तरह, लेकिन वह मरी हुई तितली है, उडते हुए रंग की निर्जीव लोथ। यह एक तरह का मौदा है "देखने, मरने और याद करने के बीच । हम स्मृति में उसे पकडते हैं, जो मृत और मुरदा हैं; जब वह जीवित थी, हम उमै ओझल कर देते हैं, हाथ से निकल जाने देते हैं, भूल जाते हैं । मैं भी उसे बहुत जल्दी भूल गया । हम स्टूडियो से बाहर आये और टैक्सी मे बैठ गये। डेरी जल्दी मे थे --वह अपना टेप-रिकार्डर नित्ती भाई के कमरे में रखकर घर लौटना चाहते थे। बिट्टी खिडकी से बाहर देख रही थी। बाहर तोते उड़ रहे थे, शाम के धुंधलके मे चक्कर काट रहे थे। पेड़ों की फुनगियाँ आखिरी धूप में सुलग रही थी, समूचा कनाट प्लेस एक चमकीला दापू- सा दिखायी देता था। यह मुझे याद है । इसके बाद सिर्फ अंधेरा जीना याद आता है। सीलन और घरेलू गन्धो की बासी हवा में सांस लेते हुए हम ऊपर आये थे। हैरी ने दरवाजा सटखटाया, लेकिन बहुत देर तक भीतर से कोई आवाज सुनायी नहीं दी। "शायद दूसरे कमरे में हैं।" डैरी ने विट्टी से कहा। "वत्ती तो जल रही है।" तभी भीतर परो की आहट सुनायी दी। दरवाजा खुला, तो निती भाई नहीं, इरा खड़ी थी। मैं एक्टवा उसे देखता रहा । उसने कपडे बदल लिये थे और अब साड़ी पहने 1 । थी। चेहरा बहुत उजला दीख रहा था। थियेटर में जो धूल-मैल चेहरे पर दिखायी दी थी, अव वह कहीं न थी। "भीतर आओ।" उसने कहा। "नहीं-मुझे जाना है; मैं सिर्फ यह छोड़ने आया था।" डैरी ने टेप-रिकार्डर और रिकार्डों का गट्ठर भीतर रख दिया। अपने थैले से पैड निकालकर इरा को दे दिया। "ये नित्ती भाई को दे देना।" "क्या है ?" इरा ने पूछा। "वह समझ जायेंगे।" डरी ने कुछ परेशानी में कहा, "मैं अब चलता हूँ।" वह पीछे मुड़े और विट्टी को देखा-उसका आधा चेहरा अब भी जीने के अंधेरे में छिपा था। वह शायद कुछ कहना चाहते थे, लेकिन बीच में ही रुक गये और फिर सीढ़ियां उतरने लगे। "क्या बात है ?" इरा ने विट्टी को देखा। "कुछ नहीं 'नित्ती भाई कहाँ है ?" "चलो।" इरा ने मेरे कन्धे को छुआ," "अपना स्वेटर उतार दो यहाँ बहुत गर्मी है।" वही कमरा था, जिसमें मैं और विट्टी कई वार आये थे। वे सदियों के दिन थे जब विट्टी के रिहर्सल शुरू नहीं हुए थे और हम दिल्ली की धूल छानते थे और जव थक जाते थे तो नित्तीभाई के पलट के नीचे आकर पर झांकते थे और अगर उनके कमरे की वत्ती जल रही होती थी, तो कुछ मिनट उनके कमरे में सांस लेने के लिए रुक जाते थे। यही वह कमरा है, जहाँ मैं अब खड़ा था। दीवार पर सिर्फ एक तस्वीर थी- आइंस्टाइन कीजिनकी सफेद दाढ़ी और चमकती आँखें हर मेहमान पर जम जाती, मानो रही हों-किस प्लेनेट के प्राणी हो? तस्वीर के नीचे फायर- प्लेस थी, जहां सदियों में नित्ती भाई आग जलाते थे-किन्तु अब वह खाली और ठण्डी पड़ी थी। चारों तरफ ड्राइंग-बोर्ड थे, किताबों की एक रैक-और कोने में खिड़की के पास एक मेज थी जिसके परे, अगर मौसम साफ हो, कनाट प्लेस की छते दिखायी देती थीं। किन्तु, अव वहाँ अँधेरा था-सिर्फ मकानों की बत्तियाँ झिलमिला रही थीं "तुम यहाँ खड़े हो? चलो, मने चाय बनायी है।" नित्ती भाई मेरे पीछे खड़े थे। वह इतने लम्बे थे, कि मुझे सिर उठाकर उन्हें ५८ (एक विथड़ा सुख देखना पडता था। उन्होंने वही हाफ पेंट पहन रखी थी-जिसे देखकर मुझे हमेशा हैरानी होती थी वह स्काउट-मास्टर से दिखायी देते थे। "अब आप यहां काम नहीं करते?" मैंने खाली मेज की तरफ इशारा किया। "यहां नीचे में बहुत शोर आता है।" उन्होंने मेरी ओर देखा, दाढी वढी थी, वैसे नही, जिसे बढ़ाया जाता है, जैसे डरी की दाढी थी, बल्कि जिसे देखकर लगता था, जैसे वह शेव करना भूल गये हो, नीले गालों पर छोटे-छोटे राफेद उगे हुए वाल । मैंने कभी किमी आदमी को अपने प्रति इतना लापरवाह नहीं देखा था- मानो उनका अपने शरीर से कोई रिश्ता न हो। किन्तु आज जो चीज मुझे सबसे अच्छी तरह याद रह गयी है, वह उनकी यावाज थी---पतली और तीखी—जो पहले क्षणो में काफी चुभती थी, पर यदि उमे देर तक सुनते रहो, तो उसके कोने अर जाते थे और वह मिकुड़कर एक लो की तरह मेरे भीतर अपना रास्ता टटोल लेती थी। नित्ती भाई ने मेग हाथ पकड़ा और हम दूमरे कमरे में चले आये। वह कमरा पहले से कही छोटा था-और साली भी। वहां नित्ती भाई की एक काऊच थी और उसमे मटा हुआ ऊंवा डेस्क। पीछे एक बडा मेज़ था, जहां एक हाट-प्लेट, कुछ वर्तन और चाय-काफी का सामान रखा रहता था। डेस्क के पास ही एक तिपाई थी, जिम पर टेवुल-लम्प जल रहा था। क्या उस दिन मुझे मालूम था, कि एक बार फिर मैं इस कमरे मे आऊँगा, ऐमाही साधारण-सा दिन होगा, ऐनी ही शान्त घडी, लेकिन सब कुछ एक काले दुःस्वप्न की तरह दुहराता हुआ लौटेगा? पया हम उसे याद कर सकते हैं, जो अभी हुआ नहीं है, लेकिन होनेवाला है ? एक दिन जो होगा-होनी को मुझे मालूम है, यह असम्भव है-मैकिन उस शाम जब मैं नित्ती भाई के साथ उनके कमरे में आया तो में एक क्षण ठिठक गया-मुझे एक पागल-सा खयाल आया, यह मैंने कभी पहले देखा है और यह फिर कभी होगा-हूबहू ऐमा जैमा में देख रहा हूँ--चाय बनाती हुई इरा और काळप पर बैठी चिट्टी-डेस्क पर पिन किया हुआ डाइंग-पेपर, सिडको से भीतर आती हुई मार्च की हवा; जब नित्ती भाई भीतर आये तो इरा कुछ कहते हुए एक गयी और विट्टी. उसने आंखें ऊपर उठायी-एक फफकती-भी जिनासा मे" लेकिन नित्ती भाई ने आसे मोड़ ली, कुछ नहीं बोले, काऊच पर बैठ गये और मुझे अपने पास विठालिया-थोडा-सा मुस्कराये।
, - सका मन लग गया?" उन्होंने विट्टी से पूछा, "अब तो इलाहाबाद जाने द नहीं करता?" इरा पीछे मुड़ी, मेरी तरफ देखा। "याद है, पहले दिन कैसे रोया था ?" "रोया कहाँ था ?" मैंने कहा। इरा चाय के प्याले हमारे पास ले आयी। "तुम स्टेशन से ही वापिस इलाहा- द लौट जाना चाहते थे।" मैं हँस दिया-हालांकि जव मैं प्लेटफार्म पर खड़ा था, तो सचमुच रोना अ. रहा था। दिल्ली का स्टेशन-सुवह की धुन्ध और बारिश में कुछ भी दिखायी नहीं देता था। मैं भीड़ में विट्टी को ढूंढ़ रहा था, लेकिन जिस लड़की ने मेरा हाथ पकड़ा, वह विल्कुल अजनवी थी। वह मेरा हाथ पकड़कर विट्टी के पास ले गयी, "देखो, यही तो तुम्हारा कज़िन नहीं है ?" तब पहली बार बिट्टी ने मेरा परिचय इरा से कराया था। किन्तु तभी मैंने देखा, एक दूसरा अजनवी आदमी मेरा सूटकेस उठाकर ले जा रहा है । मैं उसके पीछे भागनेवाला ही था कि विट्टी ने हँसते हुए अपने पास खींच लिया, "डरो नहीं, यह मेरे दोस्त हैं।" और मैं उन्हें देखने लगा, जो मुझे चोर-जैसे मालूम हुए थे, रूखे बाल, खाकी हाफ-पैंट, साधुओं-सी खोयी- खन्ती आँखें - वारिश में भीगते हुए वह मेरा सूटकेस उठाकर ले जा रहे थे। वह नित्ती भाई थे। और इरा- वह पहले दिन से ही मेरी दोस्त-सी बन गयी थी-शायद इसलिए कि विट्टी के दोस्तों में वह सबसे छोटी थी। मुझे कभी-कर्म काफी हैरानी होती थी कि कोई लड़की इतने वरस वाहर गुजारकर हिन्दुस्त आ सकती है.-थियेटर के लिए। सिर्फ थियेटर के लिए ? मैंने यही वात एक बार बिट्टी से पूछी थी। क्या सचमुच थियेटर से इतना प्यार करती है ? "पता नहीं।" विट्टी ने टालते हुए कहा, "वह किससे प्यार करती है ?' विट्टी कभी अपने दोस्तों के बारे में उसे नहीं बताती थी। वह उत बताती थी, जिसके सहारे मैं खुद ढूंढ़ सकूँ, खुद अपनी आँखों से देख सकू- देखना-वैसे ही जैसे मैंने विट्टी के साथ हुमायूं का मकबरा देखा था किला। अंधेरी सीढ़ियाँ जहाँ वादशाह लुढ़कते हुए गिर गये थे। म विट्टी उतना ही बताती थी जितना टूरिस्ट गाइड-यह इरा है, यह डरी हैं जो एक जमाने में कालेज छोड़कर भाग गये थे और अव थिये और यह हैं नित्ती भाई, आर्किटेक्ट, जो हमारे नाटकों के सैट भी बन ६०/एक चिथड़ा सुख - मूचनाओं के आगे चुप्पी के सोखल खुन जाते ये, मडकों पर मुंह फाइते 'मन- होल्स की तरह, जिनमे बचकर मैं आगे निकल जाता या। मैं सचमुच बचकर निकल गया। वे बातें कर रहे थे, मुझे भूल गये थे। मैं अकेला छूट गया था। मैं धीरे-धीरे सरकता हुआ कमरे के दूसरे छोर पर चला आया। एक दरवाजा दिखायी दिया-आधा सुला हुआ। भीतर झांका, तो कोई नहीं था-मैं चुपके-से भीतर चला आया। एक छोटी-सी कोठरी थी, रेल के डिब्बे की तरह-दीवार मे जडी एक आलमारी थी, जिसमे ताला लगा था। उसके पाम ही एक सोफा था जिसके मिरहाने एक कुशन और कुछ किताबें रखी थी। मम्भव है, जब नित्ती भाई काम करते-करते थक जाते होंगे तो यहाँ कुछ, देर सुस्ताने लेट जाते होंगे। कोठरी से सटा बाथरूम था। बत्ती खुली थी- और उसकी रोशनी में टव की मफेद चिकनी तह चमक रही थी। एक कमोड और कुछ वाल्टियां-पीछे एक खिडकी खुली थी, जहाँ से कनाट प्लेस के पिछवाड़े की गलियां दिखायी देती थी। सोचा, वापिस मुड जाऊँ । किसी अकेले घर मे घूमना, जब उसके मालिक साथ न हों, एक अनाथ-सी वीरानी ले आता है। एक सूखी-मी प्यास गले मे कुडकने लगी। नल सिर्फ टब मे लगा था। टूटी खोलने के लिए झुका, तो आँखें खूटी पर मटक गयी। टब के पीछे हैंगर लगे थे--उन पर धुले हुए पेटीकोट, ब्रा और अण्डरवियर लटके थे। कगर पर क्लिप रखे थे-पाउडर का एक डिब्बा, इन की छोटी-सी शीशी । सिगरेट और माचिस की डिब्बी और डिवी के ऊपर रखे दो क्लिप, जिन पर अब भी इरा के बालो की गन्ध चिपकी थी, वही सिगरेटें जिन्हें वह पीती थी, वही पैटी, वही साये, वही गन्ध, सास औरतो की गन्ध जो पुरुष के मर्दाने मकान मे अपने कोने ढूंढ लेती है, गुमलखाना, टव, गीले कपड़ों के हैंगर, पम्प का पानी; यह रोशनी है, उसने सोचा, वह यहां आती होगी, नहाती होगी, खिड़की के बाहर बाराखम्वा के वोराये पेडो और हवा और बत्तियों को देखती होगी। मुझे क्या मालूम था, एक दिन मैं दुवारा इस गुमलमाने में आऊँगा, सुबह की मैली रोशनी टब पर उतरेगी, मुर्ख और लिसलिसे पानी पर एक लोथ ऊपर उठेगी और पानी नीचे बहता रहेगा." यह बहुत आगे का दृश्य है, किन्तु पुरानी नोटबुक पढते हुए अक्सर समय की रील गड़वडा जाती है, जो बाद मे हुआ था, वह पहले दिखायी देने लगता है और हम दीवार पर भविष्य को उल्टी तरफ से आता हुआ देखते हैं, उन पेड़ो और खम्बों की तरह जो रेल की खिडकी से विपरीत दिशा में भागते हुए दिखायी देते सा, , - र हम एक क्षण के लिए भूल जाते हैं कि वे हमारी तरफ नहीं, हम उनकी फ जा रहे हैं। किन्तु उस दिन 'मैं' वहाँ था, मैं खुद अपनी नोटबुक पर अपने को लिखता दर्ज करता हुआ, भविष्य से कोरा अनभिज्ञ, वर्तमान की रोशनी के कोनों को कुतरता हुआ, वाथरूम में खड़ा हुआ, टूटी खोलकर पानी पीता हुआ, , देखता हुआ, उन आवाजों को सुनता हुआ जो दूसरे कमरे की देहरी लाँधकर मेरे पास आ रही थीं। मैं शब्दों को नहीं सुन सकता था----इसीलिए वे इतनी आदिम, इतनी माफ, इतनी नंगी थीं कि मैं मीधे-सीधे उन्हें पहचान सकता था, यह इरा है, यह विट्टी, यह नित्ती भाई; वे शान्त जल में हिलती छायाओं-सी दिखायी देती थी--, पहली बार मुझे पता चला, कि शब्दों को तुम सुनते हो, लेकिन आवाजों को देखा जा सकता है, सन्नाटे की दीवार पर वे फिस्कोज हैं, जिनके बीच गुस्से, पीड़ा, पछतावे का पलस्तर झरता रहता है, जहाँ चुप्पी के अपने रंग हैं, हमी की अपनी रोशनी, सोचने की अपनी स्पेस; बरसों बाद जव मैं अपनी डायरी पगा, तो शब्दों के सहारे नहीं. इन्हीं अदृश्य सुरागों को छूता हुआ इस शाम तक चला माऊँगा, और तब मुझे पता चलेगा कि वह शाम कुछ भी नहीं है, वह हमेशा के लिए चली गयी है, और में बीते हुए समय को नहीं, सिर्फ उसकी 'याद' को याद कर रहा हूँ जो मेरे भीतर है, टव, कपड़े, सिगरेट की डिब्बी-ये छलनी से छनकर भीतर की बावड़ी में टप-टप टपकते हैं और तब सहसा याद आता है, उस टप टपाट को सुनते हुए, कि वह मार्च की एक शाम थी, मैं नित्ती भाई के घर गय था; मैं गुसलखाने में खड़ा था और वे कमरे में बैठे थे; उनकी आवाजों के घोंस में सुखी और सुरक्षित; दूसरे लोगों से अलग रहकर जो सुख आता है, वह अ पर पट्टी बांधकर माता है, कानों में रुई के फाये भरे होते हैं, कहता है, मत देखो, कुछ मत सुनो, सिर्फ लिखते रहो, अपनी उस नोटबुक पर, जो माँ रे से पहले तुम्हें दी थी, तुम्हारी दिल्ली की रिपोर्ट, जिसका एक पन्ना उस श जुड़ा है, एक चीख की खूटी पर टॅगा हुआ, एक तस्वीर की तरह, जिसे तुम हो, पीछे मुड़कर देखते हो और तब... मैं मुड़ गया, उलटे पाँव लौट गया। लेकिन वे आवाजें? एक क्षण मुझे भ्रम हुआ, जैसे पड़ोस के फ्लैट में कोई बोल रहा है-चीख, और फुस के बीच में उफनता स्वर, जिसके टुकड़े हर कमरे में सुनायी दे जाते थे; कदमों में बड़े कमरे में आया-यहाँ कोई नहीं था । सिर्फ चाय की तीन खाली पड़ी थीं। जीने का दरवाजा खुला था। विट्टी वहाँ अकेली खड़ी ६२ / एक चिथड़ा सुख - - उसने मुझे देखा, जैसे मैं कोई प्रेत हूँ, किमी अंधेरे कोने से बाहर निकल आया हूँ। मैं भागता हुआ उसके पास आया । लेकिन पास आते ही पवि ठिठक गये। दूमरे कमरे में कोई चीख रहा था-एकाएक मुझे पता नहीं चला यह कौन है, चीख, जिमफा नाता किसी से नहीं होता, जो अकेले में अपने-आप गूंजती है। मैंने अनायास मिट्टी का हाथ पकड़ लिया और तुरन्त छोड दिया। सब कुछ शान्त हो गया था। कुछ देर तक कोई आवाज नहीं सुनायी दो- मानो सारा घर खाली हो । फिर हल्की-मी खटखटाहट हुई और मैंने देवा- इरा दूसरे कमरे से बाहर निकली है। वह जल्दी-मे जीने के पाम आयी और विट्टी के दोनो हाथ अपने हाथो मे ले लिये। "तुम जाओ मैं कुछ देर बाद आऊँगी।" उमकी आँखें सूज गयी थी। लम्बे बाल गले में लिपटे थे--साडी का पल्ला जमीन पर घिमट रहा था मूसे होठों के बीच एक वीभत्स-सी मुस्कराहट दिखायी दे रही थी। विट्टी देखती रही। पीछे नित्ती भाई आये थे-अपना हाथ इरा के कन्धे पर रख दिया था। दोनों खड़े थे-हमे देख रहे थे। बिट्टी चुपचाप जीने की सीढियां उतरने लगी। लेकिन मैं ? मैं अब भी वहां खडा हूँ-नोटबुक के ठहरे समय पर एक ठिठका-ठिठुरता हुआ जीव, जो लिखते हुए ऊपर देखता है, तो हर बार दो शक्लें दिखायी दे जाती हैं, एक दूसरे में बंधी हुई "मुझे लगता है, वे उस समय तक बंधी रहेंगी, जब तक मैं ऊपर देखता रहूंगा।
५ . क्या तुमने उन्हें देखा है-उन बंगलों को? इसे लुटियेन्स का शहर कहा जाता है, रायसीना के बँगले । वहाँ नम्वे लान हैं, झाड़ियों से घिरे हुए, पेड़ों से घिरे हुए। वे जामुन के पेड़ हैं, जो वारिश के दिनों में पकते हैं, टपाटप नीचे गिरते हैं। जरा ऊपर देखो, तो वुगुवगोलिया के फूल दिखायी देंगे, लाल और सुर्ख, बँगलों को अपनी लपटों में लपेटे हुए । लेकिनभीतर ठण्डा अँधेरा है; जाली की हरी, दुहरी खिड़कियाँ हैं; एक उनींदा-सा शोर है, जो झाड़ियों को छूता हुआ भीतर आता है, अकेली नौकरानी को अपनी दुपहरी ऊँघ से जगा जाता है, शोर, जिसे सुनकर चुहिया आलमारी के पीछे दुवक जाती है और छिपकली मुंह उठाकर उसे देखने लगती है, जो हर जगह है.---और कहीं नहीं है। लेकिन वे वहाँ हैं, वाहर पेड़ों में छिपे हुए । तुम सुनते हो ? वे हँस रहे हैं। रिहर्सल का कोई टुकड़ा हवा में तिरता हुआ यहाँ चला आता है, जहाँ वह खड़ा है, खाली। घर भी खाली है-डैरी का बंगला-ईटों की फंस से घिरा हुमा, जिस पर घास का मैदान एक जापानी पंखे-सा खुला है। उसे मालूम है । विट्टी ने उसे इस बँगले के बारे में इतना कुछ बताया था, कि वह जहाँ चाहे जा सकता है, आँखें मूंदकर घूम सकता है, पेड़ों के नीचे, झाड़ियों में, ईटों की मेंड़ों पर।जव डैरी के पिता टूर पर चले जाते थे, घर खाली हो जाता था, और वे रिहर्सल के लिए यहाँ आ जाते थे--अगर मौसम खुला हो-जैसा कि अक्सर मार्च के दिनों में वह हो जाता था। डैरी की माँ कहाँ रहती है, यह उसे नहीं मालूम था । विट्टी चुप रहती थी और डेरी भी इसके बारे में कुछ नहीं कहते थे। वह कहते कुछ नहीं थे, सिर्फ अपने घर बुलाते थे लेकिन वह बीच में बीमार पड़ता गया और बाद में रिहर्सल होने लगे और विट्टी देर से घर आने लगी और झगड़े की रातों में डैरी मोटर- साइकिल पर चले जाते और विट्टी छत के बीचोंबीच वैठी रहती और हवा में घास के तिनके विखरे रहते, जिसमें डरी वियर की बोतलें लपेटकर लाते थे, ६४ / एक चिथड़ा सुख युशी की रौ में कहते थे, यह हमारे लान की धाम है और उसे उनकी इन बातों पर रोना-मा आने लगा था। वही घाम अब चारो तरफ फैली थी। वह शाम की आखिरी रोशनी को पकड़ रही थी, बंगले की पीली दीवारों पर उतरती हुई-दूर से उनकी आवाजें सुनाई देती थी-रिहर्मल का शोर-ऐक्टरो की आवाजें, झाड़ियों के पीछे पैरो की मरसराहट, हमी, हवा में उडती हुई बातें, चेहरे, जिन्हें वह नहीं देख सकता था क्योकि वे लान के दूसरे छोर पर ये जहाँ जमीन का हिस्सा एक पहाड़ी-मा ऊपर उठ आया था-ऊंट के गोमड-सा-घाम का एक टेरेस, चारों तरफ अमलतास के पेड़ो से घिरा हुआ, घूप में सुलगता हुआ, एक झिलमिलाता स्टेज, जिस पर नित्ती भाई 'सी-गल' करना चाहते थे लेकिन अब वहां स्ट्रिनवर्ग का कब्जा था, एक पिंजरा, पिंजरे मे घूमता हुआ अदृश्य चीता, धूप के सीकचो के बाहर झांकता हुआ- गुर्राता हुआ-क्या तुम उसे सुन सकते हो ? वह सुन सकता था-सुन्न सन्नाटे में अपनी मांसो को, हल्के बुखार में तपती और ऊपर उठती हुईवे बहुत अच्छे लोग थे, विट्टी के दोस्त और खुद विट्टी भी, वे उस पर विश्वास करने लगे थे, वे उसे अकेला छोड देते थे । वह जहाँ चाहे जा सकता था, घूम सकता था, भटक सकता था । वह घूम रहा था। वह भटक रहा था। वह अकेला था। वह उन्हे भूल-सा गया था। वह पेडो के नीचे चल रहा था। अचानक एक चिड़िया झाडियो मे उडी और पेडो के ऊपर चक्कर काटने लगी। फिर दूसरी चिडिया; फिर तीसरी । हवा में फड फडाते पखो का रेला उठने लगा। किमी ने ऊपर से एक पत्थर झाड़ियो मे फेंका था--फिर एकसाथ ढेलो की बौछार होने लगी। कौन हो सकता है ? उसने ऊपर देखा। पत्तों और टहनियों के बीच उसे आभास हुआ, जैसे कोई ऊपर बैठा है, नीचे झांक रहा है। "कोन है ?" और ऊपर से आवाज आयी--"कोन ?" उसे पता नहीं चला. वह उसकी आवाज है -या महज एक गूंज । वह दुबारा वोला-"कोई है ?" और पत्तो के बीच छनती हुई आवाज आयी-"है ?" वह हैरानी से ऊपर देखने लगा, लेकिन तभी घास पर छप्प से कोई नीचे कूदा । पलक मारते ही वह उसके सामने खड़ी थी-एक लम्बी, छरहरी लड़की । धूप के दो छल्ले उसकी बड़ी, भूरी आंखो में चमक रहे थे। । "तुम ?" वह उसके पास चली आयी, एक हाथ में गुलेरा थी, दूमरे हाथ मे पत्थर। पांव - - थे, मिट्टी और कीचड़ में लिथड़ हुए। उसने एक नीली झाक पहन रखी थी घुटनों तक आती थी। फ्राफ के अगले हिस्से पर दोनों तरफ जेवें थीं, जिनमें ने ढेले भर रखे थे। उसका मुंह खुला था और आँखें उस पर टिकी थीं। "मुझे मालूम है, तुम कौन हो ?" उसने कहा। वह हैरत में उसे देख रहा था। "कज़िन"..'वह मुस्करायी और सहसा उसका चेहरा आलोकित हो उठा। 'यू आर दि लिटल कजिन।" वह उसकी तरफ बढ़ी, हाथ आगे बढ़ाकर उसका हाथ पकड़ लिया। "तुम इलाहाबाद से आये हो?" "वहाँ मेरा घर है।" उसने कहा। "मुझे मालूम है- मैंने सोचा था, मैं तुम्हें कभी नहीं देखूगी।" "क्यों ?" "डैरी कहते हैं, तुम कभी घर से बाहर नहीं निकलते वह एक क्षण झिझकी, फिर हल्की उत्सुकता से उसकी ओर देखा- "तुम बीमार रहते हो ?" उसकी आँखें उस पर टिकी थीं--वनली, साफ और बीहड़ । "मैंने तुम्हें टैक्सी से उतरते देखा था ।" उसने कहा, "मुझे मालूम था, तुम आओगे। वे चले जाते हैं । वे मुझे देखते भी नहीं। लेकिन तुम पहली बार आये हो..." "कौन चले जाते हैं ?" "वे मव !" उसने गुलेल का रबड़ झुलाते हुए कहा, "ऐक्टर, लड़किवां, डैरी के दोस्त-जानवर !" "यहाँ जानवर आते हैं ?" "क्यों नहीं।" उसका हाथ ठिठक गया। "पैन्थर भी ?" "पन्थर?" उसने सन्देह से उसकी ओर देखा--"क्या वे तुम्हारे घर आ हैं ?" "नहीं-मैंने सिर्फ सोचा था।" उसने कहा। वह उसे ध्यान से देखती रही-जैसे उसे अपनी जंगली निगाहों पर त रही हो---एक अदृश्य तराजू पर । दुश्मन या दोस्त-या यूं ही कोई भटव ६६ / एक चिथड़ा सुख 1 । लड़का फिर अचानक उसे याद आया, कोई बहुत पुरानी चीज । धूप में उसकी भूरी आंखें सुलगने लगी। "क्या उन्होंने मेरे बारे में कुछ बताया था ?" "तुम डरी की वहिन हो।" "और कुछ नहीं ?" "मही," उसने सिर हिलाया। वह निश्चल खडी थी। वह सुन रही थी। उनके बीच सन्नाटा था। और यह इतना गहरा था कि उसे लगा, जैसे वह उसके सुनने को मुन सकता है, जैसे उनकी आवाजें पहले उसके पास आती हो और फिर उसके कानों से छनकर उसके पास... "तुम्हारी कज़िन की आवाज है..." उमने कहा । "क्या नाम है उसका?" "विट्टी।" वह हंसने लगी, "मैं उसकी आवाज़ हमेशा पहचान लेती हूँ।" पना नहीं पयो~ उसे लगा, जैसे उसके स्वर एक हिकारत-मी भरी थी, एक छिछोरा-सा मजाकः—उसका मुंह सूख गया। "यह उसका पार्ट है !" उसने कमजोर लहजे में कहा, मानो वह इस तरह बिट्टी को वचा लेगा। "कसा पार्ट?" एक अजीब हिकारत में उसके होट खुल गये, "चे अपने को धोखा दे रहे हैं।" "धोखा?" "दे आर रुइनिंग देयर लाइस..." 'रुइनिंग' का मतलब जानते हो?" यह हंस रही थी। "बर्बाद करना, खत्म कर देना, तबाह कर देना।" उसने कहा। गुलेल का काला फन्दा उसकी आँखो के मामने झूल रहा था। डरे पक्षी पेडो पर घूम रहे थे। वह चौकन्नी आँखो से उसे छू रही थी और तब उसे पता चला, उमकी आंखो की पुतलियां धूप में नहीं, खुद अपनी रोशनी मे चमक रही थी। "तुम भी ऐक्टिग करते हो ?" उमने पूछा । "नही..." उसने जल्दी से कहा। "थियेटर जाते हो?" "एक बार गया था, रिहर्सल देखने," उसने कहा, फिर साहस वटोरकर पूछा, "तुम्हें थियेटर पमन्द नहीं है?" "दे अपना समय बर्बाद करते हैं," उसका स्वर थका-सा था, साली, हताश धूल में ? कभी वहाँ नहीं जाती।" त्यों?" वह असली नहीं है ।" उसने कहा, इतनी धीरे से, मानो उसे कोई गुप्त, य रहस्य बता रही हो-"वे वहाना करते हैं।" कैसा वहाना? वह विस्मित-सा होकर उसे देखने लगा, रुखी आँखें, बाल, हिंस्र-सी कुलबुलायी मांसलता, जो सिर्फ जंगली जानवरों में दिखायी है, या जवान होती अकेली लड़कियों में... असली क्या है ? दूर से आवाजें आती थीं, ऊपर उठती थीं, नीचे गिर जाती थीं, मर जाती । पीछे-पीछे उनकी गूंज आती थी, हर आवाज को जिलाती हुई, हवा में उठाती ई, जापिस ले जाती हुई... वे अकेले पड़ गये थे। वह लौटना चाहता था, लेकिन तभी उसे एक दवी फूत्कार-सी सुनायी दी, जैसे कोई गोली सनसनाते हुए कानों के पास से गुजर जाती है। यह उसकी साँस थी। वह उसके पास चली आयी थी, एक बिल्ली की तरह चुप और चालाक कदमों से; होंठ खुल गये थे, जिसके वीच उसके दांत वाहर निकल आये थे। वह मुस्करा रही थी, उसने अपनी गुलेल का अगला हिस्सा ऊपर उठाया और पिस्तौल की नली की तरह उसके गले पर टिका दिया, "हैंड्स अप !" एक थरथराती-सी कौंध उसकी शिराओं में लपकी, उसने आँखें मूंद ली; मार्च की हवा, रिहर्सल की आवाजें, डूबते सूरज की पीली चमक-सव कुछ गुलेल काली नोक और गले की भीतर फंसी सांस पर थिर हो गया था-क्या यह ली है? "हलो, हलो, हलो," वह उसे हिला रही थी। आँखें खुली, तो उसकी आँखें खायी दी, उसके चेहरे पर झुकी हुई, वनली, बीहड़ आतंकित, "मैंने सोचा, तुम चिमुच मर गये।" वह धीरे-धीरे उसके गले को सहलाने लगी, "तुम सिर्फ ऐक्टि - कर रहे थे! वह अपने दिल की धड़कन सुन रहा था। क्या यह लड़की पागल है, या नि बहाना कर रही है-उसे चिढ़ा रही है। मुझे यहाँ से चले जाना चाहिए, ले कहाँ ? वह उसका रास्ता रोके खड़ी थी। वह उसके पास आयी, धीरे-से उसके गालों को छुआ, "तुम बिल्कुल हो,” उसने कहा, "क्या तुम चल सकते हो?" ६८ / एक चिथड़ा सुख "घर" उमने आँखें ऊपर उठायी, जो कड़ा करके कहा-"मैं घर जाऊँगा।" वह खिलखिलाकर हंस पड़ी। "यह घर नहीं तो क्या है ? चलो, मैं तुम्हें घर दिखाती हूँ!" उसके स्वर में नम्र-सा आग्रह था, जिसमें जोर या जबरदस्ती नही थी- सिर्फ एक भूखा-सा बुलावा-जिसे टालना असम्भव-सा जान पड़ता था। वह उसके पीछे-पीछे चलने लगा-सूरज अभी नही डूबा था और बंगला एक ताश के बंगले की तरह सड़ा था-3 —अकेला, शहर से अलग, धूप मे चांदी-मा चमकता हुआ और उनकी आवाजें दूर पेडों के टैरेम से तिरती हुई उसके पास चली आती थीं। बंगले के पिछवाडे आकर वह ठिठक गयी-एक बरामदे के सामने-जिसके आगे सिर्फ नौकरों के 'आउट हाउस' थे-छोटे-छोटे क्वाटर, जिनकी छतों से धुआं निकल रहा था। वह वायी तरफ मुडी और चिक उठाकर भीतर चली गयी। वह बाहर ठिठका खडा रहा-मन में जबरदस्त इच्छा हुई, कि वह मुड जाये, समय रहते उसमे अपना पीछा छुडाकर भाग जाये - लेकिन वह कुछ निश्चय कर पाता-~इससे पहले ही उसने चिक उठाकर बाहर झांका, "इघर ।" उमने कहा और उगका हाथ पकडकर भीतर खीच लिया। भीतर अंधेरा था। एक क्षण के लिए वह कुछ भी नहीं देख मका । लडकी ने वत्ती जलायी और अचानक उमकी दोनों आँखो को भीच लिया। वह छटपटाने लगा, लेकिन उसके दोनों हाथ लोहे के पजी से उसकी आँखों पर गड़े थे। वह हँस रही थी। वह सचमुच पागल थी। वह भरमक उसके हाथों को हटाने की कोशिश करने लगा किन्तु उमको अंगुलियां उमकी आँखो पर दबती गयी, और तब गुम्से की रो में उसने अपने नाखून इमको बाहों पर भोक दिये। वह छिटककर अलग खड़ी हो गयी, अपनी बाहों को देखने लगी, जिन पर खून की बुंदकियां उभरने लगी थी। 'वह अपनी बांह के छिले मांम को सहला रही थी। वह खडा या, शर्म में भीगा हुंआ, उसके भीतर कोई चीज़ थरथरा रही थी। मैं यहां क्या कर रहा हूँ ? इस लड़की के माय, जिसे मैं जानता भी नहीं "इम कमरे में, जिसे कभी देखा नहीं, इस घर में... लेकिन इन वार लड़की ने मचमुच रमे अकेली छोड दिया था- न बैठने का बाग्रह किया, न उसे मनाने की कोई कोशिश। उसने चिक का एक मिरा उठा "बर!"
। - । दिया था-पलंग के एक सिरे पर बैठकर वह वाहर ताक रही थी। कुछ मिनट ऐसे ही गुजर गये । लड़की की चुप्पी का फायदा उठाकर उसने चारों तरफ देखा-वह कमरा नहीं था। बँगले के पीछे बरामदे में चिके डाल दी गयी थीं। एक पलँग था, जिसके सिरहाने एक लम्बा लैम्प हरे शेड में ढंका था। किताबों की अलमारियाँ चारों तरफ खड़ी थीं, जैसे वह कोई छोटी-सी लाइब्रेरी हो। पलंग के पास ही एक मेज थी, जिस पर टाइपराइटर रखा था- एक लम्बा कागज उसमें अब भी फंसा था मानो कोई बीच में लिखता हुआ उठकर चला गया हो। दीवार पर एक खूटी थी, जिस पर नीली स्लैक्स लटक रही थी। "तुमने कुछ कहा ?" लड़की ने मुड़कर उसकी ओर देखा । "नहीं," उसने सिर हिलाया। उसने कुछ नहीं कहा था, वह सिर्फ बोलने का वहाना चाहती थी। "तुम अब भी नाराज हो ?" वह मुस्करा रही थी। "देखो, तुमने क्या किया ?" उसने अपनी बाँह आगे बढ़ा दी-सांवली नंगी वाह, छोटे-छोटे रेशों से वाल-जिनके बीच उसके नाखूनों के निशान चमक रहे थे। वह भयभीत-सा होकर उसे देखने लगा उस निरीह, खून की खरोंचों से भरी बांह को एक क्षण के लिए विश्वास नहीं हो सका, यह उसके नाखूनों की करामात है। वह अपने को भूल-सा गया। उसके पास चला आया। अपना हाथ उसकी बांह पर रख दिया। वह अपलक उसकी ओर देख रही थी। होंठ चंगुल-भर खुल गये थे जैसे कभी-कभी डैरी के होंठ खुल जाते थे, लेकिन डैरी से अलग - वह कहीं दूर थी। मांद में छिपे जानवर की तरह सतर्क, चौकन्नी, दुनिया की हर आवाज़ को अपनी आत्मा की खाल पर खटखटाती हुई 'एक क्षण, दो क्षण, और फिर जैसे अन्तहीन समय बह गया- उसकी बाँह उसकी अंगुलियों के नीचे शिथिल और अपर पड़ी रही। "तुम्हारी आँखें," उसने कहा। "क्या ?" "वे विल्कुल तुम्हारी वहिन पर गयी हैं।" "वह मेरी कज़िन है।" उसने कहा । "मुझे मालूम है- तुम्हारे चाचा की लड़की।" ७०/एक चिथड़ा सुख वह अपनी बांह उसके हाथ के नीचे से सरकाकर ऊपर ले लायी, लेकिन उसे छोड़ा नहीं, उसकी हथेलियो पर उसके हाथ पडे रहे, सूखे, घूल मे सने हुए, हल्के से गर्म। गुलेल अब भी उसके गले मे लटक रही थी-छाती के दो उत्सुक उरोजों के बीच-एक काले टोटके-सी, तिब्बती लड़कियो की तरह, जो अपने गले में जादू-मन्त्रो की माला लटकाये रहती है। "तुम यहां कितने दिन रहोगे?" उसने पूछा। "कुछ और दिन।" उसने कहा। "फिर ?" "मैं इलाहाबाद लौट जाऊँगा।" उमकी आंखें ऊपर उठी, बहुत धीमे स्वर मे पूछा, "यहां नहीं रहना चाहोगे?" "वहाँ मेरा घर है।" उसने कहा। "तुम्हारी कजिन का घर भी वहाँ है, लेकिन वह यही रहती है।" "उसकी बात अलग है।" उसने कहा, "वह अपना घर छोड़कर आयी है।" वह धीरे-से हँसी। "वे सब लौट आते हैं।" "कहां से लौट आते हैं ?" वह एक क्षण उसे देखती रही, "बाहर की दुनिया से।" "बाहर मे..." उसने कहा। रोशनी उनके वालो पर गिर रही थी। खुले हुए धने वाल दोनो कन्धो पर विखर आये थे। चेहरा तपा-सा चमक रहा था, लेकिन उत्तेजित नही, एक ठण्डा, मफेद ताप जो देह की सतह पर भाप की तरह जमा रहता है। "तुम कही बाहर नहीं जाती?" "बाहर कहाँ ?" "स्टूडियो मे..." उसने कहा । "स्कूल..." वह आगे कुछ नहीं कह सका। उसे लगा, वह अचानक सहम गयी है, पीछे मुह गयी है, किताबों की आलमारी के पास जाकर ठिठक गयी है। "मैं नहीं जा सकती।" उमने कहा । "क्यों?" "वे किसी भी वक्त आ सकते है। मैं हमेशा तैयार रहती हैं।"
- । वह समझा नहीं~-सिर्फ एक अजीब डर का स्वाद मुंह में चला आया। वह विल्कुल चिक के पास खड़ा था, कुछ भी होगा, तो वह फौरन बाहर निकलकर भाग सकता है । लेकिन वह अपनी जगह पर खड़ी रही, न हिली, न डुली; एकटक उसकी ओर देखती रही। "वे कौन ?" उसने साहस बटोरकर पूछा, "कौन आ सकता है ?" "बाहर के लोग,” उसने कहा। "वे कुछ भी कर सकते हैं।" वह धीमे कदमों से उसके पास आयी, उसके हाथ को अपने हाथ में ले लिया, एक क्षण उसकी आँखों में झांका, “डैरी ने तुम्हें कुछ नहीं बताया ?" "किसके बारे में ?" "वह बाहर गये थे।" उसने कहा, "वह एक दिन अचानक चले गये और हमें कुछ भी पता नहीं चला । तुम कभी गाँवों में घूमे हो, लोगों के बीच ?" "नहीं,” उसने सिर हिलाया । "मैं भी नहीं; वह उनका दुख दूर करने गये थे "तुमने कभी उसे देखा है ?" "किसे ?" "दुःख को," एक अजीव-सी उलझन उसके चेहरे पर खिंच आयी। "मैंने भी नहीं देखा ''लेकिन कभी-कभी तुम्हारी कज़िन यहाँ आती है और मैं छिप- कर उसे देखती हूँ। वह यहाँ आकर अकेली बैठ जाती है, पता नहीं क्या सोचती रहती है और तब मुझे लगता है कि शायद यह दुःख है ।" वह धीरे-से. हँस पड़ी। "इसीलिए में कहीं नहीं जाती। यहाँ कोई नहीं आ सकता; न दुःख, न डर, न बाहर के लोग।" वह चुप हो गयी। उसे लगा, वह अपने ध्यान में है। उसे भूल-सा गयी है; अकेले लोग कभी-कभी अपने से वोलने लगते हैं। उन्हें कुछ भी पता नहीं रहता, सिर्फ यह पता रहता है, कि वे सुरक्षित हैं । अपनी चीजों के बीच बैठे हैं, कितावों की आलमारी, टाइपराइटर, खूटी पर टंगी हुई स्लैक्स ; कभी-कभी हवा से बरामदे की चिक उठ जाती, बाहर की पीली, धुंधुआती रोशनी भीतर चली आती, उसके साथ रिहर्सल की आवाजें, पेड़ों की सरसराहट, बंगले के सन्नाटे को थपथपाकर वापस लौट जाती, गुम हो जाती । वह उनके साथ घिसटता जाता, बाहर भी, भीतर भी, एक अनहोने मोह की आंच में तपता हुआ, वाहर का अंधेरा जैसे कहीं लड़की की आदिम, निडरता से जुड़ा था और वह उससे बंधा था, वह उसके साथ कहीं भी जा सकता था, वह एक क्षण के लिए भूल गया, यह वही लड़की है, जिसे उसने पागल समझा था, जो पेड़ से कूदी थी, गुलेल से उसके - - - ७२) एक चिथड़ा सुख गले को दवाया था, आंखो को भीचा था। पागल? दिल की दो धड़कनों के बीच कौन-सी जगह है, जो गैर-पागल है। वह कुछ भी नहीं सोच रहा था । वह सिर्फ उसे देख रहा था, जो उसके सामने बैठी थी, गठा हुआ सहमा, सांवला चेहरा, भूरी और भूखी माँखें, धूल में सने बाल जो कन्धों के नीचे एक काले झक्कड़ से लेटे थे, गले मे लटकती हुई गुलेल और जेवों में ठुसे पत्थर" वह मुस्करा रही थी। वह दवे कदमो से उसके पास चली आयी थी और उसे पता भी नहीं चला, कब वह आकर उसके सामने खड़ी हो गयी है। उसकी साँसें उसके चेहरे को छू रही थी, बल खाती हुई सौम, जिसे छूते ही देह बलने लगती है। । "कुछ देखोगे?" उसने कुछ इतने चुपके से कहा, मानो यह उसका भ्रम हो । उसने उत्तर की प्रतीक्षा भी न की वह उसके निकट चली आयी, लेकिन रकी नहीं, सीधे क्तिाबों की आलमारी के सामने ठिठक गयी। कुर्सी को शेल्फ के सामने खीच लिया, उस पर चढ गयी, फ्राक का निचला सिरा ऊपर खिच गया, जिसके नीचे जांघिये की सफेद, उड़ती हुई झलक दिखायी दी। वह पजों के बल खड़ी हुई किताबो के पीछे कुछ टटोल रही थी। कुछ देर बाद उसका हाथ बाहर आया और उसने देखा, कि उसमें चमडे का लम्बा केस है, तकड़ी का हैण्डिल बाहर निकला था । वह कुर्सी मे नीचे उतर आयो, हैण्डिल को फटाक मे पीछे खीचा-- और तब उसने देखा-सिरसिराते सांप-सा एक चाकू बाहर निकल आया . वह वीच कमरे में खड़ी थी-और वह विस्मृत, मन्त्र-मुग्ध-सा होकर उसे देख रहा था, चेहरे और चाकू के वीच उस मुस्कराहट को, जो एक ठण्डी कौंध-सी हवा में ठहरी थी। "तुम देखना चाहोगे ?" उसने उसकी और देखा । "डरने की बात नहीं है। नहीं, वह डर नहीं रहा था; वह अपनी जगह खडा था। उसे लगा, यह एक स्वप्न है, जब भीतर का डर अपनी धुंधली हद को लांघता हुआ बाहर की चीजों को आलोकित करने लगता है, चाकू, लडकी, लान का अंधेरा, उसके परे उनकी आवाजें ; सहसा उसे लडकी की बात याद हो आयो, "क्या यह अमली है ?" हां, जरूर असली है, जैसे मैं हूं, इस लड़की के सामने खड़ा हुआ; वह चाकू की धार पर अपनी उंगलियां फेर रही है, और मह चाकू भी असली है । मैं जब चाहूँ तो हाथ आगे बढ़ाकर उसे छू सकता हूं, लेकिन मैं ऐमा करता नही, मुझे - - लगता है, मैं जरा-सा भी हिलूंगा, तो सबकुछ टूट जायेगा, तार-तार हो जायेगा। वह भी निश्चल खड़ी थी। आँखें उठायीं, तो उनमें मुस्कराहट नहीं, एक गहरा-सा सोच भरा था। वह कुछ देर तक उसे देखती रही। "खूबसूरत है या नहीं?" उसमें कितना व्यंग्य था, वह नहीं समझ सका, फिर भी हल्की-सी उत्सुकता जाग गयी- "कहाँ से मिला तुम्हें ?" "मिला नहीं 'मेरे पास था।" उसने कुछ सोचते हुए कहा, "मैं इसे हमेशा अपने पास रखती हूँ।" "बहुत तेज़ लगता है।" उसने कहा। "काफी तेज़ है.''देखोगे ?" उसने चाकू उठाकर उसके गले की ओर इशारा किया। वह एक कदम पीछे हट गया और वह हंसने लगी। "वे सब डर जाते हैं।" उसने कहा। "कोई यहां आता है ?" उसने किंचित् विस्मय से पूछा। "पहले आते थे।" उसके स्वर में बहुत पुराने दिनों की तलछट उभर आयी, वह मेज के सामने चौकी पर बैठ गयी थी-चाकू मेज पर रख दिया अपनी दोनों कुहनियों के बीच-जहाँ वह एक रोशनी के धब्बे-सा लेटा था। "कौन आता था ?" उसने पूछा। "तलाशी लेने।" उसने कहा, "वे किसी भी समय तुम्हारी तलाशी लेने आ सकते हैं. 'मालूम है, तुम क्या करोगे?" वह ध्यान से उसकी ओर देख रही थी, मुंह का कोर ज़रा-सा खुल गया था, इतना कम, कि उसे मुस्कराहट नहीं कहा जा सकता था, इतना ज्यादा भी नहीं, कि लगे, वह हँस रही है...अचानक उसने अपना हाथ आगे बढ़ाया और उसकी हथेलियों को सहलाने लगी। "तुम वीमार रहते हो, तुम्हें कुछ भी नहीं मालूम ।" उसके स्वर में एक अजीव-सी हमदर्दी थी, जैसे वह कहीं ऊपरी मंजिल से कुछ देख रही हो, और वह नीचे खड़ा हो, वह उसे कुछ बता रही है, जिसे वह नहीं देख पा रहा हो.. "तुम्हें यहाँ से चले जाना चाहिए।" उसका स्वर सहसा बहुत धीमा हो गया। "यहाँ से?" . ७४ / एक चिथड़ा सुख दिल्ली से..." उसने रहा। "अगर वे तुमसे पूरा मेले, तुम पहा सोहो, तो तुम क्या जवाब दोगे?" वह हतप्रभ-सा उसे देखने लगा। "यहाँ बिट्टीमा घर है..." उसने कहा। "बिट्टी कौन ?" उसका सर एकदम उपडा और अपरिमित-सा गुगामी दिया। "अगर वे तुम्हें बीच सड़क पर पकड़ तो? तुगा उन्हें एगिोरी जाओगे, यह मिट्टी है, तुम्हारी करिन ? यह स्टेज पर होईपी?" गार हंस पड़ी,"वे तुम्हें पागल समझेगे!" उसने सशंकित निगाहों से उसे दसा। "ऐसा नहीं हो सकता।" उसने अपकपाते हुए कहा। "क्यो नही हो सकता? अगर तुग पाहर हो, तो मुभी हो रामा"। वे तुम्हें मार गफते है"भारकर कहीं भी फेंफ समारो है। तुमारी पापभी रहेगी और तुम्हे कोई पहचानेगा भी नही, कि तुम कौन हो, भागे हो, कहाँ रहते थे ?" उसकी आयाज धीमी पड़गे गगी, एक पुगणागार में मुगणे लगी, लेकिन पूरी तरह नही-यह एक तो की नोक पर गोगगी लाहो गयी थी, जिसके इर्द-गिर्द बाहर का अपेरा, मेज पर रखा गागा, भगारीको किताबें पीली छायाओ-सी गियुड़ गयी थीं, तामोश ही, परागोणी मी झुकती हुई "इमीलिए मैं पाही नहीं जाती। मैं पर ग बैठी रहमीणा मी हूँ। किसी भी वक्त आ गपाते हैं । ये भारोही पर गा मोगा-योगा गारंग, मेरी तलाशी लेंगे, बार-बार मुहारी पूरेंगे, माहाँ है ? म ?" उन्हे हर जगह ले गाऊँगी, कमरों में, भाग में, शादियों के पीले, मैं नमी, यहाँ कोई नहीं है, सारा पर पाली है, यहाँ मेरे अमाया मोई गहरी ना.' "यहाँ गिर्फ मैं हूँ।" उसका हाथ चाक पर था। छोटी, मेमरी छाती मार-नी fretir भी, सामों के साथ-गाथ मिहरती हुई गरी में पटना गुमेप का महाया re रहा था। महमा उमने चाय भार उठा लिया-अंग बह गाई पाना -- नंगे ब्लेड फी छाया उगके चहरे पर गिर रही थी-47 पाम आयी, श्रीधी। फुमफमाकर कहा, "तुम देखोगे ?" वह विफराया-गा उगे देख रहा था। . । ।
... - - "तुम जानना चाहते थे, डरी कहाँ गये थे? "यहाँ से, इधर आओ, वन अव दिखो "इस तरह नहीं! इस तरह तुम्हें सिर्फ अपनी छाया दिखायी देगी.."आगे आओ, देखो, "कितनी धूप है, खेतों के पीछे, इधर, नीचे, धूल के नीचे देखो. वे वहां छिपे हैं।" उसने धक्का देकर उसे अपने पास खींच लिया, अपनी गर्म, झुलसती सांसों के नीचे, जहां चाकू की बार एक मन्द, मलिन शीशे की तरह झिलमिला रही थी, जैसे उस पर एक सुर्ख, डवडवाते सूरज की छाया हो, जमीन पर फैले बेमतलब और वेलौस दुख को घेरती हुई, खुद उसकी आवाज से घिरी हुई, जो किसीधेरे गड्ढे से बाहर आ रही थी, एक चमकीली-सी फुसफुसाहट, जो चाकू की धार से छिलती हुई उसकी आत्मा को छील जाती थी... वह उसे हिला रही थी-फिर वह ठहर गयी, उसे छोड़ दिया, उसकी आँखें इवा में थिर हो गयों जैसे अचानक फिल्म खत्म होने पर आँखें खाली परदे पर हरी रहती हैं और हम सवेरे से उठकर खुली और असली दुनिया में मा जाते हैं। "तुम डर गये?" वह हंस रही थी-उसके चेहरे को सहला रही थी। "तुम वीमार रहते हो; मैं ऐक्टिग करती हूँ'''लेकिन यहां कोई डर नहीं है। यहां सिर्फ मैं हूँ तुम मुझसे डरते हो?" पता नहीं, क्यों, उसके पीले चेहरे को देखकर उसका गला रुध-सा आया; एक अजीव-सी जिनासा कलपने लगी। "क्या यह सच है ?" उसने डरते हुए उसकी ओर देखा। "क्या सच है ?" उसने पूछा। "डेरी यहाँ नहीं रहते?" "तुम्हारा मतलब है-वे ?" उसने बाहर लान की ओर इशारा किया जहाँ दिल्ली की शान्त, नीरव रात फैली थी। "हां, यह सच है।" उसने धीरे-से कहा, जैसे उसे कोई बहुत पुराना गोपनीय रहस्य बता रही हो। "वह बिहार के गाँव में हैं. वह कभी नहीं लौटेंगे।" "और यहडेरी ?" उसने विस्मय से उसकी ओर देखा । "यह तुम्हारे भाई । नहीं हैं ?" वह एकटक देखती रही, फिर उसे अपने पास खींच लिया, उसके होंठों, मांखों, कपोलों को चूमने लगी! "नहीं, यह मेरे भाई नहीं हैं।" उसने चुम्बनों के बीच सांस लेते हुए कहा, "वह तुम्हारी विट्टी के लवर हैं !" उसने उसे छोड़ दिया, चिक ऊपर उठायी, और धक्का देकर उसे बाहर १६/एक चिथड़ा सुख अंधेरे में धकेल दिया। "जाओ, वे तुम्हारा इन्तजार कर रहे होंगे !" कोई नही था। कोई इन्तजार नहीं कर रहा था । घास के टैरेस पर सफेद हँसिया चांद उग आया था, जिसकी ओट में खुद पेड़ अपनी छायाओं के साथ बंगले की दीवार में सट गये थे। समूचा लान एक पीली रोशनी में डूबा था- जहाँ उमकी हंसी उसके पैरों के पीछे भाग रही थी, एक शिकारी जानवर की तरह उसकी आहट को सूंघतो हुई, उसकी घड़कनों को अपने खुरों तले टापती वह ठिठक गया। अपने दोनों हायो से चेहरे को छुआ, अपने वालो को, होंठो को, होठो के बीच कटकटाते दांतो को, जैसे उसके चुम्बनो के टुकड़े अव भी वहां चिपके रह गये हो, उसे लगा, जैसे उसकी आवाज अब भी उसके साथ- माय माग रही है, बुखार की देवनी मे बल खाती हुई-उसे अपने पास बुलाती हुई, रोकती हुई; मनुष्य की आवाज नहीं, बल्कि झाडियो की धोंकी उसांस की तरह, जब कोई परिन्दा सहसा अंधेरे मे उड जाता है किन्तु वहां कोई नहीं था। कोई उमके पीछे नही आया था। बंगला, झाडियां, पेड़ सब नि:स्पन्द खडे थे । और तब एक धनी, टिपटिपाती टीस उसकी आत्मा को मथने लगी, लडकी का चेहरा बार-बार अंधेरे मे चमक आता था, उसकी वीरान अकेली आँखें, धूल मे सने वाल, किताबों के बीच ढोलता चाकूमन मे इच्छा हुई, वह उसके पास लौट जाये, कुछ कहे,-जैसे उसके और लड़की के बीच कोई सवाद हमेशा के लिए अधूरा रह गया है- फिर खयाल आया, वह बाहर है। लड़की को दुनिया से बाहर, जहाँ सब कुछ हो सकता है; आकाश के नीचे, पेड़ो के नीचे, जहां से समूचा लान दिखायी देता था, पीली चांदनी मे एक हथेली-सा खुला हुआ ! हवा चलती, तो घास और पत्ते सिहरने लगते, जिसके परे पेडो का टैरेस एक रेत का ढूह जान पड़ता था, नीरव और स्तब्ध। हल्की-सी खडखडाट हुई और वह चौंक गया । कोई चल रहा था। नीचे क्यारियो मे पड़े पत्ते एकाएक चरमरा उठे । फेन्स की झाड़ियों पर एक छाया सरकती दिखायी दो । वह अपने मे कुछ कह रही थी, अंधेरे में शब्द खुलते थे और मुंद जाते थे। वह फाइती आँखो से देखने लगा, समझ में नही आया, लान के इस उजाड़ कोने में इरा कहाँ जा रही है ? वह ठहर गयी थी। फेन्स के अन्तिम छोर पर, जहाँ बंगले की लाइट में उसका सिर दिखायी देता था, जूड़े के बाल छितरकर कानों के पास झूल रहे थे, माथा चमक रहा था और चेहरे पर एक पीली-सी शान्ति थी, एक तन्मय- सी तल्लीनता जो किसी अदृश्य आवाज को सुनने में उघड़ आयी थी। "Will you let me go ?” किससे पूछ रही है--- कौन है वहाँ ? क्या यह उसका पार्ट है, रिसल का एक टुकड़ा ? या शायद वह कुछ देर के लिए खाली है-नाटक के वीच एक खाली अन्तराल-जिसे लाँघकर वह यहाँ चली आयी थी, लान के एक कोने में, रिहर्सल की आवाजों से दूर, जहाँ उसे कोई नहीं देख सकता था ? वह आगे बढ़ गयी, पेड़ों के पीछे छिप गयी, रात की हजार छायाओं में एक, उस टीले की ओर चढ़ती हुई, जहाँ उठा हुआ घास का मंच था, चांदनी में झिलमिलाता हुआ, डैरी का स्टेज, जिस पर वे स्ट्रिनवर्ग का नाटक कर रहे थे। यह असली नहीं है । पागल, देखा नहीं, यह इरा थी, और कौन हो सकता है ? वह अपने से बोल रही थी-अपने से ? वह शायद असली है, अकेले में बोलना, अपने से बोलना-तुम कुछ भी कह सकते हो। कितने सुननेवाले हैं ? पेड़, घास, झाड़ियाँ ; वे वाहर हैं, लेकिन बाहर की दुनिया में वे उतने ही अकेले हैं, जितने घर के भीतर लोग । वे सब कुछ सुनते हैं। "विट्टी!" - वह चुपके-से पीछे आयी थी । वह छाया नहीं थी । वह असली थी। उसके हाथ उसके कपड़ों की गन्ध; वह उसे पकड़े थी। "तुम कहाँ थे ? मैं तुम्हें हर जगह ढूंढ़ रही थी !" वह कुछ नहीं बोला; सिर्फ उसके हाथ को पकड़े रहा; उसे खुशी थी, वह अंधेरे में उसके चेहरे को नहीं देख सकती। "देखो, मैं तुम्हारे लिए क्या लायी हूँ !" खुले लिफाफे में सेंडविचेज रखी थीं, खीरा और टमाटर और चीज में लिपटी हुई। "घर कव चलोगी?" उसने कहा। "वस आधा घण्टा और है."तुम ऊब तो नहीं गये ?" वह उसे बताना चाहता था, जो कुछ उसने देखा था; फिर सहसा उसे लगा, यह धोखा होगा; उसे झुठलाना होगा, जो कुछ देर पहले उसने भोगा था । लोग ७८/एक चिथड़ा सुख कैसे बीती हुई घटना को सामने रख देते हैं, देखो, मेरे साथ यह घटा था ! "तुम यहाँ हो !" हैरी भागते हुए आये थे, हांफ रहे थे, "वहाँ सब तुम्हारा इन्तजार कर रहे हैं।" उन्होंने विट्टी को देखा और विट्टी ने उनका हाथ पकड़कर अपनी ओर घसीट लिया, "देखो, यहाँ कौन खड़ा है ?" हैरी ने मुंह मोड़ा, जहां वह था। वह उसे देखकर कुछ इतना खुश हो गये कि उसके पास आकर उसका सिर अपने पास खीच लिया। उनकी पेटी का चमड़ा उसके गालों पर गडने लगा, सिगरेट और पसीना और मेहनत की गन्ध, यह मव हरी थे और सामने बिट्टी खड़ी थी, हमें देख रही थी और तब मुझे लगा, यह शायद सुख है-हरी से सटकर बिट्टी को देखना- यहाँ कोई खैत नहीं, न चिल- चिलाती धूप, न चीलें, न चाकू, न अपने मे बोले हुए अकेले, अनाथ शब्द.... यह सुख है। सुख में कोई नही देखता, तुम रो रहे हो। "चलना चाहिए," हरी ने उसे धीरे से अलग कर दिया और तब उसे लगा, सुख कितना छोटा होता है, आता भी नहीं, कि चला जाता है। "हम अभी आते हैं। सिर्फ लास्ट ऐक्ट वाकी है।" बिट्टी ने कहा। उसके हाथ मे संडविचेज का लिफाफा था, वह उन्हें जाता हुआ देख रहा था। वे एक क्षण खड़े हो जाते हैं-फेन्स के पास-एक-दूसरे पर झुके हुए, कुछ कह रहे है, जिसे वह नहीं सुन सकता। "तुम्हे नहीं मालूम, वे कौन हैं ?" कोई झाड़ी से फुसफमाया है। "वे प्यार करते हैं। वे पागल हैं; दे आर रुइनिंग देयर लाइव्स !" रुइनिंग नष्ट हो जाना, बरवाद हो जाना, सत्म हो जाना।
w 'उठो,” उसने उसका कन्धा हिलाया, "मुन्न, जरा उठ के बैठो, देखो, कौन आया वह रिहर्सल से बहुत देर रात लौटती थी । वह अक्सर सो जाता था। किन्तु उस रात उसने उसे झिंझोड़कर जगाया, तो एक क्षण के लिए उसे पता नहीं चला, वह दिल्ली में है या इलाहाबाद में। दिन है या रात ? आधी रात नींद में विट्टी का चेहरा तैरता-सा दिखायी दिया। कौन ? कौन आया की घुप्प " वह झपाट से उठ बैठा । वत्ती जली थी और विट्टी का विस्तर खाली पड़ा था। इरा मूढ़े पर बैठा थी-~-उसकी ओर देख रही थी। "हमने तुम्हें जगा दिया।" उसने धीरे से कहा। "मैं सो नहीं रहा था।" उसने झूठ बोला, "तुम कब आयौं ?" "काफी देर पहले । हम छत पर बैठे थे ।" वह थकी-सी दिखायी देती थी। उसने विट्टी के विस्तर पर पांव पसार लिये थे। और पैंट घुटनों तक खिंच आयी थी, परों में धूल से सनी चप्पलें लटक रही थीं। पास में एक लाल रंग का थैला था, जिसमें एक छोटी-सी छतरी की मूठ वाहर झाँक रही थी। "तुमने खाना खा लिया ?" किचन से विट्टी की आवाज सुनायी दी। उसे उठने का बहाना मिल गया लेकिन देह से चादर उठाते हुए सहसा उसके हाथ ठिठक गये-उसने सिर्फ एक जांघिया पहन रखा था। "क्या अब भी बुखार आता है ?" इरा ने पूछा-उसके स्वर में हल्का-सा लगाव था, ज्यादा नहीं, सिर्फ इतना, जिसमें लापरवाही के साथ छोटी-सी चिन्ता दवी रहती है। "मैं अब ठीक हूँ।" उसने चादर के भीतर अपने पैर समेट लिये। फिर किचन की तरफ मुंह मोड़कर ऊंची आवाज में कहा, "मैंने सूप बना लिया था।" ८०/एक चिथड़ा सुख विट्टी गैस जलाने के लिए माचिस ढूंढ़ती हुई भीतर आयो–उसने मुंह धौ लिया था । वालों की चोटी आधी सुलकर कन्धे पर लटक बायी थी । जव इरा ने यले से माविम निकालकर उसे दी, तो हल्के स्वर में पूछा-"सिगरेट तो नहीं "तकिये के नीचे होगी-तुम नहाओगी?" "अभी नहीं।" फिर सिगरेट जलाकर उसकी ओर देखा, "जब सोना चाहो, तो कह देना । मैं वत्ती दूंगी।" वह बहुत दिनों बाद घर आयी थी, जब कभी आती, रात को बिट्टी के साथ ही सोती थी। ऐसी रातो में वह अपना विस्तर किचन में ले जाता था। हमेशा नहीं। किसी दिन रिहर्मल देर शाम तक चलता रहता, आधी रात उसकी आंख खुलती तो देखता, वे बाहर छत पर लेटी हैं । सुबह उठकर वह अचानक बहुत खुश होता था, सोचता था, कि अब वह इरा से बातें कर सकेगा। बाहर आता तो सिर्फ बिट्टी सोती हुई दिखायी देती । दूसरा विस्तर साली पड़ा रहता-और तब वह जान लेता कि सुबह होते ही वह अपने होस्टल चली गयी है। "खिडकी खोल दूं-या तुम्हें सर्दी लगेगी?" इरा ने कहा। "ठहरो, मैं खोल देता हूँ।" वह उठ खडा हुआ। इस बार उसे अपने जांघिये का खयाल ही नहीं रहा। ऊपर एक बनियान पहन रखी थी। बुखार ने उसे बहुत दुवला छोड़ दिया था-लेकिन यही कारण था, कि यह अपनी उम्र से कुछ ज्यादा ही लम्बा दिखायी दे रहा था; और चेहरे पर एक पीली-सी छाया थी, जिसे बीमारी कुछ लोगों पर हमेशा के लिए छोड़ जाती है। इरा चुपचाप सिगरेट पीते हुए उसे देख रही थी। "तुम स्टूडियो नही आये ?" वह आकर अपने बिस्तर पर बैठ गया। "मैं आज आया था," वह धीरे से मुस्कराया। "रिहर्सल चल रहा था। "मच ?" इग ने आश्चर्य से उसकी ओर देखा। वह हमेशा उसे आश्चर्य मे डालना चाहता था, तव उसके होठ खुल जाते थे, आम्में फैल जाती थी और वह एकदम छोटी लड़की-सी दिसायी देता थी। "सच-मैं आया था।" "अच्छा बताओ, क्या देखा था?" उमने आगे झुककर पूछा। "बारिश हो रही थी।" उसने कहा । "विट्टी कहीं बाहर से भीगती आयी " वह धीरे-से हँसने लगी, "और मैं ? "तुम ?" क्या वह कह दे, उसने उसे अंधेरे में देखा था, अपने से बोलते हुए, पेड़ों के नीचे-लेकिन फिर उसे अपने पर ही सन्देह होने लगा- वह शायद सच नहीं था-वह चाँदनी में भीगा लान, अंधेरे में चमकता हुआ चाकू-नहीं, वह कोई सपना था। पैन्थर की पदचाप की तरह, जो सिर्फ अकेले में सुनायी देती है। और जरा-सी आहट होते ही गायब हो जाती है। विट्टी किचन से आयी ; हाथ में दो प्लेटें थीं, माथे पर पसीने की बूंदें चमचमा रही थीं। दोनों नीचे फर्श पर बैठ गयीं। दरवाजा खुला था। वाहर अंधेरे में मकबरे से उड़ता हुआ कोई चिमगादड़ दीवार से टकराता था-एक अजीव-सी सिरसिराहट होती थी, फिर सबकुछ सन्नाटे में लीन हो जाता था। "तुम अब भी सोच रही हो?" बिट्टी ने एक क्षण इरा को देखा; उसके हाथ लेट पर पड़े थे और वह खाना भूलकर खाली आँखों से हवा में ताक रही थी। उसने जल्दी-से सिर हिलाया और फिर खाने लगी- "तुम वेकार में घबराती हो--" विट्टी का स्वर बहुत कोमल-सा हो आया। "लन्दन कोई पास नहीं है -देखना, कल जरूर कोई चिट्ठी आयेगी।" इरा की आँखें प्लेट पर जमी थीं, भारी और थकान में लदी। "मैंने नित्ती से तार भेजने के लिए कहा है। "नित्ती भाई से ?" बिट्टी की आँखें ऊपर उठीं, "वह होस्टल आये थे ?" "जव मैं स्टूडियो से लौटी, वह दफ्तर में बैठे थे।" "तुमने उनसे कुछ कहा था ? " विट्टी ने कुछ अजीव निगाहों से इरा को देखा। "किसके बारे में?" इरा के हाथ प्लेट पर रुक गये। "लन्दन लौटने के बारे में।" इरा की आँखें प्लेट पर जमी थीं। कुछ देर तक विट्टी उसे देखती रही, एक निरर्थक-सी हताशा में, फिर बहुत धीमे स्वर में कहा, "इरा, यह ठीक नहीं "मुझे मालूम है इरा ने कहा। इस बार पिट्टी का स्वर कुछ तीखा हो आया, "मालूम है, तो तुम्हें उन्हें घोने में नहीं रखना चाहिए।" २२/एक चिथड़ा सुख "घोसे में ?" इरा का स्वर सहसा तन गया। "कोई धोसे में नहीं है. "मैं कुछ करूंगी, तो उनसे पूछकर नहीं करूंगी।" वह खुद चौंक गयी, जैसे हम गुस्से और निराशा में कोई सच्ची बात कह डालते हैं, और फिर हैरानी होती है, वह सच कितना कमीना और ओछा है। उसने वेबसी में विट्टी को देखा फिर उठ खडी हुई। "कहाँ जा रही हो?" "मैं खा चुकी।" वह उठ खडी हुई और बिना कुछ कहें किचन में चली गयी। नल का पानी, बाहर छत की नाली में वह रहा था। पौधे नहा रहे थे। मिसेज पन्त चांदनी रात में अपने बेंच पर बैठी दाजिस्टर सुन रही थी । कुत्ते चुप थे, अपनी मातफिन के प्रति वेखवर गहरी नीद में सो रहे थे। इरा नहाकर आयी, तो चेहरा उज्ज्वल था । आँखें चमक रही थी। उसने वालों को खुला छोड दिया था और वे उसके गालो को छूते हुए कन्धो पर झूल रहे थे। "विट्टी, आज रात छत पर सोयें तो कैसा रहे ?" उसने कहा, "आज सर्दी भी नहीं है।" बिट्टी जूठी प्लेटो को लेकर उठ सही हुई। "मैं विस्तर बिछा देती हूँ।" उसने उसकी ओर देखा, "तुम्हें ठण्ड तो नहीं लगेगी?" उसकी आंखें उस पर टिक गयी। "मैं अपनी रजाई ले लूंगा ।" छत पर सोने का मोह, आनेवाले बुखार की आशंका से कही बड़ा था। वे तीनों उस रात छत पर ही मोये थे। पास-पास दरियां पिछा ली थी। वह भीतर से कुशन और चादरें ले आया था। वह उन गर्मियों में पहली बार छत पर सो रहा था- दिल्ली के आकाश तले, तारो का आलोक पोली रेत-सा हर मकान की छत पर बराबर-बराबर से झर रहा था। देर तक नीद नही आयो । हवा ठहरी थी। पेडों की फुनगियां खुद अपनी छाया-सी दिखायी देती यो । सिर्फ मकबरे के गुम्बद पर कोई चिमगादड सन्नाटे को झिझोड देता और तव अचानक पास सरकती हुई नीद पिहुंककर पीछे हट जाती, अपनी चोच से अधकचरे सपनो को कुतरते हुए चारो ओर बिखेर देती-- और वह चौंक जाता। अपने पास के विस्तर को देखने लगता, कोई नहीं, कुछ - नहीं-और वह फिर आँखें मूंद लेता। उसे लगा कोई छाया उठी है, छत की मुंडेर के सामने गयी है, सुराही से गिलास में पानी उँडेला है, वापिस लौटी तो इरा का चेहरा दिखायी दिया, चेहरा भी नहीं, सिर्फ एक पीला-सा आभास, वह पानी पीकर लौटी, तो लेटने के बजाय विट्टी के विस्तर की तरफ मुंह मोड़कर बैठ गयी। "सो रही हो?" "नहीं," विट्टी का धीमा स्वर सुनायी दिया। "तुमने बुरा तो नहीं मान लिया ? मैं आजकल पागल-सी रहती हूँ।" "सुनो, कुछ दिनों के लिए यहाँ क्यों नहीं आ जाती ?" विट्टी ने कहा। "होस्टल में तुम्हारा मन भटकता रहता है।" "उससे कुछ होगा नहीं। यहाँ तुम्हें परेशान करूंगी। होस्टल तभी छूटेगा, जव दिल्ली छोड़ेगी।" विट्टी तकिये पर कुहनी उठाकर बैठ गयी---"पता नहीं,तुम वार-वार लन्दन लौटने के बारे में क्यों सोचती हो।" इरा अँधेरे में चुप बैठी रही। "मैं यहाँ क्या करूँगी ?" "तुम जव हिन्दुस्तान आयी थीं, तो कितना कुछ करना चाहती थीं।" विट्टी । ने कहा। - "हिन्दुस्तान में ?" कुछ देर तक इरा का स्वर अँधेरे में टॅगा रहा, "विट्टी, मैं सच कहूँ, तो इस देश के बारे में मैं कुछ नहीं जानती। मुझे हमेशा डर-सा लगता रहता है।" .. "डर?" विट्टी ने कहा, "कैसा डर?" "लोगों से। अपने से---" अगर डैरी न होते तो मैं थियेटर भी न कर पाती।" "डेरी?" "हाँ, सच ! उनके सामने मुझे अपनी तकलीफें बहुत छोटी जान पड़ती हैं उन्होंने बहुत कुछ भोगा है, जिनका हमें पता नहीं है।" "मुझे मालूम है।" इरा ने सिर उठाया, "विट्टी, क्या वात है ?" "कुछ नहीं..." विट्टी ने कहा, "उन्हें भी तुम पर बड़ा गर्व है।" "कसा गर्व ?" "इंग्लैण्ड में अपना घरवार छोड़कर यहाँ आना. "ऐसा कितने लोग करते हैं ?" - ८४ / एक चिथड़ा सुख "तभी वापिस जाने को कहती हूँ।" वह धीरे से हंसी । "बिट्टी ! मुझे तुम पर बहुत हैरानी होती है। पता नही, तुम कैसे इतनी अकेले रह लेती हो, संन्यासियों की तरह।" "अच्छा!" विट्टी को हल्की हंसी अंधेरे में चमकने लगी । "एक वरमाती, किचन, रिकार्डप्लेयर,-इतना सुख-आराम । संन्यासिनें इस तरह रहती हैं ?" "यह नही।" इरा ने धीरे से कहा, "तुम अकेले रह सकती हो।" "क्या तुम नहीं रहती ?" "अगर मैं रह सकती, तो उनके पीछे हिन्दुस्तान नहीं जाती।" किसके पीछे ? अचानक उसे नित्ती भाई का चेहरा याद हो आया, उनका कमरा, वाथरूम में लटकते इरा के कपड़े वह मिहरने लगा। कुछ देर तक वे तीनों गुमसुम अपने में लिपटे लेटे रहे । कुछ देर बाद इरा की आवाज सुनायी दी- "तुमने कभी उनकी पली को देखा है?" "नही?" विट्टी कुछ चौंक-सी गयी। "तुमने देखा है ?" "मिर्फ एक बार।" "एक बार," उसने धीरे से कहा, "मैं कनाट प्लेम मे सुपर बाजार गयी थी। वह वहाँ केश-वाक्स के आगे क्यू मे खड़ो यो । मैं भी उसके पीछे जाकर खडी हो गयी । मुझे बहुत अजीब-सा लगा, कि मैं उसके बारे में सबकुछ जानती हूँ जब कि वह मेरे बारे में कुछ भी नहीं जानती। जब वह दुकान से बाहर निकली, तो मैं भागकर उसे रोकना चाहती थी..." उसने मुंह मोड लिया, जैसे सांस लेना दूभर हो, "मैं उससे माफी मांगना चाहती यो..." "इरा, इरा..." विट्टी उसके कन्धे को हिला रही थी। उसका मुंह तकिये मे छुपा था, अंधेरे में हम दुख को सुन सकते हैं, हालांकि दिखायी कुछ भी नहीं देता, न दुस, न आंसू, न अपने किये का पछतावा । सिर्फ तकिया हिलता है और देह सुन्न पड़ी रहती है । न मदद, न ममता, न पुराने दिनो की दोस्ती-कोई कुजी काम नहीं करती। फिर भी तुम छते हो। ताला हिलता है । दरवाजा बन्द रहता है। वह खटखटाना चाहता था। खोलना चाहता था। लेकिन वह निश्चल लेटा रहा। मार्च को रात, सेमल की गन्ध, छतो पर पड़ता तारों का आलोक क्या खोलोगे? याद है, जव बिट्टी टालस्टाय मार्ग पर खड़ी थी। रोड-साइन पर 1 । - उसका सिर टिका था। तुम उसे हिला रहे थे लेकिन उस दिन भी तुम बाहर थे, कुछ भी नहीं कर सकते थे। दिल्ली आने से पहले वावू ने उससे कहा था, "देखो, तुम विट्टी के घर जा रहे हो, वहां सवसे अलग रहना । विट्टी की अपनी जिन्दगी है, अपने दोस्तवहाँ ऐसे रहना, जैसे तुम हो ही नहीं।" होकर भी न होना, यह आसान नहीं था; विट्टी से बच भी जाओ, उसकी दुनिया चारों तरफ फैली थी। "जब तुम बड़े हो जाओगे, तो दुनिया को पहचानोगे।" यह माँ कहा करती थी, जब वह जीवित थीं । अव यह जीवित नहीं हैं, और मैं दुनिया में हूँ। मैं उसे पहचानने लगा हूँ, मैं सबकुछ डायरी में लिखता हूँ। उसमें लिखते हुए मुझे उम्मीद रहती है, कि मैं इस दुनिया की रिपोर्ट उन्हें दूसरी दुनिया में दे रहा हूँ। मुझे लगता है, मैं उनसे बातें कर रहा हूँ। उस रात उसने पहली बार अपनी डायरी को सूटकेस से बाहर निकाला था। इलाहावाद से चलते हुए उसने दो चीजें बड़ी सतर्कता से अपने पास रखी थीं, मिशनरी साहव के संस्मरण और एक लम्बी नोटबुक, जिसे माँ ने उसे बारहवीं वर्षगांठ पर दी थी। पहले पन्ने पर लिखा था: Write what you see, but what you see may not be night. यह शायद उन्होंने हँसी में लिखा था, क्योंकि देखना गलत कैसे हो सकता है ? तुम देखे को न समझो, यह वात दूसरी है, लेकिन एक बार देख लेने पर दुनिया एक कीड़े की तरह सुई की नोक पर विध जाती है, तिलमिलाती है, लेकिन कोई उसे छुड़ा नहीं सकता। देखना तभी खत्म होता है, जव मरना होता है, और मरने पर भी आँखें खुली रहती हैं-जैसे माँ की आँखें थीं-काँच के दो कंचे-जिन पर दुनिया एक पथरायी छाया की तरह चिपकी रहती है." किन्तु वह वही लिखता है, जो देखता है और देखते हुए उसका 'वह' धीरे-धीरे उसके 'मैं' में बदलने लगता है। डायरी का पन्ना जैसे बद्रीनाथ की यात्रा हो, एक दुर्गम चढ़ाई, जिसमें हर पत्थर, हर मोड़, हर बाधा इस 'मैं' का गवाह हो जाता है। मत सोचो, अव तुम वह हो, जो छत के नीचे सोते थे, छिपकर ड्रामा देखते थे, विट्टी के साथ शहर में भटकते थे। अब तुम कागज पर बैठे एक अक्षर हो, अलग और अकेले, अंधेरे कोने में एक चूहे की तरह समय को कुतरते हुए, हर कतरन एक शाम है, एक घड़ी, हल्के बुखार में जड़ी हुई एक स्टिल लाइफ-विल्कुल , ८६ / एक चिथड़ा सुख स्टिल नहीं, स्मृति की सांस उसके ठहरे पानी पर यह जाती है और वह हिलने लगती है। लोग मिलते हैं, बातें करते हैं, फिर कमरे से बाहर उठकर चले जाते हैं। रात को सोने से पहले हम भूल जाते हैं, कौन याया था, कौन चला गया। उनसे वया बातें हुई थी, कुछ याद नहीं रहता। कुछ याद रह जाता है, जिसे मैं डायरी मे बन्द कर लेता हूँ। फिर मैं यपने लिखे को भी भूल जाता हूँ और वे घटनाएँ जो एक शाम हुई थी, कापी के जर्द पन्नो के बीच दबी रहती हैं। यह माम मुझे अब भी याद है जब हम इरा के होस्टल गये थे-बिना किमी तयारी के, ऐसे ही। हमने सोचा था, उसे बस मे बिठाकर घर लौट जायेंगे। किन्तु ऐसा नहीं हो सका। बस के आते ही इरा ने विट्टी का हाथ पकड लिया, "क्या कुछ देर के लिए मेरे होस्टल नही आ सकती?" उमके स्वर में कुछ ऐमी जबरदस्ती थी, कि बिट्टी विना कुछ कहे बस में चढ़ गयी-यौर में पीछे-पीछे । मैं बहुत खुश था। मैं पहली बार इरा के होस्टल जा रहा था। बम की खिड़की से इण्डिया गेट के लान देख रहा था। दिल्ली की मुलायम धूप में नहाते हुए। मार्च की सफेद हवा पेडो के झुरमुट, सरकारी बंगले-मैं उन्हें देखता हुआ अपने बुखार को भी भूल गया-या शायद बुखार एक तपता याईना था, जिसके भीतर समूचा शहर एक घब्वे-सा चमक रहा था। हम मण्डी हाउस पर उतर गये। पीछे एक मकरी लेन थी, पेड़ो की लम्बी कतारों के बीच, जहां सफेद, क्वार्टर एक-दूसरे से सटे खडे थे । दो तरफ गहरी खाइयां थी, जिनके भीतर पुराने पत्ते सड़ रहे थे। आखिरी सिरे पर इंटों की एक इमारत दिखायी दी-पेड़ों की फुनगियों के बीच छिपी हुई-जैसे अंग्रेजी जमाने मे कॉन्वेन्ट स्कूलों या मिशनरी अस्पतालों की इमारतें होती थी। मैं आगे बढ़ने- वाला था, कि ठिठक गया । इरा ने फाटक खोला था, वह और विट्टी भीतर जा रही थी। और तब मुझे आश्चर्य हुआ वह न अस्पताल या, न स्कूल- मैं इरा के होस्टल के सामने खड़ा था। गेट की दीवार के पास झाडियां थी-बीच में लम्बे पेड़ थे, जिनकी शाखाएँ होस्टल की छत को छू रही यो। शाम को धूप में सबकुछ एक ठण्डी निश्चल रोशनी में चमक रहा था। तीन सीढ़ियां चढ़कर हम दरामदे मे आ गये। सामने रिमेप्शन की एक कविथडा सुख/८७ - खिड़की थी। काउन्टर पर एक रजिस्टर रखा था-पीछे एक महिला बैठी थी, जिसका सिर्फ सिर दिखायी देता था। अगर मैं पंजों पर खड़ा होकर देखता तो शायद उसका चेहरा भी दिख जाता-किन्तु मैं कुछ कर पाता, इससे पहले ही इरा खिड़की के आगे खड़ी हो गयी, विट्टी को कमरे की चाभी देते हुए कहा, "तुम चलो, मैं आती हैं।" मुझे कुछ नहीं मालूम था, कहाँ जाना है। मैं विट्टी के पीछे रास्ता टटोल रहा था। देख रहा था, कैसे लम्वे गलियारे में हर कमरे के दरवाजे पर चिकें लटकी पीली दीवारें और काली लकड़ी की छत, कोनों में लटकते मकड़ी के जाले। कभी-कभी किसी दरवाजे के पीछे हँसी का ठहाका सुनायी दे जाता, कुछ दूर हमारा पीछा करता, फिर हम दुवारा अपने सुन्न-सूने गलियारे में चलने लगते। अचानक एक कमरे के आगे बिट्टी ठिठक गयी। दरवाजे में चाभी धुमायी, तो वह धूमती गयी-वह वन्द नहीं था और विट्टी के हाथ एक क्षण के लिए हैण्डिल पर जमे रहे। फिर हल्के से धक्का दिया, और दरवाजा खुल गया। भीतर बत्ती जली थी। विट्टी ने पीछे देखकर उसे बुलाया और जब वह भीतर आया, तो देखा, नित्ती भाई भीतर हैं, उन्होंने पीछे मुड़कर देखा और विट्टी देहरी पर खड़ी हो गयी। वह कुछ देर चुपचाप दरवाजे की ओर देखते रहे, फिर अचानक बिट्टी के पास चले आये, “इरा कहाँ है ?" "रिसेप्शन में-अभी आती है।" वह कुछ ढीले पड़े, चेहरे पर एक मन्द-सी मुस्कराहट आयी, जैसे बोझ का एक पत्थर गिर गया हो; मेरी ओर देखा, लेकिन पास नहीं आये, न ही डरी की तरह मेरे सिर के बालों को झिंझोड़ा-सिर्फ नीरव आँखों से मुझे देखते रहे, मानो याद कर रहे हों, मैं कौन हूँ, मुझे पहले कहाँ देखा है। वह काले रंग का पुलोवर पहने थे। एक दिन की दाढ़ी में नीला और सफेद रंग घुल-मिल गया था। माया बहुत पीछे तक वालों को धकेलता चला गया था- एक पीली उठान--जिस पर रेखाएँ पहिये के निशानों-सी अंकित हो गयी थीं। "तुम कब से यहाँ हो ?" विट्टी ने दुविधा में उनकी मोर देखा। "दुपहर से..." उन्होंने कहा, "मैंने सोचा था, वह कोई नोट या चिट छोड़ जायेगी। यहां कुछ भी नहीं था। रिसेप्शन में पूछा, तो पता चला, वह कल दुपहर से बाहर है।" "वह मेरे पास सोयी थी।" विट्टी ने कहा। ८८/एक चिथड़ा सुख "मुझे फोन तो कर सकती थी।" विट्टी एक क्षण चुप रही, फिर धीरे-से कहा, "फोन किया था।" "कब ? मैं कल सारे दिन घर में था।" "कल दुपहर-रिहसंल के बाद । तुम्हारी पत्नी ने रिसीवर उठाया था।" बिट्टी के स्वर में कोई घबराहट नही थी-मानो अपनी सहजता मे निती भाई को दिलासा दे रही हो। वह चुप थे-इतने लम्बे आदमी-बीच कमरे में खड़े हुए-"मैं अभी आती हूँ।" विट्टी ने कुछ खोजकर मेरी तरफ देखा, "सड़े क्या हो ? बैठ क्यो नहीं जाते?" उसने वाथरूम का दरवाजा सोला और भीतर चली गयी। मैं सचमुच खडा था, इरा के कमरे मे, निती भाई के साथ-बिना यह जाने- कि मैं वहाँ क्या कर रहा हूँ । बिस्तर के सिरहाने तिपाई पर टेबुल-लम्प जल रहा था-जिसे वह शायद बुझाना भूल गयी थी। रोशनी मी किताबों की शेल्फ पर गिर रही थी। मैं चौंक गया। गलियारे में पैरो की आहट सुनायी दी, दरवाजा खोलकर इरा भीतर आयी, पहले मुझे देखा, फिर हटात आंखें नित्ती भाई की ओर मुड गयीं, जो कोने मे खिड़की के पास सडे थे, और मुझे लगा-जैसे उसकी आँखें कुछ चौड़ी हो गयी हैं, मुस्कराहट अव भी थी, लेकिन वहां अब उसके चेहरे पर एक निर्जीव झाई-सी उघड़ आयी थी-पता नहीं वह क्या भाव था, जो मैं आज भी नहीं भूल सका हूँ--मय नही, लेकिन भयभीत, खुशी नहीं, लेकिन भयभीत- सी खुशी, एक उज्ज्वल-सा विस्मय, जिसके हाशिये पर स्याही पुती रहती है। "कव आये?" वह उनके पास आयी और नित्ती भाई अपनी जगह खड़े रहे। दोनों एक- दूसरे को देख रहे थे और उस 'देसने' में ऐमी रूसी बैचेनी थी, जो तीसरे आदमी को भी भेद जाती है। "शाम को क्या करते रहे ?' "घर में था..." वह क्षण-भर ठिटके, फिर धीमे से कहा, "मुझे पता नहीं चला, तुमने फोन किया था।" "ऐसे ही।" "मैं घर में ही था।" "मुझे मालूम है।" मुझे लगा, वे नींद में बोल रहे हैं, एक-दूसरे के पास पहुंच रहे हैं। अंधेरे IT FTET :
गढ़हों को लांघते हुए, जो बीच में खुल जाते हैं, अगर दो दिन भी तुम एक-दूसरे के साथ न रहो। ऐसा हमेशा नहीं होता। सिर्फ कुछ रिश्तों में होता है। कुछ रिश्ते रेगिस्तान से होते हैं जिन्हें हर रोज लाँघना पड़ता है। बाथरूम का दरवाजा खुला, तो बहते पानी की गड़गड़ाहट सुनायी दी। विट्टी वाहर आयी, तो मुंह भीगा था, तौलिये से नेहरा पोंछते हुए उसने उन तीनों को देखा... "इतने चुप बैठे हो कि मुझे लगा, कमरे में कोई नहीं है।" वह हंस रही थी- अचानक सब ढीले पड़ गये। मैंने धीरज की सांस ली। घड़ी की टिक-टिक सुनायी दी और मुझे लगा जैसे वहीं अटका हुआ समय फिर अपनी लीक पर बहने लगा हो। "खाने में देर है-कुछ पियोगी?" इरा ने पूछा। "कुछ है ?" विट्टी ने झूठी उत्सुकता में पूछा। "थोड़ी-सी रम है-बहुत दिनों से पड़ी है।" "मुझे मालूम था, तुम्हारे पास जरूर कुछ होगा।" उसने कहा। "मैंने तुमसे सीखा है-लन्दन में मैं वियर का एक गिलास भी नहीं पी सकती थी।" वह किताबों की शेल्फ के पास गयी 'जैसे वहां कोई छिपा खजाना हो। हर कमरे में कितने भेद-भरे कोने होते हैं, वही कितावें होती हैं, जो हर घर में होती हैं, कहीं से चाकू वाहर निकल आता है, कहीं हाथ छुआते ही एक दूसरा घर खुल जाता है, एक वोतल, गिलास, पानी का जग-घर के भीतर एक दूसरा घर, एक रोशनी, एक दरवाजा "वह उन तीनों को देख रहा है। वे बातें कर रहे हैं। वे पी रहे हैं। बीच-बीच में वे हँसने लगते हैं. 'इरा खिड़की खोल दी है। बाहर होस्टल का वाग दिखायी देता है, बैंचों पर लड़कियां वैठी हैं, उनके परे पेड़ों के झुरमुट; मैं सोचता हूँ, वह एक सुखी शाम है, सुख जो अचानक चला आता है, बातों के बीच, बोतल उठाने और गिलास रखने के बीच, हँसी के टुकड़ों पर, जब विट्टी के दोस्त सचमुच एक-दूसरे को विश्वास की निगाहों से देख रहे थे। वहां कोई सन्देह नहीं, न खतरा, न आनेवाले दिनों का भय- और तव सहसा अपने पुराने दिनों की डायरी पढ़ते हुए मुझे लगता है उन दिनों मैं कितना बेवकूफ था। सच कहूं, तो मेरी बेवकूफी की हद नहीं थी । जव दूसरे लोग एक भयानक जोखिम में फंसे होते हैं, मैं बेखवर रहता हूँ। मैं सोचता वे पी रहे हैं और बोल रहे हैं। एक कमरे में साथ बैठे हैं, तो सबकुछ ठीक ६० / एक चिथड़ा सुख ने 1 -- जमे अस्पताल के कमरे मे मां चुपचाप लेटी रहती थी और मुझे देखते ही मुस्क- राने लगती थी और मैं सोचता या, वह ठीक हैं । ठीक कुछ भी नहीं होता- यह मुझे बाद में पता चलता है, बल्कि जब चीजें सबमे ज्यादा बिगड़ी होती हैं, तभी मुझे यह सुखद उम्मीद बंधने लगती है, कि वे सबसे ज्यादा ठीक हैं। जब मैं इलाहा- वाद में था तो कभी कभी किसी फिल्म को दुवारा देखने जाता था और तब मुझे काफी हैरानी होती थी कि पहली बार मैंने कितनी चीजो को अनदेखा कर दिया था, दरवाजे का खुलना, एक खाली दीवार, किसी लड़की का खिड़की से बाहर झांकना, घडी का डायल, मुझे यह चीज काफी भयंकर जान पड़ती-देखकर भी न देख पाना-जैसे मैं कही वीच-बीच मे मर जाता हूँ । वाम उन जगहों पर, जहाँ अमली सत्य छिपा रहता है और क्योकि मैं अपने मरने की याद नहीं करना चाहता था--मैंने फिल्मों को दुवारा देखना छोड़ दिया। मैं अपने भीतर यह भ्रम पालने लगा कि जो मैंने पहली बार देखा है, वही अन्तिम है और सम्पूर्ण है, वही सत्य है । तुमने सबकुछ देख लिया, मैं अपने से कहता था, और जो कुछ नहीं देखा, वह भ्रम और भुगावा है । वह धोखा है । वह कुछ भी नही है। मैं उन दिनो दस वरस का रहा हूँगा। फिर बहुत से साल गुजर गये और मैं दिल्ली चला आया, फिल्मों की जगह मैं बिट्टी के दोस्तो को देखने लगा। वे आते थे और चले जाते थे। वे ठहर जाते थे और मैं उन्हे वैसे ही देखता था, जैसे यह एक थियेटर हो और इसमे कोई शर्म और छिछोरापन नहीं था, क्योकि ये जानते थे कि मैं उन्हें देख रहा हूँ। सच पूछो, तो कुछ देर बाद उन्हें ध्यान भी नहीं रहता या कि वे मेरे सामने हैं और मैं उनके बीच हूँ जैसे-मेज और किताबो और गिलास, खिड़की और पेड़, स्ट्रिनवर्ग और चेखव के नाटक-मे मैं । उनके बीच और उनके बाहर" विट्टी मुझे भूल-सा गयी थी और जब इराने हंसी-हमी मे थोड़ी-सी रस मुझे दी, तो भी वह कुछ नहीं बोली जैसे उमका मुझसे कोई वास्ता न हो। लेकिन मुझे उसकी परवाह नही थी और मुझे अच्छा लग रहा था कि मैं उनमे से एक हूँ और पो रहा हूँ और जब एक बार नित्ती भाई ने हंसी में कहा कि मैं विट्टी का 'रमी कजिन' हूँ तो मुझे कुछ विचिन-सा लगा कि वे इतने छोटे-से मजाक पर इतना हंस सकते हैं, इतना सुश हो सकते हैं लेकिन यह भी सम्भव है कि मैं गलत हूँ क्योकि उस शाम मैं नशे की धुंधली फिल्म में उन्हें देख रहा था । मैं बुखार में था और वे मेरे पास थे। मैं उन्हे छू सकता था । मैं उनके बीच से गुजर जाता था मानो वे धुन्ध हों लेकिन वे ठोस थे, साफ-और तब मुझे याद आया, ।
AN - । , मैंने उन्हें ऐसे नहीं देखा था। बुखार का असर था, या पहली बार पीने का- - मुझे लगा, वे मेरे वहुत पास सरक आये थे। वे अकेले नहीं थे। कुछ अदृश्य-सी चीज उनके साथ जुड़ गयी थी, लेकिन वे उसे नहीं देख सकते थे। जव नित्ती भाई अपना गिलास उठाते तो मुझे लगता जैसे यह गिलास, ये अंगुलियां किसी दूसरे आदमी की हैं, जो उनके पीछे बैठा था-इरा की आँखें नित्ती भाई पर नहीं, उस आदमी पर टिकी हैं और यह आदमी सुरक्षित नहीं है, फूंक मारते ही उसे उड़ा दिया जा सकता है, नष्ट कर दिया जा सकता है । मुझे यह असह्य-सा जान पड़ा, कि नित्ती भाई को, इरा और बिट्टी को-किसी को इसका गुमान नहीं है कि वे कितने बड़े खतरे में हैं, मैं उनसे कुछ कहनेवाला था कि सहसा मुझे विट्टी का स्पर्श महसूस हुआ, वह गिलास पर मेरे हाथ पर अपना हाथ रखे थी। वह मुस्करा रही थी, "ठीक हो?" "हाँ," मैंने कहा । मैं वह रहा था जबकि वे एक जगह बैठे थे। मुझे अब उनकी चिन्ता नहीं थी। मुझे अचानक पता चला, कि मेरे भीतर बहुत घनी शान्ति है। मैं उसे तोड़ना नहीं चाहता था। अचानक इरा उठ खड़ी हुई। गलियारे में डिनर की घण्टी गूंज रही थी। "मैं अभी आती हूँ।" इरा ने कहा। "तुम चल तो लोगी?" विट्टी ने हंसते हुए कहा । "मेरी रम अब भी बाकी है।" इरा ने सवको देखा-"मैं तुम्हारे लिए खाना पैक करा लाती हैं।" "मेरे लिए नहीं-मैं अव जाऊँगा?" नित्ती भाई ने कहा। इरा ने एक क्षण उन्हें देखा-कहा कुछ नहीं-और फिर दरवाजा खोलकर बाहर चली आयी। उसके बाद जो कुछ हुआ, धुएँ की लकीर-सा मुझे याद है । कुछ शब्द, कुछ फिकरे दिमाग के किसी कोने में फंसे हैं-फटी हुई चिट्ठी जैसे-जिसकी चिप्पियाँ जोड़-जोड़कर पढ़नी होती हैं। मेरी आँखें मुंद रही थीं, लेकिन मैं सो नहीं रहा था। एक हल्की-सी धुन्ध में तैर रहा था। कभी-कभी गिलास के खन- कने, पानी उड़ेलने की आवाज मुझे चौंका देती थी, नांखें खुल जाती-देखता, नित्ती भाई कभी अपने, कभी बिट्टी के गिलास में रम डाल रहे हैं-कहीं दूर से उनकी आवाज सुनायी देती थी और मैं उसके पीछे-पीछे चला जाता था, विना यह परवाह किये, कौन बोल रहा है, कौन सुन रहा है। किन्तु एक बार मैं रुक गया, जैसे बातों के बीच कोई एक वाक्य अलग हो गया हो और उसने बीच में ६२/ एक चिथड़ा सुख मुझं पकड़ लिया हो। "तुम सोचती होगी, मैं कैसा आदमी हूं।" नित्ती भाई ने गिलास से सिर उठाया- "मैं उसे जाने से रोक रहा हूं, पर खुद वहीं हूं, जहां पहले था।" "तुम्हारी पत्नी हैं," विट्टी ने धीरे से कहा । "और बच्चे।" "यह नहीं।" उन्होंने गिलास से एक बूंट लिया, "मुझमे होमला नही है।" बिट्टी की आंखें ऊपर उठी, "होमला किसमें है ?" "क्यों, तुममें है और डेरी..." "डेरी ?" विट्टी के होंठ एक विचित्र-मी मुस्कराहट मे खुल गये। "मैं उन्हें जानती हूँ।" "विट्टी! क्या बात है? वह हंसने लगी, ऐसी हमी, जो उसने पहले कभी नहीं देखी थी, जैसे कोई डूबते हुए ऊपर आ जाता है, पानी के अंधेरे से दिन की रोगनी को देखता है। "नित्ती भाई, तुमने कभी कुछ सोचा है ?" "किसके बारे में?" "तुम इंग्लण्ड से क्यों लौट आये ? तुम हम लोगो को नहीं देखते, जो यहाँ रहते हैं ?" नित्ती भाई कुछ देर तक चुपचाप अपने गिलास को देखते रहे; फिर एक लम्बी सांस ली, जिसमें पता नही, कितना बोझ लदा था। "विट्टी, तुम सबकुछ छोड़कर यहाँ पडी हो। किसके लिए ? हिन्दुस्तान में कितने लोग ऐसा करते हैं ?" विट्टी की प्रांखें खाली हवा पर ठिठक गयी, फिर बहुत हल्के स्वर मे बोली, "हिन्दुस्तान में कोई कुछ नहीं छोड़ता; मैंने कुछ नही छोडा • पहले मैं बाबू के पर रहती थी. अब यहाँ वरसाती मे “ोर हैरी ? वह अपने पिता के बंगले मे रहते हैं। हम वही किताबें पढ़ते हैं, जो दूसरे लोग, वही बातें करते हैं "मैंने जब इलाहाबाद छोड़ा था, तो सोचा था कि अब मैं छोटी-छोटी चीजो के घेरे से बाहर प्रा जाऊँगी. वह धीरे से हंस पड़ी,"मव मैं बडी चीज़ो के बीच में हूँ.. लेकिन में उतनी ही छोटी हूं, जितनी पहले 'मेरे भीतर कुछ भी नहीं बदला है !" "ऐसा नहीं है-विट्टी!" नित्ती भाई ने अपना हाथ धीरे से विट्टी के हाथ पर रख दिया, "जानती हो, जब कभी मैं तुम्हें रिहर्सल करते हुए देखता हूं, तो तुम बिल्कुल बदल जाती हो"मुझे विश्वास नहीं होता, तुम वही हो, जिसे में .
" जानता हूँ विट्टी की आँखों में एक असाधारण-सी चमक उमड़ आयो "बुखार की धुन्य में मुझे लगा, जैसे यह चमक देह के किसी ऐसे परदे को छानते हुए आयी है, जो सिर्फ दुर्लभ क्षणों में उठ जाता है." उसने वहुत कोमल निगाहों से नित्ती भाई को देखा और फिर अपने को दबाते हुए कहा, "हाँ- ऐसा होता है ! स्टेज पर कभी-कभी लगता है, मैं वह नहीं हूं, जो अपने को समझती पायी थी "मुझे कुछ ऐसा भ्रम होता है, जैसे मैं अपने वारे में कुछ ऐसा जान गयी हूं, जो किसी को नहीं मालूम, जैसे जैसे कोई दरवाजा खुल गया है जहाँ से मैं गुजर सकती हूं.'नित्ती भाई, मैं समझा नहीं सकती 'वाद में मुझे कुछ भी याद नहीं रहता; क्या ऐसा असली जिन्दगी में नहीं हो सकता?" "हो सकता है, विट्टी !" नित्ती भाई ने धीरे से कहा, "डरी वहीं गये थे...' विट्टी एक लम्वे क्षण तक खिड़की के बाहर देखती रही, जहाँ पेड़ों की छायाएँ अंधेरे में स्तब्ध खड़ी थीं। "हाँ, डैरी गये थे और वह लौट आये । हममें से कोई भी वहाँ ज्यादा देर तक नहीं रह सकता।" नित्ती भाई ने उसके गिलास की ओर देखा, पहली बार गायद अहसास हुना कि वह बहुत पी चुकी है, लेकिन वह स्वयं इतना आगे जा चुके थे, जहां दूसरों को रोकना वेमानी-सा जान पड़ना मैं वहुत देर तक उन दोनों को देखता रहा-दो चेहरे, प्रकाश की पीली छाया में सिमटे हुए-फिर सहसा विट्टी की आँखें दिखायी दी, नित्ती भाई के चेहरे पर गड़ी हुई। "तुम क्या सचमुच उससे प्यार करते हो?" "तुम क्या सोचती हो?" "मैं सोचती हूँ-तुम कुछ करते क्यों नहीं ?" "विट्टी "तुम्हें सबकुछ अासान लगता है।" "अपने बच्चे को छोड़ना?" विट्टी ने कहा, "या अपनी पत्नी को ?" नित्ती भाई सुन्न आँखों से उसे देखते रहे फिर वहुत धीमे स्वर में कहा, "तुम्हें कुछ नहीं मालूम 'तुम अपने से बाहर कुछ भी नहीं देखतीं।" "मुझे इतना मालूम है, वह कितना तड़पती है । तुमने "तुमने कभी..." ६४ / एक निथड़ा सुब - वह नशे में बोल रही थी । यह हकला रही थी । वह एक ऐसी जगह पहुंच गयी थी जहाँ दुःख का नाम दुख है, डर का नाम डर, प्रेम का नाम प्रेम। "क्या कुछ भी नहीं हो सकता?" इस बार बिट्टी ने अजीव भयभीत प्रसों से नित्ती भाई को देखा। "मैं कोशिश करता हूं, लेकिन हर बार पीछे हट जाता हूँ।" विट्टी फटी-फटी प्रांखों से नित्ती भाई पो देखने लगी-फिर एक भयानक- मी मुस्कराहट उसके चेहरे पर फैल गयी। "जानते हो, यह किसने कहा था ?" "किसने?" "इमकी मां ने... "चिट्टी!" मैंने उसे रोकना चाहा, पर उमने मुझे देखा भी नही । वह अचानक किसी दूसरे समय मे, किसी पुराने दिनो को सुरंग मे चली गयी थो; कुछ देर बाद जब उसका स्वर सुनायी दिया, तो लगा जैसे वह सोते हुए वोल रही हो- "मैं आखिरी बार उन्हें देखने गयी थी."अस्पताल के कमरे में 'मौसी, क्या हाल है, मैंने पूछा । वहुत देर तक वह मुझे निहारती रही, फिर मुझे अपने पास बुलाया, धीरे से कान में कहा, मैं कोशिश करती हूँ..." बिट्टी, चुप ईश्वर के लिए फिर सहसा मैं रुक गया- वहां न ईश्वर था, नमा की यातना थी- सिर्फ बिट्टी के प्रांसू थे-और वह रोना नहीं था-क्योकि रोना वर्तमान मे होता है, जबकि विट्टी के प्रांसू किसी पुराने रोने के वासी अवशेष थे, जो इस क्षण बाहर निकल पाये थे, बह रहे थे और वह उन्हे बहने दे रही थी। नित्ती भाई कुर्सी से उतर प्राये, विट्टी के साथ फर्श पर बैठ गये, उसके हाथ से रम का गिलास छुड़ा लिया-वह शायद कुछ कहना चाहते थे, किन्तु उन्हें कुछ समझ नहीं पा रहा था, कैसे अपनी पीडा के दलदल से उबरकर उस दायरे में जा सकें, जहां विट्टी थी; अगर उस समय कोई 'घटना' हो जाती, तो वह अधूरा दृश्य एक मुकम्मिल-सी परिणति पा लेता, जैसा कि उसने थियेटर में देसा पा, परदा गिर जाता है और दुःख चाहे कितना ही भयानक और मसा क्यो न हो, अगले ऐक्ट के शुरू होने तक एक रिलीफ-सी पा लेता है, पीडाको हाथ-पांव फैलाने का एक सिरहाना-सा मिल जाता है लेकिन यह रितील, जीने के दौरान नहीं मिल सकती क्योकि जब हम सचमुच जी रहे होते हैं- .
1. - शाम, होस्टल के कमरे में, बुखार और रम और पछतावे के पसीने में लिथड़े हुए -तो कहीं परदा नहीं गिरता, एक क्रूर, पथरीली-सी अपने जवड़े फैलाये रहती है। एक मन्द बुखार की तरह, जिसमें मैं तपता उन्हें देख रहा था। कुछ भी नहीं हुआ"कुछ देर बाद इरा ने दरवाजा खोला, वह हांफ रही वह दौड़ती हुई आयी थी। उसने खाने का पैकेट अपनी छाती से चिपका था । वह मुस्करा रही थी। । हम वाहर आ गये । खुली, स्वच्छ रात के अंधेरे में। मेरी आँखें मुंद रही थीं। मैंने पहली बार शराब पी थी और मुझे लग रहा था जैसे मैं हवा में चल रहा हूँ । नित्ती भाई मेरे साथ थे और उन्होंने मेरा हाथ पकड़ रखा था। मैं उनसे कुछ कहना चाहता था-डर के बारे में । मैं उनसे कहना चाहता था कि उन्हें डरना नहीं चाहिए । मैं उन्हें सान्त्वना देना चाहता था। शायद रम पीने का असर रहा होगा, जब ऊपर तारों के बीच अंधेरे में मैं उनके दुख को भी चमकता हुआ देख सकता था-एक चमकीला कीड़ा-जो भीतर रेंगता है, खाता है, सवको डराता है । वह उसे मार सकते हैं, खत्म कर सकते हैं: -मैं उनसे कहना चाहता था-लेकिन वह ठहर गये । वह वीच सड़क पर खड़े हो गये। उन्होंने मेरा हाथ छोड़ दिया। मैंने सोचा, वह शायद नाले में पेशाव करने जा रहे हैं, इसलिए मैं पीछे खड़ा रहा । किन्तु वह एक पेड़ के पास गये और अपना सिर उसके तने पर टिका दिया। वह वहां अंधेरे में पेड़ पर सिर टिका पड़े थे। मैं उनके पीछे गया, पर उन्होंने मुझे नहीं देखा। वह पीछे भी न मुड़े-एक भूत की तरह पेड़ से चिपके खड़े रहे। पीछे इरा और विट्टी रही थीं.. मैं वही खड़ा-खड़ा प्रार्थना करने लगा कि वे कहीं उन्हें इस हाल न देख लें । मैं उन्हें हिलाने लगा। मैं उन्हें पीछे की तरफ खींचने लगा जैसे सो रहे थे, इतने पेड़ों के बीच एक पेड़ की तरह। मैंने उन्हें छोड़ दिया। कोई फायदा नहीं था। मैं बस-स्टेंड की तर लगा। हवा उठ रही थी। मण्डी हाउस का स्कैयर उजाड़ पड़ा था। का एक झीना छिलका मेरे ऊपर लटक आया था. लाखों तारों क हुआ पालोक-जो हर पत्ते पर बारिश की बूंदों की तरह चमक रहा वम ठहरती है-लोग भीतर आते हैं-घण्टी रजते ही वह । - । १६ / एक चिपड़ा सुख लगती है । कण्डक्टर सोपा-सा कुछ पूछता है, और मिट्टी का चेहरा आगे की तरफ झुक जाता है-जैसे वह भी सोकर जागो हो-दो टिकट निजामुद्दीन । ईस्ट या वेस्ट ? हाडिंग ब्रिज की रोशनियो, पुराना किला, मकवरे, सण्डहर । कण्डक्टर ठिठका-सा खडा रहता है-दूसरा टिकट किसका है ? मेरा। मैं यहां हूँ, मैं बाहर देख रहा हूँ। मवकुछ पीछे भाग रहा था- रोगनी के खम्भे, पेड, तारे । मैं बस की खिड़की से दिल्ली की वहती दुनिया को देख रहा था । बिट्टी पीछे बैठी थी, लेकिन खिडकी के शीशे पर मैं उमका चेहरा देख सकता था-रोशनी का घच्या-एक फ्रेम में जड़ा हुया-और मुझे भ्रम होता था जैसे विट्टी भीतर नही, कहीं बाहर अंधेरे में बैठी है, किसी गुजरते मकान को खिडकी से मुझे देख रही है । मुझे खुगी हुई, हम अलग- अलग बैठे हैं-अलग पर अकेले नही । जिन लोगो को हमने मण्डी हाउस के बस-स्टैण्ड पर छोड़ दिया था, वे अव भी कही बाहर थे । इरा अब भी वम के पीछे भाग रही थी खाने का टिफिन विट्टी को देने के लिए, जो भूले में उसके हाथ में रह गया था, उसके हाथ हैंडिल पर चिपक गये थे, नित्ती भाई ने जबर्दस्ती उसे पीछे खीचा और वह हकवकायी आँखो से हमारी वम को देखती रही-अंधेरे में बीच सड़क पर। क्या वह अब भी वहां खडी है ? क्या ऐमा हो सकता है कि जब मैं वरसो बाद वापिस लौटूंगा, वह वही खडी होगी, एक लम्बी छरहरी लडकी, काली शाल में लिपटी हुई । नहीं, यह असम्भव है, मैंने सोचा । लोग पेड नही है जो एक जगह खड़े रहे, और पेड़ भी मुरझा जाते हैं-tbe woods decay and the woods decay-मुझे बरसों पहले पढी हुई एक लाइन याद आती है और तब मुझे काफी अजीब लगा कि जंगल भी जरजरा जाते हैं, बूढ़े हो जाते हैं, झर जाते हैं."
७ . । " वे लम्बी दुपहरें थीं। वह सुबह ही बाहर निकल जाता । मकवरे के बाग में लेट जाता - ऊपर चीलें उड़ती रहतीं, नीचे पत्ते सिर धुनते रहते । सारा शहर एक अदृश्य काली सुई-सा घूमता, मार्च से उतरकर अप्रैल की चढ़ाई पर चढ़ने लगता और तब उसे लगता (मकवरे की घास पर लेटे आकाश को ताकते हुए) जैसे समय कोई ऊंचा पहाड़ है, और सव लोग अपनी-अपनी पोटलियों के साथ ऊपर चढ़ रहे हैं-हांफ रहे हैं, विना यह जाने-कि ऊपर चोटी पर-वे सव हवा में गायब हो जायेंगे और धूल में लदी-फंदी पोटलियाँ-पता नहीं, उनमें क्या भरा है, प्रेम, घृणा, निराशाएँ, दुख-नीचे लुढ़का दी जायेंगी, जिन्हें दूसरे लोग पकड़ लेंगे और फिर उन्हें पीठ पर ढोते हुए ऊपर चढ़ने लगेंगे... क्या यह सिलसिला कभी खत्म नहीं होगा ? शाम होते ही शहर का सन्नाटा मकवरे पर उतर जाता-और वह घर की तरफ चलने लगता । खाली घर, धूल-भरी मुंडेर, साँकल पर कागज की चिन्दियां फड़फड़ाती हुई उसका स्वागत करती "मैं रिहर्सल में हूँ," दूसरा कागज "मैं आयी थी, तुम कहाँ थे ?," तीसरा कागज "खाना खा लेना, मैं देर से लौटूंगी।" वे लम्बी दुपहरें थीं । धूप और धूल और पीला अवसन्न अाकाश; किन्तु स्टूडियो के भीतर ठण्डा अँधेरा तसल्ली देता था। वह वहाँ अपने को सुरक्षित- सा महसूस करता था। दरवाजे के सूराख से रिहर्सल देखता तो दुनिया बदल जाती और समय ठहर जाता। इरा स्टेज पर आती, तो एकदम शान्त और सम्पूर्ण दिखायी देती, जैसे उसने सचमुच अपनी 'पोटली' थियेटर के बाहर छोड़ दो हो-स्टेज पर खड़ी वह और बाहर वहता हुआ समय एक हो जाते---और वह सोच न पाता, यह वही लड़की है. जो उस रात छत के अंधेरे में रो रही थी। नहीं, यह कोई दूसरी आत्मा थी, जो इरा की देह से बाहर झांक रही थी, उसे सुलाकर खुद बाहर चली आयी थी- स्टेज के मद्धिम प्रकाग में एक नंगी, साफ लो की तरह जलती हुई लेकिन क्या आत्मा वही रहती है ? यही, - ६८/एक चिथड़ा सुख तो पुनर्जन्म है, कोई उसके भीतर कहता-एक ही जिन्दगी में दूनरी जिन्दगी । थियेटर के ग्रीन-रूम में अपनी देह उतारकर दूसरी देह पहन लेना जैसा बाबू गीता मे उसे सुनाते थे. गीता नही वैवकूफ-स्ट्रिनवर्ग 1 वह स्ट्रिनवर्ग का नाटक था । उसमें दो पौरतें थी और एक प्रादमी, जिमका पार्ट कोई बहुत लम्बा-सा लड़का करता था। तीनो एक जगह फंसे थे, जिसे नेकीराम जू का पिंजरा कहता था। वह क्यूविकल में उसके पीछे बैठा रहता और जब कोई सीन वदलसा, तो वह उमका कन्धा झिझोड़कर फुसफुमाने लगता। "देखो, अव बिटिया का पार्ट होगा।" वह चौंक जाता । प्रांखें फाडकर देखने लगता -बिट्टी एक विंग में बाहर निकलकर पाती-और एक क्षण अंधेरे खाली प्राडिटोरियम को ताकती रहती और तब उसे बहुत निराशा होती कि विट्टी स्टेज पर भी विट्टी दिखायी देती है, उसकी इलाहाबादी कजिन--रूखे बालो का जूडा और पीला माथा, मुसी हुई जीन्स पर खद्दर का ढीला-ढाला कुरता-मिर्फ प्रासं कुछ बदल जाती, किसी कूर गोपनीय रहस्य मे चमकती हुई-क्रूर और पत्थर जैसी कठोर-पोर जब वह ऊंचे, फूत्कारते स्वर मे कुछ कहती तो वह उस स्वर को अंधेरी जडो में चला जाता, एक रस्सी की गांठ, जो उसके स्वर को खीचते हुए किसी कुएं में ले जाती मोर तब उसे लगता, जिस वाल्टी को स्ट्रिनवर्ग ने वरसों पहले अपने भीतर फेंका बिट्टी का स्वर उसकी पीडा को लबालब अपनी चीख मे उड़ेल लाता है। उसका दिल तेजी से घड़कने लगता । दरवाजे पर चिपकी प्रांख मुंद जाती। पागल, देवकूफ यह नाटक है, कोई झाडियों के पीछे फुसफुसाता हुमा कहता। इसमें असली कुछ नहीं है । यह एक माया है, एक मिराज, जो रेगिस्तान में पानी की तरह चमकता है, होता कुछ नहीं। बरमों पहले नाटक के लेखक ने इस चीख को अपने भीतर सुना होगा, किमी दुपहर अपने अकेले कमरे मे; उसी की गूंज अब तक चली आती है---यह असली नही है, इसका यथार्थ से कुछ लेना-देना नहीं, यह झूठ का झिलमिला है, वैसे ही, जैसे बरसो पहले फडफडाते चीथडों के धीच तुमने उस बौने को देखा था क्या उमका 'सुख' भी धोखा था? लेकिन वह दुपहर असली थी, जिसे वह माज तक नहीं भूल पाता। वह अपने सहसाने में बैठा था-तभी उमे आडिटोरियम में हल्की-सी सहसड़ाहट मुनायी दी। उमने सोचा, शायद डरी होंगे। वह कभी-कभी प्राडिटोरियम को पिछली सीट पर पाकर बैठ जाते थे और वहां मे ऐक्टरों को प्रादेश देते रहते धा, --- लेकिन वह थे। लेकिन उस दुपहर जो आदमी पिछली सीट पर बैग दिखायी दिया-उसे एक क्षण विश्वास नहीं हुआ, कि वह नित्ती भाई हो सकते हैं । वह नित्ती भाई ही थे। उन्होंने शेव भी नहीं की थी। कमीज के कालर मुड़े हुए थे और उन्होंने वही खाकी हाफ पैन्ट पहन रखी थी, जूते और मोजों के साथ । मुंह थोड़ा-सा खुला था, जैसे साँस लेना मुश्किल हो। वह आडिटोरियम में अकेले बैठे थे। वहां उन्हें कोई नहीं देख सकता था। अपने सूराख से उन्हें देख रहा था। रोशनदान का चौकोर, रोशनी का चकत्ता उनके वालों पर गिर रहा था, चाँदी के छल्ले की तरह, उन्हें दो फांकों में काटते हुए-~~-एक आदमी, जिसका घर था और पत्नी थी-दूसरे एक प्रसिद्ध पाकिटेक्ट, जो अंधेरे आडिटोरियम में बैठे थे, जेव से बोतल निकालकर पी रहे थे और वह अपना होश-हवास खोकर दरवाजे की आँख से देख रहा था "जब वह वोतल ऊपर उठाते, कांच का एक टुकड़ा छत पर नाचने लगता, उसकी अाँखों को भेदने लगता और तव उसे याद अाया, कैसे कुछ लोग धीरे-धीरे मदद के वाहर हो जाते हैं, जैसे मां हो गयी थी, जो घण्टों वदहवास-सी विस्तर पर लेटी रहती थीं, असीम कष्ट में छटपटाती हुई और वह उन्हें वैसे ही देखा करता था, जैसे इस क्षण-दिल्ली की एक दुपहर-नित्ती भाई को देख रहा था; उन्हें कोई मदद, कोई उम्मीद नहीं थी। ऐसे लोग उम्मीद को भी पार कर लेते हैं और उन्हें वह सौभाग्य भी नहीं मिलता, जो कम-से-कम नाटक के ऐक्टरों को मिल जाता है, जो कितावों में है, जिन्हें बिट्टी के दोस्त पढ़ते थे---- गीता में है, जिसमें डूबकर वायू को भूल जाते थे; वह उस रिकार्ड में था, जिसके भीतर से नीग्रो लड़की की फटी-फटी आवाज वाहर आती थी... वह अपने को नहीं रोक सका । झपाट से क्यूविकल का दरवाजा खोला और आडिटोरियम में चला आया । वहाँ कोई नहीं था। नित्ती भाई कव के जा चुके थे। उनकी सीट खाली पड़ी थी। अंधेरे में सिर्फ ह्विस्की की वासी गन्ध तैर रही । मां की मृत्यु - थी। - अब कोई अंधेरा नहीं था। वह धूप में चल रहा था। वह दुपहर के उजाले में पा गया था। अब कोई नहीं था, न थियेटर, न माया, न अफसोस । यह असली दुनिया थी । वह अप्रैल का दिन था। वह पेड़ों के नीचे चल रहा था और पेड़ असली थे। और उनकी छायाएँ सड़क को लांघकर बैंगलों तक जाती थीं। १००/एक चिथड़ा मुख उमने मण्डी हाउस का संदर पार पिया मोर मनवानदान रोड पर चना माया। कभी-कभी वह एक बाता। व्हर जाता। सुनने समता। दिल्ली भी कडा दाहरहै । वह सोचने लगता। लाल इंटों के बंगले,हवा में कांवे टेलीविजन के पोल, परदे, परदों के पीछे लोगों की प्रज्ञात निन्दनी-जिसे वह कभी नहीं जानेगा। वह चलता रहा और फिर वन-स्टैन्ड पर प्रारर रक गत । नव वर्स निजामुद्दीन होकर जाती यो । एक हरा गंड मोर इक्के-दुक्के यात्री- हागि विज पर जब कोई ट्रेन गुजरती, तो धुएं की लहर उड़ती हुई मा बाढी । पौधे वंजर मंदान या। कुछ सोचे हुए सन्डहर और माघी टूटी दीदार, कार पव्वे रहते थे। पुराने किले का चक्कर तमाकर वापिस मुह। ये-नुनापश के मंदान पर स्वर जाते थे। वह उन्हें देख रहा था । एक दिन बिट्टी के साथ यहां मादगा, बहुत देर तक घूमेगा। इलाहाबाद में कोई ऐला मैदान नहीं था, वहाँ नुमाया दीन गयी हो मोर फिर नी सड़ी हो, कायम हो, अपनी जगह बनी हो-पुरानी दुकानों के स्टॉन, टॉवर, घून में मने सोसल-कंत्राल । बाहर सादुत मोर टोल, भीतर वामो, तो माली, वासी ह्वा, और कुछ भी नहीं । साली मोर सुनमान-निन तरह कुछ क जमीन में घंन जाती हैं. घाम ग माडी है। बच्चे उस पर खेलते हैं और किमी को याद भी नहीं रहता कि मागते परों मोर मरमरी घाम नौ कोई दवा है, लेकिन अचानक किमी दिन कोई उखहा पत्यर पांवों में घुर जाता है, एक चेहरा बाहर यस्ता है, देखो में वही हूं, जो तुम्हारे साय मायी यो। जनवरी के दिन, अब इलाहाबाद में नुमाया गुरू हुई थी और मेरे इम्तहान पान मा रहे "तुम्हें याद है ? उसे याद है । वह उसे धनीटकर लाया था। वह माती नहीं दी। वह महीनों कमरे में पड़ी रहती थी। वह मे किताबों में सोदर बाहर नाया था। उसने कपड़े भी नहीं बदलेगी यो, बैनी हो उसके साथ चलो मायो धो--इन एक शतं पर-कि वे एक घट में घर लौट प्रागे। वह मान गया या क्योंकि बदरे में बिट्टी ने उने यह तसल्ली दी थी कि वे किया जाने और रिकने के पंने वह देती। कैने याद किया जाता है ? मां मूंदकर वह दो दरम के अंधेरे को नाम गरा-और एक टापू पर उतर पापा-जहाँ नि रोगनियां पी, रोगनियां मोर हवा में उड़ते गुब्बारे और अंधेरे में घूमता हुमा जापट हाल, एक सार सुखं पितारा, जिन पर बच्चों को हमी और ची गंज रही थीं। नुनाग के बीच बहे मंदान में एक बैग्ड माटर देत धुनाता हृमा चल रहा था-' -पौधे बैंड दबाते हुए । । - थे। लेकिन उस दुपहर जो आदमी पिछली सीट पर बैठा दिखायी दिया-उसे एक क्षण विश्वास नहीं हुआ, कि वह नित्ती भाई हो सकते हैं । वह नित्ती भाई ही थे। उन्होंने शेव भी नहीं की थी। कमीज के कालर मुड़े हुए थे और उन्होंने वही खाकी हाफ पैन्ट पहन रखी थी, जूते और मोजों के साथ । मुंह थोड़ा-सा खुला था, जैसे सांस लेना मुश्किल हो । वह आडिटोरियम में अकेले बैठे थे। वहां उन्हें कोई नहीं देख सकता था। लेकिन वह अपने सुराख से उन्हें देख रहा था। रोशनदान का चौकोर, रोशनी का चकत्ता उनके वालों पर गिर रहा था, चांदी के छल्ले की तरह, उन्हें दो. फांकों में काटते हुए-एक आदमी, जिसका घर था और पत्नी थी-दूसरे एक प्रसिद्ध आकिटेक्ट, जो अँधेरे आडिटोरियम में बैठे थे, जेब से वोतल निकालकर पी रहे ये और वह अपना होश-हवास खोकर दरवाजे की आँख से देख रहा था 'जव वह वोतल ऊपर उठाते, काँच का एक टुकड़ा छत पर नाचने लगता, उसकी आँखों को भेदने लगता और तब उसे याद आया, कैसे कुछ लोग धीरे-धीरे मदद के वाहर हो जाते हैं, जैसे माँ हो गयी थीं, जो घण्टों बदहवास-सी विस्तर पर लेटी रहती थीं, असीम कष्ट में छटपटाती हुई और वह उन्हें वैसे ही देखा करता था, जैसे इस क्षण-- दिल्ली की एक दुपहर-नित्ती भाई को देख रहा था; उन्हें कोई मदद, कोई उम्मीद नहीं थी। ऐसे लोग उम्मीद को भी पार कर लेते हैं और उन्हें वह सौभाग्य भी नहीं मिलता, जो कम-से-कम नाटक के ऐक्टरों को मिल जाता है, जो कितावों में है, जिन्हें बिट्टी के दोस्त पढ़ते थे-गीता में है, जिसमें डूबकर को भूल जाते थे; वह उस रिकार्ड में था, जिसके भीतर से नीग्रो लड़की की फटी-फटी आवाज़ वाहर आती थी... वह अपने को नहीं रोक सका । झपाट से क्यूविकल का दरवाजा खोला और आडिटोरियम में चला आया । वहाँ कोई नहीं था। नित्ती भाई कव के जा चुके थे। उनकी सीट खाली पड़ी थी । अंधेरे में सिर्फ ह्विस्की की वासी गन्ध तैर रही - । वाबू मां को मां की मृत्यु - - थी। अब कोई अंधेरा नहीं था। वह धूप में चल रहा था। वह दुपहर के उजाले में आ गया था। अब कोई नहीं था, न थियेटर, न माया, न अफसोस । यह असली दुनिया थी । वह अप्रैल का दिन था। वह पेड़ों के नीचे चल रहा था और पेड़ असली थे। और उनकी छायाएँ सड़क को लांघकर बंगलों तक जाती थीं। १००/एक चिथड़ा सुख उसने मण्डी हाउस का स्कयर पार किया और भगवानदाम रोड पर चला पाया । कभी-कभी वह रुक जाता । ठहर जाता । सुनने लगता । दिल्ली भी कंसा शहर है। वह सोचने लगता। लाल इंटों के बंगले, हवा में कांपते टेलीविजन के पोल, परदे, परदो के पीछे लोगों की अज्ञात जिन्दगी-जिसे वह कभी नहीं जानेगा। वह चलता रहा और फिर बस-स्टैण्ड पर पाकर रक गया। सव बसें निजामुद्दीन होकर जाती थी। एक हरा शैड और इस्के-दुक्के यात्री-हाटिंग ब्रिज पर जब कोई ट्रेन गुजरती, तो धुएँ की सहर उडती हुई पा जाती । पीछे बंजर मैदान था। कुछ सोये हुए खण्डहर और प्राधी टूटी दीवारें, ऊपर काव्वे उड़ते थे । पुराने किले का चक्कर लगाकर वापिस मुडते ये-नुमायरा के मैदान पर उतर जातेथे वह उन्हें देख रहा था । एक दिन बिट्टी के साथ यहाँ भायेगा, बहुत देर तक घूमेगा। इलाहाबाद मे कोई ऐसा मैदान नहीं या, जहां नुमायश बीत गयो हो भौर फिर भी खडी हो, कायम हो, अपनी जगह जमी हो-पुरानी दुकानों के स्टॉल, टॉवर, धूल मे सने खोखल-कंकाल । वाहर से सायुत और ठोस, भीतर जामो, तो खाली, वासी हवा, और कुछ भी नही। साली पौर सुनसान-जिम तरह कुछ करें जमीन में फंस जाती हैं, घास उग आती है। बच्चे उस पर खेलते हैं और किमी को याद भी नहीं रहता कि भागते परों और सरसरी घास के नीचे कोई दवा है, लेकिन अचानक किसी दिन कोई उखड़ा पत्थर पांवों में घुप जाता है, एक चेहरा बाहर झांकता है, देखो मैं वही हूँ, जो तुम्हारे साथ प्रायी थी । जनवरी के दिन, जब इलाहाबाद मे नुमायश शुरू हुई थी और मेरे इम्तहान पास पा रहे थे "तुम्हें याद है ? उसे याद है। वह उसे घसीटकर लाया था। वह माती नहीं थी। वह महीनों कमरे में पड़ी रहती थी। वह उसे किताबो से खीचकर वाहर लाया था। उसने कपड़े भी नहीं बदले-जैसी थी, वैसी ही उसके साथ चली आयी थी-इस एक शतं पर-कि वे एक घण्टे में घर लौट प्रायेंगे। वह मान गया था क्योकि बदले में बिट्टी ने उसे यह तसल्ली दी थी कि वे रिक्शा मे जायेंगे और रिक्शे के पैसे वह देगी। कैसे याद किया जाता ? अांखें मूंदकर वह दो बरस के अंधेरे को सांप गया-और एक टापू पर उतर पाया-5 -~-जहां सिर्फ रोशनियां थी, रोशनियां और हवा में उडते गुब्बारे और अंधेरे में घूमता हुआ जायन्ट हील, एक लाल सुखं सितारा, जिम पर बच्चों की हंसी और चीखें गूंज रही थी। नुमायरा के बीच बड़े मैदान में एक बण्ड मास्टर बेत घुमाता हुआ चल रहा था-पोछे बैण्ड बजाते हुए ।
थे। लेकिन उस दुपहर जो आदमी पिछली सीट पर बैठा दिखायी दिया-उसे एक क्षण विश्वास नहीं हुआ, कि वह नित्ती भाई हो सकते हैं । वह नित्ती भाई ही थे । उन्होंने शैव भी नहीं की थी। कमीज के कालर मुड़े हुए थे और उन्होंने वही खाकी हाफ पैन्ट पहन रखी थी, जूते और मोजों के साथ । मुंह थोड़ा-सा खुला था, जैसे सांस लेना मुश्किल हो। वह आडिटोरियम में अकेले बैठे थे। वहां उन्हें कोई नहीं देख सकता था । लेकिन वह अपने सूराख से उन्हें देख रहा था। रोशनदान का चौकोर, रोशनी का चकत्ता उनके बालों पर गिर रहा था, चाँदी के छल्ले की तरह, उन्हें दो फांकों में काटते हुए-~-एक आदमी, जिसका घर था और पत्नी थी-दूसरे एक प्रसिद्ध पाकिटेक्ट, जो अंधेरे आडिटोरियम में बैठे थे, जेब से वोतल निकालकर पी रहे थे और वह अपना होश-हवास खोकर दरवाजे की आँख से देख रहा था"जव वह वोतल ऊपर उठाते, कांच का एक टुकड़ा छत पर नाचने लगता, उसकी आँखों को भेदने लगता और तब उसे याद अाया, कैसे कुछ लोग धीरे-धीरे मदद के वाहर हो जाते हैं, जैसे मां हो गयी थीं, जो घण्टों वदहवास-सी विस्तर पर लेटी रहती थीं, असीम कष्ट में छटपटाती हुई और वह उन्हें वैसे ही देखा करता था, जैसे इस क्षण-दिल्ली की एक दुपहर-नित्ती भाई को देख रहा था; उन्हें कोई मदद, कोई उम्मीद नहीं थी। ऐसे लोग उम्मीद को भी पार कर लेते हैं और उन्हें वह सौभाग्य भी नहीं मिलता, जो कम-से-कम नाटक के ऐक्टरों को मिल जाता है, जो किताबों में है, जिन्हें विट्टी के दोस्त पढ़ते थे-~~-गीता में है, जिसमें डूबकर वाबू मां की मृत्यु को भूल जाते थे; वह उस रिकार्ड में था, जिसके भीतर से नीग्रो लड़की की फटी-फटी आवाज़ बाहर आती थी. वह अपने को नहीं रोक सका । झपाट से क्यूविकल का दरवाजा खोला और आडिटोरियम में चला आया। वहां कोई नहीं था। नित्ती भाई कब के जा चुके थे । उनकी सीट खाली पड़ी थी । अंधेरे में सिर्फ ह्विस्की की वासी गन्ध तैर रही - - अब कोई अंधेरा नहीं था। वह धूप में चल रहा था। वह दुपहर के उजाले में प्रा गया था। अव कोई नहीं था, न थियेटर, न माया, न अफसोस । यह असली दुनिया थी। वह अप्रैल का दिन था। वह पेड़ों के नीचे चल रहा था और पेड़ असली थे। और उनकी छायाएं सड़क को लांघकर बँगलों तक जाती थीं। १००/एक चिथड़ा सुख उसने मण्डी हाउस का स्कयर पार किया और भगवानदास रोड पर चला माया। कभी-कभी वह रुक जाता। ठहर जाता । सुनने लगता। दिल्ली भी फैमा शहर है । वह सोचने लगता। लाल इंटों के बंगले, हवा में कांपते टेलीविजन के पोल, परदे, परदो के पीछे लोगों की प्रज्ञात जिन्दगी-जिसे वह कभी नही जानेगा । वह चलता रहा और फिर बस स्टैण्ड पर पाकर रुक गया। राव बसें निजामुद्दीन होकर जाती थीं। एक हरा शैड और इनके-दुक्के यात्री- हाडिग विज पर जब कोई ट्रेन गुजरती, तो धुएं की लहर उड़ती हुई प्रा जाती । पीछे बंजर मैदान था। कुछ सोये हुए खण्डहर और पापी टूटी दीवारें, ऊपर कव्वे उड़ते थे। पुराने किले का चक्कर लगाकर वापिस मुहते थे-नुमायरा के मैदान पर उतर जाते थे। वह उन्हे देख रहा था । एक दिन चिट्टी के साथ यहाँ आयेगा, बहुत देर तक घूमेगा । इलाहाबाद मे कोई ऐसा मैदान नहीं था, जहाँ नुमायश बीत गयी हो और फिर भी खड़ी हो, कायम हो, अपनी जगह जमी हो-पुरानी दुकानों के स्टॉल, टॉवर, धूल में सने खोखल-कंकाल । बाहर से सायुत और ठोस, भीतर जामो, तो खाली, बासी हवा, और कुछ भी नहीं। साली और सुनसान-जिस तरह कुछ करें जमीन में फंस जाती हैं, घास उग पाती है। बच्चे उस पर खेलते हैं और किसी को याद भी नहीं रहता कि भागते परों और सरमरी घास के नीचे कोई दवा है, लेकिन अचानक किसी दिन कोई उखडा पत्यर पांवो में घुप जाता है, एक चेहरा बाहर झांकता है, देखो, मैं वही हूँ, जो तुम्हारे साथ पायी थी। जनवरी के दिन, जब इलाहाबाद में नुमायदा शुरू हुई थी और मेरे इम्तहान पास पा रहे ये "तुम्हें याद है ? उसे याद है । वह उसे घसीटकर लाया था। वह माती नहीं थी। वह महीनो कमरे में पड़ी रहती थी। वह उसे किताबो से खीचकर वाहर लाया था। उसने कपड़े भी नहीं बदले-जैसी थी, वैसी ही उसके साथ चली प्रायी थी इस एक शतं पर-कि वे एक घण्टे में घर लौट प्रायेंगे। वह मान गया था क्योंकि बदले में विट्टी ने उसे यह तसल्ली दी थी कि वे रिक्शा में जायेंगे और रिक्शे के पैसे वह देगी। कैसे याद किया जाता है ? अाँखें मूंदकर वह दो बरस के अंधेरै को गांध गया-और एक टापू पर उतर आया--- --जहां सिर्फ रोशनियां थी, रोगनियां और हवा में उड़ते गुब्बारे और अंधेरे में घूमता हुअा जायन्ट हाल, एक लाल सुखं सितारा, जिस पर बच्चों की हंसी और चीखें गूंज रही थी। नुमायरा के बीच वडे मंदान में एक बैंण्ड मास्टर बेंत धुमाता हुअा चल रहा था-पीछे बैण्ड बजाते हुए तीन तिलंगे-~-जो ताश के जोकर जैसे दिखायी देते थे, उदास, और ग़मगीन- धूप में लस्तम-पस्तम । वह ठहर जाता, सुनने लगता, विट्टी उसका हाथ अपनी हथेलियों में दबोच लेती, उसे घसीटने लगती, "जल्दी चलो-आँखें फाड़-फाड़- कर क्या देखते हो ?" वह सहम जाता। खिसियाकर हँसने लगता । वह तव काफी छोटा था। वह खें फाड़कर देखता था। वह धीरे चलता था। दुनिया का जादू अभी खत्म नहीं हुया था। वह तेजी से जी रहा था। उसे पता नहीं चला, कब और कहाँ उसने विट्टी को खो दिया। मुट्ठी खोली, तो हाथ खाली था-विट्टी कहीं न थी। इतनी भीड़, इतना उजाला; धक्के देते हुए लोग । उसने पीछे मुड़कर देखा और बिट्टी वहाँ नहीं थी-कोई और लड़की उसके पीछे चल रही थी। वह भागने लगा। हर लड़की, जिसने सिलवार-कमीज़ पहनी होती, उसे विट्टी-सी दिखायी देती। तभी उसे अपना नाम सुनायी दिया-वह नाम-जो सिर्फ विट्टी ही पुकार सकती थी। वह एक स्टॉल के सामने खड़ी थी और लोगों के सिरों के ऊपर दोनों हाथ वेतहाशा हिला रही थी। वह भागता हुना उसके पास आया और सहसा ठिठक गया। "मुन्न वह एक क्षण झिझकी और फिर लपककर उसका हाथ पकड़ लिया, "तुम कुछ देखना चाहोगे ?" 'तुम थीं कहाँ ?" उसका स्वर रुमाँसा हो पाया, "मैं तुम्हें हर जगह ढूंढ़ रहा था।" - "मैं तुम्हें बुला रही थी-लेकिन तुम आगे-आगे भाग रहे थे।" उसने कहा, "सुनो, एक चीज देखना चाहोगे ?" "कैसी चीज है ?" उसने कुछ नहीं कहा, सिर्फ उसका हाथ पकड़कर नुमायश की एक संकरी गली में चलने लगी, जहाँ सिर्फ तम्बू दिखायी देते थे-छोटी-छोटी गुफाओं-से ---जिनके दरवाजों पर लाल वल्वों की मालाएँ झूल रही थीं। बल्बों के इर्द- गिर्द पोस्टर लगे थे-राक्षसों के सिर, उड़ती हुई मछलियाँ, मूंछोवाली औरत, जिसके दांत नुकीली चोंचों-से बाहर निकलते थे 'माइक्रोफोन पर कोई आदमी चीख-चीखकर एक ही वाक्य दुहरा रहा था-पता नहीं किस बोली में-जिसका एक भी शब्द वह नहीं पकड़ पा रहा था । यहाँ रोशनी थी और अँधेरा था-ौर डर था जो एक निषिद्ध मोह के १०२ / एक चिथड़ा सुख भाग जायें- गन्ध हवा साथ जुड़ा था, एक चमकीला-सा आतंक, एक मैला सैलाव, जिसमें हम पहली वार अपना बेवकूफ और पवित्र कुंवारापन डुबो देते हैं, इच्छा हुई, घर लौट जायें, -पर पैरो पर एक जादू सांप की तरह लिपटा था, एक गिलगिला- सा आकर्षण जो उसे अपने में बांधकर घसीट रहा था। विट्टी-सूखे गले से उसका स्वर बाहर आया । बिट्टी, कहां जा रही हो ? "बोलो नही, मेरे साथ चले आओ।" बिट्टी ने कहा, वह एक स्टॉल के सामने खड़ी थी । अनिश्चित और बेचन और झिझकती हुई–तम्बू का दरवाजा प्राधा खुला था-और भीतर से एक भीनी, अगरबत्ती की बू वाहर पा रही थी। "चलोगे ?" उसने पूछा, जैसे उसका प्राश्वासन पाना चाहती हो। "क्या कोई सर्कस है ?" उसने पूछा। "सर्कस ?" उमने हैरानी से उसकी पोर देसा, "मालूम नहीं""भीतर चल- कर पता चलेगा।" किसी ने उन्हें नहीं रोका । ऊपर कनात की छत थी और नीचे एक फटी- पुरानी दरी, एक मटियाली-सी रोशनी चारो तरफ फैली थी। अगरबत्ती की में एक बोझिल नशे-सी बैठी थी। दोनों तरफ रोशनदान थे-जिसके बाहर ढेर-से तारे थे-पहले क्षण उसे विश्वास नहीं हो सका-कि वे असली हैं । वे आगे बढ़े, तो एक सिंहासन दिसायी दिया-लाल मसमली कालीन से ढका हुग्रा-जो नीचे सीढ़ियों तक चला पाया था। उसकी आँखे ठहर गयी । सबसे निचली सीढी पर एक आदमी बैठा था। उसने एक जोगिये रग का चोगा पहने रखा था और आंखें मूंद रखी थी। सिर मुंडा हुआ था। भिक्षुको की तरह -और नीचे की तरफ झुका हुआ था, जब वे भीतर प्राये तो भी वह नीचे मका रहा-वह उसे देखता रहता अगर विट्टी उसे कुहनी मार करके जगा न देती, "ऊपर देखो।" उसने फुमफुमाते हुए कहा । उसने अांखें ऊपर उठायी, तो चौंक गया "सिंहासन पर एक औरत का सिर दिखायी दिया-सिर्फ सिर और चेहरा-धड़ कही न था। पीला चेहरा- असंख्य झुरियो मे लदा हुआ-जैसे मोम की गुडिया पर बच्चे नाखूनो से लकीरें करोच देते हैं, मिस्र की ममी जसा, बैठी हुई सुतली, न हाथ, न पर, न टांगें-- सिर्फ दो आँखें और प्राधा खुला हुना मुंह-- जसे वह मुस्करा रही हो । वह सचमुच मुस्करा रही थी। उन दोनों को देख रही थी। चेहरे को भूरियां खुल रही थी । औरत ने जल्दी से आँखें झपकायी-जैसे यह कोई संकेत हो-कोई सिग्नल-जिसे पाते ही सीढी पर बैठा प्रादमी उठ खडा हुना, अपने - , । चोगे को समेटा और सिंहासन की तरफ भागने लगा और तव उसे अहसास हुआ, कि वह आदमी उतना ही बड़ा था, जितने पाँच-छ वरस के बच्चे होते हैं --एक सूखा हुआ हूंठ, दो फुट लम्बा वीना । उसने विट्टी का हाथ पकड़ लिया, लेकिन विट्टी खड़ी थी। उसकी आँखें सिंहासन पर टिकी थीं। बुढ़िया सिर झुकाकर वोने के कानों में कुछ कह रही थी और वह धीरे-धीरे अपना सिर हिला रहा था। फिर अचानक वह चुप हो गयी, वीना तेजी से सीढ़ियाँ उतरता हुया नीचे चला आया। एक क्षण ठहरा, उन दोनों को देखा, फिर अपने चोगे को थोड़ा-सा ऊपर उठाकर आगे बढ़ा और उनके सामने आकर खड़ा हो गया। इतने वरसों वाद आज भी उसका चेहरा स्मृति पर टँगा रह गया है- एक पुरानी फोटो-सा---गंजा सिर, मोटे लाल होंठ और गोल-मटोल-सी गर्दन-जैसे किसी ने दुनिया का ग्लोव दो लगड़ी-नुमा टाँगों पर टिका दिया हो । किन्तु जो चीज आज भी दिल को खोदती है-वह उसकी आँखें थीं-दो छोटी-छोटी दीवों- सी टिमटिमाती हुई, भीतर के अंधेरे को अपने पीले आलोक में टोहती, पिघलाती हुई। उसने कभी इतनी उदास आँखें नहीं देखी थीं। वह एक कदम आगे आया-दोनों को वारी-बारी से देखा। "क्या बहुत दूर से आये हो ?" उसने मुंह खोला और तब उसने देखा कि उसका ऊपरी होंठ बीच में कटा था---और कटाव के बीच एक सफेद दाँत बाहर झांक रहा था। "कहाँ से आये हो ?" उसकी ग़मगीन आवाज दुवारा वाहर आयी। "यहीं रहते हैं ।" विट्टी ने कहा। "और यह वच्चा ?" "यह भी..." वौने ने एक नजर उस पर डाली। "वाहर वोर्ड देखा था ? "एक सवाल की एक चवन्नी।" वह मुस्कराया, और इस वार दांतों की पूरी एक पात बाहर निकल पायी। "पूछो, क्या पूछना है ?" विट्टी चुप खड़ी थी। चेहरा सफेद पड़ गया था, जो तम्बू की रोशनी में और भी फीका जान पड़ता था। लेकिन आँखें बौने पर जमी थीं, जैसे उसके बाहर कुछ भी नहीं बचा था। "डरो नहीं-जो मन चाहे, सो पूछो।" १०४ / एक चिथड़ा सुख . । वे दोनो चौंक गये । वह आवाज ऊपर से प्रायी थी-बुढिया की बीहड़, वेधडक,अावाज सन्नाटे को भेदती हुई लेकिन ककंग नहीं-उसमें एक मजीव- सा अपनापा था, जैसे इतनी दूर से भी उसने उन दोनों की घड़कनों को सुन, लिया था। "क्या बात है ?" बौना अचानक विट्टी के सामने प्रा खड़ा हुमा, "तुम बहुत दुसी दिखायी देती हो?" बिट्टी इस बार न पीछे हटी, न हिली-वाने की प्रांखो को देखा, जो अन्तहीन उदासी में डूबी थी। फिर वह धीरे से मुस्करायी, "सुख क्या होता है ?" "सुख !" यौने ने मुड़कर सिंहासन की तरफ देखा, बुढ़िया खिलखिलाते हुए हंस रही थी।-"दिखानो..." उसने लगभग चीखते हुए कहा, "मुन्नी को दिखानो, सुख क्या होता है !" बौना पीछे हट गया, जैसे किसी ने उसे घूसा मारकर धकेल दिया हो । तम्बू के कनात में रोशनदान सहसा खुल गया । वाहर की हवा भीतर मा रही थी- जनवरी को हवा--जिममें रोशनदान के पल्ले फडफड़ा रहे थे । बौना भागता हुप्रा स्टाल के बीचो-बीच आ खडा हुप्रा । वह कांप रहा था -बालिस्त-भर की देह में एक अजीब कंपकंपी छूट रही थी, जैसे हवा कही उसके शरीर को भेद- कर आत्मा को मिझोड रही हो । वह विल्कुल भुक गया था। दुहरा-सा हो गया था जैसे अन्धड़ में पेड़ सिकुड जाते हैं । उसने अपने उडते जोगिया चोगेको कस- कर पकड रखा, लेकिन फायदा कुछ भी न था । हवा के थपेडों से वह बार-बार खुल जाता था-जव खुलता था--उसको साँव-सी पीली, मुरझायी टाँगें दिखायी देजाती थी। उसे याद आता है-अपना दिल-जो उसकी छाती की दीवार से टकरा रहा था। उसे कुछ समझ में नहीं पा रहा था कि क्या हो रहा है । और जो हो रहा है, वह अगर भयानक है तो वे अलग क्यों खड़े हैं, चुपचाप यह तमाशा क्यो देख रहे हैं | तमाशा? उसे विश्वास न हो सका कि बौना उनके फायदे के लिए यह 'तमाशा' कर रहा है जबकि उसकी देह का रोंया-रोंया कांप रहा था। वह छटपटा रहा था। यह अपने उड़ते चोगे से अपने ठिठुरते अंगों को ढकने की कोगिरा कर रहा था जैसे चढते बुखार की सर्दी में मरीज रजाई-कम्बल लपेट सेते हैं । वह कभी एक कोना पकड़ता था, कभी दूसरा, लेकिन हवा के भंवर मे कभी एक हिस्सा हाथ लगता, तो दूसरा फिमल जाता, देह दुवारा नंगी हो जाती। आखिर हताश होकर वह खड़ा हो गया, चोगे को खुला छोड़ दिया--और तब , चोगे का भीतरी अस्तर धीरे-धीरें फट रहा है, तार-तार हो रहा है, थिगलियां बाहर पाती थीं, नीचे दरी पर बिखर जातीर्थी; चारों ने लगती थीं। बौना एक क्षण अवाक् उन्हें देखता रहा-जैसे यह कोई -फिर वह उनके पीछे भागने लगा, निर्वस्त्र, अधनंगा, सिर्फ एक लंगोट को शर्म छिपाता हुआ। वह कभी एक धिगली को पकड़ने दौड़ता, कभी को, चारों तरफ चक्कर काटता हुआ, हांपता हुआ, बदहवास । अचानक ठठक गया, बीच फर्श पर खड़ा हो गया। उसे शायद याद आया-कि-होश पागलपन के परे भी कोई चीज है, जिसे वह घबराहट में भूल गया था देखा कर गया था। उसने अपनी तरफ देखो, मानो इतनी लम्बी जिन्दगी रान पहली बार अपनी ढूंठी देहं को देख रहा हो। कुछ देर पहले जिस जोगिया चोगा था, वहाँ अव एक अधमरा चिथड़ा डोल रहा था। वह उस हलाने लगा, ऊपर से नीचे तक फिर उसे उतार दिया। तहाकर समेट लिया, आगे बढ़ा, बिट्टी के पैरों पर उत्ते रख दिया।-"यह सुख है, मुन्नी, देखो, हाथ लगाकर देखो, सचमुच का सुख!" वह सुख था, वह कांपता हुआ चिथड़ा और ऊपर बुढ़िया हंस रही थी, न हाथ, न पैर, सिर्फ डोलता हुआ सिर, जैसे कोई नंगी खोपड़ी नशे में डोल: रही होवे बाहर आने लगे, तो बौने की आवाज सुनायी दी-चिथड़ों के बीच एक चवन्नी के लिए हांपती हुई, विट्टो ने जल्दी से पैसे उसके हाथ पर रखे, देखा भी नहीं, वह मुस्करा रहा था, और वे वाहर चले याये, वाहर, जहाँ नुमायश की रोशनियां हवा में अंधेरे को हिला रही थीं। । यह वही हवा थी, जो तम्बू के भीतर आयी थी-ठण्डी और विषण्ण, गंगाको छूती हुई इलाहाबाद की हवा, वे चुप थे। वे जल्दी-जल्दी चल रहे थे। नुमायश के एक कोने में चले पाये थे, जहाँ 'मेरी गो राउण्ड' के झूले घूम रहे थे विट्टी उन्हें देखती हुई अंचानक रुक गयी। "बैठोगे?" उसने उसकी तरफ देखा। किन्तु इन्तजार करने से पहले वह टिकट-घर की खिड़की के सामने गयी और आँख झपकते ही वे जार व्हील के निचले डिब्बे में बैठे थे। वे ऊपर जा रहे थे। उसका दिल डूब था। वे हवा में उठ रहे थे। वह आज भी देख सकता है धुन्ध में धुंधमाती इलाहाबाद की रोप १०६ / एक चिथड़ा सुख । तारे, छतो पर रित्तरायी चांदनी । वे ऊपर उठते थे, तो रोशनियों नीचे चली जाती थी, नीचे पाते थे तो प्राकारा ऊपर उठ जाता था,'ठण्डे -तारी में ठिठुरता हुअा। वे बौने को भूल गये, हमती हुई वुडिया और तार-तार हो जानेवाले सुख को भी वे अपने घरो को भी भूल गये, जो कही अंधेरे में छिपे ये पहिय्ये के ऊपर उठते ही कान सनसनाने सगते, प्राधी चीखें गले मे फेम जाती, रोशनियो का झिलमिला प्रांखों को पकड़ लेता, लगता यह इलाहाबाद नहीं है, यह कोई चमचमाती मछली है, जो हवा में मौस लेने ऊपर उठ पायी है, वह हाथ आगे बढायेगा और उसे पकड़ लेगा। उसने बिट्टी का हाथ पकड लिया। वह कुछ कहना चाहता था, अपने भीतर उमडते उछाह को बूंद-बूंद उड़ेलना चाहता था लेकिन बीच में झूला रुक गया। एक क्षण के लिए उसे विश्वास " नहीं हो सका कि घूमती हुई दुनिया इस बेहूदा ढंग से ठहर जायेगी। "क्या हम दूसरा राउण्ड नहीं ले सकते ?" ' "तुमने सुना नहीं, यह आखिरी था।" विट्टी ने कहा।। वह सचमुच प्रासिरी था । नीचे के बक्सो से लोग बाहर निकल रहे थे। वे ऊपर हवा में बैठे थे-अपनी वारी पाने की बाट जोह रहे थे। अब वह आदमी बाहर प्राया, जो कुछ देर पहले टिकट बांट रहा था। वे दोनो एक-दूसरे से सटे दुवककर बैठे थे। आदमी कुछ देर तक ऊपर देखता रहा, फिर उसने जोर से प्रावाज लगायी- कोई ऊपर है ? धे दोनों चुप बैठे रहे। हुमा कुछ नहीं । प्रादमी ने भूले के हैडिल से अपना कोट उठाया, बीडी' सुलगायी और सीटी बजाता हुअा गेट की तरफ चलने लगा। वे सांस खीचकर चुप बैठे रहे, मानो वह प्रादमी अचानक पीछे मुडेगा, उनके धोखे को पकड लेगा, पहिय्या नीचे खीचेगा और उन दोनों को बाहर धकेल देगा। "चला गया?" विट्टी ने उत्सुकता से पूछा। "लेकिन क्योः?". उसने हैरानी मे विट्टी को देखा। "मय हमें कोई नहीं देख सकता," विट्टी ने कहा। कोई नहीं देख सकता, यह स्थाल पाते ही उसके भीतर एक ठण्ड-मी फैलने लगी। उसे लगा, उस प्रादमी ने उन्हें नहीं देखा, तो कोई उन्हें नहीं देख सकता, वे मदृश्य हैं । वे कहीं ऊपर हैं, हया और अंधेरे में, एक दूसरे के अंधेरे में जकडे हुए, शहर की रोशनियों, घरो, और आदमियो के ऊपर जहां कभी वे रहते थे, बहुत पहले, किसी दूसरे जन्म में "उसकी समूची देह ठिठुरने लगी।
। - सरदी लग रही है ?" विट्टी ने उसे पास घसीट लिया, अर दराये घेरे में, "क्या सोच रहे हो?" "कुछ नहीं।" वह कुछ नहीं सोच रहा था । वह वीच अंधेरे में बैठा था, न ऊपर, न नीचे, ची दुनिया से कटा हुया । "विट्टी, क्या तुम पिछले जन्म में विश्वास करती हो?" उसने अचानक पूछा कुछ देर तक वह खामोश रही, फिर अंधेरे में उसका धीमा स्वर सुनायी दया-"मैं नहीं करती "तुम करते हो?" "मुझे पता नहीं..." उसने कहा, "लेकिन ऐसा समय जरूर रहा होगा, जब हमें कोई नहीं जानता होगा'"मेरा मतलव है..." "तुम्हारा मतलब है..." विट्टी ने कुछ सोचते हुए कहा, "अगर मैं सड़क पर चल रही हूँ और तुमने मुझे देखा है, तब भी तुम मुझे नहीं पहचान सकोगे। तुम सोचोगे यह विट्टी नहीं, कोई और है।" "क्या ऐसा हो सकता है ?" "क्यों नहीं होता ? लोग अपना घर छोड़कर चले जाते हैं और जव बरसों वाद लीटते हैं तो कोई उन्हें पहचान भी नहीं पाता।" "क्यों?" "क्योंकि..." विट्टी ने सिर उठाया और उसकी ऐनक के शीशे चाँदनी में एकाएक चमचमा उठे, "क्योंकि वे एक ही जन्म में दूसरा जन्म ले लेते हैं।" "वेवकुफ होंगे..." उसने कहा, "क्या एक जिन्दगी काफी नहीं है ?" "नहीं, वेवकूफ नहीं।" वह एक लम्बे क्षण तक उसे निहारती रही, "ऐसे लो ने से बहुत नफरत करते हैं, इसलिए वे अपने को छोड़ देते हैं। वे कुछ भी जाते हैं..." आदमी कैसे अपने को छोड़कर कुछ और बन जाता है, उसे कुछ समर हीं पाया, किन्तु उस रात बीच हवा में बैठे हुए उसे सबकुछ सच लगा असम्भव लेकिन सच, चांदनी रात में पेड़ों के नीचे एक खेल जैसा, जिस दिखायी देता है, वह नहीं है, जो सचमुच में है, वह दिखायी नहीं देता" "विट्टी, तुम कुछ और बनना चाहोगी ?" वह चौंक गयी, नीचे देखने लगी, जहाँ नुमायश का मैदान एक पीले की तरह फैला था-खाली, उजाड़, चकाचौंध । "तुमने उस बौने को देखा था ?" बिट्टी ने धीरे से कहा। १०८ / एक चिथड़ा सुख - - - "हाँ, क्यों?" "मैं वही बनना चाहती हूं।" वह भयभीत-सा होकर हंसने लगा । "तुम चिपड़े पहनोगी ?" विट्टी उसके पास मरक पायी, "वे पियड़े नहीं थे..." उसने कहा, "वह सुस था।" उसका स्वर इतना हल्का या कि अंधेरे में जान पड़ा, जैसे वह किसी स्वप्न का छिलका है, जो उसके हाथ में रह गया है, तारो की पोती छोह में कोपता हुमा--उसे नीचे की तरफ खींचता हुआ, जहां इलाहाबाद के इतने वर्ष बेकार टुकड़ो की तरह हवा में उड़ रहे थे। बिट्टी ने उसका हाथ पकड़ा और वे नीचे कूद गये । नीचे कोई न था। दुकानें बन्द हो गयी थी। हवा में पुराने अखबार और झूठी पत्तलें उड रही थीं। मेरी गो राउण्ड के हाथी-घोडे धीरे-धीरे घूम रहे थे-मानो हवा में नहीं- अपनी नीद के झोंकों में चक्कर लगा रहे हो । वे भागने लगे 'नुमायरा के चमकीले अंधेरे मे, लाल बजरी पर मुर्दा और मरियल ढाबो के भागे जहाँ बौने की गुफा किसी प्रागैतिहासिक अंधेरे मे डूबी थी । वे भाग रहे थे, बैण्ड के पवेलियन के साथ-साथ, पेडों पर झूलती रग-बिरंगी रोशनियों के नीचे, अंधेरे और अंधेरे के बीच, हवा को सुनते हुए, जनवरी की जानलेवा रात के नीचे, जो उसको हड्डियो में बर्फ की तरह जम गयी थी। अप्रैल में बिट्टो के इम्तहान आये और चले गये। गर्मी की छुट्टियों में वह बीमार पड़ा और बिट्टी इण्टरव्यू के लिए दिल्ली चली गयी, लू में लदी, सांय. साय करती दुपहरी मे यह मिशनरी हण्टर के साथ जंगलों में भटकने लगा, जहाँ झाड़ियों के पीछे पैन्थर की उदास, भूखी आंखें दिन-रात चमकती थी। फिर एक दिन चमत्कार हुमा या। मिट्टी की मां हाथ मे चिट्ठी लेकर उसके पास भायी थी, विट्टी ने उसे बुलाया था क्योकि "धीमार लड़के, जो स्कूल नहीं जाते, कही भी रह सकते हैं" और वह चला आया था, अब पुराने किले के सामने पड़ा था, बस को प्रतीक्षा में, खण्डहरों पर कब्बों को उड़ता देख रहा था। - ८ शाम जब वह घर लौटा, दरवाजा खुला था किमरे में रोशनी जल रही थी। ठिठक गया । ऐसा बहुत कम होता था कि वह घर लौटे और कमरा खुला - - -उन दिनों विट्टी बहुत देर से घर लौटती थी। वह सो जाता था। कभी च में आँख खुलती तो देखता, किचन की बत्ती जली है । वह उसे आवाज़ देता और वह भागती हुई। उसके कमरे में आ जाती, अँधेरे में ही उसके विस्तर के पास बैठाजाती। !"हमने तुम्हें जगा दिया ?" वह. उसके माथे पर हाथ रख देती यह उसकी पुरानी आदत थी; जब से उसे बुखार आना शुरू हुआ था। : "कब-पायीं ?" "एक घण्टा पहले-तुम सो रहे थे।" "अकेली ?" "नहीं, डेरी छोड़ने आये थे। मैंने उन्हें कॉफी के लिए ऊपर बुला लिया- किचन में बैठे हैं। तुम.थोड़ी-सी ओवल्टीन लोगे ?".: . ऐसी रातें बहुत सुखद होती थीं। विट्टी: रसोई में चली जाती । डरी उठ- कर उसके पास आ जाते । बैठ जाते । वह ज्यादा नहीं बोलते थे। उन दिनों सिर्फ उनकी शक्ल याद रहती थी। स्टूडियो के, कोने में बैठे हुए, ऐक्टरों से बातें करते हुए-काली छितरी हुई दाढ़ी, बहुत धनी-पलकों में ढंकी आँखें, जो आधी मुंदी रहती, जैसे पूरी खोलने पर जो दुनिया दिखायी देगी, उसे भेष पाना असम्भव हो। विट्टी अोवल्टीन का गिलास लाकर बीच में बैठ जाती । कोई उन ती को खुली बरसाती में देखता, तो सोचता, शरणाथियों का कोई परिवार वेटिंग-रूम के आगे बैठा है, ट्रेन की प्रतीक्षा में-और यह उसे अद्भुत वेंचर-सा जान पड़ता, इतनी रात गये बातें सुनना, प्रोवल्टीन पीना, .. -4 ११०/-एक चिथड़ा सुख . रहना--कोई मना करनेवाला नहीं। इलाहाबाद में या, तो दम यजे ही बत्ती वुझानी पड़ती थी। वे कितनी पास बैठे थे! छत की मुंडेर से सटी बिट्टी और उसके सामने 1 बैठे डरी' वह कम्बल में लिपटा हुपा उन्हे देख रहा था। एक फांसन्सी भीतर गड़ने लगती । वे इतने धीमे बोलते जैसे उन्हें कोई डर हो यह कोई प्रेम है ? उसने कभी ऐमा नही देखा ! अकेले हैं, तो डर किसका ? फिर यह पागल “लडकी चाकू चमकाती हुई दिखायी दे जाती, वह जैसे कोई बड़ा विराट भेद उसके कानों में कहना चाहती-लेकिन वह पीछे हट जाता । मुझे माफ पारो - मुझे किसी सत्य की लालसा नहीं; तुम जामो-प्वीज़ गो, गो भवे ! यह खड़ी रहती, फीकी चांदनी मे काजल का टोटका-सी-ईरी को बहिन, छत पर महराती हुई-और तब उसे हैरानी होती, कि दिल्ली कैसा शहर है, कोई भी झाड़ियो से निकलकर छत पर मा मकता है, घूम सकता है, दरवाजा खटखटा । सकता है. - उसने दरवाजे की तरफ देखा-कोई नहीं था-वह फिर निश्चिन्त होकर किताब पढने लगता । यह सबसे सुन्दर समय होता । वह भोवल्दीन पीता हया देर रात तक पढता रहता। रानीखेत और चौबटिया के जंगल, सरमराती लम्बी घास, अँधेरे में रिरियाते गीदड़ नहीं, ये गीदड़ नही, मिसेज पन्त के कुत्ते थे जो चांदनी रात मे बावलो की तरह चीखते थे । मिसेज पन्त अपना लहंगा फैलाकर ट्रांजिस्टर मुनती अकेली बूढी औरत; झाड़ियों में चमकती पैन्यर की "पाखें। उसकी माँखें मुंदने लगती "कुछ देर में सबकुछ शान्त हो जाता। सबकुछ नही। छत को आवाजें बराबर सुनायी देती रहती थी । पता नहीं, इतनी गयी रात वे क्या बातें करते होगे? कभी-कभी उनकी मावाजे इतनी तेज हो जाती कि उसे। दाम-सी पाने लगती । नीचे कोई सुनेगा, तो क्या 'सोचेगा? वह मन ही मन प्रार्थना करने लगता कि ये झगड़ा न करें और कभी- -कभी ऐसा होता कि ईश्वर सचमुच उसको प्रार्थना सुन लेता । एत मे सन्नाटा हो जाता। बिट्टी कमरे में पाती और बिना अपने कपड़े बदले विस्तर में घुस जाती। वह दवे पैरो बाहर माता, देखता, छत पर डरो चुपचाप सिगरेट पी रहे हैं। अकेले । दूसरी छतों को ताकते हुए---और तब उसके भीतर कोई चीर हिलने लगती, पिघलने लगती; याद आता, शायद वह दूसरे डेरी हैं, पराली हैरी बन्दूक लेकर बिहार के गांवो में घूम रहे हैं, भागते हुए, भटकते हुए, पुलिस से बचते हए." .
। लेकिन कोई आदमी दो जगहों में कैसे जी सकता है ? वह लौट आता । अपने बिस्तर पर लेट जाता । देह में कपकपी-सी छूटने लगती। पता नहीं, बुखार की ठण्ड, या सिर्फ ठण्ड, सिर्फ डर सिर्फः वह चौंक जाता । नीचे मोटर साइकिल की गड़गड़ाहट सुनायी देती-अंधेरे को झिझो- ड़ती आवाज-और उसे सुनते ही बिट्टी उठ जाती, भागते हुए छत पर जाती मुंडेर के नीचे झांकने लगती, पता नहीं, कितनी देर छत पर खड़ी रहती और जब सुबह उसकी आँख खुलती तो देखता, विट्टी. गुड़गुड़ी-सी वनकरीसो रही है, पीली, थकी और क्लान्त । किन्तु अगली रात डैरी फिर आते, मानो पिछली रात कुछ हुआ ही न हो। वह यह भी न पूछते कि बिट्टी घर में है या बाहर; सीधे छत पर चले आते और नंगी जमीन पर बैठ जाते; अपना डफल बैग उसके सामने रख देते मानो कहीं छापा मारकर पूरा खजाना लूट लाये हों-चीज़ के क्यून्स साडैन और सलामी के टिन, ब्राउन डबलरोटी-किन्तु जो चीजें उसे हमेशा हैरानी में डाल देतीं, वे होतीं वियर की बोतलें पीली सोंधी घास में लिपटी हुई। यह उनके लान की ताजा कटी घास होती । घास क्यों, तो हँसते हुए कहते, इससे अप्रैल के मौसम की गन्ध आती है, पागल, सनकी, बिल्कुल अपनी बहिन की तरह अप्रैल का मौसम ! फाटक पर सेमल का पेड़ फरफराता था न गर्मी, न सर्दी, सिर्फ एक गुनगुनी-सी हवा छतों को लांघती थी और जब शाम होती तो मकबरे का गुम्बद गुलाबी हो जाता था, धीरे-धीरे अंधेरे में डूब जाता था, किन्तु कुछ देर में वह फिर दिखायी देता, आकाश के गुम्वद तले, तारों में झिलमिलाता हुआ। वियर खोली जाती। पेड़ की पत्तियों को छत के कोने में समेट दिया जाता। डेरी रिकार्ड-प्लेयर की तार खींचकर बाहर ले पाते, छत पर; जहाँ अंधेरे में पता नहीं चलता था कि रिकार्ड का संगीत कहाँ से उठ रहा है। कहाँ जाकर 'गिर रहा है, पहाड़ी धुन्ध की तरह, जिसके पीछे टेलीविजन के पोल दिखायी देते और निजामुद्दीन का स्टेशन और भकवरे की छांह और उसके नीचे डरी बैठे रहते थे, बार-बार बरसाती की तरफ देख लेते थे- "विट्टी कहां है ?" उन्होंने पूछा । "रसोई में - आज पानी आ रहा है।" उन दिनों सिर्फ रात को नल खुलता था। एक साथ सब मकानों की पाइप्स ११२ / एक चिथड़ा सुख बुड्युड़ाने लगती। वह और विट्टी जल्दी-जल्दी सब बर्तनों-वाल्टियों को भरने लगते। किन्तु उस रात वह वैठा रहा। यहुत दिनों बाद उसे अपनी देह तपती-मी जान पडी। प्रांखो के ग्रामपास प्राग-सी सुलग रही थी। सहमा लगा, परों के नीचे पानी पा रहा है । चटाई भीग रही थी। वह भागता हुअा गुसलखाने में पाया तो देखा, विट्टी नल बन्द करना भूल गयी थी। वाल्टी में भरा हुआ पानी बाहर वह रहा था। बिस्तर पर बिट्टी मोघे मुंह लेटी थी। यत्ती नहीं जली थी, पर कमरे में अंधेरा नही था। तारो का आलोक चम- कीला रेत-सा चारों तरफ सरक आया था, हर चीज मुंह उठाये उसे ताक रही थी, दो बिस्तर और बीच में मूढ़ो का पार्टीशन, किताबो की जिल्द, चौकी पर रखी सुराही, दीवार पर चिपको मदर टेरेसा की तस्वीर । अचानक उसे खयाल आया, विट्टी की गृहस्थी कितनी अस्थायी है, कितनी छोटी-उमे किसी भी लमहे छोड़- कर निकला जा सकता है। "क्या डैरी मा गये?" उसने पूछा। "वाहर बैठे हैं।" वह एक क्षण झिझका, "तुम यहाँ क्या कर रही हो?" "तुम जानो-मैं अभी पाती हूँ।" वह वैसे ही लेटी रही, तकिय पर बाल विखराये, मुंह मोड़कर, मूढो के पीछे। वह बाहर पाया, तो चांद छतो पर डोल रहा था। हरी अपने गिलाम ये मागे बैठे थे। वह बहुत देर तक बिना हिले-डुले बैठे रहे, न उमसे कुछ कहा, न बियर का गिलास छुप्रा । जब एक रिकार्ड खत्म हो जाता, तो दूसरा लगा देते, फिर मुंडेर का सिरहाना लगाकर बैठ जाते। तुम सिर्फ चेहरा देख सकते हो- पूरा वह भी नही-पता नही पूरा चेहरा वनने में कितना समय लगता है, जिसे हम अन्तिम और सम्पूर्ण कह म ? डरी को देखकर लगता था जैसे उनके कई चेहरे रास्ते में छूट गये हैं, सेंट स्टीफेन्म कालेज में, विहार के गांवों में, स्टूडियो के स्टेज पर या अव, जैसे वह अब है, छत की धुंधली रोशनी में बैठे हुए? हल्की-सी खटखटाहट हुई और दरवाजा खुल गया। बिट्टी बाहर आयी थी वह मुंह धोकर पायी थी। बाल खुले थे, जो सोले नही गये थे, सिर्फ ढीले होकर जूहे से बाहर निकल आये थे। कानों पर भूलती लटें भव भी पानी में भीगी यो। यह अपने साथ गिलास लायी थी-हरी के कन्धे को छूकर कहा, "योडी-सी मुझे दोगे?" - रीने चौककर उसकी ओर देखा-और तब उसे लगा, एक चेहरा और आईना है, बिट्टी के अक्स से जुड़ा हुना, नो अपने में कुछ नहीं है किन्तु पर बिट्टी की हर नाम भाप की तरह जन जाती है। विट्टी ने हाथ आगे बढ़ाया और धीरे-धीरे डरी के हाथ को नहलाने लगी, अद भी वियर के गिलास से चिपका था। एक सुन्न-सी छुमन, जब-उंगलियों पोरों पर अनकहे शब्दों की पीर दूसरे की उंगलियों में पथराने लगती है। से ने निर उठाया, एक हल्की-नी मुस्कराहट में विट्टी को देखा और तव विट्टी सहलाते हाथ ठिठक गये: जैसे किसी पानेवाले खतरे को ग्राहट उसे मिली हो... कैसा खतरा ? न जंगल, न पहाड़, न झाड़ियों में चलता पैन्थर । वह यक- कर लेट जाता । वह भूल जाता जीवित प्राणियों में रिश्ते कौन-से कांटों के बीच 'घिसटते हुए अपनी खून की बूंदें छोड़ जाते हैं ? वह अपना बिस्तर देहरी पर सरका लेता। प्राधा भीतर, प्राधा बाहर । वहाँ वह हवा से बच सकता था। दोनों को देख सकता था । लेट सकता था। लेटकर अपने बुखार में अकेला रह नकता था। वे चुप बैठे थे, लेकिन लगता नहीं था कि वे चुप हैं और उसेः यह बहुत विचित्र लगा कि वह उन्हें सुन रहा था, जबकि वे कुछ भी नहीं बोल रहे थे और तब उसने नोचा, शायद यह प्रेम है, एक-दूसरे को सुन पाना, चाहे उसमें कितना ही नन्देह और निराशा क्यों न भरी हो । उन्हें शायद इसका पता भी नहीं था--किन्तु वह संघ सकता था, उस मेहमान. की तरह जो पराये घर की गन्ध एकदम सूंघ लेता है, जबकि घर के निवासियों को उसका गुमान भी नहीं होता। उसने करवट ली; यावी नींद के अंधेरे में विट्टी की आवाज़ सुनायी दी, "तू उनमे मिले थे?" "हां"एक वार उनके घर गया था।" "कौन-से घर ?" "माल रोडवाले घर में वह कई दिनों से अपने ग्राफिस में नहीं रहे।" "इरा को मालूम है, तुम गये थे?" "उसने ही मुझसे जाने के लिए कहा था-"डरी ने गिलास उठा गिलास पर चिपकी वियर की फेन चमकने लगी। स्टूडियो का हाल ११४ / एक चिथड़ा सुख --उनका . " दिया, पीली बत्तियों में भीगा मंच, पिछली वेंच पर बैठे हुए नित्ती भाई, बोतल से ह्विस्की पीते हुए, स्टेज को ताकते हुए । वह चले जाते हैं मोर पेड़ के तने पर भुक जाते है, इरा के होस्टल से बाहर निकलती हुई संकरी गली, मोर अंधेरे में फड़फड़ाता पड़ और तब वह होश में माया, बुखार को सन्दक से बाहर निकला, तो अपनी छन का पेड़ दिखायी दिया, अप्रैल को हवा में गदराया हुमा, मपनी छाया पर इतराता, सेमल का सेमी-सकिल, सी-गल, हवा में उड़ता हुमा, उसकी अांखें खुल गपी, ध्यान बीच मे मटक गया "सी-गल ?" विट्टी ने मासे ऊपर उठायी। "हाँ,-सुनो, हम उसे भगली गर्मियों में कर सकते हैं । नित्ती भाई बहुत सुना होंगे। उन्होंने सारे सैट डिजाइन किये हैं।" बिट्टी ने अजीब जिज्ञासा से डेरी को देखा, किन्तु वह कही मोर - स्वर एक छलछलाते उत्साह मे उमड़ पाया था। "विट्टी, अगर हम स्ट्रिनवर्ग के नाटक मे सफल हो जाते है, तो दूसरे दाहरो • मे भी जा सकते है। तुम हिन्दुस्तान घूमना चाहती थी" "हिन्दुस्तान ?" बिट्टी चांदनी मे हिलती सेमल को फुनगियो को देखने लगी, जैसे हिन्दुस्तान कही उनके बीच उलझा है। "इरा इंग्लैण्ड लौट रही है।" उसने कहा। उरी ने प्रश्न-भरी दृष्टि से बिट्टी को देसा, फिर नीचे झुककर धीरे से कहा, "यह गलत है।" -"क्या गलत है, डेरी?" "पता नही, हिन्दुस्तान के बाहर उसे क्या मिलेगा?" "","और यहाँ ?" बिट्टी ने डरी को देखा, "यहाँ उसे क्या मिल सकता है ?" पमिलता कुछ,नही,' डेरी ने कहा, "लेकिन जब वह यहां मायी थी, थियेटर • मे समका मन लगता था. मैं सोचता था; वह अपने काम मे इतना उलझ जायेगी, कि दूसरी चीजों के बारे मे भूल जायेगी, जिनका कोई हल नहीं है।" "दूसरी चीजें !" विट्टी छतो के मार-पार देखने लगी,"जिनका हल नहीं होता डरो, क्या वे चीजें खत्म हो जाती हैं ?" - "खत्म नहीं होती।" ईरी के स्वर मे : एक अजीब-सी कटुता भर मापी, "लेकिन वे छोटी हो जाती है"अगर तुम्हें अपने काम में विश्वास हो, तो एक न एक दिन उन्हे मुलाया जा सकता है।" विट्टी धीरे से हंस दी। - "तुम मुलाने की कोशिश करते हो?" डेरी ने विट्टी को देखा। एक क्षण तनी हुई खामोशी दोनों के बीच खिची रही। . "मैं बहुत दिनों से तुमसे कुछ पूछना चाहती थी।" विट्टी का स्वर वहुत धीमा था। "तुम क्या सचमुच थियेटर में विश्वास करते हो?" "तुम क्या सोचती हो ?" "नहीं-मैं सचमुच जानना चाहती हूं।" "यह विश्वास की बात नहीं है-" डैरी ने कुछ थके हुए स्वर में कहा, किसी वरसों पहले चली हुई जमीन पर वह दुवारा चल रहे हों। "मेरे लिए यही सबकुछ है।" "उसके बाद भी, जो कुछ तुमने देखा है ?" "मैंने जो देखा है विट्टी, उसे तुम जानती हो..." डरी की ठण्डी, विरक्त- सी आवाज को सुनकर वह भयभीत-सा हो गया, मानो वह किसी.खतरे के जोन में आ फंसे थे, चारों तरफ़ कैंटीली तारें लगी थीं, लेकिन अपनी ज़िद की री में वह पीछे नहीं हटना चाहते थे... "जानते हो, जब मैं दिल्ली आयी थी, लोग क्या कहते थे ?" "किसके बारे में ?" डेरी ने विस्मय से विट्टी को देखा। . "तुम्हारे बारे में "तुम बिना किसी से कुछ कहे-सुने यूनिवर्सिटी छोड़क चले गये थे।" "कोई फायदा नहीं, विट्टी।" डैरी ने खाली निगाहों से वियर की बोतल खुद खाली थी। "वह अलग समय था-और हम दूसरे लोग थे। सोचते थे, एक दिन में सबकुछ बदला जा सकता है-वह पागलपन था।" "अच्छा ?" विट्टी धीरे से हँस पड़ी, "यह नार्मल ज़िन्दगी क्या होत डरी ? बेस्त के नाटक ?" विट्टी के होंठ एक अजीव मुस्कान में खुल गये "रिकार्ड.. कितावें.."शाम को वियर पीना ?" डेरी के हाथ गिलास पर थमे रहे। विट्टी, तुमने क्या सोचकर घर छोड़ा था ?" डरी का स्वर इतना ठण्डा, इतना भावहीन था, कि विट्टी की मुस्कराह पर जमी रही। "मैं सोचती नहीं. सिर्फ तुमसे जानना चाहती हूँ।" "तुम मुझे जानती हो-जैसा मैं हैं ?" देखा, जो खुद - 1 निथड़ा मुख "क्या मतलब?" एक क्षण उंरी हवा में हिलती कपड़े टांगनेवाली तार को देखते रहे। "तुमने कभी किसी को मरते हुए देखा है ?" हैरी ने एक साम ली और उसमें किसी बहुत पुरानी दुपहर की तितीरी पारमा भालक मायो, "मरना नहीं, किसी को मारकर मरते हुए देखना' देखोगी, तो मालूम होगा. "वह रुक गये, विट्टी की प्रांखें उन पर जमी थी। "क्या मालूम होगा, हरी?" "कुछ भी नहीं।" हैरी ने बहुत धीरे से कहा। "जम तक तुम प्रांखों से नहीं देखतीं, कुछ भी मालूम नही होता।" कुछ देर तक सन्नाटा छाया रहा। एक बार इच्छा हुई, करवट यदलकर हेरी को देखें, क्या यह वही लडके हैं, जो ऐनक के पीछे प्रोसें झिपझपाते हुए स्टेज पर बैठे रहा करते थे, स्ट्रिनबर्ग का रहस्य समझाते थे? लेकिन वह लेटा रहा, उठते हुए बुखार में सब चीजें डूबती-सी जान पडी, उत, स्टेज, स्ट्रिनवर्ग, खेत, मरी हुई प्रौखें--सव । रिकार्ड अचानक ठहर गया था; घूमता हुमा डिस्क पुरं-धुरं कर रहा था, साली हवा को खाता हुआ; बिट्टी ने उठकर रिकार्ड-प्लेयर बन्द कर दिया। अपनी सिगरेट सुलगायी, तो तीली को रोशनी सहसा भभक उठी-हैरी का गिलाम ज्यो-का-त्यों पड़ा था। अब वह नहीं पी रहे थे। "डेरी, तुम क्या अब भी सोचते हो?" बिट्टी का स्वर बहुत कोमल हो माया "किसके बारे में?" "तुमने जो दिन यहां बिताये ये ?" "वे दिन नहीं थे''यह मेरी उम्र थी।" हैरी ने कहा, "उन बीत भी जाती है, तो भी उसे ढोना पडता है ।" वह कुछ देर टहरे, उन्होंने विट्टी को टैला,' तुमने घर छोड़ा था, तो कभी थियेटर के बारे में सोचा था ?" "थियेटर के बारे में नही लेकिन ऐक्टरो को देखकर मुझे बहुत हैरानी होती थी--जैसे वोनों को कर या बहुत बूढी पौरतो को देखकर-मुझे लगता था, जैसे उनके पास कोई सत्य है, जो हमारे पास नहीं है।" "कैसा सत्य ?" "मुझे लगता था, हम उन्हे जैसा देसते हैं, वैसे वे नहीं है- वै कोई दूसरी जिन्दगी बिताते हैं, जिसके बारे में हमें कुछ पता नहीं है । मैं उनमे नही हूँ।"
"यह तुम्हें कब पता चला ?" अंधेरे में मालूम नहीं हुआ, क्या डैरी मुस्करा "दिल्ली आने पर:.." विट्टी ने गिलास में बची बियर पी डाली.-.-"इन दो सालों में मैंने कितने पार्ट खेले हैं: 'मैं दूसरों की ज़िन्दगी जीती:हूं, लेकिन खुद वहीं हूँ जहाँ पहले थी.: पहले से भी बदतर । इलाहाबाद में थी; तो कम-से--: कम बहाना तो नहीं करती थी कि मैं कुछ हूँ।" "तुम विट्टी "तुम इस सवको बहाना समझती हो ?" "मैं तुम्हारे लिए नहीं कह रही: 'तुम सबकुछ देखकर थियेटर में आये हो; मैं घर छोड़कर यहाँ पायी थी।" "इससे क्या फर्क पड़ता है ?" "बहुत फर्क पड़ता है. अपने को देखो, तुम्हें कभी अपने प्रापपर सन्देहा:- नहीं होता "तुम हमेशा ठीक वातः कहते हो।" "तुम सोचती हो, दिल्ली लौटकर मैंने कोई जुर्म किया है ।"; "मैंने तुमसे कभी कुछ नहीं कहा।" "तुम कहतीं नहीं, सिर्फ जजः करती हो।" विट्टी पीछे हट गयी; मुंडेर से सटकर बैठ गयी। "ठीक है, अगर तुम ऐसा सोचते हो, तो मैं कभी कुछ नहीं कहूंगी।" डेरी ने अपना हाथ उसके घुटनों पर रख दिया, किन्तु वह न हिली न :- डुली, मूर्ति-सी अंधेरे में बैठी रही। "विट्टी, तुम चाहती क्या हो ?" वह चुप रही, फिर सिर उठाया - डैरी की तरफ नहीं :-वल्कि उससे पेरे, जैसे कहीं छतों पर छिटके तारों के बीच अपनी चाहना ढूंढ रही हो, लेकिन वहां कुछ भी नहीं था; निजामुद्दीन का स्टेशन; धुंधुग्राती बत्तियाँ अप्रैल का आकाश-दिल्ली पर फैला हुआ। ' विट्टी ने एक सांस ली और आँखें मोड़ ली। . "तुम जानते हो; मैंने तुमसे कितनी बार कहा है।": "मुझे नहीं मालूम; तुम बात-बात पर लड़ने लगती हो।" "बात-बात पर नहीं-सिर्फः एक बात पर। तुम मुझसे तंग नहीं आ:: जाते ?" "सुनो.." इस वार डरी के स्वर में गुस्सा नहीं, सिर्फ़ सन्तप्त-सी जिज्ञासा थी, "तुम थियेटर छोड़ दोगी; तो करोगी क्या ?" .. -- ११८/एक चिथड़ा सुख :- विट्टी हल्के से हिली जैसे कोई चीज देह मे सिहरती हुई-झरझरा जाती है.' "मुझे नहीं मालूम हरी, मैं सिर्फ दिल्ली छोडना चाहती हूँ।" वह वाक्य -कुछ देर अंधेरे में जमा-रहा- "मैं दिल्ली छोडना चाहती हूँ," उमने दुबारा कहा, .जैसे दूसरी बार. मी,.. गरमाई पहली-बार के नंगे, ठिठुरते वाक्य को अपने में प्रोट रही हो।.. "क्या-इलाहाबाद लौट जानोगी ?" • "नहीं.:"वहाँ नही।" "कहाँ जानोगी-?" "मुझे नहीं मालूम" और कही गयी तो तुम्हे नही बताऊंगी।" "क्यो ? मुझसे छिपकर भागने में शर्म आयेगी ?" बिट्टी ने प्रखें ऊपर उठायी। "म-तुमसे ?" वह हंसने लगी, "नहीं; शमं नहीं मुझे तुमसे पूछने को जरूरत नही । तुमने सबकुछ देख लिया विहार, मरते हुए लोगा थियेटर'. तुम सबकुछ जानते हो"तुम शायदानही जानते, मैं तुमसे कितनी छोटी हूँ... मैं "देखोगी?". "कुछ भी। जो कुछ मेरे पल्ले पड़ेगा-मवको।" "इससे तुम्हारी तकलीफ दूर हो जायेगी?" डेरी ने अजीव ठण्डी अावाज . सुद देखूगी।" में कहा। "क्या मतलब?" "तुम दूसरों की तकलीफ दूर करोगी?" "मैं मममी नहीं..." उसका स्वर थरथरा रहा था। "तुम भिग्वारियों के साथ बैठोगी"मदर टेरेसा की तरह तुम सोचती हो बिट्टी कि तुम..." किन्तु इसके आगे वह कुछ नही मुन सका; गिलास गिरने की अावाज और दूसरे क्षण उमे बिट्टी की लपट-सी फूरकारती प्रावाज सुनायी दी, पागल-मी बेतहामा एक ही वाक्य को दुहराती हुई-"get out of here, get out of my house, get out, get out, get out.:." और वह मटाक से उठवठा- ईरी बार-बार अपने को बचाने के लिए उसका हाथ पकड़ने की कोशिश करते पे किन्तु हर वार विट्टी हांफती हुई पीछे हट जाती थी जैसे कोई कोटी उमे छु रहा हो-"don't touch me, don't you ever dare to touch me. 7 और डैरी डरकर सचमुच पीछे हट जाते और उनके पीछे हटते ही विट्टी दुवारा उन पर झपट पड़ती, उसके बाल खुलकर डेरी पर गिरने लगते, उनके चेहरे, आंखों को छिपा लेते और विट्टी की दवी भर्रायो आवाज हवा में उठकर फिर थरथराने लगती..."get out, get out of this place, get out... रेत उड़ रही थी, उसके भीतर, और वह कांप रहा था। पागल-सी इच्छा हुई, वह विस्तर से उठ खड़ा हो, सोने का बहाना छोड़ कर उनके बीच जा खड़ा हो, विट्टी को खींचकर डैरी से अलग धकेल दे, किन्तु वह वैठा रहा, अँधेरे और वुखार और चांदनी में, उन दोनों की सांसें और सिसकियां सुनता हुआ "डेरी का रुंधा स्वर किसी मुतैली खोह से गहर पा रहा था, "क्या कर रही हो, विट्टी, सुनो, वह उठ जायेगा, जानती हो, वह यहीं छत पर सो रहा है, बिट्टी, बिट्टी..." और तव विट्टी सचमुच रुक गयी, हांफती हुई सांसों के बीच चेतना की एक लकीर कौंध गयी और तव डैरी ने काले अन्धड़ से बाहर निकलकर उसके झपटते, झिझोड़ते हाथों को थाम लिया, उसे अपने पास खींच लिया, उसके फड़फड़ाते होंठों पर अपना मुंह रख दिया मानो ऐसा करने से ऊपर उफनते हुए शब्द भिच जायेंगे, दव जायेंगे, किन्तु विट्टी रुकी नहीं, जैसे रेस में दौड़ता हुआ घोड़ा दौड़ खत्म होने के बाद भी कुछ दूर भागता रहता है, वैसे ही विट्टी के शब्द चुक जाने के बाद भी होंठों के बाहर फिसलते जा रहे थे, कमजोर, शिथिल, वेमानी, लेकिन एक लीक में बंधे हुए, अपने वण्डर में घूमते हुए, दुहराते हुए-- don't touch me, don't you dare touch me... किन्तु अव वह स्वयं डैरी को छू रही थी, अपनी तरफ समेट रही थी." उसके भिचे होंठ खुल रहे थे, डैरो के होंठों को अपने मुंह के अंधेरे में घेरते हुए, उनकी सांस को अपनी सांस में समोते हुए, एक चमकीली गरमाई के घेरे में, जहां न कोई उम्मीद होती है, न निराशा, न तसल्ली, न कोई भविष्य, न सुख, सिर्फ एक पाट खुल जाता है, झाड़ियों में अटका हुआ नाला फिर बहने लगता, है. उस समय तक वहता रहता है जब तक कोई दूसरा पत्थर, कोई झाड़-चट्टान, कोई सन्देह, बीच राह में औंघा-पड़ा कटे सत्य का कोई पेड़ उसे दुबारा नहीं रोक लेता। वे कुछ देर इसी तरह बैठे रहे । नाला बहता रहा। ऐसी ही रातों में पन्थर पाता होगा, लम्बी घास में लम्बे डग बढ़ाता हुआ---भूखा और बौख- लाया-सा । नाले के पास आकर ठिठक जाता होगा, गर्दन झुकाकर गट-गट पानी पीता होगा-वहाँ प्यास प्यास है, पानी पानी-बीच में कोई मरीचिका . - - - १२० / एक चिथड़ा सुख नहीं, माया नहीं, दूसरे दिन उसके पैरो के निशान बन जाते होंगे-एक गवाही की तरह कि पिछली रात वह यहाँ प्राया था, सुस्ताया था, पानी पिया या.. लास्ट नाइट द पन्थर केम एण्ड माई डॉग व्हाइन्ड द होल नाइट... मिसेज़ पंत के कुत्ते सचमुच चीख रहे थे, शायद डरी की छाया को देखा होगा, नीचे की दीवार पर चांदनी मे हिलती हुई-वह नीचे मुककर वियर की खाली बोतलों और गिलासों को ममेट रहे थे। "इन्हें रहने दो--मैं उठा लूंगी।" बिट्टी ने उनका कन्या पकडकर उठा दिया और गब डरी ने सिर उठाया, तो दोनों एक-दूसरे को भौचक निगाहों से देखने लगे-मानो वे किसी स्वप्न से जाग गये हों, एक-दूसरे को पहली बार देख रहे हों- हालांकि वदला कुछ नही था, वही डरी को छितरी दाढ़ी, ऐनक, झिपमिपाती प्रांखें, वही बिट्टी-सिर्फ एक क्षण के लिए यह विस्मय रहा होगा-फिर विट्टी ने ईरी का हाथ अपने गालो पर रख दिया, उनके हाथ से खुद अपने चेहरे को सहलाने लगी जमे वह किमी खोयी हुई पहचान को दुवारा सपने पास बुला रही हो। "हरी !" "क्या विट्टी?" "कुछ नही-मैं सिर्फ तुम्हारी मावाज सुनना चाहती थी।" नासुमों के बीच एक पीली-सी मुस्कराहट निकल आयी, मानो यह उनके वीच कोई पुराना खेल हो, अच्छे दिनों के तिनके, जिन्हें पकडकर वे हूक्ते दिनों में ऊपर आ जाते थे। हैरी सीढियां उतरने लगे, अपनी मोटर साइकिल स्टार्ट की, किन्तु उस रात विट्टी और दिनों की तरह भागते हुए मुंडेर तक नही गयी, वहीं छत पर बैठी रही, गिलाम और वोतलो और गमलों के बीच, कुछ सोचती हुई, और तब विट्टी को देखते हुए उसे पहली बार खयाल आया, लोगों के बारे मे हम इतना कुछ जानते हैं सिर्फ यह नहीं जानते कि वे क्या सोच रहे हैं ?
९ - , टप, टप-कोई जमीन पर पैरों को थपथपाता हुआ-भागे जा रहा था, वो घास और पेड़ों की छह में, अपने पंजों के सुराग उसकी पलकों पर ता हुआ । वह खुली दुपहर में जाग जाता, ज्वर के पीले ज्वार में ऊपर- चे डोलता हुया । वह रास्ते से हट जाता, कोने में दुवक जाता, प्लीज़ डोण्ट च मी, प्लीज़ डोण्ट, कांपता रहता, उस समय तक कांपता रहता, जब तक भागते हुए जन्तु की साँस उसके ऊपर से न गुज़र जाती और तव वह अचानक शान्त हो जाता, देह शिथिल पड़ जाती, दुपहर के घनघोर सन्नाटे में नल की बूंदें टप, टप करती और निजामुद्दीन के स्टेशन पर कोई ट्रेन धड़धड़ाते हुए गुजर जाती, मिसेज़ पन्त के कुत्ते रिरियाने लगते और वह झपटकर उठ बैठता, पसीने में लथपथ, मैं कहाँ हूँ, वह सोचने लगता, यहां या वहाँ ? उस रात जो बुखार आया, वह तीन रोज़ चलता रहा । होश और वेहोशी के बीच चक्कर लगाता हुया, पता नहीं, वह कहाँ-कहां चला जाता । एक बार उसे लगा, जैसे वह अस्पताल पहुंच गया है। पूरी दुपहर वह उनके पास बैठा रहा है, उन्हें देखता रहा है। जब वह साँस लेतीं, पेट में धसी रवड़ की नली हिलने लगती। वह अस्पताल की दुपहर थी। शाम को विट्टी कालेज से लौट आती, तुम अव जाग्रो, मैं वैलूंगी और वह उठ जाता था, गफलत में डूबी मां को बिस्तर पर छोड़कर लौट आता था। फिर याद आता, वह अब नहीं हैं। वह मर गयीं। वह गले के कैन्सर से मरी थीं और आखिरी दिनों में एक बूंद पानी की हलक में नहीं जाती थी। पे में घुपी कुप्पी से पानी उँडेल दिया जाता और वह बूंद-बूंद टपकता हुआ भीत जाता था और वह पथरायी आंखों से यह तमाशा देखती थीं। चेहरे पर यात की एक लकीर खिची रहती, जिस पर उनकी साँसें च्यूंटियों की लम्बी कत सी रेंगती रहती। रात होते ही वह आँखें खोल देती, दिन-भर की बदहन डेलों के बाहर निकल आती- - १२२ / एक चिथड़ा सुख "मुन्नू, मुझे एक सपना प्राया।" "कसा सपना? "मुझे लगा, मैं गटागट कोकाकोला पो रही हूँ''वहा ठण्डा, वर्फ में लिपटा हुप्रा।" बिट्टी मुंह फेर लेती और वह खिडकी के बाहर झांकने लगता, जहां सून और मवाद की लिपटी पट्टियां बिखरी रहती। वह प्रोसें मूंद लेती और बिट्टी धीरे-धीरे उनकी हथेलियों को सहलाने लगती, चाची, कुछ कहो, देखो, मैं यहां हूँ। वह प्रांखें खोल देती, एकटक ददवाजे की ओर देखती रहती जैसे किमी की वाट जोह रही हों, विट्टी, मैं कोशिश करती हूँ, लेकिन हर बार पीछे हट जाती कंसी कोशिश.."वह कहां जाने की कोशिश करती थी, कहाँ जाकर नौट पाती थी ? दिन और रात के बीच जरूर कोई ऐमा लमहा पाता होगा, जहां वह निढाल होकर रक जाती होंगी, पीछे देसती होगी कोई प्रा तो नहीं रहा ? वह थार जोह रही थी। वह असे मूंदे लेटी रहती और हम सोचते वह सो रही हैं। लोग सोते हुए कैसे मर जाते हैं ? ये कोई सपना देख रहे होते हैं और वीच में अचानक रील टूट जाती है, और उन्हें लगता है, यह भी कोई सपना है, अस्पताल की खिड़कियां, खिड़कियों से प्राती धूप, कुर्मी पर ऊपते वादू, बरामदे मैं बैठी विट्टी और मैं, उनका लड़का, फर्श पर चलती कोडियां, ये सब और सारी दुनिया, अपना बचपन और पुराने घरों के कोने और अपने मरे हुए मा. बाप, ये सब और अपना विस्तर और बाहर फैली दुपहर, ये सपनो के बीच सपने हैं और जब वे खत्म हो जाते हैं, छितरा जाते हैं, धुन्ध में धुन्ध हो जाते हैं, तब लोग कहते हैं, वह मर गयी, वह दुपहर को मरी थों और उन्हें कोई कष्ट नहीं हुमा, वह बड़ी सौभाग्यवान थी, क्योकि आखिरी घड़ी में सब लोग उनके पाम बैठे थे...सिर्फ विट्टी उन्हें झिझोड़ रही थी, हिला रही थी, 'चाची, तुम्हें कुछ चाहिए, देखो, मैं यहाँ हूँ !' वह प्रांखें खोल देता छत पर रात दिखायी देती। उसे हैरानी होती, दुपहर कहां चली गयी? क्या वह सोते हुए अस्पताल की दुपहर को लांधकर दिल्ली के बैंधेरे में चला पाया था? हो सकता है, वह भी कही लांघकर चली गयी हों, सिर्फ बिट्टी को मालूम हो, क्योकि उनके मरने के बाद विट्टी ने घर छोड़ा था, और जब कभी वह दीवार पर मदर टेरेसा का फोटो देखता-एक - यूही क्लान्त औरत, कंगली लड़कियों के साथ बैठी हुई, तो उसे चाची की बात ९ - बैठता, . टप, टप-कोई जमीन पर पैरों को थपथपाता हुआ भागे जा रहा था, वी घास और पेड़ों की छांह में, अपने पंजों के सुराग उसकी पलकों पर डाता हुया । वह खुली दुपहर में जाग जाता, ज्वर के पीले ज्वार में ऊपर- चे डोलता हुआ । वह रास्ते से हट जाता, कोने में दुबक जाता, प्लीज़ डोण्ट उच मी, प्लीज़ डोण्ट, काँपता रहता, उस समय तक कांपता रहता, जब तक भागते हुए जन्तु की साँस उसके ऊपर से न गुज़र जाती और तव वह अचानक शान्त हो जाता, देह शिथिल पड़ जाती, दुपहर के घनघोर सन्नाटे में नल की बूंदें टप, टप करती और निजामुद्दीन के स्टेशन पर कोई ट्रेन धड़धड़ाते हुए गुजर जाती, मिसेज़ पन्त के कुत्ते रिरियाने लगते और वह झपटकर उठ पसीने में लथपथ, मैं कहाँ हूँ, वह सोचने लगता, यहां या वहाँ ? उस रात जो बुखार आया, वह तीन रोज़ चलता रहा । होश और वेहोशी के बीच चक्कर लगाता हुआ, पता नहीं, वह कहाँ-कहां चला जाता । एक बार उसे लगा, जैसे वह अस्पताल पहुंच गया है। पूरी दुपहर वह उनके पास बैठा रहा है, उन्हें देखता रहा है। जब वह सांस लेतीं, पेट में फंसी रबड़ की नली हिलने लगती। वह अस्पताल की दुपहर थी। शाम को बिट्टी कालेज से लौट आती, तुम अब जाग्रो, मैं बैलूंगी और वह उठ जाता था, गफलत में डूबी माँ को विस्तर पर छोड़कर लौट आता था । फिर याद आता, वह अब नहीं हैं। वह मर गयीं। वह गले के कैन्सर से मरी थीं और आखिरी दिनों में एक बूंद पानी की हलक में नहीं जाती थी। पे में घुपी कुप्पी से पानी उँडेल दिया जाता और वह बूंद-बूंद टपकता हुआ भीत जाता था और वह पथरायी आँखों से यह तमाशा देखती थीं। चेहरे पर यात की एक लकीर खिची रहती, जिस पर उनकी सांसें च्यूंटियों की लम्बी कत सी रेंगती रहती। रात होते ही वह आंखें खोल देती, दिन-भर की बदहन डेलों के बाहर निकल आती- - - १२२ / एक चिथड़ा सुख "मुन्नू, मुझे एक सपना पाया।" "कैसा सपना?" "मुझे लगा, मैं गटागट कोकाकोला पो रही हूँ"बड़ा ठण्डा, वर्फ में लिपटा हुआ।" बिट्टी मुंह फेर लेती और वह खिडकी के बाहर झांकने लगता, जहां सून और मवाद की लिपटी पट्टियाँ विखरी रही । वह प्रॉ मूंद लेती और विट्टी धीरे-धीरे उनकी हथेलियो को सहलाने लगती, चाची, कुछ कहो, देखो, मैं यहां है। यह प्रांखें खोल देती, एकटक ददवाजे की ओर देखती रहती जैसे किसी की वाट जोह रही हों, विट्टी, मैं कोशिश करती हूं, लेकिन हर बार पीछे हट जाती कसी कोशिश"वह कहां जाने की कोगिम करती थी, कही जाकर लौट माती थी? दिन और रात के बीच जहर कोई ऐमा लमहा प्राता होगा, जहां वह निढाल होकर रक जाती होगी, पीछे देखती होंगी, कोई या तो नही रहा ? वह बाट जोह रही थी । वह प्रांखें मूंदे लेटी रहती और हम सोचते वह सो रही हैं। लोग सोते हुए कैसे मर जाते हैं ? वे कोई सपना देख रहे होते है और बीच में अचानक रील टूट जाती है, और उन्हें लगता है, यह भी कोई सपना है, अस्पताल की खिड़कियां, खिड़कियों से प्राती धूप, कुर्सी पर ऊंघते बाबू, बरामदे मे बैठी बिट्टी और मैं, उनका लड़का, फर्श पर चलती कोड़ियां, ये सब और सारी दुनिया, अपना बचपन और पुराने घरो के कोने और अपने मरे हुए मा. वाप, ये सब और अपना बिस्तर और बाहर फैली दुपहर, ये सपनों के बीच सपने हैं और जब वे खत्म हो जाते हैं, छितरा जाते हैं, घुन्ध में धुन्ध हो जाते हैं, तब लोग कहते हैं, वह मर गयी, वह दुपहर को मरी थीं और उन्हें कोई कष्ट नहीं हुमा, वह बडी सौभाग्यवान थों, क्योकि आखिरी घडी मे सब लोग उनके पास बैठे थे सिर्फ बिट्टी उन्हें झिझोड़ रही थी, हिला रही यो, 'चाची, तुम्हे कुछ चाहिए, देखो, मैं यहाँ हूँ !' वह प्रांखें खोल देता-छत पर रात दिसायी देती। उसे हैरानी होती, दुपहर कहाँ चली गयी ? क्या वह सोते हुए अस्पताल को दुपहर को लांघकर दिल्ली के अंधेरे में चला प्राया था? हो सकता है, वह भी कही लांधकर चली गयी हों, सिर्फ विट्टी को मालूम हो, क्योंकि उनके मरने के बाद विट्टी ने घर छोडा था, और जब कभी वह दीवार पर मदर टेरेसा का फोटो देखता-एक बूढी क्लान्त औरत, ऊँगली लड़कियों के साथ बैठी हुई, तो उसे चाची की बात - नाती, फकीरों जैसे कपड़े पहनती है, ईश्वर जाने इसका क्या होगा ? ह उठकर बैठ गया-अचानक हल्का-सा महसूस हुआ, जैसे बुखार की पसीने के परनालों में वह गयी है "विट्टी!" वह छत से भीतर आयी, तो कुत्ते की आस्तीनें चढ़ी थीं, जूड़े को तौलिये बांध रखा था, हाथों पर नीली नसें. पानी में चमक रही थीं। "कहां थीं तुम ?" "बाहर कपड़े सुखा रही थी-कुछ चाहिए ?" वह हाथ पोंछते हुए भीतर आयी, उसके सिरहाने आकर बैठ गयी। "विट्टी," उसने कहा । "मैं एक सपना देख रहा था।" "कैसा सपना?" "हम अस्पताल के गलियारे में बैठे थे । वह सो रही थीं।" विट्टी के हाथ उसके माथे पर ठिठक गये। पसीने में भीगे वाल हवा में सूख रहे थे। "तुम्हारी चिट्ठी आयी है।" उसने धीरे से कहा । "कव ?" "दुपहर को "तुम सो रहे थे सुनोगे ?" उसने सिर हिलाया। "तुम्हें इलाहाबाद बुलाया है।" "मुझे मालूम है।" उसने कहा। घर लौटने के दिन पास आ रहे थे। वे चुप रहते थे। वे उसके बारे में कोई बात नहीं करते थे। वह अप्रैल की रात थी, हल्की-सी गर्म, जैसे देह का बुखार कहीं हवा में है, और पेड़ निश्चल खड़े थे। ऐसी रातों में विट्टी वरसाती के दरवाजे, खिड़किय खोल देती और उसे लगता वह जहाज़ के किसी केविन में लेटा है, बाहर का अंधेर समुद्र-सा जान पड़ता और निजामुद्दीन का स्टेशन एक टिमटिमाता लाइ हाउस । वह लेटे-लेटे सोचने लगता, कहीं दूसरे केविन होंगे, इरा का होस्व और नित्ती भाई का दफ़्तर, जहां वह रात को सोते थे और तव उसे वह याद आता, एक टीला और झाड़ियां और पेड़ पर बैठी वह पागल लड़की की वहिन और डरी, जो उस रात चले गये---और वापिस नहीं लौटे थे। बुखार उतर रहा था। शायद इसीलिए उसे जहाज़ की याद आयी थी . वॅग - निथडा सुर कि उतरते बुखार में सब चीजें हिलती-सी जान पड़ती और मिट्टी मूहो का पार्टीशन हटा देती-खुद अपना बिस्तर उसके बिस्तर से सटा देती और बोलती कुछ भी नहीं, कपड़े टांगकर भीतर आ जाती और देर तक किचन का नल खुला रहता और उसे नीद आने लगती और फिर वत्ती वुझ जाती, लेकिन रोशनी की एक परत अघरे पर जमी रहती-एक हिस्सा तारो से प्राता मोर दूसरा खुद भीतर की प्रांखो से, जो अंधेरे को पहचान को रोशनी में डाल देता और उसमें पता चल जाता, कोई पाम लेटा है, साम ले रहा है, सोच रहा है और यही तीसरी परत होती, जिसमें न चमक होती, न अंधेरा, सिर्फ सोच को उदास और मूक महक, जो देर तक हवा में तिरती रहती । वह मोने से पहले का सोना होता, नीद के बीच नीद-नीचे से मोटर साइकिल को मावाज़ मुनायो देती और वह चौंक जाता, प्रतीक्षा में प्रांखें खोले रहता किन्तु जीने की मीढ़ियाँ मूनी पड़ी रहती और ऊपर कोई न आता । "तुम सो रही हो?" "नहीं।" उसने करवट ली। "सुनो, क्या उन्होंने बहुत दुख भोगा था ?" "पता नही, मुन्न ।" उसने कहा। "मरे हुए लोगो का दुख कहां जाता है ?" उसने पूछा। वह चुप लेटी रही और उमने सोचा, कही जरूर रहता होगा । पेडों पर। चलते हुए लोगों को छाया में । भकडी के जाले मे झूलता हुआ । बिट्टी ने सांस ली और फिर धीरे से कहा, "जानते हो, जब वह अस्पताल में थी, तो मैं क्या सोचती थी ? अगर कोई इतना कष्ट झेलकर दुनिया छोडता है, तो वे लोग जो दुनिया में रह जाते हैं, उन्हें कुछ करना चाहिए।" "क्या बिट्टी ?" "हमें किसी दूसरी तरह जीना चाहिए।" वे अंधेरे में लेटे रहे। "क्या तुम डेरी से इसीलिए लड़ रही थी ?" उसने कुछ सोचते हुए पूछा। "नहीं, इसलिए नही।" 'फिर?" "मैं पाखण्डी हूं, इमलिए।" "तुम कौन हो?" "वे लोग, जो कहते कुछ हैं और करते कुछ और हैं ।"
- "विट्टी, तुमने क्या इसीलिए घर छोड़ा था?" "किसलिए?" "तुम..." वह एक क्षण झिझका ! "तुम तकलीफ में जीना चाहती हो ।' वह हँसने लगी। अंधेरे में साफ और क्रूर हंसी, जो सबः परतों को छोर जाती है। "मुझे कोई तकलीफ नहीं है-बरसाती, किताबें, रिकार्ड प्लेयर, मेरे पार सवकुछ है । मुन्नू, गरीवी का बहाना वही करते हैं, जो असल में गरीव नह हैं । मेरे पास सबकुछ है, सिर्फ शर्म नहीं है।" "कैसी शर्म ?" "सबकुछ छोड़ने की । वे हर महीने मुझे पैसे भेजते हैं और मुझमें इतनी शर्म नहीं कि उन्हें लेने से इन्कार कर सकूँ।" "विट्टी," उसने कहा । "तुम किसी से कुछ नहीं ले सकती ?" "मैं उसके काविल नहीं हूँ।" "लेकिन तुम्हें नहीं मालूम, तुम दूसरों को कितना दुख देती हो?" "मुझे मालूम है, लेकिन तुमने कभी सुख देखा है ?" वह एक क्षण चुप रही, फिर धीरे से कहा, ''ऐसा सुख, जिसके बारे में कोई कह सके, वह उसके काबिल है ?" कुछ देर केवल उसकी सांस सुनायी देती रही। फिर उसकी आवाज सुनायी दी, इतनी धीमी, मानो वह उसकी सांस का स्वर हो। "तुम्हें कभी वह बीना याद आता है ?" "नुमायश में जिसे देखा था?" "और कहाँ ?" वह धीरे-से हँसी । "हमने एक चवन्नी में उसका सुख देखा था।" "क्या वह असली था ?" "सुख या वीना ?" "नहीं," उसने कहा । "वह बुढ़िया, जो सिंहासन पर बैठी थी।' "पता नहीं...," विट्टी ने दरवाजे की तरफ देखा, जैसे वहाँ कोई खड़ा हो । 'वह सबकुछ जानती थी।" "और बौना?" "वह भोगता था। बुढ़िया देखती थी।" वाहर कोई नहीं था सिर्फ चांदनी देहरी को लांघकर उनके विस्तरों. १२६ / एक चिथड़ा सुख M पर चू रही थी । छतों पर टेलीविजन के पोल हवा में हिल रहे थे। वे लेट गये । हवा उठी थी। छत पर झुका सेमल का पेड़ सडसड़ा जाता था। दो-चार पत्तियां अंधेरे में झिर-झिर करती भर जाती थी। कुछ देर बाद स्लीपिंग-बैग हिला, मुंह बाहर निकला, छोटी-सी भावान बाहर मायी, "मुन्नू ?" "हूँ !" उसने करवट ली। "तुम क्या सोचते हो, अगर वह जिन्दा होती, तो मुझसे बहुत निराश हो जाती ?" "बिट्टी," उसका स्वर न जाने क्यों बहुन रंधा-सा हो माया । "वह तुम्हें बहुत मानती थी।" "मुझे नहीं 'वह लड़को कोई मौर थी।" "मोर तुम "तुम कौन हो?" "मैं-" उसने बहुत धीमे से कहा । "मैं उसे ही ढूंढने दिल्ली प्रायी थी।"
१० ? तुम अायोगे ? हां, मैं आऊंगा । तुम्हें मालूम है, कर्ज़न रोड, हाँ मुझे मालूम है। मुझे कोई मुश्किल नहीं पड़ेगी । मैं वहाँ कई वार गया हूँ, प्रीमियर पास पा रहा था और विट्टी सुबह से शाम वाहर रहती थी। वह अमरीकी लाइब्रेरी में पाकर बैठ जाता था । वहाँ ढेरों कितावें थीं लेकिन उनमें उसे दिलचस्पी नहीं थी। वह रेफरेन्स-बुक्स के एक कोने में बैठ जाता था-वहाँ लम्बे शीशे की खिड़की थी। पीछे एक पीपल का पेड़ था, जिसकी नंगी शाखाएँ हवा में भूलती थीं। किन्तु शीशे के पीछे न हवा सुनायी देती थी, न शाखाओं का शोर । वहाँ शान्ति थी। ठण्डक, हल्का-सा अँधेरा, जिसके भीतर बैठकर वह जाने के दिन गिनता था। मैं वहीं वैलूंगा। तुम आसानी से मुझे देख सकती हो ! मुन्नू, तुम अच्छे लड़के हो; मैं तुम पर विश्वास कर सकती हूँ हां, तुम मुझ पर विश्वास कर सकती हो । लेकिन मैं अच्छा नहीं हूँ। मैं लड़का भी नहीं हूँ। मैं बड़ा हो रहा हूं। मैं आदमी-सा बन गया हूँ। मैंने लम्बी वीमारी पार की है। मुझे नहीं मालूम था, बीमारी के भीतर कितनी आँखें खुल जाती हैं । लेकिन दुनिया सिकुड़ जाती है, एक चमकती नोंक पर थिर हो जाती है, गले पर ठण्डे चाकू-सी, जिसका सच उस अजीब लड़की ने डैरी के लान पर दिखाया था। बीमारी के लम्बे दिनों में वह अक्सर उस लड़की के बारे में सोचा करता था। क्या वह अव भी पेड़ों पर चढ़ती है परिन्दों को डराती है, डरी के कमरे का पहरा देती है ? वह मुझे अव देखेगी तो बहुत हैरान हो जायेगी । वह खुश भी होगी। मैंने उसकी बात मान ली है। वह चाहती थी, मैं घर लौट जाऊँ, यहाँ मेरी जगह नहीं है, न नाटक के भीतर, न आडिटोरियम में। वह खतरे को जानती थी, वह उसके भीतर रहती थी। वह मुझे चेतावनी-सी देना चाहती थी। उसने मुझे चूमा था, उसने मुझे धकेल दिया था-बाहर अँधेरे में-ताकि मैं उनके १२८ / एक चिथड़ा सुख ।
। सतरे से छुटकारा पा सकें। कसा खतरा ? अप्रैल को उस दुपहर में सबकुछ निमाराक, गित भाग पड़ता था । वह लापबेरी के एक उजाड कोने मे बंठा पा. नहा या कम तोग पाते थे। वेरोजगार किस्म के मादमी, जो पाली राज्यों से जयकर गही परी. दो घडी सुस्ताने प्रा.बंठते थे। वे अपनी मेयो पर एनसायनोपीडिया मा तस्वीरों की कोई सुरक्षित और स्थूल गिताव पोल सेरो, गिगये भीगर याहर का जोखिम और मोर पोर येकार पी भटफर पुछ देर के लिए भोमाग हो जाती । एक दूसरे टेवल पर कुछ लड़पियाँ वैठी थी-'टाइम' और 'यूरोपा' के पन्ने पलट रही थी, फुसफुसाते हुए एक-दूसरे से पुछ पहली थी, हगने गगी थी, भेद-भरी आँखो से कभी उसे देख लेती थी, कभी सिडमी में याहर-~TE) पीपल का नगा पेड़ खडा था । शीशे का रंग कुछ ऐमा था, कि बाहर की धूप भी रगाह दिगायी देती थी। लगता था, जैसे वह सर्दी की पाम हो । किन्तु यह प्रमा। याहर फैली थी । वह अप्रैल का महीना था । दिल्ली की एया दुपहर । यह पा रही थी। उसे नहीं मालूम, वह उसमे क्या चाहती थी ? कोग पर उगने पर बताया । सबकुछ अचानक हो गया था। पिट्टी बाहर थी और या परगानी में अपनी चीजो को इकट्ठा कर रहा था। गूटकंग में गर्मी के उन कामों को रख रहा था, जिनकी अब कोई जरूरत नहीं थी। यह पाहता था, प्रीमियर in पहले ही अपनी चीजों को पैक कर डाले, उगे यह भी सर था, कि यदि ट्याग वुसार पाना शुरू होगा, तो वह कुछ भी नहीं कर गगा। यह टगग पहले ही तयार हो जाना चाहता था। वे रिहर्सल के अन्तिम दिन थे । वे कुछ मुह के दिनों में लाने , सर इलाहाबाद से पाया था। हरदम लोगों का ग्राना-बाना बना रहतादिया का बहुत-मा सामान विट्टी की वरमानी में जमा होता गया था-~गरे थे लिए कभी हेरी पाते, कभी इरा, कभी दूसरे महक, जिन्हें कंबल पर दो बार स्टूडियो में देखा था। वे उसे बिस्तर पर लेटा दमन, यह उन्हें, देगला, किर वे चले जाते और कमरा माली रहाता । वह प्रकला रह जाता । वह इस पर प्रागनी रवटा, पी. धारे ग्रंपरे को पाने देता । वहुत दिन पहले के दिन पाद प्राद, अब वार विट्टी के नाय निनी नाई के दस्तर में पाया गया, मह लोग यही विट्टी में मिले मान- निदिनीया ' - उन्हें स्टूडियो में देखा था, अँघरे हाल में अकोले बैठे हुए । आखिरी बार ? नहीं, यह नहीं । इलाहाबाद लौटने से पहले वह सबसे एक बार मिलेगा। पहले वे सिर्फ उसे विट्टी का कज़िन मानते थे, लेकिन पिछले दिनों बिट्टी के दोस्तों में उसकी एक अद्भुत जगह बन गयी थी । वह सबकुछ देखता था, और उन्हें मालूम था, कि वह उन्हें देख रहा है । वह न तो इतना छोटा था कि उसे टाला जा सके, न इतना बड़ा, कि उनके वीच परेशानी बन सके । वह एक मूक गवाह-सा बन गया था, तटस्थ नहीं, क्योंकि गवाह कभी तटस्थ नहीं होता। लेकिन जिम्मेवार भी नहीं; उसकी गवाही पूरी नहीं थी क्योंकि देखना कभी पूरा नहीं था । वह जब अर्से वाद विट्टी के दोस्तों को देखता नो एक अजीव-सी दहशत उसे पकड़ लेती-उसे लगता जैसे उनके साथ कुछ हो गया है, जिसे वह नहीं जानता । वह जहां से उन्हें देखना शुरू करता, वहाँ वे बहुत पहले खत्म हो चुके होते; वह जहां से उन्हें पकड़ता, वहाँ खाली जगह होती; वे कहीं और होते । सिर्फ रिहर्सल देखते हुए उसे लगता था कि वे जीवित हैं, विट्टी, इरा, डैरी किन्तु ज्योंही वे स्टेज से उतरकर अपनी ज़िन्दगी में आते वह उन्हें खो देता। वह समझ नहीं पाता था, कौन-सी ज़िन्दगी असली है, यहां दुनिया की रोशनी में या वहां, स्टूडियो के अँधेरे में ? फिर बीमारी के दिन आये---लम्बे अकेले दिन-जव उसे एक नयी चीज़ पता चली । नयी नहीं, एक बहुत पुरानी चीज़, जिसे वह चलते-फिरते कभी नहीं देख पाया था, लेकिन जो हमेशा उसके साथ थी---और वह यह, कि देखने के लिए उसे कुछ नहीं देखना चाहिए । उसे अंधेरे में रहना चाहिए.'' फिर धीरे-धीरे वे चीजें तुम्हारे पास आयेंगी, जो लोगों के साथ हुई हैं। वे तुम्हें सबकुछ बता देंगी, अगर तुम सचमुच अंधेरे में हो, सचमुच बीमार हो, सचमुच अकेले हो। जरा सुनो... सुनते हो? कोई सीढ़ियां चढ़ रहा है। तुम्हारे पास आ रहा है । "पापका फोन है।" मिसेज़ पन्त का पहाड़ी नौकर उसके सामने खड़ा था। "मेरा?" "जी, आपका।" वह नीचे पाया । मिसेज़ पन्त का फोन गलियारे में रहता था और उसकी घण्टी ऊपर तक सुनायी देती थी। घर खाली था। वह अपने कुत्तों के साथ बाहर टहलने गयी थीं। सिर्फ वरामदे की बत्ती जल रही थी। १३० / एक चिथड़ा मुख रिसीवर उठाया, तो कुछ देर तक वुछ सुनायो नहीं दिया।शायद लाइन कट गयी थी । वह फोन रखनेवाला ही था कि कही दूर से एक महीन मावाज मुनायी दी। "मुन्नू ?" "कौन ?" "मैं इरा हूं, तुम इतनी देर से कहाँ थे ?" कुछ देर चुप्पी रही। उसने मोचा, वह कुछ कहेगी, किन्तु उसकी जगह फोन का मन्नाटा वोलता रहा । आखिर उमसे नहीं रहा गया। "बिट्टी यहां नहीं है ।" उमने कहा । "नहीं, दिट्टी नहीं "मैंने तुम्हें फोन किया था।" "मुझे " "हां, कल मुझसे मिल सकते हो?" "तुममे ?" वह एक क्षण ठिठका रहा, "कहाँ ?" "अमरीकन लायब्रेरी मे''मैं दुपहर को माऊँगी।" वह पूछना चाहता था, किमलिए ? लेकिन उसके मुंह से निकला, "मैं पाऊँगा।" "तुम्हे मालूम है, कस्तूरवा मार्ग ? पहले उसका नाम कर्जन रोड था !" "हां, मुझे मालूम है।" उसने सोचा, अब वह रिसीवर रख देगी, किन्तु दुवारा उसकी प्रावाज सुनायी दी, "सुनो,"बिट्टी से कुछ मत कहना।" वह कुछ कह पाता, इससे पहले ही उसने कहा, "मुन्नू, तुम अच्छे लडके वह शायद हंसी थी, एक अजीव व्यग्यात्मक-सी हंसी, जो फोन के भीतर भयानक-सी सुनायी देती थी । उसने कुछ कहने की कोशिश की, लेकिन फोन कट गया था। वह जा चुकी थी। वह खड़ा रहा । कही कुछ गलत था। एक काले अपशगुन-सा, जो पस फड़फडाता हुमा सिर पर बैठ जाता है, हाथ लगामो, तो कुछ भी नहीं । वया या वह कौन-सी वह नियति थी, जिसने फोन के भीतर से उसे निहारा था ? उस रात वह देर तक जागता रहा । बाहर बूंदाबांदी हो रही थी, अप्रैल की वारिया, जिसमें बूंदें एक साथ, चमकीली लाइन में गिरती रहती हैं । बहुत रात गये विट्टी पायी थी, पानी मे भीगी हुई । उसने एक बार उसे देसा, फिर चुप- - र बाथरूम में चली गयी। यह भी नहीं पूछा, इतनी देर रात तक वह कैसे ग रहा था । उस दुपहर के बाद वह कुछ नहीं पूछती थी, जब से बाबूजी ने चिट्ठी आयी थी। वह कभी-कभी उसके बंधे हुए सामान, सूटकेस, किताबें को देख लेती,-उन चीजों को बटोर लाती, जिन्हें वह पैक करना भूल गया: था लेकिन कहती कुछ नहीं थी। उसने अभी तक उससे यह भी नहीं पूछा था, वह कब जा रहा है । न उसने बताने का साहस किया था। उनके बीच इलाहावाद कुछ वैसा ही निषिद्ध विषय बन गया था, जैसे डरी । उस रात वाद न कभी वह डैरी की वात करती थी, न इलाहावाद जाने की । .. वह भी कुछ नहीं पूछता था । इतनी रात तक वह कहां रहती है. कहाँ प्राी है ? उसको रह-रहकर वावू की वात याद हो आती-विट्टी की जिन्दगी में दखल मत देना; वहाँ ऐसे रहना, जैसे तुम हो ही नहीं । होकर भी नहीं होना, पिछले तीन महीनों में उसने यह सीखा है, कोशिश की है कि अपने को एक सिफ़र में बदल डाले, उस बन्द घड़ी की सुई की तरह, जो एक जगह ठहर जाती है; हिलाओ, तो भी नहीं हिलती। लेकिन उस रात किसी ने मुझे हिलाया था। मैं दखल नहीं दे रहा था सिर्फ एक नम्बर से उठकर दूसरे नम्बर पर आ बैठा था। इस क्षण यदि अचानक आ जाते, तो मैं उनसे कहता, आपने बहुत गलती की। आपको क वाहिए था, मुन्नू, वहाँ मत जायो । कहीं मत जानो। तुमने मां को मरते देखा था, सो समझ लो, तुमने सबकुछ देख लिया। अब तुम्हारी ज़िन्दगी अस्पताल की एक दुपहर को दुहराती जायेगी। आपको मुझे दिल्ली नहीं भेजना चाहिए था। आपको कहना चा कुछ मत देखो क्योंकि जो देखते हैं, वे दखल न भी दें, दूसरों की छाय एक जूठा और झूठा दुख उठाते रहते हैं। आप अगर इस समय श्रा देखते मैं बदला नही हूँ; सिर्फ मैं अस्पताल की दुपहर की दूसरी प्राया हूँ; यहाँ मैं अंधेरे में लेटा हूँ, वाहर वारिश हो रही है; शाम का फोन आया था, वह मेरे भीतर दर्ज है, वह मेरे भीतर है और मैंने पर दर्ज कर लिया है। हां, मैं अँधेरे में लिख लेता हूं, यह डायरी इसीलिए दी थी; वह सोचती थी, जो लिखता है, वह अपने पर। जो सोच सकता है, वह प्रायश्चित-सा कर लेता है। यही एक नोटबुक है, जिसे मैंने अभी तक सामान में नहीं , 77/एक चिथड़ा सुख आपके लिए संभाल कर रखा है। कभी-कभी मुझे एक सुखद माशा बंधती है, कि मेरे मरने के बाद भी प्राप जीवित रहेंगे। यह कोई मनहोनी पटना नहीं होगी, अनेक वाप अपने लड़कों को घाट तक पहुंचा पाते हैं । लौटफर पाप यह डायरी देखेंगे, पहले पन्ने पर मां का डेडीकेशन होगा, उसके परे अंग्रेज मिशनरी के संस्मरण, जिन्हें मैंने अनेक पन्नों पर टीपा है, फिर आप कुछ पन्ने पलटकर देखेंगे, मेरी दिल्ली की डायरी और पाप सोचेंगे, कैसा लडका था पह, कभी मिशनरी के साथ जाता था, कभी पॅन्थर के साथ, लेकिन जल्दी ही प्रापको अपनी भूल पता चलेगी, इन पन्नों मे न घूमता जानवर है, न विहार में भटकते हुए डेरी, न मदर टेरेसा के भूखे-नगे भिसारी-ये सिर्फ मला परदा है, जिन पर मेरे दिल्ली के दिन बीते थे, जब बरसों पहले मापने मुझे यहाँ भेजा पा पौर तब आप एक-एक पन्ने को पार करते हुए इस क्षण पर प्रा ठिठकेंगे, जो प्राज है, अब है, यह वरसाती, यह रात, यह बारिश, और मैं पापको मंगुली पकड़कर कहूंगा, चलिए, मेरे साथ पाइए, सिर्फ किचन को देहरी तक, देखिए- वहाँ कौन बैठा है। डरिए नहीं, यह गुजरा हुआ समय है और मैं बहुत पहले मर चुका हूं और प्राप असली दुनिया में नही, मेरो डायरी पर चल रहे हैं; आप जहाँ चाहै, एक सकते हैं, डायरी बन्द करके मुझमे छुटकारा पा सकते हैं, लेकिन मुझे मालूम है, अब पाप मुडना नही चाहेंगे, पाप उस लड़की को देख रहे हैं, जो रमोई के सन्नाटे में अकेली बैठी है, आप इलाहाबाद के स्टेशन पर उसे छोडने पाये थे जब चाची खम्बे के पीछे मुंह छिपाकर रो रही थी। प्राप देहरी पर सडे हैं ? मैं तो हर रोज़ देखता हूँ, जब वह पो रही होती है और मैं सोचता है, ये लोग जो अकेले में पीते होगे कुछ वैसे ही होते होंगे जो अपने से अकेले में बोलते हैं. लेकिन मैं भीतर नहीं जाता, मुझे बिट्टी की यह दुनिया बहुत पवित्र- सी जान पड़ती थी, रसोई की मेज, मेज पर रखा उमका गिलास, जमे कुछ लमहों के लिए उसने बाहर की दुनिया से बिल्कुल किनारा कर लिया हो; उस क्षण मेरा 'मैं' भी मुझसे जुदा हो जाता है, नोटबुक के पन्नों मे अपने को सिपा नेता है । देहरी पर खड़ा हुआ मैं भविष्य से लौट पाता हूँ, पुनर्जीवित हो जाता हूँ, अब मैं 'वह' हूँ, जो मुन्नू है, बिट्टी का कजिन और वह उसको माहट मुनकर चौंक जाती है, उसकी तरफ देखकर मुस्कराने लगती है। "तुम्हारे कमरे में अंधेरा था। मैंने सोचा तुम सो गये हो ।” उसने कहा।
, वह मुस्करा रही थी। उसकी प्रांतों में अजीव-सी चमक थी, जो पीने के वाद हमेशा उसके चेहरे पर सुलगने लगती थी। मन में आया, उससे कहे, पीछे वाबू खड़े हैं । उसे देख रहे हैं। लेकिन फिर याद आया, वह उसकी डायरी में हैं, उसके बाहर उन्हें कोई नहीं देख सकता। "पास आयो ! इतनी दूर क्यों खड़े हो ?" वह एक क्षण दुविधा में खड़ा रहा । फिर वह मेज़ के पास आया। बीमारी के बाद यह पहला मौका था, जब वे दोनों किचन में बैठे थे। बाहर सन्नाटा था, सिर्फ वारिश की टपटपाहट छत पर गूंज रही थी। "क्या करते रहे दिन-भर ?" विट्टी ने अपना हाथ उसके कन्धे पर रख दिया। . "मैं कमरे में ही था।" उसने कहा, "तुम बहुत देर से प्रावी ?" "अाज हमारा आखिरी रिहर्सल था," वह वैसे ही मुस्करा रही थी, ब्राण्डी का एक चूंट लिया, फिर हंसने लगी, "मैं उसी की खुशी मना रही हूँ।" "अब कोई रिहर्सल नहीं होगा?" "होगा, प्रीमियर के एक दिन पहले।" वह एक क्षण रुकी, फिर उसकी ओर देखा, "मेरा कोई फोन तो नहीं पाया ?" उसने अांखें ऊपर उठायीं, नहीं, वह कुछ भी नहीं जानती। उसके चेहरे पर अब भी बारिश के निशान थे. भीगे वाल, ढीला जूड़ा, पीली चमक में धुली- धुली-सी अांखें, वह खिड़की के बाहर देख रही थी, जहां अंधेरे में अप्रैल का आकाश एक टूटी सलेट-सा लटका था। "तुम बहुत भीग गयी थी?" "हाँ"इसीलिए यह पी रही हूँ। तुम थोड़ी-सी लोगे ?" "डेरी के साथ पायी हो ?" उसने हिम्मत बटोरकर कहा। "नहीं।" वह बाहर अंधेरे में देखती रही। "जब तुम भीतर आयीं, मैं सो नहीं रहा था।" उसने कहा। उसने सिर मोड़कर उसकी ओर देखा। "क्या कर रहे थे?" "बहुत पहले," उसने कहा, "बहुत पहले मैं नेकीराम के साथ क्यूविकल में बैठा था। याद है, तुम वारिश में भीगती हुई पायी थीं । इरा सिगरेट पी रही थी।" वह हंसने लगी। "वह एक सीन था," उसने कहा । १३४/एक चियड़ा सुख "नित्ती भाई हाल में बैठे थे।" उसने कहा। "नित्ती भाई ?" बिट्टी ने उसे देखा। "हां, वह सबसे पिछली सीट पर बैठे थे।" वह कहना चाहता था, उनकी दाडी वढी थी, जैसे वह कई रातो से नहीं सोये "वह वोतल से ह्विस्की पो रहे थे। किन्तु वह बीच में ही रक गया। विट्टी का चेहरा बिल्कुल सफेद हो गया था। "तुमने इरा को बताया था ?" "नहीं, क्यों?" कुछ देर तक वह हकबकी मांसों से उसे देखती रही। "ऐसे ही "कोई फायदा नहीं।" वह फिर अपने में लौट आयी थी, व्राण्डी के धुंधलके में, लेकिन इग वार उसके भीतर कुछ उबलने लगा। गुस्से की एक लहर उसकी मात्रा मे घुपने लगी। "बिट्टी," उसने अपने को संभालते हुए कहा, "तुम मुझे नहीं बताना चाहती हो, तो ठीक है, मत बतायो । लेकिन तुम झूठ बोलती हो।" "झूठ ?" वह हमने लगी, "कसा झूठ ?" "सबके बारे में।" "और तुम्हे सच मालूम है ?" उसने कहा। वह चुप उसे देखता रहा । उसे नहीं मालूम वह क्या है, लेकिन सच है कहीं जरूर, जिसे वे उससे छिपाते रहे हैं । तीन महीनो में पहली बार उसके भीतर बरसों का दबा गुस्सा, अकेलापन, प्रज्ञान, धोखा, लबलबाने लगे, फिर अचानक ध्यान पाया, कुछ दिनो वाद वह यहां नहीं होगा, कुछ नही देखेगा पौर यह खयाल पाते ही सबकुछ बह गया, वह खाली हो गया। मांसो में उमड़ते मांसू बीच रास्ते में वापिस लौट गये । "क्या बात है मुन्नू ?" विट्टी ने विस्मय से उसे देखा। "कुछ नहीं, मैं सोने जा रहा हूँ।" वह कुर्सी से उठ खडा हुमा और अपने मधेरे कमरे में प्रा गया। बिस्तर पर लेट गया। मेरा भी एक भेद है, बिट्टी, जो तुम नहीं जानती। जब तुम जानोगी, तो बहुत देर हो चुकी होगी। तुम नहीं जानती, मैं इस घड़ी लायब्रेरी मे बैठा हूँ। मैं मच्छा सहका हूँ। पन्छा ने के लिए सत्र का जानना जरूरी नहीं है । सच पूछो, तो मुझे सच जानने कोई चिन्ता नहीं है । मैं वही करता हूँ, जो मुझसे कहा जाता है । मैं टी उम्र का दलाल हूँ, दो झूठों के बीच एक सच, जिसे अंग्रेजी में पिम्प हा जाता है । एक ऐसा लड़का, जिसे किसी भी समय फोन करके बुलाया जा कता है। तुम इस दुपहर के बारे में कभी नहीं जानोगी। यह घड़ी एक भेद है। मेरे और भेदों में से एक, जिन्हें पोटली में बांधकर मैं इलाहाबाद ले जाऊंगा। वरसों बाद खोलूंगा, तो पीपल का बूढ़ा पेड़ दिखायी देगा, नंगा बीहड़, लायब्रेरी की खिड़की पर अपनी छाँह किताव पर फेंकता हुआ; यह तस्वीरों की किताब है, जिसमें अरीज़ोना के रेगिस्तान हैं, कैलीफोनिया का समुद्र, ग्रेड कैन्यान और लोहे के लम्वे पुल में इस पुल पर चल रहा था, जब किसी हाथ ने मुझे रोक तो वह सामने खड़ी थी। उसके बाल खुले थे । होंठों पर हल्की-सी लिपस्टिक थी। माथा खाली था। उसने सिर झुकाकर उस किताव को देखा, जहाँ मेक्सिको के जंगल थे और तब उसे भ्रम हुआ, वह कहीं बाहर से नहीं, जंगल से निकलकर बाहर पायी है। उसके सामने खड़ी है । उसे देखकर हमेशा उसकी आँखें धुंधिया जाती - लिया। मैं मुड़ा -- थीं। वह उठ खड़ा हुआ, लेकिन वह खड़ी रही। वह बड़े ध्यान से खुली तस्वीर को देख रही थी। होंठ खुल गये थे। वह उसे हमेशा जीन्स में देखता आया था, किन्तु अब वह साड़ी पहने थी। कन्धे पर काली शाल थी, हालांकि वे अप्रैल के दिन थे और ठण्ड सिर्फ एक याद की तरह हवा में रहती थी। "क्या वहुत देर से बैठे हो ?" वह उसकी पोर मुड़ी। पहली बार उसे सिर से पांव तक देखा।. "मैं जल्दी पा गया था।" उसने कहा। वह थोड़ा-सा हिचकी, "घर में तो किसी से नहीं कहा ?" "किसके बारे में ?" उसने पूछा। "यहाँ पाने के..." वह एक क्षण रुकी, फिर धीरे से कहा, "विट्टी से . कहा था ?" "नहीं", उसने सिर हिलाया। "वह सुबह ही चली गयी थी।" "मुझे मालूम है।" उसने कहा । उसने कुर्सी को पकड़ रखा था। सफेद हाथ थे। उसका चेहरा ध्यान में डूवा था । 136 | एक चिथड़ा सुख वह खुली किताव पर मैक्सिको के जंगल देख रही थी। "क्या में तुम पर विश्वास कर सकती हूँ ?" उसने कहा ! वह किसी अज्ञात विपत्ति के कोने में उसे निहार रही थी, और नव उमे खयाल माया, दूसरे का संकट भीतर कुछ भी नहीं जगाता, न दया, न हमदर्दी; सिर्फ एक भूरी, गर्म, तपती रेत सामने से भाती है और हम मुंह मोड़ लेते हैं । "सा विश्वास ?" उसने पूछा। "मैंने तुमसे कुछ कहना है।" लायब्रेरी में बैठे लोग बार-बार उन्हें देख लेते थे। "मेरे साथ बाहर प्रायोगे?" उसने कहा । वह एक साफ दुपहर थी। इन दिनों दिल्ली का प्राकारा सदी की धुन्ध-में निकलकर नीले कोच-सा चमकता था। मेडी पर पते लाल हो जाते थे, जितने ऊपर दिसायो देते, उतने ही सडकों पर; एक जादू-सा झरता पा । पतझर नीचे दिखायी देता, जबकि शहर पर वसन्त की हवा चलती रहती ।मिर्फ धूप से पता चल जाता, कि गर्मियों पा रही है । वे पेड़ों के नीचे चल रहे थे। वह कुछ आगे थी, सिर्फ इतनी आगे, कि वह बिना मुई उमे देख सकता था। ह्वा से बचने के लिए उसने साडी का पल्लू कसकर कमर में खोंस लिया या। माल को अपने थैले मे भर लिया था, जिसका ऊपरी सिरा बार-बार फड़फड़ाने लगता था। चेहरे पर न कोई हडबही थी, न बेचनी-मिर्फ एक स्वी वीरानी थी, जैसे पिछली रात उसने कुछ सोचा हो और अब चलते हुए वह 'सोच' ही उमकी प्राखें बन गया था, जिसमें वह दुनिया को देख रही थी पौर वह देखना नहीं था, क्योकि वह दुनिया नही थी, जिममें वह चल रही थी। सिन्धिया हाउस के सामने आकर वह रुक गयी । दो सड़ी हुई टैक्सियो के बीच एक मिस ड्राइवर अपनी पगड़ी मुंह पर रखे सो रहा था। "खाली है ?" उसने पूछा। "कहां जाना है ?" "माल रोड।" उसने कहा। हाइवर ने पगडी हटाकर उन दोनो को देखा-जैसे गहर के बीचोंबीच कोई सपना देख रहा हो। वह एक सपना हो था-टेक्मी में बैठना, मिण्टो रोड का पुन,धूपमे चमकतो रेल की पटरियां । उस दुपहर में कुछ ऐसा था, कि सबकुछ प्रनिदायं जान पड़ता था : संकल्प और सान्त्वना से परे मानो वे किसी पार्ट को दुहरा रहे थे। भागते हुए "क्या आप रेडियो थोड़ा कम कर देंगे?" इरा ने आगे झुककर कहा । ड्राइवर ने एक क्षण पीछे देखा, फिर कन्धे उचकाकर रेडियो खट-से वन्द कर दिया। "मैंने बन्द करने के लिए नहीं कहा था।" उसने कहा, किन्तु उसकी आवाज इतनी धीमी थी या ड्राइवर का गुस्सा इतना ज्यादा था, कि रेडियो चुप पड़ा रहा। अव कोई आवाज नहीं थी। टैक्सी की चुप्पी कितनी अलग थी, और चुप्पियों से बिल्कुल अलग; वह चलती हुई चुप्पी थी, ठहरकर भी ठहरी नहीं थी, जैसे वे वैठकर भी बैठे नहीं थे, कहीं जा रहे थे; इंजन की गड़गड़ाहट, पेड़, कटता हुआ रास्ता । समय अब भी बीत रहा था, लेकिन उलटी तरफ से। वह उलटी तरफ से उनकी ओर आ रहा था, जैसे वे भविष्य में नहीं, कहीं पिछले समय में जा रहे हों, जहाँ सबकुछ पहले से ही घट चुका था, हो चुका था और तब एक अजीव-से अातंक ने उसे पकड़ लिया । उसने मुंह मोड़कर उसे देखा। वह उसे निहार रही थी। "तुमने पूछा नहीं, मैं तुम्हें कहाँ ले जा रही हूँ ?" वह उसे देखता रहा। "डरो नहीं," उसने कहा, "तुम सब जान लोगे।" उसके चेहरे पर वही गमगीन सोचा था, जो उसने लायब्रेरी में देखा था। एक असीम ठहराव, जो किसी घातक फैसले को छूकर अचानक थिर हो जाता है, न हिलता है, न डुलता है, लेकिन फिर भी सावुत और सम्पूर्ण दिखायी देता है, उस छिपकली की तरह जो बिजली के नंगे करेंट को छूकर भी कुछ देर तक दीवार मे चिपकी रहती है, मरकर भी जीवित्त-सी दिखायी देती है। "इरा," उसने धीरे से कहा, "क्या मैं तुम्हारे लिए कुछ कर सकता हूँ ?" वह मुसकरायी, अपना हाथ उसके हाथ पर रख दिया, "तुम कर रहे हो," उसने कहा, "तुम मेरे साथ बैठे हो।" हाथ पर रखी उसकी अंगुलियां धीरे-धीरे काँप रही थीं, समूचे ठहराव के बावजूद जैसे देह अपना वदला अँगुलियों से निकाल रही थी। रोशनी मन्द हो गयी। कोई बादल सुरज पर जा अटका था, और पेड़ काले पड़ गये थे। वे दरियागंज को पार करके चौड़ी सड़क पर आ गये और फिर , । - । १३८ / एक चिथड़ा सुख सूरज निकल पाया, अपनी पीली रोशनी से जामा मस्जिद वी मीनारों को घोता हुआ और तब उसे सहमा वे दिन याद हो पाय, जब वह दिल्ली प्राया या, बिट्टी के साथ पहली बार लाल किला और जामा मस्जिद देखने गया था, कितना भोला था वह और कितना वेवकूफ जिसने मिर्फ मां का मरना और बिट्टी का जाना देखा था और वह सोचता था कि सारी दुनिया इन दो घटनानी में ममा रारती है क्या वह किसी ज्ञान की शुरुयात थी? ज्ञान, जिसका मतलब है जानना, लेकिन दूसरा मतलब है, जो जाता है, उसे छोड़ देना, और छोड़ देने में दिल्ली के वे सारे दिन शामिल हैं, जो उम सुवह में शुरू हुए थे, जब वह प्लेटफार्म पर खड़ा था; और एक अजनवी लड़की ने उमका कन्धा पकड़कर कहा था, "तुम "तुम विट्टी के कज़िन हो?" वह तव हंस रही थी। अव वह खिड़की से बाहर देख रही थी। टक्मी कदमीरी गेट के भीतर से बाहर निकल रही थी। दुपहर की प्रसन्न धूप में कुदसिया गार्डन मेटा था, धूल मे मने ताड के पेड खडे थे, पता नहीं क्यों, दिल्ली के इस हिस्से में आते ही उसे गदर की कहानियां याद माने लगती थी, जैसे मरे हुए सिपाहियों की प्रेतात्माएं अब भी सूखे ताड़ी से चिपकी खड़ी हैं। तब सहमा झटका-मा लगा। टैक्सी ट्रैफिक लाइट्स के प्रागे पडी हो गयी। ड्राइवर ने पीछे मुड़कर देखा- "माल रोड में किधर जाना है ?" "माप चलिए, मैं बता दूंगी।" वह अपना हैड बैंग खोल रही थी । एक कागज बाहर निकाला, उसे पढा, फिर लपेट दिया, इतना छोटा, जैसे वह कोई पुड़िया हो, फिर कुछ याद प्राया और वह उसे दुवारा खोलने लगी; लेकिन इस बार पढने के बजाय उमने उमे बंग पर ही पड़े रहने दिया। "मुन्नू," उसने कहा । "तुम इसे उन्हें दे देना~मिर्फ देना होगा, और कुछ नहीं।" उगने कागज को लपेटकर उसके हाथ में रख दिया-उसकी गीली हथेलियों के बीच, और वह उसे पकड़े रहा । उसने पूछा नहीं, कौन, बिग देना होगा? "तुम मेरे साथ नहीं मानोगी ?" "तुम्हें यूनिवर्सिटी का कॉफी हाउस मालूम है ?" उसने खिडकी मे बाहर . देखा, "मैं वहीं रहूंगी।" पागल-सा खयाल आया, वह कागज़ को फाड़ दे, उसकी चिन्दियाँ बनाकर टैक्सी की खिड़की से बाहर फेंक दे, किन्तु वह बैठा रहा । वह अगर यहां तक या गया है, तो आखिर तक जा सकता है। पहले शायद वह डर जाता, बीच में मुड़ जाता । पर बीमारी के लम्वे, अकेले दिनों में वह डर को भूल गया था। वह सिर्फ आतंक के अन्तहीन खुलेपन में आ गया था, जहां कोई ऐसा चोर- दरवाजा नहीं था, जिसे खोलकर कोई पुराना डर भीतर आ सके । वह तैयार होकर आया था। अचानक उसे अपने हाथ पर उसका स्पर्श महसूस हुआ, उसने सिर उठाया, तो उसकी आँखें दिखायी दी। "क्या सोच रहे हो ?" उसने कहा । "कुछ नहीं।" उसने आँखें मोड़ लीं। "कुछ भी नहीं होगा, मुन्नू," उसने उसका हाथ मसलते हुए कहा । "तुम सिर्फ यह चिट्ठी देकर आ जाना, वस।" "तुम मेरे साथ नहीं आ सकती ?" उसने कहा । एक क्षण सन्नाटा रहा । सिर्फ टैक्सी की धड़कन सुनायी देती रही। "मैं नहीं पा सकती।" उसके स्वर में कुछ ऐसी भीगी-सी याचना थी, जो उसने पहले कभी नहीं सुनी थी.. अस्पताल की दुपहरों में भी नहीं यह भी एक दुपहर है, जिसके बीच कुछ सुलझ रहा है, स्टूडियो और बरसाती के बाहर- दिल्ली की खुली रोशनी में । वह चिट्ठी हाथ में पकड़े बैठा रहा । बहुत पहले की रात याद ग्राने लगी-रात, डैरी का बंगला, पेड़ों के नीचे चलती हुई इरा, अपने से भीख मांगती हुई, प्रार्थना करती हुई और तव सहसा उसे लगा, छोड़ना अासान नहीं होता, न अपना घर, न दूसरे की चाहना"उसने आँखें मूंद लीं। वह सीट का सिरहाना लेकर बैठ गया। "दायीं तरफ मोड़ लीजिए," इरा ने कहा । ड्राइवर ने ब्रेक लगायी और वह झटके से उठ बैठा । वे एक चौराहे पर आकर रुक गये थे। टैक्सी एक संकरी गली में मुड़ रही थी। जल्दी में वह रोड-साइन भी नहीं देख पाया । चारों तरफ ऊसर-मैदान फैला था, भूरी झाड़ियां, उड़ती हुई धूल, धूप में चमकते हुए मकान । बीच-बीच में कोई बंगला दिखायी दे जाता, अंग्रेजों के जमाने का, पीले पलस्तर में लिपटा हुआ; कुछ दूर जाने पर कोठियों की कतार शुरू हो गयी, दोमंजिला फ्लॅट, - १४० / एक चिथड़ा सुख जिनकी घुमावदार सीढियां ऊपर जाकर जालीदार झरोखो में गायब हो जाती यो। सड़क के अन्तिम मोड पर इरा ने ड्राइवर से रोकने के लिए कहा और टैक्मी धीरे-धीरे सरकते हुए फुटपाथ से सटकर खड़ी हो गयी। एक दुमजिला सफेद इमारत सामने खड़ी थी ! फाटक खुला था। बीच दालान में तीन पहियों को एक साइकिल अपनी पीठ पर लुढ़क गयी थी, प्रागे का पहिया हवा में घूम रहा था। "यह घर है।" उमने सोचा, इरा को देखा । वह एकटक माइकिल को देख रही थी। वह उतरने लगा । दरवाजे के हैंडिल पर हाथ रखा, तो सहमा इरा ने उसका हाथ पकड लिया। प्राज बरसो बाद भी वे दो प्रखें दिखायी देती हैं~~-दो ठहरी हुई बुंदकियां, राख में चमकती हुई। "कुछ कहना है उसने सिर हिलाया। धीरे से अपना हाथ उसके हाथ से हटा लिया, "वह दूमरी मंजिल में रहते हैं। कुछ पूछे, तो कहना. तुम अकेले पाये हो।" उसने झटके से मुंह फेर लिया। “यूनिवर्सिटी।" उसने ड्राइवर से कहा पौर वह टैक्सी से बाहर निकलकर फुटपाथ पर खडा हो गया । किन्तु टैक्सी कुछ दूर जाकर ठहर गयी । वह खिडकी से मिर बाहर निकालकर उसे बुला रही थी । वह भागता हुआ उसके पास चला पाया । उसने खिडकी से हाथ बाहर निकाला और जल्दी से उसके हाथ में कुछ ढूंस दिया। "स्कूटर ले लेना और देखो वह एक क्षण रुकी, "सिर्फ चिट्ठी दे देना, कुछ कहना नहीं।" टैक्सी के जाने के बाद वह उडती धूल के बीच सहा रहा । उसने मुट्ठी खोली, उसमें मुमा हुअा एक दस का नोट या, जिसमे अब भी उसके पसीने की गरमायी चिपकी थी। ॥ .." फाटक प्राधा मुला था। भीतर एक चौड़ा प्रोगन था, जिसके कोनों में पूल, ककड़ और पते जमा हो गये थे । पत्तों को देखकर उसे हैरानी हुई, भाम-पारा कोई पेड़ नजर नहीं पाता था। मिर्फ पहर को दलती धप थी, और वीच प्रांगन में तीन पहिम्यो को । । - - साइकिल उलटी पड़ी थी। कहीं बहुत दूर कोई कुत्ता भौंक रहा था। वह चलता गया और किसी ने उसे नहीं रोका । नीचे की मंजिल सूनी पड़ी थी। वरामदे पर चिकें झूल रही थीं। वह कुछ आगे जाकर घर के पिछ- बाड़े चला पाया । वायीं तरफ एक जीना दिखायी दिया । न कोई नम्बर, न कोई नेमप्लेट । सिर्फ सीढ़ियां अँधेरे में ऊपर जा रही थीं। वह मुड़ जाना चाहता था। वह इरा से नहीं डरा था। टैक्सी में उसके हाथ से चिट्ठी लेते हुए भी उसने अपने को संभाल लिया था। लेकिन अब इस खाली जीने के आगे सहसा उसकी हिम्मत छूट गयी थी । दिल्ली में यह पहला मौका था, जब वह अकेला, विना बिट्टी के साथ कहीं गया था, वह भी अपने घर से इतना दूर; मैं यहाँ क्या कर रहा हूँ ? पराये घर के पागे, दुपहर की तितीरी धूप में पागलों की तरह चक्कर काट रहा हूँ। पीछे पैरों की आहट हुई; एक बूढ़ा भिश्ती पानी की मशक उठाये ले जा रहा था। उसने अर्से से कोई भिश्ती नहीं देखा था, और वह इतना जर्जरित; मशक के लटके मुंह से बूंद-बूंद पानी नीचे टपक रहा था । और तव न जाने क्यों-भिश्ती के धर्यशील चेहरे या नीचे टपकती पानी की बूंदों को देखकर सहसा उसके भीतर सव शान्त हो गया। उसे लगा, इसमें डर का कोई कारण नहीं है । इसमें दयनीय कुछ भी नहीं है कि वह एक पराये घर के आगे खड़ा है । यह बहुत आसान है । वह चिट्ठी देगा और वापिस लौट जायेगा। "किसे ढूंढ़ रहे हो ?" भिश्ती ने कन्धा सीधा करके उसकी ओर देखा। उसने नाम बताया, तो उसकी गहरी, धंसी आँखें ऊपर उठ गयीं, "पर रहते हैं । जीने से चढ़ जायो।" दो बूढ़ी, भीगी आँखों ने उसे निहारा था। उनमें अजीब-सी हमदर्दी थी। मैं शायद खुद बहुत अजीव दिखायी दे रहा हूँ; उसने सोचा, किन्तु इस बार वह नहीं रुका और जीने का वैनिस्टर पकड़कर सीढ़ियां चढ़ने लगा। वह एक साँस में सारी सीढ़ियां पार कर गया । ऊपर धूप का एक टुकड़ा दिखायी दिया। दो दरवाजों के बीच एक नन्हा रोशनी का तालाब ! वह साँस लेने को रुक गया। आँखें चुंधिया-सी गयीं। वह डर नीचे छोड़ पाया था लेकिन दिल की धड़कन एक खराव पंखे-सी उसके भीतर घुर्र-घुर्र करते हुए घूम रही थी। समझ में नहीं पाया, कौन-सा दरवाजा खटखटाये; दोनों एक से ही दिखायी १४२ / एक चिथड़ा सुख देते थे। न कोई घण्टी, न नाम की तस्नी, न कोई भीतर मे माती भावान । सिर्फ वाली जीने की सांप-सांप और तव उमरी मार्च रोशनदान पर पड़ी, एक काली दिल्ली वहाँ बैठी हुई उने घूर रही थी। क्यामह कोई अपमान है ? अपगगुन कमा, दिल्ली के खाली जीनों में न जाने कितनी विलिाग भनी बैठी रहती हैं। वह उसे देख रहा था, कि अचानक उमे लगा, बिल्ली पोड़ा-मा अपने भीतर मिकुड़ गयी, जसे उमने कुछ भांपा हो मोर तब उने अपने सन् पर एक बोझ-सा महमूम हुआ। "मैंने तुम्हें खिड़की मे देख लिया था।" निती भाई अपनी प्रांसो मे उने टोह रहे थे। वह देहरी पर गई थे। उनका हाथ अब भी उमके कन्धे पर था लेक्नि विल्ली बहुत पहले जा चुकी थी। वह देहरी मे हटकर दरवाजे की प्रोट में खड़े हो गये। धूप भय उनके चेहरे पर गिर रही थी। वह काले रंग का वृर्ता पहने थे । दाढी काट डाली थी... जिसके माथ उम्र भी भर गयी थी। वह साफ मोर हल्के से दिसायी दे रहे थे- लेकिन कमजोर-विना दादी के उनका चेहरा प्रजीव-मा नगा मौर गात्विक दिसायी दे रहा था। "क्या अकेले माये हो ?" "हाँ !" उमने कहा । वह प्रार्थना करने लगा, वह मागे कुछ न पू । मागे इतनी संकरी जगह थी, कि वहाँ मे न राच गुजर गवता या, न भूठ। मिर्फ कमरे से गुजरा जा सकता था। जल्दी में वह ठीक मे देस भी नही पाया, वहीं क्या है ? सिर्फ एक लम्बा-गा काउच दिसायी दिया था, दीवार से टिके हुए तीन कुरान । शीदो को पालपारी-ऊपर एक लम्बी पेन्टिग का पैनल। वह एक नजर मे सबको देख गया, किन्तु कमरे में धुंधलका था, परदे गिरे थे, इसलिए दर्ज कुछ भी नहीं किया था, सिर्फ प्रॉस फेरी थी, किन्तु इस एक धुंधले क्षण में भी कमरे की चीजें एक सुख-आराम का भाभाम देती थी । वह पहली बार दिल्ली में भरा-पुरा डाइंग रूम देख रहा था । अब तक वह मिर्फ बरसाती, स्टूडियो या होस्टल के कमरो को देखता पाया था, जहाँ चीजें गिर्फ अपनी जगह टटोलती जान पडती थी । यहाँ वे रहती थी। वह घर था। निती भाई घर में रहते थे। वह वीच में ठिठक गया। दूसरे कमरे का परदा हिला था। एक महिला बाहर आयी, वह भी उसे देखकर ठिठक गयी। उसने सोचा, वह कुछ पूछेगी। लेकिन वह सड़ी रही । एक छोटी-मीर ।
- । एक छोटी-सी जो घरेलू उतनी नहीं, सिर्फ घरवाली जान पड़ती थीं । शायद सोते हुए.उन्हा...' खटका सुना था। सांवला गोल चेहरा, माथे पर चौड़ी विन्दी, बड़ी-बड़ी आँखें: जिनमें एक अजीव-सा कौतूहल वाहर झांक रहा था। "भीतर चले पायो।" उन्होंने कहा । वह उनके साथ-साथ दूसरे कमरे के सामने चला आया। घर के अन्दरूनी हिस्से में, जहां एक छोटा-सा वरामदा था। वहां पाकर वह रुक गयीं। वरामदे की दायीं तरफ़ एक दूसरा कमरा था और उसके दरवाजे खुले थे। मुस्कराहट उनके चेहरे पर प्रायो। 'भीतर नहीं जानोगे?" और तव उसे ध्यान आया, नित्ती भाई अपने कमरे में हैं; किन्तु जब तक वह सामने खड़ी थी, उसे भीतर जाना असम्भव जान पड़ा, और वह शायद यह भांप गयीं, मुड़ गयीं, और वह अकेला देहरी के बाहर खड़ा रहा। भीतर चुप्पी थी। सारा घर एक धनी चुप्पी में डूबा था, लेकिन वह खाली नहीं थी। घर के सन्नाटे में हमेशा कुछ भरा रहता है-एक पुराने ऐटिक की तरह-- पुरानी गन्ध, टूटी आवाजों के चीथड़े, वन्द घड़ियां ! वे सब दरवाज़ी के पीछे थे, कोनों में दुवके हुए, चुप्पी के कोनों को कुतरते हुए। वह उन अदृश्य अावाजों को सुनता रहा । फिर दरवाजा खटखटाया। वह देहरी के पास ही खड़े थे, जैसे उसकी प्रतीक्षा कर रहे हों। "बैठोगे ?" उन्होंने अनिश्चित निगाहों से उसे देखा। दीवार से सटा एक पलंग था, जिस पर लाल खादी की चादर बिछी थी सामने एक कुर्सी, मेज के सामने रखी हुई । खिड़की के नीचे एक स्टूल । वह कहीं भी बैठ सकता था, किन्तु पहले क्षण वह सिर्फ खड़े रहने का ही निश्चय कर वह खुद बैठ गये। उसे देखते रहे। "कव तक खड़े रहोगे ?" "मुझे जाना है।" उसने कहा । "जब तक नहीं जाते, तब तक वैठो।" वह पलंग के छोर पर बैठ गया । वह उठे और वीरे से दरवाजा उढ़का दिया। पहली वार वह निती भाई के साथ अकेले में बैठा था। उनके बीच बहुत- सी चीजें थीं, लेकिन वे अलग थीं और एक-दूसरे को छूती नहीं थीं। उनकी उम्र १४४ / एक चिथड़ा मुख भी बहुत दूर-दूर थी-नित्ती भाई चालीग पार कर रहे थे पोर वह पौदह- पन्द्रह के वीच तटक रहा था। उन का मन्नाटा सबसे दूभर होता है। गिर्फ एक महारा था--दूसरे लोग । वे दोनों उन्हें लेकर बातें कर सकते थे। "सुम बहुत बीमार रहे ?" उन्होंने उसकी पोर देखा। "हां, लेकिन अब मैं ठीक हूँ।" उमने कहा । "क्या बात थी ?" "कुछ नहीं घुसार प्राता था।" "कसा बुखार?" "मालूम नहीं। रात को चढता था। दिन के समय उतर जाता था।" वह चुपचाप उसकी ओर देखते रहे । फिर उन्हे कुछ याद माया, यह धीरे से मुस्कराये, "मुझे भी यही होता था। मैं तुमसे छोटा था। मुश्किल मे दग वरस का रहा हूंगा, उतना ही जितना टुन्नू है।" "टुन्नू कोन ?" "वह स्कूल गया है। अभी माता होगा।" वह चुप हो गये । वह भूल गये कि वह कुछ कह रहे थे। यह नहीं पाता था कि वे चुप बैठे रहें। वह जिस माम मे पाया था, उमे मन्तिम क्षण नफ टाल देना चाहता था। "पाप कुछ कह रहे थे।" उसने कहा। उन्हे ध्यान पाया। चौक-से गये। "कुछ नही," उन्होंने चेहरे पर हाथ फेरा, एक थकी-सी मुस्कान पली प्रायी, "मेरी एक मौसी थी। जब रात को मुझे युसार प्राता, वह मेरे सिरहाने प्राकर बैठ जाती थी। पता नहीं, वुसार में तुम्हे क्या होता है ? मुझे बडी बेचनी होती थी। सिर फटने लगता था। वह मेरे पाम माकर बैठ जाती थी, मेरे सिर को सहलाते हुए कहती थी, 'अब तुम ठोक हो । अब तुम्हे कोई तया- लोफ नहीं।' वह इस बात को उस समय तक दुहराती रहती, जब तक मुझे नीद नहीं पा जाती थी।" बोलते हुए उनका कृशकाय चेहरा बहुत उजला-सा हो पाया था। पौधे खिड़की थी; अप्रैल की साफ, धुली हुई रोरानी उनके वालो पर गिर रही थी। और तब उन्हें देखते हुए अचानक उगे सपाल प्राया था कि कोई भी सटकी उन्हें चाह सकती है। मिर्फ एक क्षण के लिए यह विचार पाया था, लेकिन Hiraimaaहिनीच इतना छोटा था कि उसे चाहने की भूल-भूलैया नहीं मालूम थी, लेकिन उसका चमकीला और भेदभरा निशान उनके चेहरे पर था, जिसे देखकर वह हमेशा चकित हो जाता था। "तुम घर से पा रहे हो ?" उन्होंने पूछा। "हाँ," उसने कहा। "यह जगह काफी दूर है"तुम्हें मकान खोजने में तो मुश्किल नहीं पड़ी?" । "नहीं"मैं सीवा पा गया था।" उन्होंने आँखें ऊपर उठायीं- "किसने पता दिया था?" "इरा ने," इस बार वह झूठ नहीं बोल सका। "वह ठीक है ?" "जी," उसने कहा । उसका हाथ जेव में गया; दस रुपये का नोट, कुछ रेजगारी, वरसाती की डुप्लीकेट चाभी, सबके बीच टटोलते हुए उसकी अँगुलियाँ कागज पर थिर हो गयीं। वह रुका रहा । कोई चीज़ उसे रोके रही। वे दोनों एक दूसरे को देख रहे थे। "विट्टी कैसी है ?" उन्होंने पूछा । "ठीक है," उसने कहा, फिर कुछ याद आया, "आप बहुत दिनों से स्टूडियो में नहीं पाये ?" "किसलिए?" "पाप पहले पाते थे।" उसने कहा। "बहुत दिन पहले !" उन्होंने कहा। एक रूखी-सी मुस्कराहट होंठों : र चली पायी, "तुमने एक बार मुझमे स्ट्रिनबर्ग के बारे में पूछा था- याद है ?" उसने सिर हिलाया । उसे खुशी हुई कि उन्हें अभी तक वह बात याद है । "मैं उस दिन आपके घर गया था.'" वह कुछ झिझका । वह भी मुस्कराने लगे। वे अचानक उस शाम के पास आ गये थे। वह उन दोनों के बीच सुरक्षित थी।-वे मार्च के दिन थे और वह बिट्टी और डरी के साथ उनके घर गया था। बाथरूम की खिड़की से बारहखम्बा की रोगनियां देखी थीं-वहीं पर इरा के कपड़े भी देखे थे। टव के ऊपर हैंगर पर लटके हुए; कुछ चीजें हमेशा के लिए जीवित रह जाती हैं । समय उन्हें १४६ / एक चिथड़ा सुख ।
ही सोखता-वे सुद ममय को सोसती रहती है। "माप अब उस घर में नहीं जाते ?" नित्ती भाई कुछ मोच रहे थे, महसा चौरमे गये। "बहुत कम," उन्होंने कहा। फिर धीरे से हम पडे, "जय नीद नही माती, यहां सोने चला जाता हूँ।" "मिर्फ मोने के लिए" उसने निनी भाई को देवा । वह निराजन ये-मान जि पर रसे कागजो पर भुकी थी। वह हसते भी थे, तो भी गमूचा चेहरा एक हरी, टण्डी मतह पर जमा रहता था। विट्टी के दोस्ती में मिर्फ वही एक. थे, जन्हें देखकर न दुख समझ मे पाता था, न मुख । उन्हे देखकर यह नहीं लगता गा, कि वे कुछ ढूंढ रहे हैं, उलटे नगता था, उन्हें कोई ढूंढ रहा है-पार वह प्रभी तक बचे हैं । कुछ लोगो को अकेले ही छोड़ देना चाहिए । मगर वे उन्हें पूरी तरह अकेला छोड दें, तो ये भासिर तक बचे रहते हैं। पहली बार इच्छा हुई, नित्ती भाई गे कुछ पूछ । कोई सवाल । कोई ऐमा सवाल, जिगका उत्तर यह अपनी डायरी मे लिखकर इसाहाबाद ले जा सके. "नित्ती भाई !" उसने कहा । वह उसे देखने लगे। अचानक यह शर्म मे गड-मा गया। वह उनके अकेलेपन के लिए प्रार्थना कर रहा था, जबकि उनकी पाखें कुछ सोजने के लिए उसे देख रही थीं, मानो पूछ रही हो, 'क्यों आये हो, तुम्हे किमने यहाँ भेजा है '' वह उनसे नहीं, निती भाई उससे सवाल पूछ रहे थे मोर उसके पास देने के लिए एक कागज का टुकडा था।... "क्या बात है मुन्नू ?" नित्तो भाई पागे को भोर झुक माये, उसके माथे पर हाथ रसा, "तुम ठीक तो हो?" क्या वह भाग सकता है ? घर नहीं, स्टेशन की तरफ वही रो इलाहाबाद और फिर, उसके बाद? वह भागे नहीं सोच सका । जेव में हाथ डालकर चिट्ठी बाहर निकाली। यह गमय है, उसने सोचा । अब नहीं दूंगा, तो कभी नहीं दे मगा। उसने मुड़े हुए कागज को मेज पर रस दिया । "यह इरा ने प्रापके लिए दी थी।" उसने कहा। नित्ती भाई ने उगे देखा, फिर मेज से चिट्ठी को उठा लिश, गोला नही, हाथ में लिये बैठे रहे, दुबारा उसकी मोर देखा मोर फिर पूछा, "क्या?" ru - वह तुमसे मिली थी ?" "जी," उसने कहा। "कुछ कहा था ?" "नहीं, कहा कुछ नहीं। सिर्फ यह चिट्ठी दी थी।" कितना आसान था, उसने सोचा । मैं इतनी देर से यूं ही डर रहा था । डर कुछ भी नहीं है, मेरा वहम, कागज का एक टुकड़ा, दिल्ली की दुपहर; उसके परे मैं खाली हूँ। मैं हल्का हो गया हूं। मैंने अपनी जिम्मेदारी से हाथ धो लिया है। वह सचमुच बहुत छोटी चिट्ठी रही होगी। उसे कब पढ़ लिया, कव मेज पर रख दिया, कब वह खिड़की के सामने आ खड़े हुए, उसे कुछ भी पता नहीं चला। जब वह बहुत देर तक कुछ नहीं बोले, तो वह उठ खड़ा हुआ। "नित्ती भाई ?" उसने कहा, "मैं अब चलता हूँ।" वह शायद समझे नहीं। उसकी ओर देखा और तव एक अजीब-से विस्मय ने उसे पकड़ लिया। नित्ती भाई की आंखों में कोई पहचान नहीं थी। वह उसे ऐसे देख रहे थे, जैसे वह एक खाली कुर्सी हो, खाली हवा, खाली जगह । लेकिन यह गलत है । यह मेरा भ्रम है । वह जानते हैं, मैं उनके सामने हूं, लेकिन मैं अब अलग नहीं हूँ, मैं मुन्न नहीं हूँ। मैं उस चिट्ठी का हिस्सा बन गया हूँ, जो उन्होंने पढ़ी है। मैं चिट्ठी हूँ। मैं वह खबर हूँ, जो कागज की तहों में वन्द थी। अब वह वाहर आ गयी है और वह उसे वैसे ही देख रहे हैं जैसे दुर्घटना के बाद प्रादमी सुन्न अांखों से आसपास की दुनिया को देखता है, खून में लिथड़ी मिट्टी, मिट्टी में लिसलिसा जरुम, भीड़ के चेहरे, मैं उनने छिटककर दुनिया का हिस्सा बन गया था." फिर ध्यान टूटा । वह जैसे होश में आये, जल्दी से उन्होंने चिट्ठी को मेज के कागजों के नीचे दवा दिया। दरवाजे पर हल्की-सी आहट हुई । परदा हिला और कमरे में एक छांह-सी घिर आयी। वह दरवाजे पर खड़ी थी, एक नीरव क्षण तक दोनों को देखती रहीं। "इनसे पूछो, चाय या शर्वत लेंगे?" उन्होंने नित्ती भाई से पूछा। "मुझे जाना है।" वह जल्दी में उठ खड़ा हुआ । किन्तु उनकी आँखों में कोई जल्दी नहीं थी। साड़ी का पल्लू ऊपर खिंच आया था, बांह पर चूड़ियां झूल रही थीं। चेहरे पर एक दवा-सा कौतूहल था । कमरे की दुपहर छ प्रांखों में सिमट पायी थी, एक दूसरे पर टिकी हुई। १४८ / एक चिथड़ा सुख "माप कुछ लेंगे?" उन्होंने निती भाई से दुवारा पूछा। "नहीं, अभी कुछ नहीं ।" उन्होंने कुछ इतने धीमे से कहा, जैसे कमरे में सिर्फ उनकी पत्नी हों, जिसे सिर्फ वह समझ सकती है। घर की एक मायाज में कितनी तहें जमी होती हैं, जिन्हें बाहर का मादमी सुनकर भी कभी नही समझ पाता "वरमों से जमी परतें, जो सिर्फ उनके लिए ही गुलती हैं, जो उनके भीतर जीते हैं। हो, यह उनकी पत्नी थी। वह उसे देख रही थी, और तब उसे लगा, जैसे वह सब जानती थी, वह एक क्षण के लिए मुस्करायी थी, जिसमें वह शामिल था। इरा और बिट्टी मे अलग, वह घर की औरत थी, जिन्हे बाहर नहीं माना होता, जो घर की खिडकी से सव ऊंच-नीच देख लेती हैं, मोर तब न जाने क्यों, उसे वह बिल्ली याद पायी, जिसे जीने के अंधेरे मे देखा था'न घरेलू, न धनेली, दोनों के बीच अपनी उत्तप्त और उत्मक प्रखिो से घूरती हुई." वह लौट गयी । लेकिन वह खडा रहा। दुवारा बैठने की हिम्मत नहीं हुई। यह घर, वह कमरा, वह दुपहर, मानो सय उरा पोरत के साथ थे । वह सबको अपने साथ समेटकर चली गयी थी । अब कुछ नही था। उमने निट्टी दे दी थी अब कुछ भी करने को नहीं बचा था। "मैं अब जाऊँगा।" उसने कहा । नित्ती भाई कुर्सी से हिले, "ठहरो, मैं तुम्हारे साथ आता हूँ।" वह उठ खड़े हुए । अव सवबुछ पहले जैसा हो पाया था । उनकी कुर्सी, मेज पर रखे कागज, कागजो के नीचे दबा कागज ; वे दुर्घटना की हकबकापी दुनिया से निकल आये थे । अप्रैल की एक शान्त दुपहर, सफेद फीकी-मी रोवानी, सूरज पडोस की छतो पर ठुलक प्राया था। वह दरवाजे की तरफ बढ़ा, फिर पांव रुक गये । एक हल्की धीमी-मी प्रायाज़ सुनायी दी । कोई दूसरे कमरे मे माउथ-प्रार्गन बजा रहा था, इतनी मन्द और धीमी ट्यून, जिसे अगर ध्यान से न सुनो, लगता था जैगे वह मन्नाटे का ही स्वर है। चुप्पी के हाशिये पर चलता हुप्रा । "यह टुन्नू है," नित्ती भाई ने उसकी पोर झंपती निगाहों से देखा, "हर रोज स्कूल से लौटने के बाद बजाता है।" उसने नित्ती भाई को देखा; एक क्षण के लिए विश्वास नहीं हो सका, वह वाप हैं । यह उनका घर है । एक सूनी, सुपड गृहस्थी, जिमका उप प्रादमी में कोई रिश्ता नहीं, जो एक दुपहर स्टूडियो के अंधेरे मे बैठे थे। - , "पाप वैठिए, मैं अब चला जाऊँगा।" उसने कहा। नित्ती भाई उसके पीछे खड़े थे, दरवाजा खुला था, उसके पीछे एक और छाया थी, अपनी मूक आँखों से उसे निहारती हुई। "ठहरो, मैं बत्ती जला देता हूं। यहां सीढ़ियों पर अंधेरा रहता है।" नित्ती भाई जीने की सीढ़ियों तक चले आये, बत्ती जलायी, उसने सिर उठाया, वही संन्यासियों-मी उत्तप्त, निश्चल आँखें उस पर टिकी थीं। 'पापको कुछ कहना हो, तो मैं बता दूंगा।" उसने धीमे स्वर में कहा । उन्होंने उसके कन्धे पर हाथ रखा। "नहीं, कुछ नहीं।" उन्होंने कहा। फिर एक क्षण ठिठके, "प्रीमियर के दिन तो प्रायोगे?" "हा..'नीर प्राप ?" "मैं तुम्हारे साथ वैलूंगा." वह धीमे से हँसे । "हम एक साथ स्ट्रिनवर्ग देखेंगे।" - उनकी हमी अब भी याद आती है । क्यों कहा था उन्होंने, जब उन्हें नहीं आना था-या शायद उस समय उन्हें कुछ मालूम नहीं था। उस समय उन्होंने कोई फैसला नहीं लिया था। वह सीढ़ियां उतरने लगा, फिर ठहर गया, वीच जीन के मिलावी उजाले में उसकी आँखें मुड़ गयी, कोई नहीं था, सीढ़ियां खाली पड़ी थीं, सिर्फ एक हल्की, बीमी-सी धुन नीचे उतर रही थी, माउथ-प्रार्गन की यात्राज़, जीने के अंधेरे कोनों में रिसती, रेंगती हुई एक फिल्मी ट्यून, जो आखिरी सीढ़ी तक उसके साथ चलती रही, जब तक वह बाहर उजाले में नहीं आ गया। - १५० / एक चिथड़ा सुख ११ - बरमो बाद भी जब वह आधी रात के समय फोन को घण्टी सुनता है, तो उचक- कर बैठ जाता है। दिल्ली की गयी-बीती रात लोट पाती है । दीवार पर टार्च का एक धव्या दिखायी देता है, जिसमे मदर टेरेमा की तस्वीर उभर पाती है, जिसमें वह दो कोढी, भिखारी लडकियो के साथ बैठी हैं। लडकियो मुम्करा रही हैं, मदर टेरेमा हवा में दोनों हाथ उठाये पर देख रही हैं । पता नही, कहाँ देख रही हैं। उसे लगता है, वह मिसेज़ पन्त को देख रही हैं । वह टार्न लेकर छत पर पायी थी । उनके पीछे पहाडी नौकर पाया था, नौकर के पीछे कुन; कुत्ते पहली बार छत पर आये थे। वे बहुत खुश और उत्तेजित थे। एक ने टांग उठा- कर गमले के पौधे को मीचा, दूसरा टेक के नीचे पडी वियर को साली बोतलो को सूंघ रहा था। गिसेज़ पन्त के एक हाथ मे छड़ी थी, जिसके सहारे वह सीढियां चढकर आयी थीं। दूसरे हाथ में टाचं, निमे वह वरसाती के भीतर घुमा रही थी और रोशनी का धब्बा दीवार पर मरकता हुमा अखवार के फोटो पर अटक गया था। लेकिन यह सो नही रहा था। वह सबकुछ देख रहा था। पिछली तीन रातों में एक अद्भुत चीज़ हुई थी, बुखार चला गया था। लेकिन जाते-जाते उसकी नीद को भी ले गया था। वह जागता रहता। प्रांखें मूंदे लेटा रहता। मूहों के पीछे विट्टी की सांस सुनायी देती । वह यकी-मांदी स्टूडियो से घर लौटती, खाना बनाती और बिस्तर पर पसर जाती। डरी अब भी मोटर साइकिल पर उसे छोडने पाते थे, लेकिन अब वह ऊपर नहीं पाते थे। वह अपने कमरे में लेटा रहता और मोटर साइकिल की पुरपुराती प्रावान धीरे- धीरे अंधेरे में खो जाती। रातें चमकीली हो रही थी ! चांदनी में कमरे की चीजें माफ-माफ दिसायी देती- 1- उमका सूटकेस, होल्डाल, थला । उसकी नोटबुक । उमके मैले कपडे !
एक तरफ धुले हुए कपड़े दूसरी तरफ । मूड़े के पीछे विट्टी को चीजें, पिता, रिकार्ड प्लेयर । मूड़ों का पार्टीशन । बाहर सेमल का पेड़ अप्रैल को हवा में फरफराता और जव पत्ते छत पर गिरते तो हल्ली-सी बावाज होती; दूसरी आवाज होती; फिर आवाजेंचुप हो जाती और पत्ते हवा को सुंघते हुए बरसाती के पायदान पर चले जाते। वह आधी नींद के परे रेल की सीटी सुनता । फिर सन्नाटा हो जाता। लेकिन हर रात, साधी रात की घड़ी में, कोई चिमगादड़ मकबरे के गुम्बद से , बाहर निकल आता, छत पर शरावी-सा डोलता, चांदनी के किसी काले स्वप्न- सा मंडराता रहता और फिर किसी दीवार से चिपक जाता। ऐसा हर रात होता था। वह चिमगादड़ों को पहचानने लगा था। वे सब मिशनरी हन्टर की किताब के पन्नों से बाहर आते, चिमगादड़, रेल की सीटी, विट्टी की सांसें, मोटर साइकिल की गुर्राहट " और बूढ़े पैन्धर के पीछे-पीछे पत्तों को रौंदते हुए उसके विस्तर के आसपास खड़े हो जाते। नींद फिर भी नहीं आती थी। ऐसी ही एक जागती घड़ी में उसने फोन की घण्टी सुनी थी। मिसेज़ पन्त के बरामदे से उसकी आवाज़ ऊपर बरसाती तक आ रही थी। एक चीखती, रिरियाती-सी आवाज़ । फिर वह बन्द हो गयी, बरामदे की बत्ती जली और कुछ देर बाद जीने पर पैरों की आहट सुनायी दी। मिसेज पन्त अपनी टार्च चारों ओर घुमा रही थीं, कुत्ते उनके आगे-पीछे दौड़ रहे थे। यह पहला मौका था, जब वह ऊपर पायी थीं-एक बड़ी बूढ़ी औरत. पीला, झुरियों भरा चेहरा, सिर्फ एक लहँगा और ब्लाउज पहने, सिर के सफेद बाल हवा में उड़ते हुए; वह मकान-मालकिन नहीं, एक जादूगरनी-सी दिसायी दे रही थीं, आधी रात की घड़ी में अपनी लाठी खटखटाती हुई, वह तरसाती के खुले दरवाजे के प्रागे या खड़ी हुई थीं। "कहाँ है तुम्हारी कज़िन ?" ही टार्च की रोशनी उसके चेहरे पर गडा दी। - , - "कैसा फोन?' "मुझे क्या मालूम, कैसा फोन "माघी रात को तुम्हें शौन दुनाला है, यह मैं जानूंगी ?" टार्च की रोशनी मे बिट्टी का चेहरा, छत पर घूमते कुत्ते, देहरी पर सड़ी मिमेज पन्त -यह स्वप्न नहीं था । लेकिन सच भी नहीं था। वह दरवाजे में अलग, छत पर खड़ा था। बिट्टी भीतर गयी; चप्पर घसीटते हुए बाहर पापी, सीढ़ियां उतरने लगी। उसके पीछे मिसेज पल जा रही थीं, मिसेज पन्त के पीछे कुत्त; कुछ देर में छत खाली हो गयी । वहाँ अव भोई नहीं था। कोई नहीं था। सिर्फ वह था, जो अब 'मैं हूँ,बिट्टी को नीचे जाना देखता हुआ जीव; खाली छत के सन्नाटे में खड़ा हुमा । दुर्घटना की भी एक मारमा होती है, यह मैंने उस रात देखा था। देखा था, मह में ठीक कहता हूं, क्योकि उसकी गन्य ग्रामपास को चीजों को भी पता चल जाती है और वे अपनी-अपनी जगह से उठकर तुम्हें घेर लेती हैं और तुम उन्हें हकी-बकी निगाहो मे ऐसे देखते हो जैसे उन्हें पहले कभी नहीं देखा, जैसे उन्हें पहली बार देख रहे हो-दुर्घटना की खबर बाद में पता चलती है, उसके गवाह पहले जुट जाते हैं, मैं प्राज भी उन्हें याद कर सकता हूं, क्योकि वह रात, जब फोन पाया था, भन्य रातो मे अचानक अलग छिटक गयी है, उस रात की अपनी छन है, पपना प्राकाश, अपना सन्नाटा; ये सब गवाह हैं, जो मेरे साप थे; मैं उन्हें याद कर सकता हूँ, क्योंकि ऐन दुर्घटना के वक्त बाकी दुनिया बुझ जाती है, अमे बाद के पानी में सबकुछ डूब जाता है, पता भी नहीं चलना, यहां कोई रहता था, जीता या, कोई वस्ती थी, कोई घर “सब नीचे गुम हो जाते हैं। गुम हो जाते हैं, दिखते नही, लेकिन रहते हैं, पानी के नीचे एक दूसरी जिन्दगी चलती है, जिसमे मैं भी था । मैं ऊपर भी था, नीचे भी। में पानी के नीचे दूसरी जमीन पर चलता हुना अपने को पाताल के अंधेरे तल से ऊपर देख रहा था, जहां वह छन पर खड़ा था, वह लड़का, हवा में ठिठुला हुआ, प्रतीक्षा करता हुमा... ऊपर, छत पर, सेमल के पेड़ तले, मुंडेर से सटी वह सड़ी यी-निश्चल। "बिट्टी, किमका फोन था ? किसने तुम्हें बुलाया था?" वह मुडी नहीं, सिर्फ उसका हाथ पकड़ लिया, कमकर, एक कमी हुई ठण्डी पकड़, जो खून को बर्फ कर देती है, एक सफेद जमे हुए मौन पर गंगी मारों मंधेरे को लीलते हुए ऊपर उठती हैं, होंठ फड़फड़ाते हैं, किन्तु शब्द एक भी बाहर नहीं निकलता; उसके सिर के पीछे मेमल का पेड सिर हिलाता है, पीली शाखानों के बीच दो आँखें नीचे झांकती हैं, गुलेल का काला बढ़ साँप-या भूलता है, हवा में सिरसिराता हुअा, धीरे से फुसफुसाता हुआ मैंने तुमसे क्या कहा था? - पागल लड़की; देखती नहीं, वे खेल रहे हैं। वे.बहुत ऊपर घास के टापू पर हैं; वे स्टिनवर्ग का ड्रामा नहीं कर रहे, वे एक पिछली जिन्दगी दुहरा रहे हैं, झाड़ियों के पीछे, चांदनी के घरों में चलते हुए, सरसराते पत्तों के बीच, जहाँ उस शाम इरा ने अपने से बोलते हुए एक सत्य बाहर निकाला था, तुम्हारे चाकू की नोक से ज्यादा सच, ज्यादा तेज, ज्यादा असली, उसे कागज़ के एक टुकड़े पर लिखा था और तब एक चमत्कार हुआ था- चमत्कार; मैंने उसे देखा था; नित्ती भाई को उसे दिया था और नित्ती भाई, जो बग्मों में अपना रोल भूल गये थे, उन्हें उस पुरजे को पढ़कर अचानक अपना पार्ट याद हो पाया था। उन्हें मालूम था, उन्हें क्या करना है। उन्होंने कुछ ऐसा किया, जो बिट्टी और उसके दोस्त कभी नहीं कर सके। वह बाहर या गये थे। वह टब के पानी में लेटे थे । - - ऐमी ही एक गत में टैक्सी लूंगा। वह रात भी नहीं होगी, सुवह होने से पहले का अंधेरा, जब पाकाग में तारों की जगह सिर्फ शीतला देवी के दाग टिमकते हैं। मैं बिट्टी के माथ सीढ़ियां उतरूंगा, मिसेज पन्त और उनके कुत्ते चुपचाप हमें बाहर निकलता हुअा देखेंगे; मैं उन्हीं सड़कों से गुजरंगा, जिन पर बरसों पहले विट्टी के माथ गुजरा था । निजामुद्दीन का पुलिस स्टेगन, पुराने मकबरों के ग्वेंडहर, डा० जाकिर हुसैन रोड की लम्बी, अन्तहीन सड़क, इण्डिया गेट, अंधेरे में सुलगती अनात सैनिक की लौ... बह टैक्मी में चुप बैठी थी, पत्थर-सी बैजान, चेहरा खिड़की के शीशे से चिपका था, न वाहर देख रही थी, न भीतर । उसने आखिर तक मुझे कुछ नहीं बताया । उसने सबकुछ मुझ पर छोड़ दिया था। यह ठीक था। मैं अपनी आंखों से देख रहा था; हम टैक्सी से नीचे उतरे थे, प्लाजा के पीछे अंधेरी गली में | नित्ती भाई के फ्लैट के आगे एक छोटी- सी भीड़ जमा थी। पता नहीं, आधी रात की इस घड़ी में वे कौन-से बिलों से निकलकर वहाँ पा गये थे 1 वे एक कोने में खड़े ऊपर देख रहे थे। किसी ने उन्हें नहीं रोका। सिर्फ सीढ़ियों पर किसी अजनबी आदमी ने उन्हें टोका था- १५४ / एक चिथड़ा सुख "देखकर चढिएगा। पानी यह रहा है।" सीढ़ियों पर पानी, सुख, गुनाशे रंग का मला परनामा पुल पोरगिट्टी में भरे चबच्चों से बचते हुए वे ऊपर माये ये भोर तब उसे उस राा पापो यार झटका-मा लगा; नित्ती भाई के फ्लैट का दरयाजा किसी पणिक दार की तरह खुला था, कोई भी भीतर जा सकता या, हर कमरे की यतो जरा रही थी कमरे में पड़ी चीजें वही थी, जिन्हे उसने बहुत दिन पहले एक नाग देता था, नित्ती भाई का ड्राइंग बोर्ड, सिडको के पास सहा ऊंचा रस, किताबोंबी आलमारी-लेकिन अब वे नंगो, उघडी पड़ी थी और ये पोरों की तरह उनके बीच खड़े थे, खाली रोशनी में चमचमाता समूचा पट, न कोई मायारा, न गोर, सिर्फ एक वासी, तीखो गन्ध हवा में ठहरी थी, पानी में भीगी दरियों और कालीनों से ऊपर उठनी हुई वह रात बार-बार लौट पाती है । वह ममिट है। यह एक प्रेम है, जिसके भीतर दिल्ली में बिताये तीन महीने एक तस्वीर की तरह गड गये हैं। मैं व चाहूँ, उस फेम को उठा सकता हूँ, हर कोने से उसे देख सकता हूँ, यहाँ गमय ठहर गमा है; वहाँ वे ठहर गये हैं, विट्टी के दोस्त, वहाँ सब चलती सुक्ष्पा एक. दूसरे से बिंध गयी हैं, विधा हुमा बूढा समय एक ठौर पौर टियाना पा गया है। चौराहे पर खड़े सिपाही ने दोनो हाथ उठाकर हम सबको रोक लिया है नारि दुर्घटना की घड़ी को हूबहू दर्ज किया जा सके, पता चल सके, कौन मनन था, कौन ठीक । "और तब मुझे लगा जैसे दुनिया में अगली जगह " मिपंग की जगह है, यहां सब बत्तियां जली रहती हैं। यहां पुराने फैमलों के पंच दिनों रहते हैं, उस कबूतर की तरह, जिसे बिल्ली, नोच-नोंचकर फेंक देती है. पंन्द अलग, पंजे अलग, सिलावी-मा खून जहाँ पर बहता है. बूंद-बूंद मोरिने पर उतरता है, बाहर जाता है। कोई उसे रोकता नहीं।" हल्की-सी आवाज़ हुई । घर के सन्नाटे में पहली पावा; ट्रिी खड़ी रही; पहले घर की चुप्पी असाधारण जान पटी पी, भवरमार कुछ देर तक वे नित्ती भाई की चीजों को पूरते रहे। वे न्दिर से कि उसके पीछे कोई चल रहा था। अगर घर की नोई माता होती तरह चलती, अदृश्य और सर्वव्यापी, सब चीरो ने जुही हुई. अकेली; मैं वहाँ से चला जाना चाहता था। पहली बार मानस चाहता था। लेकिन उस क्षण धापरूम का दरवाजा खुमा मोरया उन्होने बिट्टी को देखा, फिर मुझे, वह मागे वह मानको बारेमा - शाखाओं के बीच दो आँखें नीचे झांकती हैं, गुलेल का काला रबड़ सांप-सा भूलता है, हवा में सिरसिराता हुया, धीरे से फुसफुसाता हुना''मैंने तुमसे क्या कहा था? + पागल लड़की; देखती नहीं, वे खेल रहे हैं। वे बहुत: ऊपर घास के टापू पर हैं; वे स्ट्रिनवर्ग का ड्रामा नहीं कर रहे, वे एक पिछली. ज़िन्दगी दुहरा रहे हैं, झाड़ियों के पीछे, चांदनी के घेरों में चलते हुए, सरसराते पत्तों के बीच, जहाँ उस शाम इरा ने अपने से बोलते हुए एक सत्य बाहर निकाला था, तुम्हारे चाकू की नोक से ज्यादा सच, ज्यादा तेज़, ज्यादा असली, उसे कागज़ के एक टुकड़े पर लिखा था और तब एक चमत्कार हुआ था- चमत्कार; मैंने उसे देखा था; नित्ती भाई को उसे. दिया था और नित्ती भाई, जो बरसों से अपना रोल भूल गये थे, उन्हें उस पुरजे को पढ़कर अचानक अपना पार्ट याद हो पाया था। उन्हें मालूम था, उन्हें क्या करना है। उन्होंने कुछ ऐसा किया, जो बिट्टी और उसके दोस्त कभी नहीं कर सके। वह बाहर आ गये थे। वह टब के पानी में लेटे थे । momen । ऐसी ही एक गत मैं टैक्सी लूंगा। वह रात भी नहीं होगी, सुवह होने से पहले का अंधेरा, जव अाकाश में तारों की जगह सिर्फ शीतला देवी के दाग टिमकते हैं। मैं बिट्टी के साथ सीढ़ियां उतरूंगा, मिसेज़ पन्त और उनके कुत्ते चुपचाप हमें बाहर निकलता हुआ देखेंगे; मैं उन्हीं सड़कों से गुज़रूँगा, जिन पर बरसों पहले बिट्टी के साथ गुजरा था । निजामुद्दीन का पुलिस स्टेशन, पुराने मकबरों के खंडहर, डा० जाकिर हुसैन रोड की लम्बी, अन्तहीन सड़का, इण्डिया गेट, अंधेरे में सुलगती अज्ञात सैनिक की लो... वह टैक्सी में चुप बैठी थी, पत्थर-सी वेजान, चेहरा खिड़की के शीशे से चिपका था, न वाहर देख रही थी, न भीतर । उसने आखिर तक मुझे कुछ नहीं बताया । उसने सवकुछ मुझ पर छोड़ दिया था। यह ठीक था। मैं अपनी आँखों से देख रहा था; हम टैक्सी से नीचे उतरे थे, प्लाजा के पीछे अंधेरी गली में । नित्ती भाई के फ्लैट के आगे एक छोटी- सी भीड़ जमा थी। पता नहीं, आधी रात की इस घड़ी में वे कौन-से विलों से निकलकर वहां आ गये थे। वे एक कोने में खड़े ऊपर देख रहे थे। किसी ने उन्हें नहीं रोका। सिर्फ सीढ़ियों पर किसी अजनवी प्रादमी ने उन्हें टोका था- १५४ / एक चिथड़ा सुख -- ।
"देखकर दिएगा। पानी बह रहा है।" सीढ़ियों पर पानी, सुखं, गुलाबी रंग का मला परनाला; धूल और मिट्टी मे भरे चबच्चों में बवते हुए वे पर प्राय थे और तब उमे उम रान पहली बार झटका.मा लगा, नित्ती भाई के पट का दरवाजा किसी पब्लिक पर पो तरह खुला था, कोई भी भीतर जा सकता था, हर कमरे की बनी जल रही यो; कमरे में पड़ी चीजें वही थी, जिन्हें उमने वहुत दिन पहले एक गाम देना था, निती भाई का लाइंग बोर्ड, खिड़की के पास यहा ऊंचा स्क, किताबों को मालमारी-लेकिन अब वे नगी, उघडी पड़ी थी और वैचोरो को तरह उनके बीच खड़े थे, साली रोगनी मे चमचमाता मभूचा फ्लैट, न कोई मावास, न मोर, सिर्फ एक बासी, तीखी गन्ध वा में रही थी, पानी में भीगो दरियों और कालीनी में अपर उटती हुई. वह रात बार-बार लौट भाती है । वह मभिट है । यह एक प्रेम है, जिमफे भीतर दिल्ली में विताये तीन महीने एक तस्वीर की तरह जद गये हैं, मैं जब चाहूं, उस फ्रेम को उठा सकता हूँ, हर कोने से उसे देख सकता हूँ, वहाँ समय ठहर गया है। वहाँ वे ठहर गये हैं, विट्टी के दोस्त; वहाँ भब बातो सुइयो एक. दूसरे से विध गयी हैं, बिंधा हुमा बूटा समय एक टौर पौर ठिकाना पा गया है, चौराहे पर पड़े सिपाही ने दोनों हाथ उठाकर हम मवको रोक लिया है ताकि दुर्घटना की घड़ी को हूबहू दर्ज किया जा सके, पता चल सकें, कौन गलत पा, कोन ठीक । “और तब मुझे लगा जैसे दुनिया में अगली जगह "सिर्फ दुर्घटना की जगह है, वहाँ मव बत्तियां जली रहती हैं। यहां पुराने फसलों के पंग विखरे रहते हैं, उस बचूनर की तरह, जिसे बिल्ली, नोंच-नोचकर फेंक देती है, पाल अलग, पंजे अलग, मिनावी-सा खून जहाँ पर वहता है, यूंद-बूंद सीढियों पर उतरता है, बाहर जाता है। कोई उसे रोकता नहीं।" हल्की-मी आवाज हुई। घर में सन्नाटे में पहली मायाज; बिट्टी टिटकी सही रही; पहले घर की चुप्पो असाधारण जान पड़ी थी, अब यह मावा । कुछ देर तक वे निती भाई को चीडों को घूरते रहे। वे स्थिर पी। लेकिन उसके पीछे कोई बन रहा था। अगर घर को कोई मात्मा होती, वो मायद इगी तरह चलती, अदृश्य और मवंच्यापी, सब चीजों से जुड़ी हुई, लेकिन अपने में अकेली; मैं वहाँ में चला जाना चाहता था। पहली बार प्रांखें मूंदकर मुड गाना चाहता था । लेकिन उन साग बायस्म का दरवाजा खुला और हरी बाहर उन्होंने चिट्टी को देखा, फिर मुझे, वह आगे बढ़ पाये । उनको चामोडमी मुड़े हुए झूल रही थीं, पर नंगे थे, पानी और कीचड़े में लिथड़े हुए, पैट के पांवचे ऊपर थे"विट्टी ने शायद यह कुछ नहीं देखा, उसने सिर्फ डरी को देखा था; उनके वदहवास चेहरे को, और वह उनके पास चली आयी थी, उनकी वाहों को हिला रही थी, उनकी आंखों को टटोल रही थी, जैसे वह अभी तक इसी क्षण की प्रतीक्षा कर रही हो; वह शायद उसे कुछ कहना चाहते थे, लेकिन विट्टी ने अपना सिर उनके कन्धों में दबोच लिया था, बीच के दुखों, झगड़ों, आंसुओं के परे, जहाँ वे इस क्षण खड़े थे और उनके पास कहने को कुछ नहीं बचा था। बिट्टी ने सिर उठाया, कुछ देर तक सूनी आंखों से डैरी को देखती रही। "इरा को खबर दी थी ?" "वह आती होगी।" डैरी ने सिर उठाया, तो सुबह का मैला उजाला उनके चेहरे पर सिमट पाया । लगता था, वह रात भर नहीं सोये। बिट्टी अव भी उनकी आंखों में कुछ हूंढ़ रही थी। "तुम्हें कैरो मालूम हुआ ?" "चौकीदार ने फोन किया था।" "चौकीदार ने ?" "वह कल रात यहां आये थे। चौकीदार ने उनका कमरा साफ किया.. कहने लगे, कुछ दिन यहां रहेंगे। दिन भर काम करते रहे, रात को खाना भी मंगवाया था।" "तुम्हें कब पता चला ?" "दो घण्टे पहले, जव तुम्हें फोन किया था"चौकीदार ने देखा, पानी सीढ़ियों पर बह रहा है। उसने सोचा, शायद वह वाथरूम का नल बन्द करना भूल गये हैं, वह ऊपर गया। देर तक दरवाजा खटखटाता रहा, लेकिन भीतर से कोई आवाज़ सुनायी नहीं दी; उसे सिर्फ मेरा नम्बर मालूम था।" "उन्हें खबर दे दी थी?" "किन्हें ?" । उनकी पत्नी को।' डैरी चुप रहे; फिर संभलकर विट्टी को देखा- "अभी नहीं"उन्हें इस तरह देखना ठीक नहीं होगा।" "वह..." "हां, वह अभी वहाँ हैं।" "तुमने उठाया नहीं ?" १५६ / एक चिथड़ा मुख "पुलिम के आने से पहले नहीं"उन्होंने कुछ भी करने से मना दिया है।" उस क्षण दोनों ने मुझे देसा; मैं विट्टी के पीछे पड़ा या" देर असमंजम मे खड़े रहे; नहीं, अब वे मुझे अलग नहीं रख सकते थे। मैं उनके साय था; मैं पाखिर तक उनके साथ घिमटता गया। बाथरूम का खुला दरवाजा और वहाँ निती भाई की जानी-पहचानी चीजे दिखायी दी। मैं वहाँ एक माम माया था; उस दिन वहाँ इरा के कपड़े रखे धे, उमके क्लिप, मिगरेट की डिब्बी, मूखते हुए अण्डरवियर, कोने में माहियों का ढेर; अब वहां कुछ नही था, अब वहां सिर्फ टय मे भरा पानी या, जो टब के बाहर बहता हुआ फर्श पर जमा हो गया था। वह टब में लेटे थे। वह खुली प्रसो से हमें निहार रहे थे, एक हल्का-मा विस्मय उनमे था, मानो उन्हें किसी बात पर घोर, अनिर्वचनीय पाश्चर्य हो और वह उसे हमें बताना चाहते हों; उनका एक हाथ पानी में था, दूसरा टब के किनारे पर, जहाँ शेव करने का ब्लेड रखा था, माफ, चमकता हुमा, जिसकी धार पर खून का एक धब्बा जमा रह गया था। उन्होंने बहुत सफाई से सब काम किया था, कही कोई गन्दगी नही, हडबडाहट नहीं। अगर वह नल बन्द करना न भूलते तो शायद किसी को पता भी नहीं चलता, भ्रम होता, जैसे यह नहा रहे हों, अगर उनकी प्रॉसें इस तरह अपलक न खुली होती, पांव और पुटने पेट की तरफ न सिकुडे होते; पानी के नीचे वह उस तस्वीर की तरह दिखायी देते थे जिसमें बच्चे अपनी मां के गर्म में लेटे रहते हैं हाय की मुट्टियां बन्द, वाल सिर पर गुंथे हुए, टांगें ऊपर की ओर मिकुडी हुई, पेट और छाती एक सफेद लोथ में लिपटे हुए; वह मुकम्मिल जान पड रहे थे, सम्पूर्ण और साफ, जैसे पानी में बहते हुए खून से उनका कोई रिप्ता न हो, मव रिस्तो से मुक्न, भीगी प्रायो मे हमें निहारते हुए, एकटक । मैं बाहर निकल पाया। उसके बाद विट्टी के चेहरे को देखना प्रमहनीय जान पड़ा, किसी भी जीते हुए मनुष्य के चेहरे को देखना असम्भव था। मैं उनका अन्तिम गवाह था, जब वह अपने कमरे मे बैठे थे "क्या उस क्षण उन्होंने फैसला लिया था? नही, मैं अकेला नही या, मेज़पर गिरती दुपहर की मलिन धूप, दालान में खड़ी तीन पहिय्यो की माइकिल, माकवाले को डूबी मासे, मज़ पर रखी इरा की चिट्ठी, दरवाजे को प्रोट में सडी छाया, सब उनके गवाह थे । मब वहां मौजूद थे। वे जानते थे। वे एक तरफ थे, नित्ती भाई दूमरी तरफ़ । वह बिना किसी से कुछ कहे-मुने दूसरी तरफ चले गये थे।
... . , - मैं कमरे में चला पाया । दीवार के सहारे वह सोफ़ा था, पुरानी किताबों के ढेर, डिजाइन के बड़े 'ड्राइंग-पेपर, पेन्सिलें, और स्याही की बोतलें.. 'मुझे याद पाया, वह पाकिटेक्ट थे; घर बनाते थे। यह उनका घर था, उनके कमरे की खिड़की, जहाँ से फनाटप्लेस की ऊँची इमारतें दिखायी देती थीं । बारह- खम्चे के पेड़ सुबह की पीली रोशनी में निकल रहे थे; हवा में धीरे-धीरे हिलते हुए; 'मुझे लगा, गर्मियां पा रही हैं; फिर याद आया, वह इन गर्मियों में 'सी गल' करना चाहते थे, डरी के टेरेस पर। पता नहीं, उस क्षण वह कहाँ थे ? . १५८/एक चिथड़ा सुख
१२
वह दिन; भोर पागका विरामीnath! 41 pal
नहीं । सबकुछ धीरे-धीरे पहने जगा II HIT iiII
पीला पड़ने लगा और अपनी Ranitill, if JI, Ayyyy)
संख्या दुगुनी हो गयी है । १. hit htrian antiy
चमकते थे। पुल की परम minth its
धूल दिन में भी उप; matlarity intent
माधू-गा पड़ा रहता, गपं. रमन In Mittinum
गिलहरी हिलती-किन प्रप faminent Anm.
दट्ट भीतर पमा घामा Infrey MEIPAaning
नहर पर तक नन्दी-मी RetinatiguANI
थी, वहां नमामीटक Hriyaratthat
फिदार गटी 17470Nm na tnatni .
प्रागटे, सराटkaranMer rinter .. .. ..
घोह 11:12. Mul
बनाई?artan tarform , naint it .
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Travha
। - । झुका हुआ । वह हड़बड़ाकर उठ बैठा । सुवह हो गयी थी और विट्टी तयार वैठी थी। उसका दिल डूबने लगा, उसने सोचा था, प्रीमियर के दिन वह सुबह जल्दी उठेगा, विट्टी के लिए चाय बनायेगा, फिर उसे उठायेगा; सब- कुछ वैसा करेगा, जैसे वह उन दिनों करता था, जब वह इलाहावाद से आया था। लेकिन अब कोई फायदा नहीं था। बिट्टी अपना बैग लेकर तैयार बैठी थी। उजली और साफ-लेकिन रक्तहीन । नित्ती भाई की मृत्यु के बाद उसका चेहरा वरावर एक ठिठुरती हुई ठण्ड में जमा रहता। न कोई भाव, न भावहीन-सिर्फ सस्त, सस्ती, जो सूख जाती है, सूखकर एक चमक-सी बन जाती है। बिट्टी उसके घेरे में थी। पहले उसे देखकर लगता था, वह यहाँ है, लेकिन कहीं और भी; अब 'कहीं और उसके भीतर था, जैसे वह चारों तरफ भटक- कर दुवारा अपनी देह में लौट आयी हो; वह देह अपने में चमक थी। निष्फल, तटस्थ, अपने को अपने से जोड़ती हुई" वह जाने को खड़ी थी। हाथ में एक बंग, पुरानी सलेटी पैंट, पुर्ते का बुला हुया कॉलर, जिस पर पसीने की एक झांई गले पर सिमट पायी थी । वह कमरे की देहरी पर खड़ी थी तल्लीन और शान्त-जैसे वरसों पहले इलाहाबाद के स्टेशन पर उसे देखा था। वह आखिरी दिन का दृश्य अाज भी वार-बार लौट आता है-यदि मैं उसे 'दृश्य' कह सकू- रसोई का खुला दरवाजा, बाहर छत पर बिखरा वासन्ती पालोक, मेरी बंधी हुई पोटलियां, मूटकेन । मूहों के पार्टीगन के पीछे छिपे हुए मेरे दिल्ली के दिन, रातें, खाली दुपहरों को महीन धागे से जीते हुए डैरी के रिकॉर्ड; दीवार पर टेंगी, सबकुछ मूक भाव से निहारती मदर टेरेसा की आंखें । नीग्री लड़की की आवाज़ । मकबरे पर लेटी छिपकली की मूछित नींद। मिसेज पन्त के ट्रांजिस्टर पर रात का संगीत, कुत्ते, धूल को आंधी । बिट्टी के दोस्तों की हमी, चाँदनी में चमकते वियर के गिलान; सीढ़ियों पर धीरे-धीरे उतरते डरी, मुंडेर के नीचे झांकती विट्टी की आँखें । कुमाऊ जंगलों में छप-छप करती पैन्थर की पदचाप । यह सब उस सुबह के एक क्षण में निमट गया था, जव विट्टी दरवाजं की देहरी पर जाने को तैयार खड़ी थी। उसे मालूम था, मुझे मालूम है; में इस दिन, इस घड़ी, इस सुवह की असे से प्रतीक्षा कर रहा था । - । -- १६०/ एक चिथड़ा सुख
यह छुटकारे की पड़ी थी। पारमा | UI (MAR
गयी।
"तुम्हें मालूम है ?"
"हाँ !" उसने सिर हिताया।
"तुम्हारा पारा नैफीराम के पाग" की, "ari in
से नहीं देखना होगा।"
वह चुप छत की पोर ताफना रहा
यह उठ खड़ी हुई, पंसा मा पा भाषा "गALE 11"
"विट्टी, मुझे तुमसे पुरष्ठ कहगा।"
यह एक गयी। दरवाजे पर पड़ेगा Mith
पायी, "क्या वान है ?"
"मैंने नित्ती भाई को एक पिट्टी दी थी"arial"
"मुझे मालूम है ।" उगने वर धाम या eat In 11
हो ? दमे जाना ही था।"
"क्या चिट्टी में यही दिया था"
"मुझे नहीं मालूम, मुन्न ! Rahakar!"
"क्या वह हिन्दुस्तान छोर?"
"यहाँ दग मां-बार है।"
"फिर?"
कुठ नहीं; दरवट sent sri
,
कहना की हारrrist...
तिमिल merraantar
-
गुना नाम दरrm frees Arrar
वह टेदार rhetrandir uri
पामार्ग क्षegmi iram
- बीच में कितना समय गुज़र गया । अब वह लड़का नहीं रहा । वह एक-एक साल पार करता हुअा उस दुपहर तक पा गया, जहां एक लम्बी लाइन लगी थी। वह भी उसमें शामिल हो गया । उसकी मुट्ठी में रुपये थे, जो वाबू ने इलाहाबाद से भिजवाये थे । वह दिन और आज का दिन 'वही धूप, वही भीड़, वही सीढ़ियों पर बहता पानी । वह अपने को उससे बचाता हुअा लाइन में पा खड़ा हुअा, धीरे-धीरे सरकता हुअा बुकिंग-आफिस की खिड़की के सामने खड़ा हो गया । वे सब जानते थे। वे सब के सब गवाह थे । दर्शक, देखनेवाले; वे लोग, जो आडिटोरियम में बैठते हैं, टिकट उनकी जेब में होता है। वे कभी भी उठकर बाहर जा सकते थे, जैसे वह । वह उनमें था। वह बाहर चला आया था। यह उसकी आखिरी शाम थी। वह टिकट जेब में रखकर चारों तरफ घूम रहा था। वह कभी-कभी किसी चौराहे पर ठिठक जाता; उन तोतों को देखने लगता जो मिण्टो रोड के पुल से उड़ते हुए पुराने शहर की तरफ जाते थे। वह स्टेट्स- मैन के मोड़ पर चला आया। वहां लोगों की भीड़ थी, किन्तु उसे सारा शहर खाली दिखायी दे रहा था । लोग अब भी दिखते हैं, ट्रैफिक लाइट जलती है, दुकानों पर साइन वोर्ड चमकते हैं, पर दिखायी कुछ नहीं देता। सब आवाजें दव जाती हैं । धूल उड़ती है; अप्रैल की धूप एक रक्तहीन निचुड़ी हुई सफेदी-सी फैल जाती है जैसे वह कोई रेगिस्तान हो, हजार साल पहले की रोशनी, जहां कुछ भी दिखायी नहीं देता, न स्ट्रिनवर्ग, न स्टूडियो, न डरी का वॅगला; और तब चलते हुए उसने जेब से टिकट निकाला, दिल्ली-इलाहावाद, मानो वह अपने को विश्वास दिला रहा हो कि अब वह उस शहर को दुवारा नहीं देखेगा, उस सड़क पर फिर कभी नहीं चलेगा जहाँ एक रात जनवरी के अंधेरे में बिट्टी भाग रही थी, उस रोड- साइन पर अपना सिर टिकाकर रो रही थी, जिसका नाम टालस्टाय मार्ग था; क्या वह सड़क सचमुच कहीं जाती थी जहां एक दिन डैरी गये थे-और लौट पाये थे? नहीं, सच, कहीं जाने के लिए टिकट का होना जरूरी है; वह एक तरह का सिग्नल है जैसे घड़ी का होना, डायरी का होना, कैलेण्डर का होना-वरना एक रात हमेशा के लिए एक रात रहेगी, एक शहर हमेशा के लिए एक शहर, एक मृत्यु हमेशा के लिए एक मृत्यु, उसके जाने के बाद भी वारहखम्बा रोड की सड़क चलती रहेगी, मण्डी हाउस के आगे वह पेड़ खड़ा रहेगा जिसे पकड़कर एक रात अंधेरे में नित्ती भाई खड़े रहे थे; सप्रू हाउस की झाड़ियां, सिगरेट की दुकान, १६२ / एक चिथड़ा सुख - - , में लहराते पेड ज्यो के त्यों खड़े रहेंगे मोर दरसे बदनार गुजरेगा, उसे पता भी नहीं चलेगा कि यहां बटरटमें लड़के के साथ जाती थी और वह सहा र लड़की रोड-साइन के तख्ते पर सिर रखकर क्या यह एक तरह की मृत्यु है ? वह अब चल नहीं रहा था। वह व्हा. जब कपर भवकुछ वहता जान पड़ता है और इस पर सकता था। वह उसके मिर के कार में बर:.प., चीख नहीं सकता था, देखो, यह मैं हूँ, बहन सामाग उसके ऊपर बहता रहेगा; किन्तु उसे रोकामना पाया गया यह उमने देखा या, अनल में प्रमनी देखना दहीमा गmi मे, उस रिकार्ड में, जिसमें नीग्रो सहकी टीम का गाई, बच्ची के चाकू पर, जिसरी नोर पर रे महामेंगर थे, वहाँ ममय और मृत्यु को रोक दिया था सा, का कामदासा, जब एक दुपहर क्यूबिकल के सुराख से उनने दिट्टी कादंदा पा, मोर दर दाट पोवर उम विन्दु की तरफ जा रही थी, जहां रोगनी का भ्रम पा;स्टेज की दूमरी सरफ, पता नहीं वहाँ कौन था, बौने की नंगी रिल या मदर टेरेमा पी गमगीनगी मुस्कराहट या वे दो लड़के और एक दची नो मी बी टम रात दावे की भट्टी से उसकी घोर निहार रहे हैं? वह बीच राम्न में ठिठक गया । कहीं दूर में वह धीरे-धीरे माई बजे का गजर मुनायी दिया । अंधेरा ही बना पा,नेरिन पंडों की पुनपि मानिरी रोगनी में मुलग रही पों और तब पता नहीं है, सो, रिमान ने पनि मूंद ली। वह दिट्टी और हरी और इस रेसिंग मा द हिा- वर्ग के लिए भी प्रार्थना करने नमागेकाले औरतों का के लिए भी दो टब में मून के बदन में और रन के सिमें अकेली बाग में मदकती यो"और माने निर" पता नहीं, दर प्रति निराकार शो काम महमा मकै फरहान हॉट रोगनगरपा बाहर पर तिर रही थी। पटनादन रनर ने गाया मार हुमा होगा । परा रहा होगा रिट्री मंत्र का नागीटमें देखा होगा-और वह मानीसही हो।
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