Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
Paatjal Yogdarsan
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28 श्रीमद्विनयानन्दमूरिभ्यो नमः । न्यायाचार्य श्रीयशोविजयोपाध्यायका व्याख्योपेत पातञ्जत योगदर्शन तथा हारिभद्री योगविंशिका। (हिन्दी सार सहित) सम्पादक- प्रज्ञाचक्षु विद्वद्वर्य श्रीमान् मुखलालजी । प्रकाशक-- थी यात्मानन्द जन पुस्तकप्रचारक मंडल, रोशनमुहाला-याया। प्रति ५००। वाग्मवत् २४५८ आत्मगवन २६ । -- विकासरत् १९७८ इस्वीमन् १९२२ रूपया 11) .
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worwarima * समर्पण Macreditedeow श्रीमान् प्रवर्तक कान्तिविजयजी! मापक प्रति मेरी अनन्य साधारण पूज्य बुद्धि है,इसका कारण न तो साथ ही मार न संधश्रद्धा. अापके विद्यानुराग, शासप्रेम और निरखद्य साधुमावसे मैं माकर्षित हुमा ई-इसीसे यह पुस्तक प्राप के करकमला सादर समर्पित करता है. आपका मेक- - सुखलाल. Ravinavintantra
grescencamwren
-
शा. गुलाबचंद लल्लभाई,
आनंद प्रिन्टींग प्रेस
भावनगर
HonoracanasaramesG2015
SeemaDADARASIRUDRAMA
मंत्री लाला डालचन्दबीजौहरी.
श्री आत्मानन्द मे० पु०प्र० मंडल,
रोशन मुहला, आमा.
geomewasi
Panorosarowapimary समर्पण। Footapapoor श्रीमान् प्रवर्तक कान्तिविजयजी! मापके प्रति मेरी अनन्य साधारण पूग्य बुद्धि है, इसका कारण न तो स्वार्थ ही है भार न अंधश्रद्धा, भापके विधानुराग, शासप्रेम भार निरवद्य साधुमावसे में आकर्षित हुमा हूं-इसीसे यह पुस्तक प्राप के करकमलोंमें सादर समर्पित करता हूं. आप मेक- सुखलाल. (Reese.coochine area
Rececamermacaract
--
शा. गुलाबचंद लल्लभाई.
आनंद प्रिन्टींग प्रेस
भावनगर.
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VERMADADARITAGRADURATION
प्रकाशक
मंत्री लाला डालचन्दजीजौहरी.
हुश्री आत्मानन्द जे० पु० प्र० मडल,
रोशन मुहसा, आग्रा
.00500
WOGesear gave समर्पण। B ... । TOdia LARADACOADupursuandore.maa.maaseemarate श्रीमान् प्रवर्तक कान्तिविजयजी ! भापक प्रति मेरी अनन्य साधारण प्रग्य रत है, इसका कारण न तो स्वार्थ ही है और न अंधश्रद्धा आपके विद्यानुराग, शासप्रेम मार निरपद्य साधुमावसे में माकर्षित हुआ हूं-इसीसे यह पुस्तक पाप के करकमलोंमें मादर समर्पित करना है. आरका मेवक- सुखलाल. Kenars arra saarkar विषयानुक्रमणिका. 1 है . .... १ .... .. विषय. पृष्ठ विषय पृष्ठ- विषयानुक्रमणिका महर्षि पतञ्जलीकी ट- परिचय टिविशालता प्रस्तावना आचार्य हरिभद्रकीयो- योगदर्शन.... २ गमागमें नवीन दिशा. १९ योगशब्दका अर्थ .... २ उपसंहार .... दर्शनशब्दका अर्थ.... ४ पातञ्जलयोगदर्शन वृत्तिमह १ योगके आविष्कारका श्रेय ४ योगविंशिका सटीक ५६ आर्य संम्झतिकी जड योगवृत्तिका सार और आर्य जातिका लक्षण१० योगविंशिकाका सार ...११४ योगमूत्रवृत्ति तथा योगवि. :ज्ञान और योगका संव- शिकावृत्तिमें प्रमाणरूपसे •न्ध तथा योगका दरजा ११ आये हुए अवतरणोका व्यावहारिक और पार. वर्णक्रमानुमारी परिशिष्ट •मार्थिक योग १४० योगकी दो धाराये.... १४ | योगमूववृत्ति और योगविं- योग और उनके सा. शिकाटीकामें आये हुए हित्यके विक्रमका दि अवतरणोका का आर १५. प्रत्यक नाम निर्देशसं- योगभारत.... १८ ! वन्धी परिशिष्ट नं०२. १४१ . .... .. .... ....
परिचय.
पाटकीय समक्ष प्रस्तुत पुस्तक उपस्थित करते हुए इमका
परिणय फगमा जरूरी है। शुस्में प्रस्तावना रूपमें
पर एक विस्तृत नियन्ध दे दिया गया है जिम
योगसया योग-सम्बन्धीमादिग्य आदिम सम्यग्ध रणनेयादी
..यातीपा मममाण विचार किया गया है। तापमात् इम
पुस्तक में मुख्यतया योगसूत्रवृति और मटीक योगपिशिका
६.प्रग्योका मंग्रह, तथा माथमें उनका हिंदी मार भी
दिया हुआ है । अतपत्र उ. दोनों प्रग्योंका, उन कां
आदिका नया हिंदी मारका कए परिचय कराना आवश्यक
है. जिमम याचीकी यह मालुम हो जाय कि ये प्रग्य कितने
महत्त्वपूर्ण हैं और इनके काका स्थान कितना उथ है। माय
यह भी विदित हो जाय कि मूल प्रन्याय माय उनका हिंदी
मारमामागयया अभिप्राय है। आशा हैम परिचय
का ध्यानपक, पदनेम पाचकाकी कधि उन दो प्रन्योकी
आर विशेष पम उत्तेजित होगी, प्रत्यकर्ताअंपि. प्रति यह
मान पदाहागा और दिदी मार देख कर उममे मूल *
माया ममर नयी उचित आकाक्षादा होगी।
। योगमुनि-या नि यागमनीको एक जॉर्ट:
मी हिणियाम्या है। यागममि मागापाग यागविया
7 जा माम्ग मिटान्तर आधार पर सीपी गई है। उनमी
प उपर मदम प्राचान र मयम अधिक महण्यी टीक
मग यामया माय है। यह प्रमन्न गभीर और पिम्तृत
भाग्य मग्य मिहान्तर अनुसार ही रचा गया है पर
जन प्रप्रियाय अनमगर रची गई है। असण्य जिम जि
विषयम सांख्य और जैन शाखका मत-भेद है तथा जिस जिम
विषयमें मतभेद न होकर मियर्णन-पद्धति या मांतिक
बाद मारका भेद है उम उम विषयके वर्णनयाले सुके ऊपर
दी वृत्तिकारने पृत्ति लीखी है, और उसमें भाष्यकार द्वारा
निशाले गये सूचगत आशय ऊपर जैन प्रक्रिया. अनुमार
या तो भासंप किया है या उम आशयय माय जैन मतस्यका
मिलान किया है। दूसरे शब्दों में यों कहना चाहिए कि यह
पति योगदर्शन रुया जैन दर्शन सम्यग्धी सिद्धान्त सिरोध
और मिलानका पक छोटा मा प्रदर्शम है। यही कारण
प्रस्तुन पृत्ति गप योगसूत्रोंक ऊपर नही फर कतिपय सूत्रीय
ऊपर हो। योगसूत्रों की कुल संख्या १९५ की है और वृत्ति
मि २७ मत्रों के ऊपर ही है। सव मत्रोको वृत्ति न होने पर
भी स्तुत पुस्तकम दमने न तो मभी दे दिये पर भाष्य
मी मि. उगहों मत्रोका दिया है जिन पर वृत्ति है। पेमा का
ने मुलपदी कारण (१) सूचीका परिमाण पर नहीं है
मौर (२) पति पाने वाले की कममे कम मूल माय, मात भी
मंपूर्ण योगपत्रिपाका तान करना हो तो मयं. लिप अग्य
पुस्लटनेशी भावश्यकता न रहे। इसके विपरीत भयका
परिमाण बाल परा है और पद की जगह अो रंगम
भी शा। पपपिनि पहनेवालेका योगदान मोभित्र
मिशाल जानने हो तो उसका पद व भाष्य बिना देग्य
भी मिररामकता शिर भी निवास गोय.
पागी भारत म म म माग हम लिए रियानि
समझने में पारा अधिन मुभीना हो, यो पतिकारने
मामाची पानमें रख कर ही भगनी पति
TREमर और पेय रिवाया है। परम
सायाम मंदिन रिण न
:, अन्य दर्शन, माय जैन दर्शनका किम किस मिडामें फितमा और मा पास्तविक मतभेद या मतेश्य है 1 इमी ধঃ গনি জাননাঃবিনানুমী ইয়াৰ रफि कारण पर नहीं जानते कि जैन दर्शन किन किन पाती. में पदिक दर्शनये. माय का तक और किस प्रकार मिल जाता इस पारस्परिक सानपं. कारण दोनों पक्षय. विद्वान तक भी बहुधा, एक परे ऊपर आदर ग्मना ती दर रक्षा, अनुचिन मला किया करते हैं, जिनमे साधारण पर्गमे श्रम पौल जाता और ये परम मंरममें दी अपनी शणिकावर्षकर चाटते हैं। हम विषमताको दूर करनेके लिए दी यह मि लिम्वी गई। यही कारण है कि उसका परिमाण यहुत छोटा " पर भी इसका मदाय उससे कई गुना अधिक है। जैन दर्शनकी भित्ति म्यामाद मिद्भातफे ऊपर ग्री। प्रामाणि- के अनेक रशियोथे. एकर मिलानको दो स्याहाद करते हैं। स्थानाद मिहातका उद्देश्य इतमा दीकिकोई भी ममत्र- ......चिमी पल्प, विषय में मिदात निधित करते ममय अपनी प्रामाणिक माग्यताको मरे परतु साथ ही दूसरोंको मामाणिक मान्यताओका भी आदर करे। मधमुप स्थामादका मिशागत हपकी उदारता, दृष्टिकी विशालता, प्रामाणिक मतभेदको शिक्षामा और पस्नुषी विविध-रूपता थपाल पर हो पिर है। प्रस्तुत पनि मारा उसके कर्ताने उस स्यामादका मंगलमय दर्शन पाग्य मिशामुऔफ लिए कर दिया है। हमें तो पदकानेमें तनीक भी संकाय नहीं है कि प्रस्तुत कृति जैन और योग दर्शन मिलानदी रश्मि गंगा यमुनाफा मंगमस्थान है, जिनमें मतभार अलकांषर्ण भेद होने पर भीदोनोंकी एकरसतादी अधिक त्तिके महरयका पुरा गयाल उमको मनन पूर्वक उदार दृष्टिम पढने पर ही आसकता है। (२) योगविंशिका यह मूल प्रन्य प्राकृतमें है। इसका परिमाण और विषय इमके नाम प्रमित है, अर्थात् यह योम गाथाओका योग मम्यन्धी एक छोटा मा ग्रन्य है। इसके प्रणे. ताने वीस बीस गाथाओंकी पक पक विशिका पेमी धीम' विशिकाएँ रची हैं, जो मभी उपलब्ध हैं। उनमें प्रस्तुत योग- विशिकाका सत्रहवां नंबर है, इसमें योगका वर्णन है। इसके प्रणेताके संस्कृत भाषामें भी जैन दृष्टिके अनुसार योग पर बनाये हुए योगयिंदु, योगद्दष्टिममुच्चय और पोडशक ये तीन ग्रन्थ प्रसिद्ध हैं जो छप चुके हैं। इसके मियाय उनका बनाया हुआ योगशतक नामका ग्रन्थ भी सूना जाता है। एक ही फकिवाग एक ही विषय पर लिखे गये उक्त चारों ग्रन्थोकी वस्तु क्या क्या है और उसमें क्या ममानता तथा क्या असमानता है इत्यादि कई प्रश्न वाचकोंक दिलमें पैदा हो मकते हैं जिनका पूरा उत्तर तो वे उक्त ग्रन्योंकि अवलोकन के द्वारा ही पा सकेंगे, फिर भी हमने प्रस्तुत पुस्तकमे इमका अलग सूचन किया है जिसके लिए हम पाठकोंका ध्यान प्रस्ता. १ वीम धीमीयों के नाम इस प्रकार है- अधिकारविशिका, २ अनादि- विशिका, ३ कुरनीनिलोवधर्मविशिवा, ४ चरमपरादत्तविंशिका, ५ वीजादिविशिका ६ सद्धर्मविशिका, ७ दानविधिविशिका, ८ पूजाविधिविशिका, ९ श्रादकधर्मविशिका १० भादप्रतिमानिनिका, ११ यतिधर्मविरिका, १. शिक्षानिरिका, १३ मिक्ष विशिका, १८ तदन्तगपशुद्धिरिइविरिया, १५ अलोचनाविशिका, १६ प्रायश्चित्त मिनिका, १७ योगविधानविशिश, १८ देवदानविशिश, १९ मिद्धविशिक २.मिदमसविगिहा। 1 ३ पमा पृष्ट ५६ पाषं "आचार्य रम्भिद्रकी योगमार्ग नवीन दिसा"मामक परेको और नीपत। योगपिशिकावी योगवस्तुका म्यूट परिचय तो पाठफ. परम कर ले, पर उममें एक. मामाजिक परिस्थितिका चिजिमका निदंश पदों करना उपयुम है. दर परदेश पर एक जाति और हर एक ममाजमें धार्मिक गुरओको सरद धर्मधूतं गुरुओंको भी कमी नहीं होती। में मामधारी गुरू भोले शिष्योंको धर्मनाशका भय दिवाकर धर्मरक्षा निमित्त अपने मनमाने दंगर्म धर्मपियाका उपदेश दंने भीर धर्मकी ओटमें शाखपिरुष व्यवहारका प्रवर्तन कराया करते हैं, मेधर्मांगी गुरुओंकी गयर जैसे 'भायश्यक- नियुमिमें श्रीभद्रपारम्वामीने ली है पैसे बहुत मरेप पर मार्मिक गतिम योगचिशिकाम भी दी गई है। उसमें धंस पादरिओको मयोधित कर कहा गया है कि "मय या जैन- नी मनमाने दगमे चलनेवाले मनुष्योफ ममुदाय मात्रा नाम नहीं. ऐमा ममुदाय तो संघ नहीं किन्तु डिौका देर मात्र मरा जैन-नीर्थ या महाजन तो शाखानुफूल चलने वाला पराध्यमि.भी हो मकता है। इसलिए तीर्थरक्षाफे नाम अशुद्ध प्रथाको जारी रखना यही पास्तषम तीर्थनाश, क्योंकि शुरु धर्मप्रयाका नाम ही तीर्थ है जो अशुर धनप्रथाम नष्ट होजाता है"।मषं मिषाय योगविशिका अन्तिम भाग- मेरूपी. अरूपी ध्यानका भी अच्छा वर्णन है। यह प्रम्य छोरा होने ममें जो वर्णन है पद मंक्षिप्त दी है, पर इमको मंस्कृत टीका जो इस के साथ ही दे दी गई है पर या दो पदनाम गाय ...।
म्पट और सांग परिपूर्ण है । मूलपर उसको टोका टीका कारने पूरा प्रकाश डाला है, जिमका पुरा परिचय तो उम् टीकाके देसनेसे ही हो सकेगा। पाटकोसे हमारा अनुरोध है कि वे योगविशिफाको टो काको पढकर टीकाकारको यहुश्रुतगामिनी बुद्धि और अनेक- शाखदोहनका योडे घी में आस्थाद ले। ग्रन्थकर्ता ऊपर जिस वृत्तिका परिचय कराया गय- है, उमय ग्धयिता जैन विद्वान् उपाध्याय यशोविजयजी हैं योगविशिकाकी टीका कर्ता भी ये ही हैं। वृत्ति मूलरूप योगमूत्र प्रणेता पैदिक विज्ञान महर्षि पतञ्जलि हैं और मूल योगपिशिकार्य रचयिता जैन विद्वान आचार्य हरिभर हैं। बम प्रकार यहाँ ग्रन्थकर्तारूपमे उमः तीन व्यक्तिओंका परिचय कराना आवश्यक है। १) पतञ्जलि-इनके जन्मस्थान, माता, पिता, ममय आदि विषय विज्ञाननि याहुत ऊहापोह किया है पर अभीतक यदी निषित नहीं हुआ कि योगसूत्रकार पतालि, पाणिनीय व्याकरणमूत्र पर भाष्य रचनेवाले महाभाष्यकार- नामम मिह पतअलिम मुदा थे या दोनों पकही थे। महा- माप्यकार और योगसूत्रकार पालिकी भिन्नता या पकनाये मम्बन्धमे आजतक कीगां मांगीमे अधिक विचार प्रदर्शित बाव दिए न तो हमने पर्यात अवलोकन ही किया है और नमही अधिष गोगमा कानेके लिए अभी हमें ममय ही पात है, इमश्रिप इस विषय निशा लिए हम माल भापम अन्य विरामोशी गपणाको देगनेकी ही मिका ER निलविद्वानोदे ग अनुभाग भापार पर पि माहि.पोगाए पदिमहामापार तो उनका समय पूर्व सगे समाधी माना जाना पाय भी परमों मिलनी योगमुरवार पलिया REET.ाद दूरी बीदीदातादीन माना जाना पाre आतु! पतलिपा भाषाको मिति स्पसे मामा धन अभी एहया भान होने पर भी की लिना मा AIATREन यांगत्र में हो जाता है Hi मामी आमामा काल पोर जाने पर भी योग पूरीम जागती। जिगपं. पास ए. पार भानपाला पाणाप पति भी सिर मुशाये बिना, विमा दासानुदाम पपिमा गरी सनातन पोग- गया परिपप परमे अभिदापिभोपाम एम प्रस्तावना T३८पर 'पोगशा'शीपंप परेकी रचानने और म. महपिंपरका परिचय करनेको हावालीका नाय "महषि टिकी रविशलता" शीर्षक. भागकी रीनप्रमावमा 7.४६ (२) हरिमद-मनाम नाबर संप्रदाय अनेक प्राचार्य पापोगविशिका मामुक्त हरिभद्र उन में पोपाकिनि महतरा मनु माममे और १४४४ प्रापतापमंसिर उनका समय पि.को 'टली नगी नाती अभी निर्णय किया गया। उनःजीवनका हाल अभी तक जो मशी अपेक्षा अधिक र मनुदित योगासनको इन्लाना। २ देसो पोजिन fantage मन सारिशोधक । मिलिपि अनिता T'प्रकट
(८)
लिपने की अभी हमारी पारी मही, मलयाने पदमाग
मपाल हुआ कि उसमे जीवन पर प्रकाश डालने
पास्त मा पाहिए मा उनणे. प्रग्योका गहग अवलोकन
अभीतक किसीने नहीं किया मा अपलोकन करके निभित
मामयीय आधार पर विशेष लियनेकी हमारी हार्दिक नया
है। परंतु ऐसा मुयोग कर आयेगा पद कहा नहीं जा सकता।
मतपय ममीतकर उन प्रयोग. अपामांकनम उम्पन्न हुए
भाषको मिर्फ एक, दो पायों में जना देना ही ममुथिन है।
जैन भागो पर मय पहले मम्तमें टीका लिमने
पाल, भारतीय ममम दर्शनीका मयम पहले वर्णन करने.
पाले, जैन शात्रक मूल मिदारत अनेकारतपर नातिक
रोतिम ध्यपम्यित म्पमें लिखनेवाले और जैन प्रक्रियाक
अनुसार योगविषय पर 'नई रीतिमे लिखनेयाले ये ही
हरिभद्र हैं। इनकी प्रतिभाने पियिध विषय जो अनेक
अन्य उत्पन्न किये हैं उनम कपल जैन माहित्यका हो नहीं
किन्तु भारतीय संस्कृत, प्राकृत माहित्यका मुख उम्पल है।
१ यह कथन उपलब्ध ग्रन्थोंकी अपेक्षाम मनमन। अन्यथा ग्भिटमरिक
पहले भी योगविषय पर लिनेवाले विशिष्ट जैनाचार्य हा दनक अनेक
वाक्योंका अवतरण देत हुए हरिभद्रमृग्नेि योगदृष्टि समुच्यत्री सामान - योगाचार्य
इस प्रतिष्ठासूवक नाममे उन क्यिा है इमक ला दया . म. 47.14
१९, २२, ३५ आदिकी टीका
अवतरण वाक्योंम माफ जान पडता है कि ' योगाचाय जैनाचार्य ही थे। यह
नहीं कहा जा सकता है कि वे बेनाम्बर ये या दिगन्दर । उनका असली नाम क्या
होगा सी भी मालूम नहीं, इसके लिए विद्वानों को खोज करनी चाहिा । मन्मा है
उनके रिमी ग्रन्थी उपलब्धिमे या अन्यत्र उद्धृत विशेष समागम अधिक
गलोंका पता चले.'।
Trमाएगी १४४४'मा ६ मध उप.
RTEभाग जिन उपलाप भी हमारे
Pिim जिन्दनीसममनपाने मोरगावीपर
दिशा परमेटिए पनि
पगाविजप-मिगरी. अटारी शादी
तिहार ममीतकमी एकाशित हुआ है
स.पाम नहीदिति त्ततिहाग लिए इन सभी
संगोपांग पावोर साप भषापावन भार।
महिए समय और वारा पारिप जो अभी भी हमारे
भारमनीपर कभी हम कामवीयारी करनेकी आर.
Reप रहना भानु अभीनी पाप-पशोषिजयका परि-
पनही पाना चाहिए कि उनवी मी गमापयशमि.
सबमेवालाम अमेसर मौलित नौका गहरा दोहन करमें-
पाला मारिप तनक परप कर उस पर समभाच.
एक अपना पर मालव्य पाशित करनेवाला, शाम्रीयप
गपिसभापामे रिधि माहित्य रच कर अपने माल और
रटिम विरोधी सर जिसासु तक पहुंचानेवी सेट करने.
पाला और सम्प्रदायरा भी मम्मदाप.धमकी परषा
नपरजी उचित जान पर उस पर निर्भपता पूर्वक
टिममेवाला, चार दिनाम्पर, दिगंपर समाजमे ही नहीं
पन्धि अंतर समाजमे भी उमा मा करें विशिट विमान
भीमरहमारे ध्यान नहीं भाया । पाट मरणमें रखते
पर भानि नही। हमने उपा-पायजी. और दूसरे
विमानानन्धोधी अभीतकमी अम्प मात्र अचल्लान किया
म आधार पर माल नापकर ऊपर पाय लिये।
मिमदापताम्बर और दिगम्पर ममासमें अनेक बहुत
विमान होगये. दिक तथा बौर मम्मदायमें भी
विद्वानको कमी नहीं रही है। माम कर येदिक विद्वान तो सदाहीसे उच्च स्थान लेते आये हैं, यिधा मानों उनकी बपौती ही है पर इसमें शक नहीं कि कोई यौद्ध या कोई वैदिक विद्वान् आज तक ऐमा नहीं हुआ है जिसके ग्रन्यके अवलोकन मे यह जान पढे कि यह यैदिक या बौद्ध शाम्रक उपरान्त जैन शाम्रका भी यास्तविक गहरा और मयंव्यापी ज्ञान रखता हो। इसके विपरीत उपाध्यायजीक ग्रन्योंको ध्यानपूर्वक देखने- वाला कोई भी बहुश्रुत दार्शनिक विज्ञान यह कहे बिना नहीं रहेगा कि उपाध्यायजी जैन ये इमलिए जैनशाम्रका गहरा ज्ञान तो उनके लिए महज था पर उपनिषद्, दर्शन आदिघेदिक ग्रन्याका तया यौद्ध ग्रन्थोंका इतना यास्तविक, परिपूर्ण और स्पष्ट ज्ञान उनको अपूर्व प्रतिभा और काशी सेवनका ही परिणाम है। हिंदी सारका उद्देश्य-ग्रन्थका महत्त्व, उमको उपयो. गिता पर निर्भर है। उपयोगिताकी मात्रा लोकप्रियताकी मागास निधित होती है। अच्छा प्रन्य होने पर भी यदि मर्य साधारणमें उसकी पहुँध न हुई तो उसकी लोकप्रियता नहीं हो मकती। जो अच्छा प्रन्य जितने ही प्रमाण अधिक लोक- प्रिय हुभा देखा जाता है उमको लोगों तक पहुँचानेकी उतनी ही अधिक पेश की गई होती है। गीताका उतना अधिक प्रचार कभी नहीं दोता यदि यियिध भाषाओम विविध रूपमे उमका उलया न होता, अतपय यद मायीन है कि शास्त्रीय भाषा प्रयोको अधिक उपयोगी और अधिक लोकप्रिय बना- नैका एक मात्र उपाय लोषिक भाषाओं में उनका परिवर्तन करमा है। भारत वर्षये. मादिश्य को भारत अधिकांश भागमें पंटानेका माधन उमको गष्ट्रीय हिंदी भाषा में परिवर्तित यही है। इमी कारण प्रस्तुत पुस्तकमें मूल मूल योगसूत्र .
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ranामी गा लिगा हूँग भित्र
frammarण माणिभदोरानमा भर
पारविनिमय योग दि. ऊपर नाही
। तापिय भाचारमगाम उपदी भाषा
राधारमा निन भयोग दानित
परिमाणाग मिधिन पर और यहभीगीन पाप परिमा.
नापागाit अलपन मका भरा. अनुवाद पा
विभावामनाद पानेवी अपेक्षा हमको अपनी नीत
पर्सा अधिक लाभदायक जाम
पीतिका मार लिया.
में पा, पानी गा.कि.मर या भाप जिम जिम
मनप्पा पूर्णरूप पा भपूर्णरुपमा राष्टिक अनुमार
पनि मिटाया पिरत उम उग मनष्यही
समान पाण पपंरपरपमे लिवकर नीगे प्रति
पारवा चादया विरोध प्रमश.मेक्षिपमें मूचित कर दिया है।
मय जगा पूर्णपक्ष और उत्ता पक्ष मष दलीलें गारमेनही
मिमा दिप पही याम सपना गया है कि
मिशनीम पार पापा पाहमा चाहतं ।
(१५) 'यणन आधारमें की गई है। फिर भी कई जग टिन पाटको पूति नहीं दी मको । जो कल्पनाबारा पूर्ति की गई है पर्दा कोष्टक आदि माम पिड किये हैं या नीचे फुट नोटम मूचना की है। योगपिशिफा, मम्माधम भी यही था क्योंकि उनकी टीकाकी भी एक दो नकल मिल मकी। उम एक नकटको खोज नीकालनेका भय प्रयतंकजी ही म्यगंधामी शिष्य मुनि थी भक्तिविजयजीको दी है। पर एक नकल कालके गालमें जा ही रही थी कि मौभाग्यवश उस मुनिजीको मिल गई। प्रमंग ऐसा हुआ कि अमदायादमें किसी प्रापकके यहां कचरे के रूपमें पुराने पन्ने पटे थे, जिनको उक्त मुनिजीने देखा और उनमें उनको उपाध्यायजी कृत योगर्षिशिका टीकाकी पक अमंड नकल मिली जो उनके स्थहस्तलिखित ही है। यद्यपि उपाध्यायजीने श्री हरिभद्रकृत धीमो विशिकाओंके ऊपर टीका लिग्बी है जैसा कि योगविशिकाटीकाके इस अन्तिम उल्लेखसे स्पष्ट है- इति महोपाध्यायश्रीकल्याणविजयगणिशिष्यमुख्यपण्डि- तश्रीजीतविजयगणिसतीध्यपण्डितश्रीनयविजयगणिचरणक- मलचश्चरीकपण्डितश्रीपविजयगणिसहोदरोपाध्यायश्रीजस. विजयगाणिसमर्धितायां विंशिकाप्रकरणव्याख्यायां योगविशि- काविवरणं सम्पूर्णम् ॥ तथापि प्रस्तुत एक विशिकाकी टोकाके सिवाय शेष उन्नीस बिशिकाओंको टीकाएँ आज अनुपलब्ध हैं। न जाने ये नाशका ग्रास दो गई, या कहीं अज्ञात रूपसे उक्त पक टीकाकी तरद कुदे कचरेक रूपमें किसी संग्रह लोलुपके द्वारा रक्षित होंगी। अस्तु, जो कुछ हो पर अप भी इतना मौभाग्य है कि मूल मूल पीसो विशिकाएँ मुछ पंरित रूपमे कुछ अशुद्ध- रूपमें भी उपदस्थ हैं। छाया महित उनको प्रकाशित करनेका तथा हो सका तो साथमें हिंदो मार देने का दमारा विधार है। हमारा निवेदन है कि जिन पाम उसमय विशिका या उनको अपूर्ण, पूर्ण रोका हौ पे हमें मूचित करें क्योंकि यह साशनिक मपत्ति, पकवार जमा एपर प्रायः फिर ऐसा ही रहता है। छपने के बाद लिपित प्रतियोको कौन देखता है। इम दशाम पाने पहले अधिक से अधिक मामग्री द्वारा मंशाधन आदि करना यही मची भुत-भक्ति है। हमारा काम प्राप्त मामीका उपयोग करना मात्र दे। इस लिप पुण्यशाली महानुभावोंका यह कर्तव्य कि लिखित प्रति आदि अपने पास जो कुछ साधन हो उसको देकर प्रकाशको निःस्वार्थ कार्यको सरल करें। पहले इस पुस्तकको पांच सौ मशले नोकलपानेका राक्ष था पर पीछे जार मकले नीकलवाने का विचार हुआ। शिग्नु उस ममय पर सरदः उतने कागा न थे और न तुरत मिक हो सकतं थे, इसलिए निरूपाय होकर दो किममय कागजों पर पाँच माँ पाँच सौ नकलें मीकलपानी पी। फिर भी धारणासे पुछ अधिक मटर यद जाने के कारण और कई दिनों तरकोशीश करने पर भी पक जातिवं. मोटे अन्टिक कागज म मिलनेसे भरतमें लाचार होकर करीय दो फार्म मरो किम- म. मोटे कागज पर एपयाने पर । अस्तु जोहो पाय कलेवरम थोरीती विभिन्नता हो जाने पर भी पुस्तकका आन्तरिक स्वरूप एक ही प्रकारका है जिस पर चम्सुमाही पाटकसंतोग कर ले।
प्रस्तुत पुस्तकमें आर्थिक महायता तीन व्यक्तिओंकी ओ- रसे प्राप्त है । जिसमें मुख्य भाग यडोदायाले शाह चुनीलाल नरोतमदासका है, प्रांतीजयाले शेट मगनलाल करमचंद और भावनगरयाले शेठ दीपचंद गांडाभाइकी धर्मपत्नी याइ मोतीयाहकी भी आर्थिक मददका इसमें होस्मा है अतपय उन तीनों महानुभाष धन्यवादके भागी हैं। अन्तमें विचारशील पाठकोंसे हम इतना ही निवेदन करते हैं कि ये इस पुस्तकमें जो कुछ त्रुटी देखें यद हमें सूचित करें। भायनगर. निवेदक- वि. सं. १९७८ मुखलाल संघी. फाल्गुन कृष्ण १३ रवि.
प्रस्तावना. प्रत्येक मनुष्य व्यक्ति अपरिमित शक्तियोंके तेजका पुष है, जैसा कि सूर्य । अत एव, राष्ट्र तो मानों अनेक सूर्योका भएडल है। फिर भी जर कोई व्यक्ति या राष्ट्र असफलता या नैराश्यकै भवरमें पडवा हे तर यह प्रश्न होना सहज है कि इसका कारण पपा है। बहुत विचार कर देख- नेसे मालूम पडता है कि असफलता व नैराश्यका कारण योग- का (स्थिरवाफा) अमाव है, क्योंकि योगन होनेसे पुद्धि संदेह- शील पनी रहती है, और इससे प्रयत्लकी गवि अनिधित हो जा. नेके कारण शक्तियां इधर उधर टकराकर यादमीको परयाद कर देती है। इस कारण सम शक्तियोंको एक केन्द्रगामी पनाने तथा साध्यतक पहुंचानेके लिये अनिवार्यरूपसे सीको योगकी जरूरत है। यही कारण है कि प्रस्तुत xप्या- ख्यानमालामें योगका विषय रखा गया है। इस विषयकी शाखीय मीमांसा करनका उद्देश यह कि हमें अपने पूर्वजोंकी तथा अपनी सभ्यताकी प्रकृति ठीक मालूम हो, और तद्वारा आर्यसंस्कृतिके एक मंशका थोडा, पर निश्चित रहस्य विदित हो। गुजरात पुरातत्व मंदिरकी भोरसे होनेवाली आरिधा. प्याख्यानमालामें यह व्याख्यान पढ़ा गया था।
[२] योगदर्शन. । योगदर्शन यह सामासिक शब्द है। इसमें योग और दर्शन ये दो शब्द मौलिक हैं। योग शब्दका अर्थ-योग शब्द युन् धातु और घम् प्रत्ययसे सिद्ध हुवा है । युन् धातु दो हैं । एकका अर्थ है जोडना और दूसरेका अर्थ है समाधि-मनः स्थिरता । सामान्य रीतिसे योगका अर्थ संबन्ध करना तथा मानसिक स्थिरता करना इतना ही है, परंतु प्रसंग व प्रकरण के अनु- सार उसके अनेक अर्थ हो जानेमे यह बहुरूपी वन जाता है । इसी बहुरूपिताके कारण लोकमान्यको अपने गीतारह- स्यमें गीताका तात्पर्य दिखाने के लिये योगशब्दार्थनिर्णयकी विस्तृत भूमिका रचनी पड़ी है। परंतु पोगदर्शनमें योग शब्दका अर्थ क्या है यह बतलाने के लिये उतनी गहराइमें उतरनेकी कोइ पारश्यकता नहीं है, क्यों कि योगदर्शनशि- यस मी प्रन्यों में जहां कहीं योग शब्द आया है वहां उसका एक ही अर्य है, और उम अर्थका मष्टीकरण उम उम ग्रन्थमें १ युनूंगी योगे गण . हेमचंद धातुगठ. २ युकिंच ममायाँ गण ४ ३ देखा ५५ ६. ----- .
[३]
अन्धकारने स्वयं ही कर दिया है। भगवान् पतंजलिने
अपने योगसूत्र में चित्चति निरोधको ही योग कहा है, और
उस ग्रन्थमें सर्वत्र योग शन्दका वही एक मात्र अर्थ विव-
पित है । श्रीमान् हरिभद्र सरिने अपने योग विषयक समी
अंन्याम मोक्ष प्राप्त कराने पाले धर्मव्यापारको ही योग कहा
। और उनके उक्त सभी ग्रन्थों में योग शब्दका वही एक
मात्र थर्थ विवचित है। चित्तवृत्तिनिरोध और मोक्षमापक
धर्मव्यापार इन दो पाक्योंके अर्धमें स्थूल दृष्टिसे देखने
पर यही भिन्नता मालूम होती है, पर सचम दृष्टिसे देखने
पर उनके अर्थकी अमिन्नता स्पष्ट मालूम हो जाती
है, क्यों कि 'चित्तचिनिरोध ' इस शब्दसे वही क्रिया या
प्यापार विवक्षित है जो मोषके लिये अनुकूल हो और
जिससे चित्तकी संसाराभिमुख पृचियां रुक जाती हों।
'मोक्षप्रापक धर्मव्यापार' इस शब्दसे भी वही क्रिया विव.
तित है। अत एव प्रस्तुत विषयमें योग शब्दका अर्थ
स्वाभाविक समस्त थात्मशक्तियोंका पूर्ण विकास करानेवाली
१ पा. १ सू. २-योगचित्तवृचिनिरोधः ।
२ योगविन्दु श्लोक ११-
अध्यात्म भावनाऽऽध्यानं ममता वृत्तिसंहयः ।
मोक्षण योजनायोग एप श्रेष्ठो यथोचरम् ।।
योगविंशिका गाया ॥१॥
[४] क्रिया अर्थात् आत्मोन्मुस चेष्टा इतना ही समजना चाहीये। योगविपयक वैदिक, जैन और बौद्ध ग्रन्थों में योग, ध्यान, समाधि ये शब्द बहुधा समानार्थक देसे जाते हैं। दर्शन शब्दका अर्थ नेत्रजन्यवान, निर्विकन्प (निराकार ) बोध, अद्धा, मैत आदि अनेक अर्थ दर्शन शब्दके देखे जाते हैं। पर प्रस्तुत विषयमें दर्शन शब्दका अर्थ मत यह एक ही विवक्षित है। योगके आविष्कारका श्रेय-जितने देश और जितनी जातियोंके आध्यात्मिक महान् पुरुषोंकी नीवनकथा तथा उनका साहित्य उपलब्ध है उसको देखनेवाला कोह मी यह नहीं कह सकता है कि आध्यात्मिक विकाम अमुक देश और अमुक जातिकी ही पोती है, क्यों कि सभी देश और सभी जातियोंमें न्यूनाधिक रूपसे आध्यात्मिक विकास- पालें महात्माओंके पाये जानेके प्रमाण मिलते हैं । योगका १ लोर्ड एवेबरीने जो शिक्षाची पूर्ण व्याख्या की है वह इसी प्रकारको है:-" Ednestion is the tattomous development of all our faculties, २ दृशं प्रेक्षणे-ण १ हेमचन्द्र पातुपाठ. ३ तत्त्वार्य अध्याय २ सूत्र ह-रलोक वार्विक. १ २ ५ षड्दर्शन समुपय-शेक २-"दर्शनानि पहेश" इत्यादि. ६ उदाहरणार्थ जरयोस्त, मु, महम्मद आदि. " " " संपन्य माध्यात्मिक विकाससे हैं। अत एव यह स्पष्ट है कि योगका भस्तित्व सभी देश और सभी जातियों में रहा है। तथापि कोई भी विचारशील मनुष्य इस यातका इनकार नहीं कर सकता है कि योगके आविष्कारका या योगको पराकाष्ठा तक पहुंचानेका श्रेय भारतवर्ष और आर्यजातिको ही है। इसके सयूवमें मुस्त्र्यवया तीन पातें पेश की जा सकती है। १ योगी, ज्ञानी, तपस्वी भादि आध्यात्मिक महापुरुषोंकी बहुलवा २ साहित्यके भादर्शकी एकरूपता ३ लोकरुचि। १ योगी, ज्ञानी, तपस्वी आदि आध्या. स्मिक महापुरुपोंकी बहुलता-पहिलेसे आज तक भारतवर्ष में थाध्यात्मिक व्यक्तियों की संख्या इतनी बडी रही है कि उसके सामने अन्य सर देश और जातियों के माध्यात्मिक प्यक्तियों की कुल संख्या इतनी अल्प जान पडती है जिवनी कि गंगाके सामने एक छोटीसी नदी। २ साहित्यके आदर्शकी एकरूपता-तप- शान, आचार, इतिहास, काव्य, नाटक भादि साहित्यका कोई भी भाग लीजिये उसका अन्तिम श्रादर्श बहुधा मोर ही होगा। प्राकृतिक दृश्य और कर्मकाण्डके वर्णनने वेदका यहुत पड़ा भाग रोका है सही, पर इसमें संदेह नहीं कि वह...
[६]
वर्णन येदका शरीर मात्र है। उसकी भात्मा कुछ और ही
है-वह है परमात्मचिंतन या माध्यात्मिक मानोंका भावि.
फरय । उपनिपदोका प्रासाद तो मनचिन्तनकी पुन्याद पर
ही सडा है। प्रमाणविषयक, प्रमेयविषयक कोई भी तच.
भान संबन्धी रामान्य हो उसमें भी सचशानके साध्यरूपसे
मोपका ही वर्णन मिलेगा। भाचारविषयक या स्मृति
भादि समी ग्रन्योंमें पाचारपालनका मुख्य उदेश मोच ही
१ शेरिकदर्शन अ० १ सू०४-
धर्मविशेषसम्लाद् द्रव्यगुण मंसामान्यविशेषसमवाया
पार्याना • माघम्यवेधयांभ्यां तस्यज्ञानामि भयसम्॥
न्यायदर्शन प० १ ०१-
प्रमाणप्रमेयमर यप्रयोजनहष्टान्तसिद्धान्तावयात निगां.
पवाजीनगदखामामन्दसानिनिहायानानt anा.
हानामभयमम ॥
साम्याशंन भ० १-
খ বিনিবনালা ।।
वेदान्नदर्शन य.
४ पा. मु. २२-
अनादि. शनानासि समार॥
अननसायं. मु०१-
सम्पादन निमार्गः ॥
7
[७] माना गया है। रामायण, महामारत भादिके मुख्य पात्रोंकी महिमा सिर्फ इस लिये नहीं कि वे एक पड़े राज्यके स्वामी थे, पर वह इस लिये है कि अंतमे वे संन्यास या उप- स्याके द्वारा मोक्षक अनुष्ठानमें ही लग जाते हैं। रामचन्द्रजी प्रथम ही अवस्था पशिष्ठसे योग भौर मोदकी शिक्षा पा लेते हैं । युधिष्ठिर मी युद्ध रस लेकर पाण-शप्यापर सोये हुवे भीष्मपितामहसे शान्तिका ही पाठ पढते हैं। गीता वो रणांगणमें भी मोपके एकतम साधन योगका ही उपदेश देती है । कालिदाम जैसे शृंगारप्रिय कहलानेवाले कवि भी अपने मुख्य पात्रों की महना मोदकी थोर झूकनेमें ही देखते है। जैन भागम और बौद्ध पिटक तो निवृतिप्रधान होनेसे १ पासवल्क स्मृति म. ३ यतिधर्मनिरूपणम् ; मनुस्मृति भ० १२ र ८३ २ देखी योगवाधि ३ वा महाभारत-शान्ति ४ कुमारमभव ~म तथा ५ वरम्या वर्णन. शाकुन्तल नाटक अरु ४ करवाति, भूला चिराय चतुरन्तमदीनपत्नी, दोप्यन्तिमप्रतिरयं तनय निवश्य । मा तदर्पितइटुम्वरेण सार्थ, शान्त करिष्यमि पर पुनरामेऽम्मिन् ||
हम्पतया मोषके मिगय अन्य पियोंका यर्णन करने
पातही मानाने हैं। शनशासमें भी शादिको या
मानका धार मान कर उमा मन्तिम ध्येय परम भेग
मारिया! कामशागतका भी भागिर
अंगमंच'। इस प्रकार भारतीय साहित्यकाको
मी देगिर. उगकी गति समुद्र जगे भपरिमेय ए।
गुणाकी और ही होगी।
गानाग यो amire
मुना बोगनाने नुमना !
AMITHAT THEpi,
नाta AIIMIम् ।
वाला माना शिक्षिी,
Pramariaferika 1.01
'श.
Pisces armruta
Hasixx
[]
३ लोकरुचि-आध्यात्मिक विषयकी चर्चावाला
और खासकर योगविषयक फोह मी अन्य किसीने भी लिया
कि लोगोंने उसे अपनाया। कंगाल और दीन हीन अवस्थामें
मी मारतपय लोगोंकी उक्त अभिरुचि यह सूचित करती
कि योगका सम्पन्ध उनके देश व उनकी जातिमें पहलेसे
ही चला आता है। इसी कारणसे मारतवर्पकी सभ्यता
भरएपमें उत्पन हुद कही जाती है। इस पैक स्वमायके
कारण जब कभी भारतीय लोग तीर्थयात्रा या सफरके लिये
पहाडों, जंगलों और अन्य तीर्थस्थानों में जाते हैं वर ये
टेरा डालनेसे पहले ही योगियोंको, उनके मठोंको और
उनके चिहतकको भी ढुंढा करते है। योगकी श्रद्धाका
उद्रेक यहां तक देखा जाता है कि किसी नंगे पावको
गजिकी चिलम फूंकते या जदा बढ़ातं देखा कि उसके मुंहके
धुंएमें या उमकी जटा व भम्मलेपमें योगका गन्ध थाने
लगता है । भाग्नवपके पहाड, जंगल और नीर्थधान भी
बिलकुल योगिशून्य मिलना दुःसंभव है। ऐसी स्थिति
अन्य देश और अन्य जानिमें दुर्लभ है। इससे यह अनुमान
करना महान है कि योगका प्राविफत कानेका तथा परा-
१ दलो कविवर टागोर कृत " साधना
fissa tuo ou
।
"
पृष्ठ ४.
" ॥ 1.1 it.
11'।
[१०] काष्ठा तक पहुंचानेका श्रेय पहुधा मारतवर्षको और भार्य- बातिको ही है। इस पातकी पुष्टि मेषमूलर जैसे विदेशीय भौर मिन्न संस्कारी विद्वान्के कथनसे भी अच्छी तरह होती। भार्यसंस्कृतिकी जड और आर्यजातिका लघण--उपरके कयनसे भार्यसंस्कृतिका मूल भाधार पा है यह स्पष्ट मालूम हो जाता है। शायत जीवनकी उदेपना दी मार्यसंस्कनिकी भित्ति है। इसी पर पाप कृतिक नियों का निषण किया गया है। पर्णविमाग जैसा सामाजिक संगठन और माश्रमव्यवस्था जैसा पैयक्तिक बीरनरिमाग उम चित्रणका अनुपम उदाहरण है। विधा, रपय, शिनिमय और मेवा ये पार जो वर्गदिमागो उमेरम हैं। उनके प्रगाह पाईरप्य जीवनरूप मैदान मलग अलग परकर मी बानायके मुहानेमें मिलकर मनमें मन्यामा. आम मारिमेय मादमें एकरूप हो जाते हैं। मगरा पा है कि सामाजिक, राजनैतिक, पार्मिक मादि ममी संत हिपोका निर्माग, थलबीरनको परिणामगिरमता और मा. Teuttrata tu.पाना) or ००:7.ucts...'-.-Hatimaicut some tant......... यादि २३- पेपर १-inglisrin मेम्जा-माना. - [१] यात्मिक जनारनवी परिणाम गुन्दरता उपर दी किया गया मा एप जो विदेशीय शिान मार्यजातिका सपए gar, उगटीलरोल, प्यापार-प्परसाय, भाषा, पादिम दरात एकदेशीय मात्र है। रोतापारी, जपान ना, परायोको पराना भादि जो जो भर्प मार्पराम्दसे निशाले गये। मापजाविक असाधारण सपरा नहीं है। भापंजानिया समाधारग लपण परलोकमात्रकी पापना भी नहीं है बपों कि उसकी रएिम पर लोक भी स्याय। रमका ममा यौर भन्तरंग सपण स्यूल जग- इ. उसपार पर्तमान परमान्मनकी एकाप्रदिमे उपासना परना यही । म मर्पयापक उदेश्य के कारण चार्यजाति अपना अन्य मर जातियों में भ्रष्ट समझती मार है। झान थे र योगका प्रबन्ध तथा योगका दरजा--प्यपहार । या पामाई. किमी भी विषयका पान मा परिपर गममा जा सकता है जबकि मानानुसार भाचाग किया जाय । अमनमें यह धारण दी योग है। ! | tm १२ मुगावर्गलो- .fa in yuty In 11 0 4 चमभनुमपन्न मा मामा नगना 40 भार २१॥ ३ दम Ani '
[१२]
भव एवं भान योगका कारण है । परन्तु योग पूर्वि जो
मान होता है यह अस्पष्ट होता है। और योगके बाद
होनेवाला भनुमयात्मक मान स्पष्ट तया परिपक होता है।
इसीसे यह समझ लेना चाहिये कि स्पष्ट तथा परिपक
शानकी एक मात्र कुंजी योग ही है। श्राधिमाविक या
आध्यात्मिक कोई भी योग हो, पर यह जिस देश या
जिस जातिमें जिनने प्रमाणमें पुष्ट पाया जाता है उस देश
या उस जातिका विकास उतना ही अधिक प्रमागमें होता
। सथा शानी यही है जो योगी है। जिसमें योग या
एकाग्रता नहीं होती वह योगवाशिष्ठकी परिभाषा ज्ञानबन्धु
१ इसी अभिप्रायसे गीता योगिको ज्ञानीसे अधिक कहती है.
गीता अ०६, शोक ४६-
तपस्विभ्योऽधिको योगी मानिभ्योऽपि मतोऽधिकः।
कर्मिभ्यश्चाधिको योगी तस्माद्
योगी भवार्जुन!॥
२ गीता अ० ५. शोक ५-
यत्सांख्यैः प्राप्यते स्यानं तद्योगैरपि गम्यते ।
एक सांख्यं च योगं च यः पश्यति स पश्यति ।।
३ योगवाशिष्ठ निर्वाण प्रकरण उत्तरार्ध सर्ग २१-
व्याचष्टे य. पठति च शास्त्रं भोगाय शिल्पिवन् ।
यतत न त्वनुष्ठाने ज्ञानयन्धुः स उच्यते ॥
आत्मज्ञानमनासाद्य ज्ञानान्तरलवेन ये |
मन्तुष्टाः कपचेष्टं ते ते स्मृता ज्ञानबन्यवः ॥ इत्यादि.
[१३] गरपिार किसी भी मनुष्यको उत्सान्ति पोदी नीती, पदों कि मानगिक पलवा कारण उसकी गाजिया एक पोरन पर फर भिम मिम पिसाने टपराधी भार परत कर सोनट तो जाती हैं। इगलिंप पपा किमान, परा कारीगर, पया सेयर, पया सापक, पमा स्यागी सभीफो अपनी नाना शातियाँको बन्द्राय पारनेर लिय योग ही परम मापन। च्यापहारिक पोर पारमार्षिक योग- মালয় মেয়া, সব কী লামা মন ममत्तफा म्याग। जिसमें सिर्फ एकाप्रताका संबन्ध दो पर प्यापारिफ पांग, मार जिगमें एकाप्रवाके माच साप महल ममत्व त्यागका भी मंपन्य हो वह पारमार्षिक योग है। पदि योगका उत्त. मात्मा किसी भी प्रतिम-पादे पर दुनिया में पानी पयों न समझी जातीको पर्तमान तो उस पामाधिक योग ही ममझना पाहिये। गफ पिपरांत म्गूलरहिवाले जिम प्रतिको माध्यात्मिक मममने हों. उममें भी पदि योगका उक्त भान्मा न हो वो रमे प्यवहारिक योग ही कहना चाहिये । यदी पात गीताके साम्पगर्भित कर्मयांग की गई। पंपापुर कमाए मद सावा धनचय। सिमियो समा भूत्वा मस्व योग सध्यते ।।
[१४] योगकी दो धारायें-व्यवहारमें किसी भी व- स्तुको परिपूर्ण स्वरूपमें तैयार करनेके लिये पहले दो बातोंकी आवश्यकता होती है। जिनमें एक ज्ञान और दूसरी किया है। चितरेको चित्र तैयार करनेसे पहले उसके स्व- रूपका, उसके साधनोंका और साधनोंके उपयोगका ज्ञान होता है, और फिर यह ज्ञान के अनुसार क्रिया भी करता है तभी वह चित्र तैयार कर पाता है। वैसे ही आध्यात्मिक क्षेत्रमें भी मोनके जिज्ञासुके लिये पन्धमोक्ष, मात्मा और पन्धमोदके कारणोंका तथा उनके परिहार, उपादानका ज्ञान होना जरूरी है। एवं ज्ञानानुसार प्रवृत्ति भी आवश्यक है। इसी से संक्षेपमें यह कहा गया है कि "ज्ञानक्रियाभ्याम् मोक्षः"। योग क्रियामार्गका नाम है । इस मार्गमें प्रवृत्त होनेसे पहले अधिकारी, प्रात्मा आदि आध्या- त्मिक विषयों का प्रारंभिक ज्ञान शास्त्रसे, सत्संगसे, या स्वयं प्रतिभा द्वारा कर लेता है। यह तत्त्वविषयक प्राथमिक ज्ञान प्रवर्तक ज्ञान कहलाता है। प्रवर्तक ज्ञान प्राथमिक दशाका ज्ञान होनेसे सबको एकाकार और एकसा नहीं हो सकता। इसीसे योगमार्गमें तथा उसके परिणामस्वरूप मोक्षस्वरूपमें ताचिक भिन्नता न होने पर भी योगमार्गके प्रवर्तक प्राथमिक ज्ञानमी कुछ मिनता अनिवार्य है। इस प्रवर्तक ज्ञानका मुख्य विषय प्रात्माका अस्तित्व है। प्रा. स्माका स्वतन्त्र अस्तित्व माननेवालोंमें भी मुख्य दो मत है-पहला एकात्मवादी और दूसरा नानात्मवादी । नानात्म- बादमें भी मात्माकी व्यापकता, अव्यापकता, परिणामिवा, अपरिणामिता माननेवाले अनेक पच हैं। पर इन वादोंको एकतरफ रख कर मुल्य जो भात्माकी एकता भार अनेक- ताके दो वाद हैं उनके आधार पर योगमार्गकी दो पारायें हो गई है। अत एव योगविषयक साहित्य भी दो मागाम विमक्त हो जाता है। कुछ उपनिपदें,' योगवाशिष्ठ, हठ- योगप्रदीपिका आदि अन्य एकात्मवादको लक्ष्यमें रख कर रचे गये है। महाभारतगत योग प्रकरण, योगसूत्र तथा जैन और यौद्ध योगग्रन्थ नानान्मवादके आधार पर रचे गये हैं। योग और उसके साहित्यके विकासका दिग्दर्शन--आयमाहिन्यका भाण्डागार मुख्यतया तीन मागोंमें विभक्त है वैदिक, जैन और बौद्ध । वैदिक माहि. स्पका प्राचीनतम प्रन्थ ऋग्वेद है। उसमें प्राधिभौतिक और प्राधिदैविक वर्णन ही मुख्य है। नयापि उसमे प्राध्या- १ प्रविधा, सुरिका, पालका, नादयन्दु, प्रविन्दु अमृतबिन्दु, थानबिन्दु, तेजोरिन्दु, शिवा, योगतत्व, स.
[१६] त्मिक भाव अर्थात् परमात्मचिन्तनका अमाव नहीं है। परमात्मचिन्तनका माग उसमें थोडा है सही, पर वह इतना अधिक स्पष्ट, सुन्दर और भावपूर्ण है कि उसको ध्यानपूर्वक देखनेसे यह साफ मालूम पड़ जाता है कि तत्कालीन लोगोंकी दृष्टि केवल बाह्य ने थी। इसके सिया उसमें १ देखो" मागवताचा उपसंहार" पृष्ठ २५२. २ उदाहरणार्य कुछ सूक्त दिये जाते है:- ऋग्वेद मं. १सू. १६४-४६- इन्दं मित्रं वरुणमनिमाहुरथो दिव्यः स सुपर्णो गरुत्मान | एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्त्यानं यमं मातरिधानमाहुः॥ भाषांतर:--लोग उसे इन्द्र, मित्र, वरुण या अनि कहते हैं। वह सुंदर पस्सिवाला दिव्य पक्षी है। एक ही सत्का विद्वान लोग अनेक प्रकारमे वर्णन करते है। कोई उसे मामि, यम या वायु भी कहते हैं। ऋग्वेद मएड. ६ सू.६ वि मे कों पनयतो वि चनुदि ज्योतिहदय माहितं यम् । दिमे मनश्चरति दूर प्राधीः किंस्विद् पदयामि किमुनु मनिध्ये ॥६॥ विधे देवा मनमायन भियानास्वाममे ' तमाश तस्थिवांसम् । धानरोजनये मोऽपर्योऽतूनये नः ॥ ७ ॥ भाषांवर:--मो कान विविध प्रकारकी प्रवृत्ति करते है। नंत्र, मेरे लयमें स्थित ज्योति चौर मेरा दूरपति मन (भी) [१७] शान, श्रद्धा, उदारता, प्रीचर्य आदि आध्यात्मिक उच्च मानसिक मावोंके चित्र मी बढी सूचीवाले मिलते हैं। इससे विविध प्रति कर रहा है। मैं क्या करें और क्या विचार पद ?|६अंधकारपित हे अग्नि! एजको अंधकारसे भय पानेवाले देव नमस्कार करते हैं। श्वानर हमारा रक्षण करे। अमर्त्य हमारा रक्षण करे। .॥ पुषसूक्त मण्डल १० सू ६. ऋग्वेद:--- सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात् । स भूमि विश्वतो पृत्वात्सविष्टदशाहुलम् ॥ १ ॥ पुरष एवेदं सर्व यदूतं यच मन्यम् । उतामृतत्वस्येशानी यदननातिगेहति ॥ २॥ एतावानस्य महिमाऽनो ज्यायांश्च पूरुषः । पादोश्य विश्वा भूतानि विपादस्यामृतं दिवि ||३|| भाषांतर:-~(जी) हजार सिरपाना, हजार प्रखवाला, हजार पाँववाला पुरुष (है) वह भूमिको धारों भोरसे पर कर (फिर भी ) दस अगुल बद कर रहा है । १ । पुरष ही यह सब कुछ है-जो भूत और जो भावि । (वह) अमृतत्त्वका ईश अनसे पता है ।२। इतनी इमकी महिमा-इससे भी १ म.१० सू.७१ ऋग्वेद।२ मं. १००१५१ । ३.१० सू. ११७ ऋग्वंद । ४ म. १० सू. १. ऋग्वेद ।
[१६] त्मिक भाव अर्थात् परमात्मचिन्तनका अमात्र नहीं है। परमात्मचिन्तनका भाग उसमें थोडा है सही, पर वह इतना अधिक स्पष्ट, सुन्दर और भावपूर्ण है कि उसको ध्यानपूर्वक देखनेसे यह साफ मालूम पड़ जाता है कि तत्कालीन लोगोंकी दृष्टि केवल बाह्य न थी। इसके सिवा उसमें १ देखो “ मागवताचा उपसंहार" पृष्ठ २५२. २ उदाहरणार्य कुछ सूक्क दिये जाते हैं:- ऋग्वेद मं. १ सू. १६४-४६--- इन्द्रं मित्रं वरुणममिमाहुरयो दिव्यः स सुपणों गरुत्मान। एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्त्यानं यमं मातरिश्वानमाहुः॥ भाषांतर:--लोग उसे इन्द्र, मित्र, वरुण या अनि कहते हैं। वह सुंदर पांखवाला दिव्य पक्षी है। एक ही सत्का विद्वान् लोग अनेक प्रकारसे वर्णन करते है । कोइ उसे आनि, यम या वायु मी कहते हैं। ऋग्वेद मएड. ६ सू.६ वि में कों पतयतो वि चतुर्वीदं ज्योतिर्हदय आदितं यत् । वि मे मनश्वरति दूर आधीः किंस्विद् वक्ष्यामि किमु नु मनिष्ये ॥६॥ विश्वे देवा अनमस्यन् भियानास्त्वाममे ! तमास तस्थिवांसम् । वैश्वानरोऽत्रतूतये नोऽमयोऽवतूतये नः ॥ ७॥ मापांवरः-मेरे कान विविध प्रकारकी प्रवृत्ति करते हैं। मेरे नेत्र, मेरे हृदयमें स्थित ज्योति और मेरा दूरवर्ति मन (मी) ।
। [१७] शान, श्रद्धा, उदारता, प्रदेंचर्य आदि आध्यात्मिक उच्च मानसिक भावोंके चित्र मी पडी सूचीवाले मिलते हैं। इससे विविध प्रति कर रहा है। मैं क्या करें और क्या विधार कर?|६|भंघकारस्थित अमि! तुमको अंधकारसे भय पानेवाले देष नमस्कार करते हैं। श्वानर हमारा रपए करे। अमर्त्य हमारा रक्षण करे।। पुरुष मण्डल १० सू. ऋग्वेद:- सहस्रशीर्षा पुरष: सइयायः सहमपात् । स भूमि विश्वको पृत्वात्यविष्टसाहुलम् ॥१॥ पुरुष एवेदं सर्व यदूतं यच मध्यम् । सामूसत्वस्येशानी यदन्ननातिरोहति ॥२॥ एवामानस्य महिमाऽतो पायांच पूपः । पादास्य विश्वा भूतानि निणदस्यामृतं दिवि ॥॥ भाषांतर:-~~( जो) हजार सिरयाना, हजार प्रांखवाला, हजार पाववाला पुरुष (है। वह भूमिको चारों चौरसे पर कर (फिर भी ) दस अगुल बद कर रहा है। १ । पुरुष ही यह सब कुछ है-जो भूत और जो भावि। (वह) अमृतत्वका हरा धसे बदता है।२। इतनी हमकी महिमा-दमसे भी १ म.१० स.७१ शवदा२म.१० २० १५१ ऋग्वेद २म.१० सू. ११. ऋग्दछ । ४ मं. १० सू. १० जावेद ।
[१६] त्मिक भाव अर्थात् परमात्मचिन्तनका अमाव नहीं है। परमात्मचिन्तनका माग उसमें थोडा है सही, पर वह इतना अधिक स्पष्ट, सुन्दर और भावपूर्ण है कि उसको ध्यानपूर्वक देखनेसे यह साफ मालूम पड़ जाता है कि तत्कालीन लोगोंकी दृष्टि केवल पाम न थी। इसके सिवा उसमें १देखो " मागवताचा उपसंहार " पृष्ठ २५२. २ उदाहरणार्थ कुछ सूत दिये जाते हैं:- शावेद मं. १ सू. १६४-४६- इन्द्र मिश्र वरुणमप्रिमाहुरयो दिव्यः स सुरणों गरुत्मान । एक सद्विप्रा बहुधा वदन्त्यानि यमं मातरियानमाहुः ।। भाषांतर:--लोग उमे इन्द्र, मित्र, वरुण या प्रति कहते हैं। वह मुंदर पायाला विठय पक्षी है। एक ही मका विद्वान लोग अनेक प्रकारमे वर्णन करते है। कोई उमे भामि, यम या वायु । ऋग्वेद मण्ड ६ मू. हि मे को पनयता वि चतुरि योनिदय मादिनं या । विमे मनधरनि प्राधी: शिबिर वक्ष्यामि किमु नु मनिये ॥६॥ विशे देश पनमभ्यन मियानास्वाम'नमामि नस्यियामम् । भानगडानूनो नमोऽस्तये नः ॥ • ॥ माषांतर:-मेरे भान विविध प्रकारची प्रति से। "नेत्र, मेरे लयमें स्थित मानि और मेरा दून (मी)
[१६]
भनेक स्थानोंमें भाया है, पर सर्वत्र उसका अर्थ प्राय:
जोडना इतना ही है, ध्यान या समाधि अर्थ नहीं है।
इतना ही नहीं पन्कि पिछले योग चिपयक साहित्य में ध्यान,
वैराग्य, प्राणायाम. प्रत्याहार श्रादि जो योगप्रक्रिया प्रसिद्ध
शन्द पाये जाते हैं ये ऋग्वेदमें बिलकुल नहीं है। ऐसा होनेका
कारण जो कुछ हो, पर यह निश्चित है कि तत्कालीन
लोगोंमें प्यानकी भी रुचि थी। ऋग्वेदका प्रमस्फुरण जैसे
बम विकसित होता गया और उपनिषदके जमाने में उसने
जैसे ही विस्तृत रूप धारण किया वैसे वैसे ध्यानमार्ग मी
अधिक पुष्ट और सागोपाङ्ग होता चला। यही कारण है
कि प्राचीन उपनिषदोंमें भी समाधि अर्थमें योग, ध्यान
भाषांतर:-कौन जानता है-कौन १६ मरता है कि यह
विविध सृष्टि कहाँम उत्सन्न हुए ? ( देव इसके विविध सर्जनके
बाद (९) है । कौन जान सकता है कि यह कहांस आई ?
यह विविध सृष्टि कहामे भाई और स्थितिमें है वा नहीं है ? यह
बात परम व्योममें जो इसका अध्यक्ष है वही जाने कदाचित
वह भी न जानता हो।
१ मंडल १ सूक्त ३४ मत्र मं. १० सू. १६६ मं,५॥
मं. १ सू. १८ में.७१ मं १, सू ५ मं. ३। मं. २ २.८
मं.१ मं. ९ सू. ५८ मं. ३
[१८] यह अनुमान करना सहज है कि उस जमानेके लोगोंका मुकाय आध्यात्मिक अवश्य था। यद्यपि ऋग्वेदमें योगशब्द वह पुरुप अधिकतर है। सारे भूत उसके एक पाद मात्र है- उसके अमर तीन पाद स्वर्गमें हैं। ३ । क सूक्त मं. १० सू. १२१ ऋग्वेदः- हिरण्यगर्भः समवर्तताप्रे भूतस्य जातः पतिरेक आसीत् । स दाधार पृथिवीं चामुतेमा कस्मै देवाय हविषा विधेम ॥१॥ य आत्मदा बलदा यस्य विश्व उपासते प्रशिपं यस्य देवाः। यस्य च्छायामृतं यस्य मृत्युः कस्मै देवाय हविषा विधेम ||२|| भाषांतर:-पहले हिरण्यगर्भ था । वही एक भूत मात्रका वपति पना था। उसने पृथ्वी और इस आकाशको धारण किया। अनेका देवको हम हविसे पूजें ।। १ । जो आत्मा और बलको मी कहता है । जिसका विश्व है। जिसके शासनकी देव उपासना ऋग्वेद अमृत और मृत्यु जिसकी छाया है। किस देवको वि मे कणों पहले ।।२। विमे मनश्चरति दूर-१२६-६ तथा ७- विश्वे देवा मनमस्य- इह प्रयोवत् कुत आ जाता कुत इयं विसृष्टिः । वैश्वानरोऽवतूतये नोऽवसर्जनेनाथा को वेइ यत आ बभूव ।। भापांवर:-मेरे बभूव यदि वा दधे यदि वा न । मेरे नेत्र, मेरे हृदयमें सिव्योमन्सो अङ्ग वेद यदि वा न वेद ।।
[१६]
अनेक स्थानोंमें आया है, पर सर्वत्र उसका अर्थ प्राय:
जोडना इतना ही है, ध्यान या समाधि अर्थ नहीं है।
इतना ही नहीं बल्कि पिछले योग विषयक साहित्यमें ध्यान,
वैराग्य, प्राणायाम. प्रत्याहार आदि जो योगप्रक्रिया प्रसिद्ध
शन्द पाये जाते हैं ये ग्वेदमें बिलकुल नहीं है। ऐसा होनेका
कारण जो कुछ हो, पर यह निश्चित है कि तत्कालीन
लोगोंमें प्यानकी भी रुचि थी। ग्वेदका ब्रह्मस्फुरण से
जसे विकसित होता गया और उपनिषदके जमाने में उसने
जैसे ही विम्न्न रूप धारण किया वैसे वैसे ध्यानमार्ग मी
अधिक पुष्ट और मागीपान होता चला। यही कारण है
कि प्राचीन उपनिषदों भी ममाधि अर्थमें योग, ध्यान
भापाता.~-कौन जानना है-कौन ६६ सकता है कि यह
विविध मूष्टि कहॉम हु. देव इसके विविध मर्जनके
बाद (हुँदै ) है | कौन जान सकता है, कि यद हामे आई?
यह विविध मांट हाम पाई और स्थितिमें है या नहीं है? यह
पास परम व्योम में जो इसका अध्यक्ष है वही जान-कदाचित
वह भी न जानना हो।
१ महले १ सूक्त ३४ मत्र म.१०. १६६ म.५।
म., सू१८ म.७ । म १ यू ५३१ में २ सू..
में १ | म ९ म ५८ म.।
[२०] आदि शन्द पाये जाते हैं। श्वेताश्वतर उपनिषदमें तो स्पष्ट रूपसे योग तथा योगोचित स्थान, प्रत्याहार, धारणा आदि योगालोंका वर्णन है। मध्यकालीन और भाचीन अनेक उपनिषदें तो सिर्फ योगविषयक ही है, जिनमें योगशास्त्रकी तरह गांगोपांग योगप्रक्रियाका वर्णन है। भयया यह कहना १(क) सिरिय २-४। कठ २-६-११ घेताधतर २-११, ६-३। (R) धान्दोग्य ७-६-१, ७-६-२, .-७-१, ७-२६-१। श्वेता धतर १-१४ । कोशीस ३-२,३-३,३-४,३-६॥ २ तातोपनिषद अध्याय २- विमतं म्याय ममं शरीरं वीन्द्रियाणि मनसा मंभिक प्रोपेन प्रोन विद्वान्यानामि मागि भयावहानि ||८|| प्रासापायह मयुकटः धाण प्राणे नामिक योदमीन । दुश्वयुकमिव वाहमेन विद्वा-मनी धारधेनाप्रमा॥ ममे सपो सामानुपानि सदनमायानिमिः। मनोनुन नबनुन गुहानिशानायगो प्रयोजयेत् ॥१०॥ इत्यादि गावास, ghaniनगद, पूननिर, मार. For merg, अमन, पानविद नमान्दुि, योग. रिमा, योगा । यो गुमनाम- Philosophy of [२१] चाहिये कि ऋग्वेदमें जो परमात्मचिन्तन भंकुरापमाण था वही उपनिषदोंमें पनावित पुष्पित होकर नाना सासा प्रशा- खामोंके साप फल अवस्थाको प्राप्त हुवा । इससे उपनिषद- कालमें योगमार्गका पुष्टरूपमें पाया जाना स्वामाविक ही है। उपनिषदाम जगव, जीव भौर परमात्मसम्पन्धी जो वारिक विचार है, उसको मिन भिम भूपियोंने अपनी रटिसे प्रोम प्रार्थित किया, और इस तरह उस विचारको सना रूप मिला ! सभी दर्शनकारोंका भागिरी उद्देश मोच ही रहा है, इसमे उन्होंने अपनी अपनी दृष्टिसे तब- • प्रमाप्रमेयमशययोजनाष्टान्तसिद्धान्तावनीमय- बादजल्पविनत्वाभामछलजातिनिप्रहस्थानाना तपमाना- मि:भेयमाधिगमः। गौ० म० १-१-१। धर्मविशेपप्रमूनाद् द्रव्यगुरुकमान्यविशेषममधापाना पदार्याना साधयंवैधा- भ्या तन्वतानानिगमम ॥ ० मू०१-१-४॥ अथ त्रिविष- दुःखात्यन्तनि नित्यन्तपुरपाय मा० २० १-११ पुरुषार्थ- रान्याना गणाना नियम + प्रिनिष्ठावा विनिशात- ति । या० सु. ४ १ न वादनानि. शमान ४-४-२,म.। मम्यग्दशनमा मामा, नवार्थ १-१ ग. २. यौद्ध दर्शन नमरा संच मा भार्गमय ही मोक्ष है - r [२४] ही है, मोच उसका साध्य नहीं | और योगका उपयोग तो मोरके लिये ही होता है। नो योग उपनिषदोंमें सूचित और सूत्रोंमें मूत्रित है, उसीकी महिमा गीतामें अनेक रूपसे गाइ गइ है। उसमें योगकी तान कभी कर्मके साथ, कभी भक्तिके साय और कमी ज्ञानके साथ सुनाई देती है। उसके छठे और तेरहवें अध्यायमें तो योगके मौलिक सर सिद्धान्त और योगकी सारी प्रक्रिया आ जाती है। कृष्णके द्वारा अर्जुनको १ गीताके अठारह अध्यायों में पहले यह अध्याय फर्मयोग प्रधान, विपके छह अध्याय भक्तियोग प्रधान और प्रतिम यह मशय ज्ञानयोग प्रधान है। २ योगी युजीत मततमात्मानं रहसि स्थितः । एकाकी यतचित्तात्मा निराशीरपरिग्रहः ।।१०।। शुषो देशे प्रतिष्ठाप्य स्थिरमासनमात्मनः । नात्युच्छ्रितं नातिनीच चैलानिनकुशोत्तरम् ॥११॥ सत्रैकामं मनः कृत्वा यतचित्तेन्द्रियक्रियः । सपरिश्यासने युम्याद् योगमात्मविशुद्धये ॥ १२ ॥ समं कायशिरोग्रीव धारयनपलं स्थिरः। संप्रेक्ष्य नासिका व दिशधानवलोकयन ॥ १३ ॥ प्रान्तात्मा विगतमाशाचाग्मिने स्थितः । मनः संयम्य मचिता युम. आमीत मसाः ॥१४॥4.६
[२५]
गीताके रूपमें योगशिक्षा दिला कर ही महाभारत
सन्तुष्ट नहीं हुआ। उसके अथक स्वरको देखते हुए कहना
पड़ता है कि ऐसा होना समय भी न था। मत्त एव शान्ति-
पर्व और अनुशासनपर्वमें योगविषयक अनेक सर्ग वर्तमान
है, जिनमें योगकी अयति प्रक्रियाका वर्णन पुनरुक्तिकी
परवा न करके किया गया है। उसमें पापशव्यापर लेटे
हुए मीप्मसे बार बार पूछनेमें न तो पुधिष्ठिरको ही कंटाला
माता है. और न उस मुपात्र धार्मिक राजाको शिक्षा देनेमें
मीप्मको ही यकावट मालूम होती है।
योगवाशिष्ठका विस्तृत महल तो योगकी भूमिकापर
पडा किया गया है। उनके छह प्रकरण मानों उसके मुदीप
कमर है, जिनमें योगी सरन्ध रखनेवाले सभी विषय
रोचकनारक वर्णन किये गये है। योग की जो जो गाते
योगदर्शन में मक्षपमें कही गई है, उन्हींश विविधरुपमें
विस्तार कार अन्धकारने योगवाशिष्टका कलेवर पहन पढा
दिया है, जिसमें ही रहना पहना है कि योगवाशिष्ठ
योगका अन्धगज है।
पुगगगमें सिर्फ प्रगशिगमाग भागवत को ही देसिंग,
उसमें योगका मम पर पयाम पग वर्णन है।
१ न.:..:.:.४ इत्यादि।
धनुशाम'.....। है ।
मुर।14-
9
.
H [२६] योगविषयक विविध साहित्यसे लोगोंकी रुचि इतनी परिमार्जित हो गई थी कि तान्त्रिक संप्रदायवालोंने भी तन्त्र- अन्यों में योगको जगह दी, यहां तक कि योग तन्त्रका एक खासा अंग बन गया। अनेक तान्त्रिक ग्रन्थों में योगकी चर्चा है, पर उन सबमें महानिर्वाणतन्त्र, पचक्रनिरूपण श्रादि मुख्य है। १ देखो महानिर्वाणतन्त्र ३ अध्याय । देखो पटवक्रनिरूपण. ऐक्यं जीवात्मनोराहुर्योग योगविशारदाः । शिवात्मनोरभेदेन प्रतिपतिं परे विदुः॥ पृष्ठ ८२ Tantrik Texts में छपा हुआ. समत्वभावनां नित्यं जीवात्मपरमात्मनो। समाधिमाहुर्मुनयः प्रोक्तमाङ्गलक्षणन् । पृ० ६१ , यदत्र नात्र निर्भामः स्तिनितोदविवत् स्मृतम् । स्वरूपशून्य यद् ध्यानं तत्म माधिविधीयते । ०६०, त्रिकोणं तस्यान्त: स्फुरन लतत विद्युदाकाररूपं । वदन्तः शून्यं तत् मकन पुग्गणे. मेवितं चातिगुमम् ।। पृ.६० "आहारनिहारविहार योगाः मुमता धर्भविदा तु कार्या:" पृ०६९" ध्यै चिन्तायाम स्मृता चातुश्चन्ता तत्त्वेन निश्चला। एनद् ध्यानमिह प्रक गुण निर्गुणं द्विधा। सगुण वर्णभेदेन निगुणं केवल तया ।। पृ०१३४ " [२७] जय नदीमें याद आता है तब यह चारों श्रोरसे बहने लगती है। योगका यही हाल हुआ, और वह श्रासन, मुद्रा, प्राणायाम आदि बाह्य अंगोंमें प्रवाहित होने लगा। पाय अंगोंका भेद प्रभेद पूर्वक इतना अधिक वर्णन किया गया और उसपर इतना अधिक जोर दिया गया कि जिससे वह योगकी एक शाखा ही अलग बन गई, जो हठयोगके नामसे प्रमिद्ध ह। हटयोगके अनेक ग्रन्थोंमें हठयोगप्रदीपिका, शिव- संहिता, घरएडसंहिता, गोरक्षपद्धति, गोरक्षशतक आदि ग्रन्थ प्रसिद्ध हैं, जिनमें थासन, पन्ध, मुद्रा, पद्कर्म, कुंभक, रेचक, पूरक यादि बाह्य योगांगोंका पेट भर भरके वर्थन किया है, और घेरण्डने तो चौरासी थासनको चौरासी लाख तक पहुंचा दिया है। उक्त हठयोगप्रधान ग्रन्थों में हठयोगप्रदीपिका ही मुख्य है, क्यों कि उसीका विपय अन्य ग्रन्थों में विस्तार रूपसे वर्णन किया गया है। योगविषयक साहित्यके जिज्ञासुओंको योगतारापली, बिन्दुयोग, योगचीज और योगकल्पद्रुमका नाम भी भूलना न चाहिये । विक्रमकी मत्रहवीं शताब्दीमें मंथिल पण्डित मवदेवद्वारा रचित योगनिवन्ध नामक हस्व- लिखित ग्रन्थ भी देखनमें आया है, जिसमें विष्णुपुराण श्रादि अनेक ग्रन्थों के हवाले दे कर योगसम्बन्धी प्रत्येक विषय पर विस्तृत चर्चा की गई है ।
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[२६] जैन सम्प्रदाय निति-प्रधान है। उसके प्रवर्तक मग- वान महावीरने पारह सालसे भधिक समय तक मौन धारण करके सिर्फ धात्मचिन्तनद्वारा योगाभ्यासमें ही मुख्यतया जीपन पिताया। उनके हजारों शिष्य तो ऐसे थे जिन्होंने परपार छोड कर योगाभ्यासद्धारा साधुजीवन पिताना ही पसंद किया था। जैन सम्प्रदायके मौलिक अन्य भागम कहलाते हैं। उनमें साधुचर्याका जो पर्यन ई, उसको देखनेसे यह स्पष्ट जान पटता है कि पांच यम; तप, स्वाध्याय चादि नियम; इन्द्रिय-जय-स्प प्रत्याहार इत्यादि जो योगके सास था है, उन्दीको साधुजीवनका एक मात्र प्राग माना है। जैनशासमें योगपर यहां तक मार दिया गया है कि पहले वो यह मुमुक्षुओंको आत्मचिन्तनके सिवाय दूसरे कार्याने प्रवृत्ति करनेकी संमति ही नहीं देता, भार अनिवार्य स्पर्म प्रवृत्ति करनी प्रावश्यक हो तो वह निवृत्तिमय प्रवृत्ति करनेको कद्दता है। इसी निवृत्तिमय प्रवृत्तिका नाम उसमें अष्टप्रवचनमाता है। साधुजीवनकी दैनिक भार रात्रिक पउहमहि ममणमाइस्मीहिं छत्तीसाद त्रिपा- साहमाहिं अववाहसूत्र २ सो चापागा, सूचनाह, उत्तराध्ययन, दशकालिक, मूलाधार, भादि । देखो उचराध्ययन प्र. २४ । १ "
[२८]
संस्कृत भाषामें योगका वर्णन होनेसे सर्व साधारणकी
जिज्ञासाको शान्त न देख कर लोकभाषाके योगियोंने भी
अपनी अपनी जबानमें योगका अलाप करना शुरु कर दिया।
महाराष्ट्रीय भाषामें गीताकी ज्ञानदेवकृत ज्ञानेश्वरी
टीका प्रसिद्ध है, जिसके छठे अध्यायका भाग पडा ही
हृदयहारी है । निःसन्देह ज्ञानेश्वरी द्वारा ज्ञानदेवने अपने
अनुभव और वाणीको अवन्ध्य कर दिया है। सुहीरोवा
अंबिये रचित नाथसम्प्रदायानुमारी सिद्धान्तसंहिता भी
योगके जिज्ञासुओंके लिये देखनेकी वस्तु है ।
कबीरका बीजक ग्रन्थ योगसम्बन्धी भापासाहित्यका
एक सुन्दर मणका है।
अन्य योगी मन्तोंने भी भाषामें अपने अपने योगानु-
भवकी प्रसादी लोगोंको चखाई है, जिससे जनताका बहुत
वडा भाग योगके नाम मात्रसे मुग्ध बन जाता है ।
अत एव हिन्दी, गुजराती, मराठी, बंगला आदि
प्रसिद्ध प्रत्येक प्रान्तीय भाषामें पातञ्जल योगशास्त्रका अनुवाद
तथा विवेचन आदि अनेक छोटे बडे ग्रन्थ बन गये हैं।
अंग्रेजी यादि निदेशीय भाषामें भी योगशास्त्रपर अनुवाद
श्रादि बहुत कुछ बन गया है, जिसमें वूडका भाष्यटीका
सहित मूल पातघल योगशाखका अनुवाद ही विशिष्ट है ।
१ मो. राजेन्द्रलाज मित्र, स्वामी विवेकानंद, श्रीयुत्
रामप्रसाद आदि का
[२६]
जैन सम्प्रदाय निवृत्ति-प्रधान है। उसके प्रवर्तक मा-
पान महावीरने मारह सालमे अधिक समय तक मौन धारण
करके मिर्फ सामचिन्तनद्वारा योगाभ्यासमें ही मुख्यतया
जीवन रिवाया। उनके हजारों शिप्य तो ऐसे थे जिन्होंने
परवार छोड कर योगाभ्यामद्वारा साधुजीरन बिताना ही
पसंद किया था।
जैन मम्प्रदायक मालिक अन्य भागम कहलाते हैं।
उनमें साधुचर्याका जो वर्णन है, उसको देखनेसे यह स्पष्ट
जान पटता है कि पांच यमः तप, स्वाध्याय प्रादि नियम,
इन्द्रिय जय-रूप प्रत्याहार इत्यादि जो योगके माम मा
है, उन्दीका माधुजीवन का एक मात्र प्राण माना है।
जनशा में योगपर यहां तक मार दिया गया है कि
पहले तो वह मभूभोंको अात्मचिन्तनके मियाय दूसरे
कायम प्रनि कनिकी समान ही नहीं देना, भार अनिवार्य
स्पर्म प्रनि करनी यावश्यक हो तो वह निवृत्तिमय प्रवृत्ति
कानका कहना है । मानिनिमय प्रवृनिका नाम उसमें
अटप्रवचनमाना है। माजीरनकी दैनिक और रात्रिक
Alt if दम अजिश्रा-
-वाईमृत्री
२६.२१ श्राचा.. सूत्रन, तायन, दशकालिक,
मूलाचार, भादि । ३ देखा उत्ताध्ययन प्र. २४ ।
..
-13
[३०] चर्याम तीसरे प्रहरके सिवाय अन्य तीनों प्रहरोंमें मुख्यतया स्वाध्याय और ध्यान करनेको ही कहा गया है। यह बात भूलनी न चाहिये कि जैन आगमोंमे योग- अर्थमें प्रधानतया ध्यानशब्द प्रयुक्त है । ध्यानके लक्षण, भेद, प्रभेद, पालम्बन आदिका विस्तृत वर्णन अनेक जैन आगोंमें है । आगमके बाद नियुक्तिका नंबर है। उसमें भी आगमगत ध्यानका ही स्पष्टीकरण है। पाचक उमा- स्वाति कृत तत्त्वार्थसूत्र में भी ध्यानका वर्णन है, पर उसमें १ दिवसस्स चउरो भाए, कुजा भिक्खु विअक्खणणे । तो उत्तरगुणे कुञा, दिणभागेसु च उसु धि ॥ १ ॥ पढम पोरिमि मज्झाय, बिइअ झाणं झिआयइ । तइपाए गोभरकालं, पुणो च त्यए सम्झायं ।। १२ ॥ रतिमि च भाए भिक्खु कुना विपकरणो , तो उत्तरगुणे कुन्ना मा. मु उत्तु ॥ १७ ॥ पढमं पोरिमि मज्झ य इिअ झाण झिायइ । तइयाए निमोक्ष नु वन्थिए मुझे विमझायं ॥१८॥ उत्तराध्ययन ५०२६ । २ देखो स्थानाङ्ग अ०४ उद्देश ५। ममवायाङ्ग स०४॥ भगवती शतक-२५ उदंश ७ । उनध्ययन अ० ३०, मो० ३५। ३ देखो आवश्यक नियुक्ति का योमर्ग अध्ययन गा. १४६२ -१४८६ । ४ देखो ५०९ सू० २७ से आगे।
[३१] भागम और नियुक्तिकी अपेक्षा कोई अधिक बात नहीं है। जिनभद्रगपी धमाश्रमणका ध्यानशतक भागमादि उक्त अन्योंमे वर्णित ध्यानका स्पष्टीकरण मात्र है, यहां तक योगविषयक जन विचारोंमें भागमोक्त वर्णनकी शैली ही धान रही है। पर इस शैलीको श्रीमान् हरिभद्रप्रिने एकदम पदलकर तत्कालीन परिस्थिति व लोकरुचिके अनु- सार नवीन परिमापा देकर और वर्णनशैली थपूर्वसी यना- फर जैन योग-साहित्यमें नया युग उपस्थित किया । इसके सयतमें उनके पनाये हुए योगपिन्दु, योगदृष्टिसमुषय, योग- विशिका, योगशत और पोडशक ये अन्य प्रसिद्ध है। इन अन्योंमें उन्होंने सिर्फ जैन-मार्गानुमार योगका वर्णन करके ही संतोष नहीं माना है, किन्तु पाता लयोगमूत्र में वर्णित योगप्रक्रिया और उसकी सास परिभाषायोंके साथ जैन संकेतीका मिलान भी किया है। योगदृष्टिसमुच्चयमें १देखो हारिभद्रीय भावश्यक वृत्ति प्रनित्रमणाध्ययन पृ०५८१ २ यह प्रन्ध जन प्रन्यावान में उल्लिखित है पृ० ११३ । ३ समाधिरप एवान्यैः सप्रमानोऽभिधीयते । सम्यकपरूपेण वृत्यर्थतानतस्तथा ।। ४१८ ।। असप्रज्ञात एषोऽपि ममाधिर्गीयन परः। निदाशेषवृत्त्यादिवत्स्वरूपानुवेधतः ।।४२०॥ इत्यादि. योगविन्दु । - . [३२] योगकी पाठ दृष्टियोंका जो वर्णन है, वह सारे योगसा- हित्यमें एक नवीन दिशा है। श्रीमान् हरिभद्रमरिक योगविषयक ग्रन्थ उनकी योगा- भिरुचि और योगविषयक व्यापक युद्धिके खासे नमूने हैं। इसके बाद श्रीमान् हेमचन्द्रररिकृत योगशास्त्रका नंबर श्राता है। उसमें पातञ्जल-योगशास्त्र-निर्दिष्ट आठ योगां- गोंके क्रमसे साधु और गृहस्थ जीवनकी आचार-प्रक्रियाका जैन शैलीके अनुसार वर्णन है, जिसमें आसन तथा प्राणा- यामसे संबन्ध रखनेवाली अनेक पातोंका विस्तृत स्वरूप है। जिसको देखनेसे यह जान पडता है कि तत्कालीन लोगोंमें हठयोग-प्रक्रियाका कितना अधिक प्रचार था। हेमचन्द्रा- चार्यन अपने योगशास्त्रमें हरिभद्रमरिक योगविषयक ग्रन्थोंकी नवीन परिभाषा और रोचक शैलीका कहीं भी उल्लेख नहीं किया है, पर शुभचन्द्राचार्यके नानार्णवंगत पदस्थ, पिण्डस्थ, १ मित्रा तारा वला दीपा स्थिरा काना प्रभा परा। नामानि योगदृष्टीना लक्षण च निबोधत ॥ १३ ॥ इन आठ दृष्टियों का स्वरूप, दृष्टान्त आदि विषय, योग- जिक्षामुओंके लिये देखने योग्य है। इसी विषयपर यशोविजय- जीने २१, २२, २३, २४ ये चार दारिशिकायें लिखी हैं। साय ही उन्होंने संस्कृत न जाननेवालोंके हिनार्थ आठ दृष्टि- यों की सम्नाय भी गुजराती भापामें बनाई है।
[२] যে, বার্নাস ঘানা বিধবা হন কিয IN उनी सानुमग शिक्षिम, पानापाठ, लिए और न गमनपार मा दर्षन करके नहीनता मानका भी गाय पाल दियाया। निम्गन्दर उनका दोगमाग अनमहान भार जनमापारका एक पात्र प्रन्यो। * র ভােষ্য-ন্যাস যাণমন্মথ। नपर टारमा उपाध्यायजामा भायमान. सांगल और योगानुमय पान गम्भीर पा। इसमे उन्होंने सध्या- मिमार, अमान्मोपनिषद् प्रथा मरीक पधीम पसीनीया पोगान्धी पिपॉपर लिगी. जिनमें जैन मन्तप्यासी एम और गंधक मामामा करने उपरान्त भन्म दर्शन धार अनदानका मिलान भी किया है। इसके मिया 1. वारा 4.भी... पहा 1114141पने माय - ८.4411 : ...॥ . , 4 4 4 . न पाएँ यो 14 न । iiननापा याता- or it. ...... - लसावी या अनुमा स! या [३४] उन्होंने हरिभद्रमुरिकृत योगविंशिका तथा पोडशकपर टीका लिख कर प्राचीन गूढ तत्त्वोंका स्पष्ट उद्घाटन भी किया है। इतना ही करके वे सन्तुष्ट नहीं हुए, उन्होंने महर्षि- पतञ्जलिकृत योगसूत्रोंके उपर एक छोटीसी वृत्ति भी लिखी है। यह वृत्ति जैन प्रक्रियाके अनुसार लिखी हुई है, इस- लिये उसमें यथासंभव योगदर्शनकी भित्ति-स्वरूप सांख्य- प्रक्रियाका जनप्रक्रियाके साथ मिलान भी किया है, और अनेक स्थलोंमें उसका सयुक्तिक प्रतिवाद भी किया है। उपाध्यायजीने अपनी विवेचनामें जो मध्यस्थता, गुणग्राह- कता, सूक्ष्म समन्वयशक्ति और स्पष्टभापिता दिखाई है ऐसी दूसरे प्राचार्योंमें बहुत कम नजर आती है । एक योगसार नामक ग्रन्थ भी श्वेताम्बर साहित्यमें है। कर्ताका उल्लेख उसमें नहीं है, पर उसके दृष्टान्त आदि वर्णनसे जान पडता है कि हेमचन्द्राचार्य के योगशास्त्रके १. इसके लिय उनका क्षानमार जो उन्होंने अतिम जीषनमें लिया मालूम होता है वह ध्यानपूर्व । देखना चाहिये। शाखवातासमुनय की उनकी टीका(पृ . १ . भी देखी आवश्यक है। २ इसके लिये उनके शावातमिमुचयादि प्रन्य च्यान- पूर्वक दम्पन नाहिये, और साम का उनकी पातखल सूत्रवृत्ति मननपूर्वक देखने से हमारा विश्वमनीय मालूम पड़ेगा। कथन अक्षरशः [३५] প্রকাশ ( শাখা না গথা गयर मारिम्प नाप सो प्रनिदरी, पर "पामार मार दागप्रदीपदी दम्पलिमिट अन्य भी मार देर बाद जो पचपन्य भार प्रमाग परे। ग. निशाप गाएर दिगार गंप्रदाय योगविषयक मन्मपिशेष परियप जन प्रन्यायनि ०१६ में भी मिलता है। स यदातर दिम जन योगलादित्य एमाम हो जाता এর নাথ মা ন ন ব নিদিনমান मगवान गौतम पुग्ने पुन्य प्राप्त होनेगे पहले यह पर्प- मक हान्यतया पानारा योगाभ्याम ही किया। उनके लागे शिष्य मी उमा मार्ग पर चले । मालिस वादग्रन्थों- में जन भागमकि. ममान योग पर्यों पहुधा पान शब्द ही मिला और उनमें ध्यान. चार भेद नजर मात । उन. पार भेदवं. नाम नथा मार प्रायः पदी है. जो जनदर्श. मया योगदगंनकी प्रप्रिया १ मा # HERE पर काम विपिच गश पामा uiana मा वि पीतिमु । प५ failu iane पिागल पनमा च "उमा- मी पदमा मापनका विचार समाधिन पद निरा. पम्मान पमपन्न विदास, पायाध विरागः पोगशानमें (पाद्ध सम्प्रदाय मममें [३८] योगशास्त्र-ऊपरके वर्णनमे मालूम हो जाता कि-योगप्रक्रियाका वर्णन करनेवाले छोटे बडे अनेक अन्य हैं । इन सब उपलब्ध ग्रन्थों में महर्पि-पतञ्जलिकत योगशासका थासन ऊंचा है । इसके तीन कारण हैं- ग्र- न्यकी संलिप्तता तथा सरलता, २ विषयकी स्पष्टता तथा पूर्णता, ३ मध्यस्थमाव तथा अनुभवमिद्धता । यही कारण है कि योगदर्शन यह नाम मुनते ही सहसा पावजल योग- सूत्रका स्मरण हो पाता है । श्रीशंकराचार्यने अपने ब्रममू- प्रभाष्यमें योगदर्शनका प्रतिवाद करते हुए जो " अथ स- म्यग्दर्शनाभ्युपायो योगः" ऐसा उल्लेख किया है, उससे इस पातमें कोई संदेह नहीं रहता कि उनके सामने पात- ञ्जल योगशास्त्रसे भिन दूसरा कोइ योगशास्त्र रहा है। क्यों कि पातञ्जल योगशास्त्रका प्रारम्भ अथ योगानुशा- सनम् " इस सूत्रसे होता है, और उक्त भाष्योल्लिखित वाक्य- में भी ग्रन्थारम्भमूचक अथ शब्द है, यद्यपि उक्त माध्यमें " तन्नाप्नोति मनःस्वास्थ्यं प्राणायामैः कदार्थतं । प्राणस्यायमने पीडा नस्या स्यान् चित्तविप्लवः ।। इत्यादि उक्तिसे उसी पातको दोहराया है | श्रीयशोविजयजीने भी पातञ्जलयोगसूत्रकी अपनी वृत्तिमें ५-३४) प्राणायाम को योगका अनिधित साधन कह कर हठयोगका ही निरमन किया है। १ ब्रह्ममूत्र २-१-३ भाष्यगत । “
[२६]
मार भी योगमायधी दो'उमेग है. जिनमें एक तो
पानझन पोशामा पूर्ण हो..'मोर दसरा उसका
किन बनी, किन्तु उमर पथमे मिलता जुलना।
दापि " गायराना पायो पांगः " म उपकी
मादार भोर याययाको मोर पान देनमें यही कहना
पराजिपिछले दो उदय भी उसी भिप योगशारा
होने चाहिए. जिगका किरा " पप सम्पादनामुरापो
पांग: "यह पाय माना जाय । अम्नु, जा
मारे सामने ना पनलिका योगनारा उपम्पित , मीर
पर मिनालय पन मलपमें भी उपका पाय
तथा पाय पग्गिर भागना मनुपयुन न होगा।
१. चार पाद भी पुल एच ४६५ है।
दो, भाज
-
[४०]
और चोथेका कैवल्यपाद है । प्रथमपादमें मुख्यतया योगका
स्वरूप, उसके उपाय और चित्तस्थिरताके उपायोंका वर्णन
है । दूसरे पादमें क्रियायोग, पाठ योगाङ्ग, उनके फल वया
चतुर्ग्रहका मुख्य वर्णन है॥
तीसरे पादमें योगजन्य विभूतियोंके वर्णनकी प्रधानता
है । और चौथे पादमें परिणामवादके स्थापन, विज्ञानवादके
निराकरण तथा कैवल्य अवस्थाके स्वरूपका वर्णन मुख्य
है। महर्षि पतञ्जलिने अपने योगशास्त्रकी नीव सांख्यासि-
द्धान्तपर डाली है। इसलिये उसके प्रत्येक पादके अन्वमें
" योगशास्त्र सांख्यप्रवचने " इत्यादि उल्लेख मिलता है
"सांख्यप्रवचने" इस विशेपणसे यह स्पष्ट ध्वनित होता है
कि सांख्यके सिवाय अन्यदर्शनके सिद्धांतोंके आधारपर भी
रचे हुए योगशास्त्र उस समय मौजुद थे या रचे जाते थे
इस योगशास्त्रके ऊपर अनेक छोटे बडे टीका अन्य है, पर
१ ईय, हेयहेतु, हान, हानोपाय ये चतुर्ग्रह करलाते हैं।
इनका वर्णन सूत्र १६.२६ नका है ।
२ य्याम कृन भाग्य, वाचस्पतिकृत तत्त्वशारदी टीका,
भोजदेवकृत राजमात, नागोजीमद कृत वृत्ति, विज्ञानभि कर
पार्टिक, योगवादिका, मणिप्रभा, भावगणसीय शनि, यासमो.
दासीन छत टिप्पयादि ।
।
[१] ETTEसमाप्र भोर यापरपतिकवटीका उसकी उपादेयता पर। सप रानाश मन्तिम मायके मम्मन्य विधार किया पाप हो रमझदो पर गोपर होते है। प्रथम पथका मन्तिम पाध्य साधत मुग नहीं है। उसका मानना किति मापन गुर नामक कोई सन्त्र पस्तु नहीं , उगमें जो धो पा दागकी पात्यन्तिक निनि हो। एसरा पर शातिक गुगलामको ही मोच कहता है। ऐसा मोप हो जानेपर दुराली मान्यन्तिक निति माप दी माप दोधाती।पिक. नैयारिक, मांय. योग भार पौद्ध- इंशन प्रथम पहले अनुगामी है । पदान्त मौर जनदर्शन, दसर पदवं. अनुगामा है।
। [४२] योगशास्त्रका विषय-विमाग उसके अन्तिमसाध्यानुसार ही है। उसमें गौण मुख्य रूपसे अनेक सिद्धान्त प्रतिपादित है, पर उन सबका संचेपमें वर्गीकरण किया जाय तो उसके चार विमाग हो जाते हैं। १ हेय २ हेय-हेतु ३ हान ४ हानो- पाय । यह वर्गीकरण स्वयं सूत्रकारने किया है। और इसीसे माष्यकारने योगशास्त्रको चतुर्रोहात्मक कहा है। सांख्यमू- अमें भी यही वर्गीकरण है । बुद्ध भगवान्ने इसी चतुर्ग्रहको आर्य-सत्य नामसे प्रसिद्ध किया है। और योगशास्त्र के आठ योगाङ्गोंकी तरह उन्होंने चौथे भार्य-सत्यके साघनरूपसे आर्य अष्टांङ्गमार्गका उपदेश किया है । दुःख हेय है, अविद्या हेयका कारण कारण है, दुःखका १ यथा चिकित्साशास्त्रं चतुर्व्यहम्-रोगो रोगहेतुरारोग्यं भैपज्यमिनि, एवमिदमपि शाम्न चतुर्दूहमेव । तद्यथा-संसारः संसारहेतुर्मोतो मोक्षोपाय इति । तत्र दुःवबहुलः संपारो हेयः । प्रधानपुरुपयोः संयोगा यहेतुः। संयोगस्यात्यन्तिको निवृत्ति- निम् । हानोपायः सम्यग्दर्शनम् । पा० २ सू० १५ भाष्य । २ सम्यक् दृष्टि, सम्यक् संकल्प, सम्यक् वाचा, सम्यक् कर्मान्त, सम्यक् श्राजीव, सम्यक् व्यायाम, सम्यक् स्मृति और सम्यक् समाधि | बुद्धलीलासार संप्रह, पृ. १५०।३" दुःखं हेयमनागतम्" २-१६ यो, सू। ४ हेयहेतुः २-१७। "तस्य हेतुरविद्या"२-२४ यो. सू.। दृष्टदृश्ययोः योगी
।
[४३]
आत्यन्तिक नाश हान है, और विवेक-ख्याति हानका
उपाय है।
उक्त वर्गीकरणकी अपेचा दूसरी रीतिसे भी योगशा-
खका विषय-विभाग किया जा सकता है। जिससे कि उसके
मन्तव्योंका ज्ञान विशेष स्पष्ट हो । यह विभाग इस प्रकार
है-१ हाता २ ईश्वर ३ जगत् ४ संसार-मौतका स्वरूप,
भार उसके कारण।
१ हाता दुःससे छुटकारा पानेवाले द्रष्टा अर्थात्
चेतनका नाम है। योग-शास्त्रमें सांख्य पेशेपि, नैयायिक,
मौद्ध, जैने और पूर्णप्रज्ञ (मध्य) दर्शनके समान दैतवाद
१ "तदमाशत् संयोगामावो हानं छद्रोः कैवल्यम्"
२-२६ यो. सू। २ "विवेकरुयानिरविसवा हानोपाय:
२-२६. यो. सू । ३"पुरुपचहुलं सिद्ध" ईश्वरकृष्णकारिका-
१८।४"यवस्थातो नाना "-३-२-२०-वैशेषिकदर्शन ।
५ "पुद्गलजीवाम्त्व नेकद्रव्याणि"-५-५. सस्वार्थसूच-भाष्य ।
६ जीवघरभिदा व जडेश्वरभिदा तथा ।
जीवभेदो मियत्रैव जहनीवभिदा तपा ||
मियश जहभेदो यः प्रचो भेदपकः ।
सोऽयं सत्योऽप्यनारिश सानिधनारामाप्नुयात् ।।
सर्वदर्शनसंग्रह पूर्णप्रशदर्शन ।।
"
[४४] अर्थात् अनेक चेतन माने गये हैं। योगशास्त्र चेतनको जैन दर्शनकी तरह देहप्रमाण मर्थात् मध्यमपरिमाणवाला नहीं मानता, और मध्वसम्प- दायकी तरह अणुप्रमाण भी नहीं मानतो, किन्तु सांख्य, वैशेपिके, नैयायिक और शांकरवेदान्तकी तरह वह उसको व्यापक मानता है। इसी प्रकार वह चेतनको जैनदर्शनकी तरह परिणामि- १"तार्य प्रति नष्टमप्यनष्टं तदन्यसाधारणत्वात्" २-२२ यो. सू. । २. " असंस्येयभा प्रदिषु जीवानाम् " । १५ । "प्रदेशसंहारविसर्गाभ्यां प्रदीपवत्" १६-तत्त्वार्यसूत्र ५०५। ३.देसो "उत्क्रान्तिगत्यागतीनाम"। महमूथ २-३-१८ पूर्ण भाष्य । तथा मिलान करो अभ्यकरशाखी कृत मराठी शांकरमाध्य अनुवाद भा. ४ पृ. १५३ टिप्पण ४६ । ४. "निष्क्रियस्य नदसम्भवान् " मा. स् १-४६. निस्कियरप-विभोः पुरुषस्य गत्यमम्भवान-माप्य विज्ञानभितु । ५. विमवान्महानाहाराम्नया चात्मा।" ७.१.२२.वै. द. । ६. देखो .म् २-1-२०. भाग्य । ७. इसलिये कि योगशास्त्रात्मक विषय में माग्य. सिद्धान्तानुसारी है। ८ "निसावस्थितान्याणि" | "ताप्ययनौम्य युक्त स"। २६ । "नकाशयय नियम" 10 स्वार्थमूत्र १०५ भाग्य मदित [१५] नित्य नहीं मानठा, भार न बाद दर्शनकी तरह उसको दपिक-मनित्य ही मानता है. किन्तु सांप आदि उक्त शेष दर्शनोंकी तरह वह उसे कूटस्थ-नित्य मानता है। २ ईश्वरके सम्बन्धमें योगशासका मत सांख्य दर्शनसे मिल है । सांख्य दर्शन नाना चेतनोंके अतिरिक ईश्वरको नहीं मानतो, पर योगशाम मानता है। योगशास्त्र-सम्मत ईश्वरका स्वरूप नैयायिक, वैशेपिक आदि दर्शनों में माने गये ईवरस्वरूपसे कुछ भिन्न है। योगशासने ईश्वरको एक भलग व्यक्ति तथा शास्त्रोपदेशक माना है सही, पर उसने नैयायिक मादिकी तरह ईश्वरमें निन्यज्ञान, निन्यईच्छा और नित्यकृतिका सम्बन्ध न मान कर इसकं स्थानमें सत्त्वगुणका १. ई. ३० पारिका ६३ मास्यस स्वकौमुपी । मा न्यायदर्शन ४-१ । । देगा ब्रह्ममूत्र २-१-१४ । २-१-शाक माय महिना २ दंग मोग • सदानानावित नयनत्प्रभो पुरुषस्य अपरिमिवान"४ "चित प्रतिम कमायानदाऽकागपत्तो स्थयुद्धिसदनम".४ । नथा " दगी पेय नित्यना, कूटस्य- नित्यता, परिणाभिानन्यता च । नत्र कूटश्यनित्यता पुरुषस्य, परिमिनित्यता गुणानाम इत्यादि ४-३३-मारय । ३ दग्यो मारपसूत्र ~E. भादि ।
[४६३
परमप्रकर्ष मान कर तद्द्वारा जगउद्धारादिकी सब व्यव
घटा दी है।
३ योगशास्त्र दृश्य जगदको न तो जैन, वैशेषि
नैयायिक दर्शनोंकी तरह परमाणुका परिणाम मानता है,
शांफरवेदान्तदर्शनकी तरह ब्रह्मका विच या ब्रह्म
परिणाम ही मानता है, और न बौद्धदर्शनकी तरह १
या विज्ञानात्मक ही मानवा है, किन्तु सांख्य दर्शनको त
वह उसको प्रकृतिका परिणाम तथा अनादि-अनन्त-प्रया
स्वरूप मानता है।
४ योगशास्त्रमें वासना, क्लेश और कर्मका नाम
संसार, तथा वासनादिका अभाव अर्थात् चेतनके स्वरूपा
स्थानका नाम ही मोई है। उसमें मंसारका मूल कार
भविद्या और मोक्षका मुख्य हेतु सम्यग्दर्शन अर्थात् योर
जन्य विवेकख्याति माना गया है।
महर्षि पतञ्जलिकी दृष्टिविशालना-यह पह
१ यद्यपि यह व्यवस्था मूल योगसूत्र में नहीं है, परन
माध्यकार तथा सकाकारने इमका उपपादन किया है । दे
पातचल यो. सू पा. १ स् २४ माध्य तथा टीका ।
२ तदा दृष्टः स्वरूपावस्थानम् । १-३ योगसूत्र ।
[७] कहा जा चुका है कि सांख्य सिद्धान्त और उसकी प्रक्रियाको ले फर पतञ्जलिने अपना योगशास्त्र रचा है, तथापि उनमें एक ऐसी विशेषता अर्थात् दृष्टिपिशालता नजर भाती है यो अन्य दार्शनिक विद्वानों में बहुत कम पाई जाती है। इसी विशेषताके कारण उनका योगशास्त्र मानों सर्वदर्शन- समन्वय पन गया है । उदाहरणार्थ माग्यका निरीश्वरवाद पर वैशेषिक, नैयायिक आदि दर्शनोंके द्वारा अच्छी तरह निरस्त हो गया और साधारण लोक-स्वभावका झुकाव भी ईश्वरोपासनाकी और विशेष मालूम पडा, तर अधिकारि- मेद तथा रुचिविचित्रताका विचार करके पतञ्जलिने अपने योगमार्गमें ईश्वरोपामनाको भी ध्यान दिया. और ईश्वरके म्वरूपका उन्होंने निष्पक्ष भावमे ऐमा निरूपणं किया है जो मनको मान्य ही मक। पतअलिने माचा कि. उपामना करनेवाले सभी लोगोंका साध्य एक ही है. फिर भी वे उपासनाकी भिन्नता मो उपामनामें उपयोगी होनेवाली प्रतीकोंकी भिन्नताके व्या १"ईश्वरप्रणिधानाद्वा " १-३३ । १ "शकमविपाकाशयर मष्ट पुरविशेष ईश्वरः " तत्र नितिशय सबझीजम् " | "पूर्वेषामपि गुरुः कालन नवन्छवान" ( १-२४, २५, २६) [४८] मोहमें अज्ञानवश आपस आपसमें लड मरते हैं, और इस धार्मिक कलहमें अपने साध्यको लोक भूल जाते हैं लोगोंको इस अज्ञानसे हटा कर सत्पथपर लानेके लिये उन्होंने कह दिया कि तुम्हारा मन जिसमें लगे उसीका ध्यान करो । जैसी प्रतीक तुम्हें पसंद आये वैसी प्रवीककी ही उपासना करो, पर किसी भी तरह अपना मन एकाग्र व स्थिर करो। और तद्वारा परमात्म-चिन्तनके सचे पात्र बनों । इस उदारताकी मूर्तिस्वरूप मतभेदसहिष्णु आदेशके द्वारा पतञ्जलिने सभी उपासकोंको योग-मार्गमें स्थान दिया, और ऐसा करके धर्मके नामसे होनेवाले कल- हको कम करनेका उन्होंने सच्चा मार्ग लोगोंको बदलाया। १ " यथाऽभिमतध्यानाद्वा १-३६ इसी भावकी सूपक महाभारतमें- ध्यानमुत्पादयत्यत्र, संहितालसंश्रयात् यथाभिमतमन्त्रेण, प्रणवाद्यं जपेस्कृती ।। शान्तिपर्व प्र. १६४ लो. २० यह शक्ति है। और योगवाशिष्टमें- ययाभिवाञ्छितध्यानाचिरमकवयोरितात् । एकतत्वधनाभ्यासात्प्राणस्पन्दो निरुध्यते ।। पशम प्रकरण सर्ग सो. १ - यह पर है।
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गतिविज्ञानवा मार मार गुप-प्राीमापा-
सपनाम मेरमरिया परका मर्म
रममा मर।
t.gir fennीर ।
mark RKETECTOR ||
पलामरिनियम
र माननीय माम् ॥
nirahafannel
farm frexi fireविधान्ति !!
पारितामारण्याप एक मा
मा यारोमादिपाम् ।।
गुलादिमाशोऽप्यपिये।
एप पाविषय मना॥
पोगपितु . १६-१.
fultandinishiक विशेष पापाराना
finitiaR पप मान्य माननेवालों
कन्यारी ना लामो नहीं रखत, पर
भिमानी प्रथमाhिan int. प्रवीभेद पारा-
नाभा यामाह । पापममें ला मरते हैं। इस अनिष्ट
Tura पद श्रीमान् रिमारिन पोंमें
अधिनिय समयारा शामनाको लामाय बत.
.
श्रद्धाका योगमार्गमें [५०] वैशेषिक, नैयायिक आदिकी ईश्वरविषयक मान्यताका तथा साधारण लोगोंकी ईश्वरविषयक उपयोग करके ही पतञ्जलि चुप न रहे, पर उन्होंने वैदिके- मानेका उदार प्रयल किया है । इस प्रयत्नका अनुकरण श्री- यशोविजयजीने भी अपनी " पूर्वसेवाद्वात्रिंशिका " रष्टियोंकी सन्माय" आदि ग्रन्थों में किया है। एकदेशीयसम्प्र- दायाभिनिवेशी लोगोंको समजाने के लिये 'चारिसंजीवनीचार' न्यायका उपयोग उक्त दोनों आचार्योंने किया है। यह न्याय बडा मनोरखक और शिक्षाप्रद है। इम समभावसूचक दृष्टान्तका उपनय श्रीज्ञानविमलने भाठदृष्टिकी सग्माय पर किये हुए अपने गूजराती टवेमें बहुत अच्छी तरह पटाया है, जो देखने योग्य है। इसका भाव संक्षेपमें इस प्रकार है। कीसी स्त्रीने अपनी मस्सीसे कहा कि मेरा पति मेरे अधीन न होनेमे मुझे बहा कष्ट है, यह सुन कर उस आगन्तुक सखीने कोई जही खिला कर उस पुरुषको बैल पना दिया, और वह अपने स्थानको चली गई। पतिके बैल पनजानेसे उसकी पत्नी दुःखित हुई, पर फिर वह पुरुषरूप बनानेका उपाय न जानने के कारण उम चैलरूप पतिको पराया करती थी, और उसकी सेवा किया करती थी। कीसी ममय मचानक एक विद्याधरके मुखसे ऐसा सुना कि अगर थैलरूप पुरुषको संजीवनी नामक जही घराई जाय तो यह फिर असली रूप
रा. REET मिया मालिसे
raviगा नाम भी अपनगशामेटी
या पथपिद लिन मागाईन लिमा.
मादपा भामियादको पुन मम पर
मोगमा पापयोगी मगम र नियन लाप
पाटलिपlt, nा ने पूरभगवानपं. परमपिप पार
cinainita न और नोपाय पगेली.
IREMENT भाप अपने पांगतान किया।
wirent An Orgarwal
writtari. RANA
awrafeti .sinha.10 परमेशपम
द... नवलापर
pr.. Manhatiभीलपा गया,
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tine on ... पान माप जीवनी
INM .. ५. uine 24 ल.
१या
और पक्षी
... ... ten umrin ले अपमा-
.
नारे।
.
दुस, मुरam शीर मार्ग।
[५२]
जैन दर्शनके साथ योगशासका सारश्य तो अन्य सब
दर्शनोंकी अपेवा अधिक ही देखने में आता है। यह पात
स्पष्ट होनेपर भी बहुतोंको विदित ही नहीं है, इसका सबब
यह है कि जैनदर्शनके सास अभ्यासी ऐसे पदुत कम
जो उदारता पूर्वक योगशास्त्रका अवलोकन करनेवाले हों,
और योगशास्रके खास अभ्यासी भी ऐसे बहुत कम हैं
जिन्होंने जैनदर्शनका यारीकीसे ठीक ठीक अवलोकन किया
हो । इसलिये इस विषयका विशेष खुलासा करना यहाँ
अप्रासङ्गिक न होगा।
योगशास्त्र और जैनदर्शनका सादृश्य मुख्यतया तीन
प्रकारका है । १ शब्दका, २ विपयका और ३ प्रक्रियाका |
१ मूल योगसूत्र में ही नहीं किन्तु उसके भाष्यतकमें
ऐसे अनेक शब्द है जो जैनेतर दर्शनोंमें प्रसिद्ध नहीं हैं, या
बहुत कम प्रसिद्ध हैं, किन्तु जैन शास्त्रमें खास प्रसिद्ध हैं।
जैसे-भवप्रत्यय, सवितर्क सविचार निर्विचार, महाव्रत, कत
१ "भवप्रत्ययो विदेहप्रकृतिलयानाम्" योगसू. १-१६
" भवप्रत्ययो नारकदेवानाम् " तत्त्वार्थ अ. १-२२॥
२ ध्यानविशेषरूप अर्थमें ही जैनशानमें ये शब्द इस प्रकार
*" एकाभये सविव पूर्वे" ( तत्त्वार्य अ. ९-४३)
तत्र
" [५] कारित भनुमोदित, प्रकाशोवरण, सोपरम निरूपक्रम, पसं. काविचार प्रथमम् " भाष्य " भविषारं द्वितीयम्" हरवा-भ १-४४ । योगसूत्र में ये शब्द इस प्रकार भाये है.-तत्र श. प्पार्पज्ञानविकल्प: संकीर्ण सवितको सभापति: ""स्मृतिपरि. एनी स्वरूपशून्येयमात्रनिसा निर्षित" "एतयैव सविधाय निर्विधारा र एमविषया व्याख्याता १-४२, ४३, ४४। ३ जैनशाख में मुनिसम्बन्धी पाप यमों के लिये यह राम्द पाती प्रसिद्ध है। " सर्वतो विरतिर्मदाप्रतमिति तत्वार्य प०७-२ भाप्य । यही शब्द उसी अर्थ में योगसूत्र २-३१ में है। ४ ये शब्द जिस भापके लिये योगसूत्र २-३१ में प्रयुफ है, उसी भावअनशाषमें भी भावे है, मन्तर बिर्फ इतना है कि अनप्रन्यों में अनुमोदितके स्थानमें बहुधा अनुमत- शम्प प्रयुक्त होता है । देखो-तस्वार्थ, प, ६-६ | ५ यह शब्द योगसूत्र २ ५२ तथा ३-४३ में है। इसके स्थानमें अनशानमें । शानावरण ' शन्द प्रसिद्ध है। देखो सत्यार्य, ६-११ धादि। ६ ये शब्द योगसूत्र ३-२२ में हैं। जैन कविषयक माहि. त्पमें ये शब्द दुत प्रसिद्ध है। तत्वार्य में भी इनका प्रयोग हमा है, देखो-~थ २-५२ भाष्य | • यह शब्द योगसूत्र ( ३-४६ ) में प्रयुक्त है। इसके स्थानमें जैन प्रन्योंमें ऋषभनारायसंहनन ' ऐसा शप मिलता है । देखो तस्वार्थ (40 ८-१२) भाप्य । ।
[५४] हनन, केवली, कुशल, ज्ञानावरणीयकर्म, सम्यग्ज्ञान, सम्यग्दर्शन, सर्वई, क्षीणलेश, चरमदेह आदि । २ प्रसुप्त, वनु आदिक्केशावस्था, पाँच यम, योगज- १ योगसूत्र (२-२५) माध्य, तत्त्वार्थ (अ. ६-१४)। २ देखो योगसूत्र ( २-२७) भाष्य, तथा दशका- लिकनियुक्ति गाधा १८६ । ३ देखो योगसूत्र (२-५१ ) भाष्य, तथा पारश्यक- नियुक्ति गाथा ८६३ । ४ योगसूत्र (२-२८) माध्य, तत्त्वार्थ (०१-१।। ५ योगसूत्र (४-१५) माध्य, तत्त्वार्थ (० १-२) । ६ योगसूत्र ( ३-४९) भाष्य, तत्त्वार्य (३-४९)। ७ योगसूत्र (१-४) माध्य । जैन शानमें बहुधा क्षीण मोह 'सीण कषाय' शब्द मिलते हैं। देखो तत्त्वार्य (अ.९-३८)। ८ योगसूत्र ( २-४) भाष्य, तत्त्वार्थ (०२-५२)। ६ प्रमुन, ननु, विच्छिन्न और उदार इन पार अवस्याओं योगसूत्र (२-४ ) में वर्णन है । जैनशानमें वही भाव मोह- नीयकर्मकी मत्ता, पराममयोपराम, विरोधिप्रकृति के उपयादिका व्यवधान और पदयावस्था वर्णनम्मे वर्तमान है। देखो योगसूत्र (२-४) की यशोविजयकृत वृत्ति | १० पांच यमाहा वर्णन महाभारत मादिप्रायोमें है सही, पर
[५५]
न्य विति, सोपकम निरुपमक्रम कर्मका स्वरूप, क्या उसके
इसकी परिपूर्णता जाहिदेशकालसमयाऽनपच्छिमार सार्वभौमा
महाप्रतम " (योगसूत्र २-३१) में तथा दशकालिक अध्ययन
४ धादि जैनशास्त्रप्रतिपादिव महानतोंमें देखने में भाती है।
१ योगसूत्र के तीमरे पादमें विभूतियों का वर्णन है, वे विभू-
तिया दो प्रकारका है। १ वैमानिक २ शारीरिक अतीताऽना-
गतवान, सर्वभूतस्नान, पूर्वजानिमान, परचित्तमान, भुवनक्षान,
माराव्यूहलान, आदि भान विभूनियाँ हैं । अन्तर्धान, हस्तिचल,
যাৰহা, অফিস বধ নয় বৰাৰ্য্যই কায়,
इत्यादि शारिक विभूतियाँ है । जैनशान भी अवधिमान,
मनःपर्यायान, आनिम्मर ज्ञान, पूर्वज्ञान आदि मानलब्धियों
है, और भामाषधि, विटावि, सामौषधि, सौंपाधि, जपा-
पारण,
विद्याचरण
किय, थाहापक प्रादि शारीरिक
माधिया है दवा मावश्य कानयुति. ( 110 ६६, ७.) लम्भि
यह विभूनिका नामान्तर है।
२ या.भाग्य और जैनप्रन्याम मोक्रम निपक्रम मायु-
बर्मा र विकुल ५कना दे, इतना ही नहीं यालक सस
स्वरूपको दिन हुए भने । यो. म् ३-२२) के
मायने भाई वस्त्र और न. ३१ जो द स्पन्न लिग है,
भाब ! • वि 4. शिवाय माय
(पा-३ ६१, आद जाने मात्र प्रामद है, पर
[५६] धान्न, भनेक कार्योका निर्माण भादि । नपा (म० -२५२) के माय मतको रातों रामा समNिTE Eष्टात भी निपा। रायमें माय चौर बसायभायी शानिक मारश्य भी पर मोर मांगना है। " assinafनिन नपायमा कामना गया TR | पालन Hfirst fire- PAR | पानानि स गुप्तो बानेन वा सानो गुण: बापमान 1 मोसमा वाम एपिस्तु. गरी माया Infsim मा nिe (३ . ) मा units मगरा- टेमा मानगो शिवि प.पि. 441 mittiatin IIT मामिन लगा पानापाना- writer'11:21RMATIनमान: iran't .. ....... 48 PATNA ।
[७] ३ परिणामि-नित्यता अर्थात् उत्पाद, व्यय, धान्य- स्पसे घिरूप यस्तु मान वर तदनुसार धर्मषीका विवचन इत्यादि। इसी विचारसमताके कारण श्रीमान हरिमद्र जैसे जैना- चानि महति लिके प्रति अपना हार्दिक सादर प्रकट करके अपने योगविषयक प्रन्योंमें गुणग्राहयताका निर्भीक है, इसका वर्णन योगसन (४.४ ) में है, यही विपय मय-माह-Bघापसे जैनमायोमें वर्णित है। 1 जैनाबमें बातुको द्रव्यपर्यायम्वरूप माना है । इमी. लिये उसका लक्षर सवर्थ : ०५-२६ ) में " उत्पादव्य- यौव्ययुक्त म " ऐमा किया है। योग सूत्र ( ३-१३, १४) में जो धर्मधर्मीषा विचार है वहा. द्रव्यपर्यायउभयरूपता विका याद, न्यय. धान्य इस विमान काही चित्रण है। भिनन म दान में है कि- गमन सायसिद्धा- सानुमान होने का hि. परिणामिनी भावा;" या सिद्धान्त मानकर 1ि-121 नि धर्मलणास्थापरि- लामका ३७ सिप में स्थान प्रकृतिम करता है, वतन नही और ...t'म मावा. परिणामिनः" ऐसा सिद्धान्त मा. मदन सत्पदव्ययाप पर्यायक। योग न मे वन है। नना भिन्नता होनेपर भी परिणामबाट या निमि १६ मा है।
[५] पानमा कांगोंका निर्माण भादि। भाग (. -२५२) माय, रोशन लाल नगणितपिकात मीनिया मे माय और भाग निक शाल भी गापित गौर भगना है। " मा विजानितं सपायमा कानेन ए सपा HTTAR | मान मन भिंगा गया पनि TERRIA चा गुनो बानेन का समतो गुतः जीनमा 17 नग मी मा पनि बना Im गाना गा RATEमा (... मागाह मना osnan- र मन मानायगा पायो भनि, नगर शिपि. arrafarm atit Jatin नामानित सन, 11 मा समानामाग. reat Time Itna सम्मत 14 154 145-11 HTTA : Kirtant ... नगमाग. मला ।
. [५७] ३ परिणामि-नित्यता अर्थात् उत्पाद, व्यय, धान्य- स्पसे निरुप यस्तु मान कर दनुसार धर्मधर्माका विवेचन इत्यादि। इसी विचारसमताके कारण श्रीमान् हरिभद्र जैसे जैना- पायाने महर्षि पतनलिक प्रति अपना हार्दिक श्रादर प्रकट परफे अपने योगविषयक ग्रन्थों में गुणग्राहक ताका निर्मीक है, उसका एन योर स्त्र (४-४ ) में है, यही विषय निय-हाहाक-धिरुपमे जैनप्रन्धों में वर्णित है। १ जनशास्त्र में वस्तुको द्रव्यपर्यायस्वरूप माना है। इसी. लिये इसका लक्षण समवयं १० ५-२६) में उत्पादय्य- यौव्ययुक्त म्" ऐमा विय है। योगसूत्र ( ३-१३, १४) में जो धर्मघमावर विचार है ददा. द्रव्यपर्यायउभयरूपता विघा सत्पाद, त्यय. धान्य इम निपत'का ६ चित्रण है। भिनता मदन है कि- यंगसूत्र सास्यमिदा ... शिनो भावा: सिद्धान्त मानकर 4.1-14। यान धर्मलणावस्या णामका उपयंग (4मर यांन प्रकृतिम करता नमे नहीं। और ....... म मायाः परिणाम पमा सिद्धान्त मा. मवाद यान पदयर पयायका प्रयोग में पता है। ननी - होनेपर भी परिणाद कया दानाम नाई। " ग्तान साहान [५] परिचय पूरे तोरसे दिया है, और जगह जगह पतअलिके योगशास्त्रगत खास साङ्केतिक शन्दोंका जैन सङ्केतोंके साय मिलान करके सङ्कीर्ण-दृष्टिवालोंके लिये एकताका मार्ग खोल दिया है। जैन विद्वान् यशोविजयवाचकने हरिमद्रसरि- सूचित एकताके मार्गको विशेष विशाल बनाकर पतअलिके योगसूत्रको जैन प्रक्रियाके अनुसार समझानेका थोडा किन्तु मार्मिक प्रयास किया है। इतना ही नहीं बल्कि अपनी पत्ती. सियोंमें उन्होंने पतञ्जलिके योगरत्रगत कुछ विषयोंपर खास पत्तीसियाँ भी रची है। इन मर बातोंको मंक्षेपमें बतलाने का १ उक्तं च योगमार्गस्तपोनिनकल्मषैः । भावियोगहिनायोथैर्मोहदीपसमं वचः ॥ ( योग. विं श्लो ६६) का ' क प निरितं पुन: योगमार्गरयात्मविद्भिः पर अलिप्रभृतिभिः ॥ एन प्रधान: म- द्वाद्धः शीलवान योगतता । जानात्यनन्द्रियानयानया पाद महामनिः" । ( योगशिपमुचरा १०० ) टीका ‘तपा पाइ महामतिः पतनानः '। ऐसा ही भा गुणपाही भीयो. विजयमान अपनी योगासनादाविशिक में प्रकाशित किया है। हो-सा. २. टीका। २ देखो ये गविन्दु १८, ४२० । यी ११ बनाई पानसमूहात । ४ा पानांगन, गाय, पो- गा, गहानाय र योगमारा।
adminine [५] उद्देश्य यही है कि महर्षि पतञ्जलिकी दृष्टिविशालता इतनी अधिक थी कि सभी दार्शनिक व साम्प्रदायिक विद्वान् योग- शासके पास आने ही अपना साम्प्रदायिक अभिनिवेश भूल गये और एकरूपताका अनुभव करने लगे। इसमें कोई संदेह नहीं कि-महर्षि पतञ्जलिकी दृष्टि-विशालता उनके विशिष्ट योगानुभवका ही फल है, क्योंकि-जब कोई भी मनुष्य शन्दज्ञानकी प्राथमिक भूमिकासे आगे बढ़ता है तब पह शब्दकी पंछ न सींचकर चिन्ताज्ञान तथा भावनाज्ञानके उत्तरोत्तर अधिकाधिक एकतापाले प्रदेशमें अभेद पानंदका अनुभव करता है। आचार्य हरिभद्रकी योगमार्गमें नवीन दिशा-श्रीहरिभद्र प्रमिड जैनाचार्या में एक हुए । उनकी बचनता. मर्यनामुनी प्रतिभा मध्यम्थना और ममन्ययरा- क्तिका पूरा परिचय कगनेका यहाँ प्रमंग नहीं है । इसके- लिये जिदाम महाशय उनकी कृतियों को दम लवें । हरिभ- द्रमरिकी शनमुखी प्रतिभाके मान उनके बनाये हुए चार- १ शब्द, पाना या भाव जन स्व: यशोविजय. जॉन अध्यापन पद्न जिम्मा अाग लागेको सन योग्य है अभीयानपद् शा. ६५, ७४ । २ द्रव्यानुयो विषय-व-मप्रहरणी प्रादि १, पिणना- नुयोगविषयक-क्षत्रममाम टीका आदि २, घरण करणानुयोर [५] परिचय पूरे तोरसे दिया है, और जगह जगह पतञ्जलिके योगशास्त्रगत सास साङ्केतिक शब्दोंका जैन सङ्केतोंके साथ मिलान करके सङ्कीर्ण-दृष्टिवालोंके लिये एकताका मार्ग खोल दिया है । जैन विद्वान् यशोविजयवाचकने हरिमद्रसरि- सूचित एकताके मार्गको विशेष विशाल बनाकर पतञ्जलिके योगसूत्रको जैन प्रक्रियाके अनुसार समझानेका थोडा किन्तु मार्मिक प्रयास किया है। इतना ही नहीं बल्कि अपनी बची- सियोंमें उन्होंने पतञ्जलिके योगसूत्रगत कुछ विपयोंपर खास बत्तीसियाँ भी रची हैं। इन सब बातोंको संक्षेपमें बतलानेका १ उक्तं च योगमार्गस्तपोनिधूतकल्मपैः । भावियोगहिनायोर्मोहदीपसमं वचः ॥ ( योग. विं श्लो ६६) टीका · उक्त च निरूपितं पुनः योगमार्गहरध्यात्मविद्भिः पतञ्जलिप्रभृतिभिः ।। एतत्प्रधानः स- छाद्धः शीलवान् योगततर । जानात्यनेन्द्रियानास्तथा चाह महामतिः" । ( योगदृष्टि नमुच्चय श्लो १०० ) टीका तथा चाह महामतिः पनांना '। ऐमा ही भाव गुणग्राही श्रीयशो- विजय जीने अपनी योनावतारद्वात्रिंशिकामें प्रकाशित किया है। देखो-श्लो. २० टीका। २ देवो योगविन्दु श्लोक ४१८, ४२० । ३ दो की बनाई हुई पानअनमूत्रवृत्ति | ४ दरो पान जनयोगन न विचार, ईशानुप्रइविचार, यो- गावतार, शहाना गाय और योगमाहात्म्य द्वात्रिंशिका ।
[५] उद्देश्य यही है कि महर्षि पतअलिकी दृष्टिविशालता इतनी अधिक थी कि सभी दार्शनिक व साम्प्रदायिक विद्वान योग- शासके पास भावे ही अपना साम्प्रदापिक अभिनिवेश भूल गये और एकरूपताका अनुभव करने लगे। इसमें कोई संदेह नहीं कि-महर्षि पतअलिकी दृष्टि-विशालता उनके विशिष्ट योगानुमक्का ही फल है, क्योंकि जब कोई भी मनुप्प शब्दझानकी प्राथमिक भूमिकासे आगे बढ़ता है तब पह शब्दकी पूंछ न खींचकर चिन्ताज्ञान तथा भावनाज्ञानके उत्तरोत्तर अधिकाधिक एकतावाले प्रदेशमें अभेद यानंदका पनुभव करता है। आचार्य हरिभद्रको योगमार्गमें नवीन दिशा-श्रीहरिभद्र प्रसिद्ध जैनाचार्योंमें एक हुए। उनकी बहुश्रुतता, सर्वतोमुखी प्रतिमा, मध्यस्थता और समन्वयरा- तिका पूरा परिचय करानेका यहाँ प्रसंग नहीं है । इसके- लिये जिदासु महाशय उनकी कृतियों को देस लेवें । हरिभ- द्रसरिकी शतमुखी प्रतिभाके खोत उनके पनाये हुए चार- १ शब्द, चिन्ता नया भावनाशानका स्वरूर धीयशोविजय- जान अध्यात्मोपनिषद् में लिखा है, जो प्राध्यमिक लोगोको रेखने योग्य है अध्यात्मोपनिषद् शां. ६५, ७४ | २ द्रव्यानुयांगविषयक-धर्मसंग्रहण प्रादि १, गणिता- नुयोगविषयक-क्षेत्रसमास टीका धादि २, पाणकरणानुयोग- [५८] परिचय पूरे तोरसे दिया है, और जगह जगह पतअलिके योगशास्त्रगत सास साझेविक शन्दोंका जैन सङ्केतोंके साथ मिलान करके सङ्कीर्ण-दृष्टिवालोंके लिये एकताका मार्ग खोल दिया है । जैन विद्वान् यशोविजयवाचकने हरिभद्रमरि- सूचित एकताके मार्गको विशेष विशाल बनाकर पतअलिके योगसूत्रको जैन प्रक्रियाके अनुसार समझानेका थोडा किन्तु मार्मिक प्रयास किया है । इतना ही नहीं बल्कि अपनी यत्ती- सियोंमें उन्होंने पवअलिके योगसूत्रगत कुछ विपयोंपर खास पत्तीसियाँ भी रची हैं। इन मय बातोंको संक्षेपमें बतलानेका १ उक्त च योगमार्गस्तिपोनिधूतकल्मपैः। भावियोगदितायोचैर्मोदीपप्तमं वचः ॥ ( योग. विं श्लो ६६) टीका · उक्त च निरूपितं पुन: योगमार्गहरध्यात्मविद्भिः पत खालप्रभृतिमिः' ।। एतत्प्रधानः स- छाद्धः शीलवान् योगतत्र । जानात्यनेन्द्रियानर्यास्तथा चाह महामतिः " || ( योगदृष्टिममुच्चय श्लो १००) टीका तथा चाह महामतिः पतीनः '। ऐसा ही भाव गुणपाही श्रीयशो- विजय जीने अपनी योगावतारद्वात्रिंशिका में प्रकाशित किया है। देखो-तो. २० टीका। २ देखो योगबिन्दु श्लोक ४१८, ४२० । ३ देखो उनकी बनाई हुई पानजलसूत्रवृत्ति । ४ देखो पातञ्ज नयोगलक्षणविवार, ईशानुपइविचार, यो- १ गावतार, लेशहानोपाय और योगमाहात्म्य द्वात्रिंशिका । ar [५] रेश्य यही है कि महर्षि पतअलिकी दृष्टिविशालता इतनी अधिक धी कि सभी दार्शनिक य साम्प्रदायिक विद्वान योग- शासके पाम भाते ही अपना साम्प्रदायिक अभिनिवेश भूल गये मार एफरूपताका अनुभव करने लगे। इसमें कोई संदर नहीं कि-महर्षि पतअलिकी दृष्टि-विशालवा उनके विशिष्ट योगानुमयका ही फल है, क्योंकि-जप कोई भी मनुष्य शन्दशानकी प्राथमिक भूमिकासे आगे पढ़ता है तब यह शन्दकी पंच नसींचकर चिन्ताज्ञान तथा मायनाज्ञानके उत्तरोत्तर अधिकाधिक एकतापाले प्रदेशमें अभेद यानंदका अनुभव करता है। आचार्य हरिभद्रकी योगमार्गमें नवीन दिशा-श्रीहरिभद्र प्रसिद्ध जैनाचार्योम एक हुए। उनकी पश्रुतता, सर्वतोमुखी प्रतिमा, मध्यस्थता और समन्वयश- तिका पूरा परिचय करानेका यहाँ प्रसंग नहीं है । इसके- लिये जिलामु महाशय उनकी कृतियों को देस लेवें । हरिम- द्रारिकी शतमुखी प्रतिभाके स्रोत उनके पनाये हुए चार- १ शब्द, चिन्ता तथा भावनाज्ञानका बार श्रीयशोविजय- आन अध्यात्मोपनिषदमें लिखा है, जो आध्यात्मिक लोगों को देखने योग्य है अध्यात्मापनिपद् नं. ६५, ७४ | २ द्रव्यानुयोगविपयक-धर्मसंप्रदणी प्रादि १, गणिता. नुयोगविषयक-संत्रसमास टीका भादि २, घरपकरणानुयोग-
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[40] अनुगोगविषयक अन्यों में ही नहीं बल्कि जैन न्याय तथा मारतवर्षीय तत्कालीन समग्र दार्शनिक मिद्धांतोंकी चर्चावाने प्रन्यों में भी बहे हुए हैं। इतना करके ही उनकी प्रतिमा मौन न हुई, उसने योगमार्गमें एक ऐमी दिशा दिसाई जो केवल जैन योगसाहित्यमें ही नहीं बल्कि आर्यजातीय संपूर्ण योग- विषयक माहित्यमें एक नई वस्तु है। जैनशानमें आध्या- स्मिक विकासके क्रममा प्राचीन वर्णन चौदह गुणस्थान- रूपसे, चार ध्यान रूपमे और बहिरात्म आदि तीन अवस्था- के रूपसे मिलता है। हरिभद्रमूरिने उसी आध्यात्मिक विकासके क्रमका योगरूपसे वर्णन किया है । पर उसमें उ- न्होंने जो शली रक्खी है यह अभीतक उपलब्ध योगविषयक साहित्यमें से किसी भी ग्रंथमें कमसे कम हमारे देखनेमें तो नहीं आई है। हरिभद्रसूरि अपने ग्रन्थों में अनेक योगियोंका नामनिर्देश करते हैं। एवं योगविषयक ग्रन्थों का उल्लेख करते विषयक-पञ्चवस्तु, धर्मबिन्दु आदि ३, धर्मकवानुयोगविषयक- समराइचकहा आदि ४ प्रन्य मुख्य हैं। १ अनेकान्तजयपनाका, षड्दर्शनसमुच्चय, शास्त्रार्चास- मुच्चय आदि। २ गोपेन्द्र ( योगबिन्दु श्लोक. २००) कालातीत (योग- विन्दु श्लोक ३००)। पतञ्जलि, भदन्तभास्करबन्धु, भगवदन्त(च) वादी (योगदृष्टि० श्लोक १६ टीका )। ३ योगनिर्णय आदि ( योगदृष्टि० श्लोक १ टीका )।
[१३] पांच भूमिकामा विमक्त करके हर एक भूमिकाके लक्षण बहुत सट दिसाये हैं। और जगह जगह जैन परिमापार साय यौद्ध तथा योगदर्शनकी परिभाषाका मिलान करके परिमापामेदकी दिवारको तोडकर उसकी भोटमें छिपी हुई योगरस्तुकी भिमभियदर्शनसम्मत एकरूपताका स्फुट प्रदर्शन कराया है । अध्यात्म, माना, ध्यान, समता और वृत्तिमंचप ये योगमार्गको पाँच भूमिकायें हैं। इनमें से पहली चारको पतंजलि मंप्रज्ञात, और अन्तिम भूमिकाको प्रसंप्र- शात पाहते हैं। यही संक्षेपमें योगविन्दुकी वस्तु है । योगदृष्टिममुरायमें आध्यात्मिक विकासके क्रमका वर्णन योगपिन्दुकी अपेक्षा मरे दंगसे है। उसमें आध्यात्मिक विकास प्रारंभक पहलेको स्थितिको अर्थात् अपरमपृद्गलपरा- चर्चपरिमाण संसारकालीन प्रात्माको स्थितिको प्रोपदृष्टि कहकर उसके तरतम मारको अनेक टांत द्वारा समझाया १ योगबिंदु, ३९, ३५७, ३५६, ३६१, ३६१, ३६५॥ २ "यत्सम्यग्दर्शन सोधिस्तान महोदया। मत्वोऽस्तु बोधिमन्वस्तदन्योऽन्वर्थतोऽपि हि ॥२७॥ बरपोधिसमेतो वा तार्ययो भविष्यति । तथाभध्यत्वाऽमी वा पोधिसत्व: सता मता" ॥२४॥ योगविन्दु। ३ देखो योग४ि१८, ४२० ।
[२] है। इस सूत्रपातका पूर्ववर्ती समय जो आध्यात्मिकविकास- रहित होता है, वह जनशास्त्रमें अचरमपुद्गलपरावर्तक नामसे प्रसिद्ध है। और उत्तरवर्ती समय जो आध्यात्मिक विकासके क्रमवाला होता है, वह चरमपुद्गलपरावर्तके नामसे प्रसिद्ध है। अचरमपुद्गलपरावर्तन और चरमपुद्गलपरावर्तनकालके परिमाणके चीच सिंधु और बिंदुका सा अंतर होता है । जिस श्रात्माका संसारप्रवाह चरमपुद्गलपरावर्तपरिमाण शेष रहता है, उसको जैन परिभाषामें 'अपुनर्वधक और सांख्य- परिभाषामें 'निवृत्ताधिकार प्रकृति' कहते हैं । अपुनर्बन्धक या निवृत्ताधिकार प्रकृति आत्माका आंतरिक परिचय इतना ही है कि उसके ऊपर मोहका दवाव कम होकर उलटे मोहके ऊपर उस आत्माका दयाव शुरू होता है। यही आध्यात्मिक विकासका पीजारोपण है। यहीमे योगमार्गका म हो जानेके कारण उस आत्माकी प्रत्येक प्रवृत्तिमें विषयक : नम्रता, उदारता, परोपकारपरायणता आदि सदा- समराश्चक रकरूपमें दिखाई देते हैं । जो उस विकासोन्मुख "परिचय है"। इतना उत्तर देकर प्राचार्यने र वास्ता योगकी पराकाष्टा तकके आध्यात्मिक (यो पाय जातपद्धिको स्पष्ट समझानेके लिये उसको आरंभसे लो लोक द्वात्रिंशिम २८ | ऋमिक आदि१८, २०१॥ १ देखो मुख्यद्वेष रलतो, १ अनेका मादि।
[३] पाँच भूमिकामोंमें विमस्त करके हर एक भूमिकाके लक्षण महुत सष्ट दिखाये हैं। और जगह जगह जैन परिमापाके साथ पौद्ध तथा योगदर्शनको परिमापाका मिलान करके परिभाषाभेदकी दिवारको तोडकर उसकी मोटमें लिपी हुई योगवस्तुकी भिन्नभिनदर्शनसम्मत एकरूपताका स्फुट प्रदर्शन कराया है । अध्यात्म, भावना, ध्यान, समता और पृत्तिसंचय ये योगमार्गकी पाँच भूमिकायें हैं। इनमें से पहली चारको पतंजलि संप्रज्ञाव, और अन्तिम भूमिकाको मसंप्र- शात कहते हैं। यही संक्षेपमें योगविन्दुकी वस्तु है। योगदृष्टिसमुचयमें माध्यात्मिक विकासके क्रमका वर्णन योगपिन्दुकी थपेक्षा दूसरे ढंगमे है। उसमें माध्यात्मिक विकासके प्रारंमके पहलेको स्थितिको अर्थात् अचरमपुद्गलपरा. वर्चपरिमाय मंसारकालीन भात्माकी स्थितिको प्रोपष्टि कहकर उसके तरतम भावको अनेक दृष्टांत द्वारा समझाया १ योगपिंटु, ११, ३५७, ३५६, ३६१, ३६१, ३६५ २ "यत्सम्यग्दर्शन बोधिस्तस्प्रधानो महोदयः । सत्वोऽस्तु बोधिसत्वस्तद्धन्तपोऽन्वर्थतोऽपि हि ॥२७॥ परपोधिसमेतो या तीयकृयो भविष्यति । सयाभव्यत्वनोऽमा वा पोधिसत्वःसतो मतः" ॥२॥ योगविन्दु । ३ देखो योगसिंदु ४१८, ४२० ।
।
[६४]
है, और पछि आध्यात्मिक विकासके आरंमसे लेकर उसके
अंततकमें पाई जानेवाली योगावस्थाको योगदृष्टि कहा है।
इस योगावस्थाकी क्रमिक वृद्धिको समझानेके लिये संक्षेपमें
उसे आठ भूमिकाओं में बाँट दिया है । वे श्राट भूमिकायें
उस ग्रन्थमें आठ योगदृष्टिक नामसे प्रसिद्ध है। इन आठ
दृष्टिनोंका विभाग पातंजलयोगदर्शन-प्रसिद्ध यम, नियम,
भासन, प्राणायाम थादि आठ योगांगोंके आधार पर किया
गया है, अर्थात् एक एक दृष्टि में एक एक योगांगका
सम्बन्ध मुख्यतया बतलाया है। पहली चार दृष्टिऔं योगकी
प्रारम्भिक अवस्थारूप होनेसे उनमें अविद्याका अल्प अंश
रहता है । जिसको प्रस्तुत ग्रंथम अवेद्यमद्यपद कहा है।
अगली चार दृष्टिोंमें विद्याका अंश बिल्कुल नहीं रहता।
इस भावको श्राचार्य ने वेद्यसंवेद्यपद शब्दस जनाया है। इसके
सिवाय प्रस्तुत ग्रंथमें पिछली चार दृष्टियों के समय पाये जाने-
वाले विशिष्ट प्राध्यात्मिक विकासको इन्छायोग, शास्त्रयोग
और सामर्थ्ययोग ऐसी तीन योगभूमिका में विभाजित करके
उक्त तीनों योगभूमिकाओंका बहुन रोचक वर्णन किया है।
१ देम्बो-योगदृष्टिसमुचय १४ ।
२
७३।
५
"
[६५] भाचार्यने अन्तमें चार प्रकारके योगियोंका वर्णनकरके योगशासक अधिकारी कौन हो सकते हैं । यह भी पतला दिया है। यही योगदृष्टिसमृचयकी पात संचित वस्तु है। योगविंशिका माध्यात्मिक विकासको प्रारंभिक भव- म्यामा पर्यन नहीं है, किन्तु उसकी पृष्ट अवस्थाथोंका ही घरीन है। इमीम उममें पुरख्यतया योगके अधिकारी त्यागी ही माने गये हैं। प्रस्तुत ग्रन्धर्म त्यागी गृहस्थ और साधुकी भावश्यक-क्रियाको ही योगरूप पलाकर उसके द्वारा था- ध्यात्मिक विकामकी ऋमिक वृद्धिका वर्णन किया है । और उस पावश्यक-क्रिया द्वारा योगको पाँच भूमिमा निमा- जित किया है। ये पाँच भूमिकायें उसमें म्यान, शब्द, अर्थ, सालंपन और निरालंबन नाममे प्रसिद्ध हैं । इन पाँच भूमि- कायोंमें कर्मयोग और ज्ञानयोगकी पटना करते हुए थाचा- पने पहली दो भूमिकाओंको कर्मयोग बार पिछली तीन भूमिकाओंको नानयोग कहा है । इसके सिवाय प्रत्येक भूमि- कामें इच्छा, वृत्ति, स्थर्य और मिद्धिरूपमे आध्यात्मिक विकासके तरतम भावका प्रदर्शन कराया है। और उस प्रत्येक भूमिका तथा इच्छा, प्रवृत्ति प्रादि अवान्तर स्थितिका ल. क्षण पद्धत स्पष्टतया वर्णन किया है। इस प्रकार उक्त १ योगविंशिका गा० ५, ६ ।
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[६५] भागाने अन्तमें चार प्रकारके योगियों का वर्णन करके योगशासके अधिकारी कौन हो सकते हैं। यह भी पतला दिया है । यही योगदृष्टिममुच्चयकी बहुन मंदिप्त वस्तु है । योगविंशिका प्राध्यात्मिक विकासकी प्रारंभिक भव- स्थाका वर्णन नहीं है, किन्तु उसकी पुष्ट अरस्थायोंका ही वर्णन है। इसीम उममें मुग्यतया योगके अधिकारी त्यागी ही माने गये हैं। प्रस्तन ग्रन्थमें न्यागी गृहस्थ और साधुकी भावश्यक-क्रियाको ही योगरूप पतलाकर उसके द्वारा भा- ध्यात्मिक विकामकी ऋमिक वृद्धिका वर्णन किया है। और उस थावश्यक- क्रिया द्वारा योगको पाँच भूमिमा विमा- जिन किया है। ये पांच भूमिकायें उसमें स्थान, शब्द, अर्थ, सालपन और निगलयन नाम से प्रसिद्ध है । इन पॉच भूमि- कायों में कर्मयोग और ज्ञानयोगकी घटना करते हुए भाषा- यन पहली दो भूमिकायों को कर्मयोग और पिछनी तीन भूमिकामाको ज्ञानयोग कहा है । इसके मियाय प्रत्येक भूमि- फामे डन्छा, प्रति. म्धय यार मिद्विरूप आध्यात्मिक विकासक तरतम भाषका प्रदर्शन कगया है। चार उम प्रत्येक भूमिका तथा इस्ला. प्रवृनि अादि अवान्तर स्थितिका ल- क्षण पहुन स्पष्टतया यणन किया है । इस प्रकार उक्त १ योगविना० ५.६ । ।
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[६] प्राचार्य ने अन्तमें चार प्रकारके योगियोंका वर्णनकरके योगशासके अधिकारी कौन हो सकते हैं ? यह भी पतला दिया है । यही योगदृष्टिसमुचयकी बहुत संक्षिप्त वस्तु है । योगविंशिकामें माध्यात्मिक विकासकी प्रारंभिक भव- स्थाका वर्णन नहीं है, किन्तु उसकी पुष्ट अवस्थाथोंका ही वर्णन है। इसीमे उसमें मुख्यतया योगके अधिकारी त्यागी ही मान गये हैं। प्रस्तुत अन्धमें त्यागी गृहस्थ और साधुकी भावश्यक-क्रियाको ही योगरूप बतलाकर उसके द्वारा था- ध्यात्मिक विकामकी ऋमिक वृद्धिका वर्णन किया है । और उस थावश्यफ-क्रियाके द्वारा योगको पाँच भूमियों में विभा- जित किया है । ये पाँच भूमिकायें उसमें स्थान, शब्द, अर्थ, सालंपन और निरालंबन नाममे प्रसिद्ध हैं । इन पाँच भूमि- कायोंमें कर्मयोग और ज्ञानयोगकी घटना करते हुए आचा- मैने पहली दो भूमिकाओंको कर्मयोग और पिछली वीन भूमिकाओंको ज्ञानयोग कहा है । इसके सिवाय प्रत्येक भूमि- फामें इच्छा, धूप्रत्ति, स्थर्य चार सिद्धिरूपसे आध्यात्मिक विकासके तरतम भावका प्रदर्शन कराया है। और उस प्रत्येक भूमिका तथा इच्छा, प्रवृत्ति यादि भवान्तर स्थितिका ल- तण बहुत स्पष्टतया वर्णन किया है। इस प्रकार उक्त १ योगविशिका गा० ५, ६ ।
[६४]
है, और पछि श्राध्यात्मिक विकास मारमने लेकर
अंततफमें पाई जानेवाली योगावस्याको योगाट क्या है।
इस योगावस्थाकी क्रमिक वृद्धिको समझाने के लिये संचाने
उरो पाठ भूमिकाओं में बाँट दिया है। वे भाउ भूमिका
उरा प्रथम माठ योगदृष्टिक नामसं प्रसिद्ध है। इन भाउ
रहिमीफा विमाग पातंजलयोगदर्शन-यनित यम, पिन
भारान, प्राणायाम आदि पाठ योगांगोंक आधार पर किया
गमा, मर्यात् एक एक धिमें एक एक योगांना
सम्मान गाया यतलाया है। पहली बार दृष्टिमा योगको
mom यायास्प होनसे उनमें अविद्याका मन्य रा
गिराको प्रस्तुत ग्रंथमें अवेद्यमद्यपद कहा है।
RI HIT मोम भविद्याका अंश दिनल नहीं रहता।
को भागाने पसंवेद्यपद शब्दमै जनाया है। इस
Kutta antyi पिछली बार रष्टियोंक ममप पापं जाने
It her In विकासको छायोग, शागपोग
hvininमीन योगभूमिकाओं में विभाजित करके
inf Muqामीका यह गंगा वर्णन किया।
maitleu VI
"
.
[६५] भाचार्यने अन्तमें चार प्रकारके योगियों का वर्णनकरके योगशासके अधिकारी कौन हो सकते है ? यह भी बतला दिया है । यदी योगमिमुचपकी बहुत मंदिम नस्तु है । योगविशिका माध्यात्मिक विकासको प्रारंभिक भव- स्थाका वर्णन नहीं है, किन्तु उसकी पृष्ट अयस्थायोंका ही वर्णन है। इसीमे उममें मुख्यतया योगके अधिकारी त्यागी ही माने गये है। प्रस्तुत ग्रन्थमें न्यागी गृहस्थ और साधुकी भावश्यक क्रियाको ही योगरूप पतलाकर उसके द्वारा सा- ध्यात्मिक विकामकी ऋमिक पृद्धिका वर्णन किया है । और उस यावरयक-क्रिया द्वारा योगको पाँच भूमियोंमें विभा- जित किया है। ये पॉच भूमिकायें उममें स्थान, शन्द, सालंबन मा निगलंबन नाम में प्रमिद्ध है । इन पाँच भूमि- काशम कर्मयोग श्री ज्ञानयोगकी पटना करत हुए थाचा- येन पहली दी भूमिकाओं को कर्मयोग और पिछली तीन भूमिकाओंको बानयोग कहा है। इसके मियाय प्रत्येक भूमि- कामें इन्छा, प्रनि बच गौर मिम्पिये आध्यात्मिक विकासक नग्नम भावका प्रदर्शन कराया है। यार उम प्रत्येक भूमिका तथा रक्छा, प्रनि अादि अवान्तर स्थितिका ल. क्षण पडून स्पष्ट नया वगन किया है । इस प्रकार उनः १ योगविश 110 ५, ६ । - [६६ ] पाँच भूमिकाओंकी अन्तर्गत भिन्न भिन्न स्थितिओंका वर्णन- करके योगके अस्सी भेद किये हैं, और उन सबके लक्षण बतलाये हैं, जिनको ध्यानपूर्वक देखनेवाला यह जान सकता है कि मैं विकासको किस सीदीपर खडा हूँ । यही योगविं- शिकाकी संक्षिप्त वस्तु है । उपसंहार-विपयकी गहराई और अपनी अपूर्ण- ताका खयाल होते हुए भी यह प्रयास इस लिये किया गया है कि अबतकका अवलोकन और स्मरण संक्षेपमें भी लिपिबद्ध हो जाय, जिसमे भविष्यत्में विशेष प्रगति करना हो तो इस विपयका प्रथम सोपान तयार रहे। इस प्रवृत्तिमें कई मित्र मेरे सहायक हुए हैं जिनके नामो- नेस मानसे मैं कृतज्ञता प्रकाशित करना नहीं चाहता। उनकी यादरणीय स्मृति मेरे हृदयमें मसंड रहेगी। पाठकों के प्रति एक मेग सूचना है। वह यह कि इस निबंध अनेक शास्त्रीय पारिभाषिक शब्द आये हैं। खास- कर अन्तिम भागमें जैन-पारिभाषिक शब्द अधिक है, जो बहुतोंको कम विदित होंगे उनका मैंने पिरोप गुलासा नहीं किया है, पर खुलासापाले उस उम ग्रन्थके उपयोगी म्यलोंका निर्देश कर दिया है, जिममे विशेपजिशासु मूल- अन्यद्वारा ही ऐसे कटिन शब्दों का गुलामा फर सफेंगे। ।
[६७] मगर या संपिप्त निरंप न होकर सास शस्तक होती तो इसमें विशेष गुलामोंका मी भपकारा रहता। इस प्रषिके लिये समको उत्साहित करनेवाले गुजरात पुरावग्य मंशोधन मंदिरक मंत्री परीण रसिकलाल घोटालाल जिनक विषाप्रेमको में नहीं भूल सकता। संवत् १९७४ पौष पहि५ मुखलाल संघवी. RAM- । प्रख्यारूपं हि चित्तसच रजस्तमोभ्यां संशष्टमश्वर्यविपयप्रियं मरतिातदेव तमसानुविद्धमधर्माज्ञानावैराग्यानेश्वर्योपगं भवति। तदेव प्रवीणमोहावरणं सर्वतः प्रद्योतमानमनुविद्धं रजोमात्रया धर्मज्ञानवैराग्यश्वर्योपगं भवति । तदेव रजोलेशमलापेतं स्वरूपप्रतिष्ठं सत्चपुरुषान्यताख्यातिमात्रं धर्ममेघध्यानोपगं भवति । तत् परं प्रसङ्कवानमित्याचक्षते घ्यायिनः । चितिश- तिरपरिणामिन्यप्रतिसंक्रमा दर्शिवविपया शुद्धा चानन्ता च; सच्चगुणात्मिका चेयमतो विपरीता विवेकख्यातिः इत्य- तस्तस्यां विरक्तं चित्तं तामपि ख्याति निरुणद्धि । तदवस्थं संस्कारोपगं भवति । स निर्षीजः समाधिः । तत्र किञ्चित् संप्रज्ञायत इत्यसंप्रज्ञावः। (य०) सर्वशब्दामहणेऽप्यत्तिल्लाभादग्याप्तिः संप्रज्ञा इति "क्लिष्टचित्तवृत्तिनिरोपो योगः" इति लक्षणं सम्यग, यद्वा " समितिगुप्तिसाधारणं धर्मव्यापारत्वमेव योगत्वम्" इति वस्माकमाचार्याः । तदुक्तम्-" मुक्खेण जोयणाओ जोगो मन्वो वि धम्मवागरो" [योगविंशिका. गा०१] तदा द्रष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम् ॥ १-३॥ वृत्तिसारूप्यमितरत्र ॥ १-४ ॥ १ सत्त्वपुरुषान्यताख्यातिमात्रं चिचं धर्ममेपार्यन्तं । २ विवेकपाः योधकमेवत्सदम् ॥
वृत्तयः पचतय्यः क्लिष्टानिष्टाः ॥ १-५॥ प्रमाणविपर्ययविकल्पनिद्रास्मृतयः ॥ १-६॥ तंत्र प्रत्यक्षानुमानागमाः प्रमाणानि ॥१-७॥ विपर्ययो मिथ्याज्ञानमतद्रूपप्रतिष्ठम् ॥ १-८ ।। शब्दज्ञानानुपानी वस्तुशून्यो विकल्पः ॥१-६।। यभावप्रत्ययालम्बना वृत्तिर्निद्रा ॥ १-१०॥ भनुभूतपिपयासंप्रमोपः स्मृतिः ॥१-११॥ माप्यम्--कि, प्रन्ययम्प चित्तं म्मरति श्राहोस्वि- द्विपपम्य ? इनि 1 ग्राह्यांपरक्तः प्रत्ययो ग्राह्यग्रहणोभयाकारनि- भामः नवाजानीयकं मंसारमारभने । म मंकारः स्वव्या- काअनः नदाकागमेव नाहगामयामिक स्मृनि जन- यनि । नत्र ग्रहणाकारता वृद्धिः, ग्रायाकारपूर्या स्मृतिः । मा च द्वयी-मापिनम्मतव्या वाभाषितम्मनच्या च म माथि नम्मनच्या। जान-मम मातरमनध्यान । मयाः स्मृतयः प्रमाणविपर्ययविनिद्रानामनुभशाप्रभवन्ति । मा- बैना नयः मुराद ग्यमोह-मा. मुबदाममोहाच प्रेशेषु व्यापयाः । मुगानुशया गमः । दायानगी द्वेषः । मोहः १ पद मुदिनयुम्नक न सपने [४] पुनरविद्येति। एताः सर्वा वृत्तयो निरोद्धव्याः । आसां निरोध सम्प्रज्ञातोऽसम्प्रज्ञातो वा समाधिर्भवति । (२०) अत्र विकल्पः शब्दान्नाऽखएहानीकनि सोऽसल्या- त्यसिद्धः, किन्तु "धसतो त्यि णिसेहो" इत्यादि भाष्यद्वध- मात्खण्डशःप्रसिद्धपदार्यानां संसर्गारोप एव, अभिने भेदनिर्भासा- दिस्तु नयात्मा प्रमाणैकदेश एव । निद्रा तु सर्वा नाऽभावालम्बना, स्वप्ने करितुरगादिभावानामपि प्रविमासनान् | नापि सर्वा मिध्यैव, संवादिस्वप्नस्यापि बहशो दर्शनात् । स्मृतिरप्यनुभूते यथार्यवचा- श्यधर्मावगाहिनी, संवादविसंवादाभ्यां द्वैविध्यदर्शनाद, इवि तिस- यामुत्तरवृत्तीनां द्वयोरेव यथायथमन्तर्भावात् पचवृत्त्यभिधानं स्वरुचितप्रपश्चार्थम् | अन्यथा क्षयोपशमभेदादसहयभेदानामपि संभवात् , इत्याईतसिद्धान्तपमार्थवेदिनः । अभ्यासवैराग्याभ्यां तन्निरोधः ॥ १-१२ ।। तत्र स्थितो यत्नोऽभ्यासः ॥ १-१३ ।। स तु दीर्घकालनेरन्तर्यसत्कारासेवितो दृढभूमिः ॥ १-१४ ॥ दृष्टानुभविकविषयवितृष्णस्य वशीकारसंज्ञा वेराग्यम् ॥ १-१५ ॥ विशेषावश्यकमाध्यगा, १५७९
[५]
तत् परं पुरुपख्यातेर्गुणवतृष्ण्यम् ॥ १-१६ ॥
माप्यम्-दृशानुअविकविषयदोपदी विरक्ता
पुरुषः दर्शनाभ्यासात्तच्छुद्धिप्रविवेकाप्यायितयुद्धिर्गुणेभ्यो
व्यक्ताव्यक्तधर्मकेभ्यो विरक्त इति । तद्यं वैराग्यम् । वत्र
यदुचरं तम्झानप्रसादमात्रम् । तस्योदये प्रत्युदितख्यातिरे
मन्यते-प्राप्तं प्रापीयम् , शीयाः क्षेतव्याः नेशाः, हिम
सिष्टपर्वा भवसंक्रमः, यस्याविच्छेदाअनित्वा म्रियते मृत्वा च
जायत इति । ज्ञानस्यैव परा काष्ठा पैराग्यम् । एतस्यैव हि
नान्तरीयकं कवन्यमिति।
(य०) विषयदोपदर्शनजनितमापातधर्मसन्यासलक्षणं प्रथमम् ,
सतस्वचिन्तया विषयौदामान्येन जनित द्वितीयापूर्वकरणभाविता-
विधर्मसन्याम लक्षण द्वितीय वैराग्यम्. यत्र तायारशमिका धमा
भपि सायन्त यात्री ने इयम्मा सिद्धान्तः ।।
वितर्कविचारानन्दास्मिनारुपानुगमा-
स्मंप्रज्ञात. ॥ १-१७॥
श्रयामप्रज्ञातः गमाधिः किमपाय : किम्मभावों या इति.
विरामप्रत्ययाभ्यासपूर्व. संम्कारशेषोऽन्यः।१-१३
माप्यम् -मवनिप्रन्यम्नमये मस्कारशंपी निगंधचित्तर
१ पुरषदर्शनाभ्या इत्यपि ।
-
[६] समाधिरसंप्रज्ञातः। तस्य परं वैराग्यमुपायः । सालम्बनो सभ्यासस्तत्साधनाय न कन्पत इति विरामप्रत्ययो निर्वस्तुक आलम्बनीक्रियते, स चार्यशून्यः । तदभ्यासपूर्व चित्तं निरा- लम्बनमभावप्राप्तमिव भवतीत्येप निजः समाधिरसंप्रज्ञातः।। (प.) द्विविधोऽध्ययं अध्यात्मभावनाध्यानसमवाचिच्यभे- देन पञ्चधोक्तस्य योगस्य पञ्चमभेदेऽववरति । वृचिक्षयो यात्मनः कर्मसंयोगयोग्यतापगमः, स्थूलसूक्ष्मा हात्मनश्चेष्टा वृत्तयः, तासां मूलहेतुः कर्मसंयोगयोग्यता, सा चाकरसनियमेन प्रन्यिभेदे उत्कृ- टमोहनीयमन्धव्यवच्छेदेन तत्तद्गुणस्थाने तत्तत्प्रकृत्यात्यन्तिकबन्ध- व्यवच्छेदस्य हेतुना क्रमशो निवर्तते । तत्र पृथक्त्ववितर्कसविचा- रैकत्ववितर्काविचारास्यशुक्लध्यानभेदद्वये संप्रज्ञाव: समाधिकृत्त्य- नां सम्यग्ज्ञानात् । तदुक्तम्-" समाधिरेप एवान्यैः संप्रज्ञा- तोऽभिधीयते । सम्यक्प्रकर्षरूपेण वृत्त्यर्थज्ञानतस्तथा ॥ १ ॥ (४१८ यो. वि. ) निर्वितर्कविचागनन्दास्मितानि सस्तु पर्या- यविनिर्मुक्तशुद्धद्रव्यध्यानाभिप्रायेण व्याख्येय(यः),यन्नयमालम्यो. तम-" का अरइ के भाग्दे ? इत्यं पि अगहे परे " इत्यादि । रुपकपिपरिममामा केवलज्ञानलाभम्त्वसंप्रजातः समाधिः, माव- मनोवृत्तीनां माहामहणाकाशालिनीनामवमहादिक्रमेण सत्र सम्य. परिमानामावान् । धन एव भावमनसा संशाऽभावाद् द्रव्यमनसा १ पापामग-३-३१.का प्रतिक मानन्दः। मध्यरेत् । " [७] र सामावली मोहोरपुरयते । सदिदमुकं योगविन्दा- "मसाल एपोधी समाधि यवे पानिकतारोपात्यादि- सतारपानुषत:॥१॥ धर्ममेपोऽमनारमा मात्रुः शिवोदयः। परवानन्दः परति योग्याश्रयायोगः ॥२॥" (४२०-२१) मावि महारशंपवं पात्र मवोरमाहिकमारामरागरेश्या বাবন, গবিলানব মায়ের মুর বনান। साममनिरपति दियः । ते प्रस्तूयते-- म सन्ययं द्विविधा, उपायप्रत्यया भवप्रत्ययय। तत्रो. पापप्रत्ययो योगिनां मपति ।। भवप्रत्ययो विदेहप्रकृतिलयानाम् ॥ १-१६ ॥ भाष्यम्-विदेहाना देवानां भवप्रत्ययः । तेहि समं- स्कारमानो पगर्दन नितन केवन्यपदमियानुभवन्तः स्वसंस्कार- विपातपाजातीपकमतिवादयन्ति । तथा प्रकृतिलयाः साधि- कार चमि प्रकृतिलीन कवन्यपदमियानुभवन्ति, पावन धुनगर तऽधिकापिशाचित्तमिति ॥ २०) उपरान्तमोइत्वनोकानां लक्सप्रमाना सानयोगरूप- समाधिमधिकृत्या प्रवृनम् । तदम्म] न्मतम् ।। श्रद्धावीर्यस्मृतिसमाधिप्रज्ञापूर्वक इतरेपाम् ॥ १-२०॥ मानोपयोगेन' इत्यपि, [-] तत्राधिमारोपायानाम्- तीनसंवेगानामासन्नः ॥ १-२१ ॥ मृदुमध्याधिमात्रत्वात्ततोऽपि विशेषः ॥ १-२२॥ ईश्वरप्रणिधानाद्वा ॥ १-२३ ।। क्लेशकर्मविपाकाशयरपरामृष्टः पुरुषविशेष ईश्वरः ॥ १-२४ ॥ तत्र निरतिशयं सर्वज्ञवीजम् ॥ १-२५ ॥ पूर्वेपामपि गुरुः कालेनानवच्छेदात् ॥ १-२६ ॥ भाप्यम्-पूर्वे हि गुग्वः कालनावच्छिद्यन्ते । यत्रावच्छे- दान काली नोपावनत म एप पूर्वेपामपि गुरुः । यथाऽस्य मर्गस्यादी प्रकर्षगन्या मिद्धः नवानि कालमर्गादिपपि प्रन्यनव्यः ।। (य)-यत्र वय वदाम -काननानयन्कार नेवायो- पास्यतावच्छेदरम! माय तु नथामभवदसिदापमा जन्यतापमछ. दकत्वेन निम मुनासिद्धी सातामा जम्बन | नित्यमुक्त धरः' इन्यमिधान घ व्यक्त ९६ वदताध्याघानः, मुपयापनविभागद- न्यपूर्वस्येव मोइस्य व्ययिनः, अन्यथा पटादवि नित्यानत्वं [] दुनितारम् । केवलसरवातिशयदा पुरुषविरोषस्य करने व केव- सरजस्तमोऽतिशयवतारपि कल्पनापतिः । कयं श्रवमात्मत्वाच्छे- देनानादिसंसारसंपन्यानिमित्तारपतिः ? | ईतिरिकारमन सयालकरने प गौग्यम् । फेवलसत्रयोदृष्टपुरुष कल्पने प नित्यशानाश्रयो नैयायिकाभिमत एवं स किं न फलप्यते ?, सरमात्सालकनिर्मुम सिद्ध एव भवतीधरत्वं युक्तम् , उपासनोप- বিনাশোনা বই মমান। অনাবাদি प्रवाहापेक्षया सव पूरणीया । यहादुः श्रीहरिभद्राचार्या:--"एसो पाइम रिय मुद्धो य वयो मणासुद्धा ति। जुत्तो प पाणं महा मुद्धया सम्मं ॥१॥" (अनादिविशिका, १२) सिद्धानामनेकरवान " एक ईश्वरः" इति श्रद्धा न पूर्यत इति पंत, न, मिना या पन्नाभावप्रनियंग्यनिशस्यकत्वस्य मिद्धानामनेवाधामसयासरस्वत्वर धामयोजकरवान् । गम्यता वा समष्टरक्षया तदपि, स्वास्तित्वमाश्यास्तित्तयार- विनिभांगातवस्य मात्रिका | Art: सर्वथैकस्य पुरुष- स्थाभ्युपगमे १ जगत्वरणस्य शम्यानि पलादापनि:, कार्यवे मककत्वस्यद शापियामाभिधानु शक्यत्वादिति । तस्य च सिद्धस्य जगवा स्यानुप्रापि योगिना पुनर्बन्धका- अवस्थाधिनमालाम १३, न त्वजिवृक्षारूपम्नस्या रागरूप- स्वाना तस्य च द्वेपमहरितस्वात, मर्गद्वषयतश्चतरबदनामध्यरवा- दिति मवेष: ।। प्रहनम-~ [१०] तस्य वाचकः प्रणवः॥१-२७॥ तज्जपस्तदर्थभावनम् ॥ १-२८॥ ततःप्रत्यक्चेतनाधिगमोऽप्यन्तरायाभावश्च ।१-२९) व्याधिस्त्यानसंशयप्रमादालस्याविरतिभ्रान्ति- दर्शनालब्धभूमिकत्वानवस्थितत्वानि चित्त- विक्षेपास्तेऽन्तरायाः ॥ १-३०॥ दुःखदोर्मनस्याह्नमेजयत्वश्वासप्रश्वासा विक्षेप- सहभुवः ॥ १-३१ ॥ तत्प्रतिषेधार्थमेकतत्त्वाभ्यासः ॥ १-३२ ॥ मैत्रीकरुणामुदितोपेक्षाणां सुखदुःखपुण्यापुण्य- विषयाणां भावनातश्चित्तप्रसादनम् ॥ १-३३ ॥ माप्यम्-नत्र मर्यप्राणिषु मुखमंभोगापमेपु मंत्री भार- येन । दुःमितेषु करूणा, पृण्यान्मकेषु मुदिता, भपुण्यशीले. पंचाम् । (३०)-अम्मदाबायांग्तु-"पाहितचिन्ता मैत्री पापिना- शिनी तथा का । परामुखतुष्टिमुदिता परपोरोपेतापेशा ॥१॥" इति वसयित्वा अपचारियजनेवरमामाग्य [११] चतुर्विधा मैत्री । मोहासुखसंगाध्यहितयुता चैव कपणा सु ॥२॥ सुररमा सखेतावनुषन्धयुत्ते परे प मुदिता तु । कहा तुबन्धनिदतत्वसारा सुमेहति ॥ ३॥” इति भेदप्रदर्शनपूर्व एताः स्वल्लभ्यास न कमेण वधनानुसारिणां घुमाम् । सट्ट- सानां मात श्राक्षाना परिणमन्न्युषैः ॥४॥" इति परिकर्म- विधिमाः । वमन्यमग्मत्कृनपोटशकटीकायाम् । प्रकृवम्- प्रच्छर्दनविधारणाभ्यां वा प्राणस्य ॥ १-३४ ॥ भाष्यम्-काट्यम्य यायांनामिकापुटाभ्यां प्रयत्नविशे- पाहमनं प्रच्छर्दनम् , विधारणं प्राणायामः, नाभ्यां मनसः स्थिति मंपादयेत् ।। (10) अनेकान्तिकमेनन , प्रमा ना-या मनो म्याकुली. माम रण शिरभइ " ( सावश्यकनियुक्ति १५१०) इत्यादि पारमा नन्निगवान, इनि वयम .. विषयवती वा प्रवृनिम्त्पन्ना मनमः स्थितिनि- बन्धनी ॥ १-३५॥ विशोका वा ज्योतिप्मनी ॥ १-३६ ॥ वातगगविषय वा चिनम् ॥ १-३७ ॥ स्वप्ननिद्राज्ञानालम्बनं वा ।। १-३८ ॥ यथाभिमनध्यानाहा ॥ १-३९ ॥ भावान Samachar [१२] परमाणुपरममहत्वान्तोऽस्य वशीकारः॥१-४०॥ क्षीणवृत्तेरभिजातस्येव मणेग्रहीतग्रहणग्राह्येषु तत्स्थतदञ्जनता समापत्तिः ॥ १-४१॥ तत्र शब्दार्थज्ञानविकल्पैः संकीर्णा सवितर्का समापत्तिः ॥ १-४२॥ स्मृतिपरिशुद्धौ स्वरूपशून्येवार्यमात्रनिर्भासा निर्वितर्का ॥१-४३॥ एतयेव सविचारा निर्विचारा च सूक्ष्मविषया व्याख्याता ॥ १-१४ ।। सूक्ष्मविषयत्वं चालिङ्गपर्यवमानम् ॥ १-१५ ॥ ना एव सीजः समाधिः॥ १-४६ ॥ माभ्यम् नाः चतयः ममापत्नयो पहिवस्तुरीजा इति ममाधिपि माजः । सत्र म्पलेऽर्थ मवितर्को निम्ति ग्रन्मऽध मश्चिाग निर्विचारः म चतुषिमंग्यातः ममा- चिरिति॥ (4.) यं योगामानुपाटस्थूलसूक्ष्मद्रयमानास्पाणा- मेटामा एमालीशनुभूताना पियारितीनामुपसान-
simranire, सहारा लिया
Prinnarent
निर्विधारशापारमप्रमादः ॥ १-४७॥
mना-
भुनानुमानप्रशाभ्यामन्यविषया विशेषार्थयात्
মামু ~~মামবিয়াৰ গৰু গামা, না-
गोन पोभिपातम , सम्मान न हि विराम
इतनाति नपानुमान गामान्यविषपमेर, पर
মাস {স , যাস ন ম বিস্মিন
अनुमान र मामा-मनापमहा: । नामान तानुमानारपयो
न विशप कानन । न पाम्य पमप्यहिनविक्षा
प्रय बात' मान्य ग्राम. न पाम्य पिशंपम्पा.
प्रमाण कम्यामाया न ममाधिशानिमारा व ग विशेषा
भान न म २१ पाना । नम्मानानुमान
मायामन्याच्या प्रan विपाप-कादनि ।।
...... 12. { "ani gh.
५१ यमलालाराना
- "यार
.
.
[१४] नुभवापरनामधेया शास्त्रोक्तायां दिशि, वेदविक्रान्तमान्द्रियं विशेषमवलम्बमाना तत्त्वतो द्वितीयापूर्वकरणमाविसामध्ययोग- प्रभवेयं समाधिप्रज्ञा, इदि युक्तः पन्थाः । प्रकृवम्-- समाधिप्रज्ञाप्रविलम्भे योगिनः प्रज्ञाकृतः संस्कारो नवो नवो जायते- तज्जः संस्कारोऽन्यसंस्कारप्रतिवन्धी ।।१-५० ॥ तस्यापि निरोधेसर्व निरोधान्नि-जःसमाधिः॥१-५१॥ ॥ इति पातञ्जले मायप्रवचने योगशास्त्रे समाधिपादः प्रथमः ।। : उद्दिष्टः समाहितचित्तस्य योगः। कथं व्युत्थितचित्तोऽपि योगयुक्तः स्यान् ? इत्येतदारभ्यते- तपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि क्रियायोगः ॥२-१॥ भाष्यम् - नानपम्बिनो योगः मिध्यति, अनादिकर्मक्लेश- वामनाचित्रा प्रत्युपस्थितविषयजाला चाशुद्धिर्नान्तरेण तपः संभेदमापद्यन इति तपम उपादानम् । तच चित्तप्रसादनम- पापमानमनेनामेव्यमिति मन्यते । स्वाध्यायः प्रणवादिपवि- ग्राणां जपः मोतशाम्राध्ययनं वा। ईश्वरप्रणिधानं सर्व- क्रियाणां परमगुरी अर्पणं तन्फलमन्यामो वा । २ शास्त्राविकान्तम् ।
[१५] (20)-METRपरमधामामामिलाम: ई" मा. ॥ गांगुनाने मुफ्तर- मामि प्रिपामगुर विधानपविभा- मरामदुम-"fear तातो गुनीन्द्र techirinaitin Amमा sins..॥" rais, maram समाधिभावनाः नेशतनुकरणाच ॥२-२॥ अविद्याग्मितारागपाभिनिवेशाः शाः॥२-३॥ अविद्या क्षेत्रमुत्तरेषां प्रमुप्ततनुपिच्छिनोदारा- राम् ।।२-१॥ भा-यम - मारिया एर प्रगर भूमिमग्पामग्मिता. समान २५ - 48.! प्रान किन दादागगाम् । नप का प्रमि - : : १५ ना मागपगमः, . . . . . . पानांना दग्ध अगर • ना पनम्न, दग्ध- 4.! मनधरमदेह इन्धन 1 1.1 गाया, मामय दग्र्धामनि विषयग्य मान मानपा प्राधः इन्युगा प्रमुमिदम्यामानामगर । नु समुयन-प्रतिपयमावना. . नान्यमान [१६] पहताः शास्तनको भवन्ति । तथा विच्छिद्य विच्छिद्य वेन तेनात्मना पुनः पुनः समुदाचरन्तीति विच्छिन्नाः । कयं रागकाले क्रोधस्यादर्शनात् । न हि रागकाले क्रोधः समुदा- चरति । रागध कचिद् दृश्यमानो न विषयान्तरे नास्ति । नैकस्या खियां चैत्रो रक्त इति अन्यासु स्त्रीपु विरक्तः, किन्तु वत्र रागो लन्धवृत्तिः, अन्यत्र मविप्यद्वृत्तिरिति स हि तदा प्रसुप्तवन विच्छिन्नो भवति । विपये यो लब्धवृत्तिः स उदारः, सर्व एवैते क्लेशविपयत्वं नातिकामन्ति । कस्तर्हि विच्छिन्न: प्रसुप्त- स्तनुरुदारो वा क्लेशः ? इति, उच्यते-सत्यमेवैतत्, किन्तु विशिष्टानामेवेतेषां विच्छिन्नादित्वं, यथैव प्रतिपक्षभावनातो निवृत्तस्तथैव स्वव्यञ्जनेनाभिव्यक्त इति सर्व एवैते वेशा अविद्याभेदाः । कस्मात् ? सर्वेपु अविद्येवाभिमवते । यद- विद्यया वस्त्वाकार्यते तदेवानुशेरते क्लेशाः, विपर्यासप्रत्यय- काले उपलभ्यन्ते, दीयमाणां चाविद्यामनु क्षीयन्त इति ।। (य०)-अत्राविद्यादयो मोहनीयकर्मण औदायिकमाववि. शेषाः । तेषां प्रमुप्तत्वं सजनककर्मणोऽवाघाकालापरिक्षयेण कर्मनिपेकामायः । तनुत्वमुपशमः क्षयोपशमो वा । विच्छिन्नत्वं प्रतिपक्षप्रकृत्युदयादिनाऽन्तरितत्वम्। उदारवं चोश्यावलिकामाम- त्वम्, इत्ययसेयम् ।। अनित्याशुचिदुःखानात्मसु नित्यशुविसुखात्म- व्यातिरविद्या ।। २-५ ॥
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[१]
सपत्नः। यया पागोप्पदं न गोष्पदामावो न गोर
किन्तु देश एव ताभ्यामन्यस्त्वन्तरम् । एवमावि
प्रमाणं न प्रमाणामार: किन्तु विद्याविपरीतं ज्ञाना
विपति ।।
हग्दर्शनशक्त्योरेकात्मतेवास्मिता ॥ २-६
माप्यम्-पुरुषो शक्तिदिदर्शनशक्तिरित्येवर
रूपापतिरिवास्मिता प्रेश उच्यते । मोक्तभोग्यशक्त्यो
मारिभकपोरत्पन्तासंकीरोयोरविभागप्रासाविव सत्यां
कमरे। सरूपपवितम्भे तु वयोः कैवन्यमेव भवति,
भोपः विवश चोकम्-"बुद्धितः परमपुरुषमाका
सरिमादिनिस्चिलमारपन गांव वात्मबुद्धिं मोहेनेवि
सुखानुशी रागः॥२-७ ॥
मापर-किनार सुकाउन्मुनिपूर्वः सुखे नत्स
सरोहा सोमरस राग हाते ।
না ঃ খায় না মা শোনা যায় বােমঃ দূর t :নমাধি। ধবা, বাঘাষনা rণ খো নি , বা। মা ft যখ: ধরলাযুনামঃ- মুখ মণ । .)-এ। নাৰ (ovষ। 'এi Pen y (৪n}}াখKথা :) - Tubgedier écrirleurteisi ecerat. **খ ঃ খাম খালা খাব। nir১লা মধৰ৭ এ, ॥ ও ir- *** ধ; আর থাংনা। এ ওষ? এ কথা rare ন - ও ।" * মামা * * * * *১১ । • ?? ( , • ••• • • খira ।।। ধ ন • অনায় পাওয়া at can ৫' ৪৫ • ৯৫} মা- | ‘ব ব'' ।Btgথাৰখা rafe. ম্য য} 83 viazy f ••না থাংখা • wify et? tgity (a +।
[१]
सपत्नः। यथा वाऽगोष्पदं न गोष्पदामावो न गोम्पदमा
किन्तु देश एष ताभ्यामन्यद्वस्त्वन्तरम् । एवमविधा
प्रमाणं न प्रमाणामावः किन्तु विद्याविपरीतं झानान्तरम्
वियेति ॥
दृग्दर्शनशक्त्योरेकात्मतेवास्मिता ॥ २-६ ॥
माध्यम्-पुरुषो शक्तिर्वृद्धिदर्शनशक्तिरित्येतयोरेक
स्वरूपापत्तिरियास्मिता नेश उच्यते । मोकभोग्यशत्योरत्य
न्वविभक्तयोरत्यन्तासंकीर्णयोरविमागप्राप्ताचि सत्या भोग
कल्पते । स्वरूपप्रविलम्मे तु वयोः कैवन्यमेव भवति, इन
मोगः इति । तथा चोक्तम्-"बुद्धितः परमपुरुषमाकारशी
लवियादिमिमिक्तमपश्यन् कुर्यात् वात्मवृद्धि मोहेनेति"
सुखानुशयी रागः॥ २-७॥
माध्यम्-सुखामिशस्य मुरारानुस्मृतिपूर्वः मुखे नमाधन
या यो गर्दस्तृष्णा लोमः स राग इति ॥
दुःयानुशयी द्वेषः ।। २-८॥
माध्यम्-दृम्पामिनस्य क्षयानुस्मृतिपूर्ण दागे माघ
-: प्रतियो मन्यु
गांमा क्रोधः सपः॥
मही विदुषो
गरदोऽभिनिवेशः ॥२-९
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[ २२] योऽनियतविपाकस्तस्य त्रयी गतिः, कृतस्याविपकस्य नाराः, प्रधानकर्मण्यावापगमनं या, नियतविपापपानकर्मणाभि- भूतस्य वा चिरमवस्थानमिति । तत्र कृतस्पाविपकस्य नासो यथा-शुक्रकर्मोदयादिहेच नाशः कृष्णस्य । यदमुक्तम्- "द्वे द्वे ह वै कर्मणी पेदितव्ये, पापकस्यैको राशिः पुण्य- कृतोऽपहन्ति । तदिच्छस्व कर्माणि मुकृतानि कर्तुमिहब ते कर्म कवयो चेदयन्ते " | प्रधानकर्मण्यावापगमनम् , यत्रेद- मुक्तम्-"सात्स्वन्प: संकरः सपरिहारः स प्रत्यवमर्पः कुश- लस्य नापकर्षायालम् । कस्मान् ? कुशलं हि मे यहन्यदनि, ययायमायापं गतः बर्गेऽप्यपकमन् करिष्यति" इति । नियतविपाकप्रधानकर्मणाऽभिभूतम्य मिरमवम्यानम् , कथ मिनि ? अदृष्टजन्मदनीयायव नियतविपाकम्य कर्मण: ममान मागमभिव्यनिकारणमुनाम्, न न्यदृष्टजन्मवेदनीयस्यानियत विपाकम्य । यचटान्मवेदनीयं कर्मानियनविपाक नमरयेत् पापाप वा गच्छन । अभिमतं वा चिरमणुपामीन माग ममान कामिय्यक निमिममम्य न पिाकाभिमुपं करो. तीति नद्विपाकम्यर देशकालनिमित्तानपधारगादिप कर्म गनिधित्रा दृमाना गनि । न चोन्मर्गम्यापमादाभिलिहिये। कविकः कमारापोऽनुमापन इति ।। (4.) अक्षर मनात मीमामामहे-"भागायुगा विशा" यापारगमनुषयों, मिरपामुरिय बनेन विमाध्यता.
. [२३] दिला अनितमरष्टं गङ्गामरणे विपच्यते इत्यस्यापि शास्त्रार्थवादार इप मरणस्यापि 'विपाककल्पातिरेकान् । किं घ जन्म-भाव. पणनंबन्धरूपमायुःप्रविलम्पनद्वारा [य] दि पूर्वकर्मविपाकः स्यात तदोतरोत्तरक्षणानामपि तथात्वाचिः, भायुपैव तदुपसंग्रहे । जन्मनोऽपि भवोपसंप्रहो युक्तः, उस्माजन्मपदं गतिजात्यादि- नामकर्म हवजीवपर्यायोपलक्षणम् । गत्यादिभोगत्वावच्छिन्ने । गयादिनामकर्मप्रकृतीनां पृथक्पृथकारणत्वमवश्यमेष्टव्यम, अन्यथा संकरापचे। भायुरपि मनुष्याचायुभेदेन जीवनपर्यायलक्षणं पतु- विध फलभूत, बचनकमायुष्कर्माऽपि प पतुर्विधमवश्यमभ्युपग- मनीयम् । भोगपदेनावशेषकर्मपटकफलमुपलक्षणीयम् , मानापर- पादिफ्ले भानावरणीयादीनां पृथक्पृथकारणत्यस्यान्वयव्यतिरेक. सिद्धत्वात् । पूर्वापरभावव्यवस्थितजन्मान्तरीयकर्मप्रचयस्य वार- शोधरजन्मफलभोगे हेतुत्वं तु दुर्वपम् , कचित्फलकमवपरीत्यस्यापि दर्शनाद् । पुद्धिविशपविषयत्वादीनां कर्मप्रपयफलप्रयापनुगमप्य हेतुहेतुमदावाभ्युपगमे तु घटपटादिकार्यप्रययेऽपि दराडोमादीनां वया [हेतु] हेतुमद्भावापानः । अनन्यगतिकत्वात्कर्मफलभोग- स्थल एवेत्थं करप्यते नान्यत्रनि धेन्, न, भवगतभगवत्प्रवधन- रहस्यस्यानन्याविकमासिद्धः । वाहि-प्रारम्भबद्धमेकमेशायुकर्म प्रापणलम्धविपाकमेव जन्म निवर्तयति, कर्मान्तराणि प कानि- १-विपाककोटिभविष्टत्वान् इति भावः। २ वोप स्पात अथवा नपोप' इति स्थान् । ३. स्वादिना' स्यात् । .
। [२४] चित्तजन्मनियतविपाकानि, कानिचिन्नानाजन्मनियतविपाकानि, कानिचिदनियतविपाकानि वा। तत्राद्यैर्नामगोत्रवेदनीयैः संवलित- मायुर्मवीपमाहिताव्यपदेशमभुते, यत्रान्ये प्रारब्धसंज्ञां निवेशयन्ति। एकस्मिन्मवे आयुयस्य बन्ध उदयश्च प्रतिषिद्ध एवेति न जन्मान्तरसंकरादिप्रसङ्गः । नन्दीश्वरनहुषादीनामप्यायुःसंकराभ्यु- पगमे जन्मसंकरो दुर्निवारः । प्रायणं विना हि नायुष्कर्मान्तरोदो. घः। शरीरान्तरपरिणामे प्रायणाभ्युपगमे च वक्तव्यं जन्मा- न्सरमिति । तस्माद्वैक्रियशरीरलामसदृशोऽयं नैकस्मिन् जन्मन्या- युद्धयमाक्षिपवीत्यलं मिध्यादृष्टिसंघटेन । तस्मादेकमविकः फर्माशय इवि भवोपप्राहिकर्मापेक्षयैव युक्तम्, नान्यथा, कर्मानु- भवनिर्मिवाना वासनानामनेकजन्मानुगमाभ्युपगमेऽर्थतः कर्मान्त- राणा स्यैव तथोपगमात् । क्रोधादिवासनानामपि मोहनीय- कर्मभावस्वरूपत्वात् , अन्यथा जातिव्यक्तिपक्षयोर्वासनाया दुनि- रूपत्वादिति प्रतिपत्तव्यम् । भषोपमाहिकर्मणोऽन्यायुष्करूप. स्यैकमविकत्वे कथं सप्तजन्मविप्रवपदकर्मविपाकोपपत्तिः । इति चेत् , देवनारकयोरेकमेव भवप्रहणं पञ्चेन्द्रियतिर्यङ्मनुष्ययो सप्ताष्टौ भवप्रहणानि, पृथ्वीकायिकादीनामसंख्येयानि कायस्थिति इत्यादि सिद्धान्तोतक्रमेण तादृशातिजातिनामफर्मादिसंचयसध्री- पीनताशनवायुःपरम्परानुषन्यानेयमनुपपचिरस्माकम् । भवतु, नै- फमेव कर्म प्रारब्धतामभुते, किन्तु तत्तत्तणवर्तियहल्पमुखदुःखहेतु- १.पामेव ' इति शुद्धम् ।। 1 [२५] शुरलघुकर्मणामनेकपा भायणकालोद्गुत्तिकाना प्रारषदेखेका जन्मनि जन्मसमभोगाफर्मम्यापतिरेव' जन्मकृतस्य तारामं- अपयस्य माणसप्तकेन यं यं चापि म्मरन् भावं"(गीता.अ.म.शे. ६.)त्यादि स्मृत्यनुरोधेन प्रायणसमककालोत्पादिताहान्तराविषया- न्तिममत्ययै क्रमशो लम्पमारस्यताकस्य ममजन्मविप्रत्तोपपा. दकत्वाभ्युपगमे 'गनमैहिकमविककर्माशयप्रतिझया, एवमनन्द- मविपाकिताया अपि यतुं शक्यन्वान् । किश्च तस्य जन्म- मोगप्रदत्वावरदेन प्रारम्धलं तदन्यावच्छेदेन प संधिसत्वं প্রম , অযথা ফানিনীধি লাহােৱৰী ব্যৱৰীৰে- स्यापनि:, संचितं हि कर्भ तत्वज्ञाननारयं न तु प्रारब्धम् । লাবন এ সব বিবালার নাঙ্গা- মমর ধান। প ব নবনমান সরমা स्थत्वम , नजन्मप्रारब्धवावर ददन प मजन्मभोगप्रदत्वमिति व्यक्त ग्वान्योऽन्याश्रय सम्मादाय मेव धनदेवकर्मा- न्तगपगृहीन ननावरम ! मन एक जानिमामनिधनायुष्का- दिभदोऽपि सिद्धान्तमिद्ध । वेवाननश्यायककर्मम वाल- समुपातेन तत्समीकरणान्न का यनुप निर्मित अन्यत्रा यषों ने. कमविकत्व नियम कमाया पद्धय कामेव भारतकर्म- प्रचाधिकामित्याप दुनिभधानम् , मुगलजीवमात्रवि. १ . मंग्यमविपातम्या' इति मर्माचीनम । २ रेसन्म' वि ०३ गमिटेक-' पनि। " M [२६] पाफभेदेन कर्मणां नानाविपाकवावविपाक्यायुष्पकृविविपाकस्य मायणोद्बोध्यत्वेऽपि सर्वत्र तया वक्तुमशक्यत्वात् । दृश्यते हि निद्रा. दिविपाकोद्बोधे फालविशेषस्यापि हेतुत्वम्, न च दृष्टेऽनुपपन्नं नाम, स्वानन्तरकर्मविपाकोद्वोधद्वारा प्रायणस्याप्रिमसंतत्युदोषकत्वस्वी- कारे चातिप्रसङ्गः, नानाभवसंततिद्वारघटनायास्तत्र तत्पूर्व च वर्छ शक्यत्वात् । प्रधानत्वमपि कर्मण एकायुष्परिग्रहं विना दुर्वचम् । न होकन भवे नानागतियोग्यकर्मोपादानेऽन्ते इदमेव फलवदित्य- तान्यन्नियामकमस्ति, आयुस्त्वेकत्र भवे एकवारमेव सभ्यत इति सदनुसारेणान्ते तादृग्लेश्योपगमात् , “ यल्लेश्यो म्रियते तल्लेरयेप- स्पद्यते " इति प्राग्भवबद्धमायुस्तादृशलेश्यया विपाकप्रामं प्रधानी- भवदन्यकर्माण्युपगृहातीति सर्व [स] गच्छते । प्रधानकर्मण्या- वापगमनादिकमपि “मूलप्रकृत्याभिन्नाः, संक्रमयति गुणत उत्तराः प्रकृतीः। नन्वात्माऽमूर्तत्वादध्यवसायप्रयोगेण ॥" इत्याद्युक्तनीत्या संक्रमविधिपरिज्ञानं विना न कथमप्युपपादयितुं शक्यम् , अन्यथा किं कुत्र संक्रामति? इति विनिगन्तुमशक्यत्वात् । तस्मादत्रार्थेऽस्म- स्कृतकर्मप्रकृतिपत्तिं मम्यगवलोक्य वीतरागसिद्धान्तानुरोधि कर्मा- शयस्वरूपं व्याख्येयमिति कृतं विस्वरेण ।। प्रकृतं प्रस्तुम:- ते लादपरितापफलाः पुण्यापुण्यहेतुत्वात् ।।२-१४॥ कथं ? तदुपपाद्यते- परिणामतापसंस्कारदुःखैर्गुणवृत्तिविरोधाच [२७] दुःखमेव सर्व विवेकिनः ॥२-१५॥ माप्यम्- सर्वस्यायं रागानुविधेवनाचेतनसाधनाधीनः मुसानुमय इति तपास्ति रागजः फर्माशयः । तया पदेष्टि दुःरासाधनानि मुमति पेति देपमोहकतोऽप्यस्ति । तया पोक्तम्-" नानुपहत्य भूतान्युपभोगः सम्भवतीति हिंसा- कृतोऽप्यन्ति शारीरः कर्माशयः "--इति । विषयसुरां चावि- पेन्युक्तम् । या भोगेप्पिन्द्रियाणां हप्तेरपशान्तिस्वसुसम्, या लान्यादनुपशान्तिस्तद्दुःराम् । न चेन्द्रियाणां मोगाभ्यासेन पप्ण्यं फतुं शक्यम् । कस्मात् । यतो मोगाभ्यासमनु विष- धते रागः फाशलानि पेन्द्रियाणामिति । तस्मादनुपाय: गुरास्प मोगाभ्याम इति । म रान्वयं पृधिकविपभीत इसा- शीविषेण दष्टो यः मुसार्थी 'विषयाननुव्यवसिवो महति दुःसपझे. मम इति । एषा परिणामदुःग्रता नाम प्रतिहला मुसायस्यायामपि योगिनमेव निनाति । अथ का ताप- दुःरावा ? सर्वस्प देषानुषिद्धर्थतनाचेतनमाधनाधीनस्तापानु- मव इति समाम्नि पजः फर्माशयः । सुखसाधनानि च प्रार्थयमानः कार्यन याचा मनसा च परिस्पन्दते, ततः परम- नुरक्षात्युपहन्ति चेति परानुग्रहपीडाभ्यां धर्माधर्माबुपचि- नोति । स कर्माशयो लोभामोहाघ भवतीत्येपा वापदुःख- १" विषयानुवासितः" इत्यपि ।
[20] चोच्यते । का पुनः मंस्ताग्दुमता? सुसानुमयान्मुससंस्का- राशयो दुरसानुभवादपि दुम्ममफागशय इति । एवं कर्मभ्यो विपाऽनुभूयमाने सुने दुर्ग या पुनः कर्माशयपचय इति । एपमिदमनादि दुःमयोतो विप्रमृतं योगिनमेव प्रतिहलात्मक- स्यादुवैजयति । कम्मान ? 'प्रतिपायान्पो हि विद्वानिनि, ययोगातन्तुरक्षिपाने न्यस्तः म्पर्शन दुःमयति, नान्येषु गावावयवेपु, एवमेतानि दुःपानि अधिपात्रकन्यं योगिनमेर किनन्ति नेतरं प्रतिपनारम् । इतरं तु बकर्मोपहनं दुःखमू- पात्तमुपानं त्यजन्तं त्यक्तं न्यक्तमुपाददानमनादिवामनावि- चित्रया चिनवृत्या ममन्ततोऽनुविमिवाविद्यया हातव्य एवाहबारममकागनुपातिनं जानं जातं याद्याध्यामिकोमय- निमित्तालिपवारणम्नापा अनुमवन्तं । नदेवमनादिदुःखस्रोतसा व्युह्यमानमात्मानं भूतग्रामं च दृष्ट्वा योगी मबंदुःखक्षयकारणं सम्यग्दर्शनं शरणं प्रपद्यत इति । गुणनिविरोधाच दुःख मेव सर्व विवेकिनः । प्रख्याप्रनिम्थितिम्पा गुणाः परस्परा- नुग्रहपरतन्त्रा भूत्वा शान्तं घोर {ड वा प्रत्ययं त्रिगुणमेवा. रभन्ते । चलं च गुणवृत्तमिति क्षिप्रपरिणामि चित्तमुक्तम् । रूपातिशया वृत्त्यतिशयाच परस्परेण विरुध्यन्ते । सामान्यानि त्यतिशयः सह वर्नन्ते । एवमेते गुणा इतरेतराश्रयेणोपानि- तसुखदुःखमोहप्रत्यया इति मर्च सर्वरूपा भवन्ति । गुणप्रधा- नभावकृतस्त्वेषां विशेष इति । तस्माद् दुःखमेव सर्व विवेकिन । -- [२६] इति । पदम महतो उपसमुदापम्प प्रभपपीजमधिप सम्पाट गम्यग्दर्शनममायहेतुः । पपा चिकिमानार्ग पतु हम्, गंगा रांगांतरागन्य अपरयमिति, एपमिदमपि शाम पतुष्टमेव । गपया- गंगारः गंगारातः मोणे मोषोपान इति । मत्र दुपएलः मंमागे देयः। प्रपानपुरपी: मंपोगे संतः । प्रयोगम्यान्यन्निकी निगिनिम् । हानोपाय: सम्यग्दर्शनम् । तत्र धातुः पम्पमुपादेय देयं या न भपितुम- तविति, हाने नम्पोदयादप्रमाः उपादाने पहेतुपादः, उभयप्रन्यायाने शाधनयाद त्येतन्मम्पदर्शनम् । तदेत- पदा पनुमिभिधायने । 10. नागनयमतर. यदुपजीप्यार गुमो महावादी- "भगवाजमनानाजान नमानम | ननदान. .ita lun.ra an"नि ।। हयं द खमनागतम् ।।२-१६ ।। नम्माघटायमिन्यन्यन नम्मेव कारण प्रतिनिर्दियने- दृश्यया योगा यहेतु. ॥२-१७॥ हरयम्वरूपम्न्यनं- RISHA.12. मममारवाकर चनपत्रिका प्रा. २९ ।। ३.थानिय इति दिन पाठाना ।
[३२] तदर्थ एव दृश्यस्यात्मा ॥ २-२१ ॥ कस्माद- कृतार्थ प्रति नष्टमप्यनष्टं तदन्यसाधारण- त्वात् ॥ २-२२ ॥ संयोगस्वरूपाभिधित्सयेदं मूत्रं प्रववृते-- स्वस्वामिशक्त्योः स्वरूपोपलब्धिहेतुः संयोगः ॥२-२३ ॥ यस्तु प्रत्यक्चेतनस्य स्वबुद्धिसंयोगः- तस्य हेतुरविद्या ॥२-२४॥ हेयं दुःखं हेयकारणं च संयोगाख्यं मनिमित्तमुक्तम्, अतः परं हानं वक्तव्यम्- तदभावात् संयोगाभावो हानं तद् दृशेः फैवल्यम् ॥
- योगाहानुटानादशुद्धिक्षये ज्ञानदीतिरा विवेक- स्यातेः ॥२-२८ ॥ वत्र योगाङ्गान्यपधार्यन्ते- यमनियमासनप्राणायामप्रत्याहारधारणाध्यान- समाधयोऽष्टावनानि ॥२-२९ ॥ अहिंसासत्यास्त्येयब्रह्मचर्यापरिग्रहा यमाः॥२-३०॥ सेतु- जातिदेशकालसमयानवच्छिन्नाः सार्वभौमा महानतम् ॥२-३१॥ माप्यम्-तग्राहिंसा जात्यवग्छिमा मत्स्पबन्धकस्य मत्स्पे- ग्य नान्यत्र हिंसा । सव देशावन्धिमान तीर्थे हनिप्यामीति। सैव कालापरिछना न चतुर्दश्यां पुण्येऽहनि हनिष्यामीति । सैप त्रिभिरूपरतस्य समयावच्छिना देवनाक्षणार्धे हनिप्या- मीति । यथा च क्षत्रियाणां युद्ध एव हिंसा नान्यति । एभिर्जातिदेशकालसमयरनपच्छिमा अहिंसादयः सर्वच प्रति. पालनीयाः। सर्वभूमिषु सर्व विषयेषु मर्वधवाविहितप्यभिचारा सार्वमीमा महाप्रतमिन्युच्यन्ते ।। "वाविदित-" इति ।
[१२] तदर्थ एव दृश्यस्यात्मा ॥ २-२१ ॥ कस्माद- कृतार्थ प्रति नष्टमप्यनष्टं तदन्यसाधारण- त्वात् ॥ २-२२ ॥ संयोगवरूपाभिधित्सयेदं सूत्रं प्रववृते- स्वस्वामिशक्त्योः स्वरूपोपलब्धिहेतुः संयोगः ॥२-२३ ॥ यस्तु प्रत्यक्चेतनस्य स्वबुद्धिसंयोगः- तस्य हेतुरविद्या ॥२-२४॥ हेयं दुःखं हेयकारणं च संयोगाम्यं सनिमित्तमुक्तम्, अतः परं हानं वक्तव्यम्- तदभावात् संयोगाभावो हानं तद् दृशेः कैवल्यम् : २-२५ ॥ अथ हानस्य कः प्राप्युपायः ? इनि- विवेकख्यातिरविप्लवा हानोपायः ॥२-२६ ॥ तस्य सप्तधा प्रान्तभूमिः प्रज्ञा ॥२-२७ ॥ सिद्धा भवति विवेकख्याविहानोपायः । न च सिदि. रन्सरेण साधनम् इत्येतदारभ्यते- 4 योगाङ्गानुष्ठानादशुद्धिक्षये ज्ञानदीतिरा विवेक ख्यातेः ॥२-२८ ॥ सन योगामान्यपधार्यन्ते- यमनियमासनप्राणायामप्रत्याहारधारणाध्यान- समाधयोऽष्टावङ्गानि ॥२-२९ ॥ अहिंसासत्यारत्येयब्रह्मचर्यापरिमहा यमाः॥२-३०॥ ते - जातिदेशकालसमयानवच्छिन्नाः सार्वभौमा महावतम् ॥२-३१॥ माप्यम्-तत्राहिंसा जान्यवरिखमा मत्स्यगन्धकस्य मत्स्ये. व नान्यत्र हिंसा । सव देशापछिमान तीर्थे हनिप्पामीति। संप कालापच्छिमा न चतुर्दश्यां पुण्येऽहनि हनिप्यामीति । सप प्रिमिरूपरतस्य समयावच्छिमा देवमाक्षणार्थे हनिप्या. मीति । पधा प क्षत्रियागां युद्ध एव हिंसा नान्यति । एमिर्जातिदेशकालसमपरनपछिमा महिमादयः सर्वव प्रति- पालनीयाः सर्वभूमिपु सर्व विषयेषु मधवाविहितप्यभिचारा! सार्चमीमा महायतमिन्युन्यन्ते ।। १॥ वाविदित-" इति ।
। [३४] (य०)-सर्वशब्दगर्भपतनया महानतानि, देराशब्द- तिशया पाणुमतानीति पुन: पारमविवेकः। एयपन पान प्रतिज्ञया पञ्चानामपि तुल्यत्वाभिव्यक्तम् ।। शौचसंतोपतपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि नियमाः ।। २-३२॥ भाष्यम्-तत्र शोचं मृअनादि जनितं मेध्याभ्यपहरण च पापम् । माभ्यन्तरं चित्तमलानामावालनम् । (य०-भावाचानुव द्रगशौचं पासमादेया सत्त्वाशिनः ॥ एतेपी यमनियमानाम्- विनाधने प्रतिपक्षभावनम् ॥ २-३३ । वितर्का हिंसादयः कृतकाग्निानुमोदिना लो, क्रोधमोहपूर्वका मृदुमध्याधिमात्रा दुःखाशा- नानन्तफला इति प्रतिपक्षभावनम् ॥२-३॥ प्रनिपतमानावनाहया निको पदा म्युरप्रमावर्मा स्वदा कानमधयं योगिनः मद्विधा माति, मयमा--- महिमाप्रति नरमान वरत्यागः ॥२-३५ सत्यप्रनिटायां कियाफलाश्रयत्वम् ॥ २-३६ [३५] अस्तेयप्रतिष्ठायां सर्वरत्नोपस्थानम् ॥ २-३७ ।। ब्रह्मचर्य प्रतिष्ठायां वीर्यलाभः ॥ २-३८ । अपरिग्रहस्थैये जन्मकथंतासंबोधः ॥२-३९ ॥ शौचात् स्वाहजुगुप्सा परैरसंसर्गः ॥२-४० ॥ किच-~- सत्वशुद्धिसोमनस्येकायोन्द्रियजयात्मदर्शन- योग्यत्वानि च ॥ २-४१ ।। सन्नोपादनुत्तमः मुखलामः ॥ २-४२ ॥ कायेन्द्रियसिद्धिरशुद्धिक्षयात्तपसः ॥२-४३ ॥ स्वाध्यायादिष्टदेवनामप्रगः ॥२-४४ ॥ समाधिमिद्धिरीश्वरप्रणिधानात् ।। २-४५ ॥ मह मिद्विभिर्यमनियमाः । भामनादीनि उनाः पक्ष्यामः । तत्र- -- स्थिरमुखमासनम् ॥ २-४६॥ प्रपत्नशथिल्यानन्तनमापनिभ्याम् ॥२-१७॥ ततो द्वन्द्वानभिधारः ॥२-४८॥
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पधिचनिरोधे निरुद्धानीन्द्रियाणि, नेतरेन्द्रियजययत् प्रयल- रुतमुपायान्तरमपेदन्ते योगिन इति । (10)-ध्युत्यानध्यानदशासाधारणं पातुरक्षमाषभावनया स्वविषयप्रतिपत्तिप्रयकरागद्वेषरूपफलानुपधानभेन्द्रियाणा परमो जयः इति तु अयम् । क्योक्तं शीवोप्णीयाध्ययने (भाचाराम, पप्ययन ३ ९० १.)-" जस्मिमे सदा प रूपा य गंधार रसा प फासा य अभिसमन्नागया भवंति से पायथं मारावं बय धम्म म " इत्यादि । अन "अभिसमन्वागता" इत्यस्य भीत्याभिमुख्यन मनःपरिणामपरतन्त्रा इन्द्रियविषयावत्युपयो- गलन (1) ममिति सम्यक्स्वरूपेण मैले इष्टा अनिष्टा गि निर्धारणया अनु पश्चादागता: परिधिमा यथार्थवभावेन परये- वर्यः, स पात्मवानिन्यादि परस्पमिन्द्रियजयस्य फलार्पवादः । अन्यत्राप्युतम-" सरुपमा६ पम् विसयमापयं । रागरामा उजे सत्य ने भिक्षु परिवजए ॥ १॥" इत्यादि। चित्तनिगंधादतिरिकप्रयत्मानजत्व तु परमनियजये निकसाये प्रयत्नमाधानपतत्वादेव नियते, नपा १ स्तुनिकार. सानि तवा(न पा)शाणि न धान्नमालनानि च । इति सम्यकपति- पदा(घ) वयन्द्रियजयः न.॥३॥ इति । न प पारणयामा- दिहठयोगाभ्यामधिननिगो पामेन्द्रियजये प निधिन पायोऽपि, १ सिद्धसंनदिवाकर " सासं ए विभइ"[आय नि० १५१० ] इत्याचागमन बोगसमाधानविनत्वेन बहुलं तस्य निषिद्धत्वात् । सम्मानप्यारम- भावनोपहितसमतापरिणामप्रवाही शानाख्यो राजयोग एव पित्ते- विजयस्य परमेन्द्रियजयस्य घोपाय इति युतम् ।। ॥ इति पातअले साहयप्रवचने योगशाग्रे साधननिर्देशो नाम द्वितीयः पादः॥ देशबन्धश्चित्तस्य धारणा ॥ ३-१ ॥ तत्र प्रत्ययेकतानता ध्यानम् ।। ३-२ ।। नदेवार्थमाननिर्माम मरुपन्यमिय समाधिः प्रयमकय मंयमः नजयान् प्रज्ञानांकः ॥२-५॥ तस्य भूमिपु विनियोगः ॥ ३-६ ॥ प्रयमलाई पूर्वभ्यः ॥ ३-७॥ सदपि गहिर निधी जम्य ॥३-८॥ प्रय निगरिनपा परं गुगाममिति गातार -
प्युरपाननिरोधसंस्कारयोरभिभवप्रादुर्भावा निरो.
पक्षणपिसान्ययो निरोधपरिणामः ॥३-१ ॥
सरय प्रशान्तयाहिता संस्कारात् ॥३-१०॥
सपिकाप्रतयोः क्षयोदयो चिनस्य
ततः पुनः समाधिपरिणामः ॥३-११॥
शान्तादिना तुल्यप्रत्ययों चिचस्पे-
कामता परिणामः ॥३-१२ ।।
एतेन भृतान्द्रयं धर्मलक्षणावस्थापरिणामा
व्याख्यानाः ३-१३ ॥
शान्तादिनच्याश्यमानुपानः धर्मी ॥३-१४॥
पमान्यत्वं परिणामान्यत्वं हेतुः ॥ ३-१५ ॥
परिणामप्रमादी-नानज्ञानम् ।।३-१६॥
शब्दार्थप्रत्ययानामिनीनमध्यापान कारस्तस्यवि-
भागसंयमात्मर्वभूनरतज्ञानम् ।। ३-१५॥
सम्फारसाक्षाकरणापूर्वजानिज्ञानम ॥३-१८ ॥
प्रत्ययस्य परचित्तज्ञानम् ॥ ३-१९ ॥
[४०] न च तत्सालम्बनं तस्याविषयीभूतत्वात्॥३-२० कायरूपसंयमात्तग्राह्यशक्तिस्तम्भे चतुष्प्रकाशा- सम्प्रयोगेऽन्तर्धानम् ॥३-२१ ॥ सोपक्रमं निरुपमं च कर्म तत्संयमादपरान्त. ज्ञानमरिष्टेभ्यो वा ॥ ३-२२ ॥ मेव्यादिषु पलानि ॥ ३-२३ ।। यलेषु हस्तियलादीनि ॥ ३-२४ ।। प्रत्या लोकन्यासात्सूक्ष्मव्यवहितविप्रकृष्टार्थ- ज्ञानम् ॥३-२५ ॥ मुवनज्ञानं सूर्ये संयमात् ॥३-२६ ॥ चन्द्रे तागव्यूहज्ञानम् ॥ ३-२७ ।। ध्रुवे नतिज्ञानम् ॥ ३-२८ ॥ नाभिचके काय यूहनानम् ।। ३-२०. ।। कगटकूप सुस्मिामानिनिः ॥३-३० ।। कूर्मनाच्यां धेयम् ।। 3-३ ॥ मूर्धयोतिषि मिरदर्शनम् । ३-३२ ।। प्रानिमादा मम् ॥ ३-३३ ।।
[1]
हृदये चित्तसंवित् ।। ३-३४ ॥
सत्त्वपुरुपयोरत्यन्तासंकीर्णयोः प्रत्ययाविशेषो
भोगः परार्थत्वात्सार्थसंयमात्पुरुपज्ञानम् ॥३-३५॥
ततः प्रातिभभावणवेदनादर्शास्वादपार्ता
जायन्ते ॥३-३६ ॥
ते समाधादुपसर्गा व्युत्याने सिद्धयः ॥ ३-३७ ॥
पन्धकारणशेथिल्पाप्रचारसंवेदनाच चित्तस्य
परशरीरप्रवेशः ॥३-३८॥
उदानजयाजलपङ्गकण्टकादिष्वसन
उत्क्रान्तिश्च ॥३-३६॥
समानजयाज्वलनम् ॥३-४०॥
धोत्राकाशयोः संपन्धसंयमादिव्यं श्रोत्रम् ॥३-४१॥
फापाकाशयोः संयन्धसंयमालधुतूलसमापत्तेश्चा-
काशगमनम् ॥३-४२॥
पहिरकल्पितात्तिर्महाविदेहा ततः प्रकाशा-
धरणक्षयः ॥३-४३ ॥
[२] स्थूलस्वरूपसूक्ष्मान्वयार्थवत्त्वसंयमात- जयः ॥ ३-४४ ॥ ततोऽणिमादिप्रादुर्भावः कायसंपत्तद्धर्मा- नभिघातश्च ॥ ३-४५ ॥ रूपलावण्यवलवनसंहननवानि काय- संपत् ।। ३-४६ ॥ ग्रहणस्वरूपास्मितान्वयार्थवत्त्वसंयमादिन्द्रिय- जयः ॥३-४७॥ ततो मनोजयित्वं विकरणभावः प्रधान- जयश्च ।। ३-४८॥ सत्त्वपुरुषान्यताख्यातिमात्रस्य सर्वभावाधिष्ठातृत्वं सर्वज्ञातृत्वं च ॥३-४९ ॥ तद्वैराग्यादपि दोपवीजक्षये कैवल्यम् ॥३-५०॥ स्थान्युपनिमन्त्रण सहस्मयाकरणं पुनरनिष्ट- प्रसङ्गात् ॥३-५१ ॥ पणतत्क्रमयोः संयमाद्विवेकजं ज्ञानम् ॥३-५२॥ वस्य विषयविशेष उपचिप्यते-
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[४४] बाहुल्येन, आत्मद्रव्यगुणपर्यायगुणस्य [रूपस्य] च तस्य शुलण्या- नशरीरघटकसया कैवल्यहेतुत्वमपि। ईश्वरस्यानीश्वरस्य वा विवेक- जज्ञानववस्तदभाववतो [वा] "सत्त्वपुरुषयोः शुद्धिमाम्ये कैवल्यम्" इत्याययुक्तम् , विवेकजं केवलज्ञानमन्तरेणोक्तशुद्धिसाम्यस्यैवानु- पपतेः । " दग्धक्केशबीजस्य झाने पुनरपेक्षा नास्ति" इत्युक्ते. नियुकिकरवादात्मदर्शनप्रतियन्धकस्यैव कर्मणः फेवलज्ञानप्रतिष- न्यकत्वेन तदपगमे तदुत्पत्तेरवर्जनीयत्वानिष्प्रयोजनस्यापि फल- रूपस्य तस्य स(स्व)स्वसामप्रीसिद्धत्वात् । न हि प्रयोजनातिभिया सामग्रीकार्य नार्जयतीति । तदिदमुक्तम्-"शपक्तिमंतिज्ञानाम किश्चिदपि केपलान् । तमःचयनिःशेषविशुद्धिप्रभषं हि तत् ॥१॥" इवि गुणविशेषजन्यत्वेऽप्यात्मदर्शनवन्मुक्तो तस्याव्यभि- चारित्वं तुल्यम् । वस्तुनो ज्ञानस्य सर्वविषयकत्व स्वभावः, मन. स्वस्य प विचित्रज्ञानावरणेन स प्रतिवध्यत इति । निःशेषप्रति- बन्धकापगमे शाने सर्व विषयकत्वमावश्यकम् । तदुक्त-"जो शेये कपमशः स्यान् पनि प्रतिबद्धरि दामिदाहको न स्यात् कथम. प्रतिवन्धकः" ।। ( योगविन्दु ४३१ ) इति । एनेन विवेक सविषयकं जानमुत्पन्नमपि मत्वगुणवेन नित्नाधिकारायां प्रकृती प्रविलीयमान नात्मानमभिशान्यात्मायंगुल्यनिwि. चिप पर मुक्तो व्यवनिष्ठ इत्यायपास्तम् । विवादरनिडया विषयकत्वस्यमावरस्पनाइ, अर्थशन्यायां चिति मानामावाद, विम्बरूपस्य विसामान्यायाविवर्नम्प सनेऽपिरसामान्यायापि
[४]
मा पापना पहा शिwिistrit परि
খাবাগান গাধা এস এ শােহা-
karnish ferमान्यमित पगातु पुणो न विधि-
Freeifer यि नांदगार गपंच गुस्यम.
शाamtोटार वामनो afte सरिताति-
Infermitोन मनीयम निर्भमंग पिता
alanयमिrgो त्र प्रमंपादयभावप्रमाण, तथा
पानBEER .इयांनुपात: प्रमादिभ्यानि-
मात्रय धादिवचनापपादने पवितमप्यविनातिष स्यादिति
विसामान्यनापिदिच ॥
सापादप्ययाचौरमुख पद
रह गुएलाया (लक्षण गोपपता संसा-
रिगुतायोgir विभावाभावपर्यापनशामा बन्यो-
दिनापपाद यानि, एम नरनामा-
पार entra. भारत वाद मायापन1-
Harity, if 4 सानु चापक लतादो।।
नि पान अल मादपप्रधान यांगास विभूतिपादननीयः।।
जन्मापधिमत्रतपासमाधिजा. सिद्धयः ॥४-१॥
सन कार्यान्द्रयाणामन्य जातीयपरिमानानाम
जात्यन्त गमः प्रत्यापूगन् ॥ ४-२ ॥
--
[४] बाहुल्येन, आत्मद्रव्यगुणपर्यायगुणस्य रूपस्य च तस्य शुक्लन्या. नरारीरघटकतया कैवल्यहेतुत्वमपि । ईश्वरस्यानीश्वरस्य वा विवेक- अज्ञानवतस्तभाववतो वा] "मत्त्वपुरुषयोः शुद्धिसाम्ये कैवल्यम्" इत्यत्ययुक्तम् , विवेकजं केवलज्ञानमन्तरेणोक्तशुद्धिसाम्यस्यैवानु- पपत्तेः । " दग्यकेशबीजस्य ज्ञाने पुनरपेक्षा नास्ति " इत्युक्ते. नियुकिकत्वादारमदर्शनप्रतिबन्धकस्यैव कर्मणः फेवलज्ञानप्रतिम- स्थफत्वेन तदपगमे तदुत्पत्तेरवर्जनीयत्वानिष्प्रयोजनस्यापि फल- रूपस्य तस्य स(स्व)स्वसामप्रीसिद्धत्वात् । न हि प्रयोजनातिभिया सामग्रीकार्य नार्जयतीति । तदिदमुक्तम्-"शपक्तिमंतिज्ञानाम किश्चिदपि केवलान् । तमःचयनिःशेषविशुद्धिप्रभवं हि तन् ॥१॥" इति गुणविशेषजन्यत्वेऽप्यात्मदर्शनयन्मुफौ तस्याम्यभि. पारित्वं तुल्यम् । वस्तुतो ज्ञानस्य मर्वविषयकत्व स्वमावः, मा. स्वस्य च विचित्रशानावरणेन स प्रतियध्यत इति । निःशेषप्रति- बन्धकापगमे शाने सर्वविश्यकत्वमावश्यकम् । तदुक्त-शो शेष कथमत: स्यात् भनि प्रतिबद्धरि । दाऽमिदाहको न स्यात् कपम- प्रतिबन्धकः" । ( योगविन्दु ४३१ ) इति । एनेन विवेक सविषयकं ज्ञानमुराममपि मत्वगुणवेन मिनाधिकारायां प्रकृती प्रविलीयमान नात्मानमभिराती यात्मार्थशून्यनिyि. चिप एव मुक्तो व्यवतिष्ठतु इत्यप्यपास्तम् । पिसावधेनेकध- विषयकत्वावमापनाद, अर्थशून्यायां चिति मानाभावाद, विम्बरूपाय चिस्पामान्यायाविवर्तम्य मोऽचियामाग्यापापि
[४]
IN TEArt: MIT लिपिरोपपत्ते:, परि
पानि पति: अपने ना दुरुसम्पाया-
विनोद विमान्यनिष्ट एम्पगन्तु युको न तु विधि-
FRERARE jि , नकदेशार पात्र गुन्या-
मरस्यात् । परापं ग्वात्मनो पन्दुतिमिदं सदितावि-
समायिन मनीयम निमंति:
पौशामित्युभो हर प्रमेयाशारणभाषमाग, तपा प
.. निदा 10"यादानुपपतिः । मादियास्ति-
माएपदादिवपापपादने परिवमप्यपियासिब स्यादिवि
MARAमान्यनानि । पदि. "त्पादध्ययप्रौप्य. सद्'
ri गुलमलोपारिताला स (लए सर्वत्रोपपपते सदा संसा-
मियो स्वविभावभावपर्यायरतापमान बन्धमो-
दियायाम नापादयताति, पननेश्वरप्रवचनामृवमा-
दीय - Eutari. भाकाको न्यादि मियारवपना-
Raaune fayd मा पधिक लतादौ ।।
पनि पानले माइधप्रवचन योगमाये विभूनिपादस्तुनीयः।।
जन्मापधिमन्नतप.समाधिना. मिद्धयः॥४-१॥
নষ্ট ব্যাখাদ্যনাৰাযৎবানা -
जात्यन्तरपणाम. प्रकृत्यागत् ॥ ४-२ ॥
-
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[१७] - नास्त्पसतः संभयो न चास्ति सतो विनाश इदि द्रव्य- बेन संभवन्त्यः कथं निवर्सिम्यन्ते वासना इति.. अतीतानागतं स्वरूपतोऽस्त्यध्धभेदाधर्मा- णाम् ॥४-१२॥ भाष्यम्-भविष्यक्तिकमनागतम्, अनुस्नम्यक्तिक- मतीतं, स्वव्यापारोपाटं वर्चमानं, भयं तदस्तु शानस्य अपम् । यदि चनसरूपतो नामरिष्यभेदं निर्विपरं ज्ञानमुद- रत्स्स्त । तस्मादनीतानागतं स्वरूपतोऽस्तीति । किस पोगमागीयस्य पापवर्गभागीयम्प या कर्मणः फलमुत्पित्सु रदि निरूपाव्यमिति नदुईशेन तेन निमित्तन कुशलानुष्ठान र युज्येत । मतय फलम्प निमिनं वनमानीकरणे समर्थ नापूर्वजनने । मिदं निमित्त नििनझम्प विशेषानुनहरा हरुने नापूर्वमुत्पादयनानि । धर्मी चानकधर्मस्वभावस्तस्य पावभंदन धमाः प्रत्यास्थिताः । न च पया पर्वमान व्यक्तिविशेपारनं दोन मतीतमनागतं च । रूपं हिं ! पर ध्यान रसानागनमनि, मेन पानुभूत- यनिकन सम्पनी मिति । तमानापन: ए. शक्तिरिति न मा भग्त्वनीलानागनपारजनाः । एकत्र बाध्धनः ममय दाव वाना धार्मसमन्वागी भवन एवनि नाभूत्वाभावमयागामधनामिनि ।। है
[४८]
(40)-द्रव्यपयांयात्मनैवाध्वयसमावेशो युज्यते नान्यया,
निमित्तस्वरूपभेदम्य परेणाप्यवश्याश्रयणीयत्वान् । पपा पाभूता
मावामावयोरपि पर्यायव्यस्वरूपाभ्यां स्याद्वार एवं युकोऽन्यथा
प्रतिनियतवनव्यवहारापनपत्तरिति तु भद्धयं सर्चतसा ।।
ते व्यक्तसूदमा गुणात्मानः ॥४-१३ ।।
यदा तु पर्ने गुणाः कथमेकः शब्द एकामिन्द्रियमिति-
परिणामफत्वाद्वस्तुतत्त्वम् ॥ ४-१४ ॥
भाग्यम्-प्रन्याक्रियास्थितिशीलानां गुणानां प्रहणा-
रमकानां करणभानका परिणामः श्रोत्रमिन्द्रियम्, प्रामा-
रमकाना शब्दमायनंकः परिणामः शन्दो विषय इति,
राप्दादीनां मूर्गिममान जानीयानामकः परिणामः पृषीपर•
माणुम्नन्मात्रावयवम्नेषा नकः परिणाम : पृजी गीः पर
पर्वन इत्परमादिभृनानापि नहीभायप्रगामिन्यायकारा.
दानान्युपादाय मामा-यमकारकागान ममाधयः ।।
(10)- Usint या पनि भ.
वानमन ।।
हनधनादन्यायम?--
वस्तुमाम्य चिनदानयोविभाग, पन्या. ॥४-१५॥
- [४] न चेकचित्ततन्त्रं वस्तु तदप्रमाणकं तदा किं स्यात् ।। ४-१६॥ तदुपरागापेक्षित्वाञ्चित्तस्य वस्तु ज्ञाताज्ञातम् ।४-१७ यस्प तु तदेव चिचं विपयस्तस्प- सदा ज्ञाताश्चित्तवृत्तयस्तत्प्रभोः पुरुपस्यापरि- गामित्वात् ॥४-१८॥ माप्यम्-यदि चिचवत्प्रभुरपि पुरुषः परियमेव तदा वद्धि- पयायिचचयः शन्दादिविषयवद् शातानाताः स्युः। सदा- ज्ञातत्वं तु मनसस्वत्प्रभोः पुरुषस्यापरिणामित्वमनुमापयति ॥ (य०)-मानरूपस्य चित्तस्यात्मनि धर्मितापरिणामः सदा समिहियत्वेन तस्य मदाज्ञायत्त्वेऽप्यनुपपन्नः, शदादीनां फापा- पिसानिधानेनेव व्यसनावग्रहादिलक्षणेन साताशावरवसमवात् । मत एष केवलझाने शक्तिविशेपेण विषयाणा मदा मनिधानात् कानावराटदकत्वेन तपा सदाशावत्वनाधितमिति सु पारमेश्वर- प्रवचनप्रसिद्धः पन्थाः । प्रकृतम- स्यादाशहा चित्तमेव स्वामामं विपयाभासं च भवि- प्पत्यग्निवत्- १ ' तत्त्रमाणक 'इत्यपि | २ 'पि नानुपन्नः' इति स्यात् । - [४८] (10)-द्रव्यपर्यापारमाधमयसमावेशो युज्यते नान्यथा, निमितस्वरूपभेदम्य परेणाप्ययश्याभपणीयतान् । तपा पाभूला भाषाभाग्योरपि पर्यायव्यस्वरूपाध्यो स्याद्वार पर युक्तोऽपिपा प्रतिनियतनपानयवहारानुपपत्तरिति तु भयं गतसा ॥ ते व्यक्तसूदमा गुणात्मानः ।।४-१३ ॥ पदा तु गो गुणाः कथमेकः शब्द एफमिन्द्रियमिति- परिणामेकत्याद्वस्तुनस्यम् ॥४-१४ ।। माध्यम्-अम्माफियास्थितिशीलाना गुगाना प्रया- रमकानां करणमावेकः परिणामः श्रीपमिन्द्रिपम्, प्राधा- रमकाना शब्दमावनकः परिणाम: शब्दो गिपशी, गदादीनां निगमानहानीपानाम.. परिणाम: पृथ्वीपर- मागुम्नन्मायावसपना का परिणाम की गी: TH पनि रमादि मना नाम नहींधायप्रणामि कारा- दानान्युपादाय मामनगमाधयः ।। इतनाम '-- दातुमा याचना ननिता पन्धा. 140 [१६] न चेकचिचतन्त्रं वस्तु तदप्रमाणकं तदा किं स्यात् ॥४-१६॥ तदुपरागापेक्षित्वाञ्चित्तस्य वस्तु ज्ञाताज्ञातम् ।४-१७ यस्प तु वदेव चि विपयस्वस्य- सदाज्ञाताश्चित्तमृत्यस्तत्प्रभोः पुरुपस्यापरि- णामित्वात् ॥४-१८॥ माप्यम्-यदि चिचयत्प्रभुरपि पुरुषः परिणमेत वदावदि- पयायितत्तयः शन्दादिविपयवद् शावाज्ञाताः स्युः। सदा- सातत्वं तु मनसस्तत्प्रभोः पुरुषस्यापरिणामित्वमनुमापयति ।। (२०)-ज्ञानरूपस्य चित्तस्यारमनि धर्मितापरिणामः सदा समितित्वन तस्य मदासानत्वेऽप्यनुपपन्नः, शब्दादीनां कादा- किसमिधानेनव व्य बनावप्रहादिलक्षणेन माताज्ञातत्वममवान् । मत एप केवल माने शक्तिविशेषगा विषयाणा मदा मनिधानाद् मानावदकत्वन नेपा मदासातन्वनयाधिसमिति सु पारमेघर- प्रवचनप्रसिद्धः पन्थाः । प्रकृतम- स्यादाशा चित्तमेव म्वामामं विषयामासं च भवि- प्पत्यनिवत्-- १ तत्प्रमाणक 'इत्यपि • पि नानुपमः' इति स्यात् । -
.
[५.]
न तत्स्वाभासं दृश्यत्वात् ॥४-१९॥
एकसमये चोभयानधारणम् ॥ ४-२० ।।
स्यान्मतिः स्वरमनिरुद्धं रितं चित्तान्तरेण समनन्त
गृसत इति-
चित्तान्तरदृश्ये बुद्धिबुद्धेातिप्रसर स्मृति
करश्च ॥४-२१ ॥
कयम् --
चितेरप्रतिसंक्रमायास्तदाकारापत्तो स्वबुद्धि
संवेदनम् ॥ ४-२२ ॥
मायतदभ्युपगम्यते
द्रदृश्योपरत चित्तं पर्थम् ॥४-२३ ॥
माप्यम्-मनो हि मलव्यनार्थनापत्र, नवयं पनि
पत्सादिपिणा पुकोणात्मीयया मामिपद्ध, मदेवगिरमेय
द्रष्टरपोरई विपपिपिनि भीम गेतनातनम्म्यापन
सिपात्मकमपविसपारमामिगतनं भवनगिर कम
जिक मामिन्युच्यते । तदनन निममा पंग धाना
कोगिरतनमित्याः। अपोपिगमा गम, गानि
मुत्वयं गगदिपटाविध महारगी मोक हानि | पनी
[१] पास्ते । कस्मात् । अस्ति हि तेपो मान्तिपीजं सर्वरूपाकार- निर्मासं चित्तमिति | समाधिप्रजायर्या प्रज्ञेयोऽर्थः प्रतिविम्मी- भूतः तस्मालम्बनीभूतत्वादन्यः । स चेदर्थः चित्तमात्र स्यात् यं प्रदर प्रशारूपमपयार्येत । तस्मात्प्रतिरिम्पीभूतोऽर्थः सापां येनापधार्यते स पुरुष इति । एवं ग्रहीतग्रहणमासस पचित्तभेदात्रयमप्येतावितः प्रविभजन्ते से सम्यग्दर्शिना रधिगतः पुरुष इति ॥ (५०)वयं तु प्रमः-घमिरूपारमके प्रकाश संयोग 'नाऽपि यथा सतप्रकाशकत्व तथा पैतन्येऽपि प्रतिप्राणि पनपेशवयानुभूयमाने, सन्यथाऽनषस्थाव्यासमानुपपरयादिदो- प्रसान् । परप्रकारात्वं प तस्य प्रयोपरामदशायां प्रतिनिय- विषयसंन्धाधीनम् । पायिफ्यां व दसायो मदा तनिरापरण- भावनिम् । वचन्पंपादिकामामायामानुपा. रसारणस्वेन गुण इति गुण्याधित एवं स्यात् । यध तम्य गुणी एषात्मा । निर्गुणत्वं च तस्य सांसारिकगुणाभाषायेद न) अन्यथा, ( सस्य ) स्वामाविकानन्तगुणाधारवाद । वि. भूतपिलो निलेमभ्युपगमें ध तत्प्रतिविम्याप त्वेन दुनो प्रथा- शस्यानुपपतिः, सिम्यतिबिम्पमावमपन्यस्य तिष्ठत्वेन योरपि नेपकवतील्यान् । उपपरितमिवारपादने पापपरितसांविषय वायुपपादनमपि तुल्पमिनि नयादेशविशेपरपासमात्र मेवन ।। प्रकृतं प्रस्तुम:- - " [२] तदसंख्येयवासनामिश्चित्रमपि परार्थ संहत्य- कारित्वात् ॥ ४-२४ ॥ विशेषदर्शिन आत्मभावभावनानिवृत्तिः॥४-२५॥ तदा विवेकनिम्नं कैवल्यप्रारभारं चित्तम् ॥४-२६॥ तच्छिद्रेषु प्रत्ययान्तराणि संस्कारेभ्यः ॥४-२७॥ हानमेषां केशवदुक्तम् ।। ४-२८ ।। प्रसंख्यानेऽप्यकुसीदस्य सर्वथा विवेकख्यातेधर्म- मेघः समाधिः ॥४-२९, ।। ततः क्लेशकर्मनिवृत्तिः ॥ ४-३० ।। तदा सर्वावरणमलापेतस्य ज्ञानस्यानन्त्याज्ञय- मल्पम् ।।४-३१॥ भाध्यम्-पर्वैः केशकर्मावरणविमुक्रम्य ज्ञानस्यानन्त्य भवति । भावरकेण नममाऽभिभूनमावृतं अनन्तं ज्ञान सर्च कचिदेव रजमा प्रवर्तितमुदाटितं ग्रहणसमर्थ भवति तत्र यदा सचरावरणमलरपगतं भवति तदा ज्ञानस्यानन्त्याज्जयमल्पं संपद्यते, यथाऽऽकारी सयोतः यत्रेदमुकम्-" अन्धो मणिमविध्यत्तमनगुलिरावयन् । प्रीयस्तं प्रत्यमुश्चरमजिहाऽभ्यपूजयत् ॥ १ ॥” इति ।।
[५३] (२०)-प्रयुक्तमेतत् । भानस्य सेयांश एवावरणस्यावार- कत्वात् , स्वरूपावरणेऽपैतन्यप्रसन्नात् । मानानन्त्ये यानन्य- स्यापि प्रोन्यान् । उहं प-सूक्त पारमपरात्मकहकर्म जाव पद- पदमिति दिग ॥ ततः कृतार्थानां परिणामकमसमाति- गुणानाम् ॥ ४-३२॥ अय कोऽयं नमो नाम ? इति- क्षणप्रतियोगी परिणामापरान्तनिर्यायः क्रमः ॥ ४-३३ ॥ माप्यम्-घणानन्तर्यान्मा परिणामस्यापरान्तेनावसानेन गृपते नमः । न पननुभूतग्रामपणा नपस्य पुराणवा पख- स्यान्ते भवति । नित्येषु च क्रमो दृएः । दयी पेयं नित्यता, शूटस्थनित्यता परिणामिनित्यता च । तत्र कूटस्थनित्यता पुरुषस्य, परिणामिनित्यता गुणानाम् । यस्मिन् परिणम्यमाने सर्च न विहन्यते तन्निन्यम् । उभयस्य च तवानभिघाता- मित्यत्वम् । तर गुणधर्मेपु पुख्यादिपु परिणामापरान्दनि- पः क्रमो लम्धपर्यवसानो नित्येषु धर्मिपु गुणेप्पलम्पपर- वसानः । इटस्थनित्येषु स्वरूपमात्रप्रतिष्ठेष पुगपुरुष स्वरू- ॥ अहम् ॥ श्रीमद्-हरिमद्रयरिसंदर्भिता श्रीमद्यशोविजयोपाध्यायविरचिउव्याख्यासंबलिता योगविशिका। - ॥ ऐ नमः ॥ अथ योगविंशिका व्याख्यायवे- मुस्खेण जोयणाओ, जोगो सो विधम्मवावारो। परिसुद्धो विन्नेओ, ठाणागओ विसेसेगं ॥१॥ मुरुमग ' नि । मोदेग' महानन्देन योजना 'सोऽपि धर्मव्यापार: ' मायांगनयरिहारमारिनयमिपा. रनादिक्रियामा योगो नि, योजनायोग इस प्यु. मारपर्यानुगृहीतमाम कारणीभूनागव्यापाग्यासयोगनवपम्प पर पटमानन्यात । कोदशा धमच्या योगः इत्यार 'परिशुद्धः ' गिधानाद्यागयांगुद्धिमान, मनीग्रस्य इप्पकियास्पदंन तुच्छवान, उनय-" मागपमेदा एते, पनि दिनमताजगन्नय्याः । माध्यमनन पिना, परा इम्पक्रिया तुप्या ।।" पोहगा -१२) ''परिपा. मादयः कियविटियामेऽपिकातल्या भागर - 4 [५७ } मेदा, अयं च पञ्चप्रकारोऽप्याशयो भावः, अनेन विना 'पेटा' कायवानोव्यापारस्पा द्रव्यक्रिया ' घसारा अमिलपितफलासाधकवादित्येतदर्थः ॥ अथ के से प्रणिधानापाशयाः ' उच्यते-प्रणिधाने प्रवृत्तिर्विमजयः सिद्धिर्विनियोगति पश, माह च-" प्रणिपि प्रवृत्ति-विम- जय-मिद्धि-विनियोगभेदतः प्रायः । धर्मज्ञराख्याता, शुमा- शयः पञ्चधाय विघा ॥"(पो०३-६) इति । तत्र हीन- गुणदेपाभावपरोपकारपासनाविशिष्टोऽधिकृतधर्मस्थानस्य क- संव्यतोपयोगः प्ररियानम् , उक्तं च-"प्रणिधानं तत्समये, स्थितिमादयः कृपानुग चैप । निरपयरन्तुषिपर्य, परार्थनि- प्पचिसारं घ" (पो. ३-७) 'तसमये' प्रतिपक्षधर्म स्थानमर्यादायो स्थितिमत' अविचलितम्रभावम् , 'तदधः' स्वप्रतिस्वधर्मस्थानादधस्तनगुणम्यानरनिपु जीपु 'कपा- नुग' फरणापरम न तु गुरुहीनन्दाचेषु देपान्वितम् , शेष गुगमम् । यधिकृतधम्मानि तदुपातिपय इति- कर्तव्पनाशुद्धः शीप्रक्रियाममाप्तीन्दादिलदान्मुक्यविर- हित. प्रपन्नानिशरः प्रवृत्तिः, माह च-नत्रय तु प्रवृत्तिः, शुभमागेपायमलनात्यन्तम् । यथितयनानिशयादीगुस्य- विव बताय । पी० ३-- } — नव' भधिनधर्म- स्थान एव गुमः प्रकृयः मारी नैपुण्यान्विता य उपाय- स्तन मंगवा . विसजयो नाम सिम्य जयोऽस्मादिति म्यु- " [५] त्पत्या धर्मान्तरायनिवर्तकः परिणामः । स च जेवन्यविनत्रै विध्यात्रिविधः, तथाहि-यथा कस्यचित्कएटकाकीर्णमार्गावती- संस्य कण्टकविनो विशिष्टगमनविघातहेतुर्भवति, तदपनयनं तु पथि प्रस्थितस्य निराकुलगमनसंपादक, तथा मोक्षमार्गप्र- वृत्तस्य कएटकस्थानीयशीतोष्णादिपरीपदरुपद्रुतस्य न निरा- कुलप्रवृत्तिः, तचितिक्षाभावनया तदपाकरणे त्वनाकुलप्रवृत्ति- सिद्धिरिति कण्टकविधजयममः प्रथमो हीनो विमजयः । तथा तस्यैव ज्वरेण भृशमभिभूतस्य निगकुत्लगमनेच्छोरपि तत्कर्तुः मशक्नुवतः कण्टकवितादधिको यथा ज्वरविघ्नम्तजयश्च विशिष्ट गमनप्रवृचिहेतुस्तहापि ज्वरकल्पाः शारीग एव रोगा विशि- एधर्मस्थानाराधनप्रतिवन्धकत्वाद्विनाम्तदपाकरणं च "हिया- हारा मियाहारा" (पिंडनियुक्ति गा०६४८ ) इत्यादिसूत्रो- क्तरीत्या तत्कारणानावनेन, 'न मत्म्यरूपम्यैते परीपहा लेशतोऽपि वाधकाः किन्तु देहमात्रम्यव'इति भावनाविशेष वा सम्यग्धाराधनाय समर्थमिति ज्वरविजयसमो मध्यमो द्वितीयो विप्नजयः । यथा च तस्यैवाध्यनि जिगमिपोर्दिग्मोह- विमोपस्थिती भूयो भूयः प्रेयमाणस्याप्यध्वनीनैर्न गमनो- त्साहः स्याचद्विजये तु स्वयमेव सम्यगन्नानात्परैश्वाभिधीयमा- नमार्गश्रद्धानान्मन्दोत्साहतात्यागेन विशिष्टगमनसंभवस्तथे- हापि मोक्षमार्गे दिग्मोहकल्पो मिथ्यात्वादिजनितो मनोविनमो विस्तअयस्तु गुरुपारतन्येण मिथ्यात्वादिप्रतिपदमावनपा [५९] मनोविममापनपनापनरिमापापसंपादक इल्पपं मोहरि- मजयराम उसमस्तीपो विश्वयः। एते प प्रयोऽपि विश- धपा मारापरुपाः समुदिताः प्रवृधिववोऽपतरकन्येऽपि तामिरित्यपधेयम् उक्तं प-"गिजपसिविषः राज, शिलो हनिमप्यमारकः । मार्ग फष्टकमरमोहजयसमः प्रतिफलः !" (पी० ३-६) इति। मविचाररहिवापिसगुणे गुपदाग्निपरयायपमानापन्निसा हीनगुणे निर्गुणे वा यादानप्यमनपतितःगपहारादिगुणप्रपाना मध्यमगुणे पोपकारपालपत्यधिरतधर्मस्थानस्याहिंसादेः प्राप्तिः सिदिः, उन प-" मिनिम्नतद्धर्मपानावाहिरिह वाचिकी झया। अधिक विनयादिपता होने न दयादिगुरासारा ॥" (पो० ३-१०) इति ।। स्वप्राप्तधर्मस्थानस्य यथोपायं परस्मियापि गंपादक विनियोगः अयं पानकजन्मान्तररान्तानप्रमेय प्रएधर्मन्धानावाग्वन्ध्या हेतु • उत्तं च-" सिद्धयोपर- कार्य विनियोगांमध्यमेतदेतस्मिन् सन्यन्वपसंपत्या, मुन्दरमिति तत्पर पारत । " . पी. ३-१) 'भान्थ्य न कदाचिनिप्पलं 'एतत् ' धर्मस्थानमहिसादि, 'एतस्मिन् ' विनियोगे सति 'मन्वपसंपत्या' अपिच्छदमान ' विनियोगमाध्यं धर्मस्थानं मुन्दरम् । इतिः' भिप्रक्रमा ममाप्त्यर्षय, यावत्परमित्येवं योगः, यावत् 'परं' प्रकृष्ट धर्मस्थानं समाप्यत इत्यर्थः । इदमत्र हृदयम्-धर्मस्वावद्रागा- तत् [२०] दिमलविगमेन पुष्टिगृद्धिमगिरमेव । पुष्टिम पुण्योपचयः, शुद्धिश पातिकर्मणा पापानां चयग या काचिनिर्मलता, तदुमयं च प्रणिधानादिलघणेन मायेनानुपन्धपद्रवति, तदनु बन्याय शुद्धिप्राः ममवति, निग्नुपन्धं च नदशुद्धिफलमे- वेति न तद्धर्मलदगम् , ततो युक्तमुक्त "प्रणिधानादिमावेन परिशुद्धः सर्वोऽपि धर्मव्यापारः मानुबन्धत्वाद् योगः " इति । यद्यप्येवं निधयतः परिशुद्धः मर्वोऽपि धर्मव्यापारो योगस्तथापि 'विशेपेण ' नान्त्रिकमकेतन्यवहारकवेनामा- धारण्येन स्थानादिगत एव धर्मव्यापारो योगः, स्थानाधन्यतम एव योगपदप्रवृत्तः मम्मतत्वादिति माव: स्थानादिगतो धर्मव्यापारो विशेपेण योग इत्युक्तम्, तत्र के ते स्थानादयः ? कतिभेदं च तत्र योगत्वम् । इन्याह- ठाणुन्नत्थालंबण-रहिओ ननम्मि पंचहा एमो। दुगभिस्थ कम्मोगो, नहा तियं नाणंजोगो उ ॥२॥ 'ठाणुनत्थेत्यादि । स्थीयतेऽनेनेति स्थान-पासनवि- शेषरूपं कायोत्मर्गपर्यक्यन्धपमासनादि सकलशास्त्रप्रसिद्धम् , ऊर्ण:-शब्दः स च क्रियादावुच्चार्यमाणमत्रवर्णलवणः, अर्थः-शब्दाभिधेयव्यवसायः, आलम्बनं-वासप्रतिमादिविष- १ "नाणजोगा उ" इत्यपि ।
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[२] देसे सव्वे य तहा, नियमेणेसो चरित्तिणो होइ । इयरस्स वीयमित्तं, इत्तु च्चिय केइ इच्छंति ॥३॥ 'देसे सव्ये य'ति । मप्तम्याः पञ्चम्यर्थत्वादेशतस्तथा सर्व- तश्व चारित्रिण एव 'एपः प्रागुतः स्यानादिरूपो योगः 'निय- मेन' इतरव्यवच्छेदलनगेन निश्चयेन भवति, क्रियारूपस्य शानरूपस्य वाऽस्य चारित्रमोहनीयक्षयोपशमनान्तरीयकत्वात्, अत एवाध्यात्मादियोगप्रवृत्तिरपि चारित्रमानिमारभ्यैव अन्य- कृता योगविन्दा प्ररूपिता, तथाहि-"देशादिमेदतश्चित्र- मिदं चोक्तं महात्मभिः । अत्र पूदिता योगोऽध्यात्मादिः संप्रवर्तते ।। १ ॥" ( ३५६ श्लोक ) इति, देशादिभेदनः' देशमविशेपा 'इदं' चारित्रं 'अध्यात्मादिः' अध्यात्म ? भावना २ आध्यानं ३ समता ४ पृत्तिसंवयच ५, नयाध्यात्म उचितप्रवृत्तवतो मंत्र्यादिमागगर्भ शासासीवादिनचचि- न्तनम् १, मावना अध्यात्मस्यैव प्रतिदिनं प्रार्धमानचिनानि. निरोधयुक्तोऽभ्यामः २, प्राध्याने प्रशनकारिप स्थिरम. दीपमहशमुत्पातादिविषयगन्मोपयोमपुतं नितम् ३, ममता अविद्याकल्पिोष्टानिष्टन्यमंतापरिहारेण शुभाशुभानां पिपणा तुन्यतामारना ४, पृतिगंस्यय मनोहारा विकल्परूपाणां शरीरद्वारा परिस्पन्दरूपाणामन्यायोगात्मवृत्तीनामपुनर्मा पेन निराध: ५। अनेसामयारमादीनां स्थानादि कर {।} बमामा पनि पेन, उपप्रध्यात्मस्प रिभेदस्य ঘোলা যযাম খান ১ ঘ। মানা গুৰি মানমানববধবাথর। আশা- মন । মণিময় নমো নি মানায়। বয়ায়ে নথ বালি ঘানাননি। খান হিমু। নন্তু যাৰ বহঃ বার বাশি মে যাননি বা বিবিযুশ্যনালৰ ম- ঘাল খায়েমা নান রুবানাঙ্কাঃ যশ এল যাবিলাখা-- যাহা fল { }শানাফে ন তু ' মােৰ নিৰা যাশৰামাৰাথ ত্রিমাস ' যা ' ষ্টাব’ মহাব্যথানাল। “যাকার্যালয়- নালন শনা নাভিশ্য গ যায়, অন- স্যাসাল সামৰ্থ সম 'ৰ নিৰনামৰ সন্মাঘনঘন যামথ্য যাচাই- সানি এনথনাসঙ্গ: খালাঘিমন, নিয়নৰ ন র গান fা নাম্ব~~ “ প্রভৃনয়ায় ঃ নাৰি: অযাশায়- সাবে, নিখনৰ ৰ' * }} | যা ঠি• 3g * {ন। নগণ বলরামযায়েখ শব- . " [६४] हारेण ' कारणे कार्यत्योपचारेण नाचिकः, कारणस्यानि कथमित्कार्यवान् । ' निश्चयेन ' उपचारपरिहारेण · उत्तर तु' चारित्रिण एव । मद्धन्धकादीनां तु म्यानादिकमद्ध- परिणामत्वानिश्वयतो व्यवहारतश्च न योगः किन्तु योगाभ्यास इत्यवधेयम् , उक्त च-" मकृदावर्तनादीनामताचिक उदा. हतः। प्रत्यपायफलप्रायस्तथा चपादिमावतः ॥३॥ (यो० वि० ३६६ श्लोक.) मकद्-एकबारमावर्तन्ते-उत्कृष्ट स्थिति बनन्ति ये ते मकदावर्तनाः, श्रादिशब्दाद्विगवर्तना- दिग्रहः, 'प्रताचिकः' व्यवहारतो निश्चयतश्चातवरूपः।।३।। वदेवं स्थानादियोगस्वामित्वं विवेचितम्, अर्थतेष्वेव प्रतिभेदानाह- इकिको य चउद्धा, इत्थं पुण तत्तओ मुणेयव्यो । इच्छापवित्तिथिरसिद्धिभेयओ समयनाए ॥ ४ ॥ 'इक्किको यत्ति । 'अन' स्थानादी 'पुनः' कर्मज्ञानवि- भेदाभिधानापेक्षया भूयः एकैकश्चतुर्दा 'तत्त्वतः' सामान्येन दृष्टावपि परमार्थतः 'समयनीत्या' योगशाखप्रतिपादितपरि- पाव्या 'इच्छाप्रधृत्तिस्थिरसिद्धिभेदतः' इच्छाप्रवृत्तिस्थिर सिद्धिभेदानाश्रित्य 'मुणेयव्यो' ति ज्ञातव्यः ॥ ४ ॥ वानेव भेदान् विवरीपुराह- - . [३५] तज्जुचकहापीईइ संगया विपरिणामिणी इच्छा। सध्यत्युवसमसार, तप्पालणमो पवत्ती उ॥ ५ ॥ तह चेव एयवाहग--चिंतारहिये यिरत्त ने सव्वं परत्थसाहग-वं पुण होइ सिद्धि ति ॥६॥ तजुत्तकहा ' इत्यादि । तद्युक्ताना-स्थानादियोगपु- कानां कयायां प्रीत्या-अर्थयुभुत्सयार्थवोपेन वा जनितो यो हर्पस्तलक्षणया मंगता-महिता विपरिणामिनी' दि. विकपमानादिगर्भ स्वोनाममायापन्किश्चिदभ्यासादिरूपं विचित्रं परिणाममादधाना इच्छा मयति, द्रव्यक्षेत्रायमरामध्ये पाङ्गमाकन्याभावेऽपि यथाविहिनम्थानादियोगेच्छया यथा- शक्ति क्रियमाणं म्यानादि इच्छाम्पमित्यर्थः । प्रतिस्तु 'सर्वत्र' मावस्थायां ' उपशममारं ' उपरामप्रधानं यथा स्थानथा • नपालनं यथाविहिनम्यानादियोगपालनम् , 'यो' नि प्राकृतवान् । चीयानिशया यथाशाख- मङ्गमाकन्यन विधीयमान म्यानादि प्रतिरूपमित्यर्थ तह नव' ति। नयर' प्रवृनियर गोपशममारे स्थानादिपालनमेनम्य-पान्यमानाय भानादेगांधचिन्नार. हिनं स्थिय यम । प्रनिविग्यांगोनावान विशेष:-- यदुन प्रनिम्पाधानादियोगविधान मानिचारवाहापापि- ran- न्वासहिनं मानि । णिमा नमागणीgोन निराधार पापमान तमानीपणेन पापानिन्नापनिपातामुदिमिरोग बदनुत्थानाग नाहिलमेर मातीनि । 'मां' म्यानादि स. मिन्नुपरामविरोगादिफन जनमदा पगमाय-मममिहि- वाना म्यानादियोगशुद्धधमागतामपि नन्मिद्धिविधानद्वारा परगतस्वमशफलमंपादक पुनः गिदिभवति । अनएर मि. दाहिमानो ममीपे दिमागीना अपि हिमां कतुं नालम् मिद्ध- सत्यानां च ममीपेऽमन्यप्रिया अप्यमन्यमभिधातुं नालम् । एवं सर्वत्रापि नेयम् । इतिः' इन्छादिभेटपग्मिमातिसूचकः । मनायं मलतः मंग्रह लोकः-" इन्छा नद्वन्कयाप्रीतिः, पालनं शमसंयुतम् । पालन (प्रनिः दोषमीहानिः स्थैर्य सिद्धिः परार्थता ॥१॥ " इति ॥६।। उन्ना इच्छादयो भेदार, अर्यवेपा हेतूनाह- एए य चित्तरूवा, नहाग्वओवसमजोगओ टुति। तस्स उ मद्धापीयाइजोगो भवमत्ताणं ।। ७ । एए य ' नि । 'एते च ' इच्छादयः 'चित्ररूपाः' परस्परं विजातीयाः स्वस्थाने चासङ्ख्यभेदभाजः, 'तस तु अधिकृतस्य स्थानादियोगस्यैव श्रद्धा-इदमित्यमेवेति प्रति- पतिः, प्रीतिः-तत्करणादौ हर्षः, आदिना धृतिधारणादिपरि- प्रहस्तयोगतः ' भन्यसत्त्वानां' मोक्षगमनयोग्यानामपुनर्वन्ध- - [६७] कादिजन्ना उपाधयोपरामयोगतः' तत्तकार्यजननाल- विचित्रषयोपशमनंपन्या भवन्ति, खायोगादिविशेष मार- यभेदाभिव्यङ्गवः पयोपशमभेदो तरिति परमार्थः । अव एव यस्प पापन्मायः पपोपशमस्तम्प वापन्मान्छादिसंपल्या मार्ग प्रवर्गमानस्य सूमोधाभावेऽपि मार्गानुमारिता न प्या- इन्यत इति संप्रदायः ॥७॥ इन्द्रादीनामेय हेतभेदमभिधाप कार्यभेदमभिधर- अणुकंपा निव्वेओ, मंगो होइ तह य पसमु ति। एपर्सि अणुभाश, इच्छाईणं जहासंखं ॥८॥ 'भणुकंप' कि । 'मनुकम्पा 'द्रव्यता भारतक्ष या. शक्ति दुःगितापरिहारेरक्षा, निवेदः - नेगुएपपरिक्षा. नेन भवनारकाहिरनाना. ' गंवेग, ' मोवाभिलापः, नया प्रराम मोधकापियन पशम:. 'ए' इन्छादना यामाना यथामा भनु पथाद् भावाः 'मनु मागः ' का भवन्ति । यशाप मम्यताम्वते कार्य- বানি লিয়ন ময়ঘন মামনি থাহি যানকামরান। বিবিয়ানামাথামিয়ে কার্যমযাযান নবি पव इनि दृष्टप्पम् । यस्तुन, कंपलसम्पपलापि मो. ऐपदादियोगपवृषरेदानुसम्पादिमावमिः । अनुकमादि- सामान्मायांगादिमामान्यम्य हिरा र सिप [७०J अर्थालम्बनयोगाभावयवामेतचैत्यवन्दनसूत्रपदपरिज्ञानं 'स्था- नादिषु यत्नवता ' गुरूपदेशानुसारेण विशुद्धस्थानवर्णोध- मपरायणानामलम्बनयोगयोश्च तीवस्पृहायतां 'परं' केवलं श्रेयः, अर्थालम्बनयोगाभावे वाचनायां प्रच्छनायां परावर्त- नायां वा तत्पदपरिज्ञानस्यानुप्रेक्षाध्वलितत्वेन "अनुपयोगो द्रव्यम्" इतिकृत्वा द्रव्यचत्यवन्दनरूपत्वेऽपि स्थानोर्णयोग- यत्लातिशयादालम्बनस्पृहयालुतया च तद्धत्वनुष्ठानरूप- तया भावचैत्यवन्दनद्वारा परम्परया स्वफलसाधकत्यादिति भावः ॥ ११ ॥ स्थानादियत्नाभावे च तचैत्यवन्दनानुष्ठान- मप्राधान्यरूपद्व्यतामास्कन्दनिष्फलं विपरीतफलं या स्या- दिवि लेशतोऽपि स्थानादियोगाभावयन्तो नैतत्प्रदानयोग्या इत्युपदिशभाह- इहरा उकायवामियपाय अहवा महामुसाबाओ। ता अणुरूवाणं चिय, कायन्यो एयविन्नासो॥१२॥ इहरा उत्ति । ' इतरथा तु ' अधीलम्बनयोगाभाव. वां स्थानादियत्नाभाये तु तत् चैत्यवन्दनानुष्ठानं 'कायवा- सितप्रायं ' सम्मूर्छनजप्रवृत्तितुल्यकायचेष्टितप्राय मानसो. पयोगशून्यत्वाद, उपलक्षणाद्वाग्यामितप्रायमपि द्रष्टव्यं, तथा चाननुष्ठानरूपत्यानिष्फलमेतदिति भावः। 'प्रथया' इति दोपान्तरे, तचैत्यपन्दनानुष्ठान महामृपावादा, "स्थानमौन• Tre rrent" या मागन मापदपाय Meniere irrenefereपयन्दनकायोगदि। भलादिम INTERE TEST, पिपि. ri inागद मारिनन र माकि- ARTATIAnsferrar पाने rছল। ও থানায়েমকােষাধ্যক্ষ বিধবা সন্তান বলে ধামকি গিয়ে বসলাখ বিষ বিধ মন খারাপোল- पनि विपापमपा पदापनि पान्यासामे- दान. या प्रकृय पांगापिन्दी-"शिप गाना- ram rम गुपादिपजानुधानमपंपादि- विधायग्जदम- भरभर मत पाम विषम, गर .पांगर ११ वापर मननशान मनुष्टानामार्ग, गाना भन्नामदामन प्रमाण नुवाद, भ. एसपना भाशयानामामादक पद वि. भान सिमाद 1३५ यापमान: मधि समागरमानापाथना ५ लावापादनानाश मलयार लाधिका-या. अपघाम. पदा र मनुहान वि५ 'मपिनमारणान परिशुदान्तःकर [२] परिणामविनाशनान् , तया मदतोऽनुष्ठानम्य 'अन्चार्थना' तुच्छलम्यादिप्रार्थनेन लगुत्वम्पापादनादिदं विर्ष अयम् ॥ दिल्यभोगामिलापेग, गरमाहुर्मनीषिणः । एतद्विदिननी. स्पेय, कालान्नरनिषाननात् ॥३॥” (१५७ सो.) एनद्' प्र. नुष्ठानं ऐहिकमोगनिम्पृहस्य वर्गमीगम्पृहया गरमाहुः 'विहि- वनीत्येव' विषोक्तनीत्यैव, केवलं कालान्तरे-भवान्तररूपे निपातनाद-अनर्थमम्पादनान् । विपं मद्य एव विनाशहेतु, गरथ कालान्तरेणेन्येवमुपन्यासः ॥ अनाभागवतशतदननु छानमुच्यते।सम्प्रमुग्धं मनोऽस्येनि, नतश्चतद्यादितम् ॥४॥" (१५८ श्लो) 'अनाभोगवतः' कुयापि फलादारप्रणिहित- मनसः 'एतद् ' अनुष्टानं 'अननुष्ठानं' अनुष्ठानमेव न भवतीत्यर्थः। सम् इति ममन्ततः प्रकर्पण मुग्धं सन्निातोप- हतस्येवानध्यवमायापनं मनो म्य, · इतिः ' पादममाप्तौ । यत एवं ततो यथोदितं नथैव ।। " एनद्रागादिदं हेतुः, श्रेष्ठो योगविदो विदुः । मदनुष्ठानमावस्य, शुभभावांशयोगतः ॥४॥" (१५६ श्लो ) · एनद्रागान् ' मदनुष्ठानबहुमानाव इदं' आदिधार्मिककालभावि देवपूजाद्यनुष्ठानं ' सदनु ष्ठानभावस्य ' तात्त्विकदेवपूजाद्याचारपरिणामम्य मुक्यद्वेपेण मनार मुक्त्यनुसारेण वा शुभभावलेशयोगात् ' श्रेष्ठः' अव. ध्यो हेतुरिति योगविदो विदुः' जानते ।। जिनोदित मिति वाहुर्भावसारमदः पुनः । संवेगगर्भमत्यन्तममृतं [७३] मुनिपुरयाः ॥६॥" ( १६० सो) जिनोदितमिन्येव 'भावमारं' श्रद्धाप्रधान 'मदः' यनुष्ठान ' गंगगर्म ' मोशामिलापसहित 'भत्यन्तं ' यतीच प्रमायहेतुन्वादन- संज्ञमा 'मुनिपुङ्गवाः गीतमादिमहामुनयः । एनं प्रय योगामासत्पादहितम्, श्यं तु मोगवादिवमिति गम्यम् । यत एवं स्थानादियानाभावयतोऽनुष्ठाने महादोषः 'सत्' सम्मान 'अनुरूपाणामेव ' योग्यानामेच एतद्विन्यामः' पत्यपन्दन- पत्रप्रदानरूपः कर्तव्यः । १२। क पतहिन्यागानुरूपा इत्याकालायामाह- जे देगविग्ह जुत्ता, जम्हा इह बोसिरामि फापं ति। सुबह विगई। इमं. तासम्म चिनियर मि॥१३॥ जे 'त्यादि। ये देशातिएका पगुग म्यानपरिणनिमन्तः ने हर भनुम पा इति शंप । नमः । इत्याद परमात 'नयमन - मजाभि काम" पनि थरनं. ६ व पिता म.पा मलि भार कार- म्युन्मगागम्भात . तम्य गाRA पास भेट र मन. मर. निन्तिनप्यमनन् गात ' काय पानि पति- খানখানুষ মোবৎ'। গে বলো তানৰিাrি. ঘামাগম বা ধনেময় নামান্তানাস। সে মাখা মূল [७४] दपदन्योपनापनप्रदमार्यम्, तेन पग्मामृतानुष्ठानपराः म पिरतालापन पर देलनुष्ठानपगः । मानन्धका प्रति महारादिदाधिकारिणी गृपन्ने, मशीदमम्पादनेनाधुन पकानामपि मैन्पयन्दनानुष्ठानम्य कलगम्पादालायाः पत्र शकादिममिदत्यादिन्यवधेयम् । ये लपूनरन्धकादिमारमा परन्तो विधिरहमानादिहिता गतानुगतिकतपत्र न्याय नायनुष्ठानं कुर्वन्ति ने मचायोग्या ति व्यवस्थिन- ॥ १३ ।। नन्यविधिनाऽपि गन्यवन्दनाधनुष्टाने नीर्थप्रवृत्तिर म्पयरिदमा स्यात्, विधरेवान्वेपणे तु द्विवागामेव विधिपराग सामात् क्रमेण तीयोंच्छेदः स्यादिति नबनुन्ददायाविध्यन ठानमप्यादरणीयमित्याशङ्कायामाह- तित्थस्सुच्छेयाइ वि, नालंवण जे मसमएमेव। सुत्तकिरियाइ नासो, एमो असमंजसविहाणा॥१४ तित्यस्म ' इत्यादि । अत्र' अविध्यनुष्ठाने तीर्थो- च्छेदापि नालम्पनी (नम् ), नीर्थानुच्छेदायाविध्यनुष्ठानमपि कर्तव्यमिति नालम्पनीयम् । यद् ' यम्मात् 'एवमेव ' अविध्यनुष्ठाने क्रियमाण एव 'अममञ्जसविधानात् ' विहि- तान्यथाकरणादशुद्धपारम्पर्यप्रवृत्या सूत्रक्रियाया विनाशः, स १ श्रीहरिभद्रसूरिकृतः। २“ तित्थस्सुच्छयाइ वि, एत्यं नालंबणं जमेमेव " इति भवेन् ।
[४] स तीर्घोच्छेदः । नहि तीर्थनामा जनसमुदाय एव तीर्थम्, माज्ञारहितस्य तस्यास्थिसद्धातरूपत्वप्रतिपादनान् , किन्तु य- प्रविहितयथोचितक्रियाविशिष्टसाधुसाध्वीयावकारिकाममु. दायः, तथा चाविधिकरणे प्रक्रियाविनाशात्परमार्थतस्तीर्थ- विनाश एवेति तीर्थोच्छेदालम्पनेनाविधिस्थापने लाममि- छतो मूलपतिरायातेत्यर्थः ॥ १४ ॥ स्यक्रियाविनाशस्य. वाहितावहता स्पष्टयमाह- सो एस वंकओचिय,नय सयमयमारियाणमविसेसो एवं पि भावियव्यं, इह तिस्थुच्छेयभीरूहि ॥ १५ ॥ मो एम "नि । • म एपः ' स्त्रक्रियाविनाशः · पक्र एव ' नीर्थीन्छेदपर्यवमायिनया दग्न्नदुःसफल एव । ननु शुद्धक्रियाया एव पदपाने क्रियमाणं शुद्धायाम्नम्या भलामा. दशुदायाथानङ्गीकागदानुश्रीनमिश्या पृच्या क्रियापरिणाम- स्य स्वन उपनिपानाधिोन्लंद म्यादय. यथाकथभिनुष्ठा- नावलम्बने च जनक्रियाविशिष्ट जनसमुदायाप नी, न प्य- पच्छिते. न न कतर यधिक्रियया गुगरपदंशकम्य कधि- दोषः, प्रक्रियाकतग्विाविधिधि रातुम्नम्य परियामाधी नप्रवृत्तिकन्यात, करल नियामवतन गृगम्नीधव्यवहाराच खाद्गुरा एवंन्याशायामा-न च मयमतमाग्निमांगरि शेपः, किन्तु विशेष एव. म्पपमने बदष्टाशयम्पानिमितवा [७६] मारिते च मार्यमाणकर्मविपाकसमुपनिपावेऽपि स्वदुष्टाशयस्त निमित्तत्वाव, तदिह स्वयमक्रियाप्रवृत्तं जीयमपेक्ष्य गुरो तदीयाविधिप्ररूपणमवलम्न्य श्रोतुरविधिप्र वृत्ती च तस्योन्मार्गप्रवर्तनपरिणामादवश्यं महादूपणमेव, तथ च श्रुतकेवलिनो वचनम्-"जहं सरणमुवगयाणं, जीवाण सिरो निम्तिए जो उ। एवं आयरियो वि हु, उस्मुत्तं पएण- तो य ॥१॥" न केवलमविधिप्ररूपणे दोपः, किन्तु विधि- प्ररूपणाभोगेऽविधिनिषेधासम्भवात् तदाशंसनानुमोदनापनेः फलतस्तत्प्रवर्तकत्वादोष एव, तस्माद ॥ स्वयमेतेऽवि- धिप्रवृत्ता नात्रास्माकं दोपो वयं हि क्रियामेवोपदिशामो न त्वविधिम् " एतावन्मात्रमपुष्टालम्बनमवलम्ब्य नोदासितव्यं परहितनिरतेन धर्माचार्येण, किन्तु सर्वोद्यमेनाविधिनिषेधेन विधावेव श्रोतारः प्रवर्तनीयाः, एवं हि ते मार्गे प्रवेशिताः, अन्यथा तन्मार्गप्रवेशनेन नाशिताः । एतदपि भावितव्यमिह तीर्थोच्छेदभीरूभिः-विधिव्यवस्थापनेनैव खेकस्यापि जीवस्य सम्यग् योधिलाभे चतुर्दशरज्ज्वात्मकलोकेऽमारिपटहवादना- तीर्थोन्नतिः, अविधिस्थापने च विपर्ययातीर्थोच्छेद एवेति । यस्तु श्रोता विधिशास्त्रश्रयणकालेऽपि न संवेगभागी तस धर्मश्रावणेऽपि महादोष एव, तथा चोक्तं ग्रन्थकृतैव पोड- १ "यथा शरणमुपगवानां जीवानां शिरो निकृन्तति यस्तु। एवमाचार्योऽपि सलूत्सूत्र प्रज्ञापयंश्च ।।" २ प्रविधि'-दवि स्यात् । , । [0] रा--"प गएपन सिद्धान्त, चिपपपिपामानिरकनः पाप प्रामोति न गंवेग, तदापि यः मोऽचिकिम्प इति ॥ १॥ विषस्य राम, मएरन्यपदेशनप्रदानमपि । कुर्वननगुरुगी, सदपिकदापोऽनगन्तव्यः ॥२॥" ( पो० १०-१४-५) मपरन्युपेशन-निदानदानेऽर्धमण्डन्युपरानम् । 'नदधिक दोषः' भयोग्यधातुरधिकदोप., पापकरपेच्या तत्कारयितु- मंदादोपल्यान । सम्मारिधिश्ररणरमिक श्रोतारमुदिरय विधि- अस्पगेनय गुरुस्तीर्थव्यवम्यापको भवति, विधिप्रयत्पर च साथमपन्धि भयनीति मिद्धम् ॥ १५॥ ननु किमताव- दार्थगयेपणया १. यहाभिजनः क्रियन नदेय कर्तव्यं "महा- बनी येन गनः पया:" नि बननान, जानव्यवहारस्ववे- दानी बाल्न प्रयनम्नम्यबाजीयकालमाधिवन तीध- যেখাবােগায়ামা-~- मुन्नण लोगमन्नं. उट्टण य नादमयसम्भावं। सम्म पट्टिय. चुणामनिउणधुद्धीए ॥१६॥ मुनगा ' नि । मनमा [ 'लोकमत'] • लोक एव प्रमाण" न्यबापा मानिरपचा मान उटगा य' नि वोडा च माधुममयमहार समाची नामदीन म्हस्य 'यम्यग' विधिनान्गा प्रनितम्य च या दमाटी ' युधेन ' पण्डितन याना नपुग युद्धा' यानावनाममा हनुधाविन्या मन्या { १ . शर१५ मान इत्या ।
[७८] साधुसमयसद्भाववायम्-" लोकमालम्ब्य कर्तव्यं, कृतं बहु- भिरेव चेदातदा मिथ्यादृशां धर्मो, न त्याज्यः स्यात्कदाचन ॥१॥ (ज्ञानसारे २३-४) स्तोका आर्या अनार्येभ्यः, स्तोका जैनाथ तेप्वपि । मुश्रद्धास्तष्वपि स्तोकाः, स्तोकास्ते- वपि सक्रियाः ॥ २ ॥ श्रेयोऽर्थिनो हि भूयांसो, लोके लोकोत्तरे च न । स्तोका हि रलवणिजः, स्तोकाय स्वा- त्मशोधकाः ॥ ३ ॥ (ज्ञानसारे २३-५ ) एकोऽपि शास्त्रनीत्या यो, वर्तते स महाजनः। किमज्ञसाथैः १ शतमप्य- न्धानां नैव पश्यति ॥ ४॥ यत्संपिग्नजनाचीर्ण, श्रुतवाक्थै- रखाधितम् । तजीतं व्यवहाराख्यं, पारम्पर्यविशुद्धिमत् ।।५।। यदाचीर्णमसंविग्नैः, श्रुतार्थानवलम्बिभिः । न जीतं व्यवहा रस्तदन्धसंततिसम्भवम् ॥ ६ ॥ आकल्पव्यवहारार्थ, श्रुतं न न्यवहारकम् । इतिवमहत्तन्त्रे, प्रायश्चित्तं प्रदर्शितम् ॥ ७ ॥ तसाच्छुतानुसारेण, विध्येकरसिकैनः । संविमजीतमालम्ब्य- मित्याज्ञा पारमेश्वरी ।। " ननु यद्येवं सर्वादरेण विधि- पक्षपातः क्रियते तदा "अविहिकया वरमकयं, अस्यवययं मणंति सव्वन्नू । पायच्छिचं जम्हा, अकए गुरुयं कए लदुभं ॥१॥” इत्यादि वचनानां का गतिः । इति चेत् , नैतानि वचनानि मूलत एवाविधिप्रकृचिविघायकानि, किन्तु विधिप्र- अविधिकृयादरमहवं असूवरपनं भवन्ति सर्वशाः | प्रायश्चित्तं यस्मादकते गुरु कृते लघुकम् ॥ १ " [७] पृषावप्पनाभोगादिनाऽविपिदोपरधनस्यस भवतीवि तद्रिया न नियात्यागो विधेयः। प्रथमाभ्यासे व्याविघशानामाराद- न्पदापि या प्रमापनीयस्याविधिदोपो निरनुबन्ध इति तस्य वाशानुष्ठानमपि न दोपाय, विधिवहुमानाद् गुर्याशायोगाच सस्य फलदो विधिरूपत्वादित्येतावन्मात्रप्रतिपादनपराणीति न कथिदोषः । भवोपाम पाध्यात्मसारप्रकरणे-"अशुद्धा. पि हि शुद्धायाः, क्रिया हेतुः सदाशपात् । तानं रसानुषेन, स्पर्पत्यमुपगच्छति ॥ १॥" (२-१६ सो.) यस्तु विध्य- पाहुमानादविधिक्रियामासक्त तत्कर्तुरपेदया विधिव्यवस्थाप- नरसिकस्तदकर्वाऽपि भव्य एव, तदुक्तं योगदृष्टिसमुराये ग्रन्थ- फुतर-"ताचिका पक्षपातम, भावशून्या च या क्रिया । भनयोरन्तरं यं, भानुराधोतयोरिव ॥१॥" (२२१ श्लो०) इत्यादि । न पैवं तादृशपष्टमप्तमगुणस्थानपरिणतिप्रयोग्य- विधिव्यवहाराभायादम्मदादीनामिदानीन्तनमावश्यकाघाचर- णमकर्तव्यमेर प्रमक्तमिति शनीयम् . विकलानुष्ठानानामपि "जा जा हविज जपणा, सा मा से पिजरा होइ । इत्यादिवचनप्रामाण्यात् यत्किमिद्विष्यनुष्ठानस्येच्छायोगसंपा- दकदितरस्यापि बालाघनुग्रहसम्पादकन्वेनाकर्तव्यत्वासिद्धः। " " मधिगच्छति ॥ इत्यपि । २ " या था मवेपतना पा सा सस्य निर्जरा भवति" ।
[८०] इच्छायोगवद्भिर्विकलानुष्ठायिभिगीताथैः सिद्धान्तविधिप्रह- पणे तु निर्भरो विधेयस्तस्यैव तेषां सकलकल्याणसम्पादक त्वात् , उक्तं च गच्छाचारप्रकीर्णके-"इ विप सब काउं, सम्मं जिणभासियं अणुट्ठाणं । तो सम्म मासिजा, जह भणियं खीणरागेहिं ॥ १ ॥ोसन्नो वि विहारे, कम्न सोहेई सुलभदोही यचरणकरणं विसुद्धं, उपवूहंतो पवितो ॥२॥"(गाथा ३२-३४) इति। ये तु गीतार्थाज्ञानिपता कि- ध्यभिमानिन इदानीन्तनव्यवहारमुन्मजन्ति अन्यं च विशुद्ध व्यवहारं संपादयितुं न शक्नुवन्ति ने बीजमात्रमप्युच्छिन्दन्तो महादोपभाजो भवन्ति । विधिमम्पादकानां विधिव्यवस्थाप- कानां च दर्शनमपि प्रत्गृहगृहविनाशनमिति वयं वदामः ।। १६ ।। अधमं प्रमकमर्थ मचिपन प्रकत निगमयमाद- कयमित्थ पसंगणं, ठाणाइमु जत्नसंगयाणं तु । हिपमेयं विनयं, मटणुहागनग्गेण नहा ॥१७॥ कमिन्य' नि। छन ' पयामं 'मा प्रगान' प्ररूपगीयमध्ये मनायपिम्नान - स्थानादिपु ' प्रदर्शित Antषतमानम् । सत्मामा म1,1.1 || Ashisit में साधयनि मुतमा | nirm fiyaगुपन प्रा. । - गन, ॥
[१] योगभेदेषु 'यत्नसंगतानां तु' प्रयत्नवतामेव 'एतद ' चत्सवन्दनाधनुष्टानं हितं ' मोक्षसाधकं विज्ञेयम्, चैत्यर- न्दनगोचरस्थानादियोगस्य मोरहेतुत्वे तस्यापि तत्प्रयोजक- स्वादिति भावः । वया' इति प्रकारान्तरसमुराये । सदनु- छानत्वेन,योगपरिणामकृतपुण्यानुवन्धिपुण्यनिदेपाद्विशुद्धचि- तसंस्काररूपया प्रशान्तवाहितया सहितस्य चैत्यपन्दनादेः स्वातन्त्र्येणच मोदहेतुन्वादिति भावः । प्रकारभेदोऽयं नय. दकृत इति न कमिदापः ॥ १७ ॥ सदगुष्ठानभेदानेव प्ररूप- यंबरमतवेदे चम्मयोगभेदमन्तर्भावय नाह- एयं च पीइभत्तागमाणुगं तह असंगयाजुत्तं । नेयं बडन्विहं ग्यलु, एसो चरमो हवड जोगो॥१८॥ एयं च नि | एतम 'मदनुष्ठानं प्रीतिभत्याग- माननुगन्धनि नन प्रीतिभक्त्यागमानुगं प्रीन्यनुष्ठानं भव्य- नुष्ठानं वचनानुपानं चेनि विभेदं नयाऽमंगनया युक्तं प्रम- गानुष्ठानमित्येव नाधि जयम नेपां भदानामिदं स्वरू- पम्---यत्रानुष्ठाने प्रयत्नातिशयोति परमा न प्रीतिरुपाने शंपन्यागन च यन्त्रियने नन्ग्रीन्यनुष्ठानम् , भाह - " यादगेऽम्ति परमः, प्रीनिश्च हिनादपा भवति कर्तुः । शंपन्यागेन कगनि पन त प्रीत्यनुष्ठानम् ॥ १॥" (पो० १०-३ ) एननुल्पमपालमनीयम्य पूज्यन्वपिशेएपक्षमा ६ [८०] इच्चायोगवद्भिर्विकलानुष्ठायिमिर्गीताथैः सिद्धान्तविधिप्रह- पणे तु निर्भरो विधयस्तस्यैव तेषां सकलकल्यायसम्पादक त्वात् , उक्तं च गच्छाचारप्रकीर्णके-"जंइ वि ण सई काउं, सम्मं जिणभासियं अणुट्ठाणं । तो सम्म मासिआ, जह भणियं सीणरागेहिं ॥ १ ॥ प्रोसनो वि विहारे, कम्म सोहेई सुलभवोही य। चरणकरणं विमुद्धं, उबबूहतो पवितो IRI"(गाथा ३२-३४) इति । ये तु गीतार्थाजानिरपेदा वि. ध्यभिमानिन इदानीन्तनव्यवहारमुन्मजन्ति अन्यं न विशुद्धं व्यवहार संपादयितुं न शक्नुवन्ति ने चीजमात्रमप्युच्छिन्दन्तो महादोपभाजो भवन्ति । विधिमम्पादकानां विधिव्यवस्थाप. कानां च दर्शनमपि प्रन्गृहगृहविनाशनमिनि वयं वदामः ॥ १६ ॥ अधेमं प्रमनमथ मक्षिपन् प्रकत निगमयमाह-- कयमित्थ पसंगणं, ठाणाइमु जत्नमंगयाणं तु । हियमेयं विनयं, मद शुद्रागनणेगण तहा ॥१७॥ कयमिन्ध ' नि। कृत ' पर्याप्त प्रा प्ररान' प्ररूपगीयगय माना जम्नारगोन । म्यानादिषु' प्रदर्शित भाषितमनुमानम् । ॥ गन्ना विक्षरे 44 गाव' + | 4tir] गुबगुपएम प्र. , तमामय 1 1 पयन ।
पांगभेद पनगंगनाना' पनपतामेप ' पलपन्दनापनशान हिलं मोपमा विशेषम् पर दिनापमानादिरोगार मोपशान्ये यस्यापि यत्प्रयोगा- मादिति भारः । तानि भारावामगुपये। सदनु- छानन.परिणामतपुरकानुन्धिपुष्पनियंपादिगुदधि- पापया प्रान्तानिया दिवस्य पन्यपन्दनादे मान्य मापनादिनि मायः । प्रकारभेदोऽयं नपर- पनि न फपि ॥ १७ ॥ मदगुशानभंदाने प्ररूप- संभरमतदै पामयोगभेदभन्नपियवाह--- एपंच पीइ मत गमाणु तह अमंगयाजुत्वं । नयंघउविर. एसी चम्म हवड जोगो॥१८॥ 'जय ! FAR नान प्रीतिभस्याग- मान नगर नवागम' युग प्रीत्यनुष्ठान भाप नुपान यमानुसार नि त्रिमद नया मगाया युनं भमं. गानुपानाम 3 मि पनपा मंदानामिदं परू- पमापन गय नानिमयो नि परमा न प्रीतिरुत्पद्यते मापन्यागन नया नयन न प्रायनुष्यानम् , भाहन- पवादगऽग्नि पाम, प्रीनिथ हिनादया भगति कर्तु।। शंपन्यागन कंगन यन नप्रीत्यनुष्ठानम् ॥ ५॥" (पो. परनुगम पालम्पनीपम्प पृम्पन्धविशंपपुजा [-] इच्छायोगपद्भिर्विकलानुष्ठायिमिगीतार्थः सिद्धान्तविधिनरू-- पणे तु निर्मरो विधयस्तस्यैव तेषां सकलकल्यायसम्पादक त्वाद, उक्तं च गच्छाचारप्रकीर्णके-"इ वि व सई काउं, सम्म जियभासियं अणुद्वाणं । तो सम्मं मासिजा, जह मणियं सीणरागेहिं ॥१॥श्रोसन्नो वि विहारे, कम्म सोहेई सुलभयोही य। चरणकरणं विसुद्धं, उपवूहतो पवितो IRI" (गाथा ३२-३४) इति । ये तु गीताज्ञानिरपेक्षा वि- ध्यमिमानिन इदानीन्तनव्यवहारमुत्सृजन्ति अन्यं च विशुद्ध व्यवहारं संपादयितुं न शक्नुवन्ति ते बीजमात्रमप्युच्छिन्दन्तो महादोपभाजो भवन्ति । विधिसम्पादकानां विधिव्यवस्थाप- कानां च दर्शनमपि प्रत्यूहव्युहविनाशनमिति वयं वदामः ॥ १६ ॥ अर्थमं प्रसक्तमथं संक्षिपन प्रकृत निगमयमाह- कयमित्थ पसंगणं, ठाणाइसु जत्तसंगयाणं तु। हियमेयं विनेयं, सदणुट्ठाणतणेण तहा ॥१७॥ 'यमित्य'ति । 'कृतं ' पर्याप्तं 'अत्र प्रसङ्गेन' प्ररूपणीयमध्ये स्मृतार्थविस्तारणेन ' स्थानादिपु' प्रदर्शित- १ ." यद्यपि न शक्यं कर्तु सम्यग्जिनभाषितमनुष्यानम् । सत्सम्यग्मापयेथा भणित तीणरागः ॥ अप्रसन्नोऽपि विहारे कर्म शोधयति सुलभोधिश्च । चरण करणं विशुद्धमुपहन प्रह- . " पयन् ॥
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[२] विशुद्धतरल्यापारं मन्यनुमानम्, पाइन-गौरतविरोपमो. गानुद्धिमतो यदिशुद्धतरयोगम् । क्रियपतरतुन्यमपि, शेयं तत्यनुष्ठानम् ।। २॥" (पो० १०-४) प्रीतित्वमानिये संतोष्यपूज्यत्या व्यनाानजनितहर्षगता जातिविशेषी, भादच-" भन्यन्नयनमा गनु पन्नी नदिना ग अन- नानि । तुभ्यमपि कृत्यमनयोतिं म्यान्मीनिमानिगलम् ॥३॥" (पो. १०-५ ) ' तुनगमपि कृत्यं ' मोनना. ग्धादनादि जान तान' उदाहरणम् । शाणार्थप्रनिर्मपानार्ग माघीः मांत्राचिनप्रनिर्वचनानुष्ठानम , बाहर--'' यग. नामिका प्रवृतिः. मांजानियांगतो या तु । पगमानुष्ठान मिद, चारित्ररतो नियमन ।.. { पो०१०-६) स्परहाकाले बनननिमधाननिदानागासागपन्दनः गन्धन्यापनात्मगाना तिनाहीन क्रियागानमगा. नुष्टानम् , बाः --" यच यामानिगपात, गामीभूनामित मलने गर । नरमदानान मार नगदाधान माधान' पिनर, पया न त निनाना मसागर 11 नवना पागदगदान। .. Amir, -- नारा वनमन! RAM ॥६॥" (. . " . १०-८) इति ।। 'पति नियरे एतेपनुमानमेदेषु 'एप' एवरः समीपतरारि (हर्षि)पापकरयासमीराभिदिवास- नामा परमो योगाऽनालम्मानयोगो भाति, महत्या. पापानानलपणवादिनि भारः ॥ १८॥ मालम्पन- पियानालम्रनम्यम्समुपदयमाह-- आलंधणंपि एयं. वमनी य इत्य परमुत्ति। तग्गुणपरिणइस्वो. सुटुंमोऽगालवणो नाम ॥१९॥ पालं पि'सि मालम्पनमपि 'एतत् ' प्राक- दिद्धिमनिहितं यत्र ' योगश्विारे सप' समयम- रस्पजिनस्पउन्मणिमादिलपम्, 'र' पुनः 'अरूपी परगः'मिमा विविधम् । ना बार-मरूपिपरमा- रमलाम्पालम्बनम्य दे गुगाः केवलज्ञानादयस्तेषां परि. যানিং-শমাথপিল না লেন বি নবি गुरुगोनान्द्रियविषयवादनालम्पनी नाम योगः, भरप्याल. বনধৰনৰন भलवता पवागः इत्ययात्र नामविसंधान । मुहमा भालंश्यो नाम " ति चित्पाटम्तत्रापि शुक्ष्मालम्बनो नामप पागस्ततामालम्बन एपनि भाव उमेयः, उन चात्राधिकारे चतुर्दशपोडशके ५ . सुटुम। मान... " इति पाठान्तरम् । . " ..
[४] अन्यतर-"सालम्पनो निरालबनय योगः परो द्विधा शेयः। जिनरूपध्यान सल्वायत्तत्तत्त्वगस्त्यपरः ॥१॥" (१४-१ ) सहालम्बनेन-गनुगदिवानविषयेग प्रतिमादिना पर्तत इति सालम्बनः । पालम्पना -विषयभापनिरूपा. निकान्तो निरालम्पनः, यो दि खमम्थेन पायने नग स्वरूपेण रयते तद्विपयो निरालम्पन इति यावत् । मिना- पस-समवमरणम्यम्य ध्यानं गलु আঃ মান্নানী योगः । तस्यैव-जिनस्य तत्व-कवलजीवप्रदेशमधातरूप के. पलतानादिम्बमावं तम्मिन गन्छनीति तयगः, 'त' एवार्थ, 'अपर:' अनालम्बनः. भवामपिताम्य पुटीप- पत्यामावादनालम्पनत्यमुनम । अधिकतन्यगाथाया ग पिपतामात्रेण नम्धालम्बनलमनवापि नविषयगोगा. सम्बनचादनालम्बनलमा प्रामाधान फलता न कमिदिरोष इति मनगम । अयं नानाम्यागः शामदर्शिनी पायम्नालिझान्नगानरः । गनपद कादिगण, गामन्यायो यमुनमः ॥१॥" ( यांग • गम भा) मो. कोनापारीद्वितीयामा गमिकथा. মাঘিম্যাদামাগণ নিদ্রানমালা पा पागंनन्दा नगी मन्नप्यः पादप-"माम ঘামী গ, ঙ্গ নিষার্য। নানা ..
[५] नयांगा, प्रीतम्तवदर्शनं पार ॥१॥" { पी० १५०) 'सर' परतचे हामिना दिया ' इति ' एवंस्वरूपा अमालया-निगमिष्ठापिन्छिमप्रवृपया पाया-पूर्णा 'सा' परमान्मदर्शनेन्या मनालम्पनयोगः, पानसम्पादनं-अनु- पलभ पापद , परमान्मम्परपदर्शने तु फेवलज्ञानेनानालम्ब नयोगो न भवति, तम्य नदालम्पनन्याय । शलब्धपरतत्य- स्तनाभाय पानपंग प्रानो एनालम्पनयोगः, सर पपग धनुर्धग एपकार्थण्यायधनुर्दण्डे लत्यपरतवाभि- मुरा संचाविमंवादिनया व्यापारिनो यी पाणजस्थानीय:, यावनस्य न मोचन नापदनालम्पनयोगल्यापारः, पदा तु শালাক্কা না লাগালাম্বাই लक्ष्यबंध नीपुपानकल्पः मालम्पनः केवलज्ञानप्रकारा एव भवति, न बनालम्बनयांगो ग) व्यापार:, फलम्य मिद्ध- स्वादिनि निगलिलार्थः । श्रार च --" तापनिनिोऽयं, पतः प्रश्नच नयनम्नय । गनिमान्नः गनु. नेनानाल- म्पनी गौर: ॥ दागम्मानःर्शनामिपानबानमात्रता संयम् । एना केवल ना मान मनापा ज्योतिः ॥ २॥ (पो. १५६, १.. भ' पान 'अनिष्ठितः ' पटानुमास समान सरिया यार याना , तथा प्रामस्नत्वादिभिः सम्ग- पानमयदरपलम्भावन नि। . ५" प्रागनशन पाने "
अलन्धप्रतिष्ठः सर्वोत्तमस योगस्य-मयोगास्यस्य अनुजः-
पृष्ठमावी ॥ तदर्शनं ' परतत्वदर्शनं 'एतग' परतत्तदर्शनं
'फेवलं ' सम्पूर्ण 'तत् ' प्रसिद्ध यत् तत् केवलशानं 'पर'
पाष्टं ज्योतिः स्यात् । अत्र कस्यनिदाशक्षा-पुपातशावाप.
रतपदर्शने सनि केरलतानोत्तरमनालम्बनयोगप्रतिर्मा भव,
सालम्बनयोगप्रतिमा विशिष्टतरा कारिम्पादय, फेलिशा.
नस्य लग्यत्वेऽपि मोराम्याचापि योजनीयलान्, मैगम्,
फेवलिनः सात्मनि माचम्य योजनीयऽपि शाकाहापा
लियतया ध्यानानालम्पनवाबपाश्रेणिकालगम्मविशी.
शिटनरयोगमय नामागदावीकरणानरयोगनिरोधप्रपन्नामा.
যায়াকিনীবালাগা গানমৰাণালাযনা-
गपरिणतरेर प्यानलनमगवान् । प्राह ग महामायकार:
गुदद्वयनमाधारण गिदी व पिप्रमाणागं । मार्ग
करणाग मयं. गनिनगगहामनाम || गि
वरयक-मावा ३ इन। याना, पदि सपाणि-
हितीया कामाची पामयाग मालम्मानयोगी अन्य
कवादिनम्नदा नपानमनाममा नगुणस्थानानामुरारत।
मानांपाधानमालाना ir-मायतिय
पमाप्रापाना बनादीनामांर निगनमनपानमर्मः
--
"
-
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[७]
गताभिधानं स्यादिति, मवम् , यद्यपि नवतः परतवलक्ष्य
घेधाभिमुरास्तदविवादी सामर्थ्ययोग एव निरालम्पनन-
थापि परतल्यलक्ष्यवेधप्रगुणतापरिणतिमायादत्तिानं परमा-
स्मगुणध्यानमपि मुख्यनिरालम्बनमापकत्वादेकध्येयाकारपरि-
णविशनियोगाग निरालम्पनमेव । अन एपारम्भापमापने
रूपातीतमिदगुराप्रणिधानलायामममनाना शुक्रध्यानाशा
निरालम्पनोऽनुमगिद्ध एव । मंगार्यात्मनोऽपि प ध्यपहा-
रनयसिद्धीपाधिक रुपमान्दाप शुद्धनिधयनयपरिकल्पित
सहजारमगुणविभाउने निगलम्पनभ्यान दुरपारमेष, परमा-
स्मतन्यतयाऽऽमनानम्पैर निगलम्बनध्यानांशया मस्पर
प मोहनाशकवान । माह ~'' जो जागर मारहते,
दलप्तगुणनपञ्जय नोहे । यो जागा भप्पाम, मोहो गल जार
तस्म लयं ।
इन । नम्मापिद्रप्यविपर्य पान
मालम्बनं अपिविषय च निगलम्बनमान विनम् ॥ ६॥
प्रय निगलम्बनायान पलपरम -
पयम्मि मोरमागरमा र ।
ततो अजांगलागी मरण प.मंच निया ॥५०॥
। [८] 'एयम्मि 'त्ति । एतस्मिन् ' निरालम्बनध्याने लधे मोहसागरस-दुरन्तरागादिभावसंतानसमुद्रस्य तरणं भवति । ततश्च श्रेणिः' क्षपकश्रेणिनिऱ्याढा भवति, सा ह्यध्यात्मा- दियोगप्रकर्षगर्भिवाशयविशेषरूपा । एप एव सम्प्रज्ञात: समाधिस्तीर्थान्तरीयीयते, एतदपि सम्यग्-यथावत् प्रकरें- ण-सवितर्कनिश्चयात्मकत्वेनात्मपर्यायाणामर्थानां च द्वीपादी. नामिह ज्ञायमानत्वादर्थवो नानुपपन्नम् । ततश्च 'केवलमेव केवलज्ञानमेव भवति । अयं चासम्प्रज्ञातः समाधिरिति परै- गीयते, तत्रापि अर्थतो नानुपपत्तिः, केवलनानेऽशेपवृत्त्यादि. निरोधालन्धात्मस्वभावस्य मानमविज्ञानवैकन्यादमम्प्रन्नात- त्यसिद्धेः। अयं चामंप्रज्ञातः ममाधिर्दिधा-मयोगिकेवलिभावी अयोगिकेवलिभावी च. श्राद्यो मनोवृनीनां विकल्पज्ञानरूपा खामत्यन्तोच्छेदात्मम्पद्यते । अन्यच परिम्पन्दम्पाणाम् , अयं च केवलज्ञानस्य फनभूतः । एतदेवाह-- नत केवलज्ञानलाभादनन्तरं च ' अयोगयोगः ' वृनित्री जदाहायो- वितर्कविचारानन्दास्मितारमानुगमात्मनहातः । (पा० योग० १-१७)। २ " विरामप्रत्ययाभ्यामपूर्वः संरहा- रोपोऽन्यः " ( पातं० १-१८)" याभ्यासपूर्व वित्त निरा. मम्पनमभावमातमिव मवतीयेप नि:जः समाधिामाप्रातः॥" इति १-१८ सूधमाध्ये घ्यामर्पिः। " " [] पाल्पा ममाधिपति, भयं " धर्ममेयः "नि पाउन. लैगीयते, " अग्रवामा " इत्ययः, "भवरापुः" पप, "शियोदया" सन्यः, “गमानन्दः" इत्य, "पप" इत्यपरे । ' मग ' उपदर्शितपारम्पर्येण सगोऽयोगयोगाद परम पोस्रपाले निर्वागं गपनि ॥ २० ॥ - . ॥इति महोपाध्यायथीकल्याणविजयगागामिप्या. पण्डितभीजीतविजयगगिसगीयपपितभीनय- বিনযাতিমাঘধষিবিশেষ, विजयगणिगदोदरीपाध्यायधीजगविजय- पाथिसमर्थिताया विशिरारद. प्पारपाया पोगविंशिका- विध मापूर्णम् ॥ RSAREE WAfte सयपुरmeer. बातिमा iivदानी ...... पापा
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उपाध्यायजी श्रीयशोविजयजी कृत--- योगवृत्तिका सार. प्रथम पाद। स्त्र २--सूत्रकारने सम्प्रज्ञात और असम्प्रज्ञात ऐसे दो योग-जैसा कि पा०१.२०१७-१८-४६-५१ में कहा है-मानकर उनका 'चित्तवृत्तिनिरोध' ऐसा लषष किया है । इस लवणमें उन्होंने 'सर्व' शब्दका ग्रहण इस लिए नहीं किया है कि यह लक्षण उभययोग साधारण है । सम्प्रज्ञात योगमें कुद्ध चित्तवृत्तियाँ होती भी हैं पर असम्प्र- ज्ञातमें सब रुक जाती हैं। अगर 'सर्वचित्तवृत्तिनिरोध ऐसा लक्षण किया जाता नो अमम्मवात ही योग कहलाता, सम्प्रभाव नहीं। अब कि 'चित्तवृत्तिनिरोध' इतना लक्षण किया है तर तो कुछ चित्तवृत्तियों का निरोप और सकल चित्तनियोंका निर्गध ऐमा अर्थ निकलता है जो क्रमशः उक्त दोनों योगमें घट जाता है। सूत्रकारका उपर्युन भाशय जो भाष्पकारने नीकाला है उमको लक्ष्यमें रखकर उपाध्यापजी कहते है कि-सर्व- शन्दका अध्याहार न किया जाय या किया जाय, उभय- पचौ सूत्रगत लवण अपूर्ण है। क्योंकि अध्याहार न
स
[१२]
करनेमें संप्रज्ञात योगका तो मंग्रह हो जाता है पर कि
अवस्था जो सूत्रकारको योगरूपसे इष्ट नहीं है और ि
कितनीक चित्तवृत्तियोंका निरोध अवश्य पाया जाता है
अतिव्याप्ति होगी । यदि उक्त अतिव्याप्तिके निरासके
अध्याहार किया जाय तो मम्प्रज्ञानमें अव्याप्ति होगी, कर
उसमें सत्र चित्तवृत्तियों नहीं रुक जाती । इस तरह
शब्दका अध्याहार करनेमें या न करनेमें दोनों तरफ र
पाशा होनेसे 'क्लिष्ट' पदका अध्याहार करके "
क्लिष्टचित्तवृत्तिनिरोधः" इतना लक्षण फलित करना चा
जिससे न तो विक्षिप्त अवस्थामें अतिव्याप्ति होगी और
सम्प्रज्ञातमें अव्याप्ति । यह तो हुई सूत्रको ही मंगत करने
पात, पर श्रीहरिभद्र जमे आचार्यकी सम्मति बतला
उपाध्यायजी जैन शैलीके अनुमार योगका लक्षण
प्रकार करते है-" जो धर्मव्यापार-अर्थात् म्बभावोन्मुग्य
चेतनाभिमुख क्रिया-ममितिगुप्ति स्वरूप है वही योग
क्योंकि उसीम मोचलाभ होना है।"
सूत्र ११-~पाद १ मृत्र ६ मे ११ तकमें निरोध कर
योग्य पाँच वृत्तियोंका निरूपण है । इसपर उपाध्यायजी
कहना यह है कि-मूत्रकारने वृत्तियोंके जो पाँच भेद कि
है सो तात्तिक नहीं किन्तु उनकी रुचिका परिणाममा
है । क्यों कि विकल्प, निद्रा और स्मृति ये पीछली ती.
त्तियाँ यथार्थ तथा थयथार्थ उभयरूप देसी जाती है, इस
[६३] लिये उनका समावेश प्रमाए और विपर्यय (मप्रमाण) इन दो पतियोंमें ही हो जाता है। अतएव चिके दो ही वि. माग करने चाहिये । यदि किसी न किसी विशेषताको लेकर अधिक विभाग करना हो तो फिर पांच ही क्यों ? पयोपशम- (योग्यता) की विविधताके कारण असंख्यात विभाग किये वा सकते हैं। विषयके न होते हुए भी जो पोध सिर्फ शन्दज्ञानके पलसे होता है यह विकल्प है । जैसे 'आकाशपुप्प ' ऐसा कहनेसे एक प्रकारका मास हो ही जाता है। इसी तरह 'च- तन्य यह मात्माका स्वरूप है ' ऐसा सुननेसे भी मास होता है। यह दोनों प्रकारका मास विकल्प है। पहले प्रकारका विकल्प विपर्यय-फोटिमें मम्मिलित करना चाहिये, क्योंकि “श्राकारापुप्प ' यह व्यवहार प्रामाणिक-सम्मत नहीं है। दूसरे प्रकारका विकल्प जिसमें भेदयोधक पष्ठीविभक्तिके पलसे मात्मा और चैतन्यका भेद मामित होता है वह नय अर्थात् प्रमाणांशरूप है। क्योंकि ऐसे विकल्पका व्यवहार शास्त्रीय य प्रामाणिक-सम्मत है । प्रमाणांश कहने का मतलब यह है कि व्यवहाकी दृष्टि कमी भेदप्रधान यार कभी अभेद- प्रधान होती है । दोनों दृष्टियोंको मिलानेमे ही प्रमाण होता है। दृष्टिको अपेक्षा या नय कहते है । वस्तुतः यात्मा पै. तन्यस्वरूप है, पर उसमें अनेक स्वरूपामसे जय चतन्यस्व- । ।
कसे लेकर चौदहवें गुणस्थानतकमें श्राजाता है | इन गुणस्थानों में जो भवोपनाही अर्थात् अघातिकर्मका संबन रहता है वही संस्कार है । और उसीकी अपेक्षासे असंप्रज्ञा तको संस्कारशेष समझना चाहिये, क्योंकि उम अवस्था मतिज्ञानविशेषरूप संस्कारका संभव नहीं है अर्थात् उE समय द्रव्यमन होनेपर भी भावमन नहीं होता। सूत्र १६-मूत्रकारने विदेह और प्रकृतिलयोंमें जो मवप्रत्यय (जन्मसिद्ध) योगका पाया जाना कहा है उसकी संगति जैनमतके अनुमार लवसप्तम देवों-अनुत्तर विमान- वासी-में करनी चाहिये, क्योंकि उन देवोंको जन्ममे ही ज्ञानयोगरूप समाधि होती है । सूत्र २६-मूत्र २४, २५, २६ में ईश्वरका स्वरूप है। माप्यकार और टीकाकारने ईश्वरके म्यरूपके विषयमें सूत्र- कारका मंतव्य दिसलाते हुए मुख्यतया उसके छह धर्म पतलाये हैं । जैसे-१ केवल मन्चगुणका प्रकर्ष, २ जगत्क- त्व, ३ एकत्व, ४ अनादिशुद्धता-नित्यमुक्तता. ५ अनुग्र- हेच्छा और ६ मर्वज्ञत्व । उपाध्यायजी उक्त धाममे । क ) पहले दो धर्मोको अर्थात् केवलसत्यगुणप्रकर्ष और जगत्कन्यको जनदृष्टिम ईश्वरमें अस्वीकार ही करते है, (य । तीन धर्मीका अर्थात् एकत्य, अनादिशुद्धता और अनुग्रहेन्याका कथंचित् ममन्वय [७] करते हैं, और (ग) एकधर्मका अर्थात् सर्वज्ञपनका सर्वथा स्वीकार करते हैं। (क) सच्चगुण जो जड प्रकृतिका भंश है यह तथा बगत्कईत्य इन दो धोका सम्बन्ध ईश्वरमें युक्तिसंगत न होनेसे जैनदर्शनको मान्य नहीं है। (स) एकत्व शब्दके संख्या और सादृश्य ये दो मर्थ होते हैं। जैनशाख ईश्वरकी एक संख्या नहीं मानता, बह ममी मुक्त पात्मानोंको ईश्वर मानता है। भतएय उसके अनुसार ईश्वरमें एकत्रका मतलब सदृशतासे है। जय ईश्वर कोई एक ही व्यक्ति नहीं है तर जनप्रक्रियाके अनुसार यह भी सिद्ध है कि अनादिशुद्धता मुक्तजीवोंके प्रवाहमें ही घट सकती है, एक व्यक्तिमायमें नहीं। अनु- ग्रहकी इच्छा जो रागरूप होनेमे उप महचरित होनी चाहिये उमका तो ईश्वरमें मम्भय ही नहीं हो मकना, अतएव जैन- शान कहना है कि ईश्वगेपासनाके निमिनये योगी जो सदा- चार लाभ करता है यही दृश्वरका अनुग्रह ममझना चाहिये। श्वरमें मन्नन्य जनशामको बैंमा ही मान्य है जमा कि योगदर्शनको, पर जनमनकी विशेषता यह है कि सर्वजन्य दोपोंके नाशम उत्पन्न होता है। भतएव वह नित्यमुक्तताका माधक नही हो मकना । सूत्र ३३-उपाध्यायजी कहते है कि-जैनशास्त्र भी मैत्री आदि चार भावनाओंफो चित्तगुद्धिका उपाय मान है, और मैत्रीका अर्थ उममें विशाल है। मूत्रमें मुम प्राणिको ही मंत्रीभावनाका विषय बनलाया है, पर जैन चार्य प्राणिमात्रको मैत्रीका विषय बतलाते हैं। इसके सिव उपाध्यायनीने पोडशकप्रकरणके चतुर्थ और नरहवें पोडर कके अनुसार चारों भावनाओंके भेद और उनका स्वर मी पतलाया है। सूत्र ३४-जैनशास्त्र प्राणायामको चित्तशुद्धिका पु साधन नहीं मानता, क्योंकि उसको हठपूर्वक करनेसे म स्थिर होनेके बदले व्याकुल हो जाता है। 'सूत्र ४६-चित्तका ध्येयविषयके समानाकार बन जान उसकी समापत्ति है। जब ध्येय स्थूल हो तव सवित निर्वितर्क और ध्येय सूक्ष्म हो तब सविचार, निर्विचार; इ- वरह समापत्तिके चार भेद हैं, जो सभी सीज ही हैं औ संप्रज्ञात कहलाते हैं। जैनशास्त्र में समापत्तिका मतलब उन भावनामोंसे है जो भावनायें चित्तमें एकाग्रता उत्पन्न करत हैं और जिनका अनुभव शुक्लध्यानवाले ही श्रात्मा करते हैं पर्यायसहित स्थूल द्रव्यकी भावना सवितर्क समापत्ति पर्यायरहित स्थूल द्रव्यकी भावना निर्वितर्क समापत्ति पर्यायसहित सूक्ष्म द्रव्यकी भावना सविचार समापत्ति, श्री- पर्यायरहित सूक्ष्म द्रव्यकी भावना निर्विचार समापत्ति है [६६] इन भावनामाको मोहकी उपशम दशा अर्थात उपराम- पेरिमें सम्प्रशात समापिकी वरद मपीज और मादपी पीय भवस्था मर्याद एपफणिमें अगरप्रधान समाधिकी सरह निज घटा लेना चाहिये। पत्रह-जनप्रक्रिया अनुसार मिराप्रमाका. मन्यय इस प्रकार -जी समाधिशा दमरे भपूर्वकरण पद धाटये गुणस्थानमें होनेवाले सामर्पयोग लगे प्रपट होती , और जो शासक द्वारा प्रतिपादनही किये सपनेपाले अतीन्द्रिय विपपोषी पगान करती है, सपप जो प्रशा न तो पलमानरूप और न एतमान- रूपा किन्तु अंगे रात गतम होत समय पर प्रयोदय पहले मरणोदयरूप या गत चार दिन दोनोगे ता पादोजी माध्यमिक विधतिरूप से दी मात मानके तमें मोर लहान. पा र रोए दोनोंकी मध्यम दशा प. जिसमा म नाम भय है, उसकी शतम्भराप्रशा मममना बाकि । दिनीय पाद । पर 1- अंम भाप्रमे पिता को निरी बरनेवाला बारमार उनी [१०] ही जैनशास्त्र भी अन्यन्त दुष्कर ऐम वाम ठप करनेकी सम्मति यहांतक ही देता है, जहांतक कि आभ्यन्तर तप अर्थात् कपायमन्दताकी वृद्धि हो, और ध्यानकी पुष्टि हो । जैनशायके अनुमार ईश्वरप्रणिधानका मतलब यह है कि प्रत्येक अनुष्ठान करते समय शास्त्रको दृष्टिमम्मुख रख करके तद्द्वारा उसके श्रादि उपदेशक वीतराग प्रमुको हृदयमें स्थान देना। सूत्र ४-यस्मिताप्रादि चारों वेशोंकी जड अविद्या है, और चारों नेश प्रसुप्त, तनु, विच्छिन्न और उदार इस प्रकारकी चार चार अवस्थावाले हैं। इस विषयका समन्वय जैनपरि- भापामें इस प्रकार है-अविद्यादि पाँचों वेश मोहनीयकर्मके प्रौदयिकमाव-विशेषरूप हैं। अबाधाकाल पूर्ण न होनेके कारण नबतक कर्मदलिकका निपेक ( रचनाविशेप)न हो तपतककी कर्मावस्थाको प्रसुप्तावस्था समझना चाहिये । कर्मका उपशम और क्षयोपशम मात्र उसकी तनुत्व अवस्था है। अपनी विरोधी प्रकृतिके उदयादि कारणों से किसी कर्म- स्कृतिका उदय रुक जाना यह उसकी विच्छिन्न अवस्था है। उदयावलिकाको प्राप्त होना कर्मकी उदार अवस्था है। सूत्र--सूत्रकारने सूत्र ५ से 8 तकमें पाँच शोके पण कहे हुए हैं उनका जैनप्रक्रियाके अनुसार समन्वय स प्रकार है- प्रविधाको जनशासमें मिथ्यात्व कहते हैं। स्थानागमत्रमें मिपावके दम भेद दिया है। जैसे-अधर्ममें पर्म, धर्ममें मधर्म, ममार्गमें मार्ग, मार्गमें ममार्ग, अमाधुमें साधु, सा- धुर्मे असायु, भजीयमें जीर, जीमें भजीत, भोर भाम पुकतथा मुत्तमें ययुत ऐगी पद्धि करना। अस्मिता थारोपको कहते हैं यारोप रो प्रकारका :- रय अर्थात् प्रपंच द्रष्टा-पेतन-फा यारोप और द्राम प्रय- का मारोप। यह दोनों प्रकारका भारोप यानि प्रमजन परि. भापाके भनुमार मिथ्यात्व ही है। यदि अस्मिताको अहंकार ममकारका पीज मान लिया जाय तो यह रागया रेपपतti राग और प कपायके भेद ही है। श्रमिनियेशका उदाहरण माप्यकारने दिया है कि-में फभी न मरूं, सदा पना रहे, अर्थात् मरणसे मर और जीरि- तकी भाशा, यह जनपरिभाषा अनुमार मपमंशादी। मपराशाकी वरद भन्य-मर्थात् माहार, मधुन भार परिम- संशाफो भी अभिनिवेश ही ममभाना चाहिये, पयोंकि मपके समान माहारमादिमें भी विद्वानोंकामी मभिनिवेशदेशादाता है। विधानोंमें भभिनिवेशका प्रभाष मिर्प. उस समय पापा जाता है जबकि मप्रमत्तशामें वनमान हो मार मामा- मापसे उन्होंने दम संज्ञामाको रोक दिया। मंहा या मोहफा दिलाप पा मोहमे पता होनेराला ठपका पाए .
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[१०३] हुए कर्माशयका फल मरणके बाद ही मिलता है। ६ मरणके समय कर्माशयका फलोन्मुग होना यह उसकी प्रधानताका लक्षण है, और उस समय फलोन्मुख न होना उसकी गीणताका लक्षण है । ७ गोणकर्मका प्रधानकर्ममें भावाप- गमन अर्थात् संमिलिन होकर उसमें दर जाना । इनके विषयमें क्रमशः जनमिद्धांत इस प्रकार है-१ विपाक तीन ही नहीं बल्कि अधिक है, क्योंकि वैदिक मोगाने ही गंगामरणको अरष्ट विशेषका फल माना है, भो प्राक्त तीन विपाकॉमे भिन्न है । वाचिक दृष्टिसे देखा जाप तो फममे कम मानावरण आदि थाठ विपाक तो मानने ही चाहिये। २ यह एकान्ल नियम नहीं है कि जो कमव्यक्ति पूर्व- बद्ध हो उमका फल प्रथम ही मिले और पश्चानबद्ध कर्मव्य. क्तिका फल पाल मिले. चिन्नु कभी कभी कभके पन्धन और पलक्रममें विपर्यय भी हो जाता है। ३ वामना भी एकपकारका कर्म प्रधान भाषकर्म है प्रतएव यामना और कर्म ये दो भिन्न नच नहीं है। ४ एकमविकताका नियम मिर्फ आयुष्कर्म ही लागू पह मकता है। ज्ञानावरणादि अन्य कर्म अनेक माविक भी हैं। प्रारब्धता-विपाकवेधना का नियम भी सिर्फ भायु.
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[१०४] कर्ममें लागू पडता है, क्योंकि अन्य सभी कर्म विपाको. दयके सिवाय अर्थात् प्रदेशोंदयद्वारा भी भोगे जा सकते हैं। ५ मरणके सिवाय अन्य अर्थात् द्रव्य, क्षेत्र, काल मादि निमित्त भी कर्माशयके उद्बोधक होते है। ६ मरणके समय अवश्य उदयमान होनेवाला कर्म भायु ही है, इस लिये यदि प्रधानता माननी हो तो यह सिर्फ आयुफर्ममें ही घटाई जा सकती है, अन्य कर्मि नहीं। ७ गोणकर्मका प्रधानाममें प्रापापगमन होता है यह पात गोल-माल जमी है। आयापगमनका पूरा मात्र संश- मगविधिको विना जाने ध्यानमें नहीं प्रामाता, इस लिये कर्ममहति, पंचसंग्रह आदि ग्रन्थों में मंकमणका पिचार आन लेना चाहिये। सत्र १५-प्रकारने संपूर्ण दृश्यप्रपनको मिति लिप दामरूप कहा है, इस कथनका नपाष्टम 24 मा करगे हुए उपाध्यापजी कहते हैं कि हरपत्रपंच दाप गानिधय रटिम, व्यवहारदृष्टिम तो यह गुगसम उमय । इस ग्यारणकी पुष्टि व गिद्धगनदियारकक. नुनिया है। उम याश्यका मार प्रकार है"! : अनंत मानकीक दिया है, और मनन शान प्रान है,हिर भी तेरी कमा न मा कम भी नम नमो मममात्र मान् एक पता ही नारत, भारत .
[१०]
किये हुए है।" इसमें जो मनंत भवचीजका फेंकना कहा गया
है सो संसारको निययटिसे दुःरारूप माननेसे ही पट
सकता है।
सूत्र १६-इसमें भाष्यकारने सृष्टिमहार क्रमको मां-
ख्यासिद्धांतके अनुसार वर्णन किया है। सांख्यशारा सत्का.
यवाद मानता है अर्थात् भमत् का उत्पाद भार सन् का
मार नहीं मानता। इसपर उपाध्यायजी कहते हैं कि-
त सिद्धांत एकातरूप नहीं मानना चाहिये, क्योंकि
कांवरूप मान लेने में प्रागभार भार प्रध्धंसाभाषका भरती-
कार करना पड़ता है, जिसमें कार्यमें भनादि-अनवताका
प्रसंग भाता है जो इष्ट नहीं है। इसलिये उक्त दोनों प्रभाव
मान फर कथंचित् असद का उत्पाद भार सत् का प्रभाव
मानना चाहिये । ऐसा मान लेनेसे वस्तुमात्रफी द्रव्यपर्याय.
रूपता पट जायगी, भार इसमे उत्पाद, व्यय, धाय्यरूप
जो वस्तुमात्रका विरूप लक्षण है वह भी पटित हो जायगा
यत्र ३१ ---सबकारने जाति. देश, काल और ममप
माचार व काव्य- के बंधन रहित भधान गाव भीम ऐम पो.
यमोंको महायत कहा है इस विषय में जनप्रक्रिया पतल
हुए उपाध्यायजी करते है कि-म शन्द के माध अमि
पांच यमोंकी जर प्रनिशा की जानी है तर महायत।
लाते है. धीर देश शन्दर माध जर उनी पनि
जाती है तर अणुमन कहलाते है।
.
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[१०७] ६, चित्तनिरोप नहीं। ज्ञान भी ऐमा समझना चाहिये जो अध्यात्म मारनामे होनेवाले सममारके प्रवाहवाला हो, यही मान राजयोग कहलाना है। मारांश यह है कि चिनमा जय हो या पास इन्द्रियोंका जय हो मपका मुख्य उपाय उक्त मानरूप राजयोग ही है, प्राणायाम भादि हठ- पोग नहीं। क्योंकि निकाममार्ग विसरूप होनेसे हठयोगके अभ्यामका शाम पार पार निषेध किया है। नो पद्ध है भार न तृतीय पाद. सूत्र ५५-दमके भाप्पमें भाप्पकारने सांख्यसिद्धांतके अनुमार योगदर्शनका मिद्धात बतलाते हुए मुख्य तीन पाते लिखी है (१) कैवल्य अर्थात् मुक्तिका मनलर मोगके अभावमे है। भोग मुख, दुःय, ज्ञान थादिरूप है जो पाम्नबमें प्रातिका शिकार है. यान्मा पुरुष-का नहीं। पुरुष सो कृटम्ध-निन्य होनम वानसमें न मुक्तः । इलिये पुम्प की मुनि का मतलर उसमें प्रागेपित मोगर प्रभारमायम । २ । विवेकग्व्यानि अर्थात् जड चेतनका भेदतान ही माता। मुख्य उपाय है। भेदतान हो जानम अविद्या ग्रादि देश और कर्मविपाकका अमान हो जाता है। हम अनार का ना मिनि है। मुनि पूर्वमें मरनर मविषयक जान ) किमीका होना है की ।
[१०]
किसीको नहीं ( ३) जिसको सर्वज्ञत्व प्राप्त होता है इस
भी मुक्ति प्राप्त होनेपर अर्थात् मन, शरीर आदि छूट
पर यह नहीं रहता, क्योंकि सर्वज्ञत्व यह मनका कार्य
श्रात्माका नहीं, आत्मा तो कूटस्थ-निर्विकार चेतनखरूप है
इन तीनों बातोंके विषयमें जैनशास्त्रका जो मतभेद है
उसीको उपाध्यायजीने दिखाया है-(१) सुख, दुःख
श्रादिरूप भोग संसार अवस्थामें थात्माका वास्तविक विकार
है, मनका नहीं। इसलिये मुक्तिका मतलब संसारकालीन
वास्तविक भोगके अभावसे है, आरोपित मोगके प्रभावसे
नहीं। (२) विवेकख्याति (जैन परिभाषानुसार सम्यग्दर्शन)
से और नेश आदिके थमावसे मोक्ष होता है सही, पर
प्रेशका अभाव होते ही सर्वज्ञत्व अवश्य प्रकट होता है।
मुक्तिके पहले मेशकी निवृत्ति अवश्य हो जाती है, और
झेश (मोह ) की निवृत्ति हो जाने पर सर्वज्ञत्व (केवलज्ञान)
अवश्य हो जाता है। (३) मुक्ति पानेवाले सभी प्रात्मा-
यौंको सर्वज्ञन्य नियममे प्रकट होता है इतना ही नहीं, परिक
यह प्रकट होने पर कायम रहना है, अर्थात् मुक्ति होने पर
पला नहीं जाता । क्योंकि मर्य विषयक शान फरना यह
मात्माका स्वभाव है. मनका नहीं । संमारदशामें भारमाको
हमा भान न होनेका कारण उसके ऊपर आपरणका होना
है। मोपदसा थावरणके न रहने उग शान माप ।
[१०] माप हुमा करता है, ऐसा मान होते रहनेसे मारमा इट- स्परप भंगफा जो पप दिया जाता है वह जैन शासका भूप। पयोंकि जैन शाम कपल जड (प्राति) को ही उत्पाद, प्यय, धान्यरूप नहीं मानता, किन्तु पेतनको मी उत्पाद, प्यय, धीप्यरूप मानता है। चतुर्थ पाद. ज्य १२-प्रस्तुत सबमें यन्तुके प्रत्येक धर्मकी मापि, भून और पर्तमान ऐमी तीन अवस्थायें मान कर उसमें अध्यमेद अर्याद कालकृत मेदका ममावेश यतलाया गया है, और वर्तमानकी तरह भूत तथा माथि अवस्थाका भी अपने अपने में प्रत्येक धर्मक, माध संबंध है पेमर इम मन्तव्यका जैन प्रक्रियाकं माध मिलान करते हुए उपाध्यायजी कहते है कि वस्तुको द्रव्यपर्यायरूप मानने दी पूर्वोत्त, अध्यभटकी च्यवधा पट सकती है अन्यथा नहीं। चन्तकी द्रव्यपायम मान लेना यही म्याद्वाद है । ऐसा म्यादाद मान लग ही गय प्रकारके वचन-व्यवहारको टीक टीक मिद्धि हो जाता है। सूत्र १४- मृत्रकारने गांग्य प्रक्रियाकं अनुगार विगु. शामक प्रकृतिका एक परिणाम मान कर कायमें एकता [११] मादारका समर्थन किया है। इस प्रक्रिया माग म्मामाद पक्षीका गमर्थन करते हुए शिकार करने किएको भनेक मोर भनेको एक परिणाम माननेगानी स्यामार शैलीका मीका काने ही से उगान्य प्रकिरा मट मानी है। एर १८-म में प्रात्माको प्रारिणामी मानीत किया है। इसका समर्थन करते हुए मायकारने कहा है कि शन्द यादि पिप कमी जाने जाते हैं और कमी नहीं। इमलिए लिन नो परिणामी है, परंतु निगकी कृषियों कमी मनात नहीं रहनी । इमलिए भामा अपरिणामी अर्थात् कटस्य ही है । इस मलयका प्रतिसाद करते हुए धृत्तिकार कहते हैं कि-बैमा चित परिणामी है वैमा मात्मा भी। मात्माको परिणामी मान लेने पर मी चित्तकी सदानातवा कोई बाधा नहीं पाती, क्योंकि वित्त वान-रूप है और ज्ञान थात्माका धर्म है। धर्म होनेमे वह प्रात्माके सनिहित होने के कारण कभी अज्ञात नहीं रहता । शन्द आदि विषय कभी ज्ञाव, और कभी अज्ञात होते हैं। इसका कारण यह कि शब्द श्रादि विषयका इन्द्रियके साथ जो व्यञ्जनार- ग्रहरूप सम्बन्ध है वह सदा नहीं रहता अर्थात् कमी होता है और कभी नहीं । यद्यपि इन्द्रियके द्वारा शन्द आदि विषय सदा नहीं जाने जाते परन्तु केवलज्ञानद्वारा सदा ही
[१११]
भाने जाते हैं। फ्योति फेवलानमें एक ऐसी शक्ति है
जिगमे यह मान्द भादि विपयोंको मदा ही जान लेता है।
एघ २३ -उभीमसे समितकके पार एशों में यप्रकारने
जो पर्चा की। उमग मामा विपपमें सांस्पसिद्धा-
न्तसम्मन तीन पाने मुख्यतया मालूम होती है। वे ये है-
( १ ) चतन्यकी स्वप्रकाराता । (२)जो नैतन्य भर्यान्
चिति-शक्ति है यही चेतन ई भर्यान् चिधि-शक्ति
स्वयं पप है। यह किमीफा अंश नहीं है और
उसके भी कोई और नहीं है। भतएव यह निर्गुण है।
(३) चिति-शचि सर्वथा फूटस्थ होनेने निर्लेप है। इन
पातक विषयमें जैन मन्नम्पके अनुसार मतभेद दिखाते
हुए उपाप्यापजी अन्तमें कहते हैं कि ये पार्वे किसी नयकी
अपवास मान्य की जा मकती है मर्पया नहीं। उक्त पावोंके
विषयमै मनभेद क्रमशः हम प्रकार है-
। ५. तन्य म्यप्रकाश भी है और प्रकाश भी।
उसी वकागना थाग्निक प्रकाशक समान अन्य पदार्थके
मंयोग मियाय ही प्रत्येक प्राणिको अनुभव-सिद्ध है।
चैतन्यकी परप्रकाशता प्रायदशामें विषयके मम्बंधक
अधीन है और धनावरण दशामें पाभाविक है।
(तन्य यह शनि । गुण ) अर्धान अन्य मुल
तपका अंश है. वह अन्य तच चंतन या धात्मा है।
[१२] उगमें मान्यकी मरह गरे भी पनल गुण (गनिया) है, भात प्रामा अनंग गुगोका प्राधार है। यह जो निर्गुण कहा जाता है महा मला उसमें पातिक गुगा ममामि। (३) मान्मा पात-निर्लप नहीं ममें मंमार- भास्थामें कयनित लेपका मी ममा। पूत्र ३१-माध्यकारने प्रस्तुत गया माध्यमें मान्य मत भनुमार मानको मन्चगुणका काय कह कर उसे प्रार- तिरुपतलाया है, पर कहा कि निगमगमगामें जान अनन्त हो जाता है जिमम उमर मामने मनी नय विषय मन्प पन जाते हैं, जैसे कि ग्राफाश मामन जुगन् । इन दोनों पातीका विरोध करते हुए निकार नन मन्तव्यको इस प्रकार दिखाते हैं-नान प्राकृतिक प्रथान अचतन्य नहीं है किन्तु यह चैतन्यरूप है कि ज्ञानके अनन्त हो जानेक ममय मभी जेय अन्य हो जाते हैं, बल्कि नानकी अनन्तता यर्की अनन्तता पर ही अपलम्पित है अर्थात् जय अनन्त है। अतएव उन सरको जाननेवाला निरावरण ज्ञान भी अनन्न कहलाता है । सूत्र ३३-इसकी व्याख्यामें भाप्यकारने क्रमका स्वरूप दिखाते हुए कहा है कि नित्यता दो प्रकारकी है। (१) ..-नित्यता अर्थात् अपरिणामि तत्व । (२) परिणामि- बात नहीं
[११]
नित्यवा अर्याद परिपर्दनशील वधाइनमें पाली निन्दा
पुरुष (मामा) में है और दूसरी प्रतिमें।
इस पर जैन मतमेद दिखाते हुए प्रतिकार पाकि-
सूटश्यनित्यता मानने कोई सस्त नहीं। भामापा
प्रकृति सभी परिणामिनित्यवादी, भयाद थम्नुमात्रमें
द्रयरूपसे नित्यता और पर्यायरूपमे भनित्पता मुनिगंगा
होने के कारण गरका एकमात्र लक्षण
घोप्य " ऐगा ही करना चाहिये।
[११४ ]
योगविंशिकाका सार.
गाथा १-मोत-प्राप्तिमें उपयोगी होने के कारण यद्यपि
सब प्रकारका विशुद्ध धर्म-व्यापार योग ही है तथापि यहाँ
निरोप रूपसे स्थान आदि सम्बन्धी धर्म-व्यापारको ही योग
जानना चाहिए।
सुलासा-जिस धर्म-व्यापारमें प्रणिधान, प्रति,
विजय, सिद्धि और विनियोग इन पाँन भावोंका सम्बन्ध
हो यही धर्म व्यापार विशुद्ध है। इमके विपरीत जिममें
उक्त भावाँका सम्बन्ध न हो यह क्रिया योगरूप नहीं है।
उक्त प्रणिपान आदि मावोंका स्वरूप इस प्रकार है-
(१) अपनेमे नीकी कोटीवाले जीगोंके प्रति देप
न रप कर परोपकारपूर्वक अपनी यनमान धार्मिक भूमिका
कर्मप्यमें सावधान रहना यह प्रणिधान है।
(२) यर्नमान धार्मिक भूमिका र उदरया किया
जानेवाला चौर उसके उपायकी पद्धतिम पुन, नी समता
रहित तीन प्रयल वह प्रनि है.
(३) जिम परिणाममें धार्मिक मानिमै किस नहीं
पाते वह विग-जय है। गिामीन माह होने ? ' भूग,
प्पाम भादि परीपद, २ गार्गरिक संग और ३ मनो
[११५] वेभ्रम । ये विस धार्मिक प्रवृत्मेिं बसे ही पापा डालनेवाले हैं जैसे कहीं प्रयाण करनेमें रास्तेके कॉटे-पभ्यर, शरीर-गत ज्वर और मनोगत दिग्भ्रम । तीन वरहका विघ्न होनसे उसका जय भी तीन प्रकारका समझना चाहिये। (४) ऐसी धार्मिक भूमिकाको प्राप्त करना जिसमें पडोंके प्रति रहुमानका मात्र हो, पराबरीवालोंके प्रति उप- कारकी भावना हो भार कम दरजेवालोंके प्रति दया, दान तया अनुकंपाकी भावना हो यह सिद्धि है। (५) अहिंसादि जो धार्मिक भूमिका अपनेको सिद ई हो उसे योग्य उपायोंके द्वारा दूसरोंको भी प्राप्त कराना यह विनियोग है। म्यान भादि क्या पया है और उसमें योग कितने प्रकारका हे यह दिखलाते है- गाथा २-स्थान, ऊर्ग, मर्य, मालंग्न और मनाल- बन ये योगके पाँच भेद है। इनमें पहले दो कर्मयोग है और पिछले तीन शानयोग है खुलासा---( कायोत्सर्ग, पर्यकामन, पशमन भादि भासनोंको स्थान कहते । (२) प्रत्येक क्रिया मादिके समय जो स्य पढ़ा जाता है उमे ऊर्ग अर्थात् वर्ण सा शब्द समझना पाहिए। ( ३ ) मर्षका मतलब स्वार्थक शानसे है।।४) शाम प्रतिमा भादिका जो ध्यान षह मालंबन
[११५]
योगविंशिकाका सार.
-
गाथा १-मोक्ष-प्राप्तिमें उपयोगी होने के कारण यर्या
सब प्रकारका विशुद्ध धर्म-व्यापार योग ही है क्यापि यह
विशेष रूपसे स्थान श्रादि सम्बन्धी धर्म-व्यापारको ही योग
जानना चाहिए।
खुलासा-जिस धर्म-व्यापारमें प्रणिधान, प्रवृत्ति,
विजय, सिद्धि और विनियोग इन पाँच भावोंका सम्बन्ध
हो वही धर्म-व्यापार विशुद्ध है। इसके विपरीत जिसमें
उक्त भावोंका सम्बन्ध न हो वह क्रिया योगरूप नहीं है।
उक्त प्रणिधान आदि मावोंका स्वरूप इस प्रकार
(१) अपनेसे नीचेकी कोटीयाले जीवोंके प्रति द्वेप
न रस कर परोपकारपूर्वक अपनी वर्तमान धार्मिक भूमिकाके
कर्तव्यमें सावधान रहना यह प्रणिधान है।
(२) वर्तमान धार्मिक भूमिकाके उद्देश्यते किया
जानेवाला और उसके उपायकी पद्धतिसे युक्त जो चयनवा-
रहित तीन प्रयत्न वह प्रवृत्ति है।
(३) जिस परिणामसे धार्मिक प्रवृश्चिम विम नहीं
भावे यह विम-जय है । विम तीन तरहके होते हैं, १ भूस,
प्यास थादि परीपह, २ शारीरिक-रोग और ३ मनो
.
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0 [११७] रिने स्वयं योगबिटुमें अध्यात्म, मारना, ध्यान, समता और पृत्तिसंक्षय इन पाँच योगोंकी संपत्ति चारित्रमें ही मानी । यह प्रश्न उठ मकता है कि जब चारित्री में ही योगका संभव तब निक्षपदृष्टिमे नारित्रहीन किन्तु व्यवहार- मायमे श्रारक या माधुकी किया करनेवालेको उस क्रियासे यया लाम, इसका उत्तर ग्रंथकारने यही दिया है कि- प्यवहार-मात्रमे जो क्रिया भपुनरंधक और सम्यग्दृष्टिक द्वारा की जाती है यह योग नहीं किन्तु योगका कारण होनेसे योगका पीनमात्र है । जो अपुनबंधक या सम्पष्टि नहीं है किन्तु सकृवंधक या द्विरंधक श्रादि है उसकी ध्यावहारिक क्रिया मी योगचीजरूप न होकर योगाभास अर्थात मिथ्या-योगमात्र है। अध्यात्म धादि उक्त योगोंका समावेश इम ग्रंथ वर्णित म्पान आदि योगोंमें इस प्रकार --अध्यात्मके अनेक प्रकार है । देव-सेवारूप अध्यात्मका ममावेश म्यानयोगमें, अपरूप अध्यात्मका ममावेश ग-योगमें और तत्याचिंतनरूप अध्यात्मका ममाश अर्थयोगमें होता है। मारनाका भी ममावेश उक्त , जो मोहनीयमकी उम्पू स्थिति एक वार बनेवाला हो १६ मध या सकृदन हनाना है और जो मी freति दी पार पाधनवाना हो 1 द्विन्धक या द्विगन पहलाता।
[१२२] नैत्यवंदन एक प्रारम्भिक अनुष्ठान है, इसलिए यह विचारना चाहिये कि वह अमृतानुष्ठानका रूप कत्र धारण करता है और न द्वेतु अनुष्ठानका रूप कब धारण करता है। जब चन्यवंदन-क्रियामें म्यान, वर्ग. अर्थ और प्रा- लंबन इन चारों योगोंका मम्बन्ध हो नत्र वह अमृतानुष्ठान है और जब उममें म्यान, वर्ग-योगका ना मम्बन्ध हो किन्तु अर्थ, पालम्बन-योगका सम्बन्ध न हो पर उनकी रुचि मात्र हो तब वह नहेतु-अनुष्ठान है । जन विधिक अनुमार अामन जमा कर शुद्ध उच्चारण- पूर्वक सूत्र पढ़ कर चन्यवंदन किया जाता है और माथ ही उन सूत्रोंके अर्थ ( तात्पर्य । तथा आलम्बनमें उपयोग रह- ता है तब वह चैत्यवंदन उक्त नागें योगोंमें संपन्न होता है ऐसा चैत्यवंदन भावक्रिया है, क्योंकि उसमें अर्थ तथा आलंबन योगमें उपयोग रखने मप जान-योग वर्त- मान है । यथाविधि अासन बाध कर शुद्ध गतिसे सून पढ़ कर चैत्यचंदन किया जाता हो पर उम समय सूत्रके अर्थ तथा ग्रालंयनमें उपयोग न हो तो वह चैत्यवंदन ज्ञानयोगशून्य होनेके कारण द्रव्यक्रिया- रूप है, ऐसी द्रव्यक्रिया अर्थ, आलंबन-योगका अभाव १ चैत्यवंदनकी चार स्तुतियों में पहनी का आलम्बन विशेष .., दूसरीका सामान्य तीर्थकर, तीमरीका प्रवचन का शासनदेवता है। और [१२३] होनेपर भी उसकी तीन कवि हो तो यह द्रव्यक्रिया अन्त में भावनियाके द्वारा कमीन कमी मोदकोदनेवाली मानी गई, इसीसे वैसी क्रियाको वद्धत-अनुष्ठान भार उपादेय कहा है। स्थान प्रादि योगों के अभावमें पत्यपंदन फेवल निष्फल ही नहीं पन्कि अनिष्टफलदायक होता है, इसलिए योग्य भधिकारीको ही यह सिसाना पाहिये ऐमा पर्षन करते हैं- गाया १२-~जो व्यक्ति अर्य, मालपन नदी योगी शून्य होकर स्थान तथा पर्ण योगगे भी शून्य है उनका पर अनुष्ठान फापिक पेप्टामात्र अर्थात निफल होता है या मृपावादरूप होनेसे विपरीत फल देनेवाला होता है, इस. लिए योग्य अधिकारिभोंको ही प्रत्यपन्दन पर सिखाना पाहिये। एलासा-जो मनुछान निकल पा भनिएपलदापक हो यह भसदनुष्ठान है। इसके तीन प्रकार हैं, (१)भन- नुष्ठान (२) गरानुष्ठान (३) विपानुशान । पत्यवन्दनी यह देख लेना चाहिये कि यह कार किस प्रकार के मसदनु. छानका रूप पारण करता है। जिस पत्परन्दनक्रिया न मर्य, मालग्न योग हैन उनकी रपिभीर न पान, वर्ग-योगका मादर यह शिया संमधिम जीरकी प्रापिकी तरह मानमिउप- योगरून्य होने के कारण निपल इमी निपल किया [१२२] चैत्यवंदन एक प्रारम्भिक अनुष्ठान है, इसलिए यह विचारना चाहिये कि वह अमृतानुष्ठानका रूप कर धारण करता है और त दे॒तु-अनुष्ठानका रूप कत्र धारण करता है। जब चैत्यवंदन-क्रियामें स्थान, वर्ण, अर्थ और भा- लंबन इन चारों योगोंका सम्बन्ध हो तब वह अमृतानुष्ठान है और जब उसमें स्थान, वर्ण-योगका तो सम्बन्ध हो किन्तु अर्थ, आलम्बन-योगका सम्बन्ध न हो पर उनकी रुचि मात्र हो तब वह तद्धेतु-अनुष्ठान है। जय विधिके अनुसार श्रासन जमा कर शुद्ध उचारण- पूर्वक सूत्र पढ़ कर चैत्यवंदन किया जाता है और साथ ही उन सूत्रोंके अर्थ (वात्पर्य) तथा पालम्बनमें उपयोग रह- ता है तब वह चैत्यवंदन उक्त चारों योगासे संपन्न होता है ऐसा चैत्यवंदन भावक्रिया है, क्योंकि उसमें अर्थ तथा थालंपन योगमें उपयोग रखने रूप शान-योग पर्व- मान है । यथाविधि श्रासन पांघ कर शुद्ध रीतिसे सूत्र पढ़ कर चैत्यवंदन किया जावा हो पर उस समय सूत्रके अर्थ तथा अालंपनमें उपयोग न हो तो यह चैन्यवंदन ज्ञानयोगशून्य होनेके कारण द्रव्यक्रिया. रूप है, ऐमी द्रव्यक्रिया अर्थ, भालंपन-योगका अमाप १ चैत्यवदनकी चार स्तुतियोंमें पहलीका पालम्बन विशेष पायंकर, दूर्गका मामान्य नीयंकर, तीमरी का प्रयपन चौथीका शासनदेवता है।
[१२३] होनेपर भी उसकी तीन रुचि हो तो यह द्रव्याक्रिया अन्त में भाषक्रियाके द्वारा फमीन कभी मोचको देनेवाली मानी गई है, इसीसे घेसी क्रियाको तदेत-अनुष्ठान और उपादेय कहा है ।। स्थान थादि योगोंके यमारमें पत्यवेदन फेवल निष्फल ही नहीं बल्कि अनिष्टफलदायक होता है, इसलिए योग्य अधिकारीको ही यह सिखाना चाहिये ऐमा वर्णन करते हैं- गापा १२-जो प्यक्ति अर्थ, मालंपन इन दो योगासे शून्य होकर स्थान तथा पर्ण योगसे भी शून्य है उनका यह अनुष्ठान फायिक पेटामाय अर्थात् निष्फल होता है अथवा प्पावादरूप होनेसे विपरीत फल देनेवाला होता है, इस- लिए योग्य अधिकारियों को ही पत्यपन्दन पत्र सिखाना पाहिये । पुलासा-बो मनुपान निष्फल पा भनिष्टफलदायक हो यह असदनुहान है । इसके तीन प्रकार है, (१) मन- नुष्ठान (२) गरानुष्ठान (३) पिपानुष्ठान । पैत्यवन्दनमें दो यह देरा लेना चाहिये कि यह फर किस प्रकार के असहनु- धानका रूप धारण करता है। जिस पत्रन्दनक्रिया न मर्प, मालग्न योगन एनजी सपिभीर न स्थान, पर्ष-योगका मादर ही है पर प्रिया संहिम जीकी प्राधिकी तरह मानषिकउप- योगशून्य होने के कारण निफला मी निपल फियाको
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" [१२५] गाथा १३-जो देशविरतिपरिणामपाले हों वे चत्य- चन्दनके योग्य अधिकारी है। क्योंकि प्रत्ययन्दनप्र में "कायं पोसिरामि इम शब्द जो कायोत्सर्ग करनेकी प्रतिज्ञा गुनी जाती है यह पिरतिक परिणाम होनपर दी घट सकती है। इसलिए यह अच्छी तरह समझ लेना चाहिए कि देशविरति परिणामवाले ही पत्यवन्दनके योग्य अधि. कारी है। खुलासा-पत्यपन्दन के अंदर " साप कार्य, ठाणेणं " इत्यादि पाठक द्वारा कायोत्सर्गकी प्रतिज्ञा की जाती है। कायोत्सर्ग यह फायगुतिरूप विरति है, इसलिए चिरवि • परिणामके सिवाय पंत्ययंदन-अनुहान करना अनधिकार- पेटामात्र है। देशविरतियालेको प्रत्ययन्दनका अधिकारी कहा सो मध्यम अधिकारीका सूचनमार है। जैसे तरा- जूकी रएटी पीपमें पफरनेसे उसके दोनों पलड पफहमें या जाते है यमे ही मध्यम अधिकारीफा कथन करनेसे नीचे और उपरफे अधिकारी भी प्यानमें था जाते हैं। इसका फलित अर्थ यह है कि सर्वविरतिवाले मुनि तो परययन्दनके पाश्चिक अधिकारी थोर बनधक या सम्पष्टि प्रव. हारमाप्रसे उसपे. अधिकारी है, परन्तु जो पमसे कम अपु. नपंधक मापसे भी खाली है अतएव जो विधिमान फरना नही जानते पे सर्वथा पत्पादन बनाधिकारी है। .
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[१२७] सिर्फ जनसमुदायका नाम नहीं है किन्तु तीर्घका मतलब शासोक्त क्रियावाले चतुर्विध संपसे है। शासाशा नहीं मान- नेवाले जनसमुदायको वीर्य नहीं किन्तु हहीयोंका संपात- मात्र कहा है । इस दशामें यह स्पष्ट है कि यदि वीर्यको रक्षाके पहानसे प्रविधिका स्थापन किया जाय वो भन्तमें प्रविधिमात्र यायी रहनसे शास्त्रविहित मियारूप विधिका सर्वथा लोप ही हो जायगा । ऐसा लोप ही तीर्घका नाश है, इममे अविधिके पचपातियों के पत्र में सीरवारुप लामा बदले वीर्ध-नाशरूप हानि ही शेष रहती है जो मुनाफेको पाइनेवाले के लिए मूल पूंजीके नाशके यरापर है। पपोत नियाका लोप यहितकारी फेगे होता है पर दिसाते हैं- गाया १५-~-यह प्रधाई भविधिक परपानमे होनेवाला यत्रोक्त विधिका नाश चक्र । अनिष्ट परिणाम देनेवाला) ही है। जो स्वयं मरा हो और जो मारा गया हो उन दोनोंमें विशेषता भयरय , यह पात तीफे उददेने टरनेपालीको पिचारना पाहिए ॥ मुतामा जो शिपिलाचारी गुरु मोल शिप्पोको . मनाममे अपनी हालमें फागत है और परिधि (शाम विराट ) धर्मका उपदंश करते हैं उनमे ए कोई शाग- विरुद्ध उपदेश न देने के लिए करता र धर्मोपदा
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[१२६] मिच है, इससे उस घटनाका दोषमागीमारनेवाला अवश्य है। इसी तरह जो लोग स्वयं प्रविधिस धर्मक्रिया कर रहे हैं उनका दोप धर्मोपदेशकपर नहीं है, पर जो लोग प्रविधिमय धर्मकि- पाफा उपदेश सुन कर उन्मार्गपर चलते हैं उनकी जवाबदेही उपदेशकपर अवश्य है। धर्मफे जिम्माम लोगोंको भपनी क्षुद्र स्वार्थपत्ति के लिए उन्मार्गका उपदेश फरना वैसा ही विश्वास- पात है जैसा शरणमें थाये हुएका सिर काटना । जैसा पल रहा है ऐसा चलने दो यह दलील भी ठीक नहीं है, क्योंकि ऐसी उपेक्षा रणनेसे शुद्ध धर्मक्रियाका लोप हो जाता है जो वास्तवमें वीर्घोच्छेद है । विधिमार्गके लिए निरन्तर प्रयत्न करते रहने से कभी किसी एक व्यक्तिको मी शुद्ध धर्म प्राप्त हो जाय तो उसको चौदह लोकमें अमारीपटह पजयाने- कीसी धर्मोप्रति हुई ममझना चाहिए अर्थात् विधि पूर्वक धर्मक्रिया करनेवाला एक भी व्यक्ति प्रविधि पूर्वक धर्म- क्रिया करनेवाले हजारों लोगोंसे अच्छा है । अतएव जो परोपकारी धर्मगुरु हों उन्हें ऐसी दुर्वलताका आश्रय कमी न लेना चाहिये कि इसमें हम क्या करें ? हम तो सिर्फ धर्म- क्रियाका उपदेश करते हैं, प्रविधिका नहीं। धर्मोपदेशक गुरुभोंको यह पात कभी न भूलनी चाहिए कि विधिका उपदेश भी उन्हींको देना चाहिये जो उसके श्रवणके लिये रसिक हो । अयोग्य पात्रको ज्ञान देने में भी महान् भनर्य [१२.] art, निरीन गाने को मनाने यही अपित दर निगम कानाकी मोना गाना रिकामा को माया मायाको गुन गायोग देना और प र प्रण करना यही गीता दे, अगर माना " उग गगां सुन कर माटी पक्षिी लोग पर पर उठा पाक में उतरना था, जो पदोंने किया की यही करना चाहिए, इमर मग "महारानी पन गनः म पन्थाः यद उमि प्रमित है। मात्र कल पपा जीतम्परहारकी ही प्रशि देनी जाती है। अपना तीथ रहेगा नपता जीनन्याहार रंगा इमलिए उमीका अनुसरण करना तीर्थ रहा है। इस कथनका उत्तर प्रत्यकार देते है- गाया १६-~लास्मताको छोड कर और शागके शुद्ध रहस्पको समझ कर विचारशील लोगोंडी अत्यन्त मून्न बुद्धिसे शुद्ध प्रवृत्ति करना चाहिए । सुलामा-शायकी परवा न रख कर गतानुगतिक लोकप्रवाहको ही प्रमाणभूत मान लेना यह लोकसंज्ञा है। लोकसंज्ञा क्यों छोडना ? महाजन किसे कहते हैं और जीत- व्यवहारका मतलब क्या है ? इन बातोंको समझानेके लिए
[११]
भानसारके जो सोक रीकामें उदत किये गये हैं ये पहुत
महण्यपूर्ण हैं. इसलिए उनमेंसे कुछका सार दिया जाता है-
यदि लोगोंपर भरोसा रख कर ही कर्तव्यका निधय
किया जाप मर्याद जो पतीने किया पही ठीक है ऐसा
मान लिया जाय वो फिर मिथ्यात्व त्याग्य नहीं समझा
जाना पाहिए. पयोंकि उसका सेवन अनेक लोक अनादि
कालसे फरते भाये है।
अनायोंमे मार्य थोड़े है, मामि भी जैनोंकी अर्थाद
समभाववालोंकी संख्या कम है। नाम भी शुद्ध श्रद्धावाले
कम, और उनमें भी शुद्ध पारिप्रपाले कम है।
ध्यपहार हो या परमार्थ, सब जगह उच्च घम्तुके अधि-
कारी कम ही होते हैं, उदाहरणार्थ-जैसे रत्नोंके परीक्षक
(जौहरी) कम, वैमे पात्मपरीक्षक भी कम ही होते हैं।
शायानुसार वर्तन करनेवाला एक भी व्यक्ति हो यो
यह महाजन ही है। अनेक लोग भी भगर अज्ञानी है तो
ये सब मिल कर मी अन्धोंके समूहकी तरह वस्तुको यथार्थ
नहीं जान सकते।
संविन ( मवमीरु ) पुरुपने जिसका पाचरण किया
हो, जो शास्त्रसे याधित न हो और जो परम्परासे भी शुद्ध
हो यही जीवव्यवहार है।
[१३६] रूपी ये दो प्रकार हैं । इन्द्रियगम्य वस्तुको रूपी (स्थूल) और इन्द्रिय-अगम्य वस्तुको अरूपी (सूक्ष्म ) कहते हैं । स्थूल आलम्बनका ध्यान सालम्पन योग और सूक्ष्म आल. म्बनका ध्यान निरालम्बन योग है, अर्थात् विषयकी अपे- चासे दोनों ध्यानमें फर्क यह है कि पहलका विषय आँखोंसे देखा जा सकता है और दूसरेका नहीं । यद्यपि दोनों ध्या- नके अधिकारी छमस्य ही होते हैं, परन्तु पहलेकी अपेक्षा दूसरेका अधिकारी उच्च भूमिकावाला होता है। अर्थात् पहले ध्यानके अधिकारी अधिकसे अधिक छटे गुणस्थान तक ही स्वामी होते हैं परन्तु दूसरे ध्यानके अधिकारी सातवें गुणस्थानसे लेकर बारहवें गुणस्थानतकके स्वामी होते हैं। पासनारूढ वीतराग प्रभुका या उनकी मूर्ति आदिका जो ध्यान किया जाता है वह सालम्बन और परमात्माके झान आदि शुद्ध गुणोंका या संसारीमात्माके थोपाधिक रूपको छोड कर उसके स्वाभाविक रूपका परमात्माके साथ तूलना पूर्वक ध्यान करना निरालम्पन ध्यान है; अर्थात् निरालम्बन ध्यान प्रात्माके तात्विक स्वरूपको देखनेकी निःसंग और अखंड लालमारूप है । ऐसी लालसा आपकश्रेणी सम्बन्धी दूसरे अपूर्वकरणके समय पाये जानेवाले धर्मसंन्यासरूप सा- मयंयोगसे होती है। हरिभद्रमरिने पोडशकमें पाणमोचनके एक रूपकके द्वारा मनालंपन ध्यानका स्वरूप समझाया है सो इस प्र.
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[१३८] है, इस सिद्धिम केवलनान और कालजानसे प्रयोग नामक योग मया परम निर्वाण क्रमशः होता है। सुलासा-मोहकी रागदेपरूप वृत्तियाँ पोसालिक अध्यासका परिणाम है और निरालम्बन ध्यानका विषय शुद्ध चैतन्य है। अतएव मोह और निरालम्पन घ्यान ये दोनों परस्पर विरोधी तच हैं। निरालम्बन ध्यानका प्रारम्म हुआ कि मोदकी जड कटने लगी, जिमको जनशास्त्रमें आप- करेणीका थारम्म कहते हैं। जब उक्त ध्यान पूर्ण अवस्था तक पहुँचता है तप मोहका पाशधन सर्वथा टूट जाता है, यही क्षपश्रेणीकी पूर्णाहुति है। महर्षि पतञ्जलिने जिम ध्यानको सम्प्रज्ञात कहा है यही जैनशावमें निरालम्बन ध्यान है । आपकश्रेणीके द्वारा सर्वथा वीतराग दशा प्रकट हो जाने पर प्रात्मवचका पूर्ण साक्षात्कार होता है, जो जैनशास्त्रमें केवलज्ञान और महर्षि पतञ्जलिकी भाषामें असम्प्रज्ञात योग कहलाता है । फेवलज्ञान हुआ कि मान- सिक धृत्तियाँ नष्ट हुई और पीछे एक ऐसी अयोग नामक योगावस्था आती है जिससे रहे-सहे वृत्तिके वीजरूप सूक्ष्म संस्कार भी जल जाते हैं, यही विदेह मुक्ति या परम निर्वाण है। ॥ समाप्त ॥
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[१३८] है, इस सिद्धिसे केवलज्ञान और केवलज्ञानसे अयोग नामक योग तथा परम निर्वाण क्रमशः होता है। खुलासा-मोहकी रागद्वेषरूप वृत्तियाँ पौगलिक अध्यासका परिणाम है और निरालम्बन ध्यानका विषय शुद्ध चैतन्य है । अतएव मोह और निरालम्बन ध्यान ये दोनों परस्पर विरोधी तत्व हैं। निरालम्बन ध्यानका प्रारम्भ हुआ कि मोहकी जड कटने लगी, जिसको जैनशास्त्रमें क्षप- कश्रेणीका थारम्भ कहते हैं। जब उक्त ध्यान पूर्ण अवस्था तक पहुँचता है तब मोहका पाशबंधन सर्वथा टूट जाता है, यही क्षपकश्रेणीकी पूर्णाहुति है। महर्षि पतञ्जलिने जिम ध्यानको सम्प्रज्ञात कहा है वही जैनशास्त्र में निरालम्मन ध्यान है । आपकश्रेणीके द्वारा सर्वथा वीतराग दशा प्रफट हो जाने पर प्रारमनचका पूर्ण साक्षात्कार होता है, जो जैनशास्त्र में केवलज्ञान और महर्षि पतअलिकी भाषामें श्रसम्प्रज्ञात योग कहलाता है। केवलनान हुआ कि मान- मिक पृनियाँ नष्ट हुई और पीछे एक ऐसी प्रयोग नामक योगावम्या पाती है जिसमे रहे-सहे वृत्तिके वीजरूप मूक्ष्म संस्कार भी जल जाते है, यही विदेह मुक्ति या परम निर्वाण है। !! समाप्त ॥
[१६] पोगसूति तपा योगविंशिकावृति प्रमाण- रूपसे आये हुए अवतरणोंका वर्ण- समानुसारी परिशिष्ट. नं०१ प्रह ७८ ९ भादतवालमा पार ८२ एपिशाधमोरया अनामोगल २ नागादिदरेतु अनाया ३, पता एवम्यानात् पिपिपा परमप. पमा मनाम घिय बरला मुलगा मा अगली पिजिही आगो चिपिहार आरि अमिमगम्मान ना आप आणद प्यमनादिम्या - आपम्पहाग ১০ ঘদিমশিয়াসাস प्राशयभंदा PINEMपामीनि उ उपवारिम्यानहर- गौरशिपदागात च भल दादाम ज मावि मतकाई रिममें माय अमरभूषगयाण उमाम रिमा [१४०] ७९ मा जाहविन्न जिनोदितमिति ओ जाणा अरिहते गोये कथमा म. याध सपः परममा ४४ । मवबीजमनन्तमुनित ण सफा रूपमाटुं नवाप्रतिष्ठितोऽयं तर तस्मातानुसा. साधिका पक्षपात- तुमतिः ३७ मुक्रयेण जोअणामो मूलमहत्यभिन्नाः य. ५७पापि मरममा ७८ पादरोक्ति परमः ७९ ययायासातिरापात परमविशाजनाची पदापीर्णमर्मविप्रः ७२ पमिपमान- पापन् शिवाल दिव्यभागाभिलाषण ধিমহলrি. प्रागामातदर्शन- पमंमगा:मना-मान न. प. लोहमामय काय प. बगनामिना गृति frylarov final मिल ग साधAM प्रNिIAIftar [१४१] सिधागरकार्य मुम्बमात्र मरता- सुदाम्पत्याचार मुलकारमपरार्थ- तोका आपण अमा- म्यामोगाम्का- ८४ ५९ दियारा मिपाहारा मयतानिवाक्षाणि मादापनादीनां मगयेष दिनराधियां ममाधिरेय एषाये: मामयोग्यता या मारम्बनी निराष्टम्च- मिरितार्म- ७८ .८ [१४२] योगसूत्रवृत्ति और योगविंशिकाटीकामें आये हुए प्रश्तरणों- का कर्ता और ग्रंयके नाम निर्देश संबंधी परिशिष्ट. २ * - (आप)- (आचारांगसूत्र पत्र ६) शीतोष्णीयाध्ययम (आचारांगगत) पत्र ३७ ॥ (भगवतगीता पत्र २५) गच्छाचार पत्र८०। महावादी- (सिद्धसेन दिवाकर)-(मार्जिशिका पत्र २९1) स्तुतिकारः-पत्र ३७ (प्रवचनसार) पत्र ८७.जोजाणा अरि'-गा-८४ माप्यकृत्- (प्रिमभप्रगणिभमाभ्रमण)-(विशेषावश्यक पत्र है।) महामाप्यकार- (मिनमद्रगणिभमाश्रमण)-(विशेषावश्यक पत्र ८६) A24म हमरा मतलब यह कि 3 मम्वनमें प्रसारने भाचार्य ११. ११ नही किया किन्तु हमने अानो आरमे स्रोश सपन रिपारे। • मनिवार सदमे प्रयकरको मिगेन अभिन? या मनमा इमरा मनीत नगा।
[१४३] - पतअलि- (पोगमूत्र पत्र १) भफलक-पत्र हरिम- (पोषिशिवा पत्र) अनादिविशिका पत्र मदमपिशिका पत्र १८॥ पागघिण्टु पत्र (६) ७ (१४)१२ (६३-४)१ ७२)। पौरशक पत्र १५ (५६-५७-५९) ६१-१ (८१-८२) ८३८८५)। पोगरसिमुपप-पत्र ७.५८४)। (यशोमद्रपरि )- चोरशराति पत्र । पशोविजय- वारवादीक्षा पत्र ।। पमेप्रति पनि पत्र साभार नरमरिया in a मलपाईनाम मालम्भमन्यनाम--- पुस्तक मिलनेका पता- आत्मानन्द जेन पुस्तक प्रचारक मण्डल. ठि. मेशन मुदला. माना शहर (य. पी. श्री जैन आरमानन्द सभा. ठि. मामानन्द भवन- मायनगर-(काटियामा).
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