Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
Navratnam Panchtikabhi Samlankritam
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-- गोस्वामिश्री १००८ श्रीगोविन्दलाल महाराज ॥ श्रीकृष्णाय नमः ॥ ॥ श्रीमद्राचार्यचरणकमलेभ्यो नमः ।। . ग्रन्थ-परिचय एक किवदन्ती के अनुसार नवरत्न ग्रन्थकी रचना श्रीमहाप्रभुने वि. स १५५८ मे अडलमे की थी ' यह ग्रन्थ खेरालुग्रामके गोविन्द दवे साचोराके लिए लिखा गया था प्रारम्भ मे ही गोविंद दवेको मनोवृत्ति वैराग्यप्रधान थी. अल्पवयमे ही ये अपने माता-पिताको छोडकर तीर्थयात्रार्थ द्वारका पहुच गये थे और बादमे वही रहने लग गये थे भावप्रकाशके अनुसार ये मर्यादापुष्टिके जीव थे और तदनुरूप इनकी द्वारकालीलामे आसक्ति अधिक थी. द्वारकाम्थ धोरणछोड. जीके स्वरूपमे भी अतएव इनकी अत्यधिक आसक्ति थी. अपने माता-पिता देहावसानके बाद ये श्राद्ध करने गया गये थ लौटते समय मागंम मनिकर्णिका घाटपर इनकी भट श्रीमहाप्रभुके साथ हुई दर्शन करते समय इन्हे इच्छा हुई कि श्रीमहाप्रभुके पास रहकर कुछ विद्यार्जन करे अनुमति मिलनेपर कहीमे व्याकरणको पोथी ले आये पर श्रीमहाप्रभुने मूल गीताके अध्यापन द्वारा ही सस्कृत भाषा, व्याकरण एवम् सिद्धान्त का भी ज्ञान इन्हें प्रदान कर दिया. इससे प्रभावित होकर ये पुष्टिमार्गमे दीक्षित हुए और आज्ञानुसार घर लोटवर भगवत्मेवामे प्रवृत्त होगये ८४ वैष्णवनको वार्ता के अनुसार- 'गोविन्द दूब घरम सेवा करे परन्तु मनमें बहुत विग्रह (व्यग्र) रहे सो मेवामें चित्त लागे नाही तव गोविन्द दूबे एक पत्र श्रीआचार्यजीको लिख-'महाराज। मेर मनम वहुत विग्रह रहत है भगवत्सेवामें वित्त लागत नाही मो कहा करू?' सो पत्र श्रीआचार्य- जीके पास आयो सो आप वाचिके नवरत्न अन्य करि लिख पठाये और लिखें 'यह नवरत्न ग्रन्थको पाठ किये तेरे मनको विग्रहता (व्यग्रता) मिटि जायेगी' सो पाठ करत श्रीआचार्यजीको कृपाते व्यग्रता--चिन्ता सप मिटि गई मन भगवत्सेवाम करन लागे १ पोशमायनो तवारीखालेख नागरदास बामणिया वैष्णववाणी अब ४ वर्ष १९७१ " इस प्रसगका निगूढ आशय श्रीहरिरायचरणने भावप्रकारा बहुत मुन्दर गब्दामें व्यक्त किया है-"गोविन्द दूबेरे मनम विग्रहता भई ताको अभिप्राय यह जो गोविन्द दूबे जीव तो द्वारिकालीला सम्बन्धी और सेवाभावना बजकी करे सो मन लागे नाही न राजलीलामें दृढता होई न व्रजलोलामें मो अनेक माधनमें मन दोरे जो तीर्थ करू के व्रत करू कोई जप करू इत्यादि मन भटके मो श्रीआचर्यजी महाप्रभु नवरन ग्रय लिखि पठाये- 'त चिन्ता मति करें चितकी उद्वेगता है यह प्रमुलीला जानि-श्रीठाकुरमे ते मन और ठोर जाये मोउ भगवदिच्छा मानि-चिन्ता मति करियो जितनी वने तितनी सेवा करियो तब गोविन्द दूबको मन स्थिर होगयो. जहा मन लौकिक वैदिक में जाई तो भगवदिच्छा माने. श्रीरनछोडजीमे मन वहोत जाई मो भगवदिच्छा माने उहाकी लीलामे मग्न रहे काहेते ? मात्र पुरान अनेक उपाई प्रभुमिलन के कहे है जीवको मिममात्र मार्ग दिखाये जो जहाको अधिकारी है वामे वाको मन स्वत सिद्ध लागत है ताते जैसे मनुष्य गेल चलिवेवारेका दम गामके मारग वताव परन्तु जारो जा गाम जानो होई सोई गाम जात है तैसे ही कोई भगवदीय द्वारा कोई गुरु द्वारा कोई ईश्वर द्वारा जैसो अधिकारी तसो सग पाय उही मार्गमे भाव वाको दृढ होत है सो गोविन्द दुवैको श्रीरणछोडजीमे दृढ भाव भयो पुष्टिप्रवाहमर्यादा ग्रन्थम मार्गभेदका निरूपण किया ही गया है मभी जीवोके मार्ग भित्र भित्र है स्वयम् पुष्टिमागमें भी भगवान पाम पहुचनेकी अनेक दिशा या मरणो है जिस दिशाम महजतया हम चल पाते हा उमो ओर हमारे चलनेका प्रयास निरायाम होता है अपने स्वभावके अनुरूप सहजतया जिस मार्गपर हम चल सकते है, उसे छोड़कर अन्यान्य फलोको कामनाक वश या मिया अनुकरणो मनोवृत्तिसे, जब हम अपने स्वभावविपरीत मार्ग- पर चलना चाहते है ता उम आयाममे चिन्ता उद्धा या व्यग्रता में मनका प्रस्त हो जाना स्वाभाविक बात है. पुष्टिपथके पथिक स्वयम् अपने म्वरूपका या अपन तंव्य स्वरूपका' अथवा अपने भजनीय भगवान स्वरूपमा चिनिन करें यह तो स्वभाविक तथा आवश्यक ही है इम चिन्तनका स्थान परन्तु अस्वाभाविक चिन्ता लेने लग जाये तो वह श्रीमहाप्रभुको नही मुहाता है क्योंकि चिन्ताका मूल हमारी आस्था भक्ति तथा स्वीकृति को मनोवृतिम न होकर अनास्था उद्विग्नता तथा अस्वीकृति की मनोवृत्तिमे होता है भगवान्को शरणागति स्वीकारनेके बाद सब कुछ ऐहिक या पारलौकिक भगवान्को समर्पित कर देना चाहिये. भगवान् तो सर्वज्ञ सर्वसमर्थ सर्वहितपी सर्वसुहृत् कर्ता-कारगिता अचिन्त्य लीला विहारी है इस भावभूमिपर सशय चिन्ता या प्रार्थना के विषेले अकुर फूट ही नही सकते जो कुछ घटित हो रहा है उसे लीलाबोधके साथ स्वीकारनेमे ही वास्तविक विवेक समाहित है भगवान्की कृपासे भगवत्सेवा या भगवत्कथा में जितना भी चित्त तन्मय होता चला जाये उसम अधिकाधिक आनन्द लेते जानेको मनोवृत्ति एक स्वस्थ स्वीकृतिको मनोवृत्ति है जबकि अनधिकार चेष्टाके द्वारा जो आदर्श तन्मयता हम प्रात नही हुई हो उसके वारेम चिन्ता या उद्वेग को मनोवृत्ति अस्वस्थ अस्वीकृतिकी मनोवृति है प्राप्तमे अधिकका मनोरथ अस्वाभाविक नहीं होता परन्तु अप्राप्त की चिन्ता या तज्जन्य उद्वग एक अस्वाभाविक मनोवृत्ति है इसी तरह लौकिक या वैदिक योगक्षम के बारे म भी निरन्तर चिन्ता करते रहना एक भक्तिविरोधी मनोभाव है अत भगवत्सेवामे प्रवृत्त होनेवाले पुष्टिजीवोको श्रीमहाप्रभु इस नवरत्न ग्रन्थके द्वारा सभी तरहको चिन्ताओसे मुक्त करना चाहते है वैदिक कर्मो के अनुष्ठानका अधिकार जैसे गायत्री मन्त्रके उपदेशग्रहण करनेसे मिलना है, वैसे ही पुष्टिमार्गम भगवल्मेवाका अधिकार ब्रह्मसम्बन्ध- को दीक्षारो प्राप्त होता है आत्मनिवेदनको मायंकना भगवत्सेवाके सम्पन्न होनेपर ही होती है अपने लौकिक व्यवहार भी आएव यावशक्य भगवान्को सेवाम उपयोग लाये हुए पदार्योंसे चलाने चाहिये इसम भी प्रयोजन पुन भावत्सेवामा निईन्द्व निर्वाह ही होना चाहिये भगवानको दानरूप किसी वस्नुके भेट करनेपर उसे पुन अपने उपयोगमे लाना वर्जित है पर निवेदितके समर्पणकी प्रकियामे किसी वस्तुको पुन अपने उपयोगम लाना वर्जित नहीं है प्रत्युत यही प्रकार अनुसरणीय है अन्यथा भगवान्को निवेदित अन आदिका भी प्रसादके रूपमे पुनर्ग्रहण वर्जित मानना पडगा जवकि सिद्धान्त- रहस्पमे असमर्पित वस्तु के त्यागका ही विवान किया गया है अत आत्म निवेदोके लिए यह सर्वथा उचित वात है कि प्रभुको समर्पित ममी वस्तुआना कमसे कम एकवार भगवान्की सेवामे पहले विनियोग करे और तर अपन उपभोगार्थ उसे ग्रहण करे इस नियमके पालनसे आत्मशुद्धि होती है परन्तु अन्न वस्त्र आदि वस्तुओके एकबार भगवान्को सेवामे काममें आ जानेपर दुवारा उन्हे जुटानेका प्रयास करना चाहिये कि नहीं? यदि नही करते तो आगे सेवाका भी स्वम्प नही निभ पायेगा और यदि करते है तो वह तो दुनियाको रोतके अनुसार ही करना पडेगा और उस उपार्जनकी प्रमियामे पुन ससारमे उलझना पडेगा तो सेवामे भी विघ्नको सम्भावना है इस तरह की चिन्ता भगवद्भक्तके मन में उठ सकती है. स्पष्ट है कि ऐसी चिन्ता स्वायरित नही होती किन्तु भगवत्सेवार्थ ही होती है पर श्रीमहा- प्रभु आशा करते है कि भक्तको न तो स्वार्थपूनिके लिए और न भगवत्मेवार्थ हो चिन्ता करनी चाहिये. आत्मनिवेदीके लिए यह आवश्यक है कि जीवनमें सुख-दुख जो भी आय उन्ह भगवदिच्छा मानकर सहजतया स्वीकार ले चिन्ता कदापि न करे लौकिक व्यवहारको निभानेके लिए लौकिक प्रयासोम व्याप्त होनेपर यह सम्भव है कि मर्यादामार्गीय वैराग्य न भी सिद्ध हो भगवान्ने, किन्तु, पुष्टिमार्गम हमारा अगीकार किया है अन प्रवाहमार्गीय लौकिर गति पुष्टिजीवकी होने नही देंगे, यह दृढ आस्या हमे रतनी चाहिये भगवत्सेवा निमानेके लिए व्यापार या नोकरो आदि करनेपर सम्भा- वित बहिर्मुखतामे बचने का उपाय है अपने आत्मनिवेदनको स्मृतिको बनाये रखना कि "मैं कृष्णका हू--- कृष्णका दास हू" किसी विषम स्थितिमे सेवा न निभ पाती हो तब भी अन्य आत्मनिवेदी भगवदीयोके सत्सगद्वारा इस आत्मनिवेदनको स्मृतिको बनाये रखना नितान्त आवश्यक है क्योकि यह रमृति मानरा-पटलपरसे मिटी और तुरत असुरावेशकी सम्भावना प्रवल हा जाती है आत्मनिवेदन करनेवाले सभी पुष्टिजोव चाहे वे उच्चकक्षा हो या निम्न कक्षाके सभी का सम्बन्ध तो दासके रूपमे भगवान्के साथ जुड हो गया है फिर चिन्ता किस वातकी ? भगवान हमारे स्वामी है वे जो भी निजेच्छासे करे वह हमें स्वीकार्य होना चाहिये. और फिर भगवान् तो भतरा भी है अत अपन भक्तोकी विकाररहित सारी मनोकामना भगवान् विना किसी प्रार्थनाकी अपेक्षा स्वयमेव पूर्ण करेगे. यह आस्था हमे रखनी चाहिये और चिन्तासे छुटकारा पाना चाहिये आत्मनिवेदन तो हम भगवान्को करते है पर सेवा तो हमे अपने स्त्री- पुत्र-परिवारकी भी करनी ही पड़ती है ऐसी चिन्ता भी आत्मनिवेदीको नही करनी चाहिये. क्योकि ब्रह्मसम्बन्ध दीक्षाके समय हम केवल अपना ही नही अपितु सम्पूर्ण परिवारका भी भगवान्को समर्पण कर देने है अतः हमसे सम्बन्धित सभी कुछ प्रभुका अर्थात् ब्रह्मसे सम्बन्धित हो जाता है अत. उनका भरण-पोषण या सरक्षण भक्तिविरोधी भाव या व्यवहार नहीं गिना जाता. फिर चिन्ता क्यो करनी चाहिये ? परिवारके सदस्य यथा पति-पत्नी माता-पिता या सन्तति आदि, यदि भगवत्सेवामे सहायक न होकर अन्यान्य सासरिक कार्यो में व्यस्त रहते हो, तब भी चिन्ता नहीं करनी चाहिये क्योकि हमारा कर्तव्य है उन्हें प्रभुको समर्पित करना सो वह कर देनेपर सव कुछ भगवदिच्छापर अवलम्बित है कि कव वे उन्हे अपनी सेवामे काममे लाये सहज सद्भाव तथा प्रेरणा से उन्हें भगव- सेवामे प्रवृत्त कराया जा सकता हो तो अच्छी बात है अन्यथा उनकी भगवत्सेवामें रूचि या प्रवृत्ति न दिखलायी पडती हो तो व्यर्थ चिन्ता कलह या क्लेश करना भक्तिविरोधी भाव है कभी यह भी सम्भव है कि हमे ऐसे व्यक्तियोके काम आना पडे जिनके वारेमे ब्रह्मसम्बन्ध लेते समय उन्हे भगवान्को समर्पित करनेका मनोभाव हमारे अन्दर सर्वथा न हो पर इससे चिन्तित होनेको आवश्यकता नहीं है क्योकि एक वार सर्वात्मना प्रभुके प्रति समर्पित हो जानेपर, चाहे वह समर्पण ज्ञानपूर्वक न भी हो परन्तु चिन्ताका कोई कारण रह नही जाता कभी-कभी हमें विश्वास नहीं होता कि हमारे आत्मनिवेदनको प्रभुने सुना कि नहीं हमने तो राव कुछ समर्पित कर दिया पर भगवान्ने उसे स्वीकारा कि नहीं यह चिन्ता भी निरर्थक है क्योकि श्रीकृष्ण तो पुष्टि- पुरषोतम है अत जैसे व्रजभक्तोका अन्याश्रय छुडाकर स्वयमेव अपने भजनम उन्हे प्रवृत्त करते है, वैसे ही जब और जिस क्षण वह अपने भजनमे हमे प्रवृत्त करना चाहेगे उस क्षण स्वत ही हमारा तथा हमसे सम्बन्धित सभी वस्तु या व्यक्ति का उनको सेवामे विनियोग अनायास सम्मन्न हो जायेगा यदि भग- वदिच्छा पुष्टिमार्गमे हमारे अगोकारको न हो तो हम आत्मनिवेदन भी नही कर पायेंगे प्रभु तो सर्वसमर्थ है अत हमारो सारी अयोग्यताओको दूर कर विना किसी साधनकी अपेक्षाके हमे योग्य भी बना सकते है अत हम निवे- दन या समर्पण के योग्य है कि नही ऐसो चिन्ता भी पुष्ट्रिभक्तको नहीं करनी चाहिये जब लौकिक व्यापार आदिमे कोई कठिनाई उपस्थित हो या वैदिक वर्गा- श्रम धर्मके पालनमे कोई कठिनाई उपस्थित हो, तब भो विना नहीं करनी चाहिये प्रत्युत यह समझना चाहिये कि भगवान् अधिकाधिक भक्तिमार्गपर अग्रसर होने का अवसर हमारे सामने उपस्थित कर रहे है आओ ! मारे पुष्टिजीव आओ। और ऐसो विषम स्थितिमे भी अपनी पुष्टिभक्तिको निभानेका यत्न करो लौकिक या वैदिक व्यवहारोमें स्वास्थ्यका क्या मूल्य यदि पुष्टि भक्तिका स्वास्थ्य न हो ? भगवान् यदि लौकिक दृष्टिसे या वैदिक दृष्टिसे कुछ विषमस्थिति हमारे सम्मुख उपस्थित करते हो तो निश्चिन्त होकर उन्हें सहन कर लेना चाहिये क्योकि सभवत इसी तरह भग- वान् हमे पुष्टिमार्गपर अग्रसर करना चाहते हो भक्तिको प्रारम्भिक अवस्थाम गुरूकी आज्ञाके अनुसार ही भगवरसेवा करनी चाहिये परन्तु भगवदिच्छावश या भगवदाज्ञावश मेवाके प्रकारमे कुछ भिन्नता भी आ जाये तो चिन्ताको कोई बात नही है गुरूकी आज्ञाके अनुसार हो अथवा भगवान्की आज्ञाके अनुसार हो जैसे भी कृष्णसेवाम तत्परता वढतो चली जाये वही जीवनप्रणाली मुखप्रद होती है निश्चिन्तताके इन सारे सिद्धान्तोको जानने के बावजूद भी कभी भी पारि- वारिक कष्ट व्यक्तिको झरझोर देता है उदाहरणतया पुत्र पनि या पत्नी के वियोग होनेपर मनस्ताप हो ही जाता है पर जो भी कुछ घटित होता है उमे भगवल्लीलाके बोधके माय सहनतया म्वोकार लेनको मनोवृत्ति सम्पादित करनी चाहिये चिन्ता उद्धा या मनस्ताप से जितनी भी जन्दो छुटकारा पाया जा सके उमे पानेको मनोवृत्ति रखनी चाहिये भक्तिके नो मोरान दिपलाय गय है-श्रवण कीर्तन म्मरण पादपवन अर्चन वन्दन दाम्प मस्य और आत्मनिवेदन इनम अपेक्षित प्रारम प्रवग वीर्तन जमे प्राथमिक मोपानापर भी आरोहण करना एक बठिन कार्य है तो अन्तिम सोपान आत्मनिवेदन और उसके बाद प्राप्त होनेवाली निश्चिन्तता- की मानसिक अवस्थाका लाभ तो अत्यधिक कठिन लगता है ! परन्तु आव- श्यकता इस कठिनताके विचारसे चिन्ताको नही प्रत्युत सर्वात्मना शरणागतिके मनोभावको बनाये रखने को है ऐसी निरर्थक चिन्ताओमे जितने समय तथा मनोयोग का व्यय हो जाता है, उनने समय तथा उतने मनोयोगसे निरन्तर "श्रीकृष्ण शरण मम" कहते रहे तो बात बन सकती है यह आश्वासन --यह अभिमत केवल गोविन्द दूबेके लिए नही अपितु सभी पुष्टिजीवोको श्रीमहाप्रभु दे रहे है भगवद्-विप्रयोगको स्नेहात्मिका अनुभूतिमे पुष्टिजीवका कृश होना तो परमपुष्टि है - "तिहारे सेवक ऐसे कृश पो ? बरजे हते पर मारगमे आये ताको फल पाय रहे है !" यह कृशता तो पुष्टिभक्तिके स्थायिभावका एक रोचक सञ्चारिभाव है अत रसवर्धक भी है पर भक्तिके स्थापिभावके विपरीत चिन्ता या उद्वग रसाभास पैदा करते है. रसामास पैदा करनेवाले चिन्ताके इन्ही विविध प्रकारोमे से कुछ प्रकारोको यहा सूचित किया गया है श्रीमहाप्रभु पुष्टिभक्तके मानसको इनसे दूपित होने से बचाना चाहते है ताकि कृष्णसेवा तनु-वित्तजासे मानसी सेवाके रूपमे विकसित हो पाये -~-आत्मनिवेदनका बीजभाव भगवत्प्रेममे अकुरित हो पाय- भगवदासक्तिमे पल्लवित हो पाये और अन्तत भगवद्-व्यसनमे वह फलित हो जाये। प्रस्तुत सस्करण वि स १९८१ मे श्रीमूलचन्द्र तुलसीदास तेलोवाला तथा श्रीधीरजलाल ब्रजदास सोकलिया द्वारा सम्पादित-प्रकाशित सस्करणका ऑफसेट प्रॉसस द्वारा पुनर्मुद्रित रूप है इस पुन प्रकाशनके अवसरपर हम इन महानुभावोका कृतज्ञापूर्वक स्मरण करते है.
Y તેવા જ કોઈ બાલકે લાલૂભટ્ટજીની માફક પોતાને અસગતિ પ્રતીત થતા અર્થ ઘટાવવાને આ પક્તિ ઉમેરી પણ હોય ગમે તેમ હોય તો પણ મા કૉઉસની પક્તિથી પ્રકાશનો અર્થ બધ બેસી રહે છે, અને તેથી લાલૂદજીનો પ્રયત્ન ઐતિહાસિક વૃષ્ટિએજ ઉપયોગી લાગે છે નવરતના યાવ...ાપ્ય સંસ્કૃત સાહિત્યનો સંગ્રહ કરી ધી અન્ન પ્રકટ કર્યું છે શ્રીગુસાઈજીનો નવરપ્રકાશ પ્રાચીન શુદ્ધ દશેક પ્રતિ ઉપરથી શોધી પ્રકટ કર્યો છે શ્રી પુરુષોત્તમજીની નવરતપ્રકાશવિવૃતિ તથા કાકા શ્રીવલ્લભજીની નવરતપ્રકાશ ટીકા પણ બહુ સારી પ્રાચીન પ્રતિઓના આધારે શોધી છપાવી છે શ્રી મુરલીધરભ. છની ટીકા માત્ર બે પ્રતિ ઉપરથી છપાવી છે આ ટીકાની શોધમાં અમે બહુ શ્રમ લીધો છે, તો પણ અમને તનુશ્રણમા સવ થયો નથી આ થીમુરલીધરભટ્ટજી કોણ અને ક્યારે થયા તે પણ અમને સાત યુ નથી આ સંસ્કૃત સાહિત્ય અમને ગદૃલાલાજીના પુસ્તસગ્રહમાથી, પોરબંદરવાલા શ્રી રણછોડલાલજી, સુરતવાળા શ્રી વ્રજરતજી, શાસ્ત્રીજી મુખ્યા ગોકુલદાસજી તથા શાસ્ત્રી ચીમનલાલ આદિ તરફથી મળ્યું છેઆ સર્વનો અમારા ઉપર પરમ ઉપકાર થયો છે શ્રવણ કર્યું છે કે શ્રીગોકુલેશે નવરત ઉપર ટીકા લખી છે, તથાપિ તેનું દર્શન કરવાનું સૌભાગ્ય અને સ્થાપ્તિ પણ થયુ નથી સંભવ છે કે શ્રીગુસાઈજીની નિવૃતિમા આપે કવચિત્ ઉમેરો કર્યો હોય એવો કોઈ ઉમેરો એ વિવૃતિમાં પાછળથી થયો છે એમા તે સદેહ નથી એવો એક ઉમેરો જે અમને મળે તે અમે ટિપ્પણમાં સૂક્ષ્મ અક્ષરમાં છાપ્યો છે, દ્રવ્ય આપનાર શેડ કરાણ તથા ઉપર જણાવેલા શ્રી સ્વામિ બાલકો તથા વિદ્વાનોને સાહાયથી આ પરમ પ્રેમ અને પરિશ્રમથી સિદ્ધ થયેલો ગ્રન્થ શ્રીમત્રભુચરણ કમલમાં સમપએ છીએ ૫ ૫ ૬ દોલોત્સવ ૧૯૮૧ } મૂલચ તેલીવાલા, પૈયેલાલ સાંકલીઆ, મુબઈ ॥ श्रीकृष्णाय नम ॥ ॥ श्रीगोपीजनवल्लभाय नम ॥ ॥ श्रीमदाचार्यचरणकमलेभ्यो नम ॥ नवरत्नम्। चिन्ता कापि न कार्या निवेदितात्मभि कदापीति'। भगवानपि पुष्टिस्थो न करिष्यति लौकिकी च गतिम् ॥१॥ निवेदन तु स्मर्तव्य सर्वधा तादृशौर्जनै । सर्वेश्वरश्च सर्वात्मा निजेच्छात करिष्यति ॥२॥ सर्वेपा भभुसम्बन्धो न प्रत्यकमिति स्थिति । अतोऽन्यविनियागेऽपि चिन्ता का स्वस्य साऽपि चत् ॥३॥ अज्ञानादथवा ज्ञानात् कृतमात्मनिवेदनम् । यै कृष्णसात्कृतप्राणैस्तेषा का परिदेवना ॥४॥ तथा निवेदन चिन्ता त्याज्या श्रीपुरुषोत्तमे। विनियोगऽपि सा त्याज्या समर्थो हि हरि स्वत ॥५॥ लोके स्वास्थ्य तथा वदे हरिस्तु न करिष्यति । पुष्टिमार्गस्थितो यस्मात् साक्षिणो भवताखिला ॥६|| सेवाकृतिगुरोराज्ञा पाधन' या हरीच्छया। अत सेवापर चित्त विधाय स्थीयतां सुखम् ||७|| चित्तोडेग विधायापि हरियद्यत्करिष्यति । तथैव तस्य शैलेति मत्वा चिन्ता द्रुत त्यजेत् ॥८॥ तस्मात् सर्वात्मना नित्य श्रीकृष्ण शरण मम । चदद्भिरेव मतत स्यमित्येष म मति ॥१॥ इति श्रीमदल्लभाचार्यचरणप्रकटित नवरत्न समाप्तम् ॥ इति रहितोऽपि पाठ क्वचिन् व पति श्रीमुरीधरमसमन पार । इति धापिका गोऽपि। ४ एव इत्यपि पाठ गोप्रभुचरणानामिर । श्रीमुररीधरभट्टाना । २ १ ३ भवाधनम् धीकृष्णाय नमः। नवरत्नम्। श्रीविठ्ठलेश्वरविरचितप्रकाशसमेतम् । चिन्तासन्तानहन्तारो यत्पदाम्बुजरेणवः । स्वीयानां तान् निजाचार्यान् प्रणमामि मुहुर्मुहुः ॥१॥ श्रीमत्पुरुषोत्तमकृतविवृतिप्रकाशसमेतम् । नत्वा श्रीवल्लभाचार्यान् प्रभून् श्रीपिछलेश्वरान् । नवरवप्रकाशे यास्तद्वाचस्ता उपायहे ॥१॥ अथ श्रीमदाचार्यचरणाः सिद्धान्तरहस आत्मनिवेदिनामुत्तरपूर्वापाश्लेपविनाशोपा- यस्य भगवतोक्तत्वेपि तत्रोक्तस्य प्रकारस्य भोगसाधकतया अलौकिकभोगानुगुणत्वमेव, न तु सेपातिपयकनियफिल्मीि िनदाफे सेकपा आधिदैविकीत्वामा तस्मिन् सति तत्त्र- वणचेतोरूपमानसीसेवाया असंभवं चालोच्य, कालप्रारब्धस्वभावैरभीक्ष्णं जन्यमाना- नामुद्रेगादीनां निवृत्यर्थ सेवाफलग्रन्थविवरणे च 'सविधत्वादल्पत्वाद्भोगस्त्याज्य' इति लौकिकमोगनिवृत्तौ तस्वरूपविचारस्यैव तन्निवृत्त्युपायत्वेनोक्तत्वात् साधारणप्रतिबन्धनिवृत्ती च तन आयो बुद्ध्या त्याज्य' इत्यनेन बुद्धिमात्रस्यैवोपायत्वेन कथनादुद्वेगनिवृत्तौ च कस्यापि साधनस्याकथनात् , किश्चित् साधनं बुद्धिविशेषरूपं वक्तव्यम्, यद्यपि अतत्त्वनिर्धारावि- वेकयोः प्रतिबन्धसाधकत्वकथनेन तातियोगिनोस्तत्त्वनिर्धारविवेकयोः सर्वप्रतिबन्धनिवृ- तिसाधनत्व सूचितम् , तथापि तत्त्वनिर्धारस्वरूपस्य सझेपतः कुत्राप्यतुक्तत्वाद्विवेकधैर्या- श्रये विवेकखरूपस्योक्तखेपि आश्रयशेपत्वेनोकतया सेवाशेषत्वेनानुक्तत्वात् सेवाया आधि- दैविकीलसम्पत्त्यर्थं प्रतिबन्धकत्रयनाशहेतुं सङ्केपेण वदिष्यन्तो, हेतुनाशे कार्यनाशात् तद्धे- तुभूतचिन्तानाशकमुपायमुपदिशन्तीत्यनुसन्दधानाः श्रीमत्प्रभुचरणाः नवरत्नं व्याचिकी- पन्तः, तत्र चिन्ताया अकरणस्य आज्ञसत्वात् स्वभावतः प्राप्तायाचिन्ताया अनिवार्यतात् तस्वरूपमन्यनिश्चित्स तनिकृत्युपायमुपदिशन्तो मङ्गलमाचरन्ति चिन्तेत्यादि । चिन्ता- शब्दः स्मरणाख्ये मनोव्यापारे योगरूढः । चिति स्मृत्यामियतो भावेऽडि कृते चिन्तापद- सिद्धः। 'साचिन्ता स्मृतिराध्यानमिति कोशाच । सा तु प्रयनमन्तरेणापि, सदृशादृष्टचि- न्तायैः तदीजवोपकैः तदा तदा सम्भवन्ती न निवारयितुं शक्या । किच, तस्याः सर्वस्या अकरणे निवेदनं तु सर्तव्य'मिसगिमग्रन्यस्यापि विरोध इति सान न निषिध्यलेन विवक्षिता, किन्तु शास्त्रेषु प्रस्तूयमाने विचारे 'अयेदं चिन्त्यत' इत्यादिप्रयोगदर्शनाद्वि- चारापरनामा सप्रयत्नः स्मरणविशेषश्चिन्ता, तस्या अपि पोऽवस्थाविशेषतोऽवान्तरवि- १. पिनारयितु मिति पाठ ।
२ , श्रीविदलेश्वरविरचिवप्रकाशसमेतम् । ननु भगवदीयाना कथ चिन्तोद्भवः । इत्यम् । आत्मनिवेदिनो हि भगवद्भजनार्दा , नेतरे । तत्र चैहिकपारलौकिकयोरययोन वशिष्ट किधिदसमर्पितम् । एव सति देहादिनि- धोह केन कार्यः, किं निवेदितार्थेन, उत इतरेण वा । तर नाय । तदीयार्थस तदिच्छा विना ग्रहीतुमशक्यत्वात्, इच्छायाश्च ज्ञातुमशक्यत्वात् । वस्तुतस्विन्छायामपि सत्या सदुपयोगोऽनुचितः सेवकस्य । न च तदीयाना देहादीना तदीयार्थेन पोषण न दोषानि श्रीमत्पुरुषोत्तमकृतविदृतिप्रकाशसमेतम् । शेष , 'एवमापन्नस्स मे किं स्यादित्याकारक , सोऽत्र चिन्तापदेन परामृश्यते । तसा सन्तान. परम्परा, तद्धन्तारो निवारका यत्पदाम्बुजरेगवस्तान् निजाचार्यान् मुहुर्मुहुः यदा यदा तत्सम्भव , तदा तदा तन्निवृत्यर्थ प्रकर्षण कायवामनसेन नमामीत्यर्थ । तेन तदीयाना प्रथमत इदमेव तन्निवृत्तिसाधनमिति घोधितम् । अत पर व्याख्येयग्रन्थे चिन्ताया अकरणस्य निवेदितात्मधर्मत्वेनोक्तवादा सम्बन्धकरणरूपस्य निवेदनस चार भगवद्धीचरणाधिकारस्वेन विवक्षितत्वात् तेन भगवदीयले सति यथा चिन्तोद्भवस्त प्रकारं ग्रन्थावतरणा पृच्छति नन्वित्यादि । सिद्धान्तरहस्से ब्रह्मसम्मन्धकरणात् सर्वदोषनिवृत्तेरसमर्पितवर्जनेन च भाविदोषाससर्गस्य च्यवहारानुरोधिगौणधर्मोपदेशेन लौकिकालौकिकनिर्वाहप्रकारस चोक्तत्वात् तद्रीसाऽभीषण मगवन्तमनुसन्दधानानामैहिकामुब्मिकचिन्ताहेतोनिरस्तत्वात् केन प्रकारेण चिन्तोद्भवो यनिवृत्यर्थ नवरलकरणमित्सर्थ । एष साभिप्रायप्रश्नमुखेन तादृशा चिन्तोद्भवे आक्षिसे तेषा यादृचिन्तोद्भवस्त प्रकार वक्तु निवेदनस्याधिकाररूपतायास्तत्पकारस्य च कुत्रापि प्रकरणग्रन्थेष्वनुत्तत्वातप्रकारकथनादिना तदावश्यकत्व च दृढीकर्तुं येषा न लौकिकी चिन्ता, ते भगवदीया इनि तेपा खरूपयोधनाय प्रथमत पुर स्फूर्तिक चिन्तोद्भवप्रकार वदिष्यन्तस्तत्र हेतु विकल्पयन्ति इत्थमित्यादि । तयाच । सिद्धान्तरहस्सोक्तरीत्या चिन्ताया असम्भवेपि शरीरादियानानिर्वाहप्रकारस्य तत्रानुक्तत्वादनन्याश्चिन्तयन्तो मा ये जना पर्युपासते । तेपा नित्याभियुक्ताना योगक्षेम वहाम्यहमिति भगवदुक्ते निर्वाहप्रकारे प्रासयोक्तविकल्पात्मकहेतोर्वशाचिन्ता सम्भवतीति तनिवृत्पर्य अन्यकरणमित्यर्थः । एव सम्मवहेतु विकल्प्याद्य परिहरन्ति तत्रेत्यादि । आप निवेदितेनैव निर्वाह कार्य इति पक्षो न युज्यते । तत्र हेतुस्तदीयार्थस्येत्यादि । नन्वेकादशोनविंश आत्मनिवेदिना धर्मा 'श्रद्धा- मृतकयाया म' इत्यादिनोपदिष्टा , ते प शरीरसितिमन्तरेणानुपपद्यमानास्तहेतुमाक्षिपन्तो निवेदितेनैव निर्वाहमाक्षिपन्तीति नेच्छापा ज्ञातुमशक्यत्वमित्यत आहु वस्तुत इत्यादि । मनुचित इति । भगवद्वाक्यतात्पर्यज्ञानाभावादनुचित । सेयकस्येति । हेतुगर्भ विशेषणम् । तथा चेच्छाडानेपि प्रत्यक्षाज्ञाभावेन स्वतस्तथाकरणे भक्तिमार्गविरुद्धस खातपस्स सम्भवादनुचित इत्यर्थ । पुन प्रकारान्तरेणौचित्यमाशय परिदरन्ति न घेत्यादि । दोपावहत्वादिति । देहादेर्भगवदीयत्वेपि तत्र खत्वाभिमानस्सानपेतत्वेन नवरत्नम्। ३ वाच्यम् । स्वतस्तथाकृतेोपावहत्वात्तदिच्छायाश्च ज्ञातुमशक्यवादित्युक्तम् । न द्वित्तीयः, अखधर्मत्वात् । निवेदितस्यार्थस्य खिलायर्थ स्वस्थ विचारसाप्यनुचितत्वात् । तदगि- माने तत्सम्भवात् । एव सति देहादिनाशसम्भवेन भजनासम्भवात्तद्वैयर्थ्यापातः । मार्ग एवं चायमुन्छियेत । अतो निवेदने भजनाधिकारः, तस्मिन् सति तदनिर्वाह इत्युभयतः- पाशा रजुरिति चेत् । अत्र वदामः । 'दारान् सुतान् गृहान् प्राणान् यत्परस्मै निवेदनम् । एव श्रीम पुरुषोत्तमकृतविवृतिप्रकाशसभेतम् । तथात्वादित्यर्थः । द्वितीय परिहरन्ति न द्वितीय इयादि । तर हेतु. अस्वधर्मस्वा- दिति । तदुपपादयन्ति निवेदितस्येत्यादि । भगवता ह्यात्मसमर्पणमिदं स्वत्वाभिमानत्यागा- धमेवाधिकारिविशेषणतयोपदिष्टम् । तत्पूर्वकमेव सेवाकरणस्य महद्विमृग्यमन्युत्कृष्टका- रणत्वात् । अन्यथा अनोक्ताना पूर्वमेकादशाध्यायेप्युक्तत्वादनोक्तेषु विशेषामा उत्कृष्ट- कारणत्वप्रतिज्ञान विरुद्ध स्यात् । उत्कृष्यत्व बनानन्यथासिद्धत्वमेव । नत्वन्यत् । तथा सति पूर्वोकेष्वेतत्कारणत्वाभावप्रसङ्गात् । न चेष्टापत्ति । तथा सत्येतेषु परत्वोक्तविरो- धप्रसङ्गादिति । अतो यथान्यस्मिनिवेदितेऽय नाभिमन्यते, तथा देहादावपि युक्तम् । तपयनिवेदितेन देहादिनिर्वाह चिन्तयेत् , तदा स्खलाद्यभिमानदायापत्त्या स्वखधर्मों पाध्येतेति स्वधर्मविरोधेन तथात्वादित्यर्थः । एव हेतुद्वय परिहत्य यथाचिन्तोद्भवस्त प्रका- रमाहुः एवं सतीत्यादि । एव देहादिनिर्वाहप्रकारद्वये चाधिते सति देहादेस्तथात्वेन भजना. सभवानिवेदनवैययं पुष्टिमर्यादात्मकभक्तिमार्गोच्छेदश्चेति भगवता भत्त्यधिकारवाक्य भक्ति- परमकारणवाक्ये किमभिप्रायेणोक्तम् । ततश्च तदर्थज्ञानासम्भवे तदुक्तकरणस्यापि प्यङ्गत्वा. स्कथं परमभक्तिलाभ इत्येव तत्सम्भव इत्यर्थः । एव चिन्तासम्भवच्युत्सादनमुखेनात्मनिवेदन- स्यावश्यक आक्षिप्ते प्रमाणपुर सर तदावश्यकत्व साधयन्त उभयतःपाश परिहरन्ति अत्रे त्यादि । इह दारानितिवाक्यमेकादशे प्रबुद्धेन 'तत्र भागवतान् धर्मान् शिक्षेनुर्वात्मदैवतम् । अमाययानुवृत्या यैस्तुष्येदात्मात्मदो हरि रिति भगवत्तोपहेतून् धर्मानुपक्रम्य तर पठितम् । दारादीनालक्ष्य यत् परमेश्वराय निवेदन तदुपयोगितया समर्पण तत् शिक्षेदिति तप- पदसम्बन्धादारादिनिवेदनस भगवत्तोपहेतुत्व बोधयति । द्वितीय तु भगवता भक्तिपरम- कारणमुपक्रम्य तदधिकारिविशेषणबोधनाय पठितमिति तर तदावश्यकता बोधयति । भादिपदेन 'दासनात्मनिवेदन मिति भगवद्वाक्य स्वगोत्रवितात्मसमर्पणेन चेति बल्याचार- पोपकवाक्य च सजायते । अत एतादृशैक्यैि स्वसर्वस्वसहितात्मसमर्पण भक्तिमार्ग आवश्यकम् । तर हेतुईष्टान्तय साक्षादित्यादिना स्फुटीक्रियते । न चैव धमै' रितिवाक्ये स्वकृतधर्मापेक्षया मनुष्यत्वस पूर्ववतिलेन तन तेषां हेतुतयाऽनन्वयेप्यात्मनिवेदिनामिति तद्विशेषण प्रति हेतुत्वस सुवचत्वात प्रत्येव तेषां हेतुल तस भक्तिं प्रतीतिप्रतीत स्फुट• त्वादामनिवेदनस धर्मकरण प्रत्यधिकारत्वमयुक्तमिति शक्ष्यम् । साक्षात् क्रियान्वयं विहायैवं कल्पने बीजाभावात् । धर्माणा तत्रोपक्षये आत्मनिवेदनोत्तर तदकरणप्रसमात् । १ सत्य धर्म इति पाठ । ।
श्रीविठ्ठलेश्वरविरचितप्रकाशसमेवम् । धर्मनुष्याणामुद्धवात्मनिवेदिनाम् । मयि सजायते भक्तिः कोन्योर्थोसावशिष्यत' इत्यादि- वाक्यम्तदावश्यकम् , साक्षात् श्रीगोकुलेशभजनाधिकाररूपत्वात् , द्विजस्य वैदिककर्मणि गायन्युपदेशजसंस्कारवत् । (निवेदनस सार्थकत्वाय भजनसिद्धयर्थमावश्यकव्यवहारार्य निवेदितस्यैव स्वार्थ विनियोगः कार्यः1) अन्यथा दारपरिग्रहोत्तरक्षण एव तन्निवेदनेऽकृतेऽग्रे तदविनियोगे प्रासे तत्परिग्रहवैयपित्तिः । अपरंच । दाने हि न स्वविनियोगो, न तु निवेदने । अन्यथा निवेदितानादेोजनं न स्यात् । अनिवेदितस्य निषिद्धत्वात् । श्रीमरपुरुषोत्तमकृतविवृतिप्रकाशसमेतम् । दास्पेनात्मनिवेदनस्य प्रागुकत्वेन दास्सापेक्षया न्यूनश्रद्धादिधर्मजन्यात्मनिवेदनस्यात्र पर- खोक्ते(जानुपलम्भाच । तस्मादात्मनिवेदनस्साधिकारत्वायैवमुक्तिरिति निश्चय इति बोध्यम् । तथा च त्रैवर्णिकत्वेन सत्यामपि स्वरूपयोग्यतायामुपनयनं विना वैदिककर्मणि यथा नाधिकारः, तथा 'देवोऽसुरोति को नु राजनिन्द्रियवा' निति घ वाक्यात् खरू- पयोग्यत्वेपि निवेदनं विना विवक्षितभक्तो नाधिकार इति सिध्यति । एवं निवेदनखरू- पस्यानवगमे भजनासिद्धि स्फुटीकुर्वन्ति अन्यथेत्यादि । यदि भगवद्वाक्यस्थे आत्मनि- वेदिपदे दारायामा न समृधेत, तदा दारपरिग्रहोतरक्षण एव तया तदात्मनिवेदने अकृते तस्या आत्मनिवेदित्वाभावादनधिकारेणाने सेवायां तदविनियोगे प्राप्ते तत्परिग्रहदैय- पित्तिरत उक्तरीत्या तज्ज्ञानमावश्यकमित्यर्थः । तथा च यथा गायन्युपदेशजनित उप- नयनसंस्कारः प्रतिपुरुष भवंस्तस्य तस्य वैदिककर्मोपकारकदेहादिनिर्वाहप्रयोजकमिक्षादि- कर्मणां न प्रतिरोधकः, तथोक्तरीत्या निवेदनरूपः संस्कारोपि भजनोपकारकदेहादि- निर्वाहप्रयोजकस्य निवेदितोपयोगम्प न प्रतिरोधक इति नोभयतःपाशारजुरित्यर्थः । अत्र दारपदं चेतनयोः पुत्रासयोरप्युपरक्षकम् । उत्तरक्षणपदं चावश्यकत्वपरम् । न लन्य- वहितोत्तरत्वपरम् । अशक्योपदेशन्वापादकत्वात् । अथवा । उत्तरक्षण एव तद्वैयर्थ्या- पतिरिति योजना, तेन न कोपि दोपः । एवं चोक्तवाफ्यद्वयविचारे दारादिनिवेदनं खात्मना सह क्रियमाणं पृथक धर्मरूपम्, दारादिभिः खयं क्रियमाणं त्वधिकाररूप- मिति सिध्यतीति । एकेन खसर्वखनिवेदने तेषां निवेदितवेपि तेषां खखसंस्काराय पृथक् तकरणं युज्यते । तस्मात्सृष्टूक्तं अन्यथा तत्परिग्रहवैयपित्तिरिति । ननु भवत्वे- वमिच्छाज्ञानेनोभयतःपाशनिवृत्तिः, तथाप्यानाऽमारे सतस्तथाकरणे यो दोषः, स कथं निवर्तेतेत्यत आहुः अपरं चेत्यादि । दानं नाम खत्वपरित्यागपूर्वकः परखस्योत्पादना- नुकूला, 'तुम्पमह सम्प्रददे न मम', इत्यादिशन्दाभिव्यश्यो मनोव्यापारः । तस्मिन कृते सति हि निश्चयेन न खविनियोगः । दत्तापहारदोषोत्पादकत्वात् । निवेदनं तु तदीयस्वानु- सन्धानपूर्वकः स्वत्वामिमानत्यागानुकूलः 'तुभ्यं समर्पयामि, निवेद्यामी'त्यादिशब्दामिव्यान- दिलक्षणो मनोव्यापारः । तस्मिन्कृते तु न खविनियोगो दोपाय । दत्तापहारदोषानु- सादकत्वात् । तत्र गमकमातुः अन्यथेत्यादि । यदि सत्तत्यागपरस्खस्योत्पत्त्यानुरत्य- 1.0 मास्ति वापुसके।
नवरगम् । निवेदितानामर्थानां भगवद्भोगार्थ विनियोगे जाते तद्दत्तप्रसादत्वेन खोपभोगकृतिरुचिततरा, दासधर्मत्वात् । 'उच्छिष्पभोजिनो दासा' इलादिवास्पैः । आत्मशोषकत्वाच । किन्तु प्रभौ निवेदितार्थस्स विनियोगे जातेऽने तदर्थ यत्नः कार्यों, नवेति भवति चिन्ता । *तत्करणे बाहिर्मुख्यसम्भवः सेवाप्रतिबन्धश्च । 'चैवर्णिकायासे'तिवास्यात् भगवत्कृतप्रतिवन्धश्य तब सात् । अकरणे निवेद्याभावेन भवति च दुःखम् । एवंभूतान् खानुपदिशन्ति चिन्ता कापिन कार्यति । श्रीमत्पुरुषोत्तमकुवधिवृतिप्रकाशसमेतम् । योर्दाने निवेदने च तुल्यतायामपि कश्चिद्विशेषो न स्यात्, तदा पुराणेष्वनिवेदिवस निपिद्धत्वानिवेदितानादेर्भोजनं नोकं स्यात् । ततूच्यते । तथा हि । हरिवल्लभसुधोदये ससान्दे 'नवेधशेष तुलसीविमिश्नं विशेषतः पादजलेन सिक्तम् । योऽशाति नित्यं पुरतो मुरारेः प्राप्नोति यज्ञायुतकोटिपुण्यम् । पद्भिर्मासोपवासैस्तु यत्फलं परिकीर्तितम् । विष्णो- नैवेद्यसिक्थेन तत्फलं भुअतः कलाविति । गारुडे च पादोदकं पियेन्नित्यं नैवेद्यं मक्ष- येद्धरेः । शेषाश्च मस्तके धार्या इति वेदानुशासन'मिति । ब्रह्माण्डे च 'पत्रं पुष्पं फलं तोयमनपानाघमौषधं । अनिवेद्य न भुञ्जीत यदाहाराय कल्पितम् । अनिवेद्य तु भुजानः प्रायश्चित्ती भवेन्नरः । तस्मात्सर्व निवेथैव विष्णोर्मुक्षीत सर्वदेति । पद्मपुराणेपि गौतमः 'अम्बरीप गृहे पक्वं सदाभीष्टं यदात्मनः । अनिवेद्य हरेर्भुजम् सप्तजन्मानि नारकी । अम्बरीष नतं वस्त्रं फलमन्नं रसादिकम् । कृता विष्णूपभोग्यं तु सदा सेव्यं हि वैष्णवै'- रिति । श्रीमागरते पठस्कन्धे दितिपुंसवनर रामायध्याये 'उद्यास्य देवं खे धाग्नि तन्निवेदितमग्रतः । अद्यादात्मविशुद्ध्यर्थ सर्वकामाप्तये तथेति । तेन सिद्धमाहुः निवेदि. तानामित्यादि, शोधकत्वाचेत्यन्तम् । तथा चैवं भगवदत्तप्रसादत्वेन तनिवेदितग्रहणस्य दासधर्मस्ने सिद्धे आज्ञतत्वमायदेव सिद्धमिनि न गक्तिमार्गविरुद्धस स्वातध्यसापत्ति- रित्यर्थः । नचोक्तवाक्येषु 'स्वयोपभुत्तेति वाक्ये च अचेतनानामेव प्रसादत्वेनोपयोग- सोक्तत्याहारादीनां विनियोगे दोषः स्यादेवेति शङ्कयम् । पाकादिसेवायां विनियोगस्य सेपामपि सिद्धत्वेनादोयादिति । एवं चैतावता ग्रन्थेन सिद्धान्तरहस्योक्तमेव सर्व निर्धारित ज्ञेयम् । तेनात्र न तदुक्कविचाराचिन्तासम्भवः, किन्तु प्रकारान्तरेणेति पोधितम् । अतः परं तसंभवप्रकारं वदन्तो अन्यमवतारयन्ति फिन्त्वित्यादि । व्याफुर्वन्ति लौकिक- (किय । तत्करणे बाहिर्मुख्यमम्भव इलारभ्योत्तचिन्ताभावायेदमा विचार्यते। सेवार्थ यमरणे वाहिमुख्यं सेवापतिषन्धश्च न सम्भवति । तस्य सेवाहरवेन तत्पूरस्त्यान् रादकरणे तदसम्भवाच । नच 'चैवर्गिस या सेति वाच्याता भगवत्कृत प्रतिबन्ध इति वाच्यम् । वकिपदवैयापते । अन्यथा आयासविषातमित्येवापतैप चारिता स्यात् । अन सीयाना वर्गिकायामविघातमैव भगवान् करोति, न खसेवार्थकाथासपिघातमिति निधीयते । अन्यथा यजमानस्य निषेधे भजनमार्ग एवोच्छिम्छन । मन्त्रात्म- १.पिहान्तर्गत टिप्पर्ण पावास प्रणामिति प्रतिभाति । २.दिनिपयोवतति पाठ । .
६ श्रीविठ्ठलेश्वरविरचितप्रकाशसमेतम् । चिन्ता कापि न कार्या निवेदितात्मभिः कदापीति । भगवानपि पुष्टिस्थो न करिष्यति लौकिकी च गतिम् ॥१॥ लौकिकतदभावेपि भगवदर्यापि सा न कार्या। एतदाहुः कापीतिशन्देन । अङ्गी- कारेणैव सर्व स्वत एय करिष्यतीति विश्वासो यतस्तस्यावश्यकः । भगवतोपि तथानियमः । कदाचित् परीक्षार्थ प्रारब्धंभोगार्थ वा प्रभुश्चेद्विलम्यते, तदापि न कार्येत्साहुः कदापीति. श्रीमरपुरुषोत्तमकृतविवृतिप्रशासप्तमेतम् । त्यादि । सिद्धान्तरहस्सोक्तरीत्या तनिष्कर्षजनकपूर्वोक्तविचाररीत्या च लौकिक्याचिन्ताया अमावेपि पूर्वोक्तरीत्या भगवदर्थापि सा न कार्या । तत्र हेत्वपेक्षायां निवेदितात्मपदेन भगवानपीत्युत्तरार्धेन च सूचित हंतुद्वय व्याख्यानमुख्न स्फुटीकुर्वन्ति अङ्गीकारेणैवे. त्यादि, आवश्यक इति । ब्रह्मास्त्रचातकन्यायादावश्यकः । एतेन निवेदितात्मपदसूचितो हेतुर्विवृतः । द्वितीय विवृण्वन्ति भगवतोपि तथा नियम इति । अङ्गीकृतपालननियमः । योगक्षेमवहनवाक्येनैव तथा सिद्धत्वादित्यर्थः । [यदि तूतरार्धस्याने व्याख्यातत्वादेतस्स पूर्वशेषत्वमङ्गीक्रियते, तदास्याथिकल ज्ञेयम् । वस्तुतस्तूत्तरार्धे व्याख्यानेपि महापुरुपेण निवेदितेन पूर्वार्धोक्त हेतोरप्युक्तत्वात्पूर्वार्धेप्युत्तरार्धाङ्गिीकारो न दुष्ट इति ज्ञेयम् ।। तत्रापि विशेष यदन्तीत्याहुः कदाचिदित्यादि । कदापीतिपदेनेति । कदाशब्दापि- शब्दाभ्यां युक्तमिति पद सेनत्यर्थः । प्रकारद्वयान्यतरेण विलम्बेपि चिन्ताया अकरणे एतावेव हेतू इति ज्ञापनायान्ते इतिपदोक्ति । तया चानेतिपदयुतात्पाठादुपगीति- छन्दः । 'आर्याद्वितीय) यद्गदित लक्षण, तत्स्सात् । यद्युभयोरपि दलयोरुपगीति तां मुनिन' इति वृत्तरनाकर तलक्षणादुदाहरणाच । यदा वितिशब्दरहितः पाठ', तदा लिय वृत्तिगन्धिचूर्णिकेति न किमपि छन्दः । (कृतिगन्धिचूर्णिकालक्षम तु छन्दोमायीमुक्तम् । 'अपाद पदसन्तानो गद्य तत्त त्रिधा मतम् । चूर्णिकोत्कलिकाप्रायवृ. तिगन्धिप्रभेदत ॥ अकठोराक्षर खल्पसमास चूर्णक विदुः । भवत्युत्कलितापायं समासाद्य हदाक्षरम् ! वृत्तैकदेशसम्बन्धाद्वृतिगन्धि पुनः स्मृतम् ॥) तदा हेतुरर्थोक्त एव । ननु सत्य भगवान् खाज्ञाकारित्व जीवेश्वलोक्यापेक्षितपूरणेन योगक्षेम भगवदर्थ लौकिकार्थं च निर्वाहयति, तथापि प्रथम जपन्याधिकारे भगवांस्तथा निर्वाहयेनवेति निवेदिनामिनरयनासम्भवन तम्बनितचिन्ताऽभावात् कथ चिन्ता न कार्येयुरदेश इति चेत् । अवेद प्रति भाति । भरनमाग हि भगवदहाशरविवव । पुाटमयादाप्रवाहभेदेन । तथापि वै विध्यम् । तत्र पुधिष्टावहाकृतस्य ननरयनगम्भावनापि । पर मयादापुथै प्रवाहपुष्ट वाङ्गीकृतम्य तत्करण मर्यादाप्रवाहाश , तद्विपात पुयश । तथा चामनिवेरिना मर्यादाप्रवाहसपलिताना यतस्य कृत मादिज्यसेरापतिरन्धत द्विघातादिक भवति तथा सेवाधकेपि यते भविष्यतीति भवति चिन्ता, अतस्तदभादाय तान् प्रति चिन्ता कापिन कार्येन्युक्तम् । अल सेवार्थ या कर्तव्य एवेति नानुपपत्ति काचित् ।) लौकिकीति पाट । ३ [ 1चिदान्तर्गत बप पुतरेषु नासि। है।)टि पण नाम्नि बहु पुनक २ भोजनार्थमिति पाद ।
नवरनम्। पदेन । ननु लोकवत् कुटुम्बाघासक्त्या स्वसापि लौकिकी गति कदाचित् प्रभुः कुर्यात् , तत्राः भगवानपीति । यत युष्टिस्थोऽतो मर्यादामागीयवैराग्याघमावेपि 'महापुरुषेण निवेदिता' इति स्वकीयत्वेनाङ्गीकारात् तथा न करिभ्यतीत्यर्थ ॥१॥ एवं चेत्, स्वाच्छन्द्यव्यवहारापत्त्या बाहिर्मुख्य सादत आहु निवेदनमिति । निवेदनं तु स्मर्तव्यं सर्वथा साहशेर्जनः । सर्वेश्वरश्च सर्वात्मा निजेन्छातः करिष्यति ॥२॥ श्रीमत्पुरषोत्तमकृतदिवृतिप्रकाशसमेतम् । चिन्ता सादेवेत्याशङ्का समादधते इत्याशयेनोत्तरार्धमवतारयन्ति ननु लोकवदि- त्यादि । स्वस्थापीसनेन भगवान् परामृश्यते । गतिमिति । रीतिम् । तथा च यया लौकिका. प्रभवः सेवकस कुटुम्याधासक्तिं दृष्ट्वा तत्काएँ उदासते, तथा भगवान युदासीत, तदा किं कुर्यादित्यर्थ । व्याकुर्वन्ति यत इत्यादि । यतोऽय जीव पुष्टिस्थ. भक्तिमागीयत्वाद्भक्तिकारणीभूतानुग्रहविषयोऽत एतस्मिन् मर्यादामागीयवैरा- ग्याधभावेपि महापुरुषेणैतत्सम्बन्धिन. सपि निवेदिता इति तेष्वासक्तावलौकिको भगवान् यथा नारदवाक्यसत्यत्वाय नलकूपरमणिग्रीवावनुजग्राहेति दृष्टत्वात् , 'स्वय समुत्तीर्येति गर्भस्तुतियाक्ये भक्तिमार्गप्रवर्तकाचार्यानुगृहीतेषु भगवदनुग्रहस्य सिद्ध- त्वाच, स्वाभीष्टमार्गप्रवर्तकाचार्यनिवेदितेषु स्वकीयत्वेनाङ्गीकारादुपेक्षा न करिष्य- तीति भगवत्स्वभाव निश्चित्स, 'संसारचके प्रमत खकर्मभिरितिन्यायेन केरो खप्रारब्धस्स हेतुता चानुसन्धाय चिन्ता न कार्या । एव यथा वित्तजाया न कार्या, तथा तनुजायां शरीरसहायसौकर्यामावेपि न कार्येति बोध्यम् । अत्र दिनारस प्रदर्शनादिति । लौकिकी चेति मूले चकारोवधारणार्य. क्रिययान्वेति । समुञ्चयार्थत्वे त्वनुक्ता वैदिकी गति समुचिनोति । यथा हि चाक्रायणस्यापद्गताविभ्यखादितफुल्मापभक्षण श्रूयते, तथान भक्तिमार्गीये काग्यश्रवणादस्मरणात् योगक्षेमप्रवहणवाक्याच । इद च 'सर्वाना- नुमति'सूने स्थितम् ॥ १॥ अतः परमत्र दोपोपस्थितिमाशङ्कष परिहरन्तीत्याशयेनाग्रिममवतारयन्ति एवं चेदित्यादि । कुटुम्बाद्यासक्तावपि भगवानुपेक्षा न कुर्याचेत् , तदा नैवेधादिसम्पादनार्य पन्न एव कर्तव्य , किमर्थ केश सोढव्य इत्यादिविचारेण खच्छन्दव्यवहारापत्या नानाविध बाहिर्मुख्य स्यात् । अत एतादृशे सकटे उपायमाहुरित्यर्थ । व्याकुर्वन्ति सर्वदेत्यादि । आत्मनिवेदन हि सेवाधिकारार्थ सस्काररूपतया भगवतोऽभिप्रेतमिति पूर्वमुपपादितम् । तथा च तदुत्तर सर्वदा सेवाया एव करणात्सर्वांशे स्वस्थ सपरिकरस्य सर्वदा भगवदीपलानुसन्धाने बाहिर्मुख्य न मरिष्यत्तीति भाव इत्यर्थ । नन्वत्र तुपन्देन निवेदनस्मरणसैव तपाल बोम्यत इति कय तथा व्याख्यापते इत्याकाझाया तुशन्द - श्रीविट्टलेश्वरविरचितप्रकाशसमेतम् । सर्वदा सर्वाशे तदीयलानुसन्धानेन तथा न भविष्यतीति मावः । अशक्त्या सेवाय- सम्मवेऽपीदं कार्यमेवेति ज्ञापनाय तुशन्दः । चकारपक्षे समुच्चयः। सर्वधेत्यस्सावश्यक- वज्ञापनाय । अथवा । सर्वथा ये तादृशा निवेदितात्मलेन तत्परास्तैः सह तथा । एतेन सगदोयो निवारितः । अतादृशेष्वेतगोपन सूच्यते । सर्वदेतिपाठे कालापरिच्छेदस्तनोन्यते । अन्यथा तदैवासुरप्रवेशः स्यादिति भावः । कदाचिदलौकिकार्यस लौकिकस्य वा सिद्धार्थ प्रभुः प्रार्थनीय इति प्रश्ने नेत्याहुः सर्वेश्वर इति । अत्र सर्वशब्दो निवेदितात्मसर्वपरः । यया 'सर्वे ब्राह्मणा भोजयितव्या' इत्यत्र निमत्रिता एव सर्वपदेनोच्यन्ते, न वन्येपि । सर्वात्मपदेप्येवं ज्ञेयम् । तेन सेवकाः स यथा यथा प्रपन्नाः, तया तथा प्रभुरपि तेष्वङ्गी- कृतस्वामित्व आत्मीयत्वमेव तेषु मनुत इति तद्धितकृतौ न प्रार्थनामपेक्षत इति ज्ञाप्यते । अथवा । कालादिनियामकत्वेन न तस्कृतोपि प्रतियन्धसम्मन इच्छायामिति ज्ञापनाय सर्वपद कालादिपरम् । प्रार्थितोपि सविचारितमेव करिष्यतीति प्रार्थनाप्यप्रयोजिकेति ज्ञापनाय निजेन्छेयुक्तम् । अथवा । निजाः स्वीयत्वेनागीकृताः सेवकास्तेषां प्रचुरेच्छातः स्वयमेवा- पेक्षितं करिष्यतीति न प्रार्थनापेक्षेत्यर्थः । परन्लिच्छाया अविकृतत्वमेवापेक्षितमिनि ज्ञाप. मायाव्ययप्रयोगः ॥२॥ श्रीमत्पुरषोत्तमतविवृतिप्रकाशसमेतम् । तात्पर्यमाहुः अशक्तयेत्यादि । तथा च अनुकल्पत्वयोधनाय तुशब्द इति न पूर्व- व्याख्याने दोष इत्यर्थः । एतदेव ड्रीक पाठान्तरं विवृण्वन्ति चकारेत्यादि । सर्वथेति पदं व्याकुर्वन्ति सर्वथेसादि । अस्येति । निवेदनस्य । ननु मुख्याशक्तावनुकल्पत्वादेषा- वश्यकत्व प्राप्तेर्नेदं व्याख्यान युक्तमित्यरुच्या पक्षान्तरमाहुः अथवेत्यादि, सूच्यत इत्यन्तम् । अस्मिन् पक्षे सर्वधाताहौरित्येक पदम् । पाठान्तर व्याकुर्वन्ति सर्वदेत्यादि । तवेति । निवेदनस्मरणे । एवं व्याख्यानद्वयेन सर्वदा भगवदीयत्वानुसन्धानमुत्तमभगव- दीपसझन दुःसङ्गवर्जन दुष्टेप्पेतगोपनं चेति त्रयमुक्तम् । तथा च सर्पदैतरकरणे पूर्वोक्त- दोपस्स न संसर्ग इत्यर्थः । अतः परं प्रारम्धेनातिल्लेशप्राप्तौ पूर्वोक्तत्रयसान्यतरस्य वाइसम्भवे प्रमोश्च सानुमावतायां क्लेशनिवृत्यर्थं तत्मान कार्य नवेति चिन्तायामुपायान्तरं वदन्ती- साशयेनोत्तरार्धमवतारयन्ति कदाचिदित्यादि । अर्धस्त्वतिरोहितः । प्रश्शे इति सप्तमी। च्याकुर्वन्ति अत्र सर्वेत्यादि । अस्मिन् पक्षे सर्वपदस्य वृत्तिसंकोच इत्यरुच्या पक्षान्तरमाहुः अथवा कालेत्यादि । निजेच्छात इति व्याकुर्वन्ति प्रार्थित इत्यादि । अस्मिन् पक्षे भगवतः कृपालुत्वं तिर इव भवतीत्यतः पक्षान्तरमाहु. अधया निशा इत्यादि । नन्वेवं सति पूर्व कुतोऽन्यथा व्याख्यातमित्सत आहुः परमित्यादि । अविकृतत्वमिति । विकृतले पाहताशशोमतलौकिकविपरवर, सद्विलक्षणत्वमविक- तत्वम् । तथा च जघन्याधिकारिणामिच्छाया विकृतत्वात्तदर्थं तथा पूर्व व्याख्यातम् । १ शेन सोश इति पाट । सर्वत्मनेति पाट । ३ सौदा इति घाट ! ४ आत्मत्वमिनि पाठ ।
नवरत्नम्। ननु भगवते समर्पितदेहादे' खीपुत्रादिषु विनियोगेन खधर्महानिचिन्ता याधते, नत्राहु सवैपामिति । सर्वपा प्रभुसम्बन्धो न प्रत्येकमिति स्थितिः। अतोन्यविनियोगेपि चिन्ता का खस्य सोपि चेत् ।। ३ ॥ खात्मना सह यावन्तो निवेदितास्तै सहैव खस्साझीकारात् तेषा सर्वेषामेव प्रभु- सम्बन्धो, न तु प्राधान्यात् स्वस्सैवेति तत्रोपयोगे स्वस्थ का चिन्ता, न कापीत्यर्थ । इय श्रीमापुरुषोत्तमकृतविवृतिप्रकाशसभेतम् । उत्तमाधिकारिणा विन्छाया अविकृतत्वादिदानीमेव व्यारयातम् । अतो व्याख्यानद्वयम प्युचितमेव । अत्रायमर्थ । प्रार्थना हि प्रभोरसर्वज्ञते उदासीनत्वे वाऽन्यत्वे वा उपयुज्यते । अत्र च खकीयसर्वेश्वरत्वाकालादिसर्वनियामकलाच नासर्वज्ञत्वम् । नियमनस ज्ञानकार्यत्वात् । तत्तदात्मत्वाच नोदासीनत्वम् । स्वात्मत्वान्नान्यत्वम् । एव सत्यपि यत् खीयझेशोपेक्षणम् , तत्किञ्चिदासत्ती भगवानेवेति न्यायेन खस्स भक्तस्य वा कार्यायैव । तत्र भगवत्कायार्थत्वे खस्यान्ययाप्रार्थनमपराधायहम् । भक्तकार्यार्थले खसवानिष्टोत्पादकम् । अत एतदुभय विचार्य प्रार्थना न कार्या, किन्तु स्वस्वाधि- कारानुसारेण विवेकधैर्य एव रक्षणीये इत्यर्थः । अत एव विवेकधैर्यानयेऽपि 'प्रार्थित वा बत किं स्यात् साम्यभिप्रायसशया'दित्युक्तम् ॥ २ ॥ ननु पूर्वोक्त विचार्यमाणे लौकिकालौकिकी सेवोपकरणविषयिणी चिन्ता न भविष्यति, तथापि वक्ष्यमाणरीत्या सेवाऽकरणविषयिणी धर्महानिचिन्ता तु भविष्यत्येवेति तन्निवृत्यर्थमग्रिम पदन्तीत्याशयेन तृतीय श्लोकमवतारयन्ति ननु भगवत इत्यादि । स्वधर्महानिचिन्ता बाधत इति । स्वय हि समर्पणक्रियाया कर्तृत्वेन प्रविष्ट इति सम न्तिरापेक्षया मुख्यश्चेतनधेति अचेतनस्य खाधिष्ठितस्य देहादे. सदा भगवत्येव विनि योग कर्तव्य , तत्र च शरीरादिक मुरयम्, तेन सेवा चेन सर्वदा कुर्यात्, तदा तस्य स्वधर्मों हीयेतेति सा तथेत्यर्थ । व्याकुर्वन्ति स्वात्मनेत्यादि । तत्रोपयोग इति । स्रीपुत्रादिषु खदेहेन्द्रियविनियोगे । शेषोऽर्यस्तु स्पष्ट । तथा च ययपि समर्पण कियोसत्तिदशाया खस्स प्राधान्यम्, तथापि तदुत्तरदशाया खसाप्यन्यतुल्यत्वात् यथा अचेतनाना वस्त्रादीना भगवत्युपयोश्यमाणाना परस्पर चिन्ताया बयोग, तथा चेतनाधिष्ठिताना संशरीरादीनामप्यचेवनाना परस्सर विनियोगे चिन्ताया अयोग' । भगवत्युपयोक्ष्यमाणत्वसोभयत्रापि तुल्यत्वात् । तत्र स्खलामिमान न्यग्भाग्य भगवदीयत्वेऽनुसहिते सधर्महान्यभावात् का चिन्ता, न कापीलर्थ । ननु निवेदनेन सर्वेषा भगवदीयत्वरूपे सम्पन्धे तुल्येपि कस्यचिदिशेपत सेवाया विनियोगो १ शरीराणामिति पाठ। २नर ८ श्रीविटुलेश्वरविरचिवप्रकाशसमेतम् । सर्वदा सर्वाशे तदीयत्वानुसन्धानेन तथा न भविष्यतीति भावः । अशक्त्या सेवाय- सम्मवेऽपीदं कार्यमेवेति ज्ञापनाय तुशन्दः । चकारपक्षे समुच्चयः । सर्वथेत्यस्वायत्यक- त्वज्ञापनाय । अथवा । सर्वथा ये तादृशा निवेदितात्मत्वेन तत्परास्तैः सह तथा । एतेन सहदोषो निवारितः । अताटशेष्वेतगोपनं सून्यते । सर्वदेतिपाठे कालापरिच्छेदस्तत्रोच्यते । अन्यया तदैवासुरप्रवेशः स्यादिति भावः । कदाचिदलौकिकार्यस्य लौकिकस्य या सिद्धार्थ प्रभुः प्रार्थनीय इति प्रश्ने नेत्याहुः सर्वेश्वर इति । अत्र सर्वशब्दो निवेदितारमसपरः । यथा 'सर्वे ब्राह्मणा भोजयितव्या' इत्यत्र निमत्रिता एव सर्वपदेनोच्यन्ते, न वन्येपि । मात्मपदेप्येवं ज्ञेयम् । तेन सेवकाः सर्वे यथा यथा प्रपन्नाः, तथा तथा प्रभुरपि तेप्वङ्गी- कृतखामित्व आत्मीयत्वमेव तेषु मनुत इति तद्धितकृतौ न प्रार्थनामपेक्षत इति ज्ञाप्यते । अथवा । कालादिनियामकत्वेन न तत्कृतोपि प्रतिवन्धसम्भव इच्छायामिति ज्ञापनाय सर्वपदं कालादिपरम् । प्रार्थितोपि खविचारितमेव करिष्यतीति प्रार्थनाप्पप्रयोजिकेति ज्ञापनाय निजेच्छेत्युक्तम् । अथवा । निजाः स्वीयत्वेनाहीताः सेवकास्तेषां अनुरेच्छातः स्वयमेवा- पेक्षितं करिष्यतीति न प्रार्थनापेक्षेसर्थः । परन्विच्छाया अविकृतत्वमेकापेक्षितमिति ज्ञाप- मायाव्ययप्रयोगः ॥२॥ श्रीमत्पुरषोत्तमकृतविवृतिमकाशसमेतम् । तात्पर्यमाहुः अशक्तयेत्यादि । तथा च अनुकल्पत्वयोधनाय नुशन्द इति न पूर्व- व्याख्याने दोष इत्यर्थः । एतदेव डीकर्तु पाठान्तरं विषण्वन्ति चकारेलादि । सर्दथेति पदं व्याकुर्वन्ति सर्वथेत्यादि । अस्यति । निवेदनस्य । ननु मुख्याशक्तावनुकत्लत्यादेवा- वश्यकत्वासेनेदं व्याख्यानं युक्तमित्सरुन्या पक्षान्तरमाहुः अथवेत्यादि, सूच्यत इत्यन्तम् । अस्मिन् पक्षे सर्वधाताहौरित्येकं पदम् । पाठान्तरं व्याकुर्वन्ति सर्वदेत्यादि । बत्रेति । निवेदनम्मरणे । एवं व्याख्यानद्वयेन सर्वदा भगवदीयत्वानुसन्धानमुत्तमभगव- दीयसङ्गेन दुःसङ्गवर्जनं दुष्टेप्पेतद्गोपन चति त्रयमुक्तम् । तथा च सर्वदैतत्करणे पूर्वोक्त- दोपस्य न संसर्ग इत्यर्थः । अतः परं प्रारब्धेनातिलेशप्राप्तौ पूर्वोक्तत्रयस्थान्यतरस्य वाऽमम्भवे प्रभोध सानुभावतायां क्लेशनिवृत्त्यर्थं तत्त्रार्थनं कार्य नवेति चिन्तायामुपायान्तरं वदन्ती त्याशयेनोत्तरार्धमवतारयन्ति कदाचिदित्यादि । अर्थस्त्वतिरोहितः । प्रश्ने इति सप्तमी । च्याकुर्वन्ति अन सर्वेत्यादि । अस्मिन् पक्षे सर्वपदस्य वृत्तिसंकोच इत्याच्या पक्षान्तरमाहुः अथवा कालेत्यादि । निजेच्छात इति व्याकुर्वन्ति मार्धित इत्यादि । अस्मिन् पक्षे भगवतः कृपालुत्वं तिर इव भवतीत्यतः पक्षान्तरमाहुः अथवा निजा इत्यादि । नन्वेवं सति पूर्व कुतोऽन्यथा व्याख्यातमित्यत आहुः परमित्यादि । अविकृतत्वमिति । विकृतत्वं प्राकृतगुणशोभकृतलौकिकविषयत्वम् , तद्विलक्षणतमविक- तत्वम् । तथा च उपन्याधिकारिमामिछाया विकृतत्वात्तदप तया पूर्व व्याख्यानम् । . शेन सवाश इति पार । १ सरमनेति पाट । । सर्वदा दही पाट । ४ अत्मत्वमिति पाद । *- नवरत्नम्। ९ तत्राहुः सर्वेषामिति । अयोगः । भगवत्युपयोक्ष्यमाणत्वस्योमयत्रापि तुत्यत्वात् । तर स्वत्वामिमानं न्यग्माय भगवदीयत्वेऽनुसहिते स्वधर्महान्यभावात् का चिन्ता, न कापीन्यपः। ननु निवेदनेन सर्वेषां मगवदीयत्वरूपे सम्बन्धे तुल्येपि कम्पचिहिटोपनः मेवानां विनियोगो ननु भगवते समर्पितदेहादेः स्त्रीपुत्रादिषु विनियोगेन सधर्महानिचिन्ता याधते, सर्वेषां प्रभुसम्बन्धो न प्रत्येकमिति स्थितिः। अतोन्यविनियोगेपि चिन्ता का खस्य सोपि चेत् ॥३॥ खात्मना सह यावन्तो निवेदितास्तैः सहैव स्वस्याङ्गीकारात् तेषां सर्वेषामेव प्रभु- सम्बन्धो, न तुप्राधान्यात् स्वसैवेति तनोपयोगे स्वस्य का चिन्ता, न कापीत्यर्थः । इयं श्रीमत्पुरुषोत्तमकृतविवृतिप्रकाससमेतम् । उत्तमाधिकारिणां विच्छाया अविकृतत्वादिदानीमेव व्याख्यातम् । अतो व्याख्यानद्वयम- प्युचितमेव । अत्रायमर्थः । प्रार्थना हि प्रमोरसर्वज्ञत्वे उदासीनत्वे वाऽन्यत्वे वा उपयुज्यते । पर च स्वकीयसर्वेश्वरत्वाकालादिसर्वनियामकत्वाच नासर्वज्ञत्वम् । नियमनस्य ज्ञानकार्यत्वात् । तत्तदात्मत्वाच नोदासीनत्वम् । स्वात्मत्वान्नान्यत्वम् । एवं सत्यपि यत् स्वीयक्लेशोपेक्षणम् , तत्किचि दासक्तौ भगवानेवेति न्यापेन खस्य भक्तस्य वा कार्यायव । तत्र भगवत्कार्यार्थले स्वस्सान्यथाप्रार्थनमपराधावहम् । भक्तकार्यार्थत्वे खस्यैवानिष्टोत्पादकम् । अत एतदुभय विचार्य प्रार्थना न कार्या, किन्तु स्वसाधि- कारानुसारेण विवेकधैर्य एव रक्षणीये इत्यर्थः । अव एव विवेकषैर्याश्रयेऽपि 'प्रार्थित वा ततः किं स्यात् स्वाम्यभिप्रायसंशया'दित्युक्तम् ॥२॥ ननु पूर्वोक्ति विचार्यमाणे लौकिकालौकिकी सेवोपकरणविषयिणी चिन्ता न भविष्यति, तथापि वक्ष्यमाणरीत्या सेवाऽकरणविषयिणी धर्महानिचिन्ता तु भविष्यसेवेति तन्निवृत्त्यर्थमग्रिम वदन्तीत्याशपेन तृतीय श्लोकमवतारयन्ति ननु भगवत इत्यादि । स्वधर्महानिचिन्ता बाधत इति । खय हि समर्पणक्रियायां कर्तृत्वेन प्रविष्ट इति सम- पान्तरापेक्षया मुख्यश्चेतनश्चेति अचेतनस्य स्वाधिष्ठितस्य देहादेः सदा भगवत्येव विनि योगः कर्तव्यः, ता च शरीरादिक मुख्यम्, तेन सेवां चेन्न सर्वदा कुर्यात्, तदा तस्स खधर्मो हीयेतेति सा तथेत्यर्थः । व्याकुर्वन्ति वात्मनेत्यादि । तत्रोपयोग इति । सीपुत्रादिपु स्वदेहेन्द्रियविनियोगे। शेषोऽर्यस्तु स्पष्टः । तथा च यद्यपि समर्पण क्रियोसतिदशाया खस प्राधान्यम्, त्यापि तदुत्तरदशयां खस्याप्यन्यतुत्यत्त्वात् यथा अचेतनानां वनादीनां भगवत्युपयोक्ष्यमाणानां परस्पर विनियोगे चिन्ताया अयोगः, तथा चेतनाधिष्ठिताना खशरीरादीनामप्यचेतनानां परसरं विनियोगे चिन्ता १ शरीराणामिति पाठ।
श्रीविट्टलेश्वरविरचितप्रकाशममेवम् । निवेदनेऽङ्गीकारमर्यादेलाहु स्थितिरिति । कस्यचिद्विशेपतोङ्गीकारश्चेत्, सा पुष्टिरिति भाव । अथवा । पुत्रादीनामन्यविनियोगदर्शनेपि खस का चिन्ता, तेपामप्यङ्गीकारेगेष कृतार्थतासम्भवादित्यर्थ । किश्च । स्वस्येतिपदमावृत्तमपिशब्देन सम्बध्यते ॥ ३॥ यथा पुत्रादीनाम्, तथा स्वस्यापि स अन्यविनियोगधेत्, तदापि चिन्ता न कार्येसाहु. अज्ञानादिति। अज्ञानादधया ज्ञानात् कृतमात्मनिवेदनम् । यैः कृष्णसास्कृतप्राणस्तेपा का परिदेवना ॥ ४ ॥ श्रीम पुरुषोत्तमकृतविवतिप्रकाशसमेतम् । दृश्यते, कस्यचित् खल्प, कस्यचिन्न, तर हेत्वज्ञाने तु चिन्ता सादेवेति तसा कथ निवृत्तिरित्यतस्तनिवृत्तिप्रकार स्थितिपदेन वदन्तीत्याहु इयमित्यादि । तथा च तत्र पुष्टि कारणत्वेनावधार्य चिन्ता न कार्या, किन्तु 'गन्धेऽचिंते तुलसिकाभरणेनेति न्यायेन सन्तोपो विधेय इति सुखेन तन्निवृत्ति । एकन विशेषदर्शनेऽप्यन्यन निवेदनकृतभगव सम्बन्धस्यानपायान्न कापि चिन्तेत्यर्थ । एवचार वास्यद्वय प्रतिमाति, सर्वेषा प्रभुसम्बन्धो न प्रत्येक ने गुणप्रधानभावेन, अतस्तेषामन्यविनियोगे खस्स का चिन्तेत्येकम् , इति उक्त- रूपा, स्थिति. निवेदनेङ्गीकारमर्यादा, इतो विलक्षणा तु पुष्टि , अत कस्यचिद्विशे पाङ्गीकारेऽपि चिन्ता केत्यपरम् । अनाग्रिमवाक्ये खम्येति चेतनपरामर्शकपददर्शनात् पूर्व- वाक्येपि सर्वेषामितिपदेन शरीराधिष्ठावृणामेव परामर्शो युक्त , न तु चेतनाचेतनाना यावतामिति पूर्वव्यारयानमयुक्तम् । किञ्च, भगवति समर्पितदेहादे स्त्रीपुत्रादिषु विनियोगे स्वधर्महानिस्तदा स्यात् , यदि तपा समर्पितत्व न स्यात्, समर्पितेषु विनियोगे तु 'निषे दिमि समयैव सर्व कुर्यादितिवाक्ये निवेदिना समर्पणस्य कयनेन तस्य च समर्पणम्स निवेदिना परस्परविनियोग एव सम्भवेन भक्तिमार्गमर्यादावोधकाढुक्तवाक्यादेव चिन्तो दयस्यासम्भव इति चारुच्या पक्षान्तरेण प्याकुर्वति अधवा पुत्रेत्यादि । तथा च सेवासम्बन्धिना चेतनाना निवेदितव्यतिरिक्तससर्गविपविण्याश्चिन्ताया निवृत्त्यर्थमयमुप देश । पुनादीनामित्यादिपदेनाचेतनानामपि सगह । उत्तरपूर्ववास्ययोरेकजानीयमेव ग्राह्य मित्यत्र नियामकत्वसामावात् । पूर्वव्याख्यानोक्ता चिन्ता तु पुष्टिमारविचारात् । साम्प तिका तु मार्गमर्यादात इति न कोपि दोप इत्यर्थ । खस्सेत्यन्तस पदराशे पूर्ववाक्य एवं सम्बन्धे शिष्ट सोपि चेदिति पदनयमलग्नक तिष्ठतीति, तत्सम्बन्धायाहु किञ्चत्यादि ॥३॥ समन्ध बोधविस्वा अर्थ बदन्तोऽसिममवतारयन्ति यथेत्यादि, स्वस्येति। अनुशाव- ज्ञानेन स्वस्मिन् विशेषाङ्गीकार निश्चितवतो वा सेवाकर्तृतेन प्रधानस्य वा। इत्याहुरिति । , १ निवेदिनोऽतीगतिपाठ । २ नैनि नास्ति। ३ विशेषनोजीकारे इति पाठ । स्वेन करणेति पार । ५ नोपि दोष इस तमविक चित ।
नवरत्नम्। ११ हीनमध्यमाधिकारिभिरपि निवेदितात्ममिश्चिन्ता न कार्या भवति यत्र, तत्र कृष्ण- सात्कृतप्रागैचिन्ता न कार्येति किमु वाच्यमित्यर्थः । केरलं प्रभधीनीकृतप्राणानां चिन्ता- विपयामावादेव न सेति भावः । अत एव केतिशब्द उक्तः । पदसम्बन्धस्तु अज्ञा- नादयवा ज्ञानायेस्तत्कृतम् , तेषां सा नेतिशेपः । कृष्णसास्कृतप्राणैस्तकृतम् , तेषां सा केत्युक्तम् ॥ ४॥ श्रीमत्पुरुषोत्तमकृतविवृतिप्रकाशसमेतम् । इतिपदं कैमुतिकयोधकेनाग्रिमवास्येनाहुरित्यर्थः । व्याकुर्वन्ति होनेत्यादि । हीन- मध्यमाधिकारिभिरिति । भगवतः सर्वरूपत्वेन मार्गप्रवर्तकोपदेशकगुवादिरूपताया निरवधिसचिदानन्दस्वरूपत्वेन परमफलताया निरुपधिभक्त्येकप्राप्यतायाधाज्ञानाद्धी- नाधिकारिभिः । तादृशज्ञानवत्त्वेपि कृष्णसारकृतप्राणत्वाभावेन मध्यमाधिकारिभिरित्यर्थः । शेष व्याख्यानं तु स्पष्टार्थम् । तथा च स्वस्मिन् विशेषानुग्रहं निधितवतोपि यत्रान्य- विनियोगसंभवः, तत्र भगवदिन्छैव किधिकार्याय वाशी तेनावधार्या, न तु चिन्ता कार्या, तन्मूलभूतस्य स्वापराधस्याभावादिति । तदेतदुक्तं केवलमित्यादिना, केति शब्द उक्त इसन्तेन । कैमुतिकन्यायस्य स्पष्टीकरणार्थ पदसम्बन्धमाहुः पदेत्यादि, सा केयुक्तमिसन्तम् । यदमुक्तं भवति । एकादशस्कन्धे साधुलक्षणकयन- समाप्ती 'ज्ञासाऽज्ञात्वाय ये वै मां यावान् यथास्मि यादृशः । मजन्यनन्यभावेन ते मे मक्ततमा मता' इति भगवद्वाक्ये हीनमध्यमयोरप्पनन्यमान भजने भक्ततमतयोत्कर्षः कथितः । भगवदुद्धवसंवादसमाप्तौ च 'न बहोपक्रमे ध्यसो मद्धर्मसोद्धवाण्वपि । मया व्यवमितः सम्यद् निर्गुणलादनाशिपः । यो यो मयि परे धर्मः कल्पते निःफलाय चेत् । तदायामो निरर्थः स्साझयादेरिव सत्तमेति लोकद्वयं भगवतोक्तम् । तब श्रीधरीये, आग हे उद्धव, अनाशिपो निष्कामस्य मधर्मस्य उपक्रमे सति, अण्वपि ईपदपि वैगुण्यादिमिनांगो नास्त्येव । यतो मयैव निर्गुणत्वादयं धर्मः सम्यग्व्यवमितो निधितः, नतु मन्यादिमुखेन कयचित् । ननु त्वद्धर्मस एवं सामर्थ्यम् , तस्मादन्या कयम् , तबाह यो य इति । अयमर्यः । किंवतन्य मर्भिस न प्यम इति, यतो तौफिकोपि यो यो निरयों व्यर्थ आयासः, सोपि मपि परे परमेश्वरे निष्फलाय करप्यते चेत्, निष्कामतया अप्तियेत्, तहि स धर्म एव सात्, कर्मकरणापासो न निरर्थः सात् । निरर्यायामे रटान्तः । यया भयशोकादेतोः पलायन मन्दनादिस्तद्वत् । एवं पात्यातम् । तया च निकाममगरद्धर्मम्प वैगुण्यादिमिरीपदापि नाशे नास्तीति भगवता कयना प्रल्ले घामनिवेदनस अविकारतया तपासात् हीनाय- १२ श्रीविहलेश्वरविरचितप्रकाशसमेतम् । ननु सख्यात्मनिवेदने हि भगवदतीकारेणैव सम्पयेते, तथा च स्वयमात्मनिवेदने कृतेपि प्रभुरङ्गीकृतवानवेति चिन्ता मवत्येव, इत्यत आहु तथेति । तथा निवेदने चिन्ता त्याज्या श्रीपुरुषोत्तमे । विनियोगेपि सा त्याज्या समर्थो हि हरिः खतः ॥५॥ पुरुपोनमोझीकृतवान्नवेति निवेदनविषयिणी या सा साज्या उक्तनिवेदनवदि. त्यर्थ । पुरुषोत्तमेन निरोधलीलाया खतोन्यगजन क्रियमाणा मक्तास्तनिवार्य स्वयमात्म सात्कृता इति तादृशे वय सर्वात्मना निवेदने कृते सा शङ्का नोचितेति ज्ञापनाय पुरुषो श्रीमरपुरषोतमकृतविवृतिप्रकाशसमेतम् । धिकारेपि साधनत फलतश्च नाशाभावाचिन्ताया अभावो यत्र, तर मुख्याधिकारे किं वक्तव्यमिति भगवद्वाक्यादेव सिद्धम् । तथा भगवदयों लौकिकोप्यायासो नापार्य इति च । अत पूर्वोक्त सर्व युक्तमेवेति तेषामुक्तचिन्ताजन्या विलापालिका परिदेवना का, न कापीत्यर्थादेवोक्तमित्सर्थ ॥४॥ एव निवेदितविषयिण्याश्चिन्ताया निवृत्त्युपायमुक्त्वा इदानी निवेदनविपपिण्या- श्चिन्ताया निवृत्त्युपाय यदन्तीत्याशयेनाग्रिममवतारयन्ति ननु सख्येत्यादि । प्रेममतौ हि विहितश्रवणादिनवक प्रत्येक कचित् समुदित च साधनम्, तेवाय प्रय सेव्यनिरपेक्षजीवमात्रसाध्यम् । पादसेवनमपि 'पादौ हरे क्षेत्रपदानुसर्पण' इति नवमस्कन्धवाक्योक्तरीत्या पक्ष्या सेवन मिति पक्षे पूर्ववदेव । पादयो सेवनमितिपक्ष तु सेव्यसापेक्षम् । तथैवार्चनादिनयमपि । तया सत्येतचतुष्टय प्रय वा सेव्ये चैतन्याप्राकटयेपि सिध्यति । सख्यात्मनिवेदने तु भजनीये चैतन्यप्राकट्यमपेक्षेते । यदि हि मननीयो मक्ते सख्य तत्कृतमात्मनिवेदन च चैतन्यप्राकट्येनानीकुर्यात् , सदा भगवदगीकारेण सम्पयेते। तत्प्राकट्य तु प्रेमभक्त्यधीनम् । साम्प्रत तु तत्साधनदशा, तथा चेदानी तत्प्राकट्याभावात् खयमित्यादिनोक्ता चिन्ता मवत्येव हीनमध्यमयोरित्यत- स्वन्निवृत्युपायमाहुरित्यर्थ । प्याकुर्वन्ति पुरुषोत्तम इत्यादि । उक्तनिवेदनपदिति । मूलस्थस्य तथापदम्यार्थ । अत्र च सप्तम्यर्थे वति । तथा च यथा भगवद्धापक्रमरूपे निवेदनेऽन्यविनियोगादिना बैगुण्यतोपि भगवद्धर्मनाशामावाचिन्ता यज्यते, तया अङ्गीकारसन्देहरूपा निवेदनविषयिण्यपि सा त्याज्येत्यर्थ । अत्र हेत्वपेक्षाया श्रीपुरु उफनिवेदववादिति पाठ।
नवरतम् । त्तमपदम् । तत्रापि स्वरूपानन्ददानेनानिशं पोष्यमाणानां भक्तानां तदितरोपयोगासम्भ- वेनैव न शकोदय इति ज्ञापनाय श्रीपदम् । तथा च तद्युक्ते तत्र निवेदने सा त्याज्येति भावः । कदाचिल्लोकभयाद्युपस्थितौ तनिवारणाय जीवस्वभाववशादत्यविनियोगेपि तेथे- त्याहुः विनियोगेपीति । प्रमादात्तथासम्भवेपि प्रभुन त्यक्ष्यति । यतस्तत्स्वभाववशात्तथा- भूतमप्युद्धतु तत्साधनानपेक्षः ॥५॥ अङ्गीकारे लक्षणान्तरमप्याहुः लोक इति । लोके स्वास्थ्य तथा वेदे हरिस्तु न करिष्यति । पुष्टिमार्गस्थितो यस्मात् साक्षिणो भवताखिलाः॥ ६ ॥ श्रीमपुरुषोत्तमकृतविवृनिप्रकाशसमेतम् । पोत्तमपदेन तं वदन्तीत्याशयेन तत्पदं विवृण्वन्ति, पुरुषोत्तमेनेयादि श्रीपदमित्यन्तम् । तापर्य स्फुटीकुर्वन्ति तथा चेत्यादि । सरसभक्तयुक्तो भगवान् हीन्द्रयागभङ्गगोवर्ष- नोद्धरणादिलीलाभिस्तथाकुर्वन् खीयान् पुष्णातीति इन्द्रयागभङ्गादिवोधकान्छब्दादेव भगवतस्तथाखभावमवगत्य सा त्याज्या, खस्यानन्यभावेन भजनस्य निर्वाहे कार्यलि. इकानुमानादेवाङ्गीकार निश्चित्य सा त्याज्या भकानां दयालुत्वादित्यर्थः । न च निवेदनगये भगवतः केवलस्यैव सम्प्रदानत्वमुक्तमिति कथमत्र श्रीपुरुषोत्तमपदेन भक्तयुक्ते निवेदनमुच्यत इति शङ्काम् । एकादश एव रामेण सार्ध'मित्यादिना या तावद्भक्तिः प्रशंसिता, तत्परमकारणत्वेनोनविंश आत्मनिवेदिधर्मा उक्ताः, तवात्मनिवेदन- प्रकारो न स्फुट इति तत्रत्यं सर्व संगृह्य कल्पसूत्रवत् गये प्रभुणोक्तः, अतः कृष्णपदेन तत्र ताभिः सहित एव परामृश्यते । तेन भक्तयुक्तसैव सम्प्रदानत्वम् । किच, सदानन्दो हि भगवान् रसात्मक एव, 'रसो पैस' इति श्रुत्या सिद्धो, रसवालम्बनसापेक्ष एवे- खतोपि तथेति न विरोधगन्धोपि । ननु सत्यमेवम् , तथापि स्वस्य कदाचित् कथचिदन्यविनियोगे जाते तस्माद्विरुद्धकार्यादङ्गीकारे सन्देहो भवत्येवेति वा सा कथं त्यक्तुं शक्येत्याकाङ्क्षायां तत्रोपायं वदन्तीत्याशयेनोत्तरार्घमवतारयन्ति कदाचिदि- त्यादि ।न तथेति । न कार्या । व्याकुर्वन्ति प्रमादादित्यादि । तत्स्वभाववशात्तथा- भूतमिति । जीवस्वभाववशात् कदाचित् पहिर्मुखम् । तथा च तादृशस्य कदाचिद- नन्यमजनाभावेनैवं वाहिर्मुख्ये तस्य जुगुप्सा तूत्यत एवेति तेन कार्येण सप्रतिबन्धक मगीकारमनुमाय 'हराम्यपं यत्स्मणां हविर्मागं ऋतुष्वहम् । वर्णश्च मे हरिवेष्टस्तस्मा- रिरहं स्मृत' इति मारते भगवचनात्, मगवतः स्वीयापनिवर्तकत्वमनुसन्धाय अपरा- पिनांपकीपकादीनामप्यनुग्राहकत्वेन जीवकृतसाधनानपेक्षलं चानुसन्धाय सा त्याज्यलयः। एतेनैताशदीनभावोसतिरजीकारलक्षणमित्युक्तम् ॥ ५॥ एतदर्थमन्यदपि बदन्तीत्याशयेनाग्रिममवतारयन्ति अङ्गीकार इत्यादि । २. बाहिर्मरूपम् ३. उत्पत्स्यव इति । 1.मतपेति पाठ १४ श्रीविठ्ठलेश्वरविरचितप्रकाशसमेतम् । कदाचित् प्रवाहवशाल्लौकिके वाणिज्यादौ, वैदिके आश्रमधर्मादी वा सितौ तर विम एव भवति, न तु तत्फलमित्यर्थः । तत्र हेतुः पुष्टीनि । तद्विनापि सबले- नैव सर्वकर्ता यत इति भावः । पुष्टिमार्गाङ्गीकारे मर्यादां न सहत इति ज्ञयम् । एव सति किं कार्यमित्याकालायामाहुः, साक्षियत् तत्कृतं पश्यत ॥ ६॥ सेवाकृतिगुरोराज्ञा याधनं वा हरीच्छ्या। अतः सेवापरं चित्तं विधाय स्थीयतां सुखम् ॥७॥ सेवाकृतिरिति । गुर्वाज्ञाया अयाधनं यथा भवति, तथा सेवाकृतिः पूर्वमपेक्षिता । एवं वर्तमानानां कदाचिद् विशेषतो भगवदाज्ञा चेत्, गुर्वाज्ञा विरुद्धा भवेत् , तदा तथा कार्यमित्याशयेनाहुः बाधनं वा हरीच्छया। विकल्पेनाधिनमित्यर्थः । एवं सति गुर्वा- धीमापुरुषोतमहतविकृतिरकाशसमेतम् । व्याकुर्वन्ति कदाधिदित्यादि । अत्र च त्रैवर्णिकायासे'ति पूर्वोक्तं पष्ठस्कन्धवाक्यमेव वीजत्वेन ज्ञेयम्, पुष्टिप्रकरणस्थलात् । तथाच यथा वृनस तारशसकष्टोपस्थितावपि भगवत्प्रसादानुमितिरेव जाता, तथास्यापि लौकिकवैदिकास्वास्थ्योपस्थिती यद्भगवत्प्रसा. दानुसन्धानम् , तदप्यङ्गीकारलक्षणम् । एतादृशयोधवन्तं प्रत्युपदिशन्ति साक्षिण इत्यादि । तद् व्याकुर्वन्ति साक्षिवत् तत्कृतं पश्यतेति । तया च 'ज्ञातयः पितरौ पुत्रा प्रातरः सुहृदोऽपरे । यद्वदन्ति यदिच्छन्ति चानुमोदेत निर्मम' इति सप्तमस्कन्ध- स्थभगवदीयगृहस्थप्रकरणथवाश्यात् पूर्वोत्तरीत्या एतदाचार्यवाक्येन लौकिके वैदिके साक्षिवत् भगवस्कृतित्वदर्शनं यत्तदपि तहक्षणमित्यर्थः ॥ ६ ॥ नन्वत्रावास्थ्येपि साक्षिरकृतिदर्शनोपदेशेन पिदुःखसहनरूपं धैर्यमेव साधनस्वे- नोक्तं भवति, ततश्च तावन्मानस्य कर्तव्यत्वे सेवायाः सम्यगमम्भवानिवेदनवैयर्थ्य तु स्थादेवेति प्रकारान्तरेण धर्महानिचिन्तापासौ तनिवृत्यर्थमुपदिशन्तीत्साशयेनाग्रिममवतार- यन्ति एवं सतीत्यादि । व्याकुर्वन्ति गुर्वाज्ञाया इत्यादि । तथा कार्यमिति । पाधनं कार्यम् । तथा च 'यस देवे परा भक्तिर्यघा देवे तथा गुराविति श्वेताश्वतरभुते 'नवोप- यन्त्यपचिति करयस्तवेश ब्रह्मादयोऽपि कृतमृद्धमुदः स्मरन्तः । योऽन्तहिस्तनुभृताम• शुभ विधुन्वन्नाचार्य चैत्यवपुपा खगति ध्यनक्ती'सेकादशवास्यादिभ्यश्च गुरुरेव मुख्य इति । गुज्ञिानाधनाभावपूर्वक सेवाकृतिरात्मनिवेदिधर्मः स यादृशेन साक्षिरत् वस्कृतिदर्श- नेन न विघटितो भवति, ताशनया साक्षिवत् सातव्यम्, न तु सेवाविरुद्धतया । तेन लौकिके विपये साक्षिवत् स्वयम्, न तु सेवाविपये इति सिध्यति । तत्रापि हरीछा विचाया, असाधने बाधने या सास्तीति । सा च भगवदनुभावमनुभवतो धुद्धिगोचरो भवति, अन्यस तु फलपलकल्प्या । एवं सति ययाधिकारं तां युद्धा कार्यम् । ततो न स्वधर्महानिरित्यर्थः । एतदेव निगमयितुमुत्तरार्धमित्याशयेनावतारयन्ति एवं सतीत्यादि । २. भम्पति पाट। 1.बाधनभान पाठ ।
नवरत्नम् ।
ज्ञाया अचाधने बाधने वा सेवैव मुख्या यतोऽतस्तथैव सेयमित्याहुः अत इति । एवं
सति पर्यवसितं सुखमेवेत्याशयेन सुखमित्युक्तम् ॥ ७॥
कदाचित् पुनादिवियोगशवाजनितदुःखेन चिन्तासम्म गतिमाहुः चित्तोडेगमिति ।
चित्तोद्वेगं विधायापि हरियद्यत्करिष्यति ।
तथैव तस्य लीलेति मत्वा चिन्तां द्रुतं त्यजेत् ।।८।।
श्रीमापुरुषोत्तमकृतविवृतिप्रकाशसमेतम् ।
तथा च यथा राजभोगसमये ने निमीत्य वीजयन्तं बृहद्रामदास प्रति भगवता श्रीगो.
वर्धनेवरेण साक्षानुमान मामुन्मील्य पश्येत्याज्ञप्ते, ममाचार्याज्ञा भोगसमये दर्शनविषयिणी
नास्तीति नोन्मीलयिष्यामीति तैः प्रत्युक्तम् , तदा भगवान् प्रसन्न आसीत् । सामग्र्यादि-
विपयिम्यां विशेषाज्ञायां तु साधारण्याचार्याज्ञा बाध्यते, तदा नाप्रसन्नो भवति, तेन
सेवाया एवं मुख्यत्वम्, अतस्तदनुसारेणैव स्थेयमित्यर्थः । अत्रापि परिनिष्ठा तु पूजाया'-
मिति नियेदिप्रकरणसं भगवद्वाक्यमेव बीजवेन ज्ञेयम् । सर्वतो नितरां निरवधितया
वा स्थितेरेव परिनिष्ठापदार्थत्वादिति ॥७॥
ननु भवत्वेवमल्पदुःखोपस्थितौ साक्षिवत् स्थितिः, महादुःखोपस्थिती वेवं
स्थितिरशक्येत्याशवानिवृत्यर्थमग्रिम वदन्तीत्याशयेनानिमगवतारयन्ति कदाचिदित्यादि ।
मूलव्याख्यानं तु स्पष्टत्वात् न कृतम्, पर तनाय भावः। अवश्यंभाविनो दुःखसाप-
तीकार्यत्वातम चित्तसगाधानमेवोपायः । सञ्च नानोपायैर्मवति । यथा सप्तमस्कन्धे यमप्रे-
तसुयज्ञबन्धुसंवादे 'अहो अमीपां वयसाधिकाना'मित्यादिना यमप्रदर्शितलोकगतिज्ञानेन
सुयज्ञबन्धूनां जातम्, यथा च पष्ठस्कन्धे 'यथा वस्तूनि पण्यानि हेमादीनि ततस्ततः ।
पर्यटन्ति नरप्वेवं जीवा योनिषु कर्तृप्विति जीववास्यात्रीवस्य सर्वसाधारण्यज्ञानेन चित्र-
केतुप्रभृतीनाए । यथा च 'पिनोः स किन्तु भार्यायाः स्वामिनोः श्वएभयोः । किमात्मनः
किं सुहृदामिति यो नावसीयत' इति देहस्य सर्वसाधारण्यज्ञानेन पुरूरवसः ।
एवमन्येपि योध्याः। ते केपि नात्मनिवेदिनामुपयुज्यन्ते, भगवत्स्मरणोदासीनत्वात् ,
किन्तु प्रभासीयलीलायां 'नेपां वधोपाय इयानतोन्य' इत्यैकादशीयभगवद्विचारानुवाद-
वाक्यात् सा लीला यथा भक्तानां चित्तोद्वेगं विवाय, या कृता लोकमर्यादारक्ष.
शार्थर, अग्रे तेषां नित्यमुखदानार्य च, नया चिचोदेगं विधाय अपिशब्दादविधाय घ हरिः
स्मर्तृगां प्रारब्धादिरूपापहारको भगवास्तद्धरणार्थ ययत् शुमलेनाशुभत्वेन वा आपाततः
प्रतीयमानं करिष्यति, तत्कार्य साक्षाद्वा केनचिबारेण वा तस्य अस्मदीश्वरस्यास्मदात्मनो
भगवतस्तथैय लीला, अनेन प्रकारेणास्माकं महतोयस नाशनाय मायिकी लीटेति मला
साधकाधकप्रमाणैरनुचिन्स चिन्तां उद्वेगजनिकां वा बजनितां वा तयां वा द्रुतं शीघ्रमेन
त्यजेत् । तस्याः बहुकालं स्याने कालकमखमावानां प्रललेन तया असुस्प्रवेशरूपमहो-
पद्रवसम्भवेन मुख्यफलप्रतिपन्धो वा विलम्बो वा स्यात् , अतो मंडु सजेदिति भावः ॥८॥
श्रीविठ्ठलेश्वरविरचितप्रकाशसमेतम् । नन्विदमखिलमशक्यमिव भाति । तथाहि । श्भवणमारभ्य सख्यपर्यन्तागतौ हि पश्चान्निवेदनवार्ता । तत्र प्रत्येकं तदेव दुरापमिति दूरतरा निवेदनदिगपि । अतस्तस्कृत- चिन्तान्यवियोगचिन्तादिसमाहितिनिरति विचार्य साधनले एकीकृत्य सर्वसमाधान- माहुः तस्मादिति । तस्मात् सर्वात्मना नियं श्रीकृष्णः शरणं मम । वद्भिरेवं सततं स्यमित्येव मे मतिः॥९॥ श्रीमत्पुरुषोत्तमकृतविवृतिप्रकाशसमेतम् । एवमत्र पुष्टिमार्गस्थस्य पूर्व सेवोपकरणकरणकर्तृनिवेदनविषयकचिन्तानिवृत्युपा- यत्वेन स स विचार उपदिष्टः, ततः सेवाकृत्यविरुद्धतया साक्षिवत् स्थित्युपदेशेन सेवायां स्थितेयोपदेशेन वैराग्यरागौ विषयभेदेन व्यवस्थापितो। चित्तोड़गे च लीलाविचार उपदिष्टः, तदिदानीं सर्वमशक्यम्, कालादिकृतगुणक्षोमेण चिचस्थैर्यस दुर्घटत्वात् , अतोऽयमुपदेशो- नुपदेश एवेत्याशय कृपया तत्सिद्ध्यर्थमुपायमधुनोपदिशन्तीत्याशयेनाग्रिममवतारपन्ति नन्विदमित्यादि । तदेव दुरापमिति । श्रवण हि भगवद्वाचकपदयाक्यानां गुरुमुखा- न्छकितापर्यनिर्धारः । तत्पूर्वकमन्यस्याने कथन कीर्तनम् । तेपामर्थानुसन्धान स्मरणम् । तदिदानी सर्वतद्विदो गुरोर्दीर्लभ्येन श्रवणस्य दुरापत्वे कीर्तनस्मरणयोरपि तथालम् । तदभावे भगवत्स्वरूपज्ञानाभावात् पादसेवनादीनामपि भगवद्विपयत्वाभावात्तथात्वम् । एवं कालादिभिः प्रतिबन्धकैः प्रत्येकमपि द्रष्टव्यम् । साधनफले एकीकृत्य सर्वसमाधा- नमाहुरिति । साधन श्रवणायष्टकम् । फठमात्मनिवेदनम् । ते उभे एकीकृत्य स्वासाध्यत्वेन तस्यां कोटौ निक्षिप्य पूर्वोक्तस्य सर्वस्य मुसाध्यत्वं यया भवति, तादृश तत्सम्बन्धिसमाधा. नमाहुरित्यर्थः । समाधानं व्याकुर्वन्तः शरणागते. समाधायकवे बोजमाहुः यस्मादित्यादि । भक्तिमार्गे प्रवेशे तत्र रुच्यादौ पानुग्रह एव हेतुरिति वरणभुन्या मक्तिहेतुनिर्णये व्युत्लादि- तम् । तस्मिन् सति यदा सेवानिवन्धसम्भवः, तदा प्रारब्धकालस्वभावानामेव हेतुत्वम् । तन्निवृत्तिस्तत्सर्वनियामकेन प्रभुणैव भवति, नान्यतः । तत्र च शरणागतिरेव साधनम् । 'सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं बज । अहं ला सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुच'इति भगवद्वाफ्यात् । 'देवर्षिभूताप्सनृणां पितृणां न किंकरो नायमणी च राजन् । सर्वात्मना यः शरणं शरण्यं गतो मुकुन्दं परिहत्य कृत्य'मिसेकादशस्कन्धे करमाजनवाक्याच मगवतः शरण्यता । तस्मादगीकृतस्स जीवसोत्तरीत्या अशक्तौ शरण्यत्वात् प्रमुरेव सर्व सम्पाद विष्यतीसाचार्याणामाशय इत्यर्थः । एतेनाप्टमस्कन्धप्रतिपादित आपस हरिसंस्मृतिरिति भगवद्भक्तिसम्पादक भापधर्मोपि गजेन्द्रसेवासापि सिध्यतीत्यपि योध्यम् । नन्वेवं सति १ भगवद्रपद्वारा मवसरणगमन तदनुसन्धान च सापनम् । पल भगवत्तीगर रातो भगवा हा भगवरणगती भगवना निरीदनभ्यागीकारादरुिष कमनियमाभावाग्निदरित्र चिन्लामाधनाना- मयुतपादिति भार ।
नवरलम्। १७ १ यस्मादुक्तरीत्या खतः सर्वमशक्यमतः सर्वात्मना शरणागतौ प्रभुरेव सम्पादयिष्यतीति हृदयम् । भक्तिमार्गीयान् सर्वानंशान् विचार्य तत्र प्रतिवन्धं खाशक्ति च स चेत् पश्यति, तदा सर्वात्मना तथा भवति । नित्यमिति नैरन्तर्यमुच्यते । अन्यथा कालेनासुरधर्मप्रवेशः सात् । अन्तःकरणे तथाभावेऽतथाभावे वा तथा वदनमावश्यकमिति ज्ञापयितुं सततमेवं यदद्भिरित्युक्तम् । एवं सति लोकशिक्षाप्यानुषङ्गिकी सिध्यति । एवमुक्तप्रकारेण सेवापरतया स्थैयमित्यर्थो वा । नन्विदमपि न स्वशक्यमित्याशङ्का 'यमेवैप वृणुत' इति श्रुतेर्मे मतिरित्येव, एवंप्रकारिकैवेत्यर्थः । श्रीमत्पुरषोत्तमकृतविवृतिप्रकाशसमेतम् । प्रथमत एवेदं साधनं कुतो नोपदिष्टमित्यत आहुः भक्तीत्यादि । सर्वात्मना तथा भव- तीति । श्रीकृष्णाश्रयोक्तरीत्या सर्वेषां सहकारिणामतयात्वमसहायत्वं च निश्चित्य, विवेका. दीनां भक्त्यन्तानां साधनानां खासाध्यत्वं च निश्चित्य, दीनभावेन सर्वैः प्रकारैः शरणाग- तिर्भवति । तथा च प्रागेवोपदेशार्हत्वेपि यदधुना सन्ति उपदिष्टम्, तत् सर्वात्मना सबैः प्रकारैर्भवनार्थमित्यर्थः । आसुरधर्मप्रवेश इति । बाहिर्मुख्यजनकाहङ्कारप्रवेशः । तथा वदनमावश्यकमिति ! वाचस्तेजोमयीत्वेन वदनक्रियायां वैखरीत्वेपि वक्तुः पश्यन्ती प्रकाशयन्त्यन्तःकरणमासुरधर्मात् परावर्तयेदत आवश्यकम् । परोपकारायापि मवेत् , अतश्य तथेति पोधनायाहुः एवं सतीत्यादि । एवं सत्याश्रयस्यैव मुख्यता आयातीति सेवावश्य- कत्वबोधकपूर्वग्रन्थविरोध इत्यतः प्रकारान्तरेण व्याकुर्वन्ति एवमुक्तेत्यादि । एवं वदद्रिः सर्वचिन्तारादित्यपूर्वक सेवापरतया सेयम् । तथा चाङ्गत्वेनैवात्र शरणोपदेशो, न तु मार्ग. खेन, अतो न विरोध इत्यर्थः । स्वमत्या निष्कर्षकथनस तात्पर्यमाहुः नन्वित्यादि । इदं सर्वात्मना शरणगमनमपि न स्वशक्यम् , 'सोहं तवायुपगतोस्यसतां दुराप'मित्यरस्तुती तथा सिद्धत्वादिसाशन 'यमेवैष वृणुत' इति वरणलम्यत्ययोधकश्रुते, मतिरेख. प्रकारिकैव । भगवता यदानुगृह्यते, तदैव सर्वात्मना शरणागतिर्भनति, मान्यया । 'तचाप्यहं भवदनुग्रहमीश मन्ये पुंसो मवेघहि संसरणापवर्गः । सप्पन्ननाम सदासगया मतिः स्यादिति तत्रैव पाक्योपात् । तया चास्मिन् मार्गे कृपय साधनए, भतः श्रुत्सनुसारेण मार्गप्रवेशतदुच्यादिना वरणमनुमाय मदीयेरेवमेव मर्तन् यतन्यं ५। पदि प न तन्निर्वाहः, तदा प्रतियन्यकमनुमेयम् । गगवमा एतद रिक्त ह सर्वप्रतिनिधिभूतस साधनान्तरसामागत् । गीतायामन्ते एासन शोमाभावार्थमुपदेशन तथा निश्चयात् । एतद्वाफ्यान्तःस्यस श्रीकृष्णपदस भातसहितपुरुषोतवाचता सुप्रसिद्धत्वेन मम स एष शरणमिति तस्मिन् सरसफलभोपने वास्यतात्पर्य का निधीरे गुरुमुखाइते अवगस तत्पूर्वकाणामन्येषों प सरूपायोस्तत एव सुस सिद्धेरिति ॥९॥ एवं सर्व व्यायाव ग्रन्यकरणसान्ते शरणाविरुवस प प्रयोजनमा ३न..
२८ नीविट्टलेश्वरविरचितप्रकाशसमेतम् । भक्तिमार्गे प्रवृत्तस्य दाार्थमिदमुच्यते । अन्यस्य सूर्य इव तद्विमुखसार नार्थिवा ॥१॥ भक्तिमार्गमुधासिन्धोर्विचारमथनः स्वयम् । स्फुटीकचानि रमान श्रीमदाचार्यपण्डितः ॥२॥ मयोवलीकृवानीत्यं हृदि धृत्वा नजाधिपम् । मजन्तु भक्ता येनासौ न विप्नुञ्चति कर्हिचित् ॥३॥ इति श्रीश्रीपिलदीक्षितविरचितो नवरत्नप्रकाशः समाप्तः । श्रीमरपुरुषोत्तमकृतविवृतिप्रकाशसमेतम् । भक्तिमार्ग इत्यादि । भगवत्कृपया यो भकिमार्गे स्वकृतार्थत्वाय प्रवृत्तः, तस्स दाार्थ तदुक्तरीत्या फलावश्यभावनिश्चयेन प्रवृत्त्यविधातायं इद नवरत्न शरणमत्रावर्तन चोच्यत थाचार्यरुपदिश्यते । तस्मैवोद्वेगनिवर्तनस प्रमूणामनन्यजनवत्सलतयावश्यकत्वात् , न तु साधारणार्थम् , तर हेतु. अन्धस्येत्यादि । तद्विमुखस्येति । मक्तिमार्गादहि- मुखस्य । अत्रेति । चिन्तानिवृत्युपाययोधकेस्मिन् अन्ये । शरणमत्रावर्तने च । तथा चाथित्वस्य अधिकारिविशेषणत्वाद्विमुखस्य चार्थित्वामावेनाधिकारामावातदर्य नोव्यत इत्यर्थ । एतस्य ग्रन्थस भगवत्सिद्धान्तसारत्वबोधनायाहु. भक्तीत्यादि । श्रीमदाचार्य- पण्डितैरिति । मयूरव्यसकादिसमास । पण्डितत्व च न केवल सदसद्विवेचकबुद्धि- मत्त्वम् , शास्त्रोत्यबुद्धिमत्त वा । किन्तु 'पण्डितो बन्धमोक्षवि'दित्येकादशे मगवद्वास्यात्, 'यस्स सर्षे समारम्भा कामसकल्पवर्जिता । ज्ञानाग्निदग्धकर्माण तमाहु पण्डित बुधा' इति गीताया भगवद्वाक्याच ताशधर्मवत्त्व विवक्षितम् , अन्यथा भक्तिमार्गविचारस्यासम्मवात् । 'भगवान् अझ कालाने ति द्वितीयस्कन्धवाक्येन भक्तिमार्गस सर्वश्रुतिसारत्वनिथयादिति । खकृतविवरणप्रयोजनमाहु. मयेत्यादि । तथा चैतदर्थ विवरणमित्यर्थ ॥१०॥ एप चात्र एतत् सिद्धम् । भगवत्सेवकतानचिचेन यथाशक्ति सेवा कुर्वता दुरसङ्गवर्जनपूर्वक खस्स स्वपरिकरस्य च भगवदीयत्वमनुसन्दधानेन पूर्वोक्तरीत्या सर्व विधचिन्तास्त्यजता सर्वन स्वाशस्यनुसन्धानेन भगवत एव शरणत्वमनुसन्दधानेन यदा स्थीयते, तदा उद्वेगाख्यप्रतिबन्धनिवृत्त्या सेवाया आधिदैविकीत्व सम्पद्यते । तस्मा. दुक्तरीत्या सेवापूर्वक सर्वात्मना शरणगमनमेव परम साधनमिति । नवरमाभासनकृतां वचसां मम यक्षपूर्वकमुपासनतः। व्रजरतहृद्यकृपयास्तु सुखादसपलचैतससपलहतिः ॥१॥ इति श्रीमहल्लभाचार्यचरणकतानस्य पीताम्बरस वनुजेन पुरुपोचमेन कृतो नवरत विष्टतिप्रकाशः सम्पूर्णः । भनन्यभजनेति पाई। १ बजरनइयतपय भवेदसपन्नतससपमहविरिनि पाउ ।
श्रीकृष्णाय नमः। नवरत्नम् । श्रीविठ्ठलेश्वरविरचितमकाशसमेतम् । चिन्तासन्तानहन्तारो यत्पदाम्बुजरेणवः । खीयानां तान निजाचार्यान् प्रणमामि मुहुर्मुहुः ॥ १ ॥ ननु भगवदीयानां कयं चिन्तोद्भवः । इत्यम् । आत्मनिवेदिनो हि मगवद्भजनार्हाः, नेतरे । तत्र चैहिकपारलौकिकयोर्थयो वशिष्टं किञ्चिदसमर्पितम् । एवं सति देहादिनि- हिः केन कार्यः, किं निवेदितार्थेन, उत इतरेण वा । तत्र नायः । तदीयार्यस्य तदिच्छां पिना ग्रहीतुमशक्यत्वात्, इच्छायाश्च ज्ञातुमशक्यत्वात् । वस्तुतस्त्विच्छायामपि सत्यां तदुपयोगोऽनुचितः सेवकस्य । न च तदीयानां देहादीनां तदीयार्थेन पोषणं न दोषायेति वान्यम् । खतस्तथाकृतेर्दोषावहत्वात्तदिच्छायाध ज्ञातुमशक्यलादित्युक्तम् । न द्वितीयः, श्रीविट्टलेशात्मजश्रीवल्लभकृतप्रकाशटिप्पणी । चिन्तात्रयनिवृत्त्यर्थमुनिननवरलकाः। समुज्वलीकृततदः प्रसीदन्तूमये मयि ॥१॥ नवरनप्रकाशे । चिन्तासन्तानेति । यत्पदाम्बुजरेणवः समाश्रिता देहेन्द्रिया- दिकं शोधयन्ति, ( वासनात्मकं लिङ्गं नाशयन्ती) सन्तःकरणशोधनद्वारा चिन्तानां वक्ष्यमाणानां सन्तानो वक्ष्यमाणप्रकारेण तन्निवर्तनेपि कुसृष्ट युद्भावनं तद्धन्तार इत्यर्थः । ग्रन्ये चिन्ताः वयमेव निवर्तयिष्यन्ति, चित्ताशुद्धया कुसृष्टयुद्भावनं तु चरणरेणुसमानयनिवर्ल्समिति भावः । नन्विति । किंमकारकचिन्तोद्भवः, सम्भव- तीति शेषः । इत्थमिति । अन्ये वक्ष्यमाणास्तिसश्चिन्ता भगवदीयानामपि हीनमध्य- माधिकारिणां सम्भवन्तीत्यर्थः । ग्रन्थाद्विनामप्येकां चिन्तां पूर्वोक्तेषु सम्भावितां खयमेव प्रमाणवाक्यैः समाधातुमाहुः आत्मनिवेदिनो हीति । एतन्निरासस प्रमाण- वात्यैः स्पष्टत्वान्मूलेऽकपनमिति भावः । तत्र चेति । निवेदने जाते सत्यैहिकसुखसा- घकानि सीपुत्रवित्तादीनि पारलौकिकसुखसाधकान्यमिहोत्रादिकर्माणि भगवदीयान्येव जातानीत्यर्थः । एवं सतीति । वित्तसमर्पणे कृते सतीत्यर्थः । देहादीति । आदिपदेन गृहादिकम् । तया च गाईस्थ्यनिर्वाह इत्यर्थः । इतरेणेति । निवेदनात् पूर्वमेव स्थापितनानिवेदितेनेत्यर्थः । अस्वधर्मत्यादिति । निवेदितस्स देहादेस्तदीयार्थेन पोषण दोषावहमित्युतम् । अनिवेदितेन च पोपणमस्वधर्म इत्यर्थः । दूपणान्तरमप्याहुः । श्रीविठ्ठलेश्वरविरचिवप्रकाशसमेवम् । अवधर्मत्वात् । निवेदितस्यार्थस स्थित्याधय स्वस्थ विचारस्याप्यनुचितत्वात् । तदमि- माने तत्पम्मवात् । एवं सति देहादिनाशसम्भवेन भजनासम्भवाचयापातः 1 मार्ग एव चायमुच्छिद्यत । अतो निवेदने भजनाधिकारः, तस्गिन् सति तदनिर्वाह इत्युभयतः- पाशा रबुरिति चेत् । अब वदामः । 'दारान् सुतान् गृहान् प्राणान् यस्परस्मै निवेदनम् । एवं धमनुष्याणामुवात्मनिवेदिनाम् । मयि सलायते भक्तिः कोन्योर्योस्यावशिष्यत' इत्यादि- वाक्यैस्तदावश्यकम् , साक्षात् श्रीगोकुलेशभजनाधिकाररूपत्वात् , द्विजस्य वैदिककर्मणि गायत्र्युपदेशजसंस्कारवत् । (निवेदनस्य सार्यकत्वाय भजनसिद्धयर्थमावश्यकव्यवहारार्थ निवेदितस्यैव साथ विनियोगः कार्यः।) अन्यथा दारपरिग्रहोत्तरक्षण एव तन्निवेदने कृतेऽये नदविनियोगे प्राप्ते तत्सरिग्रहवैयापत्तिः । अपरंच । दाने हि न सविनियोगो, न तु निवेदने । अन्यया निवेदितानादेोजनं न स्यात् । अनिवेदितस्य निषिद्धत्वात् । निवेदितानामर्थानां भगवद्धोगार्थ विनियोगे जाते तदत्तप्रसादत्वेन खोपभोगकृतिरुचिततरा, दासधर्मत्वात् । 'उच्छिष्टभोजिनो दासा' इत्यादिवाक्यः । आत्मशोधकत्वाच । किन्तु अभी निवेदितार्थम्य विनियोगे जाते तदर्य यत्नः कार्यों, नवेति भयति चिन्ता । *तत्करणे श्रीविद्वलेशामजश्रीवभकृतटिप्पणीसमेतम् । निवेदितस्यार्थस्येति । निवेदितपदार्थस देहगेहादेः स्थितिरादिपदेन तत्सम्बन्धीनि गृहादिकार्याणि विवाहादीनि च तदर्य खस्स विचारोप्यनुचितः । तर हेतुः । तदभिमाने इति । स्थापनीये सतीति शेष. । देहे वकीयत्वाभिमाने स्थापनीये सत्सेतादृशो विचारः सम्भवति । एतस्य तु देहे भगवदीयत्वमेव सम्पादनीयम् , अतः स्वस्य तद्विचारोनुचितः, भगवाने विचारयिष्यतीति स्वस्येत्युक्तम् । तथा च देहस्थित्यायथै पूर्वमेव किचित् पदार्थानिवेदनं नोचितमित्यर्थः । एवं सतीति । पक्षद्वयप्रकारेणापि देहाद्यनिर्वाह सतीत्यर्थः । तदावश्यकमिति । वाक्येषु निवेदनक- थनात् सर्वनिवेदनमावश्यकम् , नतु पदार्थविनियोगेन चापितमित्यर्थः । याधितत्वे मगवान पदेदिति भावः। साक्षादिति । भजने सर्वाधिकारत्वोक्तावपि सत्त्वम्यवहि- तस्यैव भजने तथा । साक्षात् पुरुषोतमभजने तु निवेदिनामेवाधिकार इति भावः । अन्यथेति । निवेदितपदार्थस्य स्वयमग्रहणे दारानुपयोगोपि प्राप्येत, तथा च न तथेयर्थः । दाने हीति । पुत्रविवादिकं निवेदितम्, न तु दत्तमित्यर्थः । निवेदितो- पभोगे प्रकारकथनायाहुः निवेदितागामिलारभ्य शोधकत्वादित्यन्तम् । तथा धेयं चिन्ता तु प्रमाणवाक्यैर्युक्तिभिः परिशीलितैनिजाचार्यपदाम्बुजरेणुसमाश्रयकृतचित्तशुद्धेः कुसृष्टयनुदावनेन च निवर्तते । अतोन समाधैयामन्यां चिन्तामाहुः किन्वित्यारम्य (किंच । तत्वरणे माहिमध्यसम्भव इलारभ्योतचिन्ताभावायेदमत्र रिचार्यते। सेवार्थ यत्रकरणे बाहित्य सेवाप्रतिवन्धचन सम्भवति । तस्य रोगाङ्गत्वेन तत्रवत्वात् तदररणे तदसम्भवाच । नच 1.चिहान्तर्गत टिपण पाचात्य प्रभूणानिति प्रविभाति ।
नवरत्नम् । बाहिर्मुस्त्यसम्भवः सेवाप्रतिवन्धश्च । 'नैवर्गिका या से तिवाफ्यात् भगवत्कृतप्रतिबन्ध तत्र स्यात् । अकरणे निवेद्याभावेन भवति च दुःखम् । एवंभूतान् खानुपदिशन्ति चिन्ता कापिन कार्येति । चिन्ता कापि न कार्या निवेदितात्मभिः कदापीति । भगवानपि पुष्टिस्थो न करिष्यति लौकिकी च गतिम् ।।१।। लौकिकतदभावेपि भगवदर्थापि सा न कार्या। एतदाहुः कापीविशब्देन । अङ्गी- कारेणैव सर्व स्वत एव करिष्यतीति विश्वासो यतस्तस्सावश्यकः । भगवतोपि तथानियमः । कदाचित् परीक्षार्थ प्रारम्बभोगार्थ वा प्रमुश्चेद्विलम्बते, तदापि न कार्यत्याहुः कदापीति- पदेन । ननु लोकवत् कुटुम्मायासक्त्या स्वस्यापि लौकिकी गति कदाचित् प्रभुः कुर्यात् , श्रीविद्यलेशारमगधीयहमतटिप्पणीसमेतम् । भवेति च दुःसमित्यन्लेन । एवंभूतानिति । याकरणाकरणचिन्तायुक्तान् उमयपक्ष- समाधायकवाक्येनोपदिशन्तीत्यर्थः । तत्र समाधान चिन्ता न कार्येति । पूर्वसिद्धा- निपिद्धवृत्तौ सहजसिद्धयत्नकरणेपि तस्य यत्नस्य चिन्ता अनुचिन्तनं कथं इदं कार्यमिति मनसा सर्वथा तसावनं न कार्यमित्यर्थः । अग्रेषि वक्ष्यन्ति वाणिज्यादावास्थितो तत्र विप्न एव भवतीति । आस्थितिः कायवाचनसां तदीयत्वम् । तथा चानास्थया यत्नकरणे पक्षयोक्तोपि दोषो न भविष्यतीति भावः । लौकिकेति । स्त्रीपुत्रादिनिवा- हकपमानास्थायामपि भगवन्नैवेद्यार्थकयने आस्था सम्भवति, सापि न कार्येत्यर्थः । तत्राप्याथाया तत्सम्पादकेषु पास्थितिसिझ्या पाहिमुख्यं स्यादेवेति भावः । नन्वना- स्थया कृतो यनो न सिध्येदित्याशयोत्तरार्धा सामान्यत आहुः अङ्गीकारेणैवेति । खसौदासीन्येपि भगवान् खाद्गीकारेणैव हेतुना सर्व यत्ने सिद्धं करिष्यतीत्यर्थः । विलम्बते इति । औदासीन्ये तत्कृतो यनः कदाचिन्न सिध्यति चेत्तथाप्यग्रिमयने आस्था न कार्यसर्थः । ननु लोकवदिति । लोकस्यैव कुटुम्बासस्या भगवदगीकारस्यासिद्ध- त्वेन लोकस्यैव स्वस्यापि लौकिकी लोकसदृशीं गतिमाथापूर्वक विचार्य यनकरणे एव 'वर्गिका या सेति यावयारान भगवकृत प्रतिबन्ध इति वान्यम् । नवनिश्पदचयापते । अन्यथा आयासविघातमिलतापनिव धारिता स्यात् । अत सीयाना वेवगिकायाविघालमेर भगवान् करोच, न ससेवावायासविषप्तमिति निधीयते । अन्यथा रकमानस्य निषेधै भननमाग गवारियेत । नन्दाम- निवेदिनामितरतासम्गवेन तननितचिन्ताऽभावात् कय चिन्ता न श युपदेश इति चन् । अवेद प्रति भाति । भजनमार्गे दि भगवदगीकारनिविध पुग्मियंदाप्रवाहभेदेन । नापि वै विध्यम् । तर पुष्टिपुश्पनीस्तस्य नैनरयासम्भावनापि । पर मर्यादापुर्य प्रवाइपुष्टौ चाहीनय तत्काल मर्यादाप्रवाहार, तद्रियात पुटपश । तथा चात्मनिवेदिना मर्यादप्रवाहमवलिताना यथेतरपने जूते बाहित्यसेवाप्रतिवन्धत द्विधातादिक भवति, तथा रोगावेपि सने पितानि भवति चिन्ता, मनस्तदभावय ठान् प्रीचिन्ता कापि न कार्यत्युसम् । अत सेव यह वतन्य गति नानुपपति गाचिर) गीति परः। ३ उपदिशन्दीलन्तेनेति पट । पा . ૨૨ श्रीविट्टलेश्वरविरचिनप्रकामसमेतम । तबाहुः भगवानपीति । यतः पुष्टिस्योतो मर्यादामार्गायवैशम्याघभावपि 'महापुरुषेण निवेदिता' इति खकीयत्वेनागीकारात् नया न करिष्यतीत्यर्थः ॥१॥ एवं चेत्, खाच्छन्द्यव्यवहारापत्या वाहिर्मुख्यं स्यादत आहुः निवेदनोति । निवेदनं तु स्मर्तव्यं सर्वधा तादृशैजनैः। सर्वेश्वरश्च सर्वात्मा निजेच्छातः करिष्यति ॥२॥ सर्वदा सर्वाशे तदीयत्वानुमन्धानेन तथा न भविष्यतीति भावः। अशक्या सेवाय- सम्मवेऽपीदं कार्यमेवेति ज्ञापनाय तुशन्दः । चकारपक्षे समुच्चयः सर्वथेत्यस्यावश्यक- वज्ञापनाय । अथवा । सर्वथा ये तादृशा निवेदितात्मत्वेन तसरास्तैः सह तया । एतेन सहदोपो निवारितः । अतादृशेष्वेतगोपनं सूच्यते । सर्वदेतिपाठे कालापरिच्छेदस्तत्रोच्यते । अन्यथा तदैवासुरप्रवेशः स्यादिति भावः । कदाचिदलौकिकार्यस्य लौकिकस वा सिद्ध्यर्थ प्रभुः प्रार्थनीय इति प्रश्ने नेत्याहुः सर्वेश्वर इति । अत्र सर्वशब्दो निवेदितात्मसर्वपरः । यथा 'स मामणा भोजयितव्या' इत्यत्र निमत्रिता एव सर्वपदेनोच्यन्ते, न स्वन्येपि । सर्वात्मपदेप्येवं ज्ञेयम् । तेन सेवकाः सर्वे यथा यथा प्रपन्नाः, तथा तथा प्रभुरपि तेष्वनी- श्रीविहलेशारमजीवलभकृतटिप्पणीसमेतम् । तत्फलपिद्धिरन्यथा नेतिरूपां नीतिशास्त्रानुरोधेन कुर्यादित्यर्थः । यत इति । पुष्टिः प्रवाहो मर्यादा चेति मार्गत्रयम्, तन्मध्येऊन पुष्टिस्थो भगवान्, अतः कुटुम्बासक्त्या मर्यादामार्गीयवैराग्यादिसाधनाभावेपि पुष्टिमागीयेण महापुरुषाचार्यकृतनिवेदनेन स्वीय. लागीकार करिष्यति । तथा चाङ्गीकारस्स मिद्धत्वान्न लौकिकी गतिं करिष्यतीत्यर्थः । भक्तस्य पुष्टिस्थत्वायापिशब्दः ॥ एवं चेदिति । अनास्थायामविचारेपि फलसिद्धौ खाच्छन्धन पाहिर्मुख्य भगवदननुसन्धान भवेदित्यर्थः । तथा च यत्नानास्थया समाहितो दोपः पुनः प्राप्त इति भावः। निवेदनस्मरणस्य स्वरूपमाहुः सर्वदेति । 'त्वयाभिगुप्ता विचरन्नि निर्भया' इति प्रकारकखाच्छन्धेसि बाहिर्मुख्य भगतदननुसन्धानं न भविष्यतीत्यर्थः । निवेदनानुसन्धानाभावे तु बाहिर्मुख्यं स्यादेव, अतस्तदावश्यकमिति भावः । सेवादीति । आदिपदेन कथा, तदसम्भवेपीत्यर्थः । अनायासन फलमिद्धौ खान्छन्येन प्रासम्य वाहि ख्यदोपस्य निवारणार्थ निवेदनानुसन्धानमुक्तम् । फलासिद्धावपि तदनुसन्धान कार्यवेत्सपिशब्दः । चकारपक्षे सर्पथेति पदेनावश्यक योधितम् । तुशन्दपक्षे आवश्यकत्व तेनैव बोधितमिति सर्वथापदम्य समासेनाग्रेऽन्वयमाहुः अथवेति । आसुरप्रदेश इति । 'दया ह प्राजापत्यां इत्या बागादीनां सामुद्रागात् पापवेषः, पासन्यम्य भगवदर्थमुद्दानातदभाव इति तृतीयाध्याये वैधावर्धभेदादित्यधिकरणे भाप्पे १ नम: र । गत्मनेति पाट । ३. सर्वदा रवि पाट ।
नवरतम्। २३ कृतस्वामिल आत्मीयत्वमेव तेषु मनुत इति तद्धितकृतौ न प्रार्थनामपेक्षत इति ज्ञाप्यते । अथवा। कालादिनियामकत्वेन न तत्कृतोपि प्रतिबन्धसम्भव इच्छायामिति ज्ञापनाय सर्वपदं कालादिपरम् । प्रार्थितोपि स्वविचारितमेव करिष्यतीति प्रार्थनाट्यप्रयोजिकेति ज्ञापनाय निजेच्छेत्युक्तम् । अथवा । निजाःखीयत्वेनाझीकृताः सेवकास्तेषां प्रचुरेच्छातः खयमेवा- पेक्षितं करिष्यतीति न प्रार्थनापेक्षेत्यर्थः । परन्विच्छाया अविकृतलमेवापेक्षितमिति ज्ञाप- नायान्ययप्रयोगः ॥२॥ ननु भगवते समर्पितदेहादेः स्त्रीपुत्रादिपु विनियोगेन खधर्महानिचिन्ता बाधते, तत्राहुः सर्वेपामिति । सपा मभुसम्पन्धो न प्रत्येकमिति स्थितिः। अतोन्यविनियोगेपि चिन्ता का खस्य सोपि चेत् ॥ ३॥ स्वात्मना सह यावन्तो निवेदितास्तैः सहैव स्वस्साङ्गीकारात् तेषां सर्वेषामेव प्रभु- सम्बन्धो, न तु प्राधान्यात् खस्यैवेति तत्रोपयोगे स्वस्य का चिन्ता, न कापीत्यर्थः । इयं निवेदनेशीकारमर्यादेत्याहुः स्थितिरिति । कखचिद्विशेषतोडीकारयेत् , सा पुष्टिरिति थीविंडलेशात्मगधीवतभकृतटिप्पणीसमेतम् । विवृतम् , अतो यस्मिन्नेव काले भगवदीयलविस्मरणम् , तदेव देहादावासुरधर्मप्रवेशो गवतीत्यर्थः । तेन पाहिर्मुख्यं भवेदेवेति भावः। आत्मीयत्यमेवेति । भगवत- खदात्मत्वकयनेन तेपामात्मीयत्वगुक्तम् । खामित्वं भगवनिष्ठो धर्मः सर्वेश्वरपदस्यार्थः । भात्मीयत्वं मक्तनिष्ठो धर्मः सर्वात्मपदेनोक्तः । सर्वपदम्स कालवाचकत्वपक्षे कालनिष्ठो ज्ञेयः । स्वधर्मेति । खधर्मो निवेदनम् , तस्य हानिरित्यर्थः । स्वास्मना सहेति । प्रत्येक प्रभुसम्बन्धे यावत्तत्सम्बन्धानामनजीकारस्तावत् तत्तत्सम्बन्धयुक्त स्त्रीपुत्रादौ स्वस विनियोगे दोषः स्यात् , अत्र तु सहैवाजीकारात् सेवानवसरे अनिषिद्धप्रकारेण भार्याधुपयोगेपि न खधर्महानिरिसर्थः । माधान्यादिति । प्राधान्याद्धेतोः स्वस्मैव नेत्यर्थः । का चिन्तेति । अभगवदीयसंसर्ग हि खपमहानिः । तेपामप्पडीक- तत्वान तयेत्सर्यः । तथा च भगवदीयत्वानुसन्धानेन तेषु व्यवहर्तव्यम्, न तु स्वकीयत्वामिमानेगेति भावः । वित्तादिवद्भार्यादीनामपि समर्पणम् । परमेनावान् विशेषः । अपादिदेहे प्रथैलम सम्पन्धः ला इनङ्गीकामपि सम्पन्योति, अत एतेन पत्तनिष्ठस्यसम्बन्धसमर्पणे कृतेपि तत्तजीवसत्तासमर्पणार्थ भिन्न भिन्नतया तत्तत्कृत- समर्पणमपेक्षितम् । एतत्कृतसमर्पणेनैतनिरूपिततत्सम्बन्धः समर्पितो भवति, स्वखसह- जादिदोषपचकनिवृतित खसकृतसमर्पणेन भवति । वित्तादिपु वन्यसत्तामावादेत- स्कृतसमर्पणेनैव निर्दुष्टत्वसिद्धिरिति । इयमिति ! सर्वनिष्ठसम्बन्धैः सह खसाडी- कार इत्यर्थः । विशेषाडी । निवदेकस्यैवाङ्गीकारस्यनिष्ठफिविनिरूपितसम्बन्धस नति १निवेरिनोऽतीवारेतिपाइ 1 1आमनभानपाद ।
श्रीविठ्ठलेश्वरविरचितप्रकाशसमेतम् ।
मावः । अथवा । पुत्रादीनामन्यविनियोगदर्शनेपि खस्स का चिन्ता, तेपामप्यङ्गीकारेणैव
कृतार्यतासम्भवादित्यर्थः । किश्च । स्वस्येतिपदमावृत्तमपिशन्देन सम्बध्यते ॥ ३॥
यथा पुत्रादीनाम्, तथा खस्सापि सः अन्यविनियोगश्चेत्, तदापि चिन्ता न
कार्येत्याहुः अज्ञानादिति ।
अज्ञानाथवा ज्ञानात् कृतिमात्मनिवेदनम् ।
यैः कृष्णसात्कृतप्राणैस्तेषां का परिदेवना ॥ ४॥
हीनमध्यमाधिकारिमिरपि निवेदितात्ममिश्चिन्ता न कार्या मवति यत्र, तत्र कृष्ण-
सात्कृतप्राणैश्चिन्ता न कार्येति किमु याच्यमियर्थः । केवलप्रवधीनीकृतप्राणानां चिन्ता.
विषयामावादेव न सेति भावः । अत एव केतिशब्द उक्तः । पदसम्बन्धस्तु अज्ञा-
नादयवा ज्ञानायैस्तत्कृतम् , तेषां सा नेतिशेपः । कृष्णसास्कृतप्राणैस्तस्कृतम्, तेषां सा
केत्युक्तम् ॥ ४॥
श्रीविहलेशारमजीवलभतटिप्पणीसमेतम् ।
चेत् , सा पुष्टिः मर्यादातिकमां भगवतो नियन्तुमशक्यत्वादित्यर्थः । तदा तादृशे वदेह-
विनियोगो न कार्यः । अत एप 'प्रतिकूले गृह सजेदिति वाक्यम् । अस्मिन् पक्षे
अन्यन सीपुत्रादौ विनियोगे स्वस्य देहवेत्यर्थः । अन्यविनियोगेति । अन्यत्र लौकिके
खत्रीपुत्रादिका विनियोगदर्शनेपि तेपा निवेदनहानिजनितचिन्ता वस केत्यर्थः ।
तेपामपीति । स्वाङ्गीकारेणैव क्रमेण तेपामपि कृतार्थता सम्भवति । अधुना अतथाभावे-
प्येकाझेन भगवत्सम्बन्धात् तदनुभावेनैवास्मिन् जन्मनि जन्मान्तरे वा तथा बुद्ध्या
स्वस्वकृतसमर्पणन स्वखसहजादिदोपनिवृत्त्या कृतार्यता सम्भवतीत्यर्थः । अजीनस
सर्वांशे भगवानेन चिन्तां करोतीनि स्वस्येत्युक्तम् । स्वस त्वधुनेर सहजादिदोपनिवृत्या
कृतार्थना सिद्धा, क्रमेण तेषामपि सम्भवतीत्सपिशन्दः ।। २ ।।
एतमेव पक्षमाश्रित्यानिमश्लोकाभासमाहुः किश्चति । प्रथमपक्षेसससकीयस नीपु.
त्रादेखीत्यनिमश्लोकव्याख्याने इत्यर्थः । केरलेति । भगवदधीनजीवनानां सवाशे भगवदी
यवेन विपयाः सर्वे भगवदीया एवेति भोग्यविपयेषु स्वीयतेनाभिमानाभावान् सा पक्षप-
भेदेन सान्यविनियोगजनिता पुत्रायन्यविनियोगजनिता वा चिन्ता नास्त्येव, रिन्तु हीनः
मध्याधिकारिणामपि तदभावाध योध्यत इति भावः । चिन्तामा हेतुः पूर्वोक्त एवं सर्वेषां
प्रभुराम्रो ज्ञेयः । आगयाख्याने पूर्व स्वान्यविनियोगचिन्ता, द्वितीये पुत्राचन्यवि.
नियोगांचन्तोक्ता । दितीयव्याख्याने इदं विपरीतमिति विभेदः। तेषां सा मैति ।
स्वपदस वकीयवाचकवरक्षे सा घीपुत्रादिविषयिणी चिन्ता नेत्यर्थः । निवेदनपदार्थों न
नश्यति, रिलम्पस्नु मन्येवेनि नेयम् ॥ ४ ॥
नवरत्नम् । २५ ननु राख्यात्मनिवेदने हि भगवदगीकारेणैव सम्पद्यते, तथा च खयमात्मनिवेदने शेतेपि प्रभुरङ्गीकृतवानवेति चिन्ता भवत्येय, इत्यत आहुः तथेति । तथा निवेदने चिन्ता त्याज्या श्रीपुरुषोत्तमे। चिनियोगेपि सा स्याज्या समर्थो हि हरिः स्वतः॥५॥ पुरुषोत्तमोगीकृतवान्नवेति निवेदनविपयिणी या सा साज्या उक्तनिवेदकवदि- सर्थः । पुरुषोत्तमेन निरोधलीलायां स्वतोन्यभजनं क्रियमाणा भक्तास्तनिवार्य स्वयमात्म- सात्कृता इति ताशे स्वयं सर्वात्मना निवेदने कृते सा शङ्का नोचितेति ज्ञापनाय पुरुषो- त्तमपदम् । तत्रापि स्वरूपानन्ददानेनानिशं पोष्यमाणानां भक्तानां तदितरत्रोपयोगासम्भ- वेव न शझोदय इति ज्ञानाय श्रीपदम् । तथा च तद्युक्त तत्र निवेदने सा साज्येति भावः । कदाचिलोकभयाधुपस्थितौ तन्निवारणाय जीवस्वभावशादन्यविनियोगेपि तेथे- साहुः विनियोगेपीति ! प्रमादात्तथासम्भवेषि प्रभुन त्यक्ष्यति । यतस्तत्वभावयशातथा- भूतमप्युद्धतु तत्साधनानपेक्षः ॥५॥ श्रीनिलेशात्मजीवछभकृत टिप्पणीसमेतम् । इति निवेदनविषयिणीति । इति असम्पतिप्रकारेण निवेदनविपयिणीत्यर्थः । पूर्वोक्तापि निवेदनविपविण्येव, परं हानिप्रकारेणोक्तेति भावः । पूर्वोक्तमेव समाधानमवापि ज्ञेयमित्याहुः उक्तनिवेदकवदिति । मूलस्थतथेतिपदस्यार्थोयम् । सप्तम्यर्थे वतिः । यथा निवेदके, तथा पुरुपोचमे इति मूलानुसन्धानेनार्थः । तथा च यथा पूर्वश्लोकोक्त- रीत्या निवेदककृतान्यविनियोगहेतुफनिवेदनहानिचिन्ता त्याज्या, तथा भगवत्कृताङ्गीका- राभावहेतुकनिवेदनासम्पत्तिचिन्तापि त्याज्येत्यर्थः । पुरुषोत्तमेनेति । एतेन हीनमध्या- धिकारिणां निवेदनविपयकचिन्ताभाव उक्तः। उत्तमाधिकारिणामाहुः तत्रापीति । निवेदितात्मस्वपि मध्ये कृष्णसास्कृतप्राणानामुत्तमाधिकारिणां तु परमसौन्दर्यस्य खगतत्वाय तादशाकारेण प्रादुर्भूते भक्तसहिते भगवति समर्पणस्य सिद्धत्वात् तदानन्देन पोष्यमाणानां शकाया उदयो यस्मात् स शाहेतु स्त्रीत्यर्थः । तदितरप्रेति । अधिकावनगमनेपि तं दोष निवार्य स्वस्मिन्नुपयुक्ताः सर्वे जनाः, राससानां तु गमनमेव नास्ति । इदमगीकारखरूपं ज्ञेयम् । तथाप्युत्तमाधिकारिणां तु भगव- दीयेभ्य इतरनोपयोग एव न सम्भवति । तस्मिन् सति हि तादृशशङ्का भवतीति भायः । तद्युक्ते इति । ताभिः श्रीपदसुचितलीलामिय युक्त निवेदने सति प्रमात् प्राशा शा त्याज्येत्यर्थः । तथा च पुरुषोतमे यन्निवेदनं तद्विपयिणी पुरुषोत्तमला- झीकाराभावहेतुकनिवेदनासम्पत्तिचिन्ता, तथा निवेदयकृतान्यविनियोगहेतुकनिवेदनहा- निचिन्तावत् साज्येति मूलार्थः । निवेदनश्पियिणी चिन्ता निवेदके हा पुरुषोत्तमपि साज्यत्यन्वयः । अन्यविनियोगपीति । रायाचाचपणेपीत्यर्थः । ज्ञात्वा लाखया वर्ष म कर्तव्यमिलाशयेनापिशब्दार्थमाहुः प्रमादादिति ॥५॥ उक्तानेवश्नति पाउ।
श्रीविठ्ठलेश्वरविरचितप्रकाशसमेतम् । अहीकारे लक्षणान्तरमप्याहु लोक इति । लोके स्वास्थ्य तथा वेदे हरिस्तु न करिष्यति । पुष्टिमार्गस्थितो यस्मात् साक्षिणो भवताखिला ॥६॥ कदाचित् प्रवाहवशालौकिके वाणिज्यादौ, वैदिके आनमधर्मादौ वा आस्थिती तत्र विघ्न एव भवति, न तु तत्फलमित्यर्थ । तत्र हेतु पुष्टीति । तद्विनापि स्वपले नैव सर्वकर्ता यत इति भाव 1 पुष्टिमार्गाङ्गीकारे मर्यादा न सहत इति ज्ञेयम् । एव सति किं कार्यमित्याकाङ्क्षायामाहु', साक्षिवत् तत्कृत पश्यत ॥६॥ सेवाकृतिरोराज्ञा याधन वा हरीच्छया। अत सेवापर चित्त विधाप स्थीयता सुखम् ।। ७ ।। सेवाकृतिरिति । गुर्वाज्ञाया अबाधन यया भवति, तथा सेवाकृति पूर्वगपेक्षिता । एव वतमानाना कदाचिद् विशेषतो भगवदाज्ञा चेत्, गुर्वाज्ञा विरुद्धा भवेत् , तदा तथा कार्यमित्याशयेनाहु बाधन वा हरीच्छया। विकल्पेनाबोधनमित्यर्थ । एव सति गुवा श्रीपिलेशामजश्रीवल्लभकृतटिप्पणीसमेतम् । लक्षणान्तरमपीति । पूर्वलोके भगवत पुरुषोत्तमत्वमेतद्विपयकाङ्गीकारे लक्षण सन्देहाभावसाधकमुक्तम् । तत्र पुरुषोत्तमोपि नहि सर्वानगीकृत्स्वान्, किन्तु काश्चन तार मसादविषयान, तबाह कीदा इति स्फुर ज्ञातु न शक्यत इत्यधुना लोकवेदस्वास्थ्य दूरीकर्तृत्वरूप लक्षणान्तरमप्युच्यते इत्यर्थ । स्वास्थ्यपदसार्थमाहु आस्थिताविति । आस्थिति कायवामनसा तदीयत्वमिति लक्षणमेकादशस्क पसुयोपियामुक्तम् । तथा च मूले स्वास्थ्यमित्यत्र स्वपदेन लोकवेदौ तनिष्ठता न करिष्यति, सिद्धा च दूरीकार ध्यति, विघ्नसम्पादनेनेति शेष । तथा चैव विनेनानीकारो निधेय इति भाव । आस्थितौ विघ्नकथनेन इद मम कार्यसाधकमिति ज्ञात्वा तद्विश्वासेन वाणिज्यादिकमान मधर्मादिक च न कर्तव्यम् , किलेतद्वारा भगवान् करिष्यतीति ज्ञात्वा तदुमय कर्तव्य मिति भाव । खयमेव समर्थत्वात् खकीयाना साधननिष्ठता निवारयतीत्याहु तद्वि नापीति । ननु तथापि सिद्वस्य साधनस्त विपाते को हेतुरित्याशा तृतीयररणस्य तात्पर्यान्तरमप्याहु पुष्टिमार्गाङ्गीकारे इति । किं कार्यमिति अनास्थया कृतो यन कय फल जनयेदित्यर्थ । साक्षिपदिति । यथा साक्षी कर्तुनिवृद्ध्योहयोकरहित सन् कर्तृसम्पादित फल पश्यति, तथा हर्षशोकरहिता सन्त साधनानास्थया भगवत्सम्पा दित फल विध्र वा परयतेत्यर्थ । तथा च भगवानेव तस्य यनस फलजनकता समाद यिष्यतीति भाव ॥ विकल्पेनेति । साक्षारसेवाया सिद्धाया साधनरूपसेपायाममाानमिति यव बाधन मिनि पाठ । १ मायेन याचा मनसेयर्वा शी २७ नवरणम् । बाया अबाधने यापने वा सेवैव मुख्या यतोऽतस्तथैव स्पेयमित्याहुः अत इति । एवं सति पर्यवसितं सुखमेवेसाशयेन सुखमित्युक्तम् ॥ ७ ॥ कदाचित् पुत्रादिवियोगशाजनितदुःखेन चिन्तासम्भवे गतिमाहुः चित्तौदेगमिति । चित्तोद्वेगं विधायापि हरियद्यत्करिष्यति । तथैव तस्य लीलेति मत्वा चिन्तां द्रुतं त्यजेत् ॥ ८॥ नन्विदमखिलमशक्यमिव भाति । तथाहि । श्रवणमारम्प सख्यपर्यन्तागतौ हि पम्मालिवेदनवाती । तत्र प्रत्येकं तदेव दुरापमिति दूरतरा निवेदनदिगपि । अतस्तकृत. चिन्तान्यवियोगचिन्तादिसमाहितिनिरति विचार्य साधनफैले एकीकृत्य सर्वसमाधान- माहुः तस्मादिति । तस्मात् सर्वात्मना नित्यं श्रीकृष्णः शरणं मम । वद्भिरेवं सततं स्थेयमित्येव मे मतिः॥९॥ भीतिहलेशारमजीवाशमकवाटिप्पणीसमेतम् । स्थितपिकल्पनेत्यर्थः । तथैव स्थैयगिति । आवश्यककार्यार्थ कदाचित् कार्यस्य तत्परत्वेषि चित्तं सेवापरमेव विधातव्यम् , नतु तत्कार्यपरमिति यत्नानुचिन्तनं न कर्तव्यमिति अन्यारम्भे उक्तोर्थ उपसंहृतः ।। ७॥ कदाचिदिति । कदाचित् पुत्रादिवियुक्तो मवेदिति सम्भावनया अनितं यदुःखं चित्तस्य पुत्रादिपरता इति यावत् , तेन हेतुना निवेदनविपयिणी चिन्ता सम्भवति । तया च लोकवन्ममापि चित्तं पुत्रादिपरं जायत एवातो निवेदनं सम्पन्न नवेति चिन्ता- सम्भवे गति तद्भावप्रकारमाहुरित्यर्थः । चित्तस्योद्वेग भगवदीयत्वाननुसन्धानेन पुनादि- परतां विधायापि यद्यत् करिष्यति सा सा तथा तत्तत्प्रकारिकैव तस्स लीला निवे- दिनां सर्व कार्य स्खयमेव करोतीति भावः इति मत्वा निवेदनविपरिणी चिन्तां सजेदिति मूलार्थः । एतचिन्तास्थापने 'संशयात्मा विनश्यती तिवाक्यात् सर्वमेव नश्यतीति द्रुतमित्युक्तम् । निवेदनं सम्पन्नमेय, परं विलम्बेन भगवतः स्वपापणं चिकीर्षि- तामिति ज्ञेयमित्यर्थः ॥ ८॥ तस्कृतेति । निवेदनकृता यतकरणाकरणविषयिणी चिन्त्यर्थः । साधनफले इति । साधनं श्रवणाष्टकम् , फलमात्मनिवेदनम् , शरणागतावेकदैवैते सम्पयेते इत्यर्थः । भगवतद्वारा भगवरणगमन तहनुसन्धान व साधनम् । पल भगवदशीकार । ततो भगवनक- द्वारा भगवरणगती भगवता निवेदनस्याहीवारासियु कमनियमाभावानिवेदनति स्तन लिन्तासाश्नाना- मयुक्तत्वादिति भाव । २ उवर्ष बैगामेति पाट ।
२८ श्रीविष्लेश्वरविरचितमरारासमेतम् । यस्मादुक्तरीत्या सतः मर्वमशस्यमतः सामना शरणागती प्रमुख सम्पार पिश्यनीति हदयम् । भक्तिमार्गीपान् मर्शनशान रिचार्य तर प्रतिपय सासक्ति यम चेन् पश्यति, तदा समीमना तथा भागी । नित्यमिति नरन्तरंगपो । अन्पमा फाले. नामुरधर्मरोगः सात् । अन्न.करणे तयामावेज्नयामाचे वा तपा पदनमारपामिति भारपिनु मततमेवं यदनिरित्युक्तम् । एव मी रोगशिक्षाप्पानुपहिली मिली । एमुक्तसमाप संगररतमा ग्यनियमों या । नन्विरिन गारमियान 'यमेप पृणुत' इति थुनेमें मतिरित्येर, एकावियर्थः । मनिमार्ग प्रमग दार्थमिदमुपते । अन्धम एप र हिमामात्र नापिना ॥१॥ भनिमार्गगुधागिन्धोविंधारमयनः अयम् । सुटीरतानि रमानि भीमदासार्यपण्डितः ।। २ ।। मयोगासीनानी-धं दिपा प्रजाधिपम् । मजन्तु मना नामां नरिमुवति पनि ।। ३ ।। इति श्रीधीपिहनदीक्षितपिगगितो नरममा गमाः | श्रीकृष्णाय नमः। नवरत्नम् । श्रीमुरलीधरकृतविवृतिसमेतम् । नवरत सुवर्णनिर्मिता परमानन्दरसस्य बोधिका । हृदये पसतात् सदोशी परमोचग्रहरश्मिरूपिणी ॥१॥ रसमयसुवर्णधारावर्पणशीला दशविधागुणाः । श्रीमुरलीधरलीला मुरलीधरमानसे सन्तु ॥२॥ वसु सुवर्णमयं परितः परं रसमयं च विधाय सुमण्डलम् । विविधनर्तनदर्शनतत्परा रसनिधिर्मयि सैव विराजताम् ॥ ३॥ ललिते वृन्दाविपिने वैकुण्ठादप्यतीव रमणीये । क्रीडसि नवरसरचिरे श्रीस्वामिन् मम हृदम्बुजे क्रीड ॥४॥ श्रीशुकदेवरहस्यं प्रकाशितं यैरतीव रमणीयम् । श्रीवल्लभाभियानर्नवधा तेभ्यो नमोस्तु मे सततम् ॥ ५ ॥ श्रीमद्विद्वलप्रभुपु श्रीनवरत्नप्रकाशनिपुणेषु । सप्तविभक्तिरसप्रकाशकेय्वस्तु मे प्रणतिः॥६॥ अन्त खलधर्मप्रधानकलिपिनसमयतीर्थकतगद्रव्यश्रद्धादीनामसापकत्वाद्वदिष्णु- दुरवगाहपापण्डादिनिपुणजनतासा सज्ञाताज्ञानान्धकारसंभृतहृदयदरीनिविष्टविषयविपरस- संभृतानन्तसंसारसागरे निगमतया चेतसः स्थिरलामावाद्विध्युक्तरीत्या श्रवणादिसाध- नाभावान्नवभी रथिन्ताभाषपूर्वकं तदीयत्वानुसन्धानपूर्वक च निरन्तरमष्टाक्षरवदनकृति- साधनरूपसाध्यफलामतिसुगगां च श्रीकृष्णस श्रीमदनरूपाः श्रीवल्लभाचार्या दैविजी- वानुदिपीर्षन्तः प्रथम मध्यनायकत्वेनालौकिकश्रेष्ठभानोविशेषरूपया निगूढद्विमानया आर्य- योपदिशन्ति चिन्ता कापि न कार्येत्यादिना । चिन्ता कापि न कार्या निवेदितात्मभिः कदापि । भगवानपि पुष्टिस्थो न करिष्यति लौकिकी च गतिम् ॥ १॥ वसन्तादिपूर्णरसमयपडैश्चर्यादिमूर्तिमभिः सवितस्य गोरसदानादानप्रवीणस द्वादशसुवर्णरत्नराशिकल्पतरुस्कन्धारूढस श्रुतिगीतद्वादशमाससंवत्परादिरसमयसमयपा- दुर्भावकस्स गायकपरित्राणनिपुणैकन्यक्तिपदमागावियोतिवसकलसुषमासदकीर्तिपाकठा- कारकस्स सप्ताक्षरध्यमितोतमवासरस त्रिभुवाललितमाधुर्यादिसुगन्धलतामधुपानमवीण- श्रीमुरलीधरविरचितटीकासमेतम् । षट्पदस स्वीयजनानामाधिदैविकसकलज्योतिषामानुकूल्येन चिन्तानिवर्तकस द्वितीयच. रणमात्राविद्योतितत्रयोदशमाससवत्सरस लौकिकसकलशुभकर्मानईसाप्यस्य मगवद्भक्ता. वाधिक्यद्योतकस्य तथाधिकमात्रायास्त्रयोदशीवेनानङ्गसापि साङ्गतातियोधकस्य उत्तरद- लाद्वैलक्षण्यद्योतनायाधिकैकमावस वा। सा मात्रा तु गायकपरित्राणसमाया , प्रथमचरणे गूढा न्यासे द्वितीय चरणे च प्रकीकृता । अन च याकारे आकृतिरूप निगूढवासुदेव- पदमुत्तरान्वयि गूढमासमन्तात् सर्वप्रकारेण निवेदित आत्मा येरित्यर्थात् । अत एव यद- पदत्वमुक्तम् । तस्य चरणान्तवेन गुप्तवामनत्व सत्येकादयति प्रथमचरणेन साम्पम् । अनेन मलिम्लुचातिरिक्तैकादशमासाना सनहोपि घोतित । द्वितीयचरण तु योदश. मान सममेव, रिपदायास्तृतीयान्सस्य व्यञ्जनस्य न्यासेऽगणनाघाकारस्य वैकल्पिकवाम नत्वे द्वादशमाना । अकारोप्यत्राकारात्पूर्व प्रश्लिष्टो वेष सकलवायूप । असा गायच्याश्च तुरीयम्स तुरीयनिगमवेदैकत्वाभावात् विचरणे साम्यम् । असास्त्रिचरणाया- चालौकिकश्रेष्ठभानुप्रकाशत्वम् । एकस्मिन्नर मध्यस्था दिव्यव्यक्तिरव्यक्ता पूर्वोतरा. न्वयिनी । पूर्वान्वयित्वे यशोदोत्सदलालिता व्यक्तिरुत्तरान्वयित्वे कीर्त्यालालिता व्यक्तियमिता वेद्या । अङ्को घानन्दात्मा विद्यारूपो भगवमाकट्यस्थानम् । व्यक्तिद्वये- प्यकस्य समत्वात् । सकलवापाक्षर एकस्मिन्नेकार । द्वितीयाया व्यक्ती द्वितीयत्वेपि तजातित्वेनाद्वयत्वादेकार । एव चैकाङ्कस द्वित्वे शेकादशी कृष्णवल्लभा प्रकटा भवति । तथा च दलद्वयस्यायन्तरहि तत्वेन वर्तमानता उत्तरोत्तर वर्तमानस्यैव रसावहत्वात् । योगवलेन भूतभविष्यपदार्थयोर्वर्तमानत्वेपि सर्वेपा तथात्वाभावात् । अत एवं यभोत्तर मुनीना प्रामाण्यमिवैचोथोत्तरभूयस्त्वमिवान्तिमवर्णेऽर्थपर्यवसानमनुभवसिद्ध रसावहम् । अतो वाक्यपदीये 'पदेन वर्णा विधन्त' इत्यादि । किप, दी मानाद्वयम्, प्लवने यमिति हरि पमधा इह द्वितीयचरणे मात्रात्रय गुणम् , तद् द्वितीयव्यक्त्या व्यक्तीकृत कदापीतिपदेनेति । नदि कदापीतिपदमेकम् , किन्तु पदनयम् । एवञ्च कदाप्येतस्मात् पदद्वयात् यदितिपदमाचार्य शेपत्वेन पूर्वोक्तसकलप्रकारयोधक हृयेव स्थापितम् । गायत्रीमानार्थसाम्याय तत्स्वात्मद्वितीय- व्यत्या व्यक्तीकृत वेद्यमिति भाव । द्वितीयचरणान्त इति पदे सति पवदयमानाभि- स्तिथय इति कृष्णजन्मपक्ष । पदैर्भूतभविष्यद्वर्तमाना एतत्सकलरहस्सार्ययोधक्स 'क्षय कार्तिकादिनये नान्यत सात् तदा वर्षमध्येऽधिमामय घेति सवत्सरस्यास्य मासात्रयोदशेति सोपि सग्रहीत । इति पदप्राकट्ये गूदा पोडशकला द्वादशकले प्रविशन्ति । तृतीपे मावामि सूर्यस कानामक्षरसाना पद प्रातरादीना प्रयाणा घोतकस तुर्ये मात्रामि शुक्लपक्षद्योतकस्स रुद्रसस्ताक्षरैमलिम्लुचातिरितमासाना च पघात्मकत्व स्पष्टयत , प्रात साममध्याहापराइसापाद्वाना च पोतकस, ३१ नवरनम् । दिनमणेरुत्तरपदमात्रस्य भावप्रयोगात् (१) खाथिकै कनि सत्याधुदात्तस्य माणिकस्स रसेन परिपूर्णस्य सम्बन्ध्यानन्दात्मकरत्नस्य प्रतिपादकतया आर्याविशेषरूपाया मध्यनायक- रखयोधिकाया अपि तद्रूपता वेद्या । वेद्यवेदकयोः संपृक्तत्त्वात् । एवमग्निमेष्वपि वेद्यम् । श्रीकृष्णस्य हरेः पञ्चविधवं श्रीप्रभुचरणैनियन्धे उक्तम् 'अग्निहोतं तथा दर्शः पूर्णमास: पशुस्तथा । चातुर्मास्यानि सोगश्च कमात् पञ्चविधो हरिः । तत्साधनं च स हरिः प्रयाजादि सुगादि यत् । प्राकृत रूपमेतद्धि नित्यं काम्यं तु वैकृत' मिति वेदार्थस्य पञ्चधात्म- कतां सूचयितुं हरिनामाक्षराणि चत्वारि भक्तजनदुःखहरणदक्षाणि समूहरूपेण पृथग्वर्णा- भावरूपं च पञ्चममिति पञ्चधा हरिः । तथा कृष्णनानि वीः पञ्च । पञ्चवर्णोऽगिति । स चर्वेदादिरिति पञ्च, असासनत्वं पशूनामगम्यत्वाय सूचितम् । भगवतः भक्तानां तु विद्यात्मकमुखारविन्दपति प्राप्य कृतार्थता भवति । रमन्ते भक्तानां मनांसि यत्र तद्रलम् । प्रसेकं रत्नेषु नवत्वेपि क्रमो विवक्षितः । श्रेष्ठभानोः समयपरिच्छेदकज्योतिषां प्राधान्यात् तद्रलस्य मध्यनायकत्वम् । आर्याविशेषरूपछन्दसा द्योत्ययोतकयोः श्रेष्ठत्वसूचनात् । अर्थस्येयमतिश्रेष्ठा श्रेष्ठभानो रसात्मिका । विशेपरततापन्ना बसुरत्नप्रकाशिका ॥१॥ मध्यस्था प्रथम प्रोक्ता श्रीमद्वल्लभदीक्षितैः। सोर्यशी राजतां नित्या मुरलीधरमानसे ॥२॥ अप्परतप्रधाननवमस्योर्षशीत्वं प्रधानतयोक्तं माणिक्यस्य । रसमध्यसुवर्णनायिका वरमाणिक्यतया निरूपिता । हृदये मुरलीधरस्य सा लसतानित्यमनन्तवैभवा ॥३॥ विचरणसमगायत्री तुरीयचरणेन संयुता तस्वम् । वेदानां प्रसवित्री मुरलीधरमानसे प्रकाशयताम् ॥ ४ ॥१॥ दिनमणेर्दिनप्रधानस्य रत्नमभिधाय क्षणदाप्रधानस्य कृष्णसाराकस्य खात्यमृतथि- दूरवं मुक्ताफलाभिधं द्वितीयं रतमाहुः निवेदनं च स्मर्तव्यमित्यादिना । निवेदनं च स्मर्तव्यं सर्वथा तादृशैर्जनैः । सर्वेश्वरच सर्वात्मा निजेच्छातः करिष्यति ॥२॥ स्मरणं चन्द्रेच्छे च मानसे । एवं च 'अहं तवास्मि' इति निरन्तरं स्मर्तव्यम् । तक्ष भगवत्प्राप्तौ मुरमं निमितम् । तेनाविकृतपोडशदल आधिदैविको भगवन्मनचन्द्र आधिभौतिकेऽविकृते सत् विद्यात्मतां याते अक्षरात्मनि म्यापके पघदशकललं प्राप्त सेव- कमनश्चन्द्रे निविर्शते, तदा पोडशकलो भवति । अत एव पोडशसञ्जयाकाश्चरणाः । अत १.जयतादिति पाठ ३ निवसत इति पाट ।
श्रीमुरलीधरविरचितटीकासमेतम् । एव रसिकशिरोमणिमि श्रीहरिराये 'यद्धयानाचेतोपि च पोडशकलमञ्जसा भवति' इत्यु- क्तम् । इहापिशब्दाचित्तनुयहकाराणा तत्सङ्ख्याकाना चतु पाटयक्षरात्मिका कला सम्पधन्ते । सरचा ताशै कायवानोभिरनन्यतया ये भवन्त प्रपन्ना तादृशैरिनि सहार्थे तृतीया । यद्यपि स्मरणे सङ्गापेक्षा नास्ति, तथापि ताग्भिन्नै सह सङ्गनिवृत्यर्थं तयोक्ति । सर्वसेवकानामीश्वरत्वेन निरोधकत्वात् तेप्वेष देवेषु आत्मत्वमात्मीयत्व च मनुते । अतो 'निजस्य नैजाना चाविकृतेच्छात' इत्युक्त प्रकाशे । भगवदिच्छा परीक्षार्था तात्त्विकी नेत्य- विकृतोक्ता । स्वतत्रप्रवाहमर्यादयो ने शोकोत्पादकत्वात् शोकाश्रयत्वात् वा शुक्तित्वम् । क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकनिवेशम्योनत्वात् शोकननकत्वम् । करिष्यतीति सामान्योक्त्या केपुचिदविलम्न , केपुचिन्मध्यग्लिम्प, केपुचिदतिमिलम्ब इति द्योत्यते । वर्तमानसामीप्ये भविष्यप्रयोगात् प्रथम पक्ष , इतरौ तु सामान्यप्रयोगाद्वेद्यो । उपरितनमर्यादा शुक्तिरवस्तात् प्रवाहरूपा च । उभयो सम्पुटगर्भ सातिरसालं विरतरत्नेव ॥१॥ उपरि महामर्यादाधस्तनशक्त्या तु सम्पुट याता । पुष्टिर्मुक्ता मध्येऽसमृष्टा निर्गता ततः शुद्धा ।। २ ।। पुनरनयोर्न प्रविशति भगवद्भपासु ससक्ता । इत्थं मुक्तारत द्वितीयमथ द्वय वेद्यम् ॥३॥ प्रवाहवेदमर्यादाशुक्तिसम्पुटनिर्गताः । कलानिधे रनरूपा मुक्ताः स्वातिरसात्मिकाः ॥४॥ भवन्तु भावे सरसे तासा मम रसात्मनः । सदा येन भयेन्द्रायो भूपणे भूपणे विभो ॥५॥ प्रशस्तपुप्पबद्ने सर्वरूपरसान्विते । श्रीकृष्णहृदये भाते भासेता हृदये मम ॥६॥२॥ रसवर्पणभावद्वादशात्मककृष्णसाराबाहादकरसरयम्युदयमात्रेण प्रफुलना प्राप्त- वतो, अत एव प्रशस्तयोरत्युत्कृप्टरमार्णवस्थरत्नरूपयो कमलयो पुष्पयो सदा विधमानसाययोर्गोविषप्रतिपालकाशप्रवर्तकयोरलौकिकयो सकलभुवनाप्यायकत्वेन पुष्टि- प्रदयो सूर्याचन्द्रमसो सदानन्दरूपे रत्ने अभिधाय तृतीया सेवकन्यक्ति विना सेव्यलीलानुदयात् पूर्वोत्तरान्वयिनी सदानन्दमध्यस्था चिदानन्दाक्षरदैवजीवसम्बन्धिदेह- रूपविठुमारया मध्यपुरुषयोध्यामदिगन्ता रखव्यक्तिमाहु सर्वेषामिति । सर्वेषां प्रभुसम्बन्धो न प्रत्येकमिति स्थितिः। अतोऽन्यविनियोगेऽपि चिन्ता का स्वस्थ सोऽपि चेत् ॥३॥ १ अन्त इति पाट । २ गदा विद्यमानसाणपथरमस्पयोरिति पाट ।
नयरनम्। वसुन्धराधानानां प्राकृतानां स्वसीयदेहानां परब्रह्मसम्बन्धादलौकिकता यातानाम- क्षरस्वरूपलेन चिद्रूपसात्त्विकानां विशेषेण मगलद्रुमरूपता गवति । सा तु श्रीकृष्णाभर- णत्वेन । किम्य, द्रवतेर्गसर्थकत्वेनान्यत्र विनियोगसम्भव उक्तः । न हि स पस्तुतो भवति । यतोऽलौकिकहस्तिपकेन प्रभुचरणारविन्देन खसेवकमनोमत्तमातङ्गस सस्मिन्नेव स्थापनाय नित्याङ्कुशधारणं कृतम् । अत उक्तं ललिते 'एतत्सदपकजमधुमत्तस्यायं निसर्ग एचाभूत् । नेतरभावं भजते यदशो नित्यमेवास्तीति । प्रमोरिच्छायाः सर्वकार्यकरण- समर्थाया यः सम्बन्धः स परब्रह्मणः समत्वात् सर्वत्र समः । ईग्देहानां महलमन्दिरवे- दत्रयात्मकाक्षराधारस्वेन महलरतत्वम् । स्वयं विराजमानत्वात् । भीमानां विद्रुमत्यं भवति निजपरस्त्रीयदेहादिकानाम् कृष्णेद्धा स्वर्पितानां रसमयपरमालौकिकानां स्वभक्तः। खीयाचार्यस्य मार्गे परमगुणगणालहता भूपणाः सेवायुक्ता यतस्ते रसमययपुषो जगमाः कल्पवयः ॥ १॥ मचिचे ता भयन्तु प्रणयरसभरा उर्वशी रसमध्यात् पाह्यायां वीथिकायां हृदयपरिसरे रनरूपाः सुवर्णे । इत्थं रवं तृतीयं नवसु निगदितं पूर्णकामायमानम् तसे दिव्याय मे सानम इह परमानन्दलाभाय नित्यम् ॥२॥३॥ ननु मध्यहीनाधिकारिभिः स्वयं ज्ञात्वा सदेहसार्पितत्वेपि पुत्रादीनां ज्ञाना- भावात् तहेहानामज्ञानावृतचित्तस्वेन लौकिकत्वादन्यविनियोग एव भवतीति भवति- चिन्तेति युधस सेवकजनशिक्षकस्स महापुरुषस निवेदकस्य प्रभावादज्ञानकृतनिवेदि- तदेवानामपि चिन्ता न कार्येति मरकतामिषं तुरीयं रनमाहुः अज्ञानादिति । अज्ञानादधया ज्ञानात् कृतमात्मनिवेदनम् । यैः कृष्णसात्कृतमाणस्तेषां का परिदेवना ॥ ४ ॥ अज्ञानस व्युवरणोतरक्षण एव सम्बन्धात् प्रथममुपादानम् । तबावरकत्वात् सकर्षणनिचोलनिमम्, यतः ज्ञानात् प्रकाशकत्वेन मार्खरप्रायात् सन्छा तुमतात फुतं देहादीनां परमात्मने समर्पणम् , श्रीकृष्णाधीनकरणं प्राणानामविकृतमव्ययत्वादेयम् । अतस्तस्मै हितः प्रत्ययः सातिथ वेयः। युधेऽज्ञानाद् ज्ञानाद्वार्पितं स गृह्णाति, युषवेन वैप- म्यामावात् । तदीयत्वेन रत्नमपि तादृशम् । प्रियतेऽनेनेसहन्ताममतारमको विविघदुःखदो मनोदेहेन्द्रियविकृतिजनकः संसारो मरः, तस्स कतो नैत्यजनकः । यतः कं निरतिश- यानन्द, तं तायति तनोति वा उप्रत्ययान्तः । मनोदेहेन्द्रियादीन् समावतो मलिनान् 1. भास्करति पाठः।
भीमुरलीधरविरचितटीकासमेतम् । कतकापरपर्यायनिर्मलीकृतधनरसं शोधयति, तयेदमपि । अतः प्रमागरूपरामेण तार- ग्वर्णवसनं घृतम् । अझं सुझं वा पण्डितत्वादनुगृहाति । सरस्वतीरूपनिचोलरामस्वारे य आनन्दमये रसायाम् । श्रीबालकृष्णो रमते यथेच्छं । पूर्णकामं प्रणमामि देवम् ॥ १॥ बुधो विद्यारूपः प्रकटपरमानन्दजनको निचोलं यग्नील सकलरसहारविभवम् । धृतं येन सच्छं मरकतमणिप्रख्यमतुलम् समे चिचे भूयादखिलतिमिराशानदलनः ॥ २॥ निकुञ्ज महीनं सरसरमणीना हदि नटे प्रसिदं पृन्दाया विपिनभुवनेत्र प्रतिदिनम् । प्रमेयं विख्यावं दशरमरसालातरपुर महावेजापुझं मनसि मम भूयादगुमिवम् ॥३॥ मरफतमिह र यदुघसोक्तमत- प्रभवतु मम पिते शोधनाप प्रकामम् । गुरुचरणसमर्पा सापया पुण्यकी सफलदरितही सर्वकामप्रदात्री ॥४॥ इति पुपस मरकताल्यं पतुर्थ रवम् ॥४॥ सतषः कनी सरलरममयः सीनियतनः पूर्णपुरषोतमोजतिमहीनयान , नपर संशयमुरिधीयो मुकुन्दमुखारविन्दनेशोमिपिम्पा. श्रीपतर भाचार्याः सर्वथा नवलम् । नामनामित्वेन तदीयत्वात् । एवं ब्रह्मानन्दादुद्धरणं पदार्थमात्रस वेद्यम् । भजनानन्दे योजनं तु घरणात् पुरुषधर्मः । पूरणा पुरुषतामनवद्यामुत्तमा समधिगम्य रमेशः । सोयमत्र नहि मुश्चति भक्तान् क्रीडति प्रतिदिनं हृदयेपु ।। १ ।। पुष्यति प्रतिदिनं हृदये बै येन राग इह भक्तजनानाम् । तद्गुरो रसमय पररत्नं पुष्पराग इति मे मनसि स्यात् ॥ २॥ स्वस्य स्वीयजनस्य वा परवशत्वादन्ययोगो भवेतू दैवादत्र सदा तदा निजजनैधिन्वा न कार्या यतः। सामयं पुरुषोत्तमस सततं श्रीभर्तुरख्याहतम् जानीयादिति पुष्परागरचना में मानसे भासताम् ॥३॥ इति पुष्परागाख्यं पञ्चमं गुरुदेवस्य रत्नम् ॥ ५॥ अहं ममेयसद्वाहेण लोचति यस्मिन्निति लोकः, पुनः पुनरावर्तनदः प्रवाइमार्गः । भत्र लोचनं नामाहन्ताममतयोरेव विशेषज्ञानम् । तत्र व्यवहारे क्रियमाणे सेवकस्य स्मयनाशनाय फलं न भवति, किन्तु लोके व्यवहारेण फलाभावात् खेदे सति हरिः करिष्यति, तदेव भविष्यतीति निधये जाते भगवान् पुष्टिमार्गे एष तिष्ठतीसनायासेन सकलमनोरया सेत्स्सन्तीति तटस्थतया सेवकैः स्यमित्युपदिशन्ति, मर्यादामार्गेपि स्मय- नाशनायोपदिशन्ति लोके स्वास्थ्यमित्यादिना । लोके स्वास्थ्य तथा वेदे हरिस्तु न करिष्यति । पुष्टिमार्गस्थितो यस्मात् साक्षिणो भवताखिलाः ॥ ६॥ भक्तानां स्मयनाशनेन सकलं दुःखं हरतीति हरियतोऽयं तृतीयमार्गस्थः । मर्यादा मार्गे देशादीनां कृष्णाश्रयोक्तरीत्या साम्प्रतमसाधकलात्, तत्र प्रत्युत प्रत्यूहमेव करोति परीक्षा, स्वतत्रेच्छवाय, पुष्टिमार्गस्थितत्वेन सुखमेवान्ततः प्रयन्तीति पुरुषार्थद्वयं सम्पयते । अन्यथा विततानेकविध्युक्तसाधने फ्लैशेषि फलाभावे सुतरां क्लेशः । तस्मात् स्वयं कविनामा रसापायकरीत्या अलौकिकं न फेनाप्यपनोयं फलं प्रयन्तीति मावः । मत एव कवेर्वजरलेन ब्रजति पर्वततुल्यं किल्विष गच्छत्यनेनेत्यन्वयन सर्व सेत्सतीति साक्षितया सेवकैस्तकृतिं पश्यद्भिरेव सेयम् । पाणिज्यादौ च वेदे विविधविधिकृतौ विममेवेति वेद्यम् यसातसात् फलं वैन मपति नितरां कर्तुरस कृपापाः। अन्तःस्मभूयोमिमानो न भवति सुतरां मानसं बजतुल्यम् नीरीभूतं यथा स्यात् फलमपि मरति श्रीमनिटं यवस्तत् ॥१॥ १.चितवनिति पार। म.वेदेतिपादन २. मदादिवि पाठ।
भीमुरलीधरविरचिवटीकासमेतम् । पर्वतसदृश किल्बिपमिह जात भक्तवर्गस्य । जति त्वरित वनादित्यन्वर्थ कवे रत्नम् ॥ २॥ साक्षीवत्कृतिमादराद्भगवतो यूय सदा पश्यते त्येव सिध्यति सर्वमीप्सिततम कार्य फलं कर्तृतः पुष्टिं श्रीपुरुषोतमादुपदिशन्यद्धा तदासात्मका आचार्या इह वैष्णवान् स्वकुलतोप्यन्याननन्याश्रितान् ॥ ३॥ मर्यादात्यजन विरुद्धमिह यत्च पर ये विदुः पुऐः किन्तु दरिंभरित्वमिति तत् स्वीकृत्य पुष्टिं गताः । दुष्टास्ते दयया सदा विरहिता वेदाक्षरान् वाचय- त्सद्धाज्ञान्गुरुमीथर ह्युपदिशन्तीशय चाशद्रुहः ॥ ४ ॥ इति कवे शुकस्य रत्न पष्ठम् ॥ ६॥ कवियोतीरूपो देवः सुरासुरभावज्ञ आसुरभाव निन्दयन् दैवभाव स्तुवन् खर- लेन । एव च प्रह्लादादिष्यासुरत्वेपि तद्धर्मामावादनुग्रह , अन्येषु निग्रहोपि सूचितोऽ- नेनेति । दैव किं कृत्वा स्थेयमित्यादिसन्देहान् सारिरत्नेन निवर्तयन्ति सेवाकुतिरित्यादिना । सेवाकृनिगुरोराज्ञा पाधनं वा हरीच्छया। अतः सेवापर चित्त विधाय स्थीयता सुखम् ॥७॥ गृणाति परमात्मनस्तत्त्वमिति गुरु , 'गुरु न मयं मन्येते ति वाक्यात् तदुपदिष्टमार्गेण रसमयी सेवा विधेया। तत कदाचिद्भगवदनुग्रहवशात् सेवकस्य विशेपेच्छाया भावरूपा भगवदिच्छा विशेपाकृतिरूपेण त मनस प्राकम्पमाप्नोति, साद्धा भगवदिन्छेसनुमित्या मन्तव्या सेवकै । एव हि गुर्वाज्ञायाधनमवाधन वा हरीन्छया भवतीति भाव । इन्द्रनीलान त्वतिमन्थरगते सर्ववर्णरनपनोघवर्णे तमसाप्यनुपनोप च सर्ववर्णत्वात् । इन्द्र परमात्मा परमैशर्यवान् सकलरसाया जीवनरसवर्पणशील, अत एवायुदात्तस्तद्वदतिनिधिडश्याम सुन्दरमूर्ति, तस्पेदम् । अनेन श्याममुन्दरसेवाया मन प्रभृतीना पृत्योऽयवृततया मन्धरगतयो रसमयसिरविद्युलनारूपा भवन्त्यन उक्त सेवापर चित्त विधाय स्थीयता मुखमिति । निरिडरसकुन सेवाका मन्धरा गतिर्भपतीति सेवामक्रया सकल सिध्यतीति व्यभितम् । गुरणा परमेथरेण या कथिता सर्वरसमदायिनी । परमा उनुसेवना तथा वसुना स्वस्स च सा परा मता ॥१॥ यदि सा अधिका ततो भवेन्मनमस्तस परात्मन प्रभो। परमेष्टतयारगम्यता नितमत्तरपरध्य चेन्द्रियम् ॥२॥ , आरपट ।
नवरसम् । स्थिरतामुपगम्य सेवयावसरेऽन्यत्र कथारसैस्तथा । रविनन्दनरलनीलवां रमणीयां हृदये विचिन्तयेत् ।।३।। इन्द्रनीलमणिवद्विराजिता सर्ववर्णसमवायदेवता । मन्दमन्दगतिमद्रसान्विता मे मनस्सविर विराजताम् ॥ ४॥ यधप्यनेन भगवत्सेवायां देहेन्द्रियाणां स्थिरतोपदिष्टा, तथापि 'यततो खपि कौन्तेय पुरुपस्स विपधितः । इन्द्रियाणि प्रमाथीनि हरन्ति प्रसभं मनः । इन्द्रियाणां हि चरतां यन्मनोऽनुविधीयते । तदस हरति प्रज्ञां वायु वमिवाम्मसी' त्यादिवाक्यैवीयोरिव मनसो दुर्घहत्वेनानेकदुःखोत्पत्या चित्तोद्विग्नतायां सेवाया असम्भवात् तन्निवृत्यर्थ गोमेदाख्यं विधुतुदस्साष्टमं रत्नमाहुः चित्तोरेगमित्यादिना। चित्तोदेगं विधायापि हरिर्यद्यत्करिष्यति। तधैव तस्य लीलेति मत्वा चिन्तां द्रुतं त्यजेत् ॥ ८॥ सांसारिकानन्तदुःखजन्योगस्य चित्तधर्मतयाऽवश्यं प्रथमं भवनमित्यकृतोपि स कृतो भवतीति क्वोक्तिः । तदुत्तरं सेवकस्य यत्कर्तव्यं तदाहुः हरिर्यद्यत्करिष्यतीत्यादिना । सेवकानां सकलदुःसहती हरिर्यवदनेकविधं दशललितलकारप्रकृतियोधितफलाभयं करि- ष्यति, तथैव तस्स हरेलालेति मनसि ज्ञात्वा चिन्तां शीघ्रं सिजेत् । विधौ लिङ् । विधिः कर्तव्यार्थोपदेशः । करिष्यतीति वर्तमानसामीप्ये लट् । अनेन वर्तमानकाय भविष्यत्कार्य सकलं भगवलीलेति सेवकैमन्तव्यमिति भावः । अतीतसमये स्मृतिमात्र आनन्द उपलक्षणत्वेन वेद्यः । वर्तमानस्सानुभूयमानागणितानन्दले रसापापकत्वम् । भविष्यति तु गाविनि कार्येऽत्युत्कण्ठितं मन इति रसाधायकत्वमिति विष्वपि समयेषु यवत्कार्यम् , सा लीला । एवं च सदा चिन्तात्यागे गवामिन्द्रियाणां तेपामापारसारूपम- गतदेहस्स योधकाणीनां च खेहात्मकभेदो वृद्ध्या गोमेदो विधुतुदरनप्रकाराकसास्य भवति । किय, भगवत्सेवकमानसचन्द्रम्प भगाद्वियोगजरसं रुपस्पृा ततलीमायाः रगरणात् तन्मयन प्रप्तभूयं लन्ना परमभगवत्प्राप्तिरविलम्पेन भवतीति शुतिरहसा- धोऽनेन पथितः। चिन्तात्साजनतस्त्वनेन पिदुपा पाणीहपीकादिकाः पुष्टिं यान्ति निरन्तरं विधुमनःसेदं विधायागुवम् । शी प्राप्तिरतो यतो भगरतो लक्ष्मीपनरजमा गोमेदाभिधरतरूपत इदं मे मानसे मामताम् ।। १ ।। गोपालगोरक्षणधर्महेतोपत्तमनवमत्र चिदन् । यगुन्धरा गां परिपालनाय हतारतारत्यमुपेक्षने कपम् ॥ २॥ ममयदेपामु निनपु कपिनियोजनीया मुरसानाय । नो पेट फ में पिर निरं साद पानिनन्त गरम विदन् ।। ३ ॥
३८ श्रीमुरलीधरविरचितटीकासमेतम् । इति मुरलीधरवाण्या देहहपीकाणि पुष्टिमुपयान्तु । मुरलीधरस सततं श्रीगोपालप्रसादेन ॥ ४ ॥ इत्यष्टमं गोमेदाख्यं रत्नम् ॥ ८॥ नन्विदानीन्तनानां सेवकानां श्वः श्वः पापिष्टदिवसत्वेन देशादीनां सापकत्वाभावात् श्रवणादीनां सम्यक्तयाऽसम्भवात् पूर्वोक्तप्रकाराणां सुतरामसम्भवाच कथं फलप्रासिरित्याशका सा भवत्यनायासेनेति तत्प्रकारः त्रिसूत्रापरपर्यायेण नवमेन वैर्यरत्नेनाहुःतस्मादिति । तस्मात् सर्वात्मना नित्यं श्रीकृष्णः शरणं मम । वदद्भिरेव सततं स्थेयमित्येव मे मतिः॥९॥ यस्मात् पूर्वोक्तं कर्तुमशक्यम् , तस्माद्धेतोः सर्वात्मना वाचा व्यक्ततया मनसा. न्तरव्यक्ततया तदर्थानुसन्धानपूर्वकं सदा आसुरावेशामावायाप्टाक्षरमुच्चारयदिरेव सेवकैः स्थेयम् । यथा मनसोऽन्यत्र वृत्तिर्न भवति, तथा विधेयमिति मे मनीषाऽस्तीत्युपदेशः । अयं भावः । श्रीकृष्ण इति विशेषणम्, शरणमिति विशेष्यम् , व्यक्षरं सूत्रद्वयम् । ततः समसम्बन्धपोधकं यक्षरमपि परोक्षास्सिना यक्षरीति नव । किन । जीवात्मनः सम्बन्धवो. धकं द्विधा, अव्ययमनव्ययं च । अव्ययात् विकाररहितात् पुष्टिमार्गीयसिद्धा पुष्टिमार्गी- याणाम् , साध्येतरेपामिति मावः । मक्तबोधकादनव्ययाच प्रवाहमार्गीयभक्तयोधकादस्तीति लीलायोधकं पदगस्त्विति वा शेषत्वेन विविज्ञेयम् । एवं च सलीलाप्रकाशकत्वेन सह त्र्यक्षरी तृतीयेति नवाक्षरी परमावधिसध्या वेद्या । एता ब्रह्मसूत्राक्षररूपाः सङ्कर्षण- प्रद्युम्नानिरुद्धैधृताः, सदैव शिखायज्ञोपवीतधारणं ब्रह्मवैवर्ते व्यक्तम् । प्रसादिभिश्य सह जातत्वेन तद्धारणमत्र उक्तत्वादतः सदा धारणम् । 'सदा बशिखेन चेतिकारिकाव. न्मालापि सदा धार्या । मलधातोर्धारणार्थकत्वात् । मल्यते सदा प्रियते सा माला । अनुपमसुवर्णरतैरद्भुतमाला वसुमितैर्विहिता । मध्यश्रीमाणिक्या विराजतां मामके मनसि ॥१॥ इत्थं नवाक्षरीयं परोक्षनित्यास्तिना चोका । प्रत्येक व्यक्तीनां खरूपमस्या विराजतां हृदये ॥२॥९॥ तर प्रथमं जगन्मङ्गलमजलमूर्तिर्भगवदुरसि स्थितेन श्रीवर्णेन सकलरनसुवर्ण- रससम्भृता नित्यानन्ता द्वितीया प्रकृतिः संसिक्ष्यर्यिका विराजते । द्विसुवर्णाकृतिवर्णो यत्र । अत एवादिविस्तरेण विस्ताराय श्रेष्ठभानुकीर्तिवेधपरम्परया प्रकाशको यत्र द्वौ सदी विराजमानौ सिद्धसाध्यौ यथा रामित्युक्त श्रुत्यानुनासिको तो तु व्यवहार्या- व्यवहार्यो । तर पूर्वो गत्यर्थप्रकृतिश्चतुर्पः । इति श्रीमुरलीघरभट्टविरचिता नवरत्नटीका संपूर्ण । १. खयमिति ।
परिशिष्ठम् । भीलालूमहस्य । अथ नवरसग्नन्यविषये किचिल्लिख्यते । 'श्रीयतेऽमलया भक्त्या हरिन्यविडम्ब- नम्' 'मत्याहमेकया ग्राह्य' 'वशे कुर्वन्ति मां मत्स्या' 'मत्यैव तुष्टिमभ्येती'- त्यादिवचोभिः प्रेमलक्षणया मच्या भगवान् लभ्यः । 'दारान् सुतान् गृहान् प्राणानि सारम्य 'उद्धवात्मनिवेदिनां मयि सञ्जायते भक्तिरित्यन्तेन वाक्येन प्रेमलक्षणाया निवेदनलभ्यत्वम् । निवेदनं च देहादिषु खकीयलाध्यासनिवृत्तिपूर्वकमगवदीयत्वबुद्धि- सम्पादने भवति । 'क्रीडार्थमात्मन इदं त्रिजगत्कृतं ते खाम्यं तु तत्र कुषियोऽपर ईश पुर्युरित्यादिवचनैनिखिलवस्तूनां भगवदीयत्वात्तदीयत्वबुद्धिसम्पादनेन देहादीनां भग- पसेकोपयोगिकरणस निवेदनपदार्थत्वात् । जावे च निवेदने पुनरिष्टानिष्टप्रासिनिवृत्यु- पायविमर्शनादिरूपचिन्ताकृतौ स्वकीयतामिमानेन थाहिर्मुख्यसम्भवानिवेदनवैयर्थ्य सात्। तथा सति न निखार इति परमकृपालुमिराचार्यचरणचिन्तारूपप्रतिपन्यनिवृत्यर्थ 'चिन्ता कापि न कार्ये'साधुपदिदिशे। तथापि निवेदनस श्रवणायष्टकानन्तरमादित्वात् अक्. गादीनां च प्रत्येकं दुरापतया निवेदनस सुतरां तयास्वेन प्रेमलक्षणामा अनुत्पत्या कर्य भगवदाप्तिरित्याशा 'श्रीकृष्णः शरणं ममे सधाक्षरमत्रो निरन्तरमावर्तनीयः, तेन च सर्षानुपपत्तिपरिहारः सकलसिद्धिभेत्युपदिष्टम् । तत्र कपमनुपपतिपरिहारपूर्वककार्यसिद्धि- रित्याकालायां तदाशयं निष्पन्ति प्रभुचरणाः 'साधनफले एकीकृत्य सर्वसगाधानमा- हुरित्याभासग्रन्थेन । 'श्रीकृष्णः शरणं ममे'त्यष्टाक्षरमने साधनफलयोरेकीकरणासर्व- समाधानमिति भावः । तथाहि । श्रीकृष्णः फलरूपः निःसाधनजनोवृतिकृताभिव्यक्तिः सर्पोद्धारप्रयमात्मा मम निःसापनस शरणं आश्रयः शुक्याशस्यसम्पादक इति ममार्यः । यपि खायोग्यताविचारे श्रवणादिसाधनदौतम्येन भगवाधिनैमिन्यामावः, तथापि प्रमोः पुष्टिलरूपविचारे शरणागती सर्व सुलभम् । 'तपाभई समुद्धती मृत्युसंसारसागरादि. स्पादिवास्यात् । तत्र साधनकमेण चेदुहिधीर्प, जदा जीपाशझ्यानपि अवगादीन् सम्पा. पोदाति । अन्यया विनापि साधनं नार्ययति । अतः शरणगमनं पुमर्थसापनम् । मत एव 'शरणं भावपेरिमिति श्रीमदाचार्यरुतम् । 'मक्तद्रोहे भस्यमाव' इति च । हिमायभावे भक्तिसिसय हरि शरणं मावदित्यर्थः । तेपि शरणादिनश्चिमकीनां दौलम्य शात्वा नवविधभक्तिसिद्ध्यर्थमेवन्नावृतिरुपदिशा । अतः प्रमाणपलबिचारेग पूर्वपक्षः । प्रमेयपश्चिारण समाहिनिरिति शेषन् । तथाप फलमेव मापनीकत्रेनि फलिकाः । मनेन श्रीकृष्ण शरण ममेति मार्यों प्यास्यानो शेयः। किम । अयं मो नेतरसापारगः । किन्तु पुष्टिमागीयः । समागगपरन् । मन एष प्रभुचर गैरभिहित पक्कं वाताः सीमा मम । तत एकानि नपि. समेहिके पारलौकिक' इति । पुष्टिमार्गीपवं प मगरलरूपातिरिक्तरुतामावताम् । तपाच पुष्टिसरपं मनोनवरतमापर्तनीयः । मनमा लोकतानुसन्पानेन धरनमारनं परिशिष्टम् । च कार्यम् । अत एवोक्तम्, 'एव चित्ते सदा भाव्यं वाचा च परिकीतये दिति । एवं प्रपत्ती भगवानशक्यमपि साधयिष्यतीति निष्कर्षः । अत एव तद्विवृतौ प्रभुचरणैरूचे 'सर्वात्मना शरणागती प्रभुरेव सम्पादयिष्यतीति हृदय'मिति । तया सति चिन्ताले- शोपि नास्तीति प्रतिबन्धाभावे सिद्ध निवेदनसिद्धौ मुख्यभक्तिलाम, तेन च भगवत्रा- प्तिरिति चिन्ताकरणनिराकरणनिरूपणस्स सार्थक्यमिति कोविदा एव विदाकुर्वन्तु । नवरत्नप्रकाशे, 'अन्यथा दारपरिग्रहोत्तरक्षण एव तन्निवेदने कृतेने तदविनियोगे प्राप्ते तत्परिग्रहवैयर्थ्यापत्तिः । इस फक्किा पूर्वफक्किया न सगच्छत इति बहूनामार्याणां महानवोद्यमोऽस्मिन्नन्थे नानाविधोऽस्ति । परन्तूयमशतेनापि न लगतीयं फक्किका । तत्रायं निष्कर्षों बोध्यः । इह लेएकादिदोषवशाफकिकानां वैपरीत्यं जातं लेखने । अतः फक्किकानामर्यस्वारस्सं विचार्य पूर्वापरभावं निर्धार्य फक्किका लिख्यन्ते । तथाहि । इह पूर्व 'निवेदने मजनाधिकारस्तस्मिन् सति तदनिर्वाह इत्युमयतः पाशारबुरिति चेत्' इति फकिकास्ति । तत्रोत्तरमुक्तम्, 'अत्र वदाम' इत्यादिना । तन 'गायत्र्युपदेशजसंस्का- ख'दित्यन्तेन निवेदनस्यावश्यकतोक्ता । एवं निवेदनस्यावश्यकत्वमुक्त्वा निर्वाहः केन कार्य इसाकाहायां 'निवेदितानामर्थानां भगवद्भोगाथै विनियोगे जाते तदत्तप्रसा- दत्वेन खोपभोगकृतिरुचिततरा' इति फक्किकास्ति पठिता । तथाच देहादिनिर्वाहः केन कार्य इत्याकाक्षायां निवेदितेन निर्वाहः कार्य इत्युत्तर सिध्यति । तत्र किं प्रमाणमित्या- कालायां 'दासधर्मत्वात्' इत्युक्तम् । तदने भगवद्वाक्य प्रमाणत्वेनोपन्यस निवेदितेन निर्वाहः कार्य इति ज्ञापनार्थ मुन्छिष्टमोजिनो दासा' इत्यादिवाक्य 'रात्मशोध• कत्वाचे'ति पठितम् । तदने 'अन्यथा दारपरिग्रहोत्तरक्षण एव तन्निवेदने कृते- ने तदविनियोगे प्रासे तसरिग्रहवैयापत्ति रिति फकिकया अन्यथानुपपत्तिः प्रद- र्शिता। तदने 'अपरचे'सारम्य 'अनिवेदितस्स निषिद्धत्वा'दित्यन्तेन निवेदनदानयोः पुनः स्वविनियोगतदभावाभ्यां वैलक्षण्यं प्रदर्य भगवदनिवेदितेन निर्वाह निषिध्य भगव• निवेदितपदार्थेन भगवदुपभुक्तशिष्टेन प्रसादतया प्राप्तेन निर्वाह कार्य इति सिद्धान्तितम् । एवं फक्किकाकमे सर्वोऽपि ग्रन्थः सङ्गतो भवति । तयाच सिद्धमेतत् । 'द्विजस्य वैदिक कर्मणि गायत्र्युपदेशजसंस्कारव'दिति फक्किाया अग्रे "निवेदितानामर्धानां भगवद्भोगार्य विनियोगे जाते तदत्तप्रसादलेन खोपभोगकृति रुचिततरा । दासधर्मसात् । 'उच्छिष्टभोजिनो दासा' इत्यादिवाक्यरात्मशोधकत्वाचे'त्यन्तो ग्रन्थो ज्ञेयः । एतदने 'अन्यथा दारपरिग्रहो- तरक्षण एव तनिवेदने कृतेऽने तदविनियोग प्राप्ते तत्सरिग्रहवैयापत्तिः । अपरच । दाने हिन स्वविनियोगः। न तु निवेदने । अन्यथा निवेदितान्नादर्भोजनं न सात् । भनिवेदि- तस निपिद्धत्वात्' इत्यन्तो अन्योऽस्ति । तदने 'किन्तु प्रभौ निवेदितार्थविनियोगे जाते तदर्थ यनः कार्यों न वेति मवति चिन्ते'त्यादिरूपो ग्रन्योऽस्तीति सर्वमनवधम् ।
श्रीमद्-वल्लभाचार्य महाप्रभु-विरचित-घोडश-प्रन्थान्तर्गत:-सप्तमो अन्तःकरणप्रबोधः पञ्चटीकाभिः समलंकृतः १ श्रीगोकुलनाथाना बितिः २ श्रीरघुनाथाना पियरणम् ६ श्रीहरिरायाणां विवृति ४ श्रीधजराजाना विवरणम् ५ धोपुरुषोत्तमान विवरणम् धीमद्-वल्लभाचार्य-महाप्रभु-प्रवर्तित-शुद्धाद्वंत-सम्प्रदायस्प- सप्त-पोठान्तर्गत-पष्ठ-पीठाधिष्ठित-निस्यालोलास्थित-- गोस्वामिश्री १००८ श्रीवल्लभलाल-महाराजाना- स्मृती-तेपा-श्रीमती-कृष्णावती चहूजी महा- राजधीत्येताभि-प्रकाशित वि.सं. २०३६ श्रीवल्लभारा ५०३
प्रशन।
गावामी १००८ श्रीवल्लभलालजी महाराज (पष्ठपीठाधीश्वर) के
श्रीरप्रणावती बहूजी महाराज,
श्री कल्याणगयजीवी हवेली, यंक रोड. बड़ौदा, गुजरात ३ ९००
०६,भारत
साधारण मंस्करण २००० प्रति
गज सस्मरण
१००० प्रति
श्रीवल्लभाब्द. ५०३
प्रन्थ-परिचय लेखक . गोस्वामी श्याम मनोहर
मुद्रक :
स्टूडियो बहार, २३-ए, सेन्ट्रल चौपाटी बिल्डिंग चौपाटी,
बम्बई-४०० ००७.
Pr
Nrit
गोस्वामिश्री १००८ श्रीवल्लभलालजी
महाराज
॥ श्रीकृष्णाय नम:। ।। श्रीमदाचार्यचरणकमलेभ्यो नमः ।। ग्रन्थ-परिचय अन्त.करणप्रबोध ग्रन्थ श्रीमहाप्रभुकी सन्यासग्रहण करनेसे पूर्वकी तथा षोडशग्नन्योमे योजित ग्रन्थोमे अन्तिम कृति है. श्रीयदुनाथजी-विरनित वल्लभदिग्विजयके अनुसार सन्यासग्रहण करनेके वाद श्रीमहाप्रभु भूतलपर ३९ दिन विराजे थे और यह सन्यास आपने इस ग्रन्थमे वणित तृतीय भगवदाज्ञाके पालनहेतु लिया था अतः आषाढ शुक्ल द्वितीयासे ३९ दिन पहले यानि वैशाख (व्रज जेष्ठ) कृष्णा सप्तमोके आसपास किसी दिन वि सं. १५८७ मे इस ग्रन्थको रचना हुई यह माना जा सकता है कुछ आधुनिक विद्वान् इस ग्रन्थमें वणित तीन भगवदाज्ञाओकी व्याख्या श्रीमहाप्रभुको दोवार हुई अस्वस्थता तथा अन्तमे श्रान्ति तथा देहत्यागकी आन्तरिक प्रेरणा के रूपमें देते है. जो बात इन विद्वानोके गले नहीं उतरतो है वह है इन तीन भगवदाजाओका चमत्कारिक रूप! श्रीमहाप्रभुके प्रति किसी अतकित लगावके कारण ये मिथ्याभाषणके आरोपका साहस जुटा नही पाते अतः भक्ति और भ्रान्ति के सहारे इन स्पष्टतम विधानोको अतीव अस्पष्ट और अटपटी व्याख्या प्रस्तुत करते है इन विद्वानोको कभी लगता है कि किन्ही श्रान्ति के क्षणोमे ये तीन भगवदाज्ञाकी भ्रान्तिया पैदा होगयी होगी--कभी इन्हे लगता है कोई तीन साघातिक बिमारियोसे पैदा हुई निराशाके वश श्रीमहाप्रभु इन बिमारियोको परलोक सिधारनेको भगवदाज्ञा ही मान बैठे है-कभी इन्हें लगता है कि सम्भवत. किसी अन्तरवाणोके रूपमे श्रीमहाप्रभुने लोक- त्यागका आदेश सुना हो और उसे ही श्रध्दावश भगवदाजा मान ली हो ! न पूर्ण श्रद्धा और न पूर्ण अश्रद्धा अर्थात् मध्यमार्गको अपनाने की मनोवृत्ति- वश अपनी निराधार कल्पनाओको बौद्धिकताके रूपमे ये विद्वान् मान्य करना चाहते हैं जगतके कारण स्थिति या प्रयोजन को ईश्वरीय चमत्कार मान कर भी जो चमत्कृत नहीं होते, वे ईश्वराज्ञाके श्रवणको 'चमत्कारपूर्ण' घटना कहकर अस्वीकार करना चाहते हैं. इससे अधिक चमत्कारपूर्णतार्किकता और क्या हो सकती है ! .
इन कपोलकल्पित व्याख्याओको प्रस्तुत करनेका एकमात्र हेतु स्वयम्की तूटती हुई श्रद्धाको कञ्चित जोडना होता है पर अपने इस मोहमें ये विद्वान् अक्सर यह वात भूल जाते हैं कि ऐसी अटपटी कल्पनासे श्रीमहाप्रभुका न तो कोई बुद्धिवंभव और न कोई चारित्रिक महत्ता ही सिद्ध होती है. जिस व्यक्तिका मनोवल दोवार केवल बीमार पड जानेपर तूट जाता हो उसे 'युगप्रवर्तक व्यक्ति' कैसे माना जा सकता है ? दोबारकी बिमारीसे पनपी निराशाको देहत्यागको भगवदाज्ञा मान लेनेवाले भ्रान्त आत्मघातीको किस अर्थमें बुद्धिमान् माना जा सकता है ? भारतवर्षकी तत्कालीन नितान्त विषम परिस्थितिमें किस अदम्य उत्साह निष्ठा और सकल्प के साथ श्रीमहाप्रभुने वैष्णवधर्म और संस्कृति की मगालको अपने सुदृढ हस्तोमै धारण किया था ! देशके कोने-कोनेको उससे प्रकाशित करनेको जूझते रहनेवाले व्यक्तिको इननी कमजोर इच्छाशक्तिवाला माननेमें कौनसा गौरव सिद्ध होता है । वर्ण-आश्रम जाति-लिंग निम्नवर्ग-उच्चवर्ग देशी-विदेशी के भेदके विना सभी व्यक्तियोके हृदयको पुष्टिभक्तिके उपदेशसे भावपूरित श्रीमहाप्रभुने कर दिया था. ऐसे व्यक्तित्वके धनी श्रीमहाप्रभु बोहड जगलोमे वर्षा-शीत-आतप आदिको परवाह किये विना निरन्तर परि- भ्रमण करते रहे--विदेशी आक्रामकोसे आतकित नगर-जनपदोंमे वसनेवाली जनतामें निरन्तर आस्थाका सञ्चार करते रहे वे स्वयम् दो बारकी बीमारियोसे घबराकर आत्मघात करें यह कल्पना से बुद्धिसगत मानी जा सकती है ? जबकि वे जनताको- “विदु खसहन धर्यमामृते सर्वत सदा" का उपदेश देते रहै । अत आज्ञापूर्व तु या जाता गगासागरसगमे । यापि पश्चान्मधुवने न कृत तद्-द्वय मया ।। देहदेशपरित्यागस्तृतीयो लोकगोचर. । पश्चाताप कथ तत्र मवकोह नवान्यथा ।। इन शब्दोमे रास्ती अन्तर्वाणी या सघर्षजन्य धान्ति या शारीरिक अस्वा- स्थ्यजन्य निराशा और भगवदाज्ञाकी भ्रान्ति को खोजना श्रीमहाप्रभुका अनादर है~-उनको अनुभूतिको आध्यात्मिक-आधिदैविक गहनतारो नितान्त अपरि- चयका द्योतन है। M श्रीमहाप्रभुके पौत्र श्रीगोकुलनाथजी इस ग्रन्थका सन्दर्भ यो देते है द्वादश स्कन्धात्मक श्रीभागवत पूर्णपुरुष पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण भगवान्का हो नामात्मक स्वरूपमे प्रकट दूसरा रूप है भागवतकी वाणोके अर्थको प्रकट करने के लिए ही वाणोके पति तया भगवन्मुखरूप अग्निका श्रीमहाप्रभुके रूपमें प्राकटय हुआ (यह रहस्य भागवतको सुबोधिनी व्याख्याके प्रारम्भम स्वयम् श्रीमहाप्रभुने ही प्रकट फिया है) भागवतपर सुबोधिनी व्याख्या श्रीमहा- प्रभुके अवतारका प्रमुखतम प्रयोजन है. दशमस्कन्ध भागवतका हृदय है प्रथमस्कन्धसे प्रारम्भ कर क्रमश दशमस्कन्ध तक पहुचनेमे पर्याप्त विल. म्बकी सम्भावना थी फलत तृतीयस्कन्धतक पहुचने के बाद अविलम्ब दश- मस्कन्धको व्याख्या पूर्ण करनेको कही एक विशष भगवदाज्ञा श्रीमहाप्रभुको हुई (उसका पालन तो सर्वथा हुआ ही अन यहा उस आज्ञाका उल्लख नही किया गया है. परन्तु उप आज्ञाके निगूढ आशय तया अपने अवतारके प्रयो- जनकी पूर्तिका सन्तोषोद्गार स्वयम् श्रीमहाप्रभुके मुखसे दशमस्कन्धकी सुबौ- धिनीके समाप्तिपर प्रकट हो गया है-'प्रपरणमिह पूर्यतेऽनव- द्य त्रयमपि विश्वजमाय मादृशाना, निजपदसमवाप्तये च नित्य निजगुरुणा हरिणव लोकवन्द्यम्") दशमस्कन्धकी व्याख्या पूर्ण करने के बाद श्रीमहाप्रभु पूर्वनिर्धारित योजनाके अनुसार अवशिष्ट स्कन्धोकी व्याख्या लिखने प्रवृत्त हुए भागवतके सातो अर्थोमे एकवाक्यता स्थापितकर दिखलाको अपनी प्रतिज्ञाके अनुसार भागवतार्य-निबन्धमे शास्त्रार्थ स्कन्धार्थ प्रकरणार्य तथा अध्यायार्थ को व्याख्या लिखी जा चुकी थी इसी तरह वाक्यार्थ पदार्थ और अक्षरार्थकी व्याख्या भी प्रथम सूक्ष्मटीका लिखी जा चुकी थी पुन गूढतम रहस्योको प्रकट करनेके लिए द्वितीय टोका सुबोधिनीका प्रणयन हुआ यह एक सुदीर्घकालम पूरी होनेवाली लेखनशैलीमे लिखा जा रहा ग्रन्थ था भूतलपर उतने विलम्ब तक श्रीमहाप्रभुका विराजना भगवान्को अभिप्रेत न था अतएव शीघ्र दशमस्कन्धपर सुबोधिनी-लेखनकी आज्ञा हुई और वह परिपूण भी हुई अब पुन इसी शैलीमे अवशिष्ट स्कन्धोको व्याख्या भगवदभिप्रेत नही थी श्रीपुरुषोतमजी अतएव पाचवे और छठे श्लोककी व्याख्यामे कहते है : "नच पूर्याज्ञप्तासम्पूर्तिदोष यावदुक्तमेतावत्कृत्यैव साज्ञा कृतास्तु, अधिक न कार्यम् • इदश्च सूक्ष्मटीकातिरोधान-स्कन्धक्रमव्याख्यात्याजन दशमस्क. न्धव्याख्यानानन्तरमसामयिकमाधवमट्टकाश्मीरिशरीरथराहतिप्रभृतिभि. कार्य- रनुमीयते" गगासागर और मधुवन मे जब सुबोधिनी-लेखनको बन्द करनेको आज्ञा हुई तो रासपञ्चाध्यायोवाली गोपिकाओकी तरह श्रीमहाप्रभुने भी इन आज्ञा ओका उल्लपन करना चाहा वेणुनाद सुनकर जो गोपिकायें भगवान्के समीप पहुच पायी उन्हें पुन घर लोट जानेको भगवान्ने आज्ञा दी थी, पर वे लोटी नहीं श्रीमहाप्रभुने भी इसी तरह लेखन-कार्य बन्द नही किया भगवदाज्ञाके उल्लघनके इन दोनो प्रकारोमे किन्तु एक विशेष अन्नर यह या कि गोपिकाओने भगवत्स्वरूप सुखके लिए भगवद्-वाणीका उल्लथन किया था, जबकि श्रीमहाप्रभुको भगवद्वाणीका उल्लघन नामसेवार्थ भगवद् विन योगको सहते हुए करना पड़ रहा था फलत सूक्ष्मटीकाका तिरोधान हो गया. चतुर्थसे नयमतककी व्याख्या छोडकर दशमस्कन्धको व्याख्या लिखनेका भग- वदादेश भी हुआ ही था और पुन अवशिष्ट स्कन्धोको व्याख्या लिखनेको प्रवृत्त होनेपर लिपिकार श्रीमाधव भट्ट काश्मीरी किसी पारपीके तोरस आहत हो गये यो सारी प्रतिकूलतायें कवल प्रतिकूल भगदिच्छाको अनुमापि काथी तभी तृतीय भगवदाजा हुई-लोकगोचर देह-देश-परित्यागकी. इस तृतीय भगवदाज्ञामे भगवदाग्रहको सष्टता हुई श्रीमहाप्रभु अतएव अपने आग्रही मनको भगवदाग्रहके अधीन होनेको मना रहे है "मेरे अन्त करण ! मेरी बात सावधानीसे सुनो कि कृष्णसे उत्कृष्ट एवम् निर्दुष्ट कोई तत्त्व न है और न हो सकता है भागवतकी सुबोधिनी व्याख्या पूर्ण करने के लिए जिन दो भगवदाज्ञाओका उल्लघन किया था वह अपने आग्रहिल अन्त करणके कारण ही हुआ अन्त करणको भगवदा ग्रहके अधीन होनेको समझाया जा सके तो अन्य सभी देहेन्द्रियादिकी वृत्ति । और प्रवृत्तियो पर काबू पाया जा सकता है." वैसे तो भागवतकी व्याख्याका प्रयोजन अन्तत श्रीकृष्णके स्वरूपम आसक्ति सम्पादित करना ही या पर यह समस्या श्रीमहाप्रभुरी नही किन्तु अन्य पुष्टिजीबोको थी भागवत के वास्तविक अर्थको प्रकट करनेसे पुष्टिजीवोका उपकार होगा वे श्रीकृष्ण की पुष्टिलीलाके पास्तविक रहस्यको समन r कर उसमे आसक्त हो पायेंगे जहातक श्रीमहाप्रभुका प्रश्न है तो उन्हे तो इस प्रक्रिपामे भागवतको लौकिकी भाषा और परमतभाषा का भी चिन्तन- मनन-व्याख्यान करना ही पड़ता था केवल भगवल्लीलाके मनन या प्रवचन तक सीमित रहा नहीं जा सकता यो अनेक पुष्टिजीवोके उद्धारार्थ परो- पकारको मनोवृत्तिसे श्रीमहाप्रभु स्वयम् भगवद्-विप्रयोग सहने उद्यत हुए थे. जितना व्याख्यान सम्पन्न हो चुका वह पुष्टिजीवोको पुष्टिमार्गपर प्रवृत्त करनेके लिए पर्याप्त है. इससे अधिक परोपकारको आवश्यकता नहीं है सर्व- निर्णय-निवन्धमे श्रीमहाप्रभु स्वयम् यह निर्णय दे चुके है कि भगवत्सेवाके अवसरमे हिस्सा बटानेवाले धर्मोका त्यागकर देना चाहिये परोपकारादि धर्भ भी यदि भगवत्मेवामे बाधक होते हो तो छोड देने चाहिये "एतद्विरोधि यत्किञ्चित् तत्तु शीघ्र परित्यजेद् । धर्मादीना तथा चास्य तारतम्य विचार- यन् ॥ २३९ ॥ एतदविरोधोति सामान्यवचन धर्मादीनामुपलक्षण .परोप- कारादि सर्वधर्माणामपि क्षयिष्ण्वेव फलम्. अत उभयोरन्तर ज्ञात्वा परोप- कारादिधर्मा न फतव्याः, यदि पूजाविरोधिनो भवन्ति" कोई धर्म या कर्तव्य भगवत्सेवामे सहायक होता हो तो अनुष्ठेय है अन्यथा भगवत्सेवामे बाधक होनेपर परोपकार आदि धर्म भी त्याज्य समझने चाहिये. फलत आत्मसमर्पण के बाद भगवत्मेवासे अधिक और कोई भी कर्तव्य पुष्टिजीवका हो ही नहीं सकता. श्रीमहाप्रभु अतएव कहते है कि समर्पणसे पूर्व सभी पुष्टिजीवोकी स्थिति अस्पृश्य कुलमे उत्पन्न किसो सुन्दर स्त्रोकी तरह होती है पर आत्म- समर्पणके बाद इन्ही पुष्टिजीवोको स्थिति, उक्त सुन्दरी यदि किसी राजाके मनको भा जाये और वह उसे अपनी रानी बना ले ऐसी, सम्मानपूर्ण हो जाती है इस असाधारण सम्मानकी प्राप्तिपर अभिमान भी कभी पैदा हो सकता है और उस अभिमानके कारण कभी अपमानित होनेका अवसर भी प्राप्त हो सकता है परन्तु अपनी पूर्वावस्थाको अधमताका विचार करनेपर प्राप्त सम्मानित अवस्थाम थोडा-बहुत अपमान पश्चात्तापका विषय नही लगेगा क्योकि राजाने द्वारा अपमानित भी रानी जगतमे तो सम्माननीय ही मानी जाती है इसी तरह किसी प्रौढीभाववश भगवदाज्ञाके उल्लधन करनेके कारण अपने देहके साथ भी ऐसा ही मोहजन्य व्यवहार देहके स्वामी श्रीकृष्ण को कैसे सुहायेगा ? कैसे सन्तुष्ट कर पायेगा? अत यह विचार करना चाहिये कि आत्मसमर्पणरहित अन्य लौकिक जनोकी तरह हमारी भी स्थिति होती तो क्या होता? शरीरका हठात् त्याग करना अशक्य कार्य लगता है परन्तु सर्वदु खहर्ता श्रीहरिके स्वरूपका विचार करना चाहिये कि साक्षात् नित्यलीलामें नित्य सयोग-सुखका दान, जब वे करना चाहते है तो दुग्य कैसा ? अत किसी भी प्रकारके मोहको आवश्यकता नही है कि प्रभु लौकिक स्वामीकी तरह रुष्ट हो जाये तो क्या करना-या फलदानमें प्रभु विलम्ब करेगे तो क्या होगा-या देह-देशके लोकगोचर त्याग करने पर पुष्टिजीवोका उद्धार कैसे होगा-या श्रीमद्भागवतको व्याख्या सुबोधिनी सम्पूर्ण नहीं हो पायी इत्यादि-इत्यादि अपने इस अन्त करणके प्रबोधनको ग्रन्धके रूपमे उपनिवद्ध कर श्रीमहा- प्रभुने यह प्रकट कर दिया है कि निज अन्त करणके उपदेशके व्याजसे श्रीमहा- प्रभु उन सारे पुष्टिजीवोके अन्त करणको सम्बोधित तथा प्रबोधित करना चाहते है, जिनमे भगवत्सवासे अन्य किसी आध्यात्मिक या आधिदैविक फल प्रयोजन या कर्तव्य के प्रति अधिक आकर्षण पैदा हो सकता है अतएव "तव कथामृत तप्तजीवनम्" की सुबोधिनीमे श्रीमहाप्रभुने विवेचन किया है कि अमृतको आवश्यकता मृत्युके उपस्थित होनेपर है. अन्यथा स्वत अमृतपानकी प्यास किसीको भी नहीं होती इसी तरह भगवान् के स्वरूप और भगवान्का कयामे भी घनीभूत रस और तरलोभूत रस का सा अन्तर होता है अन्यथा रासमें भगवान्के तिरोहित हो जानेपर उन्ह खोजनेके बजाय गोपीजनोने भी भागवत कथाका आयोजन किया होता ! "रसपिण्डयोरिव तव कथायाश्च विशष अन्यया कथार्थमेव यत्न कृत स्यात्" अतएव “सेवाया वा कथाया वा" मे 'सेवा और काथा' मुख्य कल्प है जवकि 'सेवा अथवा कथा' गौण कल्प है. अत सभी पुष्टिजीवोको निश्चिन्त होकर यह निश्चित कर लेना चाहिये कि "भगवद्रूपसेवार्थ तत्सृष्टिनन्यिथा भवेत्" अर्थात् भागवत-कथा भी वस्तुत भगवत्सेवाका अग हो तो उत्तम कल्प है अन्यथा गौण कल्प या अनुकल्प ही है. इस तरह श्रीमहाप्रभु सेवागभूत अन्त करणको शुद्धिका प्रकार उसे भग- वान्को सेवामे अनन्यरुचि होनेकी प्रेरणाके द्वारा इस ग्रन्थमे दे रहे है प्रस्तुत सस्करण वि म. १९८१ मे प्रकाशित सस्करणका ऑफमेट प्रॉसेस द्वारा पुनर्मुद्रित रूप है. श्रीमद्गोस्वामिकुलभूषण श्रीजीवनेशात्मज श्रीरण छोउलाल महाराजश्रीके प्रवन्धमे श्रीचीमनलाल हरिशकर शास्त्रीजीने उस सस्करणका सम्पादन किया था आर्थिक सेवा अनेक वैष्णवोने मिलकर की थी इन सभी महानुभावोका हम कृतज्ञताके साथ स्मरण करते है इति शम् है. इस तरह श्रीमहाप्रभु सेवागभूत अन्त करणकी शुद्धिका प्रकार उसे भग- वान्की सेवामे अनन्यरुचि होने की प्रेरणाके द्वारा इस ग्रन्थमे दे रहे है. प्रस्तुत सस्करण वि स. १९८१ मे प्रकाशित सस्करणका ऑफमेट प्रोसेस द्वारा पुनर्मुद्रित रूप है. श्रीमद्गोस्वामिकुलभूषण श्रीजीवनेशात्मज श्रीरण छोडलाल महाराजश्रीके प्रवन्धमे श्रीचीमनलाल हरिशकर शास्त्रीजीने उस सस्करणका सम्पादन किया था आर्थिक सेवा अनेक वैष्णवोने मिलकर की थी इन सभी महानुभावोका हम कृतज्ञताके साथ स्मरण करते है इति शम् Mis KARIRRORAKARATARARNastramania धीकृष्ण श्रीमदल्लभाचार्यचरणविरचितान्तःकरणमयोधः। se suuruures 052*Rosesse अन्तःकरण मद्राक्पं सावधाननथा भृशु। कृष्णात्परं नास्ति दैवं वस्तुतो दोपवर्जितम् ॥१॥ चाण्डाली चेद्रामपत्नी माता राज्ञा च मानिता । कदाचिदपमानेपि मूलक का क्षतियेत् ॥ २॥ समर्पणादहं पूर्वमुत्तमः किं सदा स्थितः । का माधपता भाष्या पक्षालापो यतो भवेत् ॥ ३ ॥ सत्यसङ्कल्पतो विष्णु न्यथा तु परिष्यति । आसव कार्य सततं स्वापिद्रोहोऽन्यया भवेत् ॥ ४॥ सेवकस्प तु धमोऽयं स्वामी स्वस्य फरिष्यति । थाना पूर्वं तु या जाता गङ्गासागरसङ्गमे ॥५॥ याऽपि पधान्मधुवने न कृतं तवयं मया । देवदेशपस्त्यिागस्तृतीपो लोकगोधरः ॥६॥ पश्चात्तापः कर्य तन सेवकोई न चान्पपा) लौकिम्यभुवरकृष्णो न दृष्टव्य. पदाचन ।। ७ ।। सर्व समर्पित भक्त्या कृतार्योऽसि सुखी भव । मौढाऽपि दुहिता यदल्लेदान मेष्यते घरे ।। ८॥ तपा देहे न कर्तव्यं वरस्तुभ्यति नान्यया । लोकवचेतिथतिौ पाक्ति स्यादिति विधारप ।। ९ ।। अशक्ये हरिरेवास्ति मोई मा गाः कश्चन । इति श्रीकृष्णदासस्य बलभस्य हित श्चः॥१०॥ चित्तं प्रति यदारुये भक्तो निथिन्तनां मजेत् ।। ११ ।। इति श्रीपदल्लभाचार्यविरचितोऽन्तःकरणभयोधः सम्पूर्णः । Forcarerah FANARARANASasterarrar anARARAN १'अपमाने या पिाठः श्रीवजराजनीयरपोत्तमचरताना टौको । Gervuupiv uvre sexuntoutev श्रीकृष्णाय नमः। श्रीगोपीजनयल्लभाय नमः। धीमदाचार्यधरणकमलेभ्यो नमः । श्रीवल्लभाचार्यचरणविरचितान्तःकरणप्रबोधः। --- श्रीगोकुलनाथचरणैर्विरचिता विकृतिः । दर्शयन् स्वस्य सौभाग्यं स्वीयानां भक्तिवर्म च । स्वमनोबोधवाक्यानि प्रकटीकृतवान् प्रभुः॥१॥ प्रगम्य पितृपादानं निन्तिताधिकदापकम् । स्वमनोयोधकावार्यवचो व्याख्यातुमुद्यतः ॥२॥ यद्यपीश्वरवाक्यानि दुबोधानि सदा स्वकः । तत्कृपैव तदीयस्य तदर्यावगमे गुरुः ।। ३ ।। भविष्यतीति निश्चित्य प्रवृत्तोई न चान्यया । अतः स्वाचार्यचरणौ शरणं मम सर्वदा ॥४॥ अथ भगवान् पूर्णपुरुषः पुरुषोतमः स्वस्वरूपं श्रीभागवतं द्वादशस्कन्धात्मक प्रक- टीकृत्य तदर्थमाकध्ये स्वातिरिक्तस्यायोग्यतां ज्ञात्वा स्वागधिपतिरूपश्रीवल्लभाचार्य. पाकट्य विधाय तदर्यमाकव्ये आहां च दया तदर्थपकाशिकां सुबोधिनी कारितवान् । तत्र क्रमेण स्कन्धत्रयकरणे फालविलम्बादाचार्यविप्रयोगासहिष्णुः सन् श्रीभागवततत्त्वार्य- प्रतिपादकदशमस्कन्धविवरणार्थ विशेपानां दत्तवान् । तदाचायः स्कन्धक्रमं विहाय दशम- स्कन्यविवृतिरेव कृता। सत्समासौ स्वस्थाचार्यमिलनविलम्ब सात्वा तद्विलम्बासहिष्णुः शीघ्र सनिकटागमनार्थमाज्ञां दतवान् । तदावाः स्वसौभाग्यमौढिमवलम्य स्वचिकीर्पित. सम्पूर्णक्षीभागवतविवरणस्पानातस्वात् स्वस्य धर्मिमार्गीयत्वात्तन्मार्गभावमौन्या वारदप- माशोलनं कृतान्तस्तयापि भगवानाचार्यमिलनं स्वस्पात्यन्ताम्यामिति श्रीभागस- विवरणार्य दत्तारामप्यन्ययाकलातिकृपारोपपूर्वकं पुनः स्वनिस्टागमनार्य तृतीयामाज्ञा दत्तवान् । तदाचार्या अत्यन्तं भावदामह दृष्ट्वा पूर्वमाझादपोल्हनभावमौहिस्थान स्वकी. यमन्तःकरणमेरेति ज्ञापनाय तदेव घोघपन्ति । अन्तःकरण महास्यमिति । अन्तःकरण मदाक्यं सावधानतया शृणु। कृष्णात्परं नास्ति देवं वस्तुतो दोपवर्जितम् ॥ १ ॥ यपि, प्राय सर्वेन्द्रियोपयोगात्सन्द्रियबोध उचिवस्वयापि वेपमन्वःफर- २ श्रीवल्लभाचार्यचरणविरचितान्त करणप्रदोषः । गाधीनलायथा राजनि निगृहीते सर्वमेव राज्यं निगृहीतं सवति । तयान्तःकरणे प्रबोपित सर्वाण्येवेन्द्रियाणि मघोषितानि भवन्तीत्यन्तःकरणमेव मदोयगन्ति । महाक्पं साव धानतया शृण्विति । यद्यपि माश्य भृण्वित्येतावनेव प्रबोधसिद्धेर्येत् सावधानतये- त्युक्त, तस्यायमाशयः । यया स्त्रस्य निमामिपानपोट्या बनसीपन्तिनीमिः फल. प्रारणे भारदाशोहनन स्ववीर्यसम्पत्तिः साधिता, तथापि सम्पूर्णश्रीभागवतविकृति साधयिष्यामीत्याग्रदोऽस्मिन्न वेपरोत्यादनुचितः । वपरीत्य तु बनसीमन्तिनीभिः पिय- वाक्यानि फले मतिरमकानीविभासोश्या निराकृतानि, प्रकृते तु भगवदाना फिलसा- धिकेति नामदो विपरीतफलकः, अनिष्टपर्यवसानादितिवापरणे सावधानतयेत्यु- कम् । कदाचिदतियौम्या विलम्बकरणे पापकमाहुः । कृष्णात्परं नास्ति देवमिति । कृष्णाकलरूपात्परमतिरिक देव परमेष्टरुपम् । देवमितिपदादिधातूता सर्वेप्या पर विवक्षिताः । तत्र घर्मिमार्गक्रीडास्यानपिदमेव । (क्रीडाया) विजिगीपाप्यत्रैव । (भक्तेन सह ) स्वपायव्यवहारोपि । (भक्ताय स्वमाहात्म्यद्योतनेन ) द्युति- रयत एव, नो चेत्तयतिरेकेण शुष्कतैव । ( भक्ताना ) समयविशेषे स्तुतिरपि । (मकाप मोदान पया कालीपदमनेन) । मोदोऽपि तथा । मारविशेषमनितमदोपि । परम नितिमनित स्कमोपि । स्वमानन्तर भावविशेषचककटासनितरसच्चापि । तदन- तरं स्वामिलपितस्थानगतिरपि, (भक्तसमीपगमनम् ) इत्यादिक सर्वमेव पूर्वयावमौन्या याध्यत इत्यनिष्टहेतुत्वाद पौटिस्त्याज्येत्यत उक्त कृष्णत्परं नास्ति देवमिति । ननु श्रीभागवतविचारः पुरुषोत्तमपर्यवसाय्येवेति कदाचित्लोदिविता भवेदिति शङ्कानिराकरणार्यमुक्तम् । वस्तुतो दोपवर्जितमिति । अत्राय भावः, पपि श्रीभाग- तविचार: पुरुषोत्तमपर्यवसायी क्यापि विचारे क्रिपाणे स्वसिद्धान्तनिरूपणाथै वद्धि- रुद्धशास्त्रान्तरीयसिद्धान्तनिराकरणमावश्यमेव, भगवदासाहेतुकफलविचारे एतद्भाया- निरिक्तभावमवेश एव फलयामें दोष इति वस्तुविधारे क्रियमाणे फलस्यैत निर्दुष्टत्व भावान्तरमवेशहेतुरस्तुनः सर्वात्मना न निर्दुष्टतमिविज्ञापनायोक्त वस्तुतः सस्पतो ने निर्दुष्टत्वम् ॥१॥ एवं प्रबोधनेपि पूर्वमोदिकृतासोलहनजनितापरापेन यदि भगवानपमानेन फल- विलम्ब कुर्यात्तदोभयभशादेकमपि कार्य न सिध्पेदिचि श्रीभागवदार्थविद्वतिसमाप्त्याग्रह एष समीचीन इति मनःकलिल लौकिकदृष्टान्तेन मुतिसन्यायेन निरस्यन्ति, चापडाली चेदिति । भगवत्प्राप्तिकालान् । *दिषुषी-तिमिगहरा-३ पबहार- युति- क्षति-५ सौर-1 मा-स्- कान्ति- ग1ि1 श्रीगोकुलनाथचरणविरचिता वितिः । ३ चाण्डाली चेदाजपत्नी जाता राज्ञा च मानिता । कदाचिदपमानेपि मूलतः का क्षतिर्भवेत् ॥ २ ॥ चाण्डाली चाण्डालजातीया राजपली जाता राज्ञा पत्नीत्येन परिगृहीता, इतर- पल्यपेक्षयाधिक मानिता कदाचित्ममादतस्तस्या अपराधावेदपयानोपि कृतस्तदा मूलतः राजपलीत्वतः का क्षतिर्भवेत् राजपत्नीत्वं न गच्छत्तीत्यर्थः । यरपस्यां यासंयोगा- भावात्पत्नीत्वं न सम्भवति तयापि भोग्पा जातेविपदं विहाय पत्नीपदोपादानाच्या पत्नी त्यागयोग्या न भवति, तथैवास्यामापङ्गीकाराभिमानो झापिनः । तेन स्वातिरिक्ता- दृश्यत्वस्पर्शापोग्यत्वान्यविनियोगाभारादयो धर्मा ज्ञापिताः । यदि मूलपदेन चाण्डालीय. मुच्यते तदा पानस्य नाग्डालीत्वमेव हेतु: स्पान तु रामपत्नीलम् । अन तु सम्मानने रामपत्नीत्वमेव हेतुत्वेनोच्यते न तु चाण्डालीत्वम्, अन्पया पत्नी जारोतिपदं व्पर्य स्यात् । तस्माचल्छतापमानेपि तया न रोदः कार्यः, रानपत्नीलरूपमूलस्य विधमानत्वात् । यथा फाल्गुने मासि प्राचीनपत्राएपमेऽपि समूलस्प वृक्षस्य नूतनपलायुगमेन पुनर्यया- पूर्वस्वं तथा पत्नीत्ये सति पुनः पूर्ववदेव भविष्यतीति रिचार्य रोदो न कार्यः । चेदिनि पदादयोग्पतायामपि देवगत्यागीकारपि यनैवं व्यवस्था लौकि, तत्र सर्वाङ्गीकारयोग्ये, अनीफर्तुरलौकिकत्वे, अवीकारस्य च नित्यत्वे, तवेयं फललिम्बचिन्ता सलिना नोचि. वेति नामहः कर्त्तव्यः । यदि विलम्बः मोपि रसस्य संयोगविप्रयोगात्मकत्लादिनम्बस्य विभयोगरसात्मकत्वात् फलमध्यपात्येति सर्वमतदातम् । एवमगफिरुमकारेण स्वमन:- प्रबोधनेनानुपतिकी स्वमार्गीयाणामपि शिक्षा शारिता ॥२॥ पपि फलविलम्बजनितः खेदो नास्ति तथापि भावोदयभिपानहानिजनिनः पश्चाचापो जात इति सिममन्तःकरणं मरोपितुपाहुः समर्पणादिति । समर्पणादहं पूर्वमुचमः किं सदा स्थितः । का ममाधमता भाज्या पश्चात्तापो यतो भवेत् ॥३॥ मानहानिनितः पशात्तापः स्वसमान एवोचितो न तु स्वीयन दिनाय ममु. कृतमानहानौ । मावननितमानोराचिपोग्पतापि तर मधमाधारणतमन्नेव माता न हवतापपीति विकारपति शानामुक्तं रामः किं सा स्थित इलिस असमर्पणदशापामपि उचमः पूर्वोक्तभारयोग्यः किमई स्थितः । तस्मात्सम पूर्वोक्तभाव- मननयोग्यतामाररूपाभमना, का भाव्या, का पीसी भाव्या, विचारणीपा कीची. निपदारमताया निरवधित्वमुक्तम् । यस्मात्सरांन्मना पहातापहेन्रभारस्तस्माचास्मिन पथाचापो न कर्तव्यः ॥३॥ •भाग्याया स्यामा रितीने या ।
श्रीवल्लमाचार्यचरणविरचितान्तःकरणप्रबोधः । पद्यपि पश्चात्तापहेत्वभावात् पश्यात्तापत्याग उचितत्तथापि फले बहुकालविलम्ब येत्तदा कि कार्यमिति सन्दिहानमन्तःकरणं बोधयन्ति सत्पसङ्कल्प इति । सत्यसङ्कल्पतो विष्णु न्यथा तु करिष्यति । आज्ञेव कार्या सततं स्वामिद्रोहोन्यथा भवेत् ॥ ४ ॥ सत्यः यथार्थः सङ्कलः मनोविचारों यस्य तादृशत्वादिष्णुः पायाभ्यन्तरभेदेन रसव्यासः । अन्यथा फलदाने विलम्ब न करिष्यति । अस्मिन्नन्ययाभावशानि- राकरणार्य तुन्दः । तस्मात्त्रया फलविलम्बसन्देहमपि त्यक्त्वा प्रभ्वाक्षेत्र कार्या सतत, न तु भावमौन्या कदाचिदप्यन्यथाभावः कार्यः । अकरणे वाधकमाहुः, स्वामिद्रो- होन्यथा भवेदिति । अन्यथा माज्ञाया अकरणे स्वामिद्रोहो भवेत् । आजैव कार्या सततमिल्पेहावतेव आनाकरणसिद्धारपि बायकोनेरयमाशयः । गया फलपकरणे बनसीमन्तिनीनां भावमोठ्या प्रमालाया अकरणेपि कार्य सिद, तथा ममापि सेत्स्य. तीत्यज्ञाननिष्टयर्थमुक्तं स्वामिद्रोरोन्यथा भवेदिति । अस्पायपर्यः, अनसीमन्तिनीनां भावप्रौढ्या आज्ञोलगुन पोः स्वस्य च पुरुषार्थसारकं जातम् । नाष्टान्तेन तवैरकरणे उभयोरपि विपरीतफळक्त्वज्ञानाय बाधकत्वमुक्तम् । वाधक हेतुः, तासां प्रवाशो- लानं फलमतिबन्धनिराकरणे उपयुक्तं जातं, तेन प्रभोस्तासा व निरवध्यानन्दः सिद्धः । तब लाज्ञोल्लनं प्रभुदिसितफलपतिबन्धकरवेन भोः क्रोधजननेन, तेन कोवेन तर फलविलम्पेन च, सभ्वपराधस्तर शानिष्टं भवेदिति तत्सात्मना नैव कार्य- मित्येतदर्थमुक्त, स्वामिद्रोहोन्यथा भवेदिति ॥ ४ ॥ एवं सोपपनिकायहाभारमुपाय कदाचित्पूर्वकवाग्रहेण प्रभुकोपे कर्य स्वामिल. पितसिद्धिरिति सन्दिहानमन्तःकरणं प्रयोषयन्ति सेवकरप विति । सेवकस्य तु धर्मोयं स्वामी स्वस्य करिष्यति । आज्ञा पूर्व तु या जाता गङ्गासागरसङ्गमे ॥ ५ ॥ यापि पश्चात्मधुवने न कृतं तदयं मया । देहदेशपरित्यागस्तृतीयो लोकगोचरः ॥ ६ ॥ मया यत्पूर्वश्लोक उपपादितं, तर सेक्कस्यासाधारणस्वाभाविकधर्यत्वेन तवेलाय भविष्यति तदा साधारणय दृष्ट्वा मभुरपि स्वस्वामित्वासाधारण सेवकज्ञानागोचरमपि सेवक करिष्यति। ननु छदशायामपि मपि सेवकवस्प विद्यमानत्वात् सामिन्यपि सहन- स्वामित्वाताधारणधर्मस्य विधमानत्वात् कयं फलविलम्म इति सन्देहनिहत्यर्थ फलविल.
५ श्रीगोकुलनाथचरणविरचिता वितिः । म्बहेतुं सेवकपर्म निरूपयन्ति, आज्ञेति । आज्ञा अभ्वाज्ञा पूर्व प्रथमतो गङ्गासागरसङ्गमे या जाता पवाद्वितीया या आशा मधुवने मधुराया जाता तदाशाद्वयमपि मया न कृतम् । ननु तदाशाद्वयं किं विषयक यन्न कुतं तबाहुः, देहदेशपरित्याग इति । पूर्वाशापा विपयो देहपरित्यागः । द्वितीयाज्ञाया विषयो देशपरित्यागः । ननु बलात्कारेण देहपरि- त्यागस्य दोपपत्वात् कथं सदाशासम्भवः । तदकरणे व कयं दोपसम्भव इति चेत्सत्य, फर्माधीनदेहे प्रारब्धभोगसमाप्तिव्यतिरेकेण बलात्कारेण देहत्याग एर दोपसम्भवः । यन केवल भगवदिच्छाधीनायेव देहग्रहणपरित्यागौ तदेहस्यालौकिकत्वात्तदाज्ञया परित्यागो न दोषायेति ज्ञात्वापि परादकरणं तस्याझोलड्चनहेतृत्वात् प्रतिबन्धात्वमित्युक्तम् । देशप- रित्यागः स्पष्टः । एवमाशाद्वयाकरणेऽनिष्टहेतुत्वं शाला स्तीयाज्ञा कृतेत्याहुः तृतीयो लोक- गोचर इति । तृतीया परित्यागः लोकपसिद्धस्मृत्यादिशाखेषु गोचरो विषयः संन्यास- ग्रहणपूर्वकं गृहपरित्यागः स कृतः । यद्यप्यन्त्र फूत इति शब्दो नास्ति तयापि पूर्वाशाहप- फरणनिषेधादत्र च कृत इति शब्दाभावेपि करणमायादि । यद्यपि पूर्वोक्ताशाद्वपाकरणा- परापः सम्भवति, तथापि हतीयाज्ञाकरणेन तयोरप्याइयोः करणं जातमिति नापरायः । तथापि, माशोलनमनितापराधेन यदि फलविलम्ब कुर्यात् प्रभुस्तदा तजनित: पश्चातापो भवत्येवेति कथमपराधनितिरितिसन्देहे समाधानमाहुः, पश्चात्ताप इति पश्चात्तापः कथं तत्र सेवकोहं न चान्यथा । लौकिकमभुवत्कृष्णो न दृष्टव्यः कदाचन ॥७॥ फलविलम्पेपि विलम्बस्य दण्डस्थानीयत्वात्सेवकेन पयानापो न फर्तव्यः । तर हेतुः, सेवकोहमिति । अहं सेवकः सेवाकरणयोग्यः । आजादपाकरणस्य सेवापति- पन्यकत्वं शाखा शीघ्र सेार्थ विलम्बनतापेन शिक्षामित्र प्रतिबन्धनिचि विधाय पुनः सेवार्थमेव विलम्ब न कृतवान् इति न मम पवाचारः । यतो सेयकः, न चान्यथा । यदि मपि सेवकत्वं न मन्येत तदापराधेनोपेसामेर कुर्यात्, न तु स्वीयत्वं ज्ञात्वा विलम्प जतापरूपशिहां कुर्यादित्यत उक्त, न पान्पथेति, अस्मिनन्ययामावो नास्तीत्यर्यः । ननु यया लोके 'राजा मित्रं केन दृष्टं श्रुतं येति लौफियमन्पायेन तापानन्तर- मप्युपेतामेव कुदिति चेत्तर पाघमाहुः, लौकिकप्रभुयदिति । सैफिकाः माता जीवाः भवो लोके मभुत्वेन व्यवहार्य, तहगराम द्रष्टव्यः न रतन्यः । तदा यतः कृष्णः फलात्मा मध्य । लौकिम्मभूणां माइतत्वानेपामगीकारस्य दगी- कृतस्याप्युपेक्षा सम्भवति, पते प्रभोरलौकिकत्येन तदङ्गीकारस्यापि नित्यत्वेन मी. कृतोपेरवासम्भावितति झारनापोतं, न प्रष्टव्यः कदाचनेति । अत एव पितृवरण- सुरक्त 'मीकतननननितारापक्षमाविनोदोस्प | मनी कतिष नित्ता बदन्त ६ श्रीवल्लुमाचार्यचरणविरचितान्ताकरणशेषः । कोन्योस्य साम्यमिया' नाहीकारस्प नित्यरवे न सन्देहः । कदाचनेति भूतमविए. द्वर्तमानकालेपीत्यर्थः ॥ ७॥ यद्यप्युपेक्षा न करिष्पति, तपापि, अपराधस्य जातत्त्वात्पुनः पूर्ववचाभी कृपा न करिष्यतीनि मनःसन्देइनिटापर्थमाहुः, सर्व समर्पितमिति । सर्व समर्पितं भक्त्या कृतार्थोसि सुखी भव । त्वयि पूर्व कपासीदेव, यतालया सर्वमेव समर्पित, तत्रापि भक्पा भक्तिमार्गानु- सारेण, न तु विहिवत्त्वाउपाधिना, तस्मात्वं फलरूपभक्तिमागांझीकारेण कृतार्थ एवासि । मध्ये मौदपाशोष्टहनननितापरार्धन अन्तराये सति क्लेश माप्तवानसि । अतस्तपाप परित्यज्य प्रधाज्ञा कृत्वा पुनः पूर्ववदेव सुखीभव पयापूर्व सुखं मामुहि । ननु, अङ्गी- पारस्य नित्यत्वात्कलमार्गीय सुखं यधपि दास्पति तयापि पूर्ववत्सर्वात्मना दास्यति न ति सन्देहजनितलेशमग्निपदृष्टान्तेन दीकुर्वन्ति । मौदापीति । प्रौढापि दुहिता यदरस्नेहान्न प्रेष्यते वरे ॥ ८ ॥ तथा देहे न कर्त्तव्यं वरस्तुष्यति नान्यथा। फले मभुः तारतम्यं तदा कुर्यापदि खदपेक्षा न स्याद, यस्सापेक्षारयसी रास्र दोपमम्पनीकृत्य पलं ददात्येव । पूर्वोक्तं दृष्टान्तमेव विटण्यन्ति। यथा मौदा रमणपोग्या स्वकीया दुदिता तस्यों स्नेहाधिरपात सस्पा बरे भोक्तरि भोगावयादारामये यदि न प्रेप्पो सदा वर; स्वाभिलापापा अपूयोऽसन्तुष्टो भवति । पते परसन्तुष्ट पर भवति । अपि शब्देन यद्यपि पाणिग्रहणमार पैव तस्प भोगेच्छास्त्र, तथापि तस्यां सोपमासहिष्णुत्वेन लिम्वपि सहते । सहिष्णुत्रदशायां रिपारि असन्तुष्ट एव भाति । तथा प्रभोः सत्यना साहासमये यदि अपेषां ज्ञाता पार्यसंपत्ति नियते सदा प्रभुरसन्तुष्ट एव भवति । तस्मादयं विशमा प्रभोः साभिरपितसिद्धयमातुर इति, विलम्पामा पूर्वदेव सपना सामिलापापूर्वथै पलं दारपत्येोत्पस्मिन विलम्बात्याज्य एपेपत उत्तम् । तथा देहे न कर्तव्यमिति । देहे देहत्यागविषये सामना गभुसन्तोपाभावादिग्गे न कार्यः । पपा दुरिप्रेषणविनमे स्नेहो इंतुः । निरागकपणे परसन्नोपेणोभयार्यसिदिस्नया रायाग्राहेतृत्यागमार नोभयरायसिद्धिरिति तात्मना मधुसन्तोपाय देहत्यागविगहेतुईटस्न्याग्य पर । ननु परयस्मिन्नर्थे योऽनुचिस्तयापि मगरभितश्रीमागतार्यमान सी परमोतः सिद्धनीनि पदाविपरिशिहिमेच्छा सम्भवति । तस्या अपि पर. मिहेनतेन नां निरादुर्वन्नि, लोरदिनि ।
७ श्रीगोकुलनायवरणविरचिता वितिः। लोकवचेस्थिति, स्याम्कि स्यादिति विचास्य ॥ ९ ॥ यद्यपि भगवदभितश्रीभागवतार्थपाकव्येन जैमिनिव्यासादिवत् श्रुत्पविरुद्धालौकि- कशास्त्रार्थमाकव्येन लोक एवोत्कर्षः सिद्धयेत् । नत्वलौकिकस्वसिद्धान्तफलानुभवहेतू- स्कर्षः सिदयति । लोकोतर्पसिद्धौ जैमिनिम्यासाद्युत्कर्षवल्लौकिक एवोकपः सेत्स्पति, न तु स्वमार्गीपोत्कोपि । तस्माचदुत्कासिदौमे मम स्वमार्गीयफलभोक्तुः पूर्वोत्कर्षफल- विचारस्थ समागीयफलविलम्बहेतुत्वारिक फलं स्पान किमपीरपर्यः। स्त्रमार्गीपफलविचारे पत्र मुत्यादीनामपि निःफलत्वं वत्र पूर्वोक्तलौकिकस्पापि फलवगणना सामना दूरा. पास्तेति सारनायोक्तम् , किं स्यादिति । अत एतत्फलतारतम्यविचारेण वयापि सा- मना फलसिद्धिविलम्बामाव एवं विचारणीयो न बन्योपि विचारः कर्तव्य इति झाप- नायोक्तम् । विचारयेति ॥९॥ यद्यपि फलविलम्पाभाव एव विचारणीयस्तयापि बलात्कारेण शरीरत्यागस्प स्वतोऽशक्यत्वात् कर्ष सम्भवतीति सन्देहनिवारणमकारमाहुः । अशक्य इति । अशक्ये हरिरवास्ति मोहं मा गाः कथश्चन ॥१०॥ यद्यपि बलात्कारेण शरीरत्यागः स्वकर्टफवेत्स्यात्तदाऽशक्यः स्यात् । मते घरीरत्याग भावदिच्छाकईक इति न स्वस्याशक्यत्वम् । यतोऽशस्यादिसर्वदुःख- हा यो हरिः स एर सर्वपुरुषार्थसापकत्वेन स्थित एवास्ति । अब हरिपदोग्या देहत्यागोपि फलान्तरापदुःखीकरणार्यमेव । अतो लोके अशक्यस्पायनापासेन सापकत्वमुक्तं भवति । तस्मात्फलविलम्बाभावार्यमेतावरकर्तरि मोहं मा गाः, मोई चिचविशेष मागा, न प्रामुहि करनन केनापि प्रकारेण माशोल्लानमनिनाएराध. फलविलम्माविषये आनोलहनात्पूर्वसामपिफनानुभये, आमाकरणानन्तरं फलानुभर. तारतम्पविषये च सर्वात्मना वैयस्यामारोपनायोक्तम्, कथननेति । भवः पर- मुक्तार्यमुपसंहरन्ति ।। १०॥ एवं पयोधनेन सस्मिना वैयम्यनित्तितिति झापनापाहुः । इतीति । इति श्रीकृष्णदासस्य वल्लभस्य हितं वचः । चित्रं प्रति यदाकर्ण्य भक्तो निश्चिन्ततां व्रजेत् ॥ ११ ॥ इति श्रीवल्लभाचार्यविरचितमन्तःकरणप्रबोधः समाप्तः । इतीति समाहौ। श्रीकृष्णदासस्प श्रीकृष्णपदेन भक्तसाहितलीगरसाविष्टन्न शापित, वासलेन शुष्मिागीयफलरूपदास्य मातस्य नापि यलभस्य प्रमोः शुद्ध ८ श्रीवल्लभाचार्यचरणविरचितान्तःकरणपोषः । पुष्टिमार्गीपफलरूपदास्यमाप्तानां च कल्लभस्यात्यन्तं प्रियस्य तादृशस्य स्वचित्तं पत्ति हितं यचा, हितं हितकारि । पचति हितमिति पदोपादानेन वचनस्य आताश्यत्येन मामाण्यावधारणेन चित्तस्य सर्वात्मना वैयण्यापारः सिद्ध इति ज्ञापनायोक्तम् । चित्तं प्रतीति । एवं प्रबोयनेन स्वचिचस्य शुद्धपुष्टिमार्गीयपरसफलानुभवयोग्यतां निःसन्दि- ग्यामुपपाय एतच्छ्राणेन समार्गीपाणामपि स्वाधिकारानुसारेणापि भक्तिमार्गीयफलं सिदयतीति झापनायाहुः, यदाकनि । यद्वच आकर्ण्य आसमन्ताच्छुला । यद्यपि वचः श्रुत्वेत्येतापतेव श्रवणसिद्धावपि आसमन्तात्कयनेन सामिषायश्रवणं झापितम् । साभिमापश्रवणस्य फलमाहुः, भक्त इत्यादि । भक्तो भगति लिग्धो भवति । तदन- न्तरमाचार्याणां फलविलम्बहेतुद्रीकरणसामर्थ्य शाला स्वस्यापि फलविलम्पहेतु चिन्ता दूरीकरिष्यन्तीति चिन्तापरित्यागेन निश्चिन्ततां ब्रजेत् मामोतीत्यर्थः। चिताबोधकाचार्यश्चांसि विवृतानि । तेनाचार्याः प्रसीदन्तु स्वीये मयि सदा स्वतः । इति श्रीपिकृपादान्जपरागनिना मया । श्रीवल्लभेन विरचिता वितिः पूर्णतामियात् ॥ २॥ पिता श्रीमदाचार्यपदाजेपु मया स्वतः। तेनैव कृतकृत्पोस्मि इति मे निश्चिता मतिः ॥ ३॥ इति श्रीवल्लभविरचितान्तःकरणप्रयोघटीका समासा।
श्रीकृष्णाय नमः। श्रीगोपीजनवल्लभाय नमः। भीमदाचार्यचरणकमलेभ्यो नमः । श्रीवल्लभाचार्यचरणविरचितान्तःकरणप्रबोधः । श्रीरघुनाथचरणनिर्मितं षिवरपाम् । उनसीनेत्रनलिनवनालीषु परिभमन् । लिप्सस्तन्मधु योऽलिलं माप से कृष्णमाश्रये ॥१॥ अय भगवदीयानामनवरतभगवद्धजनसिध्यय तत्मत्यूहदुरितननिवचिन्तासन्तान- दवदहनदमनोपायमन्तःकरणमबोषमन्त:करणं संमुखीकृत्य प्रतिमानवे । अन्तःकरणम- बाक्यं सावधानतया विति । अन्तःकरण मदाक्यं सावधानतया शृणु । कृष्णात्परं नास्ति दैवं वस्तुतो दोपवर्जितम् ॥ १ ॥ अब स्वान्तःकरणव्यपदेशेनान्येपामन्तःकरणं प्रबोध्यत इति ज्ञेयम् । कृष्णात्परं नास्ति देवमित्यादिवक्ष्यमानं मदीयं वाक्पं सावधानतया प्रमादरहित्यैन मृणु आक. र्णयेत्पर्यः । तदेवाहः, कृष्णात्परमिति । वस्तुतः परमार्यतो विचार्यमाणे 'कृपि वाचक' इत्पादिनिरुक्तिबलात्कृष्णात्परपन्यदोषवर्जितं देवं देवः सर्वोपास्य ईश्वरो नास्तीत्यर्थः । अत एव गीतायां 'नसत्समोस्तुप पधिकः कुतोन्प' इति । एवं पुध्यति सारशेषः । मनु भारतदीपानामपि कदाचिल्लोकाकुचिदभिमको दृश्यतेऽवयाभिमानेन स्वाभान- पाशय, अई भारति कृवात्मनिवेदीति सर्व मपि भगदेककर्तृकमिति विमृश्य मदए. मानमपि भगवतैर कृतमिति भगवत्पपि दोपरच्चों सदृष्टान्तं समाधानमाः । चाण्डाली चेदाजपली जाता राज्ञा च मानिता । कदाचिदपमाने वा मूलतः का क्षतिर्भवेत् ॥ २॥ अत्र चाम्हालीविपदं महादोपोपलक्षणपर, वेन सदोषा याकाचन रामपत्रीन परिएडीता माता रामा च सत्तता, कदाचिनस्या अपमानेपि मूलदः स्वरूपाततिः शानिः का भवन कापीत्ययः । अयं भावः । भगवसम्बन्ध विना सर्वेषामन्त:करणं स्वभावतो दुधमेर । उत्तर्पस्तु भगवत्सम्बन्धकृत एच, वेन पत्सम्बन्धात्सपमुत्सष्ट इत्य.
श्रीवल्लभाचार्पचरणविरचितान्नःकरणमयोपः ।
भिमन्यने, तापमानेपि सरूपं तु स्वस्य पूर्व सदोषमेवेति कुतस्तरां दोपाका इति ।
पकारादपैरपि रामीलेन मानिना पूजिता । दृष्टान्त एवं ज्ञेयं, सदोपापा अपि चाण्डा-
स्या राजपरिग्रहात पानिनाया अपि पदाचिद्राजकृततिरस्कारे स्वजातीयपतिकनसंमान-
ननी व रामननिरस्कार इति, यया सम्पन्ध्युत्कारस्वोत्तपः । एवं भगवत्कना-
पमानैपि स्वास लाभ एव न हानिरिति भावः ॥ २॥
सस्यान्तःकरणं स्वयमेर कयं बोधनीयमित्यपेक्षापामाहुः ।
समर्पणादई पूर्यमुत्तमः किं सदा स्थितः ।
कामगाधमता भाव्या पश्चातापो यतो भवेत् ॥ ३ ॥
योइमिदानीमुचपत्तामिमानेनावमतोस्पीति मन्ये स ताइपात्मसमर्पणात्पूर्वमपि
कि सर्वकालमुत्तम एव स्थित मासम्, प्रत्युत तद्विपरीत एवासमतो पर पूसिपाऽधमता
का भाव्या भविष्यति । यतः पूर्वावस्थामनुस्मृत्य पश्चात्तापो भवेदित्यर्यः ॥ ३॥
मन्येवं यहुशः समाधानेपीदानीन्तनापमानवत्फलदशायामप्येवं कुर्यातदानी कर्य
समाहितिरित्यपेक्षायामाहुः।
सत्यसकल्पतो विष्णु न्यथा तु करिष्यति ।
आज्ञेव कार्या सततं स्वामिद्रोहोन्यथा भवेत् ॥ ४ ॥
सत्यो यथार्यों यः सङ्कलो प्रत स्माद्विष्णुः सर्वत्र पर्चमानः फलदशापामप्य-
न्यथा न करिष्यत्येवेति वेयम् । तुशन्दो निद्धारणे च । स च सङ्कलो यथा । द्विशरं
नाभिसन्धत्ते दिल्यापपति नाश्रितान् । दिदाति न चार्थिग्यो रामो दिनैव मापते ।
'सकदेव मपयो यो यस्तवास्त्रीति याचते । अभयं सर्वभूतेभ्यो ददाम्येतद्वतं मम ।
पौन्तेय प्रतिमानीहिन मे भक्तः प्रणश्यतीत्येवमादिषु क्षेपः । येन भगाताई सर्वतः
यकृत्य स्वमनने योजितः स कथमग्रे त्यक्ष्यतीति भारः । स्वस्यावश्यकपमाहुः ।
आइयेति । सत्तं निरन्तरमावार्यद्वारा या आज्ञा सैर कार्या न तु कदाचिदापनाकाम-
मन्यमतसिद्ध वा। अन्पया एपारणे स्वामिद्रोह एव भवेत् ॥ ४ ॥
नयाझातिरिक्तकार्यमात्राकरणे भाले विकीपिकार्यस्य कयं सम्मतिरित्याहुः ।
सेवकस्य तु धर्मोयं स्वामी स्वस्य करिष्यति ।
सर्वस्वनिवेदिभक्तस्यापमेव धणे यह स्वामी प्रभुरेव सर्वमैहिकामुष्मिक स्वस्य
स्वीयभक्तस्य करीपतीपर्यः । एवमनुसन्दधानेन स्पेयमिति भावः ॥५॥
श्रीरघुनायचरणनिर्मित विवरणम् । अन विश्वासार्यमाचार्याः स्वानुभवमुद्भावपन्त्याला पूर्वमित्यारभ्य श्लोकदयेन ! आज्ञा पूर्व तु या जाता गङ्गासागरसङ्गमे । यापि पश्चान्मधुवने न कृतं तद्वयं मया ॥ ६ ॥ देहदेशपरित्यागस्तृतीयो लोकगोचरः । पश्चाचापः कथं तत्र सेवकोहं न चान्यथा। लौकिकप्रभुवकृष्णो न द्रष्टव्यः कदाचन ॥ ७॥ आज्ञापूर्वमिति । मां पति पूर्व श्यममाना देशपरित्यागविषयिणी गङ्गासागर- सङ्गाने जाता । पापि पुनरन्या देवपरित्यागरिपपिणी मधुवने मथुराया जाता तदाना- दूपं मया न कृवमेव । हतीया या लोकगोचरा लोकविषयिणी लोकानुद्धरस्वेत्सर्वमा सा कृदेवि शेषः। बनाइट्रयभट्टरूपेप्यर्ये सति कर्य मम पयाचापो, यन्मपा न कृतमित्येवं रूपः, सन फयमपि सङ्गच्छत इति । अफरणे हेतुः, सेषकोहमिति । सेवकस्य सर्वस्वनिवेदिनो या फाचन कृतिः सा भगवदिच्छयैवेति निक्षयात् । न चान्यथा अन्यसहयो नास्मीत्यर्यः । ननु लौकिकमभूणामिवानामजस्यादोपत्वे भगवतोपि तयात्वापत्तिरित्यत माहुः । लौकिकममुवदिवि । कदाचिदारव्यामोहाय लोकवदाचरणेपि लोकवनगवान कदा- चिदपि झेप इत्पर्यः । लोकवदाचरणं तु रामायणमौसलादिषु प्रसिद्धम् ॥ ७ ॥ कस्मिन्नप्यशे चिन्ता न कार्येत्याहुः । सर्व समर्पित भत्त्या कृतार्थोसि सुखीभव । प्रौढापि दुहिता यदल्लेहान प्रेष्यते वरे ।। ८ ।। तथा देहे न कर्त्तव्यं वरस्तुष्यति नान्यथा । लोकवचेस्थितिम स्याक्तिं स्यादिति विचारय ॥ ९॥ सर्व लौकिकालौकिकसाधारणं स्वीय भल्या स्नेहपूर्वक समप्तिमेशास्ति, अतः हकोहि कहकोसि तुली मय, उबर रहस्य, नरिया जिल्लरेप मालम्मा- दिना भगवद प्रियापदं स्वशरीरमनुपयुतानं प्रति सदृष्टान्त दोपमाहुः । मोडापीति । प्रौढा वृद्धा, अपि भन्दादमौदापि दुहिता यदा स्नेहवशादरे तद्भचरिन प्रेप्यते न यायदे सदा वस्तापी परस्तां विना प्रकारान्तरेण न तुष्टो भवतीति, पद्यपास्ति तया निवेदिते देहेप्पविलेहवादनुपयोगो पगबदसन्तोपकारक इत्ययः । लोकवदिति ।
१२ श्रीवलभाचार्यचरणविरवितान्तःकरणप्रबोयः । साधारणलोकवन्मे यदि स्थितिः स्याचदेदानीतनावस्यापेक्षपानदधिकं लोके वेदे च कि स्यान्न किमपि, प्रत्युन सर्वनाश एव भवेदित्येवं त्वमेव विचारय, इदसुपपनं न वेति । ननु सर्वया शरीराद्यशक्तौ भजनासम्पने कर निस्वार इत्पत माहुः ।। अशक्ये इरिस्वास्ति मोहं मा गाः कथञ्चन ॥ १० ॥ सर्वभकारेण कृत्य साध्येय हरिरवास्ति मम शरणमिति बुद्धिमवलम्बस्व । अस्मि- मर्थ कथमपि मोहं वैचित्यं मा गाः, मा प्रामुहि ॥१०॥ उपसंदरन्ति । इति श्रीकृष्णदासस्य वल्लभस्य हितं वचः । चित्तं प्रति यदाकार्य भक्तो निश्चिन्तता ब्रजेत् ॥ १९ ॥ इति श्रीमदल्लभाचार्यचरणविरचितान्तःकरणप्रबोधः । श्रीकृष्णे दास्य गतस्य वल्लभस्य, श्रीकृष्णदाप्तस्पेति जात्यभिप्रायेणेकवचनं वा । थीकृष्णदासस्य चितं प्रति हितमभीष्टसमादकं वल्लभस्येदमभिहितं वचो शेयम् । कथं तदित्यत आहुः, यदाकपर्येति । यद् वः श्रुत्ला भक्तो नैचिन्त्यं मामयादिति ॥ ११ ॥ इति * श्रीविहलेश्वरात्मजमीरघुनाथविरचितमन्तःकरणप्रबोधविवरण संपूर्णम् । • केनचियेनकेन श्रीमपरणाम विवरणमितिनिधित, परपन्या मीरवनाथामियानश्पक्षधेत भीप्रापरणविरचितटीयभाग तिरिप भीरपुनापामेति विधीयत ।
स्नीकृष्णाय नमः। धीगोपीजनवानुमाय नमः। श्रीमदाचार्यचरणकमलेभ्यो नमः। श्रीवल्लभावार्यचरणविरचितान्तःकरणप्रबोधः । श्रीमन्महानुभावनीहरिरायचरणविरचितविकृतिसमेतः । अथ श्रीवल्लभाचाः कृष्णेनाविदयालुना । निःसाधनजनोवृत्य पुष्टिप्रकटनेच्छुना ।। स्वास्यरूपाः स्वतस्तेन प्रभुणा प्रकटीकलाः । जीवोद्धाराय विवति चकुर्भागवते मुदा ।। तथा स्वतन्यमजनप्रकारस्योपदेशनम् । ततश्च भगवान्मत्वा स्वमार्योद्घाटन हितैः ॥ आनार्यविप्रयोगं चासहमानोखिलेश्वरः । आज्ञानुपमदादेइदेशत्पागैकरोधिकम् ॥ ततः स्वमौदिवशतः करुणावशतोपि च । तद्वयोलहनं च पश्याचापस्ततोऽभवत् ।। दोपस्फूर्त्या हरौ शङ्गविलम्बारयागनाद्यात् । मङ्गीतिगतश्चापि धर्मत्यागाच दुःसहः ।। चालवत्पूर्वमासः पद्यानेति यदद्रवीत् । मां तैनास्थिरयाक्त्वं हि हरौ दोपस्तदास्फुरत् ।। ततः समादधुचिचं वचनैः स्फूर्तिमागतेः। अन्तःकरण मदाक्यं सावधानतया शृणु । कृष्णात् परं नास्ति दैवं वस्तुतो दोपवर्जितम् ॥ १ ॥ अन्तःकरणपदतो पहिरज्ञानबोधनम् ॥ दोषसम्वन्धतचित्ते स्वभिन्नलं हि मन्यते । आशशेलसन्नतो दोपो भगवदोपभावनात ॥ अस एव तदात्मीयं क पत्र सपाहतिः । अन्यथा मौदिदादर्थे तु सर्वभावाच्युतिर्भवेत् ॥ महाक्यमिति वाक्येषु स्वसम्बन्धो निरूपितः । निर्दोफ्भगादानपोषकत्वातु सर्वथा ॥ अत एव समासो हि पदयोरत्र घोधितः । वाक्यमित्येकवचनं सरकार्यबोधनात् ।। स्ववाक्यस्य दुरूहत्वादावमौदस्य चेतसः । अर्थानवगमस्तस्मात्सावधानत्वबोधनम् ।। श्रवणोज्या सतापर्यमर्यावगमनं मतम् । श्रवणेनैव हि स्वीयविचारान्तरवारणम् ।। एतदश्रवणे दोषोपीति विध्यवतारणम् । पथाचापो द्विधा जातः प्रभुदोपसमागतेः।। आज्ञास्पस्वधर्मस्य परित्यागात्स्वदोपतः । तत्र तु प्रथम दोपः प्रभो नास्तीति कथ्यते ।। तदारोपणतश्चित्ते भ्रान्तत्वपपि चोरुयते । न हि कृष्णे सदानन्दे दोपसम्माधनोमवः ।। सस्छन्देन यतस्तत्र दोपाभाक्य रूपढे । सर्वस्यैव तदासत्वान पर विद्यते ततः ।। स्वस्मिन् सलम' पाठः।
श्रीवल्लभाचार्यचरणविरचितान्तःकरणप्रबोधः । अतो वैषम्पनैपुण्ये मपि दोपौ न कर्तरि । नास्तीत्युच्या तदन्यस्य सत्ताभावो विनोध्यते ॥ देवशब्देन पूज्यलं सर्वेषां झापित हरौ । तस्यैव च परत्वेन सर्वोत्कृष्टत्वबोधनम् ।। जगत्पूज्ये भावति दोपसचा कयं भवेत् । अन्येषामपि पूज्यलं तदिभूतिलवोपि हि ।। भृगवे हरिणा स्वस्य दोपाभावो वियोषितः । निदोपपूर्णगुणता सर्वत्रैव निरूपिता ।। सर्वेषां भाग्यरूपत्वं देनशल्देन चोदितम् । यथा भाग्यं विना सर्वसाधनं विफलं मतम् ॥ तथा तत्प्रतिकूल्ये न देवानां फलदावृता । अत एवास्मदाचायन्ये सेवाफलाभिषे ।। तदापदेवसेवापिन्पति विनिरूपितम्। भापश्चिचानि चीनीत्यादिवाक्यानि सन्तिहि। ससम्बन्धन सर्वेषां फलदे दोषवारके । सरूपतोपि निदोष कयं दोपनिरूपणम् ।। ननु भुव्यवतारे ह क्रोधादि दृश्यते हरौ । दैत्यमारणतोनन्तयुक्तीनां परिमहात् ।। क्रोधोपि देवस्येत्यादिवाक्यं च खलु श्पते । इति चेन हौ दोप: प्रवीत्या न हि पस्तुतः। विचार्यमाणे क्रोधादि हितं पर्यवसानतः । मुक्तिदानाबिनानन्ददानाचधिकारतः ।। दोश व न जीवैस्तु प्रयुक्तास्तं पशन्त्यपि । अमिषारा रेग्णववदतस्तद्दोपवर्जितम् ॥ एवं सतीशे नाथे दोपारोपणतः स्वत: पूर्व मातोपि चोकों नश्येचदपपानतः ।। स्वामिसम्बन्धराहित्याद्भवेत्तु महती सतिः । इति चेत्तत्समाधानमनिमश्लोकरूपितम् ।। चाण्डाली चेदाजपत्नी जाता राज्ञा च मानिता। कदाचिदपमानेपि मूलतः का क्षतिर्भवेत् ।। २ ॥ संभावितस्य चाकीतिरिति गीतोक्तवाक्यतः । उत्कृष्टस्य पुरा पवादपको सविर्भवेत् ।। पूर्व स्वरूपे दृष्टान्तस्तथा होनो निरूपितः । तादशस्य नयोत्कर्षे मूलं तु गान्मतः ।। पुष्टिमार्गद्वतौ नैव जीवोत्तों नियायकः । भक्तिसे तथा पोक्तं मभिर्विष्ठभौः ।। पूर्व जीवगतोत्कर्पोप्यायोजक इत्यपि । मूलतस्लपपाने तु न हीनस्य सविर्भवेत् ॥ अपमाननदुःखं तु क्रियते स्वविचारतः । दात्यं स्वर मनः स्वीयं दासानां नापमाननम् ।। चेदित्यनेन दौलम्पमङ्गीकारे निरूपिनम् । नातं पदामपत्नीत्तं तम याति कपश्चन ।। अन्यैर्वा सा नदुर्वाक्पा शवया बलान्वितैः।म वा तदुपभोगोन्यैः पक्षात्क हिशम्पते ।। अपमाने दिसम्बस्तु विरहानुभवार्थकः । यहि संवेदने पश्चादन्यपानमसाघमः। सदनन्तरमन्येपि मालमतयो धुवम् । मानपन्ति यतस्त्वां हि नापकर्षस्ततो यः॥ कदाचिदित्यनेनार नित्यता नापमानने । मनःपूर्वकृतित्वेन नित्यतानीमा हरेः॥ नापमाने यतस्तन हरेरिमा न ताशी 1 सिसाथै ददनाएं वा कुरुले न निवेच्छया ।। रापूर्वकृतित्वं हि भवेदेव हि नित्यता । दण्डोप्यनुपरः मोक्का रात्रैराव एव हि ॥ अपि शन्देन तस्यापि मानसाम्य निरूपितम् । एवं वाक्यैर्वोपयित्वा दृष्टान्न र बोपनम् ॥ क्रियते स्ढता यस्पाकृतबोधस्स सिम्पति।
श्रीमन्महानुभावश्रीहरिरायचरणविरचितवितिसमेतः । समपर्णादहं पूर्वमुत्तमः किं सदा स्थितः । का ममाधमता भाव्या पश्चात्तापो यतो भवेत् ॥ ३ ॥ अहं समर्पणात्पूर्वमुत्तमः किं स्थितो मनः।। यतो दोपा निटत्तास्तु सर्वेषां तत्समर्पणान् । सइत्यनेन हृदये तदावेशात्कचित्कचित् ।। जाताप्पुत्तपता नैव निरन्तरमभून्पयि । यया श्रावणशुरुकादश्यां कृष्पो पुरसस्थिते ।। साक्षात्समर्पणे सर्वोत्तमत्तं न तया पुरा । नन्वास्परूपाचार्याणां कयनं नैर युज्यते ईश कृष्णरूपत्वासस्पोक्षमता यतः । इति चेन्न रसात्मत्वावरस्वरूपं च तत्तथा ॥ यया भावतो लीलारसानुभवसिद्धये । मानिनीपु तयारूपं मई माहवलोपि हि ॥ तयावतारे भायाख्यरसानुभवहेतुकम् । रूपं तथा क्रश्चापि साचार्यचरणोदित्तम् ।। अतो रसात्मके रूपे न कार्य: संशयस्तथा । यतो रसस्वरूपं हि यत्र यादृक् तथैव तत् ।। फिञ्चाधुना चाधमता का वा भाव्या ममलया। यतोधमत्यश्चित्त पश्चात्तापोभवेत्तक। ननु सत्य तथाप्येष कृष्णः सर्वोत्तमः स्वतः । कतै चापि वथाऽनुमन्यया कर्तुमीश्वरः ॥ अतः कदाचिढरणं कुर्यादन्यथा तदा । का गतिः कुर गच्छामि गत्वा वान्यं कमाश्रये ॥ इयं चिन्ता न फर्तव्या- सत्यसङ्कल्पतो विष्णु न्यथा तु करिष्यति । आज्ञैव कार्या सततं स्वामिद्रोहोन्यथा भवेत् ॥ ४ ॥ सत्पसङ्कल्पतो हरिस । साङ्गीकृति कृपापूर्णो न कुर्यादन्यथा कचित् ।। कपा सत्या कृतिः कैप वाक् सत्या न विचारितम् । विचारित हरेः सत्यमतस्तुम्थनेन्यथा । कदाविदासदोषेण नान्यथा तद्विचारितम् । अतो वचाश्रुतौ नवं वियं भयमन्यया ॥ विष्णुः सर्वत्र सत्येन रक्षः कथमन्यया । करिष्यति यतो रक्षा साधारण्या कृतिः प्रभो।। तुशब्देन न भक्तेपु कचिदप्यन्यया कृतिः । करणं वायकरणं सुखार्थोस्तु विद्रये ।। नन्येवं चेत्स्वतन्त्रलं कि दासानां न घायकम्। स्वतन्या गतचिन्तास्तु कुर्युराशाविलोपनम् ॥ तथासति महान् दोपस्तदर्यमिह चोच्यते । आईच कार्या दासेन न प्रश्नोन विचारणम् ।। एक्कारेण धर्माणामाक्षात्येनैव वै कृतिः । कार्यत्वावश्यकत्वार्थमत्ययान्तपदोक्तितः ।। सेवास्तामकुर्वन् वै प्रत्यवायो हि जायते । निरन्तरं तस्कृतिस्तु स्वधर्मत्वेन पोधिता ।। स्वधर्मों पाशस्तस्याकृतौ दोपोपि तादृशः । वायूपवेदधर्मस्याउकरणे बाइनिलपितः जारकादिः, स्वरूपात्मधर्मस्याफरणे हरेः । स्वामिद्रोहो महान् दोपः स्वरूपेण विरोधतः ।। आज्ञाभङ्गो नरेन्द्राणामिति लौकिकापरतः । ।
श्रीमन्महानुभावश्रीहरिरायचरणविरचितविकृतिसमेतः । सेवकस्य तु धर्मोयं स्वामी स्वस्य करिष्यति । आज्ञा पूर्व तु या जाता गङ्गासागरसङ्गमे ॥ ५॥ यापि पश्चान्मधुवने न कृतं तद्धयं मया । देहदेशपरित्यागस्तृतीयो लोकगोचरः ॥ ६ ॥ सेवकस्य हरेः सेवां कुर्वतो मार्गवर्तिनः ।। धर्मोपमेव नान्योस्ति यदाज्ञाकरणं प्रभोः । तुशब्देनान्यथा धर्मः पुष्टिस्येषु विलोक्यते, तदाज्ञालोपमानादि तद्धरेधवेशनात् । तयैवात्रापि विज्ञेयं न, धर्मोयमितीरितम् ।। अत एवार्जुनेनोक्तं करिष्ये वचनं तव । न चायमीदृशो धर्मः सन्दिग्धफलसाधकः ।। यत आझाभिधं धर्म हरिः स्वीयं करिष्यति । अहं ला सर्वपापेभ्य' इत्युक्तं हरिणा यतः) अन्ये सर्वेपि ये धास्ते विभूतिपराः कृताः । फलदानं विभूतिभ्यसेषु सर्वत्र निश्चितम् ।। ईय धर्मपरित्या स्वस्मिन्नानः मति । पश्चातापोप्यतो योग्यः सर्वथेति निरूपितम् ।। तदेवा(निनाचार्या मधमाशात्रयं हरिः * अदाद, तत्र स्थलं पूर्वाज्ञायां च तन्निरूपिनम् ।। यत्र देहपरित्यागः कर्त्तव्य इति सोऽब्रवीत् । तत्र वीज तु सानिध्यादेर्भावात्मकस्य हि॥ साक्षात्तद्भावसम्बन्धी विना मार्गोपदेशनम् । ततः स्वरूपमाकटयं पुष्टिमार्गस्थितप्रभोः ।। *ज्ञानं च नाभिलपितं गूढभावस्य वै हरेः । सर्वत्र सर्वगीवानां तेनैवं प्रभुरुक्तवान ॥ ततःपाकृतवत्कृत्यागाईस्थ्यादौ विमोहनम्। सम्पाद्य स्वीयसानिध्य भक्तानामेव कारितम्।। उपदेशनमारब्धमाचार्यः पुष्टिमार्गगम् । ततो मधुवने सर्वा गूढलीला प्रकाशिता ।। उपदेशेन भक्तेभ्योऽनभीष्टं तदपि प्रभोः । लीलाधारततः स्वस्य तद्वारे प्रकाशनात् ॥ तयं न कृतं कृष्णाऽऽज्ञाया रसविशेषतः । श्रीभागवतगृहार्यप्रकटीकरणात्तपा । ळीलास्थलहगासक्तेन भयं मौदितो रतः । तुशब्देनाधुना नैव तादृगाज्ञां ददाति हि ॥ स्वास्थ्यवारये नसंन्यासे कुरते भाक्यातनम् । स्वास्थ्यवाक्यं न कर्तव्य' इत्यतोस्मत्पभोर्वचः।। स्थलं च प्रयमाज्ञायाः स्वसंयोगमधोयकम् । गद्गायाः सागरेणात्र यया योगस्तथा पया। एकीभावेन सम्बन्ध इति स्वामिप्रलोभनम् । पये द्वितीय या प्रोक्तोऽपिशब्दस्तेन वोधितम् ।। एतदाज्ञापनमपि स्वसम्बन्धमलोभकम् । पधारदेनैतदाता विलम्पेन समुद्गता ।। स्थलं मधुवनं प्रोक्तं दुष्टसम्बन्यतस्तथा । तत्र नैत्रविध कार्य कार्यमित्याशयो हरेः॥ तत्रत्यानाश्च विप्राणामतः प्रोक्तैव दुष्टता । एतद्वयं तु न कुनं तृतीयोऽर्थात्कृतो मतः॥ * अदापत्र पठ पूर्वागायो तर निरूपितम् । इति पाउ । * एतादृश प्रभुप्राकव्यात्मक ज्ञान सत्र सर्वजीवानां स्यादिति भावस्य होनाभिलपिनम् । * एव देवम्यागरूपम् ।
श्रीमन्महानुभावनीहरिरायचरणविरचितवितिसमेतः । त्यागो लोकैकाविषयो नामदानादिवर्जनात् । सेवामदर्शनाभावात् सहनावाखदस्य च ॥ नन्येवं धर्मगमने पश्चाचापस्तु संभवेत् । इति चेन्न यतः सेवाकरणात्सेवकोस्म्यहम् ॥ पश्चातापः कथं तत्र सेवकोहं न चान्यथा । लौकिकप्रमुवत्कृष्णो न द्रष्टव्यः कदाचन ॥ ७ ॥ सेवा तु स्वाम्यभिहितकरणेन भवेत्पुनः । स्वामिनैव यदुक्तं में श्रीभागवतवर्णनम् ।। पुष्टिमार्गप्रकटनं तदेव क्रियते मया । तदुत्तरं चेत्स्थास्यामि तदा दोषो भविष्यति ।। न चाहामायसेवायाः करणे धनध्युतिः । सेवाकृतेराशयापि स्थितेरन्यविनात् ।। तदा केन प्रकारेण पश्चात्तापो भवेन्मम । ननु मभूगां लोके तु वा सेवाकृतावपि । परित्यागकविः स्वीयोत्तराज्ञापरिपालने । अत्रापि चेत्तथाभाये पथानापस्तु सर्वया इति महरि कृष्णो द्रष्टव्यो लौकिकेशवत्। स भावाऽज्ञो हरिविवेत्तास क्षणिको हरिः न तपासतुदोपाढयोहरिदोपविनिता सोऽनित्यावीकृति कृष्णोनित्यागीकरणो मत! स दुःखरूपः कृष्णस्तु पूर्णानन्दो निरूपितः । सोल्पदः पूर्णपरमानन्दसन्दोहदो हरिः ।। कदाचनेति शब्देन सोऽस्थिरः स्थिरता हरेः। अतस्त्यागभयाऽभावादनुतापो निवारितः ।। सर्व समर्पित भत्तया कृतार्थोसि सुखी भव । किच, सर्व लौकिकं हि वैदिकं च समर्पितम् । अहन्तासमते चापित्या तम समर्पिते ।। अतः कर्तव्पताऽभावात् कृतार्थत्वमभूनव। किमर्थ कुरुधे दुःखें कि नास्ति सुखी भव ।। भ्रमादेवाभवदुःख पजावितिकममाशयः । सेवावशादगमने नातोपोऽलौकिकमभोः । प्रौढापि दुहिता यबस्नेहान्न प्रेष्यते वरे ॥ ८ ॥ तथा देहे न कर्तव्यं वरस्तुष्यति नान्यथा । सेवानियस्य करुणाकरस्प मृदुनेवसः । देहाध्यासादगमने खसन्तोपो भवेत्समोः ।। अतो विदधते वित्तसमाधान निदर्शनात् । देहे न सत्ता स्थाप्या दि यया दुहितरि स्वतः ।। जामात्रय पोपणं तु हर्यर्थे तदव हि । अयोग्यतायां तचिन्ता कर्तव्या रक्षणादिषु ॥ प्रौडा चेत्सकला चिन्ता सस्पैथेवि विध्यालाम् । अतोन देहाव्यासेन देवाधरणं हौ उचित जगतहास न तुभ्येद्यतो वरः प्रत्याभोक्ता, नाजातरसस्यायोग्यवस्तुनः ।। अतः स तु कयं तुष्येदपेक्षायामनर्पणात् । तदाशयपरिज्ञानमात्राचेदयते स्वतः ।। तदा विशेषसन्तोषत्वाज्ञायां मध्यमः स्मृतः । आतापामपि चैलोभो देहादेस्तोपणं फपम् ।। यदर्य सकलापेक्षा तदमावेऽखिल व्या। * महाप' पा31 .
श्रीक्छमाचार्यचरणविरचितान्तःकरणप्रबोधः । लोकवस्थितिम स्याक्ति स्यादिति विचारय ॥९॥ अशक्ये हरिवास्ति मोहं मा गाः कथञ्चन ॥१०॥ बनु देशदिलोभस्तु लोकोत्पनस्य जायते ॥ सानभिप्रेतकयने पानोपि भवति मियै । मदोषि प्रियसौमाग्पासासाधारण्यवोधकः ।। जायते दोपभाक्य प्रभो मौद्विवद्यात्पुनः । अतः किभित्रमिति चेन्नै चिचोचितं मयि ।। भई तदास्परूपोस्मि भयात्मा बहिरूपवृक् । निर्दुष्टः केवलानन्दम्रपादादिसङ्गतः ।। कृष्णापरसुपासारः परमानन्दरूपवान् । भक्तिदाता समस्तानां स्वीयसान्निध्यमावतः ।। श्रीकृष्णरसभावात्मा बनखोहदयस्थितः । लीलाशतसपाक्रान्तसावो विस्मृताखिलः ।। हृदयसामिसहितो झाविर्भूतस्तदानया । एतादृशो ममापि स्यालोकवचेस्थितिर्मनः ।। धहि किस्यादिति पुनःसप होव चिन्तया नदास्यस्य स्पिचौ नै प्रभोरपितया स्थितिः इत्यज्ञानं न तद्युक्तं हरेरानन्दरूपिणः । अशच्यत्वादेवमुक सयमेव विचारय । ननु जातेऽपराधे तु किं विधेयमशक्तितः । अज्ञाला वाथवा सात्वा यत्कृतं नातं हि तत् ।। अतः कयं सोनुतापो हृदयात्तु निवर्तते । इतिचेन हरिः सर्वदुःखहर्ता झुपेक्षते ।। अशक्ये निजभक्तानां स्वयं सर्वत्र साधकः । यतो गजेन्द्रस्थाशक्ये स्वयमाविबभूव ह ।। कार्य च कृतवान् सर्वमतो इरिपदं यतः । एतेन साधनाभावे दैन्पभावोभवे पुनः ।। निःसापनफलात्मासौ मादुर्भवति निश्चितम् । एवकारेण नान्येषां निःसारनफलात्मता ॥ नपाकपालुतापूर्णानन्दामाबादसास्थितेः। अस्तीनि पदतः सा भादुर्भूतो निरूपितः ।। अतोमोई स्ववैकल्यं मा भामुहि मनो मम । एवं सान्वःसमाधान विपाप स्वसदुक्तिभिः।। इति श्रीकृष्णदासस्य वलभस्य हितं वचः । चित्तं प्रति यदाकर्य भक्तो निश्चिन्तता प्रजेत ॥ ११ ॥ इति श्रीमदल्लभाचार्यवरणविरचितान्तःकरणप्रबोधः समाप्तः । सम्पाय स्त्रस्यनश्चिन्त्ये स्वीयानमति बदन्ति हि । एवं प्रकारचाक्यं हितं फलदशासु हि॥ स्वचिसंप्रति यमोक्तं तदाकर्ण्य भजन हरिम् । स्वदोपण्यपरित्यागी प्रचरित्यवबोधतः॥ परित्यागमयाभागाजनो निश्चिन्ततां व्रजेत् । नन्वैवं कपनादेव नैचिन्त्य तु कयं भवेत् ॥ स्वानुभूतैरभाव तु वायात्राम हि सिध्यति । इति चेदुच्यते स्त्रीयान्समायातुं वदासता ।। आविर्भूतस्वरूपस्य मोक्तानुभववोपने 1 अनुभूपैतदखिलं मयात्र विनिरूपितम् ।। मात्र कार्यो हविश्वासो भवशिसफलाशिभिः। ननु दासलकृष्णवे विरुद्रे भवतः कयम् ।। किवा विघाप कापल्यं तथा स्वस्य कथ्यते । महापुरुषचत्र कृष्ण चौपचारिकम् ।।
श्रीमन्महानुभावनीहरिरायचरणविरचितवितिसमेतः । अथवा भाववशता स्वस्वरूपस्य विस्मृतिः । विरुधर्मवा वापि ब्रह्मवचत्र रूप्यते ॥ यदा व्यामोहसिध्यर्थमेव रूपनिरूपणम् । एवं हि संगये कायर्या सद्धिरेवं समाहितिः ।। पया रसात्मनो रूपं हरेर्यत्र ययाविषम् । वचः क्रियापि सर्वेषानुरूपा यत्र याशी ।। का तादग्विषं रूपमुच्यते न प्रदर्शनम् । अन्यथा न रसात्मत्वं स्पादोद्धलं रसववत् ।। लोकेपि यत्र नाट्यादौ प्रादुर्भवतिवेदसः । स्त्रीवेशादिह तत्रैवमुच्यते सैव वर्तते ।। एवं हि भगवान् कृष्णो रसात्मा यत्र यादृशः । नसानुभवार्य हि विशिष्टस्तत्र तानः॥ रसात्मत्वाचदास्यं च मन्तब्य सादृशं पुनः । मतो दास्परसाप मादुर्भूतं तदात्मना । भत्त्यात्मकं मुखं वत्र रूपमेव हि तादृशम् । वचोपि वा तत्र सत्यमेव न चान्यया । यया क्यो हरेः स्वीयदैत्यभावनिरूपकम् । मानापनोदसमयेऽस्मसभोस्तदसामना । तयाचार्येषु वाक्यानि मात्र कश्चन संशयः । वल्लभस्पेति नामोच्या विधासस्थानमुच्यते ।। होस्वस्मिस्तया नाम्नि नित्याप्रीतिनिरुपिताईटसरूपविश्वासे नैचिन्त्य निषितं मया। भाग्यमानां हि विश्वासो भवेच्छ्रीवल्लभभौ । यया निवेदने चिन्ता नवरले निवारिता ।। एवमत्र फले चिन्ता स्वकीयानां समुद्धृता । संयोगमानविरदाभियभावत्रयं स्वतः ॥ अनुभूतं तु संयोगः सेक्षा त्यागतोऽपरः । आनाकरणतो मानगावोत्र सफलीकता ।। स्वरूपस्फूर्तितः पथात्पश्चात्तापो निवारितः । इति श्रीवल्लभाचार्यपदाम्बुरुहरेणुपु-- सक्तचित्तस्य वित्तिहरिदासस्य पूर्णताम् । भगमत्तेन ते स्त्रीय रद कुर्वन्तु मां सदा ।। अवधमनवचं वा विचारयतु मे मः। यत्मसादिदं सर्व पूर्णतां याति सर्वया ।। सन्तोपि कृपया युक्तं पदीयं मूर्खजल्पितम् । श्रीमदाचार्यसम्बन्धात्पश्यन्तु परमाता: १५१ इति श्रीहरिदासोक्तान्तःकरणप्रबोधविकृतिः समासात धीरूषणाय नमः। श्रीगोपीजनबलमाय नमः। श्रीमदाचार्यवरणकमलेभ्यो नमः । श्रीवल्लभाचार्यचरणविरचितान्तःकरणप्रबोधः । श्रीश्यामलात्मजश्रीब्रजराजकृतविवरणम् । नत्वा स्वाचार्यपादानं सांभीष्टप्रदायकम् । तदुक्तबोधराक्यानि ब्यास्याये वोधसिद्धये ॥१॥ *(अय) श्रीमदाचार्य धरणा: (सीयान प्रति नवरत्ने चिन्ता कापि न कार्या' इत्यामाप्य तस्या अन्तःकरणधर्मत्वादन्नाकरणस्य च स्वभावचञ्चलत्वादृषाध्यानादिसंभो पूर्वोक्ताशभद्तम्भवानिवेदनं कृतमध्यकृतं स्यादिति तदभावाय ममेयरलेन यथा भगवान भक्तान्त:करणसम्बन्धी सन् फलपकरणे मदमान निवारणं कृतताँलयात्र) स्त्रीयान्तःका- णोधार्य ( तदभिमुखीकृत्य) सपौटिस्वासरूपज्ञापनपूर्वकमन्तःकरणपणे निरूपयन्त्ये- कादशशोकैरेकादशेन्द्रियबोधकत्वेन । अन्तःकरणेति । अन्तःकरण मद्रास्यं सावधानतया शृणु । कृष्णात्परं नास्ति दैवं वस्तुतो दोपवर्जितम् ॥ १ ॥ है अन्तःकरण ? मदीयानामिति शेषः ( समासौ 'भक्तो निश्चिन्तता दि. स्युपसंहारादोध्यः ) मद्राक्यं सावधानतया सावधानीभूप शृणु भृणुष्वेत्यर्थः । स्ववाक्यत्वेनासतोक्ता । अरणे सावधानत्वोक्तिः श्रवणानन्तरं तयाकरणापम् । अन्त:- करणस्यैकवचनं स्वमार्गे सर्वेषामेकरूपत्वज्ञापनाय जात्यभिप्रायेण । (अत्र सर्वे पास स्वान्तःकरणमेव वोधनीयत्वेनालीचनुः । तदापि श्रीवल्लभाटके रूपद्येनावतारबोधनात्स- पौत्तमे 'स्वायं मादुर्भूतं चकारे त्युक्तेय, मुखाग्न्यनाराभिप्रायेण सदावमेवा) एवं स्त्रीयानामन्तःकरणं सम्मुखीकृत्य बोधयाफ्यमेवाहुः । कुष्णात्परमिति । कम्पात् 'कृषि वाचक' इत्यस्य भाशनन्दात्मकतया विवरणेन प्रयासलमानां भावात्मकार (परमत्कृष्टं देवं देवानां क्रीडाला समूहो वा, 'दैवं दिष्ट भागधेय भाग्यमितिकोमा- सासा भाग्यरूपं वा नास्ति इतरं ) मातीत्यर्थः । ननु स्तुनिस्पमित्याशायामाहः, वस्तुत इति । तत्रोत्कृष्ट लाया वास्तोलार्थ विशेषगमाहुः-दोपवर्जितमिति। दोपै. धनित रहितमित्यर्थः । (नया चेदं वास्तवत्वे पीगम् । किञ्च; ) कृष्णपदात् सदानन्द विहान्तर्गत श्रीमतवाणे संगेश्य सम्परिन शेश्य् ।
श्रीश्यामलात्मनश्रीब्रजराजकृतविवरणम् । कस्तेन यथा गोषिकार्य कोटिकन्दर्पलावण्यं प्रकटीकृत्य प्रकटस्तथा सर्वत्रापि सदर्य कटो भविष्यतीति शापितम् । तेनान्यत्र क्रीडारूपत्वं नास्त्येवेति जीवानामन्यत्र नायक- भावेन भजनं दोपरूपमेवेति भावो दोषवर्जितमित्यनेन ज्ञापितः । अत एव 'वीर- योषितामित्यत्र 'प्रजनितम्बिनीवास्यव्याख्याने श्रीमदाचार्य ने हि कृष्णादन्य एवं सम्बोधनमस्तीति निरूपितम् । आय धीमहिषीभिरपि 'स्वस्मथुरोम विपद्यनान्यत्र कान्तभावस्य दोपरूपता निरूपिता । ( तया च स्वकीडानुरोधेन स्वीयभाग्यरूपतया पसगमेवास्माकं करिष्यतीति निश्चित्य चिन्ता न कार्येत्यर्थः ।) (मनु सत्यमेवं तथापि भावतो अश्रुत्यादिदुरापचरणरेणुत्वे सतुच्छसे च स्फुरिते सोत्पधेतैवेति फयं तन्निवृत्तिरित्याकावाया तन्निवत्पर्यमेव) दोषरहितस्वरूपं विचार्य तत्र मानापेमादिदोपराहित्येनाव कार्यति मादैषिभिर्वदन्तः प्रथम (तुच्छत्वस्फूर्तेर किश्चि- स्करत्वाप निदर्शनमा:)चाण्डाली चेदिति । चाण्डाली चेदाजपली जाता राज्ञा च मानिता । कदाचिदपमाने वा मूलतः का क्षतिर्भवेत् ।। २ ।। चाण्डाली चेकदाचिद्राज्ञा मानिता सती राजपत्नी च जाता | चकारेण स्वस्यापि तथाभिमानोत्पनिज तेति झाप्यते । (उदा) तादृशः कदाचिदपमाने या मूलतो राजपत्नीत्वतः का क्षतिर्भवेत् ? न कापीयर्थः । माने फारणं रामपल्लीवं न तु चाण्डालीत्वम् । राजपत्नीत्येषि कारणं रानसम्माननं न तु सधर्मः कोपि । तस्मातस्कृतापमानस्यापि न राजपत्नीलान्यथाकारित्वशङ्के । येया राजपत्नीत्वसम्पाय- नन्तरमपमानेपि न वद्धानिस्तथाच समर्पणानन्तरं (परीक्षा) द्विवीयरसपूर्वथ या भावतापमानेपि ते स्वस्य पुनरन्यभावो न भविष्यति । समर्पणेन यो भावो जान से तु जात एष, (पुनर्पदा परीक्षादिपूर्तिः ) संयोगरसदानेच्छा (वा) भविष्यति तदा पुनस्तथैव मानप्रासिरपि भविष्यतीति विचार्यम् । (तया द्वितीयव्याख्यानरीत्या राज पत्नीलमिव समर्पणानन्तरं स्वस्य सेरायोग्यत्वमेव विचार्य, न तु चाण्डालीत्वमिव स्वतु- छत्वमपि विधार्पम् । भगरता पुष्टिमार्गस्य स्वार्य प्रकटितत्वेन स्वोरीचिकीर्पितजीव- दोपानादरणपुर:सर सदगीकरणे अन्तरा च जोरदोपादासको भगवालयेति न्यान विलम्बेपि पूर्वापरबलीयस्त्वन्यायन नाङ्गीकारतिरस्कारो, नापि दोपप्रापल्यमिति न तुच्छत्वानसर इत्याश)येनाहुः । समर्पणादहमिति । १(विध पया राजसम्पयनवर्ष पूर्वस्वरूप न विचार्य, सद्विचारे सति स्वहीनतेरकारिते तस्य (सहानिः स्पातपा समर्पणे कृषि वस्वरूपविशण प्रभु का परियति । पेति हीरत- विधाम) रवि धीमोरमालारा प्रलय हारमोरिसमा सन्ति !
२२ श्रीवल्लमाचार्यचरणविरचितान्तःकरणारीप: समर्पणादई पूर्वमुत्तमः किं सदा स्थितः । काममाघमता भाव्या पश्चातापो यतो भवेत् ॥ ३ ॥ समर्पणात् पूर्व किमहं सदा उत्तम स्थितः १ अपितु न । तया च सपर्णाद पूर्व येन मावहतमानापेक्षा स्याचारग्भावयुक्तस्तु न स्पिनः । वदनन्तरमेव तयानातस्ते- नापमानेपि (मम) काधमता भाव्या (भाविनी, विभारनीया वा)। यतः समर्पणा- नन्तरं पक्षाचापो मवेत् ? । .....कदाचित्कर इत्यनेनाश्वासनार्थ स्वसहनधर्म आगन्तु- कघर्पय स्मारितः । अतः परमर्दैन नित्याङ्गीकाररूपं भगवद्धपं तदर्य सारयन्तस्तेन, प्रत्युतमानकरणात्मकस्वरूपसम्पचिर्भविष्यति, पुनरन्यया सा न भविष्यत्यैव, भगवदगी- फारस्य नित्पत्वादित्याहुः। सत्यसङ्कल्पत इति । सत्पसङ्कल्पतो विष्णुर्नान्यथा तु करिष्यति । आज्ञैव कार्या सततं स्वामिद्रोहोन्यथा भवेद ॥ ४॥ सत्यसङ्कल्प्यतो विष्णुापका, अन्यथा तु न करिष्यति । यया 'ये यथा मां अपधन्ते, "दिः स्यापयति नाश्रिवा(नित्यादिः सङ्कलम: सरयो पिपाध्यभिचारी, वया) 'मां प्रानो जनः फवित्र (पूयोईति शोचितु)मित्यादि(रपि)भगरका साप एवं सङ्कल्पस्तेन पुनस्र्व (प्रपत्रमन्य)या न करिष्यति । (शोकयुक्त न करिष्य- वीत्यर्थः । किञ्च;) विष्णुपिकस्तेन विभयोगसमयेपि रसदानं करिष्यति, 'मया परोस भन'विन्यानेवि ज्ञाप्पते । एवं (तस्वरूपधर्म भगवद्धर्मच स्मारपिता स्वीयसे- कस्प राणाप यतः) प्रसुरन्यया न करिष्यत्यतो भावात्मकं समर्पणमनुसन्धापापमा- न ले परित्यज्य, मगवान् यथैवेच्छापूर्वकमाशापयति तयैव कार्यमित्याहुः । आई- बेति। सततं निरन्तरमा कार्या । अन्यथा तदकरणे सामिनः प्रभोद्रोहो भवेद । भावता कार्यकरणार्य (स्वदासीय)देहकरणाचदाज्ञाया अकरणे वापकमेव स्यादिति भावः।(भगवडतं देहं भगवत्काथै जीवो धृत्वा तिष्ठतीति पुरञ्जनोपाल्पानाक्षेपम् ।), सिद्धमाहुः । सेवकस्येति। सेवकस्य तु धर्मोयं स्वामी स्वस्य करिष्यति । सेवकस्यापमेव धर्मों यदाशाकरणम् । तु शन्देनान्यधर्मनिषिः मुच्यते (एवं पादरयेण साझापरिपालनरूपो दासपो भगवचोषहेतुरिति, तुना पक्षान्तरनिरासपूर्वक सख्यम्योपाजन्हे।) एवं सेवाधर्ममुक्त्वा प्रभुधर्मस्वरूपमाः । स्वामी मा स्वस्थ इच्छाः करिष्यतीति स्वपनोभिलपिककरणं प्रापर्म एव । सेवकपर्यस्तु वदामाकरण- श्रीश्यामलात्मनश्रीवजराजकृतविवरणम् । मेवेति तुशब्देन झाप्यते । (संयोगपरत्वेनात्रापि तु शब्दस्यानुपङ्गः । यदा, स्वामी भगवान् स्वस्यात्मीयस्य दासस्य करिष्यवि, स्वाज्ञापालनाग्रहं विलोक्य दयया तं धर्य निर्वाहयिष्यतीत्यर्थः । अतस्तदर्थमपि न चिन्ताक्सर इति भावः । एवं साथूसिभिराव काति सम्यगुपदिश्य,) एवं भगदानातकरणसंतुष्टमसम्पादितेन स्वस्योत्तमत्वेन फदाचिदाबसान्ययाकरणेपि स्वस्य ताहकसेवकत्वमेव भाव्यं, न लन्यथा विचारणीय, पथात्तापो या कर्तन्यो, यतः प्रभुरेव सेच्छावस्तयाकारयतीत्याशयेन स्वदृष्टान्त- माहुः। आज्ञेति। आज्ञा पूर्वं तु या जाता गगासागरसङ्गमे ॥५॥ यापि पश्चान्मधुवने न कृतं तदयं मया । देहदेशपरित्यागस्तृतीयो लोकगोचरः ॥ ६ ॥ या आज्ञा पूर्व गगासागरसङ्गमे गङ्गासागरसमीपे जाता, पश्चादा मधु- पनेपि जाता, तदाज्ञादयं मया न कृतम् । तु शब्दस्त्वाज्ञाद्वयाकरणस्य भगवदिच्छा. विपयरूपत्वज्ञापनार्यः । ननु, आझाद्वयं किं विषयकमित्यपेक्षायामाहुः । देहदेशपरि- त्याग इति । गङ्गासागरसङ्गमेन्यत्र गमनकृतस्त्रनिकटस्थित्यभावनकोपेन देहपरित्याग निपयिणी । सापि पूर्वोक्तमकारेच्छाजनितक्षणवियोगासहिष्णुतया जाता । ( एवं मधुवने मथुरायां देशत्यागविपपिणी । ) स्त्राचार्यस्तु स्वीयशिक्षार्थकविभयोगतापानुभवार्य दूर एव स्थितिः क्रियते । भगवता स्वार्थ तथाज्ञाम् । श्रीमदानाः स्वसौभाग्यशापनाय सदाझाद्वयमपि न कृतम् । ततोया लोकगोचरा लोकपरित्यागविषयिणी जाता, सा कृतेति भावः। ....यादे, तृतीय आशाविषयः, स चोभयसमुदायरूपः सन्यास इति व्याख्येयम् । तथा च द्वयं न कृतमप्येवं कृतं, तदपि मया बदलतारेण । अतो मनिदर्शनं पुरस्कृत्य अन्येन तया न कार्यम्, किन्तु यया मम्बाशा तथैव कार्यमिति- भाषः । यदा, न कृतमित्यत्र काकु: । 'दिह' उपचपे, 'दिश' अतिसर्नने, देह अपचया, देशो दानम् । अयपर्षः, भगवता श्रीभागवतार्यमकटनाय पूर्वमाहासं, सक्षम टीकाकरणेन कृतम् । ततः सुबोधिन्यामुपनयो अन्यत्राहुल्पामा आरब्धस्तदा देहपरि- त्याग आजसः । ततस्तद्विहाय निरोध एव विकृतः । तवो मुक्तौ विवीयमाणायां देशपरि- त्याग आशात:। तदा विमोचने स्वाश्रयपापणे व विटते फलं दतमेव स्यादितितदभाशय तादृशमाझाट्यं मयापि सापहत्यागेन कृवश्वेदन्पेन तु सर्वथा कर्तव्यमेवेति भावः।) (पवमानाया अकरणकरणे उत्सा) स्वस्पाबादपाकरणनपयाचापाभावायमाहुः । पश्चात्ताप इति ।
थीवल्लभाचार्यवरणविरचितान्तःकरणप्रबोधः । पश्चात्तापः कथं तत्र सेवकोई न चान्यथा । लौकिकप्रभुवकृष्णो न द्रष्टव्यः कदाचन ॥ ७ ॥ बाज़ाइयाकरणे पश्चातापो मया कयं कर्तव्यः ।। यतोई सेवकोस्ति। तदपि स्वस्य सेवसत्त्वमौम्यैव कृतम् I न चान्यथा, न केवर सौटयेदि । या च ममेदं (शोभते नयन्पत्येतिभावः । यहा, आज्ञादयाकरणान्ममापि पावापदन्यस्य स्वत्यन्त एव स्यादतस्तथान्येन न कार्यमित्तिभावः)। ननु सेवकले सति समोठ्या आझाया अकरणे भगवानमसमो भवेदिति कयं भवतां शोभाकर, यदि शोभारफय. मन्येन न कार्यमित्याशय मावतोऽलौकिकत्वेन तदभारमा लौकिकप्रभुषदिति। लौकिकप्रसवत् कृष्णः सदानन्दः फलहरः कथयन केनापि मकारेण न द्रष्टव्यः । तया च, पया लौकिकमभूणां स्त्रोक्ताफरणे क्रोयो भवति भगवतस्तपा न भवति । यतस्तदसानुभवार्थ प्रभुरेव तथा प्रेरपति । अत एव भगवता पार्थ प्रत्युक्त कनेछती'- त्यारभ्य 'मायये स्यन्तम् । लौकिकानामतथाभाराव कोयो भवति । (मतो भगवदरसर. लाया अभावादस्माकं शोभाकरम् । अन्यस्य तु नाहग्योग्यतापा अभायन भगदिच्छा. झानाभावादनुचितमेवेत्यर्थः)। (एवमाझाकरणतदकरणव्यवस्यामुया तैन यत् सिदं तद्वदिष्यन्नो,) भगति सर्वसमर्पणं जीवधर्मः, पधातु प्रवः सैच्छया यत्करिष्यति तस्करोत, सयापि पैर सपर्मः कृवोस्तीति नैचिन्त्येन स्पीयतापित्साहुः । सर्वमिति । सर्व समर्पित भत्या कृतार्थोसि सुखी भव । प्रौढापि दुहिता यदत्स्नेहान प्रेष्यते करे ॥८॥ तथा देहे न कर्त्तव्यं वरस्तुप्यति नान्यथा । भक्या सहन सर्व समर्पितमनः कृतार्थोसि सुपी भवसुखेनैव स्पीयताम् । परिणामे सुखमेवेति मुखी भवेत्युक्तम् । सर्वपदेन लोफिफरसाधिकरणदासम्पन्धिमार- रूपपलौफिकञ्चेति ज्ञापितम् । समर्पणे कृते देहेपि सम्बत्यस्य नाक्तानेर सेश फर्तयेति लौकिफरसात्मकनिदर्शनपूर्वक(नत्कर्तव्यत्वावश्यकत्तमाः)। मोदापीति । मौलापि रसपोम्यापि दुहिता सस्य स्नेहालस्प घरे बदन मेप्यते तथा देहेन कर्त- व्यम् । स्पस्य देहस्नेहन भगवत्सेवायां देहस्याविनियोगो न कर्तव्यः । किन्तु न लौकिकेन भावात्मरेन च भासपोग्यसेवेच कर्तव्या । तदकरणे परः प्रमुरन्यषा न तुष्पति । पपा सरस्वती विना न तप्यवि तथा प्रापि न तुप्पवि । अवापि श्रीश्यामलात्मनश्रीब्रजराजकृतविवरणम् । समर्पणाऽनन्तरं मुख्यो भावः स एवोच्यते । एतज सापनार्थमेव पूर्व निदर्शने रानपत्नी- त्वमुक्तम् । द्वितीयेनापि तथैवोक्तम् । (एवं देहस्तेहत्यागपूर्वकं देहेन सेवैव कारणीयेति निर्य पूर्व भगवता परीक्षायर्य कृते विलम्बे मम कथं गतिवित्रीति या चिन्ता कृता, सा ते गुणायैव जाना, न तु दोपाय । न पानङ्गीकृतौ चिन्ता भवनि, किन्त्वङ्गीकृतावेवेत्याश्वासनाय दृष्टान्तमुखेन परिचायकान्तरं वदन्त ) एतत्सेवायभावे सर्व व्यर्थमेवेत्याहुः । लोकवदिति । लोकवचेस्थिति, स्याकिं स्यादिति विचारय ।। ९ ।। अशक्ये इरिवास्ति मोहं मा गाः कथञ्चन ॥ १० ॥ चेत्, समर्पणाभाये में स्थितिलोकवत् सर्वसाधारण्येन स्पाचदा किं स्यात्, फलमितिशेषः । इति विचारय । किं स्यात् १ न किमपीत्यर्थः । (तथा च, तथा स्थित्यभाव एव गुणपरिचायक इति भावः)। नन्वेतदातस्य सर्वफलरूपत्वमस्तीति सरपम् , तस्य परं मावस्याशक्यत्वात्तत्माप्तिः कथं स्यादि(तिचिन्ता तु भवतीतिचेदिपि तदा तादृशभीते भगवानपि दयालरेय)त्याहुः । अशक्य इति । अशक्यै सनि हरि- रकारणसर्वदुःखहाऽस्त्येव, शरणमिति शेषः । अतस्तदभावे सई पर्पमिति लौकिकेन विचारेण कयश्चन तत्मात्यर्थ मोहं मा मात, मा मामुहि । एवं मवोधं निरूप्या(तः परं शङ्कापिशाच्यनुदपादुपसहरन्ति । इतीति । इति श्रीकृष्णदासस्य वल्लभस्य हितं वचः । चित्तं प्रति यदाकर्ण्य भक्तो निश्चिन्ततां व्रजेत् ॥ ११ ॥ इति श्रीमहालभाचार्यचरणविरचितान्तःकरणप्रबोधः । इतीति समाप्तौ प्रकारे का। श्रीकृष्णे दास्यं गतस्य वल्लभस्य रसरूपत्वेन पिपस्य चित्तं (स्मृतिजनकमातःकरण ) प्रति हितं हितकर पचोस्तीत्यर्थः । पहचः आकर्य, आसमन्तात्तात्पर्यपूर्वकं श्रुखा भक्तो भूत्वा, मिशिन्तता निश्चिन्तस्य भावपलौकिकलं व्रजेत् । चित्तमयोधवाक्यानि वाचार्योक्तानि सर्वदा । तिछन्तु हृदये येन मसीदति हरिः तपम् ॥ १॥ इति श्रीमत्मभुचरणरेणुधन(श्रीश्यामलात्मजश्रीब्रजराज्ञ)- कृतम् अन्तःकरणप्रबोधविचरणम् सम्पूर्णम् । १ धाकृष्णाय नमः। श्रीगोपीजनवल्लभाय नमः। श्रीमदाचार्यचरणकमलेभ्यो नमः । श्रीवल्लभाचार्यचरणविरचितान्तःकरणप्रबोधः । श्रीदशदिगन्तजैवनीपुम्पोत्तमचरणकृतं विवरणम् । जन्तुस्वभावदोषोत्यमन्तुचिन्ताकुलान् स्वकान् । अन्तः श्रीपदाचार्याः सन्तु मत्स्वान्तगोचराः ।।१।। अथ श्रीमदाचार्यचरणा उपदिष्टसेवाया निर्दोपचाय सिद्धान्दरहस्ये ब्रह्मसम्बन्धन सेवाफतॄणां २ पूर्वेषां देनीक्योः दोषाणामकिश्चित्करत्वमने दोपासंसर्गोपायं च भगवदुक्त निरूप्य, सेवाया आधिदैविकीलाय सरले चिन्तानिहन्युरायकथनमुखेनोदेगाख्याति- पत्यकनिरतिप्रकारश्च निरूप्य वा सेवाकरणे भगवत्माकव्यस्यानुभावपदर्शनस्य चावश्यभावाचस्मिन् सत्यपि पदा प्रामादिशात्पूर्वदोपोपोदलनं तदा पात्रस्य सल्प- लाम्महत्पाः कायारतस्सिन्न माने तस्य स्तोत्रशती भावनासाभवादारपराधे जाते भगवतोऽप्रसन्नता भवेतयापि भावद्भर्परूपायाः सेवापा नित्य क्रियमाणत्वात् । गोपक्रमे ध्वंसो मर्मस्योदवायपि,' इत्येकादशे भगवद्वाक्यात् सेवाया नाशाभावेना परापननितपक्षाचापोसची चिन्तासम्भवे क्रियमाणकरिष्यमाणसेक्योरनाधिदैविकीस्वं स्यादिति तमित्यर्थमस्सिन् मन्ये विचारात्मकं साधनमुपदेष्टुं तर विश्वासाय स्वाव्या- यिकां पायै वदिष्यन्तो 'मनोवशेन्ये घमास्य देवा मनस्तु नान्यस्य वशं समेति, भीष्मो हि देवः सहसः सहीयान् युझादशे तं स हि. देवदेव' इति भिक्षुगीनावापानमनस एवं दुष्टरत्युत्पादकतया वस्व साधनीयवं निश्चित्य स्ववापरणार्थ स्वीपानामन्तःकरण- मेवाभिमुखीकुर्वन्ति । अन्तःकरणेत्यादि । अन्तःकरण मदाक्यं सावधानतया शृणु । कृष्णाद परं नास्ति दैवं वस्तुनो दोपवर्जितम् ॥ १ ॥ यमप्यन्तःकरणपदं स्वपरान्तःकरणसाधारण तथाप्युपसंहारं 'भक्तो निश्चिन्त । प्रजेदितिफलकयनेन ग्रन्यकरणस्य तादध्ये निशायिते परान्तःकरणबोधन एव तात्य- विगत्या स्त्रीयानां भक्तानामेव पदन्तःकरणं तद्रहणस्यैवोचित्यात्तदेव प्रायम् । भीगो- १(मन्तु-अपरार) 'पूर्व देदजीदोग्यो 'ति बहलावरपार । पूषा रवीलयो सपणाम 'रत्यप्रतिपटक पाए।
૨૭ श्रीदशदिगन्तनेत्रश्रीपुरुषोत्तमवरणकृतविवरणम् । कुलनाथास्तु स्वसौभाग्यपदर्शनार्थ स्वीयानां भक्तिमार्गप्रदर्शनार्या श्रीमदाचार्यचरणः सान्तःकरणमेव योध्यत इत्याहुः । तथैवान्येपि सर्वे । श्रीरघुनापास्तु स्वान्तःकरणव्य- पदेशेनान्येषामेवान्तःकरणं योध्यत इत्याहुः । समविदमेव रोचते । सौभाग्यमदर्शनस्य सुबोधिन्यारम्भस्पेन 'अयं तस्य विवेचितु मिति श्लोकेनैव कृतत्वात्ततोधिकदर्शनस्प भकतानुपयोगात् । भक्तिमार्गप्रचारार्यमाविभूतयेन भक्तानाकरणस्यैव सापनीयत्ता- दिति । तपाचायमर्थः । हे अन्तःकरण ? इन्द्रियान्तरदुर्जय ! महार योन्तर्व- हिस्तनुभृतामि'त्येकादशीगावपादानार्यनत्यवापा' हुताशनरूपेण स्वगति व्यसतो वस्तुतः कृष्णत्वेन चासतमस्य मम वाक्यं वक्ष्यमाणं वद्धितकर ग्रन्यरूपं सावधानतया शृण्वाकर्णपेति । एवमभिमुखीकृत्य ब्रह्मसम्बन्धकरणपूर्वकसेवया स्वस्य व्रजभक्तमार्गा- पत्वेन भगवदनुभावदर्शितादिना च सस्मिन्नुल्कपरपा भगवदानादौ प्रजस्यदृष्टान्तेन प्रमागन्तं प्रति वदभावाय तेभ्योपि भगवत उत्कर्ष पूर्व भावयितुमाहुः । कृष्णादि. न्यादि । वस्तुतः अत्यादिरूपवया निर्गुणसेवया चलोकवेदोक्तदोपवर्जितं देवं प्राम- गसक्रीडानां देवीनां कदम्बकं कृष्णात्परं भियं न ! उत्कृष्टं ना न । 'सस्मान्न भिन्ना एतास्तु' इति तापनीपश्रुतेः, उत्कर्षस्य निरवधिसदानन्दरूपं भगवत्येव विश्रान्तश्च । अतस्तदीयतया तदृष्टान्वेन स्वोकर्प विभाज्य मौन्या भगरदनभिभेनं न कार्यम् । तासा- पप्यागन्तुकदोषोत्यनौ ताः मत्यपि पश्चाध्याय्यो 'प्रश्माय प्रसादाय तत्रैवान्तरधीयतेति- वाक्येन भगवतिरोधानस्योकत्वादिति । अन्न गावनार्थकक्रियापदाभारायद्यपि वाक्यस्य साकाङ्गत्वं तथाप्पग्रे उपान्त्ये विचारयेति क्रियाया वक्ष्यमाणत्वादेतेष्वान्तरवाश्येष्वपि दूरतरापि सैत्र योज्या, न तु क्रियान्तरमध्याहार्यम् । 'दूरान्वयापेक्षयाध्याारस्य गुरुत्वात् । तया नेति विनारयेत्यर्थः । एवममे गयायोग्यं धोध्यम् ॥ १ ॥ एवं प्रौडिहेतु निवार्यतस्य जीवस्य पुनस्तपालाभावाय दैन्यसिद्धयर्थ स्वभावतो निक शेधयितुं ध्यान्तमाहुः । चाण्डालीत्यादि। चाण्डाली चेदाजपत्नी जाता गज्ञा च मानिता। कदाचिदपमानेपि मूलतः का क्षतिर्भवेत् ॥ २ ॥ भारधवशादतिदुटकुलोत्पनापि, केनचिढणेन कशिदाजपनी, राजा पतिर्यस्या- स्तादशी, राशः पत्नीव पत्नी, पतनाद पनी, राज्ञो भोग्या सती राशा मानिता च जाता। तस्याः कदाचित् कालविशेष अपमानमर्यादाला कृते पाशन्दादनपमानेपि भूलतो अपमानहेतुभूतायाण्डालीलादनपमानहेतुभूतादामलीला का क्षति: काहानिर्भवेत् । न कापीति रिचारयेत्यर्थः । एतस्प पारपस्याऽऽचार्यविपपत्वं पैरलोकतं; तत्पक्षे तु २८ श्रीवल्लभाचार्यचरणविरचितान्तःकरणप्रबोधः । * मृगयुरिव कपीन्द्र मित्यादौ केशवशायया भक्त भगवति टोप आरोपितस्तपाञ्चायः स्वस्मिन्निति योव्यम् ।। २ ।। पर्व दृष्टान्तमुक्या दान्तिके तसाम्यं वदन्तस्ताविचारफलमाहुः । समर्पणा. दित्यादि। समर्पणादहं पूर्वमुत्तमः किं सदा स्थितः । का ममाधमता भाव्या पश्चात्तापो यतो भवेत् ॥ ३॥ समपर्णाद् भन्नाकसंस्कारस्पात् स्वसर्वहितात्मनिवेदनादानपरिग्रहस्थानी- यात् पूर्वमहं माकृतः, चाटालीवत्सइनागन्तुस्टोपदुष्टः, कि सदा सर्वकालगभिव्याप्य; उत्तम उत्कृष्टः स्थिनः । किशन्ट वा स्फोरयति । अपि तु न स्थितः । किन्तु समर्पणादेवोत्कृष्ट राजपत्नीत्वागाण्डालीवदुत्ववान जातः । अतः स्त्रपूर्वस्थितिविचारे रामानापमानतुल्यभगवदपसन्ननायां जातायां मम चाण्डालीवदुष्टश्याधमता निकृष्टता या भाच्या! 1 कतमा भवत्री! । यतो यया कृत्वा; पश्चात्तापरतजनितखेद विशेपो मै भवेत् । । नहि प्राकृतरूपा; तस्याः सहजत्वात् । नाप्यभावदीयरूपा; भगवता अस्यक्तत्वात् । अङ्गीकारात्मकस्यापि भगवदर्मस्य नित्यत्वातः संसाराचेशरूपस्य भगव. स्याग कार्यस्याभायनात्यागनिश्चयाच; तेनैवानिमात्यागानुमितेथ । अतो जातापामप्यमस. नतायां पूर्वदशात उत्तर दशास्ति; नत्वपमेति पश्चात्तापनित्यर्थ विचारय । तथा चैत्र विचारे भगवस्मसादसाधनं दैन्यमप्युयुद्धं भविष्यतीत्यमसन्ननापि निवात इत्यर्थः ।। ३ ।। एवं जीवधर्मपुरस्कारेण विचारमुमदिश्य भगवतोऽप्रतिहते छत्चानुसन्धानाय मग- नदर्मपुरस्कारेण तमुपदिशन्ति । सत्येत्यादि । सत्यसङ्कल्पतो विष्णु न्यथा तु करिष्यति । आज्ञेव कार्या सततं स्वामिद्रोहोन्यथा भवेत् ।। ४ ।। विष्णुष्यापकः, अन्तर्गामितया सर्वान्तः प्रविश्य यो भगवान् सत्यसङ्कल्पतः मत्यो विषयाव्यभिचारी यःसङ्कल पालोचनमिदमेवं करिष्यामीत्यागरक तस्मादन्यथा प्रकारान्तरेण न परियति । तुःशानिरासे । भगवानिवेदितात्मनाम् आमेन्यस्मटपि. प्रेतमेव करीष्यतीति शान कर्तव्या। यतः स तेपामीश्वरो नियापकोपि; अतस्तेषां वितेन्नायां तदनुरोध न करिष्यति, किन्नमोघसङ्कल्पवात्स्वारगेचितमेव करिष्यत्ति, तदिनार्थम् । अयं तुशब्दोकः शानिरास उत्तरवाक्ये हेतुत्वेन पविशनि । भन एवं *(भ्रमरगीत) श्रीदशदिगन्तनैत्रीपुरुषोत्तपचरणकृतविवरणम् । २९ शहानिरासादेतोः सततं प्रमादराहिल्यन निरन्तर; आज्ञैव कार्या । अन्यथा ममा- देनाकरणे स्वामिद्रोहो महानपराधो भवेत् । अत्रापि 'इति विचारयति पदं सम्बध्यते॥४॥ सेवफत्वपुरस्कारेण पुनर्विचारान्तरमुपदिशन्ति । सेवकस्येत्यर्दैन । सेवकस्य तु धर्मीयं स्वामी स्वस्य करिष्यति । तु पुनरयं वक्ष्यमाणः सेवकस्य धर्मस्तं व्यक्तीकुर्वन्ति । स्वामी स्वरप करि- प्यतीति । स्वामी भतो स्वस्पात्मीयस्य मम करिष्पति, मदर्थ यवदालोचितं तत् फरिष्यति । अत्रापि तथा सम्बन्ध । सेवकत्वविचारस्यावश्यकत्वाय तेनोपदेशे विश्वासार्थ स्वाख्यायिकामुपदिशन्ति द्वाभ्याम् । आज्ञा पूर्व तु या जाता गडासागरसङ्गमे ॥५॥ यापि पश्चान्मधुवने न कृतं तदयं मया । देहदेशपरित्यागस्तृतीयो लोकगोचरः ॥ ६ ॥ पश्चात्तापः कथं तत्र सेवकोहं न चान्यथा । आजेत्यादि । तुरवधारणे । पूर्वमेव गङ्गासागरसङ्गममदेशे समीपे वा या आज्ञा जाता पश्चात्तदुत्तरकाले मधुवने पथुरायामपि याज्ञा जाता, तवयं मया भगवता स्वात्मानुभावमकटनार्थ श्रीभागवतगूढार्थप्रकटनार्थ पान न कृतम् । तयोपियः फ इत्याकालायां तयोविषयमाहुः । देहदेशपरित्यागः । द्वन्द्वान्ते श्रूपमाणस्य परित्या- गशब्दाय मत्येकमभिसम्बन्धः । तथा च पूर्वा देहत्यागविपपिणी, द्वितीश देशत्याग- विषयिणीति सिद्धयति । तदकरणे बीजन्तु नाभिमानो न वा शास्त्रविरोधः । किन्तु श्रीभागवतार्थमकटनाज्ञाकार्यसम्पत्तिरेव । नहि देहे वक्ते साता सिद्धयति वाग्न्या. पारस्य तदेतुकत्वेन तदमाये तस्याप्यभावात् । पकारान्तरेणोक्तौ च कलिमत्तानां विश्वासाभावात् । नापि भगवदेशे त्यक्ते देशान्तरस्पानीदृशन्वेनैतद्विचारमतिबन्धकत्वात् । तदेवदवधार्य आचार्यैराज्ञादयं न कृतम् । भगवतस्त्वयमाशयः । देह उपचयः, देशो दानम् । "दिह उपचये, "दिश अतिसनने ' इति धातुनिष्पनत्वाद्यौगिकातौ शन्दा- वासायामुक्तौ । तपा च, उपचयो बाहुल्य दानञ्च परित्यातव्यम् । न च पूर्वाश्तास- पूतिदोपः । यावदुक्तमैतावत्कृत्यैव साझा कृतास्तु अधिकं न कार्यम् । रहस्यमशाश- स्यानभिमेतत्वात् । अधिककरणेनाधिकारिणामपि तज्ज्ञानसम्भवेन कृतार्थतामसत्ताव- धिकार्यनधिकारिविमागभङ्गापारनेः । इदन सूक्ष्पटीकातिरोधानसकन्धकमव्याख्यात्या- जनदशमस्कन्धव्याख्यानानन्तरसामयिकमाथवभट्टकाश्मीरिशरीरशाहतिमभृतिभिः कार्य- श्रीवट्भाचार्यचरणविरचितान्त:करणमबोधः । मृगयुरिक कपीन्द पित्यादौ क्लेशशायथा भागवति दोप आरोपितस्तथाऽऽचा: स्वस्मिन्निनि घोन्यम् ॥ २॥ एवं दृष्टान्तमुक्त्वा दार्शन्तिके तरसाम्यं वदन्तस्नादृग्विचारफलमाहुः । समर्पणा- दित्यादि। समर्पणादहं पूर्वमुत्तमः किं सदा स्थितः । का ममाधमता भाव्या पश्चात्तापो यतो भवेत् ॥ ३ ॥ ममपर्णाः भननार्थकसंस्कारस्पात् सर्वसहितात्मनिवेदनादानपरिग्रहस्थानी पात् पूर्वमहं प्रातः, चाण्डालीवरसहनागन्तुादोषदुष्टः, किं सदा सर्वकालाभिव्याप्प उत्तम उत्कृष्टः स्थितः । किं शब्दः काकुं स्फोरयति । अपि तु न स्थितः । किन्तु समर्पणादेवोत्ष्टा रामपत्नीत्वाचाण्डालीवदुतर्गवान् जातः । अतः स्त्रपूर्वस्थितिविचारे राजकतापमानतुल्यमगरदपसाबनाया जातायां मम चाण्डारीबदुष्टस्याधमता निकृष्टता फा भाव्या! । कतमा भवनी ! । यतो यया कृत्या; पश्चात्तापरतजनितरवेदविशेषो में भवेत् ।। नहि प्राकृतरूपाः तस्याः सहजत्वात् । नाप्यभगवदीयरूपा; भगवता अत्यतलाव । अगीकारात्मकस्यापि भावधर्मस्प नित्यत्वात संसाराशरूपस्य भगव. स्थागकार्यस्याभावेनात्यागनिश्चयाच; तेनैवानिमात्यागानुमितेश्च । अतो जातायामप्यास. मनायां पूर्वदशात उत्तमैव दशास्ति; नवधमेति पधानापनित्य विचारय । तथा चैवं विचारे भगवरप्रसादसाधनं दैन्यपप्युदसुदं भविष्यतीत्यमसन्ननावि निवयन इत्ययः ॥ ३॥ एवं जीवधर्मपुरस्कारेण विचारमुमदिश्य भगवतोऽप्रतिहतेन्छयानुसन्धानाय भा. बद्धर्मपुरस्कारेण तमुपदिशन्ति । सत्येत्यादि । सत्यसङ्कल्पतो विष्णु न्यथा तु करिष्यति । आज्ञैव कार्या सततं स्वामिदोहोन्यथा भवेत् ॥ ४ ॥ विष्णुयाएका, अन्तयामित्या सर्वान्तः प्रविष्टश्च यो भगवान् सत्यसङ्कल्पतः मत्यो विपयाव्यभिचारी यः मङ्कल्प आलोचनमिदमेवं करिष्यामीत्यारारतस्मादन्यथा महारान्तरेण न करिष्यति । तुः शानिरासे । भगवानिवेदितात्मनाम् आत्मेन्यस्मदमि- प्रेतमे वरीप्यतीनि गदा न कर्वच्यायतः स तैपामीश्वरो नियामकोपि; अतस्तेषां विकृतन्त्रायां तदनुरोन रिष्यति, किन्तमोघसङ्घलत्वात्स्यालोचितमेव करिष्यति, तद्धिनार्थम् । अयं तुशब्दोक्तः शानिराम उतरवाक्ये हेतुत्वेन प्रविशनि । अव एवं *(भमागीत) २९ श्रीदशदिगन्तजैत्रीपुरुषोत्तमचरणकृतविवरणम् । शानिरासादेतोः सततं प्रमादराहित्येन निरन्तरं; आज्ञैव कार्या । अन्यथा प्रमा- देनाकरणे स्वामिद्रोहो महानपराधो भवेत् । अत्रापि इति विचारयेति पदं सम्बध्यते॥४॥ सेवकत्वपुरस्कारेण पुनर्विचारान्तरमुपदिशन्ति । सेवकस्येत्पर्दैन । सेवकस्य तु धर्मोयं स्वामी स्वस्य करिष्यति । तु पुनरय वक्ष्यमाणः सेवकस्य धर्मस्तं व्यक्तीकुर्वन्ति । स्वामी स्वस्य करि- प्यतीति । स्वामी भर्ता स्वस्यात्मीयस्य मम करिष्यति, मदर्थ यद्यदालोचितं तत् करिष्यति । अत्रापि तथा सम्बन्धः । सेवकत्व विचारस्यावश्यकत्वाय तेनोपदेशे विश्वासार्थ स्वाख्यायिकामुपदिशन्ति द्वाभ्याम् । आज्ञा पूर्व तु या जाता गङ्गासागरसङ्गमे ॥ ५॥ यापि पश्चान्मधुवने न कृतं तदयं मया । देहदेशपरित्यागस्तृतीयो लोकगोचरः ॥६॥ पश्चात्तापः कथं तत्र सेवकोहं न चान्यथा । आज्ञेत्यादि । तुरवधारणे । पूर्वमेव गङ्गासागरसङ्गमपदेशे समीपे वा या आज्ञा जाता पश्चात्तदुत्तरकाले मधुवने मधुरायामपि याज्ञा जाता, तव्यं मया भगवता स्वात्मानुभावप्रकटनार्थ श्रीभागवतगूढार्थपकटनाथै घाज्ञसेन न कुनम् । तयोपियः क इत्याकाङ्कायां वयोर्विषयमाहुः । देहदेशपरित्यागः । द्वन्दान्ते श्रूयमाणस्य परित्या- गशब्दस्य प्रत्येकमभिसम्बन्धः । तथा च पूर्वा देहत्यागविषयिणी, द्वितीया देशत्याग- विषयिणीति सिद्धयति । तदूकरणे वीजन्तु नाभिमानो न वा शास्त्रविरोधः। किन्तु श्रीभागवतार्थप्रकटनार्थाज्ञाकार्यसम्पत्तिरेव । नहि वेहे त्यक्ते साझा सिद्धयतिः वाग्व्या- पारस्य तदेतुकत्वेन तदभायै तस्याप्यभावात् । प्रकारान्तरेणोक्तौ च कलिग्रस्तानां विश्वासाभावात् । नापि भगवदेशे त्यक्ते देशान्तरस्यानीदृशत्येनेतद्विचारप्रतिबन्धकत्वात् । तदेतदवधार्य आचार्यैराज्ञादयं न कृतम् । भगवतस्त्वयमाशयः । देहु उपचयः ; देशो दानम्, "दिह उपचये,' 'दिश अतिसर्जने' इति धातुनिष्पन्नत्यायौगिकापेतौ शब्दा- वाशायायुक्तौ । तया घ, उपचयो बाहुल्यं दानश्च परित्यक्तव्यम् । न च पूर्णवसास- पूर्तिदोषः । यावदुक्तमैतावत्कृत्यैव साज्ञा कृवास्तूअधिकं न कार्यम् । रहस्यप्रकाश- स्यानभितत्वात् । अधिककरणेनानधिकारिणामपि तज्ज्ञानसम्भवेन कृतार्थतामसक्ताव विमार्यमधिकारिविभागभट्टायापतेः । इदश्च सूक्ष्मटीकातिरोधानस्कन्धक्रमव्याख्यात्या- जनदशमस्कन्धव्याख्यानानन्तरसामयिकमाधवभकाश्मीरिशरीरथराहतिमभृतिभिः कार्य- . श्रीरल्लभावार्यवरणविरचितान्तःकरणपोषः । रनुमीपते । सोयमाचार्य स्वारितः। न वाचायांणां भगवदाशदिवधारणकयनमयुक्त- मिति शक्यम् ; भक्तानां पश्चाध्यागीस्पस्कत्यारोपणयापार्याशानरत् सम्यवात् । तदा वृतीपाश नाता । वद्विषयस्मृतीयपरित्यागः स लोकगोचरः। 'लोकस्तु भुनने जन' इति कोशाजनविषयः। स च संन्यासेन भव'त्येकचार्यनिकेतः स्पादि'त्पादिवाक्पैः संन्यासे तयात्वात् । तत्र तादृश्पामामायां जातायां पचात्तापो मम बात इति शेषः ।स कंप केन प्रकारेणेति विचार्यमाणे, सेवकोहं; अहं सेवक इति सेवकत्वमकारणाशाभ- कारणहेतुकः । च पुनरन्यथा न, स्वचिकीर्पितकायांसापूर्यादिहेतुको न । अतो मत्कृत्पादिविचारेपि मत्सेवकत्वपुरस्कारेण विचारात् पश्चाताप एव युक्त इत्यर्थः । * 'आज्ञा पूर्वन्तु या जाते'त्यत्र । अत्रेदं योभ्यम् । माकट्याव पूर्व हि' अर्थ तस्य विचितुम्' इत्यत्रोक्ताशा जाता, तदनन्तरमाशाय देहदेवपरित्यागविषयं गङ्गासा- गरसङ्गमे मथुराया जातमिति । एवमाशात्रयं सिद्धम् । वत्र श्रीमदाचार्येष्वतिकरुणत्वमस्ति नवेति लोकानां संशपनिवारणार्प पुष्टिमार्गस्थलाव स्वस्य वा तदर्थ प्राकव्यानन्तरमाबाद- यमतिकरुणलविरोधिमातम्, सदाझाट्यं स्वस्य भगवतय साङ्गीकृतेषु अतिकरुणवल्या- पनार्य न कृतम् , तत्कृतौ हि सर्वमानास न स्पाचेन च स्वाङ्गीकृतानामनुद्धारः स्यात् तेन चोभयस्य करुणन्वं न स्यात् । यदि तदेव न स्याचदा पूर्व तदर्य नाज्ञापयेत् । भगवान् स्वयं च नाविपात् । नत्वेवम् । अतः परोक्षार्यत्वानान्त:करणगोचरा तो न विशेषगत्यादि कृतमित्यर्थः । न च पूर्वयैव तत्सम्म कि देशत्यागविपयिन्या तयेति मान्यम् , क्रीडादेशे त्यक्ते रिहेण स्वयमेव देह त्पश्यन्तीति तेनातिकरुणत्वमेव परी- क्षितं न भविष्यतीति भगपदभिमायः । श्रीमदासस्तु तदपि तथैर हातमिति सापिन कवेति भावः। नन्वयमेशाशयो भारतः श्रीमदावार्याणाच तयैव ज्ञानं जातं, इत्या कि मानमित्यपेसायां भगवदादिसर्वसम्मतं हेतुमाहुः । तृतीयो लोकगोचर इति। तदपापे- सया पूर्वमाशाप्तः सद्धिारः लोकगोचर इति न किश्चिद् अलौकिकं मानं वाच्यम् । किन्तु सर्वलोकमप्तिद्धमेव मानमित्यर्थः । एवं कृते पाचाप: कयम् । न कयमपि । यतः सेवकपोन्तःकरणकमाइप्तकरणम्, न चान्पथा सद्विदमित्यर्थः । अत एवं श्रीमदानापैराश विवेकधैर्याश्रये विशेषतवेदाशा स्पादि'त्पनेनेतिदिन । (इति स्वक्त्रलेख:) ॥५-६॥ मनु युक्तोयं विचारस्वयापि पूर्वापरापननितमगरदनसमवाया अनिनौ भय. रूपोयमुद्रेगः स कथं निवर्चतामित्याबकायां तदर्प विचारान्तरमुपदिशन्ति । लौकिक- प्रमुवदित्यादि। मीणोतमपरणारामेदार सावता लिखित स्वारस्तावात स्वार निषिता ।
श्रीदशदिगन्तनेत्रश्रीपुरुषोचमचरणकृतविवरणम् । लौकिकमभुवकृष्णो न द्रष्टव्यः कदाचन ॥७॥ सर्व समर्पितं भक्त्या कृतार्थोसि मुखी भव । लौकिका हि प्रभवोपराधेनापसन्नाः कस्पचित्प्रसीदन्ति, कस्यचिन मसीदन्ति, तद्वत् कृष्णो भगवान कदाचन अववारकालेऽनवतारकाले च न द्रव्यः । अवतारकाले 'अहो पकीयमिविषाक्येन अनवतारकाले च घरणश्रुत्या 'महादाय यदा दुद्धनिष्यपि वरोजिनमिति देवान् प्रति भगवद्वाक्येन चापराधक्षन्तृत्वपूर्वकसत्फलदायत्वस्य भक्के कृपात्र- वस्य च सिद्धत्वात् । स्वया च सर्व भल्या भगवते समर्पितमतो भक्तत्वात् कवार्थोसि । एवं धर्मनुष्याणामितिवाक्ये मगवता भक्तौ जातायां निरवोपायांतिकयनात् सर्व माघनरूपं फलरूपं चार्थ प्राप्तवानसि । अतः सुखी भव, दौमनस्यनिवारणेन निटचो भवेत्यर्थः । इयं चोक्तविचारात्मकाशक: प्रभुभिराशीव दीयते । अतः परं विद्यमानेपि दैहिके सेवासामध्ये पूर्वोकसेदेन या देहाव्यासेन वा कार्यान्तराभिनिवेशादिना वा दैहिकसेरायां प्रमानन्तं प्रति पुनर्विचारान्तरमुपदिन्ति । प्रौढापीत्यादि। प्रौढापि दुहिता यबस्नेहान प्रेष्यते वरे ॥ ८॥ तथा देहे न कर्तव्यं वरस्तुष्यति नान्यथा । प्रौदा भईसकलकार्ययोग्या वत्समयापि दुहिता यदद् पया, स्नेहाद् इयं बाला पतिगृहे महत्कार्य कर्तव्यं तत् कुर्वन्ती श्रान्ता लिटा च भविष्यवीति ज्ञात्वा यर भत्- समीपे न मेष्यते, नया सद्देहे स्लेहात् सेवा विना स्थापन न कर्तव्यम् । तत्र हेतुः । वरस्तुष्यति नान्यथेति । अन्यथा प्रेषणविरुद्ध प्रकारान्तरे यरो न तुष्यति नया शरीरेण सेवाया करणे भगवानपि न तुष्यति । एतस्य देहस्य भगवता स्वसेवार्यमेव दत्त्वात् 'भवाय नाथायेति पञ्चमस्कन्धीये वाक्ये तयैव मतिपादितत्वात् । अत एवं विचारेण पूर्वोकदोपात्यत्कृत्याज्ञससेवेव कात्पर्यः । अयापराभेन प्रतिरन्यादिना बा देहस्य तदर्यवायां सन्देहे विचारन्तामुपदि- शन्ति । लोकवदित्यादि। लोकवस्थिति, स्याक्ति स्यादिति विचारय ।।९।। अशक्ये हरिश्वास्ति मोहं मा गाः कश्चन । लोका यया सप्तारासता नानास्वभावास्तत्र तत्र तेन तेन शाम्रादिना प्रपन्न, तट्वेन्मे स्थितिः स्यात् । उक्तरीत्या पक्षाचा न स्यात् बदा किं स्यात् ! लोक तुल्यतैव स्वात् । सा तु मे न जाता, अतो मदुपरि मगवान दयां करोतीति विवारय।
श्रीवल्लभाचार्यचरणपिचितान्तःकरणपोषः। तथा चैव विधार्य देहस्य सेवार्थत्वं निश्चिनुहि निश्रित्य चाज्ञातं कुर्वित्पर्यः । एकमुशु- ततथा सेवाकरणेपि पुनः प्रतिबन्धसम्पवयेत्तत्राप्युपायपाहुः । अशक्य इत्यादि। पूर्वोक्तं कर्नुपशवयं चेद् भातं तदा हरि मसापहर्ता भगानेवास्ति । 'सर्वधर्मान् परित्यज्ये तिसक्ये स्वस्य पपनसमापनिवारकत्वं वदन रसकोस्तीति विचारय। कथ- भन, केनापि पूर्वमुक्तेन कृतेनानुक्तेन भाविना सम्भावितेन वा प्रकारेण मोहं पैचित्यं पमानः परं कि भविष्यतीति पौव्यात्ममुग मा गा: । एवं भगवतः शरणत्वविचारेणन सर्वोद्रेगनिहाया भगवत्कृपाया अभिव्यक्तरित्ययः । एवं सर्ने विचारलाक्याच्योपसंहरन्ति । इतीत्यादि । इति श्रीकृष्णदासस्य वल्लभस्य हितं वचः ॥ १० ॥ चित्तं मति यदाकर्ण्य भक्तो निश्चिन्ततां व्रजेत् ।। चित्तं प्रति अन्तःकरणं लक्षीकृत्य उद्दिश्य श्रीकृष्णदास्य हितं सुखसम्मा- दकं बल्लभस्य भगवतो भकानां च पिषस्य वचः विचारोपदेशवाश्यम् । इति एता. क्व अरणोपदेशान्तमेव नाधिक; यदाकर्ण्य श्रुत्वा भक्तः पूर्वोक्तः कृतापराधोपि निधि- न्ततामुगनिवारणेन चिन्ताराहित्य प्रजत भानुपादित्पर्यः । अग्नतत् सिद्धम्। (१) भावान् समाभ्यधिकरराहित्यात् स्वतन्त्रः । (२) पार्गप्रवर्तका भक्ताः स्वरूपतो दोषरहिता भागवतोक्तभक्तपश्यतायामपि भगवदपीना एव भगवदभित्राशातः सस्य तन्मागीयत्वपि पार्गप्रवर्तकभक्तवत् स्वस्थ भगवदादामहोऽनभिप्रेतकरणं च न युक्तम् । (३) सस्य स्वभावतो दोपसत्त्वेपि समर्पणादुत्कृप्यतीति कृपावाहुल्यपि स्वोत्कर्षों न भारनीयः। (४) भगवतः सत्पसङ्कल्पलात् किं चिकीर्पतीति तदिच्छायाश्च धातुमनस्पत्याद सर्वदा नदालव कर्चव्या । तदकरणे 'आताभको नरेन्द्राणामितिवत् स्वामिद्रोहात्मको महान् अपराय: स्यात् । (५) किच, अहं सेवक इति मदनुरूपं यत् वन स्वामी एव करिष्यतीति विशारः सेफस्योचित इत्यवोप्यात कार्या। नाप्याचार्यकृतिष्टान्तेन स्वयं मौहिः कर्तव्या। तैरपि स्वपोड्या तयाकतौ पद्यावायत्वस्यैवोक्तत्वस्व पश्वासारस्थापि सेवकतमयुक्तानापा एवोक्तत्वाच। (६) किचभगवान न लौकिकमरद अपरान कुपितः परित्यजति । भग- बद्धर्मरूपस्यागीकारस्यापि नित्यत्वात् । स्वस्थ चाहीस्तो समर्पणादिनानुमितायां श्रीदशदिगन्तमैत्रश्नीपुरुषोत्तमचरणकुन विवरणम् । भगवदुक्ततद्धर्माचरणे उपक्रपदशायापपि फलतः साधनतय वैगुण्याभावस्योद्धवं प्रवि स्वयमेवोक्तत्वात् कृतार्यतैव भवत्रीति भावनीयम्। न तु सन्देश्वव्यम् , 'अनाथधानश्रेनि वाक्येन भगवता दोपस्यकोकत्वात् । (७) किश्च; देशोपि प्रौदुहिरेपणन्यायेन देहार्थ स्वार्थ न संरक्ष्यः । किन्तु, थेन केनचिदुपागेन भावनि एव विनियोक्तच्यः । भगरतास्य देवस्य ससेवार्यमेव दत्त- स्वात् । तदकरणे लोकतौल्यमेव स्यात् । यदि पुनस्तस्य तन विनियोजने मतिबन्धसम्भव- स्तदा भगवानेव शरणत्वेन भावनीयः । एतदतिरिक्तस्योपायान्तरस्याभावात् । प्रतिबन्धो हि भगवन्मायया, तस्पास्तवाधिकृतत्वात् । ततरणोपायच प्रतिरेव नान्य इति भगवतै। गीतायामाज्ञापनादिति । इति श्रीमवल्लभाचार्यचरणकनानपीताम्यरात्मजपुरूषोत्तमकृती अन्तःकरणाप्रयोधविवरणं सम्पूर्णम् ।
श्रीवल्लभाचार्यवाणविरचितान्त:करणमबोधः। सया चैव विचार्य देहस्य सेवार्यत्व निचिनुहि निधित्य चालान कवित्यर्थः । एवमुगु- कनश सेवाफरणेपि पुनः प्रतिबन्धप्तम्भवयेत्तत्राप्युपायमाह।। अशक्य इत्यादि । पूर्वोक्तं कर्तुपशवयं चेद् भातं तदा हरि मर्टस यहां भगवानेवास्ति। सर्वधर्मान् परित्यज्य'तिवाक्ये स्वस्थ पपनसर्वपापनिवारकलं पदन सकोस्तीति विचारय । कथ. शन, केनापि पूर्वमुक्तेन कृतेनानुक्तेन भाविना सम्भावितेन वा महारेण मोहं वैचित्यं पमानः परं किं भविष्यतीति पौड्यात्मकमुद्वेग मा गाः । एवं भगवतः शरणस्वविचारेणैव सद्विगनिहाया भगवत्कृपाया अभिव्यक्तरित्यर्थः । एवं सर्व विचारवाक्यमुस्लोपसंहरन्ति । इतीत्यादि । इति श्रीकृष्णदासस्य वल्लभस्य हितं वचः ॥ १० ॥ चित्तं प्रति यदाकये भक्तो निश्चिन्ततां व्रजेत् ॥ चित्तं प्रति अन्तःकरण लक्षीकृत्य उदिश्य श्रीकृष्णदास्य हितं मुखसम्पा- दकं वल्लभस्य भगवनो भकानां च प्रियस्य वचः विचारोएदेशवाश्यम् । इति पता- वत् शरणोपदेशान्तमेव नाधिकं; यदाकी श्रुत्वा भक्तः पूर्वोक्तः कृतापराधोपि निधि- न्ततामुगनिवारणेन निन्ताराहित्य प्रजेत् भाप्नुयादित्यर्थः । अप्रेतत् सिद्धम् । (१) भगवान् समाभ्यधिकराहित्यात् स्वतन्त्रः । (२) मार्गप्रवर्तका भक्ताः स्वरुपतो दोपरहिता भागवलोक्तभक्तवश्यतायापि भगवदीना एव भगवदभिग्नाश्चातः स्वस्य तन्मागीयत्येपि मार्गप्रवर्तकभक्तवत् स्वस्थ भगवदाज्ञामङ्गोऽनमितकरणं च न युक्तम् । (३) स्वस्य स्वभावतो दोपसत्त्वेपि समर्पणादुत्कृप्यतीति कृपागाहुल्यैपि स्वोत्कों न माननीयः। (४) भगवतः सत्पतङ्कल्पत्वात् किं चिकीर्यतीति तदिच्छायाय मातुशपवाद सर्वदा नदाच कर्चव्या । तदकरणे 'आशाभलो नरेन्द्राणामितिन् स्वामिद्रोहात्मको महान् अपराधः स्यात् । (५) किन्न, अहं सेवक इति मदनुरूपं यत् तत् स्वामी एवं करिष्यतीति विचारः सेवकस्मोचित इत्यतोप्यादेव कार्या। नाग्याचार्यकतिष्टान्तेन मयं पौडिः कन्या । तैरपि स्वप्रोदया नयाकृतौ पश्चातापत्वस्यैवोक्तवाद यथावापस्यापि सेवकत्वप्रयुक्ताताया एवोक्तवाद। (६) किन; भगवान न लौकिकमभुवद अपरान कुपितः परिरयनति । भग- बद्धर्मस्पस्याङ्गीकारस्थापि नित्यत्वात् । तस्य वाङ्गीकृतौ समर्पणादिनानुमितापां श्रीदशदिगन्तनवश्रीपुरुषोत्तमचरणकृनविवरणम् । ३३३ भगवदुक्ततद्धर्माचरणे उपक्रमदशायामपि फलतः साधनतच वैगुण्याथावस्योद्धव प्रति स्वयमेवोक्तवाद कृताव भवत्रीति भावनीयम्। न तु सन्देश्यव्यम् , 'अश्वाश्रदधानीनि वाक्येन भगवता दोपस्यैवोक्तत्वात् । (७) किञ्च; देहोपि मौदुहितप्रेपणन्यायेन देहार्थ स्वार्थ न संरक्ष्यः । किन्तु, थेन केनचिदुपायेन भगवनि एव विनियोक्तव्यः । भगवतास्य देहस्य स्वसेवार्थमेव दत्त- स्वात् । तदकरणे लोकतौल्यमेव स्यात् । यदि पुनस्तस्य तम विनियोजने मतिबन्धसम्भव- स्तदा भगवानेव शरणत्वेन भावनीयः । एतदतिरितस्योपायान्तरस्याभावात् । प्रतिवन्धो हि भगवन्मायया, तस्यास्तत्राधिकृतत्वात् । तत्तरणोपायच मपत्तिरेव नान्य इति भगवतैय गीतायामाज्ञापनादिति । इति श्रीमदल्लभाचार्यचरणकतानपीताम्बरात्मजपुरुषोत्तमतौ अन्तःकरणप्रयोधविचरणं सम्पूर्णम् ।
श्रीमद्-वल्लभाचार्य महाप्रभु-विरचित-षोडश-प्रन्थान्तर्गतो-अष्टमो विवेकधैर्याश्रयः चतसृभिष्टोकाभिः समलंकृतः १. श्रीरघुनाथाना दीपिका २. श्रीगोपोशाना विवृतिः ३. श्रीगोकुलोत्सवानां विकृति ४. श्रीखजरायाणा विकृति श्रीमद्-वल्लभाचार्य-महाप्रभु-प्रवर्तित--शुद्धाद्वैत--सम्प्रदायस्य-सप्त-- पीठान्तर्गत सप्तम-पीठाधिष्ठित--नित्यलीला-स्थित- गोस्वामिश्री १००८ श्रीरमणजी-महाराजश्रीत्येतेषा-- - स्मृती-तदात्मज --गोस्वामिश्री १००८ श्रीरघुनाथलाल-महाराजश्रीत्यतै प्रकाशित
प्रकाशक
गोस्वामिश्री १००८ श्रीरघुनाथलालमहाराज
मनुभवन, भगतसिंह मार्ग,
पार्ले (पश्चिम) बम्बई ४०० ०५६ भारत
माधारणसस्करण २,००० प्रति
राजसस्करण १,००० प्रति
श्रीवल्लभाब्द ५०३
ग्रन्थ-परिचय लेखक गोस्वामी श्याम मनोहर
मुद्रक
स्टूडियो बहार, २३-ए, सेन्ट्रल चौपाटी विल्डिग, चौपाटी,
बम्बई-४००००७.
Paap------
गोस्वामिश्री
१००८ श्री रमणजी महाराज
।। श्रीकृष्णाय नमः ॥ ॥श्रीमदाचार्यचरणकमलेम्यो नमः ॥ ग्रन्थ-परिचय कब कहां और किस प्रसगमे विवेकाधैर्याश्रय ग्रन्थका प्रणयन हुआ यह पता नहीं चलता. वैसे तो विवेक धर्य तथा आश्रय का सम्बन्ध प्रपतिमार्गके साथ अधिक घनिष्ट है किन्तु भक्तिमार्ग में प्रवृत्त होनेवाले पुष्टिजीवोके लिए विवेक धैर्य तथा आश्रय भगवत्सेवामें भी उपयोगी होते ही है वास्तविकता तो यह है कि इन तीनोको कर्म ज्ञान एवम् भक्ति रूप तीनों ही मार्गमें अपेक्षा रहती है. 'विवेक' 'पर्य' या 'आश्रय' शब्द सामान्य अर्थोमे श्रीमहाप्रभुको विवक्षित नहीं है अपितु एक निश्चित पारिभापिक अर्थमे ही विवक्षित है. यथा: (१) विवेक = हरिः सर्व निजेच्छातो करिष्यति (२) धेर्य - त्रिदु.ख सहनमामृते सर्वत सदा (३) आश्रय = ऐहिके पारलोके च सर्वथा शरण हरि इन्ही पारिभाषिक अर्थोमे विवेक धैर्य तथा आश्रय पुष्टिमार्गीय कृष्णसेवामे उपयोगी बनते है कृष्णसेवामे प्रवृत्त पुष्टिभक्त किन-किन परिस्थितियोमे कृष्णसेवाकर्ताक लिए आवश्यक विवेक धर्य या आश्रय को खो सकता है तथा किन उपायोस इनकी रक्षा सम्भव है आदि विषयोका निरूपण इस ग्रन्थमें हुआ है. सिद्धान्तमुक्तावलीमे उपदिष्ट सेवाके वाह्य अंगोका निरूपण हमे सिद्धा- न्तरहस्यमे तथा आभ्यन्तर अगोका निरूपण नवरत्नमे मिलता है. इन्ही बाह्य तथा आभ्यन्तर साधनोकी सागोपागता विवेक-धैर्य-आथयके सम्पन्न होनेपर सम्भव होती है. अन्तःकरणप्रबोध ग्रन्थद्वारा जो अन्तरात्माका प्रबोधन किया गया उस प्रबोधन के लिए भी विवेक-धयं-आश्रयकी निरतिशय अपेक्षा है.
इन विवेक घयं तथा आश्रय का परस्पर सम्बन्ध विलक्षण है जिसे भगवत्कृपाम आश्रय सिद्ध हो जाता है उमे विवेष और घय स्वत ही सिद्ध हो जाते है, अन्यथा विवेय और धर्य के विना आश्रप दृढ नहीं हो पाता. हमारे अविवेक और अधर्य हमें भगवदाश्रयसे विचलित कर सकते है अत अपने जागत विवर तथा पैर्य के द्वारा अदृढ आश्रयदी रक्षा आवश्यक होती है इस तरह विवेक धेर्य एक कोटी है तथा आश्रय दूसरो कोटी है यह आश्रय पुष्टिभक्तिवा आवश्यक अग होनेपर भी केवल पुष्टिक्ति ही नहीं अपितु कर्म-ज्ञान-भक्ति सभी मागोंका अनुकल्प है कर्म ज्ञान भक्तिते अनेकविध उपायोको दिखलानेके वाबजूद भगवान्ने गोताके अन्तम- "राधर्मान्परित्यज्य मामेव शरण व्रज" के महान उपदेशद्वारा एक पृषक शरणमाके रूपम इसी आश्रयको समझाया है भागवतके एकादशस्कन्धम भी इसका स्पष्टीकरण मिलता है- "तस्मात्वमुद्धवोत्सृज्य चोदना प्रतिचोदना प्रवृत्ति च निवृत्ति व श्रोतव्य श्रुतमेव च मामेकमेव शरणमात्मान मर्वदहिना याहि सर्वात्मभावेन मया स्या ह्यकुतोभयम्' अर्थ श्रुतिस्मृतिम उत्सग अपवादके रूपमें कहे गये विधि निषध और तत्परित विविध कर्मोमें प्रवृत्ति और निवृत्ति तथा विविध ज्ञानमागीय श्रोतव्य श्रुत विषयोके श्रवण-मनन निदिध्यासन आदि किसी भी प्रणालीको अपेक्षा रखे बिना केवल एकमात्र भगवान्की शरणमे सर्वात्मभावके साथ जाना चाहिये यहां भी इसी आश्रय या पृथक्करणमार्ग का विवेचन अभीष्ट है एवमाश्रयण प्रोक्त सपा सर्वदा हितम् । कलौ भक्त्यादिमार्गा हि दु साध्या इति मे मति ।। अर्थ इस तरह आश्रय सभोके लिए सर्वदा हितकारी सिद्ध होता है क्योकि कलियुगमे भक्ति आदि मार्ग दु साध्य होगये है चर्म ज्ञान या भक्ति के मार्गपर चल सकनेवाले जीवोके लिए विवेक धैर्य आश्रय अच्छी तरह चल पाने में सम्बल बन जाते है जो इन मागोंपर चल नही पाते उनके लिए आश्रय हो मार्ग भी बन जाता है और चल पानेका चल भी आश्रयका सुलभतम स्वरूप श्रीमहाप्रभुने इस तरह समझाया है।
यथा कथंचित् कार्याणि कुर्यादुच्चावचान्यपि । किंवा प्रोक्लेन बहुना शरणं भावयेद् हरिम् ।। अर्थः जैसे भी जो भी छोटे-बडे या अच्छे-बुरे कार्य व्यक्ति करता हो परन्तु किसी भी समय श्रीकृष्ण ही मेरे एकमात्र सहारा-शरण है, यह भावना मनसे दूर नहीं होनी चाहिये. मूलतः गोतामें जिस तरह-"अहं ला सर्व पापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुच" या मागवतमें जिस तरह-"मया स्या ह्यकुतोमयम्" में भगवान्ने अपने श्रीमुखसे शरणागतोको अभयदान दिया है वही इस आश्रय या प्रपत्ति की क्रिया एवम् भाव को पृथक-शरणमार्गकी पदवी प्रदान करता है. अतएव श्रीमहाप्रभु भी यहा पोडशग्रन्थ के अन्तर्गत विवेकधैर्याश्रयमे भगवत्सेवाके अग- रूपसे तथा अनुकल्परूपसे आश्रयका निरूपण करते है जो स्वयम् अनुकल्प हो सकता हो वह यदि अंग बन जाये तो भगवत्सेवा स्वरूपमे एक विशिष्ट निखार आना स्वाभानिक ही है. अतएव श्रीमहाप्रभु उपदेश देते हैं विवेक धर्य को रक्षा सतत करनी चाहिये इसी तरह आश्रयकी भी. विवेक विवेकके वमे तो अनेक अर्थ तत्तद शास्त्रीमे उपलब्ध होते हैं. यहा परन्तु 'विवेक'का विवक्षित अर्थ इतना ही है कि जो कुछ जहा जव जैसे घटिल हो रहा है वह सर्वदु खहारी भगवान् श्रीहरिको अपनी इच्छासे ही हो रहा है ब्रह्माण्डके सारे किया- कलाप भगवान्की क्रीडाके अग हं. भगवान् जो कुछ करते है उसमें किसी न किसी तरह हमारा हित ही निहित होता है, हमारे हृदय और बुद्धि में यह भावना और धारणा सवंदा ही बनो रहनी चाहिये यही 'विवेक' कहलाता है. "भगवान् सर्वसमर्थ है मत्मिा तथा सन्तियोमी है" ऐसे भाव भगवद् धर्म विचारगे 'विवेक' कहलाते हैं में भगवान्का अश हू, दाम हु, भगव. क्रीडाका अग हू तथा मेरी अहन्ता-ममताका कोई अर्थ नहीं है इत्यादि मनोमाव जीवधर्मो विचारसे 'विवेक' कहलाते है. इस तरहके विवेकसे सम्पन्न होनेपर हममें से चतुर्विध अविवेक दूर हो जायेगा हमारे भीतर चार प्रकारको .. वृत्तियां अविवेकके कारण घर कर जाती है. वे अविवेकजन्य वृत्तिया इम तरह है: १) प्रार्थनाकी वृति २) अभिमानकी वृत्ति ३) हठको वृत्ति ४) आग्रहको वृत्ति १) हमें थोडा सा कष्ट होने लगता है या कोई कामना उत्पन्न हो जाती है तो हम अपने कप्टोको दूर करनेके लिए अथवा हमारी क्षुद्र कामनाओकी पूर्ति के लिए भगवानसे प्रार्थना करने लग जाते है. मानो भगवान् रार्वज्ञ रावा- न्तर्यामी या सत्मिा ही न हो! भगवान् तो हमारी प्रार्थनाके विना भी सव कुछ जानते है कि हमारी क्या अपेक्षायें हैं तथा किन कामनाओको पूर्तिम हमारा हित निहित है और किनमे अहित हम पहचान नहीं पाते पर परमात्मा तो हमारी आत्मामे निवास करते ही है अत हमारे स्वामी हमें क्या और कितना देना चाहते है उसे जाने बिना हम मागनेको भूल कर बैठते हैं हमारे हितमे ही परमात्मा कुछ हमे देता है या नहीं देता परन्तु हम हमारे हिता. हितके ज्ञान के बिना ही मागने की बंसती कर बैठते हैं। अत भगवान् सर्वज्ञ है सब कुछ देने में समर्थ है पर देंगे वही जिसमे हमारा हित निहित हो, ऐसे दृढ विश्वासको गनमे रख कर प्रार्थना -कष्टनिवृत्ति या कामनापूर्ति की याचना-न करना विवेकका प्रथम रक्षण है २) यह प्रार्थनात्याग पूर्वोक्त भावभूमिपर किया जाये तभी 'विवेक' कहलाता है. अन्यथा पुरषार्थवादी अहकारयुनत्त मनोवृत्तिसे अथवा अनीश्वर. वादी अश्रद्धाको मनोवृत्तिसे या किंकर्तव्य-विमूढ बुद्धिसे प्रार्थना न करना विबे. कका लक्षण नहीं है. अत प्रार्थनात्यागको तरह अभिमानका त्याग भी आवश्यक है अभिमान केवल हमे अपने स्वामीता होना चाहिये-अपने पुरुषार्थपर या परमात्मा से भिन्न किसी जयक्ति यथा प्रकृति काल कर्म स्वभाव माया शैतान आदिका नहीं क्योकि इनके कारण यदि कुछ सुख-दुस हो होता है तो वह भी परमात्माकी वैसी इच्छा होनेके कारण हो अन्यथा ये सभी प्रभावहीन होते है यह विवेकका द्वितीय लक्षण है ३) मिथ्याभिमान तथा प्रार्थना रहित जीवनप्रणालीमै यह सहज सम्भव है कि हमारे अन्दर अकर्मण्यताका एक ऐसा हठीलापन पनप जाये कि सामान्य- विशेष परिस्थिति विवेकके विना केवल हाथपर हाथ धरके बैठे रहना ही हमे आदर्श लगने लग जाये अभिमानत्याग तथा प्रार्थनात्यागके गाथ ही साथ विवेक रहित अप्रवृत्तिको हठका त्याग भी अतएव आवश्यक होता है भक्तकी प्रवृति विन्तु अपने दैहिक स्वार्थोकी पूर्तिसे प्रेरित नहीं होती. भवनको प्रवृत्ति होती है जब उसके अन्त करणमे विशेप भगवदानाका अनुभव होने लगे एसी विशेष भगवदाजाय अवसर-विशषपर किसी भक्तविशंपसे किसी विशेष भगवत्कार्यको पूर्ण कराने के लिए होती है भगवदाज्ञाके अनुसार यह कार्य मुझे ही पूर्ण करना है ऐसे भगवदीय अभिमानके साथ तथा अकर्मण्य- ताको हठको छोडकर उस विशेष कार्यको सम्पन्न करना चाहिये सब कुछ भगवदिच्छाके अनुसार होता हे इस सिद्धान्तकी सहज स्वीकृति तथा असहज हठीलेपनसे उसमे साथ चिपक जानेमे बहुत अन्तर एड जाता है अवसरविशषपर स्वधर्म-- भगवनवाया उसमे सम्बन्धित किसी कर्तव्य को विशेष आयास-प्रयाससे पूर्ण करनेकी भगवदाजाजन्य प्रेरणा जब हमार अन्त करणमे उठती हो, तव जो होगा सो भगवदिच्छाके अनुसार होगा, ऐमी अकर्मण्यताकी हठ रखते समय हम यह भूल जाते है कि उक्त प्रेरणा भी तो विशेष भगवदाज्ञासे हुई है. अत हठवादितापूर्ण सिद्धान्तको दुरुपयोगका त्याग विवेककी तीसरी पहचान है (४) एक बार किसी अवसर विशेषपर "सब कुछ भगवदिच्छाके अनु- राार होता है" इस सिद्धान्तको हठवादितासे न लेनेका तात्पर्य यह नहीं हो जाता कि सैद्धान्तिक आग्रहोसे सर्वथा मुक्त हो हो जाना चाहिये व्यवहारमे मिद्धान्तत. क्या धर्म है तथा क्या अधर्म है इसका विचार प्राथमिक होना चाहिये. तदनुसार ही किसी कार्यमे प्रवृत्त या निवृत्त होना चाहिये अत आपद्धर्म या अवसरोपात्त किसी विशेष कार्यरीतिको सार्वदिक माननेका आग्रह भी नहीं रखना चाहिये अत हठत्याग भी आग्रहरहित होना चाहिये. आग्रहसहित नहीं ! यही विवेक का वास्तविक एवम् परिपूर्ण स्वरूप है इस ग्रन्थके एक व्याख्याकार श्रीगोपीगजोके अनुसार श्रीमहाप्रभु नवविध विवेकका यहा उप- देश करते है, जिम इनकी व्याख्यामे इन्होने भलोभाति सममाया है यहा विस्तारभयसे हम अनुवाद नही दे रहे है जन्यमे मृत्युपर्यन्त समी तरहके दुखोको सहन कर लेना धैर्य है, दुखोको सहन करनेका मतलब होता है उन्हें स्वीकार लेना-~-उनका प्रतिकार न करना कभी एकाद दुख सह लेना और कभी विचलित हो जाना धैर्यका स्वभाव नहीं है निस्तर सभी तरहके दु खोको सर्वदा सहना ही पूर्ण धैर्यका स्वभाव है दुख अनेन प्रकारके हो सकते है यया-रोगादिजन्य कायिक या भौतिक दुख होते है कामक्रोधादिजन्य-इन्द्रिय और मन से सम्बन्धित आध्यात्मिक दुख होते है. सेवार्य उपयोगी वस्तुओके अभाव अथवा ऐसे अन्य भगवत्सम्बन्धी दुखोका आधिदैविक दुख कहा जाता है इस तरह धर्म अर्थ और काम पुरुषायोंके सम्पादनके लिए लौक्कि आयास आधिभौतिक, वैदिक आयास आध्यात्मिक तथा भगवदथं भापाम आघिदेविक दुख माने जाते है कभीकभी काल कर्म-स्वभाव-जन्य दुखोसे भी हम पीडित हो जाते हैं इन सभी तरह के दुखाको सहन करना धैर्य कहलाता है धेय धारण करने के चार उपाय होते है १) अनाग्रह २) सहन ३) त्याग ४) असामयंभावना ११ दुखोको सहन करना चाहिये पर स्वयम् चलाकर दुखी होने के नहीं करने चाहिये अपने प्रयत्न के बिना वदिच्छासे दुख दूर हो जाते हा तो जान-बूझकर दुम्पी बने रहने अस्वस्थ दुराग्रहकी भी कोई महत्ता नहीं है आएव समागत दुखौका प्रतिकार सहज-सरलतया हो जाता हो सहने की कोई आवश्यकता नही और न होता हो तो विचलित भी नहीं होना चाहिये यही धैर्यका वास्तविक स्वरूप है . काम स्वत दुख सहनेको उद्यत रहनेपर भी दुखी बने रहनेके अस्वस्थ दुराग्रहसे बचनेका उदाहरण अघोलिखित कथाश्लोक द्वारा अच्छी तरह समझा जा सक्ता है तक्रवत् धैर्यधारण हत्वा नृप पतिमवेक्ष्य भुजगदष्ट देशान्तरे विधिवशाद् गणिकास्मि जाता । पुत्र पति समधिगम्य चिता प्रविष्टा शोचामि गोपगृहिणी कथमद्य तक्रम् ।। अर्थ मुझे हठात् रनिवासमे पकड रखनेवाले राजाकी हत्या करके अपने सध्ने पति के पास जब पहुची तो सर्पदशके कारण उसे भी मृत पाया देश देशान्तरोंमे भटकती हुई वेश्यावृत्ति अपनानेको वाधित हुई तो एक दिन स्वयम् अपने पूर्वपतिसे जात पुत्रको सम्पन्न ग्राहक मानकर आमन्त्रित कर बैठी. वास्तविक्ताका ज्ञान होनेपर अपने पुत्रके साथ प्रायश्चित्त हेतु आत्मदाहको उद्यत हुई तो पुत्र जलकर मर गया परन्तु मै कञ्चिद् बच गयो बचानेवाले ग्यालेकी पत्नी वनकर छाछ बेचती हू सो आज वह भी ढुल गई अव वताओ कि कितने दु खोको रोजा इस छाछके ढल जानेके दुखको कहा तक गेऊ ? जीवनमे एकसे बढकर दूसरे कष्ट आते है किन किनको रोया जाये और कब तक रोया जाये ? खालेकी पत्नी अपने पूर्वानुभूत कप्टोका विचार कर नित-नये आनेवाल दु खोको झल जाती है जब भी जैसे जीवन यापनक अवसर सामने आते है, उन्हें स्वीकार लेती है न तो दुःखसे विचलित होती है और न दुखी बने रहनको निराशा या कुण्ठा से ग्रस्त ही होती है न दुखोके आनेका कोई आग्रह और न दुखोके जानेका कोई आग्रह । 'प्रतीकारो यदृच्छातो सिद्धश्चन्नाग्रही भवेत्" २) धैर्य धारण करनेका दूसरा उपाय है - दु खोको कष्टोको या तिर- स्कारोको सह लेना हमे यह सोचना चाहिये कि जो हमे कष्ट है वह अन्य किसीका भी हो सकता है हमारा वाट विसी दूसरेके लिए सुख भी हो सकता है हमारी सुख दुखको अनुभूतिके हम अकेले हो दावेदार नहीं है परन्तु अनेक दावेदार है फिर अकेले हमारे उद्विग्न होनेकी स्या तुक है देवत् धैर्यधारण देह किमनदातु निएक्तुमर्मातुरेव वा । मातुपितुर्वा वलिन तुरग्ने सुनोपि वा ॥ अर्थ इस देहार सच्चा अधिकार किसका है ? क्या उसका जो हमें अन्न देता है, या हमारे जनक पिताका, या गर्भधारण करनेवाली माताका, या बलपूर्वक जो अधीन कर ले उसका,या धन देकर जो हम खरीद ले उसका, या देहको भस्मसात् करनेवाली अग्निका,या उसे खानेके भूखे कृमी-कीट-पशु- पक्षियोगा। जव हमारे देहके दावेदार अकेले हम ही नहीं - इतने सारे है सभीके किसी न किसी तरह के कष्ट और आनन्द हमारे देहके साथ जुड़े हुए हैं ऐसी सार्वजनिक सम्पत्तिसे अकेले हमारे दुखी होने की क्या आवश्यकता है? इसी तरह हमारे सुख-दुखमे भी हमारे परिवार समाज राष्ट्र मानव- मात्र और प्राणिमात्र का कुछ न कुछ या किसी न किसी तरहका हिस्सा तो है ही फिर अकेले हमे ही अपने कष्टोको असह्य क्यो मानना चाहिये किसीका कष्ट जैसे हमारे लिए सुख वन गाता है, इसी तरह हमारा कष्ट किसी दूसरेके लिए सुख होगा वनस्पतीका कष्ट वकरोका सुख है-बकरीका कष्ट सिंहका सुख है--सिंहका कष्ट शिकारी मानवका सुख होता है इत्यादि अत हमारे पारिवारिक सदस्य पल्ली आदि या अन्य भी अमाधु पुरुषो द्वारा किया गया तिरस्कार हमे सह लेना चाहिये ३) धैर्य धारण करनेका तीमरा उपाय है त्याग स्यागका अर्थ है अपनी ओरसे सभी इन्द्रियोके व्यापारोको स्थगित कर देना. उन्ह काया वाणी और मन के अभिनिवेशसे मुक्त करना जडवत पैर्यधारण जैसे जडभरत अपनी मस्तोमे बैठे हुए य जर राजाके सैनिक उन्हे पालकी दोनेके लिए ले गय तो आनाकानी विये विना पालकी ढोने लग गये ठीकसे न हो पानेके कारण राजा गाली देने लगा तो वह भी मरतीस सुन ली. पूछनेपर बुद्धिमत्ता पूर्ण उत्तर दिया और राजा चरणोम पड़ गया तो उसी पुरानी मस्तीते ज्ञानोपदेश भी कर दिया।
इस तरह जडवत व्यवहार करके भी धैर्य धारण किया जा सकता है ४) धैर्य धारण करनेका चौथा उपाय है स्वयम् अपनी असमर्थताकी भावना करना गोपभारंवत् यंधारण कृष्णके विरहमे गोपिकाओने तथा अन्य भी ब्रजवासियोने अपनी असमर्थताके बोधद्वारा धयं धारण किया था, रासके प्रकरणमे तथा मथुरा- गमनके प्रमगमें भी भगवान्पर जब बस नहीं चलता तो अपनी असमर्थताकी भावनाद्वारा धैर्य धारणके अलावा और कोई उपाय भी नही रह जाता है इस तरह भगवदिच्छाका और अपनी असमर्थताका विचार कर आधि- दैविक दु खोको सहन कर लेना चाहिये ये सारे उपाय जो शक्य या सुकर नही लगते हो तो सर्वदुःखहर्ता हरिका आश्रय ग्रहण करना चाहिये. क्योकि भगवान्के आश्रयसे अशक्य भी सुशक्य हो जाता है सारी दुर्लभ बातें भी सुलभ बन जाती हैं इस तरह धैर्यका निरूपण किया गया. अब आश्रयका स्वरूप समझना चाहिये आश्रय ऐहिक पारलौकिक सभी बातोमे सर्वथा एकमात्र हरिका ही सहारा स्वीकारना आश्रय कहलाता है आश्रमको दृढताके भी चार उपाय है १) मन और वाणी से निरन्तर शरणभावना २) कायिक वाचिक और मानसिक रूपमे अन्याश्रयका त्याग करता ३) मेघपर चातकके दृढ विश्वासकी तरह भगवान्पर सर्वदा दृढ विश्वास रखना-स्वयम् प्रयुक्त ब्रह्मास्त्रपर स्वयमेव मेघमादकी तरह भगवान्पर कभी अविश्वास न करना, ४) सुखसे या दु खसे जो भी मिल जाये उसका ममतारहित उपभोग करना १) हमारे जीवनमे अनेक प्रकारको विषम स्थितिया सामने आती रहती है जिन उद्वेगजनक परिस्थितियोमे हम विचलित हो जाते हैं, उन परि- स्थितियोमे यदि हमारे मन और वाणो मे हम शरणभावना बनाये रखें तो आश्रय दृढ हो जाता है जीवन में अनेकविध आधिभौतिक आध्यात्मिक एवम् आधिदैविक कष्ट आते हैं ऐसे समय बहुधा हम विवेक और धैर्य निभा नहीं पाते. पर मन और वागी में यदि शरणभावना बनाये रखनेमे सफल हो पायें तो आश्रय दृढ हो जाता है चाहे कोई भी परिस्थिति हमारे सामने आ पडे--पापकी, भयकी, अपूर्ण कामनाओकी, भक्तद्रोहको, भक्ति-अमावली या भक्तोसे तिरस्कृत होनेकी- मभी स्थितियोमै भगवशरणभावना एक कारगर उपाय है जब किसी अदाक्य कार्यको सम्पन्न करनेका उत्तरदायित्व हमार आ पड़ता है तब उद्वेग आशका एवम् कुण्ठा के कारण हम भगवान्को भूल जाते है जब कोई सुशक्य कार्यको सम्पन्न करने का उत्तरदायित्व हमपर आ पडता है तब सफलताको आशा उत्साह और अहंकार के कारण हम भगवान्को भूल जाते हैं कार्य चाहे अशक्य हो या सुशक्य भगवान्को शरणभावना सर्वदा मन-वाणीपर बनी रहनी चाहिये हमारा अहंकार जव प्रबल हो रहा हो- हमपर जो आश्रित हो उनके रक्षणपोषणके समय अथवा हमपर आश्रित व्यक्ति या सम्बन्धी जन जब हमारे अहम्को ठस पहुचा रहे हो अथवा हमारे शिष्य भी जव हमारा तिरस्कार कर रहे हो, तब शरणभावनाको बनाये रखना बहुत आव. श्यक होता है मानसी सेवा, व्यसनदशा, निरोध या सर्वात्मभाव के अनुभव योग्य अलौ किक मनकी सिद्धिके लिए भी एकमात्र श्रीहरि ही हमारी शरण होते है मनवाणीसे निरन्तर अष्टाक्षर मन्त्रका अनुसन्धान बनाये रखना चाहिये यह আগষী दृढ करनेका प्रथम उपाय है २) कापा वाणो और मन से अन्याधपका त्याग करना चाहिये श्रुतिमे नित्यक के रूपमे विहित न हो तर भी किसी अन्म देवादिका स्वत चलाकर-निष्काम पा सकाम भजन करना बन्याश्रय है कही जाते समय मार्ग में किसी अन्य देवका मन्दिर मिल जाये तो दूसरी बात है. अन्यया स्वयम् अपनी ओरसे चलाकर किसी अन्य देवके दर्शनार्थ उनके मदिरमें जाना अन्याश्रय है मागस जाते हुए अन्य देवका मन्दिर मिल जाये तो नमनहारा आदरभाव प्रकट करना अन्याय नहीं है किसी लौकिक या अलौकिक प्रयोजनवश किसी अन्य देवताको प्रार्थना करना अन्याश्रय है 'अन्यदेव' का अर्थ है - भगवान के ऐमे देवरून कि जिनको पुष्टिमार्गीय सेवाप्रणालोमे मान्य नहीं किया गया है अन्यायके त्याग करनेसे भी आश्रय दृढ़ हो जाता है ३) भगवान्पर अविश्वास कभी नहीं करना चाहिये--सर्वदा चातकका सा दृढ विश्वास रखना चाहिये लकामे हनुमानजीको जब ब्रह्मास्त्रसे बाधा गया तब स्वयम् वाधनेवाले राक्षसोको ही ब्रह्मास्त्रपर अविश्वास हो गया था. अतः वे जब ब्रह्मास्त्र के अलावा रस्सी या अगला से बाधने लगे तव उनके अविश्वासको जानकर दोनो ही बन्धनोको तोड़कर हनुमानजी मुक्त हो गये. अतएव अविश्वास कदापि नहीं करना चाहिये जल बरसे या न वरसे पर चातकका विश्वास स्वातिविन्दुके वारेमे कभी खण्डित नही होता ऐसा दृढ विश्वास प्रभुपर रहना चाहिये दृढ विश्वाससे भगवदाश्रय दृढ होता है ४) हमे जो कुछ जसा और जितना प्राप्त होता है, उसके ममतारहित उपभोगका बत यदि हम लेलें तो न प्रिय वस्तुको प्राप्तिसे हर्ष होगा और अप्रिय वस्तुको प्राजिसे विवाद ही इस तरह प्राप्त वस्तुके ममतारहित उप- भोग भी भगवदाश्रय की दृढ़ता सिद्ध होती है. उपसंहार किसी भी तरह हो आश्रयको दृढता अपेक्षित है. छोटे-बड़े अच्छे-बुरे किसी भी तरहके कार्यों को मारते हुए यदि हम शरणभावनाको हृदयमे जगाये रखनेमे सक्षम हो जाते है तो अन्य सारी बातें शनै शनै स्वतएव सिद्ध होने लगेगी. इस तरह हमने देखा कि कलियुगमे भक्ति आदि मार्गपर चल पाना दु साध्य हो गया है, फिर भी भगवान श्रीकृष्ण का आश्रय मभीके लिए सर्वदा हितकारक होता है. एक दृष्टिसे देखा जाये तो मार्ग तो कम ज्ञान और भक्ति रूप तीन ही है परन्तु जो जोव इन मार्गोपर चल नहीं पाते या चलने हुए थक कर बैठ जाना चाहते है, उनकी साधना अपूरी रह जाती है पर थके हुए या बिन थके जो जीव भगवान के चरणोमे बैठ जाते है, वे बिना चले भी गन्तव्यतक पहुच जाते है. भगवान्के चरण या शरण अपने आपमे मार्ग भी है और गन्तव्य भी "एवमाश्रयण प्रोक्त सर्वेषा सर्वदा हितम् प्रस्तुत विवेकधाश्रय ग्रन्थ वि स १९८३ में प्रकाशित सस्करणका ऑफसेट प्रॉसेस द्वारा पुनर्मुद्रित रूप है वह सस्करण श्रीमद्-गोस्वामिकुल- भवण--विद्यानिधि-धोबजरत्नलालजी महाराजको श्रीबालकृष्ण सुद्धादत महासभा (सूरत) द्वारा प्रकाशित हुआ था सम्पादन धोचीमनलाल है शास्त्रीजी ने किया था इन दोनो महानुभावोके प्रति हम हार्दिक कृतज्ञता प्रकट करते है " હરિસ્મરણ. આ વિધિથશ્રય માટે નીચે પ્રમાણે પ્રતિ ઉપલબ્ધ થઈ હતી. 8) પુરાવા ૧ ૪ ગોલ શ્રીજીને લાચાર્યામજ શ્રીરઘુરાયજ કેટનિા તરફથી મળે રી-મુદ્રમાં ખાસ ઉગી હ છે. વાલી અને પ્રાચીન છે ૩ જ શ્રીજરનલાલજી મહારાજ, સુરત તરફથી મળેલી થીમદુલાલા ની સસ્થાની શ્રીયુત મૂલચન તેનીવાળા તરફથી પ્રાય શુદ્ધ પ્રાચીન (૨) જો નામમા-થોrst #girsaga ૧ ૬ ૩ થીરકાનજી મહારાજ તરફથી રુદ્ધ વાલી, નુતન S પ્રાય શુદ્ધ અપૂર્ણ અશુદ્ધ • માચીન ૩ 1 જુનાગઢ, ગે શ્રીગેકુનાથજી મહારાજ તરફથી ૪ ૬ શેત્ર શ્રી રણછોડલાલજી મહારાજ તરફથી સ ૧૮૫૮ ૫ ૮ ગેઇ શીવજરનલાલજી મહારાજ મુરત તરફથી પ્રાચીન માય (ાદ અપૂર્ણ ઊંચેલી શુદ્ધ syst મામ શુદ્ધ 2 શ્રીગલાવાની, શ્રીફત દાચ તેવીવાળા તરી S છે. ? ૧૦ ૪ ગેe શ્રીગેકુલનાથજી મહારાજ મુબઈ તરફથી અશુદ્ધ તૂતન પ્રાય શુદ્ધ ON 0 વાંચન શુદ્ધ ૧ર 8 ગ. શ્રીવ્રજરત્નલાલજી મહારાજ સુરત તરફથી (૩) રિવિવારજનોફોસઘવકૃતિ. ૧ ૪ મો થીણુછપ્લાલજી મહારાજ મુબઈ તરફથી 1 પ્રાય શુદ્ધ પ્રાન શુદ્ધતર વચ્ચેની પ્રાચીન શુદ્ધતર સ ૧na ૩ ૦ થીરણછોડલાલજી મહારાજ મુબઈ તરફથી in I. ૫ ૬ શીવજત્નલાલ મહારાજ સુરત તરફથી હ-, In विवेकधैर्याश्रयः। विवेकधैर्ये सततं रक्षणीये तथाश्रयः । विषकस्तु हरिः सर्च निबेच्छातः करिष्यति ॥१॥ प्रार्थिते वा ततः किं स्यात् स्याम्यभिप्रायसंशयात् । सर्वत्र तस्य सर्व हि सर्वसामर्थ्यमेव च ॥२॥ अभिमानश्च संत्याज्य: स्वाम्पधीनत्वभावनात् । विशेषतश्चेदाज्ञा स्यादन्तःकरयागोचरः ॥३॥ तदा विशेपेयेत्यादि भाव्यं भिन्नं तु दैहिकात् । आपद्गत्यादिकार्येषु हठस्त्याज्यश्च सर्वथा ॥ ४ ॥ सर्वन धर्माधर्माप्रदर्शनम्। विचकोऽयं समाख्यातो धैर्य तु विनिरूप्यते ॥ ५॥ त्रिदुःखसहनं धैर्यमा मृतेः सर्वतः सदा । तक्रवद्देहवद्भाव्यं जडवगोपभार्यवत् ॥ ६॥ प्रतीकारो यहच्छातः सिद्धश्चन्नाग्रही भवेत् । भार्यादीनां तथान्येपामसतम्याक्रमं सहेद ॥ ७ ॥ स्वयमिन्द्रिय कार्याणि कायवाङ्मनसा त्यजेत् । अरेणापि कर्तव्यं स्वस्यासामर्थ्यभावनात् ।। ८ ॥ अशक्ये हरिरेबास्ति सर्वमाश्रयतो भवेत् । एतत्सहनमत्रोक्तमाश्रयोऽतो निरूप्यते ॥ ९॥ ऐहिक परलोके न सर्वथा शरणं हरिः । अनाग्रहश्च दुःखहानी तथा पापे भये कामाद्या पाद्यपूरणे ॥१०॥ भक्तद्रोहे भक्त्यभावे भक्तश्चातिकमे कृते । अशक्ये वा सुशक्ये वा सर्वथा शरणं हरिः ॥११॥ अहंकारकृते चैव पोप्यपोषणरक्षणे । पोप्यातिक्रमणे चैव तथान्तवास्यतिक्रमे ॥१२॥ अलौकिकमनःसिद्धौ सर्वार्था शरणं हरिः। एवं चित्ते सदा भाव्यं वाचा च परिकीर्तयेत् ॥१३॥ अन्यस्य भजनं तत्र स्वतो गमनमेव च । प्रार्थना कार्यमात्रेऽपि ततोऽन्यत्र विवर्जयेत् ॥१४॥ अविश्वासो न कर्तव्यः सर्वथा बाधकस्तु सः । ब्रह्मास्त्रचातको भाव्यौ प्राप्त सेवेत निर्ममः ॥१५॥ यथाकथंचित्कार्याणि कुर्यादुचावचान्यपि । किंवा प्रोक्तेन बहुना शरणं भारयेद्धरिम् ॥१६॥ एवमाश्रयणं प्रोक्तं सर्वेषां सर्वदा हितम् । कलौ भक्त्यादिमार्गा हि दुःसाध्या इति मे मतिः॥१७॥ इति श्रीवल्लभाचार्यविरचितो चिवकधैर्याश्रयः समाप्तः श्रीकृष्णाय नमः। श्रीगोपीजनघल्लभाय नमः। श्रीमदाचायंचरणकमलेन्यो नमः । श्रीमदखण्डभूमण्डलावार्यवयं श्रीमदल्लभाचार्यचरणविरचितः। विवेकधैर्याश्रयः। श्रीरघुनाथचरणप्रकटिना दीपिका । स्वगोकुलपरिवाणसम्भ्रमेणोद्धृत्ताचलम् । क्रीडदोपाङ्गनापागसजिगोपालपाश्रये ॥ १॥ मन्मानसेऽस्तु सतत श्रीविठ्ठलपदाम्बुजम् । संसारभयभीतानां यत्स्मृतिर्भयनाशिनी ॥२॥ अथ भगवनमार्गप्रस्तानामेकान्तिकभक्तानां भक्ति सिसाययिपूणां तत्साधनो- पायान् विवेकश्चियान स्वस्वरसाधारणलक्षणलक्षितान विवेक्तुमादौ तानसाधारणस्वंश- ब्देन निर्दिशन्ति । विवेकधैर्ये सततं रक्षणीये तथाश्रयः । विवेकस्तु हरिः सर्व निजेच्छातः करिष्यति ॥ १॥ रक्षणीये स्वीकार्ये । तर विकादयः कीदार इति स्वरूपजिज्ञासायां रथमो- दिष्टस्य विषेकस्य फलितस्वरूपमाहुविवेकस्तु हरित सर्व निच्छातः करिष्यतीति । तुशब्दः प्रसिद्धियोतनार्थः । अन्यथा प्रमाणिकर स्यात् । हरति निविधमपि भातदुःख- मितिव्युत्परया सकलदुःखहारिसमभिव्याहारिहरिपदेन, भगवान् करिष्यति न येत्यनि- पासो निरस्तो वेदितव्यः । हरिपदनिर्वचनन्तु म्हाभारते स्फुटम् । तद्यथा, 'हाम्यघं हि स्मर्तृणां हविर्भाग क्रतुष्पदम् । वर्णश्च मे हरिशेटस्तस्मादसि स्मृत' इति । सर्वहिक पारलौकिक निजछातो जीरादष्टप्रयत्नादिनिरपेक्षालौकिकस्वेच्छात इत्यर्थः । एवं वाक्यानुसन्धानेन स्थैयमितितात्पर्यम् । 'मनु लोके भगवद्भक्तानामपि प्रौददुःखदरीकरणाथै भगवान् पार्थनीय एव । मस्मादशक्याघोंपदेश एका पोगिरिलहमपटिकोपदेश इत्यत आहुः ।
२ विकधैर्याश्रयः । प्रार्थिते वा ततः किं स्यात् स्वाम्यभिप्रायसंशयात् । सर्वत्र तस्य सर्व हि सर्वसामर्थ्यमेव च ॥ २॥ वेति विरपे वियेकास्फूर्तिदशायाम् । ततः प्रार्थनातः किं स्यान्न किमपी- स्पः । कुत इत्यपेक्षायां, स्वास्यभिप्रायसंशयादिति । स्वामी प्रभुः, तस्याभिषा- यस्य चिकीपितस्य ज्ञातुमशस्यत्वात् संशयो भवत्येव । यत्र 'फलानुमेया: पारम्भाः संस्काराः प्राक्तना इवेस्पादिपु लौकिकाम्नभिप्रायोपि पूर्व जानुपरपस्तत्र किं वाच्य- मलौकिकमभोरभिमायस्येति । ननु भनेच्छापूरणाप भगवानशक्यापर्य सम्पादयति, तच, बहायाससाध्यास्मदादिवशोपि कदाचित् स्यादिति तदर्थ पुनः पुनः पार्य- नया भगवान् स्मार्यते । (भगवतस्ता कार्य स्मार्यत) इत्यन आहुः सर्वधेति । मस्मिन् काले देशे च यत्किञ्चिद्वस्तुमात्र वत्सर्वं तस्य भगवन एवेत्यर्थः । हिन्दः प्रसिद्धौ । सा च 'अहं सर्वस्व जाना मम' इत्यादिषु ज्ञेया मनु भक्तार्थे भगवनोप्यकालवस्तु । सम्पादनमायाससाक्ष्य भविष्यतीति चेतनाहुः सर्वसामर्यमेय चेति । न हि भावनोपि फालमपेक्ष्यैव कार्यकरणं सम्भवति, प्रत्युत कालापत्र भगवदधीनत्वानन्याच तत्सा- पेपरवम् । थकारात् कर्तुमककन्ययाकर्तुं सामर्थमपि द्योत्यते ॥२॥ कदाचिदत्यन्सापेक्षितपपि कार्य भगवान करोति, तेन भक्तमनस्यभिपानो भवेन्पया भजनार्थमपि प्रयत्नो न कर्तव्य इति, तन्न कार्यमित्याहुरमिमानश्च सन्त्याज्य इति । अभिमानश्च सन्त्याज्यः स्वान्यधीनखभावनात् । विशेषतवेदाज्ञा स्यादन्तःकरणगोचरः ॥ ३ ॥ तदा विशेषगत्यादि भाव्यं भिन्नं तु दैहिकात् । आपनत्यादिकार्येषु हरस्त्याज्यश्च सर्वथा ॥ ४ ॥ चमारा कार्यानिष्पत्तिनिमित्तग्लानिरपि । समित्यनेन बाचा परभेदाहि- स्पेन त्यागः सूचितः । ववो हेतुः, स्याम्पधीनत्यभावनादिति । सर्वस्वनिवेदनेनान्त:- करणमपि निवेदितमेव । अभियानधान्तःकरणधर्मः । स च सुतरांनवार्य इतिभावः। एव स्वत: कार्यमा नक्तव्यमिति माप्त भमरदाक्षायां विशेषपादुपिंदोपतश्चेदाज्ञा स्यादिति । देसम्मधि देहनिर्वाह कार्य देहिकमित्युच्यते । तच, सवानिषिद्धमेव । विशेपतो विशेषनिमितात विशेष कार्यकरणार्थपिति यार । मापि न बाइन, किश्चान्त:करणगोचरांन्तातरणपूर्विका यदि साद, तर दैहिकानिनं विशेषग- त्यादि भाव्य कार्यमित्यर्थ: । गतिपदेन क्रियामा लक्ष्यते । आदिपदेन माधनपपि कार्यमध्ये चित्सम्भवदि चेन नन वर्तव्यमेवेनि रयो । ननु विशेपाझायामपि यश- श्रीमदखण्डभूमण्डलाचार्यश्रीमद्वभावायचरणविरचितः । स्कालादिवशद् भगवदाताकार्यानिष्पत्तिस्तदापि किं भगवदाज्ञसमितिकुला प्राणादि- भयं सोदापि हटेनाशक्यपपि कार्य कर्त्तव्यमेवोत नेति प्राप्त आहुरापनत्यादिकार्य- विति । भगवदीयानाविधदशामातो भगवानेव हेतुरिनि भगवदाज्ञोलहनदोपोषि न भवतीतिज्ञेयम् । गति'शब्देन प्राप्तिरुच्यते । 'आदि'पदेनाशक्पार्थ उत्पते । तेनाऽऽपका- लीनाशक्यकार्येष्वपि सर्वेपु हा आग्रहः सर्वधा सर्वप्रकारेण त्याज्यः । चकारादापनि- हनौ पुनराग्रहः स्वीकार्य एस्पर्थः, । यता, आपदनिरादिर्येषु कार्येषु कृतेषु भाति तेवाग्रहो न कार्य इति । भगवदनुक्तप्वाप कार्यवनापद्यपि स्पृहा न कायेंत्याहुरमाग्रहश्य सर्वत्रेति । कर्तव्यान्तरमप्याहुर्धर्माधर्मायदर्शनयिति । यर्यवार्यश्च तयोरयं पर्यवसि- तफलं तदर्शनपपमादेन तदनुसन्धानम् । चिहेतेपि कार्ये यस्मिन् कृते स्वधर्मत्यागः सम्मा- व्यते, जन्न कार्यम्, स्वधर्मत्यागस्याधर्महेतुत्वात् । स्वधर्माविरोधिनश्च धर्महेतुत्वात् तन्का- यमितिभावः ॥ ४ ॥ उपसहरन्ति-- विकोयं समाख्यातः क्रममा धैर्य निरूपयन्ति--- धैर्यन्तु विनिरूप्यते । त्रिदुःखसहन धैर्यमामृतेः सर्वतः सदा । तकवदेहबद्भाव्यं जडवतोपभार्यवत् ॥ ६ ॥ प्रयाणां दुःखानां समाहारखिदुःस्वम् । दुरवस्य विविधत्वं त्याधिभौतिकादिभे. देन कायिकादिमैदेन वा कालकर्मस्वभावै । तस्य सहनं तत्प्रतीकारं विनानुभवः । सदप्यामृतेः । मूनिमरणं वर्तमानदेहत्यागः, से पर्यादीकृत्य । तदपि न यन्किश्चिन परिगणितनिमिनाद, किन्तु, सर्वतो भगवदिच्छानो यद्यदुपस्थितं तत्तत्सर्व सोहन्यमे- तिभावः । तदपि न झालनपत्येन, किन्तु सर्वदा । आमृते रित्यनेन सार्वकाली- नरये सिद्धपि सर्वदेति पुनः स्पष्टार्थ वचनम् । नन्वनवरतदुःखसहनेन शरीरशोपात तमाशोपि स्पान, तमोचिसमिति न दुःखं सोटव्यमिति चेतवाहुस्तकवदेहबद्भाव्य- मिति । देहानौ शोको न कार्य इत्यर्षे प्राक्तनं दृष्टान्नापं ज्ञेयम् । तय प्रय, तनव- जहबगोपभार्यवदिति । अन्वयस्त, देहयता भाव्यं देहवद्राव्यम् । तच देवना पुरुषण शरीरादिकमेवात्मीयत्वेन भाव्यमनुसन्धेयं दृश्यने, तादृशन्तु ने कार्यम् । तर कोह- गनुसन्धान कार्यमित्यपेक्षायां तवादिपु पया तेपामनुसन्धान तथा स्वदेहवि कार्य- मित्यर्थः । तमाख्यायिका तु, "हला त पत्तिमपेक्ष्य भुमहदष्ट देशान्तरे विधिवशाह- विकश्रियः। गिकापि जाता । पुत्र पति समधिगम्य चिता प्रविष्टा शोवामि गोपहिणी क्यमय तक्रम्" इत्यादौ प्रसिदा । जडो जडभरतस्तदाख्यायिका पञ्चपस्कन्धतोजगन्तव्या । गोपैधिपते धार्यते पोप्यते वेति गोपभायों, (देहः) गोपीना भावसम्बन्धात पूर्वकालीनः माकनो देहरतदपगमे यथा गोपीना न शोकस्तथा स्वदेहेपि कार्पमित्यर्थः । अत्र गोपभा- यांशब्दे उव्यमाने पुवद्भावानुपपत्तिः तेनान्यधा व्याख्यानम् ॥ ६ ॥ भगवदिच्छातः प्राप्ते दुःखे यथाऽपतिकारस्तथा सदिच्छामा स्वसय न विनर दु खमतीकारेपि मम मुख पास्त्विति बुद्धया द.साभारसम्पादकहेतुनिपतावाहन कुर्यादित्याहुः प्रतिकारो यदृच्छात इति । प्रतिकारो यदृच्छातः सिद्धश्वेन्नामही भवेत् । भार्यादीनां तथान्येषामसतश्चाक्रमं सहेत् ॥ ७॥ भार्यादीनामिति । भार्या आदियुपा पुत्रादीना तथैवान्येषां पोष्यांगा, असतश्च भायर्यादिमध्ये स्वतोऽत्पन्तनिकृष्टस्य सदोषस्याप्याथ तस्कृततिरस्कारमपि सहेतेत्यर्थः । अत्र सहेदिति परस्मैपद 'सह मर्पण' इत्पात्मनेपदिनो न सङ्गच्छते पापि, तथापि सहन सह इति व्युत्पत्या 'मच प्रत्यये कृते, पक्षात्सहकरोतीत्यावरनीति वा पर- स्मैपद शेषम् । तथा पूर्व भगवदिच्छया प्रामस्य स्वययत्न विनैव सुखद.सादेः सहनमुक्तपि- दानी स्वकृतिसाध्य सुखादिक न कार्यमित्याहु स्वयमिति । स्वयमिन्द्रियकार्याणि कायबामनसा त्यजेत् । अशुरेणापि वर्तव्यं स्वस्थासामध्यभावनात् ॥८॥ इन्द्रियकार्याणि । तत्तदिन्द्रियसाध्यविषयभोग । त तु कायेन धाचा मनसा त्यजेदित्यर्थः । कायवाअनसेयर विनावादेकवचन क्षेत्रम् । दु ख शोदुमशक्तेनापि तदर्थ वृदमेवनवैराग्यादिक कर्तव्य, न साहत्य धैर्यमेव । तर हेतु', स्वस्यासामर्थ्य- भावनादिति । भावनं परिदृश्यमानत्वमिति । कर्तव्यान्तरमाहुरशक्य इति । अशक्ये हरिश्वास्ति सर्वमाश्रयतो भवेत् । सर्वप्रकारेणाशयेऽर्थे हरियास्ति मम भरणमिति बुद्धिमाश्रित्य तिष्ठन सर्व- पैहिक पारलौकिक व भवेदित्यर्थः। उपसहरन्ति-एतदिति। -- श्रीपदखण्ड भूपण्डवार्यवर्यश्रीमदल्लभाचार्यचरणविरचितः । एतत्सहनमत्रोक्तमाश्रयोतो निरूप्यते ॥ ९॥ क्रममातमाश्रय निरूपयन्ति-आश्रयोतइति। अतइति धैपनिरूपणानन्तामित्यर्थः। आदौ फलित रूपमाहु:-ऐहिकेति । ऐहिके पारलोके च सर्वथा शरणं हरिः । दुःखहानौ तथा पापे भये कामाद्यपूरणे ॥ १० ॥ भक्तदोहे भत्त्यभावे भक्तैश्वातिकमे कृते । अशक्ये वा सुशक्ये वा सर्वथा शरणं हरिः ॥ ११ ॥ अहवारकृते चैव पोध्यपोपणरक्षणे । पोप्यातिक्रमणे चैव तथान्तेवास्यतिकमे ॥ १२ ॥ इहास्मिन् जन्मनि तदुपलक्षित काले वा भवदैहिककार्यमुच्यते । परोऽस्मादयः, अन्तरिक्षलोकमार-ए ब्रह्मलोपर्यन्तः । चारानगवदिउया कदाचित्ररकभोगः सम्भाव्यते चेत्तयापि सर्वप्रकारेण कायेन वाना मनसा च इरिरेव शरणं ममैति चित्ते निश्चित्य स्थैयमित्यर्थः । भगनदीयाना नरका स्वर्गादिरेव नत तामिम्रादिः । अत १३ विष्णुपुराणे युक्तम् "घासुदेवं मनो यस्य जाहोमारनादिषु, नस्यान्तरायो मैत्रेय देवेन्द्रला- दिक फलम्" सामान्यतः सर्वकार्येषु शरणगमनमुक्तम् इदानीं तदेव पुनर्निमिनविशेपेषप्यु- च्यते । तानि निमित्तानि महानौ,' इत्यारप'मधाशरण शरिरित्येनत्पन्तोक्कानि होपानि । दुःखस्प हानौ मायापि हर्षवशेन शरणविस्परणं न कार्पमित्यर्पः । एवं सर्वत्र योग्यम् । पापे मारधवशानाने, भये शादिका, काम इच्छा गैरिका किसापा- रणी, आदिपदेन धर्मादिरपि, देपामपरणेऽनिमत्तौ भक्तेषु दोहे मातेपि, अन्य भक्ति या स्वस्य भक्तिरादित्येन स्पृहापापि, भक्तः स्वस्थातिकमे करेपि नेषु मातित्यं न फार्पमितिभावः। अशक्ये स्वयमन्पहारा या पर्जुमपोग्येय, मुशस्येऽनापासेन पर्नु योग्येऽर्थे, उभयत्रापि या शन्दोऽपयें । माद्वारण कऽरकारकृते, पोपण रक्षण पोषणासणे । पोयाणा पोयगांगा पोपणास माहारण करेऽपि । पहारः सर्वत्र समुच्चयाः1 पोयरप देवमादतिक पति अग्नेगमी भगामार्गनिमानुः शिपः । सस समिक्लाउलोनिसियपि इपः ॥ १२॥ अलौकिकमनःसिद्धौ सर्वथा शरणं हरिः । एवं विते सदा भाव्यं वाचा व परिकीर्तयेत् ॥ १३ ॥ अलौकिकमन,मिडाविति निमितमामी नागरिकमानिदर्यास हरिरेगमप इस्पः पर्पतसितः पयमिति । विवादांना सम पारामनं वा विवेकधैर्याश्रयः। णिपि जाता । पुत्रं पति समधिगम्य चितां प्रविष्टा शोचामि गोपगृहिणी कपपत्र पक्रम्" इत्यादौ मसिद्धा । जडो जडभरतस्तदाख्यायिका पश्चपस्कन्धतोऽवगन्तव्या । गोपेनियने धार्यते पोध्यते अति गोपभायों, (देहः) गोपीनां भगवरसम्बन्यात पूर्वकालीनः माकतो देहस्तदपगमे यथा गोपीनां न शोकस्तया स्वदेहेपि कार्यमित्यर्थः । अत्र गोपभा- शिन्दे उच्यमाने पुंवद्भावानुपपत्तिः तेनान्यया व्याख्यातम् ॥ ६ ॥ भगवदिच्छात; मा दुःखे यथाऽप्रतिकारम्ता नदिच्छापाप्ने स्पयन्नं विनव दुःखमतीकारेपि मम सुखं मास्त्रिवि युद्धया दुःखाभावप्सम्पादकहैतुनिटत्तावाग्रह न कुर्यादित्याहुः प्रतिकारो यदृच्छात इति । प्रतिकारो यहछातः सिद्धश्चेन्नाग्रही भवेत् । भार्यादीनां तथान्येषामसतश्चाक्रमं सहेत् ।। ७ ।। भार्यादीनामिति । भार्या आदिप पुनादीनां तथैवान्येषां पोष्याणां, असतश्च भार्यादिमध्ये स्वतोऽत्यन्तनिकृष्टस्य सदोपस्याप्याम तकृततिरस्कारमपि सहेतेत्यर्थः । अन सहेदिति परस्मैपदं सह मर्पण' इत्यात्मनेपदिनो न सङ्गच्छते यद्यपि, तथापि सहनं सद इति व्युत्परा अचमत्पये कृते, पश्चात्सहस्रोतीत्यावरतीति का पर- स्मैपदं शेयम् । तया पूर्व भगदिन्छया प्राप्तस्य स्वायत्तं विनैव सुखदाखादेः सहनमुक्तमि. दानी स्वकृतिसाध्यं सुखादिक न कार्यमित्याहुः स्वयमिति । स्वयमिन्द्रियकार्याणि कायवाअनसा त्यजेत् । अशूरेणापि कर्तव्यं सस्यासामर्थ्यभावनात् ॥८॥ इन्द्रियकार्याणि । तत्तदिन्द्रियसाध्यविषयभोगः । तं तु कायेन वाचा मनसा सजेदित्यर्थः । कायवाङ्मनसेत्यत्र द्वन्द्वकवद्भावादेकवचनं शेयम् । दुःखं शोदुमशक्तेनापि तदर्य वृद्धसेवनवैराग्यादिकं कर्तव्यं, न वाहत्य धैर्यमेव । ना हेतुः, स्वस्थासामर्य- भावनादिति । भावनं परिदृश्यमानत्वमिति । कर्तव्यान्तरमाहुरशक्य इति। अशक्ये हरिरेवास्ति सर्वमाश्रयतो भवेत् । सर्वप्रकारेणाशक्येऽर्थे हरिरवास्ति मप शरणमिति बुद्धिमाश्रित्य तिटनः सर्व- मैहिकं पारलौकिक च भवैदित्यर्थः । उपसंहरन्ति-एतदिति ।
श्रीमदखण्डभूमण्डलाचार्यचर्यश्रीमद्वलभाचार्यचरणविरचितः । एतत्सहनमत्रोक्तमाश्रयोतो निरूप्यते ॥९॥ क्रमप्राप्तमाश्रयं निरूपयन्ति-आश्रयोन इति। अत इति धैर्यनिरूपणानन्तरमित्पर्य आदौ फलितं रूपमाहुः-ऐहिकेति । ऐहिके पारलोके च सर्वथा शरणं हरिः । दुःखहानौ तथा पापे भये कामाद्यपूरणे ॥ १० ॥ भक्तद्रोहे भक्त्यभावे भक्कैश्चातिकमे कृते । अशक्ये वा सुशक्ये वा सर्वथा शरणं हरिः ॥ ११ ॥ अहङ्कारकले चैव पोष्यपोपणरक्षणे । पोष्यातिक्रमणे चैव तथान्तेवास्यतिक्रमे ॥ १२ ॥ इहास्मिन् जन्मनि तनुपललिते काले वा भवदैहिककार्यमुच्यते । परोऽस्मादन्या, अन्तरिक्षलोकमारभ्य ब्रह्मलोकपर्यन्तः । चकारागावदिया कदाचिनरकभोगः सम्भाव्यते चेत्तवापि सर्वप्रकारेण कायेन वाचा मनसा च हरिरेव शरणं ममेति चित्ते निक्षिय स्थेयमित्यर्थः । भगवदीयानां नरका बादिरेव नतु तामिस्रादिः । अत पत्र विष्णुपुराणेऽप्युक्तम् "वासुदेये मनो यस्य जपहोपार्चनादिपु, तस्यान्तरायो मैत्रेय देवेन्द्रवा- दिकं फलम्" सामान्यतः सर्वकार्येषु शरणागमनमुक्तम् , इदानीं तदेव पुनर्निपिनविशेषेवप्यु- च्यते। तानि निमित्तानि दुश्बहानौ,' इत्यारभ्य सर्वधाशरणं हरिरि त्यैतत्पर्यन्तोक्तानि ज्ञेयानि । दुःखस्य हानौ मातायामपि हर्षवशेन शरणविस्मरणं न कार्यमित्यर्थः । एवं सर्वत्र पोग्यम् । पापे भारम्बाशाजाते, भये शञ्चादिकने, काम इच्छालौकिकालौकिकसाया- रणी, आदिपदैन धर्मादिरपि, तैपामपूरणेऽनिपतौ भक्तेषु द्रोह जातेपि, अन्यत्र भक्ति दृष्ट्वा स्वस्थ भक्तिराहित्येन स्पृहामापि, भक्तः सस्यातिकमे कोपि तेषु मातिकल्यं न फार्पमितिभावः । अशक्ये स्वयमन्पद्वारा का पर्नुपयोग्येऽर्थे, सुशस्पेऽनायासेन फत योग्येऽये, उभयत्रापि या शन्दोऽप्प । माकारण कडझारफते, पोपण रसणच पोपणरतणे । पोप्पाणां पोप्यरांगां पोपणरक्षणे भाकारण कोऽपि । पकारः सर्वत्र समुपपार्यः। पोम्पर्गस्पदैवग्यादतिम्म सनि भन्नेयामी भगरमार्गनिशमुः शिष्यः। सयि सर्वरिपमुक्तानुक्तरूपेपि हरिरेगनपणीप इत्यर्थः ॥ १२ ॥ अलौकिकमनःसिद्धौ सर्वया शरणं हरिः । एवं वित्ते सदा भाव्यं वावा व परिकीर्तयेत् ॥ १३ ॥ अलौकिकमनामिकारिति निमिएमसी नागैस्मिन:मिदपर्यवसाय हारिरेराथप इत्ययः पर्यररितः । पयामिनि । विवादीनां समं पामुक्त ता ६ विवर्याश्रयः। सदा चित्ते सम्यगनुसन्धयेम् । वाचा च वचनेनापि परवोधनार्य स्वार्थमेव वा परि- कीर्तयेत् परितः सर्वतः कीर्तयेत् । चकाराव कायव्यापारयोग्यं कुर्यादपि ॥ १३ ॥ अन्यस्य भजनं तत्र स्वतो गमनमेव च । प्रार्थना कार्यमापि तथान्यत्र विवर्जयेत् ॥ १४ ॥ अविश्वासो न कर्तव्यः सर्वथा वाधकस्तु सः । ब्रह्मास्त्रचातको भाव्यौ प्राप्त सेवेत निर्ममः ॥ १५ ॥ यथाकथविकार्याणि कुर्यादुच्चावचान्यपि । किं वा प्रोक्तेन बहुना शरणं भावयेद्धारम् ॥ १६ ॥ एवमाश्रयणं प्रोक्तं सपा सर्वदा हितम् । कलौ भक्त्यादिमार्गा हि दुःसाध्या इति मे मतिः ॥ १७ ॥ श्रीमदल्लभाचार्यचरणविरचितो विवेकयोश्रयग्रन्थः सम्पूर्णः । अन्यस्प भजन तत्रेति । तत्र तस्मिन्नाश्रयरूपेर्थे सम्पन्ने, अन्यस्य भगवाद- क्तव्यतिरिक्तस्य भजन सेवनं स्तो गमनं स्वस्यानाकारितस्य स्वस्य तत्समीपे गमनम् । चकारातेन सह शारीरसम्बन्धोपि न कार्य: । कार्यमानेपि क विहित स्वधर्माऽविरो. धिनि कर्नव्यर्थे मार्थना कापैतिशेषः । मार्थनीयो भगवान् तद्भक्तो वा । अत एव विष्णु. धर्मोत्तरे शङ्करगीतासु "अपृष्ट्वा यस्तु यां काश्चित् क्रियां नारभते हरिम्, असम्भिन्नार्य- मर्यादस्तस्य तुष्यति केशव" इति । तथान्यत्रेति । यथा भगवति मार्थना तथाऽन्यत्र विरोधिनि विशेषण (ता) वर्जयेत् । यदा, भगवति विहित कार्य स्वधर्माविरोधिनि प्रार्थना, तथा अन्यत्र स्वधर्मविरोधिनि (कार्य) न कार्येति । ननु भगालार्थनायामपि भगवास्तु सामान पदत्येव किमपि, किन्वाचार्योक्तसङ्केतग्रहेणानुपीयते, इदमुक्तमिदं नोक्तमिति। तत्र जीवानामविश्वासः सम्भावित इति चेतवाहुरविश्वासो न कर्तव्य इति । आचार्योक्त. मार्गे ययविश्वासस्तदा कृतं सर्व व्यर्थं भवेदित्ययः । अविश्वासस्य पहावापकत्वानु- सन्धानेन सर्वथा स न कार्य एवेत्यर्थः । विधासदाथि किश्चित्स्मरणीपयाहुबमास्त्र- चातकाविति । ब्रह्मास्त्रश्च चाताव तौ भाव्यौ, विश्वासार्थ स्मरणीयौ । मापं भारः। यया हनुमान ब्रह्माणामतिकाण बद्धोपि बन्धकानामविश्वासन मुक्तः । पश्चादुधमः सर्वोपि व्यों जातः । नाविश्वासस्य महादोपहेतुले ब्रह्मानं दृष्टान्तः । विश्वासपात्रस्प सर्वकार्यसम्पादकत्ये चातको रटान्तः । स यया चातकः कश्चन पक्षी यथा वासु मह- जलमप्यनास्वाय स्वातिनलमत्पमप्पास्वाध पुनर्वर्षपर्यन्तं तत्सतीसया जीवन् यया पूर्वमेव ७ श्रीमदरखण्टभूमण्डलाचार्यवर्यश्रीमदलमाचार्यचरणविरचितः । तिष्ठति । तस्य तु सर्व स्वातिबिन्दुविधासेनैव योगक्षेमादिनि हो यथा, तथा सबै विहायाचार्योक्तमार्गविश्वासेन सर्वे भवेदेवेत्यत्र तात्पर्यम् । प्राप्तं स्वमार्गपर्यादया कर्तव्यत्वेन प्राप्त सेवेत कुर्यादित्यर्थः । निर्ममो निरहङ्कार इत्यर्थः । स्वयं बहुज्ञवायभि- मानेनाचार्योक्तौ कुसृष्टिकल्पनं न कार्यमितिभावः । यथाकथचिदिति । लोकवेदकुला- चारमाप्तानि कर्माणि येन केनापि प्रकारेण कुर्यान्न तु परित्यजेत् । उयन, अवयञ्च, उच्चावचं, तानि उच्चावचानि, उत्कृष्टनिकृष्टानि । यद्यपि भगवद्धर्मापेक्षया सर्वाण्यन्यानि फर्माणि हीनान्येव, तथापि लोकानुसारेणोत्तमाधमत्वं ज्ञेयम् । ईदृशाममि सर्वथा फरणं भगवानेवाह, 'सहज कर्म कौनेय सदोपमपि न त्यजेत्' 1 आश्रयस्य विकधैर्यापेक्षयाऽत्या- वश्यकलं कर्मज्ञानोपासनादिभ्योपि सर्वथा माघस्त्वञ्चाहुः किं वेति । ति पक्षा- न्तरे । विवेकधैर्याचक्षमस्य महापापपतितस्यापि यथोक्ताश्रयाश्रयणेनैव सफलपुरुषार्थसि- द्धिरित्यर्थेन बहुना प्रोक्तेन पुनः पुनर्वचनेन किम् ? न किमपोत्यपः । उपसंहरन्ति एवमिति । एवममुना मकारेण यदाश्रयणं तत् प्रोक्तम् । आश्रय णरूप वस्तु मोक्तमित्यर्थः । सर्वपां पतितापतितस्त्रीशूदसाधारणायम् । अत एर भगवता- युक्तम् , 'मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य येपि स्युः पापपोनयः, स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रास्तैपि यान्ति परां गतिमित्यादिना । मर्यदा समयानियमेन । हितपतिसौख्यसम्पादकम् । ननु भक्तिज्ञानकर्मादिपु सरम सर्व विहाय यथं तदेकपरतया धेगमिन्यत आहुः कलाविति । भक्तिरादिउँपां, कर्मज्ञानादयो दुःसाध्या देशकाद्रव्यादिसाधनबैगुण्येन क्तुं न शक्या इत्यर्थः । हिशन्दो लोरुपेढमसिद्धियोतनाथः । ननु लोके भवतु मक्यादीनापरमार्फ तदकरणे किमायातम् । इति विशेपजिज्ञासायां स्वसम्मनिपम्मिन्नये विश्वासार्थमा में मतिरिति । मतिः सम्मतिरित्पर्यः । न शक्यं मे विषकादिनिरूपणमयापि तु । स्वत्पदाम्बुजसन्ध्याना-रस्ताचीः नवानहम् ॥ १॥ इति श्रीमहालभनन्दनचरणशरणधीमघुनाथकृती चिवकर्याश्रयदीपिका समाप्ता।
श्रीकृष्णाय नमः। श्रीगोपीजनवल्लभाय नमः। श्रीमदाचार्यचरणकमलेभ्यो नमः । श्रीमद्भगवद्धदनानलावतारश्रीवल्लभावार्यवरणविरचितः विवेकधैर्याश्रयः। श्रीगो० श्रीगोपीशविरविता वितिः । श्रीमदाचार्य रणनसचन्द्ररचे नमः । हदि भविस्य यत्वान्तं निभृत में यया स्यः ॥१॥ पत्कृपातो विकादिपाः स्वीये भान्ति हि। तत्पादत सम्बन्धिरेणुः शरणमस्ति मे ।। २ ॥ अय भक्तिमार्गानीकारेण भगवतो दासतं प्रातस्य सेवामा प्रसस्प समानिरहण पक्तिदायां नवरत्नोक्तचिन्तास्यागरपने विधिनिया पापि सहन उत्तान थापि विकादर्दाना विशेषविज्ञानामा सेरायां तारशी ना न भविष्यनीतिशीयानां विशेषेण ताद श्रीपदाचाचरणा विधिश्रिपान निलो निकायनि थियो। विवेकधैर्य सततं रक्षणीये तपाश्रयः । विवेकस्तु हरिः सर्व निजेच्छातः करिष्यति ॥ १ ॥ सेवायां महत्तस्य प्रथम विषक: सपारशिलो धैर्यम् । एतापसिदपर्य- मानपति प्रपः । एवं सति सापनाथय एत्र बने सर्व सम्पनीत्यन्न तमिरूपणम् । तर अप विकणं निरूपति विवेकरित्यति । रिसायम गरिक लपवताध्य योगक्षेमादि । मनोविक भगवन्मेपयि १ स एव करिष्यति, न त से बिहार स्वपपन्नादिक पम्पपिडि प्रथमो पिकः । पर: सगापपि स. पूर्ण स एव । मस नोकरस्यापेप्सिन परिप्यायोति विपासेन गैरव मार्ग, नाप स्लादिपम् । वकरणे हिर्मुग्यं सेवातियादिकं माताति पदेर "रिना पापी"तिमलोक निरुपितं मनरले । ननु मानापारे पं परिनि मानिनेपाल इति । स अरोकिक: महः सोपानामहित मानानि । सेवारि नानातीति विवेकयुर्याश्रयः श्रीगोपीशवाणानां वितिसमेतः । तथा न भविष्यतीत्युक्तं श्रीप्रभुचरणः किवायया स्वदेहादिप्वभिमानस्त्याज्यस्तपा देहादिसम्बन्धिमार्याधुवादिष्वपि स त्याग्यः । तेपि स्वात्मना सह भगवतैवाङ्गीकृता इति तदधीना इति तेषामपि योगक्षेमं ममुरेव करिष्यनीति सर्वदानुसन्धानेन तदर्थपपिप्रपत्रा- दिकरणं न भविष्यतीत्यपि भावो ज्ञापितः । तत्राप्यभिमानः सम्यक् सवासनस्त्याज्यो यथा तद्वासनापि न तिष्ठति । एतदेव "चिन्ता कापी"तिश्लोके 'लौकिक्चरौकिकी व सा स्पान्ये युक्तम् । एवं श्रीमदाचायादया विवेकादिना सेवाकारणे स्वापेक्षितवस्तुशापिका भावदाता, तं मत्याचार्याज्ञानो विशिष्ट जायते, तदा साला कर्तव्या, तदाहुविंद्रोपत इति । विशेषतश्चेदाज्ञा स्यादन्तःकरणगोचरः ॥ ३ ॥ तदा विशेषगत्यादि भाव्यं भिन्नं तु दैहिकात् । चेद्विशेषतः सेकाविपपिण्याज्ञा स्पासदा भगदपेक्षितार्यज्ञाने तविशेषगत्यादि कार्य कर्तव्यम् । नो नेदानाहानुसारेणैव कृतिः कार्या सेवायामितिभावः । ननु साझा कथं ज्ञायते ? तबाहरन्तःकरणेति । भगवदीपस्यान्तःकरणे गोचरः, माझा भवति, स्वमद्वारा ता ज्ञापयतीत्यर्थः । अथवा, एवं सेवाकरणे यतः समभुरन्तकरणगोचरो भक्तानापन्याकरणे मनस्यात्मनि वा, अन्तःकरणं सानादिकार्यकरणं येनेत्यतामाणे मात्मा वत्र स्थितो भवतीति शेषः॥३॥ एवं सति ताहरपकारंण सेवाकरणे भक्तस्य सर्वाशे आत्मस्वरूपत्वेन भावानेर स्फुरतीति साझापि ज्ञापन इति । तदा विशेषगतिर्भावस्वरूप ग्योः सम्बन्धिनी या विशेषगतिः सेवाया ज्ञाना भवेत् , तदादि सर्व स्नेहभारेन माध्यं कर्तव्यं, नोचेदानानु. सारेणैवेत्यर्थः । एतदेव “सेवातिरि"तिश्लोरे निरूपितं नपरले । ननु कदाचिहौरिक- कार्ये धपि भावदाना विशेषेण भोतमाहुर्भिन्नमित्ति । दरिकारसमन्धिपुरादि- विवाहोरनयनरूपादित पथा भवति तथाला भवति, न तु गैरिकका विशिष्मा | तेन लौकि तु सर्वसमर्पणानन्तर तस्य नदीयत्वानुसन्धानेन तात्तपसादतेन तार- मात्रमेवावश्यक पर्तव्प, न तु विशेपोत्साईन पनादिव्ययादिक पर्नव्पमि यादिनः पष्ठो वियेको निरूपितः । अया, भिन्नमिति विशेषात्यादिविशेषणम् । तेन दैहिकाशिनविशेषगतिकरणस्यनेन विशेषाज्ञापि दैहिकविपरिणी न भवत्परत्युक्तं মৰাণ, সনদ। १मोरिति पास।
श्रीमदखण्डभूमण्डलाचार्यवर्यश्रीमदल्लभाचार्यचरणविरचितः ।
ननु सेवायामपेक्षितपनादिसाधनाभावे सा कथं निर्वहति? तदा ऋणादिकमपि
कुत्ता सामग्र्यादिकं कार्य (सम्पादनीयं) न वेति, तत्राद्दुरापद्गत्यादीति ।
आपनत्यादिकार्येषु हठस्त्याज्यश्च सर्वथा ॥ ४ ॥
अनाग्रहश्च सर्वत्र धर्माधर्मागदर्शनम् ।
विवेकोयं समारख्यातो धैर्य तु विनिरूप्यते ॥ ५॥
आपत्याप्तौ यानि कार्याणि भगवद्विषयकाणि, वैपु हठो न कार्य: । ऋणं कृत्वापि
मया सर्व कर्वव्यमेवेति हठो न कार्यः, किन्तु ययालाभसन्तोषेण प्रपत्लाभारेन
यसम्पन्नं भवति, तदेव समर्पणीयम् , नान्यत् । मार्गस्थित्या यदेव समर्पयिष्यति तदेव
साक्षादगीकरिष्यतीविभावः । एतदेव 'भा सेवेत निर्मम' इत्यो वक्ष्यन्ति च । या भा-
वकार्येष्वपि हठो न कार्यस्ता लौकिककार्येषु किं वाध्यमिति फैमुतिकन्यायोपि सचित
इति सप्तमो विवेकः ॥४॥
ननु वैदिकेषु का व्यरस्था ? तत्राहुरनायद इति । सर्वत्र स्मातीतादिधर्येषु
अनाग्रह एव कर्तव्यः । भगवत्सेवापपि विहाय स्मार्तश्रौतादिधर्माचरणं सर्वया कर्तव्य-
मित्याग्रहो न कर्तव्यः । किन्तु भगवदाजपा प्राप्तपावश्यकं कर्म सेवानवप्तरे कर्तव्यमि-
त्यर्थः । चकारात्साक्षाद्भगवत्समन्धिव्यतिरिक्त सर्वेप्वप्पनाग्रह एव कर्तव्य इत्पष्टमो
विवेकः । ननु वैदिकचननामहः कयं भवेचत्राहुर्धर्माधर्मेति । धर्माणां स्मार्तादीना-
मधर्माणां तनदकरणजनिनानामग्रदर्शनं पर्यवसानविचारः कर्तव्यः, पस्मिन्छने अपमों
भवेद स न कर्तव्य इतिभावः । मानौतभगार्मास्तु उत्तरोतसलिमा, तत्र पया
श्रौतविधौ सातत्यागे न दोपस्नया भगवद्धर्मकरणे उभयविषस्यापि त्यागे न दोषः,
सांधिकालक्लादिवि विचार्य नद्धर्माणां गौणत्वात्स्वपर्मलाभावाचानामह एव कर्तव्य इति
नवमो विवेक उक्तः । यत्तु कर्मादिकरण तद्भगवदामया मार्गेऽपामा यशङ्कामाायेति झेपम्।
एवं भगवत्सेवाविषपाविवेकानुस्योपसहरन्ति विवेकोपमिति भगात्सेवापां परस्याएं
विवेकः सम्पक्षकारेण विस्तरेण आख्यातः । एतादृशाविवेकन प्रवृत्तस्य सेवानि हो
भविष्यतीति भावः। एवं विवकेन सेवायो मरतस्य यहिभजनसिदिमकारमुस्वा धैर्य
विना सेता न मिददिति मुख्यमान्तामिति तत्सिदप यु निरूपयन्ति धैर्यमिति ।
पूर्वमति चित्तोटेशमियादिना धैर्फ निरूपित, माम्मतन्तु विशेषेण निरूप्यत इति
विशन्दार्यः। तुमब्दः धयोपत्रमापकः ॥ ५॥ नाणमेवाः विदुरममिति ।
त्रिदुःखसहन धेर्यमामृतेः सर्वतः सदा ।
तकवद्देहवद्वान्यं जडवतोपभार्यवत् ॥ ६॥
विकर्याश्रयः श्रीगोपीशचरणानां विकृतिसमेतः । प्रयाणामाघिमौतिकादीनां दुःखानां सहनं धैर्यमुच्यते, व देहसम्बन्धननिवे दुःख भौतिक, कामादिननितमिन्द्रिपसम्बन्धि व आध्यात्मिक, परीक्षार्य प्रारम्प- मोगार्थ का भगवत भगवदर्यस्वासितकरणविलम्रननितं तदापिदैविकम् । तेषाम- सहने चिचव्याकुलतया सेवा न सिधेवदयारे सेक्कस्य स्वधर्महानिरेवेति सेवासिद्धयर्य तत्सहनमेव कार्यमितिधैर्यमुक्तम् । तदप्यामृतेः मरणपर्यन्वं, अथवा यावदायुरपि चेद्र- पेचावदपि धैर्यमेव रमणीयम्, न त्वन्तनिष्ठा हेया। तदपि सर्वतः देहेन्द्रियादिसर्वसमन्धि- प्वध्येकस्य द्वयोर्वा सहनं तनास्ति, किन्तु सर्वतः । तदपि सदा निरन्तरं वत्सहनामिविधैर्य- लक्षणमुक्तम् । अतः परं देहाभिमानस्य विद्यमानत्वाद् दुःखसहनं दुष्करमिति दृष्टान्ते- न तदभिमानाकर्तव्यत्वनिरूपणाव तदुपपादपन्वि तक्रवदिति । तमं यया निःसारं भवति हेयतेन तर नाभिमानः । कदाचितभापि न दुःखं भवेत् । नवनीतन्तु तत्सारं तवाभिमानो जायते तनापि दुःखमिति तद् गृह्यते, तया देहादिषु तत्सम्बन्धिपुच निःसा- रन हेयत्वयुद्धया तवाभिमानस्स्यायः । तस्यागेन तत्कृतमानापमानदुखेपपि अमि- मानत्यागेन दुःखं न भविष्यतीत्याशयेनोक्तं तफवदेहवदिति, तक्रवदेवता देहादिषु तताम्बन्धिाच भाव्यमिति । अनेन भगवत्सम्बन्धिकार्येष्वेव नवनीतवदभिमानो रक्षा णीय इति सूचितम् । तेन भगवदीयानां प्रभुसेवाकरण एव सुख, नदमाये दुःखम् । न तु देहादितत्सम्बन्धित बद्भवतीति शापितम् । एवं भौतिकदुःखसहने दृष्टान्त निरूप्याध्यात्मि- कतत्सहने दृष्टान्तमाहुः, जडवदिति । आध्यात्मिक दुःख इन्द्रियादिसम्बन्धिकामकोश- दिजन्यम् । तत्सहने जडस्य भावना कार्या । जडस्य यथा सकलेन्द्रियाणां भगवद्भावा- विश्वात् न तदिन्द्रियजन्यदुःखमानम्, जडत्वं च जातम् । नया सेवायां महत्तस्यापि सकलेन्द्रिपाणां तदीयात्वानुसन्धानेन स्वाभिमानामावाद भगवत्येव विनियोगकरणे निरन्तरं तरसेवागुणकीर्तनस्मरणावेशेन न कामादिजनितदुःखं भवेदित्याशयेनोक्तं जडचदिति । एवं सति यावत्पर्पन्तं जडबद्भावनया निरन्तरं भगवदाविष्टत्वं भवेता- वत्पर्पन्तं तचदिन्द्रियदुःखसहनेन सेवा कार्या । न तु विषयभोगादिकं कार्यमिति । अतितुच्छत्वाचदावेशेन भगवदावेशाभावास । एवमाध्यात्मिकं निरूप्पाधिदैविके दृष्टान्त. माहुर्गोपभावदिति । पारधभोगार्थ परीक्षार्थ वा प्रभुश्चेद्विलम्वते तदा गोपभार्यानां भावना कार्या । ययान्तहगवानां जारवद्धिहेतुकपारब्धभोगायें विलम्ब रुवस्वदो- गानन्तरं तत्मासिनर्माता तथा ममापि प्रारब्धभोगानन्तरं भगवान दास्यत्वेरेति युग दुःख सोढव्यमितिभावः । अत एवामृतेरित्युक्तम् । तासां गुणमयदेहत्यागानन्तरमेव फल १पि सहनमेव कर्तव्यमिनि पाठ कास्तके।
श्रीमदखण्डभूमण्डलाचार्यचर्यप्रोमदल्लभाचार्यवरणविरचितः । जावमिति तदनापि परीक्षार्थ नेविलम्बते, तदा तद्यतिरिक्तानां भावना कार्या। पया तासां समारम्भे आगमनानन्तरं निषेधवारिश्रश्णेपि पापल्लीवदन्यथाभावो न जाता, किन्तु स्वापेक्षिवाभावनितदुःखभरेण स्थाणुवरिस्थतानां व्याकुलसकलेन्द्रियाणामपि तदुःख सोद्वा धैर्यमवलम्प तच्छरणागतिभक्तिमार्गानुसार्युचरदानमेशभून्, न तु गृहा- दिपु प्रत्यागमनेच्छा जाता । तयास्यापि साइम्भावनया विलम्बजनितहःखसइनेन निरु- पधिरहेन मार्गस्थितौ भगवान्फलं दास्यतीतिदुःख सोन्यमित्युक्तं गोपभार्ययदिति । किञ्च, गोपानां भाषाः, भार्यापदेन भर्तु योग्या ययपि तयापि तासां तत्कृतमाणपोष- गादिकं नापेक्षितं किन्तु भगवत्कृतमेव । भगवत्कृततदभार तासां जीवनमेव न भवति । पतस्तदुपयोगाभावे सर्वमेव भरणपोपणादिसाधनं गृहादिकं त्यकं भवति । एतदुपयोग एव सद्भोग्यत्वेन गृहीतो भवतीति । तया प्रभुविलम्वकरणेपि तद्वयतिरिक्तदेहादिसम्बन्धि पूर्वोक्तं किमपि न भावनीयं, किन्तु मनुः मय भरणपोषणादिकं करिष्यत्येवेतिनिश्चयेन धैर्येण स्थातव्यमिति गोपभार्यपदेन झाप्यते । किन, श्रीपदापार्याणां साक्षात्पुरुषो. मास्यत्वेन तदुक्तयाक्यानामुपनिपद्रूपत्वादत्र भार्यापदे हस्व छान्दसो ज्ञेयः । स्वकी- यानामेताइयेव पुद्धिर्मविष्यति, परन्तु कस्य निदान्तस्याशङ्का भवेतदभावार्थ पक्षान्तर- मुल्यवे । यद्वा, गोपानां भार्यः भरणपोषणयोग्यः, अर्याचेपामेव भार्यजन इति यावत् । पदा, गोपभाः भायांनां समूहो भार्यः, गोपाना भार्पस्तत्समूह इत्पर्यः । एवं दृष्टान्तरपभावनया तचहुःख सहनेन फायरनोवारमाचिर्मवेत् । तथा च देहसम्बन्धिी- तिकालसहने मघमं सेवापां मट्टरया कापिकी निर्मवेत् , इन्दिपसम्बन्ध्याध्यात्मिक- दुःखसहने मनो भगवमिष्ठं भवेदितितत्मपत्तिः । ततो भगात्सम्बन्धितत्सदने भगवरहत- विलम्बाय विरहात्मकत्वेन तस्वभावाइ निन्तरं गुणगानकरणे वचोपि तभिष्ठं भवतीति विधा पपचिनिलपिता । अत्र झेय, देहेन्दियादिसाबन्धिनभेत्मविठूला भवन्ति, बदा सेवानरायत्वेन तेषां परित्यागः कर्तव्य इति सेवामकरणे तत्वार्यदीपे निरूपित "भार्यादि- सुकूल"दिति, तेन तत्यागे स्वोपयोगाभावाचे तिरस्कारादिकं कुर्वन्तीति लोके दृश्यते । क्या सवि भगवदीयस्य तु नेपु क्रोधादिकरणे पाहिमुख्य सेवापतिवन्धो भवेदिति तत्सा पशुसेवार्य सोडव्यमित्या वत्सइनमुक्तमन्यया तदभारे दुरवस्यैवरमारान कि सदन स्पादिति भावः॥६॥ ननु तिरस्कारादिना ते चैद दुःख न प्रपपुस्तदापि कि तेयां त्याग एक कन्य इति चेचत्राः मतीकार इति । प्रतिकारो यहछातः सिद्धश्येन्नाग्रही भवेत् । भार्यादीनां तथान्येपामसतश्चारमं सहेत् ।। ७ विवेकर्याश्रया, श्रीगोपीशवरणानां विकृतिसमेतः । भगवदिच्छया प्रतीकारः सिद्धश्चेद्वादियो बनुकूला उदासीना वा भवेयु. स्तदा तस्यागे आग्रहवान् न भवेकिन्तु अनुकूलत्वे भार्यादिभिरपि सेवा कारयेदु. दासीनत्ये स्वयं कुर्यात् । परन्तु तेषां तथापि योगक्षेममात्रं कर्तव्यं न तु त्यागः। मतिकूलत्वे त्याग एवं कर्तव्य इत्याशयेनोकं नाग्रही भवेत् । प्रतिकूलत्वाभावेसि सर्वपा त्याग एव कर्तव्य इत्याग्रहवान् न भवेत् । हठेन त्यागकरणे समीचीनानामपि भार्यादीनां क्रोधावेशेन स्वहिन्देपकर्तृवं संभवतीति वैन सेनापतिबन्धका स्वयमेर भवतीति तन्न कर्तव्पमितिभावः । भौतिकदुःखप्रतीकारे परमियं व्यरस्या । आध्यात्मिकदुःख- प्रतीकारेपि व्यवस्थोच्यते । प्सालेन्द्रियाणां स्वस्वविपपभोग्यवस्तुत्यागे दुःखं भवति । तद्भगदिच्छया स्वभोगार्थ सेषु पुरैव प्रतिरेव न भवेद् वेत्तदा तजनितसेवान्तरायामा वात्तत्यागे महवान न भवेत् । यतस्तादशस्य सरुवन्दनादिसालभोगसामग्री स्वाभु. निमित्वेनावश्यम्पेक्षितेति तदुपयोगे जाते तदरमहाप्रसादलेन सौभाग्यपत्येन तदुप- भोगकरणे वायाभ्यन्तरशुद्धया भगरधर्माविष्टत्वं मरतीति न तस्यामः । एवं सति विष- यभोगार्थ सर्वस्यापि त्यागस्तदभावे तस्यालौकिकले फलमध्यपातिवान सत्याग इति सूचितम् । इदमेवोक्त सेवाफले, 'अलौकिकभोगस्वित्यादि, आधिदैविरुदुःखप्रतीका. रव्यवस्थामा प्रारब्धभोगानन्तरं परीक्षानन्तरं वा भावान काया सेवोपयोगि पनादिर्क दातुमिच्छेञ्चेत्तदा साक्षात्परम्परया च तदिच्छया स्वप्रयत्नं विनय तामाप्त भवति, तदपि निरुपाधिकं विहितं शुद्ध चेद् भवेचदा तत्यागे आग्रहो न कर्तव्यः । जन्मान्तरे प्रतिपन्याभावार्थ मम पारब्धादिभोग एव भवतीति, प्रारब्धस्यापि तदधीनत्वात् । किन्तु भगवता स्वीपभोगार्थमेवेदं दत्तपिति मला सर्व भगवदर्थमेवोपयोक्तव्यं न तु स्वार्थ- मिति भावः । तया चोक्तमपि, 'निजेच्छातः करिष्यती पत्र स्वीयानामविकतेच्गत इति । सिद्धान्तमुक्तावल्यामपि भजनोपयोग्यांपैशायामपि मभुणैव सबै सम्पायत इति, तथा "कृष्णं परं ब्रह्म त्यस्य विवरणे । एवं सामान्यत आधिभौतिकादिदुःखसहनमुद्देशक उक्तम् । अतः परं देहादिसम्बन्धिनः क इत्याकालायां प्रथमं देहसम्बन्धिनो विशेषत आहुः भार्यादीनामिति । भार्यादयो भरणपोषणयोग्यास्ते देहसम्बन्धिषु स्वसमानास्तेषां भरणपोषणमेवापेक्षिनं न तु धर्मः, भरणपोपणं नाम सर्ववस्तुनो देदादिपर्यन्तस्य सवि. पयको विनियोगस्तदकरणे तेतिनयं कुर्वन्ति, तदा तत्सर्व सहरमेव कुर्यान्चतु क्रोशदि, तत्करणे तदावेशेन सेवान्तरायो बाहिर्मुख्यं स्पादिति । तथान्येपां बान्यानां मिया- दीनामुदासीनानां बहिर्मुखानां च पूर्वसामपिकनित्यमिलनव्याहारापकरणेनेर्पया तप्यनि- कम कुर्वन्ति, तस्यापि सहनमेव फर्तव्यम् । अवा मकवेपि बान्धवानां बन्धुत्वसभावाद् विभागादिननितहेपेणापि अतिक्रमः मम्भवति । अशच, असतश्च सदासतोपि, यथा भार्याधुवादयो देहसम्बन्धिनस्तथा दासो घनसम्बन्धी पोष्येश्चन्तर्भवति, तेषां सङ्गेन श्रीमदखण्टभूमण्डलाचार्यश्रीमदल्लभाचार्यचरणविरचितः । सोपि चेदविक्रम कुर्यातदपि (दुर्खि) सह्यमेवेत्यर्थः । एते तु प्रतिकूला धर्मविरोधिन उकाः । चकारात् सधर्मानुरोधिनः शिष्ययनादयोपि शेयाः । ममादतो जीवस्वभावात् शिष्योप्यविक्रमं चेत्करोति, भक्तोपि बदा स्वप्रारब्धादिभोग एवायमिति भावनया धैर्पण महावसइनमेव कर्तव्यं, न तु क्रोधादि । क्रोधादिकरणे तु आसुरावशेन सेवाप्रतिवन्धो बाहिर्मुपश्च स्यात् । किश, शिष्यभरुयोरपि प्रभुसम्बन्धो पत्तो सकृत एव, पुनस्तर शोधकरणे तदनिष्ट कृतं भवेत् । न हि भगवदीयानामय स्वभावो यत् (स्वकीयानां) खाडीकतानामनिष्ट कुर्वन्ति इति तत्सइनमेव कर्तव्यमिति भावः । एवं सेवाप्रतिबन्धक्वेन भार्यादीनां त्यागेन तत्कृतातिक्रमप्सहन निरूप्य सेवापत्ति- पन्धकत्वेन भोगत्यागेपि तत्तदिन्द्रियजनितस्याध्यात्मिकदुःखस्य सहनमाहुः स्वयमिति । स्वयमिन्द्रिय कार्याणि कायवामनसा पजेत् । अरेणापि कर्तव्यं स्वस्यासामर्थ्यभावनात् ॥८॥ स्वयं स्वभोगार्थ इन्द्रियकार्याणि त्यजेत् सेवायां प्रतिबन्धकत्वात् । तानि च निधा, कचित् कायिकानि, कचिद्वाचिकानि, कनिन् मानसानि भान्ति । तत्यागकयनेन प्राकृतविपयांत्पाजयित्रालौकिकेषु तेषु तानि योमनीपानीति भा एवं सति पार• पर्यन्तमलोकिक्षु युक्तानि मरेयुस्तावत्पर्यन्तं सत्यागमनितदुःखं भरतीति तरसहनमुक्त- मिति ज्ञेयम् । एवमाध्यामिक निरूप्यापिदैविक तदाहुरशूरेणापीति । पाल्पभो- गाथै परीक्षार्य वा विलापकरणे स्वापेक्षितवस्तुमारभावाचदुःखं सोई पचप्पशूरो धैर्य- रहिता, यथा दरिद्रः प्रात्यहिकमायामाणे, नयाप्यशूरेगापि न कम्पम् । ना हेतुः, स्वस्येति । वस्पासामध्य भारनीय, पूर्वोक्तदुःस्वसहने स्वरयत्नोप्युक्तः । भावलत. क्लिम्ये मयत्न एव न, तत्करणेपि वितः प्रभुकतो भरेदिति, स्वरयत्नसाभ्यत्वाभाराम् । स्वस्पासामध्यभावनपा 'तयैव तस्य लीलेत्यानुसन्रानेन धैर्यमेव फरव्यमितिभावः । ननु स्वशक्यमपि पूर्वोक्त दुःखसहनपशवयं, कुतस्तरां यर स्वस्प सामर्थ्यमेव नास्ति तरसहनमिति किमर्धमशक्पोपदेश इत्यत भाहुरशश्य इति । अशस्ये हरिरेवास्ति सर्वमाश्रयतो भवेत् । एतत्सहनमत्रोक्तम्, सेवापा प्रताप विश्वर्यादिपिता दशक्तिर्भपचदा हरिव शरणमस्ति नान्य इति मनसि भारनीयम् । विरग्यांदिपयनकरणेपि वैदयक्तिस्तदा तदर्य प्रभुचरणामने दवया स पर ससम्मादयिष्यनीति भावः । यतः स हरिः सादरसहतां, तदेवाः सर्वमाप्रपन इति । माधये कुनै सर्व सेस्पति मारपपि शयं भवेत् । सि. कोपि भविपति, पंसपि भविष्यतीनि भारः । यदा, तस्मिन्ने सौ शयं सर्वथा विवाधैर्याश्रयः श्रीगोपीशवरणाना वितिसमेतः । यदशक्यं च तत्सर्व भवेदन्यया तदभावे स्वशक्यापि न भवेदित्यर्थः । किच, प्रयत्न कर- णेपि तदेव सिद्धधेनतन्यद । निःसाधनसेन शरणागतौ तरपया सबै युगपदेव सिद्धये. दित्यपि झापितम् । अनेन सर्वसिदधर्यपाथय एवं कर्चव्यो नान्यत् किश्चिदिति निशितम् । एतदेवोकं कृष्णाश्रये 'विकधैर्यभस्पादिरहितस्येति । एवं धैर्यलक्षणमुक्त्वोपसंहरन्ति एतदिति । अत्र भक्तिमागें पूर्वोकप्रकारेणोक्त मदनकरूपमेतत् । अतः परमाश्रयो निरूप्यते। आश्रयोतो निरूप्यते ॥ ९॥ ऐहिके पारलोके च सर्वथा शरणं हरिः। नितरां विशेषेण रूप्यते सरूपतः कथ्यत इत्यर्थः । यहा, यह एतद्वि- पैकादिकं सर्वमाश्रयं विना अशक्यमत आश्रयो निरूप्यते । यस्मिन्कृते सर्व भवतीति मथमं समुदायेनाश्रयस्वरूपमाहुरैहिक इति । भक्तिमार्गानीकृतस्प सेरायां महत्तस्प प्रभुसेवाव्यतिरिक्तकर्मकरगस्पासधर्मत्वेनैवेहिकारलौकिकतावनकरणाभाग रोवायामप्यन्तरायबाहुल्येन तयास्वाभावाच नदुभयमपि कथं सेस्पतीति नसिद्धयर्थं शर. णमेव सर्वात्मना भावनीयं न तु सेशं विहाय किश्चित्साधनान्तरं कार्यम् । शरणगती मनुः स्वपमेन सम्पादयिष्यति । यतो हरिः सर्वदुःखाचा, स्वकीयानां निरूपधिभगव- सम्बन्ध्यपेक्षिताभावननितदुःखं दरिष्यत्यैरेति भावः । एवं समुदायेनाश्रयमुक्ता तत्रापि प्रस्पेकभेदेन विशेषत आश्रयस्तरूपमाहुःख. हानाविति। दुःखहानौ तथा पापे भये कामार्थपरणे ॥ १० ॥ भक्तदोहे भत्त्यभावे भक्कैश्वातिकमे कृते । अशक्ये वा सुशक्ये वा सर्वथा शरणं हरिः ॥११॥ भक्तिमार्गीयस्य सेशयां प्रचस्प पूर्वोक्तदेहेन्द्रियादिसम्वन्ध्याधिभौतिकादि- दुःखहानौ धैर्येण तस्कृतचित्तोडेगाधभावार्थ शरणमेव भाषनीय, तेनैर सर्वे सेत्स्यतीति प्रत्येकं तत्कायें भावनीयमित्यर्थः । तथा पापे पापनिवारणे पूर्वसामयिक प्रमादाना- यमाने च, सेवायां भगवद्विषयके देहेन्द्रियादिभगवदपरापादिरूपे च तदेवोक्त "महं त्वां सर्वपापेभ्य" इति । न तु तदर्थे प्रायश्चित्तादिकं कर्तव्य, तत्करणे शरणधो गच्छे. दित्यर्थः । तथा भये रागचौरादिजनिते, पापादिविष प्रभवपराधविपये च आधिभौ- सिकादित्रयं सर्वत्र झेयम् । कामार्थपूरणे इति । कामानामभिन्नापाणां येः पदार्या, ऐहिका भगवत्सम्बन्धिनथ । तत्राप्पैहिकं द्विविध, देहिकमेन्द्रियश्च, वत्पूरणे च, क्यापि विशेषमाहुर्भक्तबोहे इति । प्रमादतो जीवस्वभाववाशक्तस्य द्रोहो जातक्षेद सोपरायः श्रीमदखण्डभूमण्डलाचार्यवर्यश्रीमदल्लभाचार्यचरणविरचितः । केनापि दुरीकर्तुं न शक्यते पांदापापि, किं पुनः पुष्टिमार्गे । यथा दुर्वाससोम्बरीप- विपये तपास्यापि । तया सम्भरे शरणमेव भाग्नीयं नत्वन्यत् । भक्त्यभावे सेवायां महत्तस्यापि स्वरूपे स्नेहो न जायते, तदर्थ भक्तैश्च स्वस्पातिकमे कृते सति, नदि भगवदीयानामय स्वभावो यानिमित्तं विना यस्य कस्पाप्पतिक्रम कुर्वन्ति । तत्करणे तु स्वदोषमेव विचार्य शरणं भावनीयं तदोपनिटत्यर्थम् । किञ्च, अशक्ये वेति । स्वस्थ फर्तुमशक्ये कार्य शरणं भावनीयम् । अशक्य इत्युक्ते शक्यस्य स्वपमेव कार्यपित्ति न ज्ञेये, तबाहुः सुशक्य इति । सर्वथा शरणं हरिः । सस्य सुतरां शश्यापि, क्यापि शरण- मेव भावनीय, प्रभुशरणेनैवेद सिद्ध नान्यथेति । मभोषियातकरणे स्वस्य साराभा- पात्मकृतेनाभिमानान्धरणधोपि गच्छेदिति सर्वात्मना तदीयत्वानुसन्धानेन शरण- मेव भावनीयम् । यता प्रभुः हरिः सर्वदुःखहना अशक्पादिदुःखं इरिष्यत्येपेत्यर्थः । अथवा, अशक्ये भगवत्सम्बन्धिनि साधनासाध्ये, सुशक्पे साधनसाध्ये लौफिरपि तदेव भावनीय, न तु स्मयनः कन्यः, करणे शरणधों नयेदिति ॥ ११ ॥ अहङ्कारकते चैव पोष्यपोषणरक्षणे । पोष्यातिकमणे चैव तथान्तेवास्यतिक्रमे ॥ १२ ॥ फिश, अहङ्कारयते चैव जीवस्वभावशात्वेनापि उदासीनेन भक्तेन च सहा- पारः कृतस्तदा तेनासुराशो भवत्येवेति, पथदिवेक जाते पयातापो मापने मपाऽसमी. चीनं कृतमिति, तदोपपरिहारार्थ शरणमेव भावनीयम् । यद्वा, प्रभुपाभरेग मौन्या मभुगा सहवाहवारः कृतस्तदापि दोपपरिदार्थ तदेव भावनीयम् । किच, पोल्याणां पोपण रक्षणं च, तसरणेपि सदेव माननीयं, न तुमपत्रः कार्यः । पोप्यातिप्रामणे धैष । पोप्यादीनां भादीनां चकाराइन्पेगो बन्धुदासपर्यन्तानामप्पनिक्रमे, तपान्तवासी सशिष्पस्तलने प्पविक्रम शरणमेव मावनीयं, न तु क्रोपादिपम्, सत्करणे आमुरापेशसम्भवा । पिश, तदुपरि स्वस्य कोषकरणे शिष्पस्यानिट भयद इति मुकृतिना नारं स्वभावों यदलीनं स्यजन्तीनि । तस्प दण्डादिकं भुरेव करिष्यतीति तवाभिमान न सरपीहानिः कार्येति भावः ॥१२॥ ननु मानानां चित्तादीनापध्यासनिरचिरतिकठिना, तदभारे सर्वमेर कठिन मिति चेनमारलौकिकेति। अलौकिकमनःसिद्धौ सर्वायें शरणं हरिः। एवं चित्ते सदा भाव्यं वाचा च परिकीर्तयेत् ॥ १३ ॥ मन इत्युपत्रणम् । फिन्तु सपा देदिपादन प्रातांमनिपा पण मलौफिरलं भवति तसिदो सदनन्तरं सागरिकमस्लपदार्यममापरि हरिप ३ विधैर्याश्रयः, श्रीगोपीशरणानां वितिसमेतः। शरणं माननीयो नान्यन् , देवाहुरेवमिति । एवं मकारेण चित्ते ज्ञानरूपे, न तु बडे, सदा निरन्तरं भावना कार्या। अप च वाचापि परितः कीर्तयेन्निन्तरं मुरखे. कययेदित्ययः । क्षणपात्राायने वदैवासुरभावप्रवेशः स्यादित्युक्तं सदेति । वित्तस्य ज्ञानरूपस्वाभापि कीर्तनमस्यापश्यामिति कीर्तनमुक्तम् । एतदेवोक्तं नवरले 'तस्मा- सर्वात्मने स्ययातःकरणे तथाभारेऽतथाभारे वा पदनमावश्यामिति । यदा, चकारात् कागेन सेवापि कर्तव्या, मनसा भावना, वाचा कीर्तनमित्ति विविधापि पनिनिरू. पिता । एवं सति सर्वमेव पूर्वोक्तं शक्यं भविष्यतीति भावः ॥ १३ ॥ नन्येवमपि सति महत्पशक्य एवार्थे हरिशरणं भावनीय स्वशपाभगति भारः किमय देय इनि तदर्थ देवान्तरमनन वैत् कुर्यात्रादुरन्यस्येति । अन्यस्य भजनं तत्र स्वतो गमनमेव च । प्रार्थनाः कार्यमा।पि तथान्यत्र विवर्जयेत् ।। १४ ॥ अन्यस्य देशान्तरस्य भजनं स्वतस्तदर्थगमनमपि वर्नेन कुर्यात् । चरा. दन्योरणगापि तत्र न गच्छेत् । यदि न वर्जयेनद। शरणादायों गच्छेदित्यर्थः । इदमे- नोक्तं 'गासादेशेषु' इत्यत्र 'मदितरभननापेक्षगमिति । ननु प्रभो प्रार्थनाया अनुचितत्वात कदाचिवदार्यापेक्षायां देवान्तरादौ प्रार्थना मा कुन तु भजनगमनादिकं तपाहुः प्रार्थना इति । यथा अन्यस्य भजनापनादिकं न कुर्यात्तथा कार्यमाने महति स्वल्पपि वा प्रार्थना अपि विवर्जयेत् । विशेषेण सर्वथा न कुर्यान, कापि प्रार्थना न काति पहुवचनमुक्तम् । * अन देचन पूर्वपक्ष कुर्वनि, प्रार्थनारहिना न पीति, यतो फिर पारमार्थिक वा सर्वेषां प्रार्थनीयमस्ति । परमविरक्ता अपि पारमार्थिक प्रार्थयन्त्येव । फेचन मुत्पादिकमपि न यान्ति, तथापि भगवचरणारविन्दानुरागरूपां भक्ति प्रार्यय- वाले तु तादृग्मत्युसपनागर किपपि न प्रार्थयन्तीति तदात्यन्तं परमप्रेमासक्ति व्यसनवनो वनवासिनस्ते तु स्यले स्थले प्रार्थितन्तः । अन्ये तु मुत्पादिक मार्थना वनवासिनानु दासानरचदृष्टयादिनितलौकिमार्थना तिटनीति तदहितभक्तमनाभावात् प्रार्थनानिषेधः कथं क्रियते ? बोच्यते । रे दुर्विदय ! सन्दियतया विदधमन्योसि, यतो यह्मादीनां मनसाप्यालयितुं न शक्यं तत्स्वरूपे ये गुम्निः प्रेशसक्तिव्यसनिनः येपातयतिरिक्तं लौकिकं पारमार्थिक वा न किसनास्ति। तेषां लौकिनिमि- समानादिकं ब्रवीमि । पार्द वदास प्रशिकरक्त, वाच्यते । एनस्तरूपानभिज्ञ स्वरूपनिटः सन् शृणु ! येषां वदन्नराये बुटियुगायते वे तदन्तरायशाहिष्णस्वाद * अपू पूर्वपक्षोत्तो सस्पतम्धी प्राचीरेषु नया पुस्तका मस्त मिचीएका यते । मता पनापावनिरेन दिया पक्षिसे ते स्परताय ।
श्रीमदखग्भूमण्डलावार्यपर्यश्रीमद्रालभाचार्यवरणविरचितः । सानिटे सम्पन्ने संभवतीति प्रार्थनं व्यसनस्वभावेन न तु स्वनिष्ठं भवतीति कुतो लौकि. कनिमित्तप्रार्थनसम्भावनापि । यद्यपि तादृशानां मध्ये अनिष्ट न सम्भवति, तथापि तत्र ब्रीडारसायेशेन यत्किञ्चिदपि प्रभो स्वसाम्पाधिक्याने तनिरोधार्थ मभुणैव क्रियत इति शेयम् । अन्यथा ननिरोधो विशेपरसानुवश्च न भवेत् । एतदेव दावानलपस्तावे गोपेषु भगवति लौकिकमायेन स्वसाम्येनैव क्रीडासक्तेषु, गोषु च तृणलोभेन भगवन्तं विस्मृत्य बनगव्हरं पनिष्टासु प्रपत्तिहीनैः सह भगवरक्रीडा न भातीति तनिरोधार्थ प्रभुणैव वनाग्निरुत्यापितः । अन्यथा तादशमभुक्रीडायां विनकरणे कः समर्थः । अत एप तत्पपयनन्तरमेव तस्य या शान्तिः कृता सापि प्रभुणैव कुता न तु साधनैः । तत्केवलं स्वीयत्वं ज्ञापनाय, इतरमम्बन्धे स्वीयत्वाभावात् । अमे तैरपि नथैव विज्ञापितम् तदा, 'नून त्वद्वान्धवाः कृष्ण न चाहन्त्ययसीदित, वयं हि सर्वधर्मज्ञ स्वनाधास्त्वत्परायणा' इति । अस्यार्थस्तु ये केवलं त्वद्वान्धवा एव तेपि नावसीदन्ति, किं पुनः प्रपन्ना इति । बपति शापयन्ति वर्यामति । अत्राय गहाभिसन्धिः } केरल बन्धुत्वेन तरस्वभावात् कदाचित स्वसाम्येनापि मभूणा सह कीडादिक संभवति, एवमिदं तत्मपन्नानामनिकारक तदस्माकं पूर्व जातमिति वापराधनिवेदनं, तथापि सा क्रीडासाकं त्यां बिना न भवति. किन्तु, वया सहैव, त्वयतिरेकेण जीवनमेव न मदितिविशेषणद्रयेन योत्पते । अतः सर्वात्मना अपनानां नो बनामिभयं न भवति, कि महि, पूर्वोक्तापराधेन महदनिष्ट सति स्वस्वरूपा- न्तरायस्तू ततोप्यमय इति मायनमिव कुर्वन्तः स्वापरा, मपत्रिं च ज्ञापयन्ति ? मत एव पूर्व श्लोके सर्वधाप्रार्थनाया अनौचित्यमित्यभिप्रायेणैव त्रातुमईथेत्युक्तं, नहु "बाही"तिपूर्व पपि कालिपसझानन्तरं दावानलोद्गमे न शक्नुमस्त्वचरणं सन्त्यक्तुपकुतोभयमि'स्पेवोक्तम्। दादातु सोढुं शक्यो न तु चरणवियोग इति विवरणे विकृतं, न हि व्यसनव्यतिरेकेणैवं वचनं सम्भवतीतिभावः । ननु पूर्वमेवं कथमेताहशी मपत्तिनं कृता तबाहुः 'सर्वधर्मते नि । सर्व धर्भ त्वमेव नानासि, वयं तु महा अतोस्माकं तदुपदेशाभावेन तदानाद कोटारसा. पेशेन स्वत्पतिपचिविस्मृतिर्भवतीत्यर्थः । इदानी प्रमेयवलादेव तज्ज्ञानं जातमिति सर्वथा अपनानामस्माकं स्वस्वरूपान्तरायो मा भवतिति स्वरूपाशक्तिरखमानव मापेनमित्र कुर्वन्तः सशरणगतिरेव शापितति सर्वमनवयम् । नपतावदपि मार्थितमिति घेवत्रोच्यो। रे कृतकोम तिष्मितमते ! शृणु । श्रीगोकुलं तु केवलं तदेकर, तेषां भावोपि ताश एवेति शस्य तस्प प्रभुपि स्वयं सदेपर एवेत्पुभयोः परस्परकपरतमेव लोके शापयितुं तनियन्तयेन भभुणैव तया प्रेरितं यथा : मार्थित, तदनन्तरं सदैव स्वयमेव सासाचनि- वृत्ति न कृतानिति न तस्कुनमायिनेतिनिगमकृतेपि प्रपत्यमा कोपि मापने तब फरोतीनि स्वस्प सादर्श पति नत्पावाभाव एव जाप्यत इति भारः । प्रार्थनादिनिघस्तु सापनदशायां न तु फलानुभवे । तपाच, श्रीगोकुलं तु फररूपं फलोपयोगिसबरसात्मक विवधैर्याश्रयः श्रीगोपीशवरणानां वितिसमेतः। भगवता स्वलीलार्थ स्वस्वरूपेणैव साक्षासस्टीकृतम् । सा लीला बहिर्लोकानुसारिणी, अन्तस्त्वलौकिकी, बहुप्रयोजनगर्भितेति यथा यया नतद्रसामिकास्तारवा लीला भवेयुः, ततः स्वमाहात्म्यगुणादिकं सर्वजनीनं च भवेत्या तया भागनेर सर्च फरोति, न तु तेपां तत्स्वरूपन्यसनरतां तदन्यत्किश्चिदपेक्षितम् । अत एव दिनपल्यनुग्रहे फर्मु पनसैर ताशानां क्षुधामुत्पादितवान् । अन्ययाऽऽकस्मिकी तारशी दुःसहा सा कयमुत्पत। एवं सति श्रीगोकुले तत्तनिरोधार्य सर्व भगवानेव परोनीति न विश्चिपूर्वपक्षावसरः । किच, तेपां स्वरूपापेक्षापि आसक्तिव्पसनस्वभारत एव न तु कृत्रिपा । तादृशी पेट पातौ शाम्येत । इयं तु तत्मासापि उत्तरोतर पद्धत इत्येतस्याः सती भित्र रीतिनान्य मार्गीयपूर्वपक्षादिना क्लुपयितुं योग्येति दिक् । पिच, प्रार्थनं तु यावन्मनोरयं भवति, प्रकृते पनोरयान्तमानन्दं दत्तवान् इति प्रार्थनानपेक्ष एव सर्वपति पिम मार्य भये। पन दृश्यते तर हेतुः पूर्वमुक्त एवेति सर्व मुस्थम् । एवं सति धीगोकुलस्वरूपीराती. नापन्नानात् तत्मार्थनावरोक्नेन तदितरस्यापि प्रार्थना पतपेतिको निरस्तः । रस्तुनमाहुः । ननु सर्वेषां देवानां धर्माणां च त्यागेन केवल भगान्धरणगतारपि को वेद भगवानपैक्षितं दास्यति वाल पेति चेचनाहरविधाप्त इति । अविश्वासो न कर्तव्यः सर्वथा राधास्तु सः । ब्रह्मास्त्रचातको भाव्यौ प्राप्त सेवेत निर्ममः ॥ १५ ।। अस्मिन् शरणगमनेऽविश्वासो न कार्यः, यः सर्वथा पापकः । पाधान्य रापेक्षयाऽयमधिकापक इति सर्वधेत्युक्तम् | पनो विधान परिसर शरण- धों गच्छेद, इदमेवोक्तम् अन्यसंमेलने वा ग्रमाययाय उक्त' इति सेन विपास एर फर्चव्य इतिभावः । अतः परं विश्वासे फर्म भरन्यविश्वासे नेत्यय या नियन्ति ब्राह्मास्त्रेति । अविश्वास प्रभार भाप भावनीयपिरपर्यः । पमा नुमतिपचे अपुन- मपि पापविश्वासेन धर्मान्तरसम्बन्धे तनो निर्गमापीसयात्राप्परिभामेन धान्लाय म्बन्धे भरणमन्त्री यास्पति शरणधयों न गिनीति म न काग निभाः | विश्वासे पातरो भाव्यः । गतिमलरिवागेन पेत्य विष्टविदा पो पर्प पेर, स च पिरतीतिभावनया विधाम एव पर्मच्यो नरश्विामः । शरणगों रिला भगवान मा करिम्पती निभावः । एवं विधासेन शरणस्तिो भगदिमाग मयनं रिना पर प्राप्तं भवेदनायासेन सत्सरि त प्राप्य, नापि निर्ममः पारदीयमाणापि ममतारहित मन प्रभमेरा पान त वियोगार्थ यनं दोनदेवाः साप्तमिनि मेरे तेतिपदेन सम्म भगदपत्नर वाम त सामिनि चितम् ॥ १५ ॥ ननु धर्मावरसम्मन्ये शरणादायों गरीन्यापागैशियदिशाणापपि स्यागे पदाचिदमापाव्या स्पान्मार्ग, दमाशय ररपाइपंपाकनिदिति।
श्रीमदखण्वभूमण्डलाचार्यश्रीमदखभावार्यवरणविरंचिनः । यथाकथमित्कार्याणि कुर्यादुचायचान्यपि । किंवा प्रोक्तेन बहुना शरणं भावयेद्धरिम् ।। १६ ।। एवमाश्रयणं प्रोक्तं सर्वेषां सर्वदा हितम् । पथाकथमपि मागे लोकानामाशा न भरेत्तयोचावन्यारम्यफलौकि- कवैदिकसम्बन्धीनि कार्याणि मार्गप्रामाण्या प्रमोशा झाला नानि कार्याणि, न तु स्वधर्मत्वेनेति । यथा "करिष्ये वचनं तो 'नि पार्थेन भगवदाशा ना नधेपः । एवं सति शरणपदायों न गच्छेत् । इति पूर्वोक्ता शङ्का निरस्ता । नदेयोक्तं, पुष्टिमादमदायां "गैकिफरवं वैदिकत्व कापश्यात्तेषु नान्यथेति । अथवा, तदपि पत्रिकरणे न दोपः, शरणपदार्थस्यैव नावटपलानदाहुः किं वेनि । बहुना मोकेन किम्, न किञ्चिसिद्धपति, किन्तु सर शरणमेव भावनीयं न तु लोक्ससदार्थमपि कर्मकरणम् । तदर्थयपि विधिरूपत्वेन कर्मकरणे दरमपदार्याभाव इति भावः । एतदेवोक्त पन्यमम्मेलने येत्या । एवं सति प्रभोराज्ञा मत्वा कर्मकरणमायात नान्यत्ययः । न सपना शानेन कदाचित्पापं सम्भोतवारिमिति । स इरित सर्वदुःखदर्ता तत्सम्भावनापास एव पापादिफ दीकरिष्यतीतिभावः । एतत्सर्व सधनि'स्पस्य निरूपणे यासादेोषित स्पत्र द्रव्यम् । अतः परमुपसंहरन्ति एमिति । एवं कारेगाश्रयामाश्रयस्वरूप पकृष्टेन साङ्गमुक्तम् । तावता किमिति चेत्तयाः सधैवामिनि । सर्वेषां जीवानापाश्र- पाणा वर्गाना सर्वदा क्रियमाणं सत् हितं दिनकारि, साधनं विनाप्यहिकारोकिंवा सम्पत्तिसापकमित्यतः परं फिपवशिष्यते । मनु सर्वपुगेषु साधनैरेव फलं भरतीत्यधुना नानि विहाय वेचलं शरणमेव कपमुच्यते, तबाहुः कलाविति । कलौ भत्तयादिमार्गा हि दुःसाध्या इति मे मतिः ॥ १७ ॥ श्रीमदल्लभाचार्यचरणविरमिनो विधयांपमन्यः सम्पूर्णः । मन्ययुगेषु धर्मस्यैव मायान्याद्विहितमतपादीनां मानसाव्यवाद नरेव विदि. तमत्युपासनाकादीनां फलं भनि । कम्तुि पापरशन इति सापनानापसम्मका• विहितभरत्यादिमागा दुसाध्या, पापुन यद रिश्चिकरणेपि पापगेन पाप- मपि जायत इति सईया साध्या, यनो या तानमाया मपि भरपादिमागा: कलौ दुःसापाला कृतादियुगेपपि पो भक्तिमार्गः मानामाया नभानु- मईकलभ्पस्तस्प कगै मुनामेर साध्पनामा मन दुःसाध्यमिनि सामना गरग.
२२ विवेकधैर्याश्रयः, श्रीगोपीशचरणानां वित्तिसमेतः । गतौ भावान् वादृशे भक्तिमार्गे यनुप्रई करिष्यतीति, सर्वात्मना शरणमेव भावनीयं, नान्यकर्त्तव्यमिति स्वसिद्धान्तज्ञापनायोक्तं मेमतिरिति । मे मतिरिरयेव । तेन स्वपा. गीयागामिदमेव कर्तव्यं नान्यदितिभावः । श्रीमदाचार्यचरणशरणस्मरणेन मे । हृयायाता प्रणालीय ग्रन्यस्यावानुसारिणी ॥ १ ॥ भक्तिमार्गे स्वकीयस्य दार्थार्थ सर्वथा इने । अपेक्षिता विवेकाधास्त्वेनदर्थं तदाश्रयः ॥ २॥ श्रीमदाचार्यचरणैरिति ते वर्णिता: स्फुटम् । अतस्त एव चरणास्तदर्थ धरणं मम ॥ ३॥ ।। इति श्रीवनश्यामात्मजश्रीगोपीशचरणविरचिता विवेकधैर्याश्रयविवृतिः सम्पूर्णा।
श्रीकृष्णाय नमः। श्रीगोपीजनयल्लभाय नमः धीमदाचार्यचरणकमलेभ्यो नमः । श्रीभागवतप्रतिपदमणिवरभावांशुभूपितश्रीवल्लभाचार्यचरणविरचितः। विवेकधैर्याश्रयः । श्रीगोविन्दरायात्मजश्रीगोकुलोत्सवविरचिता विवृतिः । यत्पादाजाश्रयादासन सर्वे पूर्णपनोरमाः । तमेव गोकुलाधीशं सर्वसिद्धय समाश्रये ॥१॥ अय सकलकर्मादिमागाधिकारेषु सत्सु भक्तिमार्गानुसारेण भगवदाश्रय एव सापुरुषार्थसाधास्तदाश्रये च विवेकधैर्य हेतू । तथाहि । विषेक सति सर्वोचपत्वं भग- पति ज्ञात्वा तदाश्रयं करोति जीवः । थैर्षे च सति दार्य थाति, तेन विवेक- भ्यापविरतं भगवदाश्रयो भवति तत्र स्वीयानां भक्तिसिद्धयर्थ विरेक वयान माचार्या निरूपयन्ति विवेकधैर्य इति । विवेकः सततं रक्षणीये तथाश्रयः । विवेकस्तु हरिः सर्व निजेच्छातः करिष्यति ॥१॥ विवेकधैर्य निरन्तरं रक्षणीये । आप्रयो भारदाश्रयः सोपि पा निरन्तरं रमणीय इत्यर्थः । एतेषां रक्षणतदनुसन्धानपूर्वकमेव सदालकृतिकरणम् । मुरुपों भगवदाश्रयः । तद्ने च विवेकः इति झारनाय विरेकर्पयोरेपदेन निरूपणम् । माश्यनिरूपर्ण चान्येन । तर विकल्प प्रयपोदिष्टत्वासपमं वि लक्षपन्ति विवे. कस्त्यिति । विरेकस्त्वयमेव, मलत्य इत्पन्रयोगव्यादास्तुशादः विरेकरसरूपमाहु- हरिरिति । हरिः सर्वदुःखदर्ता, नेन यकरिम्पति वनव्यमेव करिष्पीतिमाः | सदपि कियत्कार्य कला नितिष्यत इति नास्तोत्पादः सर्वमिति । निजेच्छानः एपेचातः । तथा च न मार्यनीय इत्यर्थः। अत ५२ प्रलादरचनं, 'नापया नेविगु- रोपटते फरणात्मनः" । 'वस्तु आशिष मागास्त न स भृत्यः स वै वणिए,' अन स ननु सेवक २४ विवेकफ्र्याश्रयः श्रीगोविन्दरापात्मजश्रीकुलोत्सववितिसमेतः। 'नकारमतों में स्पृहयन्ति केचिन्मत्पादसेवाभिरता मदीयाः, येन्योन्यतो मागत. प्रधानाः सभाजयन्तै मम पौरपाणी'त्पादिवास्यानि ॥१॥ ममुः मार्यनीय एवेति चेचनाहुः पार्धिते वेति । पार्थितेपि ततः किं स्यात् स्वाम्यभिमायसंशयात् । सर्वत्र तस्य सर्व हि सर्वसामर्थ्यमेव च ॥ २॥ प्राधितेपि ततः प्रार्थनात् किं स्यान्न विभपीत्यर्थः । तत्र हेतु: स्वाम्यभिप्रा- येति। यतः प्रभोरभिशप: पूर्व ज्ञातुमशवपः, मधुश वाभिपेतमेन करिष्पति । लेकिका अपीश्वराः स्वतन्त्रा भरन्ति किं पुनः सकललोरमहेश्वरः। मनु निजेजतत्तदा करि- प्यति यदि सामग्री सह टिना स्यात् । नासम्भूतसामग्रीकः स्मिपि पर्नु शोतीति चेत्तत्राहुः सर्वत्रेति । तस्य भावना सर्वत्र सर्वस्मिनेवायोग्यपि देशे सर्वयोनिपु व सर्व वस्तु सिद्धमेवास्ति, अमतिहतेच्छलात् । मत एत विमलय भगति मसने श्रीनिकेतने' इत्यादि। ननु सम्भृतप्तापपीकोपि यदि स्वयमसमर्प: स्यात् सदा पयं पुर्या- तत्राः सर्वेति । 'यः सर्वना सर्वशक्तिरितिश्रुतेः । सर्वसारक सामध्ये वियत इनि साधनन्यूनस्वे साधनमपि सम्माय फलं दातुं सपर्यः । सापन दिनापि फलं दातुं समर्प इत्यर्थः । अत एव मवासिभ्यो नितानेभ्य एक पलं दचात् । रोनाधीनश्रुति- गणा नोपासितमहत्तमाः । अतातातपसः सत्सप्लान्मामुपागताः । वैवलेन हि भाग गोप्यो गावः खगा मृगाः । येन्ये मूपियो नागाः सिदा मामीयुरअमेत्यादिवास्यात् । अत एस निरिक एपकारः । पारादिच्छापि । नहीछा बिना कोपिपिपपि फरोति ॥२॥ भगवद्धमान् विविच्य नीरधर्मान रिचरन्त्यभिमानयनि । अभिमानश्च सन्त्याच्या स्वाम्यधीनत्वभावनात् । विशेषतश्चेदाज्ञा स्यादन्तःकरणगोचरः ।। ३ रोक सर्वदा स्वाम्पधीनतमेव मनसि भावनीय दासधर्मवान् । त्योप- पञ्चमी । तया व स्वाम्पधीनवभावनं साप्य अभियानः सर्वमा सम्पर त्याम्पः । सराप्तनरत्याज्य इत्युपसर्गः । अपरा, विरस्त्यायो नवगैकित इति सिंगाप- मुपसर्गः । पारादन्येपि कामनोदयः । ननु मगादीपानां शैषि वैदिक या यदि विशेषतः फाप पर्तव्यं स्यात् तदा वन प्रशारण वन्यपिनि वाइविशेषतमेदिनि । पदि विशेषतो भगवादाज्ञा स्यात्, वदा विशेषः प्रकार: मॉपि पर्नव्यः । नतु उमानिष्पाप मार *भमा निगर, श्रीमदखण्डभूमण्डलाचार्यवर्षश्रीमदल्लभाचार्यचरणविरचितः । २५ भमवदानां विना । साप्यन्ताकरणपूर्विका न तु कोपेन परिहासेन बा, तदाहुरन्त:- करणगोचर इति । अजइलिशामिदं पदम् । तेन लौकिक आवश्यक व्यवहारे नासापेक्षा, वैदिकषि नित्यकर्मणि वेदरूपसामान्यापैव तत्करणम् । तस्माद्भगवदीयानां लौकिके वैदिक वा विशेषकार्ये कर्तव्ये भगवदासापेक्षा। तदा विशेषगत्यादि भान्यं भिन्नं तु दैहिकात् । आपनत्यादिकार्येषु हउस्त्याज्यश्च सर्वथा ॥ ४ ॥ अत एव राजम्योद्यतेन धर्मराजेन विज्ञापितं 'यक्षे विभूतीर्भवत' इति । लौकिकेपि यावदावश्यकं वावदेव कर्तव्यमधिकन्तु भगवदासातः । गतिर्गमनम् , तेन विशेषमतिस्ती- दिपात्रा ! आदिपदादन्यदप्पागन्तुकम् । तथा च, पत्किञ्चिदप्यागन्तुकं कार्य, तब भगवदाज्ञापेक्षा उत्पत्ययस्य भूपातोये, तस्य भारपत्युत्पादयतीत्यर्थः । तया च भाव्यते क्रिपत इति भाव्यं कर्तव्यमित्यर्थः । ननु पुत्रादीनामुपनयनविवादादावादाम- पेक्षेत न येत्याशङ्काय, नेत्याहुन्निन्तु दैटिकादिति, दैहिकादिन्नं विशेषकार्यमाशाय कर्तव्यं नतु दैहिकमित्यर्थः।तु शब्दःसन्देहवारकः, तेन पुत्रादीनामुपनयनविवाहादिकरणे नालापेमा, किन्तु निर्वाहमात्रं कर्तव्यं । न त्वधिको व्या व्यपादिः कर्तव्यः । ननु विप. दादौ कर्य व्यवदन्यमितिदेतत्राहरापनत्यादीति । आपतिरापसासिस्ता यानि कार्याणि तेषु हठो न कार्य:, किन्तु पया सौकर्यमेन विधेयम् । आदिपदाद्भगवदाज्ञा, भावार्यावा, भगवदीयानामाप्रहः । तेष्वपि सकीयो हठो न कार्यः। ननु विपदादौ ठेऽपि का क्षतिः, भगवतद्धनिताहाल । न हि भगवान्कदाचिदपि स्वकीयानुसते, 'ये पपा पां पपचन्त' इति भगवत्यतिज्ञानादिति चेत् , सत्यम् । परन्वन्पषैत्र कार्यसम्म प्रो सोचदानस्यानुचितत्वात् । इठविपपस्य भगवदनभिप्रेतस्ये निवहिवाय । ननुक्रमेय मया भगवान् कदाचिदपि मपन्नं नोपात इति तत्कयपनिर्वाह इति चेव, सत्यम् । यदि सर्वथा प्रपनः स्यात् , परन्तु भगक्दनभितस्य करणे अपनेरेर न्यूनला न हि सर्वया अपनो यः स भगवदनभितं कदाचिदपि करोति 1 तेन सर्वथा प्रपत्यभावे भागतोषि मावश्यको हनिर्वाहः । गवनमितवं तेन कयं ज्ञातव्यमनाते तु न तस्य दोर इति चन्, सत्यम् । तथापि सन्देहेपि इटस्पानुचितत्वादित्य विस्तरेण । एतरसर्वमभिसन्धापाह: सर्वधेति । सर्वथा सौः मकानयार केनापि कारण दो न कर्तव्य इत्ययः ।। एवं भगवत्कृत्येपु विचार्य लौकिपु व्ययस्यामाहरनाग्रहोति । अनामहश्व सर्वत्र धर्माधर्माप्रदर्शनम् । विवेकोयं समाख्यातो धैर्यन्तु विनिरूप्यते ॥ ५॥ •पति च-1-21 २६ विवेकधैर्याश्रपः श्रीगोविन्दरापात्मनश्रीकुलोत्सववितिसमेतः । सर्वत्र लौफिके व्यवहारोऽनाप्रहेण फव्यः । किन्चौदासीन्येन व्यवहर्तव्यं, न केवलमौदासिन्यमेव फर्त्तव्यं लौकिके, किन्तु भक्तिविरोधिलौकिकांशस्य त्यागोपि कर्तव्य इति चकारार्थः । किञ्च, धर्माणामधर्माणां च पर्यवसानविचारेण तदनुसारेण च्यवर्तव्यमित्याहुर्धर्माधर्माप्रदर्शन मिति । एके स्मार्तधर्मा अपरे श्रौतधर्मा अन्ये मग घद्धर्माः, ते सर्वेपि सम्पदापत्तिभेदेन द्विविधाः उत्तरोचरवलियाः। तर स्वाधिकारो विचार्यः । यदि भगवदाज्ञा भवति, तदा सापि विचार्या, भगवदिच्छा च विचार्या, आचार्याशा च विचार्या । तथा च धर्माधर्माणां वलावलमतत्सर्व घ विचार्य पया क्रिपमाणे पर्यवसाने उत्तम भवति तथा करणीयम् । तेनैवं पदयोननिका । धर्माणाय- धर्माणाश्च यदा पर्यवसानं तस्य दर्शनं विचारः कर्त्तव्य इति शेषः । उपसंहरन्ति, विवे- कोयमिति । अयमेव विवेको नत्वन्य इति ज्ञापनायायमिति। सविस्तरमवान्तरभेदनिरू- पणपूर्वकामिति समिति । आख्यातः कथितः। उद्देशानुसारेण धैर्य रक्षयन्ति धैर्य- मिति । विवेकानन्तरं धैर्ये विलम्बो न कार्य इति ज्ञापनाय अव्यधानेन पूर्वोपसंहारोचरो- पक्रमयोनिरूपणम् । तुशब्दः कारमेदज्ञापकः विशेषगविस्तरमकारेण निरूप्यते ॥ ६ ॥ धैर्यस्वरूपपाहुखिदुःखेति। त्रिदुःखसहनं धैर्यमामृतेः सर्वतः सदा । तक्रवदेवदाव्यं जडवतोपभार्यवत् ॥ ६ ॥ प्रयाणामाधिभौतिकाध्यात्मिकाधिदेविकाना दुःखाना मदनम्, लौकिकायास आधिभौतिको, वैदिक आध्यात्मिको, भगवदर्य आधिदैविकः । मरणपर्यन्तं सइनमित्याहु- रामृतेरिति । तत्रापि मध्ये मध्ये विच्छिद्य सहन न साधामित्याहुः सदेति निरन्तर- मित्यर्थः । सर्वस्मात्सहन न तु तत्र होनमध्यमत्वादिकं भावनीयमित्यर्थः । अभ्यासनिवृत्तौ धैर्य सुकरमिति देहायध्यासनिवृत्तिप्रकारमाहुस्तरवदिति । देहवदिति, देवता सङ्काने तकवद्भावना कार्या । तथाहि, अवमाख्यायिका याचिद्राझी केनचित्पामरेण सम्ब- दचित्ता सती तेन सह सङ्केत कृतवनी रामानमहं मारयिष्यामि, तब भार्या भविष्यामिति । ततः कस्मिंश्चिद्वने ते स्थापयित्वा स्वभवनमागत्य रात्रौ रामानं हत्वा तदनं प्रतिष्ठा । ताच पतित्वेन कल्पित तं पुरुपं सर्पदष्टं दृष्टवती । तदन्तरमितस्ततो भ्रष्टा सती कुर- चिद्देशे गणिका बभूव । तर चाज्ञानाव स्वपुत्रेण सम्भुक्ता । तदन्तरं च मसगाव सातवनी ममाय पुत्र इति । तदन्तरमत्यन्तग्लानिमाया शरीरं त्यक्तु चिता प्रविष्टा । तत्रापि, पहितापमसहमाना ततो निर्गत्य कुत्रचिद्देशे कस्यचिदोषस्य भार्या बभूव । तत्र च, १म्येनैवेति या गप .
२७ श्रीगदखण्टभूमण्डलाचार्यश्रीमल्लभाचार्यचरणविरचितः । गोरसविक्रयेण जीविका चकार । सा नैक्दा समानामिवंगुमिः सह तक्रविक्रयाप निधाम । मध्येमागे केनचिरमरपूईन पतिनानि सर्वासां माण्डानि मनान्यन्वभवन् । तदान्या क्षुः, सा तु जहास । तदा इसन्ती सां सर्वाः परः, कथं तं न क्षुभ्यसि किमिति च हससीति । तदा सा सटत्तान्तमपनेन पपनैनोतरमदात । तह, इत्या पं पतिमवेक्ष्य भुमहदष्ट्र देशान्तरे विधिवशाइणिकास्मि जाता। पुत्रं पति समधिगम्य चिनां पविष्टा शोचामि गोपष्टक्षिणी कयमय तामिति ।। तदाहुस्तकदिति । सप्तम्यर्थे वति, तेन पया तम्पास्त उदासीनभावना नसभियाना, तया सढाते भावनीयमिरपर्गः । इयमाख्यापिकानान्यत्र प्रसिद्धेनि सुप्रसिद्धपौराणं दृष्टान्तमाहर्ज यदिति । तृतीये जन्मनि मरतो नहस्तस्य यया सवाले नाभिमानस्तया भावनीयमित्यर्थः । ययानदः समन्युपु सङ्गं स्यतानुदा- सीनेपि रहुगणे ए सई कृतवान, तया श्रीमत्मभुचरणारविन्दानुपयुक्ने पन्धुलपि सट्टो ने फार्पः, श्रीमलमुचरणारविन्दानुरक्तपदासोनेवपि सङ्गः कार्य इति Are. धान्तेन सूच्यते । अत एव फर्दमें मति विज्ञापयत्या देवहूत्या सहो यः संगतुर- सत्सु विहितो धिया । स एव साधुपु कृतो निसालापः कल्पते' (पा० ३.२३.५५) इत्युक्तम् । अत एर फपिलदेवनायुक्तम् , 'प्रसङ्गमगां पाशमात्मनः कवयो विदुः । स एमाधुपु कनो मोक्षद्वारमारतमित्युक्तम् (पा० ३-२५.२०) । अन पर श्वेगापि मापितम्, "मोचमटोकननेषु सख्य"मिति (मा० ६-११-२७) १ या च यत्रमा कुर्नाणेपि न. भद्रकालीसम्बन्धी विलो न जातस्तया सप्पैव भारदीयेपु देवान्नरको वियो न भवतीत्यपि मन्यते । अव एक गर्भस्तुतो, "सफाभिमा विचरनि निर्भया विनायकानीका मुर्दमु प्रयो' इति देशाचनं गीयते । किबहुना, कालोरिन भुन्य पर्तुमिष्टे । मत एस फपिलदोनोक्तम् , "न हिचिन्मतरा: शानरूपे नापदिनो मे निमिपो लेटि हेतिरिति" (मा० ३-२५.३८) । अनिमेपो हेनिः कारः । न पर पमेनाप्युक्तम् 'ते देवसिदारिगीतपवित्रगाया ये सायरः समदृयो मासपमा । सामोपसोदतर्गदपाभिमानमा वयं न च यः प्रभवायद इति (भा० ६-२०२७) नया कानः । मन पर दितीय कन्य दिनीयाध्याये । न पर मालेति। (०२.२०१७) एवं मध्य सुपसिद्ध पौरागं ष्यन्तमुस्ता पूर्ण गायिकापा: सपनारनाप पुनत मान- धिनमेर हटान्तमार्गापमापयदिति । गोन निंपो पोया इति गोरमाः, तस्या देहतर पपा सपा उदासीनयुदिता दे मायमित्यर्थः । ननु नगसिपोरा- भातायनातपिपपरौदासीन्यं तस्य मातीदिन्युक्ल, पान्तु दादौ नाया दाणी- भावना पा ।
२८ विवेकफ्र्याश्रयः श्रीगोविन्दरायात्मजश्रीकुलोत्सववितिसमेतः । नभावः कयं निर्धारीति चेत्, सत्यम्, यदि देहादानासकिस्तस्याः स्याचदा कवि- क्रयेण जीवन्त्यास्तस्या देहादिपोपके तने कयमौदाप्तीन्प स्यात् ? तेन ज्ञायते वस्या उदासीनवुद्धिरेव देहादौ । ननु प्रतिकाराशस्या कृतोपि शोको व्यर्प इति शोक न कृत- वती, नत्वनासक्तिर्देदादाविति चेन्मैवम् ।मतीकाराशक्ति ज्ञात्वा मतीकारोधर्म मा कुर्याद, शोकाभावस्तु दुर्निरिः । यो देहो राज्यदशायापनेकदेहपोपकः सर्वसम्पचिसम्पत्रः सर्वसुखसन्दोहनिधानमासीरस एव देहः पश्चात्सामरेण गोपेन पोष्यः, सर्वसम्पति- शुन्यः, सर्नदुःखनिधानमननीति झापनाप गोपभार्यत्वेन निर्देशः । तथा च, पद धैर्य त्यक्तन्यं ताः सम्पदश्चनला इव चश्चला इति । किमिति । सर्वदा स्यायिसकलपुरु- पार्थमतिक्षणपोपकं प्रभुपादपन (क) परित्यक्तव्यमितिभावः । तया च देहवता तक्रवन- स्वद्गोषमार्यवद् सदेहादौ भाव्यमित्पर्यः पर्यवसनः । देहवता भाव्यमिति तृतीया- समासः । देहावता देहाभिमानवता तेन यत्किश्चिदभिमानोपि संरक्ष्यः । तथा च भगवत्सेवादिविषयकः सर्वया संरक्ष्यो, लौकिकविषयास्त्याज्य इति भावः, यदा, देर- वतेति मनुष्याधिकारकत्वनिपमो व्यावर्तितः । तेन पवादिशरीरेप्येवं भाव्यमितिभावः । मत एव भरतस्य हरिणनन्मन्यप्यध्यासनितिः। तदुक्तम् , तस्मिन्नपि कालं समीक्ष्यमाणः समाच भृशमुद्विग्न आत्मसहचरः शुष्कतृणपर्णवीरूयावर्चमानो मृगवनिमित्तासानमेव गणपन्मगशरीरं तीर्थोदकं क्लिनमुत्ससर्जेवि नस्मिन्पुलहाश्रमे । अथवा | विदुःखसह- नमिति । भक्तिविरोघिदुःखनिकृत्युपायाकरणेन त्रयाणां कायिकवाचिकमानसिकानां दुःखानां देहपातपर्यन्तं सर्वेभ्य: सहनं धैर्पमित्यर्थः । सशरीरस्वीयवस्तुनोरासपा. धिक्ये दुःखाधिक्यसम्भवादेर्यपशक्यं स्यादिति तादृश्यासक्तिर्न कार्येति शन्दराहु- स्तक्रवदित्यादि । जडेन तुल्यं जबन , तृतीयासमर्यादतिः । देह इस देहवन , सप्तपी. समर्यादतिः । जडभरतेन स्वदेव इस देहेवासक्तिः कार्येत्यर्थः । गोपभार्यवद्रोपमार्पया तुल्यं, गृहे स्थितायाः खिया भरणीयत्वात् । मालामावाद्वस्तुत्वेन नपुंसकतानिर्देशः । तवदिति सप्तमीसमर्यादतिः । गोपभार्यया स्वतक इस स्वरस्तुप्पासक्तिः फात्पर्यः । तेन स्वशरीरवस्तुनोनिवाहार्यमासक्तिं कृत्वा जडभरतेनेव भगवत्परतया स्येपपितिमाः। ननु यदुक्तं त्रिदुःखसहन धैर्यमिति वा यदि कदाचित् स्वत एव दुःखमतीकारा सिद्धस्तदापि किं तं मवीकार निवार्य दुःखं सोदव्यमेवाहोस्विमतीकारेण तद् दुःखम- पोशम् ? इति सन्देहे निर्णयमाहुः प्रतीकार इति ॥ प्रतीकारो यदृच्छातः सिद्धश्वेन्नामही भवेत् । भार्यादीनां तथान्येपामसतश्चाक्रमं सहेर ॥ ७ ॥ पहछातः, अनायासेन चेद् यदि प्रतीकारः दुःखपतीकारः सिडा समरमः । श्रीमदखण्डभूमण्डलाचार्यश्रीमद्रलमाचार्यवरणविरचितः । २९ स्पातदा आग्रही मयेदं दुःखं सोढव्यमेवेत्यामहवान्न भवेत् । इदमनाकुतम् , अन्न दि भगवदाश्रयसिद्धयर्थ विवेकधैर्य उच्यते । तेन त्रिदुःख सहनरूपं यद धैर्य निरूपित तदपि यदि भगवदाश्रयनिमिनं तदा कत्तव्यं, नोचेलयोननं बिना किपिति तस्कर्तव्य ? नहि भयोजनमनुद्दिश्य मन्दोपि प्रवर्तत इति न्यायान् । अत एत्र केनचिदुक्तम् 'अनिपिदसुख- त्यागी पशुरेव न संशय' इति न केवल प्रयोजनाभावमात्र, प्रत्युत विपरितत्वमासुरत्वग्छ । अत एव गीतासु भगवताप्युक्तम्, 'अशाखविहितं धोरं तप्यन्ते ये तपोननाः । दम्मा- हदारसंयुक्ताः कामरागवलानिताः । कर्पयन्तः शरीरस्य भूतमाममचेतसः । मावान्तः शरीरस्यं सान्विद्यासुरनिधयानिति । यहछात इति, स्वयं तदर्थमायासो न कर्तव्य इति सूचितम् । तदपायासारणे स्वप्तर्वस्वपशुचरणारविन्दविस्मरणं यतः । 'भूमिनि- न्दामशंसा नित्ययोगेतिशायने। संसर्गेस्त्विति विवझापां भवन्ति मातुपादप' इति वाक्या. निन्दायामिनि मत्ययोत्र । तया नासदामहवान भरेदित्ययः । तेनायर्यः पर्यवसनः । पदि किश्चिदपि भगक्वो भगवदीपानांचा कार्य सिदधेत, तदा स्वतः सिद्धेषि पनी- कारे दुःखं सोढव्यमेव । नामहस्यासत्त्वाभावात् । न हि पेन भगवतो भक्तानां वा सेवा सिद्धपति, नस्य कदाचिदम्यतत्वं भवति । यतो जन्मनो लामः स एव यहगवतो भकानां वा कार्यसाधनम् । इदमपि स्यापरिपाकदशापापुस्पते । परिपाक- दशायां यया यथा स्वयं क्लेशं सोडा भगवतो भक्तानां वा सापयति, तथा तया परमसन्तोप एपेति दुःखमेव नास्ति कि सोदव्यम् ? । अभिपानस्यैव संसारत्वा- दपमानजनितदुःखसहनमतिकाटिनम् । तथापि सापेक्षाया हीनैः कृतोपमान- सुतरा सोमशयः । तत्रापि स्वस्वाधीनेः कृतस्ततः सुतरां सोदयशश्यस्तेन तत्सहने कदाचिरकस्यचिनियघिलना स्यादिति "त्रिदुमदनमिति सङ्केपेणोक्तपपि पुनर्षि- शेषत माहुर्भार्यादीनामिति । मायां आदिर्यपामिति । सी एच वान्धवास्तेपामामं सलततिरस्कारं सहेत् । आसपन्तात्रयः पादरिक्षेपः, शिरसि पादमहारपर्यन्तमपि तिरस्कार सहेदित्यर्थः । पुत्रा अपि कदाचिदिभागादिना स्वतन्ना भवन्ति । माया तु फेवलं भधीनति तस्कृतस्तिकारो भरतिदुःसहस्साशोपि सोदम्प इति भापनाप पषम मापांया निर्देशः । यतास्यासहोपि तिरकारः सोदन्यस्तवान्यसहने कि वक्त- व्यमिति कैमुतिकन्यायोम्यनेन मूचितः । तया च, प्रभुचरणनलिनयुगलसमाभपणाप किन फर्वव्यमिति भावोपवि । पोवायपनिरूपणापत्र विरेऊथै निरूप्यते । पपुवापि एकाप दयोपां सोहन्यो नास्ति, किन्तु मर्चेपामिति मापनाप यापनम् । ननु "पद"मर्पगे, इति पातोरनुदासलात्महेदिति परस्मैपदं फयं पातीनि ने। त्यम् ।
विवेकर्याश्रयः श्रीगोविन्दरायात्मनश्रीकुलोत्सववितिसमेतः । "वक्षिट् व्यक्तायां वाची"त्यत्रेकारसत्वेपि डकारमहगं यत् , त डितामेवात्मानपद नित्यमनुदात्तेतान्तु अनित्यमिति झापयति । तेन अनुदाचतां कदाचित् परस्मैपदमपि भाति, अत एव पण्डितप्रवणेन योपदेवेन कविकल्पद्रुमधातुपाठे अयम् उभयपयुक्तः । अत एवं महाकविना शाझलमल्लेनाप्यधिमत्समेतुमसहनुपयन्ताविफलो भवेति मघवानमशासी- दिति प्रयुक्तम् । अत एवानुक्तमप्यूहति पण्डितो जनः इतिमयोगः । ननु उदासीनाक्षेत् केपि निरस्र्युस्तदा किं करणीयम् इत्पाशङ्कय, तत्रापि पदि तदसहने आश्रये कश्चना- न्तरायः स्यात् , तदा सोढव्यमित्यास्तथान्येपामिति । यथातिदुःसहोपि धन्धूनां तिर- स्कारः सोढव्यस्तथोदासीनानामपि तिरस्कारः सोहन्यः इत्पर्यः। ननु नीचथे कोपि तिरस्कुर्यात् तदा कि कार्यमित्याशङ्कय पूर्ववदेवाइरसन इति । असतो जात्यादिहीनस्ये- त्पर्यः । यदि भगवत्सेवादिकं निर्वहति तदा तदर्य म्लेच्छादीनापपि तिरस्कारः सोदव्यः इत्यर्थः । न केवलं तेपा तिरस्कारमानं सोढव्यं, मत्युत यदि तैः प्रभुसेवादिकं निर्विन निर्वहति तदा वान्धवश उदासीना म्लेरछादयश्च त्रयोपि अनुसतव्या इति चकारार्थः । यथा भगवदर्यमतिदुःसहोपि तिरस्कारः सोहव्यः, नया प्रभुवरणसमाश्रयणाय प्रतिरन्धरूपः सर्वोपि सुखभोगः सुदुस्त्यजोपि त्यक्तव्य इत्याहुः स्वयमिति । स्वयमिन्द्रियकार्याणि कायवाङ्मनसा त्यजेत् । अरेणापि कर्तव्यं स्वस्यासामर्थ्यभावनात् ॥ ८ ॥ "स्वयं"पदाद श्रीमप्रसादत्वेन मातस्य विदितलेन मासस्य च मिटानादे परित्यागामावः सवितः । अत एव "स्वयोपभुक्ते"त्यादि । इन्द्रिपाणि सर्वेन्द्रिप- विषयभोगात् कायेन वाचा मनसा च स्वयं प्रपन्नेन स्पजेदित्यर्थः । अयमभिसन्धिा, "तस्माकेनायुपायेन मनः कृष्णे निवेशये"दिति सप्तमे नारदवचनाभिरन्तरं भगव. भावनादिरेव परमपुरुषार्थः । अत एव "वस्मादारत समित्यादि । " तस्मात्स- त्मिना रामन् हृदिस्यं कुरु केशव | निमाणोपादितस्ततोयानि पराष्ट्रनिम्" । अतस्तत्साधक एव परमलाभकरस्तदियाना एक परमहानिरः । यतभिन्तनादि- विच्छेदक एव परमहानिकरः । अत एव सा हानिः "कालरोस्वि पत मापुरनि वै पुसामित्यादि । भोगच स्मरणादिविशतकः । अतः परमहानिकरलेन भोगा. स्त्यक्तव्या इत्यर्थः। नन्विदमतहतम् , तपादि, अन्येषां गया तपास्तु, मकानान्नु विषया न पापका। यतः सरस्वपि विषयभोगेषु भक्तिरेव सर्पमाधिशस्ति । अत एव "बाम्पमानोपि "" अपि चेत्सुदुराचार" इत्यादि । अन एर मियनामहादाम्बरीपादीनापति , श्रीमदखण्डभूपण्डलाचार्यवर्यश्रीमदल्लभाचार्यचाणविरचितः । ३१ राज्यादिकरणम् । न हि स्मरणादिविघातकेषु ते प्रवर्तन्ते । अतः कथं भगवद्भापवि. पातका विषया इति चेत् ? स्वानुभवं जाननप्येवं बदन निरपत्रपोसि नहि त्या भोगं भुधानो भगवच्चरणारविन्दामिनिविष्टचिनः कश्चिदृष्टचरः श्रुतो वा । मनु श्रुता एव बहवः मियत्रतमभृतय इति चेत् १ रे मूर्ख भोगस्य नाममात्रम्, न हित विपयेण्यास कचिताः, किन्तु, केवलं मनुचरणपरापणा एव । आः प्रभोराज्ञया ते राज्यादिक कृतवन्तो न तु भोग भुक्षानाः । नन्वनुभयेन कयं निद्धारः प्रमाणसम्मति विनानुभवत- पमानयोः सन्देहादिति चेत् ? वत्स ? विमलामतिस्तै, यतः प्रमाणसम्मतिमपि श्रोतु- कामोसि । अवहितः शृणु । मपमं तावदीनासु श्रीपयदुकुलजलाधिसमुतश्रीकृष्ण- चन्द्रोक्तमधारय । तथाहि, 'विषयाध्यायतः पुंसः सङ्गस्तैपूपजायते । सङ्गात् सञ्जापने कामः कामात कोपोभिनायने । क्रोधाद्भवति सम्मोहः सम्मोहात्स्मृतिविभ्रमः । स्मृति- भ्रंशानुदिनाशो युद्धिनाशात्मणपति' । सङ्ग आसक्तिः, कामोमिलापः, कोप:' कोपा, सम्मोहो विकाभावः, स्मृतिविभ्रमो भगवचरणविस्मरणम् , युदिनाशः सुमुदिनाशः, प्रणाशः स्वरूपलामाभावः । मुकौ लीलाभपेशे वा स्वरूपलाभस्तदभातः संसारः । अत एव कपिलदेवैरप्युक्तम्, 'चेतः खत्रस्य बन्धाय मुक्तये चात्मनो मतम् । गुणेषु सक्तं बचाय रवं वा पुसि मुक्तप, इति । (भा.३.२५-१५) गुणेषु रूपरसादिपु पक्षावपि विषयेष्विति यावत् । अत एव "मन एन मनुष्याणां कारण बन्धमोक्षयोरि"त्यपि । अत एवं विपणाविष्टवितानां कृष्णायेशस्तु दूरत" इत्यपि । भोगेष्वपि त्रीसंभोगः सुतरां बाधकः, मसणमेव बुद्धिविपर्यासार- लात् । अत एव कपिलदेवैरपि 'न तथास्प भयेन्योह' इत्पायुक्तम् । 'भोगास- त्यज्य यः सर्वान्न जातु काप' इस्पादि पपातिवचनम् । महत्सनाद्वारपाचरित्यादि भवाम्पम् । ननु तर्हि 'या-यपानोपि मद्भक्त, (भा. ११-१४-१८) इत्यादिना रिप- पाणामाधार क्यपुस्पत इति चेद ? अर वदामः । केवलं भननं कुर्वाण: कदाचिदि- न्द्रियनिग्रह कर्तुमक्षानुवन्विषयः सस: किरते, नस्यासक्येर्थे भगवान् समन इति । मतस्प तत्पापभोगो भवति । अनच कृपयाहं तया समादयामीति झापयितुं स्वाक्ष- पातशापक 'मन्नत' इति पदमुक्तवान् । अत एवानिन्द्रिय" इति तस्याशक्ति (दृष्ट्वा) दपापां हेतु मुक्तवान् ! अभिनेन्द्रियः इन्द्रिपनयं कर्नुपातमा नापि न निपन्न शक्य इति कदानिदेतारोपि न समां करोति, तदा तेन पापेन सोभिभूपत एपेतिमाय इत्युक्तम् । प्रायो वाहुल्पेन मनु सईया निश्पः भक्तिपिगमा नेत माता भति, नोनेन समने । तेने पदयोजना,इन्दिपन गर्नुपयक्तः सनिपशो यो महतास विषयः पराजितो न भाति परमया मायालया व अनेनापि भक्तिस्वरोचसधिशासापा, यावरउरपमिन्द्रियनिप्रदय पम्प इति चिनम् । एटा, पूर्वपनिनेन्द्रिपः सन् स विषय- 1 ३२ विषकधैर्याश्रयः श्रीगोविन्दरापात्पनीलोत्सवविकृतिसमेतः। वाध्यागानोपि, यदा त-सर्व परित्यज्य प्रगल्भमक्तिमान् भवति तदा नाभिभूयत इति । अपवा, मौदिमकारमेव ममुराह 'वाध्यमानोपी'ति । तयाहि, प्रमुधाप्यङ्गीकरोति मर्यादया पुष्टया च। तत्र पुथ्था यसङ्गीकरोति स नाभिभूयते, प्रगल्भया पुष्टिमार्गीयया । एवमझी. कारे निमयामायालाय' इति । यया राजानोतिकृपापात्राय यनिश्चिदपि कार्यमकुर्वाणा. यापि सर्वस्वं ददति, तस्य सहस्रमप्यपराधान्न मन्यन्ते, गालिदानेपि परिहाप्त मन्यन्ते । अन्यस्मै च कार्यपकुर्वाणाय किमपि न प्रयच्छन्ति, उचैपिणेपि दण्डं विद- धति, सतना यतः, तथा भगवानपि यस्मै अतीव कृपयति तस्मै निःसापनायापि सर्वस्वं ददाति, नस्य सहसमपि दुराचारान मनुते । पर क्षुद्राः खण्डमण्डलाधिपतयोपि खैरचारिणो भवन्ति, नत्र किं वाच्यं त्रिभुवनपरिटस्य पुरुषोत्तपस्य स्वच्छन्दाऽऽचरणे। यद्यपि मनुः कदाचित्साघनं नापेक्षतेपि, तथापि मर्यादा कदापि कस्यापि न हेया, किन्तु काँपैन । सर्वेषां प्रभोरिच्छा दुईपा, यतः को वेद भगवान्कथं वा मनुते, कदा. चित्मभुः लोकसङ्ग्रहार्थमपि कारयति, कदाचिदेवमपि । अतः करणे न वाधकमकरणे तु कदाचित्लभुकोपोपि सम्भाषितः । तस्मात् "पाक्षिकोपि दोपः परिहरणीय" इति न्यायेन करणीयैव मर्यादा । यदि च मर्यादात्यागे प्रभोरिच्छां भानीयाचदा त्यागेपि न सतिः । अत एव गुर्वादिइननं विदधानोपि पार्थो न दोपभाग जातः । यदा च ज्ञानस्य भक्तेर्वा माचुर्येण देहायनुसन्धानमेव निवर्तते तदा त्यागे न दोषः । अत एर सपभदेवनहारतादीना तथैवाऽऽचरणम् । यदा च भावदा दिपु व्यसनं स्याचदा ज्ञात्वापि पर्यादात्यागे न दोपः । अत एव " तारकर्माणी"त्यादि । यदा च तत्वज्ञा- नमुत्पद्यते तदापि न दोषः । अत ए"पि चेदसि पापेभ्य" इत्यादि । तस्माचाच. पमिन्द्रियनिग्रहः कर्तव्य इति सिद्धम् । अत एव "सर्वेन्द्रियोपशान्त्या च" तर मगवदिच्छया पदा भविष्यति तदा भत्तिति प्रकारकमालस्यं न कार्य, किन्तु स्वयमुयम्येन्द्रियनिग्रहः कर्तव्य इति झारनाय स्वयमिति ।। स्वयमिन्दिपकार्याणि कायवाद्मनसा त्यजेत् । अरेणापि कर्तव्यं स्वस्यासामर्थ्यभावनात् ॥८॥ बहुवचनेन सर्वेन्द्रिपभोगस्त्याज्य इति चितम् । यद्वा, भोगानस्यज्यन्तपन्यं दृष्ट्वा पदाचित्कश्चिदारस्यं कुर्यात्तत्राहुः स्वपमिति, अन्पस्त्यना, मावा, सयन्तु पजे. दित्यर्थः । न हन्यापक दृष्ट्वा स्वयमप्यपकृष्टेन भाव्यं, फिन्स्वन्यत्रो कर्प दृष्ट्वा स्वयम्- स्कृष्टेन भाव्यम् । अत एव तैत्तिरीयोपनिपास्त्राचार्येण शिष्यशिक्षणपकारे " पान्यस्माक सुचरितानि तानि त्वयोपास्यानि, नो इतराणी" युक्तम् । भोगस्प सामग्या सत्या धैप दुष्करमिति पूर्वमेव सामग्रीमेन न समादपेदिति ज्ञापनापेन्द्रियकार्याणीति ।
- श्रीमदलण्डभूमण्डलावार्यर्यश्रीमदल्लभावार्यचरणविरचितः । अन्यथा भोगात्पजेदित्येवोक्तं स्यात् । मा एव "माना स्वसे"त्यादि । तेन समूलपातं भोग हन्पादिति पत्रसितोयः । अत एव शन्दादीविपयाँस्त्यापयेत्यादि । त्यागे मकारमाहुः कार्येति । कायेन वाया मनसा घेत्यर्थः । इन्सप्लोयम् । “ सबों हिन्द" इत्येकवद्भावः । यहा, "कायवाग्भ्यां सहितं यन्मन" इति मध्यमपदलोपी समास!! तन कायवाचोगौंगत्वं तृतीयया सूच्यते । तया च मुरुषो मानस एव त्यागः । फायिको वाचनिकश्व गौणः । अत एवं गीतासु "कर्मेन्द्रियाणि संपम्ये "स्पादि । नन्निदाखिलपशपमिव भाति । यतः कविनतम इन्द्रियनिग्रहः । अत एक गीता, "इन्द्रियाणि प्रमायीनी स्पादि । उपदेशशासम्मनः । न हि शासपप्यशक्यमुपदिशति । अता कपमुपदेश इति चे वनाएरशरणापीति । अशूर इन्द्रियजयं फर्नुपशक्तः । तादृशे- नापि यथाशक्तीन्द्रिपदपनं कर्तव्यम् । तत्र हेतुः, स्वस्पेति भावनात्, विधारणात् । अयमभिसन्धिः । यदि जीवः स्वयं स्वदोषानिका समर्थः स्याचदा पर्यादोलश्यनेन पनिवदोपानिवार्य सुखी स्यात्, परन्तु, स्वयमसपर्यः न हीचरमर्यादा परसाप्यन्यपा भावयितुं कोपीष्टे । अव एवेशस्य हि कशेलोक-इस्पादि । तया च, विचारे क्रियमाणे निग्रह एयेन्द्रियाणां कार्यः । अत एवेन्दिशा पविनिर्माह" इत्यादि विचारणावश्यकः । महि विना विचारं कोपि कुत्रापि भवर्तते । " हि मयोजनमनुद्दिश्य पन्दोपि भवति" इति पायात् । कुतस्तराश्च विवेकी र पदसम्बन्धस्त, स्वस्याप्तामध्यविचारणादरेणापी. न्द्रियनियमन काव्यमिति ॥ ८॥ ननु निग्रहः सयावश्यक इति सत्य, परन्तु यदि कयपि कर्तुं न शक्नोति तदा कि तप नाश पवाहोस्सित्कयनिनिस्तार इत्याशङ्कायापारशक्प इति । अशक्ये हरिरवास्ति सर्वमाश्रयतो भवेत् । एतत्सहनमत्रोक्तमाश्रयोतो निरूप्यते ॥ ९ ॥ अशक्येर्थे हरिरेयास्ति । रक्षक इतिशेषः । वर देतः, सर्पमिति । आश्रयता भगरदाश्रयं दुर्वतः पुरुषस्य स भवेत् । आश्रयत इति पञ्चपी वा। पादि सर्दयामाया का मगरलमेर भारति तदा दयपर भगरानेर तप स सापपति, अतो मामाप्रपा ससिदिः । मत एव "फिरान. "त्यादि । अतो न तय नाम: । अत एर "पोप प्रतिमानी"त्यादि । सन- दुखहमा हरिः । नदीने परमदशारिपथ कार्य सारधेरैति शानाय हरित दम् । एव पारंगायापालेदः । न सन्यः सर्वेषां सईदुःखानि निमार्य सरांनन्दं दातुं एका एवं सर्वपाप सावन भारापनपपि गोगः परः। मुम्परले तु मान् किमपि फरोत, स्पेन नझारनमपि न फर्धम्यम् । नापि मशेषः प्रो विवेधैर्याश्रयः श्रीगोविन्दरायात्मजश्रीकुलोत्सव विकृतिसमेतः । दातुमुचित इति ज्ञापनाय रक्षक इति वियपदस्याप्रयोग एक, किन्त्वध्याहारः । "ब्रह्मपर्व पकामस्वि"त्यादिवाश्यालतिनिपतकार्यतापका अन्ये, भगवाँस्तु सर्वे साधयति, "अकामः सर्वकामो "ति वाक्यात् । तदाहुः सर्वमिति । अत एव "किमलममि स्यादि । आश्रयत इत्यासमन्ताद अयत: सेवां कुर्वत: "श्रिसेवायां," सेवा च चित्तस्य तदेकपरता, "चेतस्तत्मवगमि"ति लक्षणात् । तदनुकुला च या फावन कृतिः, सा सर्वापि सेवैव । अत एव "मानसी सा परामते"ति । तादृश्येव च कृतिः सन्तोषजनिका, सेवा च सन्तोषजनिकैव । “यद्धये"ति वाक्यात् । लोकेपि तापर्य- पूर्विकैव कृतिः सन्तोषगनिका । तथा घ, स्वज्ञानानुसारेण प्रभुसन्तोषजनिकां झात्वा निरन्तरं कृतिः कार्येति सिद्धम् । शहपस्पयेनाश्रयत्यागे किपपि न सिद्धयती- त्यप्यमूचि। अत एव "पतन्त्योऽनाहत युष्पदइन" इत्यादि। अशक्य इति पदाच्छ. क्यत्वेऽपश्यमिन्द्रियनिग्रहः कर्त्तव्य इति सूचितम् । शक्तौ सत्यां मर्यादोल्लड्डने प्रभुरपि क्रुद्धयति । अशक्यत्वे दयाविष्टः सन्सर्वमेव साधपतीति निगर्वः । अत पर सकलदुःख- दूरीकरणज्ञापितपरमदयालुत्वज्ञापकं हरिपदं प्रयुक्तवन्तः । अन एव "समस्तदुःखात्यय- माशुधत्त" इत्यादि । मनूपक्रमे विदुःखसहनं धैर्यमित्युक्तम् , उपसंहारे च विषयभोग- रूपसुखस्य त्याग उक्तःतया चोपक्रमोपसंहार विरोध इत्याशङ्कय निरादुर्वन्त उपसंह- रन्त्येतदिति । अत्र धैर्यप्रकरणे एत'त्रिदुःखसहनमित्यारभ्य यनिरूपित सत्सर्व सह्नमेनोक्तमित्यर्थः । न हि दुःखमसोडा भोगत्यागः फर्ग शपपते, तेन भोगत्यागे- नापि पर्यवसनं दुःखसहनमेवोक्तपिति नोपक्रमोपसंहारविरोधः । ननिदं न सहच्छते । नया हि, भवद्भिः सइनमेव धैर्यमुच्यते, तचासङ्गत, वचनविरोधात , वचनेषु सर्वत्रोभयो- भेदात् । नानि च " तेको रलमित्यादीनि । अत एवं श्रीमदुद्धवैः पृपर पृष्टं, श्रीपय- दुवंशजलधिग्वेनापि तथैयोतरितम् । तस्मादुभयोरवप क्यं घटत इति चेद, अत्र बदामः। अन्यत्र यथा तथास्तु, मास्मिन्मन्थे एतदर्यमेव सहनमुक्त न तु भिन्ममिति पद- सम्बन्यः । वस्तुतस्तु द्वयोरैक्यमेर । उक्तपश्नोचरयोभिन्नतया कथनानु अवस्थाभेदमा- श्रित्य । नतु समाधृत्योर्मेदः। अत एवोत्तरे तितिक्षा दुःखसम्पर्श'इति सामान्यतः सहनमुक्तम् । 'जिलोपत्यजयोतिरिति विशेषतः। न हि जिहोपस्थपोर्नयस्तदुभय- सम्बन्धिदुःखसहनादन्योस्ति । ये हि तदुभयनयनिमिन याने ते तपोनिमहे क्रियमाणे जिलाविषयस्य सुस्वानादेपस्थविषयस्य रुयादेरलाभेन यद् दुःखमापयो, तत्वीश- मपि कठिन सहने नबन्यत् किच्चि कुर्वन्ति । यया यया चाभ्यासस्नपा तयाऽनायासेन सहन्ते । अत एव गीतातु क्षारस्वाभाविककर्ममु "शौर्य तेनो विदाश्यमि"ति धैर्य गणितम् । न हि जिछोपस्ययोजयः क्षत्रियाणां सहमो धर्षः, किन्तु, दुःखसानमारम् । अत एव गीतासु,(११)"ति न विन्दामि गीतासु (१८)"धृत्या यया"। उद्देशनमानु- . श्रीमदखण्टभूमण्डलाचार्यवर्यश्रीमद्वल्लभाचार्यचरणविरचितः । सारेणाश्रयमाहुराश्रयोत इति। अत इति त्यब्लोपे पञ्चमी। अत इदं द्वयं निरूप्पेत्यर्थः। तेनैवं पदसम्बन्धः । अतः विधेकधैर्य निरूप्य तदनन्तरमाश्रयो भगवदेवशरणत्वं नितरां विविच्य रूप्यते कथ्यत इति । तया चातः परमाश्रयो निरूप्यत इत्यर्थः । यद्वा, हेतौ पञ्चमी । अत आभ्यां विवेकधैर्याभ्यां हेतुभ्यामाश्रयो निरूप्यत इत्यर्थः यद्यपि मगवदनुयह विना नाश्रयः सम्भवति, तथापि, यदा साधनद्वाराङ्गीकरोति तदा विवेकर्यपि साधने । अत इति सहाथै कृतीया । साविभक्तिकस्तसिल । तथा च, विवेकधैर्याभ्यां सदाश्रयो निरूप्यत इत्यर्थ । तृतीयया विवेकधैर्य- योरमाधान्यं, प्राधान्यं चाश्रयस्यैवेति निरूप्यते । अथवा, एतद् विवेकसहितं सहने धैर्यमत्रास्मिन्यन्ये उक्तं कथितम् । अतो हेतोराश्रयो निरूप्यते अयमभिसन्धिः । आश्रयनिरूपणार्थमङ्गत्वेन विवेकधैर्य उक्त, तेन यद्याश्रयो न निरूप्यते, तदा विवेकधैर्य- निरूपणं व्यर्थ स्यात् । तथा चैवं पदसम्बन्धः । यतः कारणादाश्रयनिरूपणार्थमङ्गत्वेन विवेकधैर्य उक्ते, अतो हेतोविकधैर्ययोनिरूपणस्य सार्थकत्वाय विवेकधैर्यनिरूपणान- न्तरमाश्रयो निरूप्यत इति। बुद्धिस्थवावकत्वात्सर्वनाम्नां पूर्वं च विवेकस हितमेव धैर्य. मुक्तमिति विवेकसहितमेवैतत्पदेनोच्यते । यद्वा, एतद्विवेकसहित सहनं धैर्यम् , अत्राश्रये उक्तमभिहितमतो हेतोस्तदुभयनिरूपणानन्तरं यत्रेदं द्वयं निरूपितं स आश्रयो निरू- प्यत इति । तथाहि, अत्र हि भगवदाश्रये क्रियमाणे यादृशे विवेकधैर्ये अपेक्षिते तायो निरूपिते, स आश्रयस्तदुभयनिरूपणानन्तरं निरूप्पत इति । आश्रयः आसमन्ताव श्रयः सेवनम् , श्रिसेवायाम् , अस्मात् घन् । सेवा च चित्तस्य तदेकपरत्वम् , अत एवं " चेतस्तत्मवणं सेवे"ति लक्षणमुक्तमाचार्यैः। यद्यपि, मनोवाग्देहेः रोवा प्रिविगा, तथापि, मुख्या मनोव्यसनरूपस्नेहात्मिका । अन्या तु सेवा तत्साधनरूपा । अत एवं "चेतस्तत्मवणं रोवे"तिलक्षणमुक्ता "तसिद्धयै तनुवित्तजे"ति सेवान्तरस्य तत्साधन- त्वमुक्तम् । मनोवचनरूपायास्तु "मनसी सा परा मते"ति मुख्यत्वमुक्तम् , इयमेव भक्तिरित्युच्यते । शाण्डिल्यसूत्रे “सा परानुरक्तिरीश्वर " इति लक्षणात् । अत एवं नारदपश्चराने " स्नेहो भक्तिरिति प्रोक्त" इति लक्षणामुक्तम् , वर पाहात्म्यज्ञानपूर्वक तु अपराधनिय॑यम्, न तु लक्षणे प्रविष्टम् । श्रवणादिलक्षणा तु भक्तिस्तस्याः साधन- रूपा, अत एव 'मत्या सझातया भत्येति। अतः सेवामार्गो भक्तिमार्गक एव ॥९॥ प्रतिज्ञातमाश्रयं पधचतुष्टयेन लक्षयन्ति, एहिक इत्यादिना । ऐहिके पारलोके च सर्वथा शरणं हरिः । दुःखहानौ तथा पापे भये कामाद्यपरणे ॥ १० ॥ भक्तदोहे भक्त्यभावे भक्तैश्यातिकमे कृते । अशक्ये वा सुशक्ये वा सर्वथा शरणं हरिः ।। ११ ।। N ३६ विवेकधैर्याधपः श्रीगोविन्दरायात्मनश्रीकुलोत्सवविटतिसमेतः। अहद्वारकृते चैव पोष्यपोषणरक्षणे । पोष्यातिक्रमणे चैव तथान्तेवास्यतिक्रमे ॥ १२ ॥ अलौकिकमन:सिद्धौ सर्वथा शरणं हरिः । एवं चित्ते सदा भाव्यं वाचा च परिकीर्तयेत् ॥ १३॥ एवं चित्त इत्यनेनान्वयः । " मुख्यो मानस” इति पूर्वमानसोक्तिः । तत्र सद्धेपत आश्रयस्वरूपमर्दैन पधेनाहुरैहिक इति, ऐहिके इह लोक सम्बन्धिनि, परलोके परलोकसम्बन्धिनि कार्यमाने सर्वथा सर्वैः प्रकारैः हरिः श्रीकृष्णः शरणं रसकोस्तु । एवं चित्ते सदा भाव्यमित्यग्रिमेणान्वयः । रक्षणं पात्र हितकारित्वं न तु प्राण- रक्षकत्वमात्रम्, लोकेपि महाशास्त्युपस्थितौ धनादिमोपे वा उपस्थिते तस्मानिधारणे कृते अनेनायं रक्षित इति प्रयोगः । तेनैहिकपारलौकिकयोर्ययोः सर्वैः प्रकारेस्त्वमेवास्मदि- तकारी भवेति प्रार्थना । जीया मायेण स्वस्य हितमपि न विदन्ति । हितमानेऽपि प्रयलेषु स्वदोपेषु विद्यमानेषु भवलैः प्रत्यूहैः कृत्वा स्वहितं कर्तुं न शक्नुवन्ति । तस्मात्वमेव सर्वान्दोपानिवार्य हित साधयेति भावः कटाशितः। केचनेतादशा ये किमपि न मार्यपन्ते, उत्तपाश्च त एवेत्यपि झापयितुमस्त्विति प्रार्थनार्थकक्रियापदस्याप्रयोगः। नन्वेतादृशाः के सन्ति, येषामैहिकं पारलौकिकं च किमपि न प्रार्थनीयमस्ति । न हि परमविरक्ता अपि पारमार्थिकाद्विरज्यन्त इति चेद् , अन बदामः । येषां मभुचरणारविन्दे व्यसनमस्ति ते मुक्त्यादिकमपि नेच्छन्तीति पारमार्थिकमपि न मार्ययन्ने । अत एव "न नाकपृष्ठं" "नैकात्मतामि"त्यादिवचनानि । ननु ये मुक्ति न धाञ्छन्ति, सेपि प्रभुचरणारविन्दा. नुरागरूपां भक्ति वाञ्चन्त्येव, न हि भगवदीयास्ततोपि निरपेक्षा भवन्ति । अतः सा भक्तिरेव परमार्थिकी पार्यनीयास्तीति प्रार्थनानिरपेक्षाः सर्वदुलभा इति चेत्, सत्पम्, दुर्लभा एव, का सन्देहः, परन्तु, दुलभा एव, नललभ्या:, नयादि, ये चरणा- रविन्दे व्यसनिनस्तै ततोपि निरपेक्षाः । यदि तावदप्यपेक्षितं स्यातदा तदयसनमेव न स्यात् । व्यसनं हि तदेव यर तद्विना स्थातुमेव न शक्नोति, इदमेव (म्यसन) तत्र प्रतिनिमित्तं, नत्वन्यत् किश्चित् । अत एव लौकिकेपि नादौ ये व्यसनिनस्ते स्था- तुमशता एव तत्र प्रवर्तने, नत्वन्यानिमित्तास्ति । ननु धनारीव निमित्तमस्तीति चेत्, रे हृदयशून्य ? यदि धनार निमिचं स्यात् तदा मुहुर्मुटुः पराजिता अपि कयं प्रवर्तेरन् । सन्देहादेव प्रवर्तन्त इति चेत्, ज्योतिर्षिभिः समूलपातं सन्देहे इतेपि प्रवर्धन्त एव । न छुपायसहस्रेणापि तत्तद्व्यसनिनः कथमपि तेभ्यो निवर्तन्ते कचित् । किश्श, इदमपि घुते आङ्कितं स्याद, व्यसनान्तरेषु का गतिः, न हि पापदिपरायणा भैरैयमत्ताः परदाररताश्च धनाशया प्रवर्त्तन्ते, प्रत्युत शम्भलीभुक्तसर्वस्वास्त । तस्माचरणारविन्द- श्रीमदखण्डभूमण्डलाचार्यबर्यश्रीमदल्लभाचार्यचरणविरचितः। ३७ व्यसनिनोपि निमित्तनिरिपेक्षा एव, अत एव कपिलदेवेनापि " अनिमित्ता भाग- वती"ति फलभक्तिलक्षण मुक्तम् । यदि किमपि निमित्तं तत्र विद्यते तदा अनिमित्चत्वं फयं वदेत् १ अग्रे च " महेतुवयव्यवहिता या भक्तिः सुरुषोत्तमे " इत्युक्तम् । “कुर्वन्त्यहैतु. किमपि" । अत एव कौण्डिन्यप्रभृतयस्तपाभूताः । अत एव ब्रजवासिनामपि तया भावः । ननु यदि व्यसनिनः किमपि न प्रार्थयन्ते, सर्वनिरपेक्षत्वात् तदा अनवासिनः फर्य मार्थितवन्तः ? न हि तदपेक्षयाप्यन्ये व्यसनिनः सन्ति, क्षणं युगशतमि- वे"त्यादि वाक्यात् । प्रायंते च तैरनारवमेव । ननु कैरुक्तं तैः मार्क्ष्यत इति ? शुका. दिभिरेव । कुत्र ? श्रीभागवतादावेव । तथाहि, ॥ १२ ॥ "राम ! राम!" ॥ १६ ॥ "कृष्ण! कृष्ण "॥२०॥"राम! राम!" || "कृष्ण ! कृष्ण !" ॥ २६ ॥ "मैव विभो ॥ ४४ ॥ "मनसो वृत्तयः" ॥ ७९ ॥ “आहुच ते," इत्यादिषु तत्ककमार्थना श्रूयते । न च तन प्रार्थनं किन्तु, कथनमात्रमिति वाच्यम् , विज्ञापितो गोपैरि"त्यादि शुकोक्तिव्याकोपात् विज्ञापन प्रार्थनमेव, अपि च, अन्ये तु मुक्त्यादिनिमितं प्रार्थयन्ते, न वैहिकनिमित्तम् । एते तु क्षुधादिनित्यर्थमपि प्रभु प्रार्थयन्ते । अल्पतमे क्षुनियादावपि यदि प्रभु मार्थयन्ते तदा किमुवाच्यं महति कार्य, यन निरूपमनिरूपधिनिरवधिस्निग्धा वनवासिनोऽभसमर्थयन्ते तत्रान्यः को वा सनायः स्वनाथ न नाथेत् । तस्मादपार्थः पार्थनारहितान्धेपणप्रयास इति चेद् , अनोच्यते । प्रथमं तावरमार्थनास्वरूपं विचारय, प्रार्थना नाम का पदार्थः । ननु ममेदमपेक्षितमित्यपे- सितकयनं प्रार्थनेति चेत्, न, राज्ञः सेवक प्रत्येवं वचनमपि मार्थना स्यात्, न हि सा मार्थना, किन्त्वाला । तया मित्रं प्रति अन्यं कश्चिदुदासीनं प्रति ताम्वचनमपि भार्थना स्यात् । न हि सा प्रार्थना किन्तु, कयनमात्रम् । ननु तस्य प्रार्थनात्वे किं बाधकमिति चेत्, प्रयोगाभार एव, न हि तत्र राज्ञा मित्रेण वा इदं माऱ्यात इति कश्चित्मयुके। ननु लाभहेतुकं वचनं प्रार्थनेति चेत् न, प्रार्थनानन्तर लाभे तद्वचनस्य मार्थनात्वं न स्यात् । लामरूपकार्याभायेन पूर्ववर्तित्वादिरूपकारणत्वा- ऽभावात् । न च सा न प्रार्थनेति वाच्यम् , मार्थितमनेन न दत्तमिति प्रयोगात् । ननु लाभेच्छया वचनं मार्थनेति चेत्, न, प्रजाभ्यो धनं गृह्यतामिति राजाज्ञाया अपि प्रार्थनात्वपसनात् । करादिसञया प्रार्थने अव्याप्तेश्च । न च तत्मार्थनमेव न भवतीति वाच्यम् , हस्तेनायं याचत इति प्रयोगात् । गृहीतमौनत्रवस्य भोजनादावपि तथात्वात् । स्यादेतत् । न वयं वचनपर्यन्तं वदामः, किन्तु लाभेच्छया यक्रियते तत्सर्वे पार्यनेति, तस्माल्लाभार्थमुद्यमः पार्थनेति चेव, मैवम् । एवमत्राप्याप्तिव्यावर्सनेपि राजाज्ञायामतिाप्तिर्वज्रलेपायितैव । ननु दयोत्पादकं वचः मार्थनेति चेत्, मैवम् । शृण्वतां दयोत्पादकं "दुष्टमेनमाशु मारये"ति महादारुणवयसोपि याश्चात्त्मसङ्गात् । ननु .
विषकधैर्याश्रयः श्रीगोविन्दरायामनश्रीकुलोत्सववितिसमेतः । सम्बोध्यस्य दयोत्पादकं वचः प्रार्थनेति चेत्, न, आनतस्प दयालुत्वे उक्तवचने- ऽतिष्याः। निर्दये प्रति पार्यने व्याप्नेय । अश्रवणे चाव्याप्तेः । न चेदं दयमपि न याश्चेति वाच्यम्, निर्दयोयमेतत्मार्थनां न मनुते, व्यग्रोपमेतलार्यनां न भृणोतीति च प्रयोगात् । पिन, " अयं देवदत्तो भृशमलेशीदिति पासङ्गीफोक्तावप्यतिव्याः । अप स्वस्मिन्सम्बोध्य दयोत्पादकं वचस्तथेति चेत्, न, "सखे भृशमहमलेशिपमि"- तिवृत्तत्तान्तवचनेऽतिव्याः। न हि मुहल्लेशनवणेपि नानुकम्पते मनः । अथ दयार्थ- मुक्तिः मार्थनेति चेत्, न, किस्सस्मिन्दयार्यमाहोस्वित्सरस्मिन्नत सामान्यतः । न प्रथमः । परार्य प्रार्थनेऽव्याप्तेः। न द्वितीयः । स्वार्थ प्रार्थनेऽव्याप्तेः । न तृतीयः । "निर्दयमेनं सदयं बुर्वि"त्युक्तेन देवदचेन पूर्वराजकयादिभिः कृते कूरराजभवोधनेऽति.. ध्याः । न च या च नैव सेतिवाच्यम् । राजानमयं पुराणादिभिः प्रबोधयतीति वयाचत इत्यपि प्रयोगापत्तेः । तस्मात् मीमांसितव्यमेवैतदिति चेत्, न, धात्वर्यविचारण याचनैव मार्यना, न च रानादिवचनादावतिप्रसङ्गः । तत्राऽपकर्षायभावेपि भार्यना- वस्येशत्वात् । अत्र निरपेक्षत्वमपि भगवत्स्यरूपभजनातिरिक्तनिरपेक्षत्वमेव । न हि भगवदीया भगवति निरपेक्षाः, तया सति ज्ञानमार्गपातात् ॥ १३ ॥ शरणसिद्धयर्यमाहुरन्यस्येति । अन्यस्य भजनं तत्र स्वतो गमनमेव च । प्रार्थनाः कार्यमा।पि तथान्यत्र विवर्जयेत् ।। १४ ॥ देवान्तरस्य भजनं, तत्र देवान्तरसमीपे मार्गप्रशायभावेपि स्वेच्छया गमनम्, चकारात्तदर्थमन्यमेरणं च विवर्जयेत् । भगवति च कार्यपात्रे अल्पेपि कर्तव्ये अधरा सर्वेषु कर्त्तव्येषु प्रार्थना वर्जयेत् । अत्यशक्या प्रभो प्रार्थनायां कृतायापपि मुहुः प्रार्थना न काति बहुवचनम् । तथा प्रभुवन अन्यत्र देवान्तरे प्रार्थना विशेषण वर्जयेत्॥१४॥ नन्येवं सति कथमिसिदिः प्रभुरपेक्षितं कुर्यान्न घेति चेत् तत्राहुरविश्वास इति । अविश्वासो न कर्तव्यः सर्वथा बाधकस्तु सः । ब्रह्मास्त्रचातको भाव्यो प्राप्त सेवेत निर्ममः ॥ १५ ॥ भक्तिमार्गे अविश्वासो न कर्तव्यः, "ये यथा मां मपयन्त " इति वाक्यात, सः सर्वथा बाधकः । विश्वासस्तु कर्तव्यः । अनयोः (विश्वासाविश्वासयोः) क्रमेण वापकत्वसाधकरवयोमानचातको भाव्यानुसन्धेयौ । लङ्कायां राक्षसर्ब्रह्मास्त्रेण बद्धो हनुमान चलितवान् , ततस्तैरन्यैः पाशैर्वद्धमारम्धो ब्रह्माले राक्षसानामविश्वासं दृष्ट्वा स्वयमपि ब्रह्मास्त्रमर्यादामुलक्षय ततलितवान् । नतो ब्रह्माखं व्ययमभूत् । एवं भक्तिमार्गाs- श्रीमदखण्डभूपण्डलाचार्यचर्यश्रीमद्लभाचार्यचरणविरचितः । विश्वासे भक्तिमागीय सर्व व्यर्थ भवति । चातक पक्षिविशेषः, स्वातिपिध्यति स्वाति- जलमेव मया पेयमिति विश्वासेन महदन्यत् जलं विहाय तिष्ठति, तदर्य स्वातिति स पिबति । एवं भक्तिमा हरि सर्व करिष्यतीति विश्वासेन भक्तिमार्गमर्यादा गृहीला पस्तिष्ठति, तस्य योगक्षेमनिवाई मभुः करोति, "तेषां नित्याभियुक्ताना योग. क्षेमं वहाम्यदमिति वाक्यान । सर्वं भगवत एव, अहं भगवदासो मगबदामेव भगवते समर्पयामीति ममत्वं स्यात्वा पास सेवेनेत्याहुः प्राप्त सेवेत निर्मम इति । नन्येवं ममत्वामा मगरकार्यातिरिक्त कार्य न कर्तव्यमिति चेतत्राहुर्यथा- कथचिदिति। यथाकथश्चित्कार्याणि कुर्यादुम्बावचान्पपि । किं वा प्रोक्तेन बहुना शरणं भावयेद्धारम् ॥ १६ ॥ उच्चावचायनेकप्रकारकाणि, वैदिकानि लौकिमान्यप्पविरुद्धानि कार्याणि । यथा कथञ्चिद् न विस्तारेण कुर्यात् , व्यवहारोपयोगित्वाद, व्यवहारस्य परम्परया भगवनोपयोगित्वादित्यर्थः । कियन्ता प्रकाराः वक्तच्या इति सझेपणाहः किं या मोक्तेन बहुनेति । वर्मभिर्न मम निस्तारः, किन्तु, भगक्दाशया कृतैः भगरायसमः शरणं भवन्विति भादित्याशयेनाहुः शरणं भावयेडरिमिति ॥ १६ ॥ स्वाधयनिरूपणेऽन्यस्य भजनवर्जनादिकं किमित्युक्तरित्याशङ्कयाहुरेवमाश्रय- णमिति । एवमाश्रयणं प्रोक्तं सर्वेषां सर्वदा हितम् । कलौ भक्त्यादिमा हि दुःसाध्या इति मे मतिः ॥ १७ ॥ इति श्रीमदैवानरश्रीवल्लभाचार्यचरणविचितो विवेकधैर्याश्रयः सम्पूर्णः। यावदन्याश्रयस्तावद्भगवानपि ते जनम् । आलोकपत्र कृपया, अनन्यजन- वत्सल" इति महादयाक्यान् । अन्यभजने सभ्यगाश्रयणमेव न सिद्धयेदिति तदभाव- स्पाइलात् प्रयपाधिकारस्पतात अनेन प्रकारेण साहमाश्रयणमेव प्रोक्तं तत्सर्वेषां वर्णानामाप्रमाणां च सर्वकालं सुखकारि । मनु मुख्या मक्तिः कुतो नोच्यत इति आशय, " मायेगात्यायुषः सूत कलावस्मिन्युमै जनाः। मन्दाः सुभन्दपतयो मन्द- ४० विवेकफ्र्याश्रयः श्रीगोविन्दरायासजश्रीकुलोत्सवविवृतिसमेतः । भाग्या छुपद्रुता" इति कलावेतादृशा जनाः किं साधयेयुः १ अशक्योपदेशे वाऽनासत्वं स्यात् । इत्येवमाश्रये क्रियमाणे भगवान्कृपया भक्तिमपि दास्यतीत्याशयेनादुः कलौ भत्यादिमार्गा हि दुःसाध्या इति मे मतिरिति । भक्तिरादिर्येषां ते भल्यादपः । तेन च ते मार्गाव भक्त्यादिमार्गाः । प्रावाहिकभक्तिमार्गो मर्यादाभक्तिमार्गः पुष्टि- भक्तिमार्गथेत्यर्थः ॥ १७॥ विकर्याश्रयाणां विवृतिः कृतिर्मणे । श्रीगोविन्दमुनेनोक्ता गोकुलोत्सवरिणा ।। इति श्रीमदल्लभनन्दनचरणकनानश्रीगोविन्दरायात्मजश्रीगो. कुलोत्सवविरचिता विवेकधैर्याश्रपविवृतिः सम्पूर्णा ।
श्रीकृष्णाय नमः। धीगोपीजनवल्लभाय नमः। धीमदाचार्यचरणकमलेन्यो नमः श्रीवैश्वानरावतारश्रीमदल्लभाचार्यचरणविरचिनः । विवेकधैर्याश्रयः। श्रीश्यामलसुतश्रीब्रजरायचरणविरचिता विकृतिः। यसाप्तिमानतो नूनं रतिः स्यागोकुलाधिपे। स श्रीमदाचार्यपादरेणुमय प्रसीदतु ॥१॥ अप श्रीमदाचार्यचरणा निवन्धे वैदिकयोः कर्मज्ञानमार्गपोर्भक्तिमार्गस्य च सम्पमपश्चितत्वेपि कलौ तेषां दुःसाध्यत्वं विमृश्य तत्रासमर्यानामर्थे सङ्केपेण 'जग- नाये विट्टले 'त्यत्रोक्तं मपत्तिमार्ग हदि सिद्धवत्कृत्वेदानीं तं प्रपञ्चयिप्यन्तस्तस्य मार्गस्य पूर्वोक्तमार्गप्रयोपकारकत्वम योधयिष्यन्तो विषेकधैर्याभ्यामाश्रयस्य सिदि बोधयितु नत्सापने विवेकधैर्य रक्षितुं निपुञ्जन्ति, तद्राणस्यावश्यक्तं वा बोपपन्ति । विवेकेत्यादि। विवेकधैर्ये सततं रक्षणीये तथाश्रयः । विवेकस्तु हरिः सर्व निजेच्छातः करिष्यति ॥ १ ॥ सततं निरतरं रक्षणीये इति प्रेपे प्राप्तकाले ना अनीयातेन नियोग आवश्य- फत्पश्च समाप्तम् । रक्षणे नैरन्तपोक्क्या आथयोत्तरमपि ताणावश्यक्तं योध्यते । रमणमात्र नभाशनिवारपेन न पोपणम् । एतदेव साम्प्रदापि स्वीकारत्न वदनु- सन्धानपूर्वकतदनुकूलाकृतिकरणयेन न योषितम् । तेन च फल्माहुस्तपानय इति। तयाकते आश्रयः सिद्धेदित्यर्थः । पहा, ते तपा तेन प्रकारेण रक्षणीये पपा आप सिद्धधेदित्यर्थः । यचदोनित्यतम्मन्यात् क्रियापारस्पैराध्याहारः । आप्रये कियास- पन्धस्य फण्ठतोऽनुक्पा पृयगुपादानेन च सात्यसाध्यतं तमसुदानसाध्यवसमाप्यो। "सो तानमुपगतोऽस्म्यसनां दुरापं तगाप्यई मबदनुमदमीशमन्य" इत्यमरस्तुती सुपोधिन्यां तया प्रपशनात् । अत्र साम्प्रदापिकाः । अध्यारापेऽपानुसदस्य वचनपिपरिणामस्प प लपुलाचया भाभयो रमणीय इत्येवं पोननं ज्यायो पन्ना केपन ४२ विकधैर्याश्रयः श्रीश्यामलसुनश्रीव्रजरायचरणविरचिता विविध प्रयाणां दण्डचक्रादिन्यावेन भत्युपायत्वसामान्या समप्राधान्यं रोचयन्ते । केचन पूर्व योरेकपदेन फयनात उतीपय पृयगेवोपादानापूर्वयोरुत्तरहेतुले युक्तमुत्तश्यन्ति । केचन प्रयाणां क्रमेणोक्तः सेवायां भरवस्य पूर्व विरेस आवश्यकस्ततो धैर्यम् , आन- यस्तूमयनिर्वाहक इति तात्पर्य प्रकाशयन्ति । यद्यप्येवं मतत्रपमप्युपपन्नं, तथापि, समा- तावाश्रयस्य फलसम्बन्धयोधनात् स्वस्याभिसंहितरूपेणाश्रयायव मुख्यत्वपकाशनाना- ध्याहारेण योजनाप्यदुष्टैर । नप गौरव शुनीयम् । तत्पशेम्यनुपङ्गविपरिणाययोयो- रहीकारण तौल्यात् । किश्चै " पृथक् शरणमार्गोपदेष्टेति नामापि पुष्टाय भाति । अन्यथा तु निबन्धे सईपेण निरूपगात्सुयोधिन्यामप्यन्यशेपसेन कचित् सङ्कीर्ण- ताचा ता किश्चित् किश्चित् कपनेन विमझीर्णत्वाच 'पृयक पदयपुष्टार्थ स्यात् । न नै सति भवयगलमनात मुबोधिन्यादौ तथात्वेन निणं विरुदयतेतिवारयम् । उपकारस्त्येन गौण्यापि तत्सम्भवात् । विजायं धारणपागों न भक्तिमार्गाद्विविक्ता, पुष्टिप्रवाहमर्यादानन्ये पृथक् नदनुक्तेः । किन्तु, प्राहादगन्तं विविक्तो भगति सस्ता- मित्वस्य सर्पदानुसन्धानात्पर्यादापा अपि विविक्तः, पृष्टया सङ्कीर्णः । तेन मयोजकै- क्यात्तत्र मिश्रमेदेप्येतन्मिथत्वानुक्तेन च ममतावाश्रयकयने "कलौ भल्यादिमाई हि दुःसाध्या इति" मार्गप्रयदुःसाध्यत्वस्य हेतुतापनेनास्य भत्पादिमार्गानुकल्पवयोधनाच स्वरूपभेदात् त्रितयातजातीय: स्वफलसाधनेन ववदुपकारकथेति सिद्धयति । तदाने- कल्पवं "नामान्यनन्तस्ये"त्पन्न प्रथमस्कन्धपष्ठे अपश्चितम् । यद्यपि, तद्विरक्ताधिका- रित्व तथापि, गीताया द्वादशेऽध्याय "अथैनदप्यशक्तोसि कर्तुमुद्योगमाभित" इत्यत्र "सर्वधर्मानि"पत्र च, गृहस्थपर्जुनं प्रति कयनाद् गृहस्याधिकारिकत्वमपि सिद्धयति । अनुकूलस्योपकारकत्वव पूर्वतन्त्रसिद्धम् । एतावान्परं विशेषस्तत्र फलोपकारकत्वं सिद्धपत्र तु सरूपोपकारकत्वमप्यस्तीति । तेन येषां यथा भातरनस्वया विद्यत इति न कोपि कापि विरोधः । ननु नियोक्तस्यैवायं विस्तार इति कयं निगन्तव्यमिति चेद, इत्यम् । तत्र पूजाप्रवाहस्य भगवत्सान्निध्यगमकत्वमुक्या तत्र तत्परत्वेन स्थितिः पति- रितिमार्गस्वरूपं निकृष्टम् । परन्तु, तच्छरोमविष्टं तत्परत्वं न विनारितम् । तदा सिध्यतीति तथा विनिगम्यते । फिश, प्रातिपदार्थः शरणगमनम् । "कृष्ण कृष्णाममे- पात्मन् प्रपनभयभञ्जन, वयं तां शरणं याम" इति मामघसरुद्धरामाश्यसुशेधियां प्रपन्नभपनिवारक नवावश्यक, “अतो वयं अपना भवाम" इत्याहु"देय त्वां शरणं याय" इति शरणगमनस्य अपनभवनत्वेन व्याख्यानात् । तमात्र स्फुटमनोपि - १अनुकल्पयोपकारखं "पि रन् समाणित त्यसैकारप्रचितम् । “वित्रादि-
श्रीमदखण्डभूमण्डलाचार्यश्रीमदल्लभाचार्यचरणविरचितः । ४३
तयेतिदिक् । प्रकृतमनुसरामः । एवमुभयोकियो रसणं, तस्य फलसम्बन्धश
वोपयित्वा तयो रमणकारमाश्रयस्प व मार्ग वक्तुं तेन तत्स्वरूपच वक्तमुद्देशानुसारेण
प्रयम विवेकस्य स्वरूपमाहुः विवेकस्त्वित्यादि । साम्प्रदायिकास्तु, 'विवेकोयं समा-
रात' 'एतत्सहनमत्रोक्तम्' 'एवमाश्रयणं प्रोक्तमित्युपसंहारदर्शना सामान्यविशेष-
मान विवेकफ्र्याश्रयाणां स्वरूपस्यैव निरूपणमत्र ग्रन्यनाम्ना समासन्यासधारणस्प
विनिष्टत्वेन च तथा कयनस्यौचित्याचेत्याशयेन व्याकुर्वन्ति । तया सति रक्षणमकार-
स्यात् सिद्धिः । एवन्तु वचनादिति शेषः । मातमनुसरामः । विवेकशन्दः पृपक्त्वे
तझाने का प्रसिद्धः । यया नित्यानित्यवस्तुविवेक इति । शीलविशेपे च यया उचित-
सत्कारकत्तरि विवेकीति । "विवेकः पुनरेकान्ते जलद्रोणीविचारयो"रिति कोशात्रिपु
रूदश्च । गदन किमपि न विवक्षितरिति झापनाय तुशन्दः । कस्तहि ।। हरिः सर्व
निजेच्छानः करिष्यति । हरिः सर्वदुःखहर्चा सर्व स्वीयानां लोकिकालौकिकं,
निजेच्छा स्वतन्त्रेच्छातः, क्रीडेच्छावो निजानामिछातो वा, फरिष्यति ।
अपन मितानिर्देशस्तेनैतद्विपयकमनुसन्धान विधेक इत्पर्यः । अत्र हरिपदेन गजेन्द्र-
पोतकर्तृतस्फोरणात्पशुवदज्ञानामत्पन्तदुःखहारित्वं मूच्यते । निजेच्छात इत्पनेन
"क्रीडाभाण्डमिदं विश्व" "मीहार्यमात्मन इदं त्रिजगत्कृतमि"त्पादिवाश्योक्तं जगतः
क्रीडाभाण्डवं स्मार्यते । इच्छाविशेषणीभूतनिजपदेन स्तस्य विशेषतस्तदीपत्तश्च । मतः
सस्याहा क्रीडाभाण्डस्य वा स्फरिते, "विश्वस्य य: स्थितिलयोद्भवहेनुराधो योगेश्वरैः
रपि दुरत्यापोगमायः, क्षेमं विधास्पति स नो भगवरुपपीशस्तत्रास्मदीपविमृशेन किया.
निहार्य इत्यादिरूपेणानुसन्धेयम् । विशेषतस्तदीपत्वाची "मां मनपराधीनः",
"मयि ने तेपु चाप्य," "आत्मारामोप्परमदि"त्यादिवाक्पोक्तं भगवतो भक्तापी.
मलं परोरोण हिवकारित्वं स्वनिकटवर्तित्वं स्वरूपमर्यादामायतिक्रम्प भक्ताभिलापपूर-
फत्वं यापिकारमनुसृत्य भाविहितकारित्वपनुसन्धेपमिति तत्प तस्य ताहकारगनुस-
न्यानं विवेक इति भावः । करिष्यतीति भविष्यदर्थकमयोगो मान्यचिन्तापा जाप-
मानत्वात्तग्निटरपर्यो, न त भूतपमानयोर्भगरकार्यतानुसन्यानव्यायः । तेन
फरोत्यकापीत् करिष्यतीति धान्यनुसन्धान विवेक इति फाति ॥१॥
एवं स्वरूपं विकस्प निरूप रसणारं पदिप्यन्तस्तलसरुन कापनापास्तत्तर-
पसायनस्य च तमारकर इदिकस्य गजेन्दर अगस्पर मारपापि मार्पनत्सरापालन
ददिकल्प तनो रसितं मापनस्य फलव्यभिचारिलं युच्या सपर्ययन्ति प्रापितषेति।
पार्थिते वा ततः किं स्यात् स्वाम्पभिमायसंश्रयात् ।
सर्वत्र तस्य सर्व हि सर्वसामर्थ्यमेव च ॥ २ ॥
विवेकधैर्याश्रयः, श्रीश्यामलमुतश्रीवनरायचरणविरचिता वितिः । वेत्यनादरे, अभ्युपगम्य दृष्यते, प्रार्थिते मार्यनकृते ततः प्रार्थनातः किं स्यात् ? न किपपीत्यर्थः । न हि गजेन्द्रस्य प्रार्थनादो मोक्षदान, फिन्तु स्वेच्छातः । यदि ततः स्यात् प्रारजन्मन्येव स्यात् , “जजाप परमं जाप्यं प्रारजन्मन्यनुशिक्षितमि"ति वाक्या- त्चदानीमपि प्रार्थनस्य तुल्यत्वात् । किन्तु, विचारितस्य मर्यादास्थापनस्प भक्त्या तोपस्य स्वसर्वात्मत्वज्ञापनादेश्च कार्यस्य जातत्वेन स्वेच्छात एव । अन्यया "नय मामि"- त्यत्र नान्तर्दध्यात् । अपाऽपेक्षितदानपापाततः पार्यनयर चैदाद्रियते तदापि, कालवि- लम्बन फलव्यभिचारेण चान्पयासिद्धत्वम् । अय सापि चे कयश्चित् परिहियेत वर्हि, सा भगवदमिमायनिश्चयकृता प्रार्थना, न तु स्वाम्यभिमायसंशयकालीना । वया सति तत्रापीच्छर कारणत्वेन पर्यवस्पतीति तत्र भार्थनाया व्यापारनामा सेत्स्यति । संशय- कालीनायास्तु तदपि न । पत्युताधीरत्वज्ञापकवया क्रोधोपेशावहतया वा यापकतध । एतेनैव भ्रमकालीनापि व्याख्यातैव । किञ्च, यथा तथास्तु, स्वस्य जीववेनालकत्वात् स्वमनोरयस्पायल्पवारमार्थितस्तावदेव दास्पति फुजापा इव । कुमनीपित्वचाधिक भविष्यति । अभार्थितस्तु पारलौकिकन्वाचतोनन्तगुणं दास्यति । तदुक्तं "मनोरयान्त श्रुग्यो यथा ययुरिति । तदेतदुक्तं प्रार्थिते वा ततः किं स्यात्स्वाम्पभिप्रायसंश- यादिति । तया च प्रार्थनेन दाने विवकस्य सामर्थ्यनाशः, अदाने खेदाद स्वरूपना- शस्ततोस्माद्धापकादेवं विचारेण स रक्षणीय इति भावः । एतेन कामनापाः पूरक साधनान्तरं फैमुतिकादेव निरस्तम् । मार्यनैव चेन्निष्फला काम्यकर्माणि किमुतेति । 'सुखाय कर्माणि करोति लोको न तैः सुखश्चान्यदुपारमं वा, विन्देश भूयस्तत एव दुःखं यदत्र युक्तं भगवान्वदेन" इति तृतीयस्कन्धे काम्यकर्मणां फलव्यभिचारस्पानिष्टहेतु- स्वस्य च विदुरेणैव दर्शिवतात् । न च साझाद्वैदिककर्मणः फलावश्यंभारनियमकल- व्यभिचारी न प्राप्तावसर इति शङ्कयम्, दसपशादिवत् साङ्गतापा एर दुर्घटत्वात् । इदं यथा तथा "कर्मणां गहनागतिरि"त्यत्र निबन्धे प्रश्चितमिति सनोवधेयम् । नवस्त्येवम् , तथापि निन्दाचाक्यावन्नादावप्यभिमाया यानादेव मार्यरस्य वयात, ज्ञाने तु न नया दोष इति स्वामिलापपूपर्प प्रभुर्विज्ञापनीय एवेति चैनेत्याहुः सर्व- त्यादि । सर्वत्र ब्रह्माण्टे अन्तर्वहिव तस्य स्वामिनः सर्व वस्तुमात्रमस्तीति शेषः। हीतियुक्त क्रीडार्यत्वात् , सर्वसामर्थ्यश्च तस्यैव, "यः सर्वत्र सर्वशक्तिः," "सर्वस्य वशी सर्वश्वेशान," इत्यादि श्रुतेः। तथा च यदि दित्सेत् सर्वत्रत्वादस्पदमिलाएं ज्ञात्वा तदैव दधात् । पदि जी तत्फलानुभवासामध्ये पश्येपदपि विदधात् । तत्पनो- मिलपितमकारेणैव स्वस्मिनपि तथा प्रकटीकृत्य वा तन्मनोरयं पुरयेत् । एतदपि, "एवं सन्दर्शिताब हरिणा भक्तवश्यता, गोपीमिः स्वोभितोत्पन्,” यस्तदिदा
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श्रीमदखण्डभूमण्डलाचार्यवर्यश्रीमद्लभाचार्यचरणविरचिनः ।
लोक आत्मनो मृत्यवश्यतामित्यादिभिवतम् । एवं सत्यपि यम ददाति तस्मान
दिसतीति निश्चितम् । निधिवे चाभिमाये प्रार्थना न माप्तावसरेति न मार्थनीय
इत्यर्थः । एतदेवाभिसन्धाए श्रीमप्रभुचरणरुक्त, " यया वयं तदीपा: स्परतथा सोपि
निसर्गतः, अस्मत्मभुरतचिन्ता नैहिके पारलौकिक" इति । एवं कामितपूरकादक्षण-
प्रकार उक्तः । अतः परं कामनातो रक्षणमकारो वकव्यस्त वक्तुमाहुरभिमान इत्यादि ।
अभिमानश्च सन्त्याज्यः स्वाम्यधीनत्वभावनात् ।
विशेषतश्चेदाज्ञा स्यादन्तःकरणगोचरः ॥ ३ ॥
अभिमानो गर्दः । यौगिकार्यग्रहणे अभितः उपयतो मानोऽभिमानः, स्वतः
परत निरसपुनतिः पूजा या । तत्सर्वमन्त्राभिमान इत्यनेन सड़गृहाते । चकारात्तरसा.
धनादिश्च । स सम्यक् लौकिकप्रकारेण त्याज्य: । नत्र हेतुः, स्याम्पधीनस्वभावना.
दिति । पल्लोपे पञ्चमी । स्वस्य स्वाम्यधीनत्वं विमाग्य रयाज्य इत्यर्थः । कायनामूलं
दि गपित्तोनात पूजा च । अहमीदृशः, ईदृशकुलोत्पनः ईग्भिः प्रशस्पः, इत्या-
पनुसन्धान एव । तदनुरूपाकापनादर्शनात् । तदनुत्पत्तिनिष्टत्तिश्च साम्पधीनत्वभाव-
नया, तद्वतां तददर्शनात् । किञ्च, गर्वादिननकस्य स्वोत्कर्षस्यापि तदधीनत्वमेव, तस्प
सर्वकारणवाद्भावनीयम् । तथा सनि पयेदं सम्पादितवान् तयाऽपदापि सम्पादपिपती.
त्यार्या कामना, तन्मूलो गादित्यादिभावनेन ननिवार्य विवेको रक्षणीय इति
भावः । एतेनेदपपि ज्ञापितम् , यद्भक्तानां दासतान स्वतोभिमानसम्मवः, किन्तु, दुःस-
शादिवशाद । सोपि दासधर्मस्य साम्पधीनत्वस्य भावनाध्यापः । कदाचिषः कृपपा
तदधीनत्वं स्वस्मिन् प्रदर्शयेचया वा सेवां कारयेनदापि, नझावनासन कार्यस्त्पा-
ज्यश्च । यदि वा स्वतन्वेलादण्टं कुर्यातदा खेदोषि त्याज्य इति चकारोऽनुक्तता-
पायकः । मात्र हेतुरचनादेहाभिमाननिवृत्तिस्तु न विवक्षितेति पतिपाति । अप विव-
सिता तदा सेवनशरणागतप्रतिहल्लदेहाध्यासनिनिर्यायति न विगदलेशः । एवमानहरो
रक्षणमकार उक्तः । अतः परं पायं वदिष्यन्त उक्तरीत्याभिमानत्यागेन साणे तरिप्त-
पभिशापा मगवदादास्पसवान्तरफलमिर पदपन्तस्तस्पा स्यानाविरुदायामपन:
पाशारज्जुरिति शङ्कामपि पारयन्तः, भयोगमावियागेन स्वरूपविमान विपरिणागेन
च व्यरस्यामापुर्विशेषत इत्यादि ।
विशेषतशेदाज्ञा स्यादन्तःकरणगोवरः ।
तदा विशेषगत्यादि मान्यं भिन्नं तु दैहिकात् ॥ ४॥
विवेकथैर्याश्रयः, श्रीश्यामलसुतश्रीब्रजरायवरणविरचिता वितिः । उक्तहेतुहेतुपञ्चम्या आप्यन्वेति । अन्ययास्य पन्यस्याकस्मिकता स्यात् । सेवादेहेतुत्वपक्षेपि स्वाम्पधीनत्वमानस्य ताप्यावश्यकचात्सहकारित्वमदण्डवारित्त- मेव । तथा च तस्मात्तत्सहकृतसेवादेविशेषतः श्रीमदाचापांशातो विशेपमाधिक्यं विष- यीकृत्य पाध्ययोधककारतो वा दैहिकादाधिक्यं वैलक्षण्यं विषयीकृत्य वा चेद्भगवत आज्ञा स्यात्, तदा तत्प्रयोजक विचारणीय, किमयमन्तःकरणगोचरोन या । अमल्लिङ्गमिदम् । अन्त:करणमभिमायस्तस्य गोचर विषयभूता अभिप्रारमयुक्ता न वेति । किन, अन्ताकरणस्य गोचरः, अन्तःकरणे विषयत्वेन भाता, न तु स्वामी, न वान्यद्वारिकेतिस्वरूपमपि विचारणीयम् । न चैवं सहचारितः शब्दः सहद गम- यतीति नियम इति शङ्कयम्, प्रायिकत्वात् । अन्यथा श्लिष्टप्रयोगोछेदमसङ्गात् । अवोर्थद्वयमप्यत्र सहायम् । तत्र पधन्तःकरणप्रयुक्तपेनान्तःकरणे भाता स्वामीप्रभृतिल उत्कटवेत च भाता, तदातु दैहिकाहेहसम्बन्धिनो भिन्नपाइ विशेषगत्यादि भाव्य- मुलाय कार्यमिति यावत् । तथा पायर्थः । आज्ञाविषयविचारेण तत्मयोजक निशेषम्, यदि दैहिकविषया तदा नाभिभापपूर्विका, किन्तु, परीक्षार्धा, तदा ततोऽवगतं विशेष. गतिसाधनादिकं न कार्पम् । यदि स्वसेवाविषया, यदि वा सेवामविबन्धनिरर्तक- विषया तदा साभिषायपूर्विका, ततस्तद्वगतो विशेषः सामयादिविषयस्नादशी गतिस्तीर्यदेशान्तरादिपिया, आदिपदेन तादृशं तरसापनश्च कार्यम् । तेन पाहतो रक्षणमान्तरस्य स्वनुष्ठितत्वाभिज्ञानमाशार्प विरोधपरिहारथेवि सर्व सामअस्पमिति भावः । पुष्टिमार्गस्य भानाविधस्यापि कृपा एव मकटनात् । "सर्वधर्मान परित्यप," "नस्माचमुद्धपोत्सृज्य," "धन पाखिलसंशयाधिमित्यादिवाक्यः शरणागतौ सेवा. यो च भावतात्पर्यात् । “अनन्पाश्चिन्तयन्तो पामि"तिवाक्येन भगवत एव जीवस्याखिल. निर्वाहकत्वावगतेश्च ना कोपि शकालेशः। ननु दैहिकातिरिक्तविषयाया भगवदालायां नातायां यदि तदिरोयिनी काचिदा- पदन्तरा समागता, तदा माझया करणे निहाभासदाशाताऽसिद्धिा, मारणे तर शान स्वामिद्रोह इत्युभयनः पाशाररित्यतस्तत्रोपापपाहुरापदित्यादि । आपदत्यादिकार्येषु इठस्त्याज्यश्च सर्वथा । अनामहश्च सर्वत्र धर्माधर्माप्रदर्शनम् ॥ ५॥ विवेकोयं समाख्यातः उक्तहेतरत्राप्यनुवर्तते, आपदो गति: मामिरापद्धतिः, सा आदो पेपा, ताशानि यानि कार्यागि, अशक मर्या इति यावत् । नेपु "स्वाम्पधीनतभावनाव" हठस्त्या-
श्रीमदखण्डभूमण्डलाचार्यपर्यश्रीमदल्लभाचार्यचरणविरचितः ।
ज्यश्चाग्रहस्त्याज्य: । चोप्यर्थे । अयमाशयः, निर्वाहो ाभिमायस्य लिङ्गम् । प्रतिबन्ध
कापाते निर्वाहामावत्साऽऽज्ञा नाभिौता, परीक्षाधैवेति निवेयम् । नहि भगवतो
भक्काऽऽपदभिमेता, न वा कालादपस्तत्र प्रभवन्ति, “ये त्यक्तलोकधर्माश्च मदर्थे तान्त्रि-
भर्पहमि"ति वाक्यात् । अत आपत्पराभूताया आज्ञायाः परीक्षार्थत्वेनानभिपतत्वानोक्त-
दोपः । किञ्च, हठेऽनिष्टसम्भवात्सेवामतिबन्धः पर्यवस्पतीत्यतो इठो न कार्य इति शार.
नाय सर्वथेति । उक्तप्तमुच्चयार्थश्च । एतेनैवकरणे हेत्वनुसन्धानप्रावल्पादभिमान-
नाशे विवेकपोपणम्, हठे तु तन्नाश इति द्वितीयं कायिकं इठत्यागेन फरणरूपं रक्षा-
साधनमुपदिष्टम् । अय दैहिकादिविषये व्यवस्थामाहुरनाग्रह इत्यादि । सर्वत्र दैहिके
तरसम्बन्धिप्सम्बन्धिपन्यस्मिंश्व कायें अनाग्रहः, "कार्य" इति शेषः । चोनुक्तकार्या.
न्वरसमुच्चायकः । तया च, स्वतःसिद्धावतिसुखसाध्ये च न विचारः । सायासमप्पोदा.
सीन्येन कार्य, तेन विवेकपोष इति भावः । अत्र हेत्वनुत्तिर्योध्या । नवस्त्येवं लौकिके,
परं वैषस्य तु सामान्याज्ञाविषयत्वादाग्रहः प्रसृज्येतैवेति चेचत्रोपापपाहुर्धर्मेत्यादि
धर्माधर्मयोविहितनिपिद्धयोरनं पर्यवसितं परिणापस्तस्य दर्शनं विचारस्तस्कार्पमिति
शेपः। पौराणस्मार्चौतानामुनरोत्तरमुत्सर्गतो वलिष्ठत्वं, तथैव शारीरात्मभागवतधर्माणाम्,
तेपु स्वयं तादृशे भगवद्धर्मे निष्ठितस्तदविरोधिपरिणामकः कार्य:, इतरो न कार्यः ।
तया अधर्मोपि म्लेच्छसम्भाषणानुसरणादिरूपो युदिमकलुपयन स्वधर्मनिहाय चैद्युस्या
कार्यः, इतरस्तु न कार्य इति । तत्रापि "स्वाम्पधीनत्यभावनाद्यपातसिद्धिस्तया
विरक्षणमनुसन्धेपमिति भावः । एवं सपरिकर विवेकं निरूप्योपसंहानि । विवे.
कोयं समारख्यात इति, अपं न सन्पो विवेकः । सम्पक रसामकारोपदेशपूर्वक-
माख्यातः प्रमाणयुक्तिगर्भाभिक्तिभिः कयित इत्पर्यः ।
एवं विवेको निरूप्यानः परमाप्तासरं धैर्य निरूपयन्ति धैर्यन्तु विनिरूप्यते इति ।
धैर्यन्तु विनिरूप्यते ।
पूर्वोक्तरीत्या विरेकरक्षणे जिव्होपस्थ नपादिरूपस्य धैर्यस्य प्रसङ्गन एव सिद्ध
स्तनिरूपणं न मासासमिति शानिरासाय नुशब्दः । विकासे हृदयारूदे धे
स्वन एर भरेद, परं पायाम्पेन स्वरूपे अशोऽरक्षणे च कदाचितिशिल्पेयादपि, अा-
स्तदर्य विशेषग निरूप्यते क्षणोपायसहित कथ्यत इत्पर्यः ।
विवक्षित पर्पलपपाहुनीडारोन्यादि ।
त्रिदुःखसहनं धैर्यमामृतेः सर्वतः सदा।
तकवदेहवद्राव्यं जडवगोपभार्यवत् ॥ ६ ॥
४८ विधैकप्रियः, श्रीश्यामलमुतश्रीवनरायवरणविरचिता विकृतिः। आमृतेः सर्पतः,"मृति" शब्दो मरणकाललाणः । “मृति भनक मर्यादीकृत्य सर्वस्मात सदा सर्वकाले बिदुःखसहनं प्रयाणामाधिदैविकादिमेदभियानां कायि. कादिभेदभिन्नानां कालरुर्मस्वभावनाना "वर्गिकापासविधातेति पवाक्या निवर्ग- सम्पन्धावछिन्नानाच सहन पर्पणमुपेक्षणमपतीकारयुक्तोऽनुभवो धैर्यमित्यर्थः । मनु भगवदीयानामाधिदैविकादिदुःखसम्भावनैव नास्ति यत: कालादयोपि न. तदुःखदेतो भवन्ति इति कयं तत्सदनोक्तिः, इति चेत्-भगवता धैर्पपरीक्षार्थ कारादयस्तया प्रेर्य- ते, अतः पूर्व भगवद्भयादेव न प्रवृत्तिस्ततस्तदानयाऽज्ञाभङ्गभयारमत्तिरपि सम्भवति, पत्तो भगवतेयोच्यते "मद्रयाद्वाति वातोर्याम त्यादि, श्रुतिया "भीपास्मादि, त्यादि । अयं न्याय: फालादावपि तुल्पा, भगवनियम्यत्वस्य समापि समानस्वादिति । ननु भगवतः सर्वज्ञत्येन परीक्षाकरणमपि न सम्भवति तत्कयं परीक्षार्थ तपा करणम्, किन, परीक्षार्थे भक्तेषु दुःखं ददातीत्पपि नोचितमिति चेद्, अगापि बदामः । भगवति सर्वशत्वादिधर्मास्तु ज्ञानादिया साधारणेन्यांपकर पुष्टिमार्गे विशेषरपणेच्छायां तद्री- त्यैव सर्व करोतीति नानुपपत्तिः। यतः "शगतमि"त्यादिना अन्तरङ्गभक्तेप्पपि परीक्षेत्र कुता। द्वारकालीसायामपि "अव्यक्तलिङ्गं प्रकृतिवन्तःपुरगृहादिषु, कचिचल्न योगेश तत्तगाविषुभुल्सये"ति लोकरीत्यापि तयाकरणमुक्तम् । अपरश्न, "मदन्यत्ते न जानन्ति माई तेभ्यो मनागपी"ति भगता भक्तिमारीत्या भक्तातिरिक्ताशानं स्वस्योक्तम् । तेन ज्ञायते भक्तिमागे लौकिकरीतिमेव भूयः मदर्शयतीत्पतोपि नानुपपत्तिः काचित् । किश्च, दुःखदानस्यायुक्ततायामप्युच्यते । सालासरूपात्मकायदानार्यमेव पैर्यपरीक्षा क्रियते इति घालाध्यापनार्थताइनवत्, पर्यवसानतः मुखरूपत्वमेयेतिनोक्तशालेभः । अकृतमनुसरामः । धैर्यस्वरूपमुक्त्वा दृष्टान्तपुरः सरं तद्रमणप्रकारमाहुरतमादित्यादि । भाव्यमित्यस्य विश्वापचयः । तमावतो राजालनस्य देहस्तफयदेहस्तेन तुल्य स्वदेहादौ भाव्यमित्यर्थः । इयश्चाख्यायिका- हला नृपतिमवेक्ष्य मुनद्दष्टं देशान्तर विधिवशाहणिकास्पि जाता पुत्रं पति सधिगम्य चितां प्रविष्टा सोवामि गोपगृहिणी कयमय तक्रमि"दि श्लोके प्रसिद्धा । या च, उपा पया स्वदेहादिपोपणसाधनीभूते तके गते स्वदेवावस्थापनुसन्धाय शोकाभावपुरस्सरसमतीकारेण दुल्वमेव सोढे, तया स्वस्याधि. १ सदाने रामा, मावास्ये तपा, रेतरेष्विति वार, पाका । भारत स्मत का विसानोतिरिति धेई । इत्पशिपि। 5 श्रीमदखण्डभूमण्डलाचार्यपर्यनीमल्लभावायचरणविरचितः । भौतिकलौकिक्साघनीभूतधनपुत्रापपगमेपि शोकाकुला अप्रतीकारेण दुःखसहनार्थ कथा भायनीयम् । ष्णातलामानन्तरं तेपा हेपतय पतः । मत पर निवन्धेपि श्रीमदाचाय: "प्रतिकूले गृह सदित्यादिना त्याग एव तेषामुक्तः । अथवा दृष्टान्तद्वपमिदम् । तत्र पूर्वो व्याख्यातः । द्वितीयस्तु, देहः किमन्नदातुर्ग निषेतुमातुरेव घा ! मातुः पितु लिन ऋतुरः शुनोपि वे"ति देह. साधारणो नात्मीयस्तया सर्वेपि तत्तददृष्टसम्पादितत्वारसाधरणा इत्येवं तदर्थमनुसन्यमित्यर्थः । भौतिककायिक- फर्ममार्थिकदुःससहने दृष्टान्त उत्त: । माध्यामिकराहने दृष्टान्तमार्जडवदिति । यथा जडभरत मुक्तिसायनसत्येपि तेन पूर्व मगशरीरमासिनन्यं ततो भाव मायादिकृत भदकालिशलिदानममयपर्यन्तं, ततो रहगण शिविकावादनसामयिकं सोई, तथा साध्या सिकालमादिदुःखं सोई, सदाव्यम् । किश्चतदेदानन्तरं * साक्षात्सोपयोगिदंदे विपयोगादिदुःसेपि तत्सो९ जव्यदधुना भावनीयमित्यर्थः । शिक्ष, भाव्यमित्पनेन भवयं भाज्यत्वमपि छोयो । तेनाप्रतीकार्यत्वाचनिशरणार्य यत्नो न पर्चव्य इत्पपि गुच्यते ! आधिदैविकस्वाभाविकादिसाने दृष्टान्तपादुगोपभार्यचदिति । भागों समूहो भार्यम् , गोपानां भार्य गोपभार्य, वन तुल्यं भाव्यम्, पपान्तगतो गोपानां मापसमूहो भावद्विरहेणातिदुःख सोता ततो ध्यानपावभाररसाग्निध्यसुखानुभूया. पुण्यपुण्योपरमे निर्गुणदेहेन भगवन्तं प्रातस्तपाइमपि पारमादिसम्मत्रमुभयं सोदा भाम्यामीति दुःखसहनार्थमनुसपैयम् । एवं मासे माविश्वनिरासाय सम्पदृष्टान्न इति सर्व सुस्थम् ॥ ६॥ मता पर यह बात पती कारोपस्यितो यदि सहनामहरनदा वितहानिराशा. भाग, पदि राणी सत्वं तदा दुःखनिरपासनामारेन धर्महानिराशापयेत्युपपन: पाधायां रजो समाधानार्यमाः मतीकार इत्यादि। प्रतीकारो यहच्छातः सिद्धश्चन्नाग्रही भवेत् । भार्यादीनां तथान्येपामसतश्चाक्रम सहेत् ॥ ७ ॥ पहातो भगादिचात: सतोपापं पिनेति पाइन् । मामानि निन्दाया- मिति । " भूमिनिन्दापशंसा नित्ययोगेतिग्रायन, संगसिरिसायो भरनि मनुता. दप" इत्यभिपुक्कोक्ता तथा न, मगादिग्या सिदतीसरे निन्दिताऽध्यार मन् । परमानायोऽभिमानासारण निर्भिगkिwमरानानिए महान फरणादारभर इति मा सामसमिति मारः । पी योग्यम् । जच्योर. रमाRMINARMininthinitter विकधैर्याश्रयः, श्रीश्यामलसुतश्रीव्रजराजचरणविरचिता वितिः । भार्ययत् प्रतीकारो यहछातः सिद्वश्वेन्नाग्रही भवेदिति । तथा च, यथा जडो भगवदिच्छया रहूगणेन संवदन् शिक्किाबाहनार्थ नाइवान जातः । यथा च रासमण्ड- लमण्डनायितं गोपभार्य विप्रयोगतापे भगवदिच्छपा गुणगानस्मरणरूपदर्शनादिरूप- प्रतीकारोपस्थिनौ भगवदिच्छानुरूपमेव व्यवहृनवंद, तथा स्वयमपि स्वाधिकारानुसारेणा- नाग्रही भवेदित्यर्थः । तत्सम्हस्याऽनाग्रहोपि श्रीमदाचा र्गत्या ललितयोदारे"त्य. स्यामासे " यदा पुनरियारभ्य "स्वपमानिर्भूत "इत्यन्वेन "त्वयि धृतासर" इत्यन "स्वदर्थमेवे त्यारभ्य "सदैव त्यक्षन्ती"त्यन्तेन, "दुस्त्यजस्तस्कया' इत्यत्र च स्फुटीकृतः। चेदित्यनेन तादृक्ताप शीघ्र स्वाश्रय दाते प्रभुरेव प्रतीकार सम्पादयति । न सम्पादयति चेदिति स्वयं तदर्थ न यतेत । तथा सति प्रभोरनभितरपेन कोपाद्वैपरी- त्यापत्तिरित्यपि सूच्यते । अतः परं कायिक रक्षासाधनमुपदिशन्ति भार्यादीनामित्यादि। भार्यादीनामिति तद्गुणसंविज्ञानो बहुव्रीहिः । तेन येत्यन्तस्वनियम्यास्तेषाम् । अन्येपा विभक्काविभक्तवान्धवादीनामुदासीनानाच, असतो दुर्जनस्य, " दुःसहमिमं मन्ये आत्मन्यसदतिक्रममिति वाक्याद् दुःसहवास्पृथग्निर्देशः । एतेषामाममं तिरस्कार सहेत । आक्रमपदस्य योगेन पादप्रहारपर्यन्तता वोध्यते । सहेदिति अनुदात्तेत्य- लक्षणस्यात्मनेपदस्थानित्यत्वासरस्मैपदम् । ब्रह्मचारिमभृतीनामन्येपामेकाकिनाच भार्या- धभावाद्वन्ध्त्रऽभावान त्रितयनिर्देशः। तेषां सेवापतिकूलत्वं त्यागरूपमेव सहनम् । स्वविवेकमात्रप्रातिल्प च तदमतीकारेण तिरस्कारमर्पणमेव सहन सदाचरेदित्यर्थः । अनोपायो निवन्ध उपदिष्टः । "सर्व सहेन परुष सर्वेषां कृष्णभावनादिति । "एन- दन्तः स्थितः कृष्ण एवास्यानुपदिशती"ति च व्याख्यातम् ॥ ७॥ एवयाक्रपसहनोपदेशे गृहस्थितिरागता । तथा सतीन्द्रियकार्यकरणमाक्षिप्त, तत्राऽऽसक्तौ च धैर्यरूपस्य सामर्थ्यस्य का नाश इति तमिटरपर्य साधनान्तरं रक्षण- स्योपदिशन्ति स्वयमित्यादि । स्वयमिन्द्रियकार्याणि कायवाझनसा त्यजेत् । अरेणापि कर्तव्यं स्वस्यासामर्थ्यभावनात् ॥८॥ स्वपमित्युधम्य आग्रहेणेति यावत् । इन्द्रियकार्याणि ज्ञानक्रियामानान् भोगात् कायथा नसो कापवाभ्यां सहित मनसोन सायना त्यजेत् । क्रीडायामपि नाद. दीत, तेषामत्यन्तबाधकत्वादित्यर्थः । पापकत्वञ्च, “विषयान्ध्यायतः पुंस" इत्या- दिना गीतायां स्फुटमेर । कायेन त्यागो भोग्यानुपादानम् । वाया स्पाग: शुभा- १सोपियो विभागवद ।
श्रीमदखण्डभूमण्डलावार्यवर्यश्रीमदभाचार्यचरणविरचितः । शुभत्वाकीर्तनम् । मनसा त्यागस्तन्निःस्पृहत्वम् । न चैवमुद्यम्य त्यागे आग्रहापातेन वियेकदानिः प्रसज्यतेति शङ्कनीयम् । आग्रहस्योपभोग्यत्वायंश एवोपसयेण विवेकभङ्गाऽ- समर्थत्वात् । ननु "स्वयं त्यजे"दित्यनेन यादृच्छिकस्यात्पागः प्राप्ता, उचितं चैतत् । अन्यया शरीरयात्रानिर्वाहाभावेन साधनस्याप्यनुष्ठानाशक्तिमसङ्गात् । अस्पक्ते च याद- च्छिके तस्यापि विपयत्तेन वन्धनस्वभाववादिन्द्रियाण्यार्पणीयानि, तथा सती"न्द्रियै. विपपाऽऽकृष्टरिणति मनाड्या सर्वनाशमसङ्गः । न च ततो रक्षार्थ स्वभावो विजेतुं शक्यः । आरम्भदशायां तादृक् सामाभावात् । "स्वभावविजयः शौर्य"मिति वाक्येन तस्य शूरकार्यत्वात् । अतः कथं धैर्यरक्षेत्यतस्तत्रोपायमाहुरशूरेणापीत्यादि । सभाव- मिन्द्रियाणि च जेतुमसपर्थेनापि स्वस्थासामर्थ्य भावयिता इन्द्रियकार्यस्यजनं कर्तव्यम् । किं करोमि, मन्दभाग्योहमसमर्थ एतावत्यप्पाज्ञा पया पालयितुं न शक्यते, इत्यादि भावनीयम् । एवं प्रपतमानस्य ग्लानाविन्द्रियाणां कौठ्ये, विपदैरपि तथा अनाकपात प्रमेण तत्सिद्धिरित्यर्थः ॥८॥ अनाप्पशक्तौ पुनरन्पमुपागमाहुरशक्य इत्यादि । मशक्ये हरिरेवास्ति सर्वमाश्रयतो भवेत् । एतत्सइनमत्रोक्तमाश्रयोतो निरूप्यते ॥ ९ ॥ परमप्यशक्य हरिरयास्ति शरणमिति शेपः । नम्मे पारणोपदेशेन कथं तसिद्धिरित्यामालायामाहुः सर्वमानयनो भवेदिति, "सर्वधर्मान रिस्पगे"ति भर. णोपदेशस्ये स्वस्पेव पापमोचरसायनेन सोशनिवारणेन च भागादेव मिदियोर. नारत्यर्थः । एवं धैर्य सपरिकर निरूप्योपसंहरनोऽप्रिमनिरूपणस्य गतार्थ चापि बार- पनि एतदित्यादि । अब शरणमार्गे एतदुनसायनापनान्त भयमुकम् । तथा च"मराय" इत्यादिना पदाश्रयणमुक्तं तदपि धैर्याप्तगशेपत्तायांन्तःपायेव, नगा- श्रयरूपमित्पर्यः । अतः परं ममाप्त प्रशनमा निरूपनि माययोलो निरुपम इति । मनः तात्रता चारिताध्यांमायाम आश्रयो निरूणत इपर्यः । माय- पगद माशारे योग । सेग्ने योगिता, मामानान् श्रपर्ग सेग्नमाप्रप इति । तत्र पहने किं चित्रक्षितमित्याहापां नप सम्पमाईरहिक इत्यादि। ऐहिक पारलोके च सर्वथा शरणं हरिः। दुःखदानो तथा पापे भये कामाद्यपरणे ॥ १० ॥ "रा दिम्पतगाररिपांग म पाम्, वर्गय में हरियाना" इति भारत भगरनारपारमनंगां पातालपाईगा मशिना मिपा उ.
५२ . विवेकधैर्याश्रयः श्रीश्यापलसुतश्रीवनराजवरणविरचिता वितिः । बलमिति श्रुत्या स्वतः श्यामवर्णः पुरुषोत्तमो हरिस, ऐहिके एतजन्मसम्बन्धिका फल- भोगे स्वमनोऽभिलषितसेवादिसापने तत्सम्पादने च, परलोके एतजन्मान्ताभाविनि जन्मनि, चकारानर सुखदुःखफलभोगे भगवदिच्छानुरूपसादिसापने सत्सम्पादने सर्वथा "शरणं रक्षणे गेहे वध रक्षकयोरपी"ति कोशात् । ततस्ततः प्रमादादिभ्यो रस- पारमा, तत्र तत्र गेहात्मा, तत्चत्सतिरन्धनित्यात्मा, तर तत्र ततस्ततो रक्षकश्च, स्वयमे- चास्तीत्यनुसन्धानमाश्रय इत्यर्थः । तेनात्र चित्तस्यैवं भगवत्सवणस्वरूपसेवाविशेषात्मा स्वीकृतः । अन्यैरपि "मामाश्रित्य यतन्ति ये," मां हि पार्थ व्यपाश्रित्येपर चिचस- माधानत्वेन इतरवैमुख्यपूर्वकशरणागतित्वेन आश्रयतया महणत्वेन व्याख्यातः । घर- णागतिथ रामानुजाचास्तमेव शरणं गच्छे त्यत्रानुवर्तत्वेन व्याख्यानात् । शरमाणे तु "मामेकं शरणं प्र"त्पत्र भगतदनतिरिक्तानुसन्धानत्वेन पाल्पातः । मधुसूदनीये तु "अस्यैवाई" "मौवार्य "स एवाहमिति रिघा, भगवरणवं स्यात्साधनाभ्यासपात" इति भक्तिपूर्वकमेवमनुसन्धानत्वेन । अप्राप्येतदेव स्वीकृतम्, परन्तु, मायावादनिरासाद ब्रह्मवादेनाऽविहितभक्तराधिरयेन चेति विशेषः । एवं प्रसारण सदा येषां भावो मवेचदा तेपाभगवता आश्रयो दच इति शावल्पम् । कदाचित कदाचिदिन्छेदे तु सापनावस्पा, कदा- निद्भवनेत्यारम्भदशा, रक्षकलपात्रभाने स्वाश्रयस्य मावित्वपित्यायुक्तम् । अपमेवाश्रयो भत्याधिकारिणां भक्ति पोपपनत्तमः । ता जनयन् भक्तिमार्गीय: जनविपन् मक्ति- मार्गानुकलाः। एत्रमेव ज्ञानाधिकारिणा झानपोपणादि कुर्वन् तन्मार्गी । कफलस्य वैराग्यस्य पोषणादिकं कुतस्तन्मार्गीय इति ज्ञातव्यम् । एवरूपं निम्यापरणपकार. माहुः दुरोत्यादि । एवं चित्ते सदा भाव्पमित्पादिना अमिमेणान्वयः । तथा च दुःखान्यादी हरिः सर्वथा शरणं भाप इत्पादाथिके योगे सिदे दुस- हानावित्यादौ कचित् कचिनिमितान कर्मयोग इत्यनेन एसपी ! न दुःखहान्पर्ष शरणं गतस्य शरणदानाज्ञानमनितं जीयुदया दास, तदा तयेत्ययः । एन. ममेपि । साम्प्रदापिकाभिमेते विषयसप्तमीपसे तु दुस्पानिरिएपे तयेत्पर्यः । एव- भग्रेपि । दुःखनिरौ आश्रयविस्मरणाऽभावार्थमुपदेश इति श्रीरघुनापरणाः । भक्तिमार्गीपस्य सेनायां महत्तस्य दुःखपतीराकरणाद् दुःखदानो धैर्येण विनोदेगादि. सम्भार तदभावार्य शरणभावनमेव पर्नयमित्यादमिति चालागोपीशाः । गोकुलोत्सगस्तु नात्र विमपि ध्याचल्युः । एवं सर्वर तदन्यादिवशेषोनसेयः । तत्रापि भक्ति पोपपन सपरिकर आप्रयो गोपीठोविंटनः । मनिअनपन् जनपिय. श्रेत्युमपविधः प्रकारदेन श्रीरएनापचरणों कुलोत्सा विटतः । श्री स्वापु- निकाना श्रीमदावार्यमार्गपविष्टानामपि समावभेदेन तनविदर्शनाचचदपिकारानुसारेण तत्फलसिद्धयर्थे सर्वप्रकारको दिमात्र प्रदर्यत इति न कोपि कापि विरोषः । तपा श्रीपदखण्डभूमण्डलानार्यपर्यश्रीपल्लभाचार्यचरणविरचितः । पाप इति । सेवादिषविषयकपाऐ देवालात वा भावदपा येत्यर्य: । भये, स्वस्थ जीवस्प तुडत्वारकर्ष ब्रह्मादिदुरापचरणरेणोः प्राप्तिरिति भये, भान्तरे च । कामा- पपूरणे, काम आयो येषां तद्गुणविज्ञान:, अलौकिकाममुख्पामुख्यगुणज्ञानात्मक मोक्षाणां पूरणे पूर्व कामादरपूरणे वा ॥ १० ॥ भक्तदोहे भत्त्यभावे भक्तैश्यातिकमे कृते । अशक्ये वा सुशक्ये वा सर्वथा शरणं हरिः ॥ ११ ॥ स्वस्य कामादिपूनौ तस्या अन्यारादर्शने पदाद् अनशापा, प्रकारान्तरेण या द्रोहे, भक्तदोहापराधो प्रयोदयामपि न दुरीकर्तुं शक्यते, यथा दुर्वाप्तसोबरीपपोः विषये, कि पुनः पुष्टिमागे । अतस्तन्नित्यर्थमयमुपदेशः । स्वस्थ, स्वीयानां चोत्कटानुत्कटभर पनु- स्पत्तौ दुःसङ्गादिना तमाशे च । भक्तश्चालिममे कृले मत्सहनामयमुपदेशः । वे विना निमित्तं सईया कमपि नातिकामन्ति । अपाविनामन्ति सदा सस्सिन्कोपि दोपोस्ति । ततस्तनिश्पर्यमयमिति चाचागोपीशाः । अवश्य या सुशाये, वा शब्दोपर्पः । स्वरुत्यसाध्ये स्वकृतिसाध्ये च सर्वधा व्याल्यावकारेण कापवानोभिवा सर्वदुःख. हर शरणम् । सुशस्ये शरणोपदेशेदवाराभागय इति चाचाः । एवं विशेषगाय सोप्युपदेशो विवेकामावेपि आश्रयस्थासहापशूरत्वार्थ इति मम मविभाति । भाषेपि तपातामाहुरहकारेत्यादि। अहङ्कारकने धैव पोप्यपोषणरक्षणे । पोष्यातिक्रमणे चैत्र तथान्तेवास्यतिक्रमे ।। १२ ।। अहहारकृते अधिपानेन कने, नदोपनियमभिपाननिरपर्षापमुपदेशः। पकारः समानुक्तसनातीयसमुगपापः । परकार पायान्तरानापानासार्यः । पोप्यपोपणाक्षणे सम्भावनेन तद्राणस्प किस्तानकरणे स्वस्य सेरादिरियाता- दक्षणे भगवत्पोप्यानां लेगानुभयसामअस्पार्थमिदम् । पोपनियरा पहिनारिपायां पा पोष्पातिरपणे । पोप्य सह निदितः रव, जयं वा नेपा कनेतिरमगे आमुरं भा पिना दमारासयमितभिए समयानन्यायार्थ वेदम् । पान्लेपास्यतिरमे, भप्रापि मघा, } तस्मिन्यानोरकारानुसम्यानेन धनिष्टमम्मामिटरपर्य पृथगुपदेशः ॥ १२॥ पोमा पोय पेबल परोपनर, reifero रखने, सरिसर
विधेयर्याश्रयः, श्रीश्यामसुनश्रीनरामचरणविरचिता वितिः ।
अलौकिकमनःसिद्धौ सर्वथा शरणं हरिः ।
एवं वित्ते सदा भाव्यं वाचा च परिकीर्तयेत् ।। १३ ।।
अलौकिकमन: सिद्धी, निमिनासप्तमी । "मनो हि विविध मोक्त गुदशा
शुद्धमेव च । अशुद्धं कामसङ्कसं शुद्ध पापविरजितमिति श्रुः । कामसङ्कलरहित
मनःसिद्धयर्थे सेवाभायतुल्यन सिद्धयर्थमित्पर्यः । सर्वार्थ पुष्टयादिपागीयसकल-
पुरपार्थाचर्यम् , अतिदीनभावसिद्धयर्थोयमुपदेशः । शरणं हरिः व्याख्यानमैतद । एर
विषयमुपदिश्य रक्षणरकारमाहुरेवमित्यादि । विते भाग्नेन भगानाश्रय ददाति ।
भणमामप्याराशाभावार्य सदेति। चाचा परित. कोत्तनेन मार्गः प्रचलति ।
तनोमयोपदेशः ॥ १४ ॥
फापिरमाहुरन्यस्येत्यादि ।
अन्यस्य भजनं तत्र स्वतो गमनमेव च ।
प्रार्थनाः कार्यमापि तथान्यत्र विवर्जयेत् ।। १४ ॥
अन्यस्य भावदतिरिक्तस्य भजन वयेत् । अन्पं देवत्सेन कापपूरकत्वादिदुरा.
शया कान सेवेत । तरस्तोगमनमेव च, तसारणभूत तत्र तत्समीपे स्वन उपग्य
गमनश वर्जयेदेव । "यावदपाश्रयस्तावद्भगवानपि त मनम् , विलोख्येन्न दयपा पनन्य.
নম্বলল " ছবি বানাই মহানাহগদি ৰাতিৰ মাসাবীয়-
कार्यपप्यधिकालपामने नन्दयामस्योक्तत्वाच! मध्पेमार्ग सामीप्ये जाते त्वज्ञान कुर्याद,
भगवत्सेवकत्वावगवत्वादिकं भावये दित्यपि चिनम् । प्रार्थना कार्यमापि वर्जयेत् ।
रोन कार्यव्यामोहे भगति प्रार्थना कदाचित् सककुर्यादपोति मूच्यो। श्रीरघुनाथचरणेस्तु
प्राधनापदं प्रथमान्त कार्यत्य पाहत्य पाल्पातम् । “अपृष्टा यस्तु या कानिरिक्रपा
नारभते हरिम् । मसम्भिन्नार्यमादस्तस्य तुष्यति केशव' इति विष्णु रमीयशङ्करगीना-
वाक्येनोपायच । क्या च भार्थनापद विज्ञापनमात्रपरमिति तेषामाशयः । प्रवचन
पूर्वमन्यविरोधोपीति युक्ततरमेय विमृष्टम् । पाचव्यवहारामाधारणकारणीभूतः
कायादिव्याशरोयं ददातिपभिसन्धिपूर्वको वा सः प्रार्थना । सदकारणपनविहिन
ज्ञातवस्तुस्वरूपमायन विज्ञस्परमिनि पो स्वरूपभेदाचित चैतन् । साप
धीनत्वदा न विकोपरम्भान् । आशया विलम्बे धैर्यस्याप्युपष्टम्भादाश्रयदान
तास शरम स्वार्यक्षमत्व सिद्धेरिति । तथापन विवर्जयेत् । यथा भगवति सब-
स्मार्थन सर्वविज्ञापनञ्च, मधेतरेषु विशेषेण वर्जयेद, दुमयपि सर्वपा न कुर्यादित्यर्थः ।
मनसाप्यविचारणं वर्जने विशेषः । एवं कायिकमुपदिष्टम् ॥ १४ ॥
श्रीमदखण्डभूमण्डलाचार्यवर्पश्रीमदल्लभाचार्यचरणविरचितः ।
अतः परमेतरससिद्धयर्थ वापसत्यागोवश्यं वक्तव्यस्नपारविश्वास इदि ।
अविश्वासो न कर्तव्यः सर्वथा बाधकस्तु सः ।
ब्रह्मास्त्रचातको भाव्यौ माप्तं सेवेत निर्ममः ॥ १५ ॥
"मदुसाविति शेषः । "आप" इति वा ! सथेति, सरूपतः फलवय ।
तु पूर्वपक्षनिरासकः । “यस्य स्यादद्धा न विचिकित्सास्ती"ति श्रुतिम्, "अनयाभद-
धानव संशषात्या विनश्यती"त्यादिस्मृतिश्च प्रमाणत्वेनाक्षिपति । तईि अनिवचिनायो-
पायो वक्तव्य इत्यत आहुः ब्रह्मास्त्रेत्यादि । ब्रह्मावं तकथेत्युभी अवि-पाप्तस्य
पायकत्रे विश्वासस्य साधकत्ये च यया यर्थ भापी चिन्तनीयौ, वयोवृत्तान्तः स्मर्तब्य
इत्यर्थः । यथा लायां राक्षसर्वहारण हनुमान् यद्धस्तनस्तं पदं निवेमालोक्य ते
रज्जुभिधुमारब्धस्तदा तेषां विश्वासाभावं दृष्ट्वा ब्रह्मासं ततो निर्गत, इनुमान्मुक्त-
बन्धनो रज्जुरन्धनानि वमन । तेन तेषां प्रयोगमयामो ग्योऽभूत् । तथाविश्वास
भगवानपि त्यति भक्तिमार्गे शरणपागें च प्रवृत्तिापि च्या भवतीत्पविधासे दृष्टान्तः ।
चातका पतिविशेषः, स च स्वादिविन्दुमासायावर्षपर्यन्त, विश्वासेन विष्ठनि, हैन वस्प
क्षेमं निति, पुनश्च स्वाती पर्जन्यो वास्येव । नपान श्रीमदाचार्योक्तौ विश्वासे, सपा
भगवति मार्गे च विश्वास सर्वे सिद्धपतीति विश्वास पात: 1 तपा गाविनासं परित्याप
विश्वासं कृत्वा प्रास सेवेत निर्ममः, लौकिके ममतां परित्यज्य पटरच्या भास नरसं
वा दुःख वा तत्साधनं वानुमरेन तु नाभिनिवेशेतेरपर्षः ॥ १५ ॥
अनभिनिवेशे लौरिकादिनिदिमकारमाहुर्यथा काश्चिदित्यादि।
यथाकथमित्कार्याणि कुर्यादुवावचान्पपि ।
किंवा प्रोक्तेन बहुना शरणं भावयेद्धरिम् ।। १६ ॥
उपानि सेरापानि, अपचानि लोमिसायानि, उभपायुभयविधानि या या
कश्चित् फुपीत् नतु प्रणादिमा, नापि लौकिकमाभ्रमेणेपर्यः परपपि कपनिग्नि-
पन्यमम्मो ताप्युपापभानुः शिवेन्पादि। पहला प्रोतोन , नदि पाना
मारा: पालस्वभावमादेवादिनिरन्यना मानन्त्यादतं सायन्ते । दम्पादियांप्रेगो.
केापः प्रतिस्पिानोपायः पूर्वमुत्तास्तमेव सर्वानुमदःपादित्यागपेनानुदानि गरण
भाषयेदरिमिति। "मानसिप पर नमानपुर्य रपए व माता सी
निदारितनाराणा लेनी नियम नरमपादित नायः।
पतेनाङ्गापाप्यायल्पामाारसा निर्धारिता ॥१६॥
विनाश्रियः, श्रीमान श्रीमनरामवाणविरचिता चितिः । एमार्गमादिभ्योरगहानरपेयर्यापयादि। एवमाश्रयणं प्रोक्तं सर्वेषां सर्वदा हितम् । कली भरयादिमाग हि दुःसाध्या इति मे मतिः ॥ १७ ॥ पयात पारंग आरपणं मार्ग मा पग मिश्रियमाहिन्येन . शन गौतम् । मटिदै मया वर्गाश्रमपुताना तस्तिता र सदाऽस्मिन्युगे युगा- परं च सम्पदा पलिम् स्थापिरामुनमाल जनम्, "माहि पार्य पानिप," "रानाह"स्पाटिकाश्यपु तर निदारद । ननु सहि मगरता "योगाय" इत्पर प्रयाशिपिगुनाः । पृपाएं न उक्त इत्पन माहुः कला- विन्यादि । तपा मापनमापसवादारोटाका, अयं तनिरपेक्षोऽनुमत्ररूपयेत्यवो भित्रयोत्तः। भगादासयमदं नानापीन्यानिरिति । तया चैतन्य मदानारूप नुसन्धायाभयं कुर्वनां सर्वथा भगवानाश्रयं ददातात्यायः । साचा विरम्छनपयोदयि यमुनाती रनिर्वाणुसम् । प्रगनापा रचिरासयरं सननं विधारप पढीययनः ॥ १॥ चिस्पांश्रयाणां वितिस्तु यथामति । ना तन प्रसीदन्तु वाचायः सतनं मयि ।। २] लदीपरगावारिलिसिनं मपान तत् । भूपास्ताचार्यपोदाय बालयौर्य यया पितुः ॥३॥ इति श्रीमदाचार्यचरणकतानश्रीश्यामलसुनधीत्रजराजविरचिता विराभयविनिः सम्पूर्णा । १ "मासाश्रयम्" ति पलारे अन्यरतो यावीला समीचीनो मानि। सम्पूर्णीय ग्रन्थः ।
धीमद्-वल्लभाचार्य-महाप्रभु-विरचित-पोडश-प्रन्थान्तर्गत-नवमं कृष्णाश्रयस्तोत्रम् षड्भिष्टोकाभिः समालंकृतम् १. श्रीरघुनाथानां विवरणम् २. श्रीकल्याणराया प्रकाशः ३. निगृहीगोविन्दराजभट्टानां प्रकाशटिप्पणम् ४. श्रीद्वारिकेश्वराणां विवृतिः ५. श्रीव्रजराजानां विवरणम् ६. केषाश्चित विवरणम् श्रीमद्-वल्लभाचार्य-महाप्रभु-प्रवतित-शुद्धादत-सम्प्रदायस्य-सप्त- पीठान्तर्गत-पप्ठ-पीठाधिष्ठित-गोस्वानि श्री १००८ श्री श्रीवजरललालजी - महाराजश्रीत्येतेः प्रकाशितम्
गोपामियी १०.८ श्रीप्रमरानकारी महारार (पीटापीयर)
मोटु मन्दिर, मागाणार, मरत, ९५.०३. भारत,
साधारण मसारण २००० प्रति
राउ मसरण १००० प्रति
श्रीयन्नमाद ५०३
पाय-परिचय लेखकगोस्वामी श्याम मनोहर
मुद्रका
स्टूडियो बहार, २३ ए, सेन्ट्रल चौपाटी बिल्डिग, चौपाटी,
मुम्बई-४००००७
NAR मिश्री १००८ श्रीजरत्नलालजी महाराज ॥श्रीकृष्णाय नमः॥ ॥श्रीमदाचार्यचरणकमलम्यो नम ।। ग्रन्थ- परिचय कृष्णाश्रयस्तोत्रका प्रणयन अलमे श्रीमहाप्रभुने लाहोरके बूला मिथके लिए किया था यह उल्लेख चौरासी वैष्णवनकी ४६वी वार्ताके भावप्रकाशमे मिलता है इसका रचनाकाल वि स १५७० कहा जाता है । बूला मिश्रका जन्म सारस्वत ब्राह्मण के घरमै हुमा था बूलाके पिता पुरोहिताईका काम करते ये-परन्तु और किसी तरह पढे-लिखे नहीं थे बुला जब दस वर्षको हुए तो पिताने बुला कर कहा-"बेटा तुम ब्राह्मणालमै जनमे हो. कुछ थोड़ा-बहुत शास्त्रोका अध्ययन करोग तो सम्मानपूर्ण जीवन जी पाभोगे अन्यथा मेरो तरह अनपढ़ ही रह जाओगे" पिताने जिस पण्डितजीके पास अपने पुत्रको विद्योपार्जनके लिए भेजा वह पूरा 'लाभपूजापरायण' पण्डित था चेला पटते देखकर बोला-- "अच्छी तरह पढना हो तो पहले पाच-दस रूपया भेटके रूपमे लाकर मेरी पूजा-भक्ति करो।' (पाच-दस रुपया आजसे पाच सो वर्ष पूर्व बहुत महगा पा) बूला मिश्र घबरा गये. भागकर पर आ गये मोहे तानकर पिताने पूछा- "क्यो लोटकर पर आगये न'अरे, यहा घरमे पड़े रहे तो ओरतोका काम चूल्हा फूकना ही सिर्फ सीख पाओगे क्यो गुरूजीके परम रहने से क्या लग्जर माती है?" बूला बोल-"अरे, यह पण्डितजी तो पढ़ानेसे पहले हो गुरदक्षिणा माग रहे है। और यहा तो किसोके भी पास जाऊ, गति यही होगी सो में तो कासी जागा पढने." बूलाके पितानीने साना कसा- 'घरके बाहर निकलनेको हिम्मत है नहीं और बेटा काशी पठने जायेगा।" ठेस लग गयी इस बातसे बूलाके मनपर. चूलाने अपने पिताजीके पैर छुए और परसे बाहर निकल गये भोख मागकर पेट भरते हुए किसी तरह काशी पहचे वहा भी भिक्षावृत्तिके अलावा कोई चारा न था पर एक पविडोने पानेको दयालुता बुलाको दिखलाई बूलाके कठोर परिश्रम के बावजूद मी तीन वर्षको अवधिमे कोई विशेष विद्यामंन हो नहीं पाया दोना हो लिखा १ श्रीनागनासमणिया-शिषित लेस कैनवानी मा ४ वर्ष ११९ हो गये, अध्यापक भी और विद्यार्थी भी एक रोज पण्डितजीने साफ-साफ कह ही दिया-"बूला | तुम्हारे भाग्यमे सरस्वती नहीं है. व्यर्थ परिश्रम क्यो करते हो" बेचारे बूला मिश्र खिन हो गये. पण्डितजीकी पाठशालासे निकलकर यहरके वाहर गगाके तटपर अन्न-जलका त्यागकर बैठ गये ब्राह्मणोचित महत्त्वाकाक्षाको लिये हुए एक ब्राह्मणवालक काशीमे तीन वर्पतक रहकर भी विद्यार्जन न कर पाये तो दूसरा मार्ग और क्या हो सकता था? बूलाने सोचा कि या तो इस तपस्यासे सरस्वती प्रसन्न होगी, नहीं तो फिर इसी तरह प्राण- त्याग देना उचित है तीन दिन बाद सरस्वतीकी वाणी सुनायी दी कि सब कुछ भगवदिच्छाके अनुसार होता है भगवदिच्छा होनेपर चाण्डाल भी विद्वान् हो सकता है और भगवदिच्छा न होनेपर ब्राह्मण भी मूर्ख ही रह जाते है 'विवेकस्तु हरि सर्व निजेच्छात करिष्यति" "प्राकृता सकला देवा गणितानन्दक बृहत्, पूर्णानन्दो हरिस्तस्मास्कृष्ण एव गतिर्मम" बूला मिश्रके भीतर विवेक तो जागा परन्तु धैर्य छूट गया बुलाने सोचा कि यदि सब कुछ भगवदिच्छाके अनुसार ही होता हो तो भगवान्को इच्छाको बदलनेके लिए भगवान्के नामपर ही भूखहड़ताल करनी चाहिये एसा विचारकर बूला "विष्णु विष्णु विष्णु" जप करते हुए भूखे प्यासे बैठे रहे अधीर होकर ही सही पर भगवन्नाम लेनेपर बूला मिश्रको भगवत्साक्षात्कार हुआ और श्रीमहाप्रभुके पास अडल जानेको भगवदाजा भी हुई. बूला मिश्र भगवदाज्ञा पाकर अडेल पहुचे श्रीमहाप्रभुने इनका स्वागत किया और कहा "बूना' तुम धन्य हो तुमने भगवदर्शन पाये !" बूला मिश्रने सविनय निवेदन किया-"महाराज । भगवत्साक्षात्कार आपकी कृपाका फल है परन्तु भावदर्शन होनेके बावजूद भगवत्स्वरूपानन्दका अनुभव मुझे नहीं हुमा श्रीमहाप्रभुने समझाना चाहा-"एकवार भी भगवत्साक्षात्कार हो जानेपर सासारिक मोहके बन्धनका भय नही रह जाता, जीव मुक्त हो जाता है' इसपर बूला मिश्रने विनतो को-' महाराज मुझे मुक्ति नही चाहिये- भक्ति चाहिये अत कृपाकर आप अपनी शरणमें मुझे लें।" श्रीमहाप्रमुने प्रसन होकर बूला मिश्रको यमुनाजीमे स्नान करनेकी - आज्ञा दी और पश्चात् अष्टाक्षर तथा ब्रह्मसम्बन्ध का दान दिया. समप्र शारगोके गृह्यतम रहस्यके उपदेश तथा मानसीसे वोपयोगी मनको सिद्धि के लिए श्रीमहाप्रभुने कृष्णाश्रयस्तोत्रकी रचना की और उसे बूला मिश्रको पढाया 'आश्रय' शब्दके दो अर्थ होते हैं : १) सहारा देनेवाला २) सहारा लेनेकी क्रिमा. अतएव विवेकधर्याश्रय ग्रन्थमे जब-"श्रीहरिके आश्रयसे सारे अदाक्य कार्य भी सिद्ध हो जाते हैं (अशक्ये हरिरेवास्ति सर्वमाश्रयतो भवेद)" कहा तो वहा 'आश्रय' का अर्थ शरणागति या सहारा लेनेको क्रिया है. इसी तरह भागवतके द्वितीयस्कन्धके - "जगत्के उत्पत्ति एवम् प्रलय के कर्ता तथा उपादान रूप परब्रह्मको 'आश्रय' कहा जाता है (आभासश्च निरोधश्च यतश्चाध्यवसीयते स आश्रय पर ब्रह्म परमात्मेति शब्दयते )" इस वचनमे 'आश्रय' शब्द आधार या सहारा बननेवालेके अर्थमें प्रयुक्त हुआ है. 'आश्रय' शब्दके इन दोनो भोंको लेकर ही "कृष्ण एव गतिर्मम" में 'गति' शब्द प्रयुक्त हुआ है. अर्थात् भगवान् ही सावन हैं और भगवान् ही फल भी भगवान् हो मार्ग हैं और गन्तव्य भी- भगवान् श्रीकृष्ण सभी अर्थोमे हमारे आधार -आश्रय-गति हैं. अतएव "कृष्ण एव गतिर्मम" का अर्थ- कृष्ण ही हमारे आश्रय हैं और कृष्ण का ही हमें आश्रय लेना चाहिये-दोनो तरहसे लिया जा सकता है. इस जगत्मे अनेक प्रकारको जीवात्मायें है कुछ जीवरमाओमे लौकिक फलोको प्राप्तिके लिए लौकिक साधनोके आयको वृत्ति प्रवल होती है प्रवाही जीवात्माओका यह प्रमुख स्वभाव होता है. कुछ जीवात्माओम वेदादि-शास्त्रीय फलोकी प्राप्ति के लिए केवल शास्त्रीय साधनोके ही आश्रयकी वृत्ति प्रबल होती है मर्याक्षमार्गके अन्तर्गत कर्ममार्गीय जीवोमे यह स्वभाव बलवान होता है कुछ वैदिक फलोको प्राप्ति के लिए वैदिक साधनो के साथ-साथ भगवान्को भी आश्रय के रूपमे अपनाते है मपदिामार्गके अन्तर्गत ज्ञानमार्गीय उपासनामार्गीय तथा मर्यादाभक्तिमार्गाय साधकोमे यह स्वभाव पाया जाता है कुछ जीवात्माओको भगवान्के अलावा अन्य किसी फलकी कामना होतो नही है अत वे साधनकै रूपमे भी केवल हरिका आश्रय स्वीका- रते हैं ऐसे जीवोको पुष्टिजीव समझना चाहिये (दृष्टव्य भागवतार्थ-निवन्ध ५-६/१२). अतएव "कृष्ण एव गतिर्मम" मनोभाव पुष्टिजीवका परम लक्षण है भागवत के बारहवें स्कन्धका वर्ण्य-विषय भी आश्रयलीला ही है. भागव. तार्थ-निवाघमें 'आश्रय' शब्दके अनेक अप दिखलाये गये हैं. यथा-भागवत के द्वितीय स्कन्धसे लेकर ग्यारहवें स्कन्धतक भगवान्की जिन सर्ग विसर्ग स्थान पोपण ऊति मन्वन्तर ईशानुकथा निरोध और मुक्ति रूप लीलाओका वर्णन किया गया है, उन लीलाओके का आश्रय एकमात्र श्रीकृष्ण ही है. ये नवविध लीलायें लक्षण हैं और इनसे लक्षित लक्ष्य-आश्रय एकमान श्रीकृष्ण ही हैं. इन नवविध लीलाओका वर्णन भागवतकारने इसी हेतुसे किया है कि जिन जिन विभूतिरूपोको धारण कर सर्गलोलासे लेकर ईशानुकथातक की लीलायें भगवान करते हैं उन सभी रूपोके साथ भगवान्- का कार्य कारणरूप सुद्धाद्वैतरूप सम्बन्ध है. अर्थात् एक ही ब्रह्मका नाम-रूपमे विस्तार यह समय ब्रह्माण्ड है ( सर्व खलु इद ब्रह्म). कार्यरूप सभी लौकिक या अलौकिय विभूतिनामो तथा विभूतिरूपों को धारण करनेवाला कारण- रूप परमात्मा एक ही है, ऐसा शुद्धाद्वैत-बुद्धिसे समझना आवश्यक है. हृदयसे स्नेह या आश्रय किन्तु विभूतिनाम अथवा विभूतिरूप का नहीं प्रत्युत मूल- रूप श्रीकृष्णके ही नाम-रूपका होना चाहिये (ब्रह्मरूपं जगत् ज्ञातव्यं ब्रह्म जगतोतिरिच्यते इति न तत्रासक्ति कर्तच्या). अत. प्रथमस्कन्धसे लेकर नवम स्कन्धतक वर्णित लीलाये अन्याय छुडाने के लिए हैं तथा दशम स्कन्धसे लेकर द्वादश स्कन्धतक की लीलायें कृष्णाश्रयके दृढीकरणार्य है. हमने कह दिया है कि द्वादश स्वन्धका मुस्य वयं-विषय आश्रयलीला है. भागवताय निबन्धके द्वादशस्कन्धार्थ-प्रकरणमे श्रीमहाप्रभु कहते हैं- "कृष्ण एवाययो मतः" यही वाक्य इस कृष्णाश्रयस्तोत्रमे "कृष्ण एव गतिर्मम" के रूपमे रखा गया हैं एवकार इतरव्यावर्तक माना जाता है श्रीकृष्णके मूलरूपके अलावा अन्य सारे विभूति रूप-लौकिक हो या अलौकिक-जड हो या चेतन-देव दानव मानव पशु पक्षी इत्यादि सभी रूपोंको भक्तिमार्गीय एवम् प्रपत्तिमार्गीय आश्रयके दृष्टिकोणसे इतर माना जाता है. ज्ञानमार्गीय दृष्टिकोणसे शुद्धादत- वादके अनुसार ये सर्वथा अभिन्न ही है परन्तु इस अभेदबुद्धिसे ये विभूतिरूप आश्रयणीय नहीं किन्तु केवल ज्ञातव्य है अतएव सभी विभूतिस्प एवकार- द्वारा मावर्तनीय माने जाते है. इस "कृष्ण एवं गतिर्मम" के एवकारकी ही व्याख्या श्रीमहाप्रभुने- "अन्यस्य भजन तत्र स्वतो गमनमेव च, प्रार्थना कार्य- मापि ततोन्यत्र विवर्जयेत्." इस विवेकधैर्याश्रयकी कारिकामें दी है अन्याश्रय-रहित केवल श्रीकृष्णका आश्रय ही उचित है, यह दिखलाने के लिए अन्योके आश्रयकी विफलताका बोध आवश्यक है. तदनुसार इम स्तोत्र- के प्रथम तीन इलोकोमे लोकायकी विफलताका निरूपण किया गया है तथा द्वितीय तीन श्लोकोमें धमधियकी विफलताका तृतीय तीन इलोकोमे कृष्णाश्रयकी महत्ताका निरूपण कमा कर्ममार्गीय ज्ञानमार्गीय तथा भक्ति- मार्गीय दृष्टिकोणसे किया गया है अन्तिम दो श्लोकोमे पृथक्शरण-मार्ग अथवा प्रपत्तिमार्गके उपदेशद्वारा गोताको तरह श्रीमहाप्रभुने भो सम्पूर्ण निर्भयनाका वरदान दिया है एक अन्य रीतिसे प्रारम्भके छह श्लोकोमे काल देश द्रव्य कर्ता मन्त्र तथा फर्म जो धर्मकै आवश्यक छह अग है, उनकी विफलता दिखलाते हुए, द्वादश स्कन्धक वर्ण्य-विषय पञ्चविध आश्रय - कृष्णाश्रय जगदाश्रय वेदाश्रय भक्ति- आधय तथा भागवताश्रय-के अनुरूप पाच श्लोकोमे भगवदाश्रयकी महत्ताका निरूपण किया गया है. एक तृतीय रीतिसे देखनेपर प्रारम्भके नौ श्लोकोमे नवविध लीलार्थ गृहीत विभूतिरूपोका अन्याश्रय छुड़ाने के लिए नौ श्लोकोमे-"कृष्णा एव गति- मम" कहकर इतराश्रयका वारण किया है तथा दसवें श्लोकमे कृष्णाश्रयको सुदृढ किया गया है. ग्यारहवें श्लोक में इस कृष्णाश्रयस्तोत्रकी फलश्रुति कही गयी है. इस एक ही स्तोत्रमे वाक्पति श्रीमहाप्रभुने अनेक विवक्षाओसे अनेकदा कृष्णाश्रयका निरूपण बूला मिश्रको समझाया है. १) कलियुगके कारण धर्मानुष्ठानमे भी या तो अतरिक दुराशयकी प्रचुरता हो सर्वन दिखलायो देती है, या फिर ईश्वर-भजन-विरोधी उपधर्मों भनोश्वरवादी ज्ञान वैराग्य अहिंसा दया लोकोपकार इत्यादि - के पापण्डका ही प्रचुर प्रचार दिखलायी देता है इससे भगवरमाप्तिके कर्म शान और भक्ति मार्ग अवरुद्ध हो गये है. तथापि जिन्हें साधन और फलके रूपमें एक- मात्र श्रीकृष्णका हो आश्रय है उन्हें किसी तरहका भय नहीं रह जाता. अतः इस कलियुगमें एकमात्र श्रीकृष्ण ही गति हैं.
. चाहिये वह २) सारा देश तामसी म्लेच्छ शक्तियोसे आक्रान्त हो गया है तोम. लालच कामुकता व्यभिचार लूट खसोट हिंसा-अत्याचार जैसे पापोके अनैतिक अड्डे ही सर्वत्र चल निकले है स्वधर्म-पालनका जो थोडा-बहुत प्रयास करते भी है उन्हे अनेकविध पोडा और क्लेशो से सन्त्रत किया जाता है ऐसो स्थितिमे सज्जनोका व्यन हो जाना स्वाभाविक बात है ऐसी स्थितिमा सामना करनेके लिए केवल श्रीकृष्ण ही हमारे सम्बल हो सकते हैं ३) सभी पवित्रस्थल मन्दिर आश्रम वन पर्वत सरोपर गगा आदि तीयं, घनलोलुप तथा दुष्कर्म-निरत धर्मध्वजी उपदेशक पण्डा पुजारी पुरोहितों से घिर गये है अत इन पवित्र स्थलोका जैसा आधिदैविक प्रभाव प्रकट होना दिखलायी नहीं देता परत मिन भक्तोंमे श्रीकरणको लालसा है उनकी कभी दुर्गति नहीं होगी ४) कर्ता धर्मका चतुर्थ अग माना जाता है. वर्तमान युगमे धर्म-भावनासे धर्मानुष्ठान करनेवाले कर्ता दुर्लभ हो गये हैं. सारे धार्मिक अनुष्ठान पण्डित- म्मन्य लोगोद्वारा राजसीतामसी प्रकृतिके म्लेच्छोचे अनुसरण और अनुारण रूपमे किये जा रहे हैं और तिसपर भी धन और यश को लोलमता ही इनका मुख्य हेतु होता है फिर भी चुद्धिप्रेरक धोकृष्णके चरणारविन्दोका जिह आश्रय है उन्हें ऐसी खुद लालसाओसे श्रीकृष्ण ही बनायमै ५) धर्म पाचरे आवश्यक अग मन्त्रोंमे भी अब वह प्रभाव नही रह गया है किसी योग्य अधिकारी गुरुके समक्ष प्रणिपात परिमन और परिचर्या की शास्त्रीय विधिके अनुसार तत्तद् मन्त्रो विभिन्न ग्यास तात्पर्य और विनियोग के परिज्ञान तथा मन्त्राथं अपेक्षित द्रत एवम् शुदि के पालनपूर्वन दीक्षाग्रह्ण करनेसे मन्त्रोंमे प्रभाव उत्पन्न होता है इसके विपरीत आजाल अयोग्य-अनधिकारी व्यकिायोंसे अशास्त्रीय विधिरोन्यासादिके परिज्ञानवे रिना तथा मन्त्रार्थ अपक्षित यतादि शुद्धिके बिना ही मन्त्रग्रहणकी रीति पल परी है मत मन्त्रको आदिदिक प्रसारित विगोहिल हागयी है. परत सभी मन्त्र प्रभारहीन और निष्फल हो गये हैं परन्तु योवृष्ण तो मवालिके अधीन नहीं हैं. प्रत्युत सभी मन्त्रसतियां श्रीकृष्ण अधीन है अद श्रीकृष्णा ही माश्रय लेना चाहिये ६) धर्मके छठे आवश्यक अंग कर्मका भी स्वरूप भ्रष्ट हो गया है. क्यो कि जगत्मे अनेक प्रकारके वाद चल निकले हैं जो कर्म शास्त्रदृष्टया आव- श्यक होते है उन्हे ये वाद निरर्थक मान लेते है. जो कर्म शास्त्रीय दृष्टिसे बहुत आवश्यक नहीं होते उन्हे ये वाद अनिवार्य सिद्ध करते है. जो वाद शास्त्रोका प्रामाण्य मानते है वे भी अर्घश्रद्धासे शास्त्रोके मन कल्पित अर्थ निकाल लेते हैं शास्त्रोके इस तरहके अन्यथा व्याख्यानके कारण प्रान्त अनु- यायी शास्त्रीय काँका अनुष्ठान भी अन्यथा रीतिसे करने लग जाते हैं. जैसे अकरणसे कर्मोका स्वरूपत' नाश होता है वैसे ही अन्यथाकरणसे कर्मोका फलत. नाश होता है. प्राय यथाविधि कर्मोका अनुष्ठान करनेवाले भी केवल दुनियाको दिखानेके लिए कर्मानुष्ठानका पापण्ड ही करते हैं अतएव कर्मोका प्रभाव ही क्षीण हो गया है फिर भी अन्याश्रय-दोषरहित होकर श्रीकृष्णमे आश्रयभाव रखना कभी निष्फल नहीं जाता अत कृष्ण ही अव केवल आश्रयणीय रह गये है. इस तरह प्रथम तीन श्लोकोमे लोकनाश एवम् द्वितीय तीन इलोकोमे धर्मनाशके निरूपणके वाद, अव जैसे कि भागवतके वारहवें स्कन्धमे पञ्चविध आश्रयका निरूपण माना गया है, तदनुसार श्रीकृष्णकी आश्रयरूपताका भी पाच ही श्लोकोमे वर्णन किया गया है सातवे इलोकमे कर्ममार्गीय दृष्टिकोणसे, आठव श्लोकमे ज्ञानमार्गीय दृष्टिकोणसे, नौमे श्लोकमे भक्तिमार्गीप दृष्टिको. णसे तथा दसर्वे-ग्यारहव श्लोकमे प्रपत्तिमार्गीय दृष्टिकोणगे भी एकमात्र श्रीकृष्ण हो आश्रयणीय है, यह दिखलाया जा रहा है ७) कृष्ण सर्वोद्धारक है अत सुसाधन नि.साधन एवम् दुष्टसाधन जीवोका भी उद्धार करने में समर्थ हैं अजामिलका उपाख्यान भागवतके छठ कन्धमे उपलब्ध होता है.कि कैसे-कसे निन्दित कर्मोम निरत होनेपर भी भगवदनुग्रहदशात् उसके सारे कर्मदोष बिना नरकयातनाके ही नष्ट हो गये अत कमेमागीय दृष्टिसे केवल श्रीकृष्ण ही आश्रयणीय है, अजामिल के प्रमगंम जैसे भगवान्ने स्वयम्के नामका माहात्म्य प्रकट किया इसी तरह श्रीकृष्णके ध्यान अचंन आदिका भी माहात्म्य वहा दिखलाया गया है मूलत कृपा ही साधन है. बाको उद्धारका व्यापार या व्याज तो भगवान् शास्त्रत विहित अविहित या निषिद्ध कर्मोको भी बना सकते है श्रीकृष्णका यही तो माहात्म्य है कि वे काम मय द्वेष सम्बन्ध स्नेह या भक्ति किसी भी भावमूलक कमको अपने अनुग्रह- के प्रकट होनेका निमित्त बना सकते हैं. अत: "कृष्ण एवं गतिर्मम." ८) ज्ञानमार्गीय दृष्टिकोणसे भी आठ वसु, एकादश रुद्र, द्वादश आदित्य, इन्द्र एवम् प्रजापति; अथवा अग्निसे लेकर ब्रह्मा-विष्णु-शिव पर्यन्त तेतीस कोटी देव सभी भगवान के अंश-कलावतार-रूप है तथा भगवान्की सर्वभवन -सामध्यरूपा माया या प्रकृति के द्वारा लिये गये भगवद्रूप है. अतः वे स्वयम् आविर्भाव-तिरोभावशाली है. अक्षरब्रह्म यद्यापि देशतः कालतः तथा स्वरूपतः अपरिच्छिन्न एवम् पुरुषोत्तमसे अविच्छिन्नतया स्थित होता है तथापि अक्षर ब्रह्म भगवान्का ज्ञेयरूप है भजनीय रूप नही. अतः अक्षरब्रहाका गणिता. नन्दकी तरह अनुभव होता है, पूर्ण पुरुषोत्तम श्रीकृष्णकी तरह अगणिता- नन्दके रूपमे नही. अत: उपासनामार्गीय देवोंकी और ज्ञानमार्गीय अक्षरब्रह्मकी तुलनामें भी उपास्यत्वेन ज्ञेयत्वेन या भजनीयावेन भी एकमात्र श्रीकृष्ण ही आश्रयणीय है. ९) भक्तिमार्गीय दृष्टिकोणसे भी पूर्ण विवेक धर्य या भक्ति आदिके জমবে গী मन कितना भी पापासवत क्यों न हो परन्तु दैन्यके साथ एकवार जी शरणागत हो जाता है तो सुदुराचारीको भी साधु-पुरुष बना देनेवाली श्रीकृष्णकी भक्तिका लाभ हो ही जाता है. (१०-११) प्रपतिमार्गमे तो स्वयम् प्रभुने ~ "सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुच" कहा है. अतः कर्तुमकर्तुमन्यथा कर्तुं समर्थ - सर्वसमर्थ तथा भक्तोके अखिल मनोरथोको पूर्ण करने वाले श्रीकृष्ण यदि शरणागत जीवोका उद्धार नही करेगे तो और कौन करेगा? अतः श्रीमहाप्रभु सभी पुष्टि जोपोंको आश्वस्त करना चाहते हैं कि इस कृष्णाश्यस्तोत्रका जो श्रीकृष्णको सन्निधि पाठ करेगा उस पाठकर्ताक श्रीकृष्ण आश्रय वनेगे. जैसे अखिल ब्रह्माण्डके नाथ होनेपर भी अपने आश्रित अजभवतोय लिए छोटेसे गोकुलके नाथ श्रीकृष्ण बने ही है ! बूला मिश्रको हम देख सकते हैं कि इसी कृष्णादायस्तोत्रके कारण न केवल विद्वदुर्लभ वासिद्धिको प्राप्त हुई अपितु मानमी मेवोपयोगी अलौकिक मन भी सिद्ध हो गया (अलौकिकमनःसिद्धौ शरणं भावयेद् हरिम्). विवेक- धैर्याश्रय ग्रन्थमें कहे गये विवेक और सिद्ध हो या न हों पर ऐहिक-पार- लौकिक सभी विषयों में श्रीकृष्णका आश्रय सभोके लिए सर्वदा हितकारी ही होता है. इसी कृष्णाश्रयको दृढ करने के लिए इस स्तोत्रको रचना की गयी है. "कृष्णाश्रयमिदं स्तोत्रं यः पठेत् कृष्णसन्निधौ । तस्याययो भवेत्कृष्णः इति श्रीवल्लभोऽब्रवीत् ॥ प्रस्तुत संस्करण वि सं. १९८३ में प्रकाशित संस्करणका ऑफसेट प्रॉसेस द्वारा पुनर्मुद्रित रूप है. उक्त संस्करण गोस्वामिछुलभूषण श्रीरणछोड- लालजी महाराजके 'श्रीजीवनेशाचार्य पुष्टि सिद्धान्त कार्यालय से प्रकाशित हुआ था तथा उसके सम्पादक थे श्रीहरिकृष्णजी शास्त्री. इन दोनों महा- नुभावोका हम पुनर्मुद्रणावसरपर कृतज्ञताके साथ स्मरण करते हैं:
प्रास्ताविकम् साहित्योदृतिविषये स्वपिटपादाननुकुर्वन्तीति प्रत्यक्षमेव सर्वेषाम् । एनेपां समाश्रयेणा- नेकै साम्प्रदायिकाः प्रयन्या पहिरवनेरुः । पोडशग्रन्यानां सेवाफलादि पन्याष्टक नाम कृष्णाश्रयस्तोत्रं चैतेपामेव प्रान्धरलेन लब्धारतारं श्रीमदाचार्यवागमुधापिपासूनां मनोरपपूरकं भवतीति महान् प्रमोदावसरः । अपि चैताहरसमटतौ योग्यविधिन्सया परमफरणया दशवर्षाणि मे सविसाहाय्य दत्तवद्भयो गोस्वामिश्रीगोकुलनाधजि. देशिकवरेभ्यः साअलि फार्सध्यमादयामि । अस्मिन् सोपने दृष्टिदोपतो मुद्रासरपोजकममादतो वा नातानि स्खलिनानि संशोध तास्ता असुदीगोंधयित्वानुग्रहन्त दयालयो विद्वांसो मामिति मार्यपति- विठन्ननरपाभिगम- तृष्णाटमी हरिहणः शास्त्री, संवत् १९८३ 'शुद्धादनविशारदः।
EX श्रीकृष्णाय नमः। कृष्णाश्रयस्तोत्रम्। HASAX सर्वमार्गेषु नटेषु कलौ च खलधर्मिणि । पापण्डाचुरे लोके कृष्ण एवं गतिर्मम ॥ १ ॥ म्लेच्छाकान्तेषु देशेषु पापैकनिलयेषु च । सत्पीडाव्यग्रलोकेषु कृष्ण एवं गतिर्मम ॥ २॥ गङ्गादितीर्थवर्यपु इष्टैरेवावृतेविह। तिरोहिताधिदेवेषु कृष्ण एव गतिर्मम ॥३॥ अहङ्कारविमूढेषु सत्सु पापानुवर्तिपु । लाभपूजार्थगनेगु कृष्ण एवं गतिर्मम ॥ ४॥ अपरिज्ञाननटेषु मन्ष्ववतयोगिषु । तिरोहितार्थदेवेषु कृष्ण एवं गतिर्मम ॥५॥ नानावादविनष्टेषु सर्वकर्मवतादिषु । पापण्डैकप्रयत्नेषु कृष्ण एव गतिर्मम ॥ ६ ॥ अजामिलादिदोषाणां नाशकोनुभवे स्थितः । शापिताखिलमाहात्म्यः कृष्ण एवं गतिर्मम ॥ ७ ॥ माकृताः सफरता देवा गणितानन्दकं वृहत् । पूर्णानन्दो हरिस्तस्मात् कृष्ण एवं गतिर्मम ॥८॥ विवेकधैर्यभक्त्यादिरहितस्य विशेपतः। पापासक्तस्य दीनस्य कृष्ण एव गतिर्मम ॥२॥ सर्वसामर्थ्यसहितः सर्वप्रैवाखिलार्यकृत् । शरणस्थसाहारं कृष्णं विज्ञापयाम्यहम् ॥१०॥ कृष्णाश्रयमिदं स्तोत्रं यः पठेत् कृष्णसग्निधौ । तस्याश्रयो भवेत् कृष्ण इति श्रीवल्लभोवोत् ॥११॥ इति श्रीमहलमाचार्यचरणमादुर्मावितं रणाश्रयस्तो सम्पूर्णम् । १ समिणि इवियाउः। २ 'कृष्णा पाटः। Next श्रीकृष्णाय नमः। धीगोपीजनवल्लभाय नमः। श्रीमदावार्यवरणकमलेभ्यो नमः । कृष्णाश्रयस्तोत्रम् । श्रीमद्रानाधचरणविरचितविवरणविभूषितम् । य आविरासीखोरस्मिन् कलो श्रीवल्लभाभिधः । निजदास्यं स नो देयादव्यादपि दुराश्रयात् ॥ १॥ सर्वमार्गेषु नष्टेषु कलौ च खलर्मिणि । पापण्ड प्रचुरे लोके कृष्ण एव गतिर्मम ॥ १ ॥ सर्वमार्गेविति । सर्वे कर्मज्ञानोपासनादयस्ते मृग्यन्ते दत्तकलार्थिभिरिति मार्गा इटमास्युपायास्तेषु सर्वेषु नष्टेषु तिरोहितेषु सत्सु । अनेन जीवानां सर्वथैवा- गतिकस्वं सूचितम् । एवंविधेऽप्यास्येथें मम सर्वसनिवेदिनो दासस्य कृष्ण एप गतिः शरणं, माप्तव्योर्य आश्रयणं च । मनास्त्यितिपदं व्याख्याने याहार्यम् । एवकारेणान्यनिषेधः सूचितः । किं च, फालकृतोपद्ररेणाम्यगतिस्त्वं कलौ चेत्यने. नाहुः कलाविति । वहिर्मरूपाभासोन्तदोपमस्तो धर्मः खलो भवति, ताशो धमों यस्मिन्कलौ । खलानां दांभिरुहैतुकपापण्डिनामेव धो यस्मिनिति बा, चिवर- धर्मिणी'त्यपि पाठः श्रूयते, तथापि खरो रौद्रो धर्मों पस्गैति, अव प्युरिचिः- खरालो धर्मशेतिकर्मधारये कृते पशपत्तींप निमत्याः, नो द्रोही 'क'- प्रत्ययः भसज्येत । चकारात्कर्मशानायतिरोधानेपु फल्पतिरिक्तकालेपपि । किन, पापण्डो येदवायो धर्मः, स ममुरः अधिको यस्मिन, एवंवि लोके पवहार्यननवायां सत्यां, सर्वकारेण कृष्णाश्रयणं विना निस्तारो नास्त्येवेति सस्यापि फलितायों शेयः । अत एव 'पामारीय युक्तं, 'हरेनमिन नामेव नामेव मम जीवनम् । फ्लो नास्त्येव नास्त्येव नास्त्येव मतिरम्पनि । अवापि कचिनिमित्तमामा कवि 'दाण कर्तृत्व' इत्पनेन ससपी ज्ञेया ॥१॥ धोतत्तौ वागाभ्यन्तरभेदेन पापमुद्भावयन्तो निषयूह भीरगाथपणं विदधति । १सामयो । .
कृष्णाश्रपरतोयम् । म्लेच्छाकान्तेषु देशेषु पापेकनिलयेषु च । सत्पीडाव्यग्रलोकेषु कृष्ण एवं गतिर्मम ||२॥ म्लेच्छाकान्तेष्यिति । धर्माधिभिवासयोग्येषु देशेषु दुरशेवगावगादिषु म्लेच्छेरामान्तेपु प्यालेषु सत्सु, अप्रोभयया म्लेडा रोपा जात्या र्मणा । मन्पे- विधेष्वपि देशेषु पुण्यात्मानो भविष्यन्त्येव नः सह पायापरणे पुतो नेत्यत आर पापैकेति । परिमा यस्तत्वात्पापस्यवैवस्य निरयाः स्यानभूता ना पारादने- विधेयपि । एतेन धर्मादिषु कापसाधननिचिरला यन्तरमान सरणादिकतो. नेत्यत आहुः-सपोडेति । सनां सपुरपाणां धार्मिणां भगवत्परायणानामपि यार- श्री पीरा नोचिता वारा अपि दनादन्येषां विधामर्शथिल्पन प्यायेषु विसिरिसे फर्भपनामदेष नोरेपु सा । कृष्ण एव गतिर्ममेति पूर्वाग्व्येयम् ॥ २॥ ननु गद्गादिपतपुष्पदेगानां वस्तुमान मानावनों में पारसय पातु. सामध्यतिरोपानाम नपासमिति साहितिपूर्व गाभार:- गङ्गादितीर्थवर्येषु दुष्टरवारतेविद । तिरोहिताधिदेवेषु कृष्ण एवं गतिर्मम ॥ ३ ॥ गदादीति । आधिभौरिसाध्यामिकादिगिदिनविय नागदावल म 'पुरुषमाधिदेवतामितियानगरपोर कीयांदो सायद पंपानानि , सप भगवदिहलेदानी हुषा निगरित, न तु मईया, मत परिष गदादिमायापु सीपुरलेषु लेरठादिभि देवरा मारह मिन भूगो सामाण पर गतिर्ममेति पूर्वरत् ॥३॥ अहद्वारविमूढेषु सत्सु पापानुवति । लाभपूजार्ययलेषु कृष्ण एव गनिर्मम ॥ ४ ॥ आहारनि । शिश, पं गतः के मनोरणारी पान पर विशारेण पिझोपतो मरेपुमा पादागेगाना, दि. मादस्पार्पम् । त्रि, मगु पार पाएं दुशारणमामि भार, मनु परनिन्ति पे दे पालानुरर्दिनः, परिणि सम पानी गुम पापानुननि निपिदाररणारं मिलेनियमो प्रोमा TI.१११TI .
३ श्रीमद्रधुनाथचरणविरचितविवरणविभूषितम् । स्रोत्रतिपूर्वक लोकतसन्मानने, अर्थः समयोगन, एतत्रितयसिद्धयर्थमेव यान उयमो येषां तेषु सत्सु, कृष्ण एवं गतिर्मम ॥ ४॥ अपजिाननष्टेषु मन्त्रेष्ववतयोगिषु । तिरोहितार्थदेवेषु कृष्ण एव गतिर्मम ॥ ५॥ अपरिज्ञानेति । द्वननगुर्वायुपसत्यभारेन वियोपशमापाठार्यविनियोगादी. नापपरिज्ञानेन मन्त्रेषु नष्टेषु तिरादितेषु सरसु, पुनः किंविशिष्टेषु अवतयोगिषु अत्रवेषु प्रतनष्टेषु योगः स्थितिरस्ति एपामेवेनैविधेष्वतिरोहिवानामप्याकिञ्चित्काल. मेव । यद्वा, स्वस्वाश्रमस्या योगिन उच्यन्ते तेवप्यतेषु सत्सु । पुनः किंविशिष्टेषु तिरोहितार्थदेवेषु । तिरोहितः गुप्तः अर्थो मन्त्राय:, देवोऽधिष्ठात्री देवना, एतद्वयं पां मन्त्राणां नापते । किपानः सेत्स्यतीति भावः॥५॥ नानावादविनष्टेषु सर्वकर्मत्रतादिषु । पापण्डेकप्रयत्नेषु कृष्ण एव गतिर्मम ॥ ६॥ मानावादेति । कूतार्किकबौद्धाचागमोक्का ये वादा वाग्मालरूपाः ' यावनी- सुखं जीवेदि'त्येवरूपाः, तैः कृत्वा वैदिकागमायुक्तसर्वकर्मत्रतादिपु विनष्टेषु विशेषतो नष्टेषु नास्तिक्येन परामुखेषु सत्स । किच, पापण्डेपु पंदादिविरुद्धार्थेपेत एका असाधारण प्रपनः पुनः पुनरुययो येषां, एविषेषु लोकेषु सत्सु कृष्ण एपेवि पूर्ववत् ॥ ६॥ विश्वासार्य सधान्तमाश्रयणमा:- अजामिलादिदोषाणां नाशकोऽनुभवे स्थितः । ज्ञापिताखिलमाहात्म्यः कृष्ण एवं गतिर्मम ॥७॥ अजामिलादिदोपाणामिति । शूद्रीभयन्शेरनामिलनाप्नो दोषाणां महा- पातकानां नाममात्रेण नाशकोस्मासमनुमो स्थितः, चान्दानुपरे अन्तःसाक्षिमत्यो या स्पितो विपयोत इनि यार । 'आदि पदाजेन्द्रप्रभृनपः, यमनोस्पिना नारकि- गर नृसिंहपुराणादौ प्रसिदम् । शापित देवजीवितं समग्रं निगमाहात्म्पं येन, एवं विपः कृष्ण एवेति पूर्वमन् ॥ ७ ॥ आचारसत्यमारेनेदि पाठः ।
४ श्रीकृष्णाश्रयस्तोत्रम् । प्राकृताः सकला देवा गणितानन्दकं बृहत् । पूर्णानन्दो हरिस्तस्मात्कृष्ण एव गतिर्मम || ८|| माकृता इति सकला ब्रह्मादयो ये देवास्ते प्राकृताः, प्रकृतिर्णया तनिबन्ध- भोसत्तिस्थितिविलया, अतस्तेपामाश्रयणं न कालादिभपनिवर्तकं प्रत्युत भयजनकमेव । अत एवोक्तं दशमे 'मयों मृत्युपालभीतः पलापन्नित्यादौ । चहि बृहदारं समास्त्विति चेतदपि नेत्याह-गणितानन्दकमिति । ब्रह्मापेक्षया शतगुणितानन्दसेनापरिमिना- नन्दत्वाभावात्पुरपोत्तमापेक्षयाललवादरेः सकलदुःखहारकस्य श्रीकृष्णस्य पूर्णानन्दत्या- दखण्डितानन्दत्वात्सवरूपायैः सर्वात्मना, कृष्ण एवेति पूर्ववत् ॥ ८ ॥ विवेकधैर्यभत्त्यादिरहितस्य विशेषतः । पापासक्तस्य दीनस्य कृष्ण एव गतिर्मम ॥९॥ विवेकेति । 'विवेकस्तु हरिः सर्व निजेच्छातः करिष्यतीत्येवरूपः, त्रिविध- दुःखसहनं धैर्यपदार्थः । भक्तिपदेन क्रमायातमाश्रयणमुच्यते । आदिपदेन तरसायनान्यु- च्यन्ते । एतेषां विविश्य निरूपणं तु 'विकधैर्याश्रय'च्याख्याने कृतमस्ति तत एलान- गन्तव्यम् । विवादिभगवद्धर्मरहितस्य मम कृष्ण एव गतिः। विश्च, न केवलमेत- द्राहित्यमपि तु विशेषतोऽतिशयेन पापासक्तस्य महापातकाचरणरतस्यापि । पापवर्न- नेऽसमर्थवादालान्या दीनस्य । भगवताप्ये तादृशानां स्वाश्रयेणैव सिद्धिरुक्ता 'मां हि पार्य व्यपाश्रित्य येपि स्युः पापयोनय'इति, 'अपि चे सुदुराचार' इत्यादौ ॥९॥ सर्वस्यनिवेदिनांसाधनं फलं च स्वप्रभुरेव संपादयिष्यतीति मार्थनामपि तथैवाहुः- सर्वसामर्थ्यसहितः सर्वत्रैवाखिलार्थकृत् । शरणस्थसमुद्धारं कृष्ण विज्ञापयाम्यहम् ॥ १० ॥ सर्वसामयति । कर्तुमकमन्ययाकर्तुं समर्थत्वात्सर्वमामर्थ्यसहितस्त्वं मम प्रमुः। किविशिष्टः सर्वत्रैव या काप्पखिलान्सन्विाञ्चितानन्करोतीत्यखिलार्थकृत् यतस्त्वमेवंविधः स्वामी अतः कारणात् कृष्ण हे परब्रह्म शरणस्थस्य शरणागतस्य सम्पाद्धारं विज्ञापयामि अहं खत्पुरः स्थितः शरणार्थी॥१०॥ एतत्पाठमात्रपरस्याप्येतदुक्तफलमाहुः- १ अन्यथाकरणेविस ग. का श्रीमद्रघुनायचरणविरचितविवरणविभूषितम् । कृष्णाश्रयमिदं स्तोत्रं यः पठेतष्णसन्निधौ । तस्याश्रयो भवेत्कृष्ण इति श्रीवल्लभोऽब्रवीत् ॥ ११ ॥ कृष्णानयमिति । कृष्ण पाधीयते येन स्तोत्रेण तत्कृष्णानपं, कृष्ण आश्रयः प्रतिपायोर्यो यस्येति वा । इदं यः कृष्णसन्निधौ समीपे 'सनिधि पदात्तदनन्यभक्त- समीपेपि पठनीयं सनियतुल्यत्वात् पटेदयीयीत तायाश्रयानमिनस्यापि स्वयमेव कृष्ण आश्रयो भवेत् । कमिदमतिदुर्लभगेतावन्मात्रेण मवेदिति नाशङ्कनीय, यतः कारणात इतिश्रीवल्लभोत्रवीत् । इति इसमर्थ श्रीवल्लभ आचार्योव्रयोदुक्तवानतः किमार्यम् । अत्राचार्यवचनानां वस्तुशक्तिरेव प्रयोजिका, यतस्तदचनः प्रेरितो भग- चांस्सदाश्रयो भवति न तु तत्कृतमपि सायनपपेक्षते ॥११॥ सुखेन श्रीयतां कृष्णः किमाश्चिन्तया मुधा । आगर्यवाक्पासिक्ता माकड्द संशयं जनाः ॥ २ ॥ आचार्यचरणाम्भोजे दृढ़ विश्वस्य विस्तरात् । रघुनाययकारेदं कृष्णाभयविचारणम् ॥१॥ इति श्रीमबल्लभनन्दनचरणकशरणनीरधुनाथस्य कृती कृष्णानयस्तोप्रविचरणं संपूर्णम् ।
श्रीकृष्णाय नमः। श्रीगोपीजनवल्लभाय नमः। श्रीमदाचार्यचरणकमलेम्पो नमः । कृष्णांश्रयस्तोत्रम् । श्रीमत्कल्याणरायचरणविरचितप्रकाशप्रकाशितम् । पट्टीलालसंस्पर्शाग्न रोक्नेऽन्यदाशिषः । तं राधाहृदयानन्ददापर्क कृागमाश्रये ॥१॥ यत्कृपादृष्टितो गन्तुगोविन्दं विन्दते मुदा । मस्याएं तामिमावापांनभिवन्देऽसिद्धये ॥२॥ श्रीकृष्णाश्रयस्प सर्वसाधावान्तीयानां तदर्य परमदानपिन नः श्रीपदा. पार्पचरणाः कृष्णाश्रपस्तोत्रं निलपन्ति । साधुना देशादिषदमाश्नानासमाधान बदन्तो भक्तानां भगाने सर्तमानम्पपस्थिरपनि इति, दमरोगानिरप इति, दधिमकसेव्य इति, माणानापियस्य स्तोरस्प समाधानमिति पदभिः लोक: मानाव्याजेन तं स्तुरन्ति । तर अपमं मुरम्पारनाकारस्प मामासान बदन्तः पालधर्मनिरापरणपूर्वमाश्रय मापने- सर्वमार्गेषु नष्टेषु कलौ च खलर्मिणि । पापण्डपचुरे लोके कृष्ण एव गनिर्मम ॥१॥ सर्वमार्गेप्यिति । कनी पलपार्मिणि खगेन्नाटो पनि गति। 'परप- मिगी विराठे दुम्सालेष्टित पणे सतीपर्पः। कृषिवा निरामपनिरूपः सदानन्दः पुरुषोतम एर पर गम्यत इतिगतिरानप पेरिगरगेशितापमारकोस्तिनिरोपः। सलमा:-लोके नने पादः मनुर मांसपालि पम्भिमा गनि। मन पर सरे मम्पन्न इति मागां पुरपार्योगा: पमहानाय नमाये मन्ग, रामबा. दारमुखपदस्प कभ्रमजननापिनापनमनानाम्य, मायापदाधिः निसामानमार्गस्य, निरीभरवाहांगरागम्य, विभूनिस्तापामनार मगर फासापान नमापनम् । पहारान्तावादिए पगिारानुगुमा मन, ए. १९५-द-प-i-rt-1 ११ मि sort अषले ।
छ । . श्रीमत्कल्याणरायचरणविरचितमकाशप्रकाशितम् । रस्य विशेष्यान्वितत्वेनान्ययोगव्यवच्छेदकत्वादशः फलादिर्वा गतिस्वित्यर्थः । अन्या. र्थकत्वादस्य सिद्धत्तेपि प्रार्यनं न दोपाय । ननु भक्तिमार्गीयाणामपि कलिफालस्य बाधकत्त्वाहाद्यासक्तिमत्वाल्लौकिकक्रियापरत्वात्यापसंभवाच्च भक्तिमार्गस्य कयमुद्धारकत्वं मुख्यफलसाधकत्वं चेति कर्मादितुल्यत्वात्किमाश्रयेणापीति चेत्, मैव, भक्तिमार्गे वहुक्त- दुपणानामभावात् । तथाहि-कलेदोपनिधेरिति 'कलौ तद्भरिकीर्तनादिति 'फलि सभा- जयन्ती'त्यादिवाक्यैांधकरवाभावादल्पकालेनैव फलसिद्धेः प्रत्युत साधकत्वात् । 'शृण्वन् गृणन् । 'मटातायातयामानां न बन्याय गृहा मता' तावद्रागादयः स्तेना' इत्यादिवाक्य- भगवत्परत्वे गृहादेवन्धहेतुत्वाभावात् । 'एवं नृणां क्रियायोगा' इत्यादिवाक्यैलौकिकफ्रि- पाया अप्यलौकिकतुल्यत्वात्। 'मत्कर्म कुर्ववा'मित्यादिवाक्यभगवत्सेवादिना विहिताकर- गेपि मत्यवायाभावाद, 'धुनोति सर्व हदि संनिविष्टः 'ते मे न दण्डमन्तिी'त्यादिवाक्यैः कदाचित्पातकसंभवेपि नरकायभावात्कीर्तनादिनैव पापनाशात् । 'सर्वधर्मान्परित्यज्य' 'अपि चेत्सुदुराचारः यः कथिद्वैष्णवो लोके, यानास्थाय'त्यादिवाक्यैराचाराय. भाषेपि फलसिद्धः। 'धर्मः सत्पदयोपैत:, 'धर्मः स्वनुष्ठितः। नैष्कर्म्यमप्यच्युत- भाववनित' 'यमादिभिर्योगपयैः' ' श्रेयःसुति'मित्यादिवाक्यै या जलौकसा नित्यं जीवनं सलिल मतम् । तया समस्तसिद्धीनां जीरनं भक्तिरिष्यत' इतिवृहबारदीय. वापयास भक्तिरहितानां कर्मादीनायसाधकत्वाद, भक्तिसहितानामेव साधकत्वात् । 'यत्कर्मभिर्यचपसा 'चतुर्विधाः ''अकामः''ज्ञाने प्रयासमुदपास्य'" किमलभ्य' 'रूपमारोग्यमर्यानित्यादिवाक्यैः केवलभक्तेरपि सर्वसाधकलात् । 'परिनिष्ठितोपि नैर्गुण्ये 'आत्मारामाचनकात्मता' 'महतां मधुद्धि'डित्यादिवाक्यैः स्वतोपि फलरूपत्वाव। अधुना कर्मादीनामधिकाराणां गतत्वाभक्तिमार्गे यहदनुग्रहस्याधिकारत्येनाधिकारिकतस्यैव सफ- लत्वादत्राधिकारभेदेन गौणमुख्यफलसंभवात् । एतदुक्तं तवार्यदीपे'-'अधुना अधि- कारास्तु सर्व एव गताः कलौ । कृष्णश्चेत्सेव्यते भम्पा फलिस्तस्य फलाप ही ति मक्ति- साध्यफलस्यान्येनासंभवादन्यसाध्यस्य भक्तरानुपगिस्तान कांदितुल्यत्वगन्धोपि। ननु पूर्णमक्तिमार्गस्याधिनयेपीह सायिकृतस्य तत्तुल्यत्वमिति चेत्, ने 'सतव्यः' 'स्मृते" 'कृष्ण कृष्णे दि 'न वै जनो जातु' 'कृष्णेति' 'आलोडयेत्यादिवाक्यः सामिकतस्यापि फलसापकत्वादन्पस्य तदभावादसमुक्तिभिः ॥१॥ १ एपकारो हि त्रिप्रकारक:-अन्ययोगापवरकोऽयोगबारको पन्चानेगावाति, रिशेपान्वितः प्रयमो या पार्थ एव धनुः शेिषशान्चितो दितीये पण फाडग, किसबिड. स्वडीयो पया नीर रोमवयोति । २. चिनास्ति ।
+ कृष्णाश्रयस्तोत्रम् । भनीगोविन्दराजपूतटिप्पणम् । मिलिन्दद्वन्दोपपचारकैशं सुमक्तशेष मुखफारिदेशम् । पयोदनीकाशमनोनवेशं तं वेङ्कटेश धरणं प्रपरे ।। नसा श्रीवल्लभाचार्यचरणे शरणे सताम् । कृष्णाश्रयमकाशस्य व्याख्यानं सुनिरूप्यते ॥ संस्पादिति । सम्यक सम्बन्धादित्यर्थः । सम्बन्धे सम्पवतं चाचान्यापरि- भूतत्यम् । अन्यदाशिप इति । न च अन्याश्व ता आशिपवेवि चिरहे अन्याशिर इति भाव्यमिति वाम्यम् , 'अषष्ठयतृतीयास्यस्येति दुगागमान् । गाहदयानन्ददायक- मिति । राघाहृदयायानन्द ददरतीति नया ! भगवत्सुखस्यानन्दरूपत्वामानुपाति: काचित , इतरथाऽन्याप्यरित्वेन सुखमयनस्पैचोचितवान् । भत एवोक्तं 'प्रेमामुन'टी- कायाम् आनन्दोन्तःकरणदेवादिसर्वव्यापकः सुम्वमव्याप्यतीति । ननु 'आनन्दा- दधैव खल्लिमानि भूतानि' 'सत्यं विनमानन्दं प्रोत्पादिभिः युतिभिराम- न्दस्य भगवद्रूपत्वात्स्वदायक इत्यर्थः पर्यवसन्न इति चेत्, इष्टापते:, स्वरूपदानस्यो. चितवाद । एतेनानयोरभेदः सङ्गन्छन् । ददुक्तपापर्वणीयकृष्णोपनिषदि 'पूर्णप्रेश- सदी राधा श्रीकृष्णमनसोद्भवा', तस्मान्न भिन्नति । यत्कृपादृष्ठित इति । स्त्रीप- खेन परिनदादित्यर्थः । अभिवन्द इति । भस्पार्थसिद्धपे निनावार्यानभिनन्द इति सम्बन्धः । तत्र सेवाविषयसमेणा निर्विवन्यपरिसमाप्तिसिद्धप निनाचार्यनमस्कार- रूपं मङ्गलं परोमीत्येतद्वाक्यार्थः । सेवा सत्र नमनादिरूपा । न च प्रेमविशिष्टसेक्यति कुमुचितं, प्रत्वयार्यस्यैव माघान्यात् । तथा चोक्तपस्मदापानिपन्चे 'पावर्यः सेना प्रत्ययाः प्रेमेनि' । तचार्यदीप तु 'मेश्लेवान' इति फलिताकपनम्, अपया 'मत्पार्थः प्रधान मकृत्यर्षे विदोषणमिनिन्यायविरोध: स्पात् । वस्तुनस्तु एतस्य सामान्यन्यापोन विशेषन्यायस्यैर बलीयस्त्वात् । एतदुक्तं विवरणे 'प्रकृति पपपोः मत्ययार्थस्य प्राधान्यमिनिसामान्यन्यायादिच्छाविपयतया मान्दयोध्य एरशादसाधनता- न्वय इति वर्गकामादिवाक्ये क्लासशिपन्यायस्य बलीयत्वादन निगमिपनि असिना जिघांसतीत्पादिलोरिस्मयोगे पादिरूपसारनस्प तदन्यं तद्विनिवासिनव्यं मन्न. व्यमित्यादिवैदिकप्रयोग तम्यार्थभूनविषेष सन्मत्ययाभिहितारिश्य एव गमना- दान्वयस्य व्युत्पन्नत्वाय प्रकृत्यभिहितायां विधायां पनादीनां विनियोग इति । ननु 'भारे इत्यधिकारात्यत्ययार्यस्य भावत्वमुचितं न तु प्रेमवमिति चेत्, अयोयने, भावार्य- क्वं तु प्रत्ययस्य नावदुमयशदिसिद्धमेर, प्रभावशब्देन देशदिविपपिणी रनिः महत ९ प्रकाशवहिप्पणसहितम्। टिप्पणम्। सर्गः । पुरुषाब्रह्मादीनामुत्पत्तिर्विसर्गः । उत्पन्नानां तत्तन्मादया पालनं स्थानम् । स्थितानामभिवद्धिः पोषणम् । पुष्टानामाचार अतिः । तत्रापि सदाचारो मन्वन्तरम् । तत्रापि विष्णुभक्तिरीशानुकया । भक्तानां प्रपश्चाभावो निरोधः । निष्भपश्चानां स्वरूप- लामो मुक्तिः। मुक्तानां ब्रह्मस्वरूपेणावस्थानमाश्रय इति । दशविधभक्तसेव्य इति । सानिकसाचिकाः, साविकराजसाः, सात्विकनामसाः । राजसरानसा, राजस- साचिका, राजसवामसा: । तामसतामसा:, तामसरानमा, तामससाचिकाः । एके निर्गुणा इत्येतैर्देशविर्भक्तः सेव्य इत्यर्थः । प्रार्थनाव्याजेन स्तुवन्तीति । 'किमासनं ते गरुडासनायेत्यनेन प्रार्थनाच्याजेनैव स्तुतिनिरूपणस्यैयोचितत्वादिति भावः। गम्यते प्राप्यत इत्यर्थः । ननु 'भावे' इत्यधिकारात्कथमत्र कर्मणि प्रत्यय इति चेत्, सत्यम् , 'कृत्यल्युटो बहुल'मित्या 'बहुलामितियोगविभागातथा। अत एव 'एवं च बहुलग्रहणं योगविभागेन कुमावस्याव्यभिचारार्थ पादाभ्यां हियो पादहारकः कर्मणि बुल्' इति वैयाकरणशिरोमणयः । पापण्ड इति । वेदविरुदत्वं पापण्डलम् । आत्मसुख- वाचकेति । 'यन दुःलेन संभिन्नं न च ग्रस्तपनन्तरम् । अभिलापोपनीतं च तत्सुखं स्वापदास्पदमित्यनेन स्वर्गपदस्यात्मसुखवार सत्यादित्ययः । लोकभ्रमजननादिति । लोकत्वेन भ्रमजननादित्यर्थः । मायावादाभिनिवेशादिति । विवाधिष्ठानत्वेन मायो- पहितबह्मणः कर्तृत्वकथनादित्यर्थः । विवर्तस्तु अताविकोऽन्ययाभासः । यदा, वस्तु- मस्तदसमससाको विर्तः । अथरा कारणविलक्षणोऽन्यथाभारो विर्तः । कारणभेदं विनैव तद्वतिरेकेण दुर्वचं कार्य विवर्त इति वा । निरीश्वरत्वाहीकाराद्योगस्येति । निनियोगाङ्गीकारादित्यर्पः । योगस्तु चित्तचिनिरोधः स तु भगवदयानार्यपङ्गल्ये- नोपयुक्त एकः । ध्यानाभावप्पात्मयोधागभूतो हितीया । उभावपि मागिरी । पस्तु स्वतन्त्रतया फलसायकत्वेन प्रोक्तस्तथासिदिहेतु नात्मा या तयान्ये देहेन्द्रियादि- साधकाम्तेऽपामाणिकाः । सर्वमेतच निबन्धे सटम् । कलिकालानुगुणेविति । द्वाप. रादौ युगे भूत्वा कलपा मानुपादिषु । स्वागः फलितस्त्वं च जनामनिसान कुछ 'मां च गोप्य पेन स्यात्यष्टिरेपोत्तरोत्तरे' त्यादिपमपुराणायुक्तवचनैर्महादेशदीना पलि. कालानुगुणवस्य सिद्धत्वादित्पर्यः । अन्यायकत्वादिति । मत्र प्रमाणभूताः 'शुभिक शिर मारोह शोभयन्ती मुखं ममापपाप्रे वचों विहवेष्वस्तिस्यादय आगमा अनुसन्धेया इति भावः । 'कलेदोपनिरित्यारभ्या भरोपि फल्गु'रिस्पन्तानां वचनानां सद्गहा-'कने। दोपनिये रामनस्ति होको मदान गुणः। कीर्तनादेव कृष्णहर मुक्तान्यः परं प्रजे' 'कृत पदपायतो विष्णुं त्रेतायां यनतो मरः । द्वापर परिचर्यापां कलौ तदरिकीनना पलि कृष्णाश्रयस्तात्रम् । भनीगोविन्दराजकृतटिप्पणम् । मिलिन्दन्दोपमचारुकेशं सुमक्तशेपं मुखकारिदेशम् । पयोदनीकाशयनोवेशं तं पेटेनं शरणं प्रपये ॥ नवा श्रीवल्लभाचार्यचरो शरणे सताम् । कृष्णाभयप्रकाशस्य व्याख्यानं मुनिरूप्पो || संपादिति । सम्यक् सम्बन्धादित्यर्थः । सम्बन्धे सम्यक्त्रं चापाग्यापरि- भूतत्वम् । अन्यदाशिप इति । न च अन्यान ता आशिपथेति विग्रहे सम्पाशिप इति भाव्यमिति वाप्यम् , 'अपष्ठयत्तीयास्यस्यै वि दुगागमात् । राधाहृदयानन्ददायक- मिति । राबाहृदयायानन्दं ददातीति तथा । भगवसुखस्यानन्दरूपत्वाभानुपपतिः काचिद, इतरथाऽन्याप्पष्टत्तित्वेन सुखकथनस्वोचित । अत एवोक्तं 'प्रेमामुगटी- कायाम् 'आनन्दोन्तःकरणदेदादिसर्वव्यापकः सुषमव्यायनीति । मनु 'आनन्दा- द्धव खल्विपानि भूतानि' 'सत्यं विज्ञानमानन्दं ब्रह्मेत्यादिभिः श्रुतिभिरान- न्दस्य भगवद्रूपत्तास्तदायक इत्यर्थः पर्यवसन्न इति चेन, इष्टाप, सदानस्यो- चितत्वात् । एतेनानयोरभेदः सङ्गच्छते । तदुक्तमायणीपाष्णोपनिपदि 'पूर्णप्रेमा. स्पदी राधा श्रीकृष्णमनसोचवा', तस्मान्न भिन्नति । यत्कृपादृष्टित इति । स्वीय- पेन परिग्रहादित्पर्यः । अभिवन्द इति । भाग्यार्थसिद्धये निभाचार्यानभिवन्द इति सम्बन्धः । तत्र सेशविषयकोया निविश्वग्रन्थपरिसमाप्तिसिपथ निनापार्यनमस्कार- रूपं मङ्गलं करोमीत्येनदास्पार्थः । सेवा वा नमनादिरूपा । न च प्रेमविशिष्टसेक्येति वक्तमुचितं, प्रत्ययार्थस्यैव प्राधान्यात् । तथा चोक्तमस्मदावानिवन्धे 'पात्वर्थः सेवा प्रत्ययाः अमेति । तयार्थदीपे तु 'प्रेमरोवात' इति फलिताकथनम्, भन्यया 'प्रत्ययाः प्रधान प्रत्यर्थे विशेषणमितिन्यायविरोधः स्यात् । वस्तुतस्तु एतस्य सामान्यन्यायवेन विशेषन्यायस्यैव बलीयस्त्वात । एतदुक्तं विवरणे कृतित्यययोः प्रत्ययार्थस्य माधान्यमिविसामान्यन्यायादिच्छाविषयतया शब्दयोभ्य एव शादसाधनना- न्वय इति स्वर्गकामादिवास्ये क्लम विशेपत्यायस्य बलीयस्तादन निगमिपति असिना जिघांसतीत्यादिलौकिकायोगेषादिरूपसाधनस्प तदन्ष्टष्पं तद्विजिशासितव्यं पन्त. व्यमित्यादिवैदिकमयोगे तव्यार्थभूतविधेय 'सम्मत्पयामिहिनेच्छाविषय एव गपना- दापवयस्य प्युत्पनत्वाय प्रकृत्यभिहितायां विद्यायां यज्ञादीनां विनियोग इति । ननु 'भाव'इत्यधिकारातत्ययार्थस्य भावत्वमुचितं न तु ममत्वमिति चेन, पत्रोच्यते, भार्य- कलं तु प्रत्ययस्य नावदुभपवादिसिद्धमेव, तर भावशब्देन देवादिविषयिणी रतिः प्रको ९ प्रकाशतट्टिपणसहितम्। टिप्पणम्। सर्गः । पुरुषाद्ब्रह्मादीनामुत्पत्तिर्विसर्गः । उत्पन्नानां तत्तन्मादया पालनं स्थानम् । स्थितानामभिदिः पोपणम् । पुष्टानामाचार अतिः । तत्रापि सदाचारो मन्वन्तरम् । तत्रापि विष्णुमक्तिरीशानुकथा । भक्तानां प्रपश्चाभायो निरोधः । निष्पपञ्चानां स्वरूप- लाभो मुक्तिः। मुकानां ब्रह्मस्वरूपेणावस्थानमाश्रय इति । दशविधभक्तसेव्य इति । साचिकसाचिकाः, साचिकरानसाः, साचिकतामसाः । राजसरानसा, राजस- साचिका, राजरातामसाः | तामसतामसाः, तापसराजसाः, वामससाचिकाः । एके निर्गुणा इत्येतैर्दशविर्भतः सेव्य इत्यर्थः । प्रार्थनाव्याजेन स्तुवन्तीति । 'किमासनं ते गरुटासनाये'त्यनेन प्रार्थनाव्याजेनैव स्तुतिनिरूपणस्यैवोचितत्वादिति भावः। गम्यते प्राप्यत इत्यर्थः । ननु 'भावे' इत्यधिकारात्कथमत्र कर्मणि प्रत्यप इति चेत्, सत्यम् , 'कृत्पल्युटो बहुल'मित्यत्र 'बहुल मितियोगविभागात्तथा । अत एव एवं च बहुलग्रहणं योगविभागेन कन्मात्रस्यार्यव्यभिचारार्थ पादाभ्यां ट्रियते पादहारकः कर्मणि प्युल्' इति वैयाकरणशिरोमणयः । पापण्ड इति । वेदविरुदत्वं पापण्डलम् । आत्मसुख- पाचफेति । 'यन दुःलेन संभिन्नं न च ग्रस्तमनन्तरम् । अभिलापोपनीतं च तत्सुखं सम्पदास्पद'मित्यनेन स्वर्मपदस्यात्मसुखवायफत्तादित्यर्थः। लोकभ्रमजननादिति । लोकत्वेन भ्रमजननादित्यर्थः । मायावादाभिनिवेशादिति । विवाधिष्ठानत्वेन मायो- पहितग्रह्मणः फत्वकथनादित्यर्थः । विवर्तस्तु अताविकोऽन्ययाभास: । यदा, वस्तु. नस्तदसमसत्ताको विवर्तः । अथवा कारणविलक्षणोऽन्यथाभागो विवर्तः । फारणभेद विना तयतिरेकेण दुर्वचं कार्य विवर्त इति वा । निरीश्वरत्वाहीकाराद्योगस्येति । निजियोगहीकारादित्यर्थः । योगस्त चिटचिनिरोधः स तु भगवद्धयानार्थमगले. नोपयुक्त एकः। ध्यानाभावेप्यात्मबोधागभूतो द्वितीयः । उभावपि प्रामाणिौ । यस्तु स्वतन्त्रतया फलसाधकत्वेन प्रोक्तस्तयासिद्धिहेतु नात्मा वा तयाये देहेन्द्रियादि- साधकान्तेऽमामाणिकाः । सर्वमेतच निवन्धे स्पष्टम् । कलिकालानुगुणेविति । 'दाप- रादौ पुगे भूला कलपा मानुपादिषु । स्वागः कल्पितस्त्वं च जनान्मद्विमुखान् कुर' 'मां च गोपय येन स्यात्सप्टिरेपोरोनरे'त्यादिपमपुराणायुक्ताचनैर्महादेवादीनां कलि. करमानुसुमावस्य सिद्धत्वादित्या अन्यायकत्यादिति। मा प्रमाणभूताः शुभिक शिर भारोह सोमपन्ती मुसं ममासमाग्ने वचों विड्येवास्त्वित्पादय आगमा अनुसन्या इति भारः। कलेदोंपनिये रित्यारभ्या भवोपि फल्गु रित्पन्तानां वचनानां सहा-'कले. दोपनि रानमस्ति को महान् गुणः। फीर्तनादेव कृष्णस्य मुक्करन्यः परं प्रजेन्' 'कृत पदपापनो विष्णु प्रेतागं पननो मौः हारे परिचर्यायां कलौ तरिकीनना' 'कलि कृष्णाश्रयस्तोत्रम् । टिप्पणम् । समानयन्त्यार्या गुणहा सारमागिनः । यत्र संकीर्तनादेव सर्वः स्वार्थोपि लम्यते' शृण्वन् गणन संस्मरपंच चिन्तयन् नामानि रूपाणि च पड्लानि है। क्रियासु पस्त- चरणारविन्दयोराविष्टचित्तो न भवाय फल्पते 'गृहपाविशतां वापि पुंसां कुशलकर्मणाम् । मदातायातयामानां न न्याय गृहा मना!' 'तावागादयः स्तेनास्तावकाराष्ट्रहं गृहम् । तान्मोहोशिनिगडो यावत्कृष्ण न ते जनाः' 'एवं नृणां क्रियायोगा: सर्वे संमृतिहेतवः । व पवात्मविनाशाय कल्पन्ते कस्थिताः परे 'मकर्म कुर्वतां पुंसां काललोपो भवेद्यदि । तत्कर्म तस्य कुर्वन्ति तिसः कोय्यो पणिः स्वपादमूल मनतः पिएस्य पक्तान्यभावस्य हरिः परेशः । विकर्म यशोत्पतितं कथश्चिन धुनोति सर्व हृदि सनिविष्ट 'एवं विमृश्य सुधियो भगवत्यनन्ते सर्रासना विदधते खलु भारयोगम् । ते मे न दण्डमईन्स्पथ यद्यपीपी स्थात्पातकं तदपि हन्त्युरुगायवाद' ते देव सिद्धपरिगीतपवित्रगाया ये साधक समदृशो भगवत्प्रपन्नाः । तानोपसीदत हरेगदयामिगुतान्नैपां वयं न च वयः प्रभवाय दण्डे' 'सर्व- धर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं वा । अहं खां सर्वपापेभ्यो मोलयिष्यामि मा शुच' 'अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभार ! साधुरैव स मन्तव्यः सम्गव्या हिवो हि सः' 'यः कश्चिद्वैष्णको लोके मिथ्याचारोप्यनाथमी । पुनावि सालान् लोकान् सहस्रांशुरि- बोदितः' यानास्थाय नसे रामन्न समायेत कहिंचित् । धानियोल्य वा नैवे न स्खलेन पतेदिह' 'धर्मः सत्यदयोपेतः विद्या वा तपसान्विना । समस्याप्तमात्मानं न सम्यक प्रपुनाति हि धर्मः स्वष्टितः पुंसां विवरसेनकसामु यः । नोत्पादयेद्यदि रति अप एव हि केवलम् 'नैष्कर्म्यमप्यच्युतभाववर्जितं न शोभते ज्ञानमलं निरञ्जनम् । कृतः पुनः शश्वदभद्रमीश्वरे न चार्पितं कर्म यदप्यकारणम्' 'यमादिभियोगपधैः कापलोमहतो मुहुः । मुकुन्दसेक्या यदत्तात्मादा न शाम्यति' 'धेपालति भक्तिमुदस्य ते विभो क्लियन्ति ये केवलयोपलब्धये । नेपामसो प्लेशल एव शिष्यते नान्यथथा धूरतुपाच- पातिनाम् ' 'परकर्मभिर्यत्तपसा ज्ञानवैराग्यतश्च यत् । योगेन दानधर्मेण श्रेयोभिरि- तरैरपि' 'सर्व मद्धक्तियोगेन महतो लभतेसा 'चतुर्विधा भनन्तै मां जनाः सुकृतिनोर्जुन । आर्को जिज्ञासुरायी जानी च भरतर्षभ। 'अामः सर्वकापो का मोक्षकाम उदारपीतीग्रेग भक्तियोगेन यजेत पुरुष परम्' 'शाने प्रयासमुदपास्य नमन्त एव जीवन्ति सन्मुखरितां भवदीयवार्ताम् । स्थाने स्थिवाः श्रुनिम तनुवाय. नोभि प्रायशोनित मितोप्यसि तैखिोयाम् । किमलभ्यं भगवति प्रमन्नै श्रीनिके. तने । तपापि तत्सरा राजन् नदि वाञ्छन्ति किञ्चन' रूपमारोग्यप्राश भोगांवैवा- नुपगिकार ददाति ध्यापतो नित्यपवर्गपदो हरि' 'परिनिष्टितोपि नैर्गुण्ये उत्तमश्लोक- .
. प्रकाशतटिप्पणसहितम् । टिप्पणम्। लीलया । गृहीतवेता राजर्षे आख्यानं यधीतवान् । 'आत्मारामाथ मुनयो निर्ग्रन्या अप्पुरुक्रमे । कुर्वन्त्यहेतुर्की भक्तिमित्यंभूतगुणो हरिः' 'नैकात्मता मे स्पृहयन्ति कैचिन्मत्सादसैवाभिरता पदीहाः । येन्योन्यतो भागवताः प्रसज्य सभाजयन्ते मम पौरु. पाणि' 'महतां मधुद्विदोवानुरक्तमनसामभवोपि फल्गुरिति । भक्तिसाध्यफलस्येति भगवत्स्वरूपमा रित्यर्थः । तदुक्तमस्मत्प्रभुभिर्भक्तिसे'भक्तौ च न स्वरूपातिरिक्त- फलकत्व'मिति । 'स्पर्तव्य'इत्यारभ्य तदभाषा दित्यन्ते वचनानि तु 'स्मतव्यः सततं विष्णुविस्मर्वव्यो न जातुचित् । सर्वे विधिनिषेधाः स्युरेतस्यैव च किङ्कराः। 'स्मृतेः सकलकल्याणभाजनं यत्र जायते । पुरुषं तमजं नित्यं व्रजामि शरणं हरिम् । 'कृष्ण कृष्णेति कृष्णेति यो मां स्मरति नित्यशः । जलं भिवा यया पद्म नरकादुदराम्यहम्' 'कृष्णेति मजलं नाम यस्य वाचि प्रवर्तते । भस्मीभवन्ति राजेन्द्र महापातककोटयः, 'न वै जनो जातु कथंचनावोन्मुकुन्दसेव्यन्यवदङ्ग संमृतिम् । स्मरन्मुकुन्दाडधुपगृहनं पुनर्विहातुमिच्छन्न रसमहो यतः' 'आलोड्य सर्वशास्त्राणि विचापं च पुनः पुनः । इदमेक सुनिष्पन्न ध्येयो नारायणः सदेति । तत्र नवविधा भक्तिनिदानं, ततः प्रेम, तेन च विशिएकाभगवत्यादिः, सैव फलमिति फलसहितपूर्णभक्तिमार्गस्वरूपम् । अत एव सर्व- निर्णये 'स शानक्रियोभययुतः स एव फलं, तत्रापि साधनं पैर तत्साधनं नवविधा भक्ति'रिति श्रीमदाचार्यवाः। तथाच सामिकृतस्यापि स्मरणपर्यन्तं विहितस्यापि कायवामिनियोगस्नेहाभावेपि मनोमानस्थित्यैर ताशपुरुषविहितस्य वा फलसाधकल. मिति स्पष्ट एवेवरेभ्य उत्कर्षः। तयाचोक्तं निबन्ये-'फाययाम्विनियोगामारेपि स्नेहा. भावेपि मनोमायस्थिती फलमेतदिति। धर्ममार्गस्य तु न तया, सागाद्वैदिकर्मणः फला. वश्यंभावनियमादिति तवम् ॥१॥ ननु पुण्पदेशस्थितिमानेणापि पुरुषार्थसिद्धेः किमितीतरव्यवच्छेदपूर्वकमाश्रयमा- नपित्याशय देशानामसापाव पदन्त आश्रयं मार्थपन्त- म्लेच्छाकान्तेषु देशेषु पापेकनिलयेषु च । सत्पीडाव्यग्रलोकेप कृष्ण एवं गतिर्मम ॥ २ ॥ म्लेच्छामान्तयति । देशेषु निराकान्तेषु सत्नु । ननु म्लेच्या अपि न्याय- पतिनषेनदा फो दोपस्तवाः-पापेकनिलपेविति । पापरूषा एक ते नदेकनियेत, पापा ये गुरुपास्तमिलपेप, पापस्य था । भयका पूर्वोक्ता पाकनिउपेषु च अहाहा. दिप, यत्र गमनमाण पुनः संस्कारमभः । ननु लोका गणिनादपः समीचीनासा: 1. मालित मौसमग पाया सिना गन्न पुः सारमतीति रसः । प्रकाशः।
१२ कृष्णाप्रयस्वोत्रम् । प्रकाशः। सकारा -- कि कार्यमत आहुः-सदिति । साधूनां पीडया व्ययाः स्वधर्माचरणमेवानिष्टहेतुः मत्य- क्षत्वान्न कार्यमुत मारवं कर्म वेति व्याकुला लोका येषु । सद्धर्मस्य शुभहेतुत्वानिधयेन श्रद्धायभावाचेपि सहाया न भवन्तीत्यर्थः । 'अहो अमीषां किमकारि शोभनं प्रसन्न एपी स्विदुत सयं हरिः । येन्म लब्धं नृषु भारताजिरे मुकुन्दसेवोपयिक स्पृहा हि न इत्यादिवाक्पर्देशानां कृष्णाश्रितानुकूलत्वात् । शेषं पूर्ववत् ॥ २॥ टिप्पणम् । पापा ये मुख्या इति । फलितार्यकपनमेवन् , इताया विशेषणसमासे 'पूर्वका. लेके त्यनेनैकशन्दस्य पूर्वनिपावः स्यात् । विग्रहस्तु पापेषु ये मुख्या इति । यन्त्र गम नमात्रेण पुनः संस्कारसंभव इति । 'अगरङ्गकलिनेषु सौराष्ट्रमगयेषु च । तीर्थयात बिना गच्छन् पुनः संस्कारमईती' स्यनेन तथेत्ययः ॥२॥ ननु गङ्गादितीथैरपि सर्वपुरुषार्यसिद्धेः कि केवलाश्रपेणेत्याकय व्याणाम- सायकत्वं वदन्तस्तीर्यानामाहुः-- गद्गादितीर्थवर्येषु दुष्टेरेवावृतेप्विह । तिरोहिताधिदेवेषु कृष्ण एवं गतिर्मम ॥३॥ गद्गादीति । गोदोनि यानि तीर्यश्रेष्ठानि तेषु दुष्टैरेवाटतेषु सत्सु, मतो न नैः पुरुषार्पसिदिः । ननु फयं दुटैरेवारतत्वं तत्र ब्राह्मगादीनामपि सत्वाद, न, अतिपरि- चयादनादरेण तत्र भक्यभावेन मतिप्रहायपाधिभिरवस्थानाच वेपामपि दुष्टत्वमेव । ननु सर्वदोपनिवारकेषु तेषु सत्स दुष्टसंभवीति चेत्, न, सर्वेण गाड्न नलेन सम्प- इमलाशतेनाप्पय भाषदुष्टः । आगन्मतः स्नानपरोपि नित्ये न शुदधतीत्येव वर्ष वदाम' इत्यादित्यपुराणवपना , 'मत्स्यकच्छपमण्डकास्वोये ममा दिपानि । वसन्तोपि च ते स्नानाकलं नाईन्ति कर्डिचित्'प्रदाविधिसपायुक्तं यत्त क्रियते नृभिः । शुभिः टिप्पणम् । द्रव्यागामसाधकत्वं वदन्तस्तीर्थानामिति । तीर्थस्प तद्देशावच्छिापवाहात्म- काध्यात्मिकदेवताएवेन द्रव्यलभितिभावः । एवोक्तपस्मत्वसमिनिक दितीयप मवाहस्पतया तीर्थत्वमिति । यादवकोशेषि-'तीर्थ पन्नाथपाध्यायभावेवमसि पान' इति । उक्तं च दशपस्कन्धीयसुबोधिन्यां देवनारूप 'कालिन्दीति समारपास्यस्प व्याख्याने 'आध्यात्मिक देवतापनि ति । 'भापश्चिानि चीनी विवचनप्रयाणि- १. चितिहा। २. मधमावितमिदि पाठः।।
प्रकाशतट्टिपणसहितम् । प्रकाशः। शुद्धेन भावेन सदानन्त्याय कल्पते ' "विधिहीनं भावदुष्टुं कृतमश्रद्धया च यत् । तदर- त्यसुरास्तस्य समूहस्यावतात्मन' इति योगियाज्ञवल्क्यवचोभिः, 'अश्रद्दधानः पापात्मा नास्तिकोच्छिन्नसंशयः । हेतुनिष्ठश पञ्चैते न तीर्थफलमागिन' इति वायुपुरागववनाम, प्रायश्चित्तानि चीनी'त्यादिमिव तेषां भगवद्गाहिमुख्पनास्तिक्यादिदोपानिवार- फत्वात् । ननु वस्तुशक्त्यां सत्यां कयमेतत् , न ह्यमिः कदाचिन दहतीत्याशङ्कयाधि दैविकदेवतारूपतिरोधानाद्वस्तुन एवाभावादित्याहु:-तिरोहिताधिवेष्विति । दृष्टा- न्मत्याधिदैवतिरोधानात्सतः प्रत्येव प्राकट्यात् , अत एव श्रीभागवतार्यतत्वदीपे 'वीर्या- दावपीति । अत एवं सतां 'तीयीकुर्वन्ति तीर्यानी'त्यनेन तीर्थीकरणमुच्यते । आधिदै- चिकामा जले दृश्यमानदोपाभावारिक तीर्थीकरणं स्यात् । शेपं प्राग्वद ॥ ३॥ टिप्पणम् । 'प्रायश्चित्तानि चीणांनि नारायणपराङ्मुखम् । न निष्पुनन्ति राजेन्द्र सुराकुम्भमिवा. पगा: 'तीर्यादावपि या मुक्तिः कदाचिरकस्यचिद्भवेत् । कृष्णप्रसादयुक्तस्य नान्यस्येति विनिश्चयः भवद्विधा भागवतास्ती भूताः स्वयं प्रभो । तीयीकुर्वन्ति तीर्यानि स्वान्तः- स्पेन गदाभृतेति ॥३॥ ननु फसमीचीनत्व सर्वफलसिद्धेः किपाश्रयेऽन्यन्यवच्छेदेनेत्याशङ्कय कर्तृणाम- साधकलं वदन्त आश्रयं मार्ययन्ते- अहङ्कारविमूढेषु सत्तु पापानुवर्तिषु । लाभपूजार्थयनेषु कृष्ण एवं गतिर्मम ॥ ४ ॥ अहङ्कारविमूदेविति।सत्सु पण्डितेषु अहङ्कारेण वयं शाखा इतिगणान्य पृच्छन्त्यपि नेति मायाादायभिनिवेशाविशेषेण मूडेषु सत्सु । ज्ञानवतविरपि तेपां दृष्टे त्पाहु लाभपूजार्थपत्लेविति । लाभपूनार्थमेव यत्नो येषां ने पारमार्थिकमपि कर्म लाभपूनाभ्यामेव कुर्वन्ति ।पापान पुंसः, पापं वानुवर्तन्तेऽनः सशानदोषाभ्यां दुष्टत्वान तेषां स्वतः फलसिदिराभये तु भगवत्कृपापां सत एव वेदार्यस्वदोपपोः रफरणामलसिद्धिः, भगवान् भूगवदीयो वा पदार्थ नानातीति भक्तानामेश्येदतातूज्ञानान् । रोपं मुगपम्।।४।। पूर्ववदागय मन्त्राणायसायकत्वं वदन्न आश्रमायन्ते- अपरिज्ञाननष्टेषु मन्त्रेप्वव्रतयोगिषु । तिरोहितार्थदेवेषु कृष्ण एव गतिर्मम ॥ ५ ॥ समीचीनत्वेनेवि स.ग. प्रकाशः।
१४ कृष्णाश्रयस्तोत्रम् । प्रकाश । अपरिज्ञाननष्टेविति । मन्त्रा वैदिका आगमोक्ताश्य, तेषु अपरिज्ञाननष्टेषु अपरिक्षानेन तात्पर्यफगदेवतास्वरूपाज्ञानेन नष्टमायेपु सत्सु । वैदिकाना गुरखुलवासब्रह्म चर्यशूद्वासनिध्यनध्यायराहित्यपूर्वक पठिताना साधकत्वेनाप्रतयोगिनामसायकत्वात् । आगमोत्ताना तात्पर्याज्ञानेनार्यदेवयोस्तिरोभावादसायकवाद । भगवदाश्रये तु यस्य स्मृत्ये'त्पादिवाक्यैः 'सर्व रांपूर्णता याती'ति मन्त्राणामपि सापात्तात् ॥ ५॥ ननु मीयासादिना मन्त्रतात्पर्यनिर्धारातर्मभिरेव फलसिद्धः किमाश्रयेणेत्याशङ्कय कर्मणामसाकयत्वं वदन्त आश्रय प्रार्थयन्ते- नानावादविनष्टेषु सर्वकर्मव्रतादिपु । पापण्डैकप्रयत्नेषु कृष्ण एव गतिर्मम ॥ ६ ॥ मानावादविनष्टेविति । कर्माणि सोमयागादीनि, बतादीनि च, तेषु सर्वेषु मपश्चः सर्वोपि मिध्येति वेदानामपि तयावामपञ्चवरस्वाज्ञानकलितत्वेन घेदाना तो धिताना च व्यवहारमाण प्रामाण्यान किश्चित्कर्तव्य प्राप्तव्यं वास्तीति पाश्चिद्वाद। 'परमेष्ठिनो वा एप यज्ञोग्र' इत्यादिवाक्यैर्ब्रह्मादीनामपि यज्ञैरेवोत्कर्षापूर्ववासनात एवोच रोत्तरमवृत्तेः कर्मव कर्तव्य तेनैव फलं न कोप्युपास्यः फलदाता प्रवर्तको वा, देवतापि चेतना नास्ति किन्तु मन्नमयेवेति न देवतापीतिव्यापारः फलं पेति कपाश्चिद्वाद, शास्त्रेण पोडशपदार्थविवेकानन्तर श्रवणमनननिदिध्यासनैः स्वात्मसाक्षात्कारे सति दुःखात्य- न्ताभाव एव फ्लन भगवान्सेपः फलं वेति केपाश्चिद्वाद', पुरुषस्य स्वरूपेणावस्थान फल, न भगवानिति केपाश्चिन्मतम् , एवविध नावादैविशेपेण नष्टेषु सत्सु । विपरीतार्यनिश्चयेन फलाजनकत्वाद्विनाशः । वस्तुतः 'पुरुष एवेद सर्वे 'ऐतदात्स्यमिद सर्व सर्वस्य वशी सर्वस्येशान 'एप उ एव त साधु कर्म कारयति 'अहं सर्वस्य प्रभव.' को नु राजनिन्द्रिपान्' 'देवोसुरो मनुष्यो वा' 'फलपन उपपचे.' 'त एव तृप्तास्तर्पयन्त्येनमिति 'देवा व सत्रमासत' 'विशते तदनन्तरम्' 'मामेवैष्यसि आनन्द ब्रह्मणो रूप' मित्यादिश्रुतिस्मृतिपुराणन्यायैः प्रपश्चस्य ब्रह्मात्मकत्वात्सत्यतेन कर्तव्यस्य सफलत्वाद्भगवनः सर्वेश्वरत्वेन सेव्यत्वात्मवर्तकत्वात्कलदायत्वात्तृप्तिसत्रकरणा यनुपपत्या देवतानामपि चेतनत्वाद्भगवत्सापुज्यस्य मोसवादानन्दरूपस्वेन भगवत एष फलरूपत्वात्पूर्वोक्तवादाना मलपितकल्पत्वात् । स्वमताप्रहेणैव निपिद्धदशम्यादिविदकाद- मलपितकल्पत्वादिति । यत्तु 'शाखदीपिकाया नवमाध्याये देवता का प्रयोगयेद अतिथिवद्भोननस्य तदर्थवादि'त्यधिकरणे 'यद्यपि देवता विग्रहवती प्रतिया मुक्या वनति प्रसीदति च तथापि यागादेव फल विग्रहवती चानित्या स्यात् , ववव नित्य- प्रकृतितदिकारोपयानविलये टिप्पणम् ।
प्रकाशतट्टिप्पणसहितम् । टिप्पणम् । वेदविषयत्वं न स्यात्, मत्यपि विग्रहे प्रत्तस्य हविषो देवतया भोगः प्रत्यक्षविरुद्धो- शक्योभ्युपगन्तुम् , न चाभुञ्जाना प्रसीदतीति युक्तम् , अत एवामविपन्नापूर्वत्यागे देवताप्रसादे वा फलमित्येतदपि निरस्तं, न हि तस्याः मसादः संमवतीत्युक्त मिति पार्थसारथिमिश्राः तस्मौढिवादमात्रमेव । तथाहि-'यदुक्तं विग्रहवनी चानित्या स्यात्ततश्च नित्यवेदविषयत्वं न स्यादिति, तदपेशलं, अनित्यानामपि यागादीनां वेदविषय- स्वात् , विग्रहवत्वेनैव फलजनकत्वस्य 'तृप्त एवेनमिन्द्रा प्रजया पशुभिस्वर्पयती'त्यादि- श्रुत्युक्तत्वाच । मुख्यानाधेन न श्रुतैरुपचरितार्थत्वम् । अर्थवादानां स्वतः प्रामाण्यं न तु विध्येकवाक्यतया । एतेनास्मिन्नेवाधिकरणे यावरभाप्ये सिद्धान्तितं सत्स्वमता- ग्रहमात्रमेव । मकृतमनुसरामः । यदपि 'सत्यपि विग्रहे मत्तस्य हविपो देवतया भोगः प्रत्यक्षविरुद्धोशययोभ्युपगन्तुमिति, तदप्पविचारसमणीयम् । विश्वादीनामपि प्रत्यक्ष- भोगाभावत्वेन 'सर्वमनुष्या विष्णुनाउशितपनन्तीतिश्रुतौ 'पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भल्या प्रयच्छति । तददं भक्त्युपहतमश्नामि प्रयतात्मन' इति स्मृतौ 'विष्णोनिवेदिता- नेन यष्टव्यं देवतान्तरम् । पितृभ्यश्चापि तद्देयं तदानन्त्याय कल्पते । पितृशेष तु यो दद्यात् हरये परमात्मने । रेतोधाः पितरस्तस्थ भवन्ति क्लेशमागिन' इति स्कान्दे ' यः श्रादकाले हरिभक्तशेपं ददाति भक्या पिट्टदेवतानाम् । तेनैव पिण्डोस्तुलसीविमिश्रा- नाकल्पकोटि पितरस्तु दमा' इति वाले च प्रतिपादितस्य भोगस्य विरोधापत्तेः । यत्तु निर्णयसिन्धुः-'एतत्सर्वं निबन्धविरोधान्निर्मूल'मिति, तन्न, श्रीधरस्वामिनृसिंहपरिचर्या- दिमूलं वदतः स्वस्यैव वदयाघातात् । एतेन 'न चाभुजाने'त्यारभ्य 'मसादः संभरती- स्युक्त'मित्यन्तं यदुक्तं तदेतेनैव निरस्तम् । वस्तुतस्तु विशिष्ट एव देवतेति न काप्यनुप- पत्तिः । एतेन तदुक्तकर्ममार्गस्य मलपितकलात्वं सिद्धमिति निगर्वः । यत्तु मुक्तावल्या. मात्मनिरूपणे 'गुतरामीश्वरभेद' इत्यारभ्य 'परमं साम्पमुपैतीति श्रूयते' इत्यन्तं पश्चानन- भट्टाचार्या आहुस्तत्वामादिकमेव । तथाहि यदुक्तं 'गुतरामीश्वरभेदोऽन्यथा वन्धमोक्षा- नुपपत्ते रिति, तनुच्छ, बन्धस्प सांसारिकजीवविपयस्वेन सुतरां भेदाभावात् । यदपि 'योपीश्वराभेद' इत्यारभ्य 'सर्पिता' इत्यन्तं वदन्ति तदपि तथा । तथाहि अभेद- बोधिका किल 'ब्रह्म वेद ब्रीव भवतीति श्रुतिः । नहिं तदीयत्वप्रतिपादन- द्वारा स्तुतिस्तस्याः शवयोर्थोपि लौपचारिकः, न च श्रुतेरुचरितार्थत्वं संभवति मुख्यार्थावाधात् । अत एवांशो नानाव्यपदेशादित्यधिकरणे 'अद्वैतश्रुतपस्तु जातिदेश. कागभेदेन निमिचोपचारादित्युक्त्या 'नच यत्परास्तदौपचारिक युक्त'मित्युक्तं वाचस्स- तिमित्रैः । न च सर्व सामानः समर्पिता इति श्रुतिविरोधः, सर्वात्मनां तचैनैव भान- कृष्णाश्रयस्तोत्रम् । मिति तदर्थात् । यदपि 'मोक्षदायामज्ञाननिवृत्तारभेदो जायते इत्यपि न, मेदस्य नित्यत्यै नाशायोगा' तदप्यसत्, भेदस्य भ्रममाविषयत्वेन वस्तुन एवाभावात् । यदपि 'भेदनाशेपि व्यक्तिद्वयं स्थास्यत्येवेति तदपि न 'एप संमसादः असाच्छरीरा- समुत्थाय परं ज्योतिरूपसंपय स्थेन रूपेगाभिनिष्पयते' इत्यादिश्रुतिविरोधात् । एतेन 'न च द्वित्वमपी'त्यारभ्य 'सर्वजनसिद्धत्वा'दित्यन्तं यदुक्तं तत्सर्वमनेनैव परास्तम् । यदपि 'योपि तदानीमभेदप्रतिपदक आगमः सोपि निर्दम्यवादिना साम्यं प्रतिपादयति संपदाधिक्ये पुरोहितोयं राजा संहत इतिवदिति, तदपि न लम्पपर्णमतीक्ष्यं दत्तोचर- स्वात् । 'निरञ्जनः परमं साम्यमुपेती'ति श्रुतिस्तु जीवन्मुक्तपरा तस्साचार्किकमतस्यापि मलपितकल्पत्वं सिद्धमिति निष्कपः । वचनसहरस्तु-'अहं सर्वस्य प्रभवो पचः सर्व मवर्तते । इति मत्वा भजन्ते मा युपा भावसमन्विता:' 'को नु राननिन्द्रियान मुकुन्दचरणाम्बुजं । न भजेत्सर्वतोमुत्पुरपास्यममरोत्तः । देवोसुरो मनुष्यो वा पक्षो गन्धर्ष एष चा। भजन्मुकुन्दचरणं स्वस्तिमान स्पायया वयम् भन्या मामभिजानाति यावान् यश्वास्मि तत्त्वतः । ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम् ' ' मन्मना भव मद्भक्तो मवानी मां नमस्कुरु । मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिनाने मियोति मे' इति । आचार्यचरणद्वन्दवन्दनानन्दितात्मना । शिष्येण बालकृष्णानां किश्चिदन विचारितम् ॥ श्यादिवनकरणाच । कर्मत्येपि व्रतादीनां पृथगुपादानं ज्ञानारङ्गत्ववोधनाप । ननु तेपि स्वयं कुर्वन्ति परानपि वोधपन्ति मिथ्यालनिःफलवाललफलवानन्दाभावाने कर्य पूर्युः फर्य वा कोषयेयुस्तैपासपि मतानां शङ्करमिनीगोतमादिभवन्तित्वाचेत्यत माहुः-पा. पण्डैकमयलेयिनि । पापण्डनिमित्तमेस मुख्यः मय नो येषु च तिसार्दैन 'वामाराध्ये विश्लोकदोन च भगवता महादेव मन्ति तथैवानापनेन तथैव तेषां प्रवृत्तेः, स्वयं कर्मादिकाणेन स्वस्य महालख्यापनेन मनमवर्ननाद , 'यादाचरति श्रेष्ठ इनिन्या- यात् । आधुनिकानां तैरेव मोहितत्वात् । नहि देवादिप्रवर्तितशासत्वमाण सन्मनन्द विन्तु येदाविरोपित्रे सति पेदानुमारित्वात् । अन्पया वृहसतिश्यतिनवौद्धशासपापि सन्मतत्वमसङ्ग इत्यले प्रसकानुनसक्या । शेपं माग्छन् ॥६॥ शिरणम् । वं नेत्यारभ्य 'मापा वनन्य'त्यन्तानां वचनानां सहा-- 'संघरट्र महाराहो मोहशालागि फारप 1 अध्यानि वितध्यानि दर्शयस महामुन । प्रकाशं कुरु चात्मानमा च मां कुरु । सामाराध्य यथा संभो प्रही- माराः।
प्राशा प्रकाशतटिप्पणसहितम् । टिप्पणम् । प्यामि वरं सदा । द्वापरादौ युगे भूत्वा कलया मानुपादिषु । स्वागमैः कसितस्त्वं च जनान्मद्विमुखान् कुरु । मां च गोपय येन स्यात् सृष्टिरेपोत्तरोतरा । 'यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तचदेवेतरो जनः । स यत्ममाणं कुरो रोकरतदनु वर्तते ॥ ६ ॥ ननु 'धर्मेण पापमपनुदति' धर्मे सर्व प्रतिष्ठित मितिश्रुतेः पूर्व दोषाभावाय धर्मः कार्यस्तेन चित्तशुद्धौ माहात्म्ये स्वरूपे च ज्ञाचे तदाश्रयादिकं कार्य न लाशु दोपव- तैवान्ययाक योगिध्येयो भगवान् क दुष्टो जीर इत्याशय 'यमेवैप पृणुते रहुगणैतन्' भक्तपा वनन्यये ' त्यादीनाङ्गीकृत्या मइदनुग्रहेण च भक्या दोपवतापि गम्यत इति तन्माहात्म्यमपि तथेवि महापुरुषद्वारा शरणागतौ सर्व तत एव भविष्यतीत्यभिमेत्य भक्तानां भगवानेव चतुर्विधपुरुषार्थरूप इति भयमं धर्मरूपत्वं वदन्तस्तं मार्थयन्ते- अजामिलादिदोषाणां नाशकोऽनुभवे स्थितः । ज्ञापिताखिलमाहात्म्यः कृष्ण एवं गतिर्मम ॥७॥ अजामिलादीति । अनुभवविषयीभूतोऽमामिलादीनां ये दोषास्तेपा नाशकः । ज्ञापितं अखिलं माहात्म्य येन तादृशः, तेन पापनियतकत्व मिष्टपापकत्वं च धर्मकार्यमुक्त- मतो दोपोपस्थितावपि तदाश्रयणमेव कार्य भगवदीयानां न तु तं विहाय मायथित्ता. दीति भूचितम् । यद्वा, परम्परासंवन्धेनापि पूर्वोक्तः, स्वनामसाम्येनाप्य जामिलोद्धारात् अनुभवे स्थितो महदनुग्रहेण । ज्ञापितमखिलं लीलादिरूपं तयेन शेषे माग्नत् ॥ ७॥ टिप्पणम्। 'रहुगणैतत्तपसा न याति न वेज्यपा निर्वपणादाद्वा । न वन्दनान्नैव जलाग्नि- सूर्यविना महत्पादरजोमिषेकम् । 'भक्पा त्वनन्यया शक्य अहमेवंविधोर्जुन । ज्ञातुं द्रष्टुं च तत्वेन प्रवेष्टुं च परन्तपेति । अनुभवविषयीभूत इति । अजामिलादीनापिति शेषः । पक्षान्तरे त्वनामिलेतरभक्तविषयीभूतः सन्निति तदर्थः । अजामिलस्य तु पर- परासम्बन्धेन स्वनाम्नैपोद्धारात् । दोपोपस्थितावित्यारम्प सूचितमित्यन्ते-ननु 'श्रुतिस्मृती ममैवाने यस्तै उल्लहय वर्तते । आज्ञोच्छेदी मम द्रोही मद्भक्तोपि न मे मियः' इत्यनेन भक्तिमागीयस्यापि वेदविहिवारणत्वेन दोपोपस्थितावपि मायविचादेः प्रामवादित्यं क्यमुच्यते इति चेत्, सत्य, महादोषोपस्थितौ भगवदिच्छा झाला माय- विचादिकरणम् । तदुक्कं सर्वनिर्णये 'प्रायश्चिचं पातकादीनामिति । अल्पवोपोपस्थिती तु तदाश्रयणगेव कार्य न प्रायश्चिचादि । एतदुक्तं सर्वनिर्णये-'अनेनाल्पबहिर्मुखताया- मपि भागवतमनुसन्यमित्युपायः कथित ' इति सर्व समञ्जसम् ।। ७ ।। - ३ १८ कृष्णाश्रयस्तोत्रम् । ननु तस्मात्स्वाध्यायोध्येतव्यः' 'य गं तुपधीने तेन तेनास्पष्टं भात्यग्नेवायो- रादित्यस्य सायुज्यं गच्छती'त्यादिश्रुतेः कर्ममार्गेपि ब्रह्मयज्ञाध्ययनादिनाम्पादिसाधु- ज्यसिद्धेय तर मित्यादिना ज्ञानेनाप्यारसापुस्पसिद्धेः को विशेषः कृष्णाश्रय इति किमिति तस्यैव प्रार्थनमित्याशय चारतम्पज्ञानाय सर्वतस्पनिरूपणपूर्वतमरूप वदन्तस्तं प्रार्थयन्ते- प्राकृताः सकला देवा गणितानन्दकं बृहत् । पूर्णानन्दो हरिस्तस्मात् कृष्ण एव गतिर्मम ॥ ८॥ प्राकृता इदि । यस्मात्सला देशः माकनाः सत्वाधारसमतत्वात् । वृहदारं गणितानन्दकं सैपानन्दस्य मीमांसा भवती' स्यारभ्य ते ये शतं प्रमापतेरानन्दास एको ब्रह्मण आनन्द' इत्यन्तेन ब्रह्मानन्दस्य गणितत्वात् कृष्ण एप हरित सर्वदुःबहता टिप्पणम् । ये त्यक्षरमित्यादिनेति । 'ये त्वरमनिर्देश्यमन्यक्तं ययुरासने । सर्वगरविन्द च कूटस्एमचलं ध्रुवम् । “सनियम्येन्द्रियग्राम सर्वत्र समबुदयः । से मामुन्ति मामेर सर्वभूतहिते रताः' 'प्लेशोधिकतरस्तेपामव्यक्तासक्तचेतसाम् । अव्यक्ता हि गतिर्दुःख देहवहिरवाप्यते' इत्येतेन तयेत्यर्थः। सपानन्दस्येति । सेपानन्दस्य मीमरसा भवति । युवा स्यारसाधु युवाध्यायकः । आशिष्ठो द्रष्ठिो पनि । नस्पेय पथिरी वा वित्तस्य पूर्णा स्यात् स एको मानुप मानन्दः। ते ये शतं पानुपा आनन्दाः म पो मनुष्पगन्धर्वाणामानन्दः श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य । ते ये गर्व मनुष्यगन्धााणापा. नन्दा: स एको देगन्धर्वाणापानन्दः श्रोनियस्य चासमहनस्य । ते ये शतं देवगन्धर्वाणा- पानन्दा: स एकः पितृणां पिरोक्लोकानामानन्दः प्रोत्रिपस्य चाकामहतस्य । ते ये शतं पितृणा निररोकोकानामानन्दाः स एक आनाननानां देवानामानन्दः श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य । ते ये तपानाननानां देवानामानन्दाः स एम: कर्मदेवानां देवानामानन्दा, ये कर्मणा देवानपियन्ति श्रोत्रियस्य चारामहतस्य । ते ये शतं कर्मदेशनां देवानामानन्दाः स एरो देवानापानन्दः श्रोत्रिपस्य पासमा सस्य । ते ये शतं देवानामानन्दाः स एफ इन्दस्पानन्दः थोत्रियस्य पाठापनाप 1 ते ये शतमिन्द्रस्यानन्दाः स रफो बृहसतेरानन्दः श्रोत्रियस्य चाकामनाय 1 से ये वातं वृहस्पतेरानन्दाः स एकः प्रजापतेरानन्दः श्रोरिएस्प बामहतस्प । वे पेशन मजारतेरानन्दाः स एको प्रमग मानन्दः श्रोत्रियस्य चाकामहवस्य पनेत मान प्रकाष्टिप्पणसहितम्। प्रकाशः। पूर्णानन्दथ। पूर्णवासावानन्दथ, पूर्ण आनन्दो येन पत्र यस्मादिति था, तस्मात्कृष्ण एव गतिर्ममास्त्वित्यर्थः । देवादिसायुज्येपि तेषां प्रकृत्युपधानेन तन्मुक्त: सगुणत्वेन आग्रह्म- भुक्नाल्लोकाः पुनरावविनोऽर्जुने'तिभगवद्वाक्यात्युनः संसारसंभवनासानन्दत्वेन स्वर्गव- दमुक्तिस्वात् । ज्ञानमार्गेझारमुक्तनिर्गुणत्वेप्पक्षरस्य गणितानन्दत्वेमारपत्वात् क्षुधितस्यात्प. पभोजनमभोजनमेवेतिबदमयोजकत्वात् । अज्ञावार्थ स्वार्थक प्रत्ययेनाव्यक्तत्वं पुरुषो. चमापेक्षयाल्पत्वं च श्चितम् । पूर्णानन्दपेन निर्गुणयुक्तिदायकत्वेन कृष्ण एव शरणं भाव- नीय इति सिद्धम् । तदुक्तं श्रीमदाचार्यचरण 'निर्गुणा मुक्तिरस्माद्धि सगुणा सान्यसे- वयेति । ननु 'सानियों चै भगवतो हरेशाविहामतौ । भारव्यपाप प भुनः कृष्णौ यदुकुरू- दहौ' 'कलाभ्यां नितरां हरे।" इत्यादिनांशत्वकथनादेहस्प ध त्रिदिवेशादारपि पाश्वभौ- तिकत्वजन्यत्वनियमेन जन्मश्रवणात् सुखस्यात्मगुणत्वेन भेदाच कयं पूर्णत्व, कथं चानन्द- रूपत्वमानन्दवत्वं तजनकत्वं वा परं वक्तुं शक्यमिति चेत् , मैवम् , 'ताविमा वित्यादीना- पानवगमात् । तथाहि-भगवान भक्कानामातिनाशार्थ सुखदानाय च प्रकट; सुबो भारत ध्ययायेहानयोः कृष्णार्जुनयोस्ताविमौ भगवतो हरेरंशी चागतौ कृष्णयोर्यदुकुरूदइयोः प्रवि- प्रत्वाद्यदुकुरूद्वही कृष्णौ च जातो, यत आगतौ तत्र यदुकुरुद्हत्वाभावात् । तत्तत्कार्यकर- णार्थ न्यूहेषु भगवत्तस्तत्तदंशापेक्षणादनयोरपि सङ्कर्षणाशत्वेन भूभारहरणार्यमपेक्षणात् । अंशयोरेवावतारत्वे पूर्णत्वाभाचे 'कृष्णस्तु भगवान् स्वयम्' 'वसुदेवगृहे साक्षाद्भगवान् पुरुषः परः। विदितोसि भवान् साक्षात्पुरुषःमकृतेः पर' इत्यादिक विरुध्येताम चकारश्च व्यर्थः टिप्पणम्। ब्रह्मानन्दस्य गणितलादित्यर्थः । पूर्ण आनन्दो येनेति । पर्यादापुष्टिस्यस्पेति शेपः । येनेति फरणे तृतीया । ननु करणस्य व्यापारवसनिपमारक्यपस्य फलोपधानासाधारण- कारणत्वमिति चेत्, अत्रोच्यते, पत्र भगवान् साधनं कारयित्वैव फलं प्रयच्छति तर भगवतः करणत्वे, प्रयोज्यमत्युपहितायोक्तधर्मस्य साधनकारयिवृत्त्वस्य तज्जपत्वेन च्यापारवादिति । पूर्ण आनन्दो यस्मादिति । पुष्टिस्थस्येत्यर्थः । तोनियापार- साधारणत्वात् । ननूभयोरपि मुख्यफलमाप्तिवत्वेन को वा विशेषः पुष्टिस्यस्पेति चेत्, सायनानपेक्षत्वस्यैव विशेषादित्यलं बहुना । 'ताविमावि'सारभ्ग 'प्रकृतेः परः' इत्य- तानि वचनानि-'ताविमो वै भगवतो हरेशाविहागतौ । भारव्ययाप व सुषः कृष्णौ यदुकुरूद्वहौ' 'वभौ भूः परसस्याच्या कलाभ्यां नितरां हरे। अन्ये चांशकलाः पुंसः कृष्णस्तु भगवान स्वयम्' 'वसुदेवगृहे साक्षात् भगवान् पुरुषः परः । जनिष्पते तस्मिया संयवन्तु सुरखिय"विदितोसि भवान् साक्षात् पुरुषः प्रकृतेः परः। केवलानुभवानन्द- स्वरूपः सर्वबुद्धिमिति | चकारश्च व्यर्थ: स्यादिति । 'भारव्ययाय व स्वः' इत्पन कृष्णाश्रयस्तोत्रम् । प्रकाशः। स्यात् । तथाचोक्तं श्रीभागवत तत्त्वार्यदीफे 'सर्वातिरिकरूपेण नरः स्वावेशधारकः । तपोऽतिरिक्तकार्य तु पूर्णे कृष्णे न चान्पयति । 'सति व्याख्या तु 'सर्वगर्हतास- रूपो नारायणः । पुष्टिकार्यकत्वादतिरिक्तोवतारः । तत्राधिकारमाशङ्कय परि- हरति 'स्वावेशे'ति । नरस्तु तादृशमशं विभर्ति न त्वतार इत्यर्थः । 'ताविमो घे भगान' इति मूलवाक्यं 'कृष्णस्तु स्वयं भगवाने तेन विरुध्यते इति समाधत्ते तपोतिरिने 'ति । मार्गद्वयस्थापनार्यमवतीर्णापि पूर्णप्राकट्याभाचे कार्य न सेत्स्पतीति पूर्ण कृष्ण एवं प्रविष्टावंशाविति मूलार्थ' इति । 'वभावि'त्यत्र फलाभ्यामंशाभ्यां भूर्वभौ हरेः सम- धिनी भूः पदैरनुमावीलाभिथ नितरां पभावित्पर्य इति । अन्पयोक्तानविरोधात् । देहस्य पाश्चभौतिकत्वजन्यत्तनियमस्य पाकृतविपयत्यदपाकने यथावेदमेवार्थसिदेः, अन्यया ज्ञानेच्छादीनामनित्यत्वनियमानित्यं सानादिकमपि तत्र न सिदयेत् । ननु ज्ञानादिभिरेय जगत्कईत्वोपपत्नौ प्रत्यक्षपाधाय किमित्यानन्दमयो नित्यो देहोगीर्य इति चेव, न, कर्तृत्तनिहामेन व्याप्तिरलेन नित्यक्षानवतयाक्षिदेसी मारा । 'नित्यापरिच्छिन्नतनोः माकट्यस्यैव जन्मत्वेन जन्यत्वाभावात् । 'आनन्दादधेर' 'नित्यं विज्ञानपानन्दं ब्रह्म' 'स यया सैन्धवपन:' 'आनन्दं ब्रह्मणो रूपम्' 'आनन्दमपोम्पा. टिप्पणम्। भक्तातिनाशसुखदानादिकं चकारेण गृह्यते । तब पुष्टिपुरषोनमामेति तदतिरिक्त- कल्पनायां चकारो व्यर्थः स्यादित्यर्थः । व्याप्तिरलेनेति । अन्नपन्यतिरेपच्यातिनलेने- स्पर्यः। तथादि यत्र यत्र पर्वलं तर तर देवत्वं पपा दुलालादावियनपव्याप्तिः। यत्र पर देहवचामावस्तत्र तत्र पर्वलाभार, यपा मुक्तात्पनीति व्यतिरेसच्यातिरिनिन चामयोजकत्वम्, देहवत एव कर्तृत्वाद न पशरीरी उगला मोति पापै पर्नुम् । रस्तुतस्तु 'आनन्दमापारपादमुखोदरादिः' 'सर्वतः पाणिरादानमित्यादिविरोधः । शरीर शरीरेवित्यादयस्तु पाशभौतिसरीरनिषेधाराः । न र बोहियान् विलमंभवः ममेयापहारनिधनाभावा । ननु गीनाया चतुर्दशाध्याये 'नायं गुणेयः पर या द्रष्टानुपश्यति' इत्युपादाय 'गुणेभ्यो नान्यं पारमनुपश्यपि तु गुणा र धर्माणि कुर्वन्तीति' श्रीधरस्वामिव्या पानादेतुनिरुपिनच्याप्तापायी पामिरिणी मैन् , अब वदामः-गुणानामपि देनेव तापन न तु पेलनया ! गा एगने 'गुणा- नतीत्ये' त्यस्प प्यार पाने 'देहायागारः समुभवः परिणायो गेपा ने देसाया तांचीनपि गुणानतीत्यातिप्रम्ये'त्युक्तं श्रीधरस्वामिभिरिनि विद्वांग एवं रिदान्त । 'मानन्दमाने त्यारम्प 'मुदितवरम' इत्यन्तानिधानानि ।'निदोंपूर्णगुणरि भाप- महाशतट्रिप्पणसहितम् । . सात् ' 'आइ च तन्मात्रम्' केवलानुभवानन्दस्वरूप:' 'आनन्दमात्रमरपादमुखोदरादिः' 'बहूनि सन्ति नामानि' 'अट्या चोपनिपद्भिध ''न चान्तर्न पहिर्यस्य'त्यादिश्रुति- न्यायपुराणवाफ्याहसः प्रमाणप्रमाणीयलीलाभित्र पूर्ण एवं देहसाणेद्रियान्नाकरणा- स्मरूप एवानन्दरूपो ज्ञानरूपः पुरुषोत्तमो न तात्मपावमिति निधियोधि । नित्यं निज्ञान' मिति 'पूर्णमेवावशिष्यते' 'भाने: शिष्यते शेषप्तंइ' इत्यादिना नित्यल, एप होवानन्दयातीतिश्रुतेरानन्दननात्वम् । 'कृष्णः प्रीतमना' वीक्ष्यासीदु- तमा प्रीतिः' 'जातहर्षः। 'मुदिनमात्र उपयाती' यादिनानन्दावं चेति नानुपपन्न फिभित् । तथाप्यानन्दलहत्खयोविरोध इति चेत्, न, स्वस्त्राधिकरणे प्रमाणैरेकनो- भयोः मिद्धयसिद्धियां च विरोधाभावात् । गगाप्यानन्दस्य धर्मिरूपत्ये क धर्मरूपत्व. मिति चेत् । स यथा सैन्यश्चनः' 'यः सर्पज्ञः' इतिश्रुतिभ्या ज्ञानरूपत्वज्ञानाधार- त्ववदानन्दरूपस्वतदाधारत्वयोरविरोधात् । श्रीमदस्मत्पभुचरणैः समेतश्या क्या विद- न्मण्डने प्रपञितमिति नान प्रपञ्च्यते ॥८॥ विप्पणम्। तन्यो निचेतनात्मकशरीरगुणैश्च हीनः । आनन्दयाप्रकरपादमुखोदरादिः मी च स्वग- तभेदविवर्जितात्मा' 'यहूनि सन्ति नापानि रूपाणि च सुतस्य ते । गुणकर्मानुरूपाणि तान्यहं वेद नो जनाः। 'ग्या चोपनिषद्भिश्च सांख्ययोगेश सात्वतैः । उपगीयमा- नमाहालय हरि सामन्यतात्मनम् । 'न चान्तने बहिर्यस्य न पूर्व नापि चापरम् । पूर्वापर पहिश्चान्तर्जगतो यो जगा यः' 'नटे लोके द्विपरार्धावसाने महाभूतेप्यादिभूतं गतेषु । व्यकऽध्यक्तं कालयेगेन याते भवानेकः शिष्यते शेपसंज्ञः''एवं वृन्दावन श्रीपान कृष्ण, पीतमनाः पशून । रेमे सनारयन्नः सरिद्रोषस्तु सानुगः''बन्दावन गोवर्धन यमुनापु- लिनानि च । दोश्यासोदुत्तया मीती राधमाधमोर सहरलः खगवतमविलासः सानुषु क्षितिभृतो अनदेव्यः । दर्पयन् यहि येणुरवेण जातहर्प उपरम्भति विश्वम् ' 'यदुपतिदिग्द- रानविहारो यापिनीपतिरिवैप दिनान्ते । मुदिता उपयानि दुरन्तं मोचपन् अजगवा दिनतापमिति ॥ ८॥ प्रसाशन ननु विषेकधैाभ्यां स्थिता भक्तिकरणे भगवानपि वशे भरनीति मिमिति दैत्यनाथपः प्रायते इत्याशङ्कय सर्वमनोरथपूररत्वात्सर्वफलाय काम्यत्वालामरूपतं चदन्नम्वं प्रार्थयन्ते विवेकेति ।
२२ कृष्णाययस्तोत्रम् । विवेकधैर्यभत्त्यादिरहितस्य विशेषतः। पापासक्तस्य दीनस्य कृष्ण एव गतिर्मम ॥ ९ ॥ पूर्व प्रभुम्वरूपविचारणाश्रयमुक्त्या जीवस्तरूपविचारणागुनोच्यते । भगवान् स्वच्छया सर्व करिप्यति न मार्थनीय इतिनिश्श्यो विकः । भक्तिविरोधिदुःखनि- वृत्त्युपायाकरणेन विदुःखसहन धैर्यम् । भक्तिः साधनस्यापि । आदिपदारपुण्यम् । विशेपत इति । तत्साधनैरपि रहितस्य । यदा, यत्किश्चित्सचेपि विशेषतो नास्तीति न फलसिद्धिः । विश्व, दीनस्य दरिद्रस्यातः सर्वसाधनरहितस्य । पापे आसक्त- स्येति विपरीतसाधनवतो न तु प्रामादिकपापस्य । कृष्ण एवेति पूर्ववत् । अन्यत्र यत्किञ्चिद्वैगुण्येपि वैफल्यादेवताकोपादनिष्टजननादल्पदत्वादशस्य विवेकादिकं दला स्वतो वा सर्वफल्ददायकः परमकृपालुः कृष्ण एवेति स एवाश्रयणीय इति हृदयम् । नन्यस्मच्छन्दस्योचारयित्वाचकत्वादनाचार्यचरणानां तयात्वाद्विशेषणान्यतङ्गतानीति नेत् , ने, अस्यान्यासेनान्याधिकारेण कयनाद्भगवता वेदेषु 'प्रयतपाणिः शरणं प्रपद्ये' 'भूयिष्ठान्ते नम उक्ति विधेम' 'स्वस्ति मेस्तु वनस्पते' इत्यादौ यजमानाधिकारण फयन इवादोपत्लादिति सर्वपनवद्यम् ॥ ९॥ ननु सर्वथा निःसाधनस्य शरणागतावपि कथं समीदिनसिद्धिः, भगवाँस्तु तच- लतिसापेक्षस्तस्मै तस्मै फलं ददाति, प्रत्युत भावदेकशरणस्य तदेकमनसो देवान्त- रानादरेण तस्कृता अपि विघ्नाः स्युः 'श्रेयांसि बहुविनानी तिवाक्यादित्याशङ्कष मोक्षप्राप्यत्त्वान्मोक्षरूपत्वं विज्ञापनं च बदन्तः समादधते सर्वसामयसहित इति । सर्वसामर्थ्यसहितः सर्वत्रैवाखिलार्थकृत् । शरणस्थसमुद्धारं कृष्णं विज्ञापयाम्यहम् ।। १० ।। टिप्पणम् । मोक्षप्राप्यत्वादिति । सरूपलाभप्राप्यत्वादियर्थः । तथान श्रुतिः 'महावि- दामोति परमिति । अस्या अर्थ:-अक्षरचित् परं पुरुषोत्तमं मामोतीति । मोक्षरूप- त्वमिति । भक्तिमार्गस्याय भगवद्भजनं कुर्वते स्त्रीयाय सर्वफलदाइले भगवत एवं तयाचाक्षरफलदातृत्वमपि स्वस्यैवेति तद्रूपत्वान्मोतरूपत्वमित्यर्थः । नयात्रोक्तं निबन्धे 'यथा सारथी स्थी तदन्तःस्थितश्च नयान्तर्याम्यक्षरं कृष्णः । एवं सति पुरुपो- समत्वेन सर्वत्र दर्शनं भवति परब्रह्मैव त्रिपकारेण वर्तते इति त्रयो भेदा इति'। नेति कचिनास्ति।२ तत्तत्कृता इत्यपि पाट:। .
प्रकाशतटिप्पणसहितम् । २३ + . . सर्व पूर्ण सामथ्र्य सपा सर्वेषु वा, तत्सहित इतीच्छया स्वतोपि सर्दै करोति । यदि पर्यादा क्षेत्तदा भगवत्वेन ज्ञानवर्षधर्मादीना सिद्धवात्तत्तदत्वापि तत्त- दद्यात् । कदाचित्पूर्वस्थितपपि स्वस्मिन्नयेत्, सर्वत्र स्वात्यैव सामात् । 'यद्य- द्विभूतिमत् । “पमा सर्व प्रवर्तत ' इत्पादिवाक्यः सर सामर्थं येपा शुदर्शनादीना तैः सहित इति वा, नेपि भक्तानिष्टनिवारणात् , 'अन्याहतानि कृष्णस्येवियाक्यात् । ननु सापय सत्यपि कदाचिदाश्रित न रक्षेद, पर्यादयैव का यदि फल दद्यात्तदा किमाश्रयेणेत्यत माहुः-सर्वत्रैव देशेषु वर्णेषु आश्रमेषु कर्मादिषु वाखिलाकरोती- त्यखिलार्धकृत् ताछील्यादौ किए 'सकदेव' “ये दारागारपुत्राप्ते त्यादिवाक्पैः सकृदपि शरणागत भगवान् रक्षति किं पुनर्भजनः । मर्यादयापि फलदानेन्पनरपेक्ष्येण भगतो भगवान्मर्यादानपेक्षः फल प्रयच्छत्ति, विहितत्यादिना भजनो मर्यादासापेक्षो 'ये यथा मा पपयन्त ' इति तन्मयांदापा एव तादृशीखान क्षति । अत एव 'वन- स्योवाह व हर्षम् ' ' चिक्रीडे जनयन्मुदम् ' 'मनोरथान्तं श्रुतयो यथा ययुः' 'मुकुन्दो मुक्ति ददाती'त्यादि तथा न ते माधय' 'मयों मृत्युच्यालभीतः पलायन्' 'सवि मनसि यस्येपादिवाक्यैः कालयमादयोपि घेद्भगवदीयानिवर्तन्ते कुतस्तरा पुनरन्ये विघ्नकार इति न किश्चिद्रूपणम् । पूर्वोक्त शरणे स्थितं सम्यगनाशसेनोद्धरति, सकृदागतं तु यथाकयश्चित् । दश श्रीकृष्णमहमाश्रय विज्ञापयामि । 'कृष्णे तिसम्बोधनपाठे शरण- स्थसमुदार विज्ञापयामीत्यन्वयः । अनेनेश्वरे दीनभावः कर्तव्य इति मूचितम्, दीनमा- धेन कतस्यैये परतोपहेतुत्वात् ॥ १० ॥ पिणम् । 'यपदारभ्य 'अन्याहतानी' यन्तानि वचनानि 'ययविभूतिमत् सच श्रीमर्जि तमेव वा । तत्तदेवानगर व पम तेजोशसभाम्' 'अहं सर्वस्य प्रभवो पत्तः सर्व पत्र तते । इति मत्वा भमन्ने मा बुधा भावसमन्विताः' 'अव्याहतानि कृष्णस्य चकादी. न्यायुधानि तम् । रक्षन्ति सकलापद्भ्यो येन विष्णुरुपासित' इति । तासील्यादी किपिति । आकेस्तच्छीलतद्धर्मतत्साधुकारिग्नि'तिस्मरणात् । 'सहदे त्यारभ्य तत्तथा साधयिष्पापी'त्यन्ताना वचनाना सहा-'सकृदेव अपनाय तरास्मीति च याचते । समय सर्वभूतेभ्यो ददाम्पेतद्रत पर 'ये दारागारपुवासमरणान् विनमिय परम् । हिला मा शरण याताः कय तास्त्पत्तुमुत्सहे ! 'ये या मा पन्चे तास्तथैव भमाम्यहम् । यम वयानुर्वन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः। 'दर्शयस्नदिदा रोके आमनो भृत्पपश्यताम् । ननस्योकाइ के हर्ष भगान् बालवैटित.' 'ततस्तु भगवान् कृष्णो २४ कृष्णाश्रयस्वोरम् । टिप्पणम् । वयस्यनजवालकः । सहरामो व्रजनीणा चिकोडे जनयन्मुदम्' 'तदर्शनाहादविधूत. हृदुनो मनोरथान् श्रुनयो यया ययुः । स्वैरुत्तरीयः सुचाडमाङ्कितरचीकपन्नासनमात्म- यन्यरे। राजन् पनिर्गुरलं भरतां यना देवप्रियः पुलपतिः कप किङ्करो यः । अस्त्येवमन भजतां भगवान् मुबुन्दो मुक्ति ददाति कर्दिचिव स न भक्तियोगम्' 'तया न ते मापन तावाः कचिद् भ्रश्यन्ति मार्गाचयि यद्धसौहदाः । त्वयाभिगुवा विचरन्ति निर्भया विनायकानीकपर्धसु प्रभो' 'पो मृत्युन्यालभोवः पलायन सर्वान् लोग निर्भयानाध्यगच्छन् । लत्पादानं प्राप्य यहच्छयाय स्वस्थः शेते मृत्युरस्मादपैति " वसति मनसि यस्प सोव्ययात्मा पुरपवरस्य न तस्य दृष्टिपातः । गतिरय मम वा तपास्ति चाप्रतिहतगीर्यालस्य सोन्पलोकः॥१०॥ प्रकाशः। 'दश वे पशोः शणा आत्मेरदश' इतिथुः माणानामिन सर्वसाधकलं बाप- यितुं दशभिः शोकैः स्तोत्रं निरूप्य फलस्यात्मपदलपत्वं ज्ञापयितुमेकादशेनात्मरूपेणे. तत्स्तोनपाउफलमा:- कृष्णाश्रयमिदं स्तोत्रं यः पठेत्कृष्णमनिधौ । तस्याश्रयो भवेत्कृष्ण इति श्रीवल्लभोऽचवीत् ।। ११ ।। कृष्ण आ समन्तात् श्रीयते सेन्यतेनेन, कृष्ण आश्रयो येन यस्मादिति वेति कृष्णाश्रयम्, इदमेव कृष्णाश्रय यथार्थनिरूपकत्वान्नान्यम् । कृष्णासन्निधौ मिमित्वं पा, इदं यः पटेत् तस्य कृष्ण आश्रयो भवेत् । अत्र हेतुहेमतोर्लिइ' इद- मिति नान्यपाठेनेदं फलं, स्वरूपाशानात । नन्यल्पापासादेवस्तोत्रपाउमात्रेण कथमेत- स्फलं स्यादित्यापा:-श्रीवल्लभ इति । इदमन्त्रवीत् अवदत् । स्वस्य समस्या रूमाभिज्ञत्वाद्भगवना समोदाराय प्रमस्तित्वादुदारकाहरूपत्वाच नावाप्रामाण्यशङ्का, नहि भगवान सत्यवाक् संवाचमन्ययाकरोति । यत्र प्रसङ्गानारदकृतं 'तत्तया सापयि- यिष्यामि यदीतं तन्महात्मने ति सदनुग्रहो भगवान् स्वातमित मन्यमानः पुरषोत्तमा सयं तन गत्ता नलावरमणीग्रीवोद्धारं कृतवान्, ता स्वयं सर्वार्थ प्रकटितस्य सस्वरूपस्य कृतौ वचने वाकिं किं न करिष्यतीति तत्कपाया सर्व भवतीति सर्दमनवद्यम् ॥ ११ ॥ टिप्पणम्। 'देवपि प्रियतमो यदिमौ धनदात्मनौ । ततया सापयिष्यामि पट्टीतं तन्पहात्मनेति' ॥११॥ १५तिपद चिनालि। २ स्वर रवि पाटः कचिद ।
प्रकाशतटिप्पणसहितम् । प्रकाशः श्रीमद्विटल्लनाथपादकमले संवन्ध भत्त्या मुदा कृष्णकाधियोथ तातवरणात् तादृपितृव्यानपि । श्रीकृष्णाश्रयसंझके स्तुतिवरे कल्याणरायाभिधः श्रीगोविन्दसुतः प्रकाशमकरोम्यान्मुदे सद्धियाम् ॥१॥ इति श्रीविठ्ठलनाथचरणकमलैकतानश्रीकल्याणरायविरचितः कृष्णाश्रयस्तोत्रप्रकाश समाप्तः । टिप्पणम् । दूरीकरोति विकटं किल सङ्कटानां सङ्घ विशंकटारं वरसेवकानाम् । यत्वदारागमणिवर्यविराजमानं तद्वेङ्कटेशमुकुटं प्रकटं स्टामः ॥ १॥ निखिलपण्डितपण्डलमण्डितं हरिगुखागसरोरुहभास्करम् । अतुलमगलनामविराजितं जनमनोहररूपमहं भजे ॥२॥ श्रीमत्कल्याणरायागां नमस्कृत्य पदव्यम् । कृष्णाथयप्रकाशस्य तत्मणीतस्य टिप्पणम् ॥ ३ ॥ गुरुश्रीवालकृष्णानामात्पजेन सतां मतम् । कृतं गोविन्दराजेन नान्ना तत्त्वनिरूपणम् ॥ ४ ॥ इति श्रीमत्कल्याणरायचरणकोकनदमधुपायमानान्त करगतिघरो- पनामकबालकृष्ण महात्मजगोविन्दराजकृतं तत्त्वनिरूपणामिधं कृष्णाश्रयमकाशटिप्पणं समाप्तिमगमत् ।
श्रीरपणाय नमः। श्रीगोपीजनवल्लभाय नमः। श्रीमदाचार्यचरणकमलेभ्यो नमः । कृष्णाश्रयस्तोत्रम् । श्रीमद्वारिकेश्वरचरणप्रणीतविकृतियुतम् । पशुपतिकृतिभिर्ये भ्रंशिता मुग्रचित्ता- स्तदनुसनकृतीन स्वाज्ञानतः पातुमिच्छन् । अपददविकृतं यः सागमं सर्वभद्रम् तमहमतिदयालु बल्लभाख्यं नतोस्मि ॥ १ ॥ विशिष्णनारदैनिखपित शं सदा चिरन्तनीयसाधनविसम्मतं कलिं विभुः । विलोक्य सर्वतोषिक निमागर्म ततान यः सदा सुसंमतं सतां विशेषतः कलौ युगे ॥२॥ ननु सालापरम्परया च भगवत्प्राप्तिमानानां बहूनां विद्यमानत्वात्तानि विहाय किमित्याभय एव बोध्यते, किच, फ्रमेण नवविधलीलाप्रवेशज्ञानानन्तरं घाश्रयस्वन्वानं वा स्वत एव भविष्यतीति फिमिति नत्यतिपादकं स्तोत्रमुच्यते तनाह-सर्चमार्गेविति । सर्वमार्गेषु नष्टेषु कलौ च खलधर्मिणि । पापण्डप्रचुरे लोके कृष्ण एवं गतिर्मम ॥१॥ तथापि निरोधस्य सर्वापेक्षया वरीयस्त्वामुक्तरपि लोके तथासात्तिमित्ति तो विहापा. श्रय एव निरूप्यते अत्रोच्यते 'आभासच निरोधच यतचापवतीयते । स आश्रयः पर वह परमात्मेति शम्यते''या या साधनसंपत्तिः पुरुषार्थचतुष्टय । तया विना तदामोति नरो नारायणानप: 'सर्वपाश्रयतो भौदित्यादिवापराश्रयस्यैव सर्वसाधकत्येनोक्तावा- सर्वसाधनफलरूपाभ्यां स एव परिणत इति तमेवाह-कृष्ण एवं गतिर्ममेति । गतिशब्दः क्रियावाचका, तेन गतिरित्युपलक्षणं किन्तु स एव भक्तिमार्गनिर्वाह- प्रतिबन्धनिवर्तकतया परमभक्तिमतिपादकसानीभूतानुयितनादितिरादकसरीरवनि. बहकक्रिपारूपो भववित्यध्याहारस । कयश्चित्पूर्वमाययोन्मुखं शात्रा पवाजावतमा- २७ श्रीमद्यारिकेश्वरचरणप्रणीतवितियुतम् । श्रयः कर्तव्य इति नार्थः, सर्वतः सर्वाशेन कार्यसिद्धयभावं निश्वित्य स्वस्मिथ तथात्व- निधये सत्यस्माकं सर्वया लौकिकालौकिकफलसापकोऽस्मत्कृतिनिरपेक्षः स भवतु । तयाभवनं तु सदिच्छाप्ताध्यम् । भगवानाश्रयो भवतु मा चा, अस्माभिस्तदाथपैः सर्वथा भाग्यमेवेति निश्चित्याश्रयः सर्वथा कार्यः। एवंपन्नानापाश्रयः सर्वथा भवत्येव, अन्यथा 'अनन्या' इति न मे भक्तामणश्यति' इति भगवन्तं भज्येत । एवं सति सर्वफलरूपस्त्व- याऽश्रयणोक्या साधनीमूनः क्रियते ततोषिकस्य फलस्याभावाद, प्रत्युत 'दृश्चिकमिये'- तिन्पायेन स्वरूपहानिप्रसङ्गः स्पादन घूम-कृष्ण एवं गतिर्ममेति । एवंच परमभक्तिस्तु कृष्णैकफलिका सदनुमइकलभ्या च, तथासति तसिद्धिमतिबन्धनित्तिपूर्वक सिद्धौ तत्साधनादिनिर्वाइकसानापनो न हीनतामापयते । यथा-'योगपायामुपाश्रित' इत्यत्र रसमार्गेऽन्तरङ्गाश्रपर्णन दोपाधायक सन्मार्गस्यैव तथात्वात् । एवं भक्तिमार्गीयसशसाधने भगवसो न साधनरूपत्वपापयत इति सिद्धान्तः । यथा 'थर्ता सन् नियमाणो विभती' स्यत्र भगवतस्तत्सम्बन्धिनां च परस्परमाधाराधेयभावे पोष्यपोपकभावे व नोभयोमध्ये कस्यापि हीनत्वं किन्तु तदेकपोषकलं तदेकपोष्यस्वं च भगवत उत्कधायक, एवं तन्मार्गपक्षपाताभक्तिमा सर्वोशेन फलत्वमापनस्य स्वस्प साधनतास्वीकारो न हीन- स्वसंपादक इत्येवमभिसंधायाचारक्तमितिभावः { धर्यादीनां च स्वसापनसहितानामेव फलसायकलं, तत्र देशकालादयो धर्मसाधते तेपामिदानीमनथालं सर्वया निरूपपन् पूर्व कालस्यातयात्वमाह-सर्वमार्गेषु नष्टेष्विति । कलौ सर्वेषु पार्गेषु नप्टेषु सस्तु देवः कृष्ण एवं गतिर्ममेत्येवरूप आश्रम कर्तव्य इति भावः 1 मार्गोत्या तेषां सालानां स्वस्वा. धिकारानुसारेण फलपापकत्वं निरूप्यते । नाशस्तु तेषां सर्वपा फलासाधकल्वरूपः । कलौ दत्तन्माएँ किश्चिदुत्तमानां तद्विध्याचरपोपि तत्फलाभावं दृष्ट्वान्येपामनुपलब्धिमागेन ततो विधासापगपाद्वायतोपि तदाचरणपरम्पराया नाशः स्पादितिभावः । ननु सत्य- युगादीनां यया धर्मसापकत्वं तथैतस्यापि तथार को दोप; फालत्वस्याविशेषादित्यत आह खलधर्मिणीति । खलाः सर्वया बाह्याभ्यन्तामेदेन धर्मादिकृत्पनुसन्धानरहिताय, अनुसंधानेपि देपार्यमेव तदनुसन्धानं, न व स्वस्यान्येषां वा चिकीर्षायुद्धिजनफलेन । अत एव 'मन्तं गोमिथुनं पदेति तस्यासाधारणो धो निरूपितः। ननु सर्वथा धर्मादि- स्वकारः केचन भविष्यन्ति न तु सर्वे तेन तदुल्या सर्वे कथं वादशा भविष्यन्तीत्पत आह पापण्डप्रचुर इति । येपि लोके सन्यागाचावरणं कुर्वन्ति महान्तोपि वेपि धान- मनुसृत्यैव कुर्वन्ति, अन्पया तदा लोके पूज्यत्वं न स्यात् । पूर्वपल्पमाच तर श्रद्धा- भावेप्यन्यानुरोपेनाप्यन्पयाचरणे स्वबुद्धिरपि तथैव मातेति तत्र स्वयं श्रद्धालयो भूत्वा- न्येपामपि तयात्वं संपादपन्तः पयायकहिपो भूत्वा सुखेन तयार्दन्तीति भावः ।
२८ कृष्णाश्रयस्तोत्रम् । एतेनान्यानुरोधेनापि सन्मार्गत्यागः 'योन्यथा सन्तमात्मानमन्यथा प्रतिपद्यते । किं तेन न कृतं पापं चौरेणात्मापहारिणे तिन्यायेन सर्वथा स्वनाशक इति ज्ञापित भवति । नेन प्रावाहिकभक्तिमागोपि नष्ट इति शापितम् । चकारः समुच्चयार्थः । तथाहि-मार्गाश्य सर्वे नष्टास्ताहाधर्मा कलियाविर्भूना, रोके पापण्डय प्रचुरः । एवं सर्वथा सर्वनाशोप स्थितौ विविधशङ्कास्पदीभूतान्तरणान् स्यानुपदिशन्ति श्रीकृष्ण एव गतिर्ममेनि । अवतारान्तरं तु मर्यादारूपमित्येवं नि:साधनाना धर्मादिप्रतिकूलसाधनवता वा सर्व- पतिबन्धनिवृत्तिपूर्वकं तवास्मी'त्युक्तिमात्रेण भक्त्यैकलभ्यः पुष्टिपुस्पोत्तम एवोद्धार यत् शक्त इत्येवकारेणाशकलावतारव्यवच्छेदपूर्वक कृष्ण एवं गतिर्ममेत्युक्तमेवपग्रेपि ज्ञेयम् । एव कालस्य धर्मादिविरोधित्वमुच्या देशस्यापि तथात्वमाह--- --म्लेच्छाना- न्तेष्विति। म्लेच्छाकान्तेषु देशेषु पापैकनिलयेषु च । सत्पीडाव्यग्रलोकेषु कृष्ण एव गतिर्मम ॥२॥ यथा कालत्वस्याविशेषेपि सत्यादिरूप एव कालो धर्मसापको भवति तथा देशत्वस्याविशेषेपि तीर्थादिरूप एव देशो धर्मादिकरणे साधनीभूतः । तीर्यमपि जल- स्थलभेदेन द्विविध, तत्र पूर्व पुण्यक्षेनादिरूपस्य देशस्य पूर्ववदतथात्वमाह म्लेच्छा. फ्रान्तेष्विति । साक्षात्परम्परया च देशा: सवें म्लेच्छ आ-समन्तान प्रान्ताः। तत्तत्पु- ण्यक्षेत्रादिधर्मस्थानेषु तद्धर्मापगमार्थ द्वेपेण रिपरीतकृतिपूर्वक स्थितिसम्मणम् । कुत्र. चित्पुण्यादिभूमौ साक्षात्तमोत्पन्न विषयभोत्तारो भूला तव तिष्ठन्ति कुचिचत्सनि हितेषु । एवं पा साक्षास्थित्या स्त्रोत्पन्नविषयाणा तदेभोग्यत्वेन च सर्वदेशानामधर्म- साधनलं जातम् । सर्वथा म्लेच्छीयत्वात्तेपाम् । म्लेच्छा अनाविष्टाः सन्तः सर्वथा धर्मा- दिविरोधिनः कलहप्रियाश्च 'मनसा वचसा कृत्या सद्धर्मपरिपन्थिनः । म्लेच्छदेशेषु संजाता भक्ष्याभक्ष्यविचारफाः' । ननु तनोत्पन्नाः सर्वे न नयाभूतास्वद्विपरीताना बहूना दृश्यमानाबाद, यथा म्लेच्छसंसर्गात्सर्वोपि देशोऽधर्मननकता यात एव नविपरीतधर्मवता तजातीयानामपि संसर्गासयोगपृथतवान्पायेन देशव्यवच्छेदेन क्यिदेशेषु धर्मसाधनना पस्त्विति चेत्तमाह-पापैक्रनिलयेरिति । सर्व एव देशाः पापैनिलया जाता पापानामेको निलयः स्थान ताशा जाताः । तेन कुनापि धर्मराना न श्रूयते । यदा पापास्त एव महीभोक्तारस्तदेवनिलयत्वात्तथा । येपि तद्विारीतधर्मास्ते तु पूर्वजन्मनि वैष्णवा भूत्वा येदनिन्दा कृतवन्त इति ताहशेषु जन्म प्राप्तवन्तोपि सत्स्व प्रविष्टा नतु तेषु । तेन रातामिव पापपि धर्मादिनियन्ठलाभावः चिनः । ननु तदाका - श्रीमहारिकेश्वरचरणप्रणीतविकृतियुतम् । न्तेष्वपि देशेषु चातुर्वण्यस्यापि विद्यमानत्वाझोक्दलप्रतियोगित्वेन त एव सतां धर्मादि. प्रवर्तने सदायाः कयं न भवन्तीति चेतवाह-सत्पीडेति । चित्तस्यैये हि सर्वेषां स्वध- मांनुसन्धान भवति । सतां चकारानदनुवनिनां च पीडया सर्व एव लोका व्यग्राः । सतां प्रसङ्गे पीडासंभवात्तभावे धर्षादिसिद्धयमावादगग्रता । नथासति किं कर्तव्यमित्या- काहापामाह-कृष्ण एवेति । सर्वया साधनाभावाद्धर्माभावेषि भक्तिवत्कल्पतरसमा. रत्वेन सर्वधर्ममार्गीयफलतोप्यधिकफलमापकत्वेन श्रीकृष्ण एवं गतिर्ममेत्येवरूप आश्रय एव सर्वथा कार्य इत्याचार्याणां परमोक्तिरिति भावः ॥ २ ॥ एवं स्थलादिरूपतीर्याणामतयात्वमुक्त्वा जलादिरूपाणामपि तेपामतथात्वमाह-- गङ्गादितीर्थवर्येषु दुष्टेरेवालेब्बिह । तिरोहिताधिदेवेषु कृष्ण एव गतिर्मम ॥ ३॥ गडादितीर्थवर्येष्विति । ननु 'गङ्गागड़े तो स्यादिनोक्तमाहात्म्पवतां गदादीनां विद्यमानत्वात् कयं संसर्गदोपा वाधन्ते तत्राह दुष्टैरिति । 'नहि गङ्गासमं तीर्थम्' 'या वै लसदि स्यादिना च सभ्यस्तीर्येभ्यो गङ्गाया एव वरीयस्त्वस्पोक्तत्वादतीर्यानपि तीर्थी- कुर्वन्ती गङ्गेय गच्छति । एवंविधान्यतयाजातानि । किन, अस्ति गङ्गायां विरूपत्वमा- धिदैविकादिभेदेन । तत्र तीर्थरूपं तु दुष्टमम्बन्धादेव नई, तथाहि-भगवता 'स्वं च रुद्रेत्या- दिवाक्पैर्जगन्मोहनार्थ पशुपतेः प्रवर्तितत्वात्तत्र पथा सबै जीवन्नो गुमूवश्व मुग्धा भवन्ति तदर्थ सर्वथा चित्तशुद्धयभावसापनीभूनतीर्थसम्बन्धाभावार्थ शिवेन स्वगणा गङ्गादिपु स्थापितास्तै तु गणशस्तिष्ठन्ति सत्यानां प्राणापगमे यथा तीर्यसम्बन्धो न भवति तथा ते यतन्ते । तताम्बन्धाचीयरूपमेव नटं, तथाचोक्तं तैत्तिरीय 'ये' तीर्थानि प्रचरन्ती त्यादिना अव एव तत्र मृवानामपि न तीर्थपरणफलपन एव तत्र मृताःसन्तो रुद्रपिशाचं ते प्राप्नुवन्ति न दोषादिनिटत्तिः काश्यादिपु मुमूर्पणां मनुष्याणा मारभ्य विरक्षामपि । ननु तत्र मृतानामपि तारकब्रह्मोपदेशं शिवा करोतीति श्रूयने तथा सति कर्य जलस्थलरूपाणां तेषां न शुद्धिसाधकलं, सत्य, ततु पूर्वोकधर्म- वकालाभाये न तु तद्वति । यद्वा 'वं विभगाटुक्तेः पूर्व शिवस्तयाऽकरोत्तदनन्तरं तयाकरणे आाभङ्ग एव स्यादिति न तथा कृतवान् । तथापि निदर्शनस्येदानीमपि दृश्यमानत्वात्कयं न करोतीति तर शिवोपि वैष्णरत्वाद्भावसम्मतमेव मां करोति । किच, तथोपदेश कुर्वनपि पूर्व वैष्णवत्वेप्यसत्सङ्गेनापराधाद्वा दैत्यापेशे नाते संस्थान- माहात्म्यामागन्तुकदोपपरिदारपूर्वक पूर्वरूपतासंपादकत्वेन भगादाभिन्नतान्छिन है ये ठीर्यानि प्रचरन्ति मुकावन्तो निर्मङ्गण | एनायतच भूयासभ दिशो रद्रा विवस्ति ।
. कृष्णाश्रयस्तोत्रम् । एव तारफनमोपदेशं करोतीत्ययः । अत एव 'प्रायश्चित्तानि चीणानि नारायणपरा- मुखम् । न निघुनन्ती'त्यादिना भगवदहिर्मुखस्स पवित्रीकरणसामर्थ तीर्थादिवपि नास्तीति जातेपि तत्सम्बन्यै न कृतार्था भवन्तीत्यर्थः । तया चोक्तं निवन्ये 'तीर्यादावपि या मुक्तिः कदाचितस्यचिद्भवेत् । कृष्णसादयुक्तस्य नान्यस्यैति विनिश्चय' इत्यादि सर्वमनवयम् । ननु गङ्गादेराधिदैविकरूपस्य विद्यमानत्वात् ऊर्य तारावरगं तीर्थ- रूपनाशो वा भवेत्तवाहुः तिरोहितेति । जलस्थलरूपेभ्य आपिदैविकं विरोहित तस्मादृष्टसमगें अक्षरात्मकमपि तथैव जातम् । एवं सर्वेषां सर्वसारनापगमे आश्रय एन साधीयानिति तमेवाहुः कृष्ण एवेति ॥ ३ ॥ तथाप्यन्तरणबहिरङ्गमेदेन सर्वधर्मप्रवर्तकानां सतां विद्यमानत्वात्कयं धर्मादि- नाशः स्यात्तत्राह-- अहङ्कारविमूढेषु सत्सु पापानुवर्तिपु । लाभपूजार्थयत्नेषु कृष्ण एव गा अहङ्कारविमूढेष्विति । यदि तेपि तयाभूता भवेयुस्तदा कार्य सिददेव तेषां स्वरूपमाह-परीक्षिति पस्मिन् विद्यमाने तच्छरणागतो कलेरध्यवसायो जाता है एवाइद्वार इदानी सत्सु प्रविष्टः । ययैतत्सम्बन्धात्परमधार्मिकस्यापि विष्णुरातस्य कले: स्थानदानेन त्रिदोपोत्पत्तौ मौभ्याब्राह्मणातिकमे बुद्धिति सतामपि तत्सम्बन्धात्व- धर्मपरित्यागे घुदितित्यहङ्कारेण सर्व एव मुग्धा जाताः। एतेन फर्तृगापायसापकत्वमुक्तं भवति । यदि कर्तार एवाइवारेण विमुग्धा जातास्तदा तलतौ विसाधकल किमार्य- मिति कैमुतिकन्याय उक्तो भवति । अल्पमोत्ये प्रकारान्तरेगापि तदपगम: स्यानद- भालार्य विशेषेण महत्वम् । तर निदर्शनं पापानुपतिप्विति । पापा निपिद्धतिभि- स्तत्फलरूपता प्राप्तास्तदनविपपभोक्तृत्वेनानुवतित्वम् । ननु तेपि स्वोपनीव्पान् परम- धर्मादिकं बोधपन्न इस दृश्यन्ते कथं से तादृशास्तबाइ लाभेति । लाभार्थ या पूना तस्यामेव कृतमगरना न तु भगवकीननादौ सन्तुष्टाः सन्तः परस्परं पूजयन्ति, ताशी तु नापेक्षिता । पदा, स्वलामार्य स्वजार्य च यानो पामोतादृशकर्तृणां मन्त्रादीना- मसत्याष्ट्रन्याणापप्यसायकत्वमुक्तम् । अन कर्तृणां तदनुवतिनामेव द्रव्यादीनामसापक- लात्पूर्व कर्तृगामसाधफत्वमुक्तया पश्चाद्रव्याणामुक्तं, निमित्तोक्तो नैमितिकोक्तिरपि सह- छने । तेन 'स्वपं नरः परानाशपती तिन्यायेन सतां परम्पराप्येवरूपैव जाता। पदिन स्वस्य परस्प वामुष्मिक सिद्धयेत्तदा ते सन्त एवं भवेयुः । वृत्पर्य तेषां तत्करगाव 'मिक्षाशपा घ गृहन्ति मम नामानि चार्जुन । अमुख्यास्त जनाः पार्थ दतः परिवनयेन' -- . श्रीमद्वारिकेश्वरचरणपणीतविकृतियुतम् । इत्यादिवाक्पैस्तपापतयावपतिपादनाद्धर्मध्यजिवत्तकृत सर्वपकृतमाय भवतीत्येवरूप- सर्वनाश उपस्थिते सर्वेषा सर्वकार्यसाधक आश्रय एवाचा(रुपदिष्ट इति तथाह कृष्ण एवेति ॥४॥ ननु गोपालादितान्त्रिकवैदिकमन्त्रहरिदिननतादीना विद्यमानखात्तेपा च सर्वथा शोधकरवाकय न तैस्तेषा पूर्वरूपत्व नगाह- अपरिज्ञाननष्टेषु मन्त्रेष्वत्रतयोगिपु । तिरोहितार्थदेवेषु कृष्ण एव गतिर्मम ॥ ५॥ अपरिज्ञाननष्टेष्विति । नेपा परितो ज्ञानमहान्युररीकृत्य फलपर्यन्त स्वरूपनि र्धारः। किश्च, गोपालादिमन्त्राणामपि धाराङ्गनावशीकरणादिक फलत्वेन श्रूयत इत्यन थोपशम साक्षाभक्तियोगमधोक्षजे' इतिवचनाद्भगव-मन्त्राणा विषयादिपूपयोगोऽपरि- ज्ञानादेव भवति तेनानर्थोपशपस्प भक्तियोगस्य विपयागुपयोगे जाते नष्टत्वम् । गुरु कुलापासब्रह्मचर्यशूद्रावणानयापरहित्यपूर्वकपठिलाना वेदमन्त्रागा 'अनिच्छयापि सस्पृष्टो दहत्येव हि पाक' इतिन्यावेन सम्परुतात्पर्याजानेण्यध्ययनमात्रेणैव सर्व साधकरवाकर नष्टत्व तवाह-अवतयोगिविति । नवयोगो येषा, जनानामयोगो येष्विति वा । 'अधुना ह्याधिकारातु सर्व एवं गता कलौ' इतिवचनात्कृतानामपि तेपामत्रतयोगित्वम् । ननु किमित्यायासपूर्वक कर्मवतादीनामसाधकस्य साध्यते, किश्च, 'दानवततपोहोम' 'जन्मान्तरसहलेवि'त्यादिवाक्पै कर्मरतादीना भक्ताववि साथ- कत्य मन्तव्य, तेन 'प्रक्षालनाद्धि पक्षस्य दूरादस्पर्शन वरमितिन्यायेन पूर्वमेव तेपास साधकत्व न तु शक्यमिति चेतवाह-सत्य, नानि वाक्यानि मावाहिकभक्तिपाणि । नो चेन रोधयति मा योगो न साहय धर्म उद्धव । न स्वाध्यायस्तपस्त्यागो नेष्टापूर्त न दक्षिणाः' 'माहि पार्थ व्यपाश्रित्य येपि स्यु पापपोनयः । लियो वैश्यास्तथा दास्तषि यान्ति परा गतिम्' 'नायमात्मा पवचनेन लभ्यो न मेश्या न बहुना श्रुतेने त्पादिश्रुतिस्मृतयश्च न सङ्गच्छेयु । भक्तौ भावदिच्छैकसा गव धर्माचताध्यत श्रीमत्स्वामिचरणैर्भक्तिहेतुनिर्णये पश्चितपस्नीति नागोच्यते । तेन पुष्टिभक्तौ तु 'न रोधयति मा योगो न साक्ष्य धर्म एव च न स्वाध्यापस्तपरत्यागो पया मक्तिर्ममार्जिता. 'नदान न तपो नेज्यान शौच न प्रतानि च "मीयतेमलपा भन्या दरिन्पद्विडम्बनम्' 'सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेक शरण वनाइ वेदैन तपसेपादिवाक्यसहस्भगवदगी कृतानामेव तत्माप्ति । तस्माद्भगवदापये कर्मादीन्यपयोजकानि । ननु तावत्कर्माणि कुर्वीन न निर्वियेत पावते त्यादिवचनावदीयानामपि नित्यनैमित्तिकसतादिकरणमावश्यफ .
३२ कृष्णाश्रयस्तोत्रम् । तर वेदसाधकलं वदति भगवान् तदा भगवदीयानामपि नित्यनैमितिककर्मादिकरण- मेकादशीजन्माएपीनतादिकरणं च पर्यमिति चेत्, न । तत्र पूर्व भगवदीयानां कर्मत्र- तादीनां स्वरूपं वक्तव्यं तदेवाहु:-'यक्ष्ये विभूतीर्मवतस्वसंपादप नाप्रमो' 'यत्करोपि यदनासि पज्जुहोपि ददासि यत्' इति । तेन भगवदीयकृतकर्मणां 'यस्य स्मृत्ये. त्यादिवाक्यः पूर्णत्वमन्येषामपूर्णत्वादसापासम् । तेन समार्गीयाणां चेपां तेभ्यो भेदः सूचितः । वस्तुतस्तु यत्र विकधैर्यभक्यादिरहितानामपि तत्प्राप्तिस्तवाकामतयापि कृतानां कर्मवतादीनामसायकवं किमार्यम् । एतेन सर्वसाधनरहितानामेव भगवदारये मुख्योधिकार इति ज्ञेयम् । तेन तेपा सपरिकराणां ज्ञानाभावे त एव नष्टा जाता इत्याइ नटेन्विति । ननु तदधिष्ठातृदेवतानां तद्रुपसाघनै फलभ्यप्रसादानां विद्यमानत्वात्कयमप- रिझानं नाशो वा भवेचनाह-तिरोहितेति । अर्थरूपा देवास्तेभ्यस्तिरोहिता जातास्तेन गतसाराः सन्तस्तेषि तथैव जाता इति भारः ॥ ५॥ ननु तान्त्रिकमन्त्राधभावयनिहोरचान्द्रायणकृच्छादिनां विद्यमानत्वात्कयं न कार्यसिद्धिरतमाह- नानावादविनष्टेषु सर्वकर्मत्रतादिषु । पापण्डैकमयत्नेषु कृष्ण एव गतिर्मम ॥ ६ ॥ नानावादविनप्टेविति । जैमिनिकणादगौतमादयो हि कृपयस्वामसास्तैः श्रुतिस्मृत्पर्यविचारे क्रियमाणे कालसम्बन्धादुदिक्तस्वभाराः सन्तः कर्मरतादिमतिपादने निरन्तरसन्तन्यमारपरस्परमतिकूलासत्रैरझितव्यवसाया जाताः । एवं वस्तुनिर्धारा- मावे तदन्तेवासिपरम्पराया अपि पूर्वापेक्षयाप्यधिकदोषयुक्तत्वेन विविधतर्कोपेतः पर. स्परविरुद्ध नावादरूपैस्तद्वाक्यैः सर्वाग्येव कर्मनतादीनि विशेपेण नष्टानि । फलस्वरू- पाभ्यां वस्तुनिर्धाराभाषे तद्रूपेण छतमकृतमायं भवतीति तथा । अत एव भगवतापि तयैवोक्तं 'झालाज्ञाता च कर्माणि जनोयमधितिष्ठति । विदुपः कर्मसिद्धिः स्याचया नाविदुपो भवेत्' इति । तन्मार्गस्यैव सयालात् । ननु साङ्गाग्निहोत्रातपतिपादकानां' श्रुतिस्मृतीना विद्यमानत्वेन तदनुसारेण तस्कर्तारोपि दृश्यन्ते कथं तमास इति चेतवाह-पापण्डैकेति । परमतारणार्थ धर्मवलत्वा प्रदर्शनं पापण्डा, पाहननित्यत- काम्पस्वरूपसाधनफगदिपरिज्ञानाभा चित्तादिशुदयसाधाता 'अग्निहोत्रं गवालम्भ संन्यास पलपत्कम् । देवराच मुतोसनि कलो पञ्च विवर्जये'दित्यादिवाल्याचेपामिदानी निपिद्धत्वात्कृता अप्याभासत्वमेव प्रामुरन्तीति तत्वेरपि पापण्डायमेवैको यः पकण न श्रीमद्यारिकेश्वरचरणमगीतचिटतियुतम् । पलस्तद्रूपलमेव स्यात् । एवमखिलकर्पव्रतानां पापण्डैकमयत्नरूपत्वे जाते ब्रह्मात्राणा- मध्याश्रय एव साधीयानित्याह-कृष्ण इति ॥ ६॥ नन्वेवं सर्वथा सदोषाणां तृतीयकमार्गमषेशयोग्पानां 'गतिर्ममे'त्येवंरूपोक्ति- मात्रेण कथं भगवान् सर्वनिरपेक्ष आश्रयो भवेचत्राह- अजामिलादिदोषाणां नाशकोऽनुभवे स्थितः । ज्ञापिताखिलमाहात्म्यः कृष्ण एव गतिर्मम ॥७॥ अजामिलादिदोषाणां नाशक इति । ब्रह्मवादे भगरतः सर्वाश्रयत्वेपि सर्वाय भक्तिमार्गीयाश्रयस्प जीवानां सर्वथा कर्तव्यत्वादाश्रयभवने महानुत्साही भवति । या स्वनाममाहात्म्पख्यापनार्थ नापोक्तिमायणैवाजामिलादीना सर्वदोपनाशको नात स्वधर्म- पक्षपातादेव भक्तिमार्गे पक्षपातात्तन्मागीयाश्रयमाहात्म्यख्यापनार्थ तागुक्तिमात्रेणेव भगवॉस्तथाविधो भवतीति भावः । तथापि क जीवाः क्षुद्रतमाः क वा ब्रह्मादिदुर्लभकयों भगवानित्यायभवननियाभावे कथं वा समुद्दिश्य तथोक्तौ प्रवृत्तिरपि भवेत्तत्राह- अनुभवे इति । अत्रास्मच्छन्दोध्याहर्तव्यः । एवमाश्रयभवनोन्मुखो भगवान् पदनुभये स्थित इति निणीलार्याई बदामोत्यज्ञानान्यथाज्ञानमतिकूलतकर्नान्यथा वाइनीयमिति भाषः । चित्तस्पातयात्येपि निरन्तरं तदनुसन्धानपूर्वकमेतदुक्तौ सत्यां मदनुभूतो भग- वानप्यनुभवारूढो भवतीति पदीयैरेतदेव सर्वथा कार्यमित्पलं विस्तरेण । ननु यथा कलौं अत्यादिमितिमाहात्म्या अपि धर्मादयो नष्टाः नया 'कलौ दशसहस्राणि विष्णुम्त्यक्ष्यति मेदिनीम् । तददै जाह्नवीतोयं तददै ग्राम्यदेवता' इत्यादिना बादातो मगवत्सान्निध्या- भावे तन्माहात्म्यमपि तिरोभूनं भविष्यतीति कपमज्ञातमाहात्म्यास्तदाश्रयोक्तौ प्रवृत्ता भविष्यन्तीति चेत्तत्राद ज्ञापितेति । ज्ञापितमखिलमखिलेभ्यो भक्तेभ्यो वा श्रुतिपुरागश्री- भागवतादिना साक्षात्परम्परया वा माहात्म्यं यस्य येनेति वा । तथाहि 'तस्माद्वा एतस्मा- दात्मनः' इत्यादिनाऽखिलेभ्यः सृष्टिकर्तृलदोषिकया श्रुत्या माहात्म्यख्यापनम् । प्रतिपराणां कर्ममाहाम्परूपमेव भगवतमाहात्म्पज्ञापनं तत्रैव पर्यवसितमतिलातेगा- मेवं ज्ञानिनामुपातकानां च 1 भक्तानां तु साक्षादेव यथा 'जम्भनो ददृशे इदम् ' ययाच 'गरिमाणं शिशोर्वोढुं न सेहे गिरिकूटवत् ' एवमद्यपुरुधा सर्वत्र ॥ ७ ॥ ननु 'आमाशात्पतितं तोयं यथेत्यादिनोक्तमकारेण देवतान्तरं भनतामपि सर्व- मुक्तौ भगवत्सम्बन्यो भविष्यतीति फिमित्येवं निर्वधनाश्रय पोच्यते तराई-- प्राकृताः सकला देवा गणितानन्दकं बृहत् । पूर्णानन्दो हरिस्तस्मात् कृष्ण एवं गतिर्मम ॥८॥ । ५ कृष्णाश्रयस्तोत्रम् । प्राकृता इति । ब्रह्माणमारभ्य सर्व एव देवाः प्राकृता आधिभौतिकान्त:शा- तित्वात् । वृहदसरं गणितानन्दकं स्वार्थे 'क' प्रत्ययः । तेन जीवेषु निरानन्दहेतूनाम- गणितानां विद्यमानत्वायन गणितानन्देपि न पामानन्दपूर्णता नत्र माकुनैः कः पुरुषार्थः सिद्धयेत् । तथापि पिराडक्षरयोरपि तदात्मकत्वाविशेपेण कार्यसिद्धयभावे कथं मुलाश्रय- णेन सर्यथा तद्भवत्येवस्येव निधीयते तदाहुः पूर्णति नहि पूर्वोक्तैः कैरप्यानन्द. पूर्यते । म दुःखापामाभागे पूरितोप्यपूरित एव स्थाचाह-हरिरिति । ययस्यैवानन्दस्या- न्यानि भूतानि मानामुपजीवन्ती त्यादिना देवेषयि तटचमस्ति तथापि न तथा नेपा- मन्यपूरकार तदल्पीयस्त्वात । निरवधिदारिद्यस्य सावधिधनेनापगमस्याशक्यतादेवम- पूर्णानपि प्रतिवन्धनिटचिपूर्वक कृष्ण एव पूर्गान् करोति । 'तं सत्यमानन्दनिधि मजेते तिन्यायेन स एव तथाकर्तव्य इति दिक् ॥ ८॥ मनु भाद्भिरेव भक्तपुत्पत्यर्थ सदाथि वा विरुधैर्याश्रयागा निरूपिनत्वात्कमि- तरनिरपेक्षः स एवोच्यते, किञ्च, आश्रयरसायाश्च तदुमपरक्षानन्तर च भवद्धिरेवोक्त- वास्कथं श्रीमतामेव वाक्यं विसंघादि भवतीति घेताह- विवेकधैर्यभत्त्यादिरहितस्य विशेषतः । पापासक्तस्य दीनस्य कृष्ण एव गतिर्मम ॥९॥ विवेकौर्यभक्त्यादिरहितेति । विस समपार्थनेपि निजेच्छात करिष्य. तीत्येवंनिश्चयरूपः । नित्युपायाफरणेन सर्वथा दुःखसहनं धैर्यम् । भक्तिः प्रेमल- क्षणा साधनरूपावा। आदिशन्देन मर्यादाभक्तिसामाना ग्रहणमया भक्तिसाप नान्येन सिद्धयत्यन्यसाध्य तु भक्तरानुपङ्गिक फलमेवरूपभक्तिव्यतिरेकेणापि या. श्रयासर्वसिद्धिस्तव विवेकादिनिरपेक्षः स तयाभवतीति किं वाच्यम् । अत एव सत्रा- पन्त फलौ भत्यादिमा हि दुराश इत्युक्तम् । रिच, रिमादिस्पितो तदव- लपेनाश्रयामावपि स्थितिर्भवति तथातत्यानपत्ररूपं साझं न सिद्धधेव, धर्मतद्विष- रीतादिसायनामावे तुभयथाप्यनुवार्य एव स्वात्तेन धर्मपक्षमालाम धर्मादिविरोतसा धनवतामेव सर्वतः कार्यसिद्धयभावनिश्चरे दैन्याविर्भावनामेव शरणागताविनाथपे मुख्योधिकार इति तथैवोक्तं पापासक्तस्प दीनस्येति । आसक्तिः कायेन मनसा चाचा तदकरणे स्थातपशक्तिः । अयमेव विशेष मात्रयवियौ । एवं सति यादिमतियो- गि फ्री मुलपित्याश्रपाधिकारस्य बहुधा विद्यपानवान् संवैरेव स एव सर्वथा कार्य इत्याह कृष्ण एवेति । नन्वेवं सति तु पापकरणस्यैवाश्रये कारणवपायातीति ऐचत्राह 'कृष्ण एवेति 1 अप्रैवं प्रतिभाति-एक्कारेण पर विवेकथैर्यमत्पादीनां भगवद्धमां- श्रीपहारिकेश्वरचरणमणीतविकृतियुतम् । णामप्यकारणं तत्र तत्करणे तदाश्रयस्प विद्यमानत्वादन्याश्रये जाते भगवदाश्रयानु सत्तिः स्यादनो यया धर्मादित्यागस्तपाऽधर्मस्यापीवि भावः । तर्हि पूर्ववाक्यमनुपपन्न- मिति चेत्, न, अनववोधात् । तथाहि एवं सति पर्यादिपतियोगित्वं कलौ सुलभ मित्याश्रयाधिकारस्य बहुधा विद्यमानस्सा देतस्यायमर्थ:-विवेकपभक्तपादिसहितास्तु कलौ दुर्लभाः पापकारस्तु सुलभा इति तदधिकारस्य वहया विद्यमानत्वम् । ननु . धर्मकारस्तु सर्वथा तवानधिकारिणः परमधर्षाकार एवाधिकारिण इत्सायातमिति चेत् ? तपोच्यते । धर्मादिमतां विवेकक्तिमतां चेत्तत्यागपूर्वकं केवलाश्रयकरणं सहसा न भवति तेषु समीधीनत्ययुद्धेः । यथा मभुगा सर्वधर्मत्याग उपदिष्टे पार्थस्य रकरणे शोकोलची पुनः प्रभुणैव पापेभ्यो मोक्षयिष्यापी'त्युक्त, नोचेच्छरणधर्मे बद- संभरारमोननकपनमनुपपनं भवति तथैवतेषामपि शोकसंभवः । परं वद्विपरीतक्ता तु तेष्वस बुद्धया निस्साधनेप्यैव भीगोकुलेशाङ्गीकारणानुर्याचद्रलाय त्यागः सुलभ इति सुपूक्तं 'धर्मादिपतियोगिल'मित्यनेनेति सर्वमनवयम् ॥ ९ ॥ ननु 'श्रेयांसि बहुविवानी'तिन्यायेन प्रतिबन्धकानां हष्टादृष्टभेदाभ्यामुरुषा विद्यमानत्वात्कयामुक्तिमात्रेण चालिष्टकर्मा भगवानाश्रयो भवेत्तत्राह- सर्वसामर्थ्यसहितः सर्वत्रैवाखिलार्थकृत् । शरणस्थसमुद्धारं कृष्णं विज्ञापयाम्यहम् ॥ १० ॥ सर्वसामर्थ्यसहित इति । कर्तुमकर्तुगन्ययाकर्तुमामथ्यादिरूपैः सहिनः । ननु तत्र दृष्टान्तनिदर्शनस्यादृश्यमानत्वात्कथं ज्ञायते नत्राह सर्वत्रेति । सर्वत्र योग्या- योग्पविचारेणाखिलानामखिलान् कार्यान् करोति करिष्यत्यकादित्यादिधर्मस्याविना- शिवेन भगवति सर्वदा विद्यमानत्वादाभपकरणे कोनध्यवसाय इत्पर्यः। तथापि भगवतः सर्वसमत्वात्सर्वमुत्यनवसरेभार्थित: फयमुदरिष्यतीत्यत आह शरणस्थेति । ये च शरणं गत्वा तस्मिन्नेव धर्मे स्थितास्तेषामुद्धरणे अमार्थितोपि भुकृतमयत्नः सर्वदेव वर्तते किं पुनर्ममापितः । यथा भूम्युद्धारचिकीर्षायामपि ब्रह्मणा भूम्या दुःखनिवेदनरूप- प्रार्थनानन्तरमेव सरायौ नदिर श्रवणानन्तरमेव साक्षाद्भगवानवतीयस्मिानुरिष्यतीत्येवं. निश्चयो जात एवं पत्यार्थितो मदीयानामाश्रयो भवत्येवेति निश्रित्य मदीयः सर्वया सर्व परित्यज्याश्रय एव कर्तव्यः । एतदेवामिसंघायावारुक्तं कृष्णं विज्ञापयाम्यहमिति । यदा, मदीपैरेवंस्तुतिरेव कार्या, मत्मार्थितः स्वपमेवाश्रयो भविष्पविनात्र युष्मन्कृतिपपेक्षते । नवभिध स्तुतिः पूर्व कर्तव्याश्रपणेभिः । दशमे स्वस्य धर्मस्य सापक झापयेदुधः ॥ १०॥ १ कार्यस्थेलिपाठ ।
कृष्णाश्रयस्तोत्रम् । प्राकृता इति । ब्रह्माणमारभ्य सर्व एव देवाः माकृता आधिभौत्तिकान्त:पा- तिसाद । वृहदसरं गणितानन्दकं स्वार्थे 'क' प्रत्ययः । तेन जीयेषु निरानन्दहेतूनाम- गणितानां विद्यमानत्वाद्यय गणितानन्देपि न तैपापानन्दपूर्णता तत्र माकृतः कः पुरुषार्य: सिद्धचत् । तथापि विराडक्षरयोरपि तदात्मकत्वाविशेपेण कार्यसिद्धयभाये कयं मूलाश्रय- येन सर्वया तद्भवत्येवेत्येवं निश्चीयते तत्रा:-पूर्णति माह पूर्वोक्तः कैरप्यानन्दः पूर्यते । सब दुःखापगमाभावे पूरितोप्यपूरित एव स्यात्तत्राह-हरिरिति । पप्यस्यैवानन्दस्या- न्यानि भूतानि मात्रामुपजीवन्ती त्यादिना देवेष्वपि तद्वत्वमस्ति तयापि न तथा नेपाल मन्यपूरकत्वं तदल्पीयस्त्वाद । निरवधिदारिद्याय सावधिधनेनापगमस्याशस्यतादेवम- पूर्णानपि पतिबन्धनिटतिपूर्वक कृष्ण एव पूर्णान् करोति । 'तं सत्यमानन्दनिधि भजेते तिन्यायेन स एव तथाकर्तव्य इति दिक् ॥ ८॥ मनु भवद्भिरेवभक्तपुत्पत्यर्थ तहानार्थ वा विरेकधैर्याश्रयागां निरूपितत्वात्कयमि- तरनिरपेक्षः स एवोच्यते, फिञ्च, आश्रयरमायाश्च तदुभपरमानन्तरं च भवद्भिरेवोक्त- लात्कथं श्रीमनामेव वाक्यं विसंवादि भवनीति चेत्तवाह- विवेकधैर्यभक्त्यादिरहितस्य विशेषतः । पापासक्तस्य दीनस्य कृष्ण एवं गतिर्मम ॥९॥ विवेकर्यभक्त्यादिरहितेति । विवेक पर्वममायनेपि निजेरछातः करिष्य- तीरोनिश्चयरूपः । निवृत्युपायाकाणेन सर्वया दुःखसहनं धैर्यम् । भक्तिः प्रेमल- क्षणा तत्साधनरूपा वा आदिशब्देन मर्यादाभत्तिसाधनानां ग्रहणम् । यर भक्तिमाध्य नाम्येन सिद्धपत्यन्यसाध्यं तु भक्तरानुपतिक फलमेवपक्तिव्यतिरेकैणारि या. प्रयासर्वसिद्धिस्तव विवेकादिनिरपेक्षः स तयाभवतीति किं वाच्यम् ? । अत एव तत्रा- पन्ते गलौ भक्त्यादिमाग हि दुःसाध्य'इत्युक्तम् । कित, विकादिस्थिती तदव- सम्पेनाधयाभावेपि स्थितिर्भवति तथासत्याश्रयस्वरूपं साङ्गन सिद्धचेत्, धनद्विप- रीतादिसाधनामावे तूमययाप्यनुदार्य एव स्यातेन धर्मिपक्षपालम्य धर्मादिविपरीनसा- धनतामेव सर्वतः कार्यसिद्धयमावनिश्चरे दैन्याविर्भावनामे शरणागतापिताश्रये मुख्योविकार इति तथैवोक्तं पापासक्तस्य दीनस्येति । आसक्तिः कायेन मनसा वाचा तदकरणे स्थातुमशक्तिः । अयमेव विशेष आश्रयविधौ । एवं सति घमांदिप्रतियो- गिवं कलौ सुलभरित्याश्रयाधिकारम्प बहुधा विद्यमानत्वा सव स एव सर्वथा कार्य इत्पाद कृष्ण एवेति । नये मति तु पारकरणस्यैवाश्रये कारणलमायातीति देतवाह 'कृष्ण एवेति । और प्रतिभाति एक्कारेण यत्र विभपादीनां भावदमां- श्रीमहारिकै वरचरणमणीतविकृतियुतम् । णामप्यकारणं तत्र सत्करणे तदाश्रयस्य विद्यपानत्वादन्याश्रये जाते भगवदाश्रयानु- स्पतिः स्यादतो यथा धर्मादित्यागस्तथाऽधर्मस्यापीति भावः । तर्हि पूर्ववाक्यमनुपपन्न- मिति चेत्, न, अनववोधात् । तथाहि ' एवं सति धर्मादिपतियोगित्वं कलौ सुलम- मित्याश्रयाधिकारस्य बहुधा विद्यमानता देतस्यापार्थ:-विवेकधैर्यभत्यादिसहितास्तु कलौ दुर्लभाः पापकारस्तु सुलमा इति तदधिकारस्य बहुधा विद्यमानत्वम् । ननु , धर्मकारस्तु सर्वथा तत्राधिकारिणः परमधर्माकार एवाधिकारिण इत्यायातमिति चेत् ? सोच्यो । धर्मादिश्तों विवेकधैर्यभक्तिमतां वैतत्यागपूर्वक केरलाश्रयकरणं सहसा न भवति तेषु सपीचीनत्ययुद्धः । यथा प्रभुमा सर्वधर्मत्याग उपदिष्टे पार्यस्य तत्करणे शोफोसत्तौ पुनः प्रभुणैव पापेभ्यो मोक्षयिष्यामी'त्युक्त, नोचेच्छरणधर्मे तद- संभवात्तन्मोचनकपनमनुपपन्नं भवति तयैवैतेषामपि शोकसंभवः । परं तद्विपरीतरतां तु तेवसद्धदया निस्सायनेप्येव श्रीगोकुलेशाङ्गोकारमाचुर्यात्तहलाच तयाग सुला इनि सुष्टूक्तं 'धर्मादिप्रतियोगिख'मित्यनेनेति सर्वमनवद्यम् ॥ ९ ॥ मनु श्रेषांसि बहुविघ्नानी तिन्यायेन प्रतिबन्धकानां दृष्टादृष्टमेदाभ्यामुरुधा विद्यमानत्वाकयमुक्तिमात्रेण चाक्लिष्कर्मा भगवानाश्रयो भवेत्तत्राह- सर्वसामर्थ्यसहितः सर्वत्रैवाखिलार्थकृत् । शरणस्थसमुद्धारं कृष्णं विज्ञापयाम्यहम् ॥ १० सर्वसामसहित इति । कर्तुमकपन्ययाकमामादिरूपैः सहिनः । ननु तत्र दृष्टान्तनिशनस्याश्यमानस्यात्कथं ज्ञायते तत्राह सर्वप्रेति । सर्वत्र योग्या- योग्यविचारेणारिखलानामखिलान् वार्थान् करोति करिष्यत्यकापदित्यादिधर्मस्याविना- शित्वेन भगवति सर्वदा विद्यमानत्वादाश्रयकरणे कोनध्यनसाय इत्यर्थः। तथापि भगवतः सर्वसमत्वात्सर्वमुक्त्यानसरेऽमाथितः कथमुद्धरिष्यतीत्यत आह शरणस्थेति । ये च शरणं गत्ला तस्मिोष धर्मे स्थितास्तेपामुद्धरणे अमार्थितोपि भूकृतप्रयत्नः सर्वदेव वर्तते किं पुनर्यत्साथितः । यया भूम्युदारविकीयामपि ब्रह्मणा भूम्या दुःखनिवेदनरूप- प्रार्थनानन्तरमेत समायौ तरिः श्रवणानन्तरमेव साक्षाद्भगवानवतीस्पिानुदरिष्यतीत्येवं. निश्चयो जात एवं मत्मार्थितो मदीपानामाश्रयो भवत्येवेति निश्चित्य मदीयः सर्वया सर्व परित्यश्याश्रय एव कर्तव्यः । एतदेवाभिसंपायाचा रुक्तं कृष्ण विज्ञापयाम्यहमिनि यता, मदीपैरेवं स्तुतिरेव कार्या, मत्मार्थितः स्वयमेवाश्रयो भविष्यति नात्र युष्मन्कृतिमपेक्षते । नाभिश्च स्तुतिः पूर्व कर्तव्यानयणेमुभिः । दामे स्वस्य धर्मस्य साप सापयेबुधः ॥ १० ॥ कार्यस्येतिपाठः।
कृष्णाश्रयस्तोत्रम् । पाठफळमाह- कृष्णाश्रयमिदं स्तोत्रं यः पठेत्कृष्णसन्निधौ । तस्याश्रयो भवेत्कृष्ण इति श्रीवल्लभोऽब्रवीत् ॥ ११ ॥ कृष्णाश्रयमिदं स्तोत्रमिति । कृष्ण आश्रयो भवत्यस्मादिति कृष्णाश्रय इति स्तोरस्य नाम । फलाधिकारिणां पाठविधि चाह-सन्निधौ सेव्यस्य गुरोर्वा । उभपोरभारे स्मरणीयस्य वा । धर्मादिपु सर्वेषु असाधनतानिश्चयः कृतार्यताविपयिपुत्कटेच्छा च पूर्णा- वधिः अल्पे बहुच साध्ये भगवान् स्वत:सर्वसाधको भवतीत्येवरूप मापयसिदिस्तरावधिः। तावदिदं पठनीयमिति सिद्धम् । यः पठेत् कृष्णसन्निधौ । य एन पटेततदमाविष्टान्तः करणः अतयाभूतो वा। ततः किं स्यादत आह तस्याश्रयो भवेत् । क इत्याकाहाया कृष्ण इति । कृष्णः सदानन्दः। तेन तदाश्रिवानांनस्थानामिन सर्वया दुःखात्यन्ताभावः परमानन्दसम्बन्यश्वोक्तो भवतः। नन्वा कि ममागमेतत्स्तोत्रपाठमाणैव स सपा भवेद श्रीवल्लभ इति । यथा श्रिया बल्लभो भगवाँस्तयारमपीति मगरद्वारपमिवारयापि वार पेदात्मकमिति मूर्वि धृता तथैव कर्तव्यमित्यर्थः । किश, भगवदर्मागां स्वरूपं वदर्भनिरता एव जानन्तीति तदुक्तौ न विपतिपः कैरपि भाव्यमिति दिछ ।॥ ११॥ मनपतिरतिमित्यं य: प्रदातुं रुपान: सकलनिगमसारं तत्वतः संजगाद । स्वमनपरिको धुरु संततः संथपानाम् स भवतु मम सर्व विलंशः सुरेशः॥१॥ रुचिरचरणपुग्मं हत्पवेशे तितिग्मम् निनमनसि विहारं ध्वस्तगादान्धकारम् । निनवनाटारं मातलोकोपहारम् सालनिगमसारं भावये दिहलेसम् ॥ २॥ आश्रयस्तोगविरवि दारि परशुद्धधीः । आश्रितानां चारेमामायपहारनेछया ॥३॥ इति श्रीमद्गोपीजनवाहभरणेकतानद्वारिफेश्वरेण पिरपिता कृष्णानपदितिः मम्पूर्ण।
श्रीकृष्णाय नमः। श्रीगोपीजनवल्लभाय नमः। श्रीमदाचार्यचरणकमलेभ्यो नमः । कृष्णाश्रयस्तोत्रम् । श्रीमद्रजराजचरणविरचितविवरणविभूपितम् । यद्वाक्पमात्रकथनात् स्वीयत्वं मनुते हरिः। ते कृष्णवल्लभाचार्याः प्रसीदन्तु सदा मयि ॥१॥ वदनुग्रहतः कृष्णाश्रयस्य वितिर्मया। विधीयते यतः कृष्णाश्रयः फलति सर्वथा ॥२॥ अथ श्रीमदाचार्यचरणा भगवदासानुसारेण जनानुढे निबन्धादौ सपरिकर भत्यादिमार्गानुपदिश्य प्रत्यहं कलेराधिक्येन तेषां दुःसाध्यत्वमाकलय्य विवेकर्याश्रय- अन्ये विवेकधैर्याभ्यां सहितमाश्रयनुपदिष्टवन्तः, तत्स्वरूपं च तत्र सर्वया सर्वदा भगव- च्छरणगमनात्मकं सिद्धं, तथाच तत् कायिकादिभेदेन विथा भवति, तत्र मपर्म मानस शरणं भावनात्मकं भवति, पश्चात् कायिकं तद्वैयण सिद्धयति, पाचनिकं तु 'प्रपनं पाहि मां प्रभो' इत्यादिमार्यनारूपम् । एतादृशस्प भवनेपि कारणं भगवदनुग्रह एवेति 'सोई स्वामी'त्यकूरस्तुतौ 'असतां दुरापं तचाप्यहं भवदनुग्रहमीश मन्य' इति स्वानुभवेन मतिपादिवम् । शरणागतिलक्षणं च तत्रैवोक्तं 'यदि सट्टातमनुगुणं कुर्यात् स्यानयेदा तदा शरणागतिः सिदेति ज्ञातव्पमित्यारभ्य 'सत्सेवारुचिर्भगवत्स्वरूपनानेच्छा मगर छालपरत्वं चान्तिमजन्मज्ञापक मित्पन्तेन । 'अनुगुणपक्षस्तु सुगम' इति च । एवं सत्ये- तादृशी शरणागतिविकधैर्यानयोक्तरीत्यापि साम्मत कठिनेति मत्यादिमागर्माणां दुःसा- ध्यत्वे हेतुरपि तत्र नोक्त इति निबन्धादायुक्तोपि दुर्जेय इति तदुक्तिपूर्वकं साहां वाव. निकी ता सांभवं साधनत्येन विवक्षन्तः कृष्णाश्रयस्तोत्ररूपेणाहुः-सर्वेत्यादि । अन टीकारन्मे श्रीरघुनाथचरणैन्यावतरणिका फापि नोक्ता परन्तु 'प आपिरासीदोरेस्मिन् फलौ श्रीवल्लमामिधः । निनदास्य स नो देपाव्यादपि दुराश्रया- दितिमङ्गलवाये कलिस्वरूपस्य श्रीमदावार्येषु मापनस्य च कयनेन चितवन विरोपः । एवं फत्पाणरावैरपि कृष्णाश्रयस्य सर्वसापकत्वं सर्वसापनानापसापकतं पोक्तमिति नेपामध्ययमैवाचयः । लोकसहधातास तैरेवमुक्तं 'भकानां भगवाने कृष्णाश्रयस्तोत्रम् । पाठफळमाह- कृष्णाश्रयमिदं स्तोत्रं यः पठेत्कृष्णसन्निधौ। तस्याश्रयो भवेत्कृष्ण इति श्रीवल्लभोचवीत् ॥ ११ ॥ कृष्णाश्रयमिदं स्तोत्रमिति । कृष्ण आश्रयो भवत्यस्मादिति कृष्णाश्रय इति स्तोत्रस्य नाम । फलाधिकारिणां पाठविधि चाह-सन्निधौ सेव्यस्य गुरोवा उपयोरभारे स्मरणीयस्य वा । धर्मादिपु सर्वेषु असाधनतानिश्पः कृतार्यताविपपिप्पुक्कटेच्छा प पूर्वा- चधिः। अल्पे बहुच साध्ये भगवान् स्वत:सर्वसाधको भवतीत्येवंरूप माश्यसिद्धिस्तरावधिः। तावदिदं पठनीयमिति सिद्धम् । यः पठेत् कृष्णसन्निधौ । य एव पठेचचदविष्टान्त:- करणः अतयाभूतो वा। सतः किं स्पादत आह तस्याश्रयो भवेत् । क इत्यापावापा कृष्ण इति । कृष्णः सदानन्दः। वेन तदाश्रितानांवमस्पानामिव सर्वया दुःखात्यन्तामाः परमानन्दसम्बन्धमोक्तो भवतः निन्वत्र कि प्रमाणमेतत्स्तोत्रपाठमारेर स बया भयेद श्रीवल्लभ इति । यया श्रिया बलुभो भगवाँस्तयायपपीति भगतदारयपिगस्यापि वाव वेदात्ममिति मूर्ध्नि धृता तयैव कर्तव्यमित्यर्थः । किश्च, भगवदर्माणां स्वरूपं तद्धर्मनिरता एव जानन्तीति तदुक्तौ न विप्रतिपनैः कैरपि भाल्पमिति दिक् ॥ ११ ॥ घनपतिरतिमिर्प यः भदातुं कपातः सकलनिगमसारं तखतः संजगाद । स्वजनपरिदो ध्रुक संतवेः संशयानाम् स भवतु मम सर विलेश: मुशः॥१॥ रुचिरचरणपुग्मे हमवेशे तितिग्मम् निगमनसि विहारं ध्वस्तगादान्धकारम् । प्रजिनानाठारं प्राप्तलोकोपहारम् सालनिगपसारं भावदिहलेसम् ॥ २ ॥ आश्रपस्तोत्रविकृति दारिश्वरशुदधी। आश्रितानां चकारेमापामयसापनेन्छया ॥ ३ ॥ इति श्रीमद्गोपीजनयाल्लमपरणेकतानमारिकेश्वरण पिरपिता कृष्णानपरिपृतिः मम्पूर्णा ।
श्रीकृष्णाय नमः। श्रीगोपीजनवल्लभाय नमः। श्रीमदाचार्यचरणकमलेभ्यो नमः । कृष्णाश्रयस्तोत्रम् । . श्रीमद्रजराजचरणविरचितविवरणविभूपितम् । यद्वाक्यमात्रकयनात स्वीयत्वं मनुते हरिः। ते कृष्णवल्लभाचार्याः प्रसीदन्तु सदा मयि ॥१॥ तदनुमहतः कृष्णाश्रयस्य वितिर्मया। विधीयते यतः कृष्णाश्रयः फलति सर्वथा ॥२॥ अय श्रीमदाचार्यचरणा भगवदासानुसारेण जनानुदत निबन्धादौ सपरिकर भक्यादिमार्गानुपदिश्य प्रत्यहं कलेराधिक्येन तेषां दुःसाध्यत्वमाकलय्य विवेकधैर्याश्रय- अन्ये विवेकधैर्याभ्यां सहितमात्रयपदिष्टवन्तः, तत्स्वरूपं च तत्र सर्वया सर्वदा भगव- च्छरणगमनात्मकं सिद, तथाच सत् कायिकादिभेदेन त्रिधा भवति, तत्र प्रयमं मानत शरणं भावनात्मकं भवति, पश्चात् कायिकं तद्वैयण सिद्धयति, वाचनिकं तु 'प्रपन्नं पाहि मां प्रभो' इत्यादिमायेनारूपम् । एतादृशस्य भरनेपि कारणं भगवदनुमह एवेति 'सोई दवायी'त्यक्रूरस्तुतौ असतां दुरापं तचाप्यई भक्दनुग्रहमीश मन्य' इति स्वानुभवेन मतिपादिवम् । शरणागतिलक्षणं च तत्रैवोक्तं 'यदि सहातमनुगुणं कुर्यात् त्यानयेदा तदा शरणागतिः सिद्धति ज्ञातव्य'मित्यारभ्य 'सत्सेवारविर्भगवत्स्वरूपझानेच्छा भा. छासपरत्वं चान्तिपजन्मज्ञापक'मित्यन्तेन । 'अनुगुणपतस्तु सुगप' इति प । एनं सत्ये- वाशी शरणागतिर्विषेकथैर्यानयोक्तरीत्यापि साम्मत कठिनेति मच्यादिमार्गाणां दुःसा- ध्यत्वे हेतुरपि तत्र नोक्त इति निबन्धादापुरचोपि दुर्जेय इति तदुक्तिपूर्वक साहां वाच. निकी नां सांपत सापनत्वेन विवक्षन्तः कृष्णाश्रयस्तोगरूपेणाहुः सर्वत्यादि । अप टीकारम्मै श्रीरघुनायचरणैन्यावतरणिका कापि नोक्ता परन्तु 'य विरासीदोरेस्मिन् कलौ श्रीवलमाभिधः । निनदास्य स नो देयादग्पादपि दुराथया. दिविमललवाक्ये कलिस्वरूपस्य श्रीपदाचार्येषु भार्यनस्य च फपनेन सूचितवन विरोषः । एवं कल्याणरायैरपि कृष्णाश्रयस्य सर्वसाधकत्वं सर्वसाधनानायसा चोक्तमिति नेपामध्ययमैवाचयः । शोकसायावात्पर्य तैरेवमुक्तं 'मलानां भगवान ३८ कृष्णाश्रयस्तोत्रम् । देशादिपटसाधनरूपचतुर्विधपुमर्यरूपयेति, दशलीलानिरूप्य इति, दशविधभक्तसेव्य इति', स्तोत्रार्थरूपे भगवति दशविधाः 'दश वै पशुषु प्राणा'इतिश्रुतेः माणाना दाल, ते यया साधास्तया स्तोत्रमपीति शब्देपि दशविधाः । अतोऽर्थमनुकूलयन शब्द एवाय साधक इतिबोधनाय प्रार्थनाव्याजेन स्तुवन्तीति । द्वारिकै धरैस्तु 'आमासथ निरोधश्चेति वाक्यलिखनेन 'नच लक्षणलक्षितया यजमानपश्वा इदा भक्षयन्तीतिवदन दशसहया- पूरकसर्वफ्लरूपोन विवक्षित इत्याशय उद्घाटित' । तया च 'या या साधनसपत्तिः पुरुषा थेचतुष्टये । तपा विना तदामोति नरो नारायणाश्रय' इतिवारयलिवनेनापशब्द: कृष्णाश्रय इति स्तोत्रनामेति तेपामाशयः । मम त्वन्पदपि प्रतिभाति-यथाक्रूरेण प्रसन्न प्रत्यक्षो भगवान् स्वाधिकारानुसारेण शरणतया प्रार्थितस्नयाऽऽचारपि स्वपकरितभक्ति- मार्गफलदानानुकूल: प्रसन्नः स्वोक्तिपठनमात्रेणाभपदान क्त समयविशेष प्रार्थितस्तदों कृतवानिति तज्ज्ञापकमिद मार्थनापटित स्तोत्रमिति । अत्र च भगवान् गतित्वेन मार्यते अस्त्विति कियाध्याहारेण । तत्र गतिशब्दः फले रुढा, 'सा काटा सा परा गति.' 'अन्ते या मतिः सा गति.' 'नान्या भवेदतिररिन्दमेति श्रुतिपुराणादौ तयाप्रसिद्ध । समाप्तौ तु 'तस्याश्रयो भवेत्कृष्ण' इत्याश्रयत्व पाठफलत्वेनोक्तम् । आश्रयशब्दश्व सहाये रूट, सिद्धाखिलार्या मधुसूदनाथया' 'भवद्भिरमृत प्राप्त नारायणभुजाश्रय 'रित्यादी तथापसिद्धेः । कृष्णशब्दश्च परब्रामवाचकः 'कृषिभूवाचकः शब्दो णध निर्दृत्तिवाचकः। तयोरेय पर ब्रह्म कृष्ण इत्यभिधीयते' इतितापनीयश्रुतेः, 'पापकर्पणो ह वेति चा ब्रह्मवै. वर्ते श्रीकृष्णजन्मखण्डे श्रीरक्मिण्युदाहोत्तर श्रीयशोदा प्रति भगवद्वाक्येपि 'कृपिरुत्कृष्टर- पनो णश्च सद्भक्तिवाचकः । अथापि दारवचनस्तेन कृष्णं विदुर्बुधा कृपिच परमानन्दे णश्च तदास्यकर्मणि । तयोर्दाता च यो देवस्तेन कृष्णः प्रकीर्तित ' 'कोटिनन्मानित पापे कृपिः क्लेशे च वर्तते । भत्ताना णश्च निर्वाणे तेन कृष्णा प्रकीर्तितः' इति विश निरक्तः। तत्र तृतीयेन 'पापकर्पण' इतितापनीयश्रुतिस्पवृहिता । गौनमीयतन्त्रे अष्टादशार्णव्या- ख्याया च "कृपिशब्दश्च सत्तार्थों णवानन्दस्वरूपकः । सुखरूपो भवेदात्मा भावानन्दमप- वत' इति । वृहद्रगौतमीयेपि 'कृपशब्दो हि सत्ताथों णश्चानन्दस्वरूपः । सत्तास्वानन्द- योर्योगाचित्पर ब्रह्म चोच्यते' इत्येता-या पूर्वश्रुतिरुपवृहिता । अब प्रयमे सर्वशब्दपनि निमित्तभूता सत्ता भावपदेनात्मपदेन च व्याख्याता 'रूप यचमाहुरव्यकमाघ ब्रह्मज्योति- निगुणं निर्विकारम् । सत्तामात्रमितिदशमस्कन्धवाक्येन भगवत्स्वरूप तेन सम्बन्धिदाना- सत्तव भिधमाना गवादिषु जातिरित्युच्यते तस्या सर्वे शब्दा व्यवस्थिता, ता 'मातिप- दिकार्य व धालयं च प्रचक्षते सा जातिः सा महानात्मा तामाहुस्त्वालादय' इति वाक्प• पदीयोक्तरीत्या मूलसद्रूपाभित्रानन्दरूपत्वेन कृष्णल विकृत, द्वितीये च प्रत्याहारन्यायन श्रीमहनराजचरणविरचितविवरणविभूषितम् । सदानन्दयोरत्तचित्तं निवेश्य सचिदानन्दतया परब्रह्मत्वेन कृष्णत्वं वितपितिभेदाः । अन्या अपि निरुक्तयो ब्रह्मवैवर्ते नामकरणपसले गर्गणोक्ता पन सन्ति वास्ततो ज्ञातव्याः। आनन्दे च निरवधित्वमेव परमफलतावच्छेदकमित्यानन्दमयाधिकरणे स्थितम् । भूमा तत्सुखं नापे सुखपस्ति भूमैत्र सुखं भूपा त्वेव विजिज्ञासिराव्य' इति छन्दोगथुते- 'यतो वाचो निवर्तन्ते इतितत्तिरीयश्रुतेश्च । फलं ट्रिविध, माध्याभिव्यगधं च । तत्रार्थ यथा परशोभिदा । द्वितीयं यथा योगादात्मतुसम् । तत्र परे नाण्यावरूपत्वस्याभावा- हिनीयस्यतैव वाच्या । तन्त्र हेत्वपेक्षायां 'यमेवैष कृणुते तेन लभ्य' इतिश्रुत्या स्वीयत्वेन वरणे यत्साहादर्शनं तदेव हेतुः । तया सवि 'नायमात्मा प्रवचनेने सादिपूर्वार्दै उपलक्ष पविधया साधनान्तरनिषेधश्रावणेन वरणद्वारकं स्वस्यैव साधतत्वमुक्तं भवति । तदेव च ब्रह्मवैवर्तीपबृंहणेष्वपि सिद्धम् । तदेतत् सर्व हृदि कृत्वा मूढानां सन्देहनिवारणायादृष्ट- शास्त्रेऽनुरुद्धमार्गाणां कालादीनां सभिपत्याराच्चोपकारकाणामसाधक दोपांच बदन्त उक्तरीत्या स्वस्मिन् फलरूपत्वमतिरोभावयित्वा तत्र साधनरूपोस्थिति प्रार्थयन्ति- सर्वमार्गेषु नष्टेषु कलौ च खलधर्मणि । पापण्डप्रचुरे लोके कृष्ण एवं गतिर्मम ॥ १ ॥ सच ते पाश्चि । 'मृजूप् शुद्धौ' मृज्यन्ते शोध्यन्त इति 1 'मृग अन्येपणे' गृग्यन्ते तत्तत्फलार्थिभिरग्निष्पन्त इति मृगाः, स्वार्थेण व एर मार्गा: 'योगास्त्रयो मया प्रोक्ता नृणां श्रेयोविधिस्यया । ज्ञाने कर्म च भक्तिथ नोपायोन्यास्ति फवने'त्येकादशे भगवतोक्ताः स्वमाप्स्युपायाः तेषु नष्टेषु अनुशास्तृदौल यादिना तिरोहितेषु कृष्णो व्याख्यातरीतिको भगवान मम गतिःसाधनफलरूपोस्त्विति सम्बन्धः । अत्र 'यस्य च भावेन भावलक्षणमियनेन भावलक्षणा सप्तमी । अनुशास्तुदौल पादौ हेतुः-बलध- मणि कलौ लोके पापण्डप्रचुरे सतीति । चोवधारणे । खलोन्तो धर्मों यस्मिन्नसौ खलधर्मा 'धर्मादनिन् केवलादित्यनेनानि । खलधर्मत्वे हेतुलोकानां पापण्डमानुपम् । पापण्ड उपयों जैनदयादिसशस्तस्य प्राचुर्य बाहुल्यम् । कलावित्यधिकरणे सप्तमी । आधारत्वं चामाभिव्यापकनया कालिवसम्बन्धेन गौणौपश्लेषित पास । तयारताशे फलावी लोके सर्वमार्गेषु नष्टेषु सत्सु तथेत्यर्थः । पछी चानादरे' इत्यनेनानादरे क कलाविति सप्तमी । हेतु हेतुमद्रावस्तु समभिव्याहारादेव लभ्यः । तथाचनारयो लोके एर. मार्गेषु सरसु कलिपनाहत्य तद्भयं त्यस्ता सयेत्यर्थः । 'कलेोपनिये राजन' 'कलि समानयन्त्यायो' इत्यादिवाक्येषु कलिस्तुतेस्तन्त्र सायकलभ्रमवारणाय कीर्तनस्थापि यथायश्चित्कृतस्प न फल सापकत्वमितियोधनाय चात्र फलिलोकपोदॉपकपनम् ।
कृष्णाश्रयस्वोत्रम् । 'कृष्ण पदास पदाघ नैतवाक्पविरोध इति बोध्यम्। तथान जलभेदोकरीत्या कीर्वयित्र- चिधित्य भगवानाययगीय इति भावः । पहा, ताइरो लोके मार्गषु नष्टेषु 'बादवादास्त्य- जेवकान् पर कंच न संश्रयेदितिसप्तमस्कन्धीयनारदवारयानुसन्धानेन विरक्षित- मार्गस्यैव दृद्धग्रहणाव कलौं तत्तन्यागाणां साधकत्वनातमभावादिकलो नष्टे । पका- रोज नन्नाससमुचापकः । तया सति तथेत्पर्यः । एवमपि योध्यम् , प्रयमम्पाख्यानीतो फलौ सर्वमार्गेषु नष्टेवितिपदानां, फलारित्पत्थर सानिमश्लोकपश्चानुपझो घोषः । एतदीत्या व्याकुन्त: पाश्न: सर्वेपि विशेष्यान्वितस्वकारस्पान्ययोग पवादकता- शकलावतारव्यवच्छेदं तेनाहः, तदस्मारूपप्पभिमेतम् । श्रीरघुनाथास्तु खरधर्मिणीति पागन्तरमप्युपपस्थ सरशासो धर्मवेति कर्मधारयान्मात्यीयेन्मत्य बहुप्रीतिविपके 'क'पत्ययापतिभिषाहः, चकार प फलिपतिरिक्तकालसमुगापामाइ, पापातरणे अपत्यतिरिक्तसाधनाभावस्य सर्वकालेषु तौल्यादिति नेपामाशयः। प्रार्थना तु सपने. पन्यार्या ॥१॥ एवं कालदोपेण सङ्गदोपं मार्गनाशं चोपपाच पारस्प सापारणायेन देवानाप- साधारणत्वेन सदपेरुपान्नदात्य र 'काश्यादिपुपों यदि सन्ति लोके साम मध्ये मपुरैव पन्या । या जन्ममीज़ीनतमृत्युदाई गां चतुर्दा विपाति तिमि पाक्षिभि- यस्तारवायः साहात्सारालस्य 'देशान् पुण्यानाधयेत मरकैः साधुभि धिनानि'- त्यादिपिवविधर्मार्गानुकूलतापाच मतीते: भातं तपारभ्रम पारयितुं कालेन देनदोग- दिकं वदन्त आहुः-प्लेगोत्पादि। म्लेन्टामान्तेषु देशेषु पापेकनिलपेपु च । सत्पीडाव्यमलोकेषु कृष्ण एवं गतिर्मम ॥२॥ आपि भागाणा राममी । पीपारणे । नाचिन्नुपग्यो । देष म्रेनी. पनि उपरक्षणमेन अतितापरिनि यार, रामान्तेषु प्यार ! मारिप नदा मागानुरूपरियनिकन्यम् । वामानुसास्पिनों को दोष इत्पर भार पात्यादि । मुम्पान्पना नपुग्पाः कर्पगरयः । पापानां पभिचारनौपदीन-पादीनामेश मिस्टगेषु मुग्न्याशाने । ते हि मुग चामिनो दिमाय, साना भिवाद कुर्वन्ति योगादिकं पारपनि म । नदरोगा वि मारमादिना नया विदधतीयेप दोष इत्यर्थः । ननु न ग नाला नि ना दोष इत्यो दोपानरम- सत्पीदेवादि । मनां समातिनां पीरपा प्याभिशापदण्डादिन मा चम्मिा लोगः सम्पयो नना यैषिति । एव रिहाई परारोदारा रक्ता श्रीमद्रजराजवरणविरचितविवरणविभूषितम् । सामसमभुकत्वम्, पापवाहल्यम्, सत्पीडा, सदुद्देगवेत्येवैरुपद्रवेण सम्यक् पशया, सर्व- पार्गेषु नष्टेषु सत्सु कृष्ण एयेति पूर्ववत् ॥ २॥ एवं कालेन देशदोषादिकमुपपाय तेषां पाह्यत्वेन नलस्य वान्तःप्रवेशपहि:- सम्बन्धाभ्यां शोधकतया देशापेक्षयाप्यन्तरङ्गसानत्र च 'सयः पुनाति गाङ्गेयं दर्शनरदेव नामदम्' 'कारी व महापुण्या मतीवीच यहानदी । ये पिवन्ति जलं सासां मनुना मनुजेश्वर' 'प्रायो भक्ता भगवति वासुदेवेमलाशयाः' इत्यादिवाच्यः साधकरवमार्गा- नुकूलत्वमतीतेस्लेषु तथात्रभ्र वारयितुं कालेन वत्रापि दोष बदन्त आहुः गङ्गादि- तीर्धवर्येष्विति। गङ्गादितीर्थवर्येषु दुष्टैरेवावृतेष्विह । तिरोहिताधिदैवेषु कृष्ण एवं गतिर्मम ॥ ३ ॥ इह भारतवर्षे गादीनि यानि तीर्थश्रेष्ठानि से दुष्टैः कर्मणा भावभेदेन च ये दूषितास्तैरेव वेष्टितेषु । अवापि भावलक्षणैत्र सप्तमी । तथाच 'किंचाई न भुवं यास्ये नरा मट्याम्जास्पषम् । मृनामि तदधं कुत्र राजस्तन विचिन्त्यतामितिनवमकन्धे भगी- रखं पति गगावाश्यादृष्टावरणेन तेम्वपि शक्तिकोष्ठ्यदोष इत्यर्थः । ननु 'सापको न्यासिनः शान्ता नलिष्ठा लोकपावनाः । हरन्त्यर्ष तेजसगातेवास्ते हायभिदरिरिति तत्रैव गङ्गां प्रति भगीरयवाफ्यात्तादृशां सङ्गादिना तमिहत्तेस्तस्य पायिकलान्नाय दोष इत्यत आहः तिरोहिताधियेष्यिति । देवानां समूहो देवम् , देवे इत्यधिदेव, देव- समूहे विद्यमानं गङ्गादेर्देवतालपम्, तिरोहित अधिदैवं यस्मिस्ततिरोहिताधिदेयम् । तथाच देवसंसदि विद्यमाने यद्गादेराधिदैविक रूपं तचिरोधानाच्छक्तिकोष्ठाता- दवस्थ्यमित्यर्थः । यदा, तिरोहित आधिर्यस्य सचिरोहिनाधि, तादृशं देवं देवसमूहो येष्विति । 'सत्तेपान प्रियं यन्मनुष्या विद्युरिवि 'वित्रस्य वै संन्यसतो देवा दारादिरू- पिणः | विनं कुर्वन्त्ययं ह्यपानाक्रम्य समियासमिति श्रुतिस्मृत्युक्तदिशा मनुष्यम्- क्तिस्पा न पियति तनिटापर्थे वाराहपायादौ मुक्त्यभावाय भगवत्सार्थनारदन तीदिौ दृष्टेवाविश्य प्रतिवन्तस्तिरोहिताधपो भवन्त्यत: शक्तिसद्भावेपि दोपताइवस्थ्यमतः कृष्ण एपेति पूर्ववदित्यर्थः । एतेन 'तीर्यादावपि पा मुकि कदाचित्कस्यचिद् मरेन । कृष्णासादयुतस्य नान्यस्येति विनिश्चय' इतिनिबन्योको युक्तिरपि परमादि- रुपा दारीता ॥३॥ अतः परं सम्मयानि तीर्यानि न देवा मृच्छिलामयाः। ते पुनन्त्युकालेन दर्शनादेव सायर' इतिवाक्यावदपेक्षयान्तरङ्गत्वेन पांच सदस्य 'प्रप्तहमगरं पाशमात्मनः ४२ कृष्णाश्रयस्तोत्रम् । क्षयो विदुः । स एव साधुषु कृतो मोक्षद्वारमपातम्' 'सला प्रसङ्गात् 'सन्न एतस्य छिन्दन्ति' 'सत्सलेन हि दैतेया' इत्यादिवाक्यः सापकत्वमार्गानुकूलत्वातीस्तत्र तया- स्वभ्रमं पारयितुं फारकृतं सत्सु दोपं बदन्त आहुः अहवारत्यादि । अहङ्कारविमूढेषु सत्सु पापानुवर्तिषु । लाभपूजार्थयरनेषु कृष्ण एव गतिर्मम ॥ ४ ॥ अनाहाणां कर्तृत्व'इत्यनेन तद्वपरीत्यै सप्तमी । कलौ सत्सु मार्गमचारकेषु पुरु- पेष्वहङ्कारेण स्वपाण्डित्याभिमानेन विशेषतो मूढेषु सरसु । तयात्वे गमक्टूपमाहुः पापेत्यादि । पापाः पापारो राजसारतामसाथ म्लेच्छादयस्तदनुवर्तिषु तदुपजीवि केषु । अफरादेः पंसा अनुत्तिवदनुवतित्येप्यदोप इति तयाटम्यर्थं विशेषणान्तर लामे- त्यादि । लाभो द्रध्यादेः, पूजा उन्नति, अर्थशब्दो इन्द्रान्ते श्रुत: मत्येकं सम्बध्यते, तेन तदर्थ यत्नो बाह्याभ्यन्तर उद्यमो पेपामिति । एतवयं विमूढत्वज्ञापकम् । तपाप मार्गप्रचारकेश्वेतादृशेषु जातेषु सतामभावात्सङ्गो दुरापास्त इति सर्वमार्गेपु नष्टेषु कृष्ण पवेति पूर्ववत् ॥ ४ ॥ अतः परं सतां दुर्मिलतया तदपेक्षया मन्त्रमाधमनपादेः स्वमात्रसाध्यतयान्तर. नात्वाचन च 'परिहारयापि वेदास्त्रीन् कर्माणि विहितानि च । गायत्रीमापाश्रित्य द्विनो पाति निर्भयः' 'गायत्रीहीनवेदास्तु साङ्गा अपि च निष्फला:' 'सर्वेषु वर्णेषु तथाश्रमेषु नारीपु नानाद्वयनन्मभेषु । दाता फलानामभिवान्छिताना दागेर गोपाल कमन्त्र एप' इत्यादिवाक्यस्तत्तन्मन्त्राणां नपात्वनीवेस्तेषु तथात्वभ्रमं वारयितुं तत्रापि कालेन दो बदन्त माहुः-अपरीत्यादि । अपरिज्ञाननष्टेषु मन्त्रेवव्रतयोगिषु । तिरोहितार्थदेवेषु कृष्ण एव गतिर्मम ॥ ५ ॥ अपरिक्षाननष्टेप्विति । प्रापि पूर्वपदनुपको भारलक्षणा सप्तमी च । मन्त्रस्य च परिज्ञानमित्येकादशे भगवद्वाक्यात्परिज्ञानेन मन्त्रशुद्धिः । परिझानं नाम गुरूपसत्त्यादिना विधानन्यासपागतात्पर्यविनियोगादीनां निरस्तदभावोऽपरिज्ञान, वेन नष्टेषु । स्वरू- पस्प श्रावणत्वेपि शुदयभावेन 'उत वः पश्यन्न ददर्श वाधमितिवदृश्यमानेषु । कवि- स्कस्यचित्परिशानदर्शनादोपान्तरमाहुः-अप्रतयोगिप्विति । अत्रता घटयोऽशौचा' इतिद्वादशस्कन्धे कलिधर्मपूक्तमयोपाकरणदशायामेव गुरबुलावासब्रह्मपर्याध्यपनधर्म- परिपालनामावादनतेपु योग सम्बन्धो येा तादृशेषु । तेन दोपानरमायाः तिरो-
श्रीमहनराजचरणविरचितविवरणविभूपितम् ।
हितार्थदेवेचिति । तिरोहितावातीपपानौ अर्थः प्रयोजनं तात्पर्य च देवोधिष्ठानी
देवता तो येषाम् । 'य एनं शुष्क स्याणौ निपिञ्चेजायेरछाखाः परोहेयुः पलाशा.
नी'त्यादिश्रुतिपभृत्युक्तनिदर्शनव्यभिधारेग तदुभयतिरोभावस्य स्फुटत्वान्न तेपामिदानी
सायकत्वं न वा मार्गानुकूलत्वमतः कृष्ण एवेति पूर्ववत् ॥ ५॥
अतः परं मन्त्रापेक्षयापि स्वपर्याणां बतानामाचारस्य च पूर्वोक्तदोपाभावेन
सुकरत्वेन चान्तरजत्वातच स्वधर्मस्थो यजन्यज्ञैरनाशीः काम उद्भव ान याति स्वर्गनाको
यद्यन्यन समाचरेत् इह लोके वर्तमानः स्वधर्मस्पोनयः शुचिः । ज्ञान विशुद्धमामोति मद्भक्ति
च यदृच्छयेत्येकादशस्कन्धीय: 'केदारे उदकं पीत्वा पुनर्जन्म न विद्यते' 'नया चैकादशी
धेका गर्भवासक्षयङ्करी । एकादशीसम पुर्य न भूतं न भविष्यतीत्यादिभिः पुराणान्तरी-
यैर्भगवद्वापराचारप्रभवो धर्मो धर्मस्य प्रमुच्युत' इत्यादिभिारतीयत्र वारपैर्धनता-
दीनां सापकत्वादिपतीतेस्तेषु तथात्वभ्रम वारयितु तेवपि कालेन दोर्ष बदन्त माहुः
नानेत्यादि।
नानावादविनष्टेषु सर्वकर्मवतादिषु ।
पापण्डैकप्रयत्नेषु कृष्ण एव गतिर्मम ॥ ६ ॥
नानाप्रकारका ये वादा; स्वरूपफलादिविषयकास्तविशेपेण स्वरूपेण फला.
दिना च नटेपु तिरोहितेषु । तत्र सरूपतो नाशो घेदवाह्याना चादात् । 'पावजीये.
रसुखं जीवेट' 'अग्निहोत्र त्रयीतन्त्रं त्रिदण्ड भस्पपुण्डूकम् । प्रज्ञापौरुपनिःस्वानां
जीवो जल्पति जीविका' इत्यादिरूपान् । फलतो नाशस्तु यर्यकादशीनतादौ 'शुक्रेण
मोहिता विप्रा दैत्यानां कारणे भुवि । तुष्टयथै दशमीविद्धं कुर्वन्ति मम वासमिति
माये 'पुरा देवपिगणः स्वपदच्युतिशङ्कपा । सप्तमीरेधनालेन गोपिनं चाष्टमीवत' रिनि
स्कान्देन्यन च निभनिन्दादेवस्वरूपनिर्गयस च विद्यमानत्वेपि तदनाहत्य
स्वस्वाग्रहेण वाक्याभासापायाभासाथ समुदाहृत्य निर्णयन्ति, सादृशस्थले बोध्यः । एवं
स्वधर्माचारयोरपि विपतिपल्या कलतो नामो बोध्यः । वादे प्रयोजकमाहुः पापण्डेति ।
पापण्डेन दम्मेन एकोपःप्रयत्न उद्यमो येपायिति । स च 'वेश्यावेदम सीधुगरिल.
लनावयासपामोदितैनात्वा निर्भरमन्मयोत्सरसरुन्निद्रचन्द्रक्षपाः । सबझा इति दीक्षिता
इति चिरात्मासागिहोगा इति ब्रह्मज्ञा इति तापसा इति दिरा धूर्तजगाच्यते'
इतितो यः । अत एवं भूयोदर्शनात्स्वधर्मवतादीनामपि न स्वतः साधकरवं न का
मागानुकूलतमतः कृष्ण एवेति पूर्ववत् ॥ ६ ॥
- कृष्णाश्रयस्तोत्रम् । एवं परिभक्यादिमाणी दुःसाध्यताशापनाय कालकृतर्वसन्मार्गनासबोधन- मुखेनाश्रयणस्योपापलं साधितम् , तदिदं तदा दृढीभवति यदा भगवानाश्रिते समा. हात्म्यमनुभावयति तदर्थमाहुः अजामिलादीति । अजामिलादिदोषाणां नाशकोऽनुभवे स्थितः । ज्ञापिताखिलमाहात्म्यः कृष्ण एव गतिर्मम ॥७॥ अजामिलादीति। अजामिल: षष्ठस्कन्धे प्रसिद्धो दासीपतिब्रह्मरन्युः। आदि पदेन गजेन्द्राहल्याद्या, नृसिंहपुराणे नवमाध्यायै मार्कण्डेयमृत्युमस उक्ता नारकिणश, तैपां ये दोषा इहजन्मनि पूर्वजन्मनि च कृतानि पापानि तेषां नाशकः । एतेन तादृश- माहात्म्ये तदनुभावने च शन्दः प्रमागमुक्तम् । प्रत्यक्षमाहुः अनुभव इत्यादि । अनु- भवेऽस्माकं स्थितो विषयीभूतो ज्ञापितसमग्रमाहात्म्यः, एतेन प्रानस्य मायातरणे सति प्रतिबन्ध काभावात्स्तयकामे माहात्म्यं गोचरीभवतीति शापितम् । ततष पूर्वका शन्दे श्रीमदाचार्यचरणोक्तौ वोभपत्र वा विश्वस्य भगवदाश्रयणे भगवानेव साधनान्तरापेक्षा विना सर्व ज्ञापयंस्तवोचरो भवतीति सूचितम् । कृष्ण एवेति पूर्ववत् ॥ ७ ॥ एपन शब्दमत्यक्षाभ्यां पूर्वोक्तश्रुतिब्रह्मवैवादिरीत्या भगवानेर पुष्टिमार्गी- याणां साधन मिति साधितमतः परं पूर्वोकश्रुतिगातीयतन्त्रोकरीतिकं भगवतः फलतं साधयन्ति प्राकृता इत्यादि। प्राकृताः सकला देवा गणितानन्दकं वृहत् । पूर्णानन्दो हरिस्तस्मात् कृष्ण एवं गतिर्मम ॥ ८॥ देवा-अष्टी वसव, एकादश रुदा, द्वादशादित्पा, इन्द्रा, मनापतिश्चेति त्रयसिशत्- चा, 'भग्निरवमो देवानां विष्णुः परमस्तदन्तरेणान्या देवता इत्यात्यादयो विष्ण्वन्तापत्र विष्णुः काला, 'स विष्ण्याख्योधिपलोसौ काल: फलयतां वर' इतिवाक्यातदना था। कारं ब्रह्माणं नाभातुकारं विष्णु हृदये पकार रुदै भूमध्य इति प्रणवपात्राधिष्ठानारो विश्वादयो वा प्रनापत्यन्ताः, शतानन्दिनो वा तेि सकला: कला अंधस्तत्सहिनाः, सर्वे माता, प्रतिमाया मायां तु प्रकृति विद्यादितिश्रुतस्तदधीनाः । कालस्य सोम- फदया गुणानुरोधित्वेन गुणाधिष्ठातृणापभिमानिन्येन चमात्तम् । वृहदारं गणिता. नन्दक, गणित: स एको पानुप आनन्द' इत्यारभ्य शनानन्दिनां गणने 'स एको ग्रमण मानन्द' इत्युत्तरावधौ ब्रह्म गणितम्, अत एवमलयात आनन्दो यत्र, स्वायें कस्तारशम् । तेन तुरीपकोटिनिविष्टा ओंकारं सर्वेश्वरं दादशान्त इत्याधुका गुणातबारा अपितर मविशन्तीतियोपितम् । हरिर पुरुषोचमोऽक्षरासानः परः स उत्तपः पुरुषः। ..
श्रीपट्टजराजवरणविरचितविवरणविभूषितम् । 'अतोऽसि लोके वेदे च मथितः पुरुषोतम इत्यादिश्रुतिस्मृतिमतिपायः । पूर्णानन्दः शतानन्दसङ्ख्याने ब्रह्मानन्दस्य सर्वपरत्वेन गणनया मनोवाग्गोचरतामेव प्रतिपाद्य सदुत्तानुवाक 'यतो वाचो निवर्तन्तेाप्य मनसा सह । आनन्द ब्रह्मणो विज्ञान विवि कुतयने तीतिश्रुतावानन्दस्य मनोवागगोचरत्वकथनेन तदपेक्षयाधिक्यानवधित्वस्य च बोधनाचया । तस्मादानन्दे निरवधित्वस्यैव परमफलतावच्छेदकत्वेन तस्य चात्रैव विश्राः कृष्णः पूर्वोत्तरीतिका पम परमफलरूपोस्विवि पूर्ववत् ॥ ८॥ एचपष्टभिर्भगवत्स्वल्पविचारणाश्रय एव सर्वथा साधको न वन्यः कोपि मार्गः सापक इति साधितम् । अतः परमाश्रयस्पापि सागस्यैव सापकता सिकधैर्याश्रये सिद्धेति तदद्गाभावेऽपि यथा स फलं साधयति तनुपायं वदन्त आहुः विवेकेत्यादि । विवेकधैर्यमत्यादिरहितस्य विशेषतः । पापासक्तस्य दीनस्य कृष्ण एवं गतिर्मम ॥९॥ सर्वदुःखहर्ता भगवान् स्वेच्छातः सर्वे करिष्यतीत्येतद्विचारपूर्वकमनुसन्धान विवेकः। सात्तिकादीनां कायिकादीनां मौलिकादीनां त्रिविधदुःखानां प्रतीकारानाचरणेनोपेक्षणं धैर्यम् । माहाल्पज्ञानपूर्वका सुदृढा स्नेहो भक्तिर्नवविधा च । आदिपदेन तदहानि । साङ्के मानकरणी च । ते रहितस्यैवेन पावत्साधनराहित्य सूचिनम् । बाघकसचामाहुः विशेषत: पापासक्तस्येति । आसक्तिः सङ्गातिशयोपरिहार्यःमङ्ग इति यावत् । एता- वता नराणां क्षीणपापानां कृष्णे भक्तिः प्रजायत' इतिवावयस्मारणाद्भक्षुत्पत्तौ प्रति. पन्धकमपि सूचितम् । एवं बाधकद्वयसद्भावेऽपि येनाङ्गेनाश्रयस्य सिद्धिस्तदाहुः दीन- स्येति । एवं साधकामाचापकसभावाभ्यां जातया म्लान्या दीनस्य । दोर्गत्यादेरनो. जस्व दैन्यम् । अनोनम एतादृशस्य कृष्ण एवेति पूर्ववत् । एवंपकारिकाया ग्लानेर- सतां दुरापत्याद सतां मार्यादिकानां ग्लानौ साधनान्तरेषु मचेरत्र तु वाशग्लानि. प्रपतिभ्यां तदुभपविलमगतया 'सोई तबाही'त्यत्रोक्तानुग्रहस्य स्वस्मिन्कारणत्वेन सचा झाप्यते । एतादृशस्यापि फलसिदिगीतायां मां हि पार्य व्यपाश्रित्य 'अपि चेत्सुतारा- थार नया मापाता। भर पूर्वयात्तो पापली गतिका मनु पापकर्मपम, द्वितीय चानन्यभननेन पापकर्मणां साधुत्वमुक्तं, न त्वाश्रयेणेति नैतापमाश्रयेण सिदेर्गम- फमिति शङ्कर्ष, 'सकदेर मपनो यस्तयास्मीति व यो वदेत् । अययं सर्वश्तेभ्यो ददा- त्येतद्रतं इरेरितिगारुडाव, 'सकदेव अपनो यस्तवास्मीति व यो वदेव । अमयं सर्व- भूोभ्यो ददाम्येतहतं ममे विपुराणान्तरीपभगवद्वापार भगवतस्तादृशे ते निथिते ततो भगवदनुग्रहेणैव वत्र मवापि माहात्म्यज्ञानपूर्वकानेइस्यैव दारलनियादनन्य-
४६
कृष्णाश्रयस्तोत्रम् ।
माक्वसिद्धया, द्वितीयस्पा'नित्यममुखं लोकमिमं माय मनस्व मारिति मननशेषनया
निरूपितत्वेन प्रयमस्य चाअस्यात् । अतो नार कोऽपि चोद्यावसरः ॥ ९ ॥
एवं नवभिनिवेकधैांश्रयान्योक्ताहाभावेप्येतदुक्तरीतिरुदैन्येनाप्याश्रयसिद्धिरिति
वोधितम् । अतःपरमैतस्याप्यतस्याभारे द्वारा साधनान्तरमाहुः सर्वसामथ्र्येत्यादि ।
सर्वसामर्थ्य सहितः सर्वत्रवाखिलार्थकृत् ।
शरणस्थसमुद्धारं कृष्णं विज्ञापयाम्यहम् ॥ १० ॥
'परास्य शक्तिविविधैव श्रूयत' इत्यादिश्रुतिभिः कर्तुमकर्तुमन्यथा च पारन्ति
सामर्थ्यानि तत्सहितस्तदुत्पादित मनामिलादीतिपद्येन । एतस्यैवानन्दस्यान्यानि
भूतानि मात्रामुपनीवन्ति' एप होवानन्दयाती'त्यादिश्रुतिभिः सर्वत्र देशेषु जीवेषु
चाखिलानां कृत 'आकेस्तच्छीलतद्धर्मसाधुकारिवित्यनेन ताच्छीये कि कना ।
एकादृशं कृष्णमहं जगदुद्धारार्थमाइलो वैश्वानर आचार्ययः शरणस्थानां शरणमार्गर
तिनां समुद्धारं सम्पन आजसमार्गमाप्यपरमफलपर्यंतमुद्धारं विज्ञापयामि । सापानाधि-
करण्यादध्याहारानाक्रमाच अपमान्तद्वपपईपदस्यैव विशेषणं वा । तयाच वाददैन्या-
भावपि मयि विश्वासेनेतच्छरणमार्गस्थितौ श्रीपदावार्यवरणापास्माकमुद्धार इति
निश्चयदापि वकृतं साधनान्तरमनपेक्ष्य पदिशापनादेवोदरिष्यतीत्यर्थः ॥१०॥
अतः परमेतनिधयदाउगम बदन्तो विज्ञापनपकारं वरूपं चाहुः कृष्णा.
श्रपमित्यादि।
कृष्णाश्रयमिदं स्तोत्रं यः पठेत् कृष्णसन्निधौ ।
तस्याश्रयो भवेत् कृष्ण इति श्रीवल्लभोत्रवीत् ॥ १९ ॥
कृष्ण आधीयतेनेनेति, कृष्णा आश्रयो विषयो यस्येति वा कृष्णाध्यम् ।
आश्रयपदस्प विषपवायकवं मल्हादचरिने 'पचत्र गुरुणा मोक्तं श्रध्रुवेनुपपाठ चान
साधु मनसा मेने स्वपरासट्टहाश्रयपिसि सामेऽन्यत्र च मसिद्धम् । एतददनापक-
मिदमुक्तं स्तोत्रं यः कृष्णसन्निधौ अगरविरुदै पठेत् तस्य कृष्ण आभगः सहायो
भवेत् । इतीनमर्थ श्रीवल्लभोऽत्रवीदुक्तानिति । तयाचामतसाद एव पूर्वोक्तनिश्य-
दार्थगमक इत्यर्थः । एवं च विवेकपर्याप्रयोक्तरोतिकविवेकादेरमा दैन्यपूर्वस्यैवनस्तो-
प्रार्थानुसन्धानपूर्वकं भगवत्सनिसावेतरस्तोत्रपाठः । ताप्पनधिकारे श्रीपदाचार्यवरण-
विश्वासपूर्वक पावत्सनिधौ पाठ इति सापना मानसावनिक वसाचनिक-शरणा-
गतिरूपं निर्दिष्टम् ॥ ११ ॥
४७ श्रीमद्रजराजवरणविरचितविवरणविभूषितम् । ईदै प्राचां रीतिमनुसृत्य व्याख्यातं, मम त्वन्पोप्यर्थः स्तोत्रस्य प्रतिभाति । तथाहि-अयं मागोऽविहितमफिरूपः, अत्र भगवान् रसात्मकः पतिपत्रः । एवं सति तदधिकारिष्वेव मन्दमध्यमविचारेणात्र साधनोपदेशो वक्तव्यः । अत एव विवेक- धैर्याश्रयसमाप्तौ भक्त्यादिमार्गा' इत्युक्तम् । अन्यथैकादशे 'योगास्त्रयो मये' रपत्र 'ज्ञानं फर्म च भक्तिश्चेति त्रितयान्ते निवेशिताया भक्तरादित्वकथन विरुद्ध स्यात् । अतोत्र भक्तिपदेन तत्परामनः कि स्वथैतपरमं गुहामि त्यत्रोक्तायाः । तयासति सा भक्तिरादिर्येपी, ताशा ये मार्गा अविहितभक्तरेव प्रकारभेदा बालादिभावेन भजनरूपास्तै यतो दुःसाध्या इत्ययों भवति । एवं सति तत्र सवानधिकारे विवेकधैर्याश्रयोक्तीतिक आश्रयः, अत एष 'स्वाम्पभिमायसंशयात्' 'गोपमार्यवत्' इति स्वामिपदं तदृष्टान्तय सङ्गतौ भवतः । अतः परं तत्राप्यनधिकार इदं स्तोत्रपठनमपि तस्यैवानुकल्परूपम् । एतन्मार्गपविष्टाना- मतिजयन्यतमाधिकारिणामेतन्मार्गफलसम्बन्धो यया प्रणाड्या भवति तामनुसन्धायास्यो- क्तत्वात् । तदर्थ स्वस्वरूप भगवत्स्वरूपं च वक्तव्यम् । तत्र भगवत्स्वरूपं सूक्तमेव । किश्चाभेदवादानुरोधेन रसस्वरूपविचारे रसालम्बनद्वयाभिन्नरसात्मा स्वयं भवति । उपबृहित चेदं ब्रह्मवैवीय श्रीकृष्णजन्मखण्डे गर्गवाक्येषु-'वर्धते सा बजे राधा शुरु चन्द्रकला यथा । श्रीकृष्णतेजसोधेन सा च मूतिमती सती' 'एका मूर्तिद्विधा भूता भेदो वेदे निरूपितः । इयं स्त्री स पुमान् किं वा सा वा कान्ता पुमानयमिति । 'पिताहमस्य जगतो मातेति गीतायां च । तथासत्याचार्याणामपि 'वैश्वानराद्वारपते.' 'वस्तुतः कृष्ण एवेति च वाययद्वयविचारे पूर्वोक्तरीत्योभयमुखारविन्दात्मकत्वमुभयात्मकरवं च सिद्धयति । किञ्च, सप्तश्लोक्यां सर्वोत्तमे च 'श्रीमागवतमतिपदे'त्यादि 'तत्सारभून- रासस्त्रीभाषपूरितविग्रह' इति चोक्तम् । एवं स्वरूपे निश्चिते यदा यद्भावेन यान प्रति यथा वदन्ति तदा तदधिकारिणः प्रति तानि साधनानीति पुंस्तोत्रमध्ये न्याख्यायते तदापि न दोपः । तयासत्यस्यार्थस्प गुप्ततया भगवतः परोक्षाप्रियत्वेन चात्र परोक्षवादालक्षणा- प्यदुष्टैच । ततधायमर्थः । तथाहि सर्वमार्गेपु सख्यादिभोक्तेषु भगवत्मात्युपायेषु नष्टेषु तदमापफतया स्वान्तःकरणेऽनुपायतया भातेषु । खलोन्तर्दुष्ट प्रूपो धर्मों यस्मिंस्तार कलौ कलहे स्वसमानेषु स्वस्मिन् कृपातिशयरूपातिविषयके नष्टे हृदयादपयाते | चका- रेण फलहादेरपि नष्टत्वं ज्ञाप्यते । पापण्डः कलहजननकारणरूपो धर्मः प्रचुरो यस्मिस्ता- शे लोके सख्यादौ चारश्यमाने । विरहेण तेषु दोपारोप स्तस्याधमस्पान्तिकमित्यादि- वत, अतो न दोषः । एवं सति दु:खितस्य मम कृष्ण सदानन्दस्तादृशतापेहदि विभा. व्यमान एव गतिहिापासौ साधनरूपो भववित्यघ्यावा मार्थना ) अौवं सर्वसाधन- १ अत: पर भीत्रजराजपादाः प्रमेयमनुसृत्य विग्वन्ति स्तोत्रमिदम् ।
४६
कृष्णाभयस्तोत्रम् ।
मात्वसिया, द्विनीपस्या नित्यममुख लोकमिमं प्राप्य भजस्व मामिति भजनशेषनया
निरूपितत्वेन प्रथपस्य चानस्यात् । अतो मार कोऽपि चोथावसरः ॥ ९ ॥
एवं नवभिनिवेक,यग्रन्थोक्ताहामायेप्येतदुत्तरीविकदैन्येनाप्याश्रयसिद्धिरिति
योधितम् । अतःपरमेवस्याप्यङ्गस्याभावे द्वाभ्यां साधनान्तरमाद्वा सर्वसामर्येस्पादि ।
सर्वसामर्थ्यसहितः सर्वत्रैवाखिलार्थकृत् ।
शरणस्थसमुद्धारं कृष्णं विज्ञापयाम्यहम् ॥ १० ॥
परास्य शक्तिविविधैव श्रूयत' इत्यादिश्रुतिभिः कर्तुमा पन्यया च पारन्ति
सापांनि तत्सहितस्तदुपपादित मनामिलादीतिपरेन । 'एतस्यैवानन्दस्यान्यानि
भूतानि मात्रामुपनीवन्ति' 'एस खेवानन्दयाती'त्यादिश्रुतिभिः सर्वत्र देशेषु जीवेषु
बाखिलार्यानां कृत् 'आकेस्तन्छोलतद्धर्मवसाधुकारिवि'त्यनेन तान्छील्ये किए कता ।
एतादृशं कृष्णमहं जगदुद्धारार्थमातमो वैश्वानर भाचार्षवर्यः शरणायानां शरणदान-
तिनां समुद्धारं सम्यक् आजप्तमार्गप्राप्यपरमफलपर्यंतसुद्धा विज्ञापयामि । सामानाधि.
करण्पाद्ध्याहारानाक्रमाच प्रथमान्तयमपदस्यैव विशेषणं चा । तपाच तादृशदैन्या-
भावपि मयि विश्वासेनैतच्छरणमार्गस्थितौ श्रीमदाचार्यचरणकृपयुवास्माकमुद्धार इति
निक्षपदापि तत्कृतं साधनान्तरयनपेक्ष्य मद्विज्ञापनादेवोद्धरिष्यतीत्यर्थः॥१०॥
अतः परमेतनिश्चयदादर्घगमकं बदन्तो विज्ञापनमकारं रूपं चाहुः कृष्णा
अपमित्यादि।
कृष्णाश्रयमिदं स्तोत्रं यः पठेत् कृष्णसन्निधौ ।
तस्याश्रयो भवेत् कृष्ण इति श्रीवल्लभोनवीत् ॥ ११ ॥
कृष्ण आधीयतेनेनेति, कृष्ण आश्रयो विषयो यस्येति वा कृष्णाश्रयम् ।
आश्रयपदस्य विषयनाचकत्वं भल्हादचरित्रे 'यत्तत्र गुरुणा प्रोक्तं श्रभुपेनुपपाठ च । न
साधु मनसा मेने स्वपरासट्टहाश्रयमिति सप्तमेऽन्यत्र च प्रसिदम् । एतदपर्यनामक
मिदायुक्तं स्तोत्रं यः कृष्णसन्निधौ भगवन्निकटे पठेत् तस्य कृष्ण आश्रयः सहायो
भवेत् । इतीसमर्थ श्रीवल्लभोऽब्रवीदुक्तवानिति । तयाचयमेतत्पाठ एव पूर्वोक्तनिश्य-
ददगमक इत्यर्थः । एवं च विषयोंश्रयोक्तरीतिकवियेकादेरभावे दैन्पपूर्वकमेवेतरस्तो-
वार्थानुसन्धानपूर्वकं भगवत्सन्निधावेतरस्तोत्रपाठः । तत्राप्पनधिकारे श्रीपदापार्यवरण-
विश्वासपूर्वकं भगवत्सलियों पाठ इति साधनपं मानसायनिक केपलवाचनिक-शरणा-
गतिरूपं निर्दिष्टम् ॥ ११॥
श्रीपद्वजराजवरणविरचितविवरणविभूषितम् । पिकविलापस्थलोकोक, वेन नष्टेम्वसाधफवया वैशतिषु । अत एव अवतयोगिषु शान- गोचरत्वेपि नपादिनियपायोगिषु । तत्रापि हेतु:-तिरोहितार्थदेवेषु तिरोहितः अविषयः अर्थोभिधेयो देवोधिष्ठाता च येषां तादृशेषु मन्त्रेषु व्रतवर्यामासनिक-मुख्य- महिपीमासशिक-समर्पणादिमासनिकेषु सरसु। कृष्ण एवेवि पूर्ववत् ॥ ५॥ अतः परं तखोप्यतितापाधिक्येन स्वस्थाशक्ति घोतपन्तः कर्मादिनाशमाहुः- नानेत्यादि । मानाप्रकारका वादा नानावादास भावान मथुरायामेव पुरवनितादीनां काम वर्षपति, जरासुतादिभिर्युष्यति, द्वारकायामुज्जयिन्यां माज्योतिपपुरे इन्द्रप्रस्या- दावेवमेवं फरोतीत्यादिलोकोक्तिरूपाः, श्रीमदुदवानीतसन्देशादिनत्संवादादिरूपा वा, तैविनष्टेपु अक्रियमाणेषु सर्वेषु गृहादिकर्मभगवद्रतादिषु । किञ्च, पापण्डः कापश्यं, तेनैको पुरुपः प्रपत्नो पहिल्यमो येषां यत्सम्बन्धी । तयाच तादृशेष्वेतगोपनाय लोकिकवैदिकविहितमार्यादिककर्मभगवहतादीनामुयम एव न तु मनस्तस्तस्कृतिस्पीति सादृशेषु तेषु सत्सु, 'धारयन्त्यतिकृच्छ्रेण पापः प्राणान् फपञ्चनै स्वादशावस्याप कृष्ण एवेति पूर्ववत् ॥ ६॥ एश्मतिशयिततापे भगवानन्तरमादुरसूचतस्तयावस्थपाहुः-अजामिलादीति । आमि आलस्यं 'जामि वैतधनस्य क्रियते यदनचौ पुरोडाशावित्यादिश्रुतौ तया- सिदत्वात् 'आत्मा यावत्मपनोभूदित्यत्रेवात्र परोक्षवादे वैदिकमयोगल्यादोषाच । न जामि अजामि अनालस्यं तेन लान्ति गृह्णत इत्यमामिला:, आदिपदेन जामिला । तणसंविधानः । शैध्येण विलम्वेन च भगवद्विषयोजका इदि गावद । तथाच तादृशा ये दोपा पानादय आज्ञापकरणादयश्च तेषां नाशकः । अनुभवे मानसे साक्षिप्रत्यक्षे च स्थितो गोचरीभवन् । ज्ञापिताखिलमाहात्यः ज्ञापितमखिलं समीक्षाभावादि मथुराद्वारकास्थित्पादि सचल्लीलादितात्पर्य विषयक सर्व माहात्म्यमुस्कपः परोक्षमनना. विस्मरणानिमियत्वस्पो येन तादृशः । कृष्ण एवेति पूर्ववत् । एतेन योग्यतमानामप्ये. सादृशताप एव प्रादुर्भाव ईशो न त्वन्यपेति । अन्यथा सन्यथेत्यापि चितम् ।। ७ ॥ माहाल्मं यज्ञापितं तन्मध्ये यदनोपयुज्यते तत्सकटोकुन्त आहुः-प्राकृता इत्यादि । प्रकृो रसमार्गे भवा विद्यमानाः माकृताः । सकला, फला भगवदनुरञ्जन- चातुर्षे तया सह वर्तमानाः । देवा भगवता सह क्रीडापराः । किञ्च, वृहदक्षरं गुहायां परमे व्योमन्याविभूतं ब्रह्मा गणितानन्दकं, गणितः श्रुतौ सहयात आनन्दो येषां मनापरयन्तानां यतीनां वा, तेषामेव के सुखं यस्मादिति वाशि, नतु स्वस्मिन् स्थिति- मात्रेण सकळवेवानां सुखदम् । तथा पूर्णानन्दः फर्प पारयेण बावीदिणा च हरिः ४८ कृष्णालयस्तोत्रम् । वैफल्यबोधनेन स्वस्याविखेदः । एवकारेण वाशसमये 'हरुदुः सुस्तां रामनिला फलमकरण इव भगवतः प्राकव्यावश्यकलं च धोत्यते । एवमपि बोध्यम् ॥ १॥ अतः परं भावन्मिलनस्यानभूतानां देशानामप्यनुपायत्वमा:-म्लेच्छात्रान्ते. त्यादि । म्लाना रसमार्गविरोधिनीच्छा येषां ते म्लेच्छा एतद्रप्तानभिज्ञास्तदेशेषु वृन्दार नादिष्वाकान्तेषु । किन, पापैकनिलयेषु । पातीति पः स्थायिभावः सः अपः अक्षरको पासौ पापो रिहः सन्तापातिशपजनकत्वात् , तदेकनलियेषु 'सोय वसन्तसययो विपिनं तदेतत् सोय निकुञ्जविषी निखिलं तदास्त । हा हन्त इन्द नवनीरइकोमलाको नालोकि पुष्पधनुपः प्रथमावतार' इसिवनरोधकत्वेन तदेवस्थानेषु । पोवधारणे । वैन पूर्वमवयात्वमनभिज्ञसम्बन्पेन क्यास्वमिति झाप्यते । किन्च, सतः शरीरस्य या पीडा तया व्यग्रा लोकाः स्वीयैकान्तमाता येथे 1 पताशेजसरे कृष्ण एरेति पूर्ववत् ।। २ ॥ अतः पर तादृशां तीर्यानामप्यसाधक्सपाहु:-गक्रेत्यादि । इह बन्दावनादिदेशे गङ्गा सितासित सरित यन सङ्गत' इति श्रुतौ तस्याः पूर्व पवित्वासादिया मा गगादिः, यमुनातत्समृतीनि तीर्थवाणि पदविशेषाचन्द्रसरोबरीण्डाया, 'नरस्तदं' सत्रोक्ता नयच, तेषु दुष्टैरेतबाराहित्येन दुष्टैरेवाहतेषु च्यातेपु । किञ्च, तिरोहि- ताधिदधेपु । तिरोहितमगोचरमधि उपरि देवं 'देवं दिष्टं भाग भाग्पमिति फोसादस्मद्भाग्य, त्रैलोक्लयेरुपदं वपुर्दघ'धन। यदुपरि भागनिदानीं न इस्यते चिहानि सन्तीति 'श्रीनिकेतस्तत्पदफैविस्मर्तु नैव शस्नुम' इतिरदाधिकवाफ्ननकै- विति भावः । त्याचैतादृशावस्थायां कृष्ण एवेति पूर्ववत् ॥ ३ ॥ अतः परं सरसङ्गस्याप्यसायकलपा:-अहङ्कारेत्यादि । निन्दाया सत्र चापाविषयमेव वीन नतु तेषु दोपो बीजम् । अहङ्कारेणामदशो भगवानस्मतावित एवान्यत्र फलिप्पतीत्येवंम्प्रेण विमूढेपु स्तव्धेषु । किञ्च, पापानुवर्तिपु पापः पूर्वोत- रीतिको विरहस्तमनु लक्षीकृत्य वर्तन्त इति वया । तथाच पूर्व यश इदानीं तरपि सह नमिलतीति । तद्गमक लाभपूजार्थयत्नेषु । लाभो भगवत्मासिस्तदों पूजा गमपूजा तदर्य पान उद्यमो घेषाम् । पूर्व भगवत्माप्तये कात्यायन्यर्चिता पुनरिदानीपपि यत्क- वन्ति तेन सापते न पिरतीति । लीलाना नित्यलाचापेनासक्तिभ्रमवचदाविभावासे- प्वष्यमिलननिधयः । सत्सु पनामार्गगुरुम्वेतादृशेषु सत्सुक नसझेनेति कृष्ण एवेति पूर्ववत् ।। ४ ॥ अतः परं ततोप्यविलापेन गुरूणां हादै विचारयन्तो मन्त्राणामसाधरुवमार:- अपरीति | अ भगवान् तस्प परिज्ञान स्वभावलानं 'न नन्दमनु रितिपरथानसाम. * श्रीमद्नराजचरणविरचितविवरणविभूषितम् । पिकविलापस्यश्लोकोतं, तेन नष्टेष्वसाधकतया नैतेिषु । अत एव अवतयोगिषु ज्ञान- गोचरत्वेपि नपादिनियमायोगिषु । तत्रापि हेतु:-तिरोहितार्थदेवेषु तिरोहितः अविषयः अर्थोमियो देवोधिष्ठाता च येषां तादृशेषु मन्त्रेषु व्रतचर्यापासङ्गिक-मुख्य- महिपीमासनिक-समर्पणादिमासनिकेषु सत्सु। कृष्ण एपेनि पूर्ववत् ॥ ५ ॥ अतः परं ततोप्यतिवापाधिक्येन स्वस्याशक्ति द्योतयन्तः कर्मादिनाशमाहु:- नानेत्यादि । मानाप्रकारका वादा नानावादाः । भगवान् मथुरायामेवं पुरवनितादीनां काम वर्षयति, जरासुतादिभियुध्यति, द्वारकायामुजयिन्यां माग्ज्योतिपपुरे इन्द्रप्रस्था. दावेवमेवं करोतीत्यादिलोकोक्तिरूपाः, श्रीमदुद्धवानीतसन्देशादितत्संवादादिरूपा वा, तैर्विनष्टेषु अक्रियमाणेषु सर्वेषु गृहादिकर्मभगवद्रतादिषु । किञ्च, पापण्डः कापश्य, तेनेको मुख्यः प्रयत्नो बहिरुद्यमो येपां यत्सम्बन्धी। तयाच तादृशेष्येतद्गोपनाय लोकिकवैदिकविहितमार्यादिककर्मभगवद्रतादीनामुद्यम एव न तु पनस्तस्तकृतिरपीति सादृशेषु तेषु सरसु, 'धारयन्त्यतिकच्छेण प्रायः माणान् फयश्चने त्येतादृशावस्थायां कृष्ण एवेति पूर्ववत् ॥६॥ एवपतिशयिततापे भगवानन्तःमादुरभूततस्तयावस्थयाहुः-अजामिलादीति । जामि मालस्यं 'जामि चैतद्यन्नस्य क्रियते यदन्वश्चौ पुरोडाशावि'त्यादिश्रुतौ तथा- सिदलात् 'मामा यावत्सपनोभूदिस्यत्रेवान परोक्षवादे वैदिकमपोगस्यादोपाच । न जामि अजामि अनालस्यं तेन लान्ति गृह्नत इत्यमामिला:, आदिपदेन जामिळाश्च । तद्गुणसंविज्ञानः । शैध्येण विलम्बेन च भगवद्विषयोजका इति यावत् । तथाच तादृया ये दोपा मानादय आज्ञाद्यकरणादयश्च तेषां नाशकः । अनुभवे मानसे साक्षिप्रत्यक्षेच स्थितो गोचरीभवन् । ज्ञापिताखिलमाहात्म्यः ज्ञापितमखिलं समीक्षाभावादि मपुराद्वारकास्थित्यादि तत्तल्लीलादितापर्यविषयक सर्व माहात्म्पमुस्कर्षः परोसमजना- विस्मरणातिप्रियत्वरूपो येन तादृशः । कृष्ण एवेति पूर्ववत् । एतेन योग्यतमानामप्ये. ताशसाप एव प्रादुर्भाव ईशो न त्वन्ययेति । अन्यथा त्वन्यथेत्यपि चितम् ।। ७॥ माहास्पं यज्मापितं तन्मध्ये यदनोपयुज्यते तत्मकटीकुर्वन्द आहुः-प्राकृता इत्यादि । मकते रसमार्गे भवा विद्यपानाः प्राकृताः । सकलाः, कला भगवदनुरक्षन- चातुर्य तया सह वर्तमानाः । देवा भगवता सह क्रीडापराः । फिच, बृहदारं गुहायां परमे व्योमन्याविर्भूतं ब्रह्म गणितानन्दकं, गणितः श्रुतौ सड्ढयात आनन्दो येपां मनापरयन्वानां यतीनां वा, तेषामेव के सुखं यस्मादिति तादृशं, न तु स्वस्मिन् स्थिति- मात्रेण सकलदेवानां सुखदम् । तथा पूर्णानन्दः कर्म पारयेण बहुचीहिणा च हरित कृष्णाश्रयस्होत्रम् । देवानन्दतिरोभावहर्ता कृष्ण एव तस्मान्मम वयेत्यर्थः । तयावेतनमागी फल केल- परमानुग्रईकलभ्यमेवेति सपरिकरभगवन्माहाल्पं यद्भगवजापितं तत्सवितम् ॥ ८॥ एक्पनुग्रहस्य तत्फलप्य स्वकृतसायनासाध्यत्वेनुसंहिते पावस्या तपाहा-विवेके- त्यादि । विवेकः साधनतारतम्यानुसन्धान, धैर्य दुःखसहनसामथ्र्य, भक्तिः स्वशरीर- सेवा ) आदिपदेन तत्तत्सायनानि, है रहिवस्प । विशेषतोत्यन्तं पायेन पूर्वोक्तविता रमकेन असक्तस्य मुक्तसमतसङ्गस्स, अब एव दीनस्य तत एवानोगसः कृष्ण एवेति पूर्ववत् ॥ ९॥ एवमतितापेन परमदैन्ये भगवान् बहिःमादुभूतस्तदातिसन्तुष्टा जीवेषु मन्दमध्यः मेयेवं विलम्बाभावाप विज्ञापयन्ति सर्वत्यादि । अयोग्यपि योग्यतामागदर्न कमकर्तुमन्पयाकर्तुं समर्थस्यैव शक्पमिति ताशः सन् । ताशवस्प गमामौदार्यमिति सर्वत्रैवाहीकुनमात्रे अखिलार्थानां पुष्टिपुटिपोतरूपाणां कृत् ! करणशील ! कृष्ण ! पूर्वोक्तभूतिपुराणव्याख्यातरूप! । श्रीरशुनाषचरणैः कृष्णपदं सम्बुदपन्तत्वेन पाल्पा- समित्यस्माभिरपि तयोक्तम् । द्वितीयान्तपक्षेपि हिवन्तमेव । शरणरधानामेतन्मार्ग रीत्या शरणागतानां फटपर्यन्तमुदारं अहं भवदतुभारमकटनार्यानपावतीर्णः पिशा- यामि । एतेन स्वस्य विशपने भारतश्च तथोदार आवपाचा चिता ॥१०॥ विज्ञापना वदन्ति-कृष्णाश्रयमित्यादि । कृष्णारं स्तोत्रं श्रीरूप: क्वापि नीभाषपूरितत्वात् बल्लमो भगवतः भिय आचार्यगर्योनवोदिति, या पठेत् एवमनुसन्द. धानो योस्मद्विपयोगावस्यां ज्ञापपन् कृष्णसनिधी व्यक्तं ययपेत्तरप कृष्ण आभयो भवेदिदं विज्ञापन मित्पर्यः । स्तोत्रस्प मन्यात्वेनेदमा विनाप्पपसिद्धरिति, पदान्तरान पाहाराष, अत्र दुरान्वयोपदुष्ट एवं ! 'रिमुवात्मवर्नु घोरामित्युत्तो रिससर्जर। "सिसन तनु नां च पोल्मा शान्तिपति मिपा पित्पादौ मा एन सनुत्तेन पदहाराष श्रीरूपत्वोकावपि न दोष इति न कोपि शङ्कालेश इति । ययाधिकार स एव शश उपयुज्यन्त इति न कापि शालेय इति । दिव॥११॥ इति श्रीमाप्रश्टीकरमदुतम् । स्तोत्रं कृष्णाथपार वितं तत्प्रसादतः ॥१॥ इति श्रीमदल्लभाचार्यचरणकमलचरीकीदपामन्दात्मजश्रीज- राजविरचितं कृष्णाश्रयस्लीपियरगं समाप्तम् ।
श्रीकृष्णाय नमः। धीगोपीजनवल्लभाय नमः। श्रीमदाचार्यचरणकमलेभ्यो नमः कृष्णाश्रयस्तोत्रम् । विधरपासमेतम् । यत्कृपादृष्टिष्ट्येकबिन्दुस्पर्श रसाना । कृष्णलीलाधिना जन्तोन कदापि निवर्तते ॥१॥ ताने श्रीमदाचार्यचरणानाश्रये मुदा । तेनैव मम तद्वाक्यबोधो षोध्यो हिमायते ॥२॥ पुष्टिमार्गादिलीलामिः स्वानन्दं पूरपन्निजम् । स्वाभयं कुरुते यश्च तमई कृष्णपाश्रये ॥३॥ अपात्रायो देघा निरूप्यते मर्यादापुष्टिभेदेन । तत्र मर्यादया य आश्रयः स तु स्फुट एच सर्वत्र व्याख्याकः । पुधिमार्गीयस्तु गूदा, स च परोक्षकादेन साधनफलस्वरूप. निरूपणपूर्वकं निरूप्यते । तत्रापि कालादिपटसाधनानां फलासाधकत्वं वदन्त आप संभावयन्ति । एवं सति यादृशः पुष्टिमार्गीयाणामाश्रयस्तादृशोन निरूप्यते प्रकारसहित इत्परगम्यते । तथाहि प्रथमं परमकृपालः साक्षात् भगवान् स्वयं निरूपधिकरुणावता- खुष्टिफलदानेच्छया यं पृणुते तस्य तदारभ्य स्वत एयोद्धनसहजानुरागतो भगवत्सेवादों मधिर्भवति न तु तद्वयतिरिक्तधर्येषु । ततस्तादृशानुरागपूर्वकसेवादिकरणोडसित- प्रेमासक्तिणनितपुष्टिमार्गीयभाषाकुराणां भगवता सइ संलाए' इत्यायुक्तप्रकारकमा पनाया अवश्पसंभवाच्च तद्धर्मप्राकट्ये विमानीयसहानुरोधादन्तास्वरूपानुभवप्रतिबन्ध सति तदपेशाजनिताा भगवद्वयतिरिक्तस्य निर्ट शक्यत्वाच्छरणगतिरस्यत इति श्रीमदाचार्यवरणास्तत्स्वरूपनिरूपणपूर्वकं श्रीकृष्णाश्रयस्तोत्रं निरूपयन्ति सर्वेति । सर्वमार्गेषु नष्टेषु कलौ च खलधर्मिणि । पापण्डप्रचुरे लोके कृष्ण एवं गतिर्मम ॥ १ ॥ तारापुष्टिमार्गीयस्य सर्वे माग प्रमाणरूपाः मदियो नष्टाः, एक एव प्रमेयमार्य- स्तिप्रति, पतोपु फलवासापायुद्धयाऽचिरेवेवि तरणगकरणानष्टा पवेत्यर्थः । अथवा न प्रदर्शन प्रतिधात्वविचारेण मष्ठाताया। तेषां दर्शनशानयोरप्पेतन्मार्गे कृष्णा,यस्तोत्रम् । मतिवन्धकलादितिभावः । ननु भक्तानां कलिकाल सायको पवतीति निष्ठमार्गामा कयं तथात्वपिति पुष्टिमागीयाणां तस्य वाधकत्वमाहुः खलघमिणीति ! कालस्तु प्रमाणभूतः, प्रमाणं साक्षात्स्वरूप न कथयतीति तयतिरिक्तस्य सर्वस्य सदोपत्वमेवेति तन्नष्टत्वाद ग्वलो दुष्टो धर्मो धर्मकर्तापि योति । यद्यपि 'फलेदोषनिधे राजन् । कलि सभाजयन्ती'त्यादिश्चनैः फलेर्भगवद्भजनानुकूलत्वमुक्तं, तयाप्यधुनानवतारसामयिकत्ये. नाधिदैविकरूपत्वाभावात् पुष्टिमागीयान् प्रत्यानुफूल्यस्य नष्टत्वमेवेति नयोक्तम् । भौतिककाळस्य प्रमाणरूपस्पेन मर्यादोक्तविधिना नेपां भननं न पुष्टिरीत्या । फलमपि मुक्तिरेय न तोनिमकक्षापना। अत एव पापण्डप्रचुरे लोके इत्युक्तम् । धमिव्यतिरेकेण केवलधर्मस्य सोपाधिकत्वाचयोक्तमितिभाः। तानेर धर्ममार्णानुत्तरलोकेष्यसायकत्वेन वक्ष्यन्ति । एवं सति तत्तत्काले तत्तद्धर्मानाचरणे तेषां दोपबुद्धिरेवोलयत इति तत्समक्ष तत्तत्काले प्रमाणातिरिक्तं न कर्तुं शक्यत इति कालस्प भावोद्रोधे प्रतिवन्यकत्वादसाथ- फत्वं निरूपितम् । चकारागृहेपि तया । 'गृहे स्थिता स्वधर्मत' इतिवचनाचत्रापि सेवा- करणे क्रमेण स्नेहासक्तिजनितभावनाया जावयाचत्रत्यानां वदभावाचसझोत्य बाघको विजातीयभाववत्यादित्पर्यः। अथवा, एवं पुष्टिमार्गीपस्य कालतदुक्तमार्गाणां प्रतिबन्धकत्वं निरूप्य सस्य स्वधर्माचरणपकारमाहुः पापण्डेति । लोके पुष्टिमागीये पापण्डमबुरे सति तत्संसर्गेण भावापेक्षया दोषबाहुल्ये सतीत्यर्थः । यदा, पापण्डो नाम स्वान्तनिष्ठधर्म- गोपनेन पहिरन्यधर्मकरणं तदेव प्रचुरो यस्मितादृशे सति । यया न कोपि नानावि तथा कर्तव्यमापनमितिमावः । एवं सत्येतावत्प्रतिवन्धके विधमाने नत्संसर्गेण पूर्वोक्त- भावानामुच्छलितत्वाभावात्फलाभाव इति तादशस्य मतिरन्धनिरर्तकः समाद्भावानेव नान्य इति कृष्ण एवं गतिर्ममेतियरणमुपदिष्टम् । शरणं गते कृपया स एव सर्व करिष्यतीतिभावः ॥ १॥ ननु ताई भगवल्लीलाभदेशेषु गत्वा सपर्मनिषादा कर्तव्य इति पेचत्रापि मतिरन्ध- फवाहुल्येन देशानायसायकत्वेन शरणमेव निरूपयति म्लेच्छति । म्लेच्छाकान्तेषु देशेषु पापैकनिलयेषु च । सत्पीडाव्यग्रलोकेषु कृष्ण एव गतिर्मम ।। २।। पलिनपदार्थमेवेच्छन्तीति म्लेच्छा विपयिणो, मन्नायुपासकाम, कर्मशीगार । यपि तेऽनिपिई विहितमेव कुर्वन्ति तयापि स्वार्थपराः सीणे पुण्ये मर्त्यलोक विशन्ती- त्याधुक्या फर्मफलं मलिनभवति तत्पराणा न्यायेन निर्देश कृतः । तादृशस्त- राकान्ताः सर्वे प्रदेशा, अत एव ततल्लोलादीनां तिरोभावाम ते साका इतिभावः । स्वगृहं तु भगवदीयत्वादवलयेत्र किन्तु भावे वैमात्यमात्रेण वस्प बासमत्वम् । वाचवापि विवरणसमेवम् । यत्र प्रतिबन्धकत्वं सत्र देवलविण्याविष्टसम्बन्धिदेशसंसर्गेण भावनाशे किमु वकन्य- मिति कैमुतिकन्यायेनापि देशस्यासावकत्वं निलपितम् । किञ्च, न केवलमाक्रान्तिमात्र फिन्तु तन्मय एव जाता इत्याहुः पापैकनिलयेष्विति । कर्मणां हिंसामचुरत्वाशयोक्तम् । एतेन तत्र गमनमानेषण तत्सम्बन्धात्स्वधर्मनाशो भवतीतिभावः । एवं सति भगवतो पन्योपासनाचस्पृष्टत्वेनास्मिश्लोके मन्त्रोपासनवैदिकतान्त्रिकदीक्षार्थमानां सङ्काणा- साधकत्वं निरूपितम् । आदिपदेन विहितमक्यादीनामपि तथेत्यर्थः । ननु तत्रापि केचन निपिपरा भविष्यन्तीति चैतवाहुः सत्पीडेति । नितिपरत्वेन सद्रूपाणि तात्पानां देहेन्द्रियादीनि तेषां पीडा सत्पीडा, देशसम्बन्ध तानि विषयाविष्टान्येव भवन्तीति तनिग्रहाशक्यत्वानिचिपराणां खेदो जायत इति तद्रूपैव स्वधर्मनाशननिता पीडा, नया व्यमाः फयमस्माकं परलोकः सेत्स्यतीति व्यमा लोका धर्मशीला येषु । यत्र स्थूलदृष्टी- नामपि न धर्मनिर्वाहस्तत्रातिसूक्ष्मेक्षिकाणां लादृशानां भावशैथिल्ये किम वाच्यम् । तादृशानामपि स्थातुपशक्तरितिभावः । तथाचोकं 'अस्माक्ष्म तत्मभूति नान्यसमक्षमि'- त्युत्र विवरणे 'यया घ्यामाये देवाभिमानी'ति फलमकरणे । अतस्वनापोपणे मति- पन्धनित्य शरणमेव भावनीयमिति कृष्ण एवं गतिर्ममेरयुक्तम् । मत एमालौकि कमनासिद्धाविति विवेकधैर्यान्वयेप्युक्तम् ॥ २ ॥ एवं दुःसंसर्गेण देशानामसाधकत्त्वं निरूप्य तत्र भगवद्भक्ता अपि सन्ति ते समीचीनास्तै सह सहो न बाधक इत्याशय द्रव्याणामशुदया पुष्टस्य तेपामपि सङ्गो बापक इतीतरमार्गीपाणामसापकत्वमाः गङ्गादीति । गवादितीर्थवर्येषु दुष्टेरेवायतेष्विह । तिरोहिताधिदेवेषु कृष्ण एवं गतिर्मम ॥३॥ गङ्गादितीर्यवर्या भक्ताः । अयं भार:-'अस्ति गद्गायां त्रिरूपमिति सिद्धान्त- मुक्तावल्यां स्फुटीकृतं, तबिविधत्वमनापि क्षेपम् । न नरूपाधिभौतिकादिभेदेन प्रपाभक्तिमार्गीयज्ञानमार्गीयमर्यादाभक्तिमागीया मक्ता निरूपितास्तत्र प्रथमं प्रवाह- भक्तिमार्गीयाणामसापकत्वं निरूपयन्ति । यद्यपि गट्वापदस्यादौ निरूपणानहाया मर्यादा भक्तिमार्गीयभक्तत्वातन्मागीपभकानामेबादौ निरूपणं संभवति तथाप्याधिभौतिकादि. क्रमेण परिदृश्यमानप्रवाइजलस्यैव अपमनिरूपणादनाप्पादौ मवाहभक्तिमार्गीया एवं ज्ञेयाः । अग्रिमाणामुचरश्लोकेषु निरूपणम् । तथाच पदसम्बन्धः, गद्गा देवी आदिउँपां तानि गङ्गादीनि, तस्या एवाधिदैविकादिरूपाणि, तपा एव 'तीर्थभूता' मादिसायकवन- नादकाः, परन्तु दृश्पमानजलादिरूपाक्रमेण मवाहमागीपा एव । कर्ममार्गीयापेक्षयोचमत्त- , कृष्णाश्रयस्तोत्रम् । ज्ञापनाय 'वर्य'पदम् । तादृशेष्यपि दुटेरेव स्वरूपापेक्षया तदोपैरित्यर्थः । तादृशेर्धर्मवते- प्वाच्छादितेषु सत्सु, धर्मा एव तेषां धर्मिस्वरूपशाने पावरफा जाताः । ननु भगवद्ध- मनिष्टेषु फयं तद्धर्माणामावरफलं तबाहुः-तिरोहिताधिदैवेष्विति । तिरोहितमधिद- स्वरूपं येषु । यथा जलप्रवाहे मूर्तिमत्या गङ्गायास्तिरोधानं तया मराहमार्गेपि साक्षा- पुरुषोचमस्वरूपतिरोधानम् । विभूतिरूपस्यैव तेषां भजन तद्रूपमेव फलं, न तत्राधिदैवि. कभजनं फलं चेति द्रव्याशुद्धथा पुष्टिमार्गीयाणां तत्सङ्गो न सापक इति शरणगतिमे- घोपदिशन्ति कृष्ण एवेति । अत एवा यफलाभाये भगवतो दाइत्वं नास्ति सा सेवानाधिदैविकी'त्युक्तं सेवाफले । प्रकृते तु आधिदैविकस्वरूपस्यैव सर्वस्य सापक- स्वादाधिदैविकरसात्मकसदानन्दस्वरूपज्ञापककृष्णपदमेवोक्तं सर्वत्र शरणागतौ । एतेन तव्यतिरिक्तस्वरूपस्य शरणमपि न साधकमित्यपि सूच्यत इति सुष्टूक्तम् ॥ ३ ॥ ननु ज्ञानिनो निर्दोपाः समबुद्धय एकान्तस्थितयः तत्सङ्गः साधको भविष्य तीति तैपामपि मायामोहितत्वात्साक्षात्पुरुषोत्तमसम्बन्याभावेनासापकत्वं निरूपयन्तः फर्तृणां तनिरूपयन्ति-अहङ्कारविमूढेविति। अहवारविमूढेषु सत्सु पापानुवर्तिषु । लाभपूजार्थयत्नेषु कृष्ण एव गतिर्मम ॥ ४ ॥ ते तु 'अहं प्रपास्मी'त्यहङ्कारेण विशेषेण मूढा, नहि तत्र साक्षात्पुरुषोत्तमस- म्बन्धः, किन्त्वक्षरमात्रसम्बन्धेन तन्मात्रस्यैव परमफलत्वं मन्यन्त इति सेन्यसेवकभाव- स्यापि गतत्वाद्विशेषेण मूढास्तादृशेषु सत्सु । ननु अविद्यानिवृत्ती अनुभवरूपे विज्ञाने सम्पने ब्राणि लयो भवतीति कयं तेपां मोहः संभवतीति तत्राहुः पापानुयर्ति- विति । 'स्वर्गापवर्गनरकेष्वपि तुल्यार्थदर्शिन' इतिवाक्यापुष्टिमार्गीयाणां फले पति- पन्धकत्वात्साक्षात्पुरुषोचमज्ञानाभावरूपस्य तादृशज्ञानस्य पापत्वाचदनुवर्तिनां पापा- नुवर्तित्वमेवेति तथोक्तम् । किन, तादृशस्य पुनरक्षरलयानन्तरं पुष्टिफलसंभावनैव नेत्यपिज्ञापनाय पापरूपत्वं विशेषेण मूढत्त्वं चोक्तम् । ननु वयाप्यानन्दानुभवो भविष्य- तीति तत्राहुः-लाभपूजार्थयत्नेप्चिति । तन्मार्गे न साधनदशायां न च फलदशायां तदनुभवः, यतो लाभः आत्मलाभः पूजा तत्साधनार्थ मनस्येव कल्पितमूर्तेपासनारूपा, तदर्यमेव यत्नो येषां तादृशेषु । नद्यात्मन ऐक्ये सर्वेन्द्रियाणां सार्थकता, नाप्यानन्दानु- भवज्ञानं च, यथा जले निमग्नस्य जलपानम् ।बहिरेव पाने तदनुभव इति न तेपामानन्दा- नुभवोपि । प्रकृते तु पृष्टभावापन्नस्य भगक्ता सहे'त्यादिरूपभावनायामपि सर्वेन्द्रियाणां साहात्स्वरूपानुभवो, पदिमाकट्ये तदनुभो किं वाच्यमितिभावः । तदुक्तं निरोधवर्णने विवरणसमेतम् । 'सङ्कल्पादपि तत्र हि 'दर्शन स्पर्शनं स्पष्टमित्यादिनः । एवं सवि सृष्टिमार्गीपस्य न तत्सङ्गः साधक इति शरणमेव निर्दिशन्ति कृष्ण एव गतिः ॥ ४ ॥ ननु शानिष्वपि केचन भक्ता भवन्ति, तत्रापि प्रेमयुक्ताः, ते पुनहिविधा केचन नामनिष्ठाः केचन सेवैकनिष्ठास्तेषां सङ्गः साधको भविष्यति, तथाचोक्तं 'सङ्गस्तेष्वय ते मार्य: 'सतां मसङ्गादित्यादिनेत्याशङ्कय तपोरपि सापकत्वाभावात्मयमं नामनिटा- नामसाधकत्वं वदन्तो मन्त्राणां तन्निरूपयन्ति अपरिज्ञानेति । अपरिज्ञाननटेषु मन्नेष्वनतयोगिषु । तिरोहितार्थदेवेषु कृष्ण एव गतिर्मम ॥ ५॥ यद्यपि 'एक शासं देवकीपुत्रगीत'मित्यत्र 'मन्त्रोयेकरतस्य नामानि पानी'- त्युक्त्या भक्तानां नामैव परो मन्त्रः तस्कीर्तनपराः समीचीना एव तेषां तत्कीर्वने तदा- नन्दानुभवननिताभुपुलकादयोपि भवन्ति तयापि तेषां मर्यादामार्गीयत्वात्स्वरूपतोर- रिज्ञानमेवेति तेषु मन्त्रेषु नामरूपेष्वपरिज्ञानेन नष्टेषु अलक्षिषु सत्सु । यादृशः कृष्णपदस्य रसात्मकभावरूपोर्यस्तदपरिज्ञानादलक्षितत्यमुक्तम् । ननु कथं सोयों न लक्षि. तस्तत्राहु:-अवतयोगिविति । व्रतं अनन्यत्वं पतिववावत्पतिविषयकपरमानुरागन- नितरसात्मकभावेन तदेकनिष्ठारूप, तदभावतोऽवताः पूर्वोक्ताः, नादृशेषु योगः संयोगो पापिति तथात्वमुक्तम् । ननु तेष्वपि नापधर्माणां दृश्यमानत्वात्कयमेवमुच्यते तत्राहु:- तिरोहितेति । तिरोहितः अर्थो रसात्मकस्वरूपेण यः पट; स पत्र माहरोषु सत्तु । अत एव मुकुन्द ! नारायण! यज्ञेश्वर ! ज्ञाननिधे ! वासुदेवेसादीनि मोक्षेच्छुभिरुच्यन्ते, नहि पुष्टिमार्गीयैरिव 'प्रजजनातिइन् वीरयोषिताम्' 'सुरतनाथे'त्पादीनि रसात्मकानि सानि । तेषां मर्यादामार्गानुसारेणैव तदनुभयो भवति न पुष्टयनुसारेणेति न तत्सनस्तस्य सापक इति शरणमेवोपदिशन्ति कृष्ण प्रवेति ॥ ५॥ ननु ये सेयापरास्ते तत्सर्वपिनियोगेनानन्यव्रतेन सेवां कुर्वन्तीति न तेषाम- प्रतत्वमिति सापका भविष्यन्तीत्याशङ्कय तेपामसापकत्वं बदन्तः कर्मणां तदाहुः- नानावादेति । नानावादविनष्टेषु सर्वकर्मत्रतादिषु । पापण्डेकप्रयत्लेषु कृष्ण एवं गतिर्मम ॥ ६ ॥ ययपि ते पूर्वोक्तापेक्षया सर्वोचमास्तयापि वेषां पर्यादामिश्रस्वात्सर्वकर्मवता- दिषु सर्व पुष्टिमार्गीयं यावत्प्रमेयं कर्म तन्मार्गीया सेवा 'भगवता सत्यादिमा व्रतं ५६ कृष्णाश्रयस्वोत्रम् । लोकवेदनरपेक्ष्येण केवलस्वरूपमात्रैकनिष्ठत्वं, आदिपदेन तन्मागीयश्रवणकीर्तनादीनि शेयानि, तेपु नानावादविनष्टेषु सत्सु । नानावादा अनेकविधममाणवचनानि मर्यादा. मार्गीयाणि आवरणरूपाणि, तैः कृत्वा विशेषेण नष्टा अललितास्तादृशेषु सत्सु । तेषां मर्यादामिश्रत्वेन विहितैकदृष्टित्वात् , न तज्ज्ञानमितिभावः । अत एव मर्यादया गुणज्ञास्ते' इति निरूपित पुष्टिमवाहमर्यादायाम् । ननुविभक्तिमार्गनिष्टया सेवादिकं कुर्वन्तीति कयं तदज्ञानं तत्राहुः-पापण्डैकप्रयत्नेविति । पापण्डो नामोपाधिस्तद्रूप एवैकः प्रयत्न- स्तदनुकूलसाघनरूपो येषां तादृशेषु । तेपामपि मिश्रत्वेन पुरुषोचपसायुज्यैकफलस्वा. तत्मयत्नादीनां पुष्टापेक्षयोपाधिरूपत्वमेवेति तया निरूपितम् । अत एव मध्यमफलत्वं सायुज्यस्य निरूपित सेवाफले 'सेवायां फलनयमित्पनेन। किञ्च, सायुज्यस्य मर्यादाम- क्तिमार्गकफलत्वं तत्वार्थदीपे निरूपितं 'सर्वत्यागेनन्यभावे' इत्यनेन । पुष्टिफलं तु केवलं तादृशानुग्रहमरेण सर्वात्मना निरुपधिभावकसाध्यमिति तादृशस्यापि सङ्गो न साधक इति पारणमेव निरूपयन्ति कृष्ण एव गतिर्ममेति ॥ ६॥ नन्वेवं सकळमार्गीयसापनफलानां वाधकत्वेन पुरुषार्यरूपत्वाभावात्युटिमार्गीयस्य के पुरुषार्थाः ? फीदृशया वा कथं वा सिद्धा भविप्यन्तीति प्रश्ने ताशस्य भगवाने चतुर्विधपुरुषार्थरूपः, तत्सिद्धौ शरणमेव साधनं नान्पदिति भगवतस्तद्रूपनिरूपणपूर्वक चतुर्मिः श्लोकैः शरणं निरूपयन्ति । तत्र प्रथमं धर्मरूपत्वेन निरूायन्ति-अजामिला- दिदोपाणामिति । अजामिलादिदोषाणां नाशकोनुभवे स्थितः । ज्ञापिताखिलमाहास्यः कृष्ण एव गतिर्मम ॥ ७॥ 'पुष्टिमार्गे हरेर्दास्य धोयों हरिरेव हि । कामो इरेर्दिव मोक्षः कृष्णस्प चेब्रुवमित्यत्रोक्ताः पुरुषार्था मर्यादामार्गीयेभ्यो भिन्ना उपापिरहिता इति। तत्र हरेर्दास्य धर्म उक्तः । तच 'पुरुषभूषण देहि दास्यमित्या स्वरूपासमत्वेन निरूपितमिति भग. वतो धर्मरूपत्वं सिद्धम् । एवं सति धर्मेण यया दोपनित्तिनिदोष तासिद्धिश्च भवति तथा भगवान् स्वरूपेणैव दोपनिवर्तक आपकोपि भवतीति धर्मनिरूपणपूर्वकं शरणं निरूपयन्ति । तथाहि-अजामिलादयः प्रवलदोपदुष्टास्तद्रूपा अत्र सफलेन्द्रियसहा- तास्तेषां दोषाणां नाराका स्वरूपेणैव न सापनः । अयं भावः, पुष्टिमार्गीयस्य स्नेहोत्सत्य- नन्तरं स्वव्यसनतः स्वतन्त्रपुरुषार्थत्येन क्रियपाणायां 'भगवना सह संलाप' इत्यायुक्त प्रकारफभावनापामन्तलीलामहितसाशास्वरूपपारदधे सति या सेवोत्तमपुधिरूपा हवेन्द्रि पाणां माकृतपदार्यसंसर्गदर्शनस्मरणादिना या प्रतिबन्धा सोर दोपस्तनाशकः । ययाऽजामिनस्य नाममात्रेण दोषा दूरीकृतास्तथा प्रकृते वाशस्य मियो गुणगान- विवरणसमेतम् । लक्षणनापात्मकलीलया तत्तदिन्द्रियाणां दोपं नाशयतीति तथोक्तम् । अनेन दोपनिनिधर्मकार्यमुक्तम् । इष्टमा निरूपयन्ति अनुभवे स्थित इति । दोष दूरीकृत्य तत्तदिन्द्रियादिषु स्वयं स्थितो भूत्वा स्वरूपानन्दगनुभावयतीतिभा । अनेनेष्टमाप्तिरूप धर्मकार्यमुक्तम् । एतत्सर्वं निरोपवर्णने 'संसारावेशदुष्टानामित्यारभ्य 'हरिवत्सुखमि'- त्यन्तेन स्फुटीकृतम् । ततोपि विशेषमाहुः-ज्ञापिताखिलमाहात्म्य इति । शापितम- खिलं पुष्टिलीलारूपं माहात्म्यं येन । अत एव वनस्थितानामपिच लीलानुभवः।पुष्टिप- वाहमर्यादायामपि 'पुष्टया विमिश्राः सर्वज्ञा' इत्युक्तम् । भगवति साक्षादन्तःप्रकटे तल्ली- लाधर्माणामप्याविर्भावात्तज्ञानमप्याविर्भवतीति न किश्चिदनुपपन्नम् । एवं सति तादृशस्य तारग्भावपोपणादौ ईटाधर्मरूपो भगानेव शरणमिति कृष्ण एवं गतिर्ममेत्युक्तम् ॥णा ननु तेपामिन्द्रिपादीनां प्राकृतत्वात्तदधिष्ठातॄणां च तथात्वाकय दोपनिनिरि- त्याशय तेषां सर्वसवालरूपः कृष्ण एव भवतीति तस्यैवार्थरूपत्वं निरूपयन्तः शरणगतिमा:-प्राकृता इति । प्राकृताः सकला देवा गणितानन्दकं बृहत् । पूर्णानन्दो हरिस्तस्माकृष्ण एवं गतिर्मम ॥ ८ ॥ प्रपत्रनिरूपणमस्ताये 'जडे सदंशः प्रकट इत्तरावाच्छन्नौ, जीवे आद्यौ भकटौ आनन्दाशस्तिरोहित' इतिनिरूपितम् । पुष्टिमार्गीयस्य तु साधनदायां सेवागुण- गानादिपरस्य स्वत एवानन्दांशः प्रकटो भरति । तथाचोक्तं सिद्धान्तमुक्तावल्यां 'ततः संसारदुःखस्येति । तत्रैव पुनः विवरणे यद्यप्यनमिलपिते ने तथापि वस्तुस्वभा- वाद्भवत' इत्युक्तम् । सिद्धान्तरहस्येपि सर्वेषां ब्रह्मता तन' इत्युक्तम् । 'सचिदानन्दता स्वत' इति निरोधविवरणेप्युक्तम् । एवं सति ये पूर्व प्राकृता देवा इन्द्रियाधिष्ठाता- रस्ते सचिदानन्दरूपाध्यात्मक सम्पन्ने पुरुषोत्तमाविर्भावात्सकला जाताः । कला रसात्मकब्रह्मविद्यास्पा नत्साहिता जाताः । गणितानन्दरूपमक्षरं प्रहा, 'क'मत्ययेन ततोपि हावोतितुन्छो जीवः स बृहन्मातस्तदपेक्षयापि महान् जातः । उभयत्र हेतु: पूर्णानन्दो हरिरिति । यतः सर्वेपी सचिदानन्दले सम्पने पुरुषोत्तमाविर्भावाचत्सम्ब- धिरसात्मका भाषा उत्पयन्त इति तजनितमचुरार्तिशान्त्यर्थमन्तस्तत्तदिन्द्रियादिषु सत्तत्स्वल्यः स्वयमेव भूत्वा सर्वेषु तेषु पूर्णस्वरूपानन्ददानेन दुःख हरतीति तथोक्तम् । एवं सत्यक्षरात्मत्वेनामाकृतत्वे किं शश्यम् । किन्तु तस्य समस्तसह ातः साक्षादसात्मकल्ली- लारूपपूर्णानन्दभगवद्रूप एव भवतीति कुतस्तन दोराकाश इविभावः । तदेव 'श्रीमद्रो- कृष्णाश्रयस्तोत्रम् । कुलजीचारमा श्रीमगोकुलमानसमित्यायुक्तम् । यत एवं भगवत एवार्थरूपत्वं तस्मात्स्य तथालसिद्धष सरगमेव साधनमिति तनिरूपयन्ति कृष्ण एवेति ॥८॥ एवमर्थरूपं निरूप्यतामस्य प्रचुराविशान्त्यर्थ बहिनकटस्य कोटिकन्दर्पला- ण्यसाक्षाद्भगवतः सङ्गस्यैवापेक्षितत्वात्कामरूपत्व निरूपयनः शरणं प्रार्थयन्ति विवेकेति। विवेकधैर्यभत्त्यादिरहितस्य विशेषतः । पापासक्तस्य दीनस्य कृष्ण एव गतिर्मम ॥९॥ अत्रेदमाकूतम् । पुष्टिमार्गीयभावाविर्भावानन्नरं विरहानुभवार्थे त्यागस्यावश्यक त्वात्यागानन्तरं पुनः कमेण पियो गुणानुवादमनितप्रचुरभावानामुच्छलितत्वातादृशस्य देहमाणेन्द्रियान्ताकरणादीनि स्वरूपात्मकानि भवन्तीति पूर्वलोकद्वयेन निरूपितम् । एतावत्पर्यन्तं विरहानुमवे वक्षरागादिनानाशान्ताः सप्तावस्याः संपन्नाः । अस्मि- छलोके उन्मादायस्यायं निरूप्यते । लयाहि-हिरेकः, धैर्य, शक्यादयस्तै रहितस्य । विवेकराहित्ये विकलत्वं भवति यतो वैकल्ये विवेको न निष्ठति । तचोन्मादारस्थायां भवत्तीति सा निरूपिता । धैर्यराहित्येनाइनिशं साक्षात्मनाभावजप्रचुरातिननितम- स्वास्थ्य तिष्ठति । ननु पूर्व गुणगानेऽन्तः साक्षादनुभवस्योक्तत्वात्स्यं धैर्याभावेनास्वास्थ्य तत्रा:-भक्त्यादिरहितस्येति । गुणगानदशायां पूर्वमन्तःपास्टये साक्षाद्भक्ति- रूपमुखारविन्दसुधास्वादात् । आदिपदेन सामागोगः । साक्षाभोगस्याप्यनुभवात्स्वास्थ्य स्थितमिदानी प्रलापावस्थाया फलपतिबन्धकलेन साक्षात्सुधादानतदुपयोगियाफ्याच करणादस्वास्थ्यमेव तिष्ठनीति तद्रहितस्येत्युक्तम् । तत्रापि पत्किञ्चित्स्वास्थ्येपि फलम- तिबन्धकलेन विशेषतो रहितस्येत्युक्तम् । तथाचोक्त संन्यासनिर्णये ' मगवान् फलरूप- स्वात्' 'सास्थ्यवाक्यं न कर्तव्य'मित्यादि । एवमस्वास्थ्येपि स्वास्थ्यवाक्याधकरणे प्रचु- रायो मूळमापनति सा दशा निरूपिना । तनः पुन यदवस्याया स्वरूपस्थितौ सगा- भावेन स्यातुपशक्तं गुणावलम्बितचित्तं पुनाति तेन च पस्किश्चित्स्वास्थो तदेव फले प्रतिवन्धकं भवतीति तस्य पापरूपत्वमिति ननासक्तस्येत्युक्तम् । अत एवोक्तं 'ज्ञानं गुणाश्च वस्यैव वर्तमानस्य यापका' इतिसंन्यासनिर्णये। ततः पुनः क्षणानन्तरं स्थितिरेव न भवतीति दशम्यवस्था निरूपिता। एतत्सर्वं फलपकरणीयतृतीयाध्यायान्ते स्फुटीकृतम् । तत्र गुणगानानन्तरमनाविर्भावे मूर्धान्तावस्थानिरूपणपूर्व लीलाप्रवेशालापः स्वरूप- स्थितौ गुणगानमिति निरूपितम् । अग्रे पुनरतिदन्ये जाते 'रुरुदुः सुस्वर 'तन्य माण- पिवागत'मित्यादिनामिपा सा सूचितेति सर्वमुपपन्नम् । एतादृशस्य पुनः शरनमाविर्भावार्थ शरणमेव भारनीयमिति कृष्णा एव गतिर्ममेरयुक्तम् । एतदनन्तरं सर्वयाऽऽविर्भूय परमा.
. स्वरूपानन्दानुभवानन्तरं श्रीमदुद्धवोपदिष्टज्ञानेन याशो निरोधः सिद्धस्वादशो निरू पित इति झापनायोद्वारे सम्पकत्वमुक्तम् । एवं सति सदा फलरूपपूर्णनिरोगस्थित्यनन्तरं विवरणसमेतम् । नन्दं ददातीति ज्ञापनाय कृष्णपदं, शरणं निखपितम्। तयाचोक्तं 'ब्रह्मा विष्णु दश्च भूत्वा पुनः कृष्ण एव जात' इति 'तासामाविरभूत्कृष्ण' इत्यस्याभासे ॥९॥ एवं दशावस्याभिः पूर्णविषयोगानुभवे जाते प्रतिवन्धकदेहनिवृत्तौ तस्या- लौकिक रसात्मक लीलोपयोमिदेहादिकं संपाय स्वयं साक्षात्मकटीभूय वहिः स्वरू- पानन्दं ददातीति मोतरूपत्वं निरूपयन्ति सर्वसामर्थ्यसहितः सर्वत्रैवा- खिलार्थकृदिति । सर्वसामर्थ्यसहितः सर्वत्रैवाखिलार्थकृत् । शरणस्थसमुद्धारं कृष्णं विज्ञापयाम्यहम् ॥ १० ॥ कृष्णाश्रयमिदं स्तोत्रं यः पठेत् कृष्णसन्निधौ । तस्याश्रयो भवेत् कृष्ण इति श्रीवल्लभोत्रवीत् ।। ११ ॥ सर्व यावदलौकिकैश्चर्यवीर्यादिगुणानां कर्तृमकर्तुपन्ययाकर्तुं यत्सामध्ये तत्स- हितःसन् तप्रति स्त्ररूपानन्ददातुं स्थितो भवतीत्यर्थः। एतदेवोक्तं भगवानपिता रात्री'- रित्यत्र 'भगवत्पदेन स्वतन्त्रलिखने । ननु प्रभोः सर्व संभवति पर नादृशेन प्रभुणा सह साम्पेन स्वरूपानुभवः कथं सुवचो जीवस्य बबाहुः सर्वत्रैवाखिलादिति । 'पुष्टि काये- ने तिवाक्याचारशे ते भक्तं साक्षादसात्मकस्वचरणारविन्दमकरन्दरजसाऽलौकिकदेहादि- सम्पचिपूर्वकं लीलासमाजे प्रकटीकृत्य सर्वत्रैव देइमाणेन्द्रियादिप्यखिलार्थान् रसात्म- फालौकिकवयोगुणादिरूपानलोकिकैश्चर्यगुणादिसामर्थ्यरूपान करोतीति तथोक्तमत एवालौकिकसामय पुष्टिफलं निरूपित सेवाफले।एतत्सर्व'यथार्भकः स्वप्रतिविम्बविभ्रम' इत्यस्य विवरणे स्फुटीकृतं 'स्वसामर्थ्यादियोजने'त्यादि। एवं स्वरूपात्मकतां संपाय स्वरू- पानन्दं ददावीति मोक्षरूपत्वं निरूपितम् । अत एव 'मोक्षः कृष्णस्य चैद्धव'मित्युक्तम् । ननु मोसे आनन्दममता तिष्ठति प्रकृतेपि तथैव चेत्स्यात्तदा कथं लीलानुभव इत्याहुः शार णस्थसमुद्धारमिति । अत्र शरणपदं सर्वात्मभानपरम् । अलौकिकसृष्टिः सर्वैतादम्भाव- वत्येवेति शरणस्थत्य-सर्वात्मभावस्थस्य-पूर्वोक्तभक्ततत्तल्लीलानन्दसमुद्रमनस्य-तत उद्धार फरोतीति शेषः। अन्यथैकस्यां लीलायां मनस्य द्वितीया साननुभूतैव तिष्ठेछ । एतत्सई यात एतद्विमुच्यत' इत्यत्र स्फुटीकृतम् । यदा, लीलानुभवदशापामपि तत्मभावादेव दैन्यमा उत्पयत इत्यपि ज्ञापनाय शरणस्थेतिपदम् । अथवा, अतःपरं सर्वोशेन शरणस्या जाता इति वा ज्ञापनार्य शरणे स्थित्यर्थ उक्तः। तयासति शरणसमाप्तिापिता । किश, एवं पूर्ण कृष्णाश्रयस्तोत्रम् । तस्य स्वस्मिन् साक्षात्पुरुषोत्तमाभिन्नत्वज्ञानं भवतीति मुक्तिलीला निरूपिता । तत आशयलीलां निरूपयन्ति कृष्णमिति । तं पुनः केवलशुद्धभावात्मकत्वेन सहातस्य स्वरूपत्वाधारत्वेन स्वस्वरूपात्मकं केवैलानुभवान(?)बालकमावरूपं कृष्णं करोतीत्याश्रय- लीला निरूपिता । कृष्णमित्यत्रापि फरोतीतिक्रिया योज्या । अत एव ततो विमोचन स्वाश्रयमापणं प्रत्यापत्तिरित्युक्तं 'व:पीडे'तिश्लोकविवरणे । एवं सति निरो- धलीलानन्तरं 'मुक्तिहित्वान्ययाम स्वरूपेण व्यवस्थितिः' । 'मुक्तानामाश्रयः कृष्णः' इति स्कन्धद्वयार्थरूम मुक्त्याश्रयलीलाद्वयं निरुपितं पदव्येन । एतावदेवेप्सिततममितिपद- द्वयस्य कर्मत्वेन निरूपणम् । पूर्व सर्वसपर्यवेन स्वतन्त्रकर्ता प्रभुरिति प्रथमान्तपदं दत्तम् । अग्रे स्पेप्सितत्वेन पदद्वयं द्वितीयान्तमुक्तं, तेन तादृशः प्रभुरेव स्वेपिरातं करोतीतिक्रिया- ध्याहारेण ककर्मक्रियान्वयसम्बन्धोत्र ज्ञेयः । एवं ग्रन्थार्थोपि सम्यग्योजितो भवतीति सर्वमवदातम् । अतःपरं दशविघलीलानां पूर्णत्वादाश्रयाय सदा कृत इति कृष्ण एवे- त्पमेणोक्तम् । अत्र कृष्णावतारलीलाना नित्यफलावधित्वमुद्देशेन लक्षितमिति स्वरूपा. स्मकत्वेपि लीलानां नित्यत्वज्ञापनाय न कण्ठोक्त उपसंहारः कृत दतिभावः । एवं साघनफलस्वरूपविवेकनाश्रयं निरूप्य तस्य लोभनिष्ठसुधैफफलत्वेन तस्याय भगपझोग्यकभोग्यत्वाददेयतमत्वेन मभोनिवेदनीयमिति तदने कृत्वा निवेदयन्त आहुः विज्ञापयाम्पहमिति । किञ्चिदितिशेपः । किं तदित्याकालायामाहुः इदमिति । यदने कृतं तद्विनये में प्रत्यक्षतोडल्या निर्दिष्टम् । किं ते तदपीति तबाहुः स्तोत्र- मिति । तहि समीचीनं कृतं मीतोहं किमियविज्ञाप्यत इति चेत्राह कृष्णाश्रयमिति । कृष्ण आथयो यस्मिन्निति तत्स्वरूपनिवेदनं कृतम् । एतेनाथये कृते आश्रितपक्षपातस्य त्यक्तुमशक्यत्वाचनिन्धेनादेयतममपि पराकाष्ठापन्नं वस्तु तस्मै देयं भवतीति स्वकीया. नामातिनं भवति अतिविनयेन विज्ञापनमेवोचितमिति श्रीमदाचार्याणां हृदयमिति ज्ञापितम् । अत एव एवं विज्ञाप्य तत्पाटफलं निरूपयन्ति य इति । कृष्णस्य भावात्म- कस्य सन्निधौ सति पुष्टिमार्गीपस्योद्भूतभावाडुरस्य भावरूपत्वेनान्तस्तत्सानिध्य भव. तीति तथोक्तम् । तत्सानिध्याथै वा पठेत्तस्यैवाश्रयो भवेदिति। य इति मदतिरिक्तोन्योपि स्तीकव इत्यर्थः । इदं त्वतिकारुण्यमत्यौदार्य चरित आचार्याणाम् । नन्वेवं विज्ञापनेपि भगवता तन्नोरीकृवं चेत्तदा कयं फलसिद्धिस्तत्राहुः श्रीवल्लभोप्रवीदिति । इतीति पूर्वोक्त विसापनं श्रीवल्लभः सासागोपीशोऽनयीत् अङ्गीकृत्याज्ञसवानित्यर्थः । अथवा श्रीवल्लभः स्वयमेव धीरूपाणां स्वामिनीनां वल्लभः परमवात्सल्पास्पदीभूतः । अत एक १ केवलानन्दानुमपात्मकमिति युक्तं स्यात् ।
विवरणसमेतम् । सा स्वरहस्य सर्व कषयन्तीति ताप्तां गुरुत्वं निरुपितं संन्यासनिर्णये । अविप्रियाय गुका स्वरहस्य कथयतीरयुक्तत्वात् । एवं सति तल्लभत्वेन मभोरपि परमप्रेमास्पदीभूत इति तदुक्तं सर्वमङ्गीकवं भगवतेति शापितम् । अत एव यतोगीकृतमिति हेतोरत्रधी- दित्पाद, फलमित्यर्थः । किन तबल्लभवन भगवदुक्तानीकारः स्वतः सिद्ध एवेति न पुनस्तदुक्तिः कण्ठोक्ता । अनेन फले सर्वयापि निःसन्दिग्धवं निरूपितमिवि सर्वमय- दातम् ॥ १०-११॥ अतिमलिनतराशये पदीये किमयमपूर्वतरोदयो विलासः । निरुपधिकरुणैकविभ्रमोपि वितरणशील विभोरवोद्भुतं नः ॥ १॥ व्रतवतो महती किल ते कृपा मदपराधगणा अपि तादृशाः । उभयतौल्यविचारणया विमो विजपते तब सैव गरोपसी ॥२॥ अदेयदानकपरान् मौदार्यगुणैः स्वके । श्रीपदाचार्यचरणान् आश्रये करुणानिधीन ।। ३ ।। प्रणतालोकसंगातकरयाटिभिः क्षणात् । संतापं हरति श्रीमटिलेशं वमाश्रये ॥ ४॥ इति श्रीकृष्णाश्रयस्तोत्रविवरणं समाप्तम् । समासश्चायं ग्रन्थः ।
श्रीमद्-वल्लभाचार्य महाप्रभु-विरचित-षोडश-प्रन्यान्तर्गता-दशमी चतुःश्लोकी सप्तभिष्टीकाभिः समलंकृता १. पीवजराजानाम् ५. श्रीकृष्णरायभट्टानाम् २. श्रीवल्लभानाम् ६. श्रीनायभट्टानाम् ३. केपाश्वित् ७. श्रीद्वारकेशानाम ४. श्रीमथुरानाथानाम परिशिष्टम् श्रीमद्-वल्लभाचार्य-महाप्रभु-भोपद-विठ्ठलेश-प्रभुचरण-विरचिता श्रीरत्रासुरचतुःश्लोकी विवृतिः उपाख्यात्रय-समलंकृता १. श्रीहरिरायाण टिप्पणी २ श्रीवल्लभाना टिप्पणी ३. धोपुरुषोत्तमानां प्रकाश. श्रीमद्-~-वल्लभाचार्य-~-महाप्रभु-वशावतस-नित्यलोला- स्थित-गोस्वामि-श्री १००८ श्रीगोकुलनाथ-महाराज- श्रीत्येतेषा-स्मृती-प्रकाशिता व.सं. २०३६ श्रीवल्लभाम्दाः ५०३
प्रकाशक
श्रीगोकुलनाथजी महाराजस्थापित मोटा मन्दिर ट्रस्ट,
वडा मन्दिर, श्रीजीवनजी महाराज लेन,
भुलेश्वर, बम्बई, ४०.००२. भारत.
साधारणसस्करण २,००० प्रति
राजसस्करण १,००० प्रति
श्रीवल्लभान्द ५०३
अन्य-परिचय लेखक : गोस्वामी श्याम मनोहर
मुहक:
स्टूडियो बहार,२३-ए, सेन्ट्रल चोपाटी बिल्डिग, चौराटी,
बम्बई-४००००७.
m गोस्वामी १००८ श्रीगोकुलनायत्री महाराज ॥ श्रीकृष्णाय नम. ॥ ॥श्रोमदाचापंचरणकमलेम्पो नमः॥ ग्रन्थ-परिचय चतु श्लोकीका प्रणयन श्रीमहाप्रभुने वि.सं. १५८० या ८२ में कभी किया था ऐसी किंवदन्ती मिलती है ' यह अन्य किस भाग्यवान् भगवदीयके लिए लिखा गया यह तो पता नहीं चलता, किन्तु पोरासो वैष्णवोंतो वार्ता के अनुसार राना व्यास और भावानदास सानोरा ने श्रीमहाप्रभुके मुखारविन्दसे इस ग्रन्थका अध्ययन किया था. प्रत्येक मनुष्पके जीवनमे धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष रूप पुरुषार्थों का कोई न कोई विशिष्ट स्वरूप एवम् स्थान होता ही है यह भिन्न बात है कि ततन्मार्गीय बोजभाव, रुचि, संग या देशकालादिको स्थिति के अनुरूप नत-मार्गोप जोवोमे पुरुषार्थ-सम्बन्धी धारणायें भिन्न-भिन्न पायी जाती है. पुष्टिमार्गीय जीवोकी धर्मार्थकाममोक्ष-सम्बन्यो धारणाओंके आदर्श स्वरूपका विचार इस चतु श्लोकोमें किया गया है. स्वमार्गीय धर्मार्थकाममोक्षसे भिन प्रकारके पुरुषार्थोके फेरमे जब कोई पड़ जाता है तो विफलता, निराशा, कुण्ठा, ओम एवम् आत्मयाती भावनाओ की ओर ही यह अग्रसर हो जाता है इस जगतमे सभी तरह के जीव है और सभीको सभी तरह के संग भी मिल जाते है. इन आकस्मिक संगोके कारण कभी-कभी हमारे भीतर एक ऐसी अस्सामाविक अहन्ता-ममता पनप जाती है जो अस्वमार्गीय धर्मार्थकाममोक्षके प्रकारोकी ओर हमे आकृष्ट करती है गोधराके राना व्यासको भी प्रारम्भमे एक वैरागी बाबाकी सगति मिली थी. उस वैरागी बाबाको तीर्थयात्राको बातोको सुनकर राना व्यासको लगा कि जीवनका वास्तविक सुख तीयों की यात्रा करते रहनेमे ही होगा वाहिये अतः अपने माता-पिताको कुछ कहे-सुने बिना एक रात ये घरसे निकल मागे. इनका मन परन्तु किसी भी तीर्थ के पर्शनसे प्रसनन हो पाया. प्रारम्भसे ही इन्हें विद्याभिमान और जितेन्द्रिय होनेका अभि- मान तो था ही सो माता-पिताके देहान्त के बाद इन्हें पाच दस हजार रुपये और उत्तरा- पिकाइमें मिले फलत इन्हें धनाभिमान भी हो गया ! कुल मिला कर ये अपने-आपको पहुवा हुआ सिद्ध और उच्च कोटीका विद्वान् मानने लग गयें सन-शने अपने गावके लोग तो इन्हें गदारू हो लगने लो मो काशीके विद्वानोरो टक्कर लेने की लालसा इनके दिलमे जगो और एक दिन ये काशो पर गये वहा जाने के बाद किन्तु सब कुछ उलटा हो हुआ, जिन-जिन पण्डितोसे ये टकराये उन समोझे इन्हें शास्त्रार्यमे पराजित होता पड़ा! श्रीतागादाम बामनिया लिवित लेख, वैभववाणी अ.४ व १९७९ इससे य अत्यधिक लज्जित होकर गगामे कूदकर प्राणत्याग करना चाहते थे यह आत्मघात भी दिनके उजालेमे करनेमें इन्हे सकोचका अनुभव हो रहा या सो गगातटपर बैठ रात्री एकान्त और अन्धकार को प्रतीक्षा कर रहे थे। तमो श्रीमहा- प्रभुका भी वहा पधारना हुआ सयागवश किमी वैष्णवने श्रीमहाप्रमुसे प्रश्न किया कि गगाम डूबकर मरनेवालको क्या गति होती है इसपर श्रीमहाप्रभुने उत्तर दिया कि अहकारवश लड झगडकर डूबनेवालेको सर्पयोनि मिलती है और आत्मघातका पाप भी लगता है दोनभावसे किन्तु मन्याम लेबर और अपने मनको भगवान्मे एकाग्र बनाकर जो गगाम प्राणत्याग करत हैं उनकी दुर्गति नही होती ये बात सीयो जाकर राना व्यासको लग गयी और वे दौडकर श्रीमहाप्रभुके चरणो म आकर गिर पड़ अपनी आत्मगाथा सुनाकर श्रीमहाप्रभुको शरणयाचना करने लगे श्रीमहाप्रभुने गगास्नान करनेका आदेश दिया और बादमें ब्रह्मसम्बन्धकी दीक्षा दी तुरत ही श्रीमहाप्रभुने इन्ह चतु श्लोकोका उपदेश भो दिया था ये सम्प्रदायके बच्छ विद्वान् हुए श्रीमहाप्रमुविरचित अन्य भी अणुभाष्य मुबोधिनी आदि ग्रन्थोकी इनके द्वारा हस्त- लिखित प्रतिया अद्यापि उपलब्ध होती इस चतु श्लोरो अध्ययनमे राना व्यासको अपने वास्तविक धर्म अर्थ काम एवम् मोक्ष रूप पुरूषार्थीका ज्ञान हुआ और ये मिथ्या वैराग्य धन तथा विद्वत्ताके अहफारसे मुक्त हुए साथ ही साथ इस अहकारकी विफलतासे पैदा हुई कुण्ठा एवम् आत्मघात की भा क्षुद भावनाओपर वाबू पा सक य एक आदर्श भगवदीयका सा भगदत्सेवा तथा भगवत्स्मरण पगयण पुष्टिमार्गीय जीवन जीने के लिए सक्षम हो पाये पुष्टिमार्गीय भक्ति निष्काम-निरुपाधिक होती है स्वयम् भगवदनुग्रह ही पुष्टि- जीदव हृदयम भक्तिका रूप धारण कर लना है भगवदनुग्रह जीवकृत साधनोपर निभर नही होता वह नो निहतुक ही प्रकट होता है जिस बीवमें वह बीजमावके मपम विद्यमान होता है उस जीवमे वह प्रम आसक्ति व्यसन और अलौकिकसामथ्य के रूपम अकुरित पल्लवित पुष्पित और फलित होनेको विभिन्न अवम्याआमे 'पुष्टिभक्ति' शब्दसे पुकारा जाता है भगवदनुग्रहको ही अत दिशाभदसे 'पुष्टि' और 'पुष्टिमक्ति' पहा जाता है अनुग्रह जब भगवान्न भन्तको दिशामे अग्रसर होता है तो उसे हम "पुष्टि' कहते हैं और जब जीवक हृदयस परावृत्त होकर पुन भगवानकी दिशामे अग्र- सर होता है तो उसे हम पुष्टिभक्ति' कहते है निवारण ही भगवान् जब किसी जीवपर अपनो कृपा या पुष्टि की वर्षा करते हैं और वह कृपावृष्टि हृदयके छोटेसे प्रदे- शम समा नही सकती तव उच्छलित होकर पुष्टिभक्तिको सरिताक रूपमे वहने लग जाती है। उसी कृपासागर परमात्माको ओर जहासे उठकर कृपाक मेप जीवपर बरसे थे।। अत जैसे अनुग्रहके पूर्व न कोई कारण है और न अनुग्रहके पश्चात् कोई प्रयो- जन हो, वैमे ही न पुष्टिमक्तिगे पूर्व कोई कारण है और म पुष्टिभक्तिके परचात् कोई ४ प्रयोजन हो केवल अनुग्रह ही भक्तके हृदयसे परावृत्त होनेपर पुष्टिभक्ति वन जाता है (अत स्नेह पदार्थान्तरम् स भगवनिष्ठ एव भगवद्विषयको ज्ञानवर्दश्वयवद्वा भगवत्सम्बन्धाराकटमादन्यत्रापि भासते उष्णस्पर्शयत् यथा यथा भगवतंकटय तथा तया स्नेहातिशय सुबो १-१९-१६) स्वभावत प्रवाहमार्गीय ऐहिक पुरुषार्थ अर्थ कामकी सिद्धिको कामना अथवा मर्या- दामार्गीय धर्मार्थकाममोक्षरूप पुरुषार्थोकी सिद्धिको कामना पुष्टिमार्गीय जीवके हृदय में चिरस्थायो नही हो सकती ऐसे पुष्ट्रिभक्तोके पुरुषार्थ धर्म अर्थ काम या मोक्ष का स्वरूप अन्यमार्गीय पुरुषार्थोसे विलक्षण होना स्वाभाविक ही है श्रीमहाप्रभुने इस चतु - श्लोकीमे पुष्टिगक्तिमार्गीय पुरपार्योंका विलक्षण रूप हमे समझाया है चतु श्लोकी ग्रन्यके में चारो श्लोक भागवत को वृत्रासुरवतु श्लोकीके साथ पनिष्ठ साम्य रखते हैं वृत्रासुरपतु श्लोकीके भी चार इलोकोम इन्ही पुष्टिमार्गीय चार पुरुषार्थोंका स्वरूप अभिव्यक्त हुआ है प्रारम्भके तीन श्लोकोपर श्रीप्रभुचरणको विवृति उपलब्ध होती है तथा अन्तिम श्लोकपर श्रीगहाप्रभुविरचित विवृति उपलब्ध होती है इस अन्तिम श्लोकको विवृति के प्रारम्भमे श्रीमहाप्रभुने एक सग्रहश्लोक दिया है- पुष्टिमार्गे हरेर्दास्य धर्मोर्थो हरिरेव हि । कामो हरिदिदृक्षव मोक्षो कृष्णस्य चेद् ध्रुवम ।। अर्थ थीहरिका दास होना ही पुष्टिमार्गीय घम है पुष्टिभक्तो के अर्थ स्वयमेव श्रीहरि हैं श्रीहरिके दर्शनकी कामना ही पुष्टिमार्गीय काम है तथा सर्वात्मना श्रीकृष्णका बन जाना ही पुष्टिभक्तका मोक्ष है इसो सूत्रका भाष्य वृत्रासुरचतु श्लोकीमें तथा इस श्रीमहाप्रभुविरचित चतु श्लोकीम भी हम पात है पुष्टिमार्गम भगवान्के साथ जीवका सम्बध रसात्मक हाता है रसमीमासाम रति-म्नेहके सयोग एवम् वियोग दो पक्ष माने गय है । अत भक्तिमागम भगवान्को अनुभूति जब सयोग अथवा वियोग मे से किसी एकतरकी होती है तो वह अपूर्ण अनु भूति मानी जाती है अतएव इसे भक्तकी साधनावस्था भी मानते है रस द्विदलात्मक है अत सयोग और वियोग दोनोमे जद भगवान्को अनुभूति होने लग जाय तो फला- वस्था मानी जाती है तदनुसार धर्म और काम को सिद्धि साधनावस्थाका परिपाक है, और अर्थ तथा मोक्ष की सिद्धि फलावस्था है क्योकि धममे-बजाधिपके भजनम केवल सयोगका अनुभव होता है तथा काममे-हरिदशनकामनाम केवल वियोगका अनुभव होता है जबकि अर्थ-भगवान्का रसात्मक स्वरूप तो द्विदलात्मक ही है अत मोक्ष-भगवद्भजनमे सयोगानुभूति और भगवत्स्मरणमे विमोगानुभूति जब निरन्तर या क्रमश होने लग जाये तो भगवान्की रसात्मिका अनुभूति अपनी पूणतापर पहुच जाती है पुष्टिभक्तको उसका मोक्ष मिल जाता है इसमे य अत्यधिक लज्जित होकर गगामे कूदकर प्राणत्याग करना चाहते थे यह आत्मघात भी दिनके उजालेमे करनेमें इन्हें सकोचका अनुभव हो रहा था सो गगापटपर बैठ रात्री एकान्त और अन्धकार को प्रतीक्षा कर रहे थे। तमो श्रीमहा- प्रभुका भी वहा पधारना हुआ सयोगवश किसी वैष्णवने थीमहाप्रमुसे प्रश्न किया कि गगाम डूबकर मरनेवालेकी क्या गति होती है इसपर श्रीमहाप्रमुने उत्तर दिया कि अहकारवश लड झगडकर डूबनेवालेको सर्पयोनि मिलती है और आत्मघातका पाप भी लगता है दोनभावमे किन्तु सन्याम लेकर और अपने मनको भगवान्मै एकाग्र बनाकर जो गगाम प्राणत्याग करते हैं उनकी दुर्गति नहीं होती य बात मोघो जाकर राना व्यासको लग गयो और वे दौडकर श्रीमहाप्रभुके चरणों म आकर गिर पड़े अपनी आत्मगाया सुनाकर श्रीमहाप्रभुको शरणयाचना करने लगे श्रीमहाप्रभुने गगाम्नान करने का आदेश दिया और बादमें ब्रह्मसम्बन्धकी दीक्षा दी तुरत ही श्रीमहाप्रभुने इन्ह चतु श्लोकोका उपदेश भी दिया था ये सम्प्रदायके अच्छे विद्वान् हुए श्रीमहाप्रभुविरचित अन्य भी अणुभाष्य सुबोधिनी आदि ग्रन्थोकी इनके द्वारा हस्त. लिखित प्रतिया अद्यापि उपलव्य होती है इरा चतु श्लोरो अध्ययनसे राना न्यामको अपने वास्तविक धर्म अर्थ काम एवम् मोक्ष रूप पुरुषार्थोका ज्ञान हुआ और वे मिथ्या वैराग्य धन तथा विद्वत्ताके यहकारसे मुक्त हुए साथ ही साथ इस अहकारको विकलतामे पैदा हुई कुण्ठा एवम् आत्मपात को भा क्षुद्र भावनाओपर काबू पा सक य एक आदर्श भगवदीयका सा भगदत्सेवा तथा भगवत्स्मरण परायण पुष्टिमार्गीप जीवन जीने के लिए सक्षम हो पाये पुष्टिमार्गीय भक्ति निष्काम-निवाधिक होती है स्वयम् भगवदनुग्रह ही पुष्टि- जीयव हृदयमें भक्तिवा रूप धारण कर लता है भगवदनुग्रह जीवकत साधनोपर निभर नही होता वह तो निर्हेतुक ही प्रकट होता है जिस जीवमें वह बीजभावके रूपम विद्यमान होता है उस जीवमे वह प्रम आसक्ति व्यसन और अलौकिकसामर्थ्य के रूपम अकुरित पल्लवित पुष्पित और फलित होनेको विभिन्न अवम्यामोमे 'पुष्टिमक्ति' शब्दमे पुकारा जाता है भगवरनुग्रहको ही अत दिशाभदसे 'पुष्टि' और 'पुष्टिमति' कहा जाता है अनुग्रह जब भगवान्से भक्तको दिशामे अग्रसर होता है तो उसे हम "पुष्टि' कहते है और जब जीवक हृदयले परावृत्त होकर पुन भगवान्सी दिशामे मा- सर होता है तो उसे हम 'पुष्टिभक्ति' कहते है निष्कारण ही भगवान् जब किसी जीवपर अपनी कृपा या पुष्टि की वर्षा करते हैं और वह कृपावृष्टि हृदयके छोटेसे प्रदे- शमे समा नहीं सकती तव उच्चलित होकर पुष्टिभक्तिको सरिताके रूपमे बहने लग जाती है। उसो कृपासागर परमात्माकी ओर जहामे उठकर कृपाके मेघ जीवपर बरसे थे । अन जमे अनुग्रहके पूर्व न कोई कारण है और न अनुप्रहके पश्चात् कोई प्रपो- जन ही, वैसे ही न पुष्टिभक्तिमे पूर्व कोई कारण है और न पुष्टिमक्तिके पश्चात् कोई वस्था मानी जाती है तदनुसार घर्म और काम की सिद्धि साधतावम्याचा परिपाक है, और अर्थ तथा मोक्ष की सिद्धि फलावस्था है क्योकि धर्मम-जाधिर मनम केवल सयोगका अनुभव होता है तथा नामम-हरिदशनकामनामे दंचा वियागका मोश-भगवद्भजनमे सयोगानुभूति और भगवत्स्मरणमे वियोगानुनर्विनिष्टर अनुभव होता है जबकि अर्थ-भगवान्का रसात्मक स्वापता रिणामकहीन मा क्रमश होने लग जाये तो भगवानको रमारिमवा अनुभूमि यानी सारा प्रयोजन हो केवल अनुग्रह ही भक्तके हृदयसे परावृत्त होनेपर पुष्टि भक्ति वन जाता है (अत स्नेह पदार्थान्तरम् स भगवनिष्ठ एव भावद्विषयको ज्ञानवदेश्वयंवद्वा भगवत्सम्बन्धात्तनैकट्यादन्यत्रापि भासते उष्णस्पर्शवत् यथा यथा भगवन्नकटय तथा तया स्नेहातिशय. सुवो १-१९-१६) स्वभावत प्रवाहमार्गीय ऐहिक पुरषार्थ अर्थ-कामको सिद्धि की कामना अथवा मर्या- दामार्गीय धर्मार्थकाममोक्षरूप पुरुषार्थोकी सिद्धिकी कामना पुष्टिमार्गीय जीवके हृदयमें चिरस्थायी नही हो सकती ऐसे पुष्टिभक्तोके पुरुषार्थ धर्म अर्थ काम या मोक्ष का स्वरूप अन्यमार्गीय पुरुषार्थोसे विलक्षण होना स्वाभाविक ही है श्रीमहाप्रभुने इस चतु • श्लोकीमे पुष्टिभक्तिमार्गीय पुरुषार्थोका विलक्षण रूप हमे समझाया है चतु श्लोकी ग्रन्थो ये चारो श्लोक भागवतको वृत्रासुरचतु श्लोकीके साथ घनिष्ठ साम्य रखते है वृषासुरचतु श्लोकीके भी चार श्लोकोमे इन्ही पुष्टिमार्गीय चार पुरुषार्थीका स्वरूप अभिव्यक्त हुआ है प्रारम्भके तीन श्लोकोपर श्रीप्रभुचरणको विवृति उपलब्ध होती है तथा अन्तिम श्लोकपर श्रीमहाप्रभुविरचित विवृति उपलब्ध होती है इस अन्तिम श्लोकको विवृतिने प्रारम्भमे महाप्रभुने एक सग्रहश्लोक दिया है- पुष्टिमार्गे हरेर्दास्य धर्मोर्यो हरिरेव हि । कामो हरिदिदृक्षव मोक्षो कृष्णस्य चेद् ध्रुवम ।। अयं श्रीहरिका दास होना ही पुष्टिमार्गीय धर्म है पुष्टिभक्तोके अर्थ स्वयगेव श्रीहरि हैं धीहरिके दर्शनकी कामना ही पुष्टिमार्गीय काम है तथा सर्वात्मना श्रीकृष्णका बन जाना ही पुष्टिभक्तका मोक्ष है इसी सूत्रका भाष्य वृत्रासुरचतु श्लोकीमें तथा इस श्रीमहाप्रभुविरचित चतु श्लोकोम भी हम पाते है पुष्टिमार्गमे भगवान्के साथ जीवका सम्बन्ध रसात्मक होता है रममीमासाम रति-स्नेहके सयोग एवम् वियोग दो पक्ष माने गये है। अत भक्तिमार्गम भगवान्की अनुभूति जब सयोग अथवा वियोग मे से किसी एकतरको हाती है तो वह अपूर्ण अनु- भूति मानी जाती है अतएव इसे भक्तको साधनादस्था भी मानते है रम दिला है अत रायोग और वियोग दोनोमे जब भगवान्को अनुभूति हाने लग जाये तो का जाती है पुष्टिभक्तको उसका मोक्ष मिल जाता है . पुष्टिभवतका धर्म पुष्टिमार्गमे द्रजाधिप ही भजनीय है क्योकि गीता तया भागवत के अनुमार श्रीकृष्ण ही पूर्ण पुरुषोतम परब्रह्म परमानन्द रूप हैं अव्यय अप्रमेय निर्गुण गुणात्मा पर- ब्रह्म परमात्मा व्यापिवैकुण्ठनायक भगवान् जब अपनी पूर्णतारो लिये हुए व्रजमे अपनी नित्यलोला प्रकट करते है तो उन्हें 'श्रीकृष्ण' कहा जाता है जीव चाहे मुमाघन हो या नि साधन अथवा दुष्टमाधन, सभी जीवोंके नि श्रेयस्के लिए श्रीकृष्ण प्रकट होते है यही उनके प्राकटमा परम प्रयोजन है जोवोके माधनवलको परवाह किये बिना अपन म्वरूप अथवा स्वरूपानन्द क बलपर जीवोरे उद्धारक होनेसे श्रीकृष्णको 'सर्वोद्धारप्रयत्नात्मा' कहा जाता है थोकृष्ण सभी जीवात्माओके अशी होनेके कारण सहज स्वामी हैं. शुद्धाद्वैत-ब्रह्मवा- दके दृष्टिकोणमे आध्यात्मिक रूपमे सभी जीवात्माय अश होने के कारण श्रीकृष्णकी सहन दास है परन्तु लीलार्य किन्ही जीवोपर श्रीकृष्ण अपनी सहज कृपा प्रकट करते है, तब आधिभौतिक रूपमें इस भूतलार और आधिदैविक रूपमे व्यापिवैकुण्ठम भी ऐमे जीवोको अपनी स्वरूपसेवाका अवसर प्रदान करते है ऐसे जीवाको पुष्टिजीव समझना चाहिये मह सेवाका अवसर जीवात्मा और परमात्मा के बीच किन्ही भी भावोके रसात्मक मम्वन्धो द्वारा स्थापित हो सकता है यया सेवक, पुत्र, माता पिता, सखा, या प्रियतमा आदि रूपगे जीवात्मा और परमात्मा के बीच जब कोई सम्बन्ध स्थापित हो जाये, आधिभौतिक जगतमें या आधिदैविक नित्य लीलाम, तो भगवान का वह स्वरूप और वह लोला पुप्टिस्वरूप और पुष्टिलीला कहलाती है अखिल ब्रह्माण्डदे नाथका गोकुलनाथ वनना पुष्टिलीला है श्रीकृष्ण कभी इस तरह प्रकट होते है कि मभी जीव उनका दशन कर पायें और कभी इस तरह प्रकट होते है कि कोई भक्तविशष हो उनके दर्शन कर पाता है. अपने दोना प्रकारके प्रकटरूपमे भवनके अधिकार या मनोरथो के अनुरूप श्रीकृष्ण व्यापिर्वकुण्ठ अथवा व्रज को लीलाओको प्रकट कर सकते है अतएव भवनो भावोके अनुरूप स्वयम्को दाल पानेको कमोटोपर धजलीलाविहारी नगधिप श्रीकृष्ण भक्तोक लिए पूर्णतम परमानन्द-म्वरूप सिद्ध होते है मथुराके या द्वारकाके श्रीकृष्ण पूर्णतर या पूर्ण परमानन्द-म्वरूप होनेपर भी अतएव व्रजभवतोके लिए एवम् बजभक्तोकी भावनाके अनुसार भक्ति करनेवाले भक्तोके लिए प्रजाधिप श्रीकृष्ण ही समय पुष्टि- फलाके दाता तथा पुष्टिफलरूप भी है - 'अनन्यगोकुलस्वामी फलदाता फलात्मक" प्रजाधिपका यह भजन कैसे और किस भावमे करना चाहिये ? श्रीमहाप्रभु उत्तर देते है-'सर्वभावमे' "त्वमेव रावं मम देवदेव ।" मेरे माता पिता बन्धु मित्र पुत्र घन विद्या सभी कुछ भगवान् ही है, ऐमे भावके साथ भजन करना चाहिये केवल मधुरभावसे भी भजन किया जा सकता है.
श्रीकृष्ण जव परमात्मा, स्वामी, पुत्र, सखा या प्रियतम जैसे रूप धारण कर हमारे भावोके आलम्बन (विभाव) बनते है तो तदनुरूप श्रीकृष्णके प्रति पनपे हमारे स्थायी भाव भी भगवदात्मक ही होते है. श्रीकृष्णके जिस रूपसे हम स्नेह करते है वह बाह्य रूप और हमारे हृदयके भीतर रहा स्नेह दोनो हो आधिदैविक अलौकिक परमानन्द रूप होते है. लौकिक आधिभौतिक या मायिक नही भक्तोके भाव और मावोंके आलम्बन दोनों ही श्रीकृष्ण होते है. भावके आलम्बनके रूपमे भगवान् रसभोक्ता है तथा रसभावके रूपमे भगवान्को भौग्य भी माना जाता है. कभी-कभी भक्तपरवश होकर भगवान् आलम्बनके रूपमें भी भोग्यभाव प्रकट करते है. इसे 'गूढ़ स्त्रीभाव' कहा जाता है. भोक्तभाव 'पुम्भाव' कहलाता है और भोग्यभाव 'स्त्रीभाव'. भोक्तामे जब रसावेशमें भोग्यभाव प्रकट हो जाये तो उमे 'गूढ स्त्रीभाव' कहते हैं और भोग्यमें भोक्तृभाव प्रकट हो जाये तो उसे 'गूढ़ पुम्भाव' कहते है. उदाहरणतया प्रत्येक गुरुमें छिपा हुआ एक विद्यार्थी होता है और इसी तरह विद्यार्थोमे एक छिपा हुआ गुरु भी होता है अध्ययन-अध्यापनको दुर्लभ तन्मयतामे गुरुका गूढ़ विद्यार्थिभाव कभी प्रकट होता है इसी तरह विद्यार्थीका गूढ गुरुभाव भी ! इन गूढ भायोका प्राकटय पुष्टिको पराकाष्ठा है, सभी प्रकारके स्वामि-मेवमा, पुत्र-माता-पिता, सपा-गसा या प्रिया-प्रियतम-सम्वयोमे भक्त और भगवान् मे इन गूढ़ भावोको प्रकट करने के मनोरपते भी भगवान् भजनीय है जिन भयोमे ऐमा गूढमाय प्रकट हुआ अथवा जिन भत्तोके लिए भगवान्ने स्वयम्म ऐसे गूढभाव प्रपट किये ऐस भनाके प्रति देन्यभाव रखने हुए भजन करना चाहिये- "अह हरेस्तव पादेकमूलदासानुदामो मषिताम्मि" हमारे हृदयमे जबतक कोई एक निधिन भाव स्थिर नही हो जाता तबतक विविध भावोको भावना करने के अलावा अन्य कोई उपाय नहीं है प्रारम्भम आएर भगवत्मेडा बनभक्तीको भावनाके अनुगरणपर यजमाता अपना गुर मानकर करनी चाहिये. मारनावम्यामे हमारी भक्तिको भावनाक माध्यमम वजमतोके भावाना पहचानी पडगो. किमी निधित दिगामे बहती नदी होती है, जो भारम्प मागर बन जाती है मामर बहता नही बदल नहराता है ! अंत, पजमाता के भावाको भावना, माहाम्मान जनित देव और प्रामा-जा दया परमारमा-भगो के गहन निरपिर मेह के माय प्रारम्भमे मनेगा करनी चाहिये मेयाने हम प्रभारी हो भावदीक्षा ग्रहासम्बन्धी गमार दी जाती है. आमनिवेदन ममय भहन्ता और ममता से जुड़े सभी पदायों और मम्मी ने नहान समपित सरना हम गई मगर भारी भी भगवान प्रदान होना पाहिये. यो 'मर्यभायेन में सभी भाr farfunt गोमालविरमा वगारोतरा मनना। अनुपात में भी कला नगालोप मनाएर भयौ रिनी - ममान भावना भगवत्सेवामे तत्पर रहना चाहिये भगवद्-भक्तको सभी क्रियायें-- सोने-जगने कमाने- खाने या स्नेह-उपेक्षा आदि-उसके द्वारा की जाती भगवत्सेवाको अग ही बन जाती हैं "पुष्टिभक्तके लिए व्रजाधिप श्रीकृष्ण ही भजनीय है" यह कथन मजन करने की आना या विधि नहीं है. क्योकि किमो आदेशको अवहेलनाके कारण जो दण्ड मिल सकता है उस दण्डका भय न हो तो फिर आदेश-पालन आवश्यक नहीं रह जाता। श्रीमहाप्रभु अतएव आदेश नहीं दे रहे हैं किन्तु भगवान्के भजन की आवश्यकता हमे समझा रहे है पुष्टिप्रभुको रोवा न करनेवाला पुष्टिजीव अपनी सहज आवश्यक्ताओसे वञ्चित रह जाता है अमे कोई शिशु अपनी मा दूधके बिना दुर्बल हो जाये, या जैसे कोई प्राणी प्राणवायुके न मिलनेपर बंचन हो जाये, या जैसे कोई बीमार औषधीके बिना म्वस्थ न होने पाये, अथवा जैसे कोई खडी फसल बरसात न पढ़ने के कारण सूख जाये। ऐसे ही जिस पुष्टिजीवमे जिस समय या जिस जन्ममे कृष्णसेवा नही निभ पानी वह समय और जीवन उसका व्यथं चला जाता है. उसके स्वरूपका कोई प्रयोजन या अस्तिलका कोई अर्थ ही नहीं रह जाता है । पुष्टिजीवसे ब्रजाधिपकी सेवा न निभना नैतिक अपराध नहीं किन्तु अस्तित्वको निरर्थकता है. इस अर्थमे बजाधिपका भजन पुष्टिजीवोका प्रथम एवम् चरम सनातन धर्म है-उसके अस्तित्वका निगूढ तात्पर्य। अतएव श्रीमहाप्रभु कहते है कि मभी देश कालमे पुष्टिजीवका तो यहो वार्तव्य है-यही धर्म है किसी भी देशकालम इसके अलावा अन्य कोई धर्म पुष्टिजीवका हो नही सकता कृष्णमेवाके मिवा अन्य मारे धर्म पुष्टिजीवके महज-स्वाभाविर पर्म नही होने, किन्तु औपाधिक-आकस्मिक धर्म ही होते है अविद्या बन्धनके कारण आरोपित अहन्ता-सहा के कारण अब पर्म हमारे लिए प बन जाते हैं उदाहरणतया स्त्री पुरुष ब्राह्मण शूद्र या गृहस्थ-मायामो आदिके धर्म तत्तद् देह, वर्ण या आश्रम के अभिमानोके कारण हमारे लिए अनिवार्य धर्म बन जाते है में स्त्री हू या पुरुष हू, मै ब्राह्मण हूँ या मै मै गृहस्थ हू पा में सन्यामी हू इत्यादि रूपोमे हमारी आरोपिन अहन्ताके कारण तत्तद् देहोचित वर्णोचित या आश्रमोचित कर्तव्य हमारे- लिए धर्म बन जाते है इमी तरह माता पिता और मन्तति, भाई-बहन, गुरु शिष्य, मालिक-नौकर, समाज-व्यक्ति, राष्ट्र-नागरिक अथवा प्राणि-मनुष्य के ममताजन्य सम्बन्धोके कारण उनके प्रति तत्तत् कर्तव्योका निर्वाह हमारा नैतिक उत्तरदायित्व बन जाना है हम देख सकते हैं कि अहन्ता-ममताके द्वारा आरोपित सारे पर्तव्य देहाभिमान• मुलक है जबकि भगवत्मेवाका कर्तव्य होना आत्माके वास्तविक स्वरूप-बोधपर अव- लम्बित है अनव अन्य सारे कर्तव्य देश काल-द्रव्य मन्त्र कम-कर्तावी शुद्धिकी अपेक्षा रखते हैं, जबकि भगवत्सेवा तो केवल भावसापेक्ष है पुष्टिमार्गीय जीवोंके लिए धर्मरूप स्वयम् भगवान् या भगवत्सेवा ही है भावात्मक प्रमेयरूप भगवान्को जाननेका उपाय या प्रमाण भावात्मिका सेवा ही है अतएव भक्तरल वृत्रासुर कहता है- हरि। मुझे मोक्ष नही चाहिये किन्तु अपना दास मुझे बनाओ मोक्षमे तो ज्ञानसे त्रिविध दुख दूर हो जाते है परन्तु मेरे तो दुःख स्वयम् आप हरते हो तो ही दूर होने चाहिये. लौतिक अहम्के बन्धनोसे मुक्त होनेवाले ज्ञानियोका 'सोहम्'वाला अहम् मुझे नहीं सुहाता है. मेरे भीतर 'दासोहम्' का भक्तिमय अहम् कभी मिटे नही ऐसा कुछ कर दो यदि मै आपके दास बननेका अधिकारी न होऊ तो मुझे आपके दासोका दास वनाओ. मेरा मन, मेरे प्राणनाथ। तुम्हारे गुणोको गुनता रहे--मेरी वाणी तेरे गुणोको गाती रहे-मेरी काया सर्वदा तेरी सेवा करती रहे ऐसो आशिष मुझे दो. पुष्टिभक्तका अर्थ पुष्टिभक्तके अर्थ पुरुषार्थरूप स्वयम् भगवान् ही हैं श्रीमहाप्रभु आज्ञा करते है कि पुष्टिजीवोके लिए यह आवश्यक हैकि वह स्वधर्म भगवत्सेवाको सदा निभाये चला जाये (एव मदा स्म कर्तव्यम्) इस वृष्णमेवाके लिए न तो किसी ऐहिक अर्थोपार्जनके आधिभौतिक व्यापारमे उलझने की आवश्यक्ता है और न किसी पारलौक्वि अर्योपा- जनके लिए अन्यायवाली आधिदैविक भृतकवृत्तिमे ही उलझनेकी आवश्यकता है भगवान् तो अन्याश्रय अथवा प्रार्थना की अपेक्षा रखे बिना भक्तिके हितमे अपे- क्षित ऐहिक-पारलौकिक योगक्षमका और स्वयम् अपने स्वरूपानन्दका दान भी स्वय- मेव परगे. एतदर्थ उन्हें किगी लौकिव-पारलौकिक साधनोकी या अर्पोपी अपेक्षा नहीं है भगवान् भावारमक है अत छोला और एप्पनभोग, जो मी मापसे निवेदित किया जाये, समान रुचिसे स्वयमेव अगीकार करेंगे अत सौविक अर्थ. धन-सम्पत्तिपर यह भगवत्सेवा निर्भर नही है श्रुतिमे कहा गया है- "नायमारमा प्रवचनेन लम्यो न मेपपा न बहना श्रुतेन यम- वेष वर्णते तेन लभ्य तस्यष आत्मा विवृणुते तनु स्वाम्" अर्थ : यह परमारमा प्रवचन मेधा या बहुश्रुततासे प्राप्त नहीं होता विन्तु अपनी प्राप्तिके लिए यह जिस जीवात्मा पन लेता है उसे ही मिलता है- उसके ही गमक्ष यह परमारमा अपना स्वरूप प्रकट गरता अत इम परमात्मस्वरूप अयंत्रा उपार्जन हमारे मापन या व्यापार मे शाय नहीं है जिम जीवारमा परण यह सर्वममयं परमामा करता है उस जीवात्मा माधनोगी यह परवाह नही ररता भगवत्मेबारे अपिरारी वै हो जोर होते हैं, जिनका भगवान् अपनी मेपारे लिए चुनाव से हैं जिन्हें भगवान् अपना मेवारं लिए चुनते है उनरे समक्ष अपने भोग्य साम- गूद बोभावो प्रकट करते है जिन जीवो लिए भगगनभाने-आपनो समति गरी टान लेते हैं वे ही जोध भावारे लिए माने- ममपित र पाते ! म परम्पक मनांगरे वाद बादामा और परमात्मा के बीच कोई परदा रह नही जाता अत पुष्टिप्रभुका गूढ स्त्रीभाव एवम् पुष्टि- जीवका गूढ पुम्भाव प्रकट हो जाता है. व्रतचर्या प्रकरणमे ऋषिरूपा कुमारिकाओको भगवान्ने वरदान दिया था वे भग. वान्को अपना पति-भोक्ता बनाना चाहती थी. भगवान्ने उनके चीर हर लिये! यह चीरहरण भगवान् में प्रकट हुए गूढ स्त्रीभावका ही विवरण था और पुन जो चीर कुमारिकाओको लोटाये गये वह तो गूढ पुम्भावका वितरण था. कुमारिकाय श्रीकृष्ण के लिए आत्मार्पणका व्रत कर रही थी, क्योकि श्रीकृष्णने आत्मार्पणने हेतु उन्हे वृत कर लिया था-चुन लिया था चीरहरण तो केवल प्रकट पुम्भाव और स्त्रीभावो का विनिमय मात्र था ! इसके बाद जो कुमारिकाओमे भोक्तृभाव प्रकट हुआ वह उनके कात्यायनीव्रतका प्रभाव नहीं था, और न छ वरमको कुमारिकाओके देह, जिनमे न तो तारुण्य और न किमी से लावण्य की हो सम्भावना हो सकती थी, ना कोई प्रभाव स्वीकारा जा सकता है ऋषि-मुनियोके तप एवम् व्रत का भग ता कामदेव कर सकते है, परन्तु इन छह वरमको कुमारिकाओमे श्रीकृष्णके प्रति जो मधुरभाव जगे, उसे जगानेका सामर्थ्य कामदेवका नहीं किन्तु स्वयम् सर्वसमर्थ श्रीकृष्ण कामादपि कमनीय रूपका ही या प्रमेय प्रकरणमे श्रुतिरूपा गोपिकाओ श्रीकृष्ण के प्रति निरूपा- धिर स्नेहको शृगारोगाधिक गूढ़ पुम्भावके रूपमे इसी शृगाररसमूर्ति धाकृष्णने ही रूपान्तरित कर दिया था निरुपाधिक् निराकार स्नेहको शृगाररसवे म्थायिभावके आवारम वेणुपूजनकी छनोगे गढा या' अतएव श्रीमहाप्रभु रहते है-"केवल शृगारार्थमेव कूजनम् " (सुबोधिनी-वेणुगोत). श्रीकृष्णवे वारेमे रिसी भी प्रकारका स्नेह-दास्यभाव, वात्सल्य, सख्य या माधुर्य- भावात्मक-स्वयम् श्रीकृष्णवे मभी तरह। आलम्बनविभावोके रूपोको धारण करनेके सर्वमामध्यमे ही सम्भव होना है पहले श्रीकृष्ण स्वामीका रूप धारण करते है तब जीवमे दाम्यभाव जगता है श्रीकृष्णके बालरूप धारण करनपर हमारे हृदयम यात्मन्य उभरता है श्रीकृष्णवे विकराल कालरूप धारण करनेपर बचारा रम भयभीत हो जाता है श्रीकृष्णकी पीडाको इच्छामे दिमो सखाको माजर्नेपर हमारे भीतर मध्यभाव पनपता है श्रीकृष्णकी प्रियतम बननेवी वामना ही हमारे हृदय में श्रीकृष्णवे प्रति मधुर प्रेमको अदुरित करती है वह जब भाग्य बनना चाहता है तब हमारे भीतर भोक्तभाव अगड़ाई लेने लगता है उम आत्माराम भरतकाम बनने पर भसामे अलौकिक भगवलाम प्रकट होता है वह अम्बिल ब्रह्माण्डया भाधार हानेर भो मा यशोदाकी गोदमे गुपचुप आरर बैठ सकता है, ना ममथं है. हा, वह सर्वममयं है अतएव पुष्टि. भक्तो मेवाके शिना रह न मर इतना बममथं भी बन जाता है। वह बाल-बर्म- स्वभाव प्रकृति-पुस्प किमीके भी अधीन नहीं है-मवनावस्वतन्त्र है हम परतन्त्र है परन्तु वह स्वतन्त्र परतन्त्र है अतएव कहता है--"अह भक्तपराधीन ह्यस्वतन्त्र इव", अर्थात् हम 'अस्वतन्त्र एष' हैं पर अज्ञानवश अपने-आपको स्वतन्त्र इव' मान लेते हैं वह 'स्वतन्त्र एव' है अतएव कृपावश 'अस्वतन्त्र इव' बन जाता है ! वह सर्वसमर्थ सर्वभोवता होनेपर भी भक्तभोग्य बननेमे समर्थ है-सम्यम् अर्थ है अर्य, किन्तु, भावात्मक होनेसे अपने हृदयको तिजोरोमे गुप्ततया रखा रहा तो सुरक्षित रहेगा अन्यथा भावात्मक अथके भोडे प्रदर्शनको वृत्ति रखनेपर वह भावाभारा बन जाता है-चुर जाता है अत 'अर्थ' कहने के बजाय श्रीमहाप्रभुने 'सर्वसमर्थ' कहकर अपने अर्थको छिपा लिया है। पुष्टिभावसे भावित प्रभु छिपा हुआ रहा तो निश्चिन्त रहना चाहिये अन्यथा बुद्धि या हृदय के द्वार बाहरकी ओर दुले फि अन्दरका यह अर्थ चुर जाता है चतु श्लोगीके द्वितीय श्लोपका यह अर्य-प्रमेष आलम्वन विभावके रुपमे अपने रसभोवताये पदको छोडकर हमारे हृदय म्यायी भाव बननेको अर्थात् भोग्य रस बननेको उद्यत है. अत लोकाधिताये भावोका हृदयमे से इस सिद्धान्तम्मरणकी सोहनी से पुहारना पड़ेगा. अन्यथा हृदयके बाहर इस द्वितीय श्लोर अर्यको प्रतीक्षा करनी पडेगी, हृदय ने स्वच्छ होनेरी! इन प्रतीक्षाको घडियामे बाहर खड़े पुष्टिप्रभुके नारेम हमारे मनोरथ जो गावमे प्रकट हो गये तव तो सब कुछ रमाभास हो जायेगा । क्योकि पुष्टिमार्गीय गनोरथकी तो एक ही दिशा है--'प्रभु गर्वममर्थो हि ततो निश्चिन्तता व्रजेत" वत्र तो अमुर हानेपर भी इस पुष्टिमार्गीय अर्थका अन्य पिसी ऐहिक या पारलौरिक अर्यके साथ विनिमय बरनवा मनोरप नही करता- न ता मुझे लौकिक सात्त्विर अर्थ स्वर्गका इन्द्रासन चाहिये, न वैदिक्ष राजस अर्थ ब्रह्माकी पदवी, न मुझे लोरिक राजस अयं मारी पृथ्वीवे धनपा स्वामी ही बनना है और न लोरिक तामस अर्थ पाताल आदि सामोरा आधिपत्य हो न मुर वैदिक तामम अपं विभिन्न योगतिश्यापी ही वाई वामना है और न वैदिक मारित्वा अर्थ शानलभ्य अपुनर्भय-मोक्षणी ही मामना है मेरे सपिप घेवल हरि है-उनके अलावा और मग कुछ भी नही पाहिम । (प्रभु गदसमर्थो हि ततो निभिन्नता बत). पृष्टिभक्तका राम 7 इमीमे निहित है कि भूमा-परमानन्दरूप श्रीकृष्णके साथ उन्हे जोड दिया जाये दर्शन- स्पर्शन-श्रवण-किर्तन-ध्यान-आदि क्रियाओंमे आन्तरवाह्य सभी इन्द्रियोको भगवदभिमुख बनाना चाहिये. जिस इन्द्रियका भगवत्कार्यम विनियोग शक्य न हो उसके विनिग्रहका यत्न करना चाहिये धुतिमें जीवको-"काममय एवाय पुरुष" कहा गया है यह काम कौनसा है? सभी जीव चाह आस्तिक हो या नास्तिक, पुष्टिमार्गीय हो, मर्यादामार्गीय हो, या प्रवाहमार्गीय, मभीको सभी इन्द्रियोमे परमानन्दकी कामना है 'न वा अरे सर्वस्य कामाय सर्व प्रिय भवति आत्मनस्तु कामाय सर्व प्रिय भवति" नेत्रोसे, जिह्वास, नासिकास, त्वचास या कोंमे हम पोज रहे है परमानन्द-रूप श्रीकृष्णको ही-रूप, रम, गन्ध, स्पर्श या शब्दों को नही इम परमानन्दकी खोजयात्राम शीघ्रतया उस प्राप्त करनेके लिए जीवात्मा शरीरके रथपर सवार हो जाती है अपनी बुद्धिको अपना मारधी बना लेती है और मनकी लगामस बघ हुए इन्द्रियोके घोडौंको सरपट दोड़ाती है ये इन्द्रियोके घोड़े लेकिन बड ही उद्धत है - दौड़ते-दौडने ये मन और बुद्धि के नियन्त्रणके बाहर हो जाते है, और बेचार जीवको लौविक विषयात्री वासनाके गर्तमे गिरा देते है। शरीरका यह रथ भी कालजर्जरित होनसे गिरा कि टूट जाता है - नष्ट हो जाता है। प्रवाहमार्गपर तो यह दुर्घटना प्रतिदिनवा बल है मर्यादामार्ग या पुष्टिमार्ग के माइपर जो जीव अपने रथको दिशा बदल नही पाते उना तो विषय-वासना गर्तमे विनिपात निश्चित ही होता है एस जीवोको 'प्रवाहिजीव' कहा जाता है मर्यादामार्ग यी और इस परमानन्दकी खोजम रथोको मोउनेवाले मर्यादिक जोवोपर इन दुर्घटना- ओका बड़ा ही विषम प्रभाव पड़ जाता है वे मनोनिग्रह-मनकी लगाम खीचकरके रथका कश्चित् रोक देना चाहते है कभी रथमे उतर कर पैदल ही यात्रा करने की वामना करने लग जाते है कभी स्वगादि लोग या आत्ममुख वे पडावीपर ही अपनी यात्रा समाप्त कर देते है. कभी अमोम एवम् दिदाहीन अव्यक्तोपासनाको बहु- जन्म जन्मान्तात पूरी न हानेवाली अधिए विल्प्ट यात्रापर निकल पड़ते है कुल मिलाकर इन दुर्दान्त पाडावे वेगके माथ वे अपने मन और बुद्धि का सामन्जस्य बिठा नही पाते, परतहिम्मत होपर पैदल चलना अधिक पसन्द करते है ( ब्रह्मानन्द प्रवि- ष्टानामात्मनंव मुखप्रमा, सघातस्य विलीनत्वात्, भक्ताना तु विशषत सर्वेन्द्रियस्तथा- चान्त करणंगमनापि हि ब्रह्मभावात्....विशिष्यते ) आएच श्रीमहाप्रभु कहते है- "वैराग्य च भगवतो शान वा मवंतापनिवर्तकम् यत्सस्वारयाग्य तज्ज्ञानेन नश्यति यदयाग्य तपरित्यागन अतएव स्मात मस्कारागन परित्याग एव बोध्यते' (मुबो) अर्थ ज्ञान और वैराग्य म सारे ताप दूर हा जाते है, यदि हम परमानन्दरूप श्रीकृष्णको भलीभाति जान पायें तो सारे लोविक विषयोको ( ब्रह्मसम्बन्ध) मकारमे शुद्ध वर पायेंगे अन्यथा जिन विगयोको भगवत्ममपंणके सस्कारमे शुद्ध न किया जा सकता हो उनका तो परित्याग ही करना चाहिये. यही कारण है कि स्मार्त लोग सम्बार द्वारा शुद्ध करनेमे असमर्थ होने के कारण सभी वस्तुओके परित्यागका ही उपदेश देते रहते है व्यर्थ त्यागके अपेक्षा वस्तुको भगवान्को समर्पित कर देना उत्तम कल्प है. किसी वस्तु या व्यक्ति को सुधारना हो तो उसे भलीभाति जानना आवश्यक होता है पर हम स्वयम् जब किसीको समझ ही नहीं पाते तो सुधारनेका प्रश्न नही उठेगा, ऐसी स्थितिम परित्याग ही एक उपाय बच जाता है एक परमात्माको आत्मकोडाकी ही अनेक नामरूपोमे अभिव्यक्ति यह समग्र जगत है हम भी बाके चैतन्यको आशिक अभिव्यक्तिपा है मूल अशीने व्यापक प्रयोजनके विपरीत जब हम अपनी अज्ञानजन्य अहन्ता-ममताके वशीभूत हो कर कोई शुद्र प्रयो- जन घड लेते है, तभीम मारो मुसीवत खडी होने लगती हैं इन्द्रियोके तेज दौडनेवाले घोडोके रथम हेजोसे भागने हुए हम दिशा भूल जाते है. अतएव शरणागति हमारो अन्ताका शुद्धिसस्कार है और ब्रह्ममम्बन्ध हमारी ममताका शुद्धिसरकार बनता है अहाता-ममताने शुद्ध होते ही हमे दिशाको पहचान होने लग जाती है ऊवदखावद विषयवासनाके प्रदेशमे रथ दौराने के बजाय हम पुष्टि ऋजुमागंपर पुनः आरूढ हो जाते है विषयो के मेवनमे परमानन्द नहीं मिल सकता परन्तु परमानन्दकै सेवनमें तो सब कुछ मिल जाता है। योमहाप्रभु रहते है कि चित्तमे भगवत्प्रेम सम्पादित होना चाहिये- प्रेमसम्वलित मित्त मर्वत्र विद्यमान् परमात्मारो स्वयमेव खोज लेगा अतएव उपनिषद्म परमात्माका- "मर्वकर्मा मकामः सर्वगन्य सरस मर्वमिदम्" कहा गया है. श्रीगोकुलाधीशको सस्मिना हृदयम धारण करना सभी इन्द्रियों में उन्ह चाहनेको पहली बात है यदि एकबार हृदयम धारण कर पायें तो उन्ह आखाम भी देवा जा रास्ता है, कानासे मुना जा सकता, हाथोंमे पकड़ा जा सपना है और चरणोमे दौडकर परमारमा निकट पहुचा भी जाता है. आवश्यकता है सर्वप्रथम परमात्मा को हृदयम धारण करने की। अतएव श्रीमहाप्रभु रहते है । भगवता सह सलापो दर्शन मिलितम् च । आपलेप सेवन चापि स्पमंत्रापि तयाविप ।। अधरामृतपान च भोगो रोमोद्गमस्नपा । तत्तूजिताना धवणमामा चापि सरंत. तपन्तिकगनिनित्यमेव तद्भावन मा । इदमेवेन्दिपवता पर माशोपि नाम्या ।। समाधबारे नियता चिनियो पल भवेत् । एव मोपोन्दियादिपुगताना मर्वया नहिं ।। (मौसमुदो) गिरधर देख ही सुख होय । नयनवन्तको यही परमफल यही विधि माय त्रिलोय । अतएव धामहाप्रभ श्रीगोकुलाघोग वियोगक तीव्रतापम हृदयम मनम प्रकट होती भगवानको स्वरूपानुभूति तथा लीलानुभूति का परमफल कहते है क्याकि एकवार हुयम भगवान विराज जाते है तो देर सबेर सभी इद्रियामे भगवानकी रसात्मिका अनभूतिको कामना भी जग ही जाती है इस कामनाक जगत ही अय लौकिक-वदिक विषयोको कामनाओका आपण नि गप हो जायगा भगवान स्वयम कहते है- न मय्यावेगिविया काम कामाय कल्पत भजिता वविता धाना भूयो बीजाय नेते (भाग ) अथ जिनकी बुद्धि भगवानम लग गयी हो उनका काम कामाथ नहीं रह जाता जसे भजे या उबाले हुए धान बीज नही बन सकते सभी इन्द्रियोस होनेवाली टस भगवन्नुभूतिको वेणगीत और भ्रमरगीत की सबो घिनीम समभाव यमुनाष्टकम तनुनवत्व और मेवाफलम अलौविक सामथ्य कहा गया है यही निरोधको फलावग्था है जिस यहा चतु श्लोकाम मोक्ष कहा जायेगा परतु इस राबद्रियो द्वारा भगवदनुभूतिरा जीव गम्मन हो उमस पहले सदियोमे भग वदनुभूतिको कामना-पुतिमार्गीय कामका जगना आवश्यक है यह कामना जगी कि पुष्टिमार्गीय काम परुपाय गिद्ध हा गया रामश लेना चाहिये अतएव वत्र कहता है- हे अरवि वाक्ष । मेरा हृदय तुम्हारे दशन चाहता है जब मेरा मन तुम्हारे दशन चाहता ह तो सभी नद्रियाके द्वारामे वह तुम्ह अदर पघराना चाहता ह जमे पक्षीके पख बिनाके बच्चे अपनी मातारी प्रतो ना चगेके लिए करते है- जमे गायका बछडा गायके थनसे दूधकी कामना करता सम्भवत चगा या दूध और कहीसे मिल जाये तो व सन्तुष्ट हो सकते ह पर मरा मन तो परदेश गये प्रियतमको विरहिणी प्रमिकाकी तरह निरन्तर तुम्हारे ही ध्यानम-मनारथोम जुड़ा हुआ फेवल तुम्ह ही देखना चाहता है । पुष्टिभक्तका मोक्ष सर्वा मना श्रीकृष्णका बन जाना परिभक्तका मोक्ष है सर्वामिना श्रीकृष्णरे बन नेका मतलब है प्रपञ्चको विस्मृति और कृष्णमे दढ आमक्ति भक्तको कृष्णानुभतिका व्यसन हो जाना निर तर कृष्णानुभूतिको कामना इतनी तीव्र हो जाये कि या तो मयोगम बाह्यालम्वनमे सभी इद्रियोम कृष्णका अनुभव हो अयथा वियोगम आमक्ति भ्रम यायसे पूवानुभूत श्रीकृष्णरे स्वरूप एवम लीलाका रोम ध-जगाली इतनी तीन तर हा जाय कि अन्त स्थित रति ही सभी रूप (आलम्बन उद्दापन तथा सञ्चारी भावके रूप) लेने लग जाय । मयोगम भजन धम और वियोगम स्मरण-स्मर काम निर तर चलता रहे तो भक्तको मुक्त हो गया समश रेना चाहिये यह अनुभूति यदि इम भूतल पर हाने लग जाये तो उसे जीवन्मक्ति समझना चाहिये इस ही तननवव या अलौकक सामथ्य भी कहा गया है नित्यलोला-व्यापिदकुष्ठम यदि यह अनुभूति होनेवाली हो तो उसे विदेहमुक्ति समझनी चाहिये इसे ही 'नवतनुत्व' या 'सेवोपयोगिदेहो वैकुण्ठादिपु' कहा गया है. सक्षेपमें प्रयम एवम् तृतीय पुरुषार्थ धर्म एवम् काम के निरन्तर चक्रक रूपमें चल पड़ना पुष्टिभक्तका पुष्टिभविनम मोक्ष माना जाता हैं क्योकि पुष्टि. भक्तिका अर्थ-व्रजाधिप श्रीकृष्ण स्वयम् नटवरवपु होनेमे प्रेम तथा प्रियतम उभय रूप हैं- स्थायिभाव तथा आलम्बनविभाव रूप वही है अत वियोग और सयोग दोनोमें यह अनुभूत हो सकता है यही श्रीगोकुलाघोशका स्मरण और भजन है श्रीमहाप्रभु कहते है- "ज्ञान तु गुणगान हि परोक्षे तत्प्रतिष्ठितम्, प्रत्यक्ष भजन श्रष्ठमेव नेद् रोधन स्थिर, पुरुषाणा तथा स्त्रीणा रात्री च दिवसे तथा ज्ञान भक्तिध सतत चक्रवत् परिवतंते" (भाग निवन्ध) अर्थ भगवान्के वियोगम भगवान्के गुणोका गान ज्ञानरूप है, और सयोगम-प्रत्यक्षमें भजन श्रेष्ठ है यह होनेपर जोय भगवान्में निरुद्ध हो जाता है व्रजकी स्त्रियो और पुरुषो को रातम और दिनमें इन्ही ज्ञान और भक्ति वा निरन्तर अनुभव चक्रकी तरह चलता ही रहता था उन्हें परमानन्दरूप श्रीकृष्णका पूर्ण अनुभव मिल गया था! पुष्टिभक्ति अपने आपम मार्ग भी है और गन्तव्य भी- साधन भी है और फल भी अतएव सयोग वियोगम भजन स्मरणके चढाप-उतारोमै निरन्तर चलते रहना यहा मुक्ति है पुष्टिभक्ति मार्गपर चलकर अन्यत्र वही पहुचना नही है- केवल निरन्तर इसी मुहापने मार्गपर टहलते रहना है- चरैवेति । चरवेति ।। चरैवेति । । । अतएव पुष्टिपथका पथिक वृत्रासुर भी इस मागकी यात्रा में अपने सहयात्रियोका साप मागता है कि कभी वह अकेल चलते हुए अन्य मागोपर भटक न जाये- हे नाथ | मुझे रावंदा तुम्हारे भक्तोका ही सग साप तुम्हारे भक्तिमार्गपर घरते हुए मिलता रहे भी ससारासक्त पत्नियोका सस्य मुझमें न पनपने पायै । यदि यह देह-पुत्र-स्त्री-गृहादि विषयमें मेरो भासक्ति भी हो तो तेरी मेवामें उनको उपयोगिता भर के लिए हो और विसो हेतुमे नहीं। में समग्रतामे तेरा हो जाऊ और त ममग्रतासे मेरा विम १९७९ में श्रीमहाप्रभुविरचित चतुरलोकीका प्रकासन हुना था. वृत्रा- मुरतु लोको प्रशासन वि. स. १९७८ मे हुआ पा प्रस्तुत सारण उन्हीसा ऑफ सेट प्रसर पुनदिन रूप है ये दानो ही मन्य गोस्वामी श्रीरपछोलालजी महा- राज 'धोयोनापार्य पुष्टि मिटान्त मारिय' गे प्रकाशित हुए पे इनके सपुस्त- राम्पादन ये थोचोपन ही तमा योहरिप्रभा वोग्यी शाम्पो इस ममी महा- नुभावारा हम हम पुन प्रकारको अवसापर हार्दिक स्वरवा माप स्मरण करते है વિનતિ. અમોએ આ ઝુકીના સંશોધનમાં પ્રભુદા પાબુદ્ધિબdય બાયપાસ કપ છે. તથાપિ અશુદ્ધિ દષ્ટિગોચર થાય છે તે છવકૃતિ માની સુધારી લે છે. ઉપકાર દર્શન. અમને આ સંસ્થામાં જે પુસ્તક પ્રદાન કરે છે એમને ઉપકાર શબ્દોમા માનવ અશક્ય છે. સમ્પ્રદાયમા વિઘાનસરની વૃદ્ધિ થયાનું એ સુચન છે, જે સમ્પ્રદાયમાં સાહિત્યને પ્રાણા નથી તે સપ્રદાય દરેકને પ્રાણુમાં સચાર કરે છે, એ ન્યાય હવે આપણું સાધિકે સમજવા લાગ્યા છે. અને શ્રીજીવનશાચાર્ય પુસ્તકાલય ઉપરાત શ્રીગોકુલનાથજી મહારાજ, શ્રીવ્રજરનલાલજી મહારાજ, તથા શ્રી દ્વારકેશલાલજી મહારાજ, નયા ટસ્થ શ્રી છોટામથુરેશજી તથા શ્રીનાથદ્વાર વિદ્યાવિભાગ પડિત બલભ શર્મો તથા પડિત રમાનાય શાસ્ત્રીજી તથા શાસ્ત્રીજી મગનલાલભાઈ તથા રા તેલીવાલા મૂલચન્દ્રભાઈ ગુજરાતી પ્રેક્ષના માલિક મણિલાલભાઈ તથા પરિષદ સાહિત્ય માં ર. વાડિલાલભાઈ તેમ જ જુનાગઢ વિગેરે સ્થળેથી જે જે પુસ્તકો વારવાર આપવામાં આવે છે તેમને ઉપકાર અનુપમ છે, પ્રભુ આ પ્રણાલી સદા રાખે, જેમા ઉદયને પલ છે ચીમનશાસ્ત્રી “સાહિમભૂષણ અદ્વૈતરત્ન’ હરિકૃષ્ણ શાસ્ત્રી શહાદનવિશારદ श्रीकृष्णाय नमः। चतुःश्लोकी। श्रीमदाचार्यप्रकटिता। सर्वदा सर्वभावेन भजनीपो ब्रजाधिपः । स्वस्थायमेव धर्मो हि नान्यः कापि कदाचन ॥ १॥ एवं सदा स्मं कर्तव्यं स्वयमेव करिष्यति । प्रभुः सर्यसमर्थी हि ततो निश्चिन्तता प्रजेत् ॥ २॥ यदि श्रीगोकुलाधीशो घृतः सर्यात्मना हदि । ततः किर्मपरं चूहि लौकिकैवैदिकरपि ।। ३ ।। अतः सर्यात्मना शश्वनीकुलेश्वरपादयोः । स्मरणं भजनं चापि म त्याज्यामिति मे मतिः ॥४॥ इति श्रीमाभाचार्यविरचिता चतुःश्लोकी सम्पूर्णा । सावितिसतीनि पार। पातिपनि पार विति। एसीपात श्रीकृष्णाय नमः। श्रीगोपीजनवल्लभाय नमः। धीमदाचार्यचरणकमलेभ्यो नमः। चतुःश्लोकी। श्रीमद्रजराजचरणविरचितविकृतियुता। श्रीमद्रासरसामृतान्धिविलसद्वोपीशपादाम्बुज- द्वन्द्वस्नेहविलासदानकरणे श्रीपारिजातोपमः ॥ स्फूर्जगोपादम्बिनीविलसितमेमाख्यवाकरो भूयान्मे हदि सन्ततं दुरितहृच्छ्रीविठ्ठलो वालभिः ॥११॥ भगवदीयानां धर्मादिचतुष्टयं भगवानेवेति स्वीयेषु कृपया श्रीमदाचार्यचरणाव- तुभिः श्लोफैस्तदेव तज्ज्ञापनार्थ विटण्यन्ति सर्वदा सर्वभावेनेति । सर्वदा सर्वभावेन भजनीयो ब्रजाधिपः । स्वस्यायमेव धर्मो हि नान्यः कापि कदाचन ॥१॥ सर्वभावेन सर्वात्मभावेन सर्वदा प्रजाधिपो भजनीय इति सम्बन्धः । सर्वैरिति शेपः । स्वस्यायमेव धर्मोन्यो न । कापि कुत्रचित् । कदाचन कस्मिबपि फाले इत्यर्थः । हीति युक्तचायमर्थः । सहनदासत्वेन नीवस्प यतोयमेवार्यः श्रुत्या मतिपा. यते । अत एवास्मसंभुचरणै निजनिसर्गमभुश्रीगोकुलनाथचरणकमलदास्यमेव स्वधर्म' इति निरणापि । सर्वदेतिपदेन नात्र कालादिनियम इति ज्ञापितम् । धर्मशाखादिषु धर्मकरणे फालादिनियम उक्तस्तेन तत्र धर्मजनितफलस्यापि कालाधीनत्येन क्षयिष्णुत्वमेव । अत्र तभावाय सर्वदेत्युक्तं भवति । किञ्च, सर्वदेतिपदेन क्षणमात्रमप्यन्यधर्मकरणेऽनन्यत्व- भङ्गमसङ्ग इति ज्ञापितं भवति, भगवतो जीवानां पतित्वनिरूपणात् । यया पतिवतायाः क्षणमप्यन्यत्र मनश्चालनेन प्रतभहस्तयात्रापीति ज्ञापनाप सर्वदेत्युक्तमितिभावः । सर्व हामण्डन-तथा धापरिमाणस्वैर जीरप पूर्वाप न्यायेन प्रण. सानिया स्वसेषामेव निजय निर्षियस्वपरिहाराप प तथा प्रकटोत्तस्पान एव महजइरिदासस्य तईशयन पर निजनिसर्गप्रभुधीगोइलवायवाणामतहास्यमेव स्वपनः । तेन चातिसंटस्प गुणस्तस्मै दस्दा स्वस्मिन्प्रवेशयति सम्मान राउमाामियादि निरूपितम्।
२ । . श्रीमद्रजराजचरणविरचितविवृतियुता। भावेनेति । सर्वो भगवति यो भावस्तेन तया । पतिपुत्रादिभावेनापि तथेत्यर्थः । एतदे. बोक्तमाचाथैरेव ' तादृशी भावनां कुर्यादित्यादि । यदा, सर्वभावपदेन स्त्रीभार उच्यते। सर्वपदस्यकस्मिन्धर्मे तत्रैव शक्तेः । अत एव ब्रजमण्डनाभिरुक्तं, 'सन्त्यज्य सर्वविपयां- स्तव पादमूल'मिति । तत्रैफस्मिन्सर्वपदाशक्तेरिति भावः । यद्वा, सर्वो भगवति यो भावः स्त्रीभाव इति यावत् । भगवति स एव भावः प्रयोजक इति श्रीमत्स्वामिनीकृतस्त्र- शृङ्गारादिप्रकारयुक्ते भगवति यो भाषः स तया । अत एवास्मत्प्रभुचरणैरतं 'यद्यपि युवतियेप' इत्यारभ्य 'पुमामपि युवतीभाव उद्वेल' इत्यन्तं पधद्वयेन । अन एवास्मत्लभुचरणः श्रीमदाचार्यश्चोक्तं 'एतस्य दर्शने तु स्यात्समदाभाव एव हीति, स्त्रीभानो गृह' इत्यादि च । ननु सर्वेषां तद्भावायोग्यत्वादेतद्बोधनमनुपपन्नमामा- तीति चेत् ? सर्वेषां तयोग्यत्वं ब्रह्मणा वृहद्वापने 'खियो वा पुरुपा वापि भर्तृभावेन केशव'मित्यादिनोक्तम् । यद्वा, सर्वशब्देन प्रभुरेवात्रोच्यते, यतः सर्वशब्दस्य तव शक्तिः तदात्मरूपा स्वामिनी, तत्र भावेन दासीभावेन प्रभुपु वत्सन्देशादिकथन- पूर्वकसर्वसामग्रीसम्पादनेनेतिभावहृदयम् । व्रजाधिपपदेन पूर्णपुरुषोत्तमत्वं झाप्यते । यथा कृपया तेषु स्वीयत्वं प्रकटीकृत्य स्वस्मिंश्च तदाधिपत्यं प्रफटीकृत्य रमने, तथैव सर्वात्मभावेन भजने सर्वेषामेव करिष्यतीति व्रजाधिपनाना द्योत्यते । तेषु स्वाधिपत्यं तु श्रीगोकुलजनरसदानेच्छाजनितवामकरशिखरिवरधारणमोबदुत्साहोल्लसितहृदयेन श्री- गोकुलनाथेनेवोतं. 'मन्नाथं मत्परिग्रह'मित्यादिना । एवं भगवनः स्वस्याधिपत्वं हृदि कृत्वा भजनीय इति भावः । स्वस्य तदंशत्वेनायमेव धर्मो नान्य इत्यर्थः । अत एव स्मर्यते 'यो यदंशः स तं भजे'दित्यादि । अस्य स्वधर्मवोच्यान्यधर्मकरणे वाधान्य मेर स्यादित्यर्थः । अत एव श्रीदेवीभाग्योदयाचलभूपणेन श्रीगीतास्वपि उक्तं 'सधर्म निधनं श्रेयः परधर्मों भयावह' इति। अस्य स्वधर्मवोत्याऽन्यत्र तदभावः स्वतः सिद्ध एव, तथापि नान्य इति यदुक्तं तद्धर्मशाखादिष्वन्यत्र स्वधर्मपदकथनेन तदर्शनेनापि चित्ते- न्यथा न विचारणीपमिति भावः । यतस्ते बहिर्मुखा देहधर्ममेव स्वधर्मत्वेन वदन्ति, न तु भगवद्धर्ममिति ! धर्मशास्त्रस्य तेदुदेशेनैव प्रवृत्तेस्तैद निरूपणं युक्तमेर । अत एव युधिष्ठि- रेण 'यो धर्मः सर्वधर्माणां भवतः परमो मत' इति पृष्टो भीष्मः प्रभुसहस्रनामस्तानं भक्त्या तसेवनं च परमधर्मत्वेनोक्तवान् । नन्वयं कर्तव्य एव तत्कथं सर्वथा निषिध्यते । उच्यते । सत्यमस्य देहसम्बन्धित्वेन करणीयत्वमायाति, परमन्यसृष्टिवयदि भक्तानां देहो भौतिको भनेत् , भगवद्भक्तानां तु भगवत्पादपद्मरेणुसम्पादितदेहत्वाचन्दननकरणमेव सधर्मो नान्य इति सर्वमदातम् । अत एव श्रीवराहरक्तं, 'अन्यैव काचित्सा सृष्टिविधातुर्व्यतिरेकिणी'- xzारसमण्डने दशर्मागसे. ३ दहोदेशेन ३ भगवदमानिरूपणम्. . नन स्मार्मा एव ते इम्पनि पाइ ३ चतुःश्लोकी। त्यादि । सा सष्टिभगवता स्वसेवार्थमेवोत्पादितैति तत्सेवनमेव धर्म इति भावः । तेत्र देशादिसाधनस्योक्तत्वाद्धर्मामास एव न तु धर्मोपि, स्वतो दुर्वलत्वादन्यसापेक्षणमप्यंत एव । अत्र तदभावमाहुः कापीति । अस्य धर्मिमार्गत्वात्सबलत्येन कुत्रापि करोतु न देशा- दिनियमो, यतो देशाचाधिदैविकसम्पादनं भगवतैव । अत एवोक्तं श्रीभागवते 'तीर्थी- कुर्वन्ति तीयांनि स्वान्तःस्थेन गदाभृते'ति । वेन अन्यः कापि न । अयं तु धर्मिरूपत्वा- दतिमबलत्वादतिरोहितत्वारकापि भवत्विति भावः । धर्मिधर्मयोरभेदाद्धर्मोक्तिरिति भावः। कदाचन कस्मिनपि कालेऽन्यधर्मः स्वधर्मो नेत्यर्थः । भक्तानां धर्मरूपोपि भगवानेव । तस्माद्धर्मादिषु मनोगमनेपि तत आकृष्य भगवत एव धर्मरूपतां ज्ञात्वा सर्वात्मभावेन भगवानेव भजनीय इति भावः । किञ्च, धर्मेणवेष्टसिदिः, यतो निगमे तथैव प्रतिपाद्यते । 'धर्मेण पापमपनुदती'त्यादिना पापस्यैवेष्टमाप्तिपतिबन्धकत्वेन श्रवणात् । तर्ने साझवि- धिना कृतेन धर्मेण पापनिटत्तिस्ततः पुनस्तत्करणेन फलप्राप्तिः। सा चातिदूरतरा, यतः सागकरणं न सम्भवति । अतः स्मर्यते, 'यस्य स्मृत्ये त्यारभ्य 'न्यूनं सम्पूर्णतां याती'- त्यन्तेन भगवत्स्मरणेनैव तत्र पूर्णता । अन्यथा विधिशेपत्वं भवत्येव । अत्र विधेरैवा- भावेन भजनस्यैव भावात्मकत्वेन फलस्यैव धर्मोत्या भजनानन्द एव फलाप्तिरिति भावः। अत एव यदुकुलामृताधिसुधादीधितिनाऽगादि 'ये यथा मां प्रपद्यन्ते तॉस्तथैव भना- म्यह'मित्यादिना विधिहीनानां धर्मादीनामसाधकत्वं योगियाज्ञवल्क्येन स्मर्यते 'विधि- हीने भावदुष्टं कृतमश्रद्धया च यत् । तद्धरन्त्यसुरास्तस्य सुमूढस्याकृतात्मन' इति । फिच, भक्तानां भगवानेवेष्टस्तत्माप्तिश्च नान्यधर्भवति, विना तत्सेवनम् । तस्मात्तदिन- योगतापे सति तत्मात्ययं च यद्भगवरसेवनं तद्धर्मरूपमेवेति भावः । अत एव शुकवागम- तान्धौ ‘भक्या सञ्जातया भस्पा' 'भच्या तुतोष भगवान् गजयूथपाय' 'मीयतेऽम. लया भक्त्या हरिरन्पविडम्बनम् ' 'भक्त्याइमेकया प्राय: श्रद्धयात्या मियः सताम् 'प्रतिष्ठया सार्वभौम'मित्यारभ्य, ' मामेव नैरपेक्ष्येण भक्तियोगेन विन्दति' इत्यन्तेनैवे वाक्यसहस्रभक्तीतरसापनासाध्यत्वं निधीयते भगवतः । तत्रैव पुनर्भगवता सर्वधर्मा- निरूपयता श्रीमदुद्धवं प्रत्युक्तं ' सर्वेषां मदुपासन'मित्यारभ्य, 'इति मां यः स्वधर्मेण भजनित्यमनन्यभाक्' इत्यन्तेनानन्यभजनस्यैव स्वधर्मत्वम् । तस्माद्धर्माकासायां भगवदीयानां धर्मरूपो भगवानेव भजनीय इति भावः । किञ्च, अन्यधर्माणामधिकारि- परत्वमुक्त, प्रभुनरणैः स्वभजनस्य च सर्वेपामधिकारित्वम् । तेन सर्वपापशोधकनिर्मल वस्तुनो नाधिकारादिकमपेक्षितम् । तस्माद्धर्मपदस्य भगवद्भजन एव शक्तिः । तथा च तेजवत्स्वन्यत्रापि दृश्यते । अतिरोहिताधिदैविगङ्गास्त्राने पापनिवर्तकत्वं, अग्नेश्च दाह. करणेऽविचारस्तथान्यधर्मादिषु धर्मत्वं चेत्स्यात्तदेष्टरूपभगवरमाप्सिरपि स्यादेव, सपा १ स्मातें धर्म. २ जित्वादेव. ३ ताभावार्धमिति. ५ घणेशहिती. . .
श्रीमद्गजराजचरणविरचितविवृतियुता। तत्करणेऽधिकारोऽपि स्यात्परं तदभावे तत्र धर्मपदप्रयोगो गौण एवेति भावः । होति युक्तशायमर्थः, सर्वात्मकस्य भगवत एव सेवनमात्मधर्म इति । यद्वा, हीति युक्तचायमर्थः, यदन्यसम्बन्धरहितस्यैव भगवमनस्यैव धर्मत्वम् । यतो भगवताप्युक्तं ' भत्त्या सनन्यया प्रायः' 'अनन्याश्चिन्तयन्तो मा'मित्यादिनेति भक्तानां भगवद्भजनमेव स्वधर्म इति स्वधर्मत्वेन भगवानेव सेव्यो नन्वन्यधर्मेपु मनो निवेशनीयमिति भावः ॥ १॥ एवं धर्मरूपमुक्या अर्थस्वरूपमाहुः एयमिति । एवं सदा रम कर्तव्यं स्वयमेव करिष्यति । प्रभुः सर्वसमर्थो हि ततो निश्चिन्ततां ब्रजेत् ॥ २॥ सदा एवं कर्तव्यं पयाग्रे निरूप्यते । तदेवाहुः प्रभुरिति । प्रभुः स्वामी भक्तानाम् । सर्वरूपवासौ सम्यगर्थरूपश्च यतः, तस्मात्स्वयमेव करिष्यति ततः कार- णानिश्चिन्ततां निश्चिन्तस्य भावं व्रजेदित्यर्थः । एवमेव काव्यमिति । स्मेति प्रसि- द्भिरता । अर्थः सर्वदा गोप्यो भवति, तद्रूपमेव गोपापति । प्रभुः सर्वसमर्धस्ततः स्वयं कर्तव्यं रक्षणादिकं प्रभुरेव करिष्यति । एवं सदा निश्चिन्तता ब्रजेदित्यर्थः। यथा- र्थस्य रक्षार्थ स्वयं यत्नः क्रियते तस्य जडत्वादन प्रभोरेव तदुपया यो गोप्योशस्तं मभुरेव भावादिरूप गोप्यं करिष्यतीति स्वयं निश्चिन्तो भवेदितिभावः । अत एम. चानवरले उक्तं, 'चिन्ता कापी'त्यादि । यथार्थस्य सम्यगोपने कुन एवं निश्चित न्तता भवेत्नथात्र तं भावमर्थरूपं पहिर्मुखादिचौरेभ्यो भगवान् स्वयमेव गोपाय- तीति सिद्धवत्कारेण निश्चिन्ततां व्रजेदित्युक्तम् । यथार्थस्य गोपन सर्वेभ्यः क्रियते तथास्यापि भावस्यातिगोप्यत्वानोक्तं, परं निश्चिन्ततोक्या गुप्तत्वेनोक्तमिति भावः। यदा, प्रभुः सर्वसमर्थस्तनः स्वयमेव कर्तव्यं करिष्यति, सदैवं शाला निश्चिन्ततां ब्रजेदित्यर्थः । यथार्थेनैव सर्वसामयादिकं भवति तयात्र प्रभुः स्वभोग- योपदेहयोरनादिमामग्रीसम्पादनं कर्तव्यत्वेनोच्यते तत्स्वयमेर करिष्यति । यतः सर्व- पदेन भक्तानां सर्वेषां सम्यगर्थः स एवेति सदैवं तथा भवेदिति भावः । अयमेवार्थों रसापिसुधाकरश्रीमत्मभुचरण रससर्वस्वे निर्णीतः । 'विनय समयक्रम ससि तदा यदासीदतिस्फुटं नवयौवनं त्रिदशमोहिनीमोहनम् । तदङ्गगगुणो न तद्वतकृतोभ्यदी. योपि चा विचित्ररसभाषितमियाटासगोयं परम्' 'यप एवं यदीशं तदीय पिमु वाध्यं सखि विग्रहायशेपम् । रसरूपमितीन्दिरादुरापं रसमापुर्यदुदारतो रसाधे रिन्या. दिना । तेनार्यस्यार्षिदेवरूपायास्तस्या यदुरापं तदर्थासाध्यं तु भवन्येव, भगवता च स्वीयेपु तन्संपाद्यते । तस्माद्भगवानेवास्मानमर्यरूपोऽस्ति, स एव सर्व फरिष्यतीति ज्ञात्वा, १R.
५
चतुरलोकी।
एवं पूर्वोक्तसर्वात्मभावेन सदा भजनं कर्तव्यम् । ततः प्रभुरपि सर्वसमर्थस्तथैव करिष्य-
तीति भावः । ननु तथाकरणं ननवरकुमारिकास्येव समाति, तासा योग्यत्वादन्येपा-
मयोग्यत्वात्कथमेव वोधनमिति चेत् ? सत्य, तदयोग्यत्र जीवाना, तथापि सर्वात्मभारेन
तया चेद्भजेत्तदा भगवदनुग्रहेण तथा भवेत्तदा भगवानपि कुर्यादेपेति भावः । अत
एव पुष्टिसरसिजमार्तण्डायितचरणाचायरेव भ्रमरगीतविवरणे प्रकटीकृत 'तदुरापत्वेपि
तदाशया तगजनमेव कार्यमित्युक्तम् । तदप्राप्तियेत्स्यात्तदा तदाशयेति नोक्त स्यात् ।
तथा च श्रीगोपीजनप्रेमकुमुदवन्धुश्रीविठ्ठलनाथैरपि विद्वन्मण्डने रससर्पस्ये चालेखि,
'सर्वात्मभावेन चेत्तथा भजनं करोति तदा भगवानप्यनीकरोत्येवेति । 'यदान 'त्यस्मि-
पद्येपि 'यस्मिन्महानुग्रहस्तस्मिन्योपनितम्धिनीत्वमचिरारकर्ता मियः प्रायश' इति ।
तस्मात्तदनुग्रहेण तथाभवतीति भावः । अत एव यदुकुलरत्नाकरेन्दुना 'ये यथा मा प्रपद्य-
न्ते' इत्युक्तम् । यद्वा, स्वयं कर्तव्य भजनादिक वसुन्दरीषु समर्थो हि प्रभुः करिष्य-
त्येवास्मदर्शनार्थम् । सदा एव निश्चिन्तता ब्रजेत् तत्प्रकारकभगवलीलादर्शनार्थ चिन्ता न
कार्या । प्रभुः स्वत एव करिष्यतीति भावः । स्मेति प्रसिद्धिः । यतः प्रभुणैवोक्त 'अहं
भक्तपराधीन' इति । तदधीनत्वेन तन्मनोमिलपितारण स्वत एव सिद्धम् । रीति निश्च-
येन युक्तथायमर्थः । यतो भगवदर्थ 'सन्त्यज्य सविपया नित्यादिवये त्यजन्ति तेषा
मनोरथपूरण च भगवता कर्तव्यमेव । अत एव भगवतैयोक्त 'ये त्यक्तलोकधर्माश्च मदर्थे
ताधिभर्म्यहम्' इत्यनेन । भरणकरणोक्त्या यथा तेपा स्वलीलादर्शन भवति तथैव कल्या
स्वलीलायामेव स्वरूपासिकाया स्वस्मिन्नेव स्थापयामीति भावः । अर्थेनैव स्वमनोरयाभि-
लापो भवति, अन्यथा तु जलतरङ्गवदुद्भूतदीनमनोरथापूर्तिरेव सदा, तथार श्रीमत्पभुचर-
णसेवनेनैव भक्तमनोरथपूर्तिरिति भक्तानामर्थरूपोपि भगवानेव सेव्य इति भावः । यथार्थ
विना लौकिकरमणादिक भोगश्च न सिध्यति तथानार्थापिदैविकलक्ष्मीप्रवेश विना भगवदप-
भोगौ च न सम्भवतः । सा सम्पतिरपि स्वस्मिन् स्वत एव सेवनसन्तुष्टः करिष्यत्येव प्र.
मुस्तदा श्रीमदनुग्रहेण तत्माप्तिस्तेन च तो सभवेताम् । भगवदाज्ञयैव भगवदेकशरणायास्त
स्याः प्राप्तिरिति भगवानेवार्थरूप । अत एव श्रीगोकुलनाथवाधिपतिश्रीमत्माणेश्वरैः फल-
प्रकरणे सर्वत्र तामु सा भगवदाच्या निर्विष्ट'ति । अस्पार्थस्यात्यन्त गोप्यत्वात्सर्वसमर्थ
इतिपदेन परोक्षेणैव गुप्तवया प्रभुचरणैः प्रकटीकृतमित्यल लेखनेन। तचरणाजमकरन्दपा-
नमताना हदि प्रभुमुखेन्दूदयेन स्वत एव भावाधिवीचित्रचारो भविष्यतीति भावः
एवमर्थस्वरूपमुक्त्वा कामस्वरूप निरूपयन्ति यदि श्रीगोकुलाधीशेति ।
यदि श्रीगोकुलाधीशो धृतः सर्वात्मना हृदि ।
ततः किमपर ब्रूहि लौकिकैदिकैरपि ॥३॥
६ श्रीमद्रजराजचरणविरचितचिवृतियुता। श्रीगोकुलाधीशः सर्वात्मना यदि हृदि धृतस्ततो लौकिकै लोक. सम्पन्धिसुखैः वैदिकैरपि पेदोक्तर्मजन्यैः स्वर्गादिसुखैरपि किमपरमस्ति ? न किम- पीत्यर्थः । त्वं ब्रूहि । स्वं मानसमेव साक्षीकृत्योच्यते । यदीतिपदेन कस्यचिदेव परमभाग्यवतः कृतपुण्यपुञ्जस्यामिकुमारीणामिव भावो भवतीति दुर्लभत्वं ज्ञाप्यते । गोकुलाधीशनाम्ना भगवतस्तदधीनत्वं ज्ञाप्यते । अत एव स्वास्वामित्वाभिमानिभि- रपीन्द्रादिभिर्भगवान् तत्पतिखेनाभिपित्तो, भगवन्मनोनुवृत्तिज्ञानेन । एतदेवोक्तं 'इति गोगोकुलपति गोविन्दमभिषिच्यस' इति। गोगोकुलोज्या गोप्यो, गोपा, गावचोच्यन्त इति भावः । तेन तासामधीशोतिरसिकः मेमरसनाथ । अन्यथा पूर्णपुरुषोनमः कथं गोपीनां पशुतुल्यानां स्वयं प्रभुत्वमङ्गीकुर्यात् । तासां केवलं पेम्णवाङ्गीकारात्स चेदि तयोग्य- स्वरूपभावेन धृतस्तदा तथैङ्गीकुर्यादेयेति गोकुलाधीशनाम्ना द्योत्यते । सर्वात्मना सर्वथा सर्वभावेन कामभापेनेति यावत् । अत्र सर्वात्मपदं कामपरमेव । यथा प्रजभाग्य- रूपाणां सर्वात्मभावः कामभावात्मक एव, अत एवोक्तं 'गोप्य: कामादिनि । नया. स्मिन्नाचार्यरकटितपुष्टिमार्गे ताक्यामिरेवोच्यते । स एव भाव उपदिश्यते । ता एव च गुरव इत्याचायरेवोक्तं संन्यासपकरणे 'गोपिकाः मोक्ता गुरयः साधनं च तदिति । तेन सर्वात्मना कामभावनेति भावः । अस्यात्यन्तं गोप्यत्वात्स्पष्टतया नोक्तम् । एवं भकारेण चेदृदि स्वयं धृतः । स्वधारणोत्पा बलात्कारेणेव 'मैव विभोर्हती'त्यादिरीत्येति भावः । तथा चेद्धृतस्तदा लौकिकः पतिभिः वैदिकैः स्वर्गादिभिः, पुत्रादिभिर्याऽपरं कि? न किमीत्यर्धः । अत एव लौकिकवैदिकत्यागपूर्वकं कामभावेन भजनं श्रीयन. नाथप्राणवल्लभाभिरेवोक्तं 'सन्त्यज्य सर्व विषयांस्तति, 'पतिसुतादिभिरानिदैः किम्' इत्यादिभिस्त्यागमुक्या पवाद्भजनार्थमुक्तं तन्नो निधेही'त्यारभ्य 'तप्तस्तनेषु च शिरस्सु च किङ्करीणा'मित्यादिना । भगवतापि तथैवाङ्गीकाराज्ज्ञायते चास्यैव भावस्य मावल्यम् । तस्मादपरं न किस्पीति भावः । त्वया ज्ञायते या किमप्यपरं तदा ब्रूहि । यदा, गोपदमिन्द्रियवाच, तेन्द्रियकुलस्य प्रभुः सर्वात्मना पूर्वोक्तकामभावेन हृदि मनसि । सर्वन्द्रियाधिष्ठातरि यदि धृतस्ततो लौकिकैः पनिभिः किं ? न किमपीत्यर्थः । असायं भाषः । यदि भगवान् धनस्तदा सर्वाणीन्द्रियाणि भगवत्पराणि भवन्ति, तदेव च जन्मे- न्द्रियसाफल्यम् । तदेवोक्त बनवावरणीयाभिरक्षण्वनां फल मितिपये । श्रीपदुद्धवैध कि ब्रह्मजन्मभिरिति तासां भावदर्शनेनान्यजन्मवैफल्यमुक्तम् । तस्मादेवं यदि प्रभुश्रुतस्त- दापरं लौकिकैः पतिभिः किं भविष्यति न फिपपीति भावः । वैदिकैरिति पति- विशेषणम् । वेदोक्तैरपि सौरिः विमिति । अयमर्थः। वेदे पतिभजनेन मोक्षः स्पादित्युक्तं, ततु समासदेहेन्द्रियाणामसम्बद्धतरम् । अत एप्रोक्तमाचायः 'इदमेषेन्द्रिय वनां फलं मोसोपि नान्यथा । ययान्धकारे नियता स्थिनिन क्ष्णोः फलं भोत् । एवं ७ चतु लोकी। मोक्षोपीन्द्रियादियुक्तानां सर्वथा न हि' । तस्माचैः किं ब्रूहि ? पूर्वपक्षिणं प्रत्युच्यते- अपरमपि किं तैरिति जानासि चेत्तदा ब्रूहि । ननु भगवदप्राप्तिसमये लौकिकेप्येव संबन्धात्कामस्य च बलिष्टत्वात्कदाचित्तेपु मनश्चलति तदा तत्कृतमप्यकृतं भवति ततो वेदानुसारेणैव करणमुचिततरमिति चेत् । न । भगवनिवेशितमनसां सर्वथान्यत्र कामो न संभवत्येवेति श्रीव्रजकुमारिकाकामपूरणपारिजातचरणेन श्रीनन्दकुमारेणवोक्तं 'न मय्यावेशितधियां कामः कामाय कल्पते' इति । यदा, लौकिकैरपि दृश्यादिगुगैरपि, सर्वात्मना कामभावेन वा वैदिकैर्बजेन्द्रदिङ्मुखालङ्करणमुखचन्द्राभिरुक्तधर्में: 'चूतम- वालयहस्तबकोत्पलाजेत्यादिभिर्यदि श्रीगोकुलाधीशोधृतस्ततोऽपरं कि, न किम- पीति भावः । एवं सर्वपकारैरपि कामभावेन प्रभुरव सेव्य इति भावः ॥ ३॥ कामस्वरूपमुक्त्वा मोक्षस्वरूपमाहुः ततः सर्वात्मनेति । ततः सर्वात्मना शश्वद् गोकुलेश्वरपादयोः । स्मरणं भजनं चापि न त्याज्यमिति मे मतिः॥४॥ ततः कामभावात्मकभक्त्यनन्तरम् , पुनः सर्वात्मना सर्वात्मभावेन, शश्वत् निरन्तरं, गोकुलेश्वरपादयोः स्मरणं तथैव भजनमपि न त्याज्यमिति मे मम मदीया मतिरित्यर्थः । अनायमाशयः । कामभावेन भगवत्सम्बन्धानन्तरं तत्सबन्धस्व- भाषमादाननिततुल्यत्वप्रमदात्वमदेनान्यथाभाचे सति मानादिना दोपभावेन तद्भावा- युतिः स्यात् । ततः सर्वात्मभावेन भजनमेव कार्यमिति भावः । शश्वदितिपदेन क्षण- मप्यन्ययाकरणे सर्वथाऽसुरमवेशः स्यादिवि ज्ञाप्यते । गोकुलेश्वरनाना यथा तेषां सर्व- भावपपल्या सन्तुष्टयातुर्गादिरहितेष्वपि स्वामित्वमङ्गीकृतवान्, तथानापि तवापि करिष्य- तीति वन्यते । पादेषु द्वन्द्वकयनेन श्रीस्वामिनीपादसाहित्यं ज्ञाप्यते । स्मरणपदेन स्मरणं चेतसो धर्म इति चित्ते भगवद्विप्रयोगसमये सरणमिति भावः । अन्यथा तद्विप्रयोगस्या- तितीक्ष्णत्वेन जीवनमेव न स्यादिति भावः । भजन सेवा, सापि निरन्तरं तथैवेति भाः। चकारेण भननं चित्नपूर्वकमेव पर्तव्यमिति भावः । अपिशब्देन भगवान भगतु वा मा भजतु, स्वस्य भजनी येति भावः । अत एव श्रीगोकुलाधीशरतिमार्णाजमात- ण्डायितपादपमेः श्रीवेटला नादि, 'मारणे वरणे गपि दासीनां नाप्रभुर्गतिरिति । अयमेवाः स्वयं न त्याज्पमिति सकरणकात्यागोत्या ज्ञाप्यते इति भावः । मे मति- रिति समतिकयनेन स्वानुभः प्रदर्शितः । भक्तिमार्गे भक्तिरेव परमपुरपार्यः । मोक्षाद- प्यपि भक्तेः सिद्धमे । तस्मात्पुष्टिमार्गे मोक्षरूपलं च भजनस्पति भजनमेव निरू. पिनम् । भक्तमोक्षाधिकसं तु थीभागने बहुधपोत्तम् । तथा हि 'सालोक्यसाहिंसा- । १भजनुवामा भानु इति ।
श्रीमहाराजचरणविरचितविकृतियुता । मीप्यसारूप्ये त्यारभ्य 'विना मत्सेवनं जना' इत्यन्तं; 'स्वर्गापवर्गनरकेष्वपि तुल्यार्थ- दर्शिन' इति च । वीक्ष्यालझाते'त्यारभ्य 'भवाम दास्य' इत्यन्तेन परेन च । तेन भजनं सेवा मोक्षाधिका सैव कर्तव्येति भावः । मोक्षनिरूपणे भननस्य स्वकरणका- त्यागोत्या पूर्वोक्तधर्मादित्रयकरणेन भगवान् स्वक्शे भवतीति ज्ञाप्यत इति भावः । एवं मोक्षस्वरूपनिरूपणे सपतिलायनेन स्वीयानामे कर्तव्यमिति भावो ज्ञापितः॥४॥ इति श्रीगोलाधीशवागधीशमुखच्युतम् । स्वमार्गधर्मार्थकाममोक्षाणां रूपमद्भुतम् ॥ १॥ तत्पादपद्मकृपया विकृतं हि यथामति । तैनाचार्या मयि ज्ञात्वा स्वीयता कृपयन्तु वै ॥ २ ॥ पत्पदान्जमरन्दालिभावस्तुच्छीकरोति । मुक्ति तच्चरणाम्भोजरेणुमहा प्रसीदतु ॥३॥ श्रीविठ्ठलपदाम्भोजरेणुसङ्काविणा मया । स्वाचार्योक्ता चतुःश्लोकी निर्णीतेयं यथामति ॥ ४॥ इति धीवजवधूप्राणेनपादपद्मात्मपुष्टिमार्गचकोरनेत्रानन्दश्रीवल्ल भावार्योक्तचतु श्लोकीविवृतिर्भावरसदीपिका श्रीश्यामलतनुजब्रजराजकृता सम्पूर्णतामगात् ॥
व्रजाधिपः पूर्णपुरपोचमा समिटानन्दो भजनीयः संवनीप इत्यर्थः । पुष्टि- श्रीकृष्णाय नमः श्रीगोपीजनवल्लभाय नमः। श्रीमदाचार्यचरणकमलेभ्यो नमः । चतुःश्लोकी। श्रीवल्लभप्रकटितप्रकाशसमेता। श्रीमवल्लभनाथवरणसरोगहरेणुभ्यो नमो नमः । श्रीकृष्णाऽऽस्याचार्यवांछिपमरेणूनत्वा भक्तितो यद्वयोः । दुर्विज्ञेया यत्मसादं विनातस्तद्वाक्याथ तत्मसादाद्विवने ॥१॥ लोके पदार्थाश्चत्वारो धर्मार्थस्मरमुक्तयः । स्मृत्युक्तसाधनैर्लभ्याः पूजामार्गानुसारतः ।। २॥ तत्र प्रतिज्ञा नो मुक्तिविना ब्राह्मणदेहतः । भूतशुद्धया विनिर्वाहः साङ्गोपाङ्गः स्वमन्त्रतः ॥३॥ चेत्तदाप्यतरमाप्तिरूपा मुक्तिर्भवेत् कचित् । अतो निःसाधनानां यदृया जन्म सदा भवेत् ॥४॥ तदर्थ श्रीहरिः साक्षात्स्वास्यवहि स्ववारपतिम् । चकार प्रकटं लोके श्रीवल्लभामिलातले ॥५॥ तैरेव श्रीमदाचायः पुष्टिमार्गानुगामिनाम् । स्वसिद्धान्तावबोधार्या चतुःश्लोकी निरूपिता ॥ ६ ॥ यस्पाः पूर्वपदार्येभ्यः पृथग्धर्मादितुर्यकम् । सत्वरं युध्यते तस्या विरतिः क्रियते मया ॥७॥ श्रीमदाचार्पवरणाः स्वीपानां स्वमागीयपुरुषार्थचतुष्टयनापनार्थ स्वसिद्धान्त चतुः लोकी निस्पयितुकामास्ता प्रथमं सधर्माचरणरूपं मयमं पुरुषार्थमनुष्टुप्छन्दसाहुः सर्यदा संघभावेनेत्यादि। सर्वदा सर्वभावेन भजनीयो व्रजाधिपः । स्वस्यायमेव धर्मो हि नान्यः कापि कदाचन ॥ १ ॥ मार्गीयरित्यध्याहार्यम् । तदेवोक्तं श्रीमदाचार्यचरणः श्रीभागातदशपरन्य नियम १० - श्रीवल्लभमकदितप्रकाशसमेता। रणविवरणे 'निःसाधनफलारमाय प्रादुर्भूतोस्ति गोले । अनो वयं सुनिश्चिन्ता जाताः सर्वत एव ही'त्युक्तेनिःसाधनानां कृते भगवतः पुरुषोत्तमस्य प्रादुर्भावः सिद्धः । स एष निःसापनै वर्देवसृष्टयुत्पन्नः सेव्य इतिभावः । अथ स तैः कयं सेवनीय इत्याहुः सर्वभा. वेनेति । संवदेहेन्द्रियमाणान्तःकरणादिभिः कृतो यो भावः सात्मभावस्तेन सेव्यः । एत- दुक्तं भवति । देहेन्द्रियमाणान्तःकरणखीपुत्रधनगृहादिकं सबै भगवत एव न ममेत्येवंभूतो यो भावः स संसारनिवर्तकः, तस्मिन् सति जीवे निश्रिन्तता भवति । एवं सति मुक्त एवं भगवन्मयो भवति। तदुक्तं भक्तिवादिन्या गृहस्थानां वापकत्वमनात्मत्वं च भासते । यदा स्पायसनं कृष्णे कृतार्थः स्यातदेव हि । तेन सर्वान्मभावोयमेव देवनीवस्य मुख्यो धर्मः कर्तव्य इत्यर्थः । तदुक्तं श्रीभागवते एकादशस्कन्धे 'केवलेन हि भावेन गोप्यो गावः खगा मृगाः । येन्ये मूढधियो नागाः सिद्धा मामीयुरअसा निन्वयमपि सर्वथा धर्मान्तर- वदेफकालीनो वैकदेशीयो धर्मो भविष्यतीत्याशवानिरासायाहुः नान्यः कापि कदा: चनेति । अन्योस्सदुपदिष्टधर्मात्पुष्टिमागीयाविरुद्धः पूजामागीयो यो धर्मः स न वैष्णवानां कार्यसाधकः, किन्तु बाधकः विभूतिपर्यवसायित्वात् । कशब्देन देशकालयोरपि धर्मविष- र्यासौ दृष्ट्वा तत्राप्पयमेव धर्म आत्मीय इति मन्तव्यम् । कदाचनेतिशय्देन कालान्तरप्यस्य धर्मस्य त्यागो न विधेय इतिमावः । सर्वदेति सर्वकालं निरन्तरं भजनीय इत्यर्थः ॥१॥ एवं प्रथमपुरुषार्थ पुरुषोत्तमसेवनरूपं पुष्टिमार्गानुसारिपमै निरूप्यातः परं द्विती. यपुरुषार्थमर्थरूपं निरूपयन्तीन्याहुरेवमिति । एवं सतां स्म कर्तव्यं स्वयमेव करिष्यति । प्रभुः सर्वसमर्थो हि तेन निश्चिन्ततां व्रजेत् ॥ २ ॥ एवममुना प्रकारेण स्वधर्माचरणरूपे मयमपुरुपायें सम्यक्तया निर्णीते तदनन्तरं विश्वासयुक्तहृदयेन स्वनुष्टिने च सति, कालानवच्छेदेन स्मर्तव्यः । वैष्णवैरिति शेषः । होति निश्चितम् । सतां वैष्णवानामहिकं पारलौकिकं च सर्वकार्य स्वयमेव विनव प्रार्थ- नेन करिष्यति, सर्वथा सम्पादयिष्यति स्म । कुतः स प्रभुरिति । यतोसौ सर्वसमधः स्वतन्त्रश्च । कर्तुमर्नुमन्ययाकर्तुं समयों हरिरव । अतो वैष्णवानां चिन्ताकरणं व्यर्थमे- वैतिभावः । उक्तं च भोजने छादने चिन्तां ध्या कुर्वन्ति वैष्णवाः । योसौ विश्वम्भरो देवः स कि भक्तानुपेक्ष्यत' इति । अतोत्र भगवद्भक्तस्तेन भगवदीयानामहिकामुष्मिकम- नोरथानां भावतः स्वपमेव कर्तव्यरूपेग हेतुना निश्चिन्ततां बजेत् मामुयादित्यर्थः । यथोक्त दशमस्कन्धे 'तया न ते माधव तावका: कोचद भ्रश्यन्ति मागोचाय बद्धसो. हृदाः । स्वयाभिगुप्ता विचरन्ति निर्भया विनायकानीकपमूर्धसु प्रभो' इति ॥२॥ एवं भगवत्प्रमेयवलं वैष्णवानां समस्तकार्यसाधकमर्थरूपं द्वितीय पुरुषार्थे निरू- प्यातः परं कामरूपं हतीयं पुरुषार्थ निरूपयन्ति यदीति ।
११ चतुःश्लोकी। यदि श्रीगोकुलाधीशो धृतः सर्वात्मना हदि । ततः किमपरं ब्रूहि लौकिकैवैदिकैरपि ॥ ३ ॥ हे मनुज यदि स्वहृद्यन्तःकरणे सर्वात्मना सर्वात्मभावेन श्रीगोकुलाधीशः प्रभुः स्थापितस्तदा ततःश्रीगोकुलाधीशात्पूर्णपुरुषोत्तमादपरमन्यत्सर्वस्मादत्युत्कृष्टं भक्ता- नां सर्वकाभपूरकं वस्तु किमप्यस्ति तर्हि ब्रूहि कथय । लौकिकैलौकिकसाधनसिद्धियुक्तै- वचनैस्तथा वैदिकैदिकयागादिसाधकवचनैनिभरितफलं मुक्तिसापकं मुमुक्षूणां काप- पूरकमपीदमेवेतिभावः । उक्तं च श्रीमदाचार्यचरणैरन्तःकरणप्रवोधे 'अन्तःकरण मद्वाक्यं सावधानतया भृणु । कृष्णात्परं नास्ति दैवं वस्तुतो दोपवर्जितम्' । किञ्च । 'एक शास्त्रं देवकीपुत्रगीतमेको देवो देवकीपुत्र एव । मन्त्रोप्येकस्तस्य नामानि यानि कर्माप्यकं तस्य देवस्य सेवेति । अर्थाद्भगवत्याप्त्यर्थं भगवदीयानां भगवत्स्वरूपसेवनमुपदिष्टं प्राचीन- गवदीयैर्नारदाद्यैर्मुनिभिः । यदि स एव हृदये स्थापितो निविष्टस्तदा तस्य वैष्णवस्य सेवाफलं किमपरमन्पदृष्टिमाप्तव्यं, न किमपरमन्यदपीति सिद्धान्तः ॥ ३ ॥ एवं काम- रूपं तृतीय पुरुषार्थ निरूप्यातः परं चतुर्य मुक्तिरूपं पुरुषार्यमुपदिशन्ति-अत इति । अतः सर्वात्मना शश्वद् गोकुलेश्वरपादयोः । स्मरणं भजनं चापि न त्याज्यमिति मे मतिः॥४॥ अतः परं श्रीगोकुलेश्वरस्य स्वहदि स्थापनानन्तरं मुक्तिसाधनं निर्दिशन्त आहुः श्रीगोकुलेश्वरपायोः स्मरणं भजनं चापि न त्याज्यम् । इतीति समाप्तौ । पपा औपषसेवनात्सुखीभूतस्यापि पुनरौपधसेवनं पुनाध्यनुत्पनिकरं भवति, तद्वद- त्रापि भगवत्माप्तौ सत्यामपि पाञ्चभौतिकदेहभृतो जीवस्यासुरादिसगादामुरावेशसम्भा- वनापां तदनुत्पादकं साधनं कर्तव्यमेव वैष्णवेनेत्यर्थः । अतोत्रेदमौपधवत्सर्वथा न त्याज्य भगवतः स्मरणं तया भजनं चेत्सर्यः । स्मरणं त्वन्तःकरणमलापहारकं जीवस्य । भननं भगवत्सेवारूपं शरीरागीकारशापनार्थम् । यद्यपि शरीरत्यागानन्तरमन्यशरीरं प्राप्य मन नानन्दमाप्तिरूपं मुक्तिफलं भविष्यति परन्तु तदपि फलमनेन देहेन भगवत्सेवाकरणा- त्पन्नमस्ति तैनास्यैव रसाथै निरूपितम् । भगवता दैवजीवोदाराय स्ववागीशस्पा माटी - तस्तेनोक्तं श्रीमदाचार्यचरणम मतिरिति । भगवदीयेषु स्वकृपाख्यापनार्थमिति दिका इति श्रीकृष्णवागीशसिद्धान्तस्य प्रकाशिका । चतुःश्लोकी प्रसादेन तस्यैव विद्वता मया ॥१॥ रति धोमपितचरणकताननीयतमविरचित चतुःश्लोकीप्रकाशः समाप्तः ।
श्रीकृष्णाय नमः। चतुःश्लोकी। विवृतिसमेता। नमः श्रीवल्लभाचार्यचरणाजनसेन्दये । धर्मार्थकाममोक्षार्थ सेव्याय स्वजनैः सदा ॥१॥ अथ श्रीमहल्लभाचार्यचरणाः कृष्णाश्रयग्रन्ये शरणागति निरूप्य शरणागतानां स्वमार्गीयप्रमाणादीन धर्मादीयोपदेष्टुं पूर्व धर्म निरूपयन्ति सर्वदेति । सर्वदा सर्वभावेन भजनीयो व्रजाधिपः । स्वस्यायमेव धर्मो हि नान्यः कापि कदाचन ॥१॥ सर्वदा सर्वस्मिन्काले । एतेन निरोधलक्षणोच्यमाना सर्वेन्द्रियैः सेवा सूचिता । फलरूपा मानसी वा, अन्यथा कालापरिच्छेदनासम्भवात् । सर्वभावेनेति । सर्वेषा. मिन्द्रियाणामहमहमिकया प्रवृत्तिः सर्वभावः । 'तन्मनस्कास्तदालापास्तद्विचेष्टास्तदात्मिका' इनिश्लोकोक्तवत् । 'तस्मात्सर्वात्मना नित्य मिति नवरत्नवाक्याच । यद्वा, पतिपुत्रादिभा- वेन । बजस्थ निःसाधनस्यानन्यस्वामिनः अधिपः । अत एवावश्यं सेवनीयः । स्व. स्यात्मनो जीवमानस्य अयं मुख्योधर्मः । अन्ये वेतदङ्गभूता इत्येवकारः । धर्म इति 'पुष्टिमार्ग हरेदास्य धर्म' इतिकारिकोक्तो विध्युक्तः । विधिस्तु नारदीये 'भातर्मध्यन्दिने सायं विष्णुपूनां समाचरेत् । यथा सन्ध्या तथा नित्या विष्णुपूना स्मृता बुधैः । एतदे- वोक्तं भक्तिहंसे 'स्त्रियाः स्वपतिथजनव'दित्यादि । हीति युक्तोयमर्थः । अन्यो देवनान्त- भननरूपो धर्मः, कापि कस्मिन्नपि देशे, कदाचन कस्मिनपि काले न भवति । एवकारस्तु अयोगव्यवच्छेदकः । अग्रिमे 'ही'तिपदादत्र है अन्तःकरण हे भक्त इति याऽध्याहार्यम् ॥ १॥ एवं वनाधिपतिभननरूपं 'पुष्टिमार्गे हरेर्दास्यं धर्म' इतिवाक्योक्तं धर्म सप्रमाणं निरूप्य प्रमेयमर्थरूपं भगवन्तं निरूपयन्ति एवमिनि । एवं सतां रम कर्तव्य स्वयमेव करिष्यति । प्रभुः सर्वसमर्थो हि तेन निश्चिन्ततां ब्रजेत् ॥ २ ॥ देवतान्तरभजननित्तिपूर्वकं भगवद्भजनं कुर्वतां पुसां, स्मेति प्रसिद्धौ । यत्क- तिव्यमर्थादिसम्पादनं तत्सर्व प्रभुः स्वयमेव करिष्यति । स्वकर्तव्यमिति पाठे स्वैः कर्तव्यम् शेिपं पूर्ववत् । भगवनः स्वयमेव कर्नव्यत्वे प्रभारवोधनायाहुः प्रभुरिति । कर्पण ।
चतुःश्लोकी। भवति, स्वयमेव भक्ताभिलपितवस्तुरूपो भवति । यथा मैथिलश्रुतदेवयोहयोप्यादिवा- हनादिसर्वरूपो भूत्वा विवेश । अत एव 'यद्यद्धिये तिवाक्यम् । ननु सर्ववेदमतिपायो भावान्भक्ताभिलपितरूपमुचावचत्वं कयं भजत इत्यत आहुः सर्वसमर्थ इति । सर्वेपूचा- पचभावेषु समस्तुल्योयो भावो यस्य । 'सर्व खल्विदं ब्रह्मेतिश्रुत्या वस्तुतः सर्वस्य भगव- चावहि युक्तोयमर्थः । तेन भगवतः सर्वसमर्थत्वेन निश्चिन्ततां बजेसाप्नुयात् । विधौ लिङ्॥२॥ एव मथों हरिरेव हि' 'प्रमेयं हरिरेवैक"" प्रमेयं हरिं निरूप्य सकामं साधनदशां प्राप्त हरि निरूपयन्ति यदीति । यदि श्रीगोकुलाधीशो धृतः सर्वात्मना हृदि । ततः किमपरं ब्रूहि लौकिकैदिकैरपि ॥ ३ ॥ एतेन दुर्लभत्वमुक्तम् । अत एव दिदृक्षा।श्रीयुक्तो गोकुलाधीशः। 'कामः स्त्रीपुमति- ठित' इतिवाक्याताभिर्युक्तः कामरूपः हृदि धृतः, हृच्छयः कृतः । तत्रापि सर्वात्मना सर्वेन्द्रियैः एकादशेन्द्रिपैः काम' इतिनिबन्धवाक्यात् । यद्वा, श्रीभिर्गोपिकाभियुक्त इत्यु- स्या साधनं निरूपितम् । 'कौण्डिन्यो गोपिकाः मोक्ता गुरवः साधनं च तदितिवाक्यात् । सतः साधनसहितकामरूपहरेर्हदि धारणादपरमुत्कृष्टं स्वस्तिपरं किं स्यात् । एतादृशं कि- मपि न । अस्ति चेटूहि । लौकिकैरित्युद्यमादिभिः। वैदिकैरिति यज्ञादिमिः साधन- रपि ॥३॥ एवं हरेदिदृक्षारूपं कामं साधनं निरूप्य फलं मोक्षं निरूपयन्त्यत इति । अतः सर्वात्मना शश्वगोकुलेश्वरपादयोः । रमरणं भजनं चापि न त्याज्यमिति मे मतिः ॥४॥ यतो हृदये श्रीगोकुलाधीशधारणादन्यत्साधनं नास्ति, अतः सर्वात्मना देहे- न्द्रियमाणान्तःकरणैः शश्वनिरन्तरं, गोकुलेश्वरपायोः गवां कुलस्य 'कुल संस्त्याने बन्धुषु चैति धात्वत्समूहस्य, गोबन्धूनां गोपगोपीनां, गोकुलग्रामस्य वा ईश्वरस्य नि- यामकस्य, पादयोः स्मरणमाध्यानं भजन सेवन तनुनवित्तजमानसमका परिचरण त्याज्यं, अन्पत्यागपूर्वकं सादरं सर्वथा विधेयम् । चकारः अयोगव्यवच्छेदकः, अनुक्त श्रवणकीर्तनसमुञ्चायकश्च । अपि संभावनायाम् । त्यागसम्भावनैव नास्ति। इति एम. कारिका मम मतिः । मन्मतेः पर्यवसानमत्रै । इदमेव फलम् । मोक्षवायम् । मोक्षः कृष्ण- स्य धुवमि तिवाक्यान् । 'ममोचमश्लोकजनेषु सरुयमिति त्रासुरोक्तेश्रेति दिक्॥४॥ एवं श्रीवल्लभाचार्या धर्मार्थेच्छाऽमृतान्निजान् । लोके मदर्शयामासुः प्रमाणादींश्च येघशः ॥१॥ इति वितिः समाप्ता। १एमारण्यकोपलम्पा श्रीकृष्णाय नमः। श्रीगोपीजनबलमाय नमः। थीमदाचार्यचरणकमलेभ्यो नमः। चतुःश्लोकी। श्रीमदोस्वामिश्रीमथुरानाथकृतव्याख्यानान्विता । श्रीहरिवागीशो बिजयनेतराम् । नत्वा श्रीवल्लभाधीशपादाब्जयुगलं मया । क्रियते तचतुःश्लोकीव्याख्यानं विदुपां मुदे ॥१॥ अथ श्रीपुरुषोनममुखारविन्दाधिदैविकानन्दमयामिस्त्ररूपश्रीवल्लभाचार्यचरणाः परममारणिका: स्वान्तःकरणोपदेशदारा स्वसमीपस्थान्तरङ्गभक्तोपदेशव्याजेन वाखिल- स्वकीयनिरुपषिदुःखाहरणेच्छया स्वमदिनभक्तिमार्ग श्रीकृष्ण एव धर्मादिचतुष्टयपुर- पार्थरूप इति तानुपदेष्टुं शिक्षितुं च तावलोकैरेवैतद्धर्मादीनुपदिशन्तस्तत्रापि 'तानि धर्माणि प्रथमान्यासन्' 'धर्मेण पापमपनुदति' 'धर्म सर्व प्रतिष्ठितं तस्माद्धर्म परमं वद- न्ती'त्यादिश्रुतिभिर्मर्यादापामपि तत्परमोत्कर्पत्वं यत्र, तत्र फलमार्गीयभक्तिमार्गतत्परमो. कर्पत्वे किंवाच्यमिति कैमुतिकन्यायमतमपि मूचयन्तो, भजनरूपे धर्मे क्रियमाण एव तद- र्थादित्रितयं सेन्स्पतीति न तदर्थ पृथगायासः कार्य इति मार्यादिकतचतुष्टयतो भक्ति- मार्गीयतचतुष्टये लक्षण्यमतिसौख्यमिति च ध्वनयन्तस्तचतुर्पु च सर्वन प्रथमं धर्म एवो. दिष्ट इन्यत्रापि तावदादौ तमेव दृढयन्नो निरूपयन्ति सर्वदेति । सर्वदा सर्वभावेन भजनीयो ब्रजाधिपः । स्वरयायमेव धर्मो हि नान्यः क्वापि कदाचन ॥ १ ॥ सावधानतया श्रवणार्थमाभिमुखीकरणेन हे अन्तःकरण! हे भक्त! इति वा सम्बोध्य सर्वदा सर्वस्मिन्काले सर्वभावेन व्रजाधिपो भजनीय इत्पन्वयः । भग- बदीयेन त्वयेति शेषः । उपदेश्योदेशाश्रवणनस्तथासम्बोधनं वक्तव्यमन्ययोत्तरे 'ही'ति पदं न सहटेत । आसुरमवेशाभावाय सर्वदेति कालापरिच्छेद उक्तः । सर्वभावः सर्वेषां भावः पतिपुत्रधनादि सर्व प्रभुरेवेति । अत एव पुष्टिश्रुतिम्माभिस्नामसपकरणी. यफलपकरणे 'अस्त्येवमेतदित्या तयैव गीतं 'प्रेष्ठो भवांस्तनुभृतां किल वन्धुरात्मेति । एतदर्यस्तु निकस्यचिस्मियो देह' दन्यारभ्य भगवत्सेवैवोचिने'त्यन्तं तद्वाक्याशयेन प्रभु- भवति, अनुभूतं चासकृत्तादशैः । अत एव वल्लभाटके 'अनुभवनिगमायुक्तमाने रित्या श्रीगोकुलनाथचरणैर्विविन्य तेषु तथात्वं निरणायि । एवञ्च ताहगाचार्यरचनानि श्रुतिरू- पाण्येव । 'निःश्वसितमस्य वेदा' इतिश्रुत्या भगवनिवासरूपस्य तस्योक्तहेतास्तव संभ- चतुःश्लोकी। चरणैस्तथैव निरणायीति तत एव विभावनीयः । यदा, सर्वेषु पदार्थेषु भावो भगवरस- म्बन्धित्त्वभावनं, तेनेत्यर्थः । अत एव वासुरेणापि तथा प्रार्थितं 'वन्माययात्मात्मज दारगेहेप्वासक्तचित्तस्य न नाथ भूयादिति । अथवा सर्वभावः सर्वात्मभावः, तेन तथेत्यर्थः । आत्मपदमन्तरेण कथनं तु 'परोक्षप्रिया इव हि देवाः' 'परोक्षं च मम मिय- मितिव्याहारतः परोक्षकथनाभिप्रायेण । स्वरूपं तु सर्वेषामिन्द्रियाणामहमहमिकया निरुपधिभगवत्मवृत्तिः । विशेषतो जिज्ञासायां तु विवेचितोस्मत्मभुचरणरणुभाष्यतृती- पाध्यायतृतीयचरण इति सुधीभिस्तत एव परिभावनीयः । तदधिकरणरूपास्तु बजे रासमण्डलमण्डना एवेति न तद्भावाधिष्ठानान्वेषणप्रयासः । सर्वभावेनेत्यत्र हि करणे तृतीया, तद्धि व्यापारवत्कारणं, व्यापारस्तु 'सज्जन्यत्वे सति तज्जन्यजनकत्वम् । तथा च सर्वात्मभावजन्यफलं भजनानन्दानुभवस्वरूपं, तत्तु रसात्मकप्रभुस्वरूपात्मकमेव । 'रसो वै स' इतिश्रुतेः । मध्ये रमणमवान्तरच्यापारः । अत एवोक्तं फलप्रकरणारम्भ तयैव प्रभुचरणोक्तिरुभयत्र । 'पञ्चधा रमणं मत' 'ततो रूपं प्रतिष्ठितम्' । हरिमियास्त्रि. ति शेप' इति । अत एतद्रमणस्य तजनकत्वम् । एवं चोक्तमकारेण भजने फलाभाव. शङ्का निराकृता । करणं तु फलवन्न तु फलात्मकं, तेनास्य साधनवं न तु फलरूपत्व. मिति पूर्वपक्षिमनःकलिलतां ब्रजाधिपपदेन निरस्यन्ति । ब्रजस्य 'अदयावृतं निशि शयानमतिश्रमेणे'तिवाक्यान्निःसाधनस्याधिपः प्रभू राजवनियामकः, 'अनन्यगोकुलस्वा- मिफलदाता फलात्मक'थात एव 'निःसाधनफलात्माये प्रादुर्भुतोऽस्ति गोकुल' इति श्री- मदाचार्यचरणोक्तिरपि । स एव भजनीयः सेव्यो नान्यस्तदंशः कलादिवेत्यर्थः । एवञ्च सतीदं भजनं फलरूपं साधनरूपं च । यया चाखण्डभूमण्डलाखण्डलस्य हि हेममणि- पाणिक्यमयरुचिरपात्राणि, कोशविशेषे सहायाणि व्यवहार्याणि च तान्येय । यतस्तस्यैव सर्वाधिकैश्वर्यत्वात् । तेपामपि तत्तजातीयेभ्यस्तयात्वानयात्रापि । न हि ततोपि जीवमात्र- नियामकोऽपरोऽस्ति येन सोपि नियम्यः स्यात् । अतो भक्तिमार्गे सकलप्ताधनमूर्धन्यमेव साधनं सकलफलमूर्दन्यमेव फलमिति नानुपपत्तिः काचित् । किञ्च, प्रामाण्यापेक्षाया. माप्तवाक्यं शब्द एव प्रमाणम् । आतत्वं तु यथाभूतार्योपदेशकर्तृत्वम् । मते तादृमहा- नुभावाः श्रीमदाचार्यचरणा एवेति नेतरप्रमाणाकाला । युक्तं चैतत् । न हि साक्षात्पुरु- पोत्तममुखारविन्दाधिष्ठातृरूपानन्दपयामिस्वरूपादितरः कवन तथाभवितुमर्हतीत्यलं वि- शेपनल्पनेन । अत एवाचार्य मा विजानीयादिति भगवदुक्तिरपि । वस्तुतः पुरुषोत्त- मा एव श्रीमदाचार्याः, तत्त्वं च कस्यचिद्भक्तविशेषस्य तात्यु।फदशायामेवानुभूतं धीमदास्यामिश्रीमयुरानापानन्याख्यानान्विता । वान तच्छङ्कागन्य इति दिछ । प्रस्तुतं वदामः । बनपटं तनिष्टपदार्थमानोपलक्षामिति तरत्याः सर्व एव भूमियमुनापुलिनादिनिकुञ्जमदरसमलनापक्षिगोगोपालगोपीननमगादयो लक्षिताः । अत एव 'धन्येयमय धरणा' यादि भगवता गीतम् । किञ्चार भजनीय इतिविधिस्तवाप्यपूर्वनियमविरी तु न सम्भवतस्तलक्षणाभावात् । तथा हि नहीश्वरमन- नममाप्त, न वा तद्भजनं पाक्षिकमिति नोभलक्षणावसरः । अतस्तत्र चान्यत्र च प्राप्त' इतिलक्षण परिसंख्याविधिरेवायं पारिशेष्यादिति सिद्धम् । एवं च तदकरणेऽपराध. रूपमत्यवायोपि सूचितः । यथा मर्यादापा तदकरणे प्रत्यवायस्तन्मार्गीयफलाभावय, तथानापि पुष्टिमागीयाचार्यनिदेशोलइनेऽपराध एतन्मार्गीयफ्लाभावश्चेतिभावः । ननु या रागतः प्रतिस्तव स, अत एव 'पञ्च पञ्चनखा भक्ष्या' इति तार्किका इति चेत्, न । तथालक्षणस्यानुपलब्धेपिनिगमकाभावाच । यद्वा, मास्त्वयं प्रमाणपत्तान्तः, प्रमेयप- द्धतौ विधेरनियामकत्वात् । वस्तुतस्तु आवश्यकार्थेऽनीय 'आवश्यमाधमर्ययो:' 'कृत्या- थे'त्यनुशासनात् । तेन सदानन्दरूपत्वाच्छोगोकुलाधिपतिरवश्यमेव भजनीय इति भारः । अपरश्च, नमधातोर्गमनार्थकन्येन नमतीति वन इतिव्युत्पत्त्या पचायन् । भगव- तस्तस्याधिपन्येन सोपि व्यापिवैकुण्ठात्मा इत्यभूचि । तेन भक्तहृदयपदेशादौ भगवदावि- वियोग्यतायां तदिच्छया ततः पूर्वमेव तदाविर्भाव इत्युक्तं भवति । अन्यथा तस्य तद- धिष्ठानता न स्यात् । न वा भगवतः साधारणवयन कुनचित्तपन्तरेणाविर्भावः । इतरथा निखिलजीवनियामकस्यानन्दरूपफलात्मकस्य त्रैलोक्यस्याधिपतेस्तदाधिपत्यमानकथनेन को वा तदुसर्पः स्यात् , प्रत्युतापापायफश्च भवेत् । न घेन्द्रादिलोकवत्तस्योत्कर्पः कुत्रचि. रपुराणादौ प्रख्यातो येन तदधिपतित्वेन तारस्यापि तादृइमाहात्म्य, यतस्तथात्वं वदेयुः। कदाचित्तादृशश्रवणमपि भूलोक एव न स्वर्गादिपु, कचिच्छ्रयतेऽपि न तादृशः, सोपि तत्तादृशीलादर्शनानन्तरमेव, न तदा । नागपि न सर्वजनावच्छेदेन किन्तु केपा- श्चिदेव भूरिभाग्यमाना तथात्वं भासते, सोपि भगवतः सकाशादेतस्यैव, नापि ततो भग- वतः । किं पहुना तादृशस्यापि प्रादुर्भावोपि माहात्म्याच्छादक एव । अत एव कचित्सु- राणामपि तन्नावरोधः । अत एव श्रीभागवत पुराणान्तरीयपतिलाध्यायत्रयकथा । तत्र श्रीगोवर्द्धनोद्धरणमस्ताये पुरन्दरगर्वश्च । सोपि तत्र तज्जन्मादिभ्रमहेतुक एव नान्यया । नन्येवं चेतर्हि तत्रैव स एव तेषामेव कथं स्तुत्यो जात इति चेव, सत्यम् । परं सा स्तुतिः पूर्व तन्माहात्म्यज्ञानन एव । यतस्तत्स्वरूपज्ञान, तत्रापि गर्भ एव ज्ञानादेव तादृक्तन्माहा- म्याययोधनं, ब्रह्मणो भगवदवतरणसम्वन्धिनिखिलस्वान्ताववोधात् । अत एव जन्मप्र- करणीयप्रथमाध्याये राजप्रश्नाभिनन्दनानन्तरं 'भूमितपव्याजे'त्यादिना श्रीशुकैस्तत्र तम्झरनं निरूपितम् । न चैवं वत्सकारणचरित तस्य तद्धरणपशवयवचनं स्यात्तन्मोहा- सम्भवादिहासम्भवादिति वाच्यं, सर्वमेतदस्मलभुपरणेस्तामसप्रकरणीयममाणप्रकरण- चतुःश्लोकी। चरमाध्यायसमात्यनन्तरमेव 'कथामानं हरेर्वाच्यामित्यादिना समाहितं । श्रीविठ्ठलचर- गैरपि तदर्थविवरणे विविच्य निरणायीति नानानुद्यते विस्वरभीतित इति नात्र पूर्वप- क्षावसरः । अतो व्यापिवैकुण्ठात्मको व्रज इति वनाधिपतत्पदेन ध्वनितम् । अत एवाय- धणे कृष्णोपनिषदि 'वैकुण्ठं गोकुलवनं तापसास्तत्र ते द्रुमाः' । तैत्तिरीयश्रुतावपि 'ते ते धामान्युष्मसि गमध्य गावो यत्र भूरिशृङ्गा अयासः । अत्राह तदुरुगायस्य विष्णोः परमं पदमवभाति भूरेः'। 'विष्णोः कर्माणि पश्यत, यतो व्रतानि पस्पशे । इन्द्रस्य युज्यः सखा । तद्विष्णोः परमं पदं सदा पश्यन्ति सूरयः । दिवीव चक्षुरातत'मिति । एतदर्थः अपश्चितः श्रीविहलवरैर्विद्वदाभरण इति नास्माभिरत्र विस्तरणीयस्तथापि तदध्ययनमाधुनिकानां सर्वेषां दुर्घटमिति तत एव तमेवार्थमल्पतोऽनुमः । तथा हि हे भगवन् ते तव ते तानि 'सुपतिडपग्रहलिगनराणा'मित्यनुशासनाल्लिा दव्यत्ययः । धामानि क्रीडास्थानानि । गमध्ये प्राप्तुं । उप्मसि कामयामहे । तानि कानीत्याकालायां गूढाभिसन्धिमुद्धाटयति श्रुतिः । यत्र श्रीगोकुले भूरिशृङ्गा दीर्घशृङ्गा गावो वसन्तीति शेषः । अथवाऽऽरण्य- ग्राम्यपशूपलक्षणार्थम् । भूरिशृङ्गा बहुशृङ्गा झरुमभृतयो मृगा गावच तथा । कीदृशाः ? अयासः शुभाः शोभावहाः शोभापायका इति यावत् । तस्येति शेषः । अत्र स्थाने भूपौ । तथापि स्वस्य तादृग्भाग्याभावादृग्गोचरो न भवतीति खेदेनाहेत्याह श्रुतिः । तलोकवेदमसिद्धम् । उरुगायस्योरकीर्तेर्भगवतो, विष्णोर्व्यापकस्य । अत एव भरेर्व- हुरूपस्य, रासोत्सवादौ तथा प्राकट्यात् । तच्छ्रीगोकुलं परमं पदं, स्थानं वैकुण्ठं पदं, तस्मादप्यधिकं परमं पदं, प्रकृतिप्रिपत्वेनापि परमं तादृशं पदमवभाति मकाशते'। अत्र स्वयं नित्या श्रुतिः अवभातीति वदन्ती स्वभानविषयस्य श्रीगोकुलस्यापि नित्य- त्वमेव ब्रूते । अन्येपामनवभानपक्षेपि वर्तमानप्रयोगतो विषयस्यापि तत्त्वमेवापातीति भावः । एतदनन्तरमेव च 'विष्णोः कर्माणी ति पठ्यते । तया पूर्वस्मिन्मन्त्रे 'यत्र भूरिशृङ्गा अयासस्तत्तस्य परमं पद'मित्युक्ता, तत्र तदनन्तरं कृतानि विष्णोः फर्माणि यशो- दास्तनपानपूतनासुपयापानरिगणादीनि पश्यत, यूयमिति शेषः । यतः कर्मभ्यो हेतु- भूतेभ्यो व्रतानि कात्यायन्यर्चनादीनि, सानिध्याद्विष्णुरैव पस्पशे स्पृष्टवान् । अयं भावः । तत्फलत्येन तत्फीष्याविर्भूय तासु सर्वा लीलां कृतवानिति । 'पश वाधनस्पर्शयोरिति धातोलिटि रूपम् । यद्वा, अयं धातुरुभपायकस्तेन प्रतानि लोकमर्यादात्रतानि पाति बत्यादीनि वाधे । अयमप्यर्थः । घेदमर्यादात्याजकानां कर्मणां सदोपत्वशङ्कापरि- हाराय 'यत' इत्यव्ययप्रयोगः। तथा चैतकर्मणामविकृतत्वमुक्तम् । किञ्च, स्वतानि आत्मारामत्वपूर्ण कामत्वादिनियमरूपाणि ववाधे । अस्मिन्नर्थे नमश्लेपेऽनतानि स्पृष्टवा- नित्यायों युज्यते तदा, तानि फर्माणि गोपीभिः सह रमणरूपाणि पश्यतत्युपदेशः। कचनार्थविशेषस्तत्रैवोपपादित इति तत एव परिभावनीयो, विस्तरभयतो ना ३ थीमदोस्वामिनीमथुरानाथस्तव्याख्यानान्विता । वितन्यते । इन्द्रस्य युज्यो योज्योनुकूलः सखा । अयमाशयः । प्रभुणा इन्द्रयागभने कृत यह पलाहकासाधारणवणेन्द्रेण तद्रोहे कृतैपि सर्वसमयोंपित हेतुक्नन्मदमेव दूरीकृतवान्, न तु त तदधिकार वेति तथा । तदनन्तरमिन्द्राभिपेरुगोविन्दनामधारणादिभिस्तरामान- चमस्तथा । एव निरूप्य तत्पूर्वोक्तं विष्णोः लीलास्थानं परमं पदं सूरयो विद्वासः, तत्त्वं च शब्दब्रह्मपरब्रह्मस्वरूपवित्वम् । तत्र परब्रह्मयोधस्तु भक्त्यैनि सिद्धान्तः, 'भक्त्या मामभिनानाति' भत्तयाइमेकया ग्राह्य' इत्यादिवाक्यः मूरयो भक्ता एव । नन्वत्राह तदुरुगायस्येति 'मयः सदा पश्यन्ती तिवाक्यकवाक्यताया भूमौ तत्परमं पदं भक्ता एव सदा पश्यन्तीत्यर्योऽवसीयते, एवश्व काननकालिन्दीतन्पुरिनगिरिवरगहराद्यात्मकत्ये- नोवृतरूपयन्महय । तदेव हि द्रव्यं यचाक्षुपं, यन्महत्ये सति उद्भूतस्परदिति सर्कोक्तिः । तचाशुपं द्रव्यात्मक च तत् परमं पदं क्थ भक्तकदृश्यमेव, न साधारणजनगोचरमित्या. शङ्काया दृष्टान्तमाह-दिवीप चक्षुराततम् । दिवि स्वर्ग यथा आ समन्तात् तत व्यास 'यन दुःलेन सभिन्न मितिवाक्यात्सुखैरसाधनतद्रूप तत्पदार्थ तत्रस्थानामेव चतु: पश्यति नान्येपाम् , तथैतलीलामध्यवर्तिनामेव तदृश्यमित्यर्थः । शाखान्तरेपि, 'ता वा वास्तून्युप्मसि गम य या गावो भूरिशृङ्गा अयासः । अनाह तदुरगायस्य वृष्णः परमं पदमवभाति भूरि' । अर्थस्तु, ता तानि, चा युक्योः कृष्णरामयोः गोपीमाधवयोः, वास्तूनि अनेकविधकुादीन्येव वस्तूनि, गम ये मान 'तुमर्थे से स' इत्यनुशासना देतत् साधु । एष्णः कामान् वर्पतीति टपा, तस्य । गोपिकाम कामवपक्स्य। भूरि बहुरूपं, पदविशेषणम् । अग्रिमार्थस्तूक्त एव । परमपदा दधिक तत्रानुप्रविष्टमितिन्यायो घनितः अन्यथा तत्पदमित्येव श्रुतिर्वदेत् । एवञ्च, रक्ष्मीतुल्यतायामपि यथा भक्तेषु तन उत्कृष्टत्वं 'गोप्योन्तरेण भुभयोरपि यस्पृहा श्री रितिवाक्यात् । अत एव 'स्वानन्दानुभवार्थ'मि- त्यस्य विवरणे श्रीविठ्ठलवस्तथा च स्वपदस्य स्वामिनीवाचकस्यत्पादि व्याख्यान कृतम् । तथा च प्रसिद्धतदपेक्षया प्रभो रतिषीतिसाधकत्येनानिर्वचनीयच्छविविधाय- कन्वेन च तस्य तयावमितिभावः । 'न खियो जनमुन्दर्य' इत्यादि तत्पबृहद्वामनपुरा- णीयकथाप्युक्ताऽनुसन्धेयेत्यल विस्तरेण । प्रस्तुतमनुसरामः । एतादृशस्याधिपो भज- नीपः सव्य इत्यर्थः । सेवा हि सेवरुस्यैव धर्म. ! 'भज' धातोः स एवार्यों निरुदः । तथा चाशेषनीवाना सहनदासत्वमसूचि । तदकरणे तदण्डयोग्याश्च त इत्यपि । उक्तमेवो- द्वाटयन्ति स्वस्येति । स्वस्य भगवदीयस्यायमेव भननाख्य एव धो न तु मा. दिकः स इतिभावः । एक्कारस्तु पुरुषोत्तमभजनधर्मातिरिक्तधर्ममायव्यवच्छेदकः । अथवा स्वस्यैवाय धर्मों नेतरेपाम् । तेन भगवदीयव्यतिरिक्ता निवारिताः । ततो गोप- नमप्यमूचि । अत एव 'म बुद्धिभेदं जनयेत', 'वं च र महाबाहो मोहशाखाणि कारयेत्यादि भगवद्भापिनम् । एतदर्थमेव शङ्करमभृतीनामुद्भवः । यद्वा, अयं धर्म एव . चतुःश्लोकी। भगवदीयस्य सर्वपुरुषार्थसाधकस्तत एव सजातीयादित्रितयसिद्धेः । अथवाऽयं धर्म एव स्वस्य तथा, न ज्ञानादयः । तस्मान्मद्भक्तियुक्तस्ये तिवाक्यतः । हिशब्दः कैमुति- कन्यायेन युक्तार्थ ध्वनयति । भगवता गीतायां 'सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं बज । अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुच' इति स्वधर्मातिरिक्तसर्वधर्म- परित्यागपूर्वक निनशरणमुपदिष्ट, तत्फलं च पापमोचनमुक्तं, न स्वरूपसम्बन्धादिकम- तोऽयमुक्तमागों मार्यादिक एव स इत्येवं निश्चीयते । इतरथा स्वयमपि पापमोचनमेव फलत्वेन नोक्तं स्यात् । एवञ्च यत्र निखिलधर्मतो मर्यादामागीयोपि शरणमार्गः साधी- याँस्तत्र फलमार्गीयभक्तिमार्गोक्तमकारेण सेवाकरणं, तत्रापि श्रीपुरुषोत्तममुखारविन्द- विरचितपद्धत्या, सुतरां तदात्मजनिर्मितरीरया, सेव्योपि श्रीकृष्णः सदानन्दः फला. स्मकस्तत्राप्युक्तभावेन भजनं सर्वधर्मपरित्यागपूर्वकं सर्वोत्कृष्टपरमफलं स्वरूपानन्दात्मक- मिति किं वाच्यमिति । अतः सर्वात्मनाऽन्यं निराकुर्वन्ति नान्यः कापि कदाचनेति । अन्यः प्रेरणादिलक्षणो धर्मो न भगवदीयो भवतीत्यर्थः । मार्यादिकत्वाद्भगवदीयन कार्य इति भावः । कापीति देशाश्रमापरिच्छेद उक्तः । कदाचनेति कालापरिच्छेदश्च । उक्तमकारेण दासैस्तद्दास्यमेव विधेयमितिभावः । अत एव भक्तिमार्गे हरेर्दास्य धर्म' इति तन्मार्गमर्मर्दास्यमेव धर्मत्वेनोक्तम् । अत एव दृन्नासुरेणापि दृष्टपुष्टिफलेन 'अहं हरे तब पादैकमूलदासानुदासो भवितास्मि भूय' इति प्रभुं पति तदेव प्रार्थितं नेतरत् । प्रभुसाक्षात्कारे साक्षात्तत्मार्थनमनुचितं भक्तस्येति परम्परया तत्मार्थनम् । एतेन स्वस्य दीनभावो दर्शितः । प्रभुसन्तोपापायको यतस्ताग्भाव एवात एव 'भक्तानां दैन्य- मेवैकं हरितोपणसाधनमिति भापितं प्रभुचरणैः ॥१॥ एवं श्रीपुरुषोत्तमस्य भक्तिमागीयप्रथमपुरुषार्थरूपत्वं सोपपत्तिकं निरूप्य तस्यै- वार्थरूपत्वं प्रतिपादयन्ति एवमिति । एवं सति स्वकर्तव्यं खयमेव करिष्यति । प्रभुः सर्वसमर्थो हि तेन निश्चिन्ततां बजेत् ॥ २ ॥ एवं सति उक्तमकारेण भननरूले धर्मे क्रियमाणे सति । स्वकर्तव्यं स्वामिकार्य यत्तत्स्वयमेव स्वाम्येव करिष्यति न तु तदंशावतारादि । अतः प्रभोः स्वातन्त्र्यमप्य. नियामकस्य मभोस्तत्केवलं स्वभक्तमाहात्म्याववोधनायैव नान्यथा । अत 'यस्वतन्त्र सूचि । न जीववत्केवलं पारतन्त्र्यमेव । 'अई भक्तपराधीन' इत्यादिवाक्यैः कालादि- इव द्विजे ति तदाक्ये इवशन्दः । अस्वतन्त्र इव, नत्वस्वतन्त्र एवेति धनयतव भगवता तथो. तमित्यवसीयते। भक्तवात्सत्यतोपि कचित्तपा, अत एव दामोदरलीलापि। 'यस्य च भाषेत भावलक्षणमित्यनुशासनात्सतीति सप्तमी। ततः स्नेहनावच्छेदतो दास्पकरणेऽव्यभिषा श्रीमहावामिनीमधुरानाथरतम्याग्यानाम्विता। रिनित्यं शामिानव्यमिति चयनितम् । नपुंसकलिङ्गोच्या स्वयमिन्यव्ययोक्तेय ते. वास्तवत्वमानन्ददायफलपविभारितं च । अन्ययेवं कृते कृत्येति वा यूयुः। स्वकीरिति च। ननु श्रीमदस्मदाचार्यपर्यवरणसरसिनरजोभूपणभूपितरसेवर्चाङ्मधुव्वास्वादिन- स्वान्तैस्तद्विश्वासेन तत एव 'रिमलभ्यामित्यादिवास्यार्थानुसन्धानतः मार्थनमन्तरेण भननोपयोगिनिखिलपदार्यसम्पाया ताम्भायेन सभाग्यसौभाग्यसञ्चयमिर तद्भजन पर्तव्यमेव, परन्त्राघुनिकाना तत्स्वरूपानभिन्नतपा सदनुभवामावाच जीवधर्मन्येन कदा- चिदविश्वासेनोत्कटसेवासाधनरूपतनुनवित्तनसेवासिद्धयर्थमर्यापेक्षायां तत्र प्रयत्ने कने पदाचिद्वाहिर्मुर पसेवाप्रतिरन्धौ च स्याताम्, 'अवनिकायासे'तिवाक्यात्मभुकृतपति- बयोपि सम्भवेत् । न च सेवाय यन्ने प्रियमाणे न भगव-कृतमतिपन्या, अत एव 'वर्गिके तिपदम्, आयासमात्रविघातहेतुत्वे 'वर्गिकतिपदं न वदेवः अतो भन- नार्थ यत्ले कनेपि न दोप'; मर्यादामवाहसंवलितानामेव वाहिर्मुख्यादिभावो, न पुष्टाव- गीतानामिति वाच्यं, नवरत्ने 'पापी तिपदव्यार पानेस्मत्मभुचरणरेषेतदुत्तरितत्वात् । अपरच, भगवान् पूर्णपुरुषोत्तमः सर्वकरणसमर्थोपि स्वसेवार्थमप्यर्ययत्नसापेक्षश्वेत्तत्सेवा- यामेव को विशेषोऽज्यसेवैर कुतो न फार्या, यत्नायासस्य तुल्यत्वात् । तस्पालिष्टकर्मन्वं न भज्येत । वाहिर्मुख्यसेवाप्रतिवन्धौ च कश्चिदपि दुर्निवारौ स्याताम् । स्वामिकृत- प्रतिबन्धस्याप्यतिबलिपुत्वनः स्वकृतोपि प्रयत्नोपि व्यय: स्यात् । वस्तुतस्तु अस्मि- फलमायभक्तिमार्ग सेवैव धर्म इति राद्धान्तः । अत एवानव पन्थेऽस्मत्मभुभाषण- सुधाधारा, 'स्वस्यायमेव घों हीति । इतोऽपि स न कार्य एवेत्युक्तं भवति । योगक्षेमं वहाम्यह'मितियापं च व्यायुप्येत । 'तुष्यतु दुर्जन ' इनिन्यायेनास्तु वा मार्यादिक एवं स तया'प्यधिक तमानुप्रविष्टं न तु तद्धानिः' । अत्रायमभिमन्धिः, परमकारण्यक- सिन्धुः श्रीगोकुलजनकजीवनः स्वाश्रितस्य स्वल्पमप्यापासमसहमान एव सर्वकरण सपर्यस्तत्मयत्नपन्ययाकरोति स्वस्मिन्विश्वासदाव्य नान्यथा । तथा च यत्र पर्यादा- प्रवाहसवलितानामपि भक्ताना यत्नलेशासहिष्णुः करणाकोपलो हरिस्तर पुष्टावे. वाङ्गीकृतस्य यत्किश्चिदपि तदराहिष्णुः श्रीमद्गोकुलननलगेचनचकोरचन्द्र इनि किं वाय- मत एव 'किमलभ्यं भगवति प्रसन्ने श्रीनिकतने' इति वचनामृतं च । 'भगवदर्थापि सा न कार्ये'त्युक्तं नवरत्नेऽस्पत्मभुचरणैरत एव । किच, नजरत्नानामपि निजनायनिदे- शतोपि न निजतनगृहगमनमपि । यत्रैवं सूक्ष्मेक्षिका तोतरेषा वाहिर्मुख्यादौ का वार्ता । अत एव तामसप्रकरणीयफलप्रकरणे ' यमुम्बुमाक्षेतिश्लोके व्रजरत्ननिरुक्तं यत्स- भृति त्वत्पादतलपरमाक्ष्म तसभृति क्यमञ्जसा अन्यसमक्षं स्थातुं न पारयामः विकृत चैतदस्मत्प्रभुचरण या देहाभिमानी व्याघस्य देहविघातकस्वात्तत्संनिधौ स्थातुन शनो. तीति। एवं र सर्वयोक्तदोषसम्भवभयतो नमपत्नं कुर्यात् । अकृते तस्सिन्सेवासाधनानुपल. - २१ पतुःश्लोकी। ब्धिस्तदनुपलब्धौ भजनोच्छेदस्तदुच्छेदे स्वधर्मात्यन्ताभापादुक्तोपदेशे घट्टकुटीमभाव- वृत्तान्तो वृत्त इति निजजनस्वान्तभ्रान्तिमपनयन्तः प्रवदन्ति-स्वयमेवेति । स्वयं प्रभु- रेव सर्व करिष्यति । स्वाधितजनयत्नमन्तरेणापि भजनापेक्षितसकलपदार्यान्संपाद- यिष्यतीत्यर्थः । सेवकैः सेवोपयोगिसमस्तपदार्थायित्वेनेतरतोऽर्थार्थनेन मनो व्याकुलं न विधेयम् । अत्रायमाशयः, माश्रयान्तररहितः स्याश्रितननो यदि भजनाननुकू- लनिखिलन्यासपुरस्सरं तदनुकूलसकलवस्तुविकारतो निजभजनमेव सर्वतोऽधिक फलरूपं स्वसर्वस्वं ज्ञात्वा विदधाति तदा सर्वात्मरूपः फलात्मा सर्वकरणसमर्थः कालादिनियामको भगवान्पूर्णानन्दो हरिः परमकृपालुर्यतो यस्किश्चिदपि स्वकी- यपरिश्रमासहपान एवं स्वसेवासाधकमेव तदपेक्षितसमस्तसामग्रीरूपं कुतो न विद- ध्यान् । अन्यथा 'योगक्षेमं वहाम्यद'मितिदृढनिज्ञा न वदेदेव प्रभुरकुतोभयः । अमा- सस्प मापणं योगः। प्राप्तस्य परिपालन क्षेम इति तयोरर्थः । यद्वा, स्वयमेव स्वत एव सर्व करिष्यति प्रार्थनानपेक्षः। एतेन सेवकै प्रभुः पार्थनीय इतिभावः । अत एव 'निजेच्छातः करिष्यतीति नवरलेऽस्मलभुचरणीतं, 'मार्थिते वा ततः कि स्था दिति विवेकधैर्याश्रयग्रन्थे च । यहा, स्वयमेवेत्यादि पूर्ववत्, न कस्यचित्मेर- पाया देवतान्तरद्वारा वा । कालादिदेवतान्तरमेरकोऽपि हरिरेषेति भावः । अस्मिन्नर्थेऽत्रा- योगव्यवच्छेदक एवकारः । अथवा सेवकमार्थनस्य दोपावहत्वात्तत्मार्थनमन्तरेणैव ततः पूर्वमेव तदभिलषितं कुर्वन तत्मार्थनावासनां समीक्षते । अन्यथा 'यस्त आशिष आशास्ते नसभृत्यः स वै वणिक', 'माशासानो न वै भृत्य इत्यादिवाक्यैस्तत्सेवकत्वहानौ स्वस्वा- मित्वभावस्तत्र दुर्लभ इतिभावः । एतेन प्रभोः परमभक्तपरमहितकारित्वं समसूचि । अत एम योगक्षेमं वहाम्यह मितिवाक्यम् । यदा, स्वयं करिष्यत्येवेति क्रियया सहान्वये- नात्यन्तायोगव्यवच्छेदक एवकारस्तेन प्रभुविश्वासेनैव सेवकैः स्थैयमतोऽस्मिन्मार्गे तद- भाव एव परमबाधकः। अत एवं विश्वासतदभात्यो हात्रचातको भाव्या विवि तयोरतु- सन्धानं तत्रैवोक्तम् । ननु सर्वसपर्योपि प्रभुः सर्वथा साधनसम्पत्तिमन्तरेण ताइक्फलदाने कथं समर्थो भवेत् , भवेद्वा यथाकश्चित्सम्पत्ताधेर । अत एव 'ये यथा मां प्रपद्यन्त' इतिवाक्ये प्रपत्तिरेव तत्सम्पत्तिरिति चेत्, सत्यम् । परं सत्रेदमवधेयम्-यस्य येन प्रकारेण मपतिस्तस्मै तत्मकारेण मयच्छत्तीति प्रभुः 'तांस्तथैर भनाम्पह मितिवापत एकमेव । एक्श्च, यत्र मर्यादामागोंकरीत्या प्रपतिस्ता नद्रीत्व फलदानं मावाहिकेभ्यः प्रावाहिक- रीत्या पुष्टौ तद्रीत्या तथेति विवेकः । इतरथा 'यथा तथेतिपदे न वदेव । ये जना मां अपचन्ते सानेवाहं भमामि हीत्युक्तेपि चारितार्थ्यं स्यात् । उक्तार्थे ययाशब्द इत्यत्र 'प्रकारवचने थालि'तिपाणिन्यनुशासनं जागरूकमेवेति नानुपपत्तिः काचित् , तयाश- ब्दार्थोप्यनेनैव व्याख्यातः । तथा नात्र भजनोपदेशः पुष्टिपद्धत्यनुसारेणेति तथैव फल- .
२२ श्रीमद्गास्वामिश्रीमथुगनाशकृतव्याख्यानान्विना । दानमिति दिक् । इत्यं च मर्याठायां साधनापेक्षो भगवान्यथासाधनं फलं ददातीति पुष्टौ तन्निरपेक्ष इति निगर्वः । अत एव श्रीमद्भागवते श्रीगोवर्द्धनोद्धरणमस्तावे 'गोपा. येत्स्यात्मयोगेन सोऽयं मे व्रत आहित' इति श्रीमगोकुलनाथोक्तिः। अन्यथा ब्रजनन स्वरूपानन्ददानं च मुतरामशक्यवचनं स्यात् । न च तत्रैव पूर्वोक्त एव प्रस्तावे पूर्वाद्धन 'तस्मान्मच्छरण'मित्यादिनोक्तमेव वक्ति चैच्छरणगमनादिकं तत्साधनमप्यस्तीति वाच्यं, 'निस्साधनफलात्माय'मिति प्रभुरायविरोधापत्तेः । यदि अहिलतया तवाच्यं तथापि प्रभुणैव तत्सम्पादितं न तु तैरपि फिश्चिकृतम् । किश्च, कदाचिकेपाश्चित्सम्भवेपि तनत्योपरिभागस्थशुकमयूरमगादीनां सुतरां तदसम्भवः । वस्तुतो नास्त्येव तेषामपि सद्गन्धसम्भवोपि, प्रत्युत विपरीतं च तत् । अत एव श्रीमगोकुलस्वामिना महता यत्ने- नापीन्द्ररलिभागो निवारितः। अत एवा'ह्याप्त'मितिवाक्यं च । न च जन्मान्तरीयं तदस्तीति चेत्, न । तथाफ्ल्पने मानाभावात् । न चैतत्फलान्यथानुपपत्तिरेव तदिति चेन । उक्तोक्युच्छेदापत्तिः। ननु कचित्तागुक्तिरपि स्यादिति चेत्, न । 'अस्ति चेदुपलभ्येते'तिन्यायो व्याकुप्पेत्, प्रत्युत भगवतैव सर्व सम्पादितमित्युक्तिलभ्यतेपि । अत एव 'प्रसन्न एपां विदुत स्वयं हरि'रितिवाक्यमिति चेत्,समः समाधिः, 'अहो अमीपां फिमकारि शोभन'मितिवाक्यात् । अब चूमः । यद्यप्येतद्वचनमपि कोटिद्वयाक्यो- धमवगाहते तथाप्युत्तरदले यथोपोगलक मन्यापून', 'निःसाधनफलात्माय'मितिवाक्यं न तथा पूर्वदल इत्यनेनापि भगवत्कृतिरेव निरणायि, न ब्रजवासिनामतो मर्यादायां तत्सा- धनैरेव फलं यतस्तदक्षकोपि प्रभुरेव ! पुष्टौ तद्विनापि स्ववलेनैव सबै पर्ने समर्थ इति कृन याचां विलासः । इदानीमुक्तार्थमेवोद्धाटयन्त्यस्मत्मभुचरणाः प्रभुरिति । प्रभुः सर्वनियामकः । 'अन्ये चाशक्लाः पुंसः कृष्णस्तु भगवान्स्वयामितिवाक्यनः । अत एवं समर्थ इति हेतुगर्भ विशेषणम् । सर्वेभ्यः कालादिभ्योपि समर्थः । कालसाध्यपदार्थ- स्यापि स्वयमेव साधकः । यदा, सर्वेप्वाश्रमेषु देशेषु वाहोस्विद्वर्णेषु तथा कालवितयेषु वर्णाश्रमादिषु तथा। देशादिपसाधनानपेक्षः। यद्वा, सर्वस्मिन्साधनविषये तथा । तत्तत्सा- धननिरपेक्षः । यद्वा, सर्व: कालादिभिः कृत्वा सपर्थः सर्वकरणक्षमः । कालादयोपि तदधीना एपेति तत्साध्यपदार्थस्यापि प्रभोरिच्छामात्रेण त एव साधका न तु विनक- रिः। अथवा सर्वेषु देवनीयेषु साधनसम्पत्ति साधयितुं तथा । स्वस्मिन्नेव ज्ञानादेः सिद्धत्वात् । यद्वा, अमाधनमपि साधनं कर्तुं समर्थः, अद्भुतर्मवाद । अत एव तत्वा- यदीपे 'असाधनमपि साधनं करोती'त्यस्मत्प्रभुचरणोक्तिः। हिशब्दोपि समर्थमनु. मोदते । तया हि पत्र मर्यादापागीयसाधनाभाववत्तापात्यन्तासतानामिलादिभ्यः स्वांश- फ्लाचवतारः परम्परासम्बद्धेपि नामवर्णाशानेन कथनेनापि परमस्नेहभरतः केवल- स्वपुननाममाजल्पनेन स्वसम्बन्धगन्धसम्भावनाभावेपि तनामवर्णमाहात्म्याक्वोधार्य २३ चतुःश्लोकी। सारफलदानं त्तत्र साक्षाफलात्मकश्रीपुरुषोचपस्यैव पुष्टिमार्गीपस्वमुखारविन्दरूपाचार्यो- पदेशपूर्वकतदुक्तमकारेण भजने स्वयमेव कि किन विधास्यनीति निखिलमनिर्वचनीयम् । य एतादृक् मभुः समर्थः, तेन प्रभुणा कृत्वा तेन कारणेन वा हेतुना या भक्तो भगवति स्निग्धः निश्चिन्तता निराकुलतां ब्रजेसाप्नुयात् । अत्राय भावः । पूर्व श्रीमदाचायों- पदेशमात्रेण तद्विश्वासोडेकेण भजन पश्चात्तस्मिस्तदुद्रेकेण स्निग्धः सन तथा स्यादित्यर्थः । इदं भजनमेव सर्वस्वमिति ज्ञाला यदि भजनमेव कुर्वन्प्रभुं क्षणमानमपि न त्यजेत्तदास तथास्वं प्राप्नुयादिति भावः। तथा चैतन्मार्गीयो द्वितीय पुरुषार्थोपि सोपपत्तिको निरूपितः। तथैवाभिहितं भक्तिरससारपरिशीलनशील रथों हरिरेव हीति ॥२॥ एवं मार्यादिको नौ निराकृतो क्या कनेऽप्यर्थे सात्विकादिभेदेन वैविध्यमित्यतः कामस्यापि तत्र तदुपस्वमाशङ्कय तदपि प्रसुस्वरूपापेक्षया सुतरामेवाभयोमकमिति तृतीयमपि तं तमेव निरूपयन्तस्तस्परिहतमुपक्रमन्ते यदीति । यदि श्रीगोकलाधीशो धृतः सर्वात्मना हृदि । ततः किमपरहि लौकिकैदिकैरपि ॥ ३ ॥ यदि चेगोकुलाधोशी यशोदोत्सङ्गलालितोऽनन्यगोकुलस्वामी । श्रीपदोक्त्या तारगन्तरङ्गभक्तसहितः । यदा, श्रयत इन्दिरा शश्वदत्र ही 'तिवाक्यतः श्रीयुक्तं यदो- कुलं, तस्य तथा । पूर्वोक्तवाश्यतः सर्वोत्कृष्टशोभायुक्तं यत्तत्तस्य तथा । तादृशोपि सर्या- स्मनोक्तंभावेन धृतः भवता खपा येति शेषः । धृत इतिपदाकायवाझ्मानसैस्तदेक- परता ध्वनिता । विशेषततस्तत्मवणता यतः स प्रभुस्तत्सम्बन्ध्येव । अतः फलपकरणे. ऽस्मलभुचरणैतिं 'सोऽन्तःकरणसम्बन्धी विरोधत्त' इति । आश्रयान्तरं परित्यज्य केरल. तदेकनिष्ठो जात इति यावत् । तदा ततः पूर्वोक्तफलात्मकमभोः सकाशादपरस्तुच्छ- लौकिकैदिकरपि किन किमपीत्यर्थः । अयमर्थः । लौकिकैलों के परपोत्कर्षमाप- स्तामसराजससाविकै । बहुवचनं त्रिविधत्वसूचनाय । वैदिकैत्रिविधगुणरूपैनललोक- योगसिद्धिमोसः । वहुवचनं पूर्वोक्ताभिप्रायेण । चतुर्विधर्मोतज्ञानादिसूचनायापिशब्दः । उभयविधस्तै मादिमिश्च कृत्वा किन किमपीत्यर्थः । अपरमिति पाठे उक्तैरतैः कृत्वा. ऽपरमुत्कृष्टं वस्तु किमप्यस्ति । न किस्पीत्यर्थः । यता, अपरैर्देवतान्तरः कि ? सर्वपां सद्विभूतिरूपत्वात् । अत एपोक्तमस्मलभुचरणस्तलदीपे 'कृष्णशब्दैन परं वस्तूच्यते । 'कृष्णात्परं नास्ति देवमित्यन्तःकरणमवोधे च । अत्रापपभिसन्धिः । रसातलादिषु भूम्यपेक्षयाप्यानन्दाधिक्यं, तदपि वामनावतारणयोद्धृतमतः प्रभोरनपायिन्याः श्रियः सकाशादपि तदप्रयोजकम् । एवं सर्वभूमीपरत्वं लोके यशस्कर, तच यज्ञदानादिसाफ- * भार'मित्यापि पाटीपारविष्टन ।
२४ श्रीमद्गोम्वामिश्रीमथुरानातव्याख्यानान्विता। क्षमत औपाधिकं सावधि च । न च राज्यमन्ते परलोकोपकारि, 'राज्यान्ते नरकं ध्रुव'- मितिवाक्यात् । अतो भगवदनस्ययशसस्सकाशातत्तथा । एवमेवेन्द्राधिपत्यपपि परि- णामापायि । भगवदखण्डितैश्वर्यात्तत्तथा । एवं लौकिकत्रिविधमपि निराकृत्य वैदिक- मपि निराकुर्वन्ति । अपरिपकयोगिनो हि स्वयोगरलेनाभिलपितपदार्थानाविर्भाग्य तद- नुभवं कुर्वन्तस्तस्मादपि भष्टाः सन्तो दुःखिता एव पुनर्जन्माईन्तीति भगवज्ञानापेक्षया तदज्ञानमपि तथा । भगवज्ज्ञानस्य नित्यत्वात् । ब्रह्मणो रजोवतारत्वात्तल्लोकोऽपि रानसः, ताहि 'ब्रह्मणासह मुच्यन्त' इतिवाक्यात्तत्साहित्येन पारतन्त्र्यतो भोगफलयोः सिद्धिरिति स्वपराममातिकमः । भगवदीर्यापेक्षातस्तौ तथा । 'तमेव विदित्वाति- मृत्युमेति । नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाये'त्यादिश्रुत्या ज्ञानतो मोक्षस्तच्च 'सत्त्वात्सञ्जायते ज्ञानमितिवाक्यतस्तजन्यं तदपि साविकमेव भवितुमर्हतीति तत्साध्यो मोक्षोपि तथा । सोऽपि गणितानन्दात्मकोऽत: पूर्णानन्दानपेक्षया सोऽत्यन्तं स्वल्पतर इति तथेति वैदिकमपि तत्तथाकृतम् । किञ्च, मार्यादिकवैराग्यमपि प्रभोभक्तातिरिक्ते रागाभावा- लोकोत्तरवैराग्यतः पूर्ववदिति भगवद्धर्मरूपतत्पगुणत । पड्डियास्तेऽकिश्चित्करा या तर किं वाच्यमन्तरङ्गधर्मिरूपतगुणतस्तथात्वमिति कैमुतिकन्यायोपि ध्वनितः । किञ्च, 'अस्पैवानन्दस्यान्यानि भूतानि मानामुपजीवन्ती'तिश्रुत्युक्तेर्भगवदानन्द लेशस्तदतिरिक्तसालार्थेषु निर्णीतः । तर्हि विषयानन्दनिपिचमारपुनार्थादिरूपं तदा नन्दामासरूपं वस्तुतो दुःखात्मकमेव तत्तथे' त्यधिकं तनानुमविष्ट न तु तद्धानि'- रितिन्यायमपि सूचयन्तः स्वान्तरङ्गस्याश्रितमभिमुखं विधाय माचोचन्-बेरि त्वमेव बद । अा हिपदतोऽस्मदाचार्यवर्धकपामार्यतस्तरकालावच्छेदेन तस्य स्वरू- पानन्दानुभव इत्यध्यवसीयते । इतरथा बृहीतिमश्नः कथमपि न सह टेतैवेति पूर्वमेवाबो- चाम । न न ताहम्भाग्यशालिनस्तस्य तागाचार्यचरणकृपाकटाक्षपक्षपाततस्तारक्तदनु- भवो दुर्घटस्तस्य तादृङ्मुखारविन्दरूपत्वात्तद्रसपूर्णत्वाच्च । अन एवास्मत्प्रभुचरण'स्तत्सा- रभूतरासखीभावपूरितविग्रह' इति सर्वोत्तमे तादृगस्मत्स्वामिनाम गीतम् । एवञ्च भक्तो- पदेशपक्ष एव साधीयानान्तःकरणोपदेशप: । फलप्रकरणे हि किं करवाणि ' इतिवत् । अन्यथा स्त्रमनोवबोधे यया 'किं स्यादिति विचारयेति तत्मत्यवदस्तयानापि तत्पदमेव वदेयुः, यतो विचारो गन्तःकरणधर्म एव, परं तादृग्गवेपणीप एवेति यदी. तिपद भापितपस्मत्सौभाग्यसुभगभूषणः श्रीमदाचार्यचरणैरिति दिक् । नायं निग्रहा- शयः । पूर्व देवभजनमेव दुर्लभ, तत्रापि देवाधिदेवस्यातिदुर्लभम् । क योगिध्येयो भगवान्ब्रह्मादिदुर्लभो निदोषपूर्णगुणविग्रह आनन्दमावरपादमुखोदरादिः, क राकल. १ उपदेशन इत्यपि पाठ 1 २५ चतुःश्लोकी। दोपात्मको दुःखैकसदनरूप आनन्दशून्यो जीवः । अत एव सर्वधर्मान्परित्यज्यत्यन्य- थाकृतौ श्रीविद्यलयरोक्तिसुधासारो 'ब्रह्मस्तुत्यादिदुरापचरणरेणुरीश्वरः काई तुच्छो जीव' इति । ततोपि गोकुलेशस्य यशोदोत्सङ्ग लालितस्य श्रीगोकुलैकस्वामिनः पुरु- पोत्तपस्य श्रीनन्दात्मनस्यात एव पुरुषोत्तमस्तु नन्दगृह एवे'त्यस्मत्मभुवापीयूपं, तत्रापि श्रीगोकुलेशस्य परमसौन्दर्यसुन्दरस्य सुतरां ततोप्युक्तभावेन ततस्तरां तत्तथा । अत एव श्रीभागवततत्त्वार्थदीपे 'कृष्णशब्देन परं वस्तूच्यते तदेव कदाचित्परमसौन्दर्य प्रकट करिष्यामीतीच्छया प्रादुर्भूतं सच्चीकृष्ण' इति श्रीपदाचार्यमधुरं वचः । 'भक्तिमार्गे फलं कृष्णस्तदास्वादस्सुदुर्लभ' इति च । इति च प्रस्तुतासंभावनायां, कदाचित्कस्य- चिदेवनीवस्य देहस्य च प्रचुरतरभाग्योदयेन 'यमेवैप पृणुते तेन लभ्य इति श्रुतितः स्वमुखारविन्दनिष्ठसुधासाररूपाचार्यचरणापारफरुणया तदनुग्रहतस्तदुरीकारेण तामा जनतस्तदेकदशायां श्रीनन्दराजकुमारसुकुमारनिजवरणकुवलययुगलतरलतरलितपरा- गसंवलितपनोमधुलिह एव तल्लेयमिति निगः । एतेनैताग्भजनाधिकारी चैन कालाव. च्छेदेन दुर्लभ इति सूचितम् । तथा चैतनिरूपणेनैतन्मार्गीयदिक्षालक्षणतृती- यपुरुषार्थोपि निरूपितोप्यभूत् । न हि ताहफ्स्यरूपानन्दानुभवोत्तरं कस्यचिदपि लोको. तरपरमानन्दरूपस्य पुनर्दिक्षाऽसंभवः, मत्युत क्षणमपि तदर्शनमन्तरेण स्वरूपानन्द- सुधापानपरैस्ततोन्यत्र स्थातुमशक्यं, किं पुनर्वाच्य दिक्षामृते तथात्वं तथेति । अत्रोदा- हरणानि ब्रजजनरत्नान्येवानुसन्धेयानि । अत एव फलपकरणे 'ययम्बुजाक्षे'त्यादि तैरेव गीतम् । 'क्षणं युगशतमिव यासां येन विनाभव दितिवाक्यतस्तासां तद्वियोगका- लीनं क्षणमपि सोढुं तावत्परिमाणकमिति पूर्वोक्तमखिलं कमनीयम् ।। ३ ॥ एवं तृतीयं तं निरूप्य तुर्य तथा निरूपयन्ति-अत इति । अतः सर्वात्मना शश्वगोकुलेश्वरपादयोः । स्मरणं भजनं चापि न त्याज्यमिति मे मतिः॥४॥ अत्राथमाशयः । अनजनबन्दवाञ्छाकल्पतरुशीला श्रीगोकुलाधिपतिरदेयस्वस्व. रूपानन्ददानक्षमोपि प्रभु मनोरथान्तं श्रुतयो यथा ययुरितिशक्यतः पुष्टिश्रुतिरूपभक्त- वाममोगोचरातीतपरमानन्ददायको यतः, अत: कारणाद्धेतो सर्वात्मनोक्त- भावेन शम्चनरन्तर्येण गोकुलेश्वरपादपोरनन्यगोकुलस्वामिनः पुरुषोत्तमस्य भक्ति- रूपचरणसरसिजयोः स्मरणं भजन सेवन, स्मरणं नामानुभवजन:संस्काराबोधरूप. मिति तु तार्किकाः । भगवन्मते स्वनुभवजन्यमेव स्मरणमिति राधान्तः । एतत्स्फुटीकृतं 'सयो नष्टस्मृतिर्गोपी'त्यत्र सुबोधिन्याशयविशदीकरणे भगवद्दाशय:रिन्यलं बहुना । चकारातदोभिलपणमपि न त्याज्यम् । भक्तैरिति शेषः । यत्र वक्षःस्थलस्थिताया ४
चतुःश्लोकी।
चार्यचरणवचनरवना भक्तियधिन्याम् । ननु 'यमेवैप वृणुते तेन लभ्य इतिश्रुतेस्वदूरणेने-
योक्तभावेन सवरणसरणादिसम्भवेऽयामुपदेशपयासः मयास एयेति कस्यचिदहिर्मुख-
मौख परिहरन्तः स्वमति प्रमाणयन्ति इति मे मतिरिति । मे मत्सम्बन्धिनी मदीया,
मति:बुद्धिरिति एवंरूपा उत्तप्रकारे व्यवसायात्मिकेत्यर्थः । अनायमभिसन्धिः। यद्यपि
पूर्वोक्तमुक्तश्रुत्यादिना तदनुग्रहसाध्य, नयापि स्वस्य ताहगभगवन्मुखारविन्दरूपाधिष्ठा-
तत्वात्तदभितया मे मतिरित्युक्तिर्भगवदुक्तिरेव । तथा चोक्कमकारेण तत्करणेऽनुग्रह
करिष्यत्येव परमदयाला श्रीमन्नन्दराजकुमारः श्रीगोकुलननलोचनचातकतोहरनवनीर-
दगुन्दरो, यतो यथा श्रीगोकुल उलूखलबन्धनमस्ताचे प्रसङ्गतो नारदोक्तमपि निनोक्तमे-
वेति वदयस्थातोपि तत्साधनमन्तरेणापि स्वप्रयत्नेन तदुक्तमात्रेण महदायासेन स्वयमेव
सत्र गत्वा मलकूबरमणिग्रीवयोस्तरुरूपयोरन्तरगत्योलूखलतत्सङ्घटनेन सो भूमौ पालये-
स्ततो निमतलब्धस्मृतदिव्यशरीरयोस्तपोस्ताहक्स्तवननमनमदक्षिणादीनङ्गीकुर्वलत-
वानत एवं 'तत्तथा साधयिष्यामि यद्गीतं तन्महात्मनेति श्रीकृष्णचन्द्रोक्तिः । पञ्च
स्वमुखारविन्दोक्तमखिलं स्वोक्तमेव कुतो न कुर्यादिति मविश्वासेन पूर्वोक्तमदुतफरणेन
भगवदीयैर्निचिन्ततया स्थेयमिति भावः। यदा, मे मतिरिति भेदवोधकाष्ठया स्वमते।
स्वातन्त्र्यमसूचि । अत एवासमासोक्तिरपि । अन्यथा मन्मतिरित्येव वदेयुः । तेनाय-
माशयः । भारते भीष्मयुद्धे पार्थरपार्थ श्रीमयदुकुलजलधिसुधाकरः स्वभतिज्ञातामप्यन्ना-
यरूपां स्वोक्ति वितथीकृत्य तमार्थनाभावेपि स्वत एव तत्स्यन्दनकगिरिशिखरतः
सत्वरमुत्तरश्चपलजलद इव चक्रपाणिस्तेन सह युद्धार्थ प्रवृत्तस्तत्मतिन्नामेवापालयत् । यत्र
मर्यादायामपि तद्भक्तकृतप्रतिज्ञानिर्वाहकरणं तत्र पुष्टौ निनाज्ञया प्रकटीभूतसाक्षात्स्य-
स्यैव मुखारविन्दाधिछाहरूपस्य वस्तुतः स्वस्यैव तस्य तत्साधनसम्पत्तौ सत्यां स्वयमेव
स्वस्यैवामिलपितसम्पादनेन स्वोक्तमेव तदुक्तं कथं न करिष्यतीतिभावः । स्वानमिल.
पितमपि का पूर्वोक्तहेतोर्मदुक्तमिति करिष्यत्येव । एतेन स्वस्य धर्मिमार्गाभिमानमौढत्वम-
पिध्वनितम् । अत एव सिद्धवस्कारेणास्मत्ममुचरणानां तादृग्ल्याहार इत्पलं शबान्वेषणा-
विलास । पतेन तदीयत्वसिद्भिस्तत्सिद्धौ पुष्टिमागीयचरमपुरुषार्थोपि सिद्ध इत्युक्तं
भवति । अव एव मोक्षः कृष्णस्य चैद्भुव मित्युक्तलक्षणो मोहस्तदभिरेव भापित
इति संक्षेपः॥४॥
ययप्यनुचितमेतन्मत्वोचितं रचितमेतदस्माभिः ।
सन्तुं तमपि प्रभवो मन्तु मे वल्लमप्रभः ॥१॥
मया नापानुसारेण महानेवानयः कृतः।
यतकाचतुःश्लोकीन्यारुपाने विश्ता मतिः ॥ २॥
२८ श्रीमहोस्वामिधीमथुरानाधटतन्याख्यानान्विता । कृपालवस्त एवैतदागासन्तुं ममेदृशः । प्रभवो विलाधीशा मदीयोयमिति स्वत:॥३॥ रमणी रचिरा टीका भूयान्मधुरभापिणी । फरसम्वन्धपानेण विद्वदानन्ददायिनी ॥ ४ ॥ इति श्रीमहलभाचार्यचरमशरणकपनिना श्रीविठ्ठलपदकमलप- रागपरिमरलुपमधुना निर्मिता चतुःश्लोकीच्याख्या वृत्ता श्रीकृष्णाय नमः। थीगोपीजनवल्लभाय नमः। धीमहाचार्यचरणकमले यो नमः । चतुःश्लोकी। श्रीकृष्णरायभट्टविरचितसर्वार्थबोधिकाव्याख्यासमेता। श्रीमद्वल्लभपादाब्जयुगलं विगलन्मधु । नमाम्यई सदानन्दरूपं सर्वार्थसिद्धिदम् ॥ १ ॥ श्रीविहलपदद्गन्द्र नत्वा मधुसुपूरितम् । मुहं श्रीपदाचार्यकृपापूरिचराड्मनाः ॥२॥ तत्कृतायावतुःश्लोक्या व्यार या सर्वार्थोषिकाम् ॥ अथ श्रीमदाचार्यचरणा: स्वीयानां सकलनिरतिशयसाधनसा पफलमाप्त्यर्थ शुद्ध- पुष्टिमार्गीयातिरिक्तसाधनासाध्यफलं चात्र झापयितुं सफलवेदवेदान्तप्रतिपादाशुद्धपुष्टि- मार्गीयभक्तिस्वरूपं तत्साधनं वत्सेव्यस्वरूपं च वक्तुं स्वसिद्धान्तोक्तमुपोधिन्यभाष्या. दिरहस्पं राक्षेपतचतुःश्लोक्या आहुः-सर्वदेति । सर्वदा सर्वभावेन भजनीयो ब्राधिपः । स्वस्यायमेव धर्मो हि नान्यः कापि कदाचन ॥१॥ सर्वदेति न कालनियमोन । सर्वकाले निरन्तरम् । नो चेदजनाभाये यामुरादेशः स्थादित्पर्यः । सर्वभावेन नजाधिपो भजनीयः । पाहशे भावो भगवता सम्पा. घते, कोपि भावः । भावो मनोवृत्तिः । पया नन्दयशोदादीनां वात्सल्पभावः । तथा- भावेन भननीयः । अथवा, सख्यभावेन । यदा, मुख्यस्थापिनीनामिवासाशरणस्नेह- भाषेन । तत्र साधनदायां याकगति कोपि भायो नोत्पते तावहनने क्रियराणे रामसेवकवद्भयोपि रमणीयोपगधाभावार्थम् । नियमस्तु पतिगनाया इस सर्वथैव भग- बहनने रक्षणीयः । यथा पतिरतायाः पतिभजनं विहायान्यद्धर्मादिक गोणं, तथा भग- बदमनं विहायान्यद्धर्मादिकं गौणमेति । यदा, सर्वभाषेन सन्मभावेन समारंणा- स्मनः स्वस्य जीवस्य भावो मनोतिर्भगरति । यता, सपृ स्थायरनमे आत्मनो १ भयमविणीपमिति इल, कालो, मितीमी साम्पस भपमिपपरे तस्य नामर बिरगना।
श्रीकृष्णरायभट्टविरवितसार्थवोधिकाच्याख्यासमेता। भगवतो भावनाभावः । तेन तदुक्तं सर्वभूतेषु यः पश्येद्भगवद्भावमात्मनः । भूतानि भगवत्यात्मन्येप भागवतोत्तम' इतिवाक्यात् । भजनीयः सेवनीयः । सेवा कर्नव्या । सेवा च स्वामिनो मनोनुकूला स्ववृत्तिः, तस्या ज्ञानं तु शासद्वारेति विवेकधैर्यपूर्वकं काय. वाइमनोभिर्भगवदाथपपूर्व चित्तोद्वेगप्रतिबन्धभोगादिकं विहाय सेवन कर्त्तव्यम् । पदा, 'श्रवणं कीर्तन'मितियापारयणादिरूपा नवधा भक्ति मेमरूपा कार्या । सेन्यस्वरूपमा हु:-प्रजाधिप इति । ब्रजस्य निरसाधनस्याधिपः स्वामी नियामकः प्रभुः फगमा भक्तानां विविधदुःखदुरीमरणार्थमाविर्भूतः साकारो व्यापक आनन्दमानकरपादमुखो- दरादिरूपः पूर्णः परनाम 'रसो वै स' इतिश्रुत्या रसारमा युगलस्वरूपः । सर्वात्मभावेन विरहाउल्तिहृदयेन 'यच दुःखं यशोदाया' इत्यादिभावनया पूर्वोक्तवात्सल्यादिभावाविष्टेन सेव्यः । ननु 'धर्मण पापमपनुदति' 'ध सर्व प्रतिष्टित मित्यादिश्रुतिभिर्न फर्मणा न पज- या धनेन त्यागेऽमृतसमानगुरित्यादिना त्यागेर्नवामृतत्वमारुतत्वात्तथ भजनमेवो- पदिश्यन इलपेक्षायामाहुः-स्वस्पायमेवेतिरस्य नीरस्यात्मनोयमेव भगवरानमेव धर्मः । हीति निश्चये । जीवात्मनो भगवदंशसादंशिनः सेवा युक्तैन । तस्मादस्यैव मुस्यन्वम् । अन्ये धर्मास्तु दैहिकाः । तस्मादन्यैपा गोणलम् । अत एर त्यक्त्या स्वधर्म परणाम्युनं हरेरित्यस्य पाख्याने 'अस्वधर्म मिति पदरछेदं कृत्वा भगवगरणारविन्द- भजनमभिहितम् । तदेव स्वर्य इति घोतिनम् । अत एव धर्मादिभिर्यदवति तनने- नव भविष्यतीनि दैदिकधर्मागां गोगनं पोनिनम् । अत एव भगवद्वाक्यं 'यतर्मभि. पत्तपसा ज्ञानवैराग्यनश्च यत् । योगेन दानधर्मण श्रेयोभिरिनरैरपि', 'समझक्तियोगेन पद्धत्तो लभतेअसेनि । 'यन्न योगेन साहपेन दानवनतीवरः । व्याख्यास्वाध्याय. संन्यासः प्राप्नुपायत्नरानी तीतरसायनामापत्र सस्योगम् । धादिमाप्यं तु भक्तो. रानुपातिरपलन्यमुत्तम् । नान्य इनि । पापि चुनापि पदानिदप्पान्यो धर्मो नास्ति । अपच, य भगवान्स्वीयवनानुगृहाति 'यमेवप रणुन इनिथुनेर्भच्या त्वनन्यय'त्पादिवा- पैश्च भननमेन स्वधर्मः। मिश; 'वगिरे निगश्येन यस्मिन् महाननुपहस्तपिहोरितां. शत्याननाय प्रिवर्गविघातं स्वयमेव भगवानरोनि । मोसम्तु भत्तानामेन नापेक्षितो 'दीयमानमितिसरयान् । नया च भक्तिमार्ग का पुरपार्य इत्यपेक्षाया 'हरदास्य धयों हरित हियामो हरैदिक्षत्र मोक्ष कृष्णम्य गेट्ठा मिनि श्रीमदरमप्रभुचरण र हरे नर पादरमदामानुदाय' इत्यम्य प्याग्यापा निरूपितमिनि जीवमात्रस्य भगवान जनमेव सर्मः ॥१॥ ननु मर्वेश भगवननमेव सर्मवेना सर्वे भगवानमेन विमिति न पुर्व- नात्यसायापा:-एपमिति।
३१ चतुश्लोकी। एवं सदा रम कर्तव्यं स्वयमेव करिष्यति । प्रभुः सर्वसमर्थो हि तेन निश्चिन्ततो ब्रजेत् ॥ २ ॥ एवमनेन प्रकारेण खियः स्वपतिमननवत्सदा निरन्तरं दैवनीचः सद्भिर्य- स्कर्तव्यं तदस्माभिरुक्तम् । देवजीवानां सतां सत्पुरुषाणां सम्बन्धी कर्तव्यो यो भगव- अजनरूपो धर्मः सोस्माभिरुतः । स्म इति प्रसिद्धिः। दैवजीवानामेवायं घों, नत्वासुर- जीवानाम् । आसुरावेशिनां तु व्यभिचारिणीनामिवान्यधर्मध्वपि प्रतिः । दैवजीवानांतु गृहाथमिणां श्रौतस्मा दिकर्मानुष्ठाने घेदरूपभगवदाज्ञया देवतान्तरयजने क्रियमाणे भगवदकत्येन तद्विभूतिलेन यागकरणस्योक्तत्वासानन्गत्वमा इति । तथा च 'अन• न्याश्चिन्तयन्तो मामि तिवाक्यायोगक्षेमनिर्वाहकलं भगवत एवेति यद्धर्मादिभिरैहिका- मुध्यिकफलादिकं तदनायासेन भगवान्स्वयमेव करिष्यति सम्पादयिष्यति । कुत्त इत्यपेक्षायामाहुः-प्रभुरिति । सर्वेषां ब्रह्मेन्द्रद्रादीनामपि प्रभुः स्वामी नियामक सर्व- सामय विशिष्टः । समिलित्वा यत्कर्तव्यं तत्स्वयमेव फतुं समर्थः । हीत्ति प्रसिद्धिः, क्षीरोदमयने मन्दरानयने । तेन सर्वप्रकारेण देशकालद्रव्यकमन्वकर्मायाग्रहं परित्यज्य चतुर्विधपुरुषार्थरूपो भगवानेवेति भगवदाश्रयेण भगवद्भजनमेव कुर्वाणो निश्चिन्ततां ब्रजेत् । तेन देवजीवैर्भगवदानितैः कदापि कापि चिन्ता न कार्या। चिन्ताया आसु- स्पर्मत्वात् । सर्वे भगवानेव करिष्यतीति भावः ॥ २॥ ननु लौकिकवैदिकधर्माद्याश्रयपरित्यागेन भावद्भजने क्रियमाणे कदाचिझगया- नप्पेतन्मनोरयं न कुर्यात्तदा कि भविष्यतीत्यपेक्षायामाहुः-यदीदि । यदि श्रीगोकुलाधीशो धृतः सर्वात्मना हृदि । ततः किमपरं ब्रूहि लौकिकैदिकैरपि ॥ ३॥ यदि कदाचिच्छीगोकुलस्यानन्यशरणस्यानन्यगतिकस्य 'तरमान्मच्छरणं गोष्ठं मनापं मत्परिग्रह'मित्येवं भगवता श्रीनन्दनन्दनेनाङ्गीकृतस्य निस्साधनस्याधीशोपि. पतिः स्वामी रसकः फलात्मा पालकथ, सर्वात्मना कायवाचनसा सर्वात्मभायेन वा हुद्गे धृतो धारितः येषां भगवन्तं विहाय दारागारसुतधनादिकं किमपि पियं नास्त्येव सर्वस्वरूपेण भगवानेव येपामस्ति, भगवदर्यमेव यः सर्व त्यक्तं, येषां माणादयोपि भगवदर्थमेव पिया नात्माम् । यदीतिपदादेतादृश्यवस्था दुर्लभोति भूचितम् । भगव- दरणातिरिक्तसाधनासाध्येति भावः1 गोकुलाधीश इतिपदेन यया श्रीगोकुसे भक्त- वायत्वेन भगवता स्थीयते ततस्यापि कशे भूला भगवान् वर्तन इति घोतितम् । अत एव 'एवं सन्दगिता ह्यङ्ग हरिणा भक्तवश्यता । स्ववशेनापि कृष्णन यस्येदं सेश्वर बो', 'नाय सुरसापो भगवान्देहिनां गोपिकामुतः। शानिनां चात्मभूतानां यया भक्तिमतामिहे- श्रीकृष्णरायभट्टविरचितसर्थयोधिकाव्यारयासमता। ति । नन्वेवं भगवति हदि विद्यमाने गृहस्थानां धनाद्यभावाल्लौकिक्वैदिककार्यादेः कथं निर्वाह इत्यपेक्षायामाहुः-तत इति । यदा श्रीभगवानेव सर्वसामर्थ्यविशिष्टो हृदये स्थितस्तदा लौकिकैर्व्यवहारादिकर्मभिवेदिकैराश्रमवर्णादिविहितः कर्मभिर्यागदानादिभि- चैतस्य कि फलमन्यत् ? न किञ्चिदपीत्यर्थः। सर्वस्यैव ब्रह्मलोकपर्यन्तस्यापि फल स्थाब्रह्म- भुवनाल्लोकाः पुनरावत्तिनो ने तिवाक्यानश्वरत्वमेवेति न किश्चिदित्यर्थः । ततस्तस्मा. दपरं किं फलमिनि स्वमेव ब्रूयतो येषां सर्वभायेन भगवानेव हृदि स्थितस्तैपामैहिक पारलौकिकं सर्व भगवानेव करोति 'तेपामदं समुदत्त'विवाक्यात् । 'अहं त्वा सर्वपा- पेभ्यो मोक्षयिष्यामीति वाक्याच ।। ३ ।। ननु तर्हि जीवैः सदा किं कर्तव्यमित्यपेक्षायामाहुः-अत इति । अतः सर्वात्मना शश्वगोकुलेश्वरपादयोः । स्मरणं भजने चापि न त्याज्यमिति मे मतिः ॥ ४ ॥ यतः कर्मयोगज्ञानादिसाध्य फलं तद्भक्तरानुपशिस्मतः सर्वात्मना सर्वप्रकारेण शश्वनिरन्तरं गोकुलेश्वरस्य निस्साधनफलात्मनो भक्तवश्यस्य परब्रह्मणो रसात्मकस्य भगवतः पादयोमरणारविन्दयोः स्मरणं भजनं चकाराच्छ्रवर्ण कीर्तनं कदापि न त्याज्यम् । स्नेहाभावेपि मनोधर्मत्वात्स्मरणस्य मुख्यतया स्मरणमेवोक्तम् । अत एव 'तस्माद्भारत सर्वात्मे त्यस्य ध्यारयाने भाणकीर्तनस्मरणानामेवोक्तो कथं नवधा भक्तिनोंत्तेति स्वयमेवाशङ्कय समाहितम् । पादसेग्नादारभ्यात्मनिवेदनपर्यन्तानां पण्णां प्रेमोत्तरभावित्वान्मुख्यतया श्रवणकीर्तनरमरणमेवाभिहितम् । तस्मादहर्निदां स्मरणं कर्तव्यं लीलाविशिष्टस्य ।रासादिलीला अपि सर्वाधिन्तनीया भावाविष्टतया। तथैव भजन सेग्नं पव्यं, कदापि न त्याज्यम् । 'कृष्णसेवा सदा कार्य तिवाक्ये मानस्या एव फलरूप- स्वमुक्तम् । अत एव सेवालक्षण चतसो भगवत्प्रवणत्वम् । भगवत्मवणचित्तसिद्धपथ तनु- वित्तमाररणम् । तेन सेवाकरणेन संसारदुःखनितिपूर्वग्नह्मज्ञानाराप्तिरवान्तरफलम् । परमफलंतु यपाधिकरतो भगवदनुग्रहेण नित्यलीलामाप्तिरेवेति मे मम मतिरिति । श्रीमदाचार्यकृपया व्यारया सर्वार्थरोधिका । मया कृता चतुःश्लोश्याः कृष्णरायाभिधेन हि ॥१॥ तुभ्यतां तेन भगवानदीपदाचार्यवहभः । दासे निस्साधने दीने हप्णराये दयानिधिः ।। २॥ इति धीमहलमदयविरचितायाधतु श्लोरया एप्णरायमहविरचिता सर्वार्धदाधिका व्यारया सम्पूर्णा।
श्रीपणाय नमन श्रीगोपीजनयतमाय नमः। धीमदाचार्यचरणकमलेभ्यो नमः । चतुःश्लोकी। मठेशश्रीनाथभट्टकृतीकया संवलिता श्रीवल्लभाभिधान्नौमि तान् स्वशास्त्रार्थतो मुदा । उपदिष्टा चतुःश्लोकी स्वीयेम्यो पैः रामासतः ॥ १॥ अय श्रीवल्लभाचार्यचरणाः स्वीयजनानां सुमहार्थ समासतः स्रात्मधर्मपनु- शिक्षयसपतुःश्लोरपा सर्वशासाथै निरुपन्ति सर्वदा सर्वभाषेन भजनीय इति । सर्वदा सर्वभावेन भजनीयो प्रजाधिपः । स्वस्यायमेव धर्मो हि नान्यः कापि कदाचन ॥ १ ॥ परमेश्वरो देवः सेन्य इति सर्वशासार्यः । स च पाश्चिन्मने निराकारः, ता. चिन्मते साकार उपास्यः । तर निराकारस्तु नोपपयन एर । तया दि, सिमानारो देव आत्मा येति विचारणीयम् । तत्र देवस्तु पावभीतिरः प्राकृतः स नोपपद्यत एर, 'देहे- दिपामुद्दीनानामितिराश्यातदीयानां पार्षदानां यर तयातं तर तन्मृगस्वामिनः पारप पाणः पुरुषोत्तमस्य तथास्त्र विभु वाच्यामिति फैमुतिरन्यापः । अत एर आन्या पास तपाभूतो दिन्यः स्वीपर्यः । न च दिव्यपदयायो देह पर तसागरः सामार्प इति वारयं, देहदहिरिभागाभाग । 'स पया संन्धान आभ्पनरो पापः पुरानो रसघन, एवं पारेऽपमात्म' स्पादिश्रुतिभिमाननाय । दिग्पादन निति भो दिम्प इतिन्युत्पत्यामवेत्तदा देवानामिन नयादारय मानवातिः, देवानीन- ततस्पैर दियादवाच्यत्वस्वी सारा । यनु 'अन्य फर्म च मे दिन्यामि न्युक्तं तदप्पा- तत्वाभिमाग, दिग्पपदस्प रूवावस्तीगरान् । अाएर 'देहेन्द्रियामुहीनानामित्र तभिषः । न च तर सामान्योपा निषेध एर देहरादगारत इनि पापम्, पुनम्नर- पना , पुरासिनां पश्पना वर्गलां गानपित्पनुपदमंत्र तपासन निमगाव, न मानाफारस्प निषस्तर पम्पति, न नापारम्प । मानौनिशादिशा. फाग्नं न नपा भगानीनिशेपम् । मन एरोस 'सागरमालारादरम्यारो गति ३५ - माराधीनाघमरतटीया सरिता स्वाचार्यनाम सर्वोत्तमे । तपशब्दो मुख्यार्थिवाची | साकारत्वमुक्त्वा यद्रह्मस्व निरू पित, तघया ब्रह्म केवल सचिदानन्दमयं तथा तत्वरचरणादीनामपि क्वरसचिदान- न्दमपत्वं शापितम् । साकारत्वपथनेन पुष्टिमार्गीयफ्नस्य तत्स्वरूपस्य सःन्द्रियास्वायत्व, फ्गनुभवमकार उक्तः । नन्वियदाधि सर्वशाखार्थविचारकैरपि परब्रह्मणः साकारत्व. निरूपणात् क्यमाचार्याणामेव साकारलनिम्पावमिति चंच, उच्यते । ब्रह्मणोऽस्य- शैक्कित्याचारादीना रौफिरममाणवान चक्षुरादिगम्यत्तं ब्रह्मणि, किन्तु स्वच्छया संभवतीति श्रुतीनामलोकिरमानत्वेन श्रुतय एव परब्रह्मणि प्रमाणमिति तत्मतिपाद्यमेव ब्रह्म । तास्तु ‘स ईक्षाश्चक्रे' 'तस्मादेकाकी न रमते' 'स द्वितीयमैच्छत्' 'स हैतावानासे- ति सागारमेव निरूपयन्ति । गीता च 'सर्वतः पाणिपादान्त सतीक्षिशिरोमुखमित्यादि साकारत्वमेव वदति । ननु निराकारवादिभिरपि निरासम्प्रतिपादने 'अस्थूलमनवहस्त्र पदीर्यमित्यादिश्रुतय एव प्रमाणत्वनाङ्गीप्रियन्ते क्य न निराकारत्वमिति नेत् , उच्यते । निराकारत्वमतिपादका अपि श्रुतयो ब्रमणि देवाधाकारवत् प्राकृतासारत्वमेव प्रनिपे. धन्ति, नत्वानन्दमानरपादमुखोदरायाकारम् । यदि सर्वया निराकारत्वमेव शुभ मत स्यात्तदा निराकारत्वमुक्त्वापि अमे 'स ईशाञ्चक्रे' इत्यादिना साकार न प्रतिपादयेयुः। अत एव व्याससूत्रमपि 'प्रकृतनावचं हि प्रतिपेयति ततो ब्रवीति च भूय' इति । अस्या- प्यर्थः, प्रकृतमेतावच प्राकृनं सासरत्व, तनिषेधति निराकारश्रुतिः, न वानन्दैकाका- रत्य, तत्र हेतु. 'ततो प्रवीति च भूय' इति । अस्याप्यर्थः तनोये । पुनरपि स इक्षाचने 'अपा. णिपादो जवनो गृहीता पश्यत्यचः स शृणोत्यकर्ण' इत्यादि सापारत्वमेव बदतीति निराकारयादिमा यत्किन्निछुतिज्ञानवपि सर्वशाखीयोपनिषशानाभावानामु च मका- रभेदतो ब्रह्मनिरूपणा, तत्र परस्परविरोधपरिहारपूर्वकविपयव्यवस्थया यसिध्यति तार ब्रह्म मन्तव्यम् । निराकारवादिना सर्वशाखीयोपनिषत्तात्पर्यज्ञानाभावात्स्वबुध्यनुसारण यरिकश्चिच्छुतितात्पर्य स्वसिद्धान्तानुसारं कल्पयित्वा निरागारत्वकयनमिति न तदुक्त ममाणम् । स्वाचायस्तु सर्वशाखोपनिपत्तात्पर्यस्य विरोधपरिहारेणावगपात्तत्र च साकार- स्यैव निरूपणात् सर्वमवगत्यैव साकारत्वमुक्तमिति सिद्ध साकारत्वम् । स च साकारः परमेश्वर. को वा भजनीयः, शिको विष्णुर्श व्यूहात्मा का नारा- यणो ब्रह्माण्डविग्रहो विश्वरूपादित्याकासायामाहुः प्रजाधिप इति । अनेन सर्वनो व्यावस्यावतारदशापन्नेष्वपि भगवदशेपु स्वरूपेषु भजनीयः श्रीकृष्णः पुरुषोत्तमो व्रजाधिप एवोक्त' । 'वचित्पाण्डित्यमितिश्लोक निर्णीतत्त्वात् । सोपि नोपास्यः किन्तु भजनीयो, 'भन सेवायामिति धातोः । उपासनाया: कर्मान्तर्गतत्वेन मन्त्रोपा- सनवैदिकतान्त्रिकदीक्षार्चनादिवि यधीनत्व भननीयस्यायातीति विभूतिरूप व्याव- स्यने । मननश्च सेगा, सैत्र भक्तिपदशक्यार्थः । 'धात्यर्थः सेवा, प्रत्ययार्थः स्नेह' ३५ चतुःश्लोकी इति निवन्धोक्तेः। 'सा परानुरक्तिरीश्वरे' इतिभक्तिसूत्रात् । 'माहात्म्यज्ञानपूर्वस्तु सुदृढ सर्वतोधिकः। स्नेहो भक्तिरिति मोक्तस्तया मुक्तिर्न चान्यथेति नारदपश्चरात्रोक्तेश्च । ज्ञानपूर्वकत्वे विहितस्नेहो भक्तिपदवाच्यः, अन्यथा त्वविहितः स्नेह इत्यन्यत्र विस्तरः । सा सेवा तनुविरागा कायिक्येव केवला संभूतैति मानसीत्वमपि लक्षणे निवैश्यते । 'प्रत्ययार्यः स्नेह' इत्यान्तरो धर्म उक्तः । तथैतदुक्तं सिद्धान्तमुक्तावल्या 'चेतस्तत्पवणं सेवा तत्सिदधै तनुवित्तजा' इति । तथा च देहेन्द्रियमाणान्तःकरणैनिवेदितात्मभिः संसेव्य इत्यभिप्रायतः सर्वभावेनेत्युक्तम् । सर्यो यो भावो देहेन्द्रियादीनां यथाई तत्तद्विनियोगात्मकस्तेन सेव्यः । सर्वात्मभावेनेति केचित् । सोप्यन्न पुष्टिमार्गीय एव । सर्वोपि आत्मनो भावो, न तु सर्वत्रात्मस्वभावन, तस्य मर्यादामार्गीयत्वादिति विषेच. नीयम् । किञ्च, स सर्वदा भजनीयः, न तु कदाचित् कर्ममार्ग इव, नैमित्तिकदेववता । ननु वेदादिप्रमाणान्थेषु तु तदुपासनं विहितमभिहितं न वेतदित्ययविहित- मेव भननमिति चैन, सर्वतः पृथक्त्वेनैतत्पमातो व्यवस्थापितत्वात् । 'अनित्यममुख लोकमिमं प्राप्य भजस्व मामि'तिभगवद्वाक्ये भजनविध्युपपादितत्वाच । 'मन्मना भव मद्भक्तो मयाजी मां नमस्कुरु । मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिमाने मियोसि में' इत्यादि. ना । अत एवात्राप्यावश्यकत्वार्थकतयानुशिष्टानां तव्यत्तव्यानीयर्मत्यपानां मध्ये अनी यर्मत्पय उपात्तः । तथा विध्यर्थकश्च । न चैवं विध्यधीनत्वमसङ्गः । मर्यादातो व्यति. रेका पुष्टिमागीयत्वाच । अत एवोक्तमेकादशस्कन्धे भागवते भगवद्धर्मनिरूपणमसङ्के 'यानास्थाप नरो राजन्म प्रमायेत कर्हि चित् । धावनिमील्य वा नेत्रे न स्खलेन्न पतेदिहे'- त्यादि । अयमेव धर्मः ॥१॥ इति मठेशधीनाथभता चतुश्लोस्याः प्रथमश्लोकटीका समाता। (१) तव्यत्त यानीपर (३-१-१६) इतिस्वाद । (२)नाधिका तम्या ।
धीटप्णाय नम। श्रीगोपीजनवल्लभाय नम । धीमदाचार्यचरणकमलेभ्यो नम । चतुःश्लोकी। श्रीदारिकशविरचितम्याख्यायुता। श्रीगोवर्धनधराय नमः। नवा श्रीवल्लमाचार्यान्विलेशांश्च सदुरून् । स्वसिद्धान्तचतुःश्लोकी विटणोमि यथामति ।। १ ।। अथ श्रीमद्वल्लभाचार्यचरणा कृष्णाश्रयग्रन्थे सपरिकरस्याश्रयस्य निरूपितवादा- श्रितान् स्मार्गीयममाणप्रमेयसाधनफलानि निर्देष्टुं तद्बोधकधर्मार्थकाममोक्षायोपदेष्ट्र पूर्वश्लोके धर्म प्रमाणं च निरूपयन्ति सर्वदेनि । सर्वदा सर्वभावेन भजनीयो व्रजाधिपः । स्वस्यायमेव धर्मो हि नान्यः कापि कदाचन ॥ १ ॥ सर्वदेति सर्वस्मिन्काले । सर्वभावेनेति पतिपुत्रादिभाषेन । तदुक्तं 'प्रेष्ठो भवां- स्तनुभृतां किल पधुरात्मेति, 'सर्वपामात्मनो धान्मा पिता माता स ईश्वर' इति, 'येपां च त्वं प्रिय आत्मा सुतश्च सखा गुरुः सुहृदो दैवतञ्च' । प्रजाधिपः । व्रजस्य निःसाधनस्यानन्यस्वामिनः अधिपः स्वामी । कर्तव्यं निर्दिशन्ति भजनीय इति । काय- वाइमनोभिरवश्यं सेवनीयः। यदा, सर्वेपामिन्द्रियाणां भावेन 'तन्मनस्कास्तदाला- पास्तद्विचेष्टास्तदात्मिका इतिरीतिकेन, निरोधलक्षणे वक्ष्यमाणरीतिकेन वा सेव्यः । स्वस्येति 'देवोऽसुरो मनुष्यो 'तिवाफ्यात्, 'को नु राजन्नि'तिवाक्याच स्वस्यात्मनो जीवमात्रस्य । स्वस्य कृष्णाश्रितजीवस्यायगेर धर्मः । तदेव भक्तिहंसे 'खियाः सपति- भजनव'दिति । अकर्तव्य निषेधयन्ति" ण काले श्रोतफर्तव्यस्य । 'वर्णाश्रमवतां धर्मः श्रुत्यादिपु यथोदितः । तथैव विधिवत्वार्यः' वालयोये 'स्वपर्ममनुतिष्ठन्चै भारद्वैगुण्यमन्यथा' । अत एव सर्वोत्तमेऽपि 'कर्ममार्गप्रवर्तक 'यागादौ भक्तिमार्गकसाधनवोपदेश', 'यज्ञभोक्ता यज्ञकर्ते'त्यादि- नामानि । तथाकृतिश्च परम्परया दृश्यते । न चैव 'सर्वदा पदवायः शड्डयः, भक्तिमार्गे साधनफलयोरैक्येन तेपामपि सेवा मध्यपातिनीति न वाधः ।। १॥ पर्व 'सर्वदा सर्वभान भननीय' इत्यनेन प्रमाणं निरूप्य 'धर्मों ही'त्यनेन धर्म च निरूप्य ममे यमर्थं च निरूपयन्ति एवं सतामिति ।
चतुश्लोकी। ३७ एवं सतां स्म कर्तव्यं स्वयमेव करिष्यति । प्रभुः सर्वसमर्थो हि तेन निश्चिन्ततां ब्रजेत् ॥ २ ॥ उक्तमकारेण मनताम् । स्मेति मसिद्धिः । भगवद्गीतासु 'अनन्याश्चिन्तयन्तो माँ ये जनाः पर्युपासते । तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेपं वहाम्यह' मितिभगवद्वा- क्यात् । एकादशस्कन्धे च यत्कर्मभिर्यत्तपसा ज्ञानवैराग्यातच यत् । योगेन दानधर्मेण श्रेयोभिरितरैरपि, सर्व मरक्तियोगेन मद्भक्तो लभतेजसे तिभगवद्वाक्यात् । कर्तव्यं सेवोपयुक्तादार्थसम्पादन स्वयमेव करिष्यति । स्वकर्तव्यमितिपाठे स्वस्प जीवस्य भगवतो वा ययकर्तव्यं ततद्धरिः स्वयमेव अविकृत एव अभार्थित एव करिष्यति, न वन्यद्वारा । नापि कल्पवृक्षादिवत् । स हि मार्थित एष करोति । अन एव दशमस्कन्धे 'जस्योवाह वै हर्षे भगवान्बालचेष्टितः' । सर्वोत्तमेऽपि 'स्वदासार्यकृताशेपसाधन' इति । मार्यादिकमक्तेषु नृसिंहमहत्तरादिषु तथाकृतमपि श्रूयते । ननु भगवान केन प्रकारेण करोतीत्याशङ्कायामा प्रभुरिति । प्रकण भवतीति । भगवदीयाभिल- पितशय्यासिंहासनादिरूपो भवति । यथा मैथिलधुतदेवयोहयोप्यादिवाना- दिसर्वरूपो भूत्वा विवेश । तदुक्तं 'उभयोराविशद्रेहमुभाम्यां तदलक्षित' इति । यथा च पोदशसहस्रनायिकाविवाहे श्रीवसुदेवादिवीरयात्रिकसर्ववस्तुरूपो भूत्वा सर्वत्र विवाहं कृतवान् । तदुक्तं 'अघो मुहूर्त एकस्मिन्नानागारेषु ताः खियः । अधोपयेमे भगवाँस्तावद्रूपधरोऽध्यय' इति । ननु सर्ववेदप्रतिपायो भगवानुच्चावचभावं कथं मनते इत्यत आहुः सर्वसमर्थ इति । सर्व फर्तुं समर्थः । अथवा ! सर्वेपूचावचभावेषु सम- स्तुल्पोऽर्यो यस्य । 'सर्व खस्विदं ब्रह्मेति श्रुत्या वस्तुतः सर्वस्प भगवत्वात् । तथा चोक्तमष्टमस्कन्धे 'उच्चावचेषु भूतेषु चरन्वायुरिपेपरः । नोचावचत्वं भजते निर्गुणत्वादि- यो गुणैः । हि युक्तोऽयमर्थः । एतेन सिद्धमाहुः तेनेति । भगवतैव संपादितना- थेन निश्चिन्ततां भगवदेकतानतां ब्रजेत् । निश्चिन्तो भूत्वा सेवां कुर्यात् । अत एवं भक्तिवर्द्धिन्यां 'अपाचो भजेस्कृष्णं पूजपा श्रवणादिभिः । नवरत्नकाशेऽपि भगवदर्यापि सा न कार्या । विवेकश्रियेऽपि मा सेवेत निर्ममः । गदम्पर- दासीनां नयाकनिध भ्रूपते ! एवं प्रभुपदेनार्थ सर्वसमर्थपदेन प्रमेयं च निरूप्य भक्ति योगस्य तत्सर्वमन्तरायतयाक' इत्युपक्रम्य, 'यस्त आशिप आशास्ते न स भृत्यः सबै चणिका आशातानो न वै मृत्यः स्वापिन्याशिप आलनः । न स्वामी भृत्पतः स्वाम्य- मिच्छन्यो राति चाशिप'इत्युक्तत्वात् ॥ २॥ एवं तु भावतार्थसंपादने कृते भक्तिमार्गान्तरापः, सपं कृते सेवानिव इति मासे भक्तिमार्गीय साधनं निरूपपन्तो हरेदिक्षाल्पं काम निरपपन्ति पदि श्रीगो. कुलाधीश इति ।
३८ श्रीद्वारिकेशविरवितव्याख्यायुना। यदि श्रीगोकुलाधीशो धृतः सर्वात्मना हृदि । ततः किमपरं ब्रूहि लौकिकैदिकैरपि ॥ ३ ॥ एतेन दुर्लभनोच्यते । अत एव दिदृक्षा। श्रिया युक्तो गोकलाधीश, एतेन कामसम्प- त्तिनिरूपिता । 'कामः स्त्रीपु प्रतिष्ठित' इतिवाक्यात् । 'कौण्डिन्यो गोपिका मोक्ता मुखः साधनं च तदितिवाक्यात् साधनसंपत्तिनिरूपिता । तयोः स्वस्मिन्समावेशमाहुः धृतः सर्वात्मना हृदि । 'एकादशेन्द्रियैः काम' इतिवाक्यात् । अत्राऽऽत्मपदं इन्द्रियपरम् । सर्वपदं एकादग्परम् । सन्द्रियैः कापसाधनसंयुक्तो गोकुलाधीशोहदि धृतो हृदये कृतस्तदा लौकिकफलस्य स्वाधीनपतित्वस्य चैदिकफलस्य चिनशुद्धेश्व 'हृदि स्थिती यच्छति भक्तिपूत' इतिवचनादाप्तत्वेन लौकिकैद्यानादिभिः वैदिकैर्यतादिभिरपि कि' नास्ति परमुत्कृष्ट, यस्मादेतादृशमत्युत्कृष्टमस्ति चेहि ॥ ३॥ एवं श्रीपदेन कामं साधने च निरूप्य भगवदीयवरूपं मोक्षं स्मरणसेवारूपं फलं निरूपयन्ति-अत इति । अतः सर्वात्मना शवगोकुलेश्वरपादयोः । स्मरणं भजनं चापि न त्याज्यमिति मे मतिः ॥४॥ यतो हृदये श्रीगोकुलाधीशधारणादन्यसाधनं नास्ति, अतः परं सर्वात्मना देहेन्द्रियमाणान्तःकरणैः शश्वनिरन्तरं, गवां पुरस्प, गवां पन्ना गोपगोपीनां, गोकु. लग्रामस्य वा ईश्वरस्य निपामास्य पादयोर्भगवदीपदेहसंपादकयोः स्मरणमाध्यान भजन सेवनं, चकारेण अवर्ण कीर्तनं च,न त्याज्यम् । सादरं सर्वया विधेयम् । अपिः संभावनापाम् । त्पागसंभावनैव नास्ति । एवं भगवदीयत्वरूपमोक्षं सेवारूपफलं चेति । स्वयं स्वाभिप्रामाण्येन अन्यं समापपन्ति-इति मे मतिरिति मे श्रीकृष्णवद्धभस्य इनि एवं प्रकारिका मतिः ।।४।। एवं भगवदीयानां धर्माच्छामृतपदा । घ्पारयानेयं चतुःश्लोसी प्रमाणादिनदर्शिका ॥१॥ नेन श्रीवल्लभाचार्याःवदासे मयि वंशजे । प्रसीदन्तु सकृपया सावया: सामः॥२॥ इति श्रीवल्लभाचार्यचरणक्तानभीमथुरानाधारमजद्वारिकताविरचिता चतुःश्लोकीन्पारुपान्ययवोधिनी समासा
परिशिष्टम्
श्रीमद्-वल्लभाचार्य-महाप्रभु-धोमद्-विठ्ठलेश-प्रभुचरण-विरचिता
श्रीवासुरचतुःश्लोकी विवृतिः
व्याख्यात्रय-समलंकृता
१. थोहरिरायाणा टिप्पणी
२. धोवल्लभाना टिप्पणी
३. पुरुषोत्तमान प्रकार:
॥ श्रीनग्नीतमियो जपति । श्रीशाय नम ॥ ॥ थोरोपरीनभाय नए । ॥ श्रीपदापाचरणकमरेभ्यो नम ॥ महानुभावनोहरिरायमरणाना श्रीवदानाच दिसणीच्या समरन, .. परणविरचितमकाशेन विशदीसना, भीमद्वितुरेशशु सानि । ॥ श्रीवासुरचतुःश्लोकीविरतिः ॥ ननु पुष्पार्यावतारस्तर विवर्गवियानं भगवानेव करोति मोक्षस्तु भक्तानामेर नापेक्षित इति भक्तिमार्गे न कोपि पुरपार्यः सिद्धानरत्याशय भक्तिमार्गीयं तगतुष्टय भिन्नमेरेत्याह-चतुर्भिः, पूर्वमिन्द्रं प्रति प्राइ ततो भन्यानो रिम् । दृष्टा तन् मायामास पुष्दिष्टफग यनः ॥ १॥ आधे तु पुष्टिमानीरो धर्मः स्परणकीर्तने । सेवा ति य नेन प्राधिनः स निरूप्यते ॥२॥ आत्मनधाधिकारियमुनम दीनभारतः । पानीपतया तस्य माधनं च रूपान्यते ॥ ३ ॥ धर्म मार्यपन भयममधिकारिलं नस्य निस्पनि, अपिनि, अहं हरे तव पादकमूलदासानुदासो भवितास्मि भूयः ।
२ . श्रीप्रभुचाणविरचिना दास्ये तु न तयेत्याशयेनास्मच्छन्देन भेदमुपपादयति-अहमिति । ननु दास्यं कथं सेत्स्यतीत्यत आह-तवेति त्वदीयोहमित्यर्थः तेनावयोः सेन्यसेवकभावः सहन इति सूचितम् , अन्यथा त्रिवर्गविघातमसुरपि सति कथं कुर्याः, तनो मोक्षे चानधिकार उक्तः, एवं चेत् कयं दास्यं न करोपीत्यत आह-भवितेति, जीवस्य त्वदीयत्वेपि देहस्यामु. रत्येनायोग्यत्वादेहान्तरे दासो भविष्यामीत्यर्यः, अतस्त्वदनुग्रहेणैव तथा भवितेत्यत्र विश्वासमाह-अस्मीति । साक्षात्मभुदास्य हि स्वस्य दीनभावो गच्छतीति परम्परादास- स्वमुक्तं, या, प्रभुदास्ये हि स्वस्य सर्वोत्तमत्वाभिमानेन भक्तान्तरे अपराधसम्भवात् प्रभु दास्यादपि भ्रंशो भवेत्तच्चानुभूतं चित्ररतुदशायाम् , अत: परम्परादासत्वेन दैन्यमेवोचि- तमिति भावः। अथवा तयेत्यादिपदसमुदायेन मोक्षादिक्रमेण वक्ष्यमाणपुरपार्थचतुष्टयेप्यधिकाररूपं चतुर्विधं दास्यमुच्यते, तत्र पुष्टिमार्गे मोक्षो हि भजनानन्दानुभवः, स च देहेन्द्रियमाणा• न्तःकरणयुक्तानामेब, 'अक्षण्वतां फलमिदं न परं विदाम' इत्यत्र श्रुनिमतिपादितः, तत्र चाधिकाररूपं प्रभुदास्यं 'भवाम दास्यः' 'पुरुभूपण देहि दास्यामिति श्रुतिवाक्यादतस्तवेति पदान्मोक्षाधिकाररूपं प्रभुदास्यमुक्तपतस्तवेत्यसमासः, अन्यथा त्वत्पादेति वदेत् , तव पादाकं मूलं येपो ते तथा, अर्थाद्रजस्थितभक्ता एच, 'तेधि. मूलं प्राप्ता' इति तेपावोक्तः, तेन कामाधिकाररूपं दासत्वमुक्तमन्यया कामासिद्धः, अत एवोक्तमाचार्यचरणः 'तेष्वारा पुरुषाणां च भविष्यति न चान्यधेति । अनु- पदेन सदासदासत्वमर्याधिकाररूपमुक्तम्, ततस्तव दासत्वं धर्माधिकाररूपमुक्तम् । ननु सत्सङ्गाभावेप्येवम्भावस्तव कयं मात इत्यन आइ-भूय इति, पूर्वमहं चित्र- केतुर्दास एव स्थितोऽनः युनरपि तथा वितेति भावः। एवं स्वस्याधिकारचनुष्टयं प्रतिपाय तरतमभावादादौ धर्म प्रार्थयते मनः स्मरतेति । असुपतेरिति गुणानामिति च कर्मणि पष्टी, नया च मनः असुपति स्मरेत चिन्तयेत् । स्मरणस्यात्ममुरबैकसाधनादात्मने- पदम् । वाक् तस्यैव गुणान् गृणीत कीर्तयेत् , कीर्तनस्यापि मुख्यः स्वार्थ एव परार्थ. स्त्वानुपडिक इत्यात्मनेपदम् । कायस्तस्यैव कर्म सेवा करोतु, सेवा तु यथा प्रभोः सुखं भवति तथा क्रियते, न तु तत्राणुमात्रमपि स्वार्थपरत्वमनः परस्मैपदम् । स्मरणकीर्तनयोः श्रवणाधीनत्वेनान्यकथनसापेक्षत्वाद्विपिरतः । सेवायां स्नेह एव नियामकः, स च प्रभुक- पैकसाध्य इति तनाशीनिम्लपिता ॥१॥ ()भा. १०,०१,७ (.)भा. १०,२९,३९ (३) भा. १७, २९, ३८ (५) भा.
३ श्रीवृत्रासुरपतुःहोकीवितिः एवं मनोरामायभेदेन विविधमपि धर्म सम्मा िनिरूपयति-न नाकपृष्टमिति । न नाकपृष्ठं न व पारमेष्ठवं न सार्वभोमं न रसाधिपत्यम् । न योगसिद्धीरपुनर्भवं वा समञ्जस वा विरहय्य काहे ॥२॥ लौकिको वैदिकधार्यविवियः प्रानैर्गुणैः । प्रमेण ते भगवतो गुणः पडिनिराकृताः ।। १ ।। वर्गमूमिरचर्प साचिकादि तु लौकिकम् । मोतय पारमेष्ठपं च सिद्धपति वैदिकम् ।।२।। प्रकृचिधर्मसाध्यत्वासामान्यं सत्तु सौकिकम् । निर्मिसाध्यत्यादिशेपादिकं परम् ॥ ३ ॥ प्रत्येकमेव से पायर्या न तु सम्पूय कुप्रचिन् । भगरत्यरिबलात्मत्याद्भवन्त्येव तया हि ते ।।४।। अतोऽयो भगवानेर पुष्टिमारमन्पतः । सर्वतो नरपेक्ष्यं च तपात्र विनिरूप्पते ॥५॥ आदौ सौफिकमाचिस निराकरोति-न नाकाष्ठमिनि, नाकः स्वर्गस्तस्य पृष्ठं रानासनम्, इन्द्रासनमितियारन् , तग नापत्ति शालान्तरे, अस्तरयापल्टिन पर्याप विधमानत्यापन काहे नेहमीपर्यः । वैदिकरानसप निराकोनि-न पारमेय. मिति, परमेष्टी माया, स्नोरतारतातत्यानं रानमम् , तर च 'प्रामणा मद मुच्यन्ते' इति पारपासारततरेण फलसिदपा स्वाहानिर, त्वयि पापन्टिवीर्यस्य विधान- स्वादपि न काहे । लौकिकरानमम निराम्रोति-न सार्पभीममिति, सर्वभूमरीमरने हि सर्पप लोके पो भवति, तय दानादिसापेक्षतादापापित गारपि पाप ती मनि पवनारसपतोपि दुष्ट 'रान्त नरर्फ भुयामिनि भरनादरणानतारि तया, यि पानपरामो वियपानालादपि न रहे। धारिसनाममम निरानि मरमाधिपत्यमिनि, न्युपगाणं तेनापानोरा: सर निम्लिा, तप भूपोतरा उपभोगोषितः स प चिपा भावि, मा पला बापरता का प, सपि पानरा. पिया भिषणे निपं रिचमानगादपि न कराई। दिशा निरासानि-न पांग. मिदीरित, अरहयोगिनो मदिनापियन संप मागे TRA दी. गादपि भरा भरन्तीतिर्गमानं मानोर, सपिरनिन्पाालिमारम्पनिला. -- - श्रीपतिपिता गा अपि न माहे। पंदिरमाथि निगरानि-अपुनर्मयं नि, 'मैत्वात् म. शापने ज्ञान मिपिनाम्मानम्य माधिार नामाध्यमोरास्यापि तथास्वमुत्पते, मा गणितानन्दतीनवदानन्दांग एवं ननु लम्, बापिटपमेरमान नान्योन्य सामना भेदाभारादतनपानामारारापुनर्भरणम्, नत्मामानिरिक्तविशेषामा. पान तु पूर्णानन्दो मनमासयति 'मटनपने न जानन्ति नाहं तेम्पो मनाग- पी'नि पाम्पादनी भनानिस्निगगामारेन पम्पण्डिनरापाप विषपानतापमपि न पाई। मर्यादागा पोसस्नुभयपुरपाय: गप पुष्टी ऐपन्चेनार्थमध्ये गणित इत्पनादरचो. मना न्युनम, या पोरस्यापनादरमश पेश कियाच्यामिति घाम गर्थिनिरासित इत्पन आदर-समयमेनि, रेममयम पूर्णन्यान्मागर्यप, मतस्न्या पां विरग्य पृपान्योनार्यानां न चाहै, किन्तु तामेव पर्वायम्पन्नादर्पन्न पाई निरन्तरमिछा. मीत्यर्थः । यदा उनार्यानपत्य त्वामेर चार्यन्येन नाई॥०॥ एवम निम्प यामं निम्पयनि-अजामपक्षाम्चेति । अजातपता इव मातरं खगाः स्तन्यं यथा वत्सतराः क्षुधार्ताः। प्रियं प्रियेव व्युपितं विपण्णा मनोरविन्दाक्ष दिहक्षते त्वाम् ॥३॥ पुष्टिमार्गे हरे म्पदिसा मनमाम्य हि। यामो निम्प्यते ना दृष्टान्त विनयं यथा ।।१।। हिनयं टोविक पोक्तमे शास्त्रीयमुत्तमम् । साकिर लिगुणीभूय यान्तः स्पादनाविक ॥ २॥ अन्यथैव नरेणारि सिदे रिरयन रिम् । शुषो लौकियः कामो रसरीत्या गु शान्यतः ॥ ३ ॥ प्रभोस्तु रसरूपत्यावश्यकन्येन चोत्तमः । अयमेव हि शान्तस्तेनान्त चक्नादिता ॥ ४ ॥ हे अरविन्द ? मनुस्त्वां दिहशत इनि सम्पन्ः । नेत्रयोरम्युजवेन तसिया मनसो मथुपन्यं योधिनम् तथाचारविन्दे विकसिने ममुपस्य कामः मिद्धयति नान्पयति तथा दृष्टिं मयि संपादयेति प्रार्थितम् , दिक्षानुभूनं स्वम्पसौन्दर्य च संयोधनेन ध्वनिनम् । मनमः स्वतन्त्रत्वायास्मन्छन्दप्रयोगाभावः। विश्च, दिक्षा शो धर्मः स च मनसो निरूप्यने, तेन सन्द्रियाणामपि मनामनिकर्षात्पूर्णः कामो निमपिता, अन्यथा भजनानन्दानुभवो न स्यात् (१)गीता में १४.१.१(२)मा १.५.६८* अपरिनपिस्पपि पाठ।
५ - श्रीवृनासुरचतुःश्लोकोविकृति तस्य सर्वेन्द्रियैकवेद्यत्वात् । प्रभोः पूर्णकामत्वेन क्रियाफलस्यानपगामित्वापात्मनेपदम् । मनसश्चञ्चलवान्मधुपत्ववोधनेन च कामान्तरं संभवतीति तदभावाय दृष्टान्तमाह-वगा इवेति, यथा पक्षिणः कदा किमानीय दास्यतीति मातरं द्रष्टुमिच्छन्ति, सगानां नियतभक्ष्या- भावादनिपतस्प च क्षुधार्ततयार्थसिद्धत्वात्तदन नोक्तम् तदपि न सर्वदा किन्तु कियकाल. पर्यन्तमेवेत्याह-अजातपक्षा इति, पक्षोदपानन्तरं न तयेति तावदेव दृष्टान्तनेत्यर्थः । तथाचात्र क्षुदुपाधिकृतत्वमनियतविषयत्वमनियतकालवं चेति दूपणत्रय संभाव्य द्वितीय दृष्टान्तमाह-स्तन्यं पयेति । वत्सतरा अतिवालवरसास्ने यथा कदा स्तन्यं प्रास्पाम इति तदिच्छन्ति तथेत्यर्थः । तेषां स्तन्यमात्रककामत्वादत्र तदेव प्रोक्तम् , मानुरभावे तदुद्धमा परस्पा अपि स्तन्यं पिवन्तीति तदनुक्तिः । अत्रापि नियनविषयत्वेपि यन्सतरपदादनियत कालवं शुदुपाधिकृतलं चेतिदूषणदयं संभाव्य तृतीयं शान्तमाह-भियं प्रियेवेति, मिय- पदादुभत्र निरुपाधिकस्नेहो निरूपिता, स्नेहस्य तथात्वनदाभिनीत 'आविर्भाचदिने न येन गणितो हेतुस्तनीयानपी ति, तेनोपाधिदूपणमत्र परिहतम् , व्युपिनमिनि प्रवामि नमित्यर्थः, तेन गमनक्षणमारभ्यागमनावधि दिशाया एकररा-बादनियतकालय चापा स्तम् । विषण्णेतिपदादनियतविपयत्र २, अन्यथा विषादासम्भवात् , एवं दोपत्रपा भाषादयमेव दृष्टान्तो युक्त इत्याशयेन स्वस्यकत्वादत्राणेकवचनमुक्तपन्यथा पूर्ववदापि बहुवचनं वदेन , बहुषु तथात्वस्पासंभवात् , अत एवान्ते च निरूपणं कृतम् , पूर्वोनदय- मेकदेवाभिमायणेति तत्कयनमपि नातुपपन्नम्। किन्ध, नियादि विप्रयोग केवलं विपदमा न करोति किन्नु, पिये विविधरमभावाननःप्रकटयति, प्रवागन्नरेण जीवनपेव न स्पान , जाते च जीवने मिपत्वं तु वापिनं स्यात् । म्बस्य पुरुपवन स्वीटष्टान्नान्यथानुपरत्या च तजातीयरसभाव उक्तः, अतो रसस्पानियौपवादयं भारः प्रियापदेनाभिव्यज्यने, विपादस्य तु बहिरप्यनुभूयमानत्वान्यामानविषयत्वाच नथाविशेषणम् , एवमनेरमभाव. विशिष्ट विषाणं च मनवां दिक्षते, न तु दर्शनमात्रमिचिनि, तत्तु यर्थ चेन वाहिन- वादनानुपपनं विपाभावात् , अपन, अत्मसन्दप्रयोगो हि देशाध्यागता भवनि साम्पतं तु रसानुभप्रपोग्यदेहाभावाममार्गरम्प च तन्मनिरयावाद याभाभावान्मन एवोक्तं न तु ममेति दृष्टान्ते च तस्यासस्य दत्वारिमयनि नितिन तु मनः, अन्यथा मित्राई दिने इनि दृष्टान्नमा वक्तव्ये मनो विक्षन इनि न देन , अनो रसमागायः कामो रसव पूरणीय इति तथा सम्बोधनेन मार्थिनम् ॥ ३ ॥ निधननि गम्पक पार । • भ्रामविपदीनि सार ।
६ टिप्पणीभ्या प्रमाशेन च संवलिता एवं कामं निरूप्य मोक्षं निरूपपति-ममोत्तमेति, ममोत्तमश्लोकजनेषु सख्यं संसारचके भ्रमतः स्वकर्ममिः । त्वमाययात्मात्मजदारगेहेष्वासक्तचित्तस्य न जाय भूयात् ॥ ४॥ पुष्टिमार्गे हरेर्दास्यं धर्मोर्यो हरिरेव हि । कामो हरेदिव मोक्षः कृष्णस्य चेद् ध्रुवम् ॥ १॥ पुष्टिमार्गे* मोक्षो निरूप्यते, श्रीमलमारीशमहाप्रभुचरणकमटरेशुभ्यो नम ॥ अथ श्रीहरिरायचरणविरचिता टिप्पणी। श्रीवल्लभाचार्यपद स्वीयसर्वार्थसम्पद ॥ प्रणमामि तदुक्तार्थबोधनाय मुहुर्मुहु ॥ १ ॥ [१] अथ श्रीवल्लभाचार्यचरणा पुष्टिमार्ग धर्मार्थकामाना पूर्वपद्येषु स्पष्टत्वमवगम्यमानत्वा- न्मोक्षमात्रस्य सन्दिग्धत्वादतिविलक्षणत्वाच्च तन्निरूपयन्ति-पुष्टिमार्ग इति पुष्टिहि प्रभोरनुग्रह सन फलदानेन्छा, सापि द्विधा, केवला विशिष्टा च, तत्र केवला नि प्रकारा, साधन प्रकारस्त- द्रहिना, विशिष्टा ससाधना सैव फलप्राप्युपायतया मार्ग इत्यर्थ । तत्र मोक्षो निरूप्यत इत्यर्थ । अथ श्रीपुष्टिमार्गीयमुक्तिविवृतिप्रकाशः। दशदिगन्तविनयि-श्रीपुरुषोत्तमपाद-प्रणीतः । श्रीकृष्णाय नम प्रणम्य श्रीमदाचार्यचरणाम्तत्कृपावलात् । तदीया पुष्टिमार्गीयमोक्षोकि विवृणोत्ययम् ॥१॥ [१] अथ श्रीमदाचार्यचरणा पुष्टिप्रवाहमर्यादाया पुष्टेर्गित्वम्य विवृतत्वेन तत्र पुमर्थाना- मवयवक्तव्यत्वात् पुष्टे पाटस्कन्धार्थत्वेन तत्र सपरिकरायास्तस्या निरूपितत्वात् सरत्यैर्वाक्यैरेव ताविवरिषा पूर्ववाक्येषु धर्मार्थकामाना स्पष्टत्वात्तुरीयस्य चास्पश्त्वात्तनिरूपण प्रतिजानते- पुष्टिमार्गे मोक्षो निरूप्यत इति, "पोपणं तदनुग्रह" इतिलक्षणवाक्यात्पुष्टिरनुमइ, स घ धर्मान्तरमिति भक्तिहेतुनिर्णये स्थितम्, स एव फलसाधनत्वान्मार्ग । तत्र मोक्षो (भा०२, १०, ६.) "मुक्तिर्हित्वान्पयारूपं स्वरूपेण व्यवस्थितिरि "तिवाक्योत्तलक्षणकमन्ययारूपत्याग- पूर्वक स्वरूपणावस्थानम् । निरूप्यते इतरबैलमण्येन ज्ञाप्यत इत्यर्थ । १ चतुर्यटोकविकृति श्रीमदाचार्यचरणानामेवेति तहिवाश्येणावगम्यते स्स्यते चैतत्प्रमाएक पेटगुहेतो ग पुस्तके। * पुटिमागीय इस्पपि पाठ:भा २ १०,५.
७ - श्रीरासुरचतु शोकोविकृति तत्र स्थिती रन्धो नामाहन्ताममतास्पदेवासक्तिस्तदन्येषु सङ्गश्च, तस्य सहे- तुकस्याभावो मोतच, युष्टिस्तु तद्विपरीता, तत्र व्यवस्थपा मोक्षद्वयमाह-ममोसमेति । टिप्पणी-[२] भत पर पुष्टिमार्गे बन्धमोक्षाच्या वैलक्षण्य निरूपयन्ति तत्र स्थिताविति, तत्र स्थितौ पुष्टिमर्यादाया बन्धोऽहन्ताममतास्पदेषु पुत्रदारगृहपनादिषु आसक्तिः सर्वात्मना तन्निष्ठमनोवृत्ति , तदन्येवासत्तिविषयान्येषूदासीनेषु सङ्गय तस्य रन्धस्य सहेतुकस्य तदुत्पादक्कारणकलापसहितस्य योभावः स मोक्ष इत्यर्थ । पुष्टौ तद्वैपरीत्यमाहु- पुणिस्विति, पुष्टिः पुष्टिमार्गस्ताभ्या बन्धमोसा-या विपरीता, पुष्टिमार्गे बन्धो हि पुत्रा- दिप्वासक्तिविषयेषु भगवदीयत्वेनानासकिदासीनेषु भक्तेप्वसनाध, तदभावो मोस । भगवदीयेषु पुत्रादिप्यासक्तिर्भगवद्भक्तसस्य च मोस इति वैपरीत्यमित्यर्थ । प्रकाश:-- [२] मनु “मसङ्गमनरं पाशमात्मनः कवयो विदुरि"ति ( मा० ३, २५, २० ) "स्नेहपाशैनिकधाति भवान्सर्वमिदञ्जगदि" त्यादिवाक्यैरन्धाय स्परत्वेन तद- भावरूपमोक्षस्यापि तथात्वात्तस्य च मार्गमात्रतुल्यवादपार्योय प्रयास इति शङ्कायामाहु-सत्र- (यादि, मोक्षस्येतरवैलक्षण्येन ज्ञाप्यतया बैलमण्यप्रतियोगिनोऽवश्यवक्तव्यत्वे, स्थितौ उपादेय- सया प्रतियोगिभूतायाम्, बन्धः ससारकारणभूत उक्तविधः, तस्य सहेतुकस्य “तेत्र सत्वं निर्मलत्वादि" यादिगीतावाश्यात्त तवो गुणास्तत्सहितस्य बन्धस्याभावो ध्वसादिर्मोक्षः। पुष्टिः पुष्टिसरणी, तद्विपरीता विरुद्धलक्षणा, तथा च तत्र ससारासदेषु मसहासको मोक्षस्तदभावश्च बन्ध इत्यर्थ । तन मोक्षस्तु अन्न सुदिष्यति, बन्धस्तु तृतीयस्कन्धनवमाध्याये ब्रह्मस्तुती "अन्यापृतार्तकरणा” इत्यस्य सुबोधिन्या व्युत्पादित । ये पूर्वजन्मनि प्रयात्मभावचिन्त. नपरास्तेभ्यः स्वोनिवृत्तिमार्गकरणानगवान्प्रसन्नो भूत्वा सत्यादिलोकेष्विह वा किश्चित्प्रसाद प्रयच्छवि सदा नेदमस्माकमपक्षितमिति ततो विमुखा प्रमात्मभारचिन्तनेनैव "मासदेहाव- सानाधे"तिश्लोकोक्तरीत्येव सञ्चरन्तीति रजमुक्तवाभिमानेन भगवतप्रसादागृहाणा ऋषी- पामप्येव भाव इति। श्रीकृष्णाय नम अथ श्रीमदल्लभानामियं टिप्पणी । ममोत्तमेतिशोकविवरणे तवेति मोऽविषये इत्पर्य , स्थितारित मर्यादामार्ग इत्यर्थ । रिमोशमदमोषकतया शतनिरूपणत्यावश्यक्त्वात् । तद्विपरीतति, स्वरूपत साधनत फलतभेतर्थ । स्वरूप कृपया नि साधनाङ्गोकार, साधनं गृहस्थितिपूर्वक भजनम् , फल साशाननानन्दानुभव । अत एव फलप्रकरणे प्रमाणनिष्ठात्यागेन वदनुभव , मो चेत् द्विजदाखनित्राचा गूगमनमेव स्यान् । तत्र ध्यवस्थयेति, पुष्टिमागे घ्यवस्पयेत्यर्थ । १गीता १४.६ ६ टिप्पगीभ्या प्रवाशेन च संबरिता एवं काम निरूप्य मोक्षं निरूपयति-ममोत्तमेति, ममोनमश्लोकजनेषु सख्यं संसारचके भ्रमतः स्वकर्ममिः । वन्माययात्मात्मजदारगेहेप्वासक्तचित्तस्य न जाय भूयात् ॥ ४॥ पुष्टिमार्गे रेर्दास्पं पोपों हरिरेच हि । कामो रेदिक्षव मोहः कृष्णस्य चेद् धुवम् ॥१॥ पुष्टिमार्गे* मोसो निरूप्यते, श्रीमद्भाधीशमहाप्रभुचरणकमोगुम्यो मम ।। अथ श्रीहरिरायचरणविरचिता टिप्पणी। श्रीहभाचार्यपद स्वीयमार्थमम्पद ॥ प्रणमामि तदुत्ताधनोधनाय मुहुर्मुह ॥ १ ॥ [१] अष श्रीपाभाचार्गनरणा पुष्टिमार्गे धािपाना पूर्वपयेषु स्परत्वपनगम्पपानत्वा. मोक्षम वस्य सन्दिग्धनादतिविझगवाघ तनिरूपयन्ति-पुष्टिमार्ग इति पृष्टि प्रभोरनुपर मप फलदानेन्डा, मापि द्विधा, केश विशिया म, तर केवटा नि प्रकारा, साभन प्रसारस्त. हिता, विशिटा ममाधना मा फल्प्राप्युपायतया मार्ग इत्ययं ।तर मोक्षो निरूप्यत इत्यर्थ । अथ श्रीपुष्टिमार्गीयमुक्तिविवृतिप्रकाशः । ददिगन्नवियि-धीपुरपोत्तमपाद-मणीनः । श्रीराए गम प्रगम्य श्रीमदापार्याणानुपायगन् । दीया पुष्टिमागीयमोटोक्ति विकृणोत्ययम् ॥ १॥ [१]भय श्रीमदाचार्य चाणा पुष्टिप्रवाहापाया पुमांर्गत्वस्य विनयेन वा मर्याना- मायरतापवान पुगे परमार्थयेन त सपरिरगयास्तम्या निरूपितवान् समन्यायव साविरिला पूधास्येषु भर्मार्थकामना सत्वामुयस्थ पारष्टलाचरिम्पर्ग प्रविमानने- पुष्टिमार्गे मोक्षा निम्प्यताति, "पोपणं तदनु" इतिलभावास्याष्टिगुपद, म प मान्नामिनि भतिहानिये स्थितम् . म एर फरमान गन्मार्ग । मोमो (मा०२, १०, ६) "मुनिस्लिान्पपापं सरूपेण व्यवस्थिनिरि "विश्वयोपरक्षामन्ययारूपयाग- पूर्वर ERT वरधानम् । निम्प्पने तामध्येन सप्यतयः । १ पुगनि भीमाबापाणावामेवति मदिमाग से प्रभार. दिमागी पनि पा. १० ७ .. श्रीवृत्रासुरन्तु भोकोविकृति तम स्थितो बन्धो नामाइन्ताममतास्पदेष्वासक्तिस्तदन्येषु सद्श्व, तस्य सहे- तुकस्याभायो मोक्षश्व, पुष्टिस्तु तट्रिपरीता, तत्र व्यवस्थया मोक्षदयमाह-ममोत्तमेति । टिप्पणी-[२] अत पर पुष्टिमागें बन्धमोक्षाभ्या वैलक्षण्य निरूपयन्ति तत्र स्थिताविति, तत्र स्थितौ पुष्टिमर्यादाया बन्धोऽहन्ताममतास्पदेषु पुत्रदारगृहधनादिष आसक्तिः सर्वात्मना तनिष्ठमनोवृत्ति , तदन्येष्वासक्तिविषयान्येषूदासीनेषु सनथ तस्प बन्धस्य सहेतुकस्य तदुत्पादककारणकलापसहिनस्य योभावः स मोक्ष इत्यर्थ । पुष्टौ तद्वैपरीत्यमाहु - पुणिस्त्विति, पुष्टिः पृष्टिमार्गस्ता-या बन्धमोक्षा-या विपरीता, पुष्टिमार्गे बन्धो हि पुत्रा- दिवासक्तिविषयेषु भगवदीयत्वेनानासक्तिरुदासीनेषु भक्तेष्वसनश्य, तदभावो मोक्ष । भगवदीयेषु पुत्रादिष्वामक्तिर्भगवद्भक्तसख्य च मोल इति वैपरीत्यमित्यर्थ । मकाश:- [२] ननु "प्रसङ्गमजर पाशमात्मनः कवयो विदुरि"ति (भा० ३, २५, २० ) " स्नेहपार्शनिवनाति भवानसर्वमिदजगदि"त्यादिवाक्यैन्धरय स्पष्टत्वेन तद्- भानरूपमोक्षत्यापि तथात्वात्तस्य च मार्गमात्रतुल्यवादपार्योय प्रयास इति शङ्कायामाहु-तो- त्यादि, मोक्षस्येतरवलक्षण्येन ज्ञाप्यतया बैलमण्यप्रतियोगिनोऽवश्यवक्तव्यत्वे, स्थितौ उपादेय- तया प्रतियोगिभूतायाम् , बन्धः ससारकारणभूत उक्तविध , तस्य सहेतुकम्प "तंत्र सत्वं निर्मलत्वादि" यादिगीतावाक्यातद्धेतवो गुणारत सहितस्य बन्धस्याभावो ध्वसादिर्मोक्षः। पुष्टिः पुष्टिसरणी, तद्विपरीता विरुद्धलक्षणा, तथा च तत्र ससारारपदेषु मसनासक्ती मोक्षरतवभावश्च बन्ध इत्यर्थ । तर मोक्षस्तु मत्र फुटिष्यति, यन्धस्तु तृतीयस्कन्धनवमाध्याये प्रस्तुती "अन्यापृतार्तकरणा" इत्यस्य सुबोधिन्या व्युत्पादित । ये पूर्वजन्मनि प्रहारमभावचिन्त- नपरास्तेभ्य स्वोत्तनिवृत्तिमार्गकरणाझगवान्प्रसन्नो भूत्वा सत्यादिलोकेष्विह वा किश्चित्प्रसाद प्रयच्छति तदा नेश्मरमाक्रमपक्षिमिति ततो निमुखा प्रात्मभावचिन्तनेनैव "प्राप्तदेहाव- सानाश"तिश्लोकोत्तरीत्येहैव सञ्चरन्तीति स्वमुक्तवाभिमानेन भगवद्दत्तप्रसादागृहाणा ऋपी- णामध्येव भाव इति । श्रीप्णाय नम अथ श्रीमदल्लभानामियं टिप्पणी। ममोत्तमेतिशेकविवरणे तोति मोशविषये इत्यर्थ, स्थिताविति मर्यादामार्ग प्रत्यर्प । पुष्टिमोशमदभोधनातया प्रावृत्तनिरूपणस्थावस्यकलात् । सद्विपरीतति, स्वरूपत साधनत फलतवेत्यर्थ । स्वरूप कृपया नि सामनाङ्गीकार, साधन गृहस्थितिपूर्वक मजनम् , फल साशाजनानन्दागुभव । अत एच फलप्रकरणे प्रमाणनिष्ठात्यागेन तदनुभव, नो चेत् द्विजदारवत्तन्नित्रयां गृहगमनमव स्यात् । तन ध्यस्थयेति, पुष्टिमार्गे व्यवस्थयेत्यर्थ । जीता १४,६ टिपणीभ्या प्रकाशेन च सलिना *" मोक्षो हि द्विविधः, पुष्टिमर्यादया पुष्टिपुष्टया च । । (पर्यादाया ज्ञानेनैव मुक्तिः, पुष्टी च ज्ञानेन भत्तया वा मुक्तिः) भगवत्पारोक्ष्यापारोक्ष्याभ्यां व्यवस्था, प्रत्यक्षेपि भगवति टिप्पणी--[३] अथ पुष्टे शुद्धमिश्रभेदेन द्विविधाया मोक्यस्य बाधितत्वाद्यवस्थया तद्वयमाहु -तनेति, पुष्टिमार्गे व्यवस्थयैकन पोनार्द्धाभ्या मार्गभेदेन मोक्षद्वयमाहेत्यर्थ । ममोत्तमेति मोक्षो हि द्विविध इति, कर्मभि ससारचत्रे भ्रमणेन भगवदीयत्वप्रकारेण पुनाया सत्त्या, चोत्तमोक्ननसख्य मोक्ष इति द्विविध इत्यर्थ । उपायद्वैविध्यमाहु -पुष्टिमर्यादयेति, पुष्टिमर्यादा ह्यनुग्रह साधनसाहित्यम् । पृष्टिपुष्टिश्च तत्र तद्राहित्यमिति भेद । [४] ननु प्रकारभेदेपि तत्सत्यस्यैकरूपताया क्थ व्यवस्थया द्वैविध्यमित्याशङ्कयाहु भगवत्पारोक्ष्येति, पुष्टिमर्यादामोक्षरूपमख्ये भगवत्पारोस्य शास्त्रार्थतया गुणगानकर्तृशुकादिसख्ये तथात्वस्य स्पष्टत्वात् । अत एवं मथुराया व्रजङ्गता" इत्यादिषु परोक्षेणैव कथनम् । पुष्टिपुष्टौ तु गुणगानविषयलीलाविशिष्टप्रभोरपारोक्ष्यम् , " नन्दसनुरय"मित्यादिषु तयाक्ते स्त्वन्माययेत्याभिमुग्व्योक्तेश्च स्पष्ट एव व्यवस्थया भेद इत्यर्थ । प्रकाश'--[३] ननु मार्गक्ये साधनस्य समानतया वैज्ञात्याभावात्फले कथ भेद इत्यत आहु सत्यादि, तथा च मागें अवान्तरभेदान्मोक्षभेद इत्यर्थ । [४] ननु किंनिबन्धनो भेद , कथ च मोक्षभेद इत्यत आहु-मोक्षे होत्यादि । वेदोक्ता कर्मज्ञानभक्यो मर्यादेति पुष्टिप्रवाहमर्यादाया स्थितम् , तेवर प्रकरणवशाद्विहितज्ञानभक्ती प्राह्य योगोपासनादिप्रणे त्रयो वा, तथा च तया ताभ्या तैर्वा मिश्रितोऽनुग्रह पुष्टिमर्यादा, तयैक । अनुप्रहान्तरेण मिश्रितोऽनुग्रह पुनिपुष्टिस्नयेतर इति भेदनिनन्धकमुक्तम् । स्वरूप- भेदामाहु -भगवदित्यादि, तथा चाव्या भगवन परोक्षानुभव , इतरया च प्रत्यक्षानुभव , इति ताभ्या कृत्वा भक्तरूपावस्थितिरूपमोक्षस्यापि स्वरूपभेद इत्यर्थ । [५] एय शोकार्थ सङ्ग्रह्य पूर्वस्य गुणभाव स्पष्टयितु पूर्वार्द्धस्थपदानि विवृण्वन्त पूर्वश्लो. फेषु हरेसम सारबिन्दाक्षपदै सोधनेन भगवत्प्र यक्षताया स्पष्टत्वादनापि सबुद्धि सभाव्यते, तथा मति हे उरामश्लोकी उपविधस्य मम जनेषु सरय न भूयादिति जननादिधर्मवत्सल्या- भावप्रार्थन शोकार्थों भवति स वाऽपुनर्भवपर्यन्तमनाकाश्तो मनसा भगवन्त दिक्षतश्च प्रतिग्धा निरासस्य प्रागेव जातत्वाचादृशा सख्याभावे स्यादव निरस्त इति न युज्यतेऽत समासमादृत्यान्य एवार्थो वक्तुमुचित इत्याशयेनाहु-प्रत्यक्षेपीत्यादि, अप्रत्यक्षवादिनापि सम्बो श्रीवदमटि०-ननु एकस्मिन्नव मार्गे क्थ व्यवस्थाभेद । तत्राह -भगवत्पारोक्ष्येति, मुष्टिमया दास्था परस्पर गुणसभाजनेनान्त प्रक्टेनैव भगवता पूर्णता मन्याना लोकोपकारिण शुकादय इवात्मारामा रमते । गुद्भपुष्टिमार्गीयास्तु साक्षाद्वहि सब वमन्तरा नैतावव पूर्णतां मन्यत इति एतत्कृता यवस्थाभेद । अत एव फलप्रकरणे भगवद्भावसम्पत्या गुणगानेन च न तापशान्ति , पश्चादाविर्भूने एक तास्मस्तच्छान्ति । ननु पुष्टिमयादास्था कदाचिप्रयक्षे भगवति प्रमाणनि परि यस्य तमेव ग्रहीयुस्वदा कथ है इस पटूिनहि कैरिदपि टीकाकारणाना तथा च* पुस्तकयोरपि नोपलभ्यते । * भा०१०,६,३१ भा १०,३५४ श्रीवृनासुरचतु श्लोकीविकृति शास्त्रार्यत्वाय उत्तमश्लोकजनेविति समास: भक्तसंवलित एव भगवास्तद्वारा फलं द. टिप्पणी-[५] नन्वस्ति भगवान् शास्त्रार्थ " दैश्च सबै रितिस्मृते "त त्वौ- पनिपदं पुरुषमिति"श्रुते "सर्ववेदान्तमत्ययमिति न्यायाचातस्तत्मात्यर्थ तन्मानार्थ च तथाप्रतिपादकमक्तसख्यापेक्षा इति तदुपायापेक्षा । तत्र परोक्षे भगवति गुणगाने भक्तवाक्यत्र तिपाद्यतया तदपेक्षा । प्रत्यक्षे वचसा गौणतया न शाखार्थता, साक्षाढनुभूयमानत्वादिति तदुत्तर तदुपायरूपमक्ता नापेक्षन्त इति तदा किमिति तत्सल्यप्रार्थनमित्याशङ्कयाहु -प्रत्यक्षेपीति । उत्तमश्लोकजनेवितिसमासेनैकार्थताबोधकेन प्रभोक्ताना च परस्पर सापेक्षता सूचिता। सथा च भक्ताना प्रमुसवलितत्वमेव तत्सापेक्षत्व, प्रभोश्च तद्बारैव फलदातृत्वमिति सापेक्षत्वात्प्र- स्यक्षेपि प्रभौ भक्तापेक्षासत्वान्न भक्तप्रतिपाद्यतारूपशास्त्रार्थत्वन्याहतिरित्यर्थ । एतेन प्रभुस्वरू- पमनुभूयमानमपि भक्तनिरूपितमेव विदित भवतीति भाव । प्रकाशः- धनानुरोधेन बौद्धसन्निधानस्य " *अहं समाधाय मनो यथाह सङ्कर्षणस्तचरणारविन्द " इतिवाक्यात्पूर्वसर्वस्मरणस्य चावश्यवाच्यत्वात्तस्यैकान्तभक्तत्वमवश्य वाच्यम्, तथा तादृशस्या- सुत्यागावसरे भीष्ममुक्ताविव भगवदनुकम्पा, तया दर्शनदान चावश्य मन्तव्या , तथा सति कानुफ्पत्ति प्रत्यक्षे १ तस्मादुक्त प्रत्यक्ष इति । एवं यद्यपि भगवा-प्रत्यक्ष इति मम त्वदीयेषु जने. स्विति वक्तव्यम्, तयापि यदेवमुफ तेन उत्तमैर्यथार्थशास्त्रार्थविद्भि श्लोक्यते कीर्त्यत इत्युत्त- मश्लोकः । उत्तमा परापरविद्यागोचग वा शोका कोतिर्यस्य स तथा । तस्य ये जना, "न कर्मबन्धनं जन्म वैष्णयानां च विद्यते, विष्णोरनुचरत्वं हि मोक्षमाहुर्मनीषिण"इति पाना- चाहशमन्मयुक्तास्तेष्विति य समास स शास्त्रार्थत्वाय, भगवत शास्त्रार्थरूपत्व ज्ञापयितुमित्यर्थ । अन " क्रियायर्योपपदस्य च कर्मणि स्थानिन " इत्यनेन तुमुन प्रयोगे चतुर्थी । फलेभ्यो यातीतिर । ननु शास्त्रार्यत्वमुत्तमश्लोकपदीयसमासेनैव प्राप्यते, न तु पदनयसमारोन । तया च तार- शत्वेन सम्बोध्य प्रतिबन्धकामावप्रार्थन सत्सङ्गादौ पर्यवसास्यतीति कथ सम्पूर्णस्य तथार्थ इत्यत आहु-भक्तेत्यादि । तथा च वैयासकिः स भगवानथ विष्णुरातमि" त्यनेव तादृशलात्सद्दे श्रीवल्लभटि०–त दस्तत्राहु-प्रत्यक्षेपोत्यादि । कदाचितयात्वेपि तेषी शास्त्रार्थत्यमेव । गुणसभाजनरूपेण शास्त्रेणेवार्थ पुरुषार्थों या ते तया । तन्द्रावस्तत्व तदर्थमित्यर्थः । समास्तापर्यमाह - उत्तमति । उत्तमै सुकादिभि शानद्वारा श्लोक्यत एव न तु पुष्टिस्थेरिख बहिरनुभूयते । तत्सम्बन्धिनो जना । यथोत्तमाना भगवतश्च लोकितश्लोक्यमाव एव सम्बयोन स्वन्योपि बाह्यत्तया तेगु समासेन पदैकत्वाचदमकत्वमपि ज्ञापितमिति तदेव त इत्यर्थ । ताहग्जनेषु सख्यप्रार्थनया तत्समानशीलव्यसनत्व सिद्धो मुक्तता सिद्धेति सरणस्य मोक्षरूपत्व सिद्धमिति स एव प्रार्ण्यते । ननु भगवत्सस्यमेव कुतो न मार्यते तत्रा-भक्तसरलित इति । तादृग्जनराख्यद्वारा राकु प्ठादी लक्ष्यादिभतसवलित एव फलरूप स भवतीत्येकम् । १ गीता १५,१६।२ प्रत्यशोत्तरम । ३ प्रत्यशोपायरूपा सभा १,११, २१ २ टिप्पणीम्यां प्रकाशेन व संवलिता दातीति पौरपसमाजनम ("पन्पोन्यतो भागवता" इति कृतीपरतन्धे दर्शनकारण पौर- पसमाजनमुक्त) फलम् । भक्तेषु दास्यपर्यन्तस्य साधनवात्सग्ग्यं मार्यपते । टिप्पणी-[६] ननु प्राटे प्रभो फलस्पे त सग्न्य होपयुन्यत तम्य तु गुणगानमाधन- त्लादत कर शावार्थत्वप्रन्यय इत्यत आह -पौरपसमाननश फमिति । उभयत्रापि पारोच्यापारोस्ययो पौरपसभाननं लीडामिनन्दन विपनाप्ययत्यापि तदेव फलं, स्वरूपम्य तु गुणगानावमरमात्रमाक्ट्यस्य तस्य तदनुभवाधीनानुभवम्य तछेपन्वमिति तम्यैव फल्नया प्रास्त्येपि तद्भचमग्न्योपयोगेन शास्त्रार्थत्वमिद्धिरिति भाव । [७] ननु मत्तानामीशय तेषु दास्यमप्रार्थयिन्वा साम्यमम्पादन सग्य कय प्रार्थितता. नित्याशङ्कयाहु -भक्तेविति । भत्तेषु “मैद्रत पूनाम्पधिरे "त्यादिना श्रवणमारस्य दाम्य- पर्यन्तस्य सर्वम्य सग्यपालमापनन्वान्फरप्रकरणवान् फलाप सम्यमेर प्रार्ययन इत्ययं । मराश:- तेवाविष्टो भगवास्तद्वारा फरतीति पदययसमासमहिना लभ्यते, तदभावे तु घलेन सम्बोधने- नोदासीनतया सत्सङ्गाक्षेपामार्यनमसलत स्यादत' पदप्रयममाप एवादरणीय इत्यर्थ । [६] ननु पारशसत्सनेपि शास्त्रार्यरूपम्य परीक्षण प्रकाशात्तत्र पानुभवामीवि प्रत्य- यामावारकय फलनीत्युच्यत इत्यत आह पौरपेत्यादि । "नोन्मता मे स्पृहयन्ति कैचि- म्मरपादसेवाभिरता मदीहाः । येन्योन्यतो भागवताः प्रसभ्य सभानपन्ते मम पौरुपाणी-" स्यत्र श्रीकपिलदेवर्यनगवदीयाना परस्परासक्तिपूर्वक भगवत्पौरुपमम्माननरूप जीवता साधनमु तदपि "मायेणे मुनयो राजनिटना विधिपतः, नैर्गुण्यस्या रमन्ते स्म गुणानु- पथने हरेः" "परिनिष्टितोपि नैर्गुण्य उत्तमश्लोरील्या, गृहीनता रान आग्यान यदधीतवान् " "दह तेभिधास्यामि" "निवृत्ततपरुपगीयमानाद्भवोपधाडोत्रमनाभिरि-" त्यादिपु गुणातीताना स्वरूपावस्थिताना रतिविश्यत्वेन च कथनात्फलम् । ता च तहानेन फल- तीत्यर्थः । यद्वा समुच्चये । वथा प यया काव्यश्रवण वर्णनीयस्य परोक्षजानेऽपि विगरिन- घेद्यान्तर आनन्दो रोकिकाना, तथा स्वानन्दवगुणाश्च सभाजयन् स तथेत्यर्थ । [७] नन्वनाश फल श्रवणपि भवति यथा परीक्षित, तस्यापि "नातृप्ये जुपन्युप्म- द्वचो हरिकथामृतम् ॥ " येनं येनावतारणे"त्यादीना गुणसभाजनवाक्याना दर्शनान् । तत्र च चतुरपेक्षया हीनभावस्य स्फुरत्वान् सट्सममानमेव तदर्थ प्राध्य, मख्थे को विशेष इत्यन आहु -भक्तेष्वित्यादि । इमानि वाक्यानि सभाजनप्रयोजकानि न तु मभाजनरूपाणि । स्वरूपादि- श्रीवल्लभटि-इह तादृशे सह गुणसभाजन देहधर्मनियापणक ब्रह्मानन्दादप्यधिकविलक्षणर मानुभवो भवतीत्यपर फलम्, तदप्युक्त पौरुषसभाजनल फ्लमिति । तेन तत्सल्ये फलदुर्यामनि तप्रार्थनेत्यर्थ । भगवत्सरये तु स एवेक फरमिति कदाचिदर्जुनवत् (गोता अ ११-७-४१) याहारसटकोमी गति बालाराम जोगीति र प्रार्थनेति भाव । २ मा ११, १९, २१ ! ३ मा ३ २०,३४ । ४ भा . ५भा २,१,९।६ मा २,१०1७ भा १ १,४।८ भा ११ ३ २९ भा १०,७,१ १भा १०.३१.३ श्रीवृत्रासुरचतु लोकोचित्रति सर्वथा स्वतन्त्रत्वाय स्वनिष्ठभक्तविषयकीर्चनम् । गुणसभाजने स्वस्थापि स्वातन्त्र्यार्य, टिप्पणी-[८] ननु तन्निरूपितप्तरन्यमप्रार्य मम उत्तमश्लोकजनेविति षष्ठीसप्तमीभ्यां निष्ठताविषयताबोधिकाभ्या कय स्वनिष्ठतद्विषयकसख्यप्रार्थनमित्यत आहु-सर्वथा स्वतन्त्र- त्वायेति । सग्न्यस्य भक्तिमार्गीयमोक्षतया स्वातन्त्र्यमुचितं, नत् स्वनिरूपितत्वे तन्निरूपितत्वे चौ तस्य व्याहन्येत । अत स्वनिष्ठभकविषयसख्यकीर्तनमित्यर्थ । ऐतनैतन्मार्गीयमोक्षस्या साधनसाध्यत्वमुक्त भवति । {९] ननु पौरुपसभामनं हि फल तदस्वातन्त्र्ये न भवति, तथा सति श्रवणमेव भवेन्न सभाजनमिति फलप्रतिबन्धपतया न सख्यं मोक्ष । सभामनविशिष्टस्यैव तस्य तथात्पादित्यत आहु-गुणसभाजन इति । गुणानां समाजने अभिनन्दने स्वस्यापि स्वातन्त्र्यार्थ स्वस्यापि मकाश:- ज्ञानपूर्वकतदनुवादस्य सभाजनत्वात्। “कलिं समाजयन्त्यार्या गुणज्ञाः सारभागिन" इत्यादी तथा दर्शनात् । परीक्षिद्वारयाना गुणादिज्ञानार्थत्वात् । अतस्ताहशभाषाय वक्तृत्सकन सा. धनत्वम्। दास्यपर्यन्ताना तुल्यं, सख्यस्य तु तदीयस्वरूपमानसजनकत्वमिति विशेषात्तव्या- र्थनमित्यर्थः। [स] नन्वभयं विशोकत्वमपारतन्ध्यं वमोक्षलक्षणं "अभयं वै जनक माप्तोसि" "स्म- तिच्यथेच्छतामयं," " "तरति शोफमात्मवित्" " तदस्य संसतिबन्धः पारतयं च तत्क- तमि"त्यादिवाक्यात् । प्रकृते तु “निता विधिषेधत" इत्यनेन "एपहचा व तपतीति " श्रुस्यर्थस्फुरणात्तेषा भयाभावशोकाभावयोः सत्त्वेपि सत्यस्य ससम्बन्धकत्येन पारतन्त्र्यान मोक्षस्व. मित्यत माहुः-सर्वयेत्यादि । तथा च दयाप्रअयादिवत् ससंबन्धकवेपि स्वधर्मत्वेन सेषु विद्यमानः सख्यरूपो धर्मों मत्सम्बन्धोप्यस्त्वित्याशयेनात्र स्वनिष्ठस्य भक्तविषयस्य सख्यस्य कीर्तन घृतद्र- वत्ववनैमित्तिकत्वेपि तस्य विद्यमानतया सर्वथा स्वातन्त्र्यं ज्ञापयितुं, तेन न मोक्षवहानिरित्यर्थः। [8] ननु सख्यस्य स्वतत्त्वेपि स्वस्य सख्येन प्रोतृत्वे वक्तृपारतन्न्यान्मुक्तत्वहानि- स्तेपाच अनत्वेनोपान्त्यादिभावविकारदशापत्तौ प्रतियोग्यभान सख्यस्याप्यमाने देशकालपरि- पछेदान् सख्यस्य मुक्तित्वहानिरित्यत आहु -गुणेत्यादि। क्या र घहूना युगपदक्तृत्लासम्म श्रीवल्लभटि-जन त्यानित्यानाहजनदासमेव कार्य वेन गुणसभाजनमपि सेस्पतीति किं सख्यप्रार्थनयेत्यत आह–सर्वथेति । तद्दास्ये लोकत. स्वातन्त्र्येपि दरात्यष्पासनेन तत्समाजने सर्वथा तन्न स्यादिति तदर्य स्वस्मिन् विधमानस्स लोकविश्यसत्यधर्मस्य मक्तविषयक कथनमित्यर्थः । ननु गुणसमाजको महान् “ मुकानामपि सिद्धाना नारायणपरायण । सुदुमः मशान्तारमा कोटिप्वपि महामुन" इति वारयादेक एष भवति । वत्सभाजनच तीनमत: ततः स्वातन्त्र्यमम मावितं तदपि हमपे सति मवति ताशेन तदप्यसमावितमिति किं तत्प्रार्थनत्यत्र आहुः-गुणसमाजने स्वस्यापीत्यादिना । जनेषु इति महुवचनतात्पर्य, न हि तारा एक एस किन्तु १वा इति पक्षान्तरे सल्यस्प मननिहनिरूपितस्ये सति स्वातभय व्याइम्प्रेत. सश्यप, ३ भा. वत्मापनेन।
श्रीवृत्रासुरचतुःसोकोविकृतिः लेनसापनपदेन कृपया साधनसंपत्तिश्च सूचिता । योग्यायोग्यदेहानां पहुधाजातत्वादिदानी तदभावार्य प्रार्थना । प्लेशे स्वामिनामग्रहणस्य हेतुत्वे- नायुक्तत्वात्कर्मपदम् । आवश्यकत्वाय स्वपदम् । निरवधित्वाय बहुवचनम् । टिप्पणी-[१२] ननु तथापि भगवद्भक्तमख्ये किं साधनं, न हि ते संसारपरिभ्रमणमा- त्रेण मिलन्ति तत्सङ्गस्य भवापवर्गसाधनत्वात् “भवापवर्गोभ्रमत” इति वाक्यादित्याशङ्कयाहुः- क्लेशसाधनेति । क्लेशसापनपदेन परिभ्रमणपदेन कृपया सनां तत्सल्यसाधनसंपत्तिः सिद्धिः सूचितेपर्यः । ते हि कर्मभिर्भममाणमवलोक्य सहनकरुणा कृपालवो भवन्ति । सैव च साधन- मिति तथेत्यर्थः । एतेन भक्तिमार्गस्य सांशस्यापि नि साधनत्वं घोतितं, न हि तटीयोंश कोपि साधनैः सिद्धयति । नन्वेवं सति कयं प्रार्थनेत्याशङ्कयाहु --योग्यायोग्येति । संसारचकभ्रमणेन योग्यायोग्य- देहा बहवो जाता इतीदानीं क्लेशेन स्वधर्ममविचार्यापि तदभावार्ग प्रार्थना, न फलार्थमित्यर्थः । [१३] ननु कथं भक्तिमार्गीयस्य वृत्रस्य सरज्योपयोगिचक्रभ्रमणहेतुत्वन कर्म युन्य इत्यत आहुः-क्लेश । स हि भक्तिमार्गीय एवेति भ्रमणरूपे क्लेश हेतुत्वेन स्वामिनो नाम- ग्रहणमयुक्तमिति हेतुत्वेन कर्मोक्तवानित्यर्थ । ननु तानि कर्माणि त्यक्तव्यानि भ्रमणमाधनन्या- दित्यत आहु.-आवश्यकत्वायेति । स्वकृतवनावश्यंभोक्तव्यतया कर्माणि न स्यक्तुं शस्यन्त इति भाव । ननु किं बलं कर्मणां स्यसाध्यत्वादिन्यत आहु -निरवधित्वायेति । बहुवचनन कर्मणां निरवधित्वमुक्तं, नैहि कश्चिदिति वाक्यात् । प्रकाश:- :-[१२] ननु तथापि संसारपदेन ईशसाधनतापि स्फुटतीति कथं दुःखासम्भेद इत्यतस्तत्तात्पर्यमाहुः-हेशसाधनेत्यादि । तया च तैन पदेन भगवन्तं प्रति तया सा सचिनेति तदर्थ सत्पदप्रयोगो न शबोधनायेति न दुःसम्भेद इत्यर्थः । नन्विदं मूचनं प्रार्थनाफलक तथा सति फयं देशाभाव इन्यत माहुः-योग्येत्यादि । तथा पेतः परं भगवरययाऽन्तिमदेहभावनादितः प्रागेवप्लेशो, न स्वेतदुत्तरमपीति न दुःमसम्भेदश्त्यर्थ। [१३] ननु कार्यमा प्रति भावदिवाया: कारणत्वैन हेरोपि तम्या एव सथात्वावीरा- मतस्य तत्सुतेरैवोचितत्वात् कर्य तदनुत्तिरित्यत माहुः-लेग इत्यादि, यहुवचनमित्यन्तम् । आवश्यकत्वायेति । तत्फलभोगायश्यकत्वाय । तथा च तमोचितं, किन्तु कर्मपदमेको- पितम्। तयेटशष्ठेशे प्रार्थनाप्युचितेत्यर्थः । ननु “जनो वै लोक एतस्मिन्नविधाकापकर्मभिः, नावचामु गतिषु न पेद स्वां गति भ्रमन्नित्यत्र प्रयाणां भ्रमणशारणत्वसिद्धः कथं कर्ममावत्येव कारणत्वेन कयनमित्यत श्रीवल्लभाटि- हेरोदि शसाभन समारतसदेनेत्यः। वत्र पति-पतराउनमंन्यरूरमाधननिनि, मालप १ भा.१.१, १५. १ सदनापानुस्वर महिमाणीपाय भगररिभालनमः ।
टिप्पणीभ्या प्रकाशेन च सवरिता चप्रपरिभ्रमणे दण्डस्येव मुख्योपयोगे नृतीया । अस्या मुक्तौणत्वाय नात्र मानापद प्रयोगः । यथा च ताशभगवद्भक्तसख्यं पुष्टिमयाया मोक्ष इत्युक्तम् | टिप्पणी-ननु ससारचत्रभ्रमणे साधनान्तराणामविद्याकामादीना सत्त्वाकय कर्ममात्र तत्साधनदेनोक्तमित्यत आहु -चक्रपरिभ्रमण इति । सर्वेषा निमित्तकारणत्वेपि कारणता भोगविषयत्वेन मुख्योपयुक्ताना कर्मणामेव । घरे दण्डस्येवेति ज्ञापनाय तृतीयेत्यर्थ । [१४] नन्वर्धत प्रार्थनासिद्धावपि तद्वाचिपदप्रयोगाभावतात्पर्यमाहु-अस्या इति । अस्याः पृष्टिमर्यादामुकेर्द्वितीयापेक्षया गौणत्वज्ञापनायात्र प्रार्थनापदानुक्ति । निर्गलितार्थमाहु- तथा चेति । एतादृश पूर्वोत्तधर्मविशिष्ट चक्रभ्रमणादिवेशप्राप्य भगवद्भक्तसंख्य पुष्टिमर्यादाया मोक्ष इत्युक्तम् । प्रकाश:- आहु-चक्रेत्यादि । कर्माभावे ताभ्या तथाभ्रमणाभावस्यानुभवसाक्षिकत्वाद्रमणे मुख्योपयोग कर्मणामेवातस्तेषामेव तथात्व वोधितमित्यर्थ । [१४] ननु भवत्येव तथापि सरय प्रार्थयत इति यदुक्त तदसङ्गतम् । प्रार्थनावाचक पदस्यात्रानुपलम्भादतो व्यारयान सर्वमेव सन्दिग्धमित्यत माहुः-अस्या इत्यादि । तथा च तदप्रयोगमात्रेणोक्तेऽर्थे न सन्देह्यमित्यर्थ । सिद्धमाहु-तथा चे त्यादि । पुष्टिप्रवाहमर्यादाया "तस्माजीवाः पुष्टिमार्गे भिन्ना एव न सशय" इति जीवभेद पूर्वोक्तहेतुभिनिगमयित्वा भगवद्रूपसेवार्थ तत्सृष्टि , तेपा स्वरूपादिभिर्भगवनुल्यत्व, सेवासिद्धयर्थमीपत्तारतम्य चोचवा तेथा शुद्धमिनभेदेन वैविध्य प्रतिज्ञाय मर्यादामिश्राणा गुणज्ञत्व लक्षणमुक्त, तच भगवद्रूपसेवार्थ सष्टत्वे सति स्वरूपादिभिर्भगवत्तुल्यत्वे सति सेवार्थमीपत्तारतम्यवस्वे सति भगवद्गुणशत्व मर्यादामिन पुष्टत्रीवत्वमिति फलति। तथा "वैदिकत्व लौकिकत्व कापव्यानेषु नान्यथा । वैष्णवल हि सहज ततोन्यत्र विपर्यय" इत्यन्यथारूपज्ञापनपूर्वक सामान्यलक्षण त्रयाणा तत्रोक्तम् । तन्मूले "नैकात्मता मे" "पायेण मुनय." "परिनिष्ठिनोपी"त्येतेषु "तत्रीभवद्भगवान् व्यासपुत्रः" "त' यष्टव""दैपायनाच्छुको जने भगवानेव शङ्करः । अशाशेनावतीर्योो समाप परम पद त स्कन्द इत्याचक्षते" सुहृत्तमदिक्षितभने “गोविन्दभुनगुप्ताया द्वारावत्या कुलदह । अवात्सीनारदोभीक्ष्ण कृष्णोपासनलारस " इत्यादिभि शुक्सनत्कुमारनारदेपु स्पु. टम् , तथा " कायेन तु फल गुणवि 'ति पुष्टिफलम्य स्वरूपसाध्यत्व तत्रोक्तम् । तदत्र "वैयासकि: सभगवानि"त्यनेनोक्तम्। तेन लौकिकत्ववैदिफ्त्वरूपा इत्यर्थ । अत्रापिपूर्वकक्षा परीक्षिति, उत्तर- कक्षा सनत्कुमारादिषु शेया। छान्दोग्ये सनत्कुमारनारदसवादे सर्वात्मभावविवरफतया वरिंमस्तथा- त्वस्य शक्यवचनत्वाच्छुतिगीतायनिर्णयस्य भजनार्थताया सुबोधिन्या निर्णीतत्वाचेति । अय मोक्ष प्रायस्तुरीयाश्रमाणा इसपरमहसानामेवेति भाति । उदाहरणस्य तेष्वेवोपरम्भादिति दिछ । श्रीवल्लभटि०-अस्या इति । शुदपुष्टिमुक्त्यपेक्ष्या गौण वादित्यर्थ । था १,१११।२ मा १९,५ मा ११,२०, १.।
श्रीवृत्रासुरचतु श्लोकीविवृतिः द्वितीयमाह-स्वन्माययेति । समासादेव भिन्नतया न मायामोहनम् । टिप्पणी-[१५] पुष्टिपुष्टिमोक्ष वक्तु तनातीयत्वबोधनायाभासमाहु -द्वितीयमाहेति । द्वितीयं भक्तिमार्गीय मोक्षमाहेत्यर्थ । तस्य मर्यादाऽप्राप्यकेवलपुष्टिप्राप्तिप्राप्यत्वात् तत्सनाती- यत्वप्तिद्धिरित्यर्थ । त्वमाययेति । संसारचक्रे भ्रमतो भगवदिच्छ्या कुटुम्बासक्तस्य न किन्तु, त्वमायया सदासक्तस्य मे भूयादिति संबन्ध । पूर्वस्माद्वैल्क्षण्यमाहु-समासादेवेति । वन्मा- ययेतिसमासेन तम्या स्वरूपसबन्धित्वमुच्यते । सा च स्वरूपसद्वैव तदर्भ मोहयति न तु गृथ- ग्भावेन लीलार्थमेव तस्या प्रावाट्यादत एव तदुपत्रमे तस्या आज्ञापनम् । वैष्णवीं व्यतनो- मायामित्यादिष्वपि सैवोक्ता । सा च भगवान् गर प्रस्टीभूय लीला करोति तत्रैवोपगुभ्यते, तभावे लीलाऽसमतात् । एवं सति पुष्टिपुष्टिमोक्षस्य प्रकटलीलाविशिष्टप्रमुस्वरूपान्तररमणरूप- त्वात् तदुपयोगित्वेन गृहादिप्वासत्यपेक्षणात् त्वन्माययेत्युक्तम् । पूर्वत्र तु पारोक्ष्येण साक्षाली- लाऽसंभवान्नामत्तेरपयोग । माया तु तत्रापि भगवदीया पर न स्वरूपसबन्धिनी, "म माये-" तिन्यत्यासेन कथनात तरणोक्तश्च । अत एतात्रोक्त न भिन्नतया प्रमुथग्भावन मायामोहन- मिति, किन्तु प्रमुरेव तया मोहयतीत्यर्थ । (१५] मकाश:---अतः परं पुष्टिपुष्टिमोक्षं विवरितुमाहुः-द्वितीपमित्यादि । ननु "प्रसङ्गममरं पाशमात्मनः कवयो विदुः । स एव साधुषु कृतो मोक्षद्वारमपातं" "त एते सोधवः साध्वि" "सत्सङ्गेन हि दैतेया" इत्यादिवाक्य सत्सङ्गम्य मोशद्वारत्वात् पूर्वोतवा- क्पेषु गुणगानस्य फलस्वसाधनाथ पुष्टिमर्यादामोक्षरूपत्वं नासत्यरयोचितम् । तक्ष पूर्णढे भूपादि- स्पदूरान्वयानीकारेण सिद्धम् । अतः परमुत्तराः देहाद्यासक्तिशोधकं स्वविशेषणमवशिष्यते, नियमो नाथपथ । तया सति देवाचासकिनिषेधः प्रार्थनीयत्वेन फलिघ्यतीत्यासक्तिलपो मोक्षः कथमन कयं वा देहाघास. तमोक्षामित्याकाहाया भगवदपरोक्षशानेन पुष्टिपुष्टिमोक्षस्य पूर्व व्यवस्थापितत्पादन साहशत्वन तस्या मोक्षत्वं वक्तुं देहायासक्तिमनमोहने विशेपमाहु-समासादित्यादि । मायाशक्तिदि मोहने अधिकता। यदि "माया चाविद्या व स्वयमेव भवतीति" श्रुत्या मायाविषयोरमेय माद्रियते तदापि "सर्सर्जामन्यतामिसमय तामिसपादिकृत् । महामोहन मोहन लपवाशान- हत्तय" इति "तामिसंपन्यतामिसं तमो मोहो महातप" इति द्वादशविशाध्यापवास्ययोः पनिसभेरेना विद्याभेदस्य तृतीयरमन्धमुयोपिन्या विशाम्याये भगारकर्तृपलकपनपूर्ण व्युत्पा. गमतीबा मोति। मा.१०,६४३.३ गौना ७, १५ मम माया पनि गीतागारये मम्मापनि परोपम् तर मायारा योस्पत्वा तासालामुनिम टी भाकपमायापास्मरणर । ४ भा ३, २१, २१.
टिप्पणीभ्या प्रकाशेन च सवलिता पूर्वस्मादेतस्य विशेपस्त्वत्पदेनोक्तः । आभिमुख्यश्च । त्वदिच्छया प्राप्तस्यात्मात्मनादिषु सख्यं पुष्टिपुष्टिमोक्षः। टिप्पणी-[१६] ननु को विशेषो मोहस्यैकजातीयविषयत्वादित्याशङ्कयाहु-पूर्व स्मादिति । पूर्वस्मात् मोहादेतस्य पुष्टिपुष्टिमोक्षाय मोहस्य विशेप आदरणीयत्व मोक्षाइत्वा दिरूपस्त्वत्पदेन प्रकारतया तत्सबन्धसूचकनोक्त इत्यर्थ । यद्वा, नन्वंतस्मिन्नपि मोक्षे मायामो हस्य तुल्यस्वात्को विशेष इत्यत आहु -पूर्वस्मादिति । एतस्य पूर्वस्मात् मोक्षाद्विशेषस्त्वत्पदे- नोक्त । एतत्सन्धिमायाया अपि सदा स्वरूपसाहित्यादिति भाव । किश्चात्र मोक्षे विशेष प्ररारान्तरेणाप्युपपादनीय इत्याहु -आभिमुख्यं चैति । एतत्प्रार्थनावसरेपि यत्र वृत्रस्य प्रमु प्राकट्यम् , अन्यथा त्वत्पद न प्रयुज्यात्। तत्र तदनुभवे तस्य का वातेति भाव । प्रकाश:- दनात्पूर्वापेक्षयोत्तमत्वस्य च तनोपि दहाहवारो भगवत्सेवौपयित्वादुत्कृष्ट इति पञ्चमपर्वव्याख्या नेन सूचनाद्भगवद्वैमुरन्येन महाभोगेच्छारूपस्य तत्प्रथमपत्रण इन्द्रे वर्तमानस्य मखभन्नावरुहरण- लीलोपयोगिताया, भोगेच्छारूपस्य द्वितीयस्योपसेनादी, अज्ञानस्य तृतीयस्य " संघो नष्ट- स्मृतिरि"त्यादौ, मोहस्य चतुर्थस्य कालियदमनादौ, महामोहस्य पञ्चमस्य सेवौपयिकताया सर्वत्र एफुटत्वाच तदुत्तमताया सुटत्वेन प्रकारभेदो मोहने । यदि च “विद्याविद्ये मम तनू विद्धयुद्धव शरीरिणा। मोक्षबन्धफरीआये मायया मे विनिर्मित" इतिवाक्ये कार्यकारणभावोत्या भेद आद्रियते तदाप्यविधाकृत मोहन ससाराय, मायाकृत तु भागवलीलाध, तदपि "वैष्णवीं व्यत- नोन्माया मनास्नेहमयी प्रभुरि 'त्यादौ स्फुटम् । प्रकृते च तदभिप्रेतमतस्तव माया त्वन्मायेति साक्षात्सम्बन्धोधकात् त्वदविनाभूता माया त्वन्मायेति वा तथाभूतात्समासादेव भिनतया भगवत्सम्बन्धराहित्येन केवल ससारार्थतयेति यावत् । तथा न मायामोहनमित्यर्य । [१६] ननु शके शक्तिमदविनाभावस्य साक्षात्सम्वन्धस्य प सर्वजनीनत्वात् सर्वतप्रसिद्ध- स्वाद सदैव तयात्वेन प्रागपि वैष्णव इति पूर्वजन्मीनस्यापि देहपुत्राद्यासक्तिरूपमोहस्य तयात्वेन स्य च बन्धकताया मूले पुत्रशोकशापादिकथया स्फुरत्वेन प्रकृते सत को विशेपो येन मोक्षत्वमि-- स्थत हु-पूर्वेत्यादि । अविनाभावस्यानुक्तसिद्धत्वेन तद्बोधकपदोक्तिप्रयोजनाभावेपि या सदुक्ति सेदानी प्राय॑मानस्य मोहम्य सश्चिकीर्षितलीरार्थत्व बोधयतीत्येष पूर्वस्माजन्मनो विशेष इत्यर्थ । ननु भवतु लीलार्थत्व तथापि मायामोहो भगवदज्ञानस्य "ये' संवसन्तो न विदु- हरि मीना इवोडपमि"त्यादिपु सिद्धत्वात् परोक्षज्ञानमपि चेरे कुतस्तर्हि प्रत्यक्षसभावनेति पूर्वोक्तव्यवस्था तु भग्यवेत्यत आहु-आभिमुख्य चेति, तद्धि भगवतो नाभिमुख्ये, प्रकृते श्रीवल्लभटि०-पूर्वस्मादित्यत्र । पूर्वत्र माया भिन्ना, वस्याम परित्याग । अत्र न स्वरूपाभिमा सेवि न तत्परित्याग प्रत्युत स्वरूपविश्यकासचिजनकत्वेन फ्लसापकत्वानुण एव, अतो विशषस्नेत्यर्थ । आभिमुख्यञ्चेति । प्रत्यक्ष एव त्वत्पदश्यवहार इवि तप्रार्थनायामेव भगदाभिमुल्पमितीदमपि विशे पोतरित्ययं । सत्पदेन मायाया तटतासूचकेनति स्पष्टोऽध । २ भा १०.८,४४ नमिति भाव । श्रीनासुरचतु शोकोविकृति १७ त्वत्सेवीपपिकत्वेन चित्तस्य तेष्वासक्ति नाथपदेन मार्थयते । तेषां नायवे तया भवतीत्पर्यः । चक्र एव परिभ्रमतः सख्यं न भगवदिच्छया हिरण्यकशिपुप्रभृतिष्विव कुटु- मासकस्य, सर्वयानन्यत्वमङ्गमसङ्गात् । टिप्पणी-[१७] ननु लन्माययेति को विशेषो यथास्यचिदपि पुवादेर्भगवदीयत्वेन तदासक्या तत्सख्यस्य मोसत्वादित्याशङ्कयाहु -चत्र एवेति । चक्र एवं परिभ्रमतस्तत्सख्यं भनत, अनन्यत्वालते पुष्टिमर्यादामोक्षरूपत्वाच, न तु भगवदिच्छया स्वावतारवारणीभूतया, हिरण्यकशिपुमभृतिषु यथा दैवगत्या प्रलादे पुरतया आसकि सरन्यच पुरवात्सल्यरूप, अ- न्यया न शिक्षा दापयेत् , तथा कुटुमासक्तस्य में न भूयाकिन्तु लन्माययेत्यर्थ । सोपि पुरा मक एव शापेनासुरो जात इति साम्येन प्रार्थना तजातीया मन्येत प्रमुरितिभिया निषेधार्थ- ननु तयापि भगवद्गतासक्तस्तत्सख्यस्य विद्यमानत्वात् को दोप इति चेतनाहु -सर्वयेति । भगवन्मायामन्तरा केवल भगवदीयपुपाद्यासक्तावन्यनन्यत्वभगस्तदशे तत्सान्धाम्पू । न हि अनन्या कदाचिदपि तदसबद्ध किश्चिदपि स्मरन्ति । दृष्ट च हिरण्यकशिपो प्रदादासच्या शिवम. जनमतोऽन्यया सर्वथैवानन्यताभङ्ग एव । तम्मात् त्वन्माययैव तथासकस्य सख्य भूगादितिभाव । भकारा:-- प्रत्यक्ष भगवन्त प्रति युष्मत्पदोत्तयाभिमुरय सूच्यते, तेन यया " वैष्णवीं व्यतनोदि"त्यादी मोहन तयाभिप्रेत, तच्च प्रत्यक्ष इति न व्यवस्थाभद्गलेशोपीत्यर्थ । [१५] उक्त विशेष निगमयितु पूर्व जातयो सख्यासक्यो स्वरूप परिच्छिन्दन्त प्रथम सल्य परिच्छिन्दन्ति चक्र एयेत्यादि। पूर्व नारदागिरसोमर्यादापुष्टमात्योयत्सत्य सत्स्वकर्मभि संसारचक्रे भ्रमत एव । अत एवं " ज्ञात्वान्पाभिनिवेशं ते पुत्रमेव ददावहमि"त्यन्वान्यनि- रोम्यानि, अम्बिकाशापो प्रदेहाप्तिध न भगवदिच्छया परीक्षित इव न फर्मवन्धत्या. शिकया सयेति, पौर्वत्रिकसत्यस्वरूप परिच्छिन्नम् । तेन एतारामगबदलासस्य पुष्टिमर्यादापा मोक्ष इत्यत्रापि फर्मयन्त्यानिच्या भगवदिच्छयेति विशेषणीयमिति घोषितम् । मत परमासति परिच्छिन्दन्ति-हिरण्येत्यादि । अन्न सत्यपदरहिदा पूर्वदिशमनुपण्यासकिपर पाम्याहत्य योभनीयम् । तया प तलमृतिविर स्वस्यापीत: पूर्व वृतदेहे चित्र देहे प शापश्योमकशिरो- पहासादिना सयालादासचिरपीन प्राचना पने परिभ्रम न तु फर्मत्यानकोचमो. इसपादकभगवदिच्सपेत्यर्थः । तेनैव मानोभयस्वरूपनिष्करेंग प्रायमानयोस्रोिपो निगन्तव्य इति भावः । श्रीरममटिक-पक एवेत्यत्र । परि हिरपाशिपुरमृधिभगवदिष्या गरन परेमा सम्पदम्मिना सत्यमुत्तममोहनरसन , पारि त मोहन् । यि ने रहित । मग पीपयजुतमेर तपा, सपानववसत्य | पा र टपैर परिश्रमायादार । दर हिना हान जन्मामरत्वेन सस्थामा मगादि पुनर। पुगसासरपये समिरमान।पा ,,..।
१८ दिपणीभ्या प्रकाशन व सबलिवा कनार्यतं तु नाथपदप्रयोगादेव सृथितम् । तदन्ते च प्रार्थना, *"भगवदीय- वेनैव परिसमाप्तसगार्थाइतिप्तिद्धान्तात् । टिपणी-[ १८ ] नन्नय प्रकारस्तु लीगमप्टिस्थप्यैव, वृत्रस्य तु कयमेवकथना- विचार इत्यत आहु-उतार्यत्वं विति । स हि तद्रावयागल्यैव कृतार्य पूर्णसर्वार्थ । न ह्येन पतिरिचमन्याय विशिफल माति । रसानुभवस्तु नेपामेव । अन्य कामयपानोप्यपोग्य पैतेद- तस्तद्भावपुरन भगवदीयत्वसिद्धया कृतार्थ एव । अन्यथा नायपद न प्रयुज्यात् । न हि केनि दप्यमगरदीया भगत नापत्वेन सबोधयन्ति, तदनधिसरात् । अनधिकारकृतस्य दोपावहत्वाच । प्रस्ते तत्कायनाधिकारमिद्वौ सिद्ध तात्वमिति भाव । [१९] मन्येव सति फटान्तरानभिन्नापिण प्रार्थना न घन्त इत्याशङ्कचाहु -तदन्ते चेति । नाथपदप्रयोगान्तेपि या सख्यप्रार्थना सा भक्तिसिद्धान्तबोधनाय । तत्र हि भगवदीयत्व- मेव परमपुरपार्थ । “भगवदीयत्वेनैव परिसमाप्तसार्या " इतिवापात् । स च तत्सल्ये- नैव भवतीति ज्ञापनाय तथाप्रार्थनामिति भाव । प्रकाश:--[१८] नन्वरत्वेव तथाप्यये प्रार्थित संस्पतीत्यत्र किं गमक्मत आहुः-- कृतायेत्यादि । पूर्वसन्दर्भ अवत्वस्य सुटत्वादन व नायपदप्रयोगेण देन्याविभावबोधना"- ताना दैन्यमेवे हरितोपणसायनमिति सन दर्शनेन भावघोषादिति तत्मयोगादेव तसिद्धि सूचितेत्यर्थ । [१९] नन्वत्रासतिस्पैर कृतार्यतेत्या किं गमकमत आहुः-सदन्त इत्यादि । इद वाक्य पञ्चमस्कन्धीयषष्ठे कपभचरितसमाप्तावस्ति, तत्र च पूर्वगये चरित्रश्रवणश्रावणयो फल भक्तिरिति " भगवति तस्मिन् वासुदेव एकान्ततो भक्तिरनयोरपि समनुवर्त" इत्यनेनोका तदप्रिमे " यस्यामेच कवय आत्मानमविरत विविधजिनससारतापोपतप्यमानमनुसक्न लाफ्य- न्तस्तथैव परया नित्या पवर्गमात्पन्तिक परमपुरुषार्थमपि स्वयमासादित नो एवाद्रि- यन्ते भगवदीयत्वेनैव परिसमा सार्या" इति वर्तते । तत्र ससारावस्थावस्थिताना कवित्वेन भगवगुणगातृगा भक्तिजन्यसुखेन भगवदत्तपरमोक्षानादरपूर्वक भगवदीयत्वधर्मण सर्वद सभ्य- प्राप्त सर्वपुरुषार्थत्वगुक्तम् । तावता “ सालोपसासिामीप्यसारूप्पैकत्वमप्युत । दीयमान न गृहस्ति पिना मत्सेवन जना:" " स एव भक्तियोगाख्य आत्यन्तिक उदाहृत" श्रीवाभाटक-ननु सर्वसाधनाक्षारहिवन वृतार्यन पुष्टिमोश प्राय इति ता-वार्यत्व चिति । सर्वसाधनस्त्वं चेनापस्तदा न किन्निकर्तव्यमिति वसदेन तत्पचितमित्यर्थः । तदन्वे चेति कृतार्य स्वान्ते । पुष्टिमोक्षप्रार्थनेत्यर्थः । पृष्टिमोक्षस्वरूपमा(भगवदीयत्वेनैवेत्यनेन । * भा०५.१७ १ अयोग्यमिच्छाम्पुरष पतत्येव न सथप । हीनामटियत्वम् । ३ मा , २९,२३+१४ ।
भीवृत्रासुरचतुःश्लोकीविवृतिः धर्मार्थकाममोक्षचनुर्विधपुरुषार्थसिद्धयर्थं पाया क्रमाझियध्यासं करोति । तत्र देहाध्यासे धर्मसिदिः प्रसिद्धा । पुत्रापेक्षया अन्यार्थस्योत्कृष्टस्याभावादर्यसिद्धिः। टिप्पणी-[२०] नन्विदमद्भुतमिताभाति यन्मोक्षे मायातत्कार्यसंपन्धसाहित्यमित्या- शङ्कय मोक्षेऽद्भुतत्वसाधनाय वैलक्षण्यं निरूपयितुमाहुः-धर्मायेति । अनायमाशय. मर्यादामागी- यमोक्षे हि तन्मानानुभवो न धर्मार्थकामानां प्रत्युत पिरद्धत्वं च । प्रकृते तत्साहित्यापिरह्मत्वा- दिनोधनापात्मात्सनदारगेहेष्वासक्तचितस्यैत्युक्तम् । यतो माया फ्रमात् देहेन्द्रियादिकमा - हाद्यध्यासं चतुर्विधपुरुषार्थसिद्धयर्थ फरोति । तत्रैकेनैव देहाघ्यासेन धर्मार्थकाममोक्षान्तान्सा- धयति । एवमिन्द्रियाद्यध्यासेनेति क्रमो ज्ञेय । [२१] तन देहाध्यासं विवृण्पन्ति तत्रेति । तत्रैतेवध्यासेषु देहाध्यासे धर्मसिद्धिः मसिद्धा, तदध्यासवतामेव तनाधिकारात् । अर्थसिद्धिरपि देहाध्यासेन यन पुत्ररूपस्योल्मृष्ट- मकारा:- इति च स्मारितम् । तेन तादृशपरमभक्तियुजां संसाररय मुक्त्याधिस्यं तत्र स्पुटति, नदनापि स्ववि- शेषगनाथपदप्रयोगाभ्यां स्फुटतीति तदन्ते तादृशसिद्धान्तं हृदि पृत्वा प्रार्थनेर सादृशासक्तिर- पछतार्थत्वामित्यर्थः । सिद्धान्तादिति ल्यग्लोपे पञ्चमी । [२०] नतु भवत्येवं तथापि विर्गस्य गृहाश्रमे संसिद्धेमोक्षरयेतोपु मंसिद्धेः प्रहने प दारात्ममपदाभ्यां गृहाश्वमयोधनात् तस्मिनितरेतरविरुद्धचतुषंगानुभवसिद्धिर्न पुरिमधिरोहती. त्याकाहायां तदनुभवप्रकारमाहुः-धर्मत्यादि।मायेति पूोणा। फरोतीति पुष्टिपुष्टिभमानां करोति। [२१] तोति । तेवयासेपु । प्रसिद्धेति । प्राह्मणत्यापभिमानाभावे यासन्तिकापाना- दिफरणायोगात्तदुपदेशशास्नादरतत्करणाभ्यां प्रसिद्धा । पुरेत्यादि। पुरे प्राणाभिकप्रिपत्यभा. नात्ता ममतारूपस्तत्सापल्याकल्ये स्वसारत्यागन्यभानाभा देवाणवियोगान तदाघन्ता. रूपो वा प्राणायासनस्मिन् सति सदुपार्भनरयत्नान् मागाप्यासिद्धिः । मिसेस्यपाहारेग २० टिप्पणीया प्रागेन च संबलिता लिया कामसिदिः प्रसिद्धा । *"भक्तानां यह एवं विशिष्यते' इति न्यायान्मोता। टिप्पणी- स्यार्यम्य तदव्यासेनेव मिद्धे 1 काममिद्धिविधीमापेक्षा देहाध्यायमूव । यहासक्तिरपि तन्मूठेव । [ २२ ] पतुर्विधम्यापि मोक्षपत्यमाहु -भक्तानामिनि । भगवन्मायया लेलोपयोगि- पदार्थलेन तमामतया तन्निरोधेन ब्रह्मभावापेक्षया गृहमंत्र मताना विशिष्टं, यतो ग्राभावेऽस्वि- पुरपार्याननुभव इन्द्रियादिकल्प न । अनोऽनौतिकदेहप्राप्त्या प्रभुप्रास्टयेनारिकपुरपार्थप- लीगयाम्नद्रवमाहित्येनान्तरमणामकोनुभवो मोक्ष नि पिद्धम् । प्रकारा:- योज्यम् । ते वेव ममतारूपोऽध्यामो वा । मूल पुत्रपदममातोपलक्षामित्याशयेनैवमुक्तम् । स्त्रियेत्यादि । अत्र इन्द्रियाप्यास: स्त्रियामेव, ममतादि वा तेन कामसिडिम्पयेत्यर्थ. । [२२] भक्तानापित्यादि । " प्रमानन्द प्रविष्टानामान्मनैव मुखममा । सट्टानस्य विलीनत्वामतानां तु विशेषत:" "मन्टियस्तथा चान्नाकरणरात्मनापि हि । ब्रा- भावात भक्तानां गृह एव विशिष्यने " इति निबन्धकारिकाभ्या, " पश्यन्ति ते मे रचिरावतंसमसन्नवस्तारणलोचनानि । रूपाणि .दिव्यानि पत्रटानि साकं वाचं स्पृहणीयां वदन्ति तदर्शनीयावयवदारविगसगसेक्षितपाममुक्तैः । हुतात्मनो हृतपाणांच भनिरनिन्छतो मे गनिमीं प्रयुग" इनि श्रीरपिलदेववाक्यद्वयार्थ सहीत , तदनन्याया- मोमानियापुर्वरभगपदकनाननाम्पान्मोजनविशेपिलिलोपयुक्तमहामतिभिगवानन्दा- नुभवरूपो मोश्न । गोपिरादितुल्याना प्रसिद्ध इति योजना । तथा च एत्यात्परम्पराविरोशे प्रजभक्तादीनामिवेत्ययं प्रकार इत्यर्थः । श्रीपलमटिक- त्वात , तेन सिद्धिरित्यर्थ । उत्कृष्टत्यतु भगादयसपादितारशकचेन मुम्यतया सापपिकत्वेन यसननारा परम्परया सेवानिदिकत्वेनाशितिपुस्योद्वारक्लेन च । लेरे पुत्रस्यार्थत्वेन प्रसिद्धय मावात् सा नोत्ता वियेति । तया यथा विषयार्थ काममिद्भिः प्रसिद्धा नदत्रानि से पायानुभयोश्चित्तवावल्याभागाय भगवदीयपुत्रोत्पत्या तसिदिरियर्थ । भत्तानामिति । यथा लेपो भवनोपयोगि वेन विधिनगरमानु भावात्लेन शून्यस्थितितुल्यमोश्चापेक्षया गहमेव विशिष्यते तन्न्यायनैवस्थापि पुष्टिमार्गीयत्या तन्मार्गीपम समावभावना भनने तथैर परमानन्दानुमत्र म ततो विशिष्यने । भयभेव " सोभुने सर्वान् कामान् सहे त्यत्र मुख्यतया निरूरिन पुत्रिमा यो मोक्षो, न तु कैयन्यम् । * निधशाषाप्रकरणे का ५१ । निबन्ध शा ५३४. भा ३, ४,३५+३६ योवृत्रासुरचतुःश्लोकीवितिः २१ चित्तस्य वासुदेवात्मकत्वान्मोक्षप्रकरणत्वाचितपदपयोगः । क्रीडामतिवन्धकत्वा- स्मकृते विरोधाच निषेधमार्थना। टिप्पणी-[२३] ननु कथमस्य तदधिकत्वेपि मोलरूपत्वं, चित्तासक्तेः संसाररूपस्वा- दित्याशङ्कयाहुः-चित्तस्येति । चतुर्विधेऽन्त करणे चित्तस्य वासुदेवात्मकत्वात्तस्य च मोक्षदातृ- स्वात्तद्राविचित्तपदप्रयोगेण मोक्षरूपत्वं सिद्धमित्यर्थः । विश्व, प्रकरणमपि मोक्षम्येतिज्ञापनायापि चितपदप्रयोग इत्याहुः मोक्षपकरणत्वादिति । [२४]ननु भगवन्मायाननितासक्तिमात्र प्रायेंत, कि कैवलासक्तिनिषेधप्रार्थनेनेत्यत आहे. झीदामतिबन्धकत्वादिति । केवलासक्तिनिषेधाभावे 'अप्रतिषिद्धमनुमतं भवती तिन्यायेन भग- प्रकाश:-[२३] प्रकृर्व वाशोनुभवप्रकारो विवक्षितोन्तःकरणाध्याससाण्यश्वेन्यत्र किं गमकमत आहुः-चित्तस्यैत्यादि । *यत्तत्सत्वगुणं स्वच्छ शान्तं भगवतः पदम् । यदापुर्वा- सुदेवाख्यं चित्तं तन्महदात्मकमितिकपिलयाक्येन सर्वेष्वन्तःकरणेषु चित्तस्य वासुदेवात्मकत्वात् सृष्टिस्थितिप्रलयमोक्षकर्तृषु प्रद्युम्नादिषु चतुर्पु वासुदेयस्य मोक्षदातृत्वादन मोक्षप्रकरणादन चिरापद- प्रयोगः । तया च स एवोक्तप्रकारानुभवस्य तस्यान्तःकरणाध्याससाध्यतायाश्च विवक्षितस्वगमक इत्यर्थः । अनेन तादृशासक्तेर्मोक्षरवे युक्तिरपि ममारिता । तथा हि यत्रे चित्तस्य वासुदेवात्मकत्य- पोषक वाक्यं तत्रैव मनसोऽनिरुद्धत्वयोधकमहङ्कारस्य सङ्कर्पणत्वोधकं च पाक्यमसि, तेन तत. दन्तःकरणाधिदैविकलं तेषां व्यूहानां तर सिद्धम् । मतान्तःकरणरूपाश्च त एव । किप, यो योऽ- ध्यास: स सर्वोप्यहङ्काराच्यासमूलकः, अहवारश्च सङ्कर्षणात्मकः, तत्रास्याहमित्यध्यासरतदइयो- पासनातुल्यफक्षो भवति, अवहोपासना च सर्वतापनीयसिद्धा। तथा सा यया मोक्षाल- फस्यान्मोक्षरूपा तयायमण्यासोपि मोक्षफलफत्लान्मोक्षरूप इति तन्मूला देवापासक्तिरपि तयेति । [२४] ननु सर्वमिदं पदोपपधेत यरन्तरा नप्रयोगो न स्यात, दृश्यते २रा इति नायम: साधीयान् । किन्तु स्वकर्मभिः संसारचक्रे भ्रमवो मम उत्तमश्लोकजनसल्यं भूयात् तस्य प्रार्थ- नीयत्वे हेतुः त्वमाययात्मात्मजदारगेहेष्वासक्तचित्तस्य नेति "भवापरों भ्रमतो यदे "ति- पाक्योहाचासत्तौ ता भवतीति तदभावपूर्वकतत्सयमात्रमार्थनेत्ययं युक्त इत्यत माहुः-फ्रीडे- त्यादि । उकसख्यायेति शेषः । अयमर्थः, त्वया ह्येतस्यासाधुत्वेन अनुपपचिमात्रमविवक्षिवरण. श्रीवल्लभटि---चित्तस्येति । पिती महान इति पातोभित सनात्मकम् । वप यत्त्वजन्यम् । उदघिटावा यासुदेव इति तदात्मकत्वमुचम् । इतः पूर्व विभिः लोको पुष्टिमार्गीयपुरवार्यत्रमनुत्तम् । अत्र सन्मागी यो मोसो निरूप्यते रति हरप्रकरणत्वम् | "ज्ञानान्मोश"ठिन्मान चित्सपाययोगो मूरो। तेन रानात्मकृत्य एप तस्य यथा मोशसापकले सपा सुपडिमागीयमावात्मस्व एव समोसाय. पत्वमित्यर्पो शापितः । कीडेति । संसारदभूतमायामोहरम एस हे मगवान् श्रीमतीनि लागिन्य. । भार ३.१५.११.१ भा...,..
२२ टिप्पणीभ्यां प्रकाशेन च संवलिता तपा च कर्मसंवन्धव्यतिरेकेण केवलभगवन्मायया रमणरूपया भगवत्सेवाश्रवणादितत्पर- टिप्पणी- वन्मायायामपि तत्सत्त्वे तन्मिश्रणेन पुन्नादिषुमयमगरवुद्धौ केवलभगव-मायामावान भगवान झीडतीति कीडायां प्रतिबन्धकत्वात्तनिपेषप्रायनमिति पात्र । अत एव "सेमागतान्पूजयती प्रजौकस"इत्या भगतदीयत्वेपि हानिध्या तलासक्तौ मातृचरणानां तर्यामायवर्णनं, लीलारसा- नुभवप्रनित्रन्भकशस्टमनश्चेति । किञ्च, मोक्षविरुद्धवादपि केवलासक्तिनिपेघप्रार्थनमित्याहु-प्रकृते विरोधाचति । प्रस्ते विरोधो नामावल्यांशक्टभेदपरित्रे लौकिकभारवर्णनं पेति। मोक्षोहि भगदी- यत्वं, तच्च सर्वोशे तदीयन्वानुसन्धानरूपं, तर केवलासरंशत सत्या अपि बाधकत्वानिषेधप्रापर्नमि- त्यर्थ । [२१] सिद्धमर्थमाहु-तथा चेति । कर्मसंबन्धव्यतिरेकेण संसारेपि प्रभुसंन्धात्सर्व- प्रकार:- गमकतयोच्यते, सा तु नास्ति । तथा हि अब राव "अहं समाधायें"त्यादिवाक्यनस्य स्वपूर्व- जन्मीनसर्वत्तान्तस्मरण निश्चीयते । "वैवर्गिकायासे"तिवाक्यास्वस्मिन्प्रसादोऽनुमित इति च । एवं सति पूर्वजन्मीनान्याभिनिवेशाहिरसमपुत्रदानतच्छोफनारदोपदेशमगवत्प्रसादविद्या- पराधिपत्यशिदोपदासाऽम्बिकाशापा अपि तस्य स्मृतिगोचरा इति पूर्वप्रसादस्य परमफला- सापकत्वं स्मृत्वा साम्प्र प्रसादे कि भगवता विधेयमिति तदाशये सन्दिशानः इदानीच मरणाकाल इतीदानीगोचरो मोचयिष्यत्येवेति निश्चिन्वानः अनुगृहीतत्वात्पौष्टिकमेव दास्य- तीति निश्चित्य पूर्वजन्मोननारदाहिर-सत्यस्य भ्रमत्सख्यत्वञ्च निश्चित्य यदि पुष्टिमयांदया दिसति तदा पूर्ववन्माभूदिति सस्ये मविशेषणे होति प्रकारनिषेधस्य पूर्वार्धन प्रार्थना, सख्यं भूयात्परं तया न भूयादिति । यदि पुष्टिपुष्ट्या दित्सदि नदा तथाऽसक्तचित्रस्य पूर्वाद्धप्रार्थित सरत्यं न भूयादितिविशेष्य निषेधस्योत्तरार्द्धन प्रार्थनेति प्रकरणवशेनान वाक्यद्वयाट्रीकारस्योपप- प्रत्वात् तत्र नोपपत्तिरिति न सोधः किन्वयमेव साधीयानिति । [२५] सिद्धमाहुः तया चेत्यादि। "वैष्णवत्वं हि सहजमिति पुष्टिप्रवाहमर्यादायां पौष्टिकानां सरमान्यरक्षणासाश , "न कर्मरन्धनं जन्में"तिपाद्यात्तव्यतिरेकेण फेवला "अविद्याकामकर्मभिरितिवाक्योकभ्रमणसाधककामकर्मासंसृष्टा या क्रीडासाधिका भगवन्माया, क्या गृहे गृहाश्रम एव "पश्यन्ति ते म" इत्यत्रोकरीत्या सदनुभवन्, "पुष्टया विमिश्राः सर्वश" इति तेषा विशेषलक्षणात्सर्वं भगववाशर्मन्नं जानन भगवदीय: "यापन मयि ते श्रीवल्लभाटि०-- पत्वम् । प्रकृतेऽर्यान् क्रीडेव प्रार्यत इति तद्वाध्यबाधकविरोधाच राजनितासक्तिनिषेधप्रार्थना । तेन स्वन्माय. याऽऽसत्तचित्तस्य ममात्मादिषु सख्यं भूयानेतरमायासत्तचितस्य लोक्वदिति मूलार्य: पर्यवस्यति । तथा चेति । लोके कर्मसम्बन्धमन्तय पुरुषार्थनगुमयताया रिना ददनुभपः। "वस्मिन हष्टे परावर इति १ भा. १०,४,६,३ रहिर्मुखमा इरपर्यः । मदीया अप्पेर बहिखा जायते रति बोधिनी। ३पु०प्र०म०।
श्रीवृत्रासुरष सोकीविकृति तया गृह एव चतुर्विधपुरुषार्थमुखमनुभवन् भगवदीय इति द्वितीया मुक्तिरियमेव मुख्या, आशीरिति सर्वान्ने क्रियाप्रयोगः । हे नाथ ? मर्यादाज्ञानमोलो मे मा भूयादिति ।। ॥ इति श्रीमत्पभुचरणकृता वृत्रासुरचतुःश्लोकीवियुतिः संपूर्णा । टिप्पणी- था तत्समन्धराहिल्येन केवल भगवन्मायया लौकिवासक्तिसरन्धरहितया गृह एव लीलारूप चतुर्विधपुरुषार्थसुखमनुभवन् भावप्रकारेण लोग्लेदातीतप्रमुस्वरूपेण सह सर्वलीलानुभव कुर्वन् भावदीयः स्वतन्त्रभक्त इति द्वितीया पुष्टिपुष्टिमार्गीया मुक्तिरित्यर्थ । [ २६ ] तदुदाहरण तु स्वामिन्य एवानगन्तव्या , एतस्पैन सल्फरमूर्द्धन्यफलत्वज्ञाप- नायाह -इयमेवेति । इयमेव नान्या मुख्याखिलफलेषु, आशीरिति ज्ञापनाय सर्वान्वे पद्य- निष्ठार्थनातनिरूपणान्ते भूयादित्याशीर्वादार्थक विशारदप्रयोग इत्यर्थ ॥ प्रकाश:-- नाथे"तिविज्ञप्तिलोकोक्तरीत्या भगवता स्त्रीयत्वेन निश्चित इति द्वितीया पुष्टिपुष्टिकता मुक्तिः । वथा च गृह एव तथानुभवत्वेन मर्यादापुष्टगुक्तव्यावृत्तत्दै सति "निर्गुणो पदपा- अप"इत्येकादशे गुणातीतकर्नुलक्षणाद्भगवदीपत्रेन विविधलौकिक कल्यावृत्तत्व पुष्टिमित्रपु. जीवत्व तेण स्वरूप तेन रूपेण यावाव स्थिति सेभ्यर्थ । अत्रापि पूर्वकक्षा यादवादी, उत्तमा श्रीमदुद्धवादौ शेया, "नोवोऽवपि मन्यूनो यद्गुणैादित" इति कर्मबन्धव्यतिरेकरय "टफ्णध में मोहमहान्धकार" इत्यत्र प्रसारित' सृष्टिविद्धयै त्वये"ति भगवन्मायया देशपासके, 'अयापि तदभिप्रेत जानमिति ताशत्वस्य स्फुटत्वादिति । [२६] एव पुष्टिमार्गे द्विविध मोश निधित्य "शुद्धाः प्रेग्णातिदुर्लभा" इत्यत्र विषा- रिवाना शुद्धपुष्टाना फलस्य स्वरूपस्य चेतोप्यधिकृत हदि कृत्वा प्रकगानामेतदन्वता शाप- थितुमाहुः-इयमित्यादि, अयमेव, तोधिरेत्यर्थ । नन्यायमेवाशय इत्या कि मानमिति चेत् एच्यते । मन्त्र "भक्तानांसह एक विशिष्यत" इतिन्यायोपक्षेपात् तदपारयाने साधन भति फल मोक्षस्तथापि पालदशात साधनदशैषोत्तमति- कधनेन "अनिच्छतो गतिमी प्रपुर"इति मुक्तिदित्सासूननात् । युद्धपुष्टाना तु मुकीच्याया- मपि तदनुरिति भानाहान चमचानामित्यस्य स्वतनभत्ताना गोपिकादितुल्यानामिति व्याल्या. नामिति शप, तस्य सापनदशामात्रोतज्ञापनपास्यात् । भन्यथालयशापनदिरोभापा- सार । प्रहरपु गुगीते "वाश्रयाश च प्रत्यारचरि"ति प्रयापतोकाठोकारात) श्रीवाभटि०- पायानगरीयस्य सर्यकार पुरुशर्ष । भक्तिमार्ग स्थिमित्या परमपुरुमगुगामियः । अग्रे पम् ॥ इति श्रीविलायरामा गभाना ममोजमे स्वाप टिपरीमा 1भा ,मा.,,१1३ भा.३१. गिरमिदम्प ए. भा. १tt...
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टिप्पणीभ्या प्रकाशेन च सवलिता
टिप्पणी-
इति श्रीवल्लभाचार्यरुपया विनिरूपित । ममोत्तमतिपद्यार्यव्याख्यानाओं मया मुदा ॥ १॥
मयोक्तिमिद मक्ता अवलोक्य पिचारितम् । यवन्तु सतत श्रीमदाचार्यचरणाश्रया ॥ २ ॥
एतल्फल तत्कृपातो भविष्यति न सशय । अतस्तदुक्तमार्गेण भननीय प्रभु सदा ॥ ३ ॥
स एव श्रीमदाचार्यपक्षपाती मम प्रभु । करिष्यति स्वकीयानामैहिक पारलौक्तिम् ॥ ४ ॥
इति श्रीमत्प्रमुपादपद्मदातानुदासहरिदासविरचिता
ममोत्तमेतिपद्ययाकृतिटिप्पणी समाप्ता
प्रकाश-नन्यस्त्वेव, तथापि परममविस्वरूपे साधने तारतम्माभावात् फलमेट
किंप्रयुक्तो य स्वरूप भिनत्तीति चेद् , उच्यते । उत्तरतन्त्रतातीयिकतृतीयपादीयाक्षरेधिया
त्वविरोध" इतिसूत्रोक्तीपसदन्यायेन भगवदिच्छाभेदादेवेसवेहि । ततस्तेष्वपि तारतम्य भ्रमर-
गीतोक्सदेशस्वरूपाक्षातव्यम् । एकादशीयद्वादशाध्यापस्था परोपपति मा योग' इत्यारम्य
"यारपसे कुतोभयमि"त्यन्तात् सर्वात्मभावपूर्वकशरणोपदेशसदर्भाच । तेन पयों हि पुष्टि-
मर्यादायामङ्गीकृतो न तु पुष्टिपुणविति "न्यासादेशे वित्यत्र प्रभुचरणोके । सात्विकपकरणो-
कानो तत्समातीयभावक्ता चाद्य', राजसपकरणोकाना तादृशा चेतरः, तामसप्रकरणोजाना
तु प्रत्यापचिरेवेति लीलापरिकरस्य यथास्थितस्य नित्यत्वमस्यामेव लोलायो सिद्धपतीति । कि
च पूर्वोत्तोपदेशश्रवणोत्तरमपि संशयः शृग्यतो वाच तव योगेश्वरेश्वर । न निवर्तत आत्म
स्पो येन में भ्राम्पति मन" इतिश्रीमदुद्धवोक्तेरय भावौतिदुर्लभो भगवत्परमप्रसादादेव लग्य
इति । तपाने "वद्भक्तियोग च महदिमृग्य" "आपाही प्रश्ने भक्तियोगः पुरै-
वोक्त' इति द्वादशाभ्यायोक्त तत्स्वरूप स्मारयित्वा "पुनथ फययिष्यामि पक्के कारणमि"-
चादिना पदुपायकथनाचया तदुपायत्वज्ञानपूर्वकतत्करणेन मसभागवत एव तादृशमसादसिद्धि-
नेंतरथेत्यादिकमालोचनीयमिति तदेवत्स हदि त्योतमियमेवेत्यादि । इति दिन्छ ।
रससिन्धुचन्द्रगुपवारिरहोगतपुष्टिपुष्टिमकरन्दरस ।
इति कृष्णचन्द्रकृपया विदित पुरुषोचमेन वचसा विवृत ।।
इति श्रीमाभनन्दनचरक्तानश्रीपीताम्बरतनुजपुरुषोत्तमकृत'
पुष्टिमार्गीयमुविविवृतिप्रकाश सपूर्णतामगात् ।
॥ समाप्तोप ग्रन्यः ॥
१० मा ०। ३ ३३ भत्र पसगहये मणि एक सान्तमपल्प भीपसद कास्ति,
अस्मिन् कर्मणि सर्वेषां अलि तानरपाल समान, धादि भय यज्ञ यासमृरटेरि ति यजमानस्य
यस्मिन्नेहातिशय तमेव ऋविश पनमानोरशते नहि समानो कण्डार इति प्रभ समातिए
समापि भगवरिया फनभेट इत्याभय । ३ भा०॥३॥
श्रीमद-वल्लभाचार्य-महाप्रभु-विरचित-पोडश-प्रन्यान्तगता-एकादशी
भक्त्तिवर्धिनी
चतुर्दशटीकाभिःसमलंकृता
१. थोबालकृष्णानाम् ८. श्रीवल्लभानाम्
२. धीगोकुलनाथानाम् ९. श्रीजयगोपालभट्टानाम्
३. श्रीरघुनाथानाम् १०. श्रीलालुभट्टानाम्
४, श्रीकल्याणरायाणाम्
११. केपाञ्चित्
५. श्रीहरिरायाणाम् १२. श्रीवल्लभात्मजधोवासकृष्णानाम्
• আঁশীযহাম্ १३. धोगिरिधराणाम्
७. श्रीपुष्योत्तमानाम् १४. श्रीद्वारकेशानाम्
श्रीमद्-वल्लभाचार्य महाप्रभु-यंशावतंस-गोस्वामि श्री १००८
श्रीगोपीनाथ-महाराजश्रीत्येतैः - प्रकाशिता
प्रकाशका
गोस्वामिश्री १००८
श्रीगोपीनाथजी महाराज,
बडा मन्दिर, श्रीजीवनजी महाराज लेन,
भुलेश्वर, वम्बई-४०० ००२, भारत.
साधारण सस्करण २००० प्रति
राज सस्करण १००० प्रति
श्रीवल्लभाब्दाः ५०३.
अन्ध-परिपय लेसकः गोस्वामी श्याम मनोहर
स्टूडियो बहार, २३-ए, मेन्ट्रल चोपाटी विल्डिग, घोपाटी,
चम्बई-४००००७.
บรรู้จน: 1 - ชเ: “Try ॥श्रीकृष्णाय नमः ॥ ॥ श्रीमदाचार्यचरणकमलेभ्यो नमः ॥ ग्रन्थ---परिचय चौरासी वैष्णवोकी वार्ताक भावप्रवाशके अनुसार भवितवपिनी अन्य धीमहाप्रभुने साचोरा पुरुषोतम जोशीके लिए लिखा था. एक किंवदन्तीके ' अनुसार इस ग्रन्थका प्रणयनकाल वि. स. १५५२ माना जाता है तथा प्रणयनस्थल प्रयाग, परन्तु भावप्रकाशके अध्ययन करनेपर लगता है कि इस ग्रन्थको रचना गुजरातके किसी गावमे हुई होनी चाहिये "तव एक समय श्रीआचार्यजी गुजरात पधारे. सो पुरुषोत्तम जोशी मध्यान्हके समय एक तलावपर सन्ध्या करत हुते तव श्रीआचार्यजी तलावपर पधारिके सन्ध्या- चन्दन करन लागे. सो पुरुषोत्तम जोशीको ओर कपा करिके देयो जानि देखे. तव पुरुषोत्तम जोशी श्रीआचार्यजीके पास आई नमस्कार करि पूख्यो- 'महाराज! यह कर्ममारण बडो के ज्ञानमारण बड़ो" तव श्रीआचार्यजी कहे-'जाके मनमे दृढ जो मारग आवे, जामे जाको विश्वास होय, वाके भाये तो वहमारग वडो, और बडो तो भक्तिमारण है जामे जीव कृतार्य होई. और ज्ञानमारग कर्ममारग सो कृतार्थ कठिनतासो होई सो काहूसो निर्वाह होय नाही काहेते ? कष्ट साध्य है सोया कालमे शरीरको कष्ट क्यों न जाई कोऊ शरीरको कष्ट सहे तो मन ठिकाने रहे ताते भक्तिमारगमे जीव कृतार्य होई और आथय नाही "तव पुरुषोत्तम जोशीने नही जो 'महाराज ! भक्तिको स्वरूप कहा, कृपा करिवे कदिय ।' तव धोआचार्यजो कहें- 'भक्तिको स्वरूप वर्णन करिये तो पार आवे नाही परन्तु कटुव तोको कहत हो' तव 'भक्तिवपिनी अन्य करि ग्यारह लोक पुरषोत्तम जाशीको सुनाये सो यह उत्तम अधिकारी है, ताते सगरो बोष हो गयो." इस तरह भकिावधिनी पुस्पोत्तम जोशोके हृदयमे भक्तिर वर्षनार्य लिखी गई पी, गुजरातमे ही कही पुरुषोत्तम जोशीने गांवम इसके उपदेश दाद पुरषोतम जोशो सपरलीव श्रीमहाप्रभुकं अनुपायो हुए, और अश्यावृत होकर अपने घरमें मेवा तत्सर होगमै- “सा दो जन प्रोतिमो सेवा परन सागे पाछे श्रीमावायंजी दारिता पधारे गो पुरुषोत्तम जोशीने बहोत दिन सेवा परी भगवद्भावमें मगन रहते- अश्यावृत्त होई रहे काहूरे मार्ग अपने हृदयको भाव प्रकट न पले" - (1) पौनांगरताम गनिया निषित मेग, नदीमा ४ १९७१ कर्म-शान-भक्ति भगवद्गीता तीसरे अध्यायमे अर्जुन भी भगवान्से ये ही प्रश्न कर बैठा था कि ज्ञानयोग यदि थेष्ठ है तो कर्मकी क्या आवश्यकता है, और कर्म यदि आवश्यक है तो फिर ज्ञानयोग किस अर्थमें श्रेष्ठ है. भगवान्ने यहा अर्जुनको समझाया है कि को भनारम्भ या त्यागके कारण ज्ञानयोग श्रेष्ठ नही बन जाता क्योकि फलासक्ति-रहित कर्म अर्थात् निष्काम कर्म भी इस दृष्टिसे ज्ञानयोगसे मिलते लामोको देनेमें सक्षम है कर्मके फलोमे आसक्ति बनी रही तो ज्ञानमार्गीय साधक नष्कयंका भी अपने-आपमें कोई मूल्य नहीं है. कर्मके फलोके आकर्षणके रहते हुए मंका त्याग निरा पाखण्ड है. भगवान् कहते हैं कि उन्हें, आत्माराम-आप्तकाम होनेपर भी, कर्मत्यागके बजाय लोकसंग्रहार्थ ही सही पर कर्म अधिक सुहाता है. कोई भी ज्ञानी स्वयम् परमात्मासे अधिक निष्काम या आप्तकाम हो नहीं सकता फिर शानयोगके नामपर कर्मत्यागकी क्या आवश्यकता है! ज्ञानयोगी हो अथवा कर्मयोगी दोनोको हो स्वधर्म-स्वकर्मका अनुष्ठान फलासक्तिके विना करना चाहिये क्योकि परधर्मका भलीभाति अनुष्ठान भी स्वधर्मके विन-भली. भाति किये गये अनुष्ठानसे श्रेष्ठ नहीं है अर्जुनने इस सन्दर्भमे एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न भगवान्के समक्ष उपस्थापित किया है वह पूछता है कि स्वधर्म-पालनी जब इतनी अधिक महत्ता है तब व्यर्थ लोग कभी स्वधर्मके त्यागद्वारा तो कभी परधर्मोके अनुष्ठानद्वारा पापाचरण क्यो करते है ? भगवान्ने इस प्रश्नका विलक्षण उत्तर दिया है कि स्वधर्मत्याग अथवा परधर्मा- चरण के द्वारा मनुष्य पापोको बटोरता रहता है, अपने काम और क्रोध के वशीभूत होकर शानियोको ज्ञानाग्नि भी बहुधा कामके धुएमें घिर जाती है काम ही ज्ञानियोका चिरशत्रु होता है भगवान्की बात बड़ी अटपटी लगती है कि वयो वेवल ज्ञानमार्गीय साधक ही कामनाओका शिकार बनता है, कर्ममार्गीय या भक्तिमार्गीय सापक ययो नही ? काम- नाओका आकर्षण तो सभी मार्गोंके साधकोमे प्रारम्भमे तो रहता ही है या वमसे कम रह सकता है । परन्तु थोडा ध्यानमे देखनेपर पता चलेगा कि हमारी ममता और अहन्ता का ही अदम्य विस्फोट क्रमग काम और क्रोधके रूपम होता है. अतएव भगवान् कहते है- "काम एप क्रोध एप रजोगुणसमुद्भव महारानो महापाप्मा विद्धयनमिह वैरिणम् "हमारो अहन्ता हमारे रजोगुणका साथ पाकर हमारे भीतर क्रोध रोगका रूप धारण कर लेती है इसी तरह हमारी मगता हमारे रजोगुणका साथ पाकर हमारे भीतर कामके रोगवा रूप धारण कर लेती है. इन काम तथा कोधके रूपोमें हमारी ममता तथा अहन्ता के राजस विस्फोटसे ध्वस्त होती साधकोको साधनाकी सुरक्षाके उपायरूप अनेक मार्ग प्रवृत्त हुए है.
चार मार्ग (१) बुद्धने आत्मचेतनाको काम-क्रोधक आवेगोंसे बचाने के लिए इनको बीजभूत अहाता और ममता कोही तोर देने का उपाय सुझाया था एतदर्थ अनात्मवादपर आधारित 'नाहम्' की भावना तथा विज्ञानवादपर आधारित 'न मम'की भावना को जगानेपर भार दिया गया मानो हमारी चेतनामें अहन्ता और ममता की ग्रन्थियो में यदि क्रोध और कामके व्रण हो गये हो तो उन्हें रझानेकै बजाय इन ग्रन्थियोकी ही शल्यचिकित्सा कर दी गई. वैदिक शास्त्रोको यह शल्यकम सभी स्थितियोमे मान्य नहीं था अत बुद्धसे पूर्व हो कर्मयोग ज्ञानयोग एवम् भक्तियोग की प्रणालियोमे अन्य अघोर एवम् अक्लिष्ट चिकित्सा इनकी सोची गई (२) कर्मयोगकी प्रणालीम अहन्ताको तोड़नेको परवाह किये बिना ममताको विभिन्न देवताओम जोडनेकी चिकित्सा-प्रणाली अपनायी गई हैं - "अग्नये स्वाहा अग्नये इद न मम- सूर्याय स्वाहा सूर्याय इदं न मम" इत्यादि "वित्त च मे पुत्रं च मे पशुश्च में" को ममतामयो सकाम-कर्म-वृत्ति वाले साधकोकी ममताको - 'देवताये इद न मम" को प्रणालीद्वारा निष्काम-कमंकी और कर्मयोग आगे बढाना चाहता है स्वयम्के उपभोगसे पूर्व देवताओंके यजनको आवश्यक्ता है. अतएव पर्मयोगके निस्- पणमे गीता हमे समझाती है "कर्म किये बिना कोई रह नही पायेगा, अपनी प्रकृति के अनुरूप विवश होकर कुछ न कुछ कर्म तो सभीको करने ही पडगे ऐमी स्थितिम कर्मेन्द्रियोको सयत कर- नेके पाषण्डमे विमूढ साधक अपने असयत मनको इन्द्रियार्थोके चिन्तनमें डुया देते है. जबकि सच्ची विशिष्टतातो मनसे इन्द्रियोको सयत करके कर्मेन्द्रियोंसे आसक्ति- रहित कर्मयोगको करते रहने में है । अतएव नियत कर्मोको करते रहना उत्तम है, उन्हें त्याग देनेके बजाय. सर्वथा वर्मत्याग करनेपर तो पारीरयात्रा भी नहीं निभ पापगी और फिर इस लोकम वे हो कर्म बन्धनरून माने गये है, जिनका अनुष्ठान यज्ञकर्म के रूपमें नही होता जत यज्ञार्य किया गया कर्म तो असगभावमे करते ही रहना चाहिये, प्रजापतिने भी प्रजाको सृष्टि यश साप ही की है अत मज्ञ ही हमारी सारी काम- नामाको भलीभाति पूर्ण करता है हम पजके द्वारा देवताओको देनेकी वस्तु उन्हें देनी चाहिये और यजभावित देवगण जा हमे मिलना चाहिये वह हमे दंगे इमो आदान- प्रदान में हमारा परमय रहा हुआ है जो देवताओने हमे दिया है उसम में जो उन्हे देन लायर है उगे दिय विना जब हम अपने समागमे लेने है तो हम चार वन जाने है अतएव याने बाद बची हुई वस्तुओके उपमोगरी जीवनप्रणालीमे पारस्प नहीं होता है फिर भी जो रवल अपने रिए पकाने है और माने है, वे अन्ना नहीं प्रत्युत पाराही भाग परते है" दम विस्तृत सरपरे अनयनमे स्पष्ट हो जाता है कि समयाग हमारी अहाना.
की परवाह अधिक नहीं करना चाहता किन्तु ममताको मार्गदर्शन देना चाहता है ममतामे रचे-पचे मनुष्य अपने उपभोगसे पूर्व यदि थोड़ी सी धीरज धरके देवताओको लिए "इद न मम' कहना सीख पायें तो निष्कामताके मार्गपर आगे बढा जा सकेगा यही निष्काम कर्म अन्तमे आरमसुख या शाश्वत स्वर्गका सुख प्रदान करेगा. परन्तु महन्ताकी उपेक्षाके कारण इस कर्ममार्गमे प्रारम्भिक साधनावस्थामे अहन्ता और राजसगुण के साहचर्यसे पनपे क्रोधकी सम्भावना पदे-पदे रहती है कर्मयोग ममताको ही स्वस्थ बनता है (३) ज्ञानमार्ग अत अहन्ताको चिकित्सा- उने स्वस्थ बनानेका प्रयास है कर्म- योगमे जैसे ममता को देवताओंसे जोड़ा गया था इसी तरह गानयोगम हमारी अहन्ताको ब्रह्मके साथ जोड़नेका प्रयास करना पड़ता है--"योहमस्मि ब्रह्माहमस्मि अहमस्मि ब्रह्माहमस्मि अहमेवाह मा जुहोमि स्वाहा" अर्थ में जो कुछ हू-मै ब्रह्म ही हू हा, मै हू- में ब्रह्म हू मै हो में मेरा होम (ब्रह्ममें) करता हूँ. कर्मयोग जैसे प्रारम्भमे-"पुत्र च मे वित्त च मे" की कामनाओमे घिरे सवाम कर्मकर्ताको निष्काम-मंकी ऊचाईपर उठानेके लिए 'इद न मम" म प्रशिक्षित करता है वहा यज्ञाग्निमें अपनी ममताको आहूति देनी पड़ती है वैसे ही ज्ञान- योग ब्रह्माग्निमें अपनी अहन्ताको आहूति देना सिखलाता है. ज्ञानयोग हमारे अकारको चिकित्सा है ध्यान रहे कि 'अहम्' की आहूति ब्रह्माग्निमें देनी है- अपने अहकार- को धधकती ज्वालाओंमे ब्रह्मकी आहूति शानयोग नहीं है । वाक्य उद्देश्य विधेयभाव-घटित होता है जैसे "गाय प्राणी है' वाक्यमे 'गाय' उद्देश्य है और प्राणी' विधेय है. इसी तरह "अह ब्रह्मास्मि" मे 'अहम' उद्देश्य है और 'ब्रह्म' विधेय है अतएव अहमास्पद जीवात्माको ब्रह्म मानना वास्तविक ब्रह्मबोध है, तथा व्यापक अशी परमात्माके साथ अशरूप जीवात्माकी अहन्ताको सच्चे परिप्रेक्ष्यम देखना है. ब्रह्मको उद्देश्य मानकर अहकारको विषय बनाना सभी प्राणिओको गाय माननेके जैसी त्रुटी है ब्रह्म तो स्वकारास्पद भी है- "तस्वममि"म और इदकारासद भी है- "सर्व खलु इद ब्रह्म" म प्राणी तो गाय हाथी और घोड़ा आदि अनेक प्रकारके होते है अत सभी प्राणिओको गाय माननेकी जैसो गुटी यह्मको बहमास्पद माननेवाले वर बैठते है अशीको अहम् नहीं कहा जा सकता है क्योकि वह स्वम् भी है और इदम् भी अहम्को किन्तु अश होने के कारण अभी ब्रह्म कहा जा सकता है वारके जमा बेटेका चेहरा होता है बटेके जैसा वापका नही! अतएव श्रीशकराचाय कहते है कि हरोको 'समुद्रकी लहरे' कहना चाहिये- समुद्रको 'रहरोवाला समुद्र' नही (सामुद्रा हि नरग वचन समुद्रस्तारण इति). विना पर पहुच पर लहर अपनी आहूनि समुद्रमे दे देती है पर भला कभी समुद्रवी आहूति किसी लहरमे दी जा सकती है क्या 7 - ज्ञानमार्गी अहन्ताको चिकित्सापर भार देता है- ब्रह्मके साथ अपनी अहन्ताको जोड़कर उसे स्वस्थ बनाना चाहता है परन्तु इस प्रणाली ममताकी उपेक्षा हो जानी है और उसी ममताके विकृत होनेपर ज्ञानीके शानमे कामकै प्रण प्रकट हो जाते हैं ममताको छोडकर केवल अहन्ताको ब्रह्मके साथ जोड़ने का प्रयास ज्ञानमार्ग है सफल होनेपर ब्रह्मानन्दकी उपलब्धि होती है और विफल होनेपर "अह ब्रह्मास्मि' का उद्देश्य विधेयमे वदल जाता है प्राय ज्ञानमार्गीय विविदिपुके "अह ब्रह्मास्मि" वे जपमें ब्रह्मके बजाय अहम्पर भार आजाता है और इस महावाक्यका अर्थ बदल जाता है। कभी विफल ज्ञानमार्गीय साधककी उपेक्षित ममता ज्ञानमार्गपर दौड़ते हुए साध- बको रजोगुणको गोधूलोकी वेलामे शिप्येषणा जैसी कामनााका रूपधारण पर मोहपाशमे वाघ लेती है अतएव भगवान् कहते हैं- "सदृश चेष्टते स्वस्या प्रकृतान वानपि प्रकृति यान्ति भूतानि निग्रह किं करिष्यति ?" ये दोनो ही मार्ग, कर्मयोग और ज्ञानयोग के, यात्राको सफलतापर मुस्तितक पहुचाने. वाले मार्ग हैं, पर अहन्ता और ममता में से एक ही किसीको स्वस्थ करनेके ये अपूर्ण प्रयास होनेसे हमारे काम और क्रोध के रोगोको पूर्ण चिकित्सा नहीं करते भक्तियोग हो हमारी अहन्ता-ममताको पूर्णतया स्वस्थ रखनेको एकमात्र चिभित्ताप्रणाली है- अकठोर मृदु पूर्ण एवम् भयरहित । (४) "भक्ति' शब्द भज + तिन् को जोडने पर बनता है 'भज पासुकी प्रतिका अर्थ है सेवा 'क्तिन्' प्रत्ययका अर्थ होता है प्रेम अत 'भक्ति' शब्दमा कुल अर्थ होता है प्रमके साथ की जानेवाली सेवा यह भक्ति हमारी अहन्ता-ममताको पूर्ण चिकित्सा है शरणागत पुष्टिजीवो भगवरसेवामे लगाकर यह उसकी अहन्ताको भगवान के साथ जोड देतो हं- 'मोहम्' की प्रक्रियासे नहीं विन्तु 'दासोहम्' बी प्रक्रियामे सेदा मचाईमे हम उमीको पर मवन है जिसके सामने हमारा अहकार मुक जाये पुष्टिप्रभ प्रजापिप श्रीकृष्ण सम्मुम अरने अहारको 'श्रीकृष्ण शरण मम" कह कर अपया 'दामोह कृष्णम्तव" मह कर झुका देना पुष्टिभस्त या पुष्टिभक्ति की प्रतिम निहित अयं है अहसार मुवने हो तनाो भो मुना पड़ेगा अतएव मिझान्न मुसावलीमें तनुवित्तवा सेवा तथा मिक्षा नरहस्यमें सर्वममर्पण की वात ममता पर चतुलौनीम बजाधिरो भजनका हो स्वधर्म माना गया है हमारी ममताके श्रीकृष्ण के साथ जुदनेको दात चित्तको कृष्णप्रवणताके रूपमें सिद्धान्न- मुक्तावलीमे समझापी गई है. चतु श्लोकी में श्रीकृष्ण के प्रति अपनी ममताको मोडनेको क्रियावो ही पुष्टिमार्गीय काम कहा गया है. वही काम वही कृष्णदर्शन- कामना भक्ति' शब्दमें 'क्तिन् प्रत्ययका अर्थ है. चतु श्लोकीमें भजन और स्मरण के निरन्तर चकीतरह चल पडनेको फियाको मोक्ष माना गया है (स्मरण भजन पापि न त्याग्यमिति मति ). अपरोक्षम भजन या कायिकी सेवा हमारी अहन्ताके कृष्णसे जुडनेकी निशानी है परोक्षमें स्मरण या हमारे चित्तको कृष्ण-तन्मयता हमारी ममताके कृष्णसे जुडनेको निशानी है. पुष्टिमान न तो अपनी अहला या ममता को देह या विषयो म मुक्न सोडता है, और न उन्हे तोडता ही है क्योकि तोडना आवश्यक नहीं है पुष्टिमान अपनी अल्ता एवम् ममता को व्रजाधिप श्रीकृष्णके साथ जोड़ता है जिस दिन-जिस क्षण में दोनो भलीभाति श्रीकृष्णके साथ जुड़ जाती है,उमो दिन पुष्टि जीव मुक्त हो जाता है इससे अधिक और कोई मतलब मुक्तिका पुष्टिजीवके लिए नहीं होता. हमारी अस्वस्थ अहना-ममताको कारहित, सम्पूर्ण एवम् शुभ चिक्त्यिा भक्ति है अतएव थीमहाप्रभुन पुरुषोत्तम जोगीको समझाया था कि "ज्ञानमारग अरु कर्म- मारग सो कृतार्थ कठिनतामो होई . ताते भक्तिमारगर्म जीव कृतार्य होई और आश्रय नाही." जव भक्ति हो हमारे मसार-रोगकी पूर्ण चिकित्सा है तो भक्तिरसायन के अनु- पानको ही क्यो न बढाया जाये ! वस्तुत तो भक्तिको प्रोपयो मानना भी भक्तिकी पूर्ण महत्ताका विवरण नहीं है क्योकि भनि पुष्टिजीवके लिए औपघीमे कही अधिक स्वयम् म्वास्थ्य ही है परमात्मा प्रति जीवात्माकी भक्ति न होना जीवात्मा अस्वा- स्थ्यका लक्षण है पुष्टिप्रभु व्रजाधिप श्रीकृष्ण के प्रति पुष्टिजोवका पुष्टिभक्तिके भावम रहित होना भी उसकी अस्वस्थताका लक्षण है गीताके छठं अध्यायकी ममारितपर अतएव भगवान् भी कहते हैं- "मुझे कर्ममार्गीय ज्ञानमार्गीय तपस्वी माघकोमे जो योगी हैं ये अधिक मान्य लगने है. योगियों में भी श्रद्धापूर्वक जो अपनी अन्तरात्माका मेरे साथ जोड़ करके मेग भजन करते है वे मुझं सभीमे युक्ततम लगते है" इस जगनमे आहार-विहारको जिन अनियमितताओके कारण हम अपनी अहन्ता- ममताको अस्वस्थ बना लेते है, उनसे बचने के लिए श्रीमहाप भुरा स्वारथ्यवर्धक उपदेश भक्ति वधिनी'को सुनना समझना और हृदयमं धारण करना अत्यावश्यक है भावान्के अनुग्रहरे क्ल्पतरसे लिपट कर ार उठनेवाली भक्ति-कल्पवाकी वृद्धिके उपायोको जानना अत आवश्यक है भक्ति उम जीवात्मामे प्रकट होती है जिसका भगवान् मक्निके लिए वरण करने है अपनी भक्तिके हेतु परमात्माद्वारा किया गया जोवारमा वरण जीवात्माये बीजभावके रूपमे सर्वदा विद्यमान रहता है सत्सग गुरुकृपा या शास्त्रतात्पर्य-निर्णय के अनुकूल वातावरणमे कभी वह अकुरित हो पाता है और कभी नहीं श्रीप्रभुचरण कहते है कि स्वयम् परमात्मा इस एकान्तभक्ति या व्रजभक्ति के बीजको बोता है- सत्संग एपम् गुरुकृपा के जलमे उसे सीचता है- अपन अनुग्रह कल्पतरुका सहारा देकर उसे ऊपर उठाता है- उसपर उगनेवाले पुष्प-फलोको रक्षा भी एक सावधान मालोको तरह वह स्वयम् ही करता है- तव इम भक्ति-कल्पलनाका नष्ट होना या मुरझा जाना, उसे कैसे पसन्द आयेगा ? अत पुष्टिभक्तिका बीजभाव अनश्वर बोज- भाव है जन्म-जन्मान्तो तक यह नष्ट नहीं होता एक एक जन्म ऋतुचक्रवी तरह आते और जाते रहते है- किसी ऋतुमे किमी लतापर फूल खिलते है और किमी ऋतुमे नही इसी तरह भक्तिका बीजभाव भी किमी जन्म प्रमरे रूपमे अकुरित हो पाता है और किसी जन्ममे नही. भक्तिको यह कल्पलता बढकर इतनी सघन हो जाये- पुष्टिके कल्पतरुके इर्द- गिर्द इतनी फैल जाये कि दोनोके पल्लवोको पृथक करना कठिन हो जाये-- पुष्टिकल्प- तरु और भक्तिकल्पलता के पल्लव परस्पर मिलकर पुष्टिभक्तिने रूपमे दिखलाई देने लग जाये- ऐसा उपाय श्रीमहाप्रभु हमे दिखलाना चाहते है लता जब वृक्षार भलोभाति दृढतासे लिपट जाती है-- फैल जाती है- तब उसके नष्ट होने या मुरमा जाने का भय कम हो जाता है इमे ही 'बीजभाष को दृढता' कहा गया है दृढ बोजभाव तथा अदृढ योजभाष वाले जीयोंके लिए भक्तिको फलामिका वृद्धिके उपाय : अपनी प्रेमसेवात्मिका भक्तिके हेतु परमात्माद्वाग समारोपित वरणा बीज भाव जिन जीवात्माओमे दृढ़ हो जाता है वे तो निशर धवण-कीर्तनको प्रणालीसे भी भगवान्को मानमो सेवामे सर्वदा मग्न रह सकते हैं. अन एमे भा गृहत्याग भी पर माते है परन्तु जिन भक्तोका वीजभाव ही दृढ न हो उन्हें गृहत्याग नही परता चाहिये, प्रत्युत अपने घरम रहते हुए ही भगवत्सेवा तथा भापतथा में अपने आप तत्पर बनाना चाहिये तभी बीजभाव दृढ होगा भविनतीन भेद होते हैं। १) भगवास्वरूपका बाह्य भजन २) भगवत्स्वरुपका आन्तर भजन ३) भगवन्नामात्मर भागवतमा श्रवण-चिन्तनमान माहाम्यन्तरभेदेन रूपे भेदत्य मतम्। नाग्निचं ततस्त्रया भक्निमागों निरूपित ॥ बिसरा चीजमाव दा हो गया हो अर्थात् पुष्टिभक्ति भावमा रूप में अग्नि, भगवदागत्तिा पम पन्तषित तथा भगह-ममनो काम फलित होने लग गई होता ऐसे भक्तको भगवद्-व्यसनपे स्वभाववश ही भगवान्कै विरहको तीव्र अनुभूतिम सिद्धा- न्तमुक्तावलीमें दणित मानसी सेवा अर्थात् भगवत्स्वरूपका आन्तर भजन सिद्ध हो जाता है और एक कदम आगे बढनेपर सर्वात्मभावके सिद्ध होनेपर आसक्तिभ्रम-न्यायसे सभी इन्द्रियोका भगवान्मे विनियोग भी मिद्ध हो जाता है ऐसे भकोके लिए सर्वत्र भगवद्-भाव प्रकट हो जाता है घर और बाहर का भेद लुप्त हो जाता है-वे घरमे बैठे हुए हो या बाहर, उनके मन और उनकी सभी इन्द्रियो से निरन्तर भगवान्की अनुभूति चलती रहती है फलस्वरूप आसकरणदासजी (दृष्टव्य २५२ वार्ता) की तरह उनका घरमे रहना अनिवार्य नहीं रह जाता है वे गृहत्याग कर सकते है- भगवल्लीलाओका श्रवण, भगवान्के स्वरूप, गुण एवम् लीलाओको भावना तथा उनके कोर्तन को मस्तीमे, या कभी भगवद् विरहके तीव्रतापमे ऐसे भक्त कब घरको छोडकर बाहर निकल जाते है यह उन्हें स्वयम् भो मालूम नही पडता । (विरहानुभवायं तु परित्याग प्रशस्यते सन्याम- निर्णय) सर्वनिर्णय- निवन्धमे श्रीमहाप्रभु कहते है कि केवल श्रीकृष्णको ही अपना स्वामी मानकर-आन्तर और वाह्य रूपमें सभी बातोका त्याग कर- श्रीकृष्णवे विभूतिरूप सभी देवताओका सन्मान करते हुए- देहपातपर्यन्त केवन श्रीकृष्णमे ही अपने मनको जो एकाग्र कर पाते है- उनकी वाणीका और कायाका श्रीकृष्णमें विनियोग हो पाये या नही-उनके मनकी एकाग्रता स्नेहमयो बन पाये या नहीं- उन्हें श्रीकृष्णम सायुज्यका लाभ अवश्य ही मिल जाता है पर भागवत्प्रेमके प्रवल प्रवाहके कारण दारा-आगार-पुत्र आप्त-प्राण वित्त-आदिमे जिनकी ममताकी दीवार ढह जाती है और जो स्वयम् भी उस प्रवल प्रवाहके भेगसे परके बाहर फिक जाते है- ऐसे भरा व्यसनदशाके परग- भावोको भवरोमे घिर जानेसे पुन पुन डूबते और उभरते रहते है ! करोडो भक्तोम कभी-कभाक एकाद ही कोई ऐसा कृष्णपसना वन पाता है।। बीजभावकी ऐसी दृढताके अभावमे गृहत्याग श्रेयस्कर नहीं होता बोजभावके दृढ होने तक धीरज रखनी चाहिये त्याग और वैराग्य भगवदनुरागरी तीव्रताके कारण प्रकट होते हो तो उन्हें स्वस्थ एवम् सरस मानना चाहिये अन्यथा ससारमे वेवल दोषदृष्टिके कारण जो वैराग्य पनपता है वह नीरस एवम् शुष्क, अतएव अस्वस्थ भी होता है ऐसे अस्वस्य वैराग्य. वरा व्यर्थ ही किसी भी वस्तु त्याग कर देने वजाय उसे भगवान्को मपित कर देना चाहिये हमारी अहाता और ममता के विषयोको त्यागने के बजाय उन्ह थोकृष्णको समर्पित कर श्रीकृष्णको सेवाम उपयोग लानेवालेका बोजभाव दृढ हो सकता है अतएव श्रीमहाप्रभु कहते है कि अव्यावृत्त होकर स्वगृहमें स्ववर्म-भगवत्सेवा तथा भगवत्कथा- मय जोवनयापन करनेवालेका बीजभाव दृढ होता है "बोजदाढयंप्रकारस्तु गृहे स्थित्वा स्वधर्मत अव्यावृत्तो भजेन् कृष्ण पूजया श्रवणादिभि" अत पहले स्वगृहमे स्वधर्म-भगवत्सेवाकै विषयमं शास्त्रार्थ प्रकरणमे एक विलक्षण बात श्रीमहा- प्रभुने समझायो है कि ब्रह्मानन्दको प्राप्तिके लिए मोक्षकीचाहनासे भक्ति करनेवालोको यह समझना चाहिये कि साध्य मोक्षके बजाय साधन भक्ति अधिक श्रेष्ठ है जो जीव मुक्त होते हैं वे देहेन्द्रियादिके सघातको छोड़कर ही मुक्त हो पाते हैं - उनकी केवल आत्मा ही परमात्मामे लीन हो पाती है. जबकि भक्तोवो तो देह इन्द्रिय प्राण अन्त करण गृह परिवार आदि सभी कुछ उनके घरमे विराजते प्रभुको सेवामे काम आवे है मक्तका तो ससार भी ब्रह्मात्मक हो जाता है फलत जीवन्मुक्तिके वजाय भक्तके लिए तो भग- बस्कृपाके साथ गार्हस्थ्य ही श्रेष्ठतर होता है अत वीजभाव दृढ कग्नेयो लिए यह आवश्यक है कि परमे स्वधर्माचरणको निभाते हुए अभ्यरवृत्त होकर भगवद्-मजन करना चाहिये परमे रहना है तो स्वधर्माचरणका त्याग सम्भव नहीं, पर स्वपर्मको व्याख्या भी सरल नहीं है. 'स्वधर्म' का प्रथम अर्थ होता है स्वयम्के वर्ण तया आश्रम के यथाशक्ति शास्वविहिव आचरण करना शक्ति रहनेपर स्वधर्माचरणमे सकोच नही करना चाहिये क्योकि जब तक यह देह है और इस देहके साथ हमारी अहन्ता-ममता जुड़ी हुई है, तब तक वर्णाश्रम धर्म ही स्वधर्म है-- भगवद्धर्म भी विधर्म या परधर्म की तरह हो जाता है जव देहाभिमान शिथिल होने लग जाये तभी भगवद्दास्य या भगवत्सेवा आत्मदृष्टिसे स्वधर्म बन जाती है. तब वधिमधर्म भी परधर्म बन जाता है (सुयो ३-२८-२), अत इस देहाभिमान और आत्माभिमान के अति कोमल और जटिल विवेकके साथ वर्णाश्रम-धर्मका निर्वाह करते हुए कृष्णभजनमै तत्पर रहना चाहिये कृष्णभक्तिमे जैसा कि हम देख चुके है अन्ताको स्वस्थ करनेका उपाय कापिकी सेवा भज' घालुका अर्थ है, और ममताको रवस्थ करनेका उपाय चित्तको कृष्णप्रेम- प्रवण वनना है तदनुरूप अपरोक्षमे पूजा कायाको भजनमें लगाने की प्रक्रिया है और परोक्षमें श्रवण चिन्तन-कीर्तन मनको भजनमें लगानेको प्रक्रिया है स्नेहकी दृढताके विना कायामे प्रेमसेवा न भी निभ पाये पर माहात्म्पज्ञानको निभाते हुए पूजा तो निभाई जा सकती है पुष्टिप्रवाहमर्यादाग्रन्थमे इराी पूजाको- "प्रवाहेण त्रियारता" कह कर व्यक्त किया गया है सर्वनिर्णयमे २२७ वी कारिकामे लेकर २४६ वी कारिका तक भजनके इसी क्यिापक्षका निरूपण किया गया है यही "एतराव प्रयत्नेन गृहस्यस्य प्रकीतितम्" कहकर गाहाध्यमे इसकी आवश्यकता दिव. लायी है यही २४० वी कारिकामे श्रीमहापा कहते है कि श्रवण-कीर्तन आदि द्वारा जब हरि हृदयमे निदिष्ट हो जाते है तभी पूजाका निर्वाह निर्यग्रतया सम्भव हो पाता है अतएव पूजागो यदि रेवत क्रियारूप ही न रहने देना हो तो, श्रीमद्भागवतमे वनित भगवान्के स्वरूप गण एवम् लीलाओंके यवण-भावन कीर्तनको प्रणालीमे, उसे प्रेममय बनाना होगा (प्रेम्णोन्यत्साधन लोरे नास्ति मुख्य पर महत् श्रीभागवतमेवात्र पर अश्यावृत्त और तस्य हि साधनम् सर्वनिर्णय) अन्यथा प्रेमरहित क्रियासे बहुधा व्यता उत्पन्न होती ही है. श्रीमहाप्रभु अतएव वहते है-“सप्रेम इत्यनुढेगार्थम्” (सर्वनिर्णय २३०). भगवानको पूजा करते समय अनन्य भाव नही जग पाया तो हम अव्यावृत्त होकर भजन नहीं कर पायेंगे-भकिाके बजाय व्यर्थ ही मानसिक व्यग्रता बढा लेंगे. भक्तिमार्गीय जीव अव्यावृत्त भी हो सकते है और व्यावृत्त भी अत. दोनो तरहक जीवोमे भक्तिके बीजभाव की दृढताके उपाय भी श्रीमहाप्रभुने दिखलाये है व्यावृत्त अधिकारियोको भक्तिके बीजभावोंको दृढ करनेके उपाय: सभी इन्द्रियो और मन की अहमहमिकता ('पहले म-पहले मैं' को उनावल) से भगवान्के कार्योम जुट जानेको अर्थात् मेवामें तत्पर होने की वृत्ति हमारी अहन्ताका भगवानुमे विनियोग है एतदर्थ अनन्यभाव आवश्यक होता है 'भाव' का अर्थ होता है : हमारे अन्त करणमे निहित रुचि या अभिप्राय. वह यदि केवल भगवान्वे हो वारेमे हो तो उसे 'अनन्यभाव' कहते हैं अन्यथा (१)किन्ही अन्य देवताओके वारेमे (२) अन्य लौकिक अस्तु या व्यक्ति के बारेमें, अथवा (३) पुष्टिमार्गीय फलसे भिन्न किमी फरके बारेमे, हमारे हृदयको रुचि या भावना के प्रबल होनेपर हमारी वृष्णभक्ति अनन्य. भावारिमका नहीं बन पायेगी 'अनन्य भाव वाले भक्त ही अध्यावृत्त हो पाते हैं जिनकी भक्ति अनन्यभावात्मिका नहीं हो पाती चे अव्यावृत्त नहीं हो पायेंगे अत्यान्य भाव हमारे देह और अन्त करण को व्यावृत बनाये रखेंगे - वे अपनी पूर्तिरी कामनाके भावोका हमारे भीतर पैदा करके हमे व्यावृत्त बना देंगे-हमसे भव्यावृतिमय भजन सम्भव न हो पायेगा ऐसी स्थितिमें पुष्टिभक्तिमार्गपर चलने के बुद्धिगत निर्णयवे बावजूद भी हृदप इन पूर्वोक्त अन्यभावोको पूतिके प्रयास में यहा-वहां भटकता रहेगा -- व्यावृत्त रहेगा ऐसी स्थितिमें श्रीकृष्णको पूजा या कायिकी सेवा करते रहनेपर भी वह गेवाफ्लमें दिखलायो गयी - भोग, उद्वेग ओर प्रतिबन्धो से रहित सेवा नहीं हो पायेगी, फनम्वरूप चित्तमें वह व्यग्रता बढ़ानेवा ही कारण बनेगी श्रीमहाप्रभु आज्ञा करते है कि पूर्वोवत्त देवतान्तर, पदार्थान्तर, मार्गान्तर यापलान्तर के कारण जिनके देह और अन्तकरण वाह्य और आन्तर रूपमे व्यावृत्त न हो ऐसे जीवोको भगवत्पूजा और भगवत्तथा दोनोमें हो तत्पर रहना चाहिये पर जिनके देह या अन्त मरण किसी न किसी तरह न्यावृत्त हो उन्हें वृष्णसेवाका अनुष्ठान सहमा प्रारम्म नहीं करना चाहिये प्रारम्भमे केवल भगवत्स्यारे श्रवण चिन्तन एवम् कोन की प्रणालोमे चित्तको अनन्य भाव युक्त अश्यावृत्त बनाना चाहिये (. भावान्तरम- हिनो वा स हि देवतान्तरविषय पदार्थान्तरविषय. मागन्तिरविषयो वा तत्महभादोर निषिध्यते फ्लभावश्च. मुदो. ३.२५.२२) इस सुबोधिनीवी भागवतकारिकामें भक्तिका स्वरूप यो दिखलाया गया है: मय्यनन्येन भावेन भक्ति कुर्वन्ति ये दृढाम् । मत्कृते त्यक्तकर्माणरत्यक्तस्वजनबान्धवा ॥ मदाश्रया कथामृष्टा श्रृण्वन्ति कथयन्ति च । त एते साघव मावि ! मर्वसगविवजिता ।। संगस्लेप्वथ ते प्रायं मगदोपहरा हि ते ।। (भाग २।२५।२२-२४) घ्याल्या जो भगवान्म अनन्यभाव रखते हुए भगवान्को दृढ भक्ति करते है. जिन्होने आलस्यवश नही किन्तु भगवदर्य वेदादिशास्त्रोक्त अलौकिक कर्मोका तथा लोरिक स्वजन-वान्धवोका त्याग कर दिया हो, ऐसे भक्तोकी सगति करनी चाहिये निरन्तर भगवत्सेवा अथवा भगवरस्मरण में सभी कर्म तथा सम्वन्ध वाधक बनते है- अनन्यभावम कुछ न कुछ वाधा पहुंचाते ही है अन इनमे व्यावृत्त हुए विना पूगा- घवणादिमे तत्पर होना चाहिये सभी अधिकारियोम किन्तु ऐसो म्वरूपासक्ति सम्भव नही है फलत कथासक्ति- भावान्के स्वरूप गुण एवम् लीलाओ के श्रवण और कथन म आसक्ति- जिनकी दृढ़ हो एमोका सत्सग करना चाहिये ऐमे भगवदीयोक सत्सगमे- उनके मुली कथाधवण करने तथा स्वयम् भी चिनन-कीर्तन करनेसे लौकिय विषयोस ममता हटकर भगवानगे जुड पायेगी अतएव श्रीमहाप्रभु कहते है कि जो व्यावृत्त है उन्हे स्वरूपगजनके बजाय नाम- भजनम प्रवृत्त होना चाहिये इसो श्रवण-चिन्तन-कीर्तनको प्रणालीद्वारा उनका बीज- भाव प्रेम-आसक्ति व्यसनको अवस्थाओम विकसित हो पायेगा बीजभावको दृढ हुआ तभी समझना चाहिये जब हमारे देह और अन्त करण की व्यावृत्ति देवतान्तर पदार्थान्तर मागानर एवम् फलान्तर के वारेम न्यूनसे न्यूनतर होती हुई सर्वथा समाप्त हो जाये परमें भगवत्मेवा जिनमे नहीं निभ पाती परन्तु भगवत्कथाके श्रवण-भावन-कीर्तनको प्रणालोसें जो अपनी भक्तिके बीजभावो दृढ करने के लिए आगे बढते है, उन्हे इस यात्राम ये कोशम्नम्भ (milestona) आने भक्तिके मागंपर मिलेंगे (क) जन वीजभाव भगवत्स्नेहवे म्पमे अदुरित हो जाता है तर गृहस्थका अपने घर-परिवारम रहा अनुराग खतम | जाता है यह अवस्या बड़ा विलक्षण है. भगवानमें अनुराग बढने लगा तो भगवद-भरितम अनुपयोगी प्रत्येक वस्तुमे पर परिवार आदिम अनुराग घटने लगेगा. जो अमावृत्त होकर अपने घरमे भगवस्मेयाय निवाम बरले हैं उनमा अनुराग नष्ट होना आवश्यक नहीं है क्योकि उनमा घर उनसे अहना-ममना मन्तुष्ट करतेरे लिए नहीं होता प्रत्युत भगवत्मेवाका स्थल - भगवन्मन्दिर ही होता हैं. उनका परिवार भी सासारिक ममताके बन्धनमे बंधा हुआ नहीं होता प्रत्युत भगवा सेवा करनेवाले विभिन्न सेवकोका भक्तिके बन्धनमें बंधा हुआ परिवार होता हैं अत: बौजमाव प्रेमा. त्मना अकुरित होता है पर दूसरी ओर रागविनाश नहीं होता. (ख) भगवत्कथामार्गसे योजभावको दृढ करनेकी दिशा में आगे बढ़नेवाले पात्रोको द्वितीय क्रोशस्तम्भ भगवदासविसका मिलेगा जैसे ही भगवदासक्ति सिद्ध हुई कि अपने घर परिवारम जो अनुराग खण्डित हुआ था वह अब घर-परिवारमे अरुचिका रूप धारण करने लगेगा भगवदासात भातको यह प्रीत होने लगेगा कि मेरे घर और परिवार न केवल मेरी कृष्णमनिमें अनुपयोगी है बल्कि ये मेरो कृष्णासस्सिमें किसी न किमी तरह बाधा पहुचानेवाल है. वस यही मनोभाव उसमें अपने घर-परिवारके प्रति अरुनि जगा देता है अभी तक अपने घर और धरमे रहने वाले जिन माता-पिता पति-पत्नी पुत्र-पुत्री या बन्धु-वान्धवो को वह अपना मान बैठा था अब उसे लगेगा कि ये मेरे सगे नहीं है, क्योकि श्रीकृष्णके प्रति मेरे हृदयकी आसक्तिमे ये अपना हिस्सा घाटना चाहते है. प्रत्येक सदस्य अपने परिवारके दूसरे सदस्यकी अपने स्वाभाविकतया आसक्ति चाहता ही है. यही माग भगवदासक्त भक्तको अरुचिकर लगने लगती है परन्तु अपने घरमे कृष्णसेवा करनेवाले भक्तमे भगवदासक्ति तो प्रकट होती है पर घर-परिवारमे अरुषि प्रक्ट होनेका कोई कारण नहीं होता. (ग) तीसरा क्रोशस्तम्भ भगवत्कया-प्रणालोसे भक्तिमार्गपर आगे बढ़नेवाले यात्रीको व्यसनदशाका मिलता है. यहा तक पहुंचनेवाले भक्तकी दशा बड़ी विकल हो जाती है. अब वह भगवान्के बिना एक क्षण भी रह नहीं सकता. भगवान्के स्वापका चिन्तन करता हुआ, भगवान के गुणोका स्मरण करता हुआ तथा भगवानकी विविध लीलाओके मनोरयपर सवार भक्तका मन अब अपने भवितके पथपर लेशमात्र रुकावट या व्यव- धान सहन नही कर पाता. वह अमहिष्णु बन जाता है. उसे श्रीकृष्णका व्यसन हो गया समझ लेना चाहिये ! यही यह अवस्था है जहा पहुचते ही भक्त को यह समझमें आ जाता है कि "गृहस्थिते रत्कृष्टत्वं न भगवदीयत्वमात्रेण किन्तु भगवता सह स्थित्या भगवत्कार्या वा अन्यथा त स्थातव्यम्" अर्थ स्वपम्का भगवदीय होना घर रहनेका स्वस्थ हेतु नही है, किन्तु भगवान के साथ रहना अथवा भगवत्मेवार्थ रहना ही उत्कृष्ट हेतु है, अन्यथा गृहत्याग ही उचित होता है (सुबो. ३१११२). एकदिन अचानर भक्तके अना करणमें ऐगी आवाज आनी शुरू होती है- फिर मो स्वयम् उसे भी पता नहीं चलता कि वह कव घरके बाहर हो गया। इस अन्दरसे उटतो आवाजको अनसुनी करने में वह ममर्य हो पाये तो समझ लो कि वह अटक गया या मस्तिपथसे कही भटा गया है ! अतएव श्रीमहाप्रभु कहते हैं- "तादास्यापि सततं गस्थान विनाश त्याग कृत्वा यतेद् पस्तु तदर्थार्थकमानस लमते मुदृढा भक्ति सर्वतोम्यधिका पराम्" कथाप्रणालोसे व्यसनभाव सिद्ध होते ही घरसे बाहर निकल जाना श्रेयस्कर होता है अन्यथा व्यसनदशामे फलित होनेवाला बीजभाव भी सर्वात्मभाव या अलो- किक सामथ्र्य में पलिप नहीं हो पायेगा. ऐसे घरमे रहनेसे क्या लाभ जो कृष्ण भक्तिका अग न हो? यह गृहपरित्याग कृष्णव्यसनके आवेशमें कृष्ण के विरके कारण होनेवाला परि- त्याग है. जगतमे पैदा हुई दोषदृष्टिके कारण किया गया अस्वस्थ नौरस-शुष्क त्याग नही, किन्तु श्रीकृष्णमे वृद्धिगत हुई प्रेमदृष्टिसे विवश होकर किया गपा सरस प्रेमपूर्ण स्वस्थ त्याग है. सर्वनिर्णयमे इस गृहत्यागके दाद एकाकी निस्पृह शान्त- भावो- कही रुके बिना- देहपालपर्यन्त निरन्तर तीर्याटनका प्रम श्रीमहाप्रभुने समझाया है. यात्रा तीयोंकी करनी है न तो पुण्यको खोजमे और न मोक्षको खोजमे हो किन्तु श्रीकृष्णको खोजमे- "कृष्ण एव तात्पर्य न तु तीर्थादो देहपालनपर्यन्त च पर्यटनम्" प्रेमके इस कठिन त्पागमार्गपर जो चलने का साहस नहीं जुटा पाते परन्तु परसे निकल पडनेको जिनकी तंगरी हो ऐसे भक्तोको सहसा दुसाहस नहीं करने की सलाह थीमहाप्रभु देते है. इस त्यागमार्गपर चरते हुए जरा चूके कि भक्तिहीन गृहस्थसे भी अधिक नीचे गिर पडनेको भीति रहती है गृहस्थमे तो पुषणा वित्तषणा या लोकपणा वे दोप रह सकते है परन्तु त्यागीमे कही ससारो जीवोके ससगंसे मिष्यपणा जग गई तोमारा स्याग चौपट हो जायेगा । पुत्र वित्त और लोर तीनोकी वासना शिष्यसपहकी वासनाम मूक्ष्म- तया विगुणित हो जाती है ।। परसे बाहर निकलने के बाद भी त्यागो भक्तका समर्ग तो ससारी और भगवद्धि- मुम्व वाक के साथ टूट नही पायेगा भगवान्का अनिवेदित अन्न अथवा पञ्चमहासान करनेवाले गृहस्था अन्न यावर अन्नदोपवश ही अघ पातरी सम्भावना अधिक रहती है अत सर्वथा अमग और अपरिग्रह होनेरे साथ जब तक म्यसनमा प्राग्न न हो तवमा त्याग अयस्कर नहीं होना. वेवल भगवरमाप्तिरी कामना हृदयम रहे और मारी वामनाय नि दोष हो जाये तभी स्वाममार्गपर आरोहा करना चाहिये. स्याहत्याग और हरिग्रहवास पचाप्रणालीद्वारा प्रेमागविनम्मानी मिा प्रवासामा उव बीजभार दुर हो रहा हो और परमे भगवावा निहि दास न हो नव एमे घरपे रह पाना भग- यीय के लिए जागर हो जाता है पर भक्तिमार्गीय मन्बामपन अग्नी लिन भी पति भक्त अपने-आपसे समर्थन पाता हो तो करा परना चाहिये।
श्रीमहाप्रभु कहते है कि ऐसे व्यक्तिको ऐसे हरि-स्थानोपर जाकर वस जाना चाहिये जहा भगवत्मवापरायण भवनगग निवास करते हो ( उदाहरणतया बज, चोरासी बैठन, नाथद्वारा, जगदीश, श्रीरग, पढरपुर, द्वारका, निरुपति इत्यादि). इन भगवत्सेवा- परायण भक्तोकी मेवार परिचर्या अर्थात् सहायक बननेका अवसर मिले तो सबसे अच्छी बात है अन्यथा इनके सत्सगका लाम तो लेना ही चाहिये। इन भगवदीयोके साथ रहनेका तात्पर्य यही है कि जब वे भगवत्सेवामे रत हो तो हम भी उनको भगवरलेवामे राहायक वन कर कुछ भगवत्परिचर्या वर पायें मेवा वहिरा साधनोको सम्पादित करनेमे उन्ह सहयोग दे पायें और इस तरह तनका सेवामे विनियोग हो. यह सिद्धान्तमुक्तावलीमे वर्जित तनुजा-सेवा नहीं है, यह तो एक पुष्टि- मागीय सम्वन्धम बर्तवाले एक व्यापक परिवारकी भावना है एक परिवारमें पिता भगवरमेवा–अतरग-सेवाम परायग हो तो पुत्र भगवत्परिचर्याम बहिरगसैदाम परायण होता है परनो सेवा करती हा तो पतिको परिचर्या करनी चाहिये इसी तरह जन्मना एक परिवार न भी हो पर र पुष्टिमार्गमें जिन दो भक्तोको एक परिवारकी तरह साथ रहना हो ता एक अपन घरम विगनमान प्रभुको अन्तरगमेदामें तत्पर रहे और दूसरा बहि- रगसेवामे यह अनुज्ञा श्रीमहाप्रभु देना चाहते है साथम भगवासेवा करगे तो साथमें भगवत्प्रसाद भी लिया जा सकता है यह अति उदात भावनापर अवलम्बित होता है सवैतनिक तनुजासेवा अथवा उदरपूर्तिके हेतुसे नहीं वह तो सिद्धान्तमुक्तावलीमे ही वजित किया जा चुका है इसमें एक सावधानी किन्तु अपेशिन है कि न तो इतने अधिक समीप जाना चाहिये किमोके कि ए को दूसरे के दोष दिखलायो देने लग और न इसने दूर ही रहना चाहिये कि एक भगवदीय द्वारा की जाती भगवत्सेवा या भगवत्कया के लाभसे दूसरा भगवदीय सवथा वञ्चित ही रह जाये (अदूरे विप्रकर्ष वा पथा चित्त न दुष्यति) अपने परको छोडकर निकल जानवाला भसभी इस तरह भगवत्से वापरायण भगवदीयोरे साथ उनके हरिगृहमे वास करते हुए यदि भगवत्सेवा और भगवत्कथा को निभा पाता है तो कभी उसका नाश नही होगा यदि एक भगवदीयवी दूसरे भगवदीय साथ इतनी घनिष्ठना न भी पनपे कि दोनो साथ मिलजुलार भगरत्नवा कर पाप तो भी दोनो साथ मिलकर भगवरकथा तो वर सरते ही है इस तरह यदि अपने घरको छोड़ दिया हो पर दुसगसे बचना हो तो पुष्टिमार्गीय अन्य भगवदीयका मत्मा प्राप्त १ मूल्त गोस्वामी धर्मादायीको गृह्सेदामें जो मुखिया भौतरिया, जलपरिया आदि भगवा सेवाने सहयोगी देखे जाते है वे इमो तरहके अपने घरको छोडकर परिचर्याय आनवाले महा भाग्यवान भगवदीय होते पे- मवन निक कर्मचारी नहीं अतएव इन् भगवत्प्रमादी अन्न वरत्र देनकी mनीत परिपाटी थी वेतन नही कालकममें वह विकृत होकर जामेशत्रय परिणत हो गई EDITORS' NOTE, rrüft is this twelfth of the Sixteen Sacred Books nfuta wa It is the foundation of an, and it clearly slon: the inmans lig which *** tovarls Godina le incrrgard and strengthened. Nothing u said ir no about the rata, por live erfurt 18 strong enough to lead bin to final mut; the 1979 wlund 1124 to resort to an and umtaka after Ina 1974 te foro insarde Gnol, slutch 19 produced only I IIIA Grace 2.24 boere strengthened tato stiri7 and 6977. Such a sorent, who cannot live without God, should kcase Borldly surroundings, and realise 1lis separation unolistructed. Such a # 19 referred to in parte eum and he stata re described in anal TTTT... ertama FA It is for such a we, that in अन्यागाीर्णय It is sad विरहानुमवार्य तु परित्यागो प्रशस्पटे Ili9 79 nothing can but it #71 fiz For the afra-end almost all the people of the modern times should be included in this category ---tha method of strengthening the state 1 e, the divine love which is tria gift of HI13 Grace, is as folloks --He must stay in TERITA, obsesso animis, give np worldly pursuits and worship asor by , Esen if he cannot gise up worldig pursuits on account of porcrty do, ho must concentrato his mind us of the remover of all pains, and alsrays try for 197 &c, till the ata gernunates, and 24, TAPET and are producer) The test of doino love is terrar:T, the test of divine erafts 15 ZR, all the people in the house look like hodrances-nay, strangers. The test of 2297 is the mability to live without Divine Presence, als PGAT Even such a व्यसनी or विरहातुर should not constantly stay at hoine, beciuse it is a prison, full of प्रवण 1803 fetters The me stated above is not easy, it is full of obstacles due to tai and 377 Hence it is better to slay in a frazy, in the company of 748, who are sholly engrossed in serving the Lord There also the Aspirant should stay near or distant, in such a way that his fire is not spoiled awareri says that has tho 19 wholly engrossed in Ags or For till bus life yll pever perish.
EDITORS' NOTE this 4 If one is really anxious to go to God, he will learn much from The fourteen commentaries that we have been able to collect and publish show the various aspects from which we can look at it of each of the first cight commentaries we had three to five copies, and from the nith we had only one copy of each Of श्रीकल्याणरामजी commentary we had got a nss written by his illustrious son siteR245 of vigtars we had a mss corrccted by lumself in his own band writing, and of 10 11, 13 and 13, we had the original mss written by the authors themselves A large collection of these commentaries we got from Pandıt Gattulala's Library and we arc grateful to the departed Pandit for his vast and varied collection of mass Some mss we were able to get from the Bhandarkar Roserrch Institute for which we are thankful to Dr SK Belvallar Shri Vallabhalali son of Shri Devkinandanje niso gave us some mss and we acknowledge our gratefulness to h m Lastly some important original mss Mr Telvala was able to collect while on tour at श्रीनाथद्वार कोटा काक्रोली &c Jhalani BA We note with pleasure the help that we have roccived in the preparation of press copies of some of these mes from Messrs Gopaldas of Ujjain Dhirajla! Kashinath Pandya of Anand Cl andulnl C Shah Bechardas Maganlal und Purushottamdas Trıbl uvandas of Nadiad This worh is printed from the funds supplied by नित्यलीलास्थ गोखागी श्रीजीवनलालजी of पोरबंदर and his son औरणछोडलालजी and our sincere thanks are due to them With feelings of joy yo offer this fruit of our labour of love at the Lotus Leet of Ford Shri Krislina ВозрАТ Varch 1921 mohon MULACHANDRA T TELIVALA. DIIIRAJLAL V SANKALIA.
પ્રસ્તાવના, Rવાછરે ઊંડશગ્રન્થની માયા જે અમારાઢારા પ્રકટ થાય છે તેના આશ્રયદાતા શ્રીસુદી મપુરીસ્થ શ્રીસ્વામિ શ્રીજીવનલાલજી ગત શ્રાવણ કૃષ્ણ નવમી-દમહોત્સવને દિવસે નિત્યલીલામાં પધાર્યા છે, અને તેથી સાપ્રદાયિક વિજ્ઞાકાર્ય મહાન અલાભ થયો છે श्रीस નલાલજીનું પ્રાકટ્ય શ્રીમદ્દગોકુલમાં સવત ૧૮૧૬ માગીર્ષ શુકલ ગયોદશીને દિવસે થયું હતું આપશ્રીનો ઉપનયન સંસ્કાર શ્રી જગન્નાથજીમાં થયો હતો. સંવત્ ૧૯૩૫થી આપશ્રી પોરબંદર પધાર્યા અને નિવાસ ત્યજ કર્યો ત્યારથી આપશ્રી પરબદરવાલા શ્રીજીવનલાલજી એ નામથી સંપ્રદાયમાં પ્રસિદ્ધ થયા પડિત ગલાલાના સપથી વિદ્યામાં અભિરુચિ રાખનારા ત્રણ ગો સ્વામી મહારાજે શયા ૧ ચિકેતે શ્રીગોવર્ધનવાડજ, ૨ શ્રીદેવીનન્દનવાલજી, ૩ શ્રીજી વનલાલજી આ ત્રણમા શ્રીદેવકીનન્દનજી રિવીવામાં પ્રથમ પધાર્યા દેવકીનન્દનજીને વિદ્યાનુરાગ અપેક્ષિત રીતે સાંપ્રદાયિક ન થયો અને તેથી જનમનોરંજન કરીને વાપિ હતી ધનસંપત્તિ તથા કીનિ સંપાદન કરી તોપણ આપશ્રીના જીવનમા સાપ્રદાયિક નોંધ લેવા જેવું વિવાકાર્ય એક પણ ન થયું એથીના લાયજી શીવલ્લભભાવક છે ન્યૂનતા દૂર કરે એ સ્પ હણીય છે કેતકીનો વિવાનુરાગ ઉજવે છે, પરંતુ રાજકાર્યની ખટપટમા આચાર્યશ્રી તરીકેનુ પ્રધાન સ્નેચ-સાપ્રદાયિક વિવાનું રાજી-તેમા અપેક્ષિત સ્થાન અદ્યાપિપર્યન્ત એઓશ્રી આપી શક્યા નથી ત્યાના આશ્રિત જૂની શૈલિના ટુકી દૃષ્ટિવાયા અને દેશકાર નહિ સમજનારા અને સાપ્રદાયિક સાહિત્યના રક્ષણનુ શૈરવ અપરિસ્થી નહિ અનુસરનાર પતિ ઘણે અંશે આ પરિણામમાં જોખમદાર છે શ્રીજીવનલાલજીને વિદ્યાનુરાગ જ્યારથી બીજરૂપે રાયો સારથી નિત્યલીલામાં પધાર્યા ત્યા સુધી વૃક્ષાદિપે વૃદ્ધિગત થતો જ ગયો આપશ્રીમા વિદ્યાની પરીક્ષા કરવાની અને કાર્ય સેવાની શક્તિ હતી રાજ કારણથી આપશ્રીએ છ0નશાસ્ત્રી તથા બાલશાને આશ્રય આપ્યો હતો છગનલાલ શાસ્ત્રી સાથે આપશ્રી શ્રી સુપિન્યાદિનું વાચન કરતા એટલું જ નહિ, પરંતુ સમયોચિત કેટલાક મો ગુર્જર ભાષામાં લખાવી પ્રસિદ્ધ કરાવ્યા બાલશાસ્ત્રી સાથે પણ આપશ્રી મુબોધિનીજીનું વાચન નિયમ કરતા, અને અન સમયે શાસ્ત્રી હરિકૃષ્ણને પોતાના આશયમાં રાખીને આપશ્રીએ શ્રીસુધિનીજીનું વાચન પ્રવચન નિત્યલીલામાં પધાર્યા ત્યા સુધી સતત ચાલું રાખ્યું મહારાજશ્રીની વ્યાવહારિક કાર્ય કરવાની કુશલતા પણ ઘણી હતી આજ કારણથી આ પછી નિજ તનુજ રણછોડલાલજીને રહતી સમૃદ્ધિ વારસામા સોપી ગયા છે, અને તે બધી ચિન્તામાંથી મુક્ત કરી ગયા છે શ્રી રણછોડલાલજીએ પણ જિપિતૃચરણનું નામ તબીe 1 કુલ સાહિત્ય સમેત શ્રીસુધિનીજીની પ્રસિદ્ધિ કરવાનો સંકલ્પ કર્યો છે તે અત્યન્ત યોગ્ય છે એના જેવું રચારક અન્ય શું છે શકે? મ.
મહારાજશ્રીનું કાર્યકાય અસાધારણ હતુ એટલુજ નહિ પરંતુ સમયેચિત રીતે કાર્ય કરતા હતા દયાન-દાદિના મોહથી લોકોને ઉપનયનાદિનો મેહ થતો આ મોહથી તે લોકો માર્ગમાથી ભ્રષ્ટ ન થાય તેથી આપશ્રીએ ઘણા વૈષ્ણવોને ઉપનયનમસ્કાર કરવા આ શ્રીની ઉદારતા પણ ઘણી હતી પ્રત્યેક જે એઓશ્રીના સબંધમાં આવતું તેને આપશ્રી દુચિત રીતે સકારાદિ કરતા આ પ્રકારે અનેક રીતે આપશ્રીનું જગમગફકત તેમને પુરતું મહારાજશ્રીની કાર્ય કરવાની દૃઢતા પણ પ્રશસનીય હતી જ્યારે આપશ્રીએ મને ડિશ ન્યોની રાકલ સાહિત્ય સમેત પ્રકટ કરવાની સેવા સોંપી, તે સમયે સપ્રદાયના અન્ય પડ- તેએ તેમ નહિ કરવાને આપશ્રીને સૂચવેલું. બીજી તરફથી એ કાર્ય થાય છે, તેમા વચમા પડવું નહિ, આ લોકે તે વણિફ છે, તેમને એ કાર્ય સોંપાય નહિ' વગેરે વગેરે ઘણી રીતે મહારાજ શ્રી રામનવવામા આવેલા પણ એઓશ્રીની દૃઢતા તથા પ્રભુકૃપાથી અને એ સેવા અમારા દ્વારા થઈ, અને અમને જાણીને સંતોષ થાય છે કે ઉકા પતિ પણ અમારા કાર્યથી પ્રસન્ન થયા છે. આર્ટિસ્ટ પાસે તૈયાર કરાવીને આપશ્રીનું ચિત્ર સત્ર ધર્યું છે- ग्रन्यादिसंग्रह. ૧ પ્રથમ ટીકા શ્રીમદાચાર્ય પોત્ર શ્રી બાલકૃષ્ણજી-શ્રીમવિલેશ્વરના તૃતીય કુમારની છે. આ મકાના ત્રણ પ્રતિ પ્રાપ્ત થઈ હતી એક પડિત ગવાલાના સરહમાથી અને બીજી બે ચાજમાથી અમને મળી હતી ૨ દિતીય ટીકા શ્રીશ્રી વલ્લભ-શ્રીગોકુલેશ-શ્રીગુસાઈજીના ચતુર્થ લાલજીની છે આ ટીફાને ચાર પ્રતિ મળી હતી-બે ૫ ગલાવાના રસયહમાથી, એક ટીવલભલાલજીના સહમાથી, અને એક ભાડારકર રિસર્ચ ઇંસ્ટીટ્યુટમાંથી ૩ તૃતીય ટીકા શ્રીરઘુનાથજી-શ્રીગુસર્યજીના-પચમ પુત્રની છે આની ત્રણ પ્રતિ ૫ ગ લાલાના સમહમાથી મળી હતી, અને બે થનામાથી ૪ ચતુર્થ ટીકા શ્રીગુસાઈજીના પત્ર શીયાણરાયજીની છે આ ટીકાની ચાર પ્રતિ મળી છે આમાથી એક લો શ્રીહરિરાયલ્ટના નિજ શ્રીહસ્તાક્ષરમાં લખેલી છે ૫ પચમ કા શ્રીહરિરાયજીની છે આ કારિકાત્મક કાની પાચ પ્રતિ મળી છે ત્રણ N ગાદલાવાની સમહમાની છે, એક શ્રીવલ્લભરાવજીની છે, અને એક યાત્રામાથી અમને પ્રાપ્ત થઈ છે ૬ લઇ ટીડા શ્રીહરિરાયજીના ભાઈ શિક્ષાપત્રવાળા શ્રીગોપેશ્વરજીની છે. આની એ પ્રતિ યાન માથી અમને પ્રાપ્ત થઈ છે ૭ સપ્તમ ટીકા થી પુણોત્તમની છે આ ટીકાની પાચ પતિ મળી છે ત્રણ ૫ ગલા લાના સંગ્રહમા, એક થીવધુભવાયથી, અને એક નડીયાદમાથી પ્રાપ્ત થઈ છે આમા એક થીપુરામજીના નિજશ્રી હસ્તાક્ષરમા શોખેતી છે એઓછીનો પરિચય પૂર્વ પ્રકટિત સૈન્યમા કરાવ્યો છે આ કામ છાપે ટિપ્પણ થીયોગી શ્રીગોપેશ્વરજીના હસ્તાક્ષ ૨માં ખેલ ૮ ૨૧મ ટીકા કાકા થી૧૧મદની છે એ શ્રી પરિચય પૂર્વ પ્રકટત અન્યોમા ડરશો છે આની પય પ્રતિ મળી છે કે પાત્રમાંથી અને ત્રણ ૫ મલાલામ થી. ૮ નવમ ટીકા માપતિ જય સોપાયમાની છે પરિચય તેમને સેવામાં કરાખ્યો છે. આની એકજ પ્રતિ યાત્રામાથી પ્રાપ્ત થઈ છે ૧૦ દશમ ટી દીક્ષિત લાભની છે આની એક પ્રતિ ચાત્રામાથી પ્રાપ્ત થઇ છેઆ મૂળ પ્રતિ હોય એમ લાગે છે, લાલૂટનો પરિચય સેવાફલમાં કરાવ્યો છે ૧૧ નવમી વિવૃતિ બારકર રિસર્ચ ઇચ્છીમાથી મળી છે મૂડ જ પ્રતિ હેય એમ લાગે છે ટીકાકાર કોઈ ગોસ્વામી મહારાજ હોય એમ લાગે છે ૧૨ દ્વાદશ ટીકા શ્રીવમાત્મજ શ્રીબાલકૃષ્ણજીની છે આ પણ મૂતજ પ્રતિ છે. આ પ્રતિ યાત્રમાથી અમને પ્રાપ્ત થઈ છે ૧૩ દશ ટકા કેની છે તે અજ્ઞાત છે એ પુસ્તક ઉપર શ્રીગિરિધરનું નામ છે તેથી થાગિરિધરકૃત એમ કુ ચુ છે આ ગોસ્વામી શ્રીકાકારોમાં થયેલા હોવાથી તેજ ગૃહના કોઇ ગુસ ઈજીની આ ટીકા હોવાનો સંભવ છે આ પુસ્તક પણ મત જ છે કદાયિત આણંદની બેઠકવાળા શ્રીવિ, નાથજી આના કર્તા હોય ૧૪ ચતુર્દશ ટીકા કોની છે તે પણ અજ્ઞાત છે શ્રીદ્વારકેશજીનું નામ કલ્પનાથી મૂકેલું છે આ સત અશુદ્ધ તથા વટિત છે ૫ ગ લાતાના સમહમથી મળી છે યમતિ શોધી છે ગોપાળદાસ ઝાવાની બી એ ચદુલાલ ધીરજલ પડ્યા બેચરદાસ પુણ્યોત્તમદાસ દિનો લિખનમાં ઉપકાર થયો છે. વિધિનીનો સાર અને અંગ્રેજીમાં આપે છે ઉપર જણાવેલા સર્વને અમે ઉપકાર માનીએ છીએ શ્રીજીવનલાલજીનુ તથા એઓશ્રીના લાલજી શ્રી રણછોડલા નજનું સાહાએ મુક્ત કંઠે સ્વીકારીએ છીએ અને શ્રીમહાપ્રભુચરણકમલમ આ 2 ને સમર્પીએ છીએ મુંબઈ ૧૮૭ દોલોત્સવ સૂચન્દ્ર તેલીવાલા “લાલ સાકલીયા, श्रीकृष्णाय नमः। भक्तिवर्धिनी। श्रीमबल्लभाचार्यप्रणीता। यथा भक्तिः भवृद्धा स्यात्तथोपायो निरूप्यते । चीजभावे दृढे तु स्यात्यागाच्छ्रवणकीर्तनात् ॥१॥ बीजदार्यप्रकारस्तु गृहे स्थित्या वधर्मतः। अव्यावृत्तो भजेकृष्णं पूजया श्रवणादिभिः ॥२॥ व्यावृत्तोपि हरी चित्तं श्रवणादौ न्यसेत्सदा । ततः प्रेम तथासक्तिर्व्यसनं च यदा भवेत् ॥ ३ ॥ यी तदुच्यते शास्त्रे दृढं यन्नापि नश्यति । लेहाद्रागविनाशा स्थादासक्त्या स्याहारुचिः॥४॥ गृहस्थानां बाधकत्वमनात्मत्वं च भासते । पदा स्थायसनं कृष्णे कृतार्थः स्यात्तदैव हि ॥५॥ तादृशस्यापि सततं गेहेस्थानं विनाशकम् । त्यागं कृत्वा यतेवस्तु तदर्थाथै कमानसः ॥६॥ लभते सुदृढां भक्ति सर्वतोभ्यधिकां पराम् । त्यागे धाधकभूयस्त्वं दुःसंसर्गात्तथानतः ॥ ७॥ अतः स्मेयं हरिस्थान तदीयैः सह तत्परैः। अदूरे विप्रकर्षे वा यथा चित्तं न दुष्यति ॥ ८॥ सेवायां वा कथायां वा यस्यासक्तिढा भवेत् । यावज्जीवं तस्य नाशो न फापीति मतिर्मम ॥९॥ पाधसंभावनायां तु मैकान्ते वास इष्यते । हरिस्तु सर्वतो रक्षा करिष्यति न संशयः ॥ १० ॥ इत्येवं भगवच्छान गर्दतत्त्वं निलपतम्। य एतत्समधीपीत तस्यापि साइदा रतिः ॥ ११ ॥ इति श्रीमद्वल्लभाचार्यप्रकरिता भक्तिपर्धिनी समाता । यसेत् , योर । स्थानम् । । विनाशनम् । ४ यसेद । ५ भदूरम् , मदुर। मया गुप्तम् , सत्यम् ।
श्रीकृष्णाय नमः।
भक्तिवर्धिनी।
श्रीमहालकृष्णकृतवितिसमेता ।
रत्यन्ते खेदपिन्दुश्रितमुखकमलस्तामवष्टम्प जातो
निःस्पन्दः श्रान्तियुक्तो मलयजपवनासेवितः पुष्पतल्पे ॥
श्रीराधावक्रपयागुतमधुचिरतःपानघूर्णायमानो-
द्विक्तः खेहादृष्टिः प्रतिफलतु दृशोः शीघ्रमेव भजेशः ॥१॥
इह खलु स्खेनैव साक्षागवते निवेदितान् भक्त्वरितचित्तान् सर्वान् भक्तिप्रवृद्धय-
र्थमुपायानभिज्ञान् परमकृपया तानुपायानाचार्या उपदिशन्ति यथा भक्तिरिति ।
यथा भक्तिः प्रवृद्धा स्यात्तथोपायो निरूप्यते ।
वीजभावे दृढे तु स्यात्त्यागाच्छ्रवणकीर्तनात् ॥१॥
येन प्रकारेण भक्तिः प्रवृद्धा स्यात्, प्रकणैधमानोचरोतरं भगवति स्याद्, यस्या न
कदाचिदपि हासः । एतादृशस्तबद्ध्यनुकूल उपायो निरूप्यते नितरामुच्यते । यप्रकारक-
निरुपणानन्तरं न कोप्युपायस्तिष्ठत्यवशिष्टः । एवं प्रतिज्ञां कृत्वा दृढ़ वीजभावं तत्र प्रथम
भक्तिप्रवृद्धौ हेतुमाहुः बीजेति । भक्तिकल्पतरुप्रवृद्धिकारणभावो वीजमावः । अनुग्रहो-
तरकालीनभाव इति यावत् । यद्वा । बीजपदं सत्पुरुषपरम् । तस्मिन्यो भावो भगवत्वेन
भावः । 'आचार्य मां विजानीयात्' 'अविद्यो वा सवियो 'त्यादिवाक्यैः । स यदा वक्ष्य-
माणसाधनढो भवति, तदा सा तथा भवति । अथवा, बीजपदेन भगवानेवाच्यते । त-
स्मिंस्तस्य तधात्वे सा तथा भवति । ननु बीजभावोत्पञ्चायनुग्रह एव हेतुरित्यत्र को हेतुः ।
उच्यते । नहि तदुतत्तौ कर्म । तजन्यत्वेनाथूपमाणत्वात् । नापि खतः । चेत्स्यादृष्टः
स्यात् । नापि स्वभाववैचित्र्यं वक्तुं शक्यम् । अनुक्तस्वात् । तेन 'यमेवैप घृणुत' इति
'यदा यमनुगृहाती'त्यादिवाक्यैः स एव हेतुत्वेन वाच्यः । निश्चयार्थकस्तुशब्दः । हेत्व-
न्तरमाहुः स्यागादिनि । सागाद्भक्तिः प्रवृद्धा सात् । त्यागस्तु भगवचरणारविन्दप्राप्त्यर्थ
सवासनगृहादिविस्मृतिः। केवलत्यागेनैव सा तया न भवतीत्यत उक्त अवणकीर्तना-
दिति । प्राणिवर्जितनातिबाचित्वेनैकवनावः । श्रवणकीर्तनाभ्यामपि सा तथा भवति ।
एवं भक्तिप्रवृद्धौ हेतुप्रयमुक्त्वा पीजभावदायप्रकारमाहुः दीति ।
वीजदार्यप्रकारस्तु रहे स्थित्वा वधर्मतः।
अन्यावृत्तो भजेकृष्णं पूजया श्रवणादिभिः ॥२॥
२ भक्तिवाधिनी । वीजस्य दायें यः प्रकारः स उच्यते । तुशब्दः पूर्वभेदकः । यत्स्वगृहे स्थित्वा स्वधर्मतः स्वधर्मेभ्यो वर्णाश्रमधर्मेन्यः अव्यावृत्तस्तत्सहितः सन् कृष्णं पूर्णपुरुषोत्तम भक्त्यै- कगम्यं मजेत् । कैमजेदित्याकांक्षायामाहुः पूजयेति । कृष्णं पूजया मजेत् । पूजा त्याग- मोक्तप्रकारेणाईणीयोपचारः । ननु पूजया मगवजनं कथम् । मतेरेव पूजास्पियत्तात्, नतु भगवतो, यतः 'भक्तियोगं स लमत एवं यः पूजयेत मा मिति भगवद्वात्मविरोधात् । सत्यम् । अस्ति पूजाविपयत्वं मक्तेः, परन्तु मूले हि परम्पराकारणलाभिप्रायेण पूजाव्यप- देशो, न तु साक्षात् । तेन कृष्णपदं तु भवस्य पुरुषोत्तमगामिनी पूजापि भवतीत्यत उक्तम्। यद्वा । एवंविधनिःकामपूजाफलविषयनिर्धाराय कृष्णपदम् । एवं पूजया भजनं निरूप्प श्र- वणादिमिरपि निरूपयन्ति श्रवणादिभिरिति श्रवणादिमिरपि कृष्णं मजेत् । आदिपद- प्राधे कीर्तनस्मरणे । तेनैतन्मागीयस्य श्रवणादिन्यतिरेकेण क्षणमपि न स्थैयमित्यायातम् । ननु सततं कृष्णमजनं कथम्, कार्यान्तरव्यासक्तस्तत्रादुः व्यावृत्तोपीति । व्यातोपि हरौ चित्तं श्रवणादौ यसेत्सदा। ततः प्रेम तथासक्तिर्व्यसनं च यदा भवेत् ॥ ३॥ वीजं तदुच्यते शास्त्रे दृढं यन्नापि नश्यति । कार्ये व्यावृत्तो व्यासत्तोपि चेतदा गुरूपदिष्टं यादग्भगवत्स्वरूपं तत्रैव खस्य वित्त स्थाप्य भवेत्, अन्यावृचिमान् यदि भवेत्, तदा श्रवणादौ चित्तं यसेत् । यद्वा, प्रका- रान्तरेणाप्यस्यावतारिका सम्भवति । तया हि । ननु पदि स्वधर्माच्यावृत्तिरेव भजने अयो- जिका, तदा त्वातोपदेशस्य दैववशात्प्रच्युतधर्मस कस्यचित्प्रयोजकामावादननासम्भवः । तथाच तत्कृतमपि सर्व ध्यर्थ स्याद, तस्सा प्रक्षालनाद्धि पकस्यतिन्यायेन ग्रहणामाव एव परनिति चेत्तत्राहुः व्यावृत्तोपीति । अत्रेयं शश न कार्या । यत्स्वधर्माव्यावृत्तिरेव भजने प्रयोजिका । 'अपि चेसुदुराचार' इति मगवद्वाक्याद्भगवदीयस्य प्रच्युतधर्मस्यापि भगवद्भजनस्य विहितत्वात् । परन्तु यावदारभ्य भगवद्भवनामिनिविष्टस्ततःप्रभृति तस्य दुराचाराकरणमित्यपेक्षितम् । अन्यथानन्यभाक्लभहमसहः । दुराचारस्यापि भज- नात् । तेन स्वधर्मेभ्यो व्यावृत्तोपि हरौ सर्वदुःखहर्तरि चितं यसेत्प्रयत्नेन स्थापयेदित्यर्थः । एतादृशस्यापि स्ववलेनैवान्तरायान् दूरीकृत्य स्वरूपानन्ददान करोतीति ज्ञापनाय हरि- पदम् । पूर्व हरिपदोक्त्या मध्ये चित्तपदोक्त्यान्ते श्रवणादिपदोक्त्या देहलोदीप- वदुमपत्रापि साम्येन चित्तवृतिः स्थाप्येति ज्ञेयम् । एवं सततं गजने क्रियमाणे उभयनि- पानामपि यदेकजातीय फलं तदाहुः तत इति । तदनन्तरमेवं भजनानन्तरमुभपविधानां प्रेमोत्सतिर्भवति भगवति सर्वात्मना । तथैवासक्तिः, वन्यतिरेकेण स्थित्यसम्भव इति यावत् । 'क्षणं युगशतमिप यासां येन विनाऽभव' दिति यया ! व्यसनं तु सवतमन्य- ३ श्रीमद्भालकृष्णकृतविवृतिसमेना । विस्मृतिपूर्वक भगवत्परता । चः समुच्चायकः । एतत्रितयं यदा भवेत् तदा तद्वी मक्तिशास्त्रे दृढमुच्यते । यत्कथमपि न नश्यति ॥३॥ तन्नाशाभावप्रकारपूर्वकं लेहादीनां त्रयाणां प्रत्येकं फलमाहुः स्नेहादिति सार्धेन । स्नेहाद्रागविनाशः Tः स्यादासक्त्या स्याद्गृहारुचिः ॥ ४ ॥ गृहस्थानां बाधकत्वमनात्मत्वं च भासते । यदा स्याझ्यसनं कृष्णे कृतार्थः स्यात्तदैव हि ॥५॥ भगवति स्नेहाद्गह विषयको यो राग उत्कटेच्छारूपस्तस्य विशेषेण नाशः स्यात् । ना- शपदेन पुनस्तस्पानुत्पत्तिरिति ज्ञेयम् । अत एव न निवृत्त्यादिपददानम् । आसक्त्येति । यदा भगवत्यासकिर्जाता, तदा तद्यतिरेकेण स्थित्यसम्भवेन तदर्थ यत्ने जाते गृहस्थाः स्वार्थ तं प्रेरयन्तीति तस्मिन्नरुचिः, तया कृत्वा भगवनजने बाधकत्वं विघ्नकर्तृवं भासते, एत आत्मीया न भवन्तीसपि । यदि स्युस्तदा किं प्रतिबन्धकाः स्युरिति । व्यसनं हीति । यस्मिन्काले अचिन्त्यानन्तफलदातरि कृष्णे व्यसनं स्यात्तदैव स कृतार्थः स्यात् । संशय- व्युदासाय हीति पदम् ॥ ४,५॥ एवं त्रयाणां फलमुक्त्वा तादृशस्य कर्तव्यतामाहुः तादृशस्थापीति । ताशस्यापि सततं गेहस्थानं विनाशनम् । त्यागं कृत्वा यतेद्यस्तु तदर्थार्थकमानसः ॥६॥ स्नेहासक्तिव्यसनवतोपि पुरुषस्य तदनन्तरं यत्सततं सर्वदा गृहरूपं यत्स्थानं तद्विना- शनम् । लेहासक्तिव्यसनानां विनाशनमित्यर्थः । तथा सति कृतमपि सर्व व्यर्थ स्यात् । तेन तत्त्यागं कृत्वा यो यतेत्प्रपलं कुर्यात् । एतेन मध्ये तीर्थादिकमपि गच्छेदिति सततपदेन ज्ञेयम् । ननु सोपि प्रयतो मायावादिवन्निराकार एव भवेदित्याशकाव्युदासायाहुः तद्- धेति । भगवद्रो योधस्तदर्यमेकं मानसं यस्य स तथा । इदं तेषां न । शून्ये एव पर्य- वसितमतित्वात् । 'येन्येरविन्दाक्षे'सादिवाक्येन निन्दितत्वाच । तेषां गार्हस्थ्यधर्मत्यागे भगवदर्थ गृहात्यागे उभयतः प्रयुता अधःपतन्ति । तेन त्यागस्तु भगवदर्थमेव मुख्यः । सोपि पूर्वमान्तरः, तस्मिन् सिद्ध ततो पासतः । एकपदं सततमेतन्मार्गीयैकलभ्यपाला- त्मके मनःस्थितिज्ञापनाय । तेनैतदतिरिक्तावतारे 'मूलसेकः शाखायामपि पर्यवस्पत्तीति न्यायेन तदकरणं न विरुध्येत । तस्यां सत्यां देहव्यापतिस्तत्रैव ॥ ६ ॥ एतादृशस्य यत्फलं तदाहुः लभत इति । लभते सुदृढां भक्तिं सर्वतोप्यधिकां पराम् । त्यागे वाधकभूयस्त्वं दुःसंसर्गात्तथान्नतः ॥७॥ य एवं सागं कुर्यात्स भक्ति प्रानोति । एवंविधत्यागस भक्तिफलकत्वात् । तेन
,
भक्तिवार्धिनी।
मुक्त्यादीनामेतत्फलत्वाभाव सूचित । तनापि सुदृढा अविनन्धरा । सततमेधमाना ।
सापि भक्ति सर्वतो मोक्षादेरप्यधिका मुक्तानामपि दु प्राप्या ! 'भगवान् भजता मिति
वाक्येन । तत पुष्टिरूपामपि लभते । परामिति । परामुत्कृष्टामुक्तभक्त । पुष्टिरूपामिति
शेप । एव त्यागफलमुम्ला पुन सिंहावलोकनन्यायेन त्यागध्यक्सा वदन्ति त्यागे
इति । कृत एव त्यागे न कोपि पुरुषार्थ । तस्मिन् वाधकाना भूयस्व बहुत्वम् । भूयासि
पाधकान्युपस्थितानि भवन्ति । ततस्त नाशयन्ति । ननु तस्मिन् सति तदुपस्थिति कथम्?
तन हेतुमाहु दुःसंसर्गादिति । तदुपस्थितिस्तु भक्ताना भगवद्भक्तविरोधिना ससर्गात्
सगते । तत्ससर्गानन्तर सोसि तथा भवति । तत्ससर्गेण भगवद्धर्माणामन्तर्दितत्वात् ।
तथैव दुष्टान्नग्रहणे दुर्बुद्धिर्भवति । तस पापानलात्, प्रान्युपादकत्वाच । यथा
जीवाना भगवत्सपन्धाभावे सदोपत्वम्, तथान्नसापीति, तप्रवृद्धिकामोऽसमर्पित न
भुजीयादित्याशय । उपलक्षण चैतत् । वस्तुतस्तु वस्तुमाने तत्सम्बन्धव्यतिरेकेम
तदभाव । तेन सम्बद्धरसम्बद्ध न ग्राह्यमिति भाव । तेन यथाकथवित्सम्पादित तत्स-
म्बद्ध तदपि शुद्धमेव भवतीति तादृशैस्तथैव कार्यमिति भाव सूचित । असहव्योपार्जि-
तमन्न कृपणान्न च दुष्टान्नम् । तेन दुसङ्गतिर्दुरन्न च यत्र न भवति, तत्र सतत स्यम् ।
एतेनाटनाभाव सूचित ॥ ७ ॥
तत्स्थानमेवाहु अत इति ।
अतः स्थेयं हरिस्थाने तदीयः सह तत्परेः ।
अदूरविप्रकर्षे या यथा वित्तं न दुप्यति ॥ ८॥
यत उमाभ्या तयस्त्वमन एकान्ते हरिस्थाने यन हरि सर्वत तिष्ठति तत्रैव
स्थेयम् । ताप्येवमेव जडवन्न । किन्तु तदीये भगवदीये भगात्मपन्धिमि सह
मिलित्वा । ते हि तद्वार्ताभिज्ञा यतो भवन्ति । तेन सत्सहे सति कृतार्थ एव भवति ।
एतेन दुसो न भवतीत्यायातम् । दुष्टानराप्तिरपि न । तदुन्छिाम्योपादेयत्वात् ।
अयमेव दासधर्मो यत । अस्पाधारोपोषि तेषु न कार्य । यतस्तै तत्परा देवर मग-
स्परा । भगवन्त पिनान्यक्किमपि न जानन्ति । तस्मात्तेपु द्वेपादिपु सत्यु सोपि त न
सहते । भक्तद्वैपादेरसद्यत्वात् । इद तूच्यते । यस्स तत्मनस्तस्स तेषु तदारोपो भवति एव
न । वस्तुखमावात् । तस्मिन्सनि तु नयैवेति सम्भाव्यते । तदीय सह सेवाश अदूरम
दूराभावस विप्रर्प अतिशयेनाधिक्य यसिमन्देशे तन पेयम् । ययाहोरानमध्ये पार
द्वयमेकवार वा तस्सझो भवति । वन्यनादर । यतो मुख्य पक्ष म एव यस्मिन्मेवा
श्रवणादिक मतम् । अस्मिंस्तु केवल श्रवणादि एव । तेनाय गौण [मुस्यामम्भोपीद
तु कार्यमेव । अन्यथा चित्ते ढोपाला त्या ना एव ॥ ८॥
श्रीमद्भालकृष्णकृतविकृतिसमेता। नन्वेवं भगवदयं क्रियमाणायां सेवायां मध्य एवं दैवपशादुर्बुद्धौ जातायां नाशो- पस्थितौ तु तस्कृतिर्था सादत आहुः सेवायां वेति । सेवायां वा कथायां वा यस्यासक्तिढा भवेत् । यावजीवं तस्य नाशो न कापीति मतिर्मम ॥९॥ यस्य सेवायामासक्तिर्भवेत्सोपि कियत्कालपर्यन्तमेव, पुनर्नेत्येवं न, किन्तु दृढा, सेवायां तु कश्चिदेवाधिकारी भवतीत्यत उक्तं वेति । अनेन दुर्लभत्वं निरुपितम् । तथैव कथायाम् । तदनन्तरं तामेव तदीयैः सह कुर्यात् । अन्यत्र मनो न निवेशयेत् । तेन मुख्यत इदं द्वयमेव कार्यम् । कार्यान्तरल्यावृत्त्यर्थं वेत्युक्तम् । तादृशस्य नाशो न, किन्तूतरो- तरमुन्नतिरेव । तर्हि यत्किचिदिनपर्यन्तं मा मवतु, ततस्तु कदाचिद्भवेदेवेत्याशमाहुः यावजीयमिति । स यावजीवति तावत्तस्य नाशो न । कापीति । कस्मिन्नपि देशे केनापि प्रकारेण न भवतीत्यर्थः । अनिशं तत्सेवाकयोद्यमे तदितरत्रानुपयोगः क्रियाशक्ते- ीियाधितस्यापि । अत्र प्रामाण्यार्थ खमतिरेव दर्शिता । मतिर्ममेति । अहं त्वेवमेव जानामि, यत्सेवाश्रवणादिकमेव सततं कार्यम्, यतो नाशाभावप्रकारस्त्वयमेवास्मिन् शाने मुख्यतया निरूप्यते ॥ ९ ॥ नन्वेवं तत्र स्थित्वा क्रियमाणायां सेवायां चेत्केनापि कृत्वा बाधसम्भवे सति किं कार्य तत्राहुः याधसम्भावनायामिति । वाधसंभावनायां तु नैकान्ते वास इष्यते । हरिस्तु सर्वतो रक्षा करिष्यति न संशयः ॥ १० ॥ पाधस्स सम्भावना यदा भयति सेवायां तदा त्वेकान्ते भगवत्स्थाने वासो नेष्यते । न च कलहद्वेषादिनापि स्थेयम्, सेवाया एवेष्टसाधनत्वादिति वाच्यम् । एवं च प्रतिपन्ध- कस्स मलवत्त्वेन तदसम्भवे द्वेषादेर्मनसि स्थित्या श्रवणाघसम्भवे चित्ते दोषाकान्त्या कृत- वैयपित्तिः । तस्माद्भगवदिच्छयैवं जातमिति मनसि निश्चित्य ततो निःसृत्य निश्चिन्त- स्तत्स्मरणं कुर्वन् तीर्थे तिष्ठति, गृहे वा । नन्वेवमेव चेद्भगवदिच्छा, तदा तु पर्य- यसानतो नाश एवेत्याशझ्याहुः हरिस्त्यिति । सर्वतः सर्वेभ्यः सर्वप्रकारेण हरिस्तु रक्षा करिष्यतीत्येवं मनसि निर्धाय सेयम् । सर्वथाश्रितानां रक्षामेव करोति । अप्रामाण्य- शानिवृत्त्यर्थमाहुः न संशय इति । अत्र संशयो न कार्यः । यमनुगृहीतवांस्तं पुनर्न त्यक्ष्यति, सत्यसझल्पत्वात् । इदानीमिच्छाया एव तयालात्सेवाभावः । यदि कदाचित् भविष्यति, तदा सापीत्यस्मिन्नर्थे न काति चिन्ता विधेया ॥ १० ॥ एवमुपायानिरूप्य तत्फलं निरूपयन्ति इत्येवमिति ।
६ भक्तिवर्थिनी। इत्येवं भगवच्छास्त्रं गूढतत्वं निरूपितम् । य एतत्समधीयीत तस्यापि स्याट्टढा रतिः ॥ ११ ॥ इति भगवच्छात्रं मया निरूपितम् । यद्भगवत्कृपकवेद्यम् । तत्र हेतुः । यतो भ- गवच्छात्रं भगवदीयं शास्त्रम् , एतच्छात्रवेदको भगवानेव, यतो नान्यः, एतदनलात् । अन्यस्यैतदज्ञत्वे हेतुमाहुः । गूढतत्त्वं गूढं गुप्तं सर्वज्ञातं यद्भगवत्स्वरूपं तदेव तत्त्वं सारभूतं यस्य तत्तथा । तदपि मया एवं निरूपितम् । अब प्राकट्यपूर्वक निरूपितमि- त्यर्थः । भक्तिमार्गजिज्ञासूनां निमित्तम् । तेन य एतदुक्तपकारमाचरेत्तस्य भगवति रतिः स्यात्सापि दृढा । एतदुक्ताचरणाभावे यत एतत्प्रत्यहं सम्यगावयोधपूर्वकं अधीपीत पठेत्तसापि तथा रतिः सादिति ॥ ११ ॥ विठ्ठलेशपादान्जैकदास्यसझाङ्गिणा सदा । प्रकाशिता यथाशक्ति मयेयं भक्तिवर्षिनी ।।१।। इति श्रीपालकृष्णकृतमक्तिवर्षिनीविपतिः समाता । श्रीकृष्णाय नमः। भक्तिवर्धिनी। श्रीश्रीवलभविरचितविकृतिसमेता। नत्वा खाचार्यपादानं कृपामधुमुपूरितम् । तत्परागारक्तबुद्ध्या व्याख्यासे भक्तिवार्षिनीर ॥१॥ तदुढितासिध्यै पितृपादरजांस्यहम् हृधापाय प्रवृत्तोस्मि नान्ययेति हि निश्चितम् ॥ २॥ अथाचार्यचरणाः स्वमार्गाङ्गीकृवानां खमार्गीयमक्तिवृद्धिपकारमजानतां कृपया तज्ज्ञापनाय तवृद्धिप्रकार प्रतिजानते यति। यथा भक्तिः प्रवृद्धा स्यात्तथोपायो निरूप्यते । चीजभावे दृढे तु स्यात्यागाच्छूवणकीर्तनात् ॥ १॥ यथा येन सापनेन भक्तिः स्वप्रवर्तितमार्गरूपा प्रकग वृद्धि प्रामोति तथा तत्प्रकारक उपापः साधनं निरूप्यत उन्यत इत्यर्थः । ननु मन्युसतिप्रकारा शास्त्रेषु पुरा- पादिपूक्ता एव । उत्सत्यनन्तरं वृद्धिस्त्वनुक्तसिदैव । तद्यपा । श्रीभागवते 'दानवततो- ७ श्रीवल्लभविरचितविवृतिसमेता । होमजपखाध्यायसंयमैः । श्रेयोभिर्विविधैश्वान्यैः कृष्णे भक्तिहिं साध्यत' इति । एका- दशेषि 'श्रद्धामृतकथायामित्युपगम्य एवं धर्मनुष्याणासुद्धवात्मनिवेदिनाम् । मयि सजायते भक्तिः कोन्योर्थोस्सावशिष्यत' इति । प्रथमस्कन्धेषि 'यस्यां वै श्रूयमाणायां कृष्णे परमपूरुपे । भक्तिरुत्पद्यते पुंसः शोकमोहभयापहेति । गीतास्वपि 'प्रयभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न कांक्षति । समः सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं लभते परामिति भत्युत्पत्तिप्रकारा उक्ता एव । यद्यप्युत्पत्तिप्रकारा उक्तास्तथापि वृद्धिप्रकारो नोक्त इति तदृद्धिप्रकारार्थमाचार्यक- थनं सम्भवतीति चेत् । न । वृद्धिप्रकारोपि तत्रोक्तः । तृतीयस्कन्धे पचमाध्याये 'पानेन ते देव कथासुधायाः प्रवृद्धभत्या विशदाशया ये । वैराग्यसार प्रतिलभ्य बोधं यथा- आसान्वीयुरकुण्ठधिष्ण्यामिति । अत्र प्रकारोप्युक्तः । यद्यप्यत्रोत्पत्तिवृद्धिप्रकाराः पुराणादि- ध्वयुक्ता एक, तत एवोभयसम्भवे सत्यपि 'यथा भक्तिः प्रवृद्धा स्वादिति पुनर्भक्तिमृद्धि- प्रकारकथने को हेतुरिति चेत् । सत्यम् । पूर्वोक्तसाधनानां दानव्रतादीनां मर्यादामार्गी- यत्वात् तदुत्पन्नभक्तरपि सन्मार्गीयत्वमेवेत्यवधेयम् । 'कार्यकारणयोरेकजातीयत्व'मिति नियमात् । वृद्धिपकारस्यापि तन्मार्गीयसाधनसाम्यत्वेन मुक्तिफलकत्वेन च मर्यादामागी- यत्वमेव । आचार्यास्तु स्वप्रकटितशुद्धपुष्टिमार्गीयभक्तिनिरूपणं कर्तुं तस्याश्च मर्यादाभक्ति- वैलक्षण्यं ज्ञापयितुं तत्साधनानि तत्फलं च वक्तुं तत्साधनानां तत्फलस्य च वैलक्षण्यं वक्तुं भिन्नतया स्वमाया भक्ति तद्धिप्रकारसाधनं च निरूपयन्ति यति । यथा स्वमा- गीयखप्रवर्तितसाधनैर्भक्तिः शुद्धपुष्टिमार्गीया प्रकर्षण वृद्धा वर्षिता स्यात् । वृद्धौ प्रकर्षः फलोन्मुखत्वम् । तथा तत्प्रकारकोपायस्तस्रकारकसाधनसमुदायो निरूप्यत उच्यत इत्यर्थः । पूर्वोक्तसाधनसमुदायानेवाहुः बीजभावे दृढे तु सादिति । अत्र भीजमाव- स्वरूपं शुद्धपुष्टिमागीयाचार्यानुग्रहपूर्वक खमार्गप्रकारकभगवनिवेदनानन्तरं भगवदङ्गीकार एव पीजभावः । तस्स दार्य निरन्तरं तदेकपरतया तन्मार्गस्थितिः । तुशब्देन मार्गान्तरी- यसाधनन्युदासः । तदा भक्तिः प्रवृद्धा सात् । वृद्धौ खमार्गीयसाधनान्तराण्याहुः त्यागा- च्छ्रचणकीर्तनादिति । त्यागादेतन्मार्गीयातिरिक्तसाधनत्यागात् । तद्वदेचैतन्मांगीयभग- वद्धर्मश्रवणात् । तथैव तद्वदेव कीर्तनात् । अत्र श्रवणकीर्तनयोरेकवद्भायोक्त्योमयोरप्येक- जातीयत्वं ज्ञापितम् ॥१॥ यपपि पूर्व बीजदार्थप्रकार उक्त एव । तथापि कदाचिदितरव्यास नान्तरायः सम्भवति तस्मापोतरयामाहाभादेन जहाय सिध्यति तदर्थ भावजरूरं का. रान्तरमाहुः पीजदार्यप्रकारस्त्विति । बीजदार्यप्रकारस्तु गृहे स्थिस्वा स्वधर्मतः। अव्यावृत्तो भजेत्कृष्णं पूजया श्रवणादिभिः ॥ २ ॥ १ सप्रकटितशुद्ध पुष्टिमागीयसाधनः । - ८ भक्तिवर्धिनी। तुशब्देनैतदतिरिक्तप्रकारान्ताव्युदास उक्तः । स्वमार्गीयभगवाजनं तु गृहस्थित्य- मावे न सम्भपतीति पूर्व गृहस्थितिमेवाहुः गृहे स्थित्येति । मगवद्भजनानुफूले गृहे स्थित्वा स्वधर्मतः कृष्णं मजेत् । अत्र स्वधर्मपदेन वर्णाश्नमधमीन विवक्षिताः, किन्तु खमार्गीयभगवद्धमी विवक्षिताः । कुतः, वर्णाश्रमधर्माणां स्वधर्मखामावात् । तधया । घमों द्विविधः । एकः शरीरपर्यवसायी । द्वितीय आत्मपर्यवसायी । तत्र सन्ध्यावन्दन- मारम्य यागान्तानां वर्णाश्रमधर्माणां शरीरपर्यवसायित्वमेव । इन्द्रलोकादिमोगपर्यवसा- नात् । समाप्तौ पुनः क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्तीति वचनात् शरीरसुखपर्यवसा- यित्वमेव, न त्वात्मनः परलोकसापकत्वम् । खपदसात्मपरत्वात् वधर्मपदेनात्मपर्य- वसायी धर्म उच्यते । स च भगवद्धर्म एव । तथा च प्रमाणं सप्तमस्कन्धे प्रहादवच- नम् । 'यघननो भगवते विदधीत मानं तचारमने प्रतिमुखस्स यया मुखश्री रिति । किन, फलप्रकरणेपि रासमण्डलमण्डनरूपामिगीतम् । 'कुर्वन्ति हि त्वयि रति कुशलाः ख आत्मनित्यप्रिये पतिसुतादिमिरातिदैः किमिति । किध, सपर्मत इति कथनात् धर्मपदस तसिलात्ययान्तत्वेनाव्ययवादविकृतो धर्म उक्तः । तेनाविकृतो धर्मो भगवद्धर्म एवेति खधर्मपदेन भगवद्धर्म एवेति सर्वमनवद्यम् । स च खधर्मः क इत्याकांक्षायामाहुः अ. व्यावृत्तो भजेत्कृष्णमिति । अव्यावृत्तो भगवद्भजनाननुकूलव्यावृत्तिरहितः कृष्णं मजेत्। अत्र मजने कृष्णपदस फलवारकत्वेनेदं भजनं मम फलरूसमिति झाला मजनं कर्तव्यम् , नतु साधनबुझ्या । 'यद्यप्पग्रे 'लमते सुदृढां मक्ति मिसनेनालौकिकदेहसम्पत्तिपूर्वकं साक्षा- स्पुरुषोत्तमभजनसैव फलत्योफ्याधुनिकमजनस साधनत्वमायाति, तथापि पुष्टिमार्गे पुरु. पोत्तमस्यैव भजनीयत्वात्, यद्यपि आधुनिकगजने अलौकिकदेसम्पति स्ति, तथापि आधुनिकमजनस्स पुरुषोत्तमपर्यवसायित्वमेवेति अस्यापि फलरूपत्वमिति ज्ञापनायोक्तमिद भजनं मम फलरूपमिति ज्ञात्वा भजनं कर्तव्यमिति' । ननु एकस्यैव साधनरूपत्वं फलरू- पत्वं च कथं सम्भवतीति चेत् । सत्यम् । साक्षात्पुष्टिमार्गीयफलसेतरसाधनासाध्यत्वात् पुरुषोतम मजनमेव साक्षात्पुष्टिमार्गीयफलसाधक(ख)म् । यथा महाराजस धार्यमपि सुवर्ण- रत्नादिकमेव । व्यवहार्यमात्राण्यपि तन्मयान्येव । अथ च कोशे संग्राममपि सुवर्णरमादि- कमेव । यतस्तस महाराजस्य सर्वतोधिकत्वात् । सुवर्णस्यापि सर्वधावपेक्षयोत्कृष्टत्वात् । तथा तदस्य फलस्य सर्वोत्कृष्टत्वमावात्सर्वोत्कृष्टमेव साधनमपेक्षितम् । सर्वोत्कृष्टस्य साध- नस्य विचारे क्रियमाणे भजनातिरिक्तप्स सर्वोत्कृष्टत्वाभावात्सर्वोत्कृष्टमेव साधनं सर्वोत्कृष्ट- फलमेवेति मजनमेव साधनम्, भजनमेव फलमिति नानुपतिः काचित् । अमे भजन- प्रकारमाहुः पूजया श्रवणादिभिरिति । अत्र पूजापदेन आगमोक्तप्रकारकपूजा न विवक्षिता । पूर्व कृष्णपदेन सदानन्दफलरूपपुरुषोउमभजनस प्रकारत्वेनोक्तत्वात् । आ- १तः ! या वर्णाश्रमपर्मत्वेन नित्यप्राप्तल्लाद । अब केवलभक्तिमार्गीयधर्मविचारे पुन कयने प्रयोगनाभावाद में विवक्षिता इत्युकम् । विहान्तर्गत टिपण प्रतिभाति, अन्यपुसकेषु कविदर्शनाद ।
९ । श्रीश्रीवलमविरचितविकृतिसमेता । गमोक्तपूजायाः पुरुषोत्तमविभूतिपर्यवसायित्वात् न पुरुषोचममजनपर्यवसायित्वम् । तथापि पुरुषोचमभजनप्रकारेषु पूजाया अपि गणनात्सा पूजा शुद्धपुष्टिमार्गीयैवेति ज्ञेयम् । अत एव शुद्धपुष्टिमार्गविद्भिः प्रमेयप्रकरणीयसप्तमाघ्याये गुणगाने हरिणीनां मावं निरूप्य पश्या- सद्भावदृष्टरेव पूजालमुक्तम् । 'पूजां दधुर्विरनितां प्रणयावलोकै रिति कथनात् । एत- झावसजातीयभावपूर्वक श्रीकृष्णदर्शनसेवाकरणमेव पूजया भजनम् । एतद्भावज्ञापनाय अनैतन्मार्गीयभजनसाधनपूजेयमिति ज्ञापनायोः पूजयेति । अस्मिन्मार्गे मजन सेवैव । भत्र 'केचिल्लेहरहितसेवा पूजैवेति पूजापदं ध्याख्यातवन्तः, तन्न विचारक्षमम्। कुतः? मार्गभेदस्य नियामकत्वात् । आचार्यस्तु स्वप्रकटितशुद्धपुष्टिमार्गाङ्गीकृतस्वकीयजीवेषु खप्र- कटितशुद्धपुष्टिमार्गीयभक्तिवृद्ध्यर्थ भक्तिवर्धिनीरूपं शास्त्रं कृतम् । तदीयशास्त्रे तदङ्गीकृता एवाधिकारिणः, नवन्ये । तेपामाचार्यानुग्रहेण शुद्धपुष्टिमार्गीयत्वात् तत्प्रदर्शितसेवा- करणं सस्नेहं लेहरहितं वा भवतु, परन्तु पुरुषोत्तमपर्यवसायित्वाद्भक्तिमार्गीयमेव भवति । नतु पूजामार्गीयम् । किञ्च, शुद्धपुष्टिमार्गीयसेवाप्रकारसदृशाः प्रकारा वस्त्रालङ्कारादिसम- पंणरूपाः पूजायामपि दृश्यन्ते । तथापि तेयां विभूतिपर्यवसानात्यूजामार्गीयत्वमेव, न तु सायमात्रेण ते भक्तिमार्गीयत्वम् । मार्गभेदस्य नियामकत्वात् । किञ्च । यो यन्मा- गीयतत्कृत सर्व भगवद्धर्मादिकं तन्मार्गीयमेव भवति । यथा 'प्रमादाकुर्वती कर्मे त्यत्र कर्मसाद्गुण्याथ कृतस्य विष्णुस्मरणस्य कर्ममार्गीयत्वमेव । अन्यञ्च 'यस्य स्मृत्या च नामो- क्ये'सत्र स्मृत्यादित्रयाणामपि कर्ममार्गीयत्वमेव, न तु नवधामक्त्युक्तसादृश्यमाण भक्तिमार्गीयत्वम् । एवं सेवोपयोगिनी पूजामुक्त्वा तदुपयोगिश्रवणादिकमप्याहुः श्रवणा- दिभिरिति । सेवाकरणानन्तरमवशिष्टकाले इतरन्यासहाभावार्थ अवगम् । आदिपदेन कीर्तनस्मरणचिन्तनान्यपि ॥२॥ एवमव्यावृत्तिपूर्वक भजनमुक्त्वा कदाचिद्भगवदर्थव्यावृतिसमयेपि हरौ सर्वदुःखह- तेरि चित्तव्यासनपूर्वकमेव च्यावृत्तिः कर्तव्येत्यत आहुः व्यावृत्तोपि हरी चित्तमिति । व्यात्तोपि हरी चित्तं श्रवणादौ यतेत्सदा । ततः प्रेम तथासक्तिर्व्यसनं च यदा भवेत् ॥ ३॥ व्यावृत्तिकरणानन्तरमवशिष्टसमये पूर्ववत श्रवणादौ यतेत् श्रवणापर्य यनं कु- यात् । एवं मक्तिमार्गीपमक्तिवृद्धिसाधनान्युक्लास मक्तिवृद्धिप्रकारमाहुः ततः प्रेमेति । पूर्व प्रेम भवति । ततः सेहाङरो भवति । तदनन्तरं प्रौढभावे सति बासतिर्भवति । चित्तं मगवत्सरूपे व्यासक्तं सगं तदेकारं भवति । ततः प्रौढभावे सति व्यसनं भवति । 1'तस्मादत्र केचिदित्यारभ्य, सन्न विचारक्षममिति यदुक, तत्सर्व सोपपतिमुपपादितनिसलागतो- पिकविचारेण। २भजि मळिवर्धिनी। प्यसनं नाम तव्यतिरेकेण स्थातुमेव न शक्नोति तियया । दशमस्कन्धे 'गोपीनां परमानन्द आसीगोविन्ददर्शने । क्षणं युगशतमिव यासां येन बिनामवदिति । एवं यदा व्यसनं भवति, तदा पीजभावो दृढो भवति ॥ ३॥ एवं व्यसनपर्यन्तं वीजदार्यप्रकारमुक्त्वाने पीजस्स हदलं निरूपयन्ति पीज तदिति । वीजं तदुच्यते शास्त्रे दृढं यन्नापि नश्यति । स्नेहाद्रागविनाशः स्यादासच्या स्याहारुचिः ॥ ४ ॥ तत्पूर्वोक्तं चीजे व्यसनमाानन्तरं रदं भवतीति शास्त्रे मक्तिशास्त्रे उच्यते निरू- प्यत इत्यर्थः । इदत्वस्य लक्षणमाहुः यन्नापि नश्यतीति । यत्केनापि लौकिकालौकि- कनाशकेनापि न नश्यतीति । ठौकिका दुःसङ्गादयः, अलौकिकाः कालादयः, तैरपि न नाय- तीत्यर्थः । अतः परं येन प्रकारेण त्रयाणां स्नेहादीनां मध्ये येन यथा खापनोदर्न भवति, तथा तस्यापनोदनप्रकारं वदन्ति । अत्र स्नेहाधुत्पती मुख्यापनोदकास्त्रयः, भगवदतिरिक्ते रागो गृहासक्तिभंगवध्यतिरेकेणापि कालनिर्वाहः । तत्र रागादित्रयाणां क्रमेणैकैकापनोदक- त्वमाहुः स्लेहाद्रागविनाशः स्यादिति । तत्र पूर्व यथाकयचिदल्पनेहाकुरोत्पत्त्यापि भगवदतिरिक्त रागो न भवति । तदनन्तरं यदासक्तिर्भवति, ततः प्रौढमावो भवति, तदा गृहासक्यपनोदो भवति । भगवदासक्तया गृहासक्तिर्गच्छति ॥ ४ ॥ आसत्स्यनन्तरं गृहारुचौ हेतुद्वयमाहुः गृहस्थानामिति । गृहस्थानां बाधकत्वमनात्मत्वं च भासते। यदा स्याद् व्यसनं कृष्णे कृतार्थः स्यात्तदैव हि ।। ५ ।। गृहे स्थितानां भार्यापुत्रादीनां, गृहे तिष्ठन्तीति गृहस्था मार्यापुवादयस्तेषां स्वस- जातीयभाषाभावात् तैः सह संबन्धस्स भावविघातकत्वस्फूर्त्या तेष्वरुचिर्भवत्येवेत्यत उक्तं बाधकत्वं भासत इति । ननु पद्यपि भार्यापुत्रादीनां भाववाधकत्वमुक्तम् , तथापि न वा अरे पुत्राणां कामाय पुनाः पिया भवन्ति, किन्त्वात्मनः कामाय पुत्राः प्रिया भवन्ति' इत्यादिश्रुत्या तेषु आत्मसंघन्धित्येन प्रियवसापि स्फूर्त्या सर्वात्मना पाधकत्वस्फूतिर्न मरि- प्यतीत्याशङ्कानिरासाय तेषु तादृशस भगवदासक्तस आत्मसंवन्धित्वस्फूर्त्यमावेन यथा सर्वात्मना प्रियत्वामावस्त प्रकारमाहुः अनात्मत्वं च भासत इति । सस भगव- दासत्या निरुपाधिस्खेहासदखेन भगवत्स्यपालवं सुरति, न तु सालनि । तो भगवदीयध्वेवात्मसंबन्धित्वं मासते ।म तु सात्मसंवन्धिप्वात्मसंबन्धित्वं मासत इति । तेष्वात्मसंयन्धित्वभानाभावात् पापकत्वमेव मासते, नतु सात्मीयकत्वमिति ज्ञापनायोक्तं भावबन्धबाधकलमिति पाठ । भावसंबधसकलामिति पारय।
श्रीश्रीवल्लमविरचितविकृतिसमेता। पाधकत्वमनात्मत्वमिति गृहारचौ हेतुद्वयमुक्तम् । एवं तादृशस गृहारुचौ हेतुद्वयमुक्त्वा तस्यैव स्नेहवृद्धिपराकाष्ठामाहुः यदा स्यादिति । यदा यस्मिन्काले कृष्णे फलात्मके व्यसनं स्यात् । तदर्शनादिव्यतिरेकेण तत्संयन्धिव्यतिरेकेण स्थातुमशक्तिर्व्यसनं तयदा स्यात् । तादृशो भावो यदा स्याचदैव कृतार्यः स्यात् । कृतः अर्थों येन तादृशः स्यात् । अर्थोत्र भक्तिमार्गीयसाक्षाद्भगवत्संपन्धफलरूपः । सः स्वस्मिन्कृतो भवति, सम्पादितो भवति, तदा कृतः अर्थः पूर्वोक्तफलरूपो, भगवता तस्मै दत्तो भवतीत्यर्थः । नहि एतादृग्मावयुक्तस्य एतत्फलदानातिरिक्तं फलं दातुं युक्तमिति ज्ञापनायोक्तं हीति । एवं तस्य व्यसनवतो योग्यताभावं फलं च निरूप्य तस्याग्रिमव्यवस्थामाहुः तादृशस्यापीति। तादृशस्यापि सततं गेहस्थानं विनाशनम् । त्यागं कृत्वा यतेद्यस्तु तदर्थाथै कमानसः ॥ ६ ॥ लभले सुदृढां भक्तिं सर्वतोप्यधिकां पराम् । त्यागे वाधकभूयस्त्वं दुःसंसर्गात्तथान्नतः ॥७॥ तादृशस्यापि ताग्भावयुक्तस्यापि, सततं निरन्तरं, गेहस्वानं गृहस्थितिः, तार: ग्भावसत्सङ्गाभावाद्विनाशकं तद्भावविघातकमित्यर्थः । यो यस्य विघातकः सतत्सन्निधौ स्थातुं न शझोति । अत एव फलप्रकरणे 'यमुम्बुजाक्षेतिपये नजरत्नरूपाभिर्निरूपितम् । यहि यत्प्रभृति त्वत्पादतलमस्पाक्ष्म तत्समृति अन्यसमक्षं स्थातुं न पारयाम इति । तदेव मित्र- तमाचार्यचरणैः । 'यथा देहाभिमानी व्याप्रस्य देहविपातकत्वात्तत्संनिधौ स्थातुं न शमोती'- ति । अत उक्तं तादृशस्येति । अतः परं पूर्वोक्तभावयुक्तस्य गेहस्थितेर्भावविपातकत्वेन तन्त्र स्थातुमशक्त्या स गेहत्यागमेव करोतीत्साहुः त्यागं कृत्वेति । तस्य गेहत्यागानन्तरं स्थितिप्रकारमाहुः यतेचस्त्यिति । त्यागानन्तरं स यत्रमेव कुर्यात् , नतु प्रकारान्तरेण तिठेत् । तस्य यनविषयमाहुः तदर्थाकमानस इति । ताशस्य यद्विषयको भावः स विषयो भगवानेव भवतीति । स एवार्थः । स चासावर्षश्च तदर्य भगवान् तदर्थ भगव- दर्थमकं केवलं मानसं मनो यस्य तादृशो भूत्वा मुढा भक्ति लमते । पूर्व तस्य व्यसन- पर्यन्तां सर्वानपनोयां भक्तिमुक्त्वापि पुनर्यत्तदर्थाथैकमानस इत्युक्त्वापि लमते सुदृढां भक्तिमिति यदुक्तं वसायमाशयः । ततोपि सुदृढां सर्वात्मभावरूपां भक्तिमिति साक्षात् स्वरूपानुभवफलिका ठमत इति । तल्लाभरुवनेन तादृशस पूर्वोक्तातिविमाढभावेन विध- मानदेहापगमानन्तरं लीलोपपिकमलौकिकं देहं प्राप्य साक्षात्खरूपसंबन्धि फलं लभत इत्यर्थः । फलरूपभक्तेः स्वरूपमाहुः सर्वतोप्याधिकामिति । सर्वतश्चतुर्विधमुक्त्यपेक्ष- सल्पानुभवं लभत इति पाठ .
भकिवर्धिनी । यापि अधिकाम् । परामगणितानन्दपुख्योतमपर्यवसायिनीम् । एवं पूर्वोक्तमतिवृद्धिपर्य- वसानं फलं चोक्ता पुनस्त्याने वाधकभूयस्वकथनस्सायमाशयः । कदाचित्कश्चिद्भक्ति- मार्गानुवर्ती पूर्वोक्तसागखरूपमज्ञात्वाहमपि गृहादित्यागं कृला भक्तिवृद्धि साधयिष्या- मीति यदि गृहादिकं त्यक्तुमिच्छति तस्य तत्र निषेधमाहुः त्यागे पाधकभूपस्त्व- मिति । ताशस्थ त्यागे गृहादित्यागेन भक्तिवृद्धिसाधने घाघकभूयस्त्वात्फलं न सिध्यति । ('पूर्वोक्तप्रकारत्यागिनस्तु दृढं यन्नापि नश्यतीति वाधकामाव उपपादित एवेति पूर्वोक्त- सागोत्र न विवक्षितः । तस्मात्पुनस्त्यागे पापकभूयस्त्वं यदुच्यते स कदाचित्कश्चिदित्य- नेन वक्ष्यमाणत्याग एव पाषकमयस्त्वम् ।') वाधकान्येवाहुः दुःसंसर्गादिति । दुःसं- सर्गः स्वस्स पूर्वोक्तत्यागहेतुभूतभावाभावात्सर्वात्मना चित्तस्य भगवदेकपात्वामावेन चित्तचा- वल्याहुःसङ्गभगवद्भावाभाववतां लौकिकानां सङ्गः सम्भवतीति तस्य यापकत्वं सप्टमेव । अथ च तस्य पूर्वसिद्धग्रहादीनां बुद्धिपूर्वकसांगाभावाच्छरीरनिर्वाहार्थ यत्र कुत्रचिदन्न- मक्षणेन तस्यानस्य भगवदसमर्पणजनितदोपवत्वेन तदन्नभक्षणेन स्वस्यापि वाहिर्मुख्यदोपः सम्भवति । यद्यप्पेतादृशस्यापि बाधका दोपा इन्द्रियनिग्रहाभावरूपाः सम्भवन्ति, तथापि दुःसङ्गान्नदोपयोरतिप्रबलत्वादुर्भावेव गणितौ ॥ ७॥ एवं सति तादृशेन दोपाभावपूर्वकं कयं कालनिर्वादः कार्य इत्याकांक्षायामाहुः अतः स्थेयं हरिस्थान इति । अतः स्थेयं हरिस्थाने तदीयैः सह तत्परेः । अदूरे विश्कर्षे वा यथा चित्तं न दुप्पति ॥ ८॥ यतः पूर्वोतरकारस्थिती दोपसम्भावना अतो दोपाभावपूर्वक कालनिर्वाहार्य हरिसाने स्वस्थ भक्तिमार्गीयत्वात् भक्तिमार्गीयसेवाप्रकारयुक्तभगवत्याने श्रीगोवर्ध- नादौ स्पेयम् । तत्रापि स्थितिप्रकारमाहुः तदीयैः सह तत्परेरिति । तदी- मंगपदीयैः सह स्पेयम् । तत्रापि तत्परैर्भगवत्खरूपतत्मेवातन्वणादिपरेः । एतत्य- कारकरिखसमावे तत्रापि दुःसङ्गेन पूर्वसिद्धबुद्धिनाशसंभवात् जीवनवैयर्यमेव स्वादिति पूर्वोक्तप्रकारण स्थेयमिति ज्ञापितम् । निरन्तरं तत्प्रकारकस्सित्यसंगये पित्तदोपामावार्य प्रकारान्तरेणापि स्थितिप्रकारमाहुः अदूरे विभकर्षे घेति । अद्रे पूर्वोक्तम्यानात्स्वल्पा- न्तराये । अथवा विक ततोप किपिरे सेयम् । तदीयैः सह तत्परैरिति सितिप्रका- रमुफ्त्वापि पुनररे विप्रकर्षे देति यदुक्तं तस्सायमाशयः । यतिनिकटस्थिती 'अतिपरि- पादयति न्यायेन. कदाचिगवशक्तावन्नापि संमवति, तदभावायोक्तं 'अहो विप्र. करें येति । तत्राप्येवमपि स्थित्वा तैः सह सहः कार्य एव, न साज्य इत्युक्त भवति । एवं प्रकारत्रयेण शिनिप्रकासुस्त्वाति स्थितिप्रकार निर्गलितार्यमाहुः यथा चित्त नदु. सामादिवि पाठ। १सावेदेवि पाट।
श्रीश्रीवल्लभाविरचितविवृतिसमेता। प्यतीति । असायमर्थः । पूर्वोक्तप्रकारयवा खमनोमिलपितप्रकारैवी यया च भगव- दाहिमुख्यदोपेण चित्तं न दुष्यति तथा स्पेयम्, न तु प्रकारान्तरणेसर्थः । एवं पूर्व मक्तिवृद्धिपकारमुक्त्वा वृद्धः परमकाष्ठामुक्त्वा तत्साध्यं फलं चोक्तम् ॥ ८॥ तदनन्तरं भक्तिवृद्धिप्रकारमुक्त्वा वृद्धः परमकाष्ठामुक्त्वा शुद्धझुष्टिसाधनप्रकारमज्ञा- खा गृह सफ्वा वृद्धि साधयिष्यामीति प्रवृत्तस याधसंभावनानिराकरणपूर्वक फलसियर्य स्थितिप्रकारमुक्त्वा शुद्धपुष्टिभक्तिमार्गीयधर्मयासक्तानामपि एतन्मार्गीयफलसिद्धिर्भवतीति ज्ञापनायाहुः सेवायां वा कथायां वेति । सेवायां वा कथायां वा यस्यासक्तिदृढा भवेत् । यावजीवं तस्य नाशो न कापीति मतिर्मम ॥९॥ सेवायां शुद्धपुष्टिमार्गाचार्यः प्रकटितप्रकारकसेवायां, तदवशिष्टसमये तन्मापि. लीलाकयायां, यस्सासक्तिचित्तव्यासपूर्वको दृवाग्रहो यावी भवेत् , तस्स न कापि देश- कालभेदेनापि तस्य भावस्प नाशो न मवति । स भावस्तस्य फलसाघको मवति । अयवा । विकल्पेनोमयोः कथनामावदिन्छया कसचित्सेपायामेव दासतिर्भवति । कसरियस ठीलायामेव उदासक्तिर्भवति । परन्तु सासक्तिविजीवमपेक्षिता, न तु यत्किमित्कालम् । तस्येति पदाद्भगवदिच्छया सेवासक्तस्स कथासक्तस च कापि नाशो न भवति । सन्मा. गीयफलप्राप्तौ अन्तरायो न भवतीति मम मतिर्मदीया मतिः । तेन स्वमते फलविलम्पामावे हेतुत्वकयनेन फलप्राप्तौ निःसंदिग्धत्वमुक्तम् ॥९॥ एवं पूर्वलोके सेवासक्तकयासक्तयोः फलगुक्ला कदाचित्कचित् सेवासक्तं कया- सक्तं मक्तं दृष्ट्वा स्वयमप्यासक्तिन्यतिरेकेण उत्साहमाण रोवां कर्तुमिन्छति तस्स पापः संमवति, तर पाखरूप तनिवारणरकारं चाहुः पाघसंभावनायां त्विति । याधसंभावनायां तु नेकान्ते वास इप्यते । हरिस्तु सर्वतो रक्षां करिष्यति न संशयः॥ १० ॥ पापसमवे प्रकारान्तरेण पापामावयुदास उक्तस्तुशन्देन । सेपाकरणे हटासाय- भावात् उद्वेगेन भोगासक्या वा पापसंभवे सति सस सेवाकरणासकिननितग्लान्या मरः सेवा न भवतीति मया गृहं सरत्या एकान्ते मगरनामस्मरणादिकं कर्तव्यमिति पुस्सा यकान्ते सिति कर्तुमिच्छति, तारासापि सेवात्यागपूर्वकैकान्तस्थितिरवितेति निषेधमाहुः नैकान्ते घास इप्पत इति । सेवाविहाय तसैकान्तवासो नएः, सेवा. कृतिरवेध । उद्वेगादिना प्रतिरन्धे कयं सेवाकरणं भवतीति ऐवत्र समाधानमाहुः हरि- भलिपिः।
१४ मक्तियर्धिनी। स्त्विति । उद्वेगादिकमपि सोट्दा यदि सेवामेव कुर्याचदा मगवान् तस्स सेवाग्रह दृष्ट्वा खस्य सर्वदु सहरणसामथ्यं प्रकटीकृत्य सेवाविपातोद्वेगादिक दूरीकृत्य सेवासपत्तिमेव कार येदिति ज्ञापनार्यमुक्त ररिस्तु सर्वतो रक्षां करिष्यति न संशय इति । 'न सशय' इति कथनापयस्मिन्नर्थे सशय कुर्यात् , तदा भगवानपि रक्षा न कुर्यादितीत्यर्थ । अत एवं गीतास्वपि भगवतोक्त 'सशयारमा मिनश्यती ति । तस्मादस्मितर्थे नि सन्दिग्धो मूखा 'भगवान् रक्षा करिष्यत्येवेति युद्ध्या यदि सेना कुर्यात्तदा मगवानपि रक्षा करोत्येवेति ज्ञापनायोक्त 'न सशय' इति । प्रकारान्तरण रक्षाऽभावज्ञापनाय तुशब्द । कयाप रसापि वाधसमावनाया पूर्वोक्तव्यवस्थेति ज्ञातन्यम् ॥ १०॥ एर स्वमार्गीयभक्तिप्रवृद्धिप्रकारमुक्त्वा तस्योपसहारमाहु इतीति । इत्येवं भगवच्छास्त्रं गूढतत्त्वं निरूपितम् । य एतत्समधीयीत तस्यापि स्यादृढा रतिः ॥ ११ ॥ इतीति समाप्तौ । एवमुक्तप्रकारेण मगवत पुरुषोत्तमस्य भक्तिवृद्धिशिक्षाप्रकारक थान निरूपित प्रतिपादितमित्यर्थ । शास्त्रस्वरूपमाहु गूढतत्त्वमिति । गूढमत्यन्त गुप्त तत्त्व वागविषयमनुमवैकवेद्य स्वरूप यस्य तादृश निरूपितं प्रतिपादितमित्यर्थ । एव शास्त्रखरूप निरूप्यैतदध्ययनकर्तुरपि यथैतन्मार्गीय फल सिध्यति तत्प्रकारकमध्ययन स्वरूपमाहु य एतदिति । य इति सामान्योक्या नान वर्णाश्रमादिनियम उक्त । एतद् मक्तिवर्धिनीरूप शास्त्र समधीयीतेति । अध्ययने सम्यक्त्वोक्त्या न केवल पाठमात्रकर णम्, किन्तु प्रतिपदमर्थाभिप्रायविचारपूर्वकमध्ययनमुक्तम् । एव विचारपूर्वकाध्ययनकरणे तप्रतिपाचार्यनिरन्तरानुसन्धानादन्त करणदोपनिवृत्या तन्मार्गखरूपस्य हृदि स्फुरणा- तन्मार्गस्य पुरुषोत्तमैकपरत्वात् तद्वारा स्वस्यापि तस्फूतौं भक्तिमार्गीयाचार्याङ्गीकारस्य सि छत्वात् तादृशस्यापि सुदृढा अत्यन्त निश्चला रति रसभावयुक्तलेहो भवतीत्यर्थः ॥११॥ पितृपादनखालोकप्रकाशितधिया मया । खाचार्यचरणाख्येन विवृता मक्तिवर्धिनी ॥१॥ कृपया पितृपादान्जैर्दत्ता मे यादृशी मति । तन्मया विवृत भक्तिवृद्धिशास्त्र सुदुर्लभम् ॥२॥ यद्यपीश्वरवाक्यानि दुर्योधानि सदा खत । तत्कृपातो यथाबोध विवृतानिन चान्यथा॥३॥ बुद्धिदोपेण यद्यत्र ब्याकृती चेदिपर्यय । क्षमन्वाचार्यचरणा सकीयेषु दयालय ॥४॥ श्रीवल्लभेन रचिता या विवृतिभक्तिवर्धिन्या । चित्र समस्ते लोके सजाता भक्तिवर्धिनी सापि ५ इति श्रीपिचरणकतानश्रीवल्लभावरचिता भक्तियर्धिनी विधतिः समाता । श्रय लोक पाक्षात्य ।
श्रीकृष्णाय नमः।
भक्तिवर्धिनी।
श्रीमद्रधुनाथकृतवितिसमेता।
वन्दे वृन्दावने वृन्दैगोपीनां वेष्टित मुदा। हरिणीभिः कृष्णसारमिवाभातं तदीक्षणम् ॥१॥
अपारदुःखदावाग्निदग्धजीवनमीक्षितम् । यस्य तं यामि शरणं विठ्ठलेशमहं सदा ॥२॥
अथ केनचित्सरमपुपयेन प्राप्तमहापुरुषानुग्रहात्यहरितचित्तस्य कदाचिदन्तरासं.
भाविततङ्गसाभावाय मत्युद्रेकोपायनिरूपणं प्रतिजानते यथेति ।
यथा भक्तिः प्रवृद्धा स्यात्तथोपायो निरूप्यते ।
वीजभावे दृढे तु स्यात्यागाच्छ्रवणकीर्तनात् ॥१॥
पथा येनोपायाचरणप्रकारेण मक्तिः पूर्वोक्तेन हेतुना अडरतां प्राप्य स्थिता सती
प्रवृद्धा प्रकर्षण वृद्धि प्राप्ता च खकार्यकरणक्षमा स्यात् भवेत् , तथा तेनैव प्रकारेण उपायः
साधनं निरूप्यते, सोपपत्तिकं कप्यत इत्यर्थः । अयाय भावः। पया अन्तःस्थितपीजे
क्षेत्रादौ सेचनादियाझोपायकरणं सफलं भवति, नानुसतीजे, एवमत्रापि भक्तिस्पृष्टान्तःकर-
पसवैतदुच्यमानसाधनप्रवृत्यधिकारो, नान्यसेति । इसमेवार्यमुद्दिश्याप्याहुः पीज-
भावे दृढे तु स्पादिति । उक्तमक्तिप्रवृद्धिः कदेसपेक्षायां पीजभावे र सम्पने सात् ।
कुत इत्यपेक्षायां त्यागात् भगवदतिरिक्तविषयत्यागात् । श्रवणं च कीर्तनं च एकवद्रा-
वात् श्रवणकीर्तनादित्येकवचनम् । ननु को नाम पीजभाषः । उच्यते । मयसापारण-
कारणं पीजनित्युच्यते । तच महदनुग्रहरूपम् । तस्य भावः समावः तस्य दाब नियः।
या । पीजपदेन भगवानुच्यते । तस्मिन् मावस्तद्विपयिणी व्यवसायात्मिका पुद्धिः, मा.
वानेवाश्रयणीयो, नान्य इत्येवरुपा । दार्म तदनन्तर्हितत्वम् । तुशलः प्रसिद्धौ । तथैव
पक्ष्यन्तीति च । 'पीनं तदुन्यते शास्त्रे रदं यत्रापि नश्यतीति ।।
मर्यादामार्गीयाणां गृहस्सानां पीजदार्यप्रकारमाहुः पीजदार्यप्रकारस्त्विति ।
वीजदार्यप्रकारस्तु गृहे स्थित्वा स्वधर्मतः ।
अव्यावृत्तो भजेकृष्णं पूजया श्रवणादिभिः ॥ २॥
व्यात्तोपि हरो चित्तं श्रवणादो यतेत्सदा।
ततः प्रेम तथासक्तिर्व्यसनं च यदा भवेत् ॥ ३ ॥
भक्तियर्धिनी । वीजं तदुच्यते शास्त्रे दृढं यन्नापि नश्यति। स्नेहाद्रागविनाश स्थादासक्त्या स्याहारुचि ॥४॥ गृहस्थानां वाधकत्वमनात्मत्व च भासते । यदा स्याझ्यसन कृष्णे कृतार्थ स्यात्तदैव हि ॥५॥ ताशस्यापि सतत गेहस्थान विनाशकम् । गृहे स्थित्वा कृष्ण भजेदित्सवय । कय केनेत्याकाक्षाद्वपशावाद्याया स्वधर्मत खस्स यो धर्म श्रुत्याधुक्तो वर्णाश्रमधर्म तत्सहित सन् अव्यावृत्तो भगवद्भजनविरुद्धो लोकवेदपर्मव्यासजो व्यावृत्तिस्तद्रहित सन्नित्यर्थ । केनेत्याकाक्षाया पूजया श्रवणादिमि रिति योज्यम् । अत्र प्रत्येकसमुदायान्या पूजादिक ग्रायम् । तत्र पूजा वेदपुराणोक्ता ग्राह्या । ऋविधानायुक्तपुरुषसूक्तादिभिर्या सा वैदिकी । आगमपुराणायुक्तान्या । श्रवण तु श्रुतिस्मृतिपुराणेतिहासरामायणादिवाक्येभ्य एव । आदिपदेन चिन्तनलीलानुकरणादिक ज्ञेयम् । सर्वापेक्षया श्रवणस प्राधान्य शेयम् । अत एव महामारते श्रूयते 'सर्वाश्रमामि गमन सर्वतीर्थावगाहनम् । न तथा फलद सौते नारायणकथा यथेति । व्यावृतिराहियेन मजनासम्मवे उपायान्तरमाहु व्यावृत्तोपीति । व्यासतोपि सन् हरौ त्रिविघदुःखहरण शीले चित्त विधाय पूर्वोक्तप्रवणादिषु यतेत् यत्न कुर्यादित्यय । यतेदिति परस्मैपद नाम धातुना ज्ञेयम् । भगवचरणारविदयोचित सस्थाप्य बाह्यश्रवणादौ कृतस यनस निफ लत्वेपि न खार्थहानिरिति माव । अत एवैतद्वचनमपि 'क्रियासु यत्त्वचरणारविन्दयोरावि प्रचितो न भवाय कल्पते' इति । हरी चित्तमित्यनन्तर क्रियापदमध्याहृत्याग्रे योजनीयम् । सदेत्येतदुभयत्र सम्बध्यते । एवकृते यद्भवति तदाहु तत इति । प्रेम खेह । आ सक्तिखद्विना स्थातुमशक्तिः । व्यसन स्वभावत एव तद्वार्तादिरुचिर्नान्यप्रेरणत । इद सर्व यदा भवेत्सम्पयते तदेतश्रितयसम्पत्तिरूपशास्त्रे भगवछाने दृढ पीजमिति व्यव हियते । दायमेव सष्टीकियते यनापि नश्यतीति । प्रेमादीनामसा घारण तत्तत्कार्य माहु लेहादिति । रागो मगवदतिरिक्तविषयक । गृहारपिरिति । गृहे अरुचि रनासक्ति । गृहस्थानामिति । गृहविषयकरागायभावे सीपुत्रादिपोषणासम्मवरूपदोपोद्धार नेगाविवकिना गृहस्थाना परमपुरुषार्थसाधकयोरप्यनयोधर्मयोधिकत्वमेव मासते । अन धिकारित्वात् अनात्मस्व चेति । आत्मनो माव आत्मत्वम् । भावपदेन सामाविकधर्म उच्यते । तेन नायमारमन स्वधर्म इसेव मासते । वस्तुतस्तु ज्ञान तेषां नास्तीति ज्ञापनार्थ भासत इत्युक्तम् । व्यसनकार्यमाहु यदा स्यादिति । यस्मिन्काले खमावतो यत्किभिक्रियमाणमपि भगवद्विषयकमेव स्फुरति, तदा किं वक्तव्य कृतार्थतापामित्यर्थ । हिशब्द प्रहादादौ प्रसिद्धियोतनार्य । महादम्वविधत्व विष्णुपुराणे श्रूयते । 'या श्रीमद्रघुनाथकृतविकृतिसमेता। प्रीतिरविवेकानां विषयेष्वनपायिनी वामनुस्मरतः सा मे हृदयान्मापसर्पत्वि'ति । साह- शस्यापीति । उक्तलेहादिमतोपि गृहस्थस गृहरूपं स्थानं सततं सर्वदैव विनाशकं विनाशहेतुः। खेहादिसम्पत्तेः पूर्वमेव विनाशकलेपि तत्सम्पत्यनन्तरं तथा न भविष्यतीति मनसि गृहस्थैर्न धार्यमिति भावः । अत्र विनाशकत्वं प्रतिबन्धकत्वमेव । यद्वा । तार- शस्सापि सतते गृह एवं स्थानं स्थितिरिति । ईदृशगृहस्पेन मध्ये मध्ये भगवद्भक्तपुण्यक्षेत्र- नचायतनेष्वटनं कार्यम् । न तु गृहमाचैकस्थितिशीलतया भाव्यमिति भावः ॥ ६ ॥ पूर्व गृहस्थितस्यैव श्रवणायुक्तमिदानी तस्स बहुप्रतिबन्धकत्यानुसन्धानेन समी- हितासिद्धिमाशय निःप्रत्यूहोपायमाहुः त्यागं कृत्वेति । लभेतेति । त्यागं कृत्वा यतेद्यस्तु तदर्थार्थैकमानसः ॥ ६ ॥ लभेत सुदृढां भक्तिं सर्वतोप्यधिकां पराम् । त्यागे वाधकभूयस्त्वं दुःसंसर्गात्तथानतः ॥ ७ ॥ यः पुरुषः सकलदुःखाकरगृहत्यागं कृत्वा पूर्वोक्तश्रवणादिषु यतेत्, सः सुदृढामत्यन्तध्दामन्यैः प्रतियन्धसहरप्यतिरस्कृताम् सर्वतोपि ज्ञानादिम्योप्यधि- कामधिकफलदायिनी परां भगवप्राप्तेश्वरमकारणभूतां भक्तिं लभेत प्राप्नुयादित्यर्थः । तं विशदयन्ति ताकमानस इति । स भगवानेवासावर्षश्च तदर्थः, अर्थः प्रयोजनं उद्देश्यमिति यावत् । स चासावेकश्वार्थः । तदर्थः स एवार्थंकः, तदयीधैंका, तस्मिन्मानसं मनो यस्येति । एवंविधः सन् यतेदिति पूर्वेणान्वयः । यतेदिति धन के कृत्या पक्षात् नामधातुत्वात्परस्मैपदं ज्ञेयम् । ननु त्यागरूषोपाये विधमाने किम- न्योपायकयनमित्यत आहुः त्याग इति । सागसिद्धौ सर्व सुकरम् । सैव तु नोपपयते । तत्र हेतुः । पाधकानां प्रतिबन्धकानां भूयस्तं पाहुल्यादित्ययः । तत्र हेतुः दुःसं- सुर्गात् । दुष्टानां भगवहिर्मुखाणां यः संसर्गः सम्बन्धः शारीरादिस्तस्मादित्सर्थः । तयैवानतः दुष्पादनादित्यर्थः । अन्नदापास्तु पचमहायज्ञाकरणागवदनिवेदनाचोमवन्तीति सेयम् । श्रुतिरपि 'मोपमन्नं विन्दते अप्रचेताः । सत्ये प्रवीमि वय इत्स तस । नार्यमाणं पुष्यति नो सखायं केवलापो भवति केवलादी'ति । अर्यस्तु अप्रचेताः मूढः मोपं व्यर्थमन विन्दते प्राप्नोति । यतः सो अनलाभस्तस वध एव । इदं तु सत्यमेवाइं प्रवीमि । न मृपेत्यर्थः । किया अर्यमाणं सूर्य न पुष्यति, देवयज्ञाकरणात् । उपलक्षणमेतत् , देवतामात्रमपि । सखायं अतिथि नो न पुष्यति, मनुष्ययज्ञाकरणात, किन्तु वयमेव बभाति, बतः केवलादी पुमान् केवलाप एव भवति । तदन्नं नाति, किन्तु पापमचीस- पः। इसमर्थ मगवानप्पाह 'यशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्व किस्यिौः । मुखन्ते ते सर्प पापा ये परन्त्यात्मकारणादिति । अनिवेदितमक्षणेपि दोपः श्रूयते । 'अम्परीप नवं वनं फलं मनापमौषधम् । अनिवेप हो जन साजन्मानि नारकी ति पुराणान्तरे ॥ ७॥ मधि.
भनिवधिनी । न्यागस्साशमयत उम्त्या सुशस्योपायमाह अन इति । अतः स्येयं हरिस्थाने तदीयैः सह तत्परैः। अरे निमक वा यथा चित्तं न दुष्यति ॥ ८ ॥ सेवायां वा कथायां वा यस्यासक्तिदृढा भवेत् । यावज्जीवं तस्य नाशो न कापीति मतिर्मम ॥९॥ उक्तहेतोहरिस्थाने भगवदधिष्ठितप्रदेशे तत्परेभंगवदकपरै तदीयैर्भगवदीयैक्त सह अरे नैकन्य यथा स्यात्तथा स्थेयमित्यर्थ । अतिनैकय्यासम्भवे विक्र्षे वा, किञ्चिद दूरेपि स्मेयम्, नखतिदूर इति भाव । नन्वेव स्थितौ किमत आहु यथेति । येन प्रकारेण सिनिरुता तथाकरणे चित्तमन्त करण न दुष्यति, न दोपग्रस्त भवतीत्यर्थ । एन भगरदीये सह स्थितौ यम्य परमभाग्यवत सेवाया स्वशरीरसाध्ये भगवद्भजने स्थाया तद्गुणश्नवणे या आसक्ति तद्विहाय स्थातुमशक्तिः दृढा निश्चला भवेत् तस्य पुमो याबञ्जीव आदेहपात भापि कस्मिंश्चिद्देशे कारे वा नाश अन्यथाभावो न भवतीति । अस्मिन्नर्थे मम मति सम्मतिरेवेत्यर्थ । वाशब्दावन्योन्य समुचिनुत ।। ८॥९॥ नन्वेव सति पूर्वोत्तसागस्य वैवर्यमेवोत सार्थकत्वमपीत्याकाक्षायामाहु याधेति । याधसंभावनायां तु नैकान्ते वास इष्यते । हरिस्तु सर्वतो रक्षा करिष्यति न संशयः ॥ १० ॥ स्यागे सर्वथा घाध सम्भावितद्भवेश तस्कृतस्तदा एकान्ते पास सर्वसागपूर्विका स्थितिररण्यादो नेष्यते न सम्मतेत्यर्थः । सदभावे विष्टेवेशि भाव । गन्वकान्तस्थिती व्याघ्रादिभिरपमृत्युरपि सम्माच्यते, वर तदपेक्षया गृहस्थितिरित्यत आहु हरिस्त्विति । हरिशब्दार्थस्तु पूर्वोक्तोनुसन्धेय । तुशन्द प्रसिद्धौ । सर्वत सर्वदुःखहेतो रक्षण करि- ध्यत्येव, न संशय इत्यर्थ ॥१०॥ इत्येवं भगवच्छात्रं गूढतत्त्वं निरूपितम् । य एतत्समधीयीत तस्यापि स्यादृढा रतिः ॥ ११ ॥ उपप्सहरन्ति । एवमुक्तप्रकारेण भगवच्छाघ भगवताम्बन्धिशास्त्र शिक्षणम् । गूढ गुप्त तत्त्व यस बाइश निरूपितम् । य पुमानेतदुक्ताचरणेऽशत मुन्नेतन्छाचमुशदिल सम्य- गधीयीत, अर्यानुसन्धानपूर्वक पठेत् , तसाप्येतन्छात्रोक्ता रतिता भवेदित्यर्थ ॥११॥ भत्त्यङ्करितचित्तस्य तमुद्रेकाय साम्प्रतम् । आचार्यस्यामृतोता विवृता भक्तिवर्धिनी ॥१॥ इति श्रीवल्लभनन्दनचरणकशरणधीरघुनाथकृतौ भक्तिवधिनीविवरणं संपूर्णम् ॥
श्रीकृष्णाय नमः। भक्तिवर्धिनी। श्रीकल्याणरायविरचितविवृतिसमेता। वामे करे गिरि स्त्रीषु मुदमिन्द्रे च साध्वसम् । धारयन्तमहं वन्दे चिनं गोपेषु गोप्रियम् ॥१॥ यदहीकृतितो भक्त्या स्वानन्दं नन्दनन्दनः।ददाति तान्प्रभून वन्दे सर्वकामार्थसिद्धये ॥२ श्रीकृष्णमक्तिस्पृष्टान्तःकरणानां स्वकीयानां तत्फलविलम्पासहिष्णवः श्रीवलमा• चार्या एकादशेन्द्रियशोधिका भक्तिरित्येकादशमिः लोकैर्भक्तिप्रवृद्ध्युपायनिरुपण प्रति. जानते पति । यथा भक्तिः प्रवृद्धा स्यात्तथोपायो निरूप्यते । वीजभावे दृढे तु स्यात्यागाच्छ्वणकीर्तनात् ॥१॥ येन प्रकारेण भक्तिः प्रकर्षेण वृद्धि प्राप्नुयात्तेन प्रकारेण साधन विनिरूप्यत इत्यर्थः। वृद्धी प्रान फलोन्मुखत्वम् । भक्तिप्रवृद्धरुतरावधिः क इत्याकाक्षापामाहुः पीजभाये दृढे तु स्यादिति । पीजरूपो मावोऽल्पनेहः, तस्गिन् रटे व्यसनात्मके सति प्रवृद्धि पूर्ण म्सादित्यर्थः । भागे पीनलोक्तिः फलेस्स निदानत्वयोपनाय । प्रथमतस्तत्र किं साधन- मित्याकांक्षायामाहु- त्यागाचपणकीर्तनादिति । मक्तिमार्गपिरोधिनोऽन्यमजनादेल्या- गात् । श्रवणं कीर्तन च ताभ्याम् । इदमुपलक्षणम् । स्मरणमाचार्पमकिरियासत्यपि मातन्यम् । श्रवणकीर्तनयोरेकवद्रायः कर्मपोसिना विरोध इनि ज्ञापयति । न हि यथै- कस्मिन्कर्मगि क्रियमाणे नान्यत् क्रियते, तया श्रवणकीर्तनयोरपि ॥१॥ मक्तिप्रवृद्धी सापनान्युक्त्वा प्रकारमाहुः पीजदार्यकारस्त्यिति । चीजदार्यप्रकारस्तु गृहे स्थित्या स्वधर्मतः । अव्यारत्तो भजेकृष्णं पूजया श्रयणादिभिः ॥ २ ॥ पौनरूपम्प भाम रहनामिक्षार्थमय पश्यमानः प्रकार. । इममेवाः । गृहस्पिन मंजनानुफ्तत्वात् । 'श्रुतिस्मृती मान्ने वनांधमारवना पुरस'सादियास्व. म. पांशमाचारधर्मेन गृहे पिता प्यावृत्तिः पापांन्तरम्पागनादिनाजपात । भव. पादिभिः सहितया परिचर्पया हम सदानन्दं पुरुषोत्तम मरेत् । कृप्पासारठन मरनं, । मापसी भतिवधिनी। न साधनत्वेनेति ज्ञाप्यते । तत्राद्युक्तपूजायां शीतलशंखोदकस्नानादिमत्त्वेन भक्तिमार्गा- याणामनधिकारात् । स्नेहामावे सेवापि पूजातुल्येव मातीति ज्ञापनार्था पूजापदोकिरन ज्ञेया । 'तजन्म तानि कर्माणि तदायुस्तन्मनोवचः। नृणां येनेह विधात्मा सेन्यते हरिरीश्वर इत्यादिवाक्यैर्भगवद्भजनामावे जन्मादिवैयर्थ्यात् व्यावृत्तिराहित्येन सेवाया असमवेपि यथासंभवं शक्त्यनुसारेण श्रवणादिकमेव कार्यम्, नत्वन्यया स्यातव्यमित्याशयेनाहुः व्यावृत्तोपि हरी चित्तमिति । व्यावृत्तोपि हरौ चित्तं श्रवणादो यतेत्सदा । ततः प्रेम तथासक्तिर्व्यसनं च यदा भवेत् ॥ ३ ॥ बीजं तदुच्यते शास्त्रे दृढं यन्नापि नश्यति । कार्यान्तरल्यासतोपि हौ दुःखहरणशीले चित्तं निधाय श्रवणादौ यनं कुर्यादि- स्वार्थः । यसु प्रयवे । यतेदिति पाठे अनुदाचेतामात्मनेपदानित्यत्वात् साधुत्वम् । एवं वर्तमानस्य प्रेमादिकं भवतीत्याहुः ततः प्रेमेति । भगवत्सेवया श्रवणादिवोरि चिवा- सगावस्थापत् प्रेम भवति । सविषये स्वतः प्रवर्तको मावः प्रेमशन्देनोच्यते । प्रेमानन्तरं तथा पूर्वोक्तादेव सङ्कल्यावस्थावदासक्तिर्मवति । खविपये विविधमनोरयजनको भाव आसक्तिः । व्यसनं च यदा प्रभुकृपया मयेत्, तदा तद्दोजं बीजरूपो मावः शाने मग- वम्ब्यास्ने दृढमन्यापरिमूतमुच्यते, यत्फलं जनयति, दुष्टसंसर्गादिना नश्यत्यपि न । व्यसनं खविषयं विना सातुमशक्तिजनको भावः । प्रेमासक्स्योपके आहुः लेहादिति । स्नेहाद्रागविनाशः स्यादासत्या स्याहारुचिः ।। ४ ।। गृहस्थानां वाधकत्वमनात्मवंच भासते । यदा स्याध्यसनं कृष्णे कृतार्थः स्यात्तदैव हि ॥५॥ तादृशस्यापि सततं गेहस्थानं विनाशकम् । यथा यथा भगवति स्नेहस्तया तथान्यत्र हीयत इत्यर्थः । भगवत्यासक्त्या भगवदनुपयोगिगृहादिपु अरुचिरप्रीतिर्भवति । भगवति प्रेमासक्योः सर्वपुरुषार्थसा- धिकयोरपि गृहस्थानां गृहासक्तानामविवकिनां गृहादिषु रागामावजनकत्वेन मीपुत्रादि- पोपणासंभवरूपदोपोद्भावनेन पावकत्वं, स्वस प्रवृत्तिमार्गस्थनानात्मधर्मत्वं च मासते । अथवा । सर्वेपामात्मरूपे हितकारिणि मगवत्यनात्मत्वं मासते । वस्तुतस्तु तेषां निला- मियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम् 'न मे मक्तः प्रणश्यति' 'किमलम्यं भगवती'त्यादिवा- क्यस्तेषां भपवानेवैहिकपारलौकिकसाधक इति तेषामेवेदमज्ञानमिति भासत इत्युक्तम् ।
श्रीकल्याणरायविरचितविश्रुतिसमेता। पदा कृष्णे पूर्णानन्दे व्यसनं स्यात् , तदैव जीवः कृतार्थः पूर्थिः स्यात् । एक्कारेण प्रेमा- सक्योर्युदासः । हि युक्तोयमर्थः । यतः तादृशस्यापि प्रेमासाक्तिमतोपि सततं निरन्तर गेहस्यानं गेह एवावस्थान विनाशकं भावति शेपः । तेन सत्सहादिकं कर्तव्यमिति मावः । भक्तिप्रवृद्धिसाधने प्रकारान्तरमाहुः त्यागं कृत्वेति । त्यागं कृत्वा यतेयस्तु तदर्थाथैकमानसः ॥६॥ लभते सुदृढां भक्ति सर्वतोप्यधिको पराम् । त्यागे वाधकभूयस्त्वं दुःसंसर्गात्तथान्नतः ॥७॥ यस्तु पुरुषो गृहे भगवद्भजनप्रतिवन्ध ज्ञात्वा गृहत्यागं कृत्वा श्रवणादौ यसेत् यन कुर्यात् । 'यसेदिति पाठे पूर्ववज्ज्ञेयम् । तदर्थार्थेकमानसः तदयं भगवन्निमित्तं योर्थः अव- पादिः तस्मिन् । यद्वा । भगवतोर्थः प्रयोजन टीला तदर्थार्थ तनिमितं एकमनन्यं मानस यस एतादृशः सन् सुदृद्धां विषयायपरिभूतां सर्वतोपि ज्ञानयोगादिम्योप्यधिकाधिकफल. दायिनी परां प्रेमलक्षणां फलरूपां मक्ति तमेत प्रामुयादित्ययः । तर्हि निर्विस्मिन् प्रकारे विषमाने किमर्थ प्रकारान्तरमाश्रयणीयमिलात आहुः त्यागे यापकभ्यस्त्वमिति । सु-सासर्गात् । दुष्टानां भगवदहिर्मुखादीनां सहभोजनादिना सनात् । तथानतः दुष्य- मात् । चैत्रदेवमगवचरणामृतप्रक्षेपादिनाप्यन्नदोपनिवृतेः संभवात्सङ्गदोपोऽधिक इति तस्य प्रयमनिर्देशः । गृहत्यागे पाधकम्यस्त्वं वाषकानामन्तरायहतूनां बाहुल्यमस्ति, तेन यावरहे मजनं संभवति, तावद्गृहत्यागो न कर्तव्यः, सर्वया मजनाऽसमवे कर्तव्यः । तदुक्तं श्रीभागवतार्थतत्वदीपे 'मार्यादिरनुकूलखेत्कारयेगमपत्कियाम् । उदासीने स्वयं कुर्यात्प्रतिकूले गृहं त्यजेदिति । वेन गृहस त्यागेत्यागेपि यावव्यसनं संपघते, तापत्सत्सनादिकं कर्तव्यमि- मित्याहुः अतः स्थेयं हरिस्थान इति । अतः स्थेयं हरिस्थाने तदीयैः सह तत्परः। अदूरविप्रकर्षे वा यथा चित्रं न दुष्यति ॥ ८ ॥ यतः पूर्वोत्तं यापकमतः कारणात् दरियाने ग्रजमधुरादौ तदीगर्भगवन्मार्गसर- नन्यैः तसो सेवाकीर्तनादिना मगवत्परैः सह अदा निकटं यया भवति नपा सेयम् । निकटस्सित्यसंभवे रेपि स्थित्वा तदनुसरणं कर्तव्यमित्याहुः यिमकर्षे घेति । मक्ति- मागसत्तामावे त्वष्णयसमात सस कार्य न सिध्यत् , तत्परतामा भगवत्सेराकया- पमावात् खस लामो न सादिति दपमुक्तम् । निकटे वा सित्वा तासमनपदी- यानुसरले तावा विसंतुष्टं न मरतोत्साहुः पया विसं न दुप्यतीति ।। ८॥
भक्त्रिर्पिनी। एवं सत्सद्दे सति केवलमनिष्टनिवृतिरेव न, किन्विष्टप्राप्तिापि भवतीलाहुः से. वायामिति । सेवायां वा कथायां वा यस्यासक्किदृढा भवेत् । यवाजीवं तस्य नाशो न छापीति मतिर्मम ॥९॥ यस्य महत्कृपया सेवायां स्वशरीरसाध्यश्रीकृष्णभजने, कथायां तद्गुणलीलादिश्रवणे रढा विषयायनभिभूता आसक्तिर्भवेत्, यावजीवमादेहपातं, तस्स क्वापि कुत्रापि देशे कालेपि नाशः भगवद्भजनाननुरूपफलप्राप्तिन भवति । अथवा । भावस नाशो भावा- स्तरोत्पतिर्वा न भवति इति मम मतिः। प्रभुः कृपया को वेद किं दासति । वाश- न्दावनुक्तस्मरणादिसमुच्ययायौं ॥ ९॥ ननु भगवदीयानामपि सङ्गः किमर्थ कर्तव्यः, एकाकिना अरण्यादौ भगवल्लीलादि चिन्तनं कुर्वता कथं न स्यमित्यत माहुः याधसम्भावनायामिति । वाधसंभावनायां तु नैकान्ते वास इष्यते । हरिस्तु सर्वतो रक्षा करिष्यति न संशयः ॥ १० ॥ तुशब्दः तं पक्षं व्यावर्तयति । पाधोत्र चित्तोगविक्षेपादिः, स चेन सम्भ- वति तदा तथैव स्थेयम् । बाघसम्भावनायां सत्यामेकान्तेऽरण्यादौ वासो नेप्यते, न इष्ट. । नवांतनयाधामावेपि बहिौरव्याघ्रादिमयसम्मवे सति कयं स्पेयमित्यत आहुः हरिस्त्विति । सर्पदुःखहर्ता प्रभुः सर्वतः सर्वस्मात् सुदर्शनादिना रक्षां करिष्यति । 'सकदेव प्रपन्नाय तवास्मीति च वादिने । अभयं सर्वभूतेम्यो ददाम्पेतद्वतं मम ।' 'न मे भक्तः प्रणश्यती'त्यादिवाक्यैरस्मिन्नर्थे न संशय इत्यर्थः ॥ १० ॥ श्रीवलमाचार्याः सगुणनिर्गुणभेदेन दशधा मक्तिरिति दशमिः श्लोकैर्मतिवर्धिनीप्र- क्रियां निरूप्य, एतदुक्ताचरणैतत्पाठयोः फलमाहुः इत्येयमिति । इत्येवं भगवच्छास्त्रं गूढतत्त्वं निरूपितम् । य एतत्समधीयीत तस्यापि स्यादृढा रतिः ॥ ११ ॥ इतीदं गृहं गुप्तं तत्समनारोपितं रूपं यस्यैतादृशं भगवन्यानं भक्तिप्रतिपादकम् । अथवा । गूढतत्वं यया सातया, एवममुना प्रकारेण निरूपितम् । य एतदुक्तमाचरेतस्स भगवतिढा रतिः प्रीतिः सात् । यो वैतदुक्ताचरणाशक्तः स वेतद्भक्तिवर्षिनीरूप समधी- यीत श्रद्धामक्तिपूर्वकं पठेत् । तस्याप्यो इदा रतिः स्पादित्यर्यः । श्रीमत्कल्याणरायेण श्रीगोविन्दात्मजेन वै । गुरून नत्ला ययावृद्धि विकृता भक्तिपर्धिनी ।। इति श्रीविहलेश्वरचरणकतानश्रीकल्याणरायविरचिता भक्तिवर्षिनीवितिः ।
श्रीकृष्णाय नमः। भक्तिवर्धिनी। श्रीहरिरायविरचितभक्तिवार्षिनीविवृतिः । श्रीवलभाचार्यपदानुकम्पावलेन किचित् परिचिन्स चित्ते । निरूप्यते मक्तिविद्धयुपायनिरूपणग्रन्थनिरूपितोर्थः ॥ १॥ प्रकृतिप्रत्यया भ्यां भक्तिः सप्रेमसेवनम् । चेतस्तप्रवणं तच तनुवित्तप्रसाधितम् ॥२॥ तत्र मूलं हरेरंगीकारोय शरणागतिः । ततः समर्पणं जीवदेहसंबन्धिवस्तुनः ॥३॥ ततो योग्यत्वसम्पत्या सेवनं तु प्रवर्तते । पूर्वोक्तरूपतवृद्धिस्तनुवित्तजसेवनात् ॥४॥ तदुपायापरिज्ञाने सा कयं वृद्धिमेष्यति । अतस्तदृदयुपापोत्र ग्रन्ये प्रभुमिरुभ्यते ॥ ५ ॥ यथा येन प्रकारेण चेतस्तप्रवणात्मिका । मकिसनपर्यन्तं पृद्धा भवति सर्वया ॥६॥ तया तेन प्रकारेण य उपायः स कथ्यते । उपायस्तु स एवान तनुविचजसेवनम् ॥ ७॥ त्यागात्यागविभेदेन रहे मक्तएहे तथा । बीजभावः प्राथमिको यतः सेवा प्रवर्तते ॥ ८॥ खोमिसेवकमावात्मा तदादिद्धिसंभवः । अथवा त्यागपक्षेण कृतश्रवणकीर्तनात् ॥ ९ ॥ अनायासेन सुरढमक्तिप्राप्तिन संशयः । अत्यागपक्षे कमशो मत्तिवृद्धिरिदोच्यते ॥ १० ॥ अतो हि पीजदोयस प्रकारोब निरूपितः । गृहे स्थितिः स्वधर्मेण वर्णाश्रमगतेन हि ॥ ११ ॥ विधेया नापि सेवार्थमधर्मेण कथयन । अधर्मे स्थितितो मुद्धिनाशाकुसातस्तया ॥ १२ ॥ ततो दुष्कर्मकरणे चेतस्तप्रवणं कुतः । अवतयाविधं कृष्णं सदानन्दं परं वृहत् ॥ १३॥ लोकवेदफलापर्यव्यावृतिरहितो जनः । मजेत्सेवेत तन्वायेस्त्र व्यावृत्तिपोजनम् ॥ १४ ॥ प्रेम्णैव मजनंतत्र माहात्म्यज्ञानसिद्धये । पूजा प्रोक्ता नियन्धे या मादिरहिता हरी ॥ १५ ॥ पाहिर्मुल्योवामावसिद्धये अवणादयः । अयं तु मुल्यकल्पो हि सर्वया सापको मतः १६ पया रोगशतार्नस कुपप्यरहितौषधम् । एवंविधस्य निर्वाह स्वयमेव करोति हि ॥ १७ ॥ योगक्षेमोरहे सीपप्रतिज्ञापरिपालकः । सेवकसापि विश्वासः कर्तव्योऽवश्यमेव हि ॥ १८॥ नदि सेवकनिवाई विदधाति न हि प्रभुः । नयापि जीवप्रकृतिवयतो न त्यजत्यसौ ॥ १९ ॥ म्यादि रविवासामावतो लोकवेदयोः। तस्स मविश्वृद्ध्यर्थमनुकलोरि रूप्यते ॥ २०॥ कारणमिलः। यथा जे सूक्ष्मरूप पठान्शायास्थिडो रस साला इतिः स्यूलरूरल माति, तथा मरिौजे मानिसेवाभाये व्यसनपर्यन्द्रावस्थानो मामले ती मरिम परस्पार पनपता हरिभरतीति भावः।। सूनापति मानतानसः ।
२४ भक्तिवधिनी । व्यावृत्तिसहितो वापि चित्तमात्र हरौ परे । सर्वकार्येषु सतत यत्नेन स्थापयेत्पुन ।। २१ ।। तथापि भगवत्कार्यातिरिक्त उपयोगिनि । तयाभावाभाववता चित्तवमुख्यसभव ॥ २२॥ तदर्थ स्थापयत्तत्तु श्रवणादावपि खतः । एवविधा तु सतत प्रेमासक्तिकमेण हि ॥ २३ ॥ भवेट्यसनससिद्धि प्रवृद्धासौ तदारति । यदेति वचनात्तत्र व्यसन दुर्लभ मतम् ॥ २४ ॥ प्रभुणापि यतो दत्त रासस्थाखेव तत्पुन । यद्धि व्यसनपर्यन्तावस्थ पीज तदुच्यते ॥ २५ ॥ वीन भावात्मक शास्त्रे दृढ सङ्गान्न नश्यति । कुत उत्पादयेद्भावान्तरमित्यपि नोदितम् २६ आसक्तावपि दुःसङ्गो पापकत्वेन चोदित । श्रीस्वामिनीमिरप्युक्त पश्चाध्याय्या प्रभुप्रति २७ त्वयामिरमिता स्थातु पारयामोन्यतो न हि । विवृत तत्तथाचार्यैव्याघदेहिनिदर्शनात् ।। २८ ।। किं प्रेम का तथासक्ति किंवा व्यसनमुन्यते । व्यतिरेकमुखेनैव तलक्षणमुदीर्यते ॥ २९ ॥ नहि भावे हरिर्वाच्यो 'यतो वाच' इति श्रुते ।निषेधमुखतो वाच्यो नेतिनेतीत वाक्यत ॥३०॥ यतो रागविनाश सादौदासीन्येन च स्थिति 1 हरिभिन्ने विना हेतु स भाव प्रेमशन्दित ३१ आसक्तिर्येन भावेन गृहादिष्वनुयोगिषु । अप्रीतिश्च तथा तेपा गृहस्थाना निरोपनात् ॥ ३२ ॥ प्रियान्तिकगतो तेपु पापकत्वेन योधनम् । स्वासबन्धितया भान स भाव सा निगयते ॥३३॥ खयाधकतया वापि यदा स्फूर्तिनिवर्तते । गृहस्थाना तदा कृष्णे व्यसन तदुदीर्यते ॥ ३४ ॥ तदैव पूर्णसर्वार्थो हृद्यानिर्भावतो हरे । अपेक्षिता शरीरस्सालौकिकस्याप्तिरुतमा ॥ ३५ ॥ तदभावे तादृशस्य निरन्तरगृहस्थिति । पहि सवेदनाद्भावनाशिका समुदाहृता ॥ ३६ ॥ अस्याप्येव तदान्येपा का वार्तेत्यपि नोदितम् । अतस्त्यक्त्वा गृह कापि भगवरसन्निधौ स्थिति ३७ कायर्या कदाचित ततो मवेद्भावविनाशनम् । एवमेकप्रकारो हि मक्तिवृद्धरुदीरित ॥ ३८ ॥ दृढभक्तिप्राप्तिफलो द्वितीयोपि निरूप्यते । भार्यादिप्रातिकूल्येन गृहे सेवाघसम्भवे ॥ ३९ ॥ त्याग कृत्वातु य सेवायन कुर्यात्स दुर्लभ । हर्यर्थमात्रचिरस्तु नाशतोऽन्यगमानस ॥ ४० ॥ अनेनास्मिन्नपि प्रोक्ता कल्पेऽव्यावृत्तिरुतमा। लभते च स्वत सिद्धदामी भक्ति परा हरौ ४१ मोक्षादितो मक्तितश्चाधिका व्यसनरूपिणीम् । ननु त्याग विधायैव कुर्यान्वणकीर्तने ४२ किमर्थ सेवना कार्या तनुवित्तयुता हरे । चेतस्तत्प्रवण सेवा सा तु तैरपि सिध्यति ॥ ३ ॥ इति चेन यतस्त्यागे पाधकानन्यमीक्ष्यते । दु ससर्गान्नदोषाभ्या दोपहेतुतया तयो ॥४४॥ अतो यया न दुसङ्गदुष्टाने प्रतिबन्धके।साता तथा हरिस्थाने देशदोषनिवारके ॥ ४५ ॥ स्थेय यतो हरिभक्तदु खाभावाय हि स्थितः । तनापि चित्तदोपस्स सर्वथा विनिवृत्तये ॥४६॥ तदीयै कृष्णसम्बद्ध समर्पितनिजात्मभि । तत्रापि कृष्णकथया सेवया चापि तत्परैः॥४७॥ यत सत्सङ्गमो भक्तधर्मवोधेन साधित । तथा सहपदोच्यार सहमावने च शिति Mect १सया च निरोधो व्यसनमिति भाव । १ भधर्मा सत्सलेन पुष्प वे एषप्रकारेण सर्वत्र ३ एक्प्रामस्थित्यापि सहभाव सम्भवतीति सहस्थितियोचना मुळे सहपदमिति भाव । साधित इत्यर्थ ।
श्रीहरिरायविरचितविवृतिसमेता । अन्यथा कृष्णसेवायाः कयायाश्चाप्यसम्मकः । यदि ते भगवताः कृपयेयुः सभाग्यतः४९ तदा दूरे तद्गुहे तलोवनायः सहस्थितिः । तदानदोपदुःसङ्गौ बाधेयातां न सर्वथा ॥५०॥ तत्रैव देहनिर्वाहस्तत्सलेनैव च स्थितिः । तथाविधमहाभाग्याभावेन यदि तादृशाः ॥५१॥ न स्थापयेयुनिकटे विप्रक तदा स्थितिः । वाशब्दोक्क्या न कोप्यत्र विशेषः पक्षयोयो:५२ पयाकयश्चित्संतोष्याः सन्तः सन्मार्गवर्तिभिः । यथा तेषां सतां चित्तं न स्वस्योपरि दुप्यति। तया विनयसौजन्यसेवाभस्यादिभिः स्थितिः। अथवा स्वस्थ वा चित्तं यथा तदुपरि खतः ५४ न दुष्यति तथा स्थेयं तद्दोपापरिभावनैः । यद्वान्यदीयसंसर्ग चित्तदोपकरं परं ॥ ५५ ॥ विहाय भगवतैः सह स्थेयं विशेषतः । यथा प्रथमपक्षे तु प्रेमासक्त्यादिसम्भवे ॥५६॥ पीजदार्थ तथानापि सेवया कीर्तनेपि च । ढासतौ न भावस्य देहादेवापि नाशनम् ५७ यसेति दुर्लमा त्यागपक्षे प्रोक्ताधिकारिता । यतस्तस्मिन्हि कल्पे तु क्रमेणासक्तिसम्मवः ५८ अत्र तु स्यात्सतो दाययुता भाग्ये तथाविधे । कापीति पदतो लोकवेदौ भक्तिच रूपिता। सम्यक्प्रकारकस्थित्या कीर्त्या लोके न नाशनम् । त्यागपक्षस्थितौ कर्मत्यागार श्रुतिनाशनम् । भगवद्भक्तसङ्गेन भक्तिमार्गे न नाशनम् । दुःसंसर्गानदोपौ च नैव प्रभवतो यतः ॥६१ ॥ तादृशस्सापीति वाक्ये यथापूर्व गृहस्थितिः । वापिकोक्ता तथात्रापि विच्छेदो वाधको मतः । यावजीवमिति प्रोकमत एवं पदं पुनः । एतेन त्यागपैक्षाणामन्यासक्तिनिवारिता ।। ६३ ॥ तयैव चात्र विच्छेदस्तदभावे न नाशनम् । मतिर्ममेति यत्रोक्तं तदभिप्राय ईदृशः ॥६४॥ कदाचिदूरदृष्टेन भगवत्मियरोपतः । दुर्बुद्धौ तदतिद्रोहाद्भगवत्प्रतिवन्धतः ।। ६५ ।। नाशोपीति यतो वाक्ये संदेहो विनिरूपितः ननु सागं विधायान्यसङ्गः किमिति घोधितः । ज्ञानिनामिव संसर्गमानत्यागो न चोदितः । सागे खेकान्तवसतिर्विशेषेण च साधिका ।।६७॥ नयोतरं तु भावस्य थाधने हृदयस्थितैः । कामादिभिर्जीवधर्यावत्सम्भाव्यते पुनः ॥६८॥ तापदेकान्तवासस्तु नेप्टो याधानिराकृतेः । कामादयो भावनामिनीशयन्ति क्षणान्मनः ६९ न तत्र दोपनाशाय सहायोस्ति रहास्थितौ । भक्तिमार्गप्रकारेण हरिश्चापि निरोहितः ॥७॥ भक्तिमार्गीयकार्याय न व्यापकतया सितिः। अतो न रक्षकः कोपि तस्सैकान्तस्थिती मवेत् । तुशम्देन ततोन्योषि त्यागपक्षोन सूचितः । अ भरलसरायोपि दुर्यलत्वेन रूपितः॥७२॥ हरिरत्र न शक्नोति कर्तु वाघां कुतोपरे । अतो न रक्षकापेक्षा सिद्धत्यागे विधीयते ॥७३॥ खास्थ्यहेतोः परित्यागादिति वास्यायमूदितात् । यदा तु साधनदसा तदापेक्ष्यं हि रक्षणम् । मकानां रक्षकः कृष्णो नान्य इत्येप निधयः । स तु सनिहितो नित्यं लीलाग्याने तथा पुनः। यत्र या भगवद्भक्ताः सेक्या कश्या युताः । समारतो दुःखहती निजाश्रितजनाभितान्७६ नोपेक्षते यतस्तन सेयं या सितो हरिः । तत्रापि सर्वतो रक्षा नान्यसाध्या न संशयः४७ रिसानगरपशादिदं पक्षान्तर, न तु सारसार । मलाई । पाना सेवापरता, स्थापरता प्रति रागे प्रप उ.। रेगका माग । भति.
भक्तिवाधिनी । २६ यतः कालवशाः कालकर्मादिम्यो न रक्षकाः । तुशब्देन स्वभावोपि हरेरेष निरूपितः ७८ संशयाभावकथनं तत्र मकवयो हरिः । भक्तमत्तानपि सतो रक्षति स्वगतानिति ॥ ७९ ॥ रक्षणं कालकर्मादेस्तया मावान्तरादपि । पक्षद्वयेन भक्तेस्तु वृद्धिरेवं निरूपिता ॥ ८ ॥ इतिशब्दः समाप्त्यर्योन्यप्रकारनिषेधकः । एतावता हि भगवानमेव निरूपितम् ॥८१॥ यतस्वमूढतत्त्वं हि ततोन्येषां सुदुर्गमम् । तत्त्वमेतावदेवास तस्मिन्नत्र निरूपिते ॥ ८२।। तदेव सकलं शास्त्रं निरूपितमितीरितम् । एतदध्ययनात्सम्यग्वृद्धिं याति रतिईरौ ॥ ८३ ॥ सम्यक्त्वं श्रद्धया भस्या तथा विश्वासतो गुरौ । य इत्यनेन वर्णादिनियमोधिकृतौ न हि ८४ अपिशन्देन कैमुत्सन्यायोप्यत्र निरूपितः । ग्रन्यपाठादपि रतेर्वृद्विर्यत्र तदा किमु ॥ ८५ ।। वाच्यमाचरणे साधु समायामुपदेशने । तोपि भक्तिर्वृद्धापि दृढोक्ता पाठमावतः ॥ ८६ ॥ इति श्रीवल्लभाचार्यकरुणालब्धशक्तितः । वसन्तोपाय भावस्स पोपायातिप्रयत्नतः ॥ ८७॥ लोकरूपेण सर्वापि विवृता भक्तिवर्धिनी । यथामति निजाचार्यचरणाश्रयणादपि ॥ ८८ ॥ एतेनास्मत्कुलपतिः प्रभुः श्रीविठ्ठलेश्वरः । प्रसीदतु सदा दासे हरिदासे खवंशगे ॥ ८९॥ इति श्रीहरिदासविरचिता भक्तिवर्धिनीवितिः समाप्ता । श्रीकृष्णाय नमः। भक्तिवर्धिनी। श्रीगोपेश्वरविरचितविवृतिसमेता। श्रीवल्लभाचार्यचरणवारिरुहेभ्यो नमः । श्रीविठ्ठलपदपकरुहेभ्यो नमः । यत्पदाम्भोजभजनाद्भवन्ति समसिद्धयः । कलयामि कृपावाधि तं प्रभु भक्तिवृद्धये ॥ निधाय श्रीमदाचार्यचरणानयुगं हृदि । तत्कृपातो यथाशक्ति व्याकुवें भक्तिवर्धिनीम् ॥ भगवद्रसपीयूषपायिनो यत्कृपायुजः । भवन्ति...........मक्त्या तं श्रीविठ्ठलमाश्रये ॥ श्रीमत्कल्याणरायाख्याननुकम्मापयोनिधीन् । नमामि तातचरणानहं स्वाभीष्टसिद्धये ॥ अय मायावादादिदुरध्येतिवाजालमहेन्द्रजालजनितजनताव्यामोहमूलनिर्मूलेन सम- मितागमनिगमान्तस्मृतिपुराणतत्त्वसूत्रादिप्रमाणशतप्रतिपन्नप्रपन्नजनप्रतिक्षणक्षेमंकरप्रम्वा- ज्ञाप्रादुर्भाविततद्भक्तिमार्गेणातिकरालकलिकालविलुप्तकर्माद्यधिकारान् भगवदीयकृपादृक्पा- 'तत्रापि भतिदापि प्राप्यते सुद्धा हरौ। पाठमात्रेण देनेषा ससेव्या भक्तिवर्धिनी ।' इत्यधिक २ भत्राशुद्धमिव भात्रि। बाचित ।
श्रीगोपेश्वरविरविवविवृतिसमता । ताजातमक्तिमार्गश्रद्धाधाधिक्यसमधिगतैतदधिकारानपि भक्तितत्प्रवृद्धिकरोपायविशेपपरि- चयाभावप्रमवप्रचुरक्लेशकरवितान्त करणान्प्राणिन समुद्दिधीर्षव परमपालव श्रीवल्लभा. चार्यचरणा मक्तितप्रवर्धकोपायनिरूपण प्रतिजानते यथेति । यथा भक्तिः प्रवृद्धा स्यात्तथोपायो निरूप्यते । पीजभाये दृढे तु स्यात्त्यागाच्छ्रवणकीर्तनात् ॥१॥ यथा येन प्रकारेण भक्ते प्रकृष्टा वृद्धिर्भवति, तथा तेन प्रकारेण उपायो निरू प्यते, विविच्य कथ्यत इत्यर्थ । ननु श्रीभागवतगीतादिषु भक्तितद्वृद्धिनिदानभूतदान- मतादीनामुपवर्णितत्वेन तत एव तदवगतेरनर्थकमेतन्निरूपणमिति चेत् । अन वदन्ति । भक्तिर्हि द्विविधा, साधनरूपा फलरूपा च । तनाचाया दानबतायुपायपूर्वकत्वमिति तदुत्प- त्तिवृद्धिप्रकारा सुप्रसिद्धा , न द्वितीयस्सा । अतस्तस्सा खय प्रकटिताया वृद्धिप्रकारनि रूपणमुचिततर भवतीति । वस्तुतस्तूभयविधभक्तिवृद्ध्युपाय एव निरूपणीयत्वेनावाभिमत इत्यामाति, श्रवणकीर्तनादुमयसाधारणसाधनानामऽभिधानात् । न चैपामुभयरूपत्वमनु पपन्नमिति वाच्यम्, स्वतप्रफलत्वफलान्तरसाधकलप्रतिसन्धानपूर्वकविपानेनोमयरूपताया सम्मवात् । नन्वेव सत्येतेपामन्यत्र निरूपितत्वेनानापि निरूपणे क्रियमाणे पौनरुक्त्यदोषो दुष्परिहर इति चेत् । न । अन्यन धर्मान्तरव्यतिकरणानिर्लठिताकाराणामेपा व्यक्तमवश्य वक्तव्यतयोक्तदोपस वक्तुमनुचितत्वात् । न पुनरुक्तता महान्दोष , शतकृत्वोपि पथ्य वक्तव्यमिति न्यायात् । भक्तिप्रवृद्धि कदा भवेदित्याकाक्षायामाहु यीजभाये दृढे तु स्यादिति । बीजमावे सल्पलेहे दृढे व्यसनरूपे सति भक्ते सर्वाशेन वृद्धिर्मवेदित्यर्य । यहा । पीजमावे खाचार्यानुग्रहससिद्धभगवनिवेदनानन्तरमाविभगवदगीकारे दृढे अति सिरे केनाप्यचात्ये सति सा सादित्यर्थ । न च मक्तेर्मुक्तिहेतुलाद ज्ञानेनैव तदवातेर्भ क्तिवृद्धिरनमिलपितेति वाच्यम् । मक्ते खतप्रफललेन तदृढे सर्वाकाक्षणीयत्वात् । कय मन्यथा मुक्तम्र्धाभिषिक्त श्रीशुको भृश भक्तावनुरक्तोऽभूत् । कय वानारतनिवृत्तिनिरता सनकादयोपि भक्तावत्यासता आसन् । अत एव 'परिनिष्ठितोपि नैर्गुण्ये' 'आत्मारामाय 'नैकात्मता मे स्पृश्यन्ती'त्यादिवास्यानि । नापि मक्ति विना कृत ज्ञान कैयत्यकरणीम वितुमर्हति, मतिसहितसैव तस्स मुक्तिसाधकत्वात् । 'श्रेय त्रुति भक्तिमुदसे'ति वाफ्यात् । ननु ययाकयधिन्मुक्तिहेतुत्वोक्तावपि भक्तेः स्वतप्रफलत्व न मुप्रतिपदमिति चेत् १ मा न्तोसि । सत पुरुषार्यत्वेन कृतायास्तसास्वयात्वस दुवारत्वात् । अत एव प्रभुचरगे रमाणि भक्तिहसे 'बेहोसत्यनन्तर खव्यसनत पतघ्रपुरुषार्यत्वेन क्रियमाण अवा- दिरुतम' पुष्टिरूप' इति । एव सति मत्सेवया प्रतीत च सालोक्यसाध्मिामीप्यमा रूप्यकत्वमप्युत' 'मधुदिट्सेवानुरक्तमनसाममयोपि फा,' 'अनिमिता भागवती भक्तिः सिद्धेर्गरीयसी' 'भगवान्मजता मुकुन्दो मुक्तिं ददानि कहिचिस्स न भक्तियोगम्' 'एव २८ भक्तिवर्धिनी। धर्ममनुष्याणाम्' 'मक्तिं लब्धवतः' भन्या सघातया मक्या,' 'तस्मान्मद्भक्तियुक्तसे'- सादिवचनानि सङ्गच्छन्ते । तदृद्धावतिरिक्तानि सापनान्याहुः स्यागाष्ट्रवणकीर्तना. दिति । भक्तिमार्गविरोधिदेवान्तराश्रयादेस्त्यागाद्भगवन्नामचरित्रादेः श्रवणात्कीर्तनाच । कर्मणोरिव श्रवणकीर्तनयोर्विरोधो नास्तीति बोधनार्थमेकवद्भावः । श्रवणकीर्तनयोप- लक्षणवेन स्मरणखाचार्यमक्तिविश्वासादीनामपि संग्रहः । न चाप्रमाणसिद्धान्यन्याश्रय- सागश्रवणादीनीति वाच्यम् । 'यो वै खां देवतामतियजते, अस्वायै देवतायै च्यवते, न पर पामोति, पापीयान्भवति' 'यावदन्याश्रयस्तावत्', 'अनन्यचेताः सततं, 'अनन्या- श्चिन्तयन्तो माम्, 'प्र तत्ते अद्य शिपिविष्टः नामार्यः शंसामि वयुनानि विद्वान्, तं ला गृणामि तवसमतव्यान्क्षयंतमस्स रजसः पराके' 'तस्मात्सर्वात्मना राजन्' 'तस्मादारत' 'तस्मादेकेन' 'तमु स्तोतारः' 'शृण्वन्गृणन्संस्मरयन्' 'शृण्वन्ति गायन्ती'त्यादिश्रुतिपुरा- पवाक्यसिद्धत्वात् ॥१॥ भक्तिवृद्धौ साधनान्यमिधाय तत्प्रतिभुवं प्रकारमाहुः वीजदार्यप्रकारस्त्विति । बीजदार्यप्रकरस्तु गृहे स्थित्वा स्वधर्मतः । अव्यावृत्तो भजेत्कृपणं पूजया श्रवणादिभिः॥२॥ तुशब्दः प्रकारान्तरच्यवच्छेदकः । पीजस भगवद्भावस्य दाजनकः प्रकारो भगवद्भजनलक्षण इत्यर्थः । यद्वा । वीजस्य पूर्वोक्तरूपस्य स इत्यर्थः । तमेवाहुः गृहे स्थित्वा स्वधर्मतः अश्यावृत्तो भजेत्कृष्णं पूजया श्रवणादिभिरिति । सप- मतोऽमिहोत्रादेहे बव्यावृत्तः कर्तव्यान्तरव्यासक्तिशून्यः स्थित्वाऽचञ्चलो मूत्वा कृष्णं सदानन्दं, 'कृषि वाचक' इति वाक्यात्, श्रवणादिभिः पूजया भजेदित्यर्थः । इह स्नेहा- धिक्यवैधुर्येण विधीयमानायाः सेवायाः पूजासाम्यापूजापदमुक्तम् । तत्राद्युक्तपूजायां शीतलशहसलिललानाधभिधानेन भक्तिमार्गविरोधात् । अथवा । ननु कृष्णभजनप्रकरणे तद्विभूतिविषयकागमायुक्तयज्ञोकेरयुक्तत्वेन प्रकृते कयं पूजापदोपादानमुपपद्यत इति चेत् । इत्थम् । सन्ति हि बहवो भावभजनप्रकाराः, तदन्तर्निविष्टा भवति भावपूर्विका पूजापि । अत एव शुद्धपुष्टिमार्गाचार्यैः प्रमेयप्रकरणीयसप्तमाघ्याये 'पूजां दधुर्विरचितां प्रणयावलोक' रित्यत्र गुणगाने हरिणीभावनिरूपणानन्तरं तद्भावदशः पूजारूपता निरू- पिता । नहि तत्र तात्रिकी पूजा युज्यते जातुचित् , तस्याः पृयग्रूपत्वात् । तेनैवंभूतभावा- नुसारिणी साताभिधिसितेति तदुपादानमविरोधि । न चैवमप्यन्ततो भक्तौ पर्यवसानेन तसा एव वाच्यत्वात्संशयितपूजोक्तिरयुक्तेति वाच्यम् । श्रवणायमक्तिनवकान्तर्गतखत- भावपूनायाः प्रकृते पुरस्करणीयलेन क्षतेरभावादिति । यद्वा । धर्मान्तराणां परधर्मलेन परिहार्यत्वात्स्वधर्मतो भगवद्धर्मतः सेवानुकूले गृहेऽव्यावृत्तस्यक्तान्यव्यासक्तिरिति यावत्, तयाभूतः सन्, कृष्णं सदानन्दं पूर्वोक्तया पूजया श्रवणादिमिर्मजेदित्यर्थः । अत्र कृष्ण- , श्रीगोपेश्वरविरचितविवृतिसमेता। २९ पदेनोक्ता भजने फलरूपता । सूचितोकरणे प्रत्यवायो लिङ्गव्यत्ययेन च । न चास्मिन्पक्षे निहितवर्णाश्रमधर्मत्यागे प्रत्यवायपापण्डित्वादिदोपप्रसङ्ग इति वाच्यम् । सेवासमयामावे यथाधिकारं सर्वधर्मसम्पादनेनैव दोपापाकरणसम्भवात् । सेवासमये च सर्वधर्माणामन- वकाशनिराकृतत्वेन तदमावेपि हानेरभावात् । 'मत्कर्म कुर्वतां घुसा मिति वास्यात् । कदाचिद्दोपापावेपि भगवतैव तदपगमोपपत्तेश्च । 'खपादमूलं मजतः प्रियस्य त्यक्तान्यभा- वस्स हरिः परेशः । विकर्म यचोसतितं कयधिदुनोति सर्व हृदि सन्निविष्ट' इति वास्यात् । मर्यादामागीयव्यवस्सैपा । शुद्धपुष्टिमार्गमभिनिविशमानस तु प्रभुचरणतामरसैकतानचेतसः कृत्वकर्मकलापं परित्यजतोपि प्रभोरशिथिलपरिग्रहेण न कश्चिदोपः, यतस्तथाभूत एव स पन्याः । 'यदायमनुगृह्णाति भगवानात्मभावितः । स जहाति मतिं लोके पेदे परिनिष्ठिता' मिति वाक्यात् ॥२॥ एवं तदृद्धिानकारं व्यासक्तिविरहितभगवद्भजनलक्षणमुक्त्वा, 'न दि कविरक्षण- मपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृ'दितिन्यायेन क्वाचित्कन्यावृत्तावपि चितं भगवति निधाय भजन- प्रयत्नमत्सजनासीतेत्यभिप्रायेणाहुः- व्यावृत्तोपि हरी चित्तं श्रवणादौ यसेत्सदा । ततः प्रेम तथासक्तिर्व्यसनं च यदा भवेत् ॥ ३ ॥ न्यावृतोपि हरौ चित्तं श्रवणादौ यसेत्सदेति । व्यावृत्तो तौकिककर्मन्यानोपि हरी सकीयदुःखहरणसमावे चित्तं निधायेति शेषः, सदा निरन्तरं श्रवणादौ तसिमिचं यसे- प्रपतेतेत्यर्थः । यसु प्रयत्ने तेन, यया केनचिदुक्तं, 'परव्यसनिनी नारी च्यापि गृह- कर्मणि । तदेवासादयत्यन्तः परसङ्गरसायन मितिवदये हरि धृत्वावश्यकसांसारिकका- पच्याप्तेनाप्यनन्तरमनवरतं श्रवणादिप्रयत्नप्रवणान्तःकरणेन भवितव्यमित्यर्थः । यद्वा । भगवत्कार्यन्यारतोपि तत्सरिसमाप्योरितसमये अवणापर्यमुयमं दिध्यादित्यर्थः । यते- दिति कचित्पाठः । तत्र परस्मैपदमनुदात्ततामात्मनेपदानित्यत्वायत्रोतव्यम् । एवं प्रय- तमानस्यानुपयेण प्रेमासक्तिव्यसनानि मवन्तीत्याहुः ततः प्रेमेति । ततः श्रयणादिम्पः प्रयमं प्रेम चित्तासापरवति, पयात्तथैव सङ्कल्पवदासक्तिर्भवति, व्यसनं च पुनर्वदा भवे- दतिप्रजुरप्रभुप्रसादप्राप्यतावस । कीदृशानि पुनः प्रेमासक्तिव्यमनानि । म्वगोचरे सतः प्रवर्तको मावः प्रेम । तयानेकविधमनोरयजनको मार आमक्तिः । विपण चिना सानुमशक्तिर्येन स मावो व्यसनमित्येवमालय । अ संग्रहसोरी । 'स प्रेम पः विदपाति मावः स्वतःप्रवृत्ति पिपये सकीये । पयामिलापान् जनपेदनकान्मारः स मासक्तिरिति प्रसिद्धः । सानुमेव न शक्नोति विपपन्यतिरेक्तः । येन मारेन तं मार- माहुयंसनसंज्ञकम् ॥ ३॥ एतन्मम्पत्ती पोज ८ मातीत्साहुः पीजमिनि ।
भकिवर्धिनी। पीजं तदुच्यते शास्त्रे दृढं यन्नापि नश्यति । स्नेहाद्रागविनाशः स्यादासरत्या स्थाद्वहारुचिः॥४॥ भगवत्कृपादिना यदि व्यसनसमुद्भवस्तदा यद्भगवच्छाने चीजं नेहाकुरखरूप- मुच्यते तदृढमशिथितं भवति, अत एव विषयादिसंसर्गेण नश्यत्यपि न । व्यसनमावस्स पीजमावदार्थपरमावधिरूपत्वादिति भावः । यद्वा । चीजं पत्प्रभुपरिग्रहात्मकं तयदि व्यसनं समुत्पद्यते, तहा भक्तिशाले दृढं केनापि शियिलीकर्तुमशक्यमुच्यते । अत एव काला- सत्स सादिनापि न विनश्यतीत्यर्थः । नहि भगवान्निजाङ्गीकृतान्कदाचिदपि विहातुमु. सहते । तदङ्गीकारस्य नित्यत्वात् । एवमुत्तरोत्तरवलवत्तराणामेतेपामाघयोः कार्यमाहुः नेहेति । सहारगपद्विपयकप्रेम्णः प्रभुसेवाप्रतिकूले गृहे रागस विनाशो मवति । मग- वद्रागस्य द्रागेव गेहानुरागनाशोपायत्वात् । 'तावद्रारादयः स्तेना' इति वास्यात् । था- सत्त्या चोक्तरूपया गृहेशरुचिरासस्यमाय उपजायते । भगवदासक्तेस्तदतिरिक्तास- क्तिनिराकरणशीलत्वात् । 'कृष्णांनिपममधुलिट् न पुनर्षिसृष्टमायागुणेषु रमते वृजिनाव- हेवि तिवाक्यात् । न च प्रेमासक्तिमतामपि गेहलेहादिसद्भावदर्शनादसतमिदमिति पाच्यम् । तादृशां भगवद्विषयकस्नेहसङ्गोपनार्थमेव सांसारिकतत्प्रकाशनादनेवंभावे च भगवत्यपि तदभावादेवेत्युभयथापि दोपाभावात् । लोकसंग्रहार्थमपि भकानामसंख्य- च्यापारदर्शनात् । भजनौपयिकमवगायनुरागस्य खधर्मपर्यवसायित्वेनौचित्यावनितलाच । एवं सति गृहाधनुरागिणामेवात्र यापकत्वावधर्मः स्फुरत इत्याहुः गृहेति । गृहस्थानां यापकत्वमनात्मत्वं च भासते । यदा स्याह्यसनं कृष्णे कृतार्थः स्यात्सदैव हि ॥ ५॥ तादृशस्यापि सततं गेहस्थानं विनाशकम् । भगवत्सम्बन्धिप्रेमासस्योहस्थानां विवेकवैकल्येन गहेनुरागाधिक्यातत्रैव तिष्ठतां यापकत्वं, तर लेहाभावोत्पादकतया कलत्रपुत्रादिपोषणसामर्थ्याभावलक्षणदोपोद्मापना. प्रवृतिमार्गातिगात्रनिष्ठावत्तयानात्मधर्मवं च, भगवति वानात्मत्वं भासत इत्यर्थः । वस्तु- तस्तु, 'तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्' 'नमे भक्तः प्रणश्यति' 'न कर्हि चित् मत्सरा शान्तरूपे नक्ष्यन्ति' 'तस्मिन्प्रसन्ने सकलाशिपां प्रमौ', 'तस्मिन्सन्तुष्टे किममाप्यं किमलभ्यं भगवती'त्यादिवाक्येभ्यो भगवानेव निजभक्तनिखिलकार्यनिर्वाहाय जागरूक इति वास्तवसर्वभावेन भजनीय इति वस्तुगतिमविदुषामनीपामेवेपं कुमनीपेति । अत एव श्रीमदाचार्य सत इत्यभाषि । अथवा । भगवदासक्तियुक्तानामतादृशशास्त्रादिषु याध- कत्वप्रतिसन्धान भवतीत्याहुः गृहस्थानामित्यादि । अत्र गृहस्थपदेन भार्या पुत्रादयस्ता- स्थ्यादृश्यन्ते । तया च सति तेषां विजातीयमावतया तद्भावम स्वभावप्रतिद्वंद्वित्वेन खात्म-
श्रीगोपेश्वरविरचितविवृतिसमेता।
मावस्खामाव्येन च निजभावभङ्गमीरूणां तेषु बाधकत्वं भासतेऽनात्मत्त्वं च । तथाभूतानां
मगवत्येव स्फुरत्खात्ममावतया नदीयेप्वात्मीयताविर्भावात् । अत एव श्रीमदस्मदाचार्य-
रुक्तं 'पुत्रे कृष्णप्रिये रति'रिति । एतेन 'न वारे पुत्राणां कामाय पुत्राः प्रिया भवन्ति,
किन्वात्मनः कामाय पुत्राः प्रिया भवन्ती'त्यादि श्रुतेरात्मसम्बन्धितया पुत्रादीनां प्रिय-
त्वेन बाधकलमसम्भवीत्याशङ्का व्युदस्ता । एवं प्रेमासक्त्योः कार्यमुक्त्वा व्यसनस्य तदाहुः
यदेति । यदा परमदुरापमनुपममुक्तभावात्मकं व्यसनं कृष्णे सदानन्दे खलीलासहिते
स्थात्, तदैव कृतार्थः पर्याप्तार्थः स्यात्, कर्तव्यान्तरपरिशेषाभावात् । अत एव व्रजस्थितानां
तथाभावः श्रूयते श्रीभागवते, 'तदर्थविनिवर्तितसर्पकामाः,' 'सन्त्यज्य सर्व विषयांस्तव
पादमूलम्' 'क्षणं युगशतभिवेत्यादिना । एवकारः प्रेमासक्तिमतोर्व्यवन्छिनति ।
हिशब्देनान युक्तार्थतोक्ता, तद्भावविघातकसद्भावात् । तदेतदाहुः । तारशस्यापि प्रेमा-
दिमतोपि सततमविच्छेदेन सत्सङ्गाधभावेन गेहस्थानं भावस्य विनाशकं भवति ।
सत्सङ्गाद्यसचिवस्य तस्य तादृशत्वात् । न च व्यसनवतोपीदृशयाधकास्तित्वं शक्य-
शकम् । तद्भावस्सैव खतनकार्यक्षमत्वेन सत्सङ्गादिभावामावायत्तद्धिहासैस्तक्ष्यति-
रिक्तभावानामेव साधकबाधकादिसम्बन्धितया प्रकृते बाधशकानवतारात् ।
गृहादेर्भावान्तरायरूपत्वं विदित्वा तदपहाय फलाय प्रयतेत यस्तस्य तदाहुः ।
त्यागं कृत्वा यसेद्यस्तु तदर्थाथैकमानसः ॥ ६ ॥
लभेत सुद्धा भक्ति सर्वतोप्यधिकां पराम् ।
तुशन्दः प्रकारान्तरल्यावर्तकः । यः पुमान्गृहादिषु भगवद्भजनप्रतिबन्धं विबुध्य
तत्यागं कृत्वा भगवलीलाश्रयणचिन्तनादिनिमित्तं यसेत् यत्नं कुर्यात्, कीदृशः ? तदर्या-
बैंकमानसः । तस्य भगवतो योर्थः श्रवणादिरूपस्तदर्थ एकं मानसं यस्य तादृश इत्यर्थः ।
यद्वा । भगवतीर्थो लीला, तदर्थं तन्निमित्तं तदर्थेषु तत्सम्बन्धिपदार्थेषु वा तयेत्यर्थः ।
अथवा । स चासावर्थश्चेति कर्मधारये तदर्थो भगवान् तदर्थ तथेत्यर्थः। स एवार्यः शास्त्र-
स्कन्धादिषु यत्र । तादृशं श्रीभागवतं 'शास्त्रे स्कन्धे प्रकरणेऽध्याये वाक्ये पदेऽक्षरे । एकार्थ
सतपा जाननविरोधेन मुच्यत' इति श्रीमागवतार्थतत्त्वदीपवचनात् । तदर्थ वा तथेति वार्थः।
स एवार्थों धनं येषां ते । तदर्थी भगवद्भक्तास्तेषामर्थेषु कार्येषु वा तथेत्यर्थः । एतादृशः
सन् भक्ति सुदृढा विषयावनभिभाच्याम्, 'प्रायः प्रगल्भपा भक्त्या विपर्यामिभूयत' इति
वाक्यात्, सर्वतो ज्ञानादिभ्योप्यपिकामुत्कृष्टाम् । न चाधिक्ये मानाभावः । तस्मा-
मद्रक्तियुक्तस्य' 'ज्ञानविज्ञानसम्पन्नो मन मां भक्तिभावितः,' 'नकात्मतां मे स्पृह-
पन्ति परिनिष्ठितोपि नैगुण्ये 'आत्मारामाश्वेत्यादिवाक्यशतसिद्धत्वात् । विस्तरन्तु
श्रीमदस्मत्प्रभुचरणैरन्यत्र कृत इति नेह तन्यते । परामभिव्यक्तापरिच्छिन्नानन्दरसखरूपां
लमेत प्राप्नुयादित्यर्थः ॥ ६ ॥
३२ भक्तिवधिनी। तर्हि निरन्तरायेऽस्मिन्नुपाये सति किमित्युपायान्तरमुपादेयमित्यत आहुः त्याग इति। त्यागे वाधकभूपस्त्वं दुःसंसर्गात्तधानतः॥७॥ अतः स्पेयं हरिस्थाने तदीयैः सह तत्परः। अदूरं विप्रकर्षे वा यथा चित्तं न दुप्पति ।। ८ ।। न हि त्यागो निष्प्रत्यूहं फलाय कल्पते, सागे यतो चापकानि दुःसंसर्गदुष्टा- शक्षणादीनि सद्बुद्धिप्रतिक्षेपकारीणि भूयांसि सन्ति । न हि भगवत्सराशुखानामने- कदोपदन्तुरितस्वान्तानां सहस्तूर्णं भावभरं न विद्यते । न वा तथाभूतानाम- नादिकं भक्षयतो भगवसभीक्ष्णमविक्षिप्तं मनो भवति । अत एवावैष्णवादीनामन्नं न परिग्राह्यम् । तदुक्तं पद्मपुराणे 'अवैष्णवानामन्नं च पतितानां तथैव च । अनर्पितं तथा विष्णोः श्रमांससदृशं भवेदिति । ननु चाधकानां बहुले द्वावेव कथं कथितौ । दुष्ट- संसर्गानदोपयोः प्रबललादिति बुघ्यख । तेन यदि भगवद्भजनं गृहादिषु निधि सम्प- द्यते, तदा न परित्यागः श्रेयान् । तचेत्तत्र मायाघभिद्वेषादिना सम्यन निर्वहति, तदा- पूर्वोक्तप्रणालिकया त्याग एव कर्तव्य इति विवेकः । अत एव श्रीमदाचास्तत्त्वदीप- निबन्धेऽभ्यधायि भार्यादिरनुकूलश्चेत्कारयेद्भगवत्कियाम् । उदासीने स्वयं कुर्यात्प्रतिकूले गृहं बजेदिति । द्वितीयस्कन्धविवरणे च दाम्पत्य भगवद्भजनार्थमपेक्षित'मिति । एवं सागे दुःसङ्गादेविघातकत्वं निरूप्य तद्दोपनिराकरिष्णुः सतां सङ्गः कचिद्भगवत्स्थाने सम्पाद- नीय इत्याहुः अत इति । यतस्त्यागे पापकानां बहुत्वमतःकारणात्वचिद्धरेः सर्वदुःखहर्तुः स्थाने श्रीगोकुलश्रीगोवर्धनादौ तदीयैस्तत्सम्बन्धिभिस्तत्परैः, स एव परः सर्वापेक्षयोत्कृष्टो येषां तादृशैः, परमकाष्ठापन्नवस्तुनिष्ठैः सह स्पेयमित्यर्थः । न च तत्राप्यसरसङ्गादिसम्भ- वादुक्तदोपानिवृत्तिरिति वाच्यम् । सर्वसमयसत्सङ्गपत्स दुःसङ्गादिदोपाणामनवकाशनि- वारितत्वात् । न हि प्रतिदिनं सत्सङ्गरसावादिनः कचिदन्यत्र चित्तप्रसादमासाद- यन्ति । अत एव सत्सहोकपः श्रीमागवते गीयते । 'तुलयाम लवेनापि न स्वर्ग नापुन- भवम् । भगवत्सङ्गिसङ्गस्य मानां किमुताशिप' इति । ननु यत्र कचित्सत्सङ्गेन कार्यसिद्धेः सन्द्रिः सहावसानं हरिस्थान एव कार्यमिति निर्वन्धो चक्रवन्धवनिरर्थक इति पेत् । मैवम् । तत्र वाहुल्येन तेषां सहतेः सम्यक्सम्भवेन तदनुवृत्रावश्यकत्वात् । अन्यत्र तेषां प्रायशोनुरागविरहेणानवस्थानात् । वहिर्मुखजनकृतोपद्रवशझ्या स्थातुमशक्य- त्वाच । अत एवोक्तं पञ्चमस्कन्धे 'न यत्र वैकुण्ठकया सुधागा न साधवो भागवतास्तदा- अमान पत्र पदेशमा महोत्सत्याः सुरेशलोकोपि न याति सेव्यतामिति । एवं मति, तेषां सन्निधौ स्थितिः कथं कर्तव्येत्याकांक्षायामाहुः अदूरमिति । यथा भगवदीयानां चिदं न दुष्यत्युद्वेगादिना, न विकृतिमाप्नोति, तथाऽदा निकटं यथा सावधा, विप्रकर्षे दूरे वा सातव्यमित्यर्थः । अत्रायमाशयः । सन्तो हि नितान्तमेकान्ते भगवत्कयां मिया कुर्वन्तस्त- श्रीगोपेश्वरविरचितदिवृतिसमेता। सामसविवशा मवन्ति, ताननुसरन्यदि कश्चित्वलामं निथिय तेपामासत्तिमालम्बते, ते चेदतिगूढरसं तदग्रतः प्रकाशयितुमशक्यमाकलयन्तः, स्वयं ततो विरमन्ति चित्तोद्वेगवन्तः, तदा तस्स दूरस्थितिरेवानुसरणे श्रेयसी, अन्यथा मनीषितानिष्पत्तेः । अय दयाहृदयतया- तिनिकटागमने नियोगं विदधते, तर्हि तत्सामीप्यमेव समीचीनम्, अनुसरणानुकूलतया समीहितसिद्धिहेतुत्वादिति । यद्वा । स्वस्य चित्तं यथा दुष्टं न भवति तथा सन्निकण विप्रकर्षण वा स्थयमित्यर्थः ॥ ७, ८॥ एवं सत्सङ्गाद्यपगताशेपदोपसानिमव्यवस्थामाहुः सेवापामिति । सेवायां या कथायां वा यस्यासक्तिढा भवेत् । यावजीचं तस्य नाशो न कापीति मतिर्मम ॥९॥ यस्य सत्सादिकमनुतिष्ठतः श्रीकृष्णसेवायां खतत्रपुरुषार्थत्वपरिस्फूर्ती दृढा निश्चलासक्तिवेत, कथायां का, तस्या अपि सेवासमत्वात् , तस्स यावजीवं प्राणस्थिति पर्यन्तं नाशः फलाभावः कापि न स्यादिति मम मतिः । अतो नेह सन्देहः कर्तव्य इति भावः । यद्वा । मम मतिरेवं भगवान्परमकृपालुः कथं वा तस्स दयेतेति न वेदितुं शक्यमिति भावः । ननु सेवायाः कथायाश्च कथं साम्यम् । इत्यम् । तथाहि । सेवा नाम चित्तस्य तदेकावणत्वम् । 'चतस्तावणं सेवेति लक्षणाभिधानात् । तत्सम्पादिकायाः कृतेरपि तथात्वम् , अन्यथा तस्याः परत्वानुपपत्तेः । अत एव 'मानसी सा परा मते'त्यमाणि । तेन यथैवस्या भगवद्रावतद्भक्तसङ्गादिसाधकलं नान्तरीयकानन्तकार्यसाधकत्वं च, तथा कथाया सपीति साम्यं दुरपवादम् । अत एवैतादृशाभिप्रायेण 'कथारतिषु सक्तस्स कथका अपि मिलन्ति, प्रेमापि भवति, आनुपसिकं चान्यद्बह्येव भवतीत्युक्तमाचार्यैः ॥९॥ ननु क्वचिकाननादावेकान्ते वासं विधाय भगवन्नामलीलादिकमेव चिन्तनीय- मेकाकिना, किं भगवद्भक्तस नापीति चेत्तत्राहुः । पाथसंभावनायां तु नैकान्ते वास इष्यते। हरिस्तु सर्पतो रक्षा करिष्यति न संशयः ॥१०॥ तुशब्दः शताव्युदासकः । यदुक्तमेकान्तेन नामचिन्तनमेव कार्य, न सत्सङ्ग इति तत्सत्यम् , परन्तु यदि बाघस्स भोगीचचोद्वेगलक्षणस्य सम्भावना न भवेत् , सा घेत्स्यात्, तदैकान्ते वासो नेभ्यते, चित्तवाचल्यादिना नामचिन्तनायनिर्वाहात् । अतः सत्सङ्ग एवं कर्तव्य इति भावः । ननु चित्तविक्षेपादिरान्तरो बाधः सत्सनादिना नि- वर्तताम्, पाशं चौरव्याधादिभयं तु दुःपरिहरमिति चेतत्राहुः हरिरिति । तुशन्दः प्रकार- भेदावेदकः । हरिभक्तदुःखहर्ता सर्वतो वाद्यादान्तराम यापकाद्रक्षा करिष्यति । अस्मि- नर्थे संशयो नास्तीत्यर्पः । न हि भगवान्मक्तदुःख क्षणमात्रमपीक्षितुं क्षमते ? निरुपम- ५भक्ति
भपिवधिनी।
परमानुकम्पापूर्णत्वात् । अत एव हरिपदमुपातम् । भक्तदुःखहर्तृत्वस्य तदसाधारणधर्म-
सात् । तदाहुराचार्याः 'यथा गन्धः पृथिव्याः, एवं भगवतो भक्तदुःसनिवर्तकत्व'मिति ।
यद्वा । सर्वतः मुदर्शनादिना रक्षा हरिः करिष्यति, नात्र संशय इत्यर्थः । 'अव्याहतानि
कृष्णस चक्रादीन्यायुपानि तं, रक्षन्ति सकलापझ्यो येन विष्णुरुषासितः । सकृदेव
अपनाय तवास्मीति च याचते । अभयं सर्वभूतेम्पो ददाम्येततं मम । कौन्तेय प्रति-
जानीहिन में भक्तः प्रणश्यती सादिवाक्येभ्यः ।।१०।।
एवं प्रस्तुतमशेष शासगुपवण्यैतदर्यपरिज्ञानपूर्वकाठफटोपन्यासपुरःसरमुपसंहरन्ति ।
इत्येवं भगवच्छात्रं गूढतत्त्यं निरूपितम् ।
य एतत्समधीयीत तस्यापि स्यादृढा रतिः ।। ११ ॥
इतीति समाप्तौ । एवमुक्तप्रकारेण भगवच्छाखं भगवद्भक्तिप्रकारप्रतिपादनात् निरू-
तिमपि गूढतत्त्वं गुसस्वरूपम्, भगवदनुगृहीतैरेवैतदभिप्रायस्यावगन्तुं शक्यत्वात्
एतयः पुमानुदितभाग्यो भगवदीयानुग्रहेण विचारेण वा सम्यगावगमपूर्वकमधीयोत पठे-
तस्य भगवति दृढा सिरा रतिः सादित्यर्थः॥११॥
श्रीमत्कल्याणरायाहजन्मा गोपेश्वराभिधः । विवृति भक्तिवर्षिन्याः कृतिनिवृतये न्यधात् ।।
यद्यप्यतियास्याः पितृचरणनिर्मिता विवृतिः । तदुपरिकरणेऽन्यस्सा आघोयो भूयतेनल्पम् ।।
तेपामतिकरुणानां तथापि बालेग संरचिता । निजपाठितगुणनेक प्रीत्यै नित्यं भवित्रीयम् ।।
इमां श्रीवल्लभाचार्यपदपहजकिङ्कराः । पश्यन्तः सन्तनं सन्तः सन्तुष्यन्तु मुहुर्मुहुः ।।
इति श्रीमगोकुलाधीशपदारुहनिरतिशयरतिवर्मप्रवर्तकोलद्भगवलीलामहारसान्धिस-
मुन्छलद्भावकलोलसंवलितसकलखरूपश्रीवल्लभाचार्यवदनचन्द्रचवचारतमवचनमरीचिनि-
चयमोदधनिःसीमानन्दनिकुरुम्बकरम्मितीकृतनिजभृत्यनिकरचेतश्वकोरकानवधिकानुकम्पा.
निपानश्रीविहलाभिधानप्रभुचरगपयोगहरेणुफणमानसर्वखश्रीकल्याणरापतनुजगोपेश्वरविर-
निता भक्तिवर्धिनी विवृतिः समाप्तिमुपागमत् ।
श्रीविठ्ठलपदपङ्कजकिरगोपेशसुरचिता या । तां श्रितानां तोपाय रोपाय पिणामस्तु ।
अनया कृपया तेषां कृतयामितया मया । सदायी बलमाचार्याः प्रसीदन्तु सदा मयि ॥१॥
श्रीकृष्णाय नमः। भक्तिवर्धिनी। श्रीपुरुषोत्तमकृतविवृतिसमेता। प्रणम्य गोकुलाधीशभक्तिमार्गान्जभावतः । आचार्यास्तदयादृष्टया व्याकुर्वे गक्तिवर्धिनीम् ॥१॥ अप श्रीमदाचार्यचरणा मगवता एकादशस्कन्पे चतुर्दशाध्याये 'न साधयति मां योग' इत्यत्रोपलक्षणविधया सर्वेषां योगादीनामुपायानां सासापकत्वमुक्त्वोर्जितायोः भक्तः स्वसाधकत्वमुक्तम्, तन किं नामोर्जितत्यमित्याकांक्षायां प्रवृद्धत्वमेवोर्जितत्वमित्य- मिसंधाय भक्तिपायं खीयानामर्षे वक्तुं प्रतिजानते यथा भक्तिरित्यादि । पधा भक्तिः प्रपद्धा स्यात्तथोपायो निरूप्यते । तन भक्तिशन्दो माहाल्यज्ञानपूर्वकमुहलेहे रूढ । माहात्म्यबानपूर्वस्तु मुदः सर्वतोधिकः । सेहो भकिरिति श्रोतस्तया मुक्तिन चान्ययेति पमरावस्मृतेः, 'सा परानुरक्तिरीधर'इति शांडिल्यसूटोकाइक्तिलक्षणात्, 'रतिर्देवादिविषया मान इत्य- भिधीयत' इति भावलक्षणस्मृतेष । सेहय ज्ञानादिभ्योतिरित्तो मनोधर्मशेिषः । प्रीणाम्यनुरज्यामि निझामीत्सनुष्यवसायेन मानसप्रत्यक्षगम्य इति शांडित्पस्नमाम्ये खनेश्वरागापर्यवस्थापनात् । नचैवं सति हमारमेव मक्तिरिति शंस्यम् । 'गोप्यः कामास्यात्कमो देपावैधादयो नृपाः । सयपादृप्णयः ग्रेहाय्य भन्या वयं विमो' इति सप्तमस्कन्धीयनारदवाक्ये मतियद योनिर्देशभेदम्प पिरोपापत्तेः । उक्तपथरार. स्मृत्यादिपूतानां नहिशेषणानां वैयपित्तेध । तस्माचावविशेषणविशिष्टयेह एव रूदो, न केनत इति निषयः । योगश्चिारे तु 'भन सेवाया'मिति धानोमारे तिन्प्रत्यये कृते गतिसिमिति मारपकिरपायर। महरिरमो महापं , लपोतु प्रत्ययः प्राधान्येनेति वैयाकरण नियमात् पावर्षव्यग्या या प्रधानमना किया ना पर्यवम्मति । प्रधानभूता च किपा मानमे । 'अन्यत्रमना अवजारामम्, अन्यत्रमना अम्बल समितिबाउसनेपथुनो मनमः प्रापान्यभारगेन लमिलापा एवं मापान्यम्मोपिलान् । तयार सेराभिव्यंग्या प्रेमरूपा मानमी सेवा भक्तिरिति तत्र योगारः मिथ्यनि । तुरा' भारमिया रोग । परम्परी. RiR TRAग परमufti सी भक्तिवर्धिनी। तथाच श्रवणादिनवकेपि पारिभाषिकः । 'श्रवण कीर्तन विष्णो स्मरण पादसेवनम् । अर्चन बन्दन दास्स सख्यमात्मनिवेदनम् । इति पुसार्पिता विष्णौ मक्तियन्नवलक्षणे ति सप्तमस्कन्धे प्रहादवाक्यात् । अन्ये तूपासनापामपि मक्तिशब्द प्रयुञ्जते । नैयायिकास्तु आराध्यत्वेन ज्ञान मक्तिरित्साहु । तन्मते बुद्धिविशेष एव भक्ति । वस्तुतस्तु तत्र सारूप्यप्रयुक्ता गौणी । पूर्ववद्रव्यादिज्ञापकप्रमाणाभावात् । तृतीयस्कन्धे पाविंशाध्याये श्रीकपिलदेवैस्तु 'काचित्त्वयुचिता भक्ति कीशी मम गोचरे ति देवहतिप्रश्ने 'देवाना गुणलिङ्गानामानुश्रविककर्मणाम् । सत्व एवेकमनसो वृति स्वाभाविकी तु या, अनिमिता भागवती भक्ति सिद्धेगरीयसी, जरयत्साशु या कोश निगीर्णमनलो यथेति स्वरूपकार्य लक्षणाम्या योषिता । तर एकमनस' पुस इन्द्रियाणा सामाविकी अनिमिया सत्वोपाधी भगवति वृत्तिनिष्ठेति स्वरूपलक्षणम् । कोशजरण च कार्यलक्षणमिति सिध्यति । तत्सुयो धिन्या सत्त्वपद साख्यानुसारात् 'वस्तुतस्तु मूलरूप' इति व्याख्यातत्वात्स्पष्टम् । यष्टी विशाध्याये तु 'भक्तियोगो बहुविष' इति पुरुपखभावभेदकृतमार्गभेदेन भक्तियोगस बहु विधत्व प्रतिज्ञाय, निविध सात्विकराजसतामसभेदेन तदेव नवधा निमि लोकैरभिधाय, ततो 'मद्गुणश्रुतिमात्रेण मयि सर्वगुहाशये । मनोगतिरविच्छिन्ना ययागगामसोम्बुधौ । लक्षण भक्तियोगस निर्गुणसाप्युदाहृत मित्यनेन भगवद्गुणश्रवणमानात् भगवत्सविन्छिन्ना मनोगति यो जनयति स भाव निर्गुणभक्तियोगाल्य इत्येव लक्षित । तत 'अहेतुक्य व्यवहिता या भक्ति पुरुषोत्तमे । सालोक्यसासिामीप्यसारूप्यैकत्वमप्युत । दीयमान न गृहन्ति विना मत्सेवन जना' इति सार्धाभ्या कालकर्मान्यवहिता पुरुषोत्तमविषयिणी खत पुरुषार्थरूपा या सेवा सा आत्यन्तिकभक्तिरित्येवलक्षिता । अत्र च भक्तिशब्द प्रेमसेवाया योगरूढो गृहीत इति 'सालोक्ये तिवाक्यादवसीयते । अयमेव चैकादशस्कन्धे द्वादशा ध्याये 'केवलेन हि भावेन गोप्यो गाव खगा मृगा । येन्ये मूढधियो नागा सिद्धा मामी युरजसे'सादिमि लोकैर्भगवता परामृष्टो ज्ञेय । एव भक्तिशब्दस्यानेकार्यत्ये सति प्रकृते का वा विवक्षितेति चेत् १ उच्यते। आचार्याणा मगवदाजया एकादशस्कन्धे भगवदभिस हितोय सुगोप्य सत्सङ्गलम्यो माव उक्त , स एवाभिसहित । सिद्धान्तमुक्तापल्या 'चेतस्त प्रवण सेने'ति कथनात् , तद्विवरणे अशुचरणैरपि 'ता नाविद निति द्वादशाध्यायवाक्यस्य लिखनात्, प्रकृतग्रन्येपि तत्रत्यचतुर्दशाघ्यायवाक्योक्तसत्सङ्गश्रवणकीर्तनात्मकसाधनाना मभिधानाच । न च चतुर्दशाध्यायोक्तसापनाना द्वादशाध्यायोक्तभाव प्रति साधनत्व कमिति शक्यम् । चतुर्दशाध्याये तस्यैव मक्तिशब्देन परामर्शात् । द्वादशाघ्याये 'नरो प्रामाण्यामातादिति पाउ । १ एकोनविंशाध्याय इति पाठ, अध्याधिको विंशो यत्रकोनविशे सोधानिश तादो प्याये। ३ वेन मनसो गतिर्येन मावेनेति विग्रहः । एव भक्तिरस मजनमिलता मन कल्पनशन्देऽपि। ४ पुरिव साधनेष्वपि अतो न वेदलाइमसाध्यत्वविरोष ।
श्रीपुरुषोत्तमकृतविवृतिसमेता। धयति मां योग' इत्यायुक्तस्य योगादीनामसाधकस्सानापि न साधयति मां योग' इत्य- नेन प्रत्यभिज्ञानेन तथा निश्चयात् । अतस्तस्य या पूर्वावस्या 'माहात्म्यज्ञानपूर्वस्त्विति पञ्चरात्रवाक्ये उक्ता, सात्र विवक्षिता, तसाः पूर्वोक्तरूपोर्जितत्वार्थमेव प्रयतनात् । तथाच सा यथा येन प्रकारेण प्रवृद्धा ऊर्जिता स्थात् तथा तेन प्रकारेण उपायो बुद्धिम्यो निरूप्यत इत्यर्थः। एवं प्रतिज्ञाय अधिकारिभेदेन प्रकारद्वयं वदिष्यन्तो मुख्याधिकारिणो भक्तिप्रवृद्धरधि- कारपलादेव सिद्धत्वात्तदनुक्त्वा प्रथम मध्यमाधिकारिण उपायगाहुः पीजभाव इत्यर्थेन । पीजभावे दृढे तु स्यात्यागाच्छ्वणकीर्तनात् ॥ १ ॥ बीजरूपो भावः भगवदनुग्रहजन्यः प्रेमा । तस्मिन्वक्ष्यमाणरीतिकव्यसनरूप- तया रढे सति । तुः साधनान्तराशङ्कानिरासे । तदा त्यागान्वगकीर्तनात्स्यात् । विर- हानुभवार्थ संन्यासनिर्णयोकप्रकारकः सपासनगृहपरित्यागत कृत्वा तदुत्तरं यच्छ्वणस- हित कीर्तनं तस्मात्स्यांदित्यर्थः । अत्र श्रवणानन्तरं कीर्तनस्य कथनाच्छ्रुताना खरूपगु- णलीलानां भावनं कीर्तनात्पूर्वमर्गपलानाप्यते । एतदभिप्रायेणैव संन्यासनिर्णये 'भायो भाषनया सिद्धः साधन मित्युक्तम् । निरोधलक्षणे चाशंसाः प्रथमतो निरूपिताः। तया- चैतेधतुभिर्मक्तिरूजितलक्षणवती प्रवृद्धा भवतीत्यर्थः । एतदेव निरोधलक्षणग्रन्थे 'महतां कृपया याव'दित्यारभ्य 'तदध्यासोपि सिध्यती'त्यन्तेन फलानुभवपर्यन्तं प्रपचितं शे- यम् । तन्मया तत्रैव विवृतमिति नेहोच्यते । प्रायस्तु । पुष्टिमार्गाचार्यानुग्रहपूर्वकभगवनिवेदनानन्तरमाविनमंगीकारं पीजमाव- त्वेन केचिदाहुः । अन्ये तु भक्त्यसाधारणकारणमहदनुग्रहसत्ताम् । इतरे चाल्पं स्नेहम् । तथा त्यागपदेन भगवदतिरिक्तत्याग केचिदाहुः । अन्ये तु एतन्मार्गीयातिरिक्तसाधन- त्यागम् । इतरे तु भक्तिमार्गविरोधिनोन्यभजनादेस्त्यागम् । तेन तन्मते गृहस्थित्यविरो- धी त्याग मायाति । मन्मते तु ग्रहस्थितिविरोधीतिमेदो बोध्यः ॥१॥ अतःपरं जघन्याधिकार्यर्थ प्रकारं वदिष्यन्तः पूर्व बीजदायप्रकारमाहुः पीजेत्यादि । योजदायप्रकारस्तु गृहे स्थित्वा खधर्मतः । अव्यावृत्तो भजेत्कृष्णं पूजया अवणादिभिः ॥२॥ पीजं पूर्वोकम् । तद्दार्यप्रकारस्तु निरूप्यत इति शेषः । गृहे गृहस्थाश्रमे स्थित्वा खधर्मतः वर्णाश्रमधर्मतः पूर्वसिद्धादच्यावृत्तः अपरावृत्तः । आचार्यकुलाद्वेदमधीस गुरोः १ साधारणसत्तारूपप्रेमच्यावर्तक विशेषगम् । नासतो विद्यते भाव' इति गीताया तदुक्तम् । प्रेमा. पि सत्तारूपं विषयनेइम्यावतं । विशेषणादित्युतम् । १ एकादशस्सैकादशे यामे सिध्यति । ३ व्यसना- पप्रेमपरिणामान्ति मेन यमादिमस सप कारकोचा भक्तिद्धि स्वादिति नोपक्रमविरोध ।
३८ भक्तिरधिनी। कर्मातिशेषेणामिसमावृत्य कुटुम्बे शुचौ देशे खाध्यायमधीयानो पार्मिकान्विदधदात्मनि सर्वेन्द्रियाणि सप्रतिष्ठाप्याहिंसन् सर्वाणि मूलान्यन्यत्र तीर्थेभ्य , स सल्वेव वर्तयन् यावदायुष असलोकमभिसपद्यते, न च पुनरावर्तत' इति छान्दोग्यस्थे गृहिणोपसहारसूत्रविषय वाक्ये तथा सिद्धलात् । एकादशस्कन्धे उद्धवप्रश्ने मगवताप्याचारलक्षणस्य वर्णाश्रम धर्मस भनाइत्वेनोक्तत्वाच । त कुर्वन् कृष्ण पुरुषोत्तम भनेत् । तत्र साधन पूजानव णादिक च । तदाहु पूजया श्रवणादिभिरिति । अत्र पूजा ययालधोपचारै खा- नालकरणादिरूप खरूपसेवनम्, अर्चनापरपर्यायम् । तत्रैव पूजनप्रयोगदर्शनात् । श्रवणादि तु नवविध प्रसिद्धमेव । तैमजेत् सेवेत । प्राथमिकभगवदनुग्रहेण जातामनुभूता भक्तिमनया साधनमर्यादयाभिव्यञ्जयन् वर्धयेदिसर्थ । यद्यपि नवखनमपि प्रविशति, तथापि तस्सावश्यकत्वाय विशेफलसाधकत्वाय च प्रथम पृथनिर्देश । नचोक्तश्रुति भगवद्वाक्ययोधितप्रकारकस्य वर्णाश्रमधर्मस्सेदानीमभावादननस व्यङ्गत्व शश्यम् । सप्तमस्कन्धे 'सधर्माचरण शक्त्येति नारदवास्येन, नियन्ध आचारपि 'स्वधर्माचरण शस्त्से त्यगीकारेण च यथाशक्ति तत्करणेपि भक्तेर्व्यङ्गतापरिहारस नि प्रत्यूहत्वात् । एवमेक प्रकार उक्त ॥२॥ अत पर वैधुर्यादिना तदशक्ती प्रकारा तरमा व्याहत्तोपीलादि । व्यावृत्तोपि हरी चित्त श्रवणादौ यतेत्सदा । वैधुर्यादिना व्यावृत्त खाशक्त्या वर्णाश्रमधर्मानिवृत्तोपि हरौ भगवत्सघहर्तरि चित्त स्थापयित्वा श्रवणादौ श्रवणाद्यर्थम्, तादध्ये सप्तमी, यतेत् यत्न कुर्यात् । अनुदातेलक्षण सात्मनेपदस्यानियत्वात् परस्मैपदम् । न तु परार्थत्वात् । खत पुरुषार्थत्वेनैव तत्क रणस्य सिद्धान्तत्वात् । सदेति । निरन्तरमभीक्ष्ण वा । एवम जपन्याधिकारिणोर्मध्ये यस्य सेवकसाधनसपत्ति तस्स पूजा श्रवणादिक च वीजव्यक्तिसाधनम् । यस तुन पूजामाधनसपत्ति , तस तु भगवचित्ततापूर्वक श्रवणादिकमेव साधनम् । एतदेवामि सन्धाय निरोधलक्षणप्रन्ये 'ससारवेशदुष्टानामिन्द्रियाणा हिताय वै' इत्यारम्प आन्त प्रपचित ज्ञेयम् । तन्मया तद्विवरणे व्युत्पादितमिनि नेह पुनरुच्यते । प्रावस्तु अव्याहत्तशब्दस्य व्यासङ्गरहित इत्यर्घमाहु , व्यावृत्तशब्दस्य च व्यासक्त इति । सोत्र 'आत्मनि सर्वेन्द्रियाणि सप्रतिष्ठाप्येति श्रुत्यैव सिध्यतीत्युपेक्षित । व्यासक्त इति तु 'हौ चित्त'मित्यादिनैव निवार्यत इत्युपेक्षित । लक्षणाप्रसगाचेति योध्यम् ॥ २३॥ । माध्योत बानिवि भाव । २ यो विधया करोति प्रति श्रुयुक्त विशेषालम् । स्माविशेष इति चेत् । तमेव वैगनुवचनेन माझया शिविदिपनी लि शुन्युकात फ्लाद। बिपरीतरक्षणाप्रसंगार।
श्रीपुरुषोत्तमकुतविवृति समेता । एवं वीजदा साधनमुपदिश्य वीजाभिव्यक्तिप्रकारमाहुः ततः प्रेमेत्यादि । ततः प्रेम तथासक्तिर्यसनं च यदा भवेत् ॥ ३॥ पीजं तदुच्यते शास्त्रे दृई पनापि नश्यति । खत उक्तविध(मध्यम)जघन्याभ्यां कृतादुक्तविधसाधनाम हरौ भवेत् । पूर्वोक्तो हरिशब्दोनाप्यनुपजते । एवमपि बोध्यम् । प्रेम च भावकन्दलरूपं बोध्यम् । तथा- सक्तिः तदुत्तर ताशेन तत्करणेन तदुत्कर्षावस्था रागादिरूपा भवेत् । कल्याणरायास्तु खविषये स्वतः प्रवर्तको भावः प्रेमशन्देनोच्यते, खविपये विवि- धमनोरयजनको माव आसक्तिरिति तयोर्लक्षणमप्याहुः । तदपि युक्तम् । तथानुमवस सर्वजनीनत्वादिति । च पुनः यदा व्यसनं तद्विना स्थातुमशक्तिरित्याकारक यदा भवेत्, तच्छास्त्रे भक्तिपरमकारणयोधके 'श्रद्धामृतकथायां म' इत्यादिरूपे भगवता साधनपर्याधिकथनात् दृढं पीजमित्यस्माभिरुन्यते । दृढले गमकमाहुः यन्नापि नश्यतीति । नश अदर्शने। यद् दुःसंगादिना परिभूतं सहर्शनागोचरतां न प्राप्नोति, किन्तु सर्वदैव दृश्यते, स्वयं चानुभूयते । तयाचैतदेव दाळलक्षणम् । अदृढस्यैव कादाचिस्कत्वादिति । अत्र पूजाश्र- वणादिकं दशमस्कन्धोतरीतिकमेव ग्राह्यमित्यभिमेतम् । नामावलीसमासौ 'पाठलीलानाम- पाठात् श्रीकृष्णे प्रेम जायते । आसक्तिः प्रौढलीलाया नामपागदविष्यति । व्यसनं कृष्णचरणे राजलीलाभिधानतः । तस्मान्नामत्रयं जाप्यं भक्तिप्राप्तीप्सुभिः सदेति कथनात् । एवं कीर्तनस निरोधलीलाविषयत्वे निविते श्रवणस्यापि तद्विषयत्वमेव निश्चितं गवति । तया श्रवणमपि यत्र यन्नामसिद्धं, यथा च नामावल्यां यत्रोक्तं, बदनुसंधानपूर्वकमेव संपा- दनीयमिति च । तया पूजाया अपि । तेन नवानामप्येकरूपत्व निश्चितं भवतीति मम प्रतिभाति । न च 'यस्खा सकीर्तनाद्विष्णुरात्मानं संप्रयच्छती'त्युपक्रमोक्तफलविरोधः शंकनी- यः। तस्यावर्तनसिद्धारकीर्तनासिद्धेः । उपसंहारे निरन्तरे जाप्योक्त्या तयावसायादिति । एवं ढबीजलक्षणमुक्त्वा तसिझ्ययं तदुत्पादकानां प्रेमायवसानां सिद्धिज्ञापकं लक्षणं क्रमेणाहुः लेहादित्यादि । लेहाद्रागविनाशः स्यादासक्त्या स्याहारचिः ॥४॥ गृहस्थानां यापकत्वमनात्मत्वं च भासते। यदा स्वाद् व्यसनं कृष्णे कृतार्थः स्यात्तदेव हि ॥५॥ पीजं तदुच्यत इत्युत्तरमन्यात् । 'सेवायो या कथायां वेसन सेवाधरणादिसला भति. २'प्रातराशी विरारभ्य 'नौवीं यमित्य सन्तम् । तल प्रेमेजयोलमापनेमु ना- मामासाधनप्रवेशा तन इसस नामा मसाधनमाह ।
भस्विधिनी1 अौतद्वोध्यम् । मक्ति सेहविशेष इति पूर्व व्युत्पादितम् । तत्कारण तु मगवद्धर्म विशेष एवानुग्रहाख्य इति मक्तिहेतुनिर्णये स्थितम् । सा चानुग्रहजन्या मक्ति कचित्सहसे वाभिव्यज्यते, कच्चि सत्सङ्गश्रवणादिसाधनद्वारा । तर ये शुद्धपुष्टावगीकृतास्तेषु तु सह सैवाभिव्यज्यते, यथा गोकुलस्येषु । ये पुनर्मिश्रपुष्टावगीकृतास्तेषु तु साधनद्वारामिन्य ज्यते, किश्चित्कार्याय तेषु प्रतिवन्धतन्निवृत्त्योदर्शनात् । तथापि 'लौकिकत्व वैदिकत्व कापट्यात्तेषु नान्यथा । वैष्णवत हि सहजमिति लक्षण तु न व्यभिचरति । एष सति येषु साधनद्वारा भक्त्यभिव्यक्ति , तेषु साऽनुभूता भावरूपेण मनसि तिष्ठति, तत पूजादिषु साधनेष्वनुष्ठीयमानेषु प्रेमादिरूपेण क्रमादुता भवति । अमियुक्तास्तु माप स्थावस्थासप्तकमाचक्षते । 'भाव प्रेम प्रणय सेहो रागानुरागव्यसनानी'ति । यत्र च पूर्व वीनाभिव्यक्तिप्रकारकथने तत प्रेमेति प्रेमशब्देन पूर्वावस्या निर्दिश्यात्र तदमिज्ञापककयने यस्लेहशब्द प्रयुक्त , तेन प्रेमप्रणयनेहाख्यास्तिस्रोवथा यदा भवन्ति, तदा भगवन्न वाद्यतिरिक्तपु रागविनाशो भवतीति सूच्यते । तथा च इतररागविनाशस्तवाचुर्यामि ज्ञापक लक्षणम् । रागानुरागात्मकावस्थाद्वयरूपासक्तिप्राचुर्याभिज्ञापक लक्षणयमाहु आसक्तया स्साद्गृहारुचिरित्यादि । रुचिराकाक्षा गृहारुचिहाकाक्षाऽभाव उपेक्ष्यत्वमिति थावत् । सा आसत्त्या स्यादिति । तदासक्तिप्राचुर्याभिज्ञापक लक्षणम् । लक्षणान्तरमाहु गृहस्थाना मित्यादि । गृहस्थाना चेतनाचेतनाना मगवति समर्पणानन्तर भगवदीयत्वानुसन्धानेपि तेप्वशत वीयत्माभिमानस्यापि विद्यमानत्वातमादाय तेपा पूजाश्रवणादिसाधनवापकत्व स्वस्य भासते, सर्वेपा चित्रकर्मत्वात्स्वभावभेदेनान्यविनियोगसमवात्तचिन्ताया अकरणेषि तेपु स्वाभिमानस्स सहसाऽनिवृत्तेरनायत्त्यापि तचिन्तादिसमवेन 'गृहेष्वतिथिवत् क्स' निति न्यायस्य तदानीमसभवादपि तेषा अषणादियाधकत्व खस भासते । किच, अन्य विनियोगादीना स्थूललिङ्गशरीरधर्मत्वाचेपा तत्प्राधान्ये जीवस्यानुस्मृति सतीत्युक्तसा स्मधर्मस्य गौणत्वा मूर्खे पापाणकल्पत्ववदनात्मल च तेषु भासते । तथाचैतदुभयमान गृहस्थिति शिपिलीकुर्वदासक्तिदान सपादयतीति पूर्वोक्तमुमयविध मानमासक्तिप्राचुर्य लक्षणमित्यर्थ । अत्र लक्षणतयकयनेन वितयमवने आसक्तिपर्याप्तिर्बोध्या। प्रायस्तु केचिदिम मान आसक्तिलक्षणत्वेनाहु । अन्ये पुनर्व्यसनलक्षणत्वेन । अर्थ च खखरीत्या त तमाहुः । मम तु भगवानेव प्रेरितवानिति मयैव व्याख्यातम् । गृहत्याग एवाचार्याणामाशयस स्फुटत्वादिति । व्यसनस्य तदाहु यदेलादि । पदि एव प्रेमासक्तिप्रकर्पोनर व्यसन 'तद्विना संचारिभावरूपेण वर्वमाना अन्तरा भूनमामवस्खाभन' इति सूचात् । मल्लानामानि रित्यम २ निरोप घेतयोक। ३ द्वितीय लानुभवस्य मुत्यत्ताखियं । मक्तिरोक्त ।
- श्रीपुरुषोचमकवविवृतिसमेता। स्सातुमशक्तिः । सा भगवगुणलीलादिप्राधान्यं विहाय, कृष्णे स्यात्, कृष्णे इति तादयें सप्तमी, भगवत्स्वरूपार्थ सात्तदैव कृतार्थः स्यात् , कृतः अर्थः पुष्कलसाधनरूपो येन तादृशः स्यात् , तादृशत्वं विना साधनपोकल्यं नेति । 'एवं धर्मनुष्याणामुद्धवात्मनिवे- दिनाम् । मयि संजायते भक्तिः कोन्योर्थोसावशिष्यत' इत्यत्रेवात्रापि सापनपौष्कल्येर्थ- शब्दप्रयोगः । तथाच गुणलीलादिप्राधान्यं विहायैवं सर्वात्मभावपूर्वकक्षारूपं स्वरूपपरलं व्यसनोत्कर्षाभिज्ञापक लक्षणमित्यर्थः । अयं च गुणलीलादिप्राधान्यत्यागो गुणोपसंहारे 'प्रदानवरसूत्रे' प्रभुचरणैर्युपादितः 'प्रकृतेपि सर्वात्मभाव' इत्यादिना । तेनैवं दैन्य- पूर्वकशरणभावनेन स्वरूपैपरत्वं व्यसनोकर्पलक्षणं पर्यवस्यति । एतावता इढवीजखरूंप- मुक्तम् ॥५॥ एवं पीजमावे दृढे सति भक्तिवृद्धिः खत एवाने भविष्यतीति न मन्तव्यम्, किन्तु गृहं सक्तव्यमेवेत्याहुः तादृशस्थापीत्यादि । तादशस्यापि सततं गेहस्थानं विन्गशकम् । ताशस्य सर्व विहाय स्वरूपपरसापि सततं निरन्तरं गृहस्थानं टिशार ताश- स्वरूपपरतानाशकम् । एकादशस्कन्धे भगवता 'याध्यमानोपि ममता विगैरजितेन्द्रियः । प्रायः प्रगल्भया भच्या विषयैर्नामिभूयत' इत्यादिमाहात्म्यमुक्ला, अग्ने 'त्रीणां स्त्रीसगिनां सहं सक्ला दूरतमालवान् । क्षेमे विविक्त आसीनश्चिन्तयेन्मामतन्द्रिता' 'न तथास्य मवेक्लेशो बन्धनान्यप्रसङ्गतः । योपित्सङ्गायथा पुंसो यथा तत्सङ्गिसङ्गत' इति द्वाभ्यां स्यादिसगपरित्यागपूर्वकं निरुपद्रवे विविक्तस्थाने स्थित्वा खचिन्तनस्स कथनात् स्यादिसङ्गस्य केशवन्धहेतुत्वकथनाव । तस्मानिरन्तरं गृहस्थितिस्त्याज्यैव । किन्तु मध्ये मध्ये गृहानिर्गत्य, यत्र भगवत्सान्निध्यं, तत्र गत्वा, भगवदर्शनसेवादिविधानेन गृह- सिति शिपिलीकुर्यादित्यर्थः । एतेन पीजदा निर्वाहप्रकार उक्तः । अतः परं यत्पूर्व 'सागाच्यणकीर्तनादि'त्यनेन भक्तिवृद्धिप्रकार उक्तस्तं व्युत्पादयन्ति त्यागं कृत्वेत्यादि । त्यागं कृत्वा यतेचस्तु तदर्थाथैकमानसः ॥६॥ लभते सुद्धा भक्तिं सर्वतोप्पधिकां पराम् । संन्यासनिर्णये 'विरहानुभवार्य तु परित्यागः प्रशस्यत' इत्यादिना आरंभदशाया मातिविशेषो दैन्यम् । १ 'मुमत द्यायमनुपजेवि गोपालतापिनी माहात्म्य सरगलम् । ३ घोहमित्यैश्यपरत्वं चारिमावरूपम् । उग गझिकारणं बीजभावे निरूपितम्। ४ भविसलालम्ब. नोदीपनानुभारसंचारभावरूपम् । ५ रहे स्थित्वा सपमतो परस्थाभमे मजन संयोगरपं, मिश्योगरू स्वाय इति दिदगत्गकभक्तिीपदप्रसारम् । भफि.
भक्तियधिनी। अतद्वोध्यम् । भक्ति स्नेहविशेष इति पूर्व व्युत्पादितम् । तत्कारण तु मगवद्धर्म विशेष एवानुग्रहारय इति भक्तिहेतुनिर्णये खितम् । सा चानुग्रहजन्या मक्ति क्वचित्सहस वाभिव्यज्यते, कचिच सरसङ्गश्रवणादिसाधनद्वारा । तर ये शुद्धपुष्टावगीकृतास्तेपु तु सह सैवाभिव्यज्यते, यथा गोकुलस्थेषु । ये पुनर्मिनपुष्टावगीकृतास्तेषु तु साधनद्वाराभिन्य ज्यते, किश्चित्कार्याथ तेषु प्रतिवन्धतन्निवृत्त्योर्दर्शनात् । तथापि 'लौकिकत्व वैदिकत्व कापट्यातेषु नान्यथा । वैष्णवत्त हि सहज मिति लक्षण तु न व्यभिचरति । एव सति येषु सापनद्वारा मत्यभिव्यक्ति , तेषु साऽनुद्भूता भावरूपेण मनसि तिष्ठति, तत पूनादिषु साधनेष्वनुष्ठीयमानेषु प्रेमादिरूपेण क्रमादुद्ता भवति । अभियुक्तास्तु माव स्थावस्थासप्तकमाचक्षते । 'भाव प्रेम प्रणय सेहो रागानुरागव्यसनानी'ति । अत्र च पूर्व धीनाभिव्यक्तिप्रकारकथने'तत प्रेम ति प्रेमशब्देन पूर्वावस्था निर्दिश्यात्र तदमिज्ञापककथने यरलेहशब्द प्रयुक्त , तेन प्रेमप्रणयस्नेहाख्यास्तिस्रोवस्था यदा भवन्ति, तदा भगवन्द्र वणाद्यतिरिक्तेषु रागविनाशो मवतीति सूच्यते । तथा च इतररागविनाशस्तपाचुर्यामि ज्ञापक लक्षणम् । रागानुरागात्मकावस्थाद्वयरूपासक्तिप्राचुयाभिज्ञापक लक्षणयमाहु आसत्त्या स्याङ्गारुचिरित्यादि । रुचिराकाक्षा ग्रहारुचिर्यहाकाक्षाऽभाव उपेक्ष्यसमिति यावत् । सा आसक्त्या स्यादिति । तदासक्तिप्राचुर्याभिज्ञापक लक्षणम् । लक्षणान्तरमाहु गृहस्थाना मित्यादि । गृहस्थाना चेतनाचेतनाना भगवति समर्पणानन्तर भगवदीयत्वानुसन्धानेपि तेष्वशत स्वीयत्वाभिमानस्यापि विद्यमानत्वात्तमादाय तेपा पूजाश्रवणादिसाधनबाधकल स्वस्थ भासते, सर्वेषा चित्रकर्मत्वाखभावभेदेनान्यविनियोगसभवाचचिन्ताया अकरणेपि तेपु खाभिमानस्य सहसाऽनिवृत्तेरनायत्त्यापि तचिन्तादिसमवेन 'गृहेष्वतिथिवत् वस' निति न्यायस्य तदानीमसमयादपि तेपा श्रवणादिवाधकल्प खस भासते । किच, अन्य विनियोगादीना स्थूललिङ्गशरीरधर्मत्वात्तेपा तप्राधान्ये जीवस्यानुस्मृति सतीत्युक्तस्या स्मधर्मस्य गौणत्वान्मूर्खे पापाणकल्पत्ववदनात्मत्व च तेषु माराते । तथाचैतदुभयमान गृहथिति शिथिलीकुर्वदासक्तिदाय सपादयतीति पूर्वोक्तमुभयविध मानमासक्तिप्राचुर्य ठक्षणमित्यर्थ । अत्र लक्षणयकथनेन त्रितयभवने आसक्तिपर्यासिर्योध्या । प्रावस्तु केचिदिम मान आसक्तिलक्षणत्वेनाहु अन्ये पुनर्व्यसनलक्षणत्वेन । अर्थ च खखरीत्या त तमाहु । मम तु भगवानेव प्ररितवानिति मयैव व्याख्यातम् । गृहत्याग एपाचार्याणामाशयस स्फुटबादिति । व्यसनस तदादु यदेत्यादि । यदि एव प्रेमासक्तिप्रकोत्तर व्यसन 'तद्विना १ सचारिभावरूपेण वर्तमाना अतरा भूतप्रामवरसारमन इति सूचात् । मल्लानामानि रिपत्र २ निरोधक तथोके । ३ द्वितीयालानुभवस्य मुख्य वादिसर्थ । भक्तिरसोक्त ।
, श्रीपुरुषोत्तमकृतविकृतिसमेता । सातुमशक्तिः । सा भगवद्गुणतीलादिप्राधान्यं विहाय, कृष्णे सात्, कृष्णे इति तादयें सधमी, भगवत्स्वरूपार्थ सात्तदैव कृतार्यः स्यात् , कृतः अर्थः पुष्कलसाधनरूपो येन तादृशः सात् , तादृशत्वं विना साधनपौष्कत्यं नेति । 'एवं धर्मनुष्याणामुद्धवात्मनिवे- दिनाम् । मयि संजायते भक्तिः कोन्योर्थोस्वावशिष्यत' इसत्रेयात्रापि साधनपौष्कल्येर्थ- शब्दप्रयोगः । तथाच गुणलीलादिप्राधान्यं विहायैवं सर्वात्ममावपूर्वकक्षारूपं खरूपपरत्वं व्यसनोत्कर्षाभिज्ञापकं लक्षणमित्यर्थः । अयं च गुणलीलादिप्राधान्यत्यागो गुणोपसंहारे 'प्रदानवत्सूत्रे' प्रभुचरणैर्युसादितः 'प्रकृतेपि सर्वात्मभाव' इत्यादिना । तेनैवं दैन्य- पूर्वकशरणभावनेन खरूपपरत्वं व्यसनोत्कर्षलक्षणं पर्यवस्यति । एतावता दृढवीजखरूंप- मुक्तम् ॥५॥ एवं पीजमावे पुढे सति भक्तिवृद्धिः खत एवागे भविष्यतीति न मन्तव्यम्, किन्तु गृहं त्यक्तव्यमेवेत्याहुः तादृशस्यापीत्यादि । तादृशस्यापि सततं गेहस्यानं विगशकम् । ताशस्य सर्व विहाय खरूपपरस्सापि सततं निरन्तरं गृहस्थान दिसावक ताश- खरूपपरतानाशकम् । एकादरास्कन्धे भगवता 'वाध्यमानोति मनो विगैरजितेन्द्रियः । प्रायः प्रगल्भया भक्त्या विषयैर्नामिभूयत' इत्यादि गर्माहात्म्यमुक्त्वा, अग्रे 'स्त्रीणां स्त्रीसङ्गिनां सङ्गं सक्त्वा दूरत आत्मवान् । क्षेमे विविक्त आसीनश्चिन्तयेन्मामतन्द्रितः' 'न तयारस गवेल्लेशो बन्धथान्यप्रसङ्गतः । योषित्सङ्गायथा पुंसो यया तत्सझिसङ्गत' इति द्वाम्यां स्यादिसद्गपरित्सागपूर्वक निरुपद्रवे विविक्तस्थाने स्थित्वा खचिन्तनस्य कथनात् ख्यादिसगस क्लेशबन्धहेतुत्वकयनाच । तस्मानिरन्तर गृहस्थितिस्त्याज्यैव । किन्तु मध्ये मध्ये गृहानिर्गत्य, यत्र भगवत्सानिध्य, तत्र गत्या, भगवदर्शनसेवादिविधानेन गृह- स्थितिं शिथिलीकुर्यादित्यर्थः । एतेन पीजदार्यनिर्वाहप्रकार उकः । अतः परं यत्पूर्व 'त्यागाळूवणकीर्तनादि सनेन भक्तिवृद्धिप्रकार उक्तरेतं व्युत्पादयन्ति त्यागं कृत्वेत्यादि । त्यागं कृत्वा यतेयस्तु तदर्धाकमानसः॥६॥ लभते सुदृदां भक्तिं सर्वतोप्पपिका पराम् । संन्यासनिर्णये 'विरहानुभवार्य तु परित्यागः प्रशस्यत' इत्यादिना आरंभदशाया १ आतिपिशेषो दैन्यम् । २ 'अम परमजे रिति गोपाटलापिनीये माहात्म्यं शरणत्यम् । 1 मोह मिसयपर संचारिभाषरूपम् । वभयं भक्तिकारण बीउभावे निरूपितम् । ४ भादरा मोटोपनानुमावसंचारिभाषरूपम् । ५ रहे स्थित्वा सपर्मतो रहस्याधने भजन संयोगरूप, प्रियोग त्याय की दिदगत्याभटीयदस्यहारम् ।
४२ मारिवार्थिनी। पत्रकारकस्त्याग उक्तस्तं कृत्या, ययाधिकारं श्रवणकीर्तनाम्यां यतेत्, भक्तिप्रवृक्षार्थ यत्न फुर्यात् । तत्रापि न भक्तिमृद्धावेव पर्यवसन्नः, किन्तु तदर्थार्थकमानसः। पूर्व कृष्णशब्द- सोक्तवादत्र तच्छन्देन स एव परामृश्यते, पर्यध प्रयोजनम् , स अर्यो यस्याः सा तदया, सरूपमात्रफला गुणातीतमतिरिति यावत् । तस्याः य अर्यो भगवान , तस्मि- न केवलं मानसं यस्य सः तया । तया च ताशी मति यो भगवत्साधकलेन न करोति, किन्तु सरूपदिक्षयर करोनि, स तयेत्यर्थः । तस्य मिद्धिमाहुः लभत इत्यादि । सः मुद्धां इतरामतिरध्यां साम्योषि भक्तिम्योधिका निरोपलक्षणमन्य उत्कृष्टत्वेन सूपितां परामूर्जितां मगात्साधिका मक्ति लमते । तथाच दिक्षातिरिक्तयावदपेक्षारहितस परम- मतिमाप्तिमानि । तेनेदमेव भक्तिप्रवृद्धः स्वरूपमित्यर्थः ॥६॥ एवं भक्तिप्रवृद्धिसरपपर्यन्तं तदृद्धचुपायमुक्ला, तत्र प्रतिवन्धेनिधिकारे च तद- नुकल्परूपमुपायान्तरमाहुः त्यागेत्यादि । त्यागे पाघकभ्यस्त्वं दुःसंसर्गात्तधानतः ॥७॥ अतः स्पेयं हरिस्थाने तदीयैः सह तत्परः। अदूरे विपक या यथा चित्तं न दुष्यति ॥ ८॥ सेवायां वा कथायां वा यस्यासक्तिता भवेत् । यावन्नीयं तस्य नाशो नफापीति मतिर्मम ॥१॥ घाघसंभावनायां तु नैकान्त वास इप्यते । हरिस्तु सर्वतो रक्षा करिष्यति न संशयः ॥ १० ॥ सागे करिष्यमाणे कालादृष्टादिकृतदुःसंसात्, तथाऽन्नतः प्राणपोपका- दन्नाद्यतो वाधकभूयस्त्वं मक्तिवृद्धिषाधकबाहुल्यम् , अतस्तदाहुल्याखेतोः हरिसाने स्पेयम्, 'मनिकेतं तु निर्गुण मिति भगवद्वाक्येन तत्र देशदोपाभावात् । अत्र कर्य स्थेय मित्याकांक्षायां प्रकारमाहुः तदीयरित्यादि । तत्रापि तत्परैस्तदीयैः सदेति कथनेनानन्यतया सेवाकृतिः स्वस्यापि सूचिता । तेन 'सावधानः परसरं सस्नेहैरव- हिदृष्टिभिर्भगवत्सेवैकपरैः स्थेयम् ।' तया च तादृशस्थित्यां दुःसंसर्गस्यामावाप्रसा- दादिना वा संघ्रिपतुल्यवैष्णवादिम्यो भिक्षया वादेहनिर्वाहेनदोपस्याप्यभावाशक्तिवृद्धि- रित्ययः । एतेन नलकूपरप्रसंगे वैराग्याद् यस्त्यागो निणीतस्तस्यायं प्रकार इसपि योषितम् । तसाप्यसंभवे तदनुकल्पान्तरमाहुः, तत्र स्थितौ वा प्रकारमाहुः अदूरे विभकर्षे वेति । भगवन्मन्दिराद् भगवदीयेभ्यश्चादरे, दूरे वा । यादृश्या सेवया सस सेवाभिमानो न भवति, भगवदीयेषु च निकर्षबुद्धिविरुद्धबुद्धिदोषाष्टिक्षोमादिभिर्यया चित्तं न दुष्यति, तथा स्थेयमित्यर्थः । यदि च काठादृष्टादिदोषेण तादृशां सङ्गो न भवति, तदा तत्र स्थितौ प्रका- १ रसात्मतापर्यन्तम्।
श्रीपुरुषोत्तमकृतविवृतिसमेता। रान्तरं तदनुकल्प वा आहुः सेवायामित्यादि । तादृशभगवदीयसनामावेपि यद्यदूरायां विप्रकृष्ठायां वा सेवायां आसक्तिढा भवेत् । अन्यकृतोपहासन्यक्कारादिमिरनपनोधा भवेत् । एवं कयायां श्रूयमाणायां कीर्त्यमानायां वा तस्यामासक्तिदृद्धा भवेत्, सापि पावजीवम् , यावत्सामर्थ्यम् , जीवपदेन सामर्थ्यादिकमप्यर्थादाक्षिप्यते । अतस्तावत्प- र्यन्तम्, न तु कश्चित्कालम् । क्रियाविशेषणमेतत् । तस्य यावजीवं तत्कर्तुः पुंसः कापि नाशो न । इह लोके यथाधिकार स्वरूपपरतायाः साधनपरतायाश्च नाशो न । परलोके च ययाधिकार फलप्रतिबन्धश्च नेत्यर्थः । दृढकथासक्तिप्रकारश्च प्रक्षिपाध्यायेषु तृतीये 'ज्ञाने प्रयासमुदपास्येति' श्लोके आचापैर्विवृतः । 'अयमेको मार्गः सर्वेषां पुरुषार्थ- सिद्ध्यर्थ प्रसिद्धः सुगमः । आदौ स्थानसितानां जीविकोपद्रवाभावादिः स्वतःसिद्धः । सन्तथ सर्वत्र भगवदाज्ञया परिभ्रमन्ति, तेषां चैतदेव कृत्यम् । भगवद्गुणगाने ते मुखरा एव भवन्ति । तत्रापि कथायां ज्ञात्वा वक्तव्यमिति न नियमः । केवलं भगवदीया भग- वत्सम्बन्धिनी वार्ता भवतु, न तूपपन्नाऽनुपपन्ना वेति । तत्राप्यनायासेन खकर्णे समा- गता भवति । परं कायवाचनोभिर्नमस्या सा, तदनुगुणतया कायवाड्मनांसि स्थापनी- यानि, न तु तत्र विरोध आचरणीयः । एतावदेव कृत्यम् । अत्र साधनं जीवनमेव, न तु कर्मकरणादिकमपि । प्रायश इति ते चेद्भावान्तरं न कुर्युः । कालादयथ प्रतिबन्ध- कत्वाद्वा । अतोनेनैव प्रकारेणाप्रेतनानां निस्तारः ।' किच, सेवादासक्तिप्रकारोपि तत्रैव 'पुरेह म'निति लोके विवृतः । 'हे भूमन् व्यापक पूर्वमपि विद्यमान इहास्मिन्मार्गे पह- पोपि सङ्घशो योगिनो योगेनावधृतभक्तिसामर्थ्याः, अत एव त्वयर्षिता ईहा चेष्टा यैः । तेनैव समर्पणलक्षणेन कर्मणा वत्सेवालक्षणकर्मणा वा लन्धया प्राप्तया भक्त्यैव विबुध्य खरूपं ज्ञात्वा, हे अच्युत केनापि प्रकारेण च्युतिरहित, ते गति मार्ग, येन प्रकारेण त्वं गच्छसि, तां प्रपेदिरे । पश्चात्त्वदनुगानां न कापि चिन्ता । अअः अनायासेनैव परां लोकातीतां प्रपेदिरे प्राप्तवन्तः । अत भात्मज्ञानापेक्षायामप्ययमेव मार्ग उचितः ।' भत्र नान्येषां सम्मतिः, किन्त्वमेव वदामीत्याहुः मतिर्ममेति । 'श्रद्धा'मुपक्रम्य 'मत्से- पायां तु निर्गुणे'ति । संवादसमाप्तौ च 'नागोपक्रमे ध्वंस' इति 'यो यो मयि पो धर्म' इति च भगवद्वाफ्यात् सदास्तमतिप्रश्ने, तामुपगम्य मत्कयाश्रवणे श्रद्धा' 'श्रद्धामृतरुयायां म' इति च भगवद्वाक्यात् मम बुद्धिस्ताशय नाशामाव भासयति, तेन तथेत्यर्थः । यदि च जाते थीजमावदाचे अजाते वा पूर्वोक्तानां तदर्यानां साधनानां कालादृष्टादिना प्रतिबन्धा- करणाशक्तिः, तदोपायान्तरमाहुः याधेत्यादि । मुख्यः कल्पस्तु भगवत्कृपयैव सिध्यतीति न तत्र यापसम्मावना। तदा भवेयालय'मिति निरोपलक्षणे निष्कपीत् । दयायां च सत्सा प्रतिबन्धासम्मवात् । यत्र पुनस्त्यागे याधकमयस्त्वमित्यादिनोकेनुकल्प करिष्यमाणे क्रिया माणे चा मापस विघटनस सम्भावना उत्कटकोटिका संशयः, तदा तु एकान्ते मगरत्या- भफिवार्षिनी। नादौ वासो नेप्यते । तदा गृहे वा अन्यत्र वा यत्र कचिस्थित्वा हरिव शरणं मावनीयः। 'हराम्य, परस्मर्तृणामिति' भारते भगवद्वाश्यात् । 'सर्वधमान्परित्यज्येति गीतायां मग- वद्वास्याव । हरि सर्वतो रक्षां करिष्यति । तुः संशयाविश्वासादिनिरासे । न संशया, रक्षाकरणे संशयो नास्ति । तथा च पूर्वोक्तरीत्या भक्तिमार्गे प्रवृत्तिः संपाधा । तब पापे सत्यनुकल्पः करणीयः । तत्रापि या तदनुकल्पः। तत्रापि याधे शरणगमनं सर्वानुकल्प- रूपं करणीयम्, न तु पूर्वमेव सेवादिकं सक्तानुकल्ये प्रवर्तनीयम्, भगवदिच्छाया ज्ञातुमशक्यत्वादिति ॥ ७-१०॥ एवं सर्व भक्तिवृद्धथुपायं निरूप्य तदुपसंहरन्त एतद्विचारफलमाहुः इतीत्यादि । इत्येयं भगवच्छात्रं मया गुप्तं निरूपितम् । य एतत्समधीपीत तस्यापि साद दृढा रतिः॥११॥ इतिः समाप्तौ । एवं पूर्वोक्तप्रकारेण भगवच्छासं गीतायामेकादशस्कन्धेऽन्यत्र च भगवदुपदिष्टं शास्त्रं मया गुप्तं निरूपितं प्रकटीकृतम् । यः सदा एतद्गुतं शासं समधीयीत सम्यक्प्रकारेण चिन्तयेत् , इस्मरणे, इडिकावध्युपसर्गतो न न्यभिचरतः । तस्यैतद्विचार- पितुरपि रतिः प्रेमात्मिका घटा स्यात् । तथा च तया दृढया संसाररागविनाशे जाते क्रमा- दन्यदपि भगवान् सम्पादयिष्यति । 'न ह्यगोपक्रमे ध्वंस' इति भगवद्वाक्यात् । तथा चात इदमभीक्ष्णं विचारणीयमित्यर्थः । इति श्रीवल्लभाचार्यचरणाञप्रसादतः । परप्रेरणयामात व्यवृणोत्पुरुषोत्तमः ॥१॥ इति श्रीवल्लभाचार्यचरणकतानश्रीपीताम्बरात्मजपुरुषोचमविरचिता भक्तिवर्धिनीविवृतिः सम्पूर्णा ॥ १श्रद्धा रतिर्मतिरनुकमिष्यतीति त्रिके माध्यामिकरत्युपादानं भकिदुमत्वाय । 'कश्विदेव हि मकीही ति मायाद श्रीकृष्णाय नमः। भक्तिवर्धिनी। श्रीवल्लभकृतटीकासमेता। शम्पत्प्रियासितापानध्यानावस्थितचेतसा । प्राप्ततन्निजरूपाय गोविन्दाय नमो नमः ॥१॥ यथा भक्तिः प्रवृद्धा स्यात्तथोपायो निरूप्यते । पीजभावे देदे तु स्यात्यागाष्ट्रपणकीर्तनात् ॥१॥ भक्तिपर्धिन्याम् । यथेति । यथा येन प्रकारेण । भक्ति शास्त्रीया । प्रवृद्धा मानस- रूपा सती फलोन्मुखा भवेत्तथोपायप्रकारभूत उपायस्वनुविचजसेवया पीज- मावदार्यसम्पादनरूपस्त्यागेन श्रवणकीर्तनरूपश्च निरूप्यत इत्यर्थः । तस साधना- साध्यलसिद्धान्तादुपायपदम् । अत्र बीजं रत्याख्य आपः कोमलो भावः भगवानेव शर- शामित्याकारकः ।येन भगवद्धर्मेषु रुचिर्मवति । मतिर्द्धमः। फलं स्वाधिकारानुसारेणालौकि- कसामर्थ्यायन्यताप्राप्त्या भगवद्भजनम् । स उपायो द्विविध इत्याहुः बीजेति । पीजरूपे रत्यास्ये गावे तनुविचजसेवया दृढे नारासंभावनारहिते जाते तस्स भक्तिद्रुमस्स प्रवृद्धिः। फलोन्मुखत्वं स्यादित्यर्थः । अतस्तदाब सम्पादनीयमित्येक उपायः । द्वितीयनिर्धार- माहुः त्यागादिति । सामाद्धेतो सिद्धान्छक्तितात्पर्यरुपाच्ट्रवणसहितकीर्तनादित्यर्थः । हरिस्थानवासे तदीयैः सह स्थितौ शक्तितापर्यनिर्धारो भवतीति भावः । द्वितीयपक्षेपि दाळमपेक्षितमेवेति तुशन्दः । परन्वायपक्षे गृहस्थिया भावनाशशकया तनुवित्तज- सेक्या तद्दार्म सम्पादनीयं गवति । द्वितीयपक्षे तु तदगावाखत एव दार्य सिध्य- तीति विभेदः ॥ १॥ योजदार्यप्रकारस्तु गृहे स्थित्या स्वधर्मतः। अभ्यात्तो भजेकृष्णं पूजया श्रवणादिभिः ॥ २ ॥ आयमुपायमाहुः पीजदायति । द्वितीयपक्षादयं पक्षः पृथगिति तुशब्दः । पापण्डिलामावाय स्वधर्मतो वर्णाश्रमपर्मेण गृहे खिलाऽव्यावृत्तो भोगार्थच्यावृत्तिर- हितः । आश्रमधर्मलेन प्राप्तमृतुगमनादिकमेव कुर्वनिति यावत् । श्रवणादिभिः सहितया पूजया द्रव्येषु मावात्मकत्वमावनरूपया कृष्णं फलात्मकं भजेत्सेवेत । तनुवित्तजसेवां कुर्यादित्यर्थः । ज्ञानमयदल्यसम्पादितायाः पूजालं 'धन्यास्त्विति शोके निरूपितम् ।।२।।
भकिवर्धिनी। व्यावृत्तोपि हरौ चित्तं श्रवणादौ यतेत्सदा। ततः प्रेम तथासक्तिर्व्यसनं च यदा भवेत् ॥ ३ ॥ बीजं तदुच्यते शास्त्रे दृढं यन्नापि नश्यति । व्यावृत्तोपीति । कामादिप्रापत्ये तत्कृतप्रतिबन्धाभावाय मोगार्यव्यावृत्तिसहि- तोपि सेवानिवसरेऽनिषिद्धप्रकारेण नित्यमपि मोगं कुर्वन्नित्यर्थः । हरौ चित्तं स्थापयित्वेति शेपः । श्रवणादौ यतेत् , प्रतिपन्धनिवृत्तिमात्रार्थमेव भोगं कुर्वन् सदा सेवानवसरेपि यत्न श्रवणादिविषयकमेव सम्पादयेदित्यर्थः । एवं कृते बीजभावस्य दाय भवति । तत्राभि- ज्ञापकमाहुः ततः प्रेमेति । एवं कृते सा भक्तिः प्रेमशब्दवाच्या भवति । पूर्व लोकेपि नेहः स्थितो, भगवति परमधिकः । 'सर्वतोधिकः सेहो भक्ति'रितिलक्षणात् । एवं कृते तु सर्वतो निवृत्तो भगवन्मात्रविषयको भवतीत्यर्थः । तदनन्तरं सासक्ति- शब्दवाच्या भवति । अनायासेनापि भगवानेव स्मृतो भवति येन ताशस्नेहो भवतीत्यर्थः । 'चित्तखभाव आसक्तिर्यस्त्यक्तुं नैव शक्यते । स्नेहो रतिरिति प्रोक्त' इति तृतीयस्कन्धसुयो- पिन्यामुक्तम् । आसक्तित्वसाधकोपि पूर्वोक्त एव प्रकार इति तथेत्युक्तम् । व्यसनं चेति । अनापि स एव प्रकार इति चकारः । विशेषेणासनं क्षेपणं येन । येन भावेनान्यास्फुरणं भवति । प्रपञ्चविस्मृतिरिति यावत् । आसक्तिः प्रपञ्चविस्मृतियुता सती व्यसनम् । तथाच निरोधो व्यसनशब्दवाच्यस्तत्त्वं भक्तर्यदा भवेत् । तत्तदा पीजं दृढं भगवच्छा उच्यते । मक्तेर्व्यसनत्वं बीजदार्यस्याभिज्ञापकमित्यर्थः । दायस्वरूपमाहुः नापीति । नाशाप्रतियोगीत्यर्थः । सततगृहस्थितौ नाशसम्भावनामपि पश्यन्तीसपिशब्दः ॥३३॥ प्रेमादित्रयस्याभिज्ञापनाय तत्का>ण्याहुः लेहादिति । लेहाद्रागविनाशः स्यादासक्त्या स्याद्गृहारुचिः॥४॥ सर्वतो निवृत्ताद्भगवन्मात्रविषयकलेहादित्यर्थः । रागविनाशगृहारुचिकृतार्थतानां क्रमाप्रेमाघभिज्ञापकत्वमिति भावः । रागविना विपयवैराग्यम् । तेहस विषयेभ्यो निवृत्ती तेषु वैराग्यमुदासीनता भयतीत्यर्थः । आसक्त्या गृहारुचिर्भवति ॥४॥ अन ननर्थो विरुद्धत्वमित्याशयेनारुचिपदार्थ विवृण्वन्ति । गृहस्थानां पाधकत्वमनात्मत्वं च भासते। यदा स्यायसनं कृष्णे कृताः सात्तदैव हि ॥५॥ ताशस्यापि सततं गेहस्थानं विनाशकृत् । गृहस्थानामिति । अभगवदीयानामिति शेपः । एतेषां भारपायकत्वेनानारम- वेन च भानमरुचिपदार्थ इतिमावः । भार्यापुत्रयोरात्मत्वे शास्त्रसिद्ध अपि मक्तानां म. गवानेवात्मरूपो, न तु तावितिमायः । अत एव सेवानातिकूल्ये मार्यादीनामपि त्यागोड- ४७ श्रीवतमविरचितविकृतिसमेता। प्रोक्तः । यदा भक्तिर्व्यसनरूपा स्यात् । पाधकलेनाप्यन्यास्फुरणं स्यात् । तदैव कृष्णे कृतः समर्पित ऐहिकपारलौकिका सर्वोप्यों येन तादृशः सिद्धात्मनिवेदो भवतीत्यर्थः । पूर्व सामान्यतो निवेदने कृतेपि तत्सिर्व्यिसने एव जाते भवति । तथाचामनिवेदनरूपा मक्तिर्व्यसनकार्यमितिमावः । यया गोपाः सर्वस भगवदर्यत्वज्ञानेन प्रपञ्चविस्मृतेर्जातत्या- सर्वार्थे भगवानेव वक्तव्य इति ज्ञानयुक्ताः भुन्निवृत्त्यर्थमपि मगवन्तमेव प्रार्थितपन्तः । अत एव 'व्यसनान्नान्यगामिन' इति तन निवन्धे निरूपितम् । पूर्वयोः किपित्कालं प्यपधानमपि । इदं तु व्यसनसिद्धौ शीममेव भवतीति यदा तदैवेत्युक्तम् । तन किचिदन्य- दप्पाहुः । तादृशस्थापीति सिद्धात्मनिवेदनस्थापीत्यर्थः । गृहस भगवति समर्पितत्वेन सर्वया यापकत्वामावान्न सर्वात्मना त्यागः, किन्तु सततस्थिती भोगदृष्टिसम्मवात् मो- गस च सेवाफलान्ये यापकत्वनिरूपणान्मध्ये मध्ये लीलास्थलेषु गोवर्धनादिपु गच्छे- दिति सततमित्युक्तम् । विनाशकृत् । भोगसम्भावनया योजभावनाशकृदित्यर्थः । एवं तनुवित्तजसेवया पीजदार्यसम्पादने मक्तिर्व्यसनान्तावस्यां प्राप्ता चेतस्त्रावणलक्षण- मानससेवारूपा दृढा सती अलौकिकसामायन्यतरफटोन्मुखा भरतीत्येक उपाय उक्तः । मन भार्यादिप्रातिफूल्यै यः प्रतिकूलसास त्यागो, न तु गृहस । अत एव 'प्रतिफूले गृदं सोदित्यन गृहं मार्यादिकमिति प्याख्यातम् ॥ ५ ॥ त्यागं कृत्वा यतेयस्तु तदर्थाधकमानसः॥६॥ लभते सुद्धा भक्ति सर्वतोप्यधिकां पराम्। द्वितीयमाहुः त्यागं कृत्येति । गृहत्यागं कृत्वा । स चासापर्था तदर्थः । आपठोके उद्देशत उक्तः अवणकीर्तनरूपो योधनदयं तद्विपयरमक मानसं यस तादृशः सन् । प्राणकीर्तनार्यमेर हरिसाने भगवनतमंनिधौ तिष्ठनिति यावत् । एनाशः सन् यो पतेत् । अयणादाविति शेषः । स भक्ति मुद्धा व्यसनल प्राप्तां लमते । तनः सरतोऽपिका परां फलोन्मुसामपि रमत इत्यर्थः । म मिपि सिद्धत्वान्यपिशेषणे दीतिन्यायेन पिपगलाभो विधीयत इति शेयम् । 'गृहं सपारमना त्याज्यामिति वास्यादेतस पक्षस मुख्यत्वम् । अत एव प्रयम-पक्षे नाशमम्मारनाप्पमासुकम् , मा तापावर्तनाप तुशन्दः । मुख्यां विदयन्ति सुदृढामिति । आपाक्षे सनतगृह- म्पिती नाशसम्मावनाप्यस्तीति तदवा पीजदा सम्पादनेन मस्तेदान प्यमनत्यं सम्पादनीय मपनि । पत्र पक्षे तु गृहामावन नामम्मापनामारा पोकीमार्ने पले ग्निर गुदा प्यसनल प्राठा मयनी येतापदंशमाताप 'पाधिकोरि दोषः पति- हरणीय' इति न्यापेन मुल्पतम् । फलमापने तु साम्पमति पक्ष्यो ॥ ६ ॥ ननु सागमारमेर परसप्पं साति, दरिसानपामो मामाग पुनः किन पोप्पत इलत बाहुः पागही।
४८
भक्तिवर्धिनी।
त्यागे घाघकभूयस्त्वं दुःसंसर्गात्तथानतः॥७॥
अतः स्थेयं हरिस्थाने तदीयैः सह तत्परैः।
धर्मद्वयरहितकेवलत्यागे वाधकभूयस्त्वमस्त्यतो हेतोः । तथानतो दुःसंसर्गादेनोः
हरिस्याने तदीयैः सह स्थेयमित्यन्वयः । हरिस्थानवासराहिये पाधकभूयस्त्वं 'सहायसङ्ग-
साध्यत्वा'दित्यारभ्य 'नैव त्यागः सुखावह' इत्यन्तं संन्यासनिर्णयोक्तमस्तीति शेषः । अतो
हरिस्थाने स्पेयम् । तत्र ते दोपा न भविष्यन्तीति भावः । तया भक्तसाजराहिसे अन-
तो हेतोः अन्नाथ दुःसंसर्गात् दुष्टानां संसर्गसम्बन्धाद्धेतोस्तदीयैर्भगवदीयैस्तत्रापि नसी-
भगवत्परैर्नतु हिरण्यकशिपुप्रभृतिवदतसरैः सह स्पेयम् । तदानार्थमपि तेषामेव संसर्गो
भविष्यति, न तु दुष्टानामिति भावः ॥ ७ ॥
हरिस्थानस्य द्वैविघ्याशयेनाहुः अदूरे इति ।
अदूरे विप्रकर्षे पा पथा चित्तं न दुप्यति ॥ ८॥
पूजाप्रवाहवति गोवर्धननाथजगन्नायादिस्थाने भगवतः अरे पूजाप्रवाहरहित.
यमुनातटादिपु लोकदृष्टया भगवतो विप्रकर्षे वा स्वस चित्तं यथा न दुप्यति, दोपयुक्त न
भवति, तया स्वयमेव विचार्य स्थेयमिति पूर्वेणान्वयः ॥८॥
अन्योतपक्षद्वयमुपसंहरन्ति ।
सेवायां वा कथायां पा यस्यासक्तिढा भवेत् ।
यावनीयं तस्य नाशो न कापीति मतिर्मम ॥९॥
सेवायामिति । आये चीजदार्पसम्पादनपक्षे सेवायां क्रियमाणापा, द्वितीये
त्यागपक्षे कयायां वा क्रियमाणायां सत्यां यस बासक्तिरामक्तित्वं प्राप्ता मकिरदा प्यसनलं
प्राप्ता भवेत् , तस पुरुषस भक्तिपीजस नाशो न । तया च व्यसनरूपा नाशसम्माव-
नारहितपीजा मक्तितस्वावपरक्षणमानससेवारूपा सती अलौकिकसामधिन्यवरफलं
ययाधिकार सम्पादयतीति भावः । नार वर्णादिनियम इत्याहुः यापनीयमिनि ।
सर्वानेव जीवान् मर्यादीकृत्येत्यर्थः । प्यसनसिद्धानन्तरं हरिस्थानवासनियमोरि तया
भास्तीनि कापीत्युक्तम् । किन्तु सततगृहस्थितिनिपिद्धति पूर्वमुक्तम् । वादिसाधारण्य
प्रमाणेन विरुष्यत इत्याशंक्याच प्रमाणपनामावापाहुः मतिर्ममेति । अस्मन्मनिसिदीयं
पक्षा, अतः प्रमेयटसिद्धः । वाचा कयनेरि मरिमिद्धत्वमेव मुख्यमिति भावः ॥ ९ ॥
पक्षापस व्यवस्थामाहुः पायेति ।
पापसमापनायां तु नैकान्ते वास हप्यते।
हरिस्तु सर्वनो रक्षा करिष्यनि न संशयः ॥ १० ॥
भीजयगोपालभवतटीकासमेता। कामादिभिषांषसम्भावनायाम् । इन्द्रियजयसामर्थ्यामाव इति यावत् । तदा एकान्ते वासस्थागपक्षो नेष्यते । तयाचेन्द्रियजयसामर्थ्यागावे पूर्वोक्तपक्षण स्पेयम् । तत्सामर्थे त्यागपक्षेण हरिस्थाने तदीयैः सह स्पेयमिति व्यवति भावः । एवं व्यवस्थायां 'गई सर्वात्मनेति श्लोकसंमतिसूचनाय तुशब्दः । नन्वसागपक्षे गृहे स्थितौ तबासक्तिरनिवार्या । सागपक्षे च गृहत्यागसाश्रमान्तराग्रहणे प्रमाणविरुद्ध- स्वात्मापसम्भावनेसाशंक्याहुः हरिस्त्विति । सर्वतो गृहासक्तः सर्वपापेभ्यश्चेत्यर्थः । 'पई खां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुच' इत्यसार्थोनुसंधेयः । एतद्वाक्या- नुसंधानेन न संशय इत्युक्तम् । हरित्वाद्रक्षणं युक्तमेवेति तुशब्दः ॥ १० ॥ उपसंहरन्ति इत्येवमिति । इत्येवं भगवच्छास्त्रं गूदतत्य निरूपितम् । प एतत्समधीपीत तस्यापि स्वादा रतिः॥११॥ य एतदिति । एतदध्ययनेनापि रतिर्कीजिभावरूपा रटा स्यादिति । बीजदार्श्व- सम्पादनसायपक्षसायमप्येक प्रकार इति तस्सापीत्यपिशन्दः ।। ११॥ खीयेषु कृपयोक्तस प्रन्यसास महात्मभिः । वदनानउदासोक्ता न्याकृतिः पूर्णतामगात् ॥ १ ॥ इति श्रीविश्लेशात्मजश्रीवलमकता भकिपर्धिनीटीका समाता || घीकृष्णाय नमः। भक्तिवर्धिनी। मठपतिश्रीजयगोपालभट्टकृतटीकासमेता। पहिपईलसन्मौठि वेणुवादविशारदम् । दुःखं दलपतासिमटलितं महः ।। १ ॥ श्रीवलमतत्तवरपुरुपितृष्णान मुहुः प्रपमन् । टीकामतीय रस्यां कुर्वे श्रीमतिवर्षिन्याः ॥ २॥ मुगुणा भक्तिधोककरिया निपातनो दशभिः । पधैरतो पृदिप्रकार एकेन पोपसंहारः ॥ ३ ॥ पय दशक्तिमादेशविपा मफिरिति दसमोरमतिविनीशाले भनिदि -मणि- भक्तिवार्धिनी। प्रकारं एकेन झोकेन तदुपसंहारं तत्साठफलं चाहुः श्रीवल्लभाचार्याः यथा भक्तिः प्रहदा स्थादित्यादिना। यथा भक्तिः प्रवृद्धा स्यात्तथोपायो निरूप्यते । योजभाचे दृढे तु स्यात्यागाच्छ्रवणकीर्तनात् ॥१॥ यथा येन प्रकारेण भक्तिमाररूपा प्रवृद्धा अवस्थाविशेषविशेषाविर्मावेन रसरूपतापर्यन्तं प्राप्ता भवति, तथा मया उपायः साधनं निरूप्यते कथ्यत इत्यर्थः । ननु भक्त्युत्पत्तिसाधनं पूर्वमनुक्त्वा भक्तिवृद्धिसाधनोपदेशः कथं क्रियत इति चेत् । अनोच्यते । पुष्टिमार्गे प्रमो 'रसो वै स' इति श्रुत्याएकरचनाविरुद्धसामान्यरसशब्दप्रयोगे. णानेकविधरसरूपारशिष्टेकरसरूपत्वं सिध्यति । अत्र प्रभुरनेकरसविशिष्टोपि प्राधान्यतः की- दृशरसरूप इति जिज्ञासायां शृङ्गाररसरूप एवेत्सायाति । यतः श्रुतिमिः परमकाष्ठापनानन्द- स्वरूपफलरूपदर्शने प्रार्थिते भगवतोदीपनविभावरूपश्रीगोवर्धनश्रीयमुनादि विशिष्ट प्रकृत्य- तीताक्षरमसान्तर्गतग्रमानन्दगभ्यव्यापिवैकुण्ठान्तर्गतश्रीमदृन्दावने 'नानारासरसोन्मत्रं यत्र गोपीकदम्यक मित्यादीशोऽनुभावरूपो यो रासस्तद्रसोन्मत्तः शृङ्गाररसालम्बनीमूतनायि- कारूपगोपीकदम्नकयुक्तमेव परमकाष्ठापन्नफलरूपंखखरूप ताभ्यः प्रदर्शितमिति वृहद्वाम- नपुराणे श्रूयते । अन्यरसखरूपत्वेनैव प्राधान्ये तद्विभावादिविशिष्टमेव स्वरूपं प्रदर्शित स्यात् । न च तस्य स्वरूपस्य परमकाष्ठापनत्वे प्रमाणाभाव इति वाच्यम् । 'कल्पं सारखतं प्राप्य प्रजे गोप्यो भविष्यथ । पृथिव्यां भारते क्षेत्र माथुरे मम मण्डले । वृन्दावने भवि- प्यामि प्रेयान्यो रासमण्डल' इति वृहद्वामनपुराणे सारखतकल्पे स्वावतार उक्तो भगवता श्रु- तीनामनुग्रहार्यम् । तत्कल्पानुसाउँप श्रीभागवतं तत्खरूपदर्शनेनैव च निखिलवेदपुराण- धर्मजिज्ञासाब्रह्मजिज्ञासादिभिरप्यजातचित्तप्रसादानां श्रीमतां व्यासचरणानां चिचप्रसादो जातो, न त्वन्यस्वरूपदर्शनेनेत्यापत्तिरूपप्रमाणेन तस्स सरूपस्यैव परमकाष्ठापन्नत्वे सिद्ध तत्स्वरूपस परमकाष्ठापन्नत्वे प्रमाणाभावाभावात् । एवं च सिद्धे शृङ्गाररसरूपत्व- स्यैव प्राधान्येन धर्मत्वेऽन्यरसस्वरूपाणां च तदङ्गत्वेन धर्मले, शृङ्गाररसस्य तु रति- रूपस्थायिभावात्मकत्वात् रतिरूपस्थायिभावस्य च भगवद्रूपत्वेन ब्रह्मत्वात् अखणच न्या- पकत्वात् भगवद्विषयकरतेरपि व्यापकत्वे सिद्धे सर्वजीवेषु त स्थितत्वं सिद्धम् । तर रते- भ्रंशवेनानन्तरूपत्वाद्भगवद्विषयिणी श्रीमद्रजभक्तादिनिष्ठारतिः शृङ्गारसरूपा भवति । अस्मदादिनिष्ठा भगवद्विपयिणी रतिर्भक्तिरसरूपा भवति। स्वास्मदादिनिष्ठा सपरिकरमग- वदतिकृपायां स्वस्य पूर्वरूप तिरोधाप्य शृङ्गाररसरूपतामपि प्रकटीकरोति । एवं च 'प्रेम्णस्तु प्रथमावस्था भाव इत्यभिधीयते' । 'रतिवादिविषया भाव इत्यभिधीयते ।' 'माहात्म्यज्ञान- पूर्वस्तु सुदृढः सर्वतोधिक । स्नेहो भक्तिरिति प्रोक्तस्तया मुक्तिर्न चान्ययेति वाक्येभ्यः प्रेमप्र- थमावस्थारूपत्वात् प्रभुविषयकत्वाच भावशन्दवाच्या स्नेहरूपत्वेन भक्तिशब्दवान्यापि श्रीजयगोपालभट्टकृतीकासमेता । मवति। तत्र सा मक्तिर्द्विविधा । मर्यादापुष्टिमार्गीया शुद्धपुष्टिमागीया च । तत्र 'यमेवेति श्रुतिसिद्धं मर्यादापुष्टिगार्गीयं वरणं शुद्धपुष्टिमार्गीयं च वरणमिति परणेति द्वैविध्यमिति सिद्धान्तात् मर्यादापुष्टिमार्गे मर्यादानुग्रहाभ्यां मिलिताभ्यामेव कार्यसिद्धिः । शुद्धपुष्टिमार्गे तु विशुद्धानुग्रहमात्रेणैव कार्यसिद्धिः। एवम मर्यादापुष्टिमार्गे मर्यादापुष्टिमार्गीयमगवद- रणप्रेरितताराजीवकृततागाचार्यसंश्रयसलाततानामनिवेदनमाणैवातिमाघान्छादकमा- पारूपावरणमझे पूर्वोत्करसापरपर्यायभावस्याविर्भावः । 'दानव्रततपोहोमजास्वाध्यायसंयमैः। श्रेयोभिर्विविधै म्यान्यैः कृष्ण भक्तिर्हि साध्यत' इत्यादिवाक्यात्। शुद्धपुष्टिमार्गे तु शुद्धपु- प्टिमार्गीयश्रीमद्रजभक्तकृपाविष्टभगवत्कृपाप्रेरिततादृशजीवकृत शुद्धपुष्टिमार्गीयाचार्यसंश्रयस- घाततन्मार्गीयनामनिवेदनमात्रेणैव । न चैतन्मार्गीयनामनिवेदनेपि न सूक्ष्मवीजरूपमावो इश्यत इति वाच्यम् । तादृशामनिवेदनादिभिः प्रतिपन्धकाविद्यापगमेपि सूक्ष्मतस्त- दैव तदर्शनामावात् । समयविशेषसमुद्भूतकिञ्चिदश्रुपुलकादिभिस्तदुन्नयनाच रतिमात्रा- छादकमायारूपावरणमझे पूर्वोक्तभावस्साविर्भावः । 'न रोधपती'त्यारभ्य 'ययाऽ- यरूधे सत्सङ्ग' इत्यादिवास्यात् । एवं च भावसाविर्भायमाप्रमेव, न तूसत्तिरिति नोराचिप्रकार उक्तः । किन्तु वृद्धितत्प्रकार एवोक्त इति । ग चाधिर्माव एव उत्पत्तिरिति वान्यम्। 'अनिये जननं नित्से परिच्छिन्ने समागमः । नित्यापरिच्छिन्नतनी प्राक- व्यमिति सा विधेति विविधोसतौ घटादिवदनित्यलाभापान जननरूपोत्पत्तिः । जीवात्मवनित्यपरिन्छिन्नत्वास समागमरूपोलचिः । नित्यापरिन्छिनत्वेपि धर्मरूपस मावस तनुत्तामावान्न प्राकट्यरूपोत्पतिः । किन्तु वेदस यया प्रलये सूक्ष्मरूपेणाव- सानमेवमेव मावसापि पूर्वसूक्ष्मरूपेणावस्थानं पयात्सृष्टी वेदस पिस्तर इव स्पका- रणैः प्रवृद्धिमानमित्याविर्भावस उत्पत्तिरूपत्वामावात् । तस्माद्भक्तेः सूक्ष्मवीजरूप- भाररूपेण सर्वजीवेष्वपि नित्यस्थितत्वात्तस च आचार्यकृपामाणैर आधिभानौर जातत्वात् साधनान्तरापेक्षवार तदृद्धिप्रकार एवोग्यते, न तु तदुत्पादनप्रकारः, विधि- धोत्पचेरप्यसम्मवात् । न च 'पानेन ते देव कयामुधायाः प्रवृद्धमत्या पिशदाशया य' इत्यादिना कयामुघापानस भक्तिवृद्धिहेतुत्यमप्युन्यत इनि व्ययों भरवपास इति पाया। अप लोके 'वैराग्यसारं प्रतितम्य योध' मित्सम उक्तस्वादम्प वृद्धिप्रारम्म मर्यादामार्गीयगक्तिपिपपत्वान् । शुद्धपुष्टिमागीयमक्तेस्तु 'न मानं न च राज्यं प्रायः यो मवेदिदेति यास्याराग्यमानानपेक्षत्यादिति जानीहि । गृी प्रापस्नु फलानुमय- पर्यनामम्पादकसरूपः। ननु सा मतिपदिः कदा मरीयामाहापामाहुः पीजभाये तु ग्ग. स्यागाचायणकीर्तनादिशी। तय गगाए मगाम्नतिपादादित्याना । मप प अपणशीर्गनाग मागक्तियमनरूपारम्याग्निपरिमारिणीन पो.
भक्तिवार्थिनी। प्रकारकरत्यपरपर्यायवीजरूपो यो मावस्तस्मिन् दृढे केनापि तिरोधापयितुमशक्ये सति शुद्धपुष्टिमार्गीया मक्तिः प्रवृद्धा सात् । रासरूपतारूपवृद्धिप्राप्ता स्यादित्यर्थः । न चान त्यागपदेन सर्वत्याग एव कुतो नोच्यत इति वाच्यम् । अग्रे 'गृहे स्थित्वा स्वधर्मत' इत्यनेन वैदिकलौकिकधर्मसाहित्येन गृहस्थितस्यैव मजनस्स बोषितत्वेन तथा- व्याख्यानस कर्तुमशक्यलात् । अत्रेदं तस्वम् । सागस्तावत्रिविधः । भगवद्भजनाननु- कूलानामेव गृहादीनां त्यागः, न तु तदनुकूलानामपि । द्वितीयस्तु भगवद्भजनाननुकूल- गृहमात्रस्यैव त्यागः, न तु भगवद्भजनानुकूलानां खएहस्थितान्यमगवदीयानामपि । तृती- यस्तु भगवद्भजनानुकूलगृहस्थितभगवदीयानामिव तद्भजनानुकूलतदन्यमगवदीयानामपि सागः । तत्र प्रथमस्त्यागो बीजदाळप्रकारे तनुजवितजसेवारूपप्रारम्भदशासामयिकः । द्वितीयस्त्वासक्तिदशाविर्भावरूपमध्यदशासामयिकः । तृतीयस्तु व्यसनदशाविर्मावरूपपू. पंदशासामयिकः । तत्रैव तल्लोकोक्तस्त्यागो बीजदायप्रकारमारम्मदशात्यागः । अग्रे 'ताशस्थापि सततं गेहस्वानं विनाशकम् । त्यागं कृत्वा यतेधस्तु तदर्याथैकमानस' इत्यनेन नक्ष्यमाणः स मध्यमदशासागः । 'विरहानुभवार्य तु परित्यागः प्रशस्सत' इति संन्यास- निर्णयोक्तत्यागस्तु फलदशात्याग इति बोध्यम् । अत्रायं शोकः सूत्ररूपः, अग्रिमग्रन्यो व्याख्यानरूप इति ज्ञेयम् । केचितु पीजं नाम 'यमेवेति श्रुतेर्निरुपाधिकरूपणया पुष्टिमार्गीयं भगवद्वरणम्, अन्यथा तन प्रवृत्तिरेव न स्यादित्यादिप्रकारेण व्याचक्षते । तचिन्त्यम् । बटादिवृक्षस वटादिवीजमेव बीजम्, न तु पिप्पलादिवीजं वीजम् । एवं च जीवस वृक्षसजातीयत्व- मुत्सर्गतः सर्वकादिसिद्धम्, अन्यथा पिप्पलादियोजेभ्योपि वटायुत्पत्तिः स्यात् । तयात्रापि नेहरूपभक्तेरपि लेहरूपभक्तिरूपमेव वीजं भवितुं योग्यम्, सजातीयत्वात् । अत एवो- पसंहारे 'तसापि स्यादृढा रति'रित्यनेनोपक्रमोक्तभावपर्यायरतिशब्देन भावस्यैव दाळ- मुक्तम् , न तु पुरुषोत्तमवरणादीनाम् । एवं च यथा वर्षासमयो नववारिसेकेन क्षेत्रान्तः- स्थित बीजं क्षेत्रनिष्टं प्रतिवन्धकरूपं काठिन्यं दूरीकृत्य स्वकार्योन्मुखं करोति, तया च निरुपाधिपुरुषोत्तमवरणादिकं शुद्धपुष्टिमार्गीयाचार्यानुग्रहद्वारा जीवान्तःस्थितं तत्परपर्याय सूक्ष्मरूपत्वात् वीजरूपभावं मायातिरस्करिणीरूपं प्रतिबन्धकं दूरीकृत्य खकार्योन्मुखं करोतीत्यसाधारणनिमित्तकारणरूपमेव, न तु भाववत् । तत्समवायि तु इदमेवेति झापयितुं बीजपदमुक्तम् । अत्र अन्यथा मूलकारणदार्ये सादित्यायेव लोकनियन्धः कृतः स्याच्छ्रीमदाचार्यचरणैः । न च वटादियोजानामपि पटादिवृक्षं प्रति निमित्तत्वमेव दृष्टम्, न तु समवायिकत्वम्, कार्यस्य वटादेस्वत्समवेतत्वाभावात्, तथैव भावरूपवीजस्यापि निमितत्वमेवेति सिद्धे समयायित्वोतिर्विरुद्धति वाच्यम् । यथा वटादिवीजानां निमित्तवेषि कन्दरूपयीजानां समवायित्वदर्शनेन समदायित्वम्, एवमेव भावरूपवीजसापि अमलेन . श्रीजयगोपालभट्टकृतटीकासमेता । 'स हैतावानास' इति श्रुतेः, अथ च समवायिखेनानुभवाच समवायित्वोक्तेविरुद्धत्वाभा- वात् । तस्मादुपकमोपसंहारपर्यालोचनया युक्तिपोलोचनयापि बीजरूपो यो भाव इत्येव व्याख्यातमस्माभिरित्यास्तां तावत् ॥ १॥ ननु बीजदार्थोपाय उच्यतामित्याकाहायामाहुः पीजदार्यप्रकारस्त्विति । चीजदार्यप्रकारस्तु गृहे स्थित्वा स्वधर्मतः । अन्यायत्तो भजेस्कृष्णं पूजया श्रवणादिभिः॥२॥ अत्र पूर्वोको मावो बीजम्, तस दायप्रकारस्त्वयं यत् 'भार्यादिरनुकूलशेत् कारयेद्भगवरिक्रयाम् । उदासीने खयं सत् प्रतिकूले गृहं त्यजे'दिति श्रीभागवततत्त्वदीप- नियन्धे सिद्धान्तितत्वात् । भगवद्भजनानुकूले गृहे स्थित्वा स्वधर्मतः वर्णाश्रमधर्मतो भगव- द्रजनानुकूललौकिकवैदिकधर्मतश्च अव्यावृत्तः अनिवृत्तः सन् कृष्ण श्रीमगोपीजनविशिष्टं कृष्णपदार्थ फलरूपं भजेत्, कृष्णविषयिकी सेवां कुर्यादित्यर्थः । अत्र यद्यपि खधर्मत इत्यत्र स्वपदस्यात्मात्मीयवाचकत्वात् वधर्मपदेनात्मधर्मरूपो दासधर्मोप्यायाति, तथापि न व्याख्याने संगृह्यते, किन्वात्मीयधर्मरूपवैदिकलौकिकधर्मा एव संगृह्यन्ते । यतो मजेत्पदा- यस सेवाकारणस्य सेवकधर्मत्वात् भजेत्पदेनैवात्मधर्मरूपदासधर्ममंग्रहसजायमानत्वादिति पोध्यम्। कृष्णशब्दस्य श्रीमगोपीजनविशिष्टकृष्णपरत्वं तु मत्कृतप्रथमस्कन्धसुपोधि- नीटिप्पण्या कर्ता ज्ञः सकलसेति पद्यव्याख्याने मया सप्रपञ्चमुक्तमिति तथैवावलोकनी- पम् । अत्र वर्णाश्रमधर्मत्यागेन भजने यद्यपि पापं न भवति, 'तस्मात्पमुद्धवोत्सृज्य नोदनां प्रतिनोदना'मित्यादिवाक्येन विहितत्वात् , तथापि स्वधर्मत्यागेन भजने गृहस्थितानां पुत्र कलयादीनां तादग्विश्वासाभावात् खस्मिन्नसद्गुझ्या सेवौदासीन्येन पहिर्मुखजनितमार्ग- निन्दया खचित्तक्षोभेन च सेवाया अनिर्वाहः सात् । न च तर्हि पुनकलत्रादीनां निन्दया खचित्तक्षोभजनकानां पहिर्मुखानां सनत्यागस कर्तुं शपसे 'प्रतियले एवं त्यजे'दित्युक्तत्वात् सेवाप्रतिकूलतायामेव पुनकलवादीनां सागस सिद्धान्तत्वेनीदासीन्ये गृहे थिला सपं कर्तव्यस पोधितत्वात् । न च स्वपमेव सर्व मियतामिनि पान्यम् । सयमेव सेवासामग्रीसम्पादनस्य कर्तुमराम्यत्वात् । स्वधर्मत्यागेन तेपामौदासीन्याय सेवायाधः प्रसज्येतेति । अथ च स एपोचमा सेवको यः स्वामिन आयासं न सहते । एवंसित गृहसे सेकेन वैदिकलौकिकधर्मत्यागेन मजने क्रियमाणे तं दृष्ट्वान्परपि तदनुयायिभिस्तथैव मजने कृते स्मरणार्यवैरिकलौकिकधर्मनाये जायमाने 'यदा यदा दि धर्मस ग्लानिर्भवति मारत । अम्युरयानमधर्मस तदात्मानं बजाम्पहामिनि वाक्यात् धर्म- रक्षार्य भगवतः प्रपनकरने महायास उत्सपेन । स पायासः सदत एपेनि गृहस्ससेस्क- सानुत्तमसेवकत्वं च प्रसज्यतेत्यतोपि हेतोः सपर्मन अन्यायतो मोदित्यमित्यादि ।
भक्तिवाधनी। ननु केवलमेव सेवन कर्तव्यम्, अथवा किश्चिदन्यदन्यदपि कर्तव्यमित्याकाहा पामाहु पूजया श्रवणादिभिः अत्र विनापि सहयोग तृतीयेत्युक्तत्वात्महशम्दाप्रयोगपि तृतीया । तथा पूजया श्रवणादिमि सहेत्यर्थ सम्पन्न । अयाप्रधानतृतीयानिर्देशात्से वाया एव प्राधान्यम् । पूजाया श्रवणादेव गौणत्वमेव । अत्र पूनापि गृहस्थितानाम नौदासीन्यसम्पादनाथ यहिमुखजनितमार्गनिन्दया सचित्तक्षोभाभावार्थमेवोक्ता । अयया शुद्धपुष्टिमागीय सेवामावकरणे विध्युक्तवामावज्ञाने तेषामोदासीन्य स्यात् । तस्मात् पूजासाधनै शङ्खघण्टाधुपचारैरपि सह सेवा कर्तव्येत्युक्तम् , परन्तु शुद्धपुष्टिमागीयसे वाविरोधिपूजासाधनैर्न कर्तव्येति । न प पुष्टिमार्गशिरोरिपूजासाधनत्यागेपि तेपामो दासीन्ये का गतिरिति वान्यम् पञ्चोपचारपोडशोपचाराष्टादशोपचारचतु पष्टपुपचार पूजा विहिनेति उपचाराणामनियतत्वेन कमपि पक्ष करोतीति तेपामौदासीन्यागावात् । अत एक अप्रधानतृतीयया श्रवणादिवयमपि सेवाविधेर्न कर्तव्यम् । मुख्यतया सेवा कृत्वा सेवासमयातिरिक्तसमये श्रवणादिक कर्तव्यमिति तस्यापि गौणत्वमिति । यत्तु स्वधर्मतो दासधर्मतो भनेत्, अव्यावृत्त लौकिकव्यावृत्तिरहित सन् इति प्या ख्यान, तन गृहे स्थित्वा भनने लौकिकव्यावृत्तिराहित्य सर्पधा न भवतीति विचार्यम् । यद्वा । कृष्ण फलात्मक पूरया पूनासाधनतेत् । सेवा पुर्यात् , ग तु पूजयेत् । तथा च सेव्यसेवकमावेनैव कृतिं कुर्यात् । न तु देवो मूत्वा देव यदिति वाक्यात् खस्मिन् देवत्व भावयेत् । किन्तु दासत्वमेव । न च भोदित्सेतापतैवायमर्थ आयात्येव, तथा च पूरयेदिनि वचन व्यर्थमिति यान्यम् । भनेहिलेतावत्युक्ते कया सामन्या भनेदित्याकाहाया पूनया पूलासाधनैरेव भवेदिति योधनेन तस्स सार्थस्यात् । एवमेव श्रवणादिभिरपि मजेन श्रवणादिकमपि सेव्यसेवकमावेनैव कुर्यात्, न तु सेवकत्वमानयुद्धमा । तर प्रथम या ख्याने तु सेवानुकूलसागपूतासापनै सह मननम् , न तु गृहस्थितानामौदामीन्यामा वाय पहिर्मुखजनितचित्तक्षोभाभावाय मार्गनिन्दाभाषाय चेति नेयम् । द्वितीय यारयाने तु प्रायशो यैरेव स्तुतिमि पूना भवति, तेरेव स्तुतिमि सेवा भवति । परन्तु पता विहितत्वेन समर्पणम् , न तु दास्योपपोम्युचितानुचित परिचारेण । मेवाया तु दागो पयोगिशुद्धपुष्टिमार्गीपाचार्यसहसदृशभावनया समर्पण मस सहागानेपानि शिष । न र सहामावे कध पर मविष्यतीति वाच्यम् । नबनुदपुष्टिमागायाचार्यमागीयत्याक्ष पातात् । इर यया तथा 'खय समुीर्य सुदुनर मिति दरामायणमस्तुनिष्पया ख्याने मत्तिहसे अपमितमस्मत्ममिरिनि तवावरोकनीयम् । अन यो भवेदित्य न तु पूनयेदिति । अब यथा पूजामापनाना उदपुग्मिागायेण समपणम्, म । रस्तु मवृतशुभपुष्टिमेवामरणी द्राच्या, रहमासान गोक्त डनि सेयम् । उनु सेवा हि सेव्यसन्तोपतनकरियया मिष्यति । सा च क्यिा पादसानादि श्रीजयगोपालमतटीकासमेता। रूपा । श्रषणादौ तु क्रियावाभावात्कथं तेन सेवा सिध्यतीति चेत् । अत्र घूमः । सेय्यसन्तोषजनकधर्ममात्रेणैव सेवा सिध्यति लोके, न तु क्रियामात्रेण, तथैवानुभवात् । तथा च भवणादेरपि तादृशधर्मवातेनापि सेवासिद्धिर्भवत्येवेति जानीहि । यद्वा । श्रवणा- दिभिः सेवानुकूलभावभगवत्स्वरूपसेराप्रकारादीनां ज्ञानस कृतिपर्यवसापित्यमेवेति कियात्वमेव ज्ञेयम् । न च सिद्धान्तमुक्तावल्यां तु 'तत्सियै तनुवित्तजेलय तनुवि- तजसेवैवोका, न तु श्रवणादिजा सेवापीति वाच्यम् । तनुजसेवायामेव श्रवणादिजसे- वाया अन्तर्भावात् । तथा हि । तत्र तनुजावित्तजा सेवा द्विविधा मुख्या गोणी च । तत्र प्रभुसुषमात्रोद्देशेनैव कृता प्रसङ्गात् स्वधर्मपर्यवसायिनी मुख्या । वधर्मत्वमायोदेशे- नैव कृता प्रसङ्गात् प्रभुसुखपर्यवसायिनी गौणी । तन्द्रियदेहप्राणान्तःकरणसभात- रूपतनी ज्ञानेन्द्रियकर्मेन्द्रियसत्त्वात् ज्ञानेन्द्रियैर्घाणरसनचक्षुःश्रोत्रत्वानोभिर्भगए. सेकोपयोगिषु सविषयेषु सदसद्विवेचनजा सेवा, अथ च कर्मेन्द्रियैक्षिाणिपादै- भगवत्सेवोपयोगिवचनकथनार्थगमनचरणसंवाहनवस्त्यानयनादिकसेवा, अथ च करें- न्द्रियान्यां पायूपस्थाम्यां सेवाप्रतिबन्धकमलकामनिवृत्तिद्वारा स्वच्छसवातजा सेवा, अथ च शरीरावयवेन मूओ त्वयातिसमीचीना भगवद्भोग्यसामग्री सम्पादनीया सम्पा- दिति सीपुमादीनामपि वन्दनना सेवा च सकतालहारादिवपि सस्मिन् दासत्वेन तत्त- सामग्रीसम्पादकत्वात् सानास्थितप्रियप्रियतमाभ्यामेव परस्परकृतत्ययुझ्या अतिसौन्द- यावलोकनजनितानन्देन प्रियस प्रियायाश्च का पन्दनजा सेवा, अप च क्षुधातृपादीनां प्राणधर्मत्यात् चानुभावेन तत्तरसमयानतिकमेण सपरिकरे प्रभो भोजनजलादिसमर्पणन प्राणता सेवा, अथ च दासससिस्वाभ्यामात्मनिष्ठाभ्यां पहिरशान्तरणसमयेष्वपि सर्वदा प्राणप्रियासहितप्रभुसनिधी निशगमनसम्पादिता तत्तद्वस्तुसम्पादनना सेवा, अय च राहातविशियोहम् मत्सम्बंधिनः सर्वे प्रभुमात्रभोग्याः, नान्यमोग्या इत्यात्मसमर्म- गजा सर्वविधा सेवा च भगवसुखोदेशेनैव कृतत्यादिपं तनुजा मुरस्यसेवा । सधर्म- स्वमानोदेशेन कृता चेशी सेवा गौणीतनुजा सेवा ज्ञेया। एवमेव श्रवणकीर्तनस्मा- जा सेवापि द्विविधा, मुख्या गोणीच । तम मदिस्यः सपरिकरः प्रभुः सप्रियतमम- विशिष्टलीलावणेनानन्दानिशयमनुभवतामिति प्रतिष्प मापजा मेपा मुख्या । म्वेतरगतहादिस्यो मनभुस्ताशलीलाकीननेनानन्दारिशयमनुभवतामिति प्रतिष्प तरा- शोलागोमाय नाशलीलाविशिष्टयभुस्मरगना मेवा मुया ! भगवत्सुम्मारोलिनेर कृनत्वात् । धर्ममानोदेशेन मूला तु सापकीननासरगना गांनीयुयने । अत्रापा सरिपारि सेवा मुदपुष्टिमार्गापागाम, द्वितीया तु मर्यादापुष्टिमागापाना- मिर शेयम् । एवं भावादिनापा अपि ममायाः भोपामिन्द्रियान्नाकापमाप. सानुमायामन्तभार इसिमानादिननेतादिकमयति । न समपरकाय इति दिए ।
भक्तिवर्धिनी। एवं चित्तजापि द्विविधा । मुख्या गौणी च । तत्र खार्जितसर्वविधसर्वविवेन परि- करविशिष्टप्रभूपयोगिवस्तुसम्पादनजा मुख्या । वित्तजा सेवा स्वार्जितद्रव्यस्स शास्त्रोक्त- विभागं कृत्वा विमागागतभगवद्रव्येण तादृशप्रभूपयोगिवस्तुसम्पादनजा गौणी वितजा सेवा । अत्राप्याचा शुद्धयुष्टिमार्गीवाणाम्, द्वितीया मर्यादापुष्टिमार्गीयाणां ज्ञेया। स्यादेतत्। 'सर्वस्व वशी सर्वस्खेशान' इति श्रुत्या भगवत ईदृशत्वेन जीवानां सहज- दासत्वेन दाम्येन सेवा कर्तुं शक्या । सख्यात्मसमर्पणयोस्तु भगवदगीकारसाय- त्वात् सख्यात्मसमर्पणाभ्यां निःशकतया जीवेन सयं सेवा कर्तुमशक्येति चेत् । अत्र पदामः । स नो वन्धुर्जनिता संविधातेति 'पर्ति विश्वस्यात्मेश्वरं शाश्वतं शिपमन्यु तमिति तैत्तरीयोपनिषच्छुतिभ्याम् ‘भर्ता संम्रियमाणो विमति' 'एको देवो बहुधा निविष्ट' इति श्रुतिभ्यां 'द्वा सुपर्णा सयुजा सखाये' ति मुण्डकोपनिषच्छुत्या च 'पिताहमस जगतो माता धाता पितामहः । गतिर्भः प्रभुः साक्षी निवासः शरणं सुहृत्। उपद्रष्टयनुमन्ता च भर्ता भोक्ता महेश्वर' इत्यादिभगवद्गीतावाक्येभ्यः । येषामहं प्रिय आत्मा सुतब सखा गुरुः सुहृदो दैवमिष्टमिति तृतीयस्कन्धीयवास्येन । 'सुहृत्प्रेष्ठतमो नाथ आत्मा चायं शरीरिणाम् । तं विक्रीयात्मनैवाहं रेमेऽनेन यया रमा । सन्तं समीपे रमणं रतिप्रदं वित- प्रदं नित्यमिमं विहाये'त्याघेकादशस्कन्धीयपिङ्गलावाक्यैश्च । 'मां भजन्ति गुणाः सर्वे निर्गुणं निरपेक्षकम् । सुहृदं प्रियमात्मानं साम्यासहादयो गुणाः' इत्यादि तत्रसमगव द्वाक्यैश्च सर्वविघबन्धुत्वसखित्वपतित्वप्रभुत्वभर्तृत्वदेवत्वमातृत्वपितृत्वपितामहत्वधातृत्व- विपातृत्वगतित्वसाक्षित्वनिवासलशरणत्वसुहत्त्वोपदेतृत्वानुमन्तृत्वमोक्तृत्वमियत्वात्मत्व- सुतत्वगुरुत्वेष्टत्वप्रेष्ठतमत्वरमणत्ववित्तरतिदातृत्वादिधर्मा भगवति प्रतिपाद्यन्ते। ते च धर्मा भगवद्धर्मत्वात् नित्साः । नित्यधर्मवत्वं च तदैव पटते, यदि तप्रतियोगिनो धर्माः सर्ववि- धवन्धुत्वसखित्वदासत्वसेवकत्वपोष्यत्वाराधकत्वपुत्रत्वपौत्रादिकत्वायत्तविधेयत्वप्राप्तियो- ग्यत्वद्वितीयत्ववास्तव्यत्वदीनत्वसुहृत्वोपदेश्यत्वमन्तृत्लमोग्यत्वासक्तत्वपितृत्वशिष्यत्वेष्ट- स्वपरमासक्तत्वरत्याकाशितत्वार्थित्वरत्याविष्टादयो जीवेषु नित्या भवन्ति । एवं प पूर्वोकनित्यसिद्धधमीणां भगवति सत्त्वामीवेप्यते धर्मा निसा निरुद्धा इति भगवति सखित्वमोक्तृत्वयोः सत्ताजीवेष्वपि सखित्वमोग्यत्वयोरपि सत्यातयोध नामनिवेदनाम्यामाविर्भावितत्वाद्भगवदगीकारस्यापि सत्त्वानिःशकतया सख्यात्मसर्पणसे- वासिद्धिरिति घुप्पस । तथा च यतः सर्वविधोपि सम्बन्पो जीयानां भगवता सह वर्तते, अतएव 'ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव मजाम्पइमिति मगवता गीतायां येन केनापि प्रकारेण प्रपन्नस्यापि फलदानमुक्तम् । न चैवं भगवत्तो जीवैः सह सर्वविधै सम्पन्धे सति मगान् स्त्री अहं पुरुष इति मावेनापि मजनं प्रसज्येतेति पाप्यम् । 'पतिपुत्रमुहद्धातृपुः प्रयन्मित्रवरिम् । ये मजन्ति सदोयुक्तास्तेम्योपीह नमोनमः । नारी वा पुरुषो . श्रीजयगोपालभट्टकृतटीकासमेता । वापि भर्तमावेन केशवम् । हृदि कृत्वा गति यान्ति श्रुतीनां नात्र संशयः । येषामहं प्रियतम आरमा सुतश्च सखा गुरुः सुहृदो दैवमिष्टम् । पिताहमस्य जगतो घाता माता पितामहः । गतिर्भर्ता प्रभुः साक्षी निवासः शरणं सुहृत् । उपद्रष्टानुमन्ता च भर्ता मोक्ता महेश्वर' इत्यादि नारायणव्यूहस्तवीयवृहद्वामनपुराणीयश्रीभागवतीयश्री- मगवद्गीतादिस्सवचननिचयेषु त्वदुन्नीतभावेन भजनस्सानुक्तत्वात् । यावद्वचनं हि वाचनि- कमिति न्यायात् । एतादृशभाववद्भक्तस्याश्रुतत्वाच । एवं सति स्वयमेवैताशमावेन भजने 'योऽन्यथा सन्तमात्मानमन्यथा प्रतिपद्यते । किं तेन न कृतं पापं चौरेणा- सापहारिणे ति वचनेन दोष आपयते । एवं च यथा मामिति लोकसापि येजीवाः शास्त्रोक्तभजनप्रकारेषु 'यथा येन प्रकारेण प्रपद्यन्ते तांस्तेनैव उक्तप्रकारानुकू- ठप्रकारेणाई मजामी'सर्थो योध्यः । न तु येनकेनचित्प्रकारेणेति । किश्च । श्रीमागव- तेपि 'कोटिकन्दर्पलावण्यः साक्षान्मन्मयमन्मयः पुरुषोत्तम' इसेव नामोक्तं प्रमुखरूपेण, न तु कोटिरतिलावण्यः रुयुत्तम इसादि । तथा च तारामताइक्वरूपयोः अवणे दर्शने घ सर्वेषां खस्मिन् स्त्रीभावोदय एव भवति, न तु खस्मिन्पुरुषभावोदय इति । अत एवोक्तं श्रीमदस्मत्प्रभुमिः त्रिभङ्गललितस्तवे 'एतस्य दर्शने तु सालमदामाव एव ही'ति । अत्र दर्शनपदं श्रवणादीनामप्युपलक्षकम् । इयदवधि एतच्छ्रोतॄणामपि साक्षात्कवृणामिव प्रमदाभावोदयस्यैव दृश्यमानलात् । यद्वा । दर्शनपदं चाक्षुपादिज्ञान- मानपरं योध्यम् । यदि च भगवता सचिदानन्दरूपात्युत्तमसीरूपेणाविर्भूय कस्यापि पुरुषमाव उत्पादितः सात् तदा रुयुत्तम इति कोटिरतिलावण्य इति नामापि युकं खात् । मोदिनीरूपं तु 'इत्युपामवितो दैत्यैर्मायायोपिदपुर्हरि' रिति । 'यन्मे नीरूपया खैर मोहितोस मायये त्यादिश्रीभागवतीयवाक्यैर्भगवन्मायारूप एव, न तु सचिदानन्द- रूपम् । आवेशमानं तु भगवत इत्यवतारमध्ये गणना । जीवानां नारदादीनामिव । न वा तपमपि केनचिरस्खस्मिन्पुरुषभावेन मोहिन्यां च सीमा रेनोपासितमिति । तस्मान्छिष्टा. चाराभावादप्यरगदुक्तमेव साधु । यत्पुनः स वै न रेमे, तरमादेकाकी न रमते, सद्विती- यमैच्छत् , स ह एतायानास । स पतिः पनी चामप्रतामिति भुगी यत्पनीरूपं भगवतः श्रूयते, तातु सपनीलेनैन प्रकटितमिति तस प्रभुनीरूपत्वेन मजनं विमेव । पूर्वोक्त- विरुद्धभावेन भजनं तु मजनगातप्रकारेषु शाखेनुक्कनिति न कर्तव्यमेर । अन्यथा देपमपा- दिविरुद्धभागेन फलदनेनापपुक्त सात् । एवं जीवः सह गगवतः मर्गसम्पन्पसम्पन्धे निससिद्धे सिने भगतो पत्तम्पन्धपुरस्कारेण जीवेषु रिमास सम्पन्ध एवारिकद्वान्यमार. सम्पन्धारिमविविशिष्ट आविर्भमति, न तु विरुदसम्मापारिमारविषिः, साक्षालोग्यसम- म्पन्पे भर्तृत्वादिसम्यन्य इवेतिकृतप्रस कानुनमकरिपोरेगा मद सेपम् । हास. पाति सेवा प्रेमा फिपमागतरूपा । केरठ शुद्धपुटिनागापापारमरोपमा मधि.
भक्तिवर्धिनी। दिना प्रेम कृता नित्यसिद्धमक्तिवृद्धयाविर्मावसाधनरूपा ज्ञेया । वघापि साधनत्वबुद्ध्या न कर्तव्या । साधनत्ववुझ्या करणे तु 'याशी भावना यस्य सिद्धिर्भवति ताशीति वाक्यात् 'ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यह'मिति स्वप्रतिज्ञातच प्रेमाधुसाय 'मच्या मामभिजानाति यावान्यचास्मि तत्त्वतः । ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तर मिति पुरुषोत्तमज्ञानमुत्साय खप्रवेशरूपमुक्तिरूपफलमेव मर्यादामक्तिमार्गीयं भगवान् दद्यात् । न तु सर्वदा साक्षात्वसम्बन्धरूपं शुद्धपुष्टिमार्गीयं फलम्, साधनबुद्ध्या कृतनवविषमक्तेः प्रेमोत्पादनद्वारा प्रवेशपर्यवसायित्वात् । फलरूपत्वयुक्ष्या करणे तु प्रेमासक्तिव्यसनान्यु- पाय स्वसेवामेव खप्रवेशरूपफलादप्युत्तमां दद्यात् । तस्मात् फलत्वबुद्धयैव शुद्धपुष्टिमार्गे सेवा कर्तव्येति । 'साटिसामीप्ये 'त्यादि सेवानुरक्तमनसामभवोपि फल्गुरित्यादिवाक्यैः सेवा- याः सर्वोत्तमफलत्वं प्रसिद्धमेव । इदमेव ज्ञापयितुं फलात्मकनामोक्तम् । वस्तुतस्त्वाचार्य- मार्गीयस्साचार्यपक्षपातेन प्रवेशरूप फल साधनयुझ्या करणेपि न भविष्यति, तथापि भग- वत एतस्मिन्विषये सङ्कोचो मविष्यतीति फलात्मकनामोक्क्या फलत्वबुद्धथैव सेवा कर्तव्ये- त्युपदिष्टं श्रीमदाचार्यचरणैरिति योध्यमिति दिक् । ननु भगवानेकदैव प्रेमादिवक्ष्यमा• णावस्थाविवि कुतो न करोति, वा क्रमेण करोतीति चेत् । क्रमेणाविर्भावे रसाधिक्यानु- गवसानुमवसिद्धत्वाद्रसाधिक्यानुभवार्थमेवेति गृहाणेति सर्व निष्प्रत्यूहम् । प्रकृतमनुसरामः। ननु'सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं बज । अहं त्वां सर्वपापेम्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः'। 'तावत् कर्माणि कुर्वीत न निर्विघेत यावता । मत्कयाश्रवणादौ या श्रद्धा यावर जायते । तस्मात्वमुद्धवोत्सृज्य नोदनां प्रतिनोदनाम् प्रवृत्रिं च निवृत्तिं च श्रोतव्य श्रुत- मेव च' 'याहि सर्वात्ममावेन मया स्या ह्यकुतोभय' इत्यादिश्रीगीताश्रीभागवत्तीयमगव- द्वाक्येभ्यो लौकिकवैदिकत्यागपूर्वककेवलदासभावेन चेमजेत्तदा कयं भनेदिसाकाहायां सार्धचोकेनाहुः व्यावृत्तीपीति । व्यावृत्तोपि हरी चित्तं श्रवणादी न्यसेत्सदा । ततः प्रेम तथासक्तिर्व्यसनं च यदा भवेत् ।। ३ ।। बीजं तदुच्यते शास्त्रे उदं यन्नापि नश्यति । पूर्वोक्तमगवद्वचनरलेन पुत्रकलयाघौदासीन्यं पहिर्मुखजनितनिन्दा चाविगणय्य लौकिकवैदिकगृहस्थधर्मतो व्यावृत्तोपि निवृत्तोषि उदासीने स्वयं कुर्या'दिति सिद्धान्ताव- यमेव दासधर्मत्वाचयाक्ति सेवा विधाय सदा हरी सकलदुराहतरि चित्तं न्यसेत् । तत्स्मरणं कुर्यात् , अय च श्रवणादौ श्रवणकीर्तनयोरपि चित्तं न्यसेत् स्थापयेत् । न लेते- म्योपि निवृत्चो मवेदिति भावः । अत्र चित्तपदं देहलीदीपन्यायेनोमयत्र सम्बध्यते । यदा हराविति विपये सप्तमी। हरिविषयक चिच अपणादौ प्रयणकीर्वनस्सरणेषु न्यसेत् । यद्वा ।
श्रीजयगोपालमहशतटीकासमेता । इराविति निमिते ससमीचमणि दीपिनं हन्तीत्यत्रेव । तया च हरिनिमिर श्रवणादौ श्रवण- कीर्तनेषु चितं न्यसेत् । अत्रेदं ज्ञेयम् । पूर्वलोके श्रवणादिभिरित्यनामधानतृतीयायाख्यान- पक्षे तृतीयया अषणादीनां सेवासमयातिरिक्तसमये कर्तव्यलादप्राधान्यं यथायोधितं तथा तस्मिन् लोके अषणादीनां सदापदेन सर्वदा कर्तव्यत्वस्य घोधितत्वेन पूर्वश्लोकानुवर्तमाना- याः गृहे स्थित्वा सेवायाः किश्चित्समय एव कर्तव्यखस आगतत्वात् , अथ च पुत्रकलत्रा- दीनां खधर्मसागजनितीदासीन्येनासहायत्वात्पूर्णसेवानिर्वाहाभावाच स प्राधान्यं योभ्यत इति । अयं तु गौणपक्षःलौकिकवैदिकगृहसव्यावृत्ति विनानुत्मसेवकत्वसंपालया()दिति योध्यम्। अस्मिन्पक्षे पूर्णफलप्राप्तिस्तु गुणश्रवणादिसन्तुष्टान्तरङ्गभक्तकृपया ज्ञेया। यत्र यतेत । यतेत् इति पाठस्तु लेखकप्रमादमूलक एवा न चाध्याहारः। चितपदोतरं विधायेति किया- पान के""नप्याद्वारेणार्थकरणे चित्तपदस वैयापाताधेति सुपीमिरेवाकलनीयम् । एतत्सा- उस व्याख्यानं यथा श्रीमदस्मद्गुरुमियाख्यातं तथैव व्याख्यानं मन्मतेपि योध्यम् । अस्मिन् पक्षेऽनुदात्त्वक्षणमात्मनेपदमनित्यं चक्षिडो ठित्करणानापकादिति यतेदित्यत्र परस्मै- पदं साधनीयम् । नन्वेवं भक्तिवृद्धिसाधने क्रियमाणेपि भक्तिवृद्धिरेवैकपदेन सादश्या कि- चिन्मध्येत्यदपि स्यादित्याकाङ्क्षायामाहुः ततः प्रेमेति । तत इति पञ्चमी । ततस्तस्मादेतुभू- ताजनात् प्रेम । यस्य पूर्वावस्थामावस्तस्स मावस तत्रफलस्पाविर्भावातया तेन सप्रेमभज- नरूपप्रकारेण तस्यैव मावस्यासक्तिरूपावस्यात्रिर्मावात् भवेत् । च पुनर्व्यसनम् । 'दैदिकान् सकलान् मावान् निजां प्रीडां च दैहिकीम् । परित्यज्य हरिभातिदैव सातदैव तत्' इति श्रीमागवततत्त्वदीपीयभागवतरूपप्रकरणसदशमस्कन्धे सकलदैहिक मात्र देदिकलासाग- पूर्वकं हरिप्राप्ती सर्वमादिकमासस्य क्रियते तदेय तव्यसनमित्युकत्याचा व्यसनम् । भय प तदनन्तरमपि प्रासम्बन्याभावे प्रतिकायरूपं च व्यसनं यदा मवेदारिभवेत् । अत्र यदेति पदं व्यसनानिविस्य कालनियमामा ज्ञापयति । तया च यदा मगपदिन्छा- या व्यसनमाविभवेत् तदा पीजगुन्यत इत्यग्रिमसोकग सम्यन्धः । व्यसनपदासायनि- कार्यदुरापरत्वेन च व्याख्यानं तु 'व्यसनं समवोचतेति दशमस्कन्धमयमाध्यापमुसोधिन्यां श्रीगदाचायः कृतं तनवावलोकनीयम् । ननु तदा कि मवेदित्याकाहापामादुः पीज- मिति । तदा तावास्याविशेषरुपं प्पसनं शासे मक्तिशाने रदं पीजगित्युच्यते । पहर पीजमपि पुनः म नश्यति तिरोभावं न प्रामोतीत्यर्थः । एतेन प्रेमामरपोभगवदनाले गरे तदनुलले तत्यागेन तत्परसदीपैः सह सिलाप कदाचिदन्यल्यास तसने निरोमागे स्पेदपि पीनस । पसने जाडे तु सपामेर सागात् प्यासान्तोसते सम्मारनामार एदेति तस पीवत निरन्तर निष्ठिापयामिनि फल्याकत मिति धेयम् । ननु नेमाप्रतिव्यसनानां परमासाविशेषत्वेनानरपतरासायन्द्रिपालमत्तात् पर- उहिलयसि भचिवर्षिनी। निष्ठस मनसा ज्ञातुमशस्यत्वात् केन लिनेदं प्रेमेयमासक्तिरिदं व्यसनमिति ज्ञायतामित्या- शंक्य ततत्कार्यमेव ततलिमिति सार्पठोकेनाहुः स्नेहाद्रागविनाशः स्यादित्यादि । लेहावागविनाशः स्यादासक्त्या स्याहारुचिः ॥ ४ ॥ गृहस्थानां पापकत्वमनात्मत्वं च भासते। यदा स्यायसनं कृष्णे कृतार्थः स्यात्तदैव हि ॥५॥ खेहादेतोः आसक्या स्याहारुचिरिति गृहारुचेरने वक्ष्यमाणत्वात् सेवोपयोगि- खगृहस्वपुत्रतादृशान्यव्यतिरिक्तेषु रागस्य, 'रागोऽनुरको मात्सर्ये क्लेशादौ लोहितादिषु । गान्धारादौ नृपे राग' इति विश्वात् प्रेम्णो मगवद्विषयकविशेषेण नाशः तिरोमावः स्यात् । खत्रीस्वपुत्रतदन्येपु सेवोपयोगिषु तु तिष्ठत्येव । अत्र माशे विशेषकथनात्प्रेमाविर्भावात्प. कृतमजने इतरत्र कदाचिद्रागो भवति । प्रेमावि वोचरं तु न मवसेवेति ज्ञेयम् । तथा च मगवत्सम्बन्ध्यतिरिक्त तु रागामावः प्रेमलिङ्गमिति ज्ञेयम् । अथ गृहारुचिः । खगृहेपि स्वगृहस्थपुत्रादिपदार्थेषु सर्वेष्वप्यरुचिः तत्सम्बन्धानिन्छा सात् । तेषां माव- दनुफूलत्वात्सेवोपयोगित्येपि प्रेमासक्त्यभावात्सेवासमयातिरिकसमये गृहन्यासङ्गजनक- खात् । यदि गृहव्यासङ्गं न जनयेसुस्तदा त्वरुचिर्न मवत्सेवेति भावः । तथा च खगृह- स्थानां गृहव्यासहजनकत्व एव गृहारुचिरासक्तिलिङ्गम् । तेषां राहव्यासहजनकत्वे तु पूर्वदशाग्यधिकसेवाश्रवणादिरुचिरेवासक्तिलिङ्गं ज्ञेयम् । अथ प्यासजलिङ्गमाहुः गृहस्थानामिति । अत्र प्रेमासके सेवानुकूला सगृहस्थाः पुत्रमार्यादयो यदि लौकिक- व्यासङ्गं न जनयेयुस्वदाप्राप्तासक्तिना खगृहस्य भगवति निवेदितत्वेन हरिस्थानत्वात्स- गृहस्थानां सर्वदा भगवत्सेवाकथानिष्ठत्वेन तत्परं भगवदीयत्वात् लौकिकव्यासगाजनकत्वेन स्वप्रतिबन्धकत्वाभावाच्च स्वगृहस्थितौ वाधकलाभावात्खगृहमध्य एवारसत्रभुवदृढवीजसि- धर्य स्पेयम् । यदि तु ताशवगृहस्सा लौकिकव्यासङ्गं जनयेयुस्तदा तेषां वाधकत्वा- रस्वगृहं त्यक्त्वा तत्परमगवदीयैः सह दृढवीजसिद्धयर्थ सेवाकयाश्रवणादिविषयकयनं कुर्वतान्यहरिस्थाने स्थेयमिति पक्षद्वयम् । तत्र यस्मिन् पक्षे त्यासव्युत्पत्त्यनन्तरं माधका- भावात्स्वगृहस्थितस्यैव व्यसनं जातं, तस्मिन्पक्षे स्वगृहसानां तत्परमगवदीयत्वाचैर्गुण- गाने क्रियमाणे तन्वणेन प्रायव्यसनस स्वास्थ्ये जाते तापक्लेशाभावाद्भगवत्प्रादुर्मा- पातापल्लेशजनितपूर्वभगवत्राकव्यस्यापि गतत्वाधान्तःप्रकटभगवत्सम्पन्धानन्दविघातक- त्वादेते मम भगवत्सम्बन्धानन्दविशेषविघातका इति स्वगृहस्थेषु तादृशान्यगृहस्थेषु च पापकस्वमानं भवति । द्वितीयपक्षे वासन्युत्पत्त्यनन्तर स्वगृहस्थास्तु त्यक्ता एव लौकि- कव्यासाजनकत्वात् , स्थितं घ हरियाने तत्परमगवदीयैः सह, नेपामपि भगवद्गुणगानपर- त्वात् , पूर्वोक्तप्रकारेण प्राप्तव्यसनस्स तेष्वपि बाधकत्वमानं भवति, अत्तो गृहस्थानामिति भीजयगोपालभट्टकृत टीकासनेता । पदं सर्वगृहस्थपरम् । न तु स्वगृहस्समात्रपरमिति बोध्यम् । तया च गृहे तिष्ठन्ति ते गृहस्थास्तेषां बाधकत्वं तत्सम्बन्धिविरहानुभवान्तर्गतभगवदनुभवबाधकत्वं पूर्वोक्तप्र- कारेण प्राप्तव्यसनस्य भासते स्फुरतीत्यर्थः । न च स्वगृहरूपहरिस्थानस्सान्यहरिस्थानस्थ- गृहसानां भगवदीयलेन भगवद्गुणगाने क्रियमाणे प्राप्तव्यसनस स्वास्थ्ये जाते तापक्लेशा- मावाद्भगवदाविर्भावाभावे पूर्वसनातभगवत्राकट्यतिरोभावे भवद्भिर्भगवद्गुणा न गेया इति प्राप्तव्यसनेनोक्ते यस्माद्भजनप्रतिबन्धक इति प्राप्तव्यसनसम्बन्धियापकत्वं मासते । स्फुर- तीति घार्यः । इदमर्थद्वयमप्यत्राभिप्रेतं श्रीमदाचार्याणाम् , परस्य न बाधकज्ञानेन दृढ- तरपरित्यागाय गृहस्थपदं भगवदीयानां ब्रह्मचारिवानप्रस्थसंन्यासिनामप्युपलक्षकम् । एतरकृ- तगुणगानश्रवणजखास्थ्यजनितभगवदाविर्भावाभावपूर्वक प्रकटभगवत्तिरोभावाम्यां पूर्वव्या- ख्याने माचर्यादिसम्बन्धियापकत्वमानं प्राप्तव्यसनस्य, द्वितीयव्याख्याने प्राप्तसम्पन्धिवा- धकत्वमानं ब्रह्मचर्यादीनामपि जायत इति मगवदीयनचर्यादयोपि सनायाएवेति । अतएव राचार्यकृतव्यसनोत्तरपरित्यागे खपरगृहस्थाचारम्य अन्नजलादिपर्यन्तमपि त्यागो दृष्टः। अत एव विरहानुभवार्थस्त्यागः परितस्त्यागरूप इति संन्यासनिर्णये परित्यागशन्देनैवोक्तः । बत एव तादृशयापकत्वज्ञानोत्तरमेव 'विरहानुभवार्य तु परित्यागः प्रशस्सत' इति संन्या- सनिर्णयोक्तः परित्यागः स भविष्यति । यदि प्राप्तव्यसनस्य सर्वप्रकारकपूर्वोक्तभगवदीयगृ- हस्थादिपु भगवदीपगृहस्सादीनां प्राप्तव्यसने सर्वया पायकत्वमानं न भवेत्, तदा सर्व- परियागोपि दुःशकः कथं भवेदेवेति ज्ञेयम् । ननु पूर्वोक्तगृहस्थेयु प्राप्तव्यसनस प्राप्तव्य- सने च तेषां पाधकत्वज्ञानेपि प्रासव्यसनस भगवत्यासक्तौ जातायां भगवति ययात्मात्मीय- सं मा तथा भगवरसम्पन्धेन भगवदीयेप्वपि पूर्वोक्तेषु पूर्वोक्तभगवदीयानां च प्राप्तव्यसने मासत एव । एवं च परसरं दृढतरात्मवात्मीयत्वाध्यासस विद्यमानत्वात् महारोगाधुपह- तदेहादिषु यथा लौकिकालौकिकार्थवादकत्वज्ञानेपितढतराध्यासातत्यागः क न शक्यते, तया पूर्वोक्तसर्वमगरदीयत्यागोपि प्राप्तव्यसनेन प्राप्तन्यसनस च सागस्तैः कर्नु न शक्ष्यते इत्याशस्याहुः अनात्मत्वं च भासत इति । आत्मशन्दस देहात्मनोपरात् तेषु मातम्यसनस्स प्राप्तव्यसने च तेषामनात्मत्वमात्मात्मीयभिराले सहितकारित्वामार इति पावत् । तच्च भासते । यते मद्धितकारिणो भवेयुम्नदा ययानासकटीयामागीय इति गगवान् सदर्शनदानादिना हितं करोति, तथैतेपि फुयुः, मनु गगानादिनागम् ।वतो नैते ममामालीया इति प्राप्तम्पसनस पक्केिषु पपयमस्मद्धितकारी मातदारमान- निमन्धं न कुर्यात्, अतो नायमस्मदात्मात्मीय इति प्राधम्यगनतीकपदम्पादीनां प पापकलमानात् मुसेन परित्यागः सेम्पनीति भारः । तया परसारित पापलसान बनात्मकतनानं प परित्यागे कारनं योदयम् । ननु ता पाय- मनाललं प का मासत इत्यासांशपामाहुः यदा स्थानापसनं गणता पदार । ६२ भक्तिवर्धिनी । दाचिद्भगवदिच्छया कृष्णे कृष्णनिमित्त कृष्णविपये वा मागवततत्त्वदीपीयदशमस्कन्धोक्तव्य सनोत्तराप्रतिकार्य दु स तदा पूर्वोक्त भासत इति ज्ञेयम् । तदैवाप्रतिकार्यदु से जाते एव भ• क्त कृतार्थ. प्राप्तफल सात् । हि युक्तोयमर्थ । अप्रतिकार्यदु से जाते परमस्नेही भग- वान साक्षात्ससम्बन्धे कथ विलम्म कुर्यादिति जानीहि । अतावनेयम् । येषामलौकिक शरीर तेपा तु रासमण्डलमण्डनानामिन व्यसने जाते तेनैव देहेन फलप्राप्ति । येपा सन्त गतानामिव लौकिक शरीर तेपा तु व्यसनेन देहपात । तदनन्तर अलौकिकदेहप्राया फ- लग्राप्तिरिति दिक् । तथा च गृहस्थविषयक प्राप्तव्यसनस्य गृहस्थानावा प्राप्तव्यसनविषयकम भयो?भयविषयकल याधसज्ञान अनात्मकत्वज्ञान च व्यसनलिङ्ग ज्ञेयम् । एतेलिदै प्रेमासक्तिव्यसनानि ज्ञातव्यानीति भान । अथ जातव्यसनस्य गृहस्थपदार्थविपयनराधकत्वानात्मज्ञानयोरवश्यभाविलेन सन्यास- निर्णयोक्त परित्याग स्वयमे भविष्यतीति नोपदेशो योग्य ,अप्राप्त यसनस प्राप्तासक्तेभक्तस तु गृहारुचेर्जातवेषि तेपा भगवत्सेवोपयोगित्वेन भगवरसम्बन्धित्वात् त्यागो मत्सम्बन्धिन एतस्मै न रोचत इति भगान्मनस्सागते ममापराध स्यादिति भिया तत्याग न कुर्यात् , तदा नेपा पोष्यत्वादात्मपोपणार्थ सेनासमयातिरिक्तसमये व्यासद्गान्तरमुत्पाय एतरिति तत्याग उपदिश्यते । न च तेपा भगवदीयत्वात् तत्त्यागे अपराध प्रसज्यतेति वाच्यम् । एते लौकिके मा योजयन्तीति लोकिकधर्मपुरस्कारेण दोपारोपपूर्वकत्यागेपराधप्रसत्तेरभावात् । भगवदीया एते मया त्याज्या इति भगवत्सम्बन्धपुरस्कारेणैव तेषु दोपारोपेण त्यागापरा धप्रसक्तेरिति त्वत्पूर्वपक्षाभावादिति मनसिकृत्य प्राप्तासक्तेहत्यागमुपदिशन्त सुदृढसर्व- तोधिकपरममक्तिलाभ च सार्धक्षोकेनाहु तादशस्यापीति । तादृशस्यापि सततं गेहस्थानं विनाशकम् । त्यागं कृत्वा यतेद्यस्तु तदर्थार्थकमानसः ॥ ६ ॥ लभते सुदृढां भक्ति सर्वतोभ्यधिकां पराम् । सतत सर्वदा तादृशस्यापि प्राप्तासक्तित्वात् गृहासक्तियुक्तम्यापि आभासोक्तभगवद- पराधभिया गृहमत्यजतो गेहे स्थानमवस्थान विनाशक मध्ये मध्ये रोक्कियामङ्गननकत्वेन मगवद्भजनविषयकयत्ननाशकम्, अतस्तादृशाना मध्ये गृहादिमानत्याग कृत्वा य भाग्यवा खदार्थकमानस । स चासौ मगवानेवार्थों वस्तुरूपोर्थ प्रयोजन यस्पेश सन् यतेत्, भगवत्प्राप्त्यर्थ यत्न कुर्यात्, स सुदृढा मक्तिं लभते इत्युत्तरेणान्वय । नन्वस्मिन्पधेय त्यागो व्यसनोत्तरसामयिकसन्यासनिर्णयोत्तलागलेनैव कुनो नोच्यत इति चेत्। अब वदाम । अप्रतिकार्यदु सरूपन्यसनोत्तरत्यागम्य स्वयमेव जायमानत्वेन उपदेशानत्यम् । यि, यत्र व्यसनोत्तरत्यागे व्यसने जाते तत्प्रतिकारो मगवदतिरिक्तेन न कतुं शक्यत इत्येवोच्यते ।
1 श्रीजयगोपालभट्टकृतटीकासमेता । ६३ तदा 'यदा स्याद्व्यसनं कृष्ण' इत्यव्यवहितपूर्व व्यसनमुक्तमिति ईदृशसापि सततं गेहस्थानं विनाशकमित्यत्र प्रत्यक्षपदार्थवाचिइदमः प्रयोग एव कृतः स्यात् , न तु परोक्षपदार्थवाचि- तादृशस्यापीति तच्छब्दप्रयोग इति । अपरञ्च, 'व्यसनं यदा भवेत् वीजं तदुच्यते शास्त्रे दृढ़ यन्नापि नश्यती' त्यनेन व्यसने जाते भावात्मकवीजस्य नाशाभाव एवोक्तः। अत्र तु 'तार- शसापि सततं गेहस्थानं विनाशक'मिसनेन नाश उच्यते । तस्मादपि नायं त्यागशब्दः सं- न्यासनिर्णयोक्तत्यागपरः, किन्तु प्राप्तासक्तिमात्रस्यैव लौकिककार्यव्यासङ्गजनकत्वेन पुत्रकल- आदित्यागपर एवेति सुप्त प्रतिभाति । अत एवाने त्यागोत्तरं 'अतः स्थेयं हरिस्थाने तदीयैः सह तत्परै रिति तत्परतदीयसङ्ग उपदिष्टः । ययप्यतेपि तदीयास्तथापि तेषां खेन पोष्य- तासम्बन्धयुक्तत्वात् खपोपार्थ लौकिकव्यासङ्गजनकत्वाभाव इति तत्सहभावेन स्थितिरु- पदिश्यत इति । अत एव संन्यासनिर्णये 'विरहानुभवार्थं तु परित्यागः प्रशम्सत' इति विरहानुभवार्थत्यागे भगवदीयामगवदीयसकलसागवाचकः परित्यागशन्दः प्रयुक्तः, अत्र तु लौकिकव्यासहजनकपदार्थत्यागोऽलौकिकन्यासगजनकपदार्थत्यागधोक्त इति परित्याग- लामावादपि न संन्यासनिर्णयोक्तोयं त्याग उपदिष्ट इति भगवदीयैः सहृदयैः परिभावनी- यमिति दिक् । । नन्वेवं प्राप्तासक्तिहत्यागं कृत्वा हरिस्थाने स्थितस्तदीयसहतया चेत् भगाद्विपयक यत्नं कुर्यात् तदा को लाभः साद् इत्यकांक्षायामाहुः लभत इति । स भक्तः मुढा केनापि नाशयितुमशक्यां भक्तिं स्नेहरूपां व्यसनविशिष्टलेन सुद्धां चीनस्वरूपां लभते प्रामोतीत्यर्थः । नन्वेताशी भक्तिरन्यदेवविषयिण्यपि मवतीत्याशक्य आहुः सर्वतोभ्य- धिकाम विभूतिरूपभक्तिम्योप्यधिकां पुरुषोतमधिपयत्वादिति भावः । अथ च सर्व- विधमक्तिभ्यः परां चरमायधिभूतां पुरुषोत्तमसाक्षारसङ्गकारणभूतामिति यावत् । यद्वा । परां परमकाष्ठापनाम् । एतेनान्ये संप्रदायत्रयभक्तिमार्गास्तदुक्तभक्तिप्रकारास्तदुपास्यसरू- पाणि सदाचार्याध न परमकाष्ठापनाः । ते प्राप्नुपन्ति गामेवेति वास्यात् । तद्वत्सां- गतयोन्तत' इति वाक्याच शुद्धपुष्टिमार्गः, तदुत्ता भक्तिः, तदुपासम्परूपं, तदापार्याय परमकाष्ठापना इति ज्ञेयम् । तथा चैतन्मार्गतदुक्तमत्त्यैतन्मार्गापाम्पन्यरूप एतन्मागी- चार्यप्राप्ती सत्यां सर्व प्रासं किमपि नावशिष्यते प्राप्तव्यमित्येतेषां सपा फलरूपत्वम् । यतो येदरिमागाष्टादशपुराणमर्म नाविनासामहामारतादिकरपेनापि श्रीमनागपगातार- रूपाणां श्रीमतां व्यामचरणानां चितपमादेजाने नारदोपदेशेन प्रेमालाममाषा- पागुरते चितप्रमादे जाते तनानुभूतपूनपुरपोजमादिपदार्थविनगमाधिमाशीभाग- चतारणम्, भतो ज्ञायते भीमागपतो सरूपण, तयामिरा भतिः, तापापः, श्रीमगजमवादयः, तदनुगता विशुमायादिनीमाभापार्यान्ताम, नमादितो मति- मागतम परमाणपसत्ताालरूपमिति मारः।
६४
मकिवर्धिनी।
अयैताशसागका त्यागं कृत्वैकान्ते गन्तव्यमेवायवा किश्चिदन्यदपि कर्तन्य-
मित्याकांक्षायां गृहमात्रमेव सक्ता हरिस्थाने तदीयैः सह स्पेयमिति सार्पोकेनोप-
दिशन्ति त्यागे पाधकम्यस्त्वमिति ।
त्यागे बाधकभूयस्त्वं दुःसंसर्गात्तथान्नतः॥७॥
अतः स्येयं हरिस्थाने तदीयैः सह तत्परैः ।
अदूरे विप्रकर्षे वा यथा चित्तं न दुष्यति ॥८॥
त्यागे पापकानां भूयस्त्वं बाहुल्यं वर्तते । ननु करमाद्धेतो धकयाहुल्यमित्याकां-
शायाहुः दुःसंसर्गात्तथान्नत इति । देहायच्यासस्यानिवृत्तत्वाद्यत्र कुत्रापि स्थितौ सक्ने
प्रासे दुष्टसङ्गो बहिर्मुखसोपि भवति । तया देहपोषायं दुष्टान्नमक्षगं च प्रसजते । तदा
दुःसङ्गादुष्यन्नतश्च वाह्याभ्यन्तरदोषोत्पत्तेजनादिष्वालसे सम्मन्ने कृतोपि गृहत्यागो व्यर्पः
सात् । तर्हि तेन किं कर्तव्यमित्याकांक्षायामाहुः अतः स्यं हरे स्थाने तदीयैः
सह तत्परैरिति । अतः कारणाद्धरेः सर्वविधदोपहर्तुः स्थाने शुद्धपुष्टिस्याने वृन्दावनादौ
तत्पौः रात्रिंदिनं भगवत्सेवादिपरैः सह तदीयैः शुद्धपुष्टिमार्गीयदासधर्मवनिः सह
स्पेयम् । तथा च तत्सङ्गेन दुःसङ्गामावात्तत्समर्पितभगवत्प्रसादान्नमक्षणातद्दतखसमर्पिता-
अभक्षणाव बाबाम्यन्तरदोषामावाद्भजनसिद्धिनिष्प्रत्यूहा भपति । प्राप्सासक्तेरिति भावः ।
एतेनाप्ययं त्यागो न व्यसनोत्तरसामयिक संन्यासनिर्णयोक्तस्यागः । यतो व्यसनोचर-
सागे भगवदीयेप्वपि बाधकत्वज्ञानादनात्मत्त्वज्ञानाच सर्वत्यागादनादित्यागोपीतिक
दुःसंसर्गान्नादिजनितदोषप्राप्तिसंभावनापीति सुधीमिराकलनीयम् । अत एवं श्रीमदस्मदा-
चार्यचरणकृतव्यसनोत्तरत्यागेनशनकाशीगमनादिकमपि दृष्टम् । अन्यथा तेहरिस्थाने
प्रबादायक गत सात् । भगपदीयावादिकमपि गृहीतं सात् । न कृतमिति संन्यासनि-
प्रयोक्तस्त्सागो न साधनदशात्यागो येन हरिसाने गमनं सात, तदनमक्षणं च प्रसजेत,
किन्तु फलदशाजनितस्सागः फलजनित एव । अत एव संन्यासनिर्णये 'विरहानुभवार्य
तु परित्यागः प्रशसन' इति विरहानुभवार्थररित्यागस्य प्रशस्तत्वमेवादितम् । नतु 'विर-
हानुभवार्थ तु त्यागः कर्तव्य एक हीति तस्यावश्पकर्तव्यत्वमुक्तम् । जीवकृत्यसाध्यत्वात् ।
तस्मादस्मदुक्त एवाशक्तिदात्यागोपमिति ज्ञेयम् । ननु हरिसानस्यतत्परतदीयानामपि
सासक्तिसमानासमानासक्ते सत्ते तु दोपामावः सिध्यसेव, खसमानासत्तेरभावे तु नेपामपि
सेवाव्यतिरिक्तसमये कदाचिलौकिकव्यासगजनकने का गतिरित्याशंक्याहुः अदूरे
विप्रकर्षे घेति। यदि तेषां स्वसमानासमानासक्तिस्तदा तदत्तान्नमेकान्ते भक्षयित्वा नेपामरे
निकटे स्थेयम् । अदूरमिति पाठे अदूरं यया भवति तथा सेयम् । यदि पूर्वोक्तं न तदा
तेम्पः प्रामं भगवत्प्रसादान्नं तदत्तखसमर्षितान्नं च मक्षयित्वा विपकरें दूरे सेयम् । यया
येन प्रकारेण चितं न पयति तत्सर्थः ॥८॥
श्रीजयगोपालभट्टकृतटीकासमेता ।
नन्विदमत्यशक्यं, यतोस्मिन् कलिकाले हरियानानामपि दुष्टाकान्तत्वात् प्रतिष्ठा-
दिकामुकलेन तत्परभगवदीयानामपि दुर्लभवाय प्राप्तासक्तेः का मतिरित्याशक्याहुः
सेवापां वा कथायां वेति ।
सेवायां वा कथायां पा यस्यासक्तिढा भवेत् ।
यावली सस्य नाशो न कापीति मतिर्मम ।। ९ ।।
यस्य मक्तस्स पूर्वोक्तसेवायां कथायां कथाश्रवणकीर्तनयो; आसक्तिढा पद्धमूला
भवेत् , तस्य यावजीवं यावदेहस्थिति व्यसनं यदा कदापि भवतु, परंतु दुःसङ्ग-
दुष्टान्नमक्षणजनितो नाशे भगवत्सेवाकयाचासक्तिपच्युतत्वं कापि देशे वापि काले घ
कापि जन्मन्यपि च न भवतीति मे मम मतिर्बुद्धिरित्यर्थः । तथा च यदि भगवद्धर्मरूप-
सेवाकथासक्तस्यैव न नाशस्तदा साक्षारूिपमगवदासकस्स न नाश इत्यत्र किं
वक्तव्यमिति कैमुतिकन्यायः सूचितः । यद्वा । नाशः दुःसङ्गदुष्टान्नजनितदोषसम्बन्धरूपः
न कापि संभवतीत्यर्थः । तथा च दुष्टाकान्ते हरिस्थाने दुप्याक्रान्तहरिस्थानातिरिक्त
साने वा तिष्ठन् तत्परभगवदीयेभ्यस्तदितरजनेभ्यश्च भिक्षया जीवनमात्रसंपादकमन्नं
संपाय स्वयं पाकं कृत्वा प्रमले समयं मक्षपन् न दोपभाक् मक्तीति भावः ॥९॥
ननु यदि हरिसानातिरिक्त हरिसाने का दुष्पाकान्ते दुदैर्भजनवाधः, अथ च
तवानादेरप्यलाभेन वा मजनवाधः प्रसज्येत, तदा कि कर्तव्यमित्याकांक्षायामाहु:
पाघसंभावनायां त्विति ।
घाघसंभावनायां तु नैकान्ते वास इष्यते ।
हरिस्तु सर्वतो रक्षा करिष्यति न संशयः ॥१०॥
यदि रोवायाः कयाधरणादीनां वा बाधः संभाव्येन ज्ञायेत, तदा एकान्ले गृह
सत्वा स्त्रीयाज्ञाते स्थले वासो नेप्यते, किन्तु गृहे एव वास इष्यते । ननु तदा गृह-
स्थानां पुप्रकलनादीनां लौकिकव्यासद्वान्ताजनकत्वं सिद्धमेवेति दोपप्राक्तिरिति किं
कर्तव्यमित्याशक्याहुः हरिस्तु सर्वत इति । तु पुनः हरिः सर्वदुःखही सर्वतः सर्वेम्पो
दोपेभ्यः स्वयं रक्षा करिष्यति । गृहस्यपुत्रकलत्रादिजनितलौकिकम्यासद्वान्तरदोपो न
पापिष्यसेवेतिमाः । अत एव 'मद्वार्तायातयामानां न पन्धाय गृहा मता' इति
श्रीमागवते मगवतोक्तम् । ननु को वेद, हरिः प्रभुः करोति चेत्, तस किं कर्तव्यमित्या-
शंस्याहुः न संशय इति ।न सन्देह इत्सर्यः । यदि खोयरक्षा न कुर्यात्तदा हरित्वमेय
गन्छेदिति भावः ॥ १०॥
एवं भक्तिद्धिप्रकारमपाए ग्रन्योपसंहारमेतत्साठफलं चाहुः ।
इत्येवं भगवालं गूढतत्त्वं निरूपितम् ।
य एतत्समधीपीत सस्यापि स्थाद्दा रतिः॥ ११ ॥
६६ भक्तिवधिनी। इति ग्रन्थसमातौ । एवं अनेन प्रकारेण च भगवच्छास्त्रं उत्तापदलोपिसमासात् भगवयापकं शास्त्रं मगवत्यापकोपदेशमन्यः । मूढतत्त्वं गूढं गुतम् , इतरमागीयेग्यतत्त्व- सिद्धान्तो यस्य तादृशं निरूपितं कथितम् । मयेति शेपः । अत्रैतदुक्ताकारेण सेवायाः कयाश्रवणकीर्तनादीनां च कर्तुः प्रेमायाविर्भावो भवेदिति किमाचर्यम्, पत्रैतन्छासा- ध्ययनकर्तुरपि प्रेमायाभिवेदित्याहुः य एतदिति, योधिकारी कोपि एतत् समधी- पीत, सम्यक् श्रद्धापूर्वकमनुसन्धानपूर्वक वाध्ययनं कुर्यात् तस्यापि रढा केनापि तिरो- धापयितुमशक्या रति जरूपमावरूपा स्यादाविर्भवेत्, किं पुनरेतदुक्तप्रकारकमजन- कर्तुरिति दिछ। श्रीमद्वल्लभविठ्ठलभगवचरणाजरेणुकणकृपया । कृतवान् जयगोपालप्टीका श्रीमत्तिवर्धिन्याः ॥ १॥ मूर्यमलि ननु विधाय निधाय भूयो भूयः कृपालुपु महत्सु निवेदयामि । यत्किञ्चिदत्र मयका लिखितं भवद्भिस्तत्पुष्टिमार्गपथिकैः परिशोधनीयम् ॥२॥ इति श्रीमदल्लभाचार्यचरणकतानमानसश्रीमन्महाप्रभुश्रीरिकलेश्वरकपा- कटाक्षीदुद्धबुद्धिना श्रीमचिन्तामणिदीक्षितात्मजेन जयगो- पालेन विरचिता भक्तिवर्धिनी टीका ॥ श्रीगिरिधारी तनोतु मङ्गलानि । भक्तिवर्धिनी। दीक्षितलालूभट्टकृतविवृतिसमेता। नमामि श्रीमदाचार्यान् विट्ठलेगांव मप्रभून् । यकृपातो भवेप्राप्तिः (श्री)गोवर्धनगिरीशितुः ॥ १॥ अय श्रीवल्लभाचार्यचरणः पुष्टिभक्तानां निसलीलाप्रवेशाख्यखमार्गीयफलप्राप्यर्य तत्कारणमूतां पीजमावात्मिका तापात्मकसूक्ष्मनेहरूपां मक्ति वर्धयितुं तत्प्रकारनिरूपणं प्रतिजानते यथा भक्तिरित्यादिना । या माक्तिवृद्धा सातापायो मिसम्पाते। घीजभाये दृढे तु स्यात्यागावणकीर्तनात् ॥ १ ॥ यधा येन प्रकारेण भक्तिीजमावरूपा प्रकर्षेण वृद्धा सर्वात्ममावावस्थापना सात्त- थोपायः त्यागात्यागविभेदेन श्रवणादिरूपः पूजादिरूपथ निरूप्यते इत्यर्थः । इह दीक्षितलालभट्टकृतविवृतिसमेता । मक्तेर्वृद्धघुपायकथनप्रतिज्ञया भक्तिसत्ता सूचिता । अतो बीजरूपा पुष्टिभक्तिः पूर्व पुष्टि- जीवेषु सूक्ष्मरूपेण वर्तत एवेति बोध्यम् । अन्यथा यथा भक्तिरुत्पना स्यादिति प्रतिज्ञायेत। उत्पन्नाया एव वृद्ध्यादिमावाहत्वात् । अतः पूर्व पुष्टिमक्तेः सूक्ष्मरूपेण सत्ता ज्ञापिता । सैव पुष्टिभक्तिजिभावशब्देनोच्यते । इयमेतद्वन्धोदितप्रकारेण वृद्धा सती सर्वात्मभावा- वस्यां प्राप्य नित्यलीलाप्रवेशरूपं फलं सापयिष्यतीति सिद्धान्तनिष्कपः । धीजभावे इति । पीजरूपे मावे सूक्ष्मभक्त्यात्मके दृढे सति सात्, भक्तिः प्रवृद्धा सादित्यर्थः । चीजभावदाय कथं सादित्याकांक्षायामाहुः त्यागात् श्रवणकीर्तनादिति । गृहादि- यागपूर्वकं मगवत्कथाश्रवणाद्वीजदार्म भवतीत्यर्थः । गृहादेविषयासक्तिसम्पादकतया मजनप्रतिबन्धकत्वेन गृहादित्यागो भजने मुख्यमङ्गम् । 'हित्वात्मपातं गृहमन्धकूपं वनं गतो यद्धरिमाश्रयेत' इति प्रहादवाक्यात् । अत एव निवन्धे भगवदुक्तश्लोकयोरेवं रश्यते 'गृहं सर्वात्मना त्याज्य'मिति । एवं मुख्यतया पूर्व त्यागपक्षमुक्त्वा तारशजितेन्द्रियत्वादिगुणरहितस्य त्यागे दोषा- धिक्याद् वीजदाय प्रकारान्तरमाहुः बीजदार्यकारस्तु गृहे स्थित्वा स्वधर्मतः इत्यनेन । पीजदार्यप्रकारस्तु गृहे स्थित्वा खधर्मतः । अव्यावृत्तो भजेत्कृष्णं पूजया श्रवणादिभिः॥२॥ गृहे बीजदार्यप्रकारस्त्वित्यन्वयः । गृहे बीजदा प्रकारमाहुः स्थित्वा सूघ- मत इत्यादिना । गृहे इति सप्तम्यन्त देहलीदीपन्यायेनोगयत्र सम्बध्यते । स्वधर्मत इति । वेदोक्तवर्णाश्रमधर्मत इत्यर्थः । तया च विहितप्रकारेण गृहस्थाश्रमे स्थित्वा भक्ति- मार्गप्रकारेण कृष्णं भजेत् । यद्यपि 'अन्तस्त्रिलोक्यास्त्वपरो गृहमेघोऽवृहद्त' इति द्विती- पस्कन्धवाक्यात् गृहानमस फलप्रतिबन्धकत्वम् , तथापि मगवद्भजनं कुर्वाणस्य न गृह- साश्रमः प्रतिबन्धकः । 'गृहेष्याविशतां चापि पुंसां कुशलकर्मणाम् । मद्वार्तायातया- मानां न पन्धाय गृहा मताः' इति मगवद्वाक्यात् । अस्मिन्वाक्ये 'कुशलकर्मणा'मित्यनेन निषिद्धानां निवृत्तिः सूचिता । कुशलकर्मणामित्यस व्याख्यारूप स्वधर्मत इति पदमाचा- वरुक्तम् । अत एव भगवता द्वितीयोऽत्यागात्मापि पक्षः सफलो निरूपितः 'गृह सर्वात्मना त्याज्यं तचैत्यक्तुं न शक्यते । कृष्णार्य तत्प्रयुषीत कृष्णः संसारमोचकः ।' इति । अव्यावृत्त इति । तेषां नित्सामियुक्तानां योगक्षेम वहाम्यह'मिति वाक्याद्भगवान् गृहस्सानमनिर्वाहक धनादिपदार्य स्वत एव सम्पादयिष्यतीति विश्वासेन धनापर्जनामि- निवेशं त्यक्त्वा श्रीकृष्णं निरन्तर भजेदित्यर्थः । कथं मदित्याकांक्षायामाहुः पूजपा प्रवणादिभिरिति । पूजयेति । मन्दिरमार्जनादिरुपया परिचर्ययेत्यर्थः । श्रवणा- दिभिरिति । श्रीमद्भागवतोकदशविषलीलायुक्तस्य भगवतः अपमादिभिरित्यर्थः। तस्मा.
६८
भक्तिवर्धिनी।
भारत सर्वात्मा भगवान् हरिरीश्वरः । श्रोतव्यः कीर्तितव्यश्च स्मर्तव्यश्वेच्छतामय'मिति
शुकवाक्यात् । 'दशविधलीलायुक्तस्य श्रवणादि कार्यमिति सुबोधिन्यां निर्णीतत्वात् ।
दशविघलीलास्तु भागवते प्रतिपादिता इति भागवतं श्रवणादिविषयीकार्यमिति फठि-
तम् । एवं सति सेवां विधाय तदनवसरे भागवतश्रवणादि कार्यमिति विभागोवगन्तव्यः ।
एवं वर्तमानस गृहेपि संसारावेशाभावात् वीजदाम मवति । ततो भक्तिर्वषिष्यते
इति भावः । ननु यस्स भक्तिः सूक्ष्मावस्थारूपस चीजमावस सर्वात्मभावान्तावस्था
भवतीत्युक्तम् , कोसौ बीजमावः १ कदा कुत उत्पद्यते इति चेत् । शृणु ।
सृष्टवादौ 'ययानेः क्षुद्रा विस्फुलिङ्गा व्युञ्चरन्तीति श्रुतेरक्षाब्रह्मणः सकाशादुत्पन्नानां
चिदंशानां भगवदिन्छया तिरोहितानन्दत्वेन प्राप्तजीवभावानां मगवदिन्छयैवा-
विधासम्पन्धः । ततो देहाभ्यासादिस्वरूप विस्मरणान्तानि पञ्चपर्वाणि सम्पयन्ते ।
ततस्तेषु जीवेषु सदसद्वासनाभेदेन देवत्वमासुरत्वं विदधाति भगवान् । तत्र दैवजीवेषु
यान् पुष्टिमार्गीयान् कर्तुमिच्छति, तेषु स्वविषयका सूक्ष्मरूपां रति स्थापयति । सा
बीजभावशन्दवाच्या । रतिर्देवादिविषया भाव इत्यभिधीयत' इति वाक्यार कारणलेन
बीजत्वात् । सा रतिः प्रेमासक्तिव्यसनसात्मभावानां बीजरूपेति योजमावशब्देन
न्यवहियते । एवमत्यागपक्षे व्यावृत्तिराहिलेन मगवद्भजनं मुख्यः पक्षः ॥२॥
तदसम्मवे गौणं पक्षमाहुः व्यावृत्तोपीति ।
व्यावृत्तोपि हरी चित्तं श्रवणादौ न्यसेत्सदा ।
ततः प्रेम तथासक्तिर्व्यसनं च पदा भवेत् ॥ ३ ॥
वीज तदुच्यते शाग्ने ददं यन्नापि नश्यति ।
मगवत्सेवानवसरे व्यावृति कुर्वाणोपीत्यर्थः । श्रवणादाविति । 'श्रोतव्यः
कीर्तितव्यश्च'त्यत्र उक्ता ये अवणादयस्तै जेदित्यर्थः । व्यावृत्त्यपसरे पूषापा असंभपात्
श्रवणादिमानमत्रोक्तम् । अव्यावृत्तस तूमयं संगवतीति पूजया श्रवणादिभिरित्यनेनोमय-
मुत्तम् । ततः प्रेमेत्यादि । एवं भगवन्तं भजतः प्रेमासक्तिव्यसनानि क्रमेण भवन्ति ।
सूक्ष्ममक्ति/जभावरूपा पूजाश्रवणादिमिः प्रवृद्धा प्रेमासक्तिव्यसनावस्यां प्राप्नोतीत्यर्थः ।
पीजं तदुच्यत इति । व्यसनावस्थायां सिद्धायां बीजभावस दामं संपामिति योध्यम् ।
नापि नश्यतीति । न तिरोमवतीत्यर्थः । सत्प्रतियोगिनोऽमावस्य तिरोभावानतिरेकात् ।
अमावास्त्वस्मन्मते तिरोभावातिरिका न भवन्तीति सुपोधिन्यां निर्णतित्वात् ॥
लेहाद्रागपिनाशः स्वादासरत्या स्थाद्वहारुचिः ॥ ४ ॥
गृहस्थानां यायकत्वमनात्मत्वं च भासते।
पदा स्यादू व्यसनं कृष्णे कृतार्थः स्यात्तदैव हि ॥५॥
६९ दीक्षितलालूभकृतविकृतिसमेता । प्रेमावस्थायाः कार्यलक्षणमाहुः लेहाद्रागविनाशः स्यादिति । आसक्ते कार्यलक्षणमाहुः आसत्तया स्याहारुचिरिति । गृहपदं गृहसानामुपलक्षणम् । अरुचिरिति । नागारचिशब्देन रुच्यभावः । तस्य सहाद्रागविनाशः स्यादिसनेन पूर्व स्नेहकार्यत्वेनोक्तत्वात् । अतोत्रारुचिशब्देन रुचिविरुद्धो भावः । विरोधार्थे नत्रः स्मरणात् । 'तत्सादृश्यमभावश्च तदन्यत्वं तदल्पता । अप्राशस्त्यं विरोधश्य नत्रर्याः पद प्रकीर्तिता' इति वाक्यात् । स च बाधकत्वस्फूर्तिरूप इति खयमेव व्याचक्षते गृह- स्थानां बाधकत्वमिति । तया च भगवदितरविषयकवायकत्वस्फूर्तिसंपादको भाव भासक्तिरिति कार्यलक्षणमासके । आसक्तेलक्षणान्तरमाहुः अनात्मत्वं च भासत इति । देहस्येति शेपः । तया च देहात्ममावनिवर्तको भगवाव आसक्तिरिति लक्षणा- न्तरमासक्तेः । यदा स्याद्यसनमित्यादि । व्यसन मिति । विशेषेण अस्पते क्षिप्यते दूरीक्रियते अन्यसम्बन्धो येन तद्यसनं मगवत्यात्मभाव इति यावत् । एवं मगवत्यात्म- भावो निरुपाधिकलेहो व्यसनमिति फलितम् । अत एव 'श्रेष्ठो भवास्तगुमृतां किल वन्धु- रात्म'ति व्यसनभाववतीमिर्भगवत्सात्मत्वमभाणि । 'आत्मनस्तु कामाय सर्व प्रियं भवतीति श्रुतेरात्मसम्बन्धादेवान्यस प्रियत्वं लोके, एवं ब्रजसुन्दरीणां भगवत्सम्बन्धादेव खदेहादौ प्रीतिविषयत्वम् । अत एप 'त्वयि धृतासवस्त्वां विचिन्वत' इत्युक्तं तामिः । 'स्वदर्य प्राणधारण'मित्याशयो विवृतः श्रीमदाचार्यवर्यः । अतस्तादृशो निरुपधिमावो व्यसनश- ब्दार्थः । अत एतादृशे व्यसनात्मके मावे सिद्धे युक्तैव कृतार्यतेति पोषयितुं यदा स्या- व्यसनं कृष्णे कृतार्थः स्यात्तदैव हीति हिशब्द उक्तः । कृतार्थ इति । मग- वन्तं साक्षात्करोतीत्यर्थः । मगवन्मूर्ति परिचरतो जातव्यसनांख्यगावस्य भगवत्साक्षात्कारो भवेत् , तदानेकप्रकारकं भगवदासादिजन्यं सुखविशेषमनुमवेद, अतः कृतार्यता सिध्य- तीति पोयम् । एवं मगवदाविर्भावेन लीलावलोकनादिरूप मगवत्सम्बन्धिसंयोगसुसमनुभवतोपि भगवद्विरहजन्यविलक्षणसुतानुभवराहित्यार पूर्णफलप्राप्तिः, यतो द्वितीयदलानुमा सापनमाहुस्तादृशरपापीत्यारम्य त्यागं कृत्वा यतेवस्तु तदर्याकमानस इत्यन्तेन । तादृशस्यापि सनतं गेहस्यानं विनायकम् । त्यागं कृत्वा यतेषस्तु तदाकमानसः ॥६॥ तादशस्येति । प्राप्तव्यसनमावस्येत्यर्थः । गेहस्यानं विनाशकमिति । गेदे सिती हि मगवत्सेवया मगरदाविरेन संयोगानुमसमिती न रियोगानुमयो भवेत् , यतः फलपूर्णतायां गृहसिवेः प्रतिपन्धकवादिनाशकतोडा । बतो 'विरदानमा न परित्यागः प्रशसत' इति संन्यामनिर्णयप्रन्योन. सागमुपदिशनि ग्यागं त्या ७० भक्तिवर्धिनी। यतेदिति । यतोयं विलक्षणस्त्यागोत एव तदर्थाथै कमानस इति विशेषणमुक्तम् । स चासौ अर्थः तदर्थः 'पुरुषार्थरूपो भगवान्' तदर्थ तत्प्रयोजनकमेव मानसं यस्येति विग्रहः। पुष्टिमार्गे हि भगवानेव पुरुषार्थः । 'वं वै समस्तपुरुषार्थमयः फलामेति दशमस्कन्धे श्रीरुक्मिणीवाक्यात् । 'तावांस्तेहं चतुर्विध' इत्येकादश स्कन्धे श्रीमदुरुष प्रति भगवद्वाक्याच । तथा च भगवदर्यमयं त्यागो विरहे सर्वदा अन्तर्भगवत्स्फुरणार्यः । न तु 'गृहं सर्वात्मना साज्य'मित्यनेनोक्तोयं त्यागः । तत्र तु 'हित्वात्मपातं गृहमन्ध- कूप मिति वास्यासातहेतुत्वं गृहस्थितेः, अतो गृहत्याग उक्तः । स त्यागस्तु 'त्यागाम्व- णकीर्तना'दित्यनेन पूर्वमुक्तः । अयं त्यागस्तु 'गृहे सित्वा स्वधर्मत' इत्यत्रोक्तप्रकारेण वर्णाश्रमधर्मतः स्थितम्स पूजाभवणादिना व्यसनमावोत्सत्यनन्तरं विहितः । अतोस्मिन् त्यागे प्राप्तव्यसनभावोधिकारी । 'ताशसापि सतत'मित्यत्र ताशशब्देन 'यदा सायसने कृष्णे' इत्यनेन पूर्वमुक्तस्य व्यसनभाववतः परामर्शत् । अतोयं त्यागो सिरहानुभवार्य एवेति निर्धारः। एतादृक्त्यागकर्तुः फलमाहुः लभते सुदृढां भक्तिमिति । लभते सुद्धा भक्ति सर्वतोप्यधिकां पराम् । त्यागे पाधकभूपस्त्वं दुःसंसर्गात्तथामतः ॥७॥ सर्वतोप्पधिकामिति । सर्वतः प्रेमासक्तिष्यसनतोधिकामित्यर्थः। परां सर्वात्मभावरूपामित्यर्थः । वियोगे हि सर्वात्मभावो भवतीति तृतीयाप्यायमाप्पे निरूपितम् । तदवापि ध्यसनमावोसत्यनन्तरं फुलत्यागस भगवद्विरहानुमक्लेशजन्य- भगवत्सम्यन्धा] सर्वत्र भगवानेव स्फुरतीति सर्वात्ममावमिद्धौ न किचित् कर्तव्यम- पशिष्यत इनि योध्यम् । एवं गृहस्थितिपक्षे मक्ति पापं निरूप्य 'त्यागावण- कीर्तनादिति पूर्वमुपदिष्टे त्यागे थाधकामावं साधयितुं पाधकस्वरूपनिरुपण त्याग- प्रकारमाहुः त्यागे इति । स्पागे यापकम्पस्वमित्यादिना कामादिपदकजन्यानां पापकानां भूयस्त्वमित्यर्थः । दुःसंसर्गादिनि । 'प्रमहमजरं पाशमात्मनः कवयो विदुरिति वाक्यात् । जीवे हि कामादिदोषाः सदैव निष्ठन्ति । 'मयं प्रमवस बनेप्यपि सापतः स आम्ते सह पदसपन' इति कास्यात् । तथा च दुस्समदुरमाम्यां तस कामादिपदकसोदोघे तमन्यानां यापकानां पाहुल्यं स्मादित्यर्थः ॥ १ ॥ अत-परं बाधकहेतुकामादयो येन निवर्तन्ते ते उपायमाहुः अतः स्पमिति । अतः म्येयं हरिम्याने तदीयैः सह तत्परैः। अहरे विप्रकर्षे या यथा पित्तं न दुप्पति ॥ ८॥ हरिस्पाने गोवर्धनादौ, नत्रापि तदीयैः तत्सरैः मह म्यम् । 'म एव साभुपु तो मोक्षद्वारमपावृत'मिति याश्यात् । एवं गृहन्थिनिगृहत्यागपक्षी सप्रकार निरूप बन्दतर- दीक्षितलालमतवितिसमेना । साधनावस्थापनस्य पक्षद्वये अनुगतं मुख्यसाधनमाहुः अरे विपकप देति । भगवत इति शेषः । गृहस्थितिपक्षे श्रीविग्रहस्य अरे निकटे, सागपक्षे श्रीमतेविप्रकय दूरे स्थितायपि चिनदोपो यथा न भवेत्तथा स्पेयमित्युपदेशः । 'चेतः सत्वस्य बन्धाय मुक्ताये चात्मनो मतम् । गुणेषु सक्तं बन्धाय रतं या पुमि मुक्तये' इति तृतीयस्कन्धे कपिलवा- क्यात्, 'मन एव मनुष्याणां कारणं पन्धमोक्षयो रिति वास्यान्तराच चित्तस्यैव सर्वन मुख्या कारणतेति तस्मिन्दोपोसत्तौ सर्वनाश इति चित्तस निर्दोषतायै दुःसगवर्जनपूर्वक सत्सङ्गादि सम्पाय सावधानतया सेयमिति भावः ॥ ८॥ कथं चित्तं निर्दुएं सादित्याकांक्षायां पूर्वोत्तमुपायं सारयन्ति सेवायां या कथायां वेति । सेवायां वा कथायां वा यस्यासकिदा भवेत् । यावजीवं तस्य नाशो न कापीति मतिर्मम ॥१॥ गृहस्थितिपक्षे सेवायाम् , त्यागपक्षे कथायाम् , यस्यासक्तिभक्तिईटा भवेत् , लस यावनीवं कापि दुर्देशे ढुएकालेपि नाशो बुद्धिमंशरूपो न भवेत् । अन्यथा चित्तदोपे विषयध्यानात् 'पायतो विपयान पुंसः' इत्यारभ्य 'युद्धिनाशात्प्रणश्यती'त्यन्तेन निरूपितो नाशः स्यादिति भावः ॥९॥ ननु कृतसागस्य भगवदीयसनादप्येकान्ते स्थितिरेप समीचीना, भजनप्रतिबन्ध- दुःसहसंभावनाया अप्यभावादित्याकांक्षायामाहुः याधसंभावनायां त्विति । घाघसंभावनायां तु नैकान्ते वास इष्यते। हरिस्तु सर्वतो रक्षा करिप्पति न संशयः ॥१०॥ यद्यप्येकान्ते दुःसहादिदोषो नास्ति, तथापि व्याधादिभयरूपाधसंभावना यवास्ति, तत्र वासो न यते, न इष्टप्रापको, मनसश्चातत्यापादकत्वेन भगवद्भजनप्रति- पन्धकत्वादित्यर्थः । ननु सर्वरक्षको भगवान् व्याघ्रादिभ्यो भत्तान् कथं न रक्षतीत्याका. शायामाहुः हरिस्त्विति । 'रुद्धा गुहा किमजितोश्वति नोपसमा मिति वाक्यात् सर्वथैव भगवान् रक्षति, तथापि ताविश्वासाभावेन मनव्यायल्यं स्यादेव, ततो भजने प्रतिवन्धो स्वेत् । अतस्त्यागपक्षे हरिस्थाने श्रीगोवर्धनादौ भगवदीयैः सह स्थितिरेव श्रेयस्कारिणी । 'संसारैस्मिन्क्षणार्धामि सत्सलः शेवधिणा मिति भागवतवास्यादिति भावः । अपि च एकान्ते सितौ हि रक्षणार्थ भगवति भारो देवः । स च सेहविरुद्धः । हरिस्थाने मगव- दीयैः सह मझे तु सोषि दोपो नास्तीति सागपक्षे भगवत्स्थाने भगवदीयैः सह स्थित्वा गवद्भजन कार्यम् । तेन च नेमासक्तिव्यसनानि भवन्ति । ततो भगादाविर्भारः। ततो विवृतिसमेता। रहा सती वृद्धिमवाय 'भगवता सह संलाप' इत्याधुत्तरोत्तरसंकल्पैनिद्रान्छेदायनुभावयन्ती मानसी फलरूपा सात् तयोपायो निरूप्यत इत्यर्थः । तत्राधिकारी द्विविधः, अदृढचीजमावो दृढबीजभावश्च । द्वैविध्ये बीजं मक्तिहंसे निरूपितम् । 'वरणे चास्ति प्रकारद्वयम्, मर्यादापुष्टिभेदेनेति । तत्र प्रथम द्वितीयस कर्तव्यमाहुः बीजेति । रतिर्देवादिविषयिणी भाव इत्यभिधीयत' इति पीजभूतो यो भगवद्विपयको रत्यात्मको भाषः स्थायिभाव इति यावत् । तेनैव पुष्टिमार्गीयलं तेषा- मुच्यत इति । भगवदनुग्रहादेव तत्सत्त्वादिति यथा तथा पुष्टिप्रवाहमर्यादायां द्रष्टव्यम् । अत एव 'तद्वननिय आश्रुत्येतत्र टिप्पण्यामुक्तं 'एतेन श्रुतं सर्वैः स्थायिभावोवा- स्तीत्यत्रैव तदुद्दीपनमिति शा निरस्ते'ति । स भगवदिच्छया अनुग्रहप्रायल्येन दुःसहा. धनमिभूतोऽत एव ढो वक्ष्यमाणखरूपो यस्यास्ति तस्य तु बाधकगृहादिसर्वत्यागा- च्वणकीर्तनाच भक्तिः पूर्वोक्ता प्रवृद्धा फलरूपा स्यात् , तस्स नान्यत् कर्तव्यमस्तीति भावः । श्रवणसान्यसापेक्षत्वात् कीर्तनसापि तत्सापकत्वज्ञापनाय समस्तं पदमेकवचनं च । अत एवोपसंहारे एतद्ग्रन्थपाठमावस्यापि दृढरतिप्रतिपादकत्वं वक्ष्यते । अथवा । समा- हारद्वन्दुः । तेन समुच्चयस्यैव हेतुत्वमिति समास एकत्वं च । बीजभावे दृढ इति सति- सप्तमी । तुशब्द इतरल्यावर्तकः ॥१॥ प्रथमस साधनान्तरमाहुः। पीजदार्यमकारस्तु गृहे स्थित्वा स्वधर्मतः । अव्यावृत्तो भजेत्कृष्णं पूजया श्रवणादिभिः ॥२॥ अनुफूले रहे स्थित्वा स्वधर्मतः, 'सार्वविभक्तिकस्तसिल', दासधर्मेण ममायमेव धर्मः, एतदकरणे सर्वखहानिरेवेति खतन्त्रपुरुपार्थबुद्ध्या इतरव्यावृत्तिरहितः कृष्णं सदानन्द सेवेत । पूजपा भक्त्या । तदभावे स्वयं वापि मूर्ति कृत्वा हरेः कचित् । परिचर्या सदा कुर्याद्वखप्रक्षालनादिमिः । अलंकुर्वीत सप्रेम वश्रामरणैरपि' इत्यादिस्वारस्यात् सेहोत्पत्ति- पर्यन्तं विधेरनतिक्रमाय पूजापदम् । विधिप्रधानत्वात् तस्याः । अत एव भक्तिहंसेपि तथै. वोक्तं प्रमुचरणैः 'खेहोसतिपर्यन्तं विधिरेव नियामक' इति । स चात्र श्रीपदाचार्यनि- दिए एव, न तु तात्रिक इति ज्ञेयम् । स च 'कृष्णसेवापरं वीक्ष्य दम्भादिरहितं नरम् । श्रीभागवततत्त्वज्ञ मजिज्ञासुरादरादिति वास्यात् तदनुसार्यवेति हृदयम् । साक्षात् श्रीमदा सेवानवसरे श्रवणादिक विधेयम् । 'सप्रेमति सर्वत्रानुपज्यते । वक्तुरभावे स्वय. मेव कीर्तनम् । आदिपदात् स्मरणं च सर्वदा । पादसेवनमित्युपतक्षणम् । वस्तुतस्तु भगवत्स्वरूपसेवनमेव तत् । यद्यपि 'श्रवणं कीर्तनं विष्णो रिसत्र श्रवणादित्रयानन्तरं पादसेवनमुक्तम् । तब मर्यादायां भगवद्विमुखस्स विषयासक्तस गुरूपदेशमात्रेण भजन- मिच्छतः श्यमप्रवृत्तौ माहात्म्यज्ञानेत श्रवणेन्द्रियमनोदोपनिवृत्त्या शुद्धिसंपादनेन १.भाचा ७४ भक्तिवर्धिनी। 'शुद्धाय सुखिनश्चैव ब्रह्मविद्याविशारदाः । भगवत्सेवने योग्या नान्य' इति वास्यात् साक्षात् भगवत्सेवने अधिकारसिद्ध्यर्थ प्रथमत एव श्रवणं, कीर्तनं स्मरणमित्युक्त्वा अग्रे पादसेवनमुच्यते । अन तु भगवदाज्ञया श्रीमदाचारादावेव सर्वसमर्पणेन ब्रह्मसंबन्धकर- णात् तेनैव सर्वदोपनिवृत्तिपूर्वकसेवाधिकारो जात इति स क्रमो न विवक्षित इति ज्ञेयम्। तदुक्तं 'ब्रह्मसंबन्धकरणात् सर्वेषां देहजीवयोः । सर्वदोपनिवृत्तिर्हि' इति सिद्धान्तरहस्से साधनफले एकीकृत्य सर्वसमाधानमाहुरिति । नवरत्ने चेयमेवाशका समाहिता । तथा च अरुणोदयात् प्रागुत्थाय खयं सानादिकं विधाय भगवन्मन्दिरे गत्ला मन्दिरपात्रादिसंशो. धनं, सिंहासनसंस्कारः, पालभोगसजीकरणं, ततः प्रपोधस्तवैः भगवद्वोधन, शीतादि- समयोचिततूलकशुकप्रावरणादि परिधाप्य, सिंहासने उपवेश्य, पालभोगं समय, शीता. धिक्ये हसन्तीमुपनिधाय, स्नानसामग्री सुगन्धतैलतप्तोदकादि अङ्गवस्रशृङ्गारवेशोचितवसा- लङ्कारादि सर्वमुपस्थाप्य, समये जाते, पालभोगमपनीय, आचमनं मुखवस्त्रताम्यूते समर्य, दर्पणंप्रदय,तत्सामयिकशोभामवलोकयन् मगलनीराजनां कुर्यात् । एवं सानशहारमारभ्य श्रीमदाचार्यनिर्दिएप्रकारेण शृङ्गारभोगगोपीवल्लभगोपालराजभोगोत्यापनसन्ध्याशयनपर्यन्तं यथायथं परिचरणमेव पादरोवनमित्यर्थः । अर्चन च पूजनम् । तद्धि पूज्ये उत्कर्पस्यापकम् , सर्वोत्कृष्ट एव पूज्यो भवतीति । प्रकृते च पूज्यो भगवान् पुरुषोत्तमः, तत्रापि श्रीयशो- दोत्सालालितः, तनापि कोटिकन्दर्पलावण्यः श्रीगोपीजनवलमा, तनापि श्रीवल्लभाचार्य- हृदयसर्वखरूपः, तन च श्रीमदाचार्यचरणानुग्रहपक्षपातेन खरचितगृहारादिपरिष्कार- प्रकाशमानं शोभातिशयविशेपमगीकारसूचकमवधार्य परमोत्साहमरेण विवशतया सूर्ये दीपदानमिव धूपदीपनैवेद्यताम्बूलागुरुसारादिसुगन्धपुष्पमालादिमिरम्पर्य एतादृशे म्पसर्य- खरूपे कस्यापि दृष्टिदोपसंक्रमो माभूदिति परमप्रेम्णा नीराजनां सर्पदोपनिवृत्त्या "निःशे- पेण राजयतीति व्युत्पत्त्या अपूर्वशोभाप्रकाशिकां नीराजनां कुर्यादित्यर्चनम् । ततय परिक्रमणेन स्वात्मानमपि प्रमोपरि निर्मञ्य परमाणुना मया किं कर्तुं शक्यमिनि परमदैन्येन दण्डवत्माया प्रणमेदिनि वन्दनम् । ततो दास शय्यादिरचना । तर चाधिशयाने प्रभो व्यजनचरणसंवाहनादि च । ततो मुकुलितनयने प्रभावनासरं पिाय श्रीमरप्रभुप्रसादीकृतपुष्पमालादिमिश्चर्षितः परमाहादपूर्णो भगवन्मन्दिरादहिपेत्य 'उन्छि टभोजिनो दासाः' इति वास्यात् साक्षादपरामनारम्निनं याबाम्पन्तरशोधकं पग- सौमाग्यमंपादकं महाप्रमादं मेवरादिम्यो विभज्य मेवेत । सनथ क्षणं रिश्रग्योत्याय वस्त्राभरणादिमेवया तदभावे तादृशैः कृतात्मनिवेदिभिः समानशीलव्यमनर्भगवदीर्यः शक्तितात्पर्यावधारणपूर्वकं श्रीमागवतसुशोपिन्यादिश्रयणम् । तथैव कीर्तनम् । तवती- लाशोमादीनां स्मरणं च कुर्वाणो यारदुपारनं दिनं वेणुगीतोक्तप्रकारेण नपेन् । ततः योत्यापने जाते कन्दमूलफलादि तत्तदातर समर्पयेत् । अन च पुलिन्दीमामाग्यं विवृतिसमेता। संभावयेत् । ततो भगवत्यापनशयनिवेणुनादोत्यनिजनिजाहानाभिधानभवणोत्साह- समुद्भूतलाङ्कलसहर्यहुकारोलसितमुखीधैनः पुरस्कृत्य, साक्षिभिर्गोपवृन्दैरनुगीयमानचरितं 'तं गोरजरछुरिते'त्यादि वर्ण्यमानस्वरूपं भावोद्गारिणीभिदृष्टिभिः श्रीमद्वजसीमन्तिनीपरिताप परिहरन्तं गोपीगुत्सपशं ब्रजे प्रविशन्तं परिभाव्य, धेनूस्तत्तद्रोठे निवेश्य, निजमन्दि- रमलेंकुणि प्रभु वन्यपुष्पादिभिरलंकृतं पयोमोदकादिभिर्यथालब्धैोगोपचारैरम्यर्च्य, साभ्यनीराजनां विधाय, क्रमेण प्रेम्णा शृङ्गार बहूस्कृत्य उन्मजनसायन्तनवश्वालङ्कारादि- भिरलंकृत्य, दुयफेनं समर्म्य, यथालाममिति सर्वत्र ज्ञेयम् । 'यथालन्धोपचारकै रिति वाक्यात् । 'स्वादनमुपलालितमिति प्रकारकं शयनभोगमुपनीय, ताम्बूलमाल्यादिभिरलंकृत्य, शयननीराजनां कुर्यात् । ततश्च शय्यामधिशयिते प्रभौ नमस्कृत्य, अनवसरं विधाय, यहिनिःसरेत् । इदमेवोक्तं तत्वार्थदीपे 'एककालं द्विकालं वा त्रिकालं वापि पूजये दिति । ततो यथोचितं प्रसादादि संसेव्य तादृशैः श्रवणकीर्तनादि कुर्वन् परमानन्दमनुभवन् विश्नमेदिति दास्यं दिङ्मानं प्रदर्शितम् । यद्यपि सख्यात्मनिवेदने हि भगवदगी- कारेणैव संपयेते, तथापि तथा निवेदने चिन्ता त्याज्या श्रीपुरुषोचमे' इत्यत्र निवेद- नाङ्गीकारचिन्ताऽभावनिरूपणेनैव सख्यसिद्धिरपि निरूपिता । तथापि साधनदशायां निरोधलक्षणोक्तमापनावत् तदनुकूलान्तरगसेवा भावनीया । निवेदनं च ब्रह्मसंबन्ध- समये समर्पितानां पदार्थानां यथायथं तत्रैव विनियोगः ॥२॥ सर्वथा व्यावृत्तिराहित्यामावेपि प्रकारमाहुः व्यावृत्तोपोति । ध्यावृत्तोपि हरौ चित्तं श्रवणादौ न्यसेत्सदा । ततः प्रेम तथासक्तिर्व्यसनं च यदा भवेत् ॥ ३ ॥ पीजं तदुच्यते शास्त्रे दृढं यन्नापि नश्यति । हरी सर्वदुःखहर्तरि चित्तं निधायेति व्यावृत्तिसमयेपि शनीयहारिणी यद दिनिवत् इरावेव चित्तं निधाय व्यावृति कुर्यादित्यर्थः । अनन्तरं च श्रवणादौ सदा यतेत् । इदमेवाभिप्रेत्योक्तं निबन्धे 'सर्वथा विहीनथेदेकं यामं हरौ नये'दिति । एवं सर्वदा भजतः फलमाहुः तत इति । एवं भजतः प्रथमं भगवति नेहः सात्, पूर्वोक्तो योजभा- वोऽरितः स्यादित्यर्थः । ततः क्रमेणासक्तिर्भवेद, भगवत्स्वरूपे चक्षुरागो भवेत् । तदाकुरो द्विपत्रितो जात इति शेयम् । ततश्च कमेण व्यसनम् । विशेपेण अस्यन्ते तदितरे सर्व विषया येन, तं विना स्थातुमशक्तिरिति यावत् , तद्भवेत् । ततश्व सङ्कल्पा उत्तरोत्तरं पलवस्थानीया भविष्यन्ति । एवं व्यसने जाते तद्वीजं भक्तिशाले इदमुच्यते । यद्यसमा- भारहेतावपि यन नश्यति ॥३३॥ तन हेतुभूतं तस्य साधारण कार्यमाहुः लेहादिति । .
भक्तियधिनी । लेहाद्रागविनाशः स्यादासरत्या स्याहारुचिः ॥४॥ गृहस्थानां याघकत्यमनात्मत्वं च भासते। यदा स्यायसनं कृष्णे कृतार्थः स्यात्तदैव हि ॥५॥ ताशस्यापि सततं गेहस्थान विनाशकम् । भगवति लेहे जाते गृहादौ तदितरत सर्वत्रैव रागो निवर्तते, लेहपदार्यस्यैव तथात्वात् । तनाराक्तौ जाताया गृहादावरचिर्भवति, तत्प्रीतिजनक न भवतीत्यर्थ । न केवलमरुचिमात्रम्, किन्तु एते मम वाधका अनात्मीया इति बुद्धिर्जायत इलाहु गृह- स्थानामिति । सम्बन्धमाने पष्ठी । गृहस्थितेषु स्त्रीपुनादिपु ममताविपयेषु स्पष्टम् । तदेवमासतया सेवत यदा कृष्णे फलरूपे व्यसन तदितरसर्व विषयनिवृत्तिपूर्वक त विना स्थातुमशक्तिमवेत्, तदा कृत सम्पादित अर्थ यदयं तनुवित्तताया प्रकृत पीजदायरूप पुरुषार्थों येन तादृश स्यात् । अत एव चीन तदुच्यते शास्त्रे इदमिति पूर्वमुक्तम् । एवकारेण अन्यया तदभाव । तत्सत्वेन तसिद्धिनिश्चयोपि हिशन्देन सूचित । एव वीजभावे पुढे जाते यथा द्वितीयाधिकारिणस्त्याग श्रवणकीर्तनय सापन मुक्तम्, तदेवास्यापि वक्तु हेतुमाहु तादृशस्यापीति । गृहादावरुचिमतोपि पाधक त्वस्फूर्तिमतोपि भगवदेकव्यसनवतोपि निरन्तर गृहस्थितिविशेषेण भावनाशिका । अत्राय भाव । 'स्नेहाद्रागविनाश स्या'दित्यादिना विरागस्योक्तत्वाद् 'यदहरेव विरजेत् तदहरेव प्रमजे दिति श्रुतेरवसरस्य प्राप्तत्वात् त्याग उपदिश्यत इति नानुसन्धे यम् । तस्स ज्ञानमार्गीयत्वात् । प्रकृते च पुष्टिमार्गीये बीजभावे हेढे व्यसनात्मके जाते तस्य च त पिना स्थातुमशक्तिरूपत्वात् विप्रयोग एवानुभावक इति सतत गृहस्थिती स्वरूपासक्तस्य आसक्त्या, खरूपसेवा कुर्वत , सेवारसावेशेन परमानन्दानुमवेऽस्वास्थ्या भावात् पूर्वोक्तो भाव प्रवृद्धो न स्यात्, 'भगवता सह सलाप' इत्यादि सकन्पा निद्रा च्छेदादयश्च दशा न भवेयु , क फलरूपमानसीसेवासभावनेति विमृश्य 'त्याग कृत्वे'त्युक्त श्रीमदाचारिति ताशस्थापि सततमित्यादि पदसमभिन्याहारादवगम्यते । अन्यथा सततादवैयर्थ्य च । अत एव समापित्यागखरूपमुक्त सन्यासनिर्णये 'विरहानुमवार्य हि परित्याग प्रशस्यते । खीयबन्धनिवृत्त्यर्थ पेश सोन न चान्यथेति । त्यागे खीयाना पन्धवरखाभावे स पेशोपि न कार्य इत्याशयेन । अतो नाय वैषस्त्याग इनि हृदयम् । तस्मिर शम्सापि अगवात् । एतद्यथा तथा सयासनिर्णये विशेषेण भावनीयम् । अत एष जन्तापिपाणि नापतसिपो लागाष्ट्रपतीतिरिवार्षिक र स्याग उक्त ॥५॥ प्रथमसापि भ्यसने जाते घीजस दृढत्वात् तथाधिकारो जात इति तदेव सापन- माहु त्यागं कृलेति ।
विवृतिसमेता। त्यागं कृत्वा गतेद्यस्तु तदार्थकमानसः ॥ ६॥ लभते सुदृढां भक्तिं सर्वतोभ्यधिकां पराम् । वाधकरवाहादि सर्व त्यक्त्वा स एव फलरूपमानसीसेवारूपो योर्थः पुरुषार्थः स एवार्थः प्रयोजनं तस्मिन्नेवैकं मुख्यमेका वा मानसं मनो यस्स एतादृशः सन् श्रवणकीर्तने यो यतेत् स सर्वतोधिका मुक्तेरप्यधिकां परां फलरूपां सुदृढां प्रभुणाप्यनपनोया मक्ति लमते । समागीयैः सजातीयैरेव अवणादिकम्, न तु विजातीयैरन्यमार्गीयैर्वेति धात्वर्थेन ज्ञापितम् ॥ ६॥ त्यागे बाधान्तरमाशङ्कय परिहरन्ति त्याग इति । त्यागे धाधकभूयस्त्वं दुःसंसर्गात्तथानतः॥७॥ अतः स्थेयं हरिस्थाने तदीयैः सह तत्परैः। अदूरे विप्रकर्षे वा यथा चित्तं न दुष्यति ॥८॥ सेवायां या फथायां वा यस्यासक्तिईढा भवेत् । यावजीवं तस्य नाशो न कापीति मतिर्मम ॥९॥ पाघसंभावनायां तु नैकान्ते वास इप्यते। हरिस्तु सर्वतो रक्षा करिष्यति न संशयः ॥१०॥ सागानन्तरं खमार्गीयत्यागस्वरूपाज्ञानात् सजातीयबुद्ध्या अन्यमागीयैः त्यागि- भिरेव सद्गो मवेत् , स च दुःसंसर्ग एव, भाववैजात्यात् । तदुक्तसाधनप्रवृत्तौ मार्गाच्युतो भविष्यतीत्यर्थः । तयानतोपि याधः । तैः सह सर्वत्र मिक्षया असमर्पितभक्षणेन बाहि- मुख्यमेव प्रतिदिनमुपचीयेत, दूरतरा भाववृद्धिः। अतस्त्यागं कृत्वा हरिस्थाने श्रीगोवर्ध- नादौ यत्र पूजाप्रवाहः स्यादित्यायुधम् । तदीयैर्भगवरसंपधिभिस्तत्परैः सर्वत्यागपूर्वक- सेवाश्रवणकीर्तनपरैर्दडवीजभावः सजातीयैः सह स्थेयम् । एतेन दुःसंसर्गदोपो निवा- रितः । हरिस्थान इति । 'वखप्रक्षालनादिभिरिति वाक्याधथासंभवं सेवापि सूचिता । प्रसादलाभादन्नदोपोपि परिहृतः । खमार्गीयश्नवणादिसिद्धिरप्युक्ता । तत्रापि 'अति- परिचयादवज्ञेति न्यायेन याधमाशा परिहरन्ति अदूरे विप्रकर्षे वेति । सष्टम् । निर्गलितार्थमाहुः, यथा चित्तं न दुप्यति तथा स्थैयमित्यर्थः । वस्तुतस्तु सेवायामिति, सेवायां वा कयायां, वा विकल्पे समुचये वा, यस्सासक्तिढा भवेत् , तस्य यावीवं कापि भगवत्स्थले अन्यत्र या, सजातीयेषु इतरेषु वा, तिष्ठतोपि नाशो न भवेदिति मे मतिः । तेन स्वानुभवस्यैव प्रामाण्यमुक्तम् । तथापि 'पाक्षिकोपि दोपः परिहरणीय' इत्याहुः 'याध- संभावनायां तु नैकान्ते वास इप्यत' इति । वस्तुतस्तु 'हरिस्तु सर्वतो रक्षां करिष्यति न संशयः । भक्तानां सर्वदुःखहर्ता हरिः, अन्यथा तथात्वमेव न स्यात् । अत एवं - मत्तिवर्धिनी। भजने प्रवृत्तस्य सर्वतो रक्षामेव करिष्यति । अन संशयो न विधेयः । अन विशेषः संन्यासनिर्णये द्रष्टव्यः ॥ १० ॥ उपसंहरन्ति । इत्येवं भगवच्छास्त्रं गूढतत्त्वं निरूपितम् । य एतत्समधीयीत तस्यापि स्यादृदा रतिः ।। ११ ।। स्पष्टम् । अयाधुनिकेभ्यः कुटुम्बव्यावृत्तिविवशेग्यः स्वकीयेभ्यो महाकारुणिका वरदानमिव प्रयच्छन्त आहुः य एतदिति । सेवाश्यणाघसंमवे य एतद्भक्तिवर्धिनीस्तोत्रं सम्यगावधारणपूर्वकं समधीयीत तस्सापि पीजभावरूपा सायिभावात्मिका रतिर्ददा स्यादित्याशीर्दानम् ॥ ११ ॥ श्रीमदाचार्यकृपया तद्वाचामर्थसङ्गतिः । प्रादुरासीन्मम स्वान्ते तन्मयत्थं निरूपितम् ॥१॥ न प्रौढया साक्षिणस्तत्र त एव प्रभवो यदि । जीवत्वादन्यया प्रोक्तं क्षमन्तां करुणार्णवाः २ इति श्रीमद्भक्तिवर्धिनीवितिः संपूर्णा ॥ श्रीकृष्णाय नमः। भक्तिवर्धिनी। श्रीवल्लभात्मजश्रीवालकृष्णकृतटीकासमेता । नत्वा खाचार्यचरणौ कृपापातं यतो हरेः। स्मृत्वा गोपीशचरणौ व्याख्यास्ये मक्तिवर्षिनीम् ॥ १ ॥ व्याख्यानरीतिरपरैबहुधा विभिन्ना सिद्धान्तरीतिमतिरेव च नान्यथा सा । तत्रापि बोधविशदाशयतानुपगादर्थ विशेषमभिधातुमना भवामि ॥२॥ अस्याः कृतेर्मम विनोदहृदा विचारे केचित्तरे प्रतिपधीनतया विशन्तु । ये तु प्रमेयगतिमेव विभावयन्ति ते भावयन्तु सदयाहृदयाः प्रवीणाः ॥३॥ इह तावत् श्रीवल्लभाचार्याः स्वप्रकटितपुष्टिमार्गे साधारणकारणत्वाद्ब्रह्मसम्ब- न्धस तत्करणपूर्वमनुगृहीतानां जीवानां स्वमायालौकिकसाधनातिशयक्रमेण व्यस- नाकाप्तिद्वारा साक्षाद्भगवत्प्राप्तिरेकैव सर्वेपामिति ज्ञापयितुं भक्तिवर्धिनीनामान प्रयन्ध व्याचख्युर्यथा भक्तिः प्रवृद्धा स्यादिति । यथा भक्तिः प्रवृद्धा स्यात्तथोपायो निरूप्यते। बीजभावे दृढे तु स्यात्यागाच्छ्रवणकीर्तनात् ।। १ ।।
, श्रीवल्लभात्मजनीवालकृष्णकृतटीकासमेता। यथा येन प्रकारेण भक्तिः पुष्टिमार्गाया सात् प्रवृद्धा स्वावस्थात्रयापन्ना च सा- तथा उपायः साधनं निरूप्यते । विशिष्टविधानमेतत् । अयमर्थः । साधनानि तु प्रमा- णचतुष्टये प्रतिपादितानि, परं न तेषां यायत्स्वसाध्यविजातीयार्थहेतुतावार्यते, तावत्प्र- कृतोपयोगीनि भवन्ति । अतस्तद्धेतुप्रकारक उपाय उच्यत इति । यद्वा । उक्तं च साधनजातं विजातीयार्थेषु तयाकरणिकमिति वाक्येनेष्टार्थे विनियुज्यते । न चात्र प्रमाणामावो न वार्थविरोधः । इतरथा अप्रामाणिकत्वापचेः । न चैवं विपयव्यवस्था सादिति वाच्यम् । तत्वतो विषयद्वैविध्यादेरप्यनंगीकारादिति । श्रीमागवतादौ उक्तान्यपि साधनान्यसंभावनाविपरीतभावनाग्यां नाथहेतवो भवन्तीति ते निवाधिकारिविशेषवि- पयतया तदुपयोगः कथ्यत इति भावः । अत एव तृतीये कपिलेन 'भक्तियोगो बहुविध' इत्यादिना खभावगुणतारतम्येन भक्तितारतम्यं व्याख्याय 'अनिमित्ता भागवती'त्यादिना निर्गुणभक्तिरेव स्तूयते । यत्तु कश्चित्प्रमाणचतुष्टये पुष्टिमकेतत्साधनानां चाभावाद्वि- जातीयसाधनव्याख्याप्रतिज्ञत्याह । तन्न । तथा सति पुष्टिमक्तरप्रामाणिकत्वापत्तेः । प्रकृतग्रन्थसाधनविरोधात् । 'कधिदेव हि भक्तो हि यो मद्भक्त इतीरणात् । सर्वोत्कर्ष- कथनात् पुष्टिरस्तीति निश्चय' इति प्रभुपाक्यविरोधात् । 'गीतायां स्फुटमतः पुष्टिः प्रतिपाद्यत' इति तव्याख्यानं च विरुध्यत इति दिक् । ननु केयं भक्तिर्नाम । न ताव. दाराध्यखेन ज्ञानम् । तथा सति ज्ञानविशेषत्वेनाभेदप्रसङ्गात् । न चेष्टापत्तिः । 'तस्मा. न्मद्भक्तियुक्तस' 'ज्ञानिनामपि सर्वेषामित्यादिषु भेदेनासानात् । न च श्रवणादितत्ममु- दायायन्यतमत्वम् । तस्य 'भक्त्या सज्ञातया भक्त्य'सनेन कारणत्वोक्तेः । नापि वा एतेन सेवापि भक्तिः । न च श्रद्धाविशेषः । तस्याः सङ्कल्पात्मकतया निश्चयात्मकतया वा तद्विन्नभक्तेर्भेदात् । अत एव गुरवः 'श्रद्धातः साधनप्रवृत्तिस्ततः फलं भक्तिरित्याहुः । एतमेव श्रद्धाभत्तयोर्भेदमादाय 'श्रद्धावन्तो न भक्तास्ते ये स्वधर्मबहिर्मुखाः । सेवा. स्वधर्म कुर्वाणा मक्तगोष्टीविरोचका' इति वदन्ति । यत्तु केचित् श्रद्धासहितसेवाकृति- भक्तिरिति प्राहुः । तन्न । सेवाकृतेर्भक्तिसाधकत्वम्, न तु भक्तित्वमिति सिद्धान्तात् । एतेन शमादिपक्षाः प्रत्युक्ता वेदितव्याः । अत्रोच्यते । भगवति निरुपाधि प्रेम भक्ति- रिति । न चाप्रसिद्धिः। आत्मनि प्रसिद्धः। न च माहात्म्यज्ञानपूर्वकत्वस्य प्रधानवा- क्यगतत्वादुपायित्वं शश्यम् । तस तत्कारणे सेवायामुपक्षीणत्वात् । अत एव माहात्म्य- ज्ञान सेवायामपराधामावायोपयुज्यते, न तु भक्तिहेतुत्वेनेति श्रीमतोकुलनाथ चरणाः । नन्येवं व्रजस्थानां कामाद्युपाधिसत्प्रेमेति चेत । तत्र कामाभावात् । तासां जात्यनुरूप- भगवगुणवर्णनस तत्रैव विशदत्वात् । भक्तोचितखरूपनिष्ठतया वा तादृशगुणकयनस्या- वश्यकत्वमित्यस्स सुवचत्वाच । अत एव मक्ताः स्वरूपनिष्ठा एव भवन्ति । न हि पां भगवस्वरूपातिरिक्त किधिद्वर्णनीयमस्ति । तदाहुगुरुचरणाः 'तदेव हि प्रसिद्धं भग- ८० भक्तिवधिनी। वदगीकारो नाम वस्तु यत्कायवाब्मनसां भगवत्सरव मिति । यद्यपि कामानुरूपा किया दृश्यते, परं न कामः । आहुश्वाचार्याः 'क्रिया सर्वापि सैवात्र परं कामो न विद्यते' इति । यदपि 'कामागोप्यः,' 'कामं क्रोध'मित्यादिकथनं तदपि लोकप्रतीतिमापेक्षंचिचासहस्तव- नम्, न तु साधनतावोधकमिति दिह। तस्मान्निरुपापिकं प्रेम भक्तिरिति । सा च द्विधा । आत्ममनोधर्मभेदात् । न चायायां मानाभावः । सरूपेण भगयल्लीलाप्रवेशे समाता- भावेन तदसम्मवापत्तेः । अलौकिकमहातस्वीकारे जीवे निराकारताप्रसङ्गात् । अतो- न्यथानुपपत्तिरेवमानम् । नवा किश्चिद्धाधकं पश्यामः । यतः अंशत्वादिवदैश्वर्यादिसमाना- धिकरणो धर्मविशेपो भक्तिरिति युक्तमुत्पश्यामः । मनोधर्मरूपा तु श्रवणादिसागुण्योप- कृतिमपेक्षते । यावत्तद्वृत्तिमती । तया पुनः सामिव्यक्ता नेशते परोपकार खात्मनि विना- भावविशेषावस्थायां दृष्टान्तीकृतानां भावानुरूपं करणम् । क्रिया हि परतत्रा प्रयत्नामि- लापतो भवति यथा, साप्येवं यतः । अस्ति च नायं प्राणप्रदो धर्मों, विभिद्यन्ते यतो नानाविधा गतयः । गतिमामान्यमपि साक्षादेवेति न नियमः, किन्तु पारंपर्यंतयापि, तदविरोधात् । अतो द्विधा मक्तिः । तत्राद्या विधेयताहीना वृद्धिप्रकारमपेक्षते, अत. स्तदुच्यते । ननु वक्ष्यमाणसाधनैः सर्वेषां भगवति कुतो न भक्तिर्वर्धत इति व्यमि- चारिशङ्कायामाहुः 'वीजभावे दृढे तु स्यात्यागाच्छ्वणकीर्तनादिति । परमादिसृष्टी भगवतो रमणेच्छातो विस्फुलिङ्गन्यायेन निर्गता जीवाः । तेषां विविधगतितत्साधनानामानु- पूर्वीविशिष्टानां सत्त्वासत्त्वे भगवतैव विचारिते। तत्र ये स्वप्राप्तियोग्यतया इच्छाविषयी- कृतास्तेषु यत्ताशेच्छाविषयत्वं स एव बीजभावो नाम । तत्राप्ययं जीवः कतिचिदिनानि साक्षान्मत्प्राप्तिसाधनकृत्वा ततो निवान्यगतिसाधनकृत्स्यादिति चेद्भगवता विचारितं, तदा स धीजमावो दृढो न भवति । दृढे तु पीजभावे सादुक्तसाधनैः प्रवृद्धा स्मादित्यर्थः । बढे तु तस्मिन्न मवेदिति । तदुक्तं गुरुचरणैः 'न हि पदार्थगुणदोषौ वर्णयतोषि पुरुषस्य ब्रह्मादर्भवन्ति विधेयाः प्रवृत्तिनिवृत्त्योः केचिदपि न यावद्विशिष्टेच्छाविषयताशा. लित्वं धर्मस्पेति । अतो दृढे तु बीजमावे तथा स्यात् । तत्र साधनमाहुः त्यागादिति । ऐहिकपारलौकिकयावद्वस्तुनस्त्यागो भगवति स्वमार्गीयप्रकारेण सात्मनः समर्पणं । तस्मात् मगवमाप्तीन्छुना प्रथमतो मार्गानुसारेण समर्पणं कर्तव्यम् । मुख्यमिदं साधनं भक्तिवृद्धौ। अत एवैकादशे मगवतोद्धवं प्रत्युक्तम् । 'दारान्सुतान्गृहान्प्राणान्यत्परस्मै निवेदनम् । एवं धर्मनुष्याणामुद्धवात्मनिवेदिनाम् । मयि सजायते भक्तिः कोन्योर्थोस्यावशिष्यत' इति । अन्यत्र च । 'ये दारागारपुत्राप्तप्राणान्विचमिमं परम् । हित्वा मां शरणं याताः कयं तान् त्यक्तुमुत्सहे ।' 'मामुद्दिश्य हित्वे ति तद्याख्यानम् । तस्मात्सर्वार्पणं भगवति कर्तव्यम् । तदुत्तरं साधनमाहुः श्रवणकीर्तनादिति । समाहारे नपुंसकत्वम् । मात्मसमर्पणानन्तरं निबन्धोक्तलक्षणप्रकारकं गुरुमाश्रित्य यत्रात्मसमर्पणं कृतं तस्स श्रीवलमात्मजश्रीवालकृष्णकृतटीकासमेता। भगवतः खरूपज्ञानार्थ स्वखरूपज्ञानार्य भगवति स्वसम्बन्धज्ञानार्थ च भगवच्छा ओतव्यम् । तेन सकलसंशयनिवृत्तौ भगवति मतिदा मवति । तदुत्तरं श्रुतस्यार्थस्य संरक्षणार्थ सति श्रोतरि कीर्तनं कर्तव्यम् । अत्र श्रवणकीर्तनयोः समुचिस हेतुत्वम् , न तु पार्थक्येन । न च यत्र अवणमेव साक्षात्कारकं तत्र व्यभिचारः । तत्र कीर्तनस्स- रणजनितार्थस जन्मान्तरीयतया सिद्धेः । भगवदनुग्रहो वा तत्र कारणम् । अवणादीनां हि दृष्टद्वारकत्वम् । तच दृष्टं फलं कचित्संशयनिवृत्यादि यथायथमवगन्तव्यम् । संशय- निवृत्तौ, (सति सम्भवे) स्मरणं विधेयम् । सति सम्भवे सेवा कार्या। श्रवणं तु लीलात्वेन कर्तव्यम्, तथा कीर्तनं च । तदुक्तं गुरुचरणैः 'निरन्तरं भगवतः स्मरणमेव मुख्यमस्मा- कम् , श्रवणादिकं तु तदुपकारि, न तु खतत्रपुरुषार्थः । भक्त्युत्पत्तौ लीलात्वेन श्रवणं तु तनुजा सेवा यया स्वतन्त्रपुरुषार्थ 'इति । सेवा च चेतस्तप्रवणमेव, तनुजादिकं च तद्धेतुरिति तत्त्वम् ॥१॥ ननु अनधिकारिणि कथं भागवतार्थों देयः, तदपिकारित्वं च दृढवीजभाववत्वमेव, सच कयं ज्ञातव्य इत्याकालायामाहुः सार्धेन चीजदाढति । पीजदार्यप्रकारस्तु गृहे स्थित्वा खधर्मतः। अव्यावृत्तो भजेत्कृष्णं पूजया श्रयणादिभिः ॥२॥ उक्तबीजमावदाळस्य प्रकारस्तु क्रिया तु । यस्मिन् वीजभावो दृढस्तकिया तु इयम् । यत् गृहे स्थित्वा अनुकूले गृहे स्थित्वा स्वधर्मतः आत्मधर्मोयमिति ज्ञात्वा अव्यावृत्तः सन् यथालाभसन्तुष्टः सन् कृष्णं सदानन्दं मजेत् । अनुदितमुख्यमक्तेन साधनदशापनेन गृहस्थाश्रमे स्थातव्यम् । तत्र स्थित्वा सन्देहमकृत्वा दृढविश्वासेन कृष्णं यपालम्योपचारैर्भजेत् सेवेत, भज सेवायामित्यर्थकत्वात् । ननु गृहस्थाश्रमः सन्निपातरूपः कयं भगवद्भक्तिं साधयेदिति चेत्, मैवम् । 'भयं प्रमत्तस्य वनेष्वपि स्यात्' 'नैकात्मतां मे स्पृहयन्ति किचित् 'प्राप्य पुण्यकृतालोका नित्यादिवाक्यर्भगवदर्थिनी गृहाअमेपि सदसिद्धेः । तस्मादप्रामवक्ष्यमाणलक्षणभक्तिना गृहस्थाश्रमे तदुपायः कर्तव्यः । तत्राप्ययं विशेषः । गृहाश्रमावस्थानं सिद्धगृहासमस्यैव, न तु सिखणाट- तत्कसासिद्धतत्कस वा । तदपि भजनं स्वधर्मवेन कर्तव्यं न तु धर्मलेन । तया सति अन्यशेषत्वेनामक्तित्वं स्यात् । अत एव गुरवः 'कर्माशवेन क्रियमाणस्मरणादेः कर्माङ्गत्वमेव, अर्थात्कर्मत्वमेव, न भक्तित्व'मिति । अय गृहस्थान विधानेन खग्रहाधि- ठितस्वरूपभजनपरित्यागेनान्यत्र तत्करणे भक्तिर्न भवतीति सूचितं भवति । तत्रापि मजने फलमुखमङ्गमुपदिशन्ति अव्यावृत्त इति । सर्वव्यावृत्ति परित्यज्य कृष्णः सेन्यः । भाष्यायामिक कालो भगवद्वत्यैव नेयः । सेवासमये सेवा कर्तव्या, अवशिष्ट- काले श्रवणादिकं यपासम्मवं कर्तव्यम् । न तु व्यावृत्या कारक्षेपः क्षणमपि कर्तव्यः । "भक्ति मक्तिवर्धिनी। 'निद्रया हियते नक्त मित्सर्थ । यद्वा । व्यावृत्तिः सर्ववस्तुविषयक सोयमो मनोरया, सर्वथा तद्रहितोऽव्यावृत्तो भवेत् । सर्वेच्छा परित्यज्य निश्चितचेतसा स्वधर्मत्वेन कृष्णः सेन्य , न तु पूज्य । पारिभाषिकश्चाय भेदो द्रष्टव्य । यदि अन्यावृत्तो न भवेत् , तदा भगवत्सेवन केवल समाहात्म्येन यथासम्भव पापादि निवर्तयेत्, न तु उक्त फल साधये- दित्यर्थ । नान्यचेतसा कृत कृतमित्यभिमन्तव्यम् । अतो भगवदर्थिना त्रिकाल भगवत्सेवासमये तु अवश्यमव्यावृत्तेन भवितव्यम् । तत्र कामचार । ननु सेवा कर्तव्या, न तु पूजा । सा च कय कय कर्तव्या । किं खशारीरधर्मतत्समानधर्मत्वेनोपचर्यया, बाहोखिद्यथेच्छमागमादिरीत्या वेति सन्देहे पाहु पूजयेति । अत्र तद्गुणसविज्ञानन- हुव्रीह्याश्रयणादनुक्रसिद्धोपादानत्वेपि पूजाया पृथगुपादानमुक्तमेदतम् । तेन सेवा- प्राधान्येन श्रवणादिनवक विधेयमित्युक्तम् । अपमर्थ । इतिकर्तव्यताकासापां तु तात्रिकोपचारा उपयुक्ता , तत्रापि यत्प्रेमविरोधि तन कर्तव्यम्, यथा नित्य शीतोदकखा- नादि । प्रमाणवतारलापेक्षया अमेयबलाबलस्साधिकत्वेन स्थापितत्वात् । यथासम्भव चतु षष्टि उपचारा. प्रत्यह कर्तव्या । अपरश्च । त एवोपचारा भक्तिमार्गे तदीयत्वेन कर्तव्या', न तु स्वीयत्वेन, धर्मवत् । तथा सति न भतित्व स्यात् । मगवन्मनादुपयो. गवानपविशेषावधारणेन कर्तव्यत्वेन च्याख्यात । यत्तु कश्चित् पञ्चरानादिभगवन्छा- स्नतत्त्वानमिज्ञ. पूजामाया उपचारास्तत्साधनानि मत्रादीनीति न तानि पुष्टिमार्गे उपयुज्यन्ते, कयश्चिदी तदुपयोगे मिनमार्गीयत्व स्यात्, अन्यथा पूजापूजामक्तिमार्ग- योरविशेषापत्तरित्याह । तन्मतिमान्यादेव । भावविशेषापारिमापिकभेदादेव तत्सिद्धे। इतिकर्तव्यताकाहाया अनुपरमात् । अप्रामाणिकत्वापते । 'मगवच्छात्र गीता भागवत पश्यरान चेति सिद्धान्तअन्धविरोधात् । भेदस प्रत्यक्षसिद्धत्वाचेति दिक् । यद्वा । पूजया श्रवणादिमिति गृहस्थविधुरादिभेदेन पदार्थद्वयोपदेशः । 'अधिकारिभेदेनो- पदेशा निधन्त' इति सिद्धान्तात् ।। २३ ।। ननु यदि व्यावृत्त सादृत्त्यादिहानितथेसत प्राहुः व्यावृत्तीपीति । व्यावृत्तोपि हरौ चित्तं श्रवणादौ यतेत्सदा । ततः प्रेम तथासक्तिर्व्यसनं च यदा भवेत् ॥ ३ ॥ पीजं तदुच्यते शाख्ने दृढं यन्नापि नश्यति । नीचाश्रयणादिनिन्दितवृत्तिस्तु नादरणीया । अतिरिक्तवृत्त्या जीवेत । सा च दुःसाध्या यहि, तदा अवश्य व्यावृतो भवति, तदा हरी भगवदर्य श्रवणादौ चित निधाप यतेत् । सर्वथा याममात्र कालो भगवति विनियोज्य. । श्रवणादिषु पिपु पाल्यमानमे- कमादेहावसान दृष्टार्थम् । अतस्तेषु यतेत् । तथापि 'अन्ये वेवमजानन्त श्रुत्वान्येम्य उपासते। तेपि चातितरन्येव मृत्यु श्रुतिपरायणा' इति वाक्याचे मगवन्त प्राप्सन्त्येव ।
श्रीवल्लभालजश्रीबालकृष्णकृतटीकासमेता । अत एव तत्त्वदीपे भगवदाचार्यैरुक्तं सर्वथा वृतिहीनथेदेक याम हरी नये दिति । एक समर्यासमर्थभेदेन गृहसविधुरादिभेदेन च दृढचीजभावत इतिकर्तव्यता व्याख्याता । इदानीमवसरप्राप्त उक्तत्यागादिसाधनफल निरूपयन्ति ततः प्रेमेति । ततस्त्यागा- दिसाधनानां यथाभावप्रकारानुष्ठानानन्तर प्रेम भवति, निरुपाधिका स्नेहो भवति, यथा सहयोपादेयवस्तूनि भगवति तथा विनियुज्यन्ते । स्वात्मवद्भगवदुपचारकारको भावविशेषः । तत्र जाते सर्वत्रौदासीन्य सात् । तदुत्तर तादृशभाववता तथैव सेवायां क्रियमाणायामासक्तिर्भवति । अन तादृशानुपूर्वी विशिष्टैवासक्तिविधीयते । न तु खरूपतो भेदः । अन्यथा 'आसक्तिः प्रेमपूर्वव, प्रेमापि हरिणा कृत'मिति विरुध्येत । आसक्ती हि सर्वेषु अरुचिर्भवति । यथा “चित्त सुखेन भवति । ततो यदा पुनरासक्तिरेवा- वसातो व्यसनमपि भवेत् , तदा कृतार्थः स्यात् । परा काठा मक्तेः सैव यद्यसनम् , यथा 'तम्मनस्कास्तदालापा' इत्यादि । अवस्थाविशेष यावद्वावः कुतो न मध्ये कालादिमि- रुपन्यत इत्यत आहुः बीजमिति । भक्तिशास्त्रे बीज बीजमावः एवोच्यते, तदपि दृढं यन्नापि नैव नश्यति, देशकालादिभिर्न तस्य नाशः । अनेकजन्मभिरपि न तस नाशः, किं पुनरन्यरित्यर्थः ॥ ३,३॥ इदानी प्रेमासक्तिकार्य तदनुमापकमाहुः लेहादिति । लेहाद्रागविनाशः स्यादासक्त्या स्याहारुचिः ॥ ४ ॥ गृहस्थानां याधकत्यमनात्मत्वं च भासते। पदा स्यायसनं कृष्णे कृतार्थः स्यात्तदैव हि ॥५॥ यदि भावति खेहस्तदा पुत्रदारधनदेहादिषु योनुरागश्चित्तव्यासङ्गः स नश्यति । मनः सर्वाशेन भगवदुपयुक्त नान्यत्र सजते इत्यर्थः । आसच्या पुनर्गहे अरुचिः, कदा पुनरिद गच्छेयेनाहं विमुक्तः साम् । गृहे इति यावदात्मीयोपलक्षणम् । सर्वं न रोचत इत्यर्थः । प्रेमासक्तयोः फलद्वय प्रत्येकमाहुः गृहस्थानामिति । भर निर्धारणे पठी, नन हेतुबाधकल गुणः । गृहस्था. सीपुनादयस्तेपा बाधकत्वम्, एते सर्वथा लौकिका उत्पन्न- भावनाशका इति भासते । यद्वा । सम्बन्धसामान्ये पष्ठी। तथा च गृहस्थसम्पन्धि यदाध- कत्वं ततदैव भासते, नान्यथेत्यर्थः । गृहस्थपदं प्रवृत्तिमार्गनिष्ठमात्रोपलक्षकमजहलक्षण- येति च सम्यक । एपा पुनरनात्मत्व अनात्मीयख वा आगमापापित्तनित्यर्थः । तदासते। अत्र यावप्रेमासक्योः सम्भव विरोधिधर्भवतस्त्रविरोधान सम्भवति । उत्पन्चे तु व्यसने साधनमसाधन वा तुल्यमित्याहुः यदा स्यासनमिति । भगवति हृदयाकाशे सर्वाचन प्राइते तदानन्दसम्पत्या व्यसन जायते, अतः फलान्तराभावादिहैवानुभूतफलो विशिष्टे- छावशतो देहादि विदधन् प्रतिक्षण जायमानाद्विविधपरमानन्दसम्पादिगलितवेयान्तर- विज्ञानस्निगुणहीनः कृतकृत्सः कर्मनिपुटीविहीन. परमात्मन्येव रमते ॥ ४,५॥
भक्तिवर्धिनी। ८४ ननु जातव्यसनावस्थेन गृहे स्यं न वेत्याकाहायामाहुः तादृशस्यापीति । तादृशस्यापि सततं गेहस्थानं विनाशकम् । एवं भक्तेः पराकाष्ठां विधुरगृहस्थसाधनाधिकारियोग्यतापुरःसरं निरूप्य विरक्तस्स गृहाश्रमेच्छारहितस्स ब्रह्मचारिणो भगवदर्थिनो यतेश्व साधनमाहुः त्यागं कृत्येति । त्यागं कृत्वा यतेद्यस्तु तदर्थार्थकमानसः॥६॥ लभते सुदृढां भक्तिं सर्वतोभ्यधिकां पराम् । तुशब्दोधिकारिविशेषच्यावृत्त्यर्थः । य इति दुर्लमाधिकारःसूचितः। सर्वस्य लौकिकस्स त्यागं कायवाश्मनसा कृत्वा यतेत् । यत्रश्च प्राप्तमघस्मरणकीर्तनाराधनभगवलिझा- दिदर्शनादिपरायणतैव । सदृष्टप्रतिवन्धस्सादृष्टप्रतिबन्धस्य चैतन्मार्गपक्षपातिना भगवतैव निवृत्तत्वात्सुदृढां केनाप्यनपनोयां भक्तिं लभते । अत मगवदधीनत्वबोधायानुवादो, न तु विधानम् । तत्रापि यदि अन्यशेषत्लेन लोकान्तरापेक्षया मुक्त्यायपेक्षां कुर्यात् , तदा उक्तस्वरूपा तां न लभते इति अनवद्यतादृशतत्प्राप्तौ अधिकारिविशेषणमाहुः तदर्थेति । भगवद्पो योधस्तदर्य एवैको मानसे यस्य स तथा । अत्र द्वितीयार्थपदेन तपस्यैव पुरुषार्थत्वेन ज्ञानं तद्धेतुर्नान्यथेति सूचितम् । सापि भक्तिर्न मनोधर्मरूपा, अपि तु आत्मधर्मरूपा, तां प्राप्नुयादित्याहुः परामिति ॥ ६,६३ ॥ एवं विशिष्याधिकारं व्याख्याय साधनं अदृष्टकालादेर्भगवन्मार्गे प्रतिबन्धकत्वा- भावात् इदं प्रतिबन्धकं प्रदर्य तन्निवृत्तिप्रकारपूर्वकं गुणापानमाहुः त्यागे पाधकेति । त्यागे धाधकभूयस्त्वं दुःसंसर्गात्तथान्नतः ॥७॥ अतः स्थेयं हरिस्थाने तदीयैः सह तत्परैः।। अदूरे विप्रकर्षे या यथा चित्तं न दुष्यति ॥ ८॥ गृहत्यागे कृते मक्तेर्वाधकानि भूयांसि समवेयुः । दुःसंसर्गो भवति, तेन भक्ति- विषयेऽसम्भावना विपरीतभावना वा उत्पयते, द्वयं वा । तेन भक्तिमार्गीयप्रकारका- चरणाभावाद्भक्तिर्नोत्पद्यते । दुःसंसर्गो वा एकाकिनो वनितादिसङ्गः, तेन विषयावे भक्तेरनुद्भवः । उक्तं च भगवता 'सङ्गात्सजायते काम' इत्यादि । अथवा, दुष्टानामपै- प्णवानां संसर्गात्तैः सर्वथा भक्तिनाशे भवेत् । यथैव दुःसंसर्गः सर्वथा बाधकः, तया अवैष्णवानामनीशानामन्नतः अन्नमक्षणतः, अवैष्णवानां जलपानेन भक्तिनोत्पद्यते । अत एव धृतवराहरूपेण मगवता पृथ्वी प्रत्युक्तं 'वैष्णवो यस्तु मोहेन पचेदनमनुत्तमम् । अवैष्णवाग्निना देवि तन्न भुझे यथा विषम' । अन्यत्र च । 'वस्तु यद्वैष्णवं किचिदि पश्येदवैष्णवः । न तन्मय्युपयुज्येत पुंसि सीव रजखला' । तस्माद् दृष्टभेदेन प्रतिपन्ध व्याख्याय तन्निवृत्तानुपायमाहुः अत: स्पेयमिति । यत उक्तरीत्या मक्तिप्रतिपन्धो ८५ श्रीवल्लभालजश्रीयालकृष्णफतटीकासमेता । मवेत् , अतो हरियाने पुरुषोत्तमस्थाने बजे वा श्रीरङ्गधामपुरुषोत्तमक्षेत्रद्वारावतीव- दर्याश्रमवैवयादिषु वा स्यम् । तत्रापि विविधानां समागमनात्साधनदशापन्नत्वाच खस्स न सर्वैः सह स्थातव्यम्, उक्तदोपापत्तेः, किन्तु तदीपैगवदीपैर्न तु कर्मिष्ठादि- भिर्वा । तत्रापि दीक्षादिकं परिगृह्य केवलं व्याख्यातारः प्रतिष्ठाप्रेक्षका लोकसङ्ग्रहार्थम् , तैर्न स्थातव्यम्, किन्तु तत्परैः कृम्मपरायणैः सेवाश्रवणकीर्तनादिना । अत्र सर्वात्मना भगवति चित्तव्यासजो मुख्यं साध्यम् , तयथा सिध्येत् , तथा विधेयम् । ताशस्थलेपि तवन स्पेयम्, किन्तु दूरे दूरभिन्ने दूरसदृशे। अभाविप्रकर्षे वा । विवक्षित तात्पर्यमाहुः यथा चित्तं न दुष्यतीति तथा विधेयम् । चित्ते दोपो चाहिर्मुख्यमभगवत्परत्वमिति यावत्, तद्यथा न स्यात् , तथा यतनीयम् ॥ ७,८॥ ननु भगवरसेवाया अभावात्तस्याधमत्वमिति चेत्तत्राहुः सेवायां घेति । सेवायां वा कथायां वा यस्यासक्तिईदा भवेत् । यायचीवं तस्य नाशो न कापीति मतिर्मम ॥९॥ याधसंभावनायां तु नैकान्ते वास इप्यते । हरिस्तु सर्वतो रक्षा करिष्यति न संशयः ॥१०॥ न वयं तनुजावितजाद्यन्यतमसेवायामेव फलत्वं मो येन यतिप्रथमानामधमत्वं स्थात्, किन्तु भगवत्प्राप्तिं तत्साधनं च भक्तिनिरुपाधिकप्रेमास्मिकैवेति तस्यामेव फलनान्तरीयकत्वात् । किमायातमेतावता साधनकलापमनुष्ठाणामुत्तमादिविभेदे उक्त- श्रद्धासाधनप्रवृत्तितारतम्यातिरिक्तं हेतुत्वेन । अतः सेवायां द्विविधायामपि गृहस्थस्य, कथायां साम्प्रदायिकगुरुकृपाकटाक्षपूर्वकगृहीतसाम्प्रदायिकगतिना कृतायां यतेहाचारिणो वा यस्य कस्यचिद्भगवदनुगृहीतस्यासक्तिढा, केनापि अनपनोद्या हर्षविपादादिनाप्यनप- नोया भवेत् । ननु इदानीन्तनानां दृश्यते सेवाद्यासक्तिः, कथं न भक्तिरुत्पयते इत्या- शायामाहुः यावजीवमिति । भगवन्मार्गप्रेवशमारभ्य यावदेहावसानमावर्तमानानामेव अवणादीनां धार्थत्वम्, न तु सकृत्कृतानामिति भावः । य एतादृशस्तस्स कापि देशे काले नाशो नाम स्वरूपप्रन्युतिर्न स्यात्, यत्र क्वापि निन्दिते देशादौ तिष्ठेत्सर्वया मुक्तो भवेत्, किं पुनरुत्तमेनुकूले उक्तविधे देशादावित्याचार्याः स्वयं वदन्ति मम मतिर्मतं सिद्धान्तः । नात्र सन्देहः कर्तव्य इति तत्त्वम् । ननु विप्रकर्षे स्थेयमित्युक्तम्, तत्र च दुष्टैरन्पैर्वा जन्तुभिः सर्वथा बाधः सम्मान्यते, तत्कथं विप्रकरें एकान्ते स्थेयमित्यत्राहुः पाधसम्भावनापां त्विति । तेन बाधसम्भावनं यत्र ग सात्, तादृशं स्थलं विमृग्य सेयमिति सूचितम् । वस्तुतस्तु अमायया भगवर्धमेकान्ते वसतः केनापि बाधो न सम्भवतीत्याहुः हरिस्तु सर्वतो रक्षा करिष्यति न संशयः । एतेन 'चौराणि किं पथि न सन्ति' 'अनन्याश्चिन्तयन्तो मां' 'मक्तापातिप्रपन्नाय' भक्तिवधिनी। 'तया न ते माधव नावका' इत्यादिप्रमाणपुर सर सर्वथा निर्भयतया निश्चित्स सेयम्, विश्वस्स भगवदर्थिनेति तत्त्वमुपदिष्टमिति ज्ञेयम् ।। ९,१० ।। एव ग्रन्यमुपदिश्योपसहरन्ति इत्येवं भगवच्छास्त्रमिति । इत्येवं भगवच्छास्त्र गूद तत्वं निरूपितम् । य एतत्समधीयीत तस्यापि स्यादृढा रतिः ॥११॥ इति उक्त एवमनेन प्रकारेण भगवच्छाने यद्गुढ तत्त्व तनिरूपितम् । भगवच्छास्त्र गीता मागवत पञ्चरान चेति विकम् । तसिद्धान्त एतावानेवेत्यर्थ । गूढतत्त्वमिति विशेषणेप्ययमेवार्य । उपसहृत्यैतत्पाठकर्तुरीनुसन्धानपूर्वक पठितुरपि फलमाहु य एतत्समधीयीत तस्यापि स्यादृढा रतिः । अन्यानुसन्धा नात्तप्रवृत्यादिक्रमेणोक्त फल सर्वथा सेत्स्यतीति माव ॥ ११ ।। जिज्ञासितव्यमिदमुत्तमभक्तिचित्तै सिद्धान्तरीतिमनुसृत्य मयातियत्नात् । क्स निवन्धनमसौ विबुधेषु याला दूष्य वचो यदि तदा प्रथम विभाव्यम् ॥१॥ आरब्धमर्थधिपणैरनवद्यमेव व्याख्यासु कौशलकलानिपुणत्वमेव । तोचिर भवति तत्कृतकृत्यता स्सागोपालपादकमलद्वयसनिविष्टम् ॥ २॥ सवत्सरे सप्तदशेतिरम्ये वर्षे शरश्रीपतिहस्वसख्ये । दिने तथा श्रावणकृष्णपञ्चद्वयीकृतेसौ विवृत प्रबन्ध ॥ ३॥ काह मन्दमति काय प्रपन्धस्तत्त्वसङ्गह । शिशूना मासते रम्य तथापि कलमापणम् ॥ ४ ॥ इति श्रीवल्लभात्मजश्रीबालकृष्णकृतभक्तिवर्धिनीटीका समाता ! श्रीकृष्णाय नमः। भक्तिवर्धिनी। श्रीगिरिधरकृतविवृतिसमेता। श्रीविठ्ठलपदावत्वा सर्वाभीष्टप्रदान स्वत । शन्दै सक्षेपतोस्तु व्याख्यासे भक्तिवधिनीम् ।। १ ।। अथ श्रीवल्लमाचार्यचरणा परमपालको भगवद्भक्ते कल्पतरस्वभावलात तत्त्वमेव बदन्त खीयाना स्वमार्गीयमक्तिकल्पतरोनीजावापमारभ्य फलपरिपाकार्यन्त प्रय- व्युपाय प्रतिजानते यति ।
८७ श्रीगिरिधरविकृतिसमेता। यथा भक्तिः प्रवृद्धा स्यात्तथोपायो निरूप्यते। वीजभावे पुढे तु स्यात्यागाच्छ्रवणकीर्तनात् ॥ १॥ येन प्रकारेण भक्तिः प्रकर्पण वृद्धि प्राप्ता स्यात् , तरकारकोपायो निरूप्यत इत्यर्थः । अत्रोपायत्वाविशेषात् जात्यभिप्रायेणैकवचनम् । तेन क्रमेणोसरोत्तरं दृढ- तरतमासिप्रकारका उपायाः सन्तीति तानाहुः । तत्र प्रथम पीजस्स दृढत्वे सत्येवाग्रे तरो- रप्यविनाशित्वं भवति, नो चेद्वातादिवशान्महानपि तहनश्यत्येव । अतस्तमुपायमाहुः बीजेति । बीजभावः श्रीमदाचार्यकृतभगवनिवेदनानन्तरं तन्मार्गानुसारेण भगवरस्व- र पनिष्ठारूपः, स यदा दो भवति, तदा भक्तिः प्रवृद्धा सादिति प्रथमः । तदनन्तरं त्यागात् गृहादिसर्ववस्तुनस्स्यागे कृते सा दृढतरा सादिति द्वितीयः । ततः श्रवणकी- तनात् भगवद्गुणरूपलीलादीनां स्वदेहादिसर्वविस्मरणपूर्वकं तद्रसपरवशतया श्रवण- कीर्तने सिद्धे सा दृढतमा सादिति तृतीयः ॥१॥ ननु रढबीजभावः को वा तस्स दाढ्य प्रकारश्य को वेत्याशंक्य पूर्व सोरेशं बीनदायप्रकार ततो वीजभावस्वरुपं चाहुः यीजदार्यमकारस्त्यिति । यीजदार्थप्रकारस्तु गृहे स्थित्वा स्वधर्मतः । अव्यावृत्तो भजेत्कृष्णं पूजया श्रवणादिभिः ॥२॥ खन्तत्वादेतत्प्रकारप्रवृद्धभावस्य विघातकोपि वक्ष्यमाणपदार्थोस्तीत्यस्साप्रौढत्व- मुक्तं भवति । तथाचायमप्येक प्रकारो भवतीति तं पूर्वमुद्दिश्याने प्रकारमाहुः गृहेति । स्वगृह एव सितः सन् स्वधर्मतः जीवस्य ये वैधा वर्णाश्रमधीतेभ्योऽन्यातस्तेषु च्यावृतिरहितः सन् विशेषेणावृत्तिः सततं तद्धर्मेष्वेवासक्तिपूर्वकं वाकायमनसां परिभ्रमणं तद्रहितः पुष्करपत्रवत् तम स्थितोऽपि तान् लोकसंग्रहार्थ यथाकथञ्चित् कुर्वन्नपि तेष्व. सक्तः सन, पूजया तनुवित्तजया सेवया श्रवणादिभिरष्टप्रकारैश्च कृत्वा कृष्णं सदानन्द पुरुषोत्तमं भजेत् सेवेत । एतेन लौकिकधर्मव्यावृत्ति विहाय पूजाभवणादिभगवद्धीप्वेव व्यावृत्तः स्यादित्यर्थः । अत एव श्रीभागवते तावत्कर्माणि कुर्वीत न निर्वियेत यावते' पर्धेन मर्यादामार्गीयस्य कर्माचरणमर्यादामुक्त्या, अग्रे व्यवस्था भक्तिमार्गीयस्यापि तामाहुः मित्कथाश्रवणादौ वा यावन्छ्रद्धा न जायत' इति । अतो भगवद्धर्मेषु व्यावृत्तस लौकिकधर्माव्यावृत्तियुक्तैव । अथवा खधर्मतः अव्यावृत्तः अनिवृत्तः सन् । पूर्वदशायां चित्तशोधकलेन तेपामुपयोगात् । तदुक्तमेकादशे 'अस्मिलोके वर्तमानः खप- मेस्सोऽनघः शुचिः । ज्ञानं विशुद्धमानोति गद्भक्तिं वा यदृच्छयेति ॥ २॥ किच, न केवलं भगवद्धर्मसिनिमानेगाहं कृतार्थोस्मि, नातः परमधिकं किषिद- स्तौति मन्तव्यम्, किन्त्वने पर्मिसम्बन्ध्यपि किश्चित् कर्तव्यमेवेसाहुः व्यावृत्तोपीति ।
भक्तिवार्धिनी। 'तया न ते माधव तावका' इत्यादिप्रमाणपुरःसरं सर्वथा निर्भयतया निश्चित्य सेयम्, विश्वस्स मगवदथिनेति तत्त्वमुपदिष्टमिति ज्ञेयम् ॥ ९,१० ॥ एवं ग्रन्थमुपदिश्योपसंहरन्ति इत्येवं भगवच्छानमिति । इत्येवं भगषच्छास्त्र गूह सत्यं निरूपितम् । य एलत्समधीयीत तस्यापि स्याहृढा रतिः ॥ ११ ॥ इति उक्त एवमनेन प्रकारेण मगवच्छास्ने यद्गूढं तत्त्वं तन्निरूपितम् । भगवच्छात्रं गीता भागवतं पञ्चरात्रं चेति निकम् । तसिद्धान्त एतावानवेत्यर्थः । गूढतत्त्वमिति विशेषणेप्ययमेवार्थः । उपसंहृत्यैतत्पाठक रानुसन्धानपूर्वकं पठितुरपि फलमाहुः य एतत्समधीयीत तस्यापि स्थाढा रतिः । ग्रन्थानुसन्धा- नातत्प्रवृत्त्यादिक्रमेणोक्तं फलं सर्वथा सेत्सतीति भावः ।। ११ ।। जिज्ञासितव्यमिदमुत्तमभक्तिचित्तैः सिद्धान्तरी तिमनुसृत्य मयातियत्नात् । क्लस निवन्धनमसौ विबुधेषु याचा दुष्यं वचो यदि तदा प्रथमं विभाव्यम् ॥ १ ॥ आरब्धमर्थधिषणैरनवद्यमेव व्याख्यासु कौशलकलानिपुणत्वमेव । तचेचिरं भवति तत्कृतकृत्यता स्सागोपालपादकमलद्वयसंनिविष्टम् ॥ २॥ संवत्सरे सप्तदशेतिरम्ये वर्षे शरश्रीपतिहस्तसंख्ये । दिने तथा श्रावणकृष्णपचयीकृतेसौ विवृतः प्रपन्धः ॥ ३॥ काहं मन्दमतिः कायं प्रपन्धस्तत्त्वसनहः । शिशूनां मासते रम्यं तथापि कलमापणम् ॥ ४॥ इति श्रीवल्लभात्मजश्रीवालकृष्णकृतभक्तिवर्धिनीटीका समामा । श्रीकृष्णाय नमः। भक्तिवर्धिनी। श्रीगिरिधरकृतविवृतिसमेता। श्रीविठ्ठलपदानला सर्वाभीष्टप्रदान् सतः । शन्दैः संक्षेपतोषैस्तु व्याख्यास्ये भक्तिवाधिनीम् ॥ १॥ अथ श्रीवल्लभाचार्यचरणाः परमकृपालवो भगवद्भक्तेः कल्पतरुखभावत्वात् तत्त्वमेव वृदन्तः स्वीयानां खमार्गीयभक्तिकल्पतरोवीजाबापमारभ्य फलपरिसाकपर्यन्तं प्रवृ. ब्युपायं प्रतिजानते यथेति ।
श्रीगिरिधरविवृतिसमेता। यथा भक्तिः प्रवृद्धा स्यात्तथोपायो निरूप्यते । चीजभावे दृढे तु स्यात्यागाच्छ्यणकीर्तनात् ॥१॥ येन प्रकारेण भक्ति प्रकर्षेण वृद्धि प्राप्ता स्यात् , तत्प्रकारकोपायो निरूप्यत इत्यर्थ । अनोपायत्वाविशेषात् जात्यभिप्रायेणैकवचनम् । तेन क्रमेणोत्तरोत्तर दृद्ध- तरतमास्निप्रकारका उपाया सन्तीति तानाहु । तत्र प्रथम चीजस्स दृढत्वे सत्सेवाग्रे तरो- रप्यविनाशित्व भवति, नो चेद्वातादिवशान्महानपि तरुनश्यत्येव । अतस्तमुपायमाहु बीजेति । बीजभाव श्रीमदाचार्यकृतभगवन्निवेदनानन्तर तन्मार्गानुसारेण मगवत्स्व- र पनिष्ठारूप , स यदा दृढो भवति, तदा भक्ति प्रवृद्धा सादिति प्रथम । तदनन्तर त्यागात् गृहादिसर्ववस्तुनस्त्यागे कृते सा दृढतरा स्यादिति द्वितीय । ततः श्रवणकी- तनात् भगवद्गुणरूपलीलादीना खदेहादिसर्वविस्मरणपूर्वक तद्रसपरवशतया श्रवण- कीती सिद्धे सा दृढतमा स्यादिति तृतीय ॥१॥ ननु दृढबीजभाव को वा तस्य दाय प्रकारश्च को वेत्याशक्य पूर्व सोद्देश वीजदार्यप्रकार ततो बीजभावखरूप चाहु पीजदार्थप्रकारस्त्विति । पीजदार्यप्रकारस्तु गृहे स्थित्वा स्वधर्मतः। अव्यावृत्तो भजेकृष्ण पूजया श्रवणादिभिः ॥२॥ स्वन्तत्वादेतप्रकारप्रवृद्धभावस्य विघातकोपि वक्ष्यमाणपदार्थोस्तीत्यस्याप्रौढत्व- मुक्त भवति । तथाचायमप्येक प्रकारो भवतीति त पूर्वमुद्दिश्या प्रकारमाहु ग्रहेति । खगृह एव स्थित सन् खधर्मत जीवस्य ये वैधा वर्णाश्रमधर्मास्तेभ्योऽव्यावृत्तस्तेषु व्यावृत्तिरहित सन् विशेपेगावृत्ति सतत तद्धर्मेष्वेवासक्तिपूर्वक वाकायमनसा परिभ्रमण तद्रहित पुष्करपत्रवत् तर स्थितोऽपि तान् लोकसग्रहार्थं यथाकथञ्चित् कुर्वन्नपि तेप्य- सक्त सन, पूजया तनुवित्तजया सेवया श्रवणादिभिरष्टप्रकारैश्च कृत्वा कृष्ण सदानन्द पुरुषोत्तम भजेत् सेवेत । एतेन लौकिकधर्मव्यावृत्ति विहाय पूजाश्रवणादिभगवद्ध ध्येय व्यावृत्त स्यादित्यर्थ । अत एव श्रीभागवते 'तावत्कर्माणि कुर्वीत न निविद्येत यावते त्यपेन मर्यादामागीयस कर्माचरणमर्यादामुक्रवा, अग्रे व्यवस्थया भक्तिमार्गीयस्यापि तामाहु 'मत्कयाश्रवणादौ वा यावच्छ्रद्धा न जायत' इति । अतो भगवद्धर्मेषु न्यावृत्तस्य लौकिकधर्माव्यावृत्तिर्युक्त्व । अथवा स्वधर्मत अव्यावृत्तः अनिवृत्त सन्। पूर्वदशाया चित्तशोधकत्वेन तेपामुपयोगात् । तदुक्तमेकादशे 'अस्मिलोके वर्तमान स्वधे- मसोऽनघ शुचि । ज्ञान विशुद्धमानोति मद्भक्तिं वा यदृच्छति ॥२॥ किय, न केवल भगवद्धर्मस्थितिमात्रेणाह कृतार्थोस्मि, नात परमधिक किश्चिद- स्तौति मन्तव्यम्, किन्त्वने पर्मिसम्बन्ध्यपि किश्चित् कर्तव्यमेवेसाहु व्यावृत्तोपीति ।
८८ भविषधिनी। व्यावृत्तोपि हरौ चित्तं श्रवणादौ यसेत्सदा । ततः प्रेम तथासक्तिव्यसनं च यदा भवेत् ॥३॥ घीजं तदुच्यते शास्त्रे दृढं यन्नापि नश्यति । भवणादौ व्यावृत्तोपि हरौ सर्वदुःखहर्तरि चितं यसेत् प्रयतेत । तया कुर्वन्नपि प्रेमसेवामपि कुर्यादित्यर्थः । यद्वा । ननु 'पावजीवमग्निहोत्रं जुहुया'दिति न्यायेन देहाप्यासवैपा धर्माः सहसा कयं सक्तुं शक्यन्त इत्यारान्याहुः व्यावृत्तोपीति । खधर्मेषु व्यावृतोपि ययाविधि यावच्छक्यं तान् कुर्वन्नपि श्रवणादिषु मगवद्धर्मेषु हरौ भगवति धर्मिणि च चित्तं यसेत् प्रयतेत । कायिकप्रवृत्त्यां तर व्याप्तायामपि वाचिकमानस्सौ ते भगवत्येव प्रयोक्तव्ये सर्वथेत्यर्थः । तावतार कार्य सिध्यतीत्पर्यः । एवं धीजदार्थप्रकारमुक्त्वा क्रमेण वर्धमानं पूर्ण च पीजमावमाहुः ततः प्रेम इति । ततस्तदनन्तरम् । अथवा । एवं क्रियमाणेभ्यः श्रवणादिम्यः पूर्व भगवद्विषयक प्रेम उत्सघते, ततः क्रमेण मगवत्यासक्तिर्भवति । ततोग्रे व्यसनं भवति । ध्यसने जाते तदेव दृद्धबीजमावपदवाच्यमित्याहुः पीजमिति । मक्तिशाचे नदेव र पीजमित्युच्यते । यदीजमुक्तप्रकारेण स्थिती रहें सत् कदापि न नश्यति ॥ ३ ॥ ननु प्रेमायवस्थास्तु मानस्यो भवन्ति, ताः कथं पृथक् पृथक् ज्ञायन्त इत्याशय तासां व्यावर्तकधर्मानाहुः लेहादिनि । लेहाद्रागविनाशः स्यादासरत्या स्याहारपिः ॥ ४ ॥ गृहस्थानां पापकत्वमनात्मत्वं च भासते। यदा स्वाद पसनं कृष्णे कृतार्थः स्यात्तदैव हि ॥५॥ भगवति सेहे उत्पजे तत्पूर्व स्थितस्पेतरविषयकानुरागस विशेषेण नाशः स्यात् । ततो यदा भगवत्यासकिजायते, तदा गृहे गृह्मपदार्थेषु चारुधिर्भवति । तत्र सित- पन्धुकलत्रादिपु किनिद्विशेषमाहुः गृहम्यानामिति । गृहस्थिता ये पन्धुकलपादयस्पा खस्मिन्स्यितभगवद्भावे पाधकत्वमत एवानात्मत्वं च स्वस्थ मासते । अपमारायः । गृहे ये पन्धुकलत्रादयस्वे सर्वे नेकजानीयमावाः, किन्तु विजातीयमावाधान्योन्यम् । तत्र केचन लौकिका दैहिकधर्मपराः, केचन वैयका मपि नानाविधनगवरमपराम मवन्ति । तया च भगवदासक्तिपूर्णानां मनमि तेषु सम्पपत्वेनोपादेयत्वं न परति । एकेषु स्वभावविघातकन्वेनैतत्सङ्गः सर्वात्मना न कर्तव्य एवेति भासते। अपरेषु वैप्शवत्वेपि विजातीयमाववत्वेन नैने मद्रास पोपराः, किन्तु विक्षेपका इति नात्मीया मवन्त्यतः समुपेक्ष्या एपेति मामत इति । अग्रिमावसामाहुः यदेति । यदेव कृष्णे सदानन्दे असनं तसोलपते, देव नार्यः साधितः मम्यगर्षः मतिपदार्थों येन तायः सात् । व्यसनखरू तु 'सगं युगातमिर पास येन दिनाऽभवत्' श्रीगिरिधरविभूतिसमेता। इत्यादि । व्यसनपदेन यथा धूतकामादिव्यसनिन ऐहिकपारलौकिकम्यो लजाभयादिक सहसा परित्यज्य ततत्परतयैवेवरानुसन्धानरहिता सन्तस्तिष्ठन्ति, तथैतेपि सर्व परित्यज्य भगवदेकपरा सन्तस्तिष्ठन्तीति ज्ञाप्यते । परमेतावान् विशेष , तत्र वैषयिकत्वादसद्प सर्वम्, अन तद्रहितत्वात्परमकाष्ठापन समिति । अन्यथा विषयाकान्तदेहाना नायेश सर्वदा हरे रित्याचार्या न वदेयु । तथा चैव व्यसनावस्थाया जातापामेव बीजभावस पूर्ण दृढत्व सादित्यर्थ । एव पुष्टिभक्तिकल्पतरो सर्वधाऽविनाशिदृढतम बीजभावो निरूपित । ततोऽग्रे शाखापत्रादिस्थानीयभावाना घृद्धिरनुक्तसिद्ध वेति हृदयम् ॥ ४,५॥ नन्वतिदृढत्वादोजमावस्स नाशो मास्तु, पान्तु तदुत्पन्नकोमलशाखापालवादीना पक्षिसगादिकृतकृन्तनवदिहापि बीजोत्पलावान्तरमावनाशस्तु सम्भाव्यत एवेत्याशय पूर्व नाशकपदार्थमुद्दिशन्ति तादृशस्यापीति । तादृशस्यापि सततं गृहस्थान विनाशनम् । स्याग कृत्वा यसेद्यस्तु तदर्थाधैकमानसः ॥६॥ लभते सुद्धा भक्ति सर्वतोप्यधिका पराम् । सजातव्यसनस्यापि सतत गृहस्थान गृहे स्थितिविनाशन चीजोत्पन्नकोमलभावाना विघातकमित्यर्थ । एवमुद्दिश्यैतत्प्रतीकारमपि बदन्त पूर्वोक्तमक्तिप्रवर्धकोपायेषु द्विती- यमुपायमा त्यागमिति । गृहादिसकलवस्तुनस्त्याग कृत्या यसेत्, व्यसनदा प्रयत्न कुर्यादित्यर्थ । अय त्यागस्तु सन्यासनिर्णयोक्तभक्तिमार्गीयतुरीयानमग्रहणरूप । तन सागेपि प्रकारविशेषेण स्थितिं वदन्तस्तृतीय मक्तिप्रवृद्ध्युपायमाहु यस्तु तदर्थार्धक- मानस इति । तु पुन य तदर्याकमानस स भगवानेवार्थ सकलपदार्थरूपो येया ते तदा खतम्रभक्तास्तेषामप्यर्थ मुख्य पदार्यस्तादृशमतै सह मियो गुणगा. नरूपान्तररमणालिका केवला वा विप्रयोगावस्था । तवैक केवल मुख्य च मानस यस तादृश सन् यसेत्, ततद्भावानुभव कुर्यात् , स सुदृद्धा कालादिमिरपि चाल यितुमप्यशपया सर्वत मुक्त्यादिभ्योपि अधिका परा परमकाष्ठापना स्वतत्रफलरूपा भक्तिं लभते प्राप्नोति । एतेन पूरोसैस्त्रिभिक्तिप्रवर्धकोशयै क्रमेणोत्तरोत्तरगधिका सुदृढा, सर्वतोऽषिका, परा चेति विविधापि भक्तिप्रवृद्धिरुता । ननु 'ज्ञान गुणाथ तस्यैव वर्तमानस्य प्राधका' इत्युक्ते कय गुणगानस परमफलत्वमुच्यत इति चेत् । मैषम् । ते तु मार्यादिका एव पापका, नैतन्मागीया । अन्यया तत्रैवाने 'गुणास्तु सङ्गराहित्याजीवनार्य भवन्ति ही त्याचार्या न वदेयु । नन्वधिक तत्रानुप्रविष्ट ग तु तद्धानि'रिति न्यायेन विरहे जीवनाशा तदर्य यवधोमो सुतरा न युक्ततराविति पेत् । न । जीवनमृते विरहजदुखसानुभवासम्भवात् । अन्पया पातपातादिनापि ११ मकि भक्तिवार्षिनी। ते जीवनमपहातु शक्यत एवेति तथैवोक्त स्यात् । अतो नेह तथा, यतो विरहस सम्परानुभवार्थमेव परित्यागस्य घोधनमस्तीति दिक् । एव फलपर्यन्त भक्ति सोपाया निरूपिता॥६॥ ननु सशात यसनसापि यत्तस्त्यागमृते न फलसिद्धिस्ततोऽसजातप्रेमाद्यवस्थ एव येनकेनापि हेतुना यथाकथचित्सजातस्प हादिविराग एवं कथ न सर्वत्याग फुर्याय- तम्तदनन्तर फलाऽवश्यभायो भवतैवोच्यत इयाशयाहु साग इति । त्यागे बाधकभूयस्त्वं दुःससर्गात्तधानतः॥७॥ साधनदशायामेव सागे कृते तन भूयासो बाधका सम्भवन्तीत्यर्थ । ननु किंमूलमादाय सम्भवन्तीत्याशङ्कायामाहु दुःसंसर्गादिति । दुष्टै सह ससर्गेण दुष्टाना दुष्टे वा अन्ने भुक्ते पाधका उत्पद्यन्ते । अयमर्थ । सधैं त्यक्त्या यन कुनचि- स्थितेनापि यतिना नैकाकिना नापि क्षुत्पिपासादितेन कश्चित्सातु शक्यते, अपकद- शापनखात्, तथा च तदर्थ दुरी सङ्के दुष्टान्न भोजने च कृते सर्व कृतमष्यकृतप्राय भव- तीति तथा । तदुक्त श्रीमदाचार्य सन्यासनिर्णये 'गृहादेधिकत्वेने त्यारम्य 'अतो- व साधने भक्तो नैव त्याग सुखावह' इत्यन्तेन । अतोस्मिन् भक्तिमार्गे साधनदशाया परित्यागो न कर्तव्य इत्युक्त भवति ।। ७ ।। नन्चेव च सति साधनदशापत्नै स्वमार्यादिकृतमेवादिप्रानिकल्यसम्मवे कुन कथ च स्थेयमित्याकाश'यामाहु. अत इति । अतः स्थपं हरिस्थाने तदीयैः सह तत्परः। अदरविप्रकर्षे या पथा नितं न दुष्पति ॥ ८॥ यत साधनदशाया त्यागे कृते वाधकभूयस्त्वमत एव हरेर्भगरत स्थाने निव- धोक्तेषु पुरुषोत्तमादिपु प्रजादिपु वा खेय स्थिति कर्तव्येत्यर्थ । अत एव नियन्धेपि खमार्यादि गातिकूल्येन गृहे स्थातुमयक्तस गृहादित्यागप्रकारमुक्तवन्त श्रीमदाचार्या, 'भार्यादिरनुकूलश्चेत्कारयेद्भगवक्रियाम् । उदासीने खप कुर्यात्प्रतिकूले गृह त्यजे'दिति । अय त्यागस्तु न तुरीयानमग्रहणरूप , किन्तु गृहस्थेषु कलनादिषु मध्ये एक द्वी यहरो वा ये एव प्रातिकूल्य सेवादौ कुर्वन्ति, तानेव यावच्छषय सजेदित्येवयोधक । अत एव 'गृह सजे'दित्यस्य विवरण 'गृह भार्यादिक मित्युक्तम् । दैवात्पुन सर्वप्रा. तिफूल्ये तु सेवावनिर्वाहात् खस सातुमशक्के गृहमेव परित्यज्य सेवादिसामग्रीमपि खसार्थ एक नीत्वा पूर्वोक्तभगवत्यानेषु यर कुवापि सित सन् तत्परतया सेवादिक कुर्यादित्याशय । एव च सति पूर्वोक्तत्यागनिषेधस्तु तुरीयानमीणत्यागपर एव । यतस्तत्र सेवाधवरम्बासम्भवेनाएकवेन च दु सङ्गदुशानभोजनादिक भवत्येव । ततु सर्वथा साधकम् । अत एवैकादशस्कन्धे दु सदस्य बाधकवमुक्तम् । 'सहन कुर्यादमतां शिश्नोदरनृणा ११ श्रीगिरिधरविवृतिसमेता। कचित् । तस्यानुगस्तमस्सन्धे पतत्यन्धानुगान्पव'दित्यादिभिः । दुष्टानसा तु पापकत्वमुक्तं पद्मपुराणे । 'अवैष्णवानामन्न च पतितानां तथैव च । अनर्पितं च यद्विष्णोः श्वांसस- श विदुरित्यादिगिः । पक्कदशापनानां तु ता नाचिदन्मप्यनुपरधियः स्वमात्मान- मदतथेद'मित्यादिना स्वरूपनिरूपणास्वारमादिसर्वानुसन्धानापगमादेव तत्तद्विप- याभावानां दुर्वारगर्वग्रहत्वमिति दिक् । एवमेषां वासस्थलमुक्त्वा स्थितौ प्रकारमाहु तदीयेरिति । भगयदेकारा ये भगवदीयास्तैः राह मिलिता तनिकट एव अर्थात् नैः सहैय बसन् सेनाशवणकीर्तनादिपरतया स्थेयम् । एतेन दुःसद्गदुष्टानप्रभना दोपा निवा- रिताः। नन्वतिपरिचयादव 'ति न्यायेन कथं सततं निकट एव स्थातु शक्यत इत्या- शाका प्रकारान्तरमप्याहुः अदूरेति । या अयया अदूरो दूरखामावः तदान यो विप्रकों दूरदेशस्तन स्पेयमित्यर्थः । अर्थात् नाति नातिनिकटे पर ततः किमि व्यवधानेन स्थेयम् । मिलनादिकं तु तैः सह नित्य सर्वथा कर्तव्यमेन । अन्यथा तदैवासुरमार- प्रवेशः सात् । अदूरमिति पाठेऽदूरमिति क्रियाविशेषणम् । अग्रे पूर्ववत् । नन्वेव चेत् किमिति व्यवधानेन स्थितिर्योध्यत इत्याशदायामाहुः पति । यथा यसकारकरिती स्वस्थान्येपां च चित कदापि न दुष्टं भाति तथा स्थेपमित्यर्थः । अनापं समुदायार्थः । भार्यादीनां सेवादापानुकूल्ये सति तैः सहैव सेवां कुर्वन् त कारयन्स्यगृहे स्येपम् । उदासीनेषु तेषु सरसु गृह एव स्वयमेव सेवादिक कुर्यात् । तदभावे तु तेयु प्रातिपन्य परित्यजेत् । सर्वप्रातिकूल्ये गृहमेन त्यक्त्या भगात्म्याने स्थितः भगवदीय मिलित्या सेग- कपादिपरतया तिछेत् । अथ तत्सहासे चेत्स्वमन मि तद्विपकं दोपादिकमामाति, अथवा स्वाटरशासेपामेव मनमि खरिपयकं तदापातीति मनमि सम्भाव्य तेभ्यः किमि दूरदेशे स्थिरता तव सेवादिकं कुर्यात् , तदनवमो तर गला तः मह अवपकीननादि- परतया तिछेदित्यर्थः सम्पतः । यद्वा । अदूरेनि । भगवरखानादेवादरमिक सेयम् । तनव स्थिती तु अतिपरिचयाद्रगवतो भगवदीयानां या विषयका अपराधा. सम्भान्ति, तेन तु स्वस चिन दुप्यत्येवेसत आहुः यति । यथैर खिते चित न दुप्पति सभेर सेपमित्यर्थः ।। ८॥ ननु घ्यसनानन्तरमपि फलदशापामेव दाधापामारना, तदा मुनरामेय साप- नदशायां सेनि कयं मुखेन सेवादिनिर्वाह इत्याशझापामाहुः सेवायामिति । सेयायां या कथायां पा यस्यामक्किदा भवत् । पावनीयं तस्य नाशो न कापीमि मनिर्मम ॥९॥ सेरायां तनुचिनायाम् अर वागदः सामापिसवाहकः । मेगा अग्रका- वनवमरे या सोन्यापमारे स्मयारि या मरिनव्यम्, नान्यपरता मारत पोधकः । अत एवोक नपरत्नप्रकारे 'पन्यथा तदैवासुरमार सादिति । क्यापा ९२ मक्तिवाधनी। श्रीभागवतादिश्रवणकयनादौ । अरवाशब्दः श्रवणकयनयोरन्यतरेणापि कार्यसिद्धिर्भवसति सूचकः । परमुभयोरपि ता तन ढासक्तिरपेक्षिता। ततो यावजी तसां सितायां तस्य मक्तस्य नाशस्तद्भावात् च्युतिस्तस भावस्य वा न्युतिः कापि इहास्मिन् जन्मनि जन्मान्तरे वाऽमुन च नास्त्येव इत्येव मे मतिः सम्मतिनिश्चयात्मिका बुद्धिर्वा । तथा च सेवायां श्रवणकीर्तनयोती यस दृढासक्तिर्भवति, तस्य तावद्भावात् व्युतिः कदापि न भवति, परमग्ने भाववृद्धिस्तु सभाग्योन्नतिसमये भगवतस्तद्भक्तानां च कृपया भविन्येवेति परमार्थः ॥९॥ नन्वेनं सर्वं त्यक्त्वा सितस तत्रापि चेत् कवनोपद्रावकः पदार्थः सम्पयेत, तदा तेन किं कार्यमित्याकासायामाहुः वाधेति । याधसंभावनायां तु नैकान्ते वास इप्यते । हरिस्तु सर्वतो रक्षां करिष्यति न संशयः॥१०॥ एकान्तेपि चेदाधकसम्भावना सालदा पुष्टिमागीयै हिलतया तवैव स्थित्वा भगवति मारो न देयः । अतस्तन तस्स वासो नेप्यते, इष्टसाधको न भवतीत्यर्थः । ननु पुनस्तन तत्रापि चेत्तत्सम्भवम्तदा 'लितो भ्रष्टस्तनो अट' इति न्यायेन कांदि- शीकस तस का वा गतिरित्याशशायामाहुः हरिस्त्यिनि । यतो हरिः सर्वदुःखहती, अतः सर्वतः । तसिलः सार्वविभक्तिकलात्पर्वेषां स्वीयानां सर्वेभ्यः प्रतिबन्धकेभ्यः सर्वेषु देशेषु सबैलौकिकालौकिकोपायैः सर्वप्रकारैम रक्षां नि.सन्दिग्धं भगवान् करि- प्यत्येवेति नान संशयात्मभिर्भवितव्यमित्यनवद्य सर्वम् । अन्यथा 'अनन्या' इति न मे मक्त' इति 'मां हि पार्थ' इति 'द्वि स्थापयती'लादीनि भगवद्वतानि पिरदानि च विफलीमवेयुः ॥१०॥ एवं भक्तिसाधनदशायामपि स्थित्यादिप्रकारमुस्त्वा उपसहरन्त एतत्स्तोरपाठम्य फलमायाहुः इतीति । इत्येवं भगवच्छास्त्रं गूढताव निरूपितम् । य एतत्समधीपीत तस्यापि स्याद् दृढा रनिः॥ ११ ॥ इतीति परिसमाप्तौ । एवं पूर्वोतप्रकारेण भगवच्छास्त्र भगवद्धर्मशिक्षक शास्त्रम् , अत एव गूई तत्त्व सरूपात्मकं यस्मिन्निति तादृशम् । खतत्त्वायितपुष्टिपुरुषोत्तमम्य सस्परमेव साक्षात्सम्पन्धजनकत्वमिति यावत् । तन्निरूपितं नितरामुक्तम् । एतन्मार्गीयो यः कोषि बा एतन्यानं सम्यगर्थीनुसन्धानपूर्वकं श्रीमदाचार्यचरणेषु श्रद्धाविश्वासा- दिपूर्वक चाधीपीत पाठ कुर्यात् , तस्यापि भगवति रतिढा म्यात् । ढवं तु मे णासक्तिन्यसनयोरनन्तराय नियतपूर्वभाववृत्तित्वम् । असायमाशयः । पूर्व सेहोत्स- बीद्वारकेशविरचितप्रकाशसमेता। त्यर्थ ये उपाया निरूपितास्तान्विनवैतत्पाठमात्रेणापि भगवति प्रेम उत्पद्यते । तदनन्तरं यथोक्तरीत्या सितौ तदग्निमावस्थास्ववश्यमाविन्य एवेति परमार्यः ॥११॥ अत्र युक्तमयुक्तं वा लिखितं यन्मयाज्ञतः । तदिहलः कृपासिन्धुरस क्षम्यतां मुदा ॥१॥ इति श्रीविठ्ठलनाथचरणकतानश्रीव्रजभूषणात्मजश्रीगिरिपरविरचित- भक्तिवर्धिनीविधृतिः समाप्ता ।। श्रीकृष्णाय नमः। भक्तिवर्धिनी। श्रीद्वारकेशविरचित्तप्रकाशसमेता। श्रीमद्वल्लभपादपनरजसः संस्मारणेनैव मे ज्ञातुं सर्वमशक्यमत्र सदसदैवेकिकं यत्परम् ।। ज्ञातं शक्यमसाध्यमेव नितरां साध्यं तदुक्तार्यत- स्तद्विश्वासवलाश्रयैकनिरतो वक्तुं प्रवृत्तोस्म्यहम् ॥ १॥ श्रीमदाचार्यवर्याणां चरणानुग्रहादहम् । तदुक्तवाक्यसन्दर्भ विमृशामि यथामति ॥ २ ॥ तन पूर्व यथा भगवान(न)न्यपूर्वाग्यस्तादृशरसोपयोगिदशाविरहादनाधिकारित्वमा- शंक्य तद मिमप्रयोजनसिद्ध्यर्थ साधनत्वेन त्यागात्यागहेतुकी मरिं ताभ्यः प्रयन्तीति भाव- फलोपकारावधि तदुत्पादकपीजभावत्वेन ताशरसात्मकं स्वरूपं भाररूपत्वेनेतनापनया तत्तदन्तःस्थापितमिति ततो भक्तिम्तयाने चरमणं फलमितिराद्धान्तसम्मतः पन्थाः । यध- प्येतदतिरिक्तानां भक्तानां 'बजे गोप्यो भविष्ययेति वरप्राप्तत्वासाम्प्रतमधिकाग्विं वर्तत एष, तथापि, 'प्रथमातिकमे कारणाभावादिति न्यानैतत्सहकार्यख एर फलदानम्, यत एतासामेय वरनासत्वेनात्र रमणविशिष्ट क्षमा दत्तास्तव्यतिरेकेण नाम्य सम्मानममिति नैतत्पूर्व तासां रमणमिति भावः । अत एवाने मगरदाकारणं तु तारदेन द्विषयकमेव स्पष्टीकृतं श्रीमदाचार्यः । तया सत्युभयोभगवतः प्राथमिकमबन्ध एव पीवम्, तदापाहा. नम् । भक्तिभरणारविन्दरूपातसा नैरन्तर्यमायनेनावसरे प्राहे पीजपरिपाकदशायां फलं साक्षात्स्वरूपानन्दानुभम इति यावत् । तर पुमारिकापामत्यागः, तन्यतिरिक्तानां न्याग इति स्थापितत्वात् । अत एव मताध्याये श्रीमदाचार्यरुत मत्यागस्त्यागादुचम' इति । नपावाप्याधुनिकदेवीमष्टयुत्पतानां जीवानां सर्वदोपदरीकरणाय तारशरमात्मरुभ- ९४ भक्तिवाधिनी। जनानन्ददानार्थ च ताटक्सेवनानुकरणोपदिष्टलेन श्रीमदाचार्यचर्यास्तदुभयपक्षमाश्रित्य साक्षात्फलप्राप्त्यर्थ नामस्मरणानन्तर फलपरिचयावधि साधनत्वेन भक्तिवृद्धिप्रकार निक- पयन्ति यथेति। यथा भक्तिः प्रहद्धा स्यात्तथोपायो निरूप्यते। वीजभाये दृढे तु स्यात्यागाच्छ्रवणकीर्तनात् ॥ १॥ 'माहात्म्यज्ञानपूर्वस्तु सुदृढ सतोप्यधिक स्नेहो भक्ति'रिति । यन वरप्राप्तत्वेन पूर्वकालिन:सस्कारकरणानन्तरमेन भक्ते प्रक्षिप्तवीनत्वम्, तत्र स्मरणनाहुल्यादरि तत्वम्, ततस्तथाले पल्लवितत्तम्, तथैव कुसुमितत्वम्, एतारन्मानक फलीकरणावधि वर्धकत्वमने कुतो न सादित्यनुसन्धेयम् ।सा प्रवृद्धा स्यादिति । प्रकृप्टेन वृद्धि प्रतिक्षण तागार्तिपूर्वकस्मरणाहुत्येन । तथोपायम्त प्रकारकाचरणोपायो निरूप्यते, उत्तरवाक्य एव विशदीक्रियत इत्यर्थ । वीजभारे दृढीकरणापेक्षकत्वम् , अन्यथा तुशब्दस्य पूर्व- पक्षव्यावर्तकत्वानापत्ति स्यात् । किश्य, वीजभावे दृढे सत्येवाग्रेहरभावमारभ्य फलपर्यन्त तदुद्भावनपूर्वक वर्धकत्वम् । अन्यथा कृतोपि सस्कारो व्यर्थ एव सात् । अत एव 'भावैरङ्कुरित'मित्याधुक्तयस्तु ताहन्त्री भावफलीकरणत्वमेवामिष्यञ्जयन्ति । वन विषयव्यवस्साभेदेन हेतुनयमुच्यते त्यागाच्छ्यणकीर्तनादिति । अन तामसाना त्यागादेव तथात्वम् । सात्त्विकराजसाना तु श्रयणकीर्तनादिनि योजनोभयव वेदित या । तथा सति पक्षद्वयविशिष्टविभागसमानाधिकरणस्येन हेतुनिरूपणप्रस्तावपि सामानाधिक रण्यातभिन्नत्ल खीकर्तव्यम् । अत एप त्यागादिति पृथगुक्ति , न तत्र समाहारे योजना अवणकीर्तनयोस्त्वेकवद्भावत्वेन तथात्वादत्यागपक्षमाश्रित्य श्रवणकीर्तने एव हेतुत्वेन निरूपिते, नतु त्याग । तस्मायथायोग्यतया हेतुनिरूपण ज्ञेयम् । अत एव 'श्रवणादि- सारभ्य प्रतियातु ततो गृहा निसन्तेन तदृढीकरणार्थमेव भगवता ययायुक्तम्, तथापि नाङ्गीकृतमेताभि, किन्तु 'स्वपक्ष एघादरणीय' इति न्यायात्याग एव तासा दास- म्पादकत्वम् ॥१॥ अत परमेतावन्मानक वीजदार्यमुपपाध तत्प्रकारमप्यने प्रकाशयन्ति धीज- दार्यप्रकारस्त्यिति । पीजदार्यप्रकारस्तु गृहे स्थित्या खधर्मतः । अव्यावृत्तो भजेत्कृष्ण प्रजया श्रवणादिभिः ॥२॥ मन कुमारिकावरप्राप्तसाधननिरूपणत्वेन प्रथमतस्तसकारमेव प्रचारयन्ति । अतस्तुशब्देन तत्प्रकारकातिरिक्तप्रकार व्यावर्तयन्ति । तद्यथा । गृहे स्थित्वा वध मत इत्यत्र स्खेत्यारमा भगवान् तद्धर्मत पगुणैश्वर्यादिकमनुभवन् ताशरसभोक्रीणामाच- , श्रीद्वारकेशविरचितप्रकाशसमेता। ९५ रणं ज्ञात्वा भोदित्यन्वयः । अथवा, यथैताः स्वस पूर्व भगवद्गृहीतपुंस्त्वाख्यधर्म- मधुन। प्राप्य पूर्वकालीनोपदेशजनितसंस्कारस्मरणपूर्वकं तद्ब्रजनं कुर्वन्ति, तथैतन्मा- गीया अपि 'स्वधर्मत' इति नामस्मरणपूर्वकसंस्काररूपवरणप्राप्तौ तदनुकरणत्वेनैतजनं कुर्वन्त्वित्साशयेन श्रीमदाचार्यवर्या आहुः खधर्मत इति । एतत्प्रकारानुसारेण स्वपमब्यावृत्तः सर्वदा । व्यावृत्तिर्व्यवहारः । स तु सन्निपातः, तद्रहितः सन् कृष्ण फलात्मकं सदानन्दवाचकं पूजया श्रवणादिभिरित्यत्र, तया पुष्टिमार्गीयया 'पन्यास्त्विति वाक्यपदनिरूपितया, तथा श्रवणादिनवप्रकारकभक्तिभिरपि तत्तावम- माश्रितमेव भजेत्सेवनं कुर्यात् , तदप्यान्तरिकम् , नतु याह्यमित्यर्थः । अथवा । तासां कामरूपाणि वस्त्राणि गृहीत्वा पूर्व नीपमारुह्य पश्चात्तत्रैच दानत्वेन तासु यथा भगवसूजनत्वम्, तथैवाने सातित्रियोत्तरीयकल्पितासनदानवेन ताभिरपि भगवान् पूजित इति लक्ष्यते । अत एव तत्रोपविष्टो भगवान्स ईश्वर' इत्यान तछन्दपरामर्शस्यैव तदुद्धादकत्वमेतत्प्रकारकाचरणं कर्तव्यमित्यर्थः । सर्वदा भावनीय इति संक्षेपः । अतएव व्रतचर्यायां प्राग्जन्मपुरुषत्वाख्यधर्मा अपि वयस्थतां । प्राप्ता ये तैः सहागच्छन् संवन्ध सूचयन् हरिरित्यन श्रीमत्प्रभुभिस्तथैवोक्तमिति प्राथमिकसंपन्धस्यैव धीजभावत्वम् । ननु.ते तु ऋषयो मननशीला मत्रद्रष्टारः सर्वात्मना भगवदुक्तसाधनकरणत्वेनैव प्रत्यहं गृहस्थितमेवारत्य तदाज्ञापालनपूर्वकं भजनं कुर्वन्ति, अयं तु प्राकृतः, कथं तत्साधनाचरणं कर्तुं शक्यत इत्याहुः व्यापृत्तोपीति । व्यावृत्तोपि हरौ चित्तं श्रवणादौ यतेत्सदा । ततः प्रेम तथासक्तिपसनं च यदा भवेत् ॥३॥ पीजं तदुच्यते शास्त्रे दृढं यनापि नश्यति । वस्तुतस्त्वयमप्येको पीजदार्यप्रकारान्तरः, तस्मात्स्वयं व्यावृत्तोपि संसारासक्तः सनधि हरौ सर्वदुःखहरणशीले भगवति गजराजप्रास्ताविकताइपराक्रमानुस्मरणपूर्वक चित्तं संस्थाप्येति शेषः । सदेति कालापरिच्छेदकत्वेनैव श्रवणादिषु नवप्रकारकभक्ति सदृद्धिप्रकारस्फूर्त्या यतेत् । तद्विपयकं यत्नं कुर्यादित्येतत्प्रकारेणापि सा प्रश्रद्धा स्यादिति पूर्वेणान्नयः। ननु पूर्वोक्तपकाराचरणेनाग्रे किं साधितमिति प्रेमादीनां प्राप्तिमपि सूचयन्ति ततः प्रभात । ततः तदृदयनन्तरं पूवाताधिकरणकएप तयात्ने पापापनारूमापन पते, येन भक्तिवल्ली प्रत्यहं प्रतिक्षणं सिवनविषयीक्रियते । तया आसक्तिभावविशेषः । स तु पुप्पागमरूपः । अब शास्त्रार्यस्य परिज्ञानात् मावस्य कलिका भवेदिति पायोक्तीयों- नुसन्धेयः । तया सत्सेतप्रकारकासक्तेः प्रेमोत्तरभावित्वं युक्तमेव । अत एव श्रीमदा- चारपि तथैवोक्तम् । 'आसक्तिः प्रेमपूर्वव प्रेमापि हरिणा कृतमिति । तया व्यसनं च येन विना क्षणमपि स्थातुं न शक्यते, ता पीजादारम्प फताविष्कारावषि भक्तिवर्धिनी। सर्वत्र भावनीयम् । एक यदा भवेत्तदा न काप्यनुपरत्तिः । अथवा । अत्र चकार समु घयार्थक । तथा सति प्राथमिकयबन्धो वीजभाव । तस्मात्स्वभावतो वृद्धि प्राप्ता भक्ति चली, तदुद्भूत प्रेम पलास्थानापन्नम्, तजनितासक्ति पुष्पागम । ततो व्यसन च फलत्वेन स्वरूपैकनिष्ठत्वम् । एतेषा वीजत्वजातिविशिष्टसमानाधिकरणत्वेनैकजातीयत्वम् । तथा मति मूढीकरणखेनैव सर्वत्र तथात्वमिति मावनीयम् । तदेवाने निरूप्यते वीज तदु च्यते, शास्त्रे भगवच्छास्त्र, श्रीमागवतगीतानारदपञ्चरानादावपि, यद् दृढ नापि नश्यति, तत्तु प्राथमिकसवन्धकालीनमिसध्यवसेयम् । अत पर प्रेमासक्तिम्या यज्ञात तदाहु लेहादिति । लेहाद्रागविनाश स्यादासक्त्या स्याद्गुहाचि ॥४॥ गृहस्थाना बाधकत्वमनात्मत्व च भासते। यदा स्थायसन कृष्णे हतार्थ स्ात्तदैव हि ॥५॥ तादशस्यापि सतत गेहस्थान विनाशकम् । त्याग कृत्वा यतेद्यस्तु तदर्थार्थेकमानस ॥६॥ लभते सुद्धा भक्ति सर्वतोप्यधिका पराम् । त्यागे घाघकभ्यस्त्व दु ससर्गात्तथानत ॥७॥ अत स्पेय हरिस्थाने तदीय सह तत्पर । अदरे विमर्प या यथा चित्त न दुप्पति ॥ ८॥ संवाया या कथाया वा यस्थासतिढा भवेत् । याबजीय तस्य नाशो न कापीति मतिर्मम ॥९॥ बाधसभायनाया तु नैकान्ते यास इप्यते । हरिस्तु सर्वतो रक्षा करिष्यति न सशय ॥ १० ॥ अब स्नेहपदेन भक्तिरुच्यते । तत्र धात्वर्थ सेवा, प्रत्ययार्थ 'प्रेमेति । तेन रामदि नाश स्यात्, भगवत्स्वरूपानिरिक्तवस्तुमात्रेषु यो राग अनुरअन तस्स विशेषेण नश्वरत्वेन नाश अप्रतीति स्यात् । तथा आसत्यापि गृहारुचि' स्यात् । तर 'न गृह गृहमित्याहु गृहिणी गृहमुच्यत' इति वाक्याचादृशासक्त्या परिग्रहावरुचिस्तूचिततरा । अथवा । नैते आत्मसधिन , कि तु देहादीनाम्, प्रत्युत तादृशभावनिरतस्यालौकिकभावविघातका एव, नतु साधका , इतोषि तदनासत्तौ तस्य न किमपि साधकम्, प्रत्युत तथात्वे तथात्वमिनि ! अग्रिमवाये तथैव निरूप्यते गृहस्थाना याधकत्वमिति । भगवति पयकसस्कारानुभूतकर्तृणा तु श्रीपुत्रादिष्वनात्मत्व भासत एव । चकाराद्वापकत्वमपि । तथा सति तत्सङ्गो न विषय इति तात्पर्या । अयमा व्यसनभाववत्तानुपपत्ति स्यात् । अतस्तसैवाने सर्वत्र साधकत्वेनाधिकारी विषयीरियते यदा स्यादिति । , , 4 श्रीद्वारफेशविरचिवप्रकाशसमेता। यस्मिन्काले कृष्णे फलात्मके पगुणैश्वर्यसम्पने भगवति व्यसनं तदेकनिष्ठवं पूर्वो- क्तविधिना स्यात्तदैव कृतार्थः स्यात्, नात्र सन्देहः कार्य इति सिद्धम् । हिशम्दस्तु प्रसि- द्धावेव । तथा सति व्यसनं वरणकालीनमेवाभिव्यज्यते । अत एवाग्रे तादृशस्यापि व्यसन- भावप्राप्तस्स सततं निरन्तरं गेहस्थान गृहस्थितिर्षिनाशक विशेषेणोकसंस्कारविघातिकेति यावत् । अतस्त्यागपक्षमप्याश्रित्य तत्प्राप्तिप्रकारमाहुः त्यागं कृत्वेति । यत्तु पर- मकृपाशीलः सर्वात्मना निरुद्धः सन् , अत एव तदर्थार्थकमानस इति विधेयविशेषणम् । तन भगवतो योर्थः प्रयोजन तदर्थमेव तनिष्ठगेक मानस यस । अथवा । भगवदर्थमेव यत्प्रयोजनं तय मानसिकी प्रवृत्तिर्यस्येति त्यागसांमुख्यम् । अत एवात्र तुशब्दस्तूल्क- पोधायकः । तद्यथा। ब्रजसीमन्तिन्योन्यपूर्वाः सर्वथा त्यक्तूमशक्यानित्येतादृशानपि पदाथी- स्त्यक्त्वा पीजभावरूपां भक्तिम् , तथैवाने स्वरूपदर्शनस्पर्शनभापणमिलनादिकमेतासां जातमिति, तथानापि य इति सामान्यनिर्देशात् कोपि तदर्थार्थकमानसः पूर्वोक्ताचरण- शीलस्तादृशासक्तिभरण गृहादित्यागं कृत्वा यतेत्, भगवत्प्राप्तिविषयकमेव यज्ञ कुर्यात् , स पूर्वोक्तसामानाधिकरण्येनैव सुदृढां खेहरूपाम् , तत्रापि सर्वतोप्यधिकां नवप्रकारकभक्त्यपेक्षयोत्कृष्टत्वेन तामकारकाम् । अत एव 'सुदृढ. सर्वतोषिका स्नेहो भक्तिरिति लक्षणखेन प्राप्ताम् , अत एव परामुत्कृष्टाम् , यतः साक्षाद्भगवञ्चरणार- विन्दानुग्रहनिष्ठैकशीला तां लभते, प्राप्नोति, तत्कृताचरण करोतीत्यर्थः । तथापि त्याग- क्रियानौचित्यमेवारत्याग्ने तद्विपयकवाधमाहुः त्यागे पाधकभूयस्त्वमिति । अन साधनदशापन्नत्वेनाधुनिकजीवानां तदपेक्षया न्यूनत्वम् , 'सत्यज्य सर्वविषयांस्तव- पादमूल'मिति प्रकारस्य तत्रैव सिद्धत्वादत्रत्यानां तथाकरणे घाधकबाहुल्यमेव । तत्र हेतुद्वयं निरूप्यते दुःसंसर्गात्तथान्नतः । खापेक्षया विरुद्धधर्माचरणशीला एव दुष्टाः । तेषां संसर्गात्सहवासकरणत्वात्स्वस्य तदुपार्जितान्नभक्षणाद्वा तथात्वम् । यत एव बाधकापत्तिस्तत एवाग्रे स्थितिप्रकारः प्रकाश्यते । अत. स्थेयमिति । अस्माकारणादेव तद्रहिते देशे हरिसाने सर्वदुःखहरणशीलस्य ततलीलास्थाने तदीयैर्भगवत्सरैर्भगवदीयैः सह स्थेयम् । अथवा। भगवदुपदिष्टस्थाने वृन्दावनादौ स्थितिः कर्तव्या । तन तादृशैः सह वासकरणे पूर्वोक्तहेतुद्वयप्रतिबन्धोसादकानामनवसरपराहतत्वम् । तनापि अदूरे पिम- क चेति । यथोपक्रमे प्रकारद्वय तथोपसहारेपि तथावं योध्यते । अत्यागपक्षे तावददूरत्वेनैव थितिः कर्तव्या, त्यागपक्षे तु विप्रकर्षेणैवेति योजना । अत एव श्रीमदाचार्यैरपि पूर्वोक्तव्य- वस्थापूर्वकवाक्यद्वयमुक्तम् । अथवा । अदर इति वाक्यद्वय प्रतिपक्षे भिन्नतया योजनीयम् । एतत्प्रकारेणैव तन स्थेयमित्यग्ने सून्यते । यथा चित्तं न दुष्यति । एतत्प्रकारक- स्थितावेव चित्त न पित भवतीत्यर्थः । अत.पर पूर्वोक्तरीत्या यावजन्मसफलीकरणार्ये मिन्नत्वेन व्यवस्थापूर्वक साधनद्वयमुच्यते । 'सेवायां वा कयायां वे'त्युक्तो यथाक्रमा- १३भक्ति.
९८ भक्तिवार्षिनी। नुरोधेनासपूर्वाणां सेवायामिति धात्वर्थम्यानुकृरलेन भगवान एवासक्ति । सपूर्वागांतु भगवतुणानुवादत्वेन कथायामेरसा। तब कथामृतमित्यादिवाक्येषु तथा निरूपितत्वात् । उमपत्र वाशन्दो दिकल्पलेन तन्मानक बोधयति, अन्यथा एकेनैव तेन चारितायें सति द्वित्वनिरूपणवानतिप्रयोजनलात् । अत श्रीमदाचार्यवर्या स्वकीया प्रति निराधि- करुणावत्वेन म्यानुभवपूर्वकोमयपक्षीयासत्तिनिरोधस्त फलवेन प्रतिपादयति सेवापां वा कथायां वेति । अनेन सेवाकथयो स्वरूपात्मकत्व सूचितम् । आसक्तिममन्यायेन तयोक्ति । अथवा विकल्पत्वेन यस्येति सामान्यनिर्देशात्परमभाग्यवतस्तस्कृताचरणशीलम्य आसक्तिनिरोप दृढ इति प्रपश्यविस्मृतिपूर्वकत्वेन समवेत्तस्स यावजीव शरीरस्थितिपर्यन्त पूर्वोत्तरीत्या नाश छापि कस्मिलपि देशे समये वा न दृश्यत इति शेष । 'स्वानुभूत प्रकारज्ञापनाय में मतिरित्युक्त पन्त । अत परमेतत्प्रकारकाचरणका कदापि स्थितिपक्षे पापसमावनाया जातायामपि खयुद्ध्यान्यनैव मया सेयमिति पक्षो निराक्रियते। पाधसम्भावनाया तु एकान्ते वासो नोचित । वैराग्यवशान्महारण्यादौ थितिर्न कर्तव्या । किन्तु यय साक्षादगवदाविर्भाव वहदये सानुभूतो भवति, तवैव सेयमि- येकान्तपदतात्पर्यम् । अत एव नेप्यते नेच्याविषयीक्रियते । कुतस्तत्र हेतुरुच्यते हरिस्त्विति । यथा ब्रजरला सर्वतो भगवता रक्षिता , 'विपजलाप्यया'दितिवाक्य पटकथनात्, तयात्मविपयिणी या रक्षा ता सर्वत पूर्वोक्तदुष्टसमूहादपि परिष्यत्येव । अनापि खमत्यैवोक्त न सशय इति । सशय सर्वथा न कर्तव्य इत्यर्थ । हरिस्त्वस्या न्यथानुपपत्यैव तथा निथीयते । तुशब्दस्यापि तथैवोद्घाटकत्वम् ।। अत परमुपसहरति इत्येवमिति । इत्येव भगवच्छास्त्र गूढतत्वं निरूपितम् । प एतत्समधीगीत तस्यापि स्यादृढा रतिः ॥ ११ ॥ पूर्वोक्तप्रकारेण भगवच्छास्त्र श्रीमागवतभगवद्वाक्यनारदपश्चरामादिक तत्तु भग- यत्कथितमुपदिएमपि गूढत्वेन यत्तत्व एव मदयोंज्झितलोकवेदे त्यत्र यथोक्त तन्मया तदुक्तपकारेणेव निरूपितम् । नासबन्धकरणादित्याद्याज्ञाविषयत्वात् । एतदध्ययनकर्ट णामपि पूर्वोक्तसिद्धिरित्याशयेनोच्यते य एतत्समधीपीतेति । य इति समान्योक्त्या कोप्येतत्सृष्टिगतभाग्यशील परमादरेणार्यानुसन्धानपूर्वक तदुभयाचरणकर्तृलेनैतदध्ययन करोतीति । तनापि नियमनैयत्येन सम्यक्त्वम् । तेन तस्यापि दृढा रविर्भगवद्विषयको नाप सा सुद्ध म्यादिन्यल निम्तोगा । श्रीमदाचार्यचरणानुग्रहादेत निर्णय । कृतस्तदुक्तवाक्याना सुनाना तोपसिद्धये ॥ १॥ इति श्रीद्वारकेशविरचितभक्तियाधनीप्रकाश ।