Central Library, University Of Rajasthan
Vyadhinigarh Prastoshdsangrh
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PREFACE Though small in size, this book Vyadhi grah contains some of the most potent and Valäable exseriments. Embodied in it there are several novel methods of treatment and experiments hitherto unseen in other books. A Jain Goril named Vishram is the author of this book. While giving his introduction, the author writes : " There lived a Gorji-priest-named Jisva in a place called Agamgachba at Arjunpur:"( Anjar ) in Koorma Desh ( Cutch ). His disciple was Pitamber Gorji and his disciple Visbram Gorji has written this 'Vyadbi Nigrah on the fifth day of the dark half of Bhadrapad, Samvat 1839, (A. D. 1783 ) the day being Thursday”. The language and and the construction of verses in this volume were crude and faulty in many places. Hence some correcticns have been introduced therein but grary matical mistakes have beco kept upcorrected intentionally in various verses. Such tiny faults should not be looked to minutely in such useful works They do not any way minimise thei importance. The took would have remained equally useful and va'uable even if the author had written it in bis mother tongue. Real credit is however due to him that he yrote it in a verse form according to his knowledge of Sanskrit Janguage. Hence, readers, if they be knoping Sanskrit well, should not constructional mistakes in this in any onn look-stofftim ૨ work, but they should sincerely thank its author for affording to the people at large excellent, simple, easy and ready-at-hand household remedies and experiments. १ चेला मोतीचंदजी माहदजी चांपसी पठनार्थ श्री मांडवी विंदरे सं. १८७२ चैत्र शुदी ५ गुरौ लिपीकृत २ लि. ऋ. शिवजी मालजी शिष्यार्थ पठनहेतवे सं. १८७३ ना वर्षे माहा विद १४ शुक्र ३ पूज्योत्तम पूज्यजी ऋपिश्री ५ भालजीजी तत्- शिष्य पूज्योत्तम पूज्यजी ऋपिश्री ५ शिवजीजी लिपिकृतं तशिष्य ऋख गोपालजी मोतीचंदजी राजकोट मध्ये लिपीकृत्य संवत १९४७ ना ज्येष्ठ शुदी ३ वार भौमवारे बार उपर न वागे लखी ४ संवत १९०६ रा वर्षे शाके १७७१ प्र० मृगशिर शुक्ल प्रतिपदायां १ तिथौ गुरुवासरे पूज्य म श्रीश्रीश्री १०८ श्री जिनापयो सूरीश्वरजित् रतलाम चतुर्मासके गुरां साहिवजीजी १०८ श्रीश्री कस्तूरचंदजी तेपां शिष्य पं. चंद्रभाणलिपि ॥. खरतर श्री भावहर्पसूरी गच्छे पलिका चतुर्मासिके Four manuscript copies of this book were procured. Two of them were in Rasasbala Granth Bhandar and the other copies were given to me by Jain Gorji Mohanlalji Maharaj of Tankara, whom, I take here an opportunity to thank with a sincere heart. Books of proved merits on Ayurved are often to be found in Jain Granth Bhandars, but public at large scarce obtain their a . -- two . such Their crae knowledge is transmitted by din Gurus to their disciples and their benefits are reaped mainly by followers of Jainism. If such :'valuable works in Jain Granth Bhandars and in possession of Jain priests and Gorjis be pablished, a great, nery light will be thrown on the domain of Ayurveda. There will be an excellent addition to its literature and Vaidyas will come to know some of the most successful remedies to care several diseases, generally regarded incurable. It is our humble request : to Jain Sadha Mabarajs and to the Secretaries of Jain Granth Bhandars to communicate with us if they have with them valuable manuscripts, volumes, notes, pamphlets etc. on Ayurveda. We shall arrange to get them copied and published, which will be a permanent boon to humanity. The mother-tongue of the author Kathiawari-Cutchhi. So in many places he has given a sanskritised form to several words. - Such forms will not be found in any of the Ayurvedic Dictionaries or Nighantu. So to ward off the difficulties of the readers, a new commentary on this book has been prepared and published alongwith. : Gondal Rajvaidya Jivaram Kalidas 26-10-39. Shastri was 20:- - रसशाला औषधाश्रम गोंडल काठीआवाडकी पुस्तकें रसोद्धार तंत्र-गुजराती १८ वी आवृत्ति पृष्ठ ४०० पोस्टेज सह रु. १॥ रसप्रकाश सुधाकर-मूल श्लोकके साथ गुजराती टीका ३री आवृत्ति छप रही है पक्का कपडेका जिल्द रु. २ पार्वतीपुत्र श्री नित्यनाथसिद्ध विरचितरसरत्नाकरांतगतः ऋद्धिखंड हजारो किमियागर लोग जिस ग्रन्थ प्राप्त करने के लिये हजारो रुपया खर्च करनेपर निराश होते थे वह ग्रन्थ छप गया है। हजारो रुपया खर्च करके बडे परिश्रम के पीछे यह अन्थ प्राप्त किया है किमियागरोके लिये और धातुवाद लोह- सिद्धि देहसिद्धि के लिये परिश्रम करने वालोंके लिये यह अन्थ वडा प्रकाश कर रहा है इसका मूल्य जितना रखे कम है क्योंकी हजारो रुपया खर्च करने पर भी यह ग्रन्थ प्राप्त होना असंभव था । मूल्य रुपया १५ पंधरा श्री भगवद् गीता अंग्रेजी और संस्कृत-मूल्य रु. ५ पांच. अंग्रेजी सिद्धिदात्री टिप्पणी और ३ अध्याय पर राजवैद्य जीवराम कालिदास शाचिकृत चंद्रघंटा नामकी सस्कृत टीका और उसका अंग्रेजी भाषांतर के साथ छपी है। आज कल जो गीता प्रचलित है उसमे :५० जगह पाठभेद और ४५ श्लोक कम है इस पुस्तकमें २२० पाठभेद देकर उनका प्रतिपादन किया गया हैं देश विदेश से बडे वडे विद्वानोने और प्रतिष्ठितं वर्तमान पत्रोंने समालोचना कि है पक्का कपडे को सुनहरी वाइडोंग है।
५
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श्री सूक्त
श्री भगवद् गीता-रिव्युस एन्ड ओपीनीयन्स
पका सुनहरी नाम कपडे फा वाइडींग यह उपर छपी हुई
गीतापर देश विदेशके गण्य मान्य विद्वानो के अभिप्राय का
पुस्तक ६. पृष्ठ १२० मूल्य ०|| आठ आना
- आने
पका चाइडींग ११२ पृष्ठ लक्ष्मी श्वर्य प्राप्त करने का
यह घेदोक लक्ष्मीका स्तुति पाठ है मूल मंत्रके साथ श्री
प्रसादनी नामक संस्कृत टीका और गुजराती भाषांतर के
साथ छपी है इसमे अनेक प्रयोग भी दीये है।
संवत १९९६ (इस्वी १९४० के अक्टोवर तक ) जिसमे
दुनियाका भविष्य ७ कोलम मारकेका दिया है मूल्य ०-२-०
पोस्टेज ०-१-३
( रसशाला की पुस्तक विक्रीसे मिलनेवाला द्रव्य धर्मार्थ
मे हिं व्यय होता है)
-
रसशाला औषधाश्रम गोंडल
काठीआवाडनां केटलांक औषधो
भस्म कूपीपक्व रसायन पर्पटी
१ अभ्रक भस्म १००० (सहस्र पुटी)
किंमत-तोला १ ना रु. २० वीश. आ भस्म वधी
जातनी उधरस क्षय संग्रहणी केन्सर श्वास महाकुष्ठ वगेरे
महा रोगोने मटाडे. योगवाही रसायन छे, घणी शक्ति
आपे वाजीकर पौष्टिक छे. मात्रा-सवार सांज एक रती
मध माखण के घी साकर साथे लेबी.
२ अभ्रक भस्म ५०० पुटी । किंमत-तोला १ना रु.
१० दस. मात्रा १ थी २.रती सवार सांज मध घी
माखण साकर दुध के मलाइ साथे लेवी. छातीनो बळ- तरा दाह मगजना फेर चक्कर नवळाइ फेफसांनो श्वासनळी- नो सोजो मटे, भुख लागे शक्ति आवे नवळाइ धातुस्राव वीर्यदोष मटे. ३ अभ्रक भस्म १०० पुटी । र. तं. । किंमत-तोला १ ना रु. १॥ पोणा बे. मात्रा-१ थी ३ रती मध माखण के घी साथे बे वखत लेवी कफन्न शक्तिप्रद पौष्टिक. ४ कांतलोह भस्म १०० पुटी। किंमत-तोला १ ना रु. ४ चार. वीर्य आयुष्य आरोग्य वळ वधारे, पांडु आमदोष वधेली चरवी लीवर आमवात हरस कमळो वगेरे रोगने मटाडे उत्तम पौष्टिक छे. ५ ताम्रभस्म १०० पुटी किंमत-तोला १ ना रु. २॥ अढी. मात्रा-१ रती सवारे १ रती सांजे मध पीपर साथे के मलाइ साथे आपवी, उधरस छातीनो दुखावो सोजा पेटनां दरद मटे छे. ६. प्रवालभस्म चंद्रपुटी । र. तं.। किंमत-तोला १ ना on बार आना. मात्रा-२ थी ४ रती मध घी मलाइ के दुध साथे. कफ पित्तनुं शमन करे पडतुं लोही सुकी उधरस. छातीनो दुखावो दाहं मटाडे विषविकार अने भूत प्रेतनी वाधा तथा मंगळ ग्रहनी नडतर मटाडे. ७ बंगभस्म गोरक्षनाथो पीळी । र. तं. । किंमत- तोला १ ना रु.५ पांच. मात्रा-सवार सांज बबे रती मध माखण के मलाइ साथे. बळ वधे खोराक पचे, मुख लागे बुद्धि सौंदर्य आरोग्य धातु वीर्य वंधे, मधुमेह वीर्यना अने ऋतुना रोग मटे. ८ मंडूर भस्म लाल ।र. तं.। किंमत-तोला १ ना
७
०॥ आठ आना. मात्रा-१ थी २ वर्ष सुधीना वाळकने
टंक १ थी.२ रती भोटा माणसने २ थी ४ रती, मध
माखण के दुध साथे अपाय. शीतवीर्य छ, वाळकोर्नु
दुवळापणुं पेटनां दरद लीवर वरल वधी होय. लोहीनी
फीकाश वगेरे बाळकोनां दरदमां फायदो करे छे. पेटनां
दरद कमळो काळो कमळो हरस नवळाइ वगेरे दरद मटे छे.
९ मंडूरभस्म गोरक्षनाथी । र. तं.। किंमत-तोला
ना रु. २ वे. मात्रा-गुण-मंडूरभस्म लाल प्रमाणे. मध के
दुध साथे. विशेषमा पौष्टिक आयुष्य वळ शक्तिवर्धक छे.
१० मुक्तापिष्टी नं. १ (साचां मोतीनी पिष्टी) (आ
पिष्टी उंची जातना मोतीना बने छे) किंमत-तोला ?
ना रु. १०० सो. मात्रा-१ रती सवारे १ रतो सांजे
मध घी भाखण साथे मलाइ के गायना दुध साथे अपाय
2. गरम खांटी चीजो ओछी खावी. आ मोतीनी पिष्टीन
हमेशां सेवन करे तो ते माणसने गढपण आवे नहीं, आंख
कान मगज विगेरे इंद्रियो छेक्ट सुधी वळवान रहे शरीर
निरोगी रहे आयुष्य कांति प्रतिभा, बुद्धि, स्मरणशक्ति
हृदयवळ पराक्रम वधे, शरीरमां लोही भराय दरेक जातनी
नवळाइ मटे; क्षय उधरस दम मंदानि पित्त दाह कफ
गांडपण मगजनो दुखावो स्त्रीओना गर्भाशयनो रतवा आं-
खनी गरमी हरस पडतुं लोही वाइ जीर्णज्वर खोटी गरमी
मटे, स्फुति उत्साह वधे मन हमेशां आनंदमां रहे संतान
उत्पन्न थाय.
११ मुक्तापिष्टी नं. २ (आ पिष्टी साधारण मोतीनी
वने छे) किंमत-तोला १ ना रु. २० वीश. मात्रा-गुण
मुक्तापिष्टी नं. १ प्रमाणे.
८ ११ लोहभस्म १०० पुटी किंमत-तोला १ ना रु. १॥ पोणा वे. मात्रा-सबार सांज वबे रती. शक्ति वळ वीर्य कांति मुख. वधै सोराक पचे मोझ उवको अजीर्ण अम्ल- पित्त वरल लीवर बवेली चरबी लोहीवगाड हरस पटनां जंतु आमवा गूळ नवळाइ मटे शक्ति आवे. १२ सिद्धहरताल भस्म ४४५ पुटी किंमत-तोला 'ना रु. ५० पचास. मात्रा-०॥ थी १ रती घी के मध साये चाटवी. २१ थी ४० दिवस सेववाथी १८ जातना कोड लोही बगाडनां दरदो भगंदर नामुर पत गळकोह सफेदकोह सन्निपात अपस्मार उपदंश फिरंगरोम हाथीपग ग्रंथी सोजो मुबावडीना वधा दरदो, पक्षघात ८० जातना वाना रोग उयरस श्वास क्षय वधी जातना हरस, संग्रहणी मधुमेह वधैली चरबी आंतरडांनुं वधव॑ एपेन्डीसाइटीस कंठमाळ आमवात वगेरे रोगो मटेके. १३ सुवर्णभस्म रक्त किंमत-तोला १ ना रु. ५० पचास. मात्रा-सवार सांज अंकक रती मघ माखण के मलाइ साथै. शीतवीर्य कामोत्तेजक पौष्टिक वन्वर्धक है. वृद्धाव- स्था आववा देती नयी वृद्धावस्थामा जुवानी लावे छे आंखने हितकारक मेधा स्मरणशक्ति बुद्धि आयुष्य आरोग्य वधार के क्षय मधुमेह गांडपण मननो भ्रम व्यग्रता उद्धताइ उतावळापणुं चंचळपणुं तामसी स्वभाव मटाडे के कोइपण दरदनो नवळाश्मां अपाय 2. क्षय रोगनुं खास औषध गाय छे. १४ सिद्धूमकरध्वजनी षोडशगुण चंद्रोदयनी अनुपान मिश्र गोळी किंमत-तोला १ ना रु. ५०, कामोत्तेजक पौष्टिक. .
. ॥ श्री व्याधिनिग्रहः॥ ॥श्री गणेशाय नमः । श्री जिनाय नमः। श्री गुरुभ्यो नमः॥ गुरुपादं चेष्टदेवं नत्वा वक्ष्यामि ग्रंथतः व्याधिनिग्रहनामायं ग्रंथोपि वालबोधक: ॥१॥ देशकालवयोवह्निनिदानं व्याधिनिश्चयं पंच कर्माणि साध्योथ ज्ञात्वा चौषधं दापयेत् ॥२॥ लंघनं पाचकं शोध्यं शमनं पथ्यतापनं सर्वरोगेपु कर्तव्यमनुमाने विशेषतः ॥३॥ ॥ सर्वज्वरहरः क्वाथः ॥ कटंकारीद्वयं शुंठी धान्यकं सुरदारु च एभिः पाचनमुद्दिष्ट सर्वज्वरंनिकतनं ॥४॥ तुल्यैर्नागरभूनिवगुडुचीसुस्तकैः स्मृतः कपायः पाचनं चामे ज्वरिज्वरविनाशनं ॥९॥ ॥ वात ज्वरे क्वाथः ।। गुडुचीधान्यकारिष्टकंटकारी सचंदनं गुडुच्यादिरयं क्वाथः सर्वज्वरहरः स्मृतः ॥६॥ ॥ वातज्वरे काथः ॥ पिप्पली पिप्पलीमूलं निशाधन्वनमुस्तिका विश्वाछिन्नोद्भवकाथो देयो वातवरे सदा ॥७॥ ॥ पित्त ज्वरे वाथः ।। द्राक्षापर्पटक मुस्ता किरातं कटु वालुकं काथः पित्तज्वरे देयो मधयुक्तं तृपापहं ॥८॥ ॥ कफ ज्वरे छायः ॥ वासकं शुंठी सिंही च भांगी शठी किरातकं क्वाथः कफज्वरे देयो चरकेण च भापितः ॥९॥ गलो.६ अरिष्टं-निम्बत्वचा | श्लो. ८ वालक-बालकः कटु-तिक्ता गलो. ९ सिंही-कंटकारी।
૨ ॥ वातपित्त क्वाथः ॥ अमृता मुस्तकं वासा पर्पट विश्वभेपर्ज क्वाथः पित्तं मरुद्धंति पंचभद्रो ज्वरे स्मृतः ॥१०॥ ।। वातकफ ज्वरे ॥ निदिग्धिकामृता शुंठी पुष्कराद्वै शृतं पिबेत् क्वाथः कासारुचिश्वासकफवातज्वरापहः ॥११॥ ॥ पित्तकफज्वरे क्वाथः ॥ वला पटोलीत्रिफला यष्टी पत्रं वृषस्य च क्वाथो मधयुतः पीतो हंति पित्तकफज्चरे ॥१२॥ ॥ त्रिदोषज्वरे क्वाथः ।। भूनिवा कटुका मुरता शुंठी पर्पटकोमृता वासको धन्वयासश्च द्राक्षा भांर्गा सपुष्करा . ॥१३॥ पाठा सपिप्पली शंगी क्वाथमेषां प्रयोजयेत् अष्टौ ज्वरान् महाघोरान वातपित्तकफोद्भवान् ॥१४॥ ।। सन्निपात स्वरे क्वाथः ॥ = वृहत्यौ शठी शंगी वत्सकः कटुरोहिणी पटोलं पुष्करं भांर्गी वासकः सदुरालभः ॥१५॥ एप वृहत्यादिक्वाथो मलानां च निवारण: चतुर्दश सन्निपातान् हंति पाने सशीततां ॥१६॥ ॥ मलज्चरे क्वाथः ॥ श्यामाकः सिंघवं द्राक्षा कटुकं च हरीतकी एप क्वाथो मलद्रावं कुरुते ज्वरिणां सदा ॥१७॥ ॥ शीत ज्वरे ॥ भूनिंबः कटुकारिष्टा यवा चेंद्रस्य वामृता वृहती वासकः काथः पाने शीतज्वरापहः ॥१८॥ श्लो. १५ वत्सक-कुटजत्वक श्लो. १७ श्यामाकः आरग्वघः गरमाळो .
३ ।। एकांतरीये वेलावरे क्वाथः ॥ निर्गुडिकामृता क्षुद्रा भूनिवो मुंगराजक क्वाथो वेलाज्वरं हंति दिनांतरगतज्वरं ॥१९॥ ॥ विषम ज्वरे॥ सजीरकं गुई भक्षेत् सगुडां वा हरीतकी सगुडान् वा तिलान् भक्षेत् हंति वा विषमज्वर।। २०॥ ॥ जीर्णज्वरे क्वाथः ॥ गुडोकं वा त्रिफला क्वाथो देयो गुडेन तु द्राक्षामृता पद्मकं च हंति ज्वरं पुराणकं ॥२१॥ ॥ तृतीय स्वरे ॥ पिप्पली बर्द्धमानां च पिवेव क्षीरेण संयुताम् रसायनमिदं श्रेष्टं तृतीयज्वरनाशनं ॥२२॥ महौषधामृता मुस्ता चंदनोशीरधान्यक क्वाथस्तृतीयकं हंति शर्करा मधुयोजितः ॥२३॥ ॥ चातुर्थिक वरे ॥ वासा धात्रीफलं दारु पथ्यानागरसाधितः सितामधुयुतः क्वाथश्चातुर्थकनिवारणः ॥२४॥ ॥ चातुर्थिके नस्यं ॥ चातुर्थकहरं नस्यं अगस्तीपत्रजो रसः रामठं घृतं जोर्ण च नस्यं चातुर्थकं हरेत् ॥२५॥ ॥ सर्व ज्वरे ॥ गुडुची भूनिवधान्याब्दपद्मकं चंदनान्वितं किरातः पर्पटः क्वाथो सर्वज्वरहरः स्मृतः ॥२६॥ ।।.सन्निपाते नस्य-नास ॥ मधूकसारसिंधृत्या देवोषणकणासम प्रज्ञाप्रबोधनं नस्य सन्निपाते कफात्मके ॥२७॥ लो. २२ पद्मक-पद्मकाष्ठं १२५ रामट-हिंगु । श्लो. २७ मधूकसार:-यष्टिमधु । ली. २७ देव-तुत्थं-मोरथुढे ४ ॥ सन्निपाते अंजन ॥ कस्तूरी मरिच वाजिलाला च मधुनांजन तंद्रानिवारणं पुंसां व्योषं वा चांजने तथा . ॥२८॥ । सन्निपाते डंभनः डाम ॥ औषधैरपि दातव्यं संज्ञा यस्य न जायते .॥२९॥ पादयोस्तं ललाटे वा दहेल्लोहशलाकया ॥ मले. बंधनम् औषधं ॥ वध्नीयादुदरे तस्य वस्त्रेण पवारिमर्पित ॥३०॥ अजाशकृयवात् पिष्टं मलदार्य च कारयेत् ॥ सर्वज्वरे लेपः ॥ किरात कटुका कृष्णा हरितक्युष्णतां गतः सर्वज्वरे सदा लेपश्चोदरे कारयेद् बुधः ॥३१॥ ॥ दोषज्वरे धूपः ॥ दोषज्वरे सदा देयो धूपो ह्यष्टांगसंज्ञितः कुष्टारिष्टशिवावचा यवाज्यपुर सर्वपाः ॥३२॥ ॥ सर्वज्वरे अंजन ॥ रामठं पिंचुवीजानि सर्पाणां कंचुकी तथा पिष्ट्वाथ खरसूत्रेण चाजनं सर्वतापजित् ॥३३॥ ॥ सर्व ज्वरहरी गुटिका ॥ हिंगुलं वत्सनागं च टंकणं मरिचं कणा आदिकन दातव्यं गुटी सर्वज्वरापहा ॥३४॥ श्लो. २८ वाजिलाला-अश्वमुखफेनं श्लो. २९ डंभन:-अग्निशलाकया डंभन अग्निकर्म डाम ३०-चंधनं-बंधाण इति गुर्जरे प्रायः अधागुल परिमितं रोटिका रूपं उदरोपरिबंधन ।, ३१-उदरे लेपः-खरड इति गुर्जरे पत्तलीकृतो लेपरूपोपचारः ॥ सर्वज्वरे चूर्णम् ।। दिप्याभयाहिगुवहिस्त्र्यूषणं जीरकद्वयं क्षारद्वयं रोचकं च त्रिफला सिंघवत्रयं ॥३५॥ सूक्ष्मवृणीकृतं वैद्य उष्णोदकेन दापयेत् सर्वज्वरहरं नाम चूर्ण वाग्भटभाषितं ॥३६॥ न ज्वरेण विना जन्म न ज्वरेण विना मृतिः अतो ज्वरप्रतीकारं प्रथमं ब्रूमहे वयं ॥३७॥ न वातेन विना पीडा न पित्तेन विना भ्रमः .. न कफेन विना शोफो न दाहो.म वर्जितः ॥३८॥ ॥ इति ज्वरचिकित्सा ॥ -:०: ॥ अतिसार चिकित्सा ॥ उशीरं धान्यकं मुस्ता शुंठी विल्वेन्द्रवालुकं धातक्यतिविषाक्वाथो ज्वरातिसारनाशनः || आमातिसारे १॥ चित्रक पिप्पलीमूलं वचा कटुकरोहणी पाठावत्सकवीजानि क्वाथो ह्यामातिसारजित् ॥४०॥ ॥ आमातिसारे २ ॥ पथ्यादारुखचामुस्तै गरातिविपामृतैः आमातिसारशूलघ्नं क्वाथमेभिः पिबेन्नरः ॥४१॥ ॥ आमातिसारे ३ ॥ नागरातिविषामुस्ता पिप्पलं मरिचं तथा हिंगु कृष्णं च लवणं पाठा कटुकरोहणी ॥४२॥ पेयमुष्णाम्बुना चूर्ण शूलसामातिसारजित् -॥ रक्तातिसारे ॥ पथ्यं लाजाकृतं मंडं पेयं पानियं शीतलं ॥४३॥ ma ६ विल्वं शक्रजवा भेददाडमीचालकं विषा धान्यकं मधुयुक्तं च क्वाथो रक्तातिसारजित ॥४४॥ ॥ पित्तातिसारे ॥ रसांजनं सातिविषं धातुकी कुटजं फलं पित्तातिसारशमनं चूर्णं च तंडुलांबुना ॥४५॥ ॥ रक्तातिसारे ॥ क्षीरपिठं पिबेल लोद्रं ज्येष्ठा च खरवीजक रक्तातिसारशमनं शर्करा मधुयोजितं ॥४६॥ ॥ सर्वातिसारे ॥ नागरातिविषामुस्ता भूनिवामृतवासकैः सर्वज्वरस्य क्याथोयं सर्वांतीसारनाशनः ॥४७॥ । सर्वातिसारे.॥ धान्यकं नागरं मुस्ता वालुकं बिल्वदाडमे गडुचीसहितः क्वाथः सर्वांतीसारनाशनः ॥४॥ ॥ अतिसारे आर्द्रकरसेन नाभिपूरणं ॥ आईकस्य रसेनाशु पूरयेन्नाभिमंडलं नदीवेगोपमं घोरमतिसारं निवारयेत् ॥४९॥ ॥ वृद्धगंगाधर चूर्ण ॥ अरलूकघनशुंठीश्रीफलं वालुकं च कुटज सवरछल्ली धातुकी सैद्रमृर्वा अतिविषसहकारास्थीनि पाठा समोचा गुडजलमधुना वा वृद्धगंगाधरोयं ॥५०॥ श्लो. ४४ शकजवा इंद्रयवाः । भेदः-पाषाणभेदः ४५ धातुकी-धातकी पुष्पं , ४६ ज्येष्टा-यष्टिमधु, खरवीजकं इक्षुरबोज तालमखाना ४७ वासकः-वासा ४८ वालुक-वालः । गडुची, गुडुची ४९ श्रीफलं विल्वफलं | ऐंद्र-इंद्रयवाः सवरछल्ली-लोभ्रं कफोद्भवं मारुतपित्तसंभवं जयेदतीसारपुराणमामज़ प्रसिद्धगंगाधरचूर्णनामकं सर्वातिसार ग्रहणीगदापह॥५१॥ ॥ अतिसार हरी गुटी ॥ लवंगजातीफलहंशपाक पथ्याहिफेनेन समं विदध्यात् जयात्रिभागं गुटिकांप्रदद्यात सर्वातिसारग्रहणीगदात् ।।५२|| ॥ प्रवाहिकायां ॥ वालविल्वं गुडं तैलं पिप्पलीमूलवासकं लिह्याद्वातप्रतिहते सशूले समवाहिके ॥५३॥ ॥ प्रवाहिकायां ॥ विल्वं च सगुडं सैंद्र तैलं मरिचयोजितम् लिद्यात्मवाहिकाक्रांतः क्षिप्रं सुखमवाप्नुयात् ॥५४॥ ॥ प्रवाहिकायां ॥ अहिखरं गुडो विल्वं मधुना गुडशर्करा प्रवाहिकां निहंत्याशु पयसा मालिकेण वा ॥५५॥ -:0:- - ॥ अथ संग्रहणीचिकित्सा ॥ ॥ ग्रहण्यां चूर्ण ॥ पिप्पली बृहती व्याघी जवखारः कलिंगक: चित्रकं सारिवा पाठा शठी लवणपंचकं ॥५६॥ तच्चूर्ण पाययेद् दध्ना सुरयोष्णांभसा पिबेत् महांतं ग्रहणीदोषं शमयेद् दीपनं परं ॥५७॥ ॥ लवणभास्कर चूर्ण ॥ सामुद्रं लवणं कार्यमष्टकर्पमितं बुधैः पंचसौवर्चलं ग्राह्य विडं सिंधवधान्यक ॥५८॥- श्लो. ५२ पिप्पलीमूल वासक इत्यत्र पिप्पली विश्वभेषज इति पाठमेदः । , ५४ अहिखरं-इक्षुरबीजं तालमखाना-पखरो ८ पिप्पली पिप्पलीमूलं कृष्णाजीरकपत्रक नागकेसर तालिसं साम्लवंतसकं तथा ॥५९॥ 'द्विकर्पमात्राण्येतानि प्रत्येकं कल्पयेद् बुधः मरीचं जीरक विश्वा चैकैकं कर्पमात्र ॥६०॥ . दाडिमं स्याचतुक त्वगेला चाईकर्षिके एतच्चूर्णं कृतं सर्वं लवणं भास्कराभिधं ॥६॥ शाणप्रमाणं देयं तु मस्तुतक्रसूरासः वाते श्लेष्मे च मंदाग्नौ गृहणी रोगनाशनं ॥६॥ ॥ अथ अशेरोिगे हरस चिकित्सा ॥ ॥ तिलादिगुटी ॥ तिला भल्लातकं पथ्या गुडश्चेति समांशकं दुर्नाम स्वास कासनी प्लीहपांडु ज्वरापहा ॥६॥ लाक्षा हरिद्रा मांजिष्टा मधुकं नीलमुत्पलं अजाक्षीरेण पीतानि हर्षरक्तं विनाशयेत् ॥६४॥ कीटमार्याश्व गोजिह्वया रसो पलप्रमाणतः एकै पानमात्रेण हर्षायां शांतिकारका ॥६५॥ कुटजस्य फलं लोद्रं धातुकी चेमकेसरं निलोत्पलं सितायुक्तं चूर्ण हर्षविनाशनं ॥६६॥ कासीसदंतीसिद्धार्थकणवीरेण लेपयेत् तैलं सार्षपसंमिश्रं हर्षाणां किल नाशनं ॥६७॥ अर्कमूल शमीपत्रं नृकेशा सर्पकंचुकी मंजारचर्म सप्पिश्च धूपन हर्पनाशनं ॥६८॥ ॥ अथ कृमिरोग चिकित्सा ।। पलाशबोज बैडंग शक्राई रामठं त्रिवृत् श्लो. ६२ मस्तु-दधिमंडः। ६४ हर्षः-अर्शीरोगः । ६५ हर्षा- अर्थोरोगः।६६ इभकेसरं-नागकेसरं । ६७ कणवीर-कर्णिकारः। दंती अत्र निवृता।६८ मंजारर-माजारः। ६९ शक्राव्ह-इंद्रयवः । रामट-हिंगु ।
गवां तपनन् पीतं कृमिकोटि बिनामायेन् 11६९॥ पलाश समायोजानि किगतिः कटुकामृता पिनुमंदं पटोल न वायो कृमिविनाशनः 190॥ । अग तोफ चिकित्सा ।। पुनर्नयादिः पुनर्नवामुनादाम माभया च पटोलिका विचारजनारवायोः इति शोर्फ. व पानतः ॥७९॥ रियादि हरीतकी हगवे देवदार पुनर्नवा मुखांना पीतमेनन् सद्यः स्वययनादानः ॥७२॥ भोरं वापि लगोमूत्रं माहिरं मूत्रमेव च अष्ठीली पिटापि वयोशन पर ॥७३॥ पलिवात्मानन्त्याय गुइन परिमिश्रितम् सीरभुवनागरं चूर्ण वययोन सनं पर 11७४॥ स्नुक पिपली व दातव्या शोफ वा चोइरे हिता मान्नं च द्विदलं वय पथ्यं श्रेणं त्र वर्जरी ॥७॥ ॥ जय नश्यतिकिल्ला ॥ कुप्मांडरसमादाय मर्करासहितं पिवेन् यल्याशिदोपसंभूतं मृगनई निवारयेत् ॥७६॥ सहवागणारनपलं पलं नवरयान्वित संमदितं पिबंधन मृत्रकृई निवारयेन् ॥७॥ लो. ७० किनिः-फिराततिनं । कटुका-तिता पलाशं- पलाशयी । पिचुद-निन्यत्वचा । र दाल-देवदार L पटोलिका-पोल । ७२ विवा-शुंठी । आनरजनी-सान्त्र- हरिद्रा । ७३ शृंगरं झुंटी ७५ लुक स्नुहोदुन्ध-लुही- दुग्धेन भावित पिप्पली वृण रतिकाद्वयेनारन्य द्वादशरत्तिका पर्यतं रोगानुसारं देवं ! वर्जरी-बाजरी इति प्रसिद्धं धान्यं । ७६ कुप्मांडर कद्वयं तावन्मात्रा शर्करा संमिश्य सप्त दिनं यावरिपवेत् । ७ सहन्नगुणा शतावरी ।
जवक्षारजलं तद्वत सितया शीतवारिणा कर्षमात्रं तु तत्पीत मूत्रकृछू निवारयेत् ७८॥ मूत्रकृढ़े जवक्षारं चणकं हिंगु योजित हितं भवति दाहाढये वातजे च त्रिदोषजे ॥७९॥ पिबेत् शतावरीमूल शीतांवुनाथ कृहत् रंभारसो द्विपलिकः शर्करासंयुतो भवेत् ॥८॥ एला पाषाणभेदश्च रेणुकाखदिरोद्भचं मधुयष्टी कणापथ्या सुक्ष्ममेषां तु चूर्णित ॥८॥ तवराजमधूपेतं निपीतं तंडुलांबुना `सर्वाणि सूत्रकृयाणि नाशयत्यतिवेगतः ॥८२॥ गौक्षीरेण गुडः पीतो मूत्रकृविनाशन: एला दध्यंभसा पीतो भोजने गोधुमा हिताः ॥८॥ यष्टीमधु चाश्मभेदश्चंदनं रक्तचंदनं रक्ततंइलतोयेन पीतं मृत्ररुजापहं ॥८४॥ वालुकोशीरयष्टीकं कुष्टं धान्यं यवा मधु क्षीरेण क्वाधः संपीतो मृत्रकृरुजापहः ॥५॥ ॥ अथ मूत्ररोधचिकित्सा ॥ पिवेत् कर्कटिकावीज त्रिफला सिंधवान्वितं उप्णांबु चूर्णितंपीतं मूत्ररोधं शमं नयेत् ॥८६॥ अजाक्षीरेण संमिश्रं जातिमूल पिवेन्नरः तैलेन पद्मिनीकंदं पीत्वा रोधं निवारयेत् ॥८७॥ लो. ७८ जयनार-यवक्षारः कर्षपादः सिता-शर्करा चतुः फर्गमिता सतदिनं पेयं शीतवारिणा मिथितं । ७९ चणक- चणक प्रमाणं हिंगु । ८१ रेणुका-निर्गुडी बीजं । खदिरोर्व- गदिग्मारः । ८२ नयगजः-तपक्षीरी | ८४ अश्मभेदः पापाण- ८९ वान्टकः बालकः । धान्यं-धान्याकः । यवाः यया । ८ जातिमूलं-जातिनामक पुप्पलताया मृलं ।
पोतो दारुनिशाक्वाथः समधुर्मुत्ररोधहृत क्षीरेण शर्करा पीता विभूतिस्तिलसंभवा 11८८॥ त्रिफलासगुडः क्वाथो मूत्ररोध निवारयेत् ॥ मूत्ररोध लेपः ॥ विभूतिषशृंगाणि लेपात् रोध निवारयेत् ॥८९॥ ॥ अथ प्रमेह चिकित्सा ।। त्रिफला गोक्षुरं वासा दाय॑मृताचयष्टिकं क्वाथो मधुयुतः पोतो हंति सर्वप्रमेहक ॥९०॥ विल्वीदलरसो ग्राह्यः पलमानस्तु शर्करा सप्त रात्रं पिवेद्यस्तु प्रमेहस्तस्य नश्यति ||९१॥ खदिरं शर्करा दारु पाटा रजनि मुस्तका गुडेन गुटिकां दद्याद् हरेद्रोगं प्रमेहर्ज ॥९२॥ गडच्या स्वरसः पेयो मधुना सर्वमेहजित् निशाकल्कयुतो धात्रोरसो वा माक्षिकान्वितः ॥९३॥ वचाभया वंशलोचा खदिरः शर्करायुतः सर्वमेहहरं चूर्ण त्रिफला मधुना लिहेत ॥९४॥ ॥ अथ अश्मरी (पाणवी) रोग चिकित्सा ॥ असाध्यो ह्यस्मरी रोगो ह्यौपध्या न च सिध्यति शस्त्रेण साध्यो रोगोयं तथापि चौषधं वदेत् ॥१५॥ धात्रीपल्लव नीर्याससतिलतलसमन्वितः दधिमंडयुतं पेयमश्मरीमाशु पातयेत् यः पिबेत् पातरुत्थाय ह्यस्मरीं शमयेद् ध्रुवं ॥९॥ श्लो ८८ दारुनिशा-दारुहरिद्रा । ८९ विभूतिःशुष्कगोमयभस्म • राख वानी इति प्रसिद्धा । वृषस्य शृंगं तयोर्लेपो लिंगे कृतः मूत्र- रोघंहरः।९० दार्वी-दारु हरिद्रा । ९१ विल्बो-विल्ववृक्षः । ९२ रजनि हरिदा। -- . शंगवेरं जवक्षारं पथ्या कोलायकान्वित दधिमंडयुतोत्सर्गमश्मरीमाशु पातयेत् ॥२७॥ तिलाश्चापामार्गफलं पलाशक्षसंभवः क्षारः पेयोऽविमूत्रेण शर्कराश्मरिपातनं ॥९८॥ यः पिबेगजनीं सम्यक् सगुडां तुपवारिणा तस्याशु च चिरारूडामश्मरी पातयेद् ध्रुवं ॥९९॥ शुठी गोक्षुरकं चैव वरुणस्य त्वचस्तथा काथो गुडो जवक्षारो चाश्मरीरोगनाशनं ॥१०॥ त्रुसमूलकृतः क्वाथो जलेनोत्काल्य पानतः अश्मरीरोगनाशाय हेमा हरोतकी हिता ॥१०१॥ ॥ अथ वातरक्तचिकित्सा ।। गडच्याः स्वरसं कल्लं चूर्ण वा क्याथमेव च प्रभूतकालमासेव्यं मुच्यते वातशोणितान ॥१०२॥ मंजिष्टा त्रिफला तिक्ता वचा दारु निशामृता निंबश्चैषां कृतः क्याथो वातरक्तविनाशन: ॥१०॥ धातुकी सर्जमंजिष्टायष्टिगुगुलुपायसं घृतयुक्तं पचेद् वह्नौ चाभ्यंगात् वातरक्तनुत् ॥१०॥ ॥ अथ अजीर्ण चिकित्सा ॥ ॥ सर्वाजीर्णहरी गुटिका ॥ हिंगु त्रिकटुकं पाठा हपुषा चाभया शठी अजमोदाश्वगंधा च तितडीकाम्लवेतसौ ॥१०५॥ दाडिमं 'पुष्करं धान्यमजाजी चित्रकं वचा द्वौ क्षारौ लवणे द्वे च चव्यमेकत्र कारयेत् ॥१०॥ भावयेन्मातुलिंगस्य रसेनाकनिबुकातू बहुशो गुटिका बद्धा सर्वरोगविनाशका ॥१०७॥ श्लो. ९८ अपामार्गफलं-अपामार्ग वोजानि पलाशवृक्षसंभवः -पलाशं प्रज्वाल्य कृतः। कोलायकः बदरीफलास्थोनि ।
ग्रहण्य विकारे च प्लीहपांडवामयेऽरुचौ मलबंधे च हिकायां कासे श्वासे गलग्रहे ॥१०८॥ करंजनिवशिखरीगडुच्यनकवत्सकैः पीतः कपायो विमलो घोरां हति विसूचिकां ॥१०॥ ॥ अथ मंदाग्नि चिकित्सा ॥ संघवं नागरं दिप्या पिप्पलीमूलकं कणा रुचकं चाभयाजाजी चूर्ण मंदाग्निदीपनं ॥११॥ नागरं पिप्पलीमूलं धान्यकं कृष्णजीरक दाडिमं मरिचं साम्लं चित्रको हस्तिपिप्पली ॥११॥ अजमोदा कणाजाजी पथ्यारुचकराम: क्रमाद्विवधितैरभिश्चूर्ण कुर्याद्विचक्षणः ॥११२॥ जंबीरस्य रसेनैव तथाईकरसेन वा भावितं चातपं शोप्यं पुनपदि चूर्णयेत् ॥११३॥ ततो विडालपदकं पिवेदुप्णेन वारिणा मंदाग्निना सदा खाचं तीक्ष्णो भवति पावकः ॥११४॥ भुक्तस्योपरि यद्भुक्तं भस्मीभवति तदक्षणात् ॥ अय गुल्म चिकित्सा ॥ रोहिपश्चारुणः शिगुरनिमंथः पुनर्नवा करंजो गृहपर्णश्च कपायो गुल्मनाशन: ॥११५॥ रामटं पंचकोलं च पंचैव लवणानि च पूतना चाजमोदं च जवानी हिंगुपत्रिका ॥११६॥ क्षारत्रयं विडंगानि रसोनं च पाद्वयं प्रलो. १०८ मलबंधे मलावरोधे । १०९ अर्जकः आंजणियु। वत्तकः कुटजत्वक् । १९० दिप्या-अजमोदा, रुचकं संचल लवणं । १११ कृष्णजीरकं तिक्तजीरकं-काळीजीरी इति प्रतिद्ध, हस्तिपिप्पली-गजपिप्पली। ११५ रोहिषःरोहीतक्रत्व, अरुणः शिगुः रक्तशियोस्त्वक, हिंगुपत्रिका तिलपर्णी.
. एतत्संकृत्य संभारं सूक्ष्मचूर्णं तु कारयेत् . ॥११७॥ - विडालपदमात्रं तु भक्षयेत् प्रातरुत्थितः ॥९॥ पंचगुल्ममथोद्गारं शूलहृद्रोगविद्रधि उष्णोदकेन पीतं च तक्रेण सुरभेजलैः ॥९८॥ नाशयेत पीतमात्रेण तमः सूर्योदये यथा ११% आम्लवेतसनिर्यासो लवणं विडपूर्वकं रामठं स्वर्जिकाक्षारस्तकपीतं च गुल्महत् ॥१२०॥. टंकणं स्वर्जिकाक्षारो मातुलिंगेन दापयेत कुमारिकारसैः पीतं पंचगुल्मान्विनाशयेत् ॥१२१॥ ॥ अथ पांडु चिकित्सा ॥ त्रिफला लोहचूर्ण तु मधुना सह भक्षयेत् हरेत् पांडुगदं पंच तथा व्योषेण दापयेत् ॥१२२॥ फलत्रिकामृतावासा तिक्ताभूनिवनिवजः क्वाथः क्षुद्युतो हन्यात् पांडूरोग सकामलं ॥१२३॥ क्षीरं मूत्रं पिबेत् पक्वं गवां माहिषमेव च पांडुरोगं हरेत् सधः सप्ताहं त्रिफलारस: ॥१२४॥ ॥ अथ कामला चिकित्सा ।। . द्रोणपुष्पोरसः पीतो रोचनालोचनांजनात् अपामार्गशिफा पीता सतका कामलापहा ॥१२५॥ गुडाकयुता हंति कामलां त्रिफला सिता एरंडमूलकं पीतं मधुना हंति कामला ॥१२६॥ द्रोणपुष्पीरसैश्चक्षुः पूरितं याति कामला हिंगु वा लोचने न्यस्तं कामलोन्मूलनक्षमं ॥१२७॥ श्रलो. ११८ पूतना-हरीतकी, क्षपाद्वयं-हरिद्रा दारुहरिद्रा । १२१ मातुलिंग-वीजपूरकं । १२२ लोहचूर्ण-लोहभस्म । १२३ भूनिवः किराततिक्तं । १२५ द्रोणपुप्पो-कुवो, रोचना-गोरोचनं, लोचना-वंशलोचनं ।
वंध्याकौटकीमूलं नस्येनैवोपशाम्यति मलिष्णुक्रांताशिफा तत्र पीता वापि विनाशनी ॥१२८॥ करंजर्शिया गडूच्या वा दाा निवस्य वा रस पीक प्रातर्मधुयुतं कामलातः पिवेन्नरः ॥१२९॥ हरिद्रात्रिफलानिंवबलामधुकसाधितं सक्षीरं माहिपं सर्पिः कामलाहरमुत्तम ॥१३०॥ ॥ अथ हारिदकचिकित्सा || छिन्नोद्भवा च रजनी पर्पटाश्च पुनर्नवा समांशकैः कृतः क्वाथो हारिद्रकविनाशनः ॥१३॥ किरातं मधुकं मुस्तामृता वासा च निकैः पीतः क्याथो मधुयुतो हारिद्रकविनाशनः ॥१३२॥ देय हारिद्रके दुग्धं सगुडं ज्वरवर्जिते यवागुः सज्वरे देया यूषो वा सर्वदा हितः ॥१३३॥ ॥ अथ कुष्टरोग चिकित्सा ॥ तिलास्तैलं कुलत्याश्च वल्लाकालंगमूलकाः माहिषं दधि वृन्ताकमष्टौ कुष्टस्य कारकाः ॥१३४॥ कुष्टिभ्यः पृच्छन पानं शंग्यलावुजलौकसः वमनं च वलं ज्ञात्वा विधेयं सविरेचनं ॥१३५॥ नृपादिवालवृद्धानां भीतानां योषितामपि निर्विषं स्यादुपायेन रक्षेत्कष्टं जलौकसां ॥१३६॥ . . श्लो. १२८ वंध्याकोटको बांझकेरोलो, विष्णुक्रांता- शिंफा-श्वेतगिरिकर्णी मूलं कंटकारीमूलमिति केचित् । दा:- दारुहरिद्रा । १३१ छिन्नोद्भवा-गुडुची, रजनी-हरिद्रा, पर्पटः रेणुः खडसलियो पित्तपापडी, । १३४ वल्ला-वालनामकद्विदल धान्यं, कालंग-तरवुच फलं, मूलक-मूलानामक कंद, वृन्ताकं रिंगणां । १३२ पृच्छन-प्रश्नः । - १६ ॥ अथ शिवादि काथः ।। शिवा पथ्यापा निववल्कलं कुष्ठहत्सदा ॥ पटोली पाटला राजी शाल्मली चित्रकामृते ॥१३७॥ तुंवरुः कटुकी दंती करंजश्च विभीतकं भांगी वरुणमित्येषां काथः प्रेयस्त्रिसप्तकं ॥१३८॥ प्रथमे प्रथमे यामे धर्मसेवाथ भोजनं शालिभोज्यं प्रकर्तव्यं पश्चान्निद्रा विधीयते ॥१३९॥ एतत्कृतेन नश्यति कुष्ठान्यष्टादशाथ च श्वेतकुष्ठं गजचर्म नो साध्यं कथितं बुधैः ॥१४०॥ ॥ अथ कुष्ठहरलेपः ॥ अर्कमूलं हरेत्कुष्ठं वारिघृष्टं प्रलेपनान कासमर्दशिफा पिष्टा हन्यात्कुष्ठं तुषांबुना ॥१४॥ ॥ अथ चित्रीकुष्ठ-सिध्मकुष्ठ चिकित्सा ॥ रंभाक्षारो निशायुग्मं गंधकं मूलबीजकं तक्रणोद्वर्तनं कुर्यात् पुंसां सिध्मप्रणाशनं ॥१४२॥ रंभाक्षारो निशाचूर्ण टंकणं निवुकं तथा सागसंभवं सिध्म लेपान्नाशयति क्षणात् ॥१४३॥ ॥ पामा चिकित्सा शिला पारद कुष्ठानि निशा लांगलिकोद्भवं चूर्ण गोमूत्रसंपिष्टं पामा याति प्रलेपनात् ॥१४४॥ अर्कपत्ररसे पक्वं रजनीकल्कसंयुतं साधयेत्सार्पप तैलं लेपाल्पामानिवारणं ॥१४५|| ॥ अथ गजचर्म-दद्रुकंडुचिकित्सा ॥ चक्राव्हचूर्ण स्नुक्षीरभावितं मूत्रयोजितं श्लो. १३७ राजी-राजिका राई । १३९ धर्मसेवा प्रथमयाम पर्यंत सूर्यातपसेवन । १४४ शिला मनःशिला । १४६ चक्राव्ह -चक्रमर्द कुवाडियो।
-- रवितप्तः कृतो लेपः दद्रुकंडुविनाशनं ॥१४६॥ गुग्गुलुगंधकं लिंबुष्टंकणं शर्करायुतं वाकुची चाहिफेनं च लेपाशविनाशनं ॥१४॥ ॥ अय विपादिका पादत्फुटन चिकित्सा ।। शुक्तिकाभस्म सिंधृत्यं सर्पिः सर्जरसं पयः पादस्फुटनहा लेपः पादः कोमलतां व्रजेत् ॥१४८|| ॥ अथ बंधकोष्ठः मलावरोध चिकित्सा ।। ॥ अभयादि मोदकः ॥ अभया पिप्पलीमूलं मरिचं विश्वभेषजं पत्रं तगरकं मुस्ता विडंगामलकानि च ॥१४९॥ एतानि समभागानि दंती त्रिगुणिता मता विदष्टगुणा ज्ञेया षड्गुणा चात्र शर्करा ॥१५०॥ मधुना मोदकान्कृता असमात्रान् भिषन्वरः एकैकं भक्षयेत्मातः शीतं चानुजलं पिवेत् ॥१५॥ सम्यग्निरचनं तावद्यावदुष्णं न सेवते बंधकोष्टं मलानां च. शीधं चूर्ण निवारयेत् ॥१५२॥ ॥ अथ शोफोदर चिकित्सा ॥ ॥ सर्वोदरहरी गुटिका ॥ दंतीमूलं बका दारु त्रिफला चंद्रवारुणी यवञ्चिाद्रिकर्णी च नीली कंपिल्लकं निशा ॥१५॥ हिमजा जयपालश्च कटुअष्टपुनर्नवाः शंखिनी चित्रकं कृष्णा तिता स्तुगंबुरोहिणी ॥१५४॥ . सौवर्चलं तथा कुष्ठं रसोन समभावित १es लिवुः निम्बुकं । १५३ वका । यचिंचा भूम्या- मलकी । अद्रिकर्णी श्वेत गिरिकर्णी । नीलि नीलिनी गी। हिमजा अस्थिहीना हरीतकी हिमेजतंझा । १५ लुक् लुही मूल । अंबुरोहिणी-जलजंबुः । - १८ चूर्णयित्वाथ सर्वाणि स्नुहीक्षीरेण भावयेत् ॥१५५॥ काश्यपात्मजदुग्धेन भावयेच्छोषयेच्च तत् गुडेन गुटिका सूक्ष्मा सर्वोदरविनाशिनी ॥१५६॥ क्षारद्यानलव्योपनीलीलवणपंचर्क चूणितं सर्पिषा पेयं सर्वगुल्मोदरापई ॥१५७॥ गवाक्षी शंखिनी दंती नीली तिक्तकसंयुता सादरविनाशाय गौमूत्रेण समं पिबेत् ॥१५॥ सप्ताहं माहिपं मूत्रं पयसा वाम्बुवर्जित पीतमौष्टुं पयो मांसं श्वयथूदरनाशनं ॥१५९॥ ॥ अथ प्लीहोदर चिकित्सा ॥ भक्षितं नाशयेत्प्लीहं मदिराशनतोचिरात् यस्याभिधानमुच्चार्य हारयेदिंद्रवारुणं ॥१६०॥ मूलमुक्षिप्यते दूरं तस्य प्लीहो विनश्यति चिरं च वाणपुंखाया मूलिका दंतचर्विता गलिता नाशयेत्प्लीहं यवागुभोजनं ध्रुवं ॥१६॥ लवणान्यर्कपत्राणि भांडेन्तर्भमिवतिना दग्धानि मधुलीढानि प्लीहो नश्यति दारुणः॥१६२॥ . ॥ अथ जलोदर चिकित्सा ॥ त्रिवृता दंतिनीमूलं देवदालीयवासकं ॥१६३॥ कुटजांघ्रियुता किंवा कटुरोहणिमूलिका एकैकं वारिणा पीतं हंति सर्वजलोदरं पथ्या ससेंधवा चापि पीता हति जलोदरं ॥१६४॥ श्लो. १५६ काश्यमात्मजः अर्कवृक्षः तस्यदुग्धं । १५७ अ- नलः चित्रकः । १५८ गवाक्षी वृदिंद्रवारिणो गावसुकडां । १५९ ओटं उष्ट्रीजं । १६० प्लीह.-प्लीहा । मदिराशनतः नित्यं मदिरापानात् । १६१ वाणपुंग्या-शरपुखः । १६२ लव- णानि पंच लवणानि । १६३ कासक कासमूलं । १६४ कटु रोक्षणी-तिता। -- १९ तैलं एरंडमूलेन पथ्या तत्समसैंधवं कणा गोमूत्रपीतानि हन्ति रोगं जलादरं ॥१६५।। ॥ अथ रक्तपित्त-रक्तस्त्राव चिकित्सा ॥ वासकस्य रसो यष्टिः शर्करा मधुमिश्रिता कामलं देहरक्तं च इंति पित्तं च तत्क्षणात् ॥१६६॥ हीवर मधुकं धान्यं चंदनं यष्टिकामृता कृपोशीर: पीचुमंदस्त्रिफला मीडियावलं ॥१६७॥ मंजिष्टासहितः क्वाथः शर्करामधुमिश्रितः पीतो हरेद्रक्तपित्तं सर्वदेहभवं तथा ॥१६८॥ ॥ अथ नासारते॥ रसो दाडिमपुष्पोत्यो रसो दूर्वाभवोऽथवा आहरूपरसस्तद्वन्नासास्यरुधिरं हरेत् ॥१६९॥ अश्मभेदो घृते घुटो नासायां दीयते यदि रक्तस्रावं हरेदाशु रक्तष्ठीविसमुद्भवं ॥१७०॥ ॥ अथ नासाकीटे ॥ कपर पुष्पतैलेन नासायां क्षिप्यते यदा - पतंति कीटका नासात् रक्तस्रावश्च नश्यति ॥१७॥ ॥ अथ प्रदर चिकित्सा ॥ वालुकं तवराजं च चंदनं शर्करायुतं तंडुलांबु पिवेन्नित्यं योनिमेहनिवारणं ॥९७२॥ दुग्धेन संयुतः पीतो हत्यपामार्गपत्रजः अथवामलकीचूर्ण तंडुलोदकमिश्रित ॥१७३॥ श्लोकः १६६ यष्टिः मधुयष्टिः। १६७ . पीवुमंद:-पिचुमंदः, मोंढियावलः आवर्तकी-सनाय । १७० . अश्मभेद:-पाषाण: : भेदः । १७१. पुष्पतैलं फुलेल तैले । १७२ वालुकं तवराजं तवक्षीरी । १७३ अपामार्गपत्रजः रसः ।
२० तथा मेघनादरसो मधुयुक्तं रसांजनं या पिवेत्प्रत्यहं नारी प्रदरं तस्य नश्यति ॥१७४॥ वला सिता वेकरं वा पडवासः सितायुतः गवां दुग्धे पिवेन्नारी चतुर्धा प्रदरं ब्रजेत् ॥१७॥ ॥ अथ प्रदरहरी धारण गुटिका ॥ दाडीमसारं पडवासः अश्मभेदो रसांजनं गुडेन गुटिकाः कुर्यायोनिमध्ये क्षिपेत्स्त्रियाः ॥१७६॥ प्रदरं नीलं पीतं वा श्वेतं रक्तं तथैव च नारीणां हरते शीघ्रं चरकेण च भापितं ॥१७७॥ ॥ अथ गर्भस्रावे ॥ शंगाटकं वला रक्तं चंदनं शर्करा समं चूर्ण तंडूलतोयेन पिबेद् गर्भपरिस्रवे ॥१७८॥ ॥ अथ गर्भपात. निवारणार्थ ।। लज्जालुआंतकीपुष्पमुत्पलं मधुलोद्रकं जलछाया स्त्रिया पीतं गर्भपातं निवारयेत् ॥१७९॥ कपित्थविल्वत्रिवृताः पटोलेक्षुनिदिग्धका मूलानि क्षीरसिद्धानि दापयेद् भिषगष्टमे ॥१८॥ ॥ अथ नष्ट पुष्पे पुष्पानयनं ॥ तिलक्षारो गुडो व्योषं घृतं भांर्गीयुत पिवेत् पानं रक्तभवे गुल्मे नष्टपुष्पे च योषितां ॥१८॥ ॥ अथ ऋतुजननी वर्ति ॥ तुवीवीजं जवक्षारो देतीकल्क कणागरु श्लो. १७५ सितां शर्करां, वेकर-वेकरीयो । पड़वासः स्वनामख्यातः । १७८ शंगारकं-सिंगोडां इतिख्यातं । १७९ नलछाया-जलवुकः।१८० इक्षु-इक्षुमूलं । निदिग्धका-कंटकारी। १८२ जवक्षार-यवक्षारः । कणा पिप्पलो।
. कामस्य च फलं वर्तिर्वजिक्षीरेण निर्मिता योनिमध्यस्थिता पुष्पं जनयेत्तत्र योषितां ॥१८२॥ ॥ अथ गर्भतो रक्तस्रावस्तंभनं ॥ गर्भिणीगर्भतो रक्तं स्वभयेत् पतितं ध्रुवं पारावतमलं पीतं व्यहं तंडुलवारिणा ॥१८३॥ ॥ अथ योनि शुले ॥ विशालाज्यपयोयुक्ता लेपतो योनिशूलहृत हृच्छूले वीजपूरस्य रसः सैंधवसंयुतः ॥१८४॥ ॥ अथ योनिशुलहरो लेपः ॥ एरंडतेलसंयुक्तमंडीमूलमलेपतः नवप्रसूतनारीणां योनिशूलं प्रशाम्यति ॥१८५॥ योनिशुलहरं पीतं सर्पिः कार्पासवीजयुक आखुमांसेन पक्वं वा तैलं याति विलेपनातू ॥१८॥ एक एव यवक्षारो योनिशूलं निवारयेत् ॥ अथ योनि शैथिल्ये ॥ कारेलीकंदलेपेन योनिर्गाढा भवेद् ध्रुवं ॥१८७॥ ।। अथ स्तनपीडायां योन्यादि शूले ॥ स्तनपीडाशमं याति कृष्णादृषकसैंधवं अजमोदा यवक्षारश्चित्रकं शर्करान्वित ॥१८८॥ स्तनपीडा शमं याति विशालामूललेपतः कुमारीकंदलेपेन सहरिद्वातिवेगतः ॥१८९॥ वचोपकुंचिका जातिकृष्णाषभसैंधवं अजमोदा जवक्षारश्चित्रकं शर्करान्वित ॥१९॥ श्लो. १८२ कामस्य फलं मदनफलं मींढोळ । १८४ विशाला इंद्रवारुणी । १८५ मुंडी गोरखमुंडी । १८६ आरतुमांसं मूषकः- मांसं। १८७ कारेली-कारवल्ली शाकविशेष" वासा । १९० उपकुंचिका कलौंजी जीरक .
-- पिष्वा प्रसन्नयोलोड्य खादेद् घृतमनगलं योनिपार्धातिहृद्रोगगुल्मा विनिवर्तयेत् ॥१९१॥ ॥ अथ सूतिकारोगे ॥ लविंगं दशमूलं च क्षुद्रा भांगी महोप, ब्राह्मी पुष्करमूलं च भूनिवं गजपिप्पली ॥१९२॥ मुस्ता शृंगी शठी चित्रं त्रायमाणा सपिप्पली रास्ना वचा देवदारु पिप्पलीमूलवासके ॥१९३॥ वत्सकत्वक् चातिविषा क्वाथश्चाष्टावशेषितः सूतिकासर्वरोगेषु लविंगादिः प्रशस्यते ॥१९४॥ ॥ अथ प्रस्त. समये जात रोगे ॥ मरिच पिप्पली शुंठी जवक्षारोथ पूतिको कुष्मांड चव्यकं चित्रं भांर्गी च शतपुष्पिका ॥१९५॥ अष्टावशेषितः क्वाथो मरिचादिः स्मृतो बुधैः प्रसूतसमये जातं रोगं हेति न संशयः ॥१९६॥ ॥ अथ क्षय रोगे ॥ असाध्यो हि क्षयो रोगो पंचधा परिकीर्तितः राज्यक्ष्मणिमृत्युः स्यात् यथा किंचिच्चिकित्सितं ॥१९७॥ अमृतावासकक्वाथः पिप्पलीमधुसंयुतः प्रातः पीतो हरेत्कासं श्वासं क्षयं ज्वरं तथा ॥१९८॥ श्वेतास्तंदुला अर्कक्षीरे पिष्ट्वा गुटीं च कारयेत् टंकप्रमाणां मधुना भक्षेत् क्षयविनाशनी ॥१९९॥ पिप्पली वर्धमानां च दापयेद् दुग्धवारिणा भोजयेच्छष्ठिकानं च सर्पिषा दुग्धसंयुताम् ॥२०॥ क्षयरोगविनाशाय जीर्णज्वरं ततःपरं श्लो. १९२ विगं लवंगं । १९४ वत्सकत्वक्-कुटजत्वक् । २०० पष्टिकान-साठीचावल ।
२३. कासं श्वास पीनसं च हरते वृद्धपिप्पली . . .॥२०॥ . ॥ अथ कासरोगे ॥ छिन्नात्रिकटुकं भांर्गी वासा क्षुद्रा घनो शठी पिप्पलीमूलरजनीदेवपुष्पाणि कट्फलं ॥२०२॥ शृंगी पोखरमूलं च किंरातं कटुरोहिणी एष क्वाथो ज्वरं हन्यात्कासं श्वासं तथैव च ॥२०॥ आढरूपकपत्राणि पिचुमंददलानि च तुलसीपत्रं समधु शठी शृंगी मरीचकं ॥२०४॥ विभीतं पिप्पलीमूलं कणा खदिरसारज चूर्ण शुंठीगुडयुतं लिह्याकासे कफात्मके ॥२०५॥ कट्फलं पुष्करं भांर्गी कृष्णा च मधुना सह कासश्वासज्वरहरः श्रेष्ठो लेहः कफात्मके ॥२०६॥ गुडाकं कासहरं चक्षुष्यं वळवर्धन तथैव मधुसंयुक्तं कफकासनिसदनं ॥२०७ मूलं च शरपुंखाया कफकासहरं परं गुडेन दाडिमीछल्ली खादेकासनिवर्हणं ॥२०८॥ दिने न शयनं कुर्यात् तैलं खंड न भोजयेत् नं नक्तं दधि मुंजीत न सेवेतातिशीतलं ॥२०९॥ यवक्षारमरीचाक्षत्वग् देवकुसुमं समं खदीरसारसंयुक्तं चूर्णमेकत्र कारयेत् ॥२१॥ वलक्वाथे तन्मर्घ गुटी चणप्रमाणतः वक्त्रे च धारयेद्यस्तु कासं पंचविषं हरेत् ॥२१॥ .. अर्कपुष्पं लवंगं च त्रिकटु त्रिफला समं रजनी कुबेरकं वासा टंकणं चाहिफेनक ॥२१२॥ कट्फलं पौप्करं भांर्गी व्याघ्री शृंगी च शैलकः श्लो. २०३ पोखरमूलं पुष्करमूल । २०८ छल्ली त्वचा ।
.. पिप्पलीमूलापामार्गे चूर्णमेकत्र कारयेत् ॥२१॥ गुडे वा मधुना कुर्याद् गुटी बोरममाणतः पंचकासहरी सद्यः प्रातर्नित्यं च भक्षयेत् ॥२१४॥ . ॥ अथ श्वासे ॥ सिंही सनागरा भांर्गी क्वाथश्चाष्टावशेपितः मधुनो सितया युक्तो जयेत् श्वासं सुदारुणं ॥२१५॥ अंजामूत्रे पचेच्चाक्षं मधुना सह लेहयेत् कासं श्वासं हरेत्सद्यस्तथा कनकधूपिते ॥२१६॥ रोचना खोदिरं सारं हंसपाको लविगकं त्रिकटुं पिप्पलीमूलं टंकणं वत्सनाभक ॥२१७॥ आकल्लक कवाचानी अक्षत्वक चैव गैरिकं पिष्ट्वा गुटी मुखे धार्या पंचवासान् विनाशयेत् ॥२१८॥ एला नागं तथा तानं सिता चाकल्लक तथा लविंगमहिफेनं च कपरं जातिपत्रिका ॥२१९॥ नागवल्लिरसे बद्धा गुटी चणकमानतः भक्षयेद्यो निशि प्रातः पंचवोसं विनाशयेत् ॥२२०॥ • गुडं कटुकतेलेन मिश्रयित्वा समं लिहेत त्रिसप्ताहप्रयोगेण श्वासो निर्मलतां व्रजेतू ॥२२१॥ श्वासे न द्विदलं व्यं न शीतं न विदाहि च ज्वरे चोक्तानि पथ्यानि कासे चोक्तानि तानि तु २२२ ॥ अथ हिकायां ॥ कोलमज्जांजना लाजा विक्ता कांचनगैरिक श्लो. २१४ बोरं वदरीफलं । २१५ सिंही-कंटकारी । २१६ अक्ष विभीतकफलत्वक् । कनकधूपिते धत्तूरपत्रधूमः । २१७ हंस- पाकः हिंगूलः । २१८ कबाचानी कवाबचीनी-चणकबाब । २१९ जातिपत्रिका जातिपत्री-जावंत्री । २२१ कटुकतैल सर्ष- -पतैलें । २२३ कोलमजा बदरीफलांतर्गतवीजं । - अंजना- अलककः कांचन-कनकपत्र ।
. कृष्णा धात्री सिता शुंठी कासीसोदधिफेनके ॥२२३॥ पाटला सफला पूगं कृष्णा खजूरमुस्तके पडेते च पृथग लेहा हिकानाः क्षौद्गसंयुताः ॥२२४॥ मधुकं मधुसंयुक्तं पिप्पली शर्करान्वितं नागरं गुडसंयुक्त हिकानं भेपजत्रयं ॥२२५॥ स्तन्येन मक्षिकाविष्ठा नस्य वालक्तकांबुना योज्यं हिकाभिभूताय स्तन्यं वा चंदनान्वितं ॥२२६।। कासमूलं घृतस्निग्धं धूपो हिक्काविनाशनः रजनी वा मरीचं वा धूपो हिमाविनाशनः ॥२२॥ ॥ अथ छदिरोगे ॥ शक्रा वचामृता विल्वं दुर्गा लाजा मुशीतला जलेन मधुना युक्तं पाने च पंचछर्दिहा ॥२२८॥ जातीपत्ररसः कृष्णा दूरसः सशर्करः लाजा मरीचं मधुना इंति छदि च पंचधा ॥२२९।। एलालवंगगजकेसरकोलमज्जा लाजापियंगु घनचंदन पिप्पलीनां ॥ चूर्णानि माक्षिकयुतानि समानि लिह्यात् छदि निहंति कफमारुतपित्तजांच ॥२३०॥ अंगारमंडका चाज्यं छद्या पथ्यं प्रशस्यते न चोष्णतोयपानं च कर्तव्यं वमनादिते ॥२३१॥ .. लो. २२४ सफलो त्रिफला सहिता । पुगं पूगीफल । २२५ मधुकं यष्टिमधुमूले । २२६ अलतकांबुना अंजनकक्वाथेन । २२९ जातोपत्ररसः जातीनामकलताया पत्राणां रसः । २३१ . अंगारमंडका निर्धूमाग्नि पक्वा वाठी ढोला इत्याख्याळोधूमजा वर्जरीसंभवा वा पुटरोटिका तैलेन घृतेनवा भावितस्य पिष्टस्थ कठिनबंधपूर्वकंकृता ।
२६ ॥ अथ शूले ॥ कुस्तुंबरं त्रिलवणं यवानी पुष्कराह्वयं यवक्षारोभयाहिंगु विडंगान्युदधे फलं ॥२३२॥ पिवेदुष्णेन तोयेन यवक्वाथेन वा पिबेत् जयेत्सर्वाणि शूलानि गुल्मपार्थोदराणि च ॥२३॥ गुडैरंड निशादारुतिलाः सौवर्चलं पुरः धूम्रो राजी कुसुंभं च लेपश्च सर्वशूलहा ॥२३४॥ वर्जयेद् द्विदलं शूली नवमन्नं च शीतलं पिच्छलं दधि वज्यै च दिवास्वापं वर्जयेत् ॥२३५।। ॥ अथ अरोचके ॥ षटकटु सौवलं च पथ्या द्राक्षा च दाडिमं अजाजींद्रा गुडमधु गुट्यरोचकनाशनी ॥२३६॥ सिंही पलांडः सूरणं शतपुष्पा काकमाचिका व्यंजनं रोचकं प्रोक्तं गोधूमा वर्जरी हिता ॥२३७॥ ॥ अथ तृष्णायां ॥ दुरालभा पर्पटकः प्रियंगुः कोलेंद्रजं त्र्यूषणकं सकुष्ठं काथः स शीतो समधुः सिताढय स्तृष्णां त्रिदोषपभवां निहंति ॥२३८॥ अमृता पद्मकरंडद्राक्षा मधुकचंदनं चालकः शर्करायुक्तः काथः पेयस्तृषापहः ॥२३९॥. दुरालभा वा त्रिफला काथः पेयः सशकरः मधु वा शर्करायुक्तं वालुलेपात्तृषापह ॥२४॥ श्लो. २३. पुरः गुग्लुः । धूम्रो-धूमसारः धुस । २३६ षट्- कटु-इंद्रा इंद्रवारुणी मूलं । २३७ वर्जरी-बाजरो । २३८ कोल बदरीफलं । इंद्रज-इंद्रयवाः ।
कुष्ठ मुत्पलजा लाजा न्यग्रोधस्य प्ररोहकाः मधुशर्करया गुट्यो मुखे धार्यास्तपापहा ॥२४॥ रक्तशाल्योदनं शस्तं मधुशर्करयान्वितं भोजनेषु प्रशस्तं च क्षारं कटुकवर्जित ॥२४२॥ छची तृष्णापु शोषे च भ्रमे पानात्ययेपि च अतिसारे च ग्रीष्मे च दिवा निद्रा सुखावहा ॥२४॥ ॥ अथ अनिद्राहरणं ॥ यदा रात्रौ न निद्रा स्यात् तदा कुर्याद्धिमा क्रियां काक्रमाच्यास्तु मूलं वा शिरोवद्धं भिषग्वरैः ॥२४४॥ सिंही व्याघ्री सिंहमुखी काकमाची पुनर्नवा वृताकानां च मूलानां क्वाथो निद्राकरो नृणां ॥२४५॥ ॥ अथ मूतिंद्रासु॥ शर्करेक्षुरसं द्राक्षा मध्वाज्यशीतलं जलं एकैकं पानमात्रेण मृतिंद्रानिवारणं ॥२४॥ तुरगलाला मरिच संघवं मधुना सह नेत्रांजनाद्धरेन्मृच्छा नीलं शिग्रुफलान्वित ॥२४७॥ डंभयेत्तालुदेशे च वायुः कुर्यात्सुशीतल: आंदोलनं तथा कार्य शोतजलेन स्नापयेत् ॥२४८॥ ॥ अथ दाहे ॥ कुशकासेक्षुमूलानां चोशीरं घनवालुकं क्वाथः सशर्करः पीतो सर्वदाहं निवारयेत् ॥२४९॥ पर्पटीशीरचनामृता मध्वक्तः शर्करान्वितः शीतः पीतो नित्याशु दाहं सर्वशरीरज ॥२५॥ कायकरसः पीतो देहे शस्तो विलेपने श्लो. २४५ सिंही, वृहत्कंटकारी, ध्यात्री कंटकारी सिंह मुखी आढरूपको । २४७ नील नीलीमूलं । २४८ बांदोलन- हिंडोलारोहणं तेन पवनसुखं । २:१ कालेयक-अगर ।
धात्रीफलं वा सितया जले पिष्ट प्रलेपने ॥२५॥ ॥ अथ अपस्मारे मृगीरोगे ॥ नस्यं पानांजनं लेपो मर्दन दाहमेव च अपस्मारे चोपचारे घृतं तैलं च धीमतां ॥२५२॥ अगस्तिपत्रं मरिचं मूत्रेण परिपेषित नस्ये शस्तमपस्मारे मृगकीटो विनश्यति ॥२५३॥ वंध्याकटिकीमूलं घृत शर्करयान्वित नस्य श्रेष्ठमपस्मारे मृगीवातं निवारयेत् ॥२५४ खुरसाणीवचा पिष्टा दुग्वे कृत्वाथ भक्षयेत् त्रिसप्तदिवसहन्यादपस्मारं मृगी तथा ||२५५॥ यूपणं त्रिफला हिंगु सैंधवं. कटुका वचा नक्तमालकवीजानि तथा च गौरसर्पपाः ॥२५६॥ वस्तमत्रेण पिशानि गुटो छाया विशोषिता अंजनाद्धंत्यपस्मार स्मृतिभ्रंशं तथैव च ॥२५७॥ ललाटे च भ्रुवोर्मध्ये दहेद्वा मूनि मानवं तेन शांतिगीरोगे अपस्मारेषु चेतनं ॥२५॥ वर्जयेच्च मृगीरोगी कटुकाम्लं सुरां पुगीं असाध्यो हि मृगोरोगो अपस्मारो हि मृत्युदः।२५९॥ ॥ अर्थाचत्तभ्रम वायुरोगे । चित्तभ्रमे चोन्मादे वा अथलो मानवो भवेत् तत्रापस्मारकं कर्म कर्तव्यं भिषजा स्वयं ॥२६०॥ कल्याणकं तथा ब्राह्मीघृतं देयं सदा बुधैः सर्वचेतोविकारेषु शमनं परमं मतं ॥२६॥ ॥ अथ अर्दित वायुरोगे । मुखं नेत्र तथा ग्रीवा अर्दिते वक्रतां व्रजेत् श्लो. २६० ग्रथलः शुद्धिहोनः ।
२९ पक्षपाते तथाधागे शून्यं च मृत्युकारक ॥२६२॥ रसोनं पर्पटो बरी काथो चादितनाशन: वातारिविवश्वा मगधा चाचगंधा हि वातहत ॥२६३।। मापा वला अश्वगंधा रास्नैरंडं फलत्रिक क्वाथो चार्दितदोषेषु पेयो गुग्गुलुना हितः ॥२६॥ ॥ अथ जाडियावायु-धनुर्वायु रोगे ॥ घातितां मूतिका हति अम्लसेव्याद् द्विजग्रहः तस्या धनुप्याकृतिश्च सप्ताहान्नियते ध्रुवं ॥२६५॥ शरीरं सर्जतैलेन. विमर्च भिपजांवरैः दशमूलभवः क्वाथो नस्यं कदुष्णभेपजैः ॥२६६॥ पुनः कालारिपानं वो तैलं लविंगसंभवं पोनाल्लेपाद्धनुःशांतिर्मुक्तं स्याद् द्विजवंधनं ॥२६७॥ ॥ अथ शीतांग वायुरोगे ॥ हिमं सर्वशरोरं च शीतवातस्य लक्षणं तस्य कुबेरं कर्कोटी मर्दन शीतनाशनं ॥२६८॥ रास्नाभूनिव श्रीयंती दशमूलं शठी तथा दुःस्पर्शाक्वाथः पीतोयं शीतांगसमये ध्रुवं ॥२६९॥ कस्तुरीदेवकुसुमकुबेराकजै रसैः पानं शीतांगरोगेपु तथा लसणसेवनं ॥२७॥ ॥ अथ आमवाते। कटयां व्यथा गुदे बंधः संधीषु श्वयथुर्भवेत् उत्थाने न समर्थः स्यादामवातस्य लक्षणं ॥२७॥ श्लो. २६५ घातितां प्रसव पीडितां । २६७ कालारिपान कालारसपानं द्विज-दंत । २६८ कुबेर यचानी । कोटी ककोडी । २६९ त्रायंती त्रायमाणा । दुःस्पर्शा-धन्वयासः । २७० कुबेर-यवानी । लसणं रसोनं ।
३० पिबेदेरंडतलं च गुडक्षीरेण संयुतं सागोत्थामवाते च श्रेष्ठमेतद्विरेचनं : ર૭રા रास्ना-गुडूची देवाई वातारिः समहौषधः पिबेदामे बंधकोष्ठ कटीशूले विशेषतः ॥२७॥ वर्जयेद् द्विदलं गौडच तैलमम्लं च पिच्छलं शीतोदकेन स्नानं च आमवाते विवर्जयेत् - ॥२७॥ ॥ अथ रांधणवायु-रांजणवायु अध्रसी वाते ॥ रक्तवातसमुद्भूतं जानुये च रांधणं ॥२७॥ जान्योश्च जंघयोमध्ये जायते बहुवेदना अस्मिश्च रुधिरासावं तथा स्वेदं च कारयेत् ।।२७६॥ अभ्यंगो वातहृत् तैलं पानं रास्नादिपंचकं पादरोगेषु सर्वेषु चांगुल्याश्चतुरंगुले ॥२७७॥ तिर्यग्दाहः प्रकुर्वीत पथ्यं यद्वातरोगिणां ॥२७८॥ ॥ अथ संधिगतवायु रोगे ॥ हृदि प्रोणो गुदेपानः समानो नाभिमंडले उदानः कंठदेशे स्याद् व्यानः सर्वशरीरगः ॥२७९॥ संधिस्थाने भवेत्पीडा किचिच्छोफश्च जायते वायुं संधिकनामानं त्रिमासं स तु तिष्ठति ॥२८०॥ अतः प्रतिक्रियां वक्ष्ये येन सिध्यति मारुतः स्नेहं निरूहणं पथ्यं पाचनं शमनानि च ॥२८१॥ स्वेदनं मर्दनाभ्यंग वस्तिः स्नेहं रक्तमोक्षणं रेचनं लंघनं चाथ कर्तव्यं वायुनाशनं ॥२८२॥ रास्नो गद्दचिका दारु नागरैरंडगोक्षुरैः क्याथः सागवातेषु सप्तधातुगते हितः ॥२८३॥ श्लो. २७३ वातारिः परडः । २७४ गोडधं गुडविकृतिः । २७५ रांधण रांजणं अध्रसीवात: Sciatica | ३१ ॥ महारास्नादि क्वाथः ॥ रास्ना गड्ची देवाहमेरंडमभया शठी बलोग्रगंधा पाग च शतपुप्पा पुनर्नवा ॥२८४॥ पंचमूली विपा मुंडी सहाचरो दुरालभा यवानी पौष्करं मूलं वाजिगंधा प्रसारणी ॥२८॥ गोक्षुरं आहरूपश्च हपुपा वृद्धदारुक शतावरी तथा ब्राह्मी गुग्गुलुः पिप्पलीयुतः ॥२८६॥ समभागैरिमैः सर्वैः कपायमुपकल्पयेत् वातरोगेषु सर्वपु महारास्नादिकः स्मृतः ૨૮૭ ॥ योगराज गुग्गुलुः ॥ चित्रकं पिप्पलीमूलं यवानी करकी तथा विडंगान्यजमोदा च जीरकं सुरदारु च ॥२८८॥ चव्यैला संघवं कुठं रास्ना गोक्षुरधान्यक त्रिफला मुस्तकं व्योपं शिशीरयवाग्रज ॥२८९॥ तालीसपत्रं पत्रं च सूक्ष्मचूर्णानि कारयेत् यावत्येतानि चूर्णानि तावन्मात्रं तु गुग्गुलु ॥२९॥ विमर्च सर्पिषा गाढं स्निग्धभांडे विनिक्षिपेत् अक्षमात्र प्रयुजित यथेष्टाहारवानपि ॥२९॥ योगराज इति ख्यातो योगोयममृतोपमः अशीतिवातजान्हन्यात्मातर्नित्यं च भक्षयेत् ॥२९२।। विश्वा च पिप्पलीमूलं शतावर्यश्वगंधिका रास्ना वला तथा बोला सितया मधुना सह॥२९३॥ अक्षमात्रा गुटी कार्या प्रातर्नित्यं च भक्षयेत् हरते वातजारोगान् यथा सूर्योदये तमः ||२९४॥ चौपचीनी सितायुक्ता चूर्ण नित्यं च भक्षयेत् रलो. २८४ उग्नगंधा-बचा । २८८ करकी-कर्णिकारः ।
३२ हरते वातजारोगान्लवणं न तु भक्षयेत् ॥२९५॥ ॥ नारायण तेल ॥ श्योनाकः पाटला विल्वं तर्कारी पारिभद्रकं अश्वगंधा कंटकारी प्रसारणी पुनर्नवा ॥२९६॥ स्वदंष्टाविबला चैव बला च समभागिका पादशेषे जलद्रोणे क्वथितं सावयेत्तः ॥२९७॥ ततश्चतानि योज्यानि भेषजानि भिपग्वरैः शतपुष्पा वचा मांसी दारु शैलेयकं वचा ॥२९८॥ पतंग चंदन कुष्ठं तथान्यद्रक्तचंदनं करंजबीज सुमतिस्त्रिसुगंधिः पुनर्नवा ॥२९९॥ रास्ना तुरंगगंधा च सैंधवं च दुरालभा मंजिष्ठा सुरसा चैव प्रत्येकं तु पलद्वयं ॥३०॥ चूर्ण कृत्वा क्षिपेत्तत्र क्षिपेत् लाक्षारसाढ शतावरीरसं चैव अजाक्षीरं चतुर्गुण ॥३०॥ दधि तत्राढकं गव्यं तिलतैले प्रयोजयेत् सिद्धं वह्नौ पुनः शोतं तैलं नारायणाभिधं ॥३०२॥ मर्दनान्नाशयेद्रोगांश्चतुरशीतिवोयुजान् तथा शतावरी तैलं विषगर्भ च वायुहन ॥३०३॥ लशुनं मधुना युक्तं तत्र युक्ता च मेथिका पाको वा चाश्वगंधाया वातं हंति सुदुस्तरं ॥३०४॥ ॥ अथ अम्लपित्ते ॥ भोजनांते भवेद्वांतिश्चाम्लपित्तमुदाहृतं उद्गारो जायते तस्य विरुद्धाहारतो भवेत् ॥३०५॥ भूनिव निव त्रिफला पटोला वासकामृताः ....श्लो. २९६ तकारी । २९८ शलेयकं पाषाणभेद । सुमतिः सुरसा तुलसी।
पर्पटो मधुसंयुक्तः क्वाथोम्लपित्तनाशनः ॥३०॥ पारिभद्रदलानि स्युरामलक्या फलानि च क्वाथ्यमानं प्रयुक्तव्यमम्लपित्तनिवारणं ॥३०७॥ ॥ अथ विसर्प रोगे ॥ सर्वदेहे भवेचित्रं श्वेतं वा रक्तमंडलं विसर्प तं विजानीयात् सप्तधा परिकीर्तितं ॥३०८॥ चक्रमर्दः शिवा दुर्वा सैंधवं च हरीतकी एषां समानकं चूर्ण तरकांजिकमर्दितं ॥३०९॥ विसर्प हेति लेपन रक्तमंडलकं तथा क्षीरण शीततोयेन धावन ति सर्पणं ॥३१०॥ ॥ अथ व्रणरोगे॥ व्रणाश्चानेकपा मोक्ता नानाधातुविकारजाः तेषां निंवः सदा श्रेष्ठः पक्कापक्वत्रणेषु च ॥३११॥ अंकोलकं च लोद्रं च कदंवार्जुनवैतसाः पारिभद्दलानां च पिटं बणविलेपन ॥३१२॥ चंदनस्य विलपेन शतपत्राणि बंधने धात्रीफलानि पिष्टानि लेपावणविनाशनं ॥३१३॥ ॥ अथ नाडीव्रणे ॥ अमृतापटोलीमूलं च त्रिकटु त्रिफला तथा समभागं कृतं चूर्ण सर्वैस्तु गुग्गुलुः समः ॥३१॥ मविवासरमेकैक खांदेदाममाणकं नाडीव्रणसमुद्भूतरोगाणां शांतिकृत्सदा ॥३१५॥ ॥ अथ विस्फोटके लेपः॥ रक्तचंदनपोटी त्रिफलामूलकामृता खदिरो चारिपिष्टानि विस्फोटघ्नं विलेपनम् ॥३१६|| 4 ॥ अथ अग्निदग्धे ॥ निवपत्राणि सुरसा कुष्ठं धात्रीफलानि च ईपदग्ध्या कृतो लेपो दग्धपीडा निवारणः ॥३१७॥ अलसीतैल लेपेन दग्धपीडा निवारणं सर्जमेरंडतैलेन लेपार्दग्धनिवारणं ॥३१८॥ ॥ अथ कर्णके ॥ कर्णमूले भवेद ग्रन्थिः सा ग्रन्थिमन्युकारका जलौका मुच्यते तत्र डंभन वा हितं भवेत् ॥१९॥ कर्णमूले त्रयो ग्रन्थ्यश्छालिका कर्णपालिका उपायेन च ते साध्ये निवपत्रैश्च नाशयेत् . ॥३२०॥ ॥ कर्णकोत्पत्तिकारणं ॥ सुप्तेन जलपानेन कर्णको ग्रन्थि संज्ञितः । उत्पद्यते महाघोरः कर्णकः सन्निपातक: ॥३२॥ त्रिदोषवत्सदा वैधैः क्रियते पथ्यभेपर्ज गवां सर्पिस्तदा पानं कटुकाम्लं विवर्जयेत् ॥३२२॥ ॥ अथ शस्त्रघाते ॥ आदौ च शस्त्रघाते च घृतेनोष्णेन सेचयेत् पश्चाद्घातमुखे लेपः शस्त्रघातो न पच्यते ॥३२३॥ वाणमुखाशिखा दंते चर्विता तद्रसो द्रुतं पूरितो रोहितः सद्यो वचालेपोथ रोहकृत् ॥३२॥ चर्वितो द्रुतपूर्णेन सहदेवीरसेन वा श्वेतवस्त्रेण संबंध नवघातस्तिरोहति ॥३२५॥ स्वल्पेपि शस्त्रघाते च सिंदूरोपि घृतप्लुतः पाषाणोपि नसाणस्य प्रलेपो व्रणरोहकृत ॥३२६॥ - श्लो. ३१९ डंभनं अग्निकर्म डाम् । ३२६ नसाणस्य सराण- सर्श शस्त्रोत्तेजनपाषाणं शिलथा संघृष्य लेपः ।
॥ अथ गंभीरवणं हैया होडी पाठु सप्तपुट सत्पुडा चापटिका पांटुं॥ बृहत् व्रणं तद् गंभीरं त्रिप्रकारं तदुच्यते अस्थिमांसशिराप्राप्त स्थाने नाम पृथक् पृथक् ॥३२७॥ हस्तमध्ये सप्तपुटं हृदये हृदि होडिका पृष्ठे चोपटिका ज्ञेया स्थाने नाम परीक्षयेत् ॥३२८॥ कुमारीनिवपत्रेण प्रथमं पाचयेद् व्रणं पश्चात्स्फोटनकं कुर्यात् डंभन शोधनं तथा ॥३२९॥ कृशदुर्वलभीरूणां नाडिमर्माश्रिताश्च ये क्षारसूत्रेण तांश्छिंद्यान्न शस्त्रेण कदाचन ॥३३०॥ धावनं शांतिकरणं व्रणानां क्रियते बुधैः डंभन सर्वतो व्रणे श्रेष्ठ प्रोक्तं महर्षिभिः ॥३३१॥ व्रणमध्ये यदा जंतुस्तत्र धूम्रं च दापयेत् व्रणमध्ये महच्छिद्रं वति तत्र प्रदापयेत् ॥३३२॥ करंज धव निवानां कदवार्जुनवेतसात् पादावशेषक्वाथेन गंभीरव्रणधावनं ॥३३॥ निवरसं मधुयुक्तं चामिना प्रतिकारयेत् वणमध्ये क्षेपनीया सा वतिः सुखकारका ॥३३४॥ कुक्कुांडखंडयुक्तहंसपाकस्य धूमतः वणे जंतूनिहत्याशु चार्कपुष्पेण धूपित सिंदूर हिंगुलं सजे वोदारं हीरदक्षिणं श्लो. ३२७ हस्तमध्ये सप्तपुटं नामगंभीरं व्रणं जायते 'सातपडो' इति कथ्यते । हदि जातं गंभीरव्रण हृदि होडिका "हैया होडी" इति कथ्यते । पृष्ठस्थं गंभीरवणं चोपटिका "पाटुं' इति कथ्यते इदं बहुधा मधुमेहिनां भवति कएसाध्य कचिदसाध्यमपि । ३३५ कुक्कुटांडखंडः अंडावरणं 'इंडानां काचला' । हंखपाकः हिंगलः । ३३६ हीरदक्षिण-हीरादरण इति प्रसिद्ध द्रव्यं । मीणेन मधूच्छिष्टेन ।
૩૬ मनुष्यास्थि भस्मकं च घृतं मीणेन संयुतं ॥३३६॥ श्वेतवस्त्रेण तं लेपं व्रणोपरि च दापयेत् असाध्यं तदतिच्छिद्रं यथा सूत्रघृतान्वित ॥३३॥ ॥ अथ चिपिका स्फाटिका झर्मरीका कुक्षिका आमरी- कसवीपियो-फटकियो । झर्मरीको कुक्षिका च स्फोटिका चिपिका स्मृताः श्वेतव्रणो व्रणः किंचित् सद्योत्रणः स उच्यते ॥३३८॥ झमरीके डंभनं कुर्यान्येघनादैश्च लेपयेत् तैलं वाम्लं तथा हिंगु वर्जयेच सदा बुधः ॥३३॥ पारदं गंधकं नीली घृतयुक्तं च लेपयेत् कुक्षिकां स्फोटिकां चीपी सद्यो नाशयति ध्रुवम्॥३४०॥ ॥ अथ नासुरे ॥ महिपीशृंगं दग्धं च घृतयुक्तं च लेपयेत् मानुपास्थ्नां घृते लेपो नासुरं नाशयेद् ध्रवं ॥३४१॥ ॥ अथ वाले स्नायु रोगे ॥ छिपीभस्म दधियुतं पानाद्वालकनाशनम् किंशुकं गुडसंयुक्तं वालकं हंति सप्तशः ॥३४२॥ ॥ अथ श्लीपदे वल्मिके राफी कोटिकानगरे ॥ कीडियानगर रोगे ।। पादात्तले भवेद् व्याधिः श्लीपदं वलिमकं तथा श्लीपदं रक्तभेदी च वल्मिकं मेदसा स्मृतं ॥३४॥ क्षारसूरणकं षिष्ट्वा मधुना सह लेपयेत् सहस्रमूलीमूलं च मधुयुक्तं च लेपयेत् ||३४४॥ श्लो. ३३८ शर्मरी-' झामरी-झामरो । ३४२ छिपीभस्म जलशुक्ति भस्म 'नदीनी छिपनीयु' इति काठीआवाडे । किंशुकं पलाशपुष्पं । ."
३७ तैलमेरंड वापि श्लीपदं ति सत्वरं बल्मिकं कीटिनगरं एतल्लेपाद्विनश्यति ||३४५॥ ।। अथ अर्बुदे-रसोली रोगे । अर्बुदं च महत्स्थूलं यत्र तत्र तु जायते रसोलिका च सा ज्ञेया रक्तमोर्ग च रुध्यते ॥३४६॥ तस्यादौ स्फोटनं कार्य मर्मस्थानं च वर्जयेत् सैंधवेन घृतेनापि कुर्यात्तस्यानुलेपनं ॥४७॥ सरणं कंदकं दग्ध्वा घतेन च गुडेन वा सविडंगं जवक्षारो शुंठी गंधं च लेपयेत् ॥३४८॥ शेषा व्रणक्रिया कार्या तथा चाव॑दशांतये वातघ्नानि च पथ्यानि हितानि मधुराणि च ॥३४९॥ ॥ अथ कंठमाला गंडमाला गलगंडः ।। कंठदेशे भवेद् ग्रन्थ्यो मालावजंतुसंयुता सर्पपः शीग्रुवीजानि शणवीजातसीयवाः ॥३५०॥ मूलकस्य च वीजानि तक्रेणाम्लेन लेपयेत् गृहधूमं कृष्णजीरं गौमूत्रेण च लेपयेत् ॥३५॥ गंडमोलां च लूतां च हंति शीघ्रं च कीटकान कटुतैलान्वितैर्लेपात् सर्पकंचुकिभस्मना ॥३५२॥ ॥ अथ लूता ॥ लूतामध्ये भवेज्जंतुर्नखरोमाणि नाशयेत् लूतानि सर्वगात्राणि तेन लूता प्रकीर्तिता ॥३५३॥ अंकोलकस्य मूलानि पारिभद्दलानि च गौमूत्रेण कृतो लेपो लूताजंतुनिवारण ॥३५४॥ श्लो. ३४५ कीटिनगर-किडियानगरं वल्मिकभेदः श्लोपद भेदः । ३४८ गंध गंधक । ३५१ कृष्णजीरं-तिकजीरक-काळो- जीरी । पारिभद्रः आनः ३८ . हिंगु कुक्कुटविष्टा च कर्णिका रेणुसंयुता मधुयुक्तः कृतो लेपो. लूताजंतुनिवारणः ॥३५५॥ अगस्तिपत्रनिर्यांसो लेपो लूतानिवारणः वर्जयेत् : शीतवीर्याणि तीक्ष्णवीर्याणि वर्जयेत् ॥३५६॥ ॥ अथ भगंदरे ॥ वृषणासनयोर्मध्ये भगस्थानं तदुच्यते एतत्स्थाने भवेच्छिद्रं भगंदरमिति स्मृत ॥३५७॥ असाध्यो हि स रोगोस्ति कष्टसोध्यः कदाचन जलौकां मोचयेदादौ पश्चाद् भेषजमाचरेत् ॥३५॥ कोलारग्वधरजनी चूर्ण मधुघृताप्लुतं -अग्रेवतिः प्रणिहिता व्रणानां शोधने हिता ॥३५९॥ दंतीवहिनिशालेपो भगंदरविनाशकृत त्रिफलावारिणा पीतो गुग्गुलुवा प्रयत्नतः ॥३६॥ श्वानास्थिभूलताचूर्ण तर्क राशभशोणितं एतल्लेपाच्छमं याति कुपितोपि भगंदर: ॥३६१॥ पुष्टांगना तथा युद्धं व्यायामो गुरुसेवनं रूढे व्रणे प्रयत्नेन त्यजेत्संवत्सरं नरः ॥३६२॥ ॥ अथ विद्रधि रोगे ॥ अंडवृद्धिर्भवेद्यस्य तस्य चिद्रधिर्जायते मृदुविरेचनं कार्य जलौका मोचयेद् भिषक् ॥३६॥ दुग्धमेरंडतैलेन विधौ मिश्रितं हित कुंदरुः पिप्पली पथ्या दापयेच्छर्करायुतं ॥३६४॥ निहंति विधेः शोर्फ दापयेल्लघुभोजन श्लो. ३५५ कर्णिका कर्णिकारः । ३६१ भूलता भूनागसंज्ञका जीवाः । राशभः गर्दभः । ३६४ कुंदरुः तन्नामकनिर्यासः शेष- गुंदरः । ३६५ विद्रधि रोगे पादांगुष्ठयोर्मूलभागे तिर्थक् प्रका- रेण ढंभन अग्निकर्म-डाम संशकं ।
३९ विलोमं पादांगुष्ठं च मूले च तिर्यक् डंभनं ॥३६५॥ ॥ अथ उपदंशे विस्फोटके ।। निवामृताब्दकटुकी वृपधन्वयासो भूनिवपर्पटपटोलफलत्रिकाणां ॥ क्वाथो नृणामिह हितोस्त्युपदंशरोगे विस्फोटके रुधिरपितदेहभागे ॥३६६॥ सूत लवंगं कपूर जातीपत्रं फलं त्रुटी कवावो पिप्पलीमूलं पत्रं चैव शतावरी ॥३६७॥ मस्तकी चाश्वगंधा च विडंगं वृद्धदारुकं एतच्चूर्ण साशं च सूताधमहिफेनकं ॥३६८॥ गुडेन गुटिका कार्या मर्दयित्वा विचक्षणैः शुटी विस्फोटकान्हंति सर्वसंधिरजापहा ॥३६९॥ मासधि भक्ष्यमाणास्तु शर्करा चानुपानकं पयसा चोदनं भाज्यं जीर्णगोधूमभोजनं ॥३७०॥ पटिकां मंडलं हंति विस्फोटं संधिवातहृत् खादिरं सारं भक्ष्यं तु शीतमन्नं तिलं त्यजेत् ॥३७॥ त्रिफलाया कपायेण शृंगराजरसेन वा व्रणप्रक्षालनं कुर्यादुपदंशमशांतये ॥७२॥ कंपिल्लो दारशंगश्च सिंदूरश्चाश्चगंधिका घृतमाक्षिकयोश्चैव लेपो दुष्टत्रणाञ्जयेत् ॥३७३॥ निवपत्रं धात्रिमिश्रं घृतयुक्तं च लेपयेत् पथ्या रसांजनं वारि लेपाल्लिंगवणं हरेत् ॥३७४॥ अंवजंबुकरंजाश्च शमीर्वा च चब्बुल: एकैकं वारिणा पिष्वा लेपो लिंगार्तिनाशनः ॥३७॥ श्लो. जातीपत्रं-जातोपत्री । ३६८ मस्तकी-रुमीमस्तकी। ३७१ पटिका-लघु स्फोटिकान । ३७३ दारशूग-वोदार। ३७४ धात्रिमित्रं आमलकी मिश्रं । ३७५ अंव-आन ।
॥ अथ शीतळारोगे ॥ मधु वा वारिणा युक्तं पीतं दाहनिवारणं नीलिका च घृते लेपाच्छीतलादाहनाशनः ॥३७६॥ ॥ अथ उरुस्थंभे ॥ वायु रुधिरयोगेन जंघायां जायते ध्रुवं उरुस्तमः स विज्ञेयस्तत्र दाहरुजे भवेत ॥३७७॥ पिप्पली पिप्पलीमूलं भल्लातकफलानि च कल्को मधुयुतो भुक्त उरुस्तंभं निवारयेत् ॥३७८॥ पिप्पली पिप्पलीमूलं मूलमेरंडसंभवं क्वाथोयं मधुना पीत उरुस्तभं निवारयेत् ॥३७९॥ ॥ अथ विचचिका वर्चला ॥ मुक्ष्म तिलोपमं देहे रक्तं श्वेतं च कृष्णकं चिन्हं विचर्चिका नाम वर्चलापि च सा स्मृता।।३८०॥ कटु सधवं मूळ तालकं समभागतः गौमत्रेण समं पिष्ट इति लेपाद्विचर्चिकां ॥३८॥ अल्लम्लतकगीमृत्रयथितं सधर्व समं चिरकालोद्भवं हंति लेपतो चा विचचिकां ॥३८२।। ॥ अथ आनादरोगे ॥ मानन्दंगाकरसी हिंगुमौवर्चन्टान्वितः लानाविधेा सहिंग विसंधर्व ||२८३॥ वियूदरीतकीश्यामाः स्नुहोऔरण भावयेत् गटिका मृत्रसंयुक्ता श्रेष्टा चानाहभेदिनी ॥३८४॥ • सय मग नया मुशाग गंगे । गरी दादी भ्रमो मोहाप्पनियारी कमिस्नुपा १ . पना गाना लगि मायनमागयां विर्निका ४१ अनिद्रा च मुखं रक्तं ताल जिव्हा च शुष्यति ।३८५। ग्रीशमध्ये च दृश्यते स्फोटको सर्षपोपमाः नाभिपाधं भवेद् ग्रन्थिः सर्वैर्मधुर उच्यते ॥३८६॥ चंदनं यष्टिमधुकं वालक निबपपटे मुस्ताशुंठीकृतः क्वाथो मधुरं हंति पित्तकं ॥३८७॥ ॥ अथ मेदो रोगे ॥ मेदोवृद्धौ स्थूलदेहो जायते बलवर्जितः तस्य मधुयुतं वारि सेवितं स्थौल्यनाशनं ॥३८८॥ व्योषामिमंथत्रिफला विडंगं गुग्गुलुं पिबेत् हंति स्थौल्यं च मेदस्य चोष्णमन्नं च दापयेत् ॥३८९। ॥ अंववायुरोगे ॥ पादपृष्ठे आंबवायुर्जायते वायुयोगतः तस्य वै डंभनं तत्र जलौका तस्य मुच्यते ॥३९०॥ ॥ अथ कामवृद्धिकरणे ॥ ट्रिटंकमुच्चटा ज्ञेया पंच टंकं च मर्कटी पट् टंकं मुशलीकंदं शर्करा सर्वसंमिता ॥३९॥ अक्षमात्रां गुटीं कुर्यान्मधुना तां च भक्षथेद वर्धते कामवाणश्च यथारुष्करतैलतः ॥३९२॥ अश्वगंधा वचा कुष्ठं कृष्णा च गजपिप्पली महिषीनवनीतेन लेपालिंग हि चोच्छ्रितं ॥ अथ उदावर्ते ॥ उदावत गुदरोगो तस्य वति तु दापयेत् हरीतकी जवक्षारो घृतयुक्तं तु भक्षयेत् ॥३९४॥ हिंगुमाक्षिकसिंधूत्थपक्वां वति तु कारयेत् श्लो. ३९१ मर्कटी क्रौंचवीज-कौवच कौचां। ३९२ आरु- कर भल्लातक । ३९५ माक्षिक-मधु ॥
घृताभ्यक्तां गुदे दद्यादुदावर्तविनाशनं ॥३९५॥ ॥ अथ व्यंगे मुखच्छायायां ॥ मुखे गले कृष्णछाया-व्यंगं तन्नाम चोच्यते दुग्धं कृष्णतिलान् पिष्ट्वा लेपाच्छाया विनाशनं।३९६॥ जातीफलं चामलकं जले पिष्टी च लेपयेत् कोलबीजं मधुलेपात् मुखच्छायानिवारणं ॥३९७॥ ॥ अथ मुख खिल्लकरवलारोगे. लोद्रोग्राधनिकाः पिष्ट्वा मुखे लेपाच खिल्लहत मस्तके कुक्कुट शकृत् मूत्रलेपाच शांतिकृत् ॥३९८॥ ॥ अथ शिरोरोगे ॥ अतिभारात् क्रिमिरोगैस्तीक्ष्णोष्णतिक्तभक्षणैः विनाभ्यंगेन वा शैत्यात् पित्ताद्वा आम्लभक्षणात् ।३९९। अतिलेख्याद् दूरदृष्टया सूक्ष्मवस्तुनिरीक्षणात् प्रहारात् क्रोधयोगेन जायते च शिरोव्यथा ॥४०॥ तद्रोगे भोजनं दद्याद् गोधूमं घृतशर्करा शालिमुद्गं गवां दुग्धं शुंठीपाकः शुभः स्मृतः ॥४०१॥ देवदारु नतं कुष्ठं विश्वरंडं च लेपतः शिरपीडां हरेत्सयो ज्येष्ठीमधुकचंदनैः ॥४०२॥ निवपत्रं च तर्कारिः क्वाथवाष्पं जले कृतं हरते मस्तके पीडामेरंडपत्रवाष्पतः ॥४०३॥ गुडेन नागरं नस्यं जले पथ्या गुडेन वा गुडे शोभांजनं नस्यं शिरस्पीडां हरेद् ध्रुवं ॥४०४॥ कुंकुमं तवराजं च विडंग वा मनःशिला घृतेन नस्यं देयं च शिरस्पीडां निवारयेत् ॥४०५॥ श्लो. ३९७ कोलबीज-बदरीफलास्थिमज्जा । १०३ तारिः अग्निमंथः । १०५ कुंकुम केसरं ।
४३ ॥ पडबिंदु तेलं ॥ एरंडमूलं तगरं शतान्हा जयंति रास्ना सह सैंधवं च मुंगं विडंग मधु जेष्टिका च विश्वौषधं कृष्णतिलस्य तैलं ॥४०६॥ अजापयस्तैलविमिश्रितं च चतुर्गुणै गरसैस्तु पक्वं ॥ पड्विंदवो नासिकया प्रदेयाः सर्वाश्चन्याच्छिरसो विकारान् ॥४०७॥ त्रिकटु पौप्करं रात्री रास्ना च सुरदारु च क्वायः शिरोतिजालं हि निशापीतो निकृन्तति ॥४०८॥ मरिचं मधुकं श्यामामूलं कुंकुमवालक द्राक्षा विश्वा धान्यकानि नबराज नागकेसरं ॥४०९॥ चूर्णित सीरमध्वाज्यनिपीतं याति वेगतः शिरम्पोडाजा पीडा गुंजामूलस्य नस्यतः ॥४१०॥ ॥ अथ भ्ररोगे ॥ तांबलपत्रस्वरसो विडंग सिंधूद्भवं हिंगु गुडेन युक्तं ।। जलेन पिष्ट विनिहति नस्य भ्रूशंखदोष क्रिमिजे निहंति ॥४११॥ रक्तकणवीरपत्ररसः शर्करयान्वितः नस्यं प्रभातसमये चार्घशीर्षव्यथां हरेत ॥४१२॥ ॥ अथ नालारोगे ॥ नांसारोगस्त्रिया प्रोक्तः क्रिमिजो रक्तसंभव: तृतीयः पीनसो रोगो वातपित्तकफोद्भवः ॥४१३॥ ग्लो. १०८ रात्रिः-हरिद्रा । ४०९ श्यामामूल-कपूरीमधुरी. मूलं । तवराज तवथीरों। .
विडंग हिंगु कपूरं नस्ये क्रिमिजदोपहत् दुर्वाया दाडिमरसो नस्यं क्रिमिजदोपहृत् . ॥४१४॥ पाठा द्वे च निशे मूळपिप्पलोजातिपत्रकैः हत्याशु तैलसंसिद्धं नस्यं स्याद् दुष्टपीनसे ॥४१५|| त्रिफलापिप्पलीचूर्ण मधुना सह भक्षयेत् कुलिंज त्रिगट्टयुक्तं ली पीनसनाशनं ॥४१६॥ मरिच गुडसंमिश्रं दधिः पानेन नश्यति पीनसं मापगोधूमभोजनादेव नश्यति ॥४१७॥ शय्यारूढो जलं शीतं निद्राकाले तु यः पिबेत् तस्य पीनसजो दोपः शमं याति दिनत्रयात् ॥४१८॥ ॥ अथ केश रोगे ॥ आरनालं चक्रमर्दतंडूलजलमर्दितं मस्तके कुरुते लेपः शक्रलुप्तो विनश्यति ॥४१९॥ गुंजामूलं फलं गुंजा भल्लातं बृहतीफलं मधुयुक्तः कृतो लेपः शक्रलुप्तं विनश्यति ॥४२०॥ भंगराजरसेनैव लोहकिट फलत्रिकं निववीज तिलात्तैलं पक्वं च मस्तके क्षिपेत् ॥४२१॥ अकालपलित कंडुमिंद्रलुप्त च नाशयेत् बद्धमूला घना दार्घाः कृष्णाः केशा भवंति हि ॥४२२॥ ॥ अथ कर्णरोगे॥ व्रणे चाते जले पूर्ण शल्ये कृमिभवे तथा कंडूयनं कर्णरोगे जायते चाम्लसेवनातू ॥४२॥ वस्तमूत्रं क्षिपेत कोणं सैंधवेन समन्वितं सैंधवं चोदधेःफेनं तैलेन कर्णरोगहृत् ॥४२४॥ श्लो. ४१५ जातिपत्रकैः जातिनामक सुगंधी पुष्पलताया पत्रैः । ४१६ कुलिंज कुलिजनं । त्रिगडू-त्रिकटु । ४१९ शक- लुप्तः इंद्रलुप्तः ।
॥४२६॥ . लशूनं भानुपत्राणि वह्नौ तप्तानि मर्दयेत् तहसो कर्णपूरेण कर्णशूलं विनाशयेत् ॥४२५॥ शुक्ती राजी चार्कमूलं गृहधूम तक्रमर्दितं : तद्रसो कर्णनिक्षिप्तः कर्णवाधिर्यनाशनः ॥ अथ ओष्टपाके ॥ ओष्टस्फोटो भवेद्यस्य गैरिकांभो घृतं मृषेत् आम्रपत्रं घृते पिष्टं मुंशणादोटदोपहृत् ॥४२७॥ ॥ अथ दंतरोगे ॥ कुष्ठं दारू च मंजिष्ठा त्रिफलातिक्तलोद्कं निशा पाटा तेजनी च घर्पणं दंतरोगहत् ॥४२८॥ आढरूपकसेरोर्वा रसः कर्णे च पूरितः दंतपीडो प्रशाम्येत विडंगं सिंधु घर्षणात् ॥४२९॥ ॥ अथ जिव्हा पाके ॥ जिव्हायां पिटिका यस्य जिव्हापाकं विनिर्दिशेत् खादिरं च त्रुटीचूर्ण कवावा तत्र धारयेत् ॥४३०॥ वालकं पद्मकं श्यामा वर्षरं शतपत्रिका एतल्लेपेन शाम्यति स्फोटका रसनोद्वा ॥४३१।। ॥ अथ घंटिका रोगे जिव्हामूलसंभवे ॥ जिव्हामुले घंटसिद्धौ श्लेष्मरक्तोत्थग्रन्थिका वचा समरिचा कृष्णा चूर्ण तत्र निधापयेत् ॥४३२॥ धान्यं नागरजीमूतवचा उग्रा समांशकं काथो हरेद् घंटिकाया रोगं गंडूषधारणात् ॥४३३॥ श्लो. मृ४२७.षेत् मर्दयेत् । ४२८ तिक्तलोद्रकं तिक्तं तिक्ता कटुकी लोद्रकं च । तेजनी तेजबल इति प्रसिद्धं । ४३० त्रुटी एला। ४७१ श्यामा-प्रियंगुः । चर्वरं बब्वलपत्रं । १३३ जीमूत -मुस्ता । उग्रा वचा घोडावज इति । JA .
४६ तेजोवती जवक्षारो दरि कृष्णा रसांजन निशा पाठा मधुयुता गुटी तेषां च कारयेत् ॥४३४॥ मुखे च धार्यते नित्यं घंटिकारोगनाशनी मर्दन स्यात्कंठदेशे तेन ग्रन्थिविलीयते ॥४३५॥ ॥ अथ गलशुडिका रोगे ॥ घंटिकाया अर्धमार्ग लविका ग्रन्धिरुद्भवेत् असाध्या सा हि विज्ञेयां मर्दनं तत्र कारयेत् ॥४३६॥ दिवारात्रौ यवान्याश्च मुखे संधारणं हितं मंजिष्टा च निशा मुस्ता पीतः क्वाथो गलामये ४३७ सिद्धार्थको वचा कुष्ठं रजनी पारिभद्रक गृहधूमं सलवणं कंठे वा लेपने हितं ॥४३८॥ ज्वरे प्रोक्तानि पथ्यानि यानि तानि च दापयेत् न गौल्यं पिच्छलं सेव्यं तैलं नैव गलामये ॥४३९॥ ॥ अथ मुखरते ॥ पिष्ट्या तंडूलतोयेन कुस्तुंवरु शिलाभिदं स्तंभयेत्पतितं रक्तं प्रातः पीतोतिवेगतः ॥४४०॥ ॥ अथ स्वरोपघाते ॥ कृष्णा विभीतकं विश्वा लवंगं लवणोत्तम नागवल्या दलरसे गुटी धार्या निशामुखे ॥४४१॥ जातिपत्रं कणा लाजा मातुलिंगदलं मधु एतल्लेहाद् भवेन्नादः किन्नरस्वरतोधिक ॥४४२॥ ॥ अथ मुखपाके ॥ जातिपत्रामृताद्राक्षा देवदारु फलत्रिक क्वाथः क्षुद्युतः सिद्धो मुखस्थो मुखपाकजित् ॥४४॥ श्लो. १३४ तेजोवती-तेजवलं । ४३८ पारिपद्रकं आम्रपल्लवाः 1 ४३९ गौल्यं गुडविकृतिः । ४४१ लवणोत्तम सैंधवं ।
४७ ॥ अथ मुखशोषे ॥ कुष्ठं कासोद्भवं मूलं मधूकं पिष्टमंभसा मधुयुक्तं पिबेद्धति पिपासां चिरकालजां ॥४४४॥ जलं मलयजं रक्तं चंदनं मधुकं समं उशीरेणान्वितो लेपो मस्तके तृनिवारणः ॥४४५॥ ॥ अथ नेत्ररोगे ।। उष्णातिक्षारकटुकैरभिघातैः सूक्ष्मेक्षणा वातपित्तकफोभृताः सहजाश्च तथापराः ॥४४६॥ जायते नेत्रजा रोगा पट्सप्ततिकसंख्यकाः धूनं नवान्नं रूक्षं च मैथुनं चाम्लवर्जन ॥४४७॥ ॥ चंद्रोदया वतिः ॥ हरीतकी वचा कुष्ठं पिप्पली मरिचानि च विभीतकस्य वीजानि शंखनाभिर्मनःशिलाः ॥४४८॥ सर्वमेतत्समं कृत्वा छागोक्षीरेण पेपयेत् पतिश्चंद्रोदया नाम्नी अंजयेन्नयने निशि ॥४४९॥ नाशयेत्तिमिरं कंडूं पटलं चावुदानि च पुष्पं निशांधतां चार्म व्याख्याता नेत्ररोगजित् ॥४५०॥ शुक्रं च शमयेत्सद्यो माक्षिको माक्षिकैर्युतः त्रिफलाया जलं नेत्रे प्रक्षालनं पुनः पुनः ॥४५१॥ गौशकतो रसे पिष्टवा पिप्पलीमूलमंजनात् निशांध्यं नश्यते शिमं मालतीनिवपल्लवैः ॥४५२।। अमृताया रसे घृष्टं सिंधवं मधुना सह हरते नेत्रजान् रोगान् षट्सप्ततिकसंज्ञकान् ॥४५३॥ त्रिफला भुंगराट् शुंठी दधि मधुकसर्पिषा गौमूत्रेण सनागं च अंजनान्नेत्ररोगहृत् ॥४५४॥ प्रलो. ४४४ कासोद्भवं कासमूलं । ४५१ माक्षिकः सुवर्ण माक्षिकः ।
४८ खपरं फटकी तुत्थं संमांशं सर्वयोजितं सिता सर्वद्विगुणिता गुटी गोदुग्धतश्चरेत् ॥५५॥ अंजनाद्धरते पुप्पं छायांव्यं च तथार्मकं पटलं शस्त्रछेदेन सिद्धयति न तथीपर्धेः ॥४५६॥ ॥ अथ बालक रोगे । शंगी चातिविपा कृष्णा नागराधनपुष्कर घर्पणं शिशये देयं क्षीरदोपनिवारणं ॥४५७॥ किरातं मधुसंयुक्तं घर्षणं ज्वरनाशनं शंगा भांगी मधुयुतं वालानां कासनाशनं ॥४५८॥ शिलाभेदं सितायुक्तं मूत्ररोधं निवारयेत हरीतकी गुडयुता विड्बंध च निवारयेत् ॥४५९॥ विल्व जातीफलं पानादतिसारं निवारयेत् वचा पाने भवेद्वाचा अपस्मारं निवारयेत् ॥४६०॥ लोद्रं रसोजनं धात्री गैरिकं मधुना सह अंजनेनैव बालानां नेत्ररोगनिवारण ॥४६॥ लाजा च धातकीपूष्पं वालानां वांतिनाशनं लवंग खादिरं सारं वालानां श्वासनाशनं ॥४६२॥ गैरिकं राजिका धूम्र गवां तक्रेण लेपयेत् पामा विचर्चिका सिध्मं वालानां हंति सत्वरं ।४६३। ॥ अथ शारीर चिकित्सा ॥ देशकालवयोवहिसात्म्यं प्रकृतिभेषजं एवं सत्वं वलव्याधीज्ञात्वा कर्म समारभेत् ॥४६४॥ देशस्तु त्रिविधो ज्ञेय आनूपो जांगलस्तथा साधारणो विशेषेण ज्ञातव्यः स मनीषिभिः ॥४६५॥ कालस्तु विविधो ज्ञेयो अतीतोनागतस्तथा - श्लो. ४६६ अनागतः भविष्यत्कालः । संधिकाः। संध्याकालः।
४९ . . वर्तमानः पुनस्त्रीणि भातर्मध्याह्नसंधिकाः ॥४६६॥ तथा वर्षादि शीतोष्णास्त्रयः काला इमे मताः अन्ये पञतवः काला वर्षादीनामनुक्रमात् ॥४६७।। हैमंतवर्षा शिशिरेषु वायुः पित्तं च ग्रीमे च घनात्यये च कफमकोपं कुसुमागमे च कुर्वीत यत्नं विधिवद् विधिज्ञः ॥४६८॥ चयश्च त्रिविधं मोक्तमुत्तमं मध्यमाधमे वाल्ययौवनवार्धक्यं कथितं शास्त्रकोविदः ॥४६९॥ प्रकृतिस्तुर्यधा ज्ञेया वक्ष्यामि किल शास्त्रतः वातिका पैतिका चैव अलेमिका सान्निपातिकी।४७० वातिक कृष्णवर्ण च रक्तदेहश्च पैतिके लैष्मिके गौरवर्णं च श्वेतं च सन्निपातिके . ॥४७॥ आदौ रोगोत्पत्तिस्थानं यद्वस्तु चापि जायते त? विवरणं नाम आदोन पोच्यते बुधैः ॥४७२|| साध्यासाध्यकष्टसाध्यं त्रिविधो रोग उच्यते स्थितिलक्षणं रोगस्य ज्ञायते तन्निदानतः ॥४७॥ शल्यं शालाक्यं काये स्यात् तथा वालचिकित्सितं अगदे विपतंत्रं च भूतविद्या रसायनं ॥४७४॥ वाजीकरणमेवेति चिकित्साष्टकमेव च शस्त्रेण क्रियते कार्य तच्छल्यं कथितं बुधैः ॥४७॥ शिरोरोगश्च शालाक्यं देहरोगश्च कामजः अगदं गुदरोगं च मर्भादि बालरोगकं ॥४७६॥ ग्रहादिपीडनं भूतं जंगमं स्थावरं विषं रसायनं सुवर्णादि वाजिनं शुक्रवर्धनं ॥४७७॥ श्लो.४७० तुर्यधाः चतुर्विधा ।
नाही मूत्रं मलं जिव्हा मुख नेत्रं स्वरं वलं
तद् दृष्टा ज्ञायते रोग निदानमष्टधा स्मृतं ॥४७८॥
वमनं रेचनं नस्य लंघनं वस्तिकर्मणि
आदौ रोगे पंचकर्म पश्चादौपधं दापयेत् ॥४७९॥
वमनं हृदये रोगे विरेकचोदरे तथा
लंघनं मलरोगस्य नस्यं च मस्तके गदे ॥४८॥
गुदरोगे वस्तिकर्म कर्तव्यं च भिपज्वरैः
त्वचाया रुधिरस्रावो जलौका दिकमोचनात् ॥४८॥
रोगसाध्यं च विज्ञेयं औपधानां गुणागुणौ
कपायो गुटिका चूर्ण तैलं घृतं च योजयेत् ॥४८२॥
घृतं तैलं च पानीयं कपाय व्यंजनादिकं
पक्चशीतं पुनस्तप्तं सर्व तच विपोपमं ॥४८॥
पाचने पच्यते दोषा शोधने मलशो द्रवेत्
शमने रोगशांतेः कृत् पथ्ये चायुश्च वर्धते ॥४८४॥
अन्नं जलं व्यंजनं च शय्या वायुस्तथैव च
रोगिणां च सदा पथ्यं देयं रोगानुसारतः ॥४८५॥
धर्मार्थकाममोक्षार्थ शरीरं साधनं यतः
तस्माच्छारीरकं ज्ञानं संक्षेपात्कथ्यतेधुना ॥४८६॥
कर्मणा प्रेरितो जीवः शुक्रशोणितबंधयोः
गर्भकाले ऋतौ प्राप्ते नाभिमध्ये स्थितिभवेत् ॥४८७॥
प्रथमे मासि पेशी स्याच्छिरोमांसदये तथा
पाणिपादौ तृतीये च कटयुदराणि तुर्यके . ॥४८८॥
पंचमे मासि चैतन्यं षष्ठे कर्णाक्षिनासिका
सप्तमे नखरोमादि ऊर्ध्वादधस्तथाष्टमे ॥४८९॥
नवमे प्रसते गर्भश्च योनियंत्रनिपीडितः
शुक्राधिक्याद्भवेत्पुत्रो रक्ताधिक्याच कन्यका ॥४९०॥
५१
द्वयोः साम्पे भवेक्लीयो सर्वकामादिवर्जितः
परस्परं निधाताच्च युग्मगर्भश्च जायते ॥४९॥
देह सप्तशतं नाइचो संविषष्ठीशतत्रय
सप्तोत्तरं मर्मशतं पट्चक्रं पंचवायुना ॥४९२॥
कलाः सप्ताशयाः सप्त धातवः सप्त तन्मला:
सप्तोपधातवः सप्त वंचा सप्त प्रकीर्तिताः ॥४९३॥
नवद्वाराणि पुरुपे तेपां दश तु योपितां
वातपित्तकफाश्चेति त्रयो दोषाः प्रकोर्तिताः ॥४९४॥
पंचभूतं पंचतत्वं पंचेंद्रियं शरीरिणां
सार्धत्रय कोटिरोमाणि शरीरं जायते नृणां ॥४९५।।
लक्षोनाः कोटि संख्याता मुखार्ध्व प्रकीर्तिताः
आधाराः पोडश प्रोक्ता नाभिर्देहस्य मध्यमं ॥४९॥
जीवस्थानं च नाभिस्थं ब्रह्मरंध्रे मुखासनं
इडा पिंगला सुपुम्णा चंद्रसूर्यश्च ब्रह्मणा 11४९७||
एकविंशसहस्राणि पटूशतानि तथाधिक
निशाई चरति प्राणः सोहमित्यारद्वयं ॥४९८॥
लिंगे रंध्रद्वयं प्रोक्तं मूत्रं शुक्रं पृथक् पृथक्
तद् रंध्रट्टयं स्त्रीणां मूत्रं गर्भः पृथक् पृथक् ।४९९॥
उदरे पंच कोष्टानि स्त्रीणां गर्भस्तु पष्ठमा
मूत्रमाढकमानं तु विष्टां चैव तथाढक ॥५०॥
दिक्संख्या चांगुलं लिंग योनिश्चांगुलतुर्यका
द्वौद्वौ पलौ तथांडे च गुदा स्यादंगुलत्रयं ॥५०॥
--पडंगुलं तु चरणं कटिस्त्वष्टांगुला स्मृता
द्वादशांगुलमानश्च अर्धहस्तश्च जायते
॥५०२॥
व्यंगुलपमितं घ्राणं जिव्हा सप्तांगुला स्मृता
ग्रीवा चांगुलचत्वारि घाणात् द्वादश तालकं ॥५०३॥
स पलममाणं नेत्रं तु सपादघटशोणितं कुडवाध भवेच्छुकं विषं तु पलसप्तकं ॥५०॥ त्रीणि चैवाग्निस्थानानि सर्वदेहे स्मृतानि च तेनाग्निः पच्यते सर्व कथं गर्भो न पच्यते ॥५०५॥ अर्धयोनेरघोनाभ्याः कुक्षिर्वस्तिस्तथांतरे वायुना रुभ्यते येन तस्माद् गर्भो न पच्यते ।।५०६॥ नरादष्टगुणः कामो नारीणां च प्रजापते रजः प्रवर्तते तस्मान्मासि मासि च शुद्धयति।।५०७ नाभ्या अधो वामभागे दवर्क()द्वयमुच्यते एकस्मिश्च भवेन्मूत्रं द्वितीये पुरीपं स्मृतं ||५०८॥ पुरुषाणां कामदीप्तौ शिराद्वयं हि चांडयो: घ्राणमूलादत ऊर्च कपालं सप्त चांगुलं ॥५०९॥ देहमूलं यथा नाभिजिव्हा तु जपमूलक कणौ श्रवणमूलं तु मोक्षमूलं तथा गुरुः ॥५१०॥ विलोक्यानेकशास्त्राणि चिकित्सानि गुरोर्मुखातू यदत्र वर्णनं किंचित् मया प्रोक्तं यथामति ॥५११॥ संवदष्टादशे चाब्दे अंकाग्निवर्पसंयुते मासे भाद्रे कृष्णपक्षे पंचम्यां गुरुवासरे ॥५१२॥ कूर्मदेशेर्जुनपुरे तंत्रावासः कृतो यतः गुरु वाभिधनश्च गच्छे चागमसंज्ञिते ॥५१३॥ तस्य पीतांबरः शिष्यस्तत्पादांबुजकिंकरः देवीगुरुप्रसादेन विश्रामो ग्रन्थकारक: ॥५१४॥ श्लो ५०८ दवर्कद्वयं कोइली इति लिखितं तत्र । ५१२ अंकाग्नि अंक ९ अग्नि ३ प्रतिलोमेन ३९ संवत १८३९ इति । ५१३ कूर्मदेशे कच्छदेशे । अर्जुन पुरे अंजार नगरे । ॥इति श्री व्याधिनिग्रहो ग्रन्थःसंपूर्णः ॥ प्रशस्ताषधसंग्रहः॥ ॥ श्रीगणेशाय नमः ॥ श्री महाकालेश्वराय नमः ॥ ॥ अथ प्रशस्तौपधसंग्रहं व्याख्यास्यामः । श्रीनाथं शिरसा नत्वा अराधामयशांतये ।। भेपजानि प्रशस्तानि संगृह्यते समासतः ॥१॥ ॥ अथ सर्व ज्वरेषु ॥ मुस्तापपैटधन्वयासधनिकाभूनिवविश्वामृता मृद्वीकादशमूलनिवसइदेव्यारग्वधव्याधयः ।। सेव्यांभासुनिपग्णचंदनवलापाठावरीसारिवा खजूरत्रिफलामधूयवनिका अश्वत्यजं वल्कलं ॥१॥ रास्नानिर्जरदारुचव्यचपलामूलानि सर्वोत्पलं मंजिष्टाकणवेणुपत्रकटुकाभानीपटोलानि च ॥ स्तन्पक्षोणिभुजंगपुष्पलविकारुद्राक्षगोरोचनं वासाकेरजलाजवत्सकसिता सर्व निहति ज्वरान् ॥२॥ ॥ अथ शीतज्वरे ॥ पाठादार्विमहावलात्रिकटुकाजाजीरसोनस्तथा विष्णुक्रांतसिनानिकागृहभवो धूमस्तुलस्योर्द्वयं ॥ नारंगस्य शलाटुपत्रमरलुत्वपत्रनिर्गुडिका भागीपक्व टच्छदाश्च सकलं शीतज्वरं हत्यदः ॥३॥ ॥ अथ रक्तपित्ते ॥ वासापर्पटसेव्यचंदनपर केरमसूनांवुदा द्राक्षायष्टिमधूकमेघनिनदाः श्रेष्टा च खजूरकः ॥ दुर्वादाडिमशुप्कगोमयवरीक्षीराज्यमत्स्येक्षणा क्षौद्रं मोचरसो वटांकुरसिता नंत्यस्रपित्तामयं ॥४॥ - ॥ अथ प्रदरे ॥ जंक्षीरतरुत्वगंवुदवरीलाक्षाजपाचंदनं ." N
२
रंभाकेरजपुप्पधात्रिखदिराः किंजल्कमभोरुहं ॥
इक्षुश्चापि पटुर्विपाकुवलयं कृप्मांडकालिंगकं
... पत्रं च प्रदरं निहंति सुदृशामुद्रिक्तमप्पंजसा
॥ अय प्रदरावांतरभेदे सोमरोगापरपर्याय अस्थिनावे ॥
वाराहीप्रियक्षमोदकतरोःपूप्पं मधृकोद्भवं
पाठालोध्रसरोज कदलीकंदचदंष्ट्रांदा:
जवाम्रास्थिशतावरीसरसिज किंजक्लमप्युत्पलं ॥
धात्रीयष्टयमृताजतूनि च जयंत्यस्थितिं योपितां ॥६॥
॥ अथ कासश्वासहिकातु ॥
भार्डीकर्करशंगिकात्रिकटुकामांसीहरिद्रावचा
चव्यं ग्रंथिकदीप्यकाग्निलशुनाजाजीद्वयारग्वधाः ॥
निर्गुडीदशमूलसर्पपवरारास्नाचतुर्जातकं
देवाव्हं च मनःशिलाकरिकणाज्योतिष्मतीसँघवं ॥७॥
तालीसागुरुहिगुमूलकटुकामारीकपोताझ्झटा
वृश्चीवामयमातुलुंगकयवक्षाराश्च जातीफलं ॥
भुंगालर्ककुरंटकाः कंसनजिदोसाहरिन्मंजरी
कासीदलमेदिनीकुरुवकः स्फूर्जातकाः किंभृकः ॥८॥
वद्वत्कुंडलिवृश्चिकालिखदिराभूताकुलित्यः पुरः
शाकोटासनसोमवल्कसुरसाप्यंकोलबीजानि च ॥
द्राक्षाक्षीरसिता हरंति कसनं श्वासं च हिमां जलं
कापित्यं वदरास्थिपिच्छभसितं हिमां शठी चोधरेत॥९॥
॥ अथ क्षये ॥
जीवंतीघृतधन्वयासममृताजाक्षीरखजूरको
द्राक्षानागवलाष्टवर्गनवनीतान्यश्वगंधा वचा ॥
कूष्मांडं च मधुलिकाकसनजित्श्वास महोरक्षत
पूर्व भेषजसंचयः क्षयमपि व्यक्तं नयंति क्षयं ॥१०॥
३ ॥ अथ मास्वरभेदश्वातज्ञासादौ ॥ : भााँग्रंयिकताकमाचित्रविकारास्नाइपोगर द्रालामाझिकभंगराजवृहत वाग्निकैडर्यकं ॥ एलापत्रकविश्वभपजणाजाजीलवंगत्वत्र- स्तृष्णानं स्वरसाइयुक्तकसने श्वासादिकं नाशयेन्॥१२॥ ॥ अयारोचके। व्यो त्रिजातकसिताश्चिमंदपुष्प सिंघृत्यजीरकगहाईकमाटुंगं ॥ तालीसचव्यकणमूलझलस्यला निम्नत्यरोवनमपि प्रवलं क्षणेन ॥१२॥ ।। अय छौं । मुनष्टल्लोष्टहिमहाडिममानुटुंग जनानपञ्चसितामधुविल्वलाजाः ॥ कोलास्थिकरजलसतु कपित्यधुंरी तालीसजीरकपयोधनिकावमिताः ॥१३॥ ॥ जय छांयां द्राक्षाखररंभाफलहिममधुकं स्तन्यकोचास्थिगोरी कृप्नांमारकरीसलिलवृत्तसितामनु धनुलानाः ॥ दुःस्पृश्यमाविसजलचरादाडिमां भीमकं जीवंतीव्यनागान्दयमपि च मन्नति म मयं च॥१४॥ ॥ अय वृषि ॥ यष्टीसेव्यायांकचंदनवरीमुस्तापटोलामता धात्रीपर्यमुपनिकाकार्यभूनिवः ।। द्राक्षाझौद्रसिन दाडिमपयाखईरकरीजई गादीलाजवृकसजुसलिकनारैश्च वृह माम्यति ॥१५॥ 1 जय संन्याते। कवलंजननस्यांजनथना नं ६ नसतोदः ॥
20 4 दृशनमलिमुख्यैरपि लशुनपटुब्योपमातुलंगं च ॥१६॥ कपिकचा घर्षणमपि संन्यासं घ्नत्यमूनि सर्वाणि ॥ ॥ अथालि ॥ वर्षाभूवज्रवल्लीमथितशिखिवरामरणद्वंद्वमी: व्योपं कैडर्यभल्लातककरजकपिल्लाम्लिकाहस्तकर्णी॥१७॥ मुंडिन्यूलूकदंतीलशुनगुडयवक्षारमूत्रं द्विकुंभं निम्नत्यासि रक्तस्रतिदहनविधिक्षारकर्माणि चैव ॥१८॥ ॥ अथ रक्तार्शमि ॥ लेप्याशंसां हरितमजरिकाविशल्या जीमूतनादपटुकंकणगेहधूमाः ॥ रक्तासां कुटजतायपलांडुप- किंजल्कगव्यनवनीतमुपोदिकाः स्युः ॥१९॥ ॥ अथोदावर्ते ॥ श्यामात्रिवृत्तिल्वरसोनदंतीस्नुशंखिनी हिंगुशिवागवाक्ष्यः ॥ एरंडकंकुष्टकुलित्ययूपमूत्राण्युदावर्तरुज निहंति ॥२०॥ ॥ अथातिसारे ॥ पाठावत्सकधन्वयासककणामाद्रीसमंगाझटा शुंठीमाचरसोजमोदविजयाजातोफलांभोमुचौ ॥ चूतास्थीक्षुरवीजखादिरपयासर्जावरालं तथा रंभाधातकिनारिकेरकुसुमं चिंचांघिवीजाजिनं ॥२१॥ पूलासयज प्रमेहरिपुजं परवीरन्द्रमो- द्भूतं पल्लवमाम्रनीपतरुजक्षीरद्रुजवूत्वचौ ॥ बालं तिदुकविल्वदाडिमफलं लोघोरलुयक्षधृक् दृध्याज मधुलाजतैलमुखितान्येतान्यतीसारिणां ॥२२॥ ॥ अथ ग्रहण्यां॥ पूतीकद्वयवाणपुंखिमथितं क्षुद्धोधिनीबर्बरा शाष्टिातलपोठपप्पणवचाक्षारत्रयं जीरके ॥ ..
- वर्षाभूद्वयपंचकोलमरिचान्यकोलकडर्यक चांगेरीधवहिंगुपंचलवणं धनति ग्रहण्यामयं ॥२३॥ ॥ अथ मंदवन्ही ॥ यान्यतिसारहराणि प्रोक्तानि नंति तान्यपि ग्रहणीं ॥ ग्रहणीहराणि यानि तानि च जनयंति जाठरं वन्हि॥२४॥ ॥ अथ विचिकायां ॥ पूर्व छर्दनमभसा सपटुना नस्य रसैभृगजै- निष्पाव च्छदविश्वशुद्ध सुदकं दाहश्च पार्योस्तथा ॥ भ्रष्टो जीरकटंकणश्च पयसा पान तथा भेषजं । वर्चा वर्षरमंजनं च कटुकडव्यविपच्यां हितं ॥२५॥ ॥ अथ प्रमेहेषु ॥ आकुल्यद्रकमबुधात्रियुगलं कार्पासवीजामृता पाठाविजमूलशिग्रकतकं श्रेष्ठा च गुंजा सिता ॥ निर्यासः खदिरारिमेदयुगयो:रदुर्निवासने ब्राह्मीकोकिलहक्कपित्यककुभं क्षीरद्रुजंवृत्वचौ ॥२६ कांतं ह्यभ्रककिगुग्गुलुशिलाजिवाज्यमत्स्येक्षणा भंजीकेसरकैरवेक्षुरभवं पोज च कडर्यकं ।। पुष्पाश्वत्यककैरपुष्पमुशलीवेणुछदाः किंशुक- स्तैलं माक्षिकमुद्यूपमथितं नंति प्रमेहं द्रुतं ॥२७॥ ॥ अथ मूत्रकृछ्रे ॥ यष्टीगोक्षुरयुग्मकाशकतकं द्राक्षागुडूचीवरी कूष्मांडेक्षुकपोतकंकारसीदाबर्वोत्रुटिश्चंदनं ॥ मत्स्याक्षीकुशतंदुलीयवसुकब्राह्मीपुरोर्वारुकं धात्रीमुद्गसिताब्जकेरसलिलं स्यान्मूत्रकृछापहं ॥२८॥ ॥ अथ प्रमेहपिटिकासु॥ एलातुरुष्कगदपत्रकरात्रिसेव्य स्थौणेयशुक्तिनखगुग्गुलदेवधूपाः ।।
श्रीवासबोलतगरागरुदेवदारु क्षीरद्रुमाश्च पिटिका विनिहंति सद्यः ॥२९॥ ॥ अथाश्मया ॥ गुंद्रागुच्छकुलित्थटंकणयवक्षारोश्मभिद्वालुकं प- प्रस्तरभित्प्रसारिणित्रुटीनिर्यासपूत्यद्रकं ।। मूलं मोरटशिग्रपूगवरुणैरंडं त्रिश्चिका कृछध्नानि च भेपजानि सहसा नंत्यश्मरीं शर्करां:३० ॥ अथ सोमरोगे ॥ निघ्नंति मापमुशलीहिमतालकंद धात्रीवरीकतकगोक्षुरशर्करैलाः ॥ द्राक्षागुडूचिकदलीफलकं च पौं किंजल्कसेव्यमधुकानि च सोमरोगं .॥३१॥ ॥ अथ विद्रधौ ॥ त्रायंतीत्रिफलाकरंजयुगलं शिग्रुद्वयं मोरटा वर्षाभूवरणाजशंगिबृहतं' द्वंद्वाचगंधाशिवा ॥ सैयद्वंद्वपटोलगुग्गुलुशिलाजिच्चाग्निनिवद्वयं बाह्याभ्यंतरविद्रधीं प्रशमयत्यन्हाय लेपादिभिः ॥३२॥ ॥ अथ स्तनविद्रधौ ॥ स्तनविद्रधेस्तु विलयष्टिकन्यकाकुरुवकपिचुमदरात्रिभिः ॥ वहुपाञ्चलछदसदाफलत्वकसारिवाकुलिदलैश्च लेपनं ॥३३॥ ॥ अथ अंडवृद्धौ ॥ हिंगुपटुलशुनपप्पणयक्षाक्ष्यैरंडतेलमुंडिन्यः ॥ मोरटशकलतासम्वर्याभूचित्रकाश्च वृद्धिघ्नाः ॥३४॥ निर्गुडीदशमूलवबरपविक्षोरं हरिन्मंजरी विक्षारं द्विकरंजपंचलवणं कुंभवयं जीरके । श्रेष्टादिगुकुलित्थयूषहपुषाकेरीपयश्चिमिट ॥३५॥ . कैडोषणगेहधूमलशुनान्यम्लं तथा बेतसं
:
शीट्यांकरमा देवान्यं वार्षिक
नारंगोखरनृतसिलिन ईशान्तवनं ॥
विधानुदिनाममनिन ने नरेज
एल्पाइपति च युगं नृन्यास्याच्या का
इनिति माविको गुललीहा
विन्टीनिकट
कर रसन्न।
जीरकपनी कुनय कविनलिनांना ॥
क्षिः नशापालन जयालेनंत३७
जर ले
बसोमश्वव्यावर कसानलमश्वि
भवन
चित्र ॥
कारो जिजित्यांची मानल्या
अनानि मनमुलवान मानयोग्य "दा
६ अयोरें:
इंततिनियिनिस्वनरका शारः पडामोन्न:
श्रेष्ठमानिषिमिवान्यावही !
कारी निरिकणिचित्रकलानन्दनि
गोदशनिवारनाः समयानिवार
रहने
व्यायालयीन शिष्या की बोरक!
अदि वारजनहर बनाइटमा
समीरोटकडका नाइ
मरमादिमिनिनाद
श्रीनारदमाहित
गविनय भीमन्ना
॥ अथ शोथे ॥ वर्षाभूदशमूलदारुलशुनं ब्राह्मीगवाक्षीशिवा रास्नाशुक्तिपुनर्नवाययवक्षारत्रिन्मोरटा ।। दंतीमुर्मुरपंचकोलरजनीकंकष्टलोहारं गोमूत्राजपुरीपमूत्रमथितं शोथं हरत्यंजसा ॥४२॥ ॥ अथ विसर्प कल्हारोत्पलकंदकेरकुसुमं कूष्मांडमभोमृता ॥ गोलोमीशुकनाशिकाहिमवरीक्षीरद्रुशंगांचुदाः ।। रक्तोग्रामपि निवसेव्यतुलसीसपिस्तिलं सारिवा दूर्वायष्टिमधूकवोधिमुनयो वैसप्पंदपिहाः ॥४३॥ ॥ अथ मसूरिकायां ॥ वासावरी निवपटोलधात्रीब्राह्मीकुनिवोजविभूतिदुर्वाः ॥ मोधव्युपानद्रुमसारसेव्यत्रायंतिमुस्ताश्च मसूरिकाघ्नाः ॥४४॥ ॥ अथ शीतपित्त ॥ भूतिः समरिचचूर्ण सर्पपसहितं गुडूचिकाचित्रं ॥ सैंधवचंदनसर्पिः सेव्यानि नंति शीतपित्ताति ॥४५॥ ॥ अथ कुष्टे ॥ वर्षाभूपिचुमंदचंदनवरीशंपाकसेव्यानल- स्त्रायंतीसुरमूलिकासनवराजोतिष्मतीमार्कवाः ॥ जीमूतार्कपटोलगंधकशिलातालस्नुहामोरटा दारूवायसजंधिका ग्रहभवो धृमो विशाला निशा॥४६॥ आवर्तन्युभयं शिरीषखदिरौ वन्यः शिरीषद्रुमो कासघ्नो घनकारवेल्लकरजो जंतुघ्नमंजिष्टकौ ॥ वीजांकोलकसोमराजित्रिपुटाभल्लातकोग्रामया मूत्रान्यष्टककाकमाचिकटुकानि नंति कुष्टान्यलं ॥४७॥ ॥ अथ श्वित्रकुष्ठे ॥ नीलीवरालशुनवाकुचिलोहचूर्ण . शंपाकनिवमधुपासनशंखपुष्पी । दीपिद्विपार्जुनमरुष्करनित्यमौनी वित्रं हरंत्यपि च कुष्टहरौषधानि ॥४८॥ ॥ अथ कृमिषु ॥ ब्रह्मक्ष्मारहवीजवेलझरसीपथ्यावचायक्षधृक् निर्गुडीघनचंदनं कृमिरिपुः कुद्दालकः कीचकः ॥ हिंग्वग्निः कणकारवेल्ललशुनं क्षाराखुकर्णीशिफा वेत्रीय कृमिहंत्ररुष्करमजास्पृक्कोपनाहं तथा ॥४९॥ ॥ अथ सोमान्यतो वातविकृतौ ॥ रास्नासुराव्हदशमूलकरंजयुग्म कुष्टाष्टवगलवणानि वला शताब्हा ॥ एरंडमोरटकुरंदकुलित्यमाष गंधालिकोलतगरागरुरात्रिवोला: ॥५०॥ निर्गुडिकाहरितमंजरिचित्रतैलंहिगुपसारिणिपुनर्नवगेहधुमाः [५१ तर्कारिगुग्गुलुसुधाव्हयपीलुतैलं कार्पासवीजसरलाश्च हरति वात ॥ अथ सामान्यतः पित्तविकारे ।। मत्स्याक्षीतृणपंचमूलफलिनीभूशर्कराशर्करा द्राक्षावालुकसेव्यगोपवनिताखर्जरवासामृताः ॥ भद्रश्रीधनसारनिवमधुकं न्यग्रोध वोधिद्रुमौ प्लोदुंबरर्जबुतिंदुकवरीधात्रीविदारीधनः ॥५२॥ जीवंतीघननाददाडिमफलं क्षीरं च केरीपयो दूर्वाविवपटोलमुद्गजजपापुष्पं मधूकोद्भवं ॥ कन्याहल्लकपद्मकंदतरुणीशलेयरंभाफलं पुष्पोर्वारुफलं च शियुकुसुमं पित्तं निहंति ध्रुवं ।।५३॥ ॥ अथ सोमान्यतः श्लेष्मविकारे ॥ प्रोक्तानि यानि पूर्व कासवासक्षयापहारीणि ॥ तान्येव भेषजानि श्लेष्माणं नाशयंति सर्वाणि ॥५४॥ .
M ... ॥ अथ वातरते ॥ रास्नामोरटयामिनीनकुलिकादेवान्दयष्टीवला चालं क्षमादलमूलतैलजतिलाः क्षुद्रा च कंपिल्लकः ।। धान्याम्लेक्षुरकेतकीरसमिसिक्ष्मापीलुपंचांगुलो वेणुश्चार्तगलोमृतागरु गर्द वाताम्रकं नाशयेत् ॥५५॥ ॥ अयावरणे ॥ जीवंत्यमृतातुरगाफलं कणा च द्विपंचमूलानि ॥ ऐलेयकलशुनवलामधुकानि च नियतमातिघ्नानि।।५६|| ॥ अथ मेदोवृद्धौ ॥ विडंगकालायसचूर्णतैले कुलित्यगुग्गुल्वसनानलं च ॥ शिलाव्हपथ्यायवयावशूकक्षौदानि च स्थौल्यनिवर्हणानि।५७। ॥ यथ कार्य ॥ विदारिकृष्मांडतुरंगगधा क्षीरं घृतं मांसरसः पयस्या ॥ वरीकुमारीदधिमाहिपं च कार्यस्य कार्य रचयति सद्यः।५८। ॥ अथ वंध्यात्वदोपे ॥ शाङ्गटाहयगंधिकाधनददृक्लक्षीवरीपंडकी मूलं धात्रिपुनर्नवस्य च तथा श्वेतश्च पूलासकः ॥ वोधिक्षीरिणिदाडिमीवटपयावंदाकमौदवरं वंध्यास्यत्तु दिनेथवा दशदिन पीत्वा प्रस्ते सुतं ॥५९॥ ॥ अथ गर्भिण्यां॥ नवनीतदुग्धसर्पिोंगलपिशितानि जीवनीयानि ॥ अन्यानि चव मधुरद्रव्याणि सुखं दिशंति गर्भिण्याः॥६॥ ॥ अथ सुखप्रस्त्यर्थ ॥ योनेलेपनधूपनं गदफणित्वग्लांगलीसप्पै चैण्याः स्पर्शनमाशुतालुगलयोर्मधर्ना हितं स्नुक पयः॥ तालीसागरुकल्कपानमधुरामंडीनहालावुका ... पाण्यादौ च सुवर्चलापरिधृता कूर्यासस्तेः सुखं ॥६१॥ - An- ११ ॥ अथ वालग्रहेषु॥ शमनानियानियेषांभेषजसहितानितानितीक्ष्णानि ॥ तेषुगदेषुशिशूनांमुपयुज्यान्मात्रयो कनीयस्या ॥६२॥ ॥ अथ शिशूनां धूपने स्नाने च ॥ सपत्वघृतकुष्टसर्षपवचागोभृगकं चौतुविट् कार्पासास्थिसुरद्रभूजरजनीनिवच्छदैखूपनं ॥ स्नानं जंबुकपित्थकिंशुकबलाक्षीरद्रुशुद्धांबुना वत्सन्मानवलिश्चतुष्पथकृतो वालग्रहं नाशयेत् ॥६॥ ॥ अथ भूतग्रहे ॥ धूमो हिंगुरसोनकेशवृहतोनिवच्छदाज्यं क्षपा सिद्धार्थद्विपद तु गुग्गुलुवचानिर्माल्यवदिच्छदैः ।। पानं भूमिकदंबहंसपदिकाभूतांकुंशत्वक्छदै स्तद्वद्वांछितवस्तुभिश्च वलयो भूतान्नयेयुः शमं ॥६॥ ॥ अथोन्मादे ॥ द्राक्षांभस्तनलोहितांडमधुकं स्तन्येक्षुगोरोचनं शार्दूलामिषपुष्पचंदनवरीब्राह्मीपयोदावरा ॥ तीक्ष्णं नावनमंजन महरणं संत्रासनं तजन किंचित्स्वोपनहर्षणं च शमयेदुन्मादमत्युल्वणं ॥६५॥ ॥ अथापस्मारे ॥ गोजाष्ट्राश्वशृगालनागनकुलामार्जारगोधाभवैः . पित्तैस्तु त्रिफलाकरंजलशुनव्योपैश्च नस्य मुहुः ।। पानं पंचकशम्यशंखकुसुमब्राह्मीवरीसारिवा कुष्मांडैविनिहत्यपस्मृतिरुनं धूपश्च निवच्छदैः ॥६६॥ ॥ अथ नेत्ररोगेषु ॥ सौवीरांजनशंखतुत्ययुगलं सिधूत्यपुष्पांजनं स्रोतोजस्फटिकेंदुचंदनकणापाथोधिफेनक्षपाः ॥ दावी गैरिकगंधतालकशिलास्ताहिकासीसक जातीकेशरसांजनं च मधुकं चंद्रा च चिंचाफली।६७॥ रत्नानां नवकं गवादिदशनं शंगोदि तेषां तथा हेमाक्ष्यादिकधातवः श्रुतिमलो बोधिद्रुपत्रं फलं ।। श्वेतक्ष्माधरपर्णहंसपदिकासुवेतपूलासको मूलं श्वेतपुनर्नवस्य कतकं लोभ्रं शिला कुंकुंमं ॥६॥ घात्रीपीतकरोहिणीगदफलीकंसं करंजाफलं जीवंती शफरेक्षणा लवनिका मेघारवं गूंजन ॥ लक्ष्मीवन्यकुलत्यवाजिपृथुकामूलं वरा द्विस्थिरा पुष्पं तीक्ष्णशिरकपालविजयाविश्वौपचं टंकणं ॥६९॥ नंद्यावर्तकतालतलकुचोवृक्षामलपुष्पद्रुमो -- नारीक्षीरतटाकशुक्तिसलिलं ब्रह्मद्रुदुग्धोन्यपि ॥ क्षौद्राज्यं नवनीतमप्यपहरत्यक्ष्णेरशेषान्गदान गंडूषांजननस्यतृप्तिपुटपाकाश्चोतनैलेपनैः ॥७॥ ॥ अथ कर्णरोगेषु ॥ पत्राणि शिगुतुलसीरविशिंधुवार घोटाविभूतिरथ वर्बरमूलकानां ॥ मौर्वीवराटलिकुचाब्दवचाशताव्हा सिंधूत्थगुग्गुलुपलांडुसुधारसोना: ॥७॥ कोपासवालजलसर्षपतैलमेवमावर्तनीफलमुराहनिशाकाणि ॥. व्योषाजमूत्रनृपक्षफलं त्रिशूल्या तालस्य नालमथ चामरिकाजगंधे ॥७२॥ ॥ अथ कर्णवणे ॥ तालीसाग्निनिशांतधूमकयवक्षाराब्धिविश्वौषधं पथ्याचासनलोध्रसैंधवकणागोमूत्रप्रत्यक्त्रुटी दारूग्रंथिकदारुताक्ष्यचविकातेजावतीवत्सको हीरामयमाक्षिकानि च दृढं निघ्नंति कर्णामयं ॥७३॥ UP-
१३
॥ अय नालारोगे ॥
वालीसोपणवन्हिनांगरकणामंडूकपर्णी निशा
निगुंडीतुलसीकुत्भचविकापामार्गतर्कारिभिः ॥
भंगागस्त्यमुराव्हमृलकपुराजाजीद्वयं ग्रंथिक
श्रेष्टावेलफरजवीजलशुनं निम्नति नासामयं ॥७॥
॥ अथोटरोंगे।
सर्जरसस्तिलतैलं त्रिफला क्षौद्रं क्षपा मच्छिष्ट ।
निवझटा रौप्य निर्गुडीयष्टिरोष्टरोगहरं ७५॥
॥ अथ गंडमालायां ।
गंडमालाजितमपकांशो विधृपचर्यतां विदध्याच? ॥
ध्यानवविपक्का विपाव्य शनकैः प्रसादयेत्वनवत् ?||७६॥
!! मथ दंतरोगेषु ॥
रास्ना पुंसि बलारिमेदककुभत्वभानुकेरीपयो-
वर्षाभूतलपोटनिववकुलीवीजं हरिन्मंजरी ॥
सिंधृत्याकपत्रविश्वखदिरास्तैलं च कर्पूरज
वैलं दीप्यकमुहिरंति रदजास्तन्मूलजांश्चामयान् ||७||
॥ अथ रसनातालरोगेषु ॥
दाव्यिोपशिलाकुर्निवतुलसीसिंधूत्वपथ्यानिशा
निर्गुडी खदिरारिमैदयुगलक्षीरढुंमत्वग्गदाः ॥
वासापिप्पलिमूलपाक्षिकवृतं क्षारोपकुंचीवचा
विष्णुक्रांतपटोलकाश्च रसना ताखामयच्छेदनाः ॥७८
॥ अथ मुखरोगे ॥
जातीपत्रवरारिमेदमधुकं क्षीरनिवाभया
दाव्यिोपवरांगजोरकचतुर्जाताजकंकोलकं ॥
जंबुखादिरसारपातुलसीगोमूत्रजातीफलं
क्षौद्रक्षारशशांकराजतरवः सर्वास्यरोगापहा: ..॥७९॥
१ ॥ अथ शिरोरोगेषु ॥ यष्टी शिलातगरुकुंकुमकुष्टगोपी. सेव्यत्रिजातघनचंदनकेसराणि ।। सिंधूत्थवालुकवरा मृगनाभिकन्या मंजिष्टका त्रिकटुभंगवलाशताव्हाः ॥८॥ वेल्लामृता जलरुहागरु देवदार कपूरचोरकनिशाद्वितयोत्पलानि ॥ कल्हारजातितिलतैलपयोधराश्च मूर्धामयान् प्रशमयंति कपालजांच ॥८॥ ॥ अथ व्रणे ॥ धान्याम्लोदककांस्यकं. तिलघृतक्षीरद्रुयष्टीवरा दृर्वागुग्गुलुबायबरीश्वरलतागोपांगना माक्षिकं ॥ मंजिष्टा रजनीकरंजवनमाल्यारामसीताम्लिका जातीपल्लवतीक्ष्णतुत्यकटुका दा॰मधुच्छिष्टकं ॥२॥ युक्तं तंडुलखंडनं पवनजितलेन युक्तं गुडं चूर्णेनापि पुराणकेन हविषा सुश्लक्षणपिष्टं जले ।। पत्रं पप्पण(१)वोधिनिवसुवहाकार्पासकूपोदकं चिंचांकोलविदारिज व्रणहरं लेपोपनाहादिभिः ॥८॥ ॥ अथ सद्योव्रणे ॥ सधोत्रणे यष्टिमधूकदुग्धं क्षौद्राज्यलाक्षांजनकाकतिकाः ।। पथ्यापलांड्डुप्रियभूरुहत्वक् मयूरिका सर्जरसा हिताः स्युः ॥८॥ ॥ अथ अग्निदग्धव्रणे ॥ सिस्थकजपाज्ययष्टीदूर्वापत्तूरदुग्धकाकोल्यः ॥ केशहिमापामार्गसहदेव्यश्चाग्निज वर्ण घ्नंति ॥५॥ ॥ अथ भग्नत्रणे ॥ घद्धाक्तं घृतपट्टवंशवहुपादश्वत्यपार्थत्वच- . चिंचास्थित्वगुदंबरोद्भवपया दक्षांडधात्री शिवाः ।। तैलं भ्रष्टकुरंटकः समरिचं सजे च मृत्कपट पानं दुग्धयुगं च वोलजतुनोः शंसंति भंगे हितं ॥८६॥ ॥ अथ भगंदरे ॥ वराविडालास्थि कणा पुरश्च न्यग्रोधवल्कच्छदनत्वगेला ॥ भुजंगपश्चीकविडंगसारक्षाराग्निकर्माणि भगंदरेषु ॥८७॥ ॥ अथ ग्रंथिपु॥ ग्रंथिवर्कसदाफलं मधुरसं विस्फोटदग्धांगुलाः ॥ कासासासनशंखभस्मकरजोन्मत्तस्य वीजं हितं ॥ मेदोग्रंथिषु पादिकिंशुकगवा मूलं च वार्ताकजं ॥ वर्षाशूकरवीरशिगुजमपि स्याल्लांगलीकंदकं ૮%ો ॥ अथ श्लिपदे॥ शाकोटवीजविजयौपधचित्रनिव तैलं त्रिद्विवुधदारुगुडूचिपानं ॥ सश्लीपदं स्नुमदसर्पप इंगुदीयं वार्ताकशिगुरविमूलविलेपनं च ॥८९|| ॥ अथावंदे ॥ गोमूत्रपंचलवणानलशिगुमूलं पार्थः करंजयुगभानुपुनर्नवोग्रा॥ भल्लातकस्नुहिकटुत्रयगेहधूम शंपाकलांगलिनिशासनमवंदनं ॥९॥ ॥ अथोपचितव्रणे ॥ वीजं शिग्रुकरंजमूलकशमीजीमूतज :वाकुची ... निर्गुडीपटुनाकुलीमुरतरुस्नुग्भानुदुग्धान्यपि ॥ लांगल्युत्पलकन्यकासहचरा शुंठी विशालाम्लिका वृथीवो महिषीगवोरपि खुरा निघ्नंति पूर्ण व्रणं ॥११॥ :
१६ 1 . ॥ अथ नाडीव्रणे ॥ नाडीव्रणेषु तिलसेंधवरात्रियुग्मा- पामार्गकच्छुफलपूतिकपत्रनिवाः ।। सौराष्ट्रिवज्ररविदुग्धनिशांतधूम घोटाफलं. रूचकयोजनवल्लिके च ॥१२॥ ॥ अथ क्षुद्रामये ॥ अजगल्यालसिकच्छपिवत्सकपापाणभेदमख्यातान् ॥ सुरतरुकुष्टशिलाव्है लिम्पेत्सूक्ष्मांस्तु साधयेद् व्रणवत् ॥१३॥ ॥ अथ मुखदूषिकायां ॥ मुखपिका वचावटदलधान्यककेरशुक्तिभिलिपेत् ॥ आरग्वधपिचुमंदक्षौद्राज्ये पद्मकंदकं नश्येत् ॥९४॥ ॥ अथोपदंशे ॥ आदारीदलतुत्थगैरिकवरामृत्कपटैलाशिला यष्टीखादिरसारसैंधवतिलक्षौद्राज्यतालैरपि ॥ सौराष्टाढकिमृत्तथा च तिलजं शोथोपदंशापह त्वन्येषां व्रणवर्तिमेदजनुषां कार्यों गदानां क्रमः ॥१५॥ ॥ अथ योन्यामयेषु ॥ रास्नासैंधवपंचकोलमरिचाजाजीद्वयं रक्षको गीर्वाणद्रुमहिंगुदीप्यकयवक्षाराब्दपाठाशिवाः ॥ उग्रागोक्षुरमातुलंगकशिफातैलं च कारंजक : “तैलक्षिरघृतानि च प्रशमयंत्यन्हाय योन्यामयान् ॥१६॥ ॥ अथ स्थावरविषे ॥ पाठाचंदनलोध्रकुष्टतगरक्षौद्राज्यकोशातकी मृर्वाचव्यशिरीषचित्रकवचा वेल्लाब्दमेघारवा ॥ दावींगैरिकहेमता_रजतं पथ्यापटोलामृता सोमत्वग्द्विपुनर्नवं त्रिकटुकं नश्येद्विषं स्थावरं ॥९॥ ..- .. ॥ जय अंगमविषे तत्र सर्पविषे ॥ व्याघ्री मग्गिरिकर्णिका मधुरसा पाठा विशालेश्वरी निर्गुडी कटुतुविका च नकुली रश्चिवनिलीशिफा ॥ वीज वाकुचिपुत्रजीविषकुला जीमृतगुंजामृता नक्ताव्हाच नृमूत्रमाक्षिकधृतं लाला मलः कर्णजः॥२८॥ कोटी मुशली नमोगरुडकः सर्पिच निष्पावकः कंदं व्योपवचारसोनरजनीमाधृकसारामयाः ॥ शृंगी टंकणकाकमाचिमुरसा धात्री हरिन्मंजरी मेघवानकुरंटवनलतिकाजंतुम्नसौराष्टिका: ॥९९॥ शेफालीनतमागधीचनरसो गीर्वाणतालीफलं पंचांगं तु शिरीपजं ग्रहभवो धृमो महादुन्धिका ॥ चिंचापल्लवकारवेल्लदलजः सारः सितः कर्णिक पानालेपननस्यधृपनमुखैः सार्प निइन्याहिपं ॥१०॥ ॥ अय कीटकवीपे । पीता हिंगुविडंगवन्यतुलसी मूलाब्धिनाद वित् पाठा व्यापशिरीपसैंधवयवक्षारामयाः सर्पिषः ।। मंजिष्टागजकेसरविरजनीपत्तरमुस्तावचाः क्षीरक्ष्मासहकल्कलेपनमिति नत्याशु कै विष॥१०१॥ ॥ अथ वृश्चिकविषे ॥ यक्षाक्षिकसरपलाशकरंजयुग्म स्नुग्भानुदुग्धसहितांगुनिशोष्टदंताः ॥ वतारनालघृतसैंधवचित्रतैलं पथ्याकटुत्रयशिरीपकपोतविष्टाः ॥१०२॥ आस्यांबु कर्णमलसिथकवत्सनाभि पिण्याकसर्पमलगोमयमातुलंगाः ॥ वृश्चीवनीलिइलिनीमुरसाद्रिकर्णी निघ्नंति वृश्चिकविवं हि विलेपनेन . - ॥१०॥ .
१८
॥ अथ लूताविषे ॥
सर्पिर्माक्षिकसैलगोमयरसापामार्गरात्रिद्वयं
वक्ष्यामालिमनःशिलालतगरं क्षोरद्रुमत्वररुची ।।
पाठागरिकयष्टिचंदनत्रुटीसिन्धूल्यगोपांगनाः
पानालेपनयोगतः प्रशमयंत्यन्हाय लुताविपं ॥१०॥
।। अथ सूपक विपे ॥
अर्कालर्ककपित्यसंधवनिशादद्वामृतासैर्यक
जीमूतामरनागदाडिममुनि पियोदारवाः ।।
मार्जारास्थि निशांतधूमकरजांकोलद्रुनिर्गुडिका
गुंजेक्ष्वाकुपुनर्नवेंद्रलतिका नत्युदरूणां विपं ॥१०५॥
॥ अथोन्मत्तविषे ॥
पादत्रघातरविदुग्धशिरीपपत्र
तांबूलकल्कनवचूर्णनिशांतधूमाः ॥
अंकोलवीजपृथुकाः शशदक्षव!
धतूरकः स्फुटमलर्कविपं निहंति ॥१०६॥
॥ अथ सामान्यतो नखदंतविषे ॥
वटनिवशमीवल्कलफलानि द्विनिशातिपादिगोजिव्हा ॥
पर्वतमृदिंदुवल्कं दंतनवोत्थं विषं हंति ॥१०७॥
॥ अथ व्यंगामये ॥
क्षौद्रं क्षीरतरुत्वगंकुरनिशाजाक्षीरलोधामया
मंजिष्टाशररक्तपार्थफलिनीकोलास्थिदारूत्वचः ॥
शंबूः शाल्मलिजीरके घनमथो वाहश्च कृष्णास्तिला
वक्त्रांगं सगदं जयंति जनितं व्यंगं तथा लांछनं ॥१०८॥
॥ अथोत्कटे ॥
दहनं हितं प्रसूतौ मारुतकुष्टोदिता चिकित्सा च ॥
कोठे कुष्टचिकित्सा पित्तश्लेष्मक्रिया तथैवोक्ता॥१०॥
१९ ॥ अथ वाजीकरणे ॥ सूर्व कांचनगंधकाभ्रककणा शुंठी विदारी घृतं वर्षाभूमधुकाष्टवर्गमुशलीमाषाश्वगंधाशिफा || शाकोटेचरमर्कटी मुरलता वीजं च भंजीभवं निर्यासः सलिलंच शाल्मलितरोजर्जातीफलं भूसिता॥११०॥ शिग्रोः पुष्पफलच्छदाघनरवः श्वेताद्रिकादल मत्स्याक्षीछदनं तुरंगपृथुकालकाः पयस्या वरी ॥ धात्री कर्कटशूगिका सिततिलाः पापहोरा वरी जीचंतीदलगोक्षुरामृतलता मजमियालातुगाः ॥११॥ केलीदुग्धजले सितेचजरसं क्षीराज्यरंभाफलं मृवीका नवनीवमाक्षिकमधूपुष्पं च खजूरकः ॥ गोधूमो यवषष्ठिमन्जनयुतं सर्वाण्यमूनि ध्रुवं रेतोद्धिकराणि संति हि नृणां तांबूलमचे तथा॥११२॥ ॥ अथ रसायनानि ॥ हेमन्योमरसेंद्रगंधक विषायाकांतमल्लातका पथ्याक्षामलकानि गुग्गुलुशिलाजिचाग्निगोकंटकाः ॥ ब्रह्मक्ष्मारुहशृंगशंखकुसुमं मंडूकपर्णी वचा ब्राह्मी नागवला विदारिमुशलीविश्वौषधं मुंडिनी॥११॥ वाणाः कृष्णतिलाः पुनर्नवकणावेल्लामृतालोगली लीलीवायसधिका कुरुवको ज्योतिष्मती किंशका ॥ कन्यावाकुचिकाकमाचिखदिरांकोलं तिलक्षीरिणी पूलासाकुलिवृद्धदारुककुदं ह्यारग्वधोपानहः ॥११॥ जीवंती नवमल्लिकासननिशानिवावगंधावरी निर्गुडी लशुनं महद्वलतिका सूळ स्थिरा श्रेयसी ॥ इत्येतानि रसायनानि ससितक्षौद्राज्यदुग्धान्यपि प्रत्येकं च जरावलीपलितहृच्चायुः प्रकुच्चिरं ॥११५॥ - इत्येतानि च कल्ककायसहाज्यतेललेह्यानि पानान्वासनलेपाभ्यंजुनवस्त्यादिभिः प्रयोज्यानि ।। अन्नमधुराम्ललवणस्निग्धोष्णानि अनिले शीतकषायतिक्तमधुरतीक्ष्णानि पित्तेषु कफसंभवेषु तिक्तकटकषायोष्णानि ॥ संसर्गजेषु मिश्रितं समृद्धेषु सकलमपि युज्यात् ॥१ रोगेषु तेषु द्रव्याणि सम्यद्धितानि युक्त्वा ॥ प्रयोजयति यः स भिषक्शब्दस्य पात्रं भवति ॥११९ इदं समस्तरोगाणां प्रशस्तौषधवारिधेः अकार्षीद्वालवोधाय अवधानसरस्वती ॥१२॥ ॥ इति प्रषस्तौषधसंग्रहाख्यो ग्रंथः समाप्तिमगमत् ॥ . विक्रमाब्द संवत् १९०७ मिते वर्षे मार्गशीर्ष शुक्ल दशम्यां ॥ इति प्रशस्तौषधसंग्रहः समाप्तः॥ -:०:
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