Bhartiya Vidya Mandir Shoudh Pratisthan,bikaner
Satya Ki Aur
Front matter
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को और
डा राधाकृष्णन
राजपाल एण्ड सन्ज, दिल्ली
RECOVERY OF FAITH' from
अनुमारक
पीरामनाप 'सुमन'
हितावलाप
पम्पास एणप
पोस्ट गौरस १.६४, रिती
कार्यालय प्रेस
पी.जी.रोप लिस्मी-१२
मूल्य समे
कामी पैट, रिस्ती-
यूएएकालेररिस,t
SATTA KI ORE IDR.RADHAKRISHNANIPHLOSOPHY
।
प्रकाशकीय राष्ट्रपति ग• पाप्मन् हमारे पुम के एक महान विचारक पौरासनिक है। भारतीय विचार परम्परा के मुर्दम्य प्यास्माता और तप पिताम्म में ससारपोरिक क्षेत्रों में उन्हें बड़े सम्मान कास्पान प्राप्त है। उनकी पारियपूर्ण रबमापा ने पामिक रिचार-पत् को महराई से प्रभावित किया है। हमारा युगमा प्रयों में मामम-तिहास में एक प्रतिीय युग है। मानिक पाविष्कारों पौर ममोहानिक पोगों बसे मनुष्य के बाहर पोर भीतर का सब पुष बदमागमा है। ऐसी माम्यताएं चिम्हें इतिहास कीम्सीकृति प्राप्त पी पार हमें निरपक-सी प्रवीत होती है कि मये मूम्प हमारी भास्पा मार हमारे विश्वास को चुनौती दे रहे हैं। पूर्व संभावनापों से भरे इस युम को समझने के निए एक संतुमित दृष्टि पोर एक सम्यक सुप-बोष की पापापकता है। रा. पपाप्मन् की रचनाएं इसी पुग-दोष को प्राप्ति में हमारी सबसे बड़ी सहायक है। मदृष्टिरमकी प्रमिक रपमा 'घरप की मोर शिपमधे महत्वपूर्ण है। इस प्रेरणाप्रद पन्थ में ग. समाकृष्णन् में एक भास्पा एक मपे विश्वास की बोर में मार्मिक मानव का पप-निदान किया है। मनुष्य बिगत पार गर्वमान में पब तक बिन माग्यतामों कोसीकारणा रहा है, उहें विदेस पोरई की कसौटी पर कसते हुए ग. रामारप्पन मे 'सस्प की मोर में प्राचीन रपमिपयों से लेकर प्रामुनिक पानिकों तक के विचारों का मपत्री प्रवाहमयी पोर पोरस्ती हामी में बरेलरमण विरोपण और मूल्यांकन प्रस्तुत किया है। उन्होंने मह स्पष्ट दिया है किस प्रकार प्राचीन पोर नवीन पिम्तम-प्रयासों के बीच से ही एक ऐसी प्रास्पा एक ऐसे पुग-सरप की उपमम्मि हो सकती है जो हमारी पपूषवामों और पपर्याप्ततामों को दूरपरने में सहायक सरप की पोर' ग. पपाराम पन्तर्राष्ट्रीय स्याति प्राप्त परिपारी मॉकर प्रयम प्रामाणिक पौर प्रमाण अनुसार है।
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अनुक्रम
६
१७
पहमा प्रध्याय
विषय-प्रयेन
दूसरा मभ्याय
विश्वास की कठिनाइयो
१ बर्म मौर विज्ञान २ तुमनारमक पर्व १ मानव
म्पपिठ एवं प्रोपोमिकी का विकास ४ ताकि
प्रत्यक्षपारधर्म एवं सामाजिक सम्मम्मच
पौर पिप-ऐप ममा का विकास
तीसरा पम्पाय
विमासको प्रावश्यकता
१ प रेस्पानापम्न पदाय २ उपमानपीय स्थिति
में पहन । मोगवाद ४ मानवतार राष्ट्रवार
१ साम्पबाट सर्वसत्तावार ८ संचय एवं विश्वास
पौया प्रम्पाय
पपायकी पोन में
गाभिदृष्टि २ मानवीय संकट पर्म सत्या
मुभाषम में
१.२
पांच प्रप्याय
पाप्यास्मिक गोवा और भीषित पम
१ हिम्पर्म २ तापीबार । महूदी धर्म ४ पूनामी
पर्म .. परपुस्सी धम बोरपर्म ७ ईसाई
धर्म ८ स्माम समुफ ८. माधुनिक प्रतिपा
१४२
सठा प्रभ्याय
पामिक सस्प और प्रतीकवार
१ पारमपिता का सिवात २ वह तुम हो।
पार्मिक प्रतीकमार
सातवा अध्याय
ईश्वर-सिदि मोर उसका मार्म
१ पारिमक पुनर्सम्म २ पक्तिमार्ग ३ कर्ममा
मानमार्य ५ सत्य एवं प्रेम १ पवित्रता एवं
पहनीकिक पीरन परीप मानव
माठयां मम्पाय
अन्तर्वमीप मैत्री
१पर्मों में निहित म्यापक ऐक्स २ ईसाई पुमिमन
उपसंहार
१८०
सत्य की ओर
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पहमा मम्पाय विषय-प्रवेश माफ और पामकार पक्तियों का विश्वास है कि प्राय पिस लिए किसी सामानिक रामनोविक पपा प्रार्षिक पुनर्गठन से भी अधिक गहरी एक मूलभूत भारण्यकता मारिमक पुनर्वागणी, मोई पापा को पुनः प्राप्त करने कोपर सम्पदा में पठिष उत्पन्न हो पाता यह पिडित होने तपाठी है।ससे उत्पन्न होनेमाती निराण के मध्य मानवप्रमा पर्वमान प्रमाण गरस्पा की पूर्णता कोसीकार करने पीर नये सिरे से उसकी नीरगमने कपा उसमापार कोषममे की भोर रामुप होती है। इसके कारण पारमान्वेपण के महान पाम्दोनों का बम्म होता है । विमान ने ममुप्प के अपने ही हस्तक्षेप के परिसके सम्मारित दिमाए कीबो एक नई विभीपिका उत्पन्न कर दी है पससे हमें यह चेतावनी पार पापाती कि पापमा परिमाम माय ही है। पड़ मारना कि हम अपने इतिहास की एक नियिक नही पर मा पहुंचे ६ पोर हमें ऐया मार करना है की उरियों की परमानों की पति एवं विधा को निषित समराम करेया इमारे पुन के लिए अपनगीन नहीं है। इणिास के पनेक पुर्षों में गलत पाही इस प्रकार का निवास पहमे भी पहा है पर उनमें । प्रत्येक ही यह पनुपर किया किदुसरे मुर्गों की अपेक्षा असके लिए ऐशापारने का पषिक मौषिरय है।पर रोम का पतन मा तो भागस्टाइन विमाप करते हा पा "रोम पठन पर समस्त विसर पे पाहै।" तुमहप के अपने नट से सम्त प्रेम में लिपा "समाप्त मामा-भाति ही व पिनाथ और पापा मेरी रिहातात पिपफ मामौर रोरम ने इस पिम्ता में मेरी मामीकोरफर रियाफिमारमहममररी निधने समस्त सिर को प्रपना गरी बनारामा पा। इससे पूर्व की सहमति में पूसार गारस मेसे.४ (सापूर्व के पैसोपोनीशिपम पुर में एपीनियन सामाग्य पवन परपोप-संतप्त रदगार प्रकट पिएपे।४...वर्ष से भी प्रषिक पुरानी एक पापीन मिमी पामिपि निम्ननिसित पाय पितो। 'चोरों का प्राषिश्य है कोई ऐत नहीं पोता। मोप करते।
१. सत्पौरोग - "हम नहीं बानते कि रिन-दिनमा पटनाएं घटेंगी। हर बगहभूम रहती है, पर किसी पान पर सभ्य मात्र नहीं दिखाई पाते। कुम्हार पाकी मातिदेवयोमाकार धूमपा है। पासिया स्वर्माभूपों से प्रताप पीस पाती है। किसीकी इसी मही मुनाई परती। बड़े-मोटे सब यही कहते है पन्छा होता ऐसे समय हम म पराए होते। 'समर नोपों को पराकी पीमनी पर पी है मगरों की महिलायों को रासियों का काम करना पर पाई। मोम हवने पातुर कमरों के मुह से मिरे दुक पर झपट पड़ते है बिन कार्यालयों में प्रमिस रपे उर्ग तोगार मस्त कर दिया गया है पाकामय-पत्र नष्ट कर दिए गए रुपमूहों मे देस को रामवरण से रचित कर दिया है। प्रधिकारियों को पर-उपर बड़ा दिया गया है। कोई भी सायमिक कार्यामप बहो नही पहा उसे होना चाहिए पौर जनता की समस्मा बिना परवाहे की मेड़ों के समाम होगा। कलाकारों ने अपनी सामों का सूपन बग कर दिया है। घोडेसे मोग गुती का पपकर दे। कम तक को नगप्प पा पाग बनवान है और पहमे बनगान रसे नुपामर से पत्रित किए गमवे । पृष्टता का बोलबामा है काठ मनुप्प का मम्त हो पाता नारिया न मर्भ पारन करती पौरन पिणों को पम्म देती। तमी पम्त में ससार को पान्ति मिलेगी। मामय की स्मृति ससे पपनी पाति की प्रामु से प्रबनत करावी पवी है सीमिए वो हमार बर्ष पापार गर पर्ष पूर्व की भाति पार भी पापनुगम करता किमह पीयन की अन्तिम पनि में एपा है। रितु पासे धमाने में सम्पवाएं बर एकाधिक महादीपों में नष्ट हो पाती पीप भी दूसरे मेलों में बनी पती पी पोर पती का पवितहान हमारे बालों को बातिक परिप्य की रक्षा की पक्ति प्रराम रखा गया था। मिमी यूनानी ता पूनानी पेमन सभ्यताएं नियमपु पृषों तक मर्यादित पी इन मूसों तक ही समस्त मानव-नाति का पम्त महीं पा किन्तु माधुनिक सभ्यता की प्रतिपा पिण मापिनी है। फिर यह बात मोप्पान रखने की है किसरी सम्मवाओं का पवन पा तब प्रामा कामोत मुस्थत बारीमापार संकट पदर से है। दुनिया मरने लिपट परिपतम हो रहे । प्रितीवरासिक परिवर्तनों से गमकी। गुममा नहीपीमा सम्ती। वर्तमान महान् सम्भावनापों मे, पसीमों एवं प्रतुमनीय पुरसारी से पूर। पर पानीसिस हो सकती है और एकीन । मैंमा पुन: मितवा रिसेन (मिलिग पहित) गफ १५-10 मे HinवानमानNT४ भूमिमा म्न में ग्रा शिपमधवेश ममारम भी। मानस-याति पारमरिताय करके समाप्त हो सपती या रसड़ी पापास्पिा मापाचा पुपरीबित हो सकती है और एक ऐसे भीम मुग का प्रापिार हो सकता है पर यह परती मानवता के वास्तरिक गृहका रूप धारण कर मे मामुनिक मस्तिफ अस्पष्ट पानिक माँ पार गभीर इस्पारमक प्रासामों के बीच बागेम है। सपस्न दिएप भार मामा दो परस्सर-विरोपी शिविरों में विभक्त है जिनमें से प्रत्येक दूसरे पर भसट पड़ने को सम्न है। हमारे विचारों एवं भावनामों पर इस स्थिति का प्रावक है। भविष्य का पक्या होगा, इसचिम्ता से हम पुरी तरह प्रस्त है। हमारे पास को भी सामन ई यो भी बादाम में प्राप्त रिनी श्रीपस्सिा हममें विकसित हो पाई रन सबके पाप भी हम माम्ति एवं सुरक्षा पूर्वक बीवन मतीत करने में असमर्प है। हमारा भान गया है, इमारी पानकारी गई है परन्तु हिरे पूर्व सदसों में हमारा विकास नहीं हो पाया। और उनके ममात्र में सर मस्तुएं पिरम्तन सपर्प में विवाहित हो उठी है। कोई का ऐसा मही यो विष को एक मे दमकर रखक । पर कमिक एवं) सरों के लिए धर्म ममुशासन का काम देवा रहा है किन्तु प्रान पम विवास से सिकार हम बहुत पर चले गए है मौर मुरखा शहाधिया पाग सतरनाक प म छोरा और मंधित दो मम । सामाधि मनोम्पपा का प्रोक्त पर पति तिमिनिग्न मामों में पैदा हो परमो अपने को साकार पारी-माम-पर प्रपती-महंता या-प्रपन करते सोहम एसाप सम्म ए पास-साठ दोनों का रोपण कर।। यह सोचने से कोई राहत नाही मिनती कि भरमा नापी बिमारा या पुटकी विभीपिकारी भावना मुष्टि के प्रारम्य से मानव-पीड़ियों को प्रस्त मिए दी। और काम के प्रारम्म स हो एसा होता है। माम यह है कि क्या विपके मात ता से बना ही रहना चाहिए ?" या विश्वास कर मेमा किया पालिका निमम है यह मिति का प्रमिनमसिमे हम सरा के लिए पेहए। मानव की प्रसारमाावान कलापिदिए. एम.मा सम्बों में जीपन गपत् पी पुनराबहिनी पारिता के प्रति एरपभियान है तो मानव-जीपन पर मो यह रात पार भी प्रपिक परिवाई होती है। मामय मिष्ट्र भाम्प की वा पर पापित नही है । सासम पर ना पतीत इति में विकास कर मरता विहासको परिवायतानी नहीं है। यह मान समाहिम दिनाग १ जना पर मेयर नरत ...र "इलियान में पुर मेसर मुसमानरममा रोt मार निवार मपासन परिसर निलिमरहमान साडीपी गौमी- राती muttoलहरि देशर्म बार (१९५४),अपर। - सरपकीबोग के मन्तिम पतंकी मोर से बानेपानी पारामबहते हुए विश्व प्रामी। नियमा केवलमान शून्पगारका मानिगन करने के समान है।हम भाप के गिम्म हर सकते है यहाँ तक किसकी गति परम सकते है। पविहास की एक प्रमुर परिकल्पना भोगों के मन को दूषित कर पी है। इससे कोई प्रावर नाही पड़ता कि यह विकार, यह प्रष्टाचार पूर्वनिश्चित की निमति के माम पर होता है या पूर्णता की भोर मनिवार्य प्रगति के नियम के नाम पर या विषमेगा (Wdtyein) नाम पर होता है पथरावर्गहीन समाज की भावना रातारमकम से इतिहास को रसकी पन्तिम परिणति की मोर माते हुए होता है या एप ही परिकापना के बहुस्पी नाट्य मोना की सूम भारिनी एक नियतिकालिन के मन में पवार्य एवं पानीमच्याही अन्तिम सत्य है। पर ही सब कुण्है मामय उपमही। परियिर की न्य महोती किमाएको विनाप से पचासे तो ये कभी उससे गरम पाते।यही कुछ कोपीवन और दूसरों को मृत्यु का म्याय प्रणाम करता है । यदि मानवता मंगर बन पाती बम इसलिए किसी ग्याप सा हो पाहता सब नियतिवादी सम्प्रदायों की मांतिकास्विमार भी प्रास्माको प्रपनी विषमता का बोम रखने को देता है। काष्टकमिए रविदास मान का कमिक सपासमीकरण पीर ऐसा किसी की नियति के ही कारपोता। हित के लिए इतिहास परमसत्ता का क्रमिक मनावरप है। से भी हो मागपनाति समल की पोर पति पर रही है मौर ताइदिने ने भनुमप किया जिसमव की भोर इस प्रमति में देवी समावसरे ही गुपपर्तमान है 'पहसाबकि पहस्थापी है परसमस्त मानवीरवपापरे निकाल पाता।" बीवविज्ञान-सम्बाबी विकासमार सिमान्त पौर मानिक विषयों में प्रपति में एक उत्पुमन रिसात कोपरमरिया, पपपि अपने-माप होनेराती प्रति किसी निगम की स्थापना पंजानिक पापार पर नहीं की जा सकी। स्पेंसर ने कहा कि प्रत्येक परा गिसमे मानपता भी सम्मिनित अपने-माप मन्येसे पाण होगापा हा मार्ग पारी एक ऐले पुषबी पोर पति नगाए पर 'भविष्य पूर्णत रिकसित साम्पमापी समान में प्रावस्यकता के पर्म से मुक्ति का सम्मा राम्प विकसित होपा।" यपि मारत ऐतिहासिक्तियों की वजारमा प्रपति पर जोर वा १ भाचिन मे तिप्प"या पालगन की माग गने सारा बनायाबापतुर रायसेनारिमोशन मेमोमा विष मी प्रेमसमान मामलसमायो . रोमाम मरिन मर्मत (n) माप प्रत्याय! बारिमा बिमारिमारियायोमेस (१६॥
विषय प्रवेध है किन्तु महरिता प्रमल की प्रागश्यकता की मोर से प्रति नहीं मर मेता। साम्पबादी इस नियास से काम करते है कि इतिहास उनकी पोर है।नीत्येको विश्वास हो गया पाकिसूरोप की संस्कृति का विनाश होकर रहेया समस्त परम्परापत मूस्यों को प्रहग मगने ही माता है और हम मार्ग या पप-दर्पम से हीन होकर मंगस में भ्रमित हो यो ।। गलर कहता है कि नियति केही प्राय से इतिहास काम सुम में हमार माध्यारिमक भूस्प रिमसम एवं प्रस्त हो उठ है। हमें मुषित पनुपापा साप देकर परिपूर्ण वनगा या इतिहास को उसके काय में सहायता देना है। हम उदासीन इति समस्त से हो गए। पौर हमने माम लिया है हम अपने किसी भी कार्यारा पतुर्षिक फसे मिप्यापार की विजय की गतिमा भररोष करने में मसमर्म है। इतिहास की निपतिवारी पिपारपारा में मामय-स्वावश्य की पर्याप्त पारणा नहीं मिलती। नमकी दृष्टि में महराई पर सम्मान का प्रमाण है । पावश्यकता मी पामा तमे मनुप्म पो संपर्प करता है उसका उसे म्यान नहीं पर मनुष्य की मुक्त पारमा में निप्स रपे बिना हम अपने लिए भी वही हो जाएंगे पो प्राति एवं इतिहास हमारे मिए हो गए -एक गमत एक विमानता के समान । कर्म पर मुषित बारा ही गिगय मिम सकती है। पारमा का मुक्कावरण ही ऐतिहासिक पारस्यकता पर विजय प्राप्त कर सकता है। पर मे मन्दिर मिनापका निपय किया है। रिसर केही नाम पर सिरके कोप से मन्दिर की रक्षा करो।" मानवको उस पथ पर बनना है को उसकी प्राप्ति में निहित निम्नतम से उसकी पाता है, उपर उठाकर उसे भेष्ठाम तक पहुंचा दे। मामम-प्राणी पदार्थों में एम पदार्प मार नही है बस्तुमों में वस्तु-मात्र नहीं है। वह अपने लिए एप पर्प रमता हैमरकोई ऐसी मानसिक प्रक्यिा नहीं है जो पहले से ही पूर्णत: निषित हो। मदि उसे पदार्पसत्तारमक ही बना रिया गाए पौर प्रारमानुभूति से उसे रहिव कर दिया पाए, तो वह बस कर्म या भावपयाता का धिकार होकर रह पाता है। पाल्तु पदापमूसा मटनापों से अपना मनुष्य के लिए सम्भव है। वह पारपत् हो सम्ता है सपा अपने-गार बन सकता है। मानव-जाति का समस्त इतिहास समले सनहाने का निरपरिमन प्रपल-मात्र है । मानपानार में जो महान ज्योतिया पुप्पी पर प्रबतीग हुरपुर मुरुरात परपुरष सा-रेसर मानव वाशिमीरवी सम्भावनाएं ही हमारे पा म्परत र पासपोर हमें परमवीं हा...माहम प्रदान करती है। पतीबात मे प्रगति पीपोई निरन्तरता नहीं दी है।कमी एप दिशा में सनेमामा पिास इसीरिया में होनेवामी पुरस्पा का मुबह-माष पाहै। भौतिष्मातापको गुणाने में हमने ही प्रपति है कि माम समापों मुपारसे में हम मानही पर पाए । इतिहास की पति में कोई निषित नियम ।
सत्य की बोन योजना या प्राकारह महीं प्राप्त होता । मानवता मनुष्य मुमत प्रापरणारा की मई ममों द्वारा पाये बढ़ती है। जब हम बतमाम स्पिरिप्रति सचेत होते है तब उसका अभिप्राय यही होता है कि हम उसमें सोरेस्म पापरण कर सस्ते है। स्थिति किसी पूर्वनिश्चित एवं मिति-निर्धारित बस्तु की पोर नही पाती। बिनाप्त की मोर प्रपाप कृष पनिवार्य नही है। हमारा मविप्प इसपर निमर करता है कि हम क्या सोबते प्रौर सकम्प करते हैं। स्पिति की प्रतिको समम मेना उसपर नियमन प्राप्त करने की पहली सीडीपब हम उस ममझ मेवेतबासीसे उसमें मुमार-सस्कार करने का सकम्प उत्पन्न होता है। फिरतो हम उसकी गति चाहे जितनी धीमी या वेचकर सम् ।। हमारे पीरन में इतनी मसतिया कि हम नियमपूर्वक भषिप्प-कपन नही कर सकते। परिवर्तन बीवन का निगम है। ममुप्प को अपने चतुमि मी स्थिति के अनुसार अपने को बासना पाता है। या मापा मोर बम ही बन ते पिरा होता है तब समुन बारा वो एप प्राप्त हो पाता है ग्सीपर पार करनेवाला मम्पा बन मावा परिमापारपबहस सप्मकटियपीय समवायु में रहता है तो फारसपाही बन जाता है। मनुष्य को बाम प्राति पौर सायं प्रपन साप समझोता करना ही परता है। यही उसके पीवित रहने की सर्व है। सभी पम घोपित करते है कि मानवता का एकीकरण हो उनका सम्म है । भौतिक पपणा मौगोमिक दृष्टि से यह संपादित भी हो चुका है कि मानवता के इस ऐक्य की स्वीकृति लिए हमें अपने मन एवं हाय को प्रब भी तैयार करता है। मातियों एवं राष्ट्रों विभागन के गीर राष्ट्रों की प्रविनिता पौरपी के संघर्ष के बीच एक नई एकतामा निर्माण करने मि एक नमे मोर एक मबीम स्पापना की बहरत है। इसके लिए साहसिक प्रयल पार हमारे दृष्टिकोण में ऋतिकारी परिवतान की पापदपकता है। इस बाणा के रिना कि मानवता सपमुष ही एक पर मतिम स्तर तक ठमे में समय है या इस के बिना किपम्त में महापौर उसके साथी मामय एक-पूमरे को समझने पीर एकदूसरे के निाट माने मे समर्ष हो मनुष्य जी मही साता नमोई काम कर सकता है।म्पषितर्यो एवं राष्ट्रों के बीच चम विभाग कारें ही नहीं। मोहनेवानी करिया भी है। किन्तु मनुस-पाति की सबसे बड़ी मंसिस पोर साँप नियदि-और प्रषिक मामयीय पीर पषिक पाप्पारिमक बनमानवासना-सहानुभूतिपुस्त यममवारी प्रारपिक पोम्प होना । पान जैसे पुर्षों में बाकि उनम्न प्रोर मय का राम्य है यह पाया मानम हाप मे प्रथम हो ही पठती है। मंमार के महान पर्मपिया यो पुप उन्हें विरासत में मिला होता है उससे पूष भिन्न बात की हो प्रिक्षा से । पनिपों अपि मौतम बुर - पिपप-प्रदेश परपुत्र मुकात ईसा मुहम्मद नानक मोर कोर दयारि परमे जीवन मे ही परम्पपगत विचारों को प्रनियाप स से तोड़ने को वाप्य हुए। उपमिपरों केपियों और पुर मे कि मकान का विरोध किया 48 सा मे यही पर्मापता हो मोतीही बमे ही हमे भी धर्म के साथ हरयों को स्प पोर मठम पपपा बाप प्रवृत्तियों मे से मामय की दुरंमता एवं काम की विकृतियों से उत्पन्न होतो है रमा करली पापी।यो पुम हमारे युग को प्रावस्याताओं और मामों के अनुप मुबमारमा मसिम्यक्ति की दानित सोझा है, से घोर ही देना जाहिए । शानिरास पपने 'मालविकाग्निमित्र' में रहते हैं हरपीर केबम तमिए पछी नहीं है कि पुरानी है । काई भी साहित्य क्षेत्रात नया होने के कारण नगम्य नही समयमा सकता । महापुरप उपयुषत विचन-परीक्षण के पापाद ही एक या दूसरे को ग्रहण करते हैं। बस मून ही दूसरों के विकासोदारा पपप्रप्ट होते है। इतिहास निरन्तरता पौर प्रपति है। परम्परापय निरन्तरता बस पत्रिक मुजन मही। यह सरनारमक पपान्तरण है। हमें मार्मिक मपाता को दूसरे पुर्गों पी पति एक विचारसरणी से निजामकर प्रपने पुप एवं सततिमी पारपण तामों मोर मार्गों के अनुरूप रामना पड़पा और इस प्रकार उसकी रमा करनी परेगी। हमें ऐसे सामाग्य सम्पा का सुगन करना होगा जो प्रमुवा या होमवा की कोई मामना माए बिना बीमित पोको एक पर सकेंगे। कात सम्पूर्ण वस्तुओं भोपाम देता है। अपनी प्रान्तरिक प्रात्ममारमा एवं प्रेरना बारा हमें धनावन सरय तक पहना ही होगा। विपास एक प्राचार साप-साप चमत। यदि हम सा प्रातिपौर परती में निवास रखते है तो हमारी दुनिया प्रतिहिंछा एक उत्पीडम की पटनापों से भर पाएगी पर यदि हम पमी पमुपोंसा प्रापरम करेंगे तो हमारा समाज भी एक पंगत पेसा हो पाएगा। यदि हम सारथिम प्राध्यारिमा पूस्पों में विवाह रखेंगे तो रससे पाम्ति एवं लौहारमारिफास होपा । पापा पूरा प्रया फार देता है। पार इम प्रापारभूत प्रश्नों बारे में सोच रहे है और सरम को परम थरार एष पुरस्करणीय पों में पानी को रमक है। मेसार एक मानवविहार का एस और कान एकही पास्तविक तपा गहन ब पिय प्राय सबमर्य तिय पपीनर और पर शिपास एक मसिबास रेबीच भूपर्प । रितने भी पुग सिरा १ पुदलिय चम्म माम | सोमारामा परमादार मेटेगरता म ब स सत्य कीमो नियमित हुए। फिर चाहे उनकास कुछ भी पाहो उनका एक अपना मानो और पामत्व होता है अपने देश-याति के मिए भी भोर पारपत-सनातन मि भी फसरायक होते है। जितने भी सुप ऐसे { भिमपर किसी भीप में पगिया का राम्प है ये यदि अपने मिप्पा मामोक से सम-भर लिए चमक भी उठे - मैप मार मेते है वो भी समावन काल-प्रवाहारा उपेक्षा को प्राप्त होते है यो कोई भी पसुबमामा या पापादक वस्तूमो को मेकर अपने जीवन को न करना नहीं चाहता।" विभिन्न भामम-समार मी मनुष्म-प्राणिों की मा ही निष्ठा एवं पिनास से बीपि गते हैं और निष्ठा का नोप होते ही मर होगा है। परि हमारा समार पुन पपना गया हुमा स्वास्थ्य प्राप्त करमा पाहता। रसे प्रपनी बोई मिष्टा पुन प्राप्त करनी ही पड़ेगी।हमारा समाजमा मस्मर नहीं है कि उसकी साहीन कीमा सके कठिनाई सनी ही है कि यह विमा मिप्यों तथा परस्पर-प्रतिकम प्रेरणामों से पीमित है। कभीमा उत्साह निहत हो उठता है कमी निरापा से हिम्मत हार बैठता है। पर यही मारम बना यही हमारी प्रासा का कारण है। हम बम ऐसी निष्ठा की पहर है भो वस्तुपों पर प्रस्तरारमा की भक्ति स्मापित करे मोरास दुनिया में पा निमाम एवं समार गटम में अपने पारस्परिक सम्मको परम्परापत स्मों। यो दिया है, पुन महल का स्थान प्राप्त करे। १ रिमामा। (१)TT मेकर रागा दूसरा प्रप्याय विश्वास की कठिनाइया प्रारबिन प्रधान सठियों और प्रभावों के कारण अधिवास मा प्रभास्त्रा की समस्मा उठ पड़ी हुई है उनमें पता हुमा हानिक दृष्टिकोम प्रपुर सामाजिक पेदना तपा विस-एपय मे मिस्सी प्रमुख है। परि कोई TRAIरे युग के निसमार.को मार करने, उसकी मामापिस पायाभार्थो क साप महानु भूति रखने और विषय को प्रामे गाने में असमर्थ है तो यह नीवित रहने की पाएर मना १ मम मौर विज्ञान वैज्ञानिकभार अपनी प्रविधास्ताहिर निकासा, रिमी भी पोर कायम विनाम पर सीमार परन महिमिताट तपा मनहरन की भक्ति के कारण ही नम्पूर्ण पोसई प्रपोगों को पागे वाता रहा है। यह गिनी विसरको शिला निरीक्षण-परीषम प्रासोपना कमीकार नहीं करता। यह प्रश्न करने मौर माग्यवारों पर ममेह करने में सस्ता है। इस प्रेणा म भावना ने हमें अपने भौविध पविरण पर एक भभुत प्रमुख प्रान किया है। पर्म का मामाग्य मर्म मिया जाता है उमम यह विज्ञान को प्ररफ भागना पिरोनी है। विमान की विधि पारा मनमाधि है. एम.की पूनही है विज्ञान मिी मर्वाधिकारसारिता पर पापित नहीं है कि एमे दृष्ट प्रमार्गेरी पोर इंगित करता है जिनका मूस्पोकन कोई भी प्रतिक्षित मस्तिणकर सरता। विमान तिन एवं सिमाफी मनवा के बीच किमी मी प्रतिर रमीसा यह महीन मान पर नवीन प्रनुमा कासरान रखा। पर नपामानिक कभीर्यामह पाप्रपा प्राथप नहीं मेवा। रसके दृष्टि कोण मैं ममता पारमालोपन परिगणे स पोपने को तत्परता रियाई पड़ती है परिम निसामा कम्तमा को मात देते है वो हमें यह समझोरेम मगेर्म दिधर्म प्रमुग प्रा ममतारा या प्रापिहारशारिता के प्रतिम है। वामिन नेमणून नगारको राधमी बहार सरी निना की है 네 सत्य कोचोग यह पृथवा है 'ईसाई मोरासनिको बीच-सर्म के अनुयायी पार गुमान के मन बायोगीच एक पोसरमको गित करता है, और दूसरा पो उसको पुनस्थापित करता है और उसकी सिमा देता है इन दोनों के बीच कोई साक्ष्य कहाँ है?" धर्म पर बिकने बीच का मापारस्परिक पिप भार भी पितस प्रसारिक नहीं है। गाटर एप.मराहत है “धर्मनिष्ठा के लिए सुविधा की मांग करना पिरेक माद मनुष्य को धर्मविपयर बातों में प्रनाप मान मैना है। विमान के लिए तो समस्त निर्मम अस्थायी पौर नवीन शाम के प्रकार में पुमघोषित होने योग्म होते हैं। पदि म्यापिठ मर्म एक ऐसी दुनिया में कोर पौर सीमित होकर पाते हैं जिनकी नहातीमारी एवामियों पूर्व मि भए धर्म एबोडारा निश्चित की गईमी तोपिस हानिक प्रभामी मे अपना मोमियम करम सिवान्ता परन् अपने पारपर्यजनक प्रायोगिक परिनामो राम्मावहारिक प में सिद्ध कर दिया है, उसकी भोर प्राषित मोर धर्मवेरिका पर प्रयोगमाना को तरजीह ने कोही प्रवृत्त होग। फिरशानिक विचारों में मार पिता का एक तातोपो पार्मिक सिवादों में मी पामा मावा। मानिक मोग कोई राष्ट्रीय या भोमोमिन सीमा नहीं मानते । दुसर रेमों के सामियों के साप मुचनाओं का पापान-प्रराम करते है।दुरप मा गोपनीयता विमान की भावना के पिया। 'मोनॉमी सबमी राती के प्रारम्भ मे कोसि मे भी पूमने का सिगर से सो सम्म से भून कर दिवा भोजरापानमा । ग्सनेमा लोग मौसिनुप बमोहित की बात परभान सिनेमा सामने बीपीमत बामरामराह भूल नहीं लिपीमती जोमा पामा वसेको मात्र मी प्रपाली मानीगी और नही सीप में प्रशानियों से रेपोमी। स स भोज-मानता बमा पार। भिनु रविश वर्मक में Artoरोमा ने Art को साम सिबारेमाश किया' सौ मरासिन में भी बोस बरान किस शनिप रस मभर बिपिमई बी सी जैन मामोपाय ARI (ही सिरिस) पनिरको पातको मात दे।" fortस वार मोमर को भागी दूरसीन मानिस मा को नेमश्रित मोमबदिशा परेका मानिस। मैने रोपार परम्ोरे का पूरा पा और ममें सेव की नामी मिली। मोपमा दी PRANAगानरमावधीयन ( ITRAधीम्स मरर' (Rive)गमा पनि । “मी पियन रिनपावरसमस पे मितिमा रिमाया सपिभरि भर नमी को पाएमा - AR शिपासकौ फठिनाइ प्रत्येकपका दावा है कि उसका पर्मप्राप प्रताबाम्म म्म से पियर की मागी है और इसलिए निम्ति है। परन्तु धर्मपनों की साम्तिहीनता बिगान की इमि में मसपायोगों में विरोष है। कतिपय भूतपमवादियों या परम्परामादियों के अतिरिक्त पर्मयम्ब को प्रमरम प्रमाण मानने पर प्राय पर कोई चोर महाँ देवा।पर पर्ममाप बन ममोगों के प्रान्त मन पर इस परम पापी के सम्म मात्र को प्यार करते है वो रसके प्रति समुन। पागो उसको प्रहप करते।। पब पर्मपम्प की बातों को प्रताप एवं प्रान्त मही समन पाया। पर्मग्रम्पों के प्रपिकांग पाठ को प्रसरस बहन भी नही किया जा सकता। उपाहरणसम परि हम सृष्टि की तिपि-सारणी भोर सपन-सम्बन्धी माप के प्राकस्मिक कार्यों की मालिका पर विचार करें और एक ठोस स्वर्ग एर स्पिरपणी की गाव को प्रसारण माने हो ये रिमाम की पोषों के रिक्त प्रतीत हॉपि पिर कोई भी धर्म इस पवेमार के सामने ठहर नहीं सका कि वह ऐसे निपात में भूमबर बिमका कोई ऐतिहासिक पापार नहीं है, कोई पाप्यात्मिक सत्प हो उनके पीये है। वर्ष से परखा परम्परा एवं पौरानिकता को पनग कर देना चमे मोममा कर देता है। इसलिए पर्माधिकारी ऐसे सम्पूर्ण प्रपनों को निन्दा करते है रितसे पर्मपापों के प्रति निष्य कोपा समता हो।' १ प्रोसर सी एम.हिलेसम-विलास तो हानिक मानतामोसमर्पण मोरिख परेवारिसमानुपातिपस्मिनुचरोमीरमरप रसना पारिएक सरोपागोयामा मानेको रेसम्पादिम समय भारत प्रदीप सिय मोरम-भवारिAARVE (११) रस रोमन मायेने साम पविती मोवि भानामावो रोमन PRAANE सनसिप' (ब्दोर निरोप) बीच प्रदानी गडितबीती विकार, मोम पवाती मौरवारिक नितिर मोरित की पारी मिली पारीरिक्सपोनिवारण वर्ममिति मे. मासिकपोनि पिया माती मात्र मध्यप व मुरमको वारिपारपार रोप में पोमोसे अपम ने प्रदेश विणाविधिकारी प्रतिमू पुतीया . मकान पर एपिप (Hum) मामासस परभामा कम रैमन मे मारे मन्दर प्रवे पुए पर पकानादीन सरपरकार प्रारम्मिलस्पन में रमने (सीपलेप "मलोप पानगन्यमान की मनमाम्य गोहे प्रति मतिरसे सर करेगाने का प्रतिभा प्रमा बीमागा। प्रसव पर्व मनायो मामने मामही स परम नाम मैगन १११ मे सरिसको बचपनी रेले पर सब मौसमय समतावामपने tam विमिमा प्रिया सामन्यादरापरलेस पर कामे पुस्ता समिश २. सवकोशोग पाए २ तुलनात्मक पम तुमनारमक धर्म पम्पबन थे हमें न केवम धर्मविरमास एवं धर्मावरम की परिव करनेवामी पिपिषतामों का पता मयता परन् एम-पूसरे गोविरोधी मानोगामे धर्मसम्प्रदायों के बीच प्राप्त प्रनेक तमामतापों का मी मान होता है। ममतार, चमत्कार एवं सौहार से महत्वपूर्ण अंग सबमें प्राप्त होते है। बसंत में नमनीवनोग्मेष के उपलक्ष्य में मनाए पानामै नस्सा प्रमेक धर्मों में माते है। मह पपसर प्रार्थना एव स्तुति तना बम्पमार का होता है। हम अपने मेव पीर हरय उन पर्वतो की मोर उठाते यहां से प्राशा और निप्या पठिमीर मानन्द की पारा हमारे प्रकार प्राती है। रिला इसे होलिकोत्सव के रूप में मनाते है। यहूदियों में यह पास-प्रोबर भोग या बंपन से मुक्ति पार करुमा के सिरीय ग्याय के प म पागपाता है। ईसाइयों के बीच यह परिष स्टिरोप में पावा राधा के पुनीषन प्रवरा मृत्यु पर उनही विनय का मूषक है। बसतोत्सव न केवल मौतिक जगत् परन् पाप्यात्मिक पद मे भी महान मग गीरमागम का मूबा है। स्मारक देवों की पूनानी पापो मे मूनी पर पड़ाए नए मोर पुन पी उटने पाने मा पो पटना से साइम है । रोमन सापाम्प की पुरानी मूर्ति-उपाममा मे भने सामईसाईप के जीवन एवं विचार को प्रभावित किया था। हिचित् परमे नामो से कर पूनानी बों को वर्ष की हत-सूची में स्थान प्राप्त हपापा । विपरिनस सीना का 'सव पीरिलो ऐ गया विपुत्-देवता पेरण 'सत निरा के रूप में पबम गया और ममुमो का देवता मोसम 'संत श्रेमियम' प्रमाधिसभी रिमाविमा और चमकौर मारे पनि यस पनिक मारेरो विपरित (स्मारम्) नमाविक से मरेपरlass मथानमा मारे मनु सामसकिना-पर-1 पर सिर मेसिमी पय' (OER) ' परमा, 'मनमाना (मितपर 1) पसमा निमकी'मा मत मी मरम्मत को मिल गई मांगा समानाति से १०८ मेवी पभामग ( भनयमा) में पासोमनुसार मनासारवार पर ला पयाम्प गप मिनिसा सम्बनेपाती बम निधि। खरे बने गानोगोकोशिशाना से मिलन Rt पिम Pint totkनो सान मातरिक मानने के तर बरतोरातापिनों में माशिमthatar भी नराम शेगी शिवगतम महो। -R Kite ark रेपो (पुनसामानों साति सम्मः सर्वर (१५।
पिपास की कठिमाया २१ - बन गया।' तुमहम के प्रस्तबम में मानकरी जैस बामबरों के बीच 'मां और भिग की गापा भारत में पोकुम के गोगुन्द के बीच ममोपा एवं रुप्मनी याद रिजाती है। वर्ष की समामी यो कुमारी माता (मगिन मर) बी पौर मो मेरी केप में पूर्णित है पूषकाम में इस्तर एस्तोष प्राइमिस मियेन प्रौर निवोमातिस के रूप में प्राव भी। मानव जाति के लिए ईमा की वेदना गिमगामेम हेरापिसार प्रोमीषियस के पम एवं इमाइया के मेयर कप-सहन में देती या सन्नी है। मानवरूप में शपरत्व की पूजा ईमाइयों के पूर्व यहाँ तक कि रोम में भी प्रथमित पी। यही नहीं माईकेमिए दो माम 'एक्सेगिया रमागमा बह भी पस मगर राम्प में पाल मे प्रयुक्त होनापारही यहमम नागरिर ममितिमिए तर प्रयुक्त होता पा पर यह ग्याय कार्य के मिए महीं बल्कि राजनीमिर पार्यो को निपटाने के लिए बैठती थी। अब इम शम मे किमो स्थानीय ईमाई-ममार का भी योग होता है पौर माविधिक वर्षा भी। जब ईमाधिमत्रों में ईमाईच्या प्रम्य पारे वीष भनेक ममाननाए पार तो उनम मे कुछ ने कस्सना कर मी कि ये मानव को पास में फमाम के लिए संतान बी वान है। उममें गो मारा विषारयान थे उन्होंमे इनको माईपर्म के मिप वरीष तयारीकेम्प में ३ मानव-पक्ति एवं प्रौद्योगिकी का विकास हम एक ऐमी समगा में विकमिव हुए गोविज्ञान प्रात वास्तविकता पीसमोरीको प्रपनाम रेमिए हम प्ररित करनी है। गीपरिमान मनोविज्ञान सपा इतिहाम की पोों मे पता चलता है कि मानब सहन या प्रतिक्त मियामा (रिणममेय) प्राणी है पपने पर्यावरण को पक्तिया की पा पर प्राधित है नमलिस ममें ममेरमी किनमेसनरात्रिसमस मन नितर में मोन का मदिन था सूप (पसी पर्म) से AAR र। - जिमिनीन हिसास मौक मौन बसिन (1) पप . प्रथम मापाने निमोकोमाईपनाया परमोने बार भग- गया केस में परेममरख की प्रश्नाली का मासिक मरतीला भरोसी समर मामि सेपरमा प्ररथ औपील मे मोमें मी सालमिर पुरिमा मैतिक पतन पार र रगा सरल अनमामिपी के कामे रचा गाातर गे नही निमा गkि सिमा पिन समाविकीपुर में दो वर्तमान या इसे अपने पता प्रतिप्रेमलिमिा पामनिसान मानस की संहारी रिममें मिलने पर मपनी 14 गम्मिमा मिस सेवामा समरिया'-अमर • रोपनी : 1 और नि मग. (११),ne पहा रिमा। " २२ सत्य कीमोग मोर प्रायोगिक शिामरा निरूपित एवं नियंभित होता है।पान के परनमेषक (तामिस्ट) के इस प्राण का रिमामय मामि उसका सपा विचार करते हो मम्मरिणति पताम्दी का विज्ञान उत्तर देता है कि मानम एक कार्पपीन यंग है पपा पत्रिक से मभिक एक प्रापी है । परस्तू के १ एनिमा में प्रतिपारित मानव-विषयक जीवनमानीय रिपार की प्रति उसके ‘एपिल्स' में पिए हुए मासिक बीबम के मार्स महापार्मिक विचार यो पौर देता है कि कम से कम च सीमा तक तो मानव को स्पच स्वयंपूर्ण प्रमिप्रामपुक्त एक बुनिधीनमामो इसे अपोपणना नियमित प्रयोगों नहीं सिव किया जा सकता क्योंकि प्रयोग मानव की उस मनोरचना से सम्पराही महा रसते गिसमें वह एक पठन प्रानी म्प में अपने प्रति समम होता है। प्रौद्योगिकी (टेक्सामगी) की गरीमत भाषिक संघटना की ऐसी बना नियां निकल पातबिनमें मपित मी अपनी मताशरमवा क्या खरों के साथ प्रपनी एकता की भावना का मोप होगा ना पहा है। हमारा समान एक किसान संबटन का मंच ममता गाहा और पक्तिगत सम्पद उसमें नौवे माहे हैं। परिवार सम्प-समूह स्थानीय संस्था मन्दिर, पर्ष या मस्मिा का प्रमाण मिथ्या ना पाई। मोग प्रणात गतिमान है पौर उन्हें वचित् ही पान्ति मिल पाती है। प्रायोपिकी की समातिने यो मुविधाएं हमारे माये रखरी ग्नमें मोगे हुए रे पारमनिपाल के प्रपत्म मे कठिनाई अनुनय करने । म भौतिक स्तर पर मुसपूर्ण बीवन बिताने के साधनों का नितमा ही इस्तेमाम करखे है उतना ही अपने पापते पूर पावे पाते है। गन पनों की बाति ही बोरन्हें पामोर मान करते र पौर निमकर बमसमूह न तो पुरे मते । बलों ने हमारे जीवन को पटिम बना दिया हैपौर पुटिने हमारे मन को मसात कर रखा है। तुमन प्रास्रासक पौर निर्मन पान्ति हमारी पारी निकमते पाए। और सुरसा की एक गिप्पा भावनावस व्यक्ति मारें में समाहित होकर एक नया इकाईपुरबनाता पापा । नया समूह की पैद्यापिकवाया हमारे नो-विषय पोप म्यापार सामाजिक गौवन एवं पावरष सबपर या गई है। इस समूह का सबसे बड़ा बातरा संगत सीपारमा पमत पिचार महाँपण विचार का एकान्त पाप है। हमारे बीवन पर समूहमाम्पम के प्रत्यधिक पक्ष एवं प्रभाव के कारण निमिता पसरता एवं एस्पताको बान मिला है। मन मिति एवं कारस ति-ई। प्राधिक समय चिन्तम स्थान पर मापा गाएका पायेव के प्रतीकों एवं वनों को नाम्पा प्राप्त है। मनोरेगा के प्रति परमान का नाम नो-समाका व निवड पर मना है। बो नोग बनताको भवापारे सारे प्रवासाची हो पाते है। पमनीति समूह-मनोपिमान - विपास की कठिनाइ २३ पा मुमा बन गई है। समूह ने ही स्टाान पर पपराब किया समूह ही पा निसने हिटलर के प्रमारा सामूहिक प्रानब के साम स्वागत किया। भाम भी पारिक कट्टरता के लिए सोपसमूहों नामोपम एक उपयोग होगा है। मोष भारतको निर्यात करने के लिए मोकमत मेता प्रपार-बापम का पापय मेत है। हम रेग्मिो सुनते। या टेमिपिरान के कार्यक्रम का अनुसरण करते है तो हमें पता मनवा है किसे समूह राए की रेशिक नीति एक मानिक के मैतिकत, एक कमार के कार्य प्रौर एक मोटर की विपनाका निर्णय की है। एफ प्रौधोमिक माबिक सभ्यता में एक सामूहिक समान में मक्ति एक म्पस्वित्वहीन मिली प्रेरणामों से रहित एकाई-मात्र वनकर पाता है। वस्तुएं पोवन का नियम्य करती है। साम्पिक मौसा रा गुमात्मा विशेषतात्मक मानव-प्राधियों का समान धीन लिया जाता है। माननीय होने का मर्प दो विकासपीम होना पामु होला सहयोन की रामे पूर्ण होना सहानुभूतिणीस होना पहनमीम होना है। मानवीय होना पनातावारमक होमाई और उन लोगों से भी विपार-विनिमय में मापत्ति नहीं करमा है मोहमसे भिन्न मत रयते।। या पपमे पड़ोसियों पर विश्वास रसना पोर अपने सामों के प्रति सवार होना है। गरि हम मपनी मनुष्यतामो फिर से प्राप्त करनेमे तो मनमानी करनेवासी सत्ताको पारमसमपग करने से भी मार करये पौर राष्ट्रों को सामूहिक मानसनीपर्यय मापामसपन की स्पिति से रिसमै कुध (राष्ट्र) पर गए है पाने में मार देखे। परम्तु मार स्थिति यह है कि प्राथमिक मार का प्रोपोगिन संघटन जिनमें सक्ति का महत्व बढ़त ही कम हो गया। एक मौसि संग को माता ९मा मादपरमो प्रस्सीमर करने का प्राल. । पानिक सरकारें मानर-प्रागियों के पात्मसम्मान पर प्रामप करती है पौर रते नष्ट करने की प्रति रपती है। पर्न -गर्म मनुष्यों को अपने प्रति वग्य पराए में परत देती है और मन्द में उमपने प्रति निपण पोर प्रविवार मे पूर्ण पोरती। मह केबम बोटिक स्तर पर ही नहीं होता बस्मिारमा की गहराई में भी होता है। में मनुष्य पपमी मारमा ही सो पुरे है। ऐसे ही मनुप्यारो उपनिप'भारपहनो पना महार पाती है। प्रारमताम पाप है पन्तकरण के पातरिक ग्यामानित में-एक ऐसे म्यामापिपरण में मोन्सिामहरी गरिसकेप मे पतपित पौर मपनीय मानिकी पारिक प्रगुमनाममाम है-मिठा इमा पाई पारमा रापारमा पर प्रापिष्साहमारे पन्दर मम्मित काम स्वर हे सग्य का एक कम है परमा पीएर पिननारी हम पूपत पालना के प्रमापा नहीं है विधमे माधुनिक जानिक प्रौद्योगिकी हमें पिप्तीन सपा पाहपी है। सागरिक पारे - २४ सरम की लोग जम्मानित प्रयोग मोर मानव के प्रप पवन के पीप एक गुप्त राम्याप है।' पनि में अपनी मतिम साई पौरपूर्णता को कायम एणना प्रौद्योगिक प्रमति विवेकपूर्ण पारम शासन से सामगस्म परमा ही परेमा। ४ ताकिफ प्रायसवार पूर्व एवं पश्चिम दोनों में प्ररपपवार तत्वज्ञान का एक पाग्रही अंग हा । प्रमी हाम तर यह इम्झियमम्प पेठमा एवं निष्कर्ष पर प्राभित मानव Iान के एक विषेप सिमाम्त प्राप्पारिमा कस्समामों के प्रति मा पोर मैमानिक मामी मिए पवा का पोता पा-मापारपास्त्र की एक ऐमी प्रमानी मो समान में मामीप किन्तु धर्म में मनीपरपारी पी । ये प्रत्यसबारी एक सार्य सिक दृष्टिकोण रखते पं पोर पीबन पा निम्तन के प्रति उनका एक निश्चित नोमार एक निश्चित रया वा । परम्परागत प्रब में में ऐसे तत्वमाती पा पनिक कहा जा सकता है जिनके पक्ति की प्रति ससार में उसके स्वाम तबा सकी मिमतिसमय मे निषित विचार। नबीन प्रत्ययपारी सम्पूर्न प्रप्पास्मविधा का तिरस्कार करते हैं । यो कुप मिसमम्म नही है या जो मंशामिक बालों की सहायता से भी प्रियाए नही । यह सरम होने का बाना नहीं कर सरता । विहान निप्स परा-चमद सा मनु ग्मान करता है यही सत्य है उसके अतिरिक्त पो रस्तुएं सरप ई सनकी प्राति की नहीं होनी चाहिए जो पाप की है। बम परार्म को ही हम रेस और प गते । पौर मो कुछ भी भानुमक्षिक प्रमाण के योग्य है वही सस्प है। मूपों की गत सोचना वा सौन्दर्य का उपयोम करना मत्य के प्रस्म की पृष्टि से पसंपत है। सा करना प्रपपार्प की परमाश्या की मिप्पागासों पी पुनिया में प्रमन रना है । एक प्रश्य प्राप्मारिमा यमाकाम एप प्रकार के प्रमूर्त कम में एक नागपक प्यापात-मार है। मासिस बेकन ने कहा मा 'सम्पूर्ण प्रचलित बार्बनिक विचार-अनामिया प्रकार के मचनादप है वो पपपा एवं दायसम्मा की भूमि पर बने स्वयं १ ति बोर्बिम रिसी- विक्र(1) में दामन पाता। भाबनाम बागम में पारपास्य सम्बामकित पाकमान महीनी Rपमा काने लिए कोईरस नहीं कि मारगी। समारोबापित मी मनमा (नवमेगन्स) भान हैपानी परिसूचना के साथ क्ति पानामा सेमागम मोलिए अमिषही यही राक्लापरिब ने एक अबको प्रमादिको महाससमुपो ने इस समय पर रहने पर मशीन से निवौ मार मने कोपप भन। म मनुष की प मतान मेरने को मिला नमनी पर मनुपरबगी।
- विपास की कठिनाइयो २१ ममित गपत् का प्रतिनिपित करते हैं। में यह बात बम प्ररसित प्रगामियों या पुरातन सम्परापों एवं मनों के विषय में ही नहीं कह रहा हूं बनीप्रमार के मार भी बहुदो नाटक निर्मित होते रहेंगे मोर इसी त्रिम स में प्रमिमीत होते ईमे।"महायेकन मे विपनमीय हानिक नामान्यतामों की दानिक मल्पनामों से भिन्नता एवं पिरोष व्यक्त किया है। इसीरंग से हम मी कहते है "अभ्यारम विचा के प्रमिकांच के विषय में यह प्रत्यम्त म्पाम्य एवं उचित भापरित की गा सकती है कि वह ठीक प्रकार से विमान ही नहीं उमका सम्म या तो उस मानवी हकार, मोकि गे विपर्यो का अन्वयन करने का साहस करता है पो मामर की समय से मार निष्पम प्रयत्नौनाप होता है या फिर पैसे मुन रिमासोंरेकोसम से होता है जो मौबिरय की मूमि पर पर होने मे पसमप होने के कारण अपनी दुमतामो पिपाने और उसकी रक्षा करने के लिए इम उनमानेसरामी परियों को लगा करते हैं।" अपनी गुम्मर 'ट्रोटास प्रान शुमन नेबर (मानर प्रतिपर एक प्रसप) में इतकी पुष्टि करते हैं कि मुस्माकम करनेवासी कृतियों में कोई मंदाम्तिक मत्त नहीं होते। ऐसे मौमिक तप्प गो अपने पिया मोर मुख प्रमाणित नहीं करते । अपनी प्रगति में मगोपीय नही है । ये दृत्तिया तप्प के विपर्यो पर प मही कहनी । सागरतम्य बन पानुमक्षिका प्रत्यारा प्यों एवं पुनरुमितों व मीमित है। हम जगत् रेसमार या प्राति के विपप में मोइतने प्रस्न गाते है ये ऐमी मापा में होते है कि अपहोम हो जाते हैं। महत्वपूर्ण नापनारमा अनुभूतिया तप्प के लिपपों की कोई भूषना नहीं देती रे तप्पों से उद्भव नहीं होठी मजमपर परमित ही होती है। पाष्ट ने प्रथम किया पाकि यदि सम्पूर्ण मान मनुमबरम्प है तो सापिक सामजस्पारमा मियों की स्पिति क्या है। मतोये पारपाों से सम्परम्प का विषम सिमका सम्रेहबाद कार को सन्तुष्ट मकर मारिसने तर्फ पिया कि यह गान जगन् परिवर्तनलीग विचारों के पस्तरों मे हिमवासनामा निर्माण-माना अनुमय मेसर रिमी समारता मामान मरना हमारे लिए मर्मभर है। गणितीय प्रापापनाए न तोतारामपपामर माप है, म पमुपाप पुष्ट हाने योग्य मापेपणामक प्रस्थापमार है। पिरपी य रमारमाए मोमठो पारिता पुनरपिता म पानुमविक गामान्यताएं है पापा स्पगे गएप है। ए मारेर मोरपरपारगम पपने पप्रिमोरिपा मवमटिया में यह रिमाने का प्रयल पिया निमितीय प्रापापनापों में भी निषित नए , म य । . 'मनास पनमम हरमन भाग , समान ।
ग्राप कीमोर से बही वामाग्पवा रिचमान है भो तई की प्राषापमापी में पाई जाती है। पोनों किसी भी रिपपवस्तु मा भनुमगम्य रिपप से स्वाहक है । गपित एवं तई (पाप) को तो एसपी पूति या प्रमार-मार मानना चाहिए. दिनों हो प्रतीकारमह प्रमानिकपत का विषम कसे है । सभापती पाप () पुररूपपत या मौपचारिक नहीं है। विप न्याहरणीय पौ पौर उनपर प्रापित निष्कर्षों पर भी विचार करता माप (ई) का रिपुर पोषपारिक या स्पपद पंच उमी शाराहोवा विध प्रकार का पणित का होता। किन्तु म्याप (सई)मा पो म मापा लिपि एष पापम्प स्मों पारा निर्गत भागोंदारिन करता है एक चिम्म मनुणाम है। समका प्रमरन परते मो•• मर भी पन को पिपुटपनापक मदिनमारमण या निर्णयारपफ प मे ऐसा विचार है यह गिठान्व की मपेमा एक प्रगासी अधिक है। अनुसार राभिक सिम्त पो मन की सीमा से माने पाने का मन करते है मानव मस्तिष्क की कापीमा से पैदा होनेमामे भो का गिरहो पाते है।मूर का रिपार है कि वे माण केम्पपहार में प्राप्त किए जा पाते है। इसलिए परकोईरानिय सिमान्त प्रस्तावित होता है मूरगोर के मार कहते है कि हमें पहले गानने का पल करना चाहिए कि बस्तु इसका मरं मया है। मारपन का काम नही किया पर्म एवं नीति के पिगम्त बनाए अपरा उनके परस्पर-प्रतिम रिपारॉपर निर्भय है। रसा काम तो मह प्रापित करना मात्र है कि ये सियास्त तत्वहीन मूर्खतापूर्ण एष पदबास-मात्र है। पन का कार्य विशनपन, स्पष्टीकरण है। हरवइको सिमामा की पाति ही इसकी प्रपामी पानुमषिक प्रमोपारमा पिसेपमारमक है। इसका कार्यमा साम्य मानव-ज्ञान की सीमा की परिभाषा करता पर विभिन्न प्रकारमान बोषका पम्तर बताना है। मानवीय स्थिति से उत्पन्न होनेमामी जीप प्रमस्यामों से सम्पप रखमे पौर धम्मों की म्युत्पत्ति एक प्रकार की पौष पारिक मास्या पर अपने को केनित करने से वो कोई मतमा महाँ। सपना है कि पार हम शानिक पारमपूर्णता की एक ऐसी मबपि में ए पे बब इन मन्तिम प्रनाको हास्यासप पौर उत्तर देम पोम्म समारोह देते हम मानव प्रानियों कोटित मोरे सपने देखते हैं सपा मग मुख उसकी ममा पार पालम्पनीलमता को प्रापेशानिय युग का प्रयोग माग एममी है। हम मान ये है कि जिस विगोमित पीरणाकोऽनिया की हमरसमा करते ही एक पुनिया है।पर्म का मस्तिल पारे-वीरेखत्म किपा पा २० मिपास की कठिनाइयो ५ पर्म एवं सामाजिक समाप पास मिष्ठा एवं भावरिको दोनों के बीच को पम्प है, उसासे मर्म की पपर्याप्तता स्पष्ट हो जाती है। मापार में यात्रिक रूप से शामिल होने को या पर सिम्तों के प्रति मिणिय मारमसमर्पम को प्रमय धर्म समझ सिरा गया। हममें से बहुवेरे ऐते है मो पर्म के बाझाररण, समाचार एक पवित्रता की परम्परामों का पालन करते हैं परन्तु अपना जीवन रम उपदेशों पर मठित नहीं लिमको मानने का दावा कर है। हम धर्म के माध रंग-म की फा को एक मिनय जैसा सकता है। अपने सर्वोत्तम रस में गर्म विश्वासपी पेसा प्रापरण परपषिक समरेता है। निष्ठा की परिभाषा करने तक ही धर्म की सीमा नही है।सके पन्तयतसा ही पीरन-यापम करना भी पाता है। परिमापा मापन है साप्य नही। कोई सायन होगाहम उस साप या मरिम से पपारा महत्वपूर्ण नही है पाकि पर हमें से पाता है। हमें सत्य एवं भाषण में पर्मजीवी होना चाहिए, कम गाम्पिक निष्ठा-मार प्रकट करके नहीं। पान हमारे निवास पर हमारे प्रापरण में मन्तर पा गया है । इवने पर भी हम पाहते गाते है 'कर्महीन पर्मविपास ही मृत है। "पंत पाम कहते हैं इस दुनिया के अनुरूप म बमोस्टिसपने मानस कोसीम जीवन देकर प्रमुर पनो कर्ममति में स्मारित हो जिससे तुम प्रमाणित कर सको शिविरकी रथापाई मारपया घेय स्वीकार्य और पूर्व है।" यदि पर्म पासम्मप पौर म्यापक नहीं है, पहियह मानव-जीवन में प्रत्येक स में प्रवेश महीपणा पार प्रत्येद्र मानव-कार्य को प्रभारित नहीं करता तो यह केवत माशापर मात्र है यपान या तत्प नहीं है। इसके पिर यदि हमानिस है १ परिमन शिनी रिम मे हि:५६ भारत में बारित का मित मिratan के निसासियों को मार प्रशासनिक और मोदी पर हिमारे लिए मोरे लोभमा सामान सो मारम भामरेमानिat पर प्राने साममिक मारनामोई सम्परनामीबोरामो मान-सम्मत है। मेरा भेटे पस्त मामला साभारतात परत # AATA HAIR प्रपालेर नि:"मेरामिक रोगो सम्मी और परम सरपरीक्सपरने से गैर-सरायपरम में मासे 40 साम्य मिलेगा रिमनी मौरीको बीसी व से नदी- म-'मोल पानरनिरा रिकाम्म(१५) मग..मोरे अनुपम (पिता से मूर्ति (नरtand) रमने भरने से देश से गमे । मन्त्र पाशा ! 'रोममा १५ ॥
२८ सत्यपीसोर कि हमारा पम विस्तृत है और इसके अनुपायो गो पृष मानत-बहन है उगीके अनुसार प्रापरक भी करते हैं तब हममे यह निष्ण अनिवार्य प ग मिमता है किम्पषित एवं समाज के विधान-मापन-काय म पम पा स्थान प्रायन महत्वपूर्ण है। विज्ञान की पा से जीवन मी मुविधाएं बहुत बा गई ।। इन मब मानिक मुभिवापों के सम्माप में पोपा प्रतिकम तरहा है। गर प्रमब-गोगम मुक्ति प्रदान करने के लिए मारी पर मूर्यापारी सधारमा प्रयोग किया गया तब पर्व की पोर मे उसके पिराप मानक रिया पया विपरमी ही इम्मा बिमारी बह पीड़ा सहम करे परि ऐमा न होता तो यह प्रमा यो इतना पीसरायक बनाता। स्त्रीपीप्रसव-पीग में कमीतमा पिरीयामा पारस्सघन करमा है इनिए प्रपामिल है। बेरमा सिए औरना महम करने का मिसाल मुप्प नि एक यूनानी शिवारपारा से मेमनही साता। ईमाईधर्म मनुप्प राब प्रतिकेमका पौर पटोर करता है। अपनी पारमा की रक्षा मिा पारमी को मांस (घरीर) की दुबमताप्रो पौर ननकी प्रपनापूष प्रनिन्धविमा का नियन्त्रण करना ही चाहिए। पर्मों की कट्टरता सब मुगों की नव ना निम्दा करती है जब तक उनमे विरा मपन उत्पन्न हो जाए। मानव-नाम पोर कमा पाम्प एवं चित्रकला ममीवीर साहित्य इत्यारिको सैतान के गान बताया जाता है। पुष ऐसे मी मोग है जो इस सुपर मान्यता के कारण मंसार के पो से पमापम की चेष्टा करते है कि प्राम्यारिमा जीवम सामान्य सामाजिक जीवन से मिन्न है। मागकर एक एमे प्राप्मारिमन रहस्सबार मे शरण मते है गोजीरन से रहा पाता है। ज्ञान एवं पर्म टोम शेष में प्रमग होकर ये जीवन का त्याग करनेवाल इस विश्वास से एक सौदर्य एवं विपाधाम स्पित पम में पहुप पाते कि गर्म का सम्बन्ध मुम्पत सता की एक मरी ही कमी से है पीर यो भेय यह पाहता है यह हमीदिर या इस दुनिया का नही है। जीवन के ये नमोरे पावस्मक मानपी फर्मों से पूरहिसक पाते है और एक मुखित मत्ता प्राभय बसे पाते हैं। पविष एवं सासारिरबीच एक साई बनाकर समार के पास भाम्पप्रति उदासीन बनकर मानवजाति की सामाजिक वना के अपने को हटाकर तमा बह पोपणा करो कि मृत्यु के उपरान्त ही न्याय प्राप्त मिया मा सपता धर्म को सामाजिक पुनीयन की सम्भावना से ही गिरत कर दिया गया है। परन्तु हम पर्म एवं सामाजिक जीवन के बीच कोई स्पष्ट पिमा रेखा मही बीच सम्मो । सामायिक सपटम पम्तनोगला मानव-प्राणियों नापदिए गए सन निर्णयो की मानिका पर निर्भर करता है जिनके नाप तय करते है कि विश्वास की कठिनाइयां २२ सपा उनके प्रमुपायो किस प्रकार जीवन बिताएंगे। ये मिमय प्राध्यात्मिक विक के विषय है कि उनकी पूर्ति के हेतु किए जानेबाने मार्यो में प्रौद्योगिक शाम उपा सामाजिक चेतनामी मावस्यपदा पड़ती है। यह सच है कि धर्म कोई ममार-मुमार का भाग्दोमन नहीं है। इतने पर भी मनुप्प के बीवन का बहुत का भाग ममार म मीपता है। एक स्पिर समान प्मवस्था सम्प पीमन का प्राथमिक मार्य है। पम एप सामातियोमक-एक सीमेंट है. एप ऐमा मार्ग है जिसकेमारा मनु प्रपनी सम्बाकायाम् पक्त करते है पौर मपनी प्रमुफनतापों, निरामार्पो के पीप शान्ति एवं सान्स्यमा पाते हैं। पदि हम पर्म को पमापन का मार्ग महीं मममस तो फिर उसे स्पापित परस्पाकी रक्षा पासापन बना मेह । समी पम भावना में परम्परावादी होते हैं और उन सबरोमा परमे की कोशिशपरने है या दुनिया में शक्तिमान है बसि समपन के लिए उनका सहारा मते है। गतानुगति एवं तुष्टीकरण की वह भावमा किमी पर पर्म तक ही सीमित नहीं है। पार भी कुछ ऐसे हिन्दू है-हर्ष की बात है कि उनकी संख्या बराबर घटती जा रही है-चो वाविप्रपा एक पस्पृश्यता के अपराप एक काम के मममीर रक्षम है। इसमें सन्देह मही कि ईसाईपम पोरासमपा नष्ट करने तथा मना सामागिन पनीतियों का मन्त करने का पेय हा है किन्तु एक समूह या समारोप मसिाई मोग ईसा के मारेगों के अनुसार जीवन-यापम परनेमा दावा नही पर मक्ते। प्रपनी प्रमों की फूमी मही रंगठे बेमता पास (पारमवमितान के माग) को ग्रहण करत मनिपपान ही करते है। पा के प्रवर्तक मी पिकाध मनुष्यों में सप्टोबदनायो का मरे पूर्व गोवन के समीर पापों के प्रायश्चित्ताप में मही तो मोमीबन के पनिवार्य पंच रूप में पवाय मान मते है। उनके वर्तमान कप्टा बदने भविष्य में गुप-प्राप्ति का प्रावासन देते है और सन्नुमन एपमे 2 मि उत्तीक्षित बनों के fatह एक सप्टा के पमनाप स्वर्ग की मुपमा प्रौर पय मा स्याम लग कर देने है। इसीलिए मामानिस पादर्गवारो पम मी प्रपीम पहते है गोपनिम पए में निहाकारी पीपप गरी भाति प्रयोग पो गावी है-उन मार्गोहारा मपमाई गई विधिप में गा स्वयं ना हम गंभीरतापूबर मही मेते पर इमरों म प्सी प्रासा करत है। पम के पपमेयपी निम्दरा करने है या निहित स्वामी सहापता मे बोषित रपा जा रहा है। बिरमो टिम मब मनुष्य ममान ! शायर हो पिमीन इम पाठको उसमे प्रपिक स्वतंत्रता तथा नगारा + माप सीपार पिया हा जिनमी पतंगतातपा गानरारी साप प्रमरोरी पिपान के निर्मातापी ने सातार पिया पााम करना पोषणापत्र में गए समन इन गुमित पोंगे सरपीपोग परिषित ! - मनुष्य सपान सत्पम एपौर अपने सप्टा काप कतिपर मनग्य मंत्राम्यपरिपेय पिकार सम्हे माप्त हुए हैं। इनमें जीवन रक्षा पोर एमालेको अधिकार भी हैं। ये सम प्रारनामय नहीं परन् महराई साप पनुमप पिए पानेबाने दिवात की रपर है। अपने मन्तिम पर में पेपर्सन मेरा मोपमापत्र वात्सय पर टीसीपी 'मानस्याति प्रभित्र मोग पानी पीट पर मोम मा पोरगदीदह नही पैरामे मटोपिरकी पा से पोरे मे यम मोप उन्हें हारने को तैयार होकर दो"परमार मी हम सब मनुष्यों को समान मानने को तैयार नहीं है। हमारे फर्म हमारी पानी के पनुरूप नहीं। सपा की पूजीगरी सामान प्राणियों के बीच स्व समापों विकास नहीं करती। पर पर प्रारमी उत्साम सम्पूर्ण सापनों पर परिकार किए हए हो वोटोपि में नाम मिए स्वतंत्र होते हुए भी कि मुनाम महीपस्वी बोपी पई पाता कमीपे अपना प्रम चने की राय हो पाते है। भौतिक सम्पत्ति के प्रधान महल पर पूजीसारमा रम वा बिस प्रकार अंग्रहात्तिकोरुपा पार पपित्र प्राप्त करने की वृत्ति को समग करता है प्राषिक गरिसकी जिस प्रकार पूजा करता है मौरबह पवितरिय ताप बिन मम्मको मेवानिए ई उसी या सापपूनिमिए अपनाए जानेवासे तापलों को गिरा प्रकार स्पेसामा पाम ठौर जिस प्रकार पारम्पत्ति का समर्थन करता है सम्पत्ति के पिपाधिकारों का ही नहीं पर एक वर्ष प्रगानी की माम पपरगार्मोमिए मानव-यागियों की बम्पता-पासठा महमपतिकीनीमा गहर पनका उत्पीडन अधिकाधिक रतारन की पगह परिभाषित मुनाफे पर रखका मौकारण मेरमात्र परमाणित मानवदुरमा विभाजनकप्रति उसकी स्वीकृति समितर पिताबा सामायिक कार्य पर पापित भेदमा पही पर पाम प्रापिकस्मितिबारा उत्सल भेरभाव या सम मानव-सम्माना विलायक है। सबसपारा समान इन भारपाों पीर पापों को प्रोत्साहन रेवापता सामारि भयान्तिको पराया है। पिनपत पाय पन में ही परिव एवं मुरिमा सामान विभाग ऐसा है कि पोसे मोर तो बिना महमद किए हीगीपन-यापन करते और प्रपिकास वों की पौठ रमपर मरे बोझ से टूट पी संकटमोचन की भाषामा ' पातु गम्दे पाषास पर्व बेकारी पंसी सामायिक समस्यामों प्रतिभोपयकी पनिदिषतता एवं मौन मे उपाभूब से पीरिय पौर विमपिमायनों से दुर्वत सामान्य बनों के प्रति उनकी स्पेयामेधर्म की मर्यादा नीबीकाकोलामा मिक मान्दोमन समता के पिशाचों की पूर्ति की प्य करते है उनमा बम * विलास की कठिनाइयो प्रमिकारियों मारा विशेष विमा पाता है।' पातिगत भेद भाव वि भातृस्वामियों के प्रतिकम है।' संसार हमारे उपरेशों से नहीं हमारे उदाहरण पा मारणसे हमारीमावरता है। समी धर्म पीड़ितों के प्रति सपा के पकगार पर गेर देते है। उदाहरण साप ईसाईपर्म प्रादेस देता है दिमो मोग हमें पृमा करते हैंयाटेपपूपर हमारा उपयोप करते हैं उनके प्रति मी सम्पबहार करना विच है। का मोम हमें प्रेम करणे पायो प्रेम के योग्य है ही उम्दे प्रेम करने में कोई विशेषता नही पाती। सिम पापा से हमें अपने धनुषों में प्रम करने को कहते है कि इसके वारा हम उममें सानियत और प्रम करने की उमकी शक्ति को पुनर्जीवित कर सकेंगे। हम गएकहदय से पूणामूनक पाममार्मों के भय को निकालने का मारेग किया मया है। अपने से गुणा करमेशासों के प्रति भी ममै होमे रेम मादेशों का हम महो तर पालन करते हैं? पर्षनेतामण प्राय प्राथमिक मुराणमा के पैतानियत से भरेपरामों के विषय में मौन रहते हैं। म समपन के लिए पाइपम पार मिता का प्रयोग करते है। पवितपर ११कोपीय एफ.डी.पोस्ट बोषित किया था पिपम कृष वामों में पृषी निमिष मापों में होमगाइयो बनती रही है उनके पौष पर्यवत बन केमों में प्रसनिक पनता पर पाकाय ते को निदरबमा कीमा मौर जिसके फलसरप हमारी प्रारक्षित स्त्रिया पार बच्चे परपए। मा हो गए है उससे मानर-पाति के प्रम्ह करप पो गारा पापा मगा है। रनोत्तपधिकारी भी द.मर ने प्रपम यूरेनियम पम का प्रयोग करने की माझा सीमोपान के समुद्री पाह हिरोधिमा पर भगस्ट १९४५ को गिराया गया। इन पात्रों के प्रमोप में मनुष्य मे पियरको हटाकर पंतान की मात्रा का । पन् १९४६ रोप पावत नाम नपना पाय मोप मापापत्र निकाय मि समारमा सम्बार पारविन समितियों मर ही समिति महामारी Hot निकी-सी गुफा (१०), ११११मोर नियो रारें में मोवरम मामबोराम मग्रारारमोरनी पर मुकी मिशीभोर भारत वामिरे मिसरा मुमतयोकि लोगों तरा मयाब रमा प्रेमी अनुगर (मार सपा के प्रति रोमन रोहिणी अभिरपिसोभारमा पानी। . मारमापनोरिधान र पनी रिपोरसर मी.रोभ नेगेमिमा सानों से धनुरोषAntoभारते मिकी अधिोपनीमायो बोनेसन सोलापासपो मग नियमान मनमोकातेगारे रोगो प्रचारपसासिमो-सपामिय सचिनुाप पापरबाहीमहादाबादारोगा पासपोरसात से पार ।।
सत्यदीपोन 2 परिचित है 'कि सब मनुप्प समान उत्पन्न हुए और अपने सप्टाप कतिपय प्रमम्प सभाम्पपविभोप पिसार उन्हें प्राप्त हुए हैं। इनमें पीरन स्वतंत्रता पौर गुपाने के अधिकार भी हैं। ये केवल प्रपारवानप नहीं परन् पाराई के साप पनुमर किए जानेपासे दिसास की उपर है। अपने अन्तिम पत्र में फर्मन ने इस पोपनापरतात्पप पर हीराकी भी "मानवजातिमिश सोप मपनी पीठ पर मोम नामोरोपी पर नहीं पहुए ये नोपियर की पा से मोरे-से च मे मोग उन्हें हारने को तैयार होकर हीराहुए पे। परमार भी हम सब मनुप्पों को ममान मानने को तैयार नही ।।हमारे कर्म हमारी मापी के 'अनुरूप नहीं है। समान मी पूजीवादी परस्पा मानव-प्रानियों के बीच स्वस्त धमम्मों का विकास नहीं परवी। मग पर पारमी ग्वारन के समू सापनों पर अधिकार किएए हों तो दूसरे इस दृष्टि से नाम के लिए स्वतंत्र होते पाए भी किये गुमाय नाही बर्दस्ती पोपी पई पापीपे अपना पम पमेको बाम्प हो पाते भौतिक सम्पत्ति के प्रधान महल पर पूरीनार यो मम देता है विस प्रकार संपत्ति को समापोर पिक प्राप्त करने की दृत्ति को समग करता है पार्षिक भक्ति की रिस प्रकार पूनापरवा है और मह पक्ति निस साप विम माव की सैपाके मिए इसकी या मवयपूर्ति के लिए अपनाए पानेगा सापनों की लिस प्रकार उपेक्षा करता है प्राम वीर से जिस प्रकार मा सम्पत्ति का समर्थन करता है --सम्पत्ति भिषाधिकारों का ही नहीं परन् एक पई प्रधामी की पाप सप्तामों के लिए मानर-प्राणियों को बस्पता-सवा सहमक्ति की सीमा में बाहर उमका उत्पीन अधिकाधिक उत्पादन की अपर प्रधिकामिक मुनाफे पर उसका ममीकरण मार पर प्रापित मानप-गुटमभिमान प्रति उसकी स्कृति पतिक रिमैपता या सामायिक कार्य पर पापित मेरमार नहीं परन् माम मं पारिस्थितिबाराग्पन भेरमाण-पहा मानव-सम्मान का दिपायक परम पूजीवारी समारइम पारणामों पौर मारतों को प्रोरमान वा है तब व बहसानाविक प्रयान्तिको कावा है। विषय प्राय जगत् में यहाँ पक्ति एवं मुपियाकामर्तमान विमायन ऐसा है कि पोरे-से मोग तो बिना मेहनत किए ही पौषन-यापन करते है और प्रषिकाय पनों की पीठ मनपर मरे मोम से टूट रही है संकट मोचन की पारस्पावा है म्तु ममे पागात एकारी पेसी सामाषिक समस्यामों के प्रति धर्मोपरेसही भनिश्चितता एवं मौन वा मून पीरित पौर कृषिमरितारों से दुर्गम सामान्य बोप्रति उनकी उपेक्षा ने पर्म की मर्यादा नीबीकरपी है।पोसामा निक पानोमन समता के सिद्धान्तो की पूर्ति की पेश करते इनका धर्म के विस्वास की कठिनाइयो प्रधिकारियों पर निरोप मिया माता है।' गाविगत मेव माप विस प्रातल के सिवातों के प्रतिकूल है। संसार हमारे उपरोपों से नहीं, हमारे उदाहरण या भाचरम से हमारी मांग करता है। समी धर्म पीपितों के प्रति जाणारे प्रहार पर जोर देते हैं। उपाहरग सस्प ईसाईपर्म भावेश देता है कि यो मोग हमें पृणा करते हैं मारेषपूर्वक हमारा उपयोग करते हैं उनके प्रति भी सम्पबहार करमा उचित है । यो मोम हमें प्रेम पर मामो प्रेम के योग्य ही उन्हें प्रेम करने में कोई विशेषवा मही पाती। ईसा इस माथा से हमें अपने मों से प्रेम करने को कहते हैं कि इसके द्वारा हम समें इंसानियत पौर प्रेम करने की उनकी शक्ति को पुनर्जीवित कर सकेंगे। हमें मन के हरम से पनामूलक काममाभों रे भय को निकालने का भावेश किया गया है। अपने से ना करनेवालों के प्रति भी ममे होने के इन भावों का हम कहो कपासन करते? धर्मनेतापन प्राय मानिक युटकमा सेवानिमत से भरे प्रपापों के विषय में मौग पते हैं। ये उनके समर्पन के मिए मापन और वितणा का प्रयोग करने सितम्बर, १रको स्वर्गीय एफ.ग. मोस्ट ने बोषित किया था पिकने उप सातों में पृषी रिमित मानों में मोमगामा बनती रही है उनके बीर पनिव जन-केनों में भसनिक जनता पर मारायसे भो मिटर समर्पा की गई है और जिसके फलस्वरप हमारों परमित स्त्रिया मीरपणे भर गए है पापं हो गए है उससे मानव-जाति के प्रत्तकरणको महरा पका मगा है। उनके चत्तराधिकारी पी.पैन मे प्रभम पूरेनिमम बम मा प्रपोप करने की मामा की यो पापान के समुद्री बारगाह हिरोधिमा पर ६ अगस्त १५मो गिपमा या। इस परों के प्रयोग में मनुष्य ने शवर को हटाकर सवान की मात्रा का ११५४.में रोष पावस मम ने भरमा 'सायला देशपत्र निमता सिमें समाम्पर, सम्मान गति समितिको क्या कर पासी समिटिली की 'मामारी मम्र, निगामी-प्रपेशी अनुसार ( १,१५ | १५ पोलियो रहर में रखमोनरम नम्मा पारेर समाचार मोरनी कार इस नियादी और भारा यामि RATत समस्त मोहिक मोना बारा ममाल पनि भार ।सी अनुगम (१) पासमारबार पर्व सम्मान के प्रति रोमन रेमिका अनिवरिषभर मीमा ही। मामा मनोमिान र मानी रिसोई में गमरमेसी सोम ने मिया सरपे से पनुरोप Ant: दिपावलिपी अधिकातिर नकी शिकामी अप्रयापोतो मे हम्मा साई बीय मिलना चाहिए : बरि मन मिशतामात जना अपने मतेचारे दोनो परसोसि-पामिरे tमिनरेभावरपरीम सम्वोचपा ऐन निर्मपचारको भान योनिमा गर !
१२ पल सोग पामत किया है तुम सब देव-गमाम मनोने! हिरोपिमा मार गापान एकमुस्ट पर्म प्रचारक रोम से निर्भस प्राप्त करने को मिरर पपील की। जून १९५४ को सम्पन प्रागन (प्रपान पारी), सेंट पान माम पी पर्मरेदिका पर से गोमते हुए सामान को विपाम रिसामा किसाईधर्म राम पान्ति र समर्थन नही करता जो सभ्यता को मष्ट होता पा ममम रेसों को युमाम बनाया गाता र म' । पम्प बो ध करमा पाइते है उसके समर्थन में मापन व गितमा का प्रयोग करना हमारे पामिर बताओं की चतुराईते बाहरीमान नहीं है। पामीम साम पहमपा ने अपने काममनेम एबाउदरिमार(पुर [विपयकामाम्य बुधि) मे मिनामा "हम पपने मामिन-मदिरों को तुरनपुर मम्बिो में परम पर पपने पादरियों को समार के मा भूमिन कमप्रिय पायमियों रेसप में प्रकट करते है। यह प्रमाणित मालामाइस परताकि इसकेरा उत्सन कमल भाषमा उससे ही स्पारा पापा पोर पहरी जितना पप सममता है-विपत अमियों में पोपा तो पर्म को भीरता पूर्वक बहा करते है मा फिर उसका विरोध करते है पीर प्रधी वप उसकी पालोपना पर है। मा एफपिएप (प्रभान धर्माप्पग) पहनी पोनी गते ही मिा की पूजा का वाम कर देता है और पपने अनुमामील को ममान (मुख देवता) की परी की पोर से पार एकर करता है तो पारेरोमा पर समक्ति पारम प्रागम्मका कारण गारी पोर प्रीमिय के सार करता हो किन्तु इससे उसका मानहाना करना उचित नही सिर होगा कि कोई परिवर्नग नही वो मम पास परम पुम ने माम मैं मान मरतेमा भधाय की भकिस।सरे पास मार सगनेमाला मामको म सोषित के काम म । म मापन.पावसासा ओसामा सीभीमे और रामा मंचाई परामभ्यक्मिीर में शो म्ससे पकासापम पम नहीं है। १॥में मुसोलिनी पवित्र गुरुपोप में समय दोन मार, पाप ने मुमो- मिनी परम्न म अतिम मिश्री १०२ में जाने र गिर मम्मे माताद रिमा। परमात बी परिपाका म्यादीमा पोरियम सिमिया पर नि मामास समारोहमा । मी () पैना पर में पोप मे समान माता सेनानातानीमा और यमनमोपी सेनाकाकोबारात शिमा परमतीनोभसा पनि यति । मुलाath वर्तमान पर बिना किस और मालम विसावर सी कारंपस समन मगरले। तपतिपत मीनिमा वोषियो पर गोरे मोती मग काय निरगार रसने मगरका राप मारपिया राम मोसोमो के मिरभिताप की धम्ना भवे । ५-१०)। .
विस्वास की कठिनाइयो हुमा या यह कि ईमा बस्तुत युटनदेवता ही है। ईमानारीका पोर पर्ष के लिए पन्त में हिनकारी रास्ता तो यह होता कि हमारे द्वारा मुरकी पोषमा होवे ही ईसाई कर पानेबाम पोंमोहम बनकर ते पौर पर पाम्ति-सन्धि हो जाती पभी उम्ह फिर लोमत। हम यो दुष करते हैं उसके प्रपती छोर म्प को मपुर सदों के गाला प्रयागर.पने मे हा पिते । परिहम मब महानवामियो पोर पोर पपने प्रति पिानार हो म तो हम पोध हो यह गान गाम कियो तेरी गाप हम ममा मौर स्पष्ट म्यवहार म अपनी मिप्य मोते जा रहे है जन मानस में दुराई की पोर म भानपामा क गमोर गुणात्मः परिपतन हो रहा है। रागनीतिपौर पमपी साधिकारी प्रमालिया में मानिया 04 पापारा का समर्थन यामिम्म इम दृष्टि मे नहीं होते कि मानविय गीवन म उनके ममारित परिणाम मया होने पर इस दृषि म होते है पविष प्रमापी गो प्याम्या की गई है। ठीक है या गमत । बुद्धिमान माम पपने दिमाग इस वहम मे मगामे किक मुई की नाक पर कितने रेबन सो हो मकान है या मिमी गराममानपाद विपुल माक्सवादी है या नही। बहर सिवालों के प्रति अपनी नियम हम मरप मोर मनुष्यों के मुप की कोई परवाह नहीं करवे । मम भारत में मतीप्रथा बस कर देने नसबाम उराकर पासादियों मे पर्मग्रन्थों मे उतरण देने पुर कर सिपोर मानवी जीवन तपा उमरे को पार पान बन की काई पारम्पाना म मममी। ऐमी बात तभी हाती १ बरियर में निष्ण का भोर हो जाता। पौर पर कर्मकाण्डीय मा प्रापार नामसागिता तापी हो प्रपामता रह जाती है। मेरान्तिक परला मे मारा प्रलपरम मिस फर दिपा पामिर मंगाय के प्रमार की बहुत बड़ी चिम्पारी ऐतिहामिर पौ पर को है। यतिन पोपी पपने सम्म जीरन काम में समा मसति पपा प्राप्पा रिमा जीवन के सेम महान रेन रही है पितु मनासिवा और मप गिबामणा पीर परिणापा.प्राने पम्पापियों की पौरिसानी में पित भी है। साधर्म पपमे मिडान प्रम दुनिया पर काम करतबाम होके रिलंग सबमरामापित पवरपा पा पाह पह तिनी ही पनीतिपूपहा समधन करते रहम तब तोमे पापारमिस बिपनेपासे हो मा पापिष्मपोगागागामिन पपनी पुस्तक 'गौरतरिटेट (सर पोरगरप) पहना राममो पारने पम्मिरण पामुम्य मरपन मारना गे गो माता पिता 'माय गारिया है प्राण होता है। यह एक मी गामाथिर राम्मिनिरा प्रागरन माता को एक हो ममप मारे परार गाना पोरनियापगोपकर देगी।
सापकीबोग मानिएकाममूना मम ही हो पाइपहर यादी (रिमी) मेरा नही है। पानीपियस महवा गेमर देवो में प्रषिक पार्मिक में। हम ता रम समप भी अपने को बामिरहने सामानमार मागा मिशेप पामिणे के तार की पोजना मनात।साईभी पर्प हमाग अमित पानावा मीर वस्वादियह मालवा सामायिक उत्तरदायिती परपरारा निर्माननी ६ धम मौर विश्व-ऐश्य इम फेवन प्रापिक पब एनीतिक सम्मायो सरकारी गप्ट्रोमपान का निर्माणमहीर सम्ने । हम मर गमारको मानसिक प स पाप्या रिमा सम्परवा परानी होगी। सारणिय ममारका जीवित गान मिराहम पाप्मारिमा टिका पोर पारामा केप पी पापाना म भी अनुभम तिम कला की पायपना वाहै ही। पुप्पिा पो की प्रवृत्ति पादमियो का मोम्गमूहमा विमति पोर प्रागन-पसन परपी पोर है। मानना नोपा तिरके प्रा मोम पार रिपा गया Hोम मो0 RUR होती पिपिए मामिा परपग है। 'पर्म या ग्मिीवन पदपारबप मे यह मामा.दिपा मारक गोनेवानी मिमानकामी भनिन किन्तु प्रतिम नरप म पिपारिता के बारकारमपोगो के प्रति माहार भी समाप्तम हानेपानी मला का प्यार है । साहरणस्वाप यहा पोर टेस्टामट' (रामी बारिमा प्टिकोन उपस्थित निपामा ममता है । इमाम ही मनामा का मतदान ट्र पूमा भी पुरानी पर प्यान धिा "उठो पाइला' 1 पाने पापा को पिम मिनारयो। 'माहमा परिकाका र पा प्रौर पाया मे रमा पृय मरा बमना रहता था। पूररोनोमी दिबरम रेनिग माग हसर या उन मास्तिोको तुमारे साप साप देता है तो बिना सममे दिगी प्रकार का मम स्पापित किए या पिमा उमपर कोईरया कि उनका मार रो उमरिसाए भोकर करो उमो नृमाकार लस को ताररो उनले पति परमा कोकार रामो और उनकी मूर्तियो को बमा ।" मो भोप्रति परियों की प्रमाहिप्नवा गमरेस विचार से उपसर पो कि उनका सरमायण पप्पा पराठि पिर प्रकार मनिकनमो स तिसरे सो स्विप में विकास का रसप पर विश्वास की कठिनाइयो उमका विश्वास पा कि उनका शिखर और सब देवों से बड़ा है "हे प्रभु ! देषों म तुमम बड़ा मौर फोई मही है। पैगमार मोकाह (मीं पाती ईसापूर्व) म बिविपदों रे पातिपून मह-अम्सिम्बकी भावना विधमान पी। कहते है किमर दब मी प्रपमे मोगा मी मिष्य पर उचित रावा रखने के विकारी है। सब राष्ट्र प्रपन-अपने दर के प्रति वफादारी रख सकते है पर हम अपने देव याहमा के प्रति मिप्यमान बने रहेने।" जब एकेश्वरवादा विकास मा पाहपा एम पीर एकमात्र ईस्वर बन गया। “म याहवाई-सब वस्तुओं का निर्माता। मैने हो स्वर्ग (पागास) का विस्तार किया है मैंने ही परतीको फैमाया है। मरी सहायता किसने मी? मैं पाहमा हूँ मेरे सिवा दुसरा कोई विर मही है। यपि यहूदियों का विश्वास पाकिमही एकमात्र एस है बिने बिर से सम्मी धर्मपामी सखा मानानोक प्राप्त हुमा फिर भी बिर की सार्वदेसिकता की पारपा रखतेथे पोर समझने पनि मरी जातिया मी सिरीय रक्षा पामे की पषिकारी है। माना पूछता है वहरियो तुम हबधियों (एथियोपियों) से रपाला और क्या हो ? गहमराइम को मिम मसापा-हा पौर फिसिस्टीम को कोट से तपा पामीमियों को पीर में माया। परिहम सिरको समस्त ससार का पिता मान मते है तर इम पार विस्वास नहीं कर सकते कि यह पेपम इस या उस ईयरमो माननेगासों के प्रति पितृवत् पबहार करता है पौर पूसरे धर्मावलमिया के प्रति मसाप मेप से भरा हमा है । दूसर बोपी उपासना करनेवाों से वयामुता का म्पबहार किया पाता पा ये उस पाहमा के ममिरक भाषी रंगाट (अनुयायी) ५ो 'प्ररया गाति के लिए प्राथना-मन्दिर पम पाएमा म रिपारों के होते हुए भी पुरानी पमपुस्तम' (पोस टेस्टामट) मामियों को सिर के विधप कृपापात्र के रूप म प्रहग करती है। राका मानन सर गैर-यहूदियों को निरपक मानसर उनकी मिा करता है। ईयररिसेप पापात्र होने की पारमा, बा पदियों पर ही सीमित नहीं है ऐमी रीतियों एवं प्रवृत्तियों को जन्म देती है जिनके कारण श्रेष्ठ होने पार प्रपन ताही पर्मापिगार सोमित रसन पर गोर रिया गाता है। यह इमरी मरती साम EI २ मu'v ५. माना । ४ तमोग।.. स्प... (अनु! मेरा मारे (वारिण) हिन्दी सूने समिधा बनाई है। गाना मरासिम ने सहा कि बगरकोमिने समान ।-५, और भागे।
मायीमार पमगाणगपो को माानुभूतिपूर्वक समभम का वृमि मीशाली परम् प्रतिम पौर नामी पापभग पारप गन पी निभा उमसन हममें मेयर-1 का भी निगन पिरा मार्ग पर नही मिमा । म पिमा म्य स्मान मना मी मामी परिणाम पानावर मप्रति हुन पपि उगापा हान के मि गान मगर पम पिया। मारोगग में गा को माया पौर पिमा पानिया पाम पी पितरे बीच ममा निमाय विमिम हतारामी भाति पगात एक गरी मानि बागोरापा मिरान पीपा पाममा मापनाम उमा बारपार ममम म 'भारत, "ग नानि के बरपा के पट मरनोनपादियह उचित मी मापी गेटी सोनार Fil से मामले पेश दी गाण । " मेम नपा 31 पौर भी पर इसममी भ्रमित भार ममाया पौर निमामिण मै नही भया पया। उनोगसपना भी प्रमाण मिलना पर मारा उपस्थित मिस गिमा का परम परमपिता के पाम महीमा माना। मपिवार पर प्रम्प गयो म भी गार रिपाया, रिमी पूमा नाम म पुषित नही है यादिमाग (प्रासाप) के नीष मनुष्पा पो दिसा एमालाई मरा माम मा नही है रिम मिति में हमारी गा होमके।' पर्याप पाती और मुमतमान म पान पर पहमन किमा एक रंगमार पनि भूपा पा पुटप्पर पर उगतामीह ने मो नमार ही है। माईपर्म की पहली पाार्गभूमि म उन एक कास्तिक प्रान्तीयता पर पूमानी प्रपापा के पति पिरापमा प्रदान की। पानी पर्म-मान ममा चर्म मेमो पामिक माहित्य का परिणाम पाणपिया पह पापना मै पुगतन परम्परा मे पिम मिन्न है । सूनीय (मायोपिया) पुनम पहरी प्रमाकाहान हो गया। विसपर्म गम'मामत का माम स्लिाम नही पान भूमध्यसागरीय बियरे महान मयरा-म्पिार मोर राफेमम सामोनिता पौर तरिम्स राम पौर मिजारिया-म हुपा । मषमागरीय समार रन भावो मे यूनानी माविका विकामापा उहा पूनानी पूर्व की सम्पदापो के समर्ग म माए । भूरिया के पिता व पूमान की मारेपिकताबी मापन पनी पर पूर्ण नहीं हा मरा और कितने ही प्रानिक पर्ममठयारी पर भी ईमाईपन के ऐकासिम या पानग्य माप परसदन है। एपिम बमर का महाम दावी सरेप कामपूर्ण एवं अपुमर्वाण १४-11 २ मा १५ ार में कि, म् ११ २३1 ..।
विस्वासको पठिनाया सपाहीमापमा मार है। इस प्रकार की भन्निम पाता केवम महा वार परित हो मम्ता है। पार्स वार्य पायम है मा मगी मप म ईबर म मनुप्प के लिए अपने को म्पान विभा। हम पर के विषय म दूमा पार रिमी पात मे क्या गगनन है 'बिलल छनो। 'अपने घम पामर पो के प्रति पन हम ग प म रतन, मानारमा प्रम या पोर उन विद यह एक मात्र मम्म हो। या यह माना या बह। या मा प्रकाप या अपकार । हाम की एक पुस्तक म बनाया गया है कि 'माईपम साग पा मग्य उदय दुनिया म प्रो साधर्मों को निमम पर देना है । वमिन नियमितरी कन. मियम रिबटर म म मिना पा महा मी गैर माई पर्मो केगाम ईमाईपम प्रकारको मा ममम हमार पहा-बारा उन्हाने उने निमान बाहर करन मौर उनकेम्पान पर माईपर्म को प्रतिष्ण करन का प्रयास किया। विजन मिक्षम-विभाग रेप्रायमर टा. सिर मनिया, सरफ जापी पापी पौर उमनाय दूसरी पार भपनी हो प्रतिविक पम पर का पामा करने की प्रतिषित प्ररमा । उममा मम्बम्प पिता का पस्न प्रमरम एव प्रापना-ब पानापती- माप मभ्यम्प म्यापित पर ममामगा। “माप प प्रनय या प्रनिमहानपादावा 'मापिमरे प्रोटमे पौर बानिए बिन पौर प्पूग्रिम मम्प्रदाया की पार म मा किया जाता है। स्मारके माग्यम म भियोमानियम गहा पा २८ सत्यवीरोग मो मीगर! मुझे दे दो रे रो मुझे मास्ति से मुक्त परती पौर बम में मैं तुम्हें सग का राग्य ईमार मेरे साप मिमकर मास्तिकों म्मेग्य का संहार करो पौर में तुम्हारे साप मिमा फासियों का क्षारमा करगा।" प्रोटेस्टेष्ट और योनिा एक-दूसरे के प्रति बिरोप माप रपते । भूपर रोमन वर्षको भी मास्तिजगत् के प्रतर्गत गिमतापा मो ईमापिर्म के बाहर है फिर चाहे में मास्तिक हों तुर्म मपी या मिथ्या ईसाई (रामन योनिक) हो पौर मसे ही कबम एक सच्चे सिर में विपास रमते हा फिर मी सासत विमर्प और बिमास- रामावत कोष मोर मरको मय में पोहए है।"गॉन मापस ने अपनी रचना 'मन्दन के अगों के नाम सिरीय पत्र (१९५४) म मिपा पा 'एशिया में क्या है ? पिवर से प्रति पमान । प्रफीका मया हमारे प्रभ ईमा हमारे सारक के प्रति प्रस्थीति। पीधियना पर्यों में बरा है? क्या मुहम्मर पौर चमफा मिप्या सम्पराग' रोम में गया है? सारे गादूपरा काग मारी मापय । पर मक्ति मानब ! गोटारेमलिता ईसा कहेगे हिर्नक पर पग्म मे प्यारा र मही पा परन्तु परा-सा अन्तर भी एक मीम के मम ही है। फिर प्रोटेम्मा पौर संगमिों में काई पर महीये सय मरफ म एक समान ही पमॅगे। कमी-कभी प्रयतम घेप्टता मा महाबो सिप्ट पर्ने में लिपटकर यामने भाता है। यह मानते हुए भी कि ईसाई देवनानी मप्रतिम है और दूसरी देव मानियों से विमन भिन्न है उनके साथ मैत्रीपूर्ण सहयोग की सभाषमा को पस्वीकार नही किया जाता । (उनकी दष्टि में) ईसाई सस्य सर्वोच्च पूर्व प्रकाप है कि दूसरे सगित मा टिमटिमाती ज्योतियों की माति है। दूसरे पर्मो में जो मासिक मरम है उन्हे ईसाईमर्म पूर्ण रेखा है। इस एपिकप में भी इस स्थापना का पाग नही है कि ईसाईमर्म ही एक मौर समा मानम-जातिमिए एक पूप बम है । पचपि यह प्रतार्मिक महमोग को प्रोत्साहन देता पार यहाँ तक मान मतानि एक मक्ति पामिक भान पूसरे पर्मों के समर्ग से सम्पन्न मौर विकसित हो सकता है किन्तु इससे ससके म विवाह में पप भी कमी नही पाती कि ईसाईधर्म सम्वो को सिर-प्रात एकमात्र धर्म है । परि मोर सगा और बाबा ममततामेमाने बोकार में होला। तिन दिनान वादि रोमन कपमा प्रभात। नगर पसरू मी मातम मातिाप निमित इच। मिलरीम मा नरिकम से अपर मारता करन समिमी बाबी पनि ममे मोर मौर वास्मो कोरी, मसीसे न मी पीधि हो। परेमि ॥ प्रेमी अपर ( ११।। । निय, रबरामत स्मार मिरान्स' (म ११) मा। ४ एम • पैरे RURS मारमा गारो (१२१२) ।
विस्वास कीपरिमाया ३८ . स्विर ने मरे पर्मों को धार्मिग सरम को कुछ विप जानकारिया दी है तो वह इममिए नियमापको परिपूग वमाने में महायर हो।' ११.. मम्मेष हाम्फ्रेंस मे पर के ईमाई सिडान्व-सम्बपी अपनी ममिति हागरम पात की पुष्टि पोथी हम प्रमम्मनापूर्वक महान पमो में निहि पौर उनके हारा उपोपित मरों को स्वीकार परते है किन्तु किन्तु इनमें से प्रत्येक मिा की प्रजापनीय सम्पदामों से भर उपदेश से रहित है । इस्माम मे म्पयर शबर की महता दूसरे प्राप्य धर्मों के उम्म मैतिक मान एव ममीर मरप ईस द्वारा व्यक्त सिरीय मत्य के पम-मात्र है। और यह विचार सय गिा के इस बातम्य से मेस साता है मह म सोगो कि मैं पैगम्बरों को भौर पम-नियम नष्ट करने माया । मैं मप्ट करने नही उम्ह पूम करने पाया है। उपम सिामि तदा स्माम इत्यारि गो भी पर्म प्रचार म पास्प रखनेमामे पम है पानी प्या में विश्वास गया है। इन सबका दावा है। उन्हीके पास माग्न मत्य है। पाके दावे को दूसरे पर तरजीह से दीन माती है? निप्याही माधय सना पाता है। प्रोफेमर ए. ईटेसर कहते है यह मान मना भूम है कि ईमाईपर्म अपने मम्मापन के ऊपर गिम प्रपूर प्रयापीय महत्ता पा पागेप करता है उम उनके सांसारिक जीवन की मिसित पटनामों के पापार पर प्रमाणित भी च्यिा गा सकता है। प्रौर पर हम नप एप प्रमाण की मौमा मे सिगराम एवं था की मीमा में बने गात है तो प्रत्या अपने निष्णमनित कार्य को पच्युत मामता है पौरासीके कारण असहिष्णुता क सम्म होता है। इस पर्मों द्वारा पूर्ण सत्य केवम उन्हीके पास होने का पारा एं पापा के प्रस्तित्व से ही प्रसंगत हो जाता है। इन सर्वसत्ताप्रिय एवं प्रप्रमाणित पौर परस्पर-विरोपी पर्मों बारात पपने-अपने ही प्रति निष्णपी माम। साराम नापों को एक-दूसरे के निम्मा कर देते है। भविष्य की रपमा मिरा मतिर एवं पाभ्यात्मिक पषितों. एकीकरण के हमारे प्रयत्न धर्मों। प्रतिस्ता कारण धीहीन एवं निष्फम हो गाते है। - ७ प्रभया का विकास संसार में मानों मे मादमी गोपिपास या प्रसारमा पारते है कि १ भम्न पुर हिमान मरिम्नुपम (१) पर मारा सा में रिममे रे सोप मागे धनभा मुमत . परिपाई (१५.nl ३ AT1 1 ४ र मादि),1 ११ ' माय पीनीर परमही पाते।यपिय प्रनापमाप पर्मों के पापामार का उपयोमान राहत है। अपनी अपनी पामिक रीनिया के अनुमार हमाग मामरण हाना है कप निम्मा हाना है हम विवाहित होने । पोर पनाए जाते है या जमात गाते हैं पितु मा गय को हु मी पण प्रबपि में हम एफ पनिरिएन पापण विगार बन गत ।। हम एक म युग म रह रहे है बा गिधि पित है और मिमी पागा मग्न हापड़ी है। हमारे मूल्य पमिम पोर पाय । हमारी चिन्तापारा प्रमित है हमारे माय विचनिन । भात्मिा वीरम म गासापूर्व सभ्यता का प्राणप्रम पाप है उमे बुदिपम्मपितविमित नाकर माती। परन्तु पहा नही पर माती-41 नकरिबीवित मी नही रप सकती हम निर्मूम हा गाते है । पर माँ ही नष्ट हो जाती है तब एप समय ना पूरा राषित रह मगन्ता है यहा कि फलता-फूमतामा भी रिपाई दे माता पिस्तु उमो दिन गिनती होते ।।टी एम इमियर में अपनी कविता पेस्टमर म माधु निर राम्यता की रिणममता विकास तथा प्रेग्मा के प्रभाव मरीबी रिचारप्रम तपा माधुनिक पतनामीगिरताराम गिरा। निपेमामा तिन के इस बाताबरण के कारण ही मानिक मिल में माममिक गोमिणे की सग्या में पुष्टि हुई है। मारपेटन ने १६ गुमाई १८९१ को सिता पा हरिरमप मेरोमी साम तक परिवार पपना रास्ता बनाता रहा है। यह प्रविकास विमान की मोर पर मामा क्योंकि येष्ठ पुस्तकापौर सतार के मुगनारमा तिनका मपमग प्राधा नाय परियासियों द्वारा रचा गया । पिन प्रमागो का योमरामा हादरपागातर पनीपवरवारी। केरम गरको ही नेता को प्रारमी पोट मिम मास्टिन गनिम मेरित हरसमे साइनगमकी सहायता के बिना पनप नही सरता।"लार १ सी जीग झिरो । 'ने मैरो रोगियों का चार fan मैं से भकाममा मोदी मोदी मोर मान मनासी (वानिक) पापबाव मेमाराम। मेो मौसममा में मर यस सिने मी रोमी भाप बने मीसिसीमिकी समस्या भटिम निप में अपने बीमार्मिक ( शिवकोपासियोपापामा मेरो मिसन से हरेक पर हर बीमार Hans बर्न मला पुनम पाने अनुपदिय गो पाच ते से या योजनामा Raनगो ने अपना पार्मिक एव पुकदी प्राप्त यि नमें से सभी वर्णन गि म पिसभ। - माधर्म मैनवसंकर सात (4) Nuri 'सेसम्म कामतिरेमाटेमkumauthur Mahat मा वा बारेमा संगति मा १ (१) | माई ॥धमा मोरम र पिर' (१९५५) की भूमि में एपमारी ने लियामा अमरमार, मयेक मताली निर्मम परिकको हायपरमेशबान के निमम मोर, मराम निम्ब रमन रिमनभरी सिमापारण रियासपीपटिनाइयो नमह मिलने के पतामिमपबार टी.एम.मियट मेयर पापित किया हमारी पाट्य मामग्री का विकाग माग राम प्राइमिया द्वारा सिरसा गा है बिनम (वर्गीय पदम्पा रे प्रति) मकरम काई मम्बा सियाम नहीं है बसि बाग तय ममी घनमित्त सिम ममार म प्रम मी ऐम पिघर या सनदी साग है गो (वरीय मत्ता म) निनाम पते गा रहे हैं। ऐसे मानवयम मे पार्मिक निरक्षरता परावर बनी गा रही है और मम्यता प्रपनी पड़ो में प्रमम्बर हानी ना रही है। हम मास्तिवादी दर्शन के मामने-सामने पर है और कोई मोवियत हमारा प्राविपत नहीं है।' मीसा दिमी पारम्परिक पनीरवार की शिक्षा नहीं देना । हा यह पवियाम के दापारियो के पारममसौष को अस्पिर कर देना है और समस्त मूल्यों के पास पूरोपीय मास्तिवाद के सामने पोहए यानरमामो तथा समाजों की स्थिति का गिरता है। यह पूरा है नास्तिबार का बया पर्व है? पौर स्वयं ही रत्तर देता है इसका पूर्व इतना ही है किस्म मूम्य म्बयमो मुष्पहीन कर देते है। हमारी जिनामा कामदोई सयमकोई सार है। मत हताम होकर महवीप सटता है हमारा पर महा है। पोर रहा ह भने गोगा पर महीं पा सरा। प्रो-किस भाग मो नित्य कही भी मदी । मरम्पयं । यदिएर मिलता है यूरोपीय मामर एक मपान प्रापता पोरोमाने से पापा बादे और रिसीमारत मारे सामन भये RTR भनिसमा १ पमेर (0) १२५। . मानेगा-म में राम मne frh पलन nिt निपपागम हो । 'पापनेम पीमही watt नमन में कारन मनार में मिला (AARTIसमा अप्रतिमा not ा गुपये सोग HRI पाराम Freीय मतिर पसार परेपल सर उन सी ER-4 मे मा गए और पम, सिरसा (-14 पने समिर र परामराम nिमिनारी (म्मेसन मारे fra पर रखा I सा पायने न पायस चिन्दिन पर पy. ANA भोर पर मम निरपति मोरा RAAT में मनिरामी पनी मारली -- सामाTRASER मारने नगी सनी पानो - सानोमार गुनो।रामार में मmt और हमने इस मार राना मरेसिसो सम्भा मन्समा गई। यम पदपीकाकोपरे पियानमती गायोगानने के सियन नारा
गस्पपीतोर
के बीच यहा है। पर यह नहीं पानता दिउमरे बीवन की जगह पिम
सकती। अपने पापा के मीह कोई टोमगहराई का अनुमपमही करता
मास्तिबार पप्यारमपिता कामह पम्तिम मप्र की सतही पा की सीमा के
बाहर बामे से इनकार करता है। हम चारों पोर का है कि हमारे परिचित
बरबन ती मति ये रीमे परवे पारो है पोरामाएं पिसी सम्यताको एक में
बापकर रखती है ये टूटती पा रही है।
१ दाम पम (1) TRI
२ नागालना रिसमस रो माल बांच समिति ने मो मार
पपीरी में गरजर मिनी रीबी, १५ में पति
पति सरसामानिरासरेसमापभनेरमा।
मोमोसोयति म मने पेशा
पुगतेगे धर्म के पापामारो मम्मीरी मते मिस
पारपारे में से प्रतिभा विमा मोगामित्र प्रभार BOAD भिमा प्रभर
पी पार्मिक शिया के पना-मयपरिक (nr.।
मितमामात मसकिनारकीतिमी पर भी
मामीभामा समावि मम्मामा मातभालसिलाम
मोमोह परियेटिकल कोर (10)
तीसरा अध्याय विश्वास की आवश्यकता १ घम के स्पानापम्न पार्ष भार संसार मोगों को बहुमल्पक येगियो पनि विश्वास का शिकार है। दे पारम्परिक स्पों वामी मठीय पारेपन्दर पड़ी नही हो पाती फिर भी विवाम निण अपनी तमाम प्रारम्यताप्रा और पार्यो के लिए माभ पटरपी माप यस्ता है। मनुप्प पहन यमय सक प्रगतुमन या होनतामी प्रमस्पा में नहीं रह माया । प्रप्यारमपिता * यमरप में कार्य ने कहा है मिह एक पम्त प्ररणा (मटिपर) मिसे हम मप्ट नही करमावे फिर पाहे उमग्री राम प्राप्तिया से जितना ही इमार किया जाए । यही बात प्रम के लिए भी सस्प है। ममी पान प्रेरणा एष समम तम गृहहीन एह माती है रिनुपनप्ट नहीं की पापाती।बिना मिमी विस प्रापा निजी सपना प्रमेमर है। यदि प्राति में रिकारमया निर्यातवा (अस्पूम) के लिए भय है तो मानता नी पम्पत्ता से भप पाती है।मेक बहा पा 'मनुप्पका को भी होना ही चाहिए, पीरबह पर्म प्राप्त करके ऐपा। यदि उसके पास शिका धर्म महीं है तो माह प्रधानपदा प्रहा करेगा मौरगवान के मदिरों का निर्याम पराएगा ग दुनिया के उस पाकाही निरपहार पुपारेगा पीर गोमोप वान को पिर मानर पूनम रेगे उन सबको नष्ट कर देगा।"हमो शिराम ठो करना ही परगा फिर पाहे पदमी पी पीर में हो।यो सोप पाम्पात्मिक उनुधा मे पीड़ित है उनके सामने एक बड़ा काम भी पा गाएमा तो उसमें ऐमा सार पाएमा मानोसन सपाई रोटरी ही मैप प्रस्तपम हो गोप्पाम मे पर ऐ १ रतियोमी मानस्थानमा पारमा गोरकोपपदोमोग्रा पपना गरिमिता मारियापुरेममा परेर माग र ouोमररमा पाहुना में रामपानिपारेकामी पारनरसित प्रदीरमे प्राणमय भोर किमी र मन भर में भानी नुमार गोसगा1- मामी अनुर । १५ । + स्मरेमा । - ४ सम्पपीतोष है उनको पिपरा पानी मिमम पौर बीवनदायका चंगा ममगा। पारमा प्रपन मयाना यापन का माननो-मममनी है। उगा लिा का वर मही है परन्तु पियर हाना ही चाहिए । मनुष्य रिमीन पिसी पीस मे विम्माम करने पर मार देते है योनिम मिगी प्रज्ञात भय के मामने कपा नही गम पत। पापुनि मानव की पाम्पास्मिक महीनना या निराधयना पपित गिनात टिम महीं सम्नी । पही का भी न होना अपने ना मिमी बात को न मानता पाने की बिमाम प्रमग कर मेना है। यह मरपता नही महसता नही एफ नि मार है । हमे अपनी पाई गुरक्षा पृन प्राप्त करनी ही होगा। रमक मिलहम कोई भी मूस्य यहाँ तक कि गोटिन गनाईनी बमि भी बमे राया। गतहपी पानी के परितम पाम गे परम्परागत पो की पमिस म्बाननानी गई है और उसमा स्पाम मामा-गूजा का काम काई प या प्रकार ना मपा । पार्मिक भामारपीजगह धर्ममिग्पा पापार पर पविय की रक्षा करने की पेप्टार साम प्रिय होगा। २ उपमामयीय स्थिति में पतन मी-कमी हम उसमानुपी रिपति म नीट गाने की बात करते है तथा विचार हीन बिगहीन हा गाने है । पाई. बदिमानियनीय विर समीर के गोर-गुन को अपने इनक्षमो से सम्म करना चाहनाहा मैं सोना चाहता या ममुप्प पुन उसी अवस्था में नोट पाने की चाकरता हा जिसमे वह मान-पापा मम मान पूर्व गिम के स्थान में भा या कामापता हो कि समस प्राधा यह था कि वह पैदा होनहुपा होता चाहेमा बोशिक पेतनामा गुट के रप मे देवता हा भौर उरामा पत हो जाने कीया करता हा फिर इसम हम समस्या का सामना मही करते उससे बचना भागमा पाहत है । उपमाननीय प्रपा पारिप बीवन की मार मौट गाने की प्ररना जो सस्ट समय हमपर पा पाती। समपी चाया मात्र । ममुप्प पुन प्रपनी पापब चेतना की पहप नही कर रास्ता । र परमापूर्वी मी पति बप सापनी से ना एक तिराव सप्त बामना-दिन शम रिवीमियम पागुर प्रोमा निकाससे मानून पर्म का वालिभिप्रायममुप मोतिलाम मरिम्सी मेमराय रति सलममममम पामबाबा राम रहीमवर पाणु से मिस म मनुबतिम मराना मी मिलान में मंगोपनाको ममम रमर रिमम्मिमम शब शुरु शिपिन का माम मतिराम है। इसलिए रिमामन (धर्म) लिल भई देनेवान राम बाप-समावणामी बाम शैक्सि। नियो के प्रतिष शग । 'नेप-मियो। 'माम सामोमा) अनिन 'नेजिमें। -माम बागा पैशर को पा! (vert) १ २९।
४1 बिपासफीपापपाता भले ही यह पपनी बौद्धिक पत्रमा का उपयोग करने मे पकार पर दे । किन्तु मह पर्यावरण में पपने मोरिमीन करने की मॉमिक प्रवृत्ति को फिर नही प्राप्त कर पम्मा । महप्रपनी स्मृति सप पासा से नहीं छू सकता। मनाशामिक शिकाय मपमी पुष्य प्रति म परिवर्तनीय या पीछ म मौरभेशामा होमा है। इपच एस्विरमकी सरसता म परमारमणेतनापी पागपो में 'मही जोब मे एस मीस सस्त ईवा निद्रा म पामय समता पातुर है मैं मेरी धम्या मुझे मुत देगी यह मेरी मियापन दूर कर नगी तब तुम मुझे स्वप्नों मेरा देते हापौर दृश्यावसिस गे भीत कर दवे हो। हमारा प्रचाम्लियामा पोवम के गर्भ में पुम पतन नही पान मसनारमा मतना म हमाग उत्पान है। सरले हम ३ भागवाद एक ऐमी दुनिया म यहाँ बौद्धिा मौन्दर्यत्मक एवं नैतिर मान कन्ट्र हामर पिर रहे। मियपम्प मुम ही एकमात्र निविप्राप्य है। यदि मामा गंगार परिवर्तन पगिकता ही एकमात्र दुनिया है ता हम सोच रयते मुनते मुंपन स्पर्श करते पार पाल मेने है उमीसे सन्तु हो गाने पी fan हम मेनी पाहिए।'द वो फिर हम पसती-हिनी मायाप समगीवी पौर पार मा का मुत्यु हमपर हावी होनवामी है। बेला रोग पकापमा भारी है। भीग नगम, उमा कोई पहल नही पौर मृत्यु प्रपसमापी है तब पगमताम कोई विशेषता नही रह गाती पौर मफलता काप पर्प नहीं होता। पर यह मर हाव हुए भी हम दुना हान नि मही पैया ए ममार की विवापत परोया करके विषय पुष युदरदार पोरम पी महान देन को नष्ट कर देने के लिए नहीं पैदा हुए। गरीर के हम्पबादी पौर दरिय-गुरु के पूगर हम पामस्य में निमग्न हा गोमिए प. पी. पोदम दारा केस्सि पॉट' में प्रपट froपाग्दों में पुमारने । “घर पर पागरे पाम बेटा पौरपानसी परीरको मोटामा मौ।"पा फिर हम पामी लिया भागात पाप अपिपात पायमीनता मे नमाप्त कर देन पोमाने मी मार्पमीमता म पो प्राप निरपर होती है जिसके पार पामर हम मही पागल यह है गया। प्रामीन माग्नये भौतिरतामारी शमनिराम मगीमतिम-गुणमादि कामपामापापा पारम्बीर गुर्ण बीयर वर्ण पाषा पन पिया। भग्मीभूतस्य म पुनरागमन पुन ॥ "w मम ना भैसपना साल के मानाग पनी साना मग पर काममा लामा मन मोरी मार पर (1) TERI सरप कीसोग 'मग तर नियो मुपपूर रियो म मेर भी पी पिया देह + मिट्टी में मिम बामे सरररामहोपाने के बार या फिर प्रामा है?" भोमनाया यह सगून दृष्टिकोन बीपन के मानिसमय पर पापारित है। मनुप्प ह की पुकार सकार प्रारमा को पुमार, के बीच किसम्म रिमूा है। देह का पीलार पर सरम पौर प्राकृतिक मासूम पाता है और यदि मनुष्य उसे मुमता है तो उसका विकास कमाता है पौरमा एक ऐसी सवा में फिर से गिर पाता है जिससे फूटने का प्रयरन यह धीरे-धीरे कर पा है । अपनी सहा प्रवृत्ति का प्रादेप मानकर बह विकास की रेसा से मिर पाता है। पर पीपन में शाति एबम्परताकममीर मोतों का प्रभाव होता है तब हम इमिममुपो में पूरकर उमसी पूर्ति करना चाहते है और इस प्रकार की प्रवृत्तियों काग अपने पावर पी कराहती हुई रिक्तता के प्रति अपम प्पान को मृतप्राय कर देते है। रिपार प्रम में फसी पुनिया के लिए अपने मोबात का भार बहुत होता है परन्तु बाना-पीना मेर-सपाटेकरमा मौर इस विलास के मात्र विधाम करमा दिन बातों से मय होता गाता नही माननियष्टि से एक प्रमरमरान है। परिष्मान मोगमावणीवनपी समस्या का कोई उत्तर मही है। ४ मानवतावाद जब मानव मस्तिप को पता मगता है कि पिन परसों पर पर गएर ममय से भगवर सहारा मेवा पाया है ये बीम एप पर है जब मेमय होता है किपारम्परिक पर्म का मप्राय निगपार पपीवन से उसका पर्व मोगमा साभपता है पौरमह मिसार एक पर्शष एक समाई प्रसार भर ए पाता है जब मयानक प्ररमा एवं पारमा प्रमेपनमा भाग हमपर अधिकार करता है तय हम प्रनुमा करते है कि मियपूर्वक पीने का केवल एक ही मार्ग है पौर मह उन तात्तिक अनिवार्य वस्तुपाको बनपूर्ण ग्रहण किए पमा मो पाव भी निश्चित है सरम की मरमता और मैतिक नियमोपी मालीयता । यह पर नवप्रब पड़ी।पौर जो हमसे पुरार पोषम बही बता सस्ते हरिगर मृत्यु सर्वस्वान्त के रूप में रिसाई पाती बीवित प्रगत एक मृत विस्तार-मात्र नपता है सिर पर फेमा पाकाप कामारीचता है पा ससकी रिक्तता म से सिर मपान कर गए से गान पाते। तब यह मनुमय *सा भयानक होता। 'प्रासफोर स्पिनरी में मानवतावार की परिभाषा इस प्रकार की गई है कोपिषर या फायप्रमानी मिसभा समाप देगा मानवीन (महिला) हिमा से मा-फिर सामाग्यत मानव गति होता है। मानवतावार के लिए मनुष्य ही अस्तित्वमारियों में पक्तिमा सान्न प्रकार का मामर-सेवा ही सर्वोच्च धर्म है। बहरत गौचन, माणा, सामंजस्य, संतुलन में निम्नास रखो विश्वास कौमापस्यकता घानाबा व मर्म किसी दूसरी ही तुमा पर वम देता है। मानववागार यह मामकर मी पसवा है कि ममुप्प प्रकरण पन्या होता है बो बुराइया है के समान की। उन परिस्थितियों में निहित है जिनसे मामय मिरा है और यदि ये पूरकरी मावी तो मनुष्य की प्राईमाहर प्रा गाएमी पोर प्रगति सहसम्य होगी। इसके प्रविक्रम पम मानव प्रापिकी प्रतिमय अपर्याप्तता में गिलास रखता है। मार्मिक पक्ति पापकर तम्प वा उससे वर मिफममी अनिपाय मानायकता के पम सारण मंत्रमा भोग करता है। पर पर्म विएतन मौर मनप्प का ध्यान अपनी भोर सीपन मे प्रसमप हो जाता है पर मानवतावादी पुनरसार (रिमायस) की रिपारपाराएं पुम पी उम्ती है ऐसा ही प्राचीन यूनान महा था । प्रोटागोरस ने सग्य पर जा पुस्तक मिली है उमम एम उम्मेसनीय मुक्ति है बिममी प्रतिमनि माग तक सुनाई पापी है "देवतापों के रिपस म म यह पता लगाने म असमर्थ हाई फि उमका पस्विरम है या नही । विषय की प्रस्पष्वा वा मानव-जीवन की तपता इसका पता ममाने में बापक रही है। कनपपिपस मे भान का एक मुरबोकि प्टिकोप स तुम किमी पार को मानते हो तब यह कहना कि तुम उस पीर को मानते हा पोर जब तुम उम नहीं जानते ना यह मरना फितुम नसे महीं मानते पही माम है। या उससे मृत्यु के विषय में समा गोरेप्रति उपित पन्दम्य मा है दम विपप में प्रश्न रिमा गया ता कमपमूशिपस ने उत्तर दिया पा रहम जीवन पिप में ही नही पानव तो मृत्यु के विषय म गया नाम समय है? हमन पर तर नही सोपा नि मनुष्यों मासेगा मे की जा सकती है सर हम रोकी सरा मेकर मरते है ? मिस्टीय (पूनानी) पुग मे पराग्यपम (स्टोर मत) की नाप्रियता हुन एप स अनुभूति के आर माश्रित पीEि म समय में समाप मगर एवं प्रसप्टवा मे भीत पा सम्पया मे माननीय मनुमय की धनिरिपतवारों प्रस्तिर पर बम दिया। बापूमानी रोमन दुनिया मे ईमाईपर्म प्रमीयर पिया तो बह मना एवं माटरगामा म मानर नौवना मग सूटन स पारभरपाग एवं बटोर जीवनपीपारगामेरा परिवर्तनवादमम रेसम जीवनी निम्नतम पार मनापोंपिए हो मुगा नापी। पूमि पर यूनामी मावना पाप्लोपना प्रपान विही भी पोरस गम सामाजिक-रानीतिर सामा मुरिवाद पर और देवी पी इममिए स्पेगणापूषा मंगीत गरीबी ए बीनठार गा' गद्गुगा के प्रति पुग: सामंजस्य न पापित कर सकी। दोनों पीप नितमीपवान वापती रहो। यूरोप में तीसरीनरी के पा- मे ही मन ही मालिक १or: गारनीवरिन (Puny५।
४६ सरपदीपोश पपरपा प्रापम पाना पिया गया। यह रिक्ति पार्टी मोसा परापर पनतो रही । मानवतावादी पापि ममप्र प्रति पनीम प्रस्ट परख पेपर जीवन को प्रामुपापी पाटी मामले के पियोग को परीसर पर रहे। नमी से मामरतावादी दान पामार कर गया।' अठासी मरी प्राम-दान के मेनापों ने मानवीय कस्पाग लिए मारमपून अपित की निमाम्म मनिकता के माप-माप पानामि दृष्टिकोण भी पारित रिया मानवतावाद मोतिया पनि सम-अब मया। इसके प्यार हारिक परिमाम मानापिकार-ममम्बा पापणा या पानीमी शान्ति मे रिमाई पो। हमारी नीकी के पने दिवारी माननाबारको मुनकर एव पित प्रापरणसमें पर। र समिती Ram R 11 गोवा से पूर्व aan मप पार पसेर पनि में पना मम मान । मली मरीन और मार Anो रे बापर चरन राम परमगीत सोमनाथRAINभरपारपत्र पनमा को पानामा मात्र नाम POTA Relastutमान ममा पूगा पुष मनी माम मरममा पुमति rama पर सर MARRIाम मा मे मनाया ग्राम 4 ~k गाना 11-14मारमा मम पार गजमान 40t उन्नपूर्ण प्राबर सनमा बम मिा मग्र प्रमाल। म मरर्स पारपान मेयम्स (1) रस्मसारमारनेम बन भा। पर मामा नि म मरमुन मन बुमार ran tota.यानि मरेगमें शायद । म" माजन MAIममी रेशा में जा मिनबमम समीपर मारा मरेमाtm नहा मेरे पानी भने भान हरे तुम बनाते सार म रेमनास देशमरमारी आनि म स्यामम्मा, पण रमे बातमी मे नातिन समय में विस्प बाम भरममानसी ना चाHिATR HEALTH पर रेपपक्षिण भिणमोपा मारमा श्री बनाम पर Asire (22 १ | "ममममममुग पनि र म~िममा मनासमिम, सहित सिौ सयामापार्मिक मामि मिपि मामी वस्वास की भावस्पकता 'मिसीपिया एपिका (मीवि-सिमान्त) के अन्तिम पप्पाय में प्रो.भी.. मूर मे पपने विचार का सारांश दिया है। दितीय अनुमोर । में ये मिसते हैं 'हम सबसे मूस्पबाम मिस पीचको बान सकते है या उसकी कल्पना कर सकते हैं बतना की कतिपय प्रयम्पाएं हैं चिन्ह मोरे तौर पर मानव-संसर्गमा मुन या मुन्दर पदापों का उपभोग पहा बा सकता है। निषपय ही यह सरस सरप सादेशिक रूप से पहपान मिया गया है। परमो प्रभी तक नहीं पहचाना गया है, वह यह है कि यही नैतिर तत्तहान का प्ररितम एवं मौसिक सरप है। पन्हीं पस्तुपों के लिए, इसमिए कि इनमें प्रपिक से अधिक यमासमय किसी मकिसी समय पस्तित्व में रहें पिसी म्पक्ति पापोई सागनिकमा निजी मतप्यमा पामन परनाम्याय्य हो सकता है यही युों की कसौटी है यही है- पटिन पूर्वस्व सय इनके कोई मत या प्रेम नहीं-को मानवापरण के पम्तिम एविसम्मत मध्य का निर्माण करते हैं।" यह पुस्तक ११.१. में प्रकाशित हुई थी। उस समय के तरुण बुरियादियों के लिए मूरमाही पर्म प्रमान्य पा इसमिए मूर ने उनके लिए एक रास्ता निकामा। उसको पेतना की प्रस्पाएं प्राप्यारिमा बस्पाएं है-चपत पार्मिक । मूर मे मानप-मम्परयों के भारतरिक मूल्यों पर पोर दिया और अपने पियों में कहा कि में उसकी दो सबसे मूल्यवान वस्तुओं का प्रमिषन करें-मित्रता एवं सौन्दर्य का मवियक्तिक पारित एवं सफमता मा अनुमरण करें। ऐसे मनुष्य-प्रागी बहुत ही पोड़ होंय भिनमें इस रिनाम मगन की पोर देखने पर, सिमामा या रिस्मप यहाँ तक कि पातकरा भी उदय न हो। मनुप्प जगत् पी प्रातिको उसके मोत पर्ष मंसितको मानने के लिए उत्सुक है। माननीय मूस्पों में हमारा यो शिवाम है यह बयरगमपी हमारे विचारों में एकीकरण चाहता है। पिरहम मनुष्य की प्राति की परिभापार समम उसके पम्बर गो प्ररफ ताप पारमवस्म है उमे छोरनहीं सरते-उम पारमतत्व को पिसाबर्गम करते हए परस्पाहता है बह मो विवेक मे उत्तम पर्योकि पिरेक का योग है। "समिरा में सादातर मोप मानिनोर रजत गशिक्षित रिचर-अपान होगमा परिरमा मानिसमग माता मम महीपते। सपाई दोगामिपरिव रिसाम और पितामा बाराभवाह मारिया रणाम सात परिसता भीगमपाए सार बलशारमा 1 मिन पविस तुमति ए इन मारे मार गियमित परमीम मीमारतीपपत्रों में भी हम मी मापनमा म पो पुरो समयमा मनावमा पनि मम्ममममताको मगर मान मानपान प्रारमा गागोर (iv)।
सरप कीबोग मानवापार पापत प्राधामों प्रमुभूवियों पार्मिकता के लिए युमुधा एवं पिपासा तपा उत्पीड़न एवं प्राणोत्सर्गमिए यारीमी पोर मान नही देवा। एक प्रफमातून मत ऐसा भी है बोहमारे मानस के लिए पैगी एपना पैसा ममता हाइसमें सास्वत मूस्यों को भेष्टता प्रदान की गई है। पनों के चतुर्म मग में राते हमारे सामने तिम्रो का निव रखता है--यह निम्मो बगित एवं होमर नसे पुरातन महावारियों परस्तू धपा पम्य महान दानियों हेस्टर एनियस सीसर एवं प्रग्य पीरो का देश है। मनुष्य मनुष्य की हैसियत स पपने सामिष चिम्वन मारमा पर्यन बामविक एप रागनीतिक प्रसलों गिस सर्वोत्तम मुधनी पाया कर सकता है महला त श्री किन्तु पा... पति जीवन ही है। इन मेष्ठ रिचारको मात्राएँ एषमीरों में कोई ममती नहीकोपी पितु उनकी पोम्पत ए इस परती पर राम मिए मुपमारक एष भानामी लोक के लिए पपस्वी नहीं हो सकी। उनका जीवन 'माणाहित कामना का बीपन है । बस इतना ही मानन पावे के अनुसार मानवतागर देता है । शानियोश मुर परस्तू 'यही पता है पर यह स्पान स्वर्ग नहीं है। ति १ नो । बाल सुई मिली प्रहमामा में एक प्रसिा गया । "१८५१ की तु मे स मैने पानी पर माकोलानिरीषा र गिनिष्टय रिम्पारम्भ से मुकपीस की मिसे सब से सीन या मेसमा स सात्म है। सरकारकमया सापा। मेरे मनन-RSS मी समेत के पूर्वक महान भने र मिन बाबुभूति कीदार मा इस प्रमान में मेरे सारौ।। ण में जलने दुसमन मान-से किसने का बम रिय पनु अपरे गोर एवं तिमलित सोलर मे सम्पूर्ण निरस सालमा और मेसिनी मोक्न कालारसपा मोर मात्र निश्मिरने को मिलावीरस्थित व निरित पी-पेसी त्पनी शकीब रिकी र मनरेगा मनुमन योनिम्नु पिसेन समाप्त न होगा। समानसमेत स्थिति से सकारा पा मानो बप से बाहर भा..हरर की मसा बनपिति में पा स्पतिरभारमी कमी महोत्सी मानधन परब में माना कि मैं मरने से सीमासान 'मान को कि तुमारे भोजन की समाचार की दो मा मा म मरणमा काम सोनाव परिमन्यमाने होरेसा पर पूर्व सन्मानित रोग साप पारे लिए महान बामन बसगी गावो और भामाती भाम बमा मेरमा 'ग्री। पर मेरायमर मिनीर पर मेरे हमस्त जीवन की रमाबीमा कम । पनामा इस साखरे सिन पसमय में बीमए सम्रा मानना बार्षिी माना नही FRANA में महिला रेस हो सकेगा। सास से चीन के लिए मेरे पास अपनी मिल मे प्रमुसा दिया कि माममायतका प्रमुम मासस्यमा मसिंक को गान देना चाहिर ।
विनासको मागायकवा उस परस्तू के प्रति म्याय मही परवापिसका मत है कि सबसे पवित्र एवं कम से कम सापंम मुस्ताप पो मनुप्प कोमात यह है मान के लिए मान प्राप्त करना। शुभ मान का प्रानन्द ममय है। यह स्वयं ईश्वर की क्रियापीमवा में विगुण चिवम के नसरे नित्य जीवन में माम मना है।' मानवतावार धर्म के समपों के प्रति एक नषित पिरोपरयो मौकिक पवित्र में मेद पर है कात एक निरम का विमानन कर देते हैवमा पारमा एवं देह के एक्स को पणित पर है। पर्म या तो सर प है या गुध नही है । प्रत्येक पर्म को मानम् मी मर्यावासपा मानः-स्पतिसमधिकारों के प्रनि-मणि-मार सम्मान रखना पाहिए।परिहम पर्म का तिरस्कार गरेमे उसली निन्दा करेंगे तो हम उपर्युक्त बामी रसा भी नहीं कर सकते । पंसा कि मुकरात से मिलने मा हए भारतीय ने महा पा 'पदि हम ईयर के विषय में मही गामवे तो मनुष्य के विषय में भी कुछ नहीं पान सरते। 'यो सुप सम्पत मानवीय है उमीती पूर्णता भर्म है । मार मानवाबार एक पारमा की तोर में है। ५ राष्ट्रवार पर्म का कायमी या पाकिटाइम) प बहुत प्रारमिर समय से मिलता है। उस समय धर्म का कार्य अपने अनुयायियों को देशभक्तिपूर्ण वायवा मे प्रधि सिव करता था । (रास के) ईमरप में माहवा उन तोमों को राष्ट्रीय बेतना राम मी मागाों भोर माथिोपा प्रतिनिधिका । यसरी एक यो परिवार एक फिरे सदस्य पे 'मोस्टमम । मि तुझे भून तो मेरा सदिमा हाप मानी पुरामता मूस पाए । यदि मैं तुझे म पार ए तो मरी शिवा मरे वामू में पिपट पार-पोयामम ! यदि में अपने प्रपान मुफ भी कार तुम म रत।" प्रत्येक पूनानी पाब में पोई विरोप व सोत या मनिन होता पागो पहामिमी रेषता या नापा के प्रति पपित हावा पारावा या मापही उनकी रक्षा करता था। जापान म पर्म का प्रयोग राग्य को संपत्ति एकरने में लिया जाता है। मुहम्मद एक पम पौर एप राष्ट्र सेस्पापर पूर्वम एवं परमवणे म पट्रीयवासय पर्म बन गई है। मारमसम्मानकी प्रायमिर मारनामो नागरित पसे यह प्रमित एवं मपपपीस जातियों को मारमा पर्यो पोर रिलपरती है।ह उह मामविपास परी १ निषिपन समय रोमर्मते माना पा साकार पाने, बनिरम्प ने मे माप सुमारासरे माय R समुप मामी पदमा रन ।
१२ सत्य की पोर भावना देती है सपा मपणे देश का एक मिशन है एक नियुक्तमार्ग है इसमें उनका पिनास पैदा करती है। मोग मी पो प्रपने को पामिापते राष्ट्र सम्म (मेसम-स्टेट) की प्रपंसा परमहीं प्रपाते। मममग सभी रेमों में पिप-स्पामा म मिग्रापागाने बासा मर्म सितो मत का स्थानीय मसफरम-माम ही वो है जिसमें भगेसी समामी मौर राष्ट्रगीत कामायन सम्मिलित है। किसीने कहा पा हानायक पर्म है उसका पर्म ईमोरह।" राष्ट्रगार एक रागनीतिक पर्म है पो मनुष्यों के वयो वर्ष पासासाों में उपम-युपम कर देता है पोर गहें इस प्रकार सेवा एवं प्रारमत्याग की मोर परित परता है छिपापुनिन समय मे पिसी विमुर पामिन पाम्गेमन ने मा नहीं दिया। यह अपित स्वर में बोमता है और हमारे मनोबेमौ को स्पर्म करता है। राष्ट्राका पागाइकिल मेसार मेधा की सर्वोच्च प्रमिप्यक्ति है। बर्मन ईसाइयो मे स्वीकार किया कि "हिटमर के माप्यम से ईसा हमारे बीच परितमान हो मा । इमलिए राष्ट्रीय समारगाव (नेसमम सौममिरम) पावरप या कर्म में म्यस्त्र पियासीम ईसाइयत है।" धर्म को उबार, मादेधिक भार सप मापन पौ तमा मामगीर परिस्थितियो में प्राप्त किए बामे योग्य होना चाहिए । राष्ट्रवार इस मावमा पर प्रापा माता है। पर तमिम किसी वर्ष भेगी या राष्ट्र की कार्यपरिमि से बाहर मही निकसता तब तक उसका यह पाया स्वीकार नही कियाबासस्या किया सम्मार्ग का पनुसरण कर रहा है। किसी समूह की ममे मा राष्ट्र ही क्यो म हो पूजा ईश्वर को राष्ट्रीमता की एक उपाधि-मात्र बनाकर घोरती है। पर कोई राष्ट्र। अपने कोसी सिरीय माम मेता है और उसका यह विलास बन पाता है कि पपने सत्य से बस वही सबका मन कर प्रस्ता है तपासतमही संधार पो| ऊपर उठाने में रासम इन छरित पार उपनिवेों की चाह का प्रादुर्भाव होता है। ६ साम्यवार रिस विराट ऐतिहासिक पटनायक ने एक ही पीरी में पुरानी परस्पामों कोस पर दिया परस्पर विमकुम विषम समागों मे कान्ति करती विस भर में प्रय तर मात्र राजनीतिक प्राषिक एवं सैनिक सक्ति के सर्पोप पुनरिमामन को संपारित किमा मोतमा पापी पुनिया में एफम हो पाई और रेप संमार 'नमा पीबिप, नसेन मपिनिग की प्रापिसात दिन हमारे का रिक, मारी पर तक मिपुर-रेप प्रमु मिसो ममवाय मी इमभाने समरस शाम से मरे पशिशोसीमा प्रिार १५ को 'मसलिम (), १९R Pya सियासी पावायचा कमिए पनौती रेप में प्रापा है उसे पमम्मे पौर उराका प्रप्ययन करने की प्रावश्यकता है। हमें उसकी गौरिक मम्तस्तु, उसके नैतिक कार्यक्रम उसके प्रामाणिक भागापेम पो पानने का प्रयत्न करना चाहिए। माग पुनिया में बहुतेरे ऐमे पान्मीमा साम्पार की पति रोकने यो नरमुक किन्तु ऐसे बहुत कम है पो गानते हो कि यह वीरया है जिसके विरोषी हैं। हम किसी बायेगोकार महीर सावे हम किसी पारणा को मिटा नहीं सकते जब तक हम पान म में कि वह पारगा, बहरापा हमपीमगया है। शिमा उसे पाने उसदी परमा के विस्व हम पोईपरा प्रापंप भी उपस्थित नहीं कर सकते। मामूसी कहानियो मम्य रात्रीय गिरफ्तारियो अफवाह भरे मुगदमे पिएमे साम्पमादियों द्वारा अनुवाप प्रकाप-उन साम्यपादियों द्वारा गो निष्ठा से मेपर स्वप्नमय सैनिक हस्तक्षेप घोरसमान पापीबोगा पंधों के मिना को सहन कर भी बीमित इ-पदि हम इवना हीमहमा है तो हम पस्तुरे मूम तक नही पाप समाते । मारारिमा का निवास है कि उन्हान ममुष्य की प्राति के एक जानिए दृष्टिकोण पाविपास र मिया है। एक मामानिक पानी के सप में मनुष्य की प्रतिमा निर्णय उमग पर होता है निम् इगु पुर पोषन की पारम्पक पस्तुो उतारन होताउसकी पेचना की मामानि सिविकाही एक पार्य है। यही मन सिनि उत पार्पिक मम्मों । मीत पर सही एक भेष्ट रना। सिम के रान की हास्यवाओं की पूर्ति होती है। विभिन्म बामिक मय वे रिपारपागा दो परिस्पिति-विषेप मे प रिसेप हिवांगरक्षा के मिर गिरमिा पर ली गई है। रत्सादन मापनो में परिवर्तन साप-साप बर्मों में परिवर्तन हावा है। पान यमिकों एवं पूनीवादियों के दोष हो पाने के कारण राग्य बर्म-नियम बर्ग-मम का एप ऐसा साधन बन गया है निमारा एक का सरेको प्रपने प्रमुष में पता है। पर्मबह पपीम है रिमोशाय नियंत्रित पौर शासित बगमस्यों को मूधित सपा संतुष्ट दासता पी स्पिति में रसापावा है। मरमान में उतरादन के मापनों रे बिकास में वर्ण-मपर मपापभाषी है। पर यह स्पिति समाप्त हो जाएगी तो एपबगहीत समारासम्म होया मिसमें पागोपन महामा तपा राम्पपीभीमापापपतामही पगाएगी।रस समान में परली पायवाएं पूर्ण मी पामी पूराम्माय होगा तपा स्वतंत्रता के लिए भरपूरपरसपा। इतिहास पी वर्तमान पपरया मम इस मध्यपी पोरा गे। नाम्पारस सरय पो हम माय-मापन के लिए मरेप्ट परिष्य बोपोर में नेपाली पाया रे मेता है। माम्परा पर्मी निराइमसिएपरता रिपद मान सेवा हिरह एक प्रारमानिनिगली प्राणासिराम ऐतिहासिक प्रत्रियापीसीमारे मारपरि पर्मनांसारिक विषयों में कोई मिररसी मेवा योऐगारहवस सरपपीगोग ४ पनिरों पर बमपानों की मुविधा के लिए करता है। साम्पमारी पाद हमोम्मि है पौर मिय पुरस्कार पा यह पारसामन देता है पर इसी परती पर उपमोम करने के लिए है। यह धैर्य परेरणा का उपदेश महीला पाये समारसी पना में पह गम एप यल, माप एर बसिहानदी पुर। हममी पापापों एवं सिवान्ता में मे चाहे मनेकनास्पनिक प्रौर बारमाही पर साम्पबार रोप सेरे पाम, उमे पार परीरोंगोरे-इम मिसान्त पर माभित एक मपे मार्ग की पोरगरपाठा पा रहा है। यह एक ऐमा सिवान्त है किहम सब उमड़ी प्रोसा करते है पर उसो पनुमार पाचरण करने की परवाह नहीं करते। इसकी मपील या प्रेरणा विस्तृत है । युटिवारी एप ऐमी गौवम प्रमाप्ती मे उरके हो प्रसारप मे शिवित पौर गान रियाई देती है क्योकि उसकी कोई मायही नहीं। इसलिए वे इसकी पोर पारपित होते हैं। सारे समय माया पैसा पैरा पर रहना पोईका उत्साह पेशा नहीं है। यमिकों को सममाया गाता किये अपने उस एवं नीरस दीन एवं व बीवन से परसाते है। साम्यवार एक ऐसी दुनिया मे गर मिकमने का रास्ता बताता रिसाई देता यो निष्ठारहित है वो चुप की बीमारी को समझती मही मजिसमे उसपर बिजय पाने का संकल्प ही है।पो मोम भय एवं महत्तारामा हुटिमता एवं निराण से पीड़ित हो उनको यह एक ऐमा निमित्त प्रदान करता है जो मूरघु में मी बीवम पूमने की धमता - भारमसंस्काराची प्रेरखापा दमन नहीं किया जा सकता। कि परम्परा- पारी पम पपूर्व दूसरे तरीके दूसरे रास्ते निभाते गाते हैकमा एक संगीत नृत्य तथा प्रम्य जनरपक बातें । पहायन के इन तरीकों में साम्पाप सबसे पक्ति मान है। तनों एवं तरगियों को पुनः पता लय हाभिकिसी कर्तव्य के लिए भक्ति में मिष्ठा म एक पालन एक शिसवा एक उत्कृस्तताबिसके पास मुरिया मुव एव मात्मभोग का बीबम निषिय एवं स्वादहीन ममता है। एक वर्ष से पाने एवं प्रमाण-गीतों की धुन पर कदम उठाकर घमने में हम मालयंत्रमा से बच जाते है और यक्तिक विम्मेवारियों से फूट पाते हैं। साम्यबाद में धर्म के सब नमन 'वपि या पूर्णव धर्मनिरपेम एवं मानवतावारी होता है। यह मनुप्प एवं प्रकृति के एक स्पष्ट पर्थन को पूर्ण मानार उसकी सिधारता है। परिहम एक विशेष प्रकार की राजनीतिक एवं प्राषिक कान्तिपरमेते तो सामान्य सम्याग अपने-माप प्रा गाएगा। यह पम्त हामे कारागा करता है पौर मोनों पर अपनी कहता सारवाई। यह सिर्फ दुनियादी मन मितिम मरेपो दराने के पात्पलम में सम्मारी समाजति पर्म-वि सेसियोर सम्मिा (EO १११॥ - विबामदीमावस्यकता कोरी नाविक माम्पा-मात्र महींपोषि म्याय के लिए इसकी मपीस में एक पर्म की ममम प्रयमता है। यह एक ऐसे विस्वास से संचालित होता है यो पर्म निष्ठा की भाति ही गंभीर है पीर मोगों से कहता है कि इसके प्रापर्म की प्राप्ति के भिा कोई निदान भी बहुत नहीं है। प्रग्येक माप धर्म में शाम्तिकारी पुनौती का स्वर होता है। यह स्परस्पापित पमा मे मिट गया है। केवम प्रौपचारिक होकर ए गए हैं। साम्पबाद में इस मार को पा मिमा है। सेमिम मी मूर पर स्वामिम की उचित मुर्विरित है हे मापी मेनिन हम तुम्हारी घपप सेवे है किाम पारी दुनिया के प्रमिकों की एकवा मोबदामे पोर करने में अपने प्राणों की परवाह न करेंगे।" मार्स एंबेस्म मनिन पौरस्तामिम पर साम्पादियों का भरोसा हमें पामिक जी.पी- तिलागी मार दिमाया है। सच पूछे तो साम्पवार के पठिहाम में घायर ही कोईलीमी स्मिति रही हो जिसका समानान्तरण ईमाईधर्म के इतिहास में प्राण हो। इसमें भी हमें समाधियों पविष सिखारत नीरस भाप्प भाप्रपाम भर पहीप, मास्तिक लिपुटीकरण संत पापी तपा वर्तमान पापोंगो पारी म र स्वर्ग कारन होता है। इसकी प्रणालिया एवं पनुपणासन हमें बमात् मुध पम-संप्रदायों की याद दिलाते हैं। पर्म की भांति ही इसका भी विश्वास है कि दुनिया मान प्रमय के तट पर पड़ी है पोर इतिहास प्रसमस से पीमी गति से चल रहा है। परवी पर सस्प एवं म्पाप की रमापमा परिममा निस्ममेह एवं बिना धिमी समझौते के होनीपाहिए । स्व. निकोलस गरिएष एक पाणितत्वज्ञानीचे उस्सी साम्पबारमा प्रातरिक भान पाामिन्नते है साम्पमापी दृष्टिकोण धर्म के प्रति विना विरोपी इसलिए है कि यह स्वयं ही मर्म बनना चाहता है" रहने । "यह मासिक एवं प्रायोसस संप्रदायों, मनुकरम पर बना है परन्तु उनके प्रतिम सापाता है। "साम्पसार पर-रहित पास + मरमाEिxam-म है। जब हम माम्यबादमी एक ऐमो दुराई केस में निमाररते है पो दर हम बागी है पमाम्मी जगत् के मिरा गहर से एक सतरा बन गई पार पार मे उमे गोगमारपो है तपा पारधारप सम्मता के महान मूस्यों को मष्ट पलामा काम 'म बात का पनुमक नही करते कि यो उरणार पा राव सभ्यता का एक भगभूत तरप है उसके मूल्यो सगत निरास काही यह परामरता है । माया मार, मटेसापासमोरे प्रयाप्पी सदीपूर जी उगारी परपरा कीए तापिपा..। इन मुपारों ने ऐसे १. मोम्मिलिशियन बनास m)! ११ 'गनियस रिम्स.१ (१५) पर २१॥
सरप की मोर सामाजिक पुनर्गठन कीमततकीपीविसमें हर पादमी अपने विचारों के मनुसार अपना जीवन बिता सके--म इपनी ही पाकिबहसरों के मीसा ही करने के पपिकार का सम्मान करे । याय एवं समानता की पारमा से ही ये सामाजिक विरोष भूत हुए बिम्होंने पारपास्य समान कोहिमा दिया उसे मया परिया पौर पब तक उसको मार बम्यूनिस्ट पोषपापा के वित्तीय भगक पम्तिम पैरा में साम्परारी प्रापर्म को 'एक ऐसा एसोसियेचन मा पंच सिमर्ने प्रापक सदस्य मा सर्वत्र विकास सबके स्वतंत्र विभाग मी पत है। बताया मया है और पूर्व सपा पश्चिम के सब मारवादी विचारप इसे सीपार करते हैं।' इस तरह समाग कापरिगठन करना कि मनुष्यों का बीबम समर स्वतन एवं मुपी हो, सब ईश्वर की सताने है -स सनमिया माहीताकि परिणाम है। साम्पमा विकसित इसलिए हमा विभामिक बनो मे प्रपनी जिम्मेरारी छोरी। पोरवास पर प्रसिर मन्तिम रिपब म कहा गया कि “रानिको मे दुनिया की व्यास्पा भिन्न कप में की पर मुग्य बात है उसे बरसने की। साम्यवार मोकरमा चाहता है वह यही है । यह दुनिया को बरगना चाहता है और ईसाईपर्म तपा पर्मनिरपेस मानयताबार मेयाम्पास्याएं दी।मह सिर्फ पन्हीको मेकर सन्तुष्ट नहीं रह जाता । साम्पवाद को एक ईसाईमतविरोप वा नास्तिकताकहा जा सकता है कमोहिमह ईसाईपम-मूरा माक्टरता विस्य ममे ही हो पर निश्चित रूप से ईसाई-तस्प एप साई-शिवालों पिस नही है। न्यायपूर्ण समान म्यवस्पा बम के लिए एक कामना-माप बनकर पगई, किन्तु साम्पबार में उसे पूर्व करने का गंभीर पस्न मिलता है। कोई पादमी मार्म के 'कपिटत' को पाकर सामाजिक प्रन्याय के प्रति उसके समस्त रोप एवं बीमाधियों का रनियों को म्पर उठाने कनिए उसकी सच्ची चिन्ता से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता। साम्बार पौधरम की पूटियों या पोपों पर रिवा पया एक सप्ताहै।स मेरिटेन मिलते समशित गरी मनाई करय निक: "म मानद पर कप्ता से हम स्मिन मा वामेल य. (रेग्यो धर्मविपवरेचन मा (निसम) (यस्त) और कर्मग्रनब से। -म्भिव पनि पसिमी मारा चिर पालिका र 'यान्स मोरोसr रामनराव परिक t"सिमो ने अपनी विशिए ममोति मगह मिलात मसावन की मलने + मिरमाने मलामने परिपप निगारों परिमिनोमादिकालयपनी पति सोपा बोसिी सम्- भने पर नापी राम ममी बारेमा पैसा प्राप्त सपना समेगामि मा-विरोधी प्राकृत लभर म साबर - पम्प नही पान के दूसरेपासवानी चाहिए। एक समय मानब सागसीसोने मे मस्या पर सामने रखपt-समारभार या(0) विकासमी मागश्यकता है 'मुस्पत' अपने ही सिबातों के प्रति बेवफा एक ईसाई-अगत् के दापों से ही साम्पगार पैदा होता है-सकी उत्पत्ति के पीये इन दोर्मों के प्रति गहरा विरोध मारोप है केवम ईसाई-वगत् के ही विष्ट नहीं परम्-रही है इसाराम्त नाट्य (देगिरी)-स्वयं ईसाइयत के विरुम गोईसाई-गत् के बहुत प्रामे गाता है। १९४८ में ईसाई पर्मापार्यो (विसपों) के मम्धेश सम्मेलन ने ईसाई-मातियों से अनुरोध किया कि ये समझे कि साम्पबाद में ऐसे तत्व है बो वर्तमान समाज एवं पर्थ-प्यवस्पा पर सरय निर्भमस है। इस मे १९१७ की प्रान्ति पायपितक स्मवत्रता दुसस गरीबों के लिए प्रबमर एवं राष्ट्रीय प्रस्पमों को मुमित के सश्य के रूप में देना। उन्नीसगी पती के सभी उप रिचारकों में यह एक सामान्य पारमा मिनती है कि राजनीतिक सत्ता दमनकारी पौर निश्चित रूप से दुरी है। मार्स के लिए बह पामसी एवं मुविधाप्राप्त मोमा के हाप का एक मस्त्र है जो प्रमिकों के झोपण में इसका उपयोग करते हैं। फिन्तु राजनीतिक समर्प के समय यह एक प्रावपयन पुराई है। गय पमिक इसपर मभितारकर फेगे पोर समाग क दांचे को ववमने में इसका उपयोग कर पुकग केयत तमी यह पुराई दूर होगी इमक पहमे नही ।" १रस्य मनिम्म भोसी मनुवार (REE पर परम गान मैकमर निको बरण में समर मर साब से मी प्रतिम सरा ईसा। पहले दिमानी को पार रप और यवन के माम्बासी मार्ग के रूप में पका मनो परिस्चिार करतो र सर भाप हाने t किस कोई ऐसी विचित्र पार्मिक माने को सादानेपर समागे में महीप बाती । “म मा भनुभए विपिना मही ससाना किसाम्पादनेवर में पानवि निष्ण के उम सारसोपा लिबिम मारे जमाने में मपरितमाम पनि पो पुष । नि सोसाटी (१tu) १५ पुरनोर । २ पासबरीसर्य प्रसव । भिलियो- समाबमा कमीन में ये गारे कहिए मही एमाणा दमन के लिए दलित ररने के लिए मीर पीर मी एमाणी मो विरार बमनमानिर्माणमयाम्मि लिए एमपी भातस्मशहो। ममत समार प्रतिनिरिस में जा पम भरने प्रथम मान्म मे समा नाम समान सारनों पर भरि सोही ग्रमसमें ममाप्रिम पराब भी होti मनिया की पास्थान बन्नुपम सारन रसम्ममा मिनार में सेवाराम को समाप्त नही सच पास मुभारर मा ।। - ऐसी-परंग, मार्म समनुपरखमा पुरसनिनले फेस मासपी समाज में गापितली प्रतिरोष पूर्व मरासिन माग गा मापी गुण होगा। मग मी Kut गमी, पार एमीपमान नियनोमात्र समाज मन रोमा। भरारतमी सोय मी मुग्धार सपाप हो गाण-TARI समाणि सरस प्रपरेमारत होगे पिस गुपी से मुक्त कर लोग बीरे पीरे सामाजिक १८ साम की सोग - प्रगसना को प्रवृत्ति पोर गुरसा की प्रापस्पास्ता रोनों मैम मा ही माहिए। सब मान की धोती तमी नयोग में पूर्णता पाती है पीर तभी ममुप्पो पो रे भौविसर प्राप्मारिप मापन प्राप्त होने है गो हे स्वतण ममागे के सदस्य रेप में नोपन बिताने का प्रपमर ने है। तभी हिंसा की प्राणम्परता एक पोपणमा पन्त हो पाता है। पग्पा मोप मानवामा पीसता मी ति के लिए है। मार्म का पार समाज ममान मोनों का समाग है नहा की पा-मी गरे पर मानीमा नापने के मिा बमप्रयोग नही कर मरता। उसने धमा (पूजीवादी) मोरिता की भावना ममिए की कि ममान में मनुष्य पतिार एक मए पम्पमत हाप से मुरियारप बनार यह गाते हैं। जिन एक वर्गहीन समान में ही प्रत्येक मनुष्य इलमा स्वतन्त्र होना रिपेय-मम्मपी मपने विचारों के प्रमुमार पपने बीवन का सोनम उपयोग कर एकेया । परि समार की भौतिक संपदा उन मोमोरा समारहिल के लिए नियन्निवामीगाए यो उसके प्रति उतरलपी तो पसे गमार का निर्माण समय है। हमे माम्पबाद नमावरन में पोर साम्पादोरेगोंग गियानी पुतिनिए प्रपना मई प्रगानी में भेद परमाही पाहिए क्योंकि कोई भी राम मोतिम मत बरबह पापाप में पाया है तो अपरिवतिन नही रहमाना। पहा दुर्भाग्य की बात पी कि मार्म में मनुकर पिया मिन समारही स्पारना एक कामिक न एवं समझौता हित संपर्व के बिना नही हो सकती। १८४८ कम्यूनिस्ट पोषमापर'मनुसार 'नाम्पबारी इस तप्प को पिसामे से मारते हैं कि उनके गप्पों की पूर्ति समस्त बर्तमान सापारिक स्थितियों का बसपूर्वक निराकरप करने से ही हो सकती है। इसीलिए सास ने प्रातक एवं हिना का उपयोग करने को सारा दिया मोसोमा पापको गरम पार कर प्या- पूर्वरी से प्राप्त करना पाठे ये रहे मान समयसी तबामपने को विमान उम्मत कहनावापाप एपरिसर कार्रवाई करने का पक्षपाती तिवारी पापबकि समारवारी दुपारकाबानिक कोस्वप्नरी से अलग हरमेशाती पीर उसकी मांतिकारी नयन पौ। किन्तु हम किसी हिसक पाम्ति के बिना भी एफसर्पहीन समाव कौस्थापना कर सकते हैं। किसी शान्ति की प्रतिमा नियम उमप्रारमियों ाप होता है मोरप नियन्ता होते हैं। माई ऐपटन उखनुपारक महासननि मन्ति को प्रपति की माधुनिक प्रमानी' कहा है। कार्य मन प्रातिमिमोपपतन भनेबमोगावर सरोसेसवे । और मनसेचीनसवण्णा पालयोन मिना किती परेलीका किसी प्रोनर बीमारी हर असिना, से राममोरपिरो अगे। मि , समय aroute (tum,ए।
बिस्वासकी मापापरता है 'पुरावन माबोम हटा देना' और 'निमा पो मृतों के शासन सपा मना । हम क्वहीन प्रान्तियां पर साते हैं। प्रापुनिक साम्पपार की प्राधिकारवादीमा रानियन्त्रमवादी प्रति प्रमुबार प्रसंस्कृत बस्कि यहाँ तक कहा मा समता है कि मानर्स के मत के भी प्रतिकूल है। हिंसा भी पावश्यक होती है प मुविपाप्राप्त बग कानून के शासन का त्याग कर वे पौर हिंसा का मामय से है।' परिचमी यूरोप के पूर्गमा (पूजीवानी) प्रगाव धमिकों को उससे ज्यादा मवसर दे रहे है मिना उन्हें दुमिपाके पोर मानों में कमी प्राप्तहा है। पार चिन देशों ने संसदीय लोकतारमोमपना लिया हैयहाँ थमिकों की मरम्पा पम्य स्थानों को प्रपेशा स्यादा प्रयी है। ये उसमे स्यावा मध्ये प्रामामों में रहते हैं रमादा पछताते है स्यादा मन्या पहनते हैं, उसरो पयादा शिक्षित है जितमा मे कमी पे। पद त सम्पूर्ण श्रेणियों के न्यायपूर्ण दावों कोसीपार नहीं किया नाता तब तक कोई समाग स्वतन्त्र एष सुरक्षित नहीं प्ह पाता। पर मार्स एवं ओस्म तप पापा नोरता उससे कही कम ममनीती (मोमेवरिपन) निवनवे पार है। साम्पपापी रखने ही बुरे विनाई पड़वे है वैसे बरे मे बुरे पार्मिक कट्टर मतवादी है-वे यो साप्रपने पमप्ररयों की दुहाई देते रहते हैं। यह अपने पद दिमागों पोमोमो पनुभव करपे रि सनरे इस विश्वास के लिए कोई महानिक साक्ष्य नहीं है जिसमार्यों के मौसतिक एईमापिरवत उत्पादन की शक्तियों के स्वाप से निपीत होते हैं, या यह कि मुर के प्रमुख कारण पार्पिक है अपना समापार विविपस्सों से जिनर्म से हरेक प्राधिकारवादी सर्वसत्तावारी होना सरी मही विकसित नहीं हो सकता। पारमी बरमती हुई दुनिया में हम एर फटोर कहरवा का समर्पन या चाप महीं कर सकते । हमें हानिक, यस्त माती तुमे दिमाम का एक प्रपन दृष्टिकोग तपा पार्टी में सर्वनारपक बममा ही परेमा हमें समदीय मोक्तों की प्रगतिमीम प्रवृनियों पर प्रो विपाप्राप्त बों को पपेशा ममिसिए पनि मनुस्न विचार रना ही पड़ेगा। यह मग देना सम्पूर्ण प्यों के निरास जाना है कि पमिकवर्ग बिमा सदा प्रपने मपिसार रोनहीं प्राप्त कर सका और गोर बर्दस्ती ही एक सी गई है जो भरे रामारोजन्मदिमा एपनी है।पोशाम्पबारी मान्तिकारी धमारवादमा सनियर दस नि मद मोरेशननी Than भोग मानूनी वरी पर मान रहे मर रमवा मदतमपने रामपुरमानुनी शिरो मोरिपान के ग्रमा में निराशयार-मारी ममम tam परमाननरिकी RRR मेरे मेरे सामने रोमे तमनार 'रमेन मनिसरा नियन) TI ६. सत्यवीर रामपन कर है य मह भूल जाते है कि मामय प्राप्तिा भी सम्भव है मोरपिसी मतया रेमिए मामा पपाणे के भय प्राय पुनावास्योप परना रियर सम्मत नहीं है। पचपि माम्यगाव सामाजिफ ग्यास पी समस्यापाका स्पष्ट बणन करता है पिन्तु उसने पति के प्रपिसारा की उपेक्षा परके पाठा मृम की है। पप गम्णूम ममाज-म्पपस्मार्मोमो विवायापी सामागि परिपतन की पारम्परता पीनीवी स्वीकार करनी पड़गी रितु न गसोपरित के प्रति ग्याप एप उगता परा व्यवहार करमा ही माहि । मर्माधिारणा पवस्थामा में पति प्रधिकार पर दम एष दसनाता है। या इममिए कि हमारे यहा वहीन समार। यह नहीं I होदा कि राग माग समानीय पा ममनमानी और उनके हिता पा प्रतिनिपिरष एक बम द्वारा किया जा सकता है। एकदमीय म्पपापा का निर्माण उन रोपकारी विषमतामों पी रहा करने गप्प मे हुया है बोपेरा हानी पोर अपने को इस करती जा रही है।गम मे समा गयो पीप गामान्य भानुरुप पा पास नही किया है। पहा पत्र मी सामानिन पग पा पाया है । गरगाही युम पी भांति मात्र मी वहां गिर पर एम मुविपाप्राप्त पौर मी परी पोर ऐस भमिमा एक किसानों के समूह है मा स्वतन्त्रता व पाय के मर्म मे बेपमा पोर अपना विराम करन सापना से होन है। यह एपाश्म (मानोमिविर)-एकही पत्थर मे निर्मित-राग्य है नहीं मा प्रकार की गलिया-प्रापिक राजनीतिक यहाँ तक कि पामिम भी सामाभिः पिमित मिगर मनाकर रिलीन हो जाती पहा मोरेम पादमी सबकुछ मानते हैं सब कुछ करते है और सा निर्णय कर मेवे । यह स्थिति उस माननीय पारर्प की पूर्ति नहीं करती को मार्स की दृष्टि में पा। परिहमें विश्वास रिलाया बाता है कि बीवन एक प्रहीन दुर्घटना है और हम मोप पपाए, कासे पंतरिक्षण में बानाबदोश की तगम पेइमारी मानबता पिसी मी प्रकार के पाप या महल से रहित है तो हम प्रपन तारिक पभिकारों+पीन सिए पाने की कोई परवाह नहीं करते। कम्मापारी राग्य प्रमप्रपान (प्रोटेरियन) हो सकते है। इसी प्रकार साम्पवानी राम्प पूरपा (पूधीमीवी मध्यवर्गीय) हो मरते हैं। पुराने पिव प्रपना महत्व बोते माप । संघीय मारहाणारा निरिष्ट रो सिखाम्तो की पूर्ति करते है-निस मानून को हम अपने लिए बनाते हैं उनका पालन ही स्वतन्त्रता मोर पिसी भी मनुष्य को अपने स्वार्थ के लिए इस्तेमाल करमा मतिक दृष्टि से गमत है । किसी एकाश्म (मोनोमिषिक) राग्य में इन सितारों का रमण नहीं किया पावा। परि साम्पबारको स्मठबता एवं मानवतापन सिवादों के प्रति सच्चाएमा है निमकी घोपमा बह करता है तो शासन-प्रगामी पिसापकी प्रापापका में परिवर्तन करना पायापक है। माहम सुमे एवं मिहित शिरोप को पाना नहीं देते वा मुख पात्रोमन उठ पो होता है। व्यक्ति की प्ररक्षा मबम प्रापचिवनक भोर भयावह है। एक भादमी पार मंत्री और कम 4वी हो माना है। यह एक प्रमानाग मम्मानित भौर इमरे द्वारा प्रमाप्त होता है । म्यो ग्यों जीवन-मान परवा गापा मार मोग शिक्षित तपा अपने लिए स्वय मायने योग्य होते मारपे स्पोंश्यों ये एकादम राग्य के प्रति पानोपनापूर्ण होने पाएगे पौर उममी रक्षा करने में असमर्प होंगे। मोमियत स्म में एरममावनारमिन मेरमो हावतमान दामों को इसका पता है मौर बिरामत मे मो वीर सम्हाले प्राप्त की है उमपी मापापा पान एयते , पमित के पपिकारों सम एप निप्परम्पापरे क्षेत्र म सुधार के लिए पे मर है। साम्पबारियों में प्यक्ति के बार मे मो दृष्टिमाण हम दिया है यह उमे गुमाम या पटानमी बना देता है। हिमेल के पमुमार प्परित पी पाम या उसपी माय मा मामन गो उसकी राष्ट्रीय मपति स मिमित होती है अपार्ष है, महत्वहीन है।म राष्ट्रीय संगतिपो राम्प की यम एक कर दिया गया है पीर राग्यपी कारवाया इतिहास की इनारमकता के नियमों में पागित होती है। मार्म मे या रिचार का रमट लिया है और इसके लिए दूरागे पाया प्रातुन की है। रहते हैं 'मनुष्यों की पेतना उन परिवार का नियमही फरती पस्कि उनका सामागिरा मस्तिार उनकी पतनाका लिपिषत करता है। समाज-गुपार को अपनी चिन्ता में माश्म सम्पूर्ण दुराई पर अपूर्णता का शाण गाधी स्थितियों के मारे मादेनापतीत में मनुष्य को निर्यात उपची माफि मामागिर पवरपापी। यह एप वर्ग का पटल पानिममें पानव जाति का महान समूह केबस इसलिए बी पाता पानि यह उतारन के मापनों के स्वामियों को पाना प्रम देना पापोर येस्मामी पिता की भाव यातापोरापोपमा परे प्रत्येर धमिर को प्राप्त पन में मानाही देले जितने ग वह जीवित मौर गामान्य टिम ममय हमरे समाये परने समोगरे मिलते थे। परिमाणपस्वागतासाउग पान पर साम्पमापो प्रतिनिणरावो पनी पोर गरीब दानों का महायठा पले है। पनी ताग अपनी सागियो प्रमा' प्पा ठपा प्रमम्पवायोड़ देंगे और गरी में उसने प्रजान दागता मोर पपपानागापाहो मागगा। यह और है कि मनुष्य ममार में सिमामान मापामीन बनना है पिणनमे यह पिप नहीं निपारिनिरामबाप्पोमा पासा गामारिक हित पारपाप पमित महत्वपूर्ण पोपा मिर मिट्टी का पोर पामोरे नही जीपाशिमम गवगे भिटाम मा प्रभिनय कि गमा गागात प्राणी-मारी।। मनुष्य की प्रारमा दापय मतिर म १२ सस्पकौवोग गोपुप होता है पदो यो पनता मोर बियरता है वह मनुष्य के जीवन के लिए पहत्वपूर्ण है। हमें पारमा की सिी गहायों की गिनसे सब प्रकार की महान Fमा विशाम भोर साहित्य मा गम्म हाया है पदमरनी ही पाहिए । मार्स के भए ममित समान से प्रषित महत्वपूर्ण है और यही समार सर्वोत्तम मुमटिव पिसम प्रत्येक सदस्य एर परिपूर्ण एव स्वताप जीवन बिताने में समर्म है। यदि हम इस मापारमूमा माय मो मुमा देते है तो हमारी निष्ठा सिए मोम्म पदाप हिर हमारे सामने मोप रखा बाता है या संक्रमित मानवीय पषित पी रतिमा मात्र पाएमा। ऐसी बदधरी सामाजिक एराइयो । यो परिस्पिति की उप-मरापन, दिमी बीमारी पर पोपणारीमता । विन्तु सम्म गाया प्रापिप मोत से ही ही उत्पन होती । मानमरप पायेग, मानवीय रेना के प्रति मिष्ठर उरा जीनसा दूसरों पर पपिपार करने मीकामना पुराई से मूत्रमारे निर्माप में मी बर्न-भिवे होते है । मौमिक पाप का सिराव पमतामा पारिफार नहीं है। नामव-प्रावि की सहन कठोरता को पासावरण परिपतों से बस में नहीं माना समता । मार्स मादी पापा पूर्णत भौतिक पौर एस्पत्ति से सपा दित है । मनुप्य केवम समझने पार निर्माण करने के लिए ही नही परम् नापर्य एवं प्रपंसा करने के लिए भी है। विज्ञान हम सहित देते है दुष्टि नहीं बत ते ६ पनुशास्ति (समाम) नही। मनुप्प फेवस येह पौर मस्तिष्क नहीं है बह नारमा मी। म्परितमाम परही मार्स ने पूगीजीपी मप्पीय रांपास्मारकी पामो- ना की। इसलिए पूगीमारी समार को अपनी मुविधाएं सुरक्षित रखने की व्यस्तता की दामिक अमिम्पपिठ रप में म्यक्ति प्रषिकारों की बात करते मुनकर पारपर्य होता है । सम्पूर्ण प्रमति पक्तिगत प्रयत्नों से ही होती है। निर्णायक नाविकारों का मूल सोठ म्पक्किही है। यदि रम्ह स्वतंत्रता म प्राप्त होगी तो गठि पीस पाएगी। पर हम साम्पारियों पर रोषारोपपपरते हैं कि पनकी सरकारे ताओं नुष्यों का कठोर धमका परे रही है तो ये मारोप को पस्तीकार करते है । फिर यह काकर पीपार करते हैं कियाऋम्विनाम की एक कठोर नासम्मकता है। हम अपों को पारे बिना प्राममेट नही बना सकते। पर यदि विस्वास करते हो किबहा कानून एवं सस्प का सम्मान नहीं है वहाँ मोप पन स्पतिया को सहन मरते रहगे होश निरीपनायता का प्रार्थनाने। साम्पारमा एस बाबा यह है कि यह प्रतर्राष्ट्रीय है। यह कहता है कि बभिन्न राष्ट्रकमिकमा म उससे अधिक हित-साम्म है निवना एकही पष्ट्र पिमिम्न वर्गो म है। हमारा मक्ष कोई पुमिम प्रसप्ट विस-नापरिक्वाय विमास की पावरपक्ता नहीं है। किसी भी अन्तर्राष्ट्रीय समान मी रपमा पप्ट्रों के ही प्रापार पर होगी। सामाग्यत पिछले दो महापुटों में अमिरों में अपने-अपने देश कोशासा नहीं दिया। पर उन्होंने मन भावना में भाम नहीं लिया पौर बाहरी प्राण को स्वीकार पिया वब ये देशोह के पुम मे पग्गिव हुए। अर्मन साम्यबारियों पर नागियों मी सरसता पूर्व विषय का कारण रेवस उनकी निष्ठुर प्रगासी को नहीं माना जा सकता। यह इसलिए भी हुमा हिमोगो ने समम लिया कि बर्मन साम्पमापी विदेशों से निपषित हो रहे है। मावस्की और स्वामिन का निरोप साम्पमाद की अन्तर्राष्ट्रीय प्राति को मारही पा। प्रास्की पनुमय करते कि मस में पपार्य समागमाद होने के पूर्व कम से कम फुख रपारा नम्नत पोसी देशों में श्रमिक क्रान्ति का होगा भाषस्मक है। इस विपार के विस्य स्सासिम मापन पा कि चाहे मोर पड़ोसी देव पूजी भोगी पूर्तुपा मबस्पा मासे हों तो मी एक देश समाजवादी रह सकता है हो इतना है कि समागमादी देन पिसी पूंजीवादी विप्न में सुरक्षित नहीं रह सकता। सरिरपि प्रपने उपर मरे भार को विनम्र भाव से सहन कर लिया हा यह केवल इसलिए कि नमको विश्वास दिलाया गया रियविस्स पस्वी सक्तिमान नहीं हुआ तो पिरपियों के मागमन का शिकार हो जाएगा। एक समारवारी राष्ट्र के निर्माण में ममता बीदेशमक्ति मागमा का उपयोग किया गया। फिर पारियत स एव पुगोस्मारिमा के बीच कोई वाकि पन्तर नहीं है । पुगोस्मारिया प्रपनी स्वतंत्रता का सम्मान करता है और अपने को किसी विदमी पग्य के उपनिवेश के रूप मे बरते जाने से इन्कार करता है। साम्यवारी राज्य प्रपमे को पराबरन कि पपीमरप कप मे रख पाने की इच्छा रखता है। पीन में साम्पबाद इसलिए मोरप्रिय है कि लोग उसे विदेशी महीं अनुभव करो । राष्ट्रीयता पर मी एक प्रबम भावना है। विरेपों से मागत विचार माह बिसने शक्तिमान पोर उपनाकरों पिस्तु उमपी में भूमि में तभी मुएट हो सकती है और यहाँ पी यमायु के मनुकूम हा साती है बम की प्रारस्सस्वामों की पूर्तिपरस। दूसरों से उपार मिए एए पार्यत्रमा अनुसार फेरस मांग पर, हम समानों का निरास नहीं कर साते। परि हम साम्पमारप्रसारका रोकना चाहते हैं तब हमें युप बी महम १ लिन रिपुर में स्मरे प्रदेश के पार पसरे भापरिन ने करा: परभ्रेशर्मयोप्सम दोली मार दूसरे रमानो ARI भक्ति जागो में प्रापनाने के लिए भागे मनाने का मामला है कि प्रानी परसादा पर तमे वैरानएनोरशरप सोपासन में मिरिक, भामिनिस्मा नगर में सदा मारी मा रही ६, भाविकार गरपीसोग सामाजिक एवं रानीतिक समस्याओं का समाधान करना ही होमा। जिन देशों में पटिन मामागिर म्यामा तथा मर्प-गठन में उन्नत प्रभार विकगित हो पुके है ये मामा यस पाम्पबार के प्रति श्याम नहीं है । यो माग सामूहि प्र्टी में पीरित है ये सम्पनर मातुपों की पापा दिनामेवाम पिसो मुपार-पादासन का अनुसरन परम को तैयार हो नागमे । परिमोई उदार परम्परा पहले महीस्पापित होपी तो ये सामाजिक लोकसम्म म पर उसे बिगमित करेंगे। भुपार पूनीवार की जगह मोकतान्त्रिर रामासराव की स्थापना गरेंगे शामिंग म है। यहाँ कोई उतार परम्परा मही हाती मा किस्म में नहीं सर्वाधिकार बारीमान्दोमन सफल होने । धर्म तो पाहवा है कि हम मानव की उपरमप्रेमामालिक मामा प्रेम न कि भय साई पौरममा-को जागरित करें। फिर भी हम रेयते हकिमान्तिकारी पान्दोतम पपनी जीवन-शक्ति प्रेम मे नही भूमापी नामों से प्राप्त करते है। यह पूमा मामय प्रानियों के किमो समूह प्रति समासित की गाती है और उन्हे बमि का बापना गाता है जैसे याहरी ईमाई पूजीवावी या गाम्यवादी। पपपि साम्यवादी और र-माम्यपारी नोसामालिनीपन रेपन्निम मम्म प्राय एकमे है पर दोनों साधन एक गाय की परस्पर-निर्भरता में विश्वास है किन्तु दोनों का सापन-माप के पारस्परिक सम्बायो विषय में पक मत नहीं है। हाँ दोनों मानवीय मुनों की भापा म ही मका प्रबलोमा पमुमान मगाते है। पम मानता है कि मानव प्रति कितनी ही शिकत हो गई हो यह सपा रान्परित पी भनाईकी प्रेरणा की पोर उम्मुम होगी।ईमा कोकरानी सभासाय मिरतिपय भेष-मानाई तिरस्कार की प्रतीकारीकहानी है। मा ममे ही पृथ्वी पर स्व राम्प की स्थापना के मि पपने शिष्यों को मनिरबमा नेतृत्व करने से मना पर दिया हो किन्तु ईसाईराम्य मिले मामगीय पिपर्मों में एक न्यायपून परस्पा स्थापित करने की बिम्मेगरी मिली है घरीरचम का प्रयोग करने से पिरत नहीं दिए गए है। जो सस्त पारमामों पर गिजर प्राण कर उन्हें सस्प करने से सम्बन्धित है हिंसक माधनों का प्रापप नहीं मेत पोकि मे साधन पाप्यात्मिक साम्पा की पूति में समर्म महीं। इस प्रपूर्ण यमन में मकामा सम्भव नहीं कि हम पारर्मपूषता से पुस्त धर्म-योगमा का पालन कर स। साम्पपारी एवं गैर-साम्पबादी रानों प्रकार के राग्य इस शिपय में एकमत नि पाक्रमण के लिए हम सनिक वनका प्रयोग नही करना चाहिए। यहाँ त मानते मिमाश्मण के निराकरण के लिए भी हमें प्रनिमार्पन पारस्पाना मे पवित्र यारमा प्रयोग नही करना चाहिए । मुम्प प्रमाभम के राम निवपता कोई मई पीर मही है उममें निहित GY
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माय कीमोग परतु माप मह है कि हरेककी प्रकृति में ही निहित है। हमारे भीतर पा निम्न तरही तान के पापपरपान है। हमारी उत्तीफ परववा साम्प रेप पा शिरोप म हमारीहरता-पे सर मठान केही प्रमोभन । मामयता के प्रति हमारा प्रेम शान्ति एवं महयोगारमा बीरन के लिए हमारी पिता हमारे प्रपर भी दबी पिप तप है उगीही प्रभिष्पमिपा । रवान हम सबके अन्दर मापरत। मानर-हाय ही उसी पुषि है। "यदि हम कहते रिहममे पाप नही है तो अपने साबौता देते है और दम पाप हमारे अपर नही है । " किसी भी मामलरी संस्था या म्यक्ति में हम पिपुर प्रमिप पाय-याधीम पान-मार किया गया पाठा पाप-महो देश सकते। हमे समनी पसारपानी ग्रहमार पानादी पारामा पभिमान गीता मुवा कम होते है । हम पर हमारे पनु सब इन रियों पिरार है। मिठीन प्रोपों वर्ष पे विचार करें हो साम्पमाद की पर्याप्तता सप होनाएनी । ससार रे परियार बम रोटी वा भौतिक सुरक्षा की पिता म म्पम्त रहते है। जिया घिसी पापित शति के नेता होते तो मोम उन पौधार से किन्तु मनुष्य केरम पेटी के सहारे बीमित नही पता। परि रम्होने चमत्कार दिलाए होते तो ये समूहों को मक्ति प्राप्त कर सकते थे किन्तु अपनी चमत्कारिक पुषित प्ररन भीमको पापित करना नाही पाहते थे। परि रम्होने हिमा का सहारा मेकर इस दुनिया के पम्प को परापूर करने की स्वीति होती पौर इस प्रकार मानव-बादिकी एक महान समाज में परिवदित पाना चाहते तो बसमा जनता उमरामनुपमन करती। उगहोने पारित की पूजा मही की महिंसा को सीधार किया। उन्होंने गौतिक पुर्णा पार्मिक पसीनता या भावविश्वात पौर विस-अनुव पर मारपारमा सवा को तरपीरी। साम्परादी समान में पी.मानारमा सा मानणी पातप्रेरणा लेकर परसर प्राय माही। य हम बात ये पम्पिसित होते तोरकपत एवं समापद भावना भानायक पाहार प्रान्तरिक शक्ति पर मपनी सार्थकता की एकटी अनुभूति प्रपन करीम एक के विषय में भी रसौ पर उत्तेजित हो उठते से माइया विपप में होते है। यह एक ऐसा सापाम्य पावनिक कार्य प्राम करता एक ऐसी बाहरी पीरसारिसके लिए हम बी सकते है और मर समत पाएकमय पाकिबीवन का पाहार एकनपे पर्मपुरकी मीर भाषना। यह जाति किसी पान्तरिक पति का परिणाम नहीं पर एक मापक प्रचि मारमसमर्पणका परिमाम है।
पिपवास की प्राणायावा साम्पबार में सत्यानुमरण से मिए बहुत पम् गमालाई पविगत सपाई घोर पाप्मास्मि पूर्णता के लिए कोई मागावेम मही मामब-जीवन मी प्रन समताप्रति कोई मिप्य मही। राजनीतिक या पार्मिक सिी मी प्रमारा सर्वाधिकारवाद हो उसमे प्रारमय के बोर घिरे रहते हैं। वृष ममय के लिए बह भसे ही मनुप्पों के मन में मप संपय एब अनिश्चितता की भावना दूर करदे परन्तुमाईस्थामी परिणाम मही पदापर मकता । यह तभी तक सुरक्षा प्रदाम करता य तर दूसरे प्रभागा के प्रति हमारा मानम-पाट बन्द है। हमारे मस्तिप एवं अन्तःप्ररणाएं चाहे गितने प्रपूम हा किन्तु व सदा के लिए उस बुटिको पामोपनारमा त्रियाशीसता का मिगेप परमे म अफम नहीं हो समये पो प्ररपर मतबारे विषय मप्र नमरती है क्यिा यह माय है पर यो प्रत्यक पुरोहित एवं पिनापक रेबारे म पूछती है कि क्या पाया है। म्पमितपत सपा पर मात्रमणमा पमिवाय परिमाम हामा-माम्यवादी निप्ण हम पपन मार्य म पाहू मितन राम हम अपने गोवन मे पाहे गिनने पाराम सहा माम्पबादी मोउमा महम मदर म.रोगसे है। भीनमी यह मराम पूमा गाता है-या देहाबमाम के पार मी पारमा जीपित रानी है दम प्रान ना उत्तर पाहे गाहो पर इसम नो मोई मह मही निरपरीर गोदित ता है तभी मारमा प्राय पर पुषी होता है। माम्पमादमादमराप्रपाम दापयरिगापिपामिन माग उनारामापरण जो भी हो विधाम परते है कि मो-गहित सम्पुरा मनुप्यारे प्रति प्रम मार होना चाहिए साम्पमा परे पति पर परम्त मिश्य मगार बग्ने पाउतरन।पम साप महापार या मीनिपीपापणा करते हैं। प्रस्पर पति उमरा बगर राष्ट्रीयमा गा भी हो ईयरा प्रतिमा पा प्रतिविमान महार म प्राप्यारिमा प्रम सादेशिक है। प्रभाग्यमग पों ने भी मनुष्याला दो महो म निमार कर यिा-पापी एवं जटाइम माई य पर ईमाई।पनि निणन गगनमामा रे प्रति मंपए एव पुपाशा प्रगार रियामो मिगत पर माम्य भी समारहाणा में विभाग मोगरे पाने ममान प्रा मे मोरोपपरमे है। हम पामे समझौता नही कर मरने हम मंसान मे मोबात मे कर मरते है हम राम पराजित गरमाहोमा पोरगरा सारमा परदेमाहोपा-यह रसमस मोर मागम सीमा पूनीतीरी तिमोमिनारमा तरह सापार या मीनिक मार शिष मान मोमीवर परता !-प्रात् पूशान मनुष्यों को मारा लिपररता है पर मनुगमरम्नुमा म रमन प्रापित पनि यस में नरेला है। पापित पोपपदी निगरापरने तथा ममार मारपीगोर के समारगीरी मागबारे में भामगार ऐगे मारमो पहा रिला है जो प्रापेकेमिए नितिपरिणममारी ममार मनुप्प पा समार पराग पुबिना रेना है ना मागतो हम भी मिलतीगी पही तो रमो पूरीरापी निम्दाराने पाम भी पप गाएगा।मार्य पादियों के लिए यह गोपना मा शिर पुग! पोर गररारावर्ग प्रग्या है। ये मोग मनुस्रो उरी महार रेसर पारी महागराशा मिपूर्ण समारोप मानवीय जाति में पारमा यो पर माया परोपर्म गाविप बनाएर पोरती पर मार-जीपम पी परिपती उगरी माईप पाए पो रमो बौदिर रमनिय पृप्पाको स्पा उमर अपनीमार मदिवा पार। माम्पमादियामो पनुपए परमा पाहिल नि मार्य को पनागिन एतिहामि म म मिती गईपी पौर सीतापाता मबााम मिल नही है।पिपरिग्पिति और म मे परपपिर परिपतन हो गया। पानी में भी ती परिन पनि । बनो प्रभामियामीर पिसमागा- माम्पगार तिगत स्वताका मा ममारेन हा नागगा पौर मात्र गए मनपा राप राबीच ग्याप मिस मानेमापारोगाणे-ता बसमानमपप ममातोगाएमा। ७ सवातसायार गर पा रारपान भट्टरता मे नेती है सरकापहला पेय पाहापामम पाहती है। मत्तापरामता मिरा मायारा पोई परमानी। पामिर मिष्टानाष पामोषनाममा पित्ताबी पून पिमान में पानपो पाता ह कर हटा दिया गाता है। हमे मून बाहित मोरहम ग्रे ना तर प्राण नहीं कर साठ तर उन परम्परामानापामन नपरामशिभी पवित्र धर्मप्राप या स्पानिपारा प्राणह। सामानिए पपिप्प के पुम म पापिर मनु सातापी प्रामापीराती है। पुरातमा मोर हो पया है नया ममी दीर सम है। मानव-जीवनागुप मी भारविहिनही है। पिपिरीप बाली + गोनर भी बन ऐपी सप २ मपूर्ण पदार्प गुज ॥ गाएपे पौर मायोपविताबीपानि मोट मिपा जाएगा हम मानगिक पानि पौरमहा पा मगरम पार पर यहा पुर प्रौर पुरपी प्रपदा बीमों तथा शारोगन बमाका बामबामा, बाईपानामही है जब हम अपना बिवाम एफ ऐम पग्य पर मारपर्य में और एक ऐमी प्राषित पर गो बहा मुरक्षित मे मे गाने पापिम्मा मेता है रित करने बाप्प है। पर हम एक एम्मेवाड़ी मम्मदास का पहल पर हम सहन विश्वास की प्रावस्यकता पारमानों को जाम नहीं रेमन्ते परन् सहरतापूर्ण स्त्री-पुरूषों को ही पता कर सात है । एक ऐमी 8ता के लिए पा मी स्वतंत्र घोषमापन करती है, सायं पर्म मा एक भ परिहास में पास देती है। बाहरमत मामलों को मीजिए। रमजाविणाम है किपाममीरा न्यूयार्क के पोसफ स्मिम के यहाँ एक बात का पागमन हुमा। रेवदूत ने नगहें मुनहमी बस्तियों का एक सेट रिलाया भौर बवापा कोमम्बस के पूर प्रमरीका के निवासी परपियों के पत्र में पैदा हुए पे। इतना ही नहीं उन्होंने एक गोडा सुनहले चश्मे के सहारे उन वस्तियों को पर भी दिया। इस पामे ने उम मुम्दर हि लिपि को पसी पहरों में बदल दिया। उसमें एक ही गार भगवत्यापी का प्रकाश हुमा पौर उसीम सम्पूण पीरन की समस्यापों के पूम चतर, एक दम ये एक मेता सर कृष मिम पाते हैं। जब हम विवेकातिरस्कार करके निष्ठा की मांग करत तब उन पषि माप हाप मै मेसते है पो हमें गिनाम करने के लिए निश्चित धर्म मौर पापरण-महिनामा पापा कते हैं। काल पाप ने १६५८ में प्रॉक्सफोर्ड में एर म्याग्यान दिया था । उमर्म हापा 'सममी के साईको प्रादेय दिया पपामा कृष १९१३ में हुपा उमे वह सी प्रमाण के रूप में माम मे और से भाषिप्य म उतनी ही मम्भीरता मे पहण करे गिवनी गम्भीर से बह ईसा ममीह में रके प्रकार की बात मानता पर पहला है।" कि एक माभिधारणारी भम न तो उतार हो माता है , मौमात्रिक इममिए यह मरनवा मे राजनीनिक सर्वाधिकारवारा महायर पोर रोस्त हो जाता है। ये ममतावादी पर्ने व्यक्तिपत स्थानाम्य पार निजोपाई के मूस्य की परवाह मही करते। मगरमीता का प्रारम्भ वीर की प्रापरण-गरिया के पासन के मार करने माप होता है। मामला है कि समके प्रारमा निगम शोरे वाप जाना चाहिए। अपना ही रयाग परपी पपक्षा पारस्पर होने पर यह ममान मारामारने पानेमार पा।' मनोकाम पम्पासवग या मता के मारेग में वापसा रिमियम पर नै बिताया नधी मारा मर मिनायर देवो मनोमचायनीतिm नेपा। गित भावरदेवराम. तारांरभिम गण (Err) 1 ममगम मिल में बाल पार पागलप ममपनमनी कीबोरशरा मेमेनिमेि रात गुरोरी। -मानेर भार (101 राम भमरामाmutari ने में इस नारेमाहामनॉनर मे पराया मारेरेट सामो मुना नाममा विना (en), मा ११ में सम्मान गर १८U सारनीशोर परपाम नहीं करतापा। उमे पानी माती या मी पारि पर देगमा पाणिगिनि गरे प्राने मिगर n। मुगामा मिनी ईमानदारी मागरेग मुग भोगनीपोापति तिमान रोता है। इस विषय पर पाना भमर पप नगारगोनागिरेग पार शपिविटर है। पr R-नगा रामा पूर्ण मानाNITA IT मुम प्रशनमाला नगेनामा बोभ पा पार ल मेनामिह उनसोपतिरसीपी र बामनी मातिममिरा मनुष्य माग गरेपपा पर गार गन्नामा पारि fry मह उमे पानी मामला पानी परवा पतिदागारातीरे कि भारमानानासापाग गावापी मामन है। गगनगरमागा दिराप मिसात परमाधि। पर्म तितरविण निपटान , ये रिकामत परते । गगतापारी पौ मरवय ही उनके सागपा बीर मिहित होता है। दुपनमय तो मानान में प्रम मगर पोर पनिन्तिा बीमामा मन ही पूरपर रिम पे पापी परिमाप महोश पर रात। पी कर हम मुरसा दे साठे सर हमारे मतिर प्रग्य प्रमापारी पोर उम्मुगमहीं होते। गरममावती पम पार पनारपसार रोगो परापरम पोर्गे पर स्पिन पिनु राना परिगण के गिर। पत्र मागर उत्तररापी पमिना पोपामीर का प्रति(नौतिपेदित) ममातर देते पार मनुष्य से गली मानबता से रहित परमवीरेण ह। पिसारा रे पायनियो मतो पिरमाहेरपामिरहो पा गयमा मानव-प्रापियो पोbम मनोरे रप में परिवनित पर एमपी निरा उरीपन मो परामरने -मिया गिहे मेवा रे पापपर स्याग कर सहने के लिए पिर रिपा पाता है।' ८ सय एप पिवास हमने धर्म के रिम बिरयों पर विचार दिया है उनसे हमारी पिता पर नहीं होती भयोकि हमें एक संपमित पूम एर राजनीतिक एरा एक पम-सम्प्राम का सस्प बनागर हमारे अपराममा भोट तौर हम सामिप्रान परम। समय एक निराण से निरन्तर एक रियामासपर्प राही उनपर वियप प्राप्त trभामा fun # सोमामी तर मी तिन। ११. सपने मनपरीपापमोहार पर 40f. मुझे समीप राय पर्म गातो पुरे मना कर्मयों शिवामी पावश्यकता १ की वा सम्ती है। जब हम एक मोर के पन्तपत हावे है तो मपाय कापूरी तरह पौर स्याता रप में सामना करनेडाने मुक्त मानए महीं रह जाते। हम एक एस युप म ह ये है नो पपनी पक्षमता के प्रति वीरप से तम्प है और मनमानी सतिपूतिया की पोर समय है। सब हम तभग (नर्वस र पठन)ी सीमा कापस करननामे तीन प्रारमपरीक्षण म पीग्वि हावे हैं तब अपनी प्रति को स्थिरता प्ररान करगामी किसी भी स्तिकाम्बामत करने गार हो जाते है। हमारे मुप के लिए गो कोई किसी प्रकार का मामाम देता है हमारी पूजा के मिए मूर्ति प्रदान गरता है उसीकी बात हम मुमने सगत है। कोई माममिक विधि इस सीमा का नहीं गाती कि उसके अनुयायी न प्राप्त हो सरें। कोई गाय इतमा भूर्ववापूप नही कि ममुप्प उसके लिए गीमा देने को मार महा । हमार युगमा संतापकारी एस्प इममा ममारमबार नही है परन् मा विश्वास है-प्रम्बविम्याम के ये अद्भुत प्रकार चिन्ह पहप करने को कह ठेयार है। प्रनारमपानी बहन है पर प्रणिपाधी पाउदी है। विश्वास का युप महामारे माप है। उम विश्वाम पास विषय परिवर्तन होता है। हम एक पम पोरतपर दूसरे को ग्रहप कर मेते है । म पम गुप एसी पोरों पर निर्मित हुआ है ना मरय की निकासा मी मोसा पपिर पापारभूव है। पह है निष्णपी विरामी धर्म की मामला। हम म भापमाला का स्वीकार रने में पारे जिगमी भानारानी करें पर हम कुप निश्चितता ऐमा दृष्टिकोण पाहव परस्म है ना जीवन को कोई मानता दे पार उमे एक विस्पूष एव मारपसार प्रान करे। निम्तु य मई बफादारिपा तुम्याई प्रादेशिक मामे मपे पामाम करती हरिनापारण नय सेण्टों का मागिर्भाव होता है तमा सनर मरी विश्व-मरान सीमई महर पैदा होती है। व ममुप्प वेरनारीपरममीमा में होता है सभी सिर माम निगरोना है।तभी तब तक नहीं हम मस्पत मर्मभेदी मानी पुरार मुना देती है ये प्रमुमो उन में मरा हम पनामही नगद पहा पाहे " हम कहाँ गामि FIरावा ?' रिम पाम पारस जीवन बीमामी है? मद्दपाव पुपर पारियों के होठों से नही निवमती साविता प्रपनी राय रिपप में भारत तपा पूमा विश्वासीम होते हैं। तो मममने है कि रदान वर को अपना घर सा दिया है। यादती सोग ही जा सहली पारी म पुमो पा निगमको नहाए नहीं है। यही उम देना पोम्परतेविगे काम पस सिर के लिए सिर मे पाबाईपपूम मलाई राना है। इसम से बारीमा मोग परिवारमानी निराना स पनि ।। सिपा पोनिन कोसिस गनुर (L) और o, निसाल!
०२
तापपीमार
पर ऐमी मंगाग्मिरामिन पदरपा है निगमै गगी पामाएं भाप मी सानी!
ईसर के शिरगरसोरमारने रेसरम मनिरागावीपरमनीमा पर
पहराते है।
पर हम पाहोपनिरिकताना मी यह मान रिपरि मगराता में
नारममानहोतोपपनसमान एरन मायापी पायाप
पवानगीही तिने मोप। मरे मन में उपनगुपए है तापमपेसाग
दी प्रतीलाम है। इनमे पता पमता हित मनवीन जीरम की
तीमा परमक गे पौ-मानोगोर मेरे परिमाप्रारमा
माEिMमरिहित हो पर्याप्त प्रामापिक होगा मिर्म तप के
सुगम मानसी गमो रिमम पर गामरिल गामागि भागयो। यही
पार मी पामिक स्पितिवी प्रमुग विगविणाम माना मटित हो साता
हैरिस्तुतिमी पारयातामपालगमा मरी मान मपरत
गली मानवतारे
गिटिमम्मत परी पोरमा पानी ही होगी
एगे गीगा मनमाने पर पाहिरिनार परे मिपों मे मनुष्य की
मुगामा पा उपरानमरनेशमा महो-हरापमान न मिनरेभाम
पर हम उन मापना गमों के विरमपर्व कर समते है जोभार मनुष्यों
पीपारमापों पर मपगाप्रमुरा स्पापित परसेगा होगपरहे-
पोमा प्रध्याय यथार्थ की खोज में १ बमानिक दृष्टि धर्म-रिपारक पर के अस्तित्व के प्रमाण प्रस्तुत करते हैं। हमाह उपनिपत् म बासमत में पेटो एवं परस्त्र में देव मरते हैं। गत टामस विनाम के पेप प्रमाण तो मुसिव ही है। काष्ट ने मपने पिरीय विश्वास का पापार मामयीय पम्न करमपा हिमेस मै मानवीय मानपी प्राति पर रणा है। मर्म को हमारी मरप प्रेरणा को तोप करना ही चाहिए । पर सत्य है। यह मापसमाप है। मह सत्य स्वभाष पामा है। गांभीगी पिर मरम है मानहार भत्म ही पिर है महमहा ते थे। यह माम्य तपोजल के उपनिषद-पाठ पर एक टीका है।मम्मी पौर असामयी निम्तमा सर्प वरीय है। बुर गोर देर रहते हैं कि प्रमाम पर मापारित गिरेकही सरय के लिए हमारा एपमान पर है। हममे मनुरोप करते हरिसी पर्मचम्म को पाचीन हामे के कारण या रमर सेपक के प्रति सम्मान के कारण ही हम उमपर विश्वास न करें। प्रत्येक मनुप्प को अपने निए सर्प विचार करमा पाहिए और समय ही अनुभव भो करना चाहिए। ईसा मसीह पोर देते है कि सरप की प्रेरणा हमारे प्रम्तर में है और वही हमें मुक्त करेगी। गईमा हमें अपने सम्पूण मस्तिर के साप ईयर मोप्रमारने शोरले है तब उनका माप यही पता है किस ईश्वर का अपनी प्रजा के माप का हमारे पस्विर राप्रपालभंग है प्यार करें। हममे हिरेपण न कि मागारमर प्रम दीपानीमाती है। महापरकी भावना है महासयता है मुक्त होर चिन्तन एवं पापरण करने पर सभी परिस्थितियों में सत्य समय से पपिम मूस्यवान है। परिसरप हमारे मामने प्रद्मुत पिपिप में माता है यदि उमा कारण हमारे माग में कठिनाइयां पैदा होती है-ऐसी पटिमापा जो हमारे प्रियतम नियामों। स्पाम पर मोहमें सिरदेसी है-तो भी पम्तिम परिणाम मानपारमातिए निमोसा- म मरिनररित परत , म्श - - ४४ सरप कीसोग या समार पेय के लिए कभी हानिकारक नही हो सकता । प्रमुप्प की पीपमात्रा सर में सिए ममानन सोप के एप मे रही है-पिरतन गोग प्राप्ति एवं पुन' पार केमिए प्रया। इसी प्रकार हम विकसित होते है और पाने अनुभव में पति परते है। चाहे हम शामिाही या पार्मिक सत्यापन के लिए पूर्णत प्रतिपुत है। पिशान कोई मापामेश महोमपर्म ही कोई मतमा है। निशान इमे भो सरप एना है, महधर्म में भी बहुत अधिक गहराई साएमा मदि विमान मस्तिकम्मर इस तएमावा मिनिझासा पोरयोग फा अपना कार्य ही पोरेता है तो वह सत्य की भावना विपरीत है। मरिया पपने प्रमुपापियो पर से सतमा चिन्तन मन हा मैठा है और रहेमा पार देता है तो फिर एक अपविणास-मात्र होकर र जाता है। रानीसमी गवान्दो के मप्प भाग फे सगमम विमान मी उतना ही पहरो मया पा चिनमा कोई भी पार्मिक मतभार हो सकता है। उसने मान मिया पाकिपि इसमें मौतर की प्रत्येक वस्तु एक मिस्तृत मंत्रम मे है जिसम की हर पर होम भौतिक पर्चा पम परिणतित हो सकती है। ऐसी यानिक स्याम्पा सेस्कमावत मस्विर एवं भारमा के मूल्यों की मृति की सरप संभावनाए गाती है। पाधि इष्टिकोण विमान का पप्य नहीं हामिक की सोच है। नाहरण के लिए, माम्पबारकोसे । मह अपने को विज्ञान पर पाभारित बतमाता है और पोपणा करता है किसी कोई विर मझे। विधान उसकस गरे की पुष्टि मही करता। यह स्थिर से प्रस्तिस्य को ही प्रभाषित या पप्रपाणित नहीं काता से बह दस्ति के सौन्दर्य या ईममेट पी महत्ता का प्रमाणित या प्रममा गित नहीं करता। शातिर काम-माप के दो पहनते है l मा माvिoार तपासरे प्रारोहयामा देत हुए उनकी प्यास्पा मोहिमा निर्माण। तम्म प्रामाणिक होत पति प्यासा पस्पायी होती है। फिर हम मूल्पो का निप मही राबव हम सब मिनाकर प्यों की प्याम्या परम का प्रयत्न करते है एवं उसके मर्प मा पुल्प पर निर्भया कीबोपपा करते! वह विधान की पीपा कबाहर पसे माते है । शामिक मरिक्षक गौत्रकारों से सन्तुष हो पाता। सर्व सासर इमेबारमेम्मावि परिरिस परमानी नामोनिया मे किती मगर ना पण st समिरिक प्रायमरी सकायो पापो मनमा सिपबासमती प्रवरा से परमाणे तो परमविवि से मनाही देना निमें मसर बारे में विचार करने से पर-परIK पियापर स्प्रेषिका स्वमग कम से करदो किमयेरमा सलमेर। -रेस्टोरमा पिकिमान्स' (१em) in सपार्षकी योग में ७१ तरपणावी प्रौर दामनिक पम्तिग पारणों की मांग परते हैं। कारों की मनम्रा मामिका कोई म्याम्पा प्रस्तुत नही करती। पचन की मांति पर्म भी सर मिसाकर हमारे अनुमग मी म्याग्या परने का प्रगरन-मार है। प्रमुमप विविध प्रकारों का हावा है । नमका सम्पपदस्य गगन से होता है। वह प्रातिम विझाना के प्रापार पर प्रकृति के अध्ययन से सम्मपित हो सकता है वह म्पमितों-सम्बापी दुनिया तक सामारिक विमानों मानम पास्त्र तपा इतिहास सारा उनके विचारों मारनामों माफोक्षामों एवं निणयाने पम्ममम तक मीमित हो सरता है फिर उसका समन्ध केरम मूपों के उस जगत् से मी हो सकता है जिसमा मभ्ययन साहित्य दर्शन एवं पमहारा किया जाता है। हमें इन पिविष प्रसार के अनुमों की प्यास्यापसे मपन पप-दभम के लिए, एक सम्पय सापे का निर्माण परना पाहिए । प्रकृति मारमा एक सर-सम्पपी हमारी पारमाए भी मर जाती है मदि उनकी पहें अनुमत्रो के पदर पर नही होती। अनुमर की प्यास्या में हम बिक एवं तर्क को प्रणालियों का उपयोग करने है। सरपो पाने पा यही एकमात्र माग है । कोई मस्पापना या प्रतिभागी नहीं मो पर्म के लिए तो टी और तो सिए ममत हो। पामरामीपारणारे पमुमार परय एम मोर मर रो परस्पर-प्रतिम दिखाई पड़मेपासे पिचार परस्पर समयमा प्रनुसम किए जा सकते है। पन्तकरण की पारमापी गितमी भी पिपामाए है जिनमें पत्य जान पो पिपासा भी पामिम है उनका ममापान मरने की पावश्यकता है। पर हम संसार को समझने में असमय पे पौर उन प्रारतिक पापिसयां की दया पर जीते पमिनमा त्रिया-कलाप हमारे ज्ञान की सीमा पर्व नियंत्रण के परे पा तर हमने सेमार का सपने कल्पमाप्रमूत देवरियों से भर रिया पानपरेवी गोपरितुष्ट पप प्रमुगम किरा या माते पे जमे बैग प्रति पिपरा हमारे माम में पृमि होती गई,हम विज्ञान मो पपमी सफलतापों पर म हुपा और हमने मान लिया कि पार ता पो मुफ भी हो बुरा है या होगा 'प्रथम मोहारिका के प्रमुपा से मेकर रिमानपी प्रमति के लिए स्थापित प्रोम्न-परिपत् पीराबाई मी सम्पूर्ण प्राति एवं प्रनिवार्य विकास-पात्रा पी पाल्पा विज्ञान कर देगा' कि प्रथम प्रबरपा में मपापापो सत्यमो एक पहनये ही प्राप्त एवं पारिवतनीय पदार्प मान मिया मया पा पोर समझा जाता पादि म पपापना पोर उमरे द्वारा नियामित गों के प्रति पारमापण ही मामयमा कतम इमरी पपरपा पाई सो पानी पामनामा के प्रनुमार यमार्पोपको नियमित पर रमे अपनी दापों के मनुराम बमान रे मानर के सामम्प पो खान की प्रतिस्मोमि रान १ मिशन में प्रोमर पामरानापपरीरमाए।
सत्य की मोग स्वीकार किया गया । प्रथम प्रयस्पा में मनुप्पर प्रपने उपर नियंत्रण करने पौर प्रकृतिको प्रारमार्पन करने पर पमिक बा दिया गया थरारी अबस्था में पदार्थ प्राविधिक नियंत्रण पर प्रपिक बोर पिया थाने समा। पहली में प्रानप्राप्ति एवं पारमनियंत्रम की पारस्यावा मुम्प पी दूसरी म ऐसे शाम मापन परमे की प्रायम्मकता प्रमुख हो गई किसके द्वारा मनुष्य अपने पर्यावरण एवं परिस्पति पर काबू पा सके। यह पुरातन विस्वास ममी दुपसमय पहमे तक प्रचमित पारिदिनानिक मनुसंधान को स्वतंत्र म्प से कार्य करने दिया जाए तो पविश्वास नष्ट हो भाएगा रास्प पर से पर्दा उठ गाण्मा और मनुष्य म पम पुनिया का परन् पपना भी स्वामी बन पाएगा । किन्तु पब इस भारपा को नानिक तर पोहरे हैं। प्रब के मानिक बसी ममता बीनता की भावना के साप प्रपना काम करते है। नन्द मह बोष है कि बग के माचो एवं पस्यो के मारे पारा मानन एक समानी प्राणी है पोन महमामता है कि वह कहाँ से पाया पौर म यह किमहो जा रहा है । शानिकों को निश्चय नहीं किये कोई बात निश्चित रूप में पानते है। शम्त के क्षेत्र में प्रगति का हर गएम एक महत्तर-प्रमातमो नाटित करता है।महान महत्वपूर्ण प्रश्नों का कोई उत्तर नही देता कि क्या पम्गिलमागोई पर्व है बीवन का कोई प्रभिप्राय है पौर क्या बस्तुर्मों की प्राप्ति मे ही प्रीचित्य निहित है।माम ने गो ब्रह्माणी नियमित परस्मा मे पका रसना मा पनुमन पिया किनारतिमा विगम सस्प साम्म के निपप में प्राय मौन है। उसके विचार से प्रत्यक्ष पप गंधे प्रकृति के नियमों में नागिन है से ही साम्पों का भी एक राम्म है मो एक पननीय नतिक नियम के अनुसार परिवत एवं समबर। नविन बिटगेमस्टीन भी स्वीकार करता है कि पार्षविज्ञान पम्तिम या मनातन मूल्यों का प्रर्णन करने में प्रममर्प है। वह कहना है हम अनुभव करते है कि यपि सम्पूर्ण समय वैज्ञानिक प्रस्नो के उत्तर रेपिए जाएं ता भी हमारी भीबम्त सम स्माए पस्पृश्य ही रह जाती है। पीपा बिहान से अधिक विस्तृत है और मान् जीप मोरपिडिपापी है। केवमामभिए कि हम तई मे विसाम करते। यह निष्कर्प मट्टी निकमवा कि सामने माने पर हम किसी एस्प को स्वीकार नहीं करना चाहिए।'हा इस रहस्य का मन करते समय ऐसा न होना चाहिए नि मिसे सकारण सिमझान कहा जाता यसको फिवामाश्मि १२। .सी मैत्रेमा 'एक ऐसा रहस्वाद मोहममे भारम्मत और तमीम सीमासम्ममे रहरम सीम्म तानाधिको भरने कोन्तिम मी प्रति सम्माभित मा भी पानी सीमा रे परे की किमी मातु की पारचा निर्मिती -मीर इन हिंगेशियन यात्मोनॉमी (१६) ।
पपार्षकीलोर में है उसके और पार्मिक सत्य के बीच कोई पर्ष उपस्थित हो । पार्मिक पपापता म विश्वास रखने के लिए तार्षिक प्रमाण हम मते ही न रे सबै किन्तु उसे विवेक- सम्मत यो सिम पिया हो वा सकता है। गुरमान स्वयं हम विपि मा विज्ञान गरप से प्रापर्य, पम्प पापमय म से प्रा-मकवाई। गीवम पा सबस स्पप्ट तप्य उसकी सममपुरता भनित्यता है उसकी माघमारता है। ससार की प्रत्येक वस्तु का अंत है-सितित एम्म लामा परपर, ररित चित्र पीरतापून काय सब एक न एक दिन समाप्त हो जाते है। हमारे विचार एवं पाप हमारे यशस्वीय हमारी भाषिक प्यबस्पाए हमारी राजनीतिक मस्पाएं हमारी महान सभ्यताए सर इतिहास के एक गई और फात के नियम के प्रपीन है। हो सकता है कि जिस परती पर हम रहते हैं यह मी एक दिम मूय के पूरे एवं परिवर्तित हान पर, मानवीय बस्तिमों के पोप न रहे। सब वस्तुए पाम्वर पौर काम के प्रचीन है। पस्तित्व एव पणमगरता पानों का एमनमरे से परमा मा पाता।' हर तरह पी भारतीय रिचारपारा म काम भावागमन के प्रतीकमा म मिमता है । जगत्मामपर पौर मम्म-मृत्यु- पके प म गणित है। पान के लिए प्रश्न मह है कि या पासर्वमयी काम यह ससार हो सब कुछ है या इस काम के बाहर मी प है। यह समार, यह पटनामों को माप यात्रा मयपरित सांगीती पौर स्वपमिड है या इसी परे एवं सम मातहित इसके पीछे गा भोर हमे स्फूति देने पर सबसे परम्पर पाबर रमनेगाना पूष मोर मी है। इसके पहले कि हम इस प्रश्न मा उत्तर देने का यत्न करें हमें इस ममार के उपभमपी प्रमुग मातों की प्रोर प्यान देना होगा। सामे स्पष्ट को मिापना हम इसमें पाये हैं मह मी मम्मपस्पितता है। यह मागविष उपत्रम प्रक्षेप पम्पबस्पा पा पराप्तास में मही है। यह एप निश्चित विधियों-नियो रागामित है।हम मयोगमकर परम पार भरिप्प बता सकते हैं, अनुमासगीप सरते हैं शिरमनीयमान प्राप्त रममता और भावी मामा भनुमपान कर सकते है। प्रतिनिश्चित पपरवा मेमोई हस्ताप नहीं है। इसलिए हम उन पिपि-नियमों मो समझ मरठे । यो नगर पानिपमन है। यदि जमदनियम नुन-रहिन हाता परिमपरासप पोर बीररा एप तपा लिाम प्रमिपिहोता गंमारमा पमना पटिनाता पोरहमारा जीरम कम्पप्न हा गावा। प्रीन मही है। उसमें एक पान है एप मांग है निमः अनुमार १ "मनमानसमा उमो दिन तर सन 1 भीnirnप से निमियाममा पनि मे म प्रत। -म... "JHanfuski -रेन।
७८ सत्पकीबोर वस्तुएं पतिमान है । "पूटन एवं कार से मान पिधारकास पागतिक परस्पा सौनय से प्रभावित हुए थे। इससे यह निष्कर्ष निझमता है कि प्राकृतिक प्रापदाएं भी, जिनके कारण कभी-कभी पा सकर उपस्थित हो जाता है प नियमों की क्रियाशीमताही परिणाम है । परि प्राकृतिक नियमों के मियान्वय परिणाम को प्रन्यषाकर देनेवासी नाबा होती तो मान एव पौचित्यपूर्ण पापरम पसम्मय हो पाएगा। प्रकृति की अपनी एक मय है और यह मान के नीमन में मिए भी प्रायापक है। यह जगत् म्हारा पर्व शान्ति की परस्ति-मार नहीं है पहु भभिप्य की मोर प्रगतिमीम है । गागतिक उपक्रम में हम प्रस्तित्व की अनेक स्तर-मातिामो का चपय देखते है मामी रमते हैं कि इनमें से हरएक अपने ही निममो के मपीस बम रहा है, फिर भी पिक्ष्मी मामिमा के सम्मो से प्रमति भी करता या पा है । तैत्तिरीय नामक एक प्रारम्मिक रानिपद में ब्रह्माप के उपर में सत् माता का नया मिला भन्न' या पदाई (भूत) प्राग मी भोगन मना' या पीर मन विमान या मानवीय प्रज्ञा और 'र' या प्राप्मास्मिक मोक्ष इममें गम मेव है। प्रत्यक स्वर के अपने निभामा निम्न या काम। पो उसीपर मायू होत है। उच्चतर स्तर के नियम निम्नस्तर के नियमो की निरस्त नहीं परवे परन् उसमें कुछ मोर नया पोते है यो गुग में उनसे पृषक होता है। हमारमक मार्पवाद (हिगेम) यामारमक भौतिकवाद (मार्म) तक प्रगति के तम्प को स्वीकार करते । इतिहास प्रग्रगामी पति है पटनापो मा प्रमन्त पुनरावर्तन मही। उपनिषद् के प्रमुमार बगत् का गाय गमे प्राणिया श्री रामरता है जिनमें मनस एस तान मिनार मानतीमितिकमक पराह्ममोक (मात्मराम्प) की स्थापना हो पाएपी तब बागतिक उपनाम की गिय एवं सिटि हो पाएगी। इस शिपर राम्प इसमयमोह का पास्यासन हम सरपुत्र सुकरात एम ईमा से हरियमोए है। ईसाई धर्म-सिखाम्त भी इस संसार को सिर के राम्प के लिए मैयारी बप में रेसा है। यह मंसार मानव-जाति के मिए पूर्णता प्राप्त करने की एक अभिमनशामा है। हम स्पेंसर वकको संसार के वी साय में विस्वास पा। "पारर्म मामय का मन्तिम विकास निश्चित है-तना ही निश्चित गितमा कोई भी ऐसा निणर्प जिसमें हम पूर्ण पितास रखते हों-जैसे यह सब पापभी मरी है। उनके लिए "प्रगति कोई प्राकस्मिक घटना नहीं है परन् एक , मला मायरन सहियो त र मासु मठ सोधर्म (मोहोनालयकोशिभ मुगल गीतानु को नाम माय ।
७९ भाकीमोन में रास्यकता है। जिसे हम बुराई एवं मनविकता या सदाचारहीनता कहते है गमा मोप हाना ही पाहिए। इतना निश्चित है कि ममुष्य को पूर्ण होना गा।" मैमुएम पसेकरार हमें बताते है कि देश-पास (स्पेस-टाइम) पह नाचा रिसमे यह बझाग मिक्षित हुमा है या इमा है अपनी प्रान्तरिम नारयाता कमारण पेतमा ने उम्प स्तरों को सम्म देता है। इसने मानव नागियों का विकास किया है और यही देवी मनुष्यों का दिरास करेमा । म्हाइट डा गोईस्वर को परिपूरित प्रादर्भ सामञ्जस्म २ प में मानते है बझाए का प्रमिप्राम ऐहिक विश्व में मूस्योपमम्मि' यताते हैं। पोई भी दानिक प्रपस्न हो उसकी एक प्यास्या के प्रतर्गत रिपिप गर जब पतन स्तरों का समावण होना चाहिए । नमे जगत् के प्रमति कम रे तप्प उसकी पम्बितता उसके पिपास पर प्याम रखना चाहिए। प्रस्तिस्क के मो गुण २-परस्पा पिास सामिप्रायता- सर एक पारामिक प्रापार चाहत।। पह पस्तित्व है पर्यो ? किसी भी वस्तु को सत्ता ही पर्यो है ? यदि सम बस्तुऐ शिनुप्त हो जाएं तप पूर्ण पून्यता एमाएगी। यदि यह मून्यता परस्पा म करती पा उसम स्रय पस्तिरपदी संमाना म होती तो पिसी भो बस्तुपी मराराम होनी । मसार का मस्तिस्व मपूण एव परिचर है और यो दुध भी प्रपूर्ण है यह स्वयं अपने पाप या अपने सहारे रह ही मही साता पोंकि जिस सीमा तक यह माम है उम सीमा तक बह पस्मिस्वरहित है। उपनिपः इमें संसार के पपूर्ण परिताप से सर्वोष एवं परिपूर्ण प्रस्तित्व की पोर मे पाती है-उस पूपरपी भोर यो सर्वत्र है ऊपर नीम दूर हर दिशा में है जिसका फेम सच है पारे में पोटे पन में भी, बह जिसरी परिधिमही मही है क्योकि या सम्यूम मापों के परे सरंग फैना हुमा है।मसार परिवापस पप है-मत बी पापमिकमा। म तप्प का लिपस्तित्व है पौर उमा भारम्म है, पर्ष हो यह है किमोई पसी पौर सिमने सप प्रस्तित्व पहा नहीं रिया है। प्राचारभूत सिरावग्यता का पारिराजमही परिपूर्ण सत्ता है। सत्तामा पर्ष प्रायः ममा निषेपा साप मोर-मुस्पति है। यह प्रारममीन परमारमा है। यह पस्विरय एवं पनस्निपरेपो एम सर्वपररी सत्ता पर पातित मरप है। ईसर मे मूसामो मिस भगा दिहा रार ये पपने पापुमों की पा करें। ममा मे पिपरग पूपा पदि रे मुममे पूरि उगा नाप या है तो मैं उनमे पयागा?" रमे उत्तर दिया 'तुम उमसे पहाये 'म योगह है। १ मा १.१५-101 मोमोसो र शिताना सपने पर सर्वपारिम मात्र मानमिद मियबई माओuri -प्रशन पर मोसो सोमार्म पर पारमाणे बाप .
सत्यकोसोर । - यदि प्रसत् मनस्तित्व न हो तो कोई मस्तित्व को सत्ता कोई प्रमिम्पक्ति मी मही होगी। सत् वम पारमरण रहगा मौर कोई विकास कोई ममिममित मी होगी। यह मसत । पो प्रत् को अपनी प्रटम प्रारमनीमता में विषसित कर उसे पमिम्मत होने को प्रेरित करता है। यह प्रसव है या परको मस्ति-वप में प्रष्ट करता है । सत्पी भूमिरा एवं मसत् के मिसान्त बिनाको पिरीप सरप मम्मम ही नहीं है। यब हम कहते कि कोई वस्तु है तब हमारा प्राप्य यही शेता है किमहमद में माम नेवी है किन्तु स्पर्य सत् मही है। सत् को ऐसे निर्षिषषम्प में समझन माता पिसका सामना प्रप्रतीति करती है--सुशास्मा का सामना प्रमारमा करती है। अब प्रमात्मा के सायर में हरती हुई पारमा साकार सिर हो जाती है। मारमा परमारमा है। सिर को प्राति या मापा की अनुभूति होती है जिसे यह नियमित करता है। यह पारमा है पोर पनामा भी है पहरममा बीपन का स्वामी पौर पदार्थ का सुमनकर्ता । कर कहते है कि सब पराई सर-प्रसव-भात्मक है। मोहमे में इसे यह कहकर प्रकट किया है कि सब वस्तुएं एक प्रस्ति पौर नास्ति' में मूसर है। वपत् का यह क्रम सन् ारा पसत् पर सनातन विषय एवं नियमान है। इसलिए सत् पपने मंतर में प्रसन्को भी पारण करता है। सत् अपने को सबनात्मण जयत् मे सिर करता है और अपने मसत् पर हावी हो पाता पर्सत् उस सत् पर पापिठ है जिसका निषेध करता है। प्रसत् समस्साही अमत पर मत की बार्शनिक प्रापमिक्या को स्पक्त करना है। यदि पहल सत्म हो तो कोई पसत् मही हो सकता। साकार ब्रह्म प्रथम निश्चय है जिससे माप सब निश्चय गमूत होते है। सत् अपने पार स्वप पोपौर बो उराके प्रतित मा निय उस प्रसन् दोनो को रमता है। ममत मत का ही प्रम।। या ग्ससे ममग नहीं किया जा सकता। पर रहा बाता है किपर में पक्तिब उसका नही मर्म कि सत् असत् के प्रतिरोध कोपरारित कर मेगा। यह पसत् के रिपस्त को सिर प्रमाणित करता है। हिमेशात है कि परम पारणा (एक्सोस्पूट पाइरिया) नो पस्तित्व की पोर पोर मस्तित्व को पुन परम भारमा की पोर खीच मे गाने की शक्ति ही निपेष या मकार है। इस उपक्रम में परम पारणा स्यको परम मानस वा पारमा के स म मर्म करती है। हम मानते है कि यह पपत् । इम नाम किइसका एक निषेपसमाप है। परन्तु यह जगत् नही क्यो है जो यह पुबसरा क्यों नहीं मरे जगत् की जगह यही पर क्यो।' परि यह जपत् परमात्मा गा परमतमा की एक बैब प्रमिपति हो तो परमात्मा को इस जगत् कम्पों के प्रपीन होना पोया। यह ममावनापो के प्रसीम गग्य मे से विर का मोर स्वतन्त्र सम्म पुमान नही होगा। परियह ईयर पीसता पमर होती तो उमका मतलब यह होगा कि या की सोग में वरीम मगन किमाइस संसार से इस रूप में मम्बनहीं किइसनम में परिवर्तन सिर की पमन्ताको प्रमाणित कर सकें। सर सवार स्वतन्त्र है क्योकि यह स्वममू है। यह जगत् उस परमेसरको समत मता की प्रानम् यी प्रमिम्मकिन है। जगत् इस प्रम मे कोई घटना या प्रामस्मिकता नहीं है कि यह हेतुम स्प से पनिीत है । स्वतग्यता का पागम यह है कि निमयकारी कारण पन्चत प्रापयर मही है। यह दिया गया है ईशारा यह परम सत्ता के स्वभाष मे नही मिमा गा ममता । हम इमे प्रबोशिकता या परमारमा मी स्वतग्यता का एक रहस्य पाहे बो कह सरत है। परम्तू का मन है कि पर ही पासक है और उसकी उप स्विति कविना जगत् में काई गति ही मही हो सस्ती।यह ससार के लिए पापम नाम्प होने कारण ही गति करता है पर मुसाय प्रषप्त रहता है । जम के परि बर्तन उसके समाषको प्रभावित नही कर पात । मबना मास्मममापन (सरफ सम्पूनिमपन) पापाय है पौर यह पारममंत्रापन बरोय गीवन मी रस्तु है। हिमम परम सता (एग्मोम्पूट) को वागतिक उपक्रम म देखते हैं। चाहे हम कहें कि पारमा गति में बम प्रपनी सिदि कर रही है या कह नि पदार्थ पारमा की ाि में पतिमान होम्र अपने प्रति प्रेम हो गाता है गाल प ही है। हिमेम सायनुसरण परत हुए स्वर्गीय मोफंगर प्रिमम पटीमम न मिनार किया कि यात् सिर के प्रति गीत है बह कोई मास्मिर पटना से उसम्म नहीं है। हिमेम का दृष्टिकोण हम पर्व में सवग्यादीटाला है कि प्राप्यात्मिक सत्म एवं म्पात पमन् के बीच मह पनि य म सिमाम रखता है। मिरिकमा मत्ता () मग शिव पोर इम तिमी म माप्पमिम प्रमिम्पक्तियों के परे पनी गाती है। निविषय सनसत्ता कप में परमात्मा के साथ कोई बम्नु एकप मही हो गाती। पम्निान कम जगत्म ही परमामा पासमार समाप्त नहीं हो जाता। मह एमम्भावना है गोइस गागतिः उपप्रम में पूरी पीसा ही है। जब माग निगम मपम निषित पय पर पहुंच जाता है तब यह परम सत्ता काम पसागरहित जीवन में निमग्न । पाता है। गोबरवारी प्रियाण ही परम पान या परम मसाको ममाणकर देता है और उसे ममीम रूप एवं पाकार गमारपरदेला। पयन में परम्परा एक पर है और यह नसूण पपरपा र मानम की पभिन्नति पत' यह गागर परमपिन (मुप्रीम मा) नो पमिप्यक्ति है। म सग म साप्म मि समापना महारा मियामाहा महम्मान गपागपो यान नहीं है पाप निपक एवं सपटनारी यम का पोता है।' treीनारा पर मनरेगामारे सामने उभा म२ सबसमोर हम मा वो नहीं पामते कि भूत-जगत् में जीवन का पानिमा किन प्रकार मा पापीय में मम का प्रबेस कैसे हो ममा। पर हमारे अनुभव एशियनम्म । सब हमें मान कति होता है ? हमारी इमिया नगत से भी प प्राप्त करती है रमका हम एक पर्ष एक म्याम्या से करते है ? पाए गोम्मर मे पोप मीत के लिए कहा है यह सम्पूर्ण सृष्टि के लिए सत्य है 'मैं नहीं समता किसे योग मानस को ऐसा कोई मार भी परदाम मिमा फितीन स्वरों से पहचौपे कामही परन् पाकाप के एर दारे का निर्माण पर देता है।" पदिदन विविध स्थितियों पावन न करके उनकी म्याग्या मी देने 1 परत करता है तो वह किसी उत्ति (नीमस) की बात करता है (मायामान एम प्रमागर) मा हामिश्मा (म्मदस) की पोर प्रमृत्त होता है । यह एक ऐस ऐकिक अभिकरण (पूनिटरी एजेंसी)को प्रोर सफेत करतानो पाने विविध मक्सपो मनी म्यों का पा रहता है। वा संघटना के रिपितरो पर अपने को प्यक्त करता है और उसका समाहार प्राभ्यास्मिन मुक्ति म यो भागतिक उपम का नाम है होता है। यदि प्रापमिकता मी धर्मनकारी महोमोहमपमत की सपिय पसर्गमारमक पति की भी प्यास्पामही पर सरते। म्हापयर कपा है “बिसे मोप पर जुधिर्मपत पर्म का परमेपर वे यह एक मातपिक किन्तु पारमाकिन सत्ता है जिसके द्वारा बेगम सभा की प्रमितता मिनीव स्परचना में परिणत होती है। परिश्रम व्यवस्था एवं पदिपा बागतिक सिटाम्त विसे यूमानी "मोगोर' कहते व कियापीम न हो तो रागविक उपक्रम एक महान परायम्ता में बदल नाए पपा गन् एक निपल पिगमात्र एह बाए । सायना मा गागतिक परम के बीचबी समूचनमापिये या मध्यरमा काम करता है। एक कार्यशीन पावरमय ईस्वर की प्रतिक्षा या परिकासना सेही मानविकम्पबस्था एप प्रपति की प्यास्यापोगा सकती है। प्रकृति एप इतिहास समस्त परमम पिनों पम्तमान का स्फुरण हानियों का ज्ञान कमावार की प्रतिमा का कारीगर या मिपी का कौन सब पारमा वकारली है। भगवतीया हमे बताती बानाकर बरपासपसमापोरसे गर-समीरमा मूममा मानवा । कावासतिराम्त जितकारण प्रभावित बीपिरोल्पाकी स्पायसम्मानी। मेनन माम मतपरित दार्शनिक निम्तीपद मिो शिराप्त पनि पूर्वी कमीतुने मसिनो निर्मना । १ सालमा पाटन) ।।
यापैकी पोर में है "यो भी विभूति अपना ऐश्वर्य वा सत्त्व एवं मौर्य पुरत है उन्हें मेरे हो तसे तत्पर हुपा सम" वा सोग परती पर परोपराम्प का उद्घाटन करमा भाहते है उन सबकी विभूतिया परमात्मा से ही उपभूत होती है। अगत् रेस्सिारण मददी है इमसभाग, जिसके कारण प्वस्पित प्रपति प्रामाद है। बह साम कि इस मसार में एराई पौर प्रपूपता का पस्तिन क्या पार्मिक दृष्टिकोण के साथ मेम साता है विवासियों के मिए बड़ी विम्ता पौर परेपानी का कारण हा है। प्रादुर्भूत वस्तुणे में पपूगतामा तत्त्व रहता है। परि ऐसार होतो वर और उसकी मृष्टि में भेद करना सम्भव न होगा। अपूर्णता पवमान पग का एक पहन है। हम यह नहीं कह सकते विषम मुम-मुविधा का बगर ही पिरीय पासन (प्राविास मानमेंट) हे अनुकूम है । परि मानव-जीवन का मभिप्राय पुराई (पाप) एष म्पपामा प्रतिरोप करना सपा प्रमिाषय एष संसम पर निगम स्पापित करना है तो यह संसार समिए पमुविधारमक नहीं है। जीवन मी पनिरपवा ही से मूम्प सम्मान एर सोन्य प्रदान करती है। पदि इस पीपम मा प्रमिप्राप मंतिम पाप्यारिमा मूस्या कापारिही। वो एकठिनाइयों से बचना सम्भव नही है।पीट्स ने एक पत्र म मिना पा "तुम देगये मही किट एष म्पमा कोदुनिया बुद्धि के प्रसिराण एवं उसे पारमरूप देने लिए शिवमी परी है।" पोक एवं कष्ट का प्रतीक पास ही मुक्ति का मी बिर संसारमा प्रपते नियम में रहता है। पन्त में पजी को स्पूमता दूर हो पाएपी पौर पिरात्पय पूरा होगा। मही हिन्दुओं का मोक ईसा इयों का स्वग सग्य पोर मुखममामों का निहित है।बमोफस प्रारमिान कोई दूसरा मोर महीं है, यह केवल भुतिप्राप्त संसार है जर मूपी एरवी महापानि रिहिन सापक गिप्प का कारागार है कि सवार पिरासीका कारागार र रनकर तालप यही पारिरिहित परम पम्मान सताकी पनि प्पति पा सीमारण है। यह मिसापि मतापी एक जागतिक प्रतियापा एक मोगारिक पपरपालिमा पारि रसात परस्प होगा, फिर माहे वह पौटिनोटिव हा हे।इतिहराम मापा घिहित मे प्रावत है नाम निरम है। मागापो राम्रका परमोरोस संसार एप से पुपाला गलत है। दोनों बीपीपस्वामि है।म्पू.भार.नुसार मासत एमी पोई पागा नहीं दिमाती नि एक मिति नामावधि में ममुष्य मान्य ही १ सयममा पदमरा । वचरेरणादसा देखाभन १.४१ सत्व को और । पूर्ण हो पाएगा। एरबिन बेबन हम मोपों से कहते है कि मह मासना करने से पोकि हम मोनों के लिए भी इतिहास की अवधि में स्मिय पम्प की निकटता प्राप्त करना सम्भव होगा। प्रगतिसीम निकटता की पारपा उम्मीसगी चमीकोमामाम्य विका-भारणा के साथ माई 'प्रारमिक वर्ष में इस प्रकार की निकटता या उपवादन का विचार नहीं था। साधिर्म में मम ईपरीय सीम पाचा की मनिवार्यता है ऐसा कोई प्रास्यासम नहीं रिया का सकता किनिहाप की धमाप्ति होने के पहले पती की मस्तुएं पहले से अधिक पन्धी होगाएगी। ' सदा से ईसा प्रयत्म यही रहा है कि मानव-समाव होईपरीप साचे साम्य में ला दिया बाए। बरि यह संसार सिरीय अभिप्राय का माहाम (प्रमियक्ति) tो यो-यो समम बीतता बाए, हमहाम र पभिम्पक्ति पपिकारिक व्यापक होती बामी चाहिए। संत पाम एक ऐसे प्रगतिशीम विकास की प्रगपि की मामा करते है जिसका मम्त बना एव संकटाप सृष्टि के तात्पर्य की पूर्ति में हो।, मी इतना मानते हैं कि 'ऐसी मन्वहित हेतुकता हो सकती है मो मानव-याति बीवन को उस पूर्ण विकास की पोर मे पाही हो जिसका प्रमी पहुंचनहीं हो पाई है।" सब मिमाकर, उनकी सिकायत यमाता पर प्रपति की धारणा मागू करने के विस्य है। माता मा पस्पता के रोगों के मन्तर्गतही प्रगति समय एक घंभवनीय है। पपि प्रोफेसर प्रमश टोरनबी सम्पवानों की बर्तुम गति के सिमान्तको मानते हैं परन्तु उनका मुभाष कि सम्पतामा का हास एवं विमगम पर्म के स्तर पर महान बस्तुओ के लिए सीदियों का काम दे सकता है। ईसाई गीय एवं मुसलमान अपने-अपने विचारों हारा मानवाठि धर्मसार की पाया से कार्य करते है। ये सोम समापन-सिद्धान्त गो मृण्मात्मक विकास के अमे केदार एम मानिका में निवास रखते तिहास की प्रगति कोसीकार करते है। इस बागतिक पम मा एक प्रभिप्राय है। पोपमा है हम उसकी झांकी पा सकते। विन दृश्य भाम्ति से गिरे हुए है उसका मर्म एमम सकते है। जब इम बामविक सिरे से कार्य प्रारम्म परते तो एक ऐसी परम सत्तापी परिकल्पना तक पाते है जो अपने समाज में सत् चित् स्याम्प सक्ति पार भिव है। ग्राम प्रसीम सम्भावनामों का प्राभवस्पाम है पौर मुबमारमा पक्ष में , मामा मोपेस ()। पिम माविमरी (E) बातसयसम्मेलनमाला पर १. करिति १५ - रोममा ११ सोलोसम्म रियम 1-4मीपि। ४ सिविभिगेरान (C१४ । परनोर मीसार। स्वरी सपार्षदीपाग में । इनमें से एक मम्मावना को मामना के मिए समन्प से पुन मिपा जाता है। मन की धक्ति स के स्वभाव के बाहर नही है । यह उसमें कही बाहर से प्रवेश नहीं करती। यह सत् में ही है उसीके मदर प्रपन्न है। जब हम सपनारमा पक्ष पर बम देव है व उस परम सत्ता या पराएको विरा माता है। ब्रह्म एवं सिर दोना पस प्रमीम सद् एवं सम्भावना के सपम में पाता है पौर सिर समन को स्वतनता के में प्रयोम पिपा जाता है। इस गमत् पर बपदा निति (हिरम्पमम) पाप्रापिपरय है और यह न काही प्रकार (मनीफस्टे पान) है।' जगत् एक ऐमा अवतार है मिमा मांस पा पर एकपरमानना है। पनवतरित पिर ममतारमारी पर से प्रपिक प्यापक है। परम सपा स्विर एवं हिरप्पगर्म पा जगदाभिपति को प्रतय-अमम नही समममा चाहिए। परम मसा के दर्षन मिषिप प्रगार है। केन्द्र प्रशेय पम्प सब पस्तुमागो सम्म गर्न मप बनाता है। निर्षिषस्प बायकोई मस्पना भावना-मात्र मही है। मह पोरम नहीं है परन सम्पूर्ण विविक्ता का मोठ है । वह प्रत्पम्त होगय मन् है पौर पपने पमर पत् प्रत्येक प्रकार को मिए हुए है। निस जगत् महम राले हर परिवतन के मधीन है। यह मंसार प्रस्तिख का सौत नमा पाप एक मम्भर (विवमिम) का क्षेत्रमा भान भी है जहां हमें श्रीयन पाम गमभमे मा प्रबसर मिलता है। गर तर हम शान के पामे तट तामही परमातबर हमें पारा में हो बहना होगा। इस संसार की सभी वस्तुएं यपि प्रमत्य परिवर्तनलीम हरि मी उनमें पापताना व मयोंकि गरमें गत् निहित है। हम म समन् मे गनाउन रप से ए सान्ते है पोरि यह प्रदीप्रमाकप है। पस्तित्व के दम पगत् के स पर रिबिन विचार करने म ही हात होता? दि हम मप मोगों से ऊंनी एक मता प्रपश्य है रिमो मुभ महिमा पौर मिन ही मा..१४ पौमिति (सर) मुनमगा। AR (तिमिममिकी मीमा परेका परमारमा पनि १-१३। । गिर दिमिरर गमिास (१९५१) ए-15 मिनाम मास पीपन (1) rमाई (नि) मातमेस प्रतीक म्ममें भनेना। नुबासका 1 परम:" ममा निम्न पोरा नही पारताने रिममे परममानिसममहो।ती माय से दोय रे बगिर मीयोमा मिनिरपोरया पार स्विीमिया नमे मारप्रसारिनाम माग होती हप गावासापर मोटरसरही परम साराभर नam|-गमत (१५२rmi सरप की सोग - नहीं वरन् प्रेम और ममाई भी है। निविरस झसत्ता का मत संकेत किया जा सकता है उसकी प्रसना मार की पा सकती है परन्तु सरापन नहीं किया गा सकता पर एस परम व्यक्तिस्प में माना जाता है। निश्चय ही यह भपने हारा रत्पन की पई यस्तुपों से बा ।। मा म्पतिम्सी (पसनत) है पर उठ पर्व मे मही मिस पप मे हम म्यक्तित्व की निगल (पर्सनैलिटी) की प्यास्सा करते है। उसमें मनुष्यों में पाए मानेगाते सम्पूर्व सगुण है कि एक दूसरे पर्व में। वह मना है विमान है पर पस तप का ममा एवं विषपान नहीं पैसे हम है। हम पिपर के लिए विभिन्न नामों का प्रयोग कर सकते है परन्तु उसकी पत्तियां एक हैपौर समाम २ मानवीय संकट पापयत् बही नाहीयोसामिकों की सहायता से हमारी इनिर्या दिखाती है। हमें यम प्रस्के मतरंग का ही नहीं बप्ति मान्य के प्रवाद का मी सान होना चाहिए । उपनिषद की शिक्षा प्रारमा को पावो पाएमान मिति) इनानियों का पाठ पपने को सातो सब मारम्यान की महत्ता प्रदर्षित करणे है। प्रारम्म सेही धर्म-विचारकों ने मक्ति के कम्पन (मापन) उसको गोपन मतियो का पता मनाने की पेष्टा की और उसकी मत्सर चिन्तामों का अनुसरण करने का माल किया । मनुष्यू पी लिए एक रहस्य है। सुबरात मे इसे पनुमर किना पौर प्मेटो में अपनी रचना 'रस' में प्रत्पन्न प्रमावगामी म से इसे स्वस्त किया। मनुप्प सदा उससे मपिक गितना मा अपने बारे में सोच पाता है। जब मापने को एक पदार्प के रूप मे रेजसा । ठयमा अनुमा करने माता ष्टा, सस्प है जो अपने को बानता है । इस प्रकार ममुप्प सवा अपने में उपर पाता है। भारमा बिधारों की पसना की सिदियों-तमा कप्ट पाम के पनुमा परे पाती है। फिर भी यह सोचमा एक प्रम-मात्र है कि मानव-पक्ति मपने को ठीक-ठीक सम में गान-समझ सम्ताईसा पास मुबायोटो उन तत्त्वज्ञानियों का मगर माता मिनरा गिलास पा कि बेरेवापों की मौत पर से मानव-बीपन का पहन कर सकते हैं।' मनुम्म एक भौतिक बीर से पविक है। मानसशास्त्र देहिती मा पिस्तार-मान महो। मानर प्राति का एक माप ऐसा है बो वस्तुनिष्ठ , यह प्रस्तु , सामित पद बिस रस्म अरमात पण या राम रिमपिने मेरी वायाutr १.मारोपरापराबमेम्। मेद, ३ ५।
पापपी पोरमें मिष्ठ (मान-पाप्पणिय)पहमू ही मनुष्य को हम प्राति-जगत् मे अप्रतिम बनाता मनुप्प बम मसपिक वृत्ति का प्राणी नहीं है म मह मस्तिष्क का एक कर मात्र है । यह वहिषी मामरापास्त्र या समारबिनाम रे विषय के रूप म यो पुष मनता है पही तक समाप्त नहीं हो पाता। पार्मिक चेतना मी पृद्धि के लिए गो विविय सिद्धान्त प्रचारित किए नावे ६-प्रारमबारी ऐनमामि तपा समानगाम्धीय सर इस विपम में एकमत हैपि ममप्प के अप एवं ऐषान्तिकता पर विजय पाने का एक उपाय है । पर हमें यह भय है क्यों ? एकास्तिकता को प्रकमेपन की मह भावमा पयों है? क्या यह भयग्रस्त पक्नि ही गागतिक उपम का अन्त है या उसरी मोई और नियति है ? यहाँ तक भारतीय विचारतोंरा साम है पम का प्रश्न मनुष्य को वोटिस प्रावि पपने को सामने की उमग्री विछप प्रतिया तपा जिस संसार वह रहता है उसमे मम्मर है । सना एवं नाब मनुप्प को भोर प्राणियों से भिन्नता प्रदान फरत है। पेनमा चुनाव हारा नतिक उत्तरदायित्व र पहुंचाती है । ममुप्प परिया गे पोषित है।म परिया मे काम का मम होता है। मनुष्य पीडित मा पवित परस्पा में है। रगन प्रपमे को पगुस्वर मे पीरे धीरे विकसित किया है और पाने पम्दर ऐमी पारमपतना का विकास पर लिया है पापप्रमम्न मिरानम् एवं परित है।पुर पर है-पीरन पुग है। हम पर्म प्रपा प्रावपाता शाप | पासित धि में रहते हैं। (पारम होग) पतमा प्रवीरव' भी इसी सरप को प्रपट परता है। मनुप्प ज्ञान-ए काफम पाता है । परिणाम रसमा पचन है । ममुष्य की विधा में पौरिमजान मागे की पोर एक समान है किन्तु उमे पतन इसलिए पहा गया है हि मानव जीवन में एक रपर, एक अन्तर पैदा करता है उसके पाकि जम एमग एम्परपान प्राता है। पाप-पुण्य के जान-पस मा पम याने के बार प्राइम एव होगा को ज्याही पपाता के एकम रिम्ते में प्रबंध करने सामान हमा उमी पगारे मपपस्त हो पाए । भपपस्त इसलिए पनि पिया मामीन मान ने रामरे ऊपर को उत्तरदापित सन दिया नहीं ये उगती पूति परने म ममप महो। उनी प्रसस्पामो पतन की प्रबम्पा महा गया हैसपोरि एप ऐगी पोई बीरा पनुभपरपरामरी पोर कर ऐ पे निमसी एप मारप्ट मामा-मात्र उन्हें मिती पी। मुष्टिापाराम (नेमिम) दीपाको पामिद पर्व नहीं पहम परला पाहिए। यह एपपस्थित कपा या प्रती है। गिरमे पतन रेपूर एप पारपीपाश्मरी प्रबरपाका गिरापलिाया गया है। अपमाररपा में मानवीय जीवन रेमिए पिरतीपाता है, इमरे में माना भिम ।
८८ सरप की सोग मादेश मन हारा उस प्राकामा के रिमित हो पाने के कारण उसके पास्तविक बीवन की झांकी है। प्रत्यक जीवपारी अपने एग पर पूर्ण है अपने पीपल पर प्रनर बह अपने को पूतिकर मेवा है। मिस्सवह यह मृत्यु के मधीन है परन्तु उसे इसका पता महीं। यह (भत्पा) विचार ही मनुष्य में भय एवं एकारीपन की भावना पैरा करता है। यह भावना से उसकी पर्याप्त का निरसन कराती है और विकास केमिए उसकी मामस्पकता को मात करती है। बौसिक वना का उदय उसकी पूर्णता एवं निदोपता की प्रारम्भिक प्रस्मा ही समाप्ति की सूचना देता है।' ममुप्प मग्मा की भावना से पीड़ित है।वह विपी पौर परेशान होकर पूना है मुझे इस मृत्यु से कौन बचाएमा । जीवन की भनिश्चितता पौर मारमरमा की प्रेरणा में संघर्ष होता है। भौतिकवगत् में दो बावा या मूर्मा है, और अगत्म पो मारमरमा है मामबस्तर पर प्राकर बही निरन्तर बने हने की कामना पा स पर मेवी है। सभी प्रामी पात्मरसप या बीयम-वृद्धि की पोर प्रवृत्त है। वो मुपागमप कर पाता है उसका विरोध प्रानपन से करते है। समास यह है ममुप्प मृत्यू पौर शूग्मता या अस्तित्वहीनता का मन्त कर देगा मा पूम्यता पौर पस्तित्वहीनता ममुप्प का अन्त कर देसी? मरप-मय के निराकरण की पेम्टा में ही मामय में प्रत्येक पुम में ऐसे एम हेलामाों का पाविष्कार किया बो उन पूरस्म मोफों से सम्बन्धित है पहा मृतास्माए पर निवास करती है। प्रागैतिहासिक नानाखान' मानब भी पपने मृतको फोरफन करता था। उसके मन्तिम निर्वान की पारणा उसके लिए प्रया मीय पी। मृतक मृतक नही है। बप के परे कोई स्पान है यहाँ मृतक पते। पी पौर पूष का अनुभव करपे पन्हे अपमी सार-सम्बा करनी होगी मपनी रक्षा करनी होगी। इसलिए बोगन शरीर रणने के लिए रग माभूपन एष परम मृतक साग र पाते है। पर हमारे प्रिपनन हमसे मे लिए पाते है हम उनकी स्मृतियो को अपने आप में भगोकर रखते है पौर विश्वास करता है कि दूसरे किसी बगद में दी है। हम मानते है कि मृत्यु किसी दूसरी दुनिया में पुनर्जन्म फोटो से बिएन मुम्पुपरचिन्तन ।हावर के लिए प्रप्यात्मविद्या इस १ "माया मारपना-मा, ममात्र में गुरबानम मिमि पर। मे मतने के लिए पूर्व मनद के मत प्रापरने की भावना मही एक या बात की परम्से मारने के लिए सकिनु मा मेक्त गोपी मारनेरी पारस पपहीरोयम्बनमatesमसारमय खनाल पार्थम्मेवाबोबो समयसीमारको रसमा कमी-रेलर र ।
यथार्षको लोरम पनुभूति के साथ पमती है कि मनुष्य प्रस्तिरप की तीन परदा भावमा से पीड़ित है। बह गमत् में पंक दिया मया है उसीको पकोहए है यह भूमकर किना पसत् है मृय है। यह एक महान प्रम है कि हम इस संसार में शान्तिपूर रह सकते है। हीदेगर निपार से सम्पूर्व पस्तित्व, सम्पूर्ण जीवन दान-पम से एगिहासिक प्रति से प्रभावित है।यह पो भयानर निगालो से भातकित है- मृत्यु एवं सपभगुरता', तपा मृत्यु मम । होटेगर पहते हैं जिसक्षम जीवन समाप्त होने सगता है मनुष्य को जीवन की तीवनम पास्तविकता मामान होता है। ये पूफ्ते । कि प्रपन प्रत्त्वभाव और उससे प्रााभूत सम्पूर्ण निप्पो रे पापपूरपा यह सम्मम है कि काम म हमारे अस्तित्व पर ऐसी निरिपतता के भिए, पाहमारी पारमा को मासिक पारित प्रराम कर सक स्मान है। ऐहिमता सम पपने को वास्तविक भय के प्रभ-रुप में व्यक्त करती है। मानपीय अनुभव चिम्तापों गे पाम्पन्न है। मय उत्तेसाक्षों में प्रकार एवं काम क पगत् म करिए गाने से प्रतयार अनुमब में मनुष्य को मगना है मानो यह किमी रास्यमय भूपीएमी तिमिराम्यम्न भूमि में पहा है गो मगिठीय म्य-माप मही है बल्कि उसमे पुप रपारा पनारमक या सरम है। पर मनुष्य इस सब पता' (मपिममेरा) को अपने सम्पूमनार के मार पनुमग करता है तब यह परयन्त गभीर प्रशान्ति र चिंता की अनुभूति से जीवन की तीव्र प्ररक्षिवता से पीड़ित होता है। मनस्निरवरे साप यह संपर्ष पून्यतामा यह भय, प्राप्पारिमा पारमा उतनी नही है जितनी एप मानमिम्पिति है- हनीपति को पप की भावना कोरसेजित करती है और पामिर भनुमपान की पोर ने माती है। मारमयेतना में मंतिकस्तत्रता निहित है। मानव-यापी रे मोमिा पतिम सुगमारमा पारमाएं गोपात एवं प्रसाग के गमत् की पार यमनामों में भी नहीं है । मह महमा कि मनुष्य कोस्मतपता है ममात की पुष्टिकरन ममान हैपित एक ऐमावल्प बनमान है जो प्रमिमार्पत परापीन महीपमम से श्रेष्ठ है। निरपवाही पपने मोमासान्दर्मठसार निर्मयों में पस करती है। खतरनतारे उपपागारा मनुम्प अपने पासवी स्वरा उटा सपनामाफिर पागपिक जीवन पर गिरा सस्ता है। वह अपने को सामनता तक रिस्मन या फिर मसम्मका वा मनुषितरसता है। यदि हम मापाय परमर सिरा दिया MARATलिमा मम भी मनस सना न मनपर गमो गामा एपनियमिपा गाय मामरामलाल बाना सुरेश भर माना utinोस गी से, बानी में नगमा मरे निरासमारी मार समाजिम्मा पाण। Airtel ( १TU.
सत्यकोसोग स्वामित संप-मात्र है तो हमारे मापरम में कोई गम होई गरिमा नहीं है। पर हमें गमधीकरने की स्वतन्त्रता हो फिर भी हम गमवी न करें ठीक तरह काम करे तब मारे लिए प्रभसाकीबात है। मनुष्य के लिए, जीने का प्रर्ष सम्भव को अस्तित्व प्रान करना है। प्रत्येक मन हम मषिप्य से मोसम्भव का क्षेत्र पुनते हुए मपमा निर्माण करते है। पर इम सर्जनात्मक स्म में बीते है तब हम प्रसत् की शक्तियों को बप मे कर लेते हैं पौर अपने अन्दर सत् की पुष्टि करते हैं । सत्र चुनाव पासस्म से मुक्ति है। यह भूतकाम का प्रमबम नहीं है। यह एक उपास पिकात महीं। मनुष्य का पस्तित्व एवापोंकि उसे पता है। प्रस्तित्व रखने का प्रर्ष -भीर से बाहर निगमकर सग होना पाप प्रपने में होमा प्रपना निर्माण करने पर फिर से निर्माण परने के निश्चित तात्पर्य की पूर्ति । मनुप्स की कोई प्रति मही है एक इतिहास पर है । सार्य के विचार से मानव प्रानी में पम्म वस्तुपों से पीच पन्दर है। वस्तुए सतनी ही है जो है। मपने पापमें पूर्ण ।। ससकी मापा में एक बस्तु अपने-आपमें गर है पब गन मनुप मात्मा की मोर मतिमान है। टामस एनिवनास के प्रमुसार उसमे एक गश्य की मर्यादा है। स्वार्थपूर्ण महत्त्वाकांक्षा प्रारमनासक्त प्रेम दोनो का नगम मनुप्प की स्वतम न्या ही है। मपपि मनुष्य के मस्तित्व का सचा कानून प्रेम प्रति वीरमान से पामचस्प का सम्बन्प स्थापित करना ही है किन्तु मह प्राय इस नियम के विस्त मिडोह करता है। एक उक्त पारमपुष्टि भो नसे मात्मास्य की पोर में पाती है स्पषता पुरुपयोग की मुक्ति को अपना ही मास करमेती है उसपर सवार हो जाती है। सतवता के पुरपमोम की सम्भावना एक तप्प बन जाती है। स्वतत्रता का उपयोग यह स्वेच्छाचारिता विकसित करने में करता है। मा चापारिता राईको पाम रती है । मम्म होन का पर्व है सम्पूर्ण कुरा की साममे रमना किन्तु सामर्प रखकर भी कोई बुराई न करना । पुराई या पाप स्वतन्त्रता का प्रावश्यक परिणाम नही है। यह उसके दुरुपयोग का परिणाम है। पोप हमारे देवताओं या नमों में नही है स्वप हमारे अपने अन्दर है। हम उत्तरायी प्रामीह पोसंपस कर सकते है या होने पर प्रध्ये या उचितको धुन परत है और गमव या पाप को पस्तीकार कर सकते। हम बाझ पस्तिों मोहमारे परीर पर नियमन रसती है और हमारी प्रारमा का पासन करती १ सिकार मही है। मुरिपीन के ट्रोरस (110) अनुसार पहेलेन ऐकोपोते के हाल में विध विकारोप में होने के कारण अपने प्रावरण को सपित बताती है हेमा उसकी बातों को अमाप पर देता है और मोपित करता है कि पेरिस कसौन्दर्य के कारण पोरदाय में निब एक मिासिता का बीयन बिताने की मपाप की खोज में गम्भावमा केमारग हेलेन म पन्धा म मरे साम गामा पसन्द किया पा। हेगा हेलेन से कहना है 'साइमिस मे नही तुम्हारे अपन हृदय ने तुम्ह परिम के सामने मस कर दिया था। मानमा भम-पुरे का नाम है। यह विस सोमा ता मानवीय हाता है नम सीमा परु उमे ममाई या दुराई पुष्पमा पाप परना ही पड़ेगा । मरियह अपनी स्थत पवा का उपयोग किए बिना रहता फिरता है स्वयंपामिव मंत्री भाति कार्य करता है तो यह मनुष्य मही रह जाता। धामाप निश्चित म को पारम रामपंग करने की पोषामुपकरमा भी प्रग्या है पर्योकि उस अपस्पा म हम अपनी मनुप्यता का प्रमाण उपस्थित करते है। किगार प्रनुसार स्पवयतामा सम्य इस पिम्ता इस मप मो जन्म देवा है कि कही हम अपमी सतलतामा दुरपयोग नरें। प्रवासातम्प यपपि मनुष्य को पामों के ऊपर स्पान देवा पापि उसके साप ही यह उमे चिन्ता पापाका से भी पूनपर देता है। गे पतन की सम्भावनामी बनना बनी यती है पानिपनी पारमा में पा जानता है उसी प्रानि याससभाप में नया उस समाव भी रखना मरनेपाली परित म प्रमाउताए मौजूद है। विगाही मसम्मउवामो गा प्रमगतियों को निराशा और मूरपू मुखी पस्यस्पता' कहा है। सा के मिए मनुष्य यही है गिमा यह माम्प परला है जो पुपमा अपनगो बनाता है उसके पतिरिमा बह और गुप महा है। पर मात्र ला! पाहार सरा मस्तित्व है तरह प्रतिपादन करता है कि मानवपी कोई वास्तिर प्रमही है । यह यो धरहरी अपने पाबनाता है पाम्नु मे सोग मही पाता। मनुष्य यही है या कुपबह अपने को मनाता है। यही तालिम पौड पर्म है। जब प्रतिपदान्त एप सनातन परिवर्तनीय पारमा भी मान रहा है तानमरा सरिमा स होता है मानिनिय है।यक्ति मामा में ता मिरय परिपनन हो रहा है। मनुष्य म एमा पुष भी नहीं है मनुष्यान।। मात्र मानपीप पामतापमाहामालाई पोर उसपर निराणा पानी पनागरता है। या हम इस दुनिया में भाते हैं तो पनाग करत के लिए बिहाते है मतम्य होने में हम पगित है। मा हर तरह के निरपरा (मिनिम्म)मा पिरोप करते हैं और इमरी पुधिर मि माना पप में पूर्ण स्वाय निउ घरमा नाम मत मागिरहनिमी प्रयो परमिभरमहीलामपिसी मतीन से ममर है। पररवा मरिय- प्रोपरन म पपमी एपमार गार्पपता पापा ममुष्य स्व हो अपन नियम-नानून है। उमने रहने को पुना मही या दो नम होने परे मोनिटर पापोर है।हम मनमा मनिए रानी है कि रियरमा पान मात्र के अनुमार यह पागा रे पोर मारी हो जाती है या यह अनुमा मानर सत्यकोसोर बम सबको झेवा है कि हममें से हरएक चम अपने मिए नही बस्ति सबके लिए चुनाव करता है। पारमा प्रकेमी नहीं है पर इसरों के साथ मनेक सम्पयों के पाम में बी है। स्पर्स के विचार से हम इस संसार म संसूचन-मिरत पारमाए (सेम्स इन कपूनिकेएम) है। सात्र के मत से हमारी पसम यहाँ तक महत्वपूर्ण है यहाँ उपमह मणिक नहीं है पतिमीवित पकर हमारे अस्तित्व का ही पंग बन पाती है। हमें कोई ऐसा चुनाव नही करना चाहिए निसे हम उन दूसरी पारमामो के मिए उपित म समझते हों को हमारी मी ही स्थितियों में हो या हा सती हो। पड़कर हम काप्ट के निशान्त की मार मा पाती है कि हमें कार्य इस रूप में करना चाहिए मानो हमाग प्रत्पक कम सब मनुष्यों के लिए मनिवार्य एक सारेभिक नियम का प्रापार हो । मनप्प बोरिक रूप मे परमा-माषना से पौर विक रप में मात्रा से पीरिव है। प्रारमविपनेपन रेसों में यह अपने प्रतीत की परीक्षा करता उसका मन मर जाता है वह अपने बारे में परियस्त होकर कभी पर कभी उपर मटकता है। यह कद नपा बहुत मस्सरण हो उटया है। यम्य की भावना उसे पता है उसे मगता है किमान पुन अयोग्य मिषित प्रशानी बुरा एन अपविष हो गया है। यह मुनी प्राणी मिसका परम पुप्त परमार्क से भी एवं अपित है, भमानक स्प से मकेसा होकर बाहरी समितों से नही अपपे ही सामना रहा है। मह बिमागित सगित शिर्ष मम से रमित अपने साग संमर्परत प्रापी निरापा बोम सब पाता है। इस पिमानन सेवा पौर कोई एच नहीं है। पंकन सम्म मुगिरित है "यह मनुप्प सी विपिन कम्पना है ! *सा भागीय ! पैसा दान। सी मिशहमता । ईसा परस्पर-विरोषासा विमान ! सब पस्तुपों का निर्मापक विषारपति । सा कापुस्प | परती का कीड़ा सत्य का मामा, प्रनिश्चिाता एक प्रम का गर्व असत् का गौरप एवं मन 11 मानव की प्रारमचेतना पुराई-ममाई का विवेक स्वतम्यता एवं चिन्ता, मसत् के तपम ये सब मिलकर उसे पाम्पास्मिक मुरमा एवं निश्चितता, सामन्यस्म एवं साहस पी को प्रसव पर मन के विजय के परिणाम है, पासना करने के लिए बाप्प परो । असत् का मान भव पासका एक प्रनामम्मस्प पैरा करता है और ये पयसमाएं को मानव वतनास्तर पम्तर्गत है पसत् के पम में प्रमाणाप है। यह प्रसत् सत् हारा विपित होने को मातुर । पर्म की प्यास पचपता-अनिम्नता के लिए पेप्टा एक मिन बीबत की बोर-चम १ मार ।
पचार की खोर में - सबसे प्रकट होता है कि मनुष्य को बेवना केही मार्ग से प्रामेबामा है। उमेत अगित पटना की सीमामों के पार गाना ही पोया। श्विर रा मुमा दिए पाने की भावना स्वयं पिरको उपस्थितिमी गवाही है। इस संसार की विषमता उस पार के किसी नोककी पोर इंगित करती है। काम के अन्तर्गत प्रामा बीरन की साकोसा है। मास्मषित निकी प्राधियों पर पता दुरपयोग के कारण पतम होता है । उमार का मार्ग बुद्धि के परे को प्रेरणा है उम तक पहुंचना पौर स्वतन्त्रता कापित उपयोग करना है। प्रेम के फामून का अपमे प्रापपासत मरने में ही स्वतन्त्रता का उचित उपयोग होता है । एक ऐसा पपापमो वर्क के पे एकही महरा है। यह मानव के पस्तिरब के मूल में है और इसीके कारण मनुष्य प्रतिमा पवित्रमण कर पाता है। हम मुमुप है सापक है तीपपानी है जिनका इस परली पराई स्पापी निजाम या नगरी नहीं है और जिस नमरी म गाना है उसो सिए हम निरन्तर बम रहे हैं। मपाता के दबाव के कारण ही हमारे पम्पर पचाम्ति पैदा होती है । उपनिषद् की पापी है असतो मा रायमप । तमसो मा ज्योतिर्ममय । मरपोमा प्रमुट गमय। प्रात् प्रनत से मुझे सत् को मोर मे बम प्रकार से मुझे प्रमाग की मोर मे बम मरतु मे मुझे प्रमृत की भोर मे पास।" ईगाई स्तार रयिता (मामि कहते हैं पपने पसरतम से तुझे पुकारता है। यह पीपवान मह पयामि ही मानव-जीवन को इतमा रितस्प बनाता है। पहाटे पारमन है माग्मा दी पूर्णता उस जीवन से भुषित में निहित है जो पूर्णजीयम ना मा पोर उसीम सग्निपिष्ट है। हे परमेश्वर ! हम तुममे रिनप करते है कि इसममित जीवन में निम्तने पौरस संयुक्त जीवन पाने में हमारी सहायता कर। माननीय पारमा (मेर) नाप मारमा (मस्स)नही है। यह मति मारमा -पारमााबो हाला पाहिए पोर को बाहो माती है। मापारम प्रायापि ममानास्प एक पारमा पाप्या मर भारमा है। पर पारमा सिमित होपर पाप्यारिमा पाामा में परिवरिलो मरती है। मनुष्य पण मानिसमान मारिपरमही है।परमा मनिमम है 15 साली मृजना एएर पनविना में मार Lti' रिंगा पनुमार गारमा (मन्त्र) स्मार .16 प्रमेश भनुषा पुरा , त्याला मेम mmtanरालोमा निमा मारत मापन मेमने सामरदा ग भनय सत्य कीबोग प्रस्मस्मता पौर निराधा से मुक्त होकर तब स्वास्थ्य एवं पूर्णता-माम करती है पा 'बह अपनी ही पूस्मिा से सम्बन्ध स्थापित कर उस पक्ति में पारपर्म स्म से पपिप्टिक हो जाती है जिसने उसका निर्माण किया पा1 सम्पवा के बिना प्पषिताव के पुनरम्य की संभावना नहीं है। स्वमता के प्रति मनुष्य की इस बेतना में एक ऐसी संगति है पिसकी उपेक्षा हानिक को रामही की वा । सकती। सतगहता की यह तमा काम एवं प्रयास के बम का प्रतिक्रमण कर पानगामी प्रामारिमक पदार्पवा के साथ निश्चिम्प से सम्बय है। माननीय प्रगति में प्रपार घमवाए मा प्रतिमुताएं , पकि भागतिक उपभम परा कोई पूर्वनियत मय नहीं है । स्वतम चुनाव करने की सषित हमे मषिप्य के लिए पापा प्रदान करती है। हम संसार की पुनर्रचना कर सकते है। हमारे परिण में पा रोप या मानस में धो मुटिया है चनें हम दूर कर सकते है। पवि हमारने का मन करपे तो जगत् की पक्तिया हमारी पहायता करेंगी। हम अपनी पेतना मे मानव-विकास की प्रश्मिा का संचामम कर सकते है। प्रावि मानव-पस्ति में ही प्रपमी पूमता प्राप्त करती है क्योंकि वही सर्वनामिक अभिमा का निर्माता है मापगत् का अप्रतिम प्रतिनिधि है जिसमें प्रकृति की पवन सर्वमा चेतन सर्मना बन पाती है। मन्तनिरोपों का पर्प यह है कि वह विसफारी पाक्तियों का सामना कर सकता है और उनपर विजय प्राप्त कर पाम्ति पा सकता है। मानम मागी एक ऐसे प्रप्रयेम्म एकान्त में बहुत समय तक नही रह सकते जो ठम्ह नन्हींकी पपापूर्व काममामो का घी बनाकर रखता है। निरोप कमा एक प्रयस्मा कोई मंगिम नही है अन्तिम पेतम्य नही है । वा है, किन्तु नष्ट होने परागित होने के लिए है । यह पाभा एवं उपम्पि के बीच हम म हो सरी तीचठान का प्रतीक है। भारतीय विचारधारा हमें अपने को बन्पनमुक्त करने का मादेत देती है। हमें संसार से प्रसान्तिपूर्ण काम-सीमित जीवन से मोक्ष पा मारत बीरम में पाता है। बम तक हम उस अमेर-जीवन को प्राप्त मही करते हमें परसर मिमते रहेन । कर्म के नियम से पासित संसार-सिवात इस बात पर त देता है कि प्रत्येक प्राणी को अपना लक्ष्य प्राप्त करने के लिए अनेक प्रसर मिमते । प्रत्येक मामी मपने कर्मा एवं प्रवृत्तियों का परिणाम है और मपने संपबम हारा यह सपने को सामने। दोना शिनु ने जमा म येसबानवे दमन कारसकिय परको मानते रापदि में पहले साल मातामाबोबतो मकबाम प्राप्त करने में कमी सण्ड महोते मनोहर पश्विमोनिये फिर प्रवयिा 'बाप मा सोहिमाप : मोने पर पि 'और है। मने पूपा, "भो। मनवा मा “सलिए किन मतसरा हम मे काकीना।
पदार्यकीखोन में इन पौ एवं प्रवृत्तियों का परिमोपन कर सकता है। पर रहम अपनी यात्रा के अन्त या मधिम पर नहीं पहुंपते तब तक हम पर्म साना मे परे। जिसकामा मह है कि हमारी मायण एवं कर्म हमारी प्रति नियंत्रण पसे । हमारी मतमाम मनस्पा हमारे प्रदीत का परिणाम हैपौर पर हम जो तुपकरेंग रह हमारे भविष्य का निर्धारण गरेगा । मृत्यु एवं पुनम इमाम मैं वापक महीं। अपनी वर्तमान स्थिति के लिए हम सम विम्मे रार हमें ईबर या अपने पासकोमा बर्तमान समार-पपस्याको दाप रेमे की पावश्यक्ता मही है ।' से हम पां पुष मान है उसके लिए सम सिम्मेशर । से ही भविष्य में पो हमे सबै समरी निर्मित कर सकते हैं। हम प्रपमीरवमान पापा मैं साने के लिए नहीं है। यदि हममें साहस एप निमम वो हम अपने भविष्य को एक मय साप महास सम्त है।म निपतिवार या माम्पबाद नही है।'पदि हम अपनी पाकक्षिामों में सम्ने पौर मपने पत्नों में पके है तो इससे कोई प्रमतर नही पाता कि हम सफम होते है या नही । वो कुप मी प्रति हम करते है बद मूस्महीन नहीं है। गाय परिणाम जी भीहो पारिफ उमति हो होती ही है। माविष्य मी सामग्री पनिस्चित है। हम महत्ता मूस्य माय मौन्दय या फिर परके प्रतिम पस्तुएं पैदा कर रहे है। इसकी निम्मेरी ममुप्य की प्रपनी है मीमिए माननीय स्वावन्य प्रति पी सीमा के परे म्सिी वस्तु को मत्यता को पर्ण करता है। यह प्राति फिजूस पा प्रर्दशन मही हो मातो भयोकि पर मूस्यों कोरपनामोसंगप बनाती है। संमार में एक मंदिर व्यवस्था पर प्ररयर मनुप्प प्रपम फर्मो लिए उत्तरदापी है । उमरी मम्त प्टि पोर सरयापरणका तब तक बराबर पिकास होता पाएमा जग तर यह ममुप्प पूमठा नहीं प्राप्त कर सना। पपने शान एवं प्राधिकेविराम सिर प्रबमरों की गंगना का यह निसन्तहिन एवं बौर पनों के कनीय सितारा में स एक है। इसको पग्य परिमनियों मे पेस्ट एवं होटल मोमी भनेर यहूदी एवं मूमनमान महामारनपसनासिनतासामाता नारीत अप . MIT पश्या३ सरपो। पामा मामिलो देन N२० :"मो पुरो'लो !! मनुपको बम्न अनुम्बर पाने IRR Realter मग ग्रमर मर हो पाया मरो मा मौसमन्दर पुराणार तितरम में पति मर गरेमा रामन ममी। -अंगुष्मनि ।।
सत्य कौमोर मूफियों इतिपय प्रारमिक ईसाई पोपदेप्रका तपा मार के मास्तिकों में से भी पन्यापी प्राप्त हए । पारपागोरस इम्पेहरोमीर योग माटिमस मोर मासिंग प्रमेर औपनों में से होकर पक्तिो कमिक विकास में विपनाम रखते थे।कार त करता है कि म युगों एप मानद बीप मामंजस्य की साधना का माद एक पीपन मे सिर नहीं हो सका। इसलिए हम प्रसीम प्रगतिपूर्णता पेपको एक बार एक प्रापे बहानेवासे का केरा पिरकर सकते है। पटनापों की पारमिता एक मापु-चिन्ता में उत्पन्न पापा भाषणा पारमा कोदोष एवं पाप करमेकी जिम्मेदारी से गपम्न प्रापका जीवन की रिसतवा एवं निरर्पकता की भावना से उत्पन्न प्रचामिन ए पसामरस्य मे पुपर कर देती है। पतन दी मारना मनुष्य मे उन सबरीय तपकी साभी है जो उसके प्रातम में पूर्णत मत होने के लिए वर्ष कर रहा है । प्रपनी सन् स्थिति से उसके दरबामे को उसको पनि होर करना होगा और उसकी जमा पिता की स्थापना करनी होगी। यह विमुर पौतिक कार्य नही है। हमम बो सर-तत्व है समके प्रति हि सबसे बरा पाप है। मनुष्य मकान मे पोर पमान में ही पाप की सत्पत्ति होती है। पापि नापतिक प्रषिया के प्रप्यम से हम एक परम बाकी सत्यता तक पहुचते है मानदीप पनुमा दिसलेपण से सिर मानर के निपर भागाला है। परिस्विर भोर माननीय प्रारमा रोनो पूर्मत मिन होते तो कोई पूर्ण विगाव पा मप्यस्पता रबरी सावता तक हमें ममेगा पाती।मामोरे लिए सिर प्रतिवमा उतनी ही मोमिन मिचमी पारमपेठमा भिम प्रकार यात्मरेठमा की थेगिया है मे हो चिर के प्रति रेतना की मी प्रेषिमा ।। परिकाप मोर्यो में यह पुर्मिक एष भास्त होती है। वम प्रमुख प्रारमामा मे ही यह पूर्णव पक्त हावी है। ३ पर्म सरपामुमा के रूप में मरहम मसार परमानपास्मा प्रायममनुमन-समाधी मामलोपामिपार करते है बाम एमी परम सता ही पारमा की पोर बामेपोबाध्यतो पुरमा निराधमरस ए मणि पोरगा मानव पी.मम्तारमा मिस है। या तक हम वस्तुनिष्ठ एवं पास्मनिष्ठ रोनो प्रकार के समाहरणो से प्राप्त परियों के पनुमारकर मवनका यह महासागरता है किपरम मता चिन्तन की एक पावपाता और एक उपभस्यमा-भाष फिर पाहे कितनी ही समतो। प्रतिम सत्य को प्रकृति र विचारको स्पप प्रभिमस्ति रसकी पनुमति मे विरानुन निम्न है। चाहे रमका स्वागत कितना ही सत्यपूर्ण हो एक पिधार वा पारमा वामान में मारिपिठ पा प्रग्नवी-सो पती म म पाकीसोग में ७ उसपर हमारे लिनी अनुभव को स्वीकृति को पाप महीं सम जाती। बम वर्क के सहारे हम सबर के प्रस्तित्व को इस रप में नहीं प्रशित कर सकते कि सपने मुमुसु मा पयामु को संतोप हो । म विचार का सकेत देते है एवं उसकी अन्तर्वस्तु का निश्चय करते है भोर मानपान्तरिक मितम्पप में उसके कार्य माप कायमन करते है किन्तु एक बड़ी प्राचीन एवं मापक परम्परा है कि हम परम सत्ता से प्रत्यय पहचान सकते हैं । काल एक पूरी से विमा हिने ही तोमों मे परम एता पनुमब का परिवगत प्रमाम दिया वो हमें निमम तपा शिष्ट बनाता है पोर बागरले गाता है। इस प्रत्पस अनुभूति को ही टामस एक्सिमास ने 'काम्नीलियो गई एक्सपरिमेटेसिस प्राद पनुमा वान महा है। प्रत्येक वस्तु का मान हमें अनुभव से हो होता है। यहां तक निगमित जैसा प्रमूर्त गिमान गी कषित नियमिततामों के अनुभव परमापित है । पम-दान का पापार पर्मानुभव हाना ही पाहिए। सिरके प्रस्थिापनाप्रप इम सत् का पास्तविक या मेमवित अनुभव ही है। परिमान का निवसनीय मान मन्मम ही है वाहमें अपनी पर भावनाओं को तब तक शान-रहिस ही मानना पडेगा नग वापरातुमय तक न परवी हों। एक पुराने सरुव इमार में महा गया है कि सिरसीमास्तविकता कायम पून कपन परोपाहाम है पौर सिर की वास्तविषवारा मनुमभ प्ररपर शान है।' पति अपियों के 'पह प्रयास्मि (में ब्रह्म है) प्रपनी दिम्पता के सम्बम में ईमा के पनि में सत्य हू पम्हस्मार के पनाहरू मबमैं एक पारिवारिक मादरय है। टामस एविनाम 'परिवारतिमताप प्राप्त मान की बात परले है।रिमो मो मंतित गुप-म माहम पार्ष-समापी मानों का निगप परमे के दो मार्ग है। कोई न गयों का मैदान्ति पारिफ या यौरिकमान प्राप्त करके भी 'नमे रहित हो जाता है कि मरे में उसके मास पर पामधामी पानी तिमारपसायं मे पुण उपस्थित होते है । शव रे गुम मून हो उसने मोर पानी ही सपा में उमरा उन गुणों से प्रमेर हो जाता है। हम पिरीय नगामा मान पमनास्वारा प्राण र मरते है और उसका गान मिगी मनु माता भी प्राप्त कर मरते है।' माफि मूगेडायोनोमिमम ने कहा पा-- म माप पा गान ही प्राप्त नहीं करत उमरा पनुमन कसे है। हिमेन के प्रति रिंगा निरोपमापारप हिपेमारा प्रतिपादिन माप की इस पारणा में पारि परामिप्ठ मंगति (पाणिनिहिटी) मा दाग लेगामी एक frमसनारमर प्रगामी । किपा के पग मे माम का बोरिस प्रराम से और पाई तमेव वा परत . भुयाविना १-१.mस।१६।
१८ सत्यकी सोग महीं पाया ना सस्ता पैगरिक पोरन में उसकी पारा एवं प्रमुभर से हो यह प्राप्त हो सकता है । वार्षिक मध्यस्पवा या सापन नहीं बल्कि पम्वच्य होना ही पाप्मारिमर सरप है। सत्य पस्तिश्यमूलक पीपनमूमक है। इसे मानन के लिए हमे उसीरे मम्तगत रहना पड़गा । इसे हमारे प्रस्तित्व नाही पप गितक महराई का पोत बम पाना चाहिए । बय निगा पहले मिारमभिष्टता (समेक्टिविटी) सत्य । म उनका यह मतलब नहीं होण कि मनुष्य ही सर मस्तुपों का माप है। उमा पभिप्राय इतना ही है कि अब तक साप नियी रूप से सस्प को नहीं प्राप्तकर मेता तब तक पश्य सत्प नही है। मापारिमक मनुषपान मानी मन्या को मापारिमक सपा में चाय मेने पर बस येता-समें शान के विपय कारपर्व एवं पास्वार होना चाहिए। हम सरय को देखत पनुभव करते एवं उसका स्वार मेते है। यह स्वयं सत्तामा तुरन्स परिषम प्राप्त करना है। यह भागीदारीद्वारा स्पय के मषीनीकरणारा अनुभव प्राप्त करना है। हम इसे समावन परने की चेष्टा करते है। ईसा प्रपम देगा देश (कमाइमेट की पाम्पा इस प्रकारक 'पोपपदम सुनो ! हमारा प्रभु परमेश्वर एक ही है तुम अपने प्रमस्तिर को अपने समस्त पप से अपने सम्पूर्व मन्त्र करम से अपने सम्पूर्ण मन भोर सम्पूर्ण शक्ति में प्यार करो।" सत्य अपार्पता का बखनमो किसीके समस्त पस्तित्व को सम्तुष्ट कर देता है। बहर्ष सायर आपकी प्रा बिया पाता है। मह प्रत्यक्षानुभूति मानवता जितनी ही पुरानी है और किसी एक पाति या धर्म में सीमित नहीं । इस प्रकार के अनुभव की सूचना या पाप्यात्मिक एवं धार्मिक जगत् में ही नही कमा एवं प्रकृति-सामिप्य में मी प्राप्त होती है। पिसी महान प्रेम में सर्यनारममा में शामिक प्रयास में भरपषिक प्रामम्द एक तीर हमारेषों मे सत्य सौवर्ष भोर घिर के सामने हम परिवर्तनसीम बपद के म्पोरेवार सर्म से कमर रार ममेरल एवं निरवता पनुभव मे प्रवेश करते है। अन्तर टिम भनों में जब विषय पौर विषयी वस्तुनिष्ठ एव पारमनिप्ट एक प्रमेराबस्था मे रिमौन होकर एक हो पातेवन हम प्रेम एवं मा के परे एक ऐसी दुनिया में पहुच पाते है गहा पावि अनुमों की सीमा पुषनी पर पाती है पौर काम स्पिरोकरबायपाता है। पापिय परबासोपार प्रकापमा एक बगतमहा पापकर मस्तिक के उस प्रनों का समाधान हो पाता है पौरम की यमनाए समाप्त हो पाती है। इस सत्पता का अनुमा फरणा इसमें एना ही मोल प्रथवा साबित जीवन है। यह सीमावरता प्राभिस्ता मस्पिरता परिघा एवं बबन से मुक्ति है। यह मानन ब पवित्र स्वस्थता की स्थिति में ।
पपार्ष की पोग में Et रहने रेमिए पुनसम्म महनगरमा है। माग निर्माण या सिरीय राम्म झी कल्पना हमारेषत मान प्रस्तित्व के बाद पाया उमस गद्दी दूर की नहीं है । स्वर्ग गा राग्प मरम करमा विप्रामस्पस मी मनापाऐगा पदार्थ । सो पिसी दिन भरती पर स्वरेगा। यह ता HALAL परिसता एप विरिक विकास एक तीय पातर है। ग्राम्यास्मिर (मुक्ति मह पमित है जिमगे हम ससार परे हो जाते हैं फिर भी उसे प्रेष्ट स्म सकते हैं । यहा और अभी हम पारबत पौयन प्राप्त कर सकता है। पपनी प्रास्त इति कारण पापुनिर मस्तिष्क ऐसे स्पतिर एब नबीनी परण उमाहरोमा संगय एर प्रबिस्वास के साथ देखता है। किन्तु पुनर्जन्म एमपीमीपरम पपिप्राकृतिक (सुपरनेपरम) या अप्रारतिक नहीं है। यह इस मिष्टा या विकारापी तारिम परिणति है कि इस रासार मी म्पमस्या को मार उगा पदर प्रकरनेवाप्ती पदार्पत का एक और प्रम भी है। वह इस संमार मी परमार मौतर ही नयका गोपन एवं मानौररग परने उसका वामन करन एक उम प्रायपूर्ण यमाने रेमिए घर पार्यरत है। अनुमब तुरन्त को सहब पूर्वि पर पापारित होता है पर इससे यह निपप तो महीं निकल नायिह परंप है। यह महनस्पठित एवं विवादारा समर्पित है वे उममा विरोप नही करते । ज्ञान एवं विज्ञान (निजाम) माय-माप उरते है। अंगा भगवद्गीता महतो हमारा समय शाम निहितम् है। उस निएर हे मरस प्यार में परिणाम ! फिर भी में गुरप म परिपत लिए गया है। उपमिपर पनुगमन मा मीमाया पर बोर देती है। प्पमिताप मोबुष्टि एवं सहम स्पति सामना एम यमर सदर प्रवृत्ति एवं मंमिंग एप मियण मानवामो पारणा प्रमभूमर है । ऐसी प्रमग मग रामनाएं (पिसी) मही है। वे सर पर पगियो नारा एप-मो में मिमी हम विपार-क्षेत्र में मुधि एक गहन प्रेरणा भर सात मिनु भारतय में म मरे से पर नहीं रहते। मारमाम में हमारा यम्पूर्ण परिवार परता है। उमरी विभिन्न पगिता पिकिन प्रशार विपों ममाप में पारंगीन होती। सोमरते है कि मन पूर्णत पपापा जाय तो मरता है तर समरे पर प्रमिप्राय यही होताहर पपानापान करने में कम बुधिमही पम् ममम मस्तित्व जाम पाता है। साम मौविस रो परिषिद मपा प्राप्यास्मिन पगा। समारोरानमा पारले वाहमारे लिए विभिन्न पतियों ना उपयोग रिया गाना | भिम पटनामों प्राविर मोरसवाई रासन पर्व पममग प्रसारमा गतबर।। पति पभागिराम पंगा ही है रेमा प्रगामी (अपूर्ण) से होता है। ममेद पंत ष्टि हमारे सामने निरपता कामहीमठा को पात करती शिसमें काम एवं इतिहास सम्मिलित है। समय एवं मुरिणाम वास्तविकता का प्रतिबिम-मात्र नही है। यह मारमा की प्रन्तरतप सत्ताप ममुभूत सर्जनात्मक हस्प है। यह कोई काय कर्म यामारमा सारा पस्तुरे रानने का प्रान नही है। इसमें यह पनुभूति सम्मिलित है कि पारी में मारम निष्ठ पर पातुनिष्ठ प्याएर म एकही कही पपिक एक शिवना कोई भौतिक गुममा स्पट कर सकती है।' विपिन मामसिक समाष मासे पक्षियों में प्रामारिमा पनुभूतिको भाषा देप सपा प्रमामाम्प हमों से मूर्या एक पिता पनि मागियों एवं रप्टियों के साप प्रकट हावी है । और भी कुछ अनुभव प्रयास मागायन से पूर्व होवे । सति (सपिरेशम) के सम्पूर्ण कार्य ऐसे प्रारमियों द्वारा होते है जो अपने को अभिभूत (पवेरस) प्रानी के रस में मनुमय को है। किन्तु वन बामनारमक उपनना ही पर्याप्त नहीं होती। यह मनुभव म्याषिमूता (पासॉरिक) नहीं पपि इसके माप ध प्रस्मस्पवासूचक मण हो सकते हैं। मान पिक सायसिस से सस्प होते है। सीपी सासमा प्रकट हो प्रवे। रोमास्मिर होते हैं। मूपित या गावस्था से मीरम्मय प्रौर पमान से शाम का मार्ग ही ऐसा है कि मानसिक प्रगानी को मापात पता समस्ठ परीर का वध ग्लाए बिना इस चेतन एप मरतन के सापाप घमाम को २ एमाले Loanी यनबभामरते शिवमाया रेपोरोपmtinामील और दोनों to "भाबोन में पोसिको मनोतिमी जपानी मारिवानामापी पतितलिए कि पापापित मारिया होते ही गात पोसिवाय मकपि तिमो साल ग मैं रह रोग होने वाली से होनविन मारास ही कोपभोग भी रहे। ATM मलाको जाति होatxममतापाने - पर काबबप हमें ईद सापामीरोगलाई बाबारामनारमन्त श्री बाली पर इस पानी पामीविरमेश विकाससने बोषी होगा। पारसमसिनो शेयी पायमममी म्मा तय पिलरमा बिनभA पोन कि गत का प्रमा AGRAपीना समीरमाता और मच पररtatiपाकीको संगगन रोमना m पार्षीश्वोर में 1.1 धमाप्त नही परमात । पापामों के प्रास्मात् गोर दिए जाने पर मस्तिष की प्रतिपय विद्यमवा मानसिक सन्तुलन को प्रापात पहुंचा सस्ती है। देहिया पानमातिरेक प्रताप उत्तनमा--पे सर माम्पारिमा प्रमर के लिए मनिवार्म मही। ये पप मतों से उमूत हो सकते हैं। गास्तविक मान कम्पन और पुमक महीनाम समानुभूति है। मायारिमक प्रमुभूति में रचनात्मक वत्त उसकी मनोमानिक सह-सामग्री मही है मस्मि यह मान्तरिक परिपनि यो माति, मानम्, पीयम्त सकता तपा प्रमम बेदमा इरपारि मतकरण के फलों में, उपसम्पिमों म अपने मोम्पत करता है। स्वयं अपने और सत्य के मंतिम सोतों के बीच पान-प्रदान का एक उम्म सम्बन्ध स्थापित हो पाने के साथ एक नये प्रकार के जीवन का विकास होता है। इस अनुभव का एक किपारमक मुस्म है क्योंकि यह पारमा की गहराई में पड़ी शक्तिपो-रि मारना पौर संकासको सपषितरता है पौर सम्पूर्ण हिस्सा को एकस्व प्रसन करता है। सामान्य स्त्री-पुरुयों में मस्तिष्क एवं परित्र की मूवन विपपताए प्रार हो जाती। ऐसी विशेपवाएं चौमपने पनर सिरीय ज्योति का प्रकाभित करती है। एमी शनि हवा पाती है रोमे प्रपौत मस्तिकों को ऐसी मापार पीम समापों को पो रमस श्यादा शेष प्राणर मेतो। निवना टगी बुद्धि कभी भी पहन कर सरती है।" १ सयमापन तिसार,rte पोरन यि तरिम । ---PHHmmmm.ua पांचवां अध्याय आध्यात्मिक जीवन और जीवित धर्म समस्त धर्म ऐसे वषिर्यो काप्टरों के निजी अनुभोंपर भाषारित है बिहे परि बतम एप पावागमन की इस दुनिया की परिधि में पौर ससके बाार मी एक प्रसीम पाम्यात्मिक सत्ताकी उपस्पिति का प्रत्यक्ष योगा।परम सत्ता प्रबमा परमेश्वर के साप एकत्व की मिलन की निजी मनुभूति मानव-जाति के समस्त धर्मो की एक सामान्य विशेषता रही है और उसकी गहमा कमी नहीं टूटी। १ हिमपर्म प्रापीम कास से ही भारतवासी इमर के प्रत्पम अनुभव केम्प मधर्म भावना से प्रत्पम्त प्रमाणित हे है। मिला, ष्टि मौर गोप ही उपनिषा का मम्म है। यह एक नये प्रकार का चिन्तन है जिसमे सम्पूर्ण मानय न कि कबन उमकी बुद्धि का मोम है। वाह्यानुमग प्रत्यय एवं निमारमक रूप से सत्य में भाप मेमा है। वह अपनी सत्ता की पहराई मे पतीनिय सत्त्व के साथ पूर्व सभेपत्त की पुष्टि है। इस प्रमेय या एकस्म का मान बेतना के ऊर्मतम स्तरों पर सहन स्फूर्ति से होता है । यह मनु भव स्वत प्रमान है स्वयसिर । उपनिपरे पन्तरात्मा एव परमारमा प्रवगा गा की एकता की पुषि करती है। "यदि एक मनुप्प यूसरे रेव की पूजा-उपासमा करता है यह मोचते हुए कि यह एक है और पाम्पदेन दुसरा पर यह सत्य को गानता ही नहीं। फिर महा गया है “गो सबमें रहता है और सबके अन्दर है जिसे सब प्राणी नहीं मानते पर सर प्रामी ही सिसकी रेह है यही तुमारी प्रात्मा है तुम्हारे पन्त का शासन करनेवासी ममरमारमा । परि मनुप प्रपमे प्रबर के प्रमर को नही पापान पाता तो पह कर्म के पारसकता मधीम हो पातार एक कठमुतती बन पाता रिसे प्रवृस्य पत्तियां पर-उपर पौषती पती ।। यह हम नही करता किन्तु उसे पुषन कुच होता एता है। मनुप्प एक परिमबीच है। प्रसपता पायोग एक ऐसे पता स्वामित्व की अनुभूति के कारण होता है वो सम्पूर्ण परिवर्तनों का अनुकरण प्राम्मारिमा जीवम मौरजीवित धर्म या शिक्षण द्वारा पति माषिक प्रम्पार्मोनीष भी अपरिवतित रहता है। मनुष्य विश्वाम पाना है कि मह वही म्पषित है सपोकि उमा नाम वहा पहम मे पता मानेमाना नाम है उनमें वही पहसे में बसे पा रहे पनि मोन* उममी मही पुरानी पारने एवं प्रवृत्तिया है। यदि यह सरिमा को अपने पर पहषामना है नोएमपीम मुमित के पापार पर कार्य करना प्रारम्भ मरता है। मगवद्गीता में प्रकापिम्सन परमेश्वर की भक्ति मे मिथित हो पपा है। प्राध्यात्मिक मिटि पपया परम मप्ता मे मम्मम्प मापनपा प्राप्पा म नवार-परमवार म मम्पर्क यही मध्य है। जोधारमा धिमग' है प्रत मह अपने माधय-स्पान परमेश्वरको पोर मौट पाती है। भगवद्गीता में प्रार्पना पौर भति पर बहन बग दिया गया है। गिरीय प्रभाव मे मारमा म्पामामो पर पार पाणे को पारकर अपनी प्रापभा के प्रम्निम माप्य नाम्साद पाती है।' रंगपर्म म राम एष पण को रेट बनाकर मो मिसाल निगमित हुए उन परमेचरी मापना भसिब प्रेम के वागही बनाई गई है। रामानन तुगमी म सम्य दुराराम तपा महाराष्ट्रीय मता मीरापाई पारिने एक निजी मानरिक अनुमन धारापा माम्निम्प प्राणपरन पर मोर दिया है। मापरी उपमा ऐम बम्प से री गई है निमरी मा पो गई हो। तुकाराम पास है मेगामाप पानी मा कामही देयता नो रोना पोयता एव निकरा माता प्रपरा मे मवमी पानी म दूर पर शिस गाने पर वापसी है मुका पहना हैपही एमत मेरी है।" मानिसावाममरतमा दक्षिण के पाप मत शिवहर में की गानाकरखे है वमा मरितारा उमासान्निम्म प्राणपरमा पाहते हैं। वीर माना तया सिन मुरुमी भनि-मप्राय के ही है। पीरमरते है *जय मुनना मिपानी में मौ मीनप्पामो है ना मुझ हेमी पाती है ।तुम प्रयास हारम-वन पूमते हो पप गाय समय तुमार पम्बर दिपा पाहै। 'सरप पहो है । पाहबनारण गापो मा मपुरा सरासर तुम अपनी मरमा मईयर को रसार एवं पामागे तब तर मग मसार तुम्हारे मिनिरपा पना पेगा। मापट मे पते:- 'तम्हारे प्रभु पाग हो है पर भी तुम र पाने । पारपरसा रहो। रामात पानाप टार, रमन महपि हमारे प्रापुनिा मापारिमक * नरम ममम In .1 २ मत नो- मेकाममा मनसभा मनमाम मामी। सगप्पन बमिनमा , सत्मकीर अपियों में में है। हिन्दूपर्य का सर मानव-जाति को नवीन पदेना है मान-प्रातिका प्रामारिया पार करता है। पर पुग्म वीर्य रम' है। मह हितीय परम-गहन मा.प.तर समाभित है। इसका मतमयमा हो जाता प्रपा बोजार पर पर पाना है। मनुप्प भान एव मित्मतारोपम स्तरापरपरा है। दोनो के बीच का मन्तर गुनारपास का समपारमा विस्तार मिलता । समय नहीं कर सकता। भासपावन' पनिषद का बबन है। किसी भी परिमान मे हो बसार का पनुभव हमें पायत की माफी मही करा सकता। इमारी पित्तनाको काम परे, सरप एक दूसरे ही स्वर पर मे गाना होगा। योगमूप में माम्यारिमक जीवन-मापन रेमिए प्रार्थना बाप्पान पारि* स्पान का विस्तारपूर्वक वर्णन किया पया है। हितगीर न सिंह ईसाई एवं इसमाम मारि भारतीय मर्मों के पूरे हिास में जीडन के पीरन ताप्रतीडियबेतना की प्राप्ति पर उसमे पापा और खिाई रितना माकार पर की सासूना पर-पचापि पास्तिक पों में उसका भीम महत्व है। भार भीमवेरे मन ऐसी रेसमा प्राप्त करने का माय सामने रखते है विच वस्तुपरक एवं प्रारमपरक दोनों एक प्रमेदामस्मा में मितान होगा। प्रानन्द-मनसा में पाक्तिगत पापा को ऐसा पमुभा ठासे माराप्य की सत्ता अपम्पिति ने उसपर पापमम करके उसे चारो मोर से अपने प्रदर रानिमा और यह इस अनुमति मात्र रहता है कि बिसे गाबोर पापागोमाग मिन पया है। २ तामोपाव नामो-स्मे (परी मतादी .पृ.) भी पाने पीनी मोर पापो को ऐसी परम सताकेम्प में मायवे पेबोसकी सीमा परेपा उपसे पीपीपी और फासोपारम्भ रुपा म्पक्त सिरपूर्ण भी जिसका पपना पस्तितपा। पर निस्व पपरिवर्तनसीम सर्वप्पाप सिसाम्त सम्पूर्ण विकास विसकी पमि क्ति है। यह समस्त मस्तिस्वरमारि कारण है यही सयं सप्टा एक दृष्टि मो में पपये को पात का है। यह सम्पूर्ण दम पर कामन यह बह प्रदान है जिसके सहारे सम्पूर्ण प्राति परस्थित एक पारित होती है। वापी गपारिलोत निसस ससस्तुप वरभूत होती है वह मर है जिसमोर सवपस्तुए प्रधारित है। इम मिलातकारमन सिी माम के नही पिया बा सकता। माप मार्ग'वाम निधारमा नकारात्मनों इसकेगारे में भूप प्राप्यारिमा पीबन प्रौर मीवित धर्म कह सकते हैं जैसे यह कि यह रंगरहित दाम् हित पापरहित या प्रौतिक है।इस तापो से उस महापरित पापम होता है जो जगत्मा मौतिक कारण है। उमसे वा स्परमिक न.पावित-हम् है-पांग एव पिन, नर प्रौर मादा प्रभाए प्रामा। फिर शुम (पाहाय) पृषी पौर मनुष्य का म होता है ममा इनकी पारम्परिक पिा-प्रतिक्रियामों से फिर पाय जीव जन्म पाते। वापो मनुष्य में वर्तमान है, पपपि यह सामाग्यत पम्पत है। मरिहम पुन मपमी पाम्ति एर स्थिरता प्राप्त करती है हो हामो की सोग मे मिस पाना माहिए। चीनी प्राप सामोरपिम हम उस म्यवा एवं कामना के निमिमी स्थिति प्राप्त करने का महत्व बताता है।पम इसी तरह वामो प्राप्त किया जा रापता है। सामो-स्मे कहते, मगो कोई पापियनामनामों मे सरा के लिए रहित हो गया है केवम नहीं वामोरे प्राप्मारिमा सार-पत्त को प्राप्त कर सकता है। पूर्ण मारमाररागसी पारश्या पत है। हम सम्पूप पूर्वाग्रहों पूर्वमारणापों को पदमा हागा पौडिपेवनायो एक मोर रख देना होगा पौर विचार एवं भावना के प्रवाधार तामा प्रवेश के लिए पोम देना हागा। यह रही अमरपा है जिसे रेप पाठिमी प्ररथाहते हैं। तापाचर्मों पाकासामा मश्य पामो से पपरव प्राप्त करमाई-बदमयस्पा रिममें मनुष्य सेमारपिनियो दारातगाई सीमामो मे मुरत होरर सामो का अनुकून बाहन बन पाता है। मह एक्त सिद्ध हो जाता हम स्थिरता पौर चाम्ति प्राप्त र मेवे रोगिया बहन है जो मनुष्य वामो से साम पस्य स्पापित कर मेता है बहगस परायों से भी पमिष्ठ सरस्प की रिपनि में प्रवेग कर पाई और उनमें से कोई भी उसे हानि पाने या रगके मार्ग में पापा सामने में समर्प नहीं होता। भारततिर अपर म.नामो को सामून पमिम्पति! मरितिक मादेणेपाधिम पासन । एम भात् मुमतमी स्वत पिम परत हा मूम वामा उरिपन रहता है। मनीसेवाभो भी मुज गति प्राप्त गमिए प्रापकको इमरों प्रति महानुभूति पापाचरण मरमा ही चाहिए। भग के प्रति म मनाएगा पर रेएसके प्रति भी ममाही पगापयादि मग रन मारो भी मैं ममा मा रेनबोपर्म में प्यार परगलोर दिया गया है।वीन रेताप्रो पौर पो में पोल एयरादी संतरोपए है।
सम्यकीयोग ३ यहूदी धर्म हिमा या पापियों का स्वर-मानी ईशानीप या पेयम्बी पेतमा में मनाई देती है । मिनी प्रमुभव के कारण शास्त्रीय पचन मीषित साय बन जाते हैं। गिरि गय परठे मूसा एवं गुफास्थित एमिनाहाविर पपिपान इसके उदाहरण है। निर्यमन-अप (पक पौफ मोरम-जीस) के मत्तीय पप्पाप मे हम बताया गया है कि 'स्थय पिर या पिरका फरिश्ता ममा के सामने म मा के बीच से परिमठिा के रूप म पर हपा। मूसा ने देखा कि माडी गम की है पिस्तु माह सनी नही । नब मूसा ने कहा म पोरएर म महार पोरेगा मिनी क्यो नही समठी। तब गमुकेमे माही के बीच से पुकारका गुमाया पौर कता पारपार पर बडो अपने पैरो से बने पनग कर रो पोनि गर तुम को होगा पवित्र भूमि । ममा ने अपना मापिपा गिया बाकि रंगे पर भी मोर देखने में भय लगता था। ईसापा मे शिवरापिस प्रकार र्गम किया उससे पर सपा की-सीपमावेगमता प्रकट होती है पोर में भगवामीना केमिसापकी पार पा गाती है। यह गगत् सिर का प्रसारित प्रकार है। सर नि पानामा मे गो प्रतृप्प प्यास है मामा स्त्रोपकार (सामिर) के उद्गार में प्रकर, म म परे सिबा पौर पया है। इस परिची पर पिकातुमारे कोई सा नहीरिसको कामना में कई मैंने तुम्हे मार प्रेम के साप चाहा है पौर इसीलिए तुम्हारी प्रेमपूर्ण पादे महारे मने तुम्हे पपने पाम सोच लिया है। पाटो एवं परास्त सम्बो साप पागधम के सत्वनाम का अध्ययन किया गया तब उसे यही पौर यूनानी विचारपापो के एक प्रभुन समन्वय का प्रापिपापा पिसके प्रमुख प्राय पीतो की पुस्तके 'मानोमन का पिक पौर मृवियम द्वारा सुरक्षित परिस्टोम्यूमम पी स्पुट बनाए हैं। परिस्टोम्पूमम पिर-समापी यानी सिद्धान्त पौषि करता है कि यह साप हो अनुभवातीत और पन्तयामी है। वह पमन से गई उमसे भिन्न है फिर भी अपन मोप से विक से पापयत् मे पायपीम। यह मगन् रमीम मिकमा है किन्तु उसमे पाप इसका कोई पस्मिान नहीं है। पर अपन मा मारिनु फिर भी यह परता उसकासापामा पनि शिर पपविष मनुष्यो सम्पर्ष में नहीं पा सकता कि रागके परिपते पा सम्से हैं। परिपते पर से उपभूत है देव से निकले मम है। प्रना को । . - . 'माय' ०५ २५ । ३ अरेमिका
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सत्यकीयोग (रोमन) जिसमें पिता-माता दोनों के गुण मिमते हैं।' पप सात सिम्त में है या म्याय सौन्दर्य विजय कीति पापार एवं एमव । 'योहार प्रार्थमाको पहरीपाप्यारिमकवा तथा नीतिक पयत् में परिवर्तन मामे पी पक्ति पर बह रोता है। मप्ययुनीन यही पापित्य के प्रमुम प्यारयाता ममन थे। ये सब निपेमामक मार्ग पर ही पोर देते हैं। इस सम्बब म स्पिनोरा का भीतिपात (एपिम्म) पार्मिक बीवन के लिए प्रत्यन्त महत्व की वस्तु है। ४ पूमामी पर्म प्राचीन पूमामी धर्म में से प्रकारही विराए मिलती योमरीय (होमरिक) एव रहस्वारमा (मिस्टि) यूपीयनीय धर्म में पनप की सचिरीक्षित पवित ह सब बातें बताई और अपनी ही पाहों से देखेप्रमाणों के कारप अपनी युक्ति के विषय में विश्वस्त होता है। दीक्षित म्पपिठ कोई बात नही सीपता परम् ममुषित पारी में पाप एप पनुपर से गुगता है। इसिस के विषय में कोई पर्मसिधान्त नही है। करि पोफोक्मीर एक पिसार पोमीयोटस परतोक के मुखको मन उनी सोनी के मिए सीमित मामते है वो इस्यूसिस के पस्प-हान के लिए दीक्षित किए गए है। सिसगे बह मत प्रकट करणकि एस मेमसिसके इम्पों से पन्धी पौर किसी बात की उमापना नही की-पहपाठ पीयन को व्यवस्थित तथा सम्म बनाने एवं मत्पु में भाषा प्रदान करने दोनो मे माय। गयोनापीय पम्पों साप तीर्पोग्मार तपा कर बनी रीतियों के प्रमान मिलते है किन्तु पर पाफिमस के माम के साप सयुक्त हो बात कर चनका एक महत्वपूर्ण पम (पहन) प्राट होणारा प्राय समारों में सामाग्पत गयोगिसकी पासमा प्ररमित पीयपपिभी-कभी पौर रेवा मी उसका स्थान में पोसिपर से सामिप्य स्थापित करने के लिए पत्कष्ठित पते पेकपा मानसिक पाम्ति पर परिस्थिति के मापार्यों बीच पापौर विपास पूर्ण स्थान प्रारकरला पाहते परेही यस्पारमक पो की भोर पापित होठे थे। फेटो एर माटिनस मे दोनों पागएं मिल पाती है। पीके मिए बोवन का माय पर एप होना। "ची धर्मपीमता सिरका सापी कार्य इन पाता है। पानीन एपिस्टिस्त तवा चतुएं व परंस (कोबास्स) में हमें रीता एवं ससर्म (कम्पनियन) की रीतियो पर रहस्यात्मक पर्चा के प्रभार १ मा मुल प्रीमियर ली से मिल मुबते । - माम्यारिमनीवन पोरगीवित पम दृष्टिमत होते हैं। पार्षीय तपास्सूधीय पस्यों के प्रमेक बोटिम तल ईसाइयों मेयपादरी (नास्टिम) सम्प्रदायों द्वारा प्रहण कर लिए गए है। प्माटिनस (२०५-२०.६.) रहता है कि उसका सिसाम्त नया नही है। 'मह धर्म-सिवान्त मबीन नहीं है, भत्यन्त प्राचीन काल से सोग इसको मानते रह। पर्याप स्पष्ट रूप से इसे सभी विकसित नही किया गया।हम मेचम प्रापीन ऋपियों के माचिये होन की गधा रखते है तपासय मेटो का प्रमाण देकर मह निसाना चाहते हैं कि उन मागों की मही राय पी मोहमारी है। "पोरफाारी के अनुसार माता पाटिनस उसके सम्पर्क में रहा उस मपि म पार पसरा पर (माटिमस को) बियनुमय हमा। उसके मित्र चिरिस्सा युस्टोरियम ने उसकन पन्तिम पदों को मुनापा “इसके पहन कि मेरे पदर म्मित परीय तत्व निकलकर मत् में निहितपिरीय तत्व में मिसार एक हो जाए, म तुम्हारी प्रतीक्षाराभा।" परम सत्ता मस्तितो पीना पर है । महगीर परेनापरिवागामा में रहनो है। हम इमे गुम महीं कह सरते यह तो पूर्णत्ल है। यह मुशरमहीं मौर्य है।' माटिमम सरत्व एनपर में भर करता है ।रिमपिर पीप उपामना करते वह भभियक्ति है प्रभाा है पमितिमा प्रभागा नहीं। अभिप्पति के प्रमाय (रेवेमेगम) के सोतको परत मही किया रा माता दुटि का माप पर परम पडेपर मरम्परा इदा पर माय गुम या मनाई है प्रेम एवं प्रशमा का सप मादप है। मा किरमपू. पार जपो । “परम (एपमोरपूर) हाना हे पाहिए-या ग्याय ना का निमप है यह होगा ही यह भीति का महापरपाणिप है ए-पह प्रम-मिसन मारनामा पारिपार है।"हम परम सत्ताइसीमि जान मातहकि हम समय भी अपनी गहराई में वही परप है। हम परमात्मा (पस्टिमट स्पिरिट)ो प्रमगत तर बारामही परम् पिसी ऐम पाप्यारिमा ममर्गग रियो बारे म हम वाम रमा ६ उम ममय नही देर पाते हैं। हमें मियाम ररमा हो रोगा कि जग पारमा परस्मात् प्रसारी मागा पातीवर उमने समान देगा है। से निसाम परसाही पोपाटिपर र मिर्मणावारे मूह में मावा है पीर रमजीपम देता है यह उममें उरिपाई पारमापा मम्पा प्पय उम ग्याति करता भाररिभी मरे प्रशामायनही मी प्रतारा रमे निपान १ . बाण १३-१110॥ ४ नमीन पर' मा SELरको ज्योनिनगरेस।
सत्य कीबोग पाएपना-ठीक उसी तरह पो हम गूर्य मो उसके ही प्रफापरे प्रतिरिक्त पम्प पिसी प्रकार हारा नहीं रेल सप्ते। 'यह मानन्द-गिहमतानी स्पिति पर पटमूम्म वृश्य है पीर प्राप्मास्मिक रिकामरे पिवर पर पहुसार ही प्राण होती है । पारफारी प्राममम्मिय मौर प्राममम मे प्माटिमम क पाषान् नय-प्मेटो बायोपिपसित रिया। ५ ररथुस्त्री धर्म पदपि परपुस्त्रियो (पारसियो) की सग्या पोपी है किन्तु परपुत्र की पापापो में निहित विपार पामीर एवं अपनी माता में सारेभिक है। कहा बाता है कि स्वय परपुरुषाने परतीमाता की इस प्रार्थना पर परम पहग किया पा कि पाप निमुम्पन ए निर्ममन में से मानव जाति पी सहायता करे । पार मरपा पाते कि यही एकमात्र ऐस पे पो हमारी अपूर्व प्रानामों का पालन करो से महापाता कि यब परपुस्भ पहुर-मरण कपिपि नियमों पर प्यान मम तब वाम ऐप्रो-मैन्यु ने इस पर्व पर उगह समस्त जगत्मा एकाधिपरम अवाम करने का प्रलोभन रिमा हिमपुर-मरवा में उनकी का निष्ठा से मे विमा पनि व परस्त्र ने प्रसिब इसोर भटर-फर्म नापाठ सुर मिया और पापात्मा भाप माइमा। यह कपा एक ऐसे प्राप्यारिमा सकट की बात कहती है गिरामे मिप्पा के दिम सस्प एप मौपित्य का मार्ग बनने पर परपूरणको मुरारना पड़ा पा । ममुप्प की प्रकृति में ही है। बुराई की, पाप की समितया मनुप्प से बाहर ही अन्दर ही है। बव पहा यावा है कि मनुष्य को पापारमार्गों प्रेतास्माों में अभिभूत कर रहा है व इसका पर्प यही होता है पिपरवार्मों एवं दुरिचारों प्रभाव में है। कृषि यह इन प्रमावो के मनुफ़्म हो जाता है इसलिए उसका विपास पफ जाता है। पूरी प्रमिता सप्रेम हेप प्रमिमान एकमात्र सत्प: बारम्पो को समममे म मझान-पन सगरा सामूहिक बप से ही घेतान या नापारमा पहा पाता है। परपुस्त्र ने पैतान को पराजित कर दिया इसका पाटय मही कि इम पाक्तियों के पाम भने नहीं। उनके पावरष से प्रकट होता है समनुप्प रपये प्रपने माग्य का नियम्ता है। पापारमा का रिसे प्रोस्टेगमेष्ट' (पुरानी पर्म पुस्तक) प्रापुनिकतम संस्करणों में बवान बह गया। उत्तर निम प्रयेस्ता के ऍगो-मैग्मु से बड़ा सादृश्य है। प्रहर-मन्ना परमेश्वर है यह पेवन पौर गा का स्वामी समारास्विर है नमसे पुस्प एष प्राति रोनोपा उद्भव हमा है। उसके साथ म पपिम पमर दो पिता-पसमाता-पक्षी तीन-तीन किरणों से सम्परामे वस्तुम परम पत्ता पाम्पारिमक बीवन प्रौर पीवित धर्म हेमंग या उसमे मिमित सापमा' पहमी गिरण है। यह रिसर के उस सरस्सा प्रतिमिमित्र करती है जियन जगत् मी योजना की। यह माय एप प्रम पीमा प्रतिनिधि है। दूसरी है पार-ममा यो परम सप्ता या परमम्वर के प्रमाप्रती है। तीसरी है क्षत्र यो परमश्वर की मजाकिया की प्रतिनिधि है।रोपी सामंती परम - मायाव-पक्ष-पूम एवं महामणि का प्रतीक है। बहमन्तरापियासी भावना है। 'दोरपतात यह प्रादा है से प्रत्येर मानस में पर्तमान 8-पाप्यारिमा विकास का रव । मन्तिम 'अमेरवतात अमरता का रापिट पा सराये यहाँ परिठया पृषक सप्ताए नही है परन् परमवारपा प्रमा परपुरप मोपित रखे हैं कि परमपर में मिलकर एक हो जाना ही परम्प माप पर इस तर पहनने । मार्ग मानिसम हम मस्तिष्ण दपप एवं पारमा पो पनिषता प्राप्त करण । 'भया द्वारा हम तुम्हारी मालक प्राप्त हो इम तुम्हारे निकर मा समें पोर तुम में पूर्णत निमग्न हो पाएं। केवर गफ ही मार्म है--सा का मार्ग । पोर सर माग मिप्या है।" (पस्ना ६. १२ परेमापी H पीर पनि एकही मोटोप और मारतीय पारो रुप गिनियों ने पृपक हामे के पहम ही इपके प्रतहिल प्रपंका उनमे पूम विकाम हो चुका पासप वरुप महर-भरमा प्रपरिमतमोय मिरमरे अनुसार, पो उसकी सा मत करते हैं कार्य करता है। सपा के नियमों के अनुसार प्रामापीय उपक्रम अपनी परिगति की पोर प्रमतिर रहा है। समापन ही प्रधानीमच प्रशा समझने है और उमसी मारनाक अनुगार नाम फरते है।पम परमेसर के प्रम से पिए गए पाय हो पाम तेनकि साकिर गरपामासापरहित कर्म ही यह माम है शिमर पापकर मानर मापी पपने प्राम्यारिमा स्पामो प्राप्त का है और ममारी प्रगतिम सहापर होते है। परपुरष पम म पो प्रेम है रह पगुनगत् ॥ भी अपने घर में मे मैता है। पाया माम पी२ १२ १४ा २१म पार लिपियों को हर मरपुरती मानाहार नही करले। पुष हो ऐमे है यापपरे पाए मदोन मनिमी भारतमाम नही करते। गरपापसमागमन चिोरमको निसापासपमुगमन परंपे गरें पानीलम प्राप्त होगा। यह एक पप गिम ये मुमृगामम गत है। TH-IIT अमाभुराई पास गानि गरम मसाला पगा। गोपा- पुगई पी सिपोरापूत्र पिनास दामारणा और पपी पौरिष गोगाजमना मनोमिए पारितोसमगी।पात्रामाग गरपकी सोग - पपर रपना-क उसी तरह मैगे हम मृर्य पो उसके ही प्रकारे प्रतिरिक्त पम्प पिणी प्रारारामहीं दम सरते। यह पानम्-पितमतामी स्थिति पर बहमूम्प पश्य है और पाप्यारिमा चियाम रेगिपर पर पापपर ही प्राप्त होती है। पारफारी पायमग्मिकस और प्रोपनस मे प्याटिनम पाषान् मप-मेटो बाद मोरिमितम्या। ५ ररस्त्री धर्म यद्यपि परपुस्त्रियो (पारसिया) की संख्या पutt रितु परपुस्तकी नावापों में निहित विचार पुम्भीर एए अपनी महता ग सारभि ।। कहा माता है किस्म परपुरण मेपरलीमाता की इस प्रापना पर बम्म पहन गिन्या पाकि पाप निय पप एक निर्मूमन मे दे मामड-वाति मी सहायता परे। पार मदा करने दियही 'एमात्र एस जो हमारी सम्पून पानामो पापामन करते थे । कहा जाता दिपावरपुत्र महर-मसा के बिपि-मिपों परप्पान मम्न पतप तान एग्रो-मैग्यु मे इस पत पर उम्म समस्त जगत् का एकापिपरय प्रदान करने का प्रमोभन दिया किमतर-मरा में उनकोबा निष्ठा है गतिमा अमिर परपुरत्र में प्रसिरमोर पहर-बैर्य जापाठ सुरु किया पार पापारमा माग मराहमा। यह पपा एर ऐसे माम्यारिमा सकरपी बात कहती है जिसमे मिप्पा के विरय पत्य एव पौषिरय ा माग पूनमे पर वरपरको गुगरला पड़ा पा । मनुष्य की प्रकृति मे ही है। राईकी, पाप की सरिता मनुप्प हे बाहर नाही अन्दर ही है। मारहा बाप्तापि मनुप्य को पापारमामों मेतारमामों में मभिमून पर रखा है तव इसापर्य यही होता है कि वह एप्पेरणार्मो एप पिचारों के प्रभाव मे है। पि बहन प्रभावाने भनुम हो पाता है इसलिए सपा सिाम म पाता है। दुरी पपिता सप्रेम रेप पनिमान एसमान सरपके बाप पा को समझने म प्रमान-इन सबरा सामूहिक रूप से ही पैतान या पापाएमा परापाता है। परपुरुष ने घेतान को पराजित कर दिया इसमा पाण्य पही है निदेन वालियापागे को महीं। उनके भाषरण से प्रकट होता है कि मनुप्प रपयं प्रपमे भाग्य का नियाता है। पापारमा का जिसे 'पहाटेगमे (पुरानी पम पुरतक) के पापुनिएतम संसरणों में चान कहा गया है उत्तर कातिक प्रस्तागो-मग्यु से परा सादृश्य है। मार-मा परमेश्वर पाठन पोर जाका रवामी रुपा बहसर निमसे पुरप एष प्राति दानों पायामा है। उसके पापय परिष ममर यो पिता-परा माता-पक्ष की तीम-चीन पिरमोम सम्पराप वस्तुन परम सता -- पाम्मास्मिकबीवन और पीषित धर्म के प्रेम या उससे हि मृत तत्व है। प्रगा' पहनी गिरण है। यह रियर के उस सकसमा प्रतिनिधित्व करती है जिसने जगत् की योजना की। यह मार एवं पम् भीमताको प्रतिनिधि है। दूसरी है वो मना यो परम सत्ता या परमपरक प्रमका प्रतीक है। तीसरी है सरल जो परमेश्वर की सहम-क्रिया की प्रतिनिपि है। पीपी प्रामती. परममावस-पप-म एवं प्रहमानित का प्रतीक है। यह मम्तरापिपासी भावना है । होरवसात यह पावन है जो प्रत्यक मानब म पर्वमान है-पाप्यात्मिक विकास का तत्व । प्रन्ठिम 'ममेरततात प्रमरता का शस्ति मा तत्व है।ये यहाँ पारिता पृमक सत्ताए महीं है परम् परमपवर का मर्मर पंग। परपुस्म मोपित करते हैं कि इस परमश्वर में मिसार एर हो जाना ही माम पाद है पार इस तक पहुंपने मा मार्ग प्रधा है जिससे हम मस्तिष्क हृदय एवं पारमा को पमित्रता प्राप्त करता 'प्रातारा हमें तुम्हारी मला प्राप्त हो हम तुम्हारे मिस्ट पा सके और तुममें पूमत निमग्न हो पाए। “कपल गरी मार्ग है-प्रसा का मार्ग । पौर सर माग मिप्या है। (पस्मा ६० १२ पुस्तापी प्रथा पौररिकन एकही मामसप है और भारतीय पापों एवं रानियों के पृषक होने के पहम ही इसके प्रतहित प्रय का उनमें पूर्व रिकाम हा चुकापा।सर्पोन्म तल पहुर-मरा परिपतमीय नियमान मनुमार, मो उमपी इप्पा म्यक्त करते हैं. काय करता है। पया के नियमों के अनुसार नामागीय उपम पपनी परिणति की पार प्रमति कर रहा है। मम्तजन ही पानी गर्मोम्प प्रज्ञा को समझा है और नमकी भावना अनुमार नाम परते हैं। वम परमश्वर के प्रेम से किए गए पाय ही हमें मानना है कि स्वापिए गए पाय सारहित कर्म ही यह माग है चिमपर पापपर माना प्रापी प्रपने पाप्यारिमा पस्पान को प्राण करत मीर ममारी प्रगति में महायक होते है। परपुरुष पम में गा प्रम है यह पणु मग सभी अपने पैर में मे मना। पाये मान पी २ १२ १४ तपा २१ इन पार तिपियों ना हर ग्यमा मामाहार नहीं करते । एप हो ऐमेगावार पूरे पाहणे मान में निर्ग प्रकार का माम मही पहप रखे। गरवस्त्र मा पाग्यामन है पिसारी निभाया पर मर एरी गर्ने मारत गोषण प्राप्त मा । यह एक एग्य । सिमर मुगmml गुभ-पार समानुगईमाम गतिर उपप्रम र नगा। मरे पार पुपी पतियों पापिना हार बी गावामता मामिा स्थापित Imr- सतौर है कि समन् मा पुनर्मग्म एवं उतार होरर रहेगा। मर-मरवा को गामने पार उसके विपिनमियम प्रचा अनुसार पाचरण करने+मिए सापकको प्रार्थना एर पान द्वारा अपनी प्राविको पूर्णता तक पहुंचाना होगा । हम माप व पाप माईम वा सान्ति एए ऐमय की मिरि हो मापनी। ६ बौसमर्म पुर फोनबीन मार्य बताने का दावा नहीं करते। मने प्रापीम मा को रेमा है-उन पुरावन पप को विसपर पिछले प्रपुर यम बन पुके। उसी गरा प्रभुमरन करहा।' पुठ मे पोपि प्रणमामान की बात कही है। यह पूर्व प्रोजन सत्य के साप तुरत का भवानि सहग प्रेरणारमित सम्पर है। यह बम सेवान्तिराम मदी है। यह बह शाम को कामना की गों को पार देता है और जीव की प्रकृति पर पाप मामिव होने का परिचाम है। यह सापपानी का एक सरकार्य मोमिमा मुममितार। मूर्त गगन मे पारमा नहीं मिलती। प्रत्येक वस्तु को हार का विषय है पनत्ता प्रमात्मभाव है । परन्तु प्रस्तुनिष्ठ अपत् मे दर तर या कामना के मुक्न पोर MT से परे भी एक स्थिति है। हम पारा से नमे नहीं पा सरते।' प्रनामावस्था मे मनुष्य अपनी वास्तविक प्राविमो भूम भाना है पार गो मह मही है वही अपने को समझने मरता है। इन सम्पूर्ण उम्म जगद के परे को मान्य है उमे उसको पाममा ही चाहिए । “ऐसे बनो कि पारमा तुम्हारा बन पाए-पारमा ही तुम्हारा एकमात्र पापय हो निषि (मt) ही तुम्हारा रीप एवं एकमात्र प्रापय हो। प्रमा प्रकार की कोई ऐमी स्थिति नहीं है जिसमे कोई वस्तु प्रकासित हाने मिमरे हो ऐसा पनी जिसमे कोई प्रतिविम्बयाणे ऐसी चेवना है बो पस्तुनिष्ठता-प्रात्मनिष्टता (मापरेकर-मम्मट) भैराको पार कर गाठी। पौर जिरो मायूस्य उपनिपाउरोखकहती है। मामाकस्मिकता से मुक्ति पी मरस्मा है। गौरमों म मा एक प्रमात (मनुत्पम्म) पकार एवं समावन का वपा वम प्रोर पानेकामे मार्य कान पाता है। निर्वामा पपरिक पप । उपनिषा की ही भार-पारा के अनुमा र मी बम रीति पाप का कर्मापारिप पर है तथा पम्तरनुपामम पर कार रेते है। 'परि मेरमोशश पत्र ऐए पहनने से मोरोपापानिपोपा हा । सनिकाय । मतोदवसम्पुण ।। बारपामा मोम-नाग १८1 M एन.
पाम्यारिमक बीवन पीर जीवित धर्म योग के पन्मते ही उसके स्नेही एवं पुष्टमीयम उसे चोगा पहनने को बाप्प परते पौराहते-पापो पो भाम्यवासी ! प्रामो चोमा पहिन सो पोंकि इसे पहनते ही सोभी अपना सोम तमा विटेपी प्रपना वेप घोहरमे।' उपनिषद्को मारमा पनुत ही गुरुममे भूपुने को काम की सीमा से मुक्त होने का है। पपने को कामनामों से मुक्त करके हम ऐसा कर सकते है। यदि हम तहमा माससामीमाता को मोगन देने से इन्कार कर देतोपन प्रमाब में पाम स्वर्य झ पाएगी। निर्माण झोप मोम, मासमा से मुक्त होने का ही नाम है। वह बिना नहीं है। यह पायत स्थित प्रान्त मानग की स्थिति है। एलि, साधीनता एवं पारमस्फूर्वि दृष्टिमी स्पष्टता तपा स्पिर माननर की मुक्ति पर निर्वामी प्राति पर कम्पमा के गाने से पुरके इकार का यह पर्प नहीं किया कुछ नहीं है कि यह है कि यह परिमापासे परे है। तर्क का पाश्रय मेकर पुराने पुष तालिपीप प्रश्नों का चिन्हें उन्होंने निरर्पक समझा उत्तर देने सरकार ररिया । उन्हनि साधिकारिता (प्रॉरिटी) के या प्रमागपम्पों के सिवान्त को प्रमाम्प कर रिया क्योंकि किसी दूसरे के पर्मिकार या प्रमाण के कारण मान्य सरप का पो निजी पल से सिरया प्रमाणित महमा हो कोई महत्व नहीं है। महायान मोटर्म में उपासक एवं परमवर का समाप निष्ठा एवं प्रापना पर मापारित है। उपासक कोईवी या सिरोप पुर मे पपवर्मन कपा एवं पहा मता प्राप्त होती है। सभी प्रकार के पोस्पर्म में रिपाकी एकापता एवं पान पीप्रमासी पर बस रिपा गया है। ७ ईसापि रंगाका निगो पनुमर प्ररया मान पर एक महान उदाहरण है। उनके कार्य एवं पवन इमर रे साप उमरे सम्पमार की वोव भावना से मरे हुए है। बपती हुई पंप-नयोमा सम्ममेम पो यात्रा पूनाम्पान्तरित पाकार एवं मुष, गिमार निजी धनुमयी धार पी एक पहरे पाप्पारिमक परिवर्तन के पोतर पर ईमा परिस्ट मन गाम के पिपर में कहते है कि यपि ये पान में नरमे मान , मिस्तु एवम रे पन्य लोगों में में सबमे पानी परती के बड़े से पो मारमी मे पहा तब उनरा पाए पी जाता है मिमने सत्य को स्य पापा उममे मोमो विषय मनाला है पर सिमे प्राम-धन- गति मही है। हम शिरिमोगयो पारपरक प्रौर पर रक्षा ऐमा पार पम्नम्प पपिमामालिशपापाप्यास्मिर पयार्य नापा मा पनुभवरलाहोमा। तमाम tir (१) मग) :
सत्य कीहोर १ ईमा एक मम्तर्मुसी नगीनीकरण एक प्रान्तरिक परिवर्तन की मांग करते है। स्पर्म का पम्प पन्तरिक्ष में स्थित कोई स्पानयप नहीं है परन् यह एक मान सिकस्मिति है। यह राग्य पही मी समन वर्तमान है । “पापाताप कर, सर्ग का राम्य सामने रखा है। सरप मी उपमम्मि से ही सातम्य मा मुक्ति का मार्ग प्रकट होता है । ईसा प्रान्तरिक पूर्णता प्राप्त करने मानव का संभवनीय निकास करने की बात कहने पर हमे पाचाताप करने को लेबना पनि प्राय प्रायश्चिात याप-प्रपाष से नही होता परन् एक सातारिफ मन्ति से होता है। प्रोत्री का रिपटस' पब मिस यूनानी पम 'मटा-मोहया का मनुराध है मा-प्रपनी बेतमा को सामान्य प्रासामो पो उठा सामा। यह प्रान्त मनिष का परिवर्तन बिबईसा कहते है कि अपने को गरम पारनपुसिसुर्षों केस में होगा तब सनका मतलब यही होता है कि हमें बह-जगत से इमियों की निरा की स्थिति से बागना चाहिए। मुर्द को पुनः पीपित होना ही चाहिए। हमे अपने विपों एवं पृभामों के बंपन से छूटकर पारमस्प में नोट माना चाहिए । 'बर तक प्रणा नहीं करता स्पर्म के राम्प में प्रमेय मही कर सकता। हमें अपनी मिम्मप्रति को दबाते हए इनियनिता एवं प्रारम नियममारा जीवन तर स्तर तक पहुंचना होगा। "तुम्हे फिर ऊपर से पैरा होमा होपा।" यह प्राकृतिक हिल पग्म मही । यह एप पाम्बारिमक पुनर्गरम है। मनुष्य की सपूर्ण प्रकृति का रचित पुन मार ही मुक्ति का पभिप्राय है । कानून पा रिषि पाप्मारिमा । संत पान मिनट 'इससे मैं स्वप मन में पिरीम निबममा पामम करना , मिस्तु मांस से रह से पाप के कानूम का।" "पर्योकि म प्रम्त स्म माना मा पनगरन कर सबर मियम कानून में पामार का अनुभव करता है। को मुक्त हो जाता है पर विक्-िपिपान से उपर उठ पाता है। "विपाम (म) मनुप्प के लिए बना है, मनुष्य विमाम के मिए नहीं । "प्रेम ही लिपि विधान की परिपति। पर्म रहस्य दुर से प्रिप्य को प्राप्त होता है। ईसा में यह पाम्पाश्मिक प्रभा भी पर इनका मिमा रे सर्वसाधारण को, बिना किसी परमार के सहारे है। "बो परिण है उसे कुत्तों को मवरे रो मभपने मोदी एकरों के सामन फेंगो मही तो वे उसे पपने पागों से कुषम गमगे और फिर रमटकर तुम्हे ही फारवाएंगे।" . लोपोमा परनितिमाने वशिल मिते रामायकी मोहमारे समय की भरमा एकप मरिश कासिम माम्मास्मिक बीवन मौर जीवित पर्म म्यानमत प्रार्थना सभा तपस्यापरण द्वारा पारमा की पुनरमा हो सम्परा धर्म है। ईसा का वास वर्ष का मौन तथा पामास दिन तक मरुभूमि में मौन पाम्पारिमक सिदिनी वयारी-मार है। ईसा मानव-पुत्र पर पर पुर मी पे। उमा मसग स्पर्मीय एवं पारित्रिक दाना स्वरा पर पा । मनुष्य के रूप में देहर प्रसोमम में प । अन्तिम सम तर प्रमुम्प रहे। "मरे प्रम् ! तुम मुझ पर्यों भूम माए होतीन वेदमा भामते रहे । या मनुप्मों क सामने एक उदाहरण क्योंकि उग्रोन मान्सरिक मो समया पर्व प्रमोमो 'मरते हुए पपन का ऊपर उठाया। प्रातरिक विकासपी सीती पर पड़ते हुए उन्हें म जाने कितना पट उठाना पस। मपवार मोई एतिहामि पटना नदी को दो हवार पूर्व पीहा । कोई भी अपनी नियति को पूम करने के मार्य म होता है उम सबके जीवन में यह पटना बार-बार पटित होनी है । मीरटर एपहाई पर्म पा सक्ष्म मानवमी पारमा में परापम्म बताता है। पर मरमा मभिप्राय बम है। बहतर ना सम्मुष्ट नही होमा जन ना कि हमारे बीच उसो पुरमा मन्म म हो जाए। भारमा भी तब तक समृष्ट नहीं होगी व वा या पत्र नम्म मही ममता। यहाँ यम का मर्ष परामिम्परित, ईसमिति है। गरपापागामि मानव-पुत्र फिर पाएगा तप मा पभिशाप यही होता है पिर मरय पगार मप्ट हो पाएगा उस पारमा के परागजमत् ८ मममम पियर हो जाम्पा परबह हिमा पब मोतिरता म पतित हा पाएगावर सरप गोमयेस्प में प्रष्टामा पागा। पर ही प्रतापिय मरम मिभिन्न स्थितियों के मनुस्स हाने से नितिन परिवर्तितम्प में पाना है। भी बदएर पा पर जोर देता है भो दूसरे पर। समिप्या परतम्परनवा समाना पाता है र सरपगोमवा शिपिस पा गावी र सरयारमारा हमारे मीष पाना ही पाता है। प्रापेर लिम्परित मानव-युगादी पाराममन है। पारमा परमारमा माग प्रग क. मानवीय मारनाirtem मार और हम में ग्वर मैन । मन में गिरम को घर म पनन सगरमोग समतल मारेर राममान मानार सपने में मौन मनीर। और में भी गा बिनपिन ना निम्नसमारने निपातमी मियान-मापन नदी " मुरारपसन पारित बिबरमामय मपामणभोगय ALERसस मायर ममम। समीर अनुमार सरप कीबोर प्रमोमनों को ठुकराते हुए, अपने को साउठाना पुनः पापा-कायम करना पमा माननीय विकास प्रपत्र मा उपाटन करना है। ये मभिपक्तिर्या मवार मानर-प्रमाको निम्न स्तर से रप स्तर पर मेवाने में सहायक होते है। सत पाम को प्रबर का प्रस्वम शान था तभी उन्होंने कहा पब हम एक एप में धमा-सा रेल रहे है परन्तु मामने सामने है। अनेक पर्यों में अंत पाम ने सिरीय उपस्पिति के अनुभव का वर्णन किया है।' सममें मानगात्मा एवं परमात्मा के माठ सम्बन्यों की बड़ी सीन देवना पी। 'ईसा में समाविष्ट होकर पीमा ही उनका गम पा। हम ईस्वरीय स्वभाव में माम मेते हैं। परि हम अपने को फिर से नमीन कर लेते हैं और फिर से ऐसा नौवन गौते गिसमें सिर की पनिम्पपित होती है तो समम्प्रे हम बच गए 1 सेत पारा की सम्पूर्ण शिक्षा तुरन्त की मायेप्टनकारी पिरीय उपस्थिति पर निर्भर है जिसमें हम पीते है चमते फिरते है मौर अपना पस्तित्व मुरक्षित रसत है। मत पाम सिाइया से अपना मन इदम गरमने को जाते हैं प्रपमे में यही मानस बनापो बोईसामसीह मे पा। "यदि कोई मारमी ईसा में अवस्थित है वो समझो वो एक नई पुष्टि हुई है। देखोरे कि सब कुछ मरा हो गया है। देवताल प्राप्त करने के पूर्व संत पाम ने तीन साल मस्बम में बिताए । हम संत पातकी एवं पाप सिाईरनामों मेंपी मनपाने स्वप्न देखने और होनी मोस्ट' (परमात्मा) बारा परवान पाने के प्रसंग मिलते है। संत पाम के समय में बोपस्पारमा प्राध्य धर्म रोमन साम्राग्प पर माक्रमम कर येथे उनके प्रमाणे संत मी मिमते ।। संत पान मे असामईसामसीह प्रमापी अपने सामाम्प उपयों एवं सस वी बाम में विशेष किया है जिसे सिर कानाम के पहले ही हमारे फरमान एवं भेव मिए रवा बह शाम पो मुप्त पौर मोसन परिपक्म 'तोगों के लिए है यह मान मो हम मोमों के पाममे पसे मात करता है पिसे किसी भाव भरेखा मही किसी काम मे मुना नहीं म किसी मानाय मे चिसकी ग्भावना की। पास के लिए ईसा के सेवक सर एस्पों प्रक।' संत पान पोटो अत्यधिक प्रभावित है। उनके लिए वो संसार-सम्मा एवं मपार्षबगत् बो उपर है या मंधकार एवं धागापा पयत् । मिा सापत रूप से पिपरपौर उनमें सत्व एव निस्व बीवम प्रतिपमित है। सिा ॥ संसार में पात्मपनत् के समान एक ईश्वरीयम्योतिको म्यक्त करो। पाम के . पशिम'११५ १६०१ ४ परिसिमा १२ १-ऐमस१५शिर्षस १४-१। परिमित परिसि..। .
२९०२ पाम्पारिमा जीवन प्रौर गीमित धर्म मिए ईसा प्रयाग में प्रवर्भूत वरीय शाम है। सिामा पाय समस्त झाप मिए महत्व रखता है। मोमोस' का सिसाम्त भी इस बात पर जोर देता है कि समूग गमत् अपनी परिमतिको प्राप्त करता है और ईसा के द्वारा अपनी पूर्णता को मौट पा है। परम पर का प्रतिस्प (इमेन) है सम्मन सुप्टि में अपमगाव ई सम्पूर्ण वस्तुएं उनके साए और उनके लिए ही उत्तम हुई है। पाविक उपक्रम संपर्प एवं विजमा उपाय है। प्रटिस शक्तिों पर विषय सम्पूर्ण प्रमाण की जिम है। पौर मह विजय एम मृतन सम्बन्प र एवं पगत् के बीच सामम्बस्पपूम सम्बम्पको बग्म देती है। सिमरिया के पर्मतत्ववारीसोमेट(२१५६.) एवं प्रोपेरन (२५१.) में स्वयं ईमापिर्म को रास्य पर्म पथना 'सम्पा अपवाद (मास्टिसिरम) पहने में पिपिपार नहीं की, पपपि बाद में धमोही मोर मास्तिर पोपित किए जागर तिराहुए।' फीमो से सीमेष्ट मे यह विचार से लिया कि सिर की पोन पर में परनी चाहिए । निष्ठा एवं भावमगमता के हारा ही उस तक परसपा साता है। विरसपन हारा प्रापिमान मी मोर पाते हए (महा पौगाई मम्बाई एवं स्थिति कोरकर एक परपणु का छोड़ते हुए वया पार में पराको भाषाप में बमोहए)परिहम ईसा को प्रपारता में अपने मो निमग्न कर पो उससे हम पवित्रता के कारण उनकी विणाप्तवानी भोर पाये पाएगे पौर किसी मे सबविमान पर काभान प्राप्त पर सगे-यह मान तो महीकिरहरपाई पर यह माम हिपहपपा नहीं है। मोरीन पारनार प्यान माहामा देता है और गिय वमा मन पर उटर एर पनिनीय मनः पाने की बात करता है। उसने बड़ी तपस्या का बीरन बिताया था और उसरा वाया पाकिको भी इद्रिय-निग्रह एवं यम निपम-पालन काराविर एवं मामारिमर परदातों कालसर्ग प्राप्तगर सरवाहै। बोली पवागी में पारम्पत्ति मम्मास के विकास के साप मूवि बिना प्रार्यमा एवं पाम को महाल रिया गया। इस प्रामामीपनाएपोनी कभी-त्री नारी-मारी रात पारम्दोमा भीमपस्पा में पते पे मर रहोने भी प्रार्पना के मध्य के रिपप में यह रिम्प सपा पपिमामयी निर्मम दिया “बह प्रार्पमा पूर्ण नहीं है जिसमें मनुष्य पपने को मोर प्रपती प्रार्थना गोमममने पा नाीिरममार। पश्चिम १:१५-१६। एस सचिरम पार Kaस (1) सस्पनीर होग रसता है।" संत प्रामस्थान का यह कपन कि तूने हमें पपने सिए पैरा किमाई पार हमारा तब तक प्रधान ऐसा मातावरे मन्दर उरो सिमाम मही मिलता का सिर । उमपर्म का हाप उनके पर्म का तत्व उनके मिती पनुपर से मानामा एवं पिर के प्रस्पा मम्मम्प से निम्मा है। प्राय हस्सात्मक मafeपाला देते। परे । प्रभी हमने एक मारतरिक मापुर्व का मानना मूटा। महा ! भव अपने पस्तिप के पितर पर पहुंचकर पर भषिक ममान में दुच ऐसारेका पोपपरिबरनीय है। पनु ताब्दी में बेसार में मनेक मानियों का पण नपाता है। गेम के पतन के पश्चात् सत बेनेडिक्ट (५१) उनके रारा प्रार्थना एवं पर्मकार्म में इगरों सिप्यों को प्राप्त हामेवाते पम्पास के उठा लिए जाने के कारण साई धर्म सूर पमपा । सत मेनेरिक मानारमक प्रार्थमा के लिए मंसार-रयाय माग पामन मौन एवं विनम्रता पर जोर देते है जिनके कारन पम्पासी पूर्ण सारखा की स्थिति तक पहुंच गाएगा।' गे योनीमियरा (पाचवी प्रतीमा प्रस्त) तपा सत बेगोरी महाम (पठी पवी का पन्त) दोनों का मप्मयुग परमा प्रभार परा है। अपने परम मिस्टिकम पिरोनोगी (हस्मारमा मानिया) में सूगेडायोनीसियस रार्थमिक एवं पत्यारमा एप्टियोग में भेद करता है। वार्मनिक दृष्टिकोन हमे एक मिराकार भाषापरिवारलाई प्रयासमोर सारमा को पुरिर के स्तर पर सेपार माराप्य में एक कर देता है। रहस्यात्मक म्पति का मध्यम यस्मस्मक मौन के प्रतिप्ठ (सुपरस्ट) प्रत्मकार में प्रोम' पर बर्मन पिन्या गर। पानामास के सम्मान में होगमोनापियम निम्नलिखित समाह पीपी बिका पालन सम्पूर्ण मम्मयुप मे म्यिा गाता रहा "पौर तुप्पारे टिमोथी इस्पारमरपान के एकाप्रबास मे प्रपमा चेतना और अपनी पुरिनियापोनों कोपीये पोर इसी प्रकार इतियों सपा पुगिरा झाव एब वस्तुओं को भी पूलमा । मोर मी बीपीई पा नहीं है उनका ध्यान पोरकर प्रमाने प्रपने की माक्ति रस साप चौड़ने यो सब प्रापिर्यो एवं सब मान के परे है क्योकिया निपुरम में मुक एपरमेसरातपतु सबसे पनाहत होकर और सबसम्बनों प्रकरसी परपकार पीरिप की पोर प्रेरित किया जाएगा।" १ सिक्न बोले १.मता १.१.। में प्राप्यात्मिक जीवन और पीषित धर्म १११ - मंत प्रेगोरी महान मामस्टाइन से बहुत प्रभावित है। उनके लिए कर्मगीम रन से प्यामापस्थित गीवन नहीं पा है। ईसा का जीवन ऐसे पोनों जीवों के सामनस्या उदाहरण है यहां कर्मपारा मानस की सारित एवं पिरवा में बापर मही है। प्यानावस्पित गीवन पीसो गम्ति, स्पिरता दासक्ति, निरतिशय प्रारनियंत्रण तपाईपरपोषी मति प्रेम है। पनों के संत पर्नर (पाहती गठी) का पाप्यारिमर धर्म-सापना के इतिहास परका प्रभाव पड़ा है। कहते है में स्लीपार करता र मिस्विरवाणी मेरे पाम पाईदगार-बार माई फिस्तु रसके प्रियतम में बारबार मेरी पारमा मे प्रवेश करने के बार मुझे कभी उन माने माहोल नहीं रहा है। मैंने मनुभव किया है कि उपस्थित है मुझे पार पिये मेरे साप रहे कमी-कमी मुझे पूर्वमत भी हुपा है कि भारी परम्तु पमो उनके माने और गाने की पेतना मुझे नहीं रही है। यह बतानसे वार कि यह दरिद्रयों के हार रो नहीं पाता, कहते है बहनिमप पुरे गणित मे पूर्ण है पौर श्योंही उसने मुझमें प्रवेश किया मी निरित पारमापा गतिमीसहर रिया तमा मेरे हरप मो, जो गड्या की ftria.म.पा मोर पापरही मोति पठिन पा उर फोमम मौर प्रेरमामय कर दिया। मन विकर करिव (१९७१) पार एवं पुक्त पायनिक मार्ग तया उछ प्यानाम्मा प्रापरम में भेव करते है यहाँ पित्त प्रपनी सीमा के बाहर पसा पाता है और माप को निरापरणाम में रेपवाद। तैरहनी गती मे पाप्यारिमा पर्म की एक महान महर का उमड़ना देखा। मत बोनातुरा (१२७४) महते है में वना तो मानता हूँ कि मनाएको इम मारपिरपर रेरित एवं स्थिर पिया गा सरता है कि यह उमके सिवा मोर मीदेगन पाये फिर मी वाम प्रसायमी महिमा को देस या पहन मकर मामा बसि उटार एक गहन पंधकार में पा पोगा। पौर, साकि गपातोपियम रहता है म मान में यह सब पस्तुपों में घटकर अपस्थिति में पर जाएगा। दापोतीगिपस मे 'मामपूग मनान कहता है। हम प्रसार के भान के लिए स्नेहको प्रयनित पर दिया जाता है। यह गाय उन मोपायो मत्री माति गिरित है मिह प्रानन्दोग्मार पाण्पामाम है। मेरी मम्मति मे मान को इम प्रगानीरा अनुमान प्रत्येक मायामोमो गोरन मेरला पाहिए। यदि नुम पूतो पिहरी होता है वो पिता मो नमी प्रमा पनाह वापत करमपी पुटिनीमही मरणको अध्ययन एष मममीमही प्रापना में रोने अमनमरिमारा .... , गनगन इन म ।
सत्य की गोष M प्रथमतो कीटा। गेमीनिकम प्रसबर्टम मममस (१२८०) अन्तर्यप मन को सब मिमामासों पापियों से रहित एवं मन कर देने पर पोर देता है। उसके मत से ऐसा होने पर ही मन को ईस्वर में शान्ति एवं स्थिरता प्राप्त होती है। संवटामस एपिबमास (१२०४) सिर मगम स्वीय बर्मन में विश्वास करते हैं। उनके विचार से इस नए सिर कारर्मम उसी के सहारे किया जा सकता है। इष्ट पाएस पवार्य भीमही है और रखने का सायन मी यही है। पायीरिप्राप्त सोम ऐसी सामना में माम देते हैं जिसमें सिर बिना किसी माध्यम सपने को बनाता है। मे मोग सर के साथ संयुक्त पभिन्न हो जाते हैं क्योकि इस्पर के लिए किया कर्म ही पवित्र कर्म है। 'तुम्मा कॉट्रा टाइस्म के पोषे भाम के प्रारम्भ मे सत टामस एक्विनास सिरीप विषयों-सम्बाबी तीन प्रकार के मानवीय मान की पक। इनम महान है बोतके बुटिके पाहतिक प्रकार से माता है। इसमें तर्क प्राणियों के पापन से म्मर मर तक पाता है। दूसरा सिरीय पापी मा उसके ही प्रकाध या प्रमिभक्ति के रूप में प्रबप्ति होता है। तीसरा ऐसे ही मामब-मन के लिए सम्मम है 'यो प्रमुगारा प्रकापिस्त मा मत बातों के प्रति सहन प्रेरणा की पूर्णता को पांच हो। संत प्रामस्टाान का प्रमुसरण करते हए टामस एक्विनास ने सीकार किया कि मंगमरन मूसा एस मत पान को प्राप्त हमापा । या पचन ही यह प्येय है जिसके लिए मानय का निर्माण हुमा यही उसका पुरस्कारासाय संत टामस पक्विनास को ईमर का प्रत्पत अनुमपप्राप्तनपाषा तभी तो उमनिपिप्परेषानास से कहा था कि उन्हनियो कुछ मान व निताईबह सब सिरसन की विभूतियो के समय मिनात महै। मापनी सती में मतोरिया के पोसोम ने मनुण की कहानी को तीन मैपियों मना। पानी मेषी पिता की विधि (मा) के पार्ष की। वहां हमें बात मुनना पौर रसका पामन करता है।सरी पुत्र की। यहाँ हम ई एवं पामो बना भी करते। परम्पराकम्पास्या होती प्रमाण मा पिस्तार किया जाता ॥ठीमती नी मात्मा की प्रस्तावना की है विधर्मे हम प्रार्थना करणे, मनन पाते। पान करते पार पातपूर्ति प्राप्त करते है। पति (१२१५-१५२१)में हमें मपकानिकरिस्मीसबसे परिपूर्ण पभिमति मिभारिपाइम कामेग' वर्मयात्री की प्रतिमा भित्र है। इसे कामेरी सौनिएका गया है कि यह सुशान्त है। किन्तु मुक्ति कापर पाप एवं प्रायश्चित्त १ परिचम • समय पर पले (१६). - माप्यारिमक पावन पौरजीवित पमें १२१ देर से होकर मुगरता है। सिर तक पहुंचने की यात्रा तीन पियों में पूम skt-(१) बुद्धि एवं तासाभाविक प्रकाष मो मार्ग + उस भाग से प्रमागधीम होता है जहाँ मरिस पपदक है-मरण के द्वार गे परिणोपनशामा (परी)गिसर तक (२) पनुपह की परणापी मोठि गो पानी बीट्रिप की मूर्ति के स्म में पाप परिमापनगामा के पिपर से दूसरे स्वस्थ शिपरता से गाती है और यहाँ स्वर्ग के महान पाटम-पुष्प मैं अपना पान पहा करने के लिए रात को छोड़ देती है पीर (३) बहमा ग्योति पो सत पर्नर की प्रार्थना पर पबवरण प्रारम्भ करती है और पपिक के लिए मुसम होती है उपा अन्तिम रम प्राप्त करने के लिए उपर की मोर गतिमान हाती है। इनके अतिरिका भोर भी महान रहस्सबादी हुए--संह हिलेगा। (१९७१) मेघरासयतिरहनी प्रवी) फासिनो की एनेमा(१३०१) माविषयो अनि मन (१४१२) मी पनामापाप्मारिमा जीवन पर गहरा प्रभाव परा। सीना भी मवरपराइन (बौदही सी)छ वर्ष की प्रापु में ही एक दिन पE पिपरवारस पी स्वर्गीय ममा पाकर प्रष्ट हो उठीबास अनुमर ने बाद के उनके सम्पूर्ण जीवन को प्रभावित किया और उन्हें मानन्दोग्माष एम राम्य में मार्म परातरिया। एप में भी हमें मारी रेप (१२९.) हेमोत के रिचर राते (१३४६) पास्टर हिस्म१)प परपगारी मिमवे ।।हिस्टनमामिया निरामी पपौर रोमे से गहन पपिर ममापित थे।इनका पम्य दिसेल पॉफ परफेशाम बहुत प्रसिद्ध है इसी प्रसार मारा पांच प्रमनीम' भी पारपुरम धार्थना के मिए एक पन्नी पुलिरा है। पानी में मौरसर एपहाट (१२५) हिनि पूरा विमय एवं ममता साप निरा बहन की 'हपाली परिसमारताने हेमणे भूसा (१९५१) महान पर्पोरेपफ यमर (111) एवं रसके गिप्प पाहसी मसिगाए। मगमग १३. पियोलारियामिया' (मनसायमान)निमसी रमने कहा है पप गोपन परमाप्रमापरामा। पहए टासम-ए-म्पिमपी मोटेपाम पाप पार (सापी प्रतिकति) पुस्तक मम्पपुगीन हम्पबार के महान काम सुपर में पियोमोरिया पगियाप्पपनपिपापा सपा पर्मानुभर के रमणि रंगों में हाल पसिफ मुसिमाप पर हसा प मापारिमा १ "HEL नीरो प्रारम भयो त मानमानी माती में जीरोमोपशम Panta अनिल मोरा तपाने रणनिरमान कपि, सप nिt मोबाम र भौगर मेरमो! ~शियेय मालपसे। (१३ ।
१२२ सस्पकीयोग पसरष्टि का उपयोग है।राससकी मृत्यु १३४५६ में हुई। उस भी सम्पूर्ण निसर्ग मे प्राप्त विसगीपन (परमात्मा) का प्रत्यक्ष अनुभम पा। उसके विचार से मनुष्य इस जीवन का एक पपिच प्रय है। कर मोहमे (१५५५-१६२४) कहते है कि उन्हें अपने जीवन मे तीन बार ऐमे पपसर भाए यावे मानयोग्माद की स्थिति में निमग्न हो गए । यह स्थिति कार दिनों तक बनती रही रिसमें गमें ऐसा मनुमन होता था मानो मेसी प्पोति से घिर गए है। दूसरे प्रसर पर वो उऐसा पान पग मानो प्राति उनके सामने प्रनाइव हो गई हो मोर ये सब यस्तुपों रुप में केन में माराम से बैठे हों। तीसरे अनुभव के विषय में मोहमे ने मिया मेरे सिए फाटक सुन पया या चौमाई परे के मदा मन बो कृप देखा और पाना मह उससे कहीं प्रपिक पा बितनाई साल ममातार विश्वरिचालय मे रहने पर पान या देख सकता ना। बिसे मोहमे 'उमपुप मिस्टीरियम मैग्नम' मा मुक्ति महापर्व कहकर पुकारो नही सपूर्ण मस्तिष का मापार है पीर बहाम एक परकास के परे है। यह प्रापिनीरवता है । अभिक्ति या प्रमिप्रकासन (मैनीफेएन) के मिए हमें परस्पर-प्रतिकूम तत्लो एवं उनके संबपरत होने की प्रारम्पकता पम्पी है। पैस्सल की मृत्यु के बाद उसकी मालट के पस्तर में सिमा एक पर्मपत्रक मिता गिसमें पुखमस्पष्ट माग पी। इस हाईम में एकलसम्त अस मनावापौर उसके चतुरिक निम्नलिखित म पम मि मिची अनुभव की स्मृति बनाए रमने के मिए १६५४३ सुनवप मे सोमबार २३ नबम्बरको यो संत सीमेंट पोप मारियर मानसरे यहीरों का रिनो संत किसोमोमस मार्टियर एवं दूसरों की यह सप्पा ! सम्मा के साये पराप से मम्म राषिभाप पटेबार तक प्राव पाहम के सिर गिक पर बैनर तत्वज्ञानियो पौर विद्वानों के मही। निरषय । मानन्द । पिस्वास। मागोमादर्सन प्रानन। भवद् तपासबर-बाम समस्त बातों की विस्मृति। मम ने तुझे नहीं पामा पा किन्तु मन तुझे पान मिपा है। पानम्म! पानी पानाप । मानन्द के प्रासू । हे मेरे स्थिर मा तुम मुझेपोपहर बम बामोये । यो पब में तुमसे कभी पुरा न हो।' १गेम पसरवन मिसिसिप (१) al भाभ्यारिमा जोबन भौर पीवित मर्म १२५ पॉर्न फारस (१५२४-१६९१) मोहमे के प्रभाव में पाए और उन्हें भी एक पाप्यात्मिक प्रमुभव हुमा रिसने उन्हें उल्लेखनीय प्रगतई पि एवं गति प्रदान की। हरेक मनुष्य मे 'ईस्वर की ज्योति याबीन है। गा पाप-पत्तियों पर प्रारमा गियो हो जाती है और ईदवरीय पातों का पालम मरती है तब यह प्रश्वमुखी ग्योति'मा सापन या पस्त्र बम पाती है। मौन उपासना एवं स्मार्य-निग्रह द्वारा हम ईश्वरीय प्रसाद पाते है और पवित्र हो जाते हैं। बिसियम तो (१९८६-१७६१) बोहमे तया इग्मिस्वानी पफमानियों (मेटोमिस्ट्स) मिचकोट स्पिप मोर तपापाय म अत्यन्त प्रभावित था। उसकी रचमाों से उसकी पामिर पम्त पि तपा प्रदृष्य सत्ता के साप उसके प्रत्यर पम्ठमुख समागम की चेतना का पता लगता है। सत्रहवी पती के प्रप्रेजी पबिर्यो पॉन डोन गोग हबर्ट टामस ट्राहन हेनरी मागम पर प्राचीन इस्पमापकामहरा प्रभाव है। वित्तियम मेक ( १७-१८२८) मी मी प्रकार पी पित्तवृत्तिमा पा। उसी रबमाएं भमरीका के मसन की माति ही रहस्पामक है। उम्नीसवी गती म बसवर्ष कारिज टेनीमन एवं भारनिग मौरचनापों में गंभोरतम पारमजीवन के प्रति भन्नाई पि एक निजी मन्मयों के प्रमाण पाए जाते हैं। गां पसन (१४२९) मे रहस्यात्मक ब्रह्मानुभूति पर एक अन्य सिखा और एस्पारमक प्रेरगामो 'मातिर संज्ञा दी। ग के निकोसस (१४१४) मे पपने विपार मणप्मेटोराव पर ही मापारिल पिए १०मा नेविगाहन नोसियस (१५६५) मे प्रापना की ऐसी बिपि का समर्पन पिन्या है मा 'दिमा पिसी मप्पम केपिरमिमन' तक पहुचाती है। सोमहवी पती के रहस्यबारके महान मसो मा जम्म सोन में हुमा- संत पेरेसा (१५८२)प त्रास के मत पान (१५६१) संक्रेमा ने हम एक मत प्रतरतुमयों के दो सगीप रमन दिए है। उन्होंमे मनोपमानिस प्रभारों के पनु सार प्रापनाको पोटियों में प्रस्तर पिया है। पानी सबसे प्रथम रचना 'जीवन मे रम्हनि लिगाई दिप्पान में पारमा श्रीमपिता स्पामाणिक एवं मुफ्त में माग मे स्मरण पपयामीन भावना में इम्पायलियर से सान्निप्य-माम करती है जबक्रिसमा एप बदिदम मिसन में सहायर याबापर बनने के लिए पवरपती है। पूपिम में ये मन मसियो ए में मिल जाती है-पूप एपस में। मुक्षिण से यह पम पाप पोषमता है। हमके माप हर्पोरमार एवं पिसता पापनुमर भी होता रहता है। रिपरिपुएममिन (मापारिमामा) में प्राप्या रिपर रह पा मिलमपोगापा ताप लापा गया है। गाम कसन यान मंत परमारेएकमिप्य पारमा पहना है कि होंग्मार एवं मितापामारण मारिरनता है। मनी रपना 'एमट पॉप मारत १२४ सस्वकीलोग कार्मेम' (फार्मेन मिरि पर प्रारोहण) में नहोंने प्यानगोम के जीवन के वफलम का चिन किया है। पूर्व संन्यास एवं प्रारमगिरति की मांग करते ।रिसे ये इन्द्रियों की निया कहते है यह मात्मा को ऐभिव भक्ति से पूर मे गावीtar एकाम्प एवं शान्ति की इच्चा उत्पल करती है। ऐसी मबस्था में पारमा बिना किती पिपवान को मारम किए ही अपने को विर के हाबों में घोरती है। एमिमों की निशा के पार पन्तगरमा दो स्पिरिट को निता पाती है रिसमें इबर पास्मा उमाप को विनीत परिमुखमा परिसकता और उस पूर्व ऐक्य या मिमम के लिए उसे तैयार करता जिसका वर्णन मास के तबान ने 'दि स्पिरिन्यूएम रिकम (मम्मारमगीत) तमा वि सिविय क्लेम पाफसर' (प्रेम की समीप फ्योतिषिया) नामक रचमानों में पिया है समे के संत झोमिट (१९२२) मे पानात्मक प्रार्थना का मच्या बगान किया है। मोमिनो (१५१९) एष मराम पापोन (१.१७) बोर्नो मौनगर विषम में भयाना पसंतुलन में पड़ गए पौर धम्हनि प्यानयोगियों तथा इस्पापियों को कम्पना के पोरे हानेकामे नमरोररिमाण अस्वस्थ मक्तियों में पान कर लिया। परिणायक मोरपान उत्तमैन मे अपनी 'गपरी' में मिला “एक ऐसा सिमान्त या तस्वणो पपिक और मानव-म में रख दिया गया है। बिभिन्न स्थानों एवं कालों में इसके विभिन्न नाम पे हैं। इतने पर भी पषित पौर पर से उराव है। वह मीर एवं प्रस्तर्मुसी। किसी पर्म प्रपाती में सीमित नहीन किसी धर्म-अनाती से बहिकाच हसपूर्व सचाई में हता है। धिमके मी मन्दर महबा पाता है एवं विकसित-पासाबित होताt पाहे किसी बातिक होने परस्पर मनु हो पाछे है।" रसियों की बार्मिक भावना मी पस्यात्मक पकीसमा म्वी मिरों में पिठ प्रकार की उपासना का विकास पाई उससे एस्पारमा मनातियां पनपक्षी है। पर्म का लक्ष्य इसपर को सर्वम्पापक ऐप केस में प्रनुमयमा। मुरम्मर की पसात्मक प्रतिमो नम देसयामों के बहुदेववार से बड़ा हमारे एकान्त मामलों में पाकर उपासना करते ऐसपा इस तरह सहनि पपने मुबारणपान पार्मिक विधाकारिकामध्यिा। ८ साम तसमुफ शनाम काग्रीय तत्व ईसर की उपासना तवा पसे एकमात्र परमेश्वर मा मोसमी रस माया कामात मरणोपर्मित मला माम्पारिमा जीवन पार पीमित मर्म १२५ रूप में मानना है । मुहम्मद को सपना बाकि धर्म के हीरों संवा एव देवों में विश्वास करके सिपर के एकरप को पिसका प्रमाण कुरान में मिमता है सियों मे शिपिम कर दिया है। स (दिमिटी) के पस्य एष परवार श्विरीय एकरव का साान कर देते हैं। अपनी स्पष्ट दृधि से प्राप्म ईमाइयों मे तोम रामदेवों का मानिर्माण किया तपाईमा को ईश्वर-पुत्र के रूप में परिवर्तित कर रिया। मुहम्मद मे मनुष्यों एवं मूर्तियों नक्षत्रों एवं पहों की उपासमा को इस सिखात की दृष्टि से ममाम्य कर दिया किमो उदितहमा है उसका प्रस्त होमा जो पैदा हमा है यह मरेपा । यो दूपमीय है उसका हास एवं मार भी मिरिषत है। मुहम्मद के लिए ईवर एक मसीम एवं धावत मारमा है जिसका कोई प्राकार नहीं कोई स्थान मिधेप नहीं जो निम्पिप है जिसरी समामता ही नही है। वह हमारे परम पनीम विचारों में उपस्थित है.पर पा-अपनी प्रतिमा उपस्थित पौर पने ही वारा सम्मा मंदिर एवं बौसिक पूर्णतामों को प्राप्त करता है। जब प्रभात तल से हम पाम एवं प्रबका पति एवं पदाम पेठना एवं विधारमी सम्पूर्ण पारणार्पोको मतप कर देते हैं तब बोबच पाताबही विर है । मुहम्मद एवं उनके पनुपायी ऐश्ववादी हैं । उमरी शिकायत है ईिसाई पमदियो मी ऐक्य भागमा पिरवापरों के मम्म समारोहों म बिमीन हो गाती है। रियर के प्रतिरिसत अपने पर्मपुरोहितों या पादरियों एव संग्यासियों को भी प्रपमा सामी मानने के लिए मुहम्मर सिाइयों की भरमना करते है। पर्मरिया के जानकार को भी कहें मुहम्मद पुरानी परम्परा के एक प्य या पि । कुरान एक शपि का ग्प है । सूफी परम्परा महम्मद मोहीमपना सस्थापक. पा.मादिप्रवर्तक मानती है और सिरके पतिर पनुमा पर बस देती है। मूफी एकाम्बानी ये एकान्त स्थानों म पाभप मेते 4 पोर मपनी जीविका के लिए पपने भकों पर निर्भर करसे पे। राम्युफ का विश्वास है कि पत् में बम एक परम सत्ता है यह प्रोप है। इसके नामहपौराही हम रमाए दुप मान प्राणपर मरते है। विगुटारमा नामापरहित.है पर यह पानी मिसिसा पासतमा रो पोपर प्याव होता है सभी ग्म नामपणि माते है। गोपरमारमा पाम पर पुष समायों मे रहित होता है उम गूध जीमी पम्पमा' (म) पातीम अभियोग गुगल पर उगमें पतमारा विगम होता है। प्रपम रिपति कायरी मरी म प य पुष्प पानी मारना (प-नाही-मेम) है तोगी मे ममरा ही महं-ना' (पाई-म) की प्रथम Palika TURA (ant nir गा पा ( मामा-मा १२१ सत्पनीसोर तुम निगाह पुष्प मी मावना है। इस उपक्रम से परमारमा सम्पूर्ण पिस्तम का विषय बन पाता हैल्पा सर्वास्तिवकोपंक में समेटे हुए, प्रपमेमो पिपेप पुर्गों से मुक्त सिर-सत्ता स्प में म्यक्त करता है। यह एस्म पम उसी परम ब्रह्मपी पभिप्पक्ति है। इन प्रस्-परवी कहते है हम सिरको प्रावस्यकता अपन ही अस्तित्व के लिए है परकिरमे हमारी पारस्यमत्ता इसलिए है कि वह अपने लिए अपने को प्यार करे।" मामबारमा बोइम देह के पियरे में बरी है उस परमावर काही पत्र। पर बदमास से देह से मुक्त हो जाती है तो अपन उगम को फिर से पा मेती है। पचपि सब इस्तिया परम सत्ता कही किसी न किसी गुग को प्यात माती है मामय पानी बह सूक्ष्म प्रमाणन है जिसमें सब गुन म दिपताए मिमगर एक हो गई है । परमपवर मानव मे प्राने प्रति पवाय होता है। पूर्व मानम सिर इत पा सत में सिमर पोर मनुष्य एक हो गाते हैं। यह पूर्ण मानव ही मुष्टि का पम्तिम कारण है। तसमुफ सिरान्त के बीच फुराम मे मिलते हैं- 'पस्माहवारे (सस्पता) के पतिरिक्त पोर मा पस्तुएँ हामिक (मापमाम) है।" "पप्पणी पर हरक 'पामी 1 पर मरे प्रभु का परस्मो मुख बाबत है।" पिर मी कपे पस्माह का बेहरा।। 'मनुप्प पी पहपके पर पौर बहुपमा पस्मारका मतिम व्यक्तिरण सम्पूर्ण ममित प्राणियों में प्रदिपमित्र एक मस्यारमा में साकार हुमा। पर मनुष्य की सच्ची पारमा मिमे वा पानम्दोग्मार प्रारमविसर्गर में मपनी यत्तिा पेतना होने पर पाता है। 'फमा एक प्रतीन्द्रिम स्पिति पौर मम्पूर्ण पापना एवं पाममाओं का निवारण करके ही उसे प्राप्त किया जा सका। यह हमें बौसिम मिनि' एवं उसके मार्ग का स्मरण रिमाती है । सूफी मानस होकर अपने प्रदर ही परम सत्ता की उपरिग्म करते थे। पुण्साम के मामजीदते है "में एक-एक सिर के पास पमा यहाँ तक किये मेरे अन्दर म मुमसे ही बोम पो-रे तूही में है। निगमन ही में पिर भरे सिवा दूसरा पर नहीं है। इसलिए मेरी उपासना कर । मेरी पर हो! मेरी पान कितनी महान । सबमे पो मूफिया मे मे पर-प्रम् हस्तार-ने भो पपने शिषामों कारण मूमी पर पy पिये पये प्रारमानुभर की पागता के विपय में मिया है। इसे 'तपरीर कहते हैं। हम प्रत्येक वस्तु से अपन कोय मेते इसमी पारमोग्मुत होते हैं। ये रस स्थिति का वर्णन करते भिर बीम प्रारमा + से ममम कर दिया माता । उन स्पिति का भी पगम का मिसमें स्थिर माम्यात्मिकगीयम मार जीवित पर्म १२० पारमा को अपने में मिसा मेता है। उनके विपार से वेदना ऐसी यातुनहीं गिससे माम मरे हाने गीत हो उमटे यह तो बह सापन है जिससे मारमा देबी पद प्राप्त करती है। प्रम्-इस्मारकासतम्प कि में ही सस्प ही (अनमहा), उपमिपर की रवि माजास्मि की प्रतिमानि है। दानिक पितन की अपेक्षा मित्री मनुमयों के फमसाप ही ये सरम सूफियों को प्राप्त हए । मय-प्मेटोबार तथा हि एक मोर रिपारपारामों के प्रमानक कारण ये तोग इस्लाम की भी न एस्पारी श्यामा प्रस्तुत करने की प्रोर पासर हुए होये। पस्पमारी बसरा रबिया के रिपस में एक कथा कही जाती है "एम दिन बद मूफियों को रमिया मिमी। मार रही पी पोर एक हाप म माग पौर दूसरे में पानी मिएए थी। उन मूफियों ने उससे कहा प्रोपागामी संसार की देवी । तुम कहो पा रही हो तथा जो एक हाप में माम पौर दूसरे में पानी सिर रोमकाममा मचा रखने सपर दिया में बहिरत(म्म) म माग नगाने और पाप (नरक)को बलमान पर जा रही मिससे पानी पर्ने पर्मसापों जीपापों के सामने से हट पार पोरगहनामा रह पार गुरावा उमे बिना किसी पाना या मय के देव सरे।'पर स्वमी पापापा मसा पप रह जाएमा वन ममा होगा? हायकोई मपने पिर पी गाममा करना पारमी मामा मानना म पारेपा।" हमें सिर से सुर उस लिए ही प्रम करना चाहिए। रविया बोगिमार मुहम्मर सारे प्रति प्रेम नही रए मानी पी १ गुमना कीजिए, गामि भारम रे प्रमुगम (मेरी में यो मोकामासमे परिकही विमा सोनपिनमो वा समान मन बसियोतूने मुसिराम पगोपनिष्टया ने मुझे कान नाम मेरे पति मेरा मान अपाता से तेरे दी मात मुभ काममान समसमान से सामान। मम मारपीसी सरिया: "नगर मुतने HARMAR सामने नतमयमा PINERAL ANDEग्मेनोभानमोभरामचियरवा मी मे गुनी मरो जो funnामिल Raut ममनमा बाहिर 14 ममेरमोनोमन रमतोमी मनुप (irन मे) निमार thatोता मी मुहीमेनमे तार तो उसे कान MISARTANTONARY बाबारामा नुमनाम औR rat बनामो बातामा परे मारा(बीय पा) मुमुए पानी सेना का -पान withleritage म. Rm १२८ सत्य कोसोग पोंकि उसका सिर-प्रेम पसे इस पूर्णता के साप निमम्न किए हुए पा कि उसके में किसी भी प्रामी के लिए म प्रेम पानमा पी। पूपियों मे पनुभव किया कि उनकी धर्म-सामना ईमरोम मिमि (पा) अनुकूम है यहाँ तक कि अपनी सामना रे एक पम के स्म में इसे उमनि उसमें सामित भी कर मिया ।यो सिरीय सत्ताप्पान करवाईमा पैसा मन्चमुखी एवं बहिर्मु सी एफ एवं अनेक दोनों स्पों मे करता है । मिथि सत्य की ममिप्यक्ति है। मब हम ईसर सामत बीवन में प्रवेश करते है तब हम इलर के कार्यों में भी सम्मिमित होते है। एक मोर हम ऐक्य की इस स्पिति मे सिर में एवं स्विर साप हवे हैं तो पूसरी भोर अपने पसंम्पो का पालन करने के मिए इस पप-प्रपंच में मी उत्तर पाते। यही ईसाई एवं इस्मामी एहस्यबाप पर की प्रास्तिक प्रापारमा को नियतिपाती एवं अपर्याप्त मानता है। १ पापुनिक प्रवृत्तियां विभिन्न पर्मों में पैदा हुए ऐसे प्रनेक बरे विचारक गो पाम्पास्मिक धर्म की इस महान परम्परा की पोर उग्मुख है। एफ. एच. करने में प्रपियरेंस ऐप रियलिटी' (प्रतीति एम सस्प) की भूमिका में मिला एक मोर इमारी कट्टर धर्म-भावना वा दूसरी पोर हमारा सापारयस्तरीय भौतिकवार दोनों मुक्त पर सम्मान शिामा मुर्य-प्रकाप्न में प्रेत-बामा की भांति र हो जाते हैं। समे फिर कहते है धर्म मे गो फुष पाता है उससे स्यावा सपा और अपनहीं है। इस प्रकार के तपों की पाझ पस्तिल की वस्तुपों से तुलना करला विपम का उपहास करना होपा। दो प्रारमी पार्मिक चेतना से अधिक ठोस पपाता की मांग करता है यह नहीचानता किररमसम बह चाहता क्या है।"पसकी दृष्टि से माता एक अनुभव है पो पारम-मनात्मय से पहले पाता है। बह ऐसे किसी मी अनुभव के पूर्व पाती है रिसे हम अपने अनुभव केम्स में जानतेरसे कोई पहबादी या मौतिक शाम को मिप्पा माननेराला (सातिपसिस्ट) नहीं है क्योकि पारम एवं पनाम का मेव केरल मनुपूत ऐषय के तर ही पाता । कार्यता एक ऐसा पनुमा है वो सब सम्बन्पो के उपर उठ पाता है । यार्पता हमारे सम्पूर्ण अस्तितको सन्तुष्ट कर देती है।' १ प्रतिशत पनि पर। । प्रोमेमर होस त परे सेम A मेरारिम्स बॉोरसे (या। रिम् भौजपून १५ wa) दिने म सममता किरहेमामानित समय (कनिधी परिर) मसीवरेभार भनेपनियों की पेशा सम पो महान प्रस्तानिया साथ ही प्रषिक पितti प्राप्मारिम पावन और मीषित धर्म १२१ असो ने ईसर या परम सत्ता के साप मारमा के मिलन की बात मिली है। पारमा 'एक प्रपरिभाषेप सत्ता की उपस्थिति का अनुभव परती है इसके बार पसीम पारन, एक सरंमनारी होगमाद एक समयकम्पनकारी विद्धमता का पागमन होता है। सिर का प्राममन हो चुका है तथा प्रारमा उसमें समाहित है। पर कोई रहस्य नहीं रहा समस्याएं मुप्त हो गई है पगारपूर हा गया है. प्रत्येक मनु प्रकार की पारा में रही है बिपार एव विधार के मध्य की दरी मष्ट हो गई है क्योकि रिम समस्मानों के कारण यारी पो और पापा गईपी उन सबका साप हो गया है। प्रमी एक प्रियतम कमीप तीन रिधोरसा के लिए समाप्त हो पया है। पर सामने है और भानमा प्रमीम हो गया है- पारमा बिधार एवं अनुभूति के प्रमर पर मैं मम हो गई है। 'परस्मा ससार की निम्ताएं दूर हो गई। नार एवं पिम्ताए पो हमारे पमिक बीगन को निरन्तर इस प्रकार बाती कि हमें पता भी नही पमना । हम कट्टर विलास पर विस्वामों से गए है। परियम को धनुर एवं गामही होना है तो उसे पौरागिरता एवं परम्परासेम्पर उटमा होमा मौर पर के लिए प्यासी पारमा परपोर देना होगा। यह मया समाष यह मई मापना मानवसादिक रीरित पो में निगा रही है। सपा पर्म यह मही है जो हमें बाहर से प्राप्त होता है पायो पुस्तकों एवं पाकों से मिलता है। प्रा मानवामा की घटापा जिसी भन्दा उस पस्त को मनापामा प्ररपरारती को उसके पानी से मिमित्र हमा रहता है। जो मोग इस रिचारपारा का मनुगमन की पिटा है. रेएक हो मुदप के मेम है ममे ये एकमरे से रितनी ही री पर पहले समरव पती पर बियरे मे एर पनावृत पर्मपरित जाति के पारमा के पाप मम्माम बस्य है। उस जगत में बह मिल पा मेवे है ना मानर के मिए है। चवीसन पमी सप्टठा प्रामापिता परमनिप्यासगीषोम से पूर्ण रिप। RT मोरपीस, भीमनगर (HI) १९९-1601 छठामप्याय धार्मिक सत्य और प्रतीकवाद १ मास्मविद्या का सिद्धान्त मिमित पोषियों के पिचक अनुभव में हमें ऐसे पवन मिमवईबीमाठि तपा भौगोमिक सीमामों में प्राबरमही पौर मोकिंचित् परिवर्तन के होते हुए, माध्यामिक बीवन के समय में पाश्चर्यमनक सादस्य उपस्थित करते हैं। प्रत्पम प्राप्मारिमक अनुभव एक मानसिक स्थिति है दमा अनुमय से ही प्राप्त पारमरिया सिवात (मेटाफीविकन गक्दिन) से स्तंभ है। ममुभर की यमाता मारमनिषा सिवान्त के सच मा मूळ होने पर निर्भर नहीं करती। फिर भी अनुभव का एक समानी पा बोषक मूम्म है।इसमें परम सत्ता मानवारमा एवं जगत् की पाम्पात्मिक मरपारपा मा परमेसर से एकत्लसिरिया मिलन पर्व एक मार्ग की भी बात पाती है। अभिम्पत्ति में विविधताएं होती। बोलोग एक ही धर्म को मानते है उनमें भी विभिपताएं निम्नवाएं पाई जाती है। किन्तु चाहे हम हिन अपियों को बोर उपरेपकों को में मुफ्पत प्रफलातून परस्तू एवं माटिनस वैसे पूनानी विचारकों को में या फिर ईसाई इस्पबारियों और मूफियो को में इनमें पाईजामेवानी समामता प्रापर्पजनक है। पर हम अनुभव पर विचार करत महम वालासिता के क्षेत्र को बोग तेवपा पनुमय एक मिसका मनुमव किमा पया है सबीच मेरफरने मगते है। किन्तु हम मूतमूत एकता को उप्प पार्शनिक चिन्तन के द्वारा फिर से प्राप्त नहीं कर सकते यो प्रश्पमानुगर की प्यास्पा करता है। अनुपप को प्रमों में म्यात मही किया जा सकता । फिर मी जैसे हम पनिरय मौर नित्य संसार में रहने से ही हमें उनके परस्पर-समय को भी पमम्मा पार प्रनित्य की मनावती में नित्व काम्पसरला पाहिए । मामा या सापानर अनुमय के लिए भी पर्याप्त नहीं होता। जैसे पर प्रकार का मान पारमनिष्ठ एवं वस्तुनिष्ठत की पूर्वपसना करके रमता है से ही हम मनुप्प की पम्तरास्मा अपवा मन्तिम सप्तासभाष को समान या गोष (कीमनिधन) का संभाषित विपस नह बना मन्ते। बीप को परास्स में मामि सत्य और प्रतीकवाद कल्पना करना पपार्पाक साथ बमाकार करना बका बस्तुनिफएवं पात्मनिष्ठ देवीप एक राय,एक्साई उत्पन्न करना है। पोसारमा की परिमापा नहीकीया सम्वी म उसको रिपारा पा सकता है। उसका मेयम पामाम दिया या साता है क्ति दिया था सरताहै। फिर भी हम पीवारमा को पर परार्यस्प में सोचते क्योंकि वनी सरियों से मारमविया बोगारमा का ही निमाम पाहै। प्राथमिक पीर (टमा बियरीपरण किया जा सकता है परन्तु उससावन महीं मिा पा सकता। यही बताने के लिए दिया जाना रिपय नही है पनेरपियों में परमात्मा या स्पमान के विषय में कृप कहन से इन्कार कर दिया। पोपणा करते हैं कि एक एस्य एष पुष्ठ भेद है। गितमा ही पनिर्माण के रूप में उसका पनुभर रिया पावा है उतना ही मासूम परवा किया मरिष है। इस प्रकार मान पिसी शिनास या वर्क के उपरम से नहीं उपव होता। रोगों का पालन करते हए भी यह दोनों के परे याहम बिना समयागामो कभीसंसर्म स्थापित रसस्से-एक ऐसी प्रतीन्द्रिप पेतमा प्राप्त कर सकते है जो सर प्रतिमूर्तियों एवं पारमार्पोको पार कर जाती है- एकासी की एकाकी की पोरगान अनेक अपि मौन पडा में ही सन्तोप कर सते है और बापीपा पाश्रम मेन से प्रकार करते हैं। ये उसावर्णन पम्प पनि के दिमाही करते है। बामपमे पिप्य बाप्पमि पाते हैदिप्रामा पान, मीरा गामोध्यम् पारमा। मत पापरटान का है पिरको प्ररम्प भी नहीं कहा जा मस्ता गमादि ऐसा परला रसके विषय में कोई निारय प्रकट करने के अपर है। यह पुसमीरपता है ममप्पनिहीं। पूम्प ।" "य- तुम पूर्ण हो तो सिर के विषय में पावासन करो यह पहाट बामपन है।' १ मिnिran (R)13. में बम भनुमा कीमापापा मम मारो भिनाममारना और मादामी रमेम । किमी गिरवरपारपर से टीवरम् ममा भयोगमा मनामी मानरामामामान में मन बीसलपति प्यारेमा भने गगारोteant समाधासमा समनपाती मामा-भानपानमा -मरन । समय निमार मोरगर स्लिप मरण (60) TO में र RRBAR रिसरमा पन्जा भुनावणमारि । crea सपा माना KAror रस-11 सत्व की तो परम सत्ता पक्ष के मिलन से रहित गिन्नुतारमा है। उसमें परिपतन या म्यान्तरमीमा सम्माषना नहीं। उसे नाधमान प्रनित्य मस्तुपों या प्रबहमान घटनापों में नही प्राप्त किया जा सकता। यह इस स्थान एवं इस कास से विस्म परे है, सदा के लिए उन सब चीजों से मर विमें ना पा सकता है जिनकी कस्पमा की पा सकती है जो मात या नामधारी है। हम परम सता राह्य मा परमेश्वर के विषय में केवल नकारात्मक स में ही खा सकते है। परम सत्ता बिससे मिलन के लिए, एक हो पाने के लिए पीपारमा सचेप्ट है उन सब पीरों से ऊपर एवं उनके परे है वो सीमित एवं ठोस है। उसे किन्ही सपाधियों से सम्बर करता उसे सीमित करता है। हमे सम्पून सौमित मस्तुभों का निराकरण करके ही पतीम पारमा के एकरण एवं परिपूर्णता को सुरक्षित रख सकते हैं। हम केवल 'यह नहीं यह नहीं (नेवि नैति) का सकते है। पैसा किवामी केह-बिग कहते है विस नाम का मारिन किया जा सकता ोगह वास्तविक माम महीं है।" यपि सिर में पौवारमा सलिमिट है पर पपने प्रपार रूप में शिवर उससे परे है। महमत है प्रत्येक प्रकार के निषय एम पुष्टीकरण से परे है। सतरमीमेष्ट कहत है सरकी मोग मंगवार में की पानी पाहिए।"पुम' सूगे योनीमियन कहते है "इस परमार से दो प्रकाप के परे है. हम प्रार्थना करते है कि हम यहाँ पापकर पृष्टिसक्ति एवं मानका सोप पर नरेसने मौरन बातमे कतप्पारा ही उसे देख एक मान सम्बो प्टि एवं मान के परे है। वही प्रसनी दृष्टि पोरसान है।" "यह सी पंपकार पह प्रस्पर्म प्रकार है जिसमें सिर का निवास बसावा पाता है। जो मारेकर पौर मचानकर मी पर कोरेखने पौरपानने की धमता रखता है वही इस में प्रवेश करता है क्योंकि मामस्तुत नसीम है गो वृष्टि एवं मान के ऊपर है।" संत प्रेगरी पक्षामार के प्रमुसार हम ईस्वर की परिभाषा सत् केम्प में भी नही कर सकते पोंकि वह प्रत्येक नाम के बिसका नामांकन पिया ना सकता है परे है। सव टामस मत सर-सम्बन्धी मानव-मानकी पन्तिम उपसम्मि इतना ही पान मेने में है कि हम उसे नहीं जानते मा यह अनुमय पर मेने में है कि उसके विषय में हम पो कुप सोचते-सममठे हैं उसे मी मापार कर गाता है। 'भपनी शान की भाषा में हम इवना ही जानते किस्बर प्रशात है। एबहार्ट , 'रद्रोमैय १. १९॥ मिरिमाथिबोगी। २ - रिपोशिला'... " इन मोम्मिम विनिवेदमा ।
पामिर मस्म पीर प्रतीप्यार उपनिषद्-वामी की पुनरपि रखे पान पाते है पर पिसा भी असमान है पौर पिसी भी प्रस्तु के समान नहीं है। वह सत्ता पर है। यह शम्प है।" "या स्पये मन पप्रतिम है अपरिपतनीय है उपाधि रहित है इस या उस किमी भीम से रहित है। मिपेपारमाणों से हमें यह संधप नहीं माना चाहिए कि यह परम ससा परमेपर, निपपापी है। यह वो समस्त सास्तिाव बरतुर्पोराभापार है।दमी निए उस परस्पर पिरोपी पापियां दी पाती है। परम सत्ता को भी-कभी मपिनिगस्यमय परमावर या सासरस्पररपम देखा जाता है।सरम बह सब सापनों पर मपना प्रेम एव मनुमह रहता है। परम प्रतीग्न्यि एवं मम्मत वसापामापारिमा माया,मास्तिक पसन-प्रणामियों मारमा प्रादर्भ हो पाता है। प्पानमा स्पान प्रार्ममा मे सेतो है मान पा स्पान प्रम स मेटा है मौकामह रकम पापीपन मा गावा है । धार्मिक मनुमय में हम परम पास सामान तपास यति मिमन रामो प्राप्त हाने दोनो में एक मरेमा त्याग मही है। भारत के प्रतिरमववादी विडाम पर पाप्यात्मिक प्रभाव पारिता समूचन की बात कही है। पुरावन एवं मरीन पमदिरा (टेस्टामेप) मी यस्ता प्रमागमी म पामिक समागम की बात कहते हैं। पदपि भारतीय पर्म म परिवर पक्ष भी मिलता है परन्तु वसम सर्वोपण पपावता पो पराप में ही मानने पर म दिया गया है। २ वह तुम हो। सभी पापिगप इस बात पर महिमानगारमा मनाई ऐमी पीर है गोरस परम, प्रदेवम (एरसोस्यूट) से गम्बपिठ लिपी परम है। पहपारमापी मोमिर भूमि है यह पारमा पौर परमारमा का मिसन-दिर या तपूर्ग सो सम्पपिपरब बसि सादेशिक महाप समूप निरागा सोत एवं पापाराधारमा प्रदीमिय सत्यमोमोमिए महार सरती रिरह पभोतमसपा सरता वोहम साप पाप मिरर होजाती है। बदगिंग गातार गावे पार हो जाती है। मनुप्पी पापा (एमा) पौरार एमारे एय (और पूप सामनाय1 मामर एप ऐसा मूग माग (मामाराम)। बावत् मग ग्नरों-निन पिय प्रापिर मारणे एर पाण्यामिर रामम्मि माराममोरा प्रपन्नमम उमरियमान है रात पाना गर्न मामा गाम उमरे द्वारा दिए। परमपन गारो मोर पपने को प्राती समारमा परेनुसार मना है।
घरव की जान पर सपनिपत महासाप की बोपना करती है कि "यह तुम हो"बरपुर उपरेस देते हैं कि प्रत्येक मानव-यक्ति अपने प्रसर बुरश घोषिसत होने की पित सवा पायरी कहते है कि "मामात्मा ही सरकापक पर ईसा प्रपने पोतामों से कहते है कि स्वम का पब उन्हीके मन्दर । मौर पर मुहम्मर जोर देते हैं किसीवर हमारे उससे भी सारा नगरीकरितना हमारे पमे की धमनी है-ब इन सबका एक ही प्रापर होता है कि बीवन की समसे महत्वपूर्ण बस्तु मानव के माहर की किसी भीर में नही बलि र चिन्तम एवं बाबमा के मुख स्तरों में ही पाई जा सकती है। हमें नमै यहां-वहां कमी नहीं देखना चाहिए क्योकि रसो, पर सम्म तुमारेही अम्बर है। "क्या तुम नहीं मानते कि मी मा मबिर हो पौर परत तूमीमें निवास करता 1?". पीटर वितीय के प्रमों में हम इतरीय प्रतिभागीर" माटि मस हमसे कहता कि हम पोय को जान सकते है क्योंकि हम स्वयं अपने ममीरठमठम में मोव। "पारमा का सच्चा मम्म है उस प्योति का स्पर्ष करना और उसे, किसी दूसरे प्रकारे हार नहीं पी पोति के सावन से देवना-सिकिहम सूर्य को स्वयं उमौके प्रकार से न कि किसी दूसरे प्रकार के सहारे रमते है। पव पारस्टाइम कहते है "तुम मेरे उससे भी बाव प्राधिक पन्दर हो विवना मेरा पम्तएतम मान है। तटामत को है पविषारमा अपने पत्ताप में हमारे मन में स्थित है। 'मोसिपस अपनी पुस्तक पुर पॉफ स्पिरिगुएन इन्स्ट्रक्सन के प्राव में पास्मा के प्रधान उत्पनी मात कहते है। 'मा दीनों उन्मवर समवाों (स्टोर) से कहो पाग अन्तस्स एवं पम्प (ब्लाइम) गर्योकि याचनका उद्गम है स्रोत है। यह पूर्णत सरन प्रावमा एवं एकम्प है इसलिए इसमें माल नही है मस्किएकाप है और इसके माता पिपिण उनतर समताएं एक हो जाती है। यहां पूर्व शान्ति समीरतम नीरवता कोई प्रतिमा को परमाई महाँ प्रदेश नहीं कर सकती । इस गहराई के कारण ही बिसम ईमरीम मूति छिपी पड़ी है हम पम्प है। सौ माराईको 'मारमा का स्वर्ग काहा पाता है क्योकि सरका पम्प इसीके मत्वर ।। रेखा प्रम् ईसा ने कहा है पर पम्प तुम्हारे मन्दर है पा यह सिर का एम्प, सम्पूर्ण है अपने माने के प्रति मामा की मोदी से बना बीपि : मोऽसि मोस, मरम्मनोऽसि । १.१ परिधिमा ११० मी देखि रिक्तिसारोस । भरोस। ६ तिरिम्स संपत मदन सशिलम मेरे मामय से पामि सत्य और प्रवीरगाव मा-साहित स्वयं सिरही है। इसलिए यह प्रनापत तपा प्रापी गहराई सम्पूर्ण सरित पस्तुओं के मर समस्त इद्रियों एवं परिवों के मर है यह पाम एवं स्पान का प्रतिषमा कर जाती है तथा उसईयर से निरम सानिप्प रखती है जिससे उसका पारम्म हमा है। इतने पर भी बह निरषय हो हमारे मगर है क्योंकि यह मन मा प्रमाम गत है उसका मापन्त प्राव मत्ल है पर मनुइमूत गर्व अपने पो हमारी पारमा या उद्भव गत पहार पुकारे सपा से अपने साप रमे प्रभव कर मै पिससे ईश्वरत्व के गहरे सागर में सरर हमारी पारमा परमारमा में अपने को निमन कर दे । कासव जान पहले है मुद अपने नई सपोग्नेनमा पर्योंकि उससे ध्यानापरोप भौर पकाबर पाएगी। पौर तू चम न पा सकेगा क्योगि उसकी कोई उपम्पिमा परदासता उससे ग्पारा निषित स्माता सन्नर यावा मतग नही है गो पन्त स्प है। एक हाट कामपन है कोई मामी जिसने पहम अपने को नहीं माना है परको मही पान साना। पूरिहम ईबर को एकत्व में पाते हैं वह एकस्य उसारे मगर होना चाहिए बोईसरसीपोर करने पमा है। ये पुन ले! "अपने सोमरूप में हम न पहुंचने के पिए, पहले सापप गो कम से कम अपने हायसव तापपला पाहि वर्षोंकि कोई एषा प्रारमी सिर को नहीं मान माता निसने पहले स्वयं अपने को नही पान प्तिपा है। पारमापी मह म उहपे भूम ता पार पहो पाई समापो क्योकि जो भी विरकर राष्ठा है यह सब बहा परिन् । 'पविमानमारमा ए सिर पूगत भिग्न ऐवे तो वापिस प्रमाम पामभ्यस्यतापीमोई मागारमें हमारपीयपानाहर नहीं पहुंपा सरती पो। मेटे है परिपाग मूर्य-मान होती तोहम कसी भी प्रकाराकोरमे देश पावे? पौर परिस्पतरीयमपिनमा नियाम हमारे मन्दरम होतातोहमती रस्तुपाँ में पान मे प्राप्तर सम्वे ?"विगत मा रिम्पता हमें पान-निकर देती है सोहि बह (परत) हमारे पार भी है। नायक्तिर भारमा गतराल्प पारमा से मितर एकमाती है सब मुषित प्राप्त हाती पारम निशित। पर मुक्ति पामाग्ममितिमान मौम्प नया प्रम्यान होती है। ३ पामिक प्रतीकपार हिरिपासोने पति या पेर, मो मोरप पा मानीय रिसर पाती मे स्तर है नया रति मा परमरा में जो माम्या पर मापित पर रोनं दिममस (MR) TR- 10 . निरगुणम १ ।। र मालसामानहानगर। RekcurTimi सत्पकीबोग । भेर किया है। पहसा सिर सरम की प्रस्पम मिम्पति है वो पूत- प्रारमा हे मिस्त होवा विमा यो प्रसरित एवं प्रसनीय है। मे उद्गार मा करन पषिर्षयक्तिक (मुप्रानगिनियुएम) सायोपिक एवं सी। ये प्रत्पर है सीधे बिमावास्पर या प्रसम्बर मही है। प्रनुमान मानी प्रत्यक्ष अनुभव प्रपषा सनातन सत्प में सक्रिय सहभान विसासरन्य धर्मशान में प्रप्रत्या प्रश्मि सहभाग मेने से मिग्न है। प्रमेष्टि में पक्ति पक्ति रूप में मानोपमम्मि नहीं करता बल्कि अपने मम्वरम सारतत्व से उसमें भाग मेताज बोषी तत्त्व या सिवास्त से निम्न नहीं है। प्राप्मास्मिक निश्चितता निरपेम है क्योंकि यहाँ साता एवं बात दोनों एक रोनो में प्रमेव है । यही जान ईस्वर एवं मानन का सबसे पूर्व मिमम है। इसकी ममिम्मक्ति में समय पर बहस नहीं की बाती म कठिनाइयों का उत्तर दिया माता है। मो सयंसिस एवं निश्चित है उसे ही यह प्रतीकारमक साधनों से संसूषित परखा है। इससे पाठा वा पोता मे यह प्रश्न भान नामरित होता हैगो उसके मशान मे उसके पास है पौर गो सपा अपने अन्दर पिपमान है। महरित मान प्रतीकात्मक एक वर्षमात्मक होता है यहयुटिसंगत प्रमामी का प्रपोप परिपूर्ण मान मा प्रमिक निश्चितता के पाप बर्मन या अनुसार करने में बत प्रतीकम्प से करता है। पर देव को कामातीत कहा जाता है तब उसका पासप यही होता है कि पर परामच-मसाली प्रतापिट.प्रपते. म से मातीत तथा मभिक्ति की शिपिता के लिए मानगीर पापम्पकवाों से प्रभावित है। पब मापी कहते -मूसा की परम्पराका पम्त नहीं हो सकता तर उनका म्पान इसी कामातीत मानकी मोर पता। मैमोनाइके मनुसार 'तोर' निरम । नसके साथ पार कुछ मोहा या पटाबा मही पा सम्ता । “म निश्चयपूर्वक तुमसे पता है कि पर तस्पर्ग एवं पप्पोका माड नहीं हो पाता तब तक का सम्पूर्ण कार्य हो चुम्ने तक मिषि-निमम (नों) से एक विमुभी क्सिी तयार-चबरमहीं हो सकता।" "यदि हरबर की या इसके विपरीत नही हो रे म तक नहीं रहेंगे परता कि सर्ग पौर पृमी पपनी पगा विचमान है।" मुहम्मर पुन केसम्पारकरे । इसका स्व परिव एवं निरप स्विर के साररुप में निहित है और परिठे बिवाईल पारा पैगम्बर मुहम्मर तक पहुंचाया गया है। यह कामासीत कोई साहित्यिक कागर-पा मही है अस्कि वह भान है भोसर गों के पर पनो को प्राप्त है। इस बात की पाम्तरिक सममि स्पाम एक १ मार-माता-पिसमा कमरेड प्रिसिमिती या बारमा (अंग्रेरीमा १५) महकी पूर्वत अन्तिम मार होने वालम ६ पार्मिक सत्य पौर प्रतीयार १५० पाम के अन्तर्गत हो सकती है पिसका यहत बड़ा प्रभाव इम पन्त प्टियों के घर रूपों पर पाता है। निरय सम्माधी मानवीय बाप हमारे सामाग्प शाम में प्रविष्ट हो जाता है, साकार प्रहम का सते है तपानमोगों कतिए साप हो जाते है जिनके पास है हमारा ये दूसरों के पास भी पहुंपन है । यदि यबोप मामा यहान के सप के बाहर ही रह जाएंगे इमरों तक पहुंपही म पाए। पार्मिक सरप में कोई मुहिनहीं हुई पचपि सत्य की प्रमिप्यक्ति में वृदिया रिकाम हुमा है। प्ररपेर प म पुष मूमापरवादियों के प्रसावा इमरे मोग इन पमपम्पों को (रीय कति मा मुटिहीन मामले मे एकार करते हैं। पार्मिक प्रतीमगारारा पनेक रूपों में सत्पी बरी रस्पना की पई है। हम एनी स्थापनापों में अपने भन्मों का प्यार करते हैं या प्रतापारमा एक वर्णकारमा होती है। हम पपने अनुभव उन लोगों का गिमको उमरा परिचय मही प्राप्त है एमी वस्तुमा मारा ही परमाते मिनका मान उग्ह है । पर मम्मा प्रवीर सपन या पापा नहीं है प्रगाष पा जिममी मारामारी ममम म परे है उगी यह नीति भिति।। रैदिर प्रार्य तपा पार के मनुपाची पनि यो परमारमा पा प्रतीप मानते हैं। प्रनम्पमाप (ब्रह्मगता) मा में साई ग्यमात मम्नि पनीरसमा परा दी। उपमिा रम प्रामों का प्रमा' (ज्योतिषा ग्याति) पहनी है । गाहमे और मिशियम मा यो प्रा (वाइन माइट) महार मा बणन करते हैं।' सिरसाप मनुप्प के मम्मम्म राममाने में एक परिचित मानवी ममप प्रयोग प्राय रिमा पाता है। सरपिता है। बेर-उपनिषद् मग प्रयोग करत है।सादी पिशाब उपपों में तो पापार-बार पाता है। असल में मपनी म्पमा मीरा पो पे “ममा 'पिठा! मी एक वरिष्यमा पाती है मरिवार धमार पिता मेरे हमरों में में पानी पारमा रापपरता बिमारेगामापीर लिए मीन माम मा समिनिमkit पर्म मरणोपोकीमा पर मामाधार मनोरन मे ATTRACutण समनारमारनी होगमामने मरा बोरामरा रि। अमारी परेकोरी कोशिम “मो सके पतिमाकोरेगो १५bRोरिपरामो लिए नमी पवनारायण मनिषा 1 ससा ote रन रेनो EिE मुनम mrtiनाने नि analeने५.समितिमारपालो मे PHAT भी दुEEPI-Ratnा र (T !
सत्म की चोर हूँ। 'प्रपने सियों से ये को है जब प्रार्थना करी कहो- मेरे पिता !" विविध प्रतीकात्मक प्रमिवधियां परमेश्वर की विपासवा के मिविप पहनों पर प्रकाप गमती है। टामस एक्सिमास ने भरस्तू से मनुष्म एप ईयर में मान पीय भान एप सिरीय पत्य में 'तुनना' का सिद्धान्त राहण किया। सर्व करत कि प्राकृतिक पर्म मे या मनुष्य को भपनी बुधि से प्राप्त करता है उसमें सत्य कुपतत्व तो होते है किन्तु ये प्राभिक होते हैं मोर उन्हें सिरीय सान्निम्म के अनुभूव सत्यों से पूर्ण करने की पावश्यकता पाती है। हमारी पारपाए निस म में सत्प को हमारे मन में उतारती हस्विरकी ममार्यता के सामने पत्यम्त तुमच होती है। हम धर्म-सिखाम्त या प्रतीक को निष्ठा के कारण स्वीकार करते। साकि अधिकांश मोर्मों के लिए पिरीम सत्य में भाग लेने का बही एक समय रंग है। प पौर प्रतीम पान्तरिम सापना में हमारी सहायता के सामन-भर।। पियों को सब या मोष रहा है कि मामबीम मापा पन्तिम सरब या परमे सर के स्वभाव की म्यारया करणे पसती है तो टूट पाती है पसमभ हो माती है। मान प्रत्येक वस्तु की म्पास्मा करने कावामानही करता। इसकी सीमाएं बतमी स्पष्ट हैकिंगावा की प्रकृति की पूर्ण एवं मन्तिम प्याम्पा पूर्णता एवं मन्तिम निगमम का पाना परन पर समय ही हाम्पास्पद हो जाती है। सिराणिम्पत्ति पाहे जितनी पूर्ण पौर पम्तिम हो बा मह मानवीय कम्पमा के लेग मे प्रवेश करती है तो मालमीय मस्तिम की सम्पूर्ण पपुवामों के प्रभीन हो जाती है । सत्व माहसर के माननीय के विषय में प्रन्तिममा प्रयुत होने का दावा करना मनुष्य के लिए उस बीग का पामारनामो पिरीम है। यदि कोई हमसे बहता है किपिर-सम्मबी उसके विचार ही पन्तिम सत्य है वो मे मानवीय निर्णय ही मानना चाहिए और उसे निन्ति नही समममा पाहिए। प्रतीकवार में दो पिविणता पाई जाती है वह मनुमन की प्रकृति पर नहीं परन् उप राम एवं दान मे प्रथमित मार्मिक एवं प्राप्यारिसरुपाणापों पर लिभापि या प्रष्टा की मापापों पर उनका रंग पर जाता है और उसी पार्मभूमि के सहारे यह पपने प्रकार की म्मास्या करता है। बहुरपी सीणे के माहराब-सा जीवन मित्ववारेण्यम प्रमासको भभिरगित करता है। -प्रेमी एक दुसराकवि कावा 'पुरातन काम के प्रत्येक बोसीम प्रबन का सपा पारम को सम्पूर्व पवियोमा मिए-कि बाबा ने उसके द्वारा संपीत पामिक सस्प और प्रतीकवाद १५१ उलग्न भिमा-सत्री एवं तार पर ही निर्भर करमा पड़ा। यह क्षेत्री एवं तार'ही पमुभामो सौर माार प्रदान करते है मिसेगद तप पर उनका विवरण या प्यारया प्रस्तुत करने का प्रपसर माता है। सामाम्प प्रापार की पोरम्यान न कर पर्ममतवादी मिम्मतामों को दा पाकर कहना तपा एतिहासिक मूत्रीकरण मन्पर प्राप्त सार्वदेशिक तप्पो को भूम वाना मसत रग है। हम गर्यो-यों प्राप्पारिमा पूर्मता की सीडी पर नावे पाते। धर्ममठपारी म्यास्पामो मी मिविषवा सुप्त होती जाती है। यदि हम गौण प्यास्यामों को दोर तो हम देसमे कि ब्रह्मसत्ता के विषय में पिमम प्राय एक ही बात महते हैं।' प्रवीक एवं मतवाद निपसारमक नहीं है। पूर्वी धर्मों का मत है कि म्याग्यापों की मिम्नवा सारदेनिक सत्य को उसी प्रकार प्रभावित नहीं करती से प्रोपित परजित ज्योति को विभिन्न रम प्रभावित नहीं करते । पारपात्य धर्मों का मुकाम इस पोर किएर परिमापा हो मन्तिम है दूसरी मिप्या है। भारत में प्रत्येक परिमाषा एक-एक पदोन या दृष्टिकोण का प्रतिनिधित्व करती है। एक ही मनु मग को रेराने जानने के पना मार्ग । बिभिन्न वर्गम विभिन्न दृष्टिकोण पौर नरा एक-दूपरे के प्रतित होना भावस्पर नहीं है। पापारिमा सापमा के मार्ग पर सोतपित है। यदि मामिर सरय निम्न-भिन्न वर्गों को मिनभिग्न रूपों मरियाई पड़ता है तो इसका मतलब पतिम समय के एक होने से इन्कार गरमा नहीं है । परि उतर पर्मों में समानताएं है तो अनेक अवसरों पर पनेक रूपों में सरकी पदस्यमयी भावना के मार्यान्वय की इन पभिम्पभितयों पा से एक पूर्ण साई में सपोरापकर रखती है वापत किमा गाना पारिए । पर्म के विषय में मुधिशित एवं मुगी मानों रे निपम पर विश्वाध पिया नामा पाहिए। प्रपिपारपा प्राप्पारिमा पोग्यता तपाइएदेवठा'हिपूमिगत मा पता १ परमोडोर (त्ताहीमा तोरा अनुमन सेल्प म) मनि मा भाग किमीपर पदीयमे गुह मीसको सभामा सिमेमोमोसमरमा गीततो पानी र म मासपोरसपाल (रा-पसाबरमत नपान उत्तर में राम मामोरमाथि पुगपुर एरोपिरामा रिनाले निमारोहरमोनलनीinteी गुनना मे सिर पार करना प्राषि-मी लगी ताकिम कीमतामनेटरी) बारेमानी मानराम से पुलमान भी मित, नि राममायोr सागरासे पच पर "निम्न मानिरसोबती रिलूप काkha शिपमafast मारचलिमेमोगन मापशमसारमेय .
सस्य की सौर पर निर्भर कि किसी भी पति के लिए यम नियम उसके पाप्यारिमा विकास की दृष्टि से ही नियत होने चाहिए। हर में उपनिपरों में भगवामीता में विसको ममशन् का पोम्प प्रिय हो उसको उसे उसी रूप में भयने उपासना करने की स्तम्भता पो मईयाकि सभी ऐतिहासिक पो प्रतीनिय मम्प पर उनकी एप्टि मई है। उनमा मत है कि समस्त मार्ग पिसर तक पहुंचा देते हैं । "यो मुझे पिस प्रकार भगते । म मी उसे ही मनता है-स्वीकार पखाई। सब प्रकार से मनुष्य मेरे ही मार्ग का अनुसरण करते है।"सर समार के समस्त मानयो को विविध पयो से बीवन की पूर्णता की पोर सेवा पाई। मुक्ति के सापन सबको प्राप्त बपि समी समान रूप से उनका सामनही उठा पाते । बिर का कोई स पापाप नही है । "मैं सभी प्राषियों के लिए एक समान है।" कोई मोमिए पम्प मा प्रिय मही है किन्तु बो भक्तिपूर्वक मेरी उपासना करते है ये मेरे अन्दर निवास करते। पौर में धन प्रदर पहता हूँ। घसार में एक विस्तृत को बमुख है जिसमें भिन्न-भिन्न प्रकार के मार्मिक बग सम्मिमिव है। इस विषय पर हिसुपो का जो दृष्टिकोण है वह सत्य के प्रति प्रामस्यपूर्ण उपासमता का परिणाम नहीं है परन् सरव के सच्चे प्रेम कारण है। पर प्रतीक अपना नाम मोहता है और एक वर्म-पतवार बाबाता है तो उससे प्रनिष्ठा का प्रविण्यापासम्म हावा है। ईसा मे मा “मकि इतिही रोखमा सकिविमर्म समीपा-माम विपरीत बिता प्रतिपन की रिवाय ने सातपूर्व महामोरमा किन वसन्तपोवामा सोगिसमें पुनरियो बाधि पेशियमही कम से कम को रोहिनिपतामविण्याभिसरणी। माल पूर्व पाप मुख मनभूत पारवानों को सीमार मा एRR की माध्यिाच्या मित्रा भामरामाली में भावनिक गुम्मयोलोर मध। पानसे दिनको पास विदित बोला कि सोमवार - भाग एक एक पा मम मारे "नई रेनाशात विशिय पिक ( १-६। नेपा मा पपपम्ने यी महापाम् । पम कर्मापुरते मनुन पार्य संमा ||-परवा ४११। बेनापरेन ये म मामेरेममुपासते | देयमारे मोज मानो पबितर। मिामिला पि माला ये मामुम्मो । सेमप्रदामि सम्योजन सरा-शिपपीत १३ । मोमियनमा: 'राष्ट्र (म) प्रितपसमितीय पम्पा मग पने मायकोसन मा पाच वमनी मोशनुवार की पार्मिक सत्य मार प्रवीस्मार महामो बडीसोतुम्हारा नाम हो नोकि तुमने मान को मुंगी दूर हटा दी है। तुम पुर प्रपन पन्दर प्रवेश महीपत और गो प्रभाकर रहे थे उनको तुमने पापा ही पहुंचाई है।"पुर मे वेद का पणन किया तो महान मस्प विश्व हाहर निस पनु पारक कमाणप में एमए पे उनकी ग्रहाने मामापना की। बसंत पाल ने पारी पिपि-विमान को प्रमाग्य दिया दो रस मौतिक पापारवाद को प्रमाम्य किया पापा पाप्यारिमक गोबम से रहित हो गया पा। निरवियम या पूर्ण सम्य पानी सम्पूष समब पभिस्यक्तिर्यों से परे है। पमि म्पतिमा मौमित साक्षि उमड़ी विशेषताए ए बिरिषताए प्रार करती है। सरप की प्रत्येक भिम्पति केबस मापेपिर है बहमम्य सर मूल्यों को हटाकर एकमात्र मूस्प नहीं बन सरवी । पा जिसे भ्यरत करती है उसकी एकमात्र पमि मस्ति मही है यह दावा नही कर सम्वी। कोई विधिप्ट म्प भारत सीमित होता है और दुध न प अपनी धीमा के बाहर पार देता है। बिहनि एक मिगिरप्रपामो मो प्रहम कर लिया है और जो निराकार माप सरय तक नहीं पहुंच पाय है ये प्राय पारने सादर सत्य को ही पून सत्य समझ बजौर मन सत्यों को ऐतिहासिक वर्षों से मिलाकर प्रम उत्पन्न कर देते हैं। रिमिन्न धर्म विपिप मापापो के समान है जिनमें सिर मे मनुष्य स बात - बम बिन्नो मे पगगुस्ससमे एन । -मनमाय .१। सापनीतर ने मामा को मुनापी शिरत में परमतासमपनः नापी मन मोम करने पर ही पनुपाnिtiमनुमानाम UfilHTRमदा यि मरे म माना।
सातको मध्याय ईश्वर सिद्धि और उसका मार्ग १ मास्मिक पुनर्गन्म पाप पर्म इस पाठ में अपनी पिपिटता प्रकट करते है किपाश्म-अमान पाये की गइ, मनुमय पर प्रपिक म । परीकक उनमे भी मनुष्यन पा कर्मकामा और पौराणिक कपाए । पिन्तु उनके सगुण इतिहास का नियंत्रण परमेवानी पापारभूत भावना का वीपम का हौस्य स्पसम्म सिमान्त में गोरिक एकापाठा महरमा मह नापीय पपिसा है का अभिप्राय पारिमा केपम हास्सिर पिचार परिवर्तन-माल नहीं है। यह रियाद्वारा परिणको स्थानमुटपरमा है। विधायादोषिकाहपनि होती है पति एवं मिष्ठा माती है। इससे सापक की प्रति पूर्णत भूवन पा म मिती (पार पन्वर्गली प्राणाम में लीन हो जाती है। तब हम इसी रम में परयान्तिका अनुपराजे काहीको मापदी विचार की मापना नही दमाती परम् सामसम्मापित हो जाने की अनुभूति होती है। सब भी एक ही वस्तु के माप-ती मगठी है मोह निर्माण और रोग प्रम मुन की पारिक शितिबोपी पर्ष कामाय प्राप्त करने में सफल हो गया है उसका मन प्रकार से अपमय हो रटतापक्षस्य ही हो पातापायासक्ति परिपसा यी है। जीवन का दूतन मान मानव के पम्पूर्ण पस्तित्वको। पक्तिमान बनाता है और पेप्ठ पोताई। यही 'दितीय जम्म'। 'एक मूवन । मुष्टि हो पा है सो धापी मई होनt | हिन्त एवं व विचारपाय में सामावस्पसमम ईसर प्रति प्रम है। सपहार है। यह ग्प साका प्रतीकको हमारी मिणवसाममाम से प्रधिकाधिक पसी सौमर्म कीम मेवा। इस अमन-बस की बम्मर की भोर मा मापानीदे है" या मागोवा का काम है। मैं मी तुम लोग मी पुनिया हो।" नमसम्ममा सिरमिति और उसका मार्ग इन परों से पिस मिमता है सिरप का प्रानोम हमें अपने मम्दर की प्रामि से मिमता है पौरमा पापि प्रस्तुमों में अपर की वीर है। प्रारिमा पस्ति तोपास एवं पास के पायामों की सीमा के बाहर से पाकर पर पड़ती है। मनुष्य कास एवं मिरमता के बीच होमगामी प्रश्मिा का बिन्दु है। मममीठा बताती है कि पमिष्टजन बागागता है सबसेप संसार सोता रहता है। हम सब तर सोते हुए माने जाएंमै सब तक हम पर से मौविक जगत् का पारदरमही होता। हम एक पे हुए रम परमपमा जीवन बिताते जाते हैं। हम परा होते है जीविकोपार्जन करते हैं परिवार बनाते है रानीवि पाम्पापार में भाम मते है पूरा हात है मौर एक दिन मर जाते हैं। मे मा करना कोई अपराध महीं है किन्तु गारित मारमा मासे यह मार्य धारयत ष्टि रखते हुए करते हैं। मेरे रिचार से यही साधम भी मी घिसा है। सिर का उदारमान एक विहामिर मक्ति के रप में सा का गान एवं उनके प्रति निष्टा रसमा महीं है। भाइस्ट की ऐतिहासिकमा साप समीतिपरमही रमावासकता। मास्ट तो परमेश्वरको निरय घर की मारमा है। इस पद का प्रकाग तिहास के पन्धपत बम बोसस (सा) ता सीमित नहीं है । मुक्ति की पप्पस्पतावा निरप भार वर-वामी द्वारा हाती है पिसे एतिहामिर पारस्ट मममने ना प्रम नही होना चाहिए तो उन सोयों के लिए भी रामा है गिोने उमरे नगरे में मुना भी महीं है फिर भी जो सरय की भावना के प्रति निष्णान। फाप माग्नेम' (गर्म पोपोग) हम बनाना है कि पिरीय पम निमने हमारे बीरमा में पाकार पहन रिया निमम पारम्भ से ही समस्त मूपि में मत्रिय रहा है। और 'महमा प्रराम है पो प्रत्येक ममुप्प पोम्पोठिमय मला है। माती पुष्टि करता है कि नीसम (ईसा) के सम्म दे पतामियों पूर्व, मिनाई घममरनेवासे इमरापत्तिों के साप मास्ट(पोष्ट)ये। 'उहाँने पार पहार मे, मो रन मोर्गोरापनुमरण कर यो पो रसपान रिया.. पारद। पारिटन माटिपर बादाम मुरण बरिस्टार पामा तरल साईपपोसिप सिए विए, पौरपाट ग-t निरामभूचना सम्पन मेमोर-मगारगर नरसिमसिमीर- समापार मीर (Pers) dमर मरत मनोमगारमा है। - परम (Ar),real सम्म पानम . .मि. ।
सत्यकीखोन मो भी समस्त हस्य से पत्य के लिए प्रयत्न करते है उसका उन्होंने ईसाई बासुमों के रूप में सात किमाई। पामस्टाइन का कपन है 'पाय निसे पापर्म कहा पाता है वह प्रापीम काम मोयों में भी पर्तमान पा मोर मानवाति के प्रारम्भ से उस समय तक कमी उसके अस्तित्व रामोप महीमा पर तक कि सर्य भास्ट का पागमन नही हो ममा पौर मनुष्यो न एका होकर ईसाईपर्म को सच्चा धर्म कहना पारम्भ नहीं कर दिया यह धर्म को पाने से ही वर्तमानपा। ईसाई पर्म प्राचीन धर्मों का(पुष ऐसौ बीच का बो निस्म । भौर जिस विधि-विधान को पूर्ण करने के लिए न कि नष्ट करने के लिए मास्टकामागमन हमा) ही प्रवर्तन एप अनुगर्वन । मुक्ति का साधन भी तत्वत नही है पचपि उसकेन भस्म एवं संसानि-समन्धी उम परिस्थितियों कारम विविध प्रकार के हो सकते है जिनमे पहभपने को प्रकाशित करता है। ईसाई होना एक माह धर्ममत को स्वीकार करना नही है परन् एक अन्तर्मुसीबीवन बीता है। पर कोर्ष गास्पेस' (मागिन के वर्ष उपरेध) के अनुसार सा कहते है "म समिर माया हिरेपौवन प्राप्त करें प्रपुर मीरन प्राप्त करें तब उनका भवमानही होता है कि भारमियों की प्राचोम देते की भावना को महाभीमता को तीन कर देते है उन्हें उमड़ी भीर से बमा देते है पर उनके मदर जिस निस्वतत्व जिस परमेसर का निवास है उसकी माता रनके सामने प्रकट कर देते हैं। फिर से सम्म मेने पैसा ही है।संत पाम मेघोपमाफीभिमत लोगों को मिला उसमे पारमा केबपत् में पुनर्गम्म का विचार मिपमान । 'पपनी पुरावन प्रहति को यो तुम्हारी पूर्णबीरन-प्रमानी से सम्बन्धित है और प्रचनापूर्ण वासनामों द्वारा नित हो चुकी त्यान हो और मपनी मनोमाननाओं में नये बम बामो बहनवीन प्रकृति प्रापपरो यो पुस्ता एवं पविणवा मेसर से मिलती-जुलती है। इस पुनर्मग्म प्रषणा मबीन प्रकृति के निर्माण के लिए संघर्ष कला परवा है। पुर को 'मार' प. बरपुलको प्रहरिमन' पर एक ईसा को पैतान पर विजय प्राप्त करनी पड़ी थी। पा पुग्म, पापूर्व पाविहीनता हम से प्राप्त कर सम्म प्रपन शित स्वपार प्रपनी सानिप्प महत्त्वाकांक्षामों पर से विजय प्राप्त कर सकते है? मो मह से पीपित (पही सेक्षिा बनाता है कि “मे पुष हमारे। यह बन हमाप है। इस प्रकार के विचारों से मुई सपा माल पता है पर पर प ४११- समापी मारेगमप गौ मास ने मार गए पा: "म प्रवेदोरमका के रियो मेरमा, पर वर-तुम पानते होमस्मते- समले प्रण पाने मरनमल से सामठेत पत्र सरसरि पौर उसका मार्ग उसपर समाससामिल नहीं है वब पु! ई पन पर पा होगा? ईसा कहते है तो पपमे जीवन को प्रेम करता है यह उम ता देता है और पा इस एमिया में प्रपने जीवन स भूगा करता है वह मिरयमीवन म उसे पर्ययमित पर देता है।" गुमनाम ईमापहामन ई ग्रामसम्म कमिमा मरक(पार) पोर पृघ महीं असता। हम पीन के मिा भरना ही होगा। इस परिपतन समिए पापीम (परम्परा) म सम्बय नो मा होगा। पदमारा पौरामों दबायोटिक रचनापोंस सोहना कप्टप्रद हाता है। पूनारामाग रमा तर टिम एकान्त एवं अममाप्य है पाएगे पी पार की तरह नीरम है। कहा जाता है कि इस मार्ग में सारियो ह वा पर म गाती है। इन मीनिया का वर्णन की मार से मिलता है। नन्द प्रोमक प्रभापक पग हा मया है।इनमें मारनारमा मोतिष परा मानारमा म स रिमोमक्सिी पहा पर पपादानोर दिया गया है। साप तक हम भरितारा पुरुषमाग या बौशिक प्पान मारा पहुम गमते हा पर प तीना मस्तुए फामी पपन तर ही मीमित महो रहनी ने एक-दूसरे के प्रदर मी प्रवेश कर राती है। २ मरिसमाग भिम निविप मामो मे हम अपने जीवनको परमस्वर में प्रपिप्टिमर है उनमे गे भरितमार्ग नियंन एवं निरवार, पाप नीष ममक मिग मुनम।। महरिप्रति भक्ति रणने उमगीरदा माग प्रपन का ममतिर देने पापाय है। प्रारिमर गीपन समुपदया।पारिक मार्पना सारा हम इदप पा ईवा के माप मिमन + मि समर्भ गमाते हैं। मुमपमान हमा पाने का वरेण्या के पपीन परमा है आगमित ममिप्राय पराम स्मार्पण हितों के द्वारा संचामिन होता है। ममि एप सार्पना से एम गफ रोमी मनस्थिति प्राजाले जिमम हम दहसोसि परतुपो म प्रनामस्तऐ जातो पौर पर पानि में निणराप्रम निहित है। - सरप कीबोग . ममक मोगन की सादरहितता को दूर नहीं करता यह विमकुम फीका रहता है। परि में देरी रपनामों में सिरा नाम पाने का प्रयासर नहीं पाता तो मुझे उनमें कोई चि मी यदि तेरे प्रपन में उसका माम प्रतिमानित होगा नही मुनवा गे मुझे उसमें कोई विमत्रस्पी नही है। मेरे मुंह के लिए ही मधु मेरे कार्नो के मिा बही मपीत है मेरे हार के लिए पही पानात है। पा मेरे लिए प्रोपण भी है । क्या तुम लोगो से कोसोकग्रस्त है ? है तो उसे अपने मुंह एवंदर में ईटा का स्वार मेने वो पौर देखो पिसे उनके नाम की ग्यातिप्रागे समापन मुप्त हो जाते है पौर माका पुन सम्म हो माग है । रमा तुममें से किसीने को पपपप लिया है और निरामा के प्रमोभन का अनुभव रहा है? उसे (शिवरीप)गीवन के नाम का उच्चार करने दो और जीवन से सामान्य स्थिति म सा देमा। मांधी की रामनुन पी निष्ठा या किमोशियर का नाम सम्पूर्ण रिश्वास एवं सचाई से मेते है ईश्वर उनपर ममस्य मनुहा करते। स्विर भक्ति के कारण मनुष्य प्रानन्द की स्पिति को प्राप्त करता है।" साई-मार्ग प्रपाना भक्ति-मार्ग है। यह महापान बौद तपा हिम भक्ति पाग्दोलनो के समान ही है। मुहम्मद प्रार्थना परास दान वीर्षमाषा एवं बम पारा प्रशासन का मिषान करते हैं। मामा सापको सिर के मार्ग पर प्राधी दूरी तक पहुंचाएगी उपवास उमे महम के हार तक मे गाएगा और दान महम म प कराएमा। प्रत्येक मुसममान पुगारी है और उसे मप्पस्प की कोई प्रावयकता नही है । मद्यपि प्रत्येक रचान उतना ही पविण किन्तु प्रार्पना में मुसममान को अपने मयन पौर विचार-क्षितिग के एक पिसनेमामे निम्बु मे मक्का के पमिप राये पर केनित करने का विधान है।यपि सभी दिन समान म से मुम । परन्तु सुमगार सायंगनि नपासना सेमिए निषित किया गया। हमने मुसलमानो को पारम विस्मृत होकर कात पहाड़ियो का बाजार के बीच गरे देखा है। पास्तिक धर्मो मे हम परमेपार को अपने पिता एवं मप्टा के स मे रेलत है और उसपी पा के लिए प्रार्थना करते हैं। यदि परमेश्वर को परम सत्ता (आप) केप में देखा जाए तो अपना मोई पाप नहीं वरन् पपने सस पस्तिग्म से हवामा , 'माग पर मास में मारा १५ ॥ .00 की जाने व 'ग्मेग दमन कि मेरे अपना पून प्रतिसाल मोकपूर्व विकास साप म्म म गा मा पम्पने माग प्रदेश में मार करेगा। जोtो मात्रा माममा मनमें निम सभी परिपत्र माम माही मे तो मिमगन मत। फेमस 1 पिर-सरमौर उसका मार्ग ही पाप है। पर मप्पम्पदा केवाय ही हम पुम पान्ति पाते हैं। प्रापना रा हम पर की दया पान का पेप्टा करते हैं। विमियम हा प्रपनी पुस्तक दिस्पिरिट पाफ प्रेयर (मार्गमा की मारमा) मे मिसवे है भूप का भपनी मोर झुकी पाती मिराम मिप्तमा वमा निश्चित नही पिवमा समस्त ममाईसमम भमपान का विरह-म्पायुम पारमा के प्रति अपम को समूचित करमा निषित है। ३ कममाग मनुप्प टिम स में है विभिन्न हलो पाक प्राकर है। इन पलोंगा सामनस्य परम पी पारस्पषता पाती है। मनुष्य मप ममा तपा पोर उपई उसका एक पुमा ए-सहन के प्रति समवेदना प्रवासमा बेदनाकारी निष्ठरवा रोमों म समर्प है। यह जिस रूप में है एा स्थापित प्राणी है। गुपई मानव दय की कठोरवा पा स्री प्रममा से हो 47 होती है। महामारत में कामया है “मैं गामना (पिम माहे पर उनकी पोर मरा मम महीं जाता में गानता है कि अमन गया है पर मैं उससे दूर रहना नहीं चाहना।"पी मान बीय पनुमर सत्त पाम ने भी म्पस किया है सो उचित पाय मुझेरमा पाहिए में नहीं पता किन्तु पुराई ओ मुझे महीं करनी चादि करना नाता है।" यह पनुमानित तप्प है माना:प्रातिभिमाजित है। सभी प्रति पिनही है। परिऐमा होता तो रम्नति को कोई पाग या मुगाय ही माप पाती। भगवीवाना पारम्भ एक पम-सेपट से दाता है यहा पर्नुन माने पदर प्रग्पन्न वरीय पाणी से मपीम करता है-उसी बापी से रप में उपस्थित र मै पात्र मी मामी से जो गाने प्रॉफ एरन जोरपा म नुमाई पड़ोपो पर प्रमोमन में पाप सपा पार मे मरयामा उमरपा तो पायो पहवामी मुनाई पो 'ने यह सपा सरसामा? मगर प्रनोमस पर मुरादसाय ग निरन्तर पुर।हम तिला ही मोनो जीत ना ही हमें उपम्एि का सरगना पाना मिला है। नोम पाहल मनुगामनपूर्ण प्रपरल बाराही परामित पर सरने htी पापीपीपा पुरोट (मूमन पगि) पाप्रपान पंप है। मन पार निग! 'पारया में मीन पर बमो नाम मामीमामनाओं कापून मसापापागायोममा बामना प्रणयरमा रेकर मोसार पम्नयामा पाममोपानमाों के विर। 'प'म समय वर मौनिस-पार नहीं है सारिबह का परतों में मनुस्य काजीले गने की पनिकायनानिमित मित्राप तिमिर है। नामा - मनमनमान- सत्यकीयोग धर्म-सिमान्त गौर करता है । (पिपरीप) पद मांस बन गया सब स्पष्ट है कि मास (ह) तपत पुरी धीन महीं है। मास (देह) एवं प्रारमा (ही) मानव-स्वभाग के मौतिक एवं प्रभौतिक पक्षों के प्रर्प मे नही है। देह एक तटस्प (निरपेस) भूमि है। मारमा में प्रक्षेप करके हम यह की सौमानो के परे पम पाते है।ह महमा माम है गो प्रारमार्षी पाश्मिक विकास के लिए प्रयोग में मावा है। पासनासिप्ठ म्यक्ति अपनी देह का दुरुपयोग कर सकता है। मानन परत है। बितना ही मामास के परीर के प्रमोमनों पापिस पाता है ना ही अपने मय के निकट प्राता पाता है। हाचर्म अपना शरीर भोगों के त्याप पर जोर दिया जाता है। पकड़ी प्रापतों की गाड़ी को तारने मिए प्रयत्न करला पावा है । फिर इसके लिए सतत मानक रहना मी मावस्पर क्योकि ये प्रावतें पिर फिर पनपने लगती -सजीव हो पाती है। मनुप्प का जीवन उसके स्वामित्ल की मस्तुमों के बाप मे मही है।" हम बौविक स्तर पर मुखमुविधापूर्ण जीवन विताने के लिए जितना ही बोषिक उप करों पर निर्भर करते पाये रखना ही प्राम्तरिक सत्य के प्रति पोप प्राप्त करने से दूर हटत बाते है । हममे प्रनासक्त हने को कहा जाता है। उत्सम की मापना प्रपनाकर हम अपने को पुरकर सकते है। 'नकर्म से न सततिवारा म भम-मपत्ति से परम उत्सर्म एक रयाग से ही पारबत बीवन की पनयि होती है।'यूटदंतसुत प्रनुसार पुर कहते है “पत्नुभों के बलिराम स बड़ा बनि पान प्रपना पमिदान है। मोरो को अपनी पापपूर्व पासनाए पड़ा देता है यह बेदी पर पमुमोमा बप करने की निरुपयोगिता दो मेगा। रक्त में निर्मन करने की शक्ति नहीं है किन्तु मासनामो के निर्मूलन साय पवित्र हो सकता बताया की पूजा करने पी अपेक्षा मर्म के नियमों का पामम करना स्पापा पच्मा है। रोमस मे संत पास कहते है परि तुम मास की पुकार पर घमारे तो मर गामोरे पितु परिमारमा ए प्रपने परके कमा पा मार कर बोगे हो जाते होंगे। हम यदि यरस्ट के साथ ही उनकी भावि यास्मी होने के मिए, कष्ट सहन करते है तो हम सिरके उत्तराधिकारी तथा मास्के सह वापार बन जाते हैं। एपॉस्टिस (सिा के शिप्प धर्मप्रचारप) कापन है "मनिए बगन ! म पियर कीपा के लिए तुममे अपीम करता हरि पने परीरोको परिष ईसराय स्वीस्व विए यान योम्म सगीर मियामम्म । मवान प्रान बनेर स्पगेनो ममालमापन-गनापनि . FINI २ ३.1.1 ईपर-मिति और उपा मार्ग १४६ में उपस्थित गरा। यही तुम्हारी पारिमा उपासना है।" पारमनिग्रह का प्रपिा परमर पाने के लिए कमी-कमी मोग इस दुनिया से निवृत्त हो जाते है । मन पुराने जमाने मे हिन्दू एवं बौर पमो में सेम्यासियों को मम्मा रही।। मा मंग्यासी भायों का प्रारम्भ मरुभूमि के मर्मपितामों मा उनक प्रपाम पियों से मा। मिस्टसिमन नामक एक संम्पासी सम्प्रदाय रासम्म १.१.बगामी महमा जिसन एकाम्तस्पार्मों में प्राप्रमों की स्थापना को।ये माममयामी माशय कठोर जीवन बिताते थे।इनमे सबमे उत्तेपनीय पपरपाकम मरो मरवापर मा मनापे। संत मैनेरियट पारेशानुसार सम्पामी जीवन 'पामि गोदन मापारम्भ है पोर ओ सम्पासी गोपनी पूर्णता की पार रोगीमपदम रखता हमा माता है उसमे लिए पविष पितामों की सिलाएं पतमान है जिनो पानन से मनुष्य धर्म के अन्तिम मस्य को प्राप्त कर सकता है। मपाल जीवन सय प्रारिमा परिपूपता मा पितर महीं है । मुहम्मद वीस दिनों * उपपास विपान करते हैं जिसमे शरीर को पपीभूत एन पारमा को पवित्र रिया वा मरना। प्पानापामनागीना मध्यम जगत मे पूना प्रसम हो जाना नहीं मोतिर पार्यो । प्रारिमा गयों के सापन--पम उपयोग करता है। पाहपपिरागेको स्वीकार नहीं बना परन्तु देदारपपीम मारमा के संसार में पता है। यह भी समय र पारमा स्वयं अपने को नाम पम्मे हार निमग बता मेती है भोर मानी पत्राति से पपने को मुत कर मठी।।' गिमी मतिमा स्पाम पा पर समार में मोदुध भी हो प्ररपेकम्मति पर बाप्टि में मस्पन्न प्यपान और भावपूर्ण है। प्यानयोग द्वारा हम पारम के प्रतिर गहरी परिध भाषना का शिकाम रखे रहम सरदे प्रति म्याम मोर गमत के मिए मम हत्य से पेप्टा पण पोरम सत्य का प्राण करने ममिगत उनादापिरत पाकर सभी हम गमार-मारपारिताम परमाते है। परोपनरामपंगमरमीबाव मुनिए 'म्यार पानिपम पार मापुतारोमानबागा। उनके मोटा उत्तराप यह सत्यकीय - है "पुरा को छोड़ो भमाई करना सोचो।म्पाय का पभ्यास करो। रत्तीरक पर निगाह रखो। पिहानमोपविकार पितामो। विषया के लिए बोतो-पसकी बकासतरो। पुर हमसे सम्पूर्ण प्राणियों के प्रति प्रेम विकसित करने को कहते है। उनका कपन है "हमारा मन विचमित नहीं होगा कोई दुर्वचन हमसे नहीं निकमेमा हम सिमर कोमम यानु, प्रेममाय और गुप्त ईमो से हित हगि । हम अपने प्रेमत विचारो की किरणों से सदा एकन एकहो प्रकाशित करते ऐसे। मायेगा कर हम सूरमाही महान एवं पसीम कटुता तथा गुरिनारहित प्रेम से सारे अपत् को पापापित कर रेपे। ' 'वैसे एक मा प्रपमे पोषन को बतरे में गमकर मी अपने बच्चे-एकमात्र गर्ग-की रक्षा करती है वैसे ही हममे से प्रत्येक माभव को अपने पम्वर सम्पूर्ण प्राणिमो के प्रवि सभावना विकसित करने से। 'बिने मी पुगए है उनमें प्रमिताम (मापान मे अमीरा) एक प्रत्यन्त लोकप्रिय है।कभी मिस कनिम्होंने युगों पूर्व सापी प्राणियों के प्रति पपमे प्रेम के कारण पिसानीस व मिए थे। उन्होंने संकस किया था कि दूसरों की रक्षा में पपनी सम्पूर्ण प्रति पीर मोम्यता मनाए। प्रमिताभ विवेक एम रमा के मूम्स है। गो काई भी भक्तिपूर्वक उनका म्यान रखा है पह इस उसारमा प्रमित पुरकोप से कृषम कुष पप पाकर स्वर्ग में प्रवेश पाने का अधिकारी हो जाता है। परिवर्त पा पूस साम के लिए अपने गुर्पो का उपयोग करने का सिद्धान्त सम्मू मीनों की प्रतिनिर्भरता की पोर संकेत करता है। सिा महो। "तुमने ऐसा कहा जाते सुना होगा कि 'तुम अपने पड़ोसी को मार रोपे पार पपने पत्र से पुमा रोम' परन्तु मैं तुमसे कहता अपने पा को प्यार करो। 'वधिको प्रारमीकहता तो हैमिश्विर को प्यार करता है किन्तु अपने भाई को पूषा परवा तो यह भय । क्योकि वो अपने भाई को रिसको उसने देखा है प्रेम नहीं कर सकता तमग स्थिरको बिसे उसने देखा ही नही है से प्यार कर सकता है? और यह पमविस प्रमु की पोर किमो सिर से प्रेम करता है पाप्रपने भाई को भी प्रेम करे।"र पिर भगर के प्रतिमा म में मानणेमा मीनगर है। या मानवनगर सर्व-मस्याग की एक ही मौमिक दृष्टि और पात्मिक युगों के गाव संपई के पापार पर रचित सारेभिक मानव-समार ही हो सकता है। सामा.. मम्भिमानिका मेचमुता 1 'मे' । १'बॉर ४१-५ विचार-सिर पर उमा मा ४माममाग पिरतमगीस मान के वाराहम पपायता भार तक पहपत नारे रिस्तु रेबम् पार मदारे इस सरप में प्रगामही र माते । समूर्ण मानवास प्राति की पूमनापापही दम तापावागा सम्या है। यदि हम मानरीय प्रातिको मीमापों का तापकर पाप गाना है ना हम घरीर, मन व प्रारमा , गुमो का प्रम्याम परला पाहिए । परीर को पाप या बुराई के उद्गम पोर उपारण के *प ममता मानिशीगर (Manchueism) मी भूम है। मनुष्य कोई पारिक पीर नहीं है पहरे के कारामार में प्रस्पा। रूस मे यदी है- परिमित प्रमात मगन में एक पगारीमी भाति है।यह उम प्राति म मनीष प्यपस्यापा प्रग है गो सपूम पम्निाय को पग पगमों से सेयर पारिमा गोगों तक पो पाने में समरे हुए है। पारमा ही प्रातिमा नरय है नही माननीय गारवापिस रा है। जैसे प्रापमा पर तु है बनतोः इस जमत् ना हैलहै । मनुष्प र पूम होने मापा गरीर नही परम् गुमी पार प्ररित करने पापी माना है।पर तोपिरका मदिर, प्रपितामा रा प्रायपस्मान है। मामनापों के निहाप रमा बिना नहीं परन् प्रारिमा शक्तिमा माम उमरा सादर है। यह पार प्रभी यह देह भारिमा जीवन में भाप में तरती है । एक पापन गरीरहकर की प्रमिम्पतिमाता हमारे पगार परतावीर है। पर उस परित एम रिकरित होने की मुनिपा मिमनी पाहिए। एमने सितनाममम एलाई सममे रहीं प्यापक शापि की मूषनाए हम प्राण है। मोर प्रपार मे पास मरवाई परम्नु पर उसे देश नहीं पाता-मममनही पाता।"पमिशेष तमसा परमातोलोम पोवालाहरी होमा। मरद प्रसार परमाद वो हमें प्रपरको रमाना हो होगा । मे माननीय रहम्पपूर्ण गहराइयों में गरमा ही होगा और रम गापिपारमारमाही होगा-पामम्पनी पापामा प्रामामि गाग्नि गरी वितरपा गागलान नही पान् मह पार गामिनिमम ममम भनि मन रीमान मस्विप पोरिसाना पपा मर्प विषारों का प्रभार मरी पाइर्म हम सोम्मिग्यिो र ममामा मे पाने मन को 14.mमममनाने मे पागनी stkhi RRPIRनुमान मनुषHHATTER num (nt)मेरापमानेको र बरसगारा रिन मेरा माता भगतामामामामा 1 1. गावास Arrम मुगाराम ITAR गायम ने र गरमा गा सस्पकीयोग एटा मेते है उसे बितन में बहरापने देते है पौर जीवन तमा काम बोम से पान्तिपासी मुक्ति की भावना तक मे बाते है और उसका स्वाद लेते है। बम प्रथम प्रयत्न से ही साम्प की पह स्थिति प्राप्त होती है। मोम का रंग मारमा की मतमता को फिर से प्राप्त परणाई। पारमा पी सक्तिों का अनुमब होने पर यह एक प्रकार का मस्तराममन पुन-स्मृतिमाम वमा पारमा का पारमा से मनिष्ठ संमोग है। योप सम्म ऐमी बिधिपो एवं मम मियों को बताता है गो समी धर्मों में विपिम मात्रामो में प्राप्त है। योग 'चित्त अति-निरोप पबमा सम्पूर्व मानसिक ग्रिामों का साम्ा हो पाना है। मियामों की यह शान्ति हमें स्वयं उस चित्त तक ले पाती है बो पपनी मूस स्थिति में सम्पूर्ण को पौर भियापो का सद्गम पार पार्न है। मनुष्य में इस साधारण मन ये बहुत पर्मिक महान एक पौर मन है।' मन के ऊर्गततो पाप हम विधार्गो मन्वित कर देते है परन्तु नीचे बहुत पहराई में यह प्रदेस है यहाँ हम प्पामस्म होते है। हम सम्पना करते है कि प्रेरणा नही पात्मा के ऊपर से भाती है पर नहीं पा पारमा के अन्दर ही से प्राती है। गहराइयों में उतरने के लिए हमे मौन प्यान का उपयोग करना ही चाहिए। इस उपक्रम में हम प्रकने होकर भी प्रकले मही है । उस एकान्त मे हम ऐसी शक्ति का प्यान पर पो मस्तित्व के निपेमों के होते हुए भी हममें पारमनिवास रत्पान करती है।' पहरा देर तक प्याम का पम्पास करता मठिन है। संत गरी महान 'एपोकेमिष्ट' में प्राए पर्यों की प्रोरप्पा १ को (१) में पागे विनर 'माय मारेको मनुयाय के योजन (परमेस्स) तापम में प्रातमी म समाज बाल वा पिसा मी बनिन समोर पर उपकार परिणामों के प्रदेश में पायी जातीtart माली सीमित होगाती किन्तुगलमेर पापिन रजत मरे मगर में पाप माती पवित्र पर्व मित्र अमरत एवं अपरिपानीमा रे-वन मोस मुव सार्मश में पनप राती है। मालम में फित होती है और पाम बागेही तीवोमनी म्पयुका गुणो के ताप राव।स सम्ममा अपनी अपामा प्रतियो से महोती व अपरिमीत रेस में होने के माप सय मीमारियनियोग दो बाती रानामा कही कि माता भीती २ संत मेगसीभते. "माननियमान वर काम नहीं मिल पाया ममतभी बचानमारा मन भन्म भीमान की बारा में पानीमाया पा पाने सरिक सम्नाय की सन्न नामों पूर यम विवि भानपूर्वक मुना मती रिपयावा। (ममममोत . ४)पुन- मबयोगास और मास इस बार पी एस से र मिनाम रिमधि में पापबारे मेमन की म गरी पीरमा मेस्सील शिवाओं पर पानी की कमी बादीमा पानी है। -बाय १०)।
पिर-सिदि मौर उसका मार्ग दिमाते? सर्प में पगभग पाप पंटा मीरपता रही। इसके बाद मास्या करत ६ सग साषुमारी पारमा है। इसलिए जब मन में ध्यान की सावि छा जाती है तासग भी नीरस हो जाता है मिन्नु कि मन की यह मानिस जीवन में पूर्व मही हा साती इसलिए यह मही कहा मया मिपूरे परे तक स्वर्ग में मीरपणा यही पाप हो टिम रहने की बात कही गई पोकि ग्योही बह पपने को उठाना पारम्म करता है और पाररिकशान्ति की ज्योति मे प्रामापिनहाना बाहना है विचारों की इसपम पम मोट माती है और स्वयं अपने ही द्वारा यह पचान्ति में प्रम्पपस्चितता में फेर दिया जाता है और सम्मपस्थित होने के कारममह प्रथा हो पाता है।' ब्रह्मरा एकाम्त प्यान विकसित करने में योगगूत्र हमें सहायता देता है। यह दमस कहता है कि चान्त पौर निगहोपा फिर प्रतीक्षारोपौर प्रसार म ज्योति जमने दो। यह मानता है कि सरह गीगारमा का पाहन है वैसे ही जीपारमा परमारमा बाबाहन है। पार के परेरा मनोति है उमपर मा वाममापों से मुल हिमो प्रार भारमा केहदप पर प्रवरा तुमको गुम मगनेगो किमी देवीप पा प्रतीर पर मन मोकगित मन से पानम्प हमा गा सकता है। प्यानावस्था कोई पूर्ण मा पापापरति नहीं है। वह पनिष्ठ मनोयोग का कार्य है । प्साटिनय हमसे पात्तर्मती होने पौर उम सर पार्टीमा स्पाग मरने को पता है जो सिर गा। फिर यह पहला रिपारमारे एकान्त में "उस एकमात्र पपिणाम सपा को देवो उसम्मतितिा उस पमिम स रिपुरको देयो-से जिस पर घरबस्तुए निर्भर है जिसके लिए सब देखते है पीमित एते हैं काम परते हैं पौर मानते हैं-पीपन, प्रमा एवं गोवारमा के योत देखो।" दम मोईपत्ति पर या मत्र से मेते हैं और उसपर प्यान रेव गमय पारमा भीरब प्रतीक्षामरती पौर अपने मोएर एमे मन्दिर पम पदस देवी है जिसमें सिर निभाय परवाह र प्रपने पोयमस्त गीपन के पापार एप में हमारे पदर प्राररता है और अपनी सारी दुलना के गाप मनुप्य अपने सोचमरे परपो में समपित करतापरहमपात पारियोनिधान परसम्मुल होवे है तब रमीपुरा में सोनाते पक्रेरिहम गानयर पदसमस्त स्तुतिया पर है। माविकपम मोप हाने पर मान उससे हमारी मुक्ति है । गमरमर १wnापन नार (TerRI नारा दिम १५.1 सत्पनीमोर । पारा के परमो मारमा पाउसमा माय है प्रमाण है। स्पितियो भाई कितनी ही पप्टर हो मुषित भारमा मीतर ही मिलती है। समापिकी अरसा में हम अपनी समस्त पेतना से मिरपाधि पा निषिरप पहा के साथ सरात है। पति हम माननपूर्ष मनासति साम परम सत्य का पनुसरण करते है पो पप्रत्याशित एम पारिप भक्ति एष सावन्य के नबील अनुभव हमम उप होते है। इससे सारे समस्त धर्म मोतित पूर्व प्रेरणायुध हो उठते है। तई हम पास्यासन ऐवा है किन्तु मनुमप से हमारे प्रमर निश्चितता प्रापी है। पर योग के पम-मियम के परिमामयम्स देह मन अनुभूतियों एवं सहर प्रेरणामों में सामरस्य स्थापित हो पाता है. परम्पक्ति में पूर्णता पौर सतुमान पा पाता है सब पर ऐसा बाम बम बात है पिसरे वारा हमारे प्रपर स्थित विषारमा अपने को पापित म मे प्यपत करता है। सोतााटी प्रफि फेस' (मित्र-मपानी) ने परिधम मे मो काम किया है उराका हमे शामबार करना चाहिए कि पश्चिम के मिरजापरी मर्माम्पास में भी मौन उपासना मे प्रवेश पा लिया है। प्यूपा म सयुक्त गप्टस का नो भवन है उसम एक कमरा मान के लिए अलग कर दिया मया है पचपि में मिचिपाप से यह नही जानता कि उसका सपपोग कितना होता है पैमान की उक्ति कि मनुष्य का सम्पूर्व संताप उसके पाप एक कमरे में बैठ सम्मे की पसकी मना" व प्रसिप है। सभी धर्म हमसे मौन प्यास मे सिर मानी मुनये की बात कहते है। मारकी पीसी के लिए, यो भनेक चिम्ता विगिर और मनेक प्रकार के तुमुन से बिन मौमति का विकास परमा एक वर्ग पुरिकारी पाव होगी। स एक ऐसी मनोमुक्ति के पानप का पदाफाश हो पाएगा जिसमें सम्पत्ति प्रपिकार की भावना मठिक प्रनुपासनहीनता मुखोपभोग प्रमोमम पार मोगारमा निराशा का प्राभाग्य है। ५ सरप एवं प्रेम पीर एम प्रारमबोषको एकपूसरे पृषामही क्मिा पा सकता । पात्म परेप में निपम्न पीपन अपमे को प्रेम में म्पत करता है क्योकि कभी हम रस सत्ता मनर एक्सरे को मानते हैं और प्रेम ममोपासक है। हम उपसम्म सत्र की शामा एवं प्रमिमापिठोकुप्रहम है उसके ही अन्वत पर हम यतमान सरत् में हो सोचते हैं और कर्म कायपि या पापिय बीवन ही सब कुछ नही और इसमें कोई वीर सा पती नहीं फिर भी हम ऐसे सम्मायो का मुख भूट सकते पार का भी सकते हरिमपर मृत्यु सपाटन पिचर-सिरमौर उसका माग मही है। हमारे पन्तर में या ज्योति है यह मा घर है यह हर मादमी में है। विर का प्रतिविम्म पुपला पौर दुईम हो सकता है परम्नु बहसमपा मप नहीं किया जा सकता पमोकि यह मनुष्य के निर्माण में हो निहित है । भोर से और पापीनीम से मीपपराधी के लिए भी माना है। नरक वैसी कोई बीर मही। हम यह विपास मदीपर सकन्टेरियर मे प्रगति मानों को मदार लिए मृत्यु के बीच राम दिया है । पन्तगोवि मयका पषित मप्यता एप पानम् के लिए पानाहन रही है। इस रिवार से इस विनाम मा मगन हो पाता है कि रिपबिप प्रिपरम है। गो मोम भी पतग्यपूर्णर रग माति की प्रागा मामन है, पप गाने हैं बात नही । सहम प्रत्यक मानव म सत्य की सादेशिक भागना का दरोगे तो ठिो घोटे से पाटे प्रागी को भी मामवत् मामार प्रम परेंगे। सभी पोरा रा वर्ग-नियम की मिसारी गई है। हिंदू मध्य महामारत पहना है 'मानन्द और पोकम मुरा पोर म्पसा में मनुष्य को दूसरा के प्रति मा ही प्रापरम भरला पाहिए इस पद परय बगी प्रवरपा में दूसरातारा अपने प्रति दिया जाना परामरता।। पूपमरा के मान के लिए फम देते है मदिया दूसरा मामक सिग बहनी। गाग इमरा केमाभ के लिए दूध देती है और सत्पुरप मरों स्याम से मिा जीत है।' मनफ्यूमिपम मे पूछा गया क्या कोई मा मूत्र है जिमा पादमा जीवन पर जमिपम मामफर पानपरता ऐ कमरपूजियम मे उतर दिमा क्या यह सा में नही मिगमा जिममा प्रपदै किमरों का प्रतिपही पबहार परमा पाहिए जैसा मागोमयं पपने प्रति माराला पाहता है।" पमपमूपियर शिष्य रमेग-वे ने गुरमे सर का पना या पिसा है 'मी. प म मरे पापरनिगम मरने गोप्पारसरता। मरिटिस बी पुरता रे नीम, पम्पाप म पादेश मिमा परमे पोमीमो नमी वएप्पार रामास्सम प्रपन माताजाता है पिर पतिवादबिम मापूण ११५ पति पर गाना पगम्बर गीन प्रम या पोरसमा पाबातमी। न परमो प्रागपी पानीमो मिपि पिारिये उस पार पालोमे उगाने पर निरर्य निसानातिर भी मानव जाति को समारदेगा पगारियह उगे प्यार १ "नगम्भुप बी मोशन प्रार पनाने से सिर यो - RAHE TE गनर । साएर पकारार more सरसकीलोर करता है। मूसा के कानन मे पोपणा है कि अजनबी मोर पछी के मिए एक ही मासूम रहेगा पयोकि 'याद रमो तुम भी तो मिम देश में प्रबननी ही पं। 'पोरा टेस्टामेट में हम पर है या हमारे एक ही पिता नहीं है। क्या एक होशियर ने हम सबको उत्पन्न मही किया है ? हितेन के अनुसार तुम्हारे लिए समाजमफ हो उसे मपने साथी प्राणियो के प्रति न करो। पहिया प्रममा दूसरे शमों में प्राणिमात्र के प्रति प्रेम चैनपम का गीय उत्प है।पुर भी 'बोधि प्राप्त करने के बाद जीवन मर मित्रों को निर्मापक पानम मम अनुभव की सिद्धि का रास्ता बताते रहे। माता पुरसे विषम में दुराई करने के लिए सन्नर पत्र के लिए तुम भलाई करने पर सन्नर मिन हो निरन्तर बोषाम्येपन करवाने के प्रावर मी तुम गुर्जा की बोर करन में तत्पर हो। पातिदेवशषिसत्व भारर्म का बर्मन भरकर मनि प्रपने कमों में जो भी पुष्य प्राप्त किए है उनके पुरस्कारस्वरुप में मब प्राणियों के समस्त सोप में उना सान्त्वनादाता बनना पसन्द करेगा। रोपियों के लिए मैं प्रौपप उनके रोग को दूर करनेवामा एक ऐसा सेवक यन् कि पून बीमारी उनके पाम न फरके। मैं बुमुक्षा एर पिपामा की पेगना को भोगन एवं बम-से तृप्त करराकान के पठ तक में पकान में उनके लिए पेय एवं साय बन पाऊ। बीनों के लिए मैं ममय भषार बन पाई पर उनकी पापम्पमता की विविध वस्तुपों से उनकी सेवा करता रहू। मेरा समस्त पस्तित्व मेरे सुर मोग मेरे द्वारा भूत बर्टमान भविष्य में किए हए या किए पानेमामे पम्मूग पुम्भ का में समा के लिए उत्सर्ग करता है जिससे सब प्रानी पपने माय तर पाच सः। सब पस्तुमों के उत्थर्प में ही साम्ति है और मैरी पात्मा पास्तिके मिए तापती। पर मुझे सब कुछ छोड़ना ही है तो सबसे पम्या मही होना कि मैं उसे अपने साथी प्राणियों को पेड़। में सब प्रागिरों को स्वमता देता कि मेरे साप ना पाई म्पहार करें। ये भाषातर सम्वे मेरा तिरस्कार कर मन्ते । मुम पर कीषा नपान समते, मेरी रह से चितरा कर सकते। मेरा उपहास कर सकते हैं। मैंने उन्ह प्रपना सरीर सौप दिया है वयम ससकी - १ परिवारले राजस्व विचरित्रात् । होम्मेपनियपि बानेश्वर ||
पर-सिवि पौर उसमा मार्ग
चिन्ता पयों की
मम माग यो मरा परमान करता है, मुझे पार पहुवावे है, मेरा
उपहास करत है मरे 'मापि' में अपना भाम प्राप्त करें।
जो परसिव है मैं उनकी सागा वो पमि में उनका पप
rपन करमा गो वम पार पाना पाहते हैं ना सिए में पुम बमूगा
बिहे दीपर की पापाता है उनमा दीपम बनूगा पोशम्मा पाते है
उनर पिए गम्मा बनमा गोमवर पाहत उम गरम मिए सेगम बनूगा।'
मंप्पू के पोपरेमा में कहा गया है तुम मप से वाह जैसा प्रपन लिए
कराना चादन हो मा तुम उमक प्रति कप। इवमा ही पर्माप्त नहीं है दिगो
तुए प्यार पर तम्हें प्यार करो इमस पादा महत्वपूर्ण यह है शिमपने पर्यो
म प्यार परी तुम्ह पूणा परत उना माप मताई करा पोर ना तुममाप
करने है पोर तुम्ह पए पहुंचाते है उनम मिा प्रापमा पर
गारी सिरह 'ममी उगरता पोर पाता देदो । वाम र पाप पिया
मिन्नु अगको मग्मा भार गए हैं।
फरी परि तुझे रोई मारता है
वो बन म उगम मार परन् उमरे परण म ।
फरी परि मगर को
तापपिको परोकनी पूर्ण बनार विध ना।
परीत परिमोतुझ टर कर देला?
और दूसरा अपने पाया म पु गमनार
बीनू प्रभु के दरपार में प्रवेश पा गम्या।।
६ पमित्रता एप दासोरिक जीवन
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सायकीलोर एक गहरी सम्वप्टि पमानों के भीतर प्रदेश करमे गोलि तपासर एवं मनुष्य के प्रति प्रत्मस्पर्शी प्रेम होता है। हर्मो मे सत की मुक्ति इस पृप्पी पर नहीं होती। यह अपने पीछे सीमित मापों और प्रों का स्पूम प्रपा नही छोट्या उसका बीपन परमारमा के गीपन मे बिमीन मही होता। पररबपत् काम बम एक पग हो पाता है परम् मम्पूर्ण भिए एकर की मग गाता है। कि उसके पास परीर भी है इसलिए वह सपियक मे सरंचा मुक्त मही होता । परमारमा पतिक भामामों की पाक्ति के शापही काय करता है वह उन्ह नियम नही कर लेता । यो नियुक्त हो गए है समानी निकम्मरमा सभी प्राप्यात्मिस्वाकी प्रारमोन्नति पी निसानी है। मत मदा अपने प्रसस्मरपुपा के पास जलपान माने को रमी सेवा करने को उत्सुक रहता है। सब हम सिर के माष पास हो जाते है पीर या पाहन केशमा मे मार हमारी पिरापों में प्रवाहित हो रखता है पौर तारागण हमारे पाभूपगबन माते है तर प्रत्यार पवसर सम्लर प्टिको मूर्त परमे पौर अपनी रसरताको प्रावरित करने का सापन बन गाता है। र म समी रस्तुपा को परिम मानत हो तब मान पा स्वाद एवं पावित मा मुमोके पीप पौरन की पारस्यकता ही नहीए पाती। पर कोई प्रारमयत में भय व तुपापामा कर देता है तब सभी वस्तुएं एक नम पायाम में उसकी हो गाठी है । उसे जगत् की वस्तुपो का पजन करने की पारस्यता नहीं पाती उनको बदक पारिक पनामक्ति के माय रसवाt और इमो कारण एक मूठम पानपद म पूम हो गाता है। इस प्रकार जिनका द्वितीय जग्म हो पुजा ने महात्मागप मय गालि एक पूर्व पारपनिया में पर इए मसार के ग्वार एव पुनर्रचमा रेगरीय कार्य म मी भाम ते ।। समार का पोम अपने पर समी प्रकार से मेवे इसे 'मपुमक्सिरा म बनाती है पौर मरिया मामे बुनती है। उनकी पपने परिवार, राय सातिया राष्ट्र से कार पामसिनहीं होती। मपान पारमापो को प्यार करते है। मरे जीम उनके भीतरीप ऐगी पीर के बाद एक दल मिड-माप होते मो हमारी समान ममम के बाहर और गो पापित मही घासत है। मसार कम्पारा कार्य उमपर भापेपित होता है। महापान दमदोपिसरवको तिा पपपि कर्म-मियम के पपीन नही है फिर भी वियों के प्रसार के लिए कम करते हुए उपत् मे पड़े हैं, पोंकि सम्पूर्ण सृष्टि एसरे से मची हुई है। मन पास कहते है मामयकता पुकार पारोपित्त दररो गई है। सुपरपोर हर करते है "मैं पहा यहा मपार फुप नहीं कर सकता।" ए ऐमौ पक्ति गानो परे। उमापा यमीमून परसनती है। पामरोमी मार कर्मपोनी गन फे मापाप मोई नियम नहीं हो पर-सिद्धि प्रौर उसका मा गोमम पारमाए होती है इस भागदौर और संमार की हिंसा मे दूर भागती है। यह प्रायस्पामही किस प्रकार की मिति पलायम ही हो पारि प्रपत्री प्पान-मित मेरे ममान को प्रभाषित गरी है। यदि सम्सयरमापी पमो । प्रेरणा हा तो हम समार म निवृत्त हो सकते हैं पर हम मंमार के मायामान म फेम बामे के भय मे एमापरते है वो यह ठीक नहीं है। प्रतिदिन पोड़ी देर कसिए एकाम्त म पाकर मान करमे मे प्रारिमक रियास में सहायता मिलती है । सप्ताह में एक दिन दिमाम की पौर प्रतिदिन दुपदर मोन प्मान मोजो पबस्मानी गई है उसमें या निबर है। किन्तु इसके मिरा मायामी हामा पापपया मही है। गृहस्प रह ए मा हम टीम दृष्टिकोण रस गाना भान युग के एम अत्यन्त भनी पति प्रनाथपिगिा ने मुर से रोमाविरत होगपी मामा मामी व पुरन कहा मनुभम पाकि पीरन मे प्रपमे स्थान पर ए पोर पप्परमायपूर्वक प्रपना राम पर । गोपन पम पार किये पी मही है। मनुष्य को गुलाम बना मेता है परन् सेवन पन सभापतित प्रासक्ति ही र गमाम पमाती है। हम शरन पर ममारामही बरन् परमिपपल पाए है।" मनुष्य को सरप पारमारे साप इस नारामान जगत्मा सम्बम्प पपपरमिगाम्ममा (पानी म स्मित गमतपत्र नेमा) होना चाहिए।'हम म सा रते है पर मिल मही। पर मनुष्य मातमा एक पान म मुल हो जाता है नप यह पान" एवं काया मेपर नाता है। पाम्वस्लिप मामय प ा पामुग। पोर रमा परिणाम मपर्म है। पोम पमनुगमम् योग म म पलाम है। पाली पौर रोगपिसारी (कमिसार~ग मे साागेवानीभाग पाप्रपथ) एप्सर पिरोपी गामही है। पानी मंमार मी भाति रहर काम करता है। परमी उपर निप्यारी उपधा म परमहरा यह ममार में प्रामा परम्परता है। निपार प्रा मी अपि मौर अपि ममार मिना होनाएपनी मम्यता घोपिरय गिरोमा। मन परेमा रेपो म एक मदामत्य प्रगति हमारे 'पारिमा मिसमा गिम पण मी मिनीसा मे म । ७ विरोम मानय रीप भातर हमारा पमित्राप गरम पुर गागीर म गागों मेरे मार्यो महोरको पमिति ती प्रौर द्वारा मानापामाग्मानीपमिति। उमा मानम पभिस Enा १४ सत्यकीखोज - का प्रमसम्ब-मात्र है। परपुस्त्र का प्रसती नाम 'स्सितमा' पा परमुत्र तो सनकी उपापि है। भास्ट की उपपुर भी मानमरप में जागतिक सरप को प्रकट करने है। उनके स्वभाव के मानवीय एवं ईमरीय पर्यो के वीषया मम्बाबी मह प्राल उठता है। निरपेक्ष सत्ता सापेम में ही प्रतिविम्बित होती है। मरि परस्पर प्रतिम पवायसी में महा पा सके तो प्रत्येक ममिम्मपित प्रतिम तपा पाणि या सापक्ष्य-पप से निरपेक्ष होती है। फिर भी यह सत्य है। मनुप्प पूर्ण होने पर देरी पर प्राप्त करता है वह स्वतपता मुक्ति प्राप्त करता है। यह मुमित मानन्द है यही नित्पता है मही सरम है यही यह निरपेभ स्थिति है जिसमें पक्तिगत और सामानिक उपमों का अंत हो पाता है। शयरीय मानव सच्चे मान के पूर्वगामी है। दो पुष एक पौतम या ईसा के मिए संभव है पा प्रत्यक मामम-ग्रामी के मिए संभव है। उनके म मे मामब स्थमार अपनी पूषता को पाता है । मे हमारे म्मेष्ठ मधु है। ये हमे बताते हैं कि मानरतामा कर सकती है। मौतम मा ईसा पिरीय वना के स्वामी बन गए, इससे ने इसरे मानों से दूर नहीं हो गए।' यदि हम यह मान मी में कि ईसा निप्पाप है वो इसमें उनकी मानवता पर कोई प्रभाव नही परखा। पाप मानम प्रतिमा सार-तत्व नही है। यह उसकी एक निति एक रिफर है। हम सापारम मानों में पिरीय वमा मिस पुर्वम तमा प्रपूर्भस्म से विकसित होती है। सा में महापड़ी प्रवन है यहाँ ईसर-मूर्ति पूर्णम से बाचस्पमान है। दो मी प्रादमी इस दुनिया में पैरा होता है उन सबके अन्दर पोति दी गई है।यसरमा प्रेस या दी । निधर्मे पूरे पक्ति को पुनर्जीवन देने की पषित होती है। मातस्प मारमा मे पूर्ण निष्ठा रखकर हममें से प्रत्येक बगा के अपन से मुक्त हो सकता है। कोई पता या गुप्टता सिर का उपयोग करने में पापक मही। बो मत सरत्व का प्राप्तकर मेतारासतपाचरण करता है मानो बाईबर का अंग हो। बो मोग इस्सर के साथ पूश्य प्राप्त कर मेते है ये रमके ममुपह से उसके साथ इतने ही एकरूप हो पात मित्रमे ईसा स्वमावत उपये साप एक पे। मोहा प्रामप मे बदम पाता है। पर कोई मक्ति पाहे कितना ही महान हो सिर की परिपूर्ण पभिक्ति नही हो सकता। प्रत्या म्पति एक विषेप प्रकार की प्रभिम्पति पौर पामारमसत्ता के एक मिमप गुणको प्रकट करता है। यह मझ पा सकता है कि प्रत्यक ममुप्प अनुपम है और ईसरपनर एक रिशेप मावस्यकता की पूति करता है । पस्तिल एक पपीम अपरिमित पपाता है जो जीवन मने रिप १मीरमारार मन 'कर पाना दिसा में NR यादी पिन मापने के समान किनमें 'स्ममा बस्ति ।
बर-सिवि प्रौर उसका माम स्यों में अपने को प्रपट करती रहती है। प्रत्येक मनिस प्रपना ही प्रामाणिक पप । पारमा है यह पपने पाोसी की मम्स नही है बह एक बम का ग्गाहरण-मात्र नहीं है। परवेक को प्रपना मार्प तप परमा है। पक्ति जितने अरे हावे है वनोपारा प्रकट होनेगाते तव भी उतने ही विधतापूम होते हैं। हम यह नही रह सकते किस्पर में है बहसमा सब इस मा उमम्मक्ति में प्रकाशित हमा है--पिर पाहे वह पति विना ही महान पर्यो म हो। मन मानप-प्रागी बिर से ही नभूत होते हैं मार पिस उसीम नौट आते है।' हम सभी ईपर-पुष ह । ईमा बहने है जा भी मरे स्वयम्प पिता कीयाका पासन काला है बही मेरा नषु बहिन मोर माता है। ईसा जाबन एक freना मुस्य तस्य यही है कि हममें से प्रत्येक पिरमा पुध बम समता है। ये हमे स्पष्ट निर्देशनेह तुम्हारे स्पीय पिता पूर्ण है मासिए तुम्हें भी पूर्ण होना चाहिए। 'चतुरंगनिम्ममापन है निन बने उसको पहम किया जिगहनि उसके नाम मनियास रखा उम मरको उसम मे विर-पुत्र बमने की पति प्रान की मानावरत से नहीं माप को दहको पा से नहीं पर पिरकीया से ही उत्पन्न हुए हों। देवा पिमा नमें रिलमा प्रम पिया किहम पर के पुराना"-यजन के उस्ममित रमार है। जब तक जामति पत्रम पमता रहता है में पारमाए सिरहेमानिप्प म पार मुषित केमि प्रपग्नपीम यती। मापिम माम मानों माघारम पानि प्टियोग में होता है Frid माईपर्म अपने पक्ष पर पपि बार रेता है। पर पवार मवा है मोर मग का उशार करता है। मनुमन गित हो जाता है तब उसे पुम स्पाणि मिरीप ठरप पारित होकर अपने को प्रकार करता है। पूर एवं पपिम रोगों में वरीय मानयों को गिरामनार मानम बी प्रशिपाई पाता। राम पुरसा मगो परमारमा पपवाराम मानापाना।' शागि गम कीम्पा में पास्मोमिन मुग स ही रहना है , मानेमा-गे:भाका मे भागा। समभामा ममभार पारपिया १ मे १६.1 । T सम्पm Maraरममा शराबमारियो fritra Amte तो पम भय । - uter .
११२ सस्प कीबोग किसे एक मानव बपरपके पुत्र, है - मामय बिसने फप्ट एवं अपना सहन हरकेम्बिरीम मर्यारा प्राप्त की । पिस्तु परम्परा से उन्हें विष्णु का भयवार मामा बावा है। रापप का माना मास्पमान उससे कहता है कि मेरी समझ से राम मिन।" उसी काम के बहत्तर प्रमाय मे रापण स्वयं राम को परमेपर-प में रेषता है। राम परमात्मसत्ता के प्रतीक बन गाते है जिनको पाकर पिगप पामोवित है। यदि अवतार मम्प मानों की तय हीमो, उनी की वप कष्ट-दुध से मिषा न प्रहण करे तो उसका मानव-याविक लिए कोई स्पयोम ही म रह पाए। यदि यह परमात्मा ही हो तो उसका अनुकरण करना हमारे मिए प्रसम्भव हो पाएमा । उसे तो हमारे हीसा एक मानव होना चाहिए पिसने संघर्ष किया हो मसफतामा हो और फिर सेवर्प किया हो। निम्बू-परम्परा मानती है कि बब-या धर्म का हास होता है और अपम माता है तब-तब एक मान पिमक के रूप में मरीम या अपने कोम्बत करती है। परपुस्त्रीय मापाएं बताती है कि परपुल पृषी माता गरा पारमता से बिनय करने पर उत्पन्न हुए थे। एविमोनाइट मौर मेरोमो मोन ईसा को सबसे बड़ाषयमर मानकर पसा करते थे किन्तु ये उनके पूर्वगीवन मौर इमरीय परिपूर्णता को नहीं मानते थे। उनके लिए सा उसी मामे रिसोपे। पपन से यौवन तक मीर उसके बार माह पौम्प तक उनकी उन्नति उनकी महता एवं मान मिरवर विकास में पूर्ण है। रेह एप मन के मापूर्ण संताप बार मत पर उनकी मृत्यु हुई। प्राचीन काल में पूसरे धर्मों के पैगम। बीमारों को पच्चा मिा मुदों को गिनाया समा को बिगापित पिमा पूर्व को रोक रिवा मा अम्भिरप में बैठकर स्पर्म में प्रवेप किया। ऐसे मोमों को यारी स्विर-युग मरते थे। ईसा भी इसकी तप ही खर-पुष है। (साई) धर्म के बीच पूनान मोर रोम की परती पर भी पी । ना १ मामन मामुप ममेराम बारमयम् । र मम्मान एम मानु सामरिका । र ५ । ममेरा बा बासस्वम् । । एन्ने पोगिनोऽस्मिन् । .ामदारकर्मम्ममानिर्भविदरत। बनारमपमत प्रामानं समामाम् ।।-मालगीत "मीम। •सीमोलान : विजय लीका सीन समयों का प्रकार शिकस्म से मी मनसे मी मानव या सभे ममाम रमा था और मैन् गगन कोमामा-प्रसार। बिन मम मनामी ! सम अनुतो । हाम (मि) सारयों मलामी तारा रेमी बो। अगर । ।
शिवर-सदार उसका मार्य निमानी फरिवों, देवाओं मनम्तास सपा म्मोहित सिंहासन से निस्मृत बस्तुमा के अभ्यस्त और उनके प्रति गिगवासी पे। इसलिए उन्हें यह मरिसस जीप नहीं पान पाकिमोनोस वा चिरागी मोरयर-उत्पही पी इस पृषीपर ममतीनं होकर मानव-यातिको पापों एवंटिमों से मुक्ति प्रदान करे। इस्मयादी पाई स्वीकार करो पेपि ईश्वर से उपमृत प्रकासयान पसाएं एक प्रापीनामाकार एवं रूप प्राप कर सकती है। किन्तु पारितामिक पर्म-सम्प्रदायों में से कितने ही ऐसे पबिनको इस बात में कोई निरास न दाकि परमारमा प्रपा प्रपम तत्व का एक पंज प्रपरिण मांस-एन में मिम होपर (मानव-शरीर में) मरतीक हो सकता है। इसमिए पिरलोप में उन्होंने ईसा की मानण से पकार मिया । सहरमस्वरप बोसेवाइयों (Docetas)t ईसा के जन्म मेने भार उनके प्रारम्मिक ठीस पाम बीपन-सम्मपी एमपुस्तक मेयों की मरमता को मानने से इनकार कर रिया । अपरेमिए दो मह बिलासपमा पत्पमाठीत पा कि उनका सिर मानव भूगकी स्थिति में नौ महीनों तक किसी स्त्री के मभ में एने के बार पैदा हो। रमके लिए यो मह गुरु तेही पौर मानवम्प में पोरंन के तट पर परित हमामा । यह पबवरण भी केरस एक प्रारार पा तल नहीं। ईसवर मे कम देरिया हिमानों के कार्ग एवं पस्तियों का अनुकरण करे। मा सब एक पामा एक पाया पो। भागोरम एवं मृत्यु, पुनर्गीवन एवं सर्गारोहम के दुष्प केबस मामय गाति कस्पाम के मिए प्रमिमीत किए गए। सब सि के साप मुराण की तुममारते हुए कहा राता है कि मरते हुए उत्तमानी (मुराव) रहोगे से निरा एवं पयोतिमा एक भी ममही मिकमा तम उमरे रत्तर में रहा पाता है कि ईसा का पार्वमाए 'मेरे सिर ! मेरे सिर । तुमने मुझे पोशियार रणा:"मास्वषिक या प्रातिमासिकपा। ऐगे भी पे स्निका निवास पाकिमा हमारे जसे ही एप मानर है और बार तपा मेरी पुष है। पपने ही मम्पसाप से मानर नाति में समेिष्ठ रमे बुटिमान हो पर मीनिए परवी पर ईश्वर सम्पी उपासना मो पुर सितारन के माथे पर पपने गए बिगाल में पारस पामें रमरामानिमाम्यिागपातोपिरपीएकमा पनप में उन परपारिता पौर रन मन पर प्रपितारसरसकपप गीरन पास में रोमारोपापामनरलोरही।गाईमा रोयोिं महापों में मरियममा गएपमा बमा पाने पापिप पाय पो पोर पुन परमेश्वर मनुवाद निससिप्प मK पासीदा11-अनु।
सरप कीबोग में और मई मार सिापोपट रखामे शिकायत करने पौर मरने के लिए पर गई। कारिपस का यही विचार मा। पर यह निधार रियर एष मणुप रोगों के लिए सर्वथा अनुचित है। प्रारमा एष पारीर के समाप के पायल की स्यामा करना कठिन है। मानव-मीर में किसी कता या धरण्ठे समा बामे की कल्पना उप स्पारा कठिन नही है। प्रपोनिमरिम का विचार पाकसित एक पानामापी परीर से युक्त है पीर मानपारमा का कार्य भोपोस करता है। एरियनों का तर्क बाहिकहर बर्ममादियो न मत-हिरात मषियों या पासिबमारतों में मिया । मका कहना का पि मोमोस परम पिया की या गरा सम्ब से उत्सम्म एक सयपूर्व पर है। गित (ईसर }पुष से सब वस्तुए निर्मित होती है ना सम्पूर्ण लिमो के पूष उत्तानपा कार पार मोगोर के माधीत पर नौ पहम । पिता परमसर इस एम्माम पुन में अपनी प्रगत सपित का प्रषिप्यम किया और अपनी पयोमोवि की कार रसपर मगा पी। पम्म पूर्णता पीय प्रतिभाव होने के कारण पिताको पालन परलेख, पुर मे संपार का नियमन-सामन च्यिा। प्रतिमाको पिप पियोकामसमे रहसी भारतमा ट्रिनिटी' हम्मका प्रयोग किया। यह पर इसरी सरी पप्पकाम पापान की हानिक पिसारपारा एक ईमाईपर्म सिमान्त भिए सुपरिचित हो गया। दूसरी सदी पन्त के सार सन एवं समोमिमस ने पुष-सहित (परमपिता एप इस को पवित्र माबिया और दोनो के बीच के पास की भगा उनके प्रस्तर पर ही प्रपिक बम रिया। पारसी सीमा में बोलो समारों की एकता को ऐमे स्वरूप में स्वीकार कर मिया पपा जिसे हम अपमे राधाराबा मपनी बानी में बात नहीं कर सकते। इसपर सम्वाका प्रसस्यमा लिरोयाना रवा ।'निहाया भी कासिम के पाने को ऐमा धर्म-मिवात निश्चित नही टिका पयामा बिछे बार्मिक प्रनिनिष्ठापीरवाटी मानागा सके। से तिर्म की विधाों में ऐतिहासिक काटकोपी पति-पापना है मेटिनम मानिने सिम्म रोम में सन् १४ १.में गया। रेपstriभोपमा पालन मारमेर पिसमितिमा। •पसोसरी मसिमोन भागमा ममि माना। १प्रापबरोयको सेव बरामवा मोती भोसरमामा मर-tोर(भम मिनमा - पिररि मार रमा मार्ग - पास्ट में परम दिपा मा से मौतम बुर मानव प्राणी से पूष प्रणिय बमा दिए पए और प्रभु एवं ग्वार के रूप में पूरे माने तो।मे ईसाईपमधाप *त (ट्रिनिटी) सिहाम्त में निगमित हमा से ही बारपर्म में किम सिखाम्त काबिहार किया। प्रमरा दिराममिक पार्यता प्रपा मान पौर मरामारदात है। यह परम सरम जिसकी सिरि प्रायम्मतिको अपने लिए करनी होगी। सभोगकाय' मानादीकाया है इसमे मान सपर्य सातार हाता । परम मप्ता का सत्यनिस्य पुरा में व्यक्तीकरम हाता है। निर्माण काय पामार की पाया है । यही गरीरी बुट या एतिहासिक गौतम-रहै जिसमे नाममान गरीर के सब गुम मिलते हैं। बुर तीम मही एक है। ये तीन पर ही यथाई ठीन पर। मपपपीता पी माति ही महायान बौरमर्म ही मी मा पता है कि मानव जाति के ग्यारमिएर पृषी पर मस्तीण होत है। अनेक गनों के उतार तिए, बदामो पारित करने संसार-परमाना करने प्रामीप म मुस्विरूप में मानव एवं प्राममप में संमार में पाते हैं। ईमाइयों का मन है कि ईसामसीह में पानी मिपनि उनिहास मयत मानपारमामों प म मतमब अन्य सब पिरीय परिमारियों में उत्पन मिन्म है। उनकी दृष्टि स यही एकमात्र मा उराहरण है गिसमें सिर सय म्प पहम पर इस समार में प्रबतीण हरा । जीसस में परत्तरम की पाभुत पटना पोर पम्प पसतारों में माकपाल परामिम्पति कीमोगमा मा सावरप नहीं है। यह तो वितुम एक कमी पटना निष रिने मानवीय इतिहास के मंरपर एक बार, सरायमिए बस एक मार पार्य पिया एवं उपपरिया है। पोपी पवार परीय हस्तक्षेप से पुपर पा एमासी भापम नहीं माना गामापात पाप माविबाम र एम मनुष्य की कोई प्रपथ ममाप पा पात (टिम्यूटी)मही है रिम्नु यह ईमारी रम गिएरारो विसस्पिाला निमम कहा गया है कि परम मा पिता है पाराम मब पीर मनिष्ठ सरर है। लोगोमा मिसान्तसईसाई भागोपापारतिमा पर उमरा प्राय यह सिर पना पबतरों पानापाने पोशिमामा सिरामिदिमीरा मितियों ने पुपमिन नही है । मन प्रपानेनियम की भूमि पर में पानामगिए पारप frपा रिहम पिबन गई। नग भीर और माता पीर पाप कीमती है। परमार रोमा पार गपुर २. भवेशीनुपर (१९५४) सस्य कीशोर यो सतत जारी है। प्रपामेसियस कहते हैं "बिन मोर्यों में परिवारमा (होती पोस्ट) का निवास है ये फेनम बवने से ही देवतासम्म हो जाते है। इसपर संसार के इतिहास में बड़ी वारता के साप पामिम होता है। मगमगीताईस्वर की सतत सश्यिता की बात कहती है 'पब-बब धर्म की मसानि एवं पधर्म की रिहोती है सम-सब म पपने को सूचित करता हूं।" ईस्वर का यह कार्य तम तक पानवा ऐसा जब तक सम्पूर्ण संसार ही एक ईश्वरीय अपवार नहीं बन पाता। सत्यभरस्में पसाबकारी प्रेम है। एक एष्टि से प्रत्येक परवार ही मनुपम है। यह भपने संदर्म में मेगौड़ ही होता है। प्रत्येक अभिव्यक्ति परमात्मा की प्रकृति को प्रतिविम्बित करती है।' माप्पम या मध्याव को पैसा माल ईसाईधर्म में प्राप्त है सा इस्लाम में नहीं है। एक मुखममान के लिए सब च पत्ताह मे ही केमित है । ईस्वरीत माता काबिचार साधर्म का केन्द्रीय पप्प है । (सिर )पुत्र *त का द्वितीय पक्ति सम्पूर्ण पमत् पर प्रारोपित पक्ति है बाकि ईसामसीह पक्तिम्स स्विर है। स्माम में प्रत्येक मनुष्य केवल मुसममान होने के कारण र प्रपना पुरोहित है। यह प्रस्ताह की तस्वीर है पोर इस धरती पर पीमा समीपा है। पिरीम मानों को पन्त एस एवं ईसरीब यमाता एक-सी होती है । एमार्ट कहते हैं हमारे पवित्र धर्मअन्य भास्ट के बारे में गो पापहब समान रूप से प्रत्यक ममे एक सिरीय मानव के बारे में ठीक है। १ पत्र २४॥ २ मा ४ ॥ रिम्म रेरामा हिलो मरिना मात्र परमेस्स सिम्म में पूर्णतः भावरित एम पर किसी दूसरे में पानी ही नही भा |"-'मॉ देश मैन' (१.५), प्राईविराज विलियम रेगल नै निया: सिमाम पर दूसरे रामों में गीमप्त पाप के नाम र प्रवा-साप पोटो मपरकपुर मौरमाणिकस में मी सेती सोमेय पर्व पदी में प्रकाशित किया। समार में निमोनितोकी और मष मनुपानी जम्ना बनुमर म्हसे प्रमरा मास का। -रीरिगत बन मेरसम मस्पेिण () म ।सिधर्म में कमी सेलीबमोमिय मम-नियमी बीसम अपने किसीपन में माननीय शामिासकेमातरमपन्तिम वन - मर मा 'सस पोरदमाटमा (१), - रमनामावसिप सोरोमले या मान लेना किरामिति पार के मात्र समाप्त होगा पारिब तीनपिनमोर( ११। * की रि से सिरम में सम्पूर्व सरमनी मिना मीरतम समिसि ।। मि. लिपिनि प्रष्ट (१९१११।
प्राठया अध्याय
अन्तर्धर्मीय मैत्री
१ धर्मों में निहित प्यापक ऐक्प
पियों का अपना पलं पो भी हो मे सब हमसे यही कह कि मादेपो रे
र परमावरको पारपाक उठो यो सब प्रतिमामो मोर पारणामों
से परे है रिम मनुमा हिया ना परता है पर गाना नही चामरता गो
मारवारमानी बीपन शक्ति है और जो पूय मस्तित्व में है उममा प्रतिम माप
है। इस साप के प्रति ममल पमों में सम्प्रदायावीत ऐप मौरबह की
पारपतपिरिपका के परे है।
प्रमों में निम्न महलमामसिए दियाई पाती है कि परमे ही पी
के मापारभूत माप पा मान ही है। समस्त पार्मिक अनुभवों में एक मनिष्ठ
तय है मामाप पापार है बिमपर रखो निष्ठा उपामना पड़ी है।
रितुइस पापार पर इस मार पर जो भवन निर्मित किए मा है उनमें एक-एक
मनुष्य को मेपर मिम्मवादपरका स्थापत्य किसी एक ही सांचे का एक ही
ममूने का महीं मिमनों के जीवन में दमरा पर्याप्त प्रमाण मिस माता
है। मनुष्यों मपिरिपता है येसे ही परारा उन्हें दिए गए परदार में भी
Forrent मोक्ष पर हुए मत पाम पहले है कि उसने हरेक
मनुष्यता पसरपाप पानीम्यानमार पपने सानातिरप पिा है। एक
दर में प्रपा मशिनमा पनुमर बेजार होता है। रायो पाने सिएर
मापमान परना है और होक को मामाम्य TT परने विष पनुमा
पानाला है। मनमा बीपिनागिर पारिमा भर में वृद्धि
ती।
विभिन्न पो बीचमा पीमिरिमाप सर पर मभर नही कमी
गरपडिमिकरगे बिनाने प्रामुमो पारिपर रिमे ही
Hairया मानामिपि में मरे पर्यों के प्रति निमारा
भारमही है। मोपोर रिसरम्पी हमारे मान महापर तरस
• Rinामसीमिपि पारादीप गवार पनि
11.
१६८ सबकीचोर मही करता कि किसी विशेप धर्म के भवनम्बन से ही मुक्ति मिम सकती है। कोई चाहे कही का निवासी हो पोर पाहे जिस पम पा माननेवामा हो यदि यह निष्ठापूर्वक सचाई साप पर को पाना चाहता है तो प्रम प्रपमे सत्य अपने प्रेम पपने अनुग्रह-नाम से ससे कार नहीं पर सकते। अपने परिस्पिरिट मोफ प्रेयर (प्रार्थना की भावना) मे मिमियम साँ कहते है किधर्मों को विभिन्नता केवल सतह पर। यह मुक्ति पारमा में स्थिरस्म का पीरन पाने का मनुष्य के लिए एक ही रास्ता है वह यही मिए एक ईसाई के लिए इसरातमा मास्तिक के लिए तीसरा नही है। नही ईबर एक मानव-प्रति एक मुक्ति एक है मरे पाने का रास्ता मी र मोरया पारमा.की.कामना को परमेश्वर की पोर मोरो ऐसा करने पर यह कामना ही सब कर ली है बह पाल्मा को स्थिर तक मे माती रिसाप एकनीष हो पाती है। कस्पना करो कि यह कामना किसी पाहूरी या ईसाई में प्राममान नही है सक्रिय मही है तो फिर उसका समस्त बलिराम सेवा पुगा फेवन मृत कर्ममात्र है और समझे पारमा में कोई बीवन नही पा सकता म उनसे प्रारमा एकबर का मिलन ही सम्पन है। प्रम कसना करो कि या कामना ऐसे प्राणियों में भागरित है जिन्होंने फजी गरीय कानून या बाइबिम के उपदेस को मही मुना है तो विषय बीवन विराम या स्वरीम किया उनमे प्रमेश करती हैपौर अपपि उन्होंने कभी उसका नाम नहीं सुना परन्तु ये माइस्ट में एक मबीन परम पाते है। मिन्हनि सरप को मरण किया है पिर-सम्बन्धी सिद्धान्तों या उसके पास पहुंचने के मागों की सापेश्यता के प्रति विमस्त है। हिन्मास्त्र पुष्टि करते है कि हम पापी का प्रयोग पानी के परे जाने के लिए, पुर नि सम सारतत्व तक पारने के लिए करते हैं । हिमपरम्परामार्मिक पनुमय पोएकम्पवा के मृत स्वर तक माने से वार करती है। हिमाम में सम्म एक अनुभूत पमा । बह एक ऐसी-नमोनियो मनुष्य में स्मित प्रतीमिव तत्व द्वारा उस जग जगत में प्रर होतीरभिप एवं भूमि में प्रतिबिम्बित है-एक पाव चमत् जिसमें पाकर माम्पोनि मिल पा गाती है । धर्म-विचारों म परस्पर-विम्यता तो तब गपम्न होती है गर हम प्रारिमक पीयम पर नमबारपामों का प्रारोग करते है यो पालि बीवन स मी गापौर उनके लिए उपयुक्त है। याशिवारपा पौर सत्प को एक मात्र मना दिपार का पाप है। यह दुषित सूमनारमा एस्प का पर्व नपा उम प्रारमिक पारमानुभव यो बहण परने म प्रसमर्थ है निमम मन्प एवं पिराभिव्यक्ति सनों एक है। गिनको यह अनुभव हुआ है . १ तिरिविषयहाँ मग • Trni प्रतपाय मैत्री मास्तिकता से तने हो र जितना उस कल्पनाहोन मास्विरमार से पारि माम के जीर्ण एवं शिवम्मों में ही बार रामाता है। पयारी प्राणिजन दिपियों तक ही सीमित है इस प्रपनमो उठा कर ग्यायमूष पर माप्य करते हुए व्यसन है सुप्पामम्मेण्यामा ममान् मरामम् पार्यो एवं नार्कोपोनों को प्राप्त है। ये मोग अपनी मापा मसति एप परम्परा में पार नही रह गए। यो ऐतिहासिक पटनाए संसार के पम्प मापों को प्रभावित करती है उमस हम भी प्रभावित होना पडेगा। ओमपपा माहे विमोनाराका गया हो बह पविधारमा म ही नि मन यह मा एमोसे का मठ है। पर्मसस्पापों का गठन एसा होना चाहिए किये पपने पनुपापियों को पैसा ही जीवन जीने का अवसर प्रान नरें जिनकी माग उनसे की जाती है। पन्द्राणी मी में हिन्दू मुस्लिम ऐक्य का उपग परनेवाले की मकहा है हियर बनारस में रहता है मुमतमान र म म । पर रिसने इम मसार की रचना है वह (मनुप्प) हाया से बने नगर में नहीं रहता । हिन्द मार मुगरमाम का एकही पिता है-सब निपपा में एक ही विर।। पुर उन सबके पिण्ड मेमो एप सपनपाएरिपार पते पासपी विचार प्रभानी में रहते हैं। उमरा जोर इस बात पर था कि उनके अनुयायी मोपि प्राप्त परम के पार्टी परही प्यान हैं। परिहम परने निश्चित विपार मा संते है ता उनमा समर्पन भरने में 3 बात है। इनसे प्रतिस्ली बम-मिडाम्तो साप मारे उर रहे होते हैं मिला पन्त भार पभिमान में होता है । मापा अपि सब प्रार के दृष्टिकोणों मा विचारों से मुक्त होता है। उसके पास समयन पप के लिए कोई पिपार मही हाले सरासत पाने के लिए कोई विप मही हाता पर पममतबाद में मुक्त होता है। महाम गौरपर्म म बोपि का मध्य प्रनर उपायों प्राणपिपा गा माता है।पोई भी धर्म हम हमारी पारिमा भपता म प्राय देवा । माप है। प्राती नियाम गुरुगा विगार तपा गा प्रयुक्त पला उम्मीर में परवा मे मावा उपयोग मी पार करने पर नियरिया गाता है। हा गया है "मनुप्प पारिणी नाप (1) मरो परनु रमे रतमे मरमा मही पाहिए। मान के लिए वो मीपा राना पहरि नास्पाति परपरामौत पामा रे मामा गोरम मामाग्य पारापन मासाहेमापसमे बहन भने ममप बननाना या मीपा जीपन शिलानरगप्रपापा या पुराने पर गारिपारोंगो पाराले पारपत्रमा सम्मान सपा प्रामापिता मारी। .filia. रामपर ममन मनमा रोन र परिमोनिया"।
१७. अपकोहोर निकाह कहता है "हर प्रारमी को पपने शिवर के नाम पर पसने से इम अपने सर के माम पर बने।" सगे के पर-सम्मम्मी विचारों के प्रति पादर प्रामापिफ धर्म-जीवन का ससम है। साईपर्म में भी उतार एप्टिकोन है । सीमेश ईरता है नानी ईसा व वहान और हि विधि-विधान द्वारा पहलरी पारिक तिरपाराए सस्मापासे पूम है जिनकी पृति ईसाईधर्म ारा की जा सकती है। समका कपन हैट्रि पोटो एक ससके अनुपायी सिर-पुष पपमा मारमा(स्पिरिट) का प्रपसम्मन मेते हुए भी पिताप सिर का ज्ञान प्राप्त करने में समर्म ।' सस्टिम माटिपर एवं सिकन्दरिया के सरी-तीसरी सरी साईन पापी मानतेवियर की शाश्वतवाणी ईसा के बम के गहुत पहन सपनुष मुकरात एवं प्टो प्रबाहम पार नीमन मे महात्मानों के म बोमती दी। 'मास्टयान है जिसमें मनुष्यों की प्रत्येक पावि माम मेवी है और जो उस जान के अनुरूप गोवन बिताते हैं वे ही सोईसाई है फिर चाहे उन्हे नास्तिक होममा पाता । नामिपों में सुकरात एबहेपनिटस वा समजते इसरे मोग परिबरा (पैर-पमानियों) में प्राहम एमिरा मावि ऐसे ही ।" पुन-गिरामी काम नपकार परीय मान के दूसन बीगारोपन में जाक में अपना हिस्सा प्रमाकिया है। इसलिए किसी मनुष्य रानो मी पच्ची बात कही पर हमारा हम ईसाइयों की भी चीर है।" स्माम को समुनहर' (सरप का धर्म) कहा पाणबह यह रारा नहीं करवा कि सरम का एकाधिकार उसके पास है। कुरान में कहा गयाt "हम सिरमौर उसाराहमें नपा प्रबाहम इस्माइस डर सूया एवं सिापारपूसरे देशों पर कर की पहरेदानी म मिसराव रखते है।हम इनमे कोई नही करले। पुरान इसकी मी पुष्टि करता है कि पपी को पाति महाविसमे एक नेतावनी मेवानाम मेशामरा हो। इस्माम मपर्व मनुया पियों से परे बारे पैगम्बरों को मानन केमिए कहता है। सिर प्रेम और पयारे प्रति यह सोचना भी मम्माम होपा कि उसन मावों पारमिरों को हराएँ घाम तक बिना किसी माया ममा प्रसार में पटाने के लिए छोड़ दिया था। १रिदिप, ३५.। सोमैया होगी । स, १९९।
अन्तर्षीय मैत्री पो हम बोलते हैं उससे महीं बस्किपो जीवन हम जोठे है उससे पता चपता है कि हमारी निष्ठा सन्मी है या भूमे। उनके परिपार्मो-फमों-सेतु उन्हें पानेमा। प्रारम्मिका-सम्प्रदाय में सतना करने मा सिंगाप्रयेपन के प्रश्न पर एक रिकार खड़ा हो गया और उसका मिर्मय धर्मसम्मों से मही पनुमय सन्म में किया ममा। 'मरि उनके परमे उन (बिना पतना किए होदेन सोर्गो मा काफिरों) को वही उपहार दिए हैं जो उसने हम (सतना किए यहूदियों) को दिए है तो में ईश्वर की यह रोकनेवासा कौम है? 'पेनसिमबेमिया केकर संस्पापक निमिमम पेन मे सिसामा 'एक ही धर्मबामे दीन निमम दयावान, स्पायी भर्मपरामण पौर निष्ठावान सत्र है। मृत्यु उनपर से पर्ण उठा लेगी तब ये एक-दूसरे को पाने-पहनानेमे । यहाँ यो विविध मेघ भूपा वे पारण रखे रसके कारण ये एक्सरे के लिए पानी बने हुए है।" नियोसरा वरिपेय मे पहा है 'मामों को समझ मेना पाहिए कि हि गौर मादी मुमममान सतगण विचारमा प्रारमपादरी-परियार, मारिमा जीवन सत्य एवं शिव के लिए प्रपरमपील है तो साईपम के बाहरी पणिों की अपेक्षा वर एवं पारस्ट के कही पिप निकट है।" विनियम dr 'अविरतुमारी सभी मामरों को प्यार करना पारिदास मोरसणारा मीनिष्ठ . सारिकाराबरेपररी साधर्म-प्रसारपोरेगापिरो सद भारती के मनाया इम पार से मी बिमा परि तसे रिनाम में बलर रोमिने ममतापरबोराम गुणधारे माया पालिदिर.सी. मारामम THIमरस्त भोर मेरे, मामेब-बार (१५) पत। मार सभर यि मिग निम्नाय प्रम निबन्ध में निममा महिए पारिरिसे ग्रेपरमा तितो परेन दगम मे रिमर NRire माननीय मा निम्ममम मारियो से गाने की तिमिनी म बरती पर हमारे मी गनिहोम रोमोमबलिए गरम-पा प्राणायनापीभोवा ग्न मग पाप गर के प्रतिम गानीमा भनिसानसरनेवास मार सेरा में प्रेमरत मियामी है। पर उनो ममान यमरने पर रे समती तोपोनिगममा प्रगतीसगरी मानुसार समायोशातपातपर रगने के लिए भारा तिर मारे परम एमारास्केरामन रमतर मामा रारा में समरामार मेयो मसभाrituarte मेमोरमा बम माग्म मत्ताने में पारिपने प्रयतम सान autam मरमसला Tratis नोकामना (Urinामना गरम मा का सस्य की मार -- सम्परायों की मिमिपताधर्म के मामा विरार महीखी। रिस पुर मे सनका मूषीपरम होता है ये सस युग के ऐतिहासिक एवं भौगोमिक शान सरम के सापेक्ष्य होते हैं। इस प्रकार के मूभीकरण की सहायता के विमा पाक विकास नही हो सकता। उम्प्यू मार बसे पम्म महायरहित नहीं। "बार्मिक मतवाद के ठोस पुष में पाए विमान प्रयोगातीत दुफा ऐसी पर पेरिया बन पा सकते है बिममे प्रारमा अपने सबर मुम्पवान पोप को मंपि रखती है। पौराणिक पाएं एवं उपाख्यान प्रतीसरप मे पाते है। मनुप्या बारा प्रतिव ईश्वर की पारमाएं स्वय बिर नहीं है । मिरत्व को मानव रे सिए दुठिपास बनाने के हेतु मानसिक प्रतिमूर्तियों की पावश्यावा पाती है परन्तु याद रखना चाहिए कि केगम प्रतिमूर्तिया और प्रपीक पौर ऐतिहासिर तपापपर्याप्त भी है । काष्ट सई देते है कि पर्म मतवार हमारी पुरि का निममण करनेगाने विचार-मार के पोप में सहायक मान्यान-मात्र । एक ऐसी प्रक्षेब माता के प्रतीक है मो स्वय प्रपन में क्या है यह मानने में हम पसमपं । परन्तु इतना पाम सकते है कि हमारे लिए उसका क्या अभिप्राय है। परि कोई पनुमब करता है कि उसने पुर ईसा प्रषणमाम्मद शारामिरीम सत्ता की मना पाई है वो बह इस मे इसे कहे बिना नही रह सकता । पुनर्जीवन बारसा पपमे सिप्पो से कहते है "बापो सब देसों मे भिप्य नामो। "सारी दुनिया मे पामो पौर प्रत्येक प्रानी को धर्म का उपरेप पो। पै पपईसा परा कहे गए हों या नही परस्तुपामा ईसाई-सम्प्रदाय यसमें सिपास रसवा पार मत पीटर के सम्मों को पीगिए 'स्वर्ग (पर) हम हमारे प्रभु ईसा मसीह के सिवा और कोई ऐसा नाम नहीं मिमा है जिससे हमारा उवार हो सके। इसे पदस नहीं माना मा सकता क्योकि हिल गोर मारी एवं मुखतपान धर्म के पनुपाथियों को भी परमारमा की उपस्थिति के संघप-रहित मनुभव प्राप्त गए। सारे पास माम मनुष्टात से पासपाहर निप्पा मोर मानपके सति प्रेम है। जिन मेयो पौर निम्नवामों मै मनुष्यों को विभारित कर रखा है उन्हें मप्टरमेकी पापम्पकवा नहीं बन हमे उन्हे समभमे की पेप्टा करनी चाहिए । समूर्ण मानवजाति की एक परमेश्वर मे मिण पोर माना मों में प्रसीपी पूजा-उपासमा की पाती है इतना ही मानना पर्याप्त है। एक सच्चे पर्मिष्ठ मनुप्प मे विनम्रता होती है। उसमें निप्प होती है अमित महर मुकाबीही सोबापत एपी मि तमाम काहानीमारे विरसग प्राव हमार को किस मही।-सीमिव परम (१m) ११. मोर । १ मै २८ ॥१६॥ ।
म्हधर्मीय मंत्री १०३ स्किाम होता पर धर्मापता नहीं होती। मह मिस पपाता का अनुमर रता है उसको मानवा है पौर मह भी समझना है कि उसकी गिरेप दृष्टि पर्याण होती है। परिष में प्रस्तता का यहोर नहीं होता। परमिष्टर- मनोभायम है, पांग्पता पर गण बोहए पभिमान का परिणाम है। र पादमी यह तो कह पता कि उसको मिमी परीप ममा पूर्णव तोपनमक है रितु यह पह नहीं कह सकता कि मूत्राम में ऐसी कोई सिमिति ही नही या पागे इमरी को होगी महीं। यह मिया नहीं पपिता है या रसपूरक रहती है कि उसके यहाँ पी पिरामिपिन में पर-सम्बम्धी यह समूष प्रस्प निहित है तो मान र मनुष्व नै गाना है और भविष्य में पोर कोई सत्य नगामा शसस्ता है माना जाएगा। २ साई पुनमिसन प्रपर चीमित धर्म में ऐसे सम्मानय पनप पर है जिम्होंने इस प्रम की वृद्धि पीकिसमको गोमाया है वही मिति साप है।म मम्प्रदायों के पुनर्मिमनी पेरा की बायो।। रनवरी १९४९ सम्म में पाकवियपरटरपरी निपुरम पमीगन की रिपार्ट प्राधित हुई। इसमीशन दो पारिमा पापातामों एवं उपासमा म परराम गातिय पुपों के प्रपमित मोटिपिरोन के प्रसार म पामिरचीस गारको समस्त ममस्यायों का सपग परमा पा। उमे मुम्पर प्रीदेमा पाnि सत्य कौर पापी से मनावपूर्ण सम में इन भाषापाठामाको पूर्विकोपा सती है। यह रिसोई दिकमबन फि नर' (इतर मी धर्मपुषि) पर्पक से प्राधिताई है। इसमें कहा ममा निमपि 'बाद देश सह पर (म्मर ) पब पी पिt पर राष्ट्रीय पीबमपर्म का प्रमाण राधा परता पाता। सवाई और पक्तिक (मानदारी समाधी मंतिक मान में या हास हुमा है तथा यौन सम्परता पीर पूतबर में सौष गति से रिहा पिरवार में उपस्थिति की कमी भापुनिक मनुष्यों के इप्टिकोष मे पारपर्वन का एक सफर है। यह पुष्टि कोष दिन-रिल पिकाविस सपबामु एवं धर्मनिरपेक्ष होतामा पाई। पर युग की मांग है कि भास्मिक पीस पोर पर सा नविपीस हो तब पतमान नेतृत्ल सर्य प्रम एवं पनिषप से मर नमा हैइस रिपोर्ट में पुपी विममम तपा विषिष्ट पर्म-समानों में समारताप्रमाव पर बव प्रकट किया पपापोंकि पेसाईप को बता दिया है। इसमें विभिन्न साई सम्परामों से पीम कीमा किरदेगर्म-गोमनकार्य के लिए सबटन एवं सहयोगपूर्वक काम करें।' बिन मान्दोमनों का सोम साइयों की एकता निषिता में एतासिवान्त को पनाये सोकि पहनजस पर पहन पारिमक सरम पर इसमे एक सरम पर पारारिक बुटिपी निहित है। यह प्रपत्तपत साईपर्म सीमा में ही मार होकरमही पानाशाहिए। इधे और पापा एप्टिकी अपनाना पाहिए। पर्मनिरपेक्षता एक भोपबामपन बीपन केसाई मायनिए परमपूर्ण धार्षिक पृषिको भिए एकपामार मौकी पतिरमिताको पर्म की अर्पता के प्रमान-स मे उपस्पिता। पोसियाद ईसाईसम्प्रापा पुमर्मिमन के मामोसनको प्रोत्साहित कर पा से बाहर मानवजाति महान बीवित पोरबीच ऐपप-स्थापन पर भी लागू करमा पाहिए। पर्मक क्षेत्र में भी पिरिपा रेसिपम्पान है इसलिए गोको पातमहीं। परिसिपके सम्पाय एकसाप मित तौर सारयत सस्प के एकमा अधिकारी होने का रारा तोड़ सकते है वो बहमासादरनागाप परिकम होगा कि सप साईधर्म प्रारिमक सरप के एकमात्र अधिकारी होने के पारे में मोपन करे। पामिन एस्पपिपपक इस प्रकार के एकाधिकार पोकेकारम प्राप पार्मिक प्रसार पूर्व परिपता का नाम हुमा पौरमह प्रारमा की धर्मभावना की इनिरा में सहयोगमृति सापित करने में मकर TKurसमान मार (रान्ति सम्पनी समाय) मे मिरा भायोमम परिमारा 47 पुषित कि 'रममा NR ले लिइमारे भैरव पदाहिरका prtime से पाना मानिसमा अपहनारे दिल में पूर्ण मन में हमारा पसरान अन्तर्षीय मंत्री पापा-स्वरस सिटहा है। मरिहम इस मामले पर गहराई के साम रिचारकरें तो भिन्न-भिन्न पिाय भोपाय बताए हुए विविप पों की पापारमूव पारिमा उन्नति एवं प्रपरन की एकवाको गहन ही देख मये। ग्यो-ग्यों इम पारिमा पूमवादी सीडी पर पाठे पात। मूसभूत मारिमा सरयों के ऐतिहाधिक सूचीकरम में गो पिरिपवा दिखाई पड़ती है उसमा मोप होता पाया है। पर पानेगम हमी माम परव-गिपर पहुंचाते हैं । यह मामुपी प्रवृप्ति मौर परत वियर पर पहपे हुए मागों में पाश्वर्यनमक मतपय पर्मसरय के खतम प्रमाण है। भार जीवित गिर-पों में गो यह एक मौमिक मास्मिाधिकोप पाया याताई उस पर मना एक एमी विदाम्पवस्या एवं शान्ति के मिए पापापा नियम रानीतिक एवं पापिय नियोजन से नही प्राप्त किया या समता । यिनी पात्मिक एकता की उपे मरता मोर मार्मिक पिपिपता को प्रमुखता देना वरयमान की दृष्टि में मनुषित भतिक दृष्टि से अममममीय वपा सामानिमष्टि मे रातरणार है। यहाँ भी भागमती पत्ति नही ऐप है। परिमें पामिक गत् की वर्तमान पम्पम स्मित रिमन स्पिति को र कारला है तो हमें यह दृष्टिकोण पहन करमा परगा नो मिसियम मौके पदों में "दार भाषमा.बिर एप.यो पुष गिर है उस प्रम में पाप्मानित मेवोपा समागम है। इसमोई विशिष्ट काकीपहरवा मे मही प्राप्त कर माता पह मपूर्ण हमोरिस पिता के प्रति पूर्णत मृत हो पाने पर पनि प्रम सपा परीम पापहरे म पभिपैर मे ही मर है को मन को हर गएको स्पापपरता से मुरत पर देता है पोर गिाई यही या मास्तिक प्रावक मानव के प्रति समाम प्रीति गाहुपा सरस एवं पिपनाता है। बौरममाट मगर महान पपने बाप मिसामरा में पापणासीवी 'परम पुनीर सपाट सभी मम्प्रदाप मोगी प्रति बारे मन्पामोहोमा गुदाप पा रापोर रामसपा पनाती मम पटामोप्रारपरत।। पर परम पुनीन प्राररान पाना पापी सनी लिमही गिनना समान में गिर मामाया में गारनामा विसाम हो। पप पमप्रति पसारतापरामरे पौगो निमारता? मसिए नियमन परे प्रतिपात रममा पौर परने पम पाना पाता। पानापानम पाणम मपनी पर मोमा निपाता सपा प्ररिगेप पो गरे एमाग र पमिला नियम गप्पान र गुममा पापारा।। मा माग ! गिर पर गाना famपारिमा गरम मसाग या मनात aniभी पम उन मामपनाममा माने गापी माननिगाप जोप्रामी सत्पनीसोर सेवकों को उनकी पीरिक एवं महिषमतावना को पति पहुंचाए बिना अपनी पौर प्रापिठाने में समर्थ होगा को पारसी धर्मविशेष को रहम परले म असमर्थ है। मुत्पावि विपस्साय पर निरहे। दूसरे रिकारको समसार ही हम घरप का पथिक मन्या पर्सन पा सकते हैं। पति मरे विधार गमत भी है तो सत्य के लिए मिया से पनदी से परमा मन्या ही देना। परिहम विवार-सातश्य को गाते मोर दूसरों के ईमानदारी के साथ पाकिए विचारों को शामिन नतीन एकागी सासन-कायवमा प्रम्यासपूर्व प्राषिक एवं सामाजिकबाामित कर देते हैं तो हम पार्मिक सत्य पर प्रसारिक मास कामाम कर घुमते है । बम का परनीति म उन्हे पार पाने कोसिस करा जैसी कोई और नहीं है। पर्म एक क्ति एक रस पो हमारे मस्तित्व को एक प्रदेशा है एक ऐप प्ररान रखा है। मा मवमावा का कोई ऐसा पुन मही है जिसे सारी दुनिरा स्वीकार करे। अपार एवं मनुष्टान यहाँ विस्य पर्म भी अपने में कोई साप्प नही। यह मानब जाति में स्थिर तात्पर्य की पूर्ति के लिए है। एहे किसी एक वर्ग या संस्कृति गावि या राष्ट्र काग्रेषक र मही पाना चाहिए। मो परम्पगप पारो पो से बन रही है, सियोंने प्रमषित पीरियों को पारियक महापना ! तपा शानी एप परिष संठो को गरम पियाई होमो मे सहे फोन के लिए कहना कोई अधिमानी नही है । परपोपो का पपना जीवन तब तक कमा एसा है जब तक उनकी पर सती के प्रमा कती यती मे ही विचारों का मी प्रपना एक गौचन होता है। पाठीवकाम मे पो में एमपी से मिलना सीमा पार रमकी पेता मरिक पीलरते है यमपि दूध के समय में पति होने पर भी नम से कोई एक मानर गाति के पारिमः एकीकरण के लिए सबके मिा कार्य पापार नही उपस्थित र सकता। मितु मरि इम महान पर्मों के प्रापारपूर पारियकवयों तमाम पानेापी शारिधिभिवामोंकी पोर मान देते है तो ऐसा महान धर्म एकही कमी पर गाते हुए दिखाई देते हैं। हम मारो एकापिय पनों से स्फूर्ति प्राप्त करता हम कोई नया धर्म नहीं पा पिन्तु पुरान परेप्रति म एवं विकसित मममवारी चाहते हैं। वर्मा का भविष्य सबटारा एकही पम पीकार करने पापों में प्रतिता होम में नही परन् रनरी रिपेपतामों को सममने हुए भी उन सम्मिहित पापारपूत एकतारेसीकार किए जाने में निर्भर है। हमारी च्या हरप पापना की एकता है हम परम्पत पावन बाहों में बिनाधित पिनुहमाय शिवास है कि बिहिन पोंगरे मम्तमीय मंत्री बाप से पास्मिक पीवन के सत्ता एप सपुगत वर्शन हमें होमा । इस विधार पर उम मोर्गीय बस दिया गाया है जो काम एवं स्थान को दृष्टि से एनसरे रोगहतर है किन्तु यह पूरी इस उदार दान में भाग मेने में पापक नहीं हो सकती पोजिसमें हमारी सोई पिरासत को पुन विनय कर मोटा माने कार्य में सहायता दने की धक्ति है। हमा से एप में अपने पर्म के हिरा मरे पमों के लिए यदि पपमान को महीं वो सीनता की जो भावना है यह महान एवं बोषहीनता के कारण है । यदि हम असाना उनका प्रध्ययन करें हो रेपे कि उम मुबमें दृष्टिकोम की समानु मूति है। बस मम्प एकाकीपन में महीं परन्सश्मि पिरोष माव से रहने के कारण पन्हाने एका मुपरसरमो दिया है। भारतीम विपारपारा के साप महानु मूतिपूर्ण सम्बन ममाने के मठिम प्रपसर के बावजूद हमने इस दिशा में पो बहुत होमम पाल किया है वह हमारे मिए निवासी बात है। मैं यह नहीं कह पा हूँकिहम और वा हिम हो पाना चाहिए किन्तु मेरा विश्वास है कि हम उनसे खनाही सीप एपले मितना व हमसे सोच सकते हैं।" यदि स्विर समस्त मानव गाति कापर है वो पो मोप दुमरे वर्गों के हैं तथा दुसरी भाषाओं का प्रयोग करते हैं ये भी यहाँ मधिम प्रश्नों के समापान केमिए सपेप्ट है। पीसो.एफ. एमापने कहा पा "यदि गाईपर्म को सफल होना है तो १० मालिक मनोवा ने निस्य । मिनरी में विभिन्न प्रारत सोयो मी मिद-भिन्न प्रकार की होती किन्तु माने बानी समेत प्रभारी और प्रमिले। पर मिसिम्म इन रिलीयन (१mri भरागा- पिमोर 'रिपारप पोवीन पर नन् पनियों के गरपोभायात्रा मानमतकाविहाय मोनगान गाया वापर परमी पारम्बनीपरम् १ व विचार र सिप मामी की र परिप्रसाद विबा I OR निरिका सरस भारोपे। -एष मटिस (१९५४), T१३ ने परिभान नEि रिंग (4) AARTY IRATHA भारत मईr मरस समय Ifor 4 नरमे कराने मो मे भानी सा पाने की प्रतिमान माय गाभिमान र मान पत्र पारिएम ने मर रोषवर्म मेवानाकर में Raमर भनिए मरे पाचोर पर HTTEFमार नारद TER में समा पनि IRITRA शिनी गिम-सासमा मर-परसे virdinar पर ! -मारी tarkumari सत्पनीसोल . उसे मवीवकाम की महान पार्मिक चेष्टामों के विरोमी एवं प्रतिवगीदेस में सामने नहीं माना पाहिए । उसे एक सहायक एक परिपूरण प्राविस्थापक पौर गिरम में पाये मामा वाहिए। हिमर्म से धम-मरिसर्तमारा ईसाई बना मेने की इच्चारयाग देनी चाहिए किन्तु विपत्ति के प्रावस्परता के समय उसकी मरर करने के मिए तथा उम पर्सयों की पूर्ति में उसकी सहायता करने के लिए सामने पाना चाहिए निमकी सघने इसम दिनों से उपेक्षा की है। मो को एक-दूसरे के बारे मे काम करते हुए, सबारा माननीय प्राण महान स्वण की पूर्ति के लिए सहायक हाना चाहिए । ग म स्पीयर कावे । "पापपात्य एवं मारतीय वनों को इस भावना से एम-दूसरे की स्पर्मा मही करनी चाहिए कि एक सही और दूसरा नमत है। दोनों को बिन के एम ऐसे मार्ग पर प्रगति परली पाहिए जिसमें अन्त में सारी मानव-याति माग से सके।"मारिमा भीरन के अनुसरग में दोनों मित्र एक पानीबार। साति न्याय एस्ससग्नता के हिवयन कार्य में सभी धर्म एक पगि साझेदारी के सूत्र म पायम । माय बन्दु प्रेम हमारे पड़ोसी के प्रेम मे बवम माना पाहिए।'पारमा धर्मशारा पारिमक मनुता की भावना को सपा नीषित रखमा पाहिए। सभी यो पर्मों में म्यूनाधिक एक-सी धार्मिक भारमाएं मिलती है पचपि मूमत ने सरे पर्मों से मी नही गई है। पर भारत को एमपर्मनिरपेक्ष राम्प कहा जाता है तब इसका प्राथन या नहीं होता किहम एकपष्ट पारमा की सत्पदा पपमा बीवन में धर्म की पारम्म ताको प्रस्वीकार करते या मह कि हम अबार्मिक्ता की प्रभसा करते है। इसका यह मौ पाय नही किधर्म-निरपेक्षता ही एक निश्चमात्मा धर्म बन पाती है या यह कि राम्प पिपरीय प्राधिकारों (प्रीपेटिम्स)को धारप कर मेता है। सपपि परमेतार में मिप्ठा भारतीय परम्परा का प्राचारमन सिमान्त है किन्तु पाखीय पम्प स्वयं नितीधर्म के साप अपने को संयुक्त नहीं करेगा मबह किसी एछपारा नियमित होगा । इमारा विचार किकिसी मी एक बम को निमेष पर नहीं प्रदान किया बाना चाहिए। पौर किसी भी एक पम को राष्ट्रीय भागम मा पन्तर्राष्ट्रीय सम्पादों में विशेष सुविधाएँ नही दीवानी चाहिए क्योकि पसा करमा प्रजातन्त्र पामारभूत सिमावों का उस्मानमा बम एवं पासन मानो के सर्मोत्तम हितो पिस होगा। पार्मिक निप्पलता को सममबारी पर्व १पचार विराम (१४)। मामा मातीवर' (१em) । समानरको शेयरपलरमन रमतर तुम को किस ममि में ममता अपरिचित का पार करो। -सूरानोमा ।
पन्तपीय मनी १०९ महिपता के इम इणिकोम को राष्ट्रीय एवं पातर्राष्ट्रीय पोवन में एक रेवी कम्पनी पूर्ति करता है। कोई नागरिक दस उन पपिकारों एवं मुनियापों को रमर्प नहीं प्रातपरमाता जिहें दूसरों को देने से यह इमारता है। मिमी बीभीम पपने पमवारण किसी प्रकार की प्रपोम्पता मा भरभाग का निधार मही हाना पड़ेगा परन् सामाग्य जीवन में पूरी मात्रा में भाग सेमे के लिए हरेक समाम म्प मे सतण हेमा । मर्म एवं राज्य को ममग करने के मीनर मही भापारभूत सिद्धान्त मिहिप है। मारतीय गग्य की पार्मिक निष्णवामा को पम लिपेरतामा मास्तिरवा के साथ मही मिमाना चाहिए। इसमें भर्म-निरपेदाता जीमा परिभाषारी गई यह मरत की प्राचीन पार्मिक परमरा के अनुमार ही है। यह निष्णाना र माल का मतिप्ण करने का माम है-यक्निक विपनापों गोतमारे प्रपीन करो मही परम् नन्हे एष-मरे में मार्मरस्य में मार पाजीवग्यप भातस्य पनेसता में एषता सिद्धान्त पर पापित है पोर योग सिसानामि गुगलकी समता है। विभिग्न पर्मों के प्रम्पयन से पता सगता है कि उनमें पाशनि गहराई पारिमक गपना रिपारपूर्ति मानवीय महातुमूनि वतमान है। पुम्पनीमता पवित्रता निगमुपता पीर उपरका विष किमी एमपी मिम्मित नहीं है। पार हम परम्पर्म म ऐया परामत पाते है पोपपने पर्म शितिर परे भी देनवा पिमरा विषारा है कि पार्मिक भारत ममर-किमी एक पाप की ममग्न गगत् पर बरस्ती पोपपर मही परन् म मर्वग्राही माग्पना रिहानय गरपापी , मार्प में पाहेतीपाती हैप्पास का पाय समान मापरण र पारिमा मानवक पहुंचना है। पोस्वानुमके पारमपम के रेवत है अनुभव का यह ए मा पर्म-संस्मानों से गरम ममतामों मीरमर को मामधीयान मे उत्पन्न होती २-महाराप्रमद्वारा पामिन एकातिगत निर्माणमा मनप है।इम मनम्पिरियार ही भरिप्यपी प्रामा।' प्यार है उपसंहार पापि हमारे मुग ने धर्म का पासप सममाना प्राय पोररिया है फिर भी भाग म्ये ऐसी पीर की प्रबम मायापकता है भो पर्म ही दे सकता है। एक प्रवीमि परस सपा की सति उसकी पमिम्पमित रप में मार-मक्ति की ममता बा-विहार के मध्यप में मानव-माति की एकता, यही प्रमूनों के प्राचार मात्मा का धर्म इन मूलभूत सत्यों की फिर से पुष्टि करता है। यह मवमानों पौर प्रमुष्ठानों को अपर्याप्त प्रतीकंवारिता के प्रतिरिक्त पार पुष नहीं सममता । यह पर्म के नेतामों से पहना है कि उत्तापन एवं पोषन की ऐसी प्रिया का पारम्भ करें जिससे पार्मिक मा सामारिक कट्टरता . सचि में पी को ठप एवं कठोर हो जाने से बचामा ना सके। इस पृष्ठों में जिस धर्म की परेसा दोनई है उसे सनातन मा पास्मत मर्म कहा जा सकता है। इसे किसी धर्म-निक्षेप से मिमाना कम होमा क्योंकि यह ऐसा धर्म है जो माति सम्माय सबको पार कर पाग है किन्तु इतने पर भी सवातियों पौर सम्प्रदायों को प्रमुपापित करता है। विष धर्म को हम मानते हो उसे ऐसा भेष्ठ स्परे समाविमा मात्मा * धर्म की पंक्ति में पा सके। मैं मानता है कि हरेक धर्म में ऐसे कम स्पान्तरण की संभावमाएं वर्तमान ।'हमें हिमर्म या ईसाईपर्म को 'एक ऐसे विकासमान गरेर रेनो निन्। यनिक संगो मे सम्म बार गलत का सजी पापान मौतियारको पालामा निर्मक मौरस में रही। मोन से एक परम्पर प्रामाविक बमुन केप में और अपने मन में प्रचार-म में पर। दूसरे से मिलवातीपाधि समाज में सम्मिलित करमा प्रवेश मान समाहोरेपनी इसम वियतो पवियना पारिए। विना पोराहीमा हिर्मों के प्रतिवासभर के लिए हिम मनम पप्रतिम प्र मत है। इसमें विना अनेक किन्त मसमें तत्पूर्व रसिकी एक मायामा पर्म में सम्पूर्ण पारवानी को मार लामपना में Pममा में प्रभारित माती राती राप्रपनी मूतमा मनको क्षषित रखने इस बीममें बार-बार मोन बान पी यमनित और ससे भी अपित योग में मने प्रत्मक मेलामातील पिक्को वर्ष तक पहुंचा रियमो मात म्म १८
उपहार
खरीप रहस्मोपारन (महाम रिमसन) पम्पमतमा पाहिए मो
ममय पाकर एक पहचर प्रारमपर्म में परिवर्तित हो गाए।
हम एक उत्तेजना, संकर पौर मुयोम के युग में ए ऐ है। हमें अपनी
प्रपूगतामा काभान है पौर मदि हमम माय को देन साने गोष्टि और उसके
लिए काम करने का साहस हो तो हम अपनी प्रपूर्णतापा-पर्याप्ततामा को
र पर सोहै।।
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