Adarsh Library, Jaipur
Char Ankho Ka Khel
Front matter
No text on this page.
चार आँखों का खेल
No text on this page.
DODNA
निमल मित्र
यार
और
रखी
कावल
No text on this page.
अगर भविष्य के बारे में मनुष्य अंधा न होता तो दुनिया में रहना एकदम बेमजा हो जाता । भावो विपत्ति की संभावना निश्चित जानकर कोई किसी तरह के सुख के पीछे नहीं भागता । मिल्टन अगर जानते कि वे अंधे हो जायेंगे तो कभी विद्याध्ययन नही करते । शाहजहां अगर जानते कि औरंगजेब उन्हें बुढ़ापे में कैदखाने में डाल देंगे तो वे कभी दिल्ली की गद्दी नहीं छूते । भास्कराचार्य अगर जानते कि उनकी इकलोतो बेटी विधवा हो जायेगी तो वे कभी विवाह नहीं करते। नवकुमार और उसकी नयी पत्नी को मगर यह मालूम होता कि उनके विवाह का क्या परिणाम होगा तो कभी उनका विवाह नहीं होता। । बंकिमचंद्र । कपालकुंडला ॥ प्रथम संस्करण ।। १८६६ ॥
No text on this page.
चार आँखों का खेल
No text on this page.
। यह एक दूसरा ही पक्ष है । कितने पक्षों को लेकर लिखू ? इस पृथ्वी पर इतनी विचित्रता, इतनी विशिष्टता है कि मन करता है जी भर. कर अनिश्चित काल तक इसी में अवगाहन करता रहूँ। मेरे सृष्टिकर्ता ने मुझे मार दो नेत्र एवं दो पैर दिये हैं। जिस विधाता ने इस वैचित्र्य का सृजन किया उसे क्या पता नहीं था कि इतना सब देखने के लिये ये दो नेत्र पर्याप्त नही हैं और इन दो पांवों से भी इतना नहीं चला जा सकता! चारों ओर देख-देख कर कभी-कभी मेरे अचरज का ठिकाना नही रहता। लगता है यह जैसे कभी खत्म ही नहीं होगा। मन करता है विधाता को पुकार कर पूछ कि प्रभु तुम्हारे भी क्या मेरे समान केवल दो हाथ हैं ? और अगर ऐसा ही है तो मात्र दो हाथों से यह विभिन्न- रूपा सृष्टि बनाई कैसे ? गलती से भी तो दो फूल, दो मनुष्य अपवा दो पक्षी एक जैसे नहीं हुए । तुम्हारे अकेले के द्वारा यह संभव कैसे हुमा ? मैं बहुत दिनो से मनुष्य को पहचानने का प्रयत्न कर रहा हूँ। बच- पन में अपने आत्मीय-स्वजनों को देखा है। बड़े होने पर पुनः उन संबंधियों को देखा-परखा है। वाहर से तो वह जरा भी नहीं बदले। शक्ल देखकर यदि मनुष्य पहचाना जाता तो कहानी लिखने वालों का कार्य सरल हो जाता लेकिन साहित्य नाम की किसी वस्तु का अस्तित्व होता या नहीं इसमें सन्देह है। “वास्तव में आजकल के कहानी, उपन्यास व नाटक जो बड़े निम्न- स्तर के लगते हैं उसका एक मात्र कारण शायद यही है कि लेखक मनुष्य का ऊपरी चेहरा देखकर कहानी लिखते हैं. और चेहरे पर अधिकांशतः मुखौटा चढ़ा होता है। मनुष्य जितना ही सभ्य होता है उतना ही यह मुखौटा मजबूत होता है। मुझे याद है कि एक बार एक सज्जन ने मुझसे एक बड़ा अजीब प्रश्न पूछा था । उन सज्जन का भी कोई दोष नहीं था। वह उपनगरवासी थे। जीवन में किसी कहानी लेखक को उन्होंने देखा नहीं था। बोले-एक प्रश्न पूछ आपसे ?
चार प्रांखों का खेल २ - ww मैं बोला-पूछिये- -अच्छा, आप लोग क्या किताबें देख-देखकर कहानी लिखते हैं चौंककर मैंने उलटा प्रश्न किया था क्यों? ऐसा क्यों कह रहे हैं ? वह सज्जन वोले-पहले कभी किसी कहानी लेखक को देखा नहीं हैं न, इसीलिये पूछ रहा हूँ, आप बुरा मत मानियेगा- मैंने कहा--आप कहिये, मैं बिल्कुल बुरा नहीं मानगा- वह बोले- कहानी-उपन्यास का काफी शौक है मुझे। पढ़ता रहता हूँ। पढ़ने पर ऐसा लगता है आप लोग बड़ी-बड़ी किताबों से छोटी- छोटी कितावें लिखते हैं। जरा रुककर फिर बोले-~-पर मेरे कहने का बुरा मत मानियेगा। हम लोग ठहरे साधारण लोग, साहित्य-वाहित्य हमारी समझ से बाहर की चीज है । पर आप लोगों की कहानियाँ जीवन से मेल नहीं खाती। तव भी बात पूरी तरह समझ नहीं पाया मैं । पूछा-इसका मतलब? -इसका मतलब हम लोग अपने चारों ओर जिन लोगों को देखते हैं, उनके बारे में आप लोगों की कहानियां नहीं होती। आप लोग जिनके बारे में लिखते हैं वह इस संसार के चरित्र प्रतीत नहीं होते। बहुत बार मैंने इस बात पर विचार किया है। या तो लेखकों के लिखने में कोई दोष है या उनके देखने में कहीं कोई गलती है । देखा ठीक से भले ही होगा पर उसके अनुरूप लिखा ही जायेगा ऐसी कोई बात } नहीं है और अगर लिखना आता हो तो जरूरी नहीं कि देखना भी आता हो अथवा जो देखा हो वह ठीक ही हो। कहने का तात्पर्य है कि तुम्हारे लिखने के साथ हमारे देखने का ठीक संबंध होगा तभी हमें अच्छा लगेगा। तुम लेखक हो और हम पाठक । हम दोनों अलग-अलग हैं । तुम शायद वर्मा में रहते हो और मैं बंगलादेश में। लेकिन जब तुम्हारी किताव पढ़ तव मेरे और तुम्हारे बीच कोई दूरी नहीं रहनी चाहिये। तब हम दोनों को एकाकार हो जाना चाहिये। लेकिन इस तरह की रचना करने के लिये देखने का समय चाहिये। और आजकल देखने का नियम रहा नहीं। अब तो बस लिखना रह गया है। देखने का समय नहीं है अब किसी के भी पास । देखने लगें तो.लिखेंगे कब ? पर यह बात भी ठीक है कि उन सज्जन ने कोई गलत बात नहीं कही थी । आँखें रहने पर मनुष्य देख ही पायेगा जिस प्रकार यह सत्य नहीं चार प्रांखों का खेल ३ है उसी प्रकार यह भी ठीक नहीं है कि समय मिलने पर लिखा जायेगा । उन सज्जन की बात पर सोचते-सोचते न जाने कब अपने देखे मनुष्यों के बारे में सोचने लगा । बहुत पहले की बात है । बहुत से चेहरे आँखों के आगे तैर गये । बस चेहरे हो चेहरे । बंगाली, एंग्लो-इंडियन, गुजराती, मराठा-अनगिनत चेहरे। तब उमर ही कितनी थी। लेकिन अपने दोनो नेत्र सजग और दोनों कान खड़े रखे हैं मैंने । इसीलिये शायद सोते-सोते नीद में भी अचानक उनकी आवाज सुनता हूँ-राइटर जी-राइटर जी. राइटर जी कहकर बिलासपुर के लिमये साहब पुकारते थे। महा- राष्ट्रियन थे । और मिस्टर डी'सा कहते थे मिस्टर राइटर । डी'सा! जॉन डी'सा। चेहरा याद आते ही सारी बातें याद आ गई । मिसेज डी'सा, रेनी डी'सा, चाल्सं डी'सा और फेड् । मैं फेड को 'फ्रेडी' कहकर पुकारता था। मिसेज़ डी'सा मुझसे पूछती-तुम उसको फ्रेडो कहकर क्यों बुलाते हो राइटर ? उसका नाम तो फ्रेड है, आल्फेड् से बना है फ्रेड । मैं कहता-हम लोग जिसके साथ प्यार का संबंध जोड़ते हैं उसके नाम के आगे 'ई' या 'उ' प्रत्यय लगा देते हैं। मिसेज़ डी'सा कहती-तो फिर मैं भी उसे फ्रेडी कहकर पुकारा करूंगी। बेचारी मिसेज डी'सा! आज भी मेरी आंखों के सामने मिसेज डोसा का चेहरा उभर आता है। आंसू बहाते-बहाते अपना अंतिम समय व्यतीत करना पड़ा था उन्हें । उनके वह आँसू कितने मर्मान्तक थे यह शायद केवल में ही जानता हूं। जिन सज्जन ने पूछा था कि मैं भो किताव देखकर लिखता हूँ क्या- उनके साथ यदि आज साक्षात हो जाता तो कहता कि आंखों देखी घटना अगर लिखू तो आप पढ़ पायेगे क्या? यदि पढ़ कर सहन कर सकें तो आप जहाँ भी हों यह कहानी अवश्य पढ़ियेगा। फिर बताइयेगा कि यह कहानी किताव देखकर लिखो गयो है या जीवन देखकर ? आपके पढ़ने के लिये ही मैंने यह उपन्यास लिखा है। आप जैसे लोगों के लिये ही यह लिखा गया है।
चार प्रांखों का खेल ४ 1 चक्रधरपुर में जो मकान मैंने किराये पर लिया था उसी के आधे हिस्से में रहते थे मिस्टर डी'सा । वीच में बस एक पार्टीशन था । जोर से बोलने पर उनकी सारी बातें मुझे अपने कमरे में सुनाई देती थीं। जॉन डी'सा जव जीवित थे तभी से मैं उस मकान में था। माल- गाड़ी के ड्राइवर थे जॉन डी'सा । घर से सवेरे निकल जाते और पता नहीं रात को कव लौटते। कभी-कभी सारा दिन पड़े-पड़े सोते रहते और रात को दस बजे के करीब ड्यूटी पर जाते। लौटते अगले दिन दोपहर को वारह वजे । जिस दिन शाम को घर रहते, बाहर बगीचे में कुर्सियां विछतीं। चार्ली, रेनी, मिसेज़ डी'सा और जॉन डी'सा चारों मिलकर चाय पीते, बातें करते, हंसी-मज़ाक करते। साहब जिस दिन ड्यूटी पर चले जाते उस दिन जैसे महफ़िल जम ही नहीं पाती। मां, बेटा और बेटी साथ बैठकर चाय पोते तो जरूर पर उस तरह बातचीत, हँसी-मजाक नहीं होता। कभी-कभी मिसेज़ डी'सा मुझे बुलाती-गुड ईवनिंग राइटर--- चक्रधरपुर में सब लोग मुझे राइटर ही कहते थे। कहती-तुम घर में रहते हो इसका हमें पता ही नहीं चलता। राइटर- अगर कभी इतवार को साहब घर होते तो सब रेलवे चर्च जाते। आठ बजे बच्चों का हाथ पकड़े घर से निकलते । रांची रोड पर नाग- चंपा के पेड़ के नीचे से होकर चलते हुए चर्च पहुँचते। वहाँ चक्रधरपुर के दूसरे क्रिश्चियन बंधु-बांधव मिलते। किसी के वटन होल में फूल लगा होता तो किसी की टोपी में। उस दिन मिसेज़ डी'सा का साज़- सिंगार देखने लायक होता। वारह बजे के करीब चारों घर लौट आते। उस दिन तरह-तरह के पकवान बनते । मैं बैठा-बैठा सुगंध लेता रहता-मधुर मीठी सुगंध । कहने का मतलब कि देखकर यही लगता कि बड़ा सुखी परिवार है। मोटी तनख्वाह मिलती थी डी'सा को। उस सस्ते के जमाने में ओवर टाइम मिलाकर कोई ग्यारह-बारह सौ रुपये मिलते थे उन्हें । रेलवे के बड़े अधिकारी-अफसर से भी अधिक वेतन ड्राइवरों का था। हां, उनका खर्च भी अधिक था। वंगाली परिवारों के खर्चे से उनका खर्च अनुपात में कहीं ज्यादा था। रेल-बाजार के मेघानी साहब के ।
चार मांखों का खेल ५ 'प्रोविजन स्टोर' से जैम-जेली के डब्बे, स्नो, क्रीम, पाउडर, साबुन का बिल ही महीने में तोन-वार सौ रुपये का आ जाता था। फिर ऊपर से शराब का भी तो बिल था। इसमें कोई बुराई भी नहीं है। घर पर किसी सगे-संबंधी अथवा मित्र के आ जाने पर हम चाय, सन्देश, समोसा, रसगुल्ला परोसकर सम्मान करते हैं, वह लोग ड्रिंक्स देते । हर प्रकार की शराव रहती थी जॉन डी'सा के यहां--शेरी-शैम्पेन, वाइन-व्हिस्की की बोतलें सदा तैयार रहतीं। पीछे आउट हाउस में खानसामा, बावर्ची, नौकर, आया रहते, साय ही ढेर-सो मुगियां भी पली थी । लंच-डिनर के समय उनका सदु- पयोग होता था। शाम को जव घूमने निकलते तो साहब के बदन पर कीमती सूट होता। लेकिन वही साहब जब ड्यूटी पर होते तो पहचाने भी नहीं जाते। मैले कोट-पेट, फटी कमीज, चेहरे पर कालिख, कोयला पड़ने के कारण आँखें लाल और बाल विखरे हुए । मैं उन्हें देखकर कई बार सोचता कि बंगालियों के परिवार में ऐसी शान्ति देखने को क्यों नहीं मिलती? थोड़ी दूर पर ही डी० टी० एस० गांगुली साहब का घर था। उन्हें भी मोटी तनख्वाह मिलतीथी। करीब बारह सौ । लेकिन वही रहन-सहन, जैसा आम बंगालो का होता है। घर के सामने कूड़े का ढेर । बगीचा है, माली भी है लेकिन फूलों को वह बहार नहीं । ध्यान से सुनने पर अन्दर से नौकर-चाकर के साथ मालकिन के लड़ने की आवाज सुनाई देतो रहती। प्रायः नौकर भाग जाता, महरी नागा कर देती। डी० टी० एस० के घर से अक्सर सड़ी मछली के पकने की बास आती। शुरू-शुरू में मुझे भी ऐसा ही लगता । आयु भी कम थी । वही जैसा उन सज्जन ने कहा था, किताव देखकर लिखना। मैं भी किताबों में जीवन के अर्थ खोजता था। सोचता था किताबों में वर्णित जगत् ही शायद वास्तविक जगत है। लेकिन वही वात इस प्रकार मिथ्या साबित हो जायेगी उस समय क्या मैं सोच पाया था! अच्छा ही हुआ जो नहीं समझ पाया, और समझ न पाने के कारण हो यह ध्रुव सत्य जाना कि किताबों में वर्णित जगत् का वास्तविक चार प्रांखों का खेल ६ जगत् के साथ कोई मेल नहीं होता। मेल न होने की वजह से ही हमें अपनो रचना के लिये चरम प्रशंसा व चरम निन्दा सुननी पड़ती है । अनेक वर्षों की, विभिन्न अभिज्ञताओं की यही फलश्रुति है मेरी । जिन मिसेज़ डी'सा की इतनी इज्जत करता था एक दिन वही मिसेज़ डी'सा मेरे लिये विस्मय की एक पात्र बन जायेंगी, इसकी कल्पना भी भला मैं उस दिन क्योंकर कर पाता? घटना का सूत्रपात हुआ जॉन डी'सा की मृत्यु के उपरान्त । साहब के मर जाने के बाद से ही जैसे सब कुछ उलटने-पलटने लगा। घर के स्वामी की मृत्यु के बाद हर गृहस्थी में परिवर्तन आता ही है पर वह दूसरी तरह का होता है। रुपये-पैसे के प्रश्न को लेकर ही यह गड़बड़ शुरू होती है। तव गृहस्थी का खर्च चलाना मुश्किल हो जाता है अथवा सम्पत्ति को लेकर झगड़े शुरू हो जाते हैं। लेकिन यहाँ वह कारण नहीं था। इसका कारण कुछ और था। सारी गड़बड़ फ्रेड को लेकर शुरू हुई । फ्रेड अगर उस दिन इस गृहस्थी में प्रवेश नहीं करता तो ऐसा नहीं होता । वही अलफ्रेड-जॉन डो'सा का भतीजा। चक्रधरपुर के लोको डिपार्टमेंट का एप्रेन्टिस होकर आया था वह और इसके साथ हो मिसेज़ डी'सा इस उपन्यास की नायिका बन गई थीं। पर यह वात वाद को। पहले जॉन डी'सा के मरने की कहानी ही वता हूँ। प्रतिदिन की तरह उस दिन भी सुबह उठकर अखवार लेकर बैठा था मैं। ऑफिस का समय सुबह दस बजे का होने के कारण हाथ काफी वक्त था। अचानक देखा कि एक कॉल-ब्वाय तेज साइकिल चलाते हुए आया और दरवाजे पर लगी घंटी बजाने लगा। मैंने सोचा कि कॉल-ब्वाय तो इस प्रकार गार्ड व ड्राइवरों के घर आया ही करते हैं। रोज की बात है यह उनके लिये। दिन में, रात में, सुवह-शाम अक्सर खवर दे जाते हैं कि ड्यूटी पर कब जाना है । लेकिन । में चार प्रांखों का खेल - - आज इस समय कैसे ? आज तो डी'सा साहब ड्यूटी पर ही हैं। फिर किसको बुलाने आया है ? मुझे ? सामने जाकर खड़े होते ही उसने मेरी ओर देखा । मैंने पूछा- किसे चाहते हो? कॉल-ब्वाय ने कहा-डी'सा साहब की मेम साहब है ? मैं ताज्जुब में पड़ गया क्षण भर के लिये, लेकिन तुरंत ही सारी बात जल के समान स्पष्ट हो उठी। नियमानुसार डी'सा गाड़ी लेकर जिस तरह सब जगह जाते थे उस दिन भी कॉल मिलने पर रात तीन बजे टू थर्टी वन डाउन लेकर खड्गपुर गये थे। अगले दिन रात को रनिंग रूम में जाकर कुछ अधिक शराब पी ली थी शायद । उसके बाद सुवह की ट्रेन में जब ड्यूटी के लिये पुकार लगाई गई तो देखा गया कि. उनकी आत्मा शरीर छोड़ गई थी। मैंने सोचा था कि डी'सा की मृत्यु के बाद मेम साहब मकान छोड़ देंगी। क्योंकि अचानक हजार रुपये की आय कम हो जाने पर थोड़ी असुविधा तो हो ही जाती है। तिस पर डी'सा साहब खर्चीले आदमी थे। नौकर, खानसामा, बावर्ची, लंच, डिनर, शराव ! दोनों वक्त के मांस का खर्च ही चार सेर रोज का था। शराव का खर्च भी काफी था फिर उसके साथ सोडा, बर्फ, लेमनेड भी तो लगता था। काफी दिनों से बगल में रहने के कारण मैं डी'सा के घर के खर्च से अच्छी तरह वाकिफ था। कितनी बार डो'सा स्वयं मुझे अपने ड्राइंगरूम में खींच ले गये थे। सुसज्जित ड्राइंगरूम का कीमती सामान देखकर मन ही मन ईर्ष्या भी होती थी मुझे । बड़ा सत्कार करते थे वह मेरा। हर प्रकार से मुझे सन्तुष्ट करने का प्रयत्न करते थे पर उनको सबसे बड़ा दुख इस बात का था कि मैं ड्रिक नहीं लेता था। इतनी अच्छी मूल्यवान वस्तु होने के बावजूद मैं किस प्रकार इसका लोम संवरण कर पाता था; यह उनकी कल्पना से परे था। कहते-यह ड्रिंक नहीं राइटर लिक्विड गोल्ड है-लिक्विड गोल्ड- मुझे यह देखकर बड़ा आश्चर्य हुआ कि साहव की मृत्यु के बाद भी डोसा मेम साहब ने किसी नोकर को नौकरी से नही हटाया। साहब चार आँखों का खेल रहते जिस प्रकार गृहस्थी चलती थी उसी प्रकार चलती रही। उसी तरह सजधज कर रविवार को चर्च जाना, उसी प्रकार डिनर, लंच, प्रेकफास्ट चलता रहा । जैसे कहीं कुछ घटा ही न हो । यह सब देख-सुनकर बड़ा ही अचंभा लगता था मुझे। पहले जिस प्रकार मुहल्ले के मिलने-जुलने वाले घर पर मिलने आते थे अव भी आते, उसी प्रकार हँसी-मजाक चलता । डोसा के रहते जैसे शराब की बोतल खोलकर मित्रों का स्वागत-सत्कार होता था अब भी वैसे ही होता। वगल के कमरे से मैं उनकी सारी बातें सुन पाता था । डोसा की मृत्यु के अगले दिन मैंने अपनी आँखों से मिसेज़ डी'सा को रोते देखा था। अनवरत रोते और रूमाल से आँखें पोंछते देखा था। मुझे देखकर एकदम से फूट-फूट कर रो दी थीं वह । कहने लगी थीं-राइटर, जॉन नहीं रहा, जॉन नहीं रहा राइटर- रीति अनुसार सान्त्वना दी थी मैंने उन्हें । अर्थात् पति की मृत्यु के वाद विधवा स्त्री को जो कहकर धीरज बँधाया जाता है उसी तरह की निरर्थक बातें। उन्होंने कहा था-वह इतना अच्छा हसबैंड था राइटर कि क्या बताऊँ तुम्हें । इतना प्यार करता था मुझे, इतना एडोर करता था--- यह बात झूठ भी नहीं थी। दोनों में बड़ा धनिष्ठ प्यार था । साधा- रणतः एंग्लो-इंडियन समाज में ऐसा प्यार कम ही दिखाई देता है। पति-पत्नी और दो प्यारे बच्चे बड़ा सुखी परिवार था। पति-पत्नी दोनों को एक दूसरे का हाथ पकड़ कर घूमते देखा था कितनी ही वार । जिस दिन साहब को ड्यूटी से लौटने में देर हो जाती कितनी चिंतित हो जाती थी मेम साहब ! दिखाई पड़ते ही मुझसे पूछतों बताओ राइटर, क्या करूँ ? अभी तक लौटा क्यों नहीं जॉनी ? इतनी देर क्यों हो गई उसे ? मैं पूछता-कहाँ गये हैं मिस्टर डी'सा? किस तरफ ? जवाव देती-खड्गपुर ! मैं कहता-कन्ट्रोल ऑफिस में जाकर पता कर आइये न- और अंत में मजबूर होकर स्वयं साइकिल लेकर निकल पड़तीं। घर से करीव एक मील था कन्ट्रोल ऑफिस । चाहे आँधी होती या तूफान । - चार मांखों का खेल है उसी वारिश में पहुंच जातीं । ऑफिस के सारे लोग पहचानते थे उन्हें । जाकर पूछती-हैलो विलि, जॉनी की क्या खबर है ? कहां है ? ऐंग्लो-इंडियन कन्ट्रोलर उसी समय टेलीफोन करके पता कर देता। जॉन डो'सा वन सेवेन्टी टू अप लेकर आ रहा था। कलाइकुंडा के पास ट्रेन का ड्रॉ-बार टूट जाने के कारण देर हो गई। आधी गाड़ी लेकर इंजिन वापस खड्गपुर चला गया है । मेम साहब पूछती-तो फिर कौन-सी ट्रेन से आ रहा है ? कन्ट्रोलर कहता-पाइलट बुक किया है। तीन बजे रात तक हेड- क्वार्टर पहुंच जायेगा। -माई गॉड! एक दीर्घ श्वास छोड़ती मेम साहव । लौटकर मुझसे कहती-जानते हो न राइटर, गुड्स ट्रेन के ड्राइवर का काम बड़ा ही खराव काम है। बहुत काम करना पड़ता है जॉन को। मैंने कहा-यह तो है ही- वह कहती-इसीलिए तो जॉन से कहती हूँ कि तुम यह सर्विस छोड़ दो-- लेकिन छोड़ना क्या संभव है ? मेम साहब कहती-लोको शेड में अगर काम करता होता तो जॉन को थोड़ा चैन रहता । तब उसे रात को घर से बाहर नहीं रहना पड़ता। - लेकिन उस नौकरी में इतनी तनख्वाह नहीं मिलती न ? लोको फोरमैन की तनख्वाह होती ही कितनी है ? एक बार अधिक वेतन की नौकरी करने पर क्या कोई कम वेतन को नौकरी कर सकता है ? वह कहती-जॉन भी तो यही कहता है राइटर । वह कहता है सात सौ रुपये में मेरा गुजारा कैसे होगा? मेरा तो भूपाल कम्पनी का विल ही छह सौ रुपये महीने का हो जाता है। यह ठीक भी था ! 'भूपाल एण्ड कम्पनी' डो'सा साहब को ह्विस्को सप्लाई करती थी। प्रत्येक मास को तीन-चार तारीख को उसके आदमी को विल लेकर आते देखा है मैंने। हर बिल की रसोदें देखकर पेमेण्ट करती थी मिसेज़ डी'सा। साहब का सारा रुपया-पैसा उन्ही के हाथ में चार आँखों का खेल रहते जिस प्रकार गृहस्थी चलती थी उसी प्रकार चलती रही। उसी तरह सजधज कर रविवार को चर्च जाना, उसी प्रकार डिनर, लंच, ब्रेकफास्ट चलता रहा । जैसे कहीं कुछ घटा ही न हो । यह सब देख-सुनकर बड़ा ही अचंभा लगता था मुझे। पहले जिस प्रकार मुहल्ले के मिलने-जुलने वाले घर पर मिलने आते थे अव भी आते, उसी प्रकार हँसी-मजाक चलता। डी'सा के रहते जैसे शराब की बोतल खोलकर मित्रों का स्वागत-सत्कार होता था अब भी वैसे ही होता। बगल के कमरे से मैं उनकी सारी बातें सुन पाता था । डी'सा की मृत्यु के अगले दिन मैंने अपनी आँखों से मिसेज़ डी'सा को रोते देखा था। अनवरत रोते और रूमाल से आँखें पोंछते देखा था। - मुझे देखकर एकदम से फूट-फूट कर रो दी थीं वह । कहने लगी थीं-राइटर, जॉन नहीं रहा, जॉन नहीं रहा राइटर- रीति अनुसार सान्त्वना दी थी मैंने उन्हें । अर्थात् पति की मृत्यु के वाद विधवा स्त्री को जो कहकर धीरज बंधाया जाता है उसी तरह की निरर्थक बातें। उन्होंने कहा था-वह इतना अच्छा हसबैंड था राइटर कि क्या बताऊँ तुम्हें । इतना प्यार करता था मुझे, इतना एडोर करता था- यह वात झूठ भी नहीं थी। दोनों में बड़ा घनिष्ठ प्यार था । साधा- रणतः एंग्लो-इंडियन समाज में ऐसा प्यार कम ही दिखाई देता है। पति-पत्नी और दो प्यारे बच्चे वड़ा सुखी परिवार था। पति-पत्नी दोनों को एक दूसरे का हाथ पकड़ कर घूमते देखा था कितनी ही वार । जिस दिन साहब को ड्यूटी से लौटने में देर हो जाती कितनी चितित हो जाती थीं मेम साहब ! दिखाई पड़ते ही मुझसे पूछती-बताओ राइटर, क्या करूं ? अभी तक लोटा क्यों नहीं जॉनी ? इतनी देर क्यों हो गई उसे ? पूछता-कहाँ गये हैं मिस्टर डी'सा? किस तरफ ? जवाब देती-खड्गपुर! मैं कहता-कन्ट्रोल ऑफिस में जाकर पता कर आइये न- और अंत में मजबूर होकर स्वयं साइकिल लेकर निकल पड़तीं। घर से करीव एक मील था कन्ट्रोल ऑफिस । चाहे आंधी होती या तूफान । मैं - चार प्रांखों का खेस ३ . उसी बारिश में पहुंच जाती। ऑफिस के सारे लोग पहचानते थे उन्हें । जाकर पूछती-हैलो विलि, जॉनी को क्या खबर है ? कहाँ है ? ऐंग्लो-इंडियन कन्ट्रोलर उसी समय टेलीफोन करके पता कर देता। जॉन डी'सा वन सेवेन्टी टू अप लेकर आ रहा था । कलाइकुंडा के पास ट्रेन का ड्रॉ-वार टूट जाने के कारण देर हो गई। आधी गाड़ी लेकर इंजिन वापस खड्गपुर चला गया है । मेम साहब पूछती-तो फिर कौन-सी ट्रेन से आ रहा है ? कन्ट्रोलर कहता-पाइलट बुक किया है। तीन बजे रात तक हेड- क्वार्टर पहुंच जायेगा। -माई गॉड! एक दीर्घ श्वास छोड़ती मेम साहब । लौटकर मुझसे कहतीं जानते हो न राइटर, गुड्स ट्रेन के ड्राइवर का काम बड़ा ही खराब काम है । बहुत काम करना पड़ता है जॉन को। मैंने कहा-यह तो है ही- वह कहती-इसीलिए तो जॉन से कहती हूँ कि तुम यह सर्विस छोड़ दो- --लेकिन छोड़ना क्या संभव है ? मेम साहब कहती-लोको शेड में अगर काम करता होता तो जॉन को थोड़ा चैन रहता। तब उसे रात को घर से बाहर नहीं रहना पड़ता। –लेकिन उस नौकरी में इतनी तनख्वाह नहीं मिलती न ? लोको फोरमैन की तनख्वाह होती ही कितनी है ? एक बार अधिक वेतन की नौकरी करने पर क्या कोई कम वेतन की नौकरी कर सकता है ? वह कहती-जॉन भी तो यही कहता है राइटर । वह कहता है सात सौ रुपये में मेरा गुजारा कैसे होगा? मेरा तो भूपाल कम्पनी का दिल ही छह सौ रुपये महीने का हो जाता है । यह ठीक भी था ! 'भूपाल एण्ड कम्पनी' डोसा साहब को ह्विस्को सप्लाई करती थी। प्रत्येक मास की तीन-चार तारीख को उसके मादमी को विल लेकर आते देखा है मैंने । हर विल को रसोदें देखकर मैने करती थी मिसेज़ डी'सा। साहब का सारा रुपया-पैसा उन्ही के हा - न चार प्रांखों का खेल ना। जो कुछ भी मिलता लाकर पत्नी के हाथ पर रख देते डी'सा। क्रधरपुर के एंग्लो-इंडियन परिवारों में मिस्टर व मिसेज़ डी'सा रिवार सचमुच ही अपवाद स्वरूप था। उनके समाज में आमतौर औरतों के हाथ में वेतन कोई नहीं देता था। यहाँ तक कि जेब में सावधानी से रखना पड़ता था, नहीं तो जेब से निकाल लेती थी ती। इस बात का अहंकार भी कम नहीं था मिसेज़ डी'सा को। कहत -जॉन महीने का सारा वेतन मेरे हाथ में पकड़ा देता है, यह जान न राइटर? रेनी और चार्ली दोनों छोटे थे उस समय । लेकिन उन्हें भी सच्च। मां मिली थी। इस तरह की मां आम तौर पर ऐंग्लो-इंडियन समाज में कम ही मिलती हैं-कम से कम चक्रधरपुर में तो वैसी और नहीं थी। रेनी के खाने-पहनने पर, चार्ली के लिखने-पढ़ने पर, हर तरफ नजर रहती थी उनकी। जव भी यह सब बातें याद आती हैं, आश्चर्य चकित रह जाता हूँ। यह कैसे संभव हुआ? मिसेज़ डी'सा ऐसा काम करेंगी, इसकी तो कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। वह कहती-जानते हो राइटर मैं जो इतना बचा-बचाकर खर्च करती हूं, वह किसलिये ? रेनी और चार्ली के लिये। उनके फ्यूचर के वारे में सोचकर ही तो बचाती हूँ | कभी-कभी कहती-तुम हमारे एंग्लो-इंडियन समाज के बारे में नहीं जानते राइटर, वहुत करप्शन है हमारे यहाँ- मन ही मन हंसता था मैं उनकी बात सुनकर । मुझे हँसता देखकर कहती-तुम हंस रहे हो राइटर, लेकिन यह फैक्ट है-तुम्हें बताती हूं पर किसी से कहना मत...... कहकर अपने समाज की एक-एक बुराई बताती। लोको फोरमैन डी सिल्वा की बहू किससे मिलती है छिप-छिपकर, अथवा डिप्टी कन्ट्रो लर फर्नान्डिस की पत्नी डी० एल० एस० को बार-बार खाने पर क्य निमन्त्रित करती है। किसकी लड़की किसके हसबैंड के साथ कहाँ भ गई थी आदि आदि......
चार माखों का खेल ११ फिर सावधान करते हुए कहतो-पर तुम यह सब बातें किसो से कहना मत। फिर कहती-इसीलिए तो हम रेलवे क्वार्टर में नहीं रहते । वहाँ रहने से खचं बहुत कम होता, काफी पैसे बचते। लेकिन चार्ली और रेनी की वजह से मैं वहाँ नही जाती। बड़े होकर वह लोग वहां यही सब तो देखेंगे। डोसा साहब के मरने के बाद शुरू-शुरू में मिसेज डो'सा वेटे-बेटी को लेकर चर्च जाती । ठीक पहले की तरह सजधज कर एक दूसरे का हाथ पकड़े रोची रोड से जाते। डी'सा के न होने से चर्च जाना बन्द नही हुआ। फर्क वस इतना पड़ा कि पहले चार जाते थे और अब तीन । उस दिन मेम साहब की साज-पोशाक में एक विशेष चमक होती। सिर पर हैट होता गाउन में फूल लगा होता। रास्ते मे जान-पहचान का कोई मिल जाता तो सिर झुका कर विश करती। कहती-गुड मानिङ्ग जिमि । अचानक एक दिन एक नया चेहरा दिखाई दिया उस दल में। वे फिर चार हो गये थे। शुरू में तो मैंने विशेष ध्यान नहीं दिया। सोचा लड़के का कोई दोस्त-वोस्त होगा। दो-चार दिन के लिये घर आया होगा, चला जायेगा । यह तो होता ही रहता है। झारसुगुडा या खड्गपुर से कोई न कोई सगा सम्बन्धी आता हो रहता था उनके यहां । दो-चार दिन खूब हो-हुल्लड़ चलता । उन दिनों डी'सा साहब कुछ अधिक चढ़ा लेते। कभी-कभी काम का भी नागा कर देते । देखने लायक दिन होते थे वह । मैंने सोचा-उन्हीं में से कोई होगा। लेकिन नहीं । स्वयं मेम साहब ने एक दिन परिचय कराते हुए कहा-इसका नाम आल्फ्रेड है। पहली वार अच्छी तरह देखा गैडो को। सुना डी'सा साहब का भतीजा है । बाप पहले ही मर चुका था। मां-बेटा खड्गपुर में थे अब १२ चार प्राँखों का खेल तक । पर मां के पुनः विवाह कर लेने के बाद फ्रेडी ने उसके पास रहना नहीं चाहा और चक्रधरपुर चला आया है। मिसेज़ डी'सा ने लोको डिपार्टमेंट में उसकी नौकरी लगवा दी है कह-सुनकर । -मैंने ठीक नहीं किया ? तुम्हारा क्या ख्याल है राइटर? मेम साहव ने पूछा। बहुत अच्छा किया-मैंने जवाब दिया । यहाँ के सारे लोग, मुझसे स्नेह रखते हैं। मैंने डी० एल० एस० को सारी बातें बता दीं। हमारे यहाँ तो इस तरह की वारदातें रोज ही होती हैं । अब देखो ना जॉनी के मरने के बाद मैं भी फिर से शादी कर सकती थी। नहीं कर सकती थी? लेकिन चार्ली और रेनी का ख्याल आते ही शादी की इच्छा नहीं होती। मैं शादी कर लूंगी तो वह कहाँ जायेंगे, बोलो? बड़े शर्मीले स्वभाव का था आल्फडे । ऐंग्लो-इंडियन समाज में जिस तरह के लड़के प्रायः देखे जाते हैं वैसा नहीं । धीर-स्थिर-गम्भीर । दाढ़ी मूंछ उगनी शुरू ही हुई थी अभी। उम्र में चार्ली से बड़ा था लेकिन मिसेज़ डी'सा के लड़के जैसा ही था। मेम साहब बोलीं-~~~मुसीवत में पड़कर मेरे पास आया है, मैं इसे घर से तो निकाल नहीं सकती राइटर। क्या ख्याल है तुम्हारा, भगा सकती हूँ? मैंने कहा-पर उसकी माँ को दूसरी शादी करने की जरूरत ही क्या थी?. वह बोलीं-यह बात कौन कहे ? हमारे समाज की लड़कियों में बस यही सबसे बड़ी खरावी है। वह न तो अपने लड़के-बच्चों की सोचेंगी, न किसी और की, बस केवल अपने बारे में सोचेंगी। अपने को अच्छा खाना-पीना, पहनना-ओढ़ना मिल जाये बस । मेरे तो वावा समझ में आती नहीं उनकी यह वात । फेडी विल्कुल चुप बैठा था अब तक । गोरा लाल रंग । स्वास्थ्य भी अच्छा था। मैंने उससे पूछा-क्या काम करते हो? बोला-लोको एप्रेन्टिस होकर आया हूँ। -कैसी लग रही है नौकरी तुम्हें ? नॉट बैड--जवाव दिया उसने । -करते-करते अच्छी लगने लगेगी-मैंने कहा। -- चार प्रांखों का खेल -मैं भी तो यही कहती हूं इससे । डी० एल० एस० से भी यही कहा है मैंने । इतना अच्छा लड़का मैंने पहले नहीं देखा राइटर । डी० एल० एस० भी इसके काम से बहुत खुश हैं। वाद में धीरे-धीरे आल्फ्रेड घर के लड़के जैसा ही हो गया । चार्ली रेलवे स्कूल में पढ़ने जाता, रेनी भी जाती। फेडो शायद घर रहता उस समय । रात की ड्यूटी करके लौटता। दिन के समय घर पर मिसेज़ डी'सा और फ्रडो रह जाते वस, और कोई नहीं। उस निस्तब्ध शान्त दोपहर में बगल के अपने कमरे में विस्तर पर लेटे-लेटे दोनों को बात करते सुनता। कभी-कभी किसी बात पर दोनों की सम्मिलित हंसी भी सुनाई देती। ठोक जिस प्रकार जॉन डी'सा के जीवित रहते बातचीत, हंसो मजाक होता था उसी प्रकार अब भी होता । एक दिन किसी कारण स्कूल से छुट्टी हो जाने के कारण चार्ली जल्दी घर आ गया। वैसे उसके आने का समय नहीं था वह । वेडरूम के दरवाजे पर धक्का मारते हुए आवाज लगाने लगा चाली-मम्मी-मम्मी- लेकिन मम्मी तो वेसुघ सो रही थीं। इतनी गहरी नींद कि पता ही नही लगा कि चार्ली आवाज दे रहा है । चार्ली चिल्लाये जा रहा था -मम्मी मैं हूँ चार्ली, दरवाजा खोलो। लेकिन दरवाजा खुला बहुत देर बाद जब धक्का मारते-मारते उस बेचारे के हाय दुख गये। दरवाजा खुलने पर वोला-मैं कब से दरवाजा खटखटा रहा था मम्मी, तुम ऐसी सो गई पड़कर ? झुंझलाकर मेम साहब बोलीं-तुम्हारे मारे क्या मैं जरा देर को सो भी नहीं सकती चार्ली ? यह कैसा स्कूल है तुम्हारा ? जब देखो टाइम- बेटाइम छुट्टी हो जाती है ? मिज़ाज बिगड़ गया था उनका । मुझे लगा सच तो है, सारा दिन काम करते-करते थक जाती हैं वेचारी। जरा-सी देर को सो जायें तो भी चैन नहीं। फेडो भी उसी कमरे में सो रहा था। चिल्लाहट सुनकर उसकी नींद भी खुल गई।
चार प्रांखों का खेल -~-लो वहुत अच्छा किया। उठा दिया ? मालूम है न फेडी नाइट ड्यूटी करके आया है। थक कर सो रहा था, इतनी जोर से चिल्लाया जाता है कहीं ? चार्ली को लगा, वास्तव में उससे गलती हो गई। चुप कर गया वहा सच तो है, फ्रेडी को लगातार सात दिन तक नाइट ड्यूटी करनी पड़ती है । सुवह घर आने पर आराम करने को मिलता है । फिर दोप- हर को सोता है। नहीं सोये तो रात को जागेगा कैसे ? उसकी सुख- सुविधा का भी ख्याल रखना पड़ता है मेम साहब को ? कुछ दिन इसी तरह चलता रहा । मैं समझ गया कि फ्रेडी की देखभाल अधिक यत्नपूर्वक होने लगी है। ड्यूटी पर जाने का समय हो अथवा वह लौटकर आया हो-सारे नौकर-चाकर परेशान रहते। फडी का स्वास्थ्य खराब होता जा रहा है, उसे सर्दी हो गई है, वह दुवला हो गया है-यह सब सुनते-सुनते नौकर-चाकरों के कान पक जाते । एक दिन खूब धमका रही थीं नौकरों को। मैं सामने पड़ गया तो वोलीं-देख रहे हो राइटर कितने डिसओबिडियेन्ट हो गये हैं सारे नौकर? एक बात नहीं सुनते, जो करने को कहो ठीक उलटा करेंगे- मैंने पूछा-क्या हो गया ? वोली - कल शाम फ्रेडी के जूतों पर पालिश करने को कहा था, को ही नहीं। गंदे जूते पहनकर गया वह ड्यूटी पर। और देखो न, फेडी भला आदमी है इसलिए कुछ कहता नहीं, नहीं तो रात की ड्यूटी करके दोपहर को चैन से सोने तक को नहीं मिलता उसे । रसोई में बैठकर जोर-जोर से बातें करते हैं सब के सब । इस बार मैं सबको डिस्चार्ज कर दूंगी, एक को भी नहीं रक्खूगी । पूरा सेट नया अपाइन्ट करूंगी। यह कोई एक दिन की बात नहीं थी। फ्रेडी के आने के कुछ दिन बाद से ही जाने कैसी गड़बड़ शुरू हो गई थी। डी'सा साहब के जीवित रहते भी बातचीत होती, हंसी-ठट्ठा होता, मस्ती होती पर नौकर-चाकरों को लेकर ऐसी बकझक कभी नहीं होती थी। उस दिन तो ऐसा झगड़ा हुआ कि कमरे में टिकना मुश्किल हो गया। मेम साहब की आवाज जितनी ऊंची होती जाती उतना ही भी चढ़ता जाता। बावर्ची का गला चार मांखों का खेल । दोपहर का वक्त था । चिलचिलाती धूप पड़ रही थी । सामने खाली मैदान में दो-चार गाय-भैंसें घास चर रही थीं। उस निस्तब्ध दुपहरी में एकाग्रचित्त होकर लिखने की सोच रहा था। अचानक विचारों का सूत्र टूट गया। -जाओ, निकलो, निकलो यहां से- उनके बावर्ची जोसेफ को पहचानता था मैं । इंडियन क्रिश्चियन था । डो'सा साहब को बड़ा प्यारा था जोसेफ । अच्छा खाने का शौक था साहब को। मैंने देखा था ड्यूटी पर जाते समय साहब जोसेफ को बताकर जाते थे कि उनके लिए क्या-क्या बना कर लाना था। जिस ओर भी साहब गये होते उसी ओर को पैसेंजर ट्रेन के गार्ड के हाथ में साहब का टिफिन कैरियर पकड़ा आता । यथास्यान गार्ड उतार देता। यही चलन था। सारे गार्ड-ड्राइवरों का खाना इसी तरह दूसरी ट्रेन के गार्ड पहुंचाते थे। इस काम में एक्सपर्ट था जोसेफ । इसके बनाये खाने की कभी बुराई नही सुनी थी डी'सा साहब से । जोसफ की बड़ी इज्जत करते थे वह। जिस दिन साहब घर पर खाना खाते थे, जोसेफ स्वयं खड़ा रहकर परोसता। जिस दिन साहब परलोक सिधारे, खूब रोया था वह । केवल जोसेफ ही नही सारे नौकर- चाकर रोये थे । बहुत चाहते थे वह लोग साहब को । उसी बावर्ची को मेमसाहब इस तरह धमका रही थी, घर से निकल जाने को कह रही थी। बड़ा आश्चर्य हुआ मुझे। बाहर निकल कर देखा घर से बाहर निकल कर बगीचे में खड़ा था वह। मेम साहब चिल्ला रही थी-भागो, भाग जाओ- जिस जोसेफ को कभी ऊँचा बोलते नही सुना था वही गला चढ़ा- कर बोला-मेरी तनख्वाह दे दो पहले, तब जाऊँगा- -नहीं, नहीं देती तनख्वाह, कर ले जाकर जो करना हो- -मैं तनख्वाह लिये बिना नहीं जाऊँगा । पहले मेरा हिसाब कर दीजिये। मेम साहब भी गुस्से से आग बबूला हो रही थी। बोली 1-क्या ? तेरी यह हिम्मत, मेरे सामने जुबान चला रहा है ? मैं कैसे मी तनख्वाह नहीं दूंगी। देखू क्या करता है तू-महीने के माखीर में आकर ले जाना- - १६ चार प्रांखों का खेल न जोसेफ जाने को तैयार था और न ही मेम साहब टस से मस हो रही थीं। अपनी-अपनी जिद पर अड़े थे दोनों। वात करो तो बात बढ़ती है। मेम साहब ने आखीर में अन्दर जाकर दरवाजे की चिटकिनी लगा ली। कोई उपाय न देखकर जोसेफ भी दरवाजे को जोर-जोर से पीटने लगा। चीख-चीखकर मुहल्ले को सिर पर उठाने लगा-मैं कोर्ट में जाकर नालिश कर दूंगा आप पर । मेरे साथ बेईमानी। आवाज सुनकर घर के सामने लोग इकट्ठे होकर मजा देखने लगे। जोसेफ को सचमुच इस तरह गुस्सा होते कभी नहीं देखा था मैंने । चुपचाप अपना काम करता रहता था वह रसोई में। वाजार जाता, खाना बनाता, सवको खिलाता और फिर साहब का खाना साइकिल पर जाकर स्टेशन पहुंचा आता। अव मैं चुप नहीं रह सका। वोला-जोसेफ, तुम इतना चिल्ला क्यों रहे हो ? ठीक से बात करो न । उसने कहा-देखिये न बाबू, अचानक नौकरी से निकाल दिया और ऊपर से तनख्वाह भी नहीं दे रहीं- मैंने कहा-तो तुम शान्ति से बात नहीं कर सकते ? इतना चिल्ला क्यों रहे हो? -चिल्ला मैं रहा हूँ या मेम साहब ? पलट कर पूछा इसी वीच एकदम से दरवाजा खोलकर मेम साहव सामने आ खड़ी उसने । ? । क्या कहा ? मैं चिल्ला रही हूँ ? झूठा कहीं का ! निकलो; निकल जाओ मेरे घर से-- असहाय दृष्टि से मेरी ओर देख कर जोसेफ बोला-देख रहे हैं वाबू आप ? सुन रहे हैं सब अपने कान से । जो कुछ भी गलती है मेरी है ? आज साहब जिन्दा होते तो मेम साहब मुझे इस तरह बदनाम कर सकती थीं भला? -क्यों ? तुमने किया क्या था? मैंने पूछा। -हुजूर आप मेम साहव से ही पूछ लीजिये न कि क्या किया था। फ्रेडी साहब को खाना देने में जरा सी देर हो गई थी। बस, यही कसूर है मेरा?
चार मासों का खेल मेरी ओर देखकर मेम साहब बोलीं-राइटर उससे बात मत करो, स्काउण्डल है वह ? -मुझे गाली दे रही हैं आप? मामला बढ़ता देखकर मैंने जोसेफ से कहा-जोसेफ इस समय तुम जाओ, वाद को आना-देख रहे हो इस समय मेम साहब गुस्से में हैं। मेरे मुंह की ओर देखा उसने एक बार और फिर चला गया। कुछ देर वहीं चुप खड़ा घर के अन्दर से मेम साहब के चिल्लाने की आवाज सुनता रहा । उस समय उनका गला तार सप्तक पर चढ़ा हुआ था। इससे पहले कभी उन्हें इस तरह चिल्लाते नहीं देखा था मैंने । इसके बाद से आवोहवा पूरी तरह बदल गई। पहले जिस घर में इतनी शांति रहती थी, उसी घर में अशान्ति का वीज पनपने लगा था। पहले की तरह अब रेनी का गाना नहीं सुनाई देता था। चार्ली के चेहरे की हंसी भी जैसे गायब हो गई थी। और फ्रेडी... जो बेचारा शांति से रहने के लिये इस घर में आया था, अशान्ति से पीछा नहीं छुड़ा पा रहा था अपना । मन बुझ-सा गया था उसका । उसके बाद से देखता कि उस घर की बत्ती सरे शाम बुझ जाती। शायद डिनर खाते ही सो जाते थे सव । पहले खाने के समय बड़ी देर तक गपशप चलती रहती थी। अब नहीं होती थी। अगर यदा-कदा कोई आवाज सुनाई देती भी तो वही नौकर-चाकर के साथ बकझक । कुछ चकित-सा हो गया था मैं यह रंग-ढंग देखकर । एक दिन आते हुए रास्ते में जोसेफ मिल गया। सलाम किया उसने। मैंने पूछा-कहो, क्या हाल चाल है ? कहाँ काम कर रहे हो आज- कल? उसने उत्तर दिया-फर्नान्डिस साहब के घर हूं। पर मन नहीं लग रहा है। -क्यों मन क्यों नहीं लग रहा ? मैंने पूछा । जोसेफ बोला-डी'सा साहव तो देवता थे हुजूर, ऐसा साहब अब कहाँ मिलेगा?
चार प्रांखों का खेल --तो तुम्हीं क्यों वेकार को झगड़ा करने गये ? सोच-समझकर नहीं चला गया तुमसे ? नहीं हुजूर, बस के बाहर की बात थीं। रह सकता होता तो रहता ही। जोसेफ ने जवाब दिया । -क्यों ऐसी क्या वात थी, जो रह नहीं सके ? -कैसे रहता बाबू ? कोई भी उस घर में काम नहीं कर सकेगा। वह जो याकूब काम कर रहा है न, वह भी कह रहा था कि उसके लिये काम करना मुश्किल हो रहा है. -क्यों ? दिक्कत क्या है तुम लोगों को ? मेम साहब तो भली- मानस हैं। मेरी बात सुनकर हँस दिया जोसेफ । वोला-नहीं हुजूर, बाहर रहकर आप कैसे जान सकते हैं, हम दिन रात अन्दर रहते हैं, सब कुछ देखते-सुनते हैं। वह मेम साहब बड़ी सराव औरत है वाबू! -~-खराव ? चकित होकर मैंने पूछा-ऐसा कैसे कह रहे हो। इसके बाद घोमे स्वर में जो कुछ उसने बताया सुनकर मैं चौंक उठा। पूछा-सच? । जोसेफ वोला-सच नहीं तो क्या झूठ कह रहा हूँ मैं ? मेरी बात पर विश्वास नहीं होता तो याकूब से पूछ लीजियेगा । और इसके अलावा मैंने अपनी आंखों से देखा है हुजूर । अपनी खुद की आँखों पर कैसे अविश्वास कर सकता हूँ। मैंने कहा-लेकिन फ्रेडी तो मेम साहब के लड़के की उम्न का है ? --उससे क्या हुआ हुजूर, मेम साहव को वुद्धि जो भ्रष्ट हो गई है ! नहीं तो जिसके इतने बड़े-बड़े वच्चे हों वह कभी किसी और के साथ एक कमरे में सो सकती है ? एक विस्तर पर ? और वह भी दिन के समय ? हमारी सबकी नज़रों के सामने ? मैं और अधिक जोसेफ के सामने खड़ा नहीं रह सका । खड़े रहने की इच्छा भी नहीं हुई । चल हो पड़ा था कि जोसेफ ने पीछे से आवाज दो। ...... बोला-बाबू एक बात" कहकर सामने आ गया और बोला-आप यह सव वातें किसी से चार प्रांखों का खेल १६ कहियेगा मत । नहीं तो फर्नान्डिस साहब के यहां की नौकरी भी चली जायेगी मेरी । सोचेंगे मैं मालिकों के घर की अफवाहें फैलाता हूँ। कुछ रुक कर फिर वोला- और मैं न भी उड़ाऊँ तो क्या ? बात छुपेगी तो है नहीं। आप खुद देख लीजियेगा। इतना कहकर जोसेफ चला गया। किंकर्तव्य-विमूढ़ होकर कुछ देर में वहीं खड़ा रहा। मन में आया एंग्लो-इंडियन समाज में शायद सब कुछ सम्भव है ! कौन जाने ! लेकिन उस दिन से ही मेरे मन में सन्देह बैठ गया । सन्देह यों ही एक ऐसा सर्प होता है जिसका फन हो या न हो, नजर पड़ते ही सारे शरीर में सिहरन दौड जाती है। जब तक सामने रहता है तब तक किसी भी तरह मन से अलग नहीं किया जा सकता। इसीलिये उस दिन से मिसेज़ डो'सा और फ्रेडी को जैसे दूसरी ही नजर से देखने लगा मैं। उसके बाद से हर बात में जैसे एक अन्य अर्थ खोजने का प्रयत्न करने लगा । फेडो को सुख-सुविधा पर मेम साहब की उतनी तीक्ष्ण दृष्टि का भी एक नया ही अर्थ मेरी नजरों के समक्ष उभर आया। देखता पहले की ही तरह बच्चों को लेकर रविवार के दिन मेम साहव पार्क जाती। साय में फ्रेडी भी होता। रास्ते में जो भी मिलता पहले की तरह उसे गुड मानिंग कहती। लेकिन फ्रेडी का हाय इस तरह क्यों पकड़ रखा है उन्होंने ? एक- दम साथ सटकर क्यों चल रही हैं ? इतना सटकर चलना क्या उचित है ? पर फिर अपने ही मन में मन्देह होने लगता । यह मैं क्या सोच रहा हूँ? तो क्या मैं जोसेफ बात पर पूर्ण विश्वास कर बैठा हूँ? मेम साहब तो उसकी मां की उम्र की हैं ! अगर फ्रेडी को अधिक प्यार करती भी हैं तो इसमें बुराई क्या है ? फेडी को अपनी मां का प्यार तो मिला नहीं ! और दिनों की तरह उस दिन भी बगीचे में बैठे चाय पी रहे थे सब। मुझे देखकर मेम साहब बोली-आओ न राइटर -आओ- अस्वीकार नहीं करूंगा, मेरे खुद के मन में एक जिज्ञासा, एक उत्सुकता थी।
२० चार प्रांखों का खेल बैठकर अच्छी तरह देखा फ्रेडी एकदम सट कर बैठा था मिसेज़ डी'सा के पास । बोलीं-आजकल फ्रेडी की मानिंग ड्यूटी है इसलिये थोड़ा वक्त मिला है आज । मैंने बात पलटी-उस दिन जोसेफ बड़ा झगड़ा कर रहा था आपके साथ, फिर आया था क्या? अचानक जैसे याद आ गया उन्हें । वोलीं-देखा तुमने राइटर, उस दिन कैसे धमकी देकर गया मुझे? हिम्मत देखी उसकी ? इसीलिये तो कहते हैं कि छोटे लोगों को मुंह नहीं लगाना चाहिये। -लेकिन किया क्या था उसने ? मैंने पूछा । ----फेडी से पूछो; इसे सव मालूम है-उन्होंने जवाब दिया । फेडी की ओर देखा मैंने । पूछा-क्या हुआ था ? -मैं तो सो रहा था, देखा नहीं ठीक से-आंटी ने देखा है-उसने जवाब दिया। आंटी माने मिसेज़ डी'सा। मेम साहव बोलीं-तुम तो जानते हो राइटर कि फ्रेडी नाइट ड्यूटी दोपहर को वह सो रहा था, मैं भी लेटी हुई थी। "चानक देखा कि जोसेफ कमरे में झाँक रहा था। विश्वास नहीं हुआ मुझे । पूछा-क्या कह रही हैं ? झांक रहा था? पिके कमरे में? हां, और क्या कह रही हूँ ? ऐसे इम्पटिनेन्ट सर्वेन्ट को घर कैसे रक्खा जा सकता है, तुम्हीं वताओ राइटर ? सुना है आजकल ली फर्नान्डिस के यहां काम कर रहा है- पर देख लेना वहाँ भी नहीं करने जाता है। केगा। अचानक फ्रेडी की ओर नजर गई उनकी। बोलीं-क्या हुआ फ्रेडी, क कप कॉफी और दूं ? -नहीं-फ्रेडी ने जवाब दिया। मेम साहव बार-बार जोर देकर कहने लगी-पी लो न, गरम देती । एकदम फैश। फेडी वोला-नहीं।
NAGAR JAIPUR-302004 चार मांखों का खेल २१ - फिर मेरी ओर देखकर मेम साहब बोलीं-यही सबसे बड़ी खराबी है फ्रेडो में। आजकल कुछ खाता-पीता ही नहीं। अच्छा तुम्हीं बताओ राइटर, फ्रेडी को हेल्प पहले से खराब नहीं हो गई है न ? फ्रेडी का स्वास्थ्य पहले से खराब हो गया है कि नहीं यह देखने के लिये मैंने उसको ओर नजर घुमाई। पर मुझे लगा कि फ्रेडी का स्वास्थ्य पहले से खराव नहीं बल्कि अच्छा हो गया था। जब आया-आया था तव तो बहुत ही दुबला था। -मैं उससे जो साने को कहती हूँ खाता ही नहीं । अब अगर उसकी मां आकर देखेगी तो मुझे ही तो दोप देगी। सोचेगी कि मैं फ्रेडी को खाने के लिये कुछ देती ही नहीं। चार्ली और रेनी दोनो अगल-बगल बिल्कुल चुप बैठे थे। हम लोग जैसे उनकी उपस्थिति विल्कुल ही भूल गये थे। कोई भी उनसे बात नहीं कर रहा था यह देखकर सकुचा गये थे दोनों। उनसे बात करके दोनों को खुश करना चाहा मैंने । जाने कैसे तो हो गये थे दोनों। पिता के जीवित रहते जो बात थी वह जैसे अव थी ही नहीं। -तुम्हारी स्टडीज़ कैसी चल रही है रेनी ? मैंने पूछा। सिर झुकाये रेनो ने जवाब दिया-डूइंग वेल अंकल- चार्ली के साथ भी वात करके उन्हें अपने वीच लाने की कोशिश करने लगा मैं । बड़े ही अच्छे बच्चे थे दोनो। मां के मुंह पर जवाब देने की हिम्मत नहीं थी दोनों में से किसी में । लेकिन मां को प्यार भी बहुत करते थे। हर काम मां से पूछ कर करते थे। वातों के बीच में अचानक फ्रेडो उठ गया। बोला--मेरा सिर बड़ा दर्द कर रहा है, मैं उठता हूँ आन्टी। -सिर दर्द कर रहा है ? अचानक एकदम से उद्विग्न हो उठी मेम साहब । बिना और कुछ कहे फ्रेडी घर के अन्दर चला गया। मेम साहब भी साथ ही साथ उठ गई और फ्रेडी के पीछे-पीछे चली गई अन्दर । बगीचे में मैं चार्ली और रेनी वैठे रह गये ! -~अचानक फेडो को सिर दर्द क्यों होने लगा-मैंने चार्ली से पूछा। -आजकल प्रायः फ्रेडी को सिर दर्द होने लगता है । नाइट ड्यूटी करता है न चाली ने जवाब दिया।
२२ चार पांखों का खेल M wwe ma- रेनी बोली-इसीलिये तो मम्मी फ्रेडी के कमरे में सोती हैं, उसके सिर में यू डो कोलन लगा देती हैं । -तुम्हारा वावर्ची याकूब कैसा खाना बनाता है ? -नाट वैड, लेकिन जोसेफ जैसा नहीं बनाता अंकल । जोसेफ की वनाई डिशेज़ बहुत अच्छी लगती थी हमें । तो फिर तुम्हारी मम्मी ने जोसेफ को निकाल क्यों दिया ? -जोसेफ मम्मी के कमरे में ताक-झाँक करता था न -रेनी ने जवाब दिया। -क्यों ताक झाँक क्यों करता था ? --चोरी करने का इरादा था उसका । चोर था वह-रेनी ने फिर जवाब दिया। -लेकिन इससे पहले भी कभी चोरी की थी उसने ? -नहीं, मम्मी कह रही थीं कि डैडी के मरने के बाद से ही उसे चोरी का लालच पड़ गया था। मालूम है अंकल, फ्रेडी हमारे घर नहीं रहना चाहता अव । वह चला जायेगा ! -वह क्यों ? आश्चर्य चकित होकर मैंने पूछा । चार्ली बोला-लोको शेड से यह मकान दूर बहुत पड़ता है न; इसलिये। -पर अगर घर को ही वात है तो तुम लोग यह मकान बदल भी सकते हो। -पर मम्मी रेलवे क्वार्टर में नहीं जायेंगी। हमारे डैडी रेलवे क्वार्टर में नहीं रहना चाहते थे। -लेकिन फ्रेडी को अगर रेलवे क्वार्टर मिला, तो क्या करोगे ? रेनी बोली-ऑफिस से तो फेडी को रेलवे क्वार्टर मिल ही रहा है। पर मम्मी मना कर रही हैं. उनका कहना है कि वहां जाने पर फेडी की देखभाल कौन करेगा? उसकी हेल्थ पहले ही अच्छी नहीं है- मन उखड़-सा गया था सो और बैठा नहीं गया। उठ गया मैं। चार्ली और रेनी सूखा-सा मुंह लिये बैठे रहे वहीं। ।
सिाका सल २३ उस दिन अचानक फर्नान्डिस साहब आये मेम साहब से मिलने । चक्रधरपुर के कन्ट्रोल ऑफिस में डिप्टी कन्ट्रोलर हैं फर्नान्डिस । वाजार की तरफ जा रहे ये साइकिल पर सो रास्ते में उतर गये। दरवाजे पर आवाज लगाई-हैलो आंटी-आर यू इन ? भागी-भागी वाहर आई मेम साहव । -~क्या हाल है, जूली-- ----इघर से गुजर रहा था, तुम्हारा ख्याल आ गया आंटी । सोचा आंटी से मिलता चलूं। बड़ा आदर-सत्कार किया मेम साहब ने । बोली-बैठो-बैठो जूली, हैव सम कोल्ड ड्रिंक्स- फर्नान्डिस शायद जल्दी में था। बोला--नही, नही आंटी, मैं तो शॉपिंग के लिये निकला था। -तो फिर जरा-सी जिन या रम हूँ। पर फर्नान्डिस कुछ भी लेने को तैयार नहीं हुमा । फ्रेडी कहां है ? -उसने पूछा। । -वह तो ड्यूटी पर गया है । जानते हो जूली, आजकल फ्रेडी की हेल्थ ठीक नहीं चल रही काफी दिन से । -सुना है उसे क्वार्टर मिल रहा है ? -हाँ मिल तो रहा है, पर मैं उसे क्वार्टर में जाने नहीं दे रही। वहाँ उसकी देखभाल कौन करेगा जूली ? उसे देखनेवाला है ही कौन ? वो जोसेफ तुम्हारे यहां काम कर रहा है न ? -~-हाँ काम अच्छा कर रहा है आंटी, आ'एम सैटिस्फाइड- -~चोरी-वोरी तो नहीं करता? -~-कहां, अभी तो ऐसी बात पता चली नहीं। --लेकिन सावधान रहना जूली। मेरी बात तो सुनी नहीं तुमने, रख लिया उसे । कभी अगर कुछ खो जाये तो मुझे दोष मत देना।. फिर जरा रुक कर बोली-मेरे बारे में कुछ कह रहा था क्या वह ? -ना, उसने तो कुछ भी नहीं कहा। हां, जॉनी के बारे में बहुत बात करता है। उसकी अभी भी बहुत रेस्पैक्ट करता है-कहता है ऐसा मास्टर और नहीं मिलेगा। -~-वह तो कहेगा ही। जॉनी ने हो तो उसे इतना सिर चढ़ा लिया - २४ चार आंखों का खेल था ! तुम उसे निकाल दो जूली, इस तरह का बावर्ची रखने से एक दिन मुश्किल में पड़ जाओगे तुम, तब याद आयेगी आंटी की बात । फर्नान्डिस ही नहीं, जितने भी मिलने वाले आते हर एक के सामने स्वयं को निर्दोष सावित करने का प्रयत्ल करती थीं मेम साहब । कहतीं-मैं तो साफ बात कहने की आदी हूँ। भई नौकर हो, नौकर की तरह रहो । हम तेरे मालिक हैं या तू हमारा मालिक ? फिर सबसे पूछती-अच्छा तुम लोग ही बताओ, जब मैंने जोसेफ को डिस्चार्ज कर दिया था तो जूली को उसे रखना चाहिये था ? यह तो एक तरह मेरी इन्सल्ट करना हुआ। सिर हिला देते सब मिसेज़ डी'सा की बात पर । सिगरेट का कश लेते हुए कहते-वाइट राइट । ठीक बात है ! वेड रूम में ताक-झांक करना ! क्राइम है यह तो! लेकिन जोसेफ को रखने के कारण कोई जूली को बुरा भी नहीं कहता था। उस दिन फिर उघर के घर से जोर-जोर से बोलने की आवाजें आने लगीं। सोचा आज फिर शायद किसी नौकर के साथ खटपट हो गई है। फिर किसी को निकाल रही होंगी। किसी के जोर से चिल्लाने की आवाज आई कान में। कान लगाकर सुनने की कोशिश की पर कुछ समझ में नहीं आया। अचानक फ्रेडी की आवाज सुनाई दी। वह कह रहा है-अब मैं यहाँ नहीं रहूंगा। जा रहा हूँ मैं । आम तौर पर फ्रेडी प्रतिवाद नहीं करता। कभी ऊँचा बोलते भी नहीं सुना उसे । वह इस तरह क्यों चिल्ला रहा है ? देखा फ्रेडी कमरे से बाहर निकल आया और मेम साहब उसका हाथ पकड़ कर खींच रही हैं। कह रही हैं-नहीं फेडी, प्लीज, मत जालो-प्लीज!
चार मांखों का खेल २५ फेडी बोला- नही, किसी तरह नहीं रहूँगा, मुझे नहीं अच्छा लगता यहां रहना। -नहीं प्लीज़-नही-प्लीज़ फेडी! अजीब दृश्य था। घर के सारे नौकर-चाकर मुंह बाये देख रहे थे। सबके सामने मेम साहब इस तरह नाटक करेंगी, मेरी कल्पना से परे था । अंत में फ्रेडी और अधिक प्रतिवाद नहीं कर सका। शायद आंटी का मुंह देखकर दया आ गई । घोरे-धीरे घर के अन्दर चला गया। अब तक मैं छिपकर सब देख रहा था। उन लोगो के अन्दर जाते हो मैंने कान लगाये सुनने के लिये। रोने की आवाज सुनाई दी । लगा जैसे फूट-फूट कर रो रही हैं मेम साहब। शायद फ्रेडी को दोनों बाँहों में जकडे हुए थीं। मुझे और आश्चर्य हुआ। यह तो स्वाभाविक नहीं है, सहज भी नहीं है । यह तो अपवाद है। उस दिन इससे अधिक नहीं जान सका कुछ । घर छोड़कर फेडी का जाना भी नहीं हुआ उस रोज । उसके बाद एक दिन एक बात ने मुझे गहरे सोच में डाल दिया। वात ही कुछ ऐसी थी। रेलवे इन्स्टिट्यूट में एक पार्टी थी उस दिन । दिसम्बर के महीने में बड़े दिन के समय हर साल इस तरह का उत्सव होता है। चक्रधरपुर में हमेशा से ऐंग्लो-इंडियन्स की बहुलता रही है। नागपुर पैसेंजर पर जो लोग कभी चढ़े हैं वह जानते हैं कि ट्रेन के प्लेटफार्म पर पहुंचते ही कितने ऐंग्लो-इंडियन लड़के-लड़कियों की भीड़ दिखाई देती है। ट्रेन के पैसेंजरों को देखने आते हैं वह लोग । जव तक ट्रेन प्लेटफार्म पर खड़ी रहती है साइकिल पर इधर से उधर घूमते रहते हैं। ट्रेन चले जाने पर वापस कॉलोनी में लौट जाते हैं। पीछे कैरियर पर लड़की को बैठाये घूमना उनकी प्रतिदिन की दिनचर्या है।
२६ चार प्रांखों का खेल और तव तो ब्रिटिश राज था। ब्रिटिश व ऐंग्लो-इंडियन में कोई ज्यादा अंतर नहीं था । विशेषकर रेलवे की नौकरी में तो ऐसा नहीं ही था। इन्स्टिट्यूट की बगल से जा रहा था मैं । खिड़की से अन्दर का सब कुछ दिखाई देता था। नाच हो रहा था अन्दर । पचासों जोड़े नाचते हुए हॉल में घूम रहे थे। ऐसा लगा जैसे फ्रेडी भी है उनमें । जाने क्यों विश्वास करने का मन नहीं हुआ । फ्रेडो तो नाचने वाला लड़का नहीं है, खासकर लड़कियों के साथ। पहचान पाता हूँ या नहीं यह सोचकर लड़की के मुंह की ओर देखा - मैंने। बड़ा भोला-भाला सौम्य चेहरा लगा लड़की का। दोनों एक दूसरे की आंखों में आँखें डाले हाथ में हाथ पकड़े एकाग्र मन नाच रहे थे। यथा रीति हम लोगों का इस तरह देखना अच्छा नहीं समझा जाता था। इनकी नजरों में हम अन्त्यज थे। उस जमाने में अन्ततः ऐंग्लो इंडियन समाज में हम लोग हेय दृष्टि से ही देखे जाते थे। जल्दी से वहाँ से खिसकने की सोच ही रहा था कि पैर जहाँ के तहाँ रुक गये। देखा मिसेज़ डी'सा जल्दी-जल्दी पांव बढ़ाती अन्दर घुस रही थीं। किसी भी तरह नहीं हट सका वहाँ से । पाँव जैसे चिपक गये थे जमीन से। मेम साहब सीधे फ्रेडो के पास पहुंची और उसे पकड़ कर बोलीं- फ्रेडी, माइ ब्वाय, फेडी- नाच में वाधा पड़ने पर फ्रेडी ने पीछे मुड़कर देखा और मिसेज़ डोसा को देखकर नाचना बंद कर दिया। बोला-आंटी, तुम? जाने कैसे तो एक आतंक से मन सिहर उठा मेरा। फिर झगड़ा बढ़ेगा क्या? झगड़ना भी तो मनुष्य की अन्यतम वृत्ति है। विशेषकर औरतों की। मिसेज़ डी'सा को देखकर लगा जैसे आदिम क्षुधा की प्रतिमूर्ति थीं वह । पति की मृत्यु के बाद उनका बाहरी मुखौटा जैसे क्षण भर में उतर गया था और आदिम क्षुधा ने अपना स्थान ले लिया था। लेकिन सचमुच, जो सोचा था वही हुआ। ठीक से सुनाई नहीं दे रहा था उनकी वातें म्यूजिक की आवाज में दबी जा रही थीं।
चारपाखा की खल २७ तब भी कान लगा कर जितना सुना जा सके सुनने का प्रयल करने लगा। मेरे अगल-बगल और भी कई लोग तमाशा देखने को आकर खड़े हो गये थे। -आंटी, तुम यहां से जाओ प्लीज ! पर मेम साहब भला कैसे छोड़ देती। वोली-नही, तुम्हारो हेल्थ खराब है फेडो, तुम घर चलो, आराम करो चलकर । फडी बोला, मैं वाद को घर आऊँगा, आंटो । अभी डांस चल रहा है, तुम जाओ यहां से प्लीज ! -नही फेडो, तुम्हारी हेल्य वीक है, अभी तो तुम बुखार से उठे हो । घर चलो। तुमने तो कहा था ज्यादा देर नहीं रुकोगे, बस मिल- कर घर चले आओगे? -~~-मैं तो घर ही आ रहा था, आंटी। लेकिन नैन्सी के कहने से थोड़ा नाचने लगा। -~-नहीं, नही फेडो, जिस-विस के साथ नाचना उचित नहीं है। तुम्हारा एक पोजीशन भी है, इसे क्यों भूलते हो ! -नैन्सी के बारे में इस तरह की बात मत कहो । आंटी वह मेरी ~होने दो फंड, उसका फादर रेलवे में किस पद पर है जानते हो? -~-तुम शायद पहचानती नही उसे आंटी ? उसका फादर तो यार्ड फोरमैन है। वह क्या बैठे हैं मिस्टर बुकानन, उन्हें नहीं पहचानती तुम? --नही, और पहचानने की जरूरत भी नहीं है मुझे 1 नॉन गजेटेड रैक के लोगों के साथ मिलना-जुलना में नहीं वाहती। तुम यहाँ से चले चलो फ्रेडी-अभी! मिस्टर फर्नान्डिस दूसरी तरफ जाने क्या कर रहे थे । गोलमाल सुन कर इधर आये तो अवाक रह गये । -~-यह क्या, आटी तुम ? जैसे डूबते को किनारा मिला ! तुम्हीं देखो न जूली! फेडो का कांड । अभी-अभी बुतार से उठा है और यहां आकर नाच रहा है । तुम समझाओ न इसे ! कहीं मेरे साथ घर चला जाये, ही इज वीक- २८ चार अाँखों का खेल जूली बोला-थोड़ा नाच भी लेने दो आंटी आज तो क्रिसमस है, इसलिये वह आया है। रोज-रोज तो आता भी नहीं। तुम कुछ मत कहो उससे- लेकिन जब फ्रेडी बीमार पड़ेगा तो भुगतना तो मुझे ही पड़ेगा जूली। उस समय तुममें से तो कोई नहीं आयेगा सेवा करने । इसकी माँ है जब वह आकर मुझसे कहेगी कि तूने उसे ठीक से देखा क्यों नहीं, खाने को क्यों नहीं दिया, तब मैं भला क्या जवाब दूंगी उसे ? मेरी भी तो जिम्मेदारी है कुछ--- जाने कैसा तो एक हाहाकार सा सुनाई दे रहा था इनके स्वर में। आदिम विनती। मुझे लगा जैसे घटना चक्र में मेम साहब एक बच्ची बन गई हैं। बच्चे भी शायद इस तरह की गलत जिद करने में शर्म महसूस करते हों । लेकिन मिसेज़ डी'सा को वह भी भूल गई थी। जूली की समझ में नहीं आया कि क्या कहे । असहाय दृष्टि से फ्रेडी की ओर देखा उसने । फ्रेडी की समझ में भी नहीं आ रहा था कि क्या करे। नैन्सी की ओर देखकर बोला-जाऊँ मैं ? आंटो लेने आई हैं मुझे जाऊँ नैन्सी ? वड़ा ही करुण हो उठा नैन्सी का चेहरा । फ्रेडी से और भी चिपक कर खड़ी हो गई वह । बोली-नो, आज तो तुमने मेरे घर चलने को कहा था? - पड़ता है- यह सुनते ही जैसे मेम साहब का पारा चढ़ गया। नैन्सी के सामने जाकर चीख कर बोलीं-तुम लोग मेरे फ्रेडी को इस तरह बहका क्यों रहे हो भला ? जानती नहीं हो फ्रेडी की मां नहीं है ? मुझे ही उसका भला-बुरा देखना तमक कर नैन्सी ने कहा-आपके साथ कौन बात कर रहा है जी? मैंने आप से कुछ कहा है क्या जो मुझे कहने आई हैं ? आप होती कोन हैं मुझे कुछ कहने वाली? गरज कर मेम साहव बोलीं-ओह, तुम्हारी यह हिम्मत ? मुझसे मुंहजोरी ? सुनूं तो जरा तुम्हीं कौन-सी अफलातून की बेटी हो । स्टेटस ही क्या है तुम्हारा जो फ्रेडी पर डोरे डाल रही हो? फ्रेडी से रहा न गया बीच में आकर बोला-आंटी तुम चुप रहो, तुम उससे कुछ मत कहो-प्लीज़ ! शी इज माई फ्रेंड!
चार मांखों का खेल २६ -क्यों नहीं कहूं कुछ ? जब मैं तुमसे बात कर रही थी तो वह क्यों बीच में बोली ? हू इज़ शी? फर्नान्डिस ने देखा कि यह तो वेकार का झगड़ा खड़ा हो गया समझाते हुए बोला-आंटी, तुम चोखो चिल्लामो मत । उनके बीच में क्यों पड़ने आई तुम ? वह लोग यंग हैं, यही तो उनकी उम्न है एन्ज्याय करने की, तुम घर जाओ फ्रेडी आ जायेगा बाद को- क्यों, वाद को क्यो आयेगा? मैं उसकी कोई नही लगती क्या, जाने कहाँ के ऐरे-गैरे आकर उसे बहकाने लगें और मैं कुछ न बोलूं मुझ से ज्यादा वह हो गई आज फेडो के लिये ? होते-होते बात इतनी बढ़ गई कि नाच बन्द करके सब उघर ही देखने लगे । उधर से मिस्टर बुकानन भी आ पहुंचे। बोले-व्हाट इज़ अप नैन्सी ? -वह शायद आपकी लड़की है ? आप तो यार्ड फोरमैन हैं न! बचपन में यार्ड ब्वाय बनकर नौकरी में आये थे मिस्टर बुकानन ऐंग्लो इंडियन होने के कारण जल्दी-जल्दी तरक्की पाकर यार्ड फोरमैन बन गये थे। लेकिन बहुत से लोग ऐसे थे जिनके सामने उनको इज्जत बढ़ी नहीं थी। बच्चे बड़े हो गये थे इसलिये समाज में मिलने-जुलने का सुयोग मिल गया था । जीवन भर शिफ्ट ड्यटी करते रहे और शराब पीते रहे । जमा-पूंजी भी इकट्ठा नहीं हुई कुछ । रेलवे प्राविडेन्ट फन्ड के रुपये हाथ में आने के बहुत पहले लिवर सड़ने से मर जायेंगे । और तव सब मिलकर कत्र में उतार आयेंगे। लड़की के साथ किसी की वात होते देखकर उधर चले आये थे। मिसेज़ डो'सा की बात सुनकर हक्के-बक्के रह गये क्षण भर को। फिर संभल कर बोले-हां, मैं यार्ड फोरमैन बुकानन हूँ, मिस्टन डी'सा की मेरे साथ अच्छी जान पहचान थी। इस बात का कोई उत्तर न देकर मेम साहब बोलीं-आपकी लड़की इतनी बड़ी हो गई पर अभी तक उसे किसी लेडी के साथ बात करना नहीं आया? जरा भी मैनर्स नहीं सीखे इसने । -नैन्सी? नैन्सी ने क्या किया है ? -नैन्सी ने क्या किया है यह नेन्सी से ही पूछिये । बूढ़ा बाप बेटी की ओर घूम कर बोला-क्या हुमा नैन्सी? नैन्सी ने कहा-होता क्या? कुछ भी नहीं हुआ- .
चार प्रांखों का खेल -कुछ नहीं हुआ मतलव ? फिर से गुस्सा आ गया मेम साहब को। बोलीं-तुम फ्रेडी को । घर छोड़कर क्वार्टर में रहने के लिये नहीं भड़का रही हो ? नहीं मैंने किसी का क्या विगाड़ा है जो वह मेरा घर छोड़कर क्वार्टर में ना चाह रहा है । सोचा होगा क्वार्टर में चले जाने से फ्रेडी का सर जाने के लिये सुविधा मिल जायेगी, क्यों ? फ्रेडी ने बीच में टोका । बोला-नहीं आंटी, नैन्सी ने तो यह कभी नहीं कहा। डी० एल० एस० ने स्वयं मुझसे क्वार्टर में जाने के लिये कहा है । लोको शेड से पास रहेगा इसलिये ! -चुप रहो तुम । धमकाया मेम साहब ने । -तुम बीच में म बोलों। मैं जैसे कुछ समझती ही नहीं। डी० एल० एस० तुम्हारे .. ज्यादा मुझे जानते हैं । तुम्हारी यह नौकरी किसने लगवाई ? इस नैन्सी ने लगवाई या डी० एल० एस० से कहकर मैंने ? जूली बोला-आंटी, तुम वेकार की क्यों वात बढ़ा रही हो, आज क्रिसमस है, आज छोड़ दो उसे, जो हो गया हो गया- -नहीं उसे नहीं छोडूगी । चलो फ्रेडी तुम्हें इन लोगों के हाथों में छोड़कर नहीं जाऊँगी मैं-कम से कम इस डायन के हाथ में तो कभी नहीं। इस पर फ्रेडी ने कहा-मैं नहीं जाऊँगा आंटी, तुम जाओ- लेकिन मेम साहब ने उसकी एक नहीं सुनी । मैंने देखा, हाथ पकड़ कर खींचने लगी वह फ्रेडी का। मुश्किल में पड़ गया वेचारा! नैन्सी की ओर जाये या आंटी की समझ नहीं पाया। हक्का-बक्का असहाय दृष्टि से सबकी ओर देखने लगा। अंत में मेम साहब उसे खींचते हुए वाहर ले आई। बाहर अन्वे था तव भी देखा कि फ्रेडी को समझाते-बुझाते ले चलीं मेम साहब साथ-साथ प्यार भी करती जा रही थीं। और उधर इन्स्टिट्यूट अन्दर से कुछ लड़के-लड़कियों के जोर-जोर से मजाक करने व सं वजाने की आवाजें भी आ रही थीं। लेकिन मेम साहव का ध्यान नहीं था उस ओर । कितनी जल्दी फ्रेडी को लेकर घर पहुंच जायें की चिंता थी उन्हें । - ।
चार प्रांखोंका सेल आज इतने दिन बाद जव उन पुरानी बातों को सोचता हूँ तो अपने स्वयं के मन में सन्देह होता है, यह सोचकर कि उस दिन सचमुच फेडी की ओर मेम साहब का इतना आकर्षण क्यों था ! जोसेफ का कहना ही सच था क्या। या चाईबासा को कोर्ट में गवाह के कटघरे में खड़े होकर मेम साहब ने जो कुछ कहा था, वही सच था ! दरअसल मैंने अपनी आंख से तो कुछ देखा नहीं था। कोई देखता भी नहीं यह सब और देखने को मिलता भी नहीं यह किसी को। और फिर चक्रधरपुर के ऐंग्लो इंडियन समाज में व्यक्तिगत सम्पकों को यह विकृति भी कोई नई बात नहीं है। आम बात थी यह एक दूसरे से जुड़े हुए क्वार्टर साथ-साथ रहना और उस पर निर्मर्याद चाल-चलन । ऐसे में स्खलन-पतन होना तो लाजिमी है । इन सब बातों को लेकर अधिक से अधिक थोड़ा हंसी-मजाक होता; उससे अधिक कुछ नहीं। लेकिन ऐग्लो इंडियन समाज को दोप देने से ही क्या ! चार आंखों का यह खेल दूसरे समाजों में ही कौन-सा कम है ? प्रति-दिन समाचार पत्रों में जो खबरें निकलती हैं वह तो सभी समाजों की होती हैं । परन्तु यह मामला बढ़ते-बढ़ते कोर्ट तक पहुँच जायेगा यह किसने सोचा था ? चक्रधरपुर का एंग्लो-इंडियन समाज ही नहीं वरन हर व्यक्ति इस मामले को लेकर जैसे पागल हो उठा था उन दिनों। मेरा घर बगल में होने के कारण हर कोई आ जाता था मेरे पास । पूछता-हाँ महाशय, जो सुना है, सच है क्या ? मेरे लिये सारी बातें प्रकट रूप में, कहना भी सम्भव नहीं था ! जितना कुछ जानता था, वही नहीं कह पाता था। भदभाव रखते हुए मेम साहब की जितनी इज्जत बचा पाता वचा कर बोलता था। उससे अधिक नहीं। तारक बाबू रिटायर्ड हेड क्लर्क थे। काफी दिन हो गये थे। रिटा- पर हुए। काम-काज कुछ था नहीं। लड़का नौकरी से लग गया था। रांची रोड की तरफ उनका आना-जाना खत्म हो गया था। उस दिन उन्हें अपने घर देखकर हैरान रह गया। लाठो टेकते-टेकते सीधे अन्दर चले आये। वोले-तरह-तरह की बातें सुनाई दे रही हैं वैटा । सोचा तुम तो पड़ोस में रहते हो तुम्हें तो जरूर मालूम होगा सब कुछ । कुछ बताओ ३२ चार पाँखों का खेल मैंने जवाब दिया-जो कुछ जानता हूँ सब तो बता दिया आपको। इससे ज्यादा तो सुनी हुई बातें हैं और मेरी भी-आपकी भी। -सुना है बुकानन साहब की लड़की जहर खाने लगी थी ? -अच्छा ? मैंने तो ऐसा कुछ नहीं सुना, आपके ही मुंह से आज पहली बार सुन रहा हूँ। रेलवे क्वार्टर यहाँ से बहुत दूर पड़ते हैं न ! इसलिये वहां की खबरें मुझसे ज्यादा आप लोगों को मिल जाती हैं। -तो तुम कहना चाहते हो कि विष खाने की बात तुमने नहीं सुनी ? कुछ भी नहीं सुना? केवल विष खाने की नहीं और भी बहुत-सी खबरें उड़कर कानों में पहुंचने लगी थीं। रामलिंगम बाबू आकर बोले तुम तो शुरू से ही हो यहाँ । बल्कि उससे भी पहले डी'सा साहब के जमाने से हों। हसबैंड-वाइफ में कैसा रिलेशन था? -बहुत अच्छा~मैंने जवाब दिया। -अच्छा बताओ तो अचानक ऐसा कैसे हो गया ? पहले तो औरत का स्वभाव-चरित्र ऐसा खराब नहीं था। मैं भी तो बहुत दिनों से उसे देखता आ रहा हूँ। किसी जमाने में बड़ी सुन्दर थी, भले ही अव बुढ़ा गई हो। क्या जवाब दूं उन सब बातों का मेरी समझ में नहीं आया । मिसेज़ डो'सा न तो तारक बाबू की कोई लगती थी और न ही रामलिंगम की, मित्र थीं, तव भी उनके मामले में तारक बाबू या रामलिंगम को क्यों इतनी दिलचस्पी थी समझ नहीं पाता मैं असल में जिस दिन फ्रेडो घर छोड़कर जबर्दस्ती क्वार्टर में चला गया उसी दिन से गोलमाल शुरू हुआ। वह भी एक विस्फोट ही था जिससे सारा घर जैसे हिल गया था। घर के सामने एक गाड़ी खड़ी थी, जिसमें बूढ़ा यार्ड फोरमैन दुकानन साहब और उनकी लड़की नैन्सी वैठी थी। फेडी घर के अन्दर अपना सूटकेस लेने गया था। ठीक उसी समय मेम साहब ने देख लिया। ---फेडो, माई वाय, कहां जा रहे हो तुम ? कब आये ? लेकिन फ्रेडो बिना कोई उत्तर दिये जल्दी से बाहर निकल कर गाड़ी में बैठने चल पड़ा था। पहले तो मेम साहब की समझ में कुछ - चार आँखों का पेस नहीं आया। पर फ्रेडो के पीछे-पीछे बाहर आते ही गाड़ी दिखाई दे गयो उन्हें । फिर तो जैसा उनका माथा ही घूम गया । वे जोर-जोर से आवाज लगाने लगीं फेडो-फ्रेडी- मेम साहव तो दौड़कर सड़क पर ही पहुँच जाती मगर उससे पहले ही फ्रेडो गाडी में बैठ चुका था। मेम साहब के साथ-साथ चार्ली और रेनी भी अन्दर से निकल आये थे। और गाड़ी तब तक अपने पीछे धूल का गुब्बार छोड़ती रांची रोड पर काफी दूर चली गई थी। इस हद तक कल्पना नहीं की थी मेम साहब ने। यहां तक कि चार्ली व रेनो ने भी नहीं सोचा था कि फ्रेडी उनके साथ ऐसा व्यवहार करेगा। । दूसरे दिन मुझे देखते ही रो पड़ी थी मेम साहब । बोली थी-राइटर! मालूम है, फ्रेडो हमें छोड़कर चला गया। पति की मृत्यु पर भी शायद मेम साहब इतना नही रोई थी जितना उस दिन फेडी के घर छोड़कर चले जाने पर रोई थों। मैंने पूछा था-कहां चला गया झंडी ? --क्वार्टर में । कॉलोनी में क्वार्टर मिल गया है उसे-सुबकते हुए मेम साहब ने जवाब दिया था। मैंने कहा-पर क्वार्टर में क्यों गया ? तुम्हारे यहां क्या कोई तक- लीफ थी उसे ? - वह है न नैन्सी बिच, वही है सारी बातों को जड़ । और उसका बाप वह यार्ड फोरमैन । मुझे तो फूटी आंख नही सुहाता वह । और फिर तो जो मन आया कहती चली गई थी। फिर एक दिन वे सीधी जा पहुँची डी० एल० एस० साहब के पास । मिस्टर जेन्किन्स, तुमने फेडो को क्वार्टर क्यों दिया ? उसको क्या रहने की तकलीफ थी । क्यों तुमने मेरे साथ ऐसा किया ? डी० एल० एस० मिस्टर जेनिन्स किसी जमाने में लोको फोरमैन थे। चक्रधरपुर से अच्छी तरह वाकिफ थे। इसके अलावा इन्स्टिट्यूट में उस दिन जो हुआ था वह भी उनके कानों तक पहुँच चुका था । और सिर्फ उनके कानों में हो क्यों हरेक के कानों में चली गई थीं वे बातें। डी० एल० एस०, डी० टी० एस०, ए० टी० एस० सवने ठट्ठा किया था बात को लेकर । वात फ्रेडी को भी अच्छी नहीं लगी थी। क्रिसमस के अगले दिन हो वह भी डी० एल० एस० के यहां जा पहुंचा था । .
चार आँखों का खेल । -क्या बात है ? उस दिन मिसेज़ डी'सा तुम्हें इन्स्टिट्यूट से क्यों खींच ले गई थी? फ्रेडी ने जवाब दिया था-सर मेरी आंटी नहीं चाहती कि मैं नैन्सी से विवाह करूं- -तुम्हारे साथ मिसेज़ डो'सा के क्या रिलेशंस हैं ? --आपको तो सब मालूम ही है सर, एप्लीकेशन में ही मैंने सब कुछ लिख दिया है। मेरी आंटी हैं वह । -तुम लोग क्या एक ही कमरे में सोते हो? बात का जवाब देने में फ्रेडो को आँखें छलछला उठीं। बोला -सर, आप अगर मुझे क्वार्टर नहीं देंगे तो स्यूसाइड करने के अलावा मेरे पास और कोई चारा नहीं रहेगा। इसके बाद और कुछ नहीं कहा था मिस्टर जेन्किन्स ने । यो तो क्वार्टर मिलना आसान नहीं होता, लेकिन स्पेशल केश होने के कारण एक क्वार्टर खाली करा दिया था डी०एल०एस० ने । बात बिल्कुल गोप- नीय रही। किसी को पता नहीं चला। उसके बाद जिस दिन फ्रेडी चला गया तो लोगों को बातें करने को एक नया विषय मिल गया। मिस्टर जेन्किन्स को थोड़ा आश्चर्य हुआ मेम साहब की बात सुनकर। बोले - क्यों, मैंने तुम्हारे साथ क्या किया मिसेज़ डो'सा ? फ्रेडी वड़ा हो गया है, नौकरी करता है, और अब तो शादी की उम्र भी हो गई है उसकी। शादी करके तुम्हारे घर कैसे रहेगा ? कमरा कहाँ है तुम्हारे पास? -लेकिन फ्रेडी चाइल्ड है, अभी भी बच्चा है । अभी शादी करके क्या करेगा? -क्या उम्र है फ्रेडी को ? उम्र की बात टालते हुए मेम साहब बोलीं, पर उसके सारे काम अभी तक मुझे ही करने पड़ते हैं मिस्टर जेन्किन्स ! वह क्या पहनेगा, क्या खायेगा, कव ड्यूटी पर जायेगा, सब मुझे ही तो देखना पड़ता है। -~~-यह सव चिंता अवसे तुम्हें नहीं करनी पड़ेगी मिसेज डी'सा। अब से यह सब नैन्सी करेगी ! -ह्वाट ? वह यार्ड फोरमैन को जरा-सी छोकरी ? कह क्या रहे हो तुम? .
चार आँखों का पेल डो०एल०एस० बोले-नैन्सी अब छोटी नहीं रहो मिसेज़ डो'सा। कोई भी हमेशा छोटा नहीं रहता। एक दिन सब बड़े होते हैं। बाप, मो-दादी किसी के नहीं रहते हमेशा। संसार में किसी के बिना किसी को कोई असुविधा नहीं होती मिसेज डी'सा। अब तुम उसे छोड़ दो- --पर मैं उसके बिना रह जो नही सकती मिस्टर जेन्किन्स । -~उसके भले के लिये ही तुम्हें उसे छोड़ना होगा मिसेज़ हो'सा। छोड़ना ही पडेगा। ----वह चला गया तो मैं जिन्दा कैसे रहूँगी मिस्टर जेन्किन्स ? -क्यों तुम्हारे अपने भी तो वेटे-बेटी हैं। फिर वह भी तो एक दिन बड़े होगे । वह भी तो एक दिन तुम्हें छोड़कर चले जायेंगे। -वह जब जायेंगे तब जायेंगे। उनके जाने से मुझे इतना कष्ट नहीं होगा! -तो तुमने फिर से शादी क्यों नही कर ली ? --शादी? और सोफे पर बैठे-बैठे मुंह नीचा करके रोना शुरू कर दिया मिसेज़ डी'साने। बड़ी दया आई मिस्टर जेन्किन्स को उन्हें उस तरह रोते देखकर । आवाज दी-मिसेज़ डी'सा! मुंह उठाकर देखा मिसेज डी'सा ने लेकिन मुंह से कोई बात न निकल पाई। मिस्टर जेन्किन्स बोले-मिसेज़ डी'सा, तुम बहुत एजीटेटेड (शुन्ध, व्यथित) हो, थोड़ी ब्रांडी लोगी ? ब्रांडी लाने को कहूँ ? मिसेज़ डी'सा बोलीं-ब्रांडो पीने से भी मुझे कोई फायदा नहीं होगा मिस्टर जेन्किन्स ! आज कितने दिन हो गये पीते हुए ह्विस्की पोती है, मैं फेडो को भूलने की कोशिश में सब कुछ कर रही हूँ पर भूल नहीं पा रही- हाय रे ! संसार में कितनी तरह के मनुष्य हैं और न जाने उनका कितनी समस्याएं हैं जो सामने आती रहती हैं । खाने-पहनने रहने की ३६ चार आंखों का खेल समस्या हो क्या अकेली समस्या है । नून-तेल-लकड़ी के बाद लड़की की शादी, लड़के की पढ़ाई, इज्जत, अपमान एक के बाद एक ढेरों समस्याएँ जैसे द्रौपदी के चीर को भांति बढ़ती ही जाती हैं। लेकिन कभी-कभी उनके बीच एक ऐसी अद्भुत समस्या भी आ खड़ो होतो है जो कल्पना- तोत होती है । यह क्या है ? कैसी है ? मनुष्य जीवन का यह पहलू भी हैं, मानो आँख में उँगली डालकर नये सिरे से दिखा गई मिसेज़ डो'सा ! इतने पक्षों को लेकर मैंने कहानियाँ लिखी हैं, लेकिन यह पक्ष तो कभी देखा ही नहीं। और देखू भी तो लिखूगा कैसे ? यह सब क्या लिखने की बातें हैं। ऐसी बहुत-सी बातें होती हैं जो लिखो नहीं जाती, जिनको लेकर लिखना उचित भी नहीं होता। जिनको लेकर लिखना मनुष्य की रुचि के विरुद्ध है। इसीलिए इतने दिनों तक यह कहानी नहीं लिखी गई। एक तरह से भूल ही गया था मैं यह घटना । सोचा था जो छिपाने की बात है छिपी ही रहे । जड़ के जिस प्रकार धरती के अन्दर छुपे रहने से वृक्ष का सौन्दर्य बढ़ जाता है उसी प्रकार कटु सत्य के छुपे रहने से जीवन का सौन्दर्य भी बढ़ता है। पर उन सज्जन ने ऐसी बात कही क्यों ? क्यों पूछा कि हम लोग किताव देखकर कहानी लिखते हैं क्या ! हिन्दी में एक कहावत है-बात का दाम एक रुपया, चुप रहने का दो। रुपये से ही यदि चीज़ की कीमत आँकी जाती है तो मैंने इतने दिन तक चुप रह कर ही अधिक मुनाफा कमाया था । पर अब उन सज्जन ने ही मुझे बोलने को बाध्य कर दिया है। फ्रेडी को सुबह उठकर ब्रेकफास्ट खाकर लोकोशेड ड्यूटी पर जाते रोज ही देखता था। सबने देखा है। जिस जिसने भी इस मुकदमे में गवाही दी थी उन लोगों ने भी देखा था। सबने कहा था कि उन्होंने कभी फेडी को काम का नागा करते नहीं देखा था वकील ने पूछा था-इन्स्टिट्यूट में जाकर सब लोग बार में बैठ कर शराब पीते थे तब फ्रेडी को कभी नशे में होश-हवास खोते देखा था ? सभी ने कहा था-नहीं- -~-कभी रिवॉल्वर दिखाकर किसी को डराते देखा है ? नहीं। M चार आंखों का खेल सबने एक स्वर में यही कहा था कि उन्होंने कभी फ्रेडी को क्रोधित होते नहीं देखा, कभी ऊँचे स्वर में बोलते नहीं सुना । तो फिर वही फ्रेडो अपने हाथों उस दिन चार्ली का खून करने क्यों गया? पूरी घटना एक नाटकीय रूप में घट गई । मैं कुछ भी नहीं जानता था इस विषय में बावजूद इसके कि नैन्सी के साथ मेम साहब का मनमुटाव चल रहा था । मेम साहब जब विल्कुल मजबूर हो जाती, अकेली नहीं रह पाती तो फ्रेडो के क्वार्टर में चली जाती । सुबह, शाम, दोपहर जब भी मन छटपटाता, उसके घर की तरफ चल पड़ती। फ्रेडी को देखतो, उसके पास रहना चाहती। चक्रधरपुर के हर व्यक्ति ने यह देखा था । वह लोग सोचते थे देवर का लड़का है-अपने लड़के जैसा । उसका भला-बुरा सोचकर यदा-कदा मिलने चली आती है बेचारी। लौटकर मेरे पास आती कभी-कभी और दुःख प्रकट करते हुए कहती-जानते हो राइटर, फेडी को वहां बड़ी तकलीफ है । चकित होकर पूछता मैं-आप फिर वहां गई थी क्या ? उनका इस तरह वहाँ जाना किसी को भी अच्छा नहीं लगता था । चार्ली भी गुस्से में अक्सर कहता-क्यों जाती हो मम्मी तुम वहां ? नैन्सी इतना अपमान करती है तुम्हारा, फिर वहाँ क्यों जाती हो ? -~~-क्यों, बुराई क्या है जाने में ? वे पूछती। चार्ली बड़ा हो गया था। बातों को समझने लगा था। कॉलेज में पढ़ता था । अधिकतर पढ़ने-लिखने में हो लगा रहता । जिस दिन उसने मुना था कि इन्स्टिट्यूट में सबने मिलकर मां को अपमानित किया था और मां फ्रेडी को जबर्दस्ती घर ले आई थी, उस दिन भी उसे अच्छा नहीं लगा था। मां का अपमान जैसे उसका अपमान था, मां का दुःख उसका दुःख था। चार्ली ने कहा था-फ्रेडी अगर यहां रहना नहीं चाहता तो तुम जबर्दस्ती क्यों रखना चाहती हो उसे ? -लेकिन सोचो, नैन्सी क्या उसकी देख-भाल कर पायेगी। --नैन्सी देखभाल करे या न करे इससे हमें क्या मतलब ? ? .
३८ चार आँखों का खेल । मेम साहब ने कहा था-हम लोग नहीं देखेंगे तो कोन देखेगा ? हमारे अलावा उसका और है ही कौन ? उसके क्या माँ-बाप वैठे हैं ? मैं समझ गया था कि चार्ली माँ के व्यवहार से असन्तुष्ट है । रेनी भी बड़ी हो गई थी। उसे कसियांग के स्कूल में भेज दिया था मेम साहब ने । घर रह गये थे माँ और बेटा । और कोई नहीं। चार्लो कॉलेज चला जाता और मेम साहब का समय काटे नहीं कटता। सारा घर भाँय-भाय करता। रेलवे कॉलोनी में तब भी लोग दिखाई देते थे। आती जातो ट्रेन की सोटो, लोकोशेड की आवाजें-सब . मिलाकर एक कर्मव्यस्तता परिलक्षित होती थी वहाँ, लेकिन राँची रोड के इस निर्जन एकान्त में कौए बोलते थे बस । ऐसे में जब नहीं रह पाती तो फेडो के क्वार्टर में चली जाती। जब लौटती तो देखता मुंह सूखा हुआ होता । कहती-मालूम है राइटर आज उस तरफ गई थी- --किस तरफ ? प्रॉविजन खरीदने । लौटते हुए फ्रेडी के क्वार्टर में भी गई थी। देखा बड़ी तकलीफ में है। नैन्सी अच्छी तरह खाने को भी नहीं देती उसे । घर भी इतना गंदा रखती है कि क्या बताऊँ तुम्हें ? -फेडी मिला था ? -मिला था। -क्या बोला? --कुछ नहीं बोला। मैं वात करने जा रही थी, पर नैन्सी ने बात ही नहीं करने दी। निकाल दिया घर से मुझे । यह क्यों! -राइटर, देखा फ्रेडी मेम साहब इसका उत्तर नहीं देतीं दो क्षण चुप रहकर कहतीं। बहुत कमजोर हो गया है, गले की हड्डियाँ दिखाई देने लगी हैं । तुम्हीं वताओ क्या करूँ ? डी०एल०एस० से कहूँ ? मैंने कहा-नहीं, क्या फायदा होगा? उस वार भी तो कहा था ? मेम साहब समझ नहीं पातीं कि क्या करें। आकाश-पाताल एक कर देतीं सोचते-सोचते । मैंने देखा फेडी की चिन्ता में वह भी इन कुछ दिनों में दुबला गई थीं। फेडी का शोक अभी तक भूल नहीं पाई थीं वह ? उसके बारे में बात करना उन्हें अच्छा लगता था। स्वप्न भो जैसे उसी को देखती थीं। बड़ी करुण दशा थो उनको इन दिनों।
धार आंखों का पस उनको यह हालत देखकर मुझे बार-बार जोसेफ की बात याद आती। तो क्या जो उसने कहा था सच था ? लेकिन आखीर में फ्रेडी के लिये मेम साहब ऐसा कर बैठेंगी, यह कौन जानता था? चाईवासा के कोर्ट में केस पूरे जोरो पर था। मिस्टर जेन्किन्स कटघरे में खडे कह -हे थे-मैं डी० एल० एस० होने के नाते मिस्टर डोसा को भी जानता था और अब आलफ्रेड को भी जानता हूँ। दोनों ही सच्चरित्र व्यक्ति रहे हैं । मिस्टर डी'सा शराब बहुत पोते थे पर ड्यूटीफुल थे। मिसेज डो'सा को भी जानता हूँ मैं । एक दिन वह मेरे घर भी आई थी और कहा था कि मैं आल्फ्रेड को रेलवे क्वार्टर नहूँ। वकील ने पूछा था क्वार्टर देने को क्यों मना किया था इसका कोई कारण बता सकते हैं आप? -मेरा ख्याल है इसका कारण था आल्फ्रेड पर मिसेज डोसा का अत्यधिक स्नेह ! स्नेह के अलावा और कोई भी रिलेशन हो सकता है, ऐसा सन्देह है क्या आपके मन में? -नहीं-मिस्टर जेन्किन्स ने जवाब दिया था। --परन्तु चार्ली को क्या कभी अपनी मां पर सन्देह हुआ था ? यह मुझे नहीं मालूम । सच तो है मिस्टर जेन्किन्स के लिये यह जानना संभव भी नहीं था। जानती थी केवल नैन्सी। नैन्सी ही इस मुकदमे की मुख्य गवाह थी। उसे शुरू से ही मिसेज डोसा पर सन्देह था । उसकी नजरों से नही वच पाई थीं मेम साहब । नारी नारो की नजर नहीं बचा पाती । छोटी-नाटी लड़की थी नैन्सी। यार्ड फोरमैन मिस्टर बुकानन की लड़को । रंग काला । अपने काले रंग और बदसूरती के लिए एक काम्प्ले- क्स था उसमें हमेशा से । बचपन से ही पुरुष को अपनी ओर आकर्षित करने का प्रयल करती रही थी वह । रेलयार्ड में ही पलकर बड़ी हुई। वहीं यार्ड में हो रहना और यार्ड में ही मरना । नैन्सी ने समझ ४० चार आँखों का खेल । था कि यार्ड के लोहे-लंगर के अन्दर ही श्वास-प्रश्वास लेकर जीवन विताना होगा उसे । ऐंग्लो-इंडियन समाज में काला होना महापाप है। और इस पाप का फल उसे जीवन भर भोगना होगा यह मान लिया था उसने । जितने भी लड़के उसके पास आये उन्होंने कृपा की ही दृष्टि से देखा उसे, दया ही प्रकट की उस पर । उसके यौवन को खेलने की वस्तु वे अवश्य मानते पर किसी ने भी उसे अपनाना नहीं चाहा । इसीलिए उसने भी किसी को अपनी अंगुली भी नहीं छूने दी । युवकों में भी उसके प्रति एक श्रद्धा-सी व्याप गई थी। एक पेग ह्विस्की पेट में जाते ही नशे से जिनका दिल दीवाना हो जाता है उनको ऐसी स्थिति आने पर मन प्राण देह-सम्पूर्ण आत्म- समर्पण में हिचक नहीं रह जाती। इस तरह की लड़कियों का अभाव नहीं था चक्रधरपुर के ऐंग्लो-इंडियन समाज में । वरन् उन्हीं की संख्या अधिक थी; अकेलो नैन्सी ही मानो अपने अछूते यौवन के गर्व से सिर उठाकर चलती थी। कहती-आई डोन्ट केयर- किसने किसको केयर करने को कहा है और किसके केयर न करने के कारण आसमान नहीं टूट पड़ता इसका हिसाव भी रखती थी वह। वह जानतो थी कि उसकी परवाह करके चक्रधरपुर का ऐंग्लो-इंडियन समाज स्थिर नहीं हो जायेगा । इसलिये ज्यों-ज्यों उसकी उम्र बढ़ रही थी वह आत्मकेन्द्रित सी होती जा रही थी। वह सोचती नहीं मिलता कोई मेरे साथ तो न मिले। कोई नहीं नाचना चाहता मेरे साथ तो न नाचे। मेरे वाप का वेतन कम है तो भले हो। पर मेरा अहंकार वरावर वना रहेगा । अपनी स्वतन्त्रता लेकर मैं जिन्दा रहूँगी। दूसरे लड़कों के लिए नैन्सी एक रात का नशा थी। रात बीती और पहचान खत्म । दूसरी रात दूसरे लड़के के साथ विताने पर भी उन्हें गुस्सा नहीं आयेगा । वे इसका बुरा भी नहीं मानेंगे । वे कोई दूसरी ढूंढ लेंगे। यह सब अच्छी तरह जानती थी नैन्सी । इसीलिये जव नैन्सी ने फ्रेडी को पहली बार देखा तो वह समझ गई कि वह औरों जैसा नहीं है, दूसरी तरह का है। दूसरे लड़कों की तरह नैन्सी के सामने आने पर वह हँसा नहीं। उसकी ओर देखकर अवज्ञा भी नहीं दिखाई उसने । इन्स्टिट्यूट में एक तरफ बैठा विलियर्ड का खेल ।
चार आंखों का खेल देख रहा था वह । विल्कुल सादा सरल चेहरा । ड्रिक करना तो दूर की बात वह सिगरेट तक नही पो रहा था। उस दिन नैन्सी स्वयं उसके पास आई थी और बोली थी-तुम चक्रधरपुर में नये आये हो न? –हां ! फ्रेडी ने उत्तर दिया था। -लगता है किसी से जान-पहचान नही है तुम्हारी? -नहीं, फ्रेडी ने कहा था। -~आओ परिचय करा दूं तुम्हारा-नैन्सी ने कहा, फ्रेडी को आश्चर्य हुआ थोड़ा। बोला–पर तुम कौन हो? तुम्हे भी तो मैं नहीं जानता । मैं यहां के यार्ड फोरमैन मिस्टर बुकानन की लड़की हूँ। -क्या नाम है तुम्हारा? नैन्सी । और तुम्हारा ? --आल्फ्रेड। मेरी आंटी मुझे फ्रेडी कहकर बुलाती हैं- फेडो का नाम अच्छा लगा या उसका व्यवहार यह तो पता नही चला पर इतना अवश्य लगा कि फेडो नैन्सी को पसन्द आया था। इन्स्टिट्यूट में सब लोग जब विलियर्ड खेलने में तल्लोन थे, बार में ग्लास लिये विभोर थे, नाचने में मस्त थे उस समय सबकी नजर बचाकर दोनों कहाँ अदृश्य हो गये इसका किसी को पता ही नहीं चला। ऐसा क्यों होता है कौन जाने। कहाँ खड़गपुर का कोई आल्फेड और कहां यार्ड फोरमैन की कोई काली लड़की नैन्सी । शायद प्रथम बार आँख से आंख मिलते हो जो होना था हो चुका था। यह शायद आंखों का हो दोष है। किसी को आँखों में किसी को आंखें पड़ जाये तो फिर उसका कोई इलाज नहीं रहता शायद । इसी का नाम शायद 'चार आंखों का खेल' है। कौन बता सकता है कि नैन्सी को फ्रेडी क्यों अच्छा लगा? दोनो जने सीधे नदी के किनारे चले गये थे। इतनी रात को नदी किनारे जाना विपद्जनक था।पर चक्रधरपुर में उन दिनों ऐंग्लो-इंडि- यन्स का राज्य था । इन्हें कौन क्या कह सकता था? किसकी छाती इतनी चौड़ी थी? नैन्सी खुद साइकिल चला रही थी और साइकिल के पीछे उसने फेडो को बैठा लिया था।
४२ चार आँखों का खेल - । ~~यह तुम कहाँ आ गई ? नैन्सी ने कहा-यहाँ एकान्त है, कोई नहीं देख पायेगा हमें- और फिर किनारे के एक पत्थर पर जाकर बैठ गये थे दोनों आमने- सामने । आमने-सामने बैठे विना आँखों में आँखें डालकर बातें भला कैसे हो सकती थी ? फ्रेडी ने पूछा-अगर किसी ने तुम्हें ढूढ़ा तो ? -~-मुझे कोई नहीं ढूँढ़ेगा-नैन्सी ने जवाब दिया । सुनकर चकित स्वर में फ्रेडी ने पूछा-क्यों ? --मैं काली हूँ न इसीलिये। सब मुझसे घृणा करते हैं। एक दिन तुम भी घृणा करोगे । करोगे न ? इसके उत्तर में फ्रेडी ने कुछ नहीं कहा था। नैन्सी ने पूछा--सिगरेट पियोगे ? -सिगरेट पियूं ? --पियो न । बुराई क्या है पीने में । जलती सिगरेट की रोशनी में तुम्हारी आँखें तो दिखाई देंगी- फ्रेडी ने कहा--आंटी कहती मेरी आँखें वहुत अच्छी हैं क्या? नैन्सी बोली-तुम्हारी आँखें देखते ही मैं समझ गई थी कि आज तक तुम पहले कभी किसी लड़की से नहीं मिले- --आँखें देखने से ही यह पता चल जाता है ? फ्रेडी ने पूछा था । -अच्छा सच-सच बताना, तुमने पहले कभी किसी लड़की से प्यार किया है ? नहीं। -देखा न, मैंने तो तुम्हारी आँखें देखते हो समझ लिया था- -लेकिन आँखें देखने से सचमुच सब पता चल जाता है क्या ? इस बात का जवाब न देते हुए नैन्सी ने कहा-अच्छा मेरी आँखों की तरफ देखो तो- और फ्रेडी ने अपनी आँखें नैन्सी की आँखों में डाल दी। -~-क्या देख रहे हो ? नैन्सी ने पूछा। भी तो दिखाई नहीं दिया. कुछ नहीं दिखाई दिया? -नहीं। अच्छी हैं। सचमुच - --कहाँ, कुछ चार आंखों का खेल १३ -- -यह क्या ? कुछ भी नहीं देखा ? नहीं तो! नैन्सी बोलो-तुम सचमुच हो किसी लड़को से नहीं मिले कभी- लड़कियों के बारे में कोई धारणा नहीं है तुम्हारो- फ्रेडी ने पूछा-तुम भी शायद कभी प्रेम में नहीं पड़ो। कुछ क्षण चुप रही नैन्सी । फिर बोलो-मुझे सबने घोखा दिया है। यहाँ के हर लड़के ने । मेरे प्यार को लेकर सवने मुझे रुलाया है-- ---किस तरह रुलाया है ? नैन्सी ने बताया- मुझे पहले ह्विस्की पिलाई, फिर प्यार का नाटक किया और फिर फटे जूते की तरह ठोकर मारकर फेंक दिया- फ्रडो समझ नहीं पाया कुछ। बोला-क्यों? नैन्सी बोली-क्यों ? समझे नहीं ? मैं ब्लैकी हूँ न । मेरे पिता पुअर यार्ड फोरमैन हैं-! तुम अगर पहले कभी लड़कियों से मिले होते तो समझ गये होते, मेरी आँखों में दिखाई दे गया होता कि मैंने बहुत से लड़कों से प्यार किया है, लेकिन मुझे किसी ने प्यार नहीं किया । मैं बिलकुल अकेली हूँ- इसके बाद अचानक फ्रेडी के दोनों हाथ पकड़ लिये थे नैन्सी ने और बोली थी-- -आई लव यू फ्रेडी। आई लव यू- उस दिन उसी अँधेरे में नदी के किनारे फेडो को जीवन में एक नई अभिज्ञता प्राप्त हुई। ऐसी अभिज्ञता जो नूतन थी, अद्भुत थी। उसके बाद दिस दिन फेडो जवर्दस्ती मिसेज डी'सा का घर छोड़कर चला गया था उसी दिन समझ में आ गया था कि यह नैन्सी का काम था। इन्स्टिट्यूट में क्रिसमस नृत्य के समय मेम साहब द्वारा किया गया अपना अपमान वह सहन नहीं कर सकी थी। दूसरे ही दिन फ्रेडो से साक्षात् होते हो नैन्सो ने कहा था-कहो, तुम अब उस घर में नही जाओगे? फडी ने कहा था-मैं सो जाना नहीं चाहता। लेकिन आंटो मुझे छोड़ना ही नही चाहतीं। --क्यों, क्यों नहीं छोड़ना चाहती तुम्हें आंटी ?
४४ चार आँखों का खेल -मैं क्या करूँ ? वह नहीं छोड़ें तो मैं क्या कर सकता हूँ ? -पर वह तुम्हें क्यों नहीं छोड़ती, पहले यही बताओ न ? ----आंटी मुझे बहुत प्यार करती हैं । --प्यार करती हैं मतलब ? फ्रेडी चुप रहा । नैन्सी ने फिर पूछा-बताओ, मेरी बात का जवाब दो- -सच आंटी मुझे बहुत प्यार करती हैं। मेरे वहाँ से आ जाने पर शाय जिंदा भी न बचें। -जिंदा क्यों नहीं बचेंगी ? तुम्हारी आंटी के अपने बेटे-बेटी नहीं हैं क्या ? आंटी क्या तुम्हारी तनख्वाह पर निर्भर हैं ? --नहीं, मेरी आंटी के पास पैसे हैं । मेरे रुपये नहीं लेतीं वह ! -तो फिर ? तुम्हाते प्रति उसका इतना आकर्षण तो अच्छा नहीं है ? भले ही यार्ड फोरमैन की लड़की थी नैन्सी परन्तु वुद्धि उसकी प्रखर थी। आसानी से नहीं छोड़ा फ्रेडी को। बोली-तो क्या तुम्हारो आंटी नहीं चाहती कि तुम मुझसे विवाह करो? -नहीं-फ्रेडी ने कहा। -क्यों तुम्हारे विवाह करने से क्या तुम्हारी आंटी का दिल दुखेगा? –हाँ। पहले तो गुस्से से मुट्ठियाँ भिंच गईं नैन्सी की और फिर अचानक उससे लिपट कर फूट-फूट कर रोने लगी वह । फ्रेडो के वक्ष पर सिर रगड़ते हुए बोली-तुमने मुझे पहले यह बात क्यों नहीं बताई ? क्यों ऐसा किया तुमने मेरे साथ, बोलो ? फ्रेंडी क्या कहे कुछ समझ 'पखडा हठात् सिर हटाकर नैन्सी कहा- बोलो, क्यों तुमने मेरा ऐसा अंत में मजबूर होकर केड तुम्हारा ? . ? ऊपर से पू में कुछ स વિવ चार आंखों का खेल बुद्ध की तरह फ्रेडी ने कहा...मैं खुद नहीं जानता। -क्या कह रहे हो? तुम नही जान पाये। तुम कहना चाहते हो कि तुम कुछ नहीं जानते ? सारा दोप तुम्हारी आंटी का है, तुम्हारी अपनी कोई गलती नहीं है ? फ्रेडी बोला-सच कह रहा हूँ नैन्सी, आंटी को बहुत रोका मैंने- बहुत अनुनय-विनय को- --पर तुम आंटी के मुंह पर लात नही मार सकते थे क्या ? लात मारकर उसकी नाक नही तोड़ सकते थे? इस बात का जवाब नहीं दे सका फ्रेडी । -बोलो, जवाब दो मेरी वात का, चुप क्यों हो? प्लीज ! जवाब दो न मेरी बात का अब से मैं तुम्हारी बात मानूंगा नैन्सी-फेडी ने जवाब दिया। -- नहीं, अब मैं तुम्हें उस घर में एक रात भी नही रहने दूंगी। एक रात भी नहीं रहोगे तुम वहाँ। आज अभी इसी वक्त मेरे साथ चर्च चलो। --चर्च ? क्यों? -वहाँ जाने पर सब समझ जाओगे । चलो, अभी चलो। कहकर उसी समय फ्रेडी को पकड़कर जबर्दस्ती चर्च ले गई नैन्सी । और वहाँ जाकर तीन व्यक्तियों की गवाही में दोनों की शादी हो गई थी। वहां से सीधे वे रेलवे क्वार्टर में चले गये थे। उस दिन नदी किनारे रात्रि के अंधकार में जिस मनुष्य को मैन्सी ने जाना था उसी फेडी के जीवन की आड़ में एक ऐसा मारात्मक रहस्य छुपा हुआ है यह वह कहां जान पाई थी। दिन पर दिन बीतते गये। आपस का मिलना-जुलना बढ़ता गया । कभी नदी के किनारे तो कभी पहाड़ की ढलान पर प्यार भरी बातें की थी दोनों ने, हँसे थे, गीत गाये थे पर बातें खत्म ही नहीं होती थी। लगता था अभी भी बहुत कुछ बाकी रह गया है कहने को। अंत में फ्रेडी कहता--अब चलूं- -क्यों, कितनी रात हो गई ? -बहत-फ्रेडी कहता। -अधिक रात हो जाने से क्या तुम्हें तकलीफ होती है ? फ्रेडी कहता मेरी नाइट ड्यूटी है न- ४६ चार आँखों का खेल इसके बाद नैन्सी की कोई आपत्ति नहीं टिकती।दोनों जने साइकिलों पर अपने-अपने घर चले जाते । पर तव भी नैन्सी को फ्रेडी के जीवन के इस कुटिल रहस्य का आभास नहीं मिला था। दिन चैन से वीत रहे थे और शामें अच्छी ही गुजर रही थीं। पर जिस दिन पता चला उस दिन समस्त संपर्कसूत्र जैसे उलझ गये। वकील ने नैन्सी से पूछा-उसके बाद? गवाह के कटघरे में खड़ी नैन्सी बात कहते-कहते रो पड़ती थी बीच बीच में । तीन दिन उसकी गवाही चलती रही । सारा चक्रधरपुर इकट्ठा हो जाता था कोर्ट में उन दिनों। उसके बाद? फिर पूछा वकील ने~बोलिये उसके बाद क्या हुआ ? चक्रधरपुर के रेलवे के लोग और तो सब कुछ जानते थे, केवल यह नहीं जानते थे कि ऐसा कौन-सा कारण था जो फ्रेडी जैसे लड़के ने चाली जैसे निरीह लड़के को पिस्तौल से गोली चलाकर मार डाला । यही जानना चाहते थे सव । इसी रहस्य को जानने के लिये इतनी भीड़ इकट्ठा होती थी कोर्ट में। विवाह करके नव-दम्पत्ति जव नये क्वार्टर में हनीमून मनाने पहुँचे तब शायद अदृश्य विधाता मन ही मन हँसा था । तुमने सोचा है पंछियों की तरह तुम अपने सुख-चैन, आराम व अपनी गृहस्थी की चिंता में जीवन विता दोगे, पर ऐसा तो नहीं होगा । तुम्हारी गृहस्थी के बाहर भी तो एक वृहत् संसार है न । उस संसार के मनुष्यों के दाय-दायित्व, सुख स्वाच्छन्द्य के संपर्कसूत्र जुड़े हुए हैं। उनके सुख-दुःख की तराजू के पलड़े भी तो तुम्हारे सुख-दुःख के सौदे के परिमाण के साथ ऊपर-नीचे होते रहते हैं। उस दिन निर्जन रात्रि के एकान्त में जव नैन्सी रोमाञ्च से अस्थिर थी तो फ्रेडी से उसने पूछा था-तुम अवसे अपनी आंटी के बारे में तो नहीं सोचोगे? -~मैं तो कभी भी उनके बारे में नहीं सोचता ? -~बोलो, आगे भी कभी नहीं सोचोगे ? नहीं सोचूंगा। -वचन दो। -वचन देता हूँ।
चार आँखों का खेल ४७ -वचन दो, अगर कभी आंटी यहां आई भी तो तुम उसके साथ बात नहीं करोगे? -~नही करूँगा। - यदि तुम्हें अपने घर ले जाना चाहें तो तुम नहीं जाओगे? -नहीं, कभी नहीं जाऊँगा। --अगर तुम्हारी आंटी कभी मेरा अपमान करें तो तुम उसे अपना अपमान समझ कर प्रतिशोध लोगे? -लूंगा। शादी के बाद मिस्टर बुकानन खुद आये थे पर ड्यूटी होने के कारण शाम के बाद नहीं ठहर पाये थे । लड़की की शादी हो जाने से उनका मन खुशी से भरा हुआ था । कई दिन बाद उन्होंने निश्चिन्त होकर पेट भर कर खाना खाया था । खाते जा रहे थे-अंत में नैन्सी ने ही बाप को टोका था । कहा था-डैडी, अब बस करो, अव तुम ड्यूटी पर जाओ- और बूढा बुकानन सीटी बजाते-बजाते स्टेशन यार्ड की तरफ चला गया था- इट्स ए लांग लांग वे टु टिपरेअरि-इ-इ-ई- नैन्सी ने सोचा था ऐसे ही जीवन व्यतीत हो जायेगा। ऐसे ही गृहस्थो चलती रहेगी। दोनों माथ सिनेमा देखेंगे, नाचेंगे और आनन्द प्रवाह में बहते लांग लांग वे टु रिपरेअरि पहुँच जायेंगे। शायद ऐसा ही होता । पर हुआ नहीं। और नहीं हुआ इसीलिए यह कहानी बनी। तो अब वह घटना बता एक दिन मेम साहब शायद प्राविजन खरीदने कॉलोनी के रेलवे स्टो गई थीं। वेचारी मेम साहब । जब तक जॉनी जिन्दा था, उन्हें इस तरह प्राविजन खरीदने खुद नहीं जाना पड़ा कभी । तब तो टेलीफोन कर देती थों स्टोर में और वह स्वयं साइकिल पर पहुंचा देते थे और महीने के आखीर में पे में से सीधे बिल चुका दिया जाता था। जॉनी की मृत्यु के बाद टेलीफोन नहीं रहा । रेलवे में परिवार का कोई नौकरी भी नहीं करता अतः उधार माल भी कोई नहीं देता, ४८ चार आँखों का खेल . के प्राविडेन्ट फन्ड और लाइफ इन्श्योरेंस के रुपये का ही सहारा था। उसी से चार्ली व रेनी की पढ़ाई तथा होस्टेल का खर्च चलता था। जॉनी के समय का स्टाफ भी नहीं था। अतएव मेम साहव को स्वयं ही मार्केट जाना पड़ता था। खुद जाने से थोड़ी-बहुत बचत भी तो होती ही है। रेलवे कॉलोनी छोटी जगह नहीं है। एक तरफ अफसरों के क्वार्टर हैं जहाँ कि हवा साफ-सुथरो है । बड़े-बड़े ऊंचे वृक्षों की कतारें हैं। शांत वातावरण है । रात में उधर से घूमते हुए निकलो तो प्यानो बजने की आवाज़ सुनाई देती है। आउट हाउसेज़ से आती नौकर-चाकरों की आवाजें भी कानों में पड़ जाती हैं । मानिंग ग्लोरी की वेलों से मकान व बगीचे की दीवालें ढकी हुई हैं । उधर से ही मिसेज़ डो'सा साइकिल पर खरीदारी करने जाती हैं। उस दिन लौटते समय अचानक जाने क्यों ख्याल मन में आया कि बहुत दिन हो गये फ्रेडी को देखे। एक बार देखने की इच्छा होती है उसे । शायद वह और दुबला हो गया हो, शायद नैन्सी उसकी ठीक से देखभाल नहीं करती हो। कैसा है देखती जायें। कॉलोनी की सड़कों पर लम्वे-लम्बे बिजली के खंभों पर पांच सौ वाट के बल्व पहरा दे रहे थे। एक साइकिल तेजी से बगल से गुजर गई। मेम साहब ने मुँह फिराकर देखा । जूली फर्नान्डिस ! आंटी को देख ६ नहीं पाया । दूर डी० एल० एस० के घर की खिड़की खुली हुई थी। बगीचे में हजार वाट के वल्व के नीचे मिसेज़ जेन्किन्स बैठी डिटेक्टिव नावेल पढ़ रही थीं और पास में ही बच्चे डैडी के साथ बैडमिंटन खेल रहे थे। सभी बहुत खुश थे । सवकी फेमिली लाइफ है । पर एक वह थीं जिसकी कोई जिन्दगी नहीं थी। जॉनी चला गया। फ्रेडी भी चला गया। कुछ भी नहीं कर पाईं। कोई भी नहीं रहा उनके पास सव छोड़ गये। पास के एक क्वार्टर में रिकार्ड बज उठा-आई लव यू जॉनी, आई लव यू मोर- जॉनी! फेडी में क्या जॉनी को ही पाया था उन्होंने । जॉनी की तरह ही जैसे फ्रेडी ने आकर जीवन की समस्त शून्यता भर दी थी।जॉनी का विस्तर खाली था इसलिए फ्रेडी प्रथम दिन से ही उस पर सोता था । सड़क पर चलते-चलते सारी पुरानी बातें दिमाग में चक्कर काटने A धार आंखों का सेस लगों । सारी बातों को बार-बार याद करना भी जैसे अच्छा लगता है मिसेज डी'सा को। कितने दिनों का कितना आवेग था सब खत्म हो गया। अब कोई नहीं है उनका । हर कोई छोड़ गया। क्यों हुआ ऐसा? एक दिन की बात है ! जाने कितनी रात बीत चुकी थी। अचानक मेम साहब की नींद खुल गई। शाम को दो पेग ह्विस्की के लिये थे। ऐसा नशा चढ जायेगा किसे मालूम था । ख्याल ही नहीं रहा कि जॉनी नहीं है। ह्विस्की के नशे ने भुला दिया था कि जॉनी तो ग्रेव यार्ड को का मे निश्चिन्त पड़ा सो -- और जॉनी के पलंग पर जा पड़ी मेम साहबजानो, माई जॉनी-- गहरी नीद में सो रहा था केंडी। हड़बड़ा गया। बोला- आंटी, आटी मैं फ्रेडी हूँ। -नो, जॉनी, डोन्ट""डोन्ट... नशे के कारण मुंह की वात जैसे कहीं दूर से आ रही थी। वात अच्छी तरह कह न पाने के कारण गुस्सा आ रहा था मेम साहब को। क्यों तुमने मुझे दो पेग पिला दिये जॉनी । मैं तो इतना नहीं पीती, मुझे चढ़ जाती है। जानते हो एक बोतल का क्या दाम है ? इतने पैसे फेंकना क्या उचित है । क्या करूं में अब ? मुझे नींद हो नहीं आ रही । यही सब सोचते-सोचते वह फ्रेडी के क्वार्टर के सामने जा पहुँचौं । पल भर रुकी, सोचने लगीं अन्दर जायें या न जायें। गार्डेन के अन्दर घुसते ही घर के अन्दर से किसी के चिल्लाने को आवाज आई। अभी से दोनों ने लड़ना भी शुरू कर दिया। चार दिन भी तो हुए नहीं ब्याह को। अचानक चौकों मेम साहव ! यह तो चार्ली का स्वर है ! चाली क्या अन्दर है ! वह अन्दर क्यों गया। आगे बढ़कर दरवाजे पर कान लगा दिये मेम साहब ने और दिल धड़कने लगा जोर-जोर से उनका ! डर लगने लगा। चार्ली तो कभी इतना ऊँचा नहीं बोलता ।
चार आँखों का खेल कस्टर्ड पाउडर की शीशी हाथ से खिसक कर नीचे गिर गई। मेम साहब जोर-जोर से कुंडा खड़काने लगीं-फ्रेडी-फ्रेडी-- सभी को गवाह के कटघरे में खड़ा होना पड़ा था। केवल चार्ली नहीं आया था। वह शायद उस समय उससे भी बड़े कोर्ट में और भी वड़े न्यायाधीश के सामने खड़ा सफाई दे रहा था। चार्ली को कभी किसी ने गुस्सा होते नहीं देखा था। पर जो ऊपर से क्रोधित नहीं दिखाई देते, भीतर से वह बहुत ही गुस्से वाले होते हैं । बचपन से ही वह चौबीस घंटे दिन-रात मम्मी को देखता आया था। डैडी तो महीने में पन्द्रह दिन घर से बाहर ही होते थे और जिन दिनों घर होते थे तो या तो उन्हें शराब पीते देखा था या मम्मी से बातें करते। उसके साथ बात करने का समय ही नहीं मिलता था जॉन डी'सा को। तभी से चार्ली सब कुछ देखता आ रहा था। जोसेफ के साथ मम्मी का झगड़ा देखा था। मम्मी के साथ फ्रेडी के संपर्क को भी लक्ष्य किया था और फिर फ्रेडी के घर छोड़कर चले जाने के बाद मम्मी को पागलों जैसी होते भी देखा था। माँ डैडी की मृत्यु पर भी इतना नहीं रोई थी। जितना फ्रेडी के चले जाने पर मुंह में रूमाल दबाकर रोई थी, इस ओर भी उसकी नजर गई थी। देखकर मम्मी पर गुस्सा नहीं आया था। उसे फ्रेडी पर गुस्सा आया था, नैन्सी पर आया था। रास्ते में दैवात् कभी फ्रेडी से साक्षात् हो जाता तो फ्रेडी के विश करने पर भी वह कोई जवाब नहीं देता । और अगर नैन्सी मिल जाती तो मुंह फिरा लेता। उसी दिन शाम के समय की बात थी। स्टेशन का लेवेल क्रॉसिंग पार करके घर की तरफ आ रहा था चार्ली। अचानक कहीं से एक साइकिल ने आकर जोर से धक्का मारा। हूँ इज़ दैट ? कौन है ? धक्का खाकर लेवेल क्रॉसिंग की रोड़ी पर गिर गया चार्ली । अगर कुछ कहना चाहिए था तो चार्ली का कहना ही उचित था क्योंकि साइकिल उसके ऊपर गिरी थी। कुसूर साइकिल चलाने वाले का था। पर हुआ उलटा। ~~~-सड़क पर चलना भी नहीं आता। न्यूसेंस है । शरीर की धूल झाड़ता उठ खड़ा हुआ था चार्ली । उठकर अच्छी - - WHAWAN, ADAHSH NAGAR JAIPUR-302004 चार आंखों का खेल ५१ तरह देखा । साइकिल उठाकर खड़ी नैन्सी उसी को लक्ष्य करके कह रही थी। -~-मुझे चलना नहीं माता या तुम्हें चलाना नहीं आता ? ह्वाट !!! लेवेल क्रॉसिंग के नेटिव लोग ऐंग्लो-इंडियन्स का झगड़ा देखने के लिये आकर खडे हो गये और दूर खड़े होकर तमाशा देखने लगे। झगड़ा तब तक काफी बढ चुका था। -शट अप । गाली मत दो कहे देता हूँ। --जरूर दूंगी गाली! हजार बार दूंगी ! कह तो रही हूँ-सन-ऑफ- ए-विच, क्या करेगा तू? चार्ली के कान झनझनाने लगे। मन में आया कि एक बूंसा मारकर नाक तोड़ दे नैन्सी की। पर संभाल लिया खुद को, बोला-खुद गलती की और ऊपर से मुझे ही गाली दे रही हो? - तुझे नहीं दे रही, तेरी माँ को दे रही हूँ गाली ! हो हो करके हँस उठे दूर खड़े लोग । चार्ली को लगा जैसे किसी ने सबके सामने उसकी पीठ पर कोड़ा मार दिया हो अथवा चाबुक लगा दिया हो। लोगों की उपहासपूर्ण हंसी और नैन्सी की कटूक्तियों का कोड़ा सहलाते-सहलाते चार्ली घर पहुँचा उस दिन । बिना कुछ कहे समस्त अपमान का बोझा सिर पर लिये सीधा घर चला माया था वह । गुस्से से उसका शरीर काँप रहा था। -~-मम्मी कहां हैं ? सामने खड़े याकूब से पूछा। -मेम साहव बाहर गई है वावा- -वाहर ? बाहर कहाँ ? -स्टोर्स। क्या करे कुछ समझ नहीं पाया चालो ! थोड़ी देर गुम-सुम सोफे पर बैठा रहा । मम्मी की प्रतीक्षा करने लगा। सन-ऑफ-ए-बिच ! सन-ऑफ- ए-विच ! दीवाल पर लगी घड़ी के पेन्डुलम की टिक्-टिक के साथ नैन्सी के शब्द भी दिमाग मे टिक-टिक् करने लगे । फिर बैठ नहीं पाया। स्टोर्स गई है इसका मतलब क्या फ्रेडी के घर गई हैं । याद आने लगी मम्मी की बातें । दिन पर दिन मम्मी ने फ्रेडी के लिये क्या-क्या किया था, वह भी याद आने लगा। वार्ली-रेनो दोनों चार आंखों का खेल -उनको ओर देखती भी नहीं थी, लेकिन फ्रेडी के काम में जरा-भी त्रुटि होती तो नौकरों के सिर पर चढ़ जातों। कितने नौकर केवल फ्रेडी के कारण नौकरी छोड़कर चले गये थे ! और चार्ली ? रेनी ? जीवन में एक समय ऐसा भी आता है जब सोचने-विचारने का मात्राज्ञान नहीं रह जाता। जीवन का अस्तित्व ही निरर्थक लगने लगता है । भला-बुरा, न्याय-अन्याय सब निश्चिह्न हो जाता है। चार्ली की भी यही मनःस्थिति थी उस दिन । वैठे-बैठे आकाश-पाताल एक करने लगा। वह भी तो इन्सान है। उसका भी तो सुख-दुःख, मान-अपमान सब कुछ है। ऐसा कोई भी अपराध उसने नहीं किया जिसके लिये सड़क पर खड़े नेटिव लोगों के सामने उसने मेरा ऐसा अपमान किया। वैठे-बैठे डैडी की बात याद आ गई। वचपन से देखता आया था चार्ली डैडी को । जहाँ भी जाते थे कितनी चीजें चार्ली व रेनी के लिये लाते थे। कितने अच्छे थे वह दिन । घर में कभी किसी को मुंह नहीं फुलाने दिया डैडी ने । वह चाहते थे सुवह से शाम तक मेहनत करके जो कुछ कमायें उससे बच्चे आराम की जिंदगी वितायें, मौज-मजा करें। अगर ह्विस्की पीना चाहते हों तो पियें, सिनेमा देखना चाहते हों तो देखें । जब तक मैं जिंदा हूँ पैसे जुटाता रहूँगा। हँसी-खुशी रहें सव । किसी के मुंह से आह न निकले, आँख से आँसू न टपके। कितना सुखी परिवार था। कभी मिलकर सव कोरस गाते थे तो कभी नाचते थे। पार्टी-डिनर-क्लव । चक्रधरपुर कॉलोनी के सारे परिवार ईर्ष्या करते थे उन्हें देखकर । भले ही गुड्स ट्रेन का सीनियर ड्राइवर था जॉन डो'सा पर परिवार उसका एक आदर्श परिवार था । हँसता-खेलता परिवार । लेकिन उसके बाद? सिनेमा के दृश्य को तरह समस्त अतीत चार्ली के नेत्रों के समक्ष उभर आया था। उसके बाद जैसे एक काला पर्दा पड़ गया। विल्कुल धुंधला हो गया था सारा दृश्य। फ्रेडी आया! क्या आवश्यकता थी फ्रेडी को आने को ? इस घर में आये विना क्या चलता नहीं?
चार आँखों का खेल शुरू में तो इतना नहीं समझता था चार्ली । दूसरे का लड़का होने के कारण मां फ्रेडो को अधिक देखभाल करती हैं, थोड़ा पक्षपात कर जाती है । परन्तु धीरे-धीरे सन्देह होने लगा था। ऐसा लगने लगा जैसे मां के लिये चार्ली और रेनो कुछ नहीं हैं । जो कुछ है वस फ्रेंडी है । तब से ही चाली अलग-अलग रहने लगा था- सबकी आँखों की आड़ में अकेला । रेनी वोडिंग में चली गई तो वह विल्कुल ही अकेला हो गया। अकेले-अकेले दिन बीतने लगे । मम्मी अपने में खोई हुई थीं और वह भी अपने एकाकीपन का आदी हो गया था। पर मन का क्षोभ नहीं मिट सका था। अकेला-अकेला इधर-उधर घूमता रहा। लेकिन उस अतस्थ ज्वाला- मुखी का विस्फोट हुआ लेवेल क्रॉसिंग पर । चाली को वस चारो ओर से जैसे एक ही आवाज सुनाई दे रही थी-सन-ऑफ-ए-विच-सन-आफ ए-विच उसके बाद? वयान देते-देते रुक गया था याकूब । वकील ने फिर पूछा-उसके बाद?- ---उसके बाद हुजूर मैंने देखा चार्ली वावा बहुत देर तक सोफे पर चुप बैठे रहे । कमीज पर कोचड़ लगी हुई थी। मैंने सोचा शायद ठोकर खाकर गिर पड़े होंगे। मुंह, आँख, कान लाल हो रहे थे मैंने चाय के लिये पूछा तो बाबा ने कोई जवाब नहीं दिया। -फिर? फिर में वावर्तीखाने में अपना काम करने चला गया। कस्टर्ड पुडिंग बनाने का ऑर्डर दे गई थी मेम साहव । कस्टर्ड पाउडर घर में न होने के कारण उसे ही लेने गई थी वह । उसके बाद जब मैं मंडे लेने स्टोररूम जा रहा था तो मालूम पड़ा बावा सोफे पर नहीं थे। क्या हुआ ? बाबा क्या बाहर चले गये। आया से पूछा, उसे भी पता नहीं था, बटलर से पूछा, पर उसे भी कुछ पता नहीं था। अचानक मेम साहब के कमरे की तरफ देखने पर दिखाई दिया कि बावा मेम साहब चार आंखों का खेल । का चेस्टर ड्राअर खोल रहे थे। उसमें से पिस्तौल निकाली और जेब में डालकर बाहर निकल गये। मैं पीछे-पीछे भागा। बाबा-बावा कई आवाजें लगाई। कहते-कहते याकूव का गला रुंध गया। उसने सोचा भी नहीं था कि वावा के साथ यह उसका अंतिम साक्षात् था। एक-एक करके साक्षी कटहरे में आकर खड़े होते और सब लोगों की नजरें उत्सुकता लिये साक्षी के चेहरे पर लग जातीं। इतना सब हो रहा था। सारी बातें जानने-सुनने का सारे लोगों का अतीव आग्रह था पर फेडो को जैसे इससे कोई मतलब ही नहीं था। असामी के कटहरे में सिर नीचा किये चुप खड़ा रहता। होश सँभालते ही उसने देखा था उसकी अपनी माँ उसकी नहीं थी, उसका बाप उसका नहीं था। फिर जहाँ जाकर आश्रय लिया था वहाँ भी एक अद्भुत, गलत आग्रह के कारण टिक नहीं पाया। वहाँ से निकल कर खुली साँस लेने के निमित्त जहाँ अंत में पहुँचा वहाँ भी एक मर्मान्तक दुर्घटना के जाल में पड़कर हाथों में हथकड़ी पहननी पड़ी थी उसे । लोग कहते-देख लेना इसे फाँसी हो जायेगी। तारक बाबू को सबसे अधिक दिलचस्पी थी इस मामले में। किसी के चाईवासा से लौटने की खबर मिलते ही सड़क पर ही पकड़ लेते उसे । पूछते. -क्यों जी, चार्ली-हत्या का मामला कहाँ तक पहुँचा ? आज की क्या खवर है ? उस बेटे को फांसी हो जायेगी ? वह कुछ दिन सचमुच मुकदमे को लेकर बड़ी सरगर्मी में बीते थे। गवाहों के बयान व सबूतों के आधार पर जो प्रमाणित हुआ वह यह था कि अपमान सह न पाने के कारण चार्ली रिवॉल्वर लेकर नैन्सी को मारने गया था। नैन्सी के घर उस समय नैन्सी और फ्रेडी दोनों थे। वहाँ नैन्सी और चार्ली में फिर कहा-सुनी हुई। साइकिल से धक्का देने की बात उठते-उठते और वहुत-सी बातें उठीं । चार्ली की मम्मी की वात भी उठी। उससे और भी खून चढ़ गया चार्ली को और नैन्सी पर गोली चलाने के लिये पिस्तौल निकाल ली उसने । तब फेडी बैठ सका। चार्ली के हाथ से पिस्तौल छोन ली उसने। इस पर भी जब चार्ली नहीं रुका और नैन्सी को मारने के लिये झपटा तो फ्रेडी ने ही गोली चला दी। वस चार्ली गिर पड़ा और फिर नहीं उठा। ? चुप नहीं चार आंग्डों का खेल जव मामला यहाँ पर पहुंचा तो मेम साहब अपने को रोक नहीं सकी। वे बिल्कुल हो टूट गई। मुकदमे के आरंभ से ही उन्होंने अपने को अपने में समेट लिया था। पर इसके बाद तो बिस्तर ही पकड़ लिया उन्होंने। न वह कभी घर के बाहर दिखाई देती और न ही उनकी आवाज मुनाई देती। एक दिन याकूब से पूछा--मेम साहब कैसी हैं अब ? याकूब बोला-मेम साहब तो बिल्कुल ही टूट गई है हुजूर । खाना- पीना भी बंद कर दिया है। सारे घर पर जैसे श्मशान घाट की-सी मुदनी छा गई थी। नौकर- चाकर सब थे पर न होने के बरावर । मुकदमे की खबर मिलने के बाद रेनो भी कसियाग से चली आई थी। पर वह भी बाहर नही दिखाई देती थी। मां के अपराध के लिये मानो उसने भी आत्मगोपन कर लिया था। मां को लज्जा मानो उसकी अपनी लज्जा थी। शोक जो था वह तो था ही पर मम्मी के कलंक को छाप जैसे उसके शरीर पर भी लग गई थी। कोर्ट की प्रतिदिन को रिपोर्ट जैसे उसको अपनो कलंक कहानी थी। जैसे चक्रधरपुर का हर व्यक्ति उमी के चरित्र को लेकर आलोचना कर रहा हो। एक दिन मम्मी को खाली देखकर पूछा था-मम्मी तुम तो गई थी फेडो के घर, तुमने क्यों नहीं रोका ? सच ! काश, मेम साहब को पता होता कि चार्ली वहाँ जायेगा। पता होता कि लेवेल क्रॉसिंग पर नैन्सी ने चाली को गाली दी थी । और गाली भी कोई छोटी-मोटी नहीं-सबसे बड़ी गाली। याद है उस समय गल के क्वार्टर से वही गाना सुनाई दे रहा था इट इज ए लांग लांग वे टु प्टिपरेअरि इ.इ...... और तभी फ्रेंडी के क्वार्टर में से आती चार्ली की आवाज सुनकर चौक पड़ी यों वह । अंदर क्या हो रहा था, कान लगाकर सुनने की कोशिश की थी। चार्लो चीख कर कह रहा था उसने क्यो मुझे सन-ऑफ-ए-विच कहा। मेरी मम्मी को क्यो गाली दी उसने । मुझे गाली देती तो मैं बुरा नहीं मानता । पर मेरी मम्मो को ?... नैन्सी को आवाज सुनाई दी। वह कह रही थी तुम्हारी मम्मो चार आंखों का खेल 1 विच तो है ही । मैंने क्या झूठ कहा है ? वह जो है वही तो कहूँगी। सारा शरीर काँपने लगा मेम साहब का। अंदर चार्ली कह रहा था-फिर वही बात कह रही हो? -हजार वार कहूँगो, लाख वार कहूँगी, तुम्हारी मम्मी विच है- विच है--विच है-- ~~~~खवरदार, कहे दे रहा हूँ कि मत वोलो यह वात । सावधान किये दे रहा हूँ तुम्हें ! -सावधान कर रहे हो ? तुम्हारी माँ फ्रेडी के साथ नहीं सोती थी? मेम साहव के हाथ से कस्टर्ड पाउडर की शीशी नीचे गिर गई। -चुप रहो । माँ को निन्दा नहीं सुन सकता मैं । -~-जाओ, चले जाओ यहाँ से । निकल जाओ। मैं अपने घर में बैठकर जो मर्जी आयेगी वोलूंगी, तुम कोन होते हो रोकने वाले ? तुम्हारी मम्मी एक रीयल विच है- -फिर ! अव फ्रेडी की आवाज़ सुनाई दी । नैन्सी से बोला वह-बस करो ना, क्या पागलपन कर रही हो ? -पागलपन में कर रही हूँ या वह सन-ऑफ-ए-विच कर रहा है ? उसे क्या अधिकार है कि मेरे घर आकर मुझे ही गाली दे । चार्ली वोला-गाली मैंने तुम्हें दी है या तुमने मुझे ? -तुम क्यों आये यहाँ ? किसने घुसने दिया तुम्हें अन्दर । निकलो- निकलो अभी यहाँ से। -पहले कहो कि तुम फ्यूचर में कभी मेरी मम्मी को गाली नहीं दोगी? -दूंगी, जब तक जिन्दा रहूँगी दूंगी। और फिर एक विकट शब्द हुआ। शब्द सुनते ही याद आया कि जानी का रिवॉल्वर उनकी चेस्टर ड्रायर में था और चाभी घर में ही थी। लेकिन तब तक जो होना था हो गया था। सोचा था चार्ली ने ही शायद नैन्सी पर गोली चलाई थी लेकिन वास्तव में ऐसा नहीं था। दोड़कर अन्दर जा पहुंची थों मेम साहव और देखा था नैन्सी नहीं वरन् चाली पड़ा था जमीन पर | सर से खून का फव्वारा छूट रहा था। सिर चार मांखों का खेल फट गया था और कमरा धुंए से भर गया था। धुंआ साफ होते ही दिखाई दिया था कि कमरे में दोनों ओर दो जने खड़े भय से थर-थर कांप रहे थे। एक थी नैन्सी और दूसरा था फेडौ । आंटी को देखते हो फ्रेडी रो पड़ा। वोला-आंटी आंटी मैं चार्ली को मारना नहीं चाहता था । विलीव मी आंटी । मेरा कोई इरादा उसे मारने का नहीं था- लेकिन रिवॉल्वर अभी तक उसकी सख्त मुट्ठी में था। एक-एक करके सारे गवाहों को गवाहियां हो गई। काउन वर्सेस माल्फ्रेड डी'सा । अव फ्रेडी को फांसी अवश्यम्भावी थी। सारे सबूत मौजूद थे। वह किसी तरह नहीं बच सकता था। अरे भाई तुम्हारे पापों की गिनती भी है कोई ? ऊपर-सिर पर भगवान नाम की भी तो कोई चीज है । तुमने सोचा था वह देख ही नहीं रहा ! पाप और पारा भी पया कमी छुपाये छुपा है ----परन्तु महाशय, पाप तो इस औरत ने किया था। इसे अगर सजा न मिले तो कैसा भगवान । कैसा धर्म और फैसा उसका संसार । संसार में पापी छूट जायेगा और निर्दोष मारा जायेगा? यह कैसा न्याय है भगवान का? सारे शहर में उथल-पुथल मच गई थी । छोटा-सा शहर था। रेलवे कॉलोनो थी, यों तो कोई विशेषता नहीं थी। पर अब वात बदल गई थी। रसमय हो उठा था शहर का जोवन । जिस दिन मुकदमे की तारीख होती बस लोगों के मुंह पर एक हो चर्चा रहती, हाथ-पैर शिथिल हो जाते। सारी शक्ति जैसे जिह्वा और कानों में सिमट आती। पर रेनो थी कि खबरों के डर से दिन-रात दरवाजा बंद किये पड़ी रहती पर तब भी न जाने किन-किन रंधों से खबरें कानों तक पहुँचा ही दरवाजे पर आवाज सुनकर अंदर से रेनी बोला-कौन ? फिर से कुंडा खड़का। Tोन है? देता कोई।
५८ चार आंखों का खेल -- -~~-मैं । मैं नैन्सी! जैसे किसी मरे मनुष्य के मुंह से आवाज आ रही हो। रेनो के दरवाजा खोलते ही अन्दर आ गई नैन्सी । स्कार्फ से शरीर ढककर आई थी। वोली -आंटी ? आंटी हैं ? -मम्मो वीमार हैं-रेनी ने जवाब दिया। सारा चक्रधरपुर नींद की गोद में था। पर नैन्सो उनमें से थी जिन्हें रात में भी नोंद नहीं आती। और वह आई थी मेम साहब के पास फरियाद लेकर। आवाज़ सुनते ही मेरी नींद खुल गई थी। कान लगाये रहा । -आंटी ! मैं नैन्सी हूँ ! स्वर आँसुओं में भीगा हुआ था। -मेरे पास क्यों आई है आज ? मैं क्या करूँगी ? -कल आपकी एवाडेन्स होगी कोर्ट में । आप ही फ्रेडो को वचा सकती हैं आंटी । आपके अलावा और कोई नहीं बचा सकता उसे ! अपनी आँखों से आपने जो कुछ देखा है वह कहने से मेरा फ्रेडी नहीं बचेगा । फ्रेडी को बचा लो आंटी ! -मेरा चार्ली मर गया, मेरा स्वास्थ्य अच्छा नहीं है ! आपका चार्ली तो चला गया पर अब फेडो भी चला जायेगा। फ्रेडी भी तो आपका ही है। -नहीं, फ्रेडी के लिये अब कोई माया-ममता नहीं रह गई मुझमें। वह मुझे छोड़कर चला गया, उसने मेरे चार्ली का मर्डर कर दिया। --पर आंटी, अव तो आपकी एवीडेन्स के ऊपर ही सब निर्भर है। -जब मुझे विच कहकर गाली दी थी तव तो यह सब बात नहीं सोची थी। अब मैं कुछ नहीं कर पाऊँगी । तू निकल जा- -आंटी, प्लीज, तुम्हारे पाँव पड़ती हूँ। कह दिया न, निकल जा यहाँ से- -प्लीज़ आंटी, प्लीज़- -~-आंटी, आंटी- ---निकल ज्जाओss"!!! अचानक जैसे बम फूट पड़ा मेम साहव के गले से । मुझे तो कल्पना तक नहीं थी कि इतना जोर भो है उनके गले में ! --उस दिन कुछ नहीं लगा था जिस दिन फ्रेडी को छीन ले गई थी - । - . - - धाराखो का पल मुझसे ? उस दिन नहीं मालूम था कि वह कितना मेरा था ? उसे देखें विना एक दिन भी नही रह सकती थी मैं । आंटी, इसीलिये तो कह रही हूँ" --कह दिया न, निकल जा. उसके बाद लगा जैसे उठकर बैठ गई मेम साहब । चिल्लाकर बोली --जा, यहाँ से नहीं तो नौकर से धक्का देकर निकलवा दूंगी बाहर । इसके बाद कोई आवाज नहीं आई। वस दरवाजा बंद हुआ। और थोड़ी देर बाद सुनाई दिया दबा रुदन ! फफक-फफक कर रो रहा था कोई । भीतर का रुदन दवा न पाने के कारण जैसे मनुष्य रोता है उसी प्रकार रो रही थी मेम साहब! घटना सूत्र का कभी कोई सिरा मेरे हाथ आ जाता तो कभी कोई । उलझ-सा गया था सब कुछ। चार्ली के मर्डर के बाद की बात है। पुलिस आकर फ्रेडी को पकड़ ले गई थी, एक मर्मान्तक दृश्य था वह ! नैन्सी चीत्कार कर उठी थी नहीं, उसे अरेस्ट मत करो, उसने नहीं मारा चार्ली को-उसने नहीं मारा- पुलिस के आते ही फेडो के क्वार्टर के सामने काफी लोग इकट्ठा हो गये थे ! सभी मुंह बाये देख रहे थे। जिस समाज का इतना सम्मान इतनी प्रतिष्ठा हो शहर में, उसी समाज के एक व्यक्ति को पुलिस पकड़ कर ले जा रही थी। अनहोनी बात थी लोगों के लिये । सभी गर्दन ऊँची कर-करके फ्रेडी को देख रहे थे। लोको फोरमैन स्वयं भी आकर खड़ा रहा था कुछ देर । फ्रेडी उसी के डिपार्टमेंट का आदमी था। उसी का कर्मचारी था, उसका भी एक दायित्व था। रेलवे की पुलिस फ्रेडी को अरेस्ट करके ले गई, और मिस्टर बुकानन अपनी वेटो नैन्सी को पकड़े रहे । कैसा रुदन था वह भी। बाप की छाती में मुंह छिपाकर बार-बार कहने लगो-नही-नहीं, उसे अरेस्ट मत करो, उसने नहीं मारा चार्ली को, उसने नहीं मारा- -तो फिर किसने मारा, वता?
६० चार आँखों का खेल कमरे में बैठाकर मिस्टर बुकानन लड़की से पूछने लगे- वोल, किसने मारा है? कोई जवाब नहीं दिया नैन्सी ने, बस रोती रही। फिर बोली-डैडी फ्रेडी को वह लोग फांसी दे देंगे! ---पर क्यों न देंगे फाँसी? क्या नहीं किया है उसने ? उसने क्या चार्ली का मर्डर नहीं किया है ? नहीं डैडी, उसने नहीं मारा; उसने मर्डर नहीं किया ! ----पर तू तो कमरे में थी ! तूने तो सब देखा है ! तुझे तो सब पता ! मिसेज़ डी'सा क्यों आई थीं तुम्हारे घर? किसी भी बात का जवाब नहीं दिया नैन्सी ने । बस रोये जा रही थी। रो-रोकर मिस्टर बुकानन को कमीज़ भिगोये जा रही थी। लेकिन नैन्सी उत्तर दे या न दे पुलिस तो अपनी ड्यूटी करेगी हो। वह खोद-खोदकर पता लगा लेगी कि चार्ली फ्रेडी के घर क्यों आया था। कभी नहीं आता था; उसके अचानक आने के पीछे अवश्य कोई रहस्य था । और वही रहस्य पुलिस को जानना था। याद है, खवर पाकर मैं भी देखने गया था। बँगले टाइप के क्वार्टर थे, आगे-पीछे दोनों ओर गार्डेन था। सड़क के दोनों किनारे गुलमोहर के पेड़ थे। पर तव भी उस समय जैसे हवा में बड़ी घुटन लग रही थी। कमरे में पहुँच कर देखा लोग भरे हुए थे। जमोन पर एक ओर चार्ली मरा पड़ा था। खून की धार वह रही थी सिर से। अधिक देर ठहर नहीं सका था मैं उस कमरे में। इस घटना के बहुत दिन बाद तक मेरी नजरों से वह दृश्य नहीं हटा । ऐसा लगता था जैसे सारा दृश्य नज़रों में समा गया हो। बचपन से ही चाली को देखता आ रहा था मैं। सीधा, निरीह, आज्ञाकारी बालक । ऐंग्लो-इण्डियन समाज में इस तरह के लड़के कम ही देखने को मिलते हैं। धीरे-धीरे एक दिन वह वड़ा हो गया । अचानक उसके डैडी चल बसे । तब उसने सब कुछ देखना, समझना सीखा। उसके बाद एक दिन गृहस्थी में स्वयं को एकदम निरर्थक पाया। और फिर अन्त में एक दिन एक व्यक्ति से एक ऐसी अकथ्य, अश्राव्य गाली सुनी, जो उसकी जन्मदात्री पर भी कठोर आघात करने से नहीं चूकी। उस दिन यदि घर लौटने पर माँ मिल जाती तो शायद सारी बातें चार आँखों का खेल मां से कहकर वह जो हल्का कर लेता । इससे ही शायद उसके क्रोध का उपशम हो जाता! पर वह हुमा नही। मन का सारा क्षोभ, सारा अपमान मिलकर जैसे आग की तरह उसके अस्तित्व तक को खत्म करने का प्रयत्न करने लगे। और तभी घर से निकलकर फेडो के धर को ओर चल पड़ा था वह। लेकिन जब अन्दर वह सब हो रहा था तब क्या उसे पता था कि उसको मां बाहर खड़ी-खड़ी सब सुन रही थी। चार्ली के इस रूप को कल्पना ही नहीं की जा मकती कभी किसी के द्वारा। न नैन्सी ने और न फेडो ने ही कभी इतना सोचा था क्योंकि चार्ली को कभी किसी ने गुस्सा करते नहीं देखा था। हमेशा निरीह-सा दिखने वाला सीधा-सादा लड़का इस तरह घर सिर पर उठा लेगा । यह उनको समझ से परे था । और फिर हाथ में रिवॉल्वर ! सोच भो कैसे सकता था कोई। नैन्सी चौक उठी थी चालों को देखकर । बोली थी-तुम ? तुम क्या करने आये हो? फेडी की ओर देखकर चार्ली ने कहा था-तुम्हारी नैन्सी ने मेरा अपमान किया है- जवाव में नैन्सी बोली-मैं तो फिर कह रही हूँ-सन-ऑफ-ए- विच- उत्तर में चार्ली बहुत कुछ कह सकता था । जो उसकी मां को गाली देगा, उसका तो खून करके भी उसका क्रोध शान्त नहीं होगा। पर तभी नैन्सी ने कहा था--में तो हजार बार कहूँगो-सन-ऑफ- ए-विच। फ्रेडी की ओर देखा चार्ली ने और बोला-सुन रहे हो तुम ? तुम्हारे सामने मेरी मां को गाली दे रही है- तुम्हारी मां को गाली दे रही हूँ तुम्हारे सामने । वह मिलेगी तो उसके मुंह पर भी दूंगी! अव तक फ्रेडी का भी धोरज चुक चला था। बोला-नैन्सी, चुप रहे तुम, जो हो गया है उसे लेकर क्यों बात बढा रही हो- चार आंखों का खेल -~~-क्यों नहीं बढ़ाऊँ ? मैं क्या उनका दिया खाती-पहनता हूँ ? -जो कुछ भी हो-उसकी माँ मेरी आंटी हैं। -रक्खो अपनी आंटी अपने पास । असल में तुम्हारी आंटी है ही एक विचma - -आह. जीवन में शायद पहले कभी भी फ्रेडी ऐसी अस्वस्तिकर परिस्थिति में नहीं पड़ा था। एक तरफ चार्ली था और दूसरी तरफ नैन्सी । किसका पक्ष ले और किसे असन्तुष्ट करे? -तुम्हारे पास ही आया हूँ। तुम्हारे साथ फैसला करने के मतलब से आना पड़ा। -तुम अव जाओ चार्ली ! इस समय जाओ। -पर सारा दोष क्या मेरा ही है। नैन्सी को तुम कुछ भी नहीं कह रहे । नैन्सी ने क्यों मुझे सबके सामने ऐसी गाली दी ? -आगे ऐसा नहीं करेगी फेडी ने कहा था। -पर तुमने तो मेरी ही गलती देखी। उसे क्या अधिकार है सबके सामने मेरा इस तरह अपमान करने का ? -वह सब मैं समझा दूंगा उसे । तुम्हारी मम्मी कहाँ हैं ? चार्ली बोला-मम्मी घर में नहीं हैं, प्रॉविजन लेने स्टोर्स गई हैं- -पर तुम यह सब आंटी से मत कहना । तब तक नैन्सी पास आ गई और वोलो-कह दे तो कह दे, मैं क्या तुम्हारी आंटी से डरती हूँ । जव मेरा दिल दुखाया था तब ख्याल नहीं था? नैन्सी को समझाया फ्रेडो ने । वोला-तुम अब गड़े मुर्दे मत उखाड़ो। अब तो सब खत्म हो गया है। -~-खत्म कहाँ हो गया है ? अव तो हम क्वार्टर में आ गये हैं। अब भी यहाँ क्यों आती हैं तुम्हारी आंटी ? -चार्ली ने कहा-मैंने तो मना किया था मम्मी को यहाँ आने के लिये-- तो फिर उसके बाद भी क्यों आती है ? फ्रेडी को मुझसे छीन लेना चाहती है ? फेडो बोला-आ भी जाती हैं आंटी तो क्या हुआ ? हमारा नुकसान क्या है ? we- चार आँखों का रोल नुकसान नहीं है ? तुम जब लोको शेड चले जाते हो तब पीछे आती हैं । आकर मुझसे पूछती हैं कि मैं तुम्हें खाने को क्यों नहीं देती। मेरे से ज्यादा तुम्हारी चिता तुम्हारी आंटी को है ? -~~-अब छोड़ो भी यह सब । -~-क्यों छोड़ दूं। कितनी मुश्किल से तो तुम्हें उस राक्षसी से हाथ से निकाल कर लाई हूँ, तब भी क्यों आती है वह यहाँ ? क्यों पीछा नहीं छोड़ती हमारा? इट प्रूज शो इज ए विच रनिंग आफ्टर यू ! "तुम फिर मेरे सामने मेरी मां को गाली दे रही हो-धोच में बोला चाली। -~हां दे रही हूँ। कहा न एक बार नहीं हजार बार दूंगी- --आह- फ्रेडी का दम घुटने लगा । बोला-तुम दोनों में से क्या कोई चुप नहीं होगा? नैन्सी ने कहा- मैंने तो कुछ भी नहीं किया, वह क्यों हमारे घर आया ? क्यों उसकी मां हमारे यहाँ आती है। चाली को ओर देखकर फेडो ने कहा-जाओ चार्ली-प्लीज़ चले जाओ, नहीं तो घेकार बात बढ़ जायेगी । तुम आटी से कुछ मत कहना --जाओ- -~-कहना मत यानी ? मैं कहूँगो जाकर तुम्हारी आंटी से । मैं कहूँगी कि कुत्ती का बच्चा फिर न माये हमारे घर- -~-फिर? उस दिन रात को उन रेलवे क्वाटरों में अचानक जैसे घटनाचक्र से मृत्यु का आविर्भाव हुआ था पर तब तक किसी को भी उसका माभास नहीं हुआ था। और होता भी कैसे ? कभी हुआ है आज तक किसी को ? बेचारे चार्ली को ही कहाँ मालूम था पहले कि उस दिन वह गुस्से में डैडी का रिवॉल्वर लेकर वहां जायेगा और ऐसे दुर्योग में फंस जायेगा? --पर फेडी, नेग्मी बार-बार तुम्हारे सामने मेरा अपमान कर रही है और तुम उसे कुछ भी नही कह रहे ? रोक नहीं रहे, इजन्ट इट शो यौर कनाइवेन्स? फेडो को उस समय सचमुच बड़ी असहाय अवस्था हो गई थी। दोनों की खोंचतान में पत्थर बना खड़ा था वह । ।
चार आंखों का खेल 1६४ - बोला-मैं कह रहा हूँ चार्ली तुम घर जाओ, गो होम । तुम्हारा दिमाग ठीक नहीं है इस समय--यू आर अपसैट इनफ़ टु थिक ईवन.. --मेरा दिमाग ठीक है फ्रेडी, दिमाग ठीक नहीं है तुम्हारी मिसेज़ का-नैन्सी का- -निकलो, निकलो यहाँ से निकल जाओ मेरे घर से-नैन्सी गरजी थी। और उसके बाद ही कुछ देर तक जैसे छीना-झपटी हुई और फिर एक विकट शब्द के साथ सब कुछ शांत हो गया था। - उन दिनों चक्रधरपुर में उस विषय के अलावा और कोई बात हो नहीं थी किसी की जुबान पर ! जहाँ चार लोग जुड़ते बस शुरू हो जाती बातें। कोई कहता-यह तो सोचा भी नहीं जा सकता था कि चार्ली जैसा लड़का रिवॉल्वर लेकर नैन्सी को मारने आयेगा- तो दूसरा कहता-सोचा कैसे जा सकता था। देखने में तो बड़ा सीधा था, जैसे बोलना भी नहीं आता। न कभी किसी लड़की को साइ- किल के पीछे विठाये घूमते देखा और न कभी सिगरेट ही पीते देखा। तारक बाबू को तो सबसे अधिक आग्रह था। काम-काज कुछ था नहीं । जहाँ ऐसो वातें हो रही होती लाठी ठकठकाते पहुँच जाते । उस दिन भी पहुँच गये। वोले-नहीं मोशाय वह इतना सीधा नहीं था- नरसिंह वाबू बोले-ये एंग्लो-इण्डियन्स ठहरे केउटा साँप, सव कुछ संभव है इनके द्वारा- तारक वावू बोले-आप कहना चाहते हैं कि खून उस छोकरी ने किया है ? A- -उस काली-कलूटी पूरी औरत को आप छोकरी कहते हैं ? वह तो दादी है, दादी; छोकरी नहीं ! सब कर सकती है वह !---नरसिंह बाबू ने कहा था। –पर जिस समय घर में यह सव हो रहा था मेम साहब कहाँ थीं उस समय?
तरोधों कर . -होतो महो। हरोको सुन हो यो । तारक बाबु बोले- पदाहो और राहतो से होमो मti कि चारों को माँ अरनो क्लेश्याहामोराहो रही थी - उसके बाद उसके बाद और क्या, भर कहाँ का पानी : २६ जाये- सचमुच ऐसा लगता था जैसे उन दिनों पyr के लोगो को नींद उड़ गई थी। जहां जो मिलता माहे राको गार्ड, से गाई । बस यही पर्षा शुरू हो जाती -हैलो, पार्टी के मेरा पा गया था ? चार्ली का मामला जैसे सपना मामला होममायो । समाज में तो इस घटना मे उपल पुल-सीमा दी। उस दिन मिसेज डी'सा को पाया गरे ? - अच्छी नहीं हूँ राइटर, अगी मिरा rumall मिसेज डोसा ने उत्तर दिया। -हो, यह तो है ही- -अब शायद ज्यादा दिन नहीं रोगी ... बहुत दुख हुआ उन्हें प्यार । पहाit immगा। एकदम सूख गया था। पूछा--असली यात मया की? -वह तो मैं भी नही गगाना fulam ममय-जवाब दिया उन्होंगे। -परवापतो उरा रागय यहा। -अकस्मात् जापानी भी fart 1 Esti नहीं जाती तो मायद पाणी या जागा-- --पर न किगने किया ? मैग्गी या.. मेम माझ्या योनी-भीगी Eih me MITRA के एबोन्ग से गय पत्रीरोजायेगा- -गता कय गुगापा विगा? -गवनीदर पाहार, औरगड़ी Artin (मायन ML यच्छा नहीं माना Effair at areीमा चार आँखों का खेल चुपचाप खड़ा रहा मैं भी। कुछ समझ नहीं पाया कि क्या सोच रही थी मेम साहब ! पर उनके अन्दर कुछ अप्रत्याशित घट रहा था इसका आभास मुझे हो गया था। ! । इसके बाद रात को लेटे-लेटे उस तरफ कान लगाये रहता। मेम साहब प्रायः कोर्ट जाती । काफी दूर था चाईबासा कोर्ट । लौट कर चुपचाप घर में घुस जातीं। जो घर एक दिन हँसी-खुशी से भरा-पूरा था उसी घर में मरघट की-सो शांति छा गई थी। आउट हाउस से भी नौकर-चाकरों की आवाज नहीं आती थी अब । सवकी जुबान पर बस एक ही प्रश्न था--- अव क्या होगा? पर जाने वाला तो चला गया था ? आज भी याद है कि जब पुलिस आई थी फ्रेडी को गिरफ्तार करने, डी० एस० एफ० मिस्टर जैन्किन्स भी आकर भीड़ में एक तरफ खड़े हो गये थे। कमरे के एक कोने में निस्पंद पत्थर की मूर्ति के समान खड़ा था फेडी, और उसकी कमर से लिपटी नैन्सी सिसक रही थी। पुलिस को देखकर आतंक से सिहर उठी थी वह । चीख मार कर बोली थी नहीं, नहीं, फ्रेडी ने कुछ नहीं किया है, उसने खून नहीं किया." दरोगा भला आदमी था और वैसे भी ब्रिटिश राज होने के कारण ऐंग्लो-इंडियन्स के साथ पुलिस का व्यवहार इतना खराब नहीं था। नैन्सी चीखी-क्यों आये हो तुम लोग ? चले जाओ-चले जाओ यहाँ से-फेडी ने खून नहीं किया. बड़ा हृदयद्रावक दृश्य था वह भी। चार्ली का रक्त-रंजित निर्जीव शरीरफर्श पर पड़ा था। थोड़ी देर पहले जो झगड़ा कर रहा था, माँ के अपमान का बदला लेने के लिये घर से छुपाकर रिवॉल्वर ले कर आया था, अब उसो का निर्जीव शव वहाँ निस्पन्द पड़ा था। अब चाहे कोई उसके डैडी को गाली दे या मम्मी को वह प्रतिवाद करने नहीं आयेगा। हर कलह, हर विवाद, हर झगड़े -- । ।
चार आंखों का खेल से बाहर चला गया था वह । यदि परलोक नाम की कोई चीज़ है तो उसको आत्मा शायद वहीं पहुंच कर भगवान के सामने अंतिम फरियाद कर रही होगी। कह रही होगी-मेरोमां चाहे जो हो पर है तो मेरी मां, मेरो जन्मदात्री । उसका अपमान में कैसे सह सकता हूँ, अपमान करने वाले को कैसे क्षमा कर सकता हूँ? मेरी मां का अपमान क्या मेरे डैडी का अपमान नहीं है ? मेरी मां का अपमान क्या मेरा अपमान नहीं है ? मां के अपमान का प्रतिवाद करना क्या अन्याय है ? मां के अपमान का बदला लेना क्या अनुचित है ? ऍग्लो-इंडियन्स का ईश्वर अलग है कि नही, पता नहीं, पर अगर दूसरा भी हो तो अन्य ईश्वरों की तरह ही वह भी उस दिन चुप ही रहा । आँखे फाड़े चार्ली की तरफ देखता रहा। और फिर जलद-गम्भीर स्वर में बोला-आमीन!!! संसार में भगवान की करुणा जिन्हें प्राप्त होती है वे उसकी महिमा का प्रचार करते रहें। लेकिन जिन्होंने कुछ भी नहीं पाया वह किस प्रकार विपत्ति के समय भगवान का सहारा लेगे ? किस भरोसे चरम सीमा आने पर उसके चरणों में सर रखकर प्रार्थना करेंगे, अर्जी पेश करेंगे ? कैसे कहेंगे-तुमने मेरे पाप के बदले मेरे चार्ली को क्यों उठा लिया भगवान ? यह कैसा न्याय है तुम्हारा ? उसके बदले मुझे क्यों नही उठा लिया तुमने ? तुम्हारा उठा हुआ खड्ग मेरो गर्दन पर क्यों नहीं पड़ा? उस दिन दूसरे लोगों की तरह मैंने भी वह दृश्य देखा था और सोचा था-इसमें और हममें तो कोई अतर नहीं है । लड़के के शोक में एक हिन्दू मां जिस तरह छाती पीट कर रोती है, यह ऐंग्लो-इंडियन मां भी तो उसी तरह रो रही थी। मां की जान में तो कोई भेद नहीं होता, वह तो एक ही है। जव पुलिस आकर पास खड़ी हो गई थी तब भी मिसेज़ डो'सा को कोई होश नही था । चाली का रक्तरंजित शरीर छाती से लगाये कभी मुंह चूम रही थी तो कभी माथा ठोकती और हृदयवेधी आर्तनाद करके कान के पास मुंह ले जाकर पुकार रही थी-चार्लो, माई सनी-चाली, माई सनी- दरोगा को देखकर भी होश नहीं आया था मेम साहब को-बम चार्ली, चार्ली कहती रहीं-, ६८ चार लाखों का खेल । जमीन पर पड़ा रिवॉल्वर एक सिपाही ने उठा लिया था। फिर मिसेज डी'सा की ओर देखकर बोला था -सुनिये । पर कोई असर नहीं हुआ था मेम साहब पर । -सुनिये हम लोग इन्क्वायरी करने आये हैं-इन्वेस्टिगेशन करने आये हैं --पुलिस के लोग हैं- पर चार्ली का शरीर नहीं छोड़ा उन्होंने । अंत में, पुलिस वालों ने जबर्दस्ती लाश से अलग किया था उनको । कुछ भी हो आखिर थी तो मां ही। माँ से बच्चे को अलग करना क्या आसान होता है ? उनके आर्तनाद से सबके नेत्र सजल हो उठे थे। मेरी भी आँखों में पानी आ गया था। इसके बाद मेम साहब की हालत ऐसी हो गई कि किसी भी तरह उनको घर लाना असंभव हो गया था। तब रेलवे हॉस्पिटल से एम्बुलेन्स बुला कर उसमें लाया गया उन्हें । सबने मुझको ही साथ जाने को कहा था क्योंकि मैं ही मेम साहब का निकटतम पड़ोसी था। मुझे याद है किसी भी तरह चुप नहीं करा पाया था मैं उन्हें । जैसे ही वेहोशी टूटतो वे आर्तनाद करके रोने लगतीं। मैंने उन्हें दोनों हाथों से पकड़ रक्खा था नहीं तो वे स्ट्रेचर से नीचे गिर जाती। मैंने कहा था-चुप हो जाइये मिसेज़ डी'सा - धीरज रखिये मेम साहव शायद पहचान पा रही थीं मुझे। एक बार बोली--अव मैं क्या करूंगो राइटर ? किसके लिये जीवित रहूँगी मैं ? मैंने कहा-क्यों आपकी रेनी तो है । आप ही धीरज खो देंगी तो रेनी का क्या होगा वोलिये ? वह किसके पास रहेगी ? ---पर मेरा चार्ली तो नहीं रहा राइटर । -पर रेनो तो है । उसके लिये तो जिंदा रहना ही पड़ेगा आपको। -लेकिन चार्ली तो मुझे बहुत प्यार करता था राइटर, मेरे अलावा किसी को नहीं जानता था वह, किसी को नहीं पहचानता था-क्या करूं मैं ? कहां जाऊँ ? किसके लिये जियूं ? हृदय फटा जा रहा था मेम साहव का । गई थीं रेलवे कॉलोनी के स्टोर में सामान खरीदने और लाटी वेटे की लाश लेकर । परन्तु उनकी इस अवस्था ने भी मुझे जैसे अचम्भे में डाल दिया - चार योपों का खेल था। जो मां अपने बेटे की मृत्यु के शोक से इतनी कातर हो सकती है वही माँ अपना बेटा घर में होते हुए उसके समवयस्क फेडी के साथ एक विस्तर पर कैसे सो सकी थी। तो क्या इसका यही कारण न था कि मेम साहब केवल मां नहीं, नारी भो धीं। मां और नारी क्या एक दूसरी से कभी जुदा रह सकती हैं ? नहीं ! पर जाने क्यो विश्वास नहीं जम पाता। अपने मन को कितना समझाया है मैंने कभी लगता अभिनय है सब, तो कभी धूर्तता ही प्रतीत होती; छलना और प्रवञ्चना लगती। वड़ा जोर डालता अपनो स्मरण शक्ति पर कि इस विषय पर कहीं कोई कहानी या उपन्यास पढ़ा हो, पर याद नहीं आता। किसी ने लिखा हो शायद इस पर । कई बार लिखते-लिखते कलम रोक दी मैंने। नहीं, यह अश्लीलता है, यह अभद्रता है। मां मां ही होती है। मां को इस अपराध में नहीं घसीटूंगा, मां को कलंकित नहीं करूंगा। ऐसा करने से तो मेरी कलम भी कल फित हो जायेगी। पर फिर उन सज्जन को बात याद आ जाती कि हम लोग किताब देखकर लिखते है क्या- उसी समय मेम साहब याद आ गई थी मुझे। सोचा था अगर वास्त- विक जीवन की कहानी हो लिखनी हो तो मेम साहब को ही कहानी लिखना ठीक है। इससे और कुछ भी हो पर काल्पनिक कहानी लिखने की बदनामी से तो मुक्त हो हो जाऊँगा। याद है, जब मेम साहब को एम्बुलेन्स से उतार कर कमरे में ले गया था तो मेम साहब वेहोश थी । सबने मिलकर बिस्तर पर सुला दिया था उन्हें । रेनो हिचका बांध कर रोने लगी थी। किसी को डाक्टर बुलाने को कहकर मैंने रेनी की ओर देखकर कहा था-रोओ मत-नही तो तुम्हारे रोने की आवाज से तुम्हारो मां फिर जग जायेंगी। छोटी-सी लड़की । जन्म से ही केवल प्यार और ऐश्वयं में पलीथी अभी तक जीवन को सरलता, सहजता, सुख व आराम हो देखा था। संकट किसे कहते है यह कभी नहीं जाना था। डैडो की मृत्यु देखी थी पर वह ऐसी नहीं थी। उससे मानसिक या आर्थिक कोई भी तो संकट उपस्थित नहीं हुआ था उसके सामने । डडी के चले जाने पर भी मम्मी यौं । दैडी का अभाव महसूस नहीं होने दिया था मम्मी ने।
७० चार आंखों का खेल - पर आज ! रेनी की आँखों के सामने जैसे अंधेरा छा गया है। चूंकि मैं ही एक मात्र प्रतिवेशी था इसलिये मैं ही उस दिन से अवि- भावक वन गया उसका । डाक्टर आता तो उसे मेरे ही साथ परामर्श करना पड़ता। पुलिस आती तो भी मुझे हो खड़ा होना पड़ता था जा कर। डाक्टर कहता-नसिंग करनी पड़ेगी नसिंग ठीक नहीं हो रही- लेकिन कौन करेगा नसिंग । अन्त में नर्स बुलाई गई और फिर मैं तो था ही। और मैं तो केवल प्रतिवेशी ही नहीं दर्शक भी था। आँखों के झरोखे खुले रखकर सब देखता और, मन का आईना सामने करके सब उसमें उतारने का प्रयत्न करता था। किसी के ऐसे संकट के समय जिस तरह मेरा सांसारिक मन सहानुभूति दिखाता, उसी तरह मेरे लेखक मन को एक दार्शनिक आनन्द की अनुभूति होती । जैसे देखने, सोचने, लिखने की एक पृष्ठभूमि मिल गयी हो। जब जान डी'सा जीवित थे तो दो-चार बार उनके ड्राइंग रूम में तो अवश्य गया था। बगीचे में बैठ कर तो अक्सर ही उनके साथ चाय पी थी, पर अन्दर कमरों में कभी नहीं गया था। ऐशो-आराम के साधनों व उपकरणों से परिपूर्ण था घर । बाहर से कुछ पता नहीं लगता था। कौन जाने कहाँ से जुटाया था उन्होंने यह सारा सामान । शायद मिस्टर जैन्किन्स साहब के यहाँ भी जो कुछ नहीं था वह यहाँ था। सब कुछ होते हुए भी मेम साहब की ऐसी दुर्मति क्यों हुई? रेनी का सूखा मुंह देखकर समझने की कोशिश करता कि उसे क्या अपनी मां के इस परिणाम का कारण पता चल गया है ? क्या यह भी पता चल गया है कि उसके लिये उसकी माँ ही जिम्मेदार है। उसके भाई की मृत्यु के पीछे भी उसकी माँ की कलंक-कथा जुड़ो थी अदृश्य रूप से? एक दिन रेनो ने पूछा भी था-~अंकल, चार्ली का मर्डर किसने किया ? नैन्सी ने या फ्रेडी ने ? फ्रेडी क्या इतना निष्ठुर हो सकता है ? मैंने कहा था-तुम इन सब बातों को लेकर सिर मत खपाओ बेटी, पुलिस इन्वेस्टिगेशन कर रही है, वही पता लगायेगी- -तब भी तुम्हें किस पर सन्देह है ?-फिर से पूछा था उसने ।
चार मांखों का खेल --पर तुम मुझसे क्यों पूछ रही हो यह सब ? जहाँ किसी के जीवन- मरण का प्रश्न हो वहां सन्देह होते हुए भी केवल अनुमान से कुछ कहना उचित नहीं होता। -~पर अगर यह प्रमाणित हो जाये कि नैन्सी ने मर्डर किया है तो क्या उसे फांसी हो जायेगी? -हो भी सकती है-मैने कहा । -~हो जायेगी तो मुझे बहुत खुशी होगी राइटर अकल- --क्यो ? तुम्हे खुशो क्यों होगी? जब तक नैन्सी नही आई थी हम कितने सुखी थे ? हमारी फैमिली में कोई दुख नहीं था ! फेडी भी हमारा घर छोड़कर नहीं गया था." ---हां, यह तो ठीक है... -और फिर चार्ली को अच्छी तरह जानती थी मैं । मेरा अपना भाई था इसलिये नहीं कह रही हूँ। वह किसी का खून करने जायेगा, इस पर तो विश्वास हो नहीं होता । नैन्सो ने क्यो उसे सड़क पर गाली दी। चार्ली ने तो उसे कुछ नही कहा था । -लगता तो यही है कि चार्ली का इसमें कोई दोष नहीं था। -पर तुम मुझे एक बात बताओ अकल, मां ने क्या सचमुच कोई गलत काम किया है । लोग जो कहते हैं क्या यह सच है ? -लोग क्या कहते है ? मैंने पूछा था। -लोग कहते है कि मम्मी का हो दोष है। उन्हीं की गलती के कारण चार्लो मारा गया। नैन्सी या फ्रेडी को कोई गलती नहीं थी-- मैने कहा- यह तो मुझसे अधिक तुम्हारे जानने की बात है... रेनो ने जवाब दिया-मैं तो यहां रहती नहीं थी- -फिर भी मैं कैसे जान सकता हूँ। बाहर से मुझे कैसे पता लग सकता है तुम्ही बताओ? जाने क्या सोचने लगी रेनो मन में। फिर बोली-मुझे लगता है हमारे घर में फ्रेडी का आना ठीक नही हुआ-- हैरान रह गया था मैं। पूछा था-फ्रेडी को क्या तुम्हारी माँ ले कर आई थी? सर झुका कर रेनी ने कहा-हां... -पर मैंने तो कुछ और ही सुना था" -नहीं अंकल, तुमने गलत सुना था। - ७२ चार मांखों का खेल विश्वास नहीं हुआ था मुझे कि फ्रेडी को मेम साहब खुद लाई थीं इसीलिए पूछा था तुम्हें ठीक मालूम है ? रेनी वोली-हाँ, डैडी के मरने के बाद माँ हमें लेकर खड्गपुर गई थीं। वहीं माँ ने पहली बार फेडो को देखा था। यह सुनकर में और भी हैरान हुआ। इस तथ्य से तो मैं अनभिन हो था । सच, जब माँखों से आँखें मिल जाती हैं तो फिर कोई दवा नहीं रहती उसकी। जैसे हो किसी की आँखों में किसी को आँखें पड़ती हैं, चार आँखों का खेल शुरू हो जाता है । तब न तो उम्र का ख्याल रहता है और न सम्पर्क का तारतम्य । शर्म-लिहाज भी ताक पर रक्खी रह जाती है। इसी का नाम शायद चार आँखों का खेल है । न्याय-अन्याय, सत्-असत् का प्रश्न भी नहीं रह जाता तव । विचार, विवेचना-बुद्धि भी नहीं रह जाती । चार आँखों के खेल में कोई भी प्रश्न, प्रश्न नहीं होता, वहाँ तो आँखों का नशा होता है वस । उस नशे के कारण कितने हो परिवार संकटग्रस्त हो जाते हैं, कितने अतल गहराई में चले जाते हैं कहीं कोई रिकार्ड नहीं है इसका। और कोई हिसाव, कोई रिकार्ड नहीं है इसी कारण तो आज मैं यह किताब लिखने बैठा हूँ। मुकदमा चलते काफी दिन हो गये थे। उस दिन रात को नैन्सी भो आकर चली गई थी। शहर में हर समय यही चर्चा रहती थी हर एक को जुबान पर । जितने मुंह उतनी बातें। जिन लोगों को एक की चार करने में ही सुख मिलता है, उनके लिए मसाला काफी था। रास्ते में जब भी तारक वावू या नरसिंह वाबू मिल जाते तो पकड़ लेते। - ? कहते-तुम तो वगल में रहते हो, मामला क्या है ? पता लगा कुछ मैं कहता-नहीं.. तब भी नहीं छोड़ते वह । उनको लगता जैसे मैं बताना नहीं चाहता। जानता सब हूँ पर दवा जाता हूँ।
धार आंखों का खेल कहते-मैंने तो सुना है कि तुम एम्बुलेंस में मेम साहय गो पर से गये थे? उसके बाद होश नहीं आया उन्हे ? तुमने उनसे पूछा नही गुरु मो? इन सब बातों का जवाब नहीं देता मैं। और जवाब देना भी पाई तो क्या दूँ? मैं बाहर का आदमी जो ठहरा। मैं पूछू भी तो यह गुझे बताने क्यों लगी और उन्हें भी असलियत पैसे पता चलती। गह अन्दर तो थों नहीं घटना के समय और कमरे का दरवाजा अन्दर से बन्द था। मैं तो मेम साहब को लेकर चला आया था। उधर मोधी गर गिरफ्तार करके ले गई थी पुलिस । और चार्ली की मृत देह ? इस बारे में जो भो नियम-कानून है सब पूरे हुए थे। पोस्ट-गाटंग से शुरू करके थाना, पुलिस, कोर्ट, कचहरी रावने मिलकर पाधरपुर निवासियों को उत्तेजना को अच्छी खुराक जुटा दी थी। फेडी की जमानत नही हुई थी। उसे हर तारीख पर हयाणारा रो लाकर कटहरे में हाजिर किया जाता था । जैसे ही किसी को गवाही शुरू होतो वह मुंह बाये मूगी आपों से देखता रहता सबको। वह मानो कुछ भो न सुन पा रहा होता । गुणों को, समझने की शक्ति ही कहाँ रह गई थी उसमें? बयानबन्दी में कुछ भी नहीं कहा था उसने । अर्थात् एंगा कुछ नहीं कहा था जो उसके विरुद्ध जाता। उससे पूछा गया था-~जो रिवॉल्वर जमीन पर पड़ा था यह पिगमा -हो। वालों का - फेडी ने जवाब दिया था। -वह क्या तुम्हारी पत्नी का यून करने आया था ? -फिर? उसके बाद क्या तुमने उसके हाथ में रिवाल्वर छीनना चाहा था? --नहीं। -नो फिर किमकी गोली से चानी का मृन ना? म्हारी दा तुम्हारी पत्नी को? --पता नहीं।
चार आँखों का खेल पता नहीं मतलव ? तुम तो कमरे में ही थे तुम्हारे सामने ही तो आपस में कहा-सुनी हुई थी ? का भी कोई उत्तर नहीं दिया था फ्रेडी ने । इसके बाद कितने न किये गर पर फ्रेडी के मुंह से आवाज ही नहीं निकली । गूंगा हो या जैसे वह । इसके बाद नैन्सी की वारी आई थी बयान देने की। -जब चार्ली का खून हुआ, तब तुम कहाँ थीं ? -अपने क्वार्टर में। -चार्ली जब आया तो उसके हाथ में रिवॉल्वर था ? -हाँ। -वह क्या तुम्हें मारने आया था ? -किस मतलब से आया था यह तो नहीं मालूम । पर वह फेडो को डरा-धमका जरूर रहा था। -फ्रेडी से कोई वैर था उसका ? --होना स्वाभाविक ही है क्योंकि फ्रेडी पहले उनके घर रहता था, फिर चला आया था। --चले आने में गुस्से की क्या बात थी ? -उसके चले आने से उनकी आय पर प्रतिकूल असर पड़ा था। लेकिन घटना के दिन शाम को लेवेल क्रॉसिंग पर तुमने चार्ली को गाली दी थी क्या ? -गाली मैंने नहीं दी थी बल्कि चार्ली ने ही गाली दी थी मुझे। -उसी गुस्से में क्या वह तुमसे बदला लेने आया था ? -शायद ऐसा ही था। -पर उसो के रिवॉल्वर से उसका खून किसने किया ? यह मुझे नहीं मालूम। -विल्कुल जानती हो तुम । बताना पड़ेगा तुम्हें । जब तुम कमरे में हो थी तो निश्चय ही तुमने सब देखा होगा। फ्रेडो ने ही क्या तुम्हें बचाने के लिये चार्ली के हाथ से रिवॉल्वर नहीं छीन लिया था ? -नहीं, नहीं, फ्रेडी ने खून नहीं किया । वह खून कर ही न सकता । फ्रेडी बहुत अच्छा लड़का है । --पर किसी ने तो खून किया ही है। बताओ, किसने किया है -मुझे नहीं मालूम ।
चार आंखों का खेल । -मालूम नहीं का मतलव ? -~~मैं बहुत डर गई थी। डर से मैंने आंखें बंद कर ली थी। गोली चलने की आवाज से आंख खुली तो देखा चाली जमीन पर पड़ा था और उसके सर से खून बह रहा था। पर सरकारी वकील इतना वेवकूफ नही था । खोद-खोद कर बातें निकालने लगा, जिरह करने लगा। जिरह में नैन्सी गड़बड़ा गई। प्रश्नों के उल्टे-पुल्टे जवाब देने लगी। मिस्टर बुकानन को काली लड़की नैन्सी। चक्रधरपुर के एंग्लो- इंडियन समाज की सबसे बुरी तकदीर वाली थी । कभी धूम कर भी किसी ने नहीं देखा उसको ओर । इतने दिन बाद मुश्किल से विवाह करके गृहस्यो जमाई थी । फ्रेडी जैसा अच्छा पति उसे मिला यह शायद सहा नहीं गया किसी से। उस दिन लड़कों में भी आपस में इसी बात को लेकर चर्चा हो रही थी। एक ने कहा-असल में खून तो नैन्सी ने ही किया है असली मर्डरर तो वही है- -यह कैसे हो सकता है ? होता है, होता है ! इस दुनिया में सब कुछ सभव है । उस दिन घर में जो मौजूद था, उसी ने मुझे बताया है- -कौन है वह ? नैन्सी का बटलर । झगड़े को आवाज सुनकर वह किचन से वरान्डे में आकर खड़ा हो गया था। -उसके बाद? --आश्चर्य है आश्चर्य । दुबली-पतली लड़की है तो क्या पर कम तेज नही है। फेडो के साथ विवाह होने के बाद तो जैसे वह तेज और भी बढ़ गया है, धमंड के कारण जैसे उसके पैर नही पड़ते जमीन पर। फ्रेडी का हाय हाथ में लिये हर रविवार को वर्ष जाती थो मानो सवको दिखाना चाहती हो कि तुम लोगों ने मुझे दुत्कारा तो क्या हुआ देखो फ्रेडी कितना प्यार करता है मुझे । और फ्रेडी भी वैसा ही था। कहां का मां द्वारा विताड़ित लड़का । ममता और प्यार का मुंह ही नही देखा जिसने बचपन से । फिर यहां आकर जो प्यार और चारं सांखों का खेल N मिला वह जितना कदर्य या उतना ही वीभत्स भी । हाँफ उठा था वह मिसेज़ डी'सा के प्यार से । भागना चाहा था उसने । आत्महत्या करने को भी सोची हो शायद । छुप-छुपकर रोया भी होगा । फिर जब किसी तरह भी शांति नहीं मिली तव नैन्सी में ही आश्रय ढूंढा था उसने । एक सी अवस्या थी दोनों की-विताड़ित प्रताड़ित । इसीलिये दोनों जब रेलवे इन्स्टिट्यूट में मिले तो दोनों की जान में जान आई। दोनों को जैसे अपना-अपना आश्रय मिल गया था। इस पृथ्वी के सर पर जैसे एक सूर्य है उसी प्रकार जमीन के अन्दर भी एक अंधेरा नरककुंड है जहाँ उस सूर्य का प्रकाश नहीं पहुँचता । अगर वहाँ तक पहुंच पाता तो आदमी को जीवन के अनेकों दुर्भोगों से मुक्ति मिल जाती । बहुत से कलंकों से दूर रहता वह । उस नरक की वात जानते सव हैं पर आंख की आड़ में रखकर मुख पर पवित्रता को वातें करते हैं । साहित्य में अभी तक अपांक्तेय कर रखा है हमने उसे, समाज से भी छिपा कर रक्खा है । कभी-कभार अगर पत्र-पत्रिका में वह प्रकाशित हो जाता है तो या तो हम छिः छिः करने लगते हैं या पन्ना पलट कर उधर से आँखें फेर लेते हैं और मन को अन्यत्र बहलाने की कोशिश करने लगते हैं। उसी प्रकार फ्रेडी ने भी एक दिन मन को बहलाना चाहा था । सोचा था लोगों की आंखों की आड़ में, अंधेरे में जो कुछ हुआ था उसे कोई नहीं जान पायेगा। नये परिवेश को स्वस्थ आबोहवा में वह भी जीवन का नये रूप में मास्वाद लेगा। भूल जायेगा अतीत की बातें। मन से निकाल देगा सव, विगत परिच्छेद के वे कलंकमय कुछ पन्ने जीवन की किताव फाड़ कर ही फेंक देगा। परन्तु उस दिन क्या उसे पता था कि जीवन के आईने में जब किसो चीज़ को प्रतिच्छवि पड़ जाती है तो पसन्द-नापसन्द की बात नहीं रह जाती। दोनों को स्वीकार करके नीरव दर्शक होने के अलावा कोई उपाय नहीं रह जाता मनुष्य के लिये। जिस प्रकार वह सूर्य सत्य है, उसी प्रकार वह नरक भी सत्य है। दोनों का अस्तित्व मान लेने पर कोई भी गोलमाल नहीं रह जाता। हवालात में जितने दिन फ्रेडी बंद रहा, रोज नैन्सी उससे मिलने जाती रही। खून का मुलजिम । चक्रधरपुर निवासियों के लिये जितना वह चार आंखों का खेल ७७ अचंभे की वस्तु था पुलिसवालों के लिये उतनी ही चिंता का विषय भो। नैन्सी सीखचों के इस पार रहती और फ्रेडो उस पार । कुछ देर दोनों एक दूसरे की ओर अपलक देखते रहते, फिर नैन्सो हाथ बढ़ाकर उसे छूतो। धीरे-धीरे कहती-फ्रेडी, माई डियर-- फ्रेडो चुप ही रहता, कुछ नहीं कहता 1 बस उसकी आंष से टप-टप् आंसू टपक पड़ते। तुम चिंता मत करो फ्रेडी । डोण्ट यू वरी-मेरे लॉइयर ने कहा है एवरी थिंग विल वी आलराइट-सव ठीक हो जायेगा। --पर मैंने तो खून किया है नैन्सी । अपने हाथ से मैंने चार्ली को. झट से अपने हाथ से फ्रेडो का मुंह बंद कर देती नैन्सी-श-श्-श- श्..'नेवर अटर दोज़ वर्ड्स अगेन ! चुप रहो। यह क्या हो गया है तुम्हें । सब सुन लेंगे। तुमने खन किया है तो क्या तुम दोपो सावित हो गये ? यह कोर्ट है। मदालत है इसका नाम। यहां रात को दिन और दिन को रात बनाया जाता है। कौन खूनी है और कोन निरपराध, इसके विचारक तुम नहीं हो। उसके लिये कोल कर लिया गया है। बिहार का वैस्ट वकील है। सारा पैसा उस वकील पर लुटा रही हूँ। सारा जेवर वेच दिया है । तुम विल्कुल चिंता मत करो। जो कुछ भी करना होगा वह लोग ही करेंगे । बस तुम अपना स्टेटमेंट मत बदलना । संसार के सच-झूठ और कोर्ट के सच-झूठ के मानदंड अलग- अलग होते हैं। मनुष्य का मनुष्यत्व जिस प्रकार वास्तविकता है उसी प्रकार कोर्ट की वास्तविकता एवीडेन्स है । प्रमाण न मिलने पर तुम्हारे ऊपर मुकदमा चलाने का अधिकार किसी को नहीं है । सन्देह के रन्ध्र द्वारा तुम अवश्य छूट जाओगे। क्यों सोचते हो? प्रेटु गॉड । भगवान से प्रार्थना करो। लॉर्ड जोसस क्राइस्ट का आशीर्वाद तुम्हारी रक्षा करेगा, उस पर विश्वास रक्खो। ---पर नैन्सी, अब मेरी सहन शक्ति जवाब दे रही है। -~और कुछ दिन धैर्य रक्खो । केस तुम्हारे फेवर में है । अब धैर्य मत खोओ। कीप यौर नज भाई डियर! ।
चार आंखों का खेल - लेकिन नैन्सी के बटलर की गवाही ने सब उलट-पुलट कर दिया। उसकी गवाही गवाही से कोर्ट में हो-हुल्लड़ मच गया। अब तक जिस प्रकार मुकदमा चल रहा था, जिस ओर जा रहा था ठीक उससे विप- रीत दिशा में चल पड़ा अव । वह बोला-मैंने मेम साहब के हाथ में पिस्तौल देखी थी- -~-मेम साहब को गोलो छोड़ते देखा था- नहीं। -तो फिर? -देखा पिस्तौल जमीन पर पड़ी थी । लगा मेम साहव के हाथ से ही गिरी थी वह और जरा देर बाद ही वह ऐसी उलटी-सोधी बातें करने लगा कि कोर्ट में शोर मच गया। उस दिन को गवाहो के बाद नैन्सी भी जरा डर गई थी। उसी दिन रात को तो मेम साहब के घर वह अघटनीय घटना घटी थी। नैन्सी खुद गई थी मिसेज़ डी'सा के यहाँ । ऐसी कल्पना नहीं की थी मैंने । रात के शायद बारह बजे थे। राँची रोड निस्तब्ध और जन शून्य थो। कभी-कभी दो-एक गाड़ियां रांची की ओर तेजी से गुज़र जाती। सामने के मैदान पर अंधकार का राज्य था। और उघर स्टेशन के यार्ड से बीच-बीच में शंटिग की आवाज आ रही थी बस ! ऐसे समय सबके निद्रा-निमग्न रहने की बात थी । ठीक उसी समय मेम साहव के घर के बाहरी दरवाजे पर खटखटाहट हुई थी। -~-कौन? अन्दर से रेनो की आवाज आई-हूँ ? हू इज दैट ? इतनी रात को कौन आ सकता है । जरा देर पहले मैं वहीं था। कोर्ट में जो कुछ उस दिन हुआ था, वही बताने गया था । ध्यान से सुना मेम मैंने कहा था-अब तो डरने की कोई बात नहीं है- -क्यों? -फ्रेडी के बटलर की बात से तो प्रमाणित हो गया है कि पिस्तोल नैन्सी के हाथ में ही थी... -उससे क्या प्रमाणित हो जायेगा कि खून नैन्सी ने किया है ? था सब कुछ साहव ने। -- चार आंखों का पेल कोई आश्चर्य नहीं। पुलिस जव कमरे में घुसो तो रक्त में डूबा चार्ली धरती पर पड़ा था । आप भी खड़ी थी वहाँ । फ्रेडी भी खड़ा था और पास हो नैन्सी भी खड़ी थी... मेरी तरफ अच्छी तरह देखा मेम साहब ने । भयाच्छन्न हो गये थे उनके नेत्र। बोली-तो फिर क्या होगा? --सव कह रहे थे कि अव नैन्सी को भी अरेस्ट कर लेगी पुलिस... -अगर प्रमाणित हो जाये कि नैन्सी ने खून किया है, तब ? -तब जो होना है वही होगा। जाने क्या सोचने लगी थी मेम साहब मन हो मन । फिर कुछ बोली नहीं थीं। दूसरी ओर करवट ले ली थी उन्होंने । मैं भी उठकर चला आया था। रेनो वही थी। मेरे साथ वह भी कमरे से बाहर आ गई। इधर कुछ दिनों से जैसे उसके मुंह को आवाज भी बन्द हो गई थी। उसकी आँखों के आगे भी जैसे अँधेरा छा गया था। इस उम्र में ही मानो बुढ़िया हो गई थो वह । न ढंग के कपडे पहनती थी और न कुछ बोलती थी। पहचानी ही नहीं जाती थो वह । मेरे पीछे आकर पुकारा-राइटर अंकल... पीछे घूमकर पूछा-क्या है रेनी ? हम लोगों का क्या होगा अंकल ? -क्या होगा तुम्हारा? मुकदमा तो चल रहा है." ~मुकदमे में क्या होगा? क्या लगता है तुम्हें ? -~-अभी क्या कह सकता हूँ मैं ? अब शायद नैन्सी को अरेस्ट करेगो पुलिस । आज के एक गवाह को एवोडेन्स से तो मुकदमे का रुख ही बदल गया है इसका मतलब? --इसका मतलब है कि यदि प्रमाणित हो जाता है कि मर्डर नैन्सी ने किया है तो शायद उसे फांसी हो जाये । सुनकर सहसा स्तंभित हो गई रेनी । कुछ बोली नहीं। फिर कोई बात नहीं हुई । मैं अपने घर चला आया धीरे-धीरे । रेनी ने भी दरवाजा बंद करके अन्दर से चिटकिनी लगा ली थी।
No text on this page.
धारणा काम १ दूर पड़ी तो सब देख रही । देवकर आश्चर्य चकित रह गई थी। जो सारं झगड़ों की जाधी यही बाज भाकर गांवों में सर रगह रही थो, विश्वास नहीं हो रहा था उसे । जव तानेन्सी नहीं आई भी तब तक परिवार में कितनी शांति भी कितना सामजस्य था, सा समन्वय था ! तव पानी, नी, मागी, ही सब मिलकर चर्च जाते, इन्स्टिट्यूट जाते । गाम को गार्टन में टेचिन-मुसी लगाकर चाय पीते। पर जाने किस पणुम घड़ी में एक माह कारगैन की लड़की का बाविर्गाव हुआ और सब जैसे तहस-नहरा हो गया। रेनी भी यह मव देवकर अपने को रोक नहीं पाई। बोली-निकल जामो, निकल जामो तुम.... मां बेटी दोनों ही जिम घर से निकल जाने को कह रही हो, उसके लिये चले जाने के अलावा और उपाय मी या था। पर टम दिन नेगी इस घर से निकल कर चले जाने के निये नही पाई थी। बोली-मुसीवत में पह कर. तुम्हारे पास थाई है, हम नग्न निकाली मत मुझे-आई वैग यौर पिटी... --किसने थाने को कहा तुममे । अपना ही सर्वनाम किया ही अब हमारा भी सर्वनाश करना चाहती है। पहले ही कृष्ट नमर टोड़ी है क्या जो.... --मुझे क्षमा कर दो आंटी, याज में नृप माफी मांगने की गई वयों माफी दूं तुम्हें ? कौन-सा उपकार किया है हमने हमारा ? चाली का मर्डर कर दिया और फिर महे दाद भी मुंह दिम्बान चली आई ही? नैन्मी बोली पर मेरे लिये और कोई प्रास्ता भी नी नहीं है आटी इसके मिवा.... -~ -आय नही मोजन्म में जाओ--यहां क्यों आई हो ? अब गुरे FAIRS रोगोई नही मना मत्रता आटी ? ~दम माटी का कोई पालनही आया था पद छाती ठोककर दी गयी ? आम ? माहौ गया तुम्हारा फेडी? रोपी - बाण माफी मांग नही आंटी कुछ भी #famithsti in मांगी है.... ६ ..
चार आंखों का खेल ARA - -तुम्हारे माफी मांगने से सब हो जायेगा ? और मैं माफ कर दूंगी तुम्हें ? ऐम आई सो फुलिश ? -लेकिन अगर तुमने माफ नहीं किया तो फ्रेडी को फांसी हो जायेगी आंटी। हो जाये फांसी । फेडो को फाँसी हो या तुमको, मुझे इससे क्या ? मुझे क्यों परेशान करने आई हो तुम ? -आंटी, इस बार माफ कर दो बस... -नहीं, चली जाओ तुम-गेट माउट फॉर गुड ! कहकर करवट बदल ली थी मेम साहब ने अर्थात् अब वह उसके साथ बात नहीं करना चाहती थीं। किन्तु जो जीवन-मरण की अंतिम सीमा पर खड़ी थी उसके लिये मान-अपमान का प्रश्न ही कहाँ था । अगर मरना ही उसकी नियतिथी तो फांसी के फंदे से मरना और आंटी की लात खाकर मरना दोनों एक जैसे थे। कसकर पाँव पकड़ लिये नैन्सी ने मेम साहब के। कहने लगी आंटी आंटी- पांव खींच कर गुस्से से एक लात मारी मेम साहब ने और जोर से चिल्लाई-निकल-निकलती है कि नहीं-यू बिच... रेनी भी अब तक जो थोड़ी भद्रता दिखा रही थी उसे छोड़कर गुस्से में भर उठी। हाथ पकड़ कर खींचते हुए बोली-जाभो, निकल जाओ हमारे घर से हम क्या तुम्हारे कारण सोयें भी नहीं- कातर स्वर में रेनी से बोली-रेनी तुम मेरी विपत्ति के बारे में सोचो एक बार ! कितने बड़े संकट में पड़कर मनुष्य इस प्रकार लांज- शरम छोड़कर किसी के पाँव पकड़ता है- -हमें क्या जरूरत पड़ी है सोचने की.... पर बताओ मैं क्या करूं? -क्या करना है यह तुम जानो। हमें कोई मतलब नहीं इससे -अगर मेरे फ्रेडी को फाँसी हो गई तो? -फांसी तो होगी ही, साथ ही तुम्हें भी फांसी पर चढ़ा दें वह लोग। हमारा कुछ नहीं आता-जाता इससे, तुम चली जाओ यहाँ से । मेम साहब खिन्न हो रही थीं नैन्सी की बातों से। बोलीं-क्यों उसके साथ बात कर रही है रेनी । जाने को कह दे न उसे,-शो हर आउट! Re- -
चार आंखों का खेस
-
-मैं तो कह रही हूँ मम्मी, पर वह जा ही नहीं रही।
-धक्का देकर नहीं निकाल सकती उसे ? तेरे बदन में इतना भी
जोर नहीं है-
--आंटी!
करुण दृष्टि से नैन्सी ने मेम साहब की ओर देखा।
-नहीं, मैं तुम्हारी कोई बात नहीं सुनूंगी, तुम चली जामो मेरे
घर से-प्लीज़ नैन्सो यू गो अवे !
–पर मेरा क्या होगा?
---मेरे अपने बारे में कौन सोचे इसका तो ठिकाना नहीं है । मैं
सोचूंगी तुम्हारे बारे में?
-मेरे बारे में मत सोचो, पर फ्रेडी के बारे में तो सोचोगी?
~~तो क्या मेरे लड़के से फ्रेडी बड़ा हो गया? कौन है वह मेरा?
कोई नहीं है । कुछ नही लगता वह मेरा।
--तो फिर मैं जाऊँ?
तो फिर यही अतिम मिलना है तुम्हारे साथ आंटो।
-भले ही हो।
कहकर मेम साहब ने तकिये में मुंह छुपा लिया।
धीरे-धीरे नैन्सी उठकर खड़ी हो गई। फिर जैसे आई थी वैसे ही
लोट गई और अंधेरे में खो गई।
कोर्ट में फिर कोलाहल मच गया एक बार । जो लोग हर पेशी पर
चाईबासा जाते थे उस दिन आकर एक नई हो खवर सुनाई उन्होंने ।
सुनकर तारक वाबू बोले-अरे मोशाय, मैं तो तभी से कहता भा
..
-क्या कहते आ रहे हैं ?
-कहता आ रहा हूँ कि मेम साहब का ही दोष है। सारे झगड़े
की जड़ मेम साहब ही हैं....
-इसका मतलब-नरसिंह वाबू ने पूछा था ।
-इसका मतलब यह है कि उसी की वजह से झगड़ा बढ़ा । मेम
चार आंखों का खेल । साहब का ही चरित्र यदि अच्छा होता तो ऐसा होता ही क्यों ? वही तो अन्दर ही अन्दर पी रही रही थी अब तक । उसो के पाप के कारण ही तो उसका लड़का मरा। खवर विल्कुल ही नई व रुचिकर थी। अब तक की प्रति-दिन की कोर्ट की खबरें जैसे उनके मन को उल्ल- सित नहीं कर पा रही थीं। जैसे जो चाह रहे थे वह सुनने को नहीं मिल रहा था । और आज वह सुनने को मिल गया था। ऐंग्लो-इंडियन परिवारों में भी एक हलचल-सो मच गई थी उस खबर को सुनकर। उनके अपने समाज की निन्दा जो थी उसमें । जब तक यह खबर दवो हुई थी तब तक तो स्वयं वे ही उसे लेकर मज़ाक करते रहे पर वे यह कभी नहीं चाहते थे कि वह सब पर प्रकट हो जाये । नेटिव लोगों के सामने वह स्वयं को उनसे ऊंचा बनाये रखना चाहते थे । पर ऐसा हुआ नहीं। ब्रिटिश राज में भय के कारण जिन्हें सम्मान देना पड़ता था उनका कोई दोष, कोई त्रुटि मिलने पर खुश होने की बात यहाँ भी थी। क्लब में, इंडियन इन्स्टिट्यूट में, घरों के सामने जहाँ भी चार आदमी इकट्ठा होते यही खुसपुसाहट होने लगती। जिसने अब तक नहीं सुना था सुनकर कहता-अच्छा ऐसा... -हाँ मोशाय, हाँ- -पर अब क्या होगा? --और क्या होगा, फाँसी हो जायेगी। जैसे फाँसी हो जाने से सबको एक अद्भुत खुशी मिल जायेगी। अर्थात् वह लोग चाहते थे कि केस लम्बा चलता रहे । और यह रोमांच बना रहे, कौतूहल जागता रहे नित्य प्रति । केस जरा और जटिल हो जाये । अपने को उनसे उच्च समझने वालों की कुछ और निन्दनीय बातें सुनने को मिलें। अगले दिन हो रेनो के साथ मेरा साक्षात् हुआ। मुझे देखकर बोली-राइटर अंकल, जानते हो क्या हुआ ? कल रात को तुम्हारे चले जाने के वाद नैन्सी हमारे यहाँ आई थी- फिर धीरे-धीरे सारी घटना सुना दी। मैंने पूछा-फिर? -फिर मैं अपने कमरे में सोने चली गई थी। रात को मम्मी ने घार आंखों का खेल भी कुछ नहीं कहा उसके बाद । पर आज सुबह से न तो वह कोई बात कर रही हैं और न कुछ खा रही है, बस वैसी ही पड़ी हुई हैं। इसी तरह कई दिन निकल गये । यथारीति मेम साहब को देखने गया था, पर कोई बात नहीं की उन्होंने मेरे साथ । मैंने पूछा था-कैसी हैं ? धीरे से जवाब मिला-अच्छो हूँ- और कोई बात नहीं हुई। मुकदमें के संबंध में भी मैने भी कुछ नहीं पूछा । एक उदासीन भाव आ गया था उनमें मुकदमे की हार-जीत के लिये भी कोई भावना या चिंता नहीं रह गई थी जैसे । चार्ली को मृत्यु का भी कोई आवेग, शोक नही रह गया था उन्हें । मेम साहब, मेम साहब नही रह गई थी । क्या हो गई थी, कहना असम्भव था। तीन दिन बाद की बात है ? कोर्ट में उपस्थित लोग अंचभे में पड़ गये थे । मेम साहब का अपना लड़का मारा गया था। उनकी गवाहो पर ही सब निर्भर था । इसलिये उस दिन उनकी गवाही सुनने के लिये इतनी भीड़ थी कोर्ट में। फेडी भी अपने कटघरे में चुप, सूनी आंखें लिये खड़ा था। सरकारी वकील मेम साहव से जिरह करने लगा। -~आप उस दिन मुलजिम के क्वार्टर में किसलिये गई थी ? शान्त स्वर में मेम साहब ने जवाब दिया-फैडी के क्वार्टर में जाने के लिये तो मैं घर से निकली नहीं थी, में तो प्राविज़न खरीदने गई थी। -तो फिर फ्रेडी के घर कैसे पहुंच गई? -बहुत दिन से फ्रेडी को देखा नहीं था, और उसके लिये मन जाने कैसा हो रहा था- -फिर ? फेडी से मिली? - -~मैंने बाहर से ही अपने लड़के चार्ली को आवाज सुनी। -लड़के की आवाज सुनकर हो आप मन्दर नहीं गई ? वकील के प्रश्न में व्यंग्य का तीखा डंक था। -नहीं। अविचल उत्तर था मेम साहब का। -क्यों नहीं गईं ? क्या आपको किसी तरह की हिचक हुई थी अन्दर जाने में...क्योंकि आपका बैटा वहां था?
- ८६ चार आंखों का खेल -नहीं, हिचक किस बात की होती ? हैरानी में पड़ जाने के कारण ही अन्दर नहीं घुसी थी। उससे पहले कभी मैंने अपने लड़के को वहाँ जाते नहीं देखा था-इसीलिए ज़रा ठिठक कर रुक गई थी। आप क्या बाहर खड़ी होकर अन्दर की बातें सुनने लगी थीं ? -हाँ। -क्या सुना आपने ? -सुना चार्ली नैन्सी को गाली दे रहा था। गाली क्यो दे रहा था? -उस दिन शाम को नैन्सी ने रेलवे लेवेल क्रॉसिंग पर चार्ली को साइकिल से धक्का दे दिया था शायद इसीलिये। -क्या कह रहा था वह ? -लडी, बास्टर्ड, ब्लैकी... -और क्या कह रहा था ? और जो कुछ कह रहा था वह मेरे मुंह से नहीं कहा जायेगा। भाषा अश्लील थी- -आपने इससे पहले कभी अपने लड़के को इस तरह की अश्लील भाषा का व्यवहार करते सुना था ? -हाँ। --पर दूसरे गवाहों ने तो कहा है कि आपका लड़का बहुत शान्त प्रकृति का था । उसने कभी किसी के साथ झगड़ा नहीं किया था। यह क्या झूठ है ? -हाँ। ---क्या इन सब लोगों ने झूठ बोला है ? -हाँ, मैं चार्ली की माँ हूँ। मुझसे भी ज्यादा क्या वह लोग जानते हैं चार्ली को? -अच्छा यदि मान लिया जाये कि आपका लड़का बदमिज़ाज था तो क्या आप यह कहना चाहती हैं कि आपके लड़के की गालियों से ही नैन्सी ने धीरज खोकर फ्रेडी को उत्तेजित किया ? -नहीं, मैं यह नहीं कहना चाहती-मिसेज़ डी'सा ने कहा। --तो फिर उस कटघरे में खड़े मुलज़िम की तरफ देखकर बताइये कि वह क्या निर्दोष है ?
चार आँखों का खेत ८७ बहुत देर बाद मेम साहव ने केंडी की ओर नजर उठाई । पूर्ण निस्तब्धता थी कोर्ट में इतनी कि अगर मुई भी गिरतो तो आवाज सुनाई दे जाती। लोगों का कौतूहल चरम सीमा तक पहुंच चुका था। जैसे सब लोग केस के और उलझ जाने की कामना कर रहे थे। अपने जीवन की सुपुप्त कामनाएँ सर्प की तरह मन के गोपनीय गह्वर में छुपी रहने के कारण उनका वहिप्रकाश दूसरे लोगों के जीवन के माध्मय से देखने पर एक विचित्र आनन्द का स्वाद मिलता है मनुष्य को । स्वाभाविक जीवन में उसी साध की पूर्ति न होने के कारण लोग कोर्ट जाते हैं, खून का मुकदमा सुनने के लिये। उस दिन इसीलिए बहुत भीड़ थी कोर्ट में । कई महीने हो गये थे मुकदमे को सुनवाई होते। कोतूहल इतना बढ़ गया था कि लोगों से अब रहा नहीं जा रहा था। एक और मन निष्कर्ष पर पहुँचने की उतावली में था तो दूसरी ओर मुकदमा लम्बा चलने को कामना भी कर रहा था ताकि जीवन में उत्सुकता बनी रहे । --देखिये, अच्छी तरह देखकर वताइयं कि क्या यह आपको अप- राधी नहीं लगता? अपलक देख रही थी मेम साहब फैडी को । फ्रेडी ने भी आंटी की ओर देखा । दोनों को आँखें मिलीं। फिर दृष्टि एकाकार, एकात्म हो गई । मौन वार्तालाप होने लगा-तुम्हें क्या उन दिनों की बातें याद नहीं आती । वह रातें याद नहीं आती। तुम्हारी और मेरी दोनों की हो तो भूल थी। लेकिन उस गलती का प्रायश्चित्त क्या माज इस प्रकार करना पड़ेगा । तुम खून के मुलजिम वन गये और मैंने अपना लड़का खो दिया। नुकसान जो भी हो वह तो हमें भरना ही होगा । उसके लिये मनुष्य का विधान तो जो है सो है ही पर भागे शायद ईश्वर का विधान भी हो । एक प्रत्यक्ष है दूसरा अप्रत्यक्ष, बस यही अन्तर है। जो दिखाई नहीं देता उसके अस्तित्ल के संबंध में सन्देहहो सकता है। पर यह कोर्ट। इससे अधिक कटु सत्य और क्या हो सकता है संसार में ? यहां भी क्या हम अपराधी सिद्ध होगे ? जानती हूँ समाज हमें ग्रहण नहीं करेगा। पर यह समाज भी तो हमारे जैसे मनुष्यों से हो वना है । मनुष्य के समाज ने ही यह कोर्ट बनाया है, यह पुलिस, जज, वकील, मुंशी, एटनी बनाये हैं। पर किसके स्वार्थ के लिये ? न्याय या अन्याय के नि और न्याय-अन्याय का विचार क्या चिरकाल तक एक हो, A चार मांखों का खेल - होगा ? समाज बदल रहा है पर न्याय-अन्याय का मानदंड शायद नहीं बदलेगा ? जाने कव न्याय की प्रतिष्ठा हुई थी, क्रिमिनल कोड की धाराएँ निर्धारित हुई थीं पाँच कानून-विशेषज्ञों के परामर्श से। उसके बाद समाज छलांगे मारकर कितना आगे चला गया, संयुक्त परिवार टूट गये, पर कानून जहाँ का तहाँ खड़ा रहा । अडिग, अचल । आगे और जिरह करने जा रहा था वकील । अचानक जज ने हुक्म दिया । आज अब कोर्ट की कार्रवाई बंद होती -- और उस दिन मामला वहीं स्थगित हो गया। । संसार में संकट आता है और चला भी जाता है। लेकिन डी'सा परिवार पर एक दिन जो संकट आया था वह जैसे टलना ही नहीं चाह रहा था। जब तक संकट रहता है सबको ऐसा ही लगता है पर जब वह खत्म हो जाता है तो वह एक दिलचस्प कहानी वन जाता है। तव जो भी मिलता है उसे ही अपनी विपत्ति की कहानी सुनाने को जी करने लगता है हम सबका । परन्तु डो'सा परिवार इसका अपवाद था। जब मुकदमा खत्म हो गया तो कई साल वाद तक इस मामले को लेकर किसी को हँसते नहीं देखा। चक्रधरपुर के सारे लोग जैसे इस आघात से विमूढ़ से हो गये थे। वहीं कन्ट्रोल ऑफिस था, जहाँ जूली फर्नान्डिस टेलीफोन से रेलों को कन्ट्रोल करता, बूढ़ा यार्ड फोरमैन यार्ड ऑफिस में बैठा शंटिंग का सूत्र-संचालन करता और घर आकर शराब पीता। और तारक बाबू, नरसिंह वावू ? वे लोग भी अपनी-अपनी रिटायर्ड लाइफ की यन्त्रणा का बोझा सर पर उठाये सड़क पर घूमते और हाँफते। कहते-मेम साहब बड़ी अच्छी औरत थीं। जब तक मुकदमा चलता रहा यह वात किसी के मुंह से नहीं सुनी थी। कभी सभी ने उसके चरित्र की आलोचना की थी, गाली तक दी थी उन्हें । फेडो के प्रति सहानुभूति दिखाई थी और नैन्सी को सान्त्वना दी थी।
बाराखा का खल पर मुकदमे के बाद तो बात बिल्कुल हो उलटी हो गई थी। सारी आलोचना नैन्सी और फ्रेडी को केन्द्रित करके होने लगी थी। कोर्ट की दृष्टि में कुछ भी हो, मनुष्य को दृष्टि में फ्रेडी, नैन्सी और मेम साहब सभी के मूल्य रातोंरात बदल गये थे। रातोरात मेम साहव देवी के रूप में परिणत हो गई थीं। रेनी के साथ साक्षात् हुआ कई बार । वह जैसे परयर हो गई थी। घर से बाहर हो नही निकलती थी। आवाज तक सुनाई नहीं देती थी उसको । ऐसा लगता था जैसे घर में रहने वाले घर छोड़कर चले गये मैं एक दिन रेनो के पास गया था। पूछा था-कैसी हो ? उसका चेहरा बिल्कुल सूख गया था। मेरी ओर देखकर अभ्यर्थना करने की कोशिश की पर लगा जैसे हंसी रुदन में परिवत्तित हो गई हो। बोली-ठीक हूँ। मैंने कहा-अगर तुम्हें कभी किसी चीज की जरूरत हो तो मुझसे कह देना, संकोच मत करना.... रेनी बोली- मैं अब यहां नही रहूँगी... -कहाँ जाओगी? -अभी कुछ तय नहीं किया है। पूछा-तुम्हारा कोई सगा संबंधी कही है ? रेनी ने कहा-शायद हो, पर मैं किसी को नही जानती। मैंने कहा-यहां से चले जाना ही शायद तुम्हारे लिये अच्छा है। -मैं भी यही सोचती हूँ। -उस दिन मिस्टर जेन्किन्स आये थे? -हाँ। -क्या कह रहे थे? . -कुछ नहीं। - -तुम्हें तो चाहने पर रेलवे में नौकरी भी मिल सकती है। मिस्टर जेन्किन्स इस संबंध में तुम्हारी मदद भी काफी कर सकते हैं- --मैं क्या काम कर सकती हूँ ? --कोई भी। टीचर की अयवा नसिंग की- कुछ देर सोचतो रही रेनो। फिर बोलो-पर यहां रहकर मेरा चार आंखों का खेल 1 m जीना मुश्किल है- यहाँ की हवा मेरे लिये विषाक्त हो चुकी है अंकल ! आई फील ए सॉर्ट आव् सफोकेशन! यह सच था । जहाँ डी'सा फेमिली एक दिन सम्मानपूर्वक गर्व से सिर ऊँचा करके रहती थी, वहाँ वह कैसे रह सकती थी ? और फिर वहाँ के ऐंग्लो-इंडियन लड़कों के साथ घुल-मिल भी नहीं सकती थी वह। मुझे याद है इसके कुछ दिन बाद ही रेनी चक्रधरपुर छोड़कर चली गई थी। जाने से पहले मुझसे मिलकर गई थी। जाने के दिन तक मुझे पता नहीं था कि वह जा रही है। चक्रधरपुर में किसी को भी पता नहीं था । अचानक फैसला कर लिया था उसने । शायद किसी को भी नहीं बताया था अथवा किसी को भी बताना नहीं चाहा था। और बताने को था भी कौन जिसे बताती ? मैंने पूछा था-कहाँ जाओगी? रेनो वोली-देहरादून ! देहरादून ! नाम सुनकर थोड़ा आश्चर्य हुआ था। वहाँ कौन था उसका । तो क्या वहाँ कॉलेज में भर्ती होने जा रही है। वहीं लिखाई- पढ़ाई करेगी। चलो अच्छा ही हुआ । अनजान जगह उसका अतीत तो नहीं जान पायेगा कोई । रात को ट्रेन थी। रात के ग्यारह बजे नागपुर पैसेंजर छूटती थी । जानबूझ कर वही ट्रेन छाँटी थी उसने । दिन के समय लोगों को पता जो चल जाता । झूठमूठ की जवाबदेही करनी पड़ती सबसे । अकेले ही ट्रेन पर चढ़ा आया था मैं उसे । उसके कुछ दिन बाद ट्रक में भर कर उसका सामान भी कहाँ चला गया मैं नहीं जान सका। मकान खाली हो गया। मकान मालिक ने घर के सामने 'टु लैट' की तख्ती टांग दी। आज इतने दिन बाद यह घटना याद आई है तो बार-बार वह अंतिम दृश्य आँखों के सामने आ जाता है । कहाँ गई मेम साहब, कहाँ गया वह फ्रेडी और कहाँ गई रेनी!
धार आँखों का पल बहुत दिन बाद हरिद्वार से मसूरी जाते समय एक कान्वेन्ट में अचा- नक रेनी मिल गई थी। रेनी की बात तब तक दिमाग से बिल्कुल ही उतर गई थी। और फिर रोजमर्रा के सांसारिक झंझटों में याद रहने जैसी कोई बात भी नहीं थी। चलते-चलते एक जगह अचानक बस खराब हो गई थी। पहाड़ी रास्ता था। शाम भी हो गई थी। आस-पास कही कोई वस्ती नहीं थी जहां यात्री आश्रय ले सकते । बस में छोटे बच्चे भी थे दो-चार । और उधर वस के जल्दी से ठीक हो जाने की आशा भी नहीं थी। पीछे से अगर कोई बस आई तो उसी से सब चले जायेंगे यही उम्मीद थी सबको। पर तव क्या पता था कि रात वही गुजारती पड़ेगी । बस नही आई रात को वहां रहने की बात सुनकर सबके दिल जोर-जोर से धड़कने लगे थे । अंत में ड्राइवर ने ही इन्तजाम किया। पास में ही शायद एक कान्वेन्द था जिसका पता उसने हमें दिया। उसी कान्वेन्ट में रात गुजारने के लिये जगह मिल गई थी सवको । वहीं अचानक रेनी मिल गई थी। मेरी तरह ही रेनी भी मुझे देखकर चौंक गई थी। मैंने ही पूछा था-तुम रेनी हो न ? ऊपर से नीचे तक सफेद वस्त्र । सर पर सफेद स्कार्फ । सफेद गाउन पर फाला ऐप्रन । सारे शरीर में केवल मुँह खुला था । आवहवा अच्छी होने के कारण स्वास्थ्य भी अच्छा हो गया था । थोड़ी मोटी-सी हो गई यो। पर देखते ही पता लग जाता था कि उन कम है। मैंने फिर पूछा-रेनो हो हो न ? रेनी डो'सा? मेरी ओर अच्छी तरह देखा था उसने एक बार फिर चौक उठो थी। केवल क्षण भर के लिये । फिर तुरन्त स्वाभाविक हो गई थी। हाथ में दूध का वर्तन था। छोटे बच्चों के लिये कान्वेन्ट के फादर ने दूध की व्यवस्था कर दी थी। -हाउ टू यू ? एक दिन जो रेनी मुझे देखते ही अंकल कहकर आवाज देती थी, चगीचे में बैठकर प्यार से प्याले मे मेरे लिये चाय बना देती पो वही रेनी इधर कुछ वर्षों में बहुत गम्भीर हो गई थी।
चार आंखों का खेल ऐसा लगा जैसे वह मुझसे बचकर निकलना चाह रही हो। इस तरह अप्रत्याशित रूप से मेरे साथ साक्षात् हो जाने पर उसका मन विश्वास नहीं कर पा रहा था। अब मेरे लिये करने को बचा भी क्या था। जिस लड़की ने चरम संकट के आने पर जीवन को पूर्णतया पहचान लिया था, उसके लिये 'नन' बनने के अलावा दूसरी गति ही क्या थी। बाप नहीं, माँ नहीं, भाई नहीं। ऐसी लड़की मनुष्य पर कैसे विश्वास कर सकती है ? कैसे दूसरी लड़कियों की तरह गृहस्थी बसा सकती है अपनी? रेनी शायद मुझसे मिलना ही नहीं चाहती थी। अतएव मैं ही उसको खोज करने लगा। कान्वेन्ट के आउट हाउस में काफी भीड़ थी। हर व्यक्ति जहाँ जिसे जगह मिली पैर फैलाकर सोने की कोशिश कर रहा था। मैं भी एक तरफ लेटकर भावनाओं की गठरी की गाँठे खोलने लगा। जितनी भावनाएं थीं, उतनी ही बड़ी गठरी, उतनी ही गांठें । बड़ी कस गई थीं वे गाँठे। गाँठं खोलते-खोलते अचानक चक्रधरपुर जा पहुंचा था। फिर वही चार्ली की हत्या का केस । आज इतने दिन बाद रेनी के इस आत्मोत्सर्ग के माध्यम से उस दिन मेम साहब के आत्मोत्सर्ग का कारण जैसे कुछ स्पष्ट हो उठा। रेनी की आँखों में क्या उस दिन की मिसेज़ डी'सा की यन्त्रणा ही नहीं झलक रही थी ? यही याद करने की कोशिश करने लगा मैं । कहाँ कितनी दूर था वह चक्रधरपुर । रेनी के चक्रधरपुर छोड़ने के बाद मुझे भी वहाँ से चला आना पड़ा था। मुझे पता भी नहीं लग सका था कि बाद को वहाँ के हाल-चाल क्या रहे । पर मुकदमे के अंतिम कुछ दिन आज भी अच्छी तरह याद हैं मुझे । रेनी को भी जरूर याद होंगे। याद है-रेनी ने मुझसे आकर पूछा था -क्या होगा अंकल ? -क्यों, किसका क्या होगा? -मम्मी बहुत नर्वस हो गई हैं। मेम साहब की जो मानसिक अवस्था थी उसमें नर्वस हो जाना कोई विचित्र वात नहीं थी। एक तो चार्ली की मृत्यु ने ही उन्हें निर्जीव-सा बना दिया था और फिर कोर्ट की गवाही । ।
धार आंखों का खेल १३ -मम्मी न तो खाती हैं, न सोती हैं, न बात ही करती हैं, बस तकिये में मुंह छुपाये पड़ी हैं ! कब तक चलेगा ऐसे ? रोज ही केस एडजॉर्न हो जाता है- केस की सुनवाई काफी लम्बी हो गई थी। रोज तारीख पड़ जातो और मेम साहब लौटकर कटे वृक्ष की तरह विस्तर पर गिर पड़तीं। अव जैसे किसी से भी बर्दाश्त नहीं हो रहा था। रेनी भी दिन पर दिन टूटती जा रही थी अंदर ही अंदर । मैं जाकर सान्त्वना देने की कोशिश करता । कहता-इतनी निराश क्यों हो गई हैं। अपने स्वास्थ्य का भी तो ख्याल करिये कुछ- कोई जवाब नहीं देतों मेम साहब । मैं फिर कहता-रेनो के बारे में भी सोचिये, देखिये न कैसी हो गई है वह । इतने दिनों में कितनी दुबली हो गई है- तब भी कोई उत्तर नहीं देती। अंत में जिद करके मैं कुछ खिला देता । दूध-डबल रोटी मुंह में डाल देता । खाना नहीं चाहतीं वह किस तरह निगल लेती बाध्य होकर । कभी-कभी पहले की तरह तीनों जने वगीचे में बैठते चाय पीने । पर पार्टी जमती नहीं थी। जरा देर बाद ही मेम साहब की आंखों से झर-झर आँसू गिरने लगते और फिर वे वैठ नहीं पाती थीं। धीरे-धीरे अन्दर चली जातीं। मैं और रेनी परस्पर एक दूसरे की ओर देखते और कोई उपाय न देखकर हम लोग भी उठ जाते । उस दिन फिर मेम साहब को गवाही देने जाना पड़ा। कोर्ट में तिल रखने की जगह नहीं थी। उस दिन भी यथारोति ईश्वर का नाम लेकर झूठ न बोलने को कसम खाई उन्होंने। उस दिन भी सब लोग मेम साहब का इजहार सुनने के लिये उत्सुकता से प्रतीक्षारत थे । एक से एक तीखे प्रश्न वाण छोड़ता रहा सरकारी वकील और मेम साहब शिथिल होती गयीं। बोलने की शक्ति भी नहीं रही थी जैसे । -बोलिये, बोलिये, बोलती क्यों नहीं ? बात का जवाब दीजिये? -सरकारी वकील चिल्ला कर पूछ रहा था ।
चार भांखों का खेल मेरे पास ही रेनी बैठी थी। मां की हालत देखकर उसका मुंह भय से पीला पड़ गया । बोली-मम्मी गिर जायेंगी शायद.... मैंने उनकी ओर दृष्टि उठाई । लगा सचमुच वह बेहोश होकर गिर पड़ेंगी। थर-थर कांप रही थीं वह । जैसे कहीं कोई न था। गिर जाने पर सँभालने वाला कोई नहीं था। इन कुछ दिनों में ही उनके बाल सफेद हो गये थे । मुंह पर झुर्रियाँ पड़ गई थीं। आंखों के नीचे गड्ढे पड़ गये थे, हाथों को नसें फूल गई थीं। -~-बोलिये-बोलिये, बोलती क्यों नहीं? जवाब दीजिये ? प्रॉसि- क्यूटर फिर दहाड़ा था। और इसके साथ ही कोर्ट में शोर मच गया था । मेम साहव धड़ाम से कटघरे के जंगले पर ही गिरकर वेहोश हो गई थीं। कान्वेन्ट में रात बढ़ती जा रही थी। ठंड भी बढ़ती जा रही थी। अव तो अगले दिन सुबह से पहले मसूरी पहुँचने की कोई उम्मीद थी । नहीं। एक कोने में पड़ा मैं आकाश-पाताल की सोच रहा था। उस दिन का वह चक्रधरपुर का कोर्ट और आज का यह कान्वेन्ट । प्रायः एक हजार मील की दूरी पर पुल बनाना कोई अन्याय तो नहीं। उस दिन की मेम साहब को उस आत्माहुति में क्या रेनी के भविष्य जीवन का एक अद्भुत इंगित नहीं छुपा था ? अगर नहीं छुपा होता तो रेनी क्यों इस प्रकार इस दुर्गम कान्वेन्ट के दुष्कर कृच्छ साधन में परिणाम खोजने आई थी? मन में भाया कि उसका उत्तर ढूंढ़ने के लिये यहां से जाने से पहले एक बार रेनी से मिलना जरूरी है। पर मुझे पहचान लेने के बाद भी क्या वह स्वेच्छा से मुझसे मिलना चाहेगी? तब भी मिलने की इच्छा से आउट हाउस के दरवाजे से निकल कर बाहर कोर्ट यार्ड में आकर खड़ा हो गया। बहुत बड़ा कोर्ट यार्ड था। जरा दूर पर ही गिरजे का शिखर दिखाई दिया। आकाश पर हल्के कुहासे की पर्त छाई हुई थी।
पारपाकात ६५ किधर जाऊँ समझ नहीं पाया। रेनो के बारे में पूछ सर्फ ऐमा कोई आदमी भी नहीं मिला। बहुत बड़ी इमारत थी कान्वेन्ट की ! जाने पर किस संस्था ने लाखों रुपये खर्च करके क्रिश्चियनों की मुक्ति के लिये बनवाई थी और तब से न जाने कितने वर्ष बीत गये थे। नि:शब्द उनका कार्य चलता रहा था मनुष्य को चरम दुगंति के हाथ से बचाने के लिये इस जंगल में यह लोग जेरुशलम के मुक्तिदाता को साकार कर रहे हैं । आज जो इस संकट के समय उस विषय में हमें माश्रय मिला है यह भी तो उसी मुक्तिदाता को अपार करुणा है। और हमें ही क्या ! इस रेनी को ही वात ले ली जाये। इसे अगर यहां आयय नहीं मिलता तो यह कहां जाती? रिस अँधेरी मतलगुहा में उमे आत्मगोपन करना पड़ता कौन जाने ! जरा-सा आगे बढ़ते ही ऐसा लगा कि कोई मेरो तरफ भा रहा है। क्या कहूँ कुछ समझ नहीं पाया। उधर से प्रश्न आया-कौन ? डरते-डरते मैंने कहा-मैं-- किसी पुरुष को आवाज प्रतीत हुई। पर पोशाक पही थी। संवा पांव तक का सफेद गाउन और ऊपर काला ऐप्रन । मेरी ओर बढ़ने लगी वह मूर्ति । सामने आकर मेरी ओर देखा । कम उम्र का स्वस्थ्य पुरुष । चेहरा दाढ़ी-मूंछ से भरा था। फिर पूछा-आप कौन हैं ? मैंने अपना परिचय देते हुए कहा मैंने दूसरे यात्रियों के साथ माउट हाउस में आश्रय लिया है। ऐसा लगा जैसे हेसे पादरी साहव । अंधेरे मैं ठीक से समझ नहीं पाया। बोले- आप लोगों को कोई कप्ट तो नहीं हो रहा? -नहीं, बहुत धन्यवाद मैंने कहा। और कुछ न कहकर फादर अपने गन्तव्य स्थल की ओर चले ही थे कि जाने क्या सोचकर खड़े हो गये और बोले-आप लोगों के खाने- पीने का वन्दोवस्त हो गया है ? सविनय बोला-हाँ फादर, सब ठीक हो गया है। आपके यहाँ की एक नन सारी देख-भाल कर रही हैं- ६६ चार आंखों का खेल -~-कौन ? किसकी बात कर रहे हैं ? मैंने कहा-उनका नाम तो नहीं जानता, जो आकर बच्चों को दूध दे गई थीं। -ओ, वह! -हाँ-मैंने कहा। सोचा शायद दूध उन्होंने ही भेजा होगा । अतः पहचान गये थे। सुनकर प्रसन्नमन जिधर जा रहे थे उसी ओर चलने लगे। मैंने पीछे से श्रद्धामय स्वर में पुकारा -सुनिये फादर, एक बात पूछूगा आप से-- --पूछिये- कहकर खड़े हो गये वह । उस अंधकारपूर्ण निर्जन रात में कास्वेन्ट के मैदान में फादर के सामने किस तरह बात रक्खू यही सोचने लगा। कहना ठीक होगा या नहीं समझ नहीं पाया। -~कहिये क्या कह रहे थे? अच्छा, जो हम लोगों को दूध देने आई थीं, वह कौन हैं ? फादर एकदम से गंभीर हो गये मेरी बात सुनकर । अंधेरे में ठीक से दिखाई नहीं दिया। और फिर घनी दाढ़ी मूंछ होने के कारण वैसे भी चेहरे के भाव दिखाई नहीं देते थे। -~-बता सकते हैं, वह कौन हैं ? तब तक फादर ने स्वयं को संभाल लिया था। वोले-क्यों ? उनके बारे में क्यों पूछ रहे हैं ? वह एक नन हैं यहाँ की-- -और कोई भी परिचय नहीं है उनका ? -हो भी तो उसे प्रकट करने का नियम नहीं है हमारे यहाँ । -ओ-- इसके बाद क्या कहना चाहिये समझ न पाकर चुप खड़ा रहा। अचानक फादर ने पूछा-क्यों पूछा यह आपने ? आप क्या पह- चानते हैं उन्हें ? मैंने कहा-चेहरा पहचाना हुआ-सा लगा था, इसीलिये पूछा- -पहचाना हुआ कैसे लगा ?
No text on this page.
चार मांखों का खेल ६६ -कौन ? किसकी बात कर रहे हैं ? मैंने कहा-~-उनका नाम तो नहीं जानता, जो आकर बच्चों को दूध दे गई थीं। -ओ, वह ! -~-हाँ-मैंने कहा। सोचा शायद दूध उन्होंने ही भेजा होगा । अतः पहचान गये थे। सुनकर प्रसन्नमन जिधर जा रहे थे उसी ओर चलने लगे। मैंने पीछे से श्रद्धामय स्वर में पुकारा-सुनिये फादर, एक बात पूछूगा आप से- --पूछिये- कहकर खड़े हो गये वह। उस अंधकारपूर्ण निर्जन रात में कान्वेन्ट के मैदान में फादर के सामने किस तरह बात रक्खू यही सोचने लगा। कहना ठीक होगा या नहीं समझ नहीं पाया। कहिये क्या कह रहे थे ? अच्छा, जो हम लोगों को दूध देने आई थीं, वह कौन हैं ? फादर एकदम से गंभोर हो गये मेरी बात सुनकर । अंधेरे में ठीक से दिखाई नहीं दिया । और फिर घनी दाढ़ी मूंछ होने के कारण वैसे भी चेहरे के भाव दिखाई नहीं देते थे। बता सकते हैं, वह कौन हैं ? तब तक फादर ने स्वयं को संभाल लिया था। वोले--क्यों ? उनके बारे में क्यों पूछ रहे हैं ? वह एक नन हैं यहाँ की- -और कोई भी परिचय नहीं है उनका ? -हो भो तो उसे प्रकट करने का नियम नहीं है हमारे यहाँ। -ओ- इसके बाद क्या कहना चाहिये समझ न पाकर चुप खड़ा रहा। अचानक फादर ने पूछा-क्यों पूछा यह आपने ? आप क्या पह- चानते हैं उन्हें ? मैंने कहा-चेहरा पहचाना हुआ-सा लगा था, इसीलिये पूछा- -~-पहचाना हुआ कैसे लगा? ?
चार आणे काल -~-बहुत साल पहले बिहार के चक्रधरपुर मे था मैं, वहां रेनी डोसा नाम की एक लड़की थी । मुझे ऐसा लगा यह वही थी- -~-रेनी डोसा? -हो, उसके पिता रेलवे में ड्राइवर थे, उसका एका भाई था वास डोसा, उसकी मां को भी जानता था। एक मुकदमा हुआ था उनका, तव में भी वहीं था, चाईबासा कोर्ट में केस चला था.... किसी तरह मेरी वालें जबंदस्ती सुन रहे थे फादर । फिर बात वीच में ही काटकर बोले -नहीं, नहीं, यह वह नहीं है, यह दूसरी लड़की फिर चलते-चलते वोले-~गुड नाइट- जल्दी-जल्दी पाव बढ़ा कर एक तरफ चले गये फादर । और मैं वहीं खड़ा-खड़ा सोचता रहा । हो सकता है मेरी ही भूल हो, मेरी ही आंखों को धोखा हुआ हो, अथवा मन ने ही गलती की हो। असम्भव नहीं है यह। फिर आउट हाउस के कोने में अपनी जगह आकर लेट गया। नींद नही आ रहो यो। ठंड कोई बहुत अधिक नहीं थी तब भी कम्बल लपेट लिया था बदन पर अच्छी तरह । आस-पास के लोग पर्राटे लेने लगे थे, सभी थके हुए थे। रात को कमर सीधी करने को जगह मिलते ही निश्चित होकर सो गये थे। जव सुबह होगी तो फिर भगवान् का नाम लेकर कल को सोचेंगे। अभी कल की सोचकर रात को नीद क्यों पराब को जाये। पर मेरी बात अलग थी। निश्चितता के बीच भी मैं पूरी तरह निश्चित नहीं हो पाता। हर परिस्थिति में उससे युक्त होकर भी पूर्ण मुक्त रहना मेरा स्वभाव नहीं है। मेरो आँखें विनिद्र थीं। पल भर में आनन्द के आवेग से उड़ जाता तो दूसरे पल विपाद के पाताल में जा पहुँचता । स्वयं को लेकर स्वयं ही मैं बार-बार विपत्ति में पड़ जाता है। इसीलिये मैं सबसे भिन्न हूँ, दूसरे लोगों के साय मेरा मन मेल नहीं.. खाता इसीलिए इतना विरोध रहता है। ७ ६८ चार आँखों का खेल कम लोग नहीं मिले हैं जोवन में । जीवन छोटा भी तो नहीं होता। इतना पय पार करके आज जहाँ आकर पहुँचा हूँ वहाँ आकर देखता हूँ कि जो सोच कर अव तक चलता रहा हूँ वह सोचना गलत था। जिस हिसाब से चला था वह हिसाव ही गलत था। दो हाथ भरकर जो कुछ पाया है वह सही नहीं पाया। पर यह बात व्यर्थ है । कहानी के पक्ष में यह अवान्तर है। उस दिन उस अंधेरे कमरे में लेटा यही बात सोच रहा था। सोच रहा था यह कैसे हुआ अथवा यह कैसे हो सकता है। पर तब भी उस दिन अघटनीय घटित हो गया था। वही चाईबासा कोर्ट को बात कर रहा हूँ। मेम साहव फिर से ठीक हो गई थीं । स्वा- स्थ्य अभी यद्यपि दुर्बल था पर कोर्ट का कानून तो कानून था । उसी हालत में आकर खड़ी हो गई थीं कोर्ट का परवाना मिलते ही। मेम साहब की ऐसी-तैसी किये बिना जैसे भारतीय दंड विधान के परलोक- गत सृष्टि कर्ता का अपमान हो जाता। हो ऐसी-तैसी, मेम साहब को भी उसमें आपत्ति नहीं थी। उसी हालत में सर उठाये खड़ी हो गई। -बोलिये, क्या बोलना है ? -आप जव बाहर खड़ी थीं, बाहर खड़े-खड़े अपने लड़के की आवाज़ आपने सुनी और जब सुना कि आपका लड़का नैन्सी को गाली दे रहा है तो आपको गुस्सा तो अवश्य आया होगा? ~हाँ, आया था। -किसके ऊपर गुस्सा आया था। अपने लड़के पर या नैन्सी पर ? अपने लड़के पर ही गुस्सा आया था। -~-क्यों? अपने लड़के पर क्यों गुस्सा आया था ? -~-क्योंकि मेरा लड़का नैन्सी को गाली दे रहा था । ही वाज़ एव्यू- जिंग ए ऊमन ! फॉर नथिंग । ---फॉर नथिंग क्यों ? कोई कारण नहीं था क्या ? -मैंने महसूस किया था कि नैन्सी ने अगर सड़क पर गाली दी भी थी तो वह सड़क की बात थी। उसको लेकर नैन्सी के घर में घुसकर उससे गाली-गलौज करने का अधिकार किसी को नहीं था। लोगों को जाने कैसी टेढ़ी-मेढ़ो लगीं उनकी बातें । इतने महीनों से केस चल रहा था पर ऐसी बात तो किसी ने नहीं कहीं थी। सभी के 1 घार माखों का खेल कान खड़े हो गये । सोचने लगे कि मेम साहब कहने क्या जा रही थी ? दिमाग खराव हो गया था क्या उनका ? वह तो अपने लड़के के खिलाफ ही गवाही दे रही थीं। -तव आपने क्या किया? -~मैं और वहां चुप खड़ी नहीं रह सकी। --क्या किया तब आपने ? -अन्दर चली गई। -क्या देखा अन्दर । --देखा मेरे लड़के के हाथ में मेरा रिवॉल्वर था और वह नैन्सी पर गोली चलाने जा रहा था- -तब? अचानक मेम साहव के वकील ने बीच में बाधा देते हुए कहा- मी लार्ड, मेरा क्लायन्ट आज अस्वस्थ है, जिरह इस वक्त बन्द कर दी जाये-- फिर वकीलों का आपस में झगड़ा शुरू हो गया। कोर्ट का मामला मैं अच्छी तरह समझता भी नहीं । कहाँ से कानून की धाराएँ निकाल- निकाल कर दोनों पक्षों के वकील आपस में वहस करने लगे । दर्शकों में भी एक उत्तेजना फैल गई थी। शोरगुल शुरू हो गया। काठ की मुगरी मेज पर पटक कर जज साहब चिल्लाये-ऑर्डर- ऑर्डर- पर जैसे बहुत दिनों का दबा हुआ कौतूहल उस दिन कानून की बाधा मानने को तैयार नहीं था। लोग चाह रहे थे कि जिरह चलती रहे । मुकदमा जव एक दिलचस्प मोड़ ले रहा था । उस समय जिरह रोक देने को कोई तैयार नहीं था। जिरह चलती रहे वस- परन्तु तब तक मेम माहब के वकील ने कानून की एक ऐसी धारा बतलाकर दरख्वास्त को कि जज भी उसे नामंजूर नहीं कर सकता था। मुजरिम के कटघरे में उस समय भी प्रति-दिन की तरह फ्रेडी खड़ा था । जव भी तारीख पड़तो है पुलिस पहरे के अन्दर चैन में से ले आती थी और मुनवाई के बाद कड़े पहरे में वापस जेल ले जाती थी। धीरे-धीरे उसका चेहरा बदल गया या । वह सूख गया था । आँखों के नीचे कालिख छा गई थी। रोज माता, ध्यान से क्यान मुनता, जिरह सुनता । पर सुनते समय कोई आवान्तर नहीं होता था उस चेहरे पर। " ।
१०० चार आंखों का खेल पत्थर की मूर्ति को तरह निर्वाक्-निष्कम्प खड़ा रहता था फ्रेडी जैसे काठ का पुतला हो। इधर कुछ महीनों में फ्रेडी जैसे बुड्ढा हो गया था । गले की हड्डियाँ दिखाई देने लगी थीं, रंग बदल गया था। ऐसा लगता था जैसे बोलना ही भूल गया था वह । बस चुपचाप वलि के बकरे-सा खड़ा शून्य दृष्टि से देखता रहता। वकील की उस दरख्वास्त के बाद जज साहब ने हुक्म सुनाया- जुलाई की तीन तारीख तक के लिये केस स्थगित रहेगा। इसके साथ ही इजलास छोड़कर वे अपने कमरे में चले गये। मैं सीधा मेम साहव के पास गया । रेनी भी मेरे साथ जाकर माँ के पास खड़ी हो गई। रेनी बोली-यह तुम क्या कह रही थीं मम्मी ? चार्ली के विरुद्ध कह रही थीं? मेम साहब को जैसे होश हो नहीं था । दृष्टिहीन नेत्र, भाषा हीन मुख और निस्पन्द शरीर । जल्दी से उन्हें गाड़ी में बिठाकर मैं चक्रधर- पुर चला आया । साथ में उनका वकील भी था। वकील बोला-यह आप क्या कह रही थीं मिसेज़ डी'सा ? आपकी एवीडेन्स तो आप हो के अगेन्स्ट जा रही थी। उससे तो मुलजिम बरी हो जायेगा कोर्ट से? मेम साहब को जैसे कुछ भी याद नहीं था। क्या कहा था और क्या नहीं कुछ पता नहीं था। वोलीं-मैंने क्या कहा था ? ~आपने क्यों कहा कि आपने देखा था चार्ली हाथ में रिवॉल्वर लिये नैन्सी को मारने जा रहा था ? -मैंने यह कहा था क्या ? ----आपको याद नहीं है। आपने ही तो कहा था कि गलती चार्ली की थी। चार्लो हो नैन्सी को गाली दे रहा था। नैन्सो की गलती की बात तो एक बार भी आपने नहीं कहो । कितनी बार कितना सिखाया- पढ़ाया आपको कि कहियेगा आपने फ्रेडो के हाथ में रिवॉल्वर देखा था । कहियेगा कि आप जाकर फ्रेडी के हाथ से रिवॉल्वर छीनने की कोशिश कर रही थीं कि गोली छूट कर चार्ली को जा लगी। बुद्ध की तरह मेम साहब चुपचाप सुनती रहीं।
.चार'आखों का ऐल १०१ वकील ने कहना जारी रखखा-में शुरू से ही केस को मंडी के अगेन्स्ट कन्डक्ट करता आ रहा हूँ, और आपने आज सब गड़बड़ कर दिया? -~पर मैं क्या कहें-क्षीण स्वर में दुर्वल प्रतिवाद करने को चेप्टा की थी मेम साहब ने। वकील बोला-मेरा इतने दिनों का परिश्रम व्यर्थ हुआ जा रहा था, तकदीर अच्छी थी जो मैने बीमारी की पिटीशन कर दी, नही तो फेडो तो आपकी एवोडेन्स से ही छूट जाता । सेक्शन तीन सौ दो का चार्ज लगाया नहीं जा सकता था। उससे क्या होगा? फ्रेडी छूट जायेगा ? ---छूटेगा नहीं ? आप उलटी-सीधी बात करेंगी तो छूट तो जायेगा रेनी बगल में ही बैठी थी। वह बोली-एडवोकेट जो कहते हैं उसी तरह उत्तर क्यों नहीं देती तुम ? मेम साहब वोली-मुझे कुछ भो तो याद नहीं रहता है- --क्यों याद नहीं रहता ? इतना याद कराया तुम्हें और तुम सब भूल गई? इस तरह की भूल करने से तो तुम खुद फंस जाओगी। एडवोकेट ने भी हाँ में हाँ मिलाई -हाँ मिसेज़ डी'सा, मिस रेनी ठीक कह रही हैं, आप अगर फिर भूल करेंगी तो अंत में शायद आप मुजरिम बन जायेंगी इस केस में- उस दिन गाड़ी में आते-आते और भी बहुत प्रकार से समझाया गया था मेम साहब को । सवने कहा था कि गवाही देते समय इस तरह को भूल करना उचित नहीं है । इससे उनका अपना ही नुकसान होगा। अगर कहीं स्वयं मुजरिम करार दे दी गई तो और उलटी मुसीबत गले जायेगी। परन्तु कहाँ गई वह मेम साहब, कहां गया वह चाली, वह फेडी और वह नैन्सी । और आज इतने दिन बाद रेनी भी यहां आकर जीवन का अर्थ खोज पाई क्या । यह भी क्या विचित्र घटना है। और में हो क्यों इतनी जगहों के रहते यही आकर उलझा ? कौन बतायेगा मुझे इराका अर्थ? ।
१०२ चार आँखों का खेल झपकी लग गई थी शायद । अचानक किसी आवाज से आँख खुल गई । आस-पास नजरें दौड़ाई सव गहरी नींद में सो रहे थे। मेरो आँखों से ही न जाने क्यों नींद भाग गई थी। -अंकल? हड़बड़ाकर उठ बैठा। बड़ा ही नम्र स्वर था। साथ-साथ एक चेहरा आँखों के सामने तैर गया। लगा जैसे रेनी की आवाज़ थी। पास की खिड़को खुलो थो । उससे बाहर खड़ी अस्पष्ट मूर्ति अचानक बगल में सरक गई। दरवाजे से बाहर आकर देखा वह बिल्कुल चुप खड़ी थी। अनुमान से समझ गया कि भय से जड़ हो गई है। पूछा-कौन ? जरा पास जाते ही बोली-जीऽऽ, मैं रेनी- कौन रेनो ! आवाज़ में भरपूर आश्चर्य था मेरी। चक्रधरपुर की रेनी डो'सा। हैरानी से बोला-~-मुझे तो शाम से ही सन्देह हो रहा था कि तुम यहाँ हो। क्या बोले जैसे समझ नहीं पाई वह, बोली-हाँ अंकल मैं यहीं हूँ- वह तो देख ही रहा हूँ, पर और जगह नहीं थी कि यहाँ आ गई। रेनी बोली-यहाँ नहीं आती तो और कहाँ जाती? वात सत्य ही नहीं, मर्मान्तक सत्य थी। यहाँ इस परम निश्चिन्तता में न आकर और कहाँ जाती वह । उसका और था ही कौन इस दुनिया में? बोला--जब तुम दूध देने आई थीं तभी मैं पहचान गया था तुम्हें । पर तुम तो देखकर भी अनदेखा कर गई थीं। रेनी बोली--अभी भी नहीं आती। कल सुबह तुम लोगों के चले जाने से पहले मिलने की कोशिश नहीं करती। -क्यों भला? मुझसे क्या कोई कुसूर हुआ है ? नहीं तुमसे कोई कुसूर नहीं हुआ, पर फादर वाटसन से तुमने क्या कहा था ? -~-फादर वाट्सन? ये फादर वाट्सन कौन हैं ? Ans-
चार आधों का लेप
-यहां के फादर वाट्सन से तुमने मेरे बारे Kali
--पर फादर वाट्सन है कौग में तो पहा. त
हूंढने जा रहा था तो यही के ए पास गया | dil
नही, क्या उन्ही की बात माह रही हो?
-वही तो है फादर वादान, हमारे ifferifi
उनसे मेरे रावध गे पो मजा
जरा अप्रस्तुत हो गगा । बा १ मा the tity
तुम्हारा कोई मुकगान होगा हाने पाnि
तो नहीं है । जगी गृष ग गने वम माया HITS || fill
क्या-
१०४ चार मांखों का खेल वोला-तुम कहो तो कल सुवह जाने से पहले फादर वाट्सन से मिलकर तुम्हारे साथ अपने संबंध की वात वता हूँ। सब कुछ जानने के वाद निश्चय ही वह तुमसे कुछ नहीं कहेंगे । रेनी वोलो-नहीं, कोई जरूरत नहीं है, उससे तो...जाने क्या कहने जा रही थी रेनी, रुक गई। मैं वोला~-उससे तो क्या ? --उससे तो अच्छा होगा कि मैं ही यहाँ से चली जाऊँ। जैसे मैं आकाश से गिरा । बोला--यह क्या ? कह क्या रही हो तुम? सिर नीचा किये रही कुछ क्षण वह । फिर बोली--तुम नहीं जानते अंकल, मेरो तकदीर में शायद सुख नहीं है । नहीं तो सब कुछ छोड़कर यहाँ आ जाने पर भी शांति क्यों नहीं मिली--बाप गये, माँ गई, चार्ली भी चला गया, उस पर भी मैंने आत्महत्या नहीं की, जिन्दा रही, सोचा था संसार से दूर इस जंगल में शायद कुछ शान्ति मिलेगी... बात करते-करते अचानक बीच में ही रुककर बोली-मैं चलती हूँ अंकल, गुड नाइट- और वह मुड़कर एकाएक चल दी। मैंने आवाज़ दी-रेनी-रेनी सुनो-- मेरी आवाज़ रात के सन्नाटे में गूंज गई थी। सुनकर और भी डर गई वह और जल्दी-जल्दी पाँव वढ़ाकर जाने कहाँ अदृश्य हो गई। मैं देखता ही रह गया। दूसरी ओर से कोई व्यक्ति शायद इधर आ रहा था। मेरो फटी-सी आवाज़ सुनकर पता लगाने आया था। सामने आने पर देखा कान्वेन्ट का चौकीदार था। पहरा दे रहा था। आवाज़ सुनकर इधर चला आया था। सामने आकर उसने पूछा-कौन ? कौन हैं आप? अपना परिचय दिया मैंने। वापस जा ही रहा था वह निश्चित होकर कि मैंने उसे बुलाया । पूछा-तुम कब से नौकरी कर रहे हो यहाँ ? -जी पच्चीस साल हो गये उसने कहा । ~कहाँ के रहने वाले हो ? -गढ़वाल का ! मसूरी से भी आगे जाना पड़ता है।
भार सोपोरोष
दो-चार यासों के माद हो समागमा के शरीर
चौड़ा था उसका पर आदमी मह imat al
हो जाने के कारण हगने मताभ गा. am twittil
था। कई बार इस तरह लोगो मो.wat
आश्रय लेना पड़ता है।गई, भागा malani ki ihndir
आ रही भी समक्षा गगा पा महामारी
माग rain
..है यहाँ । बताया उसने।
अंत मे गने पूछा--तुमारे यहाँ , Hamanti
-बड़े पादरी साहय - उस जमा Rull
-नाग गया है ?
-- पहले जो साहय जगका माग सीमा AN II
अभी नये आये है--
-इनका नाग गया 17
यादान साध्या
जैसे में जाना नहीं मा artiy shaDARI
नये पादरी माय?
बहुत अच्छे हैं, हरपान
हैरानी-
गोषी धान Minfini)
पृष्ठ मुना पाटगरी मगा पागदामा it mytm
हो उठी थी और यह मर गाना गा sammam
में ही माना था?मादरावादमा मामी
ma- १०६ चार आंखों का खेल का ट्रंक था साय में । उसे सिरहाने रखकर सारी रात खर्राटे लेकर सोये थे वह । उठते ही मेरी ओर देखकर बोले-सारी रात नहीं सो सका बाबूजी, आप लोग अच्छे हैं । सो भी लिये और उठकर तैयार भी हो गये- मैं बोला-आप शायद सो नहीं पाये ? बिस्तर समेटते-समेटते वह सज्जन बोले-ऐसी जगह मुझे नींद नहीं आती बाबूजी । यह लोग नाश्ता-वाश्ता देंगे क्या ? थोड़ी बहुत नींद को जो आशा की थी वह भी खत्म हो गई । मैं उठ गया और बाहर निकल कर खड़ा हो गया। पहाड़ों की चोटियों पर जरा-जरा सा उजाला दिखाई दिया था। पैसे अंधेरा काफी था अभी। थोड़ी देर बाद ही कान्वेन्ट के लोग जाग जारोंगे । वह गढ़वाली भी शायद जाकर सो गया था। बहुत बड़ा कान्वेन्ट था। कान्वेन्ट के बीच में चर्च था। चर्च का शिखर बहुत ऊँचा था। उसी के एक किनारे आउट हाउस था। चर्च के उत्तर-पूर्वी कोने पर फादर और नन्स के कमरे थे एक पंक्ति में । उत्तर में स्कूल और बोडिंग हाउस थे। जाने से पहले एक बार रेनी से साक्षात् हो जाता तो अच्छा था । जाने क्यों मेरा मन उत्कंठित हो-हो उठता था। लेकिन यह कैसे संभव था। उससे मिलना शायद अपराध था। मैं बाहरो आदमी जो था। घटनावश दैवात् यहाँ भा गया था एक रात के लिये । भाभय देने के लिये इनका अनुगृहोत था, यहाँ के कायदे-कानूनों को भानना मेरा फर्ज था। इच्छा होते हुए भी यहाँ ज्यादा नहीं रह सनता था । सुबह होने पर यातायात शुरू होते हो यह जाय छोड़ देने को बार पा मैं । पर जाने से पहले क्या एक मिनट के लिये भी रेनो से नहीं मिला जा सकता? बस एक मिनट के लिये। मिलती तो एक बार पूजा कि इतना निश्चित जाश्य पाने के बाद भी कमों वह यहाँ से नली जाना चाहती है। क्या असुविधा है उसे, कित्त पर उसका अभियोग है, जैती भापति है । शान्ति की खातिर हो तो वह पावरपुर का समाजोड़कर यहाँ लाई थी, फिर यहाँ भी क्यों जशान्त यो। लोगों से दूर यह निरापद एकान्त हो तो चाहा पा जने । पावन को तमतताओं, बालाद-कामना-जाज्ञालों को तिलांजले केकर यहाँ एकान्त वावरणमें ही तो बालगोपन करकेनेतिलोनिजना । चार आँखों का खेल १०७ चाहा था उसने। फिर यह यन्त्रणा क्यों थो, यह वैराग्य किसलिये था। जिस वैराग्य के पीछे इस तरह दौड़ी थी उसी को वह अब इस तरह क्यो छोड़ना चाह रही थी ? यह शांति क्यों असह्य हो उठी थी उसके लिये ? क्या जीवन से ही वितृष्ण थी वह ? मुझे फिर चाईवासा कोर्ट की सुनवाई का अतिम दिन याद आ गया था। उस दिन भी मेम साहब गवाह के कटघरे में सीधी खड़ी थी । एड- बोकेट ने सब कुछ अच्छी तरह समझा-बुझा दिया था उन्हें । दवा-दारू के बाद कुछ ही दिनों में वह स्वस्थ हो गई थी। ध्यान देकर एडवोकेट की बात सुनी थी उन्होने । एडवोकेट ने कहा था कि आप जब घर के अन्दर घुसी तो आपने देखा कि फेडी के हाथ मे रिवॉल्वर था और निशाना चार्ली की तरफ था-कह पायेंगीन? ~हां यही कहूँगी मेम साहब ने कहा था । -हाँ यही कहियेगा। इससे आपका केस स्ट्रार हो जायेगा। --उसके बाद क्या कहूँ ?- मेम साहब ने पूछा था। ~~~कहियेगा कि आप दोड़कर फ्रेडी के हाथ से रिवॉल्वर छीनने गई पर उससे पहले ही गोली छूट गई थी...याद रहेगा न ? ~जी, याद रहेगा। ~भूल नहीं जाइयेगा। -नहीं भूलूंगी। लेकिन इतना सिखाना-पढ़ाना सव वेकार हो गया जब वह गवाहों के कटघरे में जाकर खड़ी हुई। रेनो भो हैरान हो गई थी। मेरे पास ही बैठी थी वह । बोली-अंकल, मम्मी यह क्या कह रही हैं ? मैं भी हैरान होकर सोच रहा था कि इतना मिखाने-पढ़ाने पर भी मिसेज डोसा यह सब कह क्या रही हैं ? हमारे एडवोकेट ने भी कई पॉपेन्ट्स ऑफ ऑर्डर उठाने की कोशिश की। अस्वस्थता की दुहाई देकर हियरिंग रोक देने को भी चेष्टा की; पर मिसेज़ डोसा तो जैसे अचल-अटल यों। सरकारी वकील ने पूछा-आप क्या अस्वस्थ महसूस कर रही हैं ?
११० चार आंखों का खेल मारवाड़ी सज्जन मुझे तैयारी न करते देखकर बोले-क्या हुआ, जायेंगे नहीं क्या ? देखा वह सज्जन इस अवस्था में भी स्नान करके ताजा हो लिये थे। और वही क्यों करीव-करीव सभी लोग तो तरो-ताजा थे। अंत में मन सच ही विद्रोह कर उठा । पहाड़ देखकर ही कौन-सा गड़ा धन हाथ लग जायेगा और ठंड तो यहाँ भी कम नहीं थीं ? मनुष्य को ही नहीं जाना तो क्या देखा जाना संसार में ? मनुष्य को निकाल देने पर दुनिया में बचता ही क्या है ? मन हुआ एक दिन और वहीं रह जाऊँ तो शायद शंका का समा- धान हो जाये। कमरे में लौट आया। बक्स-विस्तर वैसे ही पड़ा रहा। पड़ा रहे। वाहर का शोरगुल कानों में आने लगा। सभी जाने के लिये तैयार थे। संसार में बीच रास्ते में कोई नहीं अटकना चाहता । सबको आगे बढ़ने की जल्दी पड़ी रहती है, पीछे कोई नहीं रहना चाहता । जाने दो सवको आगे । मैं पीछे ही भला । पोछे रहने का लाभ उन्हें नहीं मालूम हो, पर मुझे तो मालूम है । मैं पोछे ही रहूँगा! । उस दिन तय कर लिया था कि मैं एक दिन और ठहरूँगा वहाँ । पर हुआ नहीं। उसके पहले ही रेनी से मुलाकात हो गई। इस तरह वह खुद मुझसे मिलने आयेगी यह नहीं सोचा था मैंने । मैं उससे पुनः मिलने का उपाय सोचने में व्यस्त था। सोचा था फादर वाट्सन से मिलकर सब खोल कर कह दूंगा। कहूँगा --मैं रेनी को पहचानता हूँ, मैं उसका शुभाकांक्षी हूँ शायद यह सव बातें कहने का अधिकार मुझे नहीं था। हो सकता है मेरी बात सुनकर फादर पूछे-तुम कौन हो? क्यों मिशन के काम में बाधा दे रहे हो? इसका उत्तर भी सोच लिया था मैंने। पूछने पर कहता-मैं जानता उससे मेरा कोई रिश्ता नहीं है, पर क्या रक्त का संबंध ही सब कुछ है ? आदमी कुछ नहीं?
चार आंखों का खेल १११ -पर तुम तो हमारे मिशन के कोई नहीं हो ? उस पर मैं कहता--मिशन क्या केवल तुम्हारे धर्म के लोगों के लिये है। जो क्रिश्चियन नहीं होता क्या तुम उसका उद्धार नही करते । विधर्मी को क्या अपने धर्म में नहीं लेते तुम लोग? फिर क्यों इतने विधर्मी निराश्रितों को आश्रय दिया था ? तुम्हारी कोई जिम्मेदारी तो थी नहीं ? फादर शायद कहते--संकट के समय तुम्हें आश्रय दिया। अब संकट खत्म हो गया है । चले जाओ- मैं कहता-मेरा संकट तो अभी भी खत्म नहीं हुआ-- -~-रेनी के कारण क्या संकट आ पड़ा--पूछते वे । में जवाब देता--रेनी के संकट को मैं अपना संक्ट समझता है-- आइ विल स्टैड वाई हर इन एनी थिंग दैट कम्स टु पास ! --यह क्या कह रहे हो तुम? हाँ, फादर को क्या मालूम कि रैनी की मां मिसेज डी'सा के उन दिनों के संकट को मैंने अपना हो संकट समझा था। उस दिन कोर्ट में जो कुछ घटित हुआ था, जिसके बाद रेनी बेहोश होकर गिर पड़ी थी वह मेरे अलावा और किसे याद होगा? चक्रधरपुर के वह तारक वायू, नरसिंह वायू अभी भी जीवित हैं कि नही मुझे नहीं मालूम । जीवित होंगे भी तो बहुत बुड्ढे हो गये होंगे। स्मरण शक्ति के परदे से सब दृश्य विलुप्त हो गये होंगे । याद दिलाने पर भी शायद उन्हें याद न आये। पर मैं मेम साहब को वह जिरह नहीं भूल सका था। किसी उत्सव को-सो भोड़ थी । वकोल जब आपस में लड़ चुके और जज ने कोर्ट की कार्रवाई जारी रखने का आदेश दिया तो सरकारी वकील ने पूछा-आपने फिर क्या किया ? -मेरे एक हाथ में कस्टर्ड पाउडर का डिब्बा था और एक हाथ में हिस्को को बोतल । मैं बाहर खड़ी-बड़ो सब सुन रही थी। मेरा लड़का फेडी को गाली बकने लगा था। फेडो चुप खड़ा मुन रहा था। -~आपका लड़का फेडी को क्यों गाली बक रहा था ? क्योंकि मेरा चरित्र वराब होने के कारण कॉलेज में लड़के उसका मजाक उड़ाते थे। इसलिये उसने एक बार मुझे मारने की भी कोशिश की थी।
११० चार आंखों का खेल मारवाड़ी सज्जन मुझे तैयारी न करते देखकर बोले- क्या हुआ, जायेंगे नहीं क्या ? देखा वह सज्जन इस अवस्था में भी स्नान करके ताजा हो लिये थे। और वही क्यों करीब-करीब सभी लोग तो तरो-ताजा थे। अंत में मन सच ही विद्रोह कर उठा । पहाड़ देखकर ही कौन-सा गड़ा धन हाथ लग जायेगा और ठंड तो यहाँ भी कम नहीं थीं ? मनुष्य को ही नहीं जाना तो क्या देखा जाना संसार में ? मनुष्य को निकाल देने पर दुनिया में बचता ही क्या है ? मन हुआ एक दिन और वहीं रह जाऊँ तो शायद शंका का समा- धान हो जाये। कमरे में लौट आया । बक्स-विस्तर वैसे ही पड़ा रहा। पड़ा रहे । बाहर का शोरगुल कानों में आने लगा । सभी जाने के लिये तैयार थे । संसार में बीच रास्ते में कोई नहीं अटकना चाहता । सबको आगे बढ़ने की जल्दी पड़ी रहती है, पीछे कोई नहीं रहना चाहता । जाने दो सवको आगे। मैं पीछे ही भला । पोछे रहने का लाभ उन्हें नहीं मालूम हो, पर मुझे तो मालूम है । मैं पीछे ही रहूँगा ! । उस दिन तय कर लिया था कि मैं एक दिन और ठहरूँगा वहाँ । पर हुआ नहीं। उसके पहले ही रेनी से मुलाकात हो गई। इस तरह वह खुद मुझसे मिलने आयेगी यह नहीं सोचा था मैंने। मैं उससे पुनः मिलने का उपाय सोचने में व्यस्त था । सोचा था फादर वाट्सन से मिलकर सव खोल कर कह दूंगा। कहूँगा-मैं रेनी को पहचानता हूँ, मैं उसका शुभाकांक्षी हूँ। शायद यह सब बातें कहने का अधिकार मुझे नहीं था। हो सकता है मेरी बात सुनकर फादर पूछे-तुम कौन हो? क्यों मिशन के काम में बाधा दे रहे हो? इसका उत्तर भी सोच लिया था मैंने । पूछने पर कहता-मैं जानता हूँ उससे मेरा कोई रिश्ता नहीं है, पर क्या रक्त का संबंध ही सब कुछ ? आदमी कुछ नहीं ?
भार माखों का पेल ११३ । - -लड़के से ज्यादा आपको फ्रेडो प्यारा था ? -मैंने तो पहले ही कहा है कि मैं इन्सान नहीं हैवान हूँ। अपने स्वभाव के चलते वहुत दुख पाया है मैंने; पर किसी भी तरह अपने स्वभाव को बदल नहीं सकी। आत्महत्या भी नही कर सको। मैं नीच हूँ, दुश्चरिया हूँ। मैं पली, मां या आंटी होने के योग्य नही हूँ- कहते-कहते जंगले पर ही चक्कर खाकर गिर पड़ी थी मेम साहब । अचानक रेना की आवाज सुनकर मैं चौंक उठा। -कौन ? कब नि.शब्द रेनी पास आकर खड़ी हो गई थी पता ही नही लगा था मुझे । बैठा सोच रहा था कि क्या करूँ ? सोचते-सोचते फिर चाई- वासा के कोर्ट में पहुँच गया था । उस दिन की मेम साहब को स्वीकारोक्ति के संबंध में अनेकों वार गंभीर रूप से सोचा है मैंने। किस कारण से उस दिन उन्होंने स्वयं की चरित्रहीनता सबके समक्ष स्वीकार को थो । क्यों सारा दोष अपने ऊपर लेकर फेडी को बचाया था? यह अब तक नहीं समझ सका । अपने लड़के से अधिक फ्रेडी को उन्होंने अपना समझा था उस दिन । रक्त के संबंध से अधिक महत्त्वपूर्ण वह चार आँखों का खेल हो गया था क्या ? उस दिन सचमुच उनकी विकृत रुचि और अपने लड़के के विरुद्ध उनकी स्वीकारोक्ति को वह प्रेरणा मुझे अच्छी नहीं लगी थी। यह तो मैं सोच ही नहीं सकता था कि इतने लोगों के सामने मेम साहब अपने मन की इस नग्न कामना को इस तरह निरावरण कर देंगी । किसलिये किया था ? किसके लिये किया था ! किसके नफे-नुनसान को बात सोचकर ऐसा किया था उन्होंने ? क्या फ्रेडी ही था इसके पोछे ! और अगर फ्रेडी था तो मेम साहब ने क्या एक वार भी यह नहीं सोचा कि वह औरत होने के साय-साथ दो बच्चों को मां भो है । तो क्या यह मान लिया जाये कि स्त्री को कामना की प्रबलता उसके मातृत्व को भी भुला देतो । मुझे याद है कि उस दिन रेनी भी वेहोश होकर गिर पड़ी थी ! कोर्ट किसको संभाले ? मुजरिम को या मुजरिम की लड़की को ? यह भी याद है कि इसके बाद जितने दिन मुकदमा चलता रहा रेनी ने अपनी मां का मुंह नहीं देखा ।
११२ चार आंखों का खेल -क्या आपका चरित्र खराब है ? -हाँ। -- -क्या खराबी है। -मैं इन्सान नहीं हूँ। मैं मुलज़िम फ्रेडी के साथ एक विस्तर पर सोती रही हूँ। --पर फ्रेडी की उम्र तो आपके लड़के के बराबर है ? -~-इससे ज्यादा मैं कुछ नहीं कह पाऊँगी। -उसके बाद? -कई वार लज्जावश मैंने आत्म-हत्या करने की भी सोची पर कर नहीं सकी। कई बार रिवॉल्वर का निशाना अपने मस्तक पर लगाया पर ट्रिगर नहीं दवा । साहस ही नहीं हुआ मरने का। -उसके बाद? -उसके वाद झगड़ा जव बहुत बढ़ गया तो मैं अन्दर घुस गई, जाकर देखा मेरे लड़के ने रिवॉल्वर की नली नैन्सी की ओर कर रक्खी -- थी। ----क्यों, नैन्सी पर किस बात का गुस्सा था ? नैन्सी पर उसकी नज़र थी। मेरा हो तो लड़का था वह । उसका भी स्वभाव-चरित्र मेरे ही जैसा तो होना था। अपने को और नहीं रोक पाई मैं । हाथ को ह्विस्की की बोतल पास की टेबिल पर रखकर उसको पकड़ने दौड़ी। मुझे देखकर उसने रिवॉल्वर मेरी ओर कर दिया शायद मुझ पर गोली भी चला देता पर फ्रेडी ने पकड़ लिया उसे । दोनों जने गुत्थमगुत्मा हो रहे थे। फिर अचानक चार्ली फ्रेडी को गिराकर उसकी छाती पर चढ़ बैठा और मारने की कोशिश करने लगा। मैंने जल्दी से उसके हाथ से रिवॉल्वर छोन लो। चार्ली ने जब देखा कि रिवॉल्वर नहीं है तो उसने पास रक्खी ह्विस्की को बोतल उठा ली और जैसे ही फ्रेडी के सर पर मारने को हुआ मैंने रिवॉल्वर चला दिया। ---अपने लड़के पर आपने खुद गोली चला दो ? -हाँ। --अपने लड़के को मारने में आपको कोई हिचक नहीं हुई ? -नहीं। -क्यों नहीं हुई ? -फ्रेडी के मारे जाने से मुझे ज्यादा ही दुख होता--शायद... P चार मांखों का ऐत ११५ –पर उसके अलावा उस समय चारा भी क्या था मेरे लिये। जिसकी मां ऐसी हो उसकी गति और हो ही क्या सकती है ? -फिर यहां क्यों नहीं रह पा रही हो? जरा देर चुप रहो रेनो, फिर बोली-तुम मुझे यहां से अपने साय ले जा सकते हो अंकल ? हँसी आ गई मुझे । वोला--तुम वच्चो नही हो, अपनी मर्जी से जहां चाहो जा सकती हो । मेरी सहायता की क्या जरूरत है तुम्हें ? -जा तो सकती हूँ, पर कहां जाऊँ ? पैसे जा ? रूपया-पैसा भी तो नहीं है मेरे पास । कहीं जाने के लिये भी तो गांठ में पैसा चाहिये- -पैसे मैं दे सकता हूँ--- -- पैसे कितने दोगे अंकल ? उससे तो तुम मुझे अपने माय ले चलो- -कहां जाओगी? -जहां भी कहो । जहाँ तुम ले जाओगे । अब तक अपनी इच्छा- नुसार चलती आई हूँ। अब तुम्हारे कहे अनुसार चलूंगी- -यह लोग तुम्हें रोकेंगे नहीं ? -रोकेंगे। पर अभी फादर वाट्सन सो रहे हैं । ऐसा सुयोग फिर नहीं मिलेगा । इसलिये सोचती हूँ तुम्हारे साथ ही निकल जाऊँ मैं सचमुच संकट में पड़ गया। अपने को कोसने लगा कि क्यों रुक गया । चला गया होता तो कम से कम इस झंझट में तो न पड़ता। पर तव सोचने का समय नहीं था। उधर बस चलने को तैयार थी। अपनी-अपनी सीट लेने में इतने व्यस्त हो गये थे सब कि मेरी बात भूल हो गये थे। - मैं बोला-तुम अगर वास्तव में चलना चाहती हो तो पलो- रेनो बोली-तुम चलो अंकल, मैं उधर से होकर बाती हूँ, चुपके से चढ़ जाऊंगी बस में- -पर किसी संकट में तो नहीं पड़ जाओगी? -अभी तो स्कूल खुलने में बहुत देर है. और फादर वाट्सन भी सो रहे हैं ब्रेकफास्ट से पहले वाहर नहीं आयेंगे- कहकर रेनो चली गई। मैं सूटकेस उठाकर आउट हाउस से निकला। जल्दी करने की आवश्यक्ता यो । वस छूटने ही वाली थी । में पहुंच कर थोड़ी देर के लिये उसे रोक सकता था।
चार आंखों का खेल ११४ । जब अपील हुई थी तब भी रेनी नहीं गई थी। मेम साहब की स्वीकारोक्ति के दिन से ही उसने मां के बारे में, उसके भले-बुरे के बारे में सोचना-विचारना बंद कर दिया था। अकेली हो गई थी वह। तब भी अकेली थी और यहाँ आकर देखा आज भी अकेली थी। उसके बाद? उसके बाद बहुत कुछ हो गया था । कैपिटल पनिशमेंट (मृत्युदंड) हो गया था मेम साहब को। स्वेच्छा से सारा अपराध अपने ऊपर लेकर फ्रेडी को साफ बचा दिया था उन्होंने । परन्तु उस समय क्या पता था कि कहानी अभी खत्म नहीं हुई थी। आज पहली बार इस बात का अनुभव हुआ था कि मनुष्य के जीवन के सामने उसकी कल्पना भी हार मान जाती है । मैंने कभी सोचा भी नहीं था कि रेनी फिर से मेरे जीवन में इस प्रकार उपस्थित हो जायेगी आकर। रेनी ने पूछा--अंकल, लगता है तुम इनके साथ नहीं जा रहे हो ? मैंने पूछा-तुम्हें कैसे पता लगा ? -बस तो तैयार है पर तुम्हारा बैग व वेडिंग यहीं पड़ा है अभी तक? स्वीकार करते हुए मैंने कहा-तुमने ठोक ही समझा है । मैं सचमुच नहीं जा रहा । तुमसे एक वार मिलना जरूरी था इसीलिये पोछे रह गया हूँ। -पर मुझसे मिलने में तुम्हारा क्या फायदा है अंकल ? -तुमने कहा था न कि यहाँ तुम्हारा जीवन अस्थिर हो उठा है, शांति के लिये तुम यहाँ आई थीं, वही तुम्हें नहीं मिलो ? बट ह्वाई ? ह्वाई आर यू अनहैप्पी ? -मुझे शान्ति नहीं मिली अपनी तकदीर के कारण, इसके लिये तुम क्या करोगे अंकल ? -तो फिर तुमने मुझसे वह सब क्यों कहा ? --गलती हो गई ! आगे से कभी नहीं कहूँगी। तुम नहीं आते तो और किसी से कहती भी नहीं- पर बताओ न, क्या दुख है तुम्हें ? याद है मेरो इच्छा नहीं थी तुम्हारे चक्रधरपुर छोड़ने की !
धार मांपों का पेल ११५ -- --पर उसके अलावा उस समय चारा भो क्या था मेरे लिये। जिसकी मां ऐसी हो उसकी गति और हो हो क्या सकती है ? -फिर यहां क्यों नहीं रह पा रही हो जरा देर चुप रहो रेनी, फिर वोली-तुम मुझे यहां से अपने साय ले जा सकते हो अंकल ? हँसी आ गई मुझे । चोला-तुम वच्ची नहीं हो, अपनी मर्जी से जहाँ चाहो जा सकती हो । मेरी सहायता की पया जरूरत है तुम्हें ? --जा तो सकती हूँ, पर कहाँ जाऊँ ? कैसे जाऊँ ? रुपया-पैसा भी तो नहीं है मेरे पास । कहीं जाने के लिये भी तो गांठ में पैसा चाहिये- -पैसे मैं दे सकता हूँ- - पैसे कितने दोगे अंकल ? उससे तो तुम मुझे अपने साथ ले चलो- -कहाँ जाओगी? --जहाँ भी कहो ! जहाँ तुम ले जाओगे । अव तफ अपनी इच्छा- नुसार चलती आई हूँ। अब तुम्हारे कहे अनुसार चलूंगी- -यह लोग तुम्हें रोकेंगे नहीं ? ~-रोकेंगे। पर अभी फादर वाट्सन सो रहे हैं । ऐसा सुयोग फिर नहीं मिलेगा । इसलिये सोचती हूँ तुम्हारे साथ ही निकल जाऊँ मैं सचमुच संकट में पड़ गया। अपने को कोसने लगा कि क्यों रुका गया । चला गया होता तो कम से कम इस झंझट में तो न पड़ता। पर तव सोचने का समय नहीं था। उधर बस चलने को तैयार थी। अपनी-अपनी सीट लेने में इतने व्यस्त हो गये थे सब कि मेरी बात भूल ही गये थे। मैं बोला-तुम अगर वास्तव में चलना चाहती हो तो चलो- रेनी बोली-तुम चलो अंकल, में उधर से होकर आती हूँ, चुपके से चढ़ जाऊँगी बस में- -पर किसी संकट में तो नहीं पड़ जाओगी? -अभी तो स्कूल पुलने में बहुत देर है. और फादर वाट्सन भी सो रहे हैं ब्रेकफास्ट से पहले बाहर नहीं आयेंगे- कहकर रेनी चली गई। मैं सूटकेस उठाकर आउट हाउस से निकला। जल्दी करने की आवश्यकता यो। बस छूटने ही वाली थी। मैं पहुंच कर थोड़ी देर के लिये उसे रोक सकता था।
११६ चार आंखों का खेल एक रात के लिये आश्रय लेना पड़ा था पर उन नौ-दस घंटों में ही घट जाने वाली इस नाटकीय घटना की कल्पना कहाँ कर सकता था मैं । चक्रधरपुर छोड़ देने के बाद सभी कुछ तो भूल गया था । मेम साहब चली गई थीं, रेनी भी चक्रधरपुर छोड़ गई थी और फ्रेडी के छूट जाने पर भी नैन्सी की गृहस्थी जलकर खाक हो गई थी। दोनों साथ रहते हुए भी एक दूसरे से कोसों दूर चले गये थे। उस मुकदमे ने नैन्सी को जैसे विल्कुल धराशायी कर दिया था। लोगों को मुंह दिखाना बन्द कर दिया था उसने । और फेडी? ऑफिस जाता क्योंकि जाये बिना चलता नहीं था, पर बस वहीं तक । बाहर निकलता तो लोग उँगली उठाकर बातें करते। उसके बाद एक दिन सुना कि नैन्सी फ्रेडी को छोड़कर अपने बाप के घर चली गई । उड़ती खबर यह भी सुनी थी कि उनका तलाक़ हो गया है । झगड़ा तो उनमें प्रायः हो जाता था-पड़ोसी आमतौर पर सुनते और चर्चाएँ करते रहते थे। कई बार झगड़े के बाद फ्रेडी रात को घर से निकल जाता। कहाँ जाता कोई नहीं जानता। कोई कहता कि स्टेशन के ओवर ब्रिज पर जाकर लेटा रहता । कोई कहता कि उसने उसे नदी किनारे अकेले घूमते देखा था। ? पर उस अशान्ति का कारण कोई नहीं बता पाता। तारक बाबू,नरसिंह वावू कुतूहली प्रकृति के लोग थे। एक दिन आकर मुझसे पूछने लगे--क्या हुआ मोशाय, क्या बात है ? --मैं कैसे जान सकता हूँ ? आप ही बताइये न ? -~-वो मेम साहब की लड़की ? वह तो है ! उसे कुछ नहीं मालूम ? -वह नहीं है! नहीं है मतलव --वह तो चली गई है-- --चली गई है ? कहाँ चली गई है ? कव आयेगी? -~वह अव नहीं आयेगी। -क्यों नहीं आयेगी ? कहाँ गई ? किसके साथ गई ? -कहा न, अव नहीं आयेगी वह । मुझे और कुछ नहीं मालूम । उसके कुछ दिन बाद मकान-मालिक ने किसी गुजराती परिवार को मकान किराये पर उठा दिया था। नये-नये बदली होकर चक्रधरपुर आये थे विलासपुर से वह लोग।
चार मांखों का पेस ११७ और उसके बाद में भी वहां से चला आया था हमेशा के लिये । फिर मुझे खबर नहीं मिली वहां की। आज इतने दिन बाद यहां इस जंगल में फिर से नाटक का सूत्र पकड़ना पड़ेगा यह तो मैंने स्वप्न में भी नहीं सोचा था। - बस पर जा ही रहा था कि आउट हाउस की तरफ से फादर वाट्- सन आते दिखाई दिये । दिल धक से रह गया । तो क्या फादर को सब कुछ पता लग गया है ? कल रात को अंधेरे में अच्छी तरह से चेहरा नहीं देख पाया था । पर अनुमान से वही लग रहे थे। मेरे पास माकर फादर ने पूछा-तुम नहीं जा रहे हो ? -अब जा रहा हूँ- -पर बस तो जाने को तैयार है। --मैं अभी जा रहा हूँ फादर ! फादर वाट्सन ने पूछा-तुम लोगों को किसी तरह की तकलीफ तो नही हुई रात को? -नहीं, आपको बहुत धन्यवाद ! -तुम क्या किसी का इन्तजार कर रहे हो? क्या जवाब दूं समझ नहीं पाया मैं । फादर ने पूछा-मुझसे कुछ कहना चाहते हो? बोला-नही, धन्यवाद देने के अलावा और कुछ कहने को नही है । रात को इतने लोगों को आपने आश्रय दिया, आपका असीम अनुग्रह था-- -अनुग्रह की कोई बात नहीं है, हमारा यह चर्च मनुष्य को सेवा के लिये ही बना है। –पर हम लोग तो क्रिश्चियन नहीं हैं, इसलिये कह रहा हूँ- फादर ने कहा- हमारे लिये क्रिश्चियन, हिन्दू, मुसलमान सब एक हैं, हम मानवता के सेवक हैं । वी सर्व मैन ! और देर करने का समय नही था । सूटकेस उठाकर चलने वाला ही चार आंखों का खेल ११८ ? था कि फादर की आवाज सुनकर चौंक पड़ा -कहाँ जा रही हो तुम घूम कर देखा रेनी थी। कपड़े बदल आई थी। बिल्कुल सादी नागरिक पोशाक । शरीर पर रंगोन फ्राक, पाँव में जूते-मोजे और हाथ में बैग । उसी अवस्था में फादर के सामने पड़ गई थी वह । डर लगने लगा मुझे। पर रेनी शायद इसके लिये तैयार होकर आई थी। मेरे पास आकर बोली-चलो अंकल, हमें देर हो रही है- फादर वाट्सन का चेहरा गुस्से से लाल हो गया। चीख कर बोले- कहाँ जा रही हो रेनी ? रेनी वोली-मैं चर्च छोड़कर जा रही हूँ फादर... -बाट ? विस्मित होकर पूछा फादर ने-जा रही हो इसका मतलव ? कहाँ जा रही हो ? एण्ड ह्वाई.... जहाँ मर्जी जा रही हूँ- -जहां मर्जी हो जा रही हो इसका मतलब ? मेरी अनुमति लेने को आवश्यकता भी नहीं समझी तुमने ? --अव अनुमति माँग रही हूँ, आप सो रहे थे इसलिये अनुमति लेने के लिये जगाया नहीं। अनुमति लेने के लिये रुकती तो बस चली जाती और फिर मेरा जाना नहीं होता। फिर मेरी ओर देखकर बोली-और मेरे यह अंकल भी चले जाते । ---यह तुम्हारे अंकल हैं ? आँखें निकालकर फादर ने कहा-पर जानती हो कि मैं तुम्हारा जाना रोक सकता हूँ? -आप जो भी कहिये मुझे तो जाना ही है। ---मेरो वात नहीं मानोगी ? -नहीं। -जानती हो मैं इस कान्वेन्ट का हैड हूँ। यहाँ मेरी बात ही कानून है । यहाँ सवको मेरी आज्ञानुसार चलना पड़ता है। सिर ऊँचा करके रेनी ने कहा-अव से मैं आपके कानून की सीमा बाहर हूँ। मैं यहाँ से सारे सम्पर्क-सम्बन्ध तोड़कर जा रही हूँ। अब आप मुझे यहाँ रोक कर नहीं रख सकते। एण्ड फादर आई हैव नो कम्प्लेण्ट अगेंस्ट एनी बड़ी ! से चार आखा का खल रेनी के करीब आकर फादर वोले-रेनी तुम इस समय बहुत उत्तेजित हो; अन्दर चलो, तुमसे बातें करनी हैं ! -नहीं आपको जो कुछ भी कहना है यही सबके सामने कहिये । मैं अन्दर नहीं जाऊँगी। - तुम्हें हम लोगों ने क्या कष्ट दिया है ? कोई कप्ट नहीं दिया? खाने-पहनने का कष्ट ही क्या सब कुछ है ? मन नाम की कोई चीज नहीं है क्या ? ससार में मेरा कोई नहीं है इसलिये क्या मेरा अपना भी कुछ नहीं है ? मैं कुछ नही हूँ ? आप क्यों आये यहाँ ? यहां आये विना रहा नहीं गया आपसे । मेरा जी जलाये विना आपको चैन नहीं पड़ रहा था ? मां-बाप-भाई सब तो खो दिये मैंने । इसके बाद यहाँ भी मुझे चैन से नहीं रहने देंगे? आप क्या यही चाहते है कि मैं आत्महत्या कर लूं ? एक सांस में इतनी बातें कहकर रेनो हांफने लगी। फिर मेरी ओर देखकर बोलो-आओ, चलो अंकल, बस चली जायेगी-- -~-सुनो तो- पोछे से आवाज़ दो फादर ने । उस दिन मेरे जैसे एक बाहरी आदमी के सामने मिशन के दो व्यक्तियों का आपस में लड़ना फादर को अच्छा नहीं लगा। विशेष कर तब जब कि एक जना मिशन का कर्ता-धर्ता था और एक सामान्य नन। और फिर न तो मैं उनके समाज का था और न मिशन का कोई। कहां सात समुद्र पार से आने वाले चंदे से इनका सेवा-धर्म चलता है। समाज संसार से दूर रहकर यह लोग कष्ट साध्य व्रत पालन करते है। फिर इनमें ऐसी कलह ऐसा विवाद क्यों यह भी मेरी समझ में नहीं आया। पर रेनी ने जैसे मन में बिल्कुल तय कर लिया था। घूमकर बोली कहिये, क्या है ? --इस तरह मिशन का कानून तोड़ना क्या तुम्हारे लिये उचित है ? फादर का स्वर अपेक्षाकृत नरम था इस बार । जवाव में रेनी ने कहा-कानून मान कर चलने के लिये ही तो यहां आई थी, फिर क्यों आपने मुझसे कानून तुड़वाया? हैरान हो गये फादर । वोले- कह क्या रही हो तुम? मैंने कब १२० चार आँखों का खेल तुमसे कानून तोड़ने को कहा है। -मुंह से तो आपने नहीं कहा; पर काम से मुझे कानून तोड़ने पर मजबूर किया है। मैं तो अपनी माँ की मृत्यु की बात भूल ही जाना चाहती थी, आपने क्यों याद दिला दी फिर से ? चुप रह गये फादर वाट्सन । मैं भी बात का अर्थ समझ नहीं पाया। दोनों के बीच में बोलने का अधिकार न होने के कारण भी मैं चुप ही खड़ा रहा। फिर फादर वोले-तो फिर मैं हो चला जाता हूँ यहाँ से-तुम क्यों जाओगी? —नहीं आप रहिये, मैं ही चली जाती हूँ- -नहीं तुम रहो, मुझे हो जाना होगा- -मैंने तो आपका रास्ता रोका नहीं है । आप जाना चाहते हैं चले जाइये पर मैं अव यहाँ नहीं रहूँगी- -कहाँ जाओगी? -कहाँ जाऊँगो यह तो मैं भी नहीं जानती। उस दिन चक्रधरपुर से चलने के समय जिस प्रकार नहीं जानती थी कि कहाँ जाऊँगी, उसी प्रकार आज भी नहीं जानती- -पर एक बार फिर सोच कर देखो, तुम ही बता जाओ कि मिशन के हैडक्वार्टर को क्या जवाव दूंगा ? क्या कारण बताऊँगा उन्हें ? -कह दीजियेगा आपकी बात न मानकर कानून भंग करके चली गई मैं। इसीलिये तो कह रहा हूँ कि मुझे इस परिस्थिति से वचा लो, मुझे ही कहीं चला जाने दो, जहाँ होगा मैं ही अपना मुंह छुपाये रहूँगा। अचानक रेनो चीख कर बोली-पर फादर, मैं भी तो इन्सान हूँ, मुझे भी ता जिंदा रहने की इच्छा होती है । मैं क्या खुशी से यहाँ आई थी या खुशी से यहाँ से जा रही हूँ- फादर जैसे आर्तनाद कर उठे । बोले--पर यह तो बताओ कि इसमें मेरा क्या अपराध है ? क्या मेरा यहाँ आना ही अपराध हो गया ? मेरे यहाँ आने के बाद से तुमने कभी एक बात नहीं की मुझसे ? मुझे अगर यह पता होता कि मुझे देखकर तुम इस तरह व्यवहार करोगी तो क्या मैं यहाँ आता?
1. सांपों का खेल -- PH पर में हो क्या कर ? अपनी नकदीर को दीर बदर और तो कोई उपाय है नही-- --पर मेरा अनुरोध है कि तुम यहीं नही दिन रखने के लिये तो रहो हो नहीं में जा रही हूँ-~चलो यरल- मेरी योर देखकर फादर बोल-जेन्टिल मना कीजिये । अव वह मेरी बात नहीं मुनेगी, अपनी- मैंने कहा~में क्या करूं । इस मामले में ले नहीं- रेनो बोली-अंकल को कहने से नी यव महान गाने मेरी मां का खून किया है आप मर्डरर है, दूनी है, मई की उन नहीं सुनेंगी- कहकर मेरा हाथ पकड़ लिया। बोलो बनो रद ह. चलें और मेरा हाथ खींचते-खोंचते दम पर ले गई। एलेको हो यो। उधर रेनी और फादर के अगड़े की आवाज सुनकर कन्टेन के लोग भी इकट्ठा हो गये थे। कुछ विद्यार्थियों की नींद भी सुनाई थी। नव लोगों को विस्मित दृष्टि के सामने हम इव पर ऋगरे। और बस छूट गई। बस चल रही थी और मैं रेनी से बार-बार पूहापामह तुमने था किया। फादर वाट्सन के नाप लड़ने की कला जहरतीका किया है उन्होंन? पर रेली ने कोई बात नहीं की थी। मारे राले चुर हो दी रहो पो वह मेरी एक भी बात का जवाब नहीं दिखा पाने । जब मुड मुझे रहस्यमय ना लग रहा था। मैं क्या लगता पालो का जो यह इस तरह मेरे साय चली बाई यो? तो उनका कोई नहीं था। जहां वन रुको अड्डे पर वहां से होटल तक पैदल ही गनापार कुलीनामान लेकर चलने लगेगार को तरक! "-
No text on this page.
चार आयो का खेल १२३ जल्दी से जाकर रेनी को उठाया। हड़बड़ा कर उठ बैठो यह गि से कांप उठी। बोली 1--क्या हुआ अंकल? -टेलीफोन पर बुला रहे है तुम्हें । -कौन ? -राजपुर मेयोडिस्ट चर्च से अर्जेन्ट कॉल है । मगरी के सारे होटलों में टेलीफोन करने के बाद यहाँ तुम मिली हो । चलो- पहले तो वह टेलीफोन पर बात करना ही नहीं पाहता थी। सोग रही थी फादर वाट्सन का फोन होगा। बोली -शायद मुझे वापस आने को गहेंगे। तुम गाह दो साल किसी भी तरह वहां लौट कर नहीं जाऊँगी। हजार बार बुलाने पर भी नहीं जाऊँगो-वरन् चलो आज ही हम मगरी छोए कर चमे जायें कही। यहां रहने से वह लोग डिस्ट करते रहेगे- मैंने कहा-पर टेलीफोन पर बात करने में क्या हर्ग है। तुम्हें जबर्दस्ती तो वे ले नहीं जायेंगे- उनके साथ तो बात करने में भी घिन लगती है मुझे यह बोली- नहीं तुम ही कह दो मेरी तरफ से । अन्त में बड़ी मुश्किल से समझा-बुझाकर नैयार किया उगे। जय उसने टेलीफोन उठाया तो पास ही गड़ा या । जाने क्या खवर यो कि सुनकर रेनी चौक उठी। ---कब ? रात को हो ? मेरे चले आने के बाद? एक नाय कई प्रश्न कर डाले टमनं । कुछ भी नहीं मम पाया में। रेलो के टेलीफोन रखते ही मैंने पूछा-क्या हुवा? रिमका टेलीफोन या? पादर का? जवाब देना चाहते हुए नी जैसे जवाब दे नहीं पाई वहा पल भर में ही उसका मुंह नन्द गया था। गुन्य दृष्टि में मंग थोर. देवनी कुछ क्षन वह घड़ा रहा। अनी उन दृष्टि म अयं न पा प्रयत्न मनोमुड़ा रहा, परपर्य। बन्द्र में हार कर मन ही किराया हमारे १२२ चार आंखों का खेल का बोझ और पड़ गया। और केवल रेनी का वोझा नहीं था बल्कि चिन्ता का वोझा उससे अधिक था। कैसे मिटेगो यह चिन्ता ? क्यों भार उठाऊँ इसका ? पर इससे वचने का भी तो कोई उपाय नहीं दिखाई देता। आजकल कितनी तरह के बोझ मनुष्य के कंधे पर पड़ने लगे हैं। मेरे पूर्वजों की चौदहवीं पीढ़ी ने भो इनकी कल्पना नहीं को होगी। प्रति- दिन सुबह अखबार आने के साथ-साथ ये हमारे मन पर जमते हैं और एक पर एक जमते-जमते इतने अधिक हो जाते हैं कि और कोई नया वोझा उठाने का साहस नहीं रह जाता। आयु के जिस सोपान पर मैं हूँ वह तो बोझ उतारने की उम्र होती है। किसी निष्कर्ष पर पहुँचने के लिये बार-बार पूछ रहा था-तुम लोगों का झगड़ा किस बात पर है ? तुम्हारी क्या क्षति की थी फादर ने। पर रेनो ने तो जैसे चुप्पी साध ली थी। रात गुज़र गई ऐसे ही आकाश-पाताल सोचते-सोचते। कमरा काफी बड़ा था। अलग-अलग दो पलंग बिछे थे। दूसरा फर्नीचर भी था। रेनी निश्चित सो रही थी अपने पलंग पर । पर मेरी आँखों में नींद नहीं थी। एक दिन रेनी की माँ की समस्या ने मुझे इसी प्रकार विचलित किया था। और आज इतने साल बाद फिर बेटी की समस्या मुझे विचलित कर रही थी। रात खत्म होने को थी कि दरवाजे पर खटखटाहट हुई। मैंने पूछा--कौन ? कौन है ? वेयरा बोला-टेलीफोन कॉल है बाबू जी टेलीफोन कॉल ! मुझे टेलीफोन करने वाला कौन हो सकता है यहाँ मैं तो नया हूँ यहाँ और मैं यहाँ हूँ यह तो किसी को भी पता नहीं। जल्दी-जल्दी ऑफिस में पहुँचा । राजपुर कान्वेन्ट से फोन था। उधर से प्रश्न आया-वहाँ मेथोडिस्ट चर्च की नन रेनी है ? आवाज किसी मेम साहब की लगी। पूछा--आप कहाँ से बोल रही हैं। ----राजपुर मेथोडिस्ट चर्च कान्वेन्ट से। -है, अभी बुला देता हूँ। .
चार आयो का पल १२३ जल्दी से जाकर रेनी को उठाया। हड़बड़ा कर उठ बैठो वह । भय से कांप उठी। बोली-क्या हुआ अंकल ? --टेलीफोन पर बुला रहे हैं तुम्हें । --कौन ? --राजपुर मेयोडिस्ट चर्च से अर्जेन्ट कॉल है । मसूरी के सारे होटलों में टेलीफोन करने के बाद यहां तुम मिली हो । चलो- पहले तो वह टेलीफोन पर बात करना ही नहीं नाहती थी। सोच रही थी फादर वाट्सन का फोन होगा। वोलो -शायद मुझे वापस आने को कहेगे। तुम कह दो अंकल मैं किसी भी तरह वहां लौट कर नही जाऊँगी । हजार बार बुलाने पर भी नही जाऊँगी-वरन् चलो आज ही हम मसूरी छोड़ कर चले जायें कही। यहां रहने से वह लोग डिस्टर्व करते रहेंगे- मैंने कहा-पर टेलीफोन पर बात करने में क्या हर्ज है। तुम्हें जबर्दस्ती तो वे ले नही जायेंगे- उनके साथ तो बात करने में भी घिन लगती है मुझे वह बोली- नहीं तुम ही कह दो मेरी तरफ से । अन्त में बड़ी मुश्किल से समझा-बुझाकर तैयार किया उसे । जब उसने टेलीफोन उठाया तो में पास ही खड़ा था। - जाने क्या यबर थी कि सुनकर रेनी चौक उठी। -~-कब ? रात को हो ? मेरे चले आने के बाद? एक साथ कई प्रश्न कर डाले उसने । कुछ भी नहीं समझ पाया मैं । रेनी के टेलीफोन रखते ही मैंने पूछा-क्या हुआ? किसका टेलीफोन था? फादर का? जवाब देना चाहते हुए भी जैसे जवाब दे नहीं पाई वह । पल भर में ही उसका मुंह सूख गया था। शून्य दृष्टि से मेरी ओर देखती कुछ क्षण वह खड़ी रही। उसकी उस दृष्टि का अर्थ ढूंढने का प्रयल करता मैं भी बड़ा रहा, पर व्यर्थ । अन्त में हार कर मैंने ही फिर पूछा-क्या हुआ रेनी, कुछ मुझे भी तो बताओ?
१२४ चार आंखों का खेल, इस बार वह बोली-जल्दी से तैयार हो जाओ अंकल, हमें अभी मसूरी छोड़ कर जाना होगा- तव भी मैं कुछ नहीं समझ पाया। फिर पूछा-आखिर ऐसी भी बात क्या है। पर बिना कोई जवाब दिये जल्दी से कमरे में जाकर वह तैयार हो गई और बोली-चलो अंकल चलो, समय नहीं है, जल्दी करो, जल्दी से एक टैक्सी मंगाने को कह दो होटल वालों को - पूछा भी- मुझे याद है रेनी ने ढंग के वात भी नहीं की थी उस समय मुझसे । जैसे मैं कुछ भी नहीं था । यह तो समझ गया था कि वह जल्दी से जल्दी मसूरी छोड़कर कहीं दूर चली जाना चाहती थी। पर क्यों ? यह जानने का कोई उपाय नहीं था। मैंने भी~पर तुमने बताया नहीं टेलीफोन किसका था ? फादर- वाट्सन का? बोली-नहीं। -तो फिर? --कोई और था। -~~-क्या कह रहा था। -~~~~फादर वाट्सन ने आत्महत्या कर ली है- सुन कर सिहर उठा मैं। -~~-यह क्या? क्यों? कहाँ ? कब ? -मेरे आने के थोड़ी देर बाद ही। -आत्महत्या क्यों कर लो? यह कोई नहीं जानता। मेरे चले आने के बाद उन्होंने किसी के साथ कोई बात नहीं की। अपने कमरे में जाकर दरवाजा बंद कर लिया था। फादर वाट्सन को जीवन में सुख नहीं मिला कभी। अब मरने के बाद हो सुख-शान्ति मिल जाये तो भी अच्छा है। मैंने पूछा-कैसे आत्महत्या की ? उन लोगों को कुछ भी नहीं मालूम परन्तु सन्देह कर रहे हैं कि - Com चार माखों का खेल १२५ उन्होंने पोटैशियम साइनाइड खाया है। -तो क्या तुम्हारे कारण आत्महत्या की है ? -मालूम नहीं, हो सकता है ऐसा हो हो- -पर तुम्हारे साथ क्या सम्बन्ध है इसका ? और फिर तुम ही क्यों चलो आई ? तुम्हारी मां की मृत्यु के साथ फादर का क्या सम्बन्ध है ? मेरे प्रश्न सुनकर उसने मेरे मुंह की ओर देखा फिर बोली-तुम फादर वाट्सन को नहीं पहचानते ? -नहीं, मैंने तो उन्हें यहीं पहली बार देखा है- -नहीं, पहले भी मिले हो तुम उनसे-- मिला हूँ? मैं कहां मिलता भला उनसे ? उस दिन रात को पड़ा तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहा था तभी तो पहली बार देखा था उन्होंने मुझे- -जानते हो, बड़े भले आदमी थे फादर --अगर भले आदमी थे तो उनके साथ झगड़ा क्यों किया तुमने ? टैक्सी तेजी से भाग रही थी । रेनो कुछ अन्यमनस्क सी हो गई थी। कुछ देर बाद मेरे प्रश्न का उत्तर देते हुए बोलो-मैंने जीवन भर उन्हें क्षमा नहीं किया और मरने पर भी नहीं करूंगी- वह जैसे अपने आप से बातें कर रही थी। फिर कुछ देर रुक कर बोलो-मैं किसके सहारे जिंदा रहूँ अंकल ? मैंने तो बस एक शेल्टर चाही थी, एक माश्रय और कुछ भी नहीं, वह आश्रय भी खत्म कर देना चाहते थे फादर वाट्सन । मानो मेरा सर्वनाश किये बिना उन्हें चैन नही पड़ रहा था- --क्यों क्या बिगाड़ा था तुमने उनका ? मैं देख रहा था कि रेनो ने अंट-शंट चकना शुरू कर दिया था। पहले तो वह ऐसी नहीं थी। चक्रधरपुर में तो उसके मुंह से वातें भी नहीं निकलतो थीं। हमेशा चुप बनी रहती थी। पर अब कितनी बदल गई थी वह ! जिस रास्ते गये थे उसी से लौट रहे थे । कान्वेन्ट के पास आते ही पूछा मैंने-उतरोगी यहाँ ? गुस्सा आ गया रेनी को। चोली-किसलिये उतरूंगी? -फादर वाट्सन ने स्विसाइड किया है, एक बार देख आना उचित नहीं होगा क्या?
१२६ चार आंखों का खेल । -नहीं-नाड़ी मत रोकना- कान्वेन्ट के सामने पहुंचते ही लोगों की भीड़ दिखाई दी। इसी बीच खवर दूर-दूर तक फैल गई थी। अन्दर काफी लोग रहते थे और फिर वोडिंग में रहने वाले विद्यार्थी भी थे। दूर गाँवों के गाँवों के भी काफी लोग थे। सभी दुखी थे। फादर की आत्महत्या से चर्च के नित्य नैमित्तिक कार्य में बाधा पड़ गई थी। एक रात के आश्रय से उनके प्रभाव का प्रमाण मुझे मिल चुका था पर उनके साय जो रहस्य जुड़ा था वह अभी भी नहीं खुला था। आया तो था घूमने और पड़ गया एक नाटक के रहस्य जाल में। रेती की ओर देखा । गम्भीर-मुख अन्यमनस्क सी बैठी थी वह । कल से बहुत-सी बातें कही थी उसने पर अव जैसे सारी बातें समाप्त हो गई थीं। उसे देखकर तो ऐसा ही लग रहा था। जैसे आर्ट गैलरी से कोई मूर्ति आकर टैक्सी में बैठ गई हो। मैंने कहा-मैं देहरादून से सीधा कलकत्ता लौट जाऊंगा- कलकत्ता पहुँच कर तुम मुझे छोड़ देना अंकल और तंग नहीं कलंगी मैं तुम्हें । ~पर कलकत्ते में तुम रहोगी कहाँ ? -~-डरो मत तुमसे आश्रय नहीं मागूंगी। कुछ न कुछ इन्तज़ाम मैं अपने लिये कर हो लूंगी। -क्या इन्तज़ाम कर लोगी? -वहां रेलवे के बहुत से लोग मेरो जान-पहचान के हैं, उनके पास जाने पर कुछ न कुछ तो हो ही जायेगा। पर वह तो जैसे खुद को लहरों के बीच डूव जाने को छोड़ देना है। इस तरह जीवन भर भटकना क्या अच्छा है ? -देखो। लैट अस सी! कहकर फिर चुप हो गई रेनी। मैं भी सोचने लगा। मेरे ऊपर निर्भर करके जो लड़को सब कुछ छोड़कर चल पड़ी है उसको कलकत्ते में मैं कहाँ रक्खूगा यही चिन्ता मुझे खाये जा रही थी । अपने पास रखना असंभव था। किसी एंग्लो-इंडियन मित्र की याद करने लगा। कोई ऐसा होना चाहिये जिसके पास इसे छोड़कर निश्चित हो सकूँ । पर ऐसा विश्वास योग्य परिचित व्यक्ति कौन हो सकता था ? गाड़ी नीचे उतर रही थी। -- - -- घार आपों का पेस १२७ अचानक रेनी बोली--अंकाल गाड़ी रोको- हैरान होकर मैंने पूछा-क्या हुआ? -~मैं जरा वहां हो आऊँ। -कहां? -अपने मिशन में । इतनी बड़ी दुर्घटना हो गई, मुझे सवर भी दी उन लोगों ने, नहीं जाना सराव लगेगा। -ठीक तो है- गाड़ी घुमाई गई फिर से । कान्वेन्ट की इमारत काफी पीछे छूट गई थी। कान्वेन्ट के सामने गाड़ी रुकी तो देखा कि भीड़ और ज्यादा हो गई थी। इस आकस्मिक घटना से समी स्तम्मित थे। रेनी गाड़ी से उतर गई और वोलो-तुम व्हरो अंकल, मैं गई और आई बस, सबसे मिल कर चली आऊँगी- कहकर रेनी अन्दर चली गई और में टैक्सो में ही बैठा रहा । उस समय क्या पता था कि यही घटना एक दिन मेरी कहानी या विषय बन जायेगी कुछ देर बाद रेनी दोड़ती हुई आई और वोली- अंकल । उसका चेहरा देखकर एक बार फिर विस्मित हो जाना पड़ा। मांखों में मामू भरे थे उसको । बोला-क्या हुआ, बैठो गाड़ी में- नहीं अंकल, मेरा बैग दे दो, मैं नहीं जा पाऊँगो मुम्हारे साथ- --पर... -हां फादर को आत्महत्या से यहां सब गड़बड़ हो गया है । मेरे बिना काम नही चलेगा- -~पर फादर वामन ने आत्महत्या क्यों की ? कुछ पता चना ? --जीवन में कभी शांति नहीं मिली थी उन्हें इसीलिये वे किमी दूसरे को भी शांति से नहीं रहने देना चाहते थे। विशेष कर नैन्सी के छोड़कर चले जाने के बाद-- -नैन्सी ! नैन्सी किसे छोड़कर चली गई थी ? -इन्हीं फादर वाट्सन को- -या कह रही हो तुम, मेरी कुछ भी समझ में नहीं आ रहा । फादर वाट्सन के साथ नैन्सो का पया सम्पर्क था?
No text on this page.
No text on this page.
१२८ चार प्रांखों का खेल . -फादर वाट्सन ही तो फ्रेडी था। आल्फ्रेड- किसी ने जैसे मुझे आकाश से नीचे गिरा दिया। रेनी आगे कहने लगी वह आघात पाकर हो तो फ्रेडी मिशन में चला आया था। फिर यहाँ आकर इस चर्च का भार संभाल लिया था। मैंने कहा-पर तुम्हारे साथ उसका क्या झगड़ा था रेनी ? वह बोली-मेरी माँ की मृत्यु के लिये जो व्यक्ति जिम्मेदार था उसे मैं कैसे बर्दाश्त करतो, तुम्हीं बताओ अंकल ? कैसे उसके साथ एक छत के नीचे रहती ? कैसे माफ कर सकती थी मैं उसे ? कहकर रुको नहीं रेनो। उसके आवेग का वाँध एकबारगी ही टूट गया । बोली- मैं चलती हूँ अंकल । अभी पुलिस आ जायेगी, बहुत से झंझट निपटाने होंगे हम लोगों को- कहकर वैग उठा कर वह अन्दर जाने लगी। मैंने पीछे से पुकारा-रेनो एक बात सुन जाओ- वह लौट आई । आने पर मैंने पूछा-फ्रेडी तो आल्फ्रेड डो'सा था, वाट्सन कैसे हो गया ? -उसकी माँ ने बाद को खड़गपुर में मिस्टर वाट्सन से विवाह कर लिया था- कहकर द्रुत कदमों से अन्दर जाकर अदृश्य हो गई वह । पत्थर की मूर्ति की तरह ज्यों का त्यों बैठा रह गया मैं । इस पटा-. क्षेप की तो कल्पना भी नहीं थी मुझे । मुझे इस तरह चुप वैठे देखकर टैक्सी ड्राइवर - - ने कहा-जायेंगे साहब ? -~-हाँ चलो। और टैक्सो के पहियों के नीचे से सड़क पोछे फिसलने लगी।
No text on this page.