Government College, Kota
Ath Vedangaprakash Bhag-8
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KOTA (Raj.)
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No.
DUE DTATE
SIGNATURE
* अोइम् *
अथ वेदाङ्गप्रकाशः
82-1-24
Mihan
DING TEXT BOS
तत्रत्य अष्टमो भागः
रकत
स्त्रैणताद्वितः
78
पाणिनिमुनिप्रणीतायामप्टाध्याय्यां पञ्चमो भागः
श्रीमत्खामिदयानन्दसरस्वतीकृतव्याख्यासहितः
पठनपाठनव्यवस्थायां सप्तमं पुस्तकम्
-:०:-
अजमेरनगरे वैदिक-यन्त्रालये मुद्रितः
इस पुस्तक के छापने का अधिकार किसी को नहीं है
क्योंकि, इसकी रजिष्ट्री कराई गई है।
सृष्टयन्दाः २,६७,२६,४६,०४८
Baad
amart
पांचवींवार
मूल्य
विक्रमीय संवत् २००४
१०००
LENDING TEXTXUTAH.
Herbert College Library
Class No.15...4...5.......
Books No.. D. a 73
Accession No........32.99..
K. P. P. 5000-2-48.
भूमिका Checka: इस में .. यह अष्टाध्यायी का पांचवां भाग, और पठन पाठन में पाठवां पुस्तक है। मैंने इसको बनाना आवश्यक इसलिये समझा है कि पढ़ने पढ़ानेवालों को 'स्त्री' और 'तद्धित' प्रत्ययों का भी वोध होना अवश्य उचित है। इसके जाने विना अन्य शास्त्रों का पढ़ना भी सुगम नहीं हो सकता। विशेष तो यह है कि संस्कृत में जैसा तद्धित प्रत्ययों से अधिक बोध होता है, वैसा अन्य से नहीं हो सकता। इसमें थोड़ा सा तो ब्रीप्रत्यय का प्रकरण है. बाकी दोनों अध्याय तद्धित के ही हैं। इन में से मुख्य २ सूत्र, जो कि विशेष कर के वेदादि शास्त्रों और संस्कृत में उपयुक्त हैं, उन को लिख कर, भाष्य के वार्तिक, कारिका, उदाहरण, प्रयुदाहरण भी लिख हैं, जिस से स्त्री- प्रत्यय' और 'तद्धित का भी यथावत् बोध हो। बहुत कर के 'उत्सर्ग और 'अपवाद के सूत्र हैं। जैसे-शंपिक के अपवाद सब तद्धित सूत्र. और ऋण का अपवाद, श्रीर इञ् के अपवाद यन आदि प्रत्यय हैं । जो अपवाद सूत्र हैं, वे उत्सर्ग के विषय ही में प्रवृत्त होते हैं, उन से जो बाकी विषय रहता है, सो उत्सर्ग का होता है। परन्तु अपवाद सूत्र के विषय में उत्सर्ग सूत्र कमी प्रवृत्त नहीं होते। जैसे-चक्रवती राजा के राज्य में माण्डलिक राजा, और मारडलिक के राज्य में कुछ थोड़े ग्रामवाले, उनके विषय में कुछ थोड़ी भूमि वाले अपवादव, और बड़े राज्यवाले उत्सर्गवत् होते हैं, वैसे ही सूत्रों में भी समझना चाहिये। कोटि२धन्यवाद परमात्मा को देना चाहिये कि जिसने अपनी वेदविद्या को प्रसिद्ध कर के मनुष्यों का परमहित किया है, कि जिस को पढ़कें महामुनि पाणिनि सदृश पुरुष हो गये। जिन्हों ने हज़ार श्लोकयुक्त छोटे ही ग्रंथ अष्टाध्यायी, और कुछ कम चौबीस हज़ार लोकों के बीच महाभाष्य ग्रंथ में समग्र वेद और लौकिक संस्कृत ब्दरूपी महासमुद्र को भी यथायोन्य सिद्ध करके विदित करा दिया है, कि जिस से एक शब्द भी बाकी नहीं रह गया । उन को भी अनेक धन्यवाद देना चाहिये, कि जो हम लोगों पर बड़ा उपकार कर गये है। वैसे उनको भी धन्यवाद देना चाहिये कि जो इन्दी अन्धों के पढ़ने पढ़ाने और प्रसिद्ध करके निष्कपट होकर तन मन धन से प्रवृत्त रहते हैं। .
(२) क्योंकि तदधीते तद्वद्ध' जो विद्वान् व्याकरण को पढ़ें और पढ़ावें उन्हीं को वैयाकरण' कहते हैं। और जो महायोगीप्रणीत संपूर्ण गुणयुक्त निर्दोष शास्त्र को छोड़ कर अपनी जुद्र बुद्धि से प्रतिष्ठा के लिये अकिंचित्कर वेदविद्यारहित 'सारस्वत- चन्द्रिका' 'मुग्धबोध' 'कातन्त्र' और 'सिद्धान्तकौमुदी' आदि अयुक्त ग्रन्थ रच के परमपुनीत ग्रन्थों की प्रवृत्ति के प्रतिवन्धक हो गये हैं, उन को न वैयाकरण और न हितकारी समझना चाहिये, प्रत्युत अहितकारी हैं। क्योंकि जो व्याकरण का संपूर्ण वोध तीन वर्षों में यथार्थ हो सकता है, उस को ऐसा कठिन और अव्यवस्थित किया है कि जिसको पचास वर्ष तक पढ़ के भी व्याकरण के पूर्ण विषय को यथार्थ नहीं जान सकते । उन के लिये धन्यवाद का विरुद्धार्थी शब्द देना ठीक है। जो इस प्रन्थ में सूत्र के आगे श्रङ्क है, सो इस की सूत्रसंख्या; और अ० संकेत से अष्टाध्यायी, एक ( १ ) से अध्यायः दो (२) से पादः तीन (३) से सूत्रसंख्या समझनी चाहिये ॥ इति भूमिका ।।
* ओ३म् *
संकत
अथ स्त्रैणताद्वितः
++++Khan
स्त्रियाम् ॥ १ ॥ अ० ४ । १ । ३ ॥
यह अधिकार सूत्र है। इस से आगे जो प्रत्यय विधान करेंगे, 'सो समस्त्रीप्रकरण
में जानना चाहिये ॥ १ ॥
अजायतष्टाप् ॥ २॥ अ०४ । १४ ॥
जो श्री अभिधेय हो, तो अजादि गणपठित और अकारान्त प्रातिपदिकों से
टाप् प्रत्यय हो।
-
जैसे-अजादि-अजा; एडका; कोकिला; चटका इत्यादि। अदन्त-खट्या देवदत्ता;
शाला; माला इत्यादि।
अकारान्त शब्द जब स्त्रीलिङ्ग के वाचक होते हैं, तब सब से टाप् ही हो जाता
है। अर्थात् स्त्रीलिङ्ग में अदन्त कोई शब्द नहीं रहता ॥ २ ॥
प्रत्ययस्थात्कारपूर्वस्याऽत इदाप्यसुपः ॥३॥ अ०७।३।४४॥
आप परे हो, तो प्रत्ययस्थ क कार से पूर्व जो अत् उस को इकार आदेश हो, परन्तु
जो वह आप् सुप् ले परे न हो तो। .
जैसे-जटिलिका; मुण्डिका; कारिका; द्वारिका; पाचिका; पाटिका इत्यादि ।
'प्रत्यय' ग्रहण इसलिये है कि-शनोतीति शका। 'ककार से पूर्व इसलिये कहा
है कि-नन्दना; रमणा । 'पूर्व को इत्त्व इसलिये कहा है कि- कटुका, यहां पर को
न हुश्रा । 'प्रकार को इत्त्व' इसलिये कहा है कि-गोका, यहां न हो। 'तपरकरण'
इसलिये है कि-राका धाका, यहां इत्त्व न हो। 'श्राप के परें' इसलिये कहा है
कि-कारकः; धारकः, यहां न हो। 'असुप्' इसलिये है कि-बहवः परिव्राजका
अस्यामिति बहुपरिव्राजका वागणसी ॥ ३ ॥
वा०-मामकनरकयोरुपसंख्यानं कर्त्तव्यमप्रत्ययस्थत्वात् ॥ ४ ॥
सुप्रहित आप के परे मामक और नरक शब्द के अत् को भी इकार आदेश हो।
जैसे-ममेयं मामिका; नरान् कायतीति नरिका ॥ ४ ॥
४ स्त्रैणताड़िते वा०-प्रत्ययप्रतिषेधे त्यक्त्यपोश्चोपसंख्यानम् + ॥ ५ ॥ सुप्रहित आप परे हो तो त्यक् और त्यप् प्रत्ययान्त को इत् अादेश हो। जैसे-दाक्षिणायिका; इहत्यिका x इत्यादि ॥ ५॥ न यालयोः ॥ ६ ॥ अ० ७।३। ४५ ॥ स्त्रीविषय में या और सा इनके ककार से पूर्व अत् को इत् आदेश न हो। जैसे- -यका; सका। यहां 'यत् तत्' शब्दों से 'अकच् प्रत्यय हुश्रा है ॥ ६ ॥ वा०-यत्तदोः प्रतिषेधे त्यकन उपसंख्यानम् ॥ ७ ॥ यत् अऔर तत् शब्दों को जो इत्त्व का निषेध किया है, वहां त्यकन् प्रत्ययान्त को भी इत्त्व न हो। जैसे --उपत्यका; अधित्यका ॥७॥ वा०-पावकादीनां छन्दस्युपसङ्ख्यानम् ॥ ८ ॥ पावका आदि वैदिक शब्दों में इत्त्व न हो ! जैसे-हिरण्यवर्णाः शुचयः पावका; यासु अलोमकाः । 'छन्द ग्रहण इसलिये है कि-पाविका; अलोमिका, यहां लोक में निषेध न हो जावे ॥ ८॥ वा०-आशिषि चोपसङ्ख्यानम् ॥ ६ ॥ आशीर्वाद अर्थ में वर्तमान शब्दों को इत्त्व न हो। जैसे-जीवतात् जीवका; नन्दतात्-नन्दका; भवतात्-भवका इत्यादि ॥ ६ ॥ वा०-उत्तरपदलोपे चोपसङ्ख्यानम् ॥ १० ॥ उत्तरपद का जहां लोप हो वहां इत्त्व न हो। जैले देवदत्तिकादेवका; यज्ञदत्तिकायनका इत्यादि ॥ १० ॥ . + यह वार्तिक इसलिये कहा है कि ( उदीचा० ) इस अगले सूत्र से य पूर्व होने से विकल्प करके इत्व प्राप्त है, सो नित्य ही हो जावे ॥ ४ यहां दक्षिणा शब्द से (दक्षिणापश्चात्पुरसस्त्यक ) इस सूत्र से 'त्यक' प्रत्यय, और इह अन्यय शब्द से (अव्ययात् त्यप् ) इस सूत्र करके 'त्यप् प्रत्यय हुआ है ।। * यहां भी य पूर्व के होने से ( उदीचा०) इसी अगले सूत्र से विकरप प्राप्त है, सो निषेध कर दिया ।
स्त्रीप्रत्ययप्रकरणम् वा०-क्षिपकादीनां चोपसङ्ख्यानम् ।। ११ ।। क्षिपका आदि शब्दों में इत्त्व न हो। जैसे-क्षिपकाः ध्रुवका इत्यादि ॥ ११ ॥ वा०-तारका ज्योतिष्युपसङ्ख्यानम् ॥ १२ ॥ तारका शब्द जहां नक्षत्र का नाम हो, वहां उसको इकारादेश न हो। जैसे-तारका। 'ज्योति ग्रहण इसलिये है कि तारिका दासी, यहां निषेध न हो ॥ १२ ॥ वा०-वर्णका तान्तव उपसङ्ख्यानम् ॥ १३ ॥ तन्तुओं के समुदाय में वर्तमान वर्णका शब्द को इत्त्व न हो । जैसे-पाका प्रावरणभेदः । 'तान्तब इसलिये कहा है कि-चर्णिका भागुरी लोकायते, यहां न हो ॥ १३ ॥ वा०-वर्तका शकुनी प्राचामुपसङ्ख्यानम् ॥ १४ ॥ पक्षी का वाची जहां वर्त्तका शब्द हो, वहां उस को इकार आदेश न हो, प्राचीन प्राचार्यों के मत में। जैसे-वर्तका शकुनिः । अन्यत्र वर्तिका । 'शकुनि ग्रहण इसलिये है कि-चर्तिका भागुरी लोकायतस्य, यहां न हो ॥ १४ ॥ वा०-अष्टका पितृदेवत्ये ॥ १५ ॥ पितृ और देवताकम में वर्तमान अष्टका शब्द को इकार न हो। . जैसे-अष्टका। 'पितृदेवत्य' इसलिये है कि अष्टिका स्वाग, यहां हो जावे ॥ १५ ॥ वा०-वा सूतकापुत्रकावृन्दारकाणामुपसङ्ख्यानम् ।। १६ ।। सृतका आदि शब्दों को विकल्प करके इकार हो। जैस-सूतिका, सूतका; पुत्रिका, पुत्रका; वृन्दारिका, वृन्दारका ॥ १६ ॥ उदीचामातः स्थाने यकपूर्वायाः ॥ १७ ॥ अ०७ । ३ । ४६ ॥ उत्तरदेशीय प्राचार्यों के मत में जो स्त्रीविषयक यकार और ककार से पूर्व आकार के स्थान में प्रकार उस को इत् आदेश हो। जैसे-यकारपूर्व-इभ्यका, इभ्यिकाः क्षत्रियका, क्षत्रियिका । ककारपूर्व- चटकका, चटकिका; मूपकका, मूपकिका । - ६ खैणताद्धिते B 'आत्' ग्रहण इसलिये है कि-साङ्काश्ये भवा साङ्काश्यिका, यहां न हो। 'यकपूर्व ग्रहण इसलिये है कि-अश्विका, यहां विकल्प न हो ॥ १७ ॥ वा०-यकपूर्वत्वे धात्वन्तप्रतिषेधः ॥ १८ ॥ धातु के अन्त के यकार ककार जिस से पूर्व हों, ऐसे प्रकार को इकार हो। सूत्र ले जो विकल्प प्राप्त है, उस का निषेध कर के निस्य विधान किया है। जैसे-सुनयिका; सुशयिका; सुपाकिका; अशोकिका इत्यादि ॥ १८ ॥ भस्त्रैषाजाज्ञाद्वास्वानपूर्वाणामपि ।। १६ ॥ अ०७ । ३ । १७ ।। स्त्रीविषय में जो भत्रा, एषा, जा, ज्ञा, द्वा, खो, ये शब्द नपूर्वक हों, तो भी श्राकार के अकार को इत् आदेश न हो, उत्तरदेशीय प्राचार्यों के मत में । जैसे- भस्त्रका, भस्त्रिका; एषका, एषिका; जका, जिका; ज्ञका, शिका; द्वके, द्विके; स्वका, स्विका। नपूर्वक-अभस्त्रिका, अभत्रका; अजका, अजिका; अशका, अशिका; अस्वका, अस्विका इत्यादि * ॥ १६ ॥ अभाषितपुंस्काच ॥ २० ॥ अ० ७।३ । ४ ।। जो शभाषितपुल्लिंग से परे, आत् के स्थान में अकार, उस को उत्तरदेशीय प्राचार्यो के मत में इत् आदेश न हो। जैसे-खट्वका, ट्विका; अखट्यका, अविका; परमखट्वका, परमनट्विका इत्यादि ॥ २०॥ आदाचार्याणाम् + ॥ २१ ॥ अ० ७ । ३ । ४६ ॥ आचार्यों के मत में, स्त्री विषय में अभापितपुंस्क प्रातिपदिकों से परे जो श्रात् के स्थान में अकार, उस को प्रात् श्रादेश हो जैसे- खट्वाका, अखट्वाका; परमखट्वाका इत्यादि ॥ २१ ॥ ऋन्नेभ्यो ङीप् ।। २२ ॥ अ० ४ । १ । ५ ॥ स्त्रीविषय में ऋकारान्त और नकारान्त प्रातिपदिकों से डीप् प्रत्यय हो । जैसे ऋकारान्त की; ही; पक्ती इत्यादि । नकारान्त-हस्तिनी; मालिनी; दण्डिनी; क्षत्रिणी इत्यादि ॥ २२ ॥ * यहां एपा और द्वा इन दो नम्पूर्वक शब्दों को इकारादेश इसलिये नहीं होता, कि जो समास की प्रातिपदिक संज्ञा होके विभक्ति पाती है, उसी से परे टाप होता है, इस कारण सुप्रहित न होने से प्राप्ति ही नहीं है। + यहां शाचारयं शब्द के बहुवचन निदंश से पाणिनि श्राचार्य का मत समझना चाहिये। - . मापू के स्त्रीप्रत्ययप्रकरणम् उगितश्च ।। २३ ।। अ० ४ । १ । ६ ॥ त्रांविषय में जो उगित् शब्द रूप है, उस से और तदन्त प्रातिपदिकों से भी डीप् प्रत्यय हो। जैस-भवती; अतिभवती; पचन्ती; यजन्ती इत्यादि ॥ २३ ॥ वा०-धातोसगितः प्रतिषेधः ।। २४ ॥ उक् जिस का इत् गया हो, ऐसे किए आदि अविद्यमान प्रत्ययान्त धातु प्राति- पदिक से ङीप् प्रत्यय न हो। जैसे-उखात्रत्: पर्णध्वत् + ब्राह्मणी ॥ २८ ॥ वा०-अश्चतेश्चोपसङ्ख्यानम् ॥ २५ ॥ उगित् धातु से जो डीए का निपंध किया है, वहां अञ्चु का उपलङ्ख्यान, अर्थात् उससे डीप का निषेध न हो। जैसे-प्राची; प्रतीची; उदीची ॥ २५ ॥ वनो र च ॥ २६ ॥ अ०४।१।७।। स्त्रीलिंग में वन्नन्त प्रातिपदिकों से डीप् प्रत्यय हो, और उस वन्नन्त को रेफ आदेश हो जावे। जैसे-धीवरी; पीवरी; शर्वरी इत्यादि ॥ २६ ॥ वा०-बनो न हशः ॥ २७ ॥ इश् प्रत्याहार से परे जो वन्, तदन्त से डीप न हो। जैसे-सहयुध्वा * ब्राह्मणी ॥ २७ ॥ पादोऽन्यतरस्याम् ॥ २८ ॥ अ० ४ । १ । ८॥ स्त्री अर्थ में पादशब्दान्त प्रातिपदिकों से विकल्प करके डीप् प्रत्यय हो। जैस-द्विपदी, द्विपाद त्रिपदी, त्रिपाद, चतुष्पदी, चतुष्पाद इत्यादि ॥ २८ ॥ टावृचि ।। २६ ।। अ० ५। १ । ६ ॥ स्त्रीलिंग में वर्तमान ऋग्वेदविषयक पादशब्दान्त प्रातिपदिकों से टाप् प्रत्यय हो। * यहां स्त्रंसु और चंसु धातु से विप् प्रत्यय के परे सकार को पदान्त में दकार ( वसुन- सुध्वस्व० ) इससे दकारादेश हो गया है । * यहां सह टपपद युध् धातु से निप् प्रत्यय (सहे च) इस सूत्र से हुआ है, और हर प्रत्याहार में धकार से पर वन है।
बैणताद्धिते
.
जैसे-द्विपदा ऋक्, त्रिपदा ऋक् चतुष्पदा ऋक् ।
'ऋक् ग्रहण इसलिये है कि-द्विपदी वृपली, यहां टापू न हो ॥ २६ ॥
न षट्स्वनादिभ्यः ॥ ३० ॥ अ० ४ । १ । १०॥
पटसंज्ञक और खस आदि गणपठित प्रातिपदिकों से स्त्रीप्रत्यय न हो।
जैसे-पञ्च ब्राह्मण्यः, सप्त नव दश वा । स्वसा; दुहिता; ननान्दा; याता; माता;
तिनः; चतन्नः इत्यादि ।
यहां ऋकारान्त शब्दों से डीप, और पञ्च आदि पदसंज्ञकों के अन्त्य नकार का
लोप होके अदन्तों से टाप् प्रत्यय प्राप्त है, सो दोनों का निषेध समझना चाहिये ॥३०॥
मनः ॥ ३१ ॥ अ० ४ । १ । ११ ॥
स्त्रीलिंग में वर्तमान मन्प्रत्ययान्त प्रातिपदिकों से डीप् प्रत्यय न हो।
जैसे-दामा, दामानी, दामानः; पामा, पामानौ, पामान; सीमा, सीमानौ, सीमानः;
अतिमहिमा; अतिमहिमानी, अतिमहिमानः इत्यादि ॥ ३१ ॥
अनो बहुव्रीहेः ।। ३२ ।। अ० ४ । १ । १२ ॥
स्त्रीलिंग में वर्तमान अन्नन्त बहुव्रीहि समास से डीप् प्रत्यय न हो।
जैसे-सुपर्वा, सुपर्वाणो, सुपर्वाणः; सुशर्मा, सुशर्माणो, सुशाणः इत्यादि ।
'बहुव्रीहि' ग्रहण इसलिये है कि प्रतिक्रान्ता राजानमतिराची, यहां एकविभक्ति-
समास में निषेध न लगे ॥ ३२ ॥
डाबुभाभ्यामन्यतरस्याम् ॥ ३३ ॥ अ० ४ । १ । १३ ॥
जो मनन्त प्रातिपदिक और अन् प्रत्ययान्त प्रातिपदिकान्त बहुव्रीहिसमास हो,
तो उनसे स्त्रीलिंग में विकल्प करके डाप् प्रत्यय होजाय ।
जैसे [--मनन्त-पामा, पामे, पामाः; सीमा, सीमे, सीमाः । पक्ष में-पामा,
पामानी, पामानः; सीमा, सीमानौ, सीमानः । अनन्त बहुव्रीहिसमास-बहवो गजानोऽस्यां
नगर्यो ला बहुराजा नगरी, बहुराजे नगर्यो, बहुगना नगर्य; बहुतक्षा, बहुतक्षे,
बहुतक्षाः । पक्ष में बहुराजा, वहुराजानो, बहुराजानः; बहुतक्षा, वहुतक्षाणो, बहुतक्षाणः ।
यहां 'अन्तरस्याम् ग्रहण इसलिये है कि-(वनो र च) इस सूत्र के विषय में भी
विकल्प हो जावे । जैसे-बहुधीवा, बहुधीवरी; बछुपीवा, बहुपीवरी इत्यादि ॥ ३३ ॥
अनुपसर्जनात् ।। ३४ ।। अ० ४ । १ । १४ ।।
यहां से आगे जिस २ प्रत्यय का विधान करेंगे, सो २ अनुपसर्जन अर्थात् स्वार्थ
में, मुख्य प्रातिपदिकों ही से होंगे । इसलिये यह अधिकार सूत्र है ॥ ३४ ॥
स्त्रीप्रत्ययप्रकरणम् है। टिड्ढाणद्वय सज्दघ्नमात्रच्तयप्ठकठकक्करपः ।। ३५ ।। अ० ४ । १ । १५ ॥ यहां अदन्त की अनुवृत्ति सर्वत्र चली आती है। परन्तु जहां संभव होता है वहां विशेषण किया जाता है। ढ, अण, अञ्, द्वयसच्, नन्, मात्र, तया, ठक्, ठञ्, कञ् और क्वरप् ये प्रत्यय जिनके अन्त में हों उन, और अदन्त अनुपसर्जन टित् प्रातिपदिकों से ङीप् प्रत्यय हो ! जैसे-टित्-कुरुबरी; मद्रचरी । ढ-आग्नेयी; सौपर्णेयी; वैनतेयी । अण्- ओपगवी; कुम्भकारी; नगरकारी । अञ्-औत्सी; प्रौदपानी । द्वयसच्-उरुद्वयसी; जानुद्वयसी । दन-ऊरुदघ्नी; जानुदनी । मात्र-ऊरुमात्री; जानुमात्री । तयप्- द्वितयी; चतुष्टयी; पंचतयी । उक् - पाक्षिकी, शालाकिकी । ठञ्- लावणिकी। कञ्-याशी; तादशी । करप-इत्वरी; नश्वरी । यहां 'अनुपसर्जन' ग्रहण इसलिये है कि-बहुकुरुचरा; बहुमद्रचरा मधुरा इत्यादि से ङीप् न हो । यहां टित् आदि अदन्त शब्दों से टाप् प्राप्त है, इसलिये उसका अपवाद यह सूत्र समझना चाहिये ॥ ३५ ॥ वा०-नस्नजीकवख्युंस्तरुणतलुनानामुपसङ्ख्यानम् ॥ ३६ ।। नञ् स्मञ् ईकक् ख्युन् इन प्रत्ययान्त शब्दों, और तरुण तलुन शब्दों से खीविषय में डीप् प्रत्यय होवे। जैसे-नञ्-स्त्रैणी; स्नञ्-पौंस्नी; ईकक्-शाक्तिकी, याष्टिकी; ख्युन्-पाढयङ्करणी, सुभगङ्करणी; तरुणी; तलुनी इत्यादि । यहां भी तदंत प्रातिपदिकों से टापू ही प्राप्त है, उसका अपवाद यह भी वार्तिक है ॥३६॥ -- यज्ञश्च ॥ ३७॥ अ० ४ । १ । १६ ॥ स्त्रीलिङ्ग में वर्तमान यञ् प्रत्ययान्त प्रातिपदिकों से ङीप् प्रत्यय हो। जैसे-गार्गी; वात्सी इत्यादि । यहां गर्ग और वत्स शब्दों से यञ् प्रत्यय हुआ है ॥ ३७॥ वा०-अपत्यग्रहणं कर्तव्यम् ॥ ३८ ॥ जिस यञ् प्रत्यय का पूर्व सूत्र में ग्रहण है, वह अपत्याधिकार का यत्र समझना । क्योंकि द्वैप्या: सिकता: * इत्यादि, यहां डीप न हो जावे ॥ ३८ ॥ * यहां शैषिक यम् प्रत्यय (हीपादनुसमुद्रं यम् ) इससे हुआ है, इसलिये ही न हुश्रा, टापू हो गया ॥ १ उत्सर्ग २ १० स्त्रैणताद्धिते 1 11 प्राचां फस्तद्धितः ॥ ३६ ॥ अ० ४ । १ । १७ ॥ स्त्रीलिङ्ग में वर्तमान यम् प्रत्ययान्त प्रातिपदिकों से प्राचीन आचार्यों के मत में तद्धितसंज्ञक एफ प्रत्यय हो। जैसे-गाायणी; वात्स्यायनी। औरों के मत में- गार्गी; बात्सी ॥ ३६॥ सर्वत्र लोहितादिकतन्तेभ्यः ॥ ४० ॥ अ० ४ । १ । १८ ॥ जो लोहित आदि कत पर्यन्त गर्गादिगणपठित अकारान्त शब्द है, उन से तद्धित- संज्ञक प्फ प्रत्यय होता है। जैसे-लोहितादि-लौहित्यायनी; शांशित्यायनी; वाभ्रव्या- यणी । कतन्त-कात्यायनी इत्यादि ॥ ४० ॥ कौरव्यमाण्डूकाभ्याञ्च ॥ ४१ ॥ अ० ४ । १ । १६ ॥ कौरव्य और माण्डूक प्रातिपदिकों से तद्धितसंज्ञक प्फ प्रत्यय हो। जैसे-कोर- व्यायणी; माण्डूकायनी इत्यादि ॥ ४१ ॥ वा०-आसुरेरुपसङ्ख्यानम् ॥ ४२ ॥ श्रासुरि शब्द से भी तदितसंज्ञक 'फ प्रत्यय हो । जैसे-श्रासुरायणी । यहां अासुरि शब्द में अपत्यसंज्ञक इञ् प्रत्यय हुआ है। पूर्व (प्राचां प्फ०) इस सूत्र में तद्धित' ग्रहण काप्रयोजन भी यही है कि आसुरि शब्द के इकार का लोप होजावे ॥४२॥ वयसि प्रथमे ॥ ४३ ॥ अ० ४ । १ । २० ॥ जो प्रथम अवस्था विदित होती हो, तो अकारान्त प्रातिपदिकों से डीप् प्रत्यय हो जैसे-कुमारी; किशोरी; कलभी; वर्करी । यहां 'प्रथम अवस्था' ग्रहण इसलिये है कि स्थविरा; वृद्धा इत्यादि से डीप न हो । 'अकारान्त' से इसलिये कहा है कि-शिशुः, यहां ङीप् प्रत्यय न हो ॥ १३ ॥ वा०-बयस्यचरम इति वक्तव्यम् ॥ ४४ ॥ सूत्र से प्रथमावस्था में जो डीप कहा है, वहां चरम अर्थात् वृद्धाऽवस्था को छोड़ के कहना चाहिये । जैसे-वधूटी; चिरण्टी । ये प्राप्तयौवन द्वितीय अवस्था के नाम हैं। प्रथमावस्था के कहने से यहां प्राप्ति नहीं थी॥22॥ + यहां प्फ प्रत्यय के पित् होने से तदन्त से दीप् प्रत्यय हो जाता है ।। .
स्त्रीप्रत्ययप्रकरणम् -.-.-.-.-.- ---- --- द्विगोः ॥ ४५ ॥ अ० ४ । १ । २१ ॥ स्त्रीलिङ्ग में वर्तमान द्विगुसंज्ञक अदन्त प्रातिपदिकों से ही प्रत्यय हो । जैसे-पञ्चमूली; दशमूली; अटाध्यायी इत्यादि । यहां 'अत् ग्रहण इसलिये है कि-पञ्चवलिः, यहां डीप न हो ॥ ४५ ॥ अपरिमाणविस्ताचितकम्बल्येभ्यो न तद्वितलुकि ॥ १६ ॥ अ० ४ । १ । २२ ।। जहां तद्धित का लुक् हुआ हो, वहां स्त्रीलिङ्ग में वर्तमान अपरिमाणान्त विस्तान्त आचितान्त और कम्बल्यान्त द्विगु प्रातिपदिकों से डी प्रत्यय न हो। जैसे-पञ्चभिरश्वैः क्रीता पञ्चाश्ना, दशाश्या, द्विवर्षा, त्रिवर्षा, द्विशता, त्रिशता; द्विविस्ता, त्रिविस्ता; दुव्याचिता, ज्याचिता; द्विकम्बल्या, त्रिकम्बल्या । यहां 'अपरिमाण ग्रहण इसलिये है कि-व्याडकी, व्याढकी, यहां निषेध न हो। 'तद्धितलुक्' इसलिये है कि-पञ्चायी, यहां भी होजावे ॥ ४६॥ काण्डान्तात्क्षेत्रे ॥ ४७ ।। अ० ४ । १ । २३ ॥ तद्धित का लुक् हुश्रा हो, तो क्षेत्रवाची स्त्रीलिंग में वर्तमान काण्ड शब्दान्त द्विगु प्रातिपदिक ले डीप् प्रत्यय न हो । जैसे वे काण्डे प्रमाणमस्याः सा द्विकाण्डा। 'क्षेत्र' इसलिये कहा है कि-द्विकाण्डी रज्जुः, यहां निषेध न हो। 'काएड' शब्द के अपरिमाणवाची होने से पूर्वसूत्र से ही निषेध हो जाता, फिर क्षेत्रग्रहण नियमार्थ है ॥४७॥ पुरुषात् प्रमाणेऽन्यतरस्याम् ॥ ४८ ॥ अ० ४ । १ । २४ ॥ जो तद्धित का लुक हुआ हो, तो प्रमाण अर्थ में स्त्रीलिङ्ग में वर्तमान पुरुपान्त द्विगु प्रातिपदिक से डीप् प्रत्यय विकल्प करके होवे । जैसे-द्वौ पुरुषो प्रमाणमस्याः परिखायाः सा द्विपुल्या, द्विपुल्पी: त्रिपुल्पा, त्रिपुरुपी। यहां 'प्रमाण ग्रहण इसलिये है कि-द्वाभ्यां पुरुषाभ्यां क्रीता द्विपुरुषाः त्रिपुरुषा, यहां विकल्प करके जीए न हो। और तद्धितलु इसलिये है कि-द्विपुरुषी; ; त्रिपुरुषी, यहां समाहार में निषेध न होवे ॥ ४ ॥ * यहां अपरिमापान्त पुत्य शब्द से नित्य ही निषेध प्राप्त है, इसलिये यह अमात विमापा समझनी चाहिये। - -- १२ णताड़िते बहुव्रीहरूधसो ङीष् ॥ ४६ ॥ अ० ४ । १ । २५ ॥ स्त्रीलिङ्ग में वर्तमान ऊधस् शब्दान्त बहुव्रीहि प्रातिपदिक से ङीप प्रत्यय हो । जैसे-घट इव ऊधो यस्याः सा घटोनी; कुण्डोनी । यहां 'बहुव्रीहि ग्रहण इसलिये है कि प्राता ऊधः प्राप्तोधाः, यहां न हुआ ॥४६॥ सल्याऽव्ययादेमप् ॥ ५० ॥ अ० ४ । १ -1 २६ ॥ संख्या और अन्यय जिस के आदि में हों, ऐसा जो स्त्रीलिङ्ग में वर्तमान ऊधस् शब्दान्त बहुव्रीहि प्रातिपदिक है, उस से डीप् प्रत्यय हो। जैसे-संख्या-यूनी; यूध्नी । अव्यय-अत्यूनी; निसनी । यहां 'आदि' ग्रहण से द्विविधोनी; त्रिविधोधी इत्यादि से भी ङीप होजाता है ॥५०॥ दामहायनान्ताच्च ।। ५१ ॥ अ०४।१ । २७॥ संख्या जिस के आदि में, दामन तथा हायन अन्त में हों, ऐसे स्त्रीलिङ्ग में वर्तमान बहुव्रीहि प्रातिपदिक से ङीप प्रत्यय होवे । जैसे-छेदानी यस्याः सा द्विदानी बड़वा; त्रिदान्नी । द्विहायनी; त्रिहायणी; चतुर्हायणी इत्यादि । (क्वचिदेकदेशो०) इस परिभाषा के प्रमाण से यहां अव्यय की अनुवृत्ति नहीं श्राती॥ ५१ ॥ अन उपधालोपिनोऽन्यतरस्याम् ॥ ५२ ॥ अ० ४ । १ । २८ ॥ जो अनन्त उपधालोपी बहुव्रीहि प्रातिपदिक है, उससे स्त्रीलिङ्ग में विकल्प करके ङीप् प्रत्यय हो । जैसे-यहुराजा, वहुराज्ञी, बहुराजे; बहुतक्षा, बहुतणी, बहुतक्षे+। 'अनन्त' ग्रहण इसलिये है कि वहुमत्स्या, यहां डीप न हो। और 'उपधालोपी' इसलिये है कि-मुपर्श, सुपर्वाणों, सुपर्वाणः इत्यादि में न हो ॥ ५२ ।। । उधस गाय श्रादि के ऐन को कहते हैं, कि जो दृध का स्थान है। इस ऊधत शब्द से तब समासान्त 'नई प्रत्यय होने से अनन्त हो जाता है, तब (धनो बहु०) इस पूर्वलिखित सून से टापू और निषेध प्राप्त होता है, उसका यह अपवाद है। * यहां हायन शन्द अवस्था भयं में समझना चाहिये, सो चेतन के साथ सम्बन्ध रखती है, इसीलिये द्विहायना शाला इत्यादि में ही नहीं होता । + यहां अनन्त बहुबौहि प्रातिपदिकों से पच में ( दाबुमान्या० ) इस टक्क सूत्र से डाप् प्रत्यय विकल्प करके हो लाता है। इन दो विकापों के होने से तीन प्रयोग हो जाते है ।। ܛܪ स्त्रीप्रत्ययप्रकरणम् १३ Arm नित्यं संज्ञाछन्दसोः ॥ ५३ ॥ अ० ४ । १ । २६ ॥ स्त्रीलिङ्ग में वर्तमान अन्नन्त उपधालोपी बहुव्रीहि प्रातिपदिक से संज्ञा और वेद- विषय में जीप प्रत्यय नित्य ही होवे । जैसे-संज्ञा में सुराज्ञी; अतिराज्ञी नाम ग्रामः । छन्द में-गौः पञ्चदानी; द्विदाम्नी; एकदानी; एकसूी; समानमूर्ती । पूर्वसूत्र में जो विकल्प है, उसके नित्यविधान के लिये यह अपवाद सूत्र है। जहां संज्ञा और वैदिकप्रयोग न होवें, वहां डीप न होगा । जैसे-सुराजा इत्यादि ॥ ५२ ॥ केवलमामकभागधेयपापापरसमानार्यकृतसुमङ्गलभेषजाच्च ॥५४॥ अ० ४।१ । ३०॥ जो स्त्रीलिङ्ग में वर्तमान केवल मामक भागधेय पाप अपर समान आर्यकृत सुमङ्गल और भेषज शब्द हों, तो इन प्रातिपदिकों से संज्ञा और वेदविषय में डीप प्रत्यय हो। जैले-केवली; मामकी; मित्रावरुणयोर्भागधेयी; पापी; उताऽपरीभ्यो मघवा विजिग्ये; समानी; आर्यकृती; सुमङ्गली; भेषजी। जहां संज्ञा और वेविषय न हों, वहां टाप होकर केवला इत्यादि प्रयोग होंगे ॥५४॥ रात्रेश्चाजसौ ॥ ५५ ॥ अ० ४ । १ । ३१ ॥ जस् विभक्ति से अन्यत्र स्त्रीलिङ्ग में वर्तमान रात्रि शब्द से संज्ञा और वेदविषय में ङीप् प्रत्यय हो । जैसे-या रात्री सृष्टा; रात्रीभिः । 'जस् में निषेध' इसलिये है कि-यास्ना रात्रयः, यहां डीप न होवे ।। ५५ ।। वा०-अजसादिष्विति वक्तव्यम् ॥ ५६ ॥ केवल जस् के परे जो ङीप का निषेध किया है, सो जस् आदि के परे निषेध करना चाहिये । जैसे-रात्रि सहोषित्वा इत्यादि से भी ङीप न होवे ॥ ५६ ॥ अन्तर्वत्पतिवतोर्नुक् ॥ ५७ ॥ अ० ४ । १.। ३२ स्त्रीलिङ्ग में वर्तमान चैदिक प्रयोगों में अन्तर्वत् और पतिवत् शब्द से ङीप और नुक का आगम भी हो ॥ ५७ ॥ का०-अन्तर्वत्पतिवतोस्तु मतुब्वत्वे निपातनात् । गर्भिण्यां जीवत्पत्यां च वा छन्दसि तु नुग्भवेत् ।।५८॥ - ४ स्त्रैणताड़िते अन्तर्वत् शब्द में मतुप और पतिवत् शब्द में मतुप के मकार को वकारादेश निपातन किया है। तथा अन्तर्वत् शब्द से गर्भिणी अर्थ में, और पत्तिवत् शब्द से जिस का पति जीता हो, वहां वैदिक प्रयोग विषय में विकल्प करके नुक् और डीप नित्य ही होवे। जैसे-सान्तर्वनी देवानुपैत्, सान्तर्वती देवानुपैत् पतिवत्नी तरुणवत्ला, पतिवती तरुणवत्सा ॥ ५८ ॥ पत्यु! यज्ञसंयोगे ॥ ५६ ॥ अ० ४ । १ । ३३ ॥ जो यज्ञ का संयोग हो, तो स्त्रीलिङ्ग में वर्तमान पति शब्द को नकारादेश और डीप् प्रत्यय हो । जैसेयजमानस्य पत्नी, पत्नि वाचं यच्छ । यहां 'यज्ञसंयोग' इसलिये कहा है कि ग्रामस्य पतिरियं ब्राह्मणी, यहां न हो ॥५६॥ विभाषा सपूर्वस्य ® ॥ ६० ॥ अ० ४ । १ । ३४ ॥ जो स्त्रीलिङ्ग में वर्तमान पूर्वपद सहित पति शब्द हो, तो उस को नकारादेश विकल्प करके हो । ङीण तो नकारान्त के होने से सिद्ध ही है। जैसे-वृद्धपतिः, वृद्धपत्नी; स्थूलपतिः, स्थूलपत्नी, जीवपतिः, जीवपत्नी । यहां 'सपूर्व' ग्रहण इसलिये है कि-पतिरियं ब्राह्मणी ग्रामस्य, यहां डीप न हुआ ॥ ६०॥ नित्यं सपल्यादिषु ।। ६१ ॥ अ० ४ । १ । ३५ ॥ स्त्रीलिङ्ग में वर्तमान सपनी आदि प्रातिपदिकों में पति शब्द.को नकारादेश नित्य ही निपातन किया है। जैसे समानः पतिरस्याः सा सपत्नी; एकपत्नी, वीरपन इत्यादि ॥ ६ ॥ पूतक्रतोरच् ॥ ६२ ॥ अ०४ । १ । ३६ ।। स्त्रीलिङ्ग में वर्तमान पूतकतु शब्द से डीप और उस को ऐ कारादेश भी होवे जैसे-पूतक्रतोः स्त्री पूतकतायी। यहाँ से लेके तीन सूत्रों में जो प्रत्ययविधान है, सो पुंयोग अर्थात् उस स्त्री के साथ पुरुषसंबन्ध की विवक्षा हो तो होवे । जैसे-यया हि पूताः क्रतवः पूतक्रतुः सा भवति यहां पुंयोग की विवक्षा नहीं, इस से डीप न हुअा ॥ ६२॥ * यह अप्राप्तविमापा इसलिये समझनी चाहिये कि यज्ञसंयोग की अनुवृत्ति इस सूत्र में नह श्राती, अन्य किसी से नुक् पाता नहीं ।
वीप्रत्ययप्रकरणम् १५ वृषाकप्यग्निकुसितकुसीदानामुदात्तः ॥ ६३ ।। अ० ४ । १ । ३७॥ बालिङ्ग और पुरुष के योग में वृषाकपि अग्नि कुसित और कुसीद शब्दों को ऐकागदेश. और इन से जीप प्रत्यय हो, और वह जीप प्रत्यय उदात्त भी होवे। जैसे-वृयाकपः बी वृयाकपायी; अन्नेः ब्री अन्नायी; कुसितस्य स्त्री कुसितायी कुसदस्य स्त्री कुलीदायी। यहां 'पुंयोग इसलिये है कि-वृषाकपिः ली इत्यादि में डीप न हो ॥ ६३ ॥ मनोरौं वा ॥ ६ ॥ अ० १ । ११३८ ॥ पुंयोग में और स्त्रीलिङ्ग में वर्तमान मनु प्रातिप देक ले विकल्प करके डीप प्रत्यय होने, और मनु शब्द को औकार. और पक्ष में ऐकारादेश हो, और वह उदात्त भी हो जाये । जैसे-मनो: स्त्री मनायी, मनावी, मनुः, ये तीन प्रयोग होते हैं ।। ६४ ।। वर्णादनुदात्तात्तोपधातो नः ॥ ६५ ।। अ० ४ । १ । ३६ ।। जो नीति में वर्तमान वर्णवाची अनुदात्त तकारोषध प्रातिपदिक हैं. उन से विकल्प करके जीप, और उन के नकार को नकारादेश भी होवे। जैसे-एता, एनी; श्येता, श्यनी: हरिता, हरिणी। यहां वर्णवाची से इसलिये कहा है कि-प्रहता, यहां डीप और नकार न होवे। 'अनुदात्त इसलिये है कि-खेता, यहां न हो। 'तोपध' इसलिये है कि-अन्य प्राति- पदिक से डीप न हो। दन्त की अनुवृत्ति इसलिये आती है कि-शितिर्ब्राह्मणी, यहां न हो ॥६५॥ । वा०-पिशहादुपसल्यानम् ॥ ६६ ॥ पिशङ्ग शद तोषध नहीं है, इस कारण डीप नहीं पाता था, इसतिये इसका उप- सल्यान है। पिराङ्ग शब्द ले भी स्त्रीलिङ्ग में डीप होवे । जैसे-पिशनी ॥ ६६ ॥ वा०-असितपलितयोः प्रतिषेधः ॥ ६७ ॥ असित और पतित प्रातिपदिकों से डीप और इनके तकार को नकारादेश न होवे । से पाया था, उस का निषेधरूप यह अपवाद है। जैसे-असिताः पलिता ॥ १७ ॥ " यह अमाप्तविभाषा इस प्रकार है कि जो कार्य इस मूत्र से होते हैं, वे किसी से प्राप्त नहीं।
१६ त्रैणताद्धिने वा०-छन्दसि कमेके ॥६८॥ वेद में असित और पलिन शब्द के तकार के स्थान में कम् आदेश और डीप प्रत्यय हो, ऐसी इच्छा कोई आचार्य करते हैं । जैसे-असिती; पलिक्ती ॥ ६ ॥ अन्यतो ङीष् ।। ६६ ।। अ० ४ । १ । ४० ॥ तोपध से भिन्न अनुदात्त वर्णवाची श्रदन्त प्रातिपदिक ले स्त्रीलिङ्ग में डीप प्रत्यय हो। जैसे-सारङ्गी; कल्माषी: शवली इत्यादि। यहां 'अनुदात्त ग्रहण इसलिये है कि-कृष्णाः कपिला इत्यादि से न हो ॥ ६६ ॥ षिद्गौगदिभ्यश्च ॥ ७० ॥ अं० ४ । १ । ४१ ॥ स्त्रीलिङ्ग में वर्तमान अकागन्त पित् और गौर आदि प्रातिपदिकों से की प्रत्यय होवे । जैसे-नर्तकी; स्खन की: रजकी। गौरी. मत्सी: शृङ्गी इत्यादि ॥ ७० ॥ जानपदकुण्डगोणस्थलभाजनागकालनीलकुशकामुककबराद् वृत्त्य- मत्राऽऽवपनाकृत्रिमाश्राणास्थौल्यवर्णानाच्छादनाऽयोविकारमैथु- नेच्छाकेशवेशेषु ॥ ७१ ॥ अ० ४ । १ । ४२ ॥ स्त्रीलिङ्ग में वर्तमान अकारान्त जानपद् प्रादि ११ ग्यारह शब्दों से वृत्ति आदि ग्यारह (११) अर्थों में यथासंख्य करके डीप् प्रत्यय होवे । जैसे-जानपदी वृत्तिः, जानपदी शीतिः (यहां ङीप होने से स्वर में भेद हो जाता है)। कुण्डी (अमत्रपात्रम् ) अन्यत्र कुराडा। गोणी (प्रायपन अर्थात् माप हो तो) अन्यत्र गोणा | स्थली (अकृत्रिमा भूमिः ) अन्यत्र स्थला ! भाजी (श्राणा-पकाने के योग्य शाक) अन्यत्र भाजा । नागी (स्थौल्यम् अति मोटी हो तो) अन्यत्र नागा। काली (जो वर्ण हो) अन्यत्र काला । नीली (जो वस्त्र हो) नहीं तो नीला शाटी। कुशी ( जो लोहे का फुछ विकार हो) नहीं तो कुशा । कामुकी (जो मैथुन की इच्छा रम्नती हो ) नहीं नो कामुका। कवरी (जो बालों का सम्हालना हो) नहीं तो कवरा ।। ७१ ॥ वा०-नीलादोषधौ ।। ७२ ॥ नील शब्द से ओषधि अर्थ में भी कीम् प्रत्यय होवे । जैसे-नीली श्रोषधिः ॥७२॥ वा०-प्राणिनि च ॥ ७३ ।। प्राणी अर्थ में भी नील शब्द से डीप् प्रत्यय होवे। जैसे-नीली नौ:: नीली बड्या, नीली गवयी इत्यादि ।। ७३॥ । - स्त्रीप्रत्ययप्रकरणम् १७ - वा०वा संज्ञायाम् ॥ ७४ ।। संझा अर्थ में विकल्प करके डीम् प्रत्यय हो । जैसे-नीली, नीला इत्यादि ॥ ७ ॥ शोणात्प्राचाम् ॥ ७५ ॥ अ० ४ । १ । ४३ ॥ प्राचीन प्राचार्यों के मत में स्त्रीलिङ्ग में वर्तमान शोण प्रातिपदिक से डीप प्रत्यय होवे, अन्य प्राचार्यों के मत में नहीं। जैस-शोणी, शोणा बडवा ॥ ५ ॥ वोतो गुणवचनात् ।। ७६ ॥ अ० ४ । १ । ४४ ॥ स्त्रीलिंग में वर्चमान गुणवचन उकारान्त प्रातिपदिकों से डीप प्रत्यय विकल्प करके हो जाये । जैसे-पट्वी, पटुः; मृद्धी, मृदुः इत्यादि । 'उत्' ग्रहण इसलिये है कि-शुचिः, यहां की न हो। 'गुणवचन' ग्रहण इसलिये है कि-श्राखुः, यहां न हो ॥ ७६ ॥ वा०-गुणवचनान्डीवायुदात्तार्थम् ॥ ७७ ।। गुणवचन प्रातिपदिक से ङीप् प्रत्यय कहना चाहिये, क्योंकि डीप के होने से अन्तोदात्त स्वर प्राप्त है, सो आयुदात्त होवे । जैसे-घी; तन्वी इत्यादि । यह विधान सर्वत्र नहीं, किन्तु जहां श्राद्युदात्त प्रयोग आवे यहीं ।। ७७ ।। वा०-खरुसंयोगोपधानां प्रतिषेधः ।। ७८ ।। वह और संयोग जिल की उपधा में हो, ऐसे गुणवचन उकारान्त प्रातिपदिकों से बीलिंग में डीप् प्रत्यय न हो जैसे-स्वरुरियं ब्राह्मणी; पाण्डुरियं ब्राह्मणी इत्यादि ।।७।। बह्वादिभ्यश्च ।। ६ ।। अ० ४ । १ । १५ ।। स्त्रीलिंग में वर्तमान यछु आदि प्रातिपदिकों से ङीप् प्रत्यय विकल्प करके हो। जैसे-बढ़ी, बहुः: पद्धती, पद्धतिः; श्रङ्कती, अतिः इत्यादि ॥ ७ ॥ नित्यं छन्दसि ॥ ८० ॥ अ०४ । १ । ४६ ॥ वेद में यह प्रादि शब्दों से जीप प्रत्यय नित्य ही हो । जैसे-घद्वीपु हित्वा प्रपियन् । बद्दी नाम श्रोषधी भवति ॥२०॥ ३ १३ _णतादित -------------- --------------- भुवश्च ॥८१॥ अ०१1१1१७॥ वेद में भू प्रातिपदिक से डीम् प्रत्यय हो । जैल-विधी चः प्रची व मुम्बी च इत्यादि-र॥ पुंयोगादाण्याचाम् ॥ ८२ ॥ अ०४ । १ । १८ ॥ पुंसा योगः पुंयोगः । स्त्रीलिंग में वर्तमान युन्य योग के कहने में प्रातिपदिकों से की प्रत्यय हो । जले-गणकन्य श्री गएकी महामात्री; प्रष्टीः प्रवरी इत्यादि । यहां योग ग्रहण इसलिये है कि-वत्ता, यहां की न हो ॥ २२ ॥ बाल-गोपालिकादीनां प्रतिषेधः ।। ८३ ।। पुंयोग के कयन में गोपालिका आदि शब्दों से जीम् प्रत्यय न हो। जैसे-गोपाल- कृश्य स्त्री गोपालिकाः पशुपातिका इत्यादि ! २३ ॥ बा०-सूर्य्याद्देवतायां चान् वक्तव्यः ॥ ८ ॥ सूर्य शब्द ले वता अर्थ में चाप् प्रत्यय हो । जैसे-स्थ्यस्य स्त्री देवता थ्यो। यहां देवता ग्रहण इसलिये है कि नूरी, यहां न हो ? =८ ॥ इन्द्रवरुणभवशवरुद्रमृडहिमारण्ययवयवनमातुलाऽऽचार्याणामा- तुक् ।। ८५ ॥ अ०४ । १ । १६ ।। स्त्रीलिंग में वर्तमान इन्द्रादि बारह (१२) प्रातिरादिकों ने की प्रत्यय, और आदि शब्दों को प्रानुक् का भागम भा हो । जैसे-इन्द्रन्य स्त्री इन्द्राती; असमानी भवानी: शारी: रुद्राणी नृहानी - 1 = 'वा०-हिमारण्ययोमहत्त्रे ।। ८६ ॥ श्रीलिंग में वर्तमान हिन और अरण्य प्रातिपदिकों से महत्त्व अर्थ में ही प्रत्यय और आनुक्का बागम हो । जलमहदिनं हिमानी महादरल्यमरण्यानी !! - यहां इन्द्रादि रादों में पुंग में टॉप न्यय होई छ से प्रा6 हो, केट प्रानुका मान होने के लिये पात्र है 1 यो सत्र से नामान्य में कार्य दिवान है. इसरिय दिन आदि पटना गिर प्रमों में गर्दिका विधान किया। 1 स्वीप्रत्ययप्रकरणम् १६ .. । वा०-यवाहोये ॥ ८७॥ ब्रीलिङ्ग में वर्तमान यब प्रातिपदिक ले दुष्टता अर्थ में प प्रत्यय और श्रानुक् का श्रागम हो जैले-दुष्टी यवो यवानी ॥ ७ ॥ वा०-यवनाल्लिप्याम् ॥ ८८ ।। स्त्रीलिङ्ग में वर्तमान यवन प्रातिपदिक से लिपि अर्थ में डीप प्रत्यय और प्रानुक् का नागम हो । जैसे-यवनानी लिपिः ॥ ८ ॥ वा०-उपाध्यायमातुलाभ्यां वा ॥ ८६ ॥ स्त्रीलिङ्ग में वर्तमान उपाध्याय और मातुल प्रातिपदिकों से ङीय प्रत्यय और श्रानुक् का श्रागम विकल्प करके होवे। जैसे---उपाध्यायानी, उपाध्यायी:मातुलानी, मातुली ॥६॥ वा०-आचाऱ्यांदणत्वं च ॥ १० ॥ यहां पूर्व वार्तिक से विकल्प की अनुवृत्ति चली आती है। स्त्रीलिङ्ग में वर्तमान प्राचार्य प्रातिपदिक से जीए प्रत्यय और आनुक का श्राराम भी विकल्प करके होवे, और धानुक के नकार को गन्त्र प्राप्त है सो न हो। जले-प्राचार्यानी, प्राचार्या । यहां पज्ञ में टाप् प्रत्यय हो जाता है ॥ १० ॥ वा०-अर्यक्षत्रियाभ्यां वा ॥ ११ ॥ यहां फिर विकल्प ग्रहण इसलिये है कि गन्य की अनुवृत्ति न पाये। स्त्रीलिङ्ग में वर्तमान अर्य और क्षत्रिय प्रातिपदिकों से दीप प्रत्यय और श्रानुदं का अागम विकल्प करके होवे । जैसे-अाणी. अर्याः जत्रियागी, क्षत्रिया ॥ वा०-मुद्गलाच्छन्दसि लिच्च ॥ १२ ॥ नीति में वर्तमान मुद्गल प्रातिपदिक. से वैदिक प्रयोग विषय में डीए प्रत्यय और आनुक् का आगम हो. और लीय प्रत्यय लित् भी हो जावे । जैसे-रथीरभून्मुद- गलानी गविष्ठी॥ १२॥ क्रीतात करणपूर्वात् ।। ६३ ॥ अ० ४ । १ । ५० ॥ ब्रीलिङ्ग में वर्तमान करणकारकबाची पूर्वपयुक्त क्रीत शब्दान्त प्रातिपदिकों से जीर प्रत्यय हो । जैसे-यात्रेलकीता सा बलकीत : वसनीती; ग्थकीती इत्यादि। * इस वार्निक में उपाध्याय सब्द से अपूर्व विधान और मातुल शब्द तो सूत्र में पढ़ा ही है ॥ यहां से लेके दोनों वार्निक अपूर्व विधायक इसलिये हैं कि प्रत्यादि शब्द सूत्र में नहीं पदे हैं ।
प्रेणताद्विते यहां करण कारक का ग्रहण इसलिये है कि देवदत्तकीता, इत्यादिसेलीपन हो । कादल्पाख्यायाम् ॥ ६४ ॥ अ०४।१ । ५१ !! स्त्रीलिङ्ग में वर्तमान अल्पाच्या अर्थ में करणकारक जिस के पूर्व हो ऐसे क्तान्त प्रातिपदिक ले जीप प्रत्यय हो ! जैले अन्नविलिप्ती द्यौः; सुपविलिप्तीस्थाली इत्यादि। यहाँ अल्पाख्या ग्रहण इसलिये है कि वन्दनाऽनुलिप्ता ब्राह्मणी, इत्यादि से की न होवे ॥२४॥ बहुब्रीहेश्चान्तोदात्तात् ।। ६५ ।। अ० ४ ! १ ! ५२ ॥ स्त्रीलिङ्ग में वर्तमान बहुव्रीहि समास में अन्तोदात्त चान्न प्रातिपदिक से डीप प्रत्यय हो जैसे- शंखो मिठोययासाशंवभिन्नी अत्तभिन्नी:गलोत्कृती रेशलूनी इत्यादि। यहां 'बहुव्रीहि ग्रहण इसलिये है कि-पट्टभ्यां पतिता पाइपतिता, यहां डीर प्रत्यय न होने ॥ वा०-अन्तोदात्ताजातप्रतिषेधः ॥ १६ ॥ अन्तोदात्त बहुव्रीहि प्रातिपदिकों ने जो डीए कहा है, सो बात शब्द जिस के अन्त में उस प्रातिपदिक से न हो! यह वार्तिक नत्र का निधरूप अपवाद है। जैले-दन्तजावा स्तनदाता इन्वादि ॥ १६ ॥ वा०-पाणिगृहीत्यादीनामर्थविशेषे !! १७ ॥ विरोष प्रयोत् जहां वेदोक्तरीति से पारिग्रहए अर्थात् विवाह किया आवे, वहां पारिगृहाती श्रादि शब्दों में जीर प्रत्यय हो । उस-पाणिगृहीती भार्यो। और जोकिसीप्रकार पारिग्रहण कर लेवे वहांपाणिग्रहीताटावन्त हीप्रयोगहो। वा०-अबहुनसुकालसुत्रादिपूर्वादिति वक्तव्यम् ।। || मन्त्र में जो अन्दोदात्त बबीहे प्रातिपदिक से डीए कहा है. सो यदि बहु नञ् नुकाल र मुसादि शब्द पूर्व हो तो न हो। ले-बहु बहुकृता । नञ्-अकृता । मु-मुकता! कान-मासडता:संवत्सरजाता। सुवादि-मुरुजाता दुःस्रज्ञाठा इत्यादि अस्वागपूर्वपदाद्वा ।। ६६ ॥ १०४ । १ । ५३ ।। प्रीलिङ्ग में वर्तमान स्यांग पूर्वपद ले भिन्न अन्तोदात्त शान्त बहुब्रीहि समासयुक्त प्रातिपदिक से विकल्प करके डोर प्रत्यय होवे । जैसे-गाईजाधी शाईवधा: पलारह महिती, पत्ता मक्षिताः मुरापीती, सुरापोता!
स्त्रीप्रत्ययप्रकरणम् २१ । यहां 'अस्वांग पूर्वपदं इसलिये है कि-दन्तभिन्नी, यहां विकल्प न हो। और 'अन्तोदात्त' इसलिये है कि वनछन्ना, यहां ङीष न हो ॥ ६ ॥ वा०-बहुलं संज्ञाछन्दसोः॥ १० ॥ संज्ञा और वैदिकप्रयोग विषय में वर्तमान तप्रत्ययान्त प्रातिपदिक से बहुल करके जीप प्रत्यय होवे । जैस-प्रवृद्धबिलूनी. प्रबुद्धबिलूना । प्रवृद्धा चासो विलूना चेति नायं बहुव्रीहिः । यहां बहुव्रीहि समास नहीं किन्तु कर्मधारय है ॥ १०० ॥ स्वाङ्गाच्चोपसर्जनादसंयोगोपधात् ॥ १०१ ॥ अ०४।१।५४ ॥ यहां बहुव्रीहि अन्तोदात्त चान्त ये तीन पद तो छूट गये. परन्तु एक विकल्प की अनुवृत्ति प्राती है। स्त्रीलिङ्ग में वर्तमान जिल के स्वांगवाची उपसर्जन संयोगोपध से भिन्न प्रातिपदिक अन्त में हो उस से डीप प्रत्यय विकल्प करके होवे ! जैसे-चन्द्रमुखी, चन्द्रमुखा; अतिक्रान्ता केशानतिकेशी. अतिकेशा माला। यहां 'स्वांग' ग्रहण इसलिये है कि- बहुयवा*। 'उपसर्जन' इसलिये है कि अशिखा । और 'असंयोगोपध ग्रहण इसलिये है कि सुगुल्फाः सुपार्खा, यहां की नहुभा ॥ २०१॥ वा०-अगन्गात्रकण्ठभ्य इति वक्तव्यम् ॥ १०२ ॥ पूर्व सूत्र से संयोगोपध के निषेध ले अङ्ग आदि का निषेध प्राप्त है, उस का अपवादविधायक यह वार्तिक है। स्त्रीलिंग में वर्तमान जो खांगवाची उपसर्जन अंग गात्र और करठ प्रातिपटिक हैं, उनसे डीप प्रत्यय हो। जैसे-मृदंगी, मृदंगा: लुगात्री, सुगात्राः स्निग्धकण्ठी, न्निग्ध- कराठा इत्यादि ॥ १०२॥ नासिकोदरौष्ठजवादन्तकर्णशृङ्गाच्च : ॥१०३।। अ० ४।११५५॥ विकल्प की अनुवृत्ति यहां भी पाती है। स्त्रीलिंग में वर्तमान बहुव्रीहि समास में जिस के अन्त में म्वांगसंज्ञक उपसर्जन अर्थात अप्रधानार्थवाची नासिका, उदर, श्रोष्ठ, जंघा.दन्त, कर्ण वा गृङ्ग शब्द हो, उस प्रातिपदिक से डीप प्रत्यय विकल्प करके हो। * यहां स्वांग उस को कहते हैं कि जिस समासान्त समुदाय प्रातिपदिक से प्रत्ययबिधान हो उस के वाच्य अयं का तो गरीरावयब होवे। जैसे-बिम्बोष्टी, बिम्ब के समान जिस के प्रोष्ठ हो । यहां गोष्ट स्वांग है, इसका विशेष व्याल्यान महामान्य में है ॥ : इस सूत्र में नासिका और उदर दो शब्दों से तो बहन के होने से अगले सूत्र से ही का निषेध प्राप्त और श्रोष्ट प्रादि शब्दों से संयोगपघ के होने से हीप का निषेध पाता है. उन दोनों का विधायक यह अपवाद सूत्र है ।
२२
स्त्रैणताद्धिते
जैसे-तुंगनासिकी, तुंगनासिका; कृशोदरी, कृशोदरा; विम्योष्ठी, बिम्बोष्ठा; दीर्घ-
जंघी, दीर्घजंघा; समदन्ती, समदन्ता; चारुकर्णी, चारुकर्णा; तीक्ष्णङ्गी, तीक्ष्णशृङ्गा
इत्यादि ॥ १०३॥
वा०-पुच्छाच्च ॥ १०४ ॥
पुच्छ शब्द भी संयोगोपध स्वांगवाची है, इस कारण निषेध का बाधक यह
पार्तिक है। पुच्छान्त वांगवाची प्रातिपदिक से विकल्प करके डीप. प्रत्यय होवे ।
जैसे-कल्याणपुच्छी, कल्याणपुच्छा ॥ १० ॥
वा०-कबरमणिविषशरेभ्यो नित्यम् ॥ १०५ ।।
कवर मणि विष और शर शब्दों से परे जो स्वांगवाची पुच्छ प्रातिपदिक उस से
स्त्रीलिङ्ग में नित्य ही ङीप प्रत्यय हो। जैसे- कवरपुच्छी, मणिपुच्छी; विषपुच्छी
शरपुच्छी इत्यादि ॥ १०५ ॥
वा०-उपमानात्पक्षाच्च पुच्छाच्च ॥ १०६ ॥
उपमानवाची शब्दों से परे जो स्वांगवाची पक्ष और पुच्छ प्रातिपदिक उन से नित्य
ही ङीष् प्रत्यय हो । जैसे-उलूकपक्षी सेना; उलूकपुच्छी शाला इत्यादि ॥ १०६ ॥
न क्रोडादिबह्वचः ॥ १०७ ॥ अ० ४ । १ । ५६ ॥
कोड आदि प्रातिपदिक और बहुत अच् जिस में हों, ऐसे प्रातिपदिक से डीए
प्रत्यय न होवे। जैसे-कल्याणकोडा; कल्यारणखुरा; कल्याणयालाः कल्याणशफा।
बच्-पृथुजघना. महाललाटा इत्यादि ॥ १०७॥
सहनविद्यमानपूर्वाच्च ॥ १०८ ॥ अ० ४ । १ । ५७ ॥
सह नम् विद्यमान ये हों पूर्व जिसके. उस स्वांगवाची स्त्रीलिङ्ग में वर्तमान प्राति-
पदिक से डीप प्रत्यय न हो ।। जैसे-सकेशा; अकेशा. विद्यमानकेशा; सनासिका.
अनासिका विद्यमाननासिका इत्यादि ॥ १० ॥
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नखमुखात्संज्ञायाम् ॥ १०६ ॥ अ० ४ । १ । ५८ ।।
स्त्रीलिंग में वर्तमान नखान्त और मुखान्त प्रातिपदिकों से डीप प्रत्यय न हो।
जैसे-शर्पणम्रा; वज्रणखा; गौरमुखाः कालमुखा ।
'संज्ञा' ग्रहण इसलिये है कि-ताम्रमुनी कन्या, यहां डीय हो ॥ १० ॥
स्त्रीप्रत्ययप्रकरणम्
२३
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दीघजिह्वी च छन्दसि ॥ ११० ।। अ० ४ । १ । ५६ ।।
वेद में 'दीर्घजिह्वी' निपातन किया है। जैसे-दीर्घजिी वै देवानां दृव्यमलेट् ।
'दीजिह्नीं शब्द नित्य डीप होने के लिये निपातन किया है ॥ १० ॥
दिकपूर्वपदान्डोप ॥ १११ ॥ अ० ४ । १ । ६० ॥
दिक् पूर्वपद हो जिस के उस खांगवाची स्त्रीलिंग में वर्तमान प्रातिपदिक से कीप
प्रत्यय हो । जैसे-
मास्त्रीः प्रत्यङ्मुखी; प्राङ्नासिकी इत्यादि ॥ ११ ॥
वाहः ॥ ११२ ।। अ०४।१ । ६१ ॥
वाहन्त प्रातिपदिक से डीप प्रत्यय हो । जैसे-दित्योही; प्रष्ठोही; विश्वोही
इत्यादि ॥ १२॥
सख्याशश्वोति भाषायाम् ॥ ११३ ॥ अ० ४ । १ । ६२ ।।
भाषा अर्थात् लौकिक प्रयोग विषय में सनी और अशिश्वी ये दोनों डीप प्रत्य-
यान्त निपातन किये हैं। जैसे-सस्त्रीयं मे ब्राह्मणीः नास्याः शिशुरस्तीति अशिश्वी ।
यहां 'भाषा ग्रहण इसलिये है कि-सखे सप्तपदी भव, यहां न हो ॥ ११३॥
जातेरस्त्रीविषयादयोपधात् ॥ ११४ ॥ अ० ४ । १ । ६३ ।।
स्त्रीलिंग में वर्तमान जो यकारोपवर्जित जातिवाची अकारान्त और नियत स्त्रीलिंग
न हो, ऐसे प्रातिपदिक से जीय प्रत्यय होवे । जैसे कुकुर्टीः सूकरी; ब्राह्मणी; वृपली;
- नाडायनी; चारायणी: बहवृत्री।
यहां 'जाति' ग्रहण इसलिये है किं-मुण्डा । 'अस्त्रीविषयं इसलिये है कि-
मक्षिका । 'अयोपध इसलिये है कि क्षत्रिया; वैश्या । 'अनुपसर्जन ग्रहण इसलिये है
कि-बढुकुझुटा; बहुसूकरा, इससे ङीष न हुआ ॥ १४ ॥
वा०-यापधप्रतिषेधे हयगवयमुकयमत्स्यमनुष्याणामप्रतिषेधः॥११५
यकारोपध का निषेध जो सूत्र से किया है, यहां हय गवय मुकय मत्स्य और
मनुष्य प्रातिपदिकों का निषेध न होबे, अर्थात् इनसे डीप प्रत्यय हो। जैसे-हयी;
गवयी मुकी; म.सी: मनुपी ॥ १५ ॥
पाककर्णपर्णपुष्पफलमूलबालोत्तरपदाच्च ॥११६॥ अ० १।१।६४ ।।
बीटिंग में वर्तमान जिस प्रातिपदिक के उत्तरपद पाक आदि शब्द हो, उससे
डीय प्रत्यय हो । जैसे-श्रोदनपाकीः मुदगपर्णीः पटपर्णीः शङ्खपुष्पी; यहुफली;
दर्भमूली; गोवाली ॥ १६ ॥
२४ स्त्रैणताद्धिते - वा०-सदचकाण्डप्रान्तशतैकेभ्यः पुष्पात्प्रतिषेधः ॥ ११७ ॥ सत् अंचु काण्ड.प्रान्त शत एक इन प्रातिपदिकों से परे जो स्त्रीलिंग में वर्तमान पुष्प प्रातिपदिक उस से ङीष् प्रत्यय न हो। सूत्र ११६ से प्राप्त है, उसका विशेष शब्दों के योग में निषेध किया है। जैसे- सत्पुष्पा; प्राक्पुष्पा, प्रत्यकपुष्पा; काण्डपुष्पा; प्रान्तपुष्पा, शतपुष्पा; एकपुष्पा ॥११॥ वा०-सम्भस्त्राजिनशणपिण्डेभ्यः फलात् ॥ ११८ ॥ सम् भत्र अजिन शण और पिण्ड शब्दों से परे जो फल प्रातिपदिक उस से ङीष प्रत्यय न हो । यहां सर्वत्र कीप का निषेध होने से टाप हो जाता है। जैसे--सम्फला; भत्रफला; अजिनफला, शणफला, पिण्डफला ॥ ११८ ॥ वा०-श्वेताच्च ॥ ११९ ॥ श्वेत शब्द से परे जो फल उससे भी ङीष् न हो । जैसे-श्वेतफला ॥ ११६ ॥ वा०-त्रेश्च ॥ १२० ॥ त्रि शब्द से परे जो फल उससे भी ङीष् न हो । जैसे-त्रिफला ॥ १२० ॥ वा०-मूलान्नञः ॥ १२१ ॥ नञ् से परे जो मूल प्रातिपदिक उससे भी ङीष् प्रत्यय न होवे। जैसे- न मूल. मस्याः सा अमूला इत्यादि ॥ १२१ ॥ इतो मनुष्यजातेः ॥ १२२ ।। अ० ४ । १ । ६५ ॥ स्त्रीलिङ्ग में वर्तमान मनुष्यजातिवाची इकारान्त प्रातिपदिक से ङीष् प्रत्यय हो । जैसे-अवन्ती; कुन्ती; दाक्षी; लाक्षी इत्यादि। यहां 'इकारान्त' ग्रहण इसलिये है कि-विटा दरत्, यहां ङीष न होवे । 'मनुष्य' प्रहण इसलिये है कि-तित्तिरिः, यहां न हो । और पूर्वसूत्र से जाति की अनुवृत्ति चली आती, फिर 'जाति' ग्रहण का प्रयोजन यह है कि-यकारोपध से भी ङीष प्रत्यय हो जावे, जैसे-औदमेयी इत्यादि ॥ १२२ ॥ वा०-इन उपसङ्ख्यानमजात्यर्थम् ॥ १२३ ॥ जाति के न होने से स्त्रीलिंग में वर्तमान इञ प्रत्ययान्त प्रातिपदिक से ङीप् प्रत्यय कहना चाहिये । जैसे-सौतङ्गमी; मौनचित्ती * इत्यादि ॥ १२३ ॥ * सुतम प्रादि प्रातिपदिकों से चातुरर्थिक प्रकरण का इम् प्रत्यय है, इस कारण जाति नहीं ॥ .
स्त्रीप्रत्ययप्रकरणम् २५ ऊडुन्तः ॥ १२४ ॥ अ० ४ । १ । ६६ ॥ स्त्रीलिंग में वर्तमान मनुष्यजातिवाची उकारान्त प्रातिपदिक से ऊङ् प्रत्यय होवे । जैसे-कुरू; ब्रह्मवन्धू, वीरवन्धः । यकारोपध के निपेध की अनुवृत्ति यहां आती है, इसी कारण अध्वर्युाह्मणी, इत्यादि में ऊङ प्रत्यय नहीं होता ॥ १२४ ॥ वा०-अप्राणिजातेश्चारज्यादीनाम् ॥ १२५ ।। स्त्रीलिंग में वर्तमान अप्राणिजातिवाची [उकारान्त] प्रातिपदिक.से ऊड प्रत्यय होघे, परन्तु रज्जु अादि प्रातिपदिकों से न हो । जैसे-अलावू; कर्कन्धः । यहां 'अप्राणि' ग्रहण इसलिये है कि-कृकवाकु:, यहां न हो। और 'अरस्वादि' ग्रहण इसलिये है कि-रज्जुः; हनुः, इत्यादि से ऊड न हो ॥ १२५ ॥ वाह्वन्तात्संज्ञायाम् ॥ १२६ ॥ अ० ४ । १ । ६७ ।। स्त्रीलिंग में वर्तमान याहु शब्दान्त प्रातिपदिक से संज्ञाविषय में ऊड प्रत्यय होथे। जैसे-भद्रवाहः; जालवाहूः । यहां 'संज्ञा' ग्रहण इसलिये है कि वृत्तवाहुः; सुबाहुः, इत्यादि से न होवे ॥ १२६:।। पङ्गोश्च ॥ १२७ ॥ अ० ४ । १ । ६८ ॥ स्त्रीलिङ्क में वर्तमान पंगु प्रातिपदिक से ऊङ प्रत्यय होवे । जैसे-पंगूः ॥ १२७ ॥ वा०-श्वशुरस्योकाराकारलोपश्च वक्तव्यः ॥ १२८ ।। स्त्रीलिङ्ग में वर्तमान श्वशुर शब्द से ऊङ् प्रत्यय और उस के उकार प्रकार का लोप हो जावे । जैसे-श्वश्रूः। यहां किसी से ऊङ प्राप्त नहीं, इसलिये यह पार्तिक अपूर्व विधायक है ॥ १२८ ॥ ऊरूत्तरपदादौपम्ये ॥ १२६ ॥ अ० ४ । १ । ६६ ॥ स्त्रीलिंग में वर्तमान ऊरु उत्तरपद में है जिसके, उस प्रातिपदिक से उपमान अर्थ ऊङ प्रत्यय होवे। जैसे-कदलीस्तम्भ इवोरू अस्याः स्त्रियाः सा कदलीस्तम्भोरुः नागनासोरुः। यहां 'श्रौपम्य' ग्रहण इसलिये है कि-वृत्तोरुः स्त्री, यहां न होवे ॥ १२६ ॥ संहितशफलक्षणवामादेश्च ॥ १३० ॥ अ० ४ । १ । ७०॥ स्त्रीलिंग में वर्तमान संहित शफ लक्षण वा वाम शब्द जिस के आदि में हो, ऐसे ऊरू- चर प्रातिपदिक से ऊः प्रत्यय होवे । जैसे-संहितोरूः; शफोरुः; लक्षणोका; वामोरुः । में - । ४ २६ स्त्रैणताद्धिते ---zrN. - यहां उपमान अर्थ नहीं है, इसलिये इस सूत्र का पृथक् श्रारम्भ है, नहीं तो पूर्व सूत्र से ही हो जाता ॥ १३० ॥ वा०-सहितसहाभ्यां च ॥ १३१ ॥ स्त्रीलिंग में वर्तमान सहित और सह शब्द से परे जो ऊरु प्रातिपदिक उस से ऊङ् प्रत्यय होवे । जैसे-सहितोसः सहोरूः इत्यादि ॥ १३१ ॥ कद्रुकमण्डल्वोश्छन्दसि ॥ १३२ ।। अ० ४ । १ । ७१ ।। स्त्रीलिंग में वर्तमान कद्रु और कमण्डलु प्रातिपदिकों से वैदिक प्रयोग विषय में ऊङ प्रत्यय होवे । जैसे-कश्च वै सुपर्णी च; मा स्म कमण्डलू शूद्राय दद्यात् । यहां 'छन्दो' ग्रहण इसलिये है कि-कद्रुः; कमण्डलुः, यहां न हो ॥ १३२ ॥ वा०-गुग्गुलुमधुजतुपतयालूनामुपसङ्ख्यानम् ॥ १३३ ॥ स्त्रीलिंग में वर्तमान वैदिक प्रयोगविषय में गुग्गुलु मधु जतु और पतयालु प्राति- पदिकों से ऊङ प्रत्यय होवे । जैसे-गुग्गुलूः; मधूः; जतू, पतयालूः ॥ १३३ ॥ संज्ञायाम् ।। १३४ ॥ अ० ४ । १ । ७२ ॥ स्त्रीलिंग में वर्तमान संज्ञाविषय में कद्रु और कमण्डलु प्रातिपदिकों से ऊङ ऊङ प्रत्यय होवे । जैसे-कद्रू; कमण्डलः । यहां 'संचा' इसलिये है कि कद्रुः; कमण्डलुः, यहां ऊड न होवे ॥ १३४ ॥ शाईरवाद्यमो डीन् ॥ १३५ ॥ अ० ४ । १ । ७३ ॥ स्त्रीलिंग में वर्तमान जाति अर्थ में शास्रव आदि और अञ प्रत्ययान्त प्रातिपदिकों से ङीन् प्रत्यय होवे । जैसे-शाईरवी; कापटवी । अञन्त -वैदी; औ: । यहां जाति की अनुवृत्ति आने से पुंयोग में प्राप्त ङीप का बाधक यह सूत्र नहीं होता ! जैसे-वैदस्य स्त्री वेदी, यहां जीप होता ही है ॥ १३५ ।। यङश्चात् ।। १३६ ॥ अ० ४।१ । ७४ ॥ स्त्रीलिंग में वर्तमान जातिवाची यङ प्रत्ययान्त प्रातिपदिक से चाप् प्रत्यय होवे । जैसे-श्राम्यष्ट्या; सौवीर्या; कारीपगन्ध्या; वाराह्या इत्यादि ॥ १३६ ॥ वा०-षाच्च यजे १३७ ।। स्त्रीलिंग में वर्तमान जो पकार से परे यञ् तदन्त प्रातिपदिक से चाप् प्रत्यय हो । जैसे-शार्कराच्या; पोतिमाया; गोकन्या इत्यादि ॥ १३७ ॥ ।
स्वीप्रत्ययप्रकरणम् २७ आवट्याच्च ॐ ॥ १३८ ।। अ०४ । १ । ७५ ॥ स्त्रीलिंग में वर्तमान जातिबाची आवश्य शब्द से चाप् प्रत्यय होवे । जैसे- श्रावट्या ॥ १३ ॥ तद्धिताः ।। १३६ ॥ अ० ४ । १ । ७६ ।। यह अधिकार सूत्र है। पञ्चमाऽध्याय पर्यन्त इसका अधिकार जायगा ! इससे आगे जो प्रत्यय विधान कर, सो२तद्धितसंशक जानने चाहियें ॥ १३६॥ यूनस्तिः ॥ १४० ॥ अ० ४ । १ । ७७ ॥ जो स्त्रीलिंग में वर्तमान युवन् शब्द से ति प्रत्यय होता है, वह तद्धितसंशक भी हो जावे । जस्ले-युवतिः ॥ १० ॥ अणिनोरनार्पयोर्गुरूपोत्तमयोः ष्यङ्गोने ॥१४१॥ अ०४।१७८॥ जो स्त्रीलिंग में वर्तमान गोत्र अर्थ में विहित ऋपिभिन्न अण् और इञ् हैं, ये जिनके अन्त में हों, ऐले गुरुपोत्तम अर्थात् जो तृतीय आदि अन्त्यवर्ण के पूर्व गुरुसंझक वर्ण हों, टन प्रातिपदिकों के स्थान में प्यङ् आदेश हो, वह तद्धितसंधक भी हो जावे । जैसे-अप-करीपस्येव गन्धोऽस्य स क पगन्धिः; कुमुदगन्धिः । तस्य [अपत्यं स्त्री कारीपगन्ध्या; कौनुदगन्ध्या । इन. वाराह्या; यालाश्या ।। यहां 'अल् और इन्न' इसलिये है कि-ऋतभागस्यापत्यं श्री श्रातभागी, यहां विदादिकों से अन्न हुआ है, इस कारण प्य नहीं होता। 'अनार्थ' इसलिये कहा है कि-बाशिष्टी, वैश्वामित्री, यहां न हो! 'गुरुपोत्तम ग्रहण इसलिये है कि-श्रोपगी; कापटवी, यहां न हो। और 'गोत्र इसलिये है कि-श्राहिच्छी, यहां न हो ॥ १२ ॥ गोत्रावयवात् ॥ १४२ ॥ अ० ४ । १ । ७९ ।। इस सूत्र का प्रारम्भ गुरुपोत्तम विशेषण न घटने के लिये है। स्त्रीलिंग में वर्तमान गोत्र का अवयव अर्थात् गोत्राभिमतकुल में मुख्य पुणिक भुणिक और मुन्नर आदि प्रातिपदिक से विहित जो गोत्र अर्थ में श्रण और इञ् हैं, * यह अवट शब्द गादिकों में पढ़ा है, इसलिये यन् प्रत्ययान्त से डीप् प्रत्यय (यनश्च) इस टच सूत्र से प्राप्त है टसका अपराद है। परन्तु प्राचीन भाचाव्यों के मन में तोफ होता ही है । जैसे-पावट्यायनी । : यहां करीपगन्धि और कुमुदगन्धि शब्दों से (तस्यापत्यन् ) इस से अप और वराह तया रक्षाका शब्दों से (अतइन ) इस प्रागानी मूत्र से इन हुआ है - २८ बैणताद्धिते उनके स्थान में प्यङ आदेश हो, वह तद्धितसंझक भी होवे । जैसे-पौणिक्या; भौणिक्या; मौखा इत्यादि ॥ १४२॥ क्रौड्यादिभ्यश्च ॥ १४३ ॥ अ० ४ । १।८० ॥ स्त्रीलिंग में वर्तमान क्रौडि आदि प्रातिपदिकों से ष्यङ : प्रत्यय, और उसकी तद्धित- संज्ञा भी हो । जैसे-कोड्या लाड्या; व्याड्या इत्यादि ॥ १३ ॥ दैवयज्ञिशौचिवृक्षिसात्यमुनिकाण्ठेविद्धिभ्योऽन्यतरस्याम्॥१४४॥ अ०४।१ । ८१ ।। गोत्र अर्थ में वर्तमान दैवयक्षि शौचिवृति सात्यमुनि और काण्ठेविद्धि प्रातिपदिकों से स्त्रीलिंग में व्यङ प्रत्यय हो, उसकी तद्धितसंक्षा भी हो । जैसे-दैवयश्या शौचिवृक्ष्या; सात्यमुठ्या; काण्ठेविद्ध्या। और पक्ष में (इतो मनुष्यजातेः ) इस उक्त सूत्र से ङीप होता है। जैसे-देवयशी शौचिवृक्षी; सात्यमुग्री; कारठेषिद्धी इत्यादि ॥ १४४ ॥ इति स्त्रीप्रत्ययप्रकरणम् ॥ समर्थानां प्रथमाद्वा ॥ १४५ ॥ अ० ४ । १ । ८२॥ समर्थानाम् प्रथमात् वा इन तीन पदों का अधिकार करते हैं। इससे आगे जो २ प्रत्यय कहे हैं, वे समों की प्रथम प्रकृति से विकल्प करके होंगे, पक्ष में वाक्य भी बना रहे। यह अधिकार छः पाद अर्थात् पञ्चमाध्याय के द्वितीय पाद के अन्तपर्य्यन्त जावेगा । जैसे-उपगोरपत्यम् श्रीपगवः । । यहां 'समर्थानाम्' इसलिये है कि-कम्बल उपगोरपत्यं देवदत्तस्य, यहां उपगु शब्द से प्रत्यय नहीं होता। 'प्रथमात्' इसलिये है कि-पट्यन्त ही से होवे प्रथमान्त से नहीं हो। जैसे-उपगु से होता है, अपत्य से नहीं हो। 'वा' इसलिये है कि वाक्य भी बना रहे । जैसे-उपगोरपत्यम् ॥ १४५ ॥ प्राग्दीव्यतोऽण् ॥ १४६ ॥ अ० ४ । १ । ८३ ॥ (तेन दीव्यति०) इस सूत्र पर्यन्त 'श्रण' प्रत्यय का अधिकार करते हैं। यहां से आगे जो २ विधान करेंगे, वहां २ अपवाद विषयों को छोड़ के प्रण ही प्रवृत्त होगा।
प्राग्दीव्यवीयाः २६ जैसे-(तस्यापत्यम् ) यहां प्रत्यय विधान किया है, सो अधिकार के होने से अण् ही होता है। जैसे-उपगोरपत्यम् औपगवः; कापटवः इत्यादि ॥ १४६ ॥ अश्वपत्यादिभ्यश्च * ॥ १४७ ॥ अ० ४ । १ । ८४ ॥ प्रान्दीव्यतीय अर्थो, अर्थात् 'तन दीव्यति' इस सूत्र से पूर्व २ जो २ अर्थ विधान किये हैं, उन २ में अश्वपति आदि प्रातिपदिकों से अण् ही होवे । जैसे-आश्वपतम्। शावपतम् धानपतम्: गाणपतम् इत्यादि ।। १४७ ।। दित्यदित्यादित्यपत्युत्तरपदाणण्यः ॥१४८॥ अ०४ । १।८५ ॥ यहां भी प्रादीव्यीय की अनुवृत्ति पाती है। और यह सूत्र अण् का अपवाद है। दिति अदिति श्रादित्य और पत्युत्तरपद प्रातिपदिक से प्राग्दीव्यतीय अर्थों में तद्धितसंचक ण्य प्रत्यय होवे । जैसे-दन्यः; आदित्यः; आदित्यम् । पत्युत्तरपद-प्राजा- पत्यम्: सेनापत्यम् इत्यादि ॥ १४ ॥ । वा०-यमाच्च ॥ १४६ ।। प्रादीव्यतीय अर्थो में यम प्रातिपदिक ले भी तद्धितसंक्षक एच प्रत्यय होवे । जैसे-याम्यम् ॥ १६॥ वा०-बाङ्मतिपितुमर्ता छन्दस्युपसङ्ख्यानम् ॥ १५० ।। प्रान्दीव्यतीय अर्थों में वाक मति और पितृमत् प्रातिपदिकों से [वैदिक प्रयोग विषय में ] तद्धितसंम्रक एय प्रत्यय हो । जैसे-वाच्यम्: मात्यम्: पैतृमत्यम् ॥ १५० ॥ वा०-पृथिव्या आजो ॥ १५१ ।। प्रादीव्यतीय अथों में पृथिवी प्रातिपदिक से अ और अञ् प्रत्यय होवें। जैसे- पार्थिवा पार्थिवी ॥ २५ ॥ वा०-देवाद्यनी ॥ १५२ ॥ प्रादीव्यतीय अर्यो में देव प्रातिपदिक से यञ् अञ् प्रत्यय होवें। जैसे- देव्यम्: दैवम् ॥ १५२ ॥ पति जिन टचरपद में हो उन प्रातिपदिकों से अगले सूत्र में एय प्रन्यय कदा है. टस का पुरस्तात् अपवाद यह सूत्र है। यहां ज और अन प्रत्ययों में इतना ही भेद है कि लान्त से ही प्राप्त नहीं, और अनन्त से टापू हो जाता है ।। ++ और अञ् ३० पताद्धिते वा०-बहिषष्टिलोपश्च ।। १५३ ॥ प्राग्दीव्यतीय अर्थों में वहिप् प्रातिपदिक से एय प्रत्यय और उस के टि का लोप भी होवे । जैसे-वहिर्भवो वाह्यः ॥ १५३ ॥ वा०-ईकक् च ॥ १५४ ॥ प्राग्दीव्यतीय अर्थो में वहिप प्रातिपदिक से ईका प्रत्यय और उसके टि का लोप भी होवे । जैसे-पाहीकः ॥ १५४ ॥ वा०-ईका छन्दसि ॥ १५५ ।। पाग्दीव्यतीय अर्थों में वैदिक प्रयोगविषयक वहिप् प्रातिपदिक से ईकञ् प्रत्यय और उसके टि का लोप भी होवे । जैसे-वाहीकः * ॥ १५५ ॥ वा०-स्थानोऽकारः ॥ १५६ ॥ प्राग्दीव्यतीय अर्थों में स्थामन् शब्दान्त प्रातिपदिक से अकार प्रत्यय होवे । जैसे-अश्वत्थामः ॥ १५६ ॥ वा०-लोनोऽपत्येषु बहुषु ।। १५७ ॥ बहुत अपस्य वाच्य हों, तो लोमन् शब्दान्त प्रातिपदिक से अकार प्रत्यय हो जावे जैसे-उडुलोन्नोऽपत्यानि उडुलोमाः; शरलोमाः इत्यादि । यहां बहुत अपत्य' ग्रहण इसलिये है कि-उडुलोन्नोऽपत्यम् श्रोडुलोमिः; शारलोमिः यहां प्रकार प्रत्यय न होवे ॥ १५७ ॥ वा०-सर्वत्र गोरजादिप्रसङ्गे यत् ।। १५८ ।। सर्वत्र अर्थात् प्राग्दीव्यतीय अर्थों में गो प्रातिपदिक से श्रा आदि अजादि प्रत्ययं की प्राप्ति में यत् प्रत्यय ही होवे । जैसे-गव्यम् । यहां 'अजादिप्रसंग' इसलिये कहा है कि-गोरूप्यम्; गोमयम्, इत्यादि में यह न होवे ॥ १५ ॥ उत्सादिभ्योऽञ् ।। १५६ ॥ अ० ४ । १ । ८६ ॥ प्राग्दीव्यतीय अर्थों में उत्स आदि प्रातिपदिकों से तद्धितसंज्ञक अञ् प्रत्यय होवे जैसे-श्रौत्सः; औदपानः करः इत्यादि। * पूर्व वातिक में इंकक और यहां इकन इन दो प्रत्ययों में केवल स्वर का ही भेद है । श्रयां लोक में अन्तोदात्त और वेद में श्रायुदात्त स्वर होता है ।।
प्रान्डीव्यतीयाः ३१ अग और उसके अपवाझं का भी यह सूत्र अपवाद है। १५६ ।। बापुंसाभ्यां नम्नजी भवनात् ।। १६० ।। अ० ४ । १ । ८७ ।। (धान्यानां भवन ) इस सूत्र से पूर्व सत्र प्रयों में स्त्री और पुत् प्रातिपदिकों से यथासंन्य करके गञ् और स्तन् प्रत्यय हों। जैसे-श्रीषु मवम् पम्: पास्नम् । बीभ्य भागतम् गम्: पास्नम् । स्त्रिया प्रोचम् ब्रमन्पॉनन् । ब्रीन्यो हितम् एम् पास्नम् इत्यादि । १६० द्विगो गनपत्ये ।। १६१ ॥ अ०४ । १1८८ ॥ द्विगु का सम्बन्धी निमित्त, अयान जिसको मानचे द्विगु किया हो, उस अपत्य- बनि पाहीन्यीय तद्धितसंडक प्रत्यय का लुक् होवे । जैसे-पञ्चमु कपालेषु संस्कृतः पुगेडाग पञ्चस्यान दशकपालः द्वौ वैज्ञवर्धा द्विवेदः, त्रिवेदः । यहां 'अनपत्यं ग्रह, इसलिये है कि-वत्तिः, इत्यादि में लुक् न हो ! गोत्रेऽलुगचि ॥ १६२ ॥ अ०४ । १ । ८६ ॥ जो ( यस्कादिभ्यो गाने ) इत्यादि सूत्रों से जिन गोत्र प्रत्ययों का लुक् कह चुके हैं सो न हो, प्राग्व्यतीय प्रजादिप्रत्यय पर हों तो। जैसे—गणां छात्राः गागीयाः; वासीया. आत्रेयीयाः; चारपायरीयाः । यहां 'गोत्रं [ग्रह | इसतिये है कि कोवतम्: यादग्म्, यहां निषेध न हो ! और 'अ ग्रह, इसलिय है कि गर्नेभ्य आगतं गर्गनप्यम्: गर्गमयम्, यहां हलादि प्रत्ययों के पर नुक होजावे . २६२ यूनि लुक् ॥ १६३ ॥ अ०४।१।१०॥ जब प्रान्दीव्यतीय अजादि प्रत्यय की विवज्ञा हो, तर युवापत्य अर्थ में विहित जो तद्वितसंझक प्रत्यय उसज्ञा लुक हो, फिर जिस प्रकृति से जो प्रत्यय प्रात हो सो हो। जैसे-फाण्टाहतन्यापत्यं फागटाहतिः । तन्य युवापत्यम्, यहां (फारटाहविनिम०) इससे युवापत्य मग्न होकर-काएटाहतः । फाण्टाहतस्य यूनश्चात्राः इस अर्थ की विवक्षा होते ही युवापन्य का नुक होके उस इञ् प्रत्ययान्त फाण्टाहति प्रातिपदिक से (इमञ्च) इस सूत्र से ऐधिक श्रग प्रत्यय हो जाता है-ले-फाटाहताः । दया भगविचस्यायलं भागवित्तिः, यहां प्रथम गोत्र में इन। तस्य मागविचरपत्यं मायको भागवित्तिक, यहां युवापत्य में उक् हुआ है। मागवित्तिकस्य नहायाः, इस अयं की श्रोना में यहां भी पूर्व के समान युव प्रत्यय टक की निवृत्ति होकर इनन्त ३२ स्त्रैणताद्धिते से श्रण हो जाता है-जैसे-भागवित्ताः । [तिकस्यापत्यं तैकार्यानः । तस्य] तैकायनेरपत्यं माणवकः तैकायनीयः । तैकायनीयस्य यूनश्छात्राः तैकायनीयाः, यहां युव प्रत्यय छ की निवृत्ति में फिञ् प्रत्ययान्त तैकायनि वृद्ध प्रातिपदिक से छ प्रत्यय हुआ है, इत्यादि । यहां 'अजादि के परे लोप' इसलिये कहा है कि-फाण्टाहृतरूप्यम्; फाण्टाहृतमयम्, यहां लुक न हो। प्राग्दीव्यतीय अर्थों में लोप होता है, अन्यत्र नहीं-भागवित्तिकाय हितं भागवित्तिकीयम्, यहां न हो ॥ १६३ ।। फफिनोरन्यतरस्याम् ॥ १६४ ॥ अ०४ । १ । ११ ॥ जो प्राग्दीव्यतीय अर्थवाची अजादि प्रत्यय परे हों, तो फक और फिञ् युवप्रत्ययों का लुक विकल्प करके हो । जैसे-गर्गस्यापत्यं गार्यः (गर्ग शब्द से यञ् ), तस्य युवापत्यम् (तदन्त से फक्)- गाायणः, तस्य छात्राः, इस विवक्षा में फक् का लुगार्गीयाः। और जिस पक्ष में लुक न हुआ वहां गाायणीया; वात्सीयाः, वात्स्यायनीयाः इत्यादि । फिञ्-यस्क- स्थापत्यम् ( शिवादिकों से अण) यास्कः, तस्य युवापत्यम् (अणन्त व्यच् प्रातिपदिक से फिञ् ) यास्कायनिस्तस्य छात्राः, इस विवक्षा में फिञ् का विकल्प से लुक्= यास्कीयाः, यास्कायनीयाः इत्यादि ॥ १६४ ॥ तस्यापत्यम् ।। १६५ ।। अ० ४ । १ ।.६२ ॥ समर्थों में प्रथम पष्ठीसमर्थ प्रातिपदिक से अपत्य अर्थ में अण् आदि प्रत्यय विकल्प करके होयें। जैसे- उपगोरपत्यम् औपगवः; आश्वपतः; दैत्यः; श्रोत्सः; स्त्रैणः; पाँस्नः इत्यादि ॥ १६५॥ ओर्गुणः ॥ १६६ ॥ अ० ६ । ४.। १४६ ॥ जो तद्धितर्सनक प्रत्यय परे हो, तो उवर्णान्त भसंज्ञक अङ्ग को गुण हो। जैसे- उपगोरपत्यम् श्रीपगवः इत्यादि ॥ १६६ ॥ - तद्धितेष्वचामादेः ॥ १६७ ॥ अ० ७ । २ । ११७ ॥ जो नित् पित् और कित् तद्धितसंक्षक प्रत्यय परे हों, तो अचों के बीच में जो आदि अच् उसके स्थान में वृद्धि हो । जैसे-औपगवः; वाभ्रव्यः; माण्डव्यः इत्यादि ॥ १६७ ॥ यस्येति च ॥ १६८ ॥ अ०६ । ४ । १४८ ॥ जो तद्धितसंज्ञक प्रत्यय और ईकार परे हों, तो भसंबक.इवर्ण और अवर्ण का लोप होवे । जैसे-ईकार-दानी; साक्षी । तद्धित में इवर्ण का लोप-दौलेया; पालेयः; आत्रेयः अपत्याधिकारः - इत्यादि अवर्ण का तोप कुमारी; किशोरी; देत्या, प्राश्वपतः; श्रोत्सःस्त्रैणः; पौंस्नः इत्यादि ॥१६॥ एको गोत्रे ॥ १६६ ।। अ० ४ । १ । ६३ ।। गोत्र अर्थ में एक ही प्रत्यय होवे, अर्थात् द्वितीय प्रत्यय न हो। ऋथवा प्रकृति का नियन करना चाहिये कि जहां गोत्रापत्य की विवज्ञा हो, वहां एक ही प्रथम मुख्य जिसले अपत्याधिकार में कोई प्रत्यय न हुआ हो, उससे प्रत्यय की उत्पत्ति हो । जैसे- गार्यः; नाडायनः इत्यादि ॥ २६६ ॥ गोत्रायून्य स्त्रियाम् ।। १७० ।। अ० ४ । १ । ९४ ॥ और जब युवापत्य की विवक्षा हो, तो गोत्रप्रत्ययान्त प्रकृति ही से दूसग प्रत्यय हो। जैसे-गार्यस्य युवापत्यं गाग्र्यायणः; वात्स्यायनः; दाक्षायणः; साक्षायणः, यहां युवापत्य में 'फा और औपनविः; नाडायनिः, यहां युवापत्य में 'इञ् हुआ है। यहां स्त्री का निषेध इसलिये है कि-दाक्षी; साक्षी, यहां गोत्रप्रत्ययान्त से स्त्रीप्रत्यय हुआ है ॥ १७० ॥ अत इञ्-॥ १७१ ।। अ० ४ । १ । ९५ ।। समयों का प्रथम पष्टीसमर्थ अकारान्त प्रातिपदिक है, उसले अपत्य अर्थ में इन प्रत्यर विकल्प करके होवे । जैसे-दक्षस्थापत्यं माणवको दाक्षिः; दाशरथिः । यह सूत्र अल् का अपवाद है। यहां 'तपरकरण इसलिये है कि-शुभंयाः कीलालपाः, इत्यादि से 'इन् न हो, अर्थात् प्राकारान्त से निषेध हो जाय ॥ १७१ ।। वाहादिभ्यश्च ।। १७२ ।। अ० ४ । १ । ९६ ॥ समयों के प्रथम पष्ठी समर्थ बाहु आदि प्रातिपदिकों से अपत्य अर्थ में इञ् प्रत्यय विकल्प करके होवे । जैसे-याहविः; औपवाहविः इन्यादि ॥ १७२ ।। सुधातुरकङ् च ।। १७३ ।। अ० ४ । १ । ९७ ॥ समयों के प्रथम पष्टीसमर्थ सुधातु प्रातिपदिक से इञ् प्रत्यय विकल्प करके और उसको श्रका आदेश भी हो । जैसे-सुधातुरपत्पं सौधातकिः ॥ २७३ ॥ वा०-व्यासवरुडानियादचण्डालविस्वानामिति वक्तव्यम् ॥१७॥ व्यास, वरुड, निषाद, चण्डाल और विस्त्र प्रातिपदिकों से इञ् प्रत्यय होवे । जैसे- खैणुताड़िते --win- "--.-~ व्यासंस्थापत्यं माणवको. वैयासकिः; वारुडकिः, नैपादकि, चाण्डालकिः; वैम्बकिः* इत्यादि ॥ १७४॥ गोत्रे कुजादिभ्यश्च्फ । ॥ १७५ ॥ अ० ४ । १ । ६८ ॥ यह सूत्र इन का अपवाद है। गोत्रसंज्ञक अपत्य अर्थ में प्रथम प्रकृति कुन आदि प्रातिपदिकों से फञ् प्रत्यय हो । जैसे-कुलस्य गोत्रापत्यं कोजायन्यः, कोना- यन्यो, कोजायनाः; वाध्नायन्यः, नाध्नायन्यो, ब्राध्नायनाः इत्यादि । यहां 'गोत्र' इसलिये कहा है कि-कुञ्जस्यानन्तरापत्यं कौतिः, यहां अनन्तरापत्य में फञ् न हो। गोत्र का अधिकार ( शिवादि०) इस सूत्रपर्यन्त जानना चाहिये ॥१७॥ नडादिभ्यः फक् ॥ १७६ ।। अ० ४ । १ । ६६ ॥ यह सूत्र भी इञ् का अपवाद है। न आदि प्रातिपदिकों से गोत्राऽपत्य अर्थ में फक्-प्रत्यय होवे । जैसे-नडस्य गोत्रापत्यं नाडायनः; चारायणः इत्यादि । यहां भी गोत्र की अनुवृत्ति आने से अनन्तरापत्य में नाडिः, [यहां] फक् नहीं होता, किन्तु इञ् हो जाता है ॥ १७६ ॥ हरितादिभ्योऽनः + ॥ १७७॥ अ० ४ । १ । १०० ।- यह भी सूत्र इञ् का ही अपवाद है, और जो शब्द हरितादिकों में अदन्त न हों उनसे अण का अपयाद समझना चाहिये । जो विदाद्यन्तर्गत अञन्त हरितादि प्रातिपदिक हैं, उनसे युवापत्य अर्थ में फक् प्रत्यय हो । जैसे-हरितस्य युवापत्यं हारितायन:; कैदासायनः इत्यादि ॥ १७७ ।। * इन व्यास श्रादि प्रातिपदिकों से अदन्तों के होने से इन् तो हो जाता, पर अकङ् श्रादेश होने के लिये यह बार्तिक पढ़ा है। यहाँ फन् प्रत्यय में चकार का अनुबन्ध (वातफलो०) इस सूत्र में सम्बन्ध होने के और मकार वृद्धि के लिये है। और इन फल प्रत्ययान्त प्रातिपदिकों से स्वार्थ में ज्य प्रत्यय हो जाता है। उसस्य प्रत्यय की तद्राजसंज्ञा होने से बहुवचन में लुक् हो जाता है ॥ विकल्प, समर्थो का प्रथम इन दो का अधिकार छ. पाद में, और तद्धितसंज्ञा का अधिकार पंचमाध्याय पर्यन्त तथा पष्ठीसमर्थ का अधिकार इसी पाद में जाता है । सो इन सब का प्रतिसूत्र में सम्बन्ध समझना चाहिये, अब वार २ नहीं लिखेंगे । + इस सूत्र में गोत्राऽपत्य की विवक्षा यों नहीं है कि हरितादिकों से प्रथम गोत्रापत्य में श्रम विधान रि दूसरा प्रत्यय गोत्रापत्य में नहीं हो सकता, किन्तु युवापत्य में ही होगा।
अपत्याधिकारः RAJA - यजिजोश्च ।। १७८ ॥ अ० ४ । १ । १०१ ॥ युवापत्य अर्थ में यान्त और इअन्त प्रातिपदिकों से फक् प्रत्यय हो। जैसे-यजन्त- गाय॑स्य युवापत्यं गाायणः; वात्स्यायनः । इअन्त से-दाक्षायणः; प्लाक्षायणः इत्यादि । यह सूत्र यान्त से इञ् का और इनान्त से अण् का बाधक समझना चाहिये ॥१७८|| शरद्वच्छुनकदर्भाद् भृगुवत्सारायणेषु ॥१७६॥ अ० ४।१।१०२॥ जो गोत्रापत्य अर्थ में भृगु, वत्स, आग्रायण ये अपत्य विशेष अर्थ वाच्य हों, तो यथा- संख्य करके शरद्वत् शुनक और दर्भ प्रातिपदिक से फक् प्रत्यय हो । जैसे--शारद्वतायनः, जो भृगु का गोत्र हो, नहीं तो शारद्वतः । शौनकायन:, जो वत्स का गोत्र हो, नहीं तो शौनकः । दार्भायणः, जो अाग्रायण का गोत्र हो, नहीं तो दाभिः । यह भी सूत्र अणू और इन दोनों का अपवाद है ॥ १७६ ॥ द्रोणपर्वतजीवन्तादन्यतरस्याम् ॥ १८० ॥ अ० ४ । १ । १०३ ॥ द्रोण पर्वत और जीवन्त प्रातिपदिक से फक प्रत्यय विकल्प करके होवे । यह सूत्र इञ् का ही अपवाद है। और एक विकल्प चला ही आता है, दूसरा ग्रहण इसलिये है कि-पन में इन प्रत्यय भी हो जावे। और यह अप्राप्त विभाषा समझनी चाहिये । जैसे-द्रोणस्य गोत्रापत्यं द्रोणायनः, द्रौणिः; पार्वतायनः, पार्वतिः; जेवन्तायन:, जैवन्तिः ॥ १८० ॥ अनुष्यानन्तर्ये विदादिभ्यो: * ॥ १८१॥ अ० ४ । १ । १०४॥ गोत्राऽपत्य शर्थ में विद आदि प्रातिपदिकों से अञ् प्रत्यय होवे। जैसे विदस्य गोत्रापत्यं वेदः, और्वः इत्यादि । परन्तु विदादिगण में जो ऋषिवाची से भिन्न पुत्र आदि शब्द पढ़े हैं, उनसे अनन्त- रापत्य अर्थ ही में अञ् प्रत्यय होवे । जैसे-पौत्रा दौहित्रा; नानान्द्रः इत्यादि । यह सूत्र भी इञ् आदि प्रत्ययों का अपवाद है ॥ १८१ ॥ गर्गादिभ्यो यञ् ॥ १८२ ॥ अ० ४ । १ । १०५ ॥ यह सूत्र भी अप आदि प्रत्ययों का ही अपवाद है। * इस प्रकरण में अपत्य तीन प्रकार के समझने चाहिये--प्रर्थात् गोत्रापत्य, युवापत्य और अनरत- रापत्य । इनमें से गोत्रापत्य और युनापत्य का प्राग इसी प्रकरण में व्याख्यान किया है। अनन्तरापत्य पिता की अपेक्षा में पुत्र को कहते हैं कि जिसमें कुछ अन्तर नहीं होता। सो इस विदादिगण में जो प्रपिवाची प्रातिपदिक है, उन्हीं से गोत्रापत्य में हो, अन्य प्रातिपदिकों से अनन्तरापत्य में अन्न होता है।
रणवाद्धिने . गोत्रापत्य अर्थ में गर्ग आदि प्रातिपदिकों से यञ् प्रत्यय हो। जैसे-गायः; वात्स्यः वैयाघ्रपद्यः इत्यादि ॥ १२॥ मधुवन्नोर्ब्राह्मणकौशिकयोः ॥ १८३॥ अ० ४ । १ । १०६॥ ब्राह्मण और कौशिक गोत्रापत्य अर्य बाच्य हों, तो मधु और बभ्रु प्रातिपदिकों से यम् प्रत्यय हो। जैले-मधोगोंत्रापत्यं माधयः; जो ब्राह्मण होदे, नहीं तो माधवः । व्याभ्रव्यः, जो कौशिक होवे, नहीं तो बाभ्रवः ॥ १८३ ।। कपिबोधादागिरले ।। १८४ ॥ अ० ४ । १ । १०७ ।। आङ्गिरस गोत्रापत्य विशेष अर्थ में कपि और बोध प्रातिपदिक से यञ् प्रत्यय होवे । जैले-कगोत्रापत्यं काप्यः; वोध्या, जो अङ्गिरा का गोत्र होवे ! नहीं तो कापेयः; बाँधिः, यहां ढक् और इञ् प्रत्यय हो जाते हैं। और इन्हीं दोनों का यह अपवाद भी है ॥ १८ ॥ वतण्डाच ॥ १८५ ॥ अ० ४ । १ । १०८ ॥ श्रागिरस गोत्रापत्य विशेष अर्थ में बतण्ड प्रातिपदिक ले यञ् प्रत्यय हो । जैसे- पतएडस्य गोत्रापत्यं बातएड्या, यहां भी जो अङ्गिरा का गोत्र हो । नहीं तो वारडा, यहाँ अए हो जाता है। और अल् का ही अपवाद यह सूत्र भी है ॥ २८५ ॥ लुक् स्त्रियाम् ।। १८६ ॥ अ० १ । १ । १०६ ॥ जहां प्रागिरसी स्त्रीवाच्य रहे, वहां वतण्ड शब्द ले विहित यञ् प्रत्यय का लुक् होवे । जब लुक हो जाता है, तर शाईरवादिगण में पढ़ने से जीन् प्रत्यय हो जाता है। जैसे-बतरडी, जो अङ्गिरा के गोत्र की स्त्री होवे । नहीं तो वातरख्यायनी - यहां प्फ प्रत्यय हो जाता है।॥ १८६॥ अश्वादिभ्यः फञ् ॥ १८७ ॥ अ० ४ । १ । ११० ॥ यह सुत्र श्रण और इञ् का ही वाधक है। * यह सूत्र अए का अपबाद है . और चत्रु शन्द गर्गादि के अन्तर्गत लोहितादिकों में पढ़ा है, वहां पड़ने से इससे बालिग में फ प्रत्यय हो जाता है। जैसे-दानन्यायणी । और इस सूत्र में इस रनु शब्द का पाठ नियनार्य है कि कौशिक गोत्र में ही यज् प्रत्यय हो, अन्यत्र नहीं । - यह वतण्ड शब्द गर्गादि के अन्तर्गत लोहिताहिकों में पढ़ा है, इस बार इससे श्रीगोत्र में रफ सत्यप होके यह प्रयोग होता है। और वरद शब्द शिवादिगण में भी पड़ा है, इससे स्त्रीलिङ्ग में दातरी मी प्रयोग होता है ।। -- अपत्याविकारः Pu-ma- - - गोवाऽपल्ल अर्थ में अन्न आदि प्रातिपदिकों ले फन् प्रत्यय हो। जैसे-अश्वस्य गोत्रायत्यम् आश्वायना; आश्मायनः; शांखायनः इत्यादि ।। २८७ ॥ सात् गर्ने ।। १८८ ॥ अ० ४ । १ । १११ ॥ यह केवल इञ् का ही अपवाद है। मन प्रातिपदिक से गोवापत्य गर्च अर्थ में कम् प्रत्यय हो । जेह-मर्गस्य गोत्रापत्यं भाईयणः, जो त्रिगर्त का गोत्र हो। नहीं तो मानिः [यहां ] इञ् प्रत्यय हो जाये !! १८ ॥ शिवादिभ्योऽण् ।। १८६ ।। अ० ४ ! १ । ११२ ।। यहां ले गोत्र की निवृति होगई। अब सामान्याऽपत्य में प्रत्ययविधान करेंगे । यह सूत्र इज् धादि का अपवाद यथायोग्य समझना चाहिये। अपत्य अर्थ में शिव आदि प्रातिपदिकों से अप प्रत्यय होवे । जैसे-शिवस्य गोत्रा- पत्यं शैवः प्रोष्ट, प्रोष्टिका इत्यादि ।। १८६ ॥ अवृद्धाभ्यो नदीमानुपीभ्यस्तन्नामिनाभ्यः॥१६०॥ अ०४।१।११३॥ यह सूत्र दुक प्रत्यय का अपवाद है। अपत्य अर्थ में अवृद्ध नदी मानुवाचक तन्नामक प्रातिपदिक्षों से अङ्ग प्रत्यय होवे। जैसे-यमुनाया अपत्यं यामुना; इरावत्या अपत्यम् ऐरावतः; वैतस्ता नार्मदः इत्यादि । यहां 'वृद्ध से निपे, इसलि है कि- चान्द्रभाग्याया अपत्यं चान्द्रभागेयः; वासव- दत्यः, इत्यादि में अप न हुआ । 'नदी मानुपी' इसलिये कहा है कि-सौपर्णयः; वैनतेया. यहां अग्न होवे । और 'तन्नामिका ग्रहण इसलिये है कि - शोभनाया अपत्यं शोभनया, यहां भी न हो ॥ १६० ॥ अप्यन्धकवृष्णिकुरुभ्यश्च ।। १६१ ॥ अ० ४ । १ । ११४ ॥ यह सूत्र इञ् का अपवाद है। अपत्य अर्थ में ऋषियाची वसिष्ट आदि तथा अन्धक वृष्णि कुरुवंशबाची प्रातिपदिको ले अण् प्रत्यय हो । * तनन शब्द शिवादिगण में पढ़ा है. टससे ( उदीचामिन ) इस श्रागानी सूत्र से टत्तरदेशीय थाचार्यों के मन में इन प्राप्त ई, टसका बाधक होने के लिये । परन्तु एय प्रत्यय का बाधक नहीं होता। ताचा ताइएयः ! और गहा शब्द इस गण में पढ़ा है, यहां उससे अण, तिकादि होने से किन और शुनादिगण में पढ़ने से डक् प्रत्य हो जाते हैं । इस प्रकार तीन प्रयोग होते हैं। जैसे- गार गानायनिः; नान्यः । तथा विधाया शब्द यहां और कुन्जादिगए में भी पढ़ा है, इससे उसके दो प्रयोग हुने हैं। जैसे-वैपाशः चपाशायन्यः ।। ।
३८ स्त्रैणताद्धिते -----------rrr- --------- जैसे-[ ऋपिः- वसिष्ठस्याऽपत्यं वासिष्ठः; वैश्वामित्रः । अन्धका-श्वाफल्का; रान्धसः । वृष्णिः-वासुदेवः; आनिरुद्धः । कुरुः-नाकुलः; साहदेवः * इत्यादि ॥१६॥ मातुरुसंख्यासम्भद्रपूर्वायाः ॥ १६२ ।। अ०४ । १ । ११५ ॥ इस मा प्रातिपदिक से पण तो प्राप्त ही है, उकारादेश होने के लिये यह सूत्र है। अपत्य अर्थ में संख्या, सम् और भद्रपूर्वक मातृशब्द को उत् आदेश और अण् प्रत्यय भी हो । जैसे-द्वयोर्मात्रोरपत्यं द्वैमातुरः त्रैमातुरः; पारमानुरः; साम्मातुरः; माद्रमातुरः ! यहां 'संख्या आदि का ग्रहण इसलिये है कि सौमात्रः, यहां केवल अण् ही हुआ है॥१२॥ कन्यायाः कनीन च ॥ १६३ ॥ अ० ४ । १ । ११६ ।। यह सूत्र ढक का अपवाद है। अपत्य अर्थ में कन्या शब्द से पण प्रत्यय और उसको कनीन आदेश भी होवे । जैसे-कन्याया अपत्यं कानीनः ॥ १३ ॥ विकर्णशुङ्गच्छगलाद्वत्सभरद्वाजाऽत्रिषु ॥१६४॥ अ०४।१।११७॥ यह सूत्र इभ का अपवाद है। यथासंख्य करके वत्स भरद्वाज और अत्रि अपत्य वाच्य हों, तो विकर्ण शुङ्ग और छगल प्रातिपदिक से ऋण प्रत्यय हो। । जैसे-विकर्णस्थापत्यं वै कर्ण, जो वत्स का गोत्र हो, नहीं तो वैकणिः । शोङ्गः, जो भरद्वाल का गोत्र हो, नहीं तो शोङ्गिः छागलः, जो भ्रात्रेय गोत्र हो, नहीं तो छागलिः। यहां सर्वत्र पक्ष में इन प्रत्यय होता है ॥ १६४ ॥ पीलाया वा ॥ १६५ ॥ अ०४ । १ । ११८ ॥ द्वयच् पीला प्रातिपदिक से ढक प्रात है, उसका यह अपवाद है। और पक्ष में दक भी होता है। और इसको अप्राप्त विभाषा समझना चाहिये, क्योंकि अरा किसी से प्राप्त नहीं है। अपत्य अर्थ में पीला प्रातिपदिक से अण् प्रत्यय होवे । जैसे - पीलाया अपत्यं पैलः; पक्ष में ढक्म्पैलेयः ॥ १५ ॥ * यहां संशय होता है कि शब्द तो सब नित्य हैं, फिर अन्धक प्रादि वंशों के प्राश्रय से इनका व्याख्यान कैसे बन सकता है, क्योंकि वंश तो अनिल है । ( उत्तर ) प्रवाहरूप से करपकल्पान्त सृष्टि भी नित्य है, और अन्धक श्रादि अधिकारी शब्द है कि इस प्रकार के कुल का नाम अन्धक होना चाहिये, सो अन्धक धादि वंश प्रतिकरूप में अनादि चले पाते हैं । इस प्रकार इन अन्धक प्रादि शब्दों का वंशों के साथ अनादि सम्बन्ध बना हुआ है, कमी नवीन नहीं हुआ ! विमातृ शब्द शुभ्रादिगण में पढ़ा है, उससे वैमात्रेयः, यह भी प्रयोग होता है । के विचार यह है कि कन्या विसका विवाह न हो उसको कहते हैं, उसका अपत्य कैसे हो सकता है।.महाभाष्य में इसका समाधान किया है कि जो विवाह होने से प्रथम ही प्रमत्त होकर किसी पुरुष के साथ व्यभिचार से गर्भवती हो जावे, उसका जो पुत्र हो उसको 'कानीन' कहना चाहिये । . - ।
अपत्याधिकारः ३६ . ढक् च मण्डूकात् ।। १६६ ॥ अ० ४ । १ । ११६ ॥ यह सूत्र इत्र का अपवाद है। अपत्य अर्थ में मण्डूक प्रातिपादिक से ढक् प्रत्यय हो, और चकार से अण्ण विकल्प करके होचे, पक्ष में इन भी हो जावे । जैसे-मण्डूक- स्याऽपत्यं माण्डूकेयः, माण्डूकः, माण्डूकिः ॥ १६ ॥ स्त्रीभ्यो ढक् ॥ १६७ ॥ अ० ४ । १ । १२० ॥ यह सूत्र अण् और उसके अपवादों का भी अपवाद है। अपत्य अर्थ में टावादि स्त्रीप्रत्ययान्त प्रातिपदिकों से ढक प्रत्यय विकल्प करके होवे ॥ १७ ॥ आयनेयीनीयियः फढखछघां प्रत्ययादीनाम् ॥११९॥ अ०७।१।२॥ जो प्रत्यय के आदि फ द ख छ और व हैं, उनके स्थान में यथासंख्य करके आयन्, पय्, ईन्. ईय् और इय् आदेश हो । जैसे-फ-नाडायना; ढ-सौपर्णेयः, वैनतेयः; स्त्र- कुलीनः; छ-शालीयः, पैतृष्वन्नीयः; श-शुक्रियम् इत्यादि ॥ १६ ॥ वा०-बडवाया वृषे वाच्य ॥ १६ ॥ वडवा प्रातिपदिक से बैल अपत्य वाच्य हो, तो दक् प्रत्यय होवे । जैसे-बडवाया अपत्यं वृपो वाडवेयः ॥ १६ ॥ वा०-अण् क्रुञ्चाकोकिलात्स्मृतः ॥ २०० ।। मामान्यापत्य में कुञ्चा और कोकिला शब्द से ढक का बाधक अप प्रत्यय होवे । जैसे-क्रुञ्चाया अपत्यं कोञ्चः; कोकिलाया अपत्यं कोकिलः ॥ २०० ॥ द्वयचः ।। २०१ ।। १० । १ । १२१ ॥ नदी और मानुषीवात्री जो ले अण् प्रत्यय प्राप्त है, उसका यह अपवाद है। अपत्यार्थ में टावादि स्त्रीप्रत्ययान्त द्वयच् प्रातिपदिक से ढक प्रत्यय होवे । जैसे- दत्ताया अपत्यं दात्यः: गौपेयः इत्यादि। यहां 'द्वय ग्रहण इसलिये है कि-यमुनाया अपत्यं यामुना, यहांढक न होवे ॥२०॥ - यद्यपि बढ़वा शब्द घोड़ी का मी वाचक है, तथापि यहां वड़वा शब्द से यजिष्ट गो का प्रय होता है, क्योंकि वड़वा शब्द केवल घोड़ी का ही वाचक नहीं, किन्तु ब्राझणी अश्वा कुंमदासी तथा अन्य भी श्रीजाति का नाम है। तया. रोरवो नरके घोर वदवा द्विजयोपिति । अश्वायां कुम्मदात्यां च नारीजात्यन्तरेपि च ॥ इति भाष्यप्रदीपकार रियाः ॥ वृष शब्द से वीर्यवान् अश्व का ग्रहण मी करते हैं । जैसे-वृपो वीजावाः । तेन चान विशेष. विहितेनापन्यन्ननोऽर्थो टको वाध्यते । तेनापते वाढव इति भवति । उस पत्र में वड़वा शब्द से थोड़ी का ग्रहण कर वृप शब्द से पूर्वोक्त प्रकार अश्व अपन्य समन्ना चाहिये ।। - - खैणताड़िते इतश्चालिञः ॥ २०२ ॥ अ० ४ । १ । १२२ ॥ यह सूत्र सामान्य अण् का अपवाद है। अपत्यार्य में इञ् प्रत्ययान्तभिन्न इकारान्त प्रातिपदिक से ढक् प्रत्यय होवे। जैसे-~मरपत्यं प्रायः नेधेयः वार्णयः; कापेयः इत्यादि। यहां 'इकारान्त इसलिये कहा है कि दाक्षिः; लाक्षिः । 'इभिन्न इसलिये कहा है कि- दाक्षायण; लातायणः, यहां इअन्त से ढक न होवे । और 'दव्यच्की अनुवृत्ति इसलिये है कि मरीचेरपल्यं मारीचः, यहां ढक को बाध के अप हो जावे ॥ २०२॥ शुभ्रादिभ्यश्च ॐ ॥ २०३ ।। अ० ४ । १ । १२३ ।। यह सूत्र इञ् आदि का यथायोग्य अपवाद समझना चाहिये। अपत्यार्थ में शुभ्र आदि प्रातिपदिकों से दक् प्रत्यय होवे । जैसे-शुभ्रस्यापत्यं शोभ्रेया; वैटपुरेयः इत्यादि । २०३ ॥ विकर्णपीतकात् काश्यपे ॥ २०४ ॥ अ० ४ । १ । १२४ ॥ यह सूत्र इत्र का अपवाद है। [काश्यप ] अपत्य अर्थ में विकर्ण और कुपीतक प्रातिपदिको से ढक प्रत्यय हो । जैसे-विकर्णस्यापत्यं वैकणेयः; कॉपीतत्तयः । यहां 'काश्यप ग्रहण इसलिये है कि-वैकर्णिः; कौषीतकिः, यहांढक न होवे ॥२०४॥ भ्रुवो वुक् च ॥ २०५ ।। अ० ४ । १ । १२५ ॥ यह अण् का अपवाद है। अपत्य अर्थ में भ्रू प्रातिपदिक से ढक् प्रत्यय और इस को बुक का आगम भी हो । जैले-भ्रुवोऽपत्यं भ्रीवेयः ॥ २०५ ॥ कल्याण्यादीनामिनङ् च ॥ २०६ ॥ अ० ४ । १ । १२६ ॥ अपत्यार्थ में कल्याणी आदि प्रातिपदिकों से डक् प्रत्यय और इनको इन आदेश भी होवे। जैले~कल्याण्या अपत्यं काल्यागिनेयः ज्येष्टिनेयः; कानिष्टिनेयः४ इत्यादि ॥२०६|| हृद्भगसिंध्वन्ते पूर्वपदस्य च ॥ २०७ ॥ अ०७१३ । १६ ॥ जो त्रित् णित् और कित् तद्धित प्रत्यय परे हों, तो हृद भरा और सिन्धु जिनके अन्त हों, उन प्रातिपदिकों के पूर्व और उत्तर पदों में अचों के श्रादि अन् को वृद्धि होवे । * इस चकार से इस शुभ्रादिगण को प्राकृतिगण समझना चाहिये, कि जिससे गायः) पाररवेयः, इत्यादि धपडित शब्दों में भी तक प्रत्यय हो नावे !! ४ यहां नीलिङ्ग प्रातिपदिकों से ढक प्रत्यय तो हो ही जाता, फिर यह उन इनछ थाईश होने । के लिये है।
अपत्याधिकारः जैसे-सुभगाया अपत्यं सौभागिनेयः; दो गिनेयः; सौहार्दम्: दोहर्दिम्; साक्तुसैन्धवः इत्यादि ॥ २०७ ॥ कुलटाया वा ।। २०८ ।। अ०४ । १ । १२७ ।। यहां इन आदेश की अनुवृत्ति चली आती है। अपत्यार्य में कुलटा प्रातिपदिक ले ढक् प्रत्यय और इसको [विकल्प ले] इन आदेश होवे । जैसे-कुलटाया अपत्यं कोलटिनेयः, कोलटेयः ॥ २० ॥ चटकाया ऐरक् ।। २०६ ॥ अ०४ । १ । १२८ ।। यह सूत्र ढक का अपवाद है। अपत्य अर्थ में चटका शब्द से ऐरक् प्रत्यय हो। जैसे-चटकाया अपत्ये चाटकरः ॥ २० ॥ वा०-चटकाच्च ॥ २१० ॥ यह वार्तिक इन का अपवाद है। चटक प्रातिपदिक से ऐरक प्रत्यय होवे । जैसे-चटकस्याऽपत्यं चाटकरः ॥ २१० ॥ वा०-स्त्रियामपत्ये लुक् ॥ २११ ॥ स्त्री अपत्य होवे तो ऐरक प्रत्यय का लुक हो जावे। जैसे-चटकाया अपत्यं ली चटका ॥ २११॥ गोधाया दूकू ॥ २१२ ।। अ० ४ । १ । १२६ ॥ यह भी ढक का अपवाद है । अपत्य अर्थ में गोधा प्रातिपदिक से दक् प्रत्यय होवे । जैसे-गोधाया अपत्यं गौधेरः । शुभ्रादिग में गोधा शब्द पढ़ा है, इस कारण गौधेयः, यह भी प्रयोग होजाता ॥२१२॥ आरगुदीचाम् ॥ २१३ ॥ अ० ४ । १ । १३० ॥ गोधा की अनुवृत्ति आती है। अपत्य अर्थ में गोधा प्रातिपदिक से प्रारक प्रत्यय होवे, उत्तरदेशीय प्राचार्यों के मत में जैसे-गोधाया अपत्यं गोधारः * ॥ २१३ ॥ क्षुद्राभ्यो वा + ॥२१४ ॥ अ०४ । १ । १३१ ।। यह भी ढक का अपवाद है । और पूर्वसूत्र से दुक् की अनुवृत्ति अाती है। अपत्य अर्थ में चुद्रा आदि प्रातिपदिकों से दूक प्रत्यय होवे, पक्ष में ढक हो । जैसे-काणेरः, काणेयः; दालेरः, दासेयः इत्यादि ॥ २१४ ॥ * रक् प्रत्यय के कहने से गोधारः प्रयोग बन ही जाता, फिर भाकारग्रहण से यह ज्ञापक होता है कि अन्य प्रातिपदिकों से भी 'बार' प्रत्यय होता है । जैसे-जाडार; पारदारः इत्यादि ।। + मुद्रा टन स्त्रियों को कहते है जो अब्दों से, धर्म से और अच्छे स्वभाव से रहित होवें ॥ . । ६ णताड़िते +-~- पितृष्वसुश्छण् ॥ २१५ ॥ १० ४ । १ । १३२ ॥ यह सूत्र अण् प्रत्यय का बाधक है। अपत्य अर्थ में पितृष्वस प्रातिपदिक से छण प्रत्यय होवे । जैसे-पितृष्वसुरपत्यं पैतृष्वस्नीयः ॥ २१५ ।। ढकि लोपः ॥ २१६ ॥ अ० ४ । १ । १३३ ॥ अपत्य अर्थ में जो ढक प्रत्यय पर हो, तो पितृवस शब्द के अन्त का लोप होवे । जैसे-पैतृष्वसेयः * ॥ २१६ ॥ * मातृष्वसुश्च ॥ २१७ ॥ अ०४ । १ । १३४ ॥ यह भी अप का अपवाद है। अपत्य अर्थ में मातृष्वस शब्द से छण् प्रत्यय और ढक के परे मातृष्वस शब्द के अन्त का लोप भी होवे । जैसे--मातृष्वसुरपत्यं मातृवत्रीयः, मातृष्वसेयः ॥ २१७ ।। चतुष्पाद्भ्यो ढञ् ॥ २१८ ॥ अ० ४ । १ । १३५ ॥ यह अरण आदि का अपवाद है। अपत्यार्थ में चतुष्पावाची प्रातिपदिकों से ढञ् प्रत्यय होवे । जैसे-कामण्डलेयः; शौन्तिवाहेयः; यामेयः; माहिषयः; शोरभेयः इत्यादि ॥ २१८ ॥ गृष्ट्यादिभ्यश्च ॥ २१६ ॥ अ० ४ । १ १ १३६ ॥ यह सूत्र केवल अण् का ही अपवाद है। अपत्य अर्थ में गृष्टि आदि प्रातिपदिकों से ढञ् प्रत्यय होवे । जैले-गृष्ट्या अपत्यं गायः; हायः; हालेयः; वालेयः; वैश्रेयः इत्यादि ॥ १६ ॥ राजश्वशुराद्यत् ॥ २२० ।। अ० ४।१।१३७ ।। यह अण और इन दोनों का बाधक है। अपत्यार्थ में राजन् और श्वशुर प्राति- पदिकों से यत् प्रत्यय हो । जैसे-राज्ञोऽपत्यं राजन्यः: श्वशुर्यः ॥ २२० । वा०-राज्ञोऽपत्ये जातिग्रहणम् ।। २२१ ॥ सूत्र में जो राजन् शब्द से यत् कहा है, सो जातिवाची राजन् शब्द का ग्रहण समझना चाहिये । जैसे-राजन्यः, जो क्षत्रिय होवे, नहीं तो राजनः ।। २२१ ।। * यहां दक् प्रत्यय के परे जो लोप कहा है, सो इली झापक से पितृप्वर शब्द से ढक प्रत्यय होता॥
अपत्याधिकारः '४३ --- ----- --- --------- - क्षत्राद्घः ।। २२२ ॥ अ० ४ । १ ।१३८ ॥ ॥ । १३८ यह सूत्र इञ. का बाधक है। अपत्यार्थ में क्षत्र प्रातिपदिक से व प्रत्यय होवे । जैसे क्षत्रियः, यहां भी जाति ही समझनी चाहिये, क्योंकि जहां जाति न हो.वहां क्षात्रिः, इञन्त प्रयोग होवे ॥ २२२ ।। - कुलात् खः ।। २२३ ॥ अ० ४ । १ । १३६ ॥ यह भी इन काही अपवाद है। अपत्य अर्थ में कुल शब्द से ख प्रत्यय हो। उत्तर- सूत्र में अपूर्वपद ग्रहण करने से इस सूत्र में पूर्वपदसहित और केवल का भी ग्रहण होता है । जैसे:-श्रोत्रियकुलीनः, श्राढयकुलीनः; कुलीनः इत्यादि ॥ २२३ ॥ अपूर्वपदादन्यतरस्यां यड्ढको छ ।॥२२४॥ अ० ४ ॥ १ ॥ १४० ॥ अपत्यार्थ में पूर्वपदरहित कुल शब्द से यत् और ढकञ् प्रत्यय विकल्प करके होवें। जेले-कुल्यः; कॉलेयकः; कुलीनः । यहां 'पद ग्रहण इसलिये है कि वहुन् पूर्वपद हो तो भी स्त्र प्रत्यय होजावे । जैसे- बहुकुल्या, बहुकोलेयकः, बहुकुलीनः ॥ २२४ ।। महाकुलादखनौ ।। २२५ ।। अ० ४ । १ । १४१ ।। यहां विकल्प की अनुवृत्ति आती है। अपत्यार्थ में महाकुल प्रातिपदिक ले अञ् और खञ् प्रत्यय विकल्प करके होवें, पक्ष में न होवे । जैसे-माहाकुलः: माहाकुलीनः; महाकुलीनः ॥ २२५ ॥ दुष्कुलाइ इक् ॥ २२६ ॥ अ० ४ । १ । १४२ ।। अपत्यार्थ में दुष्कुल शब्द से ढक. प्रत्यय विकल्प करके हो, पक्ष में स्त्र हो जावे । जैसे-दीप्कुलेयः; दुष्कुलीनः ॥ २२६ ॥ स्वसुश्छः ॥ २२७ ॥ अ० ४ । १ । १४३ ॥ अपत्य अर्थ में स्वस् प्रातिपदिक से छ प्रत्यय हो । जैसे-स्वसुरपत्यं स्वस्रीयः । यह श्रण का बाधक है ॥ २२७ ।। . भ्रातुर्व्यच्च ॥ २२८ ॥ अ० ४ । १ । १४४ ॥ यह सूत्र भी अग् का अपवाद है । अपत्यार्थ में भ्रातृ शब्द से व्यत्, और चकार से - प्रत्यय भी होवे । जैसे-भ्रातृव्यः; भ्राीयः ! २२८ ।। * गह अप्राप्तविमापा इसलिये है कि कुल शन्द से यत् और दका प्रत्यय किसी से प्राप्त नहीं है । .. .
वैणताद्धिते व्यन् सपत्ते * ॥ २२६ ॥ अ० ४ । १ । १४५ ॥ सपत्न अर्थात् शत्रु पाच्य हो, तो भ्रातृ प्रातिपदिक से व्यन् प्रत्यय हो। जैसे- पाप्मना भ्रातृव्येण; भ्रातृव्यः कण्टकः ॥ २२६ ॥ रेवत्यादिभ्यष्ठक् ।। २३० ॥ अ० ४ । १ । १४६ ।।, यह सूत्र ढक् आदि का अपवाद है । अपत्यार्थ में रेवती आदि प्रातिपदिकों से ठक् प्रत्यय हो। जैसे-रेवत्या अपत्यं रैवतिक, श्राश्वपालिकः;माणिपालिकः इत्यादि ॥२३०॥ . , . 4 गोत्रस्त्रियाः कुत्सने ण च ॥ २३१ ॥ अ० ४ । १ । १४७ ॥ यह ढक का अपवाद है। निन्दित युवापत्य अर्थ में गोत्रसंशक स्त्रीवाची प्राति- पदिक से ण, और चकार से ठक् प्रत्यय होवे । जैसे-गार्या अपत्यं जाल्मो गार्यः, गार्गिकः; ग्लुचुकायन्या अपत्यं ग्लौचुकायनः, ग्लौचुकायनिकः। यहां 'गोत्र' ग्रहण इसलिये है कि-कारिकेयो जाल्मः, यहां कारिका शब्द गोत्र- प्रत्ययान्त नहीं है। 'स्त्रीवाची' इसलिये है कि-औपगविर्जाल्मः, यहां न होवे । 'कुत्सन' इसलिये है कि-गार्गेयो माणवकः, यहां निन्दा के न होने से उत्सर्ग ढक हो गया, किन्तु ण और ठक नहीं हुए ॥ २३१ ॥ वृद्धाहक् सौवीरेषु बहुलम् ॥ २३२ ॥ अ० ४ । १ । १४८ ॥ यहां कुत्सन पद की अनुवृत्ति आती है। अपत्य और कुत्सन अर्थ में वृद्धसंशक सौवीर गोत्रवाची प्रातिपदिक से ठक् प्रत्यय बहुल करके हो । जैसे-भागवित्तेर्युचापत्यं भागवित्तिकः; तार्णविन्दवस्य युवापत्यं तार्णविन्ददिकः । पक्ष जाते हैं - भागवित्तायना, तार्णविन्दविः । यहां 'वृद्ध' ग्रहण स्त्री की निवृत्ति के लिये है। 'सौधीर' ग्रहण इसलिये है कि आँपगविः, यहां न होवे। मोर 'कुत्सन' की अनुवृत्ति इसलिये है कि-भागवितायनो माणवकः, यहां भी ठक न होवे ॥ २३२ ॥ में फक और इज हो फेश्छ च ॥ २३३ ॥ अ० ४ । १ । १४६ ॥ कुत्सन और सोधीर पदों की अनुवृत्ति श्राती है। अपत्यार्थ में फिअन्त सौपीर गोत्रधाची प्रातिपदिक से छ और चकार से ठक् प्रत्यय भी होवे । जैसे-यामुन्दायनीयः, यामुन्दायनिकः । * यहां अपत्यार्य की विषक्षा नहीं है, क्योंकि भ्राता का पुत्र शत्रु नहीं हो सकता, और इसी कारण मात सम्म का प्रत्ययं यहां प्रधान नहीं रहता है, किन्तु प्रत्ययार्थ जो शत्रु है, पही प्रधान रहता है । १ अपत्याधिकारः यहां 'कुत्सन' ब्रहण इसलिये है कि-यामुन्दायनिः, यहां अप का लुक हो गया है। 'सौवीर' इसलिये है कि-तैकायनिः, यहां च न होवे ॥ २३३ ॥ फाण्टाहृतिमिमताभ्यां णफिी ॥२३४|| अ०४।१ । १५० ।। सौवीर पद की अनुवृत्ति यहां आती है, और कुत्तन पद की निवृत्ति हुई । और यह स्त्र फक् प्रत्यय का अपवाद है। अपत्य अर्थ में सौवीर गोत्रवानी फाण्टाहति और मिमत प्रातिपदिकोंसे गौरफिञ् प्रत्यय होवे । जैसे-फारटाहतेरपत्यं फाण्टाहृतः, फाण्टाहतायनिः; मैमतः, मैमतायनिः । यहां 'सौवीर का ग्रहण इसलिये है कि-फाएटाहतायना मैमतायना, यहां रण और पिञ् न हुए !, २३४ ॥ कुर्वादिभ्यो एयः ।। २३५ ॥ अ० ४ । १ । १५१ ।। यह भी इञ् आदि का बाधक यथायोग्य समझना चाहिये। अपत्यार्य में कुरु श्रादि प्रातिपदिकों से रय प्रत्यय हो । जैसे-कुरोरपत्यं कॉरख्या गार्यः; माङ्गष्यः; श्राजमारक्यः इत्यादि ॥ २३५ ॥ सेनान्तलक्षणकारिभ्यश्च ।। २३६ ॥ अ० ४ । १ । १५२ ॥ यह सूत्र इञ् का अपवाद है। अपत्यार्थ में सेनान्त लक्षण और कारि अर्थात् कुंभार प्रादि कारीगरवाची प्रातिपदिकों से ग्य प्रत्यय होवे । जैसे-सेनान्त-भीमसेन- स्यापत्यं भैमलेन्यः कारिपेण्यः: हारिषेण्यः; वैष्वक्सेन्यः; श्रोग्रसेन्यः इत्यादि । लक्षण- लादण्यः । कारि-तान्तुबाय्याः कौम्भकार्यः इत्यादि ॥ २३६ ॥ उदीचामिञ् ॥ २३७ ॥ अ० १ । १ । १५३ ॥ यहां लेनान्त आदि की अनुवृत्ति आती है। अपत्यार्य में उत्तरदेशीय प्राचार्यों के मत में सेनान्त लक्षण और कारिवाची प्राति- पदिकों से इञ् प्रत्यय होवे। जैसे-भीमसेनस्थापत्यं भैमसनिः; हारिपेरिणः; लाक्षणिः; तान्तुवायिः; कौम्भकारिः; नापितिः इत्यादि ॥ २३७ ॥ तिकादिभ्यः फिञ् ॥ २३८ ॥ अ० ४ । १ । १५४ ॥ यह भी यथायोग्य इञ् आदि का याधक है। अपत्यार्थ में तिक आदि प्रातिपदिकों से फिञ् प्रत्यय होवे। जैसे-तिकस्यापत्यं तैकायलिः केतवायनिः; सहायनिः इत्यादि ॥ २३ ॥ * यपि कुरवाची होने से भीमसेन शब्द से अय प्राप्त है, तो भी परविप्रतिपेघ से एप ही होता है ।।
४६ स्त्रैणताद्धिते - .. कौसल्यकासाभ्यां च ॥ २३६ ॥ अ० ४ । १ । १५५ ॥ यह यज प्रत्यय का चाधक है। अपत्यार्थ में कौसल्य और कार्मार्य शब्दों से फिञ् प्रत्यय हो । जैसे:-कौसल्यस्यांपत्यं कौसल्यायनिः; कार्याियणिः ॥ २३६ ॥ वा०-फिप्रकरणे दगुकोसलकारच्छागवृषाणां युट् च ।।२४०।। फिञ् प्रकरण में दगु कोसल कर्मार छाग और वृष प्रातिपदिकों से फिन प्रत्यय और प्रत्यय को युट का आगम होवे । जैसे-दागव्यायनि:, कौसल्यायनिः; कार्मार्यायणिः; ; छाग्यायनिः, चाव्यरिणः ॥ २४० ॥ अणो व्यचः ॥ २४१ ॥ अ० ४ । १ । १५६ ।। यह सूत्र इञ् प्रत्यय का अपवाद है। अपत्यार्थ में अन्त दुव्यच् प्रातिपदिक से फिञ् प्रत्यय हो । जैसे-कात्रस्यापत्यं का यणिः; हायणिः; यास्कायनिः इत्यादि । यहां 'अणन्त' इसलिये है कि-दाक्षायणः, यहां न हो। और 'व्यच्' इसलिये कहा है कि-औपगविः, यहां भी फित्र न होवे.॥ २४१ ॥ वा०-त्यदादीनां वा फिञ् वक्तव्यः * ॥ २४२ ॥ अपत्य अर्थ में त्यदादि प्रातिपदिकों से फिञ् प्रत्यय विकल्प करके होवे । जैस- त्यादायनिः, त्यादः; यादायनिः, यादः; तादायनिः, तादः इत्यादि ॥ २४२ ।। उदीचां वृद्धादगोत्रात् ।। २४३ ॥ अ० ४ । १ । १५७ ।। यह भी इन आदि का वाधक है। अपत्यार्थ में गोत्रभिन्न वृद्धसंज्ञक प्रातिपदिक उत्तरदेशीय प्राचार्यों के मत में फित्र प्रत्यय होवे। जैसे-आम्रगुप्तस्यापत्यं अान- गुप्तायनिः; शालगुप्तायनिः; ग्रामरक्षायणिः; नापितायनिः इत्यादि । यहां 'उत्तरदेशीय प्राचार्यों का मत इसलिये कहा है कि-आम्रगुप्तिः, यहां फिज न होवे । 'वृद्ध संज्ञक' इसलिये है कि-याचदत्तिः, यहां भी न हो। और गोत्र का निषेध' इसलिये है कि-श्रोपगविः, यहां भी न होवे ।। २४३! वाकिनादीनां कुक् च ॥ २४४ ॥ अ० ४ । १ । १५८ ।। उत्तरदेशीय प्राचार्यों के मत में अपत्य अर्थ में वाकिन आदि प्रातिपदिकों से फिञ् प्रत्यय, और इनको कुक् का श्रागम भी होवे । जैसे-वाकिनस्यापत्यं वाकिनकायनि:, पक्ष में वाकिनिः; गारेधकायनिः, गारेधिः इत्यादि। और इन दोनों का अपवाद है ॥ २४ ॥ * यह वार्तिक श्रण प्रत्यय का वाधक है । और इसमें अप्राप्तविभाषा है, क्योंकि फिन किसी सूत्र वार्तिक से प्राप्त नहीं । फिन के विकल्प से पक्ष में ऋण भी हो जाता है । यह श्रण .
अपत्याधिकारः ----- - पुत्रान्तादन्यतरस्याम् ।। २४५ ॥ अ० ४ । १ । १५६ ।। यह अण् का अपवाद और इसमें अप्रातविभाषा है। उत्तरदेशीय प्राचार्यों के मत में पुत्रान्त प्रातिपदिक ले फिन, प्रत्यय और इनको कुक का आगम विकल्प करके होवे । जैसे-गार्गीपुत्रत्यापत्यं गार्गीपुत्रकायणिः, गार्गी- पुत्रायणिः, गार्गीपुत्रिवान्सीपुत्रकायरिणः वासीपुत्रायणिः, वासीपुत्रिः इत्यादि ॥२४५॥ प्राचामवृद्धात् फिन् बहुलम् ॥ २४६ ॥ अ० ४ । १ । १६० ।। अपत्यार्य और प्राचीन प्राचार्यों के मन में वृद्धसंज्ञारहित प्रातिपदिक से फिन् प्रत्यय बहुत करके हो जावे । जैले ग्लुचुकत्सापत्यं ग्लुचुकायनिः; अहिचुम्बकायनिः । यहां 'प्राचीनों का ग्रहण इसलिये है कि-ग्लोचुकिः, आहिचुम्बकिः, यहां इञ् हो जाता है। और 'बुद्ध का निषेध इसलिये किया है कि-राजदन्तिः, यहां फिन् न होवे !! २१६॥ मनोर्जातावश्यतौ पुक् च ॥ २४७ ॥ अ० ४ । १ । १६१ ।। जाति अर्थ हो, तो मनु शब्द से अञ् और यत् प्रत्यय और मनु शब्द को पुक का श्रागम हो जाये । जले-मानुषः. मनुप्यः । यहां प्रकृति और प्रत्यय के समुदाय से जाति का बोध होता है। यहां अपत्य अर्थ की विवक्षा नहीं है । और जहां अपत्य अर्थ विवक्षित होता है, वहां अरण ही हो जाता है। जैसे-मनोरपत्यं मानी प्रजा ॥ २७ ॥ का-अपत्ये कुत्सित मूढे मनोरौत्सर्गिकः स्मृतः । नकारस्य च मृर्द्धन्यस्तेन सिध्यति माणवः ॥ २४८ ॥ मूढ निन्दित अपत्य अर्थ में मनु प्रातिपदिक से औत्सर्गिक अण् प्रत्यय का स्मरण करना चाहिये । अर्थात् अण् प्रत्यय हो जाये और मनु शन्द के नकार को गत्व होवे। जैसे-मनोरपत्यं कुत्सितो मूढो माणवः ॥ २८८ ।। अपत्यं पौत्रप्रभृति गोत्रम् ।। २४६ ॥ अ० ४ । १ । १६२ !! जो पौत्रप्रभृति अर्थात् नाती से आदि नेकर अपत्य नाम सन्तान होता है, वह . गोत्रसंजक हो जैसपायाऽपत्यं पौत्रप्रभृति नार्यः: वात्स्यः । * यहां ( उदीचां वृद्धा. ) इससे फिन् प्रत्यय तो हो ही जाता, फिर 'कुक' का प्रागम विकल्प से होने के लिये यह सूत्र है। एक कुक के आगम का विकरप, और उत्तरदेशीय प्राचार्यों के मन में : नि का विकास इन दो विकलों से तीन प्रयोग होते हैं। .. -- खैणताद्धिते यहां 'पौत्रप्रभृति' इसलिये कहा है कि-अनन्तरापत्य अर्थात् पुत्र अर्थ गोत्र का प्रत्यय न होवे । जैसे-कौन्तिः; गार्गिः * इत्यादि ।। २४६ ॥ जीवति तु वंश्ये युवा ॥ २५० ।। अ० ४। १ । १६३ ॥ जो उत्पत्ति का प्रबन्ध है सो वंश, और जो उस वंश में होवे वह वंश्य कहाता है। जब तक पिता आदि कुटुम्ब के वृद्ध पुरुष जीवते हों, तब तक जो पौत्र आदि सन्तानों के अपत्य हैं, वे युवसंज्ञक होवें। यहां तु शब्द निश्चयार्थ है कि उस समय युवसंशा ही हो, गोत्र संशा न हो । जैसे- गाायणः वात्स्यायनः इत्यादि । २५० ।। भ्रातरि च ज्यायसि ॥ २५१ ॥ अ०४ । १ । १६४ ॥ जो बड़ा भाई जीता हो और पिता आदि मर भी गये हों, तो छोटे भाई की युवसंचा जाननी चाहिये । जैसे-गाग्र्यायणः वात्स्यायना; दाक्षायणः; प्लाक्षायणः इत्यादि ॥२५॥ वाऽन्यस्मिन् सपिण्डे स्थविरतरे जीवति + ॥ २५२ ॥ जो भ्राता से अन्य सात पीढ़ी में चाचा दादा आदि अधिक अवस्थावाले पुरुष जीते हों, तो भी पौत्रप्रभृति के अपत्यों की विकल्प करके युवसंज्ञा होवे । जैले-गस्यापत्यं गायों वा गाायणः; वात्स्यो वा वात्स्यायना; दाक्षि दाक्षायणः इत्यादि ॥ २५२ ॥ वा०-वृद्धस्य च पूजायाम् ॥ २५३ ॥ वृद्ध अर्थात् जिस प्रशंसित की वृद्धसंशा विधान की है, सो भी पूजा अर्थ में विकल्प करके युवसंज्ञक होवे । जैसे-तत्रभवान् गाायणः. गायों षा; तत्रभवान् वात्स्यायनः, पात्स्यो वा तत्रभवान् दाक्षायणः, दाक्षिर्वा इत्यादि । यहां पूजाप्रहण इसलिये है कि-गार्यः, यहां युवसंत्रा न हो ॥ २५३ ।। * यहां गोत्र में कुल्ज शब्द से उफन, और गर्ग शब्द से यम् विहित है, सो नहीं होते । प्रनन्त- में + यहां जीवति राब्द की अनुवृत्ति (जीवति तु०) इस पूर्व स्त्र से चली धाती, फिर जीवति राम्द का ग्रहण इसलिये है कि संझी का विशेपण यह जीवति होवे । और पूर्व का जो जीवति है, वह सपिएट का विशेपण समझना चाहिये । ' (वृद्धस्य ३० ) और (यूनश्च० ) ये दोनों काशिका मादि पुस्तकों में सूत्र करके लिखे और प्यारयात मी है, परन्तु महामाग्य में वार्तिकरूप से इनका ट्यारयान किया है, इसलिये यहां वार्षिक ही निस्से है। रापत्य इन् होजाता है। - अपत्याधिकारः B-156 १४६ वा०-यूनश्च कुत्लायाम् ।। २५४ ।। कुत्सा नाम निन्दा अर्थ में युवा की युवसंझा विकल्प करके होवे । जैसे-माग्यो जाल्मः, गाायणो वाः वात्स्यो जाल्मः, वात्स्यायनो वाः दाक्षिर्जाल्मः, दाक्षायणो घा इत्यादि ॥ २५ ॥ जनपदशब्दात् क्षत्रियादञ् * ॥२५५।। अ० ४ । १ । १६८ ॥ जो क्षत्रियवाची जनपद शब्द हो, तो उससे अपत्यार्थ में अच् प्रत्यय होवे । जैसे- पाञ्चाला: पेक्ष्वाकः, वैदेहः इत्यादि । यहां 'जनपद शब्द से इसलिये कहा है कि-द्रुह्योरपत्यं द्रौद्ययः पौरवः, यहां अञ् न होवे । 'क्षत्रयवाची' का ग्रहण इसलिये है कि ब्राह्मणस्य पाञ्चालस्यापत्यं पाञ्चालित वैदेहिः, इत्यादि में भी अञ् प्रत्यय न होवे ॥ २५५ ॥ बा०-क्षत्रियसमानशब्दाजनपदशब्दात्तस्य राजन्यापत्यवत् ॥२५६ सो क्षत्रिय के तुल्य जनपदवाची शब्द है, उससे राजा के सम्बन्ध में अपत्य के तुल्य प्रत्यय होय । जले-पञ्चालानां राजा पाञ्चाला; वैदेहः; मागधः + इत्यादि ।। २५६ ॥ साल्वेयगान्धारिभ्यां च ।। २५७ ॥ अ० ४ । १ । १६६ ।। यह पन्यमाण ञ्यङ् प्रत्यय का अपवाद है। अपत्य और तद्राज अर्थ में साल्वेय और गान्धारि इन शब्दों से अनु प्रत्यय होवे । जैसे- साल्वेयानामपत्यं तेषां राजा वा साल्वेयः; गान्धारः ।। २५७ ।। द्व्यञ्मगधकलिङ्गसूरमसादण् ॥ २५८ ॥ अ०४ । १ । १७०४ ॥ अपत्य और तद्राज अर्थ में क्षत्रियवात्री दो स्वर वाले शब्द मगध कलिङ्ग श्रीर मरमस प्रातिपदिकों से अण प्रन्यय होवे। जैसे-अङ्गानामपन्यं तेषां राजा वा श्रादः वाहमागधः; कालिङ्गः; सौरमसः इत्यादि ॥ २५ ॥ में यह जनपद शब्द मुख्य देश का परायवाची है, सो इससे देशविशेष पञ्चाल श्रादि का ग्रहण होता है। वे पदाल धादि शब्द नत्रियों और देशविशेष के नाम एक ही से बने रहते हैं। ४ यहां तक अपत्याधिकार केवल चला पाता है। अब जो देशविशेष और क्षत्रियविशेष के नाम पवाज भादि गद है, उन देश के नामों से तद्राज अर्थात् उन देशों का राजा इस अर्थ में, और शत्रियवाची शब्दों से अपन्य अर्थ में यहां से पाद के अन्त-पर्यन्त प्रत्ययविधान समझना चाहिये। इन पचाल श्रादि शब्दों से तद्राज अर्थ में ( श्रवृद्धादपि० ) हम सूत्र में शैषिक वुन प्रत्यय प्राप्त है, उसका अपवाद यहां श्रम विधान है। A स्त्रैणताद्धिने - - वृद्धत्कोललाजादाब्यङ् ॥ २५६ ॥ अ० ४।१ । १७१ ॥ अपत्य और तदान अर्थ में जनपद क्षत्रियवाची वृद्धसंक्षक इकारान्त कोसन और अजाद प्रातिपदिक से ज्यप्रत्यय होवे । यह सूत्र अञ् का अपवाद है। जैसे-वृद्ध-श्राम्यष्टानामपत्यं तेषां राजा-वा माम्वष्ट्या; सौवीर्यः । इकारान्त-श्रावन्त्यः; कौन्त्यः । कौसल्यः; श्राजाद्य. * ॥२५६।। वा०-पाण्डोर्जनपदशब्दात् क्षत्रियशब्दाइ ड्यण् वक्तव्यः ॥२६०॥ जो जनपदवाची पाराड क्षत्रिय शब्द है, उससे अपत्य और तद्राज अर्थ में उयण प्रत्यय होवे । जैसे-पाण्डनामपत्य तेषां राजा वा पाण्ड्यः ॥ २६० ॥ कुरुनादिभ्यो ग्यः ॥ २६१ ॥ अ०४।१ । १७२ ॥ अपत्य और तद्राज अर्थ में जनपद क्षत्रियवाची कुरु और नकारादि प्रातिपदिकों से ग्य प्रत्यय होवे । यह अप और अञ् का अपवाद है। जैसे-कुरूणामपत्यं तेषां राजा वो कौरव्यः । नकारादि-नैषध्या; नैपथ्यः इत्यादि ॥ २६१ ॥ साल्वावयवप्रत्यग्रथकलकूटाश्मकादिञ् ॥२६२।। अ०४।१।१७३॥ यह सूत्र अञ् का अपवाद है। अपत्य और तद्राज अर्थ में साल्व नाम देशविशेष के अवयव प्रत्यग्रथ कलकूट और अश्मक प्रातिपदक से इञ् प्रत्यय हो। जैस- औदुम्बरिः; तैलखलिः; माद्रकारिः, योगन्धरिः; भौलिङ्गिः शारदण्डिा, प्रात्यप्रथि: कालकृटिः आश्मकिः इत्यादि ॥ २६२ ॥ ते तद्राजाः ॥ २६३ ।। अ० ४ । १ । १७४ ॥ (जनपदशब्दात्० ) इस सूत्र से लेके यहां तक जो २ प्रत्यय कहे हैं, वे तद्राजमंत्रक होते हैं। इस का यह प्रयोजन है कि बहुवचन में लुक होजाये। जैसे-पावाल:, पाञ्चाली, पञ्चालाः इत्यादि ।। २६३ ।। कम्बोजाल्लुक् ।। २६४ ।। अ० ४ । १ । १७५ ॥ अपत्य और तद्राज अर्थ में कम्बोज शब्द से विहित जो अञ् प्रत्यय उसका लुक् हो। । जैसे-कम्योजस्यापत्यं तेषां राजा वा कम्योजः ॥ २६४ ॥ वा०-कम्बोजादिभ्यो लुग्वचनं चोलाद्यर्थम् ॥ २६५ ॥ कम्बोज शब्द से जो लुक कहा है, सो कम्बोज श्रादि से कहना चाहिये । जैसे- कम्बोजा: चोलः; केरलः; शकः; यवनः ॥ २६५ ॥ * यहाँ इकार में 'तपरकरण' इसलिये है कि जो कुमारी जनपद शाद दीर्घ ईकारान्त है, उस से न्यत् प्रत्यम न होवे, किन्तु भम् प्रत्यय हो जाये । जैसे-कौमारः॥ . - ।
अपत्याधिकारः ५१ v-ra.. नियामवन्तिकुन्तिकुरुभ्यश्च ॥ २६६ ॥ अ० ४ ! १ । १७६ ॥.. जो बीअपत्य वा गढी अभिधेय हो, तो अवन्ति कुन्ति और फुरु शब्द से जो उत्पन्न तद्वाजसंझक प्रत्यय उस का लुक् हो । जैसे-अवन्तीनामपत्यं तेषां राशी वा अयन्ती: कुन्ती कुरू। यहां स्त्री ग्रहण इसलिये है कि-श्रावन्त्या; कौन्त्यः; कौरव्यः +, यहां लुक न. होये ॥ २६६॥ अतश्च * || २६७ ।। अ० ४ । १ । १७७ ।। जो स्त्रीवाच्य हो, तो तद्राजमंझक अफार प्रन्यय का लुक होवे । जसे-मद्राणामपत्य नद्रादी या मद्री गुरसेनी इत्यादि। यहां जातिवाची से (जातेरस्त्री० ) इस करके डीप. प्रत्यय हो जाता है ॥ २६७ ॥ न प्राच्यभर्गादियौधेयादिभ्यः ॥ २६८ ॥ अ० ४ । १ । १७८ ॥ प्राच्य पूर्वदेशों के विशेषनाम भर्गादि और यौधेयादि प्रातिपदिकों से विहित तद्रास संशक प्रत्यय का तुक न होवे । जैसे-प्राच्य अङ्गानामपन्यं तद्राझी घा श्राझी; पाङ्गी; मागधी इन्य दि.। भर्गादि-भागी; कारुपीः कैकयी इत्यादि । यौधेयादि-यौधेयी, शोभ्रयी; शीक्रेयी इत्यादि ।। २६ ॥ इति प्रथमः पाद: अय द्वितीयः पाद:- तेन रक्तं रागात् ॥ २६६ ॥ अ० ४ । २ । १ ॥ यहां समयों का प्रथम श्रादि सय की अनुवृत्ति चली आती है। तृतीयासमर्थ रङ्ग्याची प्रातिपदिक से रंगा है, इस अर्थ में जिस से जो प्रत्यय ग्राम हो वह हो जाये । जैसे-कुसुम्भेन रनं यनं कोसुम्भम्ः कापायम्; मालिष्टम् इत्यादि । यहां का याची फा ग्रहण इसलिये है कि-देवदत्वेन रक्तं वस्त्रम्. यहां प्रत्यय की उत्पनि न हो।।२६६ ।। + यहां प्रान्ति और कुन्ति शब्द से इकारान्त के होने से । वृद्धको०) इस से न्यङ्, गन्द से रय प्रन्यय (कुरुना० ) इस टस सुत्र से होजाते हैं। * इस सूत्र में तदन्त वधे अर्थात् अकारान्त प्रत्यय का लुक इसलिये नहीं होता कि पूर्व सूत्र में मवन्न प्रादि शब्दों से लुक कहा है. धष्टी ज्ञापक है । तो यहां अदन्त का लुक होवे, तो पूर्व सूत्र में तुय व्यय होगाचे और -- .
बैणताद्धिते । लाक्षारोचनाद्वक् ॥ २७० ॥ अ० ४ । २ । २ ॥ यहां पूर्वसूत्र के सय पदों की अनुवृत्ति चली आती है। लाक्षादि और रोचन प्राति- पदिकों से ठक् प्रत्यय. होवे । जैसे-लाक्षया रक्तं वस्त्रं लाक्षिकम् रौनिकम् । अंधिकार होने से अण् प्रत्यय पाता है, उस का बाधक यह सूध है ॥ २७० ॥ वा०-ठकप्रकरणे शकलकईमाभ्यामुपसंख्यानम् ॥ २७१ ॥ अण् का ही अपवाद यह भी धार्तिक है। शकल और कईम प्रातिपदिकों से उक् प्रत्यय होवे । जैसे-शकलेन रक्तं शाकलिकम्; काईसिकम् ॥ २७१ ।। वा०-नील्या नील्या अन् । २७२ ॥ नीली प्रातिपदिक से अन् प्रत्यय होवे । जैसे-नील्या रक्तं नीलम् ॥ २७२ ।। वा०-पीतात्कन् ॥ २७३ ।। पीत प्रातिपदिक से कन् प्रत्यय होवे । जैसे-पीतेन रक्तं पीतकम् ॥ २७३ ॥ वा -हरिद्रामहारजनाभ्यामा ।। २७४ ॥ हरिद्रा और महारजना प्रातिपदिकों से अञ् प्रत्यय होथे। जैसे-दरिद्रया रक सारिद्रम् *; माहारजनम् ॥ २७४ ॥ नक्षत्रेण युक्तः कालः ॥ २७५ ॥ अ० ४ । २ । ३ ॥ युक्त काल अर्थ जो अभिधेय हो, तो तृतीयासमर्थ नक्षत्रविशेषषाची प्रातिपक्षिक स अम् प्रत्यय होवे। जैसे-पुष्येण युक्तः कालः पौषी रात्रिः, पौषमहः, माधी रात्रिः माघमहः इत्यादि। यहां 'नक्षत्रवाची का ग्रहण इसलिये है कि-चन्द्रमसा युक्ता रात्रिः, यहां प्रत्यय न होवे ॥ २७५ ॥ लुबविशेषे ।। २७६ ॥ अ० ४ । २। ४॥ जहां काल का अवयवरूप कोई विशेष अर्थ विरित न हो, वहां पूर्ष सूत्र से जो विहितं प्रत्यय उसका लुप् हो जाये । जैसे-पुष्येण युक्तः कालोऽद्य पुष्यः अद्य कृतिका; मंचं रोहिणी। यहां अधिशेष' इसलिये कहा है कि-पोषी रात्रिः; गोषमहः, यहां लुप न होवे ॥२७६॥ * 'हारिद्री कुकुरस्य पादो' हरद्रा से रझे हुए के समान मुर्ग के पग है। इस प्रयोजन में उपमानवाची मान के अब प्रत्यय हो जाता है।
दृष्टाधिकारः Ja दृष्ट सास ।। २७७ ॥ अ०४।२। ७॥ सामवेद का देखना अयात् पढ़ना पढ़ाना विचारना अर्थ हो, तो तृतीयासमर्थ प्रावि- पदिक से अा अादि ययागत प्रन्यय होवें। जैसे-घसिष्टेन दृष्टं साम वासिष्ठम्: भ्वामित्रन वन दृष्टं साम देव्य देव याः प्रजापतिना रष्टं साम प्राजापत्यम् इत्यादि ॥२७॥ वा०-सर्वत्रानिकलियां ढक * ॥ २७८ ॥ यहांले भागेजितने प्रादीव्यतीय अर्य है,वे इस वार्तिक में सर्वत्र शब्द से विवजित है। पान्दीन्यनीय श्रों में अन्नि और कति प्रातिपदिकों से ढक प्रत्यय होवे । जैसे- अग्निना दृष्टं सामाग्नेयम्: अन्नेगगतमान्नेयम्ः अग्ने स्वमान्नेयम्: अग्निदेवताऽस्यान्नेयम् इत्यादि । इसी प्रकार कलिना दृष्टं साम कालेयन. इत्यादि भी समझो ! २७ काय-दृष्ट सामनि जाते च द्विरण डिद्वा विधीयते । नयादीकडः न विद्याया गोत्रादकवादिष्यते ॥ २७६ ॥ सामवेद के देखने अर्थ में अरा प्रत्यय विकल्प करके डिलसंडक होवे। जैसे- उशनसा दृष्टं साम औगुनसम्. प्रौशनम् । यहां डित् पक्ष में टि का लोप हो जाता है। तया (वध जातः ) इस आगामी प्रकरण में अपने अपवाद का अपवाद होके फि विधान किया अप प्रत्यय विकल्प करके डिव होवे। जैसे-शतभिषजि जातः शाः भिषजः, शतभिषः। डित् का प्रयोजन यहां भी पन में टि लोप है। यहां शतभिष नक्षत्रवाची प्रतिदिक से युच्च काल अर्थ में अस् प्रत्यय होकर उसका प्रविशेष अ. में नुम् हो जाता है, पीहे शेषिक जान अर्थ में अर का बाधक कालबानी से उन मा होता है, फिर उन् का बाधक (सन्धिवेलाइससे श्रग विधान किया है। तीयमन्ययान्न प्रातिपदिकों से स्वार्थ में ईका प्रत्यय होथे। जैसे-ऐनीयीका वातीपीकम् ! और विद्यावाची तीयप्रत्ययान्त प्रातिपदिकों से ईकक न होवे। जैसे- द्वितीया विद्या; तृतीया विद्या! और गोरवादी प्रातिपदिकों में सामवे के देवने अर्थ में अङ्क प्रादि प्रों में: प्रन्यय होने हैं, वे यहां भी। जैसे-गोत्रवता) उस सूत्र ले गोत्रवाची शघ्र से अअयं बुन् प्रत्यय होता है, वैसे ही यहां भी होवे। जैसे-गाए दृष्टं सा गायकम्: वाल्यकम् औपगबेन दृष्टं साम प्रोपरकम्: कापटवकम् इत्यादि ॥ २७६ * इस दार्दिक को काशिका मादि पुस्तकों में (अमद } इतना सूत्र लिखा है। पिन धारि ऐसा ही निगरे सो महानगम्य मे दिग्द होने के कारण अब जानना चाहिये । - स्त्रैणताद्धिते. परिवृतो रशः ॥ २८० ॥ अ० ४ । २ । ६। सो परिवृत अर्थात् किसी चाम श्रादि से मड़ा रथ अादि यान अर्थ वाच्य हो, तो तृतीयासमर्थ प्रातिपदिकों से ऋण प्रत्यय होवे। जैसे-चर्मणा परिवृतो रथञ्चामणः काम्यतः यायः इत्यादि। यहां रथ का ग्रहण इसलिये किया है कि-वस्त्रेण परिवृतं शरीरम्, यहां प्रत्यय न होवे ॥ २८० ॥ कोमाराऽपूर्ववचने ॥ २८१ ॥ अ० ४ १ २ १ १२ ॥ पूर्व जिसका किसी के साथ विवाह विषयक कथन भी न हुआ हो, उस अपूर्ववचन अर्थ में कुमारी शुध्द से मणप्रत्ययान्त कौमार निपातन किया है ॥ २६ ॥ वा०-कौमारापूर्ववचन इत्युभयतः स्त्रिया अपूर्वत्वे ।। २८२ ।। हली का अपूर्ववचन अर्थ हो तो स्त्री और पुलिस में कौमार शब्द निपातन किया है। जैसे-अपूर्वपति कुमारीमुपपन्नः कोमारो भर्ता: अपूर्वपतिः कुमारी पतिमुपपन्ना कौमारी भार्या * ॥२-२॥ तत्रोधृतममत्रेभ्यः ॥ २८३ ॥ अ० ४ । २ । १३ ॥ उदघृत अर्थात रसने अर्थ में सप्तमीसमर्थ पात्रत्राची प्रातिपदिकों से अप प्रत्यय हो । जैसे-पञ्चकपालेघृत औदतः पञ्चकपालः ४: शरावेदकृतः शारायः इत्यादि। यहां पानवाची का ग्रहण इसलिये है कि-पाणावुदधृत श्रोदनः, यहां प्रत्यय न होघे ॥ २-३॥ साम्मिन् पौर्णमासीति ॥ २८४ ॥ अ० ४ । २ । २० ॥ अधिकरण अर्थ वाच्य होवे, तो पोर्णमाली विशेषवा प्रातिपदिकों से यथाप्राप्त प्रत्यय होवें । जैसे-पुष्येण युक्ता पौर्णमासी पोपी, पापी परमाती अस्मिन मानस पंपो मासः; पोयोऽधमास: पोपसंबन्सः। इसी प्रकार मानक्षत्रेण युना पौर्णमासी नामी. साऽस्मिन्वन्त इति म यो मासः; फाल्गुनः चैत्रः: वैशानः ज्येष्टः; श्रापाढः; धावणाः भादग्दः आश्विनः कार्तिकः; मार्गशीर्थः । इस सूत्र में 'इनिकरण से संहाग्रहण का प्रयोजन सूत्रकार का है !! २=2 * इस वार्षिक का प्रयोजन यह है कि प्रन्यय विधान तो कुमारी शब्द से ही होवे, पान्नु प्रत्ययार्थ दोनों लिममें रहे। अपूर्ववचन अर्य का सम्बन्ध कुमारी के साय ही रहे। जैसे-पूर्व जिल का कोई फरे काने मात्र मी न हुआ हो. ऐसी कुमारी को प्राप्त हुम्रा पुरष कौमार, घर वची ही कुमारी पति को मम्स हुई कौमारी ४ यहां पत्रकार शब्द में (हिंगोलुंगनपत्ये) इस पूर्वलिखित सूत्र में प्राम्दीव्यतीय अनपत्य प्रत्यपाल द्विगु संशाहाने से हो जाता है !
देवताधिकारः ५ वा०-साऽस्मिन् पौर्णमासीति संज्ञाग्रहणम् : ।। २८५ ।। (माऽस्मिन्० ) इस सूत्र में संचाग्रहण करना चाहिये । अर्थात् जहां प्रकृति प्रत्यय के समुदाय से महीनों की संझा प्रकट हो, वहीं प्रत्यय हावे । और--पापी पौर्णमास्यस्मिन् पञ्चदशरात्रे, यहां प्रत्यय न हो ॥ २५ ॥ . अाग्रहायण्यश्वत्थादृक् ॥ २८६॥ अ० ४ । २ । २१ ।। यह सूत्र पूर्वसूत्र ले प्राप्त अए का अपवाद है। पर्णमाली समान्तधिकरण आग्रहायणी और अश्वन्य प्रातिपदिकों से अधिकरण अर्थ में टम् प्रत्यय होवे । जैले-आग्रहायणी पौर्णमास्यस्मिन् मासे स आग्रहायणिको मासः अर्शमासो वाः आश्चत्यिकः ॥ २६ ॥ विभाषा फाल्गुनी श्रवणाकार्तिकीचैत्रीभ्यः ॥२८७||अाश२२॥ पौर्णमासी समानाधिकरण फाल्गुनी श्रवणा X कार्तिकी और चैत्री प्राविपदिकों से अधिकरण अर्य में विकल्प करके ठक् प्रत्यय हो, और पक्ष में अप हो जावे । जैसे- फाल्गुनी पौर्णमाम्यम्मिन मास ल फाल्गुनिको मातः. फाल्गुनो मासः; श्रावणिको मासः, श्रावणो मास: कार्तिकिको मासः, कार्तिको मास:: त्रिको मासः, चैत्रो मासः ॥२८॥ साऽस्य देवता ॥ २८८ ॥ अ० ४ । २ । २३ ॥ शेषकारक वाच्य हो, तो प्रथमासमर्य देवताविशेषवाची प्रातिपदिकों ले यथायोग्य प्रत्यय हो। जैसे-प्रजापतिर्देवताऽस्य प्राजापत्यम्: +; इन्द्रो देवताऽस्य ऐन्द्र इविः, ऐन्द्रो मन्त्रा, ऐन्द्री ऋक् इत्यादि ॥ २८ ॥ कन्येत् ॥ २८६ ॥ अ० ४ । २ । २४ ॥ यहां पूर्वसूत्र से अण् प्रत्यय हो ही जाता, फिर इकारादेश होने के लिये यह सूत्र है। देवता समानाधिकरण क प्रातिपदिक से अग प्रत्यय और प्रकृति को कारादेश भी होवे । जैल को देवताऽस्य कार्य हविः, कायो मन्त्रः, कायी ऋक् । : काशिका श्रादि पुस्तकों में संज्ञाग्रहण सूत्र में ही मिला दिया है, सो ठीक नहीं है. क्योंकि वार्तिक पढ़ने से । और यहा केवट ने मालिवा है कि-"संज्ञाग्रहणं सत्रेऽनामिति वार्तिकमाघम्" । * इस सूत्र में प्राप्त विमापा इसलिये है कि किसी से प्राप्त नहीं, अंपा प्राप्त है, उसी का पह अपवाद है। ४ नत्रवाची अवणा शब्द से युक्त काल अयं में (संज्ञायां प्रवणा० ४।२।५) इस सूत्र से प्रत्यय का लुप् हो जाता है, पौर्णमासी का विशेषण प्रत्ययार्थ बना रहता है + यहां अय का अधिकार भी है, तयाऽपि उसको बाध कर (दिदिल्या०) इस सूत्र मे पत्युत्तर- पद प्रातिपदिक में रप प्रत्यय हो जाता है। . ॥
.५६ नेणताद्धिते यहां यत् यहां 'इत् में तपरकरण' तत्काल का बोध होने के लिये है ॥ २८६ ॥ वायवृतुपित्रुषसो यत् ॥ २६० ॥ अ० ४ । २।३० ।। प्रथमासमर्थ देवता समानाधिकरण वायु ऋनु पितृ और उषस् प्रातिपदिकों से, पष्ठी के अर्थ में अण का वाधक यत् प्रत्यय होथे। जैसे-चायुर्देवताऽस्य वायव्यम्; अतव्यम्; पिश्यम् उपस्यम् ॥ २६० ॥ यावापृथिवीशुनासीरमरुत्वदग्नीषोमवास्तोष्पतिगृहमेधाच्छ च ॥२६ १॥ अ०४।२।३१॥ की अनुवृत्ति पूर्वसूत्र से चली आती है। प्रथमासमर्थ देवता समानाधिकरण द्यावापृथिवी आदि प्रातिपदिकों से, षष्ठी के अर्थ में छ और यत् प्रत्यय होवें। जैसे-द्यावापृथिव्या देवते अम्य द्यावापृधिवीयम्, द्यावा- पृधिव्यम् शुनासीरीयम्, शुनालीर्यम महत्वतायम्, मरुन्वत्यम्; अग्नीपोमीयम्, अग्नी- पोम्यम् वास्तापतीयम्, वास्तोष्पत्यम्: गृहमेधीयम्, गृहमेध्यम् ॥ २६१ ॥ कालेभ्यो भववत् ॥ २६२ ॥ अ० ४ । २ । ३३ ।। (तत्र भवः) इस अधिकार में जिस कालबाची प्रातिपदिक से जो प्रत्यय प्राप्त है। वही यहां देवता समानाधिकरण काल विशेषवाची प्रातिपदिक से होवे । जैसे-संवत्सरो देवताऽस्य सांवत्सरिका, यहां सामान्य कालवाची से ठञ् है, प्रावृट् देवताऽम्य प्रावृषेण्यः, यहां एय; ग्रीष्मो देवताऽस्य त्रैष्मम्, ग्रीष्म शब्द का उत्सादिकों में पाठ होने से अजू होता है। इत्यादि प्रकरण की योजना करलेनी चाहिये ।। २६२ ।। महाराजप्रोष्ठपदाट्ठञ् ॥ २६३ ॥ अ० ४ । २ । ३४ ॥ देवता समानाधिकरण महाराज और प्रोष्ठपद शब्दों से पष्ठी के अर्थ में ठञ् प्रत्यय हो। जैसे-महाराजो देवताऽस्य माहाराजिका प्रीष्ठपदिकम् ॥ २६३ ।। वा०-ठप्रकरणे तदस्मिन् वर्तत इति नवयज्ञादिभ्य उपसंख्यानम्२९४ काल अधिकरण अभिधेय होवे, तो नवयज्ञादि प्रातिपदिकों से ठञ प्रत्यय होवे । जैसे-नवयज्ञोऽस्मिन् काले वर्तते नावयक्षिकः; पाकयशिकः इत्यादि ।। २६४ ।। वा०-पूर्णमासादण ॥ २६५ ॥ पूर्व वार्तिक से कालाधिकरण की अनुवृत्ति आती है। कालाधिकरण अर्थ में पूर्णमास प्रातिपदिक से अण प्रत्यय हो। जैसे-पूर्णमासोऽस्मिन् काले घर्तते इति पौर्णमासी तिथि:, यहां अपने अपवाद ठन कोषाध के श्रण है ।। २६५ ।। 1 समूहाधिकारः - -ram--- -- -"---- -- .. पितृव्यमातुलमातामहपितामहाः ॥२६६।। अ० ४ । २ । ३५ ॥ भ्राता अर्थ वाच्य हो, तो पितृ और मातृ शब्दों से व्यत् तथा डुलच् प्रत्यय यथासंख्य करके निपातन किये हैं। जैसे-पितुर्भ्राता पितृव्यःः मातुर्धाता मातुलः । पिता का भाई पितृव्य और माता का भाई 'मातुल कहाता है। और मातृ तथा पितृ प्रातिपदिकों से पिता अर्थ में डामहच् प्रत्यय निपातन किया है । जैसे–मातुः पिता मातामहः; पितुः पिता पितामहः । माता का पिता मातामह-नाना, और पिता का पिता पितामह दादा कहाते हैं ॥ २६६ ॥ वा०-मातरि षिच्च ॥ २६७ ॥ मातृ अर्थ अभिधेय होवे, तो पूर्व प्रातिपदिकों से कहा डामहत् प्रत्यय पित् हो जावे । जैसे-मातुर्माता मातामहीः पितुर्माता पितामही । माता की माता नानी और पिता की माता दादी। यहां 'पित् करने का प्रयोजन यह है कि-स्त्रीलिङ्ग में ङीष् प्रत्यय होजावे ॥२६७॥ वा०-अवेर्दुग्धे सोढदूसमरीसचः ॥ २६८ ।। अवि प्रातिपदिक से दुग्ध अर्थ में सोढ दूस और मरीसच् प्रत्यय होवें। जैसे- अवेर्दुग्धमविसोढम्ः अविदूसम्: अविमरीसम् ॥ २६ ॥ वाल-तिलान्निष्फलात पिञ्जपेजौ ॥ २६8 । निष्फल समानाधिकरण तिल प्रातिपदिक से पिच और पेज प्रत्यय होवे । जैसे- निष्फलं तिलं तिलपितम् तिलपेजम् ॥ २६६ ॥ वा०-पिञ्जश्छन्दसि डिच्च ॥ ३०० ॥ पूर्वोक्त पिच प्रत्यय वैदिकप्रयोग विषय में डित् होवे । जैसे-तिलपिनं दण्डानतम्. यहां डित् होने से टिसंशक प्रकार का लीप हो जाता है ॥ ३०० ॥ - . तस्य समूहः ॥ ३०१ ॥ अ० ४ । २ । ३६ ॥ यह अधिकार सूत्र है। पष्ठीसमर्थ प्रातिपदिकों से समूह अर्थ में यथाप्राप्त प्रत्यय हो । जैसे-वनस्पतीनां समूहो वानस्पत्यम्:स्त्रीणां समूहःस्त्रैणम् पाँस्नम् इत्यादि ॥३०॥ गोत्रोक्षोष्ट्रोरभ्रराजराजन्यराजपुत्रवत्समनुष्याजाद वुञ् ॥३०२॥ अ०४ । २ । ३८ ॥
बैणताद्धिते Now . षष्ठीसमर्थ जो गोत्रवाची.उक्ष उष्ट्र उरभ्र राज राजन्य राजपुत्र वत्स.मनुष्य और अज प्रातिपदिक हैं, उन से समूह अर्थ में अण का बाधक बुञ् प्रत्यय होवे । जैसे-ग्लुचुकायनीनां समूहो ग्लोचुकायनकम्, गार्ग्यकम्। वात्स्यकम्,गाायणकम् इत्यादि । उक्षणां समूह औक्षकम्, औष्ट्रकम्, औरभ्रकम् राजकम: राजन्यकम् राज- पुत्रकम् वात्सकम्, मानुष्यकम् +; आजकम् ॥ ३०२॥ वा०-वृद्धाच्च ।। ३.०३ ।।. वृद्ध शब्द से भी समूह अर्थ में बुञ्प्रत्यय हो । जैसे-वृद्धानां समूहो वार्द्धकम् ॥३०३॥ ब्राह्मणमाणवबाडवायन् ॥ ३०४ ॥ अ० ४।२। ४१॥ ब्राह्मण.माणव और चाडव प्रातिपदिकों से समूह अर्थ में यन् प्रत्यय होवे । जैसे- ब्राह्मणानां समूहो ब्राह्मण्यम्; माणव्यम्; वाडव्यम् ॥ ३०४ ॥ वा०-यन्प्रकरणे पृष्ठादुपसङ्ख्यानम् ॥ ३०५ ॥ पृष्ठ शब्द से भी यन् प्रत्यय कहना चाहिये । जैसे-पृष्ठानां समूहः पृष्ठयम् ।। ३०५॥ ग्रामजनबन्धुभ्यस्तल ।। ३०६ ॥ अ० ४ । २ । ४२ ।। समूह अर्थ में ग्राम जन और वन्धु प्रातिपदिकों से तल प्रत्यय होवे । जैसे-ग्रामाणां समूहो ग्रामता, जनता, बन्धुता ॥ ३०६ ॥ वा०-गजसहायाभ्यां च ॥ ३०७ ॥ गज और सहाय प्रातिपदिकों से समूह अर्थ में तल प्रत्यय होवे। जैसे-गजानां समूहो गजता, सहायता। इस वार्तिक का सहाय शब्द काशिका आदि पुस्तकों में सूत्र में मिला दिया है ॥३०७॥ वा०-अह्नः खः कतौ ॥ ३०८ ॥ यज्ञ भर्थ में अहन् प्रातिपदिक से ख प्रत्यय हो। जैसे-अह्नां समूहोऽहीनः क्रतुः ।।३०८॥ वा०-पर्खा णस् ॥ ३०६ ॥ पर्श प्रातिपदिक से समूह अर्थ में णस् प्रत्यय होवे । जैसे–पर्शनां समूहः पार्शम् । * यहां महाभाष्य के प्रमाण से लोक में युवा को भी गोत्र कहते हैं । इसलिये युव प्रत्ययान्त को गोत्र मान के गाायण श्रादि शब्दों से वुन प्रत्यय होता है । + यहां राजन्य और मनुष्य शब्द के यकार का लोप प्राप्त है, सो (प्रकृत्या के० ) इस वार्तिक से प्रकृतिभाव हो जाने से लोप नहीं होता। , .
समूहाधिकारः ५४ NAAM -r.A... रणस् प्रत्यय में सित्करण के होने से पदसंज्ञा होकर भसंझा का कार्य उवर्णान्त अङ्ग को गुण नहीं होता ॥ ३०६ ।। अनुदात्तादेरम् ॥ ३१० ॥ अ० ४ । २ । ४३ ॥ अनुदाचादि प्रातिपदिकों से समूह अर्थ में अञ् प्रत्यय हो । जैसे-कुमारीणां समूहः कौमारम् केशोरम्बाधृटमःचैरएटम्:कपोतानां समूहः कापोतम्.मायूरम् इत्यादि ॥३१०॥ खण्डिकादिभ्यश्च ।। ३११ ॥ अ० ४ । २ । ४४ ॥ सण्डिका आदि प्रातिपदिकों से समूह अर्थ में अञ् प्रत्यय हो । जैसे-खण्डिकानां समूहः खाण्डिकम; चाडवम् इत्यादि । यह सूत्र ठक् का बाधक है ॥ ३१.१ ॥ वा०-अप्रकरणे क्षुद्रकमालवात्सेनासंज्ञायाम् ॥ ३१२ ॥ शुद्रक और मालव ये दोनों शब्द जनपद क्षत्रियवाची हैं। उनसे उत्पन्न हुए तद्राज- संज्ञक प्रत्यय का लुक हो जाता है। फिर दोनों का समाहारद्वन्द्व समास होके भन्तो. दाचस्वर हो जाता है। फिर छानुदात्तादि के होने से अञ् प्रत्यय हो ही जाता, फिर गोत्रयाची से (गोत्रोक्षो० ) इस से बुञ् प्रत्यय प्राप्त है, उस का. अपवाद अविधान किया है। और यह वात्तिक नियमार्थ भी है कि चुदकमालव प्रातिपदिक से सेना की संशा अर्थ ही में अञ् प्रत्यय होवे, अन्यत्र नहीं । जैसे-क्षौद्रकमालवी सेना । और जहां सेना- संक्षा न हो, वहां क्षोद्रकमालवकम्; गोत्रवाची से बुञ् प्रत्यय हो जावे ॥ ३१२ ॥ अचित्तहस्तिधेनोप्टक् ।। ३१३ ।। अ०४ । २ । ४६ ॥ समूह अर्थ में चित्तवर्जित हस्ति और धनु प्रातिपदिकों से टक प्रत्यय हो । जस-अपूपानां समूहः आपूपिकमः शाकुलिकम; साक्तुकम् इत्यादि । हास्तिकम् ; धेनुफम् ॥ १३॥ विषयो देशे ॥ ३१४ ॥ अ० ४ । २ । ५१ ।। जो यह विषय देश होवे, तो पष्टीसमर्थ प्रातिपदिकों से अण प्रत्यय हो। जैसे- शिवीनां विषयो देशः शेवः; श्रोष्ट्रः; पाशवः इत्यादि । यहां 'देश' ग्रहण इसलिये है कि-देवदत्तस्य विपयोऽनुवाकः, यहां प्रत्यय न हो॥३४॥ * यहां (प्रातिपदिकग्रहणे लिगवि०) इस परिमापा से सीलिन हस्तिनी शब्द से भी प्रत्यय होजाता । जैसे--हस्तिनीनां सम्हो हास्तिकम् । और (भस्याढे तद्विते ) इस वार्तिक से पुंवद्भाव होता है । . - ६० बैणताद्धिते --------- PARAN समामे प्रयोजनयोधृभ्यः ॥ ३१५ ॥ अ० ४ । २ । ५५ ॥ संग्राम अर्थ में प्रथमासमर्थ प्रयोजनवाची और योदधृवाची प्रातिपदिकों से अण् प्रत्यय हो। जैसे-भद्रा प्रयोजनमस्य संग्रामस्य भाद्रः संग्रामः; सौभद्रः; गौरिमित्रः । योदधृभ्यः-अहिमाला योद्धारोऽस्य संग्रामस्य स प्राहिमालः; स्यान्दनाऽश्व:; भारतः इत्यादि। यहां 'संग्राम का ग्रहण इसलिये है कि सुभद्रा प्रयोजनमस्य दानस्य, यहां प्रत्यय न होवे । और 'प्रयोजनयोधु' ग्रहण इसलिये है कि-सुभद्रा प्रेक्षिकाऽस्य संग्रामस्य, यहां भी न हो ॥ ३१५ ॥ तदधीते तद्वेद * ॥ ३१६ ॥ अ० ४ । २ । ५.८ ।। द्वितीयासमर्थ प्रातिपदिकों से अधीत और वेद अर्थात् पड़ने और जानने अर्थों में अण् प्रत्यय हो । जैसे-यश्छन्दोऽधीते वेद वा स छान्दसः; व्याकरणमधीते वेद वा वैयाकरणः: नरुक्तः; निमित्तानि वेद नैमित्तः; मोहः इत्यादि ॥ ३१६ ॥ ऋतूक्थादिसूत्रान्तादृक् ॥ ३१७ ॥ अ० ४ । २ । ५६ ।। यह सूत्र अरण को वाधक है। ऋतुविशेषवाची उक्थ आदि और सूत्रान्त प्राति- पदिकों से अधीत और वेद अर्थ में टक प्रत्यय होवे । जैसे-ऋतुवाची-अग्निष्टोममधीते वेद वा आग्निष्टोमिकः अश्वमेधमधीते वेद वा आश्वमेधिकः; वाजपेयिकः; राजसूयिकः। उक्थादि-उक्थं सामगानमधीते घेद वा औक्थिकाः लोकायतिकः इत्यादि। सूत्रान्त-योगसूत्रमधीते वेद वा योगसूत्रिका गोभिलीयसूत्रिका श्रोतसूत्रिकः; पाराशरसूत्रिकः इत्यादि ॥ १७ ॥ वा०-विद्यालक्षणकल्पसूत्रान्तादकल्पादेरिका स्मृतः ॥ ३१८ ।। विद्या लक्षण कल्प और सूत्र ये चार शब्द जिनके अन्त में हों, और कल्प शब्द आदि में न होवे, ऐसे प्रातिपदिकों से पढ़ने और जानने अर्थ में ठक् प्रत्यय होवे । जैसे-विद्या-वायसविद्यामधीते वेत्ति वा वायसविधिकः; सार्पविधिकः । लक्षण- गोलक्षणमधीते वेद वा गौलक्षणिकः: आश्वलक्षणिकः । कल्प-पराशरकल्पमधीते वेत्ति वा पाराशरकल्पिकः; मातृकल्पिकः । सूत्र-वार्तिकसूत्रमधीते वेद वा वार्तिकसुत्रिका. साङ्ग्रहसत्रिकः इत्यादि । या 'अकल्पादि का निषेध इसलिये है कि-कल्पसूत्रमधीते वेद वा काल्पसूत्रः यहां उक न हो, किन्तु अण् प्रत्यय ही हो जावे ॥ ३१ ॥ * इस सूत्र में दो बार तत् शब्द का पाठ इसलिये है कि एक शाम्र को पढ़ रहा और दूसरा पढ़ा हुआ शास्त्र का वेत्ता, यौदोनों पृथक् २ समझे जावें ॥
अध्येत्वेदित्रधिकारः ६१ ----- ------- ------- --- : वा०-विद्या चाननक्षत्रधर्मत्रिपूर्वा ।। ३१६ ॥ अनक्षत्र धर्म और त्रि ये चार शब्द जिसके पूर्व हों, ऐसे विद्या प्रातिपदिक से ठक प्रत्यय न होवे, किन्तु अप ही हो जाये । अन्य कोई शब्द पूर्व हो तो विद्या शब्द से ठक् ही हो, यह नियम इस वार्तिक से समझो । जैसे-अङ्गविद्यामधीते वेत्ति वा श्राइविद्या: क्षात्रविद्यः; धार्मविद्यः विद्यः ॥ ३१६॥ वा०-याख्यानाख्यायिकेतिहासपुराणेभ्यश्च ।। ३२० ।। आख्यान आख्यायिका इतिहास और पुराण इन चार के विशेषवाची प्रातिपदिकों से पढ़ने और जानने अर्थ में ठक् प्रत्यय हो। जैसे -श्राख्यान-यवक्रीतमधीतं वेत्ति वा यावक्रीतिकः; प्रैयङ्गविकः; यायातिकः । श्राख्यायिका-वासवदत्तामधीते वेद वा वासवदत्तिकः; सोमनोत्तरिकः । इतिहासमधीते वेद वा ऐतिहासिकः; पौराणिकः इत्यादि ॥ ३२० ॥ का०-अनुसूर्लक्ष्यलक्षणे सर्वसादेर्द्विगोश्च लः । इकन् पदोत्तरपदात् शतषष्टेः षिकन् पथः ॥ ३२१ ॥ अनुसू लक्ष्य और लक्षण ये तीनों ग्रन्थविशेषों के नाम हैं। इनसे ठक् प्रत्यय हो। जैसे-अनुस्वमधीते श्रानुसुकः, यहां (इसुसु०) इस सूत्र से प्रत्यय को ककारादेश हो जाता है । लक्ष्यमधीते वेद वा लाक्ष्यिकः; लाक्षणिकः । सर्व और स शब्द जिसके आदि में हों एसे द्विगुसंज्ञक प्रातिपदिक से विहित प्रत्यय का लुक हो जावे । जैसे-सर्ववेदमधीते वेत्ति वा सर्ववेदः; सर्वतन्त्रः। सवार्तिकमधीते वेद वा सवार्तिकः; ससङ्ग्रहः । पद शब्द जिसके अन्त में हो ऐसे प्रातिपदिक से इकन् प्रत्यय होवे । जैसे-पूर्वपद- मधीते वेद वा पूर्वपदिकः; उत्तरपदिकः । पथ शब्द जिनके अन्त में हो, एले शत और पष्टि प्रातिपदिकों से षिकन् प्रत्यय हो। प्रत्यय में पित्करण स्त्रीलिङ्ग में डीप होने के लिये है। जैसे-शतपथमधीते वेत्ति वा शतपथिकः, शतपथिकी; पष्टिपथिकः, पष्टिपथिकी इत्यादि ॥ ३२१ ॥ प्रोक्ताल्लुक् ॥ ३२२ ॥ अ० ४ । २ । ६३ ।। अध्येत वेदित अर्थ में प्रोक्त प्रत्ययान्त से विहित तद्धितसंबक प्रत्यय का लुक हो जावे। जैसे-पाणिनिना प्रोक्तं पाणिनीयमधीते वेद वा पाणिनीयः, पाणिनीया ब्राह्मणी;. काशकृत्स्नेन प्रोता मीमांसा काशकृत्स्नी, काशकृत्स्नी मीमांसामधीते ब्राह्मणी काशकृत्स्ना, यहां अनुपसर्जन के न होने से फिर डीप नहीं होता ॥ ३२२ ।। " ..
६२
स्त्रैणताद्धिते
M
..
छन्दोब्राह्मणानि च तद्विषयाणि ॥ ३२३॥ अ० ४ । २ । ६५ ॥
छन्द और ब्राह्मण ये दोनों प्रोक्तप्रत्ययान्त- अध्येत वेदित प्रत्ययार्थविषयक हों,
अर्थात् पढ़ने और जानने अर्थी के विना मोक्तप्रत्ययान्त छन्द और ब्राह्मणों का पृथक
प्रयोग न होवे । जैसे-कठेन प्रोक्तं छन्दोऽधीयते ते कठाः; मौदाः; पैप्पलादाः; आचार्यिनः;
वाजसनेयिनः । ब्राह्मण-तारिडना: भाल्लविनः, शाट्यायनिनः, ऐतरेयिणः ।
यहां 'छन्दोब्राह्मण' ग्रहण इसलिये है कि-पाणिनीयं व्याकरणम् पैङ्गी कल्पः, यहां
तद्विपयता न होवे ॥ ३२३ ॥
तदस्मिन्नस्तीति देशे तन्नाम्नि ॥ ३२४ ॥ अ० ४ । २ । ६६ ।।
यह सूत्र मत्वर्थ प्रत्ययों का अपवाद है। जो देश का नाम होवे, तो अस्ति समा-
नाऽधिकरण प्रथमासमर्थ प्रातिपदिकों से यथाप्राप्त प्रत्यय होवें । जैसे-उदुम्बरा अस्मिन्
देशे सन्ति श्रीदुम्बरो देशः; वाल्वजः; पार्वतः ।
यहां तन्नाम'ग्रहण इसलिये है कि-गोधूमाः सन्त्यस्मिन् देशे, यहां प्रत्यय न होवे ॥३२८॥
तेन निवृत्तम् ।। ३२५ ।। अ० ४ । २ । ६७ ।।
निवृत्त अर्थ में तृतीयासमर्थ प्रातिपदिकों से यथाप्राप्त प्रत्यय होवे । जैसे-सहस्त्रेण
निवृत्ता साहस्त्री परिवा; कुशाम्बेन निर्वृत्ता कौशाम्बी नगरी ॥ ३२५ ॥
तस्य निवासः ॥ ३२६ ॥ अ० ४ । २ । ६८ ॥
जहां निवास देश अर्थ वाच्य हो, वहां पष्ठीसमर्थ प्रातिपदिको से यथाप्राप्त प्रत्यय
होवें। जैसे-ऋजुनावान्निवासो देश आर्जुनायो देशः; शेवः; श्रीदिष्टः; उत्सस्य निवासो
देश श्रौत्सः; कौरवः इत्यादि ॥ ३२६ ॥
अदूरभवश्च ।। ३२७ ।। अ० ४ । २ । ६६ ॥
अदूरभव अर्थात् समीप अर्थ में पष्टीसमर्थ प्रातिपदिकों से अण् प्रत्यय हो । जस-
विदिशाया अदूरभवं वैदिशं नगरम्; हिमवतोऽदूरभवं हेमवतम्. हिमालयस्यादुरभवो
देशो हैमालयः इत्यादि ।
इस सूत्र से भागे चारों अर्थो की अनुवृत्ति चलती है, इसी से यह प्रकरण चातुः
रर्थिक कहाता है ॥ ३२७ ॥
ओरञ् ।। ३२८ ॥ भ० ४ । २ । ७० ।।
उक्त चारों अर्था में पष्टीसमर्थ उवर्णान्त प्रातिपदिकों से अञ् प्रत्यय हो। जैसे-
अरडु-प्रारंडवम् कक्षतु-काक्षतवम्. कर्कटेलु कार्कटेलवम् रुरवः सन्त्यस्मिन् देशे,
रुरूणां निवासी देशोऽदूरभवो वा रौरवः; परशुना निवृत्तं पारशवम् इत्यादि ॥ ३२८ ॥
चातुरधिकाधिकारः ------ - । बुञ्छएकठजिलसेनिरढण्ययफक्फिजियकक्ठकोऽरीहणकृशा- श्वर्य कुमुदकाशतृणप्रेक्षाश्मसखिसङ्काशवलपक्षकर्णसुतगमप्रग- दिन्बराहकुमुदादिभ्यः ॥ ३२६ ॥ अ० ४ । २ । ८० ॥ यह मूत्र अण का अपवाद है। अरीहणादि सत्रह गणस्य प्रातिपदिकों से पूर्वोक्त चार अर्थों में यथासंख्य करके बुञ् आदि सत्रह (२७ ) प्रत्यय होते हैं । आदि शब्द का प्रत्येक शब्द के साथ योग होता है। जैसे-अरीहणादिकों से बुञ्–पारीहणकम्ः द्रौघणकम्; स्खदियणामदूरभवं नगरम् खादिरकम् । कृशाश्व आदि से छण -काश्विीयम्: आरिणीयः । ऋश्य आदि से क-ऋश्यकः; न्यग्रोधकः शिरकः । कुमुद आदि से ठच्-कुमुदिकम्: शर्करिकम्: न्यग्रोधिकम् । काश आदि से इल काशिलम्: वाशिलम् । तृण आदि से स-तृणसः; नइसः; बुससः । प्रेन आदि से इनि-प्रेक्षी: हलकी: बन्धुकी। अश्म आदि-से र- अश्मरः; यूपाः रुपरः: मीनरः । सखि आदि से ढञ्-साडेयम्: साखिदत्तेयम् । सङ्काश आदि से गय~साद्वाश्यमः काम्पित्यम्: सामीर्यम् । बल आदि से य-वल्या; कुल्यम् । पन्न आदि से फक्-पाक्षायणः; तोपायणः: प्राण्डायनः । कर्ण श्रादि से फिञ्-का- यनिः, वासिष्टायनिः । मुतङ्गम आदि से इ-सौतमिःः मौनचित्तिः; वैप्रचित्तिः । प्रगदिन् आदि से ज्य-प्रागद्यम्:मागद्यम्: शारद्यम् । वराह आदि से कक्-वागहकम्; पालाशकम् । और कुमुदादिकों से उक् प्रत्यय होवे । जैसे-कौमुदिकम्: गौमथिकम् इत्यादि ॥ ३२६॥ जनपदे लुप् ।। ३३० ॥ अ० ४।२।८१ ॥ जहां जनपद अर्थात् देश अभिधेय रहे, वहां उक्त चार अर्थों में जो तद्धितसंज्ञक प्रत्यय होता है, उस का लुप हो। जैसे-पञ्चालानां निवासो जनपदः पञ्चालाः; कुरवः: मन्स्याः; अङ्गाः; बङ्गाः: मगधाःः पुण्ड्राः । इत्यादि ॥ ३० ॥ शेपे ॥ ३३१ ॥ अ० ४ । २ । १२ ॥ यह अधिकार सूत्र है, इस का अधिकार ( तस्यदम् ) इस आगामी सूत्रपर्यन्त जाता | अपत्य आदि और उक्त चार अों से जो भिन्न अर्थ हैं, सो शेष कहाते हैं । इस सूत्र से आगे जो २ प्रत्यय विधान करें सो २ शेप अर्थों में जानो। और यह विधिसूत्र भी है । जैसे-चक्षुषा गृह्यते चानुषं रूपम् श्रावणः शब्दः यदि पिष्टा दार्पदाः सक्तयः वितंडया प्रवर्त्तते वैतंडिकः; उलूखले नुएणः ओलखलो यावकः: अश्रुह्यते श्राश्नो रथः चतुर्भिल्ह्यते चातुरं शकटम् इत्यादि । यहां सर्वत्र यथाप्राप्त प्रत्यय होते हैं ॥३३॥ * यहां (लुपि युक्व० ) इस सूत्र से व्यक्तिवचन अर्थात् लिङ्ग और संग्या प्रत्यय होने से पूर्व के समान प्रत्यय लुप के पश्चात् भी रहते हैं । - - ..
20 श्रेषतादित ------------- । राष्ट्रावारपारा घखौ ॥ ३३२ ।। अ० ४ १२ १२३ !! ओर अवारपार प्रातिपदिको ले यथासंख्य करके य और स्त्र प्रत्यय होवें। जात आदि शेष अयों में और उन २ अधा में जो २ समर्थविभक्ति हो सो२ सर्वत्र जाननी चाहिये । जैसे-राष्ट्रभवो जातो वा राष्ट्रियःः अवारपारीणः ॥ २३२॥ वा०-विगृहीतादपि ॥ ३३३ ।। विगृहीत कहते हैं भिन्न २ को, अर्थात् अवारपार शब्दों से अलग २भी व प्रत्यय हो । जैसे-अबारीणः: पारीएः ॥ ३३३ ॥ वा०-विपरीताच्च ।। ३३४ ॥ पर पूर्व और अवार पर हो तो भी समस्त प्रातिपदिक से म्ब होवे । जैसे- “पारावारीए: ॥ ३३४ ॥ ग्रामाद्यखौ ॥ ३३५ ।। अ०४ १२ १६४ ॥ जात आदि अधों में ग्राम प्रातिपदिक से य और खञ् प्रत्यय हो । जैसे-ग्रामे जातो भवः क्रीतो लब्धः कुशलो वा मान्यः: ग्रामीणः ॥ ३३५॥ दक्षिणापश्चात्पुरसस्त्या ।। ३३६ ॥ अ० ४ । २ । १७ ॥ यह सूत्र दक्षिणा आदि अव्यय शब्दों से त्यप् प्राप्त है, उसका वाधक है ! दक्षिणा आदि तीन अव्यय शब्दों से शेषिक प्रों में न्यक प्रत्यय होवे । जैसे- दाक्षिणात्यः: पाश्चात्यः: पौरस्त्यः ।। ३२० ॥ युप्रागपागुदक्प्रतीचो यत् ॥ ३३७ । अ० ४ १२ । १०० ।। दिन् प्राच् अपाच उदच् और प्रत्यच् प्रातिपदिकों से शेष अर्थों में यत् प्रत्यय हो। जैसे-दिवि भवो दिव्यःः प्रान्भवं प्राच्यम्: अपाच्यम्: उदीच्यम्: प्रतीच्यम् । यह मूत्र प्रण प्रत्यय का अपवाद है। और यहां प्रान् श्रादि अव्यय शब्दों का प्रहरा नहीं है, किन्तु यौगिकों का है। और जहां इनका अव्यय ग्रहण होता है, वहां आगामी सूत्र से व्यु और ट्युत् प्रत्यय होते हैं। जैसे-प्राक्तनम्: प्रत्यक्तनम् इत्यादि ॥ ३३७ ! अव्ययात्त्य ।। ३३८ ।। अ० । २ । १०३ ॥ अन्यय प्रातिपदिकों से शेष अथों में न्यप् प्रत्यय होवे। यह भी स्त्र अण श्रादि अनेक प्रन्ययों का अपवाद है। यहां महाभाष्यकार ने परिगलन किया है कि अमा रह क तथा तसिल और प्रल प्रत्ययान्त इतने ही अव्ययों से त्यप् होवे । जैसे--अमात्यःः इहन्यःः क्वत्यः: ततम्त्य: यतस्त्यः; तत्रत्यः: अत्रत्याः कुत्रत्यः इत्यादि ।
वरव शेषाधिकारः ६५ - यहां परिगएन का प्रयोजन यह है कि - औपरिष्टः: पौरन्तः: पारस्तः इत्यादि प्रयोगों में त्वय् न होवे ३३% बा-त्यग्नेधुंवे ।। ३३६ ॥ नि अव्यय प्रातिपदिक से ध्रुव अर्थ में त्या प्रत्यय होवे। जैन-निरन्तरं सर्व निः ब्रह्म ।। ३३६॥ वा०-निसो गते.॥ ३४० ॥ निस् शब्द से गत अर्थ में त्यप् प्रत्यय होवे । जैले निर्गतो निष्ध्यः ॥ ३४० ॥ वा०-अरण्यागणः ।। ३४१ ।। अरण्य शब्द ले शेष ऋों में ण प्रत्यय होवे । जैसे-अरण्ये भवा श्रारण्या: सुमनसः ।। ३२१॥ वा०-दूरादेत्यः ।। ३४२ ॥ दूर प्रातिपदिक ले शेष त्रयों में एत्य प्रत्यय हो । जैले दूरे नन्धो दूरत्यः ॥ ३४२ ॥ बा०-उत्तरादाहञ् ।। ३४३ ।। उत्तर प्रातिपदिक से शेष अर्थों में ब्राहम् प्रत्यय हो । जैसे-उत्तरे जात श्रोतराहः ॥ १२३॥ वा०-अव्ययात्त्यप्याविष्ट्यस्योपसंख्यानं छन्दसि ।। ३४४ ।। प्राविस् अव्यय प्रातिपदिक से शेष अयों में वेदविषय में त्यम् प्रत्यय हो। जैले- प्राविष्ट्यो वर्धते चाराशु।। ३५४ ॥ वृद्धिर्यत्याचामादिस्तवृद्धम् ।। ३४५ ॥ अ० १ । १ । ७३ ॥ जिस समुदाय के अत्रों के बीच में आदि अच् वृद्धिसंज्ञक हो, अर्थात् आकार पकार और श्रीकार हो, तो वह समुदाय वृद्धसंशक होवे ।। ३८५ ॥ वृद्धाच्छः ।। ३६६ ।। १०४ । २ । ११४ ।। यह सूत्र अप का बाधक है। शेष अथों में वृद्धसंज्ञक प्रातिपदिकों से यणप्रान अत् आदि प्रत्यय हो । जले-शालीयः: मालीयः: औपगीयःः कापटवीयः इत्यादि । (अव्ययात्त्यय; तीरन्प्योत्तरपदा०: उदीच्यग्रामात्र प्रस्योत्तरपद० ) जहां इन सूत्रों ले ये प्रन्यय और वृद्धसंशक तेच प्रत्यय दोनों की प्राप्ति है. वहां परविप्रतिषेध मान के छ प्रत्यय ही होता है। में १
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स्त्रैणताद्धिते
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जैसे-धारात् अव्यय शब्द है, उससे छ हुआ तोप्रारातीयः । वायसतीर
शब्द से अञ् और अय भी पाते हैं, फिर छ ही होता है। जैसे-वायसतीरीयः । इसी
प्रकार रूप्योत्तरपद.माणिरुप्य वृद्ध प्रातिपदिक से परत्व से छ प्राप्त है, उसका भी
अपवाद यकारोफ्ध होने से (धन्वयोपधा०) इससे बुन होता है । जैसे-माणिरूप्यकः ।
पाडवकर्प उदीच्यग्राम अन्तोदात्त प्रातिपदिक से छ प्रत्यय परत्व से होता है। जैसे--
वाडवकर्षीयः । औलूक कोपध वृद्ध प्रातिपदिक से परविप्रतिषेध करके छ होता है।
जैसे-औलूकीयम् ॥ ३४६ ॥
अब इसके आगे वृद्धसंशा में जो विशेष वार्तिक सूत्र हैं, सो लिखते हैं-
वा०-वा नामधेयस्य वृद्धसंज्ञा वक्तव्या ।। ३४७ ।।
जो किसी मनुष्य आदि के नाम हैं, उनकी विकल्प करके वृद्धसंशा होवे । जैसे-
देवदत्तीयाः, देवदत्ताः; यशदत्तीयाः, यावदत्ताः इत्यादि ॥ ३४७ ॥
वा०-गोत्रोत्तरपदस्य च ।। ३४८ ।।
गोत्रप्रत्ययान्त प्रातिपदिक जिनके उत्तरपद में हों, उनकी वृद्धसंज्ञा हो। जैसे-
घृतप्रधानो रौढिः धृतरौढिः, तस्य छात्राः धृतरोढीयाः; श्रोदनप्रधानः पाणिनिरोदनपाणि
निस्तस्य छात्रा प्रोदनपाणिनीयाः; वृद्धाम्भीयाः; वृद्ध काश्यपीयाः इत्यादि ॥ ३४८ ॥
वा०-जिह्वाकात्यहरितकात्यवर्जम् ॥ ३४६ ॥
जिह्वाकात्य और हरितकात्य शब्दों की वृद्धसंज्ञा न हो। गोत्र उत्तरपद होने से
पूर्ववार्तिक से प्राप्त है, उसका निषेध है । जैसे-जैबाकाता:; हारितकाताः ॥ ३४६ ॥
त्यदादीनि च ॥३५० ॥ अ० १ । १ । ७४ ॥
और त्यद आदि प्रातिपदिक भी वृद्धसंशक होते हैं । जैसे-त्यदीयम्। यदीयम् तदी-
यम्; एतदीयम्; इदम यम्; अदसीयम्; त्वदीयम्:मदीयम्; त्वादायनिः;मादायनिः इत्यादि।
यहां सर्वत्र वृद्धसंहा के होने से छ प्रत्यय हो जाता है ॥ ३५० ॥
भवतष्ठक्छसौ ॥ ३५१ ।। अ० ४ । २ । ११५ ॥
शेष अर्थों में वृद्धसंक्षक भवत् प्रातिपदिक से ठक् भोर छस् प्रत्यय हों। जैसे-
भषत इदं भावत्कम् छस् प्रत्यय में सित्करण पदसंछा के लिये है-भवदीयम् ।
इस भवत् शब्द की त्यदादिकों से वृद्धसंज्ञा होके छ प्रत्यय प्राप्त है, उसका यह
माधक दै॥३५१ ॥
शेषाधिकारः ६७ --- ----------- ""- ... - Pawaharwa रोपधेतोः प्राचाम् ॥ ३५२ ।। अ० ४ । २ । १२३ ॥ शेप अर्थों में प्राग्देशवाची रेफोपध और ईकारान्त प्रातिपदिकों से बुञ प्रत्यय हो। जैसे-पाटलिपुत्रकाः; ऐकचक्रकाः । ईकारान्त-काकन्दी-काकन्दकाः; माकन्दी माकन्दकाः। यहां 'प्राचां ग्रहण इसलिये है कि-दात्तामित्रीयः, यहां बुञ् प्रत्यय न हो ॥३५२।। अवृद्धादपि बहुवचनविषयात् ।। ३५३ ।। अ० ४ । २ । १२५ ॥ शेष अर्थों में बहुवचनविषयक वृद्धसंझारहित जो जनपदवाची और जनपद के अय- धिधाची प्रातिपदिकों से बुञ् प्रत्यय हो । जैसे-] वृद्ध जनपद से-अङ्गाः, वङ्गाः, कलिङ्गाः प्राङ्गका; वाङ्गकः; कालिङ्गकः। अवृद्ध जनपदावधि - अजमीढा., अजक्रन्दा: आजमीढकः; श्राजक्रन्दकः । वृद्ध जनपद- दार्वाः, जाम्याः दार्चकः; जाम्बकः । वृद्ध जनपदावधि-कालिजराः, वैकुलिशाः कालि- अरकः, वैकुलिशकः ।। ३५३ ॥ नगरात्कुत्सनप्रावीण्ययोः ।। ३५४ । अ० ४ । २ । १२८ ॥ कुत्सन और प्राधीण्य अर्थात् निन्दा और प्रशंसारूप शेष अर्थों में नगर प्रातिपदिक से पुत्र प्रत्यय हो । [जैसे-] नागरकश्चौरः; नागरकः प्रवीणः । 'कुत्सन और प्रवीणता ग्रहण इसलिये है कि-नागरा ब्राह्मणाः, यहां वुञ् नहो॥३५४|| मद्रवृज्योः कन् । ३५५ ।। अ० ४ । २ । १३१ ॥ शेप अर्थों में मद्र और वृजि प्रातिपदिक से कन् प्रत्यय हो । [जैसे-] मद्रेषु जातः मद्रका, वृषिकः। यहां बहुवचनविषक अवृद्ध जनपद शब्दों से वुन् प्राप्त है, उस का यह अपवाद है ॥ ३५५ ॥ --[ इति द्वितीयः पादः ॥ ] [अथ तृतीयः पाद:-] युष्मदस्मदोरन्यतरस्यां खञ्च ॥ ३५६ ।। अ०४।३ । १ ॥ शेष अर्थ में युप्मद और अस्मद् प्रातिपदिकों से खन और चकार से छ प्रत्यय हो, और अन्यतरस्यां ग्रहण से पक्ष में ययाप्राप्त प्रत्यय हो । जैसे-युष्माकमयं योप्माकीणः; आस्माकीनः; युष्मदीयः; अस्मदीयः; योप्माका; आस्माकः ।। ३५६ ।।
स्त्रैणताद्धिते तस्मिन्नणि च युष्माकास्माको ॥३॥७॥ अ० ४।३।२॥ शेष अर्थों में तस्मिन् नाम खञ् और अण् प्रत्यय परे हो, तो युष्मद और अस्मद शब्द के स्थान में यथासंख्य करके युष्माक और अस्माक आदेश हों। जैसे-योप्माकीणः; आस्माकीनः; योष्माकः; आस्माकः । यहां 'खन और अण प्रत्यय के परे' इसलिये कहा है कि-युष्मदीयः अस्मदीया, यहां छ के परे आदेश न हों ।। ३५७ ।। तवकममका कवचने ॥३५८ ॥ १०४।३।४ ॥ जो एकवचन अर्थात् एक अर्थ की वाचक विभक्ति तथा अण और बन प्रत्यय परे हों, तो युप्मद और अस्मद् शब्द को तवक और ममक आदेश हो। जैसे-तापकीनः मामकीना; तावका; मामकः ।। ३५८ ।। कालाट्ठञ् ॥ ३५६ ।। अ० ४ । ३ । ११ ॥ शेष अर्थों में कालविशेषवाची प्रातिपदिकों से ठञ् प्रत्यय होवे । जैसे-मासिकः; आर्द्धमासिकः; सांवत्सरिकः इत्यादि ॥ ३५६ ।। श्राद्धे शरदः ॥३६० ॥ अ०४।३।१२॥ जो शेष अर्थों में श्राद्ध अभिधेय रहे, तो शरद् प्रातिपदिक से ठञ् प्रत्यय हो। जैसे-शरदि भव शारदिकम्, जो श्राद्ध हो। नहीं तो शारदम्, ऋतुधाची के होने से अण हो जाता है। और यह सूत्र भी अण् का ही अपवाद है ॥ ३६० ॥ सन्धिवेलातुनक्षत्रेभ्योऽण ॥ ३६१ ।। अ० ४ । ३ । १६ ॥ शेष अर्थों में सन्धिवेला आदि गण, ऋतु और नक्षत्रयाची प्रातिपदिकों से अण प्रत्यय हो । जैसे-सन्धिवेलायां लब्धं साधिवेलम्, सान्ध्यम् ! ऋतु-प्रैष्मम् शैशिरम् । नक्षत्र-तैषम् पौपम् । यह सूत्र सामान्यकालवाची से ठञ, प्राप्त है, उसका अपवाद है॥३६१॥ सायंचिरंप्रातेप्रगेऽव्ययेभ्यष्टयुटयुलौ तुट् च + ॥ ३६२ ।। अ० ४।३।२३॥ + यहां सायं तथा चिर ये शब्द मकारान्त, और पाहणे तथा प्रगे ये एकारान्त निपातन किये हैं। और जो ये अस्यय शब्द समझे जावें, तो इनका पाठ सूत्र में व्यर्थ होचे, क्योंकि श्रव्यय के कहने से होही जाता ॥ -- शेषाधिकारः ६६ ८.-rrrr. शेष अयों में सायं विरं प्राहे प्रगे और अभय प्रातिपदिकों से ट्यु और ट्युल प्रत्यय और प्रत्यय को तुटू का आगम भी हो। दिन का जो अन्त है, उस अर्थ में सायं शब्द है। जैसे-साय भवं सायन्तनम्। चिरन्तनम् प्रातनम्: प्रगततम्: दोपातनम् दिवातनम् इदानीन्तनम् अद्यतनम् ॥३६२|| वा०-चिरपरुत्परारिभ्यस्त्नः * ॥ ३६३ ।। चिर पन्त् और परारि इन तीन अव्यय प्रातिपदिकों से न प्रत्यय होवे । जैसे- चिरत्नम्ः परत्नम्: परारित्नम् ॥ ३६३ ॥ वा०-प्रगस्य छन्दसि गलोश्च ।। ३६४ ।। प्रग प्रातिपदिक से वेद में न प्रत्यय और गकार का लोप हो । जैसे-प्रगे भवं प्रत्नम् ॥३६॥ वा०-अग्रादिपश्चाड्डिमच् ।। ३६५ ।। अग्र आदि और पश्चात् इन प्रातिपदिकों से डिमच् प्रत्यय हो। डिप्रकरण यहां टिलोप होने के लिये है। जैसे-अग्रे जातोऽग्रिमः; आदी जात आदिमः; पश्चात् जातः पश्चिमः ॥ ३६५ ॥ वा०-अन्ताच्च ॥ ३६६ ॥ अन्त शब्द से भी डिमच् प्रत्यय हो । जैसे-अन्त भवोऽन्तिमः ॥ ३६६ ॥ तत्र जातः ॥ ३६७ ।। अ०४ । ३ । २५ ।। व श्रादि प्रत्यय जो सामान्य शेष अथों में विधान कर चुके हैं, उनके जात आदि अर्थ दिखाये जाते है । और तन इत्यादि समर्थ विभक्ति जाननी चाहिये । समों में प्रथम सप्तमीसमर्थ प्रातिपदिकों से जो २ प्रत्यय विधान कर चुके हैं, सो२ जात आदि अर्थों में होने । जैसे-चुने जात: चौता; माथुरः; श्रौत्सः; औदपाना; राष्ट्रियः; श्रचारपारीग; शाकलिका प्रायः: ग्रामीणः: कायकः; औम्भेयकः इत्यादि ॥ ३६७ ॥ अविष्टाफल्गुन्यनुराधास्वातितिप्यपुनर्वसुहस्तविशाखाऽऽपाढाव- हुलाल्लुक् ।। ३६८ ॥ अ० ४ । ३ । ३५ ॥ जात श्रादि प्रों में श्रविष्टा श्रादि नक्षत्रवाची शब्दों से विहित तद्धितप्रत्ययों का लुक हो । [जैसे-] श्रविष्ठायां जातः श्रविष्टः; फल्गुनः; अनुराधः; स्वातिः; तिघ्या; : पुनर्वसुः हस्त:; विशाल श्रापाढः; बहुल: । ॥ ३६८ ॥ * यहां पूर्वस्त्र से टयु थुल प्रत्यय प्राप्त है, उनके अपवाद ये वार्तिक समझने चाहिये ।। । यहां अविष्टा आदि शब्दों से तद्धित प्रत्यय का लुक होने के पश्चात् (लुक तद्वितलुकि १२४६) इस मय से नीमन्यय का मी नुक होजाता है । फिर जो ये शब्द स्त्रीलिङ्ग हों तो या होगा। जैसे-अविष्टा ।। . ।
स्त्रैणताद्धिते Pavina वा०-लुक्प्रकरणे चित्रारेवतीरोहिणीभ्यः स्त्रियामुपसंख्यानम् ॥३६६॥ जात अर्थ स्त्री अभिधेय हो, तो चित्रा रेवती और रोहिणी शब्दों से विहित प्रत्यय का लुक् होवे । जैसे-चित्रायां जाता कन्या चित्रा; रेवती; रोहिणी * ॥ ३६६ ।। वा०-फल्गुन्यषाढाभ्यां टानौ ॥ ३७० ॥ पूर्व वार्तिक से स्त्रीलिङ्ग की अनुवृत्ति आती है। फल्गुनी और अषाढा नक्षत्रवाची शब्दों से ट और अन् प्रत्यय यथासंख्य करके हो । जैसे-फल्गुन्यां जाता कन्या फल्गुनी; अशढा । ॥ ३७० !! वा०-अविष्ठाषाढाभ्यां छण ॥ ३७१ ॥ श्रविष्ठा और अपाढा प्रातिपदिकों से छण प्रत्यय हो। जैसे-अविष्टायां जाता: श्राविष्टीयाः; आषाढीयाः ॥ ३७१ ॥ स्थानान्तगोशालखरशालाच्च ॥ ३७२ ।। अ० ४ । ३ ३५ जात अर्थ में स्थानान्त गोशाल और खरशाल प्रातिपदिकों से विहित जो तद्धित प्रत्यय उसका लुक हो । जैसे-गोस्थाने जातो गोस्थानः; हस्तिस्थानः; अश्वस्थान: इत्यादि गोशाल; खरशालः । यहां तद्धितलक होने के पश्चात् शाला शब्द के स्लीप्रत्यय का लुक् होता है ॥ ३७२ ।। वत्सशालाभिजिदश्वयुक्छतभिषजो वा ॥३७३॥ अ०४।३।३६॥ जात अर्थ में वत्सगाला आदि प्रातिपदिकों से परे जो प्रत्यय, उसका लुक विकल्प करके होवे । जैसे-वत्सशालायां जातः वत्सशालः, वात्सशालः; अभिजित्, आभिजितः अषयुक् , अाश्वयुजः; शतभिपक , शातभिपजः ॥ ३७३ ॥ नक्षत्रेभ्यो वहुलम् ॥ ३७४ ।। अ० ४ । ३ । ३७ ॥ अन्य नक्षत्रवाची प्रातिपदिकों से जो प्रत्यय हो, उसका बहुल करके स्लुक होवे । जैसे-रोहिणः, रोहिणः; मृगशिरा, मार्गशीर्षः । बहुलग्रहण से कहीं लुक नहीं भी होता । जैसे-तैपः; पोपः इत्यादि ।। ३७४ ।। * यहां भी पूर्व के समान स्वीप्रत्यय का लुक् होके चित्रा शब्द से टाप और रेवती तथा रोहिणी शाद का गौरादिगण में पाठ होने से डीप् प्रत्यय हो जाता है ॥ यहां भी स्त्रीप्रत्यय का लुक् पूर्ववत् होके ट प्रत्यय के टित होने से फल्गुनी शब्द से ही और भपाठा शब्द से टाप होता है । + इस सूत्र में प्राप्ताप्राप्तविभाषा है, क्योंकि वत्सशाला शब्द से किसी सूत्र करके लुक नहीं पाता, और भमिजित् प्रादि नवनवाचियों से बहुल करके प्राप्त है, उसका विकल्प किया है ।।
शेषाधिकारः ७१ -- ------- in कृतलब्धक्रीतकुशलाः ॥ ३७५ ॥ अ० ४ । ३ । ३८ ॥ कृत आदि प्रों में सब प्रातिपदिकों से यथाविहित प्रत्यय हों। जैसे-त्रुघ्ने कृतो लन्धः क्रीतो वा कुशलः चौनः माथुरः; राष्ट्रियः इत्यादि ।। ३७५. ।। प्रायभावः * ॥ ३७६ ॥ अ०४ । ३ । ३६ ।। बहुधा होने अर्थ में सप्तमीसमर्थ प्रातिपदिकों से यथाविहित प्रत्यय हों। जैसे- बुन्ने प्रायेण भवः नौनः; माथुरः; राष्ट्रियः इत्यादि ।। ३७६ ।। सम्भूते ।। ३७७ ॥ अ० ४ । ३ । ४१ ॥ सम्भव अर्थ में सप्तमीसमर्थ ज्याप् प्रातिपदिकों से यथाविहित प्रत्यय हो । जैसे- बुन्ने सम्भवतिन्नोन्ना;माथुरः; राष्ट्रियः: ग्राम्यः;ग्रामीण शालीयःमानीयः इत्यादि॥३७७।। कालात्साधुपुष्प्यत्पच्यमानेषु ॥ ३७८ ।। अ० ४ । ३ । ४३ ॥ साधु पुष्प्यत् और पच्यमान अर्थों में कालविशेषवाची प्रातिपदिकों से यथाविहित प्रत्यय हों। जैसे-हेमन्ते साधु: हैमन्तं वस्त्रम्; शैशिरमनुलेपनम्: वसन्ते पुष्यम्ति वासन्त्यः कुन्दलताः; अप्म्यः; पाटलाः; शरदि पच्यन्ते शारदाः शालयः, प्रेमा यमाः इत्यादि ॥ ३७॥ उप्ते च ॥ ३७६ ॥ अ०४।३ । ४४ ।। उत्प्त कहते हैं बोने को, इस अर्थ में सप्तमीसमर्थ कालवाची प्रातिपदिकों से यथा- विहित प्रत्यय होठों। जैसे-हेमन्ते उप्यन्ते हेमन्ता इक्षवः ग्रीष्मे उप्यन्ते प्रेमाः शालयः शारदा यवाः इत्यादि ।। ३७६ ॥ आश्वयुज्या बुञ् ॥ ३८० ।। अ०४।३।४५॥ उप्त अर्थ में सप्तमीसमर्थ श्राश्वयुजी प्रातिपदिक से बुञ् प्रत्यय हो । अश्वयुक शब्द अश्विनी नक्षत्र का पर्याय है। उससे युक्तकाल अर्थ में अण हुआ है स्त्रीलिङ्क तिथि का विशेषण है। जैसे-] श्राश्वयुज्यामुप्ता आश्वयुजका ययाः।।३८०॥ देयमृणे ॥ ३८१ ॥ अ० ४ । ३ । ४७ ॥ ऋण देने अर्थ में सप्तमीसमर्थ कालवाची प्रातिपदिकों से यथाविहित प्रत्यय हों। जैस-प्रावृपि देयमणं प्रावृपेण्यम्; वैशाखे देयमृणं वैशाखम्; मासे देयमृणं मासिकम्; आईमासिकम् सांवत्सरिकम् इत्यादि । यहां 'ऋण' ग्रहण इसलिये है कि-मुहूचे देयं भोजनम्, यहां प्रत्यय न हो ॥ ३८१ ।। * प्रायमर उसको कहते है कि जिसके होने का नियम न हो, बहुभा होता होवे ॥
७२ स्त्रैणताद्धिने व्याहरति मृगः ॥ ३८२ ॥ अ० ४ । ३ । ५१ ॥ व्याहरति क्रिया का मृग कर्ता वाच्य रहे, तो सप्तमीसमर्थ कालवाची प्रातिपदिकों से जिस २ से जो २ प्रत्यय विधान किया हो वही २ होवे। जैसे-निशायां व्याहरति मृगः नैशिकः, नैशः, प्रादोषिकः, प्रादोषः *; सायन्तनः इत्यादि ॥ ३८२ ॥ तदस्य सोढम् ॥३८३॥ अ० ४ । ३ । ५२ ।। षष्ठी के अर्थ में सोढ समानाधिकरण प्रथमासमर्थ कालवाची प्रातिपदिकों से यथाविहित प्रत्यय हो। जैसे-निशाऽध्ययनं सोढमस्य छात्रस्य नैशः, नैशिकः; प्रादोषः, प्रादोपिकः, हेमन्तसहचरितं शीतं सोढमस्य हैमन्तः इत्यादि ॥ ३८३ ॥ तत्र भवः ।। ३८४ ।। अ० ४ । ३ । ५३ ।। यहां पूर्वसूत्र से ही तत्र ग्रहण की अनुवृत्ति चली आती, फिर तत्र ग्रहण करने का प्रयोजन यह है कि कालाधिकार की निवृत्ति हो जावे । तत्र अर्थात् वहां हुआ होता वा होगा, इस अर्थ में सप्तमीसमर्थ प्रातिपदिकों से यथाविहित प्रत्यय हों। जैसे-त्रुध्ने भवः सोध्नःअश्वपती भव श्राश्वपतः, श्रौत्सा; दैत्यः; आदित्यः, पृथिव्यां भवः पार्थिवः, वानस्पत्यः; स्त्रैणः; पौंस्नः; माथुरः; राष्ट्रियः इत्यादि ॥ ३८४॥ दिगादिभ्यो यत् ॥ ३८५ ।। अ० ४ । ३ । ५४ ॥ भवार्थ में सप्तमीसमर्थ दिश आदि प्रातिपदिकों से यत् प्रत्यय हो। [जैसे-] दिशि भवं दिश्यम्; वर्म्यम् पूग्यम् इत्यादि । यह सूत्र अण का बाधक है ॥ ३८५ ॥ शरीरावयवाच्च ॥३८६ ॥ अ० ४ । ३ । ५५ ॥ शरीर के अवयव इन्द्रिय आदि प्रातिपदिकों से भवार्थ में यत् प्रत्यय हो। जैसे- तालुनि भवं तालव्यम्; दन्त्यम् ओष्ठ्यम्, हृद्यम्; नाभ्यम्; चक्षुष्यम्; नासिक्यम्. पायव्यम्; उपस्थ्यम इत्यादि । ३८६॥ अव्ययीभावाच्च ॥ ३८७ ॥ अ० ४ । ३ । ५६ ॥ सप्तमीसमर्थ अव्ययीभावसंज्ञक प्रातिपदिकों से भवार्थ में ज्य प्रत्यय हो ॥ ३८७ ॥ वा०-ज्यप्रकरणे परिमुग्वादिभ्य, उपसंख्यानम् ॥ ३८८ ॥ * यहां (निशाप्रदोपाभ्यां च ॥ प्र०४।३.१४) इस पूर्वलिखित सूत्र से उप्न प्रत्यय विकल्प से होता है । इस सूत्र में सहचारोपाधि लीजाती है। क्योंकि काल का सहना क्या है, उस काल में जो विशेष करके हो उसका सहना ठीक है, जैसे हेमन्त ऋतु में शीत विशेष को सह सके वह हेमन्त कहावे ॥ -- . - शेषाधिकारः ७३ सुत्र में जो अव्ययीभाव प्रातिपदिकों का ग्रहण है, उसका नियम इस वात्तिक से किया है कि-परिमुखादि अव्ययीभाव प्रातिपदिकों से ही ञ्य प्रत्यय हो । जैसे- परिमुम्नं भवं पारिमुख्यम्: पार्योष्व्यम्; पारिद्दनव्यम् । यहां 'परिमुखादि का परिगणन' इसलिये है कि-उपकूलं भव औपकूल:; औप- शाला, यहां ज्य प्रत्यय न होवे ॥ ३८॥ अन्तःपूर्वपदाट्ठञ् ॥ ३८६ ॥ अ० ४ । ३ । ६० ॥ पूर्ववार्तिक से परिमुवादि का नियम होने से अण प्राप्त है, उसका बाधक यह सूत्र है। अन्तर् शब्द जिनके पूर्व हो ऐसे अव्ययीभाव प्रातिपदिकों से ठञ् प्रत्यय हो भव अर्थ जैसे-अन्तर्वेश्मनिभवमान्तश्मिकम् प्रान्तःसद्मिकम्: प्रान्तर्गहिकम् इत्यादि ॥३८६॥ का०-समानस्य तदादेश्च अध्यात्मादिषु चेष्यते । ऊर्ध्व दमाच्च देहाच्च लोकोत्तरपदस्य च ॥ ३६० ॥ समान शब्द से और समान शब्द जिनके आदि में हो उन प्रातिपदिकों से ठञ् प्रत्यय होवे । जैसे-समाने भवः सामानिकः । तदादि से-सामानग्रामिकः; सामानर्देशिकः । तथा अध्यात्मादि प्रातिपदिकों से भी ठञ् प्रत्यय होना चाहिये । जैसे-अध्यात्मनि भवमाध्यात्मिकम्: प्राधिदैविकम्ः प्राधिभौतिकम् । मकारान्त ऊर्ध्वम् शब्द जिनके पूर्व हो, ऐसे दम और देह प्रातिपदिकों से ठञ् प्रत्यय हो। जैसे-ऊध्र्व दमे भवमोर्चदमिकम् ; प्रौदेहिकम् । और लोक शब्द जिन के उत्तरपद में हो, उन प्रातिपदिकों से भी ठञ् प्रत्यय हो । जैसे-इह लोके भवमेहलौकिकम्: पारलौकिकम् । अधिदेव, अधिभूत, इहलोक और परलोक ये चार शब्द अनुशतिकादि गण में पढ़े हैं, इससे उभयपदवृद्धि होती है ॥ ३६० ॥ का०-मुखपार्श्वतसोरीयः कुरजनस्य परस्य च । ईयः कार्योऽथ मध्यस्य मण्मीयौ प्रत्ययौ तथा ॥३६१॥ तसिं प्रत्ययान्त मुस्न और पार्श्व प्रातिपदिकों से ईय प्रत्यय होवे । छ के स्थान में ईय आदेश हो जाता, फिर ईय पाद पूर्ण होने के लिये कहा है। जैसे-मुस्रतो भवं मुख- तीयम्: पार्श्वतीयम् । जन और पर प्रातिपदिकों से ईय प्रत्यय और प्रातिपदिकों को कुक् का भागम भी हो । जैसे-जने भवो जनकीयः; परकीयः । * यहां ममंशा के होने से तसन्त अव्यय के दिमाग का लोप हुधा है ॥
७४ स्त्रैणताद्धिते मध्य प्रातिपदिक से ईय मण और मीय प्रत्यय होवें। जैसे--मध्ये भवो मध्यीयः, माध्यमः, मध्यमीय: * ॥ ३६१ ॥ का०-मध्यो मध्यं दिनण चास्मात्स्थाम्नो लुगजिनात्तथा । बाह्यो दैव्यः पाञ्चजन्योऽथ गम्भीराज्य इष्यते ॥३६२॥ मध्य शब्द को "मध्यम्" ऐसा मकारान्त प्रादेश और उससे दिनण प्रत्यय हो । जैले-माध्यन्दिन उपगायति । स्थामन् और अजिन शब्द जिनके अन्त में हों, उन प्रातिपदिकों से विहित प्रत्यय का लुक हो । जैसे-अश्वत्थामनि भवोऽश्वत्थामा । इस शब्द में पृषोदरादि से सकार को तकार हो जाता है । अजिनान्न से-कृष्णाजिने भवः कृष्णाजिनः; उष्ट्राजिनः; सिंहाजिना; व्याघ्राजिनः इत्यादि। जैसे-गम्भीर शब्द से ज्य प्रत्यय होता है, वैसे वाह्य, दैव्य और पाञ्चजन्य इन तीन शब्दों में भी ज्य जानो । वहिस शब्द के टिभाग का लोप हो जाता है ॥ ३६२ ।। जिह्वामूलागुलेश्छः ॥ ३६३ ॥ अ० ४ । ३ । ६२ ॥ यह शरीरावयव से यत् प्राप्त है, उसका बाधक है। भवार्थ में जिह्वामूल और अङ्गुलि प्रातिपदिकों से छ प्रत्यय हो। जैसे--जिह्वामूले भवं जिह्वामूलीयं स्थानम् अङ्गुलीयः ॥ ३६३ ॥ वर्गान्ताच्च ।। ३६४ ॥ अ० ४ । ३ । ६३ ।। भवार्थ में वर्गान्त प्रातिपदिकों से छ प्रत्यय हो। [जैसे-] कवर्गे भवो वर्णः कवर्गीयः; चवर्गीयः; पवर्गीयः इत्यादि ॥ ३६४ ॥ तस्य व्याख्यान इति च व्याख्यातव्यनाम्नः॥३६५॥अ०४।३।६६।। षष्ठी और सप्तमीसमर्थ व्याख्यानव्यनामवाची प्रातिपदिकों से यथाविहित प्रत्यय हो। जैसे-तिङ व्याख्यानो ग्रन्थस्तैङः; सुपां व्याख्यानो ग्रन्थः सोप; बैणः; ताद्धितः; सुप्सु भवं सौपम् तैङम कार्तम् । यहां 'व्याख्यातव्यनाम' ग्रहण इसलिये है कि-पाटलिपुत्रस्य व्याख्यानम्, यहां प्रत्यय न होवे ॥ ३६५॥ बह्वचोऽन्तोदात्ता ॥ ३६६ ॥ अ० ४ । ३ । ६७ ॥ व्याख्यान और भव अर्थ में पष्ठी और सप्तमीसमर्थ बह्वच अन्तोदात्त प्रातिपदिकों से ठत्र प्रत्यय हो । जैसे-पात्वणत्विकः, नातानतिकम् सामासिकः । * गहादिगण में पृथवी मध्य शब्द के स्थान में मध्यम श्रादेश और छ प्रत्यय होके भी मध्यमीप शब्द साधा है, इससे अर्थभेद नानो शब्दमेद तो नहीं है ।।
शेषाधिकारः
७५
यहां 'बदच् ग्रहण इसलिये है कि-सीपम् तेङम् । और 'अन्तोदात्त' इसलिये
कहा है कि-सांहितः। यहां संहिता शब्द गतिस्वर से श्राद्युदात्त है, इसलिये ठञ्
न हुआ ॥ ३२६॥
द्वयवाह्मणर्वप्रथमाध्वर पुरश्चरणनामाख्याताट्ठक् ॥ ३६७ ॥
अ० ४ । ३ । ७२ ॥
भव और व्याख्यान अथों में धच् ऋवर्णान्त ब्राह्मण ऋक् प्रथम अध्वर पुरश्चरण
नाम और श्राख्यात ये जो व्याख्यातव्यनाम प्रातिपदिक हैं. उनसे ठक् प्रत्यय हो ।
जैसे-वेदस्य व्याख्यानो ग्रन्थो वैदिकः; इष्टेयाख्यानः ऐष्टिकः; पाशुकः। ऋव-
चातुहोकः, पाञ्चहातृका; ब्राह्मणिका; आर्चिकः; प्राथमिकः; प्राध्वरिका, पौरश्च-
रणिकः ॥ ३६७ ॥
वा०-नामाख्यातग्रहणं सङ्घातविगृहीतार्थम् ॥ ३९८ ।।
उस सूत्र में नाम और आख्यात शब्दों का ग्रहण इसलिये है कि जिससे समस्त
शब्द से भी ठक् होजावे । जैसे-नामिकः; आख्यातिकः ; नामाख्यातिकः ॥ ३६८ ॥
तत आगतः ॥ ३६६ ॥ अ०४ । ३ । ७४ ॥
आगमन अर्थ में पञ्चमीसमर्थ जयाप् प्रातिपदिकों से यथाविहित प्रत्यय हों। जैसे-
त्रुघ्नादागतः नोना; माथुर :; राष्ट्रियः इत्यादि ॥ ३६६ ॥
विद्यायोनिसम्बन्धेभ्यो वुञ् ॥ ४०० ॥ श्र० ४ । ३ । ७७ ॥
आगमन अर्थ में पञ्चमीसमर्थ विद्यासम्बन्ध और योनिसम्बन्धवाची प्रातिपदिकों
से वुञ् प्रत्यय हो।
जैसे-विद्यासम्बन्ध-उपाध्यायादागतं धनमोपाध्यायकम् शैष्यकम् प्राचार्यकम् ।
योनिसम्बन्ध-पैतामहकम्: मातामहकम्, मातुलकम्: श्वाशुरकम् इत्यादि ॥ ४०० ॥
तष्ठञ् ॥ ४०१ ॥ अ० ४ । ३ । ७८ ॥
पंचमीसमर्थ ऋकारान्त विद्यासम्बन्ध और योनिसम्बन्धवाची प्रातिपदिकों से
आगत अर्थ में ठञ् प्रत्यय हो। जैसे-विद्यासम्बन्ध-होतुरागतः पुरुपो होतृकः;
पैतृकम् । योनिसम्बन्ध-भ्रातृकम्; स्वासकम्: मातृकम् ।
अकारान्त वृद्धप्रातिपदिकों से भी परविप्रतिषेध मान के छ प्रत्यय को बाध के ठञ्
ही होता है । जैसे-शास्तुरागतं शास्तृकम् इत्यादि ॥ ४०१ ॥
७६ स्त्रैणताद्धिते पितुर्यच्च ॥ ४०२ ॥ अ० ४ । ३ । ७६ ॥ अागत अर्थ में पितृ प्रातिपदिक से यत् और ठञ् प्रत्यय हो। जैसे-पितुरागतं पित्र्यम्, पैतृकम् ॥ ४०२:॥ गोत्रादकवत् ॥ ४०३ ॥ अ० ४ । ३ । ८० ।। गोत्रप्रत्ययान्त प्रातिपदिकों से अङ्कवत् अर्थात् जैसे-अङ्क अर्थ में औपगशानामङ्कः प्रोपगवकः; कापटवकः; नाडायनका; चारायणकः इत्यादि में बुञ् प्रत्यय होता है, ऐसे ही औषगवेभ्य भागतम् औपगवकम्: कापटवकम् नाडायनकम्; चारायणकम् इत्यादि में भी वुञ् होवे १४०३॥ हेतुमनुष्येभ्योऽन्यतरस्यां रूक्ष्यः ॥४०४॥ अ० ४ । ३ । ८१ ॥ अागत अर्थ में हेतु और मनुष्यवाची प्रातिपदिकों से विकल्प करके रूप्य प्रत्यय हो । जैसे-गोभ्यो हेतुभ्य श्रागतं गोरूप्यम्, पक्ष में गव्यम्; समादागतं समरुप्यम्, समीयम् विषमरूप्यम्, विषमीयम् । मनुष्य-देवदत्तरुप्यम्, देवदत्तीयम्, देवदत्तम्; यज्ञदत्तरूप्यम्, यज्ञदत्तीयम्, याज्ञदत्तम् ॥ ४०४ ।। मयट् च ॥ ४०५ ।। अ० ४ । ३ । ८२ ॥ आगत अर्थ में हेतु और मनुष्यवाची प्रातिपदिकों से मयट् प्रत्यय हो। जैसे-~- सममयम् विपममयम् देवदत्तमयम् यज्ञदत्तमयम् ।। टकार जीप होने के लिये हैन्सममयी ॥ ४०५ ॥ प्रभवति ॥ ४०६ ।। अ०४ । ३ । ८३ ॥ उसले जो उत्पन्न होता है,इस अर्थ में पंचमीसमर्थ शब्दों से यथाविहित प्रत्यय हों। जैसे - हिमवतः प्रभवति हैमवती गङ्गा; दारदी सिन्धुः ॥ ४०६ ॥ 1 विदूराज्ञ्यः ।। ४०७ ॥ अ० ४ । ३ ८४ ॥ पूर्वोक्त अर्थ में विदूर प्रातिपदिक से ञ्य प्रत्यय हो। जैसे-विदूरात्प्रभवति वैदूरयों मणिः ॥ १०७॥ का०-वालवायो विदूरं वा प्रकृत्यन्तरमेव वा। न वै तत्रेति चेद् याज्जित्वरीबदुपाचरेत् ।। ४०८ ।। लोक में जिस मणि को वैदूर्य कहते हैं, वह पालवाय नामक पर्वत से उत्पन्न होता '1 विदूर शब्द नगर और पर्वत दोनों का नाम है। परन्तु विदूर नगर में उस मणि का .
शेषाधिकारः ७७ --- ----- -- संस्कार किया जाता है। इसलिये यह विचार करना चाहिये कि विदूर शब्द से प्रभव अर्थ में प्रत्यय क्यों होता है ? वैदूर्यमणि तो वालवाय पर्वत से उत्पन्न होता है। इसका समाधान यह है कि वालवाय शब्द के स्थान में विदूर आदेश जानो, अथवा वालवाय का पर्यायवाची विदूर शब्द भी है। अब सन्देह यह रहा कि वालवाय पर्वत के समीप रहनेवाले वालवाय को विदूर नहीं कहते, फिर पर्यायवाची क्यों कर हो सकता है ? इसका समाधान यह है कि-जैसे वाराणसी को वैश्य लोग 'जिन्वरी' कहते हैं। वैसे ही वैयाकरण लोग परम्परा से वालवाय को विदूर कहते चले आये हैं ॥ १० ॥ तद्गच्छति पथिदूतयोः ॥ ४०६ ॥ अ० ४ । ३ । ८५ ॥ 'उसको जाता है इस अर्थ में द्वितीयासमर्थ प्रातिपदिकों से यथाविहित प्रत्यय हों, जो गच्छति क्रिया के पन्या और दूत कर्त्ता वाच्य हों तो। जैसे-त्रुघ्नं गच्छति नानः पन्धा दूतो वाः माथुरः; पाठशालां गच्छति पन्धा दूतो वा पाटशालीयः * इत्यादि ॥ 2०६ ।। अभिनिष्कामति द्वारम् ।। ४१० ।। अ० ४ । ३ । ८६ ॥ जो अभिनिष्काम ति क्रिया का द्वार का वाच्य रहे, तो द्वितीयासमर्थ प्रातिपदिकों से यथाविहित प्रत्यय हों। जैसे-त्रुघ्नमभिनिष्क्रामति द्वारं नौनम्; माथुग्म्ः राष्ट्रियम्; वाराणसीमभिनिष्कामति वाराणसेयम्: ऐन्द्रप्रस्थम्; लावपुरम् इत्यादि। यहां द्वार ग्रहण इसलिये है कि-मथुरामभिनिष्क्रामति पुरुषः, यहां प्रत्यय न हो ॥४१०॥ अधिकृत्य कृते ग्रन्थे ॥ ४११ ॥ अ० ४ । ३ । ८७ ॥ जिस विषय को लेके ग्रन्थ रचा जावे, उस अर्थ में द्वितीयासमर्थ प्रातिपदिकों से यथाविहित प्रत्यय हों । जैसे-सुभद्रामधिकृत्य कृतो ग्रन्थः सौभद्रः; गौरिमित्रः; यायातः; शरीरमधिकृत्य कृतो ग्रन्थः शारीरः; वर्णाश्रममधिकृत्य कृतो ग्रन्थो वार्णाश्रमः; कारकम- धिकृत्य कृतो ग्रन्यः कारकीयः इत्यादि ॥ ४११ ।। सोस्य निवासः ॥ ४१२ ।। अ० ४ । ३ । ८६ ॥ 'वह इसका निवासस्थान है, इस अर्थ में प्रथमासमर्थ जयाप् प्रातिपदिकों से यथा- विहित प्रत्यय हों। जैसे-त्रुघ्नो निवासोऽस्य पुरुषस्य स नोना; माथुरः; राष्ट्रियः; वाराणसी निवासोऽस्य वाराणसेयः; ग्राम्यः; ग्रामीणः ॥ १२ ॥ * वाराणसी गच्छति पन्या दूतो वा धाराणसेयः। वाराणसी शब्द का न्यादिगण में पाठ होने से हा प्रत्यय हो जाता है। --- ७८ बैणताड़िते PRAM-PAPrrrr. -- अभिजनश्च : ॥ ४१३ ।। अ० ४ । ३ । ६० ।। 'वह इसका उत्पत्तिस्थान है,' इस अर्थ में प्रथमासपर्थ प्रातिपदिकों से यथाविहित प्रत्यय हों। [जैसे-] त्रुघ्नोऽभिजनोऽस्य नोनामाथुरः; राष्ट्रियः; इन्द्रप्रस्थोऽभिजनोऽस्य ऐन्द्रप्रस्थः; ग्राम्यः; ग्रामीणः ॥ ४१३ ॥ आयुधजीविभ्यश्छः पर्वते ॥ ४१४ ॥ अ०.४ । ३ । ६१ ।। आयुधजीवि अर्थात् शस्त्रास्त्रविद्या से जीविका करनेहारे वाच्य रहें, तो प्रयमासमर्थ पर्वतवाची प्रातिपदिकों से अभिजन अर्थ में छ प्रत्यय होवे । जैसे -हृदगोलः पर्वतोऽभि- जन एषां ते हृद्गोलीया आयुधजीविनः; रैवतकीया:; वालवायीयाः इत्यादि । यहां 'आयुधजीवियों' का ग्रहण इसलिये है कि-ऋक्षोदः पर्वतोऽभिजनमेषामा- क्षोंदा ब्राह्मणाः । और 'पर्वत' ग्रहण इसलिये है कि लाङ्काश्यमभिजनमेषां ते साका- श्यका प्रायुधजीविनः, यहां छ प्रत्यय न होवे ॥ १४ ॥ भक्तिः : ॥ ४१५ ।। अ० ४ । ३ । ६५ ॥ भक्तिसमानाधिकरण प्रथमासमर्थ प्रातिपदिकों से पष्टी के अर्थ में यथाप्राप्त प्रत्यय हो । जैसे-ग्रामो भक्तिरस्य ग्रामेयकः; ग्राम्यः; ग्रामीणः; राष्ट्रिया; माथुरः इत्यादि ॥४१॥ अचित्ताददेशकालाट्ठक् ॥ ४१६ ।। अ० ४ । ३ । ९६ ॥ 'वह इसका सेवनीय है', इस अर्थ में प्रथमासमर्थ जो देश और काल को छोड़ के अचेतनवाची प्रातिपदिक हैं, उनले उक् प्रत्यय हो । जैसे-अपूपा भक्तिरस्य आपूपिक:: शाकुलिका, पायसिकः; साक्तुकः । यहां 'अचित्त' ग्रहण इसलिये है कि-देवदत्तः । 'अदेश इसलिये है कि-स्रोन्नः । और 'अकाल' इसलिये है कि-प्मः, यहां भी ठक् न हो ॥ ४१६ ॥ जनपदिनां जनपदद्वत्सर्वं जनपदेन समानशब्दानां वहुवचने ॥४१७॥ अ० ४ । ३ । १०० ।। बहुवचन में जनपद नाम देशवाची शब्दों के तुल्य जो जनपदि अर्थात् देश के स्वाम क्षत्रियवाची शब्द हैं, उनको जनपदवत् नाम (जनपदतवध्योश्च ) इस प्रकरण में जो प्रत्यय विधान कर चुके हैं, वे ही प्रत्यय भक्तिप्तमानाधिकरण उन क्षत्रियवाची शब्दों से यहां होवें। जैसे-अङ्गा जनपदो भक्तिरस्य स आङ्गकः; वाहका; सोह्मकः इत्यादि । + निवास और अमिजन में इतना मेद है कि जहां वर्तमानकाज्ञ में रहते हो उसको निवास, और जहां पिता दादे प्रादि कुटुम्ब के पुरुष रहे हों उसको अमिजन कहते हैं ।
शेषाधिकारः
ArANamr-~-~~-A-."--
'जनपदी क्षत्रियों का ग्राण इसलिये है कि-पञ्जाला ब्राह्मणा भक्तिरस्य स पाजाल:,
यहां बुज न हो। 'सर्व' शब्द का ग्रहण इसलिये है कि-प्रकृति भी जनपद के समान
हो जावे। जैसे-मद्राणां वृजीणां वा राजा माद्रः; वार्यः; माद्रो भक्तिरस्य स मद्रका;
वृजिकः । (मद्रबृज्यो:कन् ) इससे कन् प्रत्यय प्रकृति को ह्रख होने से होता है ॥१७॥
तेन प्रोक्तम्
॥ ४१८ ॥ अ० ४ । ३ । १०१ ।।
'उसने जो कहा इस अर्थ में तृतीयासमर्थ प्रातिपदिकों से यथाविहित प्रत्यय हो ।
जैसे-उत्सेन प्रोक्तमोत्सम्: दैत्यम्; आदित्यम्: प्रजापतिना प्रोक्तं प्राजापत्यम्; स्त्रिया
प्रोक्तं णम्: पोस्नम् पाणिनिना प्रोक्तं व्याकरणं पाणिनीयम्; काशकृत्स्नम काणादम्।
गौतमम् इत्यादि ॥ १८ ॥
पुराणप्रोक्तेषु ब्राह्मणकल्पेषु ॥ ४१६ ।। अ० ४ । ३ । १०५ ।।
प्रोक्त अर्थ में जो प्राचीन लोगों के कहे ब्राह्मण और कल्प वाच्य हों, तो तृतीया-
समर्थ प्रातिपदिकों से णिनि प्रत्यय हो।
जैसे-पुराणेन चिरन्तनेन मुनिना भञ्जवेन प्रोक्ता भालविनः; शाट्यायनिनः;
ऐतरेषिणः । कल्पों में-पैङ्गी कल्पः; आरुणपराजी कल्पः इत्यादि ॥ ४१६ ॥
वा०-याज्ञवल्क्यादिभ्यः प्रतिषेधः ॥ ४२० ॥
याचवल्क्य आदि शब्दों से णिनि प्रत्यय न होवे, पुराणप्रोक्त होने से प्राप्त है।
[जैसे-] याज्ञवल्क्येन प्रोक्तानि ब्राह्मणानि याज्ञवल्क्यानि; सौलभानि इत्यादि, यहां
अण् प्रत्यय होता है।
काशिकाकार जयादित्य आदि लोग इसको नहीं समझे। इसीलिये यह लिखा है
कि यामवलकादि ब्राह्मण पुराणप्रोक्त नहीं, किन्तु पीछे बने हैं। सो महाभाष्य के
विरुद्ध होने से मिथ्या समझना चाहिये ॥ ४२० ॥
तेनेकदिक् ॥ ४२१ ।। अ० ४ । ३ । ११२ ॥
एकदिक् नाम तुल्यदिक् अर्थ में तृतीयासमर्थ प्रातिपदिकों से यथाविहित प्रत्यय
हो। जैसे-वृक्षणकदिक वार्तः; धाराणस्या एकदिक् वाराणसेयो ग्रामः; सुदान्नैकदिक्
सौदामनी विद्युत् हिमवतैकदिक् हैमवती इत्यादि ॥ ४२१ ॥
तलिश्च ।। ४२२ ॥ अ० ४ । ३ । ११३ ॥
एकदिक अर्थ में तृतीयासमर्थ प्रातिपदिकों से तसि प्रत्यय भी हो ।
तसि प्रत्यय की अव्ययसंज्ञा जाननी, स्वरादिगण में पाठ होने से । [जैसे-]
नासिकया एकदिक् नासिकातः; सुदामतः, हिमवत्ता; पीलुमूलतः इत्यादि ॥ ४२२ ॥
स्त्रैणताद्धिते ८० -MAP उरसो यच्च ॥ ४२३ ॥ अ० ४ । ३ । ११४ ॥ तेनैकदिक् इस विषय में उरस् प्रातिपदिक से यत् और चकार से तसि प्रत्यय भी हो । जैसे-उरसा एकदिक उरस्यः, उरस्तः ॥ ४२३ ॥ उपज्ञाते ॥ ४२४ ।। अ० ४ । ३ । ११५ ॥ उपक्षात अर्थ में तृतीयासमर्थ प्रातिपदिकों से यथाविहित प्रत्यय हों। जैसे- पाणिनिनोपज्ञातं पाणिनीयं व्याकरणम्: पातञ्जलं योगशास्त्रम्; काशकृत्स्नम्; गुरु- लाघवम् प्रापिशलम् । जो अपने आप जाना जाय उसको 'उपक्षात' कहते हैं, अर्थात् विद्यमान वस्तु को जानना चाहिये ॥ ४२४ ।। कृते ग्रन्थे ॥ ४२५ ॥ अ० ४ । ३ । ११६ ॥ 'जो किया जावे, सो ग्रन्थ होवे तो', इस अर्थ में तृतीयासमर्थ प्रातिपदिकों से यथा- विहित प्रत्यय हो । जैसे-वररुचिना कृताःवाररुचाः श्लोकाः; मानवो ग्रथः; भार्गवो ग्रंथः । यहाँ 'प्रन्थ' ग्रहण इसलिये है कि कुलालकृतो घटः, यहां प्रत्यय न हो ॥ ४२५ ॥ तस्येदम् ॥ ४२६ ॥ अ० ४ । ३ । १२० ॥ 'उसका यह है', इस अर्थ में पष्ठीसमर्थ प्रातिपदिकों से यथाविहित प्रत्यय हों। जैसे-वनस्पतेरयं दण्डो वानस्पत्यःः राज्ञः कुमारी राजकीया, राजकीयो भृत्या, यहां ( राक्षः क च ) इससे ककारादेश हो जाता है; उपगोरिदम् श्रीपगम्: कापटपम्; राष्ट्रियम्; अवारपारीणम् देवस्येदं देवम्, देव्यम् इत्यादि ॥ ४२६ ॥ वा०-वहेस्तुरणिट् च ।। ४२७ ।। तृच् प्रत्ययान्त वह धातु से अण प्रत्यय और प्रत्यय को इट् का पागम भी हो । जैसे-संवोढुः स्वं सांवहित्रम् ॥ ४२७ ॥ वा०-अग्नीधः शरणे रञ् भ च ॥ ४२८ ।। शरण नाम घर अर्थ में, अग्नीध प्रातिपदिक से रञ् प्रत्यय और प्रत्यय के परे पूर्व की भसंशा भी जाननी चाहिये । जैसे-श्राग्नीधः शरणम् प्राग्नीध्रम् ॥ ४२८ ॥ वा०-समिधामाधाने षेण्यण ॥ ४२६ ॥ समिध प्रातिपदिक से आधान पष्ठी का अर्थ होवे, तो पेरायण प्रत्यय होवे। पित्करण जीप् प्रत्यय होने के लिये है। [जैसे-] सामिधेन्यो मन्त्रः, सामिधेनी ऋक् ॥ ४२६ ॥ .
शेषाधिकार १ AAP-1. ....orror -"--. द्वन्द्वाद् बुन् वैरमैथुनिकयोः ॥ ४३० ।। अ० ४ । ३ । १२३ ।। जिन २ का परस्पर वैर और योनिलम्बन्ध हो, उनके वाची द्वन्द्वसमास किये प्रातिपदिकों से बुन् प्रत्यय हो स्वार्थ में ! [जैसे-] वैद्धन्द्ध से-अहिनकुलिका, वृद्ध प्रातिपदिकों से भी परत्व ले बुन् होता है। जैसे-काकोलुकिका; श्वावराहिका । मैयुनिकद्वन्द्व से-गर्गकुशिकिका; अत्रिभरद्वाजिका इत्यादि । यहां लिंगानुशासन की रीति से नित्य ब्रीलिंग होता है ॥ ४३० ॥ वा०-वैरे देवासुरादिभ्यः प्रतिषेधः ।। ४३१ ।। वैर अर्थ में देवासुर आदि प्रातिपदकों से बुन् प्रत्यय न हो, किन्तु अण् ही होवे । जैसे-देवासुरम् राक्षोऽसुरम् इत्यादि । ४३१ ।। गोत्रचरणाद् वुज्ञ ॥ ४३२ ॥ अ० ४ । ३ । १२४ ॥ गोत्रवाची और चरणवाची प्रातिपदिकों से बुञ् प्रत्यय होवे ॥ ४३२ ॥ वा०-चरणाद्धर्माम्नाययोः ॥ ४३३ ॥ गोत्रवाधियों से सामान्य षष्टी के अर्थ में और चरणवाचियों से धर्म तथा प्रान्नाय विशेष अर्थो में बुञ् प्रत्यय समझो । जैसे-गोत्र ले-लुचुकायनेरिदं ग्लोचुकायनकम्; वृद्धप्रातिपदिकों से भी परत्व से बुञ् ही होता है। जैसे-गार्गकम्; वात्सकम् इत्यादि । चरणवाचियों से-कठानां धर्म श्रान्नायो वा काठकम्; मोदकम् पेप्पलादकम्; काला- पकम् इत्यादि। अधिकार होने से अण् पाता है, उसका यह वाधक है ॥ ४३३ ॥ सङ्घाङ्कलक्षणेष्वज्यभिज्ञामण् ।।४३४॥ अ० ४ । ३ । १२५ ॥ पूर्व सूत्र से बुञ् प्रत्यय प्राप्त है, उसका यह अपवाद है। अनन्त यनन्त और इजन्त पष्टीसमर्थ गोत्रवाची प्रातिपदिकों से सम्बन्ध सामान्य अधों में अण् प्रत्यय होवे । जैसे-विदानां सङ्घोऽको लक्षणं वा वैदा और्वः । यजन्त से-गणां सड़योऽको लक्षणं वा गार्गः: वात्सः । इअन्त ले-दाक्षः; लाक्षः ॥ ३४ ॥ वा०-सवादिषु घोषग्रहणम् ॥ ४३५ ॥ सय आदि प्रों में जो प्रत्यय कहे हैं, वे घोष अर्थ में भी उन्हीं प्रातिपदिकों से हो । जैसे-गागों घोष वात्सो घोषः; दाक्ष लाक्षो वा इत्यादि ॥ ४३५ ॥ - - ६२ वैणताद्धिने शकलाद्वा ॥ ४३६ ॥ अ० ४ । ३ । १२८ ।। इस सूत्र में प्राप्तविभाषा इसलिये समझना चाहिये कि शकल शब्द गर्गादिगण में पढ़ा है, उसके यान्त होने से पूर्व सूत्र से नित्य प्रण प्राप्त है, उसका विकल्प किया है। षष्ठीसमर्थ गोत्रप्रत्ययान्त शकल प्रातिपदिक से विकल्प करके अण प्रत्यय होवे, और पक्ष में गोत्रवाची से वुञ् समझना चाहिये । [जैसे-] शाकल्यस्य सङ्घोऽङ्को लक्षणं घोपो वेति शाकलः, शाकलकः । इस सूत्र पर काशिका और सिद्धान्तकौमुदी रचने और पढ़ने वाले लोग कहते हैं कि (शाकलाद्वा ) ऐसा सूत्र होना चाहिये । वे लोग शकल शब्द से प्रोक्त अर्थ में अण करके इस शकत शब्द को चरणाची मानते और संघादि पथों में निर्वचन करके प्रत्यय करते हैं, सो यह उन लोगों का अर्थ मिथ्या है। क्योंकि जो (शाकलाद्वा) सूत्र मानें तो शकल प्रातिपदिक चरणवाची हुश्रा, फिर उससे संधादि अर्थों में कैसे प्रत्यय होगा, यह कथन पूर्वापर विरुद्ध है। क्योंकि चरणवाचियों से धर्म और पाम्नाय अर्थ में प्रत्यय कहे हैं। और महाभाष्य से भी विरुद्ध है। महाभाष्यकार पतसलि मुनि बहुत स्थलों में शाकल्य के सूत्र को शाकल लिखते हैं, फिर चरणयाची होगा तो लक्षण अर्थ में शाकल्य शब्द से क्यों प्रत्यय हो सकेगा ॥ ४३६ ॥ - रैवतिकादिभ्यश्छः ॥ ४३७ ॥ अ० ४ । ३ । १३१ ॥ यहां गोत्रवाचियों से वुञ् प्रत्यय प्राप्त है, उसका यह अपवाद है। रैवतिकादि प्रातिपदिकों से सम्बन्ध सामान्य अर्थ में छ प्रत्यय होवे । जैसे-रैवति- कानामयं संघो घोषो वा रैवतिकीयः; स्वापिशीयः; क्षमवृद्धीयः इत्यादि ॥ ४३७ ॥ वा०-कौपिजलहाास्तपदादण् ॥ ४३८ ।। यहां भी गोत्रप्रत्ययान्तों से वुञ् प्राप्त है, उसका वाधक यह वार्तिक है। कौपिचल और हास्तिपद प्रातिपदिकों से सम्बन्ध सामान्य अर्थ में अण् प्रत्यय होवे । जैसे-कौपिनलस्य संघः कौपिचलः; हास्तिपदः ॥ ४३८ ॥ . वा०-आथर्वणिकस्येकलोपश्च * ॥ ४३६ ॥ * अथर्वन् शब्द वसन्तादि गण में पड़ा है, उससे श्रधीत वेद अर्थ में ठक होता है । अथर्वाणम- धोते वेद वा प्राथणिकः । और यह चरणवाची शब्द होने से वुल् प्रत्यय प्राप्त है, उसका यह वार्षिक अपवाद है। (कौपिजल० ) और ( प्राथर्व० ) ये दोनों वार्तिक काशिका श्रादि पुस्तकों में सून्न करके लिखे और व्याख्यान भी किये हैं । सो जो ये सूत्र ही होते तो महाभाप्य में वार्तिक क्यों पढ़े जाते । और कैयट ने भी लिखा है कि सूत्रों में पाठ अपाणिनीय है । इससे निश्चय होता है कि कैयट के समय से पूर्व ही किसी ने मूर्खता से सूत्रों में लिख दिये हैं ।
विकारावयत्राधिकारः ८३ पूर्व वार्तिक से अण प्रत्यय की अनुवृत्ति चली आती है। आथर्वणिक शब्द से धर्म तथा आन्नाय अर्थ में अण् प्रत्यय और उसके इक भाग का लोप होवे । जैसे-पाथर्वणिकस्य धर्म आनायो वा आथर्वणः ॥ ४३६ ॥ तस्य विकारः ॥४४०॥ अ० ४ । ३ । १३४ ॥ विकार अर्थ में षष्ठीसमर्थ प्रातिपदिकों से यथाप्राप्त प्रत्यय हो । जैसे-अश्मनो विकार आश्मनः, प्राश्मः; भस्मनो विकारो भास्मनः, भारम: मार्तिक वनस्पतेर्विकारो दरडो वानस्पत्यः इत्यादि ॥ ४१० ॥ अवयवे च प्राण्योषधिवृनेभ्यः । ॥४४१॥ अ० ४ । ३ । १३५ ॥ विकार और अवयव अर्थ में प्राणी ओयधि और वृक्षवाची प्रातिपदिकों से यथा- विहित प्रत्यय हों, परन्तु प्राणिवाची शब्दों से इसी प्रकरण में आगे अञ् कहेंगे। जैसे [प्राणिवात्री]-कपोतस्य विकारोऽवयवो वा कापोतः; मायूरः; तैत्तिरः । श्रोपधिवाची-लपदस्य विकारोऽवययो वा लावङ्गम् देवदारम्; निर्वश्या विकारोऽवयवो वा नैर्वश्यम् । वृक्षवाची-नदिरस्य विकारोऽवयवो वा खादिरम्; घाई रम्; कारीरं काण्डम्, कारीरं भस्म इत्यादि ॥ ४४२ ॥ मयड् वैतयोर्भापायामभक्ष्याच्छादनयोः ॥४४२॥ अ० ४।३।१४३॥ विकार और अवयव अर्थ में लौकिकप्रयोगविषयक प्रकृतिमात्र से मयट् प्रत्यय विकल्प करके हो, भक्ष्य और आच्छादन अर्थ को छोड़के । [जैसे - ] अश्ममयम्, आश्मनः; मूर्वामयम्, मौर्वम्: वनस्पतेर्विकारो वनस्पतिमयम्, वानस्पत्यम् । यहां 'भाषा' ग्रहण इसनिये है कि-चल्वः स्वादिरो वा यूपः स्यात्, यहां मयट न हो । और 'अभक्ष्याच्छादन ग्रहण इसलिये है कि-मौद्गः सूपः; कार्पासमाच्छादनम्, यहां भी मयट न होवे ॥ ४४२ ॥ नित्यं वृद्धशरादिभ्यः ॥ ४४३ ।। अ० ४ । ३ । १३६ ।। यहां नित्यग्रहण विकल्प की निवृत्ति के लिये है। । इस सूत्र में उस ग्रहण की अनुवृत्ति (तस्येदम् ) इस सूत्र से चली आती, फिर तस्य ग्रहण का प्रयोजन यह है कि यहां से पूर्व २ शेषाधिकार की समाप्ति समझी नावे, अर्थात् विकार अवयव प्रादि प्रयों में घ प्रादि प्रत्यय न होवे । और यह प्रकरण सामान्य पट्यर्थ का बाधक है । : यह सूत्र नियमार्थ होने के लिये पृथक् किया है कि इस प्रकरण में प्राणी श्रोपधि और वृक्षवाची प्रातिपदिकों से विकारावयव दोनों अर्थों में, और अन्य शब्दों से केवल विकार अर्थ में ही प्रत्यय हो. - - और ये दोनों सूत्र अधिकार के लिये है ॥
स्त्रैणताद्धिते -ne --------ram 4. भक्ष्य और आच्छादनरहित विकार और अषयव अर्थ हों, तो षष्ठीसमर्थ वृद्धसंक्षक और शरादिगण प्रातिपदिकों से लौकिक प्रयोगों में मयट् प्रत्यय नित्य ही होवे। जैसे-आम्रस्य विकारोऽवयवो वा अाम्रमयम्; शालमयम्; शाकमयम्: तालमयम् इत्यादि, यहां वृद्धपातिपदिकों से छ प्रत्यय प्राप्त है, उसका वाधक मयट है। शरादि- शरमयम् दर्भमयम् इत्यादि ॥ ४४३ ॥ जातरूपेभ्यः परिमाणे ॥ ४४४ ॥ अ० ४ । ३ । १४६ ॥ जातरूप शब्द सुवर्ण का पर्यायवाची है। बहुवचन निर्देश से सुवर्णवाचकों का ग्रहण होता है। परिमाण विकार अर्थ होवे, तो सुवर्णवाची प्रातिपदिकों से श्रण प्रत्यय होवे । जैसे-अष्टापदस्य विकार श्राष्टापदम् जातरूपम्; सौवर्णम् रोक्नम् इत्यादि । यहां 'परिमाण' ग्रहण इसलिये है कि-सुवर्णमयः प्रासादः, यहां अणु प्रत्यय न हो । यह मयट का अपवाद है ॥ ४४४ ॥ प्राणिरजतादिभ्योऽञ् ॥ ४४५ ॥ अ० ४ । ३ । १५० ॥ यह प्रण का अपवाद है। पष्ठीसमर्थ प्राणिवाची और रजतादि प्रातिपदिकों से अञ प्रत्यय हो, विकार और अवयव अर्थों में । [जैसे-]-प्राणी- कपोतस्य विकारः कापोतम् मायूरम्; तैत्तिरम् । रजतादि-राजतम्; सैसम्; लोहम् इत्यादि ॥ ४४५ ॥ क्रीतवत्परिमाणात् ॥ ४४६ ॥ अ० ४ । ३ । १५२ ।। जिस २ परिमाणवाची प्रातिपदिक से क्रीत अर्थ में जो २ प्रत्यय होता है, उसी २ प्रातिपदिक से वही २ प्रत्यय यहां विकार अवयव अर्थ में होवे। जैसे-निष्केण क्रीतं नैकिकम् होता है, वैसे ही-निष्कस्य विकारो नैष्किक; शल्यः, शतिका; द्विनिष्का, द्विनैष्किकः इत्यादि ॥ ४४६ ॥ फले लुक् ॥ ४४७ ॥ अ०४।३। १५६ ।। विकारावयव फल अर्थ अभिधेय हो, तो विहित प्रत्यय का लुक् होवे। जैसे-श्राम- लक्याः फलम् आमलकम्:वदाः फलानि बदराणि, कुबलकम् विम्त्रम् इत्यादि॥४४७॥ लुप् च + ॥ ४४८ ॥ अ० ४ । ३ । १६२ ॥ * यहां सर्वत्र तद्धित प्रत्यय का लुक होने के पश्चात् ( लुक् तद्वितलुकि ) इस सूत्र से मीप्रत्यय का भी लुक हो जाता है । + यहां पूर्व सूत्र से लुक प्राप्त है, फिर लुविधान इसलिये है कि (लुपि युकव.) इससे निज और वचन भी युववत् हो जावें, नहीं तो फल का विशेषण नपुंसकलिङ्ग होता ।
ठगधिकारः ५ ------- --------- ---..." जम्बू प्रातिपदिक से विहित विकारावयव प्रत्यय का विकल्प करके लुप होवे । जैसे-जान्बा विकारः फलं जम्बूः फलम् ॥ २४ ॥ वा०-फलपाकशुषामुपसङख्यानम् ॥ ४४६ ॥ जिन गैहूँ जो धान आदि फलों के पकने के समय में उनके वृक्ष सूख जाते हैं, उनसे भी विहित विकारावयव प्रत्यय का नित्य लुप् होवे। जैसे-व्रीहीणां फलानि ब्रीहयः; गोधूमा; यवाः; माषाः; तिला; मुद्राः; मसूराः इत्यादि ॥ ४४६॥ वा०-पुष्पमूलेषु बहुलम् ॥ ४५० ।। पुष्प और मूल विकारावयव अर्थ हों, तो वहुल करके प्रत्यय का लुप् हो । जैसे- मल्लिकायाः पुष्पं मूलं वा मल्लिका; करवीरम्; विसम्: मृणालस्य पुष्पं मूलं वा मृणालम् । बहुलग्रहण से कहीं नहीं भी होता । जैसे-पाटलानि पुष्पाणि मूलानि वा; वैल्वानि फलानि ॥ ५० ॥ - [इति तृतीयः पादः ॥] [अथ चतुर्यः पादः-] प्राग्वहतेष्टक् ॥ ४५१ ॥ अ० ४ । ४ । १ ॥ यह अधिकार सूत्र है । (तहति० ) इस सूत्रपर्यन्त जो २ अर्थ कहे हैं, उन सधर्म सामान्य से उक् प्रत्यय होगा । जैसे-अनैर्दीव्यति आक्षिकः इत्यादि। इस चतुर्थाध्याय के प्रथम पाद में (प्राग्दीव्यतोऽण् ) यह अधिकार कर चुके हैं। उसकी यहां से निवृत्ति समझो, क्योंकि अगले सूत्र में दीव्यति शब्द पढ़ा है । अण् के अधिकार की समाप्ति होने से प्रथम ही दूसरा उक् प्रत्यय का अधिकार कर दिया। इस विषय में लोकिक दृष्टान्त यह है कि राजा जब वृद्ध होता है तो अपने जीवते ही पुत्र को गद्दी पर बैठा देता है ॥ ४५१ ॥ वा०-ठक्प्रकरणे तदाहेतिमाशब्दादिभ्य उपसंख्यानम् ॥ ४५२ ।। ऐसा वह कहता है, इस अर्य में माशब्दादि प्रातिपदिकों से उक् प्रत्यय होवे । जैसे- माशब्द इत्याहमाशदिक नित्या शब्दा इत्याह नैत्यशब्दिकः कार्यशब्दिकः इत्यादि॥४५२॥ वा०-याही प्रभूतादिभ्यः ॥ ४५३ ॥ द्वितीयासमर्थ प्रभूतादि प्रातिपदिकों से उक प्रत्यय होवे कहने अर्थ में । जैसे- प्रभूतमाह प्राभूतिकः; पार्याप्तिकः इत्यादि ॥ ४५३ ॥ वा०-पृच्छतौ सुस्नातादिभ्यः ॥ ४५४ ॥ द्वितीयासमयं सुनातादि प्रातिपदिकों से पूछने अर्य में ठक् प्रत्यय होवे । जैसे-सुन्नातं पृच्छति सौम्नातिकः; सोयरात्रिकः; सुखशयनं पृच्छति सौनशायनिकः इत्यादि ॥ ४५४ ॥ - aam ८६ स्त्रैणताद्धिते ".. AN- वा०-गच्छतो परदारादिभ्यः ॥ ४५५ ॥ द्वितीयासमर्थ परदारादि प्रातिपदिकों से गमन करने अर्थ में ठक् प्रत्यय हो । जैसे-परदारान् गच्छति पारदारिका; गोरुतल्पिकः इत्यादि ॥ ४५५ ॥ तेन दीव्यति खनति जयति जितम् * ॥४५६॥ अ० ४।४।२॥ दीव्यति श्रादि क्रियाओं के कर्ता वाच्य रहें, तो तृतीयासमर्थ प्रातिपदिकों से ठक् प्रत्यय होवे । जैसे-अक्षर्दीव्यति प्राक्षिकः; कुहालेन खनति कौघालिका; शलाकाभिर्जयति शालाकिका; शलाकाभिर्जितं शालाकिकं धनम् इत्यादि ॥ ४५६ ॥ संस्कृतम् ॥ ४५७ ।। अ० ४ । ४ । ३ ॥ संस्कार करने अर्थ में तृतीयासमर्थ प्रातिपदिकों से ठक् प्रत्यय होवे । जैसे-घृतेन संस्कृतं घार्तिकम् तैलिकम्; दध्ना संस्कृतं दाधिकम् ताक्रिकम् इत्यादि ॥ ४५७ ॥ तरति ॥ ४५८ ॥ अ० ४।४ । ५ ।। तरने अर्थ में तृतीयासमर्थ प्रातिपदिकों से ठम् प्रत्यय हो । जैसे-वृषभेण तरति वार्षभिका; माहिपिका; औडुपिकः इत्यादि ॥ ४५८ ॥ नौद्वयचष्ठन् ।। ४५६ ॥ अ० ४ । ४ । ७ ।। यहां पूर्व सूत्र से उक प्राप्त है, उसका अपवाद ठन् किया है। तरने अर्थ में तृतीयासमर्थ नौ और द्वयच् प्रातिपदिकों से ठन् प्रत्यय होवे । जैसे- नावा तरति नाविकः; घटेन तरति चाटिका; कोम्भिका; बाहुकः इत्यादि ॥ ४५६ ॥ चरति ॥ ४६० ॥ अ०४ । ४ । ८ ॥ चलने अर्थ में तृतीयासमर्थ प्रातिपदिकों से उक् प्रत्यय होवे । जैसे-शकटेन चरति शाकटिकः; राधिका; हास्तिकः इत्यादि ॥ ४६० ॥ आकर्षाष्ठल ॥ ४६१ ॥ अ० ४ । ४ । ६ ॥ यहां पूर्व मूत्र से ठक पाता है, उसका अपवाद है। चलने अर्थ में तृतीयासमर्य आकर्ष प्रातिपदिक से प्ठल प्रत्यय होवे । पित्करण स्त्रीलिङ्ग में ङीय होने के लिये है। [ जैसे-] आकर्येण चरति आकर्षिः, अाकर्यिकी ॥१६॥ * यहां जित शब्द का पृथक् ग्रहण इसलिये है कि जि धातु का कर्म अभिधेय हो तो भी ठक प्रत्यय हो जावे ॥ ।
ठगधिकारः ८७ ----- ------ -- -- का०-आकर्षात् पर्यादेर्भस्त्रादिभ्यः कुसीदसूत्राच्च । आवसथाकिशरादः पितः षडेते ठगधिकारे * ॥ ४६२ ॥ यह अायो छन्द है। आकर्ष है। आकर्प शब्द से टल, पर्यादिकों से टन्, भत्रादिकों से टन्, कुसीद और दशैकादश प्रातिपदिकों से ठन् और ठन्, श्रावसथ शब्द से टल, और किशरादि प्रातिपदिकों से ष्ठन् ये छः प्रत्यय इस अधिकार में पित् हैं ॥ ४२ ॥ वेतनादिभ्यो जीवति ।। ४६३ ॥ अ० ४।४ । १२ ॥ जीवने अर्थ में तृतीयासमर्थ वेतनादि प्रातिपदिकों से ठक् प्रत्यय हो । जैसे-वेतनेन जीवति वैतनिकः जालिका, वेशेन जीवति वैशिकः; उपदेशेन जीवति औपदेशिक उपस्थेन जीवति औपस्थिकः, औपस्थिकी नरिणका ॥ ४६३ ॥ हरत्युत्लङ्गादिभ्यः ॥ ४६४ ॥ अ० ४ । ४ । १५ ॥ हरने अर्थ में उत्संगादि प्रातिपदिकों से ठक् प्रत्यय होवे । जैसे-उत्सङ्गेन हरति श्रौत्सङ्गिकः प्रोडुपिकः इत्यादि ॥ ४६४ ॥ विभाषा विवधात् ।। ४६५ ॥ अ०४ । ४ । १७ ॥ इस सूत्र में अप्राप्तविभाषा इसलिये है कि प्टन् प्रत्यय किसी से प्राप्त नहीं है। हरने अर्थ में तृतीयासमर्थ विवध प्रातिपदिक से ष्ठन् प्रत्यय विकल्प करके होवे, पक्ष मेंठक हो। जैसे-विवधेन हरति विवधिकः, विवधिको वैवधिकः, वैवधिकी ॥४६५॥ वा०-बीवधाच ॥ ४६६ ।। वीवध प्रातिपदिक सं भी हरने अर्थ में टन् प्रत्यय विकल्प करके होवे। जैसे- वीवधेन हरति वीवधिक: वीवधिकी; वैवधिकः, वैवधिकी। इस वीवध शब्द को काशिका आदि पुस्तकों में सूत्र में ही मिला दिया है। सो वार्तिक होने से सूत्र में मिलाना ठीक नहीं है। और ये दोनों शब्द एकार्थ हैं । शब्द के खरूप का ग्रहण होता है, इससे प्राप्त नहीं था ॥ ४६६ ॥ निवृत्तेऽक्षयूतादिभ्यः । ४६७ ।। अ० ४ । ४ । १६ ।। निवृत्त अर्थात् सिद्ध होने अर्थ में तृतीयासमर्थ अक्षयूतादि प्रातिपदिकों से ठक् प्रत्यय हो। जैसे-अक्षयूतेन निवृत्तमाक्षयूतिकं वैरम्: जानुप्रहृतिकम्; काण्टकमई- निकम् इत्यादि ॥ ४६७ ॥ । यहां उक् प्रत्यय के अधिकार में किन्हीं प्रातिपदिकों में विमति के सकार को संहिता में पत्व होजाना है, और किन्हीं प्रत्ययों में ही होने के लिये पित् किया है। इससे संदेह होता है कि किन प्रत्ययों में प्रौपदेशिक पत्व और किन में विभक्ति का है । इस संदेह की निवृत्ति के लिये यह कारिका है । -
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बैणताद्विते
क्वेर्मन्नित्यम् ॥ ४६८ ।। अ० ४ । ४ । २० ।।
वित्र प्रत्ययान्त तृतीयासमर्थ प्रातिपदिकों से निवृत्त अर्थ में मप् प्रत्यय नित्य ही
हो । अर्थात् अधिकार के विकल्प से वाश्य प्राप्त है, सो भी न रहे । जैसे-पक्त्रिमा
यवागूः, उत्रिमं वीजम्, कृत्रिमः संसारः इत्यादि ॥ ४६८ ॥
वा०-भाव इति प्रकृत्य इमवक्तव्यः ॥ ४६६ ॥
भाववाची प्रातिपदिकों से इमप् प्रत्यय कहना चाहिये ।
ऐसा वार्तिक करने से सूत्र का भी कुछ प्रयोजन नहीं है, क्योंकि कुट्टिमा भूमिः,
सेकिमोऽसिः, इत्यादि उदाहरण सूत्र से सिद्ध नहीं हो सकते ॥ ४६६ ॥
संस्कृष्टे ॥ ४७० ॥ अ० ४ । ४ । २२ ॥
मिलाने अर्थ में तृतीयासमर्थ प्रातिपदिकों से ठक् प्रत्यय होवे। जैसे-दना संसृष्टं
दाधिकम् ताक्रिकम्; मारिचिकम्; शारैवेरिकम् पैप्पलिकम्; दौग्धिकी यवागू;
गौडिका गोधूमाः इत्यादि ॥ ४७० ॥
व्यञ्जनैरुपसिक्ते ॥ ४७१ ॥ अ० ४ । ४ । २६ ॥
उपसिक्त अर्थात् सीचने अर्थ में व्यञ्जनवाची तृतीयासमर्थ प्रातिपदिकों से ठक् प्रत्यय
हो । जैसे-दनोपसिक्तं दाधिकम्; ताक्रिकम् गौडिकम्; पायसिकम्मारिचिकम् इत्यादि।
'व्यञ्जनवाचियों' का ग्रहण इसलिये है कि-उदकेनोपसिक्तं शाकम्, यहां प्रत्यय
न हो॥४७१ ॥
तत्प्रत्यनुपूर्वमीपलोमकूलम् ॥ ४७२ ॥ अ० ४ । ४ । २८ ।।
वर्तने अर्थ में द्वितीयासमर्थ प्रति तथा अनु ये जिनके पूर्व हों,ऐसे ईप लोम और फूल
प्रातिपदिकों से ठक् प्रत्यय हो । जैसे-प्रतीपं वर्त्तते प्रातीपिकः; भान्वीपिकः; प्रतिलोमं
वर्त्तते प्रातिलोमिकः; आनुलोमिकः; प्रतिकूलं वर्तते प्रातिकृलिकः; श्रानुकूलिकः ॥४७२||
प्रयच्छति गर्झम् ।। ४७३ ॥ अ० ४ । ४ । ३० ।।
प्रयच्छति अर्थात् देने अर्थ में, जो पदार्थ दिया जाय सो निन्दित हो, तो द्वितीया-
समर्थ प्रातिपदिकों से ठक् प्रत्यय हो । ४७३ ॥
वा०-मेस्याल्लोपो वा ॥ ४७४ ।।
प्रत्यय उत्पन्न होते समय मे, स्यात् इन दो पदों का विकल्प करके लोप होजावे ।
विकल्प इसलिये है कि वाक्य भी बना रहे । जैसे-द्विगुणं मे स्थादिति प्रयच्छति
द्वैगुणिका; गुणिकः ॥ ४७४ ॥
ठगधिकार 6 वा०-वृद्धवृधुधिभावः ॥ ४७५ ॥ यहां मे; स्यात् इन दो पदों की अनुवृत्ति चली पाती है। वृद्धि शब्द को वृधुषि आदेश और ठक् प्रत्यय होवे । जैसे-वृद्धि, स्यादिति धनं प्रयच्छति वाधुपिकः ॥ ४७५ ॥ उञ्चति ॥ ४७६ ॥ अ० ४।४ । ३२ ॥ उञ्छने अर्थ में द्वितीयासमर्थ प्रातिपदिकों से ठक् प्रत्यय होवे। जैसे-वदराण्यु- ति वादरिक; श्यामाकिका गोधूमानुञ्चति गोधूमिकः; काणिकः इत्यादि ॥ ४७६ ॥ रक्षति ॥ ४७७ ॥ अ०४ । ४ । ३३ ॥ रक्षा अर्थ में द्वितीयासमर्थ प्रातिपदिकों से उक् प्रत्यय होवे । जैसे-ग्राम रक्षति ग्रामिकः; समाज रक्षति सामाजिकः; गोमण्डलं रक्षति गौमण्डलिकः; कुटुम्ब रक्षति कौटुम्विकः; नगरं रक्षति नागरिकः इत्यादि ॥ ४७७ ॥ पक्षिमत्स्यमृगान् हन्ति ।। ४७८ ॥ अ० ४ । ४ । ३५ ॥ मारने अर्थ में द्वितीयासमय पक्षि मत्स्य और मृगवाची प्रातिपदिकों उक् प्रत्यय होवे। जैले-[पक्षि-] पक्षिणो हन्ति पाक्षिक खेचरिक, शाकुनिका; शुकान् हन्ति शौकिक वाकिका; मायूरिक तैत्तिरिकः । मन्स्य-मात्स्यिकः; मैनिकः; शाफरिकः; शाकुलिकः। मृग-मार्गिका; हारिणिकः; सौकरिकः; सारङ्गिकः ॥ ४७८ ॥ परिपन्थञ्च तिष्ठति ॥ ४७६ ॥ अ० ४ । ४ । ३६ ।। स्थिति और मारने अर्थ में द्वितीयासमर्थ परिपन्य प्रातिपदिक ले ठक् प्रत्यय होवे । जेले-परिपन्यं तिष्ठति पारिपन्थिको दस्युः परिपन्यं हन्ति पारिपन्धिक उत्कोचकः ॥esen माथोत्तरपदपदव्यनुपदं धावात ॥४८०॥ अ० ४ । ४ । ३७ ॥ इस सूत्र में माथ शुद्ध मार्ग का पर्यायवाची है। शोधने और झान गमन प्राति त्रयों में पदवी अनुपद और माथ शब्द जिनके उत्तरपद में हो, ऐसे प्रातिपदिको ले ठक् प्रत्यय होवे । जैसे--विद्यामाथं धावति वैद्यामाथिकः; धार्ममाथिकः; दाण्डमाथिकः इत्यादि । पदवीं धावति पादावका; आनुपदिकः ॥ ४८० ॥ * यहां शब्दों के स्वरूप का ग्रहण इसलिये नहीं होता कि (स्वरूपं०) इस पर वार्तिक पढ़ा कि ऐसा संन्न करना चाहिये कि जिससे पक्षी मृग और मस्त्य इनके पर्यायवाची और विशेषवाचियों .. का मी प्रहर हो जावे णताड़िते ~~~~. पदोत्तरपदं गृह्णाति ॥ ४८१ ॥ अ० ४ । ४ । ३६ ॥ ग्रहण करने अर्थ में पद शब्द जिनके उत्तरपद में हो, उन द्वितीयासमर्थ प्रातिपदिकों से ठक् प्रत्यय हो । जैसे-पूर्वपदं गृह्णाति पौर्वपदिकः; औत्तरपदिकः इत्यादि ॥४१॥ । धर्म चरति ॥ ४८२ ॥ अ०४।४ । ४१ ।। अाचरण अर्थ में द्वितीयासमर्थ धर्म प्रातिपदिक से ठक् प्रत्यय होवे। जैसे-धर्म चरति धार्मिकः ॥ ४८२ ॥ वा०-अधर्माच्च ॥ ४८३ ॥ आचरण अर्थ में अधर्म शब्द से भी ठक हो । जैसे-अधर्म चरति श्रार्मिकः ॥४८३॥ समवायान्त्समवैति ॥४८४ ।। अ० ४ । ४ । ४३ ॥ यहां बहुवचन निर्देश से समवायवाची शब्दों का ग्रहण होता है। प्राप्त होने अर्थ में द्वितीयासमर्थ समवायवाची प्रातिपदिकों से ठक् प्रत्यय हो। जैसे- समवायान् समवैति सामवायिकः; सामाजिक, सामूहिकः, साधिकः इत्यादि ॥ ४८४ ॥ संज्ञायां ललाटकुक्कुट्यौ पश्यति ॥४८५॥ अ० ४ । ४ । ४६ ॥ देखने अर्थ में संज्ञा वाच्य रहे, तो द्वितीयासमर्थ ललाट और 'कुकुटी प्रातिपदिकों से ठक् प्रत्यय हो । जैसे -ललाटं पश्यति लालाटिको भृत्यः +; कुक्कुटर्टी पश्यति कौकुटिको भिजुकः ॥ ४५ ॥ तस्य धर्म्यम् ।। ४८६ ।। अ० ४ । ४ । ४७ ॥ जो कार्य धर्म का विरोधी न हो उसको धर्म्य कहते हैं । पष्ठीसमर्थ प्रातिपदिक से धर्म्य अर्थ में ठक् प्रत्यय हो। जैसे-हाटकस्य धर्म्य हाटकिकम्; आकरिकम्ः आपणिकम् इत्यादि ॥ ४८६ ॥ ऋतोऽज्ञ ॥ ४८७॥ अ० ४ । ४ । ४६ ।। धर्य अर्थ में पष्ठीसमर्थ ऋकारान्त प्रातिपदिक से अञ् प्रत्यय होवे। जैसे- होतुर्धर्म्य होत्रम् पौत्रम् दौहित्रम् स्वायम् इत्यादि ॥ ४८७ ॥ + लालाटिक उस सेवक को कहते हैं कि जो अच्छे प्रकार काम न करे, वेठा २ मालिक का मुख देखा करे ॥
ठगधिकारः ४१ ~-- वा०-नृनराभ्यामवचनम् ॥ ४८८ ॥ नृ और नर शब्द से भी अञ् प्रत्यय होवे । जैसे-नुर्धा नारी; एवं नरस्थापि नारी ॥४॥ वा०-विशसितुरिड्लोपश्च ।। ४८६ ।। विशसि शब्द से अञ् प्रत्यय और प्रत्यय के परे इट् का लोप होवे। जैसे- विशसितुर्धय॑ वैशस्त्रम् ॥ ४८६ ॥ वा विभाजयितुर्णिलोपश्च ॥ ४९० ॥ विभाजयित शब्द से अञ् प्रत्यय और उस प्रत्यय के परे णिच् का लोप भी होवे । जैसे-विभाजयितुर्धय॑ वैभाजियम् ॥ ४६० ।। अवक्रयः ।।४६१ ।। अ०४ । ४ । ५० । अवक्रय अर्थात् स्वरीदने और चेचने अर्थ मषष्ठी समर्थ प्रातिपदिक से उक्प्रत्यय होवे। जैसे-गोशालागा अवक्रयो गोशालिक आकरिका श्रापरिणका; हाटकिकः इत्यादि ॥४६१॥ तदस्य पण्यम् ।। ४६२ ।। अ० ४ । ४ ५१ ।। परयसमानाधिकरण प्रथमासमर्थ प्रातिपदिकों से पष्ठी के अर्थ में ठक प्रत्यय होवे । जैसे-सुवर्ण परयमस्य सोवर्णिका: अपूपाः परयमस्य आपूपिकः; शाकुलिका, ओषधयः पण्यमस्य औषधिक; मुक्ताः परयमस्य मौक्तिकः इत्यादि ॥ ४६२ ॥ शिल्पम् ।। ४६३ ।। अ० ४ । ४ । ५.५. ।। शिल्प शब्द क्रिया की कुशलता अर्थ में वर्तमान है। शिल्पसमानाधिकरण प्रथमा- समर्थ प्रातिपदिकों से ठक् प्रत्यय होवे । जसे-मृदङ्गवादनं शिल्पमस्य मार्दङ्गिकः । पाणविकः; वीणावादनं शिल्पमस्य वैणिकः इत्यादि ।। ४६३ ॥ । प्रहरणम् ।। ४६४ ॥ अ०४ । ४ । ५७ ।। * शब्द के ऋकारान्त होने से मूत्र से ही अञ् प्रत्यय हो जाता, फिर इसका वार्तिक में दृष्टान्त के लिये ग्रहण किया है, जैसे न शब्द से अञ् होकर नारी बनता है, वैसे नर शब्द से भी जानो ॥ । यहां वाक्य में महाभाष्यकार ने उत्तरपद का लोप इसलिये माना है कि मार्दङ्गिक शब्द से मृदन बजाने वाले का ही ग्रहण हो । और मृदङ्ग रचने वाला कुम्हार तथा चाम आदि से मढ़ने वाले में भी कारीगरी उसमें होती है, परन्तु लोक में मार्दङ्गिक शब्द से उसका बजाने वाला ही लिया जाता है । और ऐसा ही वाक्याथ सब प्रयोगों में जानो ।
8२ स्त्रैणताद्धिते प्रहरण समानाधिकरण प्रथमासमर्थ प्रातिपदिक से षष्ठी के अर्थ में ठक् प्रत्यय हो । जैसे-आग्नेयास्त्र प्रहरणमस्य आग्नेयास्त्रिकः; शतघ्नी प्रहरणमस्य शानिकः; भौशुण्डिकः; असिः प्रहरणमस्य आसिकः; चाक्रिकः; धानुष्का; दाण्डिकः इत्यादि ॥ ४६४ ॥ शक्तियष्ट्योरीकक् ॥ ४६५ ।। अ०४ । ४ । ५६ ।। प्रहरण समानाधिकरण प्रथमासमर्थ शक्ति और यष्टि प्रातिपदिकों से षष्ठी के अर्थ में ईकक् प्रत्यय होवे । जैसे-शक्तिः प्रहरणमस्य शाक्तीकः; याष्टीकः ॥ ४६५ ॥ अस्तिनास्तिदिष्ट मतिः ॥ ४६६ ॥ अ० ४ । ४ । ६० ॥ अस्ति नास्ति और दिष्ट इन मति समानाधिकरण प्रथमासमर्थ प्रातिपदिकों से षष्ठी के अर्थ में ठक् प्रत्यय होवे। जैसे-अस्तीति मतिरस्य स आस्तिकः ॥ नास्तीति मतिरस्य स नास्तिकः; दिष्टमिति मतिरस्य स दैटिकः ॥ ४६६ ॥ शीलम् ॥ ४६७ ।। अ० ४।४ । ६१ ॥ शील समानाधिकरण प्रथमासमर्थ प्रातिपदिक से षष्ठी के अर्थ में ठक् प्रत्यय हो । जैसे-अपूपा भक्षणं शीलमस्य स आपूपिकः; शाकुलिकः x; दौग्धिकः; मौदकिका औदनिका; साक्तुकः इत्यादि । ४६७ ॥ छत्रादिभ्यो णः ।। ४६८ ॥ अ०४ । ४ । ६२ ।। शील समानाधिकरण प्रथमासमर्थ छत्र श्रादि गणपठित प्रातिपदिकों से षष्ठी के अर्थ में ण प्रत्यय होवे। उक प्राप्त है उसका बाधक है। छत्र शब्द मुख्य करके छाता का नाम है॥४८॥ भा०-किं यस्य छत्रधारणं शीलं स छात्रः ? किश्चातः ? राजपुरुषे प्राप्नोति । एवं तर्युत्तरपदलोपोऽत्र द्रष्टव्यः । छत्र- मिवच्छत्रम् , गुरुश्छत्रम् , गुरुणा शिष्यश्छत्रवच्छाद्यः। शिष्येण गुरुश्छत्रवत्परिपाल्यः ॥ ४६६ ।। म यहां वाक्यार्थ में इति शब्द से उत्तरपद का लोप समझना चाहिये । क्योंकि ईश्वर, जीव, पुनर्जन्म और शुभाशुभ कर्मों का फल श्रादि है, ऐसी बुद्धि जिस पुरुष की हो वह श्रास्तिक, और इसके विस्व नास्तिक समझा जावे। और जो इति शब्द का लोप न समझे तो जिस चोर श्रादि में अधिक बुद्धि हो वह भी श्रास्तिक और बुद्धि से रहित जद पदार्थ मी नास्तिक कहावें ॥ x यहां भी भतण उत्तरपद का लोप समझना चाहिये । क्योंकि पूड़ी श्रादि बनाने वालों के नाम शाप्कुलिक श्रादि न हो जावें । लोक में इन पदार्थों के खाने वाले ही इन नामों से समझे जाते हैं ।
ठगधिकारः ६३ । . लोक में परन्परा ले छात्र शब्द विद्यार्थी का वाची है। इसलिये महाभाष्यकार ने इस विषय का स्पष्ट व्याख्यान कर दिया कि-छत्र शब्द से यहां गुरु उपमेय है। अर्थात् शिष्य के अन्लानरूपी अन्धकार को गुरु निवारण करता है, इसलिये छन है। जैसे घाम श्रादि से अपनी रक्षा करनेहारे छाता को यत्न से रखते हैं, वैसे ही अपने सेवन से गुरु की रक्षा करनेवाला पुन्य छात्र कहाता है। और जैसे छाता धाम श्रादि से होनेवाले दुःखों का निवारण करता है, जैसे ही गुरु भी मूर्खता आदि ले होनेवाले दुःखों को नष्ट करता है। [जैसे-] छत्रं गुरुत्तत्संबनशीलमस्य स छात्रः, कन्या चेञ्छात्राः बुभुक्षा शीलमन्य स योभुक्षः इत्यादि । इस सूत्र पर जयादित्य भट्टोजिदीक्षितादि कहते हैं कि-गुरु के जो दुष्ट कम हैं, उनके पाच्छादन करने का स्वभावधाता शिष्य चात्र कहाता है। इस व्याख्यान को बुद्धिमान् वैयाकरण विचारें कि महाभाष्य ले कितना विरोध अाता है। इस सूत्र के व्याख्यान ले ऐसा अनुमान होता है कि जयादित्य भट्टोजिदीक्षितादि लोग महापातकी होंगे ॥ १६ ॥ हितं भक्षाः ।। ५०० ॥ १०४।४ । ६५ ।। यहां भक्ष शब्द में बहुवचननिर्देश से भक्षबाचियों का ग्रहण होता है। हित शब्द के योग में चतुर्थी विभक्ति होती, और पूर्व से यहां पष्टयर्थ की अनुवृत्ति अाती है, इसलिये उस पष्टी का विपरिणाम चतुर्थी समझनी चाहिये । हित समानाधिकरण प्रथमासमर्थ भक्ष्यवाची प्रातिपदिकों से चतुर्थी के अर्थ में ठक् प्रत्यय होवे। जैसे-त्रोदना हितमस्मै औदनिकः; अपूपा हितमस्मै श्रापूपिका; शाप्कृतिकः मौदकिकः इत्यादि ।। ५०० ।। : नदस्मै दीयते नियुक्तम् ।। ५०१ ।। अ० ४ । ४ । ६६ ।। निरन्तर देने अर्थ में प्रथमासमर्थ प्रातिपदिक से टक् प्रत्यय होवे। जैसे-अग्रासन- मस्मै दीयते श्राग्रासनिकः श्रानभोजनिकः; अपृपा अस्मै दीयन्त इत्यापिकामौदकिक: इत्यादि । ५०१ ॥ तत्र नियुक्तः ॥ ५०२ ।। अ० ४ । ४ । ६६ ।। नियत करने अर्थ में सतमीसमर्थ प्रातिपदिक से ठक् प्रत्यय हो। जैसे-पाक- शालायां नियुक्तः पाकशालिकः; शोल्कशालिकः; हाटकिकः; आपणिका; धर्मोपदेशे नियुक्तो धार्मोपदेशिका, वैद्याध्ययनिकः; शास्त्राध्यापनिकः; यन्त्रालये नियुक्तो यात्रा- नयिक: इत्यादि ।। ५०२॥ अगारान्तान् ॥ ५०३ ।। अ० ४।४ । ७० ।।
१४ खैणताद्धिते -rouW है यहां पूर्वसूत्र से ठक् प्रत्यय प्राप्त है, उसका यह अपवाद नियत करने अर्थ में सप्तमीसमर्थ अगारान्त प्रातिपदिक से उन प्रत्यय हो । जैसे- धनागारे नियुक्तो धनागारिकः, शस्त्रागारिकःः अश्वागारिकः, पुस्तकागारिक इत्यादि । ५०३ ॥ अध्यायिन्यदेशकालात् ।। ५०४ ।। अ० ४ । ४. ७१ ।। जिन देश और कालों में पढ़ने का निषेध है, उन प्रातिपदिकों से उक् प्रत्यय हो। जैसे-श्मशानेऽधीते श्माशानिकः; शद्रसान्निधिकः; सन्धिवेलायामधीते सान्वेिलिकः; अष्टम्यामधीते आप्टमिका चातुर्दशिक: पौर्णमासकः इत्यादि ।। ५०४ ।। कठिनान्तप्रस्तारसंस्थानेषु व्यवहरति ॥५०५।। अ० ४।४।७२ ॥ व्यवहार करने अर्थ में कटिनान्त प्रस्तार और संस्थान प्रातिपदिकों से ठक् प्रत्यय होवे । जैसे-कुलकठिने व्यवहरति कॉल कठिनिकः; कौटुम्बकठिनिकः; प्रस्तारे व्यव: हरति प्रास्तारिकः; सांस्थानिकः इत्यादि ॥ ५०५ ।। निकटे वसति ॥ ५०६ ॥ अ० ४ । ४ । ७३ ।। वसने अर्थ में सप्तमीसमर्थ निकट प्रातिपदिक से ठक, प्रत्यय हो। जैसे-निकट वसति नैकटिकः ॥ ५०६ ॥ प्राग्धिताद्यत् ।। ५०७ ॥ अ० ४ । ४ । ७५ ।। प्रथम ठक् प्रत्यय का अधिकार कर आये हैं, उसकी समाप्ति यहां ले समझनी चाहिये। क्योंकि वहति शब्द अगले सूत्र में है, उस अधिकार के रहते ही दूसरा अधिकार यत् प्रत्यय का करते हैं, इसका दृष्टान्त भी पूर्व दे चुके हैं। यहां से ले के (तस्मै हितम् ) इस अधिकार के पूर्व २ जो २ अर्थ कहेंगे, उन २ में सामात्य करके यत् प्रत्यय का अधिकार सम्झना चाहिये। जैसे- रथं वहति रथ्यः युग्यः इत्यादि ॥ ५०७ ॥ तद्वहति रथयुगप्रासङ्गम् ।। ५०८ ॥ अ० ४ । ४ । ७६ ।। ले चलने अर्थ में द्वितीयासमर्थ रथ युग और प्रासङ्ग प्रातिपदिक से होवे । जैसे-रथं वहति रथ्यः युग्यः; प्रासङ्ग्यः । सम्बन्धसामान्य शेष अर्य में भी यत् प्रत्यय होता है। [जसे - ] रथ वहति रथ्यः; रथस्य वोढा रथ्यः ! यहां प्रयोग और अर्थ में कुछ भी भेद नहीं है, फिर दोनों जगह करने का प्रयोजन यह है कि जब तदन्तचिधि मान के द्विगुसंक्षक रथ शष्ट से प्रत्यय करेंगे, तब शेष अर्य में प्रारदीयनीय होने ले (द्विगोर्नु० ) इससे प्रत्यय का यत् प्रत्यय रथ शन्द ..
ग्रदाधिकारः
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लुक हो जावेगा जैसे द्वयोथियार्थीडा द्विरयः । और जब वो रथी वहति, ऐसा विग्रह
करें, तय द्विग्भ्यः ऐसा प्रयोग होगा।
इसी प्रकार हल और सीर शब्दों से भी दोनों जगह एक ही प्रत्यय कहा है, उसका
भी यही प्रयोजन है ॥ ५० ॥
संज्ञायां जन्याः ।। ५०६ ।। अ०४ । ४ । ८२ ॥
ते जाने अर्थ में बवाची द्वितीयासमर्थ जनी प्रातिपदिक से संज्ञा वाच्य रहे, तो
यत् प्रत्यय निपातन किया है । जैस--जनी वधू वन्ति ते जन्याः । विवाह के समय जो
बरात जाती है, उसको जन्या कहते हैं ॥ ५० ॥
विध्यत्यधनुषा ॥ ५१० ॥ अ० ४ । ४ । ८३ ॥
वेधने अर्थ में अनुय् करण न हो, तो द्वितीयासमर्थ प्रातिपदिकों से यत् प्रत्यय होवे।
जैसे-पादी विध्यति पद्या दूर्वा; कण्ठ विध्यति कराव्यो रसः ।
यहां 'धनुर् का निषेध इसलिये है कि-धनुपा विध्यतिः शत्रु विध्यति, यहां
उभयत्र प्रत्यय न होवे ॥ ५.० ॥
धनगणं लब्धा ॥ ५११ ॥ अ०४
११ ॥ अ०४।४। ८४ ॥
नाम होने का कर्ता वाच्य रहे, तो द्वितीयासमर्थ धन और गण शब्दों से यत् प्रत्यय
हो । जैसे-धनं लब्धा धन्या; गणं लब्धा गरायः ॥ ५११ ॥
गृहपतिना संयुक्ने ज्यः ॥ ५.१२ ।। अ० ४ । ४ । ६० ।।
यहां पूर्वमुत्र से संना की अनुवृत्ति आती है। संयुक्त अर्थ में तृतीयासमर्थ गृहपति
प्रातिपदिक से संज्ञा अभिधेय हो,तोञ्य प्रत्यय होवे । जैसे-गृहपतिनासंयुक्तोगार्हपत्यः ।
यहां संशा ग्रहण इसलिये है कि-'गार्हपत्य दक्षिणाग्नि का नाम न होजावे ॥५१२।।
नौवयोधर्मविषमूलमूलसीनातुलाभ्यस्तार्यतुल्यप्राप्यवध्यानाम्य-
समसमितसम्मितेषु ।। ५१३ ॥ अ० ४ । ४ । ६१ ।।
तृतीयासमर्थ नौ अादि प्रातिपदिकों से तार्य आदि अर्थों में यथासंख्य करके यत्
प्रत्यय होवे । जैसे-नो शब्द से तैरने अर्थ में - नावा तार्य नान्यम्; वयस शब्द से तुल्य
अर्थ में-वयसा तुल्यं बयत्यं मित्रम्: धर्म शब्द से प्राप्त होने योग्य अर्थ में-धर्मेण
प्राप्यो धम्र्योऽपवर्गः: विपशब्द से मारने योग्य अर्थ में - विपेण वध्यो विष्यः पापी; मूल
शुद्र से नमाने अर्थ म-मूलेनानाम्यं मूल्यम्: दूसरे मूल शन्द्र से सम अर्थ में-मूलेन
समो मूल्यो घटःः मीताशद से चौकस करने अर्थ में-सीतया समितं सीत्यं क्षेत्रम्:
नुदा शन्द्र ने तोलने अर्थ में-तुलया सम्मित तुल्यं धान्यम् ॥ ५१३॥
स्त्रैणताद्धिते . धर्मपथ्यर्थन्यायादनपेते ॥ ५१४ ॥ अ० ४ । ४ । १२ ॥ अनपेत अर्थात् युक्त अर्थ में पञ्चमीसमर्थ पथिन् अर्थ और न्याय प्रातिपदिक से यत् प्रत्यय होता है। जैसे-धर्मादनयेतं धर्म्यम्; पथोऽनपेतं पथ्यम् अर्थ्यम्; न्याय्यम् ॥५१४॥ छन्दसो निर्मिते ॥ ५१५ ॥ अ० ४ । ४ । १३ ॥ निर्माण अर्थ में तृतीयासमर्थ छन्दस प्रातिपदिक से यत् प्रत्यय हो । जैसे-छन्दसा निर्मितः छन्दस्यः, यहां छन्दशशब्द इच्छा का पर्यायवाची है ॥ ५१५ ॥ उरसोऽण् च ॥ ५१६ ।। अ० ४ । ४ । ९४ ॥ निर्मित अर्थ में तृतीयासमर्थ उरस् शब्द से अणू और चकार से यत् प्रत्यय भी हो । जैसे-उरसा निर्मितः औरसः; उरस्यः पुत्रः ॥ ५१६ ॥ हृदयस्य प्रियः ॥ ५१७ ॥ अ० ४।४। ९५ ॥ प्रिय अर्थ में पष्ठीसमर्थ हृदय शब्द से यत् प्रत्यय हो। जैसे-वृदयस्य प्रियो हद्यो धर्मः हृद्यो देशः; हृद्या कन्या; हृद्य वनम् ॐ ॥ १७ ॥ तंत्र साधुः ॥ ५१८ ॥ अ० ४ । ४ । ६८ ॥ साधु अर्थ में सप्तमीसमर्थ प्रातिपदिक से यत् प्रत्यय हो। जैसे-सामसु साधुः सामन्यः; वेमन्यः; कर्मण्यः; शरण्यः । साधु प्रवीण वा योग्य का नाम है ॥ ५१८ ॥ सभाया यः ।। ५१९।। अ०४ । ४ । १०५ ।। साधु अर्थ में सप्तमीसमर्थ सभा शब्द से य प्रत्यय हो । जैले-सभायां साधुः सभ्यः, यहां य और यत् में स्वर का भेद है, उदाहरण का नहीं ॥ ५१६ ॥ ढश्छन्दसि ।। ५२० ।। अ० ४ । ४ । १०६ ।। साधु अर्थ में जो वेदविषय हो, तो सभा शब्द से ढ प्रत्यय हो। जैसे-सभेयोऽस्य युवा यजमानस्य वीरो जायताम् ॥ ५२० ।। समानतीर्थे वासी ।। ५२१ ।। अ० ४ । ४ । १०७ ॥ चलने अर्थ में सप्तमीसमर्थ समानतीर्थ शब्द से यत् प्रत्यय हो ॥ ५२१ ।। तीर्थे ये || ५२२ ॥ अ०६।३ । ८७ ॥ * यहां सर्वत्र हृदय शब्द को (हृदयस्य हल्वेस्त्र०) इस सूत्र से हत् श्रादेश हो जाता है ।
यदधिकारः 8७ तीर्थ उत्तरपद परे हो, तो समान शब्द को स आदेश होवे । जैसे-समाने तीर्थ वसति सतीथ्यों ब्रह्मचारी*॥ ५२२ ।। समानोदरे शयित ओ चोदात्तः ॥५२३।। अ० ४ । ४ । १०८ ।। सोने अर्थ में सप्तमीसमर्थ समानोदर शब्द से यत् प्रत्यय और समानोदर के प्रोकार को उदात्त हो। [जैसे-] समान उदरे शयितः समानोदयों भ्राता ॥ ५२३ ॥ सोदरायः ॥ ५२४ ॥ अ० ४ । ४ । १०६ ॥ सोने अर्थ में सप्तमीसमर्थ सोदर शब्द से यत् प्रत्यय हो ॥ ५२४ ॥ विभापोदरे ॥ ५२५ ॥ अ०६।३।८८ ॥ उदर शब्द के परे यत् प्रत्यय हो, तो समान शब्द को विकल्प करके स आदेश होवे । जैले-समानोदरे शयितः सोदो भ्राता ॥ ५२५ ॥ भवे छन्दसि ।। ५२६ ।। अ० ४ । ४ । ११० ॥ भव अर्थ और वैदिक प्रयोगों में सप्तमीसमर्थ प्रातिपदिकों से यत् प्रत्यय हो । यहां छन्द का अधिकार इस पाद की समाप्ति तक, और भवाधिकार (समुद्राभाद् घ.) इससे पूर्व २ जानना चाहिये। यह अण और घ आदि प्रत्ययों का अपवाद है। [जैसे-] मेध्याय च विद्युत्याय च नमः इत्यादि ॥ ५२६ ॥ पूर्वैः कृतामनियौ च ।। ५२७ ॥ अ० ४ । ४ । १३३ ॥ कृत अर्थ में तृतीयासमर्थ पूर्व शब्द से इनि तथा य और चकार से ख प्रत्यय होवें। जैसे-पूर्वैः कृतं कर्म पूर्वि; पूर्व्यम्; पूर्वीणम् ॥ ५२७ ॥ अद्भिः संस्कृतम् ।। ५२८ ॥ अ० ४ । ४ । १३४ ।। संस्कृत अर्थ में तृतीयासमर्थ अप् शब्द से यत् प्रत्यय हो । जैसे-अद्भिः संस्कृतम् श्रयं हविः ॥ ५२८॥ सोममर्हति यः ।। ५२६ । अ० ४ । ४ । १३७ ॥ योग्यता अर्थ में द्वितीयासमर्थ सोम शब्द से य प्रत्यय हो। [जैसे- सोममर्हति सोम्यः ।। ५२६ ॥ - * यहां तीर्थ उसको कहते हैं जो संसार के दुःखों से पार कर देवे । सो पढ़ानेवाला प्राचार्य और वैविधा समझनी चाहिये । जिनका एक गुरु पढ़ानेहारा और वैट का पाठ साथ हो, वे सतीयं कहावें ॥ समानोदय और सौदर्य उन भाइयों के नाम है कि लो एक माता के उदर से उत्पन्न हुए हों। और जिनकी माता दो और पिता एक होवे उनके ये नाम नहीं हो सकते हैं ।
श्रेणताद्धित मये च ॥ ५३० ॥ अ० ४।४ । १३८ । जिन २ अधों में मयट् प्रत्यय विधान किया है, उन २ ऋयों और उन्हीं समर्थ- विभक्तियों ले लोम शब्द ले य प्रत्यय हो । जैसे-सोमस्य विकारोऽवयवो वा सोम्यं मधु इत्यादि ॥ ५३० ॥ शिवशमरिष्ठस्य करे ॥ ५३१ ॥ १० ४ । ४ । १४३ ॥ करने अर्थ में शिव शम् और अरिष्ट शन्दो से तातिल प्रत्यय हो। जैसे-शिवस्य करः शिवतातिः; शन्तातिः अरिष्टतातिः ॥ ५३२ ।। भावे च !! ५३२ ॥ १० ४ । ४ । १४४ ॥ भावार्थ में भी शिव शम् और अरिष्ट प्रातिपदिकों से तातिल प्रत्यय हो। जैसे- शिवल्य भावः शिवतातिः; शन्तातिः; अरिष्टतातिः ॥५३२।। -इति चतुर्याध्यायः समाप्तः । अथ पञ्चमाध्याय प्रारम्यते- - प्राक्क्रीताच्छः ।। ५३३ ॥ अ० ५। १ । १ ।। क्रीताधिकार ले पूर्वर प्रत्यय का अधिकार किया जाता है। यहां से भागे सामान्य करके सब अधों में प्रत्यय होगा । जैसे-घटाय हिता घटीया मृत्तिका इत्यादि ॥५३३|| उगवादिभ्यो यत् ।। ५३४ ॥ श्र० ५। १२ ॥ क्रीत से पूर्व २ जो अर्थ कहे हैं, उनमें उबन्ति और गवादि प्रातिपदिकों से यत् प्रत्यय हो । यहच प्रत्यव का अपवाद है। [जैसे- शङ्कवे हितं शङ्कन्यं दारु पिचव्यः कार्पासः कमण्डलन्या नृत्तिका इत्यादि। गवादिकों से-गवे हिनं गन्यम्: इविष्यम्: मेधाये हित मेध्यम् इत्यादि ॥ ५३४ ॥ तस्मै हितम् ।। ५३५ ।। अ० ५। १ । ५ ॥ हित नाम उपकारी का है, उस हित अर्थ में चतुर्थीसमर्थ प्रातिपदिक से छ प्रत्यय हो। जैले-रोगिणे हितं रोगीयनौषधम्ः मात्रीयः पित्रीयो वा पुत्रः; वत्सेन्यो हितो गोधुक् वत्सीयः; गर्नेग्यो हितं गर्गीयं शास्त्रम् इत्यादि !! ५२५ ॥ शरीराऽवयवाद्यत् ।। ५३६ ।। अ० ५। ११६॥ हित अर्थ में प्राणियों के चयवाची प्रातिपदिकों से यत् प्रत्यय हो। यह सूत्र छ प्रत्यय का अपवाद है। [जैसे-] दन्तेभ्यो हितं दन्त्यं मजनम्: कएल्यो रसः; नाभ्यम्: नस्यम् पद्यम् मूईन्यः इत्यादि ।। ५२६ ॥
छाविकास आत्मविश्वजनभोगोत्तरपदात्त्रः ।। ५३७ ! अ० ५। १।६॥ हित अर्थ में चतुर्थीसमर्थ श्रात्मन् विश्वजन और भोगोत्तरपद प्रातिपदिक से त्र प्रत्यय हो ! जैस-आत्मने हितमान्मनीनम् * विश्वजनेभ्यो हित विश्वजनीनम् । भोगोत्तरपदों से-मानमोगाय हितो मातृभागीणः इत्यादि । ५३७ ।। । वा०-पञ्चजनादुपसल्यानम् ।। ५३८ ।। पंत्रजन शुन्दसे भी ख प्रत्यय होवे । जेल-पंचजनाय हितं पंचजनन.. ॥ ५३= !! वा०-सर्वजनान् खश्च ।। ५३६ ।। हित अर्थ में सर्वजन शब्द प ठन् और च प्रत्यय हो । जैसे-सर्वजनाय हितं सार्व- जनिकम्ः सर्वजनीनम् ॥ ५३६ ।। वा०-महाजनाह नित्यम् ।। ५४० ॥ महाजन शब्द से ठन् प्रत्यय नित्य हो । जैसे-महाजनाय हितं माहाजनिकम् ॥५४०॥ वा०-राजाचार्याभ्यां तु नित्यम् ।। ५४१ ॥ भोग शुन्द जिन उत्तरपद में हो, ऐसे राजन् और श्राचार्य शब्दों से स्त्र प्रत्यय नित्य होवे। जैले-राजमोगाय हितो राजभोगीनः । ५४३ ।। वा०-आचार्यादणत्वञ्च ।। ५४२ ।। . प्राचार्य शब्द से परे णव न होवे । जैसे-प्राचार्यभोगीनः । यहां केवल राजन और प्राचार्य गुब्दों से स्त्र नहीं होता, किन्तु वाच्य ही बना रहता है । ५४२ ।। सर्वपुरुषाभ्यां पढौं ॥ ५४३ ।। अ० ५ । १ । १० ॥ हित अर्थ में चतुर्थीसमर्थ सर्व और पुरुष प्रातिपदिकों ले यासंख्य करके ए और दुन्न् प्रत्यय हो। जैसे-सर्वस्मै हितं सार्वम्ः पुरुषाय हितं पौरुषेयम् ।। ५४३ ।। वा०-सर्वापणस्य वा वचनम् ।। ५४४ ॥ सर्व शुन्द से प्रत्यय विकल्प करके हो । जैसे-सर्वाय हितः सर्वीयः ।। ५२४ ।। * यहां (श्रामाधानी में) इस स्त्र से प्रसव के प नचारान्त प्राप्मन् गन्द को प्रकृतिमात्र हो जाता है। : यहां विश्वजन आदि शब्दों से बांधारय समास में और महानन शब्द से तत्पुरुष समास में न्यथविधान सनन्दना चाहिये, और ऋत्य समास में प्रत्यय ही होगा । जैसे-विश्वजनीयम् पदनीयनः सर्वचनीयन्: महाजनीयन् ।। - :
-१०० खैणताद्धिते ~ वा-पुरुषाद्वधविकारसमूहतेनकृतेषु ॥ ५४५ ॥ षष्ठीसमर्थ पुरुष शब्द से वध विकार और समूह अर्थों में तथा तृतीयासमर्थ से कृत अर्थ में ढञ् प्रत्यय हो। जैसे-पौरुषेयो वधः, पौरुषेयो विकारः, पौरुषेयः समूहः, , पौरुषेयो ग्रन्थः ॥ ५४५ ॥ तदर्थं विकृतेः प्रकृतौ ॥ ५४६ ।। अ० ५। १ । १२ ॥ प्रकृति अर्थात् कारण जहां अभिधेय रहे, वहां चतुर्थीसमर्थ विकृतिवाची प्रातिपदिक से यथाविहित प्रत्यय हों। जैसे-अङ्गारेभ्यो हितानि काष्ठानि अङ्गारीयाणि काष्ठानि, प्राकारीया इष्टकाः; शङ्कव्यं दारु पिचव्यः कासः इत्यादि । यहां तदर्थ' ग्रहण इसलिये है कि-यवानां धानाः; धानानां सक्तवः, यहां प्रत्यय न हो। 'विकृति' ग्रहण इसलिये है कि-उदकार्थः कृपः । 'प्रकृति' ग्रहण इसलिये है कि-अस्यर्था कोशी *, यहां छ प्रत्यय न हो ॥ ५४६ ॥ तदस्य तदस्मिन् स्यादिति + ।। ५४७ ॥ १० ५ । १ । १६ ॥ षष्ट्यर्थ और सप्तम्यर्थ में स्यात् समानाधिकरण प्रथमासमर्थ प्रातिपदिक से यथा- विहित प्रत्यय हों। [जैसे- प्राकारमासामिष्टकानां स्यादिति प्राकारीया इष्टका प्रासा- दीयं दारु; प्राकारोऽस्मिन् देशे स्यात् प्राकारीयो देशः; प्रासादीया भूमिः इत्यादि । प्रासादो देवदत्तस्य स्यात्, यहां प्रत्यय इसलिये नहीं होता कि यहां प्रकृति विकृति का प्रकरण है, देवदत्त प्रासाद का कारण नहीं है ॥ ५४७ ॥ प्राग्वतेष्ठञ् ॥ ५४८ ॥ अ० ५। १ । १८ ॥ यह अधिकार सूत्र है। (तेन तुल्यं किया चेद्वतिः) इस सूत्र से पूर्व २ जो २ अर्थ कहें, उन २ में सामान्य से ठञ् प्रत्यय होगा। जैसे-चान्द्रायणं वर्त्तयति चान्द्रायणिक इत्यादि ॥ ५४८ ॥ आदिगोपुच्छसङ्ख्यापरिमाणादृक् ।। ५४६ ।। अ० ५११॥ १६ ॥ ठञ् अधिकार के अन्तर्गत यह ठक् प्रत्यय का अधिकार उसका बाधक किया है। (तदहति) इस सूत्र में जो अर्ह शब्द है, वहां तक ठक् प्रत्यय का अधिकार जानना चाहिये, परन्तु आङ् उपसर्ग यहां अभिविधि अर्थ में है। इसी से अह अधिकार में भी ठक होता है। * यहां प्रकृतिग्रहण से उपादानकारण समझना चाहिये, क्योंकि विकृति शब्द इसीलिये पढ़ा है। तलवार का उपादानकारण लोहा है, और म्यान नहीं, इसी से यहां छ प्रत्यय नहीं होता ॥ + इस सूत्र में स्यात् क्रिया सम्भावना अर्थ में है कि उसका वा उसमें जो होने का सम्भव हो, और इति शब्द विवता के लिये है, कि उससे प्रत्ययार्थ विवक्षित हो ।
ठगधिकारः १०१ - गोपुच्छ संख्या और परिमाणवाचियों से उक् का निषेध होने से सव अर्थों में ठञ् ही होता है। जैसे-गोपुच्छेन क्रीतं गोपुच्छिकम् । संख्या-पाष्टिकम् । परिमाण- प्रास्थिकम्: कौडविकम् इत्यादि ॥ ५४६ ॥ संख्याया अतिशदन्तायाः कन् । ५५० ॥ अ० ५। १ । २२॥ जिस संख्या के अन्त में ति और शत् शब्द न हों, उससे अाहीय अर्थी में ठक् प्रत्यय हो । यह ठञ् का अपवाद है । जैसे-पञ्चभिः क्रीतः घटः पञ्चकः; वहुक; गणकः । यहां 'तिदन्त शदंत का निषेध' इसलिये है कि-ला तिकः; चत्वारिंशत्कः, यहां कन् प्रत्यय न होवे ॥ ५५० ।। अभ्यर्द्धपूर्वद्विगोलुंगसंज्ञायाम् ॥ ५५१ ॥ अ० ५ । १ । २८ ॥ जिस प्रातिपदिक के पूर्व अद्धगर्द्ध हो, उस और द्विगुसमास प्रातिपदिक से अाहीय अर्थों में संचाविषय को छोड़ के प्रत्यय का लुक् हो । जैसे- श्रद्धयर्द्धकलेन क्रीतमय- ईकंसम्: द्विकंसम्: त्रिकंसम् अद्धयर्द्धशुर्पम् द्विशुर्पम् भिशूर्पम् । यहां 'संज्ञा का निषेध इसलिये है कि-पाञ्चलौहितिकम; पाञ्चकपालिकम्, यहां लुक् न होवे ॥ ५५१ ॥ तेन क्रीतम् ।। ५५२ ॥ अ० ५। १ । ३७ ।। ठञ् से लेके तेरह (१३) प्रत्यय हैं, उनका अर्थ और समर्थ विभक्ति इसी सूत्र से जानना चाहिये। क्रीत अर्थ में तृतीयासमर्थ प्रातिपदिक से यथाविहित ठञ् आदि प्रत्यय होवें। जैसे -सतत्या क्रीतं साप्ततिकम्। श्राशीतिकम्; नैष्किकम्; पाणिकम् पादिकम्; माधिकम् शत्यम् शतिकम् इत्यादि * ॥ ५५२ ॥ तस्य निमित्तं संयोगोत्पातौ ।। ५५३ ॥ अ० ५ । १ । ३८ ॥ जो निमित्त अर्थ संयोग वा उत्पातसम्बन्धी होवे, तो पष्टीसमर्थ प्रातिपदिक से यथाविहित प्रत्यय हों। जैसे-शतस्य निमित्तं संयोग: शत्यः; शतिकः; साहनः । शतस्य निमित्तमुत्पातः शत्यः शतिकः; साहनः इत्यादि ॥ ५५३ ॥ * देवदत्तेन मीतम् इत्यादि वाक्यों में प्रत्यय इसलिये नहीं होता कि लोक में देवदत्तिक श्रादि शब्दों से क्रीत अर्थ का बोध नहीं होता । ४ अनुकूल वा प्रतिकूल प्राणी तथा अप्राणी के साथ सम्बन्ध होने को संयोग कहते हैं। और उत्पात उसको कहते हैं जो कोई अकस्मात् अाश्चर्यरूप कार्य होवे, उससे किसी दूसरे कार्य का होना समय नावे । जैसे पीली विजुली चमके तो वायु अधिक चले इत्यादि । यह एक पदार्थ-विद्या की बात है । - १०२ खैणताद्धिते ~JJvar.." वा०-तस्य निमित्तप्रकरणे वातपित्तश्लेष्मभ्यः शमनकोपनयोरुप- सख्यानम् ॥ ५५४ ॥ शांति और कुपित होने अर्थ में वात पित्त और श्लेष्म शब्दों से ठक् प्रत्यय होवे । जैसे -वातस्य शमनं कोपने वा पातिकम् पैत्तिकम्; श्लैष्मिकम् ॥ ५५४ ॥ वा०-सन्निपाताच्च ॥ ५५५ ॥ सन्निपात शब्द से भी शान्ति और कोप अर्थ में ठक प्रत्यय होवे। जैसे-सन्नि- पातस्य शमनं कोपनं पा सान्निपातिकम् । ये दोनों वार्तिक अपूर्व विधायक हैं, क्योंकि इन शब्दों से ठक् प्रत्यय किसी सूत्र करके प्राप्त नहीं है ।। ५५५ ।। सर्वभूमिपृथिवीभ्यामणौ ।। ५५६ ॥ अ० ५ । १ । ४१ ।। संयोग और उत्पातसम्बन्धी निमित्त अर्थ में पष्ठीसमर्थ सर्वभूमि और पृथिवी प्रातिपदिक से यथासंख्य करके अण् और अञ् प्रत्यय होवें। जैसे-सर्वभूमेनिमित्तं संयोग उत्पातो वा सार्वभौमः; पार्थिवो वा। यहां अनुशतिकादिगण में होने से सर्वभूमि शब्द को उभयपदवृद्धि होती है ॥ ५५६ ॥ तस्येश्वरः ॥ ५५७ ॥ अ० ५। १ । ४२ ॥ पष्ठीसमर्थ सर्वभूमि और पृथिवी प्रातिपदिक से ईश्वर अर्थ में यथासंख्य करके अण् और अञ् प्रत्यय होवें । जैसे-सर्वभूमेरीश्वरः सार्वभौमः; पार्थिवो वा ॥ ५५७ ॥ तत्र विदित इति च ॥ ५५८ ॥ अ० ५ । १ । ४३ ॥ सप्तमीसमर्थ सर्वभूमि और पृथिवी शब्द से विदित नाम प्रसिद्धि अर्थ में अण् तथा अञ् प्रत्यय हों। जैसे-सर्वभूमौ विदितः सार्वभौमः; पार्थिवो वा ॥ ५५८ ॥ तस्य वापः ॥ ५.५६ ।। अ० ५ । १ । ४५ ॥ पष्टीसमर्थ प्रातिपदिक से खेत अर्थ वाच्य रहे, तो यथाविहित प्रत्यय हों। वाप कहते हैं खेत को, क्योंकि उसमें जो आदि अन्न बोये जाते हैं। [जैसे-] प्रस्थस्य वाप:- क्षेत्र प्रास्थिकम् द्रौरिणकम् खारिकम् इत्यादि ।। ५५६ ।। तदस्मिन् वृद्धयायलाभशुल्कोपदा दीयते ॥५६०॥ अ० ५।१।४७।। सप्तम्यर्थ में प्रथमासमर्थ प्रातिपदिक से यथाविहित प्रत्यय हो, जो वृद्धि प्राय लाभ शुल्क और उपदा ये अर्थ दीयते क्रिया के कर्मवाच्य हो। तो ।
ठगधिकारः ० .. जो द्रव्य व्याज में देते हैं उसको वृद्धि कहते हैं। ग्राम आदि में जो जमीदार का भाग होता है वह आय । जो दुकानदारी के व्यवहार में मूल वस्तु से अधिक द्रव्य की प्रानि है, उसको लाम । राजा के भ ग को शुल्क, और चूंस लेने को उपदा कहते हैं । जैस-पञ्चास्मिन् वृद्धिर्वा आयो वा लाभो वा उपदा वा दीयते पञ्चकः; सप्तकः; शत्यः शतिकः; साहनः इत्यादि ॥ ५६० ॥ वा०-चतुर्थ्यर्थ उपसङ्ख्यानम् ॥ ५६१ ॥ वृद्धि आदि दीयते क्रिया के कर्मवाच्य हों, तो चतुर्थी के अर्थ में भी प्रथमासमर्थ प्रातिपदिक से यथाविहित प्रत्यय होवें। जैसे-पञ्चास्मै वृद्धिर्वा आयो वा लाभो वा उपदा वा दीयते पञ्चको देवदत्तः इत्यादि ।। ५६१ ।। तद्धरति वहत्यावहति भाराद्वंशादिभ्यः ॥५.६२।। अ० ५.११५०॥ द्वितीयासमर्य, चंश आदि गणपठित शब्दों से परे जो भार शब्द, तदन्त से हरति वहति और श्रावहति क्रियाओं के कर्ता अर्थ में यथाविहित प्रत्यय हों। जैसे-वंशभारं हरति वहति आवहति वा धांशभारिकः; कोटजमारिकः; वाल्वजमारिकः । यहां 'भार ग्रहण इसलिये है कि-भारवंशं हरति, यहां न हो। और 'घशादि' इसलिये है कि-त्रीहिभारं हरति, यहां भी प्रत्यय न हो ॥ ५६२ ॥ सम्भवत्यवहरति पचति ॥ ५६३ ॥ अ० ५ । १ । ५२ ।। द्वितीयासमर्थ प्रातिपदिक से संभव समाप्ति और पकाने अर्थों में यथाविहित प्रत्यय हों। जैसे-प्रस्थं सम्भवति अवहरति पचति वा प्रास्थिकः; कोडविकः; खारीकः; प्रत्यक्षमनुमानं शब्दो वा यं व्यवहारं प्रति सम्भवति स प्रात्यक्षिकः; श्रानुमानिकः; शान्दिको वा व्यवहारः इत्यादि ।। ५६३ ।। वा०-तत्पचतीति द्रोणादण च ॥ ५६४ ॥ द्वितीयासमर्थ द्रोण प्रातिपदिक से पकाने अर्थ में अण और ठञ् प्रत्यय होवें। जैसे-द्रोणं पचति द्रोणी द्रोणिकी वा ब्राह्मणी ।। ५६४ ।। सोऽस्यांशवनभृतयः ॥ ५६५ ।। अ० ५। १ । ५६ ।। अंश मूल्य और सेवन अर्थों में प्रथमासमर्थ प्रातिपदिक से षष्ठी के अर्थ में यथा- विहित प्रत्यय हों। जैसे-पञ्चांशा वस्लानि भृतयो वाऽस्य व्यापारस्य पञ्चकः; सप्तका; साइना इत्यादि ।। ५६५ ॥ * इस सुत्र का दूसरा अर्थ यह भी होता है कि जो भाररूप वंशादि प्रातिपदिक हैं, उनसे ले चलने भादि अयों में यथाविहित प्रत्यय हो। जैसे-भारभूतान् वंशान् वहति वांशिकः; वास्वजिकः इत्यादि । ।
१०४
त्रैणताद्भुिते
Mahal
तदस्य परिमाणम् ।। ५६६ ॥ अ० ५। १ । ५७ ॥
पष्ठ्यर्थ में परिमाणवाची प्रथमासमर्थ प्रातिपदिकों से यथाविहित प्रत्यय हों।
जैसे -प्रस्थः परिमाणमस्य प्रास्थिको गशि'; स्वारीका; शत्यः शतिकः; साहस्रः; द्रौणिका;
कोडविकः; वर्षशत परिमाणमस्य वार्षशतिकः, वार्पसहन्त्रिकः; पष्टिजीवित परिमाणमस्य
पाष्टिकः इत्यादि ॥ ५६६ ।।
सङ्ख्यायाः संज्ञासङ्घसूत्राऽध्ययनेषु ॥५६७।। अ० ५। १।५८ ।।
पूर्वसूत्र की अनुवृत्ति यहां चली आती है।
संज्ञा सङ्घ सूत्र और अध्ययन अर्थों में परिमाणसमानाधिकरण प्रथमासमर्थ
संख्यावाची प्रातिपदिक से षष्ठी के अर्थ में यथाप्राप्त प्रत्यय होवें ॥ ५६७ ॥
वा०-संज्ञायां स्वार्थे ॥ ५६८ ।।
संज्ञा अर्थ में कहे प्रत्यय स्वार्थ की संज्ञा में होवें । जैसे-पञ्चैव पञ्चकाः शकुनयः;
प्रय एव त्रिका: शालङ्कायनाः । सङ्घ अर्थ में-पञ्च परिमाणमस्य पञ्चकः सङ्घः;
पञ्चका वृक्षाः; त्रिका, अष्टको वा। सूत्र अर्थ में-अष्टावध्यायाः परिमाणमस्य सूत्रस्य
अष्टकं पाणिनीयं सुत्रम् पञ्चको गौतमो न्यायः; द्वादशिका जैमिनीया मीमांसा; चतुष्कं
व्यासीयं सूत्रम् दशकं वैयाघ्रपदीयम्; त्रिकं काशकृत्स्नम् ।
अध्यायों का समुदाय भी सङ्घ अर्थ में आ जाता है, फिर सूत्रग्रहण पृथक
इसलिये है कि-सङ्घ शब्द वहुधा प्राणियों के समुदाय में आता है। अध्ययन अर्थ
में-पञ्चकोऽधीतः; सप्तकोऽधीतः; अष्टकः; नवकः इत्यादि ॥ ५६८ ॥
वा०-स्तोमे डविधिः पञ्चदशाद्यर्थः ॥ ५६६ ॥
स्तोमपरिमाणसमानाधिकरण प्रथमासमर्थ पञ्चदशादि प्रातिपदिक से पष्ठी के अर्थ
में ड प्रत्यय होवे । जैसे-पञ्चदश मन्त्राः परिमाणमस्य स्तोमस्य पञ्चदशः स्तोमः;
सप्तदशः; एकविंशः इत्यादि ॥ ५६६ ॥
वा०-शन्शतोर्डिनिश्छन्दसि ।। ५७० ।।
शन और शत् जिनके अन्त में हों, उन प्रातिपदिकों से वैदिकप्रयोग विषय में डिनि
प्रत्यय हो । जैसे-पञ्चदश दिनानि परिमाणमेपां पञ्चदशिनोऽर्द्धमासाः; त्रिंशिनो
.
मासाः ॥ ५७० ॥
वा०-विंशतेश्च ॥ ५७१ ॥
विंशतिशब्दसेभीडिनिप्रत्यय हो। जैसे-विंशतिः परिमाणमेपांविशिनोऽङ्गिरसः ॥५७१॥
ठंगधिकारः
१०५
।
पंक्तिविंशतित्रिंशच्चत्वारिंशत्पञ्चाशत्पष्टिसप्तत्यशीतिनवतिशतम् ।
॥ ५७२ ।। अ० ५। १ । ५६ ।।
परिमाण अर्थ में पति आदि शब्द निपातन किये हैं। जो कुछ कार्य सूत्रों से
सिद्ध नहीं होता, सो सब निपातन से सिद्ध जानना चाहिये । जैसे-पति शब्द में पञ्चन्
शब्द केटि भाग का लोप और ति प्रत्यय किया है । पञ्च परिमाणमस्य तत् पंक्तिश्छन्दः ।
दो दशत् शब्द को विन् आदेश और शतिच् प्रत्यय हो । जैसे-द्वौ दशतो परिमाण-
मेघान्ते विंशतिः पुरुषाः । तीन दशत् शब्दों को निन् भादेश और शत् प्रत्यय । जैसे-
यो दशतः परिमाणमेषान्त त्रिंशत् । चार दशत् शब्दों को चत्वारिन् आदेश और शत्
प्रत्यय । जैसे-चत्वारो दशतः परिमाणमेषां ते चत्वारिंशत् । पांच दशत् शब्दों को पञ्चा
आदेश और शत् प्रत्यय ! जैसे-पञ्च दशतः परिमाणमेपां ते पञ्चाशत् । छः दशत् शब्दों
को पप आदेश और ति प्रत्यय । जैसे-पड् दशतः परिमाणमेघा ते पष्टिः।
सात दशत् शब्दों को सप्त श्रादेश और ति प्रत्यय । जैसे-सप्त दशतः परिमाणमेषां
ते सप्ततिः। आठ दशत् शब्दों को अशी प्रादेश और ति प्रत्यय । जैसे-अष्टौ दशतः
परिमाणमेषां ते अशीतिः । नव दशत् शब्दों को नव आहेश और ति प्रत्यय । जैले-नव
दशतः परिमाणमेषां ते नवतिः । और दश दशत् शन्दों को श आदेश और त प्रत्यय
निपातन किया है। ले-दश दशतः परिमाणमेषां ते शतम् ॥ ५७२ ॥
पञ्चद्दशती वर्गे वा ॥ ५७३ ।। अ० ५ । १ । ६० ।।
यहां संख्यावाची पञ्च और दश शब्द से कन् प्राप्त है, उसका यह अपवाद है, और
पक्ष में कन् भी होजाता है।
पञ्चत् और दशत् ये डति प्रत्ययान्त वर्ग और परिमाण अर्थ में विकल्प करके निपातन
किये हैं। जैसे-पञ्च परिमाणमस्य पञ्चद्वर्गः; दशवर्गः: पञ्चको वर्गः: दशको वर्गः ॥५७३॥
तदर्हति ! ५७४ ॥ अ० ५ । १ । ६३ ।।
योग्यता अर्थ में द्वितीयासमर्थ प्रातिपदिक से यथाविहित प्रत्यय हो। जैसे-
खेतच्छत्रमर्हति श्खेतच्छत्रिका; वानयुग्मिकः; शत्यः; शतिकः इत्यादि ॥ ५७४ ॥
यज्ञविग्भ्यां घखो ॥ ५७५ ॥ अ० ५ । १ । ७१ ॥
यह सूत्र ठक् प्रत्यय का बाधक है।
योग्यता अर्थ में द्वितीयासमर्थ यन और ऋत्विज प्रातिपदिक से यथासंख्य करके
व और खन् प्रत्यय होवें। जैसे-यशमर्हति यनियः; ऋत्विजमर्हति स ात्विजीनो
गझएः ॥ ५७५ ॥
खैणताद्विते . वा०-यज्ञविंग्भ्यां तत्कर्माहतीत्युपसङ्ख्यानम् ॥ ५७६ ।। यह और ऋत्विज शब्द से उन कर्मों के करने योग्य अर्थों में उक्त प्रत्यय हों। यह वातिक सूत्र का शेप है, क्योंकि यह विशेष अर्थ सूत्र से नहीं आता है। [जैसे-] यज्ञकर्माहति यज्ञियो देशः; ऋत्विकर्माहति आत्विजीनं ब्राह्मणकुलम् । अब यहां तक अर्ह अधिकार पूरा हुआ । इसी से ठक् प्रत्यय के अधिकार की समाप्ति जानो । अव यहां से आगे केवल ठञ् प्रत्यय का ही अधिकार चलेगा ॥ ५७६ ॥ पारायणतुरायणचान्द्रायणं वर्तयति ॥५७७॥ अ०५।१।७२ ॥ द्वितीयासमर्थ पारायण तुरायण और चान्द्रायण प्रातिपदिक से वर्तन क्रिया का कर्ता वाच्य रहे, तो ठञ् प्रत्यय होवे । जैसे-पारायणं वर्त्तयति पारायणिकश्छात्रः; तुरायणं वर्तयति तोरायणिको यजमानः; चान्द्रायणं वर्त्तयति चान्द्रायणिको ब्राह्मणः ॥ ५७७ ॥ संशयमापन्नः ।। ५७८ ॥ अ० ५। १ । ७३ ॥ प्राप्त होने अर्थ में द्वितीयासमर्थ संशय प्रातिपदिक से ठञ् प्रत्यय होवे । जैसे- संशयमापन्नः सांशयिकश्चौरः ॥ ५७८॥ योजनं गच्छोत || ५७६ || अ० ५। १ । ७४ ।। चलने अर्थ में द्वितीयासमर्थ योजन प्रातिपदिक से ठञ् प्रत्यय होवे । जैसे-योजनं गच्छति योजनिकः ॥ ५७६ ॥ । वा०-क्रोशशतयोजनशतयोरुपसंख्यानम् ।। ५८० ।। चलने अर्थ में द्वितीयासमर्थ कोशशत और योजनशत प्रातिपदिक से भी ठञ् प्रत्यय हो । जैसे-क्रोशशतं गच्छति क्रोशशतिकः; योजनशतिकः ॥ ५८० ॥ वा०-ततोऽभिगमनमहतीति च ॥ ५८१ ॥ यहां चकार से पूर्व चार्तिक की अनुवृत्ति पाती है। निरन्तर चलने अर्थ में पञ्चमीसमर्थ क्रोशशत और योजनशत शब्द से भी ठञ् प्रत्यय होवे । जैसे-क्रोशशतादभिगमनमर्हति कोशशतिको भिक्षुकः; यौजनशतिक आचार्यः ॥ ५८१ ॥ उत्तरपथेनाहृतं च ॥ ५८२ ॥ अ० ५ । १ । ७७ ॥ यहां चकार से गच्छति क्रिया की अनुवृत्ति आती है।
ठअधिकारः १०७ --------- ------ ग्रहण करने और चलने अर्थ में तृतीयासमर्थ उत्तरपथ प्रातिपदिक से ठञ् प्रत्यय होवे । जैसे-उत्तरपयेनाहृतमौत्तरपथिकम् उत्तरपयेन गच्छति औतरपथिकः ॥५८२॥ वा०-याहतप्रकरणे वारिजङ्गलस्थलकान्तारपूर्वपदादुप- संख्यानम् ॥ ५८३॥ ले आने और चलने अर्थ में वारि जङ्गल स्थल और कान्तार शब्द जिसके पूर्व हों, ऐसे द्वितीयासमर्थ पथ प्रातिपदिक से ठञ् प्रत्यय हो । जैसे-बारिपथेनाहृतं वारिपथि- कम् वारिपयेन गच्छति वारिपथिकः; जङ्गलपनाहतं जागलपथिकम्; जङ्गलपधेन गच्छति जाङ्गलपथिकः; स्थलपयेनाहृतं स्थालपथिकम्; स्थलपथेन गच्छति स्थालपथिकः; कान्तारपधेनाहृतं कान्तारपथिकम् कान्तारपयेन गच्छति कान्तारपथिकः ॥ ५८३ ॥ वा०-अजपथशङ्कुपथाभ्यां च ॥ ५८४ ॥ अजपथ और शकुपथ शब्द से भी उक्त अर्थों में ठन प्रत्प्रय हो । जैसे-अजपथे- नाहतं गच्छति वा आजपथिकः शङ्कुपनाहृतं गच्छति वा शाजकुपथिकः ॥ ५८४ ॥ वा०-मधुकमरिचयोरण स्थलात् ॥ ५८५ ॥ मधुक और मरिच अभिधेय हों, तो स्थलशब्द से परे जो पथ प्रातिपदिक उससे ले श्राने अर्थ में अण् प्रत्यय होवे । जैसे-स्थलपनाहतं स्थाल पथं मधुकम्; स्थालपथं मरिचम् ।। ५८५ ॥ कालांत् ।। ५८६ ॥ अ० ५। १ । ७८ ॥ यह अधिकार सूत्र है। यहां से आगे जो २ प्रत्यय विधान करें, सो २ सामान्य करके कालवाची प्रातिपदिक से जानो! जैस-मासेन निवृत्तं कार्य मासिकम् आर्द्ध- मासिकम् सांवत्सरिकम् इत्यादि ।। ५८६ ॥ तेन निवृत्तम् ।। ५८७ ॥ अ० ५ । १ । ७६ ॥ सिद्ध होने अर्थ में तृतीयासमर्थ कालवाची प्रातिपदिक से ठत्र प्रत्यय होवे । जैसे- मुहर्जुन निवृत्तं भोजन मोहर्तिकम्: प्राहरिकम् सप्ताहेन निवृत्तो विवादः साप्ताहिकः; पाक्षिकः; अहा निवृत्तमाह्निकम् इत्यादि !! ५८७ ॥ तमधीष्टो भृतो भूतो भावी ॥ ५८८ ॥ अ० ५। १ । ८०॥ अधीष्ट कहते हैं सत्कारपूर्वक उदरने को, जो धन देकर स्वरीद लिया हो उस नौकर को भृत, भूत हो चुकने को, और भावी जो आगे होगा इसको समझना चाहिये । इन अधीष्ट आदि अर्थों में द्वितीयासमर्थ कालवाची प्रातिपदिकों से ठन् प्रत्यय हो ।
१०८ स्त्रैणताद्विते जैसे-मासमधीष्टो मासिक आचार्यः; पक्षम्भृतः पाक्षिकः कर्मकरः; सप्ताहभूतः साप्ताहिको व्याधिः; पौर्णमासी भावी पौर्णमासिक उत्सवः इत्यादि ॥ ५८८ ॥ मासाद्वयसि यत्खनौ ॥ ५८६ ।। अ० ५। १ । ८१ ॥ यह सूत्र ठञ् प्रत्यय का अपवाद है। यहां अधीष्ट श्रादि अर्था का अधिकार तो है, परन्तु योग्यता के न होने से एक भूत अर्थ ही लिया जाता है। द्वितीयासमर्थ मास शब्द से अवस्था गम्यमान होवे, तो यत् और खज प्रत्यय हो । जैसे-मासं भूतो मास्यः, मासीनो वा शिशुः ॥ ५८६ ॥ तेन परिजय्यलभ्यकार्यसुकरम् ।। ५६० ॥ अ० ५ । १। ६३॥ जीत सकने, प्राप्त होने योग्य, और जो अच्छेप्रकार सिद्ध हो, इन अर्थों से तृतीया- समर्थ कालवाची प्रातिपदिक से ठञ् प्रत्यय होवे । जैसे-पक्षेन परिजेतुं शक्यते पाक्षिकः सङ्ग्रामः; मासेन लभ्यं मासिकं धनम्। द्वादशाहेन कार्य द्वादशाहिकं व्रतम् वर्षेण सुकरो वार्षिक: प्रासादः ॥ ५६० ॥ तदस्य ब्रह्मचर्यम् ।। ५६१ ॥ अ० ५। १ । ९४ ।। प्रथमासमर्थ कालवाची प्रातिपदिक से षष्ठी के अर्थ में ठञ् प्रत्यय हो, ब्रह्मचर्य वाच्य रहे तो। जैसे-पट्त्रिंशदद्दा अस्य ब्रह्मचर्यस्य षट्त्रिंशदाब्दिकं ब्रह्मचर्यम् अष्टादशान्दिकम् नवाब्दिकम् । इस सूत्र में जयादित्य ने द्वितीया विभक्ति काल के अत्यन्त संयोग में मान के अर्थ किया है। सो सूत्र में तो काल के साथ अत्यन्त संयोग है ही नहीं, उदाहरण में हो सकता है। फिर सूत्र में द्वितीया क्यों कर हो सकती है। और द्वितीयासमर्थ विभक्ति मानने से प्रत्ययार्थ का सम्बन्ध ब्रह्मचारी के साथ होता है। सो ऋषि लोगों के अभि- प्राय से विरुद्ध है। क्योंकि मनुस्मृति में 'षट्त्रिंशदाब्दिकम्' यह पद ब्रह्मचर्य का विशेषण रक्खा है। फिर इन लोगों का अर्थ श्रादर के योग्य नहीं है ॥ ५६१ ॥ वा०-महानाम्न्यादिभ्यः षष्ठीसमर्थेभ्य उपसंख्यानम् ॥ ५६२ ।। पष्ठीसमर्थ महानाम्नी श्रादि प्रातिपदिकों से सामान्य अर्थ में ठञ् प्रत्यय हो । जैसे- महानाम्न्या इदम्पदं माहानामिकम्; गौदानिकम् इत्यादि ॥ ५६२ ॥ वा०-तच्चरतीति च ॥ ५९३ ।। यहां चकार से पूर्व वार्तिक की अनुवृत्ति आती है। महानाम्नी नाम ऋचाओं का है, उनके सहचारी अनुष्टान का ग्रहण तत् शब्द से समझना चाहिये।
ठअधिकारः १०६ द्वितीयासमर्थ महानाम्नी आदि प्रातिपदिकों से आचरण अर्थ में ठञ् प्रत्यय होवे। जैसे महानान्नीश्वरति माहानामिकः - श्रादित्यव्रतिकः इत्यादि ॥ ५६३ ॥ वा०-अवान्तरदीक्षादिभ्यो डिनिः ॥ ५६४ ॥ द्वितीयासमर्थ अवान्तरदीक्षा प्रादि प्रातिपदिकों से आचरण अर्थ में डिनि प्रत्यय होवे। जैसे-श्रवान्तरदीक्षामाचरति अचान्तरदीक्षी; तिलवती इत्यादि ॥ ५६४ ॥ वा०-अष्टाचत्वारिंशतो ड्ढुंश्च ॥ ५६५ ॥ यहां चरति क्रिया और डिनि प्रत्यय की अनुवृत्ति पूर्व वार्तिकों से आती है। द्वितीयासमर्थ अष्टाचत्वारिंशत् प्रातिपदिक से आचरण अर्थ में वुन् और डिनि प्रत्यय हों । जैसे-अष्टाचत्वारिंशद्वर्याणि व्रतमाचरति श्रष्टाचत्वारिंशकः, अष्टा- चत्वारिंशी ॥ ५६५॥ वा०-चातुर्मास्यानां यलोपश्च ।। ५६६ ।। यहां भी पूर्व की सब अनुवृत्ति आती है। द्वितीयासमर्थ चातुर्मास्य प्रातिपदिक से आचरण अर्थ में ड्वुन् और डिनि प्रत्यय होवें । जैसे-चातुर्मास्यानि व्रतान्याचरति चातुर्मासका. चातुर्मासी ।। ५६६ ॥ वा-चतुर्मासागण्यो यज्ञे तत्र भवे ॥ ५९७ ॥ सप्तमीसमर्थ चतुर्मास शुद्ध से भव अर्थ यश होवे, तो राय प्रत्यय हो । जैसे-चतुर्यु मासेपु भवाश्चातुर्मास्या यहाः ॥ ५.६७ ॥ बा०-संज्ञायामण ॥ ५९८ ।। भयार्थ संक्षा अभिधेय हो, तो सप्तमीसमर्थ चतुर्मास आदि शब्दों से अण् प्रत्यय होवे । जैसे-चतुर्यु मासेपु भवा चातुर्मासी पौर्णमासी; अापाढी; कार्तिकी; फाल्गुनी; चैत्री इत्यादि ॥ ५६८ ॥ तस्य च दक्षिणा यज्ञाख्येभ्यः ।। ५.६६ ॥ अ० ५। १ । ६५ ॥ पष्टीसमर्थ यक्षवाची प्रातिपदिकों से दक्षिणा अर्थ में टन् प्रत्यय हो । जैसे-अग्नि- टोमस्य दक्षिणा याग्निष्टोमिकी: श्राश्वमेधिकी; बाजपेयिकी; राजमृयिकी इत्यादि । यहां 'पारया' ग्रहण दसलिये है कि इस कालाधिकार में कालसमानाधिकरण यज्ञों का ही ग्रहण न हो जात्रे ॥ ५६६ ।। यहां नाम्नी शब्द में (मस्याढे तद्विते) इस धार्तिक से पुंवद्राव होकर नान्त श्रग के टिभाग का लोप हो जाता है। - ११० वैणताद्भिते तेन यथाकथाचहस्ताभ्यां णयतौ ॥६००॥ अ० ५। १ । ६८ ॥ यथाकथाच यह अव्ययशब्द अनादर अर्थ में आता है 1 और पूर्व सूत्र से 'दीयते' और 'कार्यम्' इन दो पदों की अनुवृत्ति पाती है। तृतीयासमर्थ कथाकथाच और हस्त प्रातिपदिक से देने और करने अर्थों में रण और यत् प्रत्यय यथासंख्य करके हों। जैसे-यथाकथाच दीयते कार्य वा याथाकथाचम्; हस्तेन दीयते कार्य वा हस्त्यम् ॥ ६०० ॥ सम्पादनि ॥ ६०१ ॥ अ० ५ । १ । ९९ ॥ यहां पूर्व से तृतीयासमर्थ की अनुवृत्ति आती है। अवश्य सिद्ध होनेवाला कर्त्ता वाच्य रहे, तो तृतीयासमर्थ प्रातिपदिक से ठन् प्रत्यय होवे। जैसे-ब्रह्मचर्येण सम्पद्यते विद्या ब्राह्मर्यिकी; उपकारेण सम्पद्यते औप- कारिको धमः; धर्मेण सम्पद्यते धार्मिकं सुखम् इत्यादि । ६०१ ॥ कर्मवेषाद्यत् !। ६०२ ।। अ० ५ । १ । १०० ॥ सम्पन्न होने अर्थ में तृतीयासमर्थ कर्म और वेष प्रातिपदिक से यत् प्रत्यय हो । यह ठञ् का अपवाद है। [जैसे- कर्मणा सम्पद्यते कम्मण्यं शरीरम् वेषेण सम्पद्यते वेष्यो नटः, वेष्या तटिनी। यही वेप्या शब्द आज कल शकार से प्रवृत्त है, सो ठीक नहीं। क्योंकि जो अर्थ उनमें घट सकता है वह यही है । और विश प्रवेशने धातु से भी बन सकता है, परन्तु ठीक २ अर्थ गणिकाओं में नहीं घटता ॥ ६०२ ॥ तस्मै प्रभवति सन्तापादिभ्यः ॥ ६०३ ।। अ० ५ । १ । १०१ ॥ चतुर्थीसमर्थ सन्ताप आदि गणपठित प्रातिपदिकों से प्रभव अर्थात् सामर्थ्यवान् अर्थ में उञ् प्रत्यय हो। जैसे-सन्तापाय प्रभवति सान्तापिकः; संग्रामाय प्रभवति सांग्रामिकः प्रवासाय प्रभवति प्रावासिकः ॥ ६॥३॥ 1 समयस्तदस्य प्राप्तम् । ६०४ ॥ अ० ५। १ । १०४ ॥ प्राप्तसमानाधिकरण प्रथमासमर्थ समय प्रातिपदिक से पष्ठी के अर्थ में ठञ् प्रत्यय हो । जैसे-समयः प्राप्तोऽस्य सामयिक उद्वाहः, सामयिकं वस्त्रम्, सामयिको योगाभ्यासः, सामयिकमौषधम् इत्यादि ॥ ६०४ ॥ छन्दसि घस् ।। ६०५ ।। अ० ५। १ । १०६ ॥ यहां ऋतु शब्द से अण् प्रत्यय प्राप्त है, उसका यह अपवाद है।
अधिकारः १११ प्राप्तसमानाधिकरण प्रथमासमर्थ ऋतु प्रातिपदिक से षष्ठी के अर्थ में वैदिकप्रयोग- विषयक ठञ् प्रत्यय होवे । जैसे-ऋतुः प्राप्तोऽस्य ऋत्वियः-श्रयन्ते योनिऋत्विया; यहां यस् प्रत्यय के सित् होने से भसंज्ञा होकर पदसंज्ञा का कार्य जश्त्व नहीं होता ६०५॥ प्रयाजनम् ॥ ६०६ ।। अ० ५ । १ । १०६ ।। प्रयोजनसमानाधिकरण प्रथमासमर्थ प्रातिपदिक से पष्ठी के अर्थ में ठञ् प्रत्यय हो। जैसे -उपदेशः प्रयोजनमस्य श्रीपर्देशिका; अाध्यायनिकः; स्त्री प्रयोजनमस्य स्त्रैणः; पोस्नः; धर्मः प्रयोजनमस्य धार्मिक वितण्डा प्रयोजनमस्य वेतण्डिकः; पारोक्षिकः इत्यादि ॥६०६॥ अनुप्रवचनादिभ्यः ॥ ६०७ ॥ अ० ५ । १ । १११ ॥ प्रयोजनसमानाधिकरण प्रथमासमर्थ अनुप्रवचनादि गणपठित प्रातिपदिकों से पष्ठी के अर्थ में छ प्रत्यय हो। ठञ् का अपवाद है। [जैसे-] अनुप्रवचन प्रयोजनमस्य अनुप्रवचनीयम्; उत्थापनीयम्: अनुवासनीयम्; आरम्भरणीयम् इत्यादि ॥ ६०७ ॥ वा०-विशिपूरिपातरुहिपदिप्रकृतेरनात्सपूर्वपदादुपसंख्यानम् ॥६०८॥ प्रयोजनसमानाधिकरण प्रथमासमर्थ विशि पूरि पति रुहि पदि इन ल्युट प्रत्ययान्त धातुओं के प्रयोग जिनके अन्त में हों, उन प्रातिपदिकों से छ प्रत्यय होवे। जैसे- गृहप्रवेशनं प्रयोजनमस्य गृहप्रवेशनीयम्; प्रपापूरणीयम्; अश्वप्रपतनीयम्, प्रासादारोह- गीयम्; गोप्रपदनं प्रयोजनमस्य गोप्रपदनीयम् ॥ ६०८ ।। वा०-स्वर्गादिभ्यो यत् ॥ ६०६ ।। प्रयोजनसमानाधिकरण स्वर्गादि प्रातिपदिकों से पष्ठी के अर्थ में यत् प्रत्यय हो। जैसे-वर्ग: प्रयोजनमस्य स्वर्ग्यम्; यशस्यम्; आयुष्यम् इत्यादि ॥ ६०६ ॥ वा०-पुण्याहवाचनादिभ्यो लुक् ।। ६१० ॥ प्रयोजनसमानाधिकरण प्रथमासमर्थ पुण्याहवाचन आदि प्रातिपदिकों से पष्ठी के अर्थ में विहित प्रत्यय का लुक् होवे। जैसे-पुण्याहवाचन प्रयोजनमस्य पुण्याहवाचनम्; खस्तिवाचनम् शान्तिवाचनम् इत्यादि ॥ १० ॥ समापनात्सपूर्वपदात् ॥ ६११ ॥ अ० ५ । १ । ११२ ॥ प्रयोजनसमानाधिकरण प्रथमासमर्थ समापन शब्द जिनके अन्त में हो, उन प्रातिपदिकों से षष्ठी के अर्थ में छ प्रत्यय होवे । जैसे-छन्दः समापनं प्रयोजनमस्य छन्दःसमापनीयम्; न्यायसमापनीयम्; व्याकरणसमापनीयन् इत्यादि ।। ६९१ ।। तेन तुल्यं क्रिया चेद्वतिः ॥ ६१२ ।। अ० ५। १ । ११५ ।।
११२ स्त्रैणताद्धिते तुल्य अर्थ क्रिया होवे, तो तृतीयासमर्थ प्रातिपदिक से पति प्रत्यय होवे । जैसे- ब्राह्मणेन तुल्यं ब्राह्मणवत्, सिंहपत्; व्याववत् इत्यादि । यहां 'क्रिया' ग्रहण इसलिये है कि जहां गुण और द्रव्य का सादृश्य हो वहां प्रत्यय न होवे । जैसे-भ्रात्रा तुल्यः स्यूलः; भ्रात्रा तुल्यः पिङ्गलः, यहां वति प्रत्यय न होवे ॥६१२।। तदर्हस् ।। ६१३ ।। अ० ५। १ । ११७ ।। अहं अर्थ में, द्वितीयासमर्थ प्रातिपदिक से वति प्रत्यय होवे। जैसे-राजानमर्हति राजवत् पालनम् ब्राह्मणवद्विद्याप्रचारः; ऋपिवत् इत्यादि ॥ ६१३ ॥ तस्य भावस्त्वतलो ।। ६१४ ॥ अ० ५ । १ । ११६ ॥ जिस गुण के होने से शब्द का अर्थ के साथ वाच्यवाचक सम्बन्ध समझा जाता है, उस गुण की विवक्षा में षष्टीसमर्थ प्रातिपदिकमात्र से त्व और तत् प्रत्यय हों। जैसे-ब्राह्मणस्य भावो ब्राह्मणत्वम्,ब्राह्मणता;तस्यभावस्तत्त्वम्, तत्ता स्त्रीत्वम्; पुंस्त्वम् स्थूलत्वम्, स्थूलता; कृशत्वम्, कृशता; चेतनत्वम्, चेतनता; जडत्वम्, जडता इत्यादि । यहां से ले के इस पाद् की समाप्तिपर्यन्त त्व और तल प्रत्यय का अधिकार समभाना चाहिये ॥ ६१४॥ पृथ्वादिभ्य इमनिज्वा ।। ६१५ ॥ अ० ५। १ । १२२ ।। पष्ठीसमर्थ पृथु आदि गणपठित प्रातिपदिकों से भाव अर्थ में इमनिच् प्रत्यय विकल्प करके होवे, पक्ष में त्व और तल् प्रत्यय होवें। जैसे-पृथो वः प्रथिमा; म्रदिमा; महिमा; लधिमा; गरिमा; पृथुत्वम्, पृथुता; मृदुत्वम्, मृदुता; महत्त्वम्, महत्ता; लघुत्वम्, लघुता; गुरुत्वम्, गुरुता इत्यादि ॥६१५॥ वर्णदृढादिभ्यः ष्यश्च ।। ६१६ ।। अ० ५। १ । १२३ ।। यहां चकार से इमनिच् और विकल्प की भी अनुवृत्ति आती है पष्ठीसमर्थ वर्णवाची और दृढादि प्रातिपदिकों से भाव अर्थ में प्यञ् और इमनिच प्रत्यय हो। जैसे-शुक्लस्य भावः शीक्ल्यम्, शुक्लिमा,शुक्लत्वम्, शुक्लता, कार्यम्. कृष्णिमा, कृष्णत्वम्, कृष्णता; नैल्यम्, नीलिमा, नीलित्वम्, नीलता इत्यादि । दृढादिकों से दाढर्थम्, ढिमा, दृढत्वम्, दृढता; पाण्डित्यम्, पण्डितिमा, पण्डितत्वम्, पण्डितता; मधुरस्य भावो माधुर्य्यम्, मधुरिमा, मधुरत्वम्, मधुरता इत्यादि ॥ १६ ॥ गुणवचनब्राह्मणादिभ्यः कर्मणि च ॥६१७॥ अ०५।१।१२४ ॥ जिन शब्दों से शीत उष्ण आदि गुणों का बोध हो, उनको गुणवचन कहते हैं । यहां चकार भाव अर्थ का समुच्चय होने के लिये है।
भावाधिकार ----- .- - पष्ठीसमर्थ गुणवाची और ब्राह्मणादि प्रातिपदिकों से भाव और कर्म अर्थ में प्यम् प्रत्यय होवे । जैसे-शीतस्य भावः कर्म वा शैत्यम्; औष्ण्यम्: शीतत्वम्, शीतता; उप्णत्वम्, उप्यता । ब्राह्मणादिकों से-ब्राह्मणस्य भावः कर्म वा ब्राह्मण्यम्; चौर्यम्; मोक्यम् कौशल्यम्; चापल्यम् नैपुण्यम् इत्यादि । और अधिकार से त्व और तल भी होते हैं। [जैसे-] ब्राह्मणत्वम्, ब्राह्मणता इत्यादि । यहां से आगे भाव और कर्म दोनों अधों का अधिकार चलेगा ॥ ६१७ ॥ वा०-चातुर्वर्यादीनां स्वार्थ उपसंख्यानम् ।। ६१८ ।। चतुर्वर्ण आदि शब्दों से स्वार्थ में प्या प्रत्यय हो। जैसे-चत्वार एव वर्णाश्चातु- वर्ण्यम्; चातुराश्रम्यम्; त्रैलोक्यम्त्रैवर्यम्; ऐकवर्यम्; पाड्गुण्यम्; सैन्यम्; सान्नि- ध्यम्; सामीप्यम्: औपम्यम्; सौख्यम् इत्यादि । ६९८ ।। स्तेनाद्यन्नलोपश्च ।। ६१६ ।। अ० ५ । १ । १२५ ॥ भाव और कर्म अर्थ में स्तेन शब्द से यत् प्रत्यय और नकार का लोप होवे । जैसे- स्तनस्य भावः कर्म वा स्तेयम् ॥ ६१६ ॥ सख्युर्यः ।। ६२० ।। अ० ५ । १ । १२६ ॥ भाव और कर्म अर्थ में सखि शब्द से य प्रत्यय होवे । जैसे--सख्युर्भावः कर्म वा सख्यम् ।। ६२० ॥ वा-दूतवणिग्भ्यां च ॥ ६२१ ॥ और घणिक शब्दों से भी य प्रत्यय हो। जैसे-दूतस्य भावः कर्म वा दूत्यम्। वणिज्यम् । वणिक शब्द का पाठ ब्राह्मणादिगण में होने से प्यञ् प्रत्यय भी हो जाता है। जैसे-वाणिज्यम् ।। ६२१ ।। पत्यन्तपुरोहितादिभ्यो यक् ।। ६२२ ॥ अ० ५ । १ । १२८ ।। पष्टीसमर्थ पति शब्द जिनके अन्त में हो, उन और पुरोहितादि प्रातिपदिकों से यक् प्रत्यय होवे भाव और कर्म अर्थ वाच्य रहे तो। जैसे-सेनापतेर्भावः कर्म वा सैना- पत्यम्: वानस्पत्यम् गार्हपत्यम्: वाहम्पत्यम्: प्राजापत्यम् । अधिकार के होने से त्व तल भी होते हैं । जैसे-सेनापतित्वम्, सेनापतिता इत्यादि। पुरोहितादिकों से-पौरोहित्यम् राज्यम् वाल्यम्:पुरोहितत्वम् पुरोहितता इत्यादि ॥२२॥ -यह पञ्चमाध्याय का प्रथमपाद पूरा हुआ ॥
:११४ खैणताद्धिते .. अथ द्वितीयः पादः-- धान्यानां भवने क्षेत्रे खञ् ।। ६२३ ॥ अ० ५ । २ । १ ।। यहां बहुवचन का निर्देश होने से धान्य के विशेषवाची शब्दों का ग्रहण होता है। षष्ठीसमर्थ धान्यविशेषवाची शब्दों से उत्पत्ति का स्थान खेत अर्थ वाच्य रहे, तो खज प्रत्यय हो । जैसे-गोधूमानां भवनं क्षेत्रं गोधूमीनम् मौद्गीनमः कौलत्थीनम् इत्यादि । • यहां 'धान्यबाचियों का' ग्रहण इसलिये है कि-तृणानां भवन क्षेत्रम्, यहां न हो। और 'खेत का' ग्रहण इसलिये है कि-गोधूमानां भवन कुशलम्, यहां भी खञ् प्रत्यय न होवे ।। ६२३ ॥ तत्सर्वादेः पथ्यङ्गकर्मपत्रपात्रं व्याप्नोति ॥६२४॥ अ० ५१२॥७॥ सर्व शब्द जिनके आदि में हो, ऐसे पथिन् अङ्ग कर्मन् पत्र और पात्र द्वितीयासमर्थ प्रातिपदिकों से व्याति अर्थ में स्त्र प्रत्यय होवे । जैसे-सर्वपथं व्याप्नोति सर्वपथीनं शकटम् सर्वाण्यङ्गानि व्याप्नोति सर्वाङ्गीणमौषधम्; सर्वकर्मव्याप्नोति सर्वकर्माणः पुरुषः; सर्वपत्रीणःसारथिः सर्वपात्रीणः सूपः इत्यादि॥६२४॥ तस्य पाकमूले पील्वादिकर्णादिभ्यः कुणब्जाहचौ ॥ ६२५ ॥ अ० ५ । २ । २४ ।। पाक और मूल अर्थों में पष्ठीसमर्थ पील्वादि और कर्णादि गणपठित प्राप्तिपदिकों से यथासंख्य करके कुरणप् और जाहच् प्रत्यय हों। जैसे--पीलूनां पाकः पीलुकुणः; बदरकुणः; स्नदिरकुणः इत्यादि । कर्णादिकों से- कर्णस्य मूलं कर्णजाहम्; नखजाहम् केशानां मूलं केशजाहम् दन्तजाहम् इत्यादि ॥६२५॥ तेन वित्तश्चुञ्चुप्चणपौ ॥ ६२६ ।। अ० ५ । २ । २६ ॥ तृतीयासमर्थ प्रातिपदिकों से ज्ञात अर्थ में चुञ्चुप् और चणप् प्रत्यय हों। जैसे- विद्यया वित्तो हातो विद्याचुञ्चुः; उपदेशेन वित्त उपदेशचणः इत्यादि ॥ ६२६ ॥ विनभ्यां नानाजी नसह || ६२७ ॥ अ० ५। २ । २७ ॥ नसह अर्थात् पृथग्भाव अर्थ में वि और नञ् अव्यय प्रातिपदिकों से यथासंख्य करके ना और नाञ् प्रत्यय हों । जैसे-विना नाना । नत्र अव्यय के अनुबन्ध का लोप होकर वृद्धि हो जाती है ॥ ६२७ ॥ * इत्यादि जिन २ सूत्र वार्तिकों में मध्ययों से प्रस्थय विधान किये हैं, वहां २ महाविमापा अर्थात् (समर्थानां० ) इस अधिकार सूत्र के विकल्प की प्रवृत्ति न होने से वाक्य नहीं रहता। अर्थात् नित्य प्रत्यम हो जाते है॥ 1.
कटजधिकारः --------- वेः : शालच्छकटचौ ॥ ६२८ ॥ अ० ५ । २ । २८ ॥ वि अव्यय प्रातिपदिक से शालच और शङ्कटच् प्रत्यय हों। जैसे-विशालः; विशङ्कटो वा पुरुषः ॥ ६२८ ।। सम्प्रोदश्च कटच् ।। ६२६ ॥ अ० ५। २ । २६ ॥ यहां चकार ग्रहण से वि उपसर्ग की अनुवृत्ति पाती है। सम्, प्र, उद् और वि इन उपसर्ग शब्दों से कटच् प्रत्यय हो। जैसे-सङ्कटम्; प्रकटम्; उत्कटम् विकटम् ।। ६२६ ।। . वा०-कटच्प्रकरणेऽलावूतिलोमाभङ्गाभ्यो रजस्युपसंख्यानम् ॥६३० अलावू तिल उमा और भङ्गा प्रातिपदिकों से रज अर्थ में कटन् प्रत्यय हो । जैसे- अलावूनां रजोऽलावूकटम्; तिलकटम्; उमाकटम् भङ्गाकटम् ॥ ६३० ॥ वा०-गोष्ठादयः स्थानादिषु पशुनामादिभ्य उपसंख्यानम् ॥६३१॥ स्थान आदि अर्थों में पशु आदि के विशेषनामवाची शब्दों से गोष्ठ श्रादि प्रत्यय हो । जैसे-गवां स्थान गोगोष्टम्; महिपीगोष्ठम् अजागोष्ठम् अविगोष्ठम् इत्यादि ।। ६३१ ॥ वा०-संघाते कटच ।। ६३२ ।। यहां पूर्व वार्तिक की अनुवृत्ति आती है। संघात अर्थ में पशुओं के विशेष नामवाची प्रातिपदिकों से कटच् प्रत्यय हो । जैसे-अवीनां संघातोऽविकटम्; अजाकटम्; गोकटम् इत्यादि ।। ६३२ ।। वा०-विस्तारे पटच् ॥ ६३३ ।। विस्तार अर्थ में पशुओं के विशेषनामवाची प्रातिपदिकों से पटच् प्रत्यय होवे । जैसे-गवां विस्तारो गोपटम; उष्ट्रपटम्; वृकपटम् इत्यादि ॥ ६३३ ॥ वा०-द्वित्वे गोयुगच् ॥ ६३४ ॥ पशुओं के द्वित्व अर्थ में उक्त शब्दों से गोयुगच् प्रत्यय होवे। जैसे-उष्ट्राणां द्वित्यम् उष्ट्रगोयुगम; हस्तिगोयुगम्; व्यावगोयुगम् इत्यादि ॥ ६३८ ॥ * विशाल श्रादि शब्द कि जिनका निर्वचन काने में नहीं पाता वे अव्युत्पन्न शब्द कहाते हैं । वस्तुतः ये शब्द श्रव्युत्पन्न ही हैं, क्योंकि प्रकृति और प्रत्ययों का मिग्न अर्थ कुछ विदित नहीं होता । फिर इनमें प्रत्यय विधान स्वल स्वर आदि का बोध होने के लिये है। ; इन सूत्र वार्तिकों से करच श्रादि प्रत्ययों के विधान में दूसरा पक्ष यह भी है कि कट ग्रादि शब्द रज श्रादि अयों के वाचक हैं, उनके साथ पष्टीतत्पुरुष समास होकर ये शब्द बनते हैं । जैसे गोष्ट नाम स्यान का है- गवां गोष्टं गोगोष्टम् इत्यादि । इस पल में इन पार्तिकों का कुछ प्रयोजन नहीं है ।।
११६ स्त्रैणतादिते --- --------- वा०-प्रकृत्यर्थस्य पट्त्वे पड्गवच् ॥ ६३५ ।। उक्त प्रातिपदिकों से छुः व्यक्तियों के बोध होने पर्थ में पगवन् प्रत्यय हो । जैसे- पट हस्तिनो हस्तिपड्गवम् अश्वपड्गवम् इत्यादि ।। ६३५ ।। वा०-स्नेहे तैलच ॥ ६३६ ॥ स्नेह अर्थात् घी तेल आदि मयों में सामान्य प्रातिपदिकों से तैलच् प्रत्यय हो। जैसे-एरण्डतैलम्; तिललम्; सर्पपतैलम्: इङ्गुदीतलम् इत्यादि ॥ ६३६ ॥ वा०-भवने क्षेत्रे इक्ष्वादिभ्यः शाकटशाकिनौ ।। ६३७ ॥ . उत्पत्ति का स्थान खेत वाच्य रहे, तो इनु शादिशब्दों से शाक्ट और शाकिन प्रत्यय हों। जैसे-इजूर्ण क्षेत्रमिनुशाकरम्:इनुशाकिनम् यवशाकटम्यवशाकिनम्त्यादि ॥६॥ नते नासकायाः संज्ञायां टीटनाटच्भ्रटचः ॥६३८॥ अ०५।२।३१॥ यहां पूर्व सूत्र ले अब उपसर्ग की अनुवृत्ति आती है। नासिका के टेडे होते अर्थ में संक्षा अभियेय रहे, तो अव शब्द से टीटच् नाट. और भ्रटच् प्रत्यय हों। जैसे-नासिकाया नतम् अवीटम् अवनाटम्: अबभ्रटम् । ऐसी नासिका से युक्त पुरुष के भी ये नाम पड़ जाते हैं । जैसे-अक्टीट; अवनाटः; अवभ्रटो वा पुरुषः इत्यादि ॥ ६३८ । इनपिटाच्चिकचि च ॥ ६३६ ॥ अ० ५ । २ । ३३ ॥ यहां नि उपसर्ग और नासिका के नत की अनुवृत्ति पाती है। नि शब्द से नासिका के नम जाने अर्थ में इनन् और पिटन् प्रत्ययों के परे नि शुष्ट को यथासंस्थ करके चिक और वि आदेश हो । जैसे-चिकिनः चिपिटः ॥ ६३२॥ वा०-ककारप्रत्ययो वक्तव्यश्चिक्च प्रकृत्यादेशः ॥ ६४० ॥ नि शब्द को चिक आदेश और उससे क प्रत्यय भी हो । जैसे-चिकः ॥ ३० ॥ वाक्ष-क्लिन्नस्य चिल्पिल्चुल्लश्चास्य चक्षुषी ।। ६४१ ।। इसके नेत्र इस अर्थ में क्लिन्न शब्द को.चिल पिल और चुल आदेश और ल प्रत्यय होवे । जैसे-क्लिन्ने प्रस्य चनुषी चिला; पिल्लः: चुसः ॥ ६४२ ॥ उपाधिभ्यां त्यकन्नासन्नारूढयोः ॥ ६४२ ॥ अ० ५। २ । ३४ ॥ यहां (नते नासिका० ) इस सूत्र से संत्रा की अनुवृत्ति वली पाती है।
प्रमाणाधिकारः ११७ श्रासन्न और धान्द अयं में वर्तमान उप और अधि उपसगी से संचाविषयक स्वार्थ में त्यकन् प्रत्यय हो । जैसे-पर्वतसासन्नमुपत्यका; पर्वतस्यानढमधित्यका ॥ ६४२ ॥ तदस्य लजातं तारकादिभ्य इतच् ॥६४३॥ अ० ५। २ । ३६ ॥ सवात समानाधिकरण प्रथमासमर्थ तारक आदि गणपटित शब्दों से पष्ठी के अर्थ में इतन् प्रत्यय होवे। जैसे-तारकाः सजाना अस्य तारकितं नमः; पुष्यितो वृक्षः; पण्डा सखाता अस्य पण्डिताःतन्द्रा सजावासि तन्द्रित:मुद्रा सजाताऽन्य मुद्रितं पुस्तकम् इत्यादि । तारकादि आविगए समझना चाहिये ।। ६६ ।। प्रमाणे यसज्दन्नमात्रः ॥ ६४४ ॥ अ० ५ । २ । ३७ ॥ प्रमाण समानाधिकरत प्रथमालमयं प्रातिपदिकों से षष्ठी के अर्थ में द्वयसच् दनच और मात्र प्रत्यय हो । ३४८ ॥ का०-प्रथमश्च द्वितीयश्च ऊर्ध्वमाने मतों मम ॥ ६४५ ॥ द्वयसव् और दनन् ये दोनों प्रत्यय ऊर्बमान अर्थात् ऊंचाई के इतने अर्थ में होते हैं, और मात्र सामान्य इयत्ता में जानी ! यह कारिका सूत्र का शेष है। जैसे-ऊन प्रमाणमस्य ऊद्धयसमुदकम् ऊन्दन्न- मुदकम; अल्मात्रम्: जानुयसम्: जानुदनम्: जानुमात्रम्: प्रस्थमात्रम् इत्यादि ॥ ६४५ ॥ वा०-प्रमाणे लः ॥ ६४६ ॥ प्रमाणवाची शब्दों से पष्टी के अर्थ में हुए प्रत्यय का लुक हो । जैसे-शमः प्रमाण- मन्य शमः: दिष्टिः, वितस्तिः इत्यादि ।। ६६ ।। वा०-द्विगोर्नित्यम् ॥ ६४७ ॥ द्विगुसंछक प्रमाणवाची शब्दों से नित्य ही उत्पन्न प्रलय का लुक् हो । जैसे-द्वौ शमी प्रमाणमन्य विशमा त्रिशमः द्विवितन्तिः इत्यादि । इस बार्तिक में नित्यं ग्रहण इसलिये है कि अगले वार्तिक में संशय अर्थ में मात्र कहा है, वहां भी द्विगु से लुही होजावे । जैसे-दे दिपी यातां या न वा द्विदिष्टिः॥६४७ वा०-प्रमाणपरिमाणाभ्यां संख्यायाश्चापि संशये मात्रच ॥६४८॥ प्रमाणवाची परिमाणवाची और संख्यावाची प्रातिपदिकों से संशय अर्थ में मात्रच प्रत्यय हो। जैस-प्रमालवाची-शममात्रम्: दिटिमात्रम् । परिमाणवाची-प्रस्थमात्रम् । संख्यावानी-पञ्चमात्रा वृताः दशमात्रा गावः इत्यादि । ६८ ॥ * यहां महारस्य कार से पूर्व दृत्व प्राप्त है, सो इन गन्हों। संज्ञानाची होने से नहीं होता। यात् ये गाद इसी प्रकार के पर्वत के प्रासन पाल्न अयों में रुटि है।
११८ बैणताद्धिते RAJ वा०-वत्वन्तात्स्वार्थे द्वयसज्मात्रची बहुलम् ।। ६४६ ॥ वतुप् प्रत्ययान्त प्रातिपदिक से द्वयसच और मात्र प्रत्यय स्वार्थ में वहुल करके हो । जैसे--तावदेव तावद्वयसम्; तावन्मात्रम् एतावद्वयसम्; एतावन्मात्रम्; यावद- द्वयसम्; यावन्मानम् ॥ ६४६॥ यत्तदेतेभ्यः परिमाणे वतुप ।। ६५० ।। अ० ५. । २ । ३६ ।। प्रथमासमर्थ परिमाणसमानाधिकरण यत् तत् और एतत् सर्वनामवाची प्रातिपदिकों से पष्ठी के अर्थ में बतुप् प्रत्यय हो। जैसे-यत्परिमाणमत्य यावान् तावान् एतावान् । प्रमाण ग्रहण की अनुवृत्ति पूर्व से चली आती, फिर परिमाणग्रहण से इन दोनों का भेद विदित होता है ।। ६५० ।। वा०-वतुपप्रकरणे युष्मदस्मद्भ्यां छन्दसि सादृश्य उपसंख्या- नम् ।। ६५१ ॥ युष्मद् अस्मद् शब्दों से सादृश्य अर्थ में वैदिकप्रयोगों में वतुप् प्रत्यय हो । जैसे- त्वत्सशस्त्वावान् ; मत्सदृशो मावान्; त्वावतः पुरुषसो यज्ञं विप्रस्य मावतः ॥ ६५२ ।। किमिदम्भ्यां वा घः ।। ६५२ ।। अ० ५ । २ । ४० ॥ परिमाणसमानाधिकरण प्रथमासमर्थ किम् और इदम् शब्दों से वतुप् प्रत्यय और पतु के वकार को घकारादेश होवे । जैसे-किम्परिमाणमस्य कियान इदम्परिमाणमस्य इयान् ।। ६५२ 11 संख्याया अवयवे तयप् ॥ ६५३ ॥ अ० ५। २॥ ४२ ॥ अवयवों का अवयवी के साथ सम्बन्ध होने से प्रत्ययार्थ अश्यवी समझा जाता है। अवयवसमानाधिकरण प्रथमासमर्थ संख्यावाची प्रातिपदिकों से पष्टी के अर्थ में तयप् प्रत्यय हो। जैसे-पञ्च अवयवा अस्य पञ्चतयम्; दशतयम् चतुण्यम्: चतुयी शब्दानां प्रवृत्तिः इत्यादि ॥ ६५३ ।। द्वित्रिभ्यां तयस्यायज्वा ।। ६५४ ॥ अ० ५। २ । ४३ ।। पूर्व सूत्र से विहित जो द्वि त्रिशब्दों से तयप् प्रत्यय, उसके स्थान में श्रयच आदेशा विकल्प करके होवे । जैसे-वावयवावस्य द्वयम् द्वितयम् त्रयम; चितयम् । इस अयच आदेश को जो प्रत्ययान्तर मानें, तो तय ग्रहण न करना पड़े । परन्तु स्थानिवद्भाव मान के जो त्रयी शब्द में डीए और सस् विभक्ति में सर्वनामसंडा का विकल्प होता है, सो नहीं पाये ॥ ६५४ ।। - पूरणप्रत्ययाधिकारः ------ उभादुदात्तो नित्यम् ।। ६५५ ॥ अ० ५ । २ । ४४ ।। 'यहां पूर्व सूत्र की अनुवृत्ति आती है। उभ शब्द से परे जो तयप उसके स्थान में अयच् आदेश उदात्त नित्य ही होवे । जैसे-उभावश्यवावस्य उभयो मणिः; उभये देवमनुष्याः । यहां उदात्त के कहने से आधुदात्त होता है, क्योंकि अन्तोदात्त तो चित् होने से हो ही जाता ॥ ६५५ ॥ तदस्मिन्नधिकामति दशान्ताड्डः ॥ ६५६ ।। अ० ५। २ । ४५ ॥ अधिक समानाधिकरण प्रथमासमर्थ दश जिनके अन्त में हो, ऐसे संख्यावाची प्रातिपदिक से ड प्रत्यय हो। जैसे-एकादश अधिका अस्मिन् शते एकादशं शतम्; एकादशं सहस्रम् द्वादशं शतम् द्वादशं सहन्नम् इत्यादि । यहां 'दशान्त' ग्रहण इसलिये है कि-पञ्चाधिका अस्मिन् शते, यहां प्रत्यय न हो। और 'अन्त' ग्रहण इसलिये है कि-दशाधिका अस्मिन् शते, यहां भी ड प्रत्यय न हो। 'इति शब्द इसलिये पढ़ा है कि जहां प्रत्ययार्थ की विवक्षा हो वहीं प्रत्यय हो, और-एकादश माया भधिका अस्मिन् कार्यापणशते, यहां तथा-एकादशाधिका अस्यां त्रिंशतीति, यहां भी विवक्षा के न होने से प्रत्यय नहीं होता ॥ ६५६ ॥ तस्य पूरणे डट् ।। ६५७ ॥ अ० ५। २ । ४८ ॥ पष्ठीसमर्थ संख्यावाची प्रातिपदिक से पूरण अर्थ में डट् प्रत्यय हो। जैसे-एका- दशानां पूरण एकादशः; द्वादशः; त्रयोदशः इत्यादि । डट् प्रत्यय के डित् होने से टिलोप हो जाता है । दश व्यक्तियों में एक व्यक्ति ग्यारह को पूरण करती है ॥ ६५७ ॥ नान्तादसङ्ख्यादेमट् ॥ ६५८ ॥ अ० ५ । २ । ४६ ॥ यहां पूर्व से डट् की अनुवृत्ति आती है। संख्या जिनके आदि में न हो ऐसे नकारान्त संख्यावाची प्रातिपदिक से विहित पूरण अर्थ में जो डट् उसको मट का आगम होवे । जैसे-पञ्चानां पूरणः पञ्चमः; सप्तमः; अष्टमः; नवमः इत्यादि । यहां 'नान्त ग्रहण इसलिये है कि-विशतेः पूरणो विंशः, यहां न हो। और आदि में 'संख्या का निषेध' इसलिये है कि-एकादशानां पूरण एकादशः, यहां भी मट का आगम न हो । ६५८ ॥
१२० स्त्रैणताद्धिते . षट्कतिकतिपयचतुरान्थुक् ॥ ६५६ ।। अ० ५ । २ । ५१ ॥ डट् की अनुवृत्ति यहां भी आती है। पट् कति कतिपय और चतुर् शब्दों को डट् प्रत्यय के परे थुक का आगम हो । जैसे-षराणां पूरणः पष्ठः; कतिथः; कतिपयथः; चतुर्थः ॥ ६५६ ॥ वा०-चतुरश्छयतावाद्यक्षरलोपश्च ॥ ६६० ॥ पष्ठीसमर्थ चतुर प्रातिपदिक से डट् के अपवाद छ और यत् प्रत्यय हों, और चतुर शब्द के चकार का लोप हो । जैसे-चतुर्णा पूरणः तुरीयः, तुर्यः ॥ ६६० ॥ द्वेस्तीयः ॥ ६६१ ॥ अ० ५। २। ५४ ॥ यह भी डट् का अपवाद है। द्वि शब्द से पूरण अर्थ में तीय प्रत्यय हो । जैसे-द्वयोः पूरणो द्वितीयः ॥ ६६१ ।। त्रे: : सम्प्रसारणञ्च ॥ ६६२ ॥ अ० ५। २ । ५५ ॥ त्रि शब्द से तीय प्रत्यय और उसके परे उसको सम्प्रसारण भी हो जावे। जैसे- त्रयाणां पूरणस्तृतीयः + ।। ६६२ ॥ विंशत्यादिभ्यस्तमडन्यतरस्याम् ।। ६६३ ।। अ० ५ । २ । ५६ ॥ विंशति श्रादि प्रातिपदिकों से परे डट् प्रत्यय को तमट का आगम विकल्प करके हो । जैसे-विंशतः पूरणो विंशतितमः, विंशः; एकविंशतितमः, एकविंशः; त्रिंशत्तमः, त्रिंशः; एकत्रिंशत्तमः, एकत्रिंशः इत्यादि ।। ६६३ ॥ नित्यं शतादिमासार्द्धमाससंवत्सराच्च ॥६६४॥ अ० ५।२।५७॥ पूरणार्थ में शत आदि मास अर्द्धमास और संवत्सर शब्दों से परे डट् प्रत्यय को तमट का आगम नित्य ही होवे । जैसे-शतस्य पूरणः शततमः; सहस्रतमः; लक्षतमः इत्यादि मासतमो दिवसः; अर्द्धमासतमः; संवत्सरतमः ॥ ६६४ ॥ षष्ट्यादेश्चासंख्यादेः ॥ ६६५ ॥ अ० ५। २ । ५८ ॥ : पूरणार्थ में संख्या जिनके आदि में न हो ऐसे जो पष्टि आदि शब्द हैं, उनसे परे डट् प्रत्यय को तमट का आगम हो। जैसे-पहेः पूरणः पष्टितमः; सप्ततितमः; अशीति- तमः, नवतितमः। से परे प्रकार सम्प्रसारण को दीर्घ इसलिये नहीं होता कि (हलः) इस सून सूत्र में पण की अनुवृत्ति आती, और अण पूर्व णकार से लिया जाता है ।। - + यहां पूरणप्रत्ययाधिकारः १२१ यहां 'संख्यादि का निषेध' इसलिये है कि-एकपष्टः, एकपष्टितमः; एकसप्ततः, एकसप्ततितमः, यहां विंशत्यादि सूत्र से विकल्प हो जाता है ॥ ६६५ ॥ स एषां ग्रामणीः ॥ ६६६ ।। अ० ५। २ । ७८ ।। पष्ट्यर्थ वाच्य रहे, वो ग्रामणी अर्थ में प्रथमासमर्थ प्रातिपदिक से कन् प्रत्यय हों। प्रामणी मुख्य का नाम है । जैसे-देवदत्तो ग्रामणीरेषां देवदत्तकाः; यज्ञदत्तकाः । यहां 'ग्रामणी' ग्रहण इसलिये है कि-देवदत्तः शत्रुरेषाम्, इत्यादि में कन् प्रत्यय न हो ॥ ६६६ ॥ कालप्रयोजनाद्रोगे ।। ६६७ ।। अ० ५। २ । ८१ ॥ रोग अर्थ में सप्तमीसमर्थ कालवाची और प्रयोजन माम कारणवाची तृतीयासमर्थ प्रातिपदिक से कन् प्रत्यय हो । जैसे-[कालवाची] द्वितीयेऽह्नि भवो द्वितीयको ज्वररा; तृतीयको ज्वरः; चतुर्थकः । प्रयोजन से-विषपुष्पेनितो विषपुष्पको ज्वरः; काशपुष्पको ज्वरः; उष्ण कार्यमस्य उष्णकः; शीतको स्वर: इत्यादि ॥ ६६७ ॥ श्रोत्रियश्छन्दोऽधीते ॥ ६६८ ॥ अ० ५। २। ८४ ॥ यश्छन्दोऽधीते स श्रोत्रियः, यहां छन्द के पढ़ने अर्थ में छन्दस् शब्द को श्रोप्रभाव और घन् प्रत्यय निपातन किया है ॥ ६६ ॥ श्राद्धमनेन भुक्तमिनिठनौ ।। ६६६ ॥ अ० ५। २।८५ ॥ 'अनेन भुक्तं' इस अर्थ में प्रथमासमर्थ श्राद्ध प्रातिपदिक से इनि और ठन् प्रत्यय हों। जैसे-श्राद्धं भुक्तमतेन श्राद्धी; श्राद्धिकः ॥ ६६६ ॥ साक्षाद्रष्टरि संज्ञायाम् ॥ ६७० ॥ अ० ५। २।६१ ॥ द्रष्टा की संज्ञा अर्थ में साक्षात् अव्यय से इनि प्रत्यय हो। जैसे-साक्षाद्रष्टा साक्षी॥ ६७० ॥ इन्द्रियमिन्द्रलिङ्गमिन्द्रदृष्टमिन्द्रस्कृष्टमिन्द्रजुष्टमिन्द्रदत्तमिति वा ।। ६७१ ॥ अ० ५ । २।६३ ॥ यहां इन्द्र जीवात्मा और लिङ्ग चिह्न का नाम है। लिङ्गादि अर्थो में इन्द्र शब्द से घच प्रत्यय निपातन करने से इन्द्रिय शब्द सिद्ध होता है। जैसे-इन्द्रस्य लिङ्गमिन्द्रियम् । इन्द्र नाम जीवात्मा का लिङ्ग जो प्रकाशक चिह्न हो, उसको इन्द्रिय कहते हैं । इन्द्रेण दृष्टम् इन्द्रियम् । इन्द्रेण सृष्टम् इन्द्रियम्, यहां ईश्वर का ग्रहण है। इन्द्रेण जुष्टम् इन्द्रियम्, यहां जीव का ग्रहण है। इन्द्रेण दत्तम् इन्द्रियम्, और यहां ईश्वर का प्रहण होता है ।। ६७१ ॥ .
स्त्रैणताद्धिते मतुप् प्रत्यय तदस्यास्त्यस्मिन्निति मतुप् ।। ६७२ ।। अ० ५। २ । ६४ ॥ अस्ति और प्रथमासमानाधिकरण उद्याप प्रातिपदिकों से षष्ठी और सप्तमी के अर्थ में मतुप् प्रत्यय हो । जैसे-गांवोऽस्य सन्ति गोमान् देवदत्तः; वृक्षाः सन्त्यस्मिन् स वृक्षवान् पर्वतः; यवा अस्य सन्ति यवमान, लक्षवान् इत्यादि ॥ ६७२ ॥ मादुपधायाश्च मतोर्वोऽयवादिभ्यः ॥६७३॥ अ० ८ । २ । ६ ॥ मकारान्त मकारोपध अवर्णान्त और अवर्णोपध प्रातिपदिकों से परे के मकार को वकारादेश हो, परन्तु यवादि प्रातिपदिकों से परे न हो। जैसे-मकारान्त-किंवान् शंवान् । मकारोपध-शमीवान् ; दाडिमीवान्। लक्ष्मी- वान् । अवर्णान्त-वृक्षवान् लक्षवान्; घटवान्; खट्वाधान मानावान् । अवर्णोपध- पयस्वान्; यशस्वान्; भावान् । यहां 'मकारान्त आदि' का ग्रहण इसलिये है कि-अग्निमान् वायुमान् बुद्धिमान्, यहां वकार न हो । और 'अयवादि' इसलिये कहा है कि-यवमान; दल्मिान्; अम्मिमान् इत्यादि, यहां भी मकार को वकार आदेश न होवे ॥ ६७३ ।। भयः ।। ६७४।। अ०८।२ । १० ॥ भय प्रत्याहारान्त प्रातिपदिक से परे मतुप के मकार को वकागदेश हो। जैसे- अग्निचित्वान ग्रामः; उदश्वित्वान् घोषः; विद्युत्वान् बलाहका; मरुत्वानिन्द्रः; वृषद्वान् देशः इत्यादि ।। ६७४ ॥ संज्ञायाम् ।। ६७५ ।। अ० ८ । २ । ११ ॥ संचाविषय में मतुप् के मकार को वकारादेश हो। जैसे-अहीवती; कपीवती; ऋषीवती; मुनीवती वा नगरी इत्यादि ॥ ६७५ ॥ का०-भूमनिन्दाप्रशंसासु नित्ययोगेऽतिशायने । सम्बन्धेऽस्तिविवक्षायां भवन्ति मतुबादयः ॥ ६७६ ॥ बहुत्व निन्दा प्रशंसा नित्ययोग अतिशय सम्बन्ध और अस्ति होने की विवक्षा भर्थों में मतुप, और इस प्रकरण में जितने प्रत्यय हैं, वे सब होते हैं। यह कारिका इसी सूत्र पर महाभाष्य में है। जैसे- भूम अर्थ में - गोमान्; यवमान् इत्यादि । निन्दा में-कुष्ठी, ककुदावर्तिनी इत्यादि । प्रशंसा में-रूपरती इत्यादि । नित्ययोग अर्थ में-क्षीरिणो वृक्षाः; कराटकिनी वृक्षाः इत्यादि । अतिशय में-उदरिणी कम्या इत्यादि । सम्बन्ध में-दण्डी, छत्री इत्यादि । होने की विवक्षा में-अस्तिमान् ॥ ६७६ ॥ .
मत्व याधिकारः ० १२३ ------- i वा०-गुणवचनेभ्यो मतुपा लुक् ॥ ६७७ ॥ गुणवाची प्रातिपदिकों से परे मतुप् प्रत्यय का लुक हो। जैसे-शुक्लो गुणोस्या- ऽस्तीति शुक्लः पट: कृष्णा, खेतः इत्यादि ॥ ६७७ ॥ रसादिभ्यश्च ।। ६७८ ॥ अ० ५। २। ६५ ॥ रस आदि प्रातिपदिकों से पष्ठी सप्तमी के अर्थ में मतुप प्रत्यय हो। जैसे-रसोऽस्या- स्तीति रसवान् रूपवान् गन्धवान् शब्दवान् इत्यादि । यहां रसादि शब्दों से प्रत्ययविधान इसलिये किया है कि इनके गुणवाची होने से मतुप का लुक पूर्व वार्तिक से पाया था, सो न हो ॥ ६७ ॥ प्राणस्थादातो लजन्यतरस्याम् ॥ ६७६ ।। अ० ५ । २ । ६६ ॥ मत्वर्थ में प्राणिस्थवाची प्राकारान्त शब्द से लच प्रत्यय विकल्प करके हो । जैसे- चूडालः, चूडावान्; कर्णिकालः, कर्णिकावान्; जिह्वाल:, जितावान्जंघालः, जंघावान् । यहां 'प्राणिस्थ ग्रहण इसलिये है कि-शिखावान् प्रदीपः, यहां न हो। और 'आका- रान्त' प्रहण इसलिये है कि-हस्तवान् पाद्वान् इत्यादि में भी लच् प्रत्यय न हो ॥६७६॥ वा०-प्राण्यलादिति वक्तव्यम् ॥ ६८० ।। प्राणिस्थ श्राकारान्त शब्दों से जो लच् प्रत्यय कहा है, वह प्राणियों के अङ्गवाचियों से हो। अर्थात् चिकीर्षास्यास्तीति, जिहीर्षास्यास्ति चिकीर्षावान् जिहीर्षावान् इत्यादि में लच प्रत्यय न हो ॥ ६८० ॥ सिध्मादिभ्यश्च ॥ ६८१ ॥ अ० ५ । २ । ६७ ॥ मन्नर्थ में सिध्म आदि प्रातिपदिकों से लच् प्रत्यय विकल्प करके हो, पक्ष में मतुप् हो। जैसे-सिध्मोऽस्यास्तीति सिध्मलः, सिध्मवान्, गडुलः, गडमान्; मणिलः, मणिमान् इत्यादि ॥ ६-१॥ लोमादिपामादिपिच्छादिभ्यः शनेलचः॥६८२॥ अ०५।२।१००॥ मत्वर्थ में लोमादि पामादि और पिच्छादि गणपठित प्रातिपदिकों से श न ओर इलच् प्रत्यय यथासंख्य करके हों, तथा मतुप भी होवे । जैसे -लामान्यस्य सन्ति लोमशः, लोमवान् पामनः, पामवान्; पिच्छिलः, पिच्छ्वान् उरसिलः, उरस्वान् इत्यादि ॥ ६-२ ॥ प्रज्ञाश्रद्धार्चाभ्यो णः ॥ ६८३ ॥ अ० ५। २ । १०१ ॥
१२४ बैणताद्धिते .. सत्वर्थ में प्रज्ञा श्रद्धा और अर्चा प्रातिपदिकों से प्रत्यय हो। जैसे-प्रधाऽस्यास्ति प्राज्ञः, प्रज्ञावान् श्राक्षः, श्रद्धावान्: आर्चः, अर्धावान् * ॥६॥ तपःसहनाभ्यां बिनीनी ॥ ६८४ ॥ अ० ५ । २ । १०२ ॥ मत्वर्थ में तपस् और सहन्न प्रातिपदिक से विनि और इनि प्रत्यय हो । जैसे- तपोऽस्मिन्नस्तीति तपस्वी; सहनी ॥ ६८४ ॥ अण च ।। ६८५ ॥ अ० ५ । २ । १०३ ॥ मत्वर्थ में वपस् और सहन्न प्रातिपदिक से अणू प्रत्यय भी हो। जैसे-तापसः; साहनः ॥ ६८५ ॥ । दन्त उन्नत उरच् ॥ ६८६ ॥ अ० ५ । २ । १०६ ॥ उन्नतसमानाधिकरण दन्त शब्द से मतुप के अर्थ में उरच् प्रत्यय हो। जैसे-दन्ता उन्नता अस्य सन्ति स दन्तुरः यहां 'उन्नत' विशेषण इसलिये है कि-दन्तवान्, यहां निन्दा मादि अर्थो में उरच प्रत्यय न होवे ॥ ६८६ ॥ ऊषसुषिमुष्कमधो रः ॥ ६८७ ॥ १० ५ । २ । १०७ ॥ ऊप सुपि मुष्क और मधु प्रातिपदिकों से मत्वर्थ में र प्रत्यय होवे । जैसे-ऊपमस्मि- मस्ति ऊपरा भूमिः; सुपिरं काष्ठम्: मुष्करः पशुः; मधुरो गुडः ॥ ६-७ ॥ वा०-रप्रकरणे खमुखकुञ्जभ्य उपसंख्यानम् ॥ ६८८ ॥ और कुञ्ज शब्दों से भी मत्वर्थ में र प्रत्यय हो। जैसे-समस्यास्तीति स्वरः; मुखमस्यास्तीति मुखरः कुञ्जरः । ॥ ६८ ॥ वा०-नगपांसुपाण्डुभ्यश्च ॥ ६८६ ॥ नग पांसु और पाण्ड शब्दों से भी मत्वर्थ में र प्रत्यय हो । जैसे-नगमसिनरतीति नगरम् पांसुरमः पाण्डुरम् ॥ ६८६ ॥ वा०-कच्छ्चा हत्खत्वं च ॥ ६६० ॥ * यहां प्रज्ञा भादि शन्दों से रा और मनुप् प्रत्यय प्रसंसा अयं में समझना चाहिये । और यहां सामान्य अयं में भर्यात् बुदि जिसमें हो ऐसा समझने से साधारप प्राणियों के नाम पर और प्रज्ञावान् होंगे, इसलिये टसका विशेष अर्थ समन्नो ॥ + जिसके कण्ड में स नाम विशेष अवकाश हो टसको सर । मुख का काम निरन्तर उपारण करना जिसका हो रसको मुखर । और कुञ्जर बड़ी ठोड़ी होने से हायी को कहते हैं । नग भांद और पर्वत जिसमें हॉरसको नगर कहते है। ख मुख .
मत्वीयाविकारः १२५ -------- । कच्चा शब्द से र प्रत्यय और उसको इलाश भी हो। जैसे-कच्छासामतीति कच्छच भूमिः ६० केशाद्वाऽन्यतरस्याम् ॥ ६९१ ॥ अ० ५ । २ । १०६ ॥ इस सत्र में अपाठविमाथा इसलिये समझना चाहिये कि य शब्द से व प्रत्यय किसी से प्रात नहीं है। कंश प्रातिपदिक ले व प्रत्यय विकल्प करक हो। यहां महाविमापा अयां (समानां० इस सत्र से विकल्प की अनुवृत्ति वती प्रादी है, और दूसरे इस विकल्प के होने से चार प्रयोग होते हैं। जैसे-प्रशस्ताः वेशा अस सनीति रावा. कगी, शिका, केशवान् । केश शब्द ज्योति अर्थात् प्रकाश गुप का भी नाम है.. वा०-चप्रकरणे मणिहिरण्याभ्यामुपसंख्यानम् ॥ ६९२ ।। भनि और हिरण्य प्रातिपदिक से भीव प्रत्यय हो। जैसे-मरिरलिन्नस्तीति मत्रिका सर्पः हिरण्यवा*। ६ बा०-छन्दसीवनिपों च ॥ ६९३ ॥ वैधिक प्रयोगों में सामान्य प्रातिपदिको ले मन्त्रर्य मेंई और वनिप् प्रत्यय हो। जै-र मृन्नुहगलानी गविष्टी, यहां न्यर्थी शब्द में ई प्रत्यय हुश्रा है; सुमङ्गी- रियं बघू. इत्यादि। ऋतावानम् भवानीमहे, यहांत और मत्र रचते बनिय होता है। वा-मेधारथाभ्यामिरन्निरची वक्तव्यों ।। ६६ ।। मंत्रा और रय शब्दों से मवर्य में इरन् और इरच प्रत्यय हो। जैसे-मेधिरः; रथिरा भी मनु के बायक हैं। १६४ ॥ वा०-अपर आह-वप्रकरणऽन्येभ्योपि दृश्यत इति वक्तव्यम् ॥६५॥ इस विषय में बहुतेरे ऋषि लोगों का ऐसा मत है कि अविहित सामान्य प्रातिपदिकों से व प्रत्यय देन में श्राता है। जैसे-विन्वायम्: कुग्रावन्: इष्टकावन् इत्यादि । प्रयोजन यह है कि पूर्व वार्चिक में जो मन्ति और विररय शब्दों से व प्रत्यय कहा उसका भी इस पन में कुछ प्रयोजन नहीं है।६६५. रजःकृष्यामुतिपरिपदो बलच् ।। ६९६ ।। अ० ५ १२ । ११२ ॥ रजत् कृषि प्राति और परिषद प्रातिपदिकों से मवयं में वतन् प्रत्यय हो । जैसे-रजोत्या. प्रवर्चत इति रजस्वलानी; कवितो मार्म: आनुवित्रतः शाण्डिका: परिपहलदो राजा इत्यादि । ६६६ . नदि किसी विशेष सही और हिरयर बनविरोष को संज्ञा है।
१२६ बैणताद्धिते वा०-बलच्प्रकरणेऽन्येभ्योऽपि दृश्यते ।। ६६७ ।। विहितों से पृथक प्रातिपदिकों से भी वलच् प्रत्यय देखने में आता है। जैसे- भ्राताऽस्यास्तीति भ्रातृवलः; पुत्रवतः; उत्सङ्गवलः इत्यादि ॥ ६६७ ।। अत इनिठनौ ।। ६६८ ॥ ० ५। २ । ११५ ॥ मत्वर्थ में अकारान्त प्रातिपदिक से इनि और ठन् प्रत्यय हों। जैसे-दण्डी, दण्डिका छन्नी, छत्रिकः । यहां विकल्प की अनुवृत्ति आने से पक्ष में मतुप् प्रत्यय भी होता है। जैसे- दएडवान्, दण्डिफः; श्वान्, छत्रिका इत्यादि । यहां 'तपरफरण' इसलिये है फि-खट्वावान्, यहां इनि उन् न हों ॥ ६ ॥ का०-एकाक्षरात्कृतो जातेः सप्तम्यां च न तो स्मृतौ ॥६६॥ एकातर शब्द कृदन्त जातिवाची और सप्तमी के अर्थ में रनि श्रीर ठन् प्रत्यय न हों । सत्र से जो प्राप्ति है, उसका विशेष विषय में निषेध किया है। जैसे-एकाक्षर से-स्ववान् नवान् इत्यादि । कृदन्त से-कारकवान्, हारकवान् । जातिवाचियों से-वृक्षवान, प्लक्षवान् : व्यानवान्: सिंहवान् इत्यादि। सप्तम्यर्थ में- दएडा अस्यां शालायां सन्तीति दरावती शाला इत्यादि । ६६६ ॥ ब्रीह्यादिभ्यश्च ॥ ७०० ॥ अ० ५ । २ । ११६ ॥ बीहि श्रादि गणपटित प्रातिपदिकों से मत्वर्थ में इनि और उन् प्रत्यय हो । जैसे- व्रीही, व्रीहिका, ब्रीहिमान् मायी, मायिकः, मायावान् इत्यादि !॥ ७०० ॥ का०-शिखादिभ्य इनिर्वाच्य इकन्यवखदादिषु ।। ७०१ ॥ पूर्व सूत्र में ब्रीह्यादि शब्दों में शिस्त्रादिगण हैं, उनसे इनि, और यवनदादिप्रातिपदिकों से इकन् ( ठन् ) कहना चाहिये। प्रयोजन यह है कि सब ब्रीह्यादिकों से दोनों प्रत्यय प्राप्त हैं सोन हों, किन्तु शिला- दिकों स इनि ही हो, उन् न हो, और यख्दादिको से उन ही हो, दर्शन नहीं, यह नियम समझना चाहिये । जेल-शिस्त्री, मेमली इत्यादि । यवखदिकः इत्यादि ।। ७०० ।। अस्मायामधास्त्रजो विनिः ॥ ७०२ ॥ श्र० ५ । २ । १२१ ।। असन्त माया मेधा और मज प्रातिपदिकों से मनुप् के अर्थ में विनि प्रत्यय हो, और मतुप तो सर्वत्र होता ही है। और माया शब्द ब्रहादिगण में पड़ा है, उससे इनि उन् भी होते हैं। असन्तों से-पयस्वी; यशस्वी इत्यादि, मायावी, मायी, मायिकः, मायावान् मेधावी. मेधावान् : ग्वी, स्नग्वान् ।। ७०२ ॥ । ।
मायाविकार १२७ --- बहुलं बन्दसि ।। ७०३ ।। अ० ५ । २ । १२२ ॥ वैदिकश्योगविश्य में सामान्यत्रातिपदिको समन्वयंविषयक विनि प्रत्यय बहुन्न करके हो। -न तेखिन, यहां हो गया । और यो वर्चस्वान्, यहां नहीं भी दुआ इत्यादि । बहुत से अनेक प्रयोजन समन्ना चाहिये । ०६॥ बा-छन्दोविन्प्रकरणेऽष्ट्रामेखलाइयोभयरुजाहृदयानां दीर्घश्च ७०४॥ अमानवता द्वय उभय नजा और हृदय शब्दों से विनि प्रत्यय और उनकी दीवदिश मीदव जैन-अष्ट्राची: मन्त्रनावी यात्री: उभयावी [रुजाची हृदयाची ।। ७०८ ॥ बा-मर्मणश्च ॥ ७०५ ॥ नमन शनी विनि प्रत्यय और उसको दीयांश हो । जैसे-मी ७०५ ॥ वास-पर्वत्रामयस्योपसयानम् ।। ७०६ ।। पूर्व र दीनों बानिकों से बेद में प्रत्ययविवान लमझना चाहिये. इसीलिये इस बान्तिक में नर्वत्र शन्द पढ़ा है। सर्वत्र-नौकिक वैदिक सत्र प्रयोगों में-श्रामय शुन्यले विनि प्रत्यय और दीर्यादेश भी हो। जेल-ग्रामी वा०-वृन्दान्यामारकन् । ७०७ ।। पूर्व वार्तिक ने अगसब वात्तिनों में सर्वत्र नन्द की अनुवृत्ति समझनी चाहिये । और वृन्द प्रातिपत्रिक से मवर्य प्रारकन् प्रत्यय हो। जैल-नारयन्स सन्ति झारकः: वृन्दारका Gr वा०-फलबरेभ्यामिनन् ।। ७०८ ।। फत और बई शब्दों से इनत्र हो । जल-कतान्यन्लिन्सन्ति फतिनः बर्दिरः 3GER वा०-हृदयात्रालुपन्यतरस्याम् ॥ ७०६ ॥ हृदय शब्द से प्रानु प्रत्स्य विकल्प करके हो, और पन में इनि उन क्या मतुप भी होना । जैसे-हृदयानु: हृदयी हृदयिका हदयवान : ०६ वा०-शीतोष्णतुप्रेभ्यस्तन्न सहत इति चालुवतव्यः ॥ ७१० ॥ गीत मा और तृन प्रातिपदिकों से प्रत्ययं के न सह सकने अर्थ में बालु प्रत्यय हो। जब-गीत नसहने लगीवान्नु: उन्नानुः तृप्रानुः ।... वा०-हिमाञ्चलुः ॥ ७११ ॥ हिन शब्द से उलंच नसहने अर्थ में वेनु प्रत्यय हो। जल-हिम न सहने स हिमनुः .
१२८
स्त्रैणताद्धिते
वा०-बलाच्चोलः ॥ ७१२ ।।
वल शब्दसे उसके न सहने अर्थ में ऊल प्रत्यय हो। जैसे-चलं नसहत इति बलूलः ॥७१२॥
वा०-वातासमूहे च ॥ ७१३ ॥
वात शब्द से उसके न सहने और समूह अर्थ में ऊल प्रत्यय हो। जैसे-वातानां
समूहो वातं न सहते वा स वातूलः ॥ ७१३॥
वा०-पर्वमरुद्भ्यां तम् ।। ७१४ ॥
पर्व और मरुत् प्रातिपदिक से मत्वर्थ में तप् प्रत्यय हो। जैसे–पर्वमस्सिन्नस्ति स
पर्वतः मरुत्तः।
और यह मरुत्त शब्द 'मरुतों ने दिया ऐसे भी अर्थ में रुदन्त प्रत्यय होने से धन जाता
है ॥ ७१४ ॥
वाचो ग्मिनिः ॥ ७१५ ॥ अ० ५ । २ । १२४ ॥
वाक्प्रातिपदिक ले मत्वर्थ में ग्मिनि प्रत्यय हो। जैसे-प्रशस्ता वागस्य स वाग्मी,
वाग्मिनी, वाग्मिनः ॥ ७१५ ॥
श्रालजाटचौ वहुभाषिणि ॥ ७१६ ।। अ० ५। २ । १२५ ।।
यहां पूर्व सूत्र से वाक् शब्द की अनुवृत्ति पाती है।
बहुत बोलने वाले के अर्थ में वाक् प्रातिपदिक से भालच और पाटन् प्रत्यय हों।
जैसे -बहु भाषत इति वाचाला; वाचारः । यह ग्मिनी प्रत्यय का अपवाद है।
और यह भी समझना चाहिये कि जो विद्या के अनुकूल विचारपूर्वक बहुत बोलता
है, उसको वाचाल और वाचार नहीं कहते हैं, किन्तु जो अंड बंड वोले। यह वात
महामाप्य में है ।। ७१६॥
स्वामिन्नैश्वय्ये ।। ७१७ ।। अ० ५ । २ । १२६ ।।
यहां ऐश्वर्यवाची व शब्द से मत्वर्थ में आमिन् प्रत्यय करके स्वामिन् शब्द निपातन
किया है। जैसे-स्वमेश्वर्यमस्यास्तीति स्वामी, स्वामिनी, स्वामिनः !
ऐश्वर्या अर्थ इसलिये समझना चाहिये कि-स्ववान्, यहां ामिन् न हो ॥ ७१७ ।।
वातातीसाराभ्यां कुक् च ॥ ७१८ ॥ अ० ५ । २ । १२६ ।।
वात और अतीसार प्रातिपदिकों से मत्वर्थ में इनि प्रत्यय और कुक का पागम भी
हो। जैसे-वातकी; अतीसारकी।
यहां रोग अर्थ में प्रत्यय होना इष्ट है, इससे वातवती गुहा, यहां इनि और कुक
न होते ॥ १८॥
मत्व याधिकारः १२६ वा०-पिशाचाच्च ।। ७१६ ॥ पिशाच शब्द से भी इनि और उसको कुक का आगम होवे। जैसे-पिशाचकी वैश्रवणः ॥ ७१६॥ वयसि पूरणात् ॥ ७२० ॥ अ० ५ । २ । १३० ॥ षयस् नाम अवस्था अर्थ में पूरण प्रत्ययान्त प्रातिपदिक से इनि प्रत्यय हो। जैसे- पञ्चमोऽस्यास्ति मासः संवत्सरो वा पञ्चमी उष्ट्रः; नवमी; दशमी इत्यादि । यहां अवस्था'ग्रहण इसलिये किया है कि पञ्चमवान् ग्रामरागः,यहां इनिन हुश्रा॥२०॥ मुखादिभ्यश्च ॥ ७२१ । अ० ५ । २ । १३१ ॥ सुख आदि प्रातिपदिकों से मत्वर्थ में इनि प्रत्यय हो । जैसे-सुखमस्यास्ति सुखी, दुःखी इत्यादि । ७२१ ॥ धर्मशीलवर्णान्ताच्च ।। ७२२ ॥ अ० ५ । २ । १३२ ।। धर्म शील और वर्ण ये शब्द जिनके अन्त में हों, उन प्रातिपदिकों से इनि प्रत्यय हो । जैसे-ब्राह्मणस्य धर्मः ब्राह्मणधर्मः सोऽस्यास्तीति ब्राह्मणधर्मी; ब्राह्मणशीली; ब्राह्मणवर्णी इत्यादि ॥ ७२२ ॥ हस्ताजातौ ।। ७२३ ॥ अ० ५ । २ । १३३ ।। हस्त शब्द से जाति अर्थ में इनि प्रत्यय हो । जैसे-हस्ती, हस्तिनी, इस्तिनः । यहां 'जाति' इसलिये है कि-हस्तवान् पुरुषः, यहां इनि न हो ॥ ७२३ ॥ पुष्करादिभ्यो देशे ॥ ७२४ ॥ अ० ५ । २ । १३५ ॥ देश अर्थ में पुष्कर आदि शब्दों से इनि प्रत्यय हो। जैसे -पुष्करी देशः; पुष्करिणी पद्मिनी। यहां 'देश'प्रहण इसलिये है कि-पुष्करवान् तडागः+, यहां इनि प्रत्यय न हो ॥७२४॥ वा०-इनिप्रकरणे वलाद्वाहूरुपूर्वपदादुपसंख्यानम् ॥ ७२५ ॥ वाहु और ऊरु जिसके पूर्व हों, ऐसे वल प्रातिपदिक से इनि प्रत्यय हो । जैसे- याहुवलमस्यास्ति स बाहुवली; ऊरुबली ॥ ७२५ ॥ वा०-सर्वादेश्च ॥ ७२६ ॥ + यहां (वातातीसाराभ्यां० ) इस सूत्र से लेकर जो इनि प्रत्यय विधान किया है, सो (अत इनिठनौ ) इस लिखित सूत्र से इनि होजाता, फिर विधान नियमार्थ है। अर्थात् उन २ प्रातिपदिकों और उन २ विशेप अर्थों में इनि ही हो ठन् न हो । - बैणताद्विते - सर्व शब्द जिसके आदि में हो, ऐसे प्रातिपदिक से इनि प्रत्यय हो! जैते-सर्वधनमस्यास्ति स सर्वधनी: सर्वबीजी सर्वकेशी नटः इत्यादि ! २३ ॥ वा०-अर्थाच्चासंनिहित ॥ ७२७ ।। जिसके निकट पदार्थ न हों, और उनकी चाहना हो, ऐसे अयं में ये शब्द से इनि प्रत्यय हो। जैसे-अर्थममीप्सति अर्या। यहां 'असन्निहित ग्रहण इसलिये है कि-अर्थवान्, यहां इनि प्रत्यय न हो। वा०-तदन्ताच्च ।। ७२८ ॥ अर्थ शब्द जिनके अन्त में हो, उनले भी इनि प्रत्यय हो। जैसे-धान्यार्थी; हिरएयाधी इत्यादि। इन सर वार्तिकों में भी यही नियम समझना चाहिये कि इन विशेष अयों में और शब्दों से रति ही हो, उन्न हो । ७२८ ॥ बलादिभ्यो मतुवन्यतरस्याम् ।। ७२६ ।। अ० ५ । २ । १३६ ।। बलादि प्रातिपदिकों से मतुप् प्रत्यय विकल्प करके हो, पन में इनि समझो । जैसे- वतमस्यास्तीति बलवान् वली; उत्साहवान् उत्साही: उद्धारवान्, उझावी इत्यादि !!२!! संज्ञायां मन्माभ्याम् ।। ७३० ।। अ० ५ । २ । १३७ ।। मत्वर्य में मन्नत और मान्त प्रातिपदिकों से संधाविषय में इनि प्रत्यय हो। जैसे- प्रधिमिनी; दामिनी होमिनी; सोमिनी। यहां संहांग्रहण इसलिये है कि सोमवान्: तोमवान् इत्यादि में नि न हो।३० कंशंभ्यां बभयुस्तितुतयसः ।। ७३१ ।। अ० ५ । २ । १३८ ।। जल और सुत्र के यात्री कम् और शन् मकारान्त प्रातिपदिकों से मत्वर्थ में ब, भ, युत्, ति, तु, त और यस् प्रत्यय हो । जैसे-कन्यः शन्वः; कम्मः: शन्मः; कंयु; शंयु:: कन्ठिः; शन्तिः कन्तु: शन्तुः; कन्तः शन्तः; कंयः; शंयः। यहां गुस् और यस् प्रत्यय में सकार पदसंबा होने के लिये है। इससे मकार को अनुस्वार और परसवर्ल होते हैं, और जो भसंशा हो तो नकार ही बना रहे । अहंशुभयोर्युस् ॥ ७३२ ।। अ० ५ । २ । १४० ॥ और शुभम् अन्ययसंरक शब्दों से नत्वर्थ में गुस् प्रत्यय हो। जैसे-अयुः, यह महंकारी का नाम ई: गुमंयु., यह कल्याणकारी की संश है ।। ! -यह द्वितीय पाद समात हा !!
. विभक्तिप्रत्ययाधिकारः - अय तृतीयः पादः- । प्रान्दिशो विभक्तिः ।। ७३३ ।। अ० ५। ३ । १ ॥ यह अधिकार सूत्र है। नो दिक् शब्द के उच्चारण से पूर्व २ प्रत्यय विधान करेंग, उन २ की मिभक्तिसंहा जाननी चाहिये ।। ७३३॥ किंसर्वनामवहुभ्योऽद्वयादिभ्यः ।। ७३४ ॥ अ० ५। ३ । २ ॥ यह भी अधिकार सूत्र है। यहां से भागे किम् शब्द, द्वि आदि से मिन्न सर्वनाम और बहु प्रातिपदिकों से प्रत्ययों का विधान जानना चाहिये ॥ ७३४ ॥ इदम इश् ॥ ७३५ ।। अ० ५ । ३ । ३ ॥ विभक्तिसंचक प्रत्ययों के परे इदम् शब्द को इश् आदेश हो । जैसे-इतः; इह । यहां इशु आदेश में शुक्रार सब के स्थान में आदेश होने के लिये है ॥ ७३५ ।। एतेता रथोः ।। ७३६ ।। अ० ५। ३ । ४ ॥ जो मान्दिशीय रेफादि और थकारादि विभक्ति परे हों, तो इदम् शब्द को पत और इत् आदेश हो । जैसे-एतदि; इत्यम् ॥ ७३६ ॥ सर्वस्य लोऽन्यतरस्यां दि ।। ७३७ ।। अ० ५। ३ । ६॥ जो दकारादि प्रत्यय परे हों, तो सर्व शब्द को स आदेश विकल्प करके हो। जैसे- सर्वदा सदा ।। ७३७ पञ्चम्यास्तसिल् ।। ७३८ ॥ अ० ५ । ३ । ७ ॥ किम् सर्वनाम और युद्द प्रातिपदिकों से पञ्चमी विभक्ति के स्थान में तसिल प्रत्यय हो । जैसे-कलादिति कुठः; यत्लादिति यतः ततः; बहुतः इत्यादि ॥ ७३८ ॥ पर्यभिभ्याञ्च ॥ ७३६ ॥ अ० ५ । ३।६ ॥ परि और अमि शब्दों से तसिल् प्रत्यय हो। जैसे-परितः-चारों ओर से अभितः-सन्मुत्र से ॥ ७३६ ॥ सप्तम्यातल् ॥ ७४० ॥ अ० ५। ३ । १० ॥ किम् सर्वनाम और बहु शब्दों से परे सप्तमी विभक्ति के स्थान में अल् प्रत्यय हो । जैसे-कस्मिन्निति कुत्रः सर्वस्मिन्निति सर्वत्र यत्र तत्र इत्यादि ।। ७४० ॥
१३२ बैणताड़िते AAAAP.. इदमो हः ।। ७४१ ।। अ० ५ । ३ । ११ ॥ इदम् शब्द से सप्तमी के स्थान में ह प्रत्यय हो । जैसे-अस्मिन्निति इह ॥ ७४१ ॥ किमोऽत् ।। ७४२ ।। अ० ५। ३ । १२ ॥ किम् शब्द से सप्तमी के स्थान में अत् प्रत्यय हो। जैसे-कस्मिन्निति क ॥ ७४२ ॥ इतराभ्योऽपि दृश्यन्ते ॥ ७४३ ॥ १० ५।३ । १४ ॥ इतर अर्थात् पञ्चमी सप्तमी से अन्य विभक्तियों के स्थान में भी उक्त प्रत्यय देखने में पाते हैं।। ७४३॥ इसमें विशेष यह है कि- वा०-भवदादिभियोगे ।। ७४४ ॥ भवान्, दीर्घायुः, आयुष्मान, देवानांप्रियः इन चार शब्दों के योग में पूर्व सूत्र से प्रत्ययविधान समझना चाहिये । अर्थात् सूत्र से जो सामान्य विधान था, उसको पार्तिक से विशेष जनाया है जैसे -स भवान् तत्र भवान् ततो भवान् तम्भवन्तम् तत्र भवन्तम्: ततो भवन्तम् तेन भवता; तत्र भवता; ततो भवता; तस्मै भवते; तत्र भवते; ततो भवते; तस्माद्भवतः; तत्र भवतः; ततो भवतः; तस्य भवतः तत्र भवतः; ततो भवतः, तस्मिन् भवति; तत्र भवति; ततो भवति । स दीर्घायुः; तत्र दीर्घायुः; ततो दीर्घायुः । स श्रायुष्मान् तत्रायुष्मान्; तत आयुष्मान् । स देवानांप्रियः; तत्र देवानांप्रियाः ततो देवानांप्रियः इत्यादि ॥ ७४४ ॥ सर्वैकान्यकियत्तदः काले दा ॥ ७४५ ॥ अ० ५। ३ । १५ ॥ सर्व एक अन्य किम् यद् और तद् प्रातिपदिकों से काल अर्थ में सप्तमी के स्थान में दा प्रत्यय हो। यह सूत्र प्रल् प्रत्यय का बाधक है। जैसे-सर्वस्मिन् काले इति सर्वदा; एकस्मिन् काले एकदा; अन्यदा; कदा; यदा; तदा इत्यादि । यहां 'काल' इसलिये कहा है कि सर्वत्र देशे, यहां दा प्रत्यय न हो ॥ ७४५ ॥ इदमो हिल ॥ ७४६ ॥ श्र० ५। ३ । १६ ॥ काल अर्थ में इदम् शन्द से सप्तमी के स्थान में हिल् प्रत्यय हो। जैसे अस्मिन् काले पहि। यहां काल कीअनुवृत्ति आने से इह देशे इस प्रयोग में हिल् प्रत्यय नहीं होता॥७४६॥ अधुना ॥ ७४७ ॥ अ०.५।३। १७ ॥
विभक्तिप्रत्ययाधिकारः
कालाधिकरण अर्थ में इदम् शब्द ले सप्तमी विभक्ति के स्थान में धुना प्रत्यय और
इदम् शब्द को अश भाव निपातन करने से अधुना शब्द बनता है। जैसे-अस्मिन् काले
इति अधुना ॥ ७४७ ॥
दानी च ॥ ७४८ ।। अ० ५। ३ । १८ ॥
काल अर्थ में वर्चमान इदम् शब्द से सप्तमी विभक्ति के स्थान में दानी प्रत्यय हो।
जैसे-अस्मिन् काले इदानीम् ॥ ७२८ ॥
तदो दा च ।। ७४६ || अ० ५। ३ । १६ ॥
काल अर्थ में वर्तमान तद् शब्द से सप्तमी विभक्ति के स्थान में दा, और चकार से
दानी प्रत्यय हो । जैसे-तस्मिन् काले तदा तदानीम् ।। ७८६ ।।
तयोर्दाहिलौ च छन्दसि ।। ७५० ।। अ० ५, । ३ । २० ॥
इदम् और तद दोनों शब्दों से वैदिकप्रयोगविषय में सप्तमी विभक्ति के स्थान में यथा-
संख्य करके दा और हिल प्रत्यय हों। जैसे-अस्मिन् काले इदा; तस्मिन् काले तर्हि ॥७५०॥
सद्यःपरुत्पराय्य॑पमःपरेद्यव्यद्यपूर्वेारन्येधुरन्यतरेद्यारतरेयुरपरेयुर-
धरेयुरुभयेयुरुत्तरेयुः ॥ ७५१ ॥ अ० ५ । ३ । २२ ॥
यहां सप्तमी विभक्ति और काल की अनुवृत्ति पाती है।
इस सूत्र में काल अर्थ में सद्यः श्रादि शब्द सप्तमी विभक्ति के स्थान में धस् श्रादि
प्रत्ययान्त निपातन किये हैं।
जैसेसमाने अहनि सद्यः-समान शब्द को स आदेश और धस प्रत्यय दिवस
अर्थ में हुआ है। पूर्वसिन सम्वत्सरे परुत्, पूर्वतरे सम्वत्सरे परारि-पूर्व और पूर्वतर
शब्दों को पर आदेश और उत् तथा प्रारीच प्रत्यय सम्वत्सर अर्थ में यथासंख्य करके
होते हैं। अस्मिन् सम्वत्सरे ऐयमः--यहां इदम् शब्द से सम्वत्सर अर्थ में समसण प्रत्यय
हुआ है, उसके अण्भाग का लोप होकर इदम् के इकार को वृद्धि होजाती है। परस्मि-
नहनि परेद्यवि-यहां पर शब्द से दिन अर्थ में पद्यवि प्रत्यय होगया है। अस्मिन्नहनि
अद्य-यहां इदम् शब्द को अशभाव और ध प्रत्यय दिन अर्थ में किया है।
और पूर्व अन्य अन्यतर इतर अपर अधर उभय और उत्तर शब्दों से दिन अर्थ
अभिधेय रहे, तो एद्युत् प्रत्यय निपातन किया है। जैसे-पूर्वस्मिन्नहनि पूर्वेयुः; अन्यस्मि-
नहनि अन्येयुः; अन्यनरस्मिन्नहनि अन्यतरेयुः, इतरस्मिन्नहनि इतरेयुः; अपरस्मिन्नहनि
अपरेयुः अधरस्मिन्नहनि अधरेयुः; उत्तरस्मिन्नहनि उत्तरेद्यः; उभयोरही: उभयेयुः ॥७५६॥
वा०-युश्चोभयात् ॥ ७५२ ॥
उभय शब्द से यु प्रत्यय भी हो । जैसे-तस्मान्मनुष्येभ्य उभयधुः ॥ ७५२ ॥
१३४ बैणताड़िते -------- प्रकारवचने थाल ॥ ७५३ ।। अ० ५ । ३ । २३ ॥ यहां भी किम् सर्वनाम आदि शब्दों की अनुवृत्ति चली आती है। प्रकारसमानाधिकरण किम् सर्वनाम और यहु प्रातिपदिकों से स्वार्थ में थाल् प्रत्यय हो। जैसे-तेन प्रकारेण तथा; यथा; सर्वथा; इतरथा; अन्यथा; पहुधा इत्यादि । ७५३ ॥ इदमस्थमुः ॥ ७५४ ।। अ० ५। ३ । २४ ।। प्रकारसमानाधिकरण इदम् शब्द से स्वार्थ में थाल् का अपवाद थम् प्रत्यय हो। उकार की इत्संशा होकर लोप होजाता है। जैसे-] अनेन प्रकारेण इत्थम् ॥७५४॥ किमश्च ॥ ७५५ ॥ अ० ५ । ३ । २५ ॥ प्रकारसमानाधिकरण किम् शब्द से भी स्वार्थ में थमु प्रत्यय होवे । जैसे-केन प्रकारेण कथम् ॥ ७५५ ॥ था हेतौ च छन्दसि ॥ ७५६ ॥ अ० ५ । ३ । २६ ॥ यहां पूर्व सूत्र से किम् और प्रकारवचन शब्द की अनुवृत्ति आती है। वैदिक प्रयोगविषय में हेतुसमानाधिकरण किम् प्रातिपदिक से था प्रत्यय हो । यह थमु प्रत्यय का बाधक है। [जैसे-] केन हेतुना इति कथा, केन प्रकारेण इति कथा ॥ ७५६ ॥ दिक्छन्देभ्यः सप्तमीपञ्चमीप्रथमाभ्यो दिग्देशकालेष्वस्ताातः ॥ ॥ ७५७ ॥ अ० ५ । ३ । २७ ॥ सप्तमी, पञ्चमी और प्रथमासमर्थ दिशा देश और काल अर्थों में दिशापाची पूर्वादि शब्दों से खार्थ में प्रस्ताति प्रत्यय होवे। जैले-[ सप्तमीसमर्थ से--] पूर्वस्यां दिशि पूर्वस्मिन् देशे काले वा पुरस्तात्; अधस्तात् । पञ्चमीसमर्थ से-पुरस्तादागतः । प्रथमा- समर्थ से-पुरस्ताद्रमणीयम् इत्यादि । यहां समर्थ विभक्ति और दिशा आदि अर्थों का यथासंख्य अभीष्ट नहीं है। यहां 'दिशावाचियों का ग्रहण इसलिये है कि-ऐन्द्रयां दिशि वसति, यहां ऐन्द्री शब्द दिशा का गौण नाम है। 'सप्तमी आदि समर्थविभक्तियों का' ग्रहण इसलिये है कि-पूर्व ग्राम गतः, यहां भी अस्ताति प्रत्यय नहीं होता। और 'दिग् देश काल अर्थों' का ग्रहण इसलिये है कि-पूर्वस्मिन् गुरी वसति, यहां भी प्रत्यय न होरे । अस्ताति प्रत्यय में इकार तकार की रक्षा के लिये है ॥ ७५७ ॥ दक्षिणोत्तराभ्यामतसुच् ॥ ७५८ ॥ अ० ५। ३ । २८ ॥ यह सूत्र, अस्ताति प्रत्यय पूर्वसूत्र से प्राप्त है, उसका अपवाद है।
अस्तात्यधिकारः
१३५
में
दिशा देश और काल अथों में वर्तमान सप्तमी पञ्ची और प्रथमासमर्थ प्रातिपदिकों
से स्वार्य में अंतमुच् प्रत्यय होवे । जैसे-दक्षिणतो वसति; दक्षिणत आगतः; दक्षिणतो
रमणीयम्: उत्तरतो वक्षतिः उत्तरत आगतः: उत्तरतो रमणीयम् ।
अतसुच् प्रत्यय के उच्मात्र की इत्संना होकर लोप हो जाता है। और इस सूत्र
दक्षिण शब्द का सम्बन्ध काल के साथ असम्भव होने से नहीं होता, किन्तु दिशा और
देशदी ही अर्थी के साथ होता है ॥ ७५८ ॥
विभाषा परावराभ्याम् ।। ७५६ ॥ अ० ५। ३ । २६ ॥
यहां अप्राप्तविभाषा इललिये समझना चाहिये कि अतसुच् प्रत्यय किसी से प्राप्त
नहीं। अतसुत्र का विकल्प होने से पक्ष में अस्ताति भी होजाता है।
अस्ताति प्रत्यय के अर्थों में पर और अवर शब्दों से अतसुच प्रत्यय विकल्प करके
हो, और पक्ष में प्रस्ताति होजावे ।
जैसे-परतो वसति; परत पागतः; परतो रमणीयम्; परस्तावसति; परस्तादागतः;
परस्ताद्रमणीयम्ः अवरतो वसति; अवरत आगतःः अवरतो रमणीयम्; अवस्ताद्वसतिः
अवस्तादागतः अवस्तादमणीयम् ॥ ७५६ ॥
अञ्चेर्लुक् ॥ ७६० ॥ अ० ५ । ३ । ३० ॥
क्विवन्त अञ्चुधातु जिनके अन्त में हो, ऐसे विशावाची शब्दों से परे अस्ताति प्रत्यय
का लुक हो जावे । जैसे-प्राच्यां दिशि वसति प्राग्यसतिः प्रागागतः; प्राप्रमणीयम् ।
यहां तद्धितसंबक अस्ताति प्रत्यय का लुक् होने के पश्चात् (लुक्तद्धित०) इस
से श्रीप्रत्यय का भी लुक् होजाता है । ७६० ॥
उपर्युपरिष्टात् ।। ७६१ ।। अ० ५। ३ । ३१ ।।
यहां ऊर्च शब्द को उपमाव और रिल तथा रिष्टातिल प्रत्यय अस्ताति के अर्थ में
निपातन किये हैं। जैसे-ऊर्चायां दिशि वसति उपरि वसतिः उपागतः; उपरि
रमणीयम् उपरिमावसति; उपरिणादागतः; उपरिष्टाद्रमणीयम् ॥ ७६१ ॥
पश्चात् ।। ७६२ ।। अ० ५। ३ । ३२ ।।
यहां अपर शब्द को पश्च आदेश और श्राति प्रत्यय निपातन किया है। जैसे-
अपरस्यां दिशि वसति पश्चाद्वसति; पश्चादागतः; पश्चाद्रमणीयम् ॥ ७६२ ॥
वा०-दिक्पूर्वपदस्य च ॥ ७६३ ॥
दिशा जिसके पूर्वपद में हो, उस अपर शब्द को भी पश्च आदेश और श्राति प्रत्यय
हो । जैले-दक्षिणपश्चात् उत्तरपश्चात् ॥ ७६३ ॥
१३६ स्त्रैणताद्धिते वा०-अर्वोत्तरपदस्य च समासे ॥ ७६४ ॥ दिशावाची शब्द जिसके पूर्वपद में हों, और समास में अर्द्ध शब्द जिसके उत्तरपद में हो, ऐसे अपर शब्द को पश्च आदेश होवे ! जैसे-दक्षिणपश्चाई उत्तरपश्चार्द्धः ॥७६४॥ वा०-अर्द्ध च' ।। ७६५ ।। पूर्व पद के विना भी अर्द्ध जिसके उत्तरपद में हो, उस अपर शब्द को भी पश्च आदेश हो । जैसे-पश्चाईः ॥ ७६५ ॥ पश्च पश्चा च छन्दसि ॥ ७६६ ॥ अ० ५। ३ । ३३ ॥ यहां अपर शब्द को पश्च आदेश अ तथा आ प्रत्यय वैदिकप्रयोगविषय में होते हैं, और चकार से आति प्रत्यय भी हो । जैसे -पश्च सिंहः; पश्चा सिंहा; पश्चात् सिंहः ॥७६६॥ उत्तराधरदक्षिणादातिः ।। ७६७ ।। अ० ५ । ३ । ३४ ॥ उत्तर श्रधर और दक्षिणं शब्दों से अस्ताति प्रत्यय के अर्थ में आति प्रत्यय होवे । जैसे - उत्तरस्यां दिशि घसति उत्तराद्वसति; उत्तरादागतः; उत्तराद्रमणीयम् श्रधराद्वसति; अधरादागतः अधराद्रमणीयम् दक्षिणाद्वसति दक्षिणादागतः; दक्षिणाद्रमणीयम् ॥७६७॥ एनबन्यतरस्यामदूरे ऽपञ्चभ्याः ॥ ७६८ ।। अ० ५ । ३ । ३५ ॥ यहां एनप् प्रत्यय में अप्राप्तविभाषा है, क्योंकि एनप् प्रत्यय किसी से प्राप्त नहीं है। और पूर्व सूत्र से उत्तर आदि तीनों शब्दों की अनुवृत्ति पाती है। सप्तमी और प्रथमासमर्थ उत्तर अधर और दक्षिण शब्दों से निकट अर्थ में प्राति प्रत्यय का वाधक एनप् प्रत्यय विकल्प करके हो, पक्ष में आति भी हो जावे । जैसे-उत्तरस्यां दिशि वसति उत्तरेण वसति; उत्तराद्वसति; उत्तरतो वसति; उत्तरेण रमणीयम्; उतराद्रमणीयम् उत्तरतो रमणीयम् अधरेण वसति; अधराद्वसति; अधस्ता- द्वसति;अधरेण रमणीयम्, अधराद्रमणीयम्; अधस्ताद्रमणीयम् दक्षिणेन वसति; दक्षिणा- द्वसति; दक्षिणतो वसतिः दक्षिणेन रमणीयम्; दक्षिणाद्रमणीयम्; दक्षिणतो रमणीयम् । यहां 'अदूर' ग्रहण इसलिये है कि उत्तराद्वसति, यहां एनप् न होवे । और 'पञ्चमी- समय का निषेध' इसलिये किया है कि उत्तरादागतः, यहां भी एनप् प्रत्यय न होवे । और यहां से आगे असि प्रत्यय के पूर्व २ सब सूत्रों में पञ्चमीसमर्थ का निषेध समझना चाहिये ॥ ७६८ ॥ दक्षिणादाच ।। ७६६ ।। अ० ५। ३ । ३६ ।। सप्तमी और प्रथमासमर्थ दक्षिण शब्द से प्रस्ताति के अर्थ में आच प्रत्यय हो । जैसे-दक्षिणा वसति; दक्षिणा रमणीयम् ।
अस्तात्यधिकारः
१३७
यहां 'पञ्चमी का निषेध' इसलिये है कि-दक्षिणत आगतः, यहां श्राच् प्रत्यय
न हो ॥ ७६६ ॥
आहि च दूरे ॥ ७७० ।। अ० ५ । ३ । ३७ ॥
यहां पूर्व सूत्र से दक्षिण शब्द की अनुवृत्ति आती है।
दक्षिण प्रातिपदिक से अत्ताति के अर्थ में आहि, चकार से आच प्रत्यय होवे ।
जैसे-दक्षिणाहि वसति; दक्षिणा वसति; दक्षिणाहि रमणीयम्: दक्षिणा रमणीयम् ।
यहां 'दूर' ग्रहण इसलिये है कि-दक्षिणतो वसति, यहां न हो। और 'पञ्चमीसमर्थ
का निषेध इसलिये है कि-दक्षिणत आगतः, यहां भी पाहि प्रत्यय न होवे ॥ ७० ॥
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उत्तराच्च ।। ७७१ ।। अ० ५। ३ । ३८ ॥
उत्तर शब्द ले अस्ताति प्रत्यय के अर्थ में दूर अर्थ वाच्य रहे, तो आच मोर आहि
प्रत्यय हो । जैसे-उत्तरा वसति; उत्तराहि वसति; उत्तरा रमणीयम्; उत्तराहि रमणीयम् ।
यहां 'दूर' ग्रहण इसलिये है कि उत्तरेण प्रयाति, यहां न हो। और 'पञ्चमीसमर्थ
का निषेध' इसलिये है कि उत्तरादागतः, यहां भी पाहि प्रत्यय न होवे ॥ ७७१ ॥
पूर्वाधरावराणामसि पुरधवश्चैषाम् ॥७७२॥ अ० ५ । ३ । ३६ ॥
सप्तमी पञ्चमी और प्रथमासमर्थ पूर्व अधर और अवर प्रातिपदिकों से अस्ताति
प्रत्यय के अर्थ में असि प्रत्यय, और पूर्व आदि शब्दों को क्रम से पुर् अध् और अव्
आदेश भी होवें।
जैसे- पूर्वस्यां दिशि वसति पुरो वसति; पुर आगतः पुरो रमणीयम्; अधो वसति
अध पागतः; अधो रमणीयम्: अवों वसति; अब आगतः; अवो रमणीयम् ॥ ७७२ ॥
अस्ताति च ।।७७३।। अ० ५।३। ४० ॥
प्रस्ताति प्रत्यय परे हो, तो भी पूर्व आदि तीनों शब्दों को पुर् आदि श्रादेश क्रम से
हों। और यहां अस्ताति प्रत्यय भी इस आदेश-विधानरूप ज्ञापक से ही समझना
चाहिये । जैसे-पुरस्ताद्वसतिः पुरस्तादागतः पुरस्ताद्रमणीयम् अधस्ताद्वसति; अधस्ता-
दागतः; अधस्ताद्रमणीयम् ॥ ७७३ ॥
विभाषाऽवरस्य ॥ ७७४ ।। अ० ५। ३ । ४१ ॥
यहां प्रातविभाषा है। पूर्व सूत्र से नित्य ही अव आदेश प्राप्त है।
अवर शब्द को अस्ताति प्रत्यय के परे अव् आदेश विकल्प करके हो। जैसे-
अवस्ताद्वसति; अवस्तादागतः; अवस्ताद्रमणीयम् ॥ ७७८ ॥
१३८ बैणताद्धिते प संख्याया विधार्थे धा ॥ ७७५ ॥ अ० ५ । ३ । ४२ ॥ क्रिया के प्रकार अर्थ में वर्तमान संख्यावाची प्रातिपदिकों से स्वार्थ में धा प्रत्यय हो। जैसे-एकधा भुङ्क्ते द्विधा गच्छति; चतुर्धा; पञ्चधा इत्यादि ॥ ७७५ ॥ याप्ये पाशप् ॥ ७७६ ॥ अ० ५ । ३ । ४७ ॥ याप्य-निन्दित-अर्थ में वर्तमान प्रातिपदिक से स्वार्थ में पाशप् प्रत्यय हो । जैसे-कुत्सितो वैयाकरणो वैयाकरणपाशः; याशिकपाशः इत्यादि । जो पुरुष व्याकरण शास्त्र में प्रवीण और बुरे आचरण करता हो, उसकी 'वैयाकरणपाश' संज्ञा इसलिये नहीं होती कि जिस गुण के विद्यमान होने से वैयाकरण शब्द की प्रवृत्ति उस पुरुप में होती है, उसी गुण की निन्दा में प्रत्यय होता है ॥७७६॥ एकादाकिनिच्चासहाये ॥ ७७७ ।। अ० ५। ३ । ५२ ।। असहायवाची एक शब्द से स्वार्थ में आकिनिच प्रत्यय हो, और चकार से कन् प्रत्यय और लुक भी हों । जैसे-एकाकी, एककः, एकः । यहां आकिनिच और कन दोनों का लुक समझना चाहिये, परन्तु प्रत्ययविधान व्यर्थ न हो इसलिये पक्ष में लुक होता है ॥ ७७७ ॥ आतशायने तमबिष्ठनौ ।। ७७८ ।। अ० ५ । ३ । ५५ ।। अतिशायन-प्रकृत्यर्थ की उन्नति-अर्थ में वर्तमान प्रातिपदिक से स्वार्थ में तमप् और इष्ठन् प्रत्यय हों। जैसे-अतिशयितः श्रेष्ठः श्रेष्ठतमः; वैयाकरणतमः; आढयतमः; दर्शनीयतमः; सुकु- मारतमः इत्यादि । अयमेषामतिशयेन पटुः पटिष्टः; लघिष्टः; गरिष्ठः इत्यादि ॥ ७७८ ॥ तिङश्च ।। ७७६ ।। अ० ५ । ३। ५६ ।। यहां तद्धितप्रकरण में चतुर्थाध्याय के आदि में डीवन्त श्रावन्त और प्रातिपदिकों से प्रत्ययविधान का अधिकार कर चुके हैं। इस कारण तिङन्त शब्दों से प्रत्ययविधान नहीं प्राप्त है, इसीलिये यह सूत्र पढ़ा तिङन्त शब्दों से अतिशय अर्थ में तमप् प्रत्यय हो। जैसे-अयमेषु भृशं पचति पचतितमाम्; जल्पतितमाम् इत्यादि । यहां पूर्वसूत्र से इष्ठन् प्रत्यय इसलिये नहीं पाता कि प्रत्ययान्त गुणवाची शब्दों से लोक में वाच्य अर्थो के साथ सम्बन्ध दीखता है, क्रिया शब्दों के साथ नहीं ॥ ७७६ || द्विवचनविभज्योपपदे तरबीयसुनौ ॥ ७८० ॥ अ०५ । ३ । ५७ ॥ यहां तिङन्त की अनुवृत्ति पूर्व सूत्र से आती है। . है।
अतिशयिकप्रत्ययाधिकारः १३६ ----- 44-.--- J अन्य जहां विभाग करने योग्य दो और व्यक्तियों का कहना उपपद हो, वहां सामान्य प्रातिपदिकों और तिङन्त शब्दों से अतिशय अर्थ में तरप और ईयसुन् प्रत्यय हो। जैसे-द्वाविमावादयी अयमनयोरतिशयनाढयः आढयतरः; द्वाविमौ विद्वांसी अयमनयोरतिशयेन विद्वान् विद्वत्तरःः प्रातरः; पचतितराम्; जल्पतितराम् इत्यादि । ईयसुन्-द्वाविमो गुरु, अयमनयोरतिशयेन गरीयान् पटीयान्; लघीयान् इत्यादि। विभज्योपपद से-माथुराः पाटलिपुत्रेभ्य आढयतराः; वाराणसेयाइतरेभ्यो विद्वत्तराः; दर्शनीयतराः इत्यादि । ईयसुन्-गरीयांसः; पटीयांसः इत्यादि ॥ ७८० ॥ अजादी गुणवचनादेव ।। ७८१ ।। अ० ५ । ३ । ५८ ॥ पूर्व सूत्रों में जो अजादि-इष्टन्, ईयसुन्-प्रत्यय सामान्य करके कहे हैं, उनका यहां विषयनियम करते हैं, कि वे दोनों प्रत्यय गुणवाची प्रातिपदिक से ही होवें, से नहीं। उदाहरण पूर्व दे चुके हैं। नियम होने से पाचकतरः, पाचकतमः इत्यादि में इष्टन और ईयसुन् प्रत्यय नहीं होते। और प्रत्यय का नियम समझना चाहिये, प्रकृति का नहीं। अर्थात् गुणवाची प्रातिपदिकों से तर तमप् प्रत्यय भी होते हैं, और द्रव्यवाचक शब्दों से तरप् तमप ही होते हैं, इष्टन और ईयसुन नहीं होते ॥ ७८९ ॥ तुश्छन्दसि ।। ७८२ ।। अ० ५ । ३ । ५६ ॥ यहां पूर्व सूत्र से अजादि की अनुवृत्ति चली आती है। पूर्व सूत्र में गुणवाचियों से नियम किया है, इससे यहां प्राप्ति नहीं थी। तच् और तन् प्रत्ययान्त प्रातिपदिक से वेदविषय में इष्ठन् और ईयसुन् प्रत्यय होवें। जैसे-श्रासुति करिष्ठः, 'अतिशयेन कर्त्ता' ऐसा विग्रह होगा; अतिशयेन दोग्ध्री दोहीयसी धेनुः। यहां सामान्य भसंशा में (भस्याडे०) इससे पुंवद्भाव होकर तृच तुन् प्रत्ययों का लुक हो जाता है ॥ २ ॥ प्रशस्यस्य श्रः ।। ७८३ ॥ अ० ५। ३। ६० ।। अजादि प्रत्ययों के परे प्रशस्य शब्द को श्रादेश होवे । जैसे-सर्व इमे प्रशस्याः अयमतिशयन प्रशस्यः श्रेष्टः; द्वाविमो प्रशस्यौ अयमनयोरतिशयेन प्रशस्यः श्रेयान् । तद्धितप्रत्ययों के परे भसंज्ञक एकाच शब्दों को प्रकृतिभाव होने से श्र शब्द के टिभाग का लोप नहीं होता || ७८३ ॥ ज्य च ।। ७८४ ।। अ० ५ । ३ । ६१ ॥ प्रशस्य शब्द को अजादि प्रत्ययों के परे ज्य आदेश भी हो। जैसे-सर्व इमे प्रशस्याः अयमनयोरतिशयेन प्रशस्यः ज्येष्ठः; द्वाविमा प्रशस्यौ अयमतिशयेन प्रशस्यः ज्यायान् ।
१४.. स्त्रैणताद्धिते यहां ईयसुन के ईकार को आकारादेश (ज्यादादी० ) इस वक्ष्यमाण सूत्र से हो जाता है॥ ७८४॥ वृद्धस्य च ।। ७८५ ।। अ० ५ । ३ । ६२ ।। वृद्ध शब्द को भी अजादि प्रत्ययों के परे ज्य आदेश होवे। जैसे-सर्व इमे वृद्धाः अयमेषामतिशयेन वृद्धः ज्येष्ठः; उभाविमौ वृद्धो अयमनयोरतिशयेन वृद्धः ज्यायान् । और ( प्रियस्थिर० ) इस वक्ष्यमाण सूत्र से वृद्ध शब्द को वर्ष आदेश भी होता है, परन्तु वृद्ध आदेश कहना व्यर्थ न होजावे, इसलिये पक्ष में समझना चाहिये। जैसे- वर्षिष्ठः, वर्षीयान् ॥ ७८५ ॥ अन्तिकवाढयोर्नेदसाधौ ।। ७८६ ।। अ० ५ । ३ । ६३ ।। अन्तिक और वाढ' शब्दों को यथासंख्य करके अजादि प्रत्ययों के परे नेद और साध आदेश होवें। जैसे-सर्वाणीमान्यन्तिकानि इदमेपामतिशयेनान्तिकं नेदिष्ठम्; उभे इमे अन्तिके इदमनयोरतिशयेनान्तिकं नेदीयः; सर्व इमे बाढमधीयते नेदिष्ठमधीयते; अयमस्मात् साधीयोऽधीते ॥ ७८६॥ युवाल्पयोः कनन्यतरस्याम् ।। ७८७ ॥ अ० ५। ३ । ६४ ।। इस सूत्र में अप्राप्त विभाषा इसलिये समझनी चाहिये, कि अजादि प्रत्ययों के परे कन् आदेश किसी सूत्र से प्राप्त नहीं। युव और अल्पशब्दों के स्थान में अजादिप्रत्ययों के परे कन् आदेश विकल्प करके होवे। जैसे-सर्व इमे युवानः अयमेषामतिशयेन युवा कनिष्ठः, यविष्टः; द्वाविमौ युवानी श्रयमनयोरतिशयेन युवा कनीयान्, यवीयान्, सर्व इमेऽल्पाः श्रयमतिशयेनाल्पः कनिष्ठः, अल्पिष्ठः; द्वाविमावल्पो अयमतिशयेनाल्पः कनीयान्, रल्पीयान् ॥ ७८७ ॥ विन्मतोलृक् ॥ ७८८ ।। अ० ५। ३ । ६५ ॥ विन और मतुप् प्रत्ययान्त प्रातिपदिकों से अजादि प्रत्यय परे हों, तो विन् और मतुप् प्रत्यय का लुक हो जावे । जैसे-सर्थ इमे स्रग्विणः अयमेपामतिशयेन स्रग्वी स्त्रजिष्ठः; मायिष्टः इत्यादि उभाविमौ स्रग्विणो अयमनयोरतिशयेन स्रग्वी सजीयान्; अयमस्मात् सजीयान् सर्व इमे धनवन्तः अयमेषामतिशयेन धनवान् धनिष्ठः; उभाविमो धनवन्तो भयमनयोरतिशयेन धनवान् धनीयान; अयमस्मात् धनीयान् इत्यादि। (प्रशस्यस्य श्रः) इस सूत्र से ले के यहां तक सब सूत्रों में आदेश विधानरूपचापक से अजादि प्रत्ययों-इष्टन्, ईयसुन्-की उत्पत्ति उन २ प्रशस्य आदि प्रातिपदिकों से समझनी चाहिये || ७८८ ॥
अतिशयिकप्रत्ययाधिकारः १४१ -- प्रशंसायां रूपपू ॥ ७८६ ।। अ० ५। ३ । ६६ ।। प्रकृत्यर्थ की प्रशंसा अर्थ में वर्तमान प्रातिपदिक से स्वार्थ में रूपप् प्रत्यय होवे । जैसे-प्रशस्तो वैयाकरणो वैयाकरणरूपः; याशिकरूपः; पाचकरूपः; उपदेशकरूपः; प्रारूपः इत्यादि। यहां पूर्व से तिङन्त की भी अनुवृत्ति चली आती है। जैसे-पचतिरूपम् पठति- रूपम् जल्पतिरूपम् । तद्धित प्रत्ययान्त आख्यात क्रियाओं से द्विवचन बहुवचन विभक्ति नहीं आती, और सब विभक्तियों के एकवचन भी नहीं होते, किन्तु अव्ययसंज्ञा होजाने से सब विभक्तियों के स्थान में अम् श्रादेश हो जाता है। परन्तु द्विवचनान्त और वहुवचनान्त क्रियाओं से तो तद्धित प्रत्यय हो जाते हैं । जैस-पठतोत्पम्पठन्तिरूपम् इत्यादि ॥ ६ ॥ ईपदसमाप्तौ कल्पव्देश्यदेशीयरः ।।७६०॥ अ० ५ । ३ । ६७ ॥ समाप्ति होने में थोड़ी न्यूनता अर्थ में वर्तमान प्रातिपदिक से स्वार्थ में कल्पप देश्य और देशीयर् प्रत्यय होवें । जैसे-ईपदसमाता विद्या विद्याकल्पः; विद्यादेश्यः; विद्यादेशीयः; ईयरसमाप्तः पटः पटकल्पः:पटदेश्यः पटदेशीयः मृद्रुकल्पः; मृदुदेश्यः मृदुदेशीयः इत्यादि। तिङन्त की भी अनुवृत्ति चली आती है। जैसे-पचतिकल्पम्: पठतिकल्पम्; पटतिदेश्यम्: पठतिदेशीयम्: पठतःकल्पम्; पठन्तिकल्पम् इत्यादि ॥ ७० ॥ विभाषा सुपो बहुच पुरस्तात्तु ॥ ७६१ ॥ अ० ५ । ३ । ६८ ॥ यहां भी अप्राप्तविभाषा है. क्योंकि सुवन्त से पूर्व बहु प्रत्यय किसी से प्राप्त नहीं। और यहां पूर्वसूत्र से ईपदसमाप्ति अर्थ की अनुवृत्ति भी चली आती है। ईपदसमाप्ति अर्थ में वर्तमान सुबन्त से पूर्व वहुच प्रत्यय विकल्प करके होवे । तृतीयाध्याय के प्रारम्भ में प्रत्ययों के धातु प्रातिपदिकों से परे होने का अधिकार कर चुके हैं, इसलिये यहां पुरस्तात् शब्द पढ़ा है कि प्रातिपदिकों के आदि में प्रत्यय हो । जैसे, ईपदसमातो लेखः बहुलेखः; बहुपटुः; बहुमृदुः; बहुगुडा द्राक्षा इत्यादि । विकल्प के कहने से 'कल्पप्' श्रादि प्रत्यय भी इन प्रातिपदिकों से होते हैं । और मुवन्तग्रहण तिङन्त की निवृत्ति के लिये है ॥ ७६१ ॥ । प्रकारवचने जातीयर् ॥ ७६२ ॥ अ० ५ । ३ । ६६ ॥ प्रकार के कहने अर्थ में वर्तमान प्रातिपदिक से स्वार्थ में जातीयर् प्रत्यय होवे । जैसे-एवम्प्रकारः एवजातीयः; मृदुप्रकार: मृदुजातीयः; प्रमाणजातीयः; प्रमेयजातीयः इत्यादि । ७२२॥
१४२ बैणताद्धिते प्रागिवात्कः ॥ ७६३ ।। अ० ५। ३ । ७० ॥ यह अधिकार सूत्र है। यहां से आगे ( इवे प्रतिकृती) इस सूत्रपर्यन्त सब सूत्रों तथा अर्थों में सामान्य करके क प्रत्यय होगा । जैसे-अश्वकः; वृपभकः; गोकः इन्यादि। तिङन्त की अनुवृत्ति इस सूत्र में नहीं पाती, किन्तु उत्तरसूत्र में तो पाती है ॥७६३॥ अव्ययसर्वनाम्नामकच् प्राक् टेः ॥ ७६४ ॥ अ० ५ । ३ । ७१ ॥ यहां तिङन्त की भी अनुवृत्ति आती है। और यह सूत्र क प्रत्यय का अपवाद है । अव्यय सर्वनामसंज्ञक और तिङन्त शब्दों के टि भाग से पूर्व अकच् प्रत्यय होचे । यहां भी प्रत्ययों का पर होना अधिकार होने से टि से पूर्व नहीं प्राप्त है, इसलिये प्राक्ग्रहण किया है। जैसे अव्ययों से-उच्चकैः; नीचकैः शनकैः इत्यादि । सर्वनाम- संज्ञकों से-सर्वके, सर्वे; विश्वके, विश्व उभयके, उभये, यका; सका, या; सा; यकः; सका; यः; सा; एषकः, एपः । यहां प्रातिपदिक और सुवन्त दोनों की अनुवृत्ति चली आती है, इस कारण कहीं प्रातिपदिक के टि से पूर्व. और कहीं सुबन्त के टि से पूर्व अकच प्रत्यय होता है। प्रातिपदिक के टि से पूर्व-जैसे-युष्मकाभिः; अस्मकाभिः; युप्माभिः; अस्माभिः; युष्मकासुः अस्सकासुः युष्मासु, अस्मासुः युवकयोः; आवकयोः; युवयोः; आवयोः इत्यादि । सुबन्त के टि से पूर्व-जैसे-त्वयका; मयका; त्वया; मया; त्वयकि, मयकि त्वयि मयि इत्यादि । तिङन्त से-भवतकि; पचतकि; पठतकि जल्पतकि इत्यादि ॥७६४॥ वा०-अकप्रकरणे तूष्णीमः काम् ।। ७६५ ॥ तूप्णीम् मकारान्त अध्यय शब्द के टि भाग से पूर्व अकच प्रत्यय का बाधक काम् प्रत्यय होवे । जैसे-श्रासितव्यं किल तूष्णीकाम् ॥ ७६५ ॥ वा०-शीले को मलोपश्च ॥ ७६६ ।। शील अर्थ में तूष्णीम् अव्यय शब्द से क प्रत्यय और तूष्णीम् शब्द के मकार का लोप हो जावे । जैसे-तूष्णींशीलः तूष्णीकः ॥ ७६६ ॥ पूर्व सूत्र कस्य च दः ॥ ७६७ ॥ अ० ५। ३ । ७२ ।। यहां अव्ययों के सम्बन्ध का सूत्रार्थ के साथ सम्भव होने से अव्यय की अनुवृत्ति से आती है, सर्वनाम की नहीं। क्योंकि सर्वनाम शब्द कोई ककारान्त नहीं है। ककारान्त अव्ययों को अकच् प्रत्यय के संयोग में दकारान्त आदेश होवे । जैसे- धिक्, धकित्; हिरुक, हिरकुत् पृथक्, पृथकत् इत्यादि ॥ ७ ॥ - - कप्रत्ययाधिकारः १४३ अनुकम्पायाम् ।। ७९८ ।। अ० ५ । ३ । ७६ ।। दूसरों के दुःखों को यथाशक्ति निवारण करने को 'अनुकम्पा' कहते हैं । अनुकम्पा अर्थ में वर्तमान सामान्य प्रातिपदिकों और तिङन्त शब्दों से यथाप्राप्त प्रत्यय हों। -पुत्रका; वत्सक दुचलका, बुभुक्षितकः; ज्वरितकः इत्यादि । तिङन्तों से- शेतके विश्वसितकि; खपितकि प्राणितकि इत्यादि ॥ ७६८ ॥ जैसे- ... टाजादावू द्वितीयादचः ।। ७९९ ॥ अ० ५। ३ । ८३॥ यहां पूर्व सूत्र से लोप की अनुवृत्ति पाती है। इस प्रकरण में जो ठ अजादि प्रत्यय हैं, उनके परे प्रकृति के द्वितीय अच् से अन्य जो शब्दरूप है उसका लोप हो । ऊर्ध्व शब्द के ग्रहण से सब का लोप होजाता है। जैसे--अनुकम्पितो देवदत्त देविका, देवियः, देविला; यक्षिकः, यशियः, यझिलः- यहां देवदत्त और यज्ञदत्त शब्द से ट, घ और इलच प्रत्यय क्रम से हुए हैं । अनुकम्पित उपेन्द्रदत्तकः उपडः, उपकः, उपियः, उपिलः, उपिक:-यहां उपेन्द्रदत्त शब्द से अडच, बुच, घ, इलच तथा ठच् प्रत्यय होते हैं। इस सूत्र में ठ को भी इन आदेश हो जाता है। फिर अजाद के कहने से ठप्रत्यय का भी ग्रहण हो जाता, फिर ' प्रत्यय का ग्रहण इसलिये है कि-जहां उक प्रत्याहार से परे ठ के स्थान में क ादेश होता है, वहां भी दो अच से अन्य वर्णों का लोप हो जावे । जैसे-अनुकम्पितो वायुदत्तः यायुक; पित्कः ॥ ७६६ || वा०-द्वितीयादचो लोपे संध्यक्षरस्य द्वितीयत्वे तदादेलोंपो वक्तव्यः ॥ ८०० ॥ दो अक्षरों से अन्य वर्गों का जो लोप सूत्र से कहा है, सो जो द्वितीय अक्षर सन्ध्यक्षर-ए, ऐ, ओ, औ-हों, तो वहां सन्ध्यक्षर का भी लोप हो जावे । जैसे- लहोडा, लहिकः; कहोडः, कहिकः । यहां लहोड कहोड किसी मनुष्यविशेष की संज्ञा है, उन में हकारविशिष्ट श्रोकार का भी लोप हो जाता है ॥ ८०० ॥ वा०-चतुर्थात् ॥ ८०१ ॥ द्वितीय श्रच ले परे अन्य भाग का जो लोप कहा है, सो चतुर्थ श्रच से परे भी हो जावे । जैसे-वृहस्पतिदत्तकः बृहस्पतिकः, वृहस्पतियः, वृहस्पतिलः इत्यादि । ८०१ ॥ वा०-अनजादौ च ॥ ८०२ ॥ अजादि प्रत्यय के परे लोप कहा है,लो हलादि प्रत्ययों के परे भी द्वितीय श्रच से ऊर्ध्व का लोप हो। जैसे-देवदत्तकः देवकः यज्ञदत्तकायक:-यहां कन् प्रत्यय हुआ है ।।८०२॥ ।
१४४ स्त्रैणताद्धिते. वा०-लोपः पूर्वपदस्य च ।। ८०३ ॥ : अजादि हलादि सामान्य प्रत्ययों के परे संज्ञावाची शब्दों के पूर्वपद का भी लोप हो जावे। जैसे-देवदत्तको दत्तकः, यज्ञदत्तको दत्तकः, दत्तिकः, दत्तियः, दत्तिलः इत्यादि ॥८०३॥ वा०-अप्रत्यये तथैवेष्टः ॥ ८०४ ॥ कोई भी प्रत्यय न परे हो, तो भी पूर्वपद का लोप होवे । जैसे-देवदत्तो दत्तः इत्यादि ।। ८०४॥ वा०-उवाल्ल इलस्य च ॥ ८०५ ॥ उवर्णान्त संज्ञा शब्द से परे जो इलच् प्रत्यय उसके इकार का लोप हो। जैसे- भानुदत्तो भानुलः; वसुदत्तो वसुलः इत्यादि ॥ ८०५ ॥ वा०-एकाक्षरपूर्वपदानामुत्तरपदलोपः ॥ ८०६ ॥ एकाक्षर जिनका पूर्वपद हो, उनके उत्तरपद का लोप हो, अजादि प्रत्ययों के परे । जैसे-वागाशीः; वाचिकः; त्रुचिकः; त्वचिकः इत्यादि ॥ ८०६ ॥ किंयत्तदो निर्धारणे द्वयोरेकस्य डतरच ।।८०७॥ अ०५।३।१२।। दो में से एक का जहां निर्धारण-पृथक्-करना हो, वहां किम् यत् और तत् प्रातिपदिकों से डरतच प्रत्यय होवे । जातिवाची क्रियावाची गुणवाची वा संज्ञा शब्दों के समुदाय से एकदेश का पृथक करना होता है । जैसे-कतरो भवतोः कठः; कतरो भवतोः कारकः; कतरो भवतोः पटुः; कतरो भवतोदेवदत्तः; यतरो भवतोः कठः; यतरो भवतोः कारकः, यतरो भवतोः पटुः; यतरो भवतोदेवदत्तः ततर आगच्छतु इत्यादि । यहां महाविभाषा अर्थात् (समर्थानां०) इस सूत्र से विकल्प की अनुवृत्ति चली आती है। इससे को भरतोदेवदत्तःस श्रागच्छतु इत्यादि वाक्यों में तरच प्रत्यय नहीं होता।८०७॥ वा बहूनां जातिपरिप्रश्ने उतमच् ॥ ८०८ ॥ अ० ५ । ३ । ६३ ॥ पूर्व सूत्र से किम् आदि.शब्दों और एक के निर्धारण की अनुवृत्ति पाती है। बहुतों में से एक का निर्धारण करना अर्थ हो, तो जाति के पूछने अर्थ में वर्तमान किम् आदि शब्दों से विकल्प करके उतरच प्रत्यय होवे । जैसे-कतमो भवतां कठ'; यतमो भवतां कठः ततम आगच्छतु इत्यादि । यहां विकल्प के होने से पक्ष में इसी अर्थ में अकच भी होता है। जैसे-यको भवतां कठः सक श्रागच्छतु । और महाविभाषा के चले आने से वाक्य भी बना रहता है। जैसे-यो भवतां कठः स श्रागच्छतु । ।
प्रतिकृत्यधिकारः १४५ यहां जातिपरिप्रश्न का ग्रहण इसलिये है कि-को भवतां देवदत्ता, यहां निज की संस्था के प्रश्न में किम् शव ले डतम प्रत्यय नहीं होता। और परिप्रश्न का सम्बन्ध एक किम् शब्द के साथ ही सममाना चाहिये, क्योंकि यत् तत् के साथ वह अर्थ सम्मवित नहीं होता। इवे प्रतिकृतौ ॥ ८०६ ॥ अ० ५ । ३ । ६६ ॥ यहाँ पूर्व से परिप्रश्न की अनुवृत्ति आती है। उपमावाचक अर्थ में वर्तमान प्रातिपदिक से कन् प्रत्यय होवे । जैसे-अश्व इव प्रतिकृतिः अवका; गर्दमका; उष्ट्रका ! यहां 'प्रतिकृति ग्रहण इसलिये है कि-गौरिव गवयः, यहां केवल उपमा ही है प्रतिकृति नहीं, इससे कन् प्रत्यय नहीं होता ।। ८०६ ॥ लुम्मनुष्ये ।। ८१० ॥ अ० ५ । ३ । ६८ ॥ प्रतिकृति सादृश्यार्थलंबा हो, तो उस अर्थ में विहित कन् प्रत्यय का लुप् होजावे ! जैस-चञ्चत्र मनुष्यः चञ्चा; दासी; स्वरकुटी इत्यादि, यहां तद्धित-प्रत्यय का लुप् होने से लिङ्ग और वचन पूर्व के ही हो जाते हैं। या 'मनुष्य' ग्रहण इसलिये है कि अश्वकः, उष्ट्रका इत्यादि लुप् न होवे ॥१०॥ जीविकार्थ चापण्ये + ॥ ८११ ॥ अ० ५ १३ 1 ६६ ॥ यहां मनुष्यग्रहप की अनुचि पूर्व सूत्र से समभानी चाहिये, क्योंकि उत्तर सूत्र में भी जाती है। * बीविका शब्द का अर्थ मुख्य कारक तीवनोपाय करना है। इस प्रकरण में सिवाय प्रतिकृति और मनुष्य के दूसरे की अनुवृत्ति नहीं पाती। यहां प्रयोजन यह है कि निन भी पुत्र श्रादि सम्बन्धी या मित्रादिकों के साय अत्यन्त प्रेम होता है; उनके वियोग में टनकी प्रतिञ्चति देखने और गुस्य कर्म क्या टपकार अादि का मरद करते हुए. अपने चित्त में सन्तोष करते हैं । परन्तु इस प्रकरण में यह बान विचारना चाहिये कि संसार में जितने दृश्य पदार्थ है, उन सबकी प्रतिश्चति होती है वा नहीं ? नो बहुतेरे बोरे हायी आदि जीवों की प्रतिदर्शनीय सन्मयादि की प्रतिकृतियां बना २ कर बेचते हैं, वैजीविका परम हन हैं। और जो बहुतेरे द्वीप द्वीपान्तर देश देशान्तरों में पशु पच्यादि तथा प्रति खी पुनादि की प्रतिकृतियां रखते हैं, वे अपत्यजीविकार्य प्रयान बेचने के लिये न हों, किन्तु देन और दिला के जीविका करते हों। परन्तु परमार्थ के साय इस विषय का कुछ सम्बाध नहीं। इस स्त्र से बहुतेरे वैयाकरणों का यह अमित्राय है कि-जीविका के लिये जो पदार्थ हो और वह बेचा न नावे, तो दस अर्थ में कन् प्रत्यय का लुप् हो जावे, और (लुम्मनुष्ये) इस स्त्र से मनुष्य शब्द का भी सम्बन्ध न का, अझा श्रादि देवताओं की मूर्तियां, जो कि मन्दिरों में वना २ कर रखते है, उनसेनादिका-घन का भागम-ता है परन्तु चे प्रतिमा बेचने के लिये नहीं है. इसलिये टन्दी का महब होना चाहिये। ।
स्त्रैणताद्विते पण्य उसको कहते हैं कि जो बेचा जावे, जो पदार्थ बेचने के लिये न हो और उससे किसी प्रकार की जीविका होती होवे, वह पदार्थ वाच्य रहे, तो प्रतिकृति अर्थ में विहित प्रत्यय का लुप् हो जावे । जैसे-वसिष्ठस्य प्रतिकृतिर्वसिष्ठः, विश्वामित्रः; अर्जुनस्य प्रति- कृतिरर्जुनः युधिष्ठिरः रामः; कृष्ण; शिवः विष्णुः स्कन्दा; आदित्यः इत्यादि । ये वसिष्ठ आदि मनुष्यों के विशेष नाम भूत भविष्यत् और वर्तमान तीनों काल में होते हैं। यहां 'मनुष्य ग्रहण की अनुवृत्ति इसलिये है कि-अश्वकं दर्शयति, यहां न हो। और 'अपण्य'ग्रहण इसलिये है कि हस्तिकान् विक्रीणीते,यहां भी कन् का लुप न हो ॥११॥ समासाच्च तद्विषयात् ॥ ८१२॥ अ० ५ । ३ । १०६ ॥ यहां तत् शब्द से पूर्वोक्त उपमावाचक शब्द लिया जाता है। उपमार्थ में समास किये प्रातिपदिकों से दूसरे उपमार्थ में छ प्रत्यय होवे। जैसे- काकागमनमिव तालपतनमिव काकतालं काकतालमिव यत्कार्य काकतालीयम् अजा. कृपाणीयम्; अन्धकवर्तकीयम् इत्यादि । और इस सूत्र पर महाभाष्यकार ने भी लिखा है कि जो धनार्थी लोग शिव श्रादि की प्रतिमा बना २ कर वेचते हैं, वहां लुप् नहीं पावेगा। क्योंकि सूत्रकार ने अपण्य शब्द पढ़ा है कि जो बेचने के लिये न हो। इस महामाप्य से भी अपना ही अभिप्राय सिद्ध करते हैं, सो ठीक नहीं, क्योंकि यहां प्रतिकृति और मनुष्य शब्द ही की अनुवृत्ति है, अन्य की नहीं। देवता शब्द भी जहां चेतन व्यक्तियों के साथ सम्बद होता है, वहां मनुष्यों ही की संज्ञा होती है। और वैदिक शब्द सब यौगिक ही है, देवता शब्द भी वैदिक है। जो इस सूत्र में मनुष्य शब्द की अनुवृत्ति जयादित्य श्रादि लोगों ने नहीं की, यह उनको भ्रम है। क्योंकि वे लोग देवता शब्द को मनुष्य से व्यतिरिक्तवार्थवाची समझते हैं, परन्तु सामान्य ग्रहण होने से जो २ प्रतिकृति जीविका के लिये हो और वेची न जावे, तो उस २ सबके अमिधेय में प्रत्यय का लुप् होना चाहिये । और जहां कोई मनुष्य किन्हीं जीवों की प्रतिकृतियों को दिखा के सर्वत्र अपनी जीविका करता हो, वहां भी लुप् होना चाहिये। और पूजा का अर्थ भी भादर सत्कार ही होता है, सो चेतन का होना चाहिये । फिर महामाप्यकार ने लिखा है कि लो इस समय पूजा के लिये हैं, वहां लुप् होगा। इसका भी यही अभिप्राय है कि जो शिव आदि मनुष्य की प्रतिकृति पूजा सत्कार के लिये है, उनसे प्रत्यय का लुप् हो जावे । क्योंकि अच्छे पुरुषों की जो प्रतिकृति है उसके वेचने में सजन लोग बुराई समझते हैं । देव और देवता शन्द से मनुष्यों के ग्रहण में प्रमाण- 'विश्वे देवास श्रागत शृणुतम हवम् ।। यह यजुर्वेद का प्रमाण है। 'विद्वा सोहि देवाः ।। यह शतपथ ब्राह्मण का वचन है। 'मातृदेवो भव । पितृदेवो भव । आचार्यदेवो भव । अतिथिदेवो भव ।। यह तैत्तिरीय मारण्यक का वाक्य है । इत्यादि सब प्रमाणवचनों से विद्वद् व्यक्ति प्रादि का ग्रहण देव और देवता शब्द से होता है। इसलिये पाणिनि आदि अपि लोगों का अमिमाय मी वेदों से विरुद्ध कमी न होना चाहिये । इस प्रकरण को पक्षपात छोड़ के वेदानुकूलता से सब सजन लोग विचारें।
स्वार्यिक्रप्रत्ययाधिकारः १४७ -- यहां कौवे का वृक्ष के नीचे आना और ताल के फल का गिरना एक काल में होने से उस फल से दव के मरजाना अथवा उस फल को स्ना के तृप्त होना दोनों अर्थों का सम्भव है। ऐसे ही संसार में जो कार्य हो, उस को 'काकतालीय न्याय' कहते हैं। इस सूत्र में पहले उपमार्थ में समास और दूसरे में प्रत्यय की उत्पत्ति होती है ।। ८१२॥ प्रत्नपूर्वविश्वेमारथाल् छन्दसि ।।८१३॥ अ० ५ । ३ । १११ ॥ प्रत्न पूर्व विश्व और हम शब्दों से उपमार्थ में वेविषयक थाल्-प्रत्यय होवे । जैसे- प्रत्नथा; पूर्वथा; विश्वथा; इमथा ॥ २३॥ पूगाञ् ज्योऽग्रामणीपूर्वात् ॥ ८१४ ॥ अ० ५ । ३ । ११२ ॥ यहां से उपमार्थ निवृत्त हुआ ! अर्थ और कामों में आसक्त पुरुषों को पूर्ग' कहते हैं। ग्रामणी शब्द जिसके पूर्व न हो, ऐसे पूनवाची प्रातिपदिक से स्वार्थ में ञ्य प्रत्यय हो। जैसे-लोहध्वज्यः, लोहध्वयौ, लोहध्वजाः; शैव्यः, शैन्यो, शिवयः; चातक्या, चातक्यो, चातकाः। यहां 'श्रामणी पूर्व का निषेध इसलिये है कि देवदत्तोनामीरेयां व इमे देवदत्तकाः; यज्ञदत्तका इत्यादि से भ्य प्रत्यय न होवे ॥२४॥ वातफलोरस्त्रियाम् ॥ ८१५ । अ० ५। ३ । ११३ ॥ जो पुल्प जीवों को मार के जीविका करें उनको 'बात कहते हैं। नातवाची और फञ् प्रत्ययान्त प्रातिपदिकों से स्वार्थ में ज्य प्रत्यय हो, स्त्रीलिङ्ग को छोड़ के। जैसे-कापोतपास्यः, कापोतपायो, कपोतपाकाः इत्यादि । च्फन्त से-कोजायन्यः, कोजायन्यो, कोजायनाः इत्यादि । यहां 'स्त्रीलिङ्ग का निपेध' इसलिये है कि-कपोतपाकी, कोजायनी, यहां ध्य न होवे ॥१५॥ यादयस्तद्राजाः ॥ ८१६ ॥ अ० ५ । ३। ११६ ।। (पूनाञ्यो० ) इस सूत्र में जो भ्य प्रत्यय पढ़ा है, वहां से यहां तक बीच में जितने प्रत्यय हैं, उन सब की 'ताज' संहा होती है। उसका प्रयोजन यही है कि बहुवचन में प्रत्यय का लुक् हो जाता है ॥ १६ ॥ ---इति पञ्चमाध्यायस्य तृतीयः पादः समाप्तः ॥
१४८ खैणताद्धिते अथ चतुर्थः पादः- पादशतस्य संख्यादेव:प्सायां वुन् लोपश्च ॥८१७॥अ० ५।४।१।। संख्या जिसके आदि में हो, ऐसे पाद और शतशब्दान्त प्रातिपदिक से वीप्सा अर्थ में बुन् प्रत्यय, और पाद शत शब्दों के अन्त का लोप होवे । जैसे-द्वौ द्वौ पादौ ददाति द्विपदिकां ददाति दे द्वे शते ददाति द्विशतिकां ददाति इत्यादि । यहां भसंज्ञक प्रत्ययों के परे अन्त का लोप हो जाता, फिर 'लोप ग्रहण इसलिये है कि- उस लोप के परनिमित्तक होने से स्थानिवद्भाव होकर पाद शब्द को पत् आदेश नहीं पाये । यह लोप परनिमित्त नहीं है, इस कारण स्थानिवद्भाव का निषेध होकर पत् आदेश हो जाता है। इस सूत्र में पाद और शत शब्दों का ग्रहण किया है, परन्तु पाद शत शब्दों से अन्यत्र भी संख्यादिशब्दों से वीप्सा अर्थ में बुन् प्रत्यय होता है । जैसे-'द्विमोदकिका- माददाति' इत्यादि प्रयोगों का आश्रय लेकर महामाप्यकार ने पाद शत ग्रहण की उपेक्षा की है ॥ १७ ॥ अषडक्षाशितडावलङ्कर्मालम्पुरुषाध्युत्तर पदारखः ॥ ८१८ ॥ अ० ५।४।७।। अपडक्ष, आशिवगु, अलङ्कर्म, अलम्पुरुष और अधि जिनका उत्तरपद हो, उन प्रातिपदिकों से स्वार्थ में स्त्र प्रत्यय होवे । जैसे-अविद्यमानानि षट् अक्षीण्यस्य, इस प्रकार बहुव्रीहि समास किये पश्चात् अनि शब्द से समासान्त पच प्रत्यय हो जाता है। उस अपडत शब्द से स्त्र प्रत्यय हुआ है। अपडक्षीणो मन्त्रः। आशिता गात्रोऽस्मिन्नरण्ये आशितङ्गवीनमरण्यम्, यहां निपातन पूर्वपद को मुक्का आगम हुआ है। अलङ्कर्मीणम् अलम्पुरुषीणम् कार्याधीतः राजाधीनः इत्यादि ॥१८॥ विभाषाऽञ्चेरदिस्त्रियाम् ॥ ८१६ ॥ अ० ५। ४ । ८॥ यहां अप्राप्तत्रिभाषा है, क्योंकि ख प्रत्यय किसी से प्राप्त नहीं है। विप् प्रत्ययान्त अञ्चु जिसके अन्त में हो, उस प्रातिपदिक से स्त्रीलिंग दिशा अर्थ को छोड़ के स्वार्थ में विकल्प सेखप्रत्यय होवे। जैस-प्राक्,प्राचीनम् अवाक्, अर्वाचीनम्। 'दिशा स्त्रीलिङ्ग का निषेध' इसलिये है कि प्राची दिक्; प्रतीची दिक् । 'दिशा' का ग्रहण इसलिये है कि प्राचीना ब्राह्मणी; अर्वाचीना शिस्त्रा इत्यादि से छ प्रत्यय न हो।१९॥
स्वार्थिकप्रत्ययाधिकारः १४६ - स्थानान्ताद्विभाषा संस्थानेनेति चेत् ।। ८२० ।। अ०५।४।१०॥ तुल्यता अर्थ में स्थानान्त प्रातिपदिक से विकल्प करके छ प्रत्यय होवे स्वार्थ में । जैसे-पित्रा तुल्यः पितृस्थानीयः, पितृस्थानः; मातृस्थानीयः, मातृस्थानः; भ्रातृस्थानीयः, भ्रातृस्थानः; राजस्थानीयः, राजस्थानः इत्यादि । . यहां 'स्थान ग्रहण इसलिये है कि-गोस्थानम् अश्वस्थानम्, यहां न हो ॥८२०॥ किमेत्तिडव्ययघादाम्बद्रव्यप्रकर्षे ।। ८२१ ।। अ० ५। ४ । ११ ।। किम्, एकारान्त निपात, तिङन्त और अव्यय शब्दों से परे जो च प्रत्यय तदन्त प्रातिपदिकों से अद्रव्य-क्रिया और गुण-की अधिकता में श्रामु प्रत्यय होवे । यद्यपि गुण कर्मों के विना केवल द्रव्य की कुछ उन्नति नहीं होती, तथापि क्रिया और गुणों की उन्नति की जब द्रव्य में विवक्षा होती है, उस द्रव्यस्थ प्रकर्ष का निषेध यहां समझना चाहिये । जैसे-किन्तराम्, किन्तमाम् पूर्वाहतराम्, पूर्वाह्न तमामः पठति- तराम्, पठतितमाम्; उच्चस्तराम, उच्चस्तमाम् इत्यादि । यहां प्रामु प्रत्यय में उकारानुवन्ध मकार की रक्षा के लिये है ॥ ८२१ ॥ णचः स्त्रियाम ॥ ८२२ ॥ अ० ५ । ४ । १४ ॥ स्त्रीलिङ्ग में जो कृदन्त णच प्रत्यय होता है, तदन्त प्रातिपदिक से स्त्रीलिङ्गविपयक स्वार्थ में अञ् प्रत्यय होवे । जैसे-व्यावक्रोशी; व्यावहासी इत्यादि ॥ ८२२ ॥ संख्यायाः क्रियाभ्यावृत्तिगणने कृत्वसुच् ।। ८२३ " अ०५।४।१७॥ एक ही जिनका कर्ता हो, ऐसी एक ही प्रकार की क्रियाओं के वार २ गणने सर्थ में वर्तमान संख्यावाची शब्दों से स्वार्थ में कृत्वमुच प्रत्यय होवे । जैसे-पञ्च वारान् भुङ्क्ते पञ्चकृत्वो भुङ्क्ते सप्तकृत्वः; अष्टकृत्वः; दशकृत्वः इत्यादि । यहां 'संख्या' ग्रहण इसलिये है कि-भृरीन् वागन भुङ्क्त, यहां प्रत्यय न हो। और वार २ होना क्रिया का ही हो सकता है, द्रव्य गुण का नहीं, फिर यहां 'क्रिया' ग्रहण इसलिये है कि-उत्तर सूत्रों में जहां क्रिया ही गिनी जाती और अभ्यावृत्ति नहीं होती, वहाँ भी होजावे । और 'अभ्यावृत्ति' ग्रहण इसलिये है कि-क्रियामात्र के गणने में न हो। जैसे-पञ्च पाकाः; दश पाकाः ।। ८२३ ।। द्वित्रिचतुर्थ्यः सुच् ॥ ८२४ ॥ अ० ५ । ४ । १८ ॥ क्रिया के वार २ गणने अर्थ में वर्तमान संख्यावाची द्विनि और चतुर् शब्दों से रुत्व- सुच का बाधक सुच् प्रत्ययहोवे। जैसे-द्विः पठति; निःस्नाति चतुःपिवति इत्यादि ॥२४॥ . - १५० खैणताद्धिते - - एकस्य सकृच्च १८२५ ॥ अ० ५। ४ । १६ ॥ क्रिया की संख्या में व 'मान एक शब्द से कृत्वसुच का अपवाद सुरू प्रत्यय और एक शब्द को सकृत् आदेश होवे । जैसे-सकृदधीते: सकृद्ददाति; सत् कन्या प्रदीयते इत्यादि ॥ ८२५॥ तत्प्रकृतवचने मयट् ! ८२६ । अ० ५ । ४ । २१ ॥ जिस शब्द से प्रत्ययार्थ की विवक्षा हो, उसी के निरन्तर कहने अर्थात् जात्यन्तर के मेल की निवृत्ति करने अर्थ में वर्तमान प्रथमासमर्थ प्रातिपदिकों से स्वार्थ में मयट प्रत्यय होवे । जैसे-आनन्दमयं ब्रह्म-अर्थात् ईश्वर में दुःख का लेश भी नहीं है; अन्नमयम्; प्राणमयम्; मनोमयम् इत्यादि ॥ ८२६ ॥ अनन्तावसथेतिहभेषजाड्यः ॥ ८२७ !! अ० ५। ४ । २३ ।। अनन्त आवसथ, इतिह और भेपज शब्दों से स्वार्थ में ज्य प्रत्यय होवे । जैसे-अनन्त एव आनन्त्यम् आवसथ एव आवसथ्यम् इतिह एव ऐतिह्यम् भेषजमेव भैषज्यम् ॥८२७॥ देवतात्तात्तादर्थं यत् ।। ८२८ ॥ अ० ५। ४ । २४ ॥ देवता शब्द जिसके अन्त में हो, उस चतुर्थीसमर्थ प्रातिपदिक से, प्रत्ययार्थ प्रकृत्यर्थ के लिये होवे, तो यत् प्रत्यय होवे । जैसे- अग्निदेवतायै इदम् अग्निदेवत्यम् पितृदेवत्यम्; मातृदेवत्यम्; वायुदेवत्यम् इत्यादि ॥ ८२८ ॥ अतिथेयः : || ८२६ ॥ अ० ५ । ४ । २६ ।। तादर्थ्य अर्थ में, चतुर्थीसमर्थ अतिथि प्रातिपदिक से ज्य प्रत्यय हो । जैसे-अतिथये इदमातिथ्यम् ।। १६॥ देवात्तल् ।। ८३० ॥ अ० ५ । ४ । २७ ।। देव शब्द से स्वार्थ में तल प्रत्यय होवे । जैसे-देव एव देवता ॥ ३० ॥ लोहितान्मणौ ।। ८३१ ॥ अ० ५। ४ । ३० ॥ मणिवाची लोहित शब्द से खार्थ में कन् प्रत्यय हो। जैसे-लोहितोमणिः लोहितकः । 'मणि' ग्रहण इसलिये है कि-लोहितः, यहां प्रत्यय न हो ।। ३१ ।। वा०-लोहिताल्लिङ्गवाधनं वा ।। ८३२ ॥ लोहित शब्द से प्रतिपदविधि में कन् प्रत्यय के बलवान् होने से स्त्रीलिङ्ग में तकार को नकार आदेश नहीं प्राप्त है, इसलिये यह वार्तिक पढ़ा है कि- लोहित शब्द से कन् प्रत्यय नकारादेश का वाधक विकल्प करके होये । से- लोहिनिका, लोहितिका ।। ८३२ ॥ 1 -
स्वार्थिकप्रत्ययाधिकारः
वा०-अक्षरसमूहे छन्दसि यत उपसंख्यानम् ।। ८३३ ॥
अक्षरों के समूह अर्थ में वेदविषय में यत् प्रत्यय होवे । जैसे-एप वै सप्तदशाक्षर-
श्छन्दस्यः प्रजापतिः, यहां छन्दस्य शब्द में यत् प्रत्यय हुआ है ॥ ८३३ ॥
वा०-छन्दलि वहुभिर्वसव्यैरुपसंख्यानम् ॥ ८३४ ।।
वेद में वसु शब्द से यत् प्रत्यय होवे । जैसे-हस्तैः पृणस्व बहुभिर्वसन्यैः, यहां वसव्य
शब्द में यत् प्रत्यय हुआ है ॥ ८३४ ॥
वा०-अपस, ओक, कवि, उदक, वर्चस्, निष्केवल, उक्थ, जन
इत्येतेभ्यश्च वा ॥ ८३५ ॥
यहां चकार से छन्दसि और यत् की अनुवृत्ति आती है।
इन अपस् आदि प्रातिपदिकों से वेद में स्वार्थिक यत् प्रत्यय विकल्प करके होवे ।
जले-अपस्यो वसानाः,अपो बसानाः; स्व रोक्ये,स्व बोकः; कव्योऽसि, कविरसि; उक्यम्,
उदकम् वर्चस्या, वर्चः; निष्कवल्यम्, निकेवलम् उक्थ्यम्, उक्थम्; जन्यम्जनम् ॥८३५॥
वा०-समादावतुः ।। ८३६ ॥
सम शब्द से स्वार्थ में आवतु प्रत्यय होवे । जैसे-समावद्वसति; समावद् गृह्णाति
इत्यादि।। ८३६ ॥
वा०-नवस्य नू तप्तनपखाश्च ॥ ८३७ ॥
नव शब्द को नू आदेश और उससे स्वार्थ में ना, तनप् तथा स्त्र प्रत्यय होवें।
जैसे-नूनम् नूतनम् नवीनम् ॥ ८३७ ॥
वा०-नश्च पुराणे प्रात् ॥ ८३८ ।।
प्राचीन अर्थ में वर्तमान प्र शब्द से न प्रत्यय, और चकार से नप तनप् और ख
प्रत्यय भी हों। जैसे-प्रणम्। प्रत्नम् प्रतनम्; प्रीणम् ॥ ८३८ ॥
तयुक्ताकर्मणोऽण् ॥ ८३६ ॥ अ० ५ । ४ । ३६ ॥
यहां पूर्व सूत्र से अव्याहृतवाणी की अनुवृति आती है।
व्याहृतवाणी के युक्त- योग्य-कर्म शब्द से स्वार्थ में अण प्रत्यय होवे । जैसे-कमैव
कार्मणम् । वाणी को सुन के वैसे ही जो कर्म कियाजावे उसको 'कार्मण' कहते हैं ।।८३६॥
वा०-अगप्रकरणे कुलालवरुडनिषादचण्डालामित्रेभ्यश्छन्दस्युप-
संख्यानम् ॥ ८४०॥
कुलाल, वरुड, निपाद, चण्डाल और अमित्र प्रातिपदिकों से भी वेद में अण् प्रत्यय
कहना चाहिये । जैसे-कोलालः; वारुडः, नैपादः चाण्डाला; आमित्रः ॥ ४० ॥
२५२ स्त्रैणताद्धिते ----- वा०-सागरूपनामभ्यो धेयः ॥ ८४१ ॥ भाग, रूप और नाम शब्दों ले धेय प्रत्यय हो। जैसे-भागधेयम्; रूपधेयम्। नामधेयम् ॥८४१॥ वा०-मित्राच्छन्दास धेयः ॥ ८४२ ।। मित्र शब्द से वेदविषयक खार्थ में थेय प्रत्यय हो । जैसे-मित्रधेये यतस्व ॥ ८४२ ॥ वा०-अण मित्राच्च ॥ ८४३ ॥ मित्र और अमित्र शब्दों से स्वार्थ में अण् प्रत्यय भी हो। जैसे--मित्रमेव मैत्रम् । अमित्र एव श्रामित्रः ॥ १३॥ वा०-प्लान्नाय्यानुजावरानुषूकचातुष्प्राश्यराक्षोन्नवैयातवैकृतवारि- वस्कृताग्रायणाग्रहायणसान्तपनानि निपात्यन्ते ॥ ८४४॥ सानाय्य आदि शब्द स्वार्थिक अपप्रत्ययान्त लोक वेद में सर्वत्र नियातन किये हैं। जैसे-सान्नाय्यः; आनुजावरः, आनुपूकः; चातुप्पाश्या; राक्षोनः; वैयातः; वैकृत. वारिवस्कृतः, आग्रायणः; आनहायणः; सान्तपनः ॥ ८४४ ॥ वा०-आग्नीध्रसाधारणादञ् ॥ ८४५ ॥ श्राग्नीध्र और साधारण शब्दों से स्वार्य में अञ् प्रत्यय हो। जैसे-आग्नीध्रम् साधारणम् ॥ ८४५॥ वा०-अपवलमरुद्भयां छन्दस्यञ् ॥ ८४६ ॥ अपवस और मरुत् शब्दों से स्वार्थ में अञ् प्रत्यय हो। जैसे-आपसे पर्खन्तम्; मारुतं शब्दः ॥ ८४६ ॥ वा०-नवमूरमर्त्तयविष्ठेभ्यो यत् ॥ ८४७ ॥ यहां भी पूर्व वार्तिक से छन्द की अनुवृत्ति समझनी चाहिये । नव, सूर, मर्त्त, और यविष्ठ शब्दों से स्वार्थ में यत् प्रत्यय होवे । जैसे नव्यः; सूर्यः; मर्त्यः; यविष्ठयः ॥ ८८७ ॥ वा०-क्षेमाद्यः ॥ ८४८ ॥ क्षेम शब्द से स्वार्य य में प्रत्यय हो । जैसे-म्यस्तिष्ठन् प्रतरणः सुवीरः, यहां यत् और य प्रत्यय में केवल स्वर का भेद है, रूपभेद नहीं ॥ ४ ॥ ओषधेरजातौ ।। ८४६ ॥ अ० ५ । ४ । ३७ ॥ ओपधि शब्द से जाति अर्थ न होवे, तो खार्थ में अण् प्रत्यय हो। जैसे-औषधं पियति, श्रीपधं ददाति इत्यादि ।। ८४६॥
स्वार्थिकप्रत्ययाधिकारः १५३ -- मृदस्तिकन् ।। ८५० ॥ अ० ५। ४ । ३६ ॥ मृत् शब्द से स्वार्थ में तिकन् प्रत्यय हो । जैसे-मृदेव मृत्तिका ॥ ८५० ।। सलौ प्रशंसायाम् ॥ ८५१ ॥ अ० ५ । ४ । ४० ॥ प्रशंसा अर्थ में वर्तमान मृत् प्रातिपदिक से स्वार्थ में स और स्त्र प्रत्यय हों। जैसे- प्रशस्ता मृत् मृत्सा; मृत्स्ना ॥८५१ ।। वह्वल्पार्थाच्छस्कारकादन्यतरस्याम् ।। ८५२ ॥ अ०५।४।४२ ॥ यहांशस् प्रत्यय की किसी सूत्र से प्राप्ति न होने से यह अप्राप्तविभाषासमझनी चाहिये। कारकवाची बहु अल्प और इनके अर्थ के शब्दों से विकल्प करके शस् प्रत्यय होवे। किसी कारक का यहां विशेष निर्देश नहीं किया, इससे कर्मादि सब कारकों का ग्रहण होता है। जैसे-बहूनि ददाति, बहुशो ददाति; अल्पं ददाति, अल्पशो ददाति; वहुभिर्ददाति, बहुशो ददाति; अल्पेन, अल्पशो ददाति; बहुभ्यः, बहुशः; अल्पशः; बहूनां वहुपु वा बहुशः; अल्पस्य, अल्पे वा अल्पशः । इनके अर्थ के-भूरिशो ददाति; स्तोकशो ददाति इत्यादि। यहां 'बहु तथा अल्पार्थों का' ग्रहण इसलिये है कि-गां ददाति; अश्वं ददाति इत्यादि से शस् प्रत्यय न होवे ।। ८५२ ।। वा०-बह्वल्पार्थान्मङ्गालामङ्गलवचनम् ।। ८५३ ॥ बहु और अल्प शब्दों से जो प्रत्यय विधान किया है, वहां बहु से मङ्गल और अल्प शब्द से अमङ्गल अर्थ में होवे । यह वार्तिक सूत्र का शेष है, इसलिये उक्त उदाहरण ही समझने चाहियें । अर्थात्- बहुशो ददाति, यह प्रयोग अनिष्ट के बहुत देने में न होवे । और-अल्पशो ददाति, वह भी इट के देने में प्रयोग न किया जावे ॥ ८५३ ॥ प्रतियोगे पञ्चम्यास्तसिः ॥८५४ ॥ अ० ५। ४ । ४४ ॥ कर्मप्रवचनीयसंज्ञक प्रति शब्द के योग में जहां पञ्चमी विभक्ति की है, उस विभक्त्यंत प्रातिपदिक से तसि प्रत्यय होवे। जैसे-प्रद्युम्नो वासुदेवतः प्रति, अभिमन्युरर्जुनतः प्रति । यहां पूर्व से विकल्प की अनुवृत्ति चली थाने से वासुदेवात; अर्जुनात् ऐसा भी प्रयोग होता है ।। ८५४ ।। वा०-तसिप्रकरणे अाद्यादीनामुपसंख्यानम् ॥ ८५५ ॥ इस प्रकरण में श्राद्यादि शब्दों से तसि प्रत्यय कहना चाहिये । जैसे-श्रादौ श्रादितः; मध्यतः अन्ततः; पार्श्वतः; पृष्टतः इत्यादि ॥ ८५५ ।। - - २० १५४ वणताद्धिते कुम्वस्तियोगे सरपंचकर्तरि चिः ।। ८५६ ।। अ०५।४ । ५०॥ संपूर्वक पद धातु के कत्ती अर्थ में वर्तमान प्रातिपदिक से कृ, मृऔर अस्ति धातुओं के योग में च्चि प्रत्यय होवे ।। ५६ ।। -च्चिविधावभूततद्भावग्रहणम् ।। ८५७ ।। यह वार्तिक सूत्र का शेष समझना चाहिये। जो पदार्थ प्रथम कारण रूप से अप्रसिद्ध हो, और पीछे कार्यरूप से प्रकट किया जाये, उसको 'प्रभूवतद्भाव कहते हैं। इस अभूतताव अर्थ में उक्त सूत्रले चि प्रत्यय कहा है, सो हो । जैसे-अशुक्ला शृङ्गः सन्पद्यतं तं करोति शुद्धीकरोति, अर्थात् जो पदार्थ प्रथम ले मलीन है, उसको शुद्ध करता है: शुल्लीभवतिः शृङ्गीन्यात्कठिनीकरोति; कठिन भवतिकठिन स्यात्: वटीकरोति; घटीभवति: घटीस्यात् इत्यादि । प्रयोजन यह है कि जो पदाये अपनी प्रथनावस्या में जिस खरूप से वर्तमान हो, उसी अवस्या के साथ इस प्रत्वयार्थ की विवज्ञा सनमानी चाहिये। और इस प्रत्यय के विना लोक में सिद्ध पदार्थों का कहना बन सकता है, कि जो पाये जैसा हो उसको वेले ही खरूप से वर्णन करें। यहां 'अभूतता ग्रहण इसलिये है कि सम्पद्यन्ते यवाः; सन्पद्यन्ते शालयः, यहां चि प्रत्यय न होवे ! भू अस्ति धातुओं का योग इसलिये कहा है कि-अशुक्ला शुल्लो जायते, यहां न हो। और लंपूर्वक पद धातु के कत्तों का ग्रहण इसलिये है कि- गृहे संयुज्यते, यहां भी च्चि प्रत्यय न होवे ॥ ७ ॥ वा०-समीपादिभ्य उपसंख्यानम् ।। ८५८ ॥ समीप आदि शब्दों से भी पूर्वोक्त अण में चि प्रत्यय हो। जैसे-असमीपस्यं समीपत्त्यं भवति समीपीभवतिः अभ्याशीमवति; अन्तिकीमवतिः सविर्धाभवति इत्यादि। यहां प्रकृतिले विकार का होना नहीं है, इस कारण प्रत्यय की प्राति नहीं है।५८|| विभाषा साति कात्स्न्ये ।। ८५६ ॥ अ० ५ । ४ । ५२ ।। यहां चि प्रत्यय को छोड़ के पूर्व सूत्र से सब पदों की अनुवृत्ति आती है। संपूर्वक पद धातु के कर्ता में वर्तमान प्रातिपदिकों से कृ भू और अस्ति धातु का योग हो, तो अमृततद्भाव अर्थ में संपूर्णता विदित होवे, तो साति प्रत्यय विकल्प करके हो । जैसे-भलसावति चाष्टम्, मलसाकरोति, भस्मसाल्यात्. भस्नीमवति, मनी- स्यात्: उदकताद्भवति लवपन्. उदीमवति लबलम् इत्यादि । प्रकृति संपूर्ण विकार रूप हो जावे। यह सूत्र चि प्रत्यय का अपवाद और यहां अप्राप्तविभापा है। पक्ष में चि प्रत्यय भी हो जाता है। यहां संपूर्णता ग्रहण इसलिये है कि-एकशेन पटः शुल्कीमवति, यहां प्रत्यय न होवे ॥ ५ ॥ - ।
स्वार्यिक्रप्रत्ययाधिकारः १५५ देवमनुष्यपुरुषपुरुमय॑भ्यो द्वितीयासप्तम्योर्षहुलम् ॥ ८६० ॥ अ० ५।४ । ५६ ॥ यहां से साति प्रत्यय निवृत्त हुआ, और पा प्रत्यय की अनुवृति श्राती है। द्वितीया और सप्तमीसमर्थ देव, मनुष्य, पुल्प, पुरु और मर्त्य प्रातिपदिकों से बहुल करके साथ में बा प्रत्यय होवे । जैल-देवान् लत्करोति, देवघा सत्करोति; देवेषु वसति, देवत्रा वसति; मनुष्यान् गच्छति, मनुष्यत्रा गच्छति; मनुष्येषु वसति, मनुष्यत्रा बसति; पुर्घ ध्यायति, पुरुषत्रा ध्यायति; पुन्नन् गृहाति, पुरुना गृहाति पुरुपु वसति, पुरुत्रा वसति: मान् मत्यैपु वा मर्त्यत्रा इत्यादि। यहां बहुल' शब्द के ग्रहण ले अनुक्क शब्दों से भी त्रा प्रत्यय हो जावे । जैसे-बहुना जीवतो मनः इत्यादि ।। ८६० ॥ अव्यक्तानुकरणावयजबरा दनिता डाच ॥८६१।। अ०५।१।५७॥ यहां कृ भू और अस्ति धातुओं के योग की अनुवृत्ति आती है। जिस ध्वनि में अकारादि वर्ण पृथक् २ स्पष्ट नहीं जाने जाते उसको 'अन्य' शब्द कहते हैं । उसी शब्द के अनुसार जो जनाया जाये कि वह अव्यक्त शब्द ऐसा हुआ, उसको 'अव्यकानुकरण' कहते हैं। इति शब्द जिलले पर न हो, और जिसके एक अर्द्धभाग में दो अच हों, ऐसे श्रव्य- कानुकरण प्रातिपदिक से कभू और अस.धातु के योग में डाच प्रत्यय होवे । जैसे- पटपटा करोति पटपटा भवति; पटपटा स्यात्: दमदमा करोति; दमदमा भवति; दमदमा स्यात् बनयला करोति, बलवना भवति, बलबला स्यात् इत्यादि । यहां 'अव्यतानुकरण' ग्रहण इसलिये है कि-दृपत्करोति, दरत्करोति इत्यादि में डान् प्रत्यय न हो। 'यजवराई ग्रहण इसलिये है कि-श्रत्करोति, यहां एकाच में न हो। और 'अवर' शब्द का ग्रहण इसलिये है कि- स्वरट खरट करोति, यहां अर्द्ध- भाग में तीन अव हैं, इससे डात्र प्रत्यय नहीं होता। और 'इतिपरक का निषेध इसलिय है कि-पटिति करोति, यहां इति शब्द के परे हा प्रत्यय न हो। (डाचि बहुलं द्वे भवतः ) इस वार्तिक में विषयसप्तमी मान के डाच प्रत्यय के होने की विवक्षा में ही द्विवचन हो जाता है, पश्चात् डाच प्रत्यय होता है। जो कदाचित् ऐसा न लममें तो जिसके अवर अर्द्धभाग में दो अन्न हों, यह कहना ही न बने । डात्र प्रत्यय में डकार का लोप होकर डित् मान के दिलोप और वकार अनुवन्ध से अन्तोदाचस्वर होता है॥ कृमो द्वितीयतृतीयशम्बवीजात्कृपो ८६२॥ अ० ५। ४ । ५८ ॥ यहां कृञ् धातु का ग्रहण भू और अस् थातु की निवृत्ति के लिये है।
१५६ बैणताद्धिते mmu- द्वितीय तृतीय शम्ब और वीज प्रातिपदिक से खेती अर्थ अभिधेय हो, तो कृञ् धातु के योग में डाच प्रत्यय होवे। जैसे-द्वितीया करोति, दूसरी वार खेत को जोतता है; तृतीया करोति, तीसरी वार जोतता है; शम्बा करोति, सीधा जोत के फिर तिरछा जोतता है; वीजा करोति, बीज बोने के साथ ही जोतता है। यहां 'कृषि'ग्रहण इसलिये है कि-द्वितीयं करोति पादम्, यहांडाच प्रत्यय न होवे॥८६२॥ संख्यायाश्च गुणान्तायाः ॥ ८६३ ॥ अ० ५ । ४ । ५६ ॥ यहां कृञ् धातु और कृषि अर्थ दोनों की अनुवृति चली आती है। गुण शन्द जिसके अन्त में हो, ऐसे संख्यावाची प्रातिपदिक से कृषि अर्थ में कृ धातु के योग में डाच प्रत्यय हो । जैसे-द्विगुणं विलेखनं क्षेत्रस्य करोति द्विगुणा करोति क्षेत्रम्; त्रिगुणा करोति इत्यादि । यहां 'कृषि' ग्रहण इसलिये है कि-द्विगुणां करोति रजुम्, यहां डाच प्रत्यय न हो। पूर्व सूत्र में द्वितीय तृतीय शब्दों के साथ इस सूत्र का शब्दभेद ही ज्ञात होता है, अर्थभेद नहीं ॥ ८६३॥ समयाच्च यापनायाम् ॥ ८६४ ॥ अ० ५ । ४ । ६० ॥ यहां कृषि की अनुवृत्ति नहीं आती, परन्तु कृञ् धातु की चली आती है। करने योग्य कर्मों के अवसर मिलने को 'समय' कहते हैं, उस समय के यापना अतिक्रमण अर्थ में समय शब्द से कृञ् धातु के योग में डाच प्रत्यय होवे। जैसे- समया करोति, कालक्षेप करता है। यहां 'यापना' ग्रहण इसलिये है कि-समयं करोति मेघः, यहांडाच प्रत्यय नहो॥८६४॥ मद्रात्परिवापणे ॥ ८६५ ॥ अ० ५। ४ । ६७ ।। मङ्गलवाची मद्र शब्द से परिवापण मुण्डन अर्थ में कृञ् धातु का योग होवे, तो डाच प्रत्यय हो। [जैसे-] मङ्गलं मुण्डनं करोति मद्राकरोति । यहां 'परिवापण' इसलिये कहा है कि-मद्रं करोति,यहांडाच प्रत्यय न हो ॥८६५॥ वा०-भद्राच्च ॥ ८६६ ॥ भद्र शब्द से भी परिवापण अर्थ में कृञ् धातु का योग हो, तो डाच प्रत्यय हो। जैसे-भद्रा करोति नापितः कुमारम् । यहां भी परिवापण अर्थ से पृथक्-भद्रं करोति, यही प्रयोग होता है ॥ ८६६ ॥ -इति पञ्चमाध्यायस्य चतुर्थः पादः समाप्तः ॥ [इति पञ्चमाध्यायः समाप्तः ॥]
टिलोपाधिकारः १५७ .. है। नस्तद्धिते ॥ ८६७ ॥ अ०६ । ४ । १४४ ॥ तद्धितसंचक प्रत्यय परे हों, तो नकारान्त भसंज्ञक अङ्ग के टिभाग का लोप होवे । जैसे-अग्निशर्मणोऽपत्यमाग्निशर्मिः; औडुलोमिः इत्यादि, यहां अग्निशमन आदि शब्दों का वाहादिगण में पाठ होने से इञ् प्रत्यय हुआ यहां 'नान्त' का ग्रहण इसलिये है कि सात्वतः, यहां तकारान्त के टिभाग का लोप न होवे । और तद्धित' ग्रहण इसलिये है कि-शर्मणा, शमणे इत्यादि प्रयोगों में लोप न हो ॥ ८६७ ॥ वा०-नांतस्य टिलोपे सब्रह्मचारिपीठसर्पिकलापिकौथुमितैतिलिजाज- लिलाङ्गलिशिलालिशिखण्डिसूकरस सुपर्वणामुपसंख्यानम् ।८६८। यहां इन्नन्त और अन्नन्त शब्दों में आगामी सूत्रों से प्रकृतिभाव प्राप्त है, उसका पुरस्तात् अपवाद यह वार्तिक है। तद्धित प्रत्ययों के परे सब्रह्मचारिन् आदि भसंज्ञक नकारान्त प्रातिपदिकों के टिभाग का लोप होवे । जैसे-सब्रह्मचारिण इमे छात्राः सब्रह्मचारा:-यहां सम्बन्धसामान्य में शैषिक अण् प्रत्यय हुआ है। पीठसपिण इमे छात्राः पैठसर्पा:-यहां भी पूर्व के समान अग कलापिना प्रोतमधीयते कालापा:-यहां ( कलापिनोऽण् ) इस सूत्र से प्रोक्त अर्थ में अण; कौथुमिना प्रोक्तमधीयते कोथुमाः-यहां भी पूर्ववत् अप जानो । तैतिलिनामकं ग्रन्थमधीयते विदुर्वा तैतिलाः; जाजला; लाइलाः; शैलालाः; शैखण्डाः; सूकरसाना प्रोक्तमधीयते सोकरसद्माः सुपर्वणा प्रोक्तमधीयते सौपर्वा:-यहां तैतिलि श्रादि ग्रन्यवाची शब्दों से शैपिक प्रोक्त अर्थ में वृद्ध होने से छ प्रत्यय प्राप्त है, इसलिये अधीत वेद अर्थ में अण समझना चाहिये । और सूकरसझन् तथा सुपर्वन् शब्दों से वृद्धसंझा के न होने से प्रोक्तार्थ अण् प्रत्यय होता है ॥ ८६८ ॥ वा०-चर्मणः कोश उपसंख्यानम् ॥ ८६६ ।। कोश-तलवार का घर अर्थ हो, तो तद्धितसंज्ञक प्रत्ययों के परे होते चर्मन् शब्द के टिभाग का लोप होवे । जैसे-चर्मणो विकारः कोशः चार्मः कोशः । जहां कोश अर्थ न हो वहां-चार्मणः, प्रयोग होगा ॥ ८६६ ॥ वा०-अश्मनो विकार उपसंख्यानम् ॥ ८७० ॥ विकार अर्थ में तद्धित प्रत्यय परे हों, तो पापाणवाची अश्मन् शब्द के टिभाग का लोप हो । जैसे-अश्मनो विकार आश्मः । ।
१५८ बैणताद्धिते , जहां विकार अर्थ न हो वहां-आश्मनः, ऐसा ही रहे ॥ ८७० ॥ . वा०-शुनः संकोच उपसंख्यानम् ॥ ८७१ ॥ कुत्ते के वाची श्वन् शब्द के टिभाग का लोप हो, संकोच अर्थ अभिधेय रहे तो। [जैसे-संकुचितः श्वा शौवः । इस श्वन् शब्द का द्वारादिगण में पाठ होने से वकार से पूर्व ऐच का आगम हो जाता है। और संकोच अर्थ से अन्यत्र-शौवनः, ऐसा ही प्रयोग होगा ॥ ८७१ ॥ वा०-अव्ययानां च सायम्प्रातिकाद्यर्थम् ॥ ८७२ ।। तद्धितसंज्ञक प्रत्ययों के परे सायम्पातिक आदि शब्दों के सिद्ध होने के लिये भसंज्ञक अव्यय शब्दों के टिभाग का भी लोप कहना चाहिये । जैसे-सायम्प्रातर्भवः सायम्प्रातिका पौनःपुनिकः इत्यादि । यहां द्वन्द्वसंज्ञक अन्ययों से ठञ् होता है। शालतिक शब्द में निपातन मान के टिलोप नहीं होता। (येषां च विरोधः शाश्वतिकः) जिन अव्यय शब्दों में अविहित टिलोप दीखता है, वहां वैसे ही अव्ययों में समझना चाहिये। क्योंकि शाश्वतम् इत्यादि में द्वन्द्व किये अव्यय और ठञ् प्रत्यय दोनों ही नहीं, इससे लोप नहीं होता ॥ ८७२ ॥ अष्टखोरेव ॥ ८७३ ॥ अ० ६ । ४ । १४५ ।। यह सूत्र नियमार्थ है।ट और ख इन्हीं दोनों प्रत्ययों के परे अहन् शब्द के टिभाग का लोप होवे, अन्यत्र प्रकृतिभाव ही हो जावे ! जैसे-ढे अहनी समाहृते यह व्यहः, यहां समासान्त टच् प्रत्यय हुआ है। द्वे अहनी अधीष्टो भृतो भूतो भावी वा दृश्यहीनः; व्यहीनः; अह्नां समूहोऽहीनः क्रतु: यहां 'टिलोप' का नियम इसलिये है कि असा निवृत्तमाह्निकम्, यहां नियम के होने से टिलोप न होवे ॥ ८७३॥ ओर्गुणः ॥ ८७४ ॥ अ० ६ । ४ । १४६ ॥ तद्धितसंज्ञक प्रत्यय परे हों, तो उवर्णान्त भसंज्ञक प्रातिपदिकों को गुण होवे । जैले~वभोर्गोत्रापत्यं बाभ्रव्यः; माण्डव्यः; शङ्कवे हितं शङ्कव्यं दारु पिचच्या कार्यासः; कमण्डलच्या मृत्तिका; परशव्यमयः; श्रीपगवः; कापटवः इत्यादि । पूर्वलिखित तद्धितमत्ययविधान प्रकरण में सर्वत्र गुण तथा अन्य कार्य जो २ यहां कहें, समझने चाहिये । और इस सूत्र को इसी ग्रन्थ के ३२ पृष्ठ में भी लिख चुके हैं, परन्तु विशेष व्याख्यानार्थ यहां लिखना आवश्यक समझा गया ॥ ७ ॥ । -- टिलोपाधिकारः १५ ५ ढे लापोऽकवाः ॥ ८७५ ॥ अ० ६ । ४ । १४७ ॥ तद्धितसंशक ढ प्रत्यय पर हो, तो कइ शब्द को छोड़ के भसंशक प्रातिपदिक के उवर्ष का लोप होवे। जैसे-कमण्डल्या अपत्यं कामण्डलेयः; शैतिवाहेयः; जाम्वेयः; माद्रबाहेयः इत्यादि। यहां कि शब्द का निषेध' इसलिये है कि-कावेय ऋषि , यहां लोप न हो, किन्तु पूर्व सूत्र ले गुण हो जाये। और यह लोध गुण का ही अपवाद है ॥ ८७५ ॥ यस्येति च ॥ ८७६ ।। अ०६ । ४ । १४८ ।। यहां तद्धित की अनुवृत्ति के लिये चकार पढ़ा है। तद्धितसंक और ईकार प्रत्यय परे हों, तो इवर्णान्त अवर्णान्त भसंज्ञक प्रातिपदिक का लोप हो। जैसे-इवर्णान्त का लोप ईकार के परे-दक्षत्यापत्यं स्त्री दाक्षी; साक्षी इत्यादि। यहां जो सवर्णी एकादेशमान लेवे तो हे दाक्षि,यहां सवर्णदीर्घ एकादेश वर्णकार्य से सम्वृद्धि में हल होना अङ्गकार्य बलवान् होने से प्रथम हो जाता है, फिर जो लोप न कहें तो पासवर्णी एकादेश होकर सम्बुद्धि में भी दीर्घ ईकार बना रहे । इसलिये ईकार प्रत्यय के परे इवन्त का लोप कहा है। इवान्त का लोप तद्धितप्रत्ययों के परे-दुल्या अपत्यं दौलेयः, वलि-वालयः; अनि अात्रेयः इत्यादि। अवर्णान्त का लोप ईकार प्रत्यय के परे-कुमारी; किशोरी; गौरी; जानपदी इत्यादि। तद्धितप्रत्यय के परे दाक्षिः; साक्षिः; बताकाया अपत्यं दालाकि सुमित्राया अपत्वं सामिात्र इत्यादि । वहां सर्वत्र तोप को आदेश मान के अन्त्य अल् इवर्ण और उवर्ण का लोप होता है। यह भी सूत्र (ोर्गुणः ) इसी के समीप पूर्व लिख चुके हैं, परन्तु उसी का सा लिखना इसका भी जानो।। ७६॥. वा०-यस्येत्यादौ श्यां प्रतिषेधः ।। ८७७ ।। (यन्योति च) इत्यादि सूत्रों में श्री विभक्ति के स्थान में जो शी श्रावेश होता है, उस इंकार के परे इवर्ण अवर्ण के लोप का निषेध करना चाहिये। जैसे-काण्ड; तृङ्गे, यहां जब नपुंसक काण्ड और न शब्दों से परे श्री के स्थान में शी हो जाता है, तब अवर्ण का तोप प्राप्त है, तो न हो। और-कुड्य; सौर्ये, यहां भी पूर्व के समान अवर्ण का लोप और भागामी सूत्र से उपधासंक्षक यकार का लोप प्रात है, सो न होवे। : --
१६०
बैणताद्विते
जैसे श्रियो; श्रियः; भ्रुवो; भ्रवः इत्यादि में इयङ् उघ आदेश होते हैं, वैसे ही-
वत्सान् प्रीणातीति वत्सप्री:, लेखाभूः, तस्या अपत्यं वात्सप्रेयः; लैखाभ्रेयः इत्यादि में
भी इयङ् उवङ् आदेश प्राप्त हैं, परन्तु परविप्रतिषेध मान के इवर्ण उवर्ण का लोप हो
जाता है॥८७७॥
सूर्यतिष्यागस्त्यमत्स्यानां य उपधायाः ।।८७८॥अ०६।४।१४६॥
तद्धितसंज्ञक और ईकार प्रत्यय परे हो, तो सूर्य, तिष्य, अगस्त्य और मत्स्य शब्दों
के उपधाभूत भसंक्षक यकार का लोप हो जावे । और अवर्ण का लोप तो पूर्वसूत्र से हो
ही जाता है।
जैसे-सूर्येण एकदिक् सौरी वलांका, यहां उपधाग्रहण शापक से अवर्ण का लोप
असिद्ध नहीं समझा जाता; तिष्येण युक्तः कालः तैषमहः; तैपी रात्री; अगस्त्यस्यापत्यं
कन्या-इस विग्रह में ऋपिवाची अगस्त्य शब्द से अण् प्रत्यय हो जाता है प्रागस्ती;
गस्तीयः । मत्स्य शब्द के गौरादि गण में होने से ङीप हो जाता है-मत्सी।
'उपधा' ग्रहण इसलिये है कि-सूर्यचरी, यहां सूरी शब्द से भूतपूर्व अर्थ में चरट्
प्रत्यय के परे पुंवद्भाव हुआ है। स्थानिवत् मान के यकार का लोप प्राप्त है, उपधा के
न होने से नहीं होता, इत्यादि ॥ ८७८ ॥
.
वा०-मत्स्यस्य ड्याम् ॥ ८७६ ।।
ङीष् प्रत्यय के परे ही मत्स्य शब्द के उपधा यकार का लोप हो, अन्यत्र नहीं ।
जैसे-मत्सी। नियम होने से-मत्स्यस्य विकारो मात्स्यं मांसम्, यहां न हो ॥ ८७६ ॥
वा०-सूर्यागस्त्ययोश्छे च ॥ ८८० ।।
छ और ङीप् ङीष् प्रत्यय के परे ही सूर्य और अगस्त्य शब्दों के यकार का लोप
हो। जैसे-सौरीयः, सौरी; श्रागस्तीयः, श्रागस्ती।
नियम होने से सूर्यो देवताऽस्य सौर्य्य हविः; अगस्त्यस्य गोत्रापत्यमागस्त्यः, यहां
न होवे ॥८८० ॥
वा०-तिष्यपुष्ययोनक्षत्राणि ॥ ८८१ ॥
यहां स्वरूपग्रहणपरिभाषा का प्राश्रय इसलिये नहीं होता जिर्सलिये वार्तिक पढ़ा
है। अर्थात् स्वरूपग्रहण के न होने में वार्तिक शापक है।
तद्धितसंक्षक और ईकार प्रत्यय परे हो, तो तिष्य और पुष्य शब्दों के उपधा यकार
का लोप होवे, अन्य पर्यायवाची का नहीं। जैसे-तिष्यनक्षत्रेण युक्तः कालः तैपः; पोपः।
नियम इसलिये है कि-सैध्या, यहां लोप न हो ॥१॥
टिलोपाधिकारः Fr वा०-अन्तिकस्य तति कादिलोपश्चाद्युदात्तश्च ॥ ८८२ ॥ अन्तिक शब्द से तसि प्रत्यय परे हो, तो कादि-स्वरसहित ककार--का लोप और श्राद्युदात्तस्वर होथे । जैसे-अन्तितो न दूरात् । तसि प्रत्यय को प्रत्ययस्वर होने से अन्तोदात्त होता, इसलिये आधुदात्त कहा है। और अन्तिक शब्द से अपादान कारक में असि प्रत्यय होता है । ८८२।। वा०-तमे तादेश्च ॥ ८८३ ॥ यहां चकार ग्रहण से कादि की भी अनुवृत्ति आती है। तम प्रत्यय परे हो, तो अन्तिक शब्द तादि-तिक-भाग तथा कादि-क-मांत्र का लोप होवे। जैसे-अतिशयेनान्तिकम् अन्तमः; अन्तिमः; अग्ने त्वन्नो अन्तमः; अन्तितमे अवरोहति । यद्यपि इस वार्तिक में छन्दोग्रहण नहीं किया, तथापि वैदिक प्रयोगों में ही बहुधा इसकी प्रवृत्ति दीख पड़ती है। इससे पूर्व वार्तिक में जो तसि प्रत्यय का ग्रहण है, उसकी महामाष्यकार ने उपेक्षा की है कि-'अन्तिके सीदति अन्तिषत्' इत्यादि प्रयोगों में भी कादिलोप हो जावे ॥ ८८३ ।। हलस्तद्धितस्य ॥ ८८४ ॥ अ० ६ । ४ । १५० ॥ हल से परे जो तद्धितसंज्ञक प्रत्यय का उपधा यकार, उसका लोप होवे, ईकार प्रत्यय परे हो तो । जैसे -गर्गस्यापत्यं कन्या गार्गी; वात्सी; शाकली इत्यादि । यहां 'हल' ग्रहण इसलिये है कि-वैद्यस्य स्त्री वैद्यी, यहां भी यकार का लोपन हो॥८५४॥ आपत्यस्य च तद्धितेऽनाति ॥ ८८५ ॥ अ०६।४ । १५१ ॥ आकार जिसके आदि में न हो ऐसा तद्धितसंज्ञक प्रत्यय परे हो, तो हल से परे अपत्याधिकारस्थ प्रत्यय के उपधा यकार का लोप होवे । और इस सूत्र में फिर तद्धित' ग्रहण से यह भी समझना चाहिये कि ईकार 'प्रत्यय परे हो, तो अपत्यसंज्ञक से भिन्न यकार का भी लोप हो जाता है । जैसे-गर्गाणां समूहो गार्गकम् वात्सकम् सोमो देवताऽस्य सौम्यं हविः; सोमी इष्टिः । 'आपत्य ग्रहण इसलिये है कि सांकाश्यकः, काम्पिल्यकः, यहां लोप न हो। 'आकारादि का निषेध' इसलिये है कि-गाायणः; वात्स्यायनः, यहां लोप न हो। और 'हल से परे' इसलिये कहा है कि-कारिकेयस्य युवापत्यं कारिकेयिः, यहां भी लोप न होवे।८८५॥ -- झणताद्धिते क्यव्योश्च ॥ ८८६ ॥ अ०६ । ४ । १५२ ॥ फ्य और वि प्रत्यय परे हों, तो भी हल से परे अपत्यसंशक यकार का लोप होवे। जैसे-गार्य इवाचरति गार्गीयति; वात्स्य इवाचरति वात्सीयति; शाकलीयति; गार्गीयते; वात्सीयते; शाकलीयते इत्यादि । च्चि प्रत्यय के पर-गार्गीभूतः; वात्सीभूतः; शाकली- भूतः इत्यादि। यहां अपत्यसंशक 'यकार' का ग्रहण इसलिये है कि-सांकाश्यायते; सांकाश्यीभूतः, यहां लोप न हो। और 'हल से परे' इसलिये कहा है कि-कारिकेयीयति; कारिकेयीभूतः, यहां भी यकार का लोप न होवे ॥६॥ बिल्वकादिभ्यश्छस्य लुक् ॥ ८८७ ॥ अ० ६ । ४ । १५३ ॥ (नडादीनां कुक् च ) इस सूत्र पर नडादिगण के. अन्तर्गत विल्वादि शब्द पढ़े हैं। उनको कुक का आगम होने से विल्वक श्रादि होते हैं। विल्वक आदि शब्दों से परे छ प्रत्यय का लुक् हो, तद्धितसंज्ञक प्रत्यय परे हों तो । जैसे-विल्या अस्यां सन्तीति बिल्वकीया-तस्यां भवाः बैल्वकाः; वेणुकीयाः-वैणुकाः; वेत्रकीय:-वैत्रकाः इत्यादि । यहां 'छ' प्रत्यय का ग्रहण इसलिये है कि-कुक् आगम का लुक् न होवे । अर्थात् (सन्नियोगशिष्टानां० ) इस परिभाषा से कुगागम के सहित लुक् प्राप्त है, सो न हो। और लोप की अनुवृत्ति चली श्राठी है, फिर 'लुक्' ग्रहण इसलिये किया है कि- संपूर्ण प्रत्यय का लोप हो जावे । लुक न कहते तो अन्त्य अल के स्थान में होता ॥८॥ तुरिष्ठेमेयस्सु ।। ८८८ ॥ अ० ६ । ४ । १५४ ॥ पूर्व से यहां लुक की अनुवृत्ति नहीं पाती, किन्तु लोप की आती है। लुक होने से अङ्गकार्य गुण का निषेध प्राप्त है। जो अन्त्य का लोप होवे, तो सूत्र ही व्यर्थ होवे, क्योंकि टि भाग का लोप तो अगले सूत्र से हो ही जाता । इष्ठन्, इमनिच् और ईयसुन् ये तद्धितसंक्षक प्रत्यय परे हों, तो तृ तृन् प्रत्ययान्त शब्दों का लुक होवे । प्रत्ययमात्र का लुक कहा है, इसलिये सब का हो जाता है। जैसे-अतिशयेन कर्ता करिष्ठः; भृशं विजेता विजयिष्ठः; घोढा वहिप्टो वृषभः; दोहीयसी धेनुः इत्यादि । यहां इमनिच् ग्रहण उत्तरार्थ है ।। ८८८ ॥ टेः ॥ ८८६ ॥ अ०६ । ४ । १५५ ॥ इष्ठन्, इमनिच् और ईयसुन् प्रत्यय परे हों, तो भसंज्ञक अङ्गों के टिभाग का लोप होवे।जैसे-अतिशयेन पटुः पटिष्ठः; लघिष्टः पटीयान् लघीयान् पटिमा; लघिमा इत्यादि।
टिलोपाधिकारः
१६३
यह लोप गुण का अपवाद उवर्णान्त शब्दों में समझना चाहिये । अर्थात् गुण की
प्राप्ति में लोपविधान किया है। मम ॥
वा०-रणाविष्टवत्प्रातिपदिकस्य पुंवद्भावरभावटिलोपयणादिपरप्रादि-
विन्मतोलक्कन्विध्यर्थम् ।। ८६० ।।
पिच् प्रत्यय के परे भसंझक प्रातिपदिकमात्र को इष्टवत् कार्य होवे, प्रयोजन यह
है कि पुंवद्भाव,रभाव, टिलोप, यणादिपर, प्रादि श्रादेश, विन्मतोर्नुक, और कन् प्रत्यय,
ये विधि होने के लिये यह वार्षिक कहा है।
जैसे-पुंवद्भाव-एनीमाचष्टे एतयति; श्येनीमाचष्टे श्येतयति । इष्टन् प्रत्यय के परे
पुंवद्भाव कहा है, वैसे ही यहां णिच् प्रत्यय के परे भी हो जाता है। इसी प्रकार सब
कार्य जो इष्ठन् के परे होते हैं, वे णिच् प्रत्यय के परे भी समझना चाहिये ।
रभाव-पृथुमाचष्टे, प्रथयति; म्रदयति । यहां (रऋतो०) इस अागामी सूत्र ले
इष्टन के परे ऋकार को र आदेश कहा है, सो णिच के परे भी होजाता है।
टिलोप-पटुमाचष्टे पटयति; लघुमाचष्टे लघयति। यहां इसी (टेः) सूत्र से जो
इष्ठन् प्रत्यय के परे टिलोप कहा है, वह पिच प्रत्यय के परे भी हो जाता है।
यणादिपर-स्थूलमाचष्टे स्यवयति; दूरमाचष्टे दवयति इत्यादि । यहां अगले सूत्र से
इष्टन् प्रत्यय के परे यण को श्रादि लेके परभाग का लोप और पूर्व को गुणादेश कहा है,
सो णिच् प्रत्यय के परे भी हो जाता है।
प्रादि-अगले सूत्र से इष्ठन् प्रत्यय के परे प्रिय आदि शब्दों को प्रश्रादि आदेश
कहे हैं, सो णिच् प्रत्यय के परे भी हो जावें। जैसे-प्रियमाचष्टे प्रापयति; स्थिरमाचष्टे,
स्थापयति । यहां प्रिय और स्थिर शब्दों को प्र, स्थ आदेश होकर (श्रचोऽणिति) सूत्र में
अच ग्रहण के होने से प्र, स्य को वृद्धि होकर पुगागम हो जाता है।
विन्मतोलुक्-इस सूत्र से इष्टन् प्रत्यय के परे विन् और मतुप् प्रत्ययों का लुक कहा
है, सो णिच् प्रत्यय के परे भी हो जावे । जैले नग्विणमाचष्टे लजयति; वसुमन्तमाचष्टे
वसयति । यहां वसु शब्द के उकार का भी लोप हो जाता है।
कन्विधि-युब और अल्प शब्दों को इष्टन् प्रत्यय के परे कन् श्रादेश कह चुके हैं,
लो णिच् प्रत्यय के परे भी हो जावे । जैसे-युवानमाच-अल्पमाचष्टे कनयति; यवयति;
अल्पयति इत्यादि।
इस वार्तिक के उदाहरणों की गिनती नहीं करदी कि इतने ही स्थलों में इस का
प्रयोजन है, किन्तु उदाहरणमात्र दिये हैं। और भी इसके बहुत प्रयोजन समझने
चाहियें ॥२६॥
१६४ णताद्धिते - स्थूलदरयुवह्रस्वक्षिप्रक्षुद्राणां यणादिपरं पूर्वस्य च गुणः ।।८६१॥ अ०६।४ । १५६ ।। इष्टन, इमनि और ईयसुन् प्रत्यय परे हों, तो स्थूल, दूर युव, ह्रस्व, क्षिप्र और क्षुद्र शब्दों के यण को श्रादि ले के परभाग का लोप और पूर्व को गुणादेश होवे । जैसे-अतिशयेन स्थूलः स्थविष्टः; स्थीयान्; अत्यन्तं दूरं दविष्ठम्; दधीयः । यहां स्थूल शब्द में ल और दूर में र मात्र का लोप होजाता, और पूर्व ऊकार को गुण होकर अवादेश होता है। युवन्-अत्यन्तो युवा यवीयान्; यविष्टः । इन स्यूल आदि तीन शब्दों का पृथ्वादि गण में पाठ न होने से इमनिच प्रत्यय नहीं होता। हस्व-हसिष्टः हसीयान्; हसिमा । क्षिप्र-क्षेपिष्टः; क्षेपीयान्; क्षेपिमा; क्षोदिष्ठः; क्षोदीयान्; क्षोदिमा । इन ह्रस्व प्रादि तीन शब्दों का पृथ्वादिगण में पाठ होने से इमनिचू हो जाता है। यहां 'पर' ग्रहण इसलिये किया है कि-यण को आदि लेके पूर्वभाग का लोप न हो जावे ॥८६॥ प्रियस्थिरस्फिरोरुबहुलगुरुवृद्धतृप्रदीर्घवृन्दारकाणां प्रस्थस्फवहि- गर्षित्रन्द्राघिवृन्दाः ।। ८९२ ॥ अ०६। ४ । १५७ ।। निय, स्थिर, स्फिर, उरु, बहुल, गुरु, वृद्ध, तृप्र, दीर्घ और वृन्दारक शब्दों के स्थान प्र, स्थ, स्फ, वर, बंहि, गर, वर्षि, , द्राधि और वृन्द श्रादेश यथासंख्य करके होवे, इष्टन, इमनिच और ईयसुन् प्रत्यय परे हों तो। जैसे-प्रिय-~अतिशयेन प्रियः प्रेष्टः प्रेयान् प्रियस्य भावः प्रेमा। स्थिरस्थ स्थेष्ठः; स्थेयान् । स्फिर-फ-स्केष्टः; स्फेयान् । उरु-चर-धरिष्ठः; वरीयान् बरिमा । बहुल-हि-वहिष्टः बहीयान् हिमा । गुरु-गर-गरिष्ठः गरीयान् गरिमा । वृद्ध- पर्पि-धर्पिष्टः; वर्षीयान् । तृप्र-अप्- अपिष्टःः पीयान् । दीर्घ-द्राषि-द्राविष्टः; द्राधीयान् द्राधिमा । वृन्दारक-वृन्द-वृन्दिष्टः; वृन्दीयान् । प्रिय उरु गुरु बहुल भौर दीर्घ शब्द पृथ्वादिगण में पढ़े हैं, इस कारण उनसे इमनिच प्रत्यय होता है, औरों से नहीं होता। इसीलिये उनसे इमनिच प्रत्यय के उदाहरण भी नहीं दिये || ८६२॥ वहालोंपो भू च वहोः ।। ८६३ ॥ अ०६।४ । १५८ ।। बटु शब्द से परे जो इष्टन इमनि और ईयसुन् प्रत्यय उनका लोप हो, और बहु शद को भूभादेश होवे । - टिलोपाधिकारः १६५ ---... भू अनेकाल छादेश होने से सघ के स्थान में होजाता है। और (आदेः परस्य ) इस परिमापा सूत्र ले पञ्चमीनिर्दिष्ट बहु शब्द से उत्तर को कहा लोपरूप आदेश आदि अल् के स्थान में होता है। जैसे-अतिशयेन बहुः भृयान, भूयांसी; भूयांसः; वहोर्भावः भूमा। बहु शब्द पृथ्वादिगण में पढ़ा है। और इस सूत्र में यह शब्द का दुसरी घार ग्रहण इसलिये है कि-प्रत्ययों के स्थान में भू श्रादेश न हो जाये ॥ ८६३ ॥ दृष्टन् प्रत्यय में विशेष यह है कि- - के इष्टस्य यिट् च ।। ८६४ ॥ अ०६ । ४ । १५६ ॥ बहु शब्द से परे जो इएन् प्रत्यय, उसको यिट् का पागम और पहु शन्द को भू आदेश भी होवे । जैसे-अतिशयेन बहुः भूयिष्ठः ! यिट में से दृट् मात्र का लोप हो जाता है। और यह पागम लोप का अपवाद है ॥ ८६४ ॥ ज्यादादीयलः ॥ ८६५ ॥ अ० ६ । ४ । १६० ॥ प्रशस्य और वृद्ध शब्द को जो ज्य आदेश कह चुके हैं, उससे परे ईयसुन् प्रत्यय ईकार को श्राकारादेश होवे । जैसे-अतिशयेन प्रशस्यो वृद्धो वा ज्यायान् । लोप की अनुवृत्ति यहां चली श्राती, तो श्राकारादेश कहना नहीं पड़ता, फिर बीच में यिडागम का व्यवधान होने से नहीं पा सकती ॥ ८६५ ।। र ऋतो हलादेर्लघोः ॥ ८६६ ॥ अ०६।४ । १६१ ।। इटन्, मनिच और ईयमुन् प्रत्यय परे हों, तो हल जिसके श्रादि में हो ऐसे लघु- संक्षक हस्व ऋकार के स्थान में र श्रादेश हो । जैसे-श्रातिशयेन पृथुः प्रथिष्टः प्रथीयान्; ; पृथोर्भावः प्रथिमा; म्रदिष्टः म्रदीयान् नदिमा इत्यादि । यहां 'ऋकार' का ग्रहण इसलिये है कि पटिष्टः पटीयान् पटिमा, यहां र श्रादेश न हो। 'हल आदि में' इसलिये कहा कि अतिशयेन ऋजुः ऋजिष्ठा, ऋजीयान्; ऋजिमा, यहां न हो। और 'लघुसंक्षक' विशेषण इसलिये दिया है कि- कृष्णिाष्ठः; कुष्णीयान् कृष्णिमा, यहां गुरुसंहाक ऋकार को र आदेश न होवे ॥ ८६६ ।। वा०-पृथुमृदुभृशकशढपरिवढानामिति वक्तव्यम् ॥ ८९७ ॥ इस वार्तिक से परिगणन करते हैं कि पृथु, मृदु, भृश, कृश, दृढ और परिवृढ शब्दों के ऋकार को ही र आदेश हो, दूसरों को नहीं। इस नियम के होने से-कृतमाचष्टे कृतयति; मातरमाचष्टे मातयति; भ्रातयति इत्यादि ऋ के स्थान में र आदेश नहीं होता || ८६७ ॥ - में नेणताद्धिते विभाषाश्छन्दसि ॥ ८६८ ॥ अ०६ । ४ । १६२ ॥ यहां अप्राप्तविभाषा है, क्योंकि ऋजु शब्द के ऋकार को किसी से र आदेश प्राप्त नहीं है। इप्छन्, इमनित्र और ईचलुन् प्रत्यय परे हो, तो वेदविषय में ऋजु शब्द के ऋकार को विकल्प करके र श्रादेश होवे। जैसे-अतिशयेन ऋजुः रजिष्ठा, ऋजिष्ठो वा पन्याः; रजीयान्. ऋजीयान्: ऋजुमाचष्टे ऋजयति इत्यादि ॥ == !! प्रकृत्येकाच् ॥ ८६६ ॥ अ० ६ । ४ । १६३ ।। इष्ठन्, इमनि और ईयसुन् प्रत्यय परे हो. तो भसंचक एका जो शब्द है, वह प्रकृति करके रहे। जैसे-अतिशयेन नबी नजिष्ठा, नजीयान् नग्विणमावष्टे सजयति; अतिशयेन त्रुबान त्रुचिष्ठः, त्रुर्चीयान् त्रुन्वन्तमाचष्टे त्रुत्रयति । यहां अजादि प्रत्ययों के परे बिन और मनुप् का लुक होने के पश्चात् एकाच शब्दों के दिमाग का लोप प्राप्त है, सो प्रतिभाव के होने से नहीं होता। और टिलोप का ही अपवाद यह सूत्र है। यहां एका ग्रहण इसलिये है कि-अतिशयेन वसुमान् वसिष्ठः, यहां प्रकृतिमात्र न होवे, किन्तु टिलोप ही होजावे ॥ ८६६ ॥ वा०-प्रकृत्याऽके राजन्यमनुष्ययुवानः ॥ ६०० ॥ अझ् प्रत्यय परे हो, तो राजन्य मनुष्य और युवन् शब्द प्रकृति करके रह जावे । जैसे-राजन्यानां समूहो राजन्यकम् मानुष्यकम्, यहां (भापत्यस्य च तद्धितेऽनाति) इस लिखित सूत्र ले यकार का लोए प्रात है. सो न होवे। यूनो भारः यौवनिका, यहां इस युवन् शब्द का मनोद्वादिगण में पाठ होने से बुञ् प्रत्यय हुआ है. उस के नांत टिभाग का लोप प्राप्त है, सो नहीं होता ॥ 1001 इनण्यनपत्ये ॥ ६०१ । अ०६ । ४ । १६४ ॥ अपत्यरहित श्रों में श्रप प्रत्यय परे हो, तो भसंक्षक इन्नन्त अङ्ग प्रकृति करके रह जावे । जैसे-सांटिनम्: सांरावणम्: सामार्जिनम्: नबिल इदं वाग्विणम् इत्यादि । यहां 'अम् प्रत्यय का ग्रहण इसलिये है कि दण्डिनां समूहो दाण्डम्, यहां अन् प्रत्यय के परे प्रकृतिभाव न होवे। और 'श्रपत्य हा निषेध इसलिये है कि मेधा- विनोऽपत्यं मेधावः, यहां भी प्रकृतिनाव न होने ! २० ॥ गाथिविदाथिकेशिगणिपणिनश्च ॥ १०२ ।। अ०६।४ । १६५ ।। यह सूत्र अपत्यसंबक अल् प्रत्यय के परे प्रकृतिभाव होने के लिये है। Mammar- टिलोपाधिकारः अपत्यसंज्ञक अण् प्रत्यय परे हो, तो माथिन्, विदथिन्, केशिन, गणिन्, पणिन् ये शब्द प्रकृति करके रहें। जैसे-गाथिनोऽपत्यं नाथिनः; वैदथिनः; कैशिनः; गाणिनः; पाणिनः ॥ ६०२॥ संयोगादिश्च ॥ १०३ ।। अ०६ । ४ । १६६ ॥ अपत्यसंझक अण् प्रत्यय परे हो, तो संयोग से परे इन्भाग प्रकृति करके रहे। जैसे-शाखिनोऽपत्यं शाखिनः; माद्रिणः; बाज्रिणः ॥ ६०३ ॥ । अन् ।। ६०४ ॥ अ०६।४ । १६७ ।। यहां अपत्य की अनुचि नहीं पाती, किन्तु सामान्य विधान है। अण् प्रत्यय परे हो, तो भसंझक अनन्त अङ्ग प्रकृति करके रहे 1 जैसे-सानामयं मंत्रः सामनः मनः; सौत्वनः; जैत्वनः इत्यादि ॥ १०४ ॥ ये चाभावकर्मणोः ॥ १०५ ॥ अ० ६ । ४ । १६८ ॥ भावकम अर्थों को छोड़ के अन्य अर्थों में विहित यकारादि तद्धित प्रत्यय परे हो, तो भसंज्ञक अनन्त अङ्ग प्रकृति करके रह जावे । जैसे-सामसु साधुः सामन्या; ब्रह्मण्यः इत्यादि। यहां भावकर्म अर्थों का निषेध' इसलिये है कि-राक्षो भावः कर्म वा राज्यम् । यह राजन् शब्द पुरोहितादिगण में पढ़ा है, इस कारण इससे यक्प्रत्यय हो जाता है ।।६०५॥ आत्माध्वानौ खे ॥ १०६ ॥ अ०६।४। १६९ ।। तद्धितसंडक स्त्र प्रत्यय परे हो, तो श्रात्मन् और अध्वन् शब्द प्रकृति करके रह जावें । जैसे-श्रात्मनीनः अध्वानमलङ्गामी अध्वनीनः । यहां 'ख' प्रत्यय का ग्रहण इसलिये है कि प्रत्यात्मम् प्राध्वम्, यहां प्रकृतिभाव न होवे । यहां प्रात्मन् अनन्त शब्द से समासान्त टच और उपसर्ग से परे अध्वन् शब्द से अच् प्रत्यय हुआ है ॥ ६०६ ॥ न मंपूर्वोऽपत्येऽवर्मणः ॥ ६०७ ॥ अ० ६ । ४ । १७० ।। अपत्याधिकार में विहित अरा प्रत्यय परे हो, तो वर्मन् शब्द को छोड़ के म जिसके पूर्व हो, ऐसा भसंबक अन्नन्त श्रङ्ग प्रकृति करके न रहे, किन्तु टिलोप होजावे । जैसे- सुपाम्गोऽपत्यं सौपामः; चान्द्रसामः; सुवान्नोऽपत्यं सौदामः इत्यादि । यहां 'मकारपूर्व' का ग्रहण इसलिये है कि सौत्वनः, यहां टिलोप न हो। 'अपत्य अर्थ' इसलिये कहा है कि-चर्मणा परिवृतो रथञ्चार्मणः. यहां प्रकृतिभाव हो जावे। और 'वर्मन् शब्द का निषेध' इसलिये किया है कि-भूपालवर्मणोऽपत्यं भोपालवमणः, यहां भी टिलोप न होजावे ॥६०७॥ 1 .. - - 4 १६८ स्टेणताद्धिते wi------ ----------- वा०-मपूर्वात् प्रतिषेधे वा हितनाम्नः ॥ १०८ ॥ पूर्व सूत्र में मकार जिसके पूर्व हो उसको प्रकृतिभाव का निषेध किया है, सो हितनामन् शब्द को विकल्प करके प्रतिभाव हो। जैसे-हितनान्नोऽपत्यं हैतनामः; हैतमान्नः । यहां पक्ष में टिलोप हो जाता है ॥ १० ॥ ब्राह्मोऽजातौ ॥ १०६ ।। अ० ६ । ४ । १७१ ॥ . इस सूत्र का अर्थ नहानाकार ने ऐसा किया है कि इस सत्र का योगविभाग करके दो वायार्थ समभने चाहियें। ब्राह्म शब्द सामान्य अधों में अण्प्रत्ययान्त निपातन किया है। जैसे-ब्राह्मो गर्भः; ब्राह्ममनम् ब्राह्मं हविः; ब्राह्मो नारदः इत्यादि । यहां सर्वत्र ब्रह्मन् शब्द का टिलोप निपातन ले किया है। और अपत्यसंहक अप्रत्यय परे हो, तो जाति अर्थ में ब्रह्मन् शब्द के टिभाग का लोप न होवे । जैसे-ब्रह्मणोऽपत्यं ब्राह्मणः । यहां 'अपत्यं ग्रहण इसलिये है कि-ब्राझी ओषधिः, यहां निषेध न लगे ॥ ९ ॥ कार्मस्ताच्छील्ये ॥ ६१० ॥ अ० ६ । ४ । १७२ ।। ताच्छील्य अर्थ में ए प्रत्यय परे हो, तो कर्मन् शब्द का टिलोप निपातन से किया है। जैसे-कर्मशीलः कामः । इस कर्मन् शब्द का छत्रादिगण में पाठ होने से शील अर्थ म ण प्रत्यय होता है। यह सूत्र नियमार्य है कि-कर्मण इदं काम्मरणम्, इत्यादि में टिलोप न होवे ॥१०॥ औक्षमनपत्ये ॥ ६११ ॥ अ० ६ । ४ । १७३ ॥ अपत्याधिकार को छोड़ के अन्य अर्थो में अण् प्रत्यय परे हो, तो श्रीन शन्द में टिलोप निपातन किया है । जैसे-उनए इदं श्रीक्षम् । अपत्य का निषेध इसलिये है कि उन्होऽपत्यमोक्षण, यहां निषेध न होवे ॥६ दाण्डिनायनहास्तिनायनाथर्वणिकजैह्माशिनेयवासिनायनिभ्रौणह- त्यधैवत्यतारवक्ष्वाकमैत्रेयहिरण्मयानि ॥६१२॥ अ०६४१७४ ॥ इस सूत्र में दाण्डिनायन, हास्तिनायन, प्राणिक, जैह्माशिनेय, वासिनायनि, भ्रोणहत्य, धेवत्य, सारव, ऐश्चाक, मैत्रेय और हिरएमय इन शब्दों में तद्धितप्रत्ययों के परेटिलोप श्रादि कार्य निपातन से माने हैं। दण्डिन् और हस्तिन् शब्द नडादिगण में पढ़े हैं, इनसे फक प्रत्यय के पर प्रकृति- भाव निपातन से किया है । जैसे-इण्डिनां गोत्रापत्यं दाण्डिनायना: हास्तिनायनः । -- टिलोपाधिकारः १६६ ------- 14--.-.".... अथर्वन् शब्द वसन्तादि गण में पढ़ा है। उपचारोपाधि मान के अथर्वा ऋषि के बनाये ग्रन्थ को भी 'अथर्वान् कहते है। उससे पढ़ने ज नने अर्थों में ठक् प्रत्यय के परे प्रकृतिभाव निपातन किया है। जैसे-अथर्वाणमधीत वेत्ति वा आथर्वणिकः । जिलाशिन् शब्द शुभ्रादिगण में पढ़ा है, उससे अपत्य अर्थ में ढक प्रत्यय के परे प्रकृतिभाव निपातन किया है। जेले-जिह्माशिनोऽपत्यं ब्रह्माशिनेयः । गोत्र संधारहित वृद्धसंज्ञक वासिन् शब्द से अपत्य अर्थ में फिञ् प्रत्यय के परे टिलोप का निपंध निपातन किया है। जैसे-वासिनोऽपत्यं वासिनायनिः । भ्रूणहन और धीवन् शब्दों से प्यञ् प्रत्यय के परे इनके नकार को तकारादेश निपातन किया है। जैसे-भ्रणनो भावः भ्रीणहत्यम्; धीदनो भावो धैवत्यम् । भ्रूणहन् शब्द से प्यञ् प्रत्यय के गित् होने से (हनस्तोऽचिराणलोः ) इस सूत्र से नकारादेश हो जाता, फिर निपातन नियमार्थ है कि अन्य तद्धित प्रत्ययों के परे इसको तकारादेश न होवे । जैसे-भ्रूणन्नोऽपत्यं भ्रौणनः; वात्रघ्नः, यहां अण् प्रत्यय हुआ है। सरयू शब्द से शैपिक अण प्रत्यय के परे अय् भाग का लोप निपातन किया है। जैसे-सरय्यां भवं सारवमुदकम् । ऊकार को गुण होकर अवादेश हो जाता है। जनपद के समान क्षत्रियवाची इक्ष्वाकु शब्द से अपत्य और तद्राज अर्थों में अन प्रत्यय के परे उकार का लोप निपातन किया है । जैसे -इक्ष्वाकोरपत्यमिक्ष्वाकूनां राजा वा ऐच्याकः। मित्रा शब्द गृप्ठ्यादि गण में पढ़ा है, उससे ढञ् प्रत्यय के परे इस आदेश का अपवाद यु शब्द का लोप निपातन किया है । जैसे-मित्रयोरपत्य मैत्रेयः । हिरण्य शब्द से मयट प्रत्यय के परे य मात्र का लोप निपातन किया है। जैसे- हिरण्यस्य विकारः हिरण्मयः ॥ ६१२ ॥ ऋत्व्यवास्व्यवास्त्वमाध्वीाहरण्ययानि छन्दसि ।। ६१३ ॥ अ०६ । ४ । १७५ ।।- ऋत्य, वास्तव्य, वास्त्व, माध्वी और हिरण्यय, ये शब्द वेदविषय में तद्धितप्रत्ययान्त निपातन किये हैं। जैसे-ऋती भवम् ऋत्व्यम्; वास्तौ भवं वास्त्व्यम्, यहां ऋतु और वास्तु शब्दों को यकारादि यत् प्रत्यय के परे यणादेश निपातन किया है। वस्तु शब्द से अण् प्रत्यय के परे गुण का अपवाद यणादेश निपातन किया है- वस्तूनि भवं वास्त्वम् । मधुशब्द से स्त्रीलिङ्ग में अण् प्रत्यय के परे यणादेश निपातन किया है । जैसे-मधुन इमा माध्वीनः सन्त्वोषधीः । - १७० खैणताड़िते - . - हिरराय शब्द से परे मयट के म मात्र का लोप निपातन से किया है । जैसे-हिरण्यस्य विकारो हिरण्ययम् ॥ ६१३ ॥ तद्धितेष्वचामादेंः ॥ १४ ॥ अ० ७ । २ । ११७ ॥ जित्, णित् तद्धितसंज्ञक प्रत्यय-परे हों, तो अङ्ग-के अचों में आदि अच को वृद्धि हो । जैसे-भित्-गर्गस्य गोत्रापत्यं गार्ग्यः; वात्स्यः; दाक्षिः; साक्षिः इत्यादि । णित्- उपगोरपत्यम् प्रोपगयः; कापटयों; सौम्यं हविः इत्यादि ॥ ६१४ ॥ किति च ॥ १५ ॥ अ० ७ । २ । १.१८ ॥ कित्संज्ञक तद्धितः प्रत्यय परे हों. तो भी इङ्ग के अचों-में-आदि-श्रच को वृद्धिं होवे। जैसे-फक्-नाडायना; चारायणः, रेवत्या अंपत्य रैवतिकः इत्यादि ॥ १५ ॥ देविकाशिंशपादित्यवादीर्घस्त्रश्रेयसामात्।।६१६॥ अ०-७।३।१॥ यहां मित्, णित्.और कित् तद्धितप्रत्ययों तथा अचों के आदि अच-इन सब की अनुवृत्ति चली आती है। भित्, णित् और कित् तद्धितसंज्ञक प्रत्यय परे हों, तो देविका, शिंशपा, दित्यवाद, दीर्घसंत्र और श्रेयस्, इन अङ्गों के प्रादि अच् को वृद्धि प्राप्त हैं, उस को बाध के आकारादेश होवें। जैसे-देविकायां भवं दाविकमुदकम्-देविका नाम किसी नदीविशेष का है; देविकाकूले भवाः दाविका: शालयः, पूर्वदेविका नाम है प्राचीनों के ग्राम का-पूर्वदेवि. कायां भवः पूर्वदाविकः, यहां भी (प्राचां ग्राम० ) इस आगामी सूत्र से उत्तर पदवृद्धि प्राप्त है, उसका अपवाद-आकार-ही हो जाता है। शिशपाया विकारः शांशपश्चमसः, यह शिंशपा शब्द शीशों वृक्ष का नाम हैं। उसके अनुदात्तादि होने से, विकार अर्थ में अञ् प्रत्यय होता है। शिशपास्थले भवाः शांश- पास्थलाः'। और पूर्वशिंशपा शब्द प्राचीनग्राम की संज्ञा है, उसको भी पूर्वोक्त प्रकार से उत्तरपक्वृद्धि हो जाती है । जैसे-पूर्वशिंशपायां भवः पूर्वशांशपः । दियवाट्य-दित्योह 'इदं दात्योहम्, यहां शैषिक अण प्रत्यय हुआ है; दीर्धसत्र- दीर्घसत्रे भवं दार्घसत्रम् श्रेयसि भवं श्रायसम् ॥ ६१६ ॥ वा०-वहानरस्येद्वचनम् ।।६१७॥ जितगिव और कित्तद्धितसंबकम्प्रत्यय परे हों, तो वहीनर शब्द केश्रादि अच् को इकारादेशहोवे। जैसे, वहीनरस्यापत्य वैहीनरिः, यहां इकारादेशःवृद्धि की प्राप्ति में नहीं कहा, इसीसे वृद्धि काबाधक नहीं होता है। आदेश किये इकार को वृद्धिहोजाती है।
वृद्धिप्रकरणम् १७१ और किन्हीं ऋषि लोगों का इस विषय में यह अभिप्राय है कि-विहीनर' शब्द से ही प्रत्यय होता है। अर्थात् यह ऐसा ही शब्द है। कामभोगाभ्यां विहीनो नरः विहीनरः । यहां पृषोदरादि मान के एक नकार का लोप हो जाता है। जिनके मत में 'विहीनर' शब्द है, उनके मत में वार्तिक नहीं करना चाहिये ॥ १७ ॥ केकयमित्रयुप्रलयानां यादेरियः ॥ ६१८ ।। अ० ७ । ३ । २ ॥ केकय, मित्रयु और प्रलय शब्दों के यकारादि भाग को इय् आदेश होवे, जित् णित् कित् तद्धित प्रत्यय परे हों तो, और आदि अच को वृद्धि तो पूर्व सूत्रों से सिद्ध ही है। जैसे-केकयस्यापत्यं केकयानां राजा वा कैकेयः, यहां जनपद क्षत्रियवाची केकय शब्द से अञ् प्रत्यय हुआ है; मित्रयुभावेन श्लाघते मैत्रेयिकया श्लाघते, यहां गोत्रवाची मित्रयु शब्द से श्लाघा अर्थ में बुञ् प्रत्यय हुआ है। प्रलयादागतं प्रालेयमुदकम्, यहाँ आगत अर्थ में अण प्रत्यय हुआ है ॥ ६१८ ॥ न य्वाभ्यां पदान्ताभ्यांपूर्वी तु ताभ्यामैच् ॥६१६ ।। अ०७१३॥३॥ जित् णित् और कित् संक्षक तद्धितप्रत्यय परे हों, तो यकार वकार से परे अचों के आदि अच के स्थान में वृद्धि न हो, किन्तु उन यकार वकार से पूर्व ऐच का आगम हो, अर्थात् यकार से पूर्व ऐकार और वकार से पूर्व ओकार आदेश होवे । जैसे-व्याकरणमधीते वेद वा वैयाकरणः; न्यायमते नैयायिका, व्यसने भवं वैय- सनम् इत्यादि स्वश्वस्यापत्यं सीवश्वः; सौवर्गः: स्वराणां व्याख्यानो ग्रन्थः सौवरः इत्यादि। यहां 'यकार वकार से पूर्व' इसलिये कहा है कि-त्रर्थस्याऽपत्यं त्रार्थिः, यहां रेफ से पूर्व ऐच का आगम न हो। 'पदान्त' विशेषण इसलिये है कि-यष्टि प्रहरणमस्य याष्टीकः, यहां यकार से पूर्व ऐच का आगम भी न होवे। और जहां यकार वकारों से उत्तर वृद्धि की प्राप्ति न हो, वहां उनसे पूर्व ऐच का आगम भी न हो। जैसे-दध्यश्व- स्यापत्यं दाध्यश्विः ॥ ६१६ ॥ द्वारादानाञ्च ।। ६२० ॥ अ० ७ । ३।४ । द्वारादि शब्दों के यकार वकार से उत्तर अचों के श्रादि अच् को वृद्धि न हो, किन्तु उन यकार वकारों से पूर्व तो ऐच का अागम हो जावे । जैसे-द्वारे नियुक्तः दीवारिका द्वारपालस्यापत्यं दीवारपालम् स्वरमधिकृत्य कृतो ग्रन्धः सौवरः; सौवरोऽध्यायः; स्वाध्यायः प्रयोजनमस्य सौवाध्यायिका; व्यल्कशे भवः वैयल्कशः; स्वस्तीत्याह सौवस्तिकः; स्वर्गमनं प्रयोजनमस्य सौवर्गमनिकः; स्फेयकृतस्याऽपत्यं स्फैयकृतः; स्वादुमृदु भक्तिरस्य सौवादुमृदवः; शुन इदं शौवनम्-यहां पूर्वलिनित अन्) सूत्र से अण् प्रत्यय के परे प्रकृतिभाव हो जाता है,शुनो विकारः शौवनं मांसम्; श्वदंष्ट्रायां १७२ खैणताद्धिने भवः शीवादंष्ट्रो मणिः; स्वस्येदमैश्वर्य सौवम्: स्वग्रामे भवः सौवग्रामिकः-स्वग्राम शब्द से अध्यात्मादि गण में मान के ठञ् प्रत्यय होता है। पूर्व सूत्र में पदान्त यकार वकार से पूर्व ऐच का आगम कहा है, यहां द्वारादि शब्दों में पदान्त नहीं, इसलिये फिर अलग करके कहा ! स्वाध्याय शब्द इस द्वारादि गण में पढ़ा है, इसका दो प्रकार से निर्वचन होता है--सुष्ठु वा अध्ययनं स्वाध्यायः, शोभनं वा अध्ययन स्वाध्यायः, अथवा स्वमध्ययन स्वाध्यायः। इनमें से किसी प्रकार का निर्षचन समझो, स्वाध्याय शब्द सर्वथा यौगिक ही है। और द्वारादि शब्द सब अव्युत्पन्न प्रातिपदिक हैं । इसीलिये यह सूत्र कहा है । सो जो 'सु-अध्याय' ऐसा विग्रह करें, तब तो पदान्त वकार से पूर्व प्रथम सूत्र से ही ऐच् का आगम हो जावेगा । और जत्र 'स्वाध्याय' ऐसा निर्वचन करें तो भी स्व शब्द इसी गण में पढ़ा है। तो अगले सूत्र में केवल शब्द के ज्ञापक से इस प्रकरण में तदादिविधि होती है। फिर स्वशब्द जिसके आदि में हो ऐसे स्वाध्याय शब्द ले इसी सूत्र करके ऐन् का आगम हो जावेगा । फिर स्वाध्याय शब्द को इस गण में पढ़ने से कुछ प्रयोजन नहीं। यह महामाष्यकार का आशय है ॥ ९२० ॥ न्यग्रोधस्य च केवलस्य ॥ १२१ ।। अ० ७।३। ५ ॥ केवत न्यग्रोध शब्द के यकार से परे, अचों के आदि श्रच के स्थान में वृद्धि न हो, किन्तु यकार से पूर्व ऐच का आगम हो जावे । जैसे-न्यग्रोधस्य विकारो नेयग्रोधश्चमसः। यहां 'केवल' शब्द का ग्रहण इसलिये है कि न्यग्रोधमूले भवाः न्यानोधमूला: शालयः, यहां ऐच का आगम न होवे । इस 'न्यग्रोध' शब्द का ग्रहण व्युत्पत्तिपक्ष में नियमार्थ है कि पदान्त यकार से पूर्व के केवल न्यग्रोध शब्द को ही ऐच का आगम हो, अन्य शब्दों को तदादि होने से भी हो जावे । और अव्युत्पत्तिपक्ष में विधान झापकार्थ है ॥ २१ ॥ न कर्मव्यतिहारे ॥ २२ ॥ अ० ७ । ३ । ६ ॥ कर्मव्यतिहार अर्थ में वर्तमान प्रातिपदिक के यकार वकार से पूर्व ऐच का आगम न होवे । जैसे—व्यावक्रोशी; व्यावलेखी; व्यावहासी इत्यादि । यहां कर्मन्यतिहार अर्थ में कृदन्त रणच प्रत्यय और तदन्त से स्त्रीलिङ्गस्वार्थ में तद्धितसंज्ञक अञ् प्रत्यय हुआ है ॥ १२२ ॥ स्वागतादीनां च ।। ६२३ ।। अ० ७ । ३ । ७॥ जित् गित् कित् संक्षक तद्धितप्रत्यय परे हों, तो गणपठित स्वागतादि शब्दों के यकार वकार से पूर्व ऐच का आगम न होवे ।
वृद्धिप्रकरणम् १७३ जैसे-स्वागतमित्याह स्वागतिकः; स्वध्वरेण चरति स्वाध्वरिकः; स्वागण्यापत्यं खाङ्गि व्यकस्यापत्यं व्याङ्गिः व्यस्थापत्यं व्याडि:व्यवहारः प्रयोजनमस्य व्यावहारिक:- यहां व्यवहार शब्द कमव्यतिहार अर्थ में नहीं, किन्तु लौकिक कार्यों का वाची है; स्वपतो साधुः खापतेयः । स्वागतादि सब योगिक शब्द हैं, उनमें तो पदान्त यकार वकार से पूर्व ऐच का अागम प्राप्त है, और स्वपति शब्द में यह बात नहीं, सो स्व शब्द द्वारादिगण में पढ़ा है, वहां तदादि से ऐन का श्रागम प्राप्त है, इन सबका निषेध समझना चाहिये ॥ २३ ॥ श्वादेरिजि ॥ ६२४ । अ० ७ । ३ । ८ ॥ तद्धितसंचक इञ् प्रत्यय परे हो. तो किसी शब्द के आदि में वर्तमान श्व शब्द के वकार ले पूर्व ऐच का आगमन हो । जैसे-खभन्नस्थापन्यं स्वाभस्त्रिःश्वादंष्ट्रिः इत्यादि। स्खन शब्द द्वारादिगण में पढ़ा है, इस कारण इसको तदादिविधि मान कर वकार से पूर्व ऐच प्राप्त है, उसका प्रतिषेध किया है ॥ २४ ॥ वा०-इकारादिग्रहणं च श्वागणिकाद्यर्थम्न् ॥ ६२५ ॥ सूत्र में तद्धित संक्षक इञ् प्रत्यय के पर ऐजागम का निषेध किया है, सो सामान्य इकारादि प्रत्यय के परे करना चाहिये । जैसे-श्वगणेन चरति श्खागणिकः, श्वायूथिकः इत्यादि । यह वार्तिक सूत्र का शेष है ॥ ६२५ ! वा०-तदन्तस्य चान्यन्न प्रतिषेधः ॥ १२६ ॥ और इञ् प्रत्यय से भिन्न कोई प्रत्यय परे हो, तो आदि में वर्तमान श्व शब्द के चकार से पूर्व ऐच का आगम न हो। जैसे-वाभनेः स्वं श्वाभस्त्रम् इत्यादि ॥ ६२६ ॥ पदान्तस्यान्यतरस्याम् ।। ६२७ ॥ अ० ७३ । ६ ।। पद शब्द जिसके अन्त में हो, ऐसे ख शब्द के वकार ले पूर्व ऐच का आगम विकल्प करक होवे । जैसे-खापदस्येदं श्वापदम्, शीवापदम् इत्यादि ॥ १२७ ।। उत्तरपदस्य ॥ ६२८ ॥ अ०७।३।१० ॥ यह अधिकार मूत्र है। यहां ले पागे जो कार्य विधान करें, सो (हनस्तो० ) इस सूत्र पर्यन्त सामान्य करके उत्तरपद को होगा ॥२८॥ अवयवाहतोः :॥ ६२६ ॥ अ० ७।३।११ ॥ जित् णित् और कित् संज्ञक तद्धितप्रत्यय परे हों, तो अवयवदात्री से पर जो ऋतु- याची उत्तरपद उसके अचों में आदि अव को वृद्धि होवे ।
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वैणताद्धिते
जैसे-पूर्ववर्षानुभवं पूर्ववार्षिकम् पूर्व मनम् अपरवार्षिकम्; अपरहैमनम् इत्यादि ।
यहां पूर्व शब्द का वर्षा और हेमन्त शब्द के साथ एकदेशी समाप्त होता, और वर्षा शब्द
से शैपिक ठक्, हेमन्त से अण् प्रत्यय और हेमन्त शब्द के तकार का लोप हुआ है।
यहां 'अवयव' शब्द का ग्रहण इसलिये है कि पूर्वासु वर्षासु भवं पौर्ववार्षिकम्,
यहां श्रवयविसमास के न होने से उत्तरपदवृद्धि न हुई। यहां वर्षा और हेमन्त शब्दों के
पूर्व और अपर शब्द अवयव हैं ॥ ६२६ ॥
सुसर्वार्द्धाजनपदस्य ॥ ६३० ॥ अ० ७ । ३ । १२ ॥
जित् णित् और कित् संज्ञक तद्धित प्रत्यय परे हों, तो सु, सर्व और अर्द्ध शब्दों से
परे जो जनपद देशवाची उत्तरपद, उसके अचों में आदि अच के स्थान में वृद्धि होवे ।
जैसे-सुपञ्चालेपु भवः सुपाञ्चालकः; सर्वपाञ्चालकः; अर्द्धपाञ्चालकः इत्यादि । यहां
शैषिक वुभ् प्रत्यय होता है ॥ ६३० ॥
दिशोऽमद्राणाम् ॥ ९३१ ॥ अ० ७ । ३ । १३ ॥
जित् णित् और कित् संज्ञक तद्धित प्रत्यय परे हों, तो दिशावाची शब्दों से परे जो
के स्थान
मद शब्द को छोड़ के जनपद देशवाची उत्तरपद, उसके अचों में भादि अच
में वृद्धि होवे।
जैसे-पूर्वेपञ्चाला निवासोऽस्य पूर्वपञ्चालकः; अपरपञ्चालकः; दक्षिणपञ्चालकः
इत्यादि । यहां भी शैषिक वुञ् प्रत्यय होता है।
यहां 'दिशावाची' का ग्रहण इसलिये है कि पूर्वः पञ्चालाना पूर्वपञ्चाल: पूर्वपञ्चालेपु
भवः पोर्चपञ्चालकः; आपरपञ्चालकः, यहां एकदेशी समास में पूर्व तथा अपर शब्द
दिशावाची नहीं, किन्तु अवयववाची हैं, इस कारण उत्तरपदवृद्धि नहीं होती । 'मद्रशब्द
का निषेध' इसलिये है कि-पूर्वमद्रेषु भवः पौर्वमद्रः; श्रापरमद्रः, यहां शैषिक अञ्
प्रत्यय के परे उत्तरपदवृद्धि नहीं होती ॥ ६३१ ॥
प्राचां ग्रामनगराणाम् ॥ ९३२ ॥ अ० ७।३ । १४ ॥
जित् णित् और कित् संशक तद्धित प्रत्यय परे हो, तो प्राचीन प्राचार्यों के मत में
दिशावाची शब्दों से परे जो ग्राम और नगरवाची उत्तरपद, उसके अचों में श्रादि अच
के स्थान में वृद्धि हो।
जैसे-ग्राम-पूर्वेपुकामशम्यां भवः पूर्वपुकामशमः अपरैपुकामशमः; पूर्वकार्णमृत्तिका;
अपरफार्णमृत्तिकः । नगरों से-पूर्वमथुरायां भवः पूर्वमाथुरः; अपरमाथुरः पूर्वनोनः;
दक्षिणमौनः इत्यादि ॥ ६३२ ॥
वृद्धिप्रकरणम् १७५ -----HAMAHA ----- . संख्यायाः संवत्सरसंख्यस्य च ॥ ९३३ ।। अ०७ । ३ । १५ ॥ जित् णिव और कित् संक्षक तद्धित प्रत्यय परे हों, तो संख्यावाची शब्दों से परे जो संवत्सर और संख्यावाची उत्तरपद, उसके अचों में आदि अच् के स्थान में वृद्धि होवे। जैसे-द्विसंवत्सराबंधीठो भृतो भृतो भावी बा, द्विसांवत्सरिका: द्वे पष्टी अधीयो भृतो भूतो भावी वा द्विधाष्टिकः द्विसाप्ततिक; द्वयाशीतिकः इत्यादि। यहां संवत्सर के ग्रहण से उत्तर सूत्र में परिमाणान्तग्रहण में काल परिमाण को ग्रहण नहीं होता, इससे -द्वेशमिक शमिकः, यहां उत्तरपदवृद्धि नहीं होती। द्विवर्षा; त्रिवर्धा, यहां परिमाणवाची से कहा डीप् प्रत्यय भी नहीं होता ॥ ६३ ॥ वर्षस्याभविष्यति ॥ ९३४ ॥ अ० ७ । ३ । १६ ॥ यहां संख्यावाची की अनुवृत्ति पाती है। भविष्यत् अर्थ को छोड़ के अन्य अर्थों में स्थित जित् णित् और कित् संज्ञक तद्धित प्रत्यय पर हों, तो संख्यावाची शब्दों से परे जो वर्ष उत्तरपद, उसके अंचों में आदि अच् को वृद्धि हो । जैसे-द्विवर्षे अधीष्टों भृतो भूतो वा द्विवार्षिक:; त्रिवार्षिक: इत्यादि। यहां 'भविष्यत् अर्थ का निषेध' इसलिये किया है कि-त्रीणि वर्षाणि भावी त्रैवर्यिकम् यहां उत्तरपदवृद्धि न होवे । अधीष्ट और भृत अर्थों में भी भविष्यत् का द होता है। परन्तु वहां भविष्यत् का निषेध नहीं लगता, क्योंकि उन प्रों में जो भविष्यत् आ सकता है, वह तद्धित प्रत्यय का अर्थ नहीं है । जैसे-द्वेवर्षे अधीष्टो भृतो वा कर्म करिष्यतीति द्विवार्षिको मनुष्यः ॥६३४॥ परिमाणान्तस्यासंज्ञाशाणयोः ।। ६३५ ॥ अ० ७ । ३ । १७ ॥ जित् णित् और कित् संझक तद्धित प्रत्यय परे हों, तो संख्यावाची शब्दों से परे जो संत्राविषय में और शाण उत्तरपद को छोड़ के अन्य परिमाणान्त उत्तरपद, उसके अचों में आदि अच को वृद्धि होवे । जैस-दो कुडयो प्रयोजनमत्य द्विकौडविक द्वाभ्यां सुवर मियां क्रीतं द्विसोवर्णिकम्; द्वाभ्यां निष्काभ्यां क्रींतं दिनष्किकम् त्रिनष्किकम् इत्यादि । यहां ठंञ् प्रत्यय हुआ है। यहां 'संज्ञाविषय में निषेध' इसलिये किया कि-पञ्च लोहित्यः परिमाणमस्य पाञ्चतोहितिकम् पाञ्चकपातिकम्, यहां संज्ञा में उत्तरपबृद्धि न हो। और 'शाण उत्तरपद के पर निषेध इसलिये है कि-द्वाभ्यां शाणाभ्यां क्रीतं वैशाणम् शाणम्, यहां क्रीत अर्थ में अण् प्रत्यय के परे उत्तरपद को वृद्धि न होवे ।। ६३५॥ - १७६ बैणताद्धिते जे प्रोष्ठपदानाम् ॥ ६३६ ॥ अ० ७ । ३ । १८ ॥ यहां जे शब्द से जात अर्थ का बोध होता है । जात अर्थ में विहित जित् णित् और कित् संज्ञक तद्धित प्रत्यय परे हों, तो प्रोष्टपदा नामक नक्षत्र में उत्तर पद के आदि अच् को वृद्धि होवे। जैसे-प्रोष्ठपदासु जातः प्रोष्ठपदो माणवकः, यहां नक्षत्रवाची से सामान्य काल अर्थ में विहित अण प्रत्यय का लुप् होकर फिर नक्षत्रवाची सेजात अर्थ में अण् प्रत्यया होता है। यहां 'जे' ग्रहण इसलिये है कि-प्रोष्टपदालु भवः प्रोष्ठपदः, यहां वृद्धि न हो। और इस सूत्र में बहुवचन निर्देश से प्रोष्टपदा के पर्यायवाचियों का भी ग्रहण समझना चाहिये । जैसे-भद्रपदासु जातो भद्रपादः ॥ ६३६ ॥ हृद्भगसिन्ध्वन्ते पूर्वपदस्य च ॥ ६३७ ।। १०७ । ३ । १६ ।। जित् णित् और कित् संज्ञक तद्धित प्रत्यय परे हों, तो हृद, भग, सिन्धु ये जिनके अन्त में हों, ऐसे पूर्वपदों और उत्तरपदों के अचों में श्रादि अच् के स्थान में वृद्धि हो । । जैसे-सुहृदयस्येदं सौहार्दम् सुहृदयस्य भावः सौहार्दम् सुभगस्य भावः सौभाग्यम्। दीर्भाग्यम्; सुभगाया अपत्यं सौभागिनेयः; दो गिनेयः । और 'सुभग' शब्द उद्गात्रादि गण में भी पढ़ा है, उससे वेद में ही अञ् प्रत्यय होता है । परन्तु उभयपदवृद्धि नहीं होती, क्योंकि 'मइते सौभगाय ऐसा ही प्रयोग वेद में आता है। सो वेद में सब कार्यों का विकल्प होने से पूर्वपदवृद्धि हो जाती है ॥ ६३७ ॥ अनुशतिकादानां च ॥ ६३८ । अ० ७ । ३ । २० ।। यहां पूर्व सूत्र से पूर्वपद् की भी अनुवृत्ति चली आती है। भित् णित् और कित् संज्ञक तद्धित प्रत्यय परे हों, तो अनुशतिकादिगण पठित शब्दों में पूर्व और उत्तर दोनों पदों के श्रादि अचों के स्थान में वृद्धि होवे । जैसे-अनुशतिकस्येदम् आनुशातिकम् अनुहोडेन चरति आनुहोडिका अनुसंवरणे दीयते आनुसावरणम्, अनुसंवत्सरेण दीयते श्रानुसंवत्सरिकः; अङ्गारवेणोरपत्यम् श्राङ्गारवैणवः; असिहत्ये भवम् आसिहात्यम् अस्यहत्यशब्दोऽस्मिन्नध्यायेस्ति श्रास्यहात्यः; अस्यहेतिः प्रयोजनमस्य प्रास्यतिकः; वध्योगस्यापत्यं वाध्योगः; पुष्करसतोऽपत्यं पौकर- सादिः; अनुहरतोऽपत्यम् श्रानुहारतिः; कुरुकतस्यापत्यं कोरुकात्यः; कुरुपञ्चालेषु भवः कोरुपाञ्चालः; उद्कशुद्धस्यापत्यम् श्रीदकोद्धिः । इह लोके भवं ऐहलौकिकम्परलोके भवं पारलौकिकम् लोकोत्तरपद प्रातिपदिकों से ठञ् प्रत्यय कह चुके हैं; सर्वलोके विदितः सार्वलोकिकः पुरुषः; सर्वपुरुषस्येदं कर्म वृद्धिप्रकरणम् १७७ सार्वपौरुषम्, सर्वभूमेनिमित्तं संयोग उत्पातो वा सार्वभौमः; प्रयोगे भवं प्रायोगिकम्; परस्त्रिया अपत्यं पारणेयः-परस्त्री शब्द कल्यारयादिगण में पढ़ा है, वहां इन आदेश हो जाता है; राजपुरुष शब्द को व्यञ् प्रत्यय के परे उभयपदबृद्धि होती है- राजपुत्पस्य कर्म राजपौत्व्यम् । प्यञ् प्रत्यय का नियम इसलिये है कि-राजपुरुषस्यापत्यं राजपुरुषायणिः, यहां उत्तरदेशीय प्राचारों के मत में गोत्रसंज्ञारहित वृद्धिसंक्षक प्रातिपदिक से अपत्य अर्थ में फिञ् प्रत्यय होता है; शतकुम्भे भवः शातकौम्भः; सुस्रशयनं पृच्छति सौनशायनिकः; परदारान् गच्छति पारदारिकः; सूत्रनडस्यापत्यं सोमनाडिः श्रभिगममर्हति आभिगामिकः, अधिदेवे भवमाधिदैविकम् आधिभौतिकम्, आध्यात्मिकम्-अध्यात्मादि शब्दों से भवार्य में ठञ् प्रत्यय कह चुके हैं। यह आकृतिगण इसलिये समझना चाहिये कि अन्य अपठित शन्दों को भी उभय- पवृद्धि हो जावे। जैसे-चत्र एव विद्याः चातुर्वैद्यम्, चातुराश्रम्यम् इत्यादि में भी उभयपदवृद्धि हो जाये ॥ ६३८ ॥ देवताद्वन्द्वे च ॥ ६३६ ।। अ० ७।३ । २१ ।। नित् णित् और कित् संज्ञक तद्धित प्रत्यय परे हो, तो देवतावाची शब्दों के द्वन्द्वं- समास में पूर्व और उत्तर दोनों पदों के अचों में आदि अच के स्थान में वृद्धि होवे। जैसे-श्रान्निघाल्पी; आग्निमान्तो मन्त्रः । परन्तु जहां सूक्त ऋचा मन्त्र और हविष्य पदार्थ सम्बन्धी देवतापाची शब्दों का द्वन्द्वसमास हो, वहीं उभयपदवृद्धि हो । और-स्कन्दविशाखौ देवते अस्व स्कान्दविशास्त्रं कम; ब्राह्मप्रजापत्यम्, यहां उभयपदवद्धि न होवे ॥ ६३६ ॥ नेन्द्रस्य परस्य ॥ ६४० ।। अ० ७।३ । २२ ।। देवतावाची शब्दों के द्वन्द्वसमास में उत्तरपद में जो इन्द्र शब्द आये, तो उसको वृद्धि न हो। पूर्वसूत्र से प्राप्त है, उसका निषेध किया है। जैसे-सोमेन्द्रो देवते अस्य सोमेन्द्र, प्राग्नेन्द्रः इत्यादि। यहां 'पर' ग्रहण इसलिये है कि-ऐन्द्राग्नं च निर्वपेत्, यहां पूर्वपद में निषेध न होवे । इन्द्र शब्द में दो खर हैं। उनमें से अन्त्य प्रकार का तद्धित प्रत्यय के परे लोप, और पूर्व इकार का दूसरे वर्ण के साथ एकादेश होने से उत्तरपबृद्धि की प्राप्ति ही नहीं हो सकती, फिर निषेध करने से यह ज्ञापक होता है कि अन्तरङ्ग भी एकादेश को बाध के प्रथम पूर्वोत्तरपदवृद्धि ही होती है। इस मापक का अन्यत्र फल यह है कि-पूर्वपुकामशमः, यहां उत्तरपद में इषु शब्द के इकार की वृद्धि प्रथम ही हो जाती है, पीछे एकादेश होता है ॥ ६४० ॥ २३ १७८ स्त्रैणताद्धिते 'Maward दीर्घाच वरुणस्य ॥ ६४१ ॥ अ० ७ । ३ । २३ ।। दीर्घ वर्ण से परे जो वरुण उत्तरपद उसके आदि अच् को वृद्धि न हो। यहां भी देवता के द्वन्द्वसमास में पूर्वसूत्र से प्राप्ति है, उसका प्रतिषेध समझना चाहिये । जैसे-इन्द्रावरुणो देवते असा ऐन्द्रावरुणम्, मैत्रावरुणम् इत्यादि । 'दीर्घ वर्ण से परे' इसलिये कहा है कि-प्राग्निवारुणी, यहां निषेध न होजावे ॥६४१॥ में प्राचां नगरान्ते ॥ ६४२॥ अ० ७।३ । २४ ॥ प्राचीनों के देश में जित् णित् और कित् संक्षक तद्धित प्रत्यय परे हो, तो नगरान्त उभयपद के आदि अच् को वृद्धि हो। जैसे-सुक्षनगरे भकः सौझनागरः; पौण्ड्रनागरः इत्यादि। यहां 'प्राची' ग्रहण इसलिये है कि मद्रनगरे भवः माद्रनगरः, यहां उत्तरदेशीय नगरान्त में न होवे ॥ ६४२ ॥ जङ्गलधेनुवलजान्तस्य विभाषितमुत्तरम् ॥४३॥ अ०७।३।२५॥ जित् णित् और कित् संशक तद्धित प्रत्यय परे हो, तो जङ्गल, धेनु, वलज ये शब्द जिसके अन्त में हों, उस समुदाय के उत्तरपद के आदि अच् को विकल्प करके, और पूर्षपद के आदि अच को नित्य वृद्धि होवे । जैसे--कुरुजङ्गालेषु भवं कोरुजाङ्गलम्, कोरुजङ्गलम्, वैश्वधैनधम्, वैश्वधेनवम् सौवर्णवालजः, सौवर्णवलजः, यहां शैषिक अण् प्रत्यय हुआ है ॥ ६४३ ॥ अर्द्धात्परिमाणस्य पूर्वस्य तु वा ॥६४४ ॥ अ०.७ । ३ । २६ ॥ जित् णित् और कित् संक्षक तद्धित प्रत्यय परे हो, तो अर्द्ध शब्द से परे जो परि- माणवाची उत्तरपद, उसके अचों में श्रादि अच् को नित्य और पूर्वपद के श्रादि अच् को विकल्प करके वृद्धि होवे। जैसे--अर्द्धद्रोणेन क्रीतमार्द्धद्रौणिकम्, अर्द्धद्रौणिकम् आद्ध कौडविकम्, अई कौडधिकम् । यहां 'परिमाण' ग्रहण इसलिये किया है कि-अर्द्धक्रोशः प्रयोजनमस्य आक्रोशि- कम्, यहां पूर्वपद को विकल्प और उत्तरपद को नित्य वृद्धि न होवे ॥ ६४४ ॥ नातः परस्य ।। ६४५ ।। अ०७।३ । २७ ।। 'त्रित् णित् और कित् संचक तद्धित प्रत्यय परे हो. तो आई शब्द से परे परि- माणशाची उत्तरपद के आदि अकार को वृद्धि न हो, और पूर्वपद को विकल्प वृद्धिप्रकरणम् १७६ .................. -------------- करके होवे। जैसे--अर्द्धप्रस्येन क्रीतमा प्रस्थिकम्, अर्द्धप्रस्थिकम् श्राद्ध कंसिकः; अर्द्ध कंसिकः। यहां 'श्रकार' का ग्रहण इसलिये है कि प्राई कौडविकः, यहां वृद्धि का निषेध न हो। और 'अकार में तपरंकण' इसलिये है कि-अर्द्ध खार्या भवा आईबारी, यहां खारी शब्द उत्तरपद के आदि में दीर्घ आकार है। यद्यपि वृद्धि होने न होने में कुछ विशेष नहीं दीखता, तो भी-आर्द्धकारी भार्या अस्य श्राईकारीमार्यः, यहां वृद्धि के निमित्त तद्धित प्रत्यय के परे पुंवद्भाव का निषेध नहीं पावेगा। क्योंकि जिस तद्धित प्रत्यय के परे वृद्धि का निपेध है, वह वृद्धि का निमित्त नहीं हो सकता कि जैसे-वैयाकरणी भार्या अस्य वैयाकरणभार्यः, यहां पुंवद्भाव हो जाता है, वैसे उसमें भी हो जावेगा || ६४५ ॥ प्रवाहणस्य ढे ॥ ६४६ ॥ अ० ७।३ । २८ ॥ तद्धितसंचक ढ प्रत्यय परे हो, तो प्रवाहण शब्द के उत्तरपद के आदि अच को वृद्धि हो और पूर्वपद के श्रादि अच् को विकल्प करके होवे । जैसे-प्रवाहणस्थापत्यं प्रावाहणेयः, प्रवाहणेयः । प्रवाहण शब्द का शुभ्रादिगण में पाठ होने से ढक प्रत्यय हो जाता है ।। ६४६ ॥ तत्प्रत्ययस्य च ॥ ६४७ ॥ अ०.७ । ३ । २६ ॥ जित् णित् और कित् संशक तद्धित प्रत्यय परे हो, तो ढक् प्रत्ययान्त प्रवाहण शब्द में उत्तरपद के आदि अच को नित्य और पूर्वपद के अच को विकल्प करके वृद्धि हो। जैसे-प्रवाहणेयस्य युवापन्यं प्रावाहणेयिः, प्रवाहणेयिः इत्यादि, अपत्य अर्थ में इञ् प्रत्यय हुआ है। दूसरे प्रत्यय के प्राश्रय जो वृद्धि है, सो ढक् प्रत्यय को मान के विकल्प से नहीं हो सकती, इसलिये यह सूत्र कहा है ॥ ६४७ ॥ . नञः शुचीश्वरक्षेत्रज्ञकुशलनिपुणानाम् ।।६४८॥ अ०७।३।३०॥ जित् णित् और कित् संज्ञक तद्धित प्रत्यय परे हो, तो नञ् से परे जो शुचि, ईश्वर, क्षेत्रा, कुशल और निपुण उत्तरपद उसके अचों में आदि अच को नित्य और पूर्वपद को विकल्प करके वृद्धि हो । जैसे-शुचि-अगुचेर्भावः श्राशौचम्, अशौचम्; ईश्वर-अनीश्वरस्य भावः श्राने- श्वर्यम्, अनैश्वर्यम्; क्षेत्रज्ञ-पाक्षेत्रश्यम्, अक्षत्रशयम्; कुशल-अकुशलस्य भावः श्राकोशलम्, अकौशलम्; निपुण-अानैपुणम्, अनैपुणम् || ६४८ ॥
१८० खैणताड़िते ह यथातथयथापुरयोः पर्यायण ॥ ६४६ ॥ अ० ७ । ३ । ३१ ॥ जित् णित् और कित् संशक तद्धित प्रत्यय परे हो, तो नञ् से परे जो यथातथ और यथार उसके अचों में आदि अच् को पर्याय से वृद्धि हो । अर्थात् जब पूर्वपद को हो तब उत्तेरपद को नहीं, और जब उत्तरपद को हो तब पूर्वपद को नहीं होवे । जैसे -~-अयथातथा भावः श्रायथातथ्यम्, अयाथातथ्यम्; आयथापुर्यम्, अयाथा- पुर्यम् । अयथातथा और अयथापुर ये दोनों शब्द ब्राह्मणादि गण में पढ़े हैं, इससे प्यम् प्रत्यय होता है॥ ६४६ ॥ इति श्रीमत्स्वामिदयानन्दसरस्वतीव्याख्यातोऽष्टाध्यायां झणताद्धितोऽयं प्रन्थः समाप्तः ॥ वसुरामाङ्कचन्द्रेऽन्दे मार्गशीर्षे सिते दले । पन्चमीशनिवारेऽयं ग्रन्थः पूर्ति गतः शुभः ।। संवत् १९३८ मार्गशीर्ष शुक्ल ५ शनिवार के दिन यह णताद्धित ग्रन्थ श्रीयुत दयानन्द सरस्वतीजी ने पूरा किया । समाप्त.