Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner
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विजनवती
इलाचन्द्र जोगी
प्रकाशक
ज्ञानपाल सेठिया
अर्चना मन्दिर
बीकानेर
दो रुपया
प्रकाशन
ज्ञानपाल सेठिया
अचना मदिर
वीयानेर
मुद्रक
महे द्रनाथ पाण्डेय
इलाहावाद लॉ जनल प्रेस
इलाहाबाद
निवेदन मेरी 'विजनवती' यद्यपि अभी केवल दशवर्षीया कुमारी है, तथापि वह ऐसी अनुभूतिप्रवण है कि इस सुकुमार अवस्थामें भी वह आवश्यकतासे अधिक सोचशील जान पडती है और अत्यन्त शङ्कित तथा कम्पित पगोसे काव्य- साहित्यके प्राङ्गणमे आई है। वतमान सग्रहकी कविताएँ विभिन पत्रिकाओमें प्रकाशित हो चुकी हैं। इस सग्नहके प्रकाशनके सम्बन्धमें मुझे विशेपरूपसे दो व्यक्तियोके प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकट करनी है। इनमेंसे प्रथम व्यक्ति ह मेरे नवयुवक मिन, प्रियवर थी ज्ञानपाल सेठिया, जिनको मार्मिक अनुभूति तथा अद्भुत काव्य- रसज्ञता मुझे बरबस अपनी ओर खीच ले गई और जिनकी सहृदय सहानुभूतिसे प्रेरित होकर ही म अपनी बिखरी हुई कविताआको पुस्तकके रूपमें निकालनेके लिये तत्पर हो सका । द्वितीय व्यक्ति है, हमारे साहित्यको सर्वश्रेष्ठ कवयित्री और ख्यातिप्राप्त चित्रकर्नी श्रीमती महादेवी वर्मा, जिहाने "विजनवती के भावरण-पृष्ठके लिये चित्र बनानेका कष्ट करके मुझे परम अनुगृहीत किया है। प्रयाग २९ माच, १९३७ इलाचन्द्र जोशी
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भूमिका इधर दस बारह वर्षोक भीतर हिन्दी काव्य-जगत्में जो युगान्तर हुआ है उसके प्रवर तरङ्गाभिघातसे हमारी साहित्य धाराको प्रगति ही एक्दम बदल गई है। गोस्वामी तुलसीदासने हिन्दी-मसारमे प्रथम बार क्रान्ति उत्पन्न की थी। उनके वाद वीच का दीप तीन सौ वपव्यापी काल कृत्रिम काव्य-कलाकी कौतुक- श्रीडा-जनित विफल विस्फूजन तथा व्यर्थ आम्फाल्न का युग रहा है। इस निमम कृत्रिमता के प्रति वास्तविक कवि-हृदयका विद्रोह दीघ कालसे अन्तरिक्षमें सन्वित होता चला आता था। वतमान युगमें नाना वाह्य सयपणो तथा अन्तरावेगोंके कारण वह शत शत धाराओमें उच्छ्वमित होकर निर्मुक्त वेगसे, अविराम गतिसे फूट निकलता है। हिन्दी-साहित्यमें यह द्वितीय बार वास्तविक क्रान्तिको लहर उमड पड़ी है। विरोधियों ने इस परिपूर्ण प्लावन की गति को सवत अवरुद्ध परनेकी चेष्टामें कोई बात उठा नही रखी, पर इस अदम्य सत्यकी प्रचण्ड सघूणन शक्तिका प्रतिरोध परनम वे किसी प्रकार भी समय न हो सके। सत्यमेव जयते नानृतम्। छायावादी कविगण अपनी अन्तरात्माकी वास्तविक वेदना रेकर आविर्भूत हुए थे, इसलिये उनकी विजय अनिवाय पी। आज उनके विरोपियो को भी उनके आगे नतमस्तक होना पड़ा है। वतमान 'छायावादी' युगमें हिन्दीका Romantic युग प्रारम्भ हुआ है। Romanticism क्योकर हिन्दीमें 'छायावाद' के नामसे प्रचलित हो गया, इस रहस्य का उद्घाटन करने का वाम मरा नही है। तथापि इस सम्बधमें मेरी जो कुछ धारणा है, उसे म थोडे शब्दा में व्यक्त कर देना चाहता हूँ। 'छायावादी' कविताओ के प्रचलनके पहले हिन्दीमें दो प्रकारकी कविताएँ छपा करती थी। एक तो नायकनायिका भेद प्रदशन तथा नख सिप-वणनकी पुरानी पद्धति अप अनुकरण में लिखी गयी कविताएँ, और दूसरी कोरी वणनात्मक पविताएँ। इनमें प्रथम प्रकार की कविताएँ तो जूठी पवितामाकी भी जूठन होती थी और उनमें न प्राणो की कोई वेदना और न किसी प्रकारका जीवन-सवेग ही रहता था। दूसरे प्रकार की कविताएँ बच्चो के खेलवाडकी कोरी तुवन्दियोंके अलावा कुछ भी नहीं थी। इन द्वितीय प्रपारसी पविताआ में जो कविताएँ सर्वोच्च कोटिकी समयी जाती थी उनके उत्क्षका पता पाठपास निम्न पक्लियांसे भली भांति लग जायगा- उठो भाइयो! नौवको छोड दो! जगो, जाल आलस्यका तोड दो! मिटे सयदाको अविद्या निशा। प्रभापूण हो जाय प्राची दिशा। पाठक मेरी वातपर विश्वास करें चाहे न करें, पर ये पक्तियो उस समय सवसम्मतिमें सवश्रेष्ठ माने जाने वाले और वस्तुत माननीय कवि महोदयपी तत्वा- लीन सर्वोत्तम कविताआमसे एक्के प्रारम्भ की ह। तात्पय यह कि हिन्दी-ससारके साहित्य रसिकगण इसी प्रकारकी 'प्रसादगुण-समवित, सुस्पष्ट कविताके स्वच्छ सरोवरमें विहार करनेके आदी हो गये थे। इस प्रकारचे पद्योमें तुकोका धारा-प्रवाह अच्छा रहता था, जो उस युग अल्प-सस्कृत पाठकोंके मनामें गुदगुदी- सी पैदा करता था, और उनका अय समझनेके लिये उह माथा खपानेकी कोई आवश्यक्ता ही नहीं रहती थी। (और हिन्दी-ससारमें इस समय भी ऐसे साहित्यिकोकी कमी नही ह जो इसी एक गुणको किसी कविताका सवश्रेष्ठ गुण समझते ह) । अतएव जब उनके सम्मुख अतरात्माकी वास्तविक तथा निगूढ वेदना से प्रसूत कविताएं नये रूपमें तथा नये आकाग्में आने लगी तो वे उहे विचित्र, रहस्य- पूण, अस्पष्ट तथा छायात्मक प्रतीत हुई। अचानक इस प्रकारकी कविताआकी वाढ-सी आते देख वे घबरा उठे और इस घबराहटमें उह कुछ सूप न पडा कि इस श्रेणीकी कविताओको क्या नाम दिया जाय। कोई एक नाम देना परमावश्यक हो उठा, क्याकि 'वास्तविक' कविताओ (अर्थात् सरल तुवन्दियो) को इन 'अवास्तविक' तथा 'अथहीन' कविताओकी बाढसे बचाने, उनके ससगसे सुरक्षित रखनेके लिये ऐसा करना ज़रूरी समझा गया। फलस्वरूप नये ढर्रेको पविताका नाम पड़ा 'छायावादी कविता' और इस श्रेणीकी कविताकी भावधारा का नाम पड़ा 'छायावाद।' यह नाम यद्यपि पीछे स्वय छायावादी कवियोने प्रशसात्मक दृष्टिम स्वीकृत कर लिया, पर वास्तवमें यह नयी शली की कविताके विरोधिया द्वारा घृणात्मक दृष्टिसे रखा गया नाम है। 'छायावादी' शब्दसे उन लोगोका तात्पय यह जताने का था कि नवीन कवियोकी कवितामें भावोकी वास्तविकता नही, बल्कि उसकी छायामात्र रहती है ।
- . ( ७ ) वतमान समयमें 'छायावाद' बहु विस्तृत तथा अनिश्चित अयमें व्यवहृत होता है। कोई पविता चाहे Romantic हो, चाहे Mystic, चाहे Lyric, वह 'छापावादी' ही कही जायगी। इसमें सन्देह नहीं कि उच्चकोटिकी 'रोमाण्टिक' कवितामें ममवाद (Mysticism--जो हिन्दीमें 'रहस्यवाद' के नामसे प्रसिद्ध हुआ ह) की पुट विमी-न किमी अशमें रहना अनिवाय ह, तथापि इस समय विशुद्ध "रहस्यवादी कविताके दा तीन ही आचाय ह, जिनमें श्री 'प्रसाद', श्रीमती महादेवी वर्मा तथा श्री रामकुमार वर्माका नाम विशप रूपसे उत्लेखनीय है। पन्तजीक 'पल्लव'में विशुद्ध रोमाण्टिक रस छलकता ह, पर 'गुञ्जन' में उनका खिंचाव 'रहस्यवाद' की ओर अधिक जान पडता है। निरालाजीने भी 'छायावाद' तथा 'रहस्यवाद दोनाको पूर्ण सफलतासे अपनाया ह, पर कही कही वह इन दोनो वादोंसे बहुत आगे बढ़ गये हैं और आजकल उन्हान अपनी गहन भावमयी कविताओ द्वारा अच्छी धार हिन्दी साहित्यमें जमा रखी ह । कुछ भी हो, मेरा तात्पय यह ह कि पुराणपथियोने यद्यपि नयी शलीकी कविता विरोधमें कोई कोर-यसर नही रखी, तयापि वे अपनी चष्टामें सवथा असफल रहे और अन्तम 'छायावाद' की मायाका ऐसा सिक्का जनतापर जमा कि स्वय पुराणपथी कवि भी अयथा गति न देखकर उसी शलीको अपनानके लिए बाध्य हुए। निरालाजीरी कविताके निरालेपनने और पन्तजीकी कान्त कविताके ललित लावण्य विलासने काव्य रसिकाका दृष्टि- कोण प्रसारित कर दिया, और काव्य-सागरके किनारे उसके छिछले जलम पीडा करके सन्तुष्ट रहनेवाले हिन्दीके आलसी शिशुआ को उसके गम्भीर भावा तया अगाध रसके अगम अतलमें डुबोकर ही छोडा। और अब इस रस-सागरमें "अनबूडे बूडे, तिरे, जे बूडे सब अङ्ग।' यदि विचारपूर्वक देखा जाय तो हिन्दीकी नवीन शलोकी कविताओवा'छाया वादी' नाम एक प्रकारसे साथक हो ह। भले ही यह नामकरण किसी दूसरी दष्टिसे हुआ हो, पर यह निश्चित ह कि नयी शलीकी प्राय सभी कविताएँ 'छायात्मक' होती है। इस व्यक्त जगत्के परे जो एक अदृश्य छाया प्रतिपल अपना झिलमिल रूप दिखाती रहती है उसने हिन्दी प्राय सभी पवियोको अपने अलौकिक रहस्यकी मनोमोहकता कारण प्रवल वेगसे आकर्षित किया है। यह छाया क्या ह? यह कोई भी नही बता सकता। यह अव्यक्त, अज्ञात तया रहस्यमय है और चिरकाल ऐसी ही रहेगी। यही एक कारण ह कि इसका आवर्पण भी कवियां रिये इतना अधिर प्रवेगशाली है। वदान्तिक इमे निर्गुण, निरुप तथा अव्यक्त ( " ब्रह्म कह सकते है, जिसे उपनिपदोने सव रसोका मूल माना ह-"रसो व स (वही रस ह) ऐसा कहा है, साख्यमतवाले उसे मूल प्रकृति कह सकते ह, जो अपनी मायामयी छायाकी नाना रूप रङ्ग-समवित अभिव्यञ्जनासे निखिल पुरुषात्माको विमोहित किये हुए है, जडवादी उसे कवियाका मिथ्या भ्रम तथा आत्मवञ्चक स्वप्नोको निरथक कल्पना कह सकते है। पर यथाथ कवि तत्त्ववादी नही होना, इसलिये इस प्रकारके तात्त्विक विवेचनोमेंसे किसीको भी वह अधिक महत्व नहीं देना चाहता। इस 'छाया'के आविर्भावका मूल कारण चाहे कहीपर हो, वह चाहे उमीकी मानस प्रस्त आत्म वन्वनामयी माया ही क्यो न हो, वह उसे निरन्तर अपनी नव नव रहस्यमयी यलकोंसे, अपनी अज्ञात आवेशमयी, पुलक-हिल्लोलमयी, प्रतिपल आदोलित पलको से, निसिलको विजडित करने वाली, विश्व विसर्पित मनोहारी अरकोंसे विमुग्ध करती रहती है, तथापि स्वय अपरिचित तया अज्ञात ही रह जाती है। केवल यही तथ्य उसको अन्तरात्मा रस-स्रोत उद्वेलित करनेके लिये पर्याप्त है। ब्रह्म अथवा माया, सत्य अथवा मिथ्याके झगड़े में पडनकी न तो उसमें विशेष प्रवृत्ति ही उत्पन होती ह, न वह इस बात का निबटारा ही किसीसे कराना चाहता है। वह जानता हूँ कि वह 'छाया' चाहे मिथ्या माया हो, चाहे कविका भ्रामक स्वप्न, पर उसके लिये तो वह चरम तथा परम सत्यके रूपमें क्षण क्षणमें परिलक्षित होती रहती है। इसका यह अथ नहीं कि वह इस चिर विचित्र मयी छायाका अन्तर्भेद करने, उसके मूल रहस्यसे परिचित होनेकी इच्छा नहीं रखता। वह अवश्य उसकी निगूढताका अन्तपट खोलना चाहता है, पर अपनी ही अनुभूतिसे, न कि किसी तात्त्विक्के सिखलाये हुए ज्ञानके बल पर। हालमें (नवम्बर १९३६ के 'चादमें') पन्तजीकी 'छाया' शीपक एक सुन्दर कविता प्रकाशित हुई ह जिसमें कविकी इस चिर-सहचरी, आजावन परिचिता तथापि चिर-अज्ञाता छायाके मर्मोद्घाटनकी वेदना बडे अच्छे ढंगसे व्यक्त हुई है। उसके कुछ जशाको उद्धत करनेका लोभ म यहा संभाल नही सक्ता- खोलो मुखसे घूघट खोलो! हे चिर अवगुण्ठनमयि, बोलो। क्या तुम फेवल चिर अवगुण्ठन ? अथवा भीतर जीवन-कम्पन ? x x x पटपर पट, केवल अधकार, पटपर पट पुले, न मिला पार! सखि हटा अपरिचय-अपकार, खोलो रहस्यके ममद्वार! x x x म हार गया तह छील छोल, आँखोंसे प्रिय छवि लील-लील, महूँ या तुम, यह क्सा छल! या हम दोनो, दोनो बल? स्पष्ट है कि कवि 'छाया'की भ्रामरी मायाके चक्करमें पडवर विचित्र उलझन- में है। वह जानता है कि इस रहस्यमयी कुहक्निीके रहस्यका पता पाना असम्भव ही ह, तथापि उसके लीला-वचिश्यने उसे इस प्रकार भुला रखा है कि यह सन्देह होते हुए भी वि कही वह झूठी माया तो नही है, वह उसका सङ्ग त्याग करनेकी तनिक भी इच्छा नहीं रखता और नाना विरोधी वारण होते हुए भी उसकी अन्त- रात्मा उसी छायाको एकमात्र सत्य मानना चाहती है। केवल हमारे छायावादी कवि ही नहीं, ससारके बहुतसे श्रेष्ठ कवियोको प्रकृति- की छायात्मिका मोहिनीने लुभाया है, और यद्यपि वे लोग इस वातका निणय न कर सके कि वह स्वप्न है या सत्य, तथापि उसकी बहुरङ्गी लीलामें वे उ मुक्त आत्मासे सम्मिलित हुए ह और इसीमें उन्होने अपने अन्तरकी रसाकापिणी प्रवृत्तिकी चरम साथकता मानी ह। कालिदासको मेघदूत-रचनाकी प्रेरणा तभी प्राप्त हुई थी जब वे इस छायाकी मायावे भुलावेमें आये थे, अन्यया उनमें कभी चित्रकूट-पवतमें यक्षको खडा करके उसस छायात्मक मेघ द्वारा अपनी विरहिणी प्रियाको सन्देश पठाने के बहाने छायाकी नव-नव रूपमयी लीलाओकी विचित्रता- का रस स्वय पान करने तया दूसराको पान करानेकी आकाक्षा जागरित न हो पाती। रवीन्द्रनाथको इस छायात्मिका मायाने नाना रूपोंसे भुलाया है, जिनका मनोहर वणन उन्हाने अपनी विभिन कविताओमें दिया ह। इस 'छाया'का लीला- वचित्र्य देखकर उन्हाने उसे 'चित्रा' नाम दिया है। अपनी 'चित्रा' शीपर प्रसिद्ध कवितामें वह इसी 'छाया के सम्बधम लिखते हैं- पद्य ( १० ) जगतेर माझे क्त विचित्र तुमि है तुम विचित्ररूपिणी! अयुत आलोके झलसिछो नील गगने, आकुल पुलके उलसिछो फूल-कानने, धुलोके भूलोके विलसिछो चल-चरणे, तुमि चञ्चल-गामिनी। अतर माझे शुध तुमि एका एकाकी तुमि अतरव्यापिनी! ऐक्टि स्वप्न मुग्ध सजल नयने, ऐक्टि हृदय-वत-शयने, ऐक्टि चन्द्र असीम चित्त-गगने, चारिदिके चिर-यामिनी। "हे विचिनरूपिणी । तुम जगतमें क्तिने विचिन रूपोमें विचरण कर रही हो। नील गगनमें तुम अयुत आलोकसे प्रभासित हो रही हो, फूल-कानामें पुलकित हो रही हो, धुलोक और भूलोकमें तुम चञ्चलगामिनी अपने चल चरणोंके विलाससे तरङ्गित हो रही हो "अन्तरमें तुम एकदम अकेली व्याप रही हो । मुग्ध सजल नयनमें एक स्वप्न- के समान, हृदय-वृन्त-शयनमें एक पद्मके समान, असीम चित्त-गगनमें एक मान चद्रके समान स्थिर हो, जब कि चारो ओर चिरन्यामिनी विराज रही है।" अट्ठारहवी तथा उन्नीसवी ताब्दियोमें इगलड तथा मासके सभी रोमाण्टिक तथा मिस्टिक कवियोने इसी 'चित्रा की बहुविध अचनामें अपना काव्य-भण्डार खाली किया है । इगल्डके वड्सक्थ, शली, कीटस, ब्राउनिंग, टेनिसन आदि तथा झासमें हगो (Hugo) लामातिन, बोदेलेयर (Baudelaure) आदि कवि इस सम्बधमें विशेषरूपसे उल्लेखनीय ह। जमनीमें गेटे (Goethe) अपने जगत्प्रसिद्ध काव्यात्मक नाटक Faust में (विशेप करके द्वितीय भागमें) इसी चिना-माया की छाया पूणत मग्न हुआ है और हाइने (Heine) को तो आजीवन यह छाया भूतकी मायाकी तरह प्रवल प्रवेगसे अपनी ओर आकर्षित करती रही है । विश्व-काव्य साहित्यमें छायाका जाल विस्तृत रूपसे फैला हुआ होनेपर भी हमारे कुछ साहित्यिक तथा अधिकाश साहित्यानुरागी पाठकगण उससे परिचित 1 न होने तथा परिचित होने का कष्ट उठानेकी इच्छा न रखने के कारण हिन्दीकी छायावादी कविताओको समय नहीं पाते और विश्व-साहित्यका ज्ञान न होनेके कारण उन कविताओको अथहीन कहकर उहे ठुकरानेकी विफल चेष्टा करते है। 'छाया' आखिर छाया ही है । वह जब स्वय कविके लिये रहस्यमयी सिद्ध होती है तो पाठकोको वह और भी अधिक गहन रहस्यसे वृत्त मालूम होगी, इसमें आश्चयकी कौनसी बात है। पर इसका तात्पय यह नहीं कि 'छायावादी कविताएँ (मेरा आशय उच्चकोटिकी छायावादी कविताआसे ह) पागलके प्रलापकी तरह अथहीन होती ह । यदि लोग चाहते ह कि उनका अथ समझें तो उह पहले विश्व- साहित्यका गहन अध्ययन करना होगा और उसके बाद आत्म-मनन द्वारा अपनी निजी अनुभूतिको विकसित करके कविकी अन्तरात्मासे समान-वेदन-जनित सम्बध स्थापित करना होगा। तब जाकर वे उन कविताओका यथाय रस ग्रहण करने में समय हो सकते है। हिन्दीके अनेक साहित्यिक तथा साहित्य प्रेमी कवितामें अस्पष्टताको एक बहुत बडा दोष मानते ह। पर यह उनकी भ्रान्त धारणा है। भाषाकी कृत्रिम जटिलता तथा शैलीकी कठोर कुटिलताके कारण जा कविता अस्पष्ट होती है वह वास्तवमें निन्दनीय है। पर बहुत सी उच्चकोटिकी कविताएँ भावोकी गहनताके कारण अस्पष्ट जान पड़ती है। इस श्रेणीकी कविताओकी अस्पष्टता निदनीय नहीं, बल्कि अत्यत प्रशसनीय समझी जानी चाहिये। प्रत्येक उच्चकोटि की कविता में कवि की आत्मा की निगूढतम आकाक्षानो का आभास स्वप्नांके रूपमें झलकता है। पर स्वप्न एक ऐसी माया है जो कभी स्पष्ट हो ही नहीं सकती, इस वातका अनुभव प्रत्येक व्यक्तिको अपने रात दिन- के स्वप्नोंसे हो सकता है। पर कोई भी स्वप्न प्रस्टमें कैसा ही ऊटपटाग तथा अस्पष्ट क्या न जान पड़े, किन्तु वास्तवमें उसकी प्रत्येक घटना ज्वलन्त सत्यसे घडक्ती रहती है। यह बात Freud तथा Jung के समान भनस्तत्व विश्लेषकोने अच्छी तरह सिद्ध परके दिखा दी ह। आज तक स्वप्ना सवधर्म जनतामें कई प्रकारको भ्रान्त धारणाएँ पाई जाती थी।अप विश्वासी लोग उह भविष्यवाणिया- के रूपमें ग्रहण करते ह, अधविश्वासोको ठुकरानेवाले विज्ञानवादी उह आज- तक अभहीन मनोविकार कहकर उडा दिया करते थे। पर फायड इन दोनो सिद्धा- न्ताको नहीं मानता। उसका कहना है कि प्रत्येर स्वप्नमें हम अपने Unconscious (जिसे हम अज्ञात चेतना कह सकते है) में छिपी हुई तया अव्यक्त अनात ( १२ ) आकाक्षाओको चरितायताका सुख अथवा दुय प्राप्त करते ह–पर प्रकट तथा स्पष्ट रूपमें नही, अस्पष्ट तथा साद्देतिक रूपमें। फ्रायडका क्थन ह कि स्वप्न कैसा ही विकृत और अथहीन क्या न जान पडे,उसकी प्रत्येव असम्बद्ध तथा असङ्गत घटना विशेष अथ रखती है, पर सावेतिक रूपमें। अर्थात् प्रत्येक स्वप्न हमारी निगूढ आकाक्षाआका रूपक है। उसी प्रकार एक विशेष श्रेणोकी कविताएँ ऐसी होती ह जो कवियोकी अन्तर्चेतनामें जागरित होने वाली अज्ञात आकाक्षाआको स्वप्नोके आकारमें वेप बदलकर साङ्केतिक रूपमें अपनेको व्यक्त करती है । कविकी अतरात्मा नहीं चाहती कि वह अपनी अज्ञात आकाक्षाको नग्न रूपमें, लज्जारहित अवस्थामें अभिव्यजित करे। इसलिये वह नाना रङ्गीन आवरणो, नाना रूपकोका सृजन करके इद्रजालमय वानेसे उहे ढक्कर हमारे सामने रखता है। स्मरण रहे कि इन रूपकोका मायावी पट वह सचेत अवस्थामें, जानबूझकर तयार नहीं करता, बल्कि उसकी अज्ञात चेतना उससे यह काय करवाती ह । उसकी अज्ञात चेतना जानती ह कि नग्नता और स्पष्टता सौदयके मूल रसको नष्ट कर देती ह, इस कारण उसे मनोमोहक बनाने के लिये छायामय माया रङ्गीन जालका आवरण निर्मित होना आवश्यक ह । आजपलके जो बने हुए वस्तुतत्रवादी (Pseudo-realists) नग्न रूपमें चित्रित की गई यथायताको हो कलाकी चरम श्रेष्ठता मानत ह, उनकी अज्ञात चेतना विकृत हो चुकी है, यह बात निश्चित रूप से कही जा सकती है। प्रकृतिके मूल के द्रम सृष्टिको निगढ वासनामयी प्रवृत्ति के जो बीज अव्यक्तरूपमें छिपे हुए ह वे अपनेको आकाशके तारा, पथ्वीके पत्र पुप्पो और हरी-भरी लताआ, वर्षा, शरत्, वसन्त आदि ऋतुओकी नव-नव हिल्लोल- मयी धाराओके रूपमें प्रस्फुटित होकर व्यक्त करते ह-इही स्वप्नाक रूपमें प्रकृतिकी अतरतम आकाक्षाएँ अभिरन्जित होकर हमें आनद प्रदान करती ह, और प्रकृतिके आभ्य तरिक भारको हलका करती है । अर्थात् अपने अन्तर्चेतनको रूपकके रूपमें व्यक्त करनेकी प्रवृत्ति मूल प्रकृतिम ही वतमान है। यदि प्रकृति अपनेको इस प्रकार रूपकके रूप में प्रकट न करती और अपनी अन्तरात्माको नग्न निलज्ज स्पमें व्यक्त होनवे लिये लालायित होकर दागी यथायवाहियोका सम- थन करनेपर उतारू हो जाती, तो पथ्वीमें प्रतिक्षण ज्वालामुखियोका प्रचण्ड यग्नि-उद्गीरण, समुद्र में प्रतिपल उत्ताल तरङ्गमालाआका भयङ्कर विस्फूजन, आकाशमें निरन्तर मेघमालाआका रुद्र कोपमय वज्र-वपण तथा नक्षत्रोंके रूपमें दिखाई देने वारे कोटि-कोटि महासूर्योका अहरह प्रलयङ्कर ज्वालामय संघपण दृष्टिगोचर होता, क्योकि यही प्रकृतिचे भीतरका नग्नरूप है। इसमें सन्दह नहीं कि इस नग्न रूपको प्रकृति कभी कभी बीच-बीच में क्षणकालरे लिये अभिव्यक्त कर बठनी है। ऐसे अवसरोपर समझ लेना चाहिये कि उसकी अन्तर्चेतनामें क्षणिक विवार उपस्थित हो गया ह । इसमें सन्देह रही कि यह क्षणिक विकार भी कविता- के रूपमें (रौद्र रस के बतौर) परिणत किया जा सकता है, पर तभी जब वह प्रकृति- के मूल सामाजस्यके ससगम लाया जा सके। यहाँपर प्रसङ्गवश यह जता देना भी आवश्यक है कि विकार न होनेपर भी साधारण अवस्थामे भी, जब कि प्रकृति सुन्दर स्वप्नो, नाना रसो तथा मनोहर दृश्यो रूपमें अपनी मूलात्माको अभिव्यक्त करती है, उस समय भी, उसके भीतर मालोडन विलोडन किसी न किसी रूपमें जारी रहता है। यह स्वाभाविक है। जो किया (Process) स्वप्नोका सृजन करती है उसकी प्रतिक्रिया उसे अभ्यन्तरके एक सिरेसे दूसरे सिरे तक आन्दोलित किये बिना नहीं रह सकती, हम उस आन्दोलनको भले ही न देख पायें। प्रकृति स्वप्न-सृजनके सम्बध जो बातें कही गई है वे ही बातें कविके म्वप्न सृजनके सम्बध भी कही जा सकती है, क्याकि कविकी प्रतिमाको क्रिया भी प्रकृतिमी ममान धारामें अज्ञातरूपमे चला करती है। रवि जिन स्वप्नोको कवितामें अङ्कित करता है उहे रचनेमें उसके अभ्यन्तग्में भीषण सघपण विधपण- का आलोडन भी मचता ह ! उसे पाठक भले ही न देखें, पर वह कविको सक्षम विये रहता है। हम देख चुके ह कि पविवे स्वप्न बविताने रूपमें रूपक्के बतौर स्फुटित हाने ह। यह रूपप-रस काव्य-साहित्यमें वाई नयी वस्तु नही है। प्राचीनतम फालसे कविगण इस रसको धारा बहाते चले आये ह । पौराणिक गाथाओके कवि (प्राच्य तथा पाश्चात्य सभी देशो में) इस रसको अजस धारारो साहित्य जगतो आप्लुत कर गये ह । कालिदासके मेघदून में यह रस त्यालब भरा हुआ है। यक्ष विरह और वपातरी वेदनावे रूपमें वापकी जडतामे चिरस्तन मानवात्माती चिर मिशन-व्याकुलता व्यक्त करके अरकापुरी-रूपी चिरयौवन- के चिदानन्दमय राज्य शाश्वत सुम्पनी प्राप्तिकी ओर उसकी चिर-उत्सुक्ता- पा स्वरूप कालिदासने अमर रूपये रूपमें वणित विया । Freud ने स्वप्नको जिस Wish-fulfilment या Symbol बताया ह, पालिदासके मेघदूतमें यह पूणत प्रतिपरित हुआ है। अठारही तया उन्नीसवी पातादिपो. ।
( १८ ) के यूरोपियन कवियोकी कविताओमें रूपक रसके अतिरिक्त और कुछ नहीं पाया जाता। हमारे यहा वतमान युगमें रवीन्द्रनायकी कवितामें यह रस जिस परि- पूण वेगसे उमडा ह वसा शायद ही ससारके क्सिी बय कविकी कवितामें सम्भव हुआ हो। वतमान हिदी कवितामें भी हम उस रसको छलकते हुए देखते है । छायावादी कवितापी विशेषता और महत्ता इसी बातपर है कि वह इस रूपक-रस- को अत्यन्त मनोहर तथा मुग्धकर रूपमें हमारे आगे रखने में समय हुई ह। अपनी आत्माके निपीडनमे सुदर रूपक्मय स्वप्नोको सृजन करनेवाले इन कवियाकी कविताआको जस्पष्ट करार देकर उनकी अवज्ञा करनेसे काम नहीं चलेगा, बल्कि चेष्टा यह करनी होगी कि उह समझने के लिये अपनी आत्मानु- भूतिसे उनकी आत्मानुभूतिकी कुञ्जी प्राप्त की जाय। कविको कविता उसकी जीवनकालव्यापी साधनाका धन होती है। उसे एक चुटकीमें उडा देना अथवा सरसरी निगाहसे एक बार पढकर न समझ पानेपर उसे अथहीन करार देना, कवि तथा कविताके प्रति घोर अयाय करना है। विश्वविद्यालयोमें शेली, कीट्स, कालेरिज, वडस्वथ आदिकी कविताआपर नोटपर नोट छानाको रटाये जाते है, तव भी छात्रगण उह अच्छी तरह समझ नही पाते। यह होनेपर भी किमी साहित्यालोचकने यह नहीं कहा कि वे 'छायावादी और अयहीन है । तब बेचारी हिन्दी कवितापर यह जुल्म क्यो? यह केवल अपनी मातृभाषाकी विवशताका अनुचित लाभ उठाना है। अस्पष्टताके अलावा वतमान हिन्दीकवितापर एक और दोप लगाया जाता है। लोग अक्सर कहा करते है कि छायावादी कवियोकी कविताआमें घोर नैराश्य तथा गहन विषादकी प्रगाढ छाया पाई जाती है और जीवनका आनन्द, आशा तया उल्लासको किञ्चित् झलक भी उनमें नहीं पाई जाती। हमारे नवीन कवियोके सकरण सदन तया मद मधुर वेदनके वणनोको वे लोग नपुसकता तथा निर्जीवताकी निशानी समझते है । वे लोग यह बात समझना नहीं चाहते कि प्राचीनतम कालसे 'कवि लोग करुण अथवा विषाद रसका ही प्रमुख रस मानते चले आये है। बल्कि भवभूनि जमे सर्वोत्तम कदियाने परण-रसको ही एकमात्र रस माना ह (एको रस करुणमेव)। आदि कवि वाल्मीकिकी अन्तरात्मामें करुणा तथा विषादके भावसे प्रेरणा पानेसे ही काव्य-सागरकी अनन्त धाराएं हिल्लोलित हो उठी थी। महाभारतमें पाव्यको दृष्टिसे हमें द्रौपदीके चीर-आक्पण तथा वीचक द्वारा अपमानित होनेपर निस्स- । हायावस्यामें उसके मात विलाप, दमयन्तोकी निदारुण नियतिन-गाथा, आदि करुण तथा विपार-रसपूर्ण घटनाओमें जो रस प्राप्त होता है, वह किसी वीररसपूण अथवा भोगविलासमय वणनमें नहीं। रामायणकी सारी पथा विपादके भावसे ओतप्रोत है। राम-वनवासकी हुदय-विदारक घटना उस भावके के में स्थित है और सीता- वनवासकी ममघाती घटना इस महाकाव्यका Finishing touch दे देती है। तुलसीदासको रामायणमें काल्योलपकी दष्टिसे उम स्थानमा वणन सबसे अधिक सुन्दर है जहां पर पदिने भरतकी राम विरह-जनित व्याकुलता, अनुशोवना, रोदन गन्दनके माय-साथ उनका विह्वल प्रेमो माद वर्णित करत हुए अन्त में उम अवस्थामें उसकी परिणति दिपाई ह जव भरत वनमें रामरे समीप आकर पाहि नाम कहि पाइ गुसाई। भूतल परे लकुट की नाई। भरतवे इस बात पन्दन तथा मोहमग अवस्थाको भी हमारे 'धीर, वीर, गम्भीर' साहित्यालोचक नपुसक्तारी ही निशानी बतायेंगे, पर कवि प्राण रसिक- जन इसी वणनमें काव्यवा चरम सौन्दय पाते ह । यूरोपके अर्वाचीन साहित्यमें विषादकी रेवा प्रगाढ रूपसे अकित है। शेक्स- पियर, गेटे (Goethe), शिलर आदि नाटककारी तथा कवियोकी रचनाओमें विपाद रस कूट-कूटकर मरा हुआ पाया जाता है। शेक्सपियर के हमलेट में यह रम पराकाष्ठाको पहुँचा दिया गया है, गेटेर Werther तथा Faust में मानव-जीवनको असफरता, मनुष्य-चरितकी दुबलता, स्वायमग्न मसारको सकीण हृदयता आदि और भी कई निराशाजनक कारणांके अस्तित्वसे जीवनकी व्यथताका चित्र प्रतिफलित हुआ है। गायरनको निराशावादिताके कारण Byronism का मत चल गया है, इटलीमें Leopardi, फ्रासमें Lamartune, रूस आदिमें Poushkin प्रमुख लेखकोकी रचनायोमें विपाद ही केन्द्रगन भाव है। माधुनिक यूरोपियन साहित्यमें शायद ही कोई श्रेष्ठ लेखक ऐसा देखने में आवे, जिसकी रचना विपाल्के भावसे मस्लिप्ट न हो। शेलीका जीवन जिस प्रकार सक्टाकुल था, उसकी पविनामें भी दुसकी वसी ही प्रगाढ छाया पड़ी है। 'Blithe Spitut' अथवा 'Spitut of Delight' की सोजमें वह व्यस्त है, पर West Wind' को Wild Spaut' तथा 'Spint of Night' के प्रगाढ़ अधकारमय, सव-सहारर हानेपर भी नव जीवन और उज्ज्वलनाकी सूचना- प्रदर्शक रूपपर वह जो जानसे मुग्ध ह। और तो क्या, वडस्वय' तथा टेनिसनो समान शान्त प्रकृति कवियोकी कविता तकमें विषादका मदु भाव पाया जाता है। लूसी नामकी एक छोटी लडकीके कम निरत, सेवापरायण निरानन्द तथापि शात, सयत तथा निर्विकार जीवनकी करुणा गाथाके वणनमे वडस्वथको कविताका मूलभाव केंद्रीभूत होता है। टेनिसनकी कविता उसके 'Lotos Eaters' की 'Mild-minded Melancholy' (मद-मधुर विपाद)से सवत्र आच्छन्न हुई ह। इन दो कवियोके विपादके भावमें तथा गोल्डस्मिथके 'Deserted Village at Vicar of Wakefield" मूल-रसमें हैमलेटका तीन विद्रोह नहीं झलक्ता, इसमें सदेह नही, पर इन कवियोकी कल्पनामें अनन्तके कठिन सनातन नियम (Eternal Law) के पदप्रान्तमें विरहिणी मुग्धा नायिकाकी सहनशीलताके साथ आत्मसमपण करनेका भाव प्रतिविवित होता है। ईसाका मत दुखके प्रति यही भाव पोपित करनेका उपदेश देता है। ईसाई धममें दुख घमका एक आवश्यक अग बतलाया गया ह। ईसाकी "Blessed are they that mourn, for they shall be comfort ed" इस उक्तिमें यही भाव झलकता है। इसलिये यूरोपवे कई श्रेष्ठ साहित्यिको तथा शिल्पियोने यह भाव अपनाया ह। प्रसिद्ध फासीसी चिनकार मिलेने जब किसानो तथा मजदूरोंवे जीवन मधुर चित्र अकित किए, तो देशमें विपाद रसका अपूर्व प्लावन बहा दिया, टाल्सटायने अय कई प्रसिद्ध चित्रकारो तथा क्लाकोविदोकी तीन निंदा करते हुए मिलेके सबधमें लिखा था कि विषाद- का विशुद्ध तथा पवित्र भाव दरसानेके कारण उसके चित्र ईसाई धमके अनुकूल हैं। रूसो, उमके भक्त टाल्मटाय, तथा इन दोनोके भक्त रामा रोलां-इन तीन मनीषियाने ईसाके आडबरहीन, सच्चे अनुयायी होनेवे कारण, अपने हृदयमें स्थित विपादके भावको गवके साथ अपनाकर उसे महिमावित किया है। कालिदासके मेघदूतमें चिर विरहन विपादका ही सकरुण, पर मधुर तथा आनदयुक्न गान गीत हुआ ह, 'कुमार-सभव में पावतीको कठिन तपस्या, विशुद्ध तथा स्थायी प्रेमके लिये यावश्यक कठिन त्याग तथा दुखको चिरकालिक महिमा का ही प्रतिरूप है। 'अभिज्ञान शाकुन्तल' यद्यपि सुपात नाटक ह, पर उसे पढने पर, अन्तमें दुप्यत तथा शकुन्तलाका मिल्न सघटित होनेपर भी, हृदयमें दुखिनी शकुन्तलाके नियम-क्षाम मुसको विषाद-म्लान छाया ही घिरी रहती है। उत्तररामचरित में भी रामसीताके अनिम मिलनके कारण, हृदयमें अक्ति निर्वासिता सीताका 'विग्ना कुररीव' दीण ऋदन किसी तरह मिटना नहीं चाहता। ऐसा क्या होता है? मनुष्यको आनदके विशुद्ध भावसे विरह मिश्रित आनद क्या इतना मुखकर प्रतीत होता है ? कोरे सुग्वके हास्पसे स्नेह-गलिन आनदायु क्यो प्रिप मालूम होते ह? नवीना विशोरीकी प्रेम-जनित चचलतासे परिणतयौवना रमणी मातृ-हृदयका विह्वल गाभीय क्यो मधुरतर जान पड़ता है? मनुष्यकी यह विपाद-प्राहिणी प्रवृत्ति अत्यत रहस्यमय है। वसतवे उज्वल प्रभातसे शरत्-कालकी प्रशात सध्या हृदयमें अधिक उत्सुकता उत्पन्न करती है। नदीके चचल पलहास्यसे समुद्रका विकराल गाभीय कवियोको अधिक माहित करता है। उद्यानकी रमणीयतासे अरण्यको मर्मरध्वनि चित्तको अधिक आदो- लित करती है। में पहले कह चुका है कि रवीद्रनाथको छायाके भावने अधिक मोहित किया है। व्यक्तके पीछे वह सदा अव्यक्तकी छायाके सधानमें रहे हैं। उज्वरनाके दृश्यमे उनके हृदयमें अधकारकी छाया घनीभूत हुई है। विषाद- के गाभीयका उन्हाने गौरवके साथ वणन किया है। अपनी एक कवितामें वह स्वय लिखते ह कि "यदि आज मेरी प्रिया जीवित होती तो उसे म अपने हृदयमें स्थित विपादकी वृहत् छाया नया सुगभीर विरह व्यक्न परखे दिसराता।" इसी वातको उन्हान फिरसे समझाया है-"जिस प्रकार दिनका अवसान होनेपर रानिक अधकार मिलयमें विश्व अपने ग्रह-तायााको लेकर प्रस्ट होता है, उसी प्रकार हास्य-परिहासमे मुक्त इस मेरे हृदयमें वह अतहीन जगत्वा विस्तार देवती।" आत्माको चिपुरता अधकारको विजनतामें ही प्रकट होती है। उज्वलता में चाचल्यका भाव वर्तमान रहता है, और अधपारमें एक प्रकारका स्थायित्व है। इसी कारण अंधकारखी स्तव्यता कवियाको इतनी प्रिय है। मध्या तारावे स्तिमित प्रकाशमें एक प्रकारके मपुर तथा स्थाया विपादका भाव वतमान है। इसलिये कितने ही पवियाने पिनने ही प्रकारमे इसके सौंदयका वर्णन किया है, पर फिर भी उहे तृप्ति नहीं हुई। बनमान हिन्दी कविताको अस्पष्टता, उसरे रूपपमय रूप, विपाद-रस आदि- वे सबध मने जोपैफियत पेश की है वे याही नहीं। अगरेजीसरी इम मशहूर मसल. से सभी परिचित ह कि दापी आत्मा सदायित रहती है। मेरा भी यही हार ह। मुये भी यह दावा है कि विद्वज्जन मेरी पवितातो पढकर उनपर ये ही दोर आरोपित परेंगे। क्यापि यद्यपि मुझे अपनी कविताएँ जलवत तरल, और मागेक- - ( १८ ) रश्मिवत् सरल मालूम पड़ती है, तथापि सम्भव ह बहुत-मे पाठकाको वे कठिन और कुटिल जान पड़ें। इसके अलावा मेरी अधिकाश कविताएँ रूपकमय हैं और उनमें विपाद रसकी प्रबलता है। इसलिये मुझे वतमान हिदी कविताआकी आलोचनामें उक्त 'दोषो'को सफाई देनी पड़ी है। पर केवल इतनीसी सफाईस मेरा काम नहा चलेगा। 'परिमल'को भूमिका निरालाजीका यह कथन मुझे अत्यन्त उपयुक्न जान पडा कि अपनी कविता पुस्तकको भूमिकामें स्वय अपनी ही कविताओंके सम्बधर्म प्रकाश डालनेका प्रयत्न मूखतापूण तथा हास्यास्पद ह। (निरालाजीके शब्द मुझे याद नहीं है, पर जहा तक मेरा खयाल ह उनका आशय कुछ इसी प्रकारका था।) म इस प्रकारकी चेष्टाको हास्यास्पद मूखताको भली भांति महसूस करते हुए भी अपनी कुछ विशिष्ट कविताओंके सम्बधमें कुछ कर्नेके लिये इस कारण विवश हूँ कि मेरे कुछ साहित्यिक मित्रोने मुये इसके लिये अनुरोध किया है। 'विशाल भारत' के सुयोग्य तथा विद्वान् सह सम्पादक श्री वजमान वमाने भी मुझे यही राय दी है। मने इस सग्रहकी सब कविताएँ वर्माजीको पढने के लिये दी थी। उह यद्यपि उन कविताओमेसे किसीका भी भावाथ समझने में कही किसी प्रकारकी रुकावट नही पडी और उहोने प्रत्येक कविताका वही अथ लगाया जसा कि मेरे मनमें कविता लिखते समय वतमान था, तथापि उन्होने इस वातकी आवश्यक्ता महसूस की कि पुस्तकको भूमिकामें कविताओके रूपकात्मक भावांके सम्बधमें थोडा-बहुत प्रकाश डाला जाय। अतएव म इस सम्बधमें दो शब्द कहना आवश्यक समझता हूँ। सबसे पहले म अपनी राजकुमार शीपक कवितापर यत्किञ्चित् प्रकाश डालना चाहता हूँ। इस कविताके सम्बध साहित्यके पारखियोका कहना है कि छद-सङ्गीत,भापा-लालित्य तथा रचना वचिश्यकी दृष्टिसे कविता सुन्दर होने पर भी उसका रूपकात्मक भाव समझमें आना कठिन है। मेरी तुच्छ सम्मतिमें यदि पाठक विरोधी सस्कारोको मनसे हटाकर कविताका यथाथ भाव जाननेको इच्छासे इसे पढ़े तो उहे मालूम होगा, उसका मनोवज्ञानिक रूपक अत्यन्त स्पष्ट तथा सरल ह । उक्न कवितामें एक निमल, निष्क्लुप तथा निरिप्त आत्माके उ मेप, विकास तथा ह्रासका मनोवैज्ञानिक वणन रूप रसकी दृष्टिसे किया गया है। हिमवी उज्ज्वल शुभ्रताको म सक्दा पवित्रताका Symbol मानता आया हूँ। इसलिये मेरे राजकुमारकी निवासभूमि- शुभ्र गान्त हिम-महिम असीम विजनमें होनेसे उसकी पारिपाश्विर स्थिति उसकी निमल आत्मावे पूणत अनुकूल है। जिन लोगाने कभी जाडामें पहाडोपर बरफ गिरते हुए नहीं देखी अथवा पभी "हिमालय के दशन नहीं दिये वे इस वातकी कल्पना तक नहीं कर सकते कि मिराशि अथवा हिमानीकी शुभ्र उज्ज्वलता क्या चीज है। यह बात विना अतिशयोक्निके पही जा सकती है कि यदि अमावस्यावी घन मेघाच्छन्न अधवार राविमें भी जमीनपर वरफ विछी हुई हो तो उस वरफी सफेदी कारण चादनी रातवा भान हाने लगता है फिर चांदनी रातके सवधमें पहना हो क्या है । तव तो परिस्तान भी उस दृश्यके आगे नाचीज़ मालूम होता ह । अस्तु। इस प्रकारखी शुभ्र स्वत नीहार रागिक वीच 'मिकी स्फटिय शिलासे रचित भवनमें' नित एवाकी रह्ने वाले राजकुमारको निष्क्लङ्क आत्मा नित उल्लसित रहेगी, इसमें आश्चय ही क्या है। हिमपी केवल शुभ्रता ही पवित्रताको द्योतक नहीं है, बल्कि उसका शत्य (ठण्ढय) भी इसी भावको जताता ह। पवियाने यौवनोमादकी उपमा अग्निसे दी है और उत्कट काम-लालसारा लोग प्राय कामाग्नि पहा करत ह। इसके विपरीत कामेच्छासे विरतिको अगरेजीम frigidity कहते ह, जिससे बरफकी तरह जम जानेका भाव व्यक्त हाता ह। शेक्सपियरने भी As chaste as ice (हिमके समान काम वासना रहित), इस भावके द्वारा स्त्रीकी अकाम मनो वृत्तिका वणन किया है। मेरे राजकुमारको आत्मा अपनी प्रभातकालीन अवस्थामें हिम-महिम अमीम विजनमें निजन निर्वासकी दशामें रहने और नित्य अपन भीतर तथा बाहर, सवा, एक ही निविचित्र रूप (अथवा या कहिये कि अरूप-क्याकि हिमकी शुभ्रतापा कोई रूप या रङ्ग नहीं होता) के दशन करते हुए अलस शान्तिमें मग्न रहती थी- एक रूप प्रतिबिम्बित था उस मनमें, प्रतिभासित थी हाय एक ही ज्योती! शूय हृदपके उस निस्पद विजनमें अलस शान्ति थी झूम-झूमकर सोती। तथापि वह अपने आपमें ही मग्न रहकर परिपूर्णताचे उल्लाससे उच्छ्वसित रहता था। यह दशा केवल मेरे राजकुमारखी ही नही, वैदान्तिकोकी भापामे प्रत्येक २ ( २० ) जीवात्माको प्रारम्भिक अनुप अवस्था इसी प्रकारकी होती है। पर धीरे धीरे उसपर मायात्मिका प्रकृति अनक रूप, बहुरङ्ग, तथा रस वचिश्यका जाल फलाने लगती ह और वह अपनी निविचितता तथा एक रूपतासे उक्ताने लगती है। मेरे राजकुमारका भी वही हाल हुआ। उसपर यौवनको रङ्गीनी छाने लगती है और वह जीवनकी बहुरङ्गी वणच्छटा, तथा नाना रूप रस-गधमय लुब्धताकी ओर धावित होनेके लिये छटपटाने लगता ह। उसकी इस अनन्त रङ्ग-नथा अपार तरङ्गमयी अभिलापा अथवा वासनाकी तृप्ति अलकापुरीके चिर यौवनमय तया सदावहार प्रदेशमें ही अच्छी तरह हो सकती थी। इसलिये मने उसे वही रूप-रग, यौवन-उमङ्ग तया अमर-अनङ्गकी मुक्त तरङ्गमें लावर खडा किया ह। शुभ्र हिम-महिम असीम विजनसे, जहाँ चारो ओर वेचल अनन्त प्रसारित हिमकी एकरूपतावे अतिरिक्त और कुछ दृष्टिगोचर नहीं होता था, अलकापुरीके बहुरङ्गी मायामय लोकका अच्छा contrast (विरोधाभास) मुझे जान पडा। अरकामें विविध रूप रस- गकी विचित्रताका मनमाना उपभोग कर चुकने के बाद राजकुमार अधाने लगता है। और धीरे धीरे एक कालिमा छाया लगी हाय दोनोके मुहमें छाने, अवश हुई लालस रस विजडित काया, फलुषित यौवन-कली लगी कुम्हलाने। यौवनो माद ठण्डा पडनेसे केवल राजकुमारकी आत्मामें ही क्रान्ति नहीं मची, उसको पारिपाश्विक अवस्थामे भी परिवता होने लगा। उदाहरणाथ, कनक शेलकी दीप्ति अस्तगत हुई, अलकाकी स्वण रेणुको रगत विरकिरी हो गयी और वह तुच्छ धूलि-सी आकाशमें उडने लगी। असल बात यह है कि रेणु वास्तवमें स्वणकी नहीं थी, केवल यौवनकी मायाने उमे वह लोक प्रवञ्चक रूप दिया था। यौवनकी उमङ्ग शिथिल पडनेपर सब चीजें अपने यथाय रूपमें दिखाई देंगी, इसमें पाश्चयकी कौनसी वात हो राजकुमारको फिरसे अपने हिम-लोक, हिम भवन और हिम-परियाकी याद आन रगी और वह बहुरङ्गी मायाका तजकर अञ्चल शुभ्र रूपके चरणोमें रोनेको ( २१ ) छटपटाने लगा। अर्थात् वह फिरले बहुरूपात्मिमा पनि मायाजासे छुटकारा पाकर अस्पयो शुभ शान्तिमें विलीन होनेके लिये रालायित हुआ। लगन जो लगी तो वह माया-बधन तोडकर उमी मिलोपनी जार लौट चला। पर हाय' अब यहाँका रास्ता ही भूल गया था और लाप स्मरण परतेपर याद न नाता था। कभी यण्टवागीण जङ्गलामें ठोकरें साता, अभी गह्न गहबरयुत गिरिपर चढना। पर व्यथ भटक्नेके सिवा कुछ हाथ नहीं आना था। ज्या-ज्या यह विगत जीवन-पथपी आर अग्रसर होता था त्या-त्या मानो अपने रक्ष्यमे अधिक दूर हटता चरा जाता था। यह जसे रिसीका वज्रशाप था जो किसी भी दुदमनीय प्रयत्नसे टूट नहीं सकता था। जो अनुभव मेरी पविना रूपमा मय राजकुमारको हुआ है, मेरी धारणा है वि अधिकार भावुष व्यकियाको अपने जीवनके मनावज्ञानिक तथा आध्यात्मिक विकासमें ठीक वैसा ही शुभव होता है। शैशवावस्थामे लेकर कशोरावस्था तक भावुर व्यक्तिकी आत्मा निप्पलुप जीवनको पुनीत धारामें निंद्वन्द्व रूपसे तरङ्गाय- मान होती रहती है और उसरे अन्तर्जीवनका परग-रहित निमल वातावरण शुभ्र पुण्यकी स्वच्छ, सुशीतल, तुपारोज्ज्वर महिमासे मण्डित रहता है। पर जब 'पोरे-धीरे यौवनका मधुर मोह अङ्ग-अङ्गको अपने लालस-आवेशसे अलसित करने लगता ह और तरुण क्रुण जीवापा बहुरन्जित राग नयन फिरणामें मदिर तयापि वरुण रूपसे सरसान लगता है तो उस चित्रात्मिवा माया नशमें उसकी सर्वात्मा । मग्न हो जाती है। अन्तमें प्रकृतिके वन-कठिन नियमके फलस्वरूप जब उसका उमाद ढीला पड जाता है और आँखें खुलने लगती है तो वह अपनी अवस्था देखकर आतङ्कित हो उठता ह और फिरसे उसी अन्तरात्मा अपने पुनोत शोर जीवनके स्निग्ध शान्त कोडमें लोट जाना चाहती है। पर कोटि उपाय करनेपर भी फिर वह अपन विगत जीवन-मार्गकी ओर लौटनेने लिये अपनेको समय नहीं पाता। । वह पीछेकी ओर देखता है, पर जिस पथसे वह यौवनके प्राङ्गणमें भाया था, वहाँ कुटिल कण्टवाकीण अरण्यवा जटिल जाल फला हुआ पाता है। वह समझ जाता ह कि जीवनम्वनने उसे जिस अज्ञात पथपर लाकर खडा कर दिया है उसके और क्शोर जीवा-लोस्व वीपमें वन-कठोर व्यवधान पड गया है। वह सर पटक्ता रह जाता ह और जीवन के अन्त तर अधकारमें मटवता ही रहता है। मानव-जीवनकी इस चिर-रहस्यमय, आतट्वोत्पादक 'ट्रेजेडी'को अपनी 'राज- कुमार' कवितामें रूपकके बतौर चित्रित करनेका प्रयास मने दिया है। अपने इस , न 1 । .
-- ( २२ प्रयत्नमें म कहाँ तप सफर हुआ हूँ, इमपा विचार येवल गुणीजन हा पर सवत हा 'राजकुमार की व्यारमा मने विञ्चिन् विस्तृत म्पमेशालिये की ह पि सहृदय तथा सुधी-पाठवगण मेरी अयाय पविशास्पियापर भी इमी ढंगरपिचार करेंगे। दूसरी पवितामा सम्म धमें मुझे अधिर कुछ पहनेगी आवश्यकता नहीं पड़ेगा, क्यापि अब पाठप मेरी पविताआरी स्पपात्मनगरीका म्वम्प गमझ चु हाग । तथापि मक्षेपमें दो चार प्रविनाआरे सम्बधमें कुछ सङ्घन पर दना चाहता हूँ। "विजनवती में मने विजनकी उस अमूत प्रतिमाया 'जिय गीत गाया है जिसमें मने अपने मानसपी मूर्तिमती जावित प्रतिमाया प्रतिरूप पाया ह । 'दमयती में मने 'दमय ती के रुण जीवनवे विपादमय छायारे background में स्वयं अपने सि मानसका प्रतिष्ठित पर उस विशेप कोणसे जीवन के अनन्त आनन्दमय स्वप्नाया निरोप उपभाग परना चाहा है। दमयन्तीको जिन स्वप्नोको मायासे मने दिलासा देना चाहा ह वे स्वयं मेरे नाना अभिघातामे विता- डित जीवनवे नाना रसात्मक, आदरामय स्वप्नाव पपात्मक रूप ह। 'नरक निर्वासी में मने अपनी उस मनोपज्ञानिव अवस्थाका वीभत्स वणन किया ह जब कि मेरा समस्त अन्तर्चेतन घोर अघवारमय गहन गह्वरको आतङ्क प्रद विभीपिका परिपूणरूपसे निमज्जित था। म पुण्य प्रकाशके लिए छटपटा रहा था, अधवारम टटोलता हुआ ऊपर मानेका माग ढढ रहा था, पर 'स्तर-स्तरपर दुस्तर प्रस्तरो का ऐसा वज्र-कठार अवरोध मेरे ऊपर पड़ा हुआ था कि उसे लांधना मै असम्भव मालूम कर रहा था। तयापि उम भयावह, धन-तमसाच्छन्न पशिलतामें पुण्यमय मत्यजीवनकी दिव्य विभूति, उसके सुख-दुखमय चिर- गतिशील प्रवाहपर अज्ञातरूपसे वर्पित होने वाली अमर ज्यातिकी वरुण किरणधारासे मेरा अज्ञात चेतन निरन्तर आन्दोलित हाता रहता था। 'महाश्वेता शोषक कविता लिखने की प्रेरणा मुझे 'कादम्बरी' को 'महाश्वेता'के चरित्रसे अवश्य प्राप्त हुई, पर इस पविताका मल भाव जोपयासिक महाश्वेताके व्यक्तित्व तक ही सीमित नहा है। इसमें मने विश्वनारीके महामङ्गलमय रूपके विभिन स्वरूपाका विचित्र सम्मिथण रूपकात्मक ढंगसे व्यजित करनेको चेष्टा की ह। महत् त्याग, अविचल सहिष्णुता, उज्ज्वल श्री, विह्वल ह्री सकरुण सुकुमारता, सरस, स्निग्ध स्नेहशीलता, शुभ्र सुपारोपम कठोर पवित्रता तथा प्रज्व- लित वहिनमम दीप्त तेजपा जो मम वय पन्याणीया मातृजातिमे वतमान है उसे भने महाश्वेता स्पक वाचनेका दुस्माहस पिया है। 'मायावती' में निखिल प्रकृतिक फन्दनोच्छ्वारा तया हासोल्लासमय रूपी द्वन्द्वमयी लीराका चित्रण करनेका प्रयास किया गया है। यह द्वन्द्व भाव मुझे वाह्य प्रकृति तया (पुरुष और नारीकी) अन्त प्रकृति दोनामें ही ममान धाराओमें प्रवा- हित होते हुए दिसाई दिया है। 'शकुन्तला के सम्बध यद्यपि बहुन कुछ पहनकी गुल्जाइश है, तथापि म इसके विषयमें यहाँ पर अधिक नहीं पहूँगा। केवल इतना ही कहना चाहता हूँ कि वालिदासको इस मानस-वन्याको म बहुत पहले अपनी आदश मानसी प्रतिमावे वनौर अपनी आत्माये अन्त पुरमें प्रतिष्ठित पर चुका था और उसे अपने हृदय राज्यकी महिमा मण्डिन रानी मान चुका था। इसलिये पति प्रवन्चिता, मआश्रम- परित्यक्ता निर्धातिता नारीको उसी चरम असहाय अवस्थामें प्रदर्शित करने मने अपनी आ मामें उसके प्रति अधिकाधिक समवेदना उभानी चाही थी, ताकिम उसकी स्वप्न प्रमूत आत्माको परिपूर्ण रूपसे अपनाकर उमे अपनी प्यारी ललिता' के पतौर द्विधाहीन भावमे ग्रहण कर सर, और उसके स्वप्न-मगमें व्यावहारिक जगत्की यूर पठिनाइयाको भुला सर। मेरा 'सेविका' गीपर कविता प्राय स वप पहले लिखी जा चुकी थी और 'राजकुमार' प्राय ६ साल पहो। इमलिये यदि इन कविताओ में तथा जनेद्र- सुमारगी लिखित परदसी-शोषक नाटिका (जो अक्टोवर १९३६ की 'सरस्वती' में प्रकाशित हुई है) भावात्मक साम्य पाया जाता हो तो इसके लिये में उत्तरदायी नहा हूँ। मेरा अभिप्राय जनद्रकुमारजी पर वियों प्रचारपा दोपारोपण करनेका नहीं है। मैं इस बातपर कदापि विश्वास नही पर सपना पिउहोन मेरी कवि- तासे भाव चुराया है । म इस बातवा उल्लेख भी न करता यदि मेरे तीन-चार साहित्यिक मित्रोने मेरी हस्तलिखित कापियां देखकर मुयपर उपटा जो द्रकुमार- नीने भाल चुरानवर दोष न लगाया होता। यही अयाय पाठकले मनमें भी इसी प्रकारखी धारणा जम न जाय, इसलिये मने कविताओके नीचे रचना-पाल दे दिया है और भूमिकाम अपनी सफाई के लिये इतना सा मह देना आवश्यक समझा ह। म मानता हूँ कि यह मेरी भीरुता ह, पर सम्भवत मेरी स्थितिमें यह क्षम्य है। अपनी शेप यरिताकि मम्य ध म अभी चुप रहना ही श्रयस्कर समझता हूँ ( २४ ) और मेरा खयाल है कि उनके सम्ब धर्म पिसी प्रकारकी कफियत देनेसी कोई आवश्यक्ता भी नहीं है, क्यापि उनके भाव स्वत स्पष्ट है। अन्तमे अपनी भाषा सम्बधमें दो बातें लिवकर म यह नीरम भूमिका समाप्त करना चाहता हूँ। म जानता हूँ कि अपनी भाषाके सम्ब धमें स्वय कुछ लिखना अशोभन है, पर एक विशेष कारणसे मुझे इस विषयकी चचा आवश्यक प्रतीत हुई ह। हिन्दोके प्रसिद्ध तया सुयोग्य साहित्यालोचक प० शान्तिप्रिय द्विवेदीने अपनी एक आलोचनात्मक पुस्तक्में मेरी भापापा उल्लेख करते हुए लिखा है कि उसमें 'बैंगलाषा आदान' पाया जाता है। पता नहीं द्विवेदीजी जैसे विचक्षण व्यक्तिके मनमें ऐसी भ्रान्त धारणा कसे उत्पन हा गयी। इसका एकमात्र कारण केवल यही जान पडता ह कि उह मेरो अविकाश कविताआको पढनेका बवमर नहीं मिला, और जो दो चार कविताएं उन्हाने पढी भी ह वे जल्दवाजामें। इसके अलावा और कोई दूसरा कारण मुझे नहीं दिखाई देता। मुझे इस बात पूर्ण विश्वास है और म दावेके साथ कह सकता हूँ कि मने बंगलासे आधा शब्द भी कही नहीं लिया ह और न बङ्गाली कवियासे मुझे भाव या भाषामे कहो लेशमान प्रेरणा ही मिली है । मुझे इन भारतीय ववियोसे प्रेरणा प्राप्त हुई है-मस्कृतमें मुरयत कालिदास, भवभूति, वाण, जयदेव आदिसे और हिदोमें तुलसीदासस । और इही कवियोने मेरे शब्दकोपको भी बढाया ह। इन कवियोंके अलावा ऋग्वेद, वाल्मीकीय रामायण, महाभारत आदि न थासे तया सस्कृतपे छोट मोटे बहुतसे कवियो (जसे घटकपर, लण्डो, विह्मण, गोवद्धताचाय, अमरुक, जगनाथ आदि) के अध्ययासे भी मेरा शब्भाण्डार वर्धित हुआ है। अतएव सस्कृतसे अपरिचित और बँगलासे यत्कि ञ्चित परिचित काई व्यक्ति भले ही यह कहनेकी भूल करे कि मेरी कवितामें 'बँगला का आदान' है, पर मित्रवर शान्तिप्रियजीसे मै ऐसी भाशा नही कर मकता था। इसलिये मेरा विश्वास ह कि जल्दबाजीके कारण वह ऐसी बात कह बठे ह। बहुत सम्भव है, मेरे अज्ञातम मुझे भापाके सम्ब धर्म पहा-वहा एक आध स्थानमें रवीद्रनाथसे भी प्रेरणा मिली हो, तयापि म दावेके साथ कह सकता हूँ कि रखी दनाथ द्वारा अपनाया गया कोई भी ऐसा सस्कृत शब्द मेरी कविताआमें कही नहीं आया जिसे वतमान हिदी कविताके आचार्यों (प्रसाद, पत, निरारा आदि)ने न अपनाया हो। मने ठेठ बँगला शब्दाकी बात तो दूर रही बङ्गालियो द्वारा विशेष रूपसे अपनाये गये बंगला शब्दोका व्यवहार भी बहुत कम किया ह तयापि मेरी भाषा आदानी मानी गयी है, इसे मेरे दुर्भाग्यके सिवा और क्या कहा जा सकता है।
( २५ ) निस्मन्दह मने बंगलाके दो चार ऐसे शब्दोको ग्रहण क्यिा ह जिह बगाली लेखकोने हिदीसे अपनाया है। जहां-जहाँ मने इस प्रकारचे शब्दोको अपने भाव और छन्द- सङ्गीतके उपयुक्त समझा है वहां वहां मने इरादतन् उनका उपयोग किया और ऐसा करनेका अपनेको पूरा अधिकारी समझा है । शान्तिप्रियजीने मेरी भाषा सम्बधमें एक ऐसी पतेकी बात लिखी है जो मुझे बहुत जंची। उन्हाने लिखा है, उसमें 'परुप सुकुमारता' पायी जाती ह। म अपने आप अपनी भापाके वास्तविक स्वरूपकी ठीक-ठीक परस करनेमें असमथ था। तथापि म चाहता था कि मेरी भाषा मेरे भाववि पूणत अनुरूप हो। मैं नहीं चाहता था कि मेरी कविताओमें स्त्रण भावाका समावेश हो, तथापि कठिन, कठोर, परपतासे भी मै बहुत घबराता हूँ। मेरी ऐसी धारणा ह कि मेरी कविताओंके भाव भी 'सपरुप सुकुमार' ही है, अतएव यह जानकर मुझे अतीव प्रसन्नता हुई कि मेरी भापा भी मेरे भावोके अनुरूप ह । म यद्यपि सरस, सुललित, कोमल-कमनीय भापापा गुण-ग्राहक हूँ, तयापि मेरा विश्वास है कि उच्च और गम्भीर भावोंके वणनके लिये कालिदासको मेघदूती भापाका स्निग्ध-गम्भीर घोपात्मक रूप ही सुन्दर जंचता है, जिसमें सरसता और सजलतारे साथ गुरुत्व भी हो। यहाँपर प्रसङ्गवश मुझे रवी द्रनाथकी एक बात याद आ रही है। उन्हाने अपनी किसी एक पुस्तक में लिखा था कि कोमल-कात पदावलीके आचाय, गीत-गोविदके सुप्रसिद्ध रचयिता जयदेव कविको ललित-लवङ्गी भाषा यद्यपि अत्यन्त सरल और सुकोमल ह, तयापि इसकी सरसता केवल बाह्येद्रिय को तप्त करके ही रह जाती ह, अर्थात् वह रसज्ञके मममें प्रवेश नहीं कर पाती। जयदेवके प्रसिद्ध पद 'ललित-स्वगलता-परिशीलन-कोमल-मल्य-समीरे' आदिकी तुलनामें उहोने कालिदासया निम्न पद उद्धत किया था- आवजिता किञ्चिदिव स्तनाभ्याम् वासो वसाना तरुणाक रागम् । पर्याप्त पुप्पस्तवकावनम्रा सञ्चारिणी पल्लविनी लतेव। इस श्लोक्के सम्बधम रवीद्रनाथने लिखा था कि इसकी भापाकी सकठिन- कोमलता, इसकी गतिका उत्थान और लय मिलकर जादूका ऐसा मत्र-सा फूल' देते ह कि वह अतरिद्रियको तीव्र वेगसे आन्दोलित करता है। इसके अतिरिक्त इसके अन्तरीण भावके रसोच्छ्वासने भी इसकी सपरुष-सुकुमार भाषाके शब्द- ( २६ ) सङ्गीतको श्रुति मधुर बना दिया ह। अमल वात यह ह कि लापणी भापा उसके भावके अनुरूप है और भावमें सरस गाम्भीय होनेसे तदनुरूप सपरुप-सरस भापाने उसका माधुय बढा दिया है। कालिदासकी भापा सवत्र इसी ढंगकी है और दण्डीकी तरह पद लालित्यके पीछे पागल होर उहोने अपने भावको खव करना नहीं चाहा है। मने अपनी कविताओमें भावके अनुरूप बहुत से नये शब्दोको सिरजाह और सङ्गीत तया ध्वनिको ध्यानमें रखकर सस्कृतके बहुतसे शब्दाको मनमाना रूप दिया ह। म जानता हूँ कि कवियाकी इस निरकुशताको भापातत्त्व वेत्तागण अक्षम्य समझते ह । तथापि आशा करता हूँ कि रसज्ञजन रसकी ओर अधिक ध्यान देकर मेरी यह धृष्टता क्षमा करगे। म भाव, रस और छन्त-सङ्गीतको भाषातत्त्व नियमासे अधिक महत्त्व देता हूँ और यदि क्मिी शब्दको तोडने मराडनेसे भावाभास, रस माधुय तथा सङ्गीतकी झनकारमें वृद्धि होनेकी सम्भावना हो तो म ऐसा करनेम कोई दोष नहीं देखता। अपन मध्य विरामात्मक छदके सम्ब धमें मुझे केवल इतना ही कहना है कि काव्य साहित्यमें इस प्रकारका छद कोई नयी चीज नहीं है। कविताके बीचमें भाव तथा अथके अनुरूप इच्छानुसार जहा तहा पूण विराम तथा अद्ध विराम देनेको प्रथा यूरोपियन कवियोमें बहुत पहलेसे प्रचलित थी। हमारे यहा भी सस्कृत कवियोने इस ढंगको कही कही अपनाया ह और पल्के वीचमे एक वाक्य समाप्त करके आधे पदसे दूसरा वाक्य प्रारम्भ किया ह । बङ्गालमें पहले पहल माइकेल मधुसूदन दतने अपने अमिताक्षर छ दकी रचनाआमें पदक बीचमें वाक्य समाप्त करनेकी शी प्रचलित की। उनके बाद रवी द्रनाथने इसका भूरि-भूरि उपयोग किया। ऐसे छदोमें यह सहूलियत रहता ह कि भावक धारा प्रवाहका वेग अविराम गतिसे बिना किसी वाधाके आगेको बढा चला जाता ह । इस प्रकारकी कवितालोके पाठमें कुछ लोग असुविधा मालूम कर सकते ह, पर वास्तवमें बात ऐसी नहीं होनी चाहिये। छन्दके वीचमे जहा जहापर विराम आता है वहा एक साधारणसे Accent द्वारा वह जताया जा सकता ह और पढनेवाला मन ही मन उस विराम की अथ-व्यन्जना ग्रहण करता हुआ छ दकी गति और यतिमें कोई बाधा न मानता हुआ आगेको वदा चला जाता है। अव म विद्वज्जनोसे प्राथाके बतौर दोशब्द निवेदित करके इसनीरस भूमिका- को समाप्त करना चाहता हूँ। सवमे पहले म जिस वातके लिये विद्वज्जनोंसे क्षमा ( २७ ) याचना करना चाहता हूँ वह यह ह रि मेरी भूमिकाम मेरे अज्ञातमें अहम्म यतावी बहुतसी बातें आ जानेकी विशेष सम्भावना है। इसके पई कारण ह, जिनमें शायद प्रमुस यह ह कि इधर मुझे सवत्र अपनी लघुता नजर आ रही है और अपनी नगण्यताके बोधने मुझे बहुत अधिक वित्रस्त पर रखा है। अतएव इस Inferionty Complex की प्रतिक्रियाके फलस्वरूप मुझमें अनजानमें दाम्भिक्ताका भाव आ जाना कोई आश्चयकी वात नहीं है, यद्यपि मने यथाशक्ति नम्रता प्रकाश फरनेकी चैप्टा अन्त तक की ह। मैं आशा करता हूँ कि सुधी-समाज मेरी परि- स्थितिका खयाल कखे मुझे अवश्य क्षमा परेगा और जहाँ-कही मेरी फलमसे कोई अनुचित वात निक्ली हो उसके प्रति अवज्ञाका भाव प्रदर्शित करेगा। बहुत मुमकिन है, लोगोको मेरी कविताओंके भाव कुछ अनोखे और बेतुकेसे लगें और वतमान हिंदी कवितामें साधारणत प्रचलित कविताओसे कुछ विचित्र जान पड़ें। तथापि मुये पूरा विश्वास है कि हिन्दी-जगत्मे अब नये नये भावोको अपनाने और बिना किमी Prejudice (विरोधी सस्कार)के साहित्यकी प्रत्येक सामग्रीके मूल तत्त्वकी यथाय परख करनेको प्रवृत्ति तथा याग्यता नितप्रति बढ़ती जा रही है। हो सकता है, मेरी कविताएँ नि सार हा और उनमें केवल शब्दजालकी चातुरी और अथहीन आडम्बर हो, तथापि मेरी यह विनीत प्राथना है कि रसिकजन उह एक बार पूर्ण रूपसे तथा निष्पा भावसे पढनेकी कृपा करें और कालिदासने अपनी सवप्रथम नाटक रचनाके सम्मधमें जो निम्न श्लोर लिखा था उमे ध्यानमें रखनेका अनुग्रह करें। पुराणमित्येव न साघुसवम् न चापि फाध्य नवमित्यवद्यम् । सन्त परीक्ष्या यतरद् भजन्ते मूढ़ परप्रत्ययनेय बुद्धि ॥
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सूची पृष्ठ सल्या विषय . । २ १२ २९ ३९ ४२ ४४ ५४ ६० ७२ १-विजनमती २-राजकुमार ३-तारा ४-महाश्वेता ५-नृत्य ६-साध्य विलाप -सेविका ८-प्रथम या ९-शपुन्तला १०-मायावती ११-मृत्यु-मिलन १२-दमयन्ती १३-नरफ निर्वासी १४-नवीना माता १५-मधुवन का माली १६-उसकी स्मृति में- ८० ९२
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महाधिजनसे सजनी मेरी आयो-प्यारी विजन-कुमारी,
नग्न नयनमें नील गगनका अञ्जन
मेरे मनका मान कर रहा भजन,
स्वण-वण विहरणसे हृदय हरण कर
झिलमिल झलकाती है छबि क्या न्यारी?
जगमग जोवन जगा रही है उसका तारक-चीपायलियां,
फुहराकर उल्कामोकी फुलझडियां
प्यार जताती है उसको प्रिय परियां,
दलित फर रही ह सुललित चरणोंसे-
कलित फुद-कुसुमोगी कोमल-कलियाँ।
चन्द्र विभासित शुभ्र मेघ शय्यापर -लहराती ह बाला,
विधुर अपरके तरुण करुण कम्पनसे--
पल-पल पुलकित करती है चुम्बनसे,
चुन-चुन ओस-फणोको तरलित वनमें
कब मुझको पहनावेगी वरमाला ?
कल-उल्लास, २] विजनवती विजनवती कहाँ गई वह कल-कलोलिनी मुझको बतलायेगा कौन? मेरा मधुकर-पुञ्ज-गुञ्जरित मञ्जुल कुन अाज है मौन । वह मद-कल विलोल विह्वलता, वह विलासमय वह उद्वेल तरङ्गित रोदन, वह प्रभात का कम्पित हास, वह सरिता की ललित कलित गति, सागर का फेनिल कल्लोल, उपवन की वह मृदु मादकता, कानन मर्मर-हिलोल, मधु-पासव से गन्ध-विधुर वह मलयानिल का मदिरोच्छ्वास, उच्छल-फेनिल-जलधि-विलोडित पुरवैयाँ का सजल इन सर द्वन्द्वों का विलास अब न कर सकेगा मुझको श्रान्त, गहन विजन मे बैठा हूँ मैं विरही, विभ्रात। कभी अकारण फूट फूटकर रोती थी मेरी प्यारी, कभी छोडती थी निर्जन मे हर्ष-उल्लसित किलकारी। का उसास, एकाकी,
विजनवती
बार
पाया मैंने
उमड उमड धन-अश्रु घुमड जय
आँखों को करते थे म्लान,
दमक दमक तर चपल दामिनी
उनको करती थी द्युतिमान ।
हाय ! यही पर्वत-निकुञ्ज था
उस कपोतिनी का अधिवास,
विकल कलित-कूजन से उसके
वन लेता था सकरुण सॉस ।
जिस प्रशान्त शारद-सन्ध्या में
पहली
मायाविनी
विजन-माला का
अविज्ञात वह पागल प्यार,
उस सन्ध्या को शान्त नीलिमा,
उस सन्ध्या का स्वर्णिम राग,
हाय ! जगा देता है ह्यि में
चिर-अतीत स्मृति-का अनुराग ।
बैठी थी वह स्तन्ध विपिन में
एकाकी, चिन्तित अनजान,
क्सि चिर-परदेसी का मन में
करती हुई न जाने ध्यान !
उछल उछल पडता था उसके
अङ्ग-प्रग
मे नव-यौवन,
बिखरे पडते थे पीछे से
उसके कुञ्चित केश सघन ।
४]
विजनवती
झूम झूम पडती थी आँखें,
पर उत्सुकता से थीं पूर्ण,
उसकी वह विह्वल उत्सुक्ता
करती थी मम हृदय विचूर्ण ।
दूर कही से होता था तर
उत्थित कुररी का कन्दन,
कानन-मर्मर में होता था
ध्वनित विश्व
हृद-स्पन्दन ।
सान्ध्य-गगन को चूम चूम रवि
विदा हुआ हो अस्तगमित,
उस चुम्बन के अरुण लाज से
करुण मेघ भी था रञ्जित ।
चिन्तित कुश्चित-सी बैठी थी
विस्मृति में निमग्न
बाला,
लिये केतकी-एटक कर मे
पहने मालतिका-माला।
किस अविदित विस्मित विषाद की
रेखा से था वह मुख श्रान्त
पहुँचा उसके निकट मुग्ध मैं
त्रस्त, भीत, सम्भ्रम-सम्भ्रान्त ।
मुझे देख वह चकित रह गई
खींच,
दो प्राणी हम मौन हो रहे
भीपण स्तब्ध विजन के बीच ।
?
उत्सुक्ता से आँखें
[५
टूट पड़ी
पिजनवती
अकस्मात् आँखों से उसको
अविरल जल-धार,
खडी हो गई, मुझको उसने
पहनाया फूलों का हार।
कपटक-दल को उसने गूया
कुञ्चित अलक-जाल के साथ।
थाम लिया मैंने धीरे से
उसका कोमल कम्पित हाय ।
अपने शून्य सदन में लाया
कितने वन-पर्वत कर
पार,
प्राणों से की उसकी पूजा,
जीवन-धन सब किया निसार ।
स्पन्दित - तारक-रश्मि - विभासित
रहता था जो कुञ्ज-भवन,
उसे छोड वह स्तिमित दीप से
झिलमिल गृह मे हुई मगन ।
कुछ दिन तक क्रीडा-कौतुक-युत
चला हमारा हास-विलास
उस कपोतिनी की आँखों में
कम्पित हुआ सुकात प्रभास ।
त्रस्त, भीत, अति-चकित, अजित्
उस बाला का मन जीत लिया,
वह इस चिर-विषादमय गृह के
अधिवासी की पनी प्रिया ।
६
विजनवती
हो अन्यमना,
हाय ! अचानक पाया मैंने
उसके मन मे परिवर्तन,
उसके भीतर चला अजानित
झटिका का घूर्णित नर्तन ।
लगी छटपटाने पिजर में
वह विहगी
सजल जलद-सी हो गम्भीरा
छोड दिया उसने हँसना ।
फिर विवाद की चिर-विभीषिका
हुई प्रकट ले उग्र स्वरूप,
घन-तमिस्त्र-पुजित हो आया
फिर चिर-अन्धकारमय कृप ।
उसको फिर से आकुल करने
लगी विजन की छवि-छाया,
तारक की कम्पित किरणों के
करुण-विकीरण
की माया।
अपना चिर-अधिवास छोड कर
बाहर चला उसे ले सङ्ग,
देखा कूलहीन सागर
अति भीपण विस्तार उलङ्ग ।
निविड निशा के गहन-तिमिर मे
सागर का कल रोदन-रोर,
सुनकर उन निर्मम प्राणों में
उमडी गद्गद-दर्प-हिलोर ।
का
[७ विजनवती विश्ल-पुलक से पाकुल होकर उमग पडा उसका आनन्द, तरल तरङ्गों से तरलायित हुआ हाय ! मै भी सकन्द । सागर के हिग विजन प्रान्त मे दोनों करने लगे निवास, पर उत्सुफ करती थी मुझको निर्वापित दीपक की यास। हाय ! शून्य मे लीन हुई थी मेरे गृह-प्रदीप की जोत- निश्चय ही करता होगा अन वहाँ प्रकाश 1 मृढ खद्योत ! मम जीवन के नवल प्रात मे स्वप्न-तरजिम रङ्ग अपार, मुझे कराता था उमङ्ग से निखिल निलय मे विपुल विहार ! कभी महा जीवन का मन में उमगा पडता था वेदन, कभी स्नेह की अति प्रशान्त छवि हाय ! जगाती थी चेतन । कमी नही सोचा पर मेने होगा यह निर्जन-निर्वास- मुझे करेगा मुग्ध विधुर उस का ऋन्दन-उहाम। अथिरा ३ विजनवती रोदन अज्ञात, मानस में विवश छोड़ना पड़ा मुझे मम मुख-स्मृति-पूरित गृह प्राशन, मुझको करने लगा थकित वह सुरुटिन-कोमल आलिङ्गन । सश्चित करने लगा हृदय मम अम्मुवि का भरने लगा पाह उच्छल-उर्मि-विफम्पित वात। वर्ष-वर्ष पर वर्ष बीतार युग पर युग भी बीत चला, पर सागर का सुखद कोड वह छोड न सकती थी चपला । हुआ अन्त को लव लव करके सश्चित सघन सपुञ्ज रुदन, वहने लगा उच्छलित होकर उसका उद्वेलित हावन । वेला के फेनिल उसास से फला उसका आह व ऑम् के प्रवेग से हाय । दोनो विह्वल । गिरि-निकुम्न के निभृत नीड का ध्यान उसे फिर हो पाया, फिर उन्मनी बनी वह बाला, लगी हान्त काया। वक्षस्थल, होने
केसर-चम्पक,
विजनवती
[९
जुही-केतकी
आदि कुसुम-दल का सुचयन ।
उसकी स्मृति में हुआ जागरित,
हुए सलिल से सिक्त नयन ।
छोड पुलिन की सैक्त-माया
पुन चली पर्वत की ओर,
हुआ हाय ! मैं भी अनुगामी
घर कर उसरा अञ्चल-छोर ।
फिर सुनने में आया उसका
पर्वत में कोलित कृजन,
पुन कलोलित हुआ हर्ष से
नि स्पन्द विजन।
पर मेरा वह चिर-निर्वापित
दोपा बला न किसी प्रकार,
मेरे कन्दित
अन्तस्तल मे
मचा प्रलयकर हाहार।
करने लगी मुझे नित शोपित
अन्तहीन निर्जन को भीति,
छोड नहीं सस्ता था पर मैं
उस विमना बाला की प्रीति ।
जीवन-गति मम निर्विचित्र थी
पर न गई मम उत्सुस्ता,
मेरे विद्रोही
विषाढ से
हाय ! गई वह भी उक्ता ।
पर्वत का
होने लगी म्लान,
१०]
विजनवती
दिन दिन मुक्तासम अनुपम घुति
अति शीर्ण,
उसकी वह सम्लान कान्ति नित
करती थी मम हृदय विदीर्ण ।
सागर मे सश्चित वह कन्टन
दोनों का फिर उमड चला,
चिर-विच्छेद-भरी शङ्का
से
मुझे नक्डतो थी अमला।
अपनी दो कोमल वाहों से
मुझको गले
लगाती थी,
भावी की चिर-विरह-वदना
हिय में हाय ! जगाती थी।
धीरे धीरे
पुष्पवास-सम
वह तो होने लगी विलीन,
व्याकुल उत्कण्ठा से मैं भी
दिन-दिन होने लगा मलीन ।
कुररी ने अपने क्रन्दन मे
मिलित किया उसका रोन्न,
वन स्पोत ने भी अपनाया
उमफा वह मट क्ल कृजन ।
निकर के झर प्रपात ने
सीख लिया उसका सङ्गीत,
वनस्थली भी लगी चुराने
- उसमा सुमधुर स्वप्न पुनीत ।
अश्रु विलोडित
विजनवती
[११
मधु-मृतु ने भी छीना उसका
लीलामय लावण्य विलाप्स,
हा ! निदाघ भी छीन ले गया
उसफा तेजोद्दीप्त प्रकाश।
पावस ने भी हर ली उसकी
जल-माया,
शरत् लगा करने शोपित उन
आँखों की गान्तच्छाया।
हिम मृतु ने अपनाया निर्मल,
शुभ्र,
शीत
नीहार-समान,
उसका निष्कलङ्क, अति उज्ज्वल
हीरक-सम चरित्र अम्लान ।
भरी शिशिर ने निज वशी में
उसकी सकरण टण्डी आह,
ऋतुओं की हिल्लोल-प्रगति में
उसकी गति का चला प्रवाह ।
मेरे मानस
की कल हसी
स्वच्छ सलिल कल-कन विसार,
भर उडान चल पडो लूटने
महाफाश का विपुल प्रसार ।
वह अदृश्य हो गई अचानक
छोड गई अपना अवसाद,
भ्रान्त, चकित सा रहा तास्ता
में वन में होकर उन्माद ।
१२]
विजनवती
अपनी इच्छा की बलि देकर
किया प्रकृतिमय अपना प्राण,
अलसित अकर्मण्य हो बैठा
उस पर्वत वन में म्रियमाण ।
तब से प्रति खिलाती है नित
मेरे मन में नव-नव रङ्ग,
करता हूँ मे ग्रहण उहें अब
मौन-भाव से हो नि सङ्ग ।
इच्छावत-रहित होकर
मानस वना शात-निर्मत,
रूप-रङ्ग प्रतिविम्बित उसमें
होते है अकलुष, अविश्ल ।
जन
अप्रल, १९२७
G
राजकुमार
वह था रानकुमार दुलारा, प्यारा,
दैल-चनीला, भोला था, अलनेला,
सारे जग से था वह क्योंपर न्यारा
निखिल विश्व में क्यों था हाय, प्रकला ?
?
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,
१४]
विजनवती
चन्द्रकात मणि की फुलझड़ियाँ शीतल
हिम के फानूसों पर नित्य चमक्ती,
पुण्य-प्रकाश तुषार-शिखाएं अविचल
स्तम्भों मे निष्कप, निवात झलकती।
हिम स्फुलिंग-कणिकाओंका फौवारा
शुभ्र फलकपर फहराता था छर-घर,
यन्त्र-विनिर्गत, रजत-मास हिमधारा
लहरातो उस माया-गृह के भीतर ।
विपुल काल तक विमल तपन की माया
उसे निरन्तर करती थी आलोक्ति,
दीर्घ अवधि तक निखिल-तारका-छाया
स्निग्ध भास से करती उसको पुलकित ।
दीर्घ समय मे एक बार खिलती थी
उपा की लाली उस परी-भवन मे,
एक बार झिलमिल-झिलमिल हिलती थी
कनक-झलक सध्या की उस दरपन मे ।
समय समयपर ज्योत्स्ना लहर-लहरकर
हिम-महिमापर शात छटा फैलाती,
उस मायाको मूर्छा सिहर-सिहरकर
शुभ्र विजनको करके मगन सुलाती ।
रानभूमिम
राज-फिशोर मगन-मनसे रहता था,
विभासित करके आत्म-विभाफी
शुभ्र भासमे मन्द-मन्द बहता था ।
उस
असड शोभाकी
छटा
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विजनयती माया निर्विकार, उस कौमार-हृदयमें उस ज्वाला को हलकी-सी भी आँच नहीं पाती थी, सारी उस तुपार-बालाकी चूर-चूर हो बिखर-बिखर जाती थी। निर्लेप तुपार-मवन-सा, स्प-गसे हीन कुमार-हदय था, सीरी-सोरी, शीत हिमाद्रि-पवन-सा- वह किंगोर हिम-प्रस्तर-सा निर्दय था । नभ में कभी बिलमकर दीर्घ समयमें उसे विकल करती ऊपाकी लीला, कनक-हास विम्बितार भी हदय में उत्सुक करती सऱ्या क्रुणाशीला। लय हो जाती पर वह रजित माया विफल, क्षणिक अस्पष्ट स्वप्न-सी तत्क्षण, पुन विभासित होकर शातच्छाया विमल हृदयमें करती प्रतिपल विहरण । एकरूप प्रतिनिम्चित था प्रतिभासित थी हाय, एक ही ज्योती, शून्य हृदयके उस नि स्पद विजनमे अलस शान्त थी झूम-झूमार सोती। कोई तृष्णा नही, न कोई प्राशा, पूर्ण-कुभ-सा राजकुमार मगन था, स्थिरालोफ था उन नयनोंमे भासा, निखिल-शातिमय निर्मल प्रात्म-गगन था ! उस मनमे [७ रामरमार पोभीर नगमो मा nि STAT मरम्म सम्मन नीरा मा पराममा तिदिन सुगर परीक्षा गुनिया एक ग तुम गोमिन, मास तिल माम-सरगरा- 720 हुमा परनिर मोमिए। न्या गि हो ल दिया पाम, मरम गाामय मत पागा शिमरी लगा डाला या गडाmire किम मागपुरी लिन्मा उमगार सो लगी गला? नित्रा मायासी परगा-भिग उमरो प्याल गफ लगी रला? गृगमगी गृह-गौरम-रमसिन शासा हुइ वसित पिम आफुल गग-पनमे ? मृगतृष्णारा असर जनन पिपामा पही येगमे महा-विपीडित हुमा राय, पर रत् इस सा चचन पर पुरोमल लगे पडा फिर फिर, तुपार-यालामोश हिम अचल हुआ रत्न धायाके हित यह अस्थिर । . माम।
१८]
विजनवती
रोई परियाँ, रोई लिख-बिलखकर
विरह वावरी हुई हाय, व घरवस,
चिर-वियोगकी ज्वाला सुलग-सुलगकर
लगी गलाने जीवन, यौवन, सरनस ।
हुआ श्वेत नीहार-भवन भी विगलित
तप्त श्राहसे उन विहल परियोंकी,
अन्तर्वान हुई शोभा वह सुललित
चन्द्रकात मणि खचित फूलझडियोंकी।
चला पथिक वह अनमन, विकल, उदासी
मृगके सौरभका करके अनुधावन,
वाप्प विकल आँखे वे उत्सुक, प्यासी
जीको लगती थीं केसी मन-भावन !
जुगनू ज्योति जलाकर जगमग जगमग
उसको पथ सुझाते थे इगितसे,
नक्तोषधिको शिरवा--पवनसे डगमग--
मग पालोक्ति करतो किस रगतसे ।
गिरि उपत्यकाकी छायामे घन घन
चलता था वह इठलाके, बल खाके,
वन पर्वत करके लघन
पहुँचा वह सीमा-तटमे अलकाके ।
मरक्त मटित स्वर्णिम पर्वत-स्तनपर
सन्ध्यामा स्वर्णाचल लोट रहा था,
मुक्ता-जलसे
कचन पद
सिंचनकर
गिरि-गह्वरसे निझर फूट रहा था।
क्तिने ही
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मोर-पख सम
परदेसी,
२०]
विजनवती
तनी हुई थी उसके तनको तनिमा,
कल-उल्लसित विभा उसकी विलसित थी,
श्याम कुज-सम सघन हगोंकी घनिमा
किस रससे सरसाकर मृदु-अलसित थी ?
केश-गुच्छकी वेणी
नागर-सी थी लहर-लहर लहराती,
स्फटिक लडी-सी निर्मल टतश्रेणी
निझर शीकर-सी
घर छर उहराती।
देखा उसने राजकुँवर
देखा उसका मोहन रूप निराला-
उत्सुक ऑखे थी वे विस्मित कैसी ।
निखिल विश्वको करती थी मतवाला ।
शुभ्र काति वह नव नीहार-पतन-सी,
रूप हिमाद्रि-रजत-सा स्वच्छ, सुशीतल,
आँखोंकी वह छाया तुहिन रतन-सी-
हाय, वह विह्वल ।
अलकामे वह निम्पम रूप विमोहन
कभी किसीने कही नही था देखा,
विचरित थे बालाके दोनों लोचन,
खडी रही वह चित्र-लिम्वित-सी रेखा ।
भूल गई वह मणि-गोपनको कीडा,
भूल गई उच्छल जलकी कल-लोला,
मुखम छाई अननुभूत नव-जीडा,
छाया पाखोंमें विपाद क्या नीला !
देख-देखकर हुइ
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सूना रंग महल है, - , २२] विजनवती "हाय प्रवासो ! क्यों हो तुम एकाकी ? क्यों विपादसे म्लान तुम्हारा मुख है ? तुमको चाह हुई है किम मदिरावी ? विमल हृदयमे छिपा कहो क्या दुख है ? "म भी हाय ! अकेली हूँ, अलनेली, मेरा रजित नही ससा है कोई, नहीं सहेली, नहीं वहाँ किंचित् भी चहल पहल है । "नव प्रभातमे वापीके तट जाकर स्वर्ण कमलसे में कीडा करती हूँ, नीलकान्त निभ जलमे नहान्नहार मरस्तमय सोपागोंम चढती हूँ। "सयाको नित सुरभित सरित पवनमें विद्रुम-खचित वजाती हूँ मृदु वेणू । विदलित करती हूँ नित विपुल पुलिनमें मणि-गण-रणित चरणसे स्वर्णिम रेणू । "स्तब्ध निशामें स्न-प्रदीप जलाकर मोर-पखकी शय्यामें सोती हूँ, दिनकी क्रीडा जनित थकान भुलाकर स्वप्न-जगत्मे हँस हँसार रोती हूँ। "विनन-वासका मुझको दुख नहीं था, कभी किसीकी चाह नहीं थी मनम, किसी व्ययास परस न हाय, कहीं था, नही विकलता क्सिी पुलक्की तनमें ।
. राजकुमार [२३ "आज तुम्हें देखा क्यों नदी किनारे ? कैसी व्याकुलता मेरे मन छाई। मुझे रुलाया क्यों परदेसी प्यारे ? कैसी भाग हृदयमें यह सुलगाई ? "मायो, प्यारे ! आओ, पीतम | भाओ, निशिदिन मेरे हियमे करो वसेरा, व्याकुल चितवनसे नित मुझे रुलाओ, गलित करो मणि कठिन हृदय यह मेरा । "ले जाकर मणि-रजित रंग-महलमे तुम्हे विपाउँगी पुलस्ति पलकोंसे, फंसा-फंसाकर निज कोमल अचलमे बाँध बाँध लँगी श्राकुल अलकोंसे । "वहुरगे स्वप्नोंकी मणिमय माला पहनाउँगी निर्मल वनस्थल पर, पी-पी पिला-पिलार रजित प्याला भासित होऊँगी तव अन्तस्तल पर ।" चला कुँवर उसके सँग स्वर्ण-सदनमें, देखी मणि-मालोकित उसको शोभा, दीप्त छटा भासी उस रजत-बदनमे इन्द्रधनुफ्की छायासे मन-लोमा। वापीके रत्न-कुसुम-पुंजोंमें गूंज रहे थे अलि कलियोंके भीतर, इन्द्रनील-जल-सिंचित मणि कुजोंमें कून रहे थे कल-कपोत, तर-तीतर । ४ कता-कतम विद्रुम-पर्यक मोरोंके पर थे उनपर, , २४ ] विजनवती स्तम्भ स्तम्भमें ये क्या रुचिर-विराजित स्फटिक-विनिर्मित, स्वर्ण-विमडित दर्पण 1 उनपर निज प्रतिविम्ब देखकर मोहित वाला करती अपना यौवन अर्पण । सज्जित होर स्वर्णप्रभ विछे स्थान स्थानमे रजित रत्न जड़े थे। स्वर्णसिंहके मुँहसे स्फटिक-फलकपर विविध रत्नमय चूंदें छहा रही थी, उस अनुपम फ्वारेसे फुहर-फुहरकर बहुरमित धाराएँ लहर रही थीं। उस रत्नच्छायाकी माया अनुपम राजकुँवरके मनको लगी रंगाने, उस्का सम अलकाका सस्मित विभ्रम मगन हृदयको जगमग लगा जगाने । राजकुँवरका मन वह प्यारी तरुणी भोली-भोली बातोंसे यहलाती, फैलाकर अपनी मन-हरणी विविध वर्णमय जलसे नित नहलाती । उजले मुखमे विजली क्षणिक जलाकर विभ्रम झलकाती अलकाफी ललना, कभी कुँवरसा कोमल हृदय गलाकर बलछल छलकाती नयनोंमें छलना । माया -- मचाती। राजकुमार [२५ स्नान-शिंजित, रजित वलय बनाकर कभी मोरको अधिरा पिरक नचाती, अलस लाससे उसको लजा लजाकर राजकुँवरके मनमें विगलित होकर हुआ हाय, वह पागल, क्या विलास उन्मादक रँगा नयनमें ! चिर-यौवनका मुक्त प्रवाह अनर्गल हिल्लोलित हो उमगा स्वपन, शयनमें । वीच-बीचमें कभी जाग पडती थी स्नेह-स्मति वह निज रिशोर-जीवनकी, परियोंकी वह प्रीति विकल करती थी, शुभ्रच्छाया शीत तुषार-भवनको। वह स्मित-बाया किन्तु उसे लगती थी दूर-दूरको विस्मृत स्मृति-सी निष्पल, क्या तृष्णा अब उम मनमें जगती थी। वरबस कर देती थी विह्वल, चचल । नन्दन-वनकी पवन मलय मद-दलनी उसके मनमें हहर हहर हहराई, विकल पिपासाकी क्या श्रागा छलनी हृदयमें गहर-गहर गहराई । मत्त मतग-समान भूमकर मदखावसे यौराकर यौवनको कलिकाका स्वर्णिम केमर उसके मनोगगनमें था छितराया । इतराया, २६ ] बिजनवती दोनों ही निईन्द्र, भविष्य विग्रस थे, मदन-मत्त थे, नव-नर रग बिलामी, प्रतिपलका रस चसनको उसुक थे, नव-योवन-ज्वर-विधुर, सदा-उल्लामी । मग्नालप्त हो करते थे आनन्द रंगनस-मुनन, व ता ये रमे रहे इस रंगम, बहुत दिनों तक चला सकन गुन्नन । एक-अपरक सँगमें कालिमा छाया धीरे-धीरे एक लगी हाय, दोनोंके मुंहमें छाने, अवश हुई लालस-रस-विनडित काया, कलुपित यौवन-पली लगी कुम्हलाने । हृदय हुआ निर्मीव, विगत मदन-ज्वर, स्तब्ध हुमा चचल जीवन उच्छ्सल, अपिर अधर मदहीन, धात गीतस्वर, ढका भस्मसे धूम्रहीन मदनानल । विदलित कनक-कमल-दल हुआ फलक्ति, मरक्त शैवल मलिन, स्फटिक-जल पक्लि, किम भयसे मणि-भवन हुश्रा प्रातक्ति ? राजकुँवरका हृदय हुआ क्यों शफिल ? अलका-जालाको मणि-रक्तिम तप्तागार-समान हुई प्रज्वालित,- कीरित करने लगी नरककी ज्वाला, लेलिहान रसनासे हुई विलोलित । माला +
[२७
राजकुमार
सौरभ-मय नि श्वास हुआ वह विपमय,
रोम-रोम जर्जरित हुआ स्पर्शनसे,
लुप्त हुआ नयनोंका सकरुण विस्मय,
दहल उठा दिल गलित रूप दर्शनसे ।
हुई किरकिरी स्वर्ण-रेणुको रगत,-
तुच्छ धूलि-सी उडने लगी गगनमें,
कनक-शेलकी दीप्ति हुई अस्तगत,
क्या फुफकार मची तटिनी-नागनमे !
जगी लालसा मनमे अब क्रन्दनकी,
राजकुंवर पर हाय, न रो सकता था !
सुदृढ पडी थी डोर विरस बंधनकी,
कारागार-समान जगत् लगता था।
नव किशोर-वयके कुसुमोका दोना
उलट पडा था, छिन्न हुई थी लहियाँ,
नये सिरेसे चाहा हाय, पिरोना,
किन्तु नष्ट हो जाती थी डियाँ ।
स्मटिक हर्म्यकी वह हिम-मडित महिमा,
शात भास मय तरलित ज्योति प्रभाती,
हिम-मालाको परम प्रीतिमय प्रतिमा-
मनमे विम्बित होते ही मिट जाती ।
छटपट करता था मन उसका प्रतिपल
उसी तुपारालयमें लय होनेको,-
बहु-जित मायाका तजकर अचल
शुभ-रूपके चरणोंमें
--
रोनेको।
२८]
निमनश्ती
लगी लगन, तोडा सोनेका शृङ्गल,
मुक्त हुआ वह राजकुँवर वधनसे,
हाय, उहा वह पक्षी होकर चचल,
हुई स्फूर्ति संचारित इत्-स्पदनसे ।
रोई याला, रोई, व्याकुल रोइ,
फूट-फूटकर खा पहाड वह बिलखी,
था न वहाँ मन समझानेको कोई,
लीन हुई निर्जनमे आहे दिलको ।
चला कुँवर वह तमकर मणि-मायापुर
चिर-नतन नीहार-प्रदेश-दिशाको,
भूल गया पर मार्ग, हुआ वह पातुर,
भटका दिनम, रोया नित्य निशाको ।
कभी गहन गहर-युत
गिरके ऊपर,
कभी कटकाकीर्ण विपिनमें जाता,
लुप्त हुआ चिर-परिचित पय वह क्योंकर !
लाख स्मरण करनेपर याद न पाता ।
वज्र शापकी जडता थी वह कैसी !
विवश हुआ क्यों कुंवर दुलारा,
प्यारा
व्याकुल क्रणासे वह चिर-परदेसी
अव तक भटक रहा हे मारा-मारा ।
जुलाई, १९३१
?
G
तारा
तारा
-
आज मृत्युकी उत्सवमयी निशामे
मरने दो, मरने दो मुझको भाई ।
इन्दु-किरण-करुणासे सकल दिशामे
देखो, कैसी पुलक-वेदना छाइ ।
नील गगनमें फैलाकर निज अँचरा,
Dथ-गूंथकर तारक-चयका गजरा,
प्यारी मृत्यु बनी है कैसी रुचिरा !
उसकी छवि मम नयनों में अलसाई ।
देवदारु-द्रुम के मर्मर-दोलन से
होता है यह किस देवीका वीजन ?
गिरि-निझरके झरझर सलिल-पतनसे
होता है किस पद-पल्लवका सिंचन ?
ज्योत्स्ना लहर रही है करुगाशीला
देख-देखकर किसकी लहरी-लीला ?
यहाँ करेगा चला कौन सनीला
क्सिकी लान-भरी गालोंको चुम्बन ?
झिल्लीगणने बजा बजा सहनाई
मन मेरा कैसा व्याकुल कर डाला !
मृत्यु-प्रियाने आज मुझे पहनाई
यह कैसी आश्चयमयी जयमाला !
रजनीगधाको सोरममय रलियाँ
इस उत्सव में करती है रंगरलियाँ,
सन मिलकर मेरी प्यारीकी अलियाँ
बना रही है क्यों मुमको मतवाला ?
३०]
शिनानी
नीचे गिरिक पारमूलमें सरिता
रोहों पर इठलाती है, पल साती,
किस रससे भारत होकर पल गलिता
उन्मा है, उज्सल है, मदमाती ?
दूर-दूरसे उसरा पल-पल गुंजन
करता है कैसे मेरा मा रना।
उसके जलसे होकर भाई प्रममा
शीतन करता है क्यों मेरी पाती ?
भ्राति ! भ्राति है। घोर भ्रातिको माया!
यह उत्सा है या विलाप है दिल ?
घनीमृत है पन विपाकी छाया,
पूजित है सब ओर वेदना निश्चल ।
उमड-उमड पडता है किमका प्रन्दन
पान-वगसे सिरा वन स्पन्दन
प्रस्ट कर रहा है पाकुल भावेदन ?
कौन हुआ है विरह-व्ययासे पेल ?
रो-रोकर, खाकर पहाड बहती है
इस सरिताको तरल-तर गित धारा,
कल-कल स्यरसे कानोंम फहती है-
"कहो कहाँ है आज तुम्हारी तारा
कहाँ छिपी है वह आँखोंकी तारा ?
कहाँ लय हुई तरल-अश्रु-रण हारा
किधर वह चली सरल-लास-रस-धारा
कहाँ गई है आज तुम्हारी तारा ?"
7
2
?
?
[३१
तारे करके अविरल अश्रु-विसर्जन
पुण्य स्मृतिमें अपनी प्रिया सखीकी
गगनांगनको करते है अभिसेचन,
आग बुझाते है वे अपने नीकी ।
हा ! तारा थी उनको प्रिया सहेली,
करती थी नित उनके सँग अटखेली,
लोप हुई क्यों वह प्यारी अलबेली ?
क्यों त्रिभुवनको ज्योति कर गई फीकी?
कर तक मुझे स्लायोगी तुम प्यारी?
कर तक हिय में काँटा गडा रहेगा ?
कहाँ गई वे विफल उमगें न्यारी ?
कर तक मुझको दुस्सह दाह दहेगा ?
कहाँ गई वह मृदु-मृदु पलक्ति बीडा?
वह किशोर-जीवनको सुखमय क्रीडा ?
वे सब स्मृतियाँ उपनाती है पीडा,
कर तक मम नयनोंसे नीर बहेगा ?
मुझे बताओ हे मम जीवनदाता !
कहाँ छिपी वह मूरत भोली भाली ?
चिर-परचित क्यों हुइ अाज अज्ञाता ?
नित्य-सगिनी कैसे हुई निराली ?
दो दिन पहले जिसकी गुंजित भाषा
उद्दीपित करती थी नित नव पाशा,
आज जगाकर जगकी हृदय-पिपासा
शून्य कर गई वह जीवनकी प्याली !
३२] बिजनवती प्यारी तारा ! मूल गई हो क्योंकर उस दिनकी वह सध्या, शात-सुर नित ? कुसुम-कुजके नीचे आश्रय पाकर तर तमित्र होता था धीरे पूजित, अस्ताचलके स्वर्ण-रागकी सुषमा तब विकीर्ण करती थी मधुर-मधुरिमा, स्निग्ध-गात यी सुन्दर सच्या-प्रतिमा, साम-गानसे जग था मृदु-मृदु गुंजित । चीड-द्रुमोंकी सघन-राजिसे होकर गद्गद-स्वरस निझर या कल-मुखरित, शिलाघातसे मुक्ता-सम जल शीकर विखर-बिखर पडते थे चूर्ण-विचूर्णित ।। घूर्णित होती थी जल-धारा फेनिल, झूम-झम-सा पडता था सच्यानिल, कूजन करते थे कपोत, कल-कोफिल, कुररी-कन्दनसे वन था पाकन्दित । शिलाखण्ड पर तुम थी स्तब्धासीना, मैं भी सन्न खडा था एक किनारे, अन्यमना-सी तुम थीं प्रकृति-विलीना, उद्दीपित थे विस्मित नयन तुम्हारे । साध्य अभ्रके शुभ्र स्फुलिंग बिखरकर, रँगकर धीरे रक्ताभासे नभपर- छटा बढाते थे सध्याकी सुन्दर, सन्जित थे सव्याके भूपण सारे ।
[३३
तारा
?
हुई प्रेरणा कैसी मुझे अचानक !
अस्मात् क्या रूप तुम्हारा देखा !
हरण किये सध्याकी छवि मन-मोहक
शोभित थीं तुम अविकल-आकृति-लेखा।
नयनोंमें थी नील-गगनकी छाया,
मुखमटलमें स्वर्ण-रागकी माया,
शुभ सेंदुरमें रक्त-मेघ था भाया,
विखरे यालोमे श्यामल वन-रेखा ।
विहगवृन्द नीडोंमें पाकर आश्रय,
भजन गा रहे थे करके कल-कूजन,
स्खलित कुज-कुसुमोसे मृदु सौरभमय
होता था क्या देवि ! तुम्हारा पूजन
जल-प्रपातके स्फटिक-सलिलसे निर्मल
धौत हो रहे थे पद-कमल सुकोमल,
दिक्-दिगन्तमें व्याप्त चरण-रज परिमल
स्तन्य प्रकृतिमें फेंक रहा था चेतन ।
सभ्रमसे विभ्रात, भक्तिसे विह्वल
मैं विमूढ-सा होकर चक्ति, विमोहित--
मुस्कर पढने लगा तुम्हारे पद-तल,
लगा स्पर्श करने उनको द्युति लोहित ।
मृदु-मृदु हास-सहित कर हस्त प्रसारण
परम प्रेमसे तुमने किया निवारण,
मेरा कल जकडकर सजनि ! अकारण
पेलव-लतिश-सम तुम हुई सुशोभित ।
३४]
जिनसी
मोरमारे तिमिर गाद से भारा,
परागंगा यार उठ सर ,
सपा से गई शामनगारी पाया,
जिन शिपिम गुन टाहा।
हमा भीति। एता ता मालिंगा,
लगा कि परागुको क पपन,
फिया स्मरसता सलामो पुरा,
उमडा तय नयोंसे भध्रु-उपाय।
करके मारिल यग्गा गित रिसरण
स्पन्दित पुतिमे होनरोमर पुनकाल
भगुरासमं सवार तारस-गए
दोनोंगो परत में चिन्तित, ध्यान ।
मैं मरमन-सा था तारों को गिरता,
हम सींचती थी रिम मोर पिननता ?
रिसर गई थी जग-जनकी सर चिन्ता,
विसर गया था हमको भी मानव-कुल ।
हास-घटा व्यनित कर पूर्व-गगनमें
कृष्ण द्वितीयारा शशि हुमा विमासित,
रजत-शुभ्र न्योत्स्नासे हुई पिपिनमे
निभरको फेनायित मदिरा रभसित ।
कलोलाससे
मार-मार किलकारी
कलित कठसे कर उठी तुम प्यारी,
अश्रुग्लान मुख को छवि करण तुम्हारी
पुन हुई उस शशि-मडल-सम विकसित।
तारा
-
[३५
अर्द्धरात्रि तक विकल-केलिका कल-कल
सुप्त प्रकृतिको करता रहा सचेतन,
हृदय तर गोंसे तर होकर चचल
था अशात वह नीरव शान्ति-निकेतन ।
हिल्लोलित लीलासे पुलक्ति निर्जन
हिम-कणसे करता था अश्रु-विसर्जन,
भक्ति-सहित दुम करते थे पुष्पार्चन,
फहराया वन-वनमें तव जय केतन ।
अाज हपसे रोमाचित यह रजनी,
जगा रही है वे सब प्यारी स्मृतियाँ-
वह कैशोर-हृदयकी लीला सजनी !
पुलक-स्नेह-सिंचित वे दो-दो बतियाँ ।
अन्त हो गया वह जीवन उच्छृखल--
स्वर्ण स्वप्नकी वह स्वर्णाभा पिंगल,
प्रिय प्रभात, सध्याएँ शात, सुमगल,
हुई शून्यमे लीन प्रीतिकी रतियाँ ।
नहीं तुम्हें भाती थीं कोई सखियाँ,
केवल मैं था तब प्रिय सखा प्रवासी,
उत्सुक रहती थीं वे छलछल अँखियाँ
मेरे ही दर्शनके हित नित प्यासी ।
किन्तु नही स्वीकृत था तुमको बन्धन,
उत्सुक परता था तव वन-स्पन्दन
निरद्देश्य होकर उडनेको वन-वन,
सि तृष्णासे था तब हृदय उदासी ?
३६ ]
विजनवती
रान रही हो पान कहाँ स्वाधीना ?
हूँ, तुमको प्यारी, मैं किस पनमें ?
महाकाशमें क्या तुम हुइ विलीना ?
छिपी हुई हो अथवा मेरे मनमें ?
किस तारा-मडलकी बनकर रानी,
ओढे हो तुम क्या अम्बर असमानी ?
किस तुपार-मय वनको शुभ्र हिमानी
विछी हुई है तव सुकुमार शयनमें ?
रहकर निशि-दिन सननि! तुम्हारे सँगमें,
पाकर प्रतिपल प्यारी, प्रेम
तुम्हारा-
रंग न सका मैं तुमको अपने रंगमें
देकर भी अपना जीवन-धन सारा ।
तुमको कभी न कर पाया मैं अपना,
लगता है सब इन्द्रनाल-सा सपना,
वृथा हाय ! रोना है, व्यर्थ कलपना-
झूठा था वह प्यार, स्वप्न थी तारा ।
बिना पिलाये ही यौवनको मदिरा
कहाँ उड चली तुम अस्पृश्य कुमारी ?
अन्तर्वान हुई हिम-कण-सी अथिरा,
पिन सींचे मम तरुण हृदयकी क्यारी ।
आज भ्रष्ट है मेरा सारा यौवन,
तमसाच्छन्न हुआ है निष्फल जीवन,
व्यर्थ वसत, वृथा मन-भावन सावन,
अर्थहीन है शरत्-निशा सुखकारी ।
तारा
[३७
नव-वसतका देख मदालस-लालस
सजनि | तुम्हारा जी न कभी ललचाया,
सौरभ-रमसित ललित गुलाबोंका रस
विगलित देख तुम्हारा जी मचलाया,
मृदुल मल्लिका, लावनमयी चमेली,
लज्जा-नमित लवग-लता अलबेली-
हाय । तुम्हारी रहीं न कभी सहेली,
मलयानिल था कभी न तुमको भाया ।
तडिहताकी
चलच्चित्र-सम
रेखा
तुम्हें कटकित, पुलक-चक्ति करती थी,
होकर मगल-वर्षा-जल-अभिषेका
काश-कुसुम-शोभा तब मन हरती थी,
शरत-गगनकी शान्तच्छवि सुमनोहर
लगती थी तब नयनोंको अति प्रियकर,
हिम-गिरि प्रेरित साध्य समीरण बहकर
तव थर-थर हियमे आहें भरती थी।
मेरी थी तुम प्रिया, प्रकृति की जननी,
शुद्ध, शान्त थी मूर्तिमती तुम क्रुणा,
चिर-सगीतमयी थीं सुमधुर-स्वननी,
दुख-ज्वाल पोकर थीं तुम चिर-अरणा,
उज्वल होम-शिखा-सम परम पवित्रा,
हिम-स्फुलिंग-सी स्वच्छ, शीत, अति शुभ्रा,
उपा-सम सिंदूर-सुरक्तिम-अभ्रा,
सयाकाश-समान विमुक्तावरणा।
३८] विजनवती भूलूँ कैसे ? नहीं मानता है मन, निखिल विश्व लगता है यह सब सूना, हाय! लगा है प्रतिपल उसका चिंतन, बढता है यह वेदन दिन-दिन दूना । उल्का-सम आई थी वह इस जगमे, सौरभ-सी क्यों लीन हो गई मगमे ? समा गई है यद्यपि मम रग-रगमे, पर अदृश्य है मुखडा सहन सलोना । आज मृत्युकी मगलमयो निशामे चिर-कुमार मुझको मरने दो भाई । पूत-प्रभजन-स्पन्दित सकल दिशामे पुजित पुण्य-प्रभा कैसी बिलसाई । पुलक-प्रकपित है कैसे यह धरणी। लहरें लहर रही है जीवन-मरणी, किधर वह चली मम उच्छृखल तरणी किस सागरमे इतराई, इठलाई ? मेरे प्यारो ! मेरी चिता सजाना सरिताकी उस वेत्र-कुज-छाया पर- प्यारी तारा जहाँ सुना कल गाना मुझे विफल करती थी अाहें भर-भर, जहाँ रिछाकर हरी दूबको शय्या परम स्नेहसे डाल-डाल गलया पिललातोयी कहकर-"भेया मेया!" मुझपर करती थी तन-प्राण निछावर ।
[३९
महाश्वेता
रोमो कुररी ! रोमो तार-स्वर मे,
जपो निरन्तर—“तारा, तारा, तारा!"
झिटीगण ! मनकार करो अन्तरमे-
"तारा, तारा, तारा, तारा, तारा !"
निझर ! छोडो आँसूका फौवारा,
विजन ! तुम्हारा आज वजे इकतारा,
निकले उससे शब्द करुण यह प्यारा-
"तारा, तारा, तारा, तारा, तारा !"
अप्रल, १९३१
6
महाश्वेता
मूर्तिमती शुचिता-सम हो तुम
कौन अप्सरा-याला?
बजा रही हो वीणा स्ममुम
पहने हो वनमाला।
किम तापस की हो तुम तपती क्न्या ?
मदनभस्म से रचित कौन हो धन्या ?
होमशिखा-सम उनली कौन
किस वनदेवी ने तुमको है पाला?
मूर्तिमती शुचिता सम हो तुम
कौन अप्सरा-बाला?
अनन्या
?
४०] विजनवती कठिन नियम-चारण से तेजित हो निर्मम, निर्भीता, शीतल तुहिन-कणों से मज्जित वन मे हो आनीता। शान्त विजन मे बैठी हो तुम विजना, कुन्दशुभ्र तुम हो प्रसून-दल-व्यजना, कलित केतकी-वन-सी कण्टक-मग्ना, हिम-सघात-शिला-सम हो तुम शोता । कठिन नियम-चारण से तेजित हो निर्मम, निर्मीता। अविरल - धारापात - सुमनल- वर्षाजल से स्नाता, मुक्ता-सम उज्ज्वल अति निर्मल तुम हो शरत-प्रभाता। तुहिन-सिक्त नव-कास समान पुनीता, कुसुम-स्तक-नत लता समान विनीता, स्वच्छ, स्निग्ध हो सरस-विमल नवनीता, कम्पक्ती हो शीतल उत्तर-याता । अविरल-धारापात-सुमहल- लोचन-जल से स्नाता।
महाश्वेता
[४१
किम सन्ध्या का स्वप्न झिलमिला
ऑखों मे है झलका ?
किस प्रवेग से रहा तिलमिला
रोदन अन्तस्तल का?
किस करुणा से व्याकुल है तब वीणा ?
सन्ध्या-छाया की माया म लीना
अस्तराग-सी होती छिन छिन क्षीणा
कैसे तुम अलपेली पाकुल-अलका ?
किस सन्ध्या का स्वप्न झिलमिला
अॉखों मे है झलका
?
चैठी हो शङ्कर-आलय मे
रुद्रा कौन कराला?
तुम हो रङ्गित भीम प्रलय मे
ज्वालमुखी की ज्वाला।
दीप्त हुतारान-सम अङ्गार उगलती,
वज्रपात
से भीति भावना दलती,
तुम चिताग्नि सम रङ्गिणि ! नित हो जलतो,
राज रही हो लिए हाय मे भाला।
बैठी हो शङ्कर-त्रालय मे
कौन भैरवी-बाला
?
जून, १९२७
&
४२] विजनवती - नृत्य नाचो ! नाचो । महाकाल ! तुम खर-मध्याह्न गगनमे, सूर्योञ्चल अंगनमे । होकर गर्वित अपने दीप्त विजयमें- नाचो रुद्र समुद्र-तालमे, निखिल सृष्टिके लयमे । तुम तो नाच रहे हो प्यारे । उन्मद रससे पागल- उच्छल-यौवन-चञ्चल, पर यह भोली-भालो प्यारी निपट नवेली ललना सरल लासमय तरल हगोंमे छलका निश्छल छलना पर्वत-पथके विजन प्रात मे सुन कपोत त-कुल-कूजन मद, हस गतिसे जाती है करने शिवका पूजन, सरल, मधुर विश्वास भरा है तरुण, करुण नयनोंमे, लन्ना-रक्तिम लास खिला है हस्तस्थित सुमनों मे, स्नेह-प्रेम-रस प्रतिपल उसके मधुमनमे सिंचित है, निखिल चककी वक-प्रगतिसे नहीं तनिक परिचित है, ब्रह्म-सत्य-सम निश्चित समझे बैठी है निज यौवन, परम-तत्त्व सम नित्य समझती है निज पतिका जीवन, मोहाच्छन्न हृदयको उसके मै कैसे समझाऊँ ? चिर-जोवन की तृष्णा उसको कैसे हाय, बुझाऊँ । नाचो! नायो । अमानिशाके महाफाश मडलमे, लयङ्करी लीला दिसला रदकाल ! तुम क्रो विर्णित नर्तन । अन्ध सृष्टिके रघरध्रम जगे वघहर चेतन । पल-पलम।
नत्य [४३ तुम तो नाच रहे हो प्यारे ! वसन कराल पहन कर - अगणित सूर्योकी मालाकी ज्वाला नित्य वहन कर, पर यह देखो, करुणा-विह्वल माता विकल शयनमे घन-निद्रारत, परम दुलारे शिशुके कोमल तनमें फेर-फेरकर हस्त पुलकप्रद, स्नेह वेदना-व्याकुल- रह-रह होती है अविनानित आशकासे आकुल, उसकी यह उद्दाम घेदना कैसे हाय, भुलाऊँ ? किस मायासे उसका शक्ति, कपित वक्ष सुलाऊँ ? नाचो! नाचो। भैरव! निखिल नियमके रोम-रोममें मचे व्योममय ताण्डव । गर्जित होओ सुदृढ वज्र-सम मेरे नग्न हृदयमे, हँसो उठाकर अट्टहाससे तुग तुषारालयमे । हिमखोंके भीम-पतनसे, वन्नमयी क्रीडासे तुम होते विक्षोभित जीवन-मृत्युमयी पीडासे, पर यह देखो, निखिल विश्वके मानव आर्त रुदनसे किस निष्ठुरसे भिक्षा चाह रहे है शीर्ण वदनसे । वज्रकोपसे, रुदशापसे जन्मावधि है पीडित, कठिन नियमके पेपणसे है निशिदिन त्रस्त, विताडित, नहीं शक्ति जीनेकी उनमे, नहीं चाह मरनेकी, ज्ञानहीन पशु-सम चिन्ता है तुधा शात करनेकी, उनके दुर्वल, भीरु हृदयको कैसे सरल बनाऊँ ? मस्तक ऊँचा करनेका क्या जीवन-मत्र सुनाऊँ ? नवम्बर, १९३१ ४४] विजनवती है नि शब्द सांध्य-विलाप सोई है यह निर्मल नग्न गगन में कैसो नील निराशा ! अस्ताचल मे किसके गलित नयन मे झलकी विफल पिपासा ? शात, धीर यह चिर-गभीर हिमाचल करण काति से रजित-- चिर-निर्वाणमुखी ज्वाला-सम पिंगल विराजित । अस्तगमित रवि के अतिम चुवन से रक्त मेघ लज्जित, वन है पुजित वेदन के स्तभन से घन पातक स्तब्ध शून्य को करके चकित, विकपित यह चचल काकाली- किम रहस्य-पट मे करती है अकित रेग्वा काली - काली? सरपत की सर्पित छाया से होकर निझर की खर धारा रोती है खा-खा पछाड पत्थर पर- धवल कण देवदारु के मर्मर से निश्वासित व्याकुल सध्या ललना भरती है क्या आहे शीत, सुवासित-~- छलका दृग मे छलना ? निमज्जित । M हारा। - है ? सांध्य विलाप [४५ हो हताश वह किस असफल प्राशा से विषाद मे मग्ना व्यजित करती है थरथर भाषा से विकपित अपना । हाय, सखी सध्या ! क्या गोपन वेदन अपने नीलाचल नित्य छिपाये रहती हो क्या क्रन्दन- विह्वल अस्ताचल मे ? स्निग्ध, करुण, नीरवतव परिणत यौवन विगलित-लालस? किस अतीत स्मृति से उन्मन तव जीवन तद्रित, निद्रालस? बिता दिया किस अरुण देव के सँग में उन्मद यौवन झूम रहा है आज हाय, रग-रग में वह अलसाया सपना। निखिल शून्य के किस निर्जन गन मे श्रावास तुम्हारा महाकाल के किस शुभ, शात लगन मे प्रणयो प्यारा आज हुआ लय चिर-निर्वाण-निलय में वह अलबेला स्तब्ध हुए किस वज-तुषारालय मे लोलित वे है अपना ? था ? पाया ? पागल, चचल ? t है नीरव । तव ४६] विजनवती तव चिर अविनानित प्रेमिक के शव पर हिम-गिरि-शिखर सगौरव सना-सजाकर शुभ्र, श्वेत हिम-प्रस्तर समाधि-सम करती हो तुम उस समाधि को रजित अपनी करण विमा से, क्षणिक झलक उठता है कदन पुजित इद्रधनुष - शोभा से। उस समाधि के हिम-शीतल पढतल मे अश्रु-सिक्त लोचन देवदारु-छाया के श्यामाचल मे करते जल-सेचन । सज्जित करके चिर-विश्रान्त विनन में वैधव - शय्या तुम्हें रमाती है किस भ्रमित भजन मे मृत्यु-तुम्हारी अस्ताचल के गलितानल अपर से जलती धूनी, दीपित होती सध्या-तारक-फर से कुटी तुम्हारी सूनी। आदि सृष्टि-धारा के पावन तट पर तुम अलनेली जोगन मौन ध्यान से निखिल विश्व का अतर करती हो अवलोकन । है सखि, तत्र मेया ? है तत्र साध्य विलाप [४७ मृत्युलोक के मगलमय निर्जन में स्थापित तव पुण्याश्रम हाय, जगाता है क्यों मेरे मन मे निशिदिन विस्मित विभ्रम । मैं भी हूँ सखि, चिर कुमार सन्यासी, निखिल जगत् से न्यारा। सूने मन मे रहता हूँ निर्वासी, किस जोगन का प्यारा! इस निर्वासन से हूँ प्रतिपल जर्जर, असह्य यह ज्वाला, मुझे बना लो अपना जीवन सहचर- तपस्विनी बाला मूर्छालस तप से पुनीत कानन मे नित्य विश्ल झूमूंगा, रक्तराग - रजित गोधूलि - लगन मे पद - रज चूसूंगा। धरकर सखि, तव धूसर, गैरिक ऑचर नित्य नित्य रोउँगा नील जलद की भस्ममयी शय्या पर उदासीन सोऊंगा। सध्या-तारक की कपित किरणों में हिय खोलूँगा। नोव वेदन कर अर्पण चरणों में मै तनिक बोलूंगा। he तत्र अपना न नीरव । ४६] विजनवती तव चिर अविनानित प्रेमिक के शव पर हिम-गिरि-शिखर सना सजाकर शुभ्र, श्वेत हिम-प्रस्तर समाधि-सम करती हो तुम उस समाधि को रजित अपनी करण विभा क्षणिक झलक उठता है ऋदन पुजित इद्रधनुष शोभा से। उस समाधि के हिम-शीतल पढतल मे अश्रु-सिक्त तव लोचन देवदारु-छाया के श्यामाचल मे करते जल-सेचन । सज्जित करके चिर-विश्रान्त विजन में वैधव • शय्या तुम्हें रमाती है किस भ्रमित भजन मे मृत्यु-तुम्हारी मेया? अस्ताचल के गलितानल अबर से जलती धूनो, दीपित होती सध्या-तारक कर से कुटी तुम्हारी सूनी। आदि-सृष्टि-धारा के पावन त पर तुम अलनेली जोगन मौन ध्यान से निखिल विश्व का अंतर करती हो अवलोकन । सखि, तत्र है तत्र साध्य विलाप [४७ जगत् से न्यारा। का ज्वाला, हे मृत्युलोक के मगलमय निर्जन में स्थापित तव पुण्याश्रम हाय, जगाता है क्यों मेरे मन मे निशिदिन विस्मित विभ्रम । मैं भी हूँ सखि, चिर कुमार सन्यासी, निखिल सूने मन में रहता हूँ निर्वासी, किस जोगन प्यारा! इस निर्वासन से हूँ प्रतिपल जर्जर, असह्य यह मुझे बना लो अपना जीवन सहचर- तपस्विनी बाला! मूर्छालस तप से पुनीत कानन मे नित्य विम्ल झूमूंगा, रक्तराग - रजित गोधूलि - लगन मे पद-रज चूदूंगा। घरकर सखि, तव धूसर, गैरिक आँचर नित्य नित्य रोउँगा। नील जलद की भस्ममयी शय्या पर उदासीन सध्या तारक की कपित किरणों मे हिय खोलूँगा ! नोख वेदन कर अर्पण चरणों में मे तनिक वोलूंगा। तत्र सोउँगा । . अपना न - --- है - बेकल । ४८ ] विजनवती वद्ध वेदना का विस्फूर्जित गर्जन उमड रहा निष्फल, मुक्त स्रोत से करने अच- विसर्जन हृदय हुआ जाग जाग पडती है फिर-फिर रह-रह मन में वह छवि लोनी, अब भी हाय, सताती है क्यों बहरह मृगतृष्णा अनहोनी? कहा आज हे स्वप्नवतो वह प्यारी, विजनवती अलली? किस हिम-सागर के तट में सुकुमारी होगी विकल अकेली? इस निझर के तट, शर-वन के ढिग में कितने ही दिन श्राफर झलका करण कपोत-काति निज हग मे सुनती थी कल-कल जल की अविरल गति से विह्वल उसके विस्मित लोचन फेन-वाष्प से भर जाते थे छल-छल, रोते बिना कभी देखती श्रात, कात तव सुपमा हिमगिरि मे पालचित, देख-देखकर वह अनुपम हिम महिमा रहती सभ्रम-स्तभित । जल-मर्मर । प्रयोजन ।
- अन से साध्य विलाप [४९ उसके नयनों में होती थी विवित नामकाति तव शीतल, द्विविध साध्य-आभा से पुलक-प्रकपित हो जाता धरणीतल । निभृत विजन मे वह सुकुमार कुमारी वन-कपोत-सी चचल- मधु-सया-सी लगती थी अति प्यारी, शरत्-पात-सी उज्ज्वल । करती थी नव निर्मल शारद-नभ मे शुभ्र कीडा, लहराती थी देवदारु - सौरभ में उसकी मुकुलित मि-जल-सिक्त सुनिर्मल अस्णोदय में हसती विभ्रम मलका, सजनि, तुम्हारे चिर-वियोग-श्रालय में रोती आकुल-अलका। फुल्ल कमल-वन मे होती थी रजित हासमयी वह शोभा, तरलित तारक-चय मे होतो सजित अश्रु-माल लीन हुई क्या तारों के कपन मे वह मन-मोहन पाती है क्या सुधा चद्र-चुनन मे वह रजनी की नीडा । मन-लोमा । माया ? छाया ?
५०] बिजनयती ? प्यारा? अथवा पल-कमनीय नवल हिमनाशी अमल-धवल हिमघर की सोख गयी क्या माया तरल रिमा-सी चचल निर की? या स्वर्णाचल का वह पुण्य तपोवन, प्रिय निर्वास तुम्हारा- लगा उसे मन भावन, हृदय-लुभावन मातृ-कोड-सम करती है क्या कभी तुम्हारे सँग मे हात केलि, क्ल-कौतुक ? अथवा मज्जित है विराग के रंग में आँखें मुझे छोडकर एकाकी, नि सगी चिर-अनत में उडती है क्या वह निर्मुक्त विहगी महामृत्यु के मे ? कुज-कुज में छोड गयी क्या वेदन। सलिल-पुज में कदन, पर्वत-पर्वत में क्या व्याकुल चेतन ! वन मे मर्मर-स्पदन । श्वेतशीत की निशित, तीक्ष्ण धारा-सी, अग्नि-समान अछूती- विद्युत्-सी सदीप्त, तुपार-शिला-सी थी वह पुण्य-विभूती । विस्मय-उत्सुक 7 तफ जग मग साध्य विलाप [५१ खर निखिल शून्य मे किस तारक-मडल के मध्याह गगन मे हिम-पुजित उसका कौमार्य पिघल के लहरेगा यौवन में ? अविज्ञात किस सुदर, नूतन ग्रह मे लोनी-सी वह लतिका पुन खिलेगी मधु-सौरभ-सवह मे, लालस उन्मदिका ? पुन लसंगी क्या उसके नयनों में नव-ग्रह की छवि उज्ज्वल ?..--- नव-विहान के मोहन तुहिन-कनों में अति निर्मल वह निरखेगी नवाकाग की रजनी शोभित नव - से? विहरोगी उसके हग मे तुम, सजनी, नव हिम - गैल शिखर से ? बैठेगी वह किस निझर के तट मे ? किन कुसुमों के में ? किसके सँग मे पाकर लान प्रकट मे पुलकित होगी मन मे? उस प्रपात का जल होगा ऐसा ही स्वच्छ, तरल, तीब्रगति, चचल, अविरल-वाही ? शिलाघात शरत्-शाति शशि- कर वन फेनिल, सुशीतल ? से उच्छल ?
विजनयती वर्षा, शरत्, मे ५२] [क्या मृतु - परिवर्तन के क्रम उस ग्रह मे हो से? इसी नियम वसत करेंगे नर्तन विभ्रम से? ऐसे ही अथवा केवल चिर - वसत विहरेगा ललित - लास - लावन से? या चिर - कदन का प्रवेग फुहरेगा मोह-अध सावन से ? स्निग्ध शरत की बाया विधी रहेगी ? या अनत तक नयनों - सी वह माया नभ अमित उसके नीलिम लहेगी? शोभा अथवा चिर - दिन वहाँ तुपार-भवन मे हिम • बाला सोती उसकी नाई चिर - कौमार - शयन में हँसकर रोती नहराता है चिर - यौवन से एक अखड तपोवन सुख - बालर शदिन प्राकदित ? अथवा केवल जीव वहाँ के है ऐसे ही व्याकुल- कर्म चक विकोडित ? मिट्टी है क्या हाय, वहाँ भी पाकुल- सुधा - तृपा से तद्रित ? उस ग्रह मे है - पीडित
है
rus
कपा मोनिगिर Tiनमें
पिन:
मात?
Triन, देवल 7 में
प्रता?
म प्र त में नामा
लिही
im ?
माम विभोर, वरना
मिर पिन गी?
देगे पाई हा प्रश्नों या
मानी ?
कभी हार गम्ग का पर
पो,
मंगगनी ?
गता में आग, मार निर्जन में
ईपा• पग,
पन तमियदेन्नित्य - गला
म,
मुकामो
फरपरी, १९३२
बिजनवती
५४]
सेविका
मृदुल,
मेरे इस निर्जन-निकुञ्ज मे
आयो, आयो
परदेसी!
नये सिकोरे मे शीतल जल
तुम पी जाओ परदेसी ।
सरस, प्रफुल्ल कुसुम-स्तरकों को
श्राकर कर जाओ तुम घ्राण,
श्रोस व आँसू के जल कण से
सींचा है इनको दे प्राण ।
मनोहर इन सुमनों के
सुमधुर-मधु का ले लो स्वाद,
कोमल, रुचिर, सुपल्लव युत है-
तोडो निर्दयता के साथ !
सरिता के इस निर्जन तट मे
करती थी अज्ञात-निवास,
अब तक हाय ! किसी मानव का
पाया था न यहाँ आभास ।
मधु-मृतु मे अलि-कोकिल मेरा
जी बहलाते थे सन भाँति,
शरत्काल में मम मानस में
कीडा करती थी बक-पाँति ।
सरिता के कल-कलित सलिल से
करती थी किलोल मैं प्रात,
विपुल पुलिन मे दोलन करती
आम्ल कुन्तल शीतल वात ।
नित
गिनतो,
रोविका
[५५
सन्या को तम-किल में
लेती थी में टपटो सॉस,
स्तप, स्निग्ध, पितान्त गान्ति से
रोता था मा विफल उदाम ।
रमनी म निन कुन्न मन में
तारे
विस मनान स्वर्गीय देय से
परतो यो मन में मिनती ।
यफुल-माल का व्याकुल परिमल
करता था मुझरो भलमित,
मि अपिदित पिलास से मेरा
मन हो जाता था उलसित !
अर्द्धरात्रि में लोरी गारर
सारी-सोरी सरित-हिलोर
करती तन्द्रालसित निमीलित
मेरे लोलित-लोचन-कोर ।
लोनी नक्न कलित कलिका सी
खिली हुई थी मैं अज्ञात,
उपा-लालित ललित-लता सी
अरुप राग की भी सहजात ।
सिक्त वेत सा फुल्ल-कास सा
रहता था
नित मेरा मन,
सभी कुसुम-वन से प्यारा पा
मुझे कण्टक्ति केतकि-वन ।
बिजनवती दुख-रहित परदेसी ? चिन्ताहीन विकलता अपने दिवस बिताती थी, उत्सुकता मुझको प्रतिपल हाय ! सताती थी। मेरी इस स्थिति मे तुम आये कहो कहाँ से विजन प्रान्त में क्यों पय भूले, भूखे प्यासे परदेसी । आये हो तो आओ, बैठो, रहो अनाहत परदेसी ! निर्जन शून्य कुञ्ज मे मेरे स्वागत ! स्वागत ! परदेसी! अञ्चल भर-भर सरस मृदुल फल तुमको नित्य खिलाउँगी, अपने नये सिकोरे मे जल शीतल स्वच्छ पिलाउँगी। कर्दम-मलिन, नलिन-कोमल पद दूंगी मैं प्रति साँझ पखार, सेवा तव दिन-रात करूँगी नित नित अपना रूप निखार । अश्रुहीन मम करुण नयन की कोमल भाभा अति सुकुमार तुम्हें लायेगी परदेसी। मच जायेगा हाहाकार । , रोपिरा [५७ रिस सागर के पार तुम्हारा घर है प्यारे परटेमी! निम दुसिया फ औमू लेकर परी पवार परदेसी। रिस मोती की माया तन पर हुए कुसुम के लिये मिल? रिम मुपास से भाकुल होकर पर से पार चले क्लि ? भाभो, मेरे पान-प्रदोलित इन पुसुमों को को दलित, फिर से हाय इन्हें सोचेंगे मधु उपा-करणा विगलिता नये सिरे से हाय ! रचूंगी यह भवनुपिटत, भुन्नित कुन्न, फिर से मुखरित इसे करेगा कोफिल-कुल कल-मगुफर-पुन्न । भाभो, पेठो, यक्ति हुए हो, पाँव पसारो परदेसी । घर की तीखी पत्य कली तनिक पिसारो परदेसी! मामो, श्रामो, सब दुख भूलो हो तन्द्रानत मरे निर्जन, शून्य कुन्न में स्वागत ! स्वागत! परदेसी । परदेसी। जुलाई, १९२७
विजनवती
प्रथम वर्षा
दो दिन पहले था श्मशानका तप्त भस्म बितराया,
नागन-सी फुफकार रही थी ज्वाला,
किस प्रलयङ्कर लीला से था नभमण्डल इतराया !
प्रकृति बनी थी सहरिणी, विकराला ।
आज हुआ मङ्गल अभिसेचन सघन घटामय नभसे,
द्रवित हुई है किसकी अभिनव करुणा!
गिरि-उपत्यका है आमोदित
आमोदित नन्दन-वन-सौरभसे,
नव-विवाह उत्सवसे कुसुमाभरणा।
किस सजीवन-रस-सिञ्चन-कृत सञ्चारित कम्पनसे
मुकुलित होकर पुलकित है यह धरणी,
भीनी-भीनी सरस सुरभिमय रभस-विभासित घनसे
हुई उच्छ्वसित आशा जीवन-मरणी ।
प्रथम-यौवना वनस्थली है नव-वेदन-उत्कण्ठित
लिए हाय ! निज कण्टककोर्ण प्रखरता,
क्षणिक दिखा यौवन फिर होती कुन्झटिका अवगुण्ठित
नव जल-कण से उसका रूप निखरता ।
झरझर ख से मुखरित निझर किस अनन्त मे जाकर
लय होने के लिये विकल बिललाया ।
शोष शोपकर हरण करेगा निठुर कौन रत्नाकर
मुक्ता-सम उसके जल-कण की माया
कल-कल, किल, विताल विताडित उसकी गतिका यौवन,
फेनिल धारा कठिन शिला-सङ्घाता--
?
,
प्रथम वर्षा
[५९
कम्पित करते है मम हिय मे प्रतिपल पुलक प्रलोभन,
अविरल रोदन क्या वेटन उसकाता !
नवल कुञ्जतल-वाही गद्गद विह्वल पुञ्ज-सलिल से
उथल रही यह कैसी छल-छल भाषा !
महक उठी है जुही-सुवासित अलसित गन्धानिल से
किस के तप्त विरह की व्याकुल श्वासा !
मोर, पपीहा, झीगुर दादुर मिलित राग के स्वर से
गाते है सब ओर निराली लोरी,
झूम रही है निखिल प्रकृति मृदु-मट मधुर किस ज्वर से,
तन्द्रिल-रस से होकर वरवस भोरी !
सिहर-सिहर कर कानन मर्मर की थर-थर लहरी से
कहाँ बज रही किस रसिया की बसी ।
उडती है उत्सुक होकर मिलने किस तरण परी से
सघन गगन मे दलबल लेकर हसी !
अविज्ञात उल्लास विधुर हो प्रकृति बनी मदमाती,
पर बढती जाती है मेरी चिन्ता,
किस अप्तीम के पार मुझे मम कौन प्रिया तरसाती ।
में अनन्त के पल हूँ प्रति दिन गिनता ।
चिर विरही मुझ परदेसी की कौन खिनी नारी
मेरी आशा में बैठी है विमना ?
किस तीखी केतकी-कँटीली उत्कण्ठा से प्यारी
बाट जोहती होगी उत्सुक-नयना !
कितने युग से आशा रके होकर अकथित थरिता
करती होगी वह निशि-दिन जल-मोचन,
६०]
बिजनयती
अपनी स्मृति से मीता हरिणी-सी प्यारी अति चमिता-
सनल कर रही है मेर मी लोचन ।
मुझे ले चलो अपने सँग, हे उन्मद हम-वलाका !
चिदानन्दमय हे मानस-पय-गामी !
निरस्यूँ फिर से रूप विमोहन प्यारी हिम-याला का
मैं अतीत सुस स्वप्नों का अनुफामी ।
वर्प-वर्ष तुम वर्षा के उल्लाम-जनित उत्सवसे
किम प्राशासे होकर पृलक्ति हर्पित
स्निग्ध स्नेह्मय चिर प्रिय गृहकी ओर विकल क्लरवसे
मत्त वेगसे होती हो आफर्पित !
करती रहती हो दर्शन नव वर्षाम प्रतिवत्सर
तुम उस चिर-अभिनूतन प्रियतम जग का,
भूल गया हूँ, पता नहीं पाता हूँ, पर मैं क्योंकर
चिर-परिचित उस माया मानस-मगका
?
जून, १९२७
6
शकुन्तला
भाज तजेगी शकुन्तला यह प्यारा पुण्य-तपोवन
हाय, सदाके लिये । बहो, हे होम-पवन ! चिर-पावन !
तप्तश्वास से । हे मृग-शावक ! लगता है क्यों तीता
सुमधुर दर्भाकुर ? सि भयसे हुई मृगी, तुम भीता ?
?
वायुन्तला
[६१
सखी माधवीलता | आज क्यों फुटश्री कुम्हलाई
अग-अगमे, क्ली-कलोमें क्या व्याकुलता छाई ?
करपालससे विवश हुइ क्यों ? विधा हाय, क्या काँटा
चिर-प्रफुल्ल, नव-विकच हृदयमें ? छाया क्या सन्नाटा
अलि-गुनित, कल-कलित कुजमें ? सुरभि हुई क्यों फोकी ?
मदसे रहित ? सखी,सूखी क्यों हियको तरुण पिपासा ?
प्रथम प्रातमे ही यौवनक नष्ट हुई क्यों पाशा?
सखि, प्रियतमके प्रथम परसका हर्ष हुश्रा क्या नीरस ?
स्नेहलता प्रिय शकुन्तलाके ललित करोंका लालस
प्रतिदिन तुमको विधुर पुलकसे करता था विकलाकुल,
प्रियतमके भी स्नेह-स्पर्शसे था वह कितना मजुल
हाय, हुआ दुर्लभ वह स्पर्शन समोहन, सजीवन,
आज हृदय हे म्लान तुम्हारा विफल हुआ है यौवन
निशिदिन उसको चिन्ता थी सखि, तुम्हें ग्रथित करनेकी
नव-रसालके पुण्य-पाशमे, अपना जी भरनेको
सफल स्नेहके स्निग्ध हर्षसे । पान त्यागकर माया
विस्मृति-रजनीमें लय होगी वह सध्याकी छाया ।
रोश्रो सखि, नीरव-निकुनमें हिम-जल-कण कर सिंचन,
ता यौवनका मिय्या मद सर आज हुआ है भजन ।
सखी मालिनी, वहन करो वन-वनमे कल-कल ऋदन,
पर्वत-प्रस्तरपर । आज
घधन
चली जायगो तुम्हे छोडकर निठुरा वहन तुम्हारी,
कभी न लौटेगी भ्रमसे भी अब आश्रममे प्यारी ।
-
खा पछाड
काटकर
. ६२] विजनवती निज पेलव पद-पल्लव जन वह रखती थी तब जलम- मृदु-मृदु सिहर-सिहरकर-सखि, ता आकुल अन्तस्तजमे उछल-उबल उठता था पुलक रुदन । तन उसकी प्राशा तुम अनत तक वहन करो अब निज अतृप्त पिपासा । सखि अनसूये ! प्रियवदे ! घन अन्धकार क्यों छाया अाज चतुर्दिक ? किस क्षुधाग्निसे महाशून्य बौराया ? मृत्यु-दानवी नाच रही क्यों पृथ्वीको छातीपर अट्टहाससे ? विश्व-नियम क्यों चूर्ण-विचर्णित होकर खड खड हो, विखर-निखर नभ-मडलमे छितराया ? अणु-अगुमे, कण-कणमें कातर वेदन क्यों कतराया ? सखि प्रियवदे ! अर्थहीन है सरल, मधुर नव जीवन आज तुम्हारा, मृत्यु हुई है निर्विचित्र, निर्वदन, नीरस, निष्फल । हा अनसूये ! वनशून्यको दृढता जकडे है वक्षस्थल आज तुम्हारा । केसी जडता श्रान तुम्हारे कोमल, सुनलित, चिर-निष्कटक मनमे समा गई है ! केवल प्यारी शकुन्तलाके सुखसे तुम दोनों थीं सुखी सदा, उसके सुमधुर प्रिय मुखसे सरस स्नेहकी, सरल लासकी सुन-सुन दो-दो पतियाँ, चिर-प्रफुल्ल उल्लसित हृदयसे काट रही थी रतियाँ । निज विकसित यौवनकी तृष्णा सखियो ! कहाँ छिपाई ?..-- अन्तस्तलके किस कोने ? कहाँ छिपी सुखदाई नित-नवीन जीवनकी पाशा? अपना निजका जीवन किया मिलित उसके जोवनसे, करके श्रात्म विसर्जन ।
हृदय-वेग था ? शकुन्तला [६३ शकुन्तलाका नस-नसमें समाहित सजनि, तुम्हारे अणु-अणुम सचारित । हुई विवाहित शकुन्तला,-तुम दोनोंके मन क्या उल्लास समाया ! मातृस्नेह या सखीभाव था ?-वह थी कैसी माया आज चलेगी पति-गृहको वह, तुम दोनों हो येकल, भूल गई है सखियोंको, है निज पतिके हित पागल- इस ईर्ष्याकी जलन तुम्हें क्या अति व्याकुल करती है ? हे सखियो । दुष्यन्त तुम्हारा निष्ठुर प्रतिस्पर्धी है प्रेम-जगत्में । रोओ ! बिलखो । अपना मस्तक पटको भाग्यशिला पर, गहन शुन्यमें छिन्न मेघ-सी भटको चिर-अनन्त तक। मात गौतमी, हदय हुआ है विह्वल फिस दुर्दम आकुल करुणासे ? आज हुआ है निष्फल स्निग्ध, करण तव मातृ-हृदय । अब विफल हुइ सब आशा । सूख गइ है आज तुम्हारी चिर-सिञ्चित अभिलाषा । जिस दिन तुमने देखा मुखडा सरस, सलोना, प्यारा, प्रथम बार प्रिय शकुन्तलाका स्तन्य-सुधा-रस-धारा पुलकित स्तनसे उमड चली थी, हुई देवि ! हिल्लोलित रोम-रोमसे सुनकर कल कल्लोलित निर्भर-सी क्ल-मुखरित भोली-भोली, तुतली भाषा,-- देख-देख सस्मित विलास फुलझडिया-सा, न्योत्स्ना-सा- उमडा हर्षित रुदन । आज चिर रुद्ध हुआ वह ऋढन,- अन्तस्तलमें रह-रहार करता है निष्पल गर्जन । पुलक तरगें, -
६४]
विजनवती
किम आशासे किया हाय, उस ललित लताको लालित
माता, तुमने सीच-सीच आत्माके रससे ? नित-नित
नव-प्रभातमें जगती थी तुम होकर उत्सुक चचल
किस प्रिय मुखके दर्शनके हित ? नित्य निशामें वेकल
सोती थी तुम लेकर किसकी चिन्ता ? हा । सोचा था
युग-युगान्त तक प्यारी हियमें खेलेगी। पोंछा था
नित्य नयन-जल इस आशाम । थी
मृगतृष्णा
मनमें-
लहरावेगी चिरदिन रानी यिके नील गगनमे
ज्योत्स्ना-रजित शुभ्र मेघ-सी, प्रतिपल वह फुहरेगो
तरल-तरगित धवल फेन सी, निझर-सो छहरेगी
छर-छर हास उटासे। माता, लीन हो गई पलमे
वह मरीचिका-माया । केवल सूने अन्तस्तलमे
भाँय-भॉय ख उपनाता है भय। शकुन्तला प्यारो
थी न किसीकी कभी, नही थी माता
कभी तुम्हारी।
अरुणोदयके विफल स्वप्न-सी आई यो वह जगमें,
लय होगी सच्या-माया-सी ।
पिता कण्व ! रग-रगमें
आज तुम्हारे कैमी तीखी निष्ठुर व्यया समाई ।
लोल जलधिको क्षुब्ध वेदना गहर-गहर गहराई
चिर-प्रशात मानसमें क्योंकर ? महाकालको लीला
तव दृढ श्रात्माके यत्रोंको करती है क्यों दीला ?
सोचा था तुमने-जब होगी पिदा शकुन्तला रानी,
दृढतासे श्रात्माके रसमें
रसमें डूबोगे तुम ज्ञानी,
शकुतला
[६५
मोह-जाल सब खडित होगा, छिन्न स्नेहका वधन,
फिर अखड विश्राति-भासमें लय होगा हृत्-स्पदन ।
श्राज बिदा होती है जब वह यह उच्छल, कल रोदन
विस्फर्जित है किस कोनेसे ? हे मृपिवर ! है झूठा
जप-तप, ध्यान तुम्हारा अन । किस निठुर दैवने
लूटा
चिर-पूजित मन-मदिर हाय तुम्हारा ! उसकी प्रतिमा
कौन लिए जाता है छोने ? गौरव-मडित महिमा
आज नष्ट है उसकी । जिस अद्वैत शातिको ज्योती
भास रही थी हियमें, नित नि स्पद भावसे सोतो-
आज हुई जाती है लय, अब वृथा योग-साधन है।
हाय, तरुण तापसगण । कैसे चित्त आज अनमन है ?
जिस आनन्दमयी प्रतिमाका करके निशिदिन चिन्तन
निखिल सच्चिदानन्द रूपका करते थे तुम दर्शन,
तरुण, करण छाया जिस मुखकी प्रतिपल थी मँडराती
मनोगगनमें तुम लोगोंके, निशिदिन थी लहराती
होमानलमें सरल मधुर यौवनको तरल शिखा-सी
स्निग्ध ज्योति,—वह आज हुई जाती है चिर-निर्वासी !
अय किसके हित तापस-नत है ?
रोओ करुण कपोती ।
देखो, यह आश्रमकी प्यारी शकुन्तला है रोती
मौन भावसे । निपट विकल है वह भोली, अलनेली,
जगतदुलारी, उमके आँसू टरफ-हरक पडते है
हरी दूबमे मुक्ताकप-सम । करुणाकुल करते है
,
,
६६ ]
बिजनवती
पशु-पक्षी, तरु लता, सखी-जन, पिता, गौतमी माता
विकल स्नेहसे उसको । उससे सहा नहीं अन जाता
यह वियोग प्रियजनका । उसके दुख से दुखित होकर
सितक-सिसककर रोगो तुम नव-आम्र-कुनके उपर ।
देखो धरणीमाता ! प्यारी शकुन्तला जाती है
पति-गृहको, यह देखो, कैसी विह्वल चिललाती है
परम लाडिली, अलली आश्रमकी! उसके मगमे
अतिशय कोमल फूल विछाओ, करके निज रंग-रगमे
सरस स्नेह-रस-धारा सिंचित । कुश कटासे प्यारी
नहीं रही अभ्यस्त कभी-त्रिभुवनकी पाम दुलारी ।
सन्ध्यानाला ! देखो, आज तुम्हारी प्रिया सहली
जाती है प्रियके मिलनेको। करती थी अटखेली
नित्य तुम्हारे सँगमे । अाज हदय उसका है चिन्तित,
किस शकासे वक्षस्थल है तीन वेगसे कम्पित !
निखिल शून्यकी भीति आग उसका हिय जकड रही है,
घोर तामसी निशा अमोसे उसको पकड रही है
निष्ठुर, काले हाथोंसे । सखि, डाल-डाल गलथैया
उसे रिझाना करके चुम्बन, विछा स्वर्णकी शय्या
उसे सुलाना थपकी देकर स्निग्ध करोंसे अपने ।
देखेगी तव स्निग्ध क्रोडमे जगमग-जगमग सपने
बाल्य-कालके । अभी-अभी तो थी वह निपट अयानी
सरल यालिका ! खिली कली यौवनकी, फिर भी रानी
करती थो कुछ दिन पहले तक शैशवकी मृदु क्रीडा
अन्तस्तलके निभृत विजनमे। नव-यौवनरी ब्रोडा
पापुन्तला [ ម छू न गई थी उसको । हा दुष्यन्त ! यहाँसे पाये चिर-प्रशान्त पाश्रममें ? अपने साथ कहाँसे लाये नवोन्मत्त वैशाख मासकी प्रयम तामसी झटिमा? निर्मल, पुण्य तपोयनमे फैलाई क्या कुन्झटिका विकल मोहको ? आग लगाई क्यों शीतल मृगवनमे ? नष्ट-भ्रष्ट है पान तपोवन, छिन्न-भिन्न जीवनमे पाश्रमवासी भटक रहे है, शकुन्तला है खिन्ना, प्रेम-प्रपची पतिकी स्मृतिमे है व्याकुल, उद्विग्ना । दो दिनमें ही भूल गये क्यों, हे स्वारथ-रत राजन् ? हाय, सुकोमल ललित क्लोमे करते थे अलि गुजन, तितली पख निछाकर उसपर करती थी नित छाया, पुलकित करती थी प्रभातके प्रथम किरणको माया उसकी विकसित पखडियोंको, हिम-कण करते मोचन उसको भात पिपासा, करके सरस सुधा-रस-सिंचन । छिन्न कर दिया निष्ठुर करसे क्योंकर, झूठे प्रेमिक, उस कोमल कलिकाको ? हाय, विखरकर आज चतुर्दिक तुच्छ धूलिमें म्लान पडी है उसको सब पखडियाँ ! निशादेवि ! तुम उसके मगमें उल्काकी फुलझड़ियाँ जला-जलाफर सुझाना, तारोंकी दोपालो सजा-सजाकर नभ-वितानमें, अपनी झलक निराली दिखा-दिखाकर उसे रिझाना । घोर गहन अँधियारी उसे निगलना चाह रही है, व्याकुल है वह प्यारी । मृत्यु ! दिखाओ उसको अपना रूप भुवन-मन मोहन- साध्य अन-मय अपने रजित पखोंका अलोडन । पथ
६८]
विजनवती
सव्याके तारकसे टलमल,
विह्वल विकल गगनमे
नील जलद-अकित अजनसे शकुन्तलाके मनमे
वास करो सखि | झीगुर-नूपुर-झकृत व्याकुल महिमा
उसे सुनायो । तनकर अपने दृप्त गर्वको गरिमा,
उसके हियको भौति मिटायो, कर करुणा सञ्चारण
स्नेह-स्पर्शसे करलो उसको वक्षस्थलमे । धारण ।
सखि शकुन्तले ! शक्ति मनसे चलती हो क्यों धीरे ?
म्लान हुए क्यों आज तुम्हारे मानस-खनिके हीरे ?
अपने मनके गहन विपिनमे क्यों तुम भटक रही हो ?
किस द्विविधासे निखिल शून्यमे, प्यारी, लटक रही हो ?
आत्म-मानकी महिमा करके तुच्छ धूलिमे लुठित
प्राण चली हो उन्मन-सी तुम हो पग-पगमे कुठित
बचक पतिके मिलनेको । हे निखिल विश्वकी रानी !
सारे जगको अपनाकर तुम क्योंकर हुई विरानी
हृदयहीन प्रेमिफके कारण ? त्यागो उसको माया,
सरल करो मन, स्वस्थ करो अब श्रात-कात निज काया ।
तनिक करो विश्राम सजनि, इस सघन-कुज-छायापर,
क्षणिक विसारो चिन्ता सुनकर मृदु-मृदु पल्लव-मर्मर ।
स्मरण करो सखि, वाल्य-कालको मधु-स्मृतियाँ सुखदाई ।
-
श्रान तुम्हारे निकट हाय, क्यों मुझे बहा ले आई
महाफालको उलटी धारा ? प्यारी, श्राओ, पामो !
शान्त, मगन-मन होकर मम नयनोंसे नयन लहानो।
-
[६९
दमो, पारा, पानी, मालप, जिमी,
पर्मनर-जनंग्नि परे परम • मुति - भामिना ।
दोनों किया है पारी, चिन्तारल।
मृमा परेगा भान गिरा पुन-गुना मगुल
नय-गए ग, गी भागार हम दोनों मामे,
क्या उन्मादर गान पin माल दत्-पम्पनमें,
शिम तिान-पारित निर्मक परमें ।
दो प्यारी,
लाया हूँ क्लि युगमा सर्जन, पंप-पेटना न्यारी ।
शिम रिलिन लानामा पया पन-कटोलिा ताइन
जनित है मम गयनों में किस युगमा भालोहन
स्मि विज्ञानमयों लहरीसे नग्न नृत्य करता है
मिल बघागमें मेरी । दमो, पर करता
लासन ग-मय लीलारा पहुरंगी निमर
मेरे मनमें-~~यान-विल विक्षिप्त पगमे प्रन्यर ।
गि गतारीक दोलनस शुभ प्रपोहित शेर,
नाता ज्ञान विविध मामा तीन प्रादन लेकर--
भाया हूँ समि, मैं नय गं गात, का ता मनको ।
मूलो अन दुष्यन्त रानो, मूलो हाय मदनको ।
हे स्टेिगिनी ललना ! टयो फैमा नगा रगा है
मेरी भाँसी । अति प्रन्यल क्या वेदन मुलगा है
मेरे गोरे-उनले मुसमें ।
उसे देखकर पलमें
रान-विरहसे व्यथित तुम्हारे कोमल अन्तस्तनमें
पागल
७०] विजनवती लहर उठी है देखो, कैमी विकल अपूर्व उमगें ! उबल पडी है आँखोंम हिटोलित तरल तरगें। आयो, प्यारी, आयो, मुझको अपने गले लगाओ, निखिल विश्वका अन्तर्कन्टन दियमे श्राज जगायो । कहाँ प्रिये ! दुष्यन्त-व्यया अन ? कहाँ मदनकी ज्वाला ? निखिलानन्दपूर्ण प्रात्माका खेल अपूर्व, निराला खेलेंगे सखि, चलो, आज हम सीमाहीन गगनमे । चलेंगे महाशून्यके अतिविस्तृत अगनमे, सध्याका बहुरजित पख पकडकर । सखि, भूलोगी निर्मम निर्यातन निमेपमे, नित्य-निन्य झूलोगी विश्व-प्रकृतिके राग-रगमय दोलनमे तुम रानी। भूलूँगा आत्माभिमानका पीडन में अभिमानी । होगा विस्मृत राजनीति, विज्ञान, ज्ञानका घर्षण- लोलुप, सभ्य, स्वार्थ-लीलाका निष्ठुर भैरव हर्पण । बह जावेंगे दोनों ज्योत्स्नाकी लहरोंके सँगमे , रँग जायेंगे सव्याके सुमनोहर स्वर्णिम रँगमे । दूर-दूर तारोंके हीरक-खचित रत्न-आसनपर हो निद्वासीन सुनेंगे निखिल चकका मर्मर । उस उच्चासनसे देखेंगे जीवन-मरणी धृणित कीट-सम मानव-गणको पक-निमज्जन-क्रीडा । युग-युगमे देखेंगे हम उत्थान-पतन देशोंका, देखेंगे दोलन-सघूर्णन दलितोंके केशोंका, दास-वृत्ति पतितोंकी, उन्मद, तुच्छ गर्व जेताका, पशुओंकी पर-बुद्धि, घृणित, उद्धत स्वभाव नेताका- लीला, .
" शाकुन्तला [७१ देख-देखकर प्रिये! हसेंगे मद-मधुर गौरवसे हम दोनों उस उच्च लोकसे। पक-मयित रौरवसे नीचे हमपर हुकारेंगे लक्ष्य-भ्रष्ट मानवगए। उन्नत, निर्दय, कठिन हृदयसे हो उत्फुल्ल अकारण वीच-नीचमें रुद्र नृत्यसे हम दोनों मिलसेंगे विश्व-मचपर, निर्विकार, निष्कलुष नित्य हुलसेंगे । हम दोनों सम्मिलित हुए है आज बहुत जन्मोंसे, प्रिये ! आज निर्मुक्त हुए है चक्र-जडित कर्मासे । लहरावगी पान हृदयको गति कैसी मनमानी ! मैं पिलराँगा राजा होकर, तुम मेरी प्रिय रानी शोभित होभोगी मेरे सँग,-निखिल जगतकी वद्या- स्वच्छ, शुभ्र, चिर-मेघ-विमुक्ता, शरत्-कालकी संध्या । कभी न तुम दुष्यन्त-प्रिया थी--स्वप्नमयी चिर-कविता- कालिदासको मानस-कन्या, मेरी प्यारी ललिता- हृदय-राज्यकी महिमा-मडित रानी ! आयो, आयो ! अग-अगमे प्रिये ! ललित लावण्य-लास सरसाओ ! सुद्र स्नेह-दौर्बल्य त्यागकर पुण्य-प्रकाश-विभामें बिहरेंगे सखि, प्राज, विश्वको अखिलानन्द-समामें अाज विराजेंगे हम । मेरो विश्व-व्यापिनी तारा दोनोंके हृदयोंमे सुमधुर सरस सुधा-रस-धारा परसावेगी अविरल । श्राओ, पायो ! प्यारी, आयो ! मेरे मनमे चिदानन्दको विमलामा - मलकाओ। ७
७२]
विजनवती
मायावती
मैं रोती हूँ, मैं निशिदिन पलधिन रोती,
मेरी आँखों से निखरे पडते मोती।
मेरे आँसू है पद्मपत्र मे कम्पित,
कानन है मेरे अश्रु-श्रोस से सिञ्चित,
मम क्रन्दन से तारे है नभ में पुजित,
मैं नयन-नीर से निखिल प्रकृति को धोती।
मैं तरल अश्रु से निशिदिन अविरल रोती ॥
मुझको पावस की घन-घन-घटा रुलाती,
वह सजल उसास कहाँ से है नित लाती ?
व्याकुल करती है नित मुझको धन-धारा,
रोती हूँ देख नदी का यौवन न्यारा,
उमडा पडता है आँसू का फव्वारा,
अविदित विषाद से भर जाती है छाती ।
मुझको पावस की घन-घन-घटा रुलाती ॥
मै देख शरत की शान्त नीलिमा रोती,
मैं देख विजन की छवि नित आफुल होती ।
करती है मुझको विफल बाँसुरी कन्दित,
सन्ध्या मानस मे करती श्राह तरङ्गित,
मैं विह्वल वीणा-सी हो फरणा-झकृत,
नित-नित नूतन सुमनों में अश्रु
में देख शरत् को शान्त नीलिमा रोती ॥
सजोती।
मायावती
[७३
मैं हँसती हूँ, मैं नित पगली सी हँसती,
मेरे मुख से फूलों की झडी वरसती ।
पुलकित प्रभात सी रहती हूँ नित विधुरा
उत्फुल्ल कुसुम सी रहती हूँ मधु-मधुरा,
नव-अरुण-राग सी हूँ में मादक-अधरा,
मम हास देख हिम-याला नित्य तरसती ।
मेहँसती हूँ-मैं नित पगली-सी हँसती ।।
हूँ शरच्चन्द्र सी उजियाली मे वाला,
हंसफर नित करती हूँ त्रिभुवन उजियाला ।
द्युति-दीप्त दामिनी से मम हास दमकता,
अति प्रखर सूर्यकर से यह नित्य चमकता,
इसमें झलझल सन्ध्या का स्वर्ण झलकता,
अरुणोदय ने भी इसमे है रंग डाला।
हूँ शरच्चन्द्र सी उजियाली में वाला ॥
,
मैं रोती हूँ, हंसती हूँ, हो मतवाली,
है सजल नयन मे छाई कान्ति निराली ।
निझर-शीकर मे मम क्रन्दन फुहराता,
रवि किरणों में मम हास सदा लहराता,
मन्ध्या-सागर मे अश्रुवेग गहराता,
ऊपा में सजती हास-कुसुम की डाली।
मै रोतो हूँ, हँसती हूँ, हो मतवाली ॥
विजनवती
७४]
मैं हूँ गम्भीरा, हूँ रसवती नवेली,
मैं हूँ कुहेलिका-सम अति कुटिल पहेली,
मैं विजन-वास में रहती हूँ अति रुदिता,
मैं रागरन से हो जाती हूँ मुदिता,
हूँ सन्ध्या-सम निलया प्रभात-मम उदिता,
रजनी की सननी, सविता की अलनेली ।
मैं हूँ गम्भीरा, हूँ रसवती नवेली ॥
--
मैं महामहिम हूँ मुक्नमोहिनी माया,
निज अश्रु-हास से निखिल जगत् विरमाया,
है इन्द्रधनुप मेरी माया से अङ्कित,-
मम नयन-वाष्प से होकर नभ मे व्यजित
मम तरल हास से होता है वह रञ्जित,
है धूप हँसाती मुझे, रुलाती छाया ।
मैं महामहिम हूँ मुवनमोहिनी माया ।
जून, १९२७
मृत्यु-मिलन
आज अमाफी रजनी
है निर्मल, अकलङ्कित,
मम चिर-प्रिय यह सजनी
है प्रसन्न, नि शङ्कित ।
मृत्यु-मिलन
[७५
.
गहन अतलमे
अर्द्धरानि
भागत
निद्रा नहीं नयन में,
नीरव निखिल जगत् है
पुलकित अलस-शयनमे।
विश्वगीत स्तम्भनमें
स्थिर है गौरव-गरिमा,
छायी गगनाङ्गनमें
अलख-निरञ्जन-महिमा ।
नीचे मैं भूतलमे
नरकानल हूँ सहता,
ऊपर
पुण्य मरण-जल बहता ।
पान तनिक तुम बोलो-
मृत्युदेवि ! मम रानी!
निज बूंघट-पट खोलो-
निनिड कृष्ण, असमानी।
मलकाकर अम्बरमें
मुक्तामय अवगुगठन
किया हाय, क्षणभरमे
त्रिमुवन-जन-मन लुण्ठन!
आज हृदय है पागल,
टूट पडा है बन्धन,
होकर मुक्त, अनर्गल
उमड पडा है क्रन्दन ।
विजनवती वेदना चञ्चल, मर्म हुआ है खण्डित- व्यय मन है सखि, उत्कपिठत धरने को तव अञ्चल । भान हुआ हूँ वेकल, मुझे तनिक रोने दो। शीत गात निज कोमल छूने दो । छूने दो। विरह विलय हो जावे इस अभिसार-निशा मे, मिलन-पुलफ अब छावे सकल दिशा-विदिशा मे। सुमधुर विधुर अधरमे लहरावे मृदु कम्पन, थरथर-विकलित स्वरमे झड्कृत होवे चुम्बन । अङ्ग अङ्गमे लय हो, हग सुनिमीलित हगमें, हृदमें लीन हृदय हो, काल स्तन्ध हो दिगमे । प्यारी, आज मिला है मुझे निकटतम दर्शन, हमण सहित खिला है पुलक-प्रकम्पित स्पर्शन।
मृत्य मिलन
[७
सपल्ल्व,
,
युग-युग-सिश्चित आशा
हुई प्रफुल्ल,
चिर-क्रन्दित मम भाषा
मन्त्र-मुग्ध है—नीरव !
कितने ही दिन देखा
रूप तुम्हारा मोहन,-
सम्रूण सध्या-रेखा,
वालारुण शुभ-शोभन ।
पूर्णिम निशिमें अमलिन
अनुपम छवि झलकार
आयी हो कितने दिन
इठलाफर बल खाकर ।
कितने दिन हो विम्बित
खर मध्याह्न गगनमे-
किया मुझे सखि, स्तम्भित
उज्ज्वल प्रलय-लगनमे।
किन्तु आज यह न्यारी
देखी कैसी
माया ।
मम व्याकुल हिय, प्यारी,
उच्छृङ्खल पिललाया।
पहन अग्निमय माला
तपनोंकी
लायी हो तुम बाला
फुलझड़ियाँ सपनोंकी।
प्रज्ज्वलतम
७८ ]
विजनवती
नयनोंमे मलकाया
यह क्या विश्व अनोखा।
मायाजाल बिछाया
अविनानित भुवनोंका।
मुझको ले जायोगी
किन रहस्य-कुञ्जोंमे ?
छलना छलकाओगी
किन तारक-पुजोंमें ?
तब निस्तब्ध निलयमे
निनिमेष नीरवता--
मेरे
हृदयमे
छा देगी क्या कविता ?
पाप-ताप ज्वालासे
करके मुक्त, विवर्जित
दिव्य अमल माला से
मुझे करोगी अर्चित ।
होगा लीन अतलमे
पक-गलित
रौरख-तल,
अनुभव होगा
पलमे
पुण्य परश तव शीतल !
चिदानन्दको माया
मुझे करेगी आकुल,
निखिल शान्तिको छाया
मासित होगी मञ्जुल ।
मृत्य-मिलन [७९ आज विदा होता हूँ हे प्यारे मानवगण ! अस्थिर हो रोता हूँ हर्ष-शोकके कारण मधु-स्मृतियोंकी झाँकी करतो मुझको उन्मद,- करुणामा उपाकी, सन्ध्याकी छवि गद्गद । तुहिन-सिक्त धरणीका अश्रु-गलित मुख उज्ज्वल- स्नेह जता जननीका कर देता है विह्वल । विदा धरित्री माता ! अवका अन्त-मिलन है, युग-युग-प्रन्थित नाता होता आज स्खलन है। विदा सुचारु हिमालय। विदा कलकलित सरिता ! विदा कुन] गुञ्जनमय ! विदा वनानी हरिता ! विदा वासना सजनी। आज पूर्ण है इच्छा, विदा प्रिय सखी विननी। दो अब अन्तिम भिक्षा!
८०]
विजनवती
मङ्गल,
प्यारी परियो । सब मिल
राग सुनाओ
अन्तिम लोरी तन्द्रिल
गाओ अलस, सुकोमल !
कैसा मत्त निराला,
यह अपूर्व शुभ क्षण है !
हर्ष। हर्षका प्याला
हुआ आज पूरण है।
दिसम्बर, १९३१
6
दमयन्ती
नीरव, सौरभ-स्निग्ध विपिन मे
मृदु-अलसित लालस छाया,
इस गिरितट के खर शर-वन में
अन्धकार धन हो पाया।
स्मित-विभ्रम से रनित कर दिर
पहने अरुण करण सा देश
सन्ध्या-बाला निज अञ्चल में
लाई क्या विलास-आवश।
, वमय ती [८१ रजनीगन्धा निज सौरभ से यनी उन्मना, आमूल-प्राण, कैसे विधा मर्म में उसके कुसुमायुध का खर-तर वाण वन-कपोत ने पहुँच नीड में पकडा सुखद शान्ति का कोड, हसी भी पर्वत में आई किस सैक्त की माया छोड ! गिरि-उपत्यका किस मधु-रस से हुई अलस, विह्वल, विश्रान्त ? विकल स्वप्न से हुई विमूर्छित वनस्थली हो तन्द्रा-कान्त । थकित हुई हो तुम दमयन्ती ! जडित चकित सी हो विभ्रान्त, खिन्न हुए पेलव पद-पल्लव- चलते चलते हुअा दिनान्त, नल ने भी त्यागा है, कल से भटक रही हो एकाकी, मुख में व्यजित करुण झलक है चिर-विपाढमय रेखा की, अतिशय कोमल छुईमुई-सी हुई देह-लतिका बलहीन, सोयो, सोमो, हो जामो तुम निखिल-निलय मे निपट-निलीन । , विजनवती , तुम, डुलावेगी, तन्द्रालसित, निमीलित वन में सो लो, सो लो दमयन्ती ! सो जाओ फिर अनन्त तक ऑख न खोलो दमयन्ती । निझर कल कल लोरी गाकर अवश करेगा लोचन-कोर, विमन पवन निज सरस परस से पलक करेगी पुलक-विभोर । मन्द-प्रभजन-दोलित शाखा तुमको व्यजन निष्ठुर, निलज, निदय निर्यातन करणा-सहित भुलावेगी। शीतल हिम-जल-कण-जालक से विटप करेगा अश्रु निपात, विहगी करण विहाग-राग से दुख रोवगी सारी रात । तारकगण कर निशा-जागरण, मासित कर निन तरलालोक, करुपए करों से थपकी देंगे स्तिमित नयन से तुम्हें विलोक। आँख मूंदते ही स्वों का विक जायेगा माया जाल, उन स्वों की सजल मलक से पुलस्ति होकर रहो निहाल ।
इमपन्ती
छिन्दि अन्न
+
यो निदनी
नहीं भिन्द्रन्ट व
नित हो तल्लीन, ८४ ] विजनवती अतिथि, अमुक्त, अनाय जनों की सेवा मे करुणामयो अन्नपूर्णा-सी राज रही थीं तुम स्वाधीन । अपने ही रंग मे विभोर हो थी तुम मदन-ताप से हीन, हाय ! अचानक मर्म सुकोमल कैसे तव हो पडा विलीन ? कैसे नल के मदनानल से गलित हुआ तव कोमल प्राण क्यों चिर-निर्दय पुरुष-जाति से तुम भी नहीं पा सकी त्राण ? 7 के इन्द्रजाल सोओ, सोओ, सर दुख भूलो, अब न करो निज मर्म विभग्न, तुम अनन्त तक पुलक स्वप्न के फेनिल रस में रहो निमग्न । मायापुर से रचित इन्द्रधनु की माया- फिर से रंग देगी अन्तस्तल स्वप्नमयी रत्नच्छाया । फिर से जाग पडेगा मन मे बालफाल कल-कल्लोल, फिर से किलक उठेगी कल-कल कौतुक-कोलित-केलि विलोल का दमयती - का सङ्ग, नव-यौवन का मदन-जनित ज्वर, परिणतवय का चिन्ताताप- सभी विकारों से विमुक्त हो मोगोगी उमा निष्पाप । निर्वासिता सती सीता ने जिस प्रकार होकर गतिहीन नव-जीवन-यापन की ठानी होकर वसुधा-गर्भ-विलीन, तनी हाय ! पूत्रों की माया, छोडा हाय ! राम नये सिरे से रंगना चाहा जीवन का नित-नूतन रग- उसी भाँति दमयन्ती! तुम भी त्यागो, त्यागो नल का मोह, हाय ! नहीं तो तुमको शोपित कर देगा यह भसह पिछोर । नहीं चाहती हो यदि तुम इस दुस्सह मातप से सरस स्म-माग से घर लो गदित पर जीवन अपना- कभी उडेगी राहिस-सम पह कमी शिली निर्मल मानम में पर लोगो पल-कैलि हिर। तपना, महाग में पमार, ८६ ] विजनवती स्फटिक-सलिल-सिचित सैकत में कमी दलित कर स्वर्णिम रेणु, मरकत-तुल्य नवीन बाँस की करुण बनायोगी मृदु वेणु । सीता-वञ्चक कलित कनक-मृग देगा नित्य तुम्हारा साय, करण, कान्त, कमनीय कपोती चूमेगी तव मत्ता मातङ्गी सी नित-नित नव-नव वन मे डोलोगी, चपल नाग-कन्या सी प्रतिदिन नव-रहस्य-पट हो जावेगा स्वम-स्पर्श से लय यह काल विषादाच्छन्न, में नाचोगी नव-प्रसून सी विमल-प्रसन्न । कोमल हाथ । खोलोगी। महाकाल-गति हाय ! नहीं तनती दमयतो व्यथित वसुमती की ममता, स्वप्रलोक की माया से भी उसका हृदय नहीं रमता। नल का वेश बनाकर भी जिन देवों ने निज पद सुकुमार कभी भूलकर भी धरणी पर धारण किये न किसी प्रकार- दमयन्ती [८७ उन देवों को दमयन्ती ने कभी नहीं चाहा परना,- यहीं जन्म लेकर दमयन्ती यहीं चाहती है मरना । नव- व-विवाह-उत्सव मे उसके हुआ दुःख-जल का अभिषेक, हाय ! हुई थी होमानल से उत्थित दुख-धूम्र को रेख । वह मङ्गलमय दुख हृदय मे परम सम कर धारण करती जाती है दमयन्ती सुकठिन नियमों का चारण । किसी स्वप्न की माया से भी इसे नहीं भूलेगी हाय ! कठिन वन को छिपा मर्म मे पड़ी हुई है वह मृतप्राय । कौन जगावेगा? सोई है की प्यारी दमयन्तो, तीक्ष्ण बाण से विद्ध मृगी-सी राजदुलारी दमयन्ती, महारण्य में चिर-मूर्छित सी यह अलबेली दमयन्ती, बिलख बिलख कर विकल पडी है निपट अकेली दमयन्ती । मई, १९२७ जग
८८]
विजनबत्ती
नरक-निर्वासी
पडा हुआ हूँ उग्रगन्धमय घृणित, गलित रौरखम,
स्वद-वेदसे नित प्रप्लुत हूँ। निगिदिन हाहावमे
बजती है मेरे कानोंम आतङ्कित ध्वनि मीपण
किन प्रमत्त प्रेतोंकी ! प्रतिपल होता है सघर्पण
कुष्ट रोगसे भ्रष्ट, शीर्ण, कहाल-शेप वीगणसे,
हीर, हिष्ट पुस्पोंसे । अहरह काम-प्रणोदित रणसे
जीव कौन ये मरण-मत्त है ?--ज्वर-नर्जर, उच्छृङ्खल !
हिंस-नेत्र है गहर-गत, है रक्तहीन मुख पिगल,--
चण्ड क्षुधासे लम्बित निहा है उनकी आलोलित,
रक्त-तृपासे ज्वलित, शुष्क इन्धन सम। तीन प्रदोलित
स्त, विसर्पित जटा हाय, फुफकार रही नागन-सी
किस ज्वालामय पवन-वेगसे ? नितप्रति प्रलय मगन सी
रक्तनदी बहती है यह उत्तप्त वमादि-समाकुल ।
तृप्त स्नान करते है उसमे कौन प्रेत-दानव-कुल ?
स्तूपीकृत है पुन-अस्थि पञ्जर प्रस्तर-पर्वत-सम,
उनके प्रति कोटरमे विषधर जीव घृणित कोटोपम
सर्पित, लोलित, पुजीकृत है। वक्षस्थलमे मेरे
रक्तवीज-सम चिमटे है ये क्या कीटाणु घनेरे ।---
चूस रहे है सत्त्व जुगुप्सित तृष्णासे । मै थर-थर
लोमहर्षसे काप रहा हूँ, विकट घृणासे जर्जर ।
निखिल वायु-मण्डलमे कैसी पूतिगन्ध है बहती ।
उसकी ज्वाला अहरह रहरह मेरा हिय है रहती
,
नरक निर्वासी [८९ गन्धा-विगलित अग्नि-पाण-सी । कैसा सुकठिन शृङ्खल जकडे है मेरे पावोंको ! मलिन भूमि अति पविल बनी हुई है शय्या मेरी। किन भौतिक स्वप्नोंका भीषणतर पापाण-भार यह कैसा सुदृढ, अनोखा पड़ा हुआ है मेरे कान्त हृदयपर ! । हाय, दुलारा लुप्त हुआ मम स्वर्ग कहाँ वह निखिल जगतसे न्यारा ? कहाँ गया चिर-शान्ति मगन वह नगन गगनका अगन- सूर्यालोकित, चन्द्र-तारका-रनित ? प्रिय आलिङ्गन प्यारी शरत-कुमारीका क्यों हुआ स्वप्न-सम झूठा हिमगिरि-पृजित साध्य स्वर्ण वह किस पिशाचने लूटा मेरी मानस-खनिसे? अरुणोदयकी रक्तिम माया रुधिर-रज्जमे लीन हुई, गिरिवनको श्यामल छाया अन्ध मोह-गह्वरमे मग्न हुई, खर-धारा तीखी तरल, तोत्र निझरको सुकठिन, निर्मम खड्ग सरीखी निज स्मृतिसे करती हे प्रतिदिन मेरा मर्मच्छेदन । साय-साय रखसे बजता हे प्रतिपल कैसा वेदन शिरा-शिरामें ! पिपुल वासना-विकसित मेरा यौवन भ्रष्ट योग-सम कहाँ हुआ तय ? महत् चिरन्तन जीवन चिर जडतासे स्तन्ध हुआ क्यों ? हे मेरे प्रिय भाई ! निखिल रूप रस-गन्ध लुप्त कर क्या कुहेलिका छाई अन्य मनोमण्डलमे मम ?
विजनवती
नव-नव
हे प्यारे मयं निवासी
मानवगण । प्रतिदिन तुमको फल कोमल, कलए उदाप्ती
करती है पुलकित, हिल्लोलित । प्रतिदिन नव-नव अाशा
रजित कर देती है विगलित हियकी तरल पिपासा
किन विचित्र रङ्गोंसे ! नित-नित नूतन सुख-दुख-लीला
इन्द्र-धनुष-सम रंग देती है गगन तुम्हारा नीला ।
मृदु कलरवसे करते है शिशु घर-घरमें कल-कीडा,
नव-मुकुलित लतिका-सम व्याकुल नवल-वधूकी नोडा
देख-देखकर होते हो तुम हर्पित । प्यारी तरुणी,
अलवेली करती है पागल तुमको,---जग-मन हरणी
रागमयी मायासे।
मातृ-स्तन्य-रस-धारा
उमड-उमड गद्गद करती है शिशुका हृदय दुलारा ।
अक्षय जीवन देतो तुमको माताकी मृदु ममता ।
किन्तु हाय, छाई मम हियमे यह क्या कुटिल विषमता !
जन हेमन्त अन्तकर नव-वसन्त इतराता,
विकल कण्ठसे कल कोक्लि तय पुलक विधुर हो गाता
अरुणोदयमे तुम लोगोंके अङ्गनमें, अलि-गुमन
याकुल तान-सहित करता है मानवती-मन भजन,
मृदुल-मञ्जरी माधविका तर दिन-प्रति दिन है बढती,
नव-रसालको प्रेम-पाशमे वह सोल्लास जाडती
सरस स्नेह-रससे सरसाकर । ऐसे ही नव-वर्षा
सिञ्चन करती है करणा-जल, निखिल जगत्-मन हो,-
फैला तुम लोगोंके तप्त गृहोंमे शीतल छाया-
विस्तारित करता है धन पापा-मेघ क्या
प्यारो!
N
माया
नरक निर्वासी
[९१
हाय, तुम्हारे विस्मित, उत्सुक नयनोंमे ! शरदामा
धरणोके कण-कणमे ला देती है कैसी शोभा !
अणु-अणुमे सच्चारित करती है क्या पुण्य सुशीतल ।
स्वर्ण-वर्णसे रंग
जाता है पावनतम जगतीतल ।
हाय, किन्तु अच्छेद्य वज्रकी दाम्प अविचल जडता
जकडे है मम हृदय, भीम पापाण-भारको दृढता
प्रल भूत-सी दया रही है मुझको । विश्ल पडा हूँ
स्रोतहीन इस पङ्क कुण्डमे, होकर बद्ध सडा हूँ।
स्तर-स्तरमे दुम्तर प्रस्तर है इस गहरके ऊपर,
कैसे इनको लङ्घन करके आ सस्ता हूँ भूपर-~-
मुक्तालोकित पवन-राज्यमें ?
मुझे बता दो भाई !
कर तक यह स्थिति अटल रहेगी अति निर्मम, दुखदाई ?
कौन उवारेगा मुझको इस वन-कठिन बन्धनसे?
अचल शक्ति क्या विचलित होगी मम विदीर्ण गन्दनसे ?
चिर-अनन्त तक क्या मै इस रौरखमे सडा रहूँगा ?
कितने
युग तक दुस्सह ज्वाला नित्य सहूँगा ?
किन पुजित पापोंसे करके भार-ग्रस्त यह काधा
कौन शक्ति है जिसने मुझको इस दृढतासे वाधा
महाकाल तक
हृदय ! उठो अन, आज मचेगा ताण्डव,
रोम-रोमसे हुवृत होवे महा-गान अति भैरख ।
हे उन्माद ! करो निज मदसे निखिल नियम परिवर्तन ।
विश्व-प्रकृतिको विचक्ति करके निपट नग्नतम नर्तन
कर तक,
?
९२]
विजनवती
अाज दिखा दो। फिरसे खोजो स्वन-स्वर्ग वह प्यारा-
वर्षा, शरत् , वमन्त-पाकुलित अभिनव मुक्न दुलारा ।
बद्ध वेदना उमड उठे अव, सुप्त स्फूर्ति हो स्पन्दित
नव-चेतनसे, ऋन्दित होवे तन्द्रित आशा स्तम्भित ।
विफल वासना व्याकुल होकर पुलकित होवे पलमें
नवोदाससे, सचल प्रकृति हो वाहित अखिल अचलमे ।
दिनपर दिन चीता जाता है, कब तक धैर्य रहेगा?
इस असीम स्तम्भनकी जडता कैसे हृदय सहेगा
जन्म-जन्म तक ? निठुर देवसे अर सग्राम छिडेगा,
बद्ध हृदय मम अन्ध शक्तिसे हो निर्द्वन्द्व भिडेगा।
जनवरी, १९३१
S
नवीना माता
नवल लास से विलसित शिशु-मुख चूमो माता, चूमो ।
तरल सुधाके मधुर मोहमय अविरल रस से झूमो ।
गद्गद् थरथर हर्पण छलछल नयनों में है छलका,
स्नेह-गलित नव वेदन सुललित स्वेदक्णों में झला ।
हिय के अगम अतल से कैसे पाया माँ ! यह मोती ?
हिम-सागर की कौन परी इस निधि कारण है रोती-
निशि दिन कप रुदन से ? कैसे उससे तुमने छीना
निष्क्लक हीरक यह ? हो तुम अखिलानद क्लिीना-
नवीना माता
[९३
देख-देखकर शोभा माता ! नव-नीहार-पतन-सी-
कलित काति कमनीय ललन की चिर अनमोल रतन-सी।
नव-वसत के मृदु हिलोल से हो विलोल,
उच्खल,
तुम यौवन के गहन विजन में भटक रही थीं चचल,
मलय-व्यजन से गध-विधुर हो लावनमयी चमेली
लुन्ध लयगी से करती थी लाजहीन अटखेली,
तुम भी उनके सँग मे हिलमिल थीं उन्मद-रस-पाकुल,
करती थीं तुम सन सखियाँ मिल सुरभि-रभस से व्याकुल
मायाच्छन्न विपिन को।
सहसा हुआ शरत् का आगम
विन वर्षा के। पक्क शस्य से लहराया क्या विभ्रम
धरणी के हत्तल मे ! प्रप्लुत सरिता-सीमातर में
शुभ्र काशवन हुआ प्रफुल्लित । पुलक विकल निझर में
किलक उठा कल-क दन । पल में स्तन्ध हुआ पिक-जन,
कपित, क्लात कपोत-कठ से फ्रूणलास-रस-सिञ्चन
हुआ विजन में । देखा तुमने हृदय-गगन जन अपना-
झूम रहा था स्निग्ध साध्य-छाया में सुमधुर सपना,-
स्वच्छ नीलिमा में सोया था अलसित वेदन न्यारा,
पाया तुमने विह्वल हिय से उज्वल सच्या-तारा ।
९४ ] विजनवती मधुवन का माली निज मैं वह थी वह वह किस छिन्न माल को डोरी लिए चला जाता था, गाफर अलस - पुलक • मृदु लोरी। थी नोख निर्वचना, अलसित - विकसित - नयना, मौन-मूढ लेटी थी सनकर उत्सुक वासक - शयना, झाँक रही थी बाहर को किस विकल भूल से भोरी। शशि की नवल चकोरी ! एकाको दिखलाताथा विमल जलद निज नभ मे रङ्ग - चिरङ्गी। प्रकृति शान्ति में मग्ना, सन्ध्या निर्लज - नाना, उत्कण्ठा से उत्सुक होकर गाती थी उद्विग्ना--- नवल-प्रात की आशा से उड सागर - पार विहङ्गी। बज उठी हृदय - सारङ्गी। वजाने था नि सङ्गी, छवि थी थी कल किम लगा वशी, मधुवन का माली [९५ वह तन था अधियारा, था क्रिस वह मानस किस में किलक उठी हो पुलक-प्रकम्पित श्राकुल वेतस-वन सी। छाया बहा रहा नव-तारा जनम-मरण के निखिल-स्फुरण से करुण-किरण की धारा ! हुई विपुल के लिये तरङ्गित वशी के कम्पन सी,- की कल-हसी! चला निराश उदासी, छोड गया पीछे से अपने आँखें बेफल प्यासी। व्याकुल विवश पिपासा, पुलक-उच्छ्वसित सजल-नयन इनित, अति नीरव, सुरभि-सुवासित भाषा- करती आकुल मुग्ध हृदय मम, था रस-लुब्ध विलासी- निजन - निलय - निर्वासी । मेरी चाल निराली, मदभोली आँखों में मेरी छाई लालस-लाली । मदमा, मे वह मृदु वह आशा, थीं पी थी चलता था था वन-उपवन घूमा, ९६] विजनवती किस हो फिस हूँ मैं उजल नयन के सजल लाज ने मेरा मुंह था चूमा विकल-विधुर या अथिर थिरकता पो मधु-रस की प्याली- मधु-वन का मैं माली! विजनवतो का प्यारा, भूला फिरता हूँ भटका नित राजदुलारा। घर की मुझको नित्य रुलाती! विजन-विश्वकी शान्त क्लान्त छवि जकडे है मम यहा रहा हूँ मदविह्वल हो अविरल दृग-जल-धारा, किस वेदन का मारा। किस वन में व्याकुल पाती है पर छाती। नित मैं जून, १९२५
उसकी स्मृति में-
[९७
उसकी स्मृति में-
जिस दिन मैंने पहले उसको देखा था बचपनमे,
मुखमें क्या स्वर्गीय प्रभा थी, विकसित ज्योति नयन मे !
क्या सकरुण, सुकुमार वेदना मुखमे झलक रही थी !
कैसी विह्वल व्याकुलता आँखोंमे छलक रही थी।
भोली-भाली, सरस, सलोनी छवि मेरे मन भाई,
किस विषादकी श्यामल छाया शुष्क हृदयमे छाई ।
मैंने सोचा-किस माताकी है यह परम दुलारी,
किस भैया की बहन लाडिली, किस दीदीको प्यारी ?
चिर-परिचित-सी लगी मुझे क्यों पहले ही दर्शनसे ?
सरस स्नेह उमडा रग-रगमे हाय ! प्रथम स्पशनसे ।
हाथ थामार उसका मैंने पूछा
नाम दुलारा,
मन्द-मन्द मुसका कर बोली-“हूँ प्यारी तारा।"
मैने पूछा-"किस माताके नैनोंकी हो तारा ?"
करुणा-विह्वल, छलछल दृगसे उमड चली जल-धारा ।
हाय, निखिल जगमे न कही थी जीवित उसको मैया,
दीदी भी न कहीं थी कोई, प्यारी वहन न भैया ।
उदासीन थे पिता, निष्ठुरा थी उसकी प्रिया मौसी,
जो प्रिय वचन सुनाती कहकर-"हतभागी, मुहमोसी ।"
निखिल विश्वके किस कोनेमें थी वह निपट अकेली?
निभृत विजनमे कहाँ स्फुटित थी वह लतिका अलबेली?
अपने ही अन्तरके रससे वह दिन दिन बढती थी,
स्वप्न-जगत्में हँस-हँसकर वह फिर रो-रो पड़ती थी।
- था केतकी-माला । ९८] बिजनवती हाय, एक ही दिनमें मुझसे कैसा नाता जोडा! व्याकुल हियसे मुझे जकडकर पल-भर साथ न छोडा । मुझे विकल करती थी निशिदिन उत्सुक प्यारी श्रॉग्वे, डपटब रससे भरी हुई वे नींबूको-सी फाँके । तरल भास था कैसा उनका, कैसा था आकर्षण ! देख-देख होता मेरे रोम-रोममें हर्पण । मुग्ध दृष्टिसे निरख-निरख वह मुखडा सहन सलोना, समझ गया में, मुझको सारे जीवन-भर है रोना । कभी खेलती वह निर्जनमें कैसा खेल निराला ! कभी गूथती थी उपवनमे कलित कभी मिलैयाको वह अपनी लेकर गोद सुलाती, करके प्यार, दुलार उसे तत्काल बिसर-सी जाती । उसे याद श्रा जाती थी तर अपनी प्यारी मैना, जा पिंजडेक पास स्नेहसे कहती-"आ जा, पिंजडेपर निन कोमल अधरोंको करती थी स्थापन, रक्तचचुसे मैना उनको कर देती थी चुम्बन । विकल पुलकसे किलक-फिलकार बना-बनाकर ताली, स्नेह-सहित अपनी बहनाको देती थी वह गाली । मैना कहती-"तारा, तू मर जा!" वह हँस पडती थी, रहनाफी प्यारी गालोसे वह न कभी चिढती थी। इस प्रकार निज तृपित हृदयकी ज्वाला हाय ! बुझाती, स्वय सृजनकर स्नेह-जगत् निन, मन अपना समझाती । हाय, दुलारी मैना ! कैसी सफल हुई वह यानी ! वहाँ श्राज तुम, हाय, कहाँ है मेरी तारा रानी! भैना" - उसको स्मृति में- [९९ सध्याको वह मेरे सगमे विपिन-भ्रमणको जाती, निरख-निरख छवि शान्त प्रकृतिको अपना मन बहलाती । निरदेश्य फिरते थे फिरते थे दोनों पर्वतके दोनों पर्वतके वन-वनमे, क्या उल्लास झलकता मुखमें, क्या श्राशा थो मनमे ! फिस प्रवेगसे उसे खींचता था सव्याका तारा ! उसके विस्मित नयनोंको लगता था कैसा प्यारा ! उसे देखकर फिर वह आँखें नहीं फिरा सस्ती थी, हेर-हेरकर उसकी शोभा वह न कभी थाती थी। सम्भव है क्या—वह या उसके पूर्व-जन्मका साथी ? वह पा सखा दुलारा, तारा उसकी परम प्रिया थी? छीन ले गया मुझसे उसको क्या ईपीके कारण ? वनस्यलमे किये हुए है आज उसे क्या धारण चूमो, चमो सध्या-तारा । करो उसे आलिंगन, स्निग्ध करोंसे कर दो उसके अश्रुणोंको मोचन । उसे रिझाओ, किन्तु वढाओ मेरे हियकी ज्वाला, उसे पिलामो सुधा, मुझे दो हालाहलका प्याला। सरिताके ढिग जाफर दोनों करते थे जल-कीडा, कलकल जलसे हमे रुलाती लहरी लोल अधीरा । दूर पहाडी खेतोंसे मुरलीकी तान सुरीली, बीच वीचमे यन उठतो थी कैसी करण, रसीली ! कभी निठुर हम मत्स्य पकडते लिए कँटोली वशी, निर्निमेष रहते, जब जलमे कमी तैरती हसी । कभी चैठकर वेत्र-लताको सघन कुज छायापर, सन्न हृदयसे सुनते थे हम सुरुचिर पल्लव-मर्मर ! ?
१००] विजनवती काश-गुच्छको बाँध-याँधकर निज कुचित कुन्तलमे वही लेट जाती सिर रखकर वह मेरे पत्तलमे । वहाँ सुनाता था मैं उसको कोई करुण कहानो, उत्सुक हो, एकाग्रचित्तसे सुनती मेरी रानी । जर श्मशानके निपट अकारण जाते शिवके मन्दिर, शुष्कजटा सन्यस्ता देवी दर्शन देती अन्दर । दोनोंके मस्तकमे वह क्या ज्वलित भभूत लगाती, मायामय आशीर्वादसे क्या उल्लास जगाती। काश-कुसुम करमे लेकर तारा करती थी अर्चन, रोम-रोममे भक्ति-हर्पफा हो जाता या सर्जन। उल्कापात कमी जर होता, वह होती हाकुल, लगती थी श्रानन्द-वाण-सी उसकी रेखा मजुल । एक वर्ष जर धूमकेतु था शोभित हुआ गगनमें, दमक उठा उल्लास अलौकिक उसके दीप्त नयनमे । किस अनगका वाण मनोहर हुआ शून्यम सञ्जित । देख-देखकर उसको तारा हुई पुलकसे लज्जित । भूल गई वह पाकुल वेदन, भूल गई वह रोना, अशन-वसनकी चिन्ता भूली, भूल गई वह सोना । लगा उसे वह मस्त तान सा, चिर-उन्माद-स्वपन-सा, भाग्य-गगनमे भूला-भटका अस्थिर, अचिर तपन सा । भ्राम्यमाण निज जीवनकी क्या देखी उसमे छाया ? धूमकेतु-सी लीन हुई क्या क्षणिक-प्रभा वह माया नव-नव रुचिर कुसुम-चय लेकर, गूंथ-गूंककर माला पहनाता था उसको प्यारा नव-वसत मतवाला, ?
उसी स्मृति में-
[१०१
घृणा-सहित उस मालाको निज पैरोंतले कुचलकर
नष्ट-भ्रष्ट कर देती थी वर हियमे मचल-मचलकर।
शरत-देवकी अमल-धवल नव-कान्ति मुवन-मन-मोहन
उसका चित्त हरण करती थी बनकर रुचिर, सुशोभन ।
हिम-मृतुको जर चन्द्रकान्त-निभ भाभा स्वच्छ, सुशीतल
हिम-निपातसे कर देती थी उज्ज्वल यह धरणीतल--
परिस्तानको तर वह माया उसका हृदय लुभाती,
उसे सुनाती हिमकी परियाँ क्या सगीत प्रभाती !
जय निहार नीहार-विपिनकी कल-कमनीय हिमानी
हो जाता था विनमित, अवनत मन उसका अभिमानी,
विगलित होकर तर वह कहती--"यही जगत् है मेरा ।
इसी जगत्के निभृत नीडमें लूँगी हाय, बसेरा ।
यही स्वप्न है मेरो, भैया, इसी अप्सरालय मे
कठिन जगत्से हो विमुक्त अव हुो चाहती लय मैं ।"
श्वेत-कुसुम-सम हिम-स्फुलिंगको जव होती थी वर्षा,
नाच-नाच उठती थी तन वह मुझको तरसा-तरसा ।
शुभ्र तुषार-स्फटिक-कण-सा था चिर-कुमार उसका मन,
हुआ उसीके सँग विलीन क्या पक्ड हिमानी-दामन
मेरी रानी स्वप्न-जगन्मे हुई निसशय, निर्भय,
हिम-मडित हेमन्त-कला सी दिन-दिन अधिक प्रभामय ।
स्थिर न रहा पर अधिक काल तक स्वप्न-भवन सुमनोहर,
निठुर चकके ताडनसे वह हुआ चूर धरणीपर ।
जकड लिया जगने उसको मिथ्या समाज-बन्धनसे,
बिछुडी मुझसे मेरी प्यारी वरुण, आर्त-कन्दनसे ।
?
१०२]
विजनवतो
सास-ससुर-पतिका शासन, गार्हस्थ्य-चकका पीडन
शोभित करने लगा उसे वह पाप-ताप-प्रालोडन।
हिम-सपात-गिला-सी बनकर कठिन-हदय, निमोही
बन्धनसे हो नुन्ध-प्राण वह बनी विकट विद्रोही ।
लगी छटपटाने वह विहगी चिर-मुक्ता निर्लिप्सा,
विगलित होने लगी हिमानी-सी सविता-कर-तता ।
पुन स्वप्नमय हुई हाय, वह हो अनन्त-निद्रारत,
चिर-कुमारताकी वह महिमा रहा अखड अनाहत ।
चिता जली थी उसकी प्यारो । निर्विकार, निधूमा,
मैंने उस्त अन्तिम श्रआमाको झूम-झूमकर चूमा ।
शोप-शोप वह हरण कर गई निखिल प्रकृतिको माया,
स्तब्ध शून्यमे स्तम्भित होकर में व्याकुल बौराया ।
माज यही है केवल प्यारो ! मेरा क्रुण निवदन-~--
जीवन-भर निधूम ज्योतिसे जले हाय । मम वेदन,
हाय । न फिरन पावे मेरी इस आशापर पानी-
गहन मृत्युके सघन कुजमे मुझे मिलेगी रानी ।
एप्रिल, १९३१
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