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Pahuda Doha Of Ramasimha Muni

Jain,hiralal · 2010/12/06

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तमसो मा ज्योतिर्गमय
SANTINIKETAN
VISWA BHARATI
LIBRARY
262
H61
EXE

Pahuda Doha
OF
RAMASIMHA MUNI
An Apabhramsa work on
Jaina mysticism
Critically editel
With Introduction, Translation, Glossary
Notes and Index.
By
Hiralal Jain, M. A., LL, B.,
Central Provinces Educational Service,
King Edward College, Amraoti;
Sometime Research Scholar, Allahabari l'niversity
1933-

Jammu---.. प्रकाशक गोपाल अम्बादास चवरे, मर्चेट एन्ड बैंकर, कारंजा ( बरार) D कासु समाहि करउँ को अंचः छोपु अछोपु भणिवि को वंचउँ । हल सहि कलह केण सम्माणउँ जहिं जहिं जोवउँ तहिं अप्पाणउ ॥ १३९ ॥ देवलि पाहणु तिथि जलु पुत्थई सम्बई कव्वु । वत्यु जु दीसइ कुमुमियउ इंधणु होसइ सबु ॥ १६१ ॥ --- 5) ---- मुहक टी. एम्. पाटिल, मैनेजर, सरस्वती पावर प्रेस, अमरावती (बरार ).

PREFACE Dohāpāhuda represents the same variety of Apa. bhramsa as is found in Sāvasariniammadohū alrearly issued as the second volume of this series, and which is exactly the language so well explained and exemplified by Hemacandra in his Prakrit grammar. It is highly interesting, in this connection, to note that four verses quoted by Hemacandra occur almost verbatim in the present work. We are thus slowly tracing the verses quoted in that epoch-making grammar back to their original sources, as more and more literature of this kinil is coming to light. The subject matter of the work is Jaina mysticism and in this respect, as well as in the form of its poetry, it has similarities with the Buddhist Caryā pādas of Krishna, Dombi, Vinā, Saraha and Gundari, and the Dohākshas of Saraha and Kanhupāda. With these works it has many symbolistic terms in common such as Ruvi, Shushi, Vāma, Dakshina, Shivu and Shakti. Besides this, the work has striking affinities in its subject matter, as well as form, with the works of Jaina authors such as Polskunde, Yogin:lri, Devascra, and Shrutaxiyaru. As the work has very many verses in common with the Paramātma-prakāsha and Yogasāra of Yogindradeva, it has been surmised to have been produced by the same author, but the work itself mentions Rāmasimha muni as its author and there is, so far, no convincing evidence to disprove his authorship. With regard to the verses which it has iu coinmon with the works of Yogindradeva, 6 it is difficult, at present, to say who the borrower and who the original author is, but as Yogindradeva has enjoyed celebrity for a long time, one feels inclined to give him the credit. As verses from this work are quoted by Hemacandra who wrote about 1100 A. D., and as it quotes verses from Sāvayadhamma-dohā which was composed about 933 A. D. the present work may be taken to have been produced about 1000 A. D. I have discussed at some length the question of the rela-ionship between Deshi bhāskā' and Apabhramsa, raised by Dr. Jules Bloch in his letter to me, and the various references which have been collected, tend to show that authors have been using the two names as mutually interchangeable. It is noteworthy that the poets themselves have called their language Deshi bhāshā and have never liked to use the word Apabhramsa for their language while grammarians have called it invariably by the latter name. As in the case of Sāvayadhamma-dohā, I have tried in my translation to be as literal and as close to the Apabhramsa form as possible, even at the sacrifice, sometimes, of the Hindi idiom. This, I hope, will be appreciated by those who wish to study the language. I have frequently added explanatory notes to the translation besides the elucidation and discussion of the texts separately in the tippanis. I have tried t make the glossary complete in the matter of entries as well as references. The text has been critically edited from two manuscripts, one secured from Delhi and the other from Kolhapur.

7 I have also kept in view the readings of some verses 88 found in other works. But these have been noticed in the tippanis and not incorporated in the variants. It is for the readers to judge how far I have succeeded in presenting a correct text from the scanty materials available. So little of this literature has, up till now, seen the light of day as compared to what is in store, that I am prepared, almost expect, to modify my views in any direction in future. King Edward College Amraoti. 12th December 1933. Hiralal Jain, डरर विषय-सूची. पृष्ट Preface ... .... ... ... ... ... भूमिका १ संशोधन सामग्री ८ ... १३ ... ... २ ग्रंथ का नाम M ३ पाहुडदोहा का विषय व शैली ४ पाहुडदोहा में रहस्यवाद ५ पाहुडदोहा का अन्य ग्रंथों से सम्बन्ध ६ पाहुडदोहा के रचयिता ७ पाहुडदोहा का रचनाकाल ८ देशीभाषा और अपभ्रंश पाहुडदोहा मूल पाठ, पाठभेद व अनुवाद २५ २८ ३३ ... १-६७ शब्दकोश ६८-१०२ ... ... टिप्पणी १०३-१३१ ... दोहों की वर्णानुक्रमणिका १३२-१३६

भूमिका
१. संशोधन सामग्री
पाहुडदोहा का प्रस्तुत संस्करण दो प्राचीन प्रतियों पर से
तैयार किया गया है। ये प्रतियां मुझे क्रमश: पन्नालालजी अग्रवाल,
दिल्ली, व प्रोफेसर ए एन. उपाध्ये, कोल्हापुर, द्वारा प्राप्त हुई थीं।
अतएव मैं उक्त सजनों का बहुत उपकार मानता हूं।
इन प्रतियों का परिचय निम्न प्रकार है-
द.
यह प्रति दिल्ली के नये मंदिर की है। इसका पता हमें
अनेकान्त में प्रकाशित श्रीयुक्त जुगलकिशोर जी मुख्तार के एक
नोट से चला। इसकी पत्र संख्या १२; आकार ११" x ५१
पंक्तिया प्रति पृष्ठ ११, वर्ण प्रति पंक्ति लगभग ३६; हासिया
ऊपर नीचे ", दायें वायें १३" है। यह प्रति प्रायः शुद्ध है
और अच्छी दशा में रक्षित रही है। कागज पीला, पतला है किन्तु
अभी खराब नही हुआ।
प्रारम्भ
-
अथ पाहुडदोहा लिष्यते ।
अन्त - इति श्री मुनि रामसीह वितषिता पाहबदोश सपा ॥

पाहुड-दोहा
मिती पौष शुक्ल ६ शुकरवार संवत् १७९४ ॥ लिषतं विरजभान
श्रावग पाणीपथनगरमध्ये शुपाठनाथ ॥ श्री शुभं अस्तु कल्याणं अस्तु ।
इससे विदित हुआ कि यह प्रति आज से लगभग दो सौ
वर्ष पूर्व पानीपत में लिखी गई थी। इसमें दोहों की संख्या
२२० है । दोहा नं. ७९ और १४२ नही हैं। हमने अपनी
प्रथम कापी इसी प्रति पर से तैयार की थी।
क.
यह प्रति एक गुटके के अन्तर्गत है इस गुटके में और
भी कई छोटी मोटी संस्कृत प्राकृत रचनाओं का संग्रह है । इसका
परिचय श्रीयुक्त उपाध्ये जी, अनेकान्त में प्रकाशित, अपने एक लेख
में दे चुके हैं । इसका आकार ५३० x ५" है। इस गुटके की
दशा बड़ी शोचनीय है। प्रारम्भ के सात आठ पन्ने गायब
और अंत के दस बारह पन्ने अधकट हो गये हैं। बीच के
पन्ने यत्र तत्र दीमक के भक्ष्य हुए हैं। कितने ही पन्नों की
स्याही उड़ गई है जिससे कहीं कहीं पढना दुःसाध्य और कहीं
कहीं असम्भव है।
पाहुड दोहा इस गुटके के पृष्ठ ६२ से ८१ तक है।
उसके पूर्व कुछ सैद्धान्तिक गाथाएँ लिखी हुई हैं और पश्चात्
योगीन्द्रदेव कृत परमात्मप्रकाश है।
प्रारम्भ-ऊं नमः सिद्धेभ्यः ।

संशोधन सामग्री ११ अन्त-इति श्री योगेन्द्रदेवविरचित दोहापाहुडं नाम ग्रंथं समाप्त। गुटके में कहीं संवत् आदि का उल्लेख नही मिला, इससे यह कहना कठिन है कि यह प्रति कितनी पुरानी है। श्रीयुक्त उपाध्ये ने इसे लगभग दो सौ वर्ष पुराना अनुमान किया है । मेरा भी यही अनुमान है । यद्यपि गुटके की हालत देखकर कोई इसे और भी अधिक पुराना अनुमान करेगा, किन्तु विचार पूर्वक अवलोकन से ज्ञात होता है कि गुटके की यह दुरवस्था उतनी प्रभाव से नही जितनी धानी से रखे जाने के कारण हुई है । सम्भवतः यह गुटका किसी श्रावक के घर में रहा है, वह पठन पाठन के लिये हाथों हाथ आता जाता रहा है, तथा खुला रखा रहने के कारण उसे सीड और दीमक का परीषह भी सहना पड़ा है । काल के असाव- इस गुटके की बीच बीच में कुछ पंक्तियां लाल स्याही से लिखी गई हैं। यह स्याही कई जगह बुरी तरह उड़ गई है। बीच बीच में तो पन्ने के पन्ने अपाठ्य हो गये हैं। इस कारण इसके पाठों का मिलान करने में बड़ी कठिनाई का अनुभव हुआ । पाहुड दोहा की और अधिक प्रतियां नहीं मिल सकी इस कारण मैने इसके पाठों को पढने, तथा उन्हे प्रस्तुत संस्करण में देने का भरसक प्रयत्न किया है । तथापि उपर्युक्त कठिनाई के कारण कुछ स्थानों पर इसके पाठ जानने में मैं असफल ही रहा, जैसा कि संस्करण की पाद-टिप्पणियों से पाठकों को ज्ञात हो जावेगा।

१२
पाहुड-दोहा
-
द. प्रति से इस प्रति की मुख्य विशेषतायें ये हैं-
१. इसमें दोहा नं. ६४ नही है, तथा दोहा ७९ और
१४२ अधिक हैं । नं. ७ दो दोहों पर दिया गया है, और इस
तरह से अन्तिम दोहे पर नं. २२० आया है यद्यपि यथार्थतः
दोहों की संख्या २२१ है।
२. कुछ दोहों का क्रम विपरीत है जैसे ६ और ७; २०
भौर २१, २२ और २३.
३. लिपिकार की असावधानी के कारण कही कहीं दोहों
दो या तीन चरण छूट गये हैं। उदाहरणार्थ देखिये दोहा
१३९ व १६६ की पाद-टिप्पणियां ।
के एक,
१. ण के स्थान पर न का प्रयोग बहुत हुआ है किन्तु
यह पाठभेद देने की हमने आवश्यकता नही समझी।
५. इसके पाठों में कुछ संयुक्ताक्षर ऐसे पाये जाते हैं जो
हेमचन्द्र ने स्वीकार किये हैं किन्तु प्राप्त अपभ्रंश ग्रंथों में कम
पाये जाते हैं-जैसे लिंगाग्रहण, दाम्वणु, एम्बइ। ये पाठ अन्य
पाठान्तरों के समान पाद-टिप्पणियों में दिये गये हैं।
पाठ-संशोधन का पूरा कार्य इन्ही दो पोथियों के आधार
पर किया गया है जिनमें से भी एक पोथी की ऐसी दुर्दशा है ।
अतएव किसी किसी दोहे के संशोधन में मुझे स्वयं पूर्ण संतोष

ग्रंथ का नाम १३ नही है। किन्तु मेरा ऐसा ध्यान है कि अधिकांश ग्रंथ के दोहों का पाठ असंदिग्ध रूप से इस संस्करण में निश्चित हो गया है। . जैसा कि आगे चलकर बतलाया जायगा, इस ग्रंथ के अनेक दोहे परमात्मप्रकाश में व कुछ दोहे योगसार तथा हेमचन्द्र कृत प्राकृत व्याकरण में मुझे मिले हैं। किन्तु इन ग्रंथों के पाठभेद अंकित नही किये गये। आवश्यकतानुसार उन पाठभेदों का टिप्पणी में उपयोग किया है। २. ग्रन्थ का नाम इस ग्रंथ के नाम के साथ जो दोहा शब्द लगा है वह उसके छंद का बोधक है । जैनियों ने पाहुड शब्द का प्रयोग किसी विशेष विषय के प्रतिपादक ग्रंथ के अर्थ में किया है। कुन्दकुन्दाचार्य के प्रायः सभी ग्रन्थ 'पाहुड' कहलाते हैं, यथा समयसारपाहुड, प्रवचनसारपाहुड, भावपाहुड, बोधपाहुड़ इत्यादि । गोम्मटसार जीवकाण्ड की ३४१ वी गाथा में इस शब्द का अर्थ अधिकार बतलाया गया है — अहियारो पाहुडयं ' । उसी ग्रंथ में आगे समस्त श्रुतज्ञान को पाहुड कहा है। इससे विदित होता है कि धार्मिक सिद्धान्त-संग्रह को पाहुड कहते थे। पाहुड का संस्कृत रूपान्तर प्राभृत किया जाता है जिसका अर्थ उपहार है। इसके अनुसार हम वर्तमान ग्रंथ के नाम का अर्थ ' दोहा का उपहार' ऐसा ले सकते हैं

पाहुड-दोहा
३. पाहुडदोहा का विषय व शैली
प्रस्तुत ग्रंथ के कर्ता
भारतवर्ष के उन कवियों में से एक
थे जिन्होंने समय समय पर भौतिक सुखों में भूले हुए पुरुषों को
एक उच्चतर सुख का मार्ग बताने, तथा धर्म के नाम पर सारहीन
क्रिया काण्ड व अन्धविश्वास में डूबे हुए व्यक्तियों का उद्धार करने
का प्रयत्न किया है और आर्य सभ्यता पर आध्यात्मिकता की एक
गहरी छाप लगा दी है। जैनियों के तीर्थकरों ने खास तौर से
उपभोग की अपेक्षा त्याग और कर्मकांड की अपेक्षा स्वानुभव के
श्रेष्ठ माहात्म्य को चरितार्थ किया है। ऐसे ही उपनिषदों के
रचयिता वे ऋषि थे जिन्होने जोरदार आवाज में यह घोपणा
कि-
की, कि-
एष सर्वेषु भूतेषु गूढऽत्मा न प्रकाशते ।
दृश्यते त्वग्रया बुद्धया सूक्ष्मया सूक्ष्मदार्शभिः ।।
अशरीरं शरीरेप्वनवस्थेष्ववस्तिम् ।
महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ॥
यदा सबै प्रभिद्यन्ते हृदयस्थेह ग्रंशय : ।
अथ मोऽमृतो भवत्यताबद्ध यनुशासनम् ।।
गत दो अढाई हजार वर्षों में ऐसे आचार्य और साधु मुनि
होते आये हैं जिन्होने भिन्न भिन्न समय पर, अलग अलग रूप में,
नई नई भाषाओं द्वारा, पृथक् पृथक् समाज में, इसी संदेश की

विषय व शैली .१५ रहा है , , घोषणा की है । जैन समाज में ऐसे मुनि महात्माओं का बाहुल्य । प्रस्तुत ग्रंथ के रचयिता भी इसी कोटि के थे। उन्होने अपना गुरु माना है प्रकाशदाता को। यदि सूर्य से प्रकाश आता है तो वह गुरु है, यदि चन्द्र से प्रकाश आता है तो वह गुरु है, और यदि किसी ज्ञानी से प्रकाश आता है तो वहीं गुरु है। उनका उपदेश है कि सुख के लिये बाहर के पदार्थों पर अव- लम्बित होने की आवश्यकता नही है, इससे तो केवल दुःख और संताप ही बढेगा । सच्चा सुख इन्द्रियों पर विजय और आत्मध्यान में ही मिलता है । यह सुख इंद्रियसुखाभासों के समान क्षणभंगुर नहीं है, किन्तु चिरस्थायी और कल्याणकारी है। आत्मा की शुद्धि के लिये न तीर्थ जल की आवश्यकता है, न नानाप्रकार का वेष धारण करने की । आवश्यकता है केवल, राग और द्वेष की प्रवृत्तियों को रोक कर, आत्मानुभव की । मूंड मुडाने से, केशलौंच करने से या नग्न होने से ही कोई सच्चा योगी और मुनि नही कहा जा सकता । योगी तो तभी होगा जब समस्त अंतरंग परिग्रह छूट जावे और मन आत्पध्यान में लवलीन हो जावे । देवदर्शन के लिये पाषाण के बड़े बड़े मन्दिर बनवाने तथा तीर्थों तीर्थ भटकने की अपेक्षा अपने ही शरीर के भीतर निवास करने वाले देव का दर्शन करना अधिक सुखप्रद और कल्याणकारी है। आत्मज्ञान से हीन क्रियाकांड कणरहित वुष और पयाल कूटने के समान निष्फल है ऐसे व्यक्ति को न इन्द्रियसुख ही मिलता और न मोक्ष का मार्ग ही।

१६ पाहुड-दोहा ग्रंथकार ने अपना उपर्युक्त उपदेश अत्यन्त सरल, सरस और सुन्दर दोहों में रखा है । उन्होने कहीं अपने भाषा-पाण्डित्य या विद्वत्ता को बतलाने का प्रयत्न नहीं किया, किन्तु दोहे दोहे में उनके गम्भीर विचारों तथा मानवीय दुर्बलताओं के ज्ञान का परिचय मिलता है। उनका उपदेश खासकर उन मूर्ख व्यक्तियों को है जो विना आत्मसंयम का अभ्यास किये व विना आत्मकल्याण के सच्चे मार्ग को जाने 'जोगया' बन जाते हैं। उपमाओं और रूपकों का कर्ता ने खूब उपयोग किया है । उन्होंने मन को करहा ( करभ ऊंट ), देह को देवालय कुटी (कुडिल्ली) और आत्मा को शिव तथा इंद्रियवृत्तियों को शक्ति कह कर अनेक वार सम्बोधन किया है।। करहा की उपमा कवि को बहुत ही प्रिय है। वह बहुत से दोहों में आई है और कहीं कहीं तो कवि ने उसे विस्तार से दर्शाया है। उदाहरणार्थ १११, ११२, ११३ दोहे देखिये । कहीं कहीं कवि के श्लेष और अन्योक्तियाँ मार्मिक हैं, जैसे दोहा नं. ११५, १४९, १५०, १५१, १५२. उनके दृष्टान्त भी सुन्दर और सरल होते हैं ( देखो दोहा १५, ७१, १४६, १४७, १४८. )/ ग्रंथकार ने कुछ दोहों में देह और आत्मा के संयोग का प्रेयसी और प्रेमी के रूपक में वर्णन किया है ( दोहा ९९, १०० )। यह शैली पीछे हिन्दी कविता में बहुत लोक प्रिय होगई और भक्त और आराध्य का प्रेयसी और प्रेमी के रूपक बहुत वर्णन हुआ है । ग्रंथ में ऐसी उपमायें और उक्तियां बहुत हैं जो सार्वजनिक होने के लायक हैं तथा जो सम्भवतः कवि के समय में ऐसी रही हैं में रहस्यवाद १७ ४. पाहुडदोहा में रहस्यवाद इस ग्रंथ के कर्ता एक योगी थे और योगियों को ही सम्बो- धन कर के उन्होने ग्रंथरचना की है। यद्यपि उनका सामान्योपदेश सीधा और सरल है किन्तु ग्रंथ के स्थल स्थल पर रहस्यवाद की छाप भी लगी हुई है। कर्ता के लिये देह एक देवालय है जिप्तमें अनेक शक्तियों सहित एक देव अधिष्ठित है। उस देव का आराधन करना, उसे पहचानना, उसमें तन्मय होना, एक बड़ी गूढ क्रिया है जिसके लिये गुरु के उपदेश और निरन्तर अभ्यास की आवश्यकता है । ग्रंथकार का गूढवाद समझने के लिये मैं पाठकों का ध्यान निम्न दोहों पर विशेष रूप से आकर्षित करता हूं-दोहा नं. १,९, १४, ४६, ५३, ५५, ५६, ९४, ९९, १००, १२१, १२२, १२४, १९७,. १३७, १४४, १५७, १६७, १६८, १७०, १७७, १८१, १८४, १८६, १८८, १९२, २०३, २१३, २१९, २२०, २२१. इन दोंहों में जोगियों का आगम, अचित् और चित्, देहदेवली, शिव और शक्ति, संकल्प और विकल्प, सगुण और निर्गुण, अक्षर, बोध और विबोध, वाम, दक्षिण और मध्य, दो पथ, रवि, शशि, पवन और काल आदि ऐसे शब्द हैं, और,उनका ऐसे गहन रूप में प्रयोग हुआ है, कि उनसे हमें योग और तांत्रिक ग्रंथों का स्मरण आये विना नही रहता । ययार्थतः विना इन ग्रंथों की सांकेतिक भाषा के अव- लम्बन के उपर्युक्त दोहों के पूरे रहस्य का उद्घाटन नही होता- १८ पाहुड-दोहा कर दिया कहीं कहीं तो कुछ अर्थ ही समझ में नहीं आता। कोरा शब्दज्ञान काम नहीं देता, युक्ति थकित हो जाती है और बुद्धि भ्रमित होने लगती है। जब कवि ‘णिम्मलि होइ गवेसु' कह कर चल देते हैं तब ऐसा प्रतीत होता है कि वे हमें भ्रान्ति में डाल- कर, धोका देकर, भाग रहे हैं। टिप्पणी में कहीं कहीं इस योग और तंत्र के रहस्य का अति सूक्ष्म संकेत मात्र गया है । इसका पूर्ण अध्ययन कर, रहस्य के उद्घाटन के लिये न तो इस समय मेरे पास यथेष्ट साधन हैं और न अवकाश है । इसलिये विषय के चित्ताकर्षक और मोहक होने पर भी उसे यहीं छोड़ना पड़ता है। किन्तु यह बात ध्यान देने योग्य है कि इस विषय में यह ग्रंथ ब्राह्मण और बौद्ध तांत्रिक कविता से समानता रखता है। इसी ग्रंथ के प्रायः समकालीन बौद्ध चर्यापद और दोहाकोषों में भी इसी प्रकार की, प्रायः इन्ही सांकेतिक शब्दों में, और ऐसी ही अपभ्रंश भाषा में, कविता पाई जाती है। ५. पाहुडदोहा का अन्य ग्रंथों से सम्बन्ध यों तो इस ग्रंथ में जो भाव प्रगट किये गये हैं उनसे ब्राह्मण साहित्य के उपनिषद् ग्रंथ तथा जैन साहित्य के प्रायः सभी आध्यात्मिक ग्रंथ ओतप्रोत हैं, तथापि निम्न ग्रंथों में, भाषा और भाव, दोनो दृष्टियों से कुछ असाधारण सादृश्य हमारे देखने में आया है जिसका यहां परिचय दे देना उपयुक्त प्रतीत होता है।

अन्य ग्रंथों से सम्बन्ध १९ पाहुडदोहा और कुन्दकुन्दाचार्य दिगम्बर सम्प्रदाय के प्राचीनतम और उच्चतम आचार्य कुन्दकुन्द के सभी ग्रंथ आध्यात्मिक भावों से भरे हुए हैं, किन्तु उनके भाव पाहुड में विशेष रूप से वे भाव पाये जाते हैं जो प्रस्तुत ग्रंथ में आये हैं, तथा भाषा और रचना भी कहीं कहीं एक सी दिख जाती है। विशेषतः उल्लेखनीय गाथा ८६ है जिसमें 'सालिसिथ ' का उदाहरण उसी रूप से और उसी भाव में दिया गया है जैसा प्रस्तुत ग्रंथ के पांचवे दोहे में ( देखो दोहा नं. ५ की टिप्पणी ) । ४७ वी गाथा तो यहां नं. २३ पर पूरी ही उद्धृत की हुई पाई जाती है ( देखो दोहा नं. २३ की टिप्पणी )। - पाहुडदोहा और योगीन्द्रदेव योगीन्द्रदेव के दो ग्रंथ-परमात्मप्रकाश और योगसार- बहुत दिन के प्रकाशित हो चुके हैं* । इन दोनों ग्रंथों और प्रस्तुत ग्रंथ में असाधारण साम्य है -केवल साम्य ही नहीं किन्तु इस ग्रंथ का लगभग पंचमांश भाग परमात्मप्रकाश में प्रायः ज्यों का त्यों पाया जाता है.। दोहों का ऐक्य इस प्रकार है परमात्म प्रकाश-सहारनपुर १९०९; रायचन्द्र शास्त्रमाला, बम्बई १९१६. अब पुनः संशोधन हो रहा है। योगसार-माणिकचंद्र ग्रंथमाला नं. २१, बम्बई १९२२.

२० पाहुड-दोहा परमा. परमा. पाहुड. पाहुड. पाहुड. परमा. ८२, ८८ ७४ ८३, ८९ ३ ८० ३१८ १६५ योग. ४० २१० २८८ ८४ ३०३ ९ ११ १२ १३ १४ २८५ ३१ ११८३२ २५१३३ योग. ५१ ३४ २५२३५ २५३ ३७ २५४ ३९ २७५ ४९ २५८ ५२ २९४ ५७ योग, ६१६२ ६७ २७९ ६६ ६८ ८० ८१६९ ९०-९२ ९३ ७२ २८३ योग. ३९ २०१ २३७ ७५ १०१ ४१ १०५ १२५ १०७ २५९ १३९. ११४ १४७ १२६ १४८ २८९ १६१ ७९ १८३ १८६ योग, ३३ १८९ योग. १९२ २०५ २०६ १९८ योग. १७ १८ २३ २९० योग, ४२ २९१ २२ २६ २७-२८ २९ ( ऊपर पाहुडदोहा, परमात्मप्रकाश और योगसार के समान दोहों के अंक दिये गये हैं। परमात्मप्रकाश के अंक रायचन्द्र शास्त्रमाला, बम्बई, में प्रकाशित प्रति के अनुसार हैं । केवल दोहा ८४ का समरूप उक्त प्रति में नही है वह सन् १९०९ में बाबू सूरजभानु जी द्वारा प्रकाशित प्रति के नं. २१० पर है।) विषय भी इन तीनों ग्रंथों का एक ही है, शैली भी वही अन्य ग्रंथों से सम्बन्ध . है और उक्तियां, उपामायें आदि भी एक सी ही हैं। सम्बोधन के लिये वही 'जोइया ' और 'वढ' तथा देहरूपी देवालय और आत्मा रूपी शिव सभी में हैं। हां, करहा की उपमा, उपमा, जो प्रस्तुत ग्रंथ में जगह जगह आई है, परमात्मप्रकाश में केवल एक ही जगह ( दोहा २६६ में ) पाई जाती है। पाहुडदोहा और सावयधम्मदोहा यद्यपि सावयधम्मदोहा और प्रस्तुत ग्रंथ में विषय की दृष्टि से कुछ भेद है, क्योंकि पूर्वोक्त ग्रंथ गृहस्थों के लिये लिखा गया है और प्रस्तुत ग्रंथ जोगियों के लिये, किन्तु भाषा और शैली दोनों की समान ही है। छोटे मोटे भावों, उपमाओं आदि व उक्तिओं आदि के साम्य के अतिरिक्त दो पूरे दोहे दोनों में समान पाहुड. सावय. ४३ १२९ ३० २१५ पाहुडदोहा और श्रुतसागर श्रुतसागर तथा उनकी पटनाभृत टीका का उल्लेख हम सावयधम्मदोहा की भूमिका में कर चुके हैं । इस टीका में पाहुड- दोहा के तीन दोहे थोड़े से हेर फेर के साथ उद्धृत पाये जाते हैं। यथाः -- २२ पाहुड-दोहा पाहुड. १९ = भावपाहुडटीका गाथा १०८; पा. १४६ = भा. टी. १६२; पाहुड. १४७ = चरित्र पाहुड टीका गा. ११. पाहुडदोहा और हेमचन्द्र सब से अधिक महत्वपूर्ण और चित्तग्राही इस ग्रंथ का सम्बन्ध हेमचन्द्राचार्य कृत प्राकृत व्याकरण से है। इस व्याकरण के चौथे पाद के अपभ्रंश सम्बन्धी सूत्रों के उदाहरण रूप इस ग्रंथ के कुछ दोहे हमें मिले हैं । ऐतिहासिक एवं पाठभेद की दृष्टि से ये सामञ्जस्य इतने उपयोगी हैं कि हम उन्हे यहाँ उद्धृत करना आवश्यक समझते हैं:- -- पाहुउदोहा सयल वि को वि तडप्फडइ सिद्धत्तणहु तणेण । सिद्धत्तणु परि पावियइ चित्तहं णिम्मलएण ॥ ८८ ।। छंडेविणु गुणरयणणिहि अग्घथडिहिं विप्पंति । तहिं संखाहं विहाणु पर फुक्किनंति ण भंति ॥ १५१ ॥ अखइ णिरामइ परमगइ अन्ज वि लउ ण लहंति हेम. व्याकरण साहु वि लोउ तडफडइ वडुत्तणही तणेण । वड्डप्पणु परिपावियइ हत्थि मोकलडेण ॥ ३६६ ।। जे छड्डेविणु रयणनिहि अप्पउं तडि घल्लंति । तहं संखहं विट्टाल पर फुक्ति भमन्ति ॥ ४२२ प्राइव मुणिहं वि भंतडी ते माणअडा गणंति ।

अन्य प्रयों से सम्बन्ध २३ भग्गी मणहं ण भंतडी तिम दिवहडा गणंति ॥१६९॥ जिम लोणु विलिज्जइ पाणियह ॥ १७६ ॥ जइ इक हि पावीसि पय अंकय कोडि करीसु । णं अंगुलि पय पयडणई जिम सव्वंगय सीसु ॥ १७७ ॥ अखइ निरामइ परम गइ अज्ज वि लउ न लहंति ॥ १४ लोणु विलिज्जइ पाणिएण॥ ४१८ जइ केवइ पावीसु पिउ अकिआ कुड्ड करीसु। पाणिउ नवइ सरावि जिव सव्वंगें पइसीसु ॥ १६ हेमचन्द्राचार्य कृत व्याकरण में जो दोहे उदाहरण रूप से दिये गये हैं उनके सम्बन्ध में विद्वानों का यही मत है कि वे उस समय के प्रचलित साहित्य से लिये गये हैं। यह बात सत्य है कि हेमचन्द्र ने उन दोहों को कुछ परिवर्तित रूप में दिये हैं। किन्तु यह कोई आश्चर्य की बात नही है, क्योंकि जब एक विद्वान् वैयाकरण व्याकरण के निमयों की पुष्टि में कोई उदाहरण देगा जो वह उसकी जिह्वा से परिमार्जित होकर ही निकलेगा। दूसरे, हेमचन्द्र कवि भी थे, अतः उन्होने दोहों को सार्वजनिक रुचि के अनुकूल बनाकर रखा है। हमारे दोहा नं. ८८ में उन्होने जो परिवर्तन किया है वह उसे सर्वप्रिय बनाने की दृष्टि से ही किया है। उन्होने 'सकल' की जगह 'साधु लोक,' 'सिद्धत्व' की जगह वडप्पन' और ' चित्तनैमल्य ' की जगह ' मुक्त-हस्तता' अर्थात् दानशीलता का आरोपण कर दिया है जिससे दोहा आध्यात्मिक २४ पाहुड-दोहा १ अवश्य है कि । क्षेत्र से निकल कर लौकिक क्षेत्र में आगया है। दोहे का शेष संगठन बिलकुल जैसा का तैसा रहा है। हमारे दोहा नं. १५१ के दूसरे चरण का परिवर्तन केवल पाठभेद सा प्रतीत होता है। हमारे पाठ के 'थड' का अर्थ भी हेमचन्द्र के 'तड' (तट ) के समान होता है, तथा 'घिप्पंति और 'घल्लंति' भी यहां समानार्थ हैं । शेष दो चरणों का पाठ हेमचन्द्र के प्रकाशित व्याकरण में कुछ भिन्न है। हां, इतना विद्यालु' पाठ उसमें हेपचन्द्रजी ने अवश्य रखा है, क्योंकि उसी शब्द के उदाहरण रूप दोहा उद्धृत किया गया है। किन्तु उन चरणों का कुछ ठीक अर्थ नहीं लगता । इस व्याकरण के सम्पादक डॉ. वैद्य ने दोहे के सम्बंध में कहा है कि 'प्रसङ्ग के अभाव में दोहे का ठीक अर्थ नही बैठाया जा सकता' किन्तु यदि हमारे ग्रंथ का प्रसंग ध्यान में रखा जावे तो अर्थ स्पष्ट हो जाता है। अर्थ होगा वहां संखों की बड़ी दुर्गति ( विट्टाल ) होती है, वे फूंके जाते हैं, इसमें भ्रान्ति नही ' या (हेमचन्द्र के पाठ के अनुसार ) — फूंके जाते और भ्रमते फिरते हैं । प्रसंग सत्संग-त्याग के दुष्परिणाम का है यह हमारे ग्रंथ से स्पष्ट है दोहा नं. १६९ के दो चरणों में परिवर्तन किया गया और दोहे के चरणों का क्रम बदल दिया गया है। हमारे दोहे के प्रथम दो चरण ज्यों के त्यो अन्तिम दो चरणों में रखे गये हैं। x हेम. प्राकृत व्याकरण, सं. डॉ. वैद्य, नोट्स पृ. ६२. Thd रचयिता २५ शेष दो चरणों में जो परिवर्तन किये गये हैं वे साभिप्राय हैं। प्राइव । प्रायः ) का तो उदाहरण ही देना था इससे वह रक्खा गया है, और दिवहडा की जगह ' माणिअडा' से अर्थ में बहुत कुछ विशेषता लाई गई है। इन परिवर्तनों के निर्वाह के लिये ' मणहं ' के स्थान पर ' मुणिहं ' कर दिया गया है। जो अवस्था हमारे १५१ वें दोहे की हेमचन्द्र व्याकरण में हुई हैं, ठीक वही अवस्था हमारे दोहा नंबर १७७ के प्राप्त पाठ में पाई जाती है । अन्तिम दो चरणों का तो कुछ मतलब ही नहीं लगता । दोहे का अर्थ पहले ही से क्लिष्ट था, अतएव, जैसा मैं टिप्पणी में कह चुका हूं, लिपिकारों के अज्ञान से उसकी वह दुरवस्था हुई है । हेम. व्याकरण में उसका ठीक रूप रक्षित है। इन अवतरणों से हमारे ग्रंथ के रचनाकाल पर जो प्रकाश पड़ता है उसका अगले प्रकरण में उल्लेख किया जायगा । अभीतक हेमचन्द्राचार्य के दोहों के मूल स्रोतों का कोई पता नही था । यह अत्यन्त महत्व की बात है कि अपभ्रंश साहित्य के प्रकाश में आने से अब उनका ठीक ठीक पता, धीरे धीरे, लग रहा है। तीन दोहे परमात्मप्रकाश में भी पाये गये हैं | ६ पाहुडदोहा के रचयिता ग्रंथ के दोहा नं. २११ में ' रामसीहु मुणि इम भणइ . x Annals of Bhand. Orien. Re. Inst., 1231, p. 159-160.

पाहुड-दोहा . वाक्य आया है, तथा द. प्रति की पुष्पिका में ये दोहे मुनि-रामसीह -विरचित कहे गये हैं। इससे ज्ञात होता है कि कोई रामासिंह नाम- धारी मुनि इस ग्रंथ के रचयिता हुए हैं। किन्तु क. प्रति की पुष्पिका में यह दोहापाहुड योगी द्रदेवविरचित ' कहा गया है। इससे ग्रंथकर्तृत्व का प्रश्न कुछ जटिल हो गया है । यह हम देख ही चुके हैं कि प्रस्तुत ग्रंथ की योगीन्द्रदेव के अन्य दो ज्ञात ग्रंथों से भाषा और भाव में असाधारण समता है। इस सम्बंध में श्रीयुक्त उपाध्ये का बहुत ही नियन्त्रण पूर्वक एक संकेत है कि प्रस्तुत ग्रंथ कदाचित् योगींद्रकृत ही हो और रामसिंह केवल एक परम्प- रागत नाम हो, जैसा कि परमात्मप्रकाश (दोहा १८८ ) में अजउ संति भणेइ ' में शान्ति का नाम पाया जाता है । किन्तु जबतक और कोई सबल प्रमाण न मिलें तबतक इस ग्रंथ को योगीन्द्रदेव कृत मानना ठीक नहीं है । योगीन्द्र ने अपने पर- मात्मप्रकाश व योगसार में अपना नाम स्पष्ट रूप से अंकित कर रखा है । हम सावयधम्मदोहा में देख चुके हैं कि किस प्रकार १. A. N. Upadhye: Joindia and his Apabhrunsal irorks: Annals of Bhand. Orien. Rr. Inst. Poona, 1931 p. 132. २. परमात्मप्रकाश दोहा ८. ३. योगसार दोहा १०७. ४. एक और काव्य अमृताशीति (संस्कृत) के अन्त में योगीन्द्र का नाम मिलता है। पर इन दोनों कर्ताओं के एकत्व के सम्बंध में संशय है। मा. ग्रंथमाला २१, पृ. १०१ व भूमिका.

रचयिता " ग्रंथ-साम्य के कारण योगीन्द्रदेव का नाम उस ग्रंथ के कर्ता के रूप में कुछ लिपिकारों ने लिखा है। जहां ग्रंथ के अनेक दोहों के परमात्म. काश और प्रस्तुत ग्रंथ में पाये जाने के आधार पर दोनों के ग्रंथ कर्ता एक ही अनुमान किये जाते हैं, वहां यह भी प्रश्न हो सकता है कि यदि सचमुच दोनों ग्रंथ एक ही कर्ता की रचनायें है तो ऐसी पुनरुक्ति से कती का क्या अभिप्राय है ? नियम तो यह है कि ग्रंथकर्ता सदैव ऐसे पुनरुक्तिदोष से बचने का प्रयत्न करते । हां, एक आध उक्ति कभी दोनो में एक ही रूप से, विना जाने, आजाती है, या प्रसंग में बहुत उपयोगी कभी किसी वाक्य को दोहराना पड़ता है, किन्तु दोसौ बीस या बाइस दोहों में कोई चालीस दोहे अपने दूसरे ग्रंथ के प्रायः जैसे के तैसे रखना कवियों में सर्वथा अपूर्व या असाधारण है। अतएव जब तक और अधिक प्रमाण इस सम्बंध में हमें न मिल जावें तब तक प्रस्तुत दोहों के कर्ता ग्रंथ के भीतर निर्दिष्ट मुनि रामसिंह को ही मानना उचत है। नाम पर से ये मुनि अर्हद्वलि आचार्य द्वारा स्थापित 'सिंह' संघ के अनुमान किये जा सकते हैं । ग्रंथ में ' करहा ' ( ऊंट ) की उपमा बहुत आई है तथा भाषा में भी · राजस्थानी ' हिन्दी 1 सावयधम्मदोहा पृ. ।) और 12)॥. इंद्रनन्दि कृत नीतिसार ६-७; श्रवगवेगोला शिलालेख नं. २६-२७. १०५, २८ पाहुड-दोहा के प्राचीन महावरे दिखाई देते हैं । इससे अनुमान होता है कि ग्रंथकार राजपुताना प्रान्त के थे। ग्रंथकार का इससे अधिक परिचय देने के लिये कोई प्रमाण उपलब्ध नही हैं । ७. पाहुउदोहा का रचनाकाल प्रस्तुत ग्रंथ कब रचा गया, इस प्रश्न का निश्चित उत्तर देना तो कठिन है, किन्तु हम ऊपर जो इस ग्रंथ का अन्य ग्रंथों से सम्बन्ध बतला आये हैं, तथा इसमें भापा का जो रूप पाया जाता है, उस पर से उसके रचनाकाल का स्थूल रूप से अनुमान करना अशक्य नही है। उपलब्ध दो हस्तलिखित प्रतियों में से एक संवत् १७९४ अर्थात् ईस्वी १७३७ की लिखी हुई है। अतएव ग्रंथ इससे पूर्व बन चुका था यह निश्चित है। इस ग्रंथ के जो तीन दोहे श्रुतसागर की पट्पाहुड टीका में उद्धृत पाये जाते हैं उससे सिद्ध होता है कि यह ग्रंथ श्रुतसागर से पूर्व बन चुका था । श्रुतसागरजी गुर्जरदेश के पट्टाधीश लक्ष्मीचन्द्र के शिष्य थे, और लक्ष्मीचन्द्रजी . एक उल्लेख संवतू १५८२ का पाया जाता है+ । श्रुतसागरजी इसी समय के लगभग हुए होंगे । अतः यह माना जा सकता है कि हमारा ग्रंथ उक्त संवत् अर्थात् ईस्वी १५२५ के लगभग वर्तमान था । इसी प्रकार हेमचन्द्राचार्य के व्याकरण में इस ग्रंथ के + माणिकचन्द्र ग्रंथमाला २१, भूमिका.

रचनाकाल २९ चार दोहे पाये जाने से सिद्ध होता है कि यह ग्रंथ उक्त आचार्य के पूर्व बन चुका था । हेमचन्द्र के समय के सम्बन्ध में कोई शंका नहीं है। उन्होने अपने व्याकरण के अन्त में स्वयं कहा है कि वह ग्रंथ उन्होने गुजरात के चालुक्यवंशी राजा सिद्ध- राज की अभ्यर्थना से लिखा । सिद्धराज गुजरात के राजसिंहासन पर सन् १०९३ ईस्वी में बैठे, और उन्होंने सन् ११४३ तक राज्य किया । सन् ११४३ में उनके उत्तराधिकारी कुमारपाल सिंहासन पर आये । अतः सिद्ध है कि हेमचन्द्र का व्याकरण सन् १०९३ और ११४३ के बीच में बना है। इससे प्रस्तुत ग्रंथ सन् ११०० से पूर्व का बना हुआ सिद्ध होता है। जैसा श्रुतसागर की टीका और हेमचन्द्र के व्याकरण के सम्बन्ध में कह सकते हैं कि उनमें दोहे उद्धृत किये गये हैं वैसा परमात्मप्रकाश, योगमार और सावयधम्मदोहा के सम्बन्ध में नही कह सकते । इन ग्रंथों के समान दोहों के सम्बन्ध में तीन अनुमान किये जा सकते हैं । या तो प्रस्तुत ग्रंथ में से पूर्वोक्त ग्रंथों में वे दोहे उद्धृत किये गये हैं, या उन ग्रंथों में से प्रस्तुत ग्रंथ में उद्धृत किये गये हैं और या वे दोहे किसी और ही ग्रंथ से या प्रचलित दोहों में से उक्त सभी ग्रंथों ने लिये हैं। इस सम्बन्ध में निर्णायक प्रमाण हमारे पास कुछ नही है। हां, ग्रंथों के ही प्रसंग, शैली आदि पर से कदाचित् कुछ अनुमान किया जा सके कि किस ग्रंथ में वे दोहे उस ग्रंथ के अवश्यंभावी अंग है और किस ३० पाहुड-दोहा में वे आगन्तुक से ज्ञात होते हैं। जैसा हम ऊपर कह आये हैं, परमात्मप्रकाश, योगसार और प्रस्तुत ग्रंथ के प्रसंग और शैली में इतनी समानता है कि उन पर पूर्वोक्त कसौटी भी कुछ नही चलती । हां, योगीन्द्र का नाम बहुत समय से प्रसिद्ध और सुप्रति- ष्ठित रहा है, उनके ग्रंथों पर संस्कृत हिन्दी टीकायें भी लिखी गई हैं, तथा अन्य अनेक टीकाकारों ने उनका उल्लेख किया है, इससे यही अनुमान करने को जी चाहता है कि उन्ही के ग्रंथों से प्रस्तुत ग्रंथ में दोहे लिये गये हैं। पर यह विषय शंकास्पद ही है। यदि इस सम्बन्ध में कोई बात निश्चयतः कही भी जावे तो उससे प्रस्तुत ग्रंथ के रचना काल के सम्बन्ध में कुछ नहीं कहा जा सकत , क्योंकि अभी तक योगीन्द्रदेव के समय का भी निर्णय नहीं हुआ है । किन्तु सावयधम्म और प्रस्तुत ग्रंथ में जो दोहे मिलते हैं उनके सम्बन्ध में पूर्वोक्त कसौटी काम में लाई जा सकती है। प्रथम, दोहा नं. ४३ को लीजिये । इसमें पांच इंद्रियों के संयम का और विशेषतः दो अर्थात् जिह्वा और परस्त्री-कामना के नियंत्रण का उपदेश दिया गया है। पांच इन्द्रियों का प्रसंग ऊपर से तो नही आया किन्तु नीचे के दोहों में पाया जाता है। पर जीभ और पराई नार के निवारण का उपदेश तो यहां बिलकुल अप्रासंगिक है। । प्रथम तो जब यह कह दिया कि जिस बुद्धिमान् का मन अक्षयिनी रचनाकाल रामा में लग गया वह और कहीं कैसे रति कर सकता है, तब फिर नारी के निवारण के उपदेश का मतलब ही क्या रहा ? और यदि रहा भी तो 'पराई नार' का विशेषण तो यहां बिलकुल ही अयुक्त है। इस ग्रंथ का उपदेश जोगियों के लिये दिया गया है। ऊपर के ही दोहे में जोगी को सम्बोधन किया है। जोगी सस्त्रीक नही हुआ करते, अतएव यदि उनको उपदेश देना था तो 'पराई' विशेषण लगाने की कोई आवश्यकता नहीं थी। स्पष्टतः यह उपदेश गृहस्थ के लिये है। उसे अपनी स्त्री को छोड़ अन्य स्त्रियों से विराक्त का उपदेश दिया गया है। फिर जीभ-निवारण के उपदेश का तो यहां कोई प्रसंग ही नहीं है। वह बात यहां बिलकुल वेमेल अँचती है । इस प्रकार पूर्वापर प्रसंग पर दृष्टि डालने से यह दोहा प्रस्तुत ग्रंथ में आगन्तुक सिद्ध होता है। उसको यदि हम यहां से हटा दें तो भी प्रसंग में कोई बाधा नहीं पड़ती। अब इसी दोहे का सावयधम्म के २९ नं. पर विचार कीजिये । वहां उससे पूर्व कर्ता ने एक एक इंद्रिय में वशीभूत होने के दोप दिखाये हैं और फिर प्रस्तुत दोहे में उनके सम्बन्ध में संचेत होने का उपदेश दिया है । गृहस्थों को जीभ की लोलुपता और काम की प्रेरणा अधिक हुआ करती है । अत: इन दोनों इन्द्रियों के सम्बन्ध में कवि ने गृहस्थों को विशेष रूप से सचेत रहने का उपदेश दिया है। यहां यह दोहा स्वाभाविक है। उसके यहां से अलग करने में एक कमी का बोध होगा। अतएव मानना पड़ता है कि यह दोहा सावयधम्म का मूल अंग है। ।

३२ पाहुड-दोहा अब दोहा नं. २१५ पर विचार कीजिये । प्रथम तो इस दोहे का पाठ ही यहां शुद्ध नही मिला। इससे अर्थ ही बराबर नहीं बैठता । किन्तु इतना निश्चित है कि यहां कोई लोगों के यहां भोजन करने का निषेध किया गया है। पर कौन लोगों के यहां इस का कुछ ठीक पता ही नही चलता । पूर्वापर प्रसंग में उसका कुछ अर्थ ही नहीं बैठता । जिस रूप में वह दोहा है उसमें व्याकरण के दोष भी हैं। यही दोहा सावयधम्म में नं. ३० पर बहुत उपयुक्त और प्रसंगोपयोगी है ! ऊपर के ही ऊपर के ही दोहे में बताया गया है कि मद्यमांस-भौजियों के संसर्ग से श्रद्धान में दोष उत्पन्न होता है। फिर प्रस्तुत दोहे में कहा गया है कि उनके घर में भोजन करना तो रहने ही दो, शिष्ट पुरुषों को उनसे बात भी नही करना चाहिये क्योंकि इससे सम्यक्त्व मलिन होता है । वही प्रसंग आगे के दोहे में चालू है और कहा गया है कि ऐसे गृहस्थों के वर्तन भांडे उपयोग में लाना भी अच्छा नही, इत्यादि । 'अच्छउ' का महावरा सावयधम्मकार की विशेषता है। आगे ३१ वें ही दोहे में वह फिर आया है, फिर १५० वें दोहे में भी आया है। किन्तु प्रस्तुत ग्रंथ में उसका ऐसा उपयोग अन्य कहीं नही है । अतः अनुमान होता है कि यह दोहा भी हमारे ग्रंथ में आगन्तुक है और सावयधम्म का वह मूल, आवश्यक अंग है। अब हम कुछ दृढतापूर्वक कह सकते हैं कि ये दोहे पाहडदोहाकार ने सावयधम्मदोहा में से लिये हैं। उपलब्ध

देशीभाषा और अपभ्रंश
३३
प्रमाणों पर से सावयधम्म को हम विक्रम संवत् ९९० अर्थात्
ईस्वी ९३३ के लगभग बना हुआ सिद्ध कर चुके है। अतः
अनुमान होता है कि पाहुड दोहा सन ९३३ और ११०० के बीच
में किसी समय अर्थात् सन् १००० ईस्वी के लगभग रचा
गया है।
८. देशीभाषा और अपभ्रंश
प्रस्तुत ग्रंथ की भापा वही है जिसका परिचय सावयधम्म
दोहा की भूमिका में दिया जा चुका है। उसके सम्बन्ध में फ्रांस
के सुप्रसिद्ध विद्वान् डा. जुले ब्लॉक ने मुझे भेजे हुए अपने एक
अनुग्रहपूर्ण पत्र में एक शंका उपस्थित की है । मैने सावयधम्म
की भाषा का परिचय देते हुए कीर्तिलता का एक पद्य उद्धृत
किया है जिसके दो अन्तिम चरण हैं:
देसिल वअना सव जन मिट्ठा ।
तँ तैसन जम्पो अवहट्ठा ॥
मैने इस पद्य का कोई अनुवाद नहीं दिया किन्तु इस बात
को परोक्षरूप से स्वीकार कर लिया था कि यहां ' देसिल वअना'
का एक ही भाषा से तात्पर्य है। डा. ब्लॉक
को इस समानार्थकता में शंका है । उन्होने अपनी शंका का
कारण, परोक्ष रूप से, यह प्रगट किया है कि उक्त चरणों के
और ' अवहट्ठा
As regards the identification Desi=Apabhranga, I feel
some doubts'. Letter dated 30-11-32.

पाहुड-दोहा
अर्थ के सम्बन्ध में मतभेद है। मैं उन चरणों का संस्कृत
रूपान्तर इस प्रकार करूंगा-
-
एक
' देशीवचनानि सर्वजनमिष्टानि
तद् तादृशं जल्पे अपभ्रष्टम् ॥
मुझे स्वयं इन पंक्तियों के अनुवाद के सम्बन्ध में कोई मतभेद
तो देखने सुनने को नहीं मिले, किन्तु मैं समझता हूँ कि मतभेद का
कारण ' तादृशं' शब्द हो सकता है । इस शब्द के साधारण अर्थ
के अनुसार उक्त पंक्तियों का अर्थ होगा कि देशी वचन
सब लोगों को मीठे हैं, इसलिये उसी के समान ' अपभ्रष्ट'
अपभ्रष्ट भाषा
में रचना करता हूं।' इस से 'देशी' और 'अपभ्रष्ट
भाषा सिद्ध नही हुई, किन्तु पृथक् होते हुए सदृश सिद्ध हुई ।
किन्तु मै ' तादृशं' का वैसा अर्थ नही करता। यहां तादृश का
'तदेव' के समान अर्थ है। उदाहरणार्थ 'यादृशं पुस्तके दृष्टं
तादृशं लिखितं मया ' का यह तात्पर्य नही है कि जो कुछ देखा
उससे कुछ मिलता जुलता लिखा, किन्तु उसका अर्थ है जैसा
देखा वैसा ही लिखा ' यदेव दृष्टं तदेव लिखितम् ' । हिन्दी में भी
तैसा व · तैसन् ' का 'तदेव' अर्थ होता है । जैसा बताया तैसा
किया ' का अर्थ जो बताया वही किया है, न कि जो बताया
उससे भिन्न, किन्तु उससे कुछ
मिलता
जुलता,
उक्त पंक्तियों का ' देशीवचन सब जनों को मोठे होते हैं, इसलिये
उसी अपभ्रंश में रचना करता हूँ,' ऐसा अर्थ करना चाहिये ।
किया । अतएव

देशीभाषा और अपभ्रंश ३५ इससे विद्यापतिजी के अनुसार देशी और अपभ्रंश एक ही भाषा ठहरती है। यदि वह भिन्न समझी जावें तो उनका कहना वैसा ही होगा जैसा कोई कहे कि दिल्ली शहर देखने लायक है इसलिये मैं उसके पास वाले शहर मथुरा को जा रहा हूं'। अब हम इस विषय के ऐतिहासिक प्रमाणों पर दृष्टि डालेंगे। अपभ्रंश शब्द का भाषा के सम्बन्ध में सबसे प्रथम उल्लेख हमें पातञ्जलि के महाभाष्य में मिलता है। वहां उन्होने कहा 'एकस्यैव शब्दस्य बहवो अपभ्रंशाः। तद्यथा गौरित्यस्य गावी, गोणी, गोता, गोपोतालिकेल्येवमादयाऽपभ्रंशाः । प्राकृत भापा के प्राचीनतम व्याकरणकार चण्ड ने तथा प्राकृत व्याकरण के श्रेष्ठ प्रमाण हेमचन्द्र ने अपने अपने व्याकरणों में उक्त रूपों में से कुछ प्राकृत के सामान्य रूप स्वीकार किये हैंx । इससे ज्ञात हुआ कि पातञ्जलि ने संस्कृत से निकली हुई सभी भाषाओं को अपभ्रंश माना है, तथा जिन भाषाओं को हम आज अर्धमागधी, शौर- सेनी, महाराष्ट्रा आदि नाम देते हैं, पाताञ्जलि के मत से वे सभी अपभ्रंश कही जाना चाहिये । भरतमुनि ने अपने नाट्यशास्त्र के १७ वें अध्याय में प्राकृत व देशी भाषाओं के. सम्बन्ध में बहुत कुछ कहा है । संस्कृत से विकृत हुए रूप को वे प्राकृत कहते हैं और प्राकृत xचण्ड 'प्राकृत लक्षण २,१६, • गो गाविः । हेम. ध्याकरण २, १७४, 'गोणादयः ' गौः, गोणो, गावी, गावः, प्राकृत गावीओ.

पाहुड-दोहा
भाषा में वे तीन प्रकार के शब्दों का प्रचलित होना स्वीकार करते
हैं, समान
समान ( तत्सम ), विभ्रष्ट (तद्भव ) और देशी । वे पुनः
कहते हैं कि प्रयोग में भिन्न भिन्न जातिभाषायें आती हैं जो म्लेच्छ
शब्दों से युक्त होकर भारतवर्ष में प्रचलित हुई हैं। नाटक में
सौरसेनी या इच्छानुसार देशभाषा का उपयोग करना चाहिये ।
मागधी, आवन्ती, प्राच्या, सूरसेनी, अर्धमागधी, वाल्हीका, और
दाक्षिणात्या, ये सात भापायें प्रसिद्ध हैं । शबर, आभार, चाण्डाल,
सचर, द्रविड, उद्रज, हीन और वनचरों की भाषायें नाटक में
विभाषा मानी गई हैं। यथा---
एवं संस्कृतं पाठ्यं मया प्रोक्तं समासतः ।।
प्राकृतस्य तु पाठ्यस्य संप्रवक्ष्यामि लक्षणम् ।। १ ।।
एतदेव विपर्यस्तं संस्कारगुणवर्जितम् ।
विज्ञेयं प्राकृतं पाट्यं नानावस्थान्तरात्मकम् ॥ २ ॥
त्रिविधं तच्च विज्ञेयं नाट्ययोगे समासतः ।
समानशब्दै विभ्रष्टं देशीमतमथापि वा ॥ ३ ॥
X
X
X
X
विविधा जातिभाषा च प्रयोगे समुदाहृता ।
म्लेच्छशब्दोपचारा च भारत वर्षमाश्रितम् ॥ २८ ॥
अथ या जात्यन्तरी भाषा प्रामारण्यशूद्भवा ।
नानाविहंगजा चैव नाट्यधर्मी प्रयोगजा ॥ २९ ॥

देशीभाषा और अपभ्रंश ३७ जातिभाषाश्रयं पाठ्यं द्विविधं समुदाहृतम् । प्राकृतं संस्कृतं चैव चातुर्वर्ण्यसमाश्रयम् ॥ ३० ॥ x x x x सौरसेनं समाश्रित्य भाषा कार्या तु नाटके । अथवा छन्दतः कार्या देशभाषा प्रयोक्तृभिः ॥ ४६ ॥ मागध्यावन्तिजा प्राच्या सूरसेन्यर्धमागधी । बाल्हीका दाक्षिणात्या च सप्त भाषाः प्रकीर्तिताः ॥४७॥ शबराभीरचाण्डालसचरद्रविडोद्रजाः । हीना वनेचराणां च विभाषा नाटके स्मृता ॥ ४९ ॥ -अध्याय १७. यद्यपि इस अध्याय में दिए हुए भाषा सम्बन्धी भेद और प्रभेद कुछ भ्रमोत्पादक हैं, किन्तु मेरी समझ में भरतमुनि का मत यह है कि संस्कृत के अतिरिक्त दो प्रकार की भाषायें हैं, एक प्राकृत जिसमें संस्कृत के विकृत शब्द प्रयोग में आते हैं और इस- लिये जिन्हे वे 'विभ्रष्ट' कहते हैं, और दूसरी देशी जिसमें संस्कृत प्राकृत के शब्द भी हैं तथा कुछ म्लेच्छ ( अनार्य अर्थात् असंस्कृत ) शब्द भी हैं। मुख्य देशी भाषायें ( भाषा ) मागधी, आवन्ती आदि सात हैं और गांड देशी भाषायें ( विभाषा ) शबर, आभीर, चाण्डालादि की अनेक हैं। स्मरण रखना चाहिये कि आभारों की भाषा यहां एक देशी भाषा मानी गई है।

पाहुड-दोहा काव्यादर्श के कर्ता दण्डी ने समस्त वाङ्मय के चार भेद किये हैं- संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश और मिश्र । ये चार भेद दण्डी से पूर्व ही माने जा चुके थे । इन आचार्य ने अपभ्रंश के सम्बन्ध में जो बड़ी महत्वपूर्ण बात कही है वह यह है कि काव्य में तो आभीर आदि जातियों की भाषा ही अप- भ्रंश मानी गई है, किन्तु शास्त्र में संस्कृत से अन्य सभी भाषायें अपभ्रंश कही गई हैं। शास्त्र से दण्डी का यहां तात्पर्य संभवतः भाषाशास्त्र अर्थात् व्याकरण से है और जान पड़ता है उन्होने यह बात पातञ्जलि के उल्लेख को ध्यान में रख कर कही है । दूसरी उपयोगी बात उन्होने यह कही है कि आभीरादि जातियों की भाषा में भी कविता होती है और यह कविता अपभ्रंश के नाम से प्रसिद्ध है । यथा- - आभीरादिगिरः काव्येष्त्रपभ्रंशतया स्मृताः । शास्त्रे तु संस्कृतादन्यदपभ्रंशतयोदितम् ॥ इस प्रकार जिसे भरतमुनि ने देशी भाषा या विभाषा कहा है, उसी के काव्य को दण्डी और, उनके सामयिकों ने अपभ्रंश है। कहा दण्डी के पश्चात् अलंकार शास्त्र के अनेक कर्ताओं, जैसे x तदेतद्वाङ्मयं भूयः संस्कृतं प्राकृतं तथा । अपभ्रंशश्च मिश्रं चेत्याहुराप्ताश्चतुर्विधम् ॥ १, ३२.

देशीभाषा और अपभ्रंश ३९ भामहे; रुद्रट, राजशेखर, नमिसाधु, वाग्भट ने अपभ्रंश काव्य को संस्कृत और प्राकृत काव्य के साथ साथ स्वीकार किया है तथा कहीं कहीं अपभ्रंश को ही देशी भाषा कहा है । उदाहरणार्थ, रुद्रट भाषा के छह भेद करते हैं 'षष्ठोऽत्र भूरिभेदो देशविशेषादपभ्रंशः'। इसी पर टीका करते हुए नमि साधु कहते हैं तथा प्राकृतमेवापभ्रंशः । स चान्यरुपनागरा- भारग्राम्यावभेदेन त्रिधोक्तस्तन्निरासार्थमुक्तं भूरिभेद इति । कुतो देशविशेषात् । तस्य च लक्षणं लोकादेव सम्यगवसेयम् । वाग्भट अपभ्रंश के सम्बन्ध में कहते हैं ' अपभ्रंशस्तु यच्छुद्धं तत्तद्देशेषु भाषितम् ' । राजशेखर ने भाषाओं को भिन्न भिन्न प्रदेशों में बांटते हुए कहा है 'सापभ्रंशप्रयोगा सकलमरुभुवष्टक- भादानकाश्च' अर्थात् अपभ्रंश का प्रयोग समस्त मरुभूभि, टक्क और भादानक (?) देशों में होता है । इन्ही टक्क और मरुभूमि की भाषाओं को राजशेखर के प्रायः समसामयिक, विलासवती कथा कर्ता ने अठारह देशी भाषाओं के अन्तर्गत बाताया है । विष्णु- धर्मोत्तर के कर्ता ने स्पष्ट रूप से अपभ्रंश को देशभेद के अनुसार पृथक् पृथक् कहा है। १ काव्यांलकार १,१६. ३ काव्यमीमांसा पृ. ६,४८-५४, २ काव्यालंकार २,११-१२; ४ काव्यालंकार वृत्ति २,११. ५ वाग्भटालंकार २,१-३. ६ देखो अपभ्रंश काव्यत्रयी, बडोदा संस्कृत सीरीज ३५, भूमिका पृ. ९२-९३. ७ उपर्युक्त, भूमिका पृ. ९६.

पाहुड-दोहा उपर्युक्त समस्त उल्लेखों का सार यही है कि अपभ्रंश को ही देशभाषा और देशभाषा को अपभ्रंश नाम से साहित्याचार्य समझते और कहते आये हैं। चंड, हेमचंद्र आदि प्राकृत के वैयाकरणों ने इस भाषा को अपभ्रंश ही कहा है और उसे अर्धमागधी, शौरसेनी व महाराष्ट्री के समान प्राकृत का एक अंग माना है। व्याकरण में उन्होने संस्कृत के शब्दा में जो विकार होकर इस भाषा के शब्द बनते हैं, उनके नियम तथा कारकरूपों, क्रियारूपों, धातु-आदेशों व अन्य शब्द- रचना के नियम दिये हैं। इन नियमों, तथा उनपर दिये हुए उदाहरणों, से सिद्ध है कि हमारे प्रस्तुत ग्रंथ तथा उसी समान पुष्पदन्तादि के ग्रंथों की भाषा वही अपभ्रंश है। जैसा हम ऊपर बता आये हैं, हमारे प्रस्तुत ग्रंथ के ही चार दोहे हेमचन्द्र के उदाहरणों में पाये जाते हैं। हेमचन्द्र ने एक कोश भी रचा है जो ‘देशीनाममाला' के नाम से प्रसिद्ध है, किन्तु जिसका नाम मूल ग्रंथ में देशी-शब्द-संग्रह पाया जाता है | इस ग्रंथ में कर्ता ने कोई चार हजार देशी शब्दों के अर्थ दिये हैं। देशी से कर्ता का क्या तात्पर्य है यह उन्होने आदि में ही दो गाथाओं द्वारा स्पष्ट कर दिया है कि- * देशी नाममाला, कलकत्ता यूनीवर्सिटी १९३१, भूमिका पृ. ३४.

देशीभाषा और अपभ्रंश जे लक्खणे ण सिद्धा ण पसिद्धा सक्कयाहिहाणेसु । ण य गउणलक्खणासत्तिसंभवा ते इह णिबद्धा ।। देसविसेसपसिद्धीइ भण्णमाणा अणंतया इंति । तम्हा अणाइ-पाइय-पयट्ट-भासा-विसेसओ देसी ॥ अर्थात् " मैने इस कोश में उन्ही शब्दों को एकत्र किया है जो लक्षण ' में सिद्ध नही होते, न संस्कृताभिधानकोशों में प्रसिद्ध हैं, और न गोडी लक्षणा की शक्ति ने सिद्ध होते हैं । खास खास देशों में बोली जाने वाली भाषायें अनन्त हैं, इसलिये यहां देशी शब्द का तात्पर्य उस विशेष भाषा से है जो अनादि काल से चली आई हुई प्राकृत से उत्पन्न हुई है । 'लक्षण' शब्द की टीका में कहा गया है-- लक्षणे शब्द- शास्त्रे सिद्धहेमचन्द्रनाम्नि ये न सिद्धाः प्रकृतिप्रत्ययादिविभागेन न निष्पन्नास्तेऽत्र निबद्धाः । ये तु बजर-पज़र-उप्फाल-पिसुण-संघ-बोल्ल चव-जंप-सीस-साहादयः कथ्यादीनामादेशत्वेन साधिता: तेऽन्यैर्देशीयेषु परिगृहीता अप्यस्माभिन निबद्धाः ।" इस नियम को कर्ता ने सर्वत्र निवाहने का प्रयत्न किया है । इस कोश की टीका में जगह जगह ऐसे स्थल मिलते हैं, जहां कर्ता ने कहा है कि अमुक शब्द अन्य कोशकारों ने अपने देशी कोश में लिया है किन्तु वह हमारे व्याकरण के अमुक सूत्र से सिद्ध होता है इससे हमने उसे यहां नही दिया । ये उल्लेख प्रायः उनकी प्राकृत व्याकरण के चौथे पाद के ही हैं जिस पाद में ही उन्होने अपभंश भाषा का निरूपण ४२ पाहुड-दोहा किया है । ऊपर उद्धृत टीका में जो वजर-पज्जर आदि सूत्र का उल्लेख है वह भी चौथे पाद का दूसरा सूत्र है । यह सूत्र सभी प्राकृतों को लागू है। इस कोश की उक्त विशेषताओं पर से यह प्रमाणित होता है कि हेमचन्द्र ने उसे अपने प्राकृत व्याकरण का सहकारी ग्रंथ बनाया है । जो संज्ञायें या अन्य शब्द उनके व्याकरण के नियमों द्वारा सिद्ध होते हैं उन्हे वे प्राकृत कहते हैं और उनके कारक व क्रिया के रूपों की विशषतानुसार वे उन्हे, शौरसेनी, महाराष्ट्री व अपभ्रंश आदि नाम देते हैं; तथा जो संज्ञायें उक्त भाषाओं में प्रचलित हैं किन्तु उनके व्याकरण से सिद्ध नहीं होतीं उन्हे वे 'देशी' कहते हैं और उनके अर्थ उक्त कोश में दिये गये हैं। इस तरह उन्होने 'अपभ्रंश' का प्रायः उसी अर्थ में उपयोग किया है जिस अर्थ में कि पातञ्जलि ने किया है । वे संस्कृत से विकृत रूपों की दृष्टि से एक भाषा को 'अपभ्रंश' कहते हैं और उसी भाषा को उसमें प्रचलित संस्कृत से अव्युत्पन्न शब्दों, भरतमुनि के अनुसार ' म्लेच्छ शब्दों, की दृष्टि से देशी' कहते हैं। अब हमें यह भी देख लेना चाहिये कि जो ग्रंथ हमें मिले हैं, और जिन्हे हमने अपभ्रंश भाषा में रचित मान लिया है, उनके कर्ताओं ने स्वयं उन्हे किस भाषा का कहा है । यद्यपि इस सम्बन्ध के उल्लेख कम मिलते हैं तथापि जो कुछ दो चार मिल सकते हैं उनसे हमें ग्रंथकर्ताओं का अभिप्राय ज्ञात हो जावेगा।

देशीभाषा और अपभ्रंश
में कहा
हमें जो इस भाषा का साहित्य अबतक मिला है उसमें
स्वयंभू कवि के पउमचरिउ और हरिवंशपुराण सबसे प्राचीन
सिद्ध होते हैं। पउमचीरउ के प्रारम्भ में कवि ने राम की कथा
के सम्बन्ध
है-
वद्धमाण-मुह-कुहर-विणिग्गय
रामकहा-णइ एह कमागय ।
दहि-समास-पवाहालंकिय
सक्कय-पायय-पुलिणालंकिय ।
देसीभासा-उभयतडुजल
कविदुक्कर घणसदसिलायल ।
अस्थबहल कल्लोलाणिष्ट्रिय
आसामय-समऊह-परिट्रिय ।
एह रामकह-सरि सोहंती
गणहरदेवहं दिट वहंती ॥
यद्यपि यहां स्पष्ट यह नही कहा गया कि प्रस्तुत ग्रंथ को
कवि ने कौन सी भाषा में रचा है किन्तु मेरे मत से 'देशी भाषा
से कवि का अपने ग्रंथ की भाषा से अभिप्राय है। रविषेणकृत
संस्कृत 'पद्मचरित' और विश्लसूरिकृत प्राकृत 'पउमचरिउ' कवि से
पूर्व बन चुके थे, इसलिये उन्हे कवि ने रामकथा रूपी नदी के
वीच दृश्यमान पुलिन कहा है। स्वयंभू से पूर्व 'देसी भासा' में
बने हुए किसी रामकथा सम्बन्धी ग्रंथ का, विशेषतः जैनसाहित्य

४४
पाहुड-दोहा
में, हमें अबतक पता नही है । इसलिये मेरा अनुमान है कि कवि
अपने काव्य को ही देसी भासा में रचित निर्दिष्ट करते हैं। यह
ग्रंथ प्रारम्भ ही हुआ है,प्रवाह में नहीं पहुंचा, इसी से कदाचित् उसे
रामकथासरित् का तट ही कहा है
पद्मदेवकृत 'पासणाहचरिउ ' दशवीं शताब्दि का बना
हुआ है । उसके आदि में कवि कहते हैं-
वायरणु देसिसद्दत्थगाढ
छंदालंकारविसाल पोढ ।
ससमय-परसमय-वियारसहिय
अवसद्दवाय दूरण रहिय ॥
जइ एवमाइ-बहुलक्खणेहि
इह विरइय कन्य वियक्खणेहिं ।
ता इयरकईयणसंकिरहिं
पयडिव्वउ कि अप्पउ ण तेहिं ।।
यह उल्लेख एक दृष्टि से कुछ स्पष्ट है । कवि कहते है कि
यद्यपि व्याकरण और देशीशब्द व अर्थ से गाढ, आदि लक्षणों
युक्त काव्य दृसरे कवियों ने बनाये है, तो क्या उनकी शंका से
दूसरे कोई अपने भाव प्रगट न करें ! कवि का तात्पर्य है कि
देशी शब्दों में अनेक काव्य उच्चकोटि के बन चुके हैं तथापि मैं भी
देशी शब्दों में एक काव्य बनाने का साहस करता हूं । इस प्रकार
पद्मदेव भी अपने काव्य की भाषा को देशी कहते हैं।

देशीभाषा और अपभ्रंश
उक्त ग्रंथों से
-
कुछ
पोले के एक ग्रंय । लखमएव (लक्ष्मण
देव ) कृत 'मिणाह चरिउ' की पूर्व पीठिका में इस प्रकार
कहा गया है-
ण समाणमि छंदु न बंधभेउ
णउ हीणाहिउ मत्तासमेउ ।
णउ सक्कउ पायउ देस-भास
णउ सदु वण्णु जाणमि समास । इत्यादि
यहां भी हमारा मत है कि कवि का देसभाषा से अपने
ग्रंथ की भाषा से ही तात्पर्य है ।
इस सम्बन्ध में सबसे स्पष्ट उल्लेख पादलिप्त कृत तरङ्गवती
कथा में पाया जाता है+। यथा-
पालित्तएण रइया वित्थरओ तह य देसिवयणेहिं
नामेण तरंगवई कहा विचित्ता य विउला य ॥
यहां स्पष्ट कहा गया है कि पादलिप्त ने तरङ्गवती कथा
की रचना देसीवचनों में की।
पूर्वोक्त अवतरण इस बात को सिद्ध करने के लिये पर्याप्त
हैं कि व्याकरणाचार्य जिस भाषा को अपभ्रंश कहते हैं उसी भाषा
को उसमें रचना करने वाले कवि देशी भापा कहते थे । वह भाषा
हेमचन्द्र द्वारा स्वीकृत देशी भाषा के लक्षणों से युक्त भी है,
+ डा. जैकोबी, सनत्कुमार चरित, भूमिका, पृ. १८.

पाहुड-दोहा अर्थात् वह अनादिकालागत प्राकृत का एक रूप है, तथा उसमें व्याकरण के नियमों से अव्युत्पन्न भी शब्द पाये जाते हैं। यह बात विचारणीय है कि इस भाषा में रचना करने वाले कवियों ने अपनी भाषा को अपभ्रंश का नाम कहीं नहीं दिया । अपभ्रंश शब्द का, भाषा के सम्बन्ध में, एक भी उल्लेख इस भाषा के काव्यों में अभीतक मेरे देखने में नही आया । ऊपर दिये हुए अवतरणों के अतिरिक्त और अनेक उल्लेख मेरे पास संकलित हैं जिनमें कवियों ने कहीं अपने काव्य को 'पद्धडिया बंध ' कहा है और कहीं ' प्राकृत रचना' । मेरा मत है कि भाषा के सम्बंध में इस अपभ्रंश शब्द से उक्त भाषा के लेखकों को अरुचि थी। उस शब्द में भाषा की हीनता और बुराई का भाव अंकित है और इसलिये उस भाषा के प्रेमियों को उससे असहयोग करना स्वाभाविक था । यथार्थतः यह शब्द पातञ्जलि आदि संस्कृत व्याकरण के महारथियों ने घृणा कि दृष्टि से ही दिया था, क्योंकि वे उसे संस्कृत का विकाश नही विकार समझते थे । प्राकृत वैया- करणों ने उस शब्द को यो स्वीकार कर लिया कि उन्हे वह उस भाषा का लक्षण-घोतक जंचा, और संस्कृत से विकार रूप में उस भाषा का स्वरूप समझाने में उन्हे सुविधा होगई। मेरा मत है कि इसी सुविधा के विचार से हेमचन्द्र जैसे ' वैयाकरण ने भी प्राकृत की प्रकृतिः संस्कृतं तत्र भवं तत आगतं वा प्राकृतम् ' ऐसी अयुक्तिसंगत व्युत्पत्ति दे डाली है।

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पाहु ड-दो हा पाहुड-दोहा गुरु दिणेयरु गुरु हिमकरणु गुरु दीवउ गुरु देउ । अप्पांपरहं परंपरहं जो दरिसावइ भेउ ॥ १॥ अप्पायत्तउ जंजि सुहु तेण जि करि संतोसु । परसुडं वह चिंतंतहं हियइ ण फिट्टइ सोसु ॥ २ ॥ जं सुहु विसयपरंमुहउ णिय अप्पा झायतु । तं सुहु इंदु वि गउँ लहइ देविहिं कोडि रमंतु ।। ३ ।। आभुजंता विसयसुहँ जे ण वि हियइ धरति । ते सासयसुहु लहु लहहिं जिणवर एम भणंति ॥४॥ ण वि भुजंता विसय सुह हियडइ भाउ धरति । सालिसित्थु जिम वैप्पुडउ णर णरयहं णिवडंति ॥ ५ ॥ १ क. दिणियरु. २ क. अप्पहं परहं. ३ द." सुह. ४ द. ण वि. ५ क. सुहु. ६ क. द. जिणवरु. ७ क. वापुडौ.

हिन्दी अनुवाद
जो आत्म और पर की परम्परा का भेद दर्शाता है वह
दिनकर (सूर्य) गुरु है, हिमकिरण (चन्द्र ) गुरु है, दीप
गुरु हे और देव भी गुरु है।
जो सुख अपने अधीन हो उसी से सन्तोप कर। दूसरी
के सुख की चिन्ता (अभिलापा) करने वालों के हृदय का
सोच, हे मूर्ख, कभी नही फिटता ।
२
३
जो
सुख
विपयों से
पराङ्मुख
होकर अपनी आत्मा के
ध्यान में मिलता है वह सुख करोड़ों देवियों के साथ
या देवियों की कोटि में) रमण करने वाला इन्द्र भी
नही पाता।
विषयसुखों का पूरा उपभोग करते हुए भी जो हृदय में
उनकी धारणा नहीं करते वे शीघ्र शाश्वत सुख का
लाभ उठाते हैं, ऐसा जिनवरों ने कहा है।
विषयसुखों का उपभोग न करते हुए भी जो हृदय में
उनका भाव रखते हैं वे नर वेचारे शालिसिक्थ के समान
नरकों में पड़ते हैं। (शालिसिपथ की कथा के लिये
देखो टिप्पणी)।

४ पाहुड-दोहा आयई अडवड वडवडइ पर रंजिजइ लोउ । मणसुद्धइं णिचलठियई पाविजइ परलोउ ॥ ६॥ धंधई पडियउ सयलु जगु कम्मइं करइ अयाणु । मोक्खहं कारणु एक खणु ण वि चिंतइ अप्पाणु ॥ ७ ॥ जोणिहिं लक्खहिं परिभमइ अप्पा दुक्खु सहंतु । पुत्सकलत्तई मोहियर जाम ण बोहि लहंतु ॥ ८ ॥ अण्णुं म जाणहि अप्पणउ घरु परियणु तणु इट्छ । कम्मायत्तउ कारिमउ आगमि जोइहिं सि? ॥ ५ ॥ जं दुक्खु वि तं वि तं सुक्खु किउ जं सुहु तं पि य दुकाबु । पई जिय मोहहिं वसि गर्यई तेण ण पायउ मुक्षु ॥ १० ॥ मोक्खु ण पावहि जीव तुटुं धणु परियगु चिंतंतु । तो इ विचिंतहि तर जि तर पावहि सुक्खु महंतु ।। ११ ॥ घरवासउ मा जाणि जिय दुकियवासउ एहु । पासु कयंते मंडियउ अविचलु ण वि संदेहु ॥ १२ ॥ १ क. में दोहा ६ और ७ का कम इससे विपरीत है। २ द. ठियह. ३. क. कारणि. ४ क. कलत्तहं. ५ क. अपु. ६ क. जो. ७ क. सिद्ध. ८ द. गय उ. ९. क. पावइ. १० क. वि. ११ क. सो.

अनुवाद
६
आपत्ति में अटपट बडबडाता है पर इससे लोक का
मनोरंजन (विनोद ) मात्र होता है। मन के शुद्ध और
निश्चल होने पर परलोक प्राप्त होता है ।
धंधे में पड़ा हुआ सकल जग, अज्ञानवश, कर्म करता है
किन्तु मोक्ष के कारण अपनी आत्मा का एक क्षण भी
चिन्तन नहीं करता।
यह आत्मा जव तक धोत्र नही पाता तब तक पुत्रकलत्र
में मोहित होकर, दुःख सहना हुआ, लाखों योनियों में
भ्रमण करता है।
घर, परिजन, तन व इष्ट सव अन्य हैं, इन्हे अपने मत
जान । यह कर्म के अधीन कर्मजाल है, ऐसा योगियों
ने आगम में बताया है।
१०
हे जीव ! मोह के वश में पड़कर तृने जो दुख है उसे
सुख कर के माना है, और जो मुख है उसे दुख । इस
से तूने मोक्ष नहीं पाया।
धन और परिजन का चिन्तन करने से, हे जीव! तूं
मोक्ष नही पा सकता। तो भी यूँ उसी उसी के चिन्तन
करने में सुख मानता है।
१२
हे जीव ! इसे गृह-वास मत समझ, यह दुष्कृतवास
(पापवास) है। यह यम द्वारा मांडा (फैलाया ) हुआ
अविचल फंदा है, इसमें सन्देद नही ।

६ पाहुड-दोहा मूढा सयलु वि कारिमउ मं फुडु तुहुं तुसे कंडि । सिवपई णिम्मलि करहि रइ घर परियणु लहु छडि ॥ १३ ॥ मोहु विलिजइ मणु मरइ तुट्टइ सासु णिसासु । केरलणागु वि परिणवइ अंबरि जाह णिवासु ॥ १४ ॥ सपि मुक्की कंचुलिय जं विसु तं ण मुएइ । भोयह भाउ ण परिहाइ लिंगंग्गहणु करेई ॥ १५ ॥ जो मुणि छंडिवि विसयसुह पुणु अहिलामु करेइ । लुंचणु सोसणु सो सहइ पुणु संसारु भमेइ ।। १६ ।। विसयसुहा दुइ दिवहडा पुणु दुक्खहं परिवाडि । भुल्लउ जीव म वाहि तुहुँ अप्पाखंधि कुहाडि ॥ १७ उव्वलि चोप्पडि चिट्ठ करि देहि सुमिट्टाहार । सबल वि देह णिरस्थ गय जिहँ दुजण उवयार ॥ १८ ।। अथिरेण थिरा मइलेण णिम्मला णिग्गुणेण गुणसारा । काएण जा विढप्पइ सा किरिया किण्ण कायव्या ॥ १९ ॥ १ क. तुसपंडि. २ क. पहि. ३ द. मुवेइ. ४ क. भोहिं. ५ कं. लिंगाग्रहणु. ६ द. धरेइ. ७ क. विसइ सुहई. ८ क. क्वधि. ९ द. देह. १० क. जह.

अनुवाद
१३ हे मूढ ! मह समस्त कर्म जाल है तूं प्रकट भुस को मत
कूट । घर, परिजन को शीघ्र छोड़कर निर्मल शिव-पद में
प्रीति कर।
जिनका वस्त्र अम्बर है (अर्थात् जो दिगम्बर हैं, या
जिनका निवास आकाश में है, अर्थात् जो मुक्त है) उनका
मोह विलीन हो जाता है, मन मर जाता है, श्वास
निश्वास छूट जाता है और केवलज्ञान प्रकट हो
जाता है।
सर्प कांचुली तो छोड़ देता है किन्तु जो विप है उसे
नहीं छोड़ता। (इसी प्रकार द्रव्यलिङ्गी मुनि) वेष
धारण कर लेता है परंतु भोगों के भाव का परिहार
नहीं करता।
जो मुनि विषयसुखों को छोड़कर पुनः उनकी अभिलाषा
करता है वह (केश-) लौच और (शरीर-) शोषण
का क्लेश सह कर फिर भी संसार में भ्रमण करता है।
विषय-सुख दो दिन के हैं, फिर वही दुखों की परि-
पाटी है। भूलकर, हे जीव, तूं अपने कंधे पर कुल्हाड़ी
मत मार।
उपटन और तैलमर्दन की चेष्टा कर और सुमिष्ट आहार
दे, तो भी दुर्जन के प्रति किये हुए उपकारों के समान
समस्त देह निरर्थ जानेवाली है।
आस्थिर, मैले और निर्गुण काय से जो स्थिर, निर्मल
और गुणसार क्रिया बढ़ सकती है वह क्रिया क्यों न
की जाय ? (अर्थात् इस विनाशी, मलिन और निर्गुण
शरीर को स्थिर, निर्मल और गुणयुक्त आत्मा के
ध्यान में लगाना चाहिये।

८ पाहुड-दाहा Arrdsmpe रु विसु विमहरु वरु जलणु वरु मेविउ वणवासु । णउ जिगधम्मपरम्गृहउ मित्थतिय सहु वासु ॥ २० ॥ उम्मूलिवि ते मूलगुण उत्तरगुणहिं विलग्ग । वण्णर जेम पलंबचुय बहुय पडेविगु भग्ग ॥ २१ ॥ अप्पा बुझिउँ णिच्चु जइ केवलणाणसहाउ । ता पर किजइ कॉई वड तणु उप्परि अणुगउ ॥ २२ ॥ सों णत्थि इह पएमो चउरासीलक्खजोणिमामि । जिणवयणं अलहंतो जत्थ ण दुरंतुल्लिओ जीवो ।। २३ ॥ जसु मणि णाणु ण विष्फुरइ कम्मई हेउ करंतु । मो मुणि पावइ सुक्षु ण वि सयलई सत्थ मुणंतु ॥ २४ ॥ बोहिविवजिउ जीव तुहुं विवरिउ तच्चु मुहि । कम्मविणिम्मिय भावडा ते अप्पाणं भणेहि ॥ २५ ॥ हउं गोरउ हउं सालउ हउं मि" विभिण्णउँ वाणि । हउं तणुअंगउ शूल हउं एहउ जीव म मणि ॥ २६ ॥ १ क में दोहा २० और २१ का क्रम इससे विपरीत है। २ क. जालजलगु. ३ क. में दोहा २२ और २३ का क्रम इससे विपरीत है। ४ क. वुज्झहि. ५ द. एत्यु. ६ द. में इससे पूर्व गाथा' है. ७ क. दुरु', ८ क. अप्पणा. ९ क. सावळउ. १० द. जि. ११ क. विभिन्नइ. १२ द. ण्णु.

२०
अनुवाद
विष व विषधर (सर्प ) बहतर हैं, अग्नि बहतर है,
वनवास का सेवन बहतर है; किन्तु जिनधर्म से पराङ्-
मुख मिथ्यातयों के साथ निवास अच्छा नहीं ।
जो
मूल गुणों को उन्मूल कर उत्तर गुणों में संलग्न
होते हैं वे डाल के चूके वानरों के समान बहुत नीचे
गिरकर भग्न होते हैं।
२१
२२
यदि आत्मा को नित्य और केवलज्ञान-स्वभाव जान
लिया, तो फिर, हे मूर्ख ! इस शरीर के ऊपर क्यों
अनुराग करता है?
२३
.
यहां चौरासी लाख योनियों के मध्य ऐसा कोई प्रदेश
नही, जहां, जिनवचन को न पाकर, यह जीव भ्रमण न
कर चुका हो।
जिसके मन में ज्ञान विस्फुरित नहीं हुआ वह मुनि
सकल शास्त्रों को जानते हुए भी, कर्मों के हेतु को
करता हुआ, सुख नही पाता।
२४
बोध से विवर्जित, हे जीव ! तूं तत्व को विपरीत मानता
है । जो भाव कर्मों द्वारा निर्माण हुए हैं उन्हे आत्मा के
भाव कहता है। (अर्थात् यह अज्ञान का ही कारण है
कि जीव पर को आत्म समझता है)।
मैं गोरा हूं, मैं साँवला हूं, मैं विभिन्न वर्ण का हूं, मैं
दुर्बलाङ्ग हूं, मैं स्थूल हूं; हे जीव! ऐसा मत मान ।
२६

पाहुड-दोहा ण वि तुहुं पंडिउ मुक्खु ण वि ण वि ईसरु ण वि णीसु । ण वि गुरु कोइ वि सीसु ण वि सई कम्मविसेसु ॥ २७ ॥ ण वि तुहुं कारणु कन्जु ण वि ण वि सामिउ ण विभिच्चु । सूरउ कायरु जीव ण वि ण वि उत्तमु ण वि णिच्चु ॥२८॥ पुण्णु वि पाउ वि कालु गहुँ धम्मु अहम्मु ण काउ । एकु वि जीव ण होहि तुहुं मिल्लिवि चेयणभाउ ॥ २९ ॥ ण वि गोरउ ण वि सामउ ण वि तुहूं एकु वि वण्णु । ण वि तणुअंगउ थूलु ण वि एहउ जाणि सवण्णु ॥ ३० ॥ हउं वरु बंभणु ण वि वइमु णउ खत्तिउ णे वि सेसु । पुरिसु णउंसउ इत्थि ण वि एहउ जाणि विसेसु ॥ ३१ ॥ तरुणउ बूढउ वालु हउं सूरउ पंडिउ दिन्छ । खवणउ वंदउ सेवंडउ एहउ चिंति म सव्वु ॥ ३२ ॥ देहहो पिक्खिवि जरमरणु मा भउ जीव करेहि । जो अजरामरु बंभु परु सो अप्पाणं मुणेहि ॥ ३३ ॥ . १ क. सव्वु इ. २ क. नहि. ३ क. मिल्लिअ. ४ क. सावलउ. ५ क. उ. ६ क. सेउडउ. ७ द. बंभपरु. ८ क.अप्पणा.

अनुवाद ११ २७ २८ न तो तूं पंडित है न मूर्ख, न ईश्चर है न अनीश, न गुरु है और न कोई शिप्य। सव में कर्म की विशेषता है। (अर्थात् आत्मा सब जीवों का एक रूप है, केवल अपने अपने कर्मानुसार सव जीव भिन्न भिन्न परिस्थिति में दिखाई देते हैं)। न तो तूं कारण है न कार्य, न स्वामी है न भृत्य, न सूर है न कायर हे जीव ! न तू उत्तम है न नीच । २९ न पुण्य, न पाप, न काल, न नभ, न धर्म, न अधर्म और न काय । हे जीव तूं, चेतन भाव को छोडकर, इनमें से कोई एक भी नहीं है। (अर्थात् आत्मा चैतन्य स्वभाव वाला है। पुण्य पाप इत्यादि जो जड भाव हैं उन से वह सर्वथा भिन्न है )। ३० न तूं गोरा है न साँवला, न एक भी वर्ण का है। दुर्वलाङ्ग है, न स्थूल। अपने स्वरूप को ऐसा जान । (अर्थात् वर्ण और दुर्बलता व मोटापन आदि गुण जड शरीर के हैं, चिदानन्द आत्मा के नहीं)। न में श्रेष्ठ ब्राह्मण हूं, न वैश्य हूं, न क्षत्रिय हूं, न शेष (शूद्र) हुं, और न पुरुप, नपुंसक या स्त्री हूं। ऐसा विशेष जान। (अर्थात् शुद्ध आत्मा में वर्णभेद और लिङ्गभेद नही हैं)। ३२ तरुण हूं, बूढा हूं, बाल हूं, सूर हूं, दिव्य पंडित हूं या क्षपणक (दिगम्बर), बंदक (मंदिरमार्गी ?) या श्वेताम्बर हूं। इस सब की चिंता मत कर। ३३ हे जीव ! देह का जरा-मरण देखकर भय मत खा। जो अजरामर, परम ब्रह्म है उसे ही अपना मान। न . मैं .

१२ पाहुड-दोहा देहहि उब्भउ जरमरणु देहहि वण्ण विचित्त । देहहो रोया जाणि तुहुं देहहि लिंगई मित्त ॥ ३४ ॥ अत्थि ण उब्भउ जरमरणु रोय वि लिंगई वण्ण । णिच्छइ अप्पा जाणि तुहुं जीवहो णेक वि सण्ण ॥ ३५ ॥ कम्महं केरउ भावडउ जइ अप्पाण भणेहि । तो वि ण पावहि परमपउ पुणु संसारु भमेहि ॥ ३६ ॥ अप्पा मिल्लिविणाणमउ अवरु परायउ भाउ । सो ठंडेविणु जीव तुहुं झावहि सुद्धसहाउ ॥ ३७ ॥ वण्णविहूणउ णाणमउ जो भावइ सम्भाउ । संतु णिरंजणु सो जि सिउ तहिं किजइ अणुराउ ।। ३८ ।। तिहुयणि दीसइ देउ जिणु जिणवरि तिहुवणु एउ । जिणवरि दीसइ सयलु जगु को विण किन्जइ भउ ॥ ३९ ॥ बुज्झहु बुज्झहु जिणु भणइ को बुझउँ हलि अण्णु । अप्पा देहहं णाणमउ छुडु बुज्झियउ विभिण्णु ॥ ४० ॥ १ क. निच्छवि अप्पु वियाणि तुहुं. २ क. निक. ३ क. अप्पणा. ४ क. झायहि. ५ क. तिहुयणु. ६ क. बुज्झइ. ७ क. देहे.

अनुवाद
१३
जरा और मरण दोनों देह के हैं, और देह ही के
विचित्र वर्ण है। हे मित्र! देह ही के रोग और देह ही के
लिंग जानो।
न तो दोनों जरा मरण है, न रोग, लिंग व वर्ण हैं । हे
आत्मन् ! यह दूं निश्चय से जान कि जीव के इन में से
एक भी नहीं है।
३६
कर्मों के भाव को ही यदि तूं आत्मा कहता है तो फिर
परम पद को नहीं पा सकता, अभी और भी संसार
का भ्रमण करेगा।
ज्ञानमय आत्मा के अतिरिक्त और भाव पराया है। उसे
छोड़कर, हे जीव ! हूँ शुद्ध स्वभाव का ध्यान कर।
जो वर्णविहीन है, ज्ञानमय है, सद्भाव को भाता है,
जो संत और निरंजन है, वहीं शिव है। उसी में अनुराग
करना चाहिये।
३८
त्रिभुवन में जिन देव दिखता है और जिनवर में यह
त्रिभुवन। जिनवर में सकल जगत् दृष्टिगोचर होता
है। इनमें कोई भेद न करना चाहिये ।
जिन कहते हैं जानो! जानो ! किन्तु यदि ज्ञानमय
आत्मा को देह से विभिन्न जान लिया तो, भला, और
अन्य क्या जानने को रहा ?

१४ पाहुड-दोहा वंदहु वंदहु जिणु भणइ को बंदउ हलि इत्थु । णियदेहाहं वसंतयहं जइ जाणिउ परमत्थु ॥ ४१॥ उपलाणहिं जोइय करहुलउ दावेणु छोडहि जिम चरइ । जसुअखइणि रामई गयउ मणु सो किम बुहु जगिरइ करइ॥४२॥ दिल्लउ होहि म इंदियहं पंचहं विण्णि णिवारि । एक णिवारहि जीहडिय अण्ण पराइय णारि ॥ ४३ ॥ पंच बलद ण रक्खियई णंदणवणु ण गओ सि । अप्पु ण जाणिउ णे वि परु वि एमई पव्वइओ सि ॥ ४४ ।। पंचंहिं बाहिरु णेहँडउ हलि सहि लग्गु पिर्यस्स । तांसु ण दीसइ आगमणु जो खलु मिलिउ परस्स ॥ ४५ ॥ मणु जाणइ उवएसडउ जहिं सोवेइ अचिंतु । अचित्तहो चिनु जो मेलवइ सो पुणु होइ णिचिंतु ॥ ४६ ॥ वट्टडिया अणुलग्गयहं अग्गउ जोयंताहं । कंटउ भग्गेइ पाउ जइ भजउ दोसु ण ताहं ।। ४७ ॥ १ क. दाम्वणु. २ क. पंचई.बंधि णिसारि. ३ क. एक. ४ क. न वि वि परु. ५ क. एम्वइ. ६ क. पंचहे. ७ द. मेहडउ. ८ द. पयस्स ९ द. जासु. १० क. जहिं सोवइ अच्चितु. ११ द. जि. १२ द. भजउ पाइ. १३ द. कु.

अनुवाद
१५
४१
४२
जिन कहते हैं वन्दना करो! वन्दना करो! किन्तु यदि
अपने देह में वसने वाले का परमार्थ जान लिया तो,
भला, यहां किस की वन्दना करना शेष रहा ?
जिस प्रकार कमलों को देखकर गजकुमार अपने वन्धन
को छुड़ाकर विचरण करने लगते है, तैसे ही जिसका
मन अक्षयिनी रामा (मुक्ति-स्त्री) पर गया वह विद्वान्
जगत् में कैसे रति कर सकता है ?
इन्द्रियों के सम्बन्ध में ढीला मत हो। पांच में से दो
का निवारण कर। एक जीभ को रोक और दूसरी
पराई नार।
तूने न तो पांच बैलों को रखाया और न नन्दन वन में
प्रवेश किया। न अपने को जाना और न पर को। यों
ही परिव्राजक बन गया है। (यहां पांच वैलों से पांच
इंन्द्रियों तथा नन्दन वन से आत्मा का तात्पर्य है।)
४५ हे सखि ! प्रियतम को वाहिर पांच का नेह लगा हुआ
है। जो खल दूसरे से मिला हुआ है उसका आगमन
भी नही दिखता। (अर्थात् जब तक इन्द्रियों में मोह
फंसा हुआ है तब तक आत्मानन्द का अनुभव नही
हो सकता।)
जब मन निश्चिन्त सो जाता है तभी वह उपदेश को
समझता है। और निश्चिन्त वही होता है जो अचित् से
चित्त को अलग कर लेता है।
जो मार्ग पर लगे हुए हैं, और आगे देख कर चलते हैं,
उनके पैर में यदि कांटा लग जाय तो लग जावे । इसमें
उनका दोष नही।

१६ पाहुड-दोहा मिल्लहु मिल्लहु मोकलउ जहिं भावइ तहिं जाउ । सिद्धिमहापुरि पइसरउ मा करि हरिसु विसाउ ॥४८॥ मणु मिलियउ परमेसैरहो परमेसरु जि मणस्स । विणि वि समरसि हुइ रहिय पुज चडावरं कस्म ॥ ४९ ॥ आराहिजइ देउ परमेसरु कहिं गयउ । वीसारिजइ काई तासु जो सिउ सव्वंगउ ॥ ५० ॥ अम्मिए जो पर सो जि पर पर अप्पाण ण होइ । हउं डज्झउ सो उव्यरइ पलिवि ण जोवइ तो इ॥५१ ॥ मूढा सयलु वि कारिमउ णिकारिमउ ण कोइ । जीवहु जंत ण कुडि गइय इउँ पडिछंदा जोइ ॥ ५२ ।। देहादेवलि जो वसइ सत्तिहिं सहिय उ देउ । को तहिं जोइय सत्तिसिउ सिग्घु गवेसहि भेउ ॥ ५३ ॥ जरइ ण मरइ ण संभवइ जो पंरि को वि अणंतु । तिहुवणसामिउ णाणमउ सो सिदेउ णिभंतु ॥ ५४॥ १ क. परमेसरहं. २ द. काई दिउ. ३ क. जि. ४ क. अण्पणा. ५ क. तो वि. ६ द. जंतु. ७ क. इहु. ८ क. °देउलि. ९क.में यह पंक्ति स्याही उड़ जाने के कारण पढी .नहीं जा सकी. १० द. परु.११ क.सिउ.

अनुवाद
१७
,
,
छोड़ दो ! स्वतन्त्र छोड़ दो! जहां भावे तहां जाने दो।
उस सिद्धि-महापुरी की ओर बढने दो। कुछ हर्ष विषाद
मत करो। ( अर्थात् मन जव इन्द्रिय-विषयों से मुक्त हो
जाता है तो वह मुक्ति की ओर अग्रसर होता है।)
मन परमेश्वर से मिल गया और परमेश्वर मन स ।
दोनों संगार हो रहे, पूजा किसे चढाऊं ?
देव की आराधना करता है, परमेश्वर कहां चला गया?
जो शिव सर्वाङ्ग में व्याप्त है उसका विस्मरण कैसे
हो गया?
अहो ! जो पर है बद पर ही है, पर आत्मा नही है । मैं
दग्ध हो जाता है, वह बच जाता है और फिर लौट कर
भी नहीं देखता। ( अर्थात् जड़ शरीर पर है। इसके
दग्ध हो जाने पर आत्मा इससे सर्वथा पृथक् हो
जाता है।)
५२ हे मूढ ! यह सब कर्मजंजाल है। निष्कर्म कोई नही है।
जीव गया पर उसके साथ कुटी (देह ) नहीं गई। इस
दृष्टान्त को देख।
५३ देहरूपी देवालय में जो शक्तियों सहित देव वास करता
है, हे जोगी! वह शक्तिमान् शिव कौन है ? इस भेद को
शीघ्र ढूंढ ।
५४ जो न जीर्ण होता है, न मरता है और न उत्पन्न होता
है, जो सव के परे कोई अनन्त, ज्ञानमय, त्रिभुवन का
स्वामी है, वही निर्धान्त शिव देव है।

पाहुड-दोहा सिव विणु सत्ति ण वावरइ सिउ पुणु सत्तिविहीणु । दोहिं मि' जाणहिं सयलु जगु बुज्झइ मोहविलीणु ॥ ५५ ॥ अण्णु तुहारउ णाणमउ लक्खिर जाम ण भाउ । संकप्पवियप्पिउ णाणमंउ दड्डउ चित्तु वराउ ॥५६॥ णिच्चु णिरामउ णांणमउ परमाणंदसहाउ । अप्पा बुझिउ जेण परु तासु ण अण्णुं हि भाउ ॥ ५७ ॥ अम्हहिं जाणिउ एकु जिणु जाणिउ देउ अणंतु । णचरिसु मोहें मोहियउ अच्छइ दूरि भमंतु ॥ ५८ ।। अप्पा केवलणाणमउ हियडइ णिवसइ जासु । तिहुयणि अच्छइ मोकलउ पाउ ण लग्गइ तासु ॥ ५९ ॥ चिंतइ जंपइ कुणइ ण वि जो मुणि बंधणहेउ । केवलणाणफुरंततणु सो परमप्पउ देउँ ॥ ६० ॥ अभितरचित्ति वि मइलियई बाहिरि काई तवेण । चित्ति णिरंजणु को वि धरि मुचहि जेम मलेण ॥ ६१ ॥ १ द. वि. २ द. णाणमइ. ३ क. अण्णहि. ४ क. अम्हहं. ५ द. णवरिसु (१) ६ क. भवंतु. ७ द. मोकलउ. ८ द. भेउ. ९ क. बाहिर. १० क.णिरंजाणि.

अनुवाद
२१
शिव के विना शक्ति का व्यापार नहीं होता और शंजन
विहीन शिव का। इन दोनो को जान लेने से सकले
जगत मोह में विलीन समझ में अग्ने लगता है।
५६
जबतक तुम्हारा वह अन्य, ज्ञानमय भाव नही लखा
गया (तभी तक यह) संकल्प-विकल्परूपी अज्ञानमय,
हतभाग्य,
वेचारा चित्त है।
नित्य, निरामय, ज्ञानमय, परमानन्द-स्वभाव, पर
आत्मा को जिसने जान लिया उसके कोई अन्य भाव
नहीं रहता।
हमने एक जिन को जान लिया तो अनन्त देव को जान
लिया। जो ऐसा आचरणशील नहीं है वह मोह से
मोहित होकर दूर भ्रमण करता रहता है।
जिसके हृदय में केवलज्ञानमय आत्मा निवास करता
है वह त्रिभुवन में स्वतंत्र रहता है। उसे कोई पाप
नही लगता।
जो मुनि वंधन के हेतु को न सोचता है, न कहता है
और न करता है वही केवलज्ञान से स्फुरायमान
शरीरवाला, परमात्म, देव है।
जब भीतरी चित्त मैला है तब वाहिर तप करने से
क्या? चित्त में उस विचित्र निरंजन को धारण कर
जिससे मैल से
छुटकारा
हो।

२२ पाहुड-दोहा अप्पा दंसंणणाणमउ सयलु वि अण्णु पयालु । इयं जाणेविणु जोइयहुँ छंडहु मायाजालु ।। ६९ ॥ अप्पा मिल्लिवि जगतिलउ जो परंदवि रमंति । अण्णु कि मिच्छादिट्टियहं मत्थई सिंगई होंति ॥ ७ ॥ अप्पा मिल्लिवि जगतिलउ मूढ म झायहि अण्णु । जिं मरगउ परियाणियउ तहु किं कच्चहु गण्णु ॥ ७१ ॥ सुहपरिणामहिं धम्मु वढ असुहई होइ अहम्मु । दोहिं मि ऐहिं विवज्जियँउ पावइ जीउ ण जम्मु ॥ ७२ ॥ सई मिलिया सई विहडिया जोइय कम्म णिभंति । तरलसहावहिं पंथियहि अण्णु कि गाम वसंति ॥ ७३ ॥ अण्णु जि जीउ म चिंति तुहुँ जइ वीहँउ दुक्खस्स । तिलतुस मित्तु वि सल्लडा वेयण करइ अवस्स ॥ ७४ ॥ अप्पाए वि विभाचियई णासइ पाउ खणेण । सूरु विणासइ तिमिरहरु एकल्लउ णिमिसेण ।। ७५ ।। १ क. द.दसणु. २ द. इम. ३ क हो. ४ क. मेल्लेवि जयति'.५ क. परदव्व. ६ क. जे. ७ 4. तहो. ८ क. दोहं मि. ९ क. द. पहं. १० क. विवजियए. ११ क. तरलसहाव वि; द. तरलि सहाव वि. १२ क. भीयउ. १३ क. में यहां से आगे की तीन पंक्तियां बिलकुल ही उड़ गई हैं.

अनुवाद
२३
६९
आत्मा दर्शन और ज्ञानमय है, अन्य और सब प्रजाल
है। ऐसा जानकर, हे योगियो ! मायाजाल को छोड़ो।
७०
जगतिलक आत्मा को छोड़कर जो परद्रव्य में रमण
करते हैं, तो और क्या मिश्या-दृष्टियों के माथे पर सींग
होते हैं?
७१
७२
!
जगतिलक आत्मा को छोड़कर, हे मूढ ! अन्य किसी
का ध्यान मत कर। जिसने मरकत (मणि) को पहचान
लिया वह क्या कांच को कुछ गिनता है ?
हे मूर्ख ! शुभ परिणामों से धर्म और अशुभ से अधर्म
होता है। इन दोनों से विवर्जित होकर जीव पुनर्जन्म
नहीं पाता।
हे जोगी! कर्म स्वयं मिलते और स्वयं विछुड़ते हैं,
इसमें भ्रान्ति नही । चञ्चल स्वभाव के पथिकों से और
क्या गांव वसते हैं!
७३
यदि तूं दुख से भयभीत है तो अन्य को जीव
मत मान । तिल व तुषमात्र शल्य (कांटा) भी
अवश्य वेदना करता है।
आत्मा की भावना करने से पाप एक क्षण में नष्ट हो
जाता है। अकेला सूर्य एक निमेष में अंधकार के समूह
का विनाश कर देता है।

२४ पाहुड-दोहा जोइय हियडइ जासु पर एकु जि णिवसइ देउ । जम्मणमरणविवज्जियउ तो पावइ परलोउ ।। ७६ ।। कम्मु पुराइउ जो खवइ आहिणव पेमु ण देइ । परमणिरंजणु जो णवइ सो परमप्पर होइ ।। ७७ ॥ पाउ वि अप्पहिं परिणवइ कम्मई ताम करेइ । परमणिरंजणु जाम ण वि णिम्मलु होइ मुणेइ ॥ ७८ ॥ अण्णु णिरंजणु देउ पर अप्पा दंसणणाणु । अप्पा सच्चउ मोक्खपहु एहउ मूढ वियाणु ॥ ७९ ॥ ताम कुतित्थई परिभमई धुतिम ताम करति । गुरुहुँ पसाएं जाम ण वि देहहं देउ मुंणंति ॥ ८० ॥ लोहिं मोहिउ ताम तुहुँ विसयह सुक्ख मुणहि । गुरुहुं पामाएं जाम ण वि अविचल बोहि लहेहि ॥ ८१ ॥ उप्पजइ जेण विबोहु णं वि बहिरण्णउ तेण णाणण । तइलोयपायडेण वि असुंदरो जत्थ परिणामी ।। ८२ ॥ १ क. पुरायड. २ क. णिम्मणु. ३ द. में यह दोहा नहीं है. ४ क. कुतित्थहं. ५ द. करेइ. ६ द. गुरहं, ७ द. मुणंतु, ८ क. बोह. ९ क. में 'ण वि' नहीं है.

अनुवाद
२५
७६ हे जोगी! जिसके हृदय में जन्म-मरण से विवर्जित
एक परम देव निवास करता है वह परलोक को प्राप्त
करता है।
जो पुराने कर्म को खपाता है और नये का प्रवेश नही
होने देता, तथा जो परम निरंजन (देव) को नमस्कार
करता है वह परमात्मा हो जाता है।
७९
पाप का आत्मा में तभी तक परिणाम होता है और
तभी तक कम-बंध होता है, जब तक, निर्मल होकर,
परम निरंजन को नही जान लेता।
दर्शन और ज्ञानमयी निरंजन देव परम आत्मा अन्य ही
है। आत्मा ही सच्चा मोक्ष पथ है। हे मूढ ! ऐसा जान ।
(लोक ) तभी तक कुतीर्थों का परिभ्रमण करते हैं
और तभी तक धूर्तता भी करते हैं जब तक वे गुरु के
प्रसाद से देह के देव को नहीं जान लेते ।
८१
,
तूं तभी तक लोभ से मोहित हुआ विषयों में सुख
मानता है, जब तक कि, गुरु के प्रसाद से, अविचल
बोध नही पाया।
जिससे विशेष बोध ( अर्थात् आत्मज्ञान ) उत्पन्न न हो
ऐसे त्रैलोक्य को प्रकट करने वाले ज्ञान से भी (जीव)
बहिर्शानी (बहिरात्मा) ही रहता है, जिसका कि
परिणाम अशुभ है।
८२

२६ पाहुड-दोहा तासु लीह दिढ दिजइ जिम पढियइ तिम किजइ । अह व ण गम्मागम्मइ तासु भजेसहि अप्पुणु कम्मई ॥ ८३ ।। वक्खाणडा करंतु बुहु अप्पि ण दिण्णु णु चित्तु । कहिं जि रहिउँ पयालु जिम पर संगहिउ बहुत्तु ॥ ८४ ॥ पंडियपंडिय पंडिया कणु छंडिवि तुस कंडियों । अत्थे गंथे तुट्टो सि परमत्थु ण जाणहि मूढो सि ॥ ८५ ॥ अक्खरडेहिं जि गधिया कारणु ते ण मुणंति । वंसविहत्था डोम जिम परहत्थडा धुणंति ॥ ८६ ॥ णाणतिडिक्की सिक्खि वह किं पढियई बहुएण । जा सुंधुकी णिड्डहइ पुण्णु वि पाउ खणेण ॥ ८७ ॥ सयलु वि को वि तडफडइ सिद्धत्तणहु तेणेण । सिद्धत्तणु परि पावियइ चित्तहं णिम्मलएण ॥ ८८ ॥ केवल मलपरिवजियउँ जहिं सो ठाइ अणाइ । तस उरि सवु जगु संचरइ परइ ण कोइ वि जाइ ॥ ८९ ।। १ द. अप्पु. २ क. दिण्णा चित्तु. ३ क. रहियउ. ४.क. खंडिया. ५ द. अत्थो. ६ क. तु?सि. ७ क. म सुणंति. ८ क. तिडकी; द. तिडिका. ९ क. सिंधुक्की. १० द. खणेण. ११ क. पर. १२ क. सीलहं कलपरि', १३ द. यइं. १४ क. कहिं.

अनुवाद
उसकी दृढ रेखा खींच लेना चाहिये, जैसा पढा तैसा
करना चाहिये, अथवा इधर उधर भटकना नहीं
चाहिये। ऐसा करने वाले के कर्म आपसे भय हो
जॉयगे।
व्याख्यान करते हुए बुद्धिमान् ने यदि आत्मा में चित्त
नहीं दिया तो मानो उसने अन्न के कणों से रहित
बहुतसा पयाल संग्रह किया।
हे पण्डितों में श्रेष्ठ पाण्डन! तूने कण को छोड़ तुष को
कूटा है। तूं ग्रंथ और उसके अर्थ में संतुष्ट है, किन्तु
परमार्थ को नहीं जानता । इसलिये तूं मूर्ख है।
जो शब्दाडम्बर का ही गर्व करते हैं वे कारण को नही
जानते। वे वंशविहीन डोम के समान दूसरों के हाथ
मलते हैं !
हे मूर्ख ! बहुत पढने से क्या ? ज्ञान-तिलिंग
(-अग्निकण ) को सीख जो प्रज्वलित होने पर पुण्य
और पाप को क्षणमात्र में जला डालती है
सभी कोई सिद्धत्व के लिये तड़फड़ाता है । पर सिद्धत्व
चित्त के निर्मल होने से ही मिल सकता है ।
जहां वह मल-परिवर्जित, अनादि, केवली स्थित है
उसी के उर में समस्त जगत् संचार करता है । उसके
परे कोई भी नहीं जा सकता।
.

२८ पाहुड-दोहा अप्पा अप्पि परिहियउ कहिं मि ण लग्गइ लेउ । सव्वु जि दोसु महंतु तहुँ जं पुणु होइ अछेउ ॥९० ॥ जोइय जोएं लइयेइण जइ धंधइ ण पडीसि । देहकुंडिल्ली परिखिवइ तुहुँ तेमइ अच्छेसि ॥ ९१ ॥ अरि मणकरह म रइ करहि इंदियविसयसुहेण । सुक्खु णिरंतर जेहिं ण वि मुञ्चहि ते वि खणेण ॥ ९२ ॥ तूसि म रूसि म कोहु करि कोहे णासइ धम्मु । धुम्मि ण िणरयगइ अह गउ माणुसजम्मु ॥ ९३ ।। हत्थ अहुदहं देवली वालहं णा हि पवेसु । संतु णिरंजणु तेहिं वसइ णिम्मल होइ गवेसु ॥ ९४ ।। अप्पापरहं ण मेलयउ मणु मोडिवि सहस त्ति । सो वढ जोइय किं करइ जासु ण ऐही सत्ति ।। ९५ ।। सो जोयउ जो जोगवइ णिम्मलि जोइय जोइ । जो पुणु इंदियवसि गयउ सो इह सायलोइ ॥ ९६ ॥ १ क लोउ. २ क. जु. ३ क. तहो. ४ क. लइण. ५ द. कुडल्ली. ६ क. मुक्खु. ७ क. धम्म पढें. ८ द. अटुट्ठ जु. ९ द. वालहि. १० द. सत्तु. ११ क तह. १२ क. तोडिवि. १३ क. पहा. १४ क. णिम्मणु भावइ जीउ. १५ क. सावइ.

अनुवाद
२९
९०
९१
९२
९३
जब आत्मा आत्मा में परिस्थित हो जाता है तब उसमें
कहीं कोई लेप (मल) नही लगता और उसके जो सब
महादोष होते हैं उनका पूर्णतः छेदन हो जाता है।
हे जोगी! जोग लेकर यदि तूं फिर धंधे में नहीं पड़ेगा
तो इस देहरूपी कुटिया का क्षय हो जायगा और
उसी प्रकार अक्षय हो जायगा! (या,तू जिस कुटिया में
रहता है उस देहरूपी कुटी का क्षय हो जायगा)।
रे भनरूपी करम, इन्द्रियविषयों के सुख से गति मत
कर । जिनसे निरन्तर सुख नहीं मिल सकता उन सब को
क्षणमात्र में छोड़।
न तोप कर, न रोष कर, न क्रोध कर । क्रोध से धर्म
का नाश होता है। धर्म नष्ट होने से नरकगति होती
। इस प्रकार मनुष्य-जन्म ही गया।
हाथ से अधिष्ठित (?) जो छोटासा देवालय है वहां
वाल का भी प्रवेश नहीं हो सकता । संत निरंजन वहीं
वसता है । निर्मल होकर हूंढ ।
मन को सहसा मोड लेने से आत्मा और पर का मेल
नहीं हो सकता। किन्तु वह मूर्ख जोगिया क्या करे
जिसकी इतनी शक्ति ही नही है ?
वही जोग है जो जोगी निर्मल ज्योति को जोहले
(देखले)। किन्तु जो इन्द्रियों के वश में गया वह यहीं
श्रावक लोक में है।
९६

पाहुड-दोहा बहुयइं पढियई मूढ पर तालू सुक्कइ जेण । एकु जि अक्खरु तं पढहु सिवपुरि गम्मइ जेण ॥ ९७ ॥ अन्तो णस्थि सुईणं कालो थोओ वयं च दुम्मेहा । तं णवर सिक्खियध्वं जिं जरमरणक्खयं कुणहि ॥ ९८ ।। णिलक्खणु इत्थीबाहिरउ अकुलीणउ महु मणि ठियउ । तसु काराणि आणी माहू जैण गवंगउ संठियउ ॥ १९ ॥ ह सगुणी पिउ णिग्गुणउ णिल्लक्खणु णीसंगु । एकहिं अंगि वसंतयहं मिलिउ ण अंगहि अंगु ॥ १०० ॥ सव्याहिं रायहिं छहरसहिं पंचहिं सर्वहिं चित्तु । जासु ण रंजिउ भुवणयंलि सो जोइय करि मित्तु ॥१०१ ॥ तब तणु मि सरीरयहं संगु करि हिउ जाहं । ताहं वि मरणदवैकडिय दुसही होइ णराहं ॥ १०२ ॥ देह गलंतहं सत्रु गलइ मइ मुइ धारण धेउ । तहिं तेहइं वह अवसरहिं विरला सुमरहिं देउ ॥ १०३ ॥ १ क. भरणं. २ द. थीमाई(?). ३ क. तेण. ४ क. रूपहिं. ५ द.णिरंजिउ. ६ क. भुवणयलु. ७ क. दयककडिय ८ क. दुसही. ९ क. हल्लोहलई.

अनुवाद
३१
९७
बहुत पढा जिससे तालू सूख गया पर मूर्ख ही रहा ।
उस एक ही अक्षर को पढ जिससे शिवपुरी का गमन
हो।
.
श्रुतियों का अन्त नहीं है, काल थोडा भऔर हम
दुर्बुद्धि है । इसलिये केवल वही सीखना चाहिये जिससे
तूं जरा-मरण का क्षय कर सके।
में वसा
मैं
निर्लक्षण, स्त्री-बहिष्कृत और अकुलीन मेरे मन में
है। उसके कारण माहुर लाई गयी जिससे इन्द्रियाङ्ग
को सुशोभित किया।
१०० सगुण हूं और प्रिय निर्गुण, निर्लक्षण और निःसंग
है । एकही अंग रूपी अंक अर्थात् कोठे में वसने पर भी
अंग से अंग नही मिल पाया।
१०१ जिसका चित्त सब रागों में, छह रसों में व पांच रूपों
में भुवनतल में रक्त नहीं है, हे जोगी, उसे अपना मित्र
बना।
१०२ जिनका तप थोडा भी शरीर का संग करके स्थित है
( अर्थात् जो तपस्या करते हुए भी थोड़ा बहुत शरीर
का मोह रखते है) उन नरों को भी मरण की छोटीसी
आग दुस्सह होती है।
१०३ जिनकी देह गलती है उनकी मति, श्रुति, धारण, ध्येय
सब गल जाता है। तब उस अवसर पर, हे मूर्ख! विरले
ही देव का स्मरण करते हैं।

३२ पाहुड-दोहा उम्मणि थका जामु मणु भग्गा भूवहिं चारु । जिम भावइ तिम संचरउ ण वि भउ ण वि संसारु ॥१०४॥ जीव वहति णरयगई अभयपदाणे सग्गु । वे पह जब लो दरिसियई जहिं भावइ तहिं लग्गु ॥१०५॥ सुक्खअडा दुइ दिवहडइं पुणु दुक्खहं परिवाडि । हियडा हउँ पई सिक्खवामि चित्त करिजहि वाडि ॥१०६॥ मूढा देह में रजियइ देह ण अप्पा होइ । देहँह भिण्णउ णाणमउ सो तुहुँ अप्पा जोइ ॥ १०७ ॥ जेहा पाणहं झुपडा तेहा पुत्तिए काउ । तित्थु जि णिवसइ पाणिवइ तहिं करि जोइय भाउ ॥१०८॥ मूलु छडि जो डाल चडि कंह तह जोयाभासि । चीरु ण वुणणहं जाइ वह विणु उट्टियई कपासि ॥१०९।। सव्ववियप्पैहं तुट्टहं चेयणभावैगयाहं । कीलइ अप्पु परेण सिहु णिम्मलझाणठियाहं ॥११०॥ १ द. गउ. २ क. ले. ३ द. दरिसियड. ४ क. द. सुझ्खडा. ५ क. न. ६ द. रञ्चियइ. ७ क. देहें. ८ क.जे. ९ क. कालहं जोयामासि. १० क. अडिया. ११ क. 'प्पई तुट्टाहं. १२ क. भाउ. १३ क. णिम्मलु.

अनुवाद
३३
१०४ जिसका सुन्दर मन भौतिक पदार्थों से भागकर मन के
परे (आत्मा में स्थिर हो गया वह फिर जैसा भावे
तैसा संचार कर सकता है। उसे फिर न भय है न
संसार।
१०५ जीवों के वध से नरकगति होती है और अभयप्रदान
से स्वर्ग। ये दो पथ जाने के लिये बतला दिये गये हैं।
जहां भावे तहां लग जा।
१०६ सुख दो दिन के हैं, फिर दुःखों की परिपाटी । हे हृदय,
मैं तुझे सिखाता हूं । वाट (सच्चे मार्ग) पर चित्त दे।
१०७ हे मूढ ! देह में रंजायमान मत हो। देह आत्मा नही है ।
देह से भिन्न जो ज्ञानमय है उस आत्मा को तूं देख।
१०८ जैसा प्राणों का झोंपड़ा तैसा, अहो, यह काय है।
उसमें प्राणिपति निवास करता है। हे जोगी! उसी में
भाव कर।
१०९ मूल को छोड़कर जो डाल पर चढता है उसको जोग
अभ्यास कहां? हे मूर्ख ! विना औटे हुए कपास के
चीर नही बुना जाता।
११० जिनके सब विकल्प छूट गये हैं, जो चेतन भाव में गये
हैं, और निर्मल ध्यान में स्थित हैं उनका आत्मा पर के
साथ खेलता है।

३ पाहुड-दोहा ne अजु जिणिजइ करहुलउ लइ पइं देविणुं लक्षु । जित्थु चडेविणु परममुणि सव्व गयागय मोक्खं ॥ १११ ।। करहा चैरि जिणगुणथलिहिं तव विल्लडिय पगाम । विसमी भवसंसारगइ उल्लरियहि ण जाम ॥ ११२ ॥ तब दावणु वय भियमंडा समदम कियउ पलाणु । संजमघरहं उमाहियउ गउ करहा णिव्याणु ॥ ११३ ।। एक ण जाणहि वडिय अवरु ण पुच्छहि कोई । अवियद्दई डुंगरहं पर भंजंता जोइ ॥ ११४ ॥ वट्ट जु छोडि वि मउलियउ सो तरुवरु अकयत्थु । रीणा पहिय ण वीसमिय फलहिण लायउ हत्थु ॥११५॥ छहदसणधंधइ पडिय मणहं ण फिट्टिये भति । एकु देउ छह भेउ किउ तेण ण मोक्खेंहं जंति ॥ ११६ ।। अप्पा मिल्लिवि एकु पर अण्णु ण वइरिउ कोइ । जेणे विणिम्मिय कम्मडा जइ पर फेडइ सोइ ॥ ११७॥ १ क. जि णजइ. २ क. दिव्बउ. ३ क. क. दिव्बउ. ३ क. मुक्खु. ४ द. बडि. ५ क. वय णिल्लडइ. ६ क. घर. ७ द. उम्मा'.८ द. को वि.९ क. अकियत्थु. १० क. फलिहिं. ११ क. फिट्टय. १२ क. 'हो. १३ द. जेण वि अजिय दुक्खडा.

अनुवाद
१११ शीघ्र लक्ष्य देकर आज तुझे उस करभ को जीतना
चाहिये जिसपर चढकर परम मुनि सब गमनागमन से
मुक्त हो जाते हैं।
११२ हे करभ! जद तक तूं विषम भवसंसार की गति का
उच्छेदन न कर डाले तव तक जिनगुण रूपी स्थली में
चर। तेरा पैगाम छोड़ दिया है।
११३ तप का दामन (वधन), व्रत का...(?) तथा शम और
दम का पल्याण बनाया। इस प्रकार संयमरूपी गृह से
उन्माथी हुआ करहा (काम) निर्वाण को गया।
११४ एक तो तूं स्वयं मार्ग नहीं जानता और दूसरे किसी से
पूछता भी नही है। । इस प्रकार के) मनुष्यों को अटवी
अटवी और पहाड़ों पर भटकते हुए देख !
११५ जो पत्र छोड़कर मौग है वह तरुवर अकृतार्थ है। थके
हुए पैथिकों को वहां विश्राम नहीं मिलता और फलों
को भी कोई हाथ नहीं लगाता। (अर्थात् यदि धनी
पुरुप
में परोपकार बुद्धि न रही और उससे दुःखियों
का उपकार न हुआ तो उस धन से क्या लाभ?)
११६ पट्दर्शन के धंधे में पड़कर मन की भ्रान्ति न मिटी।
एक देव के छह भेद किये इससे वे मोक्ष नहीं जाते।
( अर्थात् पट्दर्शन का लक्ष्य एक ही है। उनमें जो
विरोध मानता है वह भ्रान्ति में है, इससे उसका
कल्याण नही हो सकता।)
११७ हे आत्मन् ! एक पर को छोड़कर अन्य कोई वैरी नहीं
है। जिसने कर्मों का निर्माण किया है उस पर को जो
मिटा दे वही यति है।

पाहुड-दोहा जइ वारउं तो तहिं जि पर अप्पहं मणु ण धरेइ । विसयह कारणि जीवडउ गरयहं दुक्ख सहेइ ॥ ११८ ।। जीव म जाणहि अप्पणा विसया होसहिं मज्झु । फल किं पाकहि जेम तिम दुक्ख करेसहिं तुज्झु ॥ ११९ ॥ विसया सेवहि जीव तुडं दुक्खहं सांहिक एण । तेण णिरारिउ पजलइ हुववहु जेम घिएण ॥ १२० ।। असरीरहं संधाणु किउ सो धाणुकु णिरुत्तु । सिवतत्तिं जिं संधियउ सो अच्छइ णिचिंतु ॥ १२१ ।। हलि सहि काइं करइ सो दप्पणु । जहिं पडिविषु ण दीसइ अप्पणु ॥ धंधेवालु मो जगु पडिहासइ । धरि अच्छंतु ण घरवइ दीसइ ।। १२२ ।। जसु जीवंतहं मणु मुवउ पंचेंदियहं समाणु । सो जाणिज्जइ मोकलउ लद्धड पहु णिव्याणु ॥ १२३ ॥ किं किज्जइ बहु अक्खरहं जे कालि खउ जति । जेम अणक्खरु संतु मुणि तव वढं मोक्खु कहति ॥१२४॥ १ क. अन्नहि. २ क. साहेक. ३ द.जं. ४ द. पडिविवि. ५ द. धंधइवालु. ६ क. घर. ७ क. न वि. ८ क

अनुवाद
३७
११८ यद्यपि मैं रोकता हूं तो भी वह पर ही पर जाता है,
मन को आत्मा में धारण नहीं करता। विषयों के
कारण जीव नरकों के दुख सहता है ।
११९ हे जीव ! अपने से ऐसा मत जान कि ये विषय मेरे
होवेंगे। ऐसे फल क्यों पकाता है जिससे पे तुझे दुख
पहुँचावें।
१२० हे जीव ! तँ विषयों का सेवन करता है किन्तु वे दुख
के साधक हैं । इसीलिर: तूं वहुत जलता है, जैसे घृत
से अग्नि प्रज्वलित होती है।
१२१ जिसने अशरीरी (सिद्धात्मा) का सन्धान किया वही
सच्चा धनुर्धारी है। जो शिव की तत्परता में संलग्न है
यह निश्चिन्त रहता है। (अर्थात् अपने आत्मा को
लक्ष्य बनाकर उसी में तल्लीन रहना ही सच्चा कौशल
है)।
१२२ हे सखी ! भला उस दर्पण का क्या करना जहां अपना
प्रतिबिंव न दिखे ? मुझे यह जगत् लजावान् भासता
है । घर में रहते हुए भी गृहपति का दर्शन नहीं होता।
१२३ जिसका जीते जी पंचेन्द्रियों सहित मन मर गया उस
को मुक्त जानना चाहिये । उसने निर्वाण-पथ को पा
लिया।
१२४ वहुत से अक्षरों का क्या करना जो
कुछ समय
में
क्षय को प्राप्त हो जाते हैं। जिससे मुनि अनक्षर
( अक्षय ) हो जावे उसे, हे मूर्ख ! मोक्ष कहते हैं।

३८ पाहुड-दोहा छहदंसणगंथिं बहुल अवरुप्परु गर्जति । जं कारणं तं इकु पर विवरेरा जाणंति ॥ १२५ ॥ सिद्धतपुराणहिं वेय वह बुझंतहं णउ भंति । आणंदेण वं जाम गउ ता वढ सिद्ध कहति ॥ १२६ ॥ सिवसत्तिहिं मेलावडा इहुँ पसुवाहमि होइ । भिणिय सत्ति सिवेण सिहुँ विरला बुज्झइ कोइ ॥१२७॥ भिण्णउ जेहिं ण जाणियउ णियदहहं परमत्थु । सो अंधउ अवरहं अंधयहं किम दरिसावइ पंथु ।। १२८ ॥ जोइय भिण्णउ झाय तुहुं देहहं ते अप्पाणु । जइ देहु वि अपउ मुणहि ण वि पावहि णिव्याणु ॥१२०॥ छत्तु वि पाइ सुगुरुवडा सयलकालसंतावि । णियदेहडइ वसंतयहं पाहण वाडि वहाइ ॥ १३० ॥ मा मुट्टा पसु गरुबडा सयल कॉल झंखाइ । णियदेहहं मि वसंतयहं सुण्णा म. सेवाइ ॥ १३१ ॥ १ द. कारणि. २ क. पुराणहं. ३ क. विजाण. ४ क. सिद्धि. ५ क. यहु. ६ क. सह. ७ द. झाइ. ८ द. अप्पु वि. ९ द. 'कला'. २० के. मडु.

अनुवाद
३९
१२५ षट् दशन के ग्रंथ रूपी ग्रन्थि से वहुत से एक दूसरे पर ।
गरजते हैं। जो कारण है वह एक पर ही है, किन्तु लोग
विपरीत समझते हैं।
१२६ सिद्धान्त, पुराण और वेद जानने वालों के जव भ्रान्ति "
न रहे और जव उनका आनन्द से गमन हो जाय तव, हे
मूर्ख ! वे सिद्ध कहलाते हैं।
१२७ यह शिव और शक्ति का मेल पशु-वध में होता है।
शक्ति शिव से भिन्न है यह कोई विरला ही समझता है।
१२८ जिसने अपनी देह से परमार्थ को भिन्न नहीं जाना वह
अंधा दूसरे अंधों को कैसे मार्ग दिखा सकता है ?
१२९ हे जोगी! तूं अपने आत्मा का देह से भिन्न ध्यान कर।
यदि देह को भी आत्मा मानेगा तो निर्वाण नही पा
सकता।
१३० बड़ा भारी छत्र पाकर भी सव काल में संताप पाता
है। अपनी देह में वसने पर भी वाड़े में पापाण
ढुलवाता है । ( अर्थात् छत्रधारी नरेश होकर के भी,
लोभ और मोह के वश, जीव दुखी होता है। आत्मा
का वास तो देह में है पर रहने के लिये पापाणों के
महल वनवाता है, यह सब मोहजाल है)।
१३१ सदैव मोटे और बड़े पशुओं को मतसंताप पहुंचा ।अपनी
देह में वसने पर भी सूने मठ में वसने जाता है । (अर्थात्
पशुओं का बलिदान देने में कल्याण नहीं है और न सूने
मठों में रहने से । कल्याण आत्मानुभव में ही है)।

४० पाहुड-दोहा रायवयल्लहिं छहरसहिं पंचहिं रूवहिं चित्तु । जासु ण रंजिउ भुवर्णयालि सो जोइय करि मित्तु ॥ १३२ ॥ तोडिवि सयल वियप्पडा अप्पहं मणु वि धरेहि । सोक्खु णिरंतरु तहिं लहहि लहु संसारु तरेहि ॥ १३३ ।। अरि जिय जिणवरि मणु ठवहि विसयकसाय चएहि । सिद्धिमहापुरि पइसरहि दुक्खहं पाणिउ देहि ॥ १३४ ॥ मुंडियमुंडिय मुडिया । सिरु मुंडिउ चितु ण मुंडिया । चित्तहं मुंडणु जिं कियउ । संसारहं खंडणुतिं कियउ ।। १३५॥ अप्पु करिअँइ काई तसु जो अच्छइ संव्वंगओ संतें । पुण्णविसज्जणु काई तसु जो हलि इच्छइ परमत्थें ।। १३६ ।। गमणागमणविवजियउ जो तइलोयपहाणु । गंगइ गरुवइ देउ किउ सो मण्णाणु अयाणु ॥ १३७ ॥ पुण्णेण होइ विहओ विहवेण मओ मएण मंइमोहो । मंइमोहेण य णरयं तं पुण्णं अम्ह मा होउ ॥ १३८ ।। १ क. भुवणयलु. २ क. सुक्खु. ३द. तें. ४ क. कहिजइ. ५ क. सव्वंगउ संठिउ. ६ क. गुरु. ७ क. सोसें भाणु सयाणु. ८क. मय.

अनुनाद
४१
१३२ राग के कलकल से, छह रसों से व पांच रूपों से
जिसका चित्त भुवनतल में रक्त न हुआ, हे जोगी !
उसको मित्र वना।
१३३ समस्त विकल्पों को तोड़कर आत्मा म मन को धारण
कर । वहीं तुझे निरन्तर सुख मिलेगा और तूं शीघ्र
संसार को तर जायगा।
१३४ रे जीव : जिनवर में मन को स्थिर कर, विषय कपाय
को छोड़, सिद्धि महापुरी में प्रवेश कर और दुखों को
पानी ( जलाअलि ) दे।
१३५ हे मूंड़ मुड़ाने वालों में श्रेष्ठ मुंडा! तुने सिर तो
मुंडाया पर चित्त को न मोड़ा। जिसने चित्त का
मुण्डन कर डाला उसने संसार का खण्डन कर डाला।
१३६ आत्मा उसका क्या करेगा जो सर्वांग में सुस्थित
रहता है ? जो भला परमार्थ की इच्छा करता है उसका
पुण्य-विसर्जन क्या?
१३७ जो गमनागमन से विवर्जित है, त्रैलोक्य में प्रधान है
( वह भी देव है) तथा बड़ी गंगा में भी (लोक ने )
देव माना है । वह सद्ज्ञान
१३८ पुण्य से विभव होता है, विभव से मद, मद से मति
मोह और मतिमोह से नरक । ऐसा पुण्य मुझे न हो ।
और अज्ञान
है

४२ पाहुड-दोहा कासु समाहि करडं को अंचउं । छोपु अछोपु भणिधि को वंचउं ॥ हेल सहि कलह केण सम्माण । जहिं जहिं जोवउं तहिं अप्पाणउ ॥ १३२ ॥ जंइ मणि कोहु करिवि कलहीजइ । तो अहिसेउ णिरंजणुं कीजइ ।। जहिं जहिं जोयउ तहिं णउ को विउ । हेउं ण वि कासु वि मज्झु वि को विउ ॥ १४० ।। णमिओ सि ताम जिणवर जाम ण मुणिओ सि देहमज्झम्मि । जइ मुणिउ देहमॉम्मि ता केण णवजए कस्स ॥ १४१ ।। तो संकप्पवियप्पा कम्मं अकुणंतु मुंहासुहाजणयं । अप्पसरूवासिद्धी जाम ण हियए परि फुग्इ ॥ १४२ ।। गहिलउ गहिलउ जणु भणइ गहिलउ मं करि खोहु । सिद्धिमहापुरि पइसाईं उप्पाडेविणु मोहु ॥ १४३ ॥ १ क. में यह पंक्ति नहीं है. २ द. जं. ३ क. णिरंजण. ४ क. मुणसि. ५ क. मज्झं को नवइ नविजए कस्स. ६ द. में यह दोहा नहीं है. ७ क. सुहसुहजणयं । ८ क. हो.

अनुवाद
४३
१३९ किसकी समाधि करूँ ? किसे पू ? स्पृश्य-अस्पृश्य .
कहकर किसे छोड़ दूं? भला, किस के साथ कलह
ठानूँ ? जहाँ जहाँ देखता हूँ तहाँ तहाँ अपनी ही आत्मा
तो दिखाई देती है।
१४० यदि मन में क्रोध कर के कलह करना है तो निरञ्जन
अभिषेक करना चाहिये । जहां जहां देखा वहां कोई
नही मिला । न में किसी का हूं, न मेरा कोई है।
(अर्थात् यदि मन में राग-द्वेप की भावनाएं उठे तो
उन्ह ठण्डी करना चाहिये और यह भावना दृढ
करना चाहिये कि सच्चा आत्मा का संवन्ध आत्मा से
ही है, अन्य किसी वस्तु से नही)।
१४१ हे जिनवर ! तव तक तुझे नमस्कार किया जब तक
अपनी देह के भीतर ही तुझे न जाना। यदि देह के
भीतर ही तुझे जान लिया तब फिर कौन किसको
नमन कर?
१४२ शुभ और अशुभ उत्पन्न करने वाले कर्म न करते हुए
भी संकल्प और विकल्प तव तक रहते हैं जव तक हृदय
में आत्मस्वरूप की सिद्धि स्फुरायमान न होजावे ।
१४३ हटीला हठीला, लोग कहते हैं। हे हठी, क्षोभ मत कर।
तूं मोह को उपाड़ कर सिद्धिमहापुरी में प्रवेश कर ।
( अर्थात् लोगों के बुरा भला कहने से बुरा न मान कर
मोह जीतना चाहिये, इसी में कल्याण है)।

४४ पाहुड-दोहा अवधउ अक्खरु जं उप्पजइ । अणु वि किं पि अण्णाउ ण किजइ ॥ आयई चित्ति लिहि मणु धारिवि । सोउ णिचिंतिउ पाय पसारिवि ॥ १४४ ॥ किं बहुएं अडवड वडिण देह म अप्पा होइ । देहहं भिण्णउ णाणमउ सो तुहुँ अप्पा जोइ ॥ १४५ ॥ पोत्था पहणि मोक्खु कहं मणु वि असुद्धउ जामु । बहुयारउ लुद्धउ णवइ मूलटिड हरिणांसु ।। १४६ ।। दयाविहीण धम्मडा णाणिय कह वि ण जोइ बहुएं सलिलविरोलियई करु चोप्पडा ण होइ ॥ १४७ ।। भल्लाण वि णासंति गुण जहिं सहु संगु खलेहिं । वइमाणरु लोहहं मिलिउ पिट्टिलइ सुघणेहिं ॥ १४८ ॥ हुर्यवहि णाइ ण सकियउ धवलत्तणु संखस्सा । फिट्टीसइ मा भंति करि डु मिलिया खेयरस्म ।। १४९ ।। संखसमुद्दहिं मुकियए एट्टी होइ अवन्थ । जो दुव्याहहं चुबिया लाएविणु गलि हत्थ ॥ १५० ॥ १ क. मणि. २ द. पाउ. ३ क. में यह पूरी पनि भिन्न है जो स्याही उड़ जाने से स्सर नहीं पड़ी जानी-करि मणज अविचल टिएण ह... बेहि '।४ क. हरिणाह. ५ क. विहणड. ६ क. कहिं मि. ७ के. भल्लाह मि. ८ द. हुई'. १. क. सकिया. १० द. हु पर स्स.

अनुवाद
४५
१४४ अवध (अहिंसा ) शब्द ( का भाव ) उत्पन्न करना
चाहिये और थोड़ा भी कोई अन्याय नही करना
चाहिये। ये ( वाते ) मन लगाकर अपने चित्त में लिख
लो और लेश्वित पाँव पसार कर सोओ।
१४५ बहुत अटपट बड़बडाने से क्या ? देह आत्मा नही है।
देह से भिन्न जो ज्ञानमय है, हे जोगी, वही आत्मा
१४६ जिसका मन ही अशुद्ध है उसे पाथा पढने से मोक्ष
कहाँ ? वध करने वाला लुब्धक (शिकारी ) भी नीचे
खड़ा होकर हरिण के सामने नमता है । ( अर्थात् फल
क्रिया के ऊपर नहीं किन्तु भाव के ऊपर निर्भर है)।
१४७ हे ज्ञानी जोगी! च्या से विहीन धर्म किसी प्रकार नहीं
हो सकता । वहुतसा पानी विलोडने से हाथ चिकना
नहीं हो सकता।
१४८ जहां खलों का संग हुआ वहां भले पुरुषों के भी गुण
नष्ट हो जाते हैं। लोहे से मिलकर अग्निदेव भी बड़े
बड़े घनों से पीटे जाते हैं
१४९. शंख की सफदी का आग्न में संस्कार न हुआ हो ऐसा
नहीं है। तो भी यदि वह खैर से मिल गया तो बदल
जायगा। इसमें भान्ति मत कर। ( अर्थात् सुशिक्षित
पुरुषां पर भी दुस्संगति का प्रभाव पड़े विना नही
रहता)।
१५० शंख की समुग्दक ( पेटिका ) में पड़ी मुक्ता की ऐसी
अवस्था होती है कि वह धीवरों द्वारा गल हाथ में
लेकर बाहर निकाली जाती है। [भिष्टार्थ यह भी है
कि शंख के आकार वाले अंग के कारण वाराङ्गना की
यह अवस्था होती है कि वह नग्न पुरुषों द्वारा गले में
हाथ डाल कर चूंवी जाती है।]

४६ पाहुड-दोहा छंडेविणु गुणरयणणिहि अग्घथडिहिं घिप्पंति । तहिं संखाहं विहाणु पर फुकिजंति ण भंति ॥ १५१ ।। महुयर सुरतरुमंजरिहिं परिमलु रेसिवि हयास । हियडा फुट्टिवि कि ण मुयउ ढंढोलंतु पलास ॥ १५२ ॥ मुंडु मुंडाइवि सिक्ख धरि धम्नहं बद्धी आस । णवरि कुटुंबउ मेलियंउ छुडु मिल्यिा परास ।। १५३ ॥ णग्गत्तणि जे गधिया विग्गुत्ता ण गणंति । गंथहं बाहिरभिंतरिहिं एक इ ते ण मुयंति ॥ १५४ ।। अम्मिय इहु मणु हत्थिया विंझह जंतउ वारि । तं भंजेसइ सीलवणु पुणु पडिसइ संसारि ॥१५५ ।। जे पहिया जे पंडिया जाहिं मि माणु मरहु । ते महिलाण हि पिडि पडिय भमियई जेम घरटु ॥११६ ।। विद्धा वम्मा मुट्टिईण फुसिवि लिहिहि तुहूं ताम । जह संखहं जीहालु सिवि सड्डुच्छलइ ण जाम ॥ १५७ ॥ १ द. फुट्टिजति भवंति. २ द. रसवि. ३ क. मुवउ. ४ द.लंत उ.५ क. मिल्लियउ. ६. मिलिया हु परम्स. ७ क. विगुत्ता. ८ क. इक. २ क. महिलाहहं. १० क. भमियहिं. ११ क. सिद्धा. १२ क. मुट्ठइण.

अनुवाद
४७
१५१ गुणों के रत्नाकर (समुद्र) को छोड़कर विक्री की
वस्तुओं के ढेर में फेंके जाते हैं, और फिर वहां शंखों
का क्या विधान होता है? वे फूंके जाते हैं, इसमें भ्रान्ति
नहीं। (अर्थात् जो सत्संगति छोड़ देते हैं उनकी बडी
दुर्गति होती है)।
१५२ हे हताश मधुकर! कल्पवृक्ष की मञ्जरी के परिमल का
रस लेकर अव पलाश पर भ्रमता फिरता है। तेरा
हृदय क्यों न फट गया और तूं मर क्यों न गया?
१५३ मूंड मुँडाकर शिक्षा ली और धर्म की आशा बढी।
किन्तु कुटुम्ब का त्याग तभी (सार्थक ) है जो पराई
आशा छोड़ दी।
१५३ जो नग्नत्व (दिगम्बरत्व ) का गर्व करते हैं और विगुप्त
( वस्त्रधारियों) को कुछ नही गिनते वे वाह्य और
अभ्यंतर परिग्रहों में से एक का भी त्याग नहीं करते।
(अर्थात् अपने वेप का गर्व करना और दूसरों के वेष
को हीन गिनना सच्चे त्याग का लक्षण नही है)।
९५५ अहो! इस मन रूपी हाथी को विंध्य (पर्वत ) की ओर
जाने से रोको। वह शील रूपी वन को भंग कर देगा
और फिर संसार में पड़ेगा।
१५६ जो पढे लिखे हैं, जो पंडित हैं, जिनके मान-मर्यादा है,
वे भी महिलाओं के पिंड में पड़ कर चक्की के पाट के
समान चक्कर काटते हैं।
१५७ मुष्टि द्वारा भेदे हुए वर्म ( मर्म ) को तव तक स्पर्श
करके चाट ले जब तक शंख में की जिह्वालोलुपी सीप
के सदृश शिथिल न हो जाय । (?)

४८ पाहुड-दोहा पत्तिय तोडेहि तडतडह णाई पइट्टा उछ । एव ण जाणहि मोहिया को तोडइ को तु? ॥ १५८ ।। पत्तिय पाणिउ दव्भ तिल सव्वई जाणि सवण्णु । जं पुणु मोक्खंहं जाइवउ तं कारणु कु इ अण्णु ॥ १५९ ॥ पत्तिय तोडि म जोइया फलहिं जि हत्थु म वहि । जसु कारणि तोडेहि तुहूं सो सिउ एत्थु चैहाहि ॥ १६० ।। देवलि पाहणु तित्थिं जलु पुत्थई सव्वई कर्बु । वत्थु जु दीसइ कुमुमियउ इंधणु होसइ सर्बु ॥ १६१ ॥ तित्थई तित्थ भमंतयहं कि ण्णेहाँ फल हृव । बाहिरु सुद्धउ पाणियह अभितरु किम इव ॥ १६२ ।। तित्थई तित्थें भमेहि वढ धोयउ चम्मु जलेण । एहु मणु किम धोएसि तुटुं मइलउ पावमलेण ॥ १६३ ।। जोइय हियडइ जासु ण वि इक्कु ण णिवसइ देउ । जम्मणमरणविवाजियउ किमै पावइ परलोउ ।। १६४ ।। १ द. तोडि तडतडइ. २ क. मुक्खहं. ३ क. ताडेसि. ४ द. चहावि. ५ द. तित्थ. ६ क. काउ. ६ क. सब्बु वि. ८ क. काउ. ९ द.णेहउ. १० क. तित्थई भमहि वढ. ११ क. सो.

अनुवाद
४९
१५८ तूं तडातड़ पत्तियाँ तोड़ता है मानों ऊंट का प्रवेश हुआ
हो । मोह में वशीभूत होकर तूं यह नही जानता कि
कौन तोड़ता है और कौन टूटता है। ( अर्थात् वनस्पति
में भी वही आत्मा है जो मनुष्य में है, इसलिये वृक्षों
को भी व्यर्थ नही सताना चाहिये।)
१५९ पत्ती, पानी, दर्भ, तिल, इन सब को अपने समान ही
जान ! फिर यदि मोक्ष को जाना है तो उसका कारण
कोई अन्य ही है। (अर्थात् उक्त वस्तुओं को देव को
चढाने से मुक्ति नहीं मिलती। मोक्ष का उपाय तो
आत्मध्यान ही है।)
१६० हे जोगी! पत्ती मत तोड़ और फलों पर भी हाथ मत
बढा । जिसके कारण से तूं इन्हें तोडता है उसी शिव
को यहां चढा दे।
१६१ देवालय में पाषाण है, तीर्थ में जल और सव पोथियों में
काव्य हैं। जो वस्तु फूली फली दिखती है वह सब
इंधन हो जायगी। (अर्थात् उक्त सब वस्तुएं नश्वर हैं,
उनके द्वारा आत्मकल्याण नही हो सकता।)
१६२ एक तीर्थ से दुसरे तीर्थ का भ्रमण करनेवालों को कुछ
फल न हुआ। बाहर तो पानी से शुद्ध होगया पर
अभ्यंतर का क्या हाल हुआ ?
१६३ हे मूर्ख! तूं ने तीर्थ से तीर्थ भ्रमण किया और अपने
चमड़े को जल से धो लिया। पर तूं इस मन को, जो
पापरूपी मल स मैला है, किस प्रकार धोयगा?
१६४ हे जोगी! जिसके हृदय में एक जन्म-मरण से विवर्जित
देव निवास नही करता वह परलोक को कैसे पा
सकता है?
१

५० पाहुड-दोहा एक्कु सुवेयइ अण्णु ण वेयइ । तासु चरिउ गउ जाणेहिं देव इ ।। जो अणुहवइ सो जि परियाणइ । पुच्छंतहं समित्ति को आणइ ॥ १६५ ।। जं लिहिउ ण पुच्छिउ कह व जाइ । कहियउ कासु वि णउ चित्ति ठाइ । अह गुरुउवएसें चित्ति ठाइ । तं तेम धरतिहिं कहिं मि ठाइ ॥ १६६ ॥ कड़इ सरिजलु जलहि विपिल्लिउ । जाणू पवाणु पवणपडिपिल्लिउ ।। बोहु विवोहु तेम संर्घट्टइ । अवर हि उत्तउ ता [ पयइ ॥ १६७ ॥ अंबरि विविहु सदु जो सुम्मइ । तहिं पइसरहुँ ण वुच्चइ दुम्मइ ॥ मणु पंचहिं सि? अथवण जाइ । मूढा परमतत्तु फुड तहिं जि ठाइ ॥ १६८ ॥ १ क. जाणइ. २ क. में आगे के तीन चरण नहीं ३ द. जाण. ४ क. संवदृइ. ५ क. ण. ६ क. सिउ. ७ क अंथवणह.

अनुवाद
१६५ एक अच्छी तरह जानता है, दूसरा कुछ नही जानता।
उसका चरित्र देव भी नहीं जानते।जो अनुभव करता है
वही पूर्ण रूप से जान पाता है। पूछने वालों की संतृप्ति
कौन लावे ? (अर्थात् आत्मा का सच्चा शान स्वानुभव
से ही हो सकता है, परोक्ष साधनों से नहीं।)
१६१ जो किसी प्रकार लिखा व पूछा नहीं जाता, जो कहने
से किसी के चित्त में नहीं ठहरता, वह गुरु के उपदेश
से ही चित्त में ठहरता है। इस प्रकार धारण करने
वालों में वह कहीं भी स्थित है। (अर्थात् जब गुरु के
उपदेश से आत्मा का स्वरूप समझ
में आ जाता है तब
वह सर्वत्र दिखाई देने लगता है।)
१६७ नदी का जल जलधि द्वारा विरुद्ध दशा में प्रेरित होकर
खिंचता है,तथा बड़ा भारी जहाज पवन से प्रेरित होकर
(चलता है)। उसी प्रकार जब बोध और विबोध का
संघट्ट होता है तब दूसरी ही बात प्रवृत्त हो जाती है।
१६८ आकाश में जो विविध शब्द सुनाई पड़ता है, दुर्मति
उसके उत्तर में कुछ नहीं बोलता । जब मन पांचों
[ इन्द्रियों ] सहित अस्त हो जाता है, तब,
वह परमतत्व स्फुट रूप से वहीं स्थित रहता है।
हे मूढ,

५२ पाहुड-दोहा अखई णिरामइ परमगइ अन्ज वि लउ ण लहंति । भंग्गी मणहं ण भंतडी तिम दिवहडा गणंति ॥ १६९ ॥ सहजअवस्थहिं करहुलउ जोइय जंतउ वारि । अखंड णिरामइ पेसियर मई होसइ संहारि ॥१७० ॥ अखई णिरामइ परमगइ मणु घल्लेप्पिणु मिल्लि । तुट्टेसइ मा भति करि आवागमणहं वेल्लि ॥ १७१ ॥ एमइ अप्पा झाइयइ अविचलु चित्तु धरेवि । मिद्धिमहापुरि जाइयइ अझ वि कम्म हणेवि ॥ १७२ ।। अक्खरचडिया मसिमिलिया पाहंता गय खीण । एक ण जाणी परम कला काहिं उग्गउ कहिं लीण ।। १७३ ।। वे भंजेविणु एक्कु किउ मणहं ण चारिय विल्लि । तहि गुरुवहि हउं मिस्तिणी अण्णहि कामिण लल्लि ॥ १७४ ।। अग्गई पच्छई दहदिहहिं जहिं जोवर तहिं सोइ । ता महु फिट्टिय भंतेंडी असनु ण पुच्छइ कोइ ॥ १७५ ॥ १ द. अखय. २ द.भग्गा. ३ द. जाई. ४ क. मिलिया. ५ क. अवरखडी.

अनुवाद
५३
१६९ अक्षय, निरामय, परमगति में अभी तक लय को
प्राप्त नहीं होते और मन की भ्रान्ति मिटी नही ।
इसी प्रकार दिन गिनते हैं। ( अर्थात् आत्मा में लीन हुए
विना सच्चा आत्मकल्याण नही हो सकता।)
१७० हे जोगी। सहज अवस्था में जाते हुए इस करम
( ऊंट) को रोक। अक्षय, निरामय में प्रेपित होकर
वह स्वयं अपना संहार कर डालेगा। ( अर्थात् मन
जब आत्मा में लीन हो जाता है तव आपही उसकी
वृत्ति सर्वथा नष्ट हो जाती है।)
१७१ अक्षय, निरामय, परमगति में मन को फेंक कर छोड़ दे।
आवागमन की वेल टूट जायगी, इसमें भ्रान्ति मत कर।
१७ इस प्रकार चित्त को अविचल धारण करके आत्मा का
ध्यान किया जाता है, और आठों कमों का नाश करके
सिद्धि महापुरी को गमन किया जाता है।
१७३ अक्षरारूढ, स्याहीमिश्रित (ग्रंथों) को पढते पढ़ते
क्षीण होगये, किन्तु एक परम कला न जानी कि (यह
जीव ) कहां ऊगा और कहां लीन हुआ।
१७४ जिसने दो को मिटा कर एक कर दिया और मन की
वेल का चारण न होने दिया, उस गुरु की मैं शिष्यानी
हूँ, अन्य किसी की में लालसा नहीं करती।
१७५ आगे, पीछे, दशों दिशाओं में, जहां में देखता हूं तहां
यही है। अब मेरी भ्रान्ति मिट गई । अब अवश्य
किसी से पूछना नहीं है।
.

पाहुड-दोही जिम लोणु विलिजइ पाणियहं तिम जइ चित्तु विलिज । समरसि हूवइ जीवडा काई समाहि करिज ॥ १७६ ॥ जैइ इक्क हि पौवीसि पय अंकय कोडि करीसु । णं अंगुलि पय पयडणई जिम सव्वंग य सीसु (?) ॥१७७॥ तित्थई तित्थ भमंतयहं संताविजइ देहु । अप्पें अप्पा झाइयई णिव्याणं पर देहु ॥ १७८ ॥ जो पइं जोइडं जोइया तित्थई तित्थ भमेइ । सिउ पई सिहं हहिंडियउ लहिविण सकिउ तोइ ॥ १७९ ।। मूढा जोवइ देवलई लोयहिं जाई कियाई । देह ण पिच्छइ अप्पणिय जहिं सिउ संतु ठियाइं ।। १८० ।। वामिय किय अरु दाहिणिय मज्झई वहइ णिराम । तहिं गामडा जु जोगवइ अवर वसावइ गाम ॥ १८१ ।। देव तुहारी चिंत महु मज्मणपसरवियालि । तुहूं अच्छेमहि जाइ सुउ परइ णिरामइ पालि ॥ १८२ ॥ १ क. समरस हवउ. २ क. में दे हा नं. १७७ और १७८ का कम इससे विपरीत है, किन्तु स्याही उड़ जाने से अक्षर इतने अस्पष्ट होगये हैं कि पाठ संशोधन में उम प्रति से यहां कोई विशेष सहायता नहीं मिल सकी। ३ द. पावासि. ४ द. हंढियउ. ५ द. अच्छेसहु.

अनुवाद
१७६ जैसे लवण पानी में विलीन हो जाता है, तैसा यदि
चिन विलीन हो गया तो जीव समरस हो गया। और
समाधि में क्या किया जाता है ?
१७७ यदि एक ही पद को पा गया तो अकृत कौतुक
करूंगा। जैसे अंगुलि और पद प्रगट करने से अवश्य
सब अंग प्रगट हो जाते हैं। ( टिप्पणी देखो )।
१७८ एक तीर्थ से दूसरे तीर्थ को भ्रमण करने वालों की
केवल देह को संताप पहुंचता है। आत्मा में आत्मा
का ध्यान करके निर्वाण में पैर दो।
१७९ हे जोगी ! जिसे देखने के लिये तूं तीर्थों तीर्थ भ्रमण
करता फिरता है वह शिव भी तेरे साथ साथ घूमता
फिरा, तो भी तूं उसे न पा सका।
१८० मूर्ख उन देवालयों को तो देखता है जो लोगों के द्वारा
बनाये गये हैं, किन्तु अपनी देह नहीं देखता जहां संत
शिव स्थित है।
१८१ वायीं ओर ग्राम वसाये और दहिनी ओर, किन्तु मध्य
को सूना रक्खा । हे जोगी, वहां एक और ग्राम वसा।
१८२ हे देव ! मुझे तुम्हारी चिन्ता है । जब मध्याह्न के प्रसार
का अन्त हो जायगा तब तूं तो जाकर सो रहेगा और
पाली सूनी पड़ जायगी।

पाहुड-दोहा तुट्टइ बुद्धि तडत्ति जहिं मणु अथवणहं जाइ। सो सामिये उवएसु कहि अण्णहिं देवहिं काई ॥ १८३ ॥ सयलीकरणु ण जाणियउ पाणियंपण्णहं भेउ । अप्पापरहु ण मेलयउ गंगडु पुज्जइ देउ ॥ १८४ ॥ अप्पापरहं ण मेलंयउ आवागमणु ण भग्गु । तुस कंडंतहं कालु गउ तंदुलु हत्थि ण लग्गु ॥ १८५ ।। देहादेवलि सिउ वसइ तुहुं देवलई णिएहि । हासउ महु मणि अत्थि इहु सिद्ध भिक्ख भमेहि ॥ १८६ ॥ वणि देवलि तित्थई भमहि आयासो वि णियंतु । अम्मिय विहडिय भेडियां पसुलोगडा भमंतु ॥ १८७ ।। वे ठंडेविणु पंथडा विचे जाइ अलक्खु । तहो फल वेयहो कि पि णउ जइ सो पावइ लक्खु ॥ १८८ ।। जोइय विसमी जोयगइ मणु वारणहं ण जाइ । इंदियविसय जि सुक्खडा तित्थई वलि वलि जाइ ॥ १८९ ।। १ द. सामिउ. २ क. पाणिध. ३ द. मेलियउ. ४ क. अत्थि. ५ द. भेट्टिया. ६ क. तहु. ७ क. तित्थु जि. ८ द. विलि.

अनुवाद
५७
१८३ जिससे बुद्धि तड़ से टूट जाय और मन भी अस्त हो
जाय, हे स्वामी, ऐसा उपदेश कहिये । अन्य देवों से
क्या?
१८४ न सकलीकरण जाना, न पानी और पूर्ण का भेद, और
न आत्मा का और पर का मेल । शुद्र देव को
पूजता है।
मल
१८. न आत्मा और पर का
हुआ
और न आवागमन भंग
हुअा। तुप कूटते काल गया और एक तंदुल हाथ
,
१८६ देहरूपी देवालय म शिव निवास करता है, तूं देवालय
में हूँढता है । मेरे मन में यह हमी आती है कि तूं
सिद्ध से भीख मँगवाता है।
१८७ वन में, देवालय में, तीर्थों में भ्रमण किया और आकाश
में भी देखा। अहो, इस भ्रमण में भेड़िये और पशु
लोगों से भेंट हुई।
१८८ दोनों मार्गों को छोड़कर अलक्षण ( अभागी) बीच में
जाता है । उसे दोनों का कुछ फल नही मिलता जिससे
वह लक्ष्य को पा जावे।
१८९ हे जोगी ! जोग की गति विषम है। मन रोका नही
जाता । इन्द्रिय-विषयों के जो
सुख हैं उन्ही पर बलि
बलि जाता है। बलिदान होता है)।

पाहुड-दोहा बद्धउ तिहुवेणु परिभमइ मुक्कउ पर विण देइ । दिक्खु ण जोइय करहुलउ विवरेरउ पउ देइ ॥ १९ ॥ संतु ण दीसइ तत्तु ण वि संसारहिं भमंतु । खंधावौरिउ जिउ भमइ अवराडइहिं रहंतु ॥ १९१॥ उव्वस वसिया जो करइ वसिया करइ जु सुण्णु । बलि किजउ तसु जोइयहि जासुर्णे पाउ ण पुण्णु ॥१९२॥ कम्मु पुराइंउ जो खवइ अहिणव पेसु ण देइ । अणुदिणु झायइ देउ जिणु सो परमप्पउ होई ॥१९३॥ विसया सेवइ जो वि परूँ बहुला पाउ करेइ । गच्छइ णरयहं पाहुणउ कम्मु सहाउँ लएइ ॥१९४॥ कुहिएण पूरिएण य छिद्देण य खारमुत्तगंधेण । संताविजइ लोओ जह सुणहो चम्मखंडेण ॥१९५।। देखताहं वि मूढ वढ रमियई सुक्खु ण होइ । अम्मिए मुत्तहं छिर्दु लहु तो वि ण विणडइ कोई ॥१९६॥ १ क. तिहुयणु. २ क. जु. ३ द. खंधाया; क. संधावा. ४६. वि. ५ क. पुरायउ. ६ द. जोइ. ७ क. पर. ८ क. सहार. ९ द. छड़. १० क. को वि.

अनुवाद
१९० बंधा हुआ त्रिभुवन में परिभ्रमण करता है और मुक्त
हुआ पांव भी नहीं देता । हे जोगी! करभ को देखो न
विपरीत पांव देता है।
१९१ संसार में भ्रमण करते हुए न संत दिखता और न
तत्व । किन्तु जीव स्कंधावार ( फौज ) सहित दूसरों
की रक्षा करता हुआ भ्रमता है। ( अर्थात् संसारी
जीव तत्व की खोज तो नहीं करता, इन्द्रिय और मन
की फौज सहित पर की रक्षा में लगा फिरता है।)
१९२ जो उजाड़ को वासित और वासित को उजाड़ करता
है, हे जोगी ! उसकी बलिहारी है, जिसके पाप है न
पुण्य।
१९३ जो पुराने कर्म को खपाता है और नयों को प्रवेश
नही देता तथा अनुदिन जिनदेव का ध्यान करता है
वह परमात्मा हो जाता है।
१९४ और दूसरा, जो विषयों का सेवन तथा बहुत से पाप
करता है, वह कर्म की सहायता लेकर नरक का पाहुना
वन कर जाता है।
१९५ कुत्सित, क्षार-मूत्र की गन्ध से पूरित छिद्र लोक को
संताप पहुंचाता है, जैसे कुत्ते को चर्म-खण्ड ।
१९६ हे मूर्ख घेडे ! देखने वालों को या रमण से सुख नही
होता। अहो ! छोटासा मूत्र का छिद्र है तो भी उसे
कोई नहीं छोड़ता।

पाहुड-दोहा जिणवरु झोयहि जीव तुहुं विसयकसायहं खोइ । दुक्खु ण देक्खहि कहि मि बढ अजरामरु पउ होइ ॥१९७।। विसयकसाय चएवि वढ अप्पहं मणु वि धरहि । चूरिवि चउगइ णितुलउ परमप्पउ पावेहि ।।१९८।। इंदियपसरु णिवारियई मण जाणहि परमत्थु । अप्पा मिल्लिवि णाणमड अवरु विडाविड सत्यु ॥१९९।। विसया चिंति म जीव तुटुं विसय ण भला होति । सेवंताहं वि महुर वह पच्छई दुवई दिति ॥२०॥ विसयकसायहं रांजय र अपहिं चित्तु ण देइ । बंधिवि दुकियकम्मडा चित्र संसार भनेइ ।।२०१।। इंदियविसब चएवि वह करि मोहहं परिचाउ । अणुदिणु झार्वहि परमपर तो एहर ववसाउ ।।२०२।। णिज्जियसासो गिफइलोयणो मुक्कायलवायारो । एयाई अवत्थ गओ सो जोयउ णत्थि संदेहो ॥२०३॥ १ द. झावह. २ द. जिम सिवारि पायेइ. ३ क. चएहि. ४ द. चूरहि. ५ द. पसर. ६ क. अप्पर. ७ द. संसार. ८ क. झापहि.

अनुवाद ६१ १९७ हे जीव ! तू विषय-कपाय को खोकर जिनवर का ध्यान कर, जिससे, हे मूढ ! फिर कभी दुख न देखे और अजरामर पद होवे। १९८ हे मूर्ख ! विषय-कपाय को छोड़ कर आत्मा में मन को धारण कर, नथा चतुर्गति को चूर कर, अनुन्य परमात्म- पद को प्राप्त कर। १५९. इन्द्रियों के प्रसार का निवारण करने में ही, हे मन ! परमार्थ जान । शानमय आत्मा को छोड़कर ओर शास्त्र कल्पित है। २०० ह जीव ! तूं विपयों की चिन्ता मत कर । विपय भले नहीं होते। सेवन करते समय तो मधुर लगते हैं, किन्तु, हे मूर्ख ! पीछ दुःख देते हैं। २.१. विश्य कपाय में गंजित होकर आत्मा में चित्त नहीं देता। दुष्कृत कर्मों को बांध कर चिरकाल तक संसार में भ्रमण करता है। २०२ हे मूर्ख ! इन्द्रिय विषयों को छोड़कर माह का भी परित्याग कर । अनुदिन परमपद का ध्यान कर। तो यह व्यवसाय बने। २०३ - श्वास को जीत लिया, लोचन निस्पंद होगये, सब व्यापार छूट गया । ऐसी अवस्था को पहुंच जाय वही जोग है , इसमें सन्दह नहीं ।

६२ पाहुड-दोहा तुट्टे मणवावारे भग्गे तह रायरोससब्भावे । परमप्पयम्मि अप्पे परिहिए होइ णिव्वाणं ॥२०४॥ विसया सेवहि जीव तुहुं छोडवि अप्पसहाउ । अण्णइ दुग्गइ जाईसिहि तं एहउ क्वसाउ ॥२०५|| मंतु ण तंतु ण धेउ ण धारणु । ण वि उच्छासह किजइ कारणु ॥ एमइ परमसुक्क्षु मुणि सुर्वइ । एही गलगल कासु ण रुच्चइ ॥२०६॥ उववाँस विसेस करिवि बहु एहु वि संवरु होइ । पुच्छइ किं बहु वित्थरिण मा पुच्छिज्जइ कोइ ॥२०७॥ तउ करि दहविहु धम्मु करि जिणभासिउ सुपसिद्ध । कम्महं णि जर एह जिय फुड अक्खि उ मई तुज्झु ॥२०८।। दहविहु जिणवरभासियउ धम्मु अहिंसासारु । अहो जिय भावहि एकमणु जिम तोडहि संसारु ॥२८९॥ १ द. रोय. २ द. अप्पो परिट्टिओ. ३ द. अप्पु. ४ द. जाणि. ५ द. सुक्ख. ६ द. सुच्चइ. ७ द. उववाविसेस.

अनुवाद
२०४ जब मन का व्यापार टूट गया, तथा राग-रोष का
सद्भाव भन्न हो गया और आत्मा परमपद पर
परिस्थित हो गया, तभी निर्वाण है।
२०५ हे जीव, तूं आत्म-स्वभाव को छोड़कर विषयों का
सेवन करता है, इससे, हे जोगी ! अन्य दुर्गति में
जायगा। यह ऐसा ही व्यवसाय है।
२०६ जव न मंत्र, न तंत्र, न ध्येय, न धारण, न उच्छास का
कारण किया जाता है तब मुनि परम सुख से सोता
है। यह गड़बड़ किसी को नही रुवती ।
२०७ वहुतसे विशेष उपवास करके यह संवर होता है।
और बहुत विस्तार से पूछने से क्या लाभ ? किसी से
कुछ मत पूछ।
.
२०८ तप कर, जिन द्वारा भाषित, सुप्रसिद्ध, दशविध धर्म
कर । हे जीव ! यही कर्मों की निर्जरा है। मैने तुझे
स्पष्ट बता दिया।
२०९ हे जीव ! जिनवर द्वारा भाषित, दशविध, आहिंसाचार
धर्म की एक मन से भावना कर जिससे तूं संसार को
तोड़ दे।

६४ पाहुड-दोहा भवि भवि दंसणु मलरहिउ भवि भवि करउं समाहि । भवि भवि रिस गुरु होइ महु णिहयमणुब्भववाहि ॥२१०॥ अणुपेहा बारह वि जिय भांविधि एकमणेण । रामसीहु मुणि इम भणइ सिवपुरि पावहि जेण ॥२११।। सुण्णं ण होइ सुण्णं दीसइ सुण्णं च तिहुँवणे सुण्णं । अवहरइ पावपुण्णं सुण्णसहावेणं गओ अप्पा ॥२१२॥ वेपंथेहिं ण गम्मइ वेमुहमूई ण मिजए कंथा । विणि ण हुँति अयाणा इंदियोक्खं च मोक्वं च ॥२१३ उववासह होइ पलेवणा संताविनइ देहु । धरु डझइ इंदियतणउ मोक्खहं कारणु पहु ।।२१४॥ अच्छउ भोयंणु ताहं घरि सिद्ध हरेप्पिणु जेत्थु । ताहं समउ जय कारियई ता मेलियइ समनु ॥२१॥ जइ लहर माणिकड उ जोइय पुहवि भमंत । बंधिजइ णियकप्पडई जोइजई एकंत १२१६॥ ह १ क. 'माणु . २ क. भवि भवि इक. ३ क. इम्ब. ४ क. तिहुयणे. ५ क. सहावे. ६ क. वेविनि. ७ क° सुक्खं च मुक्खं च. ८ क. पलेवणउ. ९ क. जोयउ. १० क. सिद्ध हरेविणु जित्थु. ११ क. करियई. १२ क. ना (?). १३. क.जोइजहि इकंत.

अनुवाद
६५
२१० भव भव में मलरहित सम्यगदर्शन होवे, भव भव में
समाधि करूँ और भव भव में मन में उत्पन्न होनेवाली
व्याधि का निहनन करने वाला ऋपि मेरा गुरु होवे।
२११ हे जीव ! एकाग्र मन से बारह अनुप्रेक्षा की भावना कर
जिससे शिवपुरी प्राप्त होवे। रामसिंह मुनि ऐसा
कहते हैं।
२१२ शुन्य शून्य नहीं है। त्रिभुवन में शून्य शून्य दिखाई
देता है। शुन्य स्वभाव में गत आत्मा पाप और पुण्य
का अपहार कर देता है ।
२१३ दो रास्तों से जाना नहीं होता । दो मुख की सूजी से
कथरी नहीं सीई जाती। हे अजान ! दोनो बातें नही
हो सकती, इन्द्रिय सुख भी और मोक्ष भी।
२१४ उपवास में प्रदीपन होता है, दह को संताप पहुंचता
है और इंद्रियों का घर दग्ध होता है। मोक्ष का
कारण यही है।
,
२१५ उनक घर का भोजन रहन दो जहां सिद्ध का अपहरण
हो । उनके साथ जय ( जय जिनेन्द्र) करने से भी
सम्यक्त्व मैला होता है।
२१६ हे जोगी ! पृथ्वी पर भ्रमण करते हुए यदि माणिक्य
मिल गया तो उसे अपने कपड़े में बांध लेना चाहिये
और
एकान्त में देखना चाहिये।

पाहुड-दोहा वादविवादा जे करहिं जाहिं ण मिट्टिय भंति । जे रत्ता गउपावियेई ते गुपंत भैमंति ॥ २१७॥ कोयोऽस्तीत्यर्थमाहाः कायो ज्ञानं समीहते । ज्ञानं कर्मविनाशाय तन्नाशे परमं पदम् ।। २१८ ॥ कालहिं पवणहिं रविससिहि चहु एक्कट्टई वासु । हउं तुहिं पुच्छउँ जोइया पहिले कासु विणासु ॥ २१० ।। ससि पोखइ रवि पजलइ पवणु हलोले लेइ । सत्त रजु तमु पिल्लि करि कम्महं कालु गिलेइ ।। २२० ॥ मुखनासिकयोर्मध्ये प्राणान् संचरते सदा । आकाशे चरते नित्यं स जीवो तेन जीवति ॥ २२१ ॥ आपदा मूच्छितो वारिचुलुकेनापि जीवति । अंभःकुंभसहस्त्राणां गतजीवः करोति किम् ।। २२२ ।। इय पाहुड-दोहा समत्ता । १ क. वियउ. २ द. भवंति. ३ क.द, काया. ४ क. द, हारं. ५ क. जीवते.

अनुवाद
६७
.
२१७ जो वादविवाद करते हैं, जिनकी भ्रान्ति नही मिटी
और जो अपनी वड़ाई करने में रक्त है वे भ्रान्त हुए
(संसार में ) भ्ररण करते रहते हैं।
२१८ काय है इसलिये आहार किया जाता है, काय ज्ञान
के लिये प्रयत्न करता है, ज्ञान कर्म के विनाश के लिये
है। उसका नाश होजाने पर परम पद है।
२१०. काल, पवन, रवि और शशि चारों का इकट्ठा वास है।
हे जोगी ! मैं तुझे पूछता हूं पहले किस का विनाश
( होने वाला है)।
२२० शशि पोषण करता है, रवि प्रज्वलित करता है, पवन
हिलोर लेता है। किन्तु सात २जु अंधकार को पेल
कर काल कर्मों को खा जाता है।
२२१ जो मुख और नासिका के मध्य सदा प्राणों का संचार
करता है, जो नित्य आकाश में विचरण करता है, यह
जीव उसी से जीता है।
२२२ जो आपद् से मूर्छित है वह एक चुल्लु जल से जी
उठता है । किन्तु जो गतजीव है उसे पानी के हजारों
घड़ों से भी क्या लाभ ?
इति प्राभृतदोहा समाप्त ।

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शब्द कोश

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शब्दकोश इस कोश में ग्रंथ के कुल शब्दों के संरकृत रूप तथा दोहा नम्बर देने का प्रयत्न किया गया है। जो शब्द एक ही अर्थ में बहुत बार आया है उसके दो तीन दोहा नम्बर देकर आदि लिख दिया गया है। हिन्दी रूप एक तो संस्कृत रूप से ही प्रगट हो जाते हैं, दूपरे अनुवाद में रे आ चुके हैं, इससे यहां अलग नहीं दिये गये। हां, विशेष शब्दों के साम्हने * चिह्न लगा दिया गया है। निम्न संकेताक्षरों का प्रयोग किया गया है:- गु गुजराती; दे. देशीनाममाला हेमचन्द्र कृत; म मराठी; हि हिन्दी; हेम. हेमचन्द्रकृत प्राकृत व्याकरण. - ९.५, १२४, अकयत्थ- अकृतार्थ ११५. अकुणंत - अकुर्वत् १४२. अकुलीण - °न ९९. अक्खर - अक्षर १४४, १७३. अक्खरड- अक्षर+ड ( अल्पार्थ) ८६. अक्खिअ-आख्यात २०८. अखअ-अक्षय १६९-१७१. अखणि- अक्षयिनी ४२. अग्ग अग्र ४७, १७५. अग्य - अर्घ्य १५१. अचित्त - अचित् ४६. अचिंत- (तत्सम ) ४६. *अच्छ- आ+क्षि ( निवासगयोः ) °इ वसति ५८, १२१,१३६६ °च्छेसि - वससि ९१ °च्छेसइ वसिष्यसि १८२; 'च्छउ-आस्टाम् २१५; अच्छंत - वसत् १२२. अछेअ- आछेद्य ९..

७२ पाहुड-दोहा - ३३, *अछोप- अस्पृश्य १३९. ('स्पृशेः छिप्पः' हेम. ४ २५७ ). अजरामर (तत्सम) ३३, १९७. अज्ज - अद्य १६९. अजु - अद्य १११. अट्ठ- अष्ट ६६, १७२. *अडवड - अटपट (ध्वनिवाचक) ६, १४५. अणक्खर - अनक्षर (अक्षय), १२४. अणंत - अनन्त ५४. अणाइ - अनादि ८९, अणु-( तत्सम ) १४४. अणुदिणु - अनुदिनम् १९३ २०२. अणुपेहा - अनुप्रेक्षा २११ (टिप्पणी देखो). अणुराअ- अनुराग २२, ३८. अणुलग्ग - अनुलग्न ४७. अणुहवइ-अनुभवति १६५. अण्ण - अन्य ९,४०, ४२ आदि. अत्थि - अस्ति ३५, १८६. आथिर- अस्थिर १९. अहुवियह - (!) अटवी + अटवी ११४. अप्प-आत्मन् ४४, ८४ आदि. अग्पण - आत्मन् ९. अप्पणिय- आत्मीय (हि अपनी) १८० अप्पा - आत्मन् ३, ८, अप्पाए ( तृतीया ) ७५. अप्पाण - आत्मन् २५, ३६, ५१, आदि. अप्पापर-आत्म+पर १, ९, १८४, १८५. अप्पायत्त-आत्म+आयत्त २. अप्पुणु - आत्मना (म आपण ) ८३. अभितर - अभ्यन्तर ६१,१६२. अभय - ( तत्सम) १०५. अम्मिए - (आंम्बके अहो के समान सम्बोधनार्थक) ५१, १५५, १८७, १९६. अम्ह - अस्माकम् १३८, अम्हहि- अस्माभिः १३८. अयाण - अजानत् ( अजान ) ७, १३७, २१३ अरि- अरे ( सम्बोधनार्थक) ९२. १३३. १ . अण्णा अन्याय १४४. अण्णाण-अज्ञान ६७. अत्थ- अर्थ ८५. अत्थवण अस्तमन १६८.

शब्दकोश अरु - अपरम्, (हि. और )।८१. अलक्ख- अलक्ष्य १८८. अलहंत - अलभमान २३. अवत्थ-अवस्था १५०, १७, २०३. अवध-( तत्सम ) अहिंसा अहिंसा-( तत्सम) २०९. अट्टहं - (१) अधस्तात् ९४. अहो- (तत्सम) २.९. अंकय - अकृत १७७. अंग-( तत्सम ) १००. अंच - अ ( पूजायाम् ) 'उ= अर्चयामि १३९. अंत - (तत्सम) ९८. अंध- ( तत्सम ) १२८. अथवण- अस्तमन १८३ ( देखो अथवण). अंबर - ( तत्सम ) १४, १६८. आ भवर- अपर ३५, ६२, ११४, आदि. अवहर- अप+ह, द-ति २१२. अवराड - अपर+: ( अल्पार्थ ) १९१. अवरुप्परु-अपरापरम् १२५. अवसर -( तत्सम) १०३. अवसु - अवश्यम् १७५. अवस्स - अवश्य ७४. अविचल - ( तत्सम) १२, ८१, १७२. असरार - अशरीर १२१. असुद्ध - अशुद्ध १४६. असुह - अशुभ ७२, १४२. असुंदर -( तत्सम ) ७२. अह-अथ ९३, १६६. अहम्म - अधर्म २९, ७२. अह व- अथ वा ८३. अहिणव- अभिनव ७७, १९३. अहिलास- अभिलाष १६. अहिलेअ-अभिषेक १४०. आगम - (तत्सम ) ९. आगमण -°न ४५. °आजणय - आ+जनक १४२. आण - आ+नी, °इ=आनयति १६५. ( म. आण) आणंद - आनन्द १२६. आणी- आनीता ९९. आभुजंत - आ+भुञ्जत् ४. आयअ- आपद् ६. आयई - एतानि १४४. (' इदम आयः ' हेम ४, ३६५). आयास आकाश १८७. आराहिज - आ+राध् ( कर्मणि) 'इ-आराध्यते ५०, पाहुड-दोहा - आवागमण 'न १७१. आस-आशा १५३. ha इ-पि ( अपि) ५१, उग्गा - उद्गस (हि. अंगा) १७३. उच्छास - उच्वास २०६. उ - उष्ट्र ( हि. उंट) १.८. उट्टिय - ओंटा हुआ १०९. ( सम्भवतः धातु से बने उटित के बराबर) उक्त १६७. उत्तम -(तत्सम) २८. उत्तरगुण - (तत्सम) २१ टिप्पणी उठ उपचाते - देखो ). इउ- एतत् ५२. इक - एक १२५, १६४. इच्छ -इ-इच्छति १३६. इट्ट-इट ९. इत्थि- स्त्री ३१, ९९, इत्यु- अत्र ४१. इम - एवम् २११. इय इह - (तत्सम) २३, ९६. इह - एतत् १२०, १५, १८६. इंद - इन्द्र ३. इंदिय - इन्द्रिय ४३, ६३, ९२ आदि. इंधण - इन्धन १६१. इति ६९. उपलाण - उत्पलानि (संज्ञा) या उपल्यानय ( किया) ४२. ( टिप्पणी देखो) उप्पज - उत्पद् ( कर्मणि) इ उत्पद्यते ८२. १४४. उप्परि- उपरि १२. उप्पाड - उत्पाट्य विणु उत्साट्य १४३. उभश्न-उभय ३४, ३५. उमाहिय - उन्माथिन् (हि. उमाहा) ११३. उम्मण - उद्+मनम् १०४ उम्सूल - उद्+ मूलय 'लिवि- उन्मूल्य २१, उर- उरम् ८९. cho ईसर - ईश्वर २७. उ उ-तु १४..

शब्दकाश *उल्लूर - उत् + ल, रियहि उद्+लनासी ११२ ( हेम.४, ११६ के अनुसार यह तुड (त्रुट ) धातु का आदेश है). उवएस- उपदेश १६६, १८३. उवएसड - उपदेश+ड (अल्पार्थ) ४६. उवयार-उपकार १८. उववास-उपवास २०५,२३४. उबर - उर्वर इ ५१ (हि उबरना) *उव्वलि - उद्वर्तन (?) (हि. उपटन) १८. उब्बस - उद्वारा ( उजाट ) १९२. एम - एवम् ४. पमइ - एवम् ४४, १७२, २०६. ण्याई - एनाम् २०३. एव- एवम् १५८. एह - एतत् २६, ३०, ६४,१६३, २०५, आदि. एही - एषा, ईदृशी ९५, १५० क ए - एतत् ३९; एग एते १२०; एहिं ताभ्याम् ७२. एक - (त्त्सम ) १००. एक-एक ७, २९ आदि. एकट्ट- एकत्र २१९. एकल- एकाकिन् ७५. (हि. अकेल) एक्कमण - एक+मनग२०९,११1. एकंत- एकान्त २१६. एत्तडअ-एतावत् ६२. पत्यु- अन १६०. कच्च-काच ७१. कज - कार्य २८, कड्ड - कृा इ-कर्षति १६७. कण- ( तत्सम) ८४, ८५. कापड - कर्पट २१६. कपास - कार्पास १०९. करम - कर्मन् ७, २४ आदि. कम्मड - कर्म+ड ( कुत्सार्थे ) ११७, २०१. कम्मायत्त - कर्मायत्त ९. कयंत - कृतान्त १२. कर - कृइ करोति ७, ४२ आदि; उ.-करोमि १३९, २१०; 'मिः करोमि १७४, 'हि-कुरु १३, ९२; "हि- कुर्वन्ति २१७; रंति कुर्वन्ति ८०; करि-कुरु २, १८ आदि ७६ पाहुड-दोहा करि-कृत्वा १०२; करिजइ-क्रियते or क्रियताम् १३६; करिजहि-क्रियताम् १.६; करिवि-कृत्वा १४०, २०७; करीसु-करिष्यामि १७७, करेइ-करोति १५, १६, आदि; ११९ कहिय - कथित १६६. कहिं - व ५०. कंथा - ( तत्सम ) (हि. कथरी) २१३. कंचुलिय - कंचुली १५. कंटअ - कण्टक ४७. कंडंत - कण्डत् १८५. कीड - कण्डय १३. कंडिय- कण्डित ८५. काअ-काय १९, २९, १०८ काई - किम् २२, किम् २२, ५०, ६१, १२२, १३६. कायर कातर २८. कायव्य - कर्तव्य १९. कारण - ( तत्सम ) ७, २८, ६२ आदि. करेसहि-करिष्यन्ति करेहि-कुरु ३३ करंत-कुर्वत् २४, ८४. करह - करभ (ऊँट ) ९२, ११२ आदि. करहुल - करम+उल ( स्वार्थ ) ४२, १११,१७०. कलत्त-कलत्र ८ कलह-( तत्सम) १३९. कलहीजइ - कलहायते १४० कव्व-काव्य १६१. कसाय कषाय ६२, १३४. कस्स-कस्य ४९, १४१. कह, हं- कथम् १०९, १४६, १४७, १६६. कह - कथ् हति-कथयन्ति १२४, १२६, कहि कथय १८३. कह व-कथमपि १६६. कहं-कं ६५. कहंत - कथयत, ६५.. - कारिम - कर्मन् ९ १३, ५२. कारिय- कारित २१५. काल -- (तत्सम) २९, ९८, २२०. कासु वि- कस्य+अपि १६६. कि- किम् ७०. किअ - कृत १०, १२१, १३, १७४, किज - कृ ( कर्मणि) =क्रियते २२, ३८; क्रियताम् ३९, ८३ आदि; 'उक्रियताम् १९२; कीजइ-क्रियताम् १४.. .

शब्दकोश कोडि - कोटि ३. को वि- कोऽपि ३९. कोह - क्रोध ९३,१४.. ख किण्ण- किम्+न १९. किम - किम् ( कथम् )४२, ६५, १६२, १६३. किय-कृत ११३, १३५. किरिया- क्रिया १९. कीलइ-क्रीडति ११०. कुद - कोऽपि १५९. कुडि - कुटी ५२. कुडिल्ली - कुटी + 0 (म्वाथै)९१. कुडुंब - कुटुम्ब १५३- कुणइ- करोति ६.. 'हि = करोषि ९८. कुतित्थ - कुतीर्थ ८०. कुल्हाडि - कुठारिका (हि - कुल्हाड़ी) १७. कुसुमिय - *त १६१. कुहिअ - कुथित १९५. 'केरअ - सम्बन्ध वाचक ३६. केवल ज्ञानविशेष ६८. केवलणाण-'ज्ञान १४,२२,६७. को - कः ४०,४१; कम् १३९: केणकेन, कासु-कस्य १३९. कोइ - कोऽपि २७,५२,११४. "कोडि - कुतूहल ११७ (हेम. २, १७४ कुतूहल-कुतः (४,४२२, कौतुकस्य कोड:) टिप्पणी देखो. खअ-क्षय १२४. खण - क्षण ५,७५,८७,९२. खत्तिअ-क्षत्रिय ३१.' खयर - खदिर (हि-खर) १४९, खल - (तत्सम ) ४५,१४८. खव - क्षप् इ = क्षपयति ७७, १९३. खवणअ-क्षपणक ३२. खंडण खण्डन १३५. खत- खादन् ६३. खंध-स्कंध १७. खंधावारिअ - स्कंधावारिक (!) १९१. खार-क्षार ६९५. खीण-क्षीण १७३. खोइ - क्षपयित्वा (हि.-खोकर) १९७. खोह क्षोभ १४३. - : ग गअ - गत ४४,९३, आदि.

पाहुड-दोहा गंत्र- ( तत्सम) १९५. गाम-ग्राम ७३, १८१. गामड - ग्राम+3 १८१. गिलेइ - गृणाति २२०. गुणसार- (तत्सम) १९. गुप्पंत- गुप्यमान २१७. गुरु - ( तत्सम) १, २७, ८०. गोर - गौर २६, ३०. - घ गइ- गति ६६,९३ आदि. गइय गता ५२. गउपाविय- गोपायित २१७. गच्छइ - गच्छति १९४. गजंति- गर्जन्ति १२५. गणंति - गणयन्ति १५४,१६९, गण्ण - गणना ७१. गमणागमण गमनागमन १३७. गम्म - गम् ( कणि) 'द ९७ २१३; गम्मागम्मर-गंगम्यते (गमनागमनं क्रियते) ८३. गय - गत १०,१८ आदि. गयागय-गत + आगत १२१. गरुव-गुरु + क १३७. गरुवड -गुरु+क+ ड१३१. गल- (तत्सम) १५०. गलइ-ति १०३. गलंत- गलत १०३. गलगल-कलकल २०६. गवंगअ-गो+अक ९९. गवेस- गोपय् हि ५.३; °सु ९४. गविय-गवित ८६, १५४. गहिल - प्रहिल १४३. गंग - गंगा १३७. *गंगड-क्षुद्र १८४ (गु. गांगडी) गंथ-ग्रंथ ८५, १२५. गंथि- ग्रंथि १५४. घर - गृह ९, १३, ११३ आदि. घरट्ट-(तत्सम ) १५६. घरवइ - गृहपति १२२. घरवास - गहवास १२. *घल्ल - क्षिप् हेपिणु=क्षिप्त्या १७१. ( हि पालना) घिअ-घृत १२०. धिप्प - क्षिप् ( कर्मणि) पनि क्षियन्ते १५१. च च - (तत्सम) ९८. च - त्यज् एवि-त्यक्त्वा १९८, २०२; "एहि-त्यज १३४. चउगर - चतुर्गति १९८. चउरासी- चतुरशीति २३.

शब्दकोश चिकण १४७.(म्रक्षेश्चोप्पडः हेम. ४,१९३.) छ *चड - आरुह डि-आरुढ १०९; 'डाव-आरोहयामि ( उपनयामि ) ४९; "डाहि- आरोहय १६०; चनिय. आरूढ १७३; डविणु- आरुह्य १११. चम्म - चर्मन् १६३ चर -- इ-चरति ४२; रि-घर ११२; "रिअ-चरित १६५. चत्र - त्या त्यजति ६३; रेवि त्याक्वा ६६. चहु - चतुर्णाम् २१९ चरिय-चरित १७४. चारु- ( तत्सम ) १०४. चिट्ठ - चेष्टा १८. चित्त - ( तत्सम) ४६ ५६ आदि चिरु - चिरम् २०१. चिंत-३= चिन्तयति ७,६० 'ति-चिन्तय ३२,७४,२०० : तत-चिन्तयत् २, १३. चिंत-चिन्ता ६६,१८२. चीर-(तत्सम) १०९. चुय-च्युत २१. चुंबिय - चुम्बित १५०. चूर - 'रिवि=चूरयित्वा १९८. चेयण - चेतन २९,११०. 'चोप्पडि - नक्षण १८० छत्त - 1३.. छह-पट १०१. 'छंड - मुन् ?डि मुन्ज १३; मुक्त्वा १०९; डिवि-मुक्त्वा १६, २०५; °डेविणु-मुक्त्वा ३१, १५१,१८८; °दु-मुत्रत ६९ | हि छोड़ना; मुचः छद्र - हेम. ४,९.१. छर्द से बना. हे... २,३६]. छिद्द -छिद्र १९५ 'छुडु - यदि ४०,१४९,१५३. छोड - ( देखो छंद) हि ४२; डिवि ११५. छाप - स्पृश्य १३९ (हि-छूना) ज ज-या, जति यान्ति ११६,१२४, जइ - यदि २२,३६, आदि. जह-यति ११७. जग - जगत् ७,३९,४२ आदि, जत्थ-यत्र २३,८२. जम्म-जन्मन् ७२,९३.

पाहुड-दोहा - जम्मण - जन्मन् ७६,१६४. जय -- [तत्सम ] २१५. जर -- जरा ३३,३४. आदि. जर -- जुइ-जीर्यति ५४. जलण ज्वलन २०, जलहि- जलधि १६५. जव ला-यातुम् १०५. (म. जाय ला: हि. जाने के लिये) जसु- यस्य २४, ४२, १६.. जहा- यथा १९५. जहिं - यत्र ४६, ४८, ८९ ( यस्मिन् से बना ). जं- यन् २, ३ आदि. जंत-यात् ५२, ६२ आदि जति - यान्ति (देखे ज' ११६,१२४ जंप- जल्प् इ जल्पति ६० (कथ् का आदेश, हेम. ४, २.) जा-या १९ ई-यानि १८०; जासु-यस्य ५९, ७६, आदि; जाह-यस्य १४; जाह-येपां १०२; जाहिं-येषाम् १५६, "उ-यातु ४८; 'इवउ यातव्य १५९ (देखो ज). जाण यान १६७. जाण - ज्ञा इ - जानाति ४६; "हि - जानासि ९,८५आदि; हिं - जानन्ति १६५,१२५; 'णि-जानीहि १२,३० आदि; 'णिजइ-ज्ञायताम् १२३; . णविणु-ज्ञात्वा ६९. जाण-ज्ञात ५५. जाणिअ- ज्ञात४१,४४,५८ आदि. जाणी - ज्ञात १७३. जाम - यावत् ८, ५६ आदि. जि- पादपूरक अव्यय २, ११, ३८, ४९, ७४. जि-- ये ८६. जिअ - जीव १९१. जिण - जि, "णिनइ-जीयताम् १११. जिण - जिन ३९, ४० आदि. जिणधम्म - जिनधर्म २०. जिणवयण - जिनवचन २३. जिणवर - जिनवर ४, ३९. जित्थु - यत्र १११. जिम - यथा ५, ४२, आदि. जिय-जीव १०, १२ आदि. जिह - यथा १८. जा-या (धातु) इ-याति ८९,१०९, १६६, १६८, "इयइ-याति १७२, इसिहि-यास्यसि २०५:

शब्दकोश जोइय- ज्योतिः ९६. जोगवइ- योगपति ( योगिन) ९६,१८१. जोणि- यानि ८, २३. जोय - योग ९६, २०३. जोयगह - योग+गति १८९. जोयंत- पश्यत् ४७, ( देखा जोअ). जोयाभासि- योगाभ्यास १०९. “जोव-दृश् इ-पश्यति ५१, १८० "उ-पश्यामि १३९, १७५; ( देखो जोअ). जि-येन ७१, ९८, १२१. जीअ-जीव ७२. जीव-(तत्सम) ११,१७ आदि. जीवड जीव+(अल्पार्थे ) ११८, १७६. जीवंत- जीवत् १२३. जीहडिय - जिह्वा ४३. जीहालु - जिह्वाल १५७. जु-पादपूरक अव्यय ११५,१८१. जु- यत् १६१. जे-ये ४; जण येन ५७, ८२, ९९; जेहिं यः ९२. जेत्थु - यत्र २१५. जम-यथा २१, ६१, आदि ( देखो जिम) जेहा - यथा १०८. जो - यः १, १६, ३३ आदि (देखो जे, जु). जाअ - योग ९१. जोअ- दृश्य पश्य ५२, १०७, ११४, आदि; पश्यति ९६; जोइउं-दृष्टुम् १७९; जोइजइ- दृश्यताम् २१६; जोयउं- पश्यामि १४.. जोइ - योगिन् ९. जोइय - योगिन् ४२, ५३, ६९ आदि. झा झंखाअ- संतापय् "इ संतापयति १३१ ( संतपेझखः, हेम. ४, १४०) झा- ध्ये, इयइ-ध्यायते, ध्यायताम् ६८,१७२, "य-ध्याय १२९; यइ-ध्यायति १९३; यहि ६७,७१, १९५७ यंत-ध्यायत् ३; इय-ध्यात १७८. झाण - ध्यान ६७, ११०. झाव - ध्यै हि-ध्यायहि ·३५, २०२ ( देखो झा) ८२ पाहुड-दोहा ण झुपडा- कुटी (अल्पगृह ) १०८ (हि. झोपडा; हेम. ४,४१६ उदाहरण ho ट्ठिय · स्थित १०२. ठ ठा- स्था, इ-तिष्ठति ८९, १६६, १६.८; टवहि-स्थापय १३४. ठिय- स्थित ९९, ११०, १८०. ण- न २, ८, १०, आदि. ण उ - न तु ३, २०, ३१, आदि. णउंसअ- नपुंसक ३१. णग्गत्तण नग्नत्व १५४. णचरिसु - न+चरिष्णु ५८. ण?- नष्ट ९३. णात्थ-नास्ति २३, ९८ आदि. णमिअ- नमित १४१. णर-नर ५, १०२. णरय नरक. ५, ९३, १३८ आदि. णव - नम् इ-नमति ७७, १४६; जए-नम्यते १४१. *णवर - केवलम् ९८ (णवर केवले, हेम. २, १८७) *णवरि - अनन्तरम् १५३ (णवरि आनन्तर्ये, हेम. २, १८८) ण विन+अपि ४, ५ आदि. णह - नभस् २९. णं - ननु १७७. ( हेम. ४, ३०२ ड 0 डज्झ-दह इ-दह्यने २१४; दग्ध , *डाल-शाखा १०९(डाली साहाए द. ४, ९) डुंगर- शैल ११४ (डुंगरो सेले, दे. ४, ११). डोम- अन्त्यज (तत्सम ) ८६. टीका) गंदणवण - नन्दनवन ४४. णाइ - न १४९ ( अण णाई नवर्थ, हेम. २, १९०). *णाई - इव १५८ ( हि. नाई हेम. ४, ४४४). *ढंढोलत-भ्रमत् १५२ ( हेम. ४, १६१). *ढिल्ल'- शिथिल ४३ (हि. ढीला) दुरदुल्लिअ- भ्रमित २३. , शब्दकोश ८३ - णाण-ज्ञान १४, २४ आदि. णाणमअ-ज्ञानमय ३७, ३८, ४० आदि. णिमिस निमिष ७५. णिम्मल - निर्मल १३, १९ आदि. णिय-निज ३, ४१ आदि. *णियंत- पश्यत् १८७ ( देखा- जिअ ). णिरत्थ-निरर्थ १८. णिरंजण - निरजन ३८.६१,आदि. णिरंतर -निरन्तर ९२, १३३. णिराम - निराम १८१ णिरामअ- निरामय ५७, १६९ आदि. *णिरारिउ - नितराम् १२०. “णिरुत्त निश्चितम् १२१. ( णिच्छिए णिहतं, दे. ४, ३०). णिलअ-निलय ६७. णिल्लक्षण - निलक्षण ९९,१००. णिवड-नि+त् ति-निपतन्ति णाणिय-ज्ञानिन् १४७. णारि- नारी ४३. णास-नश् इ-नश्यति ७५, ९३: संति-नश्यन्ति १४८. णा हि - न हि ९४. *णिअ - दृश् एहि-पश्यसि १८६; १८१ ). णिकारिम - निकमन् ५२. णिग्गुण - निर्गुण १९, १००. णिचिंत - निश्चिन्त ४६. णिचिंतित्र-निश्चिन्तित १४४. णिच - नित्य २२, ५७. णिच्च-नीच २८. णिञ्चल - निश्चल ६. णिञ्चसुह - नित्यमुख ६५. णिञ्चित - निश्चिन्त १२१. णिच्छइ - निश्चयेन ३५. णिजर-निर्जरा २०८. णिजिय - निर्जित २०३. णिड्डह - निर्+दह इ-निर्दहति ८७. णितुल - निस्तुल १९८. णिप्फंद - निस्पन्द २०३. णिभंत - निधान्त ५४. णिभंति-निर्धान्ति ७३. (हेम. ४, णिवस - इ-निवसति ५९, ६६ आदि. णिवार - नि+वारय् हि ४३; "रि-निवारय ४३. णिवारिय- निवारित १९९. णिवास- निवास १४. णिव्वाण - निर्वाण ११३, १२३ आदि.

८१ पाहुड-दोहा णिसास-निःश्वास १४ णिहय-निहत २१०. णिहि - निधि १५१. णीस-न+ईश २७. णीसंग-निःसंग १००. णु-नु ८४, १६७. णेक-न+एक ३५. णेहडअ- स्नेह+ड+क ४५. हा-न+इह १६२. त तालोय- त्रैलोक्य ६८, ८२ आदि. तउ-तद् ११. तउ-त्वाम् ६४. तउ-तपस् २०८. तत्व २५. *तडतडह-( ध्वनिसूचक ) १५८ (हि. तडतड). तडत्ति- तड् इति ( ध्वनिसूचक १८३.) *तडप्फड-परिस्फुर्इ-ति ८८. तण - सम्बन्धार्थक, ८८, २१४. तणु-तनु ९, २२, ६०. तणुअ-तनु+क १०२. तत्त-तत्व १९१. तम-तमम् २२.. तर - तृरेहि-तर १३३. तरल -(तत्सम) ७३. तरुण-(तत्सम) ३२. तरुवर - ( तत्सम) ११५. तव तपस् ६१, १०२, ११३. तं - तत् ३, १०, १५,९७, ९८, तेण १०, ८२; तस-तस्य ८९; तहु-तस्य-७१; तहं. तेषाम् ६७ तहि-तस्य १७४; ताहं-तेषाम् ४७, १०२; तहि-तास्मन् ३८, ४८; तासु-तस्य ४५, ५०,५९: तेहइ-तस्मिन् १०३. तह-तथा २०४. तंत-तंत्र २०६. तंदुल - ( तत्सम ) १८५. ता-तदा, तावत् २२, १२६, १६७. ताम-तावत् ६४, ७८, १४१. तालू-तालु ९७. तिडिकी- स्फुलिंग ८७ (हि तिलगी) तित्थ- तीर्थ १६१,१६२,१६३. तित्थु - तत्र १०८. तिम तथा १७६. तिमिरहर - 'गृह ७५. तिल - ( तत्सम ) ७४, १५९, तिलअ- निलक ७०, 1.

शब्दकोश नोटयित्वा १३३; "डेहि-त्रो. टयसि १६०. तोवि-नदापि ३६, १९६. "त्ति - इति ९५. थ तिहुयण - त्रिभुवन ३१, ५९, आदि. तिहुवण - त्रिभुवन ५४, १९०, आदि. तुह - त्रुटित ११०, १५८, २०४. तुट्ट- त्रुट इ-त्रुट्यति १४, १८३; 'हेसइ-त्रुटिष्यति १७१. तुट्ठ-तुष्ट ८५. तुस-तुष १३, ७४, ८५, १८५. तुहूं - त्वम् ११, १३, आदि; तुहि-तुभ्यम २१९; तुझु- तव ११९, तुभ्यम् २०८. तुहारअ - त्वदीय ५६, १८२. ( युष्मदादेरीयस्य डारः, हेम. ४, ४३४). तूस - तुः सि-नुष्य ९३. ते-ते ४, २१. तेम- तथा १६६. तेमद - तस्मिन् ९१. तेहा- तथा १०८. तो. - तदा ५१, १४०, २०२. ( ततस्तदोस्तो; हेम. ४, ४१७.) तो- सः ७६. तोइ- तदापि ११, १७९. तोड - नोटय् °इ=त्रोटयति १५८; 'हि-त्रोटयसि १५८, २०९; "डि-त्रोटय १६०; 'डिवि. थक्क-स्थित १.४ ( स्थष्टाथका- चिहनिरप्पाः, हेम. ४, १६.) थडि - स्थली १५१ ( म. घड. तटः थंडिल्ल-मंडल, दे. २५). थलि - स्थली ११२. थिर-स्थिर १९. थूल - स्थूल २६,३०. थोअ - स्तोक ९८. द दड-दग्ध ५६. दप्पण - दर्पण १२२. दब्भ - दर्भ १५९. दम-( तत्सम) ११३. दया - ( तत्सम) १४७ दरिसाव - दर्शय् द १, १२८. दरिसिय - दार्शत १०५. दवकडिय - दावाग्नि + इ + क १०२.

८६ पाहुड-दोहा - दव्व द्रव्य ७०. दह-दश १७५. दहविह - दशविध २०८. दसण- दर्शन ६८, ६९, ७९, ११६, १२५, २१०. दावण -दामन् ४२, ११३. दाहिणिय- दक्षिणीय १८१. दिक्खु - पश्य १९० ( देखो देवख) दिज - दा ( कर्मणि ) इ ८३. दिढ- दृढ ८३. दिणयर - दिनकर १. दिण्ण - दत्त ८४. दिवहडा - दिवस + डा १७, १०६,१६९. दिव्य-दिव्य ३२. दिह - दिशा १७५. दिति - ददति २०० (देखो दे. ) दीवअ- दीपक १. इ-दृश्यते ३९,४५, १२२,१६१,२१२. वुड-द्वि १५,१०६. दुक्रिय - दुस्कृत १२,२०१. दुक्ख-दुःख ८,१०,१७,७४, दुग्गड - दुर्गति २०५. दुज्जण - दुर्जन १८. दुम्मइ - दुर्मति १६८. दुम्मेह - दुर्मेधस् ९८. दुव्वाह - दुर्व्याध, दुर्वासस् १५०. दुसह-दुःसह १०२. दूरि - दूरम् ५८. दे- दा इ = ददाति ७७,१९. आदि; दिति-ददति २००; 'विणु-दत्त्वा १११; हि १८, १३४; हु-देहि १७८. *देवख - दृश् °हि--पश्यसि १९७, दिवम्वु-पश्य १९०; देखत- पश्यत् १९६ (हि.देखना) देअ -- देव १,३९,५० आदि. देवल -- देवालय ९४,१६१. देवि -- देवी ३. देह -- ( तत्सम ) १८,३३ आदि. दास - दोष ४७,९०. ध दीस- दृश् धण-धन ११. धम्म - धर्म २०, धर्म २०,२९ आदि. धम्मडा-धर्म + डा १४७. धर - रंति ४,५; 'रि-धारय ६१; रि, रिवि 'रेवि-वृत्वा १४४,१५३,१७२, रेइ. धरति ११८, रेहि- धारय १३३,१९८ रंत-धरत् १६६. धरिअ-धृत ६२.

शब्दकोश . धवलत्तण-धवलत्व १४९. "धंध-व्यवसाय ७,९१,११६ (हि-धंधा-रोज़गार) *धंधवाल- लज्जावत् १२२ (धयधंधा गरलज्जा, दे. ५,५७.) धाणुक्क धानुष्क १२१. धारण • धारणा १०३,२०६. धुण-धुगंति-धन्वन्ति ८६. धुत्तिम -- धृतिमन् ८०. धेअ.. ध्येय १०३,२०६. धोअ -- धावय् एसि-धावयसि १६३. धोय:-धीत १६३. पड -- पत् डीसि-पतसि ११; 'डिसइ-पतिष्यति १५५; 'डिय-पतित ७,११६,१५६. 'डेविणु-पतित्वा २१. पडिछंद - प्रतिच्छंद ५२. पाडेपिलिअ--प्रति + प्रेरित १६७. पडिबिंब .. प्रतिषिमा १२२. पडिय-पतित ७,११६,१५६. पडिहास - प्रतिभास 'इ १२२. पढ -- पठ हु ९७; "डियइ पठ्यते ८३; 'ढिय-पटित ८७. पढण-पटन १४६. पढिय .. पठेत ८७,९७,१५६. पण्ण -- पर्ण १८४. पत्तिय - पत्रिका १५८, १५९; १६० (हि. पत्ती.) पदाण-प्रदान १०५. पय-पद १७७, पयट्ट-प्रवृत् इ-प्रवर्तते १६७, पयडण-प्रकटन १७७. पयाल-प्रजाल ६९, ८४ ( धान्यबुस, हि. पिंयाल) पर - ( तत्सम) ६, २२, ३३ आदि; रिण ४५; स्स ४५; °-परस्मिन् ८९. पर - पत् इ-पतति ( भवति) १८२. प . .. - पअ. पद ३६,१७८,१९० आदि. पइट्ठ - प्रविष्ट १५८. पइसर -- प्रति + सृ °उ-'तु ४८; 'इ-ति १४३: 'हि १३४; "हुं-सर्तुम् १६८ पइं- त्वम् १७९; त्वाम् १०६; त्वया १०,१११. पएस .. प्रदेश २३. *पगाम-- प्रकामम् ११२. पच्छई -- पश्चात् १७५,२००, पज्जल -- प्र + अल् इ १२०, २२०.

८८ पाहुड-दोहा परम - (तत्सम ) ६६. परमत्थ- परमार्थ ४१, ८५ आदि. परमप्पअ- परमात्मन् ७७, १९३. परमाणंद - परमानन्द ५७. परमेसर- परमेश्वर ४९. परम्मुह - पराङ्मुख २०. परलोअ-°क ६, ७६, १६४, परसुह- “ख २. परंपर-परम्परा १. पराइय- परकीय ४३. परायअ-परायत्त ३७. परास-पर+आश १५३. परिखिव - "क्षि इ-परिक्षीयते९१. परिचाअ- 'त्याग २०२. परिट्टिअ - स्थित ९०, २०४. परिणव- णम् इ-परिणमति परिवजिय- वर्जित ८९. परिवाडि - पाटी १७, १०६. परिहर - ह, इ परिहरति,१५. पलंब -प्रलम्ब, शाखा २१. पलाण -पल्याण ११३. पलास-पलाश १५२. पलेवणा- प्रदीपना २१४ (प्रदीपि दोहदे लः, हेम. १, २२१) पवण पवन १६७, २१९, २२०. पवाण-प्रमाण ( प्रकृटं मानं यस्य ) १६७. पवेस-प्रवेश ९४. पव्वइअ प्रवजित ४४. पसर-प्रसर १८२, १९९. पसाअ-प्रसाद ८०, ८१. पसार-प्रसारय् रिवि-प्रसार्य - - १४, ७८. परिणाम - ( तत्सम ) ७२, परिफुर - स्फुर इ-परिस्फुरति १४२. परिभम - भ्रम 'इ-परिभ्रमति ८,८०, १९.. परिमल-( तत्सम ) १५२. परियण-जन ९, ११. परियाण-ज्ञा, इ-जानाति १६५ परियाणिय - ज्ञात : ७१. पसु-पशु १३१. पसुलोय - पशुलोक १८७. पसुवाह - पशुवध १२७. पह - पथिन् ७९, १०५, १२३. पहाण प्रधान १३७. पहिय- पथिक ११५. *पहिल-प्रथम २१९ (हि. पहला) पंच-(तत्सम)४३, ४४ आदि. पंचेंदिय - पञ्च+इन्द्रिय १२३.

शब्दकोश ८९ पंडिअ-पण्डित २', ३३, ८४, आदि. पंथ-पथिन् १२८, २१३. पंथडा-पथिन्+डा १८८. पंथिय-पथिक ७३. पाअ- पाप २९, ५९ आदेि. पाअ-पद ४७. पाक-पाचय हि-पाचयसि ११९, पाढंत - परत १७३. पाण प्राण १०८. पाणिअ - पानीय १३४, १५९ आदि. पाणिवइ-प्राणिपति १०८. पाय पाद १४४. पायअ-प्राप्त+क १. ( हि पाया) पायड - प्रकट ८२. पालि -( तत्सम ) १८२ पाव - प्राय् °इ-प्रामाति २४, ६५, आदि; हि-त्र प्रेषि ११, ३६ आदि; विजइ-प्राप्यते ६; °विय-प्राप्यते ८८; 'वीसि-प्राप्स्यामि १७७ः 'वेहि-प्राप्नोषि १९८. पाइ-प्राप्य १३०. पावपुण्ण - पापपुण्य २१२. पावमल-पापमल १६३. पास-पाश १२. पाहण- पापाण १३०, १६१. पाहुणअ - प्राघूर्णक १९४ (हि. पाहुना ) पि- अपि १०. पिअ- प्रिय १००. पिक्ख - प्रेक्ष, खिवि-प्रेक्ष्य ३३. पिच्छ-प्रेक्ष, इ-प्रक्षते १८०. पिट-पीड् हिजइ-पीज्यते १४८. पिड-पिण्ड १५६. पिय-प्रिय ४५. पियंत-पिबत् ६३. पिल्लि-प्रेय २२०. पुच्छ--प्रच्छ् इ-पृच्छति १७५, २०७: हि. सि ११४; °उ- मि २:१९; 'त-पच्छत् १६५;च्छिअ-पृष्ट १६६; च्छिन्नइ-पृच्छयताम् २०७. पुज-पूजा ४९. पुज-पुजय °इ-ति १८४. पुगु-पुनः १६, १७ आदि पुण्ण-पुण्य २९, ८७ आदि. पुत्त-पुत्र ८. पुत्तिए पुत्रिके [ सम्बोधनार्थक अव्यय, अम्मिए सदृश] १०८ पुत्थ-पुस्तक १६१. - पाहुड-दोहा ब पुरयण-°जन १३. पुराइअ-"कृत ७७, १९३. पुराण - (तत्सम ) १२६. पुरिस- पुरुष ३१. पुहवि-पृथ्वी २१६. पूरिअ - पूरित १९५. पेस-प्रवेश, ७७, १९३. पोसिय-प्रेपित १७०. पोख-पोषय °इ-°ति २२० पोत्था - पुस्तक १४६. बद्ध -- (तत्सम) १९०. बलद्द -- बलीव ४४. बहिरण्णअ -- बहिायक (बहिरात्मन् ) ८२. बहुअ - बहु + क २३,८७,९७. वहुत्त - बहु ८४. (हि-बहुन) बहुयारअ.- वधकारक १४६. बहुल - (तत्सम् ) १२५,१९४. वंध- ( तत्सम् ) धिवि-बद्धवा २०१; धिज्जइ-बध्यताम् फ फल-तत्सम)११५,११९,आदि. फिट्ट-स्फिट इ-स्फिट्यने २: 'टीसद स्फिदृिष्यति १४९ फिट्टिय -- स्फिहित ११५,१७५, २१७. *फुक्क . स्फाय "किजंति-सफाय्यन्ते १५१ ( हि-फूंकना) फुट्ट - स्फुट टिवि-स्फुटित्वा १५२. फुड- स्फुटम् १३,१६८,२०८, फुरंत - स्फुरत् ६०. 'फुस -- मृज् सिवि-मृष्ट्वा १५७ अथवा, भ्रमित्वा (हेम. ४,१०५,१६१.) फेड-- स्फिट इ-स्फिट्टयति ११७ (देखो फिट). बंधण -- बन्धन ६.. बंम -- ब्रह्मन् ३३. वंभण -- ब्राह्मण ३१. बारह -- द्वादश २११. बाल .. ( तत्सम) ३२. वाहिर - बहिः ४५,६१ आदि. बुज्झ -- बुध ०इ-बुध्यते ५५, बोधति १२७: ° उ-बुध्य- ताम् ४०; °हु-बोधत ४०: उझंत-बोधत् १२६; •झिय-बुद्ध २२,४० आदि. बुद्धि -- ( तत्सम) १८३. बुह बुध ४२,८४. बूढअ -वृद्ध + क ३२.

शब्दकोश बोह -- बोध १६७. बोहि -- बोधि ८,२५,८१. भ .. . १ भअ-भय ३३, १०४. भग्ग- भग्न २१, १०४, १८५, आदि. भग्ग- भज ह भनक्ति ४७. भज - भज, जेसहिं-भक्ष्यन्ति ८३. भज-भ, भन ४७. भडार भट्टारक ६३. भण - ( तत्सम) इति ४०, ४१ आदि; गंति ४; "णिवि -भणित्वा १३९; "णेहि भणसि २५, ३६. भम - भ्रम् हि भ्रमसि १८७; मंत-चमत् ५८, २१६; °मंति-भ्रमन्ति २१७; 'मिय भ्रमित १५६; °मेइ- भ्रमति १६, १७९ आदि; मेहि-भ्रमसि ३६, १६३, १८६. भल्ल - भद्र १४८, २०० (हि. भला) भव- ( तत्सम) ११२, २१०. भंज- (तत्सम ) जेविणु-भक्त्वा १७४; जेसइ-भक्ष्यति १५५, जंत-भज्यमान १४४ ( देखो भज, भन्न). भंतडी- भ्रान्ति १६९, १७५. भति- भ्रान्ति ११६, १२६ आदि. भाअ-भाव ५, १५ आदि. भाव- (तत्सम ) ११०. भाव-भावय् इति ३८; भाति ४८, १०४, १०५; हि- भावय २०९, विवि-भाव- यित्वा २११. भावडा - भाव+डा २५, ३६. भासिअ-भाषित २०८, २०९. भिक्ख - भिक्षा १८६. भिश्च - मृत्य २८. • भिण्ण-भिन्न १०७, १२८, १२९. भिणिय-भिन्ना १२७. मियमडा - (१) ऊंट का कोई साज ११३. भितर- अभ्यन्तर १५४. "भुल्ल - ऋष्ट (भ्रान्त)१७ (हेम. ४, १७७; हि. भूला) भुवणयल-भुवनतल १०१,१३२. भुजंत - भुजमान ५. भूव - भूत १०४. भेअ-भेद १, ३९, ५३ आदि. भेडिआ-वृकाः१८७ (हि.भेडिया) , पाहुड-दोहा टीका ) भोय-भोग १५. मई-मया २०८;मझु-मम ११९ भोयण-भोजन २१५. महु-मम ९९, १८६ आदि; महु-मह्यम् १८२. म महंत- महत् ११, ९.. महापुरि - °री ४८, १३४. म-मा ९, १७, २६, ३२, आदि. महिल - महिला, लाण-नाम् (हि. मत) १५६. मअ-मद १३८. महुयर - मधुकर 1५२. मइ - मति १०३. मइल- मलिन १९ (हि मैल) महुर - मधुर २००. महेली - महिला, महेलिका ६४ महलअ- मलिन + क १६३. मइलिय - मलिन ६१. ( महेला, हेम. १, १४६ मउलिय -मुकुलित ११५. मं-मा १३, १४३. मज्झ- मध्य २३, १४१ आदि. मंजरि-(तत्सम ) १५२. मज्झण- मध्याह्न १८२. मंडिय- मण्डित १२. मढ-मठ १३१. मंत - मंत्र ६२,२०६. मण - मनस् ६, १४ आदि. मा- ( तत्सम) १२,३३,४८. मण-मन् °णि-मन्यस्व २६. माण-मान १५६. मणुब्भव-मनस् + उद्भव २१०. माणिकडा- माणिज्य + डा मत्थ मस्तक ७० (हि.माथा) २१६. मर-मृ इ-नियते १४, ५४. माणुस- मानुष ९३. मरगअ-मरकत ७१. मायाजाल - (तत्सम) ६९. *मरट्ट- मर्यादा, गर्व १५६ *माहू - (!) लाक्षारस ९९ (हेम. ४, ४२२ उदाहरण) मरण- (तत्सम ) ३३,७६ आदि. मि- पि ( अपि, अनुस्वार के मरणक्खय-क्षप ९८. पश्चात् ) २६,५५,१०२. मल-(सत्सम) ६१,८१ आदि मिच्छादिट्टि - मिथ्यादृष्टि ७०. मसि-मषि १७३. मित-मित्र ३४,७४,आदि. - ( हि माहुर) शब्दकोश ९३ मित्थत्तिय - मिध्यात्विन् २०. मिलिअ-मिलित ४५,४९ आदि. *मिल्ल-मुंच हु-मुञ्चत ४८; 'ल्लिवि-मुक्त्वा २९,३७आदि, 'ल्लिय-मुक्त; "ल्लि-मुञ्च १७१; (हि-मेलना). मुअ - मुच् एइ-मुञ्चति १५; 'यंति-पुरुवन्ति १५४, मुक-मुक्त १५,१९०,२०३, मुकिय- मुक्ता, वाराङ्गना १५०; मुक्ख-मोक्ष १०. मुक्ख मूर्ख २७. मुच्च - मुच् हि-मुच्यसे ६१; मुञ्च ९२. *मुट्टा-(?) स्थूल १३१ (हि.मोटा ). मुट्टि - मुष्टि १५७. मुण-(तत्सम् ) हि १२९; 'णेइ मुणति ७८; °णेहि-मुग २५,३३,८१; °णंति ८०, ८६; गंत-मुणत् २४, 'णिअ-मुणि 1 १४१. मुणि - मुनि १६,२४ आदि. 'मुणिअ- मुणित १४३. मुत्त-मूत्र १९५,१९६. मुय-मृत १५२. मुवअ-मृत + क १२३. मुंड- मुण्ड १५३. मुंडण - मुण्डन १३५. मुंडाइवि - मुण्डयित्वा १५३. मुंडिअ- मुण्डित १३५. मूढ - मूर्ख १३, ५२, ८५. मूल -( तत्सम ) १०९. मूलगुण - ( तत्सम) २१. मूलट्टिअ- मूल + स्थित १४६. मेलय-मेलक १८४, १८५. मलयअ - मेलापक ९५. मेलावडा-मेलापक १२७. *मेलिय- मुक्त १५३ देखो मिल्ल) मेलियह-मलिनायते २१५. मेलवइ - मोचयति ४६ ( देखो मिल) 'मो-मह्यम् १२२. मोकलअ-मुक्त + क ४८, ५९, १२३. मोक्ष - मोक्ष, ७, ११ आदि. मोड - मुद् डिवि-मोटयित्वा ९५ (हि. मोड़ना) मोह -( तत्सम ) १०, १४, ५८ आदि. मोहिय- मोहित ८, ५०, ८१ आदि. य य-च१०.

पाहुड-दोहा र रीण-(तत्सम ) रि+क-आगत (श्रान्त) ११५. रुच-रुच्, इ-रोचते २०६. रूव-रूप १०१, १३२. रूस-रुष 'सि-रुष्य ९३. रोय-रोग ३४. रोस - रोष २०४. रम- मंति-रमन्ते ल रह - रति १३, ४२, ९२. रक्खिय-रक्षित ४४. रज- र जियइ-रज्यताम् १०७. रजु - ( तत्सम ) २२०. रक्त २१७. मंति-रमन्ते ७० 'रमंत- रममाण ३; "मिय-मित १९६. रयण-रत्न १५१. रवि-(तत्सम) २१९. रस-(तत्सम ) १.१. रस-रस् °सिवि-रसयित्वा १५२. रह - रक्ष हंत-रक्षत् १९१. (हि. रहना ). रहिअ - रहित ८४. रहिय- रक्षित ( रहा) ४९. रंज- 'जिजा-रज्यते ६. रजिअ, य- रक्त १०१, १३२, २०1. राम - रामा ( स्त्री) ४२. गमसीह - "सिंह ( ग्रंथकती ) २११. राय- राग १०१, १३२, २०४. रिसह.- ऋषभ (नीर्थकर ) ६३. रिसि- ऋप २१०. लअ-लय १६९, *लइ - शीघ्र १११ ( सम्मवत: लात्वा से) लइय- लात, इण लातेन ९१ (हि लेने से) लक्ख-लक्ष ८, २३. लक्ख-लक्ष्य १११, १८८. लक्खिअ-लक्षित ५६. लग्ग - लग्न ४५, १८५. लग्ग - लग् 'इ-लगति ५९, ९०; गु-लग ( लेट् ) १०५. (हि. लगना) लद्ध-ल.ध १२३, २१६. लल्लि- लालसा, स्पृहा १७४. ( ललं सपिह-णूणेमु दे. ७, २६ ). लह - लम् इ-लभते ३; "हिं-लभन्ते इति १६४, हि-लभ- शब्दकोश - स्व १३३; हेहि-लभसे ८१%B "इंत-लभमान ८; हिवि. लन्धुम् १७९. लहु-लघु ( शीघ्र ) ४, १३, १३३, १९६. ला-ला, लेइ-लाति २२०; लाए- विणु-लात्वा १५०; लएइ. लात्वा १९४ लायअ-लात ११५; : हि. लेना ). लिह-लिख, हि-लिख १४४; हिहि-लिग्न १५७; हिअ. लिखित १६६. लिंग- (तत्सम ) ३४, ३५. लिंगग्गहण - लिंग+ ग्रहण १५. लीण - लीन १७३. लीह-रेखा ८३. लुद्धअ-लुब्धक १४६. लुंचण- लुञ्चन १६. लेअ-लेप ९०. लोअ, य - ले.क ६,९६,१८०, १९५. लोण - लवण १७६. लोयण - लोचन २०३. लोह- लोभ ८१. लोह - (तत्सम ) १४८. 'वण वइस-वैश्य ३१. वहसाणर- वैश्वानर १४८, वक्खाणडा व्याख्यान+डा ८४. वट्ट-पत्र, वर्त्मन् ११५. नट्टडिय - वर्मन् + डी ४७,११४. (हि.वाट-मार्ग). वड - उक्त, "डिण-उक्तेन १४५. *वडवड - विलापार्थे ध्वनिसूचक धातु, इ = प्रलपति ६. (विलपेझखवडवडी, हेम, ४,१४८.) चढ - मूर्ख ( कोमलामंत्रणे) २,२२,६४ आदि.(सम्भवतः वटु से; म. वेडा). वन १८७. वण्ण - वर्ण ३०,३४,३५,३८. वण्णर वानर २१. वण्णि - वर्णिन् २६. वत्थु-वस्तु १६१. वद्ध-वृद्ध १५३. *वप्पुडअ- वराक ५ (पुरानी हि. वापुरो). वम्म - वर्मन् १५७. वय-व्रत ११३. वयण वचन २३. *वयल्ल-कलकल १३२. (वियसंत कलयलेसुं वयलो, दे. ७,८४.) - १ve - व वइरि-वैरिन् ११७.

९६ पाहुड-दाहा वर-(तत्सम) २०,३१. बराअ - वराक ५६. वल- लिवि वलित्वा ५१. बलि-अलि १८९,१९२. ववसाअ-व्यवसाय २०२, २०५. ववहार-व्यवहार ६८. वस-वश१०,९६, वस-वस् इ-ति ५३, ९४; संति ७३; °संत-वसत् ४१, १००, आदि; °सावइ- वासयति १८१; सिय- उषित १९२. वह - इ-वहति १८१; 'हाइ. वाहयति १३०; वाहि-वाहय १५, १६.. वह-वध १०५. वंच-उं-वञ्चयामि १३९. वंद - °उ-वन्दत ४१;°हु-वन्दध्वम् ४१. वंदअ- वन्दक (१) ३२. वंस-वंश ८६. वाड - वर्मन् , या पाटक १०६, १३.. वादविवाद - ( तत्सम) २१७. वामिय-वामीकृत १८१. वार- उ-वारयामि ११८; रि- वारय १५५, १५.. वारणहं - वारितुम् १८९. वाल बाल (रोमन् ) ९४. वावर-व्यापृ .इ-व्यात्रियते ५५. वावार- व्यापार २०३, २.४. वास-(तत्सम) १२, २०, आदि. वाहि - वाहय ( देखो वह ) १७, १६.. वाहि - व्याधि २१.. वि - पि ( अपि) ३, १० आदि. (हि. भी.) विग्गुत्त- विगुप्त (सचेल) १५४ *विञ्च- वर्मन् १८८. (हि. बीच-मध्य) विचित्त-विचित्र ३४. विचिंत-हि-विचिन्तयसि ११. *विडाविड - रचित ( कल्पित) १९९. ( ' रचेगहावह- विड-विटाः' हेम. ४, ९४.) विढप्प- अर्ज इ अर्यते (वर्धते) १९; (अर्जेविढष्पः, हेम.४, २५१ *विणड-त्यज् ०इन्त्यजति १९६ (ड-गुप् हेम. ४, १५० गुप्यर्विरणडौ. सम्भवतः वि+नट से बना है। यहां प्रसंग में त्यज का अर्थ अधिक उपयुक्त होता है).

शब्दकोश विणास-इ-विनाशयति ७५. विणास- विनाश २१९. विणिम्मिय-विनिर्मित २५, ११७. विणु-विना ५५. विण्णि-द्वि ४३,४९,२१३. वित्थर-- विस्तार २०५७. विद्ध -- ( तत्सम) १५७. विपिल्लिअ-- विप्रेरित १६७. विप्फुर -- वि + स्फुर् इ °ति २४,६५. विबोह-विबोध ८२,१६७ विभाविय- ०त ७५. विभिण्ण - विभिन्न २६,४०. विमीसिय- विमिश्रित ६७. वियप्प-विकल्प ६५,११०, १४२. वियप्पडा- विकल्प + डा १३३. वियप्पिअ -- विकल्पित ५६. वियाण -- वि+ज्ञा, °णु-विजानीहि विल्लडिय-- वल्लि + का ११२. विल्लि -- वल्ली १७४ (देखो वेल्लि). विवज्जिअ . विवर्जित २५,७२, ७६ आदि. विवरिअ -- विपरीत २५. विवरर -- विपरीत १२५,१२९. विविह.- विविध १६८. विस.. विष १,२०, विसज्जण -- विसर्जन १३६. विसम-विषम ११२,१८९. विसय - विषय ३,४ आदि. विसहर- विषधर २०. विसाअ-विषाद ४८. विसेस-विशेष २०,३१,२०७. विहअ-विभव १३८. विहडिय - विघटित ७३,१८५, विहत्थ - विहस्त, विहीन ८६. विहाण - विधान १५१. विहीण - विहीन ५५,१४७. विहूण विहीन ३८. विंझ - विन्ध्य (पर्वत) १५५. वीसमिय - विश्रामित ११५. वीसारिज्ज- इ-विस्मार्यते ५. वीहअ-- विभीत ७४. घुञ्च -- ब्रज °इ-व्रजति १६८. वुणणहं - वातुम् १०८ (हि. बुनना) . .. वियाल --विकाल (विगतकाल, अन्त) १८२. विरल -- ( तत्सम) १०३,१२७. विरोलिय विलोडित १४७. (मन्थे सल-विरोली, हेम. ४,१२१. विलिज-- °इ-विलीयते १४, १७६.

पाहुड-दोहा वे --द्वे १०५,१७४,१८८ आदि. वेमुह -- द्विमुख २१३. वेय --विद् °इ-वेत्ति १६५. वेय--वेद १२६. वयण -- वेदना ७४. वल्लि -- वल्ली १७१ (हि. वेल). स - समरसि- समरसिन् ४९,६४, १७६. समाण-समान १२३. समाहि- समाधि १३९, १७६, २१०. समित्ति- संतृप्ति १६५. समुद्द - समुद्, समुद्र ( समान +मुद्रा) १५०. सम्माण "उ-सन्मानयामि १३९. सयल - सकल ७, १३ आदि. सयलीकरण -सकली° १८४. सरिजल - सरित् °१६७. सरीर-शरीर १०२. सरूव-स्वरूप १४२, सलिल - (तत्सम ) १४७. सल्लडा-- शल्य + डा ७४. सव- १०३. सवण्ण - स्ववर्ण, सवर्ण ३०, १५९. सव्व - सर्व २७, ३२,६५ आदि. सव्वंग- सर्वांग १३६. सव्वंगअ- सर्वाग+क ५०. ससि- शशिन् २१९, २२०. सह - °इ-सहते १६; °हंत-सह- मान ८; °हेर-हते ११८. सहज-(तत्सम) १७०, सहस त्ति- सहसा + इति ९५. सहाअ°व-स्वभाव २२,३५, आदि. सर्व ८९, - सई- स्वयम् ७३,१७०. सकिय-- संस्कृत १४९. सग्ग -- स्वर्ग १०५. सगुणी- ( सत्सम ) १०.. सच्च- सत्य ७९. सड्डुच्छलइ - (2) १५७. सण्ण-सत् + क्त ३५. सण्णाण-सद् + ज्ञान १३७. सत्त-सप्त २२०. सत्ताव -- °इ,संतापयति ६४. सत्ति -- शक्ति ५३,५५, आदि. सात्तसिअ-शक्ति + शिव ५३. सत्थ-शास्त्र २४,१९९. सद्द-शब्द १६८. सप्प-सर्प १५. सब्भा सद्भाव ३८,२०४. समा-शम ११३. सम-सम २१५. समत्त--सम्यक्त्व २१५.

शब्दकोश ९९ सालिसित्थ- शालिसिक्थ,नाम, ५ ( देखो टिप्पणी). सावय श्रावक ९६. सास.. श्वास १४,२०३. सासय-शाश्वत ४,६३, साहिक - साधक, या सहायक १२०. . सहि - सखि ४५, १२२ आदि. सहिय - सहित ५३. सह-सह २०, १४८. संकप्प-संकप ५६, १४२. संग- (तत्सम) १०२, १४८. संगहिअ - संगृहीत ८४. संख- शंख १४९, १५१, १५७. संघट्ट- °इ-संघति १६७. संचर- °इ-संचति ८९: -°तु.४. संजम-संयम ११३. संठिय-संस्थित्त ९९. संत- सत् ३८, ९४, १२४. संतावि- संतापिन् १३०. संताव- °विजइ-सताप्यते १७८, १९५,२१४, संतोस-- संतोप २. संदेह - सन्देह १२,२०३. संधाण-सन्धान १२१. संधिय-संहित १२१. संभव- °इ-ति ५४. संवर-( तत्सम ) २०७. संसार-( सत्सम) १६,३६, आदि. संहारि-- संहारिन् १७०. सामल-- श्यामल २६.३०. सामिअ--स्वामिन् २८,५४,१८३. सार--( सत्सम) ६८,२०९. सि.. असि ४४,८५,१४१. सि-शिव ३८,५०,१६०, सिक्ख - शिक्षा १५३. सिक्ख -- °वमि-शिक्षयामि १०६; क्खि-शिक्षय ८४; क्खियव्व-शिक्षितव्य ९८. सिग्घ-- शीघ्र ५३. सिज्ज-. °ए-सीव्यते २१३. सिट -- शिट ९. सिद्ध -- ( तत्सम) १२६,२१५. सिद्धत्तण - °त्व ८८. सिद्धंत - सिद्धान्त १२६. सिद्धि - ( तत्सम ) ४८,१३४, १४३. सिर - शिरस् १३५. सिव-शिव ५५,१२७. सिवतत्त - शिव + तत्त्व १२१. सिवदेअ - शिव + देव ५४. सिवपअ-शिव + पद १३. सिवपुरि - शिवपुरी ९७,२२१. सिवि- शुक्ति १५७, (हि-सीप).

पाहुड-दोहा सिस्सिणी-शिष्यानी १७४. सिह-सह १२७. सिहु - सह ६४,११०,१६८, सिंग-शृंग ७०. सीलवण-शील + वन १५६. सीस-शिष्य २७. सीस-शीर्ष १७७. सु-सः ६८. सुअ-सुप्त १८२. सुइ-श्रुति ९८,१०३. सुक्क °इ-शुष्यति ९७. सुक्ख-सुख १०,११,२४, आदि. सुक्खअडा-सुख + क + डा. १०६. सुक्खडा - सुख + डा १८९. सुगुरुवडा-सु + गुरु + क + डा १३०. सुघण-सु + घन १४८. सुणह-श्वन् १९५. सुण्ण - शून्य १३१,२१२, आदि. सुद्ध-शुद्ध ६,३७,१६२. सुपसिद्ध - सुप्रसिद्ध २०८. सुमर - हिं-स्मरन्ति १०३. सुमिट्ठ - सुभिष्ट १८. सुम्म -इ-श्रूयते १८८. सुरतरु - (तत्सम) १५२. सुवेय - °इ.सु + वेत्ति १६५. सुव्व - इ-स्वपिति २०६. सुह - सुख २,३,४ आदि. सुह-शुभ ७२,१४२. सुंधुकी - संक्षित, प्रदीप्त ८७. (सन्धुक्क-प्रदीप, हेम ४, १५२.) सूई - शूची २१३. सूर-शर २८,३२. सूर - सूर्य ७५. सेव-इ-सेवते १९४; वाइ-सेवते १३१; हि-सेवसे १२०, २०५; °वंत-सेवमान २००. सेवड-श्वेताम्बर ३२. सेविअ - सेवित २०. सेस-शेष ( शद ) ३१. सो - सः १६,२३ आदि; तम् ४६,१६०. सोइ - सोऽपि ११७,१७५. सोक्ख - सौख्य ६३,१३३,२१३. सोव - वेद-स्वपिति ४६ °उ-स्वपितु १४४. सोस- शोष २. सोसण - शोपण १६. ho हां - अहम् २६,३१,३२,५१, १७४.

शब्दकोश १०१ हण - गंत-प्रत् ६५; गेवि-हत्वा ६६,१७२. हत्थ-हस्त १४,११५,१५० आदि. हत्थडा-हस्त+डा ८६. हत्थिय - हस्तिन् १५५. हयास-हताश १५२. हर - रोप्पिणु हृत्वा २१५. हरिण-( तत्सम ) १४६. हरिस- हर्ष ४८. हल लि- सम्बोधनार्थक अव्यय ४१,४५,१२२,१३६,१३९. *हलोल - हिलोल २२० (हि-हिलोर ). हंहिंडिय-हहिण्डित (भ्रशार्थ) १७९. हास -(तत्सम) १८६. हि-( तत्सम) अव्यय १६७. हिमकरण - हिमकिरण (चन्द्र) १. हियअ- हृदय २,४,१४२. हियडा -- हृदय + डा ५,५९, ७६ आदि. हु- इ-भूत्वा ४९; हुँति-भवन्ति २१३. हुयवह-हुतवह १४९. हुववह-हुतवह १२०. हू- °वइ-भवति १७६; °व-भूत १६२ ( देखो हु). हेउ - हेतु २४,६०. हो - °इ-भवति ४६, ५१ आदि. उ-भवतु १३८, होति- भान्ति ७०,२००; °सइ भविष्यति १६१, १७०; सहिं-भविष्यन्ति ११९; 'हि-भवसि २९,मव ४३. ०

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टिप्पणी

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टिप्पणी - ३. 'देविहिं कोडि ' का " करोड़ों देवियों के साथ अर्थ करने में — कोडि ' शब्द में तृतीया विभक्ति का लोप मानना पड़ेगा, अर्थात् कोडि यहां कोडिहिं ( कोटिभिः ) के बराबर है। कोटि को सप्तम्यन्त मानकर देवियों की कोटि में ' अर्थ भी सम्भव है। ५. ' सालिसित्थ' का उल्लेख कुन्दकुन्दाचार्यकृत ' भाव पाहुड' की निम्न गाथा में आया है- मच्छो वि सालिसिथो असुद्धभावो गओ महाणरयं । इय गाउं अप्पाणं भावह जिणभावणं णिच्चं ॥ ८८ ॥ अर्थात् ' सालिसित्य मच्छ भी अशुद्ध भाव के कारण महानरक को गया। ऐसा जानकर जिन भगवान द्वारा उपदिष्ट रीति से अपने आत्मा की भावना कर इस गाथा पर श्रुतसागरजी ने अपनी टीका में शालिसिक्य की यह कथा दी है । पुष्पदन्त तीर्थंकर की जन्मभूमि काकन्दीपुरी में सौरसेन नाम का राजा था । उसने श्रावक के व्रत लिये थे और मांसभोजन का त्याग किया था, किन्तु एक वेदानुयायी रुद्रदत्त की संगति से उसकी मांस-भोजन की इच्छा हुई। व्रतभङग और

१०६
पाहुड-दोहा
लोकापवाद के डर से वह प्रकटरूप से मांस न खा सका ।
अतएव उसने अपने एक कर्मप्रिय नामक रसोइये को गुप्तरूप
मांस पकाने के लिये कहा। रसोइया प्रतिदिन नानाप्रकार के
जीवों का मांस पकाता किन्तु किसी न किसी अडचन के कारण
राजा उसे खा न पाता। कर्मप्रिय को एक दिन सांप ने डस
लिया जिससे मरकर वह स्वयंभूरमण समुद्र में महामत्स्य हुआ ।
राजा मांसभोजन की इच्छा को तृप्त न कर पाया किन्तु लोलु-
पता के कारण मरकर उसी महामत्स्य के कान में शालि अर्थात्
तंदुल के आकार का कीड़ा हुआ । वह उस महामत्स्य के मुख
में अनेक जलचर जन्तुओं को प्रवेश करते हुए और पुनः बाहर
आते हुए देखकर अपने मन में कहता ' अहो, यह मत्स्य बड़ा
मूर्ख और अभागी है जो अपने मुँह में आये हुए जन्तुओं को भी
छोड़ देता है । यदि मैं इतना बड़ा मुँह पाता तो सारे समुद्र को
जीवरहित कर डालता । इस प्रकार मांस खाने की शक्ति न
होते हुए भी कुभावना के कारण शालिसिक्थ मर कर सप्तम नरक
को गया।
दोहा ४ और ५ का भगवद्गीता के निम्न श्लोकों से मिलान
कीजिये
न कर्मणामनारम्भान्नैष्कर्म्य पुरुषोऽश्नुते ।
न च संन्यसनादेव सिद्धिं समधिगच्छति ॥४॥
न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत् ।
कार्यते हवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः ॥ ५ ॥

टिप्पणी १०७ कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन् । इन्द्रियार्थान्विमूढात्मा मिश्याचारः स उच्यते ॥६॥ यस्त्विन्द्रियागि मनसा नियम्यारभतेऽर्जुन । कर्मेन्द्रियैः कर्मयोगमसक्तः स विशिष्यते ।। ७॥ [अध्याय ३.] ११. इस दोहे की दूसरी पंक्ति परमात्मप्रकाश २५४ में इस प्रकार है- तो वरि चिंतहि तउ जि तउ पावहि मोक्खु महंतु । इसका हिन्दी अनुवाद किया गया है 'इस कारण तू तप की चिन्ता कर जिससे महान् मोक्ष की प्राप्ति हो'। १९. यह गाथा 'उक्तं च ' रूप से श्रुतसागर ने भाव- प्राभूत की १०८ वी गाथा की टीका में उद्धृत की है। २१. पांच महाव्रत ( अहिंसा, अचौर्य, सत्य, ब्रह्मचर्य व परिग्रह ), पांच समिति (ईर्या, भाषा, एषणा, आदान-निक्षेपण व प्रतिष्ठापना ), पंचेन्द्रिय-निग्रह, छह आवश्यक ( सामायिक, स्तुति, वंदना, प्रतिक्रमण, प्रत्यारव्यान व कायोत्सर्ग ), और सात अन्य गुण ( केशलौंच, अचेलत्व, अस्नान, क्षितिशयन, अदंतधावन, स्थितिभोजन व एकभक्त ), ये अट्ठाइस साधनायें जैन मुनियों के मूल- गुण कहलाते हैं। इनका विवरण स्वामी बढकेर कृत मूलाचार के प्रथम अध्याय में देखिये ।

१०८ पाहुड-दोहा उत्तरगुणों की संख्या चौरासी लाख कही गई है। परिचय के लिये मूलाचार का ग्यारहवाँ अध्याय देखिये । इसी भाव के लिये देखो दोहा १०९. २३. यह गाथा कुन्दकुन्दाचार्य कृत भावप्राभृत में निम्न रूप में पाई जाती है- सो णत्थि तं पएसो चउरासीलक्खजोणिवासम्मि । भावविरओ विसवणो जत्थ ण दुरुदुल्लिओ जीव ( जीवो ) ॥४७॥ ३२. खवणअसे क्षपणक अर्थात् दिगम्बर और सेवड से श्वेताम्बर का अभिप्राय है। देवसेन ने अपने दर्शनसार तथा भावसंग्रह दो ग्रंथों में सेवडसंघ की उत्पत्ति के सम्बन्ध में निम्न गाथा लिखी है:- छत्तीसे वरिससए विक्कमरायस्स मरणपत्तस्स । सोरटे वलहीए उप्पण्णो सेवडो संघो। दर्शन०. ११; भाव० ५२. अर्थात् विक्रमादित्य की मृत्यु के १३६ वर्ष पश्चात् सौराष्ट्र देश के वल्लभीपुर में श्वेताम्बर संघ उत्पन्न हुआ । यह दोहा परमात्मप्रकाश ८३ में भी पाया जाता है। वहां संस्कृत टीका में वंदक का अर्थ बौद्ध किया गया है।

टिप्पणी १०९ ३८. इस दोहे का भगवद्गीता के निम्न वाक्य से मिलान कीजिये- सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज । अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ॥ १८, ६६. - ३९. मोक्ष प्राभूत की ५० वी गाथा की टीका में श्रुत- सागर ने निन्न दोहा उद्धृत किया है जीवा जिणवर जो मुणइ जिणवर जीव मुणेइ । सो समभावपरिट्टियउ लहु णिव्वाणु लहेइ ॥ ४०. अनुवाद में 'जिणु' कर्ता कारक में लिया गया है । उसे कर्म कारक में लेकर निम्न प्रकार अनुवाद किया जा सकता है। '(कोई कहता है) जिन को जानो, जिन को जानो' । इसी प्रकार दोहा नं ४१ में भी किया जा सकता है । ४२. अनुवाद में प्रथम पंक्ति का संस्कृत रूपान्तर इस प्रकार लिया गया है- -- 'उत्पलानि दृष्टा करभः (गजशावः ) दाम मोचयति यथा चरति ' । उक्त पंक्ति का रूपान्तर निम्न प्रकार भी किया जा सकता है-' उत्पल्याणय पोगिन् करभकं ( उष्ट्रं ) दाम मुञ्च यथा चरति ' । अर्थात् 'हे जोगी, ऊँट पर पलान रख और उसका बन्धन छोड जिससे वह आगे चले' । किन्तु दूसरी पंक्ति के भाव के अनुसार .

११०
पाहुड-दोहा
प्रथम दिया हुआ अर्थ ही अधिक उचित है यद्यपि व्याकरण की
दृष्टि से द्वितीय अर्थ अधिक अच्छा है क्योंकि प्रथम अर्थ में
'उपलाणहि ' का उत्पलानि और ‘छोडहि' का मोचयति रूपान्तर
शंका के परे नही है।
५५. शिव और शक्ति को ही सांख्य दर्शन में पुरुष और
प्रकृति, वेदान्त में ब्रह्म और माया तथा जैन सिद्धान्त में जीव और
अजीव कहा है।
५६. वेदान्त में चित्त या मन की परिभाषा यह पाई जाती
है-' संकल्पविकल्पात्मिका वृत्ति मनः' अर्थात् संकल्प विकल्प
रूप वृत्ति का ही नाम मन है जिसका मूल अज्ञान है। जब जीव
पूर्णतः ध्यानमय या समाधिस्थ हो जाता है तब यह संकल्प विकल्प
रूप वृत्ति नष्ट हो जाती है अर्थात् मन का लय हो जाता है।
५७. आत्मा के निर्मल होने से जो सर्वज्ञता का उदय
होता है उसे ही जैन सिद्धान्त में केवल ज्ञान कहा है ।
६३. रिसह ऋषभ जैनियों के प्रथम तीर्थकर हुए हैं
जिन्होने इस युग में ऋपिधर्म चलाया ।
का
६५. 'सयलई धम्म कहंतु ' सब धर्मों का
व्याख्यान. करता हुआ ' यह अर्थ भी हो सकता है। इस अर्थ में
धर्म से बाह्य सक्रियाओं का अभिप्राय है। अर्थात् जो व्याक्त

टिप्पणी १११ बाहरी आचार-विचार का पूरा पंडित और उपदेशक है उसके मन में यदि आत्मा के सच्चे स्वरूप की भावना उत्पन्न नहीं हुई तो वह भी मोक्ष नही पा सकता। ६६. जीव के रागद्वेषादि परिणामों से जो जीव और कर्म- परमाणुओं का बन्ध होता है उसे कर्म कहते हैं। कर्म का स्वभाव आत्मा के गुणों को दबाने या ढक लेने का है। वह आठ प्रकार का माना गया है- ज्ञानावरण, दर्शनावरण, वेदनीय, मोहनीय, आयु, नाभ, गोत्र और अन्तराय । इन्ही आठ बंधों के प्रभाव से जीव को संसार की भिन्न भिन्न अवस्थाओं का अनुभव होता है। ६८. जैनधर्म में वस्तुओं के स्वरूप को समझने तथा वर्णन करने के दो दृष्टि-कोण हैं जिन्हे नय कहते हैं एकनिश्चय नय और दूसरा व्यवहार नय । निश्चय नय में वस्तु के असली, अमिट स्वरूप का ही विचार किया जाता है, तथा व्यवहार में उसके क्षेत्रकालादि परिस्थिति पर ध्यान देकर विचार किया जाता है। प्रस्तुत दोहे का तात्पर्य यह है कि आत्मा का असली स्वरूप, निश्चय नय से तो चैतन्य अर्थात् देखना और जानना (दर्शन और ज्ञान ) है, किन्तु व्यवहार में इन्द्रिय, मन, बुद्धि आदि का व्यापार भी आत्मा का रूप माना जाता है । दोहे की दूसरी पंक्ति में योगियों को निश्चय नय से आत्मा को पहचाने तथा अगले दोहे में व्यवहार दृष्टि को छोड़ने का उपदेश दिया गया है। देखो भावपाहुड़ की निम्न गाथा- ..

पाहुड-दोहा एगो मे सस्सदो अप्पा णाणदसणलक्खणो। सेसा मे बाहिरा भावा सव्वे संजोगलक्खणा ॥५९॥ ७४. दोहे का सारांश यह है कि जिस प्रकार अणुमात्र कांटा भी यदि शरीर में चुभ जावे तो पीड़ा उत्पन्न होती है, उसी प्रकार अणुमात्र भी परभाव जब तक आत्मा में वना हुआ है तब तक उसे सच्चा सुख अर्थात् मोक्ष नही मिल सकता । देखो बोधपाहुड- तिलतुसमत्ताणमित्तं समवाहिरगंथसंगहो णत्थि । पवज हवइ एसा जह भणिया सव्वदरिसीहिं ॥ ५५ ॥ ७७. यह दोहा थोड़े से परिवर्तन के साथ पुन नं. १९३ पर पाया जाता है ८६. दोहे का भावार्थ पूर्णतः स्पष्ट नहीं है। तात्पर्य यह समझ पड़ता है कि जिस प्रकार वंश · अर्थात् उच्च वंश की प्राप्ति न होने से डोम दूसरों के हाथ जोड़ते हैं, अर्थात् पराधीन रहते हैं उसी प्रकार जो शब्दाडम्बर का ही अभिमान करके सच्चे ज्ञान की प्राप्ति नही करते वे मुक्त नही हो पाते, अर्थात् संसार में ही भ्रमण करते हैं। ८७. जैसे अग्नि का कण प्रज्वलित होकर वन के हरे व सूखे सभी झाडों को भस्म कर डालता है उसी प्रकार एक आत्म- ज्ञान, पूर्णता को प्राप्त होने पर, समस्त पुण्य और पाप का नाश करके मुक्ति का मार्ग साफ कर देता है। ऊपर दोहा ७२ में टिप्पणी कह आये हैं कि पुण्य और पाप क्रमशः सुख और दुःख के कारण हैं। मुक्ति दोनों के नाश होने से ही मिल सकती है। ९४. इस दोहे का अर्थ कुछ अस्पष्ट है। अधिक अच्छे अर्थ के अभाव में मैने ऐसा अर्थ लगाया है । हाथ अर्थात् भुजा- मूल से नीचे जो हृदय-स्थान है वही आत्मदेव का मंदिर है। वह ऐसा सुरक्षित है कि वहां नाल का भी प्रवेश नहीं हो सकता। वहीं अर्थात् अपने गूढ हृदय में ही उत्त सच्चिदानन्द को ढूँढना चाहिये। ९५. इस दोहे का परमात्मप्रकाश में कुछ भिन्न पाठ पाया जाता है- अप्पापरह ण मेलयउ मणु मारिवि सहसत्ति। सो बढ जोएं किं करइ जासु ण एही सत्ति ॥२८८॥ प्रस्तुत दोहे का निम्न उपनिषद् वाक्य से मिलान कीजिये । नायमात्मा बलहीनेन लभ्यो न च प्रमादात्तपसो वाप्यलिंगात् । एतैरुपायैर्यतते यस्तु विद्वां स्तस्यैष आत्मा विशते ब्रह्मधाम ॥ मण्डूक, ३, ४. ९६. प्रथम पंक्ति का संस्कृत रूपान्तर इस प्रकार लिया गया है ‘स योगो यत् योगपतिः निर्मलं ज्योतिः पश्येत् ' । निर्मल ज्योति से तात्पर्य शुद्ध आत्मा का है।

पाहुड-दोहा ९७. यहां एक अक्षर से तात्पर्य सम्भवतः ॐ से है जो ब्रह्म, परमात्म या सोऽहं का भाववाचक है। ९८. इस दोहे का निम्न श्लोक से मिलान कीजिये अनन्तपारं किल शब्दशास्त्रम् स्वल्पं तथायु बहवश्च विघ्नाः। सारं ततो ग्राह्यमपास्य फल्गु हंसो यथा क्षीरमिवाम्बुमध्यात् ॥ ९९. निर्लक्षण, स्त्रीबाह्य और अकुलीन, कुत्सित नायक तथा शुद्ध आत्मा के विशेषण हैं। आत्मा के अर्थ में अकुलीन का अर्थ होगा 'न को पृथिव्यां लीन: ' अर्थात् जो पृथ्वी व संसार में लीन न हो । अन्य दो विशेषण दोनों अर्थों में स्पष्ट ही हैं। दूसरी पंक्ति का भाव यह प्रतीत होता है कि जिस प्रकार शुष्क और नीरसहृदय व्यक्ति के प्रेम में पडकर नायिका अनेक शृंगार करने पर भी उसे नही लुभा सकती, उसी प्रकार शुद्ध आत्मा इन्द्रियविषयों द्वारा सदाकाल बन्धन में नही रक्खा जा सकता। यही भाव अगले दोहे में भी है। भक्त का प्रेयसी बनकर पर- मात्मा को प्रेमी के रूप में सम्बोधन करने की प्रणाली पुरानी भक्तिरस-प्रधान कविता में बहुत पाई जाती है। १०२. तात्पर्य यह कि जब तक थोड़ा भी शरीर का मोह रहेगा तब तक इष्ट-वियोग और अनिष्ट-संयोग से दुःख की उत्पत्ति

टिप्पणी
११५
होगी। जब जीव सर्वथा निर्मम हो जाता है तब उस पर सांसारिक
द्वन्द्व का कोई प्रभाव नहीं पड़ता । देखो ऊपर दोहा ७४.
१०३, तात्पर्य यह कि बहुधा लोग कहा करते हैं कि
यौवन में संसार के सुखों का पूरा आनन्द लेकर वृद्धावस्था में
धर्मसेवन कर लेंगे और अगला भव सुधार लेंगे। किन्तु जब
वुढापा आता है तब शरीर की शिथिलता के साथ मन की सब
शक्तियां भी नष्ट हो जाती हैं । उस समय धर्मसाधन की कौन
कहे परमात्मा का स्मरण करनेवाले भी बहुत थोड़े ही निकलते
हैं। अधिकतः लोग आतध्यान में ही समय बिताते हैं।
.
१०४. अर्थात् जिसका मन सांसारिक पदार्थों से हट कर
मन के परे जो आत्मा है उसमें स्थिर होगया उसे फिर संसार के
मायाजाल में फंसने का डर नही रहता ।
०६. दोनों मूल पोथियों में ' सुक्खडा ' पाठ है किन्तु
इसमें एक मात्रा की कमी होने से छंदोभंग होता है इससे
सुक्खअडा ' पाठ कर दिया गया है।
१०७.
'जोइ' अनुवाद
पश्य
' के समरूप लिया
गया है । यदि उसे ' योगिन् ' के समरूप माने तो यह अर्थ
होगा “ जो देह से भिन्न, ज्ञानमय है, हे जोगी, वही आत्मा तूं है।"
१०८. 'पुत्तिए' (पुत्रिके ) अम्मिए ( अम्बिके ) के
सदृश सम्बोधनार्थ अन्यय सा प्रतीत होता है । धनपाल कृत
में

११६
पाहुड-दोहा
।
भविसयत्तकहा में आश्चर्य के अर्थ में 'पुत्ति चोज्जु ' अव्यय
अनेक वार आया है। ( देखो भविस. ४, ७, ९ आदि ).
इसका अर्थ ' अहो आश्चर्य है । ऐसा करना चाहिये । डाक्टर गुणे
ने उसे एक ही शब्द के रूप में लिया है।
१०९. जिस प्रकार मूल को छोड़ कर एकदम वृक्ष की
डाल पर चढना दुस्साध्य है उसी प्रकार मूल गुणों का पालन किये
विना उत्तर गुणों का पालन नहीं हो सकता। इसी भाव के लिये
देखो ऊपर दोहा २१.
११०. जिनकी भ्रान्ति मिट गई और चेतनभाव जागृत
होगया उनका पर के साथ ऊपरी संसर्ग रहने पर भी कोई कर्मबन्ध
नही होता । ' आत्मा पर के साथ खेलता है' इसका तात्पर्य यह
है कि उसका पर के साथ घना सम्बन्ध नहीं होता, कमलपत्र
और जलबिन्दु सदृश साथ रहता है ।
१११. यहां करभ से तात्पर्य इंद्रियों सहित मन से है।
जिसने मन को जीत लिया वह सब प्रकार मुक्त हो जाता है ।
११२. हिन्दी व मराठी में पैगाम लगाम या प्रग्रह को
कहते हैं और · विल्लडिय' कदाचित् 'लड उन्क्षेपणे' धातु से बना
[विलडित } । इसी आधार पर अनुवाद किया गया है ।
इसके पश्चात् एक मणकरहा-जयमाल नामक अप्रकाशित
अपभ्रंश कविता में हमने निम्न पद्य पढा---
.
.

टिप्पणी
११७
'
का अर्थ
मणकरहु जु बंधिवि घरि धरइ तवविल्लडी चरावइ ।
परियाणिवि कालहो तणिय गइ संजमभंड भरावा ॥
इस पद्य में ' तवविल्लडी चरावइ ' का जो भाव है उस पर
से प्रस्तुत दोहे की प्रथम पंक्ति का संस्कृत रूप हमें इस प्रकार
अँचा- 'करभ वर जिनगुणस्थल्यां तपोवल्ली प्रकामम् ' जिसका
अनुवाद है ' हे करभ ! जिनगुण रूपी स्थली में तप रूपी वेल
को यथेच्छ चर'।
।' 'चर
खाना' और ' आचरण
करना ' दोनों हैं । यह अर्थ अधिक अच्छा है।
११३. 'भियमडा' का अर्थ समझ में नहीं आया।
प्रसङ्ग से जान पड़ता है कि यह ऊँट की सजावट में उपयोगी
किसी वस्तु का नाम है
११४ ' अहुवियदहं . से — अटव्याः अटवीम् ' अर्थ
लिया गया है । यह कहां तक ठीक है यह मैं विश्वासपूर्वक नहीं
कह सकता।
११५ अनुवाद
पत्र ' की जगह वाट ' ( मार्ग)
होना चाहिये । तात्पर्य यह है कि जिस प्रकार मार्ग से बहुत दूर
जो वृक्ष है उससे पथिकों को कोई लाभ नहीं, इसी प्रकार सन्मार्ग
से जो व्यक्ति च्युत है उसके धन वैभव से जीवों का कोई उपकार
नहीं हो सकता।
११६. हिन्दू धर्म के पट् दर्शनों के नाम ये हैं- सांख्य,
में

११८ पाहुड-दोहा योग, न्याय, वैशेषिक, मीमांसा और वेदान्त । इनके पक्षकारों में बहुत काल से वाद विवाद होता रहा है ११७. इस दोहे का संस्कृत रूपान्तर ऐसा लिया गया है- - आत्मन् ! मुक्वा एकं परं अन्यो न वैरी कोऽपि । येन विनिर्मितानि कर्माणि यतिः परं स्फेटयति सोऽपि ॥ दूसरी पंक्ति का अन्वय है । येन कर्माणि विनिर्मितानि ( तं ) परं ( यः ) स्फेटयति सोऽपि यतिः । १२६. प्रथम पंक्ति का इस प्रकार भी अनुवाद किया जा सकता है- हे मूर्ख, सिद्धान्त और पुराणों को समझ । समझने वालों के भ्रान्ति नही रहती । १२८. इस दोहे का कठोपनिषद् के निम्न पद्य से मिलान कीजिये:- अविद्यायामन्तरे वर्तमानाः स्वयंधीराः पण्डितं मन्यमानाः। वन्द्रग्यमाणाः परियन्ति मूढा अन्धेनैव नीयमाना यथान्धाः। . १/२/५. १३६. तात्पर्य यह है कि एकाग्र चित्त से आत्मध्यान में रत रहने वालों के आत्मा में कर्मबन्ध नही होता । तथा जो पर- मार्थ की इच्छा करता है वह पुण्य-प्रकृतियों के नाश से दुःख नही मानता । अर्थात् परमार्थ की इच्छा करनेवाला और आत्म. ध्यान में रत रहने वाला पुरुष पापप्रकृतियों के साथ पुण्यप्रकृतियों

टिप्पणी
का भी नाश कर देता है और नये कोई कर्मबन्ध नही करता ।
इस प्रकार वह मोक्ष का अधिकारी हो जाता है।
१३७. इस दोहे की दूसरी पंक्ति का अर्थ अस्पष्ट है ।
अनुवाद के अनुसार दोहे का भाव यह है। कोई संसार के
गमनागमन अर्थात् जन्म-मरण से मुक्त, त्रैलोक्य में प्रधान आत्मा
को देव मानता है, जैसे जैनियों के सिद्ध, और कोई गंगा नदी
आदि स्थानों में ही देवत्व की स्थापना करता है। इन दो भावों
में प्रथम में सद्ज्ञान है और दूसरे में अज्ञान ।
१४२ सुहासुहाजणयं-शुभ+अशुभ+आजनकम् ।
१४६. यह दोहा उक्तं च ' रूप से श्रुतसागर ने
भावप्राभूत की १६२ वीं गाथा की टीका में निम्न रूप में
उद्धृत किया है:-
सीसु नमंतहं कवणु गुणु भाउ कुसुद्धउ जाहं ।
पारद्धी दूणउ नमइ दुकंतउ हरिणाहं ॥
१४७. इस दोहे की प्रथम पंक्ति परमात्मप्रकाश २०१
और श्रुतसागर की चारित्र पाहुड़ पर ४१ वी गाथा की टीका में
इस प्रकार पाई जाती है-
णाणविहीणहं मोक्खपउ जीव म कासु वि जोइ ।
१५७. इस दोहे का अर्थ अस्पष्ट है। किन्तु ज्ञात होता

१२०
पाहुड-दोहा
है कि विषयलोलुपी व्यक्तियों को लक्ष्य करके दोहा लिखा गया
है । भाव ऐसा कुछ प्रतीत होता है कि हे विषयी जीव, जब तक
यह शरीर शिथिल नही हुआ तब तक के ही यह तेरे स्पर्श
और जिह्वा इन्द्रियों के सुख हैं, जिस प्रकार कि सीप ( शुक्ति )
का सुख तभी तक है जब तक वह फूटी नही है ।
.
१५८-९ यह शिवपूजन में. बेलपत्री चढानेवालों
को
लक्ष्य करके कहा गया है। वेलपत्रादि हरित वस्तुओं में भी
चैतन्य आत्मा का वास है । उनके चढाने से मोक्ष नही मिलता।
मोक्ष का मार्ग तो एक आत्मध्यान है।
में
१६०. यह शिवपूजन के लिये पत्ती तोडनेवालों को
हास्यरूप
कहा गया है कि यदि शिवदेव को पत्ती प्रिय है
तो उन्हे ही वृक्ष पर क्यों न चढा दिया जाय जिससे वे मनमानी
पत्ती खा सकें?
१६४. यहां दो 'न' का भाव प्रकृत्यर्थ सूचक नही है ।
१६५. यहां ' एक्कु ' से तात्पर्य जीव, आत्मा या चैतन्य
से और — अण्णु' का अजीव, अचेतन, जड पदार्थों से है । दूसरी
पंक्ति में 'तासु' का सम्बन्ध आत्मा से है । इस आत्मा का ज्ञान
केवल स्वानुभव से ही हो सकता है, पूछा पूछी या लिखने पढने
आदि से नही । इस भाव का कठोपनिषद् के निम्न पद्य से मिलान
कीजिये-
-
-

टिप्पणी
१२२
नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन ।
यमैष वृणुते तेन लभ्यस्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनें स्वाम् ॥
१, २, २३.
१६६. इस दोहे का कठोपनिषद् के निम्न वाक्यों
से मिलान कीजिये-
श्रवणायापि बहुभिर्यो न लभ्यः
शृण्वन्तोऽपि यहवो यं न विद्युः ।
आश्चर्यो वक्ता कुशलोऽस्य लब्धा-
श्वर्यो ज्ञाता कुशलानुशिष्टः ॥ १, २, ७.
नैषा तर्केण मतिरापनीया।
प्रोक्तान्येन सुज्ञानाय प्रेष्ठ ॥ १, २, ९.
१६७. दोहे का मुख्य तात्पर्म क्या है यह स्पष्ट नहीं हुआ।
सम्भवतः उसका भाव यह है कि 'वादे वादे जायते तत्वबोधः ।।
१६८. इस दोहे के भाव का अंग्रेजी के प्रसिद्ध कवि
वर्ड्सवर्थ के निम्न लिखित पों के भाव से मिलान कीजिये-
Have not we too? yes, we have,
Answers, and we know not whence;
Echoes from beyond the grave,
Recognised intelligence !
Such rebounds our inward ear
Catches sometimes from afar
Listen, ponder, hold them dear;
For of god - of god they are.

१२२ पाहुड-दोहा १७०-१७२ इन तीन दोहों में योग व ध्यान की उस अवस्था का वर्णन है जिसे वेदान्त में निर्विकल्पक समाधि कहा है । उस समय योगी को लय, विक्षेप, कषाय और रस इन चार विनों से सचेत रहना चाहिये जैसा गौडपाद कारिका ३, ४४-४५ में कहा है- लये सम्बोधयेच्चित्तं विक्षिप्तं शमयेत्पुनः । सकषायं विजानीयाच्छमप्राप्तं न चालयेत् ॥ नास्वादयेद्रसं तत्र निःसङ्गः प्रज्ञया भवेत् ॥ इसी अवस्या को जैनाचार्यों ने रूपातीत ध्यान कहा है जिसके सम्बंध में शुभचन्द्र ने ज्ञानार्णव में कहा है- वदन्ति योगिनो ध्यानं वित्तमेवमनाकुलम् । कथं शिवत्वमापनमात्मानं संस्मरेन्मुनिः ॥१७॥ विवेच्य तद्गग्रामं तत्स्वरूपं निरूप्य च । अनन्यशरणो शानी तस्मिन्नेव लयं व्रजेत् ॥१८॥ [प्रकरण ४० १७४. मन की वेल का चारण न होने दिया, अर्थात् मन की वेल को न बढने दिया, अर्थात् मन का लय कर डाला। हम ' को 'नु ' ( ननु ) के अर्थ में लेकर यह अर्थ भी कर सकते हैं कि जिसने मन की वेल को चरा डाली अर्थात् नष्ट कर दी । सावयधम्मदोहा में 'ण' नु के अर्थ में कई वार आया है। १७७. यह दोहा जिस रूप में है उससे उसकी दूसरी टिप्पणी १२३ पंक्ति का कुछ स्पष्ट अर्थ समझ में नही आता । यही दोहा हेम- चन्द्र ने अपनी प्राकृत व्याकरण के ४ थे पाद के ३९६ सूत्र के उदाहरण में इस प्रकार उद्धृत किया है- जह केवह पावीसु पिउ अकिआ कुडु करीसु । पाणिउ णवह सरावि जिव सव्वंगे पइसीसु॥ इसका अर्थ है-यदि किसी प्रकार मैं अपने प्रिय को पा जाऊँ तो अपूर्व कौतुक करूँ। नये सकोरे ( मिट्टी के प्याले ) में रक्खे हुए पानी के सदृश मैं उसके सर्वांग में प्रवेश कर जाऊं । ( या मैं उसमें सर्वांग प्रवेश कर जाऊं)। यह भाव परमात्मध्यान के सम्बन्ध में भी अच्छी तरह योजित किया जा सकता है। सम्भवतः हमारे ग्रंथ के दोहे का भी यही शुद्ध रूप है। लिपिकारों के उसका अर्थ न समझने के कारण उसका पाठ भ्रष्ट हो गया है। १८१. अर्थात् मनुष्य अपने दायें वायें जो इन्द्रियों के विषय हैं उनमें तो चित्त देता है किन्तु अपने ही बीच में जो परमात्मा निवास करता है उसकी ओर ध्यान नहीं देता। योगी वही है जो उस ओर ध्यान दे । योगशास्त्र में वाम और दक्षिग इडा पिंगला नाडियों के अर्थ में भी आते हैं। १४२. यह दोहा मृत्यु अवस्था या निर्विकल्पक समाधि अर्थात् रूपातीत ध्यान के सम्बन्ध में योजित किया जा सकता है। उक्त दोनों अवस्थाओं में आत्मा शान्त भाव में लीन हो जाता है १२४ पाहुड-दोहा और शरीर शून्य पड़ जाता है। इसका ‘परमात्म प्रकाश' के निम्न दोहे से मिलान कीजिये- देहि वसंते जेण पर इंदियगामु वसेइ । उव्वसु होइ गएण फुड्ड सो परमप्पु हवेइ ॥ ४॥ १८३. इस दोहे में शिष्य पूर्वोक्त रूपातीत ध्यान या निर्विकल्पक समाधि का उपदेश मांगता है। १८४. सकलीकरण एक विधान है जो देवाराधना, देव- प्रतिष्ठादि में विघ्नशान्ति के हेतु किया जाता है । इसके लिये देखिये जयसेन कृत प्रतिष्ठापाठ ३७२-३७५, व आशाधर कृत प्रतिष्ठासारोद्धार २,५२-७०, इस विधान का महत्व आशाधरजी ने इस प्रकार बतलाया है. वर्मितोऽनेन सकलीकरणेन महामनाः। कुर्वन्निष्टानि कर्माणि केनापि न विहन्यते ॥ प्रतिष्ठा. २, ७०. , गुजराती में — गांगडी' का अर्थ छोटा सा टुकड़ा होता है। उसी पर से अनुवाद में गंगडु का क्षुद्र अर्थ किया गया है जो देव का या पूजक का विशपण माना जा सकता है। गंगडु देउ' का अर्थ गंगा के देव भी हो सकता है । ग्रंथकार ने दोहा १३७ में भी गंगा में देवता माने जाने की समालोचना की है। प्रस्तुत दोहे में ग्रंथकार सम्भवतः पूजा प्रतिष्टा सम्बंधी कर्मकाण्ड का खंडन कर रहे हैं,

टिप्पणी
१२५
जिसमें सकलीकरण क्रिया की जाती है तथा कमल के अष्ट पत्रों पर
आठ प्रकार के जल-देवताओं का पूजन किया जाता है। इस
पूजन में गंगादि देवताओं का आहान इस प्रकार किया जाता है-
गंगादिदिव्यसारदंत्रुविभूतिभोक्त्री
गंगादिदैवतवधूर्विधिपूर्वमेताः।
अवगंधतंदुललतांतचरुप्रदीप--
धूपप्रसूनकुसुमाञ्जलिभिर्यजेऽस्मिन् ।।
प्रतिष्ठासार. २१४३.
ग्रंथकार का कहना है कि आराधक न तो सकलीकरण
के मर्म को समझता, न जिसे पूजता है उस कमलपत्र और जिससे
पूजता है उस पानी के भेद को समझता, न आत्मा और रर के
भेद को समझता । केवल ज्ञानहीन रूप से क्षुद्र गंगादि देवताओं
की पूजा करः।। है ।
१८८. यहां दो पंथों से कवि का क्या तात्पर्य है यह
कहना कठिन है। क्या भाक्त और ज्ञान, या ज्ञान और कर्म से
मतलब है ? भगवद्गीता में दो प्रकार की निष्ठा बतलाई गई है, यथा
लोकेऽस्मिन्द्विविधा निष्ठा पुरा प्रोक्ता मयानघ ।
ज्ञानयोगेन सांख्यानां कर्मयोगेन योगिनाम् ॥ ३, ३.
सम्भव है यहां कवि लौकिक और पारलौकिक या भौतिक
और आधिभौतिक सुख की बात सोच रहे हैं। उनका कहना

१२६ पाहु-दोहा है कि जो व्याक्ति अंध विश्वासों और सारहीन क्रियाओं को धर्म समझते हैं वे न भौतिक सुखों का ही लाभ उठाते और न आत्मा का ही कुछ कल्याण करते । दोहा १०५ में कवि ने नरक और स्वर्ग को जाने के दो पथों का उल्लेख किया है। आगे दोहा २१३ में इंद्रियसुख और मोक्ष के दो मागों का उल्लेख है। १९०. इस दोहे में कवि ने मुक्ति के असाधारण स्वरूप का वर्णन किया है । साधारण नियम यह है कि जीवधारियों को बांध लेने से उनकी गति रुक जाती है और बन्धन से छूटने पर वे चारों ओर भ्रमण करते हैं। किन्तु आत्मा का स्वरूप इससे विपरीत है। कर्म के बन्धन में बंधा हुआ आत्मा संसार की अनेक योनियों में भ्रमण करता है, किन्तु मुक्त होने पर सब अवागमन से रहित हो जाता है। इस प्रकार यह आत्मारूपी करवा विचित्र ही है। १९१. इस दोहे का अर्थ कुछ अस्पष्ट है। अनुवाद में रहन्तु का अर्थ रक्षत् लिया गया है । 'रह' धातु का अर्थ छोड़ना, त्यागना होता है। अबराडइहिं ' का अर्थ 'अपरकानि' [ अपराणि ] लिया गया है वह भी सन्देह से परे नही है। खंधा वारिउ ( स्कंधावारितः ) का अर्थ · इन्द्रियों की फौज सहित' लिया गया । अनुवाद के अतिरिक्त और कोई अर्थ मुझे यहां युक्तिसंगत नही जंचता ।

टिप्पणी १२७ १९२. इस दोहे का तात्पर्य भगवद्गीता के निम्न श्लोक के समान है-- - या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी । यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः।। २।६९. मोक्षपाहुड की ३१ वी गाथा की टीका में श्रुतसागर ने निम्न दोहा उद्धृत किया है: जा निसि सयलहं देहियह जोग्गिउ तहि जग्गेइ । जहिं पुणु जग्गइ सयलु जगु सा निसि भणिवि सुएइ ॥ १९३. संचित कर्मों के नाश करने जैन सिद्धान्त में निर्जरा, और नये कमों के मार्ग को रोकन को संवर कहा है। इन दोनों क्रियाओं के पूर्ण होने पर मोक्ष होता है। यह दोहा थोडे से भिन्न रूप में ऊपर नं. ७७ पर आ चुका है। २०६. दोहे का तात्पर्य यह है कि समस्त मंत्रतंत्रादि क्रियाओं से रहित होकर, ध्येय, ध्यायक और ध्यान की विभिन्नता को भूलकर से सोता है, उसे इस संसार का कल- 'कल रुचिप्रद नही होता योगी आनन्द - २०८. क्षमा, मार्दव, आर्जव, सत्य, शौच, संयम, तप, त्याग, आकिञ्चन और ब्रह्मचर्य, ये धर्म के दश अंग हैं। इनका सुन्दर वर्णन अपभ्रंश भाषा में रइधू कवि ने अपने ' 'दहलक्खण- जयमाल ' में किया है। .

१२८
पाहुड-दोहा
इनका वर्णन
आ चुका
२११. अणुपेहा-अनुप्रेक्षा, अनुचिन्तन या भावना को
कहते हैं । अंतरंग शुद्धि तथा वैराग्य भाव बढाने के लिये जैन
धर्म में बारह भावनाएँ मानी गई हैं। ये बारह भावनाएँ हैं-
अनित्य, अशरण, संसार, एकत्व, अन्यत्व, अशुचित्व, आश्रव,
संवर, निर्जरा, लोक, धर्म और बोध ।
अपभ्रंश 'करकंडचरिउ ' की नवमी सन्धि में या कुन्दकुन्दाचार्य.
कृत प्राकृत 'बारस अणुवेक्खा ' में देखिये ।
२१३. दो पंथों का उल्लेख दोहा १०५ और १८८ में
है। योग के
कुछ ग्रंथों में वाम और दक्षिण मार्ग को
छोड़ने का उल्लेख पाया जाता है ।
२१४. कवि का तात्पर्य यह है कि उपवास से शरीर को
संताप पहुंचता है और इसी संताप से यह इन्द्रियों का निवास
दग्ध हो जाता है और आत्मा मुक्त हो जाता है।
२१५. यह दोहा कुछ भिन्न रूप में ' सावयधम्मदोहा ' में
भी है। उसके पाठ और अर्थ के लिये देखो सावय. ३०.
२१६. तात्पर्य यह है कि जिस प्रकार जिसे चलते फिरते
माणिक्य मिल जाता है तो वह उसे चुपचाप अपने अंचल में बांध
लेता है और एकान्त में उसका निरूपण करता है, ठीक उसी
प्रकार यदि आत्मज्ञान का अंकुर हृदय में जम गया हो तो संसार
के जंजाल से
पृथक्
होकर
स्वानुभव में चित्त को लगाना चाहिये ।
,

टिप्पणी १२९ २१७. रत्ता गउपावियई-गोपायिते रक्ताः। आप्टे कृत संस्कृत अंग्रेजी कोष में गोपयति का एक अर्थ to shine; to speak भी दिया हुआ है इसी पर से अनुवाद में अपनी श्लाघा करने का अर्थ लिया गया है । उसी प्रकार ‘गुप्यति' का अर्थ उक्त कोष में to be confused or disturbed दिया गया है, उसी पर से गुप्पंत-गुप्यन्तः का अर्थ ' भ्रान्त हुए ' किया गया है। इस पक्ति का अर्थ यों भी किया जा सकता है जो अपनी रक्षा में रत हैं वे छिपे छिपे भ्रमण करते फिरते है । किन्तु पहला अर्थ इससे अच्छा है। २१८. इस श्लोक का तात्पर्य यह है कि ज्ञान ही सब जीवन का सार है, क्योंकि उससे ही कर्मों का नाश होकर परम पद की प्राप्ति होती है। आहार शरीर के पोषण के लिये किया जाता है और शरीर का उपयोग ज्ञान सम्पादन में है। इस प्रकार आहार और शरीर भी अन्ततः ज्ञान के ही लिये हैं। २१९-२२०. प्रश्न यह है कि प्रकृति में जो काल, वायु, सूर्य और चन्द्र ये चार शक्तियां दिखाई देती हैं उनमें प्रधान कौन है ? किस शक्ति द्वारा इनका विनाश होता है ? उत्तर है कि सूर्य, चन्द्र और पवन का कार्य काल के ऊपर निर्भर है। काल ही के द्वारा इनका प्रलय होता है। जैन सिद्धान्तानुसार सब द्रव्यों में परिवर्तन करनेवाला कालद्रव्य ही है । यथा-

१३०
पाहुड-दोहा
यदी परिवर्तन्ते पदार्था विश्ववर्तिनः।
नवजीर्णादिरूपेण तत्कालस्यैव चेष्टितम् ॥
शुभचन्द्रकृत ज्ञानार्णव ६३८.
चन्द्र में वनस्पतियों के पोषण करने की शक्ति है इसी
लिये उसे ' ओषधीनाम् पतिः ' भी कहा है ।
सत्त रज्जु तम पिल्लि करि ,
[ सात रज्जु अंधकार
को पेल कर ] रज्जु जैन सिद्धान्त में एक माप है । इसके अनुसार
समस्त लोकाकाश चौदह रज्जु ऊंचा माना गया है। मध्यलोक
ठीक बीच में है उससे सात रज्जु नीचे तक अधोलोक, तथा सात
रज्जु ऊपर तक ऊर्ध्वलेोक है, यथा-
आयामस्तु त्रिलोकानां स्याच्चतुर्दश रजवः ।
सप्ताधो मंदरादूर्ध्व सार्द्ध तेनैव सप्त ताः॥
हरिवंशपुराण ४, ११.
तात्पर्य यह है कि काल का अधिकार मध्यलोक से सात
रज्जु ऊपर और नीचे तक है । इतने में वह पदार्थों में परिवर्तन
करता रहता है । कुछ तांत्रिक ग्रंथों में चन्द्र और सूर्य शरीर की
आंतरिक शक्तियों के लिये भी प्रयोग में आये हैं।
२२१. प्राणान् संचरते का अर्थ 'प्राणान् संचारयति ।
ऐसा लेना ठीक होगा। जो मुख और नासिका के बीच

टिप्पणी १३१ प्राणवायु का संचार करता है और आकाश में सदा विचरण करता है उसी वायु से जीवों का सांसारिक जीवन है। २२२. इस दोहे का अभिप्राय भव्य और अभव्य जीवों से है । ग्रंथकार अन्त में कहते हैं कि जिस प्रकार मूछित व्यक्ति थोड़े से उपचार से सचेत हो जाता है, किन्तु जो मृत हो चुका है वह हजार उपायों से भी नहीं जी सकता; उसी प्रकार जो भव्य जीव हैं वे इस थोड़े से उपदेश से सन्मार्ग पर लगकर आत्म कल्याण कर लेंगे, किन्तु जो अभव्य हैं उनको इससे कोई लाभ न होगा।

दोहों की वर्णानुक्रमणिका अक्खरचडिया मसिमिलिया १७३, भक्खरडेहिं जि गब्धिया ८६. अखइ णिरामइ परमगइ अज वि १६९. अखइ णिरामइ परमगइ मणु १७१. भग्गई पच्छई दहदिहहिं १७५. अच्छउ भोयणु ताहं घरि २१५. भजु जिणिज्जइ करहुलउ १११. अणुपेहा बारह वि जिय २११. अण्णु जि जीउ म चिंति तुहुँ ७४. अण्णु णिरंजणु देउ पर ७९. अण्णु तुहारउ णाणमउ ५६. अण्णु म जाणहि अप्पणउ ९. भत्थि ण उन्भउ जरमरणु ३५. अथिरेण थिरा मइलेण णिम्मला १९. अन्तो गस्थि सुईणं ९८. अप्पा अपि परिट्ठियउ ९०. अप्पाए वि विभावियई ७५. अप्पा केवलणाणमउ ५९. अप्पा दंसणणाणमड ६९. अप्पा सणु केवलु वि ६८. अप्पापरहण मेलयउ आवागमणु १८५. अप्पापरहं ण मेलयउ मणु ९५. अप्पा बुज्झिउ मिच्चु जइ २२. अप्पा मिल्लिवि एकु पर ११७. अप्पा मिल्लिवि गुणणिलउ ६७. अप्पा मिल्लिवि जगतिलउ जो ७०. अप्पा मिल्लिवि जगतिलउ मूढ ७१. अप्पा मिल्लिवि णाणमउ ३७ अप्पायत्तउ जं जि सुहु २. अप्पु करिजइ काई तसु १३६. अभितरचित्ति वि मइलियई ६१. अम्मिए जो परु सो जि परु ५१. अम्मिय इहु मणु हस्थिया १५५. अम्हहिं जाणिउ एकु जिणु ५८. अरि जिय जिणवरि मणु टवहि १३४ अति मणकरह म रइ करहि ९२. अवघउ अक्खरु जं उपजइ १४४. असरीरहं संधाणु किउ १२१. अंबरि विविहु सर्दु जो मुम्मइ १६८. आपदा मूच्छितो वारि° २२२. आभुजंता विसयमुह ४. आयई अडवड वडवडइ ६. आराहिज्जइ देउ ५०. इंदियपसरु णिवारियई १९९.

दोहों की वर्णानुक्रमणिका . वहुल १२५. घरवासउ मा जाणि जिय १२. चिंतइ जंपइ कुणइ ण वि ६.. छत्तु वि पाइ सुगुरुवडा १३०. छहदसंणगांथें छहदसणधंधइ पडिय ११६. छडेविगु गुणरयणाणिहि १५१. जइ इकाहि पावीसि पय १७७. जइ मणि कोह करिविकलहीजइ १४०. जइ लद्धउ माणिकडउ २१६. जइ वारउं तो तहिं जि पर ११८. जरइ ण मरइ ण संभवइ ५४. जसु जीवंतहं मणु मुवउ १२३. जसु मणि णाणु ण विप्फुरइ कम्मई इंदियविसय चएवि वढ २०२. उपलाणहि जोइय करहुलउ ४२. उप्पजइ जेण विबोहु ण वि ८२. उम्मणि थका जासु मणु १०४. उम्मूलिवि ते मूलगुण २१. उववासविसेस करिवि बहु २०७. उववासह होइ पलेवणा २१४. उव्वालि चोप्पडि चिट करि १८. उव्वस वसिया गे करइ १९२. एक ण जाणहि वडिय ११४. एक्कु सुवेयर अण्णु ण वेयइ १६५. एमइ अप्पा झाइयइ १७२. कड्डइ सरिजलु जलहिविपिल्लिउ १६७. कम्महं केरउ भावडउ ३६. कम्मु पुराइउ जो खवइ ७७. कम्मु पुराइउ जो खवइ १९३. करहा चरि जिणगुणथलिहिं ११२. कायोऽस्तीत्यर्थमाहारः २१८. कालहिं पवहिं रविससिहि २१९. कासु समाहि करउं को अंच १३९. किं किजइ बहु अक्खरहं १२४. किं बहुएं अडवड वडिण १४५. कुहिएण पूरिएण य १९५. केवलु मलपरिवजियउ ८९. खंतु पियंतु वि जीव जइ ६३. गमणागमण विवन्जियउ १३७. गहिलउ गहिलउ जणु भणइ १४३. गुरु दिणयरु गुरु हिमकरणु १. जसु मणि णाणु ण विप्फुरइ सव्व ६५. जस मणि णिवसइ परमपउ ६६. जं दुक्खु वितं सुक्खु किउ १०. जं लिहिउ ण पुच्छिउ कह व जाइ जं विसयपरंमुहउ ३. जिणवरु झायहि जीव तुहुं १९७. जिम लोणु विलिजइ पाणियहं १७६. जीव म जाणहि अप्पणा ११९. जीववहति गरयगइ १०५. जेण गिरंजणि मणु जे पढिया जे पंडिया १५६. जेहा पाणहं झुपडा १०८. । जोइय जोएं लइयइण ९१. धरिउ ६२.

१३४ पाहुड-दोहा जोइय भिण्णउ झाय तुहुं १२९ जोइय विसमी जोयगइ १८९. जोइय हियडइ जासु ण वि १६४. जोइय हियडइ जासु पर ७६. जोणिहि लक्खहिं परिभमइ ८. जो पई जोइउं जोइया १७९. जो मुणि छंडिवि विसयसुह १६. डिल्लउ होहि म इंदियहं ४३. णग्गत्तणि जे गम्विया १५४. णमिओ सि ताम जिणवर १४१. ण वि गोरउ ण वि सामलउ ३०. ण वि तुहुं कारणु कज्जु ण वि २८. ण वि तुडं पंडिउ मुक्खु ण वि २७. ण वि भुजंता विसयसुह ५. णाणतिडिकी सिक्खि बढ ८७. णिच्चु णिरामउ णाणमउ ५७. णिज्जियसासो णिफंदलोयणो २०३. शिल्लक्खणु इत्थीबाहिरउ ९९. तउ करि दहविहु धम्मु करि २०८. तरुणउ बूडउ बाल हउं ३२. तव तणुअं मि सरीरयह १०२. तव दावणु वय भियमडा ११३. ताम कुतित्थई परिभमइ ८०. ता संकप्पवियप्पा १४२. तासु लीह दिढ दिनइ ८३. तित्थई तित्थ भमंतयह किं १६२. तित्थई तित्थ भमंतयहं संता १७८. तित्थई तित्थ भमेहि वढ १६३. तिहुयणि दीसइ देउ जिणु ३९, तुइ बुद्धि तडत्ति जहिं १८३. तुहे मणवावारे भग्गे तह २०४. तूसि म रूसि म कोहु करि ९३. तोडिवि सयल वियप्पडा १३३. दयाविहीणउ धम्मडा १४७. दहविहु जिणवरभासियउ २०९. देखताहं वि मूढ वढ १९६. देव दुहारी चिंत महु १८२. देवाल पाहणु तिस्थि जलु १६१. देह गलंतहं सवु गलइ १०३. देहमहेली एह वढ ६४. देहहि उन्भउ जरमरणु ३४. देहहो पिक्खिवि जरमरणु ३३. देहादेवाल जो वसइ ५३. देहादेवलि सिउ वसइ १८६. धई पडियउ सयलु जगु ७. पत्तिय तोडहि तडतडह १५८. पत्तिय तोडि म जोइया १६.. पत्तिय पाणिउ दम्भ तिल १५९. पंच बलद्द ण रक्खियई ४४. पंडियपंडिय पंडिया ८५. पंचहिं बाहिरू णेहडउ ४५. पाउ वि अप्पहिं परिणवइ ७८. पुण्णु वि पाउ वि कालु गहु २९. पुणेण होइ विहओ १३८. पोत्था पढणि मोक्खु कहं १४६. बद्धउ तिहुवणु परिभमइ १९.. ।

दोहों की वर्णानुक्रमणिका बहुयई पढियई मूढ पर ९७. बुज्झहु बुज्झहु जिणु भणइ ४०. बोहिविवजिउ जीव तुहुँ २५. भल्लाण वि णासंति गुण १४८, भवि भवि-दसणु मलरहिउ २१०. भिण्णउ जेहिं ण जाणियउ १२८. मणु जाणइ उवएसडउ ४६. मणु मिलियउ परमेसरहो ४९. महुयर सुरतरुमंजरिहिं १५२. मंतु ण तंतु ण धेउ ण धारणु २०६. मा मुट्टा पसु गरवडा १३१. मिल्लहु मिल्लहु मोकलउ ४८. मुखनासिकयोर्मध्ये २२१. मुंडियमुंडिय मुंडिया १३५. मुंडु मुंडाइवि सिक्ख धरि १५३. मूढा जोवइ देवलई १८०. मूढा देह म रजियट १०७. मूढा सयल वि कारिमउ णिकारिमउ ५२. मूढा सयलु वि कारिमउ में १३. मूल छडि जो डालि चडि १०९. मोक्खु ण पावहि जीव तुहु ११. मोहु विलिज्जइ मणु मरइ १४. रायवयलहिं छहरसहिं १३२. लोहिं मोहिउ ताम तुहुं ८१. वश्खाणडा करंतु बुहु ८४. वह जु छोडिवि मउलियउ ११५. वडिया अणुलग्गयह ४७. वणि देवलि तित्थई भमहि १८७. वण्णविहणउ णाणमउ ३८. वरु विसु विसहरु वरु जलणु २०. वंदहु वंदहु जिणु भगई ४१. वादविवादा जे करहिं २१७ वामिय किय अरु दाहिणिय १८१. विद्धा वम्मा मुट्टिइण १५७. विसयकसाय चएवि वढ १९८. विसयकसायहं रंजियउ २०१. विसयसुहा दुइदिवहडा १७. विसया चिंति म जीव तुहुं २००. विसया सेवइ जो वि परु १९४, विसया सेवहि जीव तुहुं छेडिवि २०५. विसया सेवहि जीव तुहुं दुक्खह १२०. वे छंडविणु पंथडा १८८. वे पंथेहिं ण गम्मइ २१३. वे भजविणु एक किउ १७४, सई मिलिया सई विडिया ७३. सपि मुक्की कंचुलिय १५. सयलीकरणु ण जाणियउ १८४. सयलु वि को वि तडफडइ ८८. सम्ववियप्पह तुहं ११०. सव्वहिं रायहिं छहरसहिं १०१. ससि पोखइ रवि पजलइ २२०. सहजअवत्थई करहुलउ १७०.

१३६
पाहुड-दोहा
संखसमुद्दहिं मुक्कियए १५०.
संतु ण दीसइ तत्तु ण वि १९१.
सिद्धंतपुराणहिं वेय वढ १२६.
सिव विणु सत्ति ण वावरइ ५५.
सिवसत्तिहिं मेलावडा १२७.
सुश्खअडा दुइदिवहडई १०६.
सुण्णं ण होइ सुण्णं २१२.
सुहपरिणामहिं धम्मु वढ ७२.
सो जोयउ जो जोगवह ९६.
सो णस्थि इह पएसो २३.
हउं गोरउ ह सामलउ २६.
हउं वरु बम्हणुण वि वासु ३१.
हउं सगुणी पिउ णिग्गुणउ १...
हत्थअहुटहं देवली ९४.
हलि सहि काइंकरइ सो दप्पणु १२२.
हुयवहि गाइ ण सक्कियउ १४९.

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Pahuda Doha Of Ramasimha Muni

Author
Jain,hiralal
Title
An Apabhramsa Work On Jaina Mysticism
File name
Pahuda Doha Of Ramasimha Muni
Text
OCR done
Citation
1933
Published
2010/12/06
Publisher
Gopal Ambadas Chabre
Language
Sanskrit
Pages
184
Library
Central Library, Visva-bharati
Classification
Jainism
Keywords
Yogindradeb
DLI number
553629
Barcode
4990010047927.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
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In Public Domain
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