Shri Jawahar Vidyapith Binasar, Bikaner

Chamkate Sitare

Muni Devendra · 2011/01

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चमकते सितार
[ जैन इतिहास के ११ प्रसिद्ध मनीपी आचार्यो
की जीवन कथा]
तेपर
ध्यात्मयोगी उपाध्याय धी पुटमरमुनि जी महाराज के सुशिष्य
श्री देवेन्द्र मुनि, शास्त्री
प्रवााक
श्री तारक गुरु जैन प्रन्यालय
शास्त्री सल, उरमपुर (राम)

श्री तारक गुरु जैन प्रत्यमाला : पुष्प ११६
५ उपाध्यार श्री पुष्करमुनि जी महाराज हे दोक्षा स्वर्ण
जयन्ती समारोह पर
पुस्तक
चमरते सितारे
लेखक
देवेन्द्र मुनि, शास्नी
पिपर
जैन जगत के ज्योतिधर आचार्य
+ प्रदम प्रवेश
पटनि०म०.०३६
म-गोन रपये मात्र
मग पारे
दर, गग

प्रकाशकीय श्रीशारण गुर जन अन्धालय स्वपनमय में ही निन- गरे पभिनय उपार लेगार प्रवृद्ध पाठको की नमक्ष र्गत लाना। पहले भगवान मारियो एचीपदी निर्माण मसानी उपलक्ष्य में और उन परमात्य व नरक राध्याय राजधान गरी अध्यालयोनी श्री पुष्पगनि जी का स्वर्ण जयन्ती समारोह के रुपलक्ष्य में अपने साहित्य सभी विधाको में जमे हाट अन्य पल यि है. कि बुर पाठको में बात ही पसन्द जिया। यह गत्य है कि समालय को अवगदगुरपा नाहित्य मनीपी देदेन मुनिजी कार्य गरयोग प्रारोला । जिनके कारण पर पट जीवनपयोगी मारित्र पानिले में गया होगा। प्राय सदर शिरगा दक्षिण भारत की दलोदामाले हए व भी नगर मिला तवामानात मास्मिन मादाये साधार लिपदे भी हैं। को मानfarenा भी प्रमादन पर पाई जगे। पोषि समर र पक्षी है जो एक बार राप में निकल गया

( ४ )
तो
वह दुवारा पुन. हाथ मे नही आता अत जितना हो सके
समय का सदुपयोग करो। समय के सदुपयोग का सुफल ही
है कि यह विराट साहित्य हमे प्राप्त हो सका है।
'अतीत के चलचित्र' और 'चमकते सितारे इन दोनो
पुस्तको मे जैन इतिहास के वे गौरवशाली पृष्ठ है जो सैकर
वर्षों से प्रेरणा के स्रोत रहे है, पथ-प्रदर्शक रहे है । मुनि ४
गहन अध्ययन कर उन पृष्ठो को हमारे समक्ष प्रस्तुत किर
है अत हम उनका आभार मानते है ।
हमारे अन्य प्रकाशनो की
तरह
ये प्रकाशन भी पाठको
के लिए प्रेरणादायी सिद्ध होगे ।
do
श्री तारक गुरु जैन ग्रन्थाल.

लेखक की कलम से -- विराट विश्व में प्रतिपल-प्रतिक्षण बडो व्यक्ति जन्म लेते है और मैकलो व्यक्ति पर काल के गाल मे नमा पाने है। न स्नपं जन्म लेने पर प्रमानना होती है और न माने पर गोकही होता है। वह अपना जीवन पूकार-शूकर की तरह व्यतीत फर अन्त मे मगार मे विदा हो जाते है । उनका जीवन अर्धदग्ध करे की नरम होता है, जोनदा विषय- चानना का, राग-प का ध आ छोरता गाता है । पर कभी- मार ने तेजाची-वर्गवी पक्ति भी आते है जिनका जीवन निगला गता। ये सूर्य की तन्ह तेजस्वी होते है. चन्द्र की सगर गौम्य होते हैं। अमृत पी तरह मधुर होते है । उनका नित्व भी अदभूत होता है। ये मेर की तरह दनारने हए जन-जीवन मे अपूर्व पान्ति करते है। उनवी प्रान्ति मांधी और तूफान की तरह विध्यनक नही होती, पर मान्ति में लिए पर्यापी सना निर्माणकारी होती है। वे पर प्रकाशित गोगे और अपने निर्मल प्रसादिर गे प्रयापित rrm गरे । उनका नाम ऐया अपने युग में ही की, अपितु किस पृष्टी पर मरता गता है। ये धर्म और गन. नाहित्य और मन में निर्माता होते है। हे अपने करपी कार्यों में इतिहान यो नया मोर देते हैं। दिद- ६) ज्योति भगवान महावीर के पश्चात् भी जैन इतिहास में ऐसे हजारो आचार्य हुए है, जिनका जीवन प्रेरणा का पवित्र सोत रहा है । उन्ही आचार्यों में से कुछ चमकते-दमकते आचार्यों का परिचय और साथ ही तेजस्वी सद्गृहस्थो का परिचय देने का मैंने प्रयास किया है। कुछ परिचय अतीत के उज्ज्वल चरित्र मे तथा कुछ परिचय प्रस्तुत पुस्तक मे देने का प्रयास किया है । इन पुस्तको मे व्यवस्थित रूप से ऐतिहासिक क्रमवर परिचय नहीं दिया गया है । अपितु जिन महापुरुषा की जीवन- गाथाओ ने मेरे जीवन को प्रभावित किया उन्ही का सक्षेप में परिचय दिया गया है । मैं सोचता हूँ कि ये जीवन-प्रसग प्रबुद्ध पाठको को भी पसन्द आयेगे। वे भी इनसे एक प्रेरणा प्राप्त करेंगे। परम श्रद्धय सद्गुरुवर्य का मै किन शब्दो मे आभार मानूं जिनकी असीम कृपा दृष्टि के कारण ही प्रगति के पर पर बढ सका हूँ । तथा श्री रमेश मुनि जी, श्री राजेन्द्र मुनि जी, श्री दिनेश मुनि जी की भक्ति-भावना से की गई सेवा शुश्रूपा भी लेखन कार्य मे अत्यधिक सहयोगी रही है, उन्हे भी विस्मृत नहीं किया जा सकता । स्नेहमूर्ति श्रीयुत श्रीचन्दजी मुराना ने पुन्तक को मुद्रण कला की दृष्टि से सुन्दर बनाने का जो प्रयास किया है वह भी भुलाया नहीं जा मकता । -देवेन्द्र गका केवम प्रा. लिमिटेड कपा (आध्र)

समर्पण
गयर को
जिनके जीवन में अहिंसा को निर्मल गगा
सुन्दर सरस्पती
और तप को पवित्र यमुना का
मरस सगम हुआ है
उन्हीं
परम श्रद्धय सद्गुरुवयं
उपाध्याय श्री पुरकर मुनि जी महाराज
मकर-कमलो में
मादर, सक्ति समपित
-देवेन्द्र मुनि

अनुक्रमणिका
१ मुनि अवन्तिसुकुमाल
२ आर्यरक्षित
३ आचार्य वनस्वामी
४ आचार्य शमित
५ आचार्य पादलिप्तसूरि
६ आचार्य वप्पसूरि
७ आचार्य कालक
८ आचार्य
खपुट
६ आचार्य शय्यभव
१० कवि कुलभूपण मुनि रामचन्द्र
११ कलिकाल सर्वज्ञ आचार्य हेमचन्द्र

मुनि अवन्तिसुकुमाल आर्य सुहरती प्रबल प्रतिभा के धनी ज्योतिर्धर प्राचार्य थे । वे अपनी पिप्यमण्डली महित एक बार उज्जयिनी पधारे और नगर के बाहर उद्यान में ठहरे। तव शिष्य भिक्षा के लिए नगर मे जाने लगे तब उन्होंने लहानगर में कही पर ठहरने के लिए योग्य नावास मल सके तो गवेपणा करना। एक श्रमण युगल भद्रा पंचाही ने यहाँ भिक्षा के लिए पहुँचा । भद्रा ने भक्ति- प से विभोर होकर माहार प्रदान किया और TI- भगवन् ! आप फिन नाचार्य के मिप्य है ? पियो ने बताया-हम बायं सुहाती के मिप्य । आचार्य प्रवर उद्यान मे विराज रहे हैं, उन्होंने हमे देश दिया है कि शहर में कोई योग्य आवारा मिल फे तो लावेपणा करना । भिक्षा के माप हम उसपी अन्वेषणा करने हेतु आये है। भद्रा ने मयिगर प्रार्थना करते हुए कहा-भाग- [ ! मेरा विशाल भवन खाली पटा हुआ है। वह पो के विराजने के योग्य है । आप जापादेव से ६

२
चमकते सितारे
।
गये।
प्रार्थना करें। वे यहाँ पर पधारेगे तो मुझे महती प्रर
न्नता होगी, मै अपने आपको महान् भाग्यशालिन
समझूगी।
शिष्यो ने आचार्यदेव को मकान की अनुकूल
के सम्बन्ध मे जानकारी दी। आचार्यदेव शिष्यो के स
उसके मकान
में पधार
भद्रा के एक पुत्र था, वह अत्यन्त सुकुमाल
और 'अवन्तिसुकुमाल' के नाम से विश्रुत था। उस
पाणिग्रहण वत्तीस श्रेष्ठी पुत्रियो के साथ हुआ
जो रूप और सौन्दर्य मे अप्सरा के समान थी। अर्वा
सुकुमाल उनके साथ सदा भोगों में निमग्न रहता थ
रात्रि के प्रथम प्रहर मे आचार्य सुहस्ती अ
शिष्यो के साथ स्वाध्याय मे तल्लीन थे। सुमधुर स
से नलिनीगुल्म अध्ययन की परिवर्तना चल रही
महलों में बैठे हुए अवन्तिसुकुमाल के कर्ण-कुहरो
वे शब्द गिरे । वह एकाग्रता से उसे सुनने लगा।
यह अनुभव होने लगा कि यह वर्णन जो आचार्य
कर रहे है यह तो मेरा पूर्व परिचित है। मैने इस
अच्छी तरह से अनुभव किया है । कहाँ अनुभव किय
इस प्रश्न पर गहराई मे चिन्तन करते हुए, उसे जा
म्मरणशान हुआ।
वह उसी क्षण अपने महल से उतर कर जहाँ

!
-
मुनि अवन्तिमकुमाल
आचार्य देव विगजे थे वहां पर पहुंचा, और नमस्कार
कर निवेदन किया-भगवन् ! मैं भद्रा मार्थवाहिनी का
पुत्र । अभी-अभी आप नलिनीगुल्म अध्ययन की
परिवर्तना कर रहे थे, उसे वर्तमान में जानना कठिन
है, फिर आपने उसे कोसे जाना ?
भाचार्य मुहस्ती ने कहा-धमण भगवान महा-
वीर को वाणी मे मैने यह जाना है।
अवन्तिसुकुमाल ने निवेदन करते हुए कहा-
भगवन् । मै उनी नलिनीगुत्म विमान मे च्युत होकर
यहां पर जन्मा हूँ। भापत्री के मुखारविन्द ने वणन
गुनकर मेरी ग्मति उद्बुद्ध हो गई। अब मेरी किञ्चित्
मान भी यहां के वैभव के प्रति अनुरक्ति नहीं है अत.
आप मुझे पीघ्र ही दीक्षा प्रदान करे और माथ ही
सभागभी कराये।
मार्य मुहरती ने कहा-आवेग में किया गया
निर्णय मादी नहीं होता। तुम पीता न कर गहराई
निन्तन पर निर्णय लो । श्रमण जीवन की साधना
गमत्यात पाठोर माधना है। मोम के दांतो ने लोहे के
वमने पदाने ये. समान पाटिन है। तुम्हारा गरीर पून
सागर पोगरा है। माधु जीवन 2; प.प्टो को सहन
करने में गर असमर्म है।
हैं पतितुङ्गमाल-भगवन् । भानुशता से का
-

चमकते सितारे मैंने निर्णय नही किया है। मन में यदि दृढता है तो तन की कोमलता कभी बाधक नहीं बनती है, अपितु साधक ही होती है, अतः आप अब मुझे शीध्र ही प्रव्रज्या प्रदान करे। आर्य सुहस्ती-वत्स ! मैं तुम्हे प्रव्रज्या देने को प्रस्तुत हूँ, पर माता भद्रा व पत्नियो की अनुमति अपेक्षित है। क्या तुम उनके राग-पाश को तोड़ सकोगे अवन्तिसुकुमाल ने माता से और अपनी पत्नियं से प्रव्रज्या की अनुमति मांगी, पर किसी ने भी अनुमति नही दी तो उसने स्वय ही केशलुचन कर मुनिवे धारण कर लिया। आर्य सुहस्ती ने उसकी उत्कृष्ट • भावना देखकर दीक्षा प्रदान की। दीक्षित होते हैं उने यावज्जीवन का अनशनव्रत ग्रहण कर लिया कंटकाकीर्ण झाड़ी के मार्ग में से होकर वह श्मशान मे पहुँचा और वहाँ एकान्त शान्त स्थान मे जाका ध्यानस्थ हो गया। मुनि जिस मार्ग से श्मशान मे पहुँचे थे उस रास्ते के नुकीले काँटों से उनके पैर विध गये थे। पैरो से रक्त झरने लगा था। एक शृगालिनी रक्त-दो को देख. कर वहीं पहुंच गई जहां पर मुनि ध्यानस्थ थे । उसके साथ उसके बच्चे भी थे। उन सभी ने मुनि पर आन- मण किया। शृगालिनी ने प्रथम प्रहर में मुनि के एवं ।

५
मुनि अवन्तिमुकुमाल
पर मो या लिया तो उसके बच्चो ने दूसरे पैर को निगल
लिया, अपार वेदना होने पर भी मुनि आत्मभाव मे
स्थित रहे । दूसरे प्रहर मे मुनि की जंघाओ को चीर
दिया, तीसरे प्रहर मे उनके पेट की आंतो को चबाने
लगे और चतुर्थ प्रहर आते ही मुनि ने आयुष्य पूर्ण कार
दिया । मन मे नलिनीगुल्म विमान धूम रहा था अतः
वही पर महपिक देव बने ।
दूगरे दिन प्रात. माता भद्रा और उनकी
पलियो ने जव मुनि अवन्ति-सुकुमाल को न देखा तो
निन्तित हो गई । उन्होने आचार्यदेव से पूछा । आचार्य
देव ने कहा-वा जिस नलिनीगुल्म विमान के लिए
प्रमण बना था, वह उसे प्राप्त हो गया । घटना मुनकर
सभी सिहर उठी । उनके मन में भी चंगग्य का पयोधि
उहाले मारने लगा। उन्होने भी मयम स्वीकार कर
अपने जीवन को परम पवित बनाया।
आर्य गृहन्ती ने वर्षों तक धर्म की प्रभावना को
गौरत समय में अनदान कर समाधिपूर्वक आयु
पूर्ण किया। उनका समय और निर्वाण स० २४५ ने
२६ कम है।

२
आर्यरक्षित
।
दशपुर में राजा उदयन का राज्य था । उसके
राजपुरोहित का नाम सोम था, और उसकी धर्मपत्नी
का नाम रुद्रसोमा था। उसके आर्यरक्षित और फल्गु
रक्षित ये दो पुत्र थे। सोमदेव की निष्ठा वेद और
पनिषदों पर थी तो रुद्रसोमा जैनधर्मावलम्बी थी
र जैन अगम साहित्य पर निष्ठावान् थी। सोमदेव
ने अपने प्यारे पुत्रो को वेदों का सांगोपाड्न अध्ययन
करवाया । आर्यरक्षित विशेष अध्ययन हेतु पाटली-
पुत्र पहुंचा और गंभीर अध्ययन कर जब वह पुनः
लौटा तो नगर-निवासियों ने उसका हृदय से स्वागत
किया। सभी उसके आगमन से झूम उठे। स्वयं राजा
उदयन भी
फूला न समाया।
नगर में अपूर्व प्रसन्नता का वातावरण था।
सभी उसके प्रकाण्ड पाण्डित्य की चर्चा कर रहे थे।
आर्यरक्षित सभी के उपहारो को लेते हुए जब माँ के
पास नमस्कार के लिए पहुँचा तब मां के चेहरे पर

आयंरक्षित
उल्लास न देखा तो उसका माथा ठनका | अरे ! मा
की यह कैसी उपेक्षा है। मां को मेरे अध्ययन से क्यो
नही परितोष हुआ। जिस विद्या से माँ को मानन्द
नही, वह विद्या किस काम की ?
नमस्कार कर आर्यरक्षित ने मां से पूछा--मां !
में दीर्घ काल के पश्चात् अध्ययन कर आज लौटा हूँ,
पर तू मुझे देखकर क्यों नही प्रसन्न हुई ?
वत्स | तू मेरे कलेजे का टुकडा है, तुझे देखकर
प्रसन्नता होनी स्वाभाविक है। पर पुत्र, तेने अन्यान्य
शास्त्रों का अध्ययन तो किया है किन्तु दृष्टिवाद अभी
तक तूने नही पढा है। मेरी हार्दिक इच्छा है कि तू
दृष्टिवाद का अध्ययन कर। जव तू दृष्टिवाद का
अध्ययन कर लोटेगा तो मेरी प्रसन्नता का पार न
रहेगा।
आर्य रक्षित-मां मुझे बताओ, दृष्टिवाद के
ज्ञाता कौन है ? मैं किसके पास अध्ययन करूं ?
पुत्र ! इक्षुवन मे आचार्य तोसलिपुत्र विराज रहे
रहे है, जो जैन संघ के एक ज्योतिर्धर आचार्य हैं। वे
हप्टिवाद के ज्ञाता है तू उनके पास जा और दिल
लगाकर अध्ययन कर।
प्रात होते ही मां की आज्ञा से आयंरक्षित
आचार्य तोसलिपुत्र के पास अध्ययनार्थ प्रस्थित हुआ।

चमकते सितारे
M
D
कुछ मार्ग तय किया कि उसके पिता का परम मित्र
शाखापुर का निवासी महाद्विज वृद्ध मिला, जो आर्य
रक्षित से मिलने के लिए आ रहा था, उसके हाथ
इक्ष थे । इक्ष का प्रस्थान के समय मिलना अत्यन्
शुभ माना जाता है । मार्यरक्षित ने इक्ष गिने ।
साढ़े नौ थे। उसे सहज ही परिज्ञात हुआ कि व
जिस दृष्टिवाद का अध्ययन करने जा रहा है उसके
साढे नौ अध्ययन पढ़ सकेगा। महाद्विज ने आनः
किया कि एक बार तुम पुन: मेरे साथ घर चलो
किन्तु आर्य रक्षित ने कहा~मै घर इस समय नही चर
सकता । दृष्टिवाद का अध्ययन करके ही लौटूंगा
तुम मां को जाकर सम्पूर्ण वृत्त सुना देना।
आर्यरक्षित इक्ष वन पहुंचा। उसने बाहर ।
उपाश्रय मे झांककर देखा सभी श्रमण स्वाध्याय
तल्लीन है । वह उपाश्रय में जाना चाहता था प
जैन वन्दना-विधि का परिज्ञान न होने से कुछ समय तः
उपाश्रय के बाहर ही चंक्रमण करता रहा। कुछ सम
के पश्चात् आचार्यदेव को वन्दन करने हेतु ढड्ढ
नामक श्रावक आया । उसके तेजस्वी चेहरे से ही परि
ज्ञात हो रहा था कि वह जैनदर्शन का मर्मज्ञ है । आर्य
रक्षित ने सोचा, यह जिस प्रकार वन्दना आदि विधि
करेगा, मै भी उसी का अनुसरण करूंगा । उस दृष्टि से

आयंरक्षित है वह भी ढड्ढर के पीछे-पीछे उपाश्रय मे प्रविष्ट हुमा । ढढर ने जिस प्रकार आचार्य देव मादि मुनिवरो को नमस्कार किया उसी प्रकार उसने भी सारी क्रियाएँ की। आचार्य तोसलिपुत्र की पैनी दृष्टि उस पर टिकी । उन्होने देखा यह कोई महान् प्रतिभा का धनी है । आचार्य ने उससे पूछा-आर्य । तुम्हारा गुरु कोन है 2 hco आर्यरक्षित ने मधुर मुस्कान बिखेरते हुए कहा-~-इस समय मेरा गुरु ढड्ढर श्रावक है । आचार्य उससे अगला परिचय पूछना चाहते थे कि आचार्य के सन्निकट बैठे हुए एक मुनि ने कहा- गुरुदेव । यह राज-पुरोहित सोमदेव एव सुश्राविका रद्र- सोगा का पुत्र है। यह वैदिक साहित्य का उद्भट विद्वान है, पट्दर्शन का परिज्ञाता है । कल ही अध्य- यन कर यह पाटलीपुत्र से लौटा है जिसकी प्रसन्नता मे सारे नगर मे उत्सव मनाया गया था। आचायं तोसलिपुत्र ने उसके आने का कारण जानना चाहा । आर्यरक्षित ने कहा-मेरी मां ने दृष्टि- वाद के अध्ययन के लिए आपकी सेवा मे भेजा है। मैं दृष्टिवाद का अध्ययन करना चाहता हूँ। आचार्य ने अपने विशिष्ट ज्ञान ने जाना कि यह जैन शासन का महान प्रभावक आचार्य होगा ।

१० चमकते सितारे आचार्य ने कहा-आर्य ! मैं तुम्हें दृष्टिवाद का अध्ययन कराने के लिए प्रस्तुत हूँ, पर एक शर्त है कि तुम्हे श्रमण वेष धारण करना होगा और सच्चा जैन श्रमण बनना होगा। आर्यरक्षित-गुरुदेव ! मैं श्रमणधर्म स्वीकार करने के लिए तैयार हूँ, पर मेरा नम्र निवेदन है कि नगर निवासियों का व राजा का मेरे पर अत्यन्त स्नेह है। वे स्नेह के कारण कोई बाधा उपस्थित न करें अतः आप मुझे दीक्षा प्रदान कर शीघ्र ही यहाँ से अन्यत्र प्रस्थान करे तो श्रेयस्कर रहेगा। आर्यरक्षित का प्रस्ताव आचार्यदेव को उचित स हुआ। दीक्षा देकर उन्होने अन्यत्र प्रस्थान कर दिया। आर्यरक्षित की सूक्ष्मग्राहिणी प्रतिभा ने कुछ ही दिनो मे एकादश अगो का अध्ययन पूर्ण किया। दृष्टिवाद का अध्ययन प्रारम्भ हुआ। उस समय आचार्य वज्र स्वामी दृष्टिवाद के दश पूर्वो के पूर्ण ज्ञाता थे, जो उज्जयिनी में थे । आचार्य तोसलि- पुत्र ने अन्य स्थविर सन्तों के साथ आर्यरक्षित को आचार्य वज्र के पास प्रेषित किया। आर्यरक्षित क्रमशः विहार करते हुए उज्जयिनी पधारे। उज्जयिनी में महास्थविर भद्रगुप्तसूरि विराज रहे थे। जो अत्य- धिक वृद्ध हो चुके थे, शरीर जर्जरित हो चुका था,

आर्यरक्षित
११
।
त: सर्वप्रथम आर्यरक्षित उनकी सेवा में पहुँचे ।
'द्रगुप्त मूरि ने आर्यरक्षित को देखकर कहा-तुम
क समय पर आये हो, तुम्हारे मधुर सहयोग से
झे समाधिमरण प्राप्त होगा। कुछ समय तक मेरी
वा मे रहो । आचार्य के आदेश से वे सेवा मे रहे, और
नकी सेवावृत्ति को देखकर आचार्य बहुत ही प्रसन्न
ए । आचार्य भद्रगुप्त के स्वर्गारोहण के पश्चात् वे
चार्य वज्र की सेवा में पहुँचे । आर्यरक्षित के आगमन
पूर्व रात्रि मे आचार्य वज्र ने एक स्वप्न देखा-कि
क अतिथि आया है जो मेरे पयः पूरित पात्र को प्रायः
। गया है, पर कुछ अवशिष्ट रह गया । आचार्य वज्र
'अपने स्वप्न को सन्तो को बताते हुए कहा-कि आज
कोई विशिष्ट अतिथि आयेगा और मेरे से पूर्वो का
नि प्राप्त करेगा, पर दश पूर्वो का पूर्ण ज्ञान प्राप्त
ही कर सकेगा। आचार्य वज्र ने अपनी बात पूर्ण की
क आयंरक्षित ने सन्तो के साथ आचार्य वज्र के उपा-
ज्य मे प्रवेश किया। आचार्य वन ने उनका स्वागत
रते हुए पूछा कि आप कहाँ से आ रहे है और कोई
वशेष प्रयोजन भी है क्या
आर्यरक्षित ने कहा-मैं आचार्य तोसलिपुत्र का
शष्य आर्यरक्षित हूँ। आचार्यदेव की आज्ञा से दृष्टि-
पाद का अध्ययन करने हेतु आपकी सेवा में उपस्थित
जा हूँ।
?

૧૨ चमकते सितारे Pol- आचार्य वज ने अध्ययन प्रारम्भ करवाया। आर रक्षित मनोयोगपूर्वक अध्ययन करने लगे। उन्होंने पूर्व का अध्ययन पूर्ण कर लिया । दशवे पूर्व की चौवी जविकाओ का अध्ययन भी सम्पन्न हो चुका था। आ का अध्ययन चल रहा था। इधर माता रुद्रसोमा को पुत्र की याद सता र थी। कुछ दिनों तक तो वह पुत्र को भुलाने का प्रयाः करने लगी पर ज्यो-ज्यो पुत्र को भुलाने का प्रयात करती थी त्यो-त्यो पुत्र की स्मृति अधिक आने लगी एक दिन उसके धीरज का बांध टूट गया । उसी आँखों से आँसू बरसने लगे। पुरोहित सोमदेव ने कहा- कुछ धैर्य रखो, मैं अभी आर्यरक्षित को बुलाने के लिए फल्गुरक्षित को भेजता हूँ। रुद्रसोमा ने कहा-यह बहु ही अच्छा है। रुद्रसोमा ने फल्गुरक्षित को कहा-अपरे ज्येष्ठ भ्राता को बुलाकर लाओ। पर वह साधु वन चुका है । ऐसे नहीं आयेगा अतः तुम उससे कहना माँ तुम्हारी स्मृति से पागल हो रही है, तुम्हे इतन निर्मोही नही होना चाहिए। तुमने जिस श्रेष्ठ मान को ग्रहण किया है उस मार्ग को माता-पिता, बन्द आदि भी स्वीकार करना चाहते है अतः उनके उद्धार हेतु तुम्हे शीघ्र ही आना चाहिए। फल्गुरक्षित माँ के सन्देश को लेकर आयरक्षित

आर्यरक्षित
१३
-
।
। पास पहुंचा, और मां की बात कही। आर्यरक्षित
कहा-मेरा अध्ययन चल रहा है, मैं इस समय नही
IT सकता । यदि तेरा मेरे पर स्नेह है तो तू साधु बन
IT । आर्यरक्षित के त्याग वैराग्यपूर्ण उपदेश को
हुनकर फल्गुरक्षित ने सयम स्वीकार कर लिया।
ध्ययन निरन्तर चल रहा था। एक दिन आर्यरक्षित
। वज्र स्वामी से प्रश्न किया-भगवन् ! अभी तक
कतना अध्ययन अवशिष्ट है ?
आचार्य वज्र ने कहा- वत्स | तुम इसकी चिन्ता
1 करो, निरन्तर अध्ययन करते रहो। अभी तक
तुम्हारा अध्ययन सरसो के दाने जितना हुआ है और
सुमेर जितना अवशिष्ट है । अतः मन लगाकर प्रयत्न
करो, सफलता देवी तुम्हारे चरण चूमेगी।
आर्य रक्षित विशेष अध्यवसायपूर्वक अध्ययन मे
सलग्न हो गये । काफी समय बीत गया। एक दिन फल्गु
रक्षित ने पुनः माँ की बात को दुहराई और कहा-
भाई, इतने निष्ठर न वनो, उन्हे प्रतिबोध देकर उनका
भी उद्धार करो। फल्गुरक्षित ने वात इस तरह से कही
कि आर्य रक्षित को वह वात जच गई, उन्होने आचार्य
वज़ से कहा-भगवन् ! मेरी इच्छा है कि माता-पिता
को प्रतिवोध देकर
पुनः
आपकी सेवा मे आकर अध्ययन
पार।
।
-

१४
चमकते सितारे
am
आचार्य वज्र ने गम्भीरता से चिन्तन किया जा
कहा, मेरा आयुष्य अब कम है, तुम पुनः लौटकर आने
तब तक मै जीवित नहीं रह सकूगा, अतः तुम्हार
जान अपूर्ण ही रहेगा। तुम सहर्ष जाओ, और आ
परिजनों को साधना के महामार्ग में प्रवेश कराओ
आचार्य वज्र यह भी जानते थे कि आर्यरक्षित इस
अधिक ज्ञान प्राप्त न कर सकेगा। दश पूर्व का ज्ञान
मेरे साथ ही लुप्त हो जायेगा अतः उन्होने जाने ।
अनुमति दे दी।
आर्य रक्षित सन्तों के साथ विहार करते हु।
1 पाटलीपुत्र पहुँचे । आचार्य तोसलिपुत्र को अपने अध्यय
से परिचित किया। अपने शिष्य की दक्षता देखना
आचार्य तोसलिपुत्र बहुत ही प्रसन्न हुए। वे बहुत
वृद्ध हो चुके थे अत. उन्होने अपना उत्तराधिकार आहे,
रक्षित को प्रदान किया। आर्यरक्षित वहाँ से विहान
कर दशपुर पहुँचे। राजा से लेकर रंक तक सभी
उनका हृदय से स्वागत किया। आर्यरक्षित के पाव
प्रवचन को सुनकर राजा ने जैनधर्म ग्रहण किया
अपने दोनों ही पुत्रो को श्रमण वेश मे देखकर मां के
हृदय आनन्द से झूम उठा । वह पक्की निर्गन्थ श्राविक
थी अतः उसे बहुत ही प्रसन्नता थी। पर सोमदेव ने, जो
कट्टर वैदिक परम्परा का अनुयायी था, कहा-
पुत्र ! श्रमण वेष का परित्याग कर शीघ्र ही गृहस्थाश्रम
।

आर्यरक्षित
१५
मि प्रवेश करो। मैने तुम्हारे लिए अनेक याज्ञिक कन्याएँ
देख रखी है । उनके साथ विवाह कर वंश वृद्धि करो।
'गृहस्थाश्रम से वढकर अन्य कोई आश्रम नही है ।
आर्यरक्षित ने पिता के तर्कों का खण्डन कर
श्रमण जीवन के महत्त्व का प्रतिपादन किया। सोमदेव
आर्यरक्षित की अकाट्य युक्तियो का खण्डन न कर
• सका । वह केवल इतना ही कह सका कि तुम जरा
अपनी प्यारी माँ की ओर देखो, उसकी मनसमाधि के
लिए गृहस्थाश्रम स्वीकार करो।
आर्यरक्षित ने माँ से कहा-मां ! क्यो वृथा मोह
मे उलझ रही हो । ससार तो असार है, संयम ही सार
है, उसे ग्रहण कर अपने जीवन को चमकाओ। तुम्हारी
पवित्र प्रेरणा से ही मैं दृष्टिवाद के अध्ययन के लिए
गया । क्या तुम्ही ससार की मोह-माया मे उलझोगी ?
माता तुम सच्ची वीरागना हो । तुम्हें साधना के क्षेत्र
में प्रवेश कर अपने सच्चे वीरत्व का परिचय देना है।
पुत्र के उपदेश से मां के मन में वैराग्य भावना
: जागृत हुई। उसने ससार का परित्याग कर दीक्षा
। ग्रहण की । उसके पश्चात् एक-एक सदस्य साधना के
मार्ग में आगे बढ़ने लगा और अन्त मे पिता सोमदेव
ने भी दीक्षा ग्रहण को। इस प्रकार आर्यरक्षित ने
अपने पूरे परिवार को बाहती दीक्षा प्रदान कर उनके
जीवन का कल्याण किया।
।

१६
चमकते सितारे
fy
आचार्य आर्यरक्षित के घृतपुष्यमित्र, वस्त्र
पुष्यमित्र और दुर्बलिकापुष्यमित्र ये तीन विशिष्ट
लब्धिधारक शिष्य थे। तीनों ही प्रबल प्रतिभाधारी
थे । घृतपुष्यमित्र में वह शक्ति थी कि जहां पर घृत
का पूर्ण अभाव होता था वहाँ पर भी वे प्रचुर मात्रा
मे घृत प्राप्त कर सकते थे। कंजूस से कंजूस व्यक्ति भी
उन्हें प्रसन्नता से घी देता था।
वस्त्रपुष्यमित्र में वह शक्ति थी कि चाहे जितने
वस्त्र उन्हे सुगमता से मिल सकते थे। जिनके पास
स्वयं भी तन ढाँकने को वस्त्र नही होते थे वे भी
उन्हे वस्त्र देने में आनन्द का अनुभव करते थे।
दुर्बलिकापुष्यमित्र की शक्ति निराली थी
वे अपनी लब्धि-बल से चाहे जितना घृत आदि से सन
हुआ आहार करते थे। वह सभी उन्हे हजम हो जात
था। वे सदा अध्ययन-चिन्तन मे लीन रहते थे। ध्या
योग की साधना विशेष रूप से चलती थी। प्रज्ञा
निर्मलता से उन्होने स्वल्प समय में ही नौ पूर्वो व
अध्ययन पूर्ण कर लिया था। अधीत श्रुत कहीं विस्मृ
न हो जाये अतः रात-दिन उसी की परिवर्तना में लन
रहते थे।
दुर्बलिकापुष्यमित्र के पारिवारिक जन दशपुर
रहते थे और वे बौद्धधर्म के अनुयायी थे। वे एक बार
में

आर्यरक्षित १७ पुरमार्यरक्षित की सेवा में उपस्थित हुए, उन्होने वार्तालाप तार के प्रसग मे कहा-ज्ञात होता है कि जैन-साधना बल पद्धति मे ध्यान का कोई भी महत्त्व नही है । आर्यरक्षित ने कहा-तुम्हारी यह धारणा भ्रान्त. । तुम्हारा ही बन्धु पुष्यमित्र गजव का ध्यानी है जिसके कारण ही वह दुर्वल दिखाई दे रहा है । उन बौद्ध अनुयायियो ने उपहास करते हुए कहा चा -सरस आहार के अभाव मे ये कृश हो गये होगे, कही शिकोई ध्यान की साधना से कृश होता है ? है आर्यरक्षित ने प्रतिवाद करते हुए कहा-जैन 'ये। शासन मे घृत आदि सरस आहार की कोई कमी नही राती है । इसे खूब ही सरस आहार प्राप्त होता है किन्तु दिसतत अध्ययन और ध्यान-साधना मे लगे रहने के हो कारण यह कृश है। सरस आहार करने के बावजूद 11 भी योग की साधना से यह कृश रहता है । यदि तुम्हे प्रज्ञा परे कथन मे विश्वास न हो तो तुम इसे अपने आवास पूर्वोमे रखकर निरन्तर स्निग्ध भोजन कराकर मेरे कथन विकी वास्तविकता देख सकते हो। बन्धुजनों के अत्यधिक आग्रह से आचार्य आर्य- रक्षित ने दुर्बलिकापुष्यमित्र को उनके वहाँ पर रहने ६ का आदेश दिया। निरन्तर सरस आहार करने पर भी जब ये दुर्बल हो रहे तब उन्हे आचार्यदेव के कथन पर में

on
चमकते सितारे
।
विश्वास हुआ और अपनी भूल ज्ञात हुई । दुईलिका
पुष्यमित्र ने पारिवारिको को प्रतिबोध दिया और
जैनधर्मानुयायी बनाया।
आर्यरक्षित के चार प्रज्ञा-सम्पन्न शिष्य थे
दुर्बलिकापुष्यमित्र, विन्ध्य, फल्गुरक्षित, और गोष्ट
माहिल । हम पहले वता चुके है कि फल्गुरक्षित आर्य
रक्षित के लघु भ्राता थे और गोष्ठामाहिल उन
मामा थे। ये चारो सदा अध्ययन में मग्न रहते थे।
एक दिन मुनि विन्ध्य ने आचार्यदेव से निवेदन
किया-गुरुदेव ! मै पाठ शीघ्र ही भूल जाता हूँ अ
मुझे पृथक् वाचना दी जाये। आर्यरक्षित ने कहा-
यदि मैं तुम्हे ही लक्ष्य मे रखकर व्याख्या करूं तो सभ
के अध्ययन में व्याघात होगा अतः तुम दुर्बलिका
पुष्यमित्र से अध्ययन करो, जिससे तुम शीघ्र ही आने
बढ सकोगे।
आर्यरक्षित की आज्ञा को शिरोधार्य कर मुनि
विन्ध्य ने मुनि दुर्बलिकापुष्यमित्र से अध्ययन प्रारम्म
किया। कुछ दिनों के पश्चात् दुर्बलिका पुष्यमित्र ने
आचार्य से निवेदन किया-गुरुदेव | वाचना में लगे
रहने से मैं स्वयं अध्ययन नहीं कर पा रहा हूँ और साथ
ही पठित श्रुत भी परिवर्तना के अभाव में विस्मृत हो
रहा है, अतः मुझे योग्य मार्गदर्शन दें। यदि मैं वाचना

आर्यरक्षित १६ - देने मे ही लगा रहा तो नौवे पूर्व की विस्मृति हो जायेगी। दुर्वलिकापुष्यमित्र के इस कथन से आर्यरक्षित चिन्तित हो गये । इसके जैसा प्रतिभा सम्पन्न व्यक्ति भी विस्मृति की शिकायत करता है तो स्वल्प प्रतिभाधारी मुनियो की क्या स्थिति होगी। अत. उन्होने चरण कर- णानुयोग, धर्मकथानुयोग, गणितानुयोग और द्रव्यानुयोग को पृथक्-पृथक् विभाजित किया। अंग और उपाङ्गों को मुख्य रूप से नरणकरणानुयोग मे, उत्तराध्ययन, ज्ञाता आदि को धर्मकथानुयोग मे; सूर्यप्रज्ञप्ति, चन्द्रप्र- ज्ञप्ति, जम्बूद्वीपप्रज्ञप्ति आदि को गणितानुयोग मे और दृष्टि- वाद को द्रव्यानुयोग में सस्थापित किया । एक वार आर्यरक्षित मथुरा में विराज रहे थे। उस समय प्रथम देवलोक का शकेन्द्र श्री सीमधर स्वामी के पास दर्शन के हेतु पहुँचा। सीमधर स्वामी से निगोद की सूक्ष्मतम व्याख्या सुनकर वह अत्यन्त उत्साहित हुआ। उसने भगवान से निवेदन किया-भगवन् । क्या वर्तमान में भरतक्षेत्र मे इस प्रकार निगोद की व्याख्या करने वाले कोई विद्वान् आचार्य या सन्त है ? यदि हैं तो कौन है ? कहां हैं? सोमंधर स्वामी ने आयंरक्षित का नाम बताया और कहा कि वे इस समय मथुरा मे है । -

२०
चमकते सितारे
शक्रन्द्र सीधा मथुरा आया और उसने एक वृद्ध
ब्राह्मण का रूप बनाया जिसके हाथ थर-थर काँप रहे
थे, पैर लड़खड़ा रहे थे, कमर झुकी हुई थी, और केश
चाँदी के समान चमक रहे थे। भयकर रूप से खांसी
और कफ का प्रकोप था। आँखो में से पानी टपक रहा
था, गीड आ रहे थे। उसने सच्चे जिज्ञासु की भांति
आर्यरक्षित से निगोद के सम्बन्ध मे प्रश्न किया । आर्य
रक्षित ने निगोद का गम्भीर विश्लेषण किया जिसे
सुनकर शक्नेन्द्र का सिर श्रद्धा से झुक गया।
उन्होने द्वितीय प्रश्न किया-भगवन् ! मै बहुत ही
वृद्ध हो चुका हूँ कृपा करके बताइये अभी मेरा कितना
आयु अवशिष्ट है
आर्यरक्षित ने वृद्ध को और देखा । उनकी
रेखाओं पर उनकी दृष्टि गई। उन्होने उपयोग लगाकर
कहा-~तुमने कृत्रिम वृद्ध का रूप बनाया है, तुमने
जितना आयुष्य भोगा है उससे अधिक अवशिष्ट है ।
तुम्हारा पूर्ण आयुष्य दो सागर का है और तुम सौधर्म
देवलोक के शवेन्द्र हो।
शक्रेन्द्र अपने आपको छुपा न सका, वह प्रकट
हुआ। उसने भगवान सीमधर स्वामी की घटना
बताई और नमस्कार कर ज्यों ही जाने के लिए प्रस्तुत
हुआ त्यो ही आर्यरक्षित ने कहा-आप कुछ समय
?

आर्यरक्षित
२१
तक ठहरे, क्योकि सभी शिष्य भिक्षा के लिए नगर मे
गये हैं। वे आपको देखकर धर्म के प्रति अधिक श्रद्धा-
निष्ठ होंगे।
शक्रन्द्र ने निवेदन किया-भगवन् | इससे लाभ
के बजाय हानि अधिक होने की सम्भावना दीखती है।
मेरे दिव्य रूप और ऐश्वर्य को देखकर अनेक सन्त
निदान करेगे। अतः मेरा न रहना ही उपयुक्त है ।
शिष्यो को विश्वास दिलाने के लिए मैं मकान का द्वार
विपरीत दिशा में कर देता हूँ।
भिक्षा के लिए गये हुए मुनि जव पुनः लौटे तो
उन्हे उपाश्रय का द्वार न मिला, वे इधर-उधर ढूँढ़ने
लगे। आर्यरक्षित ने अन्त मे उन्हे वताया। सभी
शिष्य विस्मित थे, उन्होने इसका रहस्य जानना
चाहा । आचार्यदेव ने शक्रेन्द्र के आगमन की सम्पूर्ण
घटना कह सुनाई। सभी के मन में यह बात कचो-
टने लगी कि शकेन्द्र के आने पर भी हम उसे नहीं
देख सके।
आर्यरक्षित एक युगप्रवर्तक आचार्य थे। उन्होने
परम्परा की दृष्टि से अनेक वातो मे देवा-काल के
अनु-
सार परिवर्तन किया। उस समय श्रमण एक ही पात्र
रखा करते थे पर आर्यरक्षित ने वर्षाऋतु के चार
माह मे द्वितीय मात्रिक पान रखने का विधान

२२
चमकते सितारे
किया। साध्वियां साध्वियो के पास ही आलोयणा
करती थी, आर्यरक्षित ने कहा कि साध्वियों साधुओं के
पास भी आलोयणा कर सकती है।
एक बार आर्यरक्षित पाटलीपुत्र पधारे । आचार्य
देव के पावन-प्रवचनो को सुनकर राजा चन्द्र जैन धर्मा-
नुयायी बना।
आर्यरक्षित के शिष्य भी बड़े योग्य थे। तार्किक
थे। शास्त्रार्थ में निष्णात थे। एक बार आर्यरक्षित के
मथुरा से प्रस्थान करने के पश्चात् नास्तिक विज्ञ वहाँ
पर आये और उन्होंने अपने अकाट्य तर्कों से आस्तिको
को पराजित कर दिया। उस समय गोष्ठामाहिल ने
अपनी विशेष प्रतिभा का परिचय दिया और नास्तिको
को पराजित कर जैनधर्म की विजय-वैजयन्ती
फहराई।
आर्यरक्षित वृद्ध हो चुके थे । अपना उत्तरदायित्व
किसे देना यह एक चिन्तनीय प्रश्न था। आर्यरक्षित के
परिवार वालों का आग्रह था कि फल्गुरक्षित को दिया
१ (क) निशीथसूत्र भाष्य, गा० ४५१५
(ख) निशीथसूत्र चूर्णि, भाग ४, पृ० ८८७
(ग) व्यवहारसूत्र मलयगिरिवृत्ति, पृ० ४१-४२
२ व्यवहारसूत्र मलयगिरि वृत्ति, पृ० १६

आर्य रक्षित जाय । संघ का आग्रह था कि गोष्ठामाहिल इस पद के योग्य है, पर आयंरक्षित इन दोनों को प्रस्तुत पद के योग्य नही समझते थे। उनकी दृष्टि से इस पद के सर्वथा योग्य दुवंलिकापुष्यमित्र थे । उन्होने तीन घड़े मँगवाये । एक घड़े मे तेल, दूसरे घड़े मे घृत और तीसरे घड़े मे उढ़द भरा गया। तीनो को ही पुनः खाली किया गया । तेल वाले घड़े मे कुछ तेल लगा हुआ था, घी वाले घड़े में काफी मात्रा मे घी लगा हुआ था और उड़द का घड़ा सर्वथा खाली था। आर्यरक्षित ने स्पष्टीकरण करते हुए कहा-फल्गुरक्षित तेल के घड़े के सदृश है। यह ससार से पूर्ण अनासक्त नही है, कुछ आसक्त है। गोष्ठा- माहिल घृत के घड़े के सदृश है, फल्गुरक्षित की अपेक्षा इसमे आसक्ति की मात्रा अधिक है। इसमे यश की कामना अधिक है, किन्तु दुर्बलिकापुष्यमित्र उड़द के घडे के सदृश है जो पूर्ण रूप से अनासक्त है, यश की तनिक भी इच्छा नहीं है अतः यही आचार्य पद के लिए सर्वथा योग्य है । सभी ने आयंरक्षित के कथन का समर्थन किया। दुर्व- लिकापुष्यमित्र को आचार्य पद प्रदान किया गया । सघ की समुचित व्यवस्था करने के पश्चात् आर्य- रक्षित ने समाधिपूर्वक अनशन कर आयु पूर्ण किया। दुर्बलिकापुष्यमित्र ने अपने कुशल नेतृत्व से संघ का सचालन किया। गोष्ठामाहिल आचार्य पद न मिलने

२४
चर्मकते सितारे
वह अन्यमनस्क रहने लगा । उसने संघ का परित्याग
किया और सातवें निह्नव के रूप मे विश्रुत हुआ। उसका
सम्प्रदाय 'अबद्धक' के नाम से प्रसिद्ध हुआ । उसका यह
मन्तव्य था कि आत्मा के साथ कर्मों का स्पर्श ही होता
है, वे आत्मा के साथ एकीभूत नहीं होते।
आर्यरक्षित का जन्म विक्रम स० ५२ मे हुआ,
दीक्षा ७४ में हुई, युगप्रधान पद ११४ में और स्वर्गवास
१२७ में हुआ।
-प्रभावक चरित
-भरतेश्वर-बाहुबलि वृति
Rition

३
आर्य वजस्वामी
अवन्ति देश के तुम्ववन सन्निवेश मे धन श्रेष्ठी
रहता था । धनगिरि उसका पुत्र था, जो वाल्यकाल से
ही विरक्त था, उसी सन्निवेश मे धनपाल नामक
दूसरा श्रेष्ठी था उसके शमित नामक पुत्र और सुनन्दा
नामक पुत्री थी। शमित विराट् वैभव और असीम
वात्सल्य मे पला-पुसा था किन्तु जन्म से ही वह वैरागी
था। राग का वधन उसे बाँध नही सका। एक बार
आचार्य सिहगिरि अपने शिष्यों सहित वहाँ पधारे ।
उनके पावन प्रवचन को सुनकर विराट वैभव को त्याग
कर शमित ने आहती दीक्षा ग्रहण की।
श्रेष्ठी धनपाल ने एक दिन धनगिरि के समक्ष
सुनन्दा के पाणिग्रहण का प्रस्ताव रखा। घनगिरि ने
इन्कारी की, पर अन्त मे धनपाल के अत्यधिक आग्रह
मे उसे स्वीकृति देनी पड़ी। धनगिरि और सुनन्दा का
विवाह सम्पन्न हुआ किन्तु अनुराग विराग को लम्बे
समय तक दवा न सका । सुनन्दा सगर्भा थी । आचार्य
सिंहगिरि वहाँ पर पधारे और धनगिरि ने भी आचार्य

२६ चमकते सितारे । - के पास दीक्षा ग्रहण कर ली। आर्य शमित और धनगिरि दोनों ही साथ-साथ स्वाध्याय, तप आदि अनुष्ठान करने लगे। सवा नौ माह पूर्ण होने पर सुनन्दा ने तेजस्वी पुत्र को जन्म दिया। चारों ओर उल्लास का वातावरण छा गया। अभिनव राग-रंग में सभी झूम रहे थे, उसी समय किसी के मुंह से ये शब्द निकल पड़े, 'यदि इस बालक के पिता दीक्षित न हुए होते तो इससे भी अधिक उल्लासमय वातावरण होता।' बालक के कर्ण- कुहरों में ये शब्द गिरे। शब्दो के श्रवण मात्र से ही उसकी आत्मा में एक आध्यात्मिक स्पन्दन हुआ। वह चिन्तन करने लगा कि पिताजी ने बधन को छोड़कर मुक्ति की ओर कदम बढ़ाये हैं, मैं भी कोई ऐसा उपाय करूँ जिससे बंधन से मुक्त हो सकें। माँ की ममता निराली है, मैं ही उसका आधार स्तम्भ हूँ अतः सारी ममता उसकी मेरे में केन्द्रित रहेगी अतः अभी से मुझे ऐसा प्रयास करना चाहिए जिससे मैं माँ की ममता मुक्त हो सकूँ। माता के मोह पर प्रहार करने के लिए उसने उसी क्षण से रोना प्रारंभ किया वह दिन-रात रोने लगा। उसके रोने से सुनन्दा न एक क्षण शान्ति से बैठ सकती थी, न नीद ले सकती थी। न भोजन ही शान्ति से कर सकती थी न अन्य कोई कार्य ही । अनेक उपाय

।
करने पर पर भी उसका रोना वन्द नहीं हुआ। सुनन्दा
उससे बहुत ही परेशान होगई । सुनन्दा ही नही, सारा
परिवार भी परेशान था। छह महीने बीत गये ।
सुनन्दा सोचने लगी कि सन्तान के अभाव मे भी दुख
होता है और ऐसी सन्तान से अधिक दुःख होता है।
इस दुःख से मुक्त होने का एक ही उपाय है कि यदि
इसके पिता आ जाये तो मैं उन्हे सौपकर इस दुःख से
मुक्त हो सकती हूँ।
आचार्य सिहगिरि अन्यान्य गांवों में परिभ्रमण
करते हुए तुम्बवन मे पधारे । आर्य शमित और मुनि
धनगिरि भी उनके साथ थे । आचार्यश्री की अनुमति
लेकर आर्य शमित व मुनि धनगिरि गोचरी के लिए
ज्यों ही प्रस्थित होने लगे, त्यों ही शुभ शकुन हुए।
आचार्य सिहगिरि ने उस शकुन के आधार से चिन्तन
कर कहा-आज तुम्हे महान लाभ की प्राप्ति होगी।
गोचरी मे सचित्त, अचित्त और मिश्र जो भी मिल जाये
उसे ले लेना उसमे किञ्चित् मात्र भी संकोच करने की
आवश्यकता नहीं है।
आर्य शमित के साथ मुनि धनगिरि सर्वप्रथम
सुनन्दा के यहाँ भिक्षा के लिए पहुंचे। मुनि धनगिरि
को देखकर सुनन्दा पुलक उठी । नमस्कार कर बोली-
आपके इस पुष ने मुझे बहुत ही परेशान कर दिया

२८
चमकते सितारे
है । अनेक उपाय करने पर भी इसका रोना बन्द नही
हुआ है। अब आप आ गये है तो इसे सभालिये। मैं
अकेली ही कष्ट भोगती रहूँ, यह कहाँ का न्याय है ?
मुनि धनगिरि को आचार्यदेव का कथन स्मरण
हो आया। उन्होने लेने के पूर्व स्पष्टीकरण किया कि
तुम मुझे प्रसन्नतापूर्वक दे रही हो न ? इसका साक्षी
तुम्हारा भाई और तुम्हारी सहेलियाँ है। पुत्र को में
ले जाऊँगा। उसके पश्चात् तुम्हारा कोई अधिकार न
रहेगा। फिर पश्चात्ताप न करना।
सुनन्दा अत्यन्त परेशान हो रही थी, उसने कहा-
आप इसे ले जाइए, मैं कभी भी आपत्ति नहीं उठा-
ऊँगी। आप इसे लेकर मुझे कष्ट-मुक्त कीजिए।
मुनि धनगिरि ने अपनी झोली फैलाई और सुनन्दा
ने अपने प्यारे लाडले को उसमे रख दिया । ज्यों ही
मुनि उसे लेकर चले त्यो ही वज्र ने रोना बन्द कर
दिया। बालक बहुत ही भारी था, अतः धनगिरि की
भुजा कुछ झुक गई थी। आचार्य सिहगिरि ने हाथ
आगे बढ़ाया। उन्होने मुनि धनगिरि से पूछा-वज्र
के समान ठोस और सारभूत क्या वस्तु लेकर आया है ?
झोली खोलकर देखा, अन्दर एक तेजस्वी बालक है जो
आचार्य को देखकर मुस्करा रहा है । मुनियों को देख
कर बालक के मन में अपूर्व प्रसन्नता थी कि आज

आर्य वज्रस्वामी २६ उसका पुरुषार्थ सफल हुआ है । वह ममता के स्थान को छोडकर समता के स्थान में आ गया है आचार्य सिंहगिरि ने बालक के लिए 'वन' शब्द का प्रयोग किया था अतः उस दिन से बालक का नाम- करण ही 'वन' हो गया। वालक के लालन-पालन का उत्तरदायित्व साध्वियो के नेश्राय मे शय्यातर को दिया गया। शय्यातर महिलाओ ने अत्यन्त स्नेह से वज्र का लालन-पालन प्रारम्भ किया। वन का अधिकांश समय साध्वियों के उपाश्रय में ही व्यतीत होता था। साध्वियाँ जो स्वाध्याय करती उसे वह तन्मय होकर सुनता, उस समय उसे नीद भी नही सताती थी। वन में प्रतिभा गजव की थी । उसने ग्यारह अगो को सुनकर स्मरण कर लिया था किन्तु कही पर भी ज्ञान को छलकने नहीं दिया। साध्वियो के नेश्राय मे वालक वन बड़ा हो रहा था । जब कभी सुनन्दा साध्वियों के उपाश्रय मे जाती तो बालक वज्र को देखकर उसका मातृस्नेह उमड़ पड़ता । वह बालक वज्र को गोद मे लेती, उसे दुग्धपान कराती। रंग-बिरंगे सेल-खिलौने लाकर उसे अपनी और आकर्षित करने का प्रयास करती। अपनी भूल उसे रह-रहकर कोटे की तरह खलती, पर वाण हाथ से छूट चुका था । उसने साध्वियों से पुनः अपने पुत्र - ܇ ܀

चमकते सितारे
को वापिस देने के लिए प्रार्थना की, पर साध्वियों ने
स्पष्ट रूप से कहा-~यह वालक आचार्य की धरोहर है,
हमारा देने का तनिक मात्र भी अधिकार नहीं है।
बालक वज्र को देखकर सुनन्दा उसे लेने के
लिए अकुला उठती थी । उसने उसके लिए बहुत
सारे प्रयत्न किये, पर सफल न हो सकी। वह पुत्र को
पाने के लिए अधीर हो रही थी।
एक बार पुनः आचार्य तुम्बवन पधारे । मुक्ति
धनगिरि के समक्ष सुनन्दा ने अपने अन्तर्मन की व्यथा
कही । बालक वज्र की मॉग की। मुनि धनगिरि ने
कहा-सज्जन कही हुई बात से मुकरते नही है । तुमने
मुझे सदा के लिए इसे दिया है और इस सत्य के लिए
साक्षी भी प्रस्तुत है । अब तुम्हारा कुमार पर कोई
अधिकार नहीं है, यह तो हमारे साथ रहेगा और जैन
शासन की महान् प्रभावना करेगा।
सुनन्दा ने अपनी बात संघ के समक्ष रखी । सघ
ने भी उसे समझाया पर उसका मातृस्नेह अधिक से
अधिक उमड़ता ही गया। उसने राजा को अपनी बात
कही। उसे पूर्ण आशा थी कि राजा अवश्य ही न्याय
करेगा। राजा ने सम्मान के साथ सघ सहित सन्तो
को निमंत्रित किया। राजा के सामने दाहिनी ओर
आचार्य सिहगिरि आदि बैठे और बाईं ओर पारिवा.

आय वनस्वामी रिक जनों के साथ सुनन्दा बैठी। सुनन्दा ने कहा-- परिस्थिति के कारण मैंने कुमार को सौपा था यह सत्य है, पर मातृ-हृदय इतना निष्ठुर नही है जो पुत्र को दुत्कार दे, यह मेरा हृदय है। इसे मुझे पुन: सौंपना चाहिए। आचार्य ने कहा-कुमार वज्र पर उसकी माता मुनन्दा का कोई अधिकार नही है। वह अपने सम्पूर्ण अधिकार मुनि धनगिरि को दे चुकी है, अव पुनः अधि- कारो का प्रत्यावर्तन नही हो सकता । इस पर अव आचार्य और सघ का ही अधिकार है। राजा असमजस मे पड़ गया। न्याय का पलडा आचार्य व संघ की ओर था और करुणा माता की ओर उमड रही थी। न्याय और करुणा का यह विचित्र द्वन्द्व था। राजा को सहज ही एक उपाय सूझा । उसने कहा-बालक बीच मे बैठे, एक ओर माता रहेगी और दूसरी ओर पिता। दोनों ही अपनी ओर आक- पित करने का प्रयास करे, बालक अपने स्वेच्छा से जिधर जायेगा उस पर उसका अधिकार होगा। यह सुनते ही सुनन्दा की वाँछे खिल उठी। उसने उसी क्षण प्रस्ताव रखा कि पुत्र को प्रथम आकर्षित करने का अधिकार मेरा है, अतः इस अधिकार से मुझे वचित न रखा जाये। राजा व आचार्य ने उसके प्रस्ताव को स्वीकार

३२
चमकते सितारे
कर लिया । सुनन्दा ने सोचा, अब विजय मेरे हाथ मे
है। उसने सुस्वादु पदार्थ, खेल-खिलौने उसकी ओर
बढ़ाये । प्यार से उसे पुकारा, आओ बेटे ! मैं कभी से
पलक-पाँवडे बिछाये बैठी हूँ, शीघ्र ही आओ।
बालक ने एक बार उधर देखा तो सुनन्दा
विश्वास हो गया कि बालक अब मेरी ओर लपक कर
आ जायेगा । किन्तु दूसरे ही क्षण वज्र ने अपनी दृष्टि
उधर से हटा ली और ध्यानस्थ होकर बैठ गया।
सुनन्दा की कमनीय कल्पनाओ का महल ढह गया।
उसने बहुत ही प्रयास किये किन्तु वज्र को अपनी ओर
.., आकर्षित न कर सकी। वज्र जानता था कि मैं यदि
माता की ओर आकर्षित हुआ तो मेरा ही नही अपितु
माता का भी अहित होगा । यदि मै आचार्य की ओर
आकर्षित हुआ तो मेरा और माता दोनों का ही
कल्याण है।
राजा ने दूसरा अवसर मुनि धनगिरि को दिया
और कहा कि अब आप वालक को अपनी ओर आकर्षित
करे । मुनि धनगिरि ने कहा-वज्र ! यदि तू कर्म
रूपी रज का परिमार्जन करना चाहता हैं तो रजोहरण
ग्रहण कर, त्याग मार्ग को स्वीकार करने के लिए आगे
बढ़।
वज्र वालक होने पर भी हलुकर्मी था। धनगिरि
के आह्वान को सुनते ही वह प्रसन्नता से झूमता

आर्य वजस्वामी ३३ हुमा पिता के पास आया और रजोहरण आदि धर्मोप- करण ग्रहण कर लिये । संघ ने जय-जयकार के नारों से भू-मण्डल को गूजा दिया। राजा ने प्रसन्न होकर आचार्य आदि का हृदय से स्वागत किया । अभी भी वालक वज की अवस्था बहुत ही छोटी थी अतः ज्ञाना- ग्यास के लिए साध्वियो की देख-रेख मे शय्यातर के पाय छोड दिया गया। - पुत्र की अपने प्रति भयकर उपेक्षा देखकर सुनन्दा का जीवन ही सूना-सूना हो गया। वह सोचने लगी- मेरा प्यारा भाई, साधु बन गया, मेरे पति ने भी गृहस्थाश्रम को सदा के लिए छोड़ दिया, मेरे पुत्र ने भी सदा के लिए मुझे त्याग दिया है और मैं संसार के मोह में फंसी हुई हूँ, क्या मैं आसक्ति के जाल को नही तोट सकती, धिक्कार है मुझे । मुझे इसी क्षण भाई और पति व पुत्र के त्यागमार्ग का अनुसरण करना चाहिए। उसने आचार्य सिंहगिरि के चरणों मे निवेदन किग। आचार्यश्री ने उसे दीक्षा प्रदान की और वज्र जब आठ वर्ष का हो गया तब उसे भी विधिवत् दीक्षा प्रदान की। एक बार आचार्य सिंहगिरि ने अवन्ती की भोर प्रस्थान किया । वज्रमुनि भी साथ थे। यकायक आकाश में उमड-घुमड कर घनघोर घटाएं आई और वे हजार-

३४
चमकते सितारे
।
-
हजार धाराओ के रूप में बरस पड़ी। कल-कल छल-छल
कर नदी नाले बहने लगे । आचार्य के आदेश से सभी
सन्त सन्निकट की किसी गुफा में ठहर गये । वर्षा लम्बे
समय तक चलती रही। भयानक जंगल था । मुनियो के
उपवास चलते रहे । वज्र मुनि बालक थे पर वे क्ष धा
से आकुल-व्याकुल न हुए। सदा ध्यान-स्वाध्याय में
तल्लीन रहते थे। मुनि वज्र के पूर्वभव के एक मित्र
देव ने वज्र मुनि की परीक्षा लेने के विचार से
सार्थवाह का रूप बनाया और आर्य सिंहगिरि के पास
पहुँचा । उस देव ने अपनी दिव्य शक्ति से वर्षा रोक
दी थी। उसने आचार्य प्रवर से निवेदन किया-भगवन् !
म आगे जा रहा था, यहां पर भोजन के लिए रुका।
आपश्री को यहाँ देखकर मुझे अत्यन्त आह्लाद हुआ।
आप कृपा कर मुझे आहारदान का लाभ प्रदान करे ।
आचार्यश्री ने मुनि वज्र को आहार के लिए
प्रेषित किया । मुनि वज्र सार्थवाह के साथ चलने लगे।
देव ने मुनि वज्र की परीक्षा हेतु बारीक-बारीक बूंदें
गिराना प्रारम्भ किया। मुनि वज्र वही वृक्ष के नीचे
रुक गये । जब बूंदे बन्द हुई तो वे पुनः आगे बढे,
सार्थवाह के वहाँ पर पहुंचे । वहाँ के निराले ठाट-बाट
को देखकर मुनि वज्र के मन मे आशका हुई कि यह
सार्थवाह मनुष्य नही होना चाहिए। अपने अनुभवो
के आधार पर उन्होने अपनी पैनी दृष्टि से देखा कि
।

आर्य वनस्वामी
३५
उसके नेत्र अनिमेप हैं। पैर पृथ्वी को स्पर्श नहीं कर
रहे हैं । उन्होने प्रसन्न वदन सार्थवाह को कहा-मै
आपका आहार ग्रहण नही कर सकता क्योकि देवपिण्ड
श्रमणो के लिए अकल्प्य होता है।
देव ने प्रकट होकर मुनि के चरणो मे सिर
झुकाया । उसने बहुत ही प्रसन्न होकर मुनि वज्र को
'वैक्रिय विद्या' समर्पित की। दूसरी वार पुनः उसी देव
ने मुनि वज्र की परीक्षा ली। उसने मुनि वज्र को
वढिया घेवर बहराने का प्रयास किया । मुनि वज्र की
सूक्ष्मग्राहिणी प्रतिभा ने जान लिया कि यह देवमाया
है। उन्होने घेवर नही लिये । वज्र मुनि की कठोर
चर्या मे देव अत्यधिक प्रभावित हुआ । उसने वज्र मुनि
को आकाशगामिनी विद्या प्रदान की। विद्या के दिव्य
प्रभाव से वे मानुपोत्तर पर्वत तक विना किसी भी
रुकावट के जा सकते थे।
मुनि वज्र की अवस्था लघु थी, पर वे पढने मे
उदासीन थे। रत्नाधिक मुनि सोचते कि यह क्रिया मे
तो बहुत ही कुशल है, पर ज्ञानाराधना मे कमजोर है।
वे उसे सतत प्रेरणा देते किन्तु वे उसे ध्यानपूर्वक सुन
नेते । अन्य मुनियो को यह लगता कि इसकी ज्ञान के
प्रति उपेक्षा है पर सत्य तथ्य यह था कि उन्होने
साध्वियो से स्वाध्याय सुनकर ग्यारह अग कठस्थ कर
लिये थे।

चमकते सितारे बाहर पधारे 7 - एक दिन आचार्य सिहगिरि शौचभूमि के लिए हुए थे और कुछ श्रमण भिक्षा के लिए गये हुए थे । उपाश्रय में वज्र मुनि अकेले थे। वे प्रति दिन आचार्य को वाचना देते हुए देखा करते थे। उनके अन्तर्मानस मे यह विचार उद्बुद्ध हुआ कि मैं भी आचार्य की भांति वाचना हूँ । पर वाचना किसे हूँ कोई भी साधु उपाश्रय में नही था। उन्होने सन्तो के उपकरणों को एकत्र किया और अच्छी तरह उन्हे सामने रखकर स्वय बीच में बैठकर उच्चस्वर सेवाचना देनी प्रारम्भ की। अंग सूत्रों के गम्भीर रहस्यो को वे प्रकट कर रहे थे। उन्हे समय का ध्यान नही रहा । “नाचार्यश्री शौचभूमि से लौट आये । उपाश्रय के पास पहुँचते ही उन्होने वाचना के स्वर सुने । विचार किया सम्भव है भिक्षा से लौटकर साधु स्वाध्याय कर रहे है, पर और अधिक सन्निकट आने पर ज्ञात हुआ कि यह स्वर तो वज्र का है । कुछ क्षण रुककर उन्होंने सुना तो चकित हो गये, अरे । इसने इतना ज्ञान कहाँ से प्राप्त किया। प्रतिभासम्पन्न बालक मुनि जिस गच्छ में हो, वह गच्छ वस्तुतः भाग्यशाली है। वज्र मुनि के मन में किसी भी प्रकार का क्षोभ न हो अतः उच्च- स्वर से "निस्सही' शब्द का उच्चारण किया। मुनि वज सँभल गये, सभी उपकरण यथावस्थित रखकर वे आचार्य के स्वागत के लिए प्रस्तुत हो गये।

आर्य वज्रस्वामी
आचार्य सिंहगिरि ने सोचा-वज्र भले ही अवस्था
में छोटा है किन्तु इसकी योग्यता महान है, कही अन्य
सन्त इसकी अवज्ञा न करे। इसकी योग्यता का अन्य
मन्तों को भी पता लगे इस दृष्टि से आचार्य ने सन्तो
को एकत्र कर कहा-हम कुछ
दिनो तक आस-पास के
क्षत्रों में विचरण करेंगे। छोटे-छोटे ग्राम है अतः कुछ
मन्त हमारे साथ रहेगे और शेष सन्त यही पर रहेगे।
हम पुनः शीघ्र ही लौट आयेगे।
योग-चाहक श्रमणो ने आचार्य प्रवर से निवेदन
किया-भगवन् । हमे वाचना कौन देगा?
आचार्यदेव ने कहा- मेरी दृष्टि से इस कार्य के
लिए वज्र सर्वथा उपयुक्त है ।
जव आचार्यश्री ने वन की ओर सकेत किया तो
मुनि मण्डल आश्चर्यचकित हो गया, पर अत्यन्त विनीत
होने से किसी ने भी प्रतिवाद नहीं किया। आचार्यश्री
ने विहार कर दिया।
वाचना का समय हुआ। सन्तो ने मुनि वज्र से
फहा । मुनि वन ने वाचना प्रारम्भ की। वे प्रत्येक
गाथा को बहुत ही सुगम व्याख्या करते गये। सभी
सन्त वज्र मुनि की व्याख्या पद्धति से अत्यधिक प्रभावित
हुए। कुछ श्रमणो ने पूर्व अधीत अध्ययनो के अर्थ भी
पूछे गौर वन मुनि ने उनका स्पष्ट उत्तर देकर उन्हे
।

mr
១
चमकते सितारे
सन्तुष्ट किया । सन्त सोचने लगे कि आचार्यश्री थोड़े
समय के बाद ही पधारें तो अच्छा है क्योकि समयाभाव
से आचार्य वाचना पूर्ण नहीं दे पाते है किन्तु वज्न मुनि
से वही वाचना हमे एक प्रहर में प्राप्त हो जाती है।
कुछ समय के पश्चात् आचार्यश्री पुनः पधारे।
उन्होने शिष्यो से वाचना के सम्बन्ध मे पूछा । सर्भ
सन्तो ने एक स्वर से कहा-गुरुदेव ! वज्र मुनि क
वाचना देने का तरीका बहुत ही सुन्दर है । हमारी यह
हार्दिक इच्छा है कि हमारे वाचना-प्रमुख वज्र मुनि हो
आचार्यश्री ने कहा-मै वज्र मुनि के ज्ञान वे
सम्बन्ध मे जानता था, पर आप लोग अपरिचित थे
आपको परिचय कराने हेतु ही मैने यहाँ से विहार किय
था वज्र को जो, ज्ञान प्राप्त है वह केवल श्रवण से हुआ
है । वह अदत्त श्रुत है अतः अब मैं इसे व्यवस्थित रूप
से श्रु त का ज्ञान दूंगा और कुछ ही समय मे आचार्य
श्री ने वज्र मुनि को जितना भी पूर्वो का ज्ञान उन्हे
था वह उसे सिखा दिया और विशेष पूर्वो का अध्ययन
करने के लिए उज्जैन में विराजित आचार्य भद्रगुप्त
पास उन्हे भेजा। आचार्य भद्रगुप्त दश पूर्व के ज्ञाता थे।
वज्र मुनि के आने के पूर्व ही प्रातः उन्होने स्वप्न देखा
कि मेरा एक पात्र दूध से छलछला कर भरा हुआ है
और कोई अतिथि आया है । वह उसे पूरा पी गया है।
आचार्य ने चिन्तन कर कहा-ज्ञात होता है कि कोई
के

आर्य वनस्वामी ३६ ३ नया साधु आयेगा और मेरे दश पूर्व के ज्ञान को सम्पूर्ण रूप से ग्रहण कर लेगा । मैं चिन्तित था कि कोई भी मेरे ज्ञान को ग्रहण नहीं कर रहा है पर जैन शासन मे ऐसा एक रत्न अवश्य है जो मेरे ज्ञान को ग्रहण करेगा। । प्रातः होने पर वज्र मुनि मंथर गति से चलते हुए उपाश्रय में प्रविष्ट हुए । वज्र मुनि को देखते ही आचार्य भद्रगुप्त को अनुभव हुआ कि मैंने इसी व्यक्ति को स्वप्न में देखा था। वन्दन कर उन्होने अपने आने का कारण निवेदन किया। आचार्य भद्रगुप्त बहुत ही प्रसन्न हुए। उन्होने ज्ञानदान प्रारम्भ किया। वज्र मुनि की प्रतिभा अत्यन्त तीक्ष्ण थी । कुछ ही दिनों में उन्होंने दश पूर्वो का अध्ययन कर लिया। पुनः वे आचार्य भद्रगुप्त की आज्ञा से आचार्य सिंहगिरि की सेवा मे दशपुर पहुंचे। मर्वत्र प्रसन्नता का वातावरण था। आचार्य सिंहगिरि की वृद्धावस्था हो गई थी अतः उन्होने संघ का उत्तर- दायित्व मुनि वज्र को सौप दिया और स्वय ने अनशन कर समाधिमरण प्राप्त किया। वज मुनि बहुत ही प्रभावक आचार्य थे। उनकी भाज्ञा मे पांच सौ साधु थे। उनकी अद्भुत विलक्षण प्रतिभा से सारा सघ प्रभावित था। उनका रूप सौन्दर्य भी अनूठा था।

चमकते सितारे
पाटलीपुत्र मे धन नामक एक श्रेष्ठी था । उसकी
पुत्री का नाम रुक्मणी था, जो रूप में देवागना के
समान थी। एक बार वज्र मुनि की साध्वियाँ धनश्रेष्ठी
की वाहनशाला मे ठहरी हुई थी। रुक्मणी साध्वियों
के पास जाती और विविध विषयों पर चर्चाएं चलाती।
एक दिन सहज रूप से वज्र मुनि के सम्बन्ध में चर्चा
चली, साध्वियों ने वज्र मुनि के अद्भुत रूप लावण्य
और ज्ञान का परिचय दिया। रुक्मणी वज्र मुनि पर
अनुरक्त हो गई। उसने अपने हदय की बात साध्वियो
से कही । साध्वियों ने उसे समझाते हुए कहा-मुनियों
• साथ केवल साधना का सम्बन्ध होता है, वासना का
नही। तुम्हारे मन मे जो गलत विचार पैदा हुआ है
उसे मन से निकाल दो। रुक्मणी ने अपने मन की बात
पिता से कही कि 'आचार्य वज्र ही मेरे पति होगे। यदि
वे मुझे स्वीकार नहीं करेंगे तो मैं भी संयम ग्रहण कर
लूंगी।' श्रेष्ठी ने भी उसे समझाया पर वह न मानी।
एक बार आचार्य वज्र विहार करते हुए पाटलीपुत्र
पधारे । राजा सहित पौरजन आचार्य वज्र के दर्शनार्थ
पहुंचे। उनके पावन प्रवचन को सुनकर वे वहुत ही
प्रभावित हुए। जन-जन की जिह्वा पर एक ही बात थी
कि आचार्यश्री का ज्ञान जितना महान है उतना ही
रूप भी अद्भुत है। यह मणि-कांचन सयोग बहुत ही

आर्य वज्रस्वामी ४१ कम मिलता है । रुक्मणी ने सुना तो उसके हर्ष का पार न रहा । उसने पिता को सूचित किया । धनश्रेष्ठी एक करोड की रत्नराशि, रुक्मणी और उसकी दासियो को लेकर आचार्यश्री की सेवा मे पहुँचा । रुक्मणी के मन की वात रपष्ट शब्दों मे आचार्यश्री से निवेदन की। कचन और कामिनी का आकर्पण आचार्यश्री को कैसे हो सकता था। आचार्य श्री के त्याग-वैराग्य से छल- छलाते हुए उपदेश को सुनकर रुक्मणी ने प्रव्रज्या ग्रहण की और अनेकों व्यक्तियो ने जैनधर्म को स्वीकार किया। आचार्य वज्र का श्रुतज्ञान बहुत ही निर्मल था। उन्हे अनेक लब्धियां प्राप्त थी। कहा जाता है आचाराग सूत्र के महापरिज्ञा नामक अध्ययन से पदा- नुसारी लब्धि के आधार से उन्होने गगन-गामिनी विद्या का उद्धार किया था। किन्तु भविष्य में होने वाले श्रमणो की अल्प प्रज्ञा और अल्प सत्व को दृष्टि में रख- कार उन्होने वह विद्या किसी भी साधु को प्रदान नहीं की।

४२ चमकते सितारे था कि कोई भी घर का द्वार खुला नही रखता था। यदि कोई भोजन सामग्री लेकर जाता तो भिखमंगे उससे रास्ते में ही छीन लेते थे । एक दिन संघ ने आचार्य से निवेदन किया कि आपके जैसे महान् शक्तिशाली आचार्य के रहते हमें यह कष्ट उठाना पड़े यह कहाँ तक उचित है। आपश्री कोई न कोई उपाय करे। संघ की प्रार्थना को सम्मान देकर आचार्य ने एक पट को फैलाया और उस पर सघ को बैठने के लिए कहा । सघ के बैठ जाने पर आचार्यश्री बीच में बैठे, विद्या के बल से उस पट को आकाश में उड़ाया और सीधे ही दक्षिणापथ मे जगन्नाथ पुरी पहुँचे, क्यों कि उस समय वहाँ पर सुकाल था। सम्पूर्ण संघ आनन्द के साथ वहाँ पर रहने लगा। उस समय जग- न्नाथ पुरी में बौद्धो का अधिक प्रभाव था। शास्त्रार्थ होने लगे किन्तु जैनाचार्यों के समक्ष बौद्धाचार्य सदा पराजित होते रहे। आचार्य वज्र विचरते हुए एक वार दक्षिणापथ पधारे । वहाँ उन्हे श्लेष्म की व्याधि हो गई । व्याधि के निवारणार्थ उन्होने सौठ का सेवन प्रारम्भ किया। सौठ का एक नन्हा सा टुकड़ा उन्होने कान पर रख लिया और वे स्वाध्याय में लीन हो गये। समय बीत गया और उसका प्रयोग करना वे विस्मृत हो ।

आर्य वज्रम्बामी
४३
।
गये। मायं प्रतिक्रमण की आज्ञा लेते समय वह टुकड़ा
नीचे गिरा । उसे देखते ही आचार्य चिन्तन करने लगे
कि अब मेरी स्मृति क्षीण होती चली जा रही है। यह
तो आयु-समाप्ति का लक्षण है अतः मुझे समाधिपूर्वक
अनशन कर देह का परित्याग करना चाहिए।
आचार्य वज्र ने उपयोग लगाकर देखा कि बारह
वर्ष का भयंकर दुर्भिक्ष होने वाला है। यह दुर्भिक्ष
पहले से भी अधिक भयंकर होगा। ऐसी स्थिति मे संघ
छिन्न-भिन्न हो जायेगा, अतः अभी से सजगता से काम
लेना चाहिए। आचार्य ने अपने प्रमुख शिष्य वज्रसेन
मुनि से कहा-तुम संघ की रक्षा के लिए श्रमण-समु-
दाय को लेकर अन्यत्र विहार करो, मै सन्निकट के पर्वत
पर अनशन कर समाधिमरण प्राप्त करूँगा।"
मुनि वज्रमेन सघ को लेकर प्ररिथत हुए। किन्तु
दुर्भिक्ष का सर्वत्र साम्राज्य था । मुनि आहार आदि के
अभाव मे भूसे रहने लगे। मुनि वज्रसेन ने कहा-मै
इस प्रकार संघ को भूख से छटपटाते हुए नहीं देख
सकता। संघ के लिए मैं लब्धि से माहार प्राप्त
करूगा । अपवाद विधि से माहार प्राप्त करना होगा।
पांच सौ मुनियों ने आचार्य वज्रसेन से निवेदन
किया-भगवन् । अपवाद विधि से प्राप्त सदोष माहार
हम सेवन करना नहीं चाहते । हम आचार्य व स्वामी
।

४४ चमकते सितारे , । के श्रीचरणो में पहुँच कर अनशन कर समाधिपूर्वक आयु पूर्ण करेगे। वे सभी आचार्य वज्र की सेवा मे पहुंचे और उत्कृष्ट भावना से अनशन किया, और समाधिपूर्वक आयु पूर्ण किया। अनशन के समय एक प्रत्यनिका देवी ने दही आदि लाकर अनुकूल उपसर्ग दिया पर आचार्यश्री और अन्य कोई भी सन्त उस उप- सर्ग से विचलित नहीं हुए। आचार्य वज्र के पास ही आर्यरक्षित ने साढ़े नौ पूर्वो का अध्ययन किया था। आचार्य वज्र के प्रमुख शिष्य वज्रसेन थे । आचार्य वज्र के नाम से ही श्रमणो की एक शाखा 'वज्र' के नाम से विश्रु त हुई । वन वामी की विहार स्थली मुख्य रूप से मालवा, मगध और कलिग प्रदेश रही है। कोंकण प्रदेश में भी उन्होने विहार किया था। विक्रम संवत् २६ में वज्रस्वामी का जन्म हुआ । ३४ में दीक्षा हुई, ७१ में वे आचार्य पद पर आसीन हुए और ११४ में उनका स्वर्गवास हुआ। आचार्य वज्र जैन जगत के एक महान ज्योतिर्धर आचार्य थे। उनको स्मृति सदा जन जीवन में बनी रहेगी। .

४ आचार्य शमित आभीर देश मे अचलपुर नगर था जो अत्यन्त सुन्दर था। उसके सन्निकट कन्ना और पूर्णा नामक दो नदियां थी और उन दोनो नदियो के बीच में ब्रह्म द्वीप नामक एक छोटा सा द्वीप था । उस द्वीप में तापसो का एक आश्रम था जिसमे पांच सौ तापस रहते थे। तापसो का प्रमुख नदी के जल पर इस तरह से चलता था जैसे स्थल पर चल रहा हो । किञ्चित् मात्र भी जल का स्पर्श न होने से सारी जनता आश्चर्य- चकित थी। चमत्कार को नमस्कार की उक्ति के अनु- सार हजारों लोग अपने धर्म को छोड़कर तापसो के भक्त बनने लगे। हजारो जैन परिवारों ने तापस धर्म को स्वीकार किया। तापसो के मन मे जैनधर्म के प्रति घृणा की भावना थी और वह समय-समय पर उपहास के रूप मे व्यक्त होती थी। जिससे जैन समाज मे गहरी निराशा व्याप्त हो गई थी। गार्य शमित विहार करते हुए वहां पर पधारे । समझदार धावको ने आचार्य प्रवर से निवेदन किया ।

४६
चमकते सितारे
कि भगवन् । यहाँ जैन समाज अत्यन्त विकट स्थिति में
गुजर रहा है, यदि यही स्थिति रही तो कुछ ही दिनों
में यहाँ पर जैन समाज पूर्णरूप से नष्ट हो जायेगा।
हमें आशा है आप जैसे योगनिष्ठ प्रतिभासम्पन्न
आचार्य हमें इस संकट से मुक्त कर सकते है।
आचार्य ने कुछ समय तक चिन्तन कर श्रावक
सघ के अध्यक्ष को उपाय बता दिया। आचार्यश्री की
बात सुनते ही अध्यक्ष की आँखों मे नई चमक आ गई।
अध्यक्ष महोदय ने तापस प्रमुख के पास जाकर
कृत्रिम श्रद्धा व्यक्त करते हुए निवेदन किया-भगवन्!
संसार में धर्म तो बहुत देखे है किन्तु आपके समान
चमत्कार किसी से भी नही देखा। लगता है यह योग
की महान् उपलब्धि है। आप जैसे महान् सिद्ध पुरुष
को देखकर मेरा सिर श्रद्धा से नत है।
तापस जैन संघ के अध्यक्ष के मुंह से अपनी
प्रशंसा सुनकर फूला न समाया। उसका चेहरा फूल की
तरह खिल उठा। संघ प्रमुख ने कहा-तपस्वी श्रेष्ठ ।
क्या आप जैसे सिद्ध पुरुपो को भिक्षा प्रदान करने का
मुझे सुअवसर मिल सकता है, यदि यह अनमोल लाभ
मुझे मिल जाय तो मैं आपका शिष्य वन जाऊँ।
तापस प्रमुख ने मुस्कराते हुए कहा-आप जैन
समाज के प्रमुख है । आपके प्रेम भरे आग्रह को मैं कैसे
टाल सकता हूँ । सन्त तो भक्ति के भूखे होते हैं ।
।

आचार्य शमित
४७
भगवन् ! यह सुनहरा अवसर मुझे कल ही प्राप्त
हो जाये तो अच्छा है। क्योकि शुभ कार्य मे विलम्ब
अपेक्षित नहीं है । संघ प्रमुख ने निवेदन किया।
तापसप्रमुख ने उसकी भक्ति को मुक्तकंठ से
गसा करते हुए सहर्ष स्वीकृति प्रदान की।
दूसरे दिन तापसप्रमुख अन्य शताधिक तापसो
के साथ ठीक समय पर जैन संघ के प्रमुख के वहाँ पर
हुँचा । संघ प्रमुख ने पहले से ही एक विशाल भव्य
गण्डप बना रखा था और बीच मे उच्चस्थान पर एक
स्वर्ण सिंहासन भी रखा था। शहर के सहस्राधिक
सभ्रान्त नागरिक उपस्थित थे। जयजयकारों के
नारो से गगन मण्डल गंज उठा। तापसप्रमुख स्वर्ण
सिहासन पर आसीन
हुआ। संघ प्रमुख ने भक्ति से
विभोर होकर अपने ही हाथो से तापसप्रमुख के
चरणो का प्रक्षालन प्रारम्भ किया । तापसप्रमुख
चरण प्रक्षालन के लिये इत्कार होता रहा, पर सघ
प्रमुख मल-मलकर के अच्छी तरह से धोने लगा।
प्रच्छन्न रूप से तापसप्रमुख की पादुकाये भी धो दी
गई। जनता श्रावकप्रमुख की भक्ति को देखकर
चक्ति थी; यह जैन सघ का नायक भी देखो तापसो
का कितना भक्त बन गया है।
सपप्रमुख ने अपने हाथों से सभी तापसों को

४८ चमकते सितारे भोजन कराया । बढ़िया स्वादिष्ट सरस पकवानों को खाकर सभी तापस हर्ष-विभोर थे किन्तु तापसप्रमुख की हवाइयाँ उड़ गई। उसके हृदय की धडकन बढ गई। वह-मन-ही मन में घबरा रहा था कि अब कुछ ही समय में मेरी कलई खुल जायेगी। वह भोजन कर रहा था पर उसका मन उसमें नही था । वह सोच रहा था कि मैं इसके चंगुल में वुरा फँस गया। उसे विचार आया कोई बात नहीं, पादुकाओं के सहारे ही मैं नदी को पार कर जाऊंगा। उसे यह पता नही था कि पादुकाओ का भी अच्छी तरह से प्रक्षालन हो गया है। IN भोजन से निवृत्त होकर तापसप्रमुख तापसो के साथ आश्रम की ओर प्रस्थित हुआ। सघप्रमुख और हजारो लोग पीछे जय-जयकार के नारे लगाते हुए चल रहे थे। शौच निवृत्ति के लिए आचार्य शमित भी नदी किनारे पहले ही पहुंच चुके थे। प्रतिदिन की तरह तापसप्रमुख ने जल पर स्थल की तरह चलने के लिए कदम बढ़ाया कि वह जल पर चल न सका किन्तु पानी में डूबने लगा । लोग देखकर चकित थे कि योग की सिद्धि आज कहाँ गायव हो गई। जनता तरह- तरह की बाते बनाने लगी । तापसप्रमुख उन बातो के भी कोई उत्तर न दे सका। आज वह जैन संघ के प्रमुख द्वारा छला गया था। संघप्रमुख को सुनकर ने आचार्य शमित ४३ -अरे, यह महान पाखण्डी उच्च स्वर से रहस्योद्घाटन करते हुए कहा-तापस- प्रमुख जो प्रतिदिन जल पर स्थल की भांति चलते थे वह कोई योग की सिद्धि नही थी और न कोई तप का हो प्रभाव था। यह एक रासायनिक प्रयोग था। जडी-बूटियो का लेप ये अपने पैरों के तलो में लगाते थे, आज वह चरण प्रक्षालन से साफ होगया है अतः डूब रहे है, इन्हे वचाओ। रहस्योद्घाटन होते ही जनमानस विक्ष ब्ध हो उठा । सभी कहने लगे- तो है, मायाचार से हम को ठगता था । इसमे धर्म का क्या सम्बन्ध है ? आर्य शमित आगे वढे । उन्होने नदी को सम्बो- धित करते हुए कहा-हे नदी । मैं उस पार जाना चाहता हूँ. मेरी आध्यात्मिक साधना व तप मे प्रभाव है तो मुझे मार्ग दो। आर्य शमित के कहते ही विस्तृत क्षेत्र मे वेग से यहती हुई नदी एकदम सकुचित हो गई और आर्य शमित उरो लांघकर दूसरे किनारे पहुंच गये । आर्यशमित के आध्यात्मिक साधना के प्रत्यक्ष चमत्कार को देखकर जनता आश्चर्यचकित हो गई। आर्य शमित और जैन- धर्म की जय-जयकार के गगनभेदी नारे गंज उठे। तापसप्रमुख अपने पांच सौ शिष्यो के साथ आर्य

चमकते सितारे
शमित के चरणो मे उपस्थित हुआ । आर्य शमित ने
धर्म के मर्म को प्रकट किया। उसे सुनकर पांच सौ
तापसो के साथ तापसप्रमुख ने जैनेन्द्री दीक्षा ग्रहण
की। तापस ब्रह्मद्वीप मे रहते थे अतः उनकी शाखा
जैन परम्परा मे 'ब्रह्मद्वीपक' के रूप मे विश्रुत हुई।'
एक बार आर्य शमित हरन्त सन्निवेश मे पधारे।
वहाँ पर जिनदत्त नामक श्रावक श्रमणो का परम भक्त
था किन्तु उसकी भक्ति मे धीरे-धीरे मोह मिल गया
और वह श्रमणो के लिए विशेष रूप से आहार बनाने
लगा। आर्य शमित को ज्ञात होने पर उन्होंने उसे ग्रहण
नहीं किया और अपने शिष्यो को भी उस अकल्पनीय
हार को न लेने का आदेश दिया।
आर्य शमित ने वर्षों तक जैन धर्मकी प्रभावना
की और अनेकों को आहती दीक्षाएँ प्रदान कर अन्त में
वे समाधिपूर्वक आयु पूर्ण कर स्वर्गस्थ हुए।
44
१ (क) आवश्यक चूणि, पूर्वभाग पृ० ५१४-१५
(ख) निशीथसूत्र भाष्य गा० ४४४८-५०
(ग) निशीथ चूणि भाग ४, पृ० ८७४-७५
(घ) जीतकल्प भाष्य गा० १४६३, पृ० १३२
(ड) कल्पसूत्र किरणावली टोका पृ० १७

५
आचार्य पादलिप्तसूरि
मे
जिस समय अयोध्या मे विजय ब्रह्म का राज्य था,
उस समय वहाँ पर फुल्ल नामक एक श्रेष्ठी रहता था।
उसकी धर्मपत्नी का नाम प्रतिभा था। उसके कोई भी
सन्तान न थी। उसे स्वप्न मे ऐसा आभास हुआ कि
महान लव्धिधारी आर्य नागहस्ती के चरणोदक का
पान करने से उसकी आशा फलवती होगी। प्रातः वह
आर्य नागहस्ती के दर्शनार्थ पहुंची, ज्यो ही वह उपा-
श्रय मे प्रविष्ट होने लगी त्यो ही एक साधु हाथ
पान लेकर पानी परठने के लिए आ रहा था । प्रतिभा
ने पूछा-भगवन् । क्या ले जा रहे है ? उसने कहा-
नाचार्य प्रवर अभी-अभी वाहर मे पधारे है, उनके
चरणो का प्रक्षालन किया था, वह जल परठने जा
रहा हूँ।
प्रतिभा ने भक्ति भाव से विभोर होकर कहा-
भगवन् । यह जल मुझे मिल जाय तो जन्मभर बारका
उपकार न भूलूगी।
।

५२ चमकते सितारे - मुनि ने पात्र नीचे रख दिया। उसने वह पानी लेकर पी लिया, और आर्य नागहस्ती को नमन करने के उनके पास पहुंची। आचार्यदेव ने कहा-तेने मेरे से दश हाथ दूर रहकर जलपान किया है जिसके कारण तेरा प्रथम पुत्र तेरे से दश योजन दूर रहकर बडा होगा । दूसरी वात दश हाथ दूर रहने से तेरे दश पुत्र होगे, जो सभी प्रतिभावान होंगे। प्रतिभा ने जब दश पुत्र की बात सुनी तो उसका हृदय हर्ष से नाच उठा । उसने निवेदन किया भगवन् ! मेरा प्रथम पुत्र मेरे से दश योजन दूर रहेगा, इससे तो यही श्रेयस्कर है कि वह आपश्री के सान्निध्य मे रहकर जिन शासन की शोभा में अभिवृद्धि करे । आचार्य नागहस्ती ने कहा-वस्तुतः तेरा प्रथम पुत्र जिनशासन को चार चाँद लगाने वाला होगा। प्रतिभा के पुत्र हुआ । उसने प्रथम पुत्र आचार्य के चरणो मे समर्पित किया। आचार्य ने लालन- पालन के लिए उसे पुनः प्रतिभा को सौप दिया और उस बालक का नाम 'नागेन्द्र' रखा। आठ वर्ष की उम्र मे नागेन्द्र आर्य नागहस्ती की सेवा मे पहुँचा । दीक्षाग्रहण की। आर्य नागहस्ती ने मुनि नागेन्द्र की शिक्षा का दायित्व मण्डन गणी को सौपा। मुनि नागेन्द्र की प्रतिभा तीक्ष्ण थी जिससे वे शीघ्र ही -

-
-
आचार्य पादलिप्तसूरि
न्याय, व्याकरण, साहित्य और आगम में निष्णात हो
गये।
एक दिन मुनि नागेन्द्र को आर्य नागहस्ती ने
किसी गृहस्थ के वहाँ से कांजी का पानी लाने भेजा और
वे पानी ले आये, आचार्य ने पानी लाने के सम्बन्ध में
पूछा तो उन्होने एक गाथा कही-
अंवं तबच्छीए,
अपुफियं पुप्फदंतपंतीओ।
नवसालिकंजियं,
नवबहूइ कुडएण मे दिन्न ।
लाल वस्त्रो को धारण करने वाली और अपु.
पित (अरजस्वला) पुष्पदत पंक्ति वाली नववधू ने
बडे ही प्रमोद ने मुझे नये चावलो की कांजी का पानी
बहराया।

चमकते सितारे
विद्या जो पैरों पर लेप करने से सिद्ध होती है । यह वार
सुनकर आर्य नागहस्ती अत्यधिक प्रसन्न हुए और वा
विद्या उन्हें प्रदान कर दी।
जव नागेन्द्र मुनि दश वर्ष के हुए, उनका ज्ञान
अनुभव, इतना प्रौढ था कि आर्य नागहस्ती ने उन्हें
अपना उत्तराधिकारी घोषित किया । आचार्य पद पर
प्रतिष्ठित होने पर नागेन्द्र मुनि का नाम पादलिप्त
सूरि रखा गया।
एक बार आचार्य पादलिप्तसूरि पाटलीपुत्र
पधारे । पाटलीपुत्र के राजा मुरण्ड पादलिप्त सूरि की
अत्यधिक प्रशसा सुन रखी थी अतः उसने नानाविध
रूप से उनकी परीक्षाएं की। सभी परीक्षाओं मे वे
समुत्तीर्ण हुए। एक वार एक व्यक्ति ने राजा मुरण्ड
को एक गेंद समर्पित करते हुए कहा-राजन् ! आप इस
गेद पर लगाये हुए धागे का छोर बताने का अनुग्रह
करे।
H
राजा मुरण्ड ने बहुत ही प्रयास किया पर उसका
छोर हाथ न लगा । अन्त मे उसने वह गेद आचार्य
पादलिप्त के समक्ष उपस्थित की। आचार्यश्री ने
उसी समय गर्मागर्म पानी मँगवाया और गेंद को कुछ
क्षणो के लिए उसमें छोड़ दिया। गेद पर लगा हुआ
मोम पिघल कर पथक् होगया और छोर का पता लग
7

आचार्य पादलिप्त सूरि ५५ गया । राजा आचार्यश्री की प्रतिभा से चमत्कृत हुआ। एक दिन राजा मुरण्ड ने एक लकडी पादलिप्त सूरि के पास भेजी, और आचार्यश्री से पुछवाया कि इसका मूल और अनुभाग किधर है, कृपया बताएँ। आचार्यश्री ने लकड़ी को पानी मे छोडा । मूल भाग भारी होने से वह पानी में डूबा रहा और दूसरा छोर हलका होने से ऊपर हो गया। आचार्यश्री ने उन पर चिह्न लगा कर राजा के पास भिजवा दिया। इस प्रकार राजा मुरण्ड ने अनेक परीक्षाएँ ली और सभी मे आचार्यश्री की प्रतिभा को देखकर वह चमत्कृत हुआ। राजा के सिर मे एक वार छः महीने तक भयकर वेदना रही किन्तु आचार्यश्री के माग- लिक से वह शान्त हो गई। एक दिन आचार्यश्री से राजा ने पूछा-भगवन् ! हमारे अधिकारी वेतन लेने पर भी प्रामाणिकता से कार्य नही करते है और आपके शिष्य बिना वेतन लिए हुए भी प्रामाणिकता से कार्य किस प्रकार कर सकते है? राजन् ! आपके अधिकारियो मे अर्थ प्रधान भावना है तो हमारे शिष्यों मे परमार्थ की भावना है और उसने वे आंख मूद करके भी आज्ञा का पूर्ण पालन भारते है।

५८
चमकते सितारे
?
में
रही थी कि वे इस मूर्ख आचार्य से क्यों मैत्री-सम्बर
स्थापित करना चाहते है ? वह इसी उधेड-बुन
अपने गुरु नागार्जुन के पास पहुँचा और उस प्रस्रवण
पात्र को देते हुए कहा-लीजिए यह अमूल्य उपहार
प्रस्रवण को देखते ही नागार्जुन क्रोध से आगवबूल
हो उठा। उसने उसे काच के बर्तन को सामने के
चट्टान पर फेक दिया, किन्तु यह देखकर हैरान है
गया कि वह सारी चट्टान सोने के रूप में चमकरें
लगी । नागार्जुन का सिर श्रद्धा से नत हो गया। अरे
जिस महापुरुष के मल-मूत्र में यह शक्ति है उस स्वर
में कितनी शक्ति होगी। मैं जिस रस के पीछे दीवान
बनकर भटकता रहा वह रस आचार्य के सामने कुछ
१ भी नहीं है । कहाँ मेरु और कहाँ राई का दाना ?
वह सीधा ही आचार्य पादलिप्त के पास पहुंचा।
"भगवन् ! मै अपने को महान् समझ रहा था और
आपको छोटा; पर आपकी महान् साधना से मेरा गर्व
नष्ट हो गया है । वह आचार्य के चरणो मे रहने लगा।
एक दिन आचार्य पादलिप्त ने पैरों मे लेप किया और
आकाश में उड़कर अपने इच्छित स्थान पर पहुंचे।
जब आचार्यश्री लौटकर आये तो नागार्जुन ने उनके
चरणो का प्रक्षालन किया और प्रक्षालित जल को
एकान्त मे ले जाकर उसकी सुगन्ध, स्वाद और स्पर्श
आदि से १०७ औषधियो का पता लगाया। जिस

आचार्य पादलिप्त सूरि ५६ अद्भुत लेप को जानने के लिए वह वर्षों से छटपटा 'रहा था उसे जानकर उसका मन मयूर नाच उठा। 'नागार्जुन ने भी वह लेप तैयार किया। उसे आकाश मे उदने की उतावल थी, अपने पैरो मे लेप लगाया, कुछ ऊँचाई तक उडा और धडाम से नीचे आ गिरा। उसके हाथ-पैर जख्मी हो गये। आचार्य पादलिप्त ने जव देखा तो वोले-विना गुरुगम के क्या कभी किसी को गुर मिला है, तू विना गुरुगम के पाद लेप सिद्ध करना चाहता है इसीलिए जरमी हो गया है। नागार्जुन लज्जित था, उसने कहा-गुरुदेव ! भूल हो गई । मुझे पता है कि विना गुरु के कभी सिद्धि नहीं मिलती । मैंने आपश्री के पाद लेप का अपनी बुद्धि से पता लगाया है वे एक सौ सात औष- धियां है। आचार्यश्री ने कहा-मैं तुम्हारी तीक्ष्ण प्रतिभा ने प्रभावित हूँ। तुमने चरण प्रक्षालन से इन औषधियो को जान लिया है, इसमे अपूर्णता यही है कि इन नोप- धियो यो भावित करने के लिए तूने जल का उपयोग किया है जब कि इन औषधियो को कांजी और चावली के निर्मल पानी में पोटकर परो पर लेप करना चाहिए, ऐसा करने से किसी भी प्रकार की अपूर्णता नहीं रहेगी।

६०
चमकते सितारे
आचार्य के सकेत से वह लेपकर आकाश
गरुड़ की तरह उड़ने लगा। उसकी वर्षों की सा
पूर्ण हुई।
एक बार प्रतिष्ठानपुर के राजा सातवाहन
आचार्य पादलिप्त को अपने नगर में पधारने का निा
न्त्रण दिया। आचार्यश्री पधारे और उद्यान में विराजे
कवि बृहस्पति को जब यह ज्ञात हुआ कि आचार्य प्रद
आये है तो उसने उनकी परीक्षा लेने के लिए चाँदी
प्याले में तरल घृत भर कर आचार्य के पास भेजा
आचार्य ने उसका रहस्य समझकर धारणी विद्या
कुछ सुइयाँ उसमें खडी कर दी और आगन्तुक के हा
ही उसे लौटा दिया । वृहस्पति समझ गया कि आचा
श्री विशेष दक्ष है। बृहस्पति का तात्पर्य था कि र
नगरी विद्वानों से भरी पडी है । आचार्य ने उत्तर दिन
कि मैं उन सभी विद्वानो की प्रतिभा का भेदन करने
समर्थ हूँ।
राजा सातवाहन को जब यह घटना परिज्ञा
हुई तो उसे अपार प्रसन्नता हुई। आचार्य पादलिर
राजसभा में आते, शास्त्रार्थ कर विद्वानो को अपने
विद्धत्ता से चकित करते थे। उनकी प्रतिभा से सर
प्रभावित थे। एक वार आचार्य पादलिप्त राजसभा
'तरंगलोला' कथा का वाचन कर रहे थे, कविर

आचार्य पादलिप्त मूरि ६१ । शक्ति पर सभी मंत्रमुग्ध थे, सभी के मुंह से आचार्य की प्रशारित मुखर हो रही थी। कवि पाञ्चाल को आचार्यश्री की प्रशस्ति सहन नहीं हुई। उसने भरी सभा में आक्षेप करते हुए कहा-राजन् । यह कथा नहीं कथा है । यह इनकी मौलिक रचना नहीं है, मेरे ग्रन्थों के भाव, भापा और शैली को चुगकर ये अपने आपको विद्वान सिद्ध कर रहे है । आचार्यश्री कटु आलोचना करने पर भी चुप रहे । दो चार दिन के पश्चात् ही लोगो ने सुना कि आचार्यश्री स्वर्गस्थ हो गये। सर्वत्र हाहाकार मच गया। शिविका मे आचार्यश्री के मृत देह को सजाकर शोभा यात्रा जा रही थी। मार्ग मे कवि पाचाल का घर आया। आचार्यश्री के शव को देखकर वह फूट- पूट पर रोने लगा-धिवकार है मुझे ऐसे महापुरुष के साथ ही मैने दुप्टतापूर्ण व्यवहार किया । तरगलोला के लिए मैंने मिथ्या आरोप लगाया। यह मेरी नहीं, इसी महापुरुप की मौलिक रचना थी । क्या मुझ अधम को यह महान आत्मा क्षमा करेगी। कवि पाचाल की आंखो से आंसू बरस रहे थे। पाप के प्रक्षालन स्वरूप उसके हत्त त्री के तार सनसना रहे थे जिसके मुख स्पी निसर से तरगलोला (नरग- पती) नामक नदी प्रादुर्भूत हुई, उस पारतिप्त

६२
चमकते सितारे
ho
हरण करते समय यम की ही कपाल क्रिया क्यो न
गई।
हजारो लोग यह दृश्य देख कर चकित थे, सहसा
शिविका मे से आचार्य पादलिप्त खड़े हुए और जनता
को आह्वान कर बोले-'कवि पाञ्चाल की सत्य उक्ति
ने मुझे जीवन दान दिया है।' हर्ष से सारा वातावरण
मुखरित हो उठा । आचार्यश्री मरे नही थे पर उन्होने
सत्य तथ्य के उद्घाटन के लिए योग की क्रिया से ऐसा
किया था। राजा और जनता के मन में कवि पाञ्चाल
के प्रति घृणा को भावना उबुद्ध हुई पर आचार्य श्री ने
उसे क्षमा कर अपने विराट् हृदय का परिचय दिया।
तरगलोला (तरंगवती) आचार्यश्री की महत्त्वपूर्ण
कृति थी, पर वह वर्तमान मे मूल रूप मे उपलब्ध नही
है । आचार्य वीरभद्र के शिष्य नेमिचन्द्र ने प्राकृत भाषा
में उसका सक्षेप किया था जो आज भी उपलब्ध है।
बहुत वर्षों पूर्व उसका यूरोपीय भाषाओं में अनुवाद भी
हो चुका है। आचार्यश्री की प्रश्न प्रकाश,
ज्योतिप
करण्डक आदि अन्य अनेक रचनाएँ हैं ।
१ सीस कहवि न फुट जम्मस्स पालित्तय हरतस्स
जस्स मुहनिज्झराओ तरंगलोला नई बूढा ॥
२ श्री केवलमुनि ने "तरंगलोला" को 'राग-विराग' नाम से
हिन्दी में प्रस्तुत की है।
"
।

आचार्य पादलिप्त सूरि
६३
पादलिप्त सूरि ने वर्षों तक धर्म की प्रभावना की।
जीवन के अन्तिम दिनो में सब कुछ त्याग कर बत्तीस
-: दिन तक अनशन कर शत्रुजय पर्वत पर उन्होंने समाधि
मरण प्राप्त किया। उनके जीवन की हजारों विशेषताएँ
इतिहास के पृष्ठो पर चमक रही हैं।
--प्रभावक चरित्र
-प्रवन्ध चिन्तामणि
-प्रबन्ध कोश

मल जैसे मुलायम हाथों से शनैः-शनै. आचार्यश्री थे- ६ आचार्य बप्पसूरि बप्पसूरि एक जैन आचार्य थे। उनके तप-त्याग और संयम की कठोर चर्या की प्रशसा विरोधी से विरोधी व्यक्ति भी करता हुआ नही अघाता था। एक राजा ने सुना। उसने आचार्यश्री की परीक्षा करने का निश्चय किया। रात्रि का शान्त वातावरण था। चारो ओर गहन अधकार का साम्राज्य था। हाथ से हाथ भी दिखाई नही दे रहा था। उस समय भोगी भोग मे निमज्जित थे तो योगी आत्म-साधना में तल्लीन थे। उस भयकर अंधकार मे आचार्य वप्पभट्ट स्वाध्याय और ध्यान से निवृत्त होकर पट्ट पर सोये थे। मन में वैराग्य का उदधि उछाले मार रहा था, कही पर भी विकार और वासनाएँ न थी। उस समय राजा के आदेश से एक महान सुन्दरी गणिका ने आचार्यश्री के उपाश्रय में प्रवेश किया और धीरे से अपने मख- - पैर दबाने लगी। उसके कोमल स्पर्श से आचार्य

आचार्य वप्पसूरि
।
अन्तर्मानस मे भक्ति की भागीरथी का अजस्र स्रोत
प्रवाहित हो गया । उनकी नीद खुल गई और अतीत
की मुनहरी स्मृतियाँ मानस-पटल पर चमकने लगी।
उनकी आंखों में आँसू आ गये वे सिसकियाँ भरने लगे।
आचार्यश्री को एक बालक की तरह रोते देखकर
गणिका ने कहा -भगवन् । आप रोये नही और न
'सिसकियां ही भरे किन्तु जरा आँखें खोलकर मेरे अद्
भूत रूप को देखे । मेरा तन-मन आपश्री के चरणों में
न्योछावर है।
आचार्यश्री ने सुमधुर आवाज को सुनकर आँखें
खोली । पर अपने आसन पर गणिका को देखकर चकित
हो गये । वे एकदम उठ बैठे। कहीं नीचे न गिर जाय
मतः गणिका ने अपने बाहुपाश मे उन्हे जकड लिया।
आचार्यश्री ने कडक कर कहा-जरा दूर बैठो,
बासन को छोडकर।
किसलिए भगवन ! क्या मेरा कोमल स्पर्श आपको
नहीं सुहाता है ? मैं तो आपके चरणों मे समर्पित हूँ।
आचार्यश्री ने आँखो से आँसू बहाते हुए कहा-
तुम्हारा स्पां अच्छा भी लगता है और नहीं भी लगता
-
?
--
-
1

चमकते सितारे आचार्यश्री ने अपने आंसू पोछते हुए कहा-तेरे कोमल स्पर्श से मुझे अतीत की स्मृति हो आई । जिस प्रेम भरे भावो से तुम मेरे पैर दबा रही थी, उसी तरह मैं भी श्रद्धा और भक्ति से विभोर अपने सद्गुरुदेव के पैर दबाता था । तुम्हारी तरह ही गुरुदेवश्री का शरीर कोमल था । तुम्हारे स्पर्श से मुझे गुरुदेव की स्मृति आ गई । वह दिन धन्य था जिस दिन गुरु-चरणो मे बैठकर सेवा करता था । आज गुरुदेव नही हैं। उनके स्वर्ग- वास हुए कई वर्ष व्यतीत हो गये । मैं अपने महान गुरुदेव का चरणस्पर्श कव कर पाऊंगा।" आचार्य की आँखो से आँसू टपक रहे थे-गुरुदेव आप कहाँ हो, जल्दी दर्शन दो। आचार्यश्री के निर्मल हृदय ने गणिका के दिल को परिवर्तित कर दिया। उसने अपने अपराध की क्षमा * याचना करते हुए कहा-गुरुदेव ! मैं आपको पहचान नही सकी। मैंने राजा के आदेश से आपका अविनय किया है, आपको कष्ट दिया है। आप तो वैराग्य की साक्षात्मूर्ति है। आपश्री के दर्शन कर मै धन्य हो उठी। और भक्ति से आचार्यदेव को नमस्कार कर वह अपने निवास स्थान पर लौट आई। आचार्य के त्याग वैराग्य से छलछलाते हुए जीवन का दर्शन करके उसने स्वयं को धन्य माना। X.

७ आर्य कालक । ने प्रातःकाल का सुहावना समय था । ठुमक ठुमककर पवन चल रहा था। आज उज्जयिनी निवासी अत्यन्त प्रसन्न थे। क्योकि ज्योतिर्घर जैनाचार्य आर्य कालक नगर के वाहर उपवन मे पधारे थे । बरसाती नदी की तरह जनता उनके दर्शन के लिए उमड़ रही थी। उज्ज- यिनी मे अवस्थिता सतीवृन्द सुना, वे भी आचार्य प्रवर के दर्शन हेतु प्रस्थित हुई । श्रमणियो के साथ आर्य कालक की लघु बहिन महासती सरस्वती भी थी जिनका रूप अनूप था। वह नीची दृष्टि किये हुए अन्य श्रम- णियो के साथ-साथ चल रही थी। उस समय उज्जयिनी का राजा गर्दभिल्ल था। उसका असली नाम क्या था यह पता नही। उसने शत्रओ पर विजय प्राप्त करने हेतु गर्दभी विद्या सिद्ध की थी और उस विद्या के कारण अपने आपको वह अपराजित सम्राट समझता था। न्याय-नीति को विस्मृत होकर अनीतिपूर्ण आचरण करने में भी वह नही चूकता था।

६८ चमकते सितारे साध्वियां राजपथ पर बढ रही थीं। गर्दभिल्ल ने राज- महल के गवाक्ष से उन्हें जाते हुए देखा। साध्वी सर- स्वती के अनुपम रूप को देखकर वह कामान्ध हो उठा। उसने अपने विश्वस्त अनुचरो को बुलाकर कहा-शीघ्र ही जाकर उन साध्वियो को राजमहल में बुला लाओ। राजा के अनुचरों के द्वारा भावभीनी प्रार्थना करने से साध्वियाँ राजमहल मे पहुँची। पूर्व सकेता- नुसार महासती सरस्वती को अन्दर के प्रकोष्ठ मे ले गये और अन्य साध्वियों को अनुचरों ने कहा-अव आप सभी पधार सकती हैं । साध्वियों ने कहा-हमारी साध्वी को अन्दर ले गये हो और हमें जाने के लिए कहते हो? यह कितना अनुचित है ? पर राजाज्ञा के कारण अनु- चरों ने एक भी बात नहीं सुनी। उन्होंने अन्य सभी को राजभवन से बाहर निकाल दिया । साध्वी सरस्वती को राजा गर्दभिल्ल के सामने उपस्थित किया गया। साध्वी को देखते ही राजा अपने आसन से उठा, स्वागत करते हुए कहा-आइये, इस आसन पर बैठिये । साध्वी सरस्वती ने कहा-राजन् । हम सर्वप्रथम गृहस्थ के आसन पर नहीं बैठती । विशेष कारण के अतिरिक्त गृहस्थ के घर भी नहीं बैठती। फिर मेरी अन्य साध्वियां पीछे रह गई है । मैं एकाकी हूँ। इसलिए बैठने का प्रश्न ही उपस्थित नही होता कहिए, किस कारण से आपने हमको बुलाया है।

आर्य कालक
६६
?
गर्दभिल्ल ने कहा-जिस कार्य के लिए पुरुष
स्त्री को चाहता है उसी कार्य के लिए आपको यहाँ
बुलाया है।
सररवती-मै आपका तात्पर्य नहीं समझ पायी ।
गर्दभिल्ल-आपकी युवावस्था, गुलाब के फूल
की तरह खिलता हुआ चेहरा, अनुपम लावण्य और
कमल-मी-कोमलता को देखकर आप पर कौन मुग्ध
नही होगा ? मैं आपके रूप-अमृत का पान करना
चाहता हूँ। इसीलिए आपको कष्ट दिया । अव तो आप
मेरी बात समझ गई न
सरस्वती-आप राजा है। क्षत्रिय-पुत्र है, जो
दूसरों की रक्षा करता है। क्या, आपको इस प्रकार
पापपूर्ण विचार करते
हुए
भी
लज्जा का अनुभव नही
होता ? अन्य साधारण महिला के सम्बन्ध में सोचना
भी जहाँ ठीक नहीं है, वहां एक साध्वी के सम्बन्ध
मे ऐसा सोचना तो विलकुल ही अनुचित है। पाप ही
नहीं, महान् पाप है।
गर्दभिल्ल-सबसे बड़ा पाप मेरी दृष्टि में किसी
के
हृदय को ठेस पहुँचाना है। मैं आपसे प्रेम की भीख
मांग रहा हूँ और उसे आप करा रही है । नया, यह
महान् पाप नही है? मेरी दृष्टि से मैं नहीं; बाप
स्वय महापाप कर रही है । देखिए, यह युदावत्या इन

चमकते सितारे प्रकार दर-दर भटकने के लिए नही है। और न कष्ट उठाने के लिए ही है। जीवन को रसमय बनाने के लिए है, अतः मै आपसे प्रार्थना करता हूँ कि आप राज- महल में रहकर खूब ही आनन्द क्रीड़ा करे और मेरे मन को प्रसन्न करे। सरस्वती-राजन्! लगता है तुम्हारा हृदय पाप- पूर्ण है । हृदय का पाप ही तुम्हारी जवान पर आकर वोल रहा है । हम ऐसी बात सुनना भी पाप समझती है। अत: आज्ञा दे, मै यहाँ से जाना चाहती हूँ । एक क्षण भी रुकना मुझे पसन्द नहीं है। गर्दभिल्लस व्यंग्य हँसी हंसते हुए बोला-सरस्वती अब कहाँ जाओगी ? तुम राजमहल को छोड़कर जा नही सकती । तुम बन्दी बन चुकी हो। अतः श्रमणी वेष का परित्याग कर मेरे साथ आनन्द क्रीडा करो। तुम्हें मेरी इच्छा पूरी करनी ही होगी। सरस्वती-अरे दुष्ट ! तू राजा है या अधम है तुझे इस प्रकार बाते करते हुए लज्जा भी नही आती? मैं जैन साध्वी हूँ। हँसते हुए प्राणों का त्याग कर सकती हूँ, पर अपने धर्म का परित्याग नही कर सकती। गर्दभिल्ल ने अपने अनुचरों को आदेश दिया कि सरस्वती कही भाग न जाय इसका पूर्ण ध्यान ? A -- ?

आयं कालका ७१ रग्बना । साध्वी सरस्वती के चारो ओर परिचारि- काओ का पहरा लग गया। राजमहल के बाहर खडी हुई 'साध्वियां महासती सरस्वती की प्रतीक्षा करती रही। तीन प्रहर व्यतीत हो गये, पर सरस्वती नही लौटी तो साध्वियो ने यह दुःखद समाचार आचार्य कालक को पहुंचाया। यह घोर अनाचारपूर्ण समाचार सुनते ही आचार्य कालक का खून खौल उठा। वे सीधे ही राजा गर्दभिल्ल के पास पहुंचे और उसे समझाते हुए कहा-राजन् ! किसी साध्वी को इस प्रकार अपहरण करना, उसे बन्दी बनाना, नीति के विरुद्ध है । आप राजा है । इस- लिए ऐमा कार्य करना आपके लिए शोभास्पद नही है । अत. मैं आपसे कहता हूँ इसी क्षण साध्वी सर- स्वती को छोड दीजिए। गर्दभिल्ल-क्या राजा की आज्ञा पालन करना आप लोगों का कर्तव्य नहीं है ? मैं कहता हूँ कि आप राजाज्ञा का पालन करे। आचार्य-राजन् ! तुम्हारी आज्ञा अनीति पर भाधारित है जो सर्वथा अनुचित है। सन्त या मती- गण तुम्हारी साधारण प्रजा नहीं है जो तुम्हारी अनु- चित आज्ञा का पालन करे। गर्दभिल्ल-आचार्य । आपको यह ज्ञात है न, कि ---

७२
चमकते सितारे
।
प्रत्येक श्रेष्ठ वस्तु पर राजा का अधिकार होता है
उसी दृष्टि से मैं सरस्वती के साथ व्यवहार करन
चाहता हूँ और मेरी इच्छा पूर्ण होकर रहेगी।
आचार्य-राजन् ! साध्वी के साथ इस प्रकार का
व्यवहार करना सर्वथा अनुचित है। अभी भी तुम
समझ जाओ। नही तो इसका कटु फल तुम्हे भोगना
पड़ेगा।
गर्दभिल्ल ने अपने अनुचरों को आदेश दिया कि
इस साधु को गर्दन पकड़कर बाहर निकाल दो। राजा
के अनुचर ज्यों ही आचार्य कालक को पकड़ने के
लिए आगे बढ़े त्यो ही आचार्य कालक को राजा के
इस अनुचित व्यवहार पर, इसके अनैतिक निकृष्ट
कृत्य पर क्रोध आ गया। उन्होने राजसभा मे ही
भीषण प्रतिज्ञा करते हुए कहा-दुष्ट गर्दभिल्ल ! याद
रखना ! मैं तुझे एक दिन राज्यच्युत कर दूंगा। और
वे उसी क्रोध के आवेश में राजसभा से बाहर
निकल गये।
जब आचार्य कालक का क्रोध शान्त हुआ तो
उन्होने सोचा कि मेरी प्रतिज्ञा से गर्दभिल्ल कही सतर्क
न हो जाय । क्रोध में कही सरस्वती का अहित न कर
जानबूझ कर कुछ दिनो तक विक्षिप्त
अवस्था मे उज्जयिनी के राजपथों पर घूमते रहे। जब
दे
। अतः

आर्य कालक
11
। राजा को और उज्जयिनी के निवासियो को यह विश्वास
- हो गया कि आर्य कालक पागल हो गये हैं, तव वे
। चुपचाप वहाँ से रवाना होकर भरोच पहुँचे।
उस समय भरोच मे आचार्य कालक के भानजे
। बलमित्र का राज्य था और उसका लघुभ्राता भानु-
। मित्र वहां का युवराज था । आचार्य ने दोनों को राजा
गर्दभिल्ल फी नीचता का वर्णन करते हुए कहा-इस
प्रकार उस दुष्ट राजा ने सरस्वती साध्वी का अपहरण
किया है । दोनो भाई युद्ध के लिए प्रस्तुत हो गये ।
किन्तु आचार्य ने कहा-तुम्हारी संन्य-शवित से उसकी
मैन्य शक्ति अधिक है । अतः इस समय आक्रमण करना
उचित नहीं है।
आचार्य वहाँ से पारिसकुल शक गासक के पास
पहुँचे और वहाँ के शक शासक को अपने निमित्त
और ज्योतिष-शास्त्र सम्बन्धी ज्ञान से चमत्कृत किया
और उसे अपना भवत वनाया। शक शासक को ससंन्य
तैयार किया और अपने भानजे बलमित्र-भानुमित्र को
भी । दोनों की सेना बिना पूर्व सूचना दिये उम्पविनी
की भोर प्रवल वेग के माथ वढी ।
राजा गर्दभिल्ल को अपनी गर्दभी
लभिमान था। किसी भी शनु फे आ
पाते ही राजा गर्दभिल्ल एक गर्दभी
-
.
1

७४
चकमते सितारे
.
स्थान पर शत्रु सेना की ओर अभिमुख कर स्थापित
करता और स्वय तीन दिन के तप की साधना करता।
तीन दिन के तप की साधना पूर्ण होते ही उस गर्दभी
का मुंह खुल जाता और वह बहुत ही जोर से रेकने
लगती । शत्रुसेना का जो भी सैनिक, हाथी, घोडा
आदि उस स्वर को सुनते वे तत्काल ही मुंह से रक्त
उगलते हुए मूछित होकर जमीन पर गिर पडते । उस
गर्दभी विद्या के बल पर राजा अपने आपको अपरा.
जेय समझता था। आर्य कालक गर्दभी विद्या के
सभी गुप्त रहस्यों को जानते थे । वे उसके प्रभाव
और परिणामो से भी परिचित थे । अत: उन्होने १०८
ऐसे महान् धनुर्धरो को ऐसे गुप्त स्थानो पर छिपाकर
रख दिया जहाँ से वे गर्दभी के मुख को भेद सके ।
ही गर्दभी ने मुंह खोला त्यो हो एक साथ १०८ वाण
गर्दभी के मुंह मे प्रवेश कर गये । गर्दभी का मुंह
वाणों से भर गया जिससे वह रेकने में असमर्थ हो
गयी । फलस्वरूप गर्दभिल्ल की गर्दभी विद्या का प्रभाव
नष्ट हो गया।
दोनो ओर से भीषण युद्ध हुआ। उज्जयिनी की
सेना युद्ध के लिए पूर्व तैयार नहीं थी। अत: वह बुरी
तरह परास्त हो गई । शकराजा, वलमित्र और भानु
मित्र की विराट सेना उज्जयिनी के दुर्ग में प्रविष्ट

आर्य कालक
७५
इई और राजा गर्दभिल्ल को वन्दी क्नाया तथा
साध्वी सरस्वती को उसके चगुल से मुक्त किया।
आर्य कालक तथा सतीसाध्वी सरस्वती ने
पुन.
व्रज्या ग्रहण कर अपने जीवन को विशुद्ध बनाया।
बुद्ध आदि मे जो हिंसा हुई थी उसके प्रायश्चित्त रूप
न आचार्य ने पुन' सयम लेकर शुद्धि की ।
एक बार आचार्य कालक उज्जयिनी से भडोच
पधारे। बडा भाई वलमित्र राजा था और भानुमित्र
घुवराज था । वे आचार्य के प्रवचन परिषद मे उपस्थित
होते । उनकी बहिन भानुश्री का पुत्र वलभानु बहुत ही
सरल व साधु प्रकृति का था । वह आचार्यश्री के पावन
प्रवननो से अत्यन्त प्रभावित हुआ । आचार्यश्री
का वर्षावास भी उस वर्ष वही था । एक दिन बलभानु
ने आचार्य प्रवर से निवेदन किया कि मैं दीक्षा लेना
चाहता हूँ । आचार्यश्री ने उसे समझाते हुए कहा-
वत्म, अभी तुम युवक हो श्रमणधर्म को ग्रहण करना
तलवार की धार पर चलने के समान कठिन है।
बलभानु-आचार्य प्रवर, मैं से विरक्त हो
गुका है। मेरे अन्तर्मानस मे वैराग्य भावना अगडाइयां
ते रही है। मैने गम्भीर चिन्तन के पश्चात् ही दीक्षा-
ग्रहण करने का निश्चय किया है ।
गचार्य-वत्स । तुम्हारी वैराग्य भावना देखकर
।
ससार
--

७६
चमकते सितारे
मेरा मन अत्यधिक आह्लादित है, पर अभिभाव
की अनुमति लेना बहुत ही आवश्यक है । विना अनुम
के हम दीक्षा नहीं दे सकते।
युवक वलभानु आचार्यश्री की प्रवल प्रेरणा
उत्प्रेरित होकर अपनी माँ के पास पहुंचा। माँ से उसने
अनुनय-विनय किया कि मुझे दीक्षा की अनुमति दे दो।
पर मां ने बहुत प्रयास करने पर भी दीक्षा की अनुमति
नही दी। बलभानु निराश होकर आचार्य के पार
पहुँचा । उसकी उत्कट भावना देखकर अन्त मे आचार्य
श्री ने उसे दीक्षा प्रदान की।
अपने दोनो भ्राता बलमित्र
और भानुमित्र को भड़काया । वे आचार्यश्री पर रुष्ट
बलभानु की माँ
१ बलमित्र और भानुमित्र ये दोनो आचार्य कालक के प्रति
परम श्रद्धालु थे। पर उनका पुरोहित ब्राह्मण होने से
आचार्य से द्वेष भाव रखता था । एक दिन वह आचार्य से
शास्त्रार्थ मे पराजित हो गया जिससे उसकी क्रोधाग्नि
भडक उठी, वह यह उपाय सोचने लगा कि किसी तरह
से आचार्य यहाँ से प्रस्थित हो जायँ । एक दिन उसने
वलमित्र और भानुमित्र को कहा-आचार्य महान् तपस्वी
और
पुण्यात्मा है । वे जिधर भी चलते है उधर सामान्य
व्यक्तियो को नही चलना चाहिए. क्योकि उनकी आशा-

आयं कालक गये । अतः आचार्यश्री को वर्षावास मे ही वहाँ से स्थान करना पड़ा । और वे भडौच से प्रतिष्ठानपुर हुँचे। प्रतिष्ठानपुर का राजा सातवाहन जैनधर्म का नुयायी था । आचार्य प्रवर के आगमन के समाचारो को जानकर उसे महती प्रसन्नता हुई। प्रतिष्ठानपुर मे हले ही सन्त ठहरे हुए थे। उन्होंने तथा राजा और रजनो ने आचार्यश्री का भाव-भीना स्वागत किया। चार्य ने कहा-भाद्रगुक्ला पचमी के दिन सामूहिक रूप ' पयूषण पर्व की आराधना करनी है । सभी ने आचार्य वर के आदेश को शिरोधार्य किया । आचार्य के चरणो सातवाहन ने नम्र निवेदन करते हुए कहा-भग- न् । स्थानीय लोक परम्परा की दृष्टि से पंचमी के इन इन्द्र महोत्सव मनाया जाता है और उस महोत्सव मुले मम्मिलित होना आवश्यक होता है । अतः पंचमी 5 दिन में पर्वाराधन नही कर सकता। मेरी श्री- । तना होती है जिससे राज्यविग्रह हो सकता है। राज्य- हित के लिए उन्हे पिदा कर दे। बलमिन और भानुमित्र को पुरोहित की बात जंच गई और उन्होंने आचार्य फालक को वर्षागल मे ही विहार करने के लिए उत्प्रे- नित किया।

चमकते सिकारे
चरणो में नम्र प्रार्थना है कि पर्वाराधना पचमी को
कर षष्ठी को की जाय।
आचार्य कालक ने कहा-पर्व तिथि का अतिक्रम
नही हो सकता।
राजा ने पुन. निवेदन किया-यदि एक दिन पू
चतुर्थी को पर्वाराधन करने मे कोई आपत्ति न
तो वैसा ही आपश्री करे।
आचार्यश्री ने राजा सातवाहन के लिए अपवा
रूप में इसकी स्वीकृति प्रदान की।
एक वार आचार्य कालक अपनी विशाल शिष्
मडली के साथ उज्जयिनी मे विराज रहे थे। तन से
वृद्ध हो चुके थे, किन्तु उनके मन मे अपार स्फूर्ति थी
वे अपने शिष्यों को आगम वाचना देते, किन्तु आचा
श्री ने देखा कि शिष्यों मे आगम वाचना के प्रति
नहीं है। जो विनय, भक्ति गुरु के प्रति होनी चाहि
उसका भी उनमें अभाव है। अपने शिष्यो को सन्मा
पर लाने हेतु आचार्य चिन्तन करने लगे कि मै इन
बीच रहा, तो भी कोई लाभ नहीं है। इस प्रकार म
मे प्रतिदिन सक्लेश होने से तो कर्मबन्धन होगा । अर
१ कारणिया चउत्थी अज्ज कालगायरिएण पत्तिया ।
-निशीथ चूणि उ० १०, भा० ३, पृष्ठ १३
•ith

आर्य कालक
७६
मुझे यहाँ से एकाकी ही चल देना चाहिए । पर एकाकी
कहाँ जाना ?--इस पर चिन्तन करते हुए उन्हे स्मरण
आया कि उनका प्रशिष्य आर्य सागर है जिसने आज
दिन तक मुझे देखा नही है । वह इस समय स्वर्णभूमि
मे विचरण कर रहा है । जो आगम साहित्य का मर्मज्ञ
विद्वान् है, उसी के पास जाना उपयुक्त है।
आयं कालक ने शय्यातर
को
एकान्त
मे बुलाकर
कहा कि शिप्यगण आगम वाचना के प्रति उपेक्षित है।
उनमें जो विनय और विवेक चाहिए उसकी भी कमी
है । अतः मैं यहाँ से स्वर्णभूमि की ओर जा रहा हूँ। पर
मेरे शिष्यो को यह वात महज रूप से मत कहना । जब
वे अत्यधिक आग्रह करे और उन्हे अपने कृत्य पर
पश्चात्ताप हो तब उन्हे यह रहस्य बता देना।
शय्यातर को यह निर्देश देकर आचार्य अपने
शिष्यो को बिना कुछ कहे स्वर्णभूमि की ओर चल दिये ।
आर्य सागर ने उन्हें साधारण साधु समक्षकरे न उनका
सत्कार किया और न उन्हे बहुमान ही दिया-आप
यहाँ रहना चाहते है तो सहर्ष रह सकते है। आर्य
पालक ने भी अपना परिचय नही दिया।
आगम वानना के समय आयं नागर ने कहा
पर महानुभाव । आगम वानना को तुम सुनोगे
नार्य कालक ने कहा- हां । मैं भी आपकी वाचना
सुनना चाहता हूँ।
7
V

८०
चमकते सितारे
आगम वाचना पूर्ण होने पर आर्य सागर में
पूछा-आगम की गम्भीर बातें कुछ समझ में भी
आती है ?
आचार्य ने कहा-हाँ, कुछ समझता अवश्य हूँ
वे गम्भीरतापूर्वक प्रतिदिन सुनते रहे।
इधर उज्जयिनी में आचार्य कालक के शिष्यो
देखा कि गुरुदेव का कही पता नही है। वे इधर-उधर
हूँढने लगे। पर कही पता न लगा । उन्हे स्मरण
आया-हमारे अविनयपूर्ण असद्व्यवहार से आचार्य
का अन्तर्मानस व्यथित हुआ है और वे हमें छोडकर
कही चले गये हैं। शिष्यों ने शय्यातर से पूछा-क्य
आचार्यदेव ने जाते समय कुछ संकेत किया है ? वे कह
पधारे है
?
शय्यातर ने कहा-आप सभी की प्रवृत्ति से असं-
तुष्ट होकर आचार्यश्री को जाना पड़ा है। क्या आप
लोगों को अपने कृत्यों पर पश्चात्ताप नही होता
आगम वाचना के प्रति आप लोग कितने उपेक्षित हैं।
गुरुजनो का किस प्रकार विनय करना चाहिए, उनी
भक्ति करनी चाहिए, यह भी आप लोगो को ध्यान
नहीं है। ऐसी स्थिति में आप लोगों के वीच आचार्य
रहकर क्या करते ? अतः वे यहां से प्रस्थित हो
चुके है।

आयं कालक - सभी शिष्य अपनी भूलो पर पश्चात्ताप करने गे। उन्हे अपनी एक-एक भूल स्मरण आने लगी कि मने आचार्यश्री को कितना कष्ट दिया है ? अव हमे हान उपकारी गुरुदेव के दर्शन कव होगे। उनकी ग्यो से आंसू टपक पडे । शय्यातर ने कहा-पहले यह प्रतिज्ञा ग्रहण करो त भूलो की पुनरावृत्ति नहीं होगी, तो मै तुम्हे आचार्य हालक जहां गये है उनका सही पता बता सकता हूँ। सभी शिष्यो ने एक स्वर से कहा-हम कभी भी पाचार्य का अविनय नही करेंगे। हम उनके श्रीचरणो जाना चाहते है। शय्यातर ने बताया-आर्य कालक स्वर्ण-भूमि मे धारे है। आपको आर्य सागर के पास उनके दर्शन दोगे। शिष्यो का विराट ममुदाय उज्जयिनी से स्वर्ण- भूमि की ओर प्रस्थिा हुआ। मार्ग मे विराट सन्त गुबार देखकर लोग पूछते-आपके आचार्य कोन से उत्तर देते-आर्य कालक। आर्य सागर ने सुना तो सोचा-मेरे दादागुरु भागमो के गर्मम विद्वान् आर्य कालक अपने गिप्यो के साप पधार रहे हैं। मुझे उनके सर्वप्रथम दर्शन होंगे । .-

८२
चमकते सितारे
और मैं अपनी अनेक जिज्ञासाएं उनके चरणो
रखूगा। मेरे धन्य भाग्य है जो उनके दर्शन होगे।
आर्य कालक का शिष्य समुदाय स्वर्णभूमि
पहुंचा । आचार्य सागर अपने शिष्यो के साथ आ
की अगवानी के लिए पहुंचे। आर्य कालक के शिष्यो
आर्य सागर से पूछा-क्या आर्य कालक आपके र
पधार गये हैं ?
कहा-~आचार्य कालक
पधारे है । हाँ, कुछ दिन पूर्व एक नये वृद्ध सन्त अन
आर्य सागर
ने
।
--
आये है।
आर्य कालक का शिष्य समुदाय जो उज्जयिन
आया था, वह उपाश्रय पहुँचा। दूर से आर्य का
को देखकर उनके चरणों में गिर पड़ा और अपने
राध की क्षमायाचना की।
आर्य सागर तो लज्जा से जमीन में गडे जा
थे। “अरे, मैंने दादागुरु का कितना अपमान किया
उनसे वन्दन और नमस्कार करवाया है। मैं उच्चा
पर बैठा और उन्हे नीचे बैठाया।" उनके चरणो मे
कर वे भी अपने अविनय की क्षमा-याचना करने ल
आगम-वाचना का समय होते ही आर्य सागर ने निदे
किया-भगवन् ! अब तो आप को ही आगम-वार

आर्य कालक
८३
।
।
करनी है । पर भगवन् ! मै आगम-वाचना केसी करता
है ? अनुयोगो की वाचना स्पष्ट होती है या नही ?
आर्य कालक ने आर्य सागर के सिर पर हाथ
खते हुए कहा-वत्स | भूल करके भी अभिमान मत
रो। अभिमान करना बुरा है ।
आर्य कालक ने शिप्यो को समझाने हेतु एक
ट्ठी धूल हाथ मे ली । उसे एक स्थान पर रखा । उसी
ल को तीन स्थानो पर रखी। फिर प्रतिप्रश्न किया-
गर, पया समझे?
आर्य सागर ने निवेदन किया-भगवन्इस रहस्य
। उद्घाटन आप ही करें।
आर्य कालक ने कहा-जैसे प्रथम स्थान पर
ल अधिक है, द्वितीय स्थान पर उससे कम है और
त्तरोत्तर वह कम होती जाती है, वैसे ही तीर्थकर में
णधर, गणधर में आचार्य, और उनकी परम्पराओ
आता हुआ शान कम होता चला गया है ।
कितने ही अर्थ और पर्याय नष्ट हो चुके है
नसकी कल्पना नही की जा सकती। अत. ज्ञान का गर्व
रना सर्वथा अनुचित है। आचार्य कालक के वचनो
आर्य सागर और उनका शिष्य समुदाय प्रतिपुर
आ।

८४
चमकते सितारे
मार्य कालक एक ज्योतिघर तेजस्वी आचार्य
उन्होने अपने जीवन मे जैनधर्म की अत्यधिक प्रभाव
की।
-निशीय चूफी
-कहावली
---कालकाचार्य कया
-वृहत्कल्पमान

८
आचार्य खपुट
राजा
मुनि भुवन
ने
भडौच (भृगुकच्छ) का
वलमित्र
बौद्ध धर्मावलम्बी था। वौद्ध आचार्य गेहेनर्दी से प्रभा-
'वेत था और उन्हे वह अपना धर्मगुरु मानता था । एक
दिन जैन आचार्य खपुट
के शिष्य
भुवन
अनेक श्रावको
के साथ राजा की सभा मे पहुँचे । राजा ने उनका
उचित सत्कार किया और आने का कारण पूछा।
कहा-आपके गुरु गेहेनर्दी आपके
द्वारा विशिष्ट सम्मान प्राप्त कर के जैन श्रमणो को
पशु तुल्य समझते है। वे जन धमणो के उपाश्रयो में
पास की पूनियां डालते है। इस प्रकार अपने हृदय के
प को प्रगट करते है जो सर्वथा ही अनुचित है ।
राजा बलमित्र ने कहा-आपका यह कथन कि मैं
बौर धर्मावलम्बी है और मेरी अनन्त श्रद्धा गुर गेहेनर्दी
के प्रति भी है, यह सत्य है । पर इस प्रकार कोई किसी
का अपमान करे उसे भी मैं वरदास्त नहीं कर

८६
चमकते सितारे
पर मुझे यह समझ में नहीं आया कि वे किस भावना
से यह कार्य करते है।
मुनि भुवन-इसका कारण बहुत ही स्पष्ट है ।
आपके द्वारा अत्यधिक सम्मान प्राप्त करके उनके
अन्तर्मानस में ज्ञान का अहंकार पैदा हो गया है जिससे
वे अपने आपको महान् ज्ञानी और तर्कविद् समझते
और शेष बुद्धिमानों को वे बुद्ध भी समझते है ।
बलमित्र-मुनिप्रवर ! आपका यह कथन भी
सत्य है। वस्तुतः वे प्रकांड पडित है। धर्म रहस्य के
ज्ञाता है। मै भी मानता हूँ कि उनके तर्क के सामने
अन्य कोई भी व्यक्ति टिक नहीं सकता।
मुनि भुवन-राजन् ! सभी अपने घर मे पहल
वान है, सभी अपने आपको महान् समझते है । किसके
सिद्धान्त सत्य हैं और कौन तर्कविद्या में निष्णात है।
इसक सही निर्णय तभी हो सकता है जब परस्पर
शास्त्रार्थ हो।
बलमित्र-जहाँ तक मैं समझता हूँ कोई भी व्यक्ति
उनके सामने शास्त्रार्थ में टिक नही सकता।
मुनि भुवन-यह तो मिथ्या अहंकार है । जैसे ना
मण्डूक अपने आपको महान् समझता है, किन्तु जब व
बाहर निकलता है तो उसकी आँखे फटी रह
है । उसका मिथ्या-अहकार हवा लगते ही पेट्रोल के
तरह उड जाता है।
जात

आचार्य खपुट
८७
वलमित्र-क्या आप मेरे गुरुजी से शास्त्रार्थ के
लए प्रस्तुत है ? यदि आप प्रस्तुत है तो मैं आचार्य
स्वर गेहेनर्दी को शास्त्रार्थ के लिए आमंत्रित करूं।
मुनि भुवन-यद्यपि जैन श्रमण वाद-विवाद को
सिन्द नहीं करते क्योकि उसमे राग-दोष की सहज
उत्पत्ति हो सकती है, पर सत्य और असत्य के निर्णय
हेतु वे सदा तत्पर रहते हैं और अपने अकाट्य
वों से विशद सत्य को जन-मानस के सम्मुख प्रस्तुत
करने के लिए भी सदा तत्पर रहते है। और यह भी
पष्ट है उनके सामने कोई भी टिक नही पाता।
बलमित्र-आप दोनो के शास्त्रार्थ की सुनकर
मुझे महान लाभ होगा। सत्य क्या है, इसको में समझ
अनांगा।
राजा बलमित्र ने उसी समय बौद्ध सघ के साथ
गुरु गेहेनर्दी को
राजसभा मे
बुलाया। गुरु गेहेनर्दी ने
शारया प्रारम्भ किया। किन्तु मुनि भुवन के प्रवल
तों के सामने वे टिक नही सके और परास्त हो
गये।
मुनि भुवन के अकाट्य तर्को से जव गेहेनर्दो
परास्त हो गये, तो राजा बलमित्र के मन मे बोलधर्म
के प्रति जो पूर्व श्रद्धा थी वह नहीं रही । बौद्ध नघ जो
पहले उपद्रव कर रहा था और जन संघको

चमकते सितारे
कर रहा था, वे उपद्रव शान्त हो गये। गेहेनर्दी में
परास्त होने पर मुनि भुवन से शास्त्रार्थ करने हेतु गुरू
शस्त्रपुर के प्रसिद्ध बौद्धाचार्य वुड्ढकर (बुद्धकर) को
बुलाया । उनके साथ मुनि भुवन का पुन. शास्त्रा
प्रारम्भ हुआ। किन्तु मुनि भुवन के प्रवल तकों से बुर
कर भी पराजित हो गये। इस पराजय वुड्डका
को हार्दिक आघात लगा और उसी आघात से गुडशस्त्र
पुर में आकर उन्होंने अनशन कर अपने जीवन का अन्त
कर दिया। वे मरकर यक्ष रूप में उत्पन्न हुए । पूर्वभव
के वैर को स्मरण कर उन्होंने जैनसघ पर उपद्रव
करना प्रारम्भ कर दिया। गुडशस्त्रपुर के जैनसघ ने
आचार्य खपुट को सूचना दी कि आप शीघ्र ही यहाँ
पधारें और जनसघ पर आये हुए उपद्रव को शान्त
ANI
करे।
आचार्य खपुट गुडशस्त्रपुर चलने के लिए प्रस्तुत
हुए। उन्होने मुनि भुवन को भड़ौच मे ही रहने का
कहा । मुनि भुवन आर्य खपुट की भगिनी का ही पुत्र
था अतः उस पर विश्वास कर एक कपर्दी (जंत्रिपट=
यंत्रपट) देते हुए कहा-वत्स ! इसे अपने पास सभाल
कर रखना। पर इसे कभी खोलना मत।
आचार्य खपुट गुडशस्त्रपुर पहुँचे । वे यक्षायतन
में ही ठहर गये। यक्ष की मूर्ति के कानों में उन्होंने एक
--

याचार्य खपुट । जूता वांध दिया। यक्षायतन के पुजारी ने राजा को जाकर प्रार्थना की कि राजन्! एक जैन श्रमण आये है। वे यक्षायतन मे ठहरे हैं और उन्होने यक्ष की प्रतिमा के कान मे एक जूता बांध दिया है । राजा ने इसे यक्ष का अपमान समझा। उसने उसी समय आदेश दिया कि जैन-श्रमणो की कोड़े से पिटाई की जाय । जैसे ही आचार्य खपुट के शरीर पर प्रहार होने लगा वैसे ही राजा के अन्तःपुर मे रानियो पर कोडो की वर्षा प्रारम्भ हो गयी । वे बुरी तरह चिल्लाने लगी। किन्तु आचार्य खपुट अपनी आत्म-मस्ती मे वही पर आराम से सोते रहे। राजा ने आचार्य से क्षमा- याचना की। आचार्य के दिव्य तपोवल से यक्ष भी अपने वैर को भूलकर उनका शिष्य बन गया अर्थात् उनके सकेत के अनुसार कार्य करने लगा। जिस समय आचार्य खपुट गुडशस्त्रपुर मे विराज रहे थे, उस समय उनके दो शिष्य वहुत दूर से चलकर उनकी सेवा मे पहुंचे। उन्होने आचार्यश्री को निवेदन केया-गुरुदेव । आपने मुनि भुवन को यहाँ ने चलते समय एक कपर्दी दी थी और उसे गोपनीय रखने के लए कहा था। पर आपश्री की आजा की अवहेलना र मुनि भूवन ने उस कपर्दी को सोला । उसमें से एक निकाला और उसका पाठ कर उसने

६०
चमकते सितारे
विद्या सिद्ध की । उस विद्या के प्रभाव से जहाँ कहीं से
भी सुस्वादु श्रेष्ठ भोजन को वह मगाता और उसका
वह आहार करता है । हम सभी श्रमणो ने कहा-यह
सर्वथा अनुचित है । प्रथम तो तुमने गुरु की आज्ञा की
अवहेलना की। दूसरी बात, इस प्रकार आहार मंगवाना
श्रमणों की आचार-मर्यादा के विरुद्ध है। इस प्रकार
कहने पर हमारे से रुष्ट होकर, बौद्ध विहार मे चला
गया। विद्या के प्रभाव से खाली पात्र आकाश में जाते
है और बढ़िया मिष्ठान्न से भरकर लौटते हैं । इस
प्रकार विचित्र चमत्कार को देखकर हमारे श्रमण भी
उनकी ओर आकर्षित हो रहे है । कृपा कर आप शीघ्र
ही पधारे और मुनि भुवन को भी शिक्षा देवे तथा
• श्रमणाचार के विरुद्ध जो प्रवृत्ति कर रहा है उसे
के और पुनः जैनधर्म की प्रभावना करें
अपने शिष्यो की प्रार्थना को सुनकर आचार्य कुछ
क्षणो तक चिन्तन करते रहे। उन्होने अपने विशिष्ट
ज्ञान से देखा और भड़ौच (भृगुकच्छ) की ओर प्रस्थित
हुए। वे भड़ौच पहुँचे और स्वयं एकान्त शांत स्थान
में ठहर गये तथा मुनि भुवन द्वारा मंगाये खाद्य
पदार्थों से भरे हुए पात्रों को देखा। उन्होंने विद्या
के बल से उन पात्रो को आकाश में फोड़ना प्रारम्भ कर
दिया । मुनि भुवन समझ गया कि सेर पर सवासेर कोई

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१२ चमकते सितारे ही लाल शाखा बाह्मणो की और घुमायी त्यों ही ब्राह्मणों के सिर धड़ से अलग होते हुए दिखाई दिये ! मुनि महेन्द्र ने कहा-राजन् । क्या तुम्हें भी नमस्कार करूं? राजा के पैरो के नीचे की धरती खिसक गई । वह कॉप उठा कि कही इन्होंने टहनी इधर घुमा दी तो अभी जमी-दोज हो जाऊँगा । अतः उठकर मुनि महेन्द्र के चरणों में नमस्कार किया । अपने अपराध की क्षमायाचना की कि मैंने अनुचित आदेश जाहिर कर जैन श्रमणो का जो तिरस्कार किया है, उसके लिए मैं क्षमाप्रार्थी हूँ। आप इन सभी ब्राह्मणो को स्वस्थ कीजिए नहीं तो मुझे ब्रह्महत्या का महान् पाप लगेगा। मुनि महेन्द्र ने सफेद कणेर की टहनी घुमायो कि सभी ब्राह्मण पूर्ण स्वस्थ हो गये। उन्होने भी चरणो में झुककर अपने अपराध की क्षमायाचना की। आचार्य खपुट को अनेक विद्याएँ सिद्ध थी । आव- श्यक मलयगिरि वृत्ति, निशीथचूणि, प्रभावक चरित्र, आदि अनेक ग्रन्थो में उन्हे विद्याचक्रवर्ती, विद्यासिद्ध, आदि विशेषणो से अलकृत किया है। इन्होने अपने विद्याबल से जैनधर्म की अत्यधिक प्रभावना की। इनका आचार्य काल वीर निर्वाण सं० ४५३ से ४६४ माना जाता है । वस्तुतः खपुटाचार्य जैसे प्रभावक

आचार्य खपुट
९३
आचार्यों से समय-समय पर जैनधर्म की दिव्य ज्योति
प्रज्वलित हुई है। इसमें तनिक मात्र भी शंका नही ।
-~~आवश्यक मलयगिरि वृत्ति
-निशीथ चूर्णि
-प्रभावक चरित्र
-तपागच्छ पट्टावली
वीरशासन के प्रभावक आचार्य
-

& आचार्य शय्यंभव आचार्य प्रभव को जीवन की सान्ध्य बेला मे एक विचार उबुद्ध हुआ कि मेरा पट्टधर कौन बनेगा उन्होंने अपने विशिष्ट ज्ञान से देखा कि जितने भी उनके शिष्य थे उनमे से एक भी शिष्य ऐसा नही था जो उनके गौरव में चार चांद लगा सके। उन्होने ज्ञान से जैन-संघ के श्रावको को भी देखा। पर वे भी इस पद के योग्य नही थे। अन्त में उन्होने देखा इस पद के योग्य राजगृह नगर का वेद-वेदाग का पारगत विद्वान् ब्राह्मण शयभव जो प्रकृष्ट प्रतिभा का धनी है जिसके जीवन के कण-कण मे और मन के अणु-अणु मे जिज्ञासाएँ अँगड़ाइयाँ ले रही है, वही सर्वथा योग्य है। विद्वत्ता के साथ उसके जीवन मे सच्चरित्रता एव प्रशासन कुशलता का भी सुन्दर संगम है। संघ के शासन हेतु ऐसे ही विशिष्ट व्यक्ति की आवश्यकता है जिसके कुशल नेतृत्व मे शासन चमक सके । आर्य प्रभव अपने विराट शिष्य समुदाय साथ ग्रामानुग्राम विच- रण करते हुए राजगृह के गुणशीलक उद्यान मे पधारे । के आचार्य शय्यभव आर्य प्रभव ने अपने दो प्रधान अन्तेवासियो को चुलाकर कहा-तुम दोनो वत्सगोत्रीय शयभव ब्राह्मण के घर जाओ। वह इस समय यज्ञ कर रहा है। द्वार पर खड़े रहकर तीन वार उच्च स्वर से कहना- "अहो कष्टमहोकप्ट, तत्त्व न ज्ञायते क्वचित् ।" --अत्यधिक कष्ट का अनुभव करते हुए भी तत्त्व का परिज्ञान न हो सका। आचार्य के आदेश से वे दोनो शिप्य शयभव के घर पहुंचे और शब्द कहे। वे शब्द शयंभव के कर्ण-कुहरो मे गूंजने लगे। इन शब्दो से शयभव के हृदय व मस्तिष्क के तार झन- सना उठे। वह चिन्तन करने लगा-मैंने सुना है कि जैन श्रमण मिथ्या नही वोलते । फिर इन्होने कैसे कहा कि मैं तत्त्व नही जानता और मैं व्यर्थ ही कष्ट उठा गुरु उपदिष्ट रहा हूँ? ५ तत्त्व क्या है ? इस सम्बन्ध मे चिन्तन करते हुए उन्होने सोचा कि क्यो नही मै इन श्रमणो से ही पूछ ल। पर ज्यो ही उसने ऊपर आँख उठाकर देखा तो ज्ञात हुआ कि श्रमण यहाँ नही है । वह श्रमणो से तत्व क्या है, यह जानने के लिए उनके पीछे चत पड़ा। शिष्यो ने कहा-विप्रवर । यदि आपको सही तत्त्व जानना है, हमारे साथ ही जैन संघ के ज्योतिर्षर आचार्य प्रभव नगर के बाहर ही विराजे हुए हैं, उनके पास चलिए। वे आपकी जिज्ञासा का सही स करेगे। शयभव आर्य प्रभव की सेवा मे पहुँचे। जिज्ञासा प्रस्तुत की-विज्ञ! बताइये, यज्ञ का स्वरूप क्या है ? और तत्त्व क्या है? आर्य प्रभव ने मुस्कराते हुए कहा-आपने ? यज्ञाचार्य से इस सम्बन्ध मे नही पूछा ? रात- जिनके नेतृत्व में आप यज्ञ करते है, उन्हे तो यज्ञ सही स्वरूप ज्ञात होगा ही। आपको उन्हें अवश्य पूछ चाहिए। शयंभव-मैंने यज्ञाचार्य को पूछा अवश्य था पर उन्होंने इस प्रश्न को ही टाल दिया। उन्होने । जिज्ञासा का सही समाधान नही दिया। प्रभव-यदि आप उन्हें भय दिखाये तो आपको यज्ञ का वास्तविक स्वरूप और तत्त्व का मर्म बतायेगे। मै आपको यज्ञ का रहस्य और तत्त्व का स्वरूप बता सकता हूँ। पर मैं सोचता हूँ कि वे जो बतायेगे वह आपके लिए अधिक श्रेयस्कर होगा। आप पहले उन्हें ही पूछ लें। हाँ, वे यो सहज मे नही बता- येंगे पर भय बताने से वे सही स्थिति आपके सामने स्पष्ट कर देंगे। आर्य प्रभव के सकेतानुसार शयभव पुनः अपने ,

आचार्य शय्यभव
1
घर आया और यज्ञाचार्य से पूछा-आप मुझे यज्ञ का
रहस्य बताइये।
यज्ञाचार्य ने
कहा-
-जो
हम
वर्षों से यज्ञ कर रहे
है वही वास्तविक यज्ञ है और वही तत्त्व भी है।
शय्यभव ने चमचमाते हुए शस्त्रो को निकालते
'हुए कहा- यदि आपने मुझे यज्ञ का सही स्वरूप नही
ममझाया और न तत्त्व का रहस्य बताया तो मैं इसी
शम्य से आपका हनन कर दूंगा।
शय्यभव की आंखे क्रोध से लाल हो रही थी।
तीक्ष्ण शस्त्र को देखकर यज्ञाचार्य काप उठा। उसने
कहा-वत्स ! मुझे मारो मत । मैं तुम्हे सही स्वरूप
बताता हूँ। अहिंसा, सयम प्रधान यज्ञ ही वस्तुतः सही
यज्ञ है । रसलोलुप वत्ति के कारण जो हम हिंसाप्रधान
यश करते रहे हैं वे वस्तुतः यज्ञ नही है। अहिसा ही
सच्चा तत्त्व है । मेरे स्वार्थ को ठेस पहुंचती थी, इसलिए
आज दिन तक मैंने सही स्वरूप तुम्हारे से छिपाया है ।
यज्ञाचार्य की सही बात सुनकर शय्यंभव को नई
रोशनी प्राप्त हुई। वह आचार्य प्रभव के पास पहुँचा ।
कहा - भगवन् । आज दिन तक सही तत्त्व को न समक्ष
कर हिंसा करता रहा । धर्म के नाम पर 'वैदिको हिंसा
हिला न भवति' कहकर मैंने हिंसा को प्रोत्साहन दिया
। आज ही मुझे सत्यतथ्य का परिक्षान या

८
चमकते सितारे
i
है । अब मै इस ससार में नही रहूँगा । आपका रि
स्वीकार करूंगा।
आचार्य प्रभव ने कहा-हम विना अनुमति
प्रव्रज्या नही देते। तुम्हारे माता-पिता तो नहीं है
तुम्हारी पत्नी तो अवश्य है । दीक्षा के लिए उसकी
मति तो आवश्यक है।
शय्यभव ने अपने घर जाकर अपनी युवती पर
से कहा- मै जैनाचार्य प्रभव के पास प्रव्रज्या ले र
हूँ। तुम्हारी इच्छा हो तो तुम भी प्रव्रज्या ग्रहण के
सकती हो।
पत्नी ने कहा-स्वामी । मुझे निराधार छोड़कर
कहाँ जा रहे है ? मै भी आपका अनुसरण करती.
पर मुझे ऐसा लगता है कि मैने गर्भ धारण कर रखा
है । इसलिए मैं इस समय प्रवजित नही हो सकती।
आप भी कुछ समय रुकिए ।
किन्तु शय्यंभव की वैराग्य भावना इतनी तीव्र
थी कि जिससे वह एक क्षण भी संसार में रुकना नहीं
चाहता था । अन्त मे पत्नी की अनुमति प्राप्त कर वह
प्रवजित हो गया।
प्रव्रज्या ग्रहण करने के पश्चात् शय्यभव ने द्वाद
शांगी का गम्भीर अध्ययन किया। उसके रहस्यो को
॥

आचार्य शय्यभव 7 पुत्र होता तो समझा। अन्त मे प्रभव स्वामी ने उनको सर्वथा योग्य ममझकर अपने पट्ट पर आसीन किया। शय्यभव के प्रवजित होते ही आसपास की महि- लाएं सान्त्वना देने हेतु उसकी पत्नी के पास पहुंची। किसी ने कहा-शय्यभव, कितना निर्दय निकला ? अट्ठाइम वर्ष की उम्र मे ही वह साधु बन गया है। अभी तेरी उम्र ही क्या है ? यदि एक भी उसके सहारे भी तेरी जीवन-नैया पार हो जाती । न पुत्र, न पति। दूसरी ने कहा-शारीरिक अवयवो से ऐसा प्रतीत होता है कि यह गर्भवती है । तीसरी ने उस से पूछा-वता, क्या इसका कथन सत्य है ? उसका मुख लज्जा से लाल हो गया है । क्योकि वह अभी युवती थी । प्रौढ महिलाओ की जैमी वाचालता का उसमे अभाव था और न इतना व्याव- हाहिक ज्ञान ही था। उसने नीचा सिर किये हुए धीरे से कहा-मणगम (मनक) हां, कुछ है । जब यह समाचार शय्यभव के स्वजनों को परि- मान हुआ तो वे आह्लादित हुए । गान होने पर उसने पुत्ररत्न को जन्म दिया।

१००
चमकते सितारे
निकले हुए "मणगम" शब्द के आधार उसका नाम
मणक रखा।
--
?
बालक मणक आठ वर्ष का हुआ। वह अपने स्नेही
साथियो के साथ खेलने लगा तथा अध्ययन भी करने
लगा। वह बड़ा ही तेज-तर्रार था-पढ़ने मे भी और
खेलने में भी। अतः दूसरे बालक उससे चिढ़ते थे और
जब उससे पराजित हो जाते थे तो उसे कहते कि तेरे
पिता का तो पता ही नही है और हमारे से बात कर
रहा है।
एक दिन वालक मणक ने अपनी माँ से पूछा--
माँ ! मेरे पिता कहाँ है ? उनका क्या नाम है ? मैने
आज तक उन्हे नही देखा । मेरे साथियों के पिता तो
पने पुत्रों से प्यार करते है। फिर मेरे पिता मेरे से
क्यो प्यार नही करते ?
बालक के प्रश्न ने मॉ के हृदय को झकझोर दिया।
उसे वह दिन स्मरण हो आया जिस दिन शय्यभव ने
प्रव्रज्या ग्रहण की थी। उसकी आँखों से, उसको स्मरण
कर, ऑसू टपक पड़े। कही बालक न देख ले, अतः आंसू
पौछती हुई उसने कहा-वत्स ! जव तुम गर्भ मे थे
तभी यहाँ पर आचार्य प्रभव आये थे और उन्होने
तुम्हारे पिता को समझाया और अपने साथ ले चले।
मैने बहुत मना किया किन्तु वे नहीं माने । आज वे जैन

आचार्य शय्यभव १०१ । - मंघ के एक प्रभावशाली आचार्य शय्यभव है । न तो तेरे पिता ने तेरा मुंह देखा है, और तूने ही उनका मुंह देखा है । इसलिए तू उन्हें कैसे पहचान सकता है ? वालक मणक मॉ को दुःखपूर्ण मुद्रा मे देखना नही चाहता था। उसने उस समय कुछ नहीं कहा । पर उसके मन मे पिता को देखने की उत्कट अभिलापा जागृत हुई । एक दिन जव माँ बहुत ही प्रसन्न मुद्रा मे थी, वालक मणक ने कहा-माँ | क्या मेरी एक इच्छा तुम पूरी करोगी? हाँ वेटा | क्यो नही करूंगी? तू तो मेरा लाल है । तेरी भावना को पूर्ण करना मेरा कर्तव्य है। वता, तेरी क्या इच्छा है ? माँ ! मैं चाहता हूँ अपने पिता के दर्शन करूं। मेरे हृदय मे पितृदर्शन की तीव्र लालसा है । वताओ, वे इस समय कहाँ हे माँ ने ज्यो हो मणक के मुह से पितृदर्शन की भावना सुनी त्यों ही उसका हृदय कॉप उठा--क्या यह भी अपने पिता की तरह मुझे छाड़कर चला जायगा ? उसने कहा-वत्स | तेरे ।' चम्पानगरी मे है । चम्पानगरी यहां से इसलिए जब वे यहाँ आएंगे मैं तुझे ने चलूगी। ? समय tor प

१०२
चमकते सितारे
?
।
माँ, वे कब आयेगे? इसका कोई पता नह
चाहता हूँ कि चम्पा जाकर उनके दर्शन करूं।
तुम मुझे जाने की अनुमति नहीं दोगी?
पुत्र को गले लगाते हुए माँ ने कहा-तुम
बहुत छोटे हो । अकेले कहाँ जाओगे ? क्या मुझे अ
छोडकर जाओगे ?
माँ | मै और कही नही जाता। अपने पिता
पास ही तो जा रहा हूँ। तुम इतनी चितित क्यों
रही हो? मुझे आज्ञा दो। मैं पिता के दर्शन करूंगा
अन्त में माँ पुत्र को दुःखी देखना नही चाह
थी। उसके कोमल हृदय ने उसे जाने की अनुमति
दी। बालक राजगृह नगर से बाहर आया, जहाँ
चम्पापुरी जाने के लिए रास्ता था। बालक ने एक
व्यापारी को पूछा-यह सामान से लदी हुई गाड़ी कह
जा रही है ?
उसने बताया-यह चम्पापुरी जा रही है। बता
तुझे क्या काम है ?
मै भी चम्पापुरी जाना चाहता हूँ। क्या तुम मुझे
गाडी में बिठाकर ले जाओगे ?
व्यापारी ने पूछा-तुम वहाँ पर क्यो जाना चाहते
हो ? क्या काम है ?
-

आचार्य शय्यभव । उसने बताया-मेरे पिना वहां है। मैं उनसे मिलने के लिए वहाँ जाना चाहता हूँ। व्यापारी का भावक हृदय पिघल गया। उसने कहा-चलो ! मैं तुम्हे चम्पानगरी ले चलूगा। पर, चम्पानगरी के द्वार पर हो तुम्हे उतार दूगा। क्या तुम अपने पिता के पास वहाँ से पहुँच जाओगे। बालक ने कहा-आप मुझे चम्पानगरी के द्वार पर छोड दे। मैं वहाँ से अपने पिता के पास पहुँच जाऊँगा। ध्यापारी के साथ वालक मणक चपानगरी पहुंचा। व्यापारी ने नगर के बाहर उसे गाडी से उतार दिया। बालक मणक सोच रहा था-किधर जाऊँ ? इतने मे आचार्य शय्यंभव शौच निवृत्ति के लिए नगर के बाहर निकले । मुनिश्री को देखकर बालक मणक ने सोचा- ये मुनि मेरे पिता को अवश्य ही पहचानते होंगे। इन्हे मेरे पिता के समाचार ज्ञात होगे। इन्ही से समाचार -- पूछ लू। उसने नमस्कार कर मुनि से पूछा-क्या आप आर्य स्वयभव को जानते है ? बालक को देखते ही आचार्य के हृदय में सहज- स्नेह उमड़ पड़ा। उन्होने मधुर शब्दो मे पूछा- तु आर्य शय्यभव को कैसे जानता है - 7 । - बालक ने कहा-वे मेरे पिता है। मै राजगृह नगर का निवासी हूँ। मेरा नाम मणक है। मैंने उन्हें आज तक देखा नहीं है। कृपा कर मुझे उनका अता पता बता दीजिए। वत्स ! मैं तुम्हारे पिता को जानता हूँ। वे और मैं अभिन्न हैं । मुझे ही पिता-तुल्य समझकर अपने की बात कहो। बालक ने कहा-मैं अपने पिता के पास रहना चाहता हूँ । माँ की अनुमति लेकर मै आया हूँ। आचार्य उसे लेकर अपने स्थान पर आये । आचार्य ने अपने विशिष्ट ज्ञान से जाना कि वालक मणक की उम्र केवल छः महीने की अवशेष है । छः महीने के स्वल्प समय मे वह श्रुतसागर का पारायण कर सकता और सासारिक नाते से पिता होने के का ' मेरा कर्तव्य है इसका भविष्य सुधरे । उन्होने बालक मणक के लिए विभिन्न पूर्वसाहित्य मे से सार लेकर दशवकालिक सूत्र का निर्माण किया । सायंकाल के विकाल में पूर्ण होने से उसका नाम दश- वैकालिक रखा गया। आचार्य ने उसका अध्ययन करवाया जिसके कारण उसके जीवन मे विनयशीलता, आज्ञापालकता आदि विभिन्न गुण विकसित हुए। उसने सम्यक् प्रकार .

आचार्य शय्यमब से श्रमणधर्म की आराधना की। अतिम समय में आचार्य ने उगे स्वय आराधना करवायी । समाधिमरण प्राप्त कर छ महीने में ही वह स्वर्गगति को प्राप्त -- हुआ। -- पश्चात् आचार्य की गया ? वालक मणक की मृत्यु के औरों पुछ गीली हो गयी। यशोभद्र आदि श्रमणो ने पूछा-~-गुरदेव ! आज तक आपके चेहरे पर कभी विनता नहीं देखी। आज यह सागर कैसे विचलित हो यह कुछ समझ में नहीं आया। आयं याय्यभव ने कहा- मुनि मणक, मेरा ससार- पक्षी पुत्र था। इतनी म्वल्प आयु मे साधना कर वह स्वर्ग को प्राप्त हुआ । पुत्र-मोह के कारण मेरी आंख गीली हो गयी । यदि उसकी लम्बी आयु होती तो वह लम्बी साधना करता। यशोभद्र न कहा-बालक मणफ आपका पुत्र था, यह आपने हमे पहले क्यो नहीं बताया ? यदि हमे पहले ज्ञात होता तो गुरुपुन की सेवा का लाभ मिलता। आचार्य ने कहा-इसीलिए तो मैने नहीं बताया पा । आप उस पर अधिक स्नेह करते जिससे वह साधना से वचित हो जाता। स्वल्प समय मे उसने जो साधना की, वह न कर पाता । मैंने उसके लिए पूर्वो ने से आवश्यक ज्ञान हेतु सार रूप दस अध्यायो का

१०६
चमकते सितारे
निर्माण किया। उसे पुनः पूर्वो में मिलाना चाहत
यशोभद्र आदि मुनियों ने कहा--भगवन्
{ जिस
सूत्र की रचना की है वह श्रमण-श्रमणियों के लिए
अत्यन्त उपयोगी है । अतः इसे रहने दे।
आचार्य ने शिष्यो की व संघ की प्रार्थना को
स्वीकार कर उसे रहने दिया। आज भी वह आग:
श्रमण-श्रमणियों की साधना के लिए ज्योतिस्तम्भ वे
रूप में है और उस आगम का नाम दशवकालिक है।
-परिशिष्ट पर्व
-~-दशवकालिक, अगसिंह चूणि
--

१० कवि कुलभूषण मुनि रामचन्द्र गुजरात के इतिहास में राजा कुमारपाल के शासन का समय स्वर्ण-काल माना जाता है। महाराजा कुमारपाल के सुशासन की सुगध मे सर्वत्र प्रेम को सरम सरिता प्रवाहित होने लगी। अहिसा का आलोक जगमगाने लगा। और उसका श्रेय था कलि- कालसर्वज्ञ आचार्य हेमचन्द्र को, जिनके पावन उपदेशों से प्रभावित होकर उसने सर्वम 'अमारी पटह' की उद्- घोषणा करवायी थी। यहां तक कि उसके राज्य मे पशुओ को भी छानकर पानी पिलाने की व्यवस्था थी। चाहे जैन धर्मावलम्बी हो चाहे वैदिक धर्मावलम्बी हो उनमे किसी भी प्रकार का मतभेद नहीं था। सभी को अपनी इच्छा से धार्मिक साधना करने की छूट थी। आचार्य हेमचन्द्र के दो मुख्य शिष्य थे-वालचन्द्र और रामचन्द्र । ये दोनों भी सरस्वती के पुत्र थे। अपनी कमनीय कविता से ये जन-जन के मन मे त्याग- निष्ठा और सयम की प्रतिष्ठा करते थे। कवि मुनि रामचन्द्र ने निन्यानवे काव्य-नधों का प्रणयन किया १०८ चमकते सितारे । था। सौवें काव्य-रचना में वे प्रवृत्त थे। जिस दि सौवाँ काव्य ग्रन्थ पूर्ण होगा उस दिन वे 'प्रबधशत कर्ता' की श्रेष्ठ उपाधि से अलंकृत वनेगे। इधर आचार्य हेमचन्द्र का स्वर्गवास हो गया और कुमारपाल का भी । आचार्य हेमचन्द्र के पाट पर वाल- चन्द्र आसीन हुए तो कुमारपाल के राज्य सिहासन पर अजयपाल । मुनि वालचन्द्र बहुत ही ईर्ष्यालु प्रकृति का था। कविवर रामचन्द्र जो उसका गुरु-भ्राता था जि की यश-गरिमा दिग्-दिगन्त मे गूज रही थी, उस वह जलता था। वह चाहता था कि मेरा नाम हो और रामचन्द्र को लोग भूल जायें। राजसभा मे मुनि बालचन्द्र बैठे हुए थे। अजय- पाल ने कहा-सभासदो ! जैन और ब्राह्मण को एक माननेवाले मेरे राज्य में नही रह सकते। ब्राह्मण का जैन होना मैं पाप मानता हूँ। ब्राह्मण कभी भी जैन नही हो सकता, क्योकि वह अग्र-जन्म है । राजा अजयपाल ने मुनि कवि वालचन्द्र की ओर मुडकर कहा-बालचन्द्र | मेरी आजा का पूर्ण पालन होना चाहिए। तुम्हारे गुरुजी हेमचन्द्र ने ब्राह्मणधर्म को लुप्त करने का अथक प्रयास किया। उन्होने जैन- धर्म की प्रशस्तियाँ लिखी। आज से आप मेरी प्रशस्ति लिखेगे और उसमें ब्राह्मणधर्म के उन्नायक अजयपाल के शासन की गौरव गरिमा अकित होगी।

-- कवि कुलभूषण मुनि रामचन्द्र १०९ मुनि वालचन्द्र ने कहा-राजन् ! मैं तो लिख दूंगा। पर, मेरा गुरु भाई रामचन्द्र जो निन्यानवे प्रवन्ध-काव्य लिख चुका है, सौवाँ प्रवन्ध काव्य उसका पूर्ण होने वाला है। उन सभी ग्रन्यो मे जैनधर्म के गुण- गान गाये गये हे और सर्वत्र जंन व वैष्णव व शवधर्म का समन्वय किया गया है। अजयपाल ने बीच में ही गरजकर कहा-जिन ग्रन्थो में मेरी प्रशस्ति नही है और जिन ग्रन्थो मे वैदिक धर्म की यशोगाथा नही गायी गयी है, वे सभी ग्रन्थ भस्म कर दिये जाएंगे। याद रसो, मभी ग्रन्थो मे मेरी पुण्य-प्रशस्ति होनी चाहिए, क्योंकि मैं पाटन का राजा हूँ और मैं वैदिक धर्म को मानने वाला हूँ। बालचन्द्र ने हुए कहा-आप रामचन्द्र के यन्धो को भस्म कर देगे, किन्तु जो वात जनता-जना- चन के गाण्ठ मे उतर चुकी है उसे आप कैसे विस्मृत करा सकते है अजयपाल ने चमचमाती हुई तलवार हाप मे गते हुए कहा-मेरी यह तलवार या तो उन कविताओ फो भुला देगी या उन व्यक्तियो को समाप्त कर देगी। बालचन्द्र ने कहा-राजन् ! जैनधर्म मे या वैदिक धर्म में अनेक पातो मे समानता है । अहिता, दया, परोपकार, अस्तेय, आत्मा की अमरता ये सभी वाते मुस्कराते 2 - ११० चमकते सितारे . जैनधर्म में भी हैं और वैदिक धर्म मे भी। यहाँ जैन और वैदिक धर्म एक हो गये है। चाहे ब्रह्मा है चाहे विष्णु हो, चाहे हर हो, चाहे जिन हो, जिन्हो रागद्वेष को नष्ट कर दिया है, जैन उन सभी को नम स्कार करता है । मै समझता हूँ जहाँ आत्म-कल्याण की मंगलमय भावना का प्रश्न है वहाँ जैनधर्म और वैदिक- धर्म में अत्यधिक समानता है । राजा अजयपाल ने अपनी तलवार वालचन्द्र पर उठाई। वह उसे मारना चाहता था क्योंकि उसने उसके मन के प्रतिकूल बात कह दी थी। बालचन्द्र ने देखा-जीवन खतरे में है, अतः राजा के चरणो मे गिरते हुए अपने प्राणो की भिक्षा मांगी और कहा- राजन् ! यह मेरी मान्यता नही है, कवि रामचन्द्र ने जो अपने काव्य में लिखा है, उसे ही मैंने आपको पता । है। जब राजा अजयपाल का क्रोध शात हुआ तब उन्होने बालचन्द्र को कहा-तुम अपने गुरुभाई रामचन्द्र को समझाओ। यदि वह मेरी आज्ञा को स्वीकार करेगा तो मैं उसे "कलिकालसर्वज्ञ" की उपाधि से अलकृत कर दूंगा और यदि वह आज्ञा की अवहेलना करेगा तो मैं उसे मौत के घाट उतार दूंगा। ब्राह्मण और जैन कभी एक न हुए हैं और न होगे ही । यह तो केवल कुमारपाल के चापलूसो की चाल है ।

कवि कुलभूपण मुनि रामचन्द्र १११ प्रधानमन्त्री को आदेश देते हुए अजयपाल ने कहा---गुर्जर प्रदेश में एक भी जन प्रतीक न रहे। जैन उपाश्रय, मन्दिर, जैन भण्डार आदि मभी को ममाप्त कर दे। मन्त्री एक क्षण तक सोचने लगा-कहाँ यह अजय- पात और कहाँ कुमारपाल जो सभी को आदर की दृष्टि से देखता, कभी भी उसके राज्य मे कैप-बुद्धि नहीं थी। पर राजाज्ञा का पालन तो करना ही होगा। यह राजाज्ञा अनुचित ही नहीं सर्वथा अनुचित है, तयापि उसका पालन करना मेरे लिए अनिवार्य है। उसने राजाज्ञा से जैनधर्म के स्थानों को नष्ट कर दिया। कवि रामचन्द्र अपने उपाश्रय मे बैठे हुए कविता का सृजन कर रहे थे । आज उनके मन में अपूर्व प्रस- यता थी कि सीवां काव्य पूर्ण हो जायगा । द्रुत गति से उनको लेसनी चल रही थी। एक पद्य के पश्चात् दूसग पध तिसते जा रहे थे। तभी एक श्रद्धालु श्रावक ने जाकर कहा-गुरुदेव आप तो कविता-निर्माण में लगे हुए हैं। आपको पता ही नही है पाटन मे इम समय नया हो रहा है। कवि रामचन्द्र ने मुस्कराते हुए कहा- मेरा क्या होने वाला है ? मैं आज यही सोच रहा हूँ कि नौवाँ काव्य पूर्ण हो जाय तो अच्छा है।

११२
चमकते सितारे
?
।
श्रावक ने कहा-क्या आप अपने काव्य व
यज्ञ में आहुति देने के लिए रच रहे है ? मैं ही
किन्तु जिन्होने आपके काव्य को सुना है, आपके
को पढ़ा है वे ग्रन्थों को पढ़कर भाव-विभोर होते
है। वस्तुतः आपके ग्रन्थ मुर्दो में प्राण फूक देते हैं
राजा अजयपाल अत्यधिक दुष्ट प्रकृति का है।
समन्वयात्मक नीति पसन्द नही है। जैनधर्म के प्र
उसके मानस मे अत्यधिक घृणा की भावना है। इसति
वह चाहता है कि आप उसकी झूठी प्रशंसा करे।
आप उसकी झूठी प्रशंसा नही करते, इसलिए वह आप
सभी ग्रन्थों को भस्म करवाना चाहता है और जः
वह सम्पूर्ण ग्रन्थ को भस्म कर देगा तभी उसकी कोपारिन
शान्त होगी।
कवि मुनि रामचन्द्र ने कहा-अजयपाल को मेरे
ग्रन्थों पर क्यो क्रोध है ? मैने उसका कुछ विगाड़ा
नहीं है । चाहे राजा कोई भी हो, मेरे काव्य को छीन
नहीं सकता।
श्रावक ने कहा-गुरुदेव ! आपको पता नही है
अजयपाल की दुष्टवृत्ति का । जो उसकी हाँ मे हाँ
मिलाता है वह आदर पाता है और जिसने उसका
विरोध किया उसे जीने का अधिकार नही। जैन और
वह उभारना चाहता है। यदि आप
?
ब्राह्मण के भेद को

कवि कुलभूषण मुनि रामचन्द्र ११३ । जीवित रहना चाहते हो तो अपनी कविता की धारा को मोड दीजिए । आपको अपने भाव व विचार बदलने होगे। तभी आप इस राज्य में रह सकते हैं । दैपिए, वालचन्द्र आपके गुरुभाई है। समय को देखते हुए उन्होंने अपने विचारो को बदल दिया। यदि जल- पोन हवा की रुख को देखकर आगे बढ़ता है तो लक्ष्य स्था पर पहुँच जाता है, नही तो वह नष्ट हो जाता है। आप अपने हठ को नहीं छोडगे तो अजयपाल आपका अनिष्ट कर देगा। कवि मुनि रामचन्द्र ने मुस्कराते हुए कहा- स्पष्ट शब्दो मे कहो, वह मार देगा। मुझे तो गिरगिट की तरह रग वदलना नही आता । सूर्य कभी पश्चिम मे उदय नहीं हो सकता। तुम कहते हो कि वाल- चन्द्र मेरा गुरुभाई है । उमकी तरह मुझे भी बदलना चाहिए। पर यह सर्वथा असभव है। ममुद्र मे अमृत का जाना भो मिलता है और जहर भी प्राप्त होता है । बाराचन्द्र का नाम नते ही अजयपाल के शासन को प्रशसा कर पर उस अत्याचारी एवं कर दशासर कालए मेरी लेखनो एक नीअक्षर नहीं लिख सकती। न में उसकी नित्या करना चाहता हूँ जोर न स्तुति हो। गुज वो अपने गुरुदेव की आज्ञा ही शिरोधार्य , रामना नी। धात्मा गर-अमर है। उसे कोई नही पार सकता। मांतिकारीर तो पहले से हो मरा ?

११४
चमकते सितारे
उसको क्या मारना ? यदि अजयपाल ने मुझे मार भी
भी दिया तो मुझे इसकी चिन्ता नही । मैं यही सोचू
कि पूर्व बँधे हुए कर्मो के कारण ही ऐसा हुआ है।
कवि मुनि रामचन्द्र अपनी बात पूर्ण भी न का
पाये थे कि अजयपाल के राजसैनिक उपाश्रय मे आ
पहुँचे। उन्होने कवि रामचन्द्र को बन्दी बना दिया। आ
राजसभा में हजारों श्रोताओ की भीड़ खचाखच भरी
हुई थी। वे देखना चाहते थे कि कवि रामचन्द्र क्या
कहते है । तभी महामन्त्री ने उद्घोषणा की-युग बदल
चुका है। राज्य परिवर्तन हो चुका है। महाराज अजयः
पाल के राज्य मे कोई भी व्यक्ति जैनियो के अरिहन्त
और महेश्वर में एकता स्थापित नही कर सकता।
जैनियो के देव ब्राह्मणो के देव नही बन सकते और
ब्राह्मणो के देव जेनियो के देव नही हो सकते । ये वेमेल
खिचड़ी अब नही पक सकती। जो दोनो मे अभेद
स्थापित करता है वह मृत्युदण्ड का भागी होगा।
राजा अजयपाल का कहना है कि दूध और पानी को
मिलाना ठीक नहीं । कवि वालचन्द्र का अनुसरण कर
यदि रामचन्द्र अपने हठ का परित्याग करते हैं तो राजा
के द्वारा सम्मानित होगे । यदि उन्होने हठ नही छोडा
तो वे उसका फल भोगेंगे और जो राज-विद्रोह
करते है उन्हे सही शिक्षा प्राप्त होगी।

कवि कुलभूपण मुनि गमचन्द्र ११५ मभा मे वन्दो के रूप मे मुनि रामचन्द्र को उप- स्थित किया गया । सभी जानना चाहते थे कि अब क्या होता है ? तभी राजा अजयपाल ने रामचन्द्र की और मुकर कहा-रामचन्द्र । तुमने राजा की आज्ञा का उल्लघन किया है । मेरी आज्ञा थी जैन और ब्राह्मण दोनो पृथक् है । दोनो मे किसी प्रकार का मेल नहीं। जो समन्वय के गीत गाये जाते हैं वे ठीक नही है पर परिताप है कि तुमने मेरी आज्ञा पर कुछ भी ध्यान नहीं दिया। अब तुम्हे उसका प्रायश्चित्त लेना होगा। कवि रामचन्द्र ने मुस्कराते हुए कहा-राजन् कवि फिसी की आशा से नहीं लिखता । वह तो अपनी इच्छा से लिखता है । जब मैंने आपकी आज्ञा से लिखा ही नही तो उगे वन्द केसे करता राजा - आज से मेरी प्रशस्ति मे लिखो। मेरी प्रशस्ति मे लिखोगे तो में तुम्हे "कलिकाल-सर्वज्ञ" की उपाधि से अलकृत करूंगा। । मैं तुम्हारा भाट या चारण नहीं हूँ जो तुम्हारी मिथ्या प्रशस्तियां लिखता फिल्। मैं जो भी लिखता हूँ वह आत्मसन्तोप के लिए लिखता हूँ। भेरी कविता स्वान्त मुखाय है । मे अपने गुरुभाई पालचन्द्र का अनुसरण नहीं कर सकता। मुझे तुम्हारे - ? कवि-राजन्

११६
चमकते सितारे
द्वारा दिये गये शारीरिक सुख के लिए अपनी आर
को नही बेचना है।
वीच मे ही ईर्ष्यालु बालचन्द्र ने राजा को भडका
हुए कहा-राजन् । मेरे गुरुभाई रामचन्द्र को र
काव्य लिखने का बहुत बडा घमण्ड है । भरी सभा
यह मेरा अपमान कर रहा है। मेरा ही नही. आप
भी अपमान कर रहा है।
अजयपाल-कवि बालचन्द्र! तुम घबराओ नहीं
मै अभी-अभी रामचन्द्र का अहकार नष्ट करूंगा
अव इसकी जीभ ज्यादा देर नही चलेगी । देखो
राजाज्ञा का उल्लघन करने वाले को क्षमा नही किया
जा सकता।
.
क्रोध से पागल बने हुए अजयपाल ने जल्लादो से
कहा-लोहे की गरम शलाकाएँ कवि रामचन्द्र की
आँखो में ऑज दो।
पर कवि के भव्य भाल पर वही तेज, वही क्षमा
झलक रही थी। कवि रामचन्द्र ने मुस्कराते हुए कहा-
राजन् ! आपने मेरी आँखो को छीन लिया है। पर
मेरे अतर्चक्षुओं को छीनने की शक्ति आप मे नही है।
वालचन्द्र ने राजा अजयपाल से निवेदन किया-
राजन् । आपने रामचन्द्र को अन्धा बनाकर इसकी
प्रतिभा को और बढ़ा दिया है। अन्धे व्यक्तियो की
-

। कवि कुलभूषण मुनि रामचन्द्र ११७ कविता में प्रलय उपस्थित करने की शक्ति होती है। आपके द्वारा दिया गया यह दण्ड इसके लिए वरदान स्वरूप हुआ । यह जहां भी जायेगा वही आपको अप- कोति होगी। अतः इसे मृत्युदण्ड देना चाहिए । अजयपाल ने कविवर रामचन्द्र की ओर मुड़कर कहा-तुम अपने हठ का परित्याग करो। यदि तुमने अपना हठ छोड़ दिया तो मैं तुम्हारा सम्मान करूंगा। 'कलिकालमर्वज्ञ' की उपाधि से तुम्हे अलंकृत पासंगा। कवि रामचन्द्र ने गम्भीर गर्जना करते हुए कहा- राजन् ! मुझे किसी वस्तु की आवश्यकता नहीं । 'कलिकालसर्वज्ञ' तो मेरे गुरु थे । तुम मेरे शरी मेरे शरीर को नष्ट कर सकते हो किन्तु मेरी आत्मा को नहीं। मेरी हार्दिक यही इच्छा है कि स्वतत्रो देव । भूयास, सारमेयोऽपि वर्मनि । मा स्म भूय परायतः लोक्यस्यापि नायकः ।। (हे राजन् । मानव मात्र की स्वतन्त्रता पूर्णरूप से रहे, परतय होकर नितोको के नायक बनने की अपेक्षा स्वतन्त्र कुत्ता वनना अच्छा है ।)-आज दिन तक सरस्वती किसी की भी अनुचरी नहीं बनी है । मेरा भौतिक शरीर भले ही नष्ट हो जाय, किन्तु लोन के वशीभूत होकर मै अत्याचार को सहन नहीं कर सकता

११८
चमकते सितारे
मृत्यु के भय से मै अपनी वाणी को कलकित नही
10
सकता।
कवि रामचन्द्र के अन्तिम शब्द दशो दिशाओ
गूंज उठे।
क्रोध मे पागल बने हुए अजयपाल ने दण्ड देते हु
कहा-कवि अपने आप को जगत का राजा मानता है
अत: तप्त तवे के सिहासन पर इसे आसीन कराओ
खौलते हुए तेल से इसका अभिषेक करो । लोहे क
गरम किया हुआ मुकुट इनके सिर पर धारण कराओ
राजाज्ञा को सुनकर क्रूरहृदय जल्लादो के दिल
भी काँप उठे। दण्ड दिया जा रहा था और कवि सम.
भाव मे लीन था । वह सोच रहा था कि मेरे कर्मों के
बन्धन शिथिल हो रहे है। उसने शुभभाव से नश्वर
शरीर का त्याग किया। किन्तु उसका यश.शरीर आज
भी जीवित है और सदा जीवित रहेगा। कवि रामचन्द्र
की स्वतन्त्र भावनाएँ और निर्मल विचारधाराएँ सदा
जन-जन को प्रेरणा देती रहेंगी।
4-

- ११ कलिकालसर्वज्ञ आचार्य हेमचन्द्र 'कलिकाल मवंज्ञ' आचार्य हेमचन्द्र अपने विद्वान कियो के साथ पाटन मे वर्षावास कर रहे थे। प्रवचन मे पाण्डव-चरित्र चल रहा था। आचार्यश्री की प्रव- । चन शैली इतनी मधुर थी कि सैकडो श्रोतागण प्रवचन श्रवण करने के लिए प्रस्तुत होते । क्या जैन और क्या अजन सभी समान रूप से आते और प्रवचन-रस का पान कर अपने आप को धन्य अनुभव करते । एक दिन प्रवचन मे पाण्डवो की मुक्ति के प्रसग में आचार्यप्रवर ने कहा-वे शत्र जय पर्वत पर मुक्त हुए। यह सुनते ही एक ब्राह्मण पण्डित ने सोचा महाराग जयसिंह सिद्धराज जो शेव धर्मानुयायी है और जैनधर्म के प्रति उनके अन्तर्मानस मे घृणा है, क्यों न में इस प्रसग को लेकर उन्हे भडकाऊँ और विरोधी वातावरण तयार करू। दुसरे दिन पण्डित सिद्धराज की सभा में पहुंचा और कहा--राजन् । यह जैनो हमारे धर्म के विपरीत

१२०
चमकते सितारे
प्रचार करते है। आपके ही राज्य में आपके सिद्ध
विरुद्ध प्रचार करना कहाँ तक उचित है।
सिद्धराज जयसिह ने पूछा-ऐसी क्या वात
है ? विस्तार से बताओ।
पण्डित ने कहा-राजन् । आप जानते है पा
हिमालय पर्वत पर मुक्त हुए है और वही से धर्म
युधिष्ठिर सदेह स्वर्ग गये है। पर आचार्य हेम
कहते हैं कि पाण्डव शत्रुजय पर्वत पर मुक्त हुए
सर्वथा गलत है।
सिद्धराज जयसिह ने अपना दूत भेजकर आच
को राजसभा में बुलवाया । शिष्टाचार के पश्च
सिद्धराज जयसिंह ने पूछा-आचार्य प्रवर ! आजक
आप किस विषय पर प्रवचन कर रहे है
आचार्य हेमचन्द्र-आजकल पाण्डव चरित्र च
?
हा है।
ने
राजा-पाडव कहाँ पर मुक्त हुए थे ?
आचार्य हेमचन्द्र ने कहा-जैन-पाडव-पुराण
अनुसार वे शत्रुजय पर्वत पर मुक्त हुए है और महा.
भारत मे वेदव्यास ने कहा है-कौरव पाण्डव युद्ध मे
वीर अर्जुन के बाणो से दानवीर कर्ण मरणासन्न हो
चुका था। उस समय कृष्ण ने ब्राह्मण का वेश बनाकर
उससे दान की याचना की । दानवीर कर्ण का यह नियम

कलिकालसर्वज्ञ आचार्य हेमचन्द्र
१२१
।
था कोई भी याचक उसके द्वार से खाली नही लौटता
था । अतः दुखी बनकर कहा -विप्रवर ! इस समय मेरे
पास कुछ
भी नहीं है।
विप्र ने कहा-राजन् । मैं आपका नाम सुनकर
बहुत दूर मे आया था। लगता है किसी ने झूठा ही
तुम्हारा नाम दानवीर रख दिया। यहां से मैं तो निराग
होकर लौट रहा हूँ।
दुःसी होकर कर्ण ने अपने दांतो से जीभ काटी।
दांतो से जिह्वा का स्पर्श होते ही उन्हे अनुभव हुआ
उनके दातो मे एक दाँत म्वर्ण का है। उन्होने ब्राह्मण
। मे कहा-विप्रवर! रुकिए, मेरा एक दाँत सोने का है।
में उसे तोडकर आपको समर्पित करूंगा । कृपया पत्थर
उटाकर मुझे दे दीजिये।
ब्राह्मण ने कहा-यह कैसा दान ? तुम हमारे से
काम करवा कर पारिश्रमिक देना चाहते हो। यदि
तुम्हे दान ही देना है तो स्वय पत्थर उठाकर दाँत
तोडकर दे दो। नहीं तो हम खाती हाथ ही लोट
जाएंगे।
कण ने अनुनय किया-आप रुप्ट न वनिये। मैं
स्वा पत्थर उठाऊंगा। दांत तोडकर आपको अर्पण
"
न
लगा।
शरीर में अपार वेदना होने पर भी कार्ण धीरे-

१२२ चमकते सितारे धीरे सरकने लगा। उसके धावों से रक्त की धारा बह रही थी तथापि धैर्य से रेगता हुआ और पत्थर को अपने ऊपर जोर से लगाया। पत्थर की चोट से उसके दांत टूट गये। जमीन की ओर मुंह करके उसने खून उगल दिया। उसी खून से सने हुए दाँत बाहर आए। उनमे से स्वर्ण दाँत को पोछकर ब्राह्मण को देते हुए कहा-लीजिए, विप्रवर । कर्ण की दानवीरता को देखकर कृष्ण अत्यन्त प्रसन्न हुए। उन्होंने प्रकट होकर कहा-मैं तुम्हारे पर प्रसन्न हूँ। जो इच्छा हो वह वर माँगो। कर्ण-प्रभु! आपके इस समय दर्शन कर मेरी सभी इच्छाएँ पूर्ण हो चुकी हैं, मुझे और कोई इच्छा नही है । मुझे पूर्ण विश्वास है कि आपके दर्शन से अवश्य मुक्ति प्राप्त होगी। कृष्ण-तुम्हे कुछ न कुछ मॉगना ही चाहिए । कर्ण-भगवन् ! यदि आपको इच्छा है तो मेरी दाहकिया ऐसा स्थान पर हो जहाँ पर पहले किसी की दाहक्रिया न हुई हो। श्रीकृष्ण ने 'तथास्तु' कहा और कर्ण के प्राण पखेरू उड़ गये। श्रीकृष्ण कर्ण के शव को लेकर इधर से उधर ऐसे स्थान की अन्वेषणा करते रहे जहाँ किसी की दाह- कलिकालमर्वन आचार्य हेमचन्द्र १२३ -- - । क्रिया न हुई हो। पर ऐसा कोई स्थान न मिला अन्त में वे समुद्र के बीच मे एक निर्जनद्वीप पर पहुंचे। कृष्ण 'ने गोचा यह स्थान इतना एकात और शान्त है कि यहां पर किमी की दाहक्रिया नहीं हुई होगी। अत. उन्होने चिता तैयार की । इतने मे ही एक आकाशवाणी हुई- जन द्रोण शत दग्ध, पाडवाना शतनयन् । दुर्योधन सहस्रच, कर्णसख्या न विद्यते ॥ हे कृष्ण । प्रस्तुत स्थान पर एक सौ द्रोण, तीन सो पाउव तथा एक हजार दुर्योधनो को जलाया गया है और कितने कर्ण जलाये गये है उसकी तो परिगणना ही नहीं की जा सकती है। आकाशवाणी को सुनकर कृष्ण ठगे-से रह गये । आचार्य हेमचन्द्र ने कहा-राजन् । उस समुद्र द्वीप में तीन सौ पाण्डव जल हो तो पाण्टव गुजय पर्वत पर मुक्त हुए होगा हिमालय पर्वत पर मुक्त हुए हो उसमे वहां अन्तर आता है। स प्रकार आचार्यप्रवर के तर्फयुक्त वचनो को सुनकर सिद्धराज परम मतुष्ट हुए और आचार्य हेमचन्द्र अपने उपाश्रय लौटने लगे तब राजा ने उनसे करा--जाप अच्छी तरह ने धर्म का प्रचार कीजिए। वस्तुतः मम होने से ही मैंने आपको फप्ट दिया । आपने को निराकरण किया यह पधार्थ है ।

१२४ चमकते सितारे X X ब्राह्मण पंडित के पास कोई उत्तर नही आचार्य हेमचन्द्र की प्रतिभा के सामने वह कुछ में बोल सका। X पाटन के सिहासन पर कुमारपाल आसीन हुए क्योकि उनकी युवावस्था राजा सिद्धराज से युद्ध कर हुए व्यतीत हुई थी अतः युद्ध के कारण उन्हें सस्कृत भाष के अध्ययन का समय ही न मिल पाया था। एक बार वे राजसभा मे बैठे थे। एक विद्वान उन्हे कामन्दकीय नीतिशास्त्र सुना रहा था। उसमे एक श्लोक आया- "पर्जन्य इव भूतानामाधारः पृथिवीपतिः।" प्रस्तुत पद का अर्थ करते हुए विज्ञ ने कहा-राजा मेघ के सदृश है । वह समस्त प्राणियो का आधार है। इसे सुनकर कुमारपाल अत्यधिक प्रसन्न हुए- अच्छा राजा को मेघ की उपम्या दी गई है। महामन्त्री कपर्दी ने "उपम्या" अशुद्ध शब्द का प्रयोग सुना तो उसका सिर लज्जा से झुक गया। उसके चेहरे पर विषाद की रेखाएँ उभर आई। जब राजा ने महामन्त्री की ओर देखा तो समझ गया कि मेरे से भूल अवश्य हुई है । एकान्त मे राजा ने मन्त्री से पूछा -उस समय तुम्हारा चेहरा क्यों मुरझा गया था? राजन् । अप्रसन्न न हों तो कहूँगा। नीति मे कहा - कलिकालसर्वज्ञ आचार्य हेमचन्द्र १२५ गया है-राजा होना अच्छा है, न होना भी अच्छा है, किन्तु मुख राजा होना अच्छा नहीं है । राजा कुमारपाल को अपने लिए 'मूर्ख शब्द सुन- कर क्रोध आ गया-क्या मैं मूर्स हूँ? हा, राजन् ! यदि आप अध्ययनशील होते तो उपम्या जैसे अशुद्ध शब्द का प्रयोग नहीं करते। जो चाटुकार है ये आपकी भले ही प्रशंमा करे किन्तु मै अपने राजा को इस प्रकार अशुद्ध प्रयोग करते हुए देख नही मकता । यह आपके गौरव के प्रतिकूल है। राजा कुमारपाल को अपनी भूल का परिज्ञान हुआ । उमने विद्वानो के पास अनेक वार 'उपमा' शब्द गुना था। उसने यह दृटसकल्प किया कि इस वार सस्कृत व्याकरण का ज्ञान प्राप्त करेगा। उसने उसी दिन से अध्ययन प्रारम्भ कर दिया। शनैः दान. उसने काव्य और अलकार तथा व्याकरण पर अधिकार प्राप्त कर लिया । वह प्रतिदिन आचार्य हेमचन्द्र के बनाये हुए योगशास्त्र और वीतरागस्तोत्र का पाठ करता था। उसा की प्रेरणा ने उत्प्रेरित होकर आचार्य हेमचन्द्र ने अष्टि शलाका पुरष चरित्र का निर्माण किया। विष्टि राजाका पुरुप चरित आचार्य हेमचन्द्र की अपूर्व रचना है जिनने तीर्पकर, चक्रवर्ती, वासुदेव, प्रति- पानुदेव और दलो के पवित्र चार गो का वर्णन है ।

१२६
चमकते सितारे
गरीब वृद्धा
?
एक बार आचार्य हेमचन्द्र राजस्थान के
स्थान पर पधारे । मार्ग मे एक नन्हा सा गांव था
ने अपने ही हाथों से सूत कातकर चद्द
निर्माण किया था। जब आचार्यश्री वहाँ पर पधा
उस वृद्धा ने अत्यन्त भक्ति भावना से विभोर ह
आचार्य प्रवर को उस चद्दर को लेने का आग्रह कि
आचार्य देव ने कहा- मुझे इसकी आवश्यकता नहीं
वृद्धा की आँखो से ऑसू टपक पड़े-क्या गुरुदे
गरीवो पर आप भी कृपा नहीं करते। क्या निर्धन
पुकार आप भी नही सुनते ? मेरे मे ऐसी क्या कमी
जिसके कारण आपश्री लेने से इन्कार कर रहे हैं ?
आचार्यश्री ने कहा-तुम्हारी भक्ति मे कोई
कमी नही है । पर तुम्हारी आर्थिक स्थिति को देखकर
मैं सोचता हूँ कि न लू तो अच्छा है।
वृद्धा ने कहा-भक्ति के साथ धन का क्या
सम्बन्ध है ? आप कृपा करे और मुझ वृद्धा की भावना
को सफल करे। वर्षों से मै आपकी प्रतीक्षा कर रही
थी। आज ही मेरी भावना को मूर्त रूप मिला है
और आपश्री लेने से इन्कार हो रहे है। मुझ गरीब
पर कृपा करो और इसे ग्रहण करो।
आचार्य ने कहा-अच्छा तो, थोड़ा-सा टुकडा
इसमें से दे दो।
।
?

-- 4 कलिकालसवंश आचार्य हेमचन्द्र १२७ वृद्धा ने कहा-श्रद्धा-तन्तुओ से निर्मित पूरी बादर को क्या आप ग्रहण नहीं करेगे ? श्रद्धाभाव में विभोर शब्दो ने आचार्यश्री के हदय को स्पर्श कर दिया। उन्होंने चादर प्रेम से ग्रहण की और उस मोटी चादर को स्वय ने ही धारण कर । लिया। आचार्यश्री को अपनी वनाई हुई चादर धारण * किये हुए देखकर वृद्धा का हृदय आनन्द से झूमने लगा। । जाचार्यप्रवर राजस्थान में विहार करते हुए पाटन । पधारे । राजा कुमारपाल अठारह अन्य नरेशो के साथ : आचार्य को वन्दन करने के लिए पहुंचे। आचार्य हेम- चन्द्र के शरीर पर मोटी असुन्दर चादर देखकर अन्य राजागण मुस्कराने लगे कि राजा कितना कजूस है कि अपने को वस्त्र भी प्रदान नहीं करता। कुमारपाल ने अन्य राजाओ के मन की बात समझ ली। उन्होने आचार्य हेमचन्द्र से निवेदन किया- भगवन् । बहिया रेशमी दुशाला ग्रहण कीजिए। यह मोटी चद्दर आपके शरीर पर सुशोभित नहीं होती है । तो साधु है। जो भी स्नेह और मद्भावना व धक्षा के नाथ देता है वही हमारे लिए माध है। कुमारपाल ने कहा-आप इसे ग्रहण करे और एल नहर को त्याग दे। क्योकि लोग क्या कहेंगे कि - आचार्य-~हम ।

आचार्यश्री की तो नही पर हजारों गरीवो की १२८ चमकते सितारे के सम्राट कुमारपाल गुरु होने पर भी इस प्रक चद्दर आप धारण करे इसे देख कर मुझे लज्जा है। आचार्यश्री ने कहा-राजन् । मोटी और खु चद्दर को देखकर तुम्हे लज्जित होने की आवश्य नही है मुझे तो लज्जा इसलिए आ रही है तुम्हारी स्वधर्मी वन्धुओं के प्रति जो उपेक्षा है इससे लोगो को अनुभव होगा कि राजा कुमारपाल के स्वधर्मी वन्धु की कितनी दयनीय स्थिति है । यही लज्जा की बात है कुमारपाल-भगवन् ! ऐसी कौन सी बात जिसके कारण आपको लज्जा आती है। तुम्हारी प्रजा निर्धनता से पिसी जा रही है । उन ढकने के लिए वस्त्र नही मिल रहे है और न खाने के अन्न ही। और तुम स्वय राजमहल में बैठकर मौज कर रहे हो। क्या तुमने उनकी ओर दृष्टि उठाकर भी देखा है ? वे किस प्रकार खाते है, पहनते हैं, जीवन- यापन करते है ? सम्राट ने आचार्यश्री की प्रेरणा प्राप्त कर एक करोड स्वर्ण मुद्राएँ राजकोष से देने का वचन दिया जिससे गरीबो की सहायता की जा सके। ? फटी और पुरानी चद्दरे बदल गई । X X X सालिकालमर्वन आचार्य हेमचन्द्र १२६ .. न -- एक बार आचार्य हेमचन्द्र से कुमारपाल ने ज्ञाना प्रस्तुत की-भगवन् | मैंने श्रावक के व्रत प्रहण किये है । आप मेरे हाय से भिक्षा ग्रहण करे। आचार्यश्री ने कहा-श्रमणो के लिए राजपिण्ड वज्र्य है। अत: आप श्रमणों के म्यान पर श्रावको को सासारादि देकर उनकी सेवा-सुधू पा कर सकते है। भगवन् ! मैं श्रावक होकर श्रावको की सेवा करू, यह यहाँ तक उचित है ? आचार्य ने कहा-एक बार भगवान ऋपभदेव अष्टापद पवंत पर अवस्थित थे । उस समय सम्राट भरत पाच सी गाड़ियां स्वादिष्ट भोजन से भरकर भगवान पी गेवा में पहुँचे । आहार ग्रहण की प्रार्थना । की। पर भगवान ने राजपिण्ड कहकर उसे ग्रहण नही किया । नम्राट भरत को इससे अत्यधिक दु.ख हुआ। उनके मुरमाये हुए चेहरे को देखकर शकेन्द्र ने भगवान में पूछा-भगवन् । अवग्रह कितने प्रकार का है ? भगवान ने कहा- देवेन्द्र अवगह, राज-अवग्रह, गृहपति-भवाह, नागारिक-अभिग्रह, सार्मिक-अवग्रह ~~~~पाच प्रकार के अवग्रह है। इन अवग्रहो में पिरपिटले उकार प्राप्त हो जाये तो पहले अवग्रह का होई प्रयोजन नहीं है । अर्थात्, पदि राज-अवग्रह चालित रूप में प्राप्त हो जाएं तो देवेन्द्र अवग्रह की नावश्यकता नहीं। - -

१३०
१
चमकते सितारे
भरत की ओर मुड़कर शकेन्द्र ने कहा-
श्रमणों को आहारादि नही दे सकते हो, पर स्व
बन्धुओ को अवश्य ही आहार आदि दे सकते हो।
जो द्वादशवतधारी श्रावक है उन्हे बुलाकर आप
-''तुम्हे असि, मसि और कृपि करने की आवश्य
नहीं । तुम स्वाध्याय और चिन्तन करो। मुझे उद्दो
दो जिससे मै राज्य की ऋद्धि-समृद्धि मे न फंसू
तुम लोग मेरे भोजनालय मे भोजन करो।"
शकेन्द्र का यह सुझाव सुनकर भरत को प्रसन्न
हुई । उन्होने आदेश प्रसारित कर दिया। फलस्वर
खाने वालों की संख्या अत्यधिक वढने लगी । मोरन
बनाने वालो ने सम्राट से निवेदन किया कि इतनी
अधिक संख्या बढ रही है। कौन सच्चा श्रावक है और
कौन पाखण्डी है, इसका पता लगाना ही कटिन हा
रहा है।
सम्राट भरत ने उन श्रावक समूह की परीक्षा ली
जो सच्चे और अच्छे जानकार श्रावक थे उनके सम्यक
दर्शन, सम्यकज्ञान और सम्यक्चारित्र के प्रतीक रूप
में काकिणी रत्न से उनके शरीर पर तीन रेखाएँ कर
दी जो रेखाये दूर से ही चमकती थी। और जो नये
श्रावक होते थे उनकी परीक्षा लेकर उनके शरीर पर
रेखाये कर दी जाती थी। और श्रावको को इस प्रकार
1
1
7

कानिकालमर्वन आचार्य हेमचन्द्र १३१ " " , सहयोग देकर भरत चक्रवर्ती अपने अतिथिसविभाग व्रत की आराधना करता था। इस प्रकार राजन् । तुम भी श्रावको को सहयोग देकर अपने प्रत की आराधना कर मकते हो। समाज- मेवा करना तुम्हारा कर्तव्य है । आचार्यश्री के उपदेश से प्रभावित होकर राजा कुमारपाल ने धावको का कर माफ कर दिया जिससे वहत्तर लाप की वार्षिक आमदनी कम होने लगी। किन्तु उसने उसकी चिन्ता नहीं की। अपने स्वधर्मी • बन्धुओ को सहयोग देने हेतु चौदह करोड़ मुद्राएँ लेकर • एक गहायक-कोप को सस्थापना की। उन्होने उससे अनेक दानशाताएं पुलवायी। उत्तम भोजन, वस्त्र । आदि की व्यवस्था की। इस प्रकार आचार्य हेमचन्द्र . की प्रेरणा ने कुमारपाल ने ममाज-सेवा का महान् i आदर्श उपम्पित किया। -- |. X आचार्य हेमचन्द्र के पावन उपदेशो से कुमारपाल र के हृदय मे करुणा की बोतस्विनी प्रवाहित होने लगी थी । एक रात कुमारपाल राजमहल में सो रहा था। उसे नीद नहीं आ रही थी। रात्रि के नीरव व शान्त पातावरण में उसके कर्ण-कुहरों में किसी के रोने की जापान आगी। राजा तोचने लगा-इस नीरव रात्रि • मे ऐसा कौन दुखो व्यक्ति है जो रो रहा है ? राजा -- ?

१३२
वनस्ते नितारे
.
वेप परिवर्तन कर वहीं पहुंचा, जहाँ पर एक स्त्री
रही थी।
राजा ने मधुर सब्दो में पूछा - बहिन ! यी
रही हो ' तुम अपने रोने का कारण बताओ। न
है मैं तुम्हारे काम में आ सके।
उम वहन ने जांखों से आंसू बहाते हुए कहा
दु.ल का कारण एक नहीं, अनेक हैं। और उनमें अनु
कारण है राजा कुमारपाल ।
कुमारपाल ने अपना नाम सुना तो चौंक पड़ा
मैं इन वहन के दुःख का कारण कैसे ? वह कुछ भने
तक सोचने लगा। उस बहिन ने कहा-तुन वर्गों में
में सहायता करूगा । अब चुप कैसे हो गये ?
राजा कुमारपाल ने संभल कर कहा-वहन !
ओ, राजा कुमारपाल ने तुन्हें क्या दुःख है ?
उस स्त्री ने कहा-राज्य नियम के अनुसार नै
कल भिखारिन वन जाऊंगी।
कुमारपाल-तुमने ऐसा कौन ना अपराध निया
है जिसके कारण तुम्हे भिखारिन बनना पड़ेगा ? जरा
कारण को स्पष्ट करो।
स्त्री ने कहा-मेरे पति का नुझ पर अत्यन्त न्नेह
था। उसने अपना विराट् वैभव मेरे पर न्योछावर कर
दिया था। वर्षों को प्रतीक्षा के पश्चात् मेरे एक पुत्र
?
।

। कालिकालसर्वज्ञ आचार्य हेमचन्द्र १३३ हुआ। पुत्र को देखकर हम फूले न समाते थे । मेरा पुन वीस वर्ष का हो गया। किन्तु एकाएक कुछ घण्टो 1 तक बीमार रहकर सदा के लिए उसने आँखे मूंद ली। पुत्र को मरा हुआ देखकर उसके पिता उस दुःख को महन न पार सके । उनकी हृदय-गति रुक गयी और वे चल बसे । में फंसी फूट भाग्यवाली हूँ। पुन भी मर गया और पति भी। राज्य के नियमानुसार जिसका पति और पुत्र मर जाता हे उसके धन का स्वामी राजा होता है। इस दृष्टि से प्रात होते ही मेरी सारी सम्पत्ति गना छीन लेगा। पति आर पुन का दुरा तो सिर पर मदरा ही रहा है : कल भिखारिन बनकर घर-घर भीख मांगनी होगी। अत मै फॉमी कर मरना चाहती हूँ। अब बताओ तुम मेरी क्या सहायता कर सकते हो राजा ने हटता के साप फहा-बहिन । तुम घब- रामो मत । मैं ऐसा उपाय करूंगा जिससे तुन्हे दर-दर भट ना नहीं पड़ेगा। यदि राज्य के अधिकारी तुम्हारे पान जाये तुम उनमें कहना कि राजा जुमारपात ते जादेश ले के बाओ । अब तुम आत्मत्या की वात मन से निकाल दो। राजा उने सान्त्वना देकर अपने महल लौट आया। उन्हें रात भर नोद ही नहीं आई। वह राज्य १३४ चमकते सितारे नियम के औचित्य-अनौचित्य पर चिन्तन करता रहा। पुत्रहीन या पतिहीन माताओं को भिखारिन बनाना सर्वथा अनुचित है। न्याय के प्रतिकूल है। और इस प्रकार आत्महत्या के लिए उन्हें विवश करना कितना अशोभनीय कार्य है। प्रातःकाल होते ही महाराजा कुमारपाल राज- सभा मे पहुंचे। उन्होने उद्घोपणा की कि जिन माताओं के पुत्र व पति मर गये हो उनका धन राज्य- कोप मे न लिया जायगा । सामन्तो ने तथा मत्रियों ने समझाया-राजन् ! यह नियम न बनाया जाय । क्योकि इससे राज्यकोष को प्रतिवर्ष करोड़ो रुपयो की संपत्ति प्राप्त होती है। राजा कुमारपाल ने कहा-खून से सना हुआ धन मुझे नहीं चाहिए । जो धन दुःखियो के दिल में आ उत्पन्न करता है उस धन से हम राज्यकोष को सजाये यह बिल्कुल ही अनुचित है। मेरा दृढ़ निश्चय है कि इस प्रकार के धन पर मुझे नियन्त्रण करना है। मैं आचार हेमचन्द्र का शिष्य हूँ। मैं दूध पी सकता हूँ, खून नहीं पी सकता। इस प्रकार आचार्य हेमचन्द्र के निकट सम्पर्क रहकर राजा कुमारपाल का जीवन परिवर्तित हैं गया। उसके जीवन मे हिंसा के स्थान पर अहिंसा के भावना लहराने लगी।

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Chamkate Sitare

Author
Muni Devendra
Title
Chamkate Sitare
File name
Chamkate Sitare
Text
OCR done
Citation
1989
Published
2011/01
Publisher
Shree Tarak Muni Jain Granthalayan Udaipur Raj.
Language
Sanskrit
Pages
142
Library
Shri Jawahar Vidyapith Binasar, Bikaner
Classification
Autobiography
DLI number
548817
Barcode
4990010028908.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
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