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Sanskrith Paath Mala Vol Xx
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अंक २०. ॐ
संस्कृत-पाठ-माला।
[संस्कृत-भाषाका अध्ययन करनेका सुगम उपाय]
भाग २० वाँ।
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लेखक
Halomoteatimes
पं. श्रीपाद दामोदर सातवलेकर,
स्वाध्याय मंडल, पारडी, (जि. सूरत )
तृतीय वार
संवत् २००६, शके १८७१, सन १९४९
मूल्य ८ आने
SIR
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स्वरचित
वेदमें अक्षरों के नीचे और ऊपर स्वरचिह्न दिये जाते हैं, उनको स्वर
कहते हैं। इन स्वरों के कुछ नियम इस पुस्तकमें दिये हैं। यदि पाठक
इन नियमोंको ध्यानसे पढेंगे तो उनको स्वर किस नियमसे दिये जाते हैं
और स्वर कैसे बदलते हैं, इस बातका पता लग जायगा । स्वरका प्रकरण
बडा लंबा चौडा है, परंतु इस भागको संक्षेपसे यहां दिया है । इसलिये
इसके मननसे पाठक स्वरके विषयका आवश्यक ज्ञान समझ सकते हैं।
स्वाध्याय-मण्डल
'आनंदाश्रम'
पारडी (जि० सूरत)
लेखक
पं. श्रीपाद दामोदर सातवलेकर
अध्यक्ष-स्वाध्याय-मंडल
मुद्रक तथा प्रकाशक- व. श्री. सातवलेकर, बी. ए.
भारत-मुद्रणालय 'आनंदाश्रम' पारडी [जि० सूरत]
संस्कृत-पाठ-माला।
भाग २०वाँ
पाठ १
इस पाठमें निम्नलिखित मंत्रोंका अध्ययन कीजिये-
(१)
नमस्ते हरसे शोचिषे नमस्ते अस्त्वचिषे ।
अन्याँस्ते अस्मत्तपन्तु हेतयः पावको अस्मभ्य शिवो भव ॥
(वा० य० ३६।२०)
हे ईश्वर ! ( हरसे ) दुष्टताका हरण करनेवाले, ( शोचिषे ) पवित्रता
बढानेवाले और ( अर्चिषे ) तेज फैलानेवाले (ते नमः, ते नमः ) तेरे लिये
हमारा नमस्कार (अस्तु ) है । ( ते हेतयः) तेरे शख ( अस्मत् अन्यान् )
हमको छोडकर अन्योंको अर्थात् धर्मके शत्रुओंको (तपन्तु) ताप देते रहें।
(पावकः) पवित्रता करनेवाला तू ईश्वर ( अस्मभ्यं ) हम सबके लिये
(शिवो भव ) कल्याणकारी हो ।
परमेश्वर दुष्टता दूर करनेवाला, पवित्रता बढानेवाला और प्रकाशको
फैलानेवाला है, इसलिये उसकोही नमन करना हम सबको उचित है।
(४) प्रत्येक मनुष्य उसीकी पूजा करे । हम सबका आचरण ऐसा धर्माधयमोंमे युक्त हो कि जिससे हमपर ईश्वरका शासक दण्ड न गिरे । वह दण्ड उनपर गिरे कि जो अधर्माचरण करते हों। पवित्रता बढानेवाले ईश्वरकी दया हम सबपर बरसती रहे। नमस्ते अस्तु विद्युते नमस्ते स्तनयित्नवे । नमस्ते भगवन्नस्तु यतः स्वः समीहसे ॥ ( वा० य० ३६।२१) हे ईश्वर ! ( विद्युते ते नमः अस्तु ) विशेष तेजःस्वरूप तेरे लिये हमारा नमस्कार हो । ( स्तनयित्नवे ते नमः ) महान् शब्द करनेवाले तेरे लिये मेरा नमस्कार हो । हे ( भगवन् ) ऐश्वर्यसंपन्न ईश्वर ! ( यतः ) जिस स्थानसे तू ( स्वः) अपने निजानंदमें ( सं ईहसे ) सम्यक् चेष्टा करता है, वहाँ (ते नमः अस्तु ) तेरे लिये मेरा नमस्कार हो । ईश्वर परम तेजस्वी है, महान् ऐश्वर्यसंपन्न है और शब्दका प्रवर्तक भी तथा वह अखंड आनंदमय है । इसलिये उसको नमस्कार करना चाहिये, उसीकी पूजा करनी चाहिये । और उसीकी भाक्त करनी चाहिये । (३) यतो-यतः समीहसे ततो नो अभयं कुरु । शं नः कुरु प्रजाभ्योऽभयं नः पशुभ्यः ॥ (वा० य० ३६३२२) हे ईश्वर ! ( यतः-यतः) जिस जिस स्थानसे तू ( सं ईइसे ) प्रेरणा करता है (ततः ) उस उस स्थानसे ( नः अभयं कुरु ) हम सबका अभय कर । ( नः प्रजाभ्यः ) हमारी सब प्रजाओंके लिये (शं अभयं ) कल्याण- कारक अभय (कुरु ) कर और ( नः पशुभ्यः ) हम सबके पशुओंके लिये भी अभय दान कर। ईश्वर हम सबको अभय देवे, हमारी प्रजाओं और हमारे पशुओंको, - (५) भयरहित करे अर्थात् हम सबका पूर्ण कल्याण करे । वह तो सब प्रकारले कल्याण करताही है। परंतु यहां यह प्रार्थना इसलिये है कि इस प्रकारकी प्रार्थना मनुष्य करें और उसकी निर्भयतामें सदा रहें। नमः सायं नमः प्रातर्नमोराच्या नमो दिवा। भवाय च शर्वाय चोभाभ्यामकरं नमः ॥ ( अथर्व० १९।२।१६) (भवाय) सबके उत्पादक ईश्वरके लिये और ( शर्वाय ) सबका दुःख निवारण करनेवाले ईश्वरके लिये सायंकाल, प्रातःकाल, रात्रिके समय और दिनके समय ( नमः अकरं ) नमस्कार करते हैं। दिनमें प्रातःकाल, दोपहरके समय, सायंकाल और रात्रिमें सोते समय ईश्वरकी स्तुति, प्रार्थना उपासना भक्तिसे और प्रेमसे करनी चाहिये । (५) ता अस्य नमसा सहः सपर्यन्ति प्रचेतसः। व्रतान्यस्य सश्चिरे पुरूणि पूर्वचित्तये वस्वीरनु खराज्यम् ॥ (ऋग्वेद १।८४१२) ( स्वराज्यं मनु वस्वीः) स्वराज्य-प्रालिके अनुकूल व्यवहार करनेवाले ( ताः प्रचेतसः ) वह ज्ञानी जन (अस्य सहः) इस ईश्वरकी शक्तिका (नमसा सपर्यन्ति ) नमस्कारोंसे पूजन करते हैं । तथा ( अस्य पुरुणि व्रतानि ) इसके विविध नियमोंका ( सश्चिरे ) पालन करते हैं, इसलिये कि उससे (पूर्वचित्तये ) अपूर्व लाभ प्राप्त हो। अपना अभ्युदय चाहनेवाले सब लोक परमेश्वरकी शक्तियोंका, उसके महान् कर्मोंका और उसके अनन्त यशका चिंतन करें और अपनी भक्तिसे उसकी पूजा करें। ऐसा करनेसेही उनको अपूर्व लाभ प्राप्त हो सकता है।
यदिन्द्र ब्रह्मणस्पतेऽपि मृषा चरामसि । प्रचेता न आंगिरसो दुरितात्पात्वंहसः ॥ ( अथर्व०६।४५।२) हे ( इन्द्र ) प्रभो ! हे ( ब्रह्मणस्पते ) ज्ञानके स्वामिन् ! ( यत् ) यदि ( अपि मृषा चरामसि ) असत्य आचरण हमसे हुआ हो, (दुरितात् अंहसः) तो उन सब पापोंसे (आंगिरसः प्रचेताः) विशेष ज्ञानी विद्वान् ( नः पातु हमको वचावे । इस जगत्का एकही प्रभु है, वह सर्वज्ञ है, वही सबसे श्रेष्ठ और सर्वोपरि है। कोई भी मनुष्य उससे छिपकर कोई पाप कर नहीं सकता। इसलिये सबको उचित है कि वे उस ईश्वरकी भक्ति करें और श्रद्धाले उस- की प्रार्थना करें कि वह हम सबको ऐसी प्रेरणा करें कि हमसे कभी बुरा आचरण न हो और हम सब सदा पापसे बचते रहें। सूचना पाठक इस प्रकार मंत्रोंके शब्दोंका अर्थ करें और शब्दार्थके अनुसार मनन करके मन्त्रका भावार्थ देखें | छोटेसे मन्त्रका भी भावार्थ बडा गंभीर हो सकता है, क्योंकि भावार्थमें एक एक शब्दके आशयका स्पष्टी- करणके साथ तात्पर्य लेना होता है। इस ढंगसे अभ्यास करनेके पाठकोंको बडा लाभ होगा।
(७)
पाठ २
वैदिक स्वर
उदात्तश्चानुदात्तश्च स्वरितश्च स्वरात्रयः।
ह्रस्वो दीर्घः प्लुत इति कालतो नियमा आचि ।।
( शिक्षा ११)
उदात्त, अनुदात्त, स्वरित ये तीन स्वर हैं और उच्चारणके लघु दीर्घ
भेदसे ह्रस्व, दीर्घ, प्लुत ये भो तीन भेद होते हैं।
इनमें उदात्त, अनुदात्त और स्वरित ये स्वरके भेद ऊपर नाचेके आघातके
कारण बनते हैं और
न्यून
आधिक काल लगनेके कारण हस्व दीर्घ प्लुत
होते हैं।
हस्व स्वर-अ, इ, उ, ऋ,ल।
दीर्घ स्वर- आ, ई, ऊ, ऋ, ल, ए, ऐ, ओ, औ ।
ह्रस्व स्वरका काल एक, दीर्घ स्वरका काल दो और प्लुत स्वरका काल
तीन मात्रा होता है । अर्थात् ह्रस्व स्वरही दो गुणा लंबा करनेसे दीर्घ
और दीर्घ स्वर और अधिक बढानेसे प्लुत बनता है। देखिये-
हस्व-हे राम-1
दीर्घ- हे रामाs-5-1
प्लुत-हे रामाs-5-51
एकही अकार दो गुणा और तीन गुणा लंबा करनेसे दीर्घ और प्लुत
क्रमशः होता है। इसी प्रकार अन्य स्वरोंके विषयमें समझना योग्य है।
दूसरे भी कारणोंसे हस्व स्वरको दीर्घत्व अथवा गुरुत्व प्राप्त होता है,
उसके कारण ये है-
-
(८) - १ यदि हस्व स्वर अनुस्वारयुक्त होगा तो वह दीर्घ या गुरु समझा जाता है। जैसा-रामं, इसमें अन्त्य अकार गुरु है । २ यदि हस्व स्वर विसर्गयुक्त हो तो वह गुरु समझा जाता है। जैसा- रामः, इसमें विसर्ग पूर्वका अकार गुरु है। ३ संयुक्त अक्षरके पूर्वका हस्व स्वर दीर्घ या गुरु माना जाता है, जैसा इन्द्र, इसमें न्द्र अक्षर आगे आनेके कारण इसके पूर्व ह्रस्व इकार दीर्घ या गुरु माना जाता है। ४ इस नियममें अपवाद प्र और ह इन दो संयुक्त अक्षरोंके पूर्वका हस्व स्वर विकल्पसे दीर्घ समझा जाता है । अर्थात् इसको हस्व स्वर भी कह सकते हैं और आवश्यकता होनेपर दीर्घ भी कह सकते हैं। ५ पद्यमें चरणके अन्तमें यदि हस्व स्वर भागया तो वह दीर्घसदृश समझा जाता है। इस प्रकार हस्व स्वर भी परिस्थितिके अनुसार दीर्घवत् समझे जाते हैं । हस्वकी एक मात्रा, दीर्घकी दो मात्राएं और प्लुतकी तीन मात्राएं होती हैं। छंदकी रचना करनेके लिये इन मात्राओंकी गिनती करनेकी आवश्य- कता होती है। दूसरेको पुकारनेके समय प्रायः प्लुत स्वरका उच्चारण होता है । जैसा- हे रामाs-s-s ! हस्व तथा दीर्घ स्वरोंके प्रयोग शब्दोंमें सर्वत्र होते हैं। हस्व, दीर्घ और प्लुत स्वरोंका उच्चार केवल स्वरोच्चारके कालकी लंबाई- के साथ संबंधित है, यह बात यहां पाठकोंके ध्यानमें आगई होगी। इससे पूर्व यह बतायाही है कि स्वरोंके उच्च, नीच और संयुक्त आघात- से उदात्त, अनुदात्त और स्वरित स्वर होते हैं, अर्थात् ये स्वर माघातके हैं। वैदिक भाषा इस समय प्रचलित नहीं है, इसलिये इन भाघातोंका वास्तविक स्वरूप हम जान नहीं सकते, तथापि प्रायः संपूर्ण भाषाओं में न्यूनाधिक प्रमाणसे ये भाघात रहतेही हैं। अंग्रेजी भाषामें शब्दोंके विशेष (९) स्वराक्षरपर दबाव होता है और कईयोंपर नहीं होता है। भाषामें भी वैसाही है। देखिये- यह बात ऐसीही है। इसमें 'ही' पर आघात या दबाव है। प्रायः ये दवाव भिन्न भिन्न भाषामें भिन्न भिन्न रीतिसे होते हैं । परन्तु होते हैं इसमें संदेह नहीं है। वेदमंत्रोंमें ये आघात अथवा दबाव अक्षरों के नीचे और ऊपर खडी या तेढी लकीरोंसे बताये जाते हैं, तथा अन्य चिह्न भी बहुतही रहते हैं, जो वाजनेयी संहिताके मंत्रों में प्रसिद्ध हैं । दखिये- । -- पुवित्रेस्त्थोवैष्ण्ण्णुल्योसवितुर्वप्रमुवऽउत्त्पुना म्यांच्छद्रेणपवित्रेणुसूय॑स्यरश्म्मिभिः ॥ देवी रापोऽअग्ग्रेगुवोऽअग्ग्रेपुवोग्ग्रेऽइममुद्दययज्ञन्नय वाग्ग्रेयुज्ञपति मुधातुम्युज्ञपतिन्देव्युवम् ॥ १२॥ इसमें पाठक देख सकते हैं कि स्वरोच्चार करनेके कितने चिह्न इसमें लिखे गये हैं । ऋग्वेद, यजुर्वेद, साम और अथर्ववेद मंत्रोंके उच्चारके चिह्न भिन्न भिवही होते हैं, परन्तुःयहां सब स्वरोंका विचार करना नहीं है, प्रत्युत केवल उदात्त, अनुदात्त और स्वरित स्वरचिह्नोंकाही विचार करना है । ये स्वरचिह्न महत्त्वके हैं और अन्य चिह्न गौण हैं। इन वैदिक स्वरोंका उच्चारण भिन्न भिन्न रीतिसे होता है । अर्थात् उदात्त, अनुदात्त और स्वरित स्वरोंका उच्चार भिन्न भिन्न रीतिसे होता है। और यदि इन स्वरोंके उच्चारणमें अशुद्धि हुई तो अर्थका अनर्थ भी होता है ! इसलिये वेदोच्चार करनेके लिये इन स्वरोंके ठीक ज्ञान होनेकी अत्यंत भावश्यकता है।
(१०) अग्निमीळे पुरोहितं यज्ञस्य देवमृत्विजम् होतारं रत्नधातमम् ॥ ( ऋ० १०११) यह मंत्र देखिये । इसमें कई अक्षरोंके नीचे रेषा है, कईयोंके सिरपर रेषा है और कई अक्षर इस प्रकारकी रेषाओंसे रहित हैं । ये स्वर- चिह्न ऐसे क्यों आते हैं और इसका इन अक्षरोंसे क्या संबन्ध है, यह अब देखना है। यदि पाठक इस विषयके लेख आगेके पाठोंमें विशेष ध्यानसे पढ़ेंगे तो उनको इस विषयका आवश्यक ज्ञान हो जायगा । इसलिये पाठकोंसे निवेदन है कि वे इस स्वरबोधक पाठोंका अध्ययन विशेष मननसे करें और लाभ उठावें। पाठ ३ इस पाठमें निम्नलिखित मंत्रोंका अध्ययन कीजिए. पाहि नो अग्ने रक्षसः पाहि धूर्तेरराण्वः । पाहि रीषत उत वा जिघांसतो बृहद्भानो यविष्ठय ॥ ( ऋग्वेद ११३६।१५) हे ( बृहत्-भानो) विशेष तेजस्वी ! हे ( यविष्ठय ) बलवान् (अग्ने) प्रकाशके देव ईश्वर ! (नः) हम सबको ( राक्षसः) राक्षसोंसे (पादि) बचानो, (धूर्तेः अ- राव्णः) धूर्त स्वार्थियोंसे (पाहि ) बचाभो, (जिघां- सतः ) हनन करनेवाले शत्रुसे ( उत वा ) तथा (रीषतः ) विनाश करने- वाले शत्रु से पाहि) हम सबको बचानो। ..
(११) , R हे ईश्वर ! तू हम सबका बचाव क्रूर, राक्षस, दुष्ट, धूर्त, स्वार्थी आदिसे कर । तूही सबमें समर्थ, सबको तेज देनेवाला, सबका प्रेरक देव है । इस- लिये हम सबको अपने बचाव करने के लिये समर्थ बनाओ और हमें तेजस्वी तथा यशस्वी कर। (२) विजानीर्यान्ये च दस्यवो बर्हिष्मते रन्धया शासव्रतान् । शाकी भव यजमानस्य चोदिता विश्वेत्ता ते सधमादेषु चाकन ॥ (ऋग्वेद ११५१८) हे ईश्वर ! ( आर्यान् विजानीहि ) आयौँको अर्थात् सत्य धर्मियोंको जान लो और ( ये च दस्यवः ) जो चोर हैं और घातक तथा हिंसक हैं उनको भी जान लो। (बर्हिष्मते) सत्कर्म करनेवाले के लिये ( अ- व्रतान् ) नियम तोडनेवालोंको ( शासत् रंधय ) शासन करते हुए दण्ड दो । तू ( शाकी भव) समर्थ है । तथा तू ( यजमानस्य चोदिता ) कर्मण्य पुरुषको प्रेरणा करनेवाला है। ( ते ) ये ( ता विश्वा ) वे सब कर्म मैं (सधसादेषु ) आनंद-प्राप्तिके पुरुषार्थमें ( चाकन ) चाहता हूं। हे ईश्वर ! हम सबमें जो सच्चे धर्मात्मा हैं और जो दुराचारी अधार्मिक हैं तथा नियमविरुद्ध आचरण करनेवाले हैं, उन सबको देख लो ! जो सज्जन हैं उनकी रक्षा कर और जो दुर्जन हों उनको दण्ड दो। तूही यह सब कर्म करनेके लिये समर्थ है। तूही सबको पुरुषार्थ करनेकी प्रेरणा देता है और तुम्हारेही कर्म हम सबको आनंद बढानेके कार्यमें सहाय- कारी होते हैं, इसलिये हम सब यह प्रार्थना कर रहे हैं ऐसे मंत्र मनुष्योंको धर्मके नियम बताते हैं । इसलिये इनसे जो बोध लेना उचित है वह यहां बताया जाता है- (१) मनुष्य प्रथम सज्जन कौन हैं और दुर्जन कौन हैं इसका विचार । - (१२) auntmare . करे, (२) उनमें पुरुषार्थी कौन हैं और नियम तोडनेवाले कौन हैं यह देखे, (३) पश्चात् सज्जनोंकी रक्षा करे और दुर्जनोंको दण्ड देवे, (४) अपना सामर्थ्य बढावे, (५) सत्कर्मी पुरुषार्थियोंकी सहायता करे, (६) इस प्रकार व्यवहार करके जगत् में उन्नतिको प्राप्त हो। इन आशयोंको प्रकट करनेवाले इस मंत्रके ये शब्द हैं- (१) आर्यान् विजानीहि ये च दस्यवः, (२-३) बर्हिष्मते शासत्, अव्रतान् रन्धय, (४) शाकी भव, (५) यजमानस्य चोदिता, (६ ६) ते ता विश्वा सधमादेषु चाकन । पाठक इस रीतिसे मंत्रोंद्वारा अपने आचरणके लिये बोध प्राप्त करें। वेद- के मंत्रोंसे मनुष्योंके व्यवहारमें इस प्रकार बोध प्राप्त किया जा सकता है । (३) वधैर्दुःशंसाँ अप दूढ्यो जहि दूरे घा ये आन्त वा केचिदत्रिणः । अधा यशाय गृणते सुगं कृध्यग्ने सख्ये मा रिषामा क्यं तव ॥ ( ऋग्वेद १ । ९४।९) (अग्ने ) प्रकाश देनेवाले प्रभो ! (वधैः) बधके साधनभूत शस्त्रोंसे (दुःशंसान् ) दुष्ट (दूढ्यः ) दुर्बुद्धिवालोंको (अप जहि) मार । जो (दूरे वा ये अन्ति वा) दूर हैं अथवा जो पास हों तथा (ये के च ) जो कोई ( भत्रिणः ) सर्वभक्षक स्वार्थी हैं, उन सबको दण्ड दे। ( अधा) पश्चात् (यज्ञाय गृणते ) यज्ञ करनेवाले स्तोताको (सुगं कृधि) सुगम मार्ग कर । हे प्रभो! तेरी ( सख्ये ) मित्रतामें ( वयं मा रिषाम ) हम नष्ट नहीं होंगे। हे ईश्वर ! दुष्ट दुर्जनोंको, जो पास हों वा दूर हों, एकदम हमसे दूर कर दे। स्वार्थी खुदगर्ज केवल अपने पेट भरनेवालेही जो हैं उनको भी योग्य १ (१३) दण्ड दे । तथा जो यज्ञकर्ता है उसकी उन्नतिका मार्ग सुगम कर । प्रभो ! हम तुम्हारी मित्रतामें रहेंगे तो कभी नष्ट नहीं होंगे। इस मंत्रसे व्यवहारका बोध इस प्रकार लिया जाता है-(१) दुष्टोंको अपराधके योग्य दण्ड देना चाहिये, (२) स्वार्थी स्वयंभोगी लोगोंको भी योग्य मार्गपर लाना चाहिये, (३) सत्कर्मी पुरुषार्थी जो हों उनकी उमति. का मार्ग सुगम करना चाहिये, (४) जो मनुष्य ईश्वरकी भक्ति करते हों उनका कभी नाश नहीं होगा। यहां पाठक देख लें कि किस वेदवाक्यका कौनसा अर्थ होता है और उससे भावार्थ तथा बोध कैसा प्राप्त किया जाता है। (४) इन्द्रोतिभिर्बहुलाभिर्नो अद्य याच्छ्रेष्ठाभिर्मघवञ्छूर जिन्व । यो नो द्वेष्टयधरः सस्पदीष्ट यमुद्विष्मस्तमु प्राणो जहातु ॥ (ऋग्वेद ३ । ५३ । २१) हे (इन्द्र ) प्रभो ! ( भद्य ) आजही (बहुलाभिः अतिभिः) अनेक रक्षणोंके साथ (नः ) हमारा रक्षण कर । हे (मघवन् ) धनवान् ! हे शूर ! हम सबको (श्रेष्ठाभिः ) श्रेष्ठताओंके साथ (यात् ) आगे ( जिन्व ) बढाओ। ( यः नः द्वेष्टि ) जो हम सबका द्वेष करता है उसको (अधरः सस्पदीष्ट ) नीचे दवाओ। हम सब (यं उ द्विष्मः) जिसका द्वेष करते हैं (तं उ) उसको ( प्राणः जहातु) प्राण छोड देवे। हे ईश्वर ! हमारी रक्षा कर । हे ऐश्वर्यमय प्रभो! हम सबको श्रेष्ठ गुणोंके साथ आगे बडाओ। जो अकेला हम सबका निष्कारण द्वेष करता है इस कारण जिसका हम सब द्वेष करते हैं वह हमसे दूर हो। सूचना पाठक यहां प्रथम मंत्रोंके पद पृथक् पृथक् करना सीखें । तत्पश्चात् उन पदोंका अन्वय करें। अन्वयके पश्चात् स्वयं अर्थ करनेका यत्न करें। और
यदि अर्थ नहीं हुआ तो फिर यहां दिया हुआ अर्थ पढकर ठीक अर्थ जानें ।
इस प्रकार प्रयत्नके साथ अध्ययन करेंगे तो वे बहुत उन्नति प्राप्त कर
सकते हैं।
(५)
तवाहमन ऊतिभिर्मित्रस्य च प्रशस्तिभिः।
द्वेषोयुतो न दुरिता तुर्याम मानाम् ॥ (ऋ० ५।९।६)
पदानि-तव । अहं । अग्ने । अतिभिः । मित्रस्य । च। प्रशस्तिभिः ।
द्वेषः+युतः । न ! दुरिता । तुर्याम । मानाम् ।
अन्वयः- हे अग्ने ! मित्रस्य तव प्रशस्तिभिः ऊतिभिः द्वेष युतः न
मानां दुरिता तुर्याम ।
अर्थ-हे (अग्ने ) प्रकाश देनेवाले ईश्वर ! (मित्रस्य तव ) तु जो मित्र
उसकी ( प्रशस्तिभिः अतिभिः) प्रशंसनीय रक्षणोंसे सुरक्षित होकर (द्वेषः
+युतः न ) द्वेषयुक्त लोगोंके समान अहित करनेवाले (मानां ) मनुष्योंके
(दुरिता तुर्याम ) दुष्ट कर्मों से दूर होकर सुरक्षित होंगे।
भावार्थ-हे ईश्वर ! तू हमारा मित्र है और हमारा उत्तम संरक्षण
करता है। तेरे
अद्भुत
संरक्षणसे
युक्त
होते हुए हम दुष्ट मनुष्योंके कर्तृतोंसे
अपने आपको बचायेंगे, क्योंकि जो मनुष्य तेरी रक्षामें आगया है उसको
डरानेवाला इस जगत् में कौन हो सकता है ?
" अग्नि" शब्द आगका वाचक है, परन्तु अग्निको भी जिसने बनाया
उसका भी नाम वेदमें "अग्नि" ही होता है।
"न" शब्द निषेध, नकार अर्थमें जाता है, परन्तु वेदमें ।
(समान ) के अर्थ में आता है।
पाठक इस प्रकार मंत्रोंके अर्थ लिखनेका यत्न करें। मंत्रोंको कंठ भी
करते जाय । ऐसा करनेसे उनको बडा लाभ हो सकता है।
!
पाठ ४ - वैदिक स्वर वेदमंत्रोंके अक्षरोंके ऊपर और नीचे जो रेषाएं होती हैं उनको स्वर कहते हैं और उनके भेद उदात्त, अनुदात्त और स्वरित हैं, इस विषयमें इससे पूर्व बताया जा चुका है । इन रेषाओंके अनुसार ऊपर अथवा नीचें आघात करके मंत्राक्षरोंका उच्चारण किया जाता है अथवा वसा करना चाहिये, अन्यथा कभी कभी अर्थमें भी विपरीत परिणाम होता है। .. उदात्त स्वरके लिये कोई चिह्न लिखा नहीं होता है अर्थात् साधारण- तया स्वरचिह्नरहित अक्षर उदात्त समझना योग्य है । अनुदात्त स्वरका चिह्न अक्षरके नीचे रेषा '--' ऐसी दी जाती है और स्वरित चिह्नकी रेषा अक्षरके सिरपर ऊपर खडी'।' ऐसी रहती है। प्रायः प्रत्येक शब्दमें एक स्वरको छोडकर शेष सब स्वर अनुदात्त होते हैं- अनुदात्तं पदमेकवर्जम् ॥ ( अष्टाध्यायी ६१११५८) पदमें एक स्वरको छोडकर शेष स्वर अनुदात्त होते हैं।' उदात्तका उच्च उच्चारण, अनुदात्तका नीच भागमें दबा हुआ उच्चारण और दोनोंका संयुक्त उच्चारण स्वरित स्वरका होता है- उच्चैरुदात्तः । नीचैरनुदात्तः। समाहारः स्वरितः ॥ (अष्टाध्यायी ११५।५९-३५ ) उदात्तका उच्चारण उच्च, अनुदात्तका नीच और स्वरितका उच्चारण मिश्रित होता है। यद्यपि ऐसा कहा है तथापि इससे सब बातोंका स्पष्टीकरण नहीं होता है। इसलिये इसका अधिक सुबोध विवरण करना चाहिये। पाठक स्मरण रखें कि वेदमंत्राका उच्चार करते समय इन स्वरचिह्नोंकी ओर ध्यान देना । .
(१६) Rama - अत्यंत आवश्यक है, अशुद्ध स्वरोच्चारसे मंत्रका भाव बदल जाता है, इस विषयमें व्याकरण शिक्षाका वचन देखनेयोग्य है- मंत्रो हीनः स्वरतो वर्णतो वा मिथ्या प्रयुक्तो न तमर्थमाह । ( शिक्षा ४९) स्वर और वर्णके बुरे उच्चारके कारण मन्त्र अपने योग्य अर्थको प्रकट नहीं कर सकता।' तथा- व्याघ्री यथा हरेत्पुत्रान्दंष्ट्राभ्यां न च पीडयेत् । तद्वद्वर्णाः प्रयोक्तव्याः (शिक्षा) 'शेरनी जैसी अपने बच्चोंको अपने जबडे में पकडकर ले जाती है, परन्तु बच्चोंको दांत नहीं लगाती, उसी प्रकार संभालकर अक्षरोंका उच्चा- रण करना चाहिये।' इत्यादि सब कथन इसलिये कहा गया है कि अक्षरोंका उच्चगण योग्य रीतिसे किया जावे। इसीलिये ऐसा कहा है कि योग्य गुरुके पाससे वेद सीखना चाहिये । स्वरका अशुद्ध उच्चार करनेसे 'इन्द्रशत्रु ' पदका बिल- कुल उलटा अर्थ होता है, यह उदाहरण भी शिशाग्रन्थमें इसीलिये दिया गया है । इत्यादि वर्णनसे पाठक जान गये होंगे कि वैदिक भाषामें स्वरोंका महत्त्व कितना है। उदात्त, अनुदात्त और स्वरित ये स्वर अथवा इनके स्वरचिह्न केवल स्वरोंके साथही संबंध रखते हैं, इनका व्यंजनोंके साथ कोई संबन्ध नहीं यह बात पाठकोंको विदितही है। प्रत्येक शब्दमें एकसे अधिक उदात्त स्वर नहीं होता है, यह सर्वसाधा- रण नियम इससे पूर्व बतायाही है। सामासिक शब्दोंमें कई स्थानोंपर एकसे अधिक उदात्त स्वर रहते हैं। ये सब बातें ध्यानमें लेनेसे शब्दोंके नऊ भेद होते हैं, यह पाठकों के ध्यानमें आ जायगा। ये भेद यहां दिये हैं- (१) अन्तोदात्त- जिसमें अन्तभागमें उदात्त स्वर होता है। जैसा- 'अग्निः' (२) आधुदात्त-जिसमें प्रथम स्वर उदात्त होता है। जैसा-'सोमः , (१७) , , , ३ उदात्त- केवल उदात्त स्वरयुक्त शब्द । जैसा-'प्र' ४ अनुदात्त-अनुदात्त स्वरयुक्त शब्द । जैसा- 'व: ५ नीच स्वरित-निम्न स्वरसे उच्चारा जानेवाला स्वरित स्वरवाला शब्द । जैसा- 'वीर्य ६ मध्योदत्त- मध्य स्वर जिसमें उदात्त होता है । जैसा, 'हुविषा' ७ स्वरित उदात और अनुदात्त इन दोनों स्वरोंके धमौका संयोग जिसमें होता है, ऐसे स्वरयुक्त शब्द । जैसा, 'स्व ८ द्वयुदात्त -- जिसमें दो उदात्त स्वर होते हैं। जैसा, ‘बृहस्पतिः ९ ज्युदात-जिसमें तीन उदात्त स्वर होते हैं । जैसा, 'इन्द्रावृहस्पती' अनुदात्तके नीचे --' ऐसी रेषा होती है, स्वरितके लिरपर ।' ऐसी खडी रेषा होती है और उदात्तके लिये कोई चिह्न नहीं होता है। इनमें स्वरित स्वरके बहुतसे भेद हैं और उनके नाम भी प्रत्येक भेदके लिये अलग अलग हैं । जैसा- एकश्रुति, प्रचय, सन्चत्तर, अनुदात्ततर इत्यादि स्वरित स्वरके अनेक भेद हैं । इन लब स्वरों के विषयमें प्रथमतः सामान्य नियम बताकर पश्चात् विशेष स्पष्टीकरण करेंगे । किस शब्दमें कौनसा स्वर उदात्त, कौनसा अनुदात्त और कौनसा स्वरित हो, इस विषयमें परिपाठीकाही नियम सर्वतोपरि शिरोधार्य होता है, इसमें कोई संदेह नहीं । तथापि वैय्याकरणी लोगोंने इस विषयका सूक्ष्म निरी- क्षण करके कुछ नियम बनाये हैं । इन नियमोंको अपवाद हैं, तथापि कुछ साधारण दृष्टिके लिये ये नियम पर्याप्त है- १ नियम पहिला- शब्दके एक स्वरको छोडकर शेष स्वर अनुदात्त होते हैं। २ नियम दूसरा- शब्दमें यदि एकही स्वर होगा तो वह स्वर उदात्त रहता है। जैसा- “गौः, ग्मा, क्षमा, भूः, जाः, शं, प्सु,धीः, आ, भा, का, यः, मा, तत्, यत्, ये' इत्यादि शब्द एक स्वरवाले हैं, इसलिये इनका स्वर उदात्त है। २ (सं. पा. मा. भा. २०) (१८) " . इस नियमका अपवाद यह है कि अस्मत् और युष्मत् शब्दके जो रूप मा, त्वा, ते, मे, नः, वः” इत्यादि होते है, उनमें एक स्वर होनेपर भी ये अनुदात्त हैं । तथा " चित्, इ, सी, त्व: इत्यादि अव्यय यद्यपि एक स्वरवाले हैं, तथापि ये अनुदात्त हैं । तथा " स्वः” इत्यादि एक स्वरवाले शब्द स्वरित हैं। इन अपवादोंको छोड दिया जाय, तो उक्त नियम बड़े व्यापक समझनेयोग्य हैं। यहांतक हमने एक स्वरवाले शब्दोंका विचार किया, अब दो स्वर अथवा अधिक स्वरवाले शब्दोंका विचार करना है। इस विचारसे पूर्व कुछ वैदिक शब्दसिद्धिके नियम ध्यानमें धरने चाहिये- १. निरुक्तकार तथा कई व्याकरण-शास्त्रज्ञ विद्वान् मानते हैं कि वेदके शब्द यौगिक हैं अर्थात् धातुसे प्रत्यय लगकर बने हैं । " नाम च धातु- जमाह ।” अर्थात् नाम धातुसे बने हैं । जैसा अग्नि शब्द अग धातुसे " नि " प्रत्यय लगकर तथा वह्नि शब्द “ वह " धातुसे " नि " प्रत्यय लगकर बना है । इसी प्रकार अन्य शब्द अन्य धातुओं और अन्य प्रत्ययोंके योगसे बने हैं। इससे अनुमान हो सकता है कि धातु और प्रत्यय इनके स्वरका अनु- स धान करनेसे शब्दका स्वर निश्चित हो सकता | बहुत सत्य है। यद्यपि इस नियमको भी बहुत अपवाद हैं, तथापि यह सर्व- साधारण नियम माना जा सकता है । भगवान् पाणिधि मुनिने धातुपाठमें धातुके स्वर दिये हैं और व्याकरणमें प्रत्ययोंके स्वर भी दिये हैं। यदि धातु और प्रत्ययके स्वर समझ आ गये, तो उनसे बननेवाले पदके स्वर समझमें आ सकेंगे, परंतु इसके लिये भी बड़े अपवादक नियम हैं, उनका विचार आगे करेंगे। है अंशमें यह (१९) पाठ ५ इस पाठमें निम्नलिखित मंत्रोंका अध्ययन कीजिये- (१) विशां कविं विश्पतिं शश्वतीनां नितोशनं वृषभं चषणीनाम् । प्रेतीषणिमिषयन्तं पावकं राजन्तमाग्निं यजतं रयीणाम् ।। (ऋग्वेद ६।१८) पदानि-विशां । कविं । विश्पति । शश्वतीनां । नि-तोशनं । वृषभं । चर्षणीनां । प्रेति-इषणिं । इषयन्तं । पावकं । राजन्तं । अग्निं । यजतं । रयीणाम् ॥ अन्वयः-शश्वतीनां विशां कविं विश्पतिं नितोशनं चर्षणीनां वृषभ प्रेतीषण इषयन्तं पावकं रयीणां यजतं राजन्तं अग्निं (स्तुमः)॥ अर्थ-( शश्वतीनां विशां कविं ) शाश्वत प्रजाओंका कवि अर्थात् वाणीका प्रेरक, (विश्-पात ) प्रजापालक, (निऽतोशनं ) शत्रुनाशक, ( चर्षणीनां वृषभं ) मनुष्योंके बलोंका वर्धक, (प्रेतीपाणि ) प्रेरक, (इषयन्तं) अनादिको सिद्धता करनेवाला, (पावकं) पवित्रता करनेवाला, ( स्यीणां यजतं) धनोंका दाता ( राजन्तं अग्नि) प्रकाशमय तेजके देवकी हम प्रशंसा करते हैं॥ भावार्थ-अग्निको भी उष्णता देनेवाला ईश्वर है, वह सब प्रजाओंको वाक्शक्ति देता है, वही सबका पालनकर्ता है, वही दुष्टोंको दूर करता है, वही मनुष्योंके बलोंकी वृद्धि करता है, सबको उन्नतिके मार्गपर चलाता और सबको अन्न आदि देता है, वही सबकी पवित्रता करता है और सबकी शोभा बढाता है। वहीं एक देव हम सबको नमस्कार करने. योग्य है। (२) नाना ह्यग्नेऽवसे स्पर्धन्ते रायो अर्यः । तूर्वन्तो दस्युमायवो व्रतैः सीक्षन्तो अव्रतम् ॥ (२०६।१४॥३) (२०) पदानि- नाना । हि । अमे। अवसे । स्पर्धन्ते । रायः । अर्यः । पूर्वन्तः। दस्यु । आयवः । व्रतैः । सीक्षन्तः । अव्रतम् ॥ अन्वयः- अग्ने ! अर्यः नाना रायः अवसे स्पर्धन्ते । आयवः दस्यु दूर्वन्तः व्रतैः अत्रतं सीक्षन्तः ॥ अर्थ- हे ( अ ) तेजस्विताके देव ! ( अर्थः) शत्रुझे ( नाना रायः ) नाना प्रकारके धन ( अवले स्पर्धन्ते ) अपनी रक्षाके लिये बडी स्पर्धा कर रहे हैं । ( आयवः ) मनुष्य ( दस्यु ) शत्रको ( तूर्वन्तः ) नष्ट करते हुए अपने (व्रतैः ) व्रताचरणोंसे ( अ-व्रतं ) धर्मनियमोंका पालन न करने- वाले मनुष्यको (सीक्षन्तः ) पराभूत करते हुए आगे बढते हैं। भावार्थ- हे ईश्वर ! शत्रुके नाना प्रकारके धन अपने बचावके लिये प्रयत्न कर रहे हैं, परंतु उनका प्रयत्न अब निष्फल है, क्योंकि हमारे मनुष्य शत्रुझा पराभव करते हुए अपने शुद्ध धर्माचरणोंसे अधार्मिकोंको हटाते हैं अर्थात् हमारे नियम पालन करनेवाले लोगोंके सामने शत्रु ठहर नहीं सकते। हे ईश्वर ! यह तुम्हारी हमपर बडी कृपा है। (३) सुवीरं रयिमा भर जातवेदो विचर्पणे। जहि रक्षांसि सुक्रतो॥ ( ऋग्वेद ६॥ १६॥२९) पदान-सु-वीरं । रायें । आ-भर। जातवेदः। विचर्षणे । जहि । रक्षांसि। सुक्रतो॥ अन्वयः- हे जातवेदः विचर्षणे ! सु-वीरं रयिं आ भर । हे सुक्रतो ! रक्षांसि जहि ॥ अर्थ- हे ( जात-वेदः ) सबके ज्ञाता ! हे (वि. चर्षणे) सर्वसाक्षी ईश्वर ! (सु-वीरं रायें ) उत्तम वीरोंसे युक्त धनको हमें (आ भर) दो और हे (सु-ऋतो) उत्तम कर्म करनेवाले ! (रक्षांसि जहि) दुष्टोंका नाश कर । भावार्थ- हे ज्ञानी सर्वसाक्षी ईश्वर ! हमें ऐसा धन दो कि जिसके ।
(२१) शब्द-प्रयोग रखते हैं। साथ उत्तम वीर रहें । तथा हे उत्तम कर्म करनेवाले ईश्वर ! कर्म करनेवाले दुष्टोंको दूर कर । इस मंत्र में सु-- वीरं रयिं आ भर ' ये महत्व धन ऐसी चाहिये कि जिसके साथ वीरता भी वसती हो। अर्थात् वीरता- के साथ जो धन रहता है वही सुरक्षित रहता है। जिस धनके साथ वीरता नहीं रहती वह सुरक्षित नहीं रहता । यह मंत्र बोध देता है कि अपने धनकी सुरक्षितताके लिये प्रत्येक मनुष्य अपनेमें वीरता बढावे । अशक्त मनुष्योंका धन कोई भी छीन सकता है। (४) इन्द्रः सुत्रामा स्ववाँ अवोभिः सुमृळीको भवतु विश्ववेदाः। बाधतां द्वेषो अभयं कृणोतु सुवीर्यस्य पतयः स्याम ॥ (ऋग्वेद ६१४७/१२) पदानि- इन्द्रः। सु-त्रामा। स्व-वान् । अवःअभिः । सु-मुळीकः भवतु । विश्व-वेदाः । बाधतां । द्वेषः। अभयं । कृणोतु । सु-वीर्यस्य । पतयः । स्यामा इन्द्रः अवोभिः भवतु। .. .. अन्वयः- सुत्रामा स्ववान सुमृळीकः विश्ववेदाः द्वेषः बाधतां । अभयं कृणोतु । सुवीर्यस्य पतयः स्याम ॥ अर्थ-(सु-त्रामा ) उत्तम रक्षक, (स्व-वान् ) आत्मिक शक्तिसे युक्त, (सुमृळीकः ) उत्तम सुख देनेवाला, (विश्व-वेदाः) सर्वज्ञ, ( इन्द्रः) प्रभु अपनी (अवोभिः) संरक्षक शक्तियोंके साथ हमारा सहायक (भवतु ) होवे । वह ( द्वेषः बाधतां) द्वेष करनेवालोंको दूर करे । (अभयं कृणोतु ) हमें निर्भय करे। हम (सुवीर्यस्य पतयः स्याम ) उत्तम शौर्यके स्वामी बनें। भावार्थ-परमेश्वर हमारा उत्तम रक्षण करनेवाला है, उसमें विलक्षण आत्मिक शक्ति है, वही सबको सुख देनेवाला है और सर्वज्ञ भी वही है। वह अपनी रक्षक शक्तियोंसे हमारी रक्षा करे, द्वेषभाव दूर करे, (२२) । हमें निर्भय करे । हम उसकी कृपासे शौर्य-धैर्य-वीर्यादि गुणों के स्वामी बनें। (५) तस्य वयं सुमतौ यशियस्यापि भद्रे सौमनसे स्याम । स सुत्रामा स्ववाँ इन्द्रो असे आराच्चिद् द्वेषः सनुतर्युयोतु ॥ (ऋग्वेद ६।४७।१३) पदानि-तस्य । वयं । सु-मतौ । यज्ञियस्य। अपि । भद्रे । सौमनसे। स्याम । सः । सु-त्रामा । स्व-वान् । इन्द्रः। अस्मे । आराद् । चित् । द्वषः। सनुतः । युयोतु ॥ अन्वयः-तस्य यज्ञियस्य सुमतौ भद्रे सौमनसे च वयं स्याम । सः सुत्रामा स्ववान् इन्द्रः अस्मे आरात् चित् द्वेषः सनुतः युयोतु ॥ अर्थ-(तस्य यज्ञियस्य) उस पूजनीय परमेश्वरकी ( सुमतौ भद्रे सौमनसे च ) सुमति और उत्तम मनके अंदर ( वयं स्याम ) रहेंगे। अर्थात् हम ऐसा आचरण करेंगे कि हमारे विषयमें उसका मन सदा प्रसन्न रहेगा । (सः ) वह ( सु-त्रामा) उत्तम रक्षक और ( स्व-वान् ) आत्म-शक्तिसे युक्त ( इन्द्रः ) प्रभु है, वह (अस्मे आरात् चित् ) हमारे पाससे और दूरसे भी (द्वेषः) द्वेष करनेवाले शत्रुओंको (सनुतः ) अंदरही अंदरसे (युयोतु ) नष्ट करे। भावार्थ-परमेश्वर परम पूज्य है। हम ऐसा आचरण करेंगे कि उसका मन हमारे विषयमें सदा प्रसन्न रहेगा और उसकी दया हमपर बरसती रहेगी। वह प्रभुही हमारा उत्तम रक्षक, अप्रतिम आत्मिक बलसे युक्त मौर सबसे श्रेष्ठ है । इसलिये हम उसकी प्रार्थना करते हैं कि वह हमारे सब शत्रुओंको दूर भगा देवे । सूचना पाठक इस प्रकार पद, अन्वय, पदार्थ और भावार्थ स्वयं करनेका यत्न करें । यदि यत्न करनेपर न बना, तब उतनीही सहायता यहांके पद पदार्थोंसे लें। यदि पाठक इस प्रकार स्वावलंबन करते जायेंगे तो उनकी वेदमन्त्रोंका अर्थ बनानेमें बडी उन्नति होगी।
(२३) पाठ ६ वैदिक स्वर। । भगवान् पाणिनि मुनिने अपने धातुपाठमें कबीर दो हजार धातु दिये हैं और ये धातु दस गणोंमें विभक्त किये हैं। इन धातुओंमें कौनसा धातु उदात्त और कौनसा अनुदात्त है, यह सब उन्होंने दे रखा है। इसी प्रकार शब्दसिद्धिके प्रत्यय भी उदात्त, अनुदात्त या स्वरित, जैसे हैं बैसे बताये हैं। धातु और प्रत्ययसे शब्द बनता है । इसलिये धातुका स्वर और प्रत्यय- का स्वर यदि विदित हुआ तो शब्दका स्वर समझमें मानेमें कोई रुका- वट नहीं हो सकती । बहुतसे स्वर इस रीतिसे स्वयं निश्चित हो जाते हैं देखिये- अग+नि = अग्नि वह्ननि वह्नि ये शब्द सिद्ध हुए। इनमें ' अग् ' और 'वह' ये दोनों धातु उदात्त हैं तथा 'नि' प्रत्यय भी उदात्तही है । अर्थात् यहां धातु और प्रत्यय भी उदात्तही हैं । इसलिये यह शब्द केवल उदात्तही होना चाहिये था, परन्तु यहां और एक नियम ऐसा है कि "प्रातिपदिक-शब्द-का अंत्य स्वर उदात्त रहता है।” इस नियमके अनुसार इन शब्दोंका अंतिम स्वर उदात्त रहा और 'अग्नि' 'वह्नि' ये शब्द स्वरसहित इस प्रकार बन गये। यद्यपि इन शब्दोंके केवल पदस्थितिमें ये ऐसे स्वर होते हैं, तथापि जिस समय इनका प्रयोग मंत्रोंमें होता है उस समय भी आगे पीछेके शब्दोंके संबंधसे इन स्वरोंमें परिवर्तन हुआ करता है । इसी कारण शब्द मंत्रमें रहनेके समय उसका स्वर अन्य होता है और मंत्रके पद लिखनेके समय उसका स्वर अलग होता है। यह सब बात स्पष्ट रीतिसे दर्शानेके लिये एक मंत्र यहां लेते हैं- (२४) अग्निमीळे पुरोहितं यज्ञस्य देवमूत्विजम् । होतारं रत्नधातमम् ॥ ऋग्वेद ११४१) यह ऋग्वेदका मंत्र है। अब इसके पद देखिये- अग्निम् । ईळे । पुरःऽहितम् । यज्ञस्य॑ । देवम् । ऋत्विजम् । होतारम् । रत्नऽधातमम् ॥ पाठक मंत्रके स्वर और पदोंके स्वरों में जो फरक हुआ है, वह यहां देखें । पदपाठके पदोंके स्वर मंत्रमें जानेपर बदलते हैं। इस विषयका विचार यह है- १ 'अग्निं' शब्द पहिला है। उसका अग्' धातु उदात्त है, 'नि' प्रत्यय भी उदात्त है। परंतु उदात्त धातुके परे उदात्त प्रत्यय आनेले शब्द 'अन्त्योदात्त' बन गया। अर्थात् पहिला स्वर अनुदात्त बना और अन्त्य स्वर उदात्त रहा और 'अग्निं' यह रूप बन गया । २ 'ई' क्रियापद है, क्रियापद प्रायः अनुदात्तही होते हैं । इस नियम- को अपवाद भी हैं, उसका विचार पीछेले किया जायगा। ३"पुरः हितम् ' इस पदमें 'पु' अनुदात्त है, '' उदात्त है, हि स्वरित है और ' त' अनुदात्त है । यह अनुदात्त होते हुए भी त अक्षरके नीचे रेषा नहीं है, इसका कारण यह है कि यह त स्वरित स्वरके पश्चात् आगया है आर बीचमें और कुछ भी नहीं है । इसका नियम यह है कि-" स्वरित स्वर के पश्चात् यदि अनुदात्त स्वर आगया, तो वह उदात्ततर किंवा सन्नतर कहलाता है और उसके लिये कोई चिन्ह नहीं होता। इसका नाम एक श्रुति भी होता है। ४ 'यज्ञस्य' इस पदमें 'य' और 'स्य' ये वस्तुतः अनुदात्त हैं, हैं, परंतु अनुदात्तका चिह्न य के नीचे है और स्य के नीचे वैसा चिह्न नहीं है। " (२५) , । "उदात्तके पीछे अनुदात्त आगया, तो वह स्वरित होता है।" इस नियमके अनुसार स्य स्वरित बन गया ५ ' देवम् ' शब्दमें दे अनुदात्त है और उसका चिह्न उसके नीचे है। व उदात्त है, उदात्तके लिये कोई चिह्न नहीं होता, यह पाठक जानते ही हैं। ६ ऋत्विजम् ' इसमें 'यज्ञस्य ' के अनुसारही समझना चाहिये। अर्थात् ऋ अनुदात्त ज भी अनुदात्त है, परंतु वह उदात्त त्वि के पीछे आनेसे स्वरित बन गया है। ७ ' होतारम् ' इस पदमें हो उदात्त है, ता अनुदात्त है, परंतु वह उदात्त के पश्चात् आनेले पूर्ववत् स्वरित बन गया है और उसके पीछेका र अनुदात्त है, परंतु यह अनुदात्तके पीछे आनेसे इसको अनुदात्ततर कहा जाता है। ८ · रत्न-धा--तमम् ' यह शब्द है। इसमें रत्न ये दो अनुदात्त हैं । धा उदात्त है । इस उदात्तेक पश्चात् अनुदात्त त आगया है, इसलिये उदात्त के पीछे आनेवाला अनुदात्त स्वरित होता है, इस नियमके अनुसार वह त स्वरित हुआ है और उसके पश्चात्का म अनुदात्ततर हुआ, वास्तवमें यह अनदात्तही है। यहांतक पदोंके स्वरोंके विषयमें विवरण हुआ । यह विवरण पाठक वारंवार पढें और जबतक ठीक समझमें आ जावे तबतक मननपूर्वक पढते जायें। ऐसा करनेसेही यह विषय ठीक समझमें आ सकता है। अब पुनः दृढीकरणार्थ स्वरोंके नियम यहां देते हैं- १ स्वरोच्चारमें कालमर्यादाके न्यून और अधिक होनेसे स्वरके 'हस्व, दीर्घ, प्लुत' ये तीन भेद होते हैं। २ स्वरके आघातके भेदसे उदात्त, अनुदात्त और स्वरित ये भेद होते हैं। उदात्तका आधात मुखके उच्च भाममें, अनुदात्तका नीचे भागमें और स्वरितका दोनों भागोंमें होता है।
(२६) ३ अनुदात्त स्वरका चिह्न अक्षरके नीचे रेषासे बताया जाता है। उदात्त के लिये कोई चिह्न नहीं है और स्वरितका चिह्न अक्षरके सिरपर खडी रेषांसे बताया जाता है। ४ प्रायः शब्दमें एक स्वरको छोडकर शेष सब स्वर अनुदात्त होते हैं। ५ शब्दमें यदि एकही स्वर रहा तो वह प्रायः उदात्त होता है। - ६ वेदके शब्द यौगिक हैं अर्थात् वे धातु और प्रत्यय लगकर बने हैं। ७ धातुके स्वर धातुपाठमें बताये हैं और प्रत्ययके स्वर व्याकरणमें बताये हैं। दोनोंके मेलसे शब्दका स्वर बहुत करके निश्चित होता है। ८ प्रायः पदका अन्त्य स्वर उदात्त रहता है। ९ साथ साथ दो स्वरित चिह्न (अर्थात् सिरपर खडी रेषाके चिह्न) कभी नहीं आते । अनुदात्तके चिह्न साथ साथ अधिक भी आते हैं। १० उदात्तके परे उदात्त आनेसे अन्त्य उदात्त रहता है और पीछेका अनुदात्त बनता है। ११ सब क्रियापद प्रायः अनुदात्त होते हैं। १२ स्वरितके परे अनुदात्त आगया तो उस अनुदात्तके लिये नीचे स्वर चिह्न नहीं लगाया जाता। १३ उदात्तके पीछे अनुदात्त आगया, तो वह स्वरित बन जाता है। इस समयतक इतने नियम दिये हैं। यह सब नियम विवरण के साथ और उदाहरणके साथ दिये हैं । इसलिये पाठक इनका मननपूर्वक अभ्यास करेंगे, तो यह स्वरकी बात उनके ध्यानमें आ जायगी । आशा है कि पाठक इसका अध्ययन विशेष प्रयत्नके साथ करेंगे।
(२७) पाठ ७ पाठमें निम्नलिखित मंत्रोंका अध्ययन कीजिये- (१) पाहि नो अग्ने रक्षसो अजुष्टात्पाहि धूर्तेरररुषो अघायोः । त्वा युजा पृतनायूँरभि ष्याम् ॥ ( ऋग्वेद. ७।१३१३) पदानि-पाहि । नः । अग्ने। रक्षसः । अ-जुष्टात् । पाहि । धूर्तेः । अररुषः । अघ-आयोः । त्वा । युजा । पृतना-यून् । आभि । स्याम् ॥ अन्वयः-हे अग्ने ! अजुष्टात् रक्षसः नः पाहि । भररुषः धूर्तेः अघायोः नः पाहि । त्वा युजा पृतनायून् अभि ष्याम् ॥ अर्थ-हे (अग्ने ) तेजस्वी ईश्वर ! ( अजुष्टात् ) हीन ( रक्षसः) राक्षसोंसे ( नः पाहि ) हम सबकी रक्षा कर । ( अ-रुषः धूर्तेः ) अनु- दार धूर्त ( अघ-आयोः) पापीसे हमारा (पाहि) बचाव कर । ( त्वा युजा ) तेरे साथ रहते हुए हम (पृतनायून् ) सेना लेकर चढाई करने- वाले शत्रुका ( आभि घ्याम् ) हम पराभव करेंगे। भावार्थ-हे ईश्वर ! दुष्ट, दुर्जन, धूर्त, धोखेबाज, पापी, इस प्रकारके लोगोंसे हमारा बचाव कर । तेरी कृपा हमपर रही तो हम सब प्रकारके शत्रुओंका पराभव कर सकेंगे। यत इन्द्र भयामहे ततो नो अभयं कृधि । मघवञ्छग्धि तव तन्न ऊतिभिर्विद्विषो वि मृधो जहि ॥ (ऋ० ८१६१२१३) पदानि -यतः। इन्द्र । भयामहे । ततः। नः। अभयं । कृधि । मघवन् । शग्धि । तव । तत् । नः । ऊतिभिः । वि। द्विषः। वि। मृधः। जहि ॥ अन्वयः-हे इन्द्र ! यतः भयामहे, ततः नः अभयं कृधि । हे मघवन् ! शग्धि । तव ऊतिभिः नः द्विषः मृधः च वि वि जहि ॥ अर्थ-हे (इन्द्र) प्रभो ! ( यतः भयामहे ) जहांसे हमें भय होता (२८) है ( ततः) वहांसे (नः) हमारे लिये (अभयं कृधि ) अभय कर ! हे (मघवन् ) धनसंपन्न प्रभो ! तू (शन्धि ) शक्तिमान् हो इसलिये ( तव अतिभिः ) तेरी रक्षाकी शक्तियों द्वारा (नः द्विषः) हमारे द्वेषकर्ताओंका तथा हमारे (मृधः) हिंसकका ( वि वि जहि ) विशेष पराभव कर । भावार्थ- हे परमेश्वर ! हमें निर्भय कर, किसी भी दिशासे हमें भय प्राप्त न हो। तू समर्थ है, इसलिये तेरी रक्षाकी शक्तियों द्वारा हम सुरक्षित हो गये तो हमें किसी भी भय नहीं हो सकता । क्योंकि तूही हमारे शत्रुओं, द्वेषकर्ताओं और हिंसकोंका नाश करेगा और तेरी रक्षासे सुरक्षित होकर हम सदा विजयी होते रहेंगे। (३) त्वं नः पश्चाद्धरादुचरात्पुर इन्द्र नि पाहि विश्वतः। आरे अस्मत्कृणुहि दैव्यं भयमारे हेतीरदेवीः ॥ (ऋ० ८।६१६१६) पदान- त्वं । नः । पश्चात् । अधरात् । उत्तरात् । पुरः । इन्द्रः । नि । पाहि । विश्वतः । आरे । अस्मत् । कृणुहि । दैव्यं । भयं । आरे। हेतीः । अदेवीः ॥ अन्वयः-हे इन्द्रः! त्वं पश्चात्, अधरात्, उत्तरात्, पुरः (च) विश्वतः (च)नि पाहि । दैव्यं भयं अस्मत् आरे कृणुहि । अदेवीः हेतीः आरे ॥ अर्थ-- हे ( इन्द्र) प्रभो ! (त्वं ) तू ( पश्चात्, अधरात्, उत्तरात् ) पछिसे, नीचेसे, ऊपरसे ( पुनः विश्वतः च) आगेसे और सब ओरसे हमारी (नि पाहि ) रक्षा कर । तथा ( दैव्यं भयं) दैविक भयको (अस्मत् आरे ) हम सबसे दूर (कृणुहि ) कर, तथा (अदेवीः हेतीः) राक्षसी शस्त्र भी हम सबसे (आरे ) दूर रहें। भावार्थ- हे ईश्वर ! तू हम सबका सब ओरसे रक्षण कर, हमें सब ओरसे निर्भय बना । विद्युत्पात्, अवर्षण भादि दैवी आपत्ति हम सबसे दूर रहे और अन्य विपत्तियां भी हमसे दूर रहें। । ..
(२९) (अथर्व (४) यदिन्द्र ब्रह्मणस्पतेऽपि सृषा चरामलि । प्रचेता न आङ्गिरसो दुरितात्पात्वहसः ॥ ०६१४५३) पदानि- यत् । इन्द्र । अह्मणरूपते । अपि । नृपा। चरामलि । प्रचेताः । नः। आंगिरसः । दुरितात् ! पातु । अंहसः ।। अन्वयः- हे इन्द्र ! ब्रह्मणस्पते ! यत् अपि तृषा चरामसि दुरितात् अंहसः प्रचेताः आंगिरसः नः पातु । अर्थ- हे प्रभो, हे ज्ञानपते ! यदि हमने झूटा व्यवहार किया हो, उस पापले ज्ञानी आंगिरस देव हमारी रक्षा करें तो -- त्वं विश्वस्य मेधिर दिवश्च सश्च राजसि। सयामनि प्रति श्रुधि॥ (ऋग्वेद २२५।२०) पदानि-वं। विश्वस्य ! मेधिर । दिवः । च । गमः । च । राजसि ! सः । यामनि । प्रति । श्रुधि । अन्वयः-हे मेधिर ! त्वं विश्वस्य दिवः ग्मः च राजसि । स त्वं यामनि । प्रति श्रुधि । gho अर्थ-हे (मेधिर ) बुद्धि-प्रदाता ईश्वर ! (त्व) तू (विश्वस्य दिवः रमः च) सब धुलोक और भूमिका (राजसि) राजा है । वह तू हमारी ( यामनि प्रति श्रुधि)प्रार्थना श्रवण कर । भावार्थ-हे बुद्धिप्रदाता ईश्वर : तूही संपूर्ण जगत्का सच्चा एक राजा वह तू हमारी प्रार्थना श्रवण कर । (६) स नो दूराच्चासाच्च नि मादधायोः । पाहि समिद्विश्वायुः। (ऋ० १।२७३) पदानि-सः । नः । दूरात् । च। आसात् । च । नि। मयात् । अघायोः । पाहि । सदं । इत् । विश्व-आयुः॥
(३०)
अन्वयः--हे ईश्वर ! सः त्वं दूरात् च आसात् च अघायोः मात्
विश्वायुः सदं इत् नः नि पाहि ॥
अर्थ-हे ईश्वर ! (सः त्वं ) वह तू (दूरात् च आसात् च ) दूरसे
और पाससे (अघ-आयोः मात् ) पापी मनुष्य से ( विश्व-आयुः सदं
इत् ) सब आयुभरमें सदा सर्वदा (नः) हम सबकी ( नि पाहि ) रक्षा
कर।
)
(७)
त्वं हि नः पिता वसो त्वं माता शतक्रतो बभूविथ ।
अधा ते सुम्नमीमहे ॥
(ऋ० ८१९८५११)
पदानि-त्वं । हि । नः । पिता। वसो। त्वं। माता । शत-क्रतो । बभूविथ ।
अधा । ते । सुम्न । ईमहे ॥
अन्वयः-हे वसो शतक्रतो ! त्वं हि नः पिता च त्वं माता बभूविथ ।
अधा ते सुम्नं ईमहे ॥
अर्थ-हे ( वसो ) सबके निवासक ( शतक्रतो) सैकडों सत्कृत्य करने-
वाले ईश्वर ! ( त्वं हि नः पिता) तूही हमारा पिता और ( त्वं माता बभू.
विथ ) तू माता होता है । (अधा) इसलिये हम सब ( ते सु-म्नं) तेरे
उत्तम विचारको ( ईमहे ) प्राप्त करते हैं।
भावार्थ हे ईश्वर ! तूही हम सबका पिता और माता है, इसलिये
तेरी दयाही हम चाहते हैं।
सूचना
पाठक इस प्रकार मंत्रोंके अर्थ लगानेका यत्न करें । इस ढंगसे प्रयत्न
करनेसे उनकी मंत्रार्थ लगाने में प्रगति शीघ्र हो सकती है। जहांतक
हो सकता है वहांतक यत्न करके पाठक मंत्रोंको कण्ठ करनेका भी यत्न
(३१) पाठ८ वैदिक स्वर पूर्व पाठोंमें बहुतसा वैदिक स्वरोंका विचार हुआ है। प्रत्येक पदके स्वरका भी विचार किया है। अब वेही पद मंत्रमें किस प्रकार आगये और उनके स्वर किस कारण बदले हैं, इसका विचार करना है। देखिये वही मंत्र- अग्रिमीळे पुरोहितं यज्ञस्य॑ देवमुत्विज॑म् । होतारं रत्नधातमम् ॥ ऋ० ११११) १इसमें पहिला 'अ' अनुदात्त है और उसका चिह्न उसके नीचे आया है। २ दूसरा अक्षर 'नि' उदात्त है, इसलिये उसके साथ कोई चिह्न नहीं है। ३ तीसरा अक्षर 'मी' है । यह वास्तवमें अनुदात्त है, परन्तु यह उदात्तके पश्चात् आगया है, इसलिये नियमानुसार स्वरित हुआ । (नियम१३ देखिये) इस नियमके अनुसार स्वरित होनेके कारण इसके सिरपर स्वरितका चिह्न खडी रेषा आगया है। ४ चतुर्थ अक्षर 'ळे' अथवा 'डे' अनुदात्त है, परंतु यह अनुदात्तके पश्चात् आया है, इसलिये इसको अनुदात्ततर कहते हैं । अनुदात्ततर होनेसे इसके लिये कोई चिह्न नहीं है। ५पंचम अक्षर 'पु' अनुदात्त है और उसका चिह्न उसके नीचे है। यह अक्षर भी पूर्व नियमानुसार अनुदात्तके पीछे आनेके कारण अनुदात्ततर होना चाहिये था, परन्तु उसके परे 'रो' उदात्त आनेके कारण 'पु' अक्षर अनु- दात्त ही रहा है। ६ छठां अक्षर 'रो' उदात्त है, इसलिये उसके साथ कोई चिह्न नहीं लगा। ७ सातवां अक्षर 'हि' पूर्ववत् स्वरित हुआ है, जिसका चिह्न उसके सिरपर खडा है।
(३२) ८ आठवां अक्षर 'त' पूर्ववत् अनुदात्ततर है । इसलिये उसके साथ कोई चिह्न नहीं है। ९ नवम अक्षर 'य' अनुदात्त है, जिसका चिह्न उसके नीचे है। १० दशम अक्षर 'ज्ञ' उदात्त है, इसलिये उसका कोई चिह्न नहीं है। ११ ग्यारहवां अक्षर 'स्य' स्वरित है, उसका स्वरित चिह्न उसके सिरपर खडा है। १२ बारहवां अक्षर 'दे' अनुदात्त है। 'स्य' स्वरितके आगे दे अनुदात्त आनेसे वास्तव में वह अनुदात्ततर होना चाहिये था, परंतु उसके आगे उदात्त व आनेके कारण वह अनुदात्तही रहा और उसको अनुदात्तका चिह्न नीचे लगा है। १३ तेहरवां अक्षर 'व' उदात्त है, इसलिये उसके साथ कोई चिह्न १४ चौदहवां अक्षर '' अनुदात्त है; उदात्त 'व' के आगे आने के कारण वह पूर्वोक्त 'स्य' के लमाल स्वरित होना चाहिये था। परंतु आगे उदात्त अक्षर 'वि' आनेके कारण स्वरित नहीं बना और अनुदात्त ही रहा, इसलिये उसके नीचे स्वर आगया है। १५ पंद्रहवां अक्षर 'वि' उदात्त है । इस कारण उसके लिये कोई स्वर- चिह्न उसके लाथ नहीं है। १६ सोलहवां अक्षर 'ज' अनुदात्त है, परंतु वह उदात्तके पीछे आनेसे स्वरित चिह्न उसके सिरपर ला गया है। १७ सतरहवां अक्षर 'हो' है। यह उदात्त है, इसलिये कोई चिह्न उसके साथ नहीं लगा। १८ अठारहवां अक्षर 'ता' अनुदात्त है, परंतु यह उदात्तके पीछे आनेके कारण स्वरित बना है, जिस कारण उसके सिरपर स्वर लगा है।
(३३)
१९ उन्नीसवां अक्षर 'र' अनुदात्त है, परंतु वह पूर्वोक्त प्रकार अनुदात्ततर
हुला है और इस कारण उसको कोई स्वराचिह्न नहीं लगा।
२० वीसवां 'र' भी उसी प्रकार अनुदात्ततर है ।
२१ इक्कीसवां 'ल' अनुदास है, आगे या' उदात्त आनेके कारण इसके
नीचे स्वरचिह्न लगा है।
२२ बाइस अक्षर वा' उदात्त है, इसलिये वह चिरहित है।
२३ तेईसवां अक्षर '' पूर्वोक्त कारणही स्वरित बना और उसका चिह्न
उसके सिरपर खड़ा है।
२४ चौबीलवा अक्षर 'म' पूान्त प्रकारही अनुदात्ततर है, इसलिये उसके
साथ कोई स्वर-चिह्न नहीं लगा।
इस विवरणसे पाठकोंको पता लग जायगा कि स्वरित स्वर कहां बनता
है और अनुदात्ततर कहां होता है।
হলাৰ স্ত্ৰৰ
समासमें स्वरोका कुछ हेरफेर होता है। इस विषयका सामान्य नियम
ऐसा है-
१ पदमें एक स्वरको छोडकर सब अन्य स्वर अनुदात्त होते हैं। इसलिये
समासमें समिलित हुए पदोंके ले भी स्वर हुए तो भी उनका समास
बननेपर उनमेंसे एककाही उदात्त अवशिष्ट रहता है और शेष स्वर अनु.
दात्त होते हैं।
२ समासोंमें सामान्यतः नियम यह है कि अन्य समासोंमें उत्तरपद
अपना स्वर स्थिर रखता है और पिछले पदके स्वर अनुदात्त होते हैं, तथा
बहुव्रीहि समासमें ही पूर्वपद अपना स्वर स्थिर रखता है और पिछले पदोंके
स्वर अनुदात्त बन जाते हैं।
३ तत्पुरुष समालों में भी प्रायः पूर्ववत् होता है।
३ (सं. पा. मा. भा. २०)
(३४) ४ कृदन्त और उत्तरपद समासोंमें भी पूर्वपदका उदास स्वर स्थिर रहता है और उत्तरपदका स्वर बदल जाता है। पूर्वोक्त मंत्रमें 'पुरो-हितं' और ' रत्न-धा-तम' ये पद समास हैं। पूर्वोक्त नियमोंके अनुसार 'पुरः' शब्दका उदात्त बदला नहीं, परंतु हितं' पदही अनुदात्त रहा। वस्तुतः 'पुर:' और 'हितं ' ये दोनों शब्द भन्तोदात्त हैं, तथापि पूर्वोक्त नियमके अनुसार पहिले पदका स्वर स्थिर रहा और दूसरे पदके सब स्वर अनुदात्त बने, परंतु उदात्तके पीछे अनुदात्त भानेसे 'हि' स्वरित चिह्नवाला बन गया। 'रत्न-धा-तमं' शब्दमें तीन भाग हैं। इसमें पहिला 'रत्न शब्द आयुदात्त है, परंतु आगे 'धा' धातु मानेसे और उपपदपूर्व तत्पुरुष समास बननेसे रत्नधा शब्द अन्तोदात्त बन गया और ' तम' प्रत्यय स्वयं अनुदात्त है, इसके त का पूर्व नियमके अनुसार स्वरित बन गया और म अनुदात्ततर हो गया। इसके नियम पहिले बतायेही हैं। अब और नियम देखिये- (१) संबोधनके शब्द तथा क्रियापदके शब्द वाक्योंमें प्रायः अनुदात्त रहते हैं। परंतु यदि ये वाक्यके या मंत्रपादके प्रारंभमें आगये तो उसके स्वर अन्य नियमानुसार हो जाते हैं। २) उदात्त और अनुदात्त स्वरोंके संधि होनेपर उदात्त स्वरकी प्रधान- ता रहती है। जैसा- 'आइहि ' इसका संधि उदात्त स्वरयुक्त' एहि । ऐसा होता है। इस प्रकार सामान्य नियम हैं । पाठक यदि इनका विचार वारंवार मनन करके करेंगे तो उनको स्वरविषयक अत्यावश्यक ज्ञान प्राप्त होगा। यह विषय थोडा कठिन है, तथापि यहां अतिसुगम बनाकर लिख दिया है, वारंवार पढनेले पाठकोंके समझमें आ जायगा। -
(३५)
।
पाठ ९
पाठमें निम्नलिखित मंत्रोंका अभ्यास कीजिये
(१)
नकिरस्य सहन्त्य पर्येता कयस्य चित् ।
वाजो अस्ति श्रवाय्यः । ( ऋग्वेद ११२७१८)
पदानि-नकिः । अस्य । सहन्त्य । पर्येता । कयस्य । चित् । वाजः। अस्ति ।
श्रवाय्यः॥
अन्वयः-हे सहन्त्य ! वाजः श्रवाय्यः अस्ति । अस्य कयस्य चित्
पर्यता नकिः ॥
अर्थ-हे (सहन्त्य ) बलवान् ईश्वर ! तेरा (वाजः) बल (श्रवाय्यः
अस्ति ) प्रशंसनीय है । ( अस्य कयस्य चित् ) इसका (पयेता) उलंघन
करनेवाला (नकिः ) कोई भी नहीं है।
भावार्थ-परमेश्वर सब बलवानोंमें बलवान् है, इसलिये उसकी शक्ति
प्रशंसाके योग्य है। इसको उल्लंघनेवाला अर्थात् इसकी शक्तिको दबानेवाला
कोई नहीं है।
(२)
न यस्य देवा देवता न मर्ता आपश्च न शवसो अन्तमापुः ।
सप्ररिक्वा त्वक्षसा क्ष्मो दिवश्च मरुत्वान्नो भवत्विन्द्र ऊती॥
(ऋग्वेद १।१००। १५)
पदानि-न। यस्य । देवाः। देवताः। न । मर्ताः । आपः । च। न । शवसः।
अन्तं । आपुः । सः । परिक्वा । त्वक्षसा । क्ष्मः । दिवः । च । मरुत्वान् ।
नः। भवतु । इन्द्रः । ऊती ॥
अन्वयः यस्य शवसः अन्तं देवाः देवताः न, मर्ताः न, आपः च न
आमुः, स मरुत्वान् इन्द्रः दिवः क्ष्मः च त्वक्षसा प्ररिक्वा नः ऊती भवतु ॥
.
.
(३६) अर्थ- (यस्य शवसः) जिस ईश्वरके बलका ( अन्त) अन्व देव या देवता (1) नहीं प्राप्त कर सकते, ( मताः न ) मनुष्य भी नहीं प्राप्त कर लकते, तथा (आपः च न आधुः) जल भी नहीं प्राल कर सकते । (सः सरुत्वान् इन्द्रः) वह प्राण-शक्षिसे युक इन्द्र (दिवः क्ष्मः च ) धुलोक और पृथ्वी लोकको ( वक्षसा प्ररिक्वा ) वलले पूरित करनेवाला ईश्वर (नः जती भवतु हस सबका रक्षण करनेवाला हो। भावार्थ-परमेश्वरकी शक्ति इतनी अपराध है कि उस शक्तिका अंत कोई देव, देवता, मनु य श अन्य कोई भी नहीं पा सकता। वह जीवन- शस्किले परिपूर्ण ईश्वर जोकि गुलोश और पृथ्वीलोकको अपनी शक्ति परिपूर्ण कर रहा है, वह हम सबकी उत्तरका करें। (३) प्रतुविधुजस्य स्थशिरस्य वृशेिर ন্যা দূথ্যা: জহৃ অলিনি ब प्रतिष्ठिः पुरुमारस्य सोम (नग्वेद ६॥६॥३२) पदानि-न। युधि--जस्य स्थादिरल्याण्वः । दिकः । ररशे जहिमा। पृथिव्याः । न । अस्य । शत्रुः । न । प्रतिसान । अस्ति । । प्रतिष्ठिः पुरुमायस्य । ल्होः॥ अन्वधः-तुविद्युनत्य स्थाविरस्य वृधः महिमा दिवः पृथिव्याः ररप्शे ! ल अस्य शत्रुः । न प्रतिसानं अस्ति । पुरुमाचस्य लोः प्रतिष्ठि न। अर्थ- (तुषि-द्युम्नस्य ) अत्यंत तेजस्वी (स्थविरस्य ) स्थिर अथवा पुराण पुरुष और (प्वेः ) दुष्टताको पोलनेवाले ईश्वरको (महिमा महिमा (दिवः पृथिव्याः) धुलोक और पृथिवी-लोकके भी (प्रररप्शे) बाइर फैला है। (न अस्य शत्रुः) इसका कोई शत्रु नहीं है, (न अस्य प्रतिमानं ) न इसकी कोई प्रतिमा या उपमा है । इस ( पुरु-मायस्य ..
(३७) । . . अनंत प्रज्ञावाले और (सह्योः) शक्तिवाले ईश्वर के लिये भी कोई दूसरा (प्रतिष्ठिः न) आधार नहीं है अर्थात् यही लबका आधार है আগ্রহ জন্মক বলল, হ্রস্বাক্ষর নাই লাভা উৎ बडा पुराण पुरुष है। उस महिला सब जगदले ली है। इसका कोई शत्रु नहीं और नाही इलकी कोई उपना है। इस अलंत शनिवाले ईश्वरको छोडकर और कोई दूला आधार किलीको नहीं है। (४) साना पितेव सूलचेऽग्ने सूपायो यक! सबस्कान स्वस्तये।। (ऋग्वेद ५१११९) पदालि-लः नः । पिता ! छ । सूनवे ! अग्ने । सु-उपायनः ! भर । सचस्व नः । स्वस्तये॥ अन्दाय:-हे अग्ने ! लः त्वं सूनवे पिता इव नः रूपायानः सव । दः स्वस्तये लचस्व ॥ अर्थ-हे (अग्ने ) प्रकाश देनेवाले प्रभो ! (सः त्वं, यह (सूनवे पिता इब) पुत्र लिये पिताले लमान (नः) हम सजके लिये (सु-उपा- यना ) उत्तम प्रास होनेवाला (भव ) हो। (नः) हम सबकी (स्वस्तये) कल्याणके लिये ( सचस्व ) हमारे साथ रह । भावार्थ-हे प्रकाश देनेवाले प्रभो ! जैसा पिता पुत्रका लहायक होता है वैसा तू हम सबका सहायक हो और हमारा कल्याण करनेके लिये हमें सहायक हो। आहि प्मा सूनवे पितापिर्यजत्यापये। सखा सख्ये वरेण्यः॥ (ऋग्वेद ११२६॥३) पदानि-आ । हि । स्म । सूनवे । पिता । आपिः। यजति । भापये । सखा। सख्ये। वरेण्यः । अन्वय और अर्थ-जिस प्रकार ( पिता । सूनवे ) पिता पुत्र के लिये,। मापिः आपये) बंधु बंधुके लिये तथा ( वरेण्यः सखा सख्ये) श्रेष्ट । । (३८) मित्र मित्रके लिये (आ यजति स्म) सहायता करता है, उस प्रकार हे ईश्वर ! तू हमारी सहायता कर ।। भावार्थ-जैसा पिता पुत्रकी, भाई भाईकी और मित्र मित्रकी सहायता करता है, उस प्रकार ईश्वर हमारी सहायता करे । त्वमग्ने प्रमतिस्त्वं पिताऽसि नस्त्वं वयस्कृत्तव जामयो वयम् । सं त्वा रायः शतिनः सं सहस्रिणः सुवीरं यन्ति व्रतपामदाभ्य॥ ( ऋग्वेद १।३।१०) पदानि-वं । अग्ने ।प्रमतिः । त्वं । पिता । असि । नः। त्वं । वयस्कृत् । तव । जामयः । वयम् । सं। त्वा । रायः । शतिनः । सहस्त्रिणः । सुवीरं । यन्ति । व्रतपां। अदाभ्य । अन्वयः-हे अग्ने ! त्वं प्रमतिः, त्वं नः पिता नसि । त्वं वयस्कृत् । वयं तव जामयः । हे अदाभ्य ! सुवीरं व्रतपां त्वा शतिनः सहस्त्रिणः रायः सं यन्ति । अर्थ- हे (अग्ने) प्रकाश देनेवाले ईश्वर ! तू (प्रमतिः)विशेष बुद्धि- मान् हो, तू हम सबका पिता है । तूहि ( वयः कृत् ) जीवन देनेवाला है । (वयं) हम सब ( तव ) तेरे (जामयः) बंधु हैं । हे (अदाभ्य ) न दबनेवाले ईश्वर ! (सुवीरं व्रतपां) उत्तम वीरोंसे युक्त नियमोंके पालक तुझ ईश्वरके प्रति सौ और सहस्रों (रायः) धन (सं यन्ति ) इकटे होते हैं भावार्थ-हे ईश्वर ! तूही सबमें अत्यंत बुद्धिमान् हो, तूही हम सबका पिता हो और तूही सबको जीवन देनेवाला हो । तेरेही हम सब भाई हैं। हे न दब जानेवाले ईश्वर ! तू अनेक वीरताके गुणोंसे युक्त तथा उत्तम नियमोंके चलानेवाले हो, इसलिये सैकडों धन तेरे पास इकट्ठे होते हैं । अर्थात् जो इस प्रकार उत्तम नियमोंका पालनकर्ता और वीरताके गुणों से युक्त होगा, वह भी अनेक धनोंको अपने पास धारण कर सकेगा और धनी बन जायगा। पाठक इस प्रकार मंत्रोंका अध्ययन करें। । .
(३९)
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पाठ १०
(१)
वयं शूरेभिरस्तृभिरिन्द्र त्वया युजा वयम्।
सासह्याम पृतन्यतः॥
(ऋग्वेद ११८॥४)
अन्वयः वयं त्वया युजा अस्तृभिः शूरेभिः (च सह) वयं पृतन्यतः
सासह्याम॥
अर्थ- हम सब तेरे (युजा) साथ और (भस्तृभिः) भत्रोंका प्रयोग
करनेवाले (शूरेभिः) शूर वीरोंके साथ हम (पृतन्यतः) सेनासे हमला
करनेवाले
शत्रुका ( सासह्याम )पराभव करेंगे।
भावार्थ- हे ईश्वर ! तेरी सहायता लेकर तथा शूर वीरोंकी सहायता
लेकर हम शत्रुका पराजय करेंगे।
(२)
वयं जयेम त्वया युजा वृतमस्माकमंशमुदवा भरेभरे।
अस्मभ्यमिन्द्र वरिवः सुगं कृधि प्र शत्रूणां मघवन्वृष्ण्या रुज ॥
( ऋग्वेद १२१०२।४)
अन्वय और अर्थ-हे(मघवन् ) धनैश्वर्यसंपन्न प्रभो ! (स्वया युजा)
तेरे साथ युक्त होकर ( वयं वृतं जयेम ) हम सब घेरनेवाले शत्रुका पराभव
करेंगे। (भरे भरे) हरएक प्रकारके युद्ध में ( अस्माकं अशं) हमारे भागका
( उदव ) उत्तम रक्षण कर। हे ( इन्द्र) प्रभो! ( अस्मभ्यं ) हम सबके
लिये ( वरिवः सुगं कृधि ) धन सुखसे प्राप्त होनेयोग्य कर । ( शत्रूणां
वृष्ण्या) शत्रुओंके बल ( प्र रुज ) नष्टभ्रष्ट कर ।
भावार्थ- हे प्रभो ! तेरी कृपा प्राप्त करके हम सब प्रकारके शत्रुओंपर
विजय प्राप्त करेंगे । हे ईश्वर ! हरएक प्रकारके युद्ध में हमारा कर्तव्यका भाग
हमसे ठीक प्रकार हो जावे, ऐसी उन्नति हमारी हो जावे । हे देव! हमें
सब प्रकारके धन सुगमतासे प्राप्त हों और तेरी प्रेरणासे हमारे शत्रुओंके
बल पूर्णतासे नष्टभ्रष्ट कर मौर सदा हमारा विजय हो।
(४०) . त्वे इन्द्रायभूम विप्रा धियं वनेम ऋतथा सपन्तः। अवस्थ्यो धीमहि प्रशस्ति व्यस्ते रायो दायने स्थान (ऋग्वेद २१११११२) अन्वय और अर्थ-हे (इन्द्र ) प्रभो ! हम लब (विप्राः ) ज्ञानी लोग (टे अभूम) तेरे अंदर अर्थात् तेरे होकर रहेंगे । ( ऋतया समन्तः) सोधे भागले व्यवहार करते हुए ( धियं बटेर बुद्धि और कसकी सिद्धि प्राप्त करेंगे । हम सब ( अवस्यवः) अपनी रक्षा करनेका यत्न करनेवाले लोग ( प्रशस्ति धीमहि ) तेरे गुगोंको मन धारण करेंगे। ( सद्यः) तत्काल ही ( वे सत्रः ) तेरे धनके ( वाकले दाबके लिये हम योग्य (स्वाल) होंगे। भावार्थ-हे ईश्वर ! हम लोरे दनकर रहें और सीधे लागले चलकर कर्मी लिद्धि प्राश करेंगे। हम सब अपनी रक्षा करनेका पुरुषार्थ करेंगे और सदा तेरे शुभ गुणों का ध्यान करेंगे। ऐसा करनेले हल सब तेरे धन दान भाग बन जायेंगे। (४) यो जात एक प्रथयो मनस्वान् देवो देवान्ऋतुना पर्यभूषत् । यस्य शुष्माद्रोदसी अभ्यलेतां नृस्णस्य महा ल जनास इन्द्रः॥ (ऋग्वेद २।१२।१ ) अन्वय तथा अर्थ-(यः प्रथमः देवः ) जो आदि देव ( जातः एव) प्रकट होतेही (मनस्वान् ) मनन-शक्तिसे श्रेष्ठ होकर अपने (क्रतुना ) कर्मसे ( देवान् पर्यभूषत् ) देवोंको शोभायुक्त करता रहा । ( यस्य शुष्मात् ) जिसके बलसे ( रोदसी ) द्युलोक और पृथ्वी-लोक (अभ्यसेतां ) कांपती हैं (सः ) वही देव है, (जनासः ) लोगो! वही ( नृम्णस्य मह्ना) मानसिक शक्तिके महत्त्वसे युक्त ( इन्द्रः ) प्रभु है ।
भावार्थ-आदिदेव परमेश्वर पहलेलेही महती मानल-मालिसे युक्त है और अपने प्रशंसनोर कर्मसे संपूर्ण देवताओंचे सुशोभित करता है । इसका कल इतना है कि उनके भन्यले धानापथि मी कांपते हैं । हे लोगोयही सब जगत्मा एक प्र है । और वही सबले अधिक समर्थ हैं। यस्ला करते विजयन्ते जालो यं सुखलाना अरले हवन्ते । यो विश्वस्य प्रतिसानं बभूध यो अच्युतच्छुत्व जबान इन्द्रः ।। ऋ० २६१२९ अजय और अर्थ-हे ( जनालः) लोगो ! ( यजात् ऋते ) जिल बिना ( जनासः न विजयन्ते ) लोग विजय प्राप्त नहीं कर सकले, (सुद्धय सानाः) लडते हुए ( अवस्ले ) रक्षाके लिये ( यं हवन्ते) जिसकी प्रार्थना करते हैं और (य:) जो ( विश्वस्य प्रतिमानं वळूद ) विवज्ञ बखूना है तथा जो (अ-च्युत-च्युट ) न हिलनेवालोंको भी हिला देनेकी शक्ति रखता है, वही इन्द्र है। भावार्थ-परमेश्वरकी कृपा न हुई तो लोगोंका कभी विजय नहीं हो सकता, इसलिये युद्धके समय सब लोग उसी की प्रार्थना मनोभावनासे करते हैं । जो प्रभु जगत् बननेके लिये आदर्शरूप हुआ, वह इतना समर्थ है कि वह वडे प्रभावशालियों को भी हिला देता है, परंतु उसको हिला ने- वाला कोई नहीं है। . अस्माकमग्ने मघवत्सु धारयानामि क्षत्रमजरं सुवीर्यम् । वयं जयेम शतिनं सहस्रिणं वैश्वानर वाजमन्ने तवोतिभिः ।। (२०६८६) अन्वय और अर्थ- हे (वैश्वानर अग्ने) विश्वके संचालक प्रकाश देनेवाले देव ! ( अस्माकं मघवत्सु ) हमारे धनिकोंमें (सु-वीर्य) उत्तम वीरतासे युक्त ( अ-नामि ) कभी नम्न न होनेवाला (अ-जरं क्षत्रं ) (४२) कभी क्षीण न होनेवाला क्षात्रतेज (धारय) धारण कर । (तव ऊतिभिः तेरी रक्षा-शक्कियोंसे (वा) बल प्राप्त करके ( वयं) हम सब (शातनं सहनिणं) सौ और हजारों सैनिकोंके साथ हमला करनेवाले शत्रुको (जयेम) पराजित करेंगे भावार्थ-हे जगत्के संचालक प्रभु! हमारेमें जो धनी हैं, उनमें उत्तम शौर्य, वीर्य, धैर्य, स्थापन कर अर्थात् धनी लोग शूर हों और डरपोक न हों, कभी किसीसे वे न डरें और अपनी रक्षा करनेमें समर्थ हों। तेरी रक्षाओंसे सुरक्षित होकरही हम बडे बलवान् बनेंगे और सैन्यके साथ हमपर हमला करनेवाले शत्रुओंको भी परास्त करेंगे। (७) सख्ये त इन्द्र वाजिनो मा भम शवसस्पते। त्वामाभ प्र णोनुमो जेतारमपराजितम् ॥ (ऋग्वेद ११११११२) अर्थ-हे (शवसः पते इन्द्र) बलके स्वामी प्रभो ! (ते सख्ये ) तेरी मित्रतामें हम ( वाजिनः) बलवान् होनेके कारण (मा भैम)किसीसे भी नहीं डरते । तू ( जेतारं ) विजयी और ( अ-पराजितं ) कभी पराजित न होनेवाला है, इसलिये (त्वां अभि प्र णोनुमः ) तुझेही नमन करते हैं। भावार्थ-हे सर्व-समर्थ प्रमो ! तेरी मित्रतासे हम बलशाली होनेके कारण हम किसीसे नहीं डरेंगे। क्योंकि तू सदा विजयी हो और तुम्हारा पराजय कभी नहीं होता। इसलिये हम तेरी ही शरणमें आते हैं, तेरीही भक्ति करते हैं और तुझे छोडकर किसी अन्यकी उपासना नहीं करते। सूचना। पाठक इस प्रकार मंत्रोंका अर्थ करें, हरएक मंत्र कण्ठ करें और उसके पद, पदार्थ, अन्वय और भावार्थ स्वयं करनेका यत्न करें। जहां समझमें न आवे वहाँ ऊपर दिये अर्थकी सहायता लें । इस प्रकार करनेसे उनकी प्रगति वेदविद्यामें शीघ्र होगी ।
(४३)
पाठ ११
(म० भा. द्रोणपर्व अ० ३६)
सञ्जय उवाच।
॥२॥
सौभद्रस्तद्वचः श्रुत्वा धर्मराजस्य धीमतः।
अचोदयत यन्तारंद्रोणानीकाय भारत ॥१॥
तेन संचोद्यमानस्तु याहि याहीति सारथिः।
प्रत्युवाच ततो राजन्नभिमन्युमिदं वचः
अतिभारोऽयमायुष्मन्नाहितस्त्वयि पाण्डवैः ।
सम्प्रधार्य क्षणं बुद्धया ततस्त्वं योद्धुमर्हसि ॥३॥
आचार्यो हि कृती द्रोणः परमास्त्रे कृतश्रमः ।
अत्यन्तसुखसंवृद्धस्त्वं चायुद्धविशारदः
ततोऽभिमन्युः प्रहसन्सारार्थ वाक्यमब्रवीत् ।
सारथे को न्वयं द्रोणः समनं क्षत्रमेव वा
एरावतगतं शक्र सहामरगणैरहम्
॥६॥
सञ्जय उवाच- हे भारत ! धीमतो बुद्धिमतो धर्मराजस्य तद्वचः तद्व-
चनं श्रुत्वा सौभद्रः सुभद्रापुत्रः यंतारं सारथिनं द्रोणानीकाय द्रोणस्य
सैन्याय अचोदयत प्रेरितवान् ॥ १॥ तेन द्रौपदीपुत्रेण अभिमन्युना
" याहि याहि ' गच्छ गच्छ इति सन्चोद्यमानः संप्रेर्यमाणः सारथिस्तु, हे
राजन् ! ततः तदनंतरं इदं वचः इदं वचनं अभिमन्युं प्रत्युवाच ॥ २ ॥
हे आयुष्मन् अभिमन्यो ! पाण्डवैस्त्वयि अयं अतिभारः आहितः स्थापितः।
बुद्धया क्षणं संप्रधार्य विचार्य ततः तदनंतरं त्वं योद्धु अर्हसि ॥ ३॥ हि
आचार्य द्रोणः कृती कृतकार्यः परमास्त्रे च कृतश्रमः ! त्वं च अयुद्धविशारदः
न युद्धविशारदः अत्यंतसुखसंवृद्धः च ॥ ४ ॥ ततोऽभिमन्युः प्रहसन् सारथि
इदं वाक्यं अब्रवीत् । हे सारथे ! को नु अयं द्रोण ? समग्रं संपूर्ण क्षात्रं
क्षत्रियबलं वा ॥ ५॥ ऐरावतगतं अमरगणैः सह शक्रं इन्द्रं वा ॥ ६॥
(४४) अथवा रुद्रमीशानं सर्वभूतगणार्चितम् । याधयेयं रणमुखे न मे क्षऽध विस्मयः न मत द्विपत्सैन् कलामहति पोडशीम् ॥८॥ জব বিলিন স্ট্রি বালুত সত্য স্কুল। पितरं चाजुलं युद्धे न भानुपयास्यति अभिमन्युश्च तां वाचं कद कृत्य लारथः । याहीत्ववानदीदेनं द्रोणानीकाया साचिरम् ॥१०॥ ततः संनोदयामास हयाना निहायलान् । नातिनाः सूतो हेसलाण्डपरिच्छदाम् ॥ १२ ॥ प्रताः सुमित्रेण द्रोणानकाय वाजिनः । দুংলু হতে অস্থায়ী মহাবতা: ২ ৫ तनुश्य तथावात सर्व द्रोणपुरोगमा: অঞ্চত : তুতায় সুস্থ ২৪। ते विसतिपदे यत्ताः हारं प्रचकिरे। জালে দুম্বা নুরুষজাতি অন্য নাকি অনুভুত্তি কাল ই বা হল योध्ययन् ! अच्य भन्ने मे विस्मयो न ॥ ७॥ एतत् द्विजन्तव्यं शत्रुसैन्यं मम षोडशी कलां न अर्हति ॥ ८॥ हे सूतज! साहुलं विश्वजित बिष्णुं प्राप्य अपि पिलरं अर्जुनं चापि प्राय मां भीः न उपथास्यति ॥९॥ अभिमन्युः च तां सारथेः वाचं कद कृत्य द्रोणानोकाय चाहि, मा चिरं' इत्येव एवं अब्रवीत् ॥१०॥ ततः अतिहृष्टमना सूतो हेलभाण्डपरिच्छदान् सुवर्णालंकारयुतान् निहाय- नान् त्रिवर्षीयान् हयान् अश्वान् आशु संनोदयामास्त ॥१२॥ सुमित्रेण सारथिना द्रोणानीकाय प्रेषितास्ते वाजिनः अश्वाः हे राजन् ! महावेगा महाबलाः द्रोणं अभ्यद्रवन् ॥१३॥ तथायान्तं तं अभिमन्यु उदीक्ष्य दृष्ट्वा, सर्दै द्रोणपुरोगमाः तं अभ्यवर्तन्त, पाण्डवाश्च तं अन्वयुः॥१४॥ ते विंशतिपदे यत्ताः संयत्ता: संप्रहारं प्रचक्रिरे । उदधौ समुद्रे गांगः आवर्त इव मुहूर्त आसीत् ॥१६॥ "
•
!! ২
(৭)
হলা জ্বললাল লিনমনন।
হলুস্থ ভ্রমৰ গুহ
সরল লেজ নলবাঃ।
মুণ্ডা মেনে চলা অভি।
ল এক ভিন্ন হই।
অহং, আঃ কাই
লালাখানিই ভিকজন।
কা: বছর বয় হিষ্টৰ বিল
সত্তা অনুষ্টি অসুবি।
অংশজলা: ৪ গুস্তম্ভ
ছি:
ছিন: লালজি।
সুজ্জাহা মালিন
নম্বৰৱৰা শ্রঃ ত্বশী মা।
মন্স অর্থমন্ত্রী হলঃ
ব লালন লাই: হা হা।
আলঃ হা হা হু দ্বাৰা
शूराणां युद्धयमानाना इतरेतरं गिद्धत, हे राजन् ! सुदारणः जुजुलः संधामः
পাবন ?? ও নিলু ভাবিসহ রে মাল মুহিত : হেন
সুস্থ জানি লাল ইভেম্বন্দ্ব, অনু মানুষ। এ
ছা ভূলই মা জালু শিলিল ওখঃ শুভাস্তু হু
খাদ্ধ: এবি বহিঃ =: ২৩লালংকাহিঙ্গনিঃমল: ভিকহ
কাজিৰঃ : কাঃ লিনাই ৫ লিঃ কিছু ” ভূরি লি:: ॥২॥
স্ত্রীঃ হুন্ডাহা “ নয় :. নি, মা ঘুপ্তি, অলি ! জী এই ” হুনি
ভঃ সুম্ভ: বাংলা মইল:২২ বুনি: মিলন: ছা: ভলানবি
वसुधा संनादयन्तः आर्जुनि अभिनयुः ॥२३। इसीप्रयोधी महावलो बीरः
সাঃ চালিমাই জেললঙ্কঃ বিঃ লাল লাল
ঙিৰীঃ আঃ জানা না নীলু। ২৪ লালাভনী: মি: মই: বিয়া
हन्यमान्दास्ते वीराः पावकं शलमा इव सुबहुशः आभपेतुः ॥२५॥
(४६) पाठ १२ चाणक्य-सूत्राणि। १धर्मेण धार्यते लोकः-धर्मसे सब लोकोंका धारण होता है। २ प्रेतमपि धर्माधर्मावनुगच्छतः-मरनेपर भी धर्म और अधर्म मनुष्यके पीछे जाते हैं। ३ दया धमस्य जन्मभूमिः-दया धर्मकी जन्मभूमी है। दयाले धर्म- की उत्पत्ति होती है। ४धर्ममूले सत्यदाने-सत्य और दान धर्मसे उत्पन्न होते हैं । ५ धर्मेण जयति लोकान्-धर्मसे सब लोकोंको जीत सकते हैं। ६ मृत्युरापि धर्मिष्ठं रक्षति-मृत्यु भी धार्मिक मानवकी सुरक्षा करता ७ धर्माद्विपरीतं पापं यत्रयत्र प्रसज्यते, तत्र धर्मावमतिमहती प्रसज्यते-धर्मके विरुद्ध पाप जहां जहां फैलता है, वहां धर्मके विषय- में निरादर भी फैलता है। ८ उपस्थितविनाशानां प्रकृतिकारेण लक्ष्यते-जिनका नाश समीप भाया है उसका बोध उनकी प्रकृतिसे ही विदित हो जाता है । उनके आचार व्यवहारसे विदित होता है कि इनका नाश शीघ्र होने- वाला है।) ९ आत्मनाशं सूचयति अधर्मबुद्धिः-अधर्म की बुद्धि अपना नाश समीप आया है इसकी सूचना देती। १० पिशुनवादिनोऽरहस्यम्-चुगली करनेवालेके पास कुछ भी बात गुह्य नहीं रह सकती। ११ पररहस्यं नैव श्रोतव्यम्---दूसरेकी गुप्त बात कभी सुननी नहीं चाहिये। १२ वल्लभस्य कारकत्वं अधर्मयुक्तम्--खजाके प्रेममें रहनेवालों
(४७)
की प्रेरणा अधर्मयुक्त होती है।
१३ स्वजनेषु अतिक्रमो नैव कर्तव्यः--स्वजनोंका अपमान कदापि
करना नहीं चाहिये।
१४ माताऽपि दुष्टा त्याज्या-माता दुष्ट हुई तो उसका त्याग करना
योग्य है।
१५ स्वहस्तोऽपि विषदिग्धश्छेद्यः-अपना हाथ भी विषबाधा होनेपर
काटने योग्य होता है।
१६ परोऽपि च हिता बन्धुः-- परकीय मनुष्य हितकारी होनेपर
भाई मानने योग्य है।
१७ कक्षादप्यौषधं गृह्यते--घाससे भी औषधि ली जाती है ।
१८ नास्ति चोरेषु विश्वासः-चोरोंपर विश्वास रखना नहीं चाहिये ।
१९ अप्रतिकारेष्वनादरो न कर्तव्यः-- जो प्रतिकार नहीं करते
उनका निरादर करना योग्य नहीं है
२० व्यसनं मनागपि बाधते--व्यसन अल्प होनेपर भी बाधा
करते है
२१ अमरवद्
अर्थजातं अर्जयत्-अमर
-अमर हूँ ऐसा मानकर ऐश्वर्य
प्राप्त करते रहना चाहिये।
२२ अर्थवान् सर्वलोकस्य बहुमतः-ऐश्वर्यवान् को सब मान देते
हैं
२३ महेन्द्रमाप अर्थहीनं न बहुमन्यते लोकः--इन्द्र भी यहीं
ऐश्वर्यहीन हो जाय, तो उसका कोई मान नहीं करता।
२४ दारियं खलु पुरुषस्य जीवितं मरणम्-दारिद्य मनुष्यके लिये
जीवितदशामें मरण के समान है।
२५ विरूपोडअर्थवान् सुरूपः- ऐश्वर्यवाला पुरुष कुरूप होनेपर
सुरूप माना जाता है।
(४८)
२६ अदातारमपि अर्थवन्तं अर्थिनो न त्यजन्ति-धनवान्
पुरुष कंजूस होनेपर भी उसका त्याग याचक नहीं करते ।
२७ अकुलीनोऽपि कुलीनाद्विशिष्टः--ऐश्वर्यवान् मनुष्य कुलहीन
होनेपर भी कुलीलले भी श्रेड साना जाता है।
२८ नात्ति अमानमयं अनार्यस्य-अनायको अपमानका भय नहीं होता
२९ न चेतनवतां वृत्तिभयन्-जो चैतन्य ( ज्ञान ) युक्त होते हैं
उनको आजीविका सय नहीं होता।
जितन्द्रयाज शिषय अक्षम्य मनुष्योंको विषयोंका
सय नहीं होता।
३१ असायीन मारणभवा--जोता हुआ उनको घरमा भय
नहीं होता।
३२ करा चिदर्थ स्थानिक स्यने साधु:-किसी की मल्याण
तो वह अपना ही कल्याण है ऐला साधु मालते है।
३३ पविभवेषु आदरोमदतव्यः--दूसरेके बनपर कभी इच्छा
नहीं रखनी चाहिये।
#ঃ ৰিমত্ত আট জাহই ভাল ছাঃ হল বহু
नाश का कारण हैं।
३५ पलालमपि परब्यं न हर्तव्य-बासका तिनका भी दूलरेका
नहीं हरण करना चाहिये।
३६ परद्रव्यापहरणमात्मद्रव्यनाराहेतुः-- परद्रव्यका अपहार
करना अपने द्रव्य नाश होनेका कारण होता
३७न चौर्यात्परं मृत्युपाशा-चोरीले भिन्न दूसरा मृत्युपाश नहीं है।
३८ यवागूरापि प्राणधारणं करोति काले-अनका पानी भी समय
पर प्राणधारण करता है।
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श्रीमद्भगवद्वीता संपादक- पं० श्रीपाद दामोदर सातवळेकर इस — पुरुषार्थवोधिनी' भाषाटीकामें यह बात दर्शायी गयी है कि वेद, उपनिषद आदि प्राचीन ग्रंथोंही सिद्वान्त गीतामें नये ढंगसे किस प्रकार कहे हैं । अतः इस प्राचीन परंपराको बताना इस 'पुरुषार्थबोधिनी' टीकाका मुख्य उद्देश्य है, अथवा यही इसकी विशेषता है। गीता-क १८ अध्याय ३ भागों में विभाजित किये हैं और एकही जिल्द से बांधे हैं । इसका मू. १०) रु. और डाकव्यय ॥) रु. है। लेकिन मनीआर्डरसे ११) रु. भेजनेवालोंको हमारे अपने व्ययसे भेज देंगे ! प्रत्येक अध्यायका मू और डा० व्यय ...) है। श्रीमद्भगवदीता-समन्वय । वैदिक धर्म' के आकारके १३६ पृष्ठ, चिकना कागज, सजिल्दका मू० २ ) रु०, डा० व्य०) डा. व्यय सहित मूल्य भेज दीजिये। भगवद्गीता-श्लोकार्धसूची। इसमें श्रीगीताके श्लोकार्बोकी अकारादिक्रमले आद्याक्षरसूची है और उसी क्रमसे अन्त्याक्षरसूची भी है । मूल्य केवल .in.) डा. व्य० । ) भगवद्गीता--लेखमाला। an 'गीता' मासिकके प्रकाशित गीताविषयक लेखोंका यह संग्रह है। इसके १,२,६,७भाग तैयार हैं, जिनका मू०५) रु० और डा० व्यय १॥) है। १ मंत्री-स्वाध्याय-मण्डल, पारडी (जि० सूरत )
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