Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai

Arogyadarpana Khand-i

Sharma,.jaganath · 2012/08

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भारोग्य दर्पण। प्रस्तावना॥ सुशन पालन धादि कर्ता ईश्वर ने इस स्थूल सूक्ष्म कारण एवं पञ्च तत्यमय इन्द्रियादि सहित इस मनुष्य शरीर को उत्पन्ना, किया और इसमें इस शरीर द्वारा उपयुक्त यहां तक शक्ति दे दी है कि यही मनुष्य इह लौकिक धर्म अर्थ, काम और पार लौकिक गोक्ष को भी मिटु फर सत्ता है परन्तु इन सबों का मुख्य कारण आरोग्यता है। जिस गरीर में आरों- ग्यता नहीं होती यह समस्त भूगगठल का राजा होने पर और घौगठ फला विद्या निधान रहने पर भी उपरोक्त चारो पदार्थों से यञ्चित रहता है। हाय यह भारोग्यता जैसी फि अघ चाहिये कहीं नहीं दिसलाई देती। पुरा फाल में इसी भूमण्डल के मध्य में भारोग्य प्रभाय से कमे २ पीर पुरुप और वेदोपवेद के माद्योपान्त बेत्ता अनेक महर्षि हुये हैं कि जिन- फी विख्यात अय तफ सय मनुष्यों के हृदयस्य हो रहा है। थोड़ेही रोज हुये फि इसी मध्य प्रदेश में आएहा ऊदल दयाराम आदिक अति यलयान और श्रीधर आदिक कैसे विद्वान हुये हैं कि जिनका शतांश भी आज फल के मनुष्यों में होना दुष्कर है, वर्तमान में ही देखिये हम लोगों की अपेक्षा इस समय इङ्गलेण्ड के लोग इसी दिन चर्या गलि पर्या के उत्तम साधरण से कैसे २ फाम कर रहे हैं फि जिनके केवल यंत्र विद्याओं को देख फर एक दूसरे ब्रह्मा का अवतार मानना पड़ता है। इस से सब से प्रथमः सः नारोग्यता पर सय को ध्यान देना आवश्य घाहिये । यद्यपि लोग रिष्ट पुष्ट और अपने काम काज में लिपटे हुये. दिखाई देते हैं/ले फिन प्रायः देखने में यही आता है कि लोग मिथ्याहार विहारादि द्वारा रोगाफुल हो हजार में चाहे दो चार पूर्ण आयु को प्राप्त होते हो, बाकी सम काल ही में मृत्यु को प्राप्त होते हैं। वेद में भी प्रमाण है ईि. शत जीपी है परंच विकर्म के प्रभाय ( सांसारिक बुरे आचरण) से पानी काल यम होते हैं। यह वेद का कथन प्रत्यक्ष देखने में आता है लिता . गगुप्य पारीग्य दर्पण आज फल मनुप्प तुच्छ २ रोगों से अकस्मात् शीघ्र मर जाते हैं । तयां तीस ३० चालीस ४ वर्ष भर में ही युद्ध हो जाते हैं । कहां तक फहैं कि दशै वर्ष की अवस्था से याल.पकना शुरू हो जाता है। यहां तब देखने में आता है कि पांच सात वर्ष के बालक मूत्र कृच्छादिक रोगों से पीड़ित हैं । इसफो मुख्य कारण यह है कि आगे के लोगों को खाना पीना च- लना फिरना स्त्री प्रसङ्गादिक जितने कर्म हैं सब ठीक तौर परथे माज कल | पयों नहीं हैं वैद्यक शास्त्र के न जानने से ! वैद्यक विद्या केवले वैद्यों ही के लिये नहीं हैं बल्कि सर्व साधारण के स्मरण रखने के योग्य है। । सर्व साधारण में यह विद्या प्रायः लुप्त क्यों हो गई है कारण यह है कि जब से यह देश - अत्यापारी ययनों के हाथ में जाकर उत्पीडित होने लगा और समस्त बेद वेदाग यायत् हिन्दू शास्त्र थे वे सब भरमी भूत हो कर प्रदेश मान में संक्षे विद्या फैल गई और मजा. गान को असहन कष्ट प्राप्त होने लग गया तभी से यहां के लोगों का शारीरिक और मानसिक पल कम से घटते घटते जो कुछ रहा सहा यह गी जङ्ग- रेजी राज्य के गुणानुसार खाना पीना रीति नीति प्रथर्तित होने से मनुष्य मरुति में बहुत कुछ हेर फेर हो इस महोपकारी विद्या का लोपही हो गया जातीय आक्षेप का विषय इस पर है कि अय तमाम भारत घर्ष - स्वास्थ्य कर क्यों हो गया है और इसका प्रतीकार भी किसी प्रकार हो सता है इस बात की कोई खोज खबर नहीं लेता ले करेन, यह सबों , दृढ़ निश्चय हो गया है फि आय तय इस वैद्य विद्या में रामा ध्यान नहीं देगा उन्नति होना असंभव है। पर हम यही कह सक्ते हैं कि इस विद्या का जीर्णोद्वार चाहै.जय हो समाज ही करेगी। इस लिये विशेष फर पहिले, हम जायुर्वेदीय चिकित्सक जन समाज से ही समिनय प्रार्थना करते हैं कि आप लोग क्यों घोर निद्रा में से रहे हैं या आप लोगों के कर्ण में रोगाकान्त दुःसियों पारोग्य दपंगा। देश वाले आज तक नहीं कर सकतं । हाय, यह यही आयुर्वेद है कि जो इस समय प्रायः लुप्त दशा पर भी इस देश के अनेक चिकित्सक पिता कादेही क्षार मूत्र प्रलेप पट्टी अथया पिचकारी किम्या अन्य कोई औपध गर फर भगायाम घाय अच्छा कर देते हैं । ऐसे बहुत प्रण देसे गये कि जिन्हें डाक्तर लोग पुलटिस देकर नहीं पका सके देशो वैद्यों ने एकही प्र लेप के द्वारा उसे गला दिया है । शरीर में ऐसे यहुतसे स्थान हैं कि जहां शस्त्र प्रयोग अत्यन्त कठिन और दुखदाई है हातर लोग सेवाय शस्त्र प्र. योग के पीव और रक्त कदापि नहीं गिरा सक्ते परन्तु एतद्देशीय उत्तम चिकित्सक गण औषध के द्वारा ऐसी युक्ति करते हैं फि चमड़ा फट फर आपसे आप पीय और रक्त निकल आता है। ऐसे भी बहुत व्रज तपा शोष देखे गये हैं कि डाक्तरों ने बहुत दिनों तक अनेक चेष्ठा की पर धे नहीं बैठे और आयुर्वेदोक्त प्रलेप द्वारा ट पट बैठ गये हैं। व्रण शोधन और रोपण के लिये सापुः शील गुणोंपेत परिडत गण ऐसे २ तेल और घृत निकाल गये हैं कि जिनके द्वारा भगन्दर नाही प्रणा और दुष्ट व्रण अच्छा हो जाता है । अपची गगडमाला मादि रोगों के अच्छा करने में आज तक भायुर्वेदोक्त चिकित्सकों की बरायरी कोई नहीं कर सका। धात रोग, कुष्ट रोग, जीर्णज्वर प्रभृति रोगों पर जायुर्वेदोक्त फेपल तैल जैमा उत्कृष्ट है वैसी उपम औषध दूसरे किसी चिकित्सक के गत में नहीं पाया जाता रक्तातिसार आदि रोगों में हमारे देश की औपधियां बेल मुगन्ध याला फुरैया नागरमोथा आदि जैसी गुण कारिणी हैं विदेशी दयाइयों में ऐसी कोई नहीं है यह बात बहुत ठीक और मेटेरियामेडिका एयं फारमा फोपिया भादि किताबों से स्पष्ट है कि इस देश में आय कर डातर लोग भी एतद्देशीय औषधियों का अनुकरण पूर्यफ फोम में लाने लगे तथापि हमारे शास्त्रोक्त कुटजायलेह, कुटज पुटपाफ की चमत्कारी को नहीं पाते । ग्रहणी उदर भादिक रोगों में प्रत्यक्ष देखा जाता है कि देशी वैद्य लोग परपटी दुग्ध यटी,मानमंड प्रभृतिके द्वारा जितने रोगी भारोग्य कर सक्ते हैं. उतना हाक्तरों से हेमा असम्भय है ॥ HTM भारोग्य दर्पण। इसपत्रका मुख्यप्रयोजन क्याहै ।। व्याध्युपसृष्टानां व्याधिपरिमोक्षः खस्थ्यस्य रक्षणञ्च ॥ माध्यालिक ( ज्वरादि रोगों से कश ) माधि भौतिक (सोदि दुष्ट 'जन्तुओं मे होश ) आधि दैयिक ( मन इन्द्रियादिकों से क्लेश ) रोग युक्त पुरुषों को रोग से परिमोक्ष करना तथा आरोग्य जन की रक्षा । इस धास्ते हम गय मनुष्यों के उपकार के लिये लघु एहत्सिद्धान्त ग्रन्थों की मम्पति से एवं श्रेष्ट प्राचीन वैद्यों के निश्चित किये हुये अभिप्रायों से, अनुमान से, प्रत्यक्ष रो, वर्तमान पृथ्यो जल चायु के गुणानुसार देह पालन, आयुस्संरक्षण धात्री शिक्षा, बाल रक्षा, स्त्री पुरुप पयहार, साद्याउखाद्य माधार यय- हागदि अनेक शरीरोप योगी पदाथों का वर्णन आरोग्य दर्पण पत्र द्वारा प्रकाश करना आरंभ किया है माशा है, कि इस पत्र के अनुसार घलने से जैसे की जागे के लोग पुरुषार्थी पराक्रमी और विद्वान होते थे भय भी होने ठौं । भाज हम यहे आगन्द के साथ मनुष्यों के उग महल कारी का या को प्रकाश करते हैं जो कि मध से प्रथम मनुष्यों के फर्तव्य हैं । शौच ॥ से दो प्रकार है एफ याय दुसरा माभ्यन्तर मृतिका भौर जलमे हस्त पादादि धोना याद्यशीच है और काम क्रोध लोम मेहादिक से रहित होना माझ्यन्तर शौचहै । अतएव मनुष्यको शरीर रक्षार्थ यह दोनों गोध पारगा जयश्य है। सपको उचित है कि मूर्योदय के पूर्व ही उठ ईश्वर की मामा कर अपने पतंभफार्म को पिधार कर तय गौघ भात् दिशा को शाचे पाच त्याने उठ तमी यह नहीं किन्तु दश मिंट टहर के तम जाय गिसमें दल तुपामा माये । दस लाने के लिये किमी प्रकार की शादत न परोिग्य दा। डालनी चाहिये जैसा कि लोग दस्त शाफे पहिले तमाकू खाई या पीते हैं या दस्तावरपीश खा लेते हैं इन सयों में अभ्यास से स्वयं गलप्रया की जो मक्ति है यह जाती रहती है । यह भी याद रखने के योग्य है फि दस्त जाने के लिये दिशा फिरतेसमय यहुत ताकत न दे क्योंकि धातु गर्म निर्वट हो उसी वक्त पेशाब के रास्ते से ढरफ भाता है। इस्मे दस्त में और भी काय जियत आ जाती है । फारण यह है कि , जितना ही धातु शीश होगी उतना ही पनि मन्द और दस्त में फयर्जियत आवेगी । जय देसे फी पेट बहुत भारी है और कई रोग से दस्त सुलाया नहीं हुये तब सेते समय कोई ऐमा मुलायम रेचन द्रव्य सा ले कि जिस्से सबेरे खुलासा दस्त मा जाप एमी हेतु बहुत से लोग मेोते समय दूध पीते हैं लेकिन न घाहिये । क्योंकि जितनी धातूत्पादक द्रव्यादिक हैं उनको सा पीये न साना घा- हिये, हेतु यह है फि पचता नहीं; जप न पचा तो मल साधिक या पतना अवश्य ही होगा, इस्ने अग्न्यादि आशप तथा वीर्य नियत हो जाता है। मुलायम रेचन यह है, उष्ण प्ररुत याले सो जमे फि शरयत इमिली गुल. फंद गुलाय गुलकंद सेघती गुलकंद अगिताय मुग्धा हष्ट अमृत हरीतकी इत्यादि । शीत प्ररुत याले को जैसे कि लपण पंगफ यवक्षारादि चूर्ण पं. घसकार चूर्ण कोष्ठबद्धारि चूणादि जिनका नुसखा आगे लिखा है, इन द- याइयों को सोते समय खा लेने से सवेरे सुखासा दस्त भा जाता है। प्रायः हिन्दुस्तानी लेग जो दिशा जाने के समय शिर में अंगोछा बांध लेते हैं और दिशा के समय बोलते नहीं ये दोनों फर्म उत्तग हैं । इनको अवश्य करना चाहिये क्योंकि शिर बांधने से मलाशय में गर्मी पच फर दस्त माफ आता है और मूक रहिने के समय से मल अपान वायु प्रेरित निराश्रय त्रिपाली मार्ग हे निकलता है त्रियली मल मार्ग के फाहते हैं जिसमें शंख की तरह तीन बल है तीनों का नाम यह है। प्रशाहिगी मर्जनी ग्राहिका इन तीनों शिरा की प्रकृत.और गुण भागे काँगे यही सीनों में से एक ऐसी, नाही है कि जिसमें युद्धि स्थान ने संबंध है जब तक जल और मृतिका से सफाई न कर ले तय तक वा पजल रहती है ले. किन पानी के तरायट से स्थिर हो जाती है इसने अप तफ हाथ पैर मुंह मारोग्य दर्पगा। ६ न धो डाले तय तक न तो शिर का कपडा खोले और न बोले इस फा और २ अभिमाय येगिशास्त्र से मालूम हो सक्ता है वह भी आगे फहँगे। यदि यह कोई शंका फरै फि और देश याले क्यों नहीं शिरमें कपड़ा यांधते और मूक रहिते यया उनके यह स्नाक नहीं है, परंच यायत् कर्म मनुष्यों के शरीर रक्षक हैं वे सब देश प्रभाष से हैं जैसे कि लण्डयाले 'प्रायः दिशा फिर के आयदस्त नहीं लेते कागद से गुदा पोंछ घालते हैं इसका मुख्य कारण हिम प्रधान देश है। क्योंकि अति जाहा के कारण पानी छुआही नहीं जाता। दंत धावन.॥ शोधानन्तर दन्त शुद्ध हेतु १२ अंगुल की लम्बी और फनिष्ठिका प्रमाण मोटी जिसके बोध में गांठ न हो ऐसी दातून को फरै परंघ जहां तक हो सके खैर महुआ करंज नीम प्रबूल गौर मौसली इन्हों की दतून हा यदि शेठ पीपर मिर्ष सेंधा निमक इन सबों के पूर्ण में शहत्त या तेल मिला दातों में मल फर बाद दांतून फरे तो दांतो के बीच में जो मांस पढ़ आता है मुंह की दुर्गन्धि दांतों से सून फा आ जाना और यादी पन यह कभी न हो, दांत बिमल और मन में रुघि हमेशा बनी रहे । अगर किसी समय दातून न मिले तो काट फोयला और सेंधा निमक | यूफ कर दांत मल हाल और जीभ छालने के यास्ते सेोमा या चांदी गादि धातु की सुन्दर मुलायम चिफनी धन्याफार दश अंगुल की रानी है। इसके अभाव में दातून फाई कर जीभ छील ले यदि उपरोक्त रीति दन्तधायन जिहा सद्ध फर कभी २ या जम आवश्यक समझे एक उँटाफ काली तिल के तेल से फुली कर हाला करें तो मुख फा फीकापन दुगंध मसफुर फामूजना गोर दांत का हिलना बन्द हो और दांत को जह सूब मजबूत हो परन्तु ये लेोग जिनका गला तालु, मोष्ठ और जिहा का रोग हो एवं मुस मड़ा । तपा सांसी श्वास हिचकी हो या जी म. चलाता हो ज्यादा नसा साये हो शिर और फर्ण में दर्द हो, तो जय तक ए येमारियां न माराग हो जांप तय तफ दातूग न करे पाद दन्तः आरोग्य दर्पण। -- धायन के शीतल जल से.सूब नेत्र मुख को धो डाले । दन्त घायन के अलावा यदि मनुष्य दिन में तीन चार मरतये हमेशा ठंढे अप्ठ से नेत्र मुरा धाया करे तो उसको नेत्र और शिर को यीमारी कभी न हे! ॥ 'दन्तमञ्जन ॥ सही सुपारीका कोइला छैटाक भूजाआ तूतिया ६ मासा दोनोंको बूककर दांत मांजने से दांत सूब साफ होजाता है.तथा दांतों से रक्त का आना वन्द हो जाता है । प्रतिसारण॥ फूट, दारुहल्दी, धवफे फूल, पाढ़ी, कुटकी, हल्दी, तेजयल, माथा, लोध इन सयों को परायर भाग ले चूर्ण फर जीम और दांत के जाल में वारंवार मल फर वार गिराने से दन्त पीडा रक्त माना गमूढा मूगन और जलन जल्द जाता रहता है । . 'प्रातःकालंकीहवाखाना ॥ दन्तधायन के बाद मनुष्य अच्छा कपडा पहिन पैर में जूता हाथ छड़ी ले सूर्योदय के पूर्व ही, फिसी अध्छे मगीचे या स्वच्छ मैदानमें कि,जहां मउ मूत्र आदि युरे पदाथा फी दुर्गन्धि न हो । यायु सेवनार्थ यहां जाय न महुत जल्दी चले.न यहुत शाहिस्ते समगति से वहां दहिले । परञ्च बहुत तेज हया पणता हो या, भान्धी गरदा हो तो न जाये। क्योंकि तेश हवा अर्थात् आन्धी गुवाड़े में रहिने से गरीर रुक्ष तथा चेहरे की रंगत बदल जाती है और बाप्त श्लेष्म पाले के सन्धियों में दर्द होने लगता है मनुष्य को यहां तक चलना फिरना उचित है कि जब तफ पैर न, पके क्यों कि बहुत ज्यादा चलने से शरीर में हरारत और कमर में कमजोरी माती है एवं योप्यं भी कुछ निर्वल हो जाता है । जोलोग न घूमते हैं न फिसी प्रकार का परिश्रम करते हैं उनका शरीरं फफ मेद के बढ़ जाने से मोटा और शिथिल हो जाता है । जैसे की महन्त और प्रायः तीथी के पंडे " प्रारोग्य दर्पग "सुखमातंप्रसेवेत ग्रीटमेशरदिमानयः"ग्रीम भरत अर्थात् बैशाख ज्येष्ठ फा- तिक और अगहन इन महीनो में सुखार्थी लोग अवश्य मायु का सेवन . जूतापहिरनेकागुण ॥ मनुष्य को ऐसा जूता पहिरना चाहिये फि जिसकी एडी कुछ ऊंची हो न बहुत ढीला हो न स हो । जूते के भीतर किसी तरह का ऐसा रुलायम चमड़ा लगा हो कि जिससे तलुवे के सून में उष्णता न पहुचै । जूता पहिरने से पैर में ताकत रहती है, जादमी सुख समेत चल सत्ता है, पैर का घमष्ठा मुलायम रहिता है यिवाई जादि किसी तरहकी श्रीमारी नही होती न काटा और बिच्छू आदि जीवो से भय रहिता है इसलिये जूता चारो आश्रमियो को पहिरना चाहिये और जो माय. ब्र. ह्मचारी आदि जूता न पहिर कर खडाऊं पर चढ़ दिन रात चला करते है उनका मस्तिष्क रुक्ष होजाता है और बुद्धि विक्षिप्तो के साथ गिल जाती है । ना पैर चलने से नेत्र और शिर में गर्मी पहुच कर शिरोग्रह आदि अनेक बीमारी होती है । छड़ीलेनेका गुण ॥ मनुष्य को यह भी उचित है कि बिगैर छड़ी लिये हुये कभी याहर न निकले क्योकि हाथ में छही रहिने से दातसे काटने वाले कुत्ता धादि और सीग से मारनेयाले गाय भैंस आदि इसी तरह और र घातफ जीवो) से बचने का सम्भय रहिता है । बडी हाथ में लेने से कमर और हाथको फलाई में ताफत रहिती है पर जमीन पर ठीक तौर से पड़ता है और छही हाथ में रहिने से एतना साहस रहिता है कि मानों कोई रक्षक अपने साथ है। तेललगाना॥ गनुष्य को आधघण्टा या एक घण्ठा हया सागा बहुत है बाद एक १२ भारोग्य दर्पण। खाने के सूर्योदय से लेकर सात गाठ बजे भर में तेल लगाना अति गुणा कर होता है। शिर में तेल.लगाना। शिरमें तेल लगाने से शिरं सम्बन्धी यावत् रोग हैं सय नष्ट हो जा. ते हैं। बाल काले और चिकने रहिते हैं । आंख फान नाफ और मुस इनमें किसी तरह की बीमारियां नहीं होती याउ फम पंफता है और शिर ठंढा रहिता है। जो लोग नित्य शिर में तेल लगा शिर से स्नान फरते हैं उन फी बुद्धि तीव्र होती है और निद्रा सुख पूर्यफ आजाया क- रती है । इस हेतु शिर में तेल रोज लगाना चाहिये ॥, सव प्ररुसियालों के लिये काली तिल का तेल अति उत्तम है। शिर में गरी फा तेल भी फ़ायदा करता है । लेकिन कितने लोग यह जानते हैं कि शिर में गरी का तेल लगाने से नुक्शान होता है से यह भूल है। हां घमेली हिना आदिक तेलों के लगाने से बेसक वाल जल्द पक जाते है। कारण यह है कि यह तेल सफ़ेद तिल के साथ बनता है और स- फेद तिल याल को जल्द पकाता और नजला पैदा करता है। एक फा- रण गरी के तेषान लगाने का और भी है फि गरी के तेल से शिर ग. धाने लगता है । यदि गरी फा तेल इस रीति से बना फर शिर में 8. गा तो शिर कभी न गन्यावे॥ गरी का तेल सेर भर बालछड़, सुगन्धवाला, कपूर फघरी, छरीला, नागरमोथा, सुगन्धनन्तरी, सुगन्धकाफिला, पांडरी, महाभारी, चम्पायती, सफेदचन्दन, डोटीलाइची, एनय एक २ तोला तेजबल, छा घेर, तालीम, कपूर, लोग बड़ीलायची, ए सय चार चार मासा ले सय को अधकचरा कर एक बड़े बोतल में तेल और सय दया डाल फाग से मुख घन्द कर दश रोज तफ दिन को घाम में और रात को जोस में रस दिया फरे । बाद दश रोज़ के यह तेल विलायटिङ्ग पेपर या गूप नशीन फपड़े से छान दूसरे बोतल में रख दे और रोज़ शिर में लगाया करै ॥ S भारोग्य दर्पगा। "अमलंक्यादि तैल । . - कच्चे आयले का रस दो सेर, सेंधा निमक ३ छंटाफ गुलेटी पाय भर मुलेठी को अधकचरा कर सेर भर पानी में एक रात दिन भिगोय रखे दूमरे रोज गल कर पानी छान ले । बाद सेर भर फाले तिल का तेल किमी फलई दार घरतन में डाल चूल्हे पर चढ़ा उसी में आपले का रस सेंधा निमक और मुलेठी का पानी भी छोड़ मंदाग्नि मे पचा ले जब दे. खे को पानी यिएकुल जल गया तय तेल उतार ले परंच एतना ध्यान अवश्य रक्खे कि तेल न जलने पावै इस तेल को छान फर रोज शिर में लगाया करै तो उसको शिर सम्बन्धी विकारात्पन्न कभी न हो शिर ठंढा बाल काले और चिकना हमेशा यमा रहे इसी तेल को अथया फाले तिल के तेल को यदि बाल्यावस्था से दिन प्रतिदिन शिर में लगाना प्रा. रंभ फर तो जन्म भर सक उमफा पाल कदापि न पकै । जो हम लोगों को अपेक्षा बंगालियों का या अति काल में पकता है सो केयल तेलही का गुण है । यद्यपि और २ फारणों से भी अकाल पलित (नधीन अघ. स्था में बाल फा स्वेत होना) होजाता है, यथा- क्रोधशोकाश्रमकृतः शरीरामाशिरीगतः । पितंचकेशान पचितं पलितंवेन जायते ॥ सुश्रुत ॥ (क्रोध) धातु की क्षीणतासे उण प्रकृत हो हर समय अन्तम में गुस्सा फा रहिना (शोक) धन पुत्र फलनादिकों के नष्ट से अथवा किसी के यिरह की चिन्ता में डूया रहिना (श्रम) क्षुधा पिपासा लगी है पैट गर्म और चित्त घेवड़ा रहा है परन्तु फाम से छुट्टी नहीं मिलती, · इत्यादि कारणों से तमाम शरीर की गर्मी पेट में पित्त द्वारा तण माफ होम- स्तिष्क जिसको अंगरेजी में (ब्रेन ) कहते हैं उसमें जाके लगने से बाल भी पकता है तथा वही जल नीचे गिरने से नेत्र, कर्ण दन्त और ना. शिफा में घिकार पहुंचता है, इसी के हिमते याले निजला कहते हैं - .

पारोग्य दर्पण। १४ . . तथापि शिर की रुक्षता से बाल शीघ्र पकने फा सम्भव रहता है परन्तु नपरोक्त तेग या और बहुत से तैष्ठ हैं कि जिनके शिरोवस्ति से अकाल पलित और नजला नहीं होता। गनुष्य को तैल आदि द्वारा शिर की रक्षा करना अवश्य फतथ्य है क्योंकि समग्र शरीर का मूल मस्तिष्क मी शिर में है, जिसकी ताकत ने मनुष्य के बल बुद्धि, विद्या, पराक्रम पुरुपार्थ और मायुः फी रद्धि होती है, इमी की ताकत से स्वामी दयानन्दसरस्वती और केशवसेन आदिको ने बड़ी २ वक्तृता दे हर एफं देशों में अपनी २ सभाएं जमा गये । इसी मस्तिष्क की पुष्टता से इस समय कारनल अलफट हजारों, मस्तिष्क के निर्मल भकुआ हिन्दुओं को चेला मूह रहा है । इस्से इस लेख पर ध्यान दे अवश्य शिर को रक्षा करनी चाहिये । कान में तैल छोड़ना। मनुष्य को दूसरे तीसरे दिन कानमें भी तेल जरूर डालना चाहिये पपोंकि "हनुमन्याशिरः कर्णशूलमनग् कर्णपूरणम्" मुश्रुत । फर्ण पूरण अ- र्थात् कान में तैलादिफ के डालने से कान का परदा तर रहता है जिससे टोही मयूरगलसन्निभ गले के पीछे की शिरा शिर और कान इनमें दर्द 'कभी नहीं होता। . - शरीर में तेल लगाना। इमके घराघर शरीर में ताफत लाने वाला दूसरा उपाय नहीं है। "जलसिक्तस्यपटुंन्ते यथा, मूलेङ्कास्तरो तथाधातुविष्टुहिस्नेह सिक्तस्य जायते"। जैसे वृक्ष के बाद में जल सींचने से वृक्ष का अंकुर बढ़ता है. धैसाही शरीर में तेल के लगाने से धातुः यढ़ता है । यही कारण है फि. जो भायुर्वेद घेत्ता वैद्यगण, वात रोग कुष्ठरोग, जीर्णज्वर प्रभुत रोगों पर विशेष कर तेलही का अधिक गुण दिखलाया है यह, बात, तो प्रसिद्ध है कि मर्दन करने से तैल,सम रोम कूपों के राह से शरीर में घुसकर एक चारोग्य दर्पगा हो समय सम नसों में तथा रक्तादि में कार्य करता है। इसलिये तैल मर्दन करना अत्यायश्य है। शरीर में सेल लगाने से स्नायु शिरा धमनी और त्वया कोमल रहिती है खाज दाद में हुआ घोड़ा फुन्सी आदि त्वचा की बीमारियां स्वप्न में भी नहीं होती हैं शरीर खूबसूरत बली और फुर्तीला बना रहता है । चन्दानांदितैल। मफेद चन्दन, मेघा, खम, सुगन्धवाला, मुलेठी, कमलगट्टा की गरी, छोटीलायची, नागकेशर, मजीठ, हरदी, दारुहरंदी, शिलाजीत, जटामा- मी, सेजपात, फकोल, सरियन, कुटकी, अगर, लौंग, फेशर, दालचिनी, ए सब औषध दो दो तोला ले फूट कर ४ सेर पानी में एक रात्रि दिन भिगाय रपये दूसरे रोज उन्हीं सघ औपधियों को शिल पर पीस उसी पानी में छान ले तत्पश्चात् डेढ़ सेर काले तिल का तेल किसी कलईदार बरतन में हाल चूल्हे पर चढ़ाय मन्दामि से उक्त जल और पांधसेर दही का ताई पधा ले । जय देखे की सब पानी जल गया तब उतार ठंढा कर छान बोतल में भर कर रख दे। इस तेल को शरीर में मर्दन करने से जीर्णज्वर, उन्माद गर्मी पित्तविकार, मुख तथा शरीर का पीलापन, बातों का भूल जाना, धातु की क्षीणता और सुस्ती ए सब नष्ट हो जाते हैं । यदि पांच चार महीना परायर इस तेल को लगाये तो बदन ऐसा सुख और सूयमूरत हो जाता है कि जिसका कुछ बयान नहीं। यह तेल सब कोई नहीं बना सकते इसलिये काले तिल का तेल सर्व साधारण को लगाना उत्तम है । निपेध.. तरुणवयंजीणीच नाभ्यताव्योकथंचन । तथाविरक्तोवां- तथनिरूढ़ोययमानवः ॥ -- .

प्रारोग्य दर्पगा। . नपाज्यर, अजीर्ण, अतीसार और यगन बाला, तथा गुदा मार्ग फी पिधकारी ले चुका हो एतने मनुष्य तैउ न लगावै ॥ स्नान करना। हर एक चिकित्सा ग्रन्यों के देखने से ज्ञात होता है कि जैमा इस आर्यावर्त में स्नान करने का प्रचार है वैसा अन्य दीपों में नहीं। इस का मुख्य कारण यही है कि एक तो और २ द्वीपों की अपेक्षा यह द्वीप सदा ही गर्म है दूसरे ग्रीष्म ऋतु में अत्यन्त उप्त हो जाता है। तीमरे इस देश में एक २ नदी ऐसी हैं, कि जिन में स्नान या उन के केवल जल पीनेसेही कुछतक आराम हो जाताहै। चौधे हमारे भूतपूर्व भारतवर्षीय अधिकांश आप्तगण योगाभ्यासी होते.थे इस लिये, उन फो बास फर्म (शौचक्रिया) अधिक फरना पड़ता था। स्नान करने से न तो वैकुण्ठ मिलता है और न मुक्ति होती है पर, घाह. स्वास्थ्य का एक अङ्ग है "अद्विर्गाहाणि शुध्यन्ति" मनु० इत्यादि बहुतसे बंधन हैं कि जलसे फेवल १२ प्रकार के मठ दूर होते हैं। जैसे कि- वसाशुक्रमसृमज्जा मूत्रबिट्माणकर्णविट । श्लेष्माथुदूषि- काखेदो द्वादशैतेनृणामलाः ॥ मनु. यसा, बीर्य रक्त मज्जा मूत्र नाफ फान इन सबों, का मैल और कफ मांशू कीपर पसीना यही १२ मल मनुष्यों के मात्र में होते हैं वेही साफ फरने के लिये स्नान है । आज फल हमारे भ्रात गणों के हृदय से उक्त भाशप तो जाता रहा । गङ्गाजी मुक्ति के देने वाली हैं यही निश्चय फर जूग फजून नहाय रोग ग्रसित हो फितने झट पद शरीरही से मुक्ति हे। जाते हैं। स्नान का गुण.1 तन्द्रापपोपशमनं तुष्टिदंपुंस्त्ववईनम् । रक्तप्रसादनंचामि स्नानमग्नेश्वदीपनम् । सुथुत चिकित्सा स्थान अ० २४ भारोग्य दर्पण। गुण। स्नान करने से हर समयका भोघाना और पापोपशमन अर्थात् मन की ग्लानि जाती रहती है चित्त की प्रसन्नता और पुंस्त्व की दृद्धि हो- ती है अग्नि दीपन एवं रक्त का सञ्चालन ठीक रहता है । जब यह सब बातें स्नान करने से प्राप्त होती हैं तो जात्मा भी सय व्याधियों से शांत हो सकता है.इसी लिये आचार्यों ने कहीं यदि प्रसंग बस मुक्ति प्राप्ति भी कह दिया हो तो कोई असंगत नहीं है ॥ तेल लगा के स्नान करने का शिरामुखैरोमकूपैर्धमनी भिश्चतर्पयन । शरीरबलमाधत्ते युक्तस्नेहो ऽवगाहनें ॥ सुश्रुत चिकित्सा स्थान अ० २४ तेल लगा के मान करने से शिरा मुग (मोठी नसों का मुए) रोम कूप (रोमों के गहढे) धमनी (सबसे बड़ी नसे) वे सम पुष्ट होते हैं और शरीर में ताकत आती है । सब मनुष्यों को उचित है कि गर्म ऋतु में अधिक गर्म जल से और जाड़े में अधिक ठंढे जलसे कदापि स्मान न फरै "अतिशीताम्युशीतेच श्लेममारुतफेोपनम् । अत्युप्ण मुणकालेच पित्तशो. णितवर्द्धनम" सुश्रुत चिकित्सा अ० २४ । शीत काल में अति शीताम्यु (बासी पानी) में स्नान करने से कफ बायु फा कोप होता है इसी प्रकार उपण काल में अत्युण जल (आग से या घाम से गर्म किया हुआ जल) के स्नान करने से पित्त रक्त बढ़ता है। यह भी याद रखने के योग्य है कि कैसाहू जादा से जाहा क्यों न पड़ता हो गर्भ जल शिर पर कभी न हाले "उष्णेनशिरमानानमहितंचक्षुपासदा" सु० चि० ० २४ गर्म जल से शिर से स्नान करमा हमेशा नेत्र के लिये अहित है। यदि ऐसाही किसी को फफ बात की बीमारी घेरे हो तो मलयत व्याधि का बलाबल देख गर्म जल शिर पर दे। निपेध। अतीसार, ज्वर फर्णमूल, बातरोग, जाधमान (पेटफूलाहो) अजीर्ण ३ १८ पारोग्य दर्पगा। धन रोगों में और भोजन मेधुन और कमरत के उपरान्त तत्क्षण मानन करै । शरीर पसीना युक्त हो । या अति शीतल यायु यहती हो या पदन किसी कारण से गर्म हो तो भी स्नान न करै । जिस पागी में कीड़े पर गये हों घास फूस के पड़ने से सह गया हो और जिस तालाय या मदी में पाखाने और नावदानों को नालियां लगीहों और पानी सफा चारो तरफ से रुका हो तो उस जल से स्नान न फरना चाहिये इलाजुलगुरया और तिब यूसफी मादि यूनानी कित्तायों में लिखा है कि पाहे गर्मशाल से हो या सर्द जल से ही रोज २ नहाना पट्टों को क्षीण करता है। इसी कारण से बहुत से हिन्दुओं को जोकि सदा नहाते हैं चाहे युथावस्या में स्थभाव की गर्मी से हानि कम मालूम होती है। परन्तु अब उमर कुछ अधिक बढ़ जाती है तो रगों और गुरदे में निर्वलता देख पड़ती है ॥ (उत्तर) यह लेख महा भ्रम दायक और हिन्दुओं के तन्दुरुस्ती का यिन कारक है क्योंकि यूनानी वैद्यक शास्त्र अरय पारस आदि ठंढे मुल्कों के प्रकत के मनुसार यने हैं जहां भाभ्यन्तरिक गर्मी और याय शीत का सञ्चार रहता है यहां अयश्य प्रति दिन का स्नान करमा औगुण करेगा। भारतवर्ष में बाघ गर्मी हमेशा यनी रहती है यदि लोग मान करने का नियम छोड़ दें तो थोडेही काल में उनको कोई न कोई रा सभ्यन्धी योगारी अवश्य खड़ी हो जाय । हां, यहुत ज्यादा तर स्नान करना जैसे की बाजे २ अधिकाधारी हिन्दू गण जै दफे दिशा जाते हैं तै दफे नहाते है ऐसा न घाहिये प्रतिदिन नियमित समय पर एक मरतवे सान करना उत्तम है । अन्यथा स्नान करने से नाड़ियां सङ्कषित हो उत्तेगन क्रिया से रहित हो जाती हैं। 1 -- स्नानकरनेका समय ॥ निरोग पुरुषों के लिये सूर्योदय मे लेफर सात यजे दिन तक स्नान करना. लाभदायक है; बिमार और कमजोर मनुष्य को आठ बजे से ग्या- १६ भारोग्य दर्पगा। रह बजे तक में स्नान करलेना उत्तम है । आज कल बहुत से वैद्य लोग शहत ग्रन्थों के अनभिज्ञता से कतिपय ऐसे रोगों में स्नान करना बन्द क- रादेते हैं कि जिन रोगों में स्नान पथ्य है । यही कारण है कि बहुत से रोगी आरोग्य न होकर और भी उसी में पच जाते हैं । जैसे, रक्तपित्त, यक्ष्मा ( तपेदिक ) हिचकी, तृष्णा, मूर्छा, मदात्यय ( जो अधिक नशा खाने से हो ) उन्माद अपस्मार ( मृगी) अस्मरी ( पथरी ) यह सब रोग यिना नान के कदापि निर्मूल नहीं हो सक्ते पुराना ज्वर, दाहरोग, उ- ष्णयान ( जिसमें बातों का भूलना आदि अनेक उपद्रव होते हैं ) मूत्र कृच्छ मूत्राघात ( सुजाफ ) नेत्ररोग, पिपरोग, चाहिये कि उक्त रोगात पुरुष और गर्मिणी स्त्री तमाम शरीर में तेल लगा के पूर्वोक्त समय में अवश्य रमान करै । हाल की बात है कि महल्ले शाहगज के एक बाबू को उण दात की बीमारी दो गर्व से थी डाक्तरी दवाइयों में हजारों रुपये खर्च हुये पर विमारी न गई किसी एक महात्माने शिक्षा दिया कि बाबू साहब आप नित्यप्रति गङ्गाजी स्नान फरिये गवाही जल पीजिये और । उन्हीं का ध्यान रखिये आपकी यिगारी जाती रहेगी। पापा जी वैद्यक सतसे रोग और गाहा जलका संयोग परिशात फरके नहीं कहा था लोक में जैसे प्रसिद्ध हैं उस तरह से कहा था पर बायू जी उस साधू की शिक्षा मान प्रतिदिन सबेरे उठ गगा नहाने लगे और जल भी गङ्गाही का पीने लगे उनका रोग एकही दो महीने के आभ्यन्तर में जाता रहा, अय पों कर हम मान भत्ते हैं कि गङ्गाजी के स्नान करने लोगों का दुःख नहीं छूटता । यह जो स्वामी दयानन्द सरस्वती जी ने सत्यार्थप्रकाश के एका. दश समुल्लास मे आयुर्धेद द्वारा गंगा जी का यथार्थ समालोचना न कर एफ बारगी लिखमारा जोकि जल स्थल मय हैं वे तीर्थ कभी नहीं होगक्त स्योंकि "जनायैस्तरंतितानितीर्थानि" मनुष्य जिन करके दुःखों से तरे उन फा नाम तीर्थ है अम पाठक गण विचार करें कि ऐसे २ महा यज मिमा रियों से बढ़ कर और कौन सा.दुख है यह बिलकुल मनभिज्ञता है कि जाल का केवल एक डुमानाही गुण जान लिया और पय दया धैठे । अल प्रकरण में गड्डा जल का गुण लिखेंगे ८ २० ग्रारोग्य दर्पगा। कसरत करना। न फसरत भी आरोग्यता का एक बड़ा अङ्ग है। हमारे इस देश में फसरत करने की चाल भले आदमियों में अब नहीं रह गई लोग समझते हैं स्पा हम फो पहलवानी करता है और गदकाफरी याना आदिक क- गरत को तो निश्चही बदमासी पेसा जान फर उस का नाम तक नहीं लेते, काल की भी पा विचित्र गति है, एक समय यह था कि यही ह. मारे भारत भ्रातृगण उक्त विद्या में ऐसे २ निपुण होते रहे और नमी के प्रभाय से आरोग्यता; साहस, बल, बीर्य और सदा बुद्धि गील बने रहते थे कि जिन की अत्युन्नत विमल कीर्ति रूपी मयूर अब तक आधिकांश शिक्षित पुरुषों के हृदय में नाच रहा है यह यात विचार करने के योग्य है कि जिस समय से आयुर्वेदानुगामी धनुर्वेद की अवनति आरम्भ हुभा सभी से आर्य सन्तान या हिन्दुओं की सौभाग्य प्रभा जस्तगित और मा. रत लक्ष्मी का अन्तरध्यान हो चला और तभी से हिन्दूगण निर्वलता हेतु मुसलमानों से लड़ते हुये भी पराजित होने लगे और दिन २. निर्द्धन निस्तेज और शक्ति रहित होते आये । तभी से आज तक हिन्दुओं की प्राचीन रीति नीति उन्नति आदि सब बातों में ऐसी हेठी पही चली आती है कि जिसका उदाहरण देखलाना अपने गृह के छिद्र का प्रकाश फरना है । यही धनुर्वेद प्रणाली की आज फल ऐमी अनादूत और लुप्त दशा है कि लोग गवर्नमेंट से प्रार्थना करते हैं कि हम को घालंटियर मनाइये हम आप को सन्ती रूस मनहूस से उड़ कर पूस कर देंगे। हम कहते हैं साफ फर देपगें जय तुम्हारी धार कदम चलने ने सांस फू- लने लगती है, किसी के शरीर से रक्त यहते देख गस आ जाता है, राम लीला मुहरंग संग पड़ने से दश रोज याहर नहीं निकलसक्त दश फोठरी के भीतर रह कर भी शंख नहीं बना सक्ते, बलिप्रदान में अजा तक को हाथ से नहीं मार सक्त, किसी तरे फा गुल गपाड़ा सुनतेही ले लोटा पाखाने को दौड़ते हो तो. या तुम वालंदियर बनोगे और रूस को फते फरोगे अगरेजों में साठ वर्ष के बूढ़े को भी किसी न किसी प्रकार का आरोग्य दर्पग फसरत करते अवश्य ही देखते होंगे, यह कसरतही का प्रताप है जो अद्यावधि भारत वर्ष में नित नये गोरे मुह वाले आकर धर्मगजरी मचा रहे हैं और हातरी आदि कलईदार चमकीली चीजों को देखा २ कर हिन्दुस्तानियों के तन मन धन को खींच अपनी मुट्ठी में कर लिया है । अब यह समय ऐसा नहीं है कि आप लोग उनकी मुट्ठी से छुटकारा पाने का यत्न न करें आप लोग सुश्रुनादि ग्रन्थों की आलोचना कीजिये और देखिये कि कसरत के क्या २ गुण उन लोगों ने यर्णन किया है । कसरत का गुण । शरीरापचयःकान्ति वाणांसुभिक्तता, दीप्ताग्निलमना लस्यं स्थिरत्वंताघरमृजा । श्रमलमपिपासापाशीतादीनां सहिष्णुता, पारोग्यंचापिपरमव्यायामादुपजायते ॥ सु. कसरत करने से तमाम शरीर के त्वचा कस जाते हैं बदन खूप सूरत और सुडौल हो जाता है, अग्नि दीप्त अनालल्य (सुस्ती न मालुम हे।) स्थिरत्वं अर्थात् शरीर बहु काल स्याई रहे हलकी और मुलायम बनी रहती है। कसरती मनुष्य मेहनत, पियास, गरमी सरदी इन सब को सहि सत्ता है और उसको परम आरोग्यता प्राप्त होती है । कैसाहू मोटा से मोटा क्यों न हो कसरत करने से अवश्य उसकी बे ढङ्गी मुटाई कम हो जाती है अतएव कैमाहू दुयला मनुष्य होगा कुछ न कुछ जरूर मोटा हो जाता है । निश्चय है फि मिना कसरत किये श- रौर में तय्यारी और ताकत कभी नहीं आसक्ती चाहै यह दिवा रात्रि मोतीही क्यों न खाया फरें। अङ्गरेज लोग हिन्दुस्तानियों की अपेक्षा रिष्ठ पुष्ठ यली पराक्रमी विद्वान और एक न एक नये २ कल विद्या के प्रकाश करने याले दिखलाई देते हैं यह सय कसरत ही का मताप है। यदि कोई यह कहै कि हजारों हिन्दुस्तानी लोग ऐसे २ कसरत करने घाले.पड़े हैं कि एक अकेला दश अंगरेज को मार के गिरा सकता है ले- २२ आरोग्य दर्पण। किन महा मूर्ख लंदराज क्यों बने रहते हैं ? यह क्यों नहीं घिद्वान् और शिरुप विद्या के प्रकाशक होते हैं, इसका उत्तर यही है कि मनका फस- रत मत विद्या से सम्बन्ध नहीं रखता और पथ्य प्रकरण से ठीक भी न- ही मिलता फारण यह है कि विद्वान् लोग फसरत को बदमाशी पेमा जान त्याग बैठे हैं और मूर्स लोग इसे जोयिफा सम राज दरबारों में या जहां तहां खेल कूद के पेट भर खेते हैं। युद्धि की परिधालना और विद्या की उन्नति करने याला गुण प्रायः भारत वर्ष से जाता रहा क- सरत करने वाले को यन रणगिरि दुर्गम और कठोर स्थे उ में एवं सत्रुओं से भय कम रहता है । एकाएको किसी प्रकार की विमारी या वृद्धापन बहुत जल्द उसे नहीं घेर सक्ता और अजीर्ण की बिमारी तो उसे हाती ही नहीं। व्यायामकुर्वतानित्यं विरुद्धमपिभोजनम् । विदग्धमविद- ग्धंवानिर्दोषंपरिपच्यते ॥ प्रतिदिन का कसरती यदि विरुद्ध भोजन ( रोगात्पन्न फारफ) सा लेगा तो निस्सन्देह यिदग्ध हे या अविदग्ध हो पर उसे 'निर्दोष पर जायगा इसी तरे- वयारूपगुण होनमपिकुर्यात्सुदर्शनम् ॥ सु. अवस्था और रूप करके हीन भी पुरुप कसरत करने से पति रूप- यान हो जाता है । अपने शरीर की आरोग्यता (हेल्थ) चाहने वाले मनुष्य बारहो महीना थोड़ा हएइ मुग्दर और बैठफ की फसरत अवश्य फरै । बहुत से लोग यह जानते हैं कि बैठक करने से कोयत्य (नपुंसफ) हो जाता है यह महा भूल है, "हां" विना लंगोट फसे बैठक लगाने से पोता बढ़ आने का सम्भव रहता है । कसरती पुरुष को घी दुम्प आदि यतफर यस्तु हमेशा खानी चाहिये विशेष फर कसरत के उपरान्त बिना कोई ताकंत बर चीज खाये प्रांनी चारोग्य दर्पण। २३ पीना वर्जित है। बहुत से लोग कसरत के पहिलेही दूध पी लेते हैं या कसरत किये जाते हैं और दूध या भीजा चना खाते जाते हैं । यह मू. खेता है। क्योंकि इसका विधान वैद्यक में कहीं नहीं है.--और परिक्षा से नुकसान पाया गया है। यह भी याद रखने के योग्य है ॥ वयोवलशरीराणिदेशकालाशनानिच । समीक्ष्यकुयात्या याममन्यथारोगमाप्नुयात् ॥ सु. मनुष्य को सचित है कि अपनी अवस्था यल शरीर देश काल और भोजन देस फर कसरत फरै अन्यथा करने से रोगी हो जाता है जैसे की अवस्या तो १० वर्ष की है पर कसरत करना ३० वर्ष याले की बरायर, पाल ५ सेर बोका उठानेका है मनभर उठानेमें उद्यत है, शरीर तो महा माटी पर बिना क्रम एका एफी मलखम आदि (जमनाठिक) का कसरत किया चाहते हैं । अति शीतल देश में मट्टी लगा के छतलेोट करना, उप्णकाल में अधिक करना अयोग्य है, खाना तो छंटाफ घी भी नहीं डण्ड लगाना पांच सौ इससे अवश्य क्षयी, तृष्णा, बमन, रक्त, पित्त, भ्रम, खांसी, स्वास और ज्वर आदिक बिमारी होने का सम्भय है ॥ . निषेध ॥ रक्तपित्तकशःशोषावासकासनतातुरः । भुक्तवान्स्त्रीषुच क्षीणोंधमार्तश्च विवर्जयेत् ॥ रक्त, पित्ती, दुर्षल और जो किसी रोग से सूखा जाता हो, दमा, खांसी और घाव से पीड़ित या अति स्त्री प्रसङ्ग करने वाला गरमी, सु- शाक तथा धुमरी युक्त पुरुष और भोजन के अपर कसरत न करै । कसरतकरनेकासमय उत्तम तो यह है कि सबेरे स्नान के उपरान्त यथाशक्ति कसरत फर माद माथे में चन्दन लगा गायत्री सन्ध्या से निष्टत्त हो भोजन करे। इस्से २४ आरोग्य दपंगा। अतिरिक्त समय में भी कमरत कर सकता है पर नागा न होनी चाहिये, नियमित समय पर अयश्य कुछ न कुछ जरूरही कर ले । कसरत फर के उसी वक्त लँगोट खोल डालना, या नान फर लेना, या बिना कोईनीज खाये गति ठण्डा जल पी लेना नुकसान करता है । फमरत के उपरान्त माधघण्टा या पावघण्टा टहल के तय कोई फाम करै। पाठकगण, यदि आप लोग इस दुर्लभ शरीरको कि जिसके द्वारा पारो पुरुषाची फी मिद्धि है आनन्द से रसना धाई तो अवश्य कसरत करें। । and... " चन्दनलगाना ॥ यद्यपि आजकल माथे में चन्दन लगाना नय शिक्षित लोगों को पा खण्ड या एक प्रकार का चिन्ह जान पड़ता है परञ्च आयुर्वेद में इसका अधिक गुण लिखा है जो सविस्तार इसे दूसरे खराठ में लिखेंगे । पैरधोना ॥ यह जो प्रायः हिन्दू लोग बिना पैर धोये भोजन नहीं करते इसे होटल में भोजन करने वाले जेन्टलमेन लोग चाहे बुरा समझे या पसन्द न करें लेकिन यह भी एक उत्तम फल देने वाला कर्म है । पादप्रक्षालनंपादमलरोगत्रमापहम् । चक्षुःप्रसाद वष्यं रक्षोनंप्रीतिबर्द्धनम् ॥ , पैर फे, धोने मे पैर का मल रोग और पकाई जाती रहती है नेत्र में तरावट शरीर में तैपारी और मन प्रसन्न रहता है। केवल खानेही के समय पैर धोना नहीं बल्कि जघ २ आवश्यकता देखे तमी धेर डाले जैसे कि भोजन के आदि में मूत्रपुरीप के अन्त में कहीं से घूग फिर के आया हो और सोते समय पर जरूर पैर धोना चाहिये पैर धोयके सोनेसे सुख समेत नींद आ जाती है और यह दुरस्थान नहीं देखता ॥ m हारोग्य दर्पण : २५ भोजन ॥ यह यात सबको अच्छी तरह से मालूम है कि हम लोगों को भूख और प्यास लगती है और तय खाने और पीने की जरूरत पड़ती है। यदि किसी मनुष्य को रोज तक कुछ भी साना न मिले तो इसमें सक नहीं कि यह बहुत दुबला हो के भूख से मर जायगा । इससे यह यात सिद्ध हुई फि भोजनही जीयन फा मूल है इसलिये विशेष फर मनुष्य को खाने पीने के नियमों पर ध्यान अवश्य रखना चाहिये क्योंकि जिन फा साना पीना एफ अन्धी हुई तादाद के यमूजिय नहीं है उसे और स- मस्त भाचरणों से कुछ भी फायदा नहीं है। सत्ता । यह बात साफ जा. हिर है कि ठीक समय पर परिमित भोजन करने से यह भोजन अति गुण कारी होता है जैसा कि सुश्रुत में लिखा । अहारःप्राणन:सद्योवलकृहेहघारकः। घायुस्तेजःसमुत्साह स्मृत्वाजाऽग्निविबईनः ॥ चि. स्था. भा० २४ ॥ समय का भोजन ग्यही प्राण को तृप्त करता है और यल कर एवं देह धारक है मायुः तेज उत्साह सारण शक्ति पराक्रम और अग्नि को य ढ़ाता है। जो लोग समय कुसमय कम जादा पशुवत भोजन किया करते हैं उनके सामने हर समय काल सड़ा रहता है और वेही मनुष्य हैजा आदि बिमारियों से पीड़ित भी होते हैं । हमारे हिन्दुस्तान में हर एक तिथियों में व्रत की परिपाटी ऐसी फैल गई है कि लोग देश काल पात्र न मिधार फर एकादश्यादिफ तिथि यों में उपवास कर एक न एक रोग में ग्रस्त हो जाते हैं। जैसे देखिये ज्येष्ठ शुरूपक्ष की एकादशी को अन्न खाना कौन कहै जल तक पीनाम- ना है कि जिस ऋतु में एक घड़ी भर जठ न मिलने से मनुष्य व्याकुछ हो जाता है । तो ऐसी अवस्था में सबके लिये व्रतों को परिपाटी आयु वेद सम्मति नहीं है क्योंकि लिखा है कि- यारोग्य दर्पण। २६ - भोजनेच्छाविघातास्या दङ्गमर्दोऽरूचिःधमः । तन्द्रालो. चनदौर्बल्यं धातुदाहोवलक्षयः ॥ विघातेनपिपासायाः शीप कठास्ययोर्भवेत् । श्रवणस्यावरांधश्च रक्तशोपाइंदिव्यथा ॥ खूप भूस उगने पर भोजन के न मिलने से यदन में हड़ फूटन होना, अरुधि, शरीर ढीली, नेत्रों में सांप, नेत्र के सामने तिलमिल मा- लूम होना, रक्त गांसादि सप्त धातुभों में दाह और यल फा नाश होता है। तो भला यतलाइये जिस शरीर से परम पुरुषार्थ की सिद्धि है वही निकम्मी होगई तो उपयाग करनेमे फैसे तुम मुक्ति पा सत्तोही गीता में स्पष्ट लिखदिया है कि उपयास से योगकी सिद्धि नहीं होती। इसी प्रकार प्यास से, प्यास के रोकने से कंठ और गुस फा सूराना, श्रवण शक्ति अ- र्थात सुनने की ताकत जाती रहती है। रुधिर का मूसना और हृदय में दर्द होने लगता है। भावकाश मे भी लिखा है कि- पनीयंप्राणिनांप्राग विश्वमेवचतन्मयम । अतीत्यन्त निषे. धेननक्वचिदारिवारयेत् ॥ विस्य तनमय यह जल मनुष्य का प्राण है इसलिये जहां जल फा पीना अत्यन्त निषेध है वहां भी प्यास लगने पर पानी अवश्य पिये क्यों कि "तृपितो मोह मायाति मोहात् प्राणं मिमुञ्चति" प्यासे को पानी न मिलने से बिहोशी आती है और यिहोशी में प्राण छूटने का सम्भय है यङ्गाल में एकादशी के दिन बिधया स्त्रियों की यही दुर्दशा होती है ए. फादशी महात्म के इस यचन से कि "एकादश्यामन्नेपापानिवसन्ति" अ- र्थात् जितने पाप हैं ये सय एकादशी के दिन अन्न में यसते हैं यस इस यघन फो धर्म का मूल जान उन बिधारी अघलाओं को जपरदस्ती उप. यास कराते हैं । यद्यपि यह व्रतादिफ गीता मादि ग्रन्यों के देखने से गि रक जान पड़ता है पर हमें मत मतान्तरों के झगड़े से प्रयोजन नहीं है लेकिन जम हम देखते हैं कि व्रत करते २ गर्भयती फा गर्भ गिर जाता है पुत्रायती का पुत्र बिमार हो जाता है। सद्यो विवाहिता स्त्री लड़के और - पारोग्य दर्पण। २७ A युवा पुरुषों को निस्तेज देखते हैं तो हम क्यों कर फह सक्ते हैं कि एका दश्यादिकों के व्रत से दुःरा नाश हो जाता है ऐसा तो नहीं होता किन्तु उण्टा सुधा जादि से दुःस, होता है और दुःख पाप का फष्ठ है, गत्य तो | यह है कि धम्नांत्मा पुरयात्मा और ईश्यर का जानने याला यही पुरुप हो सकता है फि जिराफा खाना पीना चालना फिरना आदि इन्द्रियों का 'आचरण काठानुसार ठीक बन्धा है ॥ भोजन करने का घर सफेदी से पुता हुआ उगदा साफ और पाफ स्थान से कुछ दूर पर होना चाहिये यहां पर कुछ सुगन्धित द्रव्य रपरोहां और नेत्र के सामने विशेष करके भोजन करने एवं सेायने का कमरा ब. हुत साफ रखना लिखा है । खाने के बस यदि माता पिता गिव वैद्य पाक कर्ता ( साना पकाने याला ) मोर कुत्ता और धानर इन्हें सामने बैठाय लेवे तो उत्तम है, क्योंकि इन सभों की दृष्टि अच्छी होती है और बहुत गरीब आदमी जिन्हें उत्तम प्रकार का भोजन दुर्लभ है एवं बिल्ली मादि जीव उस समय न रहने पायें -:*:-- भोजनकपात्र। भोजन के समय घी फांसे के पात्र में रखना उत्तम है, क्योंकि कांस की कटोरी में घृत बिगड़ता नहीं, यही कारण है जो यशा में घृत फांस ही के पात्र में रखना लिखा है। मीठी चीज पीने या घाटने की हो तो चांदी के पात्र में रक्से । सूखा मांस ( फयाय आदि ) रसा दार या मू- रया ( अखनी ) सोने के पात्र में लिखा है । कटु और अन्न आदि की घटनी वगैरः पत्थल की कूड़ी में ले ॥ दद्यात्ताममयेपासुशीतंशुशृतपयः ॥ पीने के लिये उमदा परिश्रुन शीतल जल तान पान में लेना चा- हिये। बहुत लोग जानते हैं कि तामे के बर्तन में पानी पीना मने है - आरोग्य दर्पण 1. सो भूल दे, मनु ने सिर्फ दूध या सहत आदि मीठी चीज ताम्र पात्र में रख कर खाना मने किया है, इसका कारण यह है कि उक्त द्रव्यों में तार्म का यमि फारफ अंश खिंच जाता है । निर्णय सिंधु में लिखा है गव्यंचतामपात्रस्यं मद्यतुल्यंतंविना ।। दूध ताम्र पात्र में रखने से मद्य के तुल्य हो जाता है, यदि घृत उस में न मिला है, इससे स्पष्ट होता है कि घृत उस अंश को खींचने नहीं देता। भोजन के समय मद्य मृत्तिफा पात्र में और दही चीनी कांच एवं स्फटिक पात्र में रस कर खाना लिखा है "कुलार्णय, कुठप्रदीप, समया- चार देवीरहस्य आदि शाक्त के ग्रन्यों में लिखा है" कि फांघ पात्र कभी जूठ नहीं होता, यैसेही विष्णुपुराणादि वैष्णयी ग्रंथों में शंख की महिमा लिखी है। दाल भात और रोटी इन्हें अच्छे गनोरग छिछले पात्र में लेना अच्छा है । उक्त पात्रों के अभाव में उक्त धातुओं की कलई हो, उसके भी अभाव में पत्याल या मृत्तिका का पात्र लेना उत्तम है जितने सूसे पदार्थ हैं उन्हें अपने दहने तर्फ और पानी गादि द्रव्य पदार्थ अ- पने वांये तर्फ रखना उचित है और दाल रोटी की थाली अपने सागने रक्खे । चाहिये कि एफ गज लम्यो चौकोर बिलस्य भर की ऊंची चौकी अपने सामने रस उसी पर सब पात्रों को स्थापन करे ताकि झुक कर खांना न.पड़े पयोंकि- सुखमुच्चैःसमातीनःसमदेहोऽन्नतत्परः ॥ सुश्रुत, मुख पूर्वक ऊंची छाती और शरीर को सूय सीधी करके भोजन करै षयोंकि अफ कर खाने से पेट दया रहती है, इससे उस समय पक्काशप की धमनी निर्यल रहती है। यही कारण है जो युरोपियन लोग टेबुल पर साना रस और कुरसी पर बैठ कर साते हैं, पर एतद्देशीय नवशि; क्षित गण उक्त आशय को तो जानते नही इसे अय्याशी फोटिमें गणना फर यहे २ महाजनों के लड़के चोरी छिपा होटल में जाके खाना खाते हैं इससे यदि अपने घर में एक चौकी पर भोजन के समय बरतन सजा और भारोग्य दर्पण २६ आप सुस पूर्वक आसन पर बैठ आनन्द से भोजन करे तो होटल से क्या कम गजा मिले, अगरेजोंका अनुकरण भी न हो और महागांस की पर. सादी से भी बचे रहैं । पर वह साहब जो मुख में चुरट दाब (गिटपिट बोलत साहयो गत चले पतलून जाकट से ) उन्हें यह कर अच्छा लगेगा। भोजन करने के पदार्थ न बहुत गर्म हों और न बहुत शीतल पर ताकत देने वाले सुगन्धित समालों से धूपित हो । और भोजन करने में न तो बहुत जल्दी करे और न अति देर फरे, यद्यपि नीति का वचन है- अचिरंकुरुराजेन्द्रभोजनेशयनिरो ।। भाजन शयन और युद्ध बहुत जल्द करना, पर जल्दी २ भोजन क- रना बड़ा हानि फारफ है ॥ पूर्वमधुरमश्नीयान्मध्येऽम्ललवारसौ ॥ सुश्रुत, भोजन के आदि में मिष्ट द्रश्य जैसे दूध धिनी या रोटी दूध खीर | और मालपुआ आदि, मध्य में अम्न और नगकीन यथा रोटी तरकारी दाल भात और चटनी आदि, अन्त में पीने की यथा माठा आदि पीना लिखा है । पर बहुत काल से आयुर्वेद का प्रचार प्रायः लुस हो जाने के कारण मनुष्यों फा खाना पीना ऐसा गड़बड़ हो गया है कि लोग इतना भी नहीं जानते कि कौन सी चीज हमैं पहले और कौनसी पीछे खानी चाहिये और कौन द्रव्य के साथ कौन सा पदार्थ खाना उचित नहीं है, इसीसे वन्धी तादाद और नियमित समय के भोजन करनेवाले लोग भी प्रत्यह अनेकानेक रोगों में ग्रस्त रहते हैं । अब कुछ भोजन के उन अङ्गों को कहता हूं जिस से प्रत्येक मनुष्य की स्वस्थ्यता, यष्ठ, बुद्धि, पराक्रम बढ़ सक्ती है। यह सभी जानते हैं कि भूख प्यास लगने पर खाने पीने की इच्छा सब लोगों को होती है इसलिये उक्त बेगों के रोकने या उनके समय को न्यूनाधिक करने से रोग पैदा होता है । भूस मारने से देह और. आंखों में दर्द, अरुचि, अमः तन्द्रा, आरोग्य दपंगा। दाह, और बल का नाश होता है, जो लोग भूग लगने पर नहीं जाते उनकी अग्नि पहिले तो वातादिक दोपों को नष्ट कर धातु को जलाती है बाद यही जठराग्नि आहार रूपी इन्धन न पाके ठंढी हो जाती है किसी कवि ने कहा भी है ॥ आदौरूपविनाशिनीकृशकरीवामस्य विध्वंशिनी। जाना- च्छेदकरौतपःचयकरीधर्मस्यनिर्मूलिनी ॥ पुत्रधाटकलत्रभे- दनकरीलज्जाकुलच्छेदिनी। सामांपीड़ासर्वदोषजननीप्रा- गापहारीक्षुधा ॥ अब बतलाये कौन कह सकता है कि मनुष्य व्रत उपयाम करके अर्थ धर्म काम मोक्ष को पर सत्ता है, इस दुर्लभ शरीर को तो वेशफ फाल के मुख में दे शीघ्र ही जीवन से हाथ धो सक्ता है, जो घारों पुरुपायों के साधन फी जड़ है, हम यह नहीं कह सक्ते कि तुम एकादश्यादि व्रत मत करो, फरो फिर; करो अवश्य करो; किन्तु प्यारे भ्रातृ गण, भूख लगने पर अवश्य खावा; चाहे फन्दही फल खा के रहे। कुछ अन्देशा नहीं, हां सा ना, न पचने से अजीर्ण हुआ हो तो एकादशी पर क्या हसर है माप द्वा दशी को भी न खाइये, हम तो वैद्य हैं जिससे आप आरोग्य रहैं वही शिक्षा देंगे। बिघार सहित माहार फरने से तृप्ति, यल, बुद्धि आयु, शक्ति ओज और सुन्दरता की वृद्धि होती है। जो हमने कहा है कि भोजन के आदि में मीठी चीज खानी चा. हिये उसका कारण यह है कि जो मनुष्य जितनी देर में भोजन करते हैं। उस फाष्ठ फा तीन भागं फर प्रथम में वायु शमन करनेयाली मीठी चीज बीच में अग्निकारी खट्टी और नमकीन और अन्त में कफ नाशक फडुई तीती और फली चीजों को प्रीति पूर्वक मन लगा कर भोजन करना चाहिये; जो लिखा है कि फड़ी और भारी बस्तु भी भोजन के आदि में खाना उत्तम है इस लिये फि भोजन काठ में जठराग्नि तेज रहती है . .

पारोग्य दर्पा इस से कड़ी और भारी वस्तु (रोटी पूरी जादि ) खाना जल्द पच जाता है। पहले हम भोजन करने का मकान भोजन के पात्र और किस प्रकार भोजन करना चाहिये फह आये हैं और यह भी दिखलाया है कि ठीक समय पर भोजन करने से पपा लाभ होता है । अम विचार करना घा- हिये कि ईश्वर ने हमारे जीधन के हेतु या २ गस्तु उत्पन किया है और फोन २ द्रव्य के साने से हमे क्या २ हानि लाम हे सत्ता है । उ. रोक्त सब बातें सास करके उन लोगों के लिये है जिनको सय तरे का आराग है। पर विशेषकर ममान्प रीति से देश काठ आयहया औ दोप विचार करके उसके अनुसार चलना सब को उचित है । अन्न पाक यंत्र ॥ सच्चिदानन्द ज्योति स्वरूप नित्यासरह निस्पृह निर्गुण परमात्मा ने जीयधारियों के अभ्यन्तर ऐसे २ सूक्ष्मातिसूक्ष्म नाहियों के द्वारा प्राण र- क्षक भोजन पचने और शुक्र बनने का यंत्र बनाया है कि जरा भी उलट फोर होने में शरीरही नष्ट भ्रष्ट हो जाती है । जो कुछ भोजन किया जा- ता है यह पहले प्राणवायु आय कर आहार को आमाशय में ले जाती है यह आहार पट रस में कोई रस पयों न हो आमाशय में जा मधुर और फेना सा हो जाता है बाद यही पाचफ पित्त से दग्ध है। खदा हो जाता है फिर समान वायु से प्रेरित हो ग्रहणी में पड़ता है और ग्रहणी से अग्निकोष्ठ में पच का हो जाता है यदि न पधा ते भाय हो गया और नहीं तो यही उत्तम रस अग्नि के बल से मधुर और चिकना हो जाता है और यही रस अमृत के समान हो अखिल धातुओं को उत्पन्न कर शरीर को पुष्ट करता है। यदि मन्दाग्नि से अपक्व अर्थात् अच्छे प्रकार से न पचा तो यही रस कडुमा खट्टा हो तादृश इकार स- त्पन्न करताहै और विप समान हो अनेक उदरादि व्याधि प्रगटकर महत AA चारोग्य दर्षगा। सोश देवा हे पाहिये तुम अयस्या में यमित द्रव्य के यल से यमन कर उम रस को निकाल हाले । जो फजूल यह भी जानने के योग्य है कि जितना साना पाया जाता है वह मय शरीर के विभागों के यनाने में नहीं काम आता अवश्य फुछ हिस्सा बदन से थाहर निकल जाता है परंच उन मिश्र द्रव्यों की मूरत में आकर निकलता है जिनमें निमफ की चीजें ज्यादा रहती है असे गाल मूत्र । जय आहारसे रस खिंच कर अलग हो जाताहै तप सार हीन मण, और जल, रह जाता है उस जल को मूत्र वाहिनी शिरा ले- फर यस्ति पाने मून की थैली में डाल लिंग द्वारा निकाल देती है और मल को अपान वायु पक्षाशप में लाय त्रिमली भर्थात् गुदा मार्ग से निकाल देती हैं। बाद इसके फिर यह रस समान घायु (जो वायु अग्न्याशय में रहती है) से प्रेरित (भेजा हुघा) हृदय में 'जाय रंजित पित्त (रंजक पित्त यह है जो अपनी ताकत से उसी रस को रक्त यना देता है) सो पपफर रक्त हो जाता है। यही रक्त सर्य शरीर में स्थिति उत्तम जीवका अधार है और, रक्तही बदन के सय हिस्सों को जिन्दा रखता है। रक्त पा चीज है और किस तौर पर यह शरीर में चलता है और गर्दिस फिया हुमा रक्त किस प्रकार उसी हया से साफ हो जाता है इन सयों का ययाग रक्त प्रफर्ण में लिखेंगे। + यदि यह रस रक्त न होकर यिदग्ध हो गया तो सटा हो जाता है अब जानना चाहिये फि भोजन किया हुआ द्रव्य प्रथम रस बनके रोज में पित्त की मदद से रक्त हो जाता है, इसी प्रकार पांच ५ रोग में रक्त से मांस, मांस से भेद, मेद, से हड्डी, हड्डी से मज्जा और भज्जा से दगड अधिक एक मास में जाके शुक्र मनता है । परन्तु जिसकी जठरामि तेज है उसको इमसे कग दिन में गौर जिसकी भूस कम है उसको इससे भी ঘি। में शुभ होता है । लेकिन धातु यर्द्धक औषध साने से जल्द आरोग्यदर्पगा। और अधिक शुक्र होता है । यदायस्या में वायु की अधिकता से रस सूख जाता है इमलिये उम अवस्था यायु शगन कारक एवं धातुमढ़ाने थाले तर द्रव्य भे। शग करंगा उत्तम है। शरीर में योर्यही प्रधान यस्तु है इम की ताकत से जीयधारी गण अनेक प्रकार के काम कर रहे हैं जैसे दूध में घी और अख में रम रहता है वैमाही मनुष्य के शरीर भरमें शुक्र है और यही शुझ, स्त्री के देखने, छूगे, उमकी कोली सुनने, उनका ध्यान 'करने और मैथुग का आनन्द दोन रो लिङ्ग के रास्ते निकल जाता है, यही कारण है कि अति मैथुन करने से मनुण महुत जल्द निवल है। शुद्ध हो जाता है। मनुष्य को अपने खाने पीने का मंथम विचार महित ठीक समय पर रखना उचित है, चाहिये कि शिममे धातु में हानि म पहुंच कर और दिग प्रति दिन शुक्र की वृद्धि होती जाय ऐमा भोजन करै । भूख हे।ने पर यदि भोजन न प तो अगि यौर्य और रक्त को मुखाती है इसलिये भूरा लगने पर अयश्य खाये । भोजन करनेका समय ॥ सामान्य तरह से सय चिकित्साओं का मत है कि एक पहर दिन के ऊपर और दे। पहर के भीतर और रात के एक पहर के भीतर भोजन करना श्रेष्ट है; परन्तु रग देप और गल के पकने पर जब भूग्य तेज है। आहार करने का यही समय ठीक है लेकिन परीक्षा से देखा गया है कि जिन लोगों के भागन का मगय बँधा है उन्हें उमी समय में जाके भूख लगती है. जो लोग एक दिन रात में एक ही बार भोजन करते हैं उन्हें ठीक देोपहर के भोजन करना उत्तम है । बाजी २ यूनानी किताबों में लिखा है कि दो दिन एक रातमें तीन बार से अधिक न खाना चाहिये शायद ऐसा यूनान थाले करते भी हों पर यहोके मुसलमानों में सा ऐसा चारोग्यदर्पग। नही देखा जाता हनारी रायमें तो भोजन का ममय दम बजे दिन भोर १० वा यज्ञे रात को उत्तम उममें भी जो कोमल प्रकृति वाले हैं और जिन्हें पढ़ने लिखने आदि की मेहनत अधित पड़ती है उन्हें मामूली भोजन के अतिरिक्त प्रातःका शौम के अनन्तर और सन्ध्या समय चार पांच यजे शौच के अनन्तर शुद्धचित्त हो कुछ ताफतयर मेदिक या अन्य पदार्थ खाके जाल पी लेना बहुत जरूरी है, क्योंकि इससे शरीर का यष्ठ अधिक मेहनत करने पर भी नहीं घटता पर समय का स्याल अवश्य रखना चाहिये। . निपिद्धान्न ॥ जिस भाग में कुछ स्वाद न हो ऐमा भोजन घामी, जूठा (उच्छिष्ट) और जो खाना यमाने लगा है।, यहुत देर में पका हेया तुर्रियाय गया हो, शीतलसे फिर गर्म किया गया हो या अच्छी तरह न पकाहे। और जल गया हो तो कदापि न खाना चाहिये क्योंकि ऐसे २ अन्नों के खाने से पिशूपिलादिक रोग होने का सम्भव रहता है, यह भी याद रखने के योग्य है कि गात के साथ मिरका और मुर्गे के मामके साथ भूली, मूली के माप दूध या दही के माथ यफुले का मांस न खाना चाहिये क्योंकि उमझे फफ में विकार नरपन्न होता है । दूध के साथ गाजीर या नीयू या. गछली और कयूतर के बच्चे के गांव के साथ प्याजमा साना वर्जित है पपोंकि इसमे वायु का केोप होता है । मरमों के तेल से भूजा तुमा क- यूसर का माम गौर दूध के माप तेल का बना पदार्थ कदापि ने खाना पादिये इसमे शीघ्रही कमाल रोग हेाता है। जो हम लिस आये हैं कि धार दफे भोजन करमा नाहिये, मर्यात मामूली भोजम के अतिरिक्त भी सबेरे और शाम के कुछ टालिष्ट पदार्थ खाना अत्यावश्य है । और अति लाभदायक शिक्षा में यह भी देखलाया हैं कि प्रातःकाल उठ कर थामी मुंह वासी पानी पीना अति गुणकारक है। गय ग प्यों को उचित है फि उजाल पान के एक घण्टा बाद .

पारोग्यदर्पया। ३५ नीचे कद ये पदार्थों में से जो इच्छा हो साना बहुत जरूरी है पर ऐमा भी न सा ले जिससे कि मामूली भाजग में विघ्न पड़े (खाने की इच्छा न हो या कम साया जाय) ॥ कुण्डलनी अर्थात् जलेवी ॥ जलेबी का बनाना कुछ कठिग नहीं है, इसलिये बनाने की क्रिया मदी लिखा इमे घर में औरतें भी यना लेती हैं और यागार में भी हे. थाइयों की दुकान में प्रत्यार सयेरे साजो मिल सक्ती है । गुण ॥ एषांनुरडत गौनानापुष्टिकान्तिबल प्रदा । धातुबधिकरी शष्यामच्याचेन्द्रियतर्पणी ॥ . जलेबी शरीर को पुष्ट ( मरत ) करती है फान्ति ( चेहरे पर रौनक ) और पल को बढ़ाती है, धातु रवि, सृष्य ( सद्यः शुक्रार ) रुधि और इन्द्रियों को तृप्त करती है । परीक्षा करने से देखा भी गया है कि रोश मोरे जलेयी खाने से बहुत अधिक फायदा हुआ है, लेकिन मन्दाग्नि याले को भय पैदा करती है, मातार की अपेक्षा घर को धनी हुई ज. लेषी यहुत लाभदायक होती है क्योंकि बाजार का खमीर अच्छा नहीं होता, खमीरही पर कुछ कथन नहीं है बाजार के बने पदार्थ समी ख. राय हेते हैं। इसी से वेद में लिखा है। "मापग्गीमनमनीयादिति" बजार का पका अन्न न सामा चाहिये । कारण यह कि हेलयाई लेग प्रायः सहा, घुमा, पाणी, सराय जो कुछ माल धघ जाता उसे भी किसी न किमी दा में बेंच डालते हैं और यहुत प्रकार का मिलायट कर देते हैं। इसी सवय ने हर एक मेलाओं में लोगों के हैना हे। जाता है | ... - याराग्यदर्पण। MY माखन मिश्री॥ दुग्ध मथो से जो घी निकलताहे उमी को प्रायः गक्सन कहते हैं। मक्यन का गुण ॥ "दुग्धोत्यं नवनीतन्तु चक्षुष्यंतापित्तनुत् । प्यंबल्य मति- स्निग्धं मधुरंग्राहि शीतलम्" . दूध से निकला मक्खन नेत्र और रक्त के विकार के हर लेता है और प्य (शुक्र कर) यल्य (दाफत घर) अति चिक्कन, मीठ', ग्राहि (दी- पन पाचन) और शीतल है । रोज मयेरे मासग और मिश्री के खाने मे बिशेप कर नेत्र और मस्तिष्क में अधिक बल होता है और इसके खाने थाले फेो मृगी, उन्माद, मूर्छा और शिर की बिमारी स्वप्न में भी नहीं हो सक्ती । यदि नियम के साथ रोज मवेरे तीन चार महीने तक रास्यास (दमा) और यक्ष्मा (कफक्षयी) याले केो माखन मिश्री' सिलाई जाय तो हम निस्सन्देह कह सक्ते हैं कि बिमारी जाती रहेगी। का- आंवला का मुरब्बा ॥ राज सवेरे एक या दो रेसा रहित आंवले के मुग्वे में एक चांदी का यर्फ लपेट कर खाने से जैमा पायदा करता है प्रशंमा करना व्यर्थ है। आंचला तीन देय फेो नांश करता है । "रक्तपित्तंप्रमेहघ्नं परंप्यरसायनं । हन्तिवातं तदम्लत्वात् पित्तंमार्यशैत्यतः ॥ कफरुनकषायत्वात् फालंधाच्यास्त्रि- दोपजित्" गांवला रक्त पित्त और प्रमोह का नाशक एवं सृष्य और रमायन (जो वृद्धावस्या न आने दे) है विशेष कर भांबला अपने खट्टे अंश से यात केो, गीतल और मोठे अंश से पित्त के, रुक्ष और कपाय प्रभाव में - आरोग्यदर्पग। कफ का नाश करता है। जिनके आंवले का मुग्धा और चांदी का वर्क न गिल मके वे मर्फ मुसा आंधले का चूर्ण ६ मामा और मिश्री ६ गामा मयेरे फांक का थाहा सा जमा पो लिपा करें तो भी बहुत फायदा करै । गोक्षुर पाक ॥ बड़ा गोधुरू पाय भर, जाधितो ३ मामा, लय ४ गामा, मिर्च तेोला, फपूर ६ मामा, अकरकरा ६ मामा, ममुद्रशीप ६ गामा, अजधा- इन ६ मामा, दरदी६ गामा, अपिता, तज, तेजपात, छोटीलायची, वं. शलोचन, नागफैशर और तालमसाना, एक २ तेल गई मांग ५ मासा, अफीम २ गामा, गौ का दूध ४ मेर, घिमी २ मेर, बयूल का गोंद ८ तो- ला, चांदी का यकं २० ताय । फ्रिया, मय दयाइयों का भिन्न २ कूट क- पर छान फर ले पहिले दूध को पढ़ाई में पढ़ा आच दे जय दे। हिस्सा दूध जल जाय तय गोपुर का चूर्ण और अफोग को दूध में छे। हदे और पकाता जाय, जय बिलकुल खेाया हो जाय तय उसी में पाव भर घी हाल रोये को सूप भूग ले, याद इसके गांद केो भी घी में तल ले, फिर चिनी का उगदा घामनी कर उमी में सोया और मय दया मिला दे छदाम - किमगिम - पिस्ता 5- गरी २ तोला, नई घिरौंजी २ ला इम सयों को भी महीन कतर फर उसी में डाल एक २ उँटाक का लड्डू बनाले। "नातन्मेव्यमिदं महौषधवरं रोगौघविध्वंसनं द्याघ्नं सकलप्रमेहननं प्रौढ़ांगनाद्रावगाम् ॥ नित्य प्रातःकाल एक लड्डू खाने से सम्पूर्ण रोगों का नाश होता है विशेष कर पायाशीर प्रमेह के नाश करने एवं स्त्री द्रावण और धातु स्तम्भन में उत्तम औषधि है। और भी बहुत सी दवाइयां प्रातः काल खाने के योग्य हैं जिनका ययार फिर कभी समयानुसार करेंगे । प्रिय पाठकगण ऊपर लिसे हुये औषधियों में जो प्राप्त है। सके अवश्य प्रातः 1 अारोग्यदर्पगा। ३८ काय साया फरिये फिर देखिये धन्द रोज़ में फैमा फ़ायदा मालूम होता दूसरा भोजन ॥ ऊपर . इमका नियम दिग के एक पहर के ऊपर भीर दो पहर के भीतर लिग्य चुके हैं । इम वक्त के भोजन लाय उत्तम यह यस्तु है, मंग भौर भुर्द को धुली हुई दाल क्योंकि इन देने का छिलका जहर है कानपुर में लेकर पूर्व में प्रायः लोग अरहर की दाल उयादा राते हैं हैं लेकिन जहां तक परीक्षा करने से ज्ञात जुभा है केगल अरहर की दाल खामा पति हानि कारक हैं इग मघों के गुण मागे प्रकाश करेंगे । चावल दूध घी, चिनी, मुलायम, तरकारी और मांस, किन्तु मांस का शास्त्र पिहित खाद्यानाद्य की अनुगति आगे देंगे। इस ममय फैथल इस नाही दिखलाते हैं कि बिना घी दुग्ध अर्थात् बिलकुष्ठ रूखाही भान पाना पहा निषेध है क्योंकि निरा रुक्ष (अरहर धना की दाल रोटी) और रूसा जान (च. ना अरहर और मटर का घरधन) ये पचे हुये गोलाकार हो कर का हिस्सा समका जल जाता है इस्से मन्दाग्नि या कोष्ठयदु हाने का सं. भय है । दूध भात या दूध रोटी चिनी के साथ रोज भोजन के आदि में खाना शरीर के। मोटा और बलवान करता है। दालभात दालरोटी और पिघरी के साए घी खाने से खाना अच्छी तरह हम हो जाता है एवं कोष्ठ परिस्कार और मन्दाग्नि का नाश होता है। यह भी याद राने के योग्य है, जैसा किमी कपि ने कहा है ॥ "शतं विहाय भोक्तव्य ससंन्नानमाचरेत् । लक्षविहाय दातव्यं योटिल्यहा रिमोत्: मयं माधारण को उचित है कि सैक्दो ज़ारी काम केो को माय पर भोजन करें क्योंकि भोजन काल के पहले ही खा लेने में मामध्य की हामि, सिरमें दर्द और मिशूपिका, शादि योगारी उत्पत्ति होने का डर आरोग्यदर्पण है दगी तरह भेजान के भगय के। धिता कर खाने मे यायु का विकार, गन्दानि अघि अजीर्ण रोग पैदा होता है । सुतां नियमित समय पर जन करना अति लाभ दायक है । फाष्ट अर्थात् जहां भोजन किया हुभा पदार्थ एकत्रित होता है तमो चार भाग मान कर दो भाग अ. नादि से, १ भाग जसा से परिपूर्ण करना और एक भाग यायु के मञ्चार के लिये खाली छोड़ देना चाहिये। भोजन का तीसरा समय ॥ चार पांच बजे साम को ममस्त द्रव्योपार्जनादि कामों से निष्टात हे। शोधान्तर शुद्ध चित्त हे। बतौर जल खया के के।ई पुष्ट कारक लड अधो लिखित में जो मुनामिय समको खाफर थे।हा लाल पी ले याद इ. स्के कामोद्दीपन ममाला से पूरित बंगला पाग का एक घोडा सा स्वच्छ निर्मल और इन सुगन्धादिकों से बासित हलका मस्त्र पहन हाथ में छ• हो ले मन प्रमन्न भौर श्रम निवारणार्थ किमी मगीचे में मा ऐसे स्थान में एक आध घंटा घूमने के लिये निकल जाय जहां हर एक अपने परम प्रेमियों से मेल मिलाप हो, या फिमी उत्तम हया दार दिध्य स्थान में येट फर दिख बहलाने वाली किताम देखे या मितार आदि रमणीक याध यजाय पा सुने, पा अपने परम इष्ट मित्रों से यातालाप करे इम व्यवहारों से परिश्रम की जो हारत है बिलकुल जाती रहती है. धित प्रसन्न भोर धातु पुष्ठ होता है, एवं उस व्यक्त को गजले की बीमारी स्थान में भी नही हो सक्ती है ॥ FAL फपिकच्छु (केवाछ) पाक ॥ केघाट के पीज की गरी - दूध धिनी र छोटी पीपा, गि जायफल, तज, तेजपात, लया, छः छः गासा, जायिती भोर शर चार चार गामा, छोटो लायगी, वंशलोचन, पुननंधा, मफेद मूमली, मोद चन्दम, अगर गौर करफरहा, एक २ साला, कस्तूगी एक या दो मामा प्रारोग्यदपंगा। कपूर ३ गामा, यदाम पिस्ता किमभिम और मुगक्षा आपाय इन सघ दवाइयों को अपग २ फूट कपड़ छान कर जपर कहे हुये गोपुर पाग की तरह इमे तय्यार फर यादाम आदि मेघा हाल तीन २ तोले का मेदिक धना ले प्रत्यह मुंध्या मगय ए एड गाकर कंपर से पाय भाध पाव दूध पी लेने से मय प्रकार का प्रमेह नाश होता है.॥ "तत्रापिक्षीग देहस्य वलपुष्टि विवईनम" कैयाहू दुर्यल और यल होन पुरुप क्यों न हो कुछ कान पर्यन्त इसके सेवन से अवश्य बली और पुष्ट होगा ॥ यदि उत्ता पाक न घन मके तो माने को घी में तल कर चिनी या मिश्री में पाक घना लें । रोज संध्या ममय तीन चार तोना खाकर दूध या जल पीले अगर यह मी न हो सके तो सिर्फ पाव या आधमेर अधावट दूधही पीले फ्योंकि उस समय फुछ पर कुछ साना बहुत ज़- . चौथा रात्रि भोजन ॥ यह तो लिखो चुके हैं कि एक प्रहर रात के भीतर ही भोजन क. रना उत्तम है कि । बहुत से लोग ऐमे भी देखे जाते हैं जो १२ बजे रात को आहार करते हैं पर यह बिलकुल वाहियात है क्योंकि भोजन या. स्तविक न परिपाक होने मे मधेरे दो तीन दले दस्त जाना पड़ता है और कुछ दुहार या गले में जलन होती है। -- अति लाभदायक शिक्षा ॥ शरीर के आरोग्य कारक अनेक विषय ऐमी हैं जिन्हे याद रखने मे सर्वसाधारण जन प्रति दिन क्या प्रति मुहूर्त लाभ उठा सकते हैं सुतरा आत्म हितकारियों को उचित है कि निम्नलिखित बातों पर अवश्यमेव ध्यान दें।

चारोग्यदर्पण। १ भोजन से उदर को बहुत नहीं भर लेना चाहिये क्योंकि अधिक खाने मे यदन वेकार और निकम्मा हो जाता है । २ एक आहार जम तक न पच जाय तय तक दूसरा शाहार कभी न करना चाहिये क्योंकि इससे अग्नि का दीपन पायन बल घट जाता है। ३ भोजन करके सतक्षाण स्त्री प्रसङ्ग कदापि न करना चाहिये इससे निशयही उदर मूग और अपहरद्धि हो जाता है । ४ अति भूस गयी है। तो पानी पी कर पेट न भर लें कारण यह है कि जलोदर रोग होजाता है, इसी तरह मति प्यास में मन सा लेने से गुरुम रोग होता है । ५ माणी मात्र को छः घंटे से कम और आठ घंटे से ज्यादा नही साना चाहिये। क्योंकि खः घंटे से कम सोने में मस्तिष्क में निर्यगता और आठ घंटे से अधिक सोने में शरीर में भारी पन और आलस्य प्राप्त होती है ॥ ६ शरीर पसीना से आई है। तो जब तक पसीना न मूग जाय. या कपड़े से अच्छी तरह न पोंछ लिया जाय तथ तक आकाशी हया विशेष फर पूर्व की बायु न लगनी चाहिये और न स्वेद युन शरीर पर पानी पहना नषित है समय यह है कि इन देनों कारणों से स्नायुयों में वायु के कोप से दर्द होने लगता है ॥ ७ दिस्यान्तेपिवैदुग्धं निशान्तेशीतलं जलं । भोगनान्ते पिवेत्तन किमन्वैर्भपजैर्नृणाम् ॥ मन्ध्या समय दूध पीगा अति लाभदायक है, मी लिये शास्त्रकारों धातु पर्दुक द्रव्य मन्ध्याही को साना लिखा है और पातु एतिकारक द्रयों में दुग्ध प्रधान द्रःप .

४२ भारोग्यदर्पण। • " धातुपुष्टि अग वलकारन जोकोई पूछे गाय । पय समान औषध नहीं जंगमें दिया बतायः ।। ८ प्रति दिन मृर्योदय से पहिले कुछ अंधकार रहते में एक और या सिसनी इच्छा हो यामी जल पीने से मम रोगों का नाश और १००, वर्ष फी आयु होती है, और यह क्रिया अर्श, शोथ, कुष्ठ, मूत्राघात, रक्तपित्त, असपित, मेद और उदा, नेत्र, कणं, गल गिर रोग एपं अस्ति शूल और त्रिदेव को नाश करता है पर यह भी याद रखने योग्य है कि मेते से उठ पर ततकाल जल न पी ले दश पन्द्रह मिन्ट ठहर, के जल पीना उचित है । उमी काल में नाफ से यामी जाल पीने से बुद्धि और दूष्टि की शुद्धि एवं जल्द याल का पाना, स्थभंग, पीनस, कासश्वासादि अनेक रोग नाश होते हैं । । लगोगन के अन्त में तक अर्थात् गाढा पीने से भोजन अच्छे प्रकार पच जाता है। १० (उदके आत्मानं न पश्येत् ) पानी में अपना मुन्न न देखना पा. हिये सवय यह है कि दृष्टि रजश गम में वायु का कोप होता है । मायुर्वेद (वैद्यक शास्त्र) के जाने वाले प्रिययर "त्यापशकुनिक पतितपापकारिणां नपप्रतिस्तव्यं एवं विद्या प्रकाशले गितमंशोधनार्थ हामांश्च मासोति" जम के तथा ग्राम पशुओं के मारनेवाले (गोपालक मलेक्ष) पक्षियो के मारने वाले तपा पतित ( हिन्द शाई हो गया हो और खाद्याखाद्य का प्रिपार न रखता है।) और पापियों को जीपध न करना इस आवरण से विद्या सफल होती है लेोक में मित्रता बढ़ती है यश हेता है धर्म, अर्घ काम और मोक्ष प्राप्त होते हैं । शुश्रुत जन.मि दूध घृत उत्तम सम्मादिकी से शरीर पुष्ठ और यालापान रहता है तो मायः खाने की कोई जरुरत नहीं है । मांस खानेवाले इस को याहुत कुछ सगाते हैं और ऐमाही है भी लेकिन विचार करना चा.

आरोग्यदर्पण। हिये कि किम समय पर किस चीज की आवश्यकता होती है। स्था. स्थ्य में मांस खाना व्यर्थ है और देसला सके हैं कि और २ पदाई सा घर के गांस की अपेक्षा अधिक फल पा सक्त हैं, तो अच्छे विच्छे में भी पशु का खाना पशुओं का काम है, जा की तुम्हारे खियां चन्द तरह के यस्तु खाने पीने के लिये ऐसे, तेय्यार हैं कि जिनके खाने पीने से दिन प्रतिदिन बलिष्ठ और पुर्षार्थी हो सो हो तो क्यों या मांस खाकर व्यदनाम होते हो। तुम्हारे. पूर्व के पुरपे जिनका इतिहास दिन रात बांधा और सुना करते हो। पे तुम से किम घात में कम थे, या वे मांसाहारी थे? कभी नहीं। विधार फरके देखिये भारतवर्ष, चीन, और जापान में करीब ३० किरोड़ बौद्ध मत वाले हैं और सब लोग जानते हैं कि यह लोग कुछ कग जेार नहीं हैं और यह भी नहीं है कि एग लोगों की जिन्दगी घोड़े दिन की होती है इस लिये हे प्यारे बांधयगमा दया की हालत के छोड़ जहां तक बन पड़े मांस भक्षण त्याग करो इ. ममें तुम्हाराही फल्याण है ॥ गरमी के दिन बीत जाने पर हलके कपडे को फ्रमशः यदागना पाहिये जाड़े के दिनों में शरीर रुइंदार और ऊनी कपड़ों से आरोग्य रहता है॥ जाड़े के दिनों में लोग रात को सयन करने के मकान की सियास यन्द रसते हैं घाहिये कि सूज तह के उठ कियार और खिड़कियों को कुल साल तफ रोल रक्सा फरै पोंकि सराम हवा जो रात में एकट्टी होती है निकल जाती है ॥ गद्यपान इस देश में जैसा फैला हुआ है और फैला जाता है उसका कारण गुप्त नहीं है बिद्वान लोग ममी जानते हैं। जहां तक आयुर्वेद द्वारा जयालोकन किया जाता है गद्यपान (जो गिर्फ नशा करने के लिये पति ) किमी सरई पर गुसं दाई नहीं है। सत्ता यल्कि भनेक तरफ राग पैदा हो सक्ते प्रत्यक्ष कि इसी को मित्रता गाया अपने मान के। घुलागा है, प्रायः देखने में भाया है कि इसके पौते २ कितने लोगो ४४ आरोग्यदर्पगा। फार और पागल हो गये हैं । अति सुरापान से गस्तिष्क का नाश और यहुत से रोग, यक्ष्मा, स्वास और काश पैदा हो जाते हैं और रक्त का कोई उपद्रव उठना तो गवाही नही है और यह भी है कि जो अति सुरापान से रोग होता है उसे अमाध्यही जानना चाहिये फिर धन्वन्तर भी उमफी चिकित्सा मही कर सक्ते हैं, इसलिये हे व्यारे भ्रातृगणु दया की हालत को छोड़ और किसी तरह पर सुरापान करना उचित नहीं है बाकी बयान सुरा के प्रफर्ण में करेंगे। यात तम्याफू और चुरट को भी पीना न चाहिये पयोंकि एमफे अभ्यास से भांत, फुफुम (फेफड़ा) हृतपिंड (दिल) मस्तिष्क और दांत कमजोर हो जाते हैं । क्योंकि शीतल यायु से दिल को ताफत कायम रहती है और भाभ्यन्तरिक आशय मजबूत होते हैं इस हेतु दवा के अतिरिक्त तम्बाकू मादि का पीना वाहियात है। सात आठ बजे रात को एक मरतये न सेा के एफबारगी रात को पढने से और अधिक श्रम करने से बुद्धि तीव्र नहीं रहती इसलिये नियम के साथ दिनही में या तीन चार बजे रातको उठ के पढ़ना उत्तम है ले. फिर चिमनी या किसी किस्म की तेज रोशनी को पाखों के सामने रस्य कर पढ़ने से गेस्त्र कमजोर हो जाते हैं इमलिये यदि रातफो पढ़गा होता नेत्र को बधा कर रोशनी रक्षे या लम्प परहरी चिमनी लगाधे या चि. मनी पर मार रस कर पढ़ मक्ते हैं । जाड़े के दिनों में जो मकान मोड़ या पानी से तर रहता है उस मकान में बिना अग्नि रक्खे रहना निषेध है पयोंकि जाड़े के ऋतु हुत अधिक सरदी से अलग रहनाही उत्तम है,. कारण यह है कि इम तु में अति ठण्ड जल हया और सरद भाहार आदि के सरदी की अ- धिकता से उयर खांसी जामयात और अतीसार आदि रोग पैदा हो जाते हैं। बिना जाने यूके और परिक्षा के किसी के हाथ से कुछ चीज विशेष । आरोग्यदर्पण। ४५ कर पान का बीड़ा न साना चाहिये इसी प्रकार मूर्ख वैद्य ( अताई ) के हाथ की दवा खाना और जहर खाना दोनों घरायर है क्योंकि शास्त्र- फारों ने इम यात का यहाही निषेध किया है, कारण यह है कि:- औषध्योऽमृतकल्पास्तुशस्त्राशनिविपोपमाः । भवन्त्यरू पहृतास्तमादेतीविवर्जयेत् ॥ औषधि जो अमृत के समान हैं वे उग अशिक्षित वैद्यों के हाप से शस्त्र यज अथवा बिप के ममान हो जाती हैं इसलिये मूर्ख चिकित्सकों के हाथ की औषध कभी न खाय ॥ मेहादिष्यन मिनीयःछेद्यासुचकम मु । सनिहन्तिजनला भात्कुवैद्यानपदीयतः ॥ जो वैद्य ममय पर पसीना देना अथवा छेदमभेदन (चीरफाड़) आदि क्रियाशों को नहीं जानता यह लोभ मे रोगी के प्राण को नाश कर देता है और उस इत्या से राजा पापी बनता है क्योंकि उसने अपने में ऐसे मूर्ख को चिकित्सा फरने का अधिकार क्यों दिया ॥ जो वैद्य केवल शास्त्र को जानता है और फर्म का नहीं जानता इसी तरह जो क्रिया को जानता है परन्तु शास्त्र के बोध से रहित है यह वैद्य रोगी को पायकर घयहाय जाता है जैसे कातर पुरुप रण में घमहा जाता है राजा को उचित है कि ऐसे वैद्य का मरया हाले। फिर आज कल यहुत से वैद्य ऐसे भी देखने में माते हैं कि कुछ पढ़े लिखे तो हैं पर उसके तत्त्व (गीतरी मतलब) को बिलकुल नहीं जानते तो धम गनुष्य चा है सब शास्त्र को पढ़ ले परंतु बिना अर्थ के जाने यह शास्त्रज्ञ नहो कहलाता केवल शास्त्रों का भार उठाने वाला है । "यथा खरचन्दन भारवाही भारस्यवेत्ता नतुचन्दनम्य" जैसे गधे पर चन्दन लादने से गधा केवल चन्दन के भार को जानता है परंतु उसको सुगन्ध को नहीं जानता राज्य आगग्यदर्पण सुबह का उठना॥ २ अगर आदगीको मबेरे उदना होतो उनको रातो सयेगी माना जर है। बहुत रात आ जाने पर जो सोते हैं वे मवेरे विखौना परसे नहीं उठ मक्ते । अगर यह उठें भी ते कुछ फायदा न होकर यहुत तरह, की सराधियां पैदा होती हैं बदन दुयला और रोगी है। जाता है, मिा भारी मालुम हेाता है, आंखों में जलन होती है और किसी काम के फ गही में उत्स ह नहीं होता । इमलिये अगर मार के धक्त चार पांच बजे पिलौना पर से उठने का नियम फरमा हातेरात को नव दम पजे सेोने का अभ्यास करना पड़ेगा और यही करना उचित है । - A रात को ज्यादे न भाग कर सोने की आदत लगाने से सुबह को उठ कर अपना काम अच्छी तरह हो सकता है सिर्फ इतना ही नहीं होता पर हममे बहुत तरह की आफतें, डर और धुरी बुगे पातेने भी बचाव होता है । साधी रात के अधियारे में छिप कर और इमे सुयोग मग फर बहुत से लोग अपने पैरों में आप फुरहाही गारते और नरक का द रयाता खोलते हैं और अन्तको जन्म पर पछताया करके भी अपने किये हुए युरे कामों के फल से छुटकारा नहीं पाते ऐसे भी भादगी वात में देखने में आते हैं कि जो अपने किये हुए युरे कामों का पाल अपने ल- के पाले तक फैलाते हैं और उनके विधारे लड़के को निरपराधी है। कर भी अपने पिता के किये हुए धुरे फों का फल भेगना पड़ता है। ऐगे नरक के जाने वाले, अपनी सी जिन्दगी में दाग लगाकर मिर्फ का पही दुःख नहीं भेगते पर इस पृथ्वी पर बहुत से दूभरे मनुष्यों को गी दुःख मागर में डुगाते है ऐमे आदगियों के जिन्दगी पर घिर है। . an भाइयो, तुम कमी गी इस तरण की बुरी चाग गरी भूल करमा । हर | मरा करके रात के ९.१० वो मेनि की सादत लामो और भार को चार पांच बजे उठो और नम भर इमो नियम का पालन करी एम निया के चलने में हिमाण करके देखा कि जिन्दगी के दिग कितने पाराग्यदपणन . बढ़ जाते हैं। एक आदमी चार बजे हर रोज उठ कर अपना काम शुरू फरता है । और दूसरा भादगी छः बजे उठ कर काम शुरू करता है । यदि वे दोनों रात को एकही वक्त सेायें तो ४० परस के बाद मालूम प हेगा कि पहिला जादमी दूमरे मे १० शरम ज्यादे बघा । इस तरह हि. माय करने का मतलब यही है कि अमल जिन्दगी पपा है ? एम यातको अगर अच्छी तरह सेोघा जाये तो, चपन का सेल, स्नान, खाना पीना माना, राग वगैरह फागों में जो यक्त योतता है यह छोड़ कर सिर्फ कई घंटे जो.हमलोग हकीकत में अच्छे कामों में पिताते हैं जमी का नाम अमल जिन्दगी पराने से, भले कामों में, मनुष्य के जीवन का यहुत हो फम धक्त सर्थ होता है, यह तो साफही जाहिर है इस तरह हिसाब करने से जो जितना उपादे काम कर सकता है लमको उतनाही यही जि न्दगी का आदमी कह सकते हैं और इसी लिये उन दोनों भादमियों में एक आदमी दूसरे से दश बरस उपादे जीना ॥ एक य ज्ञानी ने कहा है कि, सुशद इण्ढी हया में कोई ऐसी एक चीज है फि जिससे लाल सून को तेजी बढ़ती है । मारा शरीर तेजस्व होताहै, भोट लाल होते हैं और बदन समझी जगह से सुहौल होती है इसलिये मैं कहता हूं भाई यदि तुग दीर्घजीवी हेना चाहा, रकर आ. योजसे जिस तरह निर्मल ललका सेता बहता है उसी तरह अपनी नसों सून यहै यह चाहते है तो अपना विशोना सुबह को तहके छोड़ो और परिंदों की भांति नेहाल है। कर ईश्वर का भजन करते हुए फिरने फेो बाहर निकल जामो। तय यह मालुग होगा कि मनुष्य इस जिन्दगी में कितना सुखी है। सकता है। पदि इस जन्म में मनुप्पों के उपकारका कोई बड़ा काम करना पाहे. यदि,अकाल मृत्यु से यध कर बुढ़ापेर्गे सुख से ईश्वर का मजन करते हुए प्राण देना चाहे, तय प्रण कर के नियम के साथ तह के उठो, सूर्य निकलने के पाहिले आपस से भरेहुये बिछौना को छोड़ो..घर की रुकी हया से बाहर निकल जाओ। थोड़ी देर तक साफ शोर ढण्ढी हवा साशो !, ईश्वर का नाम ले कर उत्साह के साथ काग में ४८ आरोग्यदर्पण। लगा, तभी तुमको मालुम होगा कि तुग कितनी तरझो करते हो और कितना काम कर डालते हो तुम अपना काम अपनी तरक्को और फुर्ती देस फर आश्चर्य में आ जाओगे ॥ ऋतु॥ - शरद ऋतु। शरदऋतु गप मुनियेको मतमे कुमार कार्तिक गिने गये हैं । सुश्रुत में भी इमो प्रकार पहिले ऋतु का वर्णन किया है पर दोनों के एकटा होने और काप करने और उनके सम के लिये दूपरे प्रकार प्रातु संज्ञा बांधी है जिसको मय वैद्यक शास्त्रानुपाथियों ने माङ्गीकार किया है। ये भादों कुमार को पर्या कहते हैं और कार्तिक अगहन के। शरद ऋतु कहते हैं । यथार्थ में भी दोषों का एक्ट्ठा और केपि होना आदि इसी प्रकार की तु यांधनेही से ठीक होता है। यद ऋतु मनुष्यों के स्वास्थ्य और शरीर संबोधन में जमा लाम दा. यह है मगी जानते हैं । इमी त्रातु में स्नेह, स्वेद, यमन, जुगाय और रक्त क्षिण (फस्त लेना) उत्तम होता है इस ऋतु में खाने पीने का ममय अवश्य ठोक २ रखना चाहिये । अाजकल प्रायः भाग्न मन्द और अजीर्ण द्वारा ज्यरादिक रोगात्पन्न होने का सम्भय रहता है पोंकि ". पनि गीयतेपित, शरत्काले प्रफुप्पति" बर्षा ऋतु फा एकटा हुआ पिरा, भरद मातु में काप करना है। दमी हेतु. शारङ्गधर ने विशेष,कर १५ रोश अवश्य अल्पाहार करना लिया है ।। "यार्तिकस्य दिनान्यडौ पठौवा ग्रहणस्य च । 'यगंद्रष्टा समाख्याता खल्पाहारी सुग्वीभवत्" । कार्तिक शुक्ल पक्ष की अष्टमी से अगहन की अष्टमी पर्यन्त यम दन्ट्या मंजक दिन है इन दिनों में स्वल्पाहारी मनुष्य सुख से रहते हैं '- - पाराग्यदर्प। ४६ इम ऋतु में पित सान कारक आहार विहार फरना उचित है। जैसा कि, मूंग, पुराना घायल, जंगली जानवरों का मांम, जप, गिनी का स. रयत, शईत, ताड़ी, गाय का दूध, आदि और जो २ मगप के फलादिक हैं अपनी प्रकृति के अनुसार भोजन करे। वृक्ष की छाया, कपूर और स्वेत चन्दग का लेप कुछ चन्द्रमा की मेयो, मुगन्धित पुप्यों की माला, सफेद और हलका यस्त्र पहिरमा, मुम्घादु शीतल तथा निर्मल जाए पीना, आज कल प्राय: सभी जाल निर्मल हो जाने के कारण पीना लिखा है । परन्तु आंमृद और नदी का जाल जैमा गुण दायक होता है ययान करना था है । लेकिन यह नदी जिगका जल कहीं से रुका न हो न गाय भैंस और घोड़ा आदि पशु पाहां धोये जाते है। जहां मनुष्य स्नान न करता हो धोषी कंपदा न धोता हो। और शहर गावे के नामदानों की मारियां जहां पर न लगी हों। यहां का जल पीना उत्तम है । प्रायः जो नदी हिमालय से निकली हैं या जिनकी धारा यालू तथा पथरीली भूमि में तीव्र गति मे यहती है उनका जला पति हलका, गि- मल और अमृत के समान होता है यह पूर्व काल के सुश्रुतादि वैद्यों ने परीक्षा करके देखी है इसी कारण गंगा जी का महात्म यहां तक बढ़ गया है कि नाम लेने से पाप पलायमान होते हैं ।। (आंसूद जल की विधि ) प्रातः काल एक धड़ा में जमा भर कर धाम में रख दो और राति को पैसाही रक्या रहने दो दूभरे रोज़ छान कर पीने को रख लेो याद नमी प्रकार घड़े को जल से भर कर फिर रख दी। यह माल मूर्य के किरणों से सपा और चन्द्रमा के किरणो से या अधी पसित बोस के गणु मात्रों से शीतल हुआ अमृत के समान हो जाता है। बात, पित्त, कफ, रक्त इनका सम कारक, बल इद्धि कर, अरुचि क्षय, और मन्दागि का नाशफ एवं नेत्रों को अतिलाभ दायक है ।

५० आरोग्यदर्पण। -- निषेध । खटाई, गर्म पील, क्षार, मदिरा, दही, आठमी, तेल, ज्यादा नमः कीन बस्तु, दिन का सोना, घाम व्रत करना, रात्रि जागरण, मैघुन । क्रोध और जो २ पित्त के यढ़ाने याठी वस्तु हैं मेयन करना मय वैद्यों ने शरद ऋतु में मना किया है इस मून पर कार्तिक और अगहन के जितने पर्व हैं सब उत्तम भोशन विशिष्ट हैं । जैसे दियाली, अन्नफूट, भ्रातृद्वितीया, रामपूर्णिमा, देव उठानी एकादशी को भी यहां मब म. कार उत्तम फल फूल भोजन करते हैं । यी रितु फा उत्पन्न चीजें विष्णु को पहिले समर्पण की जाती हैं । इसका कारण . यही है कि वर्षा ऋतु में सब औषधियां निरम और विदाह करने वाली रहती हैं वे, ऋतु में रम युक्त और बलयती हो जाती हैं और आजही काल की म- ग्रहीत औषधियां साल भर गुण दापत रहती हैं। यह भी एक प्रधान कारण है कि यनियों के यहां की औषधियां कुसगय के संग्रहीत होने से गां पर अपना यथार्थ गुण नहीं दिखातीं ।। शरद *- हेमन्त ऋतु । पीच और माघ महीने के। हेमन्त ऋतु कहते हैं । जाज फल अग्नि की तीव्रता से भोजन पचायत पच कर उसका रस शीघ्र खिंच तमाम शरीर में पहुंग गाता है "नत्मात् स्निग्धं तदाहितम्" मु० इममे स्निग्ध पदार्ग अर्थात् घी दुग्ध आदि अधिक हित करता है। यही कारण है जो इम ब्रतु के थाने पीने में प्रापः आयुर्वेद ग्रंथकारों ने स्निग्धही.नि. गप लिया है और प्रत्यक्ष भी है कि कुमार निर्षल पयों न हो जाड़े में अवस्याही कुछ अधिक खाने लगता है। हम निस्सन्देह का सक्ते है कि एम तु में जो गनुष्य भयग सहित पणिष्ट धातुत्पादक द्रव्य भोजन क. रते हैं उनका. यल एक यर्ष तक कदापि नहीं घटता । इस नातु के साने योग्य पाक॥

आरोग्यदर्पण। ५१ को मूसली पाक । मूसली सफेद देहली की 51 गौ का दूध ४ सेर, घी पाय भर, चीनी २ मेर, जायफल, लौंग, केशर, सेठ, पीपर, मिर्च जायिती एसय छः २ मासा छोटी लायची, त्रिफला तज, तेजपात, जटामासी और नाग केशर ए छ जीजें एकरताला । केयांछ का योग, धनियां और बंशलोचन दे।२ तोला, पहिले सय दया को अलग २ फूट फपर छान कर ले। दूध को एक कहाही में हाल भेटाये जय देसे कि तीन हिस्सा दूध जाल गपा एक हिस्सा माकी है सघ मूमली के चूर्ण को उसी में हाल सूम घोंट ले जय सूध गाढ़ा खोमा के मानिन्द हो जाय तय उसी में घी डाल खोये सूघ भूजे जय महक उठने लगे और रथा उसका विथर जाय उतार ले । याद चीनी की गाढ़ी धामनो घना उसी में खोया और राब दया को मिला ऊपर से बादाम की गरी आधपाय पिस्ता आधपाय चांदी का यर्फ २० हाल आधी २ उँटाक की गोली बना ले प्रातः और सायङ्काल एक गोली खा के सापर से पाय भर गौ के दूध पीने से अवश्य प्रमेह जादिक रोग लाराम हो यल बीर्य बढ़ता। वैद्यक शास्त्र, पा के गुण यहां तक लिखा है कि खाने वाला कामदेय से अधिक रूप और सहस्पति से भी अधिक विद्वान हो जाय परञ्च परिक्षा लेने से ज्ञात हुआ कि जिम तरे हरएक स्तोत्रों में कमियों की तरंगे घुमी हैं उसी प्रकार यह भी है ॥ रतिवल्लभाख्य वृहत्पूंगीपाक ॥ दक्षिणी चिकनी सुपारी डेढ़पाव, गौ का दूध ५ सेर, धिनी ढाईसेर. घी पायभर, छोटी पीपर, जायफाग, जावित्री, तेजपात, शोंठ, लौंग, के- शर, गजपीपर, कचूर, मेथी, छ २ मामा । छोटी लायची, गुलसकरी, घ. रियारा के जई का छान, दालचीनी, खस, सुगन्धवाला, माथा, त्रिफला, बंशलोचन, शतावर, केयांछ का बोज, मुनक्का, तालमखाना, बहा गोखुर | छुहारा, तीसुर, धनियां, सूखा कसेरू और सिवाड़ा, मुलेठी, य, जाटा- में हर एक - - ५२ पाराग्यदर्पण। मामी, सौंफ, सफेद मूमाली, असगन्ध, मिर्च, चिरौंजी, सेमर फा योज, ह. गलग? फी गरी, स्वेत चन्दन, और लाल चन्दन, ए सय एक एक तोला कस्तूरी, शुद्ध कपूर, अगवेधी माती, गुलाम के अर्फ को घांटी चार २मामा, बदाम को गरी और पिस्ता माघ २ पाय, चांदी का वर्फ २० सेनेिका यफ ५ सय दवाइयों को अलग २ फूट फपरखान कर पूर्वोक्त रीति से पाक घना उसी में सब औषध हाल आधी २ उँटाफ का मोदक बना दोनों म मय एक २ लड्डू खा ऊपर से पायभर दूध गिनी मिला के पिये। कुछ दिग बराबर इसके खाने से धीर्य अधिक बलयान हो क्लीयत्व नष्ट हो जाता है। और जिन मनुष्यों का बीर्य प्रम न रुकता हो तो इतनी औषध और मिला देय । अफरफरहा नाला, शमुद्रशोध, पास्ता का दामा और धुगी हुई भांग छ २ माणा दूध का साधा हुभा धतूर फा योग ४मासा॥ -- हेमन्तऋतु का पथ्य ॥ घी, दूध, मांस, वर्द, मिश्री, ऊख, मद्य (बलकारफ जर्फ) और रित के पल इत्यादि मरुत के अनुमार खाये शरीर में तेल गर्दन, फमरत स्त्री प्रमा, शशि का सेवन पटे मकान में सेना गर्म जल का पीना इत्यादि इस रितु में वैद्यों ने उत्तम लिखा है तथापि पाठक गणको इस यात पर अवश्य प्रतिक्षण दत्तचित्त रहना चाहिये फि फोन मी शातें हमारे लिये घटप्रद हैं और कौन सी नहीं, यथा स्त्री प्रमग पाहै जो रित है। प्रति. दिन करना हाथी मरीसे बलवान को भी मदिया गमान कर युद्दों के कोटि में कर देता है। यदि ऐमाही अति कामी हे। तो इम रितु में भा ठो रोज प्रसंग कर सक्ता है नहीं तो वही वेदानुसार माम २ में उत्तम "भागकातापना"चाहे गाटासे जादा फ्यों न पड़ता पित्तप्रकृत वाला और जिमको सून की बिमारी हो कदापि न चाहिये । अतिकाल तक घागर्ने रहना किमोरित में अच्छा नहीं है क्योंकि "शासपस्स्वेदमूलाराकपित्ततृष्णा गा, दाहं बिपरणांपुर्य देतांछायाव्यपोहति" जादा घाम में रहने से पमीना भिर में गर्मा र पित्त पिपाम ओंकाई घुमी शरीर में जलग आरोग्यदर्पण। .५३ और चेहरे का रंग काला पड़ जाता है, इन सयों की शान्ति छाया से होती है। . - वसन्त ऋतु॥ फारगुण और घैल महीने को बसन्त कहते हैं हेमन्त ऋतु का सश्चित कंपा भाजफल काप करता है । इस ऋतु में कसरत करना, शाम सवेरे हवा खाना, चिनी का सरयत जादि शीतल पदार्थों का सेवन करना य हुत फायदा करता है । परन्तु सबसे बढ़कर इस ऋतु में कै करना और जुलाय लेना उत्तम लिखा है और देखा भो गया है कि अच्छाजुलाय होने से शरीर हलकी और चित्त प्रसन्न हो जाता है पर अंटकर पच्चू किसी को पनाई हुई कही जुलाब ले लेना यिगकुग वाहियात है । का रण यह है कि जुलाय का पच जागा या तादाद से जादा दस्त का मा जाना शरीर को नाश कर डालता है। चरक, सुश्रत और यामह इनका मत यह है कि बिना स्नेह घी आदि चिकनी चीज पी के नाडियों के मल को फुलाना ( स्वेद ) फूले हुये नाड़ियों के मल को पमीना के द्वारा पाहर निकलना ( यमन ) पित्त को ऊर्द्ध मार्ग से गिराना ( जुलाख लेना उत्तम नहीं है । यूनानी हिकमत में लिया है फि वगैर मुजिस ( दोष पकाए नये ) के सुस्साहस न लेना चाहिये । हारी में इसका कुछ विचार ही नहीं है, इसी से डाकृरी जुलाय यथार्थ गुगल नहीं करता इस लिये हम आपलोगों के उपकारार्थ दे। चार साधारण २ जुलाब लिखे देते हैं फि जिनमें सेवाय फायदा के हानि नहीं है ॥ मुञ्जिस हकीमी॥ खीरा ककड़ी का बीज १॥ ताला, गुणयनप्ता, गुमानीलोफर, गुलाय और ये सय एक २ तोला, मुलेठी ८ मासा, उन्नाय १४दाना मालूबसारा २० दाना, लाहा २० दाना मुनक्का १५ दाना, सय दवा को अारोग्यदर्पगा। तय, एमिड हाल शीघ्रही पी गाय । सोडा एमिड अंगरेजी दया साना में तो एक के आठ देना पड़ता है पर मौदागरों के यहां मेला एक पौगड (आधसेर) SJ का और टाटारिक एसिड ४ ओम (माधपाय। फा मिलता है । एवं शीतल जल या धर्फ का पानी फायदेमन्द है, धर्फ का गुण प्रथम अङ्क में लिख चुके हैं. यहुत मे लोग जानते हैं कि यर्फ की. तामीर गर्म है जय गरम है तो, टोग जाड़े में क्यों नहीं पीते और शीत को बिमारियों में ययों नुकसान करता है जानना चाहिये कि । शीतल परिश्रुत जल (फिल्टर याटर) का गुणं है यही वर्फ फा, रहा यह कि उपादा ठगंढक की यजे से जाउ की अपेक्षा यर्फ फा मिपाक किश्चित . धिक गरम है ॥ दिन को तःखाने में या पटे हुये मकान में और रात्रि को जोम में शयन करना गुण दायक है। दिन केो शयन करमा सेवाय पस ऋतु के गौर ऋत में घर्जित है। सर्व पुदिवाखाप: प्रतिसिद्धोऽन्यत्रीमात् प्रतिपिहेष्व पितुं वालधस्वीकर्षितक्षत क्षीणमद्यनित्ययानवाहनध्ववाम्म परिथान्तानामभुक्तावतां मेदाखेदकफरसरक्तचौगागाम जार्ग नांचमुहूर्त (घटिकाइयं ) दिवास्वपनमप्रतिसिद्धम् सु. गा औरया अ०६॥ मिषेध में भी बालक, रद्धः स्त्री को शित फोड़ा से पीड़ित, धातुक्षीण याला रायी, घोड़े हाथी आदि को मयारी मे पा रास्ते का थका. भूषा, मेद पमीना रम और रक्त करके क्षीण और शिमे अजीर्णमा बना रहता हे तो ये लोग दिन में दे। घड़ी से सक्ते हैं । दिवाखाप:प्रकोपाञ्च कासस्वासप्रतिश्यामशिरे।गौरवान महाऽरीचयाञ्चराग्निदौर्बल्यानिभवन्तिः ॥... PM भाराग्यदर्पण। दिन के सोने से मनुष्य को खांसी, स्वाम, जुकाम घिर में भारीपन अंग में दर्द, रुचि, ज्यर और शरीर दुर्वल हो जाता है । रात्रावपिजागरितवां वातपित्तनिमित्ताताएवोद्रया भवन्ति तस्मान्नजागृयाद्राची दिवास्वप्नञ्चवर्जयेत् ॥ यही रोग रात के जागने से मात पित्त करके हेोता है इसलिये दिन के सोयना और रात के जागना वर्जित है--ऐसाही यदि अति जरूरत रात के जागने की पड़े ते (रात्रायपिजागरितयतांगागरितकालादमि प्यते दिवास्वप्नः ) चाहिये कि जितना फालतक रातको जागे उसका आधा दिन को शयन करे॥ • यह भी सब पर विदित है कि और ऋतों की अपेक्षा इस ऋतु में सप्ण प्रकत वाले को अधिक सेश मिलता है अतएप उन्हीं के कल्याणार्थ कुछ औषध लिखे देते हैं। छ; मामा यिहीदाने को डेढ़पाय जाल में एक मृत्तिका पात्र में मि- जा फर रात को भोस में रखदे, सबेरे सूब गलकर लुभाब निकाल लेय याद उसमें एक ताला मिश्री डाल पहिले एक या दो आंवले का मुग्धा खा कर ऊपर से वही बिहीदाने का मरयत पी जाय । मी प्रकार सबेरे भिजा पर किसी ठण्ढे मकान में रखदे शाम को उक्त प्रकार सेवन करे। इसी प्रकार दो महीने यरायर पीने से अन्तम दाह, हौल दिल, घुगरी, समलमायु, मिरगी और बातों का अधिक मिस्मृत होना जाता रहता है। . अन्यच ।. खीरा ककड़ी का योग, धनियां, काहू का योज, कुलफा, फागनी, गुलाब का फूल और सेयती का फूण दो २ तोला खस सफेद चन्दन का बुरादा कमल गट्टे की गरी, सौंफ, मिर्च एक २ ताला छोटी हायची छ मामा सम को अधकचरा कर दे। दो तोले की मात्रा बना ले एक मात्रा को. पाषभर जल में रात को मिजो सबेरे सूय मल के छान कर दो तोला पूर भारोग्यदर्पण। चिनी छोड़ पी जाय, इसी प्रकार दोनों समय पीने से अधिक फायदा करता है। पेठे का मुरब्बा। पेठे फा गूदा दो सेर चीनी दो सेर, पेठे के टुकड़े २ घना कर यांस फी गुदनी से गोद फर चूने के पानी में घड़ी भर डाठ रबखें फिर सफा पानी से धो फर किसी तांबे के बरतन में थोड़े से पानी में ढाल फर जोर दे जय पेठा बाधा गलजाय उतार पानी से निधोए ठंढा फर लें। फिर चूरे की चासनी पकी फर उसमें उन टुकड़ों को डालकर थोष्ठी देर तक जोस दे जय शीरा उनमें भरजाय उतार फर ठंढा फरले । जय देरो शीरा बहुत पतला हो गया है तो उसमें से पेटे को निकाल चासनी को थोड़ी और गाढ़ कर उसमें फिर पेठे को डाल देय बाद इसके सपोद जीरा, धनियां, तेजपात इलायची छोटी, गिर्घ, यमलोचन दो दो तोला. और चांदी के वर्फ २० सयों को पूर्ण फर मिला अमृतधान में रख दे । इसको शाम सधेरे खाने से रक्त पित्त उपर, छयो प्यासोखास, कासादि रोग छूट जाते हैं विशेप कर धातुक्षीण याले को अधिक पायदा करता है ॥ - ईश्वर ने मनुष्य के चारोग्य रहने के हेतु समय पर अनेक प्रकार के फलफलादिफ उत्पन्न किया है चाहिये कि मनुष्य अपने मिजाज के मु माफिफा देस जयश्य थोड़ा बहुत रोज २ फलों को खाया फरें इसलिये हम समय के फलों का भी कुछ गुण ठिसे देते हैं हिनवाना। इसमें कुछ निमक फा भी अंश है सुर योजयाले में रुपण योजयाला हिगयागा उत्तम होता है, (गुण ) दूसरे दरजे फा शीतल है इसका यिपाफ गर्म है धातु को क्षीण करता है और पित्त बटुक एवं कफ वायु का नागा है और फफ सांसी वाले को अधिक फायदा करता है ।

आरोग्यदर्पण। ५६ खरबूजा। चतुर्थ श्रेणी में ठगडा है, (गुण ) बायु पित्त का नाशक एवं दिशा पेशाब माफ लाने वाला है विशेष फर सुशाक वाले को अधिक फायदा करता है। वेल । विशेष कर ग्रहणी और जामशूल को नाश करता है लेकिन बड़े बेल की अपेक्षा छोटा बेल किञ्चित गर्म है एलका और शीघ्र पचजाता है लेफिन स्वाद में फटु है ।। फालसा। द्वितीय दरजे का शीतल है स्वाद में कपाय और अम्ल है परञ्च पकने पर मीठा हो जाता है और खाने में भी मीठा ही फारसा गुण दायक होता है (गुण ) दिल का घड़फना घुमरी पियारा अन्तर्दाह रुधिर की गरमी, गरम ज्वर ( पात पित्त ज्वर ) धातु क्षय इन रोगों को आराम फरता है विशेष कर चीनी के साथ इसका शरयत बड़ा फायदा करता है। प्रावट ऋतु मापाढ़ और श्रावण महीने को प्रारद् ऋतु कहते हैं ग्रीस भत्तु का संचय ( संग्रह ) वायु इस ऋतु में कोप करता है । इसलिये भाज कछ मायु शमनकारी आहारादि करने से यायु यलहीन हो जाता है । घी, दूध, प्रत्यादि भोजन एवं यदग में मही ठगा के कसरत फरना :- धिक फायदा करता है। प्रांम । . इस बातु में ईश्वर ने मनुष्य के साने योग्य एक उत्तम फल गि फा आरोग्यदर्पगा। ऐमा उत्पन्न किया जिसफा मंमंशा करतो व्यर्थ है हम तो जानते है स्वर्ग में भी इससे चढ़कर फल न होता होगा १ वैद्यान में मांग के गुण अधिक लिसे है, इसमें कुछ सन्देह नहीं है कि जाम के पर्याङ्ग में अनेक प्रकार के गुण भरे है ॥ आम का फूल । इसे छाया में सुखा चूर्ण कर परामर की मिश्री मिला ६ मामा के अंदाज दोनों समय जला के माथ खाने से अंतीमार, प्रमेह कफ पित्त, अरुसि सधिर एयं दृष्टि रोग माराम होता है । परन्तु फेघष यायु सद्धि रोगी को फग फायदा करता है। प्रांम की गुठली। पफे मांग की गुठली के भीतर की गरी का चूर्ण सांड. या दही के साथ खाने से बगन पतीसार.और पेट का दाह हर लेता है ।। आम का पत्ता। भांग के मुलायम नयीन पत्ते के चूर्ण से फपा पित्त का नाश होता. है, दृमरे हरएक मंगल में इगफा बन्धनयार बना कर घरमें बांधने से ग्रह की शोभा और देवता तक ममन्न होते हैं। प्रांम पेशी अर्थात् अमचूर. इसका स्वाद सहा और मायला हैं पर खाने से दस्त साफ और कपा यातको नाश करता है ॥' आम की खटाई। यद्यपि खाने मे फुख धातु में विकार पहुंचाती है, पर लगाने से ख- जुली विशेष कर बकरी के मूत्र से या भोर कोई फदकीले जानया के छु जाने से शरीर में पायला सा पड़ जाता है यह शीघ्रही माराम होताहे ॥

आरोग्यदपण। लगाने की तरकीव । मांग की पुरानी खटाई २ तोला ढांक के पत्ते को ढिपुनी १ तोला मिर्च १० दाना सबको महीन पानी में पीस याद सौ पानी का घोया हुआ घी छटांक घी में फेंट दोनों समय लगावे और एफ मरतये रोज नींब के पानी से धो डाला फरै॥ प्रांम का छाल। आम का अन्तर छाल २ तोला कुघल कर पावभर जल में रात को भिगा मोस में रखदे सधेरे मलकर छान २ गासा शहद डाल 9 रोज पीने से रक्त पित्त अर्थात् मुख से या दस्त से या दोनों रास्ते से पित्त के साथ ठेहू का गिरना अवश्य जाता रहता है । अम्रातक अर्थात् अमावट । इसे इस तौर पर बनाते हैं कि पके आंग के रस को किमी काठ या पत्याल शादि धिको पात्र पर फैला के घाम में भुम्बावें, ऐसे कई बार सुखा २ के जमाता जाय उसीको अमावट कहते हैं। अमावट को लोग कई तरह से साते हैं, इसका गुण, रेचक रूधिकारी, हलका और पाचन है एवं यदि पिपासा और मात पित्त का हरने वाला है । कच्चा आम। कच्चा शाम यहुत सहा रखा त्रिदोष और रुधिर में विकार उत्पन्न जरने याला है इस्मे फच्चा जाम साना अच्छा नहीं, लेकिन इसी नाम से जय दूसरा पदार्थ बनता है तो उसफा गुण औरही हो जाता है जैसे जाचार सादि । जाण का आधार तेलहा और नुनहा एवं जाम का मु. रबा और जाम का सिरका यह सब लोग यना गत है और धन चीजों फा खाना भोजन के मध्य में उत्तम होता है साली पेट माघार सामा सध्या नहीं है।

आरोग्यदर्पगा। सास। यह अंगरेजी आचार है और अंगरेजों में इसका सर्च अधिक रहता है, यगाने की तरकीय यह है कि हरे भाग को छिली हुई फांफी जाधसेर नमक डा चिनी 51 लोला अदरख किसिमसाल मिरधा आधी छटांक निखालिम सिरका 5 सिरके में सय पीश को पोम फर किसी यरतन में भर मुख बन्द कर १५ या २२ राज तक घाम में रक्खें फिर उस को निचोड़ कपड़े में छान बोतल में भरले और जय किसी सानेश भेजे दार करना हो तो उसमें से दस पांच बूंद डाल दे। प्राम की जेली। तरकीय यह है कि दो सेर फच्चे नामों को छील के गहीम फतरले डेढ़ सेर पानी में इतना पफा कि बाइ सूय गलजाय गय देरो कि आधा पानी रह गया है उतार ले और धौले रंग के फलालेन के कपड़े में शिम प्रकार फुग शुआया जाता है उसी प्रकार खाने बाद टपकाये हुये आई के बराबर मिश्री या चिनी डाल चासनी पक्षाले और चिनी के बरतन या चौड़े मुख की बोतल में भर कर जगावे यह यड़े मजेदार चीज है खाने से मन प्रसन्न हो जाता है। आम की चटनी। फचा जाम छोला हुमा एक सेर शक्कर १ सैर नमक 1 लाल मिर्चा 5.अदरख । मूखा प्रदीना मिफा १ मम चीजों को सिरका में म. हीन पीस किसी पाचार के बरतन में पांघ व रोग घाग में रसदे माद खाने के काम में लाये.. -- आम का पाक । पपके जीर.मीठे माम का रस १६.सेर मिश्री ४ सैर पी १ से तीनों को एक कलईदार डेग में हाल पूरहे पर चढ़ाय गन्दामि से पधावे, जय आरोग्यदर्यगा। सूर्य गाढ़ी घासगी हो जाय तब उतार शीतल कर उसमें यह दवा डाले मिर्च, धनिया, सफेद जीरा, जपात, दालचिनी, नागकेशर, छोटी ला- यची, यसलेाचन, अकरकरहा, यह सम दो २ तोला छोटी पीपर, लौंग, और जायफल यह सब एफ २ ताला केशर ६ मासा कस्तूरी १ भाषा चांदी का बर्फ ३० ताय राहत 5। सय दया को पीस उक्त घासनी में गि- लाम अमृतधान में रसदे । एक छटांक सबेरे और एक छटांक शाम को खा,के ऊपर से दूध पीने से शरीर पुष्ट और स्वास फास जादि बाराम होता है पक्का आम साके कपर से दूध पीना अति गुणकर होता है । जल। मनुष्य, पशु पक्षी कीट पतङ्गादि सभी जीव पानी की इच्छा रखते हैं और ईश्वर रचित द्रव्यों में से जल वह यस्तु है कि जिसके पिना क्षण भर जिन्दगानी नहीं रह सक्ती इसी तरह जीव से अन्य जड पदार्थ बक्ष लता गुलम, तृणादि यह भी जल के बिना व्याकुल हो जाते हैं और जष्ठ न पाने से शीघ्रही समूल नष्ट हो जाते हैं, इसी से वैद्यक में जल का प्र धान नाग जीयन रक्खा है “पानीयंमाणिनांमाणविखमेवघतन्मयम्" जा हार के बिना तो कुछ काल प्राण रक्षा हे सक्ती है परन्तु जल के बिना जीवन रक्षा यहीही कठिन है । यह तो जल का अभाव हुभा, जल के माप्ति समय में भी यदि कुत्सित या मिष दूषित जल मिला तो भी जी. चन का विनाशही समझिये, पयोंकि ऋतु के विपर्याय अर्थात् शीतकाल में गर्मी और तण काल में शीत होने से एवं अन्य २ कारणों से भी जल पिगल जाते हैं और बिगड़े जल के व्यवहार से शरीर में अनेक रोग है। जाते हैं। यह तो सभी जानते हैं कि भूख मारने की अपेक्षा प्यास मारना कठिग काम है। पर श्यों कठिन है और प्यास क्यों उगती है? इसका कारण यह है कि शरीर में जो चैतन्यता है यह रुधिर से है और यही रुधिर निरन्तर सम्पूर्ण शरीर की शिरा (भेईन) और मूक्ष्म २ लायुमों -- an भारोग्यदर्पण। (ग) में दौरा करता है मे इमी. गति के हेतु मे मधिर का ठीय श्रम कम हो जाने से घन हो जाता है तब उस गति फो समंजस करने के लिये रुधिर में फिर जनांम यढ़ाना चाहिये, यम इमी क्रिया से रक्त में सुमको पहुंग पर मनुष्य को प्याग मालुम होती है। यह तो सिर्फ स्वभाविक प्यास है इसमे मिन और २ कारणों मे भी रक्त का जलांश कम होने से तृष्णा लगती है । यथा, यूं के अधिक गिरने से पमीना निकखने रोने और आंसू बहाने गे एवं गर्म और अधिक क्षार पदार्थ के खाने से इसी तरह सेच, कोध, चिन्ता, फतरत और रास्ता चलने से जल पीने की इच्छा होती है। सघी प्यास लगने पर पानी पीना अच्छा है परन्तु यहुत सी जगह अपथ्य भी है चैमे रात्रि में उठि २ के पानी पीगा नसला पैदा करता है, फल शादि जैसे स— गा, त— ग शामरूद खोरा अस इत्यादि अनेक प्रकार के ऐसे फन हैं जिन्हें साफर ऊपर से जल पी लेना सांसी और अजीर्ण रोग होने का डर हैं और बच्चों के लिये तो यहुत ही मना है, इसी तरह मैथुग और फसरत करने उपरांत, यहुत मेहनत या रास्ते का थका हो तो पानी न पी ले क्योंकि इससे नाड़ियां निस्तेज हो जा- ती हैं । हगने हिफगत को फिताय में यह लिखा देखा है, मनुष्य को उचित है फि मैथुन (स्त्री प्रसंग) के उपरांत जल पी लिया कर, बीर्य गागिन्द घी के है और तमाग जिस्म में रहता है घरत मैथुन के गाएट पाकर यह पतला और पलायमान हो जाता है से जल पी लेने से फिर बाह गाढ़ा और ठंढा हो जाता है । पाठकगण, वैद्यक शास्त्र में मैथुन के उपरांत जल पीना जति हानि दायफ खिसा है परीक्षा से यहां तक सिद्ध हुगा है कि याद मेधुम के तत्क्षण उपस्थि को जलसे न धोकर रु. माल से पोछ लिया करें तो उत्तम है कारण यह है कि उस समय वह स्थान अति उष्ण रहता है इसे जल शीघ्रही भीतरी नसों में,जाय तसे निवंल और निरोश कर देता है मैपुन के उपरांत पपा २ करना चाहिये उसे मैथुन के प्रमशा में लिखेंगे, ॥ अति सुधा में पिता का भोजन के जल पी लेना अपश्य है अर्थात . . -- आगंग्यदर्पगा। हाशिमन्द हो के उदर रोग होता है। एक दिन में गई जगह का जल न पीना चाहिये शिस कुये या गदी या तालाब में छोटे २ कीड़े पह गये हों या कूड़ा करकट के गिरने से पानी मड़ गया है। या जिस कुये के समीप संहास हो तो तमों का पानी न पीना चाहिये ।। माग फल के रोगों के देखने से मालुम होता हैं कि मनुष्यों को स्वच्छ जल पीने को नहीं मिलता है सैकड़ों प्रकार के रोग गनुप्यों भ्रष्ट जाल पान और दुर वायु के सेवन से होता है, मय से उत्तम जल नदी का है से नदी के जल पीने वाले भी प्रायः मिगारही रहते हैं, इसका भी समय घदी है, एक तो नदी और तालावों में अनेक अस्वास्थ्य कर द्रव्यों के साप जाल ऊपर से बहकर पा मिलता है, दृमरे नदियों में गलीज़ कूड़ा और गुर्दे, अधजले मुद, और जाले हुये मुद्दे को राप ठा- ली जाती हैं, तीसरे जिस घाट से पानी पीने के लिये लेते हैं यहीं या उसके थे।ड़े ही दर पर लोग नहाते धोते औ जानवरों को नहलाते हैं और धोयो कपड़े धोते हैं, चौथे गाज करत प्रायः नग घाटो में जहां कि लेग नहाते धोते और जल पीते हैं तमाम शहरों के नायदानों का पानी यह कर जाता है । इमी तरह अनेक यिनों से कुएं का भी पानी यि- गह जाता है, जैसे कुयें के समीप संडास और मारियों का होना पानी को गन्दा करता है, कुवों में मुहेर का न होना जिस्से परसात का मैला पानी चला जाता है, बाजे २ कुवों के पास जानवरों को पानी पिलाने और सहक खिड़कने के हौद बने हैं उन हौदों का गन्दा पानी सूक्ष्म २ सूराखों से होकर कुयें में रसा करता है। फिर कुयें का मुष खुले रहने से पाम के एक्षों के पत्ते तह कर उसमें गिरते हैं और मूस घुइस छिपकिली वगैरह जानवर भी गिर पड़ते हैं फिर भक्त्तर कुधों की जगत पर लोग नहाते और गलीज कपड़ा ऐसे ढंग से पछाड़ते हैं कि तगाम छींटा कुएं में जाता है, उक्त सब कारणों से फुयें का पानी गन्द्रा हो जाता है ॥ ध्यान देकर देखने और परीक्षा लेने में ज्ञात हुआ है कि भारत वर्ष में यात पैत्तिक ज्वर, विशूधिका, रक्त आमातिसार, स्लीपद (हापीपांव) .

यारोग्यदर्पण। गौर अराउद्धि (पति का भूजन) बजाजादि और भी बहुत से रोग हैं जो विशेष कर जलही के दाप से होते हैं । मोजन के मध्य में प्यास लगने पर घूट दो बूंट जल पी लेना अच्छा है परन्तु श्लेष्म मरुत्त वाले को जहां तक हो सके भोजन के अन्त में जठ पीना उत्तम है। भोजन में एक रस के अन्त और दूसरे के प्रवेशमें (जैसे मीठा खाने के बाद नमकीन पदार्थ का खाना) पूर्व रस को जिहा से छु खाने के हेतु यदि तृष्णा ता एक चूंट जल पी ले नहीं तो सिर्फ जल | से फुला कर डाले क्योंकि "विशुद्धरमनेतस्मै रोषतेनमपूर्ववत्" म त- रह करने से जिहा शुद्ध रहती है और जो पदार्थ खाये जाते है उनको यथार्थ स्वाद मिलता है। जो लोग भोजन के सा अधिक जल पीते हैं उनका पेट बढ़ जाता है और पनि गन्द हो जाती है। भोजन के बीच में थोड़ा जल पीने से अग्नि तेज होती है अन्त में पौनेसे अंग पुष्ठ और ताफतवर होताहै । भोजनके कुछ देर याद यारम्यार थोड़ा २ जल पीने से शीघ्रही आहार पच जाता है । जलका नाम। जाल, पानी, सलिल, नीर, फीलाल, भंवु, माप, बार, यारि, ताय, पय, उदफ, जीवन, अमृत और धनरम याह पंद्रह जल के मुख्य नाम हैं "यथानाम तथागुणः" जैसा है वैशाही जल में गुण भी हैं ॥ नाग सर्बसाधारण जलका गुण । धुमरी नम जारा के मामने अधियारा का होना, प्यास, तंद्रा (सां स पा रहना) बमन अजीर्ण और जति निद्रा को दूर करता है एवं पल को बढ़ाता है तर्पण, हृदय को हित और रसं का कारण तथा म. मृत के समान जीवन है ।। म आरोग्यदर्पग। तालाव के जलका गुण। उत्तम भूमि में हमेसा जिसमें जल बना रहता है यह तड़ाग (ता. लाय) कहलाता है। तालाब का जल स्वादु में फसायल पाक मैं कडुआ घायु का पढ़ाने वाला एवं मूत्र और बिष्टा के बांधने याला होता है और रक्त पित्त फो नाश करता है। यही कारण है कि जो ताठायके जल पीने से अजीर्ण हो जाता है और स्नान करने से शरीर खजुषाने ल- गता है, सम्भय है कि यदि बङ्गदेश घाले यदन में तेल दरदी मल के स्नान न करें और अधिक तेल न खांम तो नका जीयन ही कठिन हो जाय क्योंकि यहां तालाबही में लोग नहाते धोते और उसी का जल पीते हैं याद रसना चाहिये कि शायत किसी समय पर सेवाय तालाय दूसरा जल पीने को न मिले तो अवश्य औषधियों के द्वारा जल शुद्ध फर लेना उचित है। बावली। पत्थरों धा ईटों की सीढ़ियां जिस घौड़े कुये में नीचे तक बनाई जाती है उसको यापी (बायली) कहते हैं जो यावली का जल सारा होता है तो पित्त को सृद्धि कर शीत घायु को नाश करता है और मी. ठो होने से फफ.कृत और बायु पित का नाशक होता है । कुआं । जो जमीन में सकहा गत और गहिरा खोदा जाय जिस में की पानी निकल आए चार पक्का हे। या कच्चा उसे कूप ( कुआं) कहते हैं। जो कुयें का जल मीठा हो तो एलफा और निदेोप नाशक एवं अमि और बल का सृद्धि करने वाला और मनुष्यों को अति हितकारी होता है.और खारा होने से अमि मन्दादि अनेक रोग का करने वाला होता है।

पारोग्यदपए। घुमरी, जी मचलाना, धुगां मा डकार जामा, यमन और पित्त इन रोगों में जरूर ठंढा जल पिलाने से उपकार होता है ॥ शीतल जलका निषेध । पजुली की दर्द में शीत युक्त यायु रोग में गले के दर्द में, हिपको में,. उदर शोध और नबीन उयर में शीतष्ठ जल न देना चाहिये ॥ अति जल पीनका निषेध । अरुचि जुकाम मन्दाग्नि कोढ़ मधु प्रमेह ( जिस मूत्र पर मच्छी वै ठती है ) फोड़ा, उदर रोग उपर और नेत्र रोग इन रोगों में जल बहुत ही घोहा २ पीना योग्य है और घरत जल एक बारगी पीलेना तो किसी अवस्था में सेवाय हानि के लाभदायक नहीं होता, क्योंकि ज्यादा गि. कदार जल के पीने से मन का परिपाक नहीं होता और जय अम्न ही नहीं पचा तो बिमारी न पचनेमें या कोई नयीन घिमारी वही होजाने में क्या असम्भव है। मनुष्य को उचित है कि जठराग्नि के बढ़ाने के लिये थोड़ा जल यारम्पार पीये । प्रायः देखने में आया है कि अज्ञान लोग रोगियों को चित्त लेटे में भी जल पिला देते हैं सोचना चाहिये क्योंकि "उत्तानशयने पेयं काश्यगन्दाग्निदेपरुत् । यामदक्षिणपानपिवेतोयंमुखा पहं" उतान सोये जल पीने से दुर्यलता और मन्दान्ति आदि दोष बढ़ता है यामे और दहिने करवट जल पीने से भारोग्य काम होता है । अद्भुत। बहुत मी तरकीबें ऐसी हैं जिनको करामात से एक प्रकार का ति. लस्स जान पड़ता है। पर तिनका ओंट पहाइही है जब तक उस तत्व को लोग सम्पूर्ण रूप से नहीं जानते तब तक उन्हें अचम्भा मालुम होता है, जादा जानगये फिर क्या यही कहेंगे या तिनका नोट पहाड़ ॥

आरोग्यदर्पण।. पानी से सूखा वालू निकालना । माफ किया हुभा बालू या भाभूजे का बालू या पत्यल को कूट क- पड़ छान कर तीनपाय लेवे । एक छटाफ मेमि. को गला उसी बालू में डाल ऐमा मल दे कि मोम मिलकुमा न मालुम हो, बाद किसी बरतनमें भर कर रखदे। जय किमी को दिखवाना हो तो एक चौड़े मुहका . रतन ( जिसमें बन्धी मुट्ठी अच्छी तरह आ जा सके) ले पानी भर दें। यहा पर घोड़ी चालाको चाहिये बालू.को मुट्ठी में भर मुहीको उक्त पानी अन्दर जाय चुपचाप बालू को रखदे कि यालू को पिण्डी न फूटने पावे ऊपर से पानी को गन्दलो दे ताकि लोगों को मालुम हो जाय कि बालू पानी में मिल गपा तथ हांप को पानी से निकाल सबको देखादे फिर पानी में हाथ डाल जाहिस्ते से उसी बालू की पिरडी वठा कर या हर लाय सबके सामने मुट्ठी के एक कोने से बालू करारा दे। बिना आग के आग वल उठे। क्लोरो पुटास और चिनी दोनों बराबर से एक में मिला दे किसी कागदार सीसी में रखदे, जय किसीफो देखलाना हो सो थोड़ी सी बही. दया निकाल उसमें फिसी ढङ्ग से एक बिन्दु गन्धक फा तेजात्र हाल दे, बस तेजाय के हाउतेही याल उठेगा । अष्टाक्षर। अगर चूने से सफेद कागज पर लिस कर सुखादो तो कुछ पढ़ा जायगा, परन्तु गाठ में डालने से सम अक्षर सफेद देस पड़ेगे ॥ दूसरा। पूर्वोक्त प्रकार दूध से लिख कर सुसाले, पानी में डालने से नीले रंग के अक्षर देसने उगेंगे ।

धारोग्यदर्पण
तीसरा।
गौसादर, नीबू या पियाज़ पा लहसुन के रससे सफेद कागज
पर लिख कर सुखा ले, भांच दिखाने से मुर्ख रंग के अक्षर देस
पड़ेगे॥
चौथा ।
मदार के दूध से हथेली में लिख कर सुखा ले कुछ भी न
मालुम होगा, जब दिखलाना हो तो थोड़ी सी राख लेफर हांध में
मल ले सय काले रंग के अक्षर देखने लगेंगे ।
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मोम की बत्ती प्रापी आप वालने की विधि ।
एक मोमयत्ती के सिरे पर फास्फोस ( यह एक दवा है हड्डि-
|यों के खार से बनती है ) मद्य में घिस कर लगादो फिर रख
छोड़ो देखाने के समय एफ बिलौर की छड़ी एक तरफसे गरम कर
यत्ती के ऊपर मारो और फहो जल उठ तो यह बत्ती खुद खुद
जल उठेगी।
घिनौर को छड़ी में यह सुमीता है कि वह गरम भई गालुम
नहीं होती है ॥
'वरतनपर चांदीचढ़ानेकी सहज विधि ।
चांदी का यर्क ५ भूजी फिटकिरी १५ रत्ती नौसादर १५ रत्ती
सेंधा नमक १५ रत्ती तीनों को सरल कर किसी शीशी में रख दे
जिरा बरतन पर धांदी चढ़ाना हो उसे खूब मांज कर चमका छे याद
इसी पौडर से सूघ मल दे, पर यह कलई कच्ची है ।

भारोग्यदर्पगा।
पीतल तावा आदि वस्तुओंके साफकरनेकी रीति ।
छोटी २ चीजें जैमा कि घड़ी के पुरजे चेन और यस्तुहों वन्हें
चिमटी से थम नाइट्रिक एमिड में दुबो शीघ्रही पानी में दुपादेय
चमकने लगेगा।
कांच की चीजों का वरावर तोड़ना।
गिलाश शीमा या बोतल वगैरह जहां से तोहगा हो वहां
रेती से जरा निशान फरदे फिर एक लोहे की सलाई सूप गरम
करके उसपर फेरें तो ठीक यरायर जगह से वह टूटेगी ।
दूसरी तरकीव ।
जहां से तोड़ना हो उस स्थान को थोड़ी सी इस्पिर्ट या मिट्टी
के तेल में मृत फा डोरा तर करके बांध दियासलाई से जला दे,
जय बल कर बुत जाय तो यहां पर जरासा पानी डाल दे ठीक
उसी जगह से टूटेगी ॥
ऐने पर फलई करना।
जिस कदर बड़ा ऐना हो उतनाही वड़ा साथ शीसे की पड़ी
जो पनियों को दूकानों में मिलती दै मैंगाले एक चिकने पत्थल पर
कि जिसमे बाल समान मी कहीं रेखा नहीं हो क्योंकि जो कुछ
करामात है. वह पत्थलही में है अकसर कलई करने वालों के पास
'पत्थल बहुत उगदा रहता है। उसी पत्थल पर पानी की कमा दे
और उसके ऊपर थोड़ा पारा -( जितने में कि अगस्त ताय में फैल
गाय ) हाल कपड़े की पोटली से चारो तर्फ फैलादे,वस, ऐने को
ले एक, तर्फ से उसी, पत्नी पर सरता दे और उठा ले यह पन्नी
शोसे को अच्छी तरह. यां,लेगी और मुस दोसने लगेगा। इसका
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अारोग्यदर्पग। ७३ कारखाना देहली. और कलकत्ते में राहुन करने वाले प्रायः मुसलमान हैं यहां भी दो तीन मुसलमानों की दूकान हैं चाहिये कि हमारे एक साध हिन्दू भाई भी दुकान करलें ॥ तांबे के डेकची आदि पर कलई करना । जिस परतन पर मलाई फरगा है। उसे अट कोहरा (पक्की ईंट का रथादार चूर्ण) और इमिगी या आम की सटाईसे सूथ मांजे ताकि जरा भी मेला न रहे और बरतन चमकने लगे, सय उमे अग्नि पर रस सूय गर्म करे (ऐसा गर्म हो कि उसमें रांगा हागने में गल जाय और फैलाने से फैल जाय) तय उस गरण यरतन में रांगा डाल घग के गलायले, पाद इसके यरतन के चारो तर्फ नौसादर की बुफनी छोट कपड़े से गले हुये रांगे को जहां तक कलई करना हो जाहिस्ते से चारो तर्फ ोर देप यस बहुत उत्तम स्वेत और चमकदार फलई हो जायगी। इस काम के फरने थाले सिर्फ मुमष्ठगागही लोग हैं और मुमलगानों के अतिरिक्त हमारे हिन्दू भाई विशेष कर कायस्य भौर काश्मीरियों के यहां तो अवश्य ही कलईदार वर्तन रहता है और फलईदार वर्तन कहीं निषेध भी नहीं है और न घेद्यक मत से कलईदार यतग में खाना पकामा मना है पर हिंदू लोग अपने खाने पीने का यरतन नुमलमाम को नहीं छुलाते इस लिये हरएफ शहरों में एक दो हिन्दुओं की दुकान होनी चाहिये । जरमन सिलवर। ३ गाग दसा धातु, दो भाग तांया और तीन भाग निकेश यह भी एक प्रकार चांदी की साक्षार धातु है और यहे २ सौदागरों के यहां गिष्ठता हे उक्त तीनों धातुओं को एकत्र कर गला देने में मंग सियर मन माता॥

४ चारोग्यदर्पण। पूटीन । जालमारी याफस और कियाई आदि के दराज या सांस को बन्द करने के लिये पुदीन तैय्यार की जाती है इसके बनाने की बहुत सी तरफोवे हैं सर्व साधारण कार्य के लिये यह उत्तम है। पहिले थोड़ा मा टीमी का तेल अग्नि पर खूष पका ले बाद उसे अगि पर से उतार शीतल कर ले, अन्दाज माफिक जितने में तेल घन हो जाय लिखने फी खरी बूक फर गिला दे और एक काष्ट पर रस एक लोहे की हथोड़ी से सूप पीटे की पीटते २ अति फोमल हो जाय तर लाये॥ काम में दो द्रव्यों के संयोग से अद्भुत पदार्थ का बनना ॥ पासंख्य द्रष्य ऐसे हैं कि जो एक दूगरे के साथ मिण जाने से भक्ति भाश्चर्यित और यहुत से गुण गर्मित पदार्थ बन जाते हैं जैसे पूना और नौगादर । इन्हें भिन्न २ सृङ्घने से नाक को कुछ भी कष्ट नहीं मालुम होता पर इन्ही दोनों को एक में मिला देने से इसमें ऐमा एक प्रकारका तेज उत्पन्न हो जाता है कि लोग उसको नाफ के पास तक नहीं ले जा सक्ते अंगरेजी में इगोको "इमोनिया" कहते हैं। परन्तु यह लोग इसको बड़ी सफाई के माथ तैय्यार करते हैं। नीचे लिखी हुई रीति से मिलाने में भी वैमाही तेश और यही फायदा होता है परन्तु इमफी तेजी .थोड़े ही काल में जाती रहती है । साने का चूना घुसा हुमा और नीमोदर दोनों सम भाग ले एकत्र फर किमी कागदार सीमी में बन्द करले । यदि कोई जादमी किसी कारण से बेहोश हो गया हो या शीत से दांत बैठ गये हों तो इमझे सङ्घातही होश में आ जाता है । जिस स्त्री को भूत मेत पुढेग लगहों और बड़े २ मा फूंक वालों में भी न कयूलती हो तो इमो मुला देने से शौरन ताया करने लगेगी और कहेगी मैं फलमियां हूं आ जाती हूं मम भूत प्रेत चुडेन गय पग जायगे । परन्तु यह भी याद सपना चाहिये कि तीन मिण्ट से अधिक देर तफ किमी को न मला आरोग्यदर्पण। और यालकों को किसी अवस्था में न सुवानी चाहिये । एवं उस आदमी को भी न सङ्घायै जो किसी नशा के खाने से बेहोश हो गया है। । एक विशेष बात परीक्षाओं से और भी सिद्ध भईहै कि जो मिहेश रोगी इस के सङ्घाने से होश में नहीं आया तो फिर उसका होश में जाना बहुत फठिन है ॥ उन्हीं,तक्त दोनों पदार्थों से पानी भी मनाया जाता है जिसको नं गरेगी में "एमोनियां वाटर" बोलते हैं और उसी जर्फको स्पिरिट के साथ मिलाने से स्पिरिट एमोनिया" कहलाता है और मोल लेने से अं गरेगी दया खाने में ) का एक औंस ( ढाई ताला) मिलता है। लेकिन यही अर्क यहां भी तैयार हो सकता है। उसकी तरकीय यछ है कि नया चूमा एक सेर पानी में भिगा दे और दूसरे एक बासन में आधमेर नौसादर को तीन सेर पानी में मिला के जोश दे जय खूप गर्म हो जाय तय तमीमें चूने का पानी भी हाल दे याद ठंढा हो जाने के उस पानी को माइस्ते से योग २ उड़ेल ले फिर उसी थोरे पानी को डेग में भर धीमी जांच से जाधसेर जर्क टपकाले । इसका गाना २० मिन्दु से ६० बिन्दु पर्यन्त है । मूर्खा रोग में और सांप के काटने में डाक्तरी पिकि. त्सा की यह प्रधान भीषधि है आध घंटे पर उक्त विमारी में इस दवा के पिलाने से शीघ्रही फायदा होता । एक तोला एमोनिया वाटर फेो ६ तोला सरसों के तेल में मिला के गले के सूजन से लगाने से प. धिक फायदा करता है। नौसादर और घूमा इन दोनोका गुण अलग २ भी देशों पर है लेकिन यग इचका गुण मधुश कम जानते हैं। हैजा॥ इस बिमारी का नाम सुनते ही साग्र शरीर के रोम सड़े हो जाते हैं और देह पर २ कांपने लगती है। हां!! ईश्वर ने कैसे २ एफ २ रोग कराल.महाकाष्ठ के समान गनुष्य के इस छोटे से नीष के हरणार्थ उत्पन्न किया है कि जिमके चंगुल में फंस कर इस संसार संसार में पड पाराग्यदर्पग। . भर को पौदा स्थिति फरना दुष्कर हो जाता है। आज कल प्रायः देसने आता है कि हमेशा हैजे का राज्य किसी ग किमी देश में बना ही रहता है। फिर मिशूधिका (हेजा) महारानी की कृपा कटाक्ष रोगियों पर ऐसी रहती है कि यदि रोग मास काल में गवैद्य या साकरन मिला ट पट ग्राम फर डालती है। पीछे एक भी किसी को दाल ग. लाई नही गलती । पाहे अमृत का घड़ा क्यों न हाथ में लिये हो बस फर गल २ कर रोना और कहना कि हाय अमुक डाक्तरी दवाखाने की हरी सीसी पिलाई जाती तो जरूर बच जाता समय चूम फिर प्या प. छताना । म बिमारी के सम्यन्ध में विलायत वालों ने कई मरतये आं- दोलन फिया और बड़े २ सभ्य एलोपेषिक तथा हेगियोपेथिक हार महादयों से अनुमंधान किया कि कोई ऐसा उपाय या औषध प्रकाश की जाय लिजिस्से मंकामया रोग अर्थात् विशूधिकादिया रोगों की उ. त्पत्ति बहुत फा हो और इसे भरने न पाथें । इमफे नार में हारोंगे भलीभांति से परीक्षा करके कहा है कि मेघाप गफाई और धूम द्वारा दूपित विप यायु का निराकरण । एवं रोगियों के मलं सूत्र द्वारा रोगन फैलने पाये और उपाय नाहीं। प्रत्यक्ष भी है कि आज तक किसी वेद्य डासर गौर हकीम द्वारा कोई ऐमी निश्चय उग्र महापधिन नि. फली कि जिसमे रोगी वही जाये और याही औषधि देश विदेश गांव गॅयई जहां वैद्य डाक्तर गूलर के फूल हैं सर्वत्र बटषा दी जाती कि जिस से रोगी इस महामारी के पद से लतगर्दन न होने पाते.॥ इंग निस्सन्देश का मक्ते हैं कि जैसा पास करल संक्रामक रोग (मा रोग छुईछूत और पदयू से फैलते हैं) फिमी न किसी स्थान बनाही र. हता है। ऐसा उपद्य पूर्व काल में कमी न था। इसका मुख्य कारण यही है कि अगले जमाने में यहां जंगल इस कदर थे कि जिससे वह दूषित वायु नो गनुप्यों के स्वास द्वारा निकलता हे सय दादि खींच लेते थे इनसे था गाफ यनी रहती थी। दूगरे दुष्ट और निपितु मांसा दारी बहुत कम थे इससे मनुष्य के शरीर से दूषित वायु भी नही नि! पालती थी। विवेचित्त भया देशाधिक गो गांसादि दूपितर गांगाहारी -- - आरोग्यदपगा। ७७ मनुष्यों के शरीर से जो पमीना निकलता है यह निहायत यदबूदार होती है जिससे कि जहरीली वायु ( मलेरिया ) होने का मम्भय है । यदि कोई यह कहै कि अगले जमाने में जय कि बहुत पागल था उन जंगली में लाखों दुर्गन्धित जानवर शेर भेड़िया रहते थे और हजारों गौ मैंस मादि जीवों को खाते थे और मांस हडियां यहीं पड़ी सहा करती थी कि जिससे बड़ा भयानक दुषित बायुसत्पन्न होता था तो उममे क्यों नहीं संक्रामक बिमारियों पैदा होती थीं ? मत्य है पर ईश्वर ऐमा द- यालु और सर्य शक्तिमान है कि उन जङ्गलों में अकस्मात् अंधड़े को बेग से परस्पर यांस आदि सक्षों की हालियो रगड़ जाने से अग्नि लग जाती थी और यहां के जानवर दूसरे जंगल में भाग जाते और बहुत से यहीं जल जाते थे। तीसरे इस जायित में मुर्दे भी सेवाय जलाने के फेंके या गाड़े नहीं जाते थे । आज कल गाहे जाने के वजे से लक्खों बिगहा जमीन बिगड़ गई और उस जमीन की हया बिगह कर लोगों के शरीर में रोग उत्पन्न किया और यही हया भूत प्रेत पिशाच के नाम से प्रसिद्ध दो पड़े २ विद्वानों की बुद्धि को भी गिगाह दी । चौथे आज काल मायः गांव के निकासे में मरे हुये जानवरों की एड्डियों का ढेर लगा रहता है वो सा कर हया गन्दी कर डालती हैं। पोपवे हर एक शहर के बाहर थोडेही दूर पर यंपुलसे के मैलों का ग- हढा भरा रहता है कि जिसकी दुर्गन्धि आधे २ मील तक जाती है और दंट सपरा मादि पहावे भी जटा तहां लगे रहते हैं कि जित, हड्डी भौर याहुत सी निकम्मी यद्यूदार चीजें पढ़ती हैं और वे लपक के साथ नजष्ठ फर केवल धागेभोर धुआंधारी गचामे रहती दे कि जिसको दु. गन्धि गनुष्य को असम रहती है। उठे पूर्म काल में यज हाम अधिक होते थे जिससे कि बायु सुगन्धित पदार्थों के परिमाण गिड फर हवा हमेसा स्वच्छ रहती थी। यद्यपि अप सफाई का यन्दोमस्त अच्छा है पर उपरोक्त रीति से न होने + पाराग्यदर्पगा। कारण दिन २ मंफ्राग गोगों की सृद्धि हेाती जाती है और इस पर गवर्नमेंट भी ध्यान केग देती है ! इस प्रफर्ण के उठाने का मुख्य अभिप्राय यह है कि हमारे पढ़े लि- से देशी गण सचेत हो जाधुनिक बाह्य सफाई ही में न मग्न रहें '. धात् पिनायती सभ्यताही पर न लटू रह कर अपने पूर्वजों को मत मिपाभों को भी देखें सुनें और हमारे आयुर्वेद मे है ना मादि संक्रामक रोगों से बचने के नियमों को याद रखें और हैजा प्रास होने पर जय तक अच्छा सत वैद्य या देश काल हकीम हातर ना जाय तप तक उसके रोकने का उपाय करता रहै । क्योंकि बहुत से स्थान ऐसे हैं कि जहां कोई भी चिकित्सक नहीं है यदिहै भी तो घास दो केस पर जप उसे एक आदमी बुलाने केो गया ओर वैद्यराज न मिले कहीं पिकित्सा करने गये हैं अय यह मादमी यहीं ठहर गया कि वैद्य जी को संग ले के चलें उधर पति काल होने से दूमरा भी मादमी चला तय रोगी और घधराने लगा । चिकित्सक को आते २ पांध घार घंटा या इसे भी कुछ अधिक काल लग गया तब तक में रोग चतुर्गुण हे। रोगीदी इस मसार 'संसार को परित्याग चला ! इस लिये यह रोग ही न होने पावै ऐमा उपाय सर्वदा करना चाहिये, धड़ अपाय मय से मुख्य सफाई है जिसकी वेद्य ठाकर और हकीग सय मकार के चिकित्सक लोग मानते हैं । सफाई.॥ १ मकान की आंगनाई कुछ यही है। जिसमें धूप और हवा जा सके गायदान एक कोने में भीर पक्का. हे। जिससे पानी कहां से निकल जाया करें। २ पाखाना यदि सगडाम अर्थात् गहिरा कूप सा हो तो हर भ. हीने में दो तीन सेर खारी निमक या चूना या रेह नहीं डाला करै गौर पाखाना या गुड्दी है। तो पंद्रहमें रोज कारयालिफ के पानी या चूने के पानी से धुला दिया करै ।।

भारोग्यदर्पण। ७९ ३ मांगगाई में या दरवाजे में दुर्गन्धित गंदीली चीज़ मा ऐसी चीज़ जिस से जी मचलाने का सम्भव हे। न पड़ी रहनी चाहिये । ४ मय भगीर गरीय को उचित है कि दरवाजे पर या जहां उचित सगरी यथा शक्ति यदि फुलवारी लगाने की शक्ति न हो तो फूलों के गमला थे।ड़े यहुत अयश्य रयरो। यह जो तुलमी का पेट हमारे यहां बड़ा पूजनीय है यह इमी मफाई फा प्रधान अङ्ग है। इस पर दुर्घायु नाकर्षण की शक्ति भधिक है इससे इसको घरमें अवश्य रखना चाहिये। ५ चाहिये कि तमाम मकान चूने से पुता रहे परंच भोजन करने और सोने का घर तो निश्चही पुता रहना चाहिये और गाई का घर गायर और पिंडोर से पुता रहना चाहिये और रसेई के घर में बैठकर भोजन न करें। इसी कारण गहूर्त चिन्तामणि मे रमाई पनाने का घर अग्नि कोण में और भोजन का घर पश्चिम दिशा में लिखा है। ६ जय कपड़े से यू आने लगे तो यिना धुलाये उसे कदापि न पहिने म हैजा न होनेका उपाय । यह तो सभी जानते हैं कि हेजा हमेशा एक न एक देशमें अनाही रहता है पर विशेष कर ग्रीस ( बैशाय जेष्ठ ) और यमन्त (फाल्गुणचैत्र) ऋतु में हैजा होने का सम्भय रहता है। और यह भी समको विदित है कि एक प्रकार की विपदूपित्त यायु फैलती है तभी अजीर्ण द्वारा यह रोग होता है । हमारे कहने का तात्पर्य यह है कि प्राप्तकाष्ठ पर इसका रो कना दुस्साध्य है इसलिये मनुष्यको चाहिये कि इसके बङ्गुल में न फंसने का सपाय हमेशा करता रहै पर उपरोक्त महीनों में तो अपश्यही अपने संजमों को ठीक रक्खे । क्योंकि यह रोग उन्हीं को होता है जिन्है यह परिज्ञान नहीं है कि हमें किस समय या गोचरण जौर कौन द्रव्य भ- "क्षण करना उचित है और कौन नहीं । और जो व्यक्त परिमित भोजन आरोग्यदर्पण। करते हैं विशेषतः आयु के हिताहित विषय में सूय अभिज्ञ है यह प्रायः इस रोग में आक्रान्त नहीं होते। १ बहुत गर्म स्थान में रह कर एक बारगी शैत्य स्थान में न घडा जाय और न महुत ठंढ पदार्थ भोजरले ॥ २ अतिशय लाल पान, कभी अरुप कमी जादा, कभी फम पका कभी जादा पका या यासी द्रव्य भोजन, दिशा पेशाप का रोकना, दिवानिद्रा रात्रि जागरण, प्रभृति त्याग करे । ३ दश ग्यारह बजे के उपरान्त रात को न जागे क्योंकि रात के जा गने से प्रायः दशा हो जाता है। ४ अत्यंत विरेचक औषध, तेल की मनी हुई पोरी आदि गर्मधीज शरीय आदि अधिक नशा न खाये ॥ ५ शाम पवेरे घंटा आप घंटा शुद्ध वायु का सेवन करना और गीत वाद्यादिकों से गनमें पिनोद रक्खे ॥ ६ हैजा के प्रादुर्भाव समय में प्रतिदिन एक बार बेल का शरयत पीना या ठंढई के साथ रत्ती दो रत्ती भांग घोंटकर प्रतिदिन सन्ध्या स मय पीना उत्तम है॥ ७. कपूर सूंघे गौर कपूर का पानी २ तोला दोनों समय पी.लिया कर अपया जल के घड़े में एक छोटी सी डली कपूर की डाल दिया करे क्योंकि कपूर के सेवन से हेगा नहीं होता, परन्तु इस विषयको लोग याहुन कम जानते हैं । पिलायत,फे प्रसिद्ध डाक्तर रिङ्गर साहय चिकित्सा विधान में लिखा है कि गरमी के दस्त (जे) कपूर से धड़कर दूसरी भोपध नहीं है। ८.परत सफेत कोठरी में रात को मुख दांप कर न सेमि भौरन किसी अधिकता वैठक.में दश घोस जादमी को मन लेकर बैठे ॥ . -- 40 पाराग्यदर्पण। ८१ ९ जिस स्थान में हैजा उठा हो यह स्थान त्याग दूसरे जगह को चला जाय और हैजे का नाम सुन कर कदापि न उरै ॥ १० घामें प्रत्यहं शाम सवेरे गंधक या दशांग या धूप या गुग्गुष्ठकी धूनी जयश्य दिया फरै प्योंकि इससे विष दूपित पायु फा निराकरण हो जाता है यही कारण है जो पूर्यापारों ने व्यवस्था दिया है कि गृहस्य लोग घर में ठाकुर रक्खे और शाम सवेरे धूप दीप दिया करै । अंगरेजी डाक्तरों ने अच्छी तरह परीक्षा लिया है कि हैशा' वाले रोगियों का मल आदि कूप तालाय नद्यादिकां के जल के साथ मिल जाने से यह रोग शीघ्र ही चारो तर्फ फैल जाता है । यदि हैजाबाले का गल इधर उधर न फेंका जाय और स्त्र गादि तालाय नदी कूप आदि स्थानों पर न धोये जांय तो निश्चय है कि यह बिमारी चारो तर्फ न फैले, चाहिये कि किसी ए- कांत में गढ़ा खेाद उसमें फाष्ठ कोयला डाल उसी में मल फेके और क- पर से चूने का पानी या कार्यालिफ एसिड का पानी छुड़ा दे इससे गछ का दोष दूर हो जाता है । और बस्त्र को पहले चूना या लोराइड आमा लाईग के जल से धो कर तय तालाय आदि में या धामी को धोने को दे। जिस घर में रोगी है। उस घर को धूप पालकत्तरा या गंधक के | धुंधा से धूपित करे और नसी मफान के एक कोने में फाोलिक एसिड की एक सीसी का मुह खोल कर रख दे। इसमें रोगी को फायदा और देश का उपकार दोनों होगा ॥ बिप वायु दूपित गृह ॥ भन्फेकटेडचेम्बरस । जिस समय ज्वर, हैजा, माता आदि रोग द्वारा देश भर ग्रसित हो जाय, या कोई गृहस्थ मै परियार उस रोग में ग्र- गित हे। कोई तो गर जाय, कोई, माराम है और कोई २ फिर ठगी रोग में ग्रस्त हो दुर्यल बना रहे तव निशय जानना चाहिये कि उस देश या उस घर की वायु विप से दूपित है, तय अगर उस देश के प्रत्येक गहस्य अपने २ घर में या फ़त रोगी के घर में निम्न लिखित धुंधा देवे तो नियही उक्त महा कराठ रोगों से छूट जाय ॥ .

- पात्र घर' आरोग्यदर्पगा। सोरे का धुंआ देना ॥ सारा.१.उटांक, गन्धक का तेजाय, आधी उटॉक ... एक बड़े पास में या गमले में गरम जल भर कर उसके बीच में एक घरतन इस प्रकार से रक्से कि उसके भीतर जल न जाने न पाये। याद उस वीध के य- रतन में सारा हाल ऊपर से यूंद २ गंधक -फा तेजाय टपंफाना जारम्भ करै इमसे धुंया निकलने लगेगा । एक छोटे से घर में घुपा करने के लिये केवल एक पात्र बहुत है, यदि यहा पर हो से उसी तरह दो स्थापन करे और जिस घर में रोगी हे। उस घर में तो अयश्य.धु या दे. वे लेकिन धुवे का पात्र रोगी के समीप न रक्खे किन्तु घोड़ी दूर पर रक्खे। इस धुंवे को पहले पहल श्री युतं हात्तर फारमईकेल स्मिपामा- हय ने प्रकाश किया था। जिस समय सन् १७८२ ई० में पिंगायत के विनचेस्टर नगर में सत्ता रोग द्वारा बड़ी गरी पड़ी थी तिम समयं धम धुंवे से यहा भारी उपकार हुभा और इसी पर गयर्नमेंट ने उक्त ent को पचास हजार रुपया पुरस्कार दे कर राश चिकित्सक का पद अभि- पित किया। उसी समय से गाज तक हरएक चिकित्सक गण बराबर इसे फाग में लाते जाये और इससे विशेष उपकार देखा गया है । हैजे को संस्कृत में विशूचिका, अंगरेजी में फालरा, पंग भाषा में उलाउठा और तन्त्र शास्त्र याले इसीको महामारी की बिमारी कहते हैं डारी में मेलिगनेन्ट आदि कालरा बहुत प्रकार के हैं जिनका बयान आगे लिखेंगे । प्रथम हा शङ्गस्कालरा" का बयान करते हैं जो देश विदेश सयंत्र फैला है। इस हैजे का विवरण और लक्षण । पांग्यार के और पाकस्थली एवं आंत में दर्द हो । परन्तु अधिक धमा होने से पेट का दर्द बन्द हो जाता है। दस्त पतला पीत वर्ण और .

चारोग्यदर्पण। ८३ मठ सहित एवं अजीर्ण द्रव्य युक्त और जयशेष में कुछ जांध सहित भी होता है.। जिहा कंटक मई और नाही मन्द २ गति एवं कधी गतिहीन भी हो जाती है । पिपास अत्याधिक और किसी २ रोगी को हिचकी भी जाने उगती है हाथ पैर शीतल समग्र शरीर या गोठ और हाथ पैर नाखून तो अवश्यही नील वर्ण हो जाते हैं । सम्पूर्ण शरीर में ऐंठने और हाथ पैर के नस खिंचने लगते हैं । उक्त लक्षण युक्त शेगी ऐसाही कोई भाग्य यस बघ जाता हो नहीं तो २४ घंटे के भीतर अयश्यही मर जाता है . चिकित्सा रोगी को किसी प्रकार की गीली चीज खाने न दे, जिसमें ताकत आये ऐसी चीज खिलानी चाहिये। जैसे ब्रांही या पेटिवाइन के साथ अरारोट का गांड मिलाफे पिलाना उत्तम है। और इस दवा को देखें । 2 चाकमिक्सचर ५ औंस । टिच्चदाई शासऐमाई दो छाम । पिपर- मेन्ट वाटर १ औंस सय को एकत्र कर एक २ औंस के अंदाज दिन में चार पांध दफे या जैसा रोगी का बलायल देखे सेयन फराधे ।। पगर देसे कि रोगी बिलकुल बलहीन हो गया है और नाही अति.क्षीण एवं स्थान भ्रष्ट चल रही है, शरीर या हाथ पैर पाला के समान है, तम निम्र लिखित उप्ण कारक अर्क पिलावै ॥ व्यवस्था ॥ ऐरोमेटिक एमोनिया १ छाम । मलपिउरिक ईथर आधा काम । टिचर फारडेम कम्पौंड ४ छाम, ब्रांष्ठी १ औंल, लडेनम १ ड्राम, फेफर याटर ५ भौंस । एकत्र कर एक सीसी में १२ दाग (मार्क) बना उसी में भर्फ भर दे, एफ २ दाग आध २ घंटा या एक २ घंटे पर देवे जप देखे कि.दो तीन मात्रा दे चुके और कुछ फायदा नहीं मालुम होता तय १ पाराग्यदर्पण। सोरे का धुंआ देना ॥ सारा १उटांक, गन्धक फा तेजाय आधी छटाफ। एक बड़े पास में मां गमले में गरम जल भर कर उसके यीच में एक परतन इस प्रकार से रक्से कि उसके भीतर जल न जाने न पाये । याद उस बीच के य. रतग में सेरा हाउ ऊपर से यूंद २ गंधक का तेजाय टपकाना बारम्भ करै इमसे धुंया निफसाने उगेगा । एक छोटे से घरमें धुंधा करने के लिये केवल एक पात्र बहुत है, यदि पहा घर हे तो उसी तरह दो पात्र स्थापन करे और जिस घर में रोगी हे। वम घर में तो अवश्य धुवा. दे. वे लेकिन धुवे का पात्र रोगी के समीप न रक्से फिन्तु घासी दूर पर रक्खे ॥ इस धुंवे को पहले पहल श्री युत डाक्तर कारगईकेल स्मिथ सा. हय ने प्रकाश किया था। गिस समय सन् १७८२ ई० में प्रिंगायत के बिनचेस्टर नगर में उक्त रोग द्वारा यही गरी पड़ी थी तिस सग पस धुंवे से यहा भारी उपकार हुआ और इसी पर गवर्नमेंट नेता इतर फो पचास हजार रूपया पुरस्कार दे कर राज चिकित्सक का पद अभि- पित किया। उसी समय से आज तक हरएक चिकित्सक गण बराबर इसे फाग में लाते जाये और इमसे विशेष उपकार देखा गया है। हैजे को संस्कृत में घिभूचिका, अंगरेजी में कालरा, यंग भापा उठाउठा और तन्त्र शास्त्र वाले इसी को महामारी की बिमारी कहते हैं डाक्तरी. में मेलिगनेन्ट आदि कालरा बहुत प्रकार के हैं जिनका बयान आगे लिखेंगे । प्रथग हम भास्कालरा" का ययाग करते हैं जो देश विदेश सर्वत्र फैला है। इस हैजे का विवरण और लक्षण ॥ याप्यार के और पाकस्पली एवं आंत में दर्द हो । परन्तु अधिक पमा हेगे मे पेट का दर्द वन्द हो जाता है। दस्त पतला पीत वर्ण और . .

भारोग्यदर्पण। मठ सहित एवं जीर्ण द्रव्य युक्त और जयशेष में कुछ गांव सहित भी होता है.। जिला कंटक गई और नाही मन्द २ गति एवं कधी गतिहीन भी हो जाती है। पियास अत्याधिक और किसी ३ रोगी को हिचकी भी जाने उगती है हाथ पैर शीतल समग्र शरीर या गोठ और हाथ पैर मासून तो यश्यही नील वर्ण हो जाते हैं । सम्पूर्ण शरीर में ऐंठगे और हाथ पैर के नस खिंचने लगते हैं । उक्त लक्षण युक्त रोगी ऐसाही कोई भाग्य यस यच जाता है। नहीं तो २४ घंटे के भीतर अयश्यही मर जाता है। चिकित्सा॥ रोगी को किसी प्रकार की गीली चीज साने न दे, जिसमें ताफत आये ऐसी चीज खिलानी चाहिये। जैसे ब्रांही या पाटयाइग के साथ अरारोट का गांड मिलाके पिलाना उत्तम है। और इस दया को देवे ॥ 02 चाकमिक्सचर ५ औंस । टिचरहाईमासऐगाई दो छाम । पिपर- मेन्ट थाटर १ औंस सय को एकत्र कर एक २ भौंस के अंदाज दिन में चार पांच दफे या जैसा रोगी का बलायल देखे सेवन करावे ।। अगर देसे कि रोगी बिलकुल बलहीन हो गया है और नाही जति क्षीया एवं स्यान भ्रष्ट चल रही है, शरीर या हाथ पैर पाला के समान है, तय गिन लिखित उप्ण कारक अर्क पिलावै ॥ व्यवस्था॥ ऐरोमेटिक एमोनिया १छाम । सलपिउरिक ईथर साधा छाम । टिश्चर फारम कम्पौंह ४ छाम, ब्रांष्ठी १ औंध, लडेनम १ छाम, केम्फर वाटर ५ भौंस । एकत्र कर एक सीसी में १२ दाग (माक) यना उसी में आर्फ भर दे, एफ २ दाग माघ २ घंटा या एक २ घंटे पर देवे जयं देखे कि.दो तीन मात्रा दे धुके और कुछ फायदा • नहीं मालुग होता तय वैद्यक मत धारोग्यदर्पगा। योस मिनट पर देना नफेर दे ।' तय भी यदि हाथ पैर में गर्माहट और नाही तेजी के साथ न पठने. उगे तय पैर को एडी और हाथ की पालाई पर राई फा पलस्तर र दे। पलस्तर लगाने का प्रयोजन यह कि इसके द्वारा गर्मी उत्पन्न हो नाही घखने लगे। से हैजा ॥ पीछे हम हेजा न होने का उपाय लिए भाये हैं, पर 'जय हम मायुर्येद द्वारा संक्षेप से हैजे का निदान और चिकित्सा &िखते हैं। गाथाहै कि पाठकगण अवश्य इस ठेवानुमार रोगियों के अफाट फाल से मचा धन्यवाद देंगे। माज कल हैजे की अधिकता से विशेष को लक्षण दिखलाने की जसरत नहीं है पपोकिं मूर्स से भी मूर्स तक जान जाते हैं कि इसे हैजा हो गया है। हैजेका लक्षण । मूीतिसागैवमथुःपिपासा शूलंधमादेष्टन जृम्भदाहाः । 'वैवी कम्पा हृदयेश भवन्तितस्यां शिरसयभेदः ।।.. गेहोशी, दस्त पतला, पारंपार के हे!ना, पियास, शरीर में ऐंठन घुगरी, पाल ग परै, भुयाई, दाह शरीर का रंग बदल जाना, देव का- पना हृदय और शरीर में दर्दाहेमा विशेष फरके के दस्त पेट और शरीर में ऐंठन पेशाय फा न होना, पिपास की प्राधिपयता अवश्य होती. साध्य लक्षण। यदि धीरे २ उपद्रव घटता जाय विशेष कर यमन रोगीको पीड़ा निद्रा पा जाय शरीर गर्म बना रहे एवं रोगी तीन बार रोज बजार ८५ धारोग्यदपण। और मात कफ का कोई उपद्रय न उठे तो यकीन है कि रोगी अवश्य यथायगा ॥ असाध्य लक्षण । हाथ पैर में ऐंठन ज्यादा हो, स्वर मा और यल घट गया हो, भी तर दाइसपर शीत हो । रोगी को कल न पड़े, पेशाब न उतरे मारे पिपास के गले में कांटे पड़ गये हों, सांस कम आवै या मांस लेते में गला खर २ बोले हुअफी आर्य और नाही रुक २ के चले तो रोगी का जीना यहा कठिन है ॥ चिकित्सा ॥ इस रोग की चिकित्सा गामा प्रकार की है विशेष कर बातरी में इसकी यही तूल के साप ययान है, परन्तु जिस प्रकार की चिकित्सा से अधिकांस लाम देसा गया है प्रथमतः उसीको कहते हैं। इसके परे और भी चैद्य हात्तरों के मतामत से फोन औषध देने से क्या काम हुमा हे यह भी प्रकाश करेंगे। जहां तफ.हो सके फौरन के दस्त बन्द करै । हकीमों को राय है कि हेगा शुरू होतेही के दस्त न चन्द करै कुछ दूषित मल निकल जाने दे? पर हम कहते हैं कि ततक्षण बन्द करना उचित है क्योंकि हैजे के दस्त बन्द करने में रोगी का पेट नहीं फूलता। बाद इसके पेशाय खो- छने.और शरीर में ताकत लाने की उपाय करै ॥ 'हैजे की प्रधान गोष. फेछ यह है । अफीम, पारद, आफूर, नाही सौंफ, गुष्ठाय, पुदीना, वर्षा.॥ 'विभूचिकान्तक बटी ॥ गिगरस मकसूदा यादी एक तोला कोई नहर कागजो नीबू के रस . -- आरोग्यदर्पण। में खरल फर छायो में मुषा ले याद इमफे सिमरण के बराबर अफीम से दोनों सरल, हाल पानीसे घोंट कर बाजराफे घरायर गोलियां पनाले। या अटी हेसे में रामयाण मा गुण दिखाती हैं और पाठक गणों से म. विगय प्रार्थना करते हैं कि जहां तक, हो सके यटी को पुक्या दिया अनुपान। घाहिये कि देगा शुरू होतही यह गोली खिला दी जाय, रोगी गोली को मुह में रख पानी से उतार जावे ग दांत से कुचले पोर न जीम से दुघलाये। यदि गोली उसी समय के में गिर जाय तो दूमरी गोली पानी में घोल कर पिला दे, गोली के पचतेही के दस्त बन्द हो जायगा अगर गोली पच जाय और दत्ता न बन्द हो तो ३ घंटे के बाद एक या दो गोली जैसी ताकत देरो खिला दे। फिर भी न बन्दु हो तो १०.चंदे सफ गाली न दे पियास और यमन रोकने की उपाय फरै अर्क मो. अर्फ पुदीना - मर्फ गुलाम अफूर का पानी Son साधी उँटाफ, धर्म को पानी । इन सबों में जो मिल जाय एकल कर एफ २ तोला दश २ मिन्ट पर बराबर पिलाता जाय, इससे भी के न बन्द हो तो धामी राई पानी में पीस आठ भंगुल लंपा चौड़े कागज पर लेप कर चेट पर रस दे जयसूर्य जलन होने लगे तय निकाल डाले , जय देसे कि रोगी के हाथ पैर में ऐंठन ज्यादा है और बदन बहुत ठंढा है नाड़ी की गति अति मन्द है तो उक्त रीत्यानुसार राई हाथ पैर फो फलाई पर रख दे। और केवल तारपीन का तेल हांए पैर में मालिस फरना प्रारंभ कर दे जप तफ कि ऐंठन मिट फर नामी सूय तेजी से न चलने लगे । ज्योंही दस्त बन्द हो उसी वक्त पेशाय खोलने की चेष्टा करें। फलमीसारा ३ तोला, देसू का फूल २ तोला दोनों को पानी में पीस टिकिपा यना पेडू पर रख दे जोर माघ २ घंटे पर बदलता जाय और पन्द्रह.२ मिन्ट पर गाईद्रिक इपर का दश २ यूंद थोड़े से पानी के भारोग्यदर्पग। साथ या दश र दाना शीतल चिनी की बुकगी थोड़े से पानी के साथ बराबा देता जाय जय तक कि पेशाब साफ न आने लगे। अति सुधा लगने पर गाबूदामा गिनी के साथ दे या भंग की मुठायग, खिचरी दे॥ आध्यात्मिक शक्ति ॥ परम पिता परमेश्वर ने हमारे शात्मा की रक्षा और उसके ना- ध्यात्मिक कार्य साधन के लिये आत्मा के साथ २ एक प्रकार की मृक्ष्म विद्युत भी दी है जिसके। गूफी लेग "नूरेइन्सान" और यूरपीय बिद्वान, माहिल कहते हैं। यह विद्युत शीतल, प्रकाश युक्त और मृक्षागामी होती है। जिस प्रकार आत्मा अपनी मानसिक इच्छा द्वारा अपने पाश्य शारीरक अंगों को हिलाया, डोलता अपने काम में लाता है उसी प्र. फार पर विद्युत केो भी जिधर चाहता है फैलाता और उसे अनेक प्रकार के कार्य साधन फरता है । इस विद्युत द्वारा जारमा याय. न्द्रियों के मिनाही जितनी दूर चाहे देख सक्ता मुन सक्ता है और अ. पनी इच्छा प्रकाश कर सका है। यह विद्युत ऐसी भूक्ष्म है कि कोई पहार दियार आदि उसे रोक नहीं सक्ता है उनके भीतर से निकल २ जाती और मारमा दृष्टि गादिक शक्तियों को दूर २ फैला देती है । इस विद्युत का और कोई शब्द नहीं मिलता लाचार विद्युत कहना पहा इमी के द्वारा योगी जन अद्भुत शक्ति शम्पन्न होकर एक स्थान पर बैठ कर देश देशान्तरों को जाम्यम्तरिक दृष्टि से देख सक्त हैं। भी विद्युत के विषय में आज कल "पियो सोफिष्टी" कुछ कहने भोर लिएने लगे जिस्से लेोग उनकी दुग में घुमे जाते हैं और उसके घेले मनते जाते हैं यह जाश्चर्य की बात नहीं है। मंमार में यद्यपि कोई । मनुष्य एक तुच्छ शरीरक मा को ही किसी ऐसे कार्य में लगाना शारंभ करे, जिसे और डाग नहीं कर सकते, तो सम्र हैरान होकर उस्के पीछे खरल कर छाया में आरोग्यदर्पगा। में सुदा ले याद इमफे मिमरस फे घरायर अफीम ले दोनों खरल में डाल पागीसे घोंट कर बाजराके यरायर गोलियां बनालें। यह अटी हैजे में गमयाण मा गुण दिखाती हैं; और पाठक गणों से स. विषय प्रार्थना करते हैं कि जहां तक, हो सके घटी को पुक्या दिया . अनुपान। घाहिये कि हैजा शुरू होतेही यह गोली खिठा दी जाय, रोगी गोली को मुह में रख पानी से उतार जावे न दांत से कुचले और न जीभ मे दुघलाये। यदि गोली उसी समय के से गिर जाय तो दूमरी गोली पानी में घोल कर पिला दे, गोली के पचतेही के दस्त यन्द हो जायगा सागर गोली पच जाय और दस्त न बन्द हो तो ३ घंटे के बाद एक या दो गोली जैसी ताकत देसे खिला दे । फिर भी न बन्द हो तो १० घंटे तफ गोली न दे पिपास और यमन रोकने की उपाय फरै अर्फ सौंफ । अर्क पुदीना - अर्फ गुलाम - आफूर का पानी San माधी उँटाफ, बर्फ का पानी । इन सबों में जो मिल जाय एकत्र कर एक २ तोला दश २ मिन्ट पर यराबर पिलाता जाय, इस्से भी कै न बन्द हो तो धेसी राई पानी में पीस आठ अंगुल लंबा चौड़े कागज पर लेप कर पेट पर रस दे जय सूर्य जलन होने लगे तब निकाल डाले , जब देसे कि रोगी के हाथ पैर में ऐठन ज्यादा है और बदन बहुत ठंढा है 'नाही की गति अति मन्द है तो उक्त रीत्यानुसार राई हांथ पैर फी कलाई पर रख दे। और केवल तारपीन का तेल हांथ पैर में मालिस करना प्रारंभ कर दे जब तक कि ऐंठन मिट कर नाही सूप तेजी से न घटने लगे। ज्योंही दस्त 'बन्द हो उसी वक्त पेशाय रोलिने की चेष्ठा करें। कलमीसारा ३ तोला, देसू का फूल २ तोलां दोनों को पानी में पोस टिकिपा यना पेडू पर रख दे और माघ २ घंटे पर बदलता जाय और पन्द्रह २ मिन्ट पर गाईट्रिक इपर का दश २ . बूंद थोड़े से पानी के 7 भारोग्यदर्पगा। ៤១ साथ या दश २ दाना शीतल चिनी की युकगी थोड़े से पानी के साथ बराबर देता जाय जय तफ कि पेशाम साफ न भाने लगे। पति क्षुधा लगने पर गायूदाना गिनी के साथ दे या मंग की मुलायम.पिचरी दे॥ आध्यात्मिक शक्ति। परम पिता परमेश्वर ने हमारे शात्मा की रक्षा और उसके गा- ध्यात्मिक कार्य साधन के लिये आत्मा के साथ २ एक प्रकार की भूक्ष्म विद्युत भी दी हे शिरको गृफी लेग "भूरेइन्साग" और यूरपोय मिद्वान, जाहिल कहते हैं । यह मिद्युत शीतल, प्रकाश युक्त और मृतागा होती है। जिस प्रकार शारमा अपनी मानसिक इच्छा द्वारा अपने पाश्य शारीरफ अंगों को हिलाता, होलता अपने काम में लाता है उगी म. कार इस विद्युत को भी जिधर चाहता है पलाता और उसे अनेक प्रकार के कार्य साधन करता है । इस विद्युत द्वारा शाला पाय इ. न्द्रियों के विगाही जितनी दूर चाहे देख सत्ता सुन मक्ता हे और n. पनी इच्छा प्रकाश कर सका है। यह पिट्युत ऐसी भूक्ष्म है कि कोई पहार दिवार शादि उसे रोक नहीं सक्ता है उनके भीतर से निकल २ जाती और मारमा दृष्टि गादिक शक्तियों केो दूर २ फैला देती है। इस विद्युत का और कोई शब्द नहीं मिलता लाचार पिट्युत फहमा पहा इमी के द्वारा योगी जग अद्भुत शक्ति गम्ममा होकर एक स्थान पर बैठ कर देश देशान्तरों को शाभ्यम्तरिक दृष्टि से देख सक्ते हैं। भी विद्युत के विषय में जा क "पियो माफिष्टी" कुछ कहने गीर लिराने लगे जिस्मे लोग उनकी दुग में पुमे गाते है भी उगके चेठे याते जाते हैं यह पाश्चर्य की बात नहीं है। मंमार में यद्यपि कोई मनुष्य एक मुच्छ शरीरक भाग कोही किसी ऐसे कार्य में लगाना भारंभ करे, जिसे जीरोग नहीं कर सकते, तो मन हान होकर उसके पीछे पाराग्यदर्पण। दौड़ने लगते हैं । थियोमा फिट छागों ने इस पुरातन मिद्या का भी तक लेश भी नहीं है। गौर न यह जानने के लिये प्रयत्न ही सर है। नन्न लोगों ने तो फेया रुपमा फगाने और भारत बामियों को मूमने के लिये ही यह थोपा मा तगामा मेस्मितीजग शादि मीर लिया है। जिसमे हमारे भोले भाले देश यामी गंतवासे पर उनके गीत गात और पो परिश्रम की कमाई में बाग लगाते हैं। मेरे प्यारे भारत बामिया यह तुम्हारेही देश की विद्या है जिसमे गम "गियां की जूती गियां की चांद" का सेख हो रहा है। जिम प्रकार हम यद्यपि एक हाथ उद्धंगाई को नाई पड़ा या समा रहने दें, और उस्मे फुल काम न लें, तो थेसि में काल में पाह जफर कर किमी काला नहीं र. सा। अगर कोई अच्छा पद्य गिले और किमी सोपधि या पल द्वारा उसे सुधारे, तो या कुछ फाग देने लगे तो मम्मय है । इमी न. कार ने ममय मे हम लोगों ने अपने पाप दादा के माध्यामिक माधग को छोड़ कर इम पदभुत ईश्वरीय शक्ति को येकार कर रहा निगे अपंग साधारण रूप से भी उसे किसी काम में नहीं ला पत।। और यद्यपि किमी को उस्का लेश मात्र मी साधक देखते हैं, तो गुलाम यनने, उसकी शूती माफ करने, और अपना सन, गग फरने को तत्पर दे जाते हैं। पसर्ग सन्देश नहीं किया हम महान शक्ति के रो कर बस दुर्य जोर दुखी हो रहे हैं। और जमातफ इस सपने माधन फी भोर दूष्टि ग फरेंगे, तप तक हमारी दशा सुधर न.ए. फेगी । यही सो योग का मूल है । लाम. फल हमारे भारत पासी यह समारोहैं कि प्रमको साधग करने के लिये,घरपार त्याग फरगा पड़ता है। भार गंधार से विदेशी होकर यम में रहना होता है। नहीं गाई, यह सारा रोल संगार के पवित्र उद्देश्य के पूरा करने के लिये ही है। परमेश्वर ने यह गुन्दर संचार त्याग करने मोर उसे मुंह मोड़ने के लिये ही घंगाया है। पां, अत्याचार, कुसंस्कार जादि अपश्यं त्याग फरणा पता है पपोंकि ये तक • जामा पवित्र न हो, यह विद्युत गिर्मल नहीं होती, कार पमा कार्य कर सकती है। यदि लोगों को आगग्यदर्पगा। ८६ - इच्छा होगी, और यह अपनी आध्यात्मिक शक्ति को जानना और उसे अपने कार्य में लगाना चाहेंगे, तो मैं यथा शक्ति उनको ऐसा उपाय और साधना यतलाने में प्रस्तुत हूंगा जिस्से यह इस शक्ति को लाम करके अनेक प्रकार का आनन्द पावेंगे। मैं तो यही चाहता हूं कि मेरे देश बासी इन शारीरिक इन्द्रियों पर ही भरोसा करते न रहजायें क्यों कि एक समय ऐसा आवेगा जय यह शरीर न रहेगा और आध्यात्मिक इंन्द्रियों से ही काम लेना पड़ेगा यद्यपि अभी से इस्का सीखना आरंभ न करेंगे तो मृत्यु के पश्चात् अंधे लूले की दशा में रहना पड़ेगा । आध्यात्मिकशक्ति साधन ॥ माग में लोगों की इच्छा देख कर कुछ आध्यात्मिकशक्ति के रद्धि का उपाय वर्णन करना आरंभ करता हूं। यदि भारत यासी सज्जन पु. रूप शान्ति लाभ निमित्त इस्को सीखना और अपने जीवन में इसका अनुष्ठान करके मानन्दित होगा चाहेंगे तो मैं धीरे २ सय कुछ यथाशक्ति प्रकाश करूंगा । यह तो मैं जानता हूं कि आज कल हमारे देश यासी युक्ति, तर्फ ज्ञान पालोचना, संदेह यादी, और सांसारिक गोलमाल से अशान्त गौर थकित हो कर एक प्रकार की नूतन पिपासा योग साधने की प्रकाश कर रहे हैं । इसी लिये किसी मनुष्य में लेश मान भी आध्या त्मिकशक्ति देख कर मोहित हे। जाते हैं। यहां तक कि धन और माण भी अर्पण करना स्वीकार कर बैठते हैं । जिसफा कि मैं पहिली बार कुछ वर्णन कर चुका हूं। आप जानते हैं जप एफ यस्तु पर किसी प्रकार का रंग चढ़ जाता है, तो उसपर दूसरा रंग चढ़ाना, या उस्को अपनी पहली अयस्था में लाना फठिग होता है । पहिले उस रंग दे रगए कर साफ करना प. हता है । इसी प्रकार जय हमारी प्रकृति ही अदल गई है, हमारा रंग ही दूभरा हो गया है, तप हमारे भात्मा की प्ररुति शक्ति का प्रकाथ पाना या समझो अमली रुप का बिलगा फटिग देसाई देता है।

श्रारोग्यदर्पण। सारा कार्य विश्वास द्वारा ही चलता है, साना, पीना, उठना, बैठना, | सोना, जागना, वाणिज्य, व्यापार सभी विश्वास बिना नहीं हो सक्ते हैं। हमारे आपस में विश्वास न होने के कारण हम एक दूसरे को माहायता नहीं करते, एक दूसरे का उपफार साधन नहीं करते, इसी लिये दाम चन फर दुःख भोग कर रहे हैं, देग बिनाश हो रहा है। आप फाहते हेांगे कि यह तो और ही कुछ कह रहा है, जिम विषय पर कहना है और जिसके लिये हम अपेक्षा करते हैं, यह तो नहीं फहता है गहा राज जब तक भूमि ठीक नहीं होती, उसमें योर्य योने से कुछ फल न. ही होता है ऐसे छोटे मोटे चुटकले जिनको पिओमफिप्ट लोगों में दे- खते हैं, और जिनके कारण आप मोहित होरहे हैं, यह तो दो दिन में आ सक्ते हैं। यह तो याजीगर के नाम के दृक्ष हैं, जाज हैं फल नहीं । मैं तो आप के हंदय भूमि ऐसा पेड़ लगाना चाहता हूं कि जो सर्वदा हरा भरा रहे और उत्तम से उत्तम फल देकर जाप को सायं पुरुषों की ठीक सन्तान बना देवै । घयहाइये नहीं, आप को कुछ यहुत फट उठा- ना नहीं पड़ेगा घोड़ा ही हदय भूमि का जंगल फाट फर माग गाना होगा-केयल अपने हृदय को प्रकृति अवस्था में लाना हेगा, माटी जंगल माफ़ करना होगा । इसी लिये मैं आज शाप से इतनाही फटना चाहता हूं, कि प्रकृत विश्वाम पया है (जिस्से शाप को विदित हो जा. वेगा, कि आप के ऊपर कैमा रंग चढ़ा हुआ है) और उसके उज्वल करने की रीति पपा है । प्रहत विश्वाम ही आत्मदर्शन का मूल है, जय तक भाप अपने मात्मा को देयाही नहीं गफेंगे, तो उसकी शक्ति का जा- गगा, उसकी रहि या उससे कार्य साधन करना कसे सम्भय हो सकेगा? . यह तो स्पष्टरूप से जाना जा सक्ता है, फि जिसे लोग विश्वास कहते हैं या प्रकृत विश्वास नहीं या तो फेवल गापम के संस्कार हैं। धम बात का प्रमाण यही देख लीजिये, कि वह मंदेह से गतीत नहीं है। जग तक मंदेह है तब तक याही जागना चाहिये कि प्ररुत विश्वास नहीं मिला और जय तक प्रकृत मिश्यास प्राप्त नहीं। तय तक योग की थारोग्यदर्पा । ६१ पात फहना ही निरर्थक है। योग. के पथ में घटने के लिये सर्वत्र ही यह लौकिक संस्कार परित्याग करना और प्रकृत विश्वास ढूंढ़ना हेगा । प्रकृत विश्वास योग पथ की पहिली सीढ़ी है ॥ प्रकृत विश्वास का लक्षण अपरिहार्यता और अनतिमणीयताही है। जिस विश्वास को किसी बल द्वारा हटा न सके, हजार २ विरोधी युक्ति से उसे हिला न सबै, यही प्रकृत विश्वास है । दर्शन शास्त्र में इस फे। ब्रह्म विद्या और बात्मप्रत्यय बोलते हैं । जिमफे पिपगीत कुछ भा- घना करदी नहीं सक्त यही बात्म प्रत्यय, यही प्रकृत विश्वास है । क्यों जी देसे तो सही पाप में भी कुछ है, चुटकुलों को देखकर तो मोहित हे जाते हे । किन्तु पहिले इस विश्वास के लाभ करने के लिये प्रस्तुत हो । तब मैं आगे कहूंगा, नहीं तो बस सलाम । वाफी दूसरे राह में देखो। लड़कों की पसुली की विमारी ॥ एक त वैद्यक शास्त्र की ऐसे ही दुर्दशा हे। रही है दूसरे जो कुछ छ भी यह अपढ़ आसान नकली वैद्य और चांडाल औरतों के मारे और भी भत्यानाश हो रहा है । यह तो सभी जानते हैं कि युवा गनुष्यों के अपेक्षा यालकों के रोगों का नाड़ी के द्वारा यपाधं शान कर लेना यहा दुष्कर है, क्योंकि समान भादमी गाड़ी के अतिरिक्त अपने समग्र सोशों को कई मी देता है। पालक विचारा न तो बोल सके और न अपने भ्यन्तरिक सुरा दुःख का पयाग कर सो पद सिर्फ गाता के आधीन रहता है चाह माता मारे या जिलाये । धात्री शिक्षा, गर्भ रक्षा, याल पोषण और स्त्री पुरुष य्ययहार णादि पिद्या जो स्त्रियों को पढ़ना ज. त्यावश्य है यह तो. जाता रहा अय तो केवल गहा महामा, मंदिरों में ना के कथा मुनमा पति रोके तो चूल्हा और घर के घरतग फोहना, फलमियां के शिरे पलिराजा पायथै, फलानियां तो.दुमा माया का पूजत आरोग्यदर्पगा। थों और फलाने बाबा जी तो ऐसे हैं कि जन्म के यांक को छहका देते में यही फुसङ्ग और कुसंस्कार रह गया । यही कारण है आजकल स्त्रियों के अति प्रचण्ड होने का क्या इनियार है फि बिना महामायाको जात्रा घर के गर्द कुछ कर तो मकै, जहां याला बीगार सुभा और तन के स्वामी जी बोले कि लाभो किसी सतवैद्य या हाक्तर को दिखलायें तहां झट घुडुक उठीं कि कुछ जानंत यूआत है। कल घसिटिया की गाई आई रही सो देख लिहेन है। फिर क्या पूछना है ओढ़ चदरिया तैय्यार है। गई। हमारे इस देश के स्त्रियों को ऐसा टोना टामरका दृढ़ विश्वास पर गया है कि जहां देरी अच्छे २ घर की स्त्रियां बालकों को बगान में दयाए और हाथ में थोड़ी सी बढन्ही की सीक लिये मह जित के दर- पाजे खड़ी हैं । प्रायः देखने में जाता है कि बड़े मधेरे महको पर महक पटोरने वाले एलासोर जादि हाथ में काडू लिये लड़कों को मार रहे हैं। बड़े माश्चर्य की बात है कि अंगरेज़ भोर यजालियों के ऐसे सूब भूरत पीर साफ़ लसफे जिनको दाइयां गादों में लिये सहके पर टह- लाया करती हैं, कि जिन को अच्छे और बुरे लोग सभी देखते हैं उनके लिये न कहीं टोना न टामर और हमारे इस देश वाले के लड़के जिन की नाक यह रही है। मक्सियो भिग मिना रही हैं, कुंडा कपडा पड़ा है तैल चाफे चिपड़ों की सहयोग गले में गूंपी है वहसग जौर हींग को दुर्गन्ध देह से निकल रही है, घर के बाहर नहीं माने पाते परंच टोगा उन्हें रोज़ लगता है। जय देखिये एक तो गति फाल तक थाल का मुख ढांप फर गोद मैं दया रसने से मोगारी होती है. दूसरे दोने के भय से, लमको का. इस कदर मैला फुचैला यमाये रहती हैं कि जिस्मे अकस्मात एक न एक रोग उत्पन्न हो रहता है, तीसरे गो गांसाहारी गर्मी सुजाक वाले सेको मुल्मानों के मुंह की भाफ और धूंक कि जिसकी बौछार बालक की मां के मुख तक जाती है, कि जिस्से रोग होने का सम्भव वैद्य, हात्तर, हकीम सभी का मक्ते हैं । चौथे हलालसोर जादि गीचों के पाप सादू और टोकरों की दुर्गन्धि, पांचवे माता का तीन बजे रात्रि पदन में मैला आरोग्यदर्पण। से उठ गंगा जमुना का नाहाना, एकादशी, मङ्गल और एतवार का व्रत अन्न और सक्ष पदार्थो का जून फजून गोगन, छठे यिमा जागे बूती से हुड़ के पत्ते का अर्फ तक पिला देना, इत्यादि हम कहां तक कहैं हजारों अनाचार हैं। "माता यदि विष दद्यात् पिता विक्रयते सुतं, राजा हरति सर्वस्वं शरणं कस्य जायते" । माता हो यालक को यदि पिप पिला दे पिता बेध हाले राजा सब छीन ले तो फिर यह किम के शरण में जा सकता है। अंघ कहिये इस प्रकार बालकों को रखने से पोंकर जीवन रक्षा हो मक्ती है यदि लेट पोट बष भी गये तो उभी, निबंसता के कारण घल बीर्य बुद्धि तथा सक्ति उत्तमता अनुकरण उपलब्ध कदापि न होगी। इभी सब से इस देश पाल के लड़के की मेधा ती नहीं होती बोल्क और भी जस २ उमर बढ़ती जाती है तस २ और भी मोटी हेाती जाती है। यह जो पंसुली की बीमारी आज फल प्रसिद्ध है और मूर्स से बि- द्वान तक यही कहते हैं कि इस लड़के को पसुली चल रही है। इसको खूष गर्म चीज़ खिलामो और पेट पर गर्म दयाईयों का लेप करो। परन्तु आज तक किसी ने इस विषय पर ध्यान न दिया कि अमिल में यह बिमारी.पया है और इस बिमारी का हाल किसी ग्रन्थ में भी है या नहीं। हम नहीं जानते इस बिमारी का प्रकाशक कौन वैद्य हात्तर हकीम है जो हर एक औरत मर्द के मुह से पमुली चली २ सुनाई देती है । इसी भेड़िया घसान से तमाम भारतवर्ष तहस नहस है। गया इसी प्रयाग नगर में एक से एक वैद्य धन्वन्तरि यने हजारों रुपये खसोट रहे हैं पर इसकी मालोचना लाज तक किसी ने न की। ये जे' यापप रहित पराधीन विचारे हजारों के प्रति दिन काल काखग्रास होते जाते हैं इसका प्रतीकार किमी प्रकार हो सका है या नहीं इसी रोग का हवा यदि किसी साप कोई प्रथम श्रेणी के यूरोपियन डाक्तर लिस कर गवर्नमेंट में भेज देगा और जैसे माता की बिमारी रोकने के पारे।ग्यदर्पण। ६४ . लिये टीकता का प्रकाश हुआ है उमी प्रकार इसका भी टीफा या औषध लगाने अथवा खिलाने का हुक्म निकल जायेगा तो अन्त में निरुद्यमी लोग सड़कों केा लेके भीतर भागेंगे और यही कहेंगे कि सरकार हमारे माथ अन्याय करती है ॥ निस्सन्देह का मक्ते हैं कि “पसुली चली" इस नाग की बिमारी का लेस समस्त वैद्यक के ग्रन्यों में नहीं है पर अत्याश्चर्य इस विषय पर है कि पढ़े लिये वैद्य लोग भी टाका कह देते हैं कि इसकी पमुली चल रही है। हिकात के ग्रन्थों में कहीं २ पसुली के रोग का पत्र ऐसा लिसा है पर निदान ठीक २ नहीं मिलता । किसी २ देश वाले इसी रोग के हवा हवा भी कहते हैं । इम रोग की दवाइयां प्रायः लोहार बढ़ाई छोम पगार कमाई तक यना करके यांटा करते हैं कि जिनसे ह. जारों लड़के बिचारे काम आ जाते हैं । इसका संशोधन बिना गजांफी दृष्ठ पड़े कदापि हाना सम्भव नहीं है । अब हम पाठकगखों के जयलो फनार्थ प्रथमतः यालकों के उन समग्र रोगों का वर्णन करते हैं जो प्रायः लड़कों को हुभा ही करते हैं और जिनका वैद्यक के ग्रन्थों में प्रमाण भी मिलता है । सुश्रुतादि मिद्धान्त ग्रन्थों के देखने से ठीक मालुम होता है कि सेयाप पूनाना आदि याल ग्रह के और जो रोग सयान' के होते हैं यह बालकों के भी, पर शाधर आदि छोटे २ ग्रन्धों में पूतना के अ. न्यत्र बहुत से पालकों के रोग लिसे हैं फि जिनके लक्षण अद्यावधि या. लकों में पाये जाते हैं और उसी प्रकार की चिफित्सा से रोग आराम मी हो जाता है। पूतना आदि यालग्रह शिगफा घपान एहत् ग्रन्थोंमे छोटे ग्रन्ध तक सभी पाये जाते हैं, और जिनका लक्षण. कुछ २ यालकों में भी मिल जाता है पर चिकित्सा उनका सेवाय झाड़ फूक टोटका उतारा के और नहीं है परंञ्च ग्रन्थकार ने जिस मतलय से टोटका आदि लिखा है उनका गूढ़ अभिप्राय कमी प्रकाश करेंगे। पपोंकि यहां सब से पहिले हमको याही कहिना परता है कि जब तक फुपथ्यं से माता के दूध में विकार उत्पन्न नहीं होता तप तक याप्ठफ फदापि रोगग्रस्त भी नहीं होता । जिन स्त्रियों के दूध में बात का विकार अधिक हो जाता है भारोग्यदर्पगा। उम दूध पिये पालक का लक्षण यह होता है। दिन प्रति दिग दुयला होता जाय, दस्त दुमरे तीमरे रोज है।, पेशाब करते कारो और फम तु. तरे और गिन्मिनाता रहे ॥ पित्त दूषित दूध पीने से दस्त पतला फटा सा पीला या हरा हो, मुह से फटा दूध भी फेंक दे, शरीर गर्म रहे, मुह पर से कपहा फेंक दे, और कभी २ पमीना भी आ जाय मूत्र गर्म ननरै ।। कफ सम्बन्धी दुष्ट दूध के पीने से मुह से गार अहे. हर समय भी. घाया करें और उयफाय ॥ पालकों की हांफी जिसको लेोग पसुली की बिमारी जानते हैं और घका जिसे औरतें पेट कहती हैं इस बिमारी में लड़के रोलते २ ए. काएक आंग उलट देते हैं और चेहरे का रंग यदल जाता है गालूम होता है कि खतम हो गये मगर जप मुह पर पानी छिडफा जाता है और में या लगती है तो फिर हे।स में आजाते हैं लेकिन यहां की स्त्रियां तो निस्सन्देह इस बिगारी को अढ़ाई घड़ी का नारसिंही टोगा सास नसको और भी चारो तरफ में डांप राजधान और गि की धूनी दे कर फौरन गार डालती हैं। प्रिय पाठक गण, दूध में विकार उत्पदा होने का ग्रूपाप (प्रथम लक्षण) यह है कि पाठ दम रोज़ के पे. स्तरही गे यालक को मा के पेट में जागसा जलने लगता है या पेट क. रोने, छगता है यदि उसका उपाय तत्क्षण कर दिया जाय तो न माता फा दूधही विगहे और न उड़का यिमार हे। ॥ मुमका उपाय यही है कि जेन धात्री (दूध पिलानेवाली स्त्री) के पेट में लागं यल उठे या पेट फरोने लगे तय पाय भर गौ के दूध में एक ताला मित्री गिता के पिया देय या मिश्री का सरयस पिला देय या और कोई टेंढी पी खिष्ठा के.पानी पिठा देय । इसी प्रकार या जलग उठने के कर दिया करे तो कदापि पाठक मिगार न हो। को उचित है कि यह पात अयश्य अपनी २ स्त्रियों को गिनका दूध सुय - आरोग्यदपंग। बालक पीता है। मिसा दें कि 'जय उनके पेट में भाग सा जलने लगे या पेट करने लगे तो उक्त उपाय मे निवारण कर लिया करे। पोंकि "अग्र माची मदा सुखी पहले ही मेष लेने में मनुष्य मदा सुखी रहता है । ऐमा कौम मा मनुष्य है जो यह न जानता होगा कि "गृहे. रत्नानि यालके" यालफ गृह का एक रत्न है और जिनके गृह में या नहीं है यह घर धन के समान है, एक पुत्र के लिये लेग लाखों रुपये खर्च कर हालते हैं देवी देवता पोर पैगम्बर मनाया करते हैं पहां तक कि मे स्त्री पुरुप दिया रात्रि इसी शोध में पड़े रहते हैं और कहते हैं कि हे ईश्वर हमको एक लड़का चाहे लँगड़ाही लूला दे लोग अपुत्री तो न कहेंगे । अब विधार करने का स्थलहै फि ऐमा अमूल्य पदार्थ कि जिस्के द्वारा पिता.तक स्वर्ग जाने की भाशा रखते हैं, वह केवल माता की अज्ञानता से छण गाल में एक साधारण विमारी में पिधारे फाल काल ग्रास हो जाते हैं। हां! "पुत्रशोऽ महाकष्टम्" ऐमा फोगमा पाषाण हृदय होगा जो माद मर जाने पुत्र के महा शोक समुद्र में डूब कर अस. हन कष्ट को न प्राप्त होगा। यह जो पसुली की बिमारी माज कल समस्त भारत वर्ष में फैली है खास कोई ऐसा बिगारी नहीं है फि जिसमें लड़के मरही जाय । यह केवल रोग के अनभिज्ञता से लोग भ्रम में पट उलटी पुलटी औषध क- रफे यालकों को मार डालते हैं। पाठक गण प्रथमतः जय हम सिर्फ मायुर्वेद के दो चार लेोटे मोटे अन्य देख चिकित्सा करना बारम्भ किया पाउस अवस्था में हमारी भी यही दशा थी कि प्रचलित गोलियां जो कि लोग अब तक पनाकर लड़कों को दिया करते हैं हम भी देते थे, पर, ईश्वर की करुणागय दृष्टि से शीघ्र ही हम को सुश्रुतादि ग्रंथों के शयलोकन द्वारा, इम घिमारी का अनुमान हो गया और देईघार ल. इकों पर आजमाने से पूर्घात कुपथ्य जनित रोग निवारक , महौषधि मी, उपलव्य हो गई। उसी समय से गाज तक कोई दश हजार लपके ऐमे २ भाग किये हेगे कि जिमे, लोग पसुली की दया सिलाते और अरयातेर मार चुके थे एक परिक्षा और देखा है कि जम मति गर्म दया पारोग्यदर्पगा। देते देते बालक के अभ्यन्तर गर्मी इस कदर बढ़ जाती है कि यगल में ज्वर भापक तापमान यंत्र (परमामेटर) के लगाने से पारद सौ नम्बर तक चढ़ जाता है तो फिर उसका बचना'वहा कठिन हो जाता है । उक्त रोग का लक्षण यत्न । माता के घिदग्ध दूध के पीने से यालक के पक्काशपस्थ वायु कुपित है। पित्त के साथ मिल जाने से छाती का कफ सूख जाता है तप प्राण बायु के अपराध से स्वास गत बायु का गमनागगन कुछ कम होने के कारण बालकों को एक प्रकार की हांफी पैदा होती है तब पेट उनका जाति होगलता के कारण उछलने लगता है उसी को लोग पसुली की बिागरी जानते हैं। . यह रोग दे। प्रकार से होता है एक बायु पित्त के कोप से दूसरा फेवल वायु से, पहले का लक्षण यह है कि पेट बहुत अधिक म उछले दस्त पतला हे, पेशाय बहुत गर्म और फम उतरे, गले में कफ का घुर- घुराहट हो या ग भी हे। पियास से भोंठ चाटे और पानी के तरफ जादा रुजू हो, कपहा मुह पर न रख मके और कभी २ घयहा कर दूध भी न पिये। दूसरे का लक्षण जो सिर्फ यायु से होता है यह यह है कि मल के सूर जाने से दस्त न हो, पेट बहुत उछले, मूत्र जाति उप्ण हो और कम मूते और गला सांय २ करे या गले, कफ बोले, नाशिका का छिद्र मृए जाय स्वास मुखमे पाये गौर कुछ पेट भी पूल जाता है । पसुली की विमारी की अनभूत महोपधि । जो रोग सिर्फ मायु पित्त के कोप से होता है कि जिगका लक्षण अपर लिख चुके हैं, उसका उत्तम उपाय यह है कि पहिले उसका दस्त इस औषध से गाढ़ा और कम कर दे। बेश की गरी मृखी ६ माया, चारोग्यदर्पगा। गर पानी पुराने जम के गुठली की गरी ४ मासा देने के। माहीत पूर्ण कर ४ मासा मित्री गिठा सय को ६ मात्रा फर पानी के साथ दिग में ६ गर- तथे फरके पिला दे। या केवल बेल का मुद्या दे। २ गामा करके दिन में ४ मरतये पानी में घोल कर पिला दे। एकाही दाज में दस्त गाढ़ा और फम हे। जायगा । बाद दो रोग के पांच दाना शीतल चिनीकी बुफनी दो २ घंटे पर पानी के साथ देकर पेशाब की गर्मी भी बांट दे। जय देसे शि इसका दस्त और पेशाय माफ होता है मिपा गले में फुल कप का घरघराहट बांकी हे तय फार्थानेट मास सेोहा या साफ किया मज्जीसार ६ रत्ती मिश्री रत्ती दोनों को मिला ४ गाग, के साथ दिन में ४ दफे पिला दे। अपर लिखी हुई माया दो पर्ष से अपर पाले पालकों के लिये है, उससे का उगरवाले चालकों के आधा मात्रा देना चाहिये और उनकी गातां को गर्म चीजों से परहेज करावे । दूसग जो केवल वायु से होता है उसने पहिले दस्त जुलागा फ: रावे यह याह है कि हा ३ रत्ती, गुलकन्द गुलाब ४ गामा पहिले गुल कन्द झा घोड़े से पानी में घोल मल कर छान ले सब उसी में रोहा डाल पिला दे। इसी तरह दिन में ३ पा घार मरतने पिलावे । यदि इससे एक रोग में दस्त न आये तो दूसरे रोज मोरे' रेसी का तेल २ गागा तारपिन का तेल २.विन्दु थोड़े से दूध में मिला के. पिठा दे । पाद दस्त माफ आने के पूर्वोक्त रीति से शीतल चिनी पिला पेशाय भी माफ कर दे। यदि लाएका कुछ खाता पीता तो उसे मूज की मुला- पम सिधरी या साबूदाना दूध मिन्नी के साथ दे। निस्सन्देह पालक पांघ सात रोज में गाराम हो जायगा। माशा है कि हमारे प्रिय पाठक गण इम लेखानुसार ' उपाय कर पालकों को आशाल काल के भुग से बचाय इसका पान्दोलन अयश्य करेंगे। पोजिीपदान के समान दूमग दान नहीं है जोर न जीय है परापर संचार में कोई उपहार है। लिखा गी गन्दपुराण में । ।

चारोग्यदर्पां। ६६ - "अप्प फनीरुजीहत्य व्याधितंभेषीनरः । प्रयातिवासदन कुमार संयुनः" जे मनुष्य एज भी रोगी को औषध द्वारा निरोग करता है यह सात फुल सहित प्रह्म लोक हो जाता है "कपिलाकाटिदानादि यसलं परिकीर्तितम् । तत् पाठकोटिगुणितं मेकातुरचिकित्सया" एक कोटि क. पिला गौ के दान में जितना कमा है, उसका कोटि गुण पाल एक रोगी की चिकित्सा में है पायल्पयः “दीर्घतीग्रामयग्रस्तं वालणंगामयापिया, दृष्टापथिनिरासंफ रुत्वासनलहाशुचिः" पुरातन कठिन रोग ग्रस्त ग्रा- लय या गौ को रास्ते में देख उसका रोग छुटा देने में व्रल एत्या का पाप छूट जाता है। पुरा फाल में एही भूमाउल मध्य में गनुष्यों के . ल्याण एवं देह रक्षार्थ निमित्त अनेक महर्षि यहु यन द्वारा अनेकानेक द्रव्य तथा शारीरक परीक्षा पर अपई येदान्तर गत आयुर्वेद नामक प्र- तिष्ठित शास्त्र मिस्यात किया तद्वारा पद्यपर्यन्त दयायलम्मी प्राप्त पैद्य पर देश काल के अनुमार प्राणी मात्र फा दुःख हरण करते पाये । अरुण काल से समुद्र तुल्य आयुर्वेद शास्त्र का शंका समाधान एवं समाधिगा न होने से माय लुप्त ही हो गया । । धातृ शिक्षा। - शाहका सय से पहले इसके लिसने का अभिप्राय यह है कि उत्तमोत्तम स्या- स्थ्य उमी फे। छाभ हो सकता है जिसके पूर्णयु यर्टक का उद्योग मन्न से पपा गर्भाधान की रो किया जाय, पेलि "सिनोमूनेय पनमगा" इससे मायूत होना अत्यावश्य है। और यह सभी जानते है मिालकों हे गीतरी पोहा का हाल जागना हर एक का काम गही है ? मेयाय उगाधों के जिन्हें भायुर्वेद का पांचया अंग फोगारमृत्य गायक तंत्र में राम म्याम है। पर इस बात का महा रोद गौर गत्यंत शेफ है कि हमारे इस देश के वैद्य डेग शुश्रुतादि मायुर्थेद के अमृत सरोवर में रसान न करने पद संत्र मिष्ठल. गहों भागते इसी से १०. आरोग्यदर्पण। अपकीर्ति जोर अपयश का टीका लगाये फिरते हैं कि जिसमे डवरे के नहाने वाले (धर्मकार फम्योहर) भी घिनाते हैं। बार निषित्सा पर ध्यान देना वैद्यों को क्या गृहस्थ मात्र को भी उचित है । पालकी की यस्था तीन भाग में विभक्त है ॥ पहली शिशुता, जोकि जन्म से दो वर्ष पर्यन्त जन तक कि दूध के सब दांत न निकल आयें॥ तक कि दूसरी कुमारता, अर्थात दो वर्ष से सात आठ वर्ष पर्यन्त जय के समग्र दांत फट फर' ठहराऊ दांत सबन पाजाय॥ तोमरे कैशोर, जो कि कुंमारता योतने के उपरांत पन्द्रह सोलह वर्ष पर्यन्त की अवस्था गिनी जाती है । अब हम शिशु संञक बालक की जन्म समय से लेकर जय तक कि के संपं दांत न निकल जायें पूरी और परिक्षित चिकित्सा लिखते हैं। पाठफ गण अपनी २ स्त्रियों को इसे अवश्य पढ़ा3 ॥, स्नान ॥ . जन्म हुए बाडफ को उमी सगय स्नान कराना अच्छा नहीं। प्रायः स्त्रियां ठंडे पानी भी नहयाती या धो डालती हैं, पर इससे उपकार न होकर और जनहित होता है जैसा कि मांख और फेफड़े में जलन इ. त्यादि। परंष अति गरम जलसे भी नहयाना उचित नहीं है पपोंकि इस्से. भी रक्तके अति कोमलता से यच्चे के शरीर में ददोरा या दाना २ मा निकल जाता है। इसलिये फेषल पानी को जराणा धिकाले जैसा कि जाड़े में प्राप्त:काल में कूपका जाल उप्प होता है । आजकल जन्मतुए को दाई लोग सावुन लगा के नहलाती हैं पर याद रखना चाहिये कि साबुन याचे के माखमें न जाने पाये। इस प्रकार नहयाना उत्तमह फि आरोग्यदर्पण। 26351 ताकि एक किमी पात्र में शीतगर्म जल भर जन्मतुए पाठक को सूष नहया कर तमाम मैल साफ करदे क्योंकि जो धात्री डर से अधिक जल में न नहवा कर ऐसाही धोना के रहने देती हैं. इससे मैल जम कर त्वचा में अनेक प्रकार के रोग हो जाते हैं। बच्चे को नहयाने के याद बहुत कोमल क पड़े के टुकड़े से आहिस्ते २ रगड़ के चमड़े का मैल पोछ लेना चाहिये गर्भ के मैल का अंश न राहजाय ॥ एक बार प्रातःकाल बालकों को शिर से पैर तक रोज नहयाना चाहिये । बहुत सी औरतें जानती हैं कि बालकों को रोज २ नाहयानेसे सर्दी और फल खांसी हो जाती है ? से भूल है, बल्कि चौथे माठयें न हवाने, से 'बेसक बालक बीमार हो जाता है। ऐसा देखने में भी पाया हे रोग २ जल द्वारा सफाई न रखने से यालकों के शिर में मैल जम कर फुन्सियां निकल आती हैं जिसे वैद्यक में उपशीर्षक (चांइचूद) कहते हैं इसी प्रकार गुदा में मैल जमकर गुदपाक (दिशाकेजगह घाय) और काम के पीछे मैल जमकर फनफटी हो जाती है । छां इतना अवश्य करना चाहिये कि जन्म समय में या जाड़े के ऋतु में बालक को स्नान कराय मुलायम कपड़े से बहुत शीघ्र तमाम शरीर पोंछ ले बाद इसके पानी म पने हाथों को आग में सेंक ले ताफि फिर ठंढे २ हांथ पाठक के शरीर में न लगने पाबें, इस प्रकार करने से अवश्य यालक बलिष्ट होता जा- यगा । इगने प्रायः देखा है कि गरम ऋतु में भी स्त्रियां धात्रीशिक्षा की अनभिज्ञता से दो २ घंटे तक जन्मतुए पाठक फो मागसे सेंका करती हैं। दो महीने के याद यदि याला किसी कारण से कश और पाशक्त देस पड़ता हो तो उसके नहाने के पानी में तनिकमा सेंधानिमक डाल देने से उड़फा बली होता जायगा ॥ जिस ढा से यच्चों को नहवाना लिखा है यदि वैसाही प्रति दिन स्नान कराया जाये तो जयश्य बच्चा नाना प्रकार के दुःखों से यथा रहेगा इसी से प्राधी वैद्ययरों ने यह यथार्थ गुण जान संस्कृत में जल का नाम १०२ पाराग्यदर्षगा। जीवन (शिलाने याला) 'कहा है यास्तविक यायु के नीचे जलाही जीयों के जीवन का मूल है बिगा जल जीवगण का प्राणधारण कदापि नहीं हो सत्ता । ठीक समय के स्वांग से गेगदोष दूररहते हैं नालियां सतेश और शरीर यलिए होता है । एतद्देशियों के लिये ऐसाउत्तम और कोई पदार्थ बलदायत नहीं ऐ गुस्ने हे पच्चों की माता यदि प्रीति पूर्वक मि. भय यांधके मित्य बच्चों को स्नान कराती नाभोगी तो अवश्य पालकोंको स्वास्थ्यता दिन २ पढ़ती जावेगी इममें कुछ भी संशय नहीं है । स्तनपान का बयान । जो स्त्री दो एक बार बच्चा पैदा कर चुको हैं वह जन्मतुए वालक को थोड़ा ठहर के स्तन का दूध अवश्य पिलावे । वहतेरी गर्म मिजाल वाली स्त्रियों के एक दो रोन स्तन में दूध आता नहीं, उस अवस्था में जव देखे कि दो एक बार बच्चे के भखमै स्तन देके चुमलाने से भी दूध नहीं निकलता तव लाचार हो गाय या बकरी के दूध में आधा गर्म पानी और जरामा रवादार चिनी डाल कर पिलावे । वाद इसके ऐसा उपाय कर * जिससे माताके स्तन में पीघ्रौ दूध पाजाय क्योंकि जन्मतुए को कुछ रोज तक ऊपर का दूध या किसी प्रकार का खाना खिला कर रखने से वच्चा बहुत दुर्वत और कमजोर हो जाता है। पर यह वात बहुत याद रखने के योग्य है कि बिना पानी मिलाहुमा दूध बच्चे, को कभी न पिलाव क्योंकि निखालिस दूध वह हजम नहीं कर स- करो । फटा २ दूध के करने लगते हैं और उन्हें अनपचा दस्त पाने लगता है और पेट के दर्द के मारे रे, रे, किया करते हैं ऐसी हालत में न सूझ पड़ा तो लड़के खतमहौ हो जाते हैं। * दूध में दो तोला शतावर पवा थोड़ी सी मियो डाल कर पिलाना या चार मासा तालमखाना के चूर्ण को फंको फँवा कर ऊपर से दूध पिलाना, ले म प्रकृत वाली को दो पीपर दूध में पकाकर पिलाना ।

धारोग्यदर्पण। जो बच्चा दूध पीने में इच्छा न करे अथवा वह पोने चाहता है और पोते नहीं बगता तो झट क्रिसौ अच्छे चिकित्सक को बुला के देखा लेना उ. चित है कि बच्चे को जीभ किसी दूसरे स्थान से जुड़ तो नहीं गई जो वह दूध नहौं पौ सक्ता। यदि जुड़ी हो तो अति सूक्ष्म अस्त्र से उसे चौर वार अलग कारदें जिससे कि बच्चा सुख से दूध पौने लगे। यह तो सभी जान सकते हैं कि जहां लड़का पेट के बाहर हुआ और मां का दूध पिया तहां जरूर ही पाखाना फिरेगा लेकिन जब देखे कि जन्म- तुमा अपनी मां का दूध पीने पर भी दस्त नहीं फिरा और एक या दो रोन बीत गया है तो अवश्य है कि लड़के को एक मामा अंडी को तेल में जरा सा सहत मिला के चटादे या दूधमें घोलकर पिलाद क्योंकि दो तीनदिनतक पेट में पुराना मल रहने से सूख जाता है और उसौ से वच्चे को धनुस्टंकार रोग हो जाता है जिसे लोग जगहा दबाना कहते हैं। ऐसा भी देखने में पाया है कि बच्चे का दस्त पारहे हैं और जहुआ दबा लिया है ? कारण यह है कि भाज वाल धात्रो विद्या के न जागने से स्त्रियों को देश काल वा परिज्ञानता ता जाती रहो परंपरा की अधाधुंध वातें याद हैं, जैसे मोहर ऐसे घर में करना जो घर मकान भर में सबसे खराब समेत अंधियारा और कोने में पड़ता है। हवा स्वप्न में भी न जा सके इस तरे मकान बन्द उस पर भी दिन रात राई और लहसग की धनी प्रसूतौ यदि अति गर्म प्रकृति वाली भौ हो तो भी उसे झोंका झोक साठौरा और अनवाइन दिया जाता है। उपरोक्त कारणों से दग्ध हुआ माता का दूध जहां बच्चे ने पिया मोघ्रही दस्त पतला और पेभाव अति गर्म अदइने सा होने लगा, बस गिर में गर्मी पहुंच तालु (जिसको ताकत से लड़के दूध पीते हैं) सूख जबड़े का नस खिंच काक्षा बैठ गाता है। इसे भी जहा दबाना कहते हैं, और भी बहुत से कारण हैं जिससे यह रोग होता है पर इस देश के मूर्ख लोग सेवाय झाड़ फूंका के और जान्ते ही नहीं। फिर यह रोग ऐज हत्यारा है कि जिस लड़के को होता है उसको जागही ले के छोड़ता है। मौर में इसी रोग से हजारों लड़के मरते हैं। पाठक गण यह अमात्य बातें भापही पद कार न रखदे प: ।

आरोग्यदर्पगा। १.०४ । रंच काशिन करके खियों को अप्रश्य पढ़ाइये । फिर देखिये स्त्रियां धात्री कम में केसी चैतन्य हो जायगी कि आप को विजिट देके भी किमो गेम साहब को न बुलाना पड़ेगा फिर भी कहा जाता है कि माता को उचित है कि नित्य नियम पूर्वक बंधेल से बच्चे को दूध पिलावें क्योंकि प्रायः ऐमा भी देखने में आया है कि बच्चों को मां निरोग रिट पुट और स्तन का दूध वेकार रहित है तो भी वा. लक वीमार ही रहता है कारण यह कि दूध पिलाने कौ रोति नहीं जानती॥ चेत करके दहिनेवायें दोनों स्तनों का माता पारी २ बच्चों को स्तन पाग करा दिया करें यह न स्याल करें कि स्तन छुड़ाने से वालक रोने लगेगा क्योंकि वैसा न करने से सायत किसी स्तन में दुग्ध पाटा है। जम गया तो फौरन वह दूध स्तन में किसी न किसी प्रकार का कम उत्पन्न कर सक्ता है। बाजी २ स्त्रियों का यह हाल है कि किसी रोज लड़के को तो दिन भर दूध ही पिलाया करती हैं और कभी पालश्य वस दिन में फक्त दो तीन दफे पिला के रहने देती है इससे अनपच होकर लड़के को अवश्य पेट की वोमारी हो जाती है, इस लिये दूध पिलाने का वक्त वांध रखना चाहिये, जैमा कि लड़के का प्रथम महीने में दिन भर में पाठ दफे और रात को दो तीन दफे से ज्यादे दूध नही पिलाना चाहिये इसी प्रकार ज्यों २ बचो कि आयु बढ़ती जांय अर्थात् पांच छः महोने के बाद चार २ घंटे का नियम बांध दे। अक्सर धात्री लड़कों को नौंद से उठा के दूध पिलाने लगती हैं या बच्चा से रहा है और आप चुभुर २ उसे दूध पिलाये जाती हैं यह पादत बहुत ही खराब है, और ज्यादा रात बीते पर भी दूघ न पिलाना चाचिय, वांद एक पहर के अथवा ग्यारह बारह बजे के बाद अवश्य आरोग्यदर्पण। रोयेंगे या रात को बच्चा से जरा दूर लपके को सुलाधैं ताकि यह मग मानता दुग्ध न पिये दूर २ मुलाने से मेरा मतलब यह नहीं है कि दूसरी कोठरी या दूसरे पलंग पर ॥ एक जादत और भी यहां की स्त्रियों में देखी जाती है कि जैसे ही रसे।ई पकाय मांध से बाहर जाई तसो समय दुग्ध पिलाने लगती हैं या किमी के साथ लड़ रही हैं और दुग्ध पिलाती जाती हैं ऐमा न चाहिये क्योंकि उस समय उनका दुग्ध घिष समान हो जाता है । याद रखना चाहिये कि जय माता का कोई बीमारी हो या तमि- यत गुस्से या सेोच से परेशान है। या व्रत उपवास किये है। तो लड़के को उस समय मा का दुग्ध न पीने देगा चाहिये क्योंकि उस दुग्ध पीने से पालकों को अनेक प्रकार की बीमारी हो जाती है ।। के प्रभूता का शरीर सघठ गीर स्तग दुधार हे। तो चार गास पर्यन्त बच्चे के। कोई अन्य महार देने की ज़रूरत नहीं है यदि सामने के दो दांत निकल आयें तब भा के दूध के सिया साबूदाना या पुराने घायल का भात दूध के साथ देने से कुछ हर्ज नहीं होता और मा का दूध तभी छुड़ाना उचित है जय लड़के का समग्र दांत मिल जाये, किसी कारण से गा के स्तन में दूध न होता है। या मा सूतिका ज्वर गादि रागसे ग्रस्त हे। तो घ.हिये कि दूध पिलाने को कोई अन्य धात्री रखले या दूध पिलाने वाली सीसी से पिलाये, पर दूध गाय या सकरीही का होना उचित है गोर बाजे २ लोग लड़की को गदही का दूध पिठाते हैं, लेकिग दूध में पानी जरूर मिठागा चाहिये और जैसे २ लड़के उम्र बढ़ती जाय चैसे पानी का हिस्सा भी कम करता जाप, पानी सिर्फ इस लिये बढ़ाया जाता है कि दूध पतला हो जाय जिस्मे कि खड़के को भामामी से पच जाये और मयेरे का दूध तीसरे पहर को गौर तीसरे पहर का दूध शाम को न पिलाना चाहिये। जप परषा ः सात महीने का हो जाय से नसे मा के प्रारोग्यदर्पगा। १०४ रंच काशिम करके स्त्रियों को अपश्य पढ़ाये। फिर देखिये स्त्रियां धावी कम में कैसो चैतन्य हो जायगी कि माप को 8, विजिट देके भी किसो मेम साव को न बुलाना पड़ेगा। फिर भी कहा जाता है कि माता को उनित है कि नित्य नियम पूर्वक बंधेज से बच्चे को दूध पिलावें क्योंकि प्रायः ऐसा भी देखने में आया है कि बच्चों की मां निरोग रिष्ट पुष्ट और स्तन का दूध वेकार रहित है तो भी वा. खक बीमार ही रहता है कारण यह कि दूध पिलाने को रोति नहीं जानती॥ चेत करके दाहिने बायें दोनों स्तनों का माता पारी २ वचों को स्तन पान करा दिया वारें यह न स्याल करें कि स्तन छुड़ाने से बालक रोने लगेगा क्योंकि वैसा न करने से सायत किसी स्तन में दुग्ध दुपट्टा हे। नम' गया तो फौरन वह दूध स्तन में किसी न किसी प्रकार का क्लेश उत्पन्न कर सक्ता है। 3 . वाजी २ स्तियों का यह हाल है कि किसो रोज लड़के को ते दिन भर दूध ही पिलाया करती हैं और कभी पालश्य वस दिन में फकत दो तीन दफे पिला के रहने देती है इमसे अनपच होकर लड़के को अवश्य पेट को बीमारी हो जाती है, दम लिये दूध पिलाने का वक्त वांध रखना चाहिये, जैमा कि लड़के का प्रथम महीने में दिन भर में पाठ दफे और रात को दो तीन दफ से ज्यादे दूध नही पिलाना चाहिये इसी प्रकार ज्यों २ बचो कि आयु बढ़ती जांय अर्थात् पनि छः महोने के बाद चार २ घंटे का नियम बांध दें। अक्सर धावी लड़कों को नौंद से उठा के दूध पिलाने लगती हैं या वधा मे रहा है और आप चुभुर २ उसे दूध पिलाये जाती हैं यह मादल बहुत ही खराब है, और ज्यादा रात बीते पर भी दूध न पिलाना चाहिये, बाद एक पहर के अथवा ग्यारह बारह बजे के बाद अवश्य आरोग्यदर्पण । १०५ रोयेंगे या रात को बच्चा से जरा दूर लटके को सुलाबैं ताकि वह मन मानता दुग्ध न पिये दूर २ सुलाने से मेरा मतलय यह नहीं है कि दूसरी कोठरी या दूसरे पलंग पर ॥ एक मादत और भी यहां की स्त्रियों में देखी जाती है कि जैसे ही रसे।ई पकाय मांध से बाहर आई उसी समय दुग्ध पिलाने लगती हैं या किमी के साथ लड़ रही हैं और दुग्ध पिलाती जाती हैं ऐमा न चाहिये क्योंकि उस समय उनका दुग्ध विष समान हो जाता है ।। याद रखना चाहिये कि जब माता को कोई बीमारी हो या तषि- यत गुस्से या सेचि से परेशान हो या प्रत उपवास किये है। तो लड़के के। उस समय मा का दुग्ध न पीने देना चाहिये पयोंकि उस दुग्ध के पीने से बालकों को अनेक प्रकार की बीमारी हो जाती है। - प्रसूता का शरीर सयल और स्तर दुधार हे। तो चार माम पर्यन्त बच्चे के। कोई अन्य शहार देने की ज़रूरत नहीं है यदि सामने के दो दांत निकल जायें तय मा के दूध के सिवा साबूदाना या पुराने घायल का भात दूध के साथ देने से कुछ हर्म नहीं होता और मा का दूध तमी छुड़ाना उचित है जय लहफे का ममग्न दांत निकल आये, किसी कारण से गा के स्तन में दूध न हेाता है। या मा मूतिका ज्वर आदि रोगसे ग्रस्त हो तो ध.हिये कि दूध पिलागे को कोई अन्य धात्री रखले या दूध पिलाने वाली सीसी से पिठाये, पर दूध गाय या प्रकरीही का होना उचित है भोर बाजे २ लोग लड़की केो गदही का दूध पिलाते पानी जरूर मिलाना चाहिये और जैसे २ लड़के की उम्र बढ़ती जाय येसे पानी का हिस्सा भी कम करता जाय, पामी सिर्फ इस लिये बढ़ाया जाता है कि दूध पतला हो जाय जिस्से कि लड़के को गासानी से पच जाये भीर सवेरे का दूध तीसरे पहर को भोर तीसरे पहर का दूध शाम को न पिठाना चाहिये । जय यथा छः सात महीने का हो जाय तो मुसे मा के.

भारोग्यदर्पण। मलाया संधारी खाना (दाल भात रोटी) आदि भी थोडा २ खिल्लागा प्रारंभ करदे गौर पुराने गहीन धावटका भातं और दूध खिलाना पच्चों को पाति डाम दायक होता है, परन्तु पर बांध कर पिलाना याहुत जरूर है। गहुत सी औरतें बच्चों के। ज़बरदस्ती ज्यादे खाना खिला देती हैं इस वास्ते कि लड़के मोटे ताजे हे। जांय, ऐसा समाना . महा भूल है, क्योंकि जितना पच सके उतनाही खिलाना गया है। जियादे खिलाने से लड़के का पेट निकल जाता है, गला पतला पौर देखने में के दशाहीन मालुम पड़ते हैं, पस लिये कग और दिन रात में सिर्फ तीन पा पार दफे खिलाना उत्तम है, और यह यात भी याद रखने के योग्य है कि जब तक लडका दशवर्य का न हो जाय यिना दूध खाना कभी न देगा चाहिये, काई २ दृध न देकर मांस का जूम बधों को पिलाते हैं परन्तु वह बच्चे के पक्ष में पथ्य नहीं कहा जा सत्ता प्योंकि उससे पेट में जन (खहा रस) उपजता और पेट फूलता है.. और छांट भी हो जाती है, एवं कमी २ पेट में पोहा और मरोड़ भी उठने लगती है। लेकिन दूध भी गनेक गायों का या गाप यकरी भैंस का एक में मिला के देगा अनुचित है सिर्फ एक ही गाय या पकरी का दूध देना चाहिये। जिस देहिनी में दूध दुहा जाय अपवा जिम पात्र . क्या रहा करे उसको चेत करके देख लेना चाहिये कि भीतर मैगा तो नहीं लगा है । मैल जमे और बिगा आग के सेंके दोहनी में का दूध शीघ्रहो पेट में जाके फटकर दहीमा हो जाता है। सांसवेरे दोनों बेला गि. त्य दुए के टटका दूध उसमें जरासी मिनी और फणिनाभर निएफ हाल कर मात के पा रोटी के साथ या ऐमाही पिला देगा यच्चों को बड़ा फा- यदा करता है। मिश्री से मांस पुष्ट होता है और नोन से अपने को शक्ति बढ़ती है और पेट में कीड़े नहीं पड़ने पाते । आचों को अधिक मीठा गौर फल फलाहारियोंमे गूम परहेज करना चाहिये । यहां के गौरतों की बात है कि जहां लएका रोयाट उसके हाथ में गोठा या कुछ फल का धीग फँमा देतो यह नहीं जानती पीछे हमको गिर पर छाप घर फर रोमा होगा । - 1 भारोग्यदर्पगा। - मोठा खिलाना दांत के हक में पहुध खराब है और इससे शीघ्रही शुखंठी (मिठया) रोष हे जाता है कि जिस बिमारी से भाज फल गार- तयर्प के असंख्य लड़के बिचारे काल कालग्रास होते जाते हैं: इस रोग का लक्षण और औषध शागे लिखेंगे । फष्ठ फलाहारियों से लड़की के पेट में योगागियां हो जाती हैं। लड़कों को कपड़ा पहिनाना। जाहां एका पैदा हुशा उसी वक्त से यहां की धात शिक्षा हीन स्त्रियां बच्चे को शिर से पैर तफ ऐसा ढांप रसती हैं कि जिसका कुछ घयान नहीं, यहां तक कि गर्म ऋतु में भी मदार या फलालैग फे कना टोप से हर समय शिरको ढ़ापे रहती हैं । परन्तु इससे पिगार छोड़ कुंछ भी गुण नहीं हो सकता । साधारण रुई के कपड़े के टुकड़े की अपेक्षा फलालैन अथवा अन्य किसी गर्म कपड़े के टुकड़े से बच्चे का पेट बांधे रखना ठीक है । कारण यह है कि बच्चे का पेट दन्दाया रहताहै शिमसे उसको मुख जोर स्वस्यता बोध होती है और पुत्र आदि के द्वारा जो यह भीग भी जाता है तो भी नाभि पन्धनी नहीं भीगने पाती, परन्तु उस भीगेहुये को अलग कर दूसरा पहिना देना उचित है । परन्तु याद रखना चाहिये कि उसे बहुत कस के न यांधे क्योंकि कमफे यांधने से अंतरी का काम ठीक २ नहीं होने पाता विशेष फरफे यदि अंतरीका कुछ दुख पच्चे को हो गया तो आरोज्य करने में बड़ी कठिंगता पड़ती है । पहत लम्बे कपड़े के द्वारा बच्चे को लपेद रखना या अनेक कपड़े खूप ढांप रखगा बिलकुल याहियात है, सिर्फ एक ऐसे साफ और मु. लायम कपड़े से बच्चों को ढांके रहना चाहिये ताकि मच्छर शादिन का न तेज बायु बहुत शरीर में प्रवेश करे और छाती पेंट एवं पांध सर्वदा ढांके रहना चाहिये पर शिर नेत्र मुख नाशिका और रणं (कान) खुला रहना उत्तम है। जो लहका जन्मही से कृश हो या सांसी भासी हो तो जाड़े और यर्या के दिनों में लालैनका टुकड़ा उसे उढ़ाये रहना बहुतही अच्छा है। - धारोग्यदर्पण। - 'जय देसे कि कपड़े मैले हो गये हैं या पेशाय करने से भीग गपाह कोरल सतार कर दूसरा माफ कपडा पहिरागा उचित है क्योंकि भीजा पा पसीना साया हुआ कपड़ा बच्चे के देह पर पड़ा रहने न पाय । शिर खुला रहे ऐमा सुग कर यहुत से लोग गङ्कित होंगे उन्हें घा- हिये कि विशेष कर गर्म ऋतु में मेटे कपड़े की, टोपी या कनटोपन पदिनां के पतील भूत' के कपड़े की दोपी पहिगाया करें, क्योंकि मोटी टोपी या कनटोप पहिना रखने से भाथे में गर्मी पहुंव पसीना चुक्चुका माता है याद बाही पमीना शीतल हे। फिर उसी गर्म माथे में सुष्क है। जाता है उसी गर्मी शर्दी के योग से बच्चे को नाक बहने लगती है। शिम घरमें के रहते है। यह घर खूप साफ और हवादार होगा उचित है। रात को लडके गर्मी से रोयें तो उन्हें पल मल कर हवा देनी चाहिये । जाय चौदह पन्द्रह रोज के लड़के हो जाय तो उन्हें गोद में बाहर ले जाकर हया सिलानी चाहिये, पर यहां की दुष्ट स्त्रियों के मारे लड़के विचार वषों बाहर नहीं निकलने पाते हैं, जहां कोई भी बादर ले चला यहीं खांब २ कर दीही सघरदार बाहर न ले जाओ फ. लनियां यही टोमहाइन है देखते टोना लगाय देई । हे ईश्वर दयानिध भारतवर्ष से कम कुमन्स्कार दूर होगा। दांत निकलना।. पच्चों को दांत निकलने, के समय भी यही तकलीफ होती है, प्रायः एतद्देशीप अशिक्षित स्त्रियां दांत आने के पूर्व की अनेकानेक उपद्रव को देगा और नजर सग यस साठी फूक के भरोसे में पर कर बा. लको के जीवन से हाथ धो बैठती हैं, दांत निकलने का समय सब या- लकों का एक मा नहीं होता, किसी को तो मातवे गाठवे महीने में दूध के दांत निकलने लगते हैं, कभी ऐसा देखा गया है कि तीन चार मास के.गौतरही यचों का दांत निकलना प्रारंभ हो गया है। जाज तक देखने में नहीं जागा पर सुगा है कि बाजे बच्चे घेट ही.से दांत पाराग्यदर्पण। .१०६ लिये गाये हैं । अस्तु पर ऐमा पच्चा बिरलाही कोई जन्मता हे।गा और यह भी कह मक्ते हैं कि पेट ही से उत्पन्न दांत शीघ्रही और भी जाता हेगा। किमी २ यरचे को एक दो बरस इससे अधिक वर्ष होने पर भी दाप्त नहीं निकलते केतगों के जवानी पर दुग्ध का दांत निकलता है किसी डाक्तरी पुस्तक में लिखा है कि फांस देश में एक युढ़िया के दुग्ध के दांत पचासी वर्ष की अवस्था में निकले थे, किमी २ ग्रंथकारों का कथन है कि केतनों के जन्म पर दांत ही नही निकलते ॥ यालक के दन्तोत्पान का शुभाशुभ फल भी कई एक ग्रंषों में लिखा है, जैसे, यदि यालक दांत समेत जन्मे तो.समका जन्म राक्षसका जानना और उममे मागेक जीये का क्लेश पहुंचे और माता को शीघ्र ही नाश करे । प्रपा द्वितीय और तृतीय माम में यालक के दांत निकले तो पिता का नाश करे चाहे वह पिता मूर्य के समान तेजस्वी क्यों न है। पर यह यालक पम ममान हे। निश्चही पिता का प्राण हरै। चतुर्थ मास में दन्तीत्पन्न होने से निज भ्राता को नाश करता है । पञ्चम मास में गामा को और पष्टम मास में माता पिता के धन का नाशक हो। घरगर सातवे गास में याठक के दांत निकले तो अयश्यमेय दासत्य को प्राप्त (किसी का मेवा टहल करने वाला) हे।। धाम, नयम, दशम, एकादश, द्वादश, त्रयोदश, और चतुर्दश इन महीनों में दांत के निकलने से बालक सौभाग्य युक्त अनेक सुखों के भोगने वाला होता है, निषिद्ध मास में दन्तीत्पान होने का शान्ति मी ग्रंथकारों ने लिखा है पर उसके लिखने की कोई भायम्यकता नहीं जान पड़ी । दुग्धके दांतोंको संख्या १० ऊपर और १० नीचे मिला कर २० हेोती है । तिनमें बीच वाले साम्हने के धार २ दांतों को राज दन्त और उन. के पास के ए इधर एक उधर इस क्रम से दो २ दांतों को कुक्कुर दन्त (भेदन दन्त) कहते हैं और दोनों तरफ के दे। २ दांत इसी प्रकार नीचे ऊपर मिला के दांतों को चौगह (पेषन दन्त) के दांत कहते हैं । उनके उत्पत्तिका क्रम मायः यही देखने में नाया है कि पहले नीचे की याद पाराग्यदर्पण। ऊपर के पांति के मध्य का दे। २ दास सम और बाद इसके पहिले ज. पर अनन्तर गीचे के निकलता है इस क्रम में प्रायः दे। वर्षों ममग्र दांत निकल आते हैं। दांत निकलने के समय भक्तर बच्चों को ज्या, खांसी और दस्त पतम्ता होने लगता है । जय देसे कि उक्त बिमारियां दांत के बजे में हैं और दांतों की जड़ का मांस फूला एवं छूने में गर्म गौर, पी- का बोध हो तो, मस्कुर के उस स्थान को पद पर. दांत विंधे रहते हैं सूक्ष्म छूरी से चौर देना चाहिये । लेकिन ख्याल रसमा चाहिये यदि मसकुर फूला गोर गर्म ग मालुम होता हो तो कदापि न चीरे और न अँगुली से दघावे पपोंकि यहां कि स्त्रियां चिराग देकर प्रायः अंगुली में फूले हुये मस्कुर को दया देती हैं ताकि चमटा फटकर दांत भासानी से निकल भाये पर इस्मे पौर देना कहीं शच्छा होता है। दांत मिकराने के समय बच्चा जो चीज हाथ में थांभता है उसे मुह में हाहा के मस्कुर के नीचे दांतों की जद में रख चाभने लगता है। लेकिन यह धस्तु कड़ी हुई तो अपने दरेरे से दांत जल्द जाने में अधिक याधा करता है स्मे छोटी और कही कोई यस्तु भूल कर भी लड़के को न दे शायद घोसे से गले ही में चला जाय, सय से उत्तम यह है कि एक रयर का गेंहा या फङ्कण यमा फर परचे की कलाई में पहिराय दे ताकि उसी को पारम्बार मुह में डाला करै । एक पात और भी देखने में मा. ती है कि प्रायः लह के दांत निकलने देशा में अपनी अंगुलियां . गूठा मुह में डाल पिया करते हैं । सो उसे ग छुट्टाना अच्छा है, कारणं यह है कि एक ते दांत निकलने की व्यथा शांत रहती है, दूसरे दांत निकलने में हित होता है, तीसरे मुह से लार यहने लगता है, उस . षस्था में लड़की के मुह मे लार यहना यशुन पाच्छा होता है। यद्यपि अधिक बार यहा करने में बच्चे की छाती पर का कपड़ा भीग जाता परन्तु लार के पहले से तालू गोदे रहते हैं और जाहार की पंचम शक्ति बढ़ती है लेकिन याचे के मां को यह भी सर्वदा स्याल रखना धादिये कि लड़के का, मुह तो नहीं गा गया जो सार अधिक बहता है, क्योंकि मु६ गाने का सार मियाय हानि के कुछ भी फायदा नहीं दें भारोग्यदेपंग । भक्ता, यदि हो तो निम्नलिखित उपायों से शीघ्र ही परचे के मुह को भाराम करना शत्यायश्य है । जो अधिक सार बहने से बारम्बार बच्चे की छाती और छाती पर का कपड़ा भीग जापा करता है उसे घेत कर के पोछ लेना और भीगा कपड़ा उतार' के सूखा कपड़ा. पहिना देना उचित है। एसद्देशीय बच्चों को दांत निकलने की दशा में नाना प्रकार के रोग घेर लेते हैं और उन रोगों से हजारों बिचारे पडके मर जाते हैं । का. रण यह है कि एक तो यहां कि आपढ़ स्त्रियां जन्मतेही से बच्चे के। 'अफ़ीम लिसाना शुरू कर देती हैं कि जिस्से दांत ति पीड़ा और ज. लन के साथ निकलता है। दूसरे चाहै लड़का गर जाय पर मुमकुर क- भी न चीरने देंगी, तीसरे टोना टागर पर ऐसा दृढ़ बिस्वास पड़ा कि सिर्फ करवाने हो के भरोसे में बच्चे को खतम कर हालती हैं । दुग्ध यिकार से प्रायः बच्चों का मुह पाजाता है, से दो प्रकार का है जो बच्चे के मुख में सफेद मलाई सी जमी और फटी.२ सी देख पड़े वह मुख श्राध है लौकिक में इसे सफेद मुहा कहते हैं इसमें मुह से लार बहुत यहता है और जो पाठक के मुख में लाल २ दाने या छाले पट जांप उसे मुख पाक ( लालमुहा ) कहते हैं । चिकित्सा। सफेद कत्या ६ मामा, शीतलचिनी १० दाना, कपूर १ रत्ती तीनों को पानी में पोस अंगुली से भुख के भीतर लेप करै । पीपल का छाछ और पन दोनों मुखाय पराबर ले कूट कपड़ छान कर २ रत्ती के अन्दाज दिग में ४ दफे सहत के साथ घटाने से मच्चों का मुखप्राय आराम होता है ।। सरिधन, छोघ, तिल, मुलहठी, धारो केो छः २ मासा ले पाय भेर जल में काय कर, उसी कार्य में रुई भिगा २ पच्चे का मुख दिन में दो माता .

शिम्यदपंगा। २१२ .. या तीन दफे पोख लिया कर इस्से मुख पाक शीघ्रही मिट जाता है। लेकिन बच्चे की मां को पाहेश वश्य करना चाहिये । दन्त चिकित्सा भागे लिखेंगे। माय सिर्फ यह बात कहना है कि कभी दांत निकलने के समय बच्चों की देह में जा बजा खास कर कानों के पीछे छोटी २ फुन्मियां था खाज उपजती है परन्तु एकाएक किमी जीप को लगाकर आराम क- रना हानि कारक है, उम स्थान पर कोई औषध लगाने की जरूरत नहीं है सिर्फ नीम के पानी या माबुन से रोज २ धो देना काफी है पौर कभी २ जगसा रेसो का तेल दे के कोठा साफ कर देना चाहिये, बस भापही निश्त हो जावेगी । अत्यन्त बच्चों को हवाखिलान । छुट पनही से चाहिये कि बच्चे को मित्य गोद में ले कर शाग मधेरे घर के बाहर किमी स्वच्छ स्याग में जा निर्मल और भाग्य कारक वायु का सेवन करावे । कितने रोज के लड़के को बाहर ले जाकर हवा खिलाना चाहिये ? यह बात देश का और ऋतुभों के स्वभाव मालुम हे। मक्ता है । जैसे गर्मी के दिनों में प्रातःकाल और सन्ध्यामभय पन्दरह बोम रोज के बच्चे को भी गोद में लेजाकर बाहर ना खिल्लागा उत्तम है परन्तु जाले गोर बरसात में इतनी अवस्था पाले को बाहर के जाना अच्छा नहीं है। जप यचा तीन चार महीने का हो जाय तय ता मिशयही प्रतिदिन दोनों समय बच्चे का पाय अच्छे कपड़े से ढांप तोप के गोद में लेफे या- हर किसी उत्तम स्थान में घुगा ले जाना लड़कों के। जीषा सूपो रक्षकी अमृत का सींचना.है । मायः देखने में जाया है कि जहां बाउको को गोद में लिया बालक सुद प्रसन्न हो बाहर ले चलने के लिये चेष्टा प्रकाश करता है और बाहर ले जाते ही बच्चे बहुत सन्तुष्ट जोर प्रफुणित 1 1 पारोग्यदर्पण। देख पाते हैं। जिस दिन बड़ी ठगढी हया चलती हो या गरदा गुधार हो तो बच्चे को कदापि न ले जाना चाहिये । प्रायः हिन्दुस्तानी गयरदउ मर्द और औरतें उड़कों को गोद में छेना बिलकुल नहीं जानती हैं और न अँगरेजों के बड़कों को गोद में लिये हुए देख शिक्षा होती है। यहां कि जो बेवकूफ मजदूरिन या खुद बच्चे की माता बच्चे की जांघ फाष्ट अपने कमर पर बिठा कर ले चलती हैं बल्कि नमी को गोद में लेना जानती हैं, इस प्रकार गोद में लेना ल हकों के स्वास्थ्य में घटा हानि पहुंचाता है, यहां तक कि फीते के नीचे की नम में अति रगह पहते २ वही जुया जयस्था में फीवत्य का रूप दिसष्ठाता है। बचपन ही से अङ्ग का प्रचालन स्वस्थ्यता के लिये पावश्यक है, यही कारण है कि ईश्वर ने बच्चेको जन्मतेही वे उनकी प्रात हाथ पैर सकेलने और फेकने की करदी है। सबको उचित है कि चेत करके बच्चों को एक छोटे खटोले या चौरस जमीन पर गुलगुला और साफ बिछौना बिछा उतान लिटा दिया करै, तब देखिये यचा कैसा हर्पित और प्रफु- लित हो हाथ पैर ऐचता और फेकता है और खिल खिला कर हंसता है कि देखते ही बनता है, उक्त क्रिया ( परिचालन ) से बच्चे की आ- भ्पन्तरिक पेशियां पढ़ती हैं और पीठ की रीढ़ एवं हाथ पांव अच्छा व लवान होता है और विशेष बात यह है कि बच्चे का खाना हजम हो जाया करता है। देखिये ईश्वर की कृपा से प्रथमतः बच्चे अनायास यमाय ही से बकैयां चलने लगते हैं और फिर स्थमायही से क्रमशः कुछ थांम खड़े भी होने लगते हैं बाद चलने फिरने की शक्ति हो जाती है भगवान ने जो कुछ धमत्कारी और प्रवीणता किया है शम धन्य है कितनी स्त्रियां बच्चों को बकैयां चलने से रोकती हैं इस लिये कि कपड़ा मैला हो जायगा यह नहीं जामती कि यकीयां घलने से बच्चों की जांघ, हाथ पांव और स मग्र नस रोज मरोज बली होते जाते हैं ।

. पाराग्यदर्पण। यह भी स्त्रियों को जानना अवश्य है कि जब तक घरचे की पीट का हाड (रीढ़) मायूस न हो जाय और लड़के.कुछ पांम कर स्वयं न सड़े होने लगें तप तक प्यार से बच्चे को याहुत म पोरे और न खड़ा करने की चेष्टा करे, प्रायः यच्चों को नादाग स्त्रियां दोनों हाथ पकड़ फे गेंदे के समान ऊपर उछाल कर लोक लेती है यह महज नादानी है फ्योंकि पस तरह पर बच्चा भयभीत हो जाता है और त्रु (हेमिया) एवं रक्त के घर में पतिकम पड़ जाता है और पिष्ठाने के याद भी बच्चे को न तोरना चाहिये । बच्चे के लेटे रहने का स्थान या कोठरी को न तो चारोतर्फ से पा रहना चाहिये कि जिस्से एक यारगी बायु का आना जाना बन्द होजाय भीर न ऐमाही साठ रक्से कि शीतल युक्त वायु समस्त घर में भर जाय घेत फरफे बच्चों के लिये एक छोटीसी मसहरी अवश्य बनया ले ताकि लेटे हुये बच्चे को मसा मच्छर शादि जीष न काट सके, यह भी प्रायः देखने में पाया है कि लेल उपटन के बाद लेटे हुये बच्चों के पटोले पर चढ़ जाती हैं इसलिये ममहरी के धारी पाये के नीचे घार पत्थल की कूदी में पानी भर कर रख देना उचित है ताकि कोई जीय जन्तु बच्चे की पाट पर न चढ़जांय, माफी मरे खण्ड में देश । अकसर चींटी वीर्य । यह बात प्रगट है कि प्राणी मात्र के लिये भारोग्य और स्वस्थ रहने का मुख्य कारण बीर्य फी ताकत है, जिसका वीर्य क्षीण स्वरुप वा शुष्क हो जाता है यह जयश्य किसी न किसी रोग में ग्रस्त हे। शीघ्रही मृत्यु के कराल मुख में प्रवेश करता है या सदैव के लिये किसी न किसी फठित रोग में लिप्त हो गृहकार्य देयफाय और विद्या के पठन पाठन आदि मतकार्य से रहित हो पूर्ण जायु भर उसका जीयन निष्फल एवं दुखदाई हो जाता है। यह सभी जानते है कि समान्यता से बीर्य सम्पूर्ण शरीर में रहता है पर विशेष कर वीर्य पीयाशय और स्त्रियों MM 'चाराग्यदर्पण। ११५ के शुद्ध रक्त में रहता है यदि उनमें क्षीगता हुई तो शीघ्रही शरीर का नाश हो जाता है। फैसे परम शोक का स्थल है कि मनुष्य इस धीर्य को तुच्छ मीर अमार मम फर नष्ट और धिनष्ट करने में कुछ भी शंका नहीं करते और कुसंग यस हस्त मैथुनादि या वेश्या गगनादि विषय में लित हो थे.हेही काल में अपने पान्मात सुख परम पौरुप और मान यहाई को भी हाथ से से बैठते हैं । युद्धिमान को उचित है कि प्रथा वीर्य कभी न नष्ट करें बल्कि जहां तक हे। निरन्तर इसके युद्ध करनेहीं फी चेष्टा में रहें क्योंकि योयेही शरीर का मूल है, धीर्य ही के घोड से शरीर में से पराक्रम सौंदर्यता और विद्या प्राप्त होती है । जितने भयानक रोग भागय देह में घुस कर शरीर को नाश करते हैं जान न होने के कारण गनुप्य अकस्मात् फित्तनी यिपदों में गिरजाता है, कोई नहीं कह सक्ता । नानकर भी कितने गादमी हैं, जो ऐसी विपदे के भय से सतर्फ हो कर उनसे बच सक्त हैं? धास्तविक में गनुष्य यह कह कर कि हम इनसे नहीं बच सक्त हैं, पग पग में रोग यन्तणा और मन की यातना आदिफ शारीरिक मान- सिक अशेयशों में फंस कर दुःख भोग करते २ इस जीधन की बाणा को समाप्त कर देता हैं । तो भी जो मनुष्य विचार शील और पतुर हो. ता है, वह सतर्फ रह कर और जहां तक हो सकता है इन सारे पापों से बघ कर मनेक सुख के साथ जीवन निर्वाह करने में अवश्य समर्थ होता है ।। जैसाही हो, पाप तो अनेक प्रकार में संघटित होतादी रहता है. किन्तु मनुष्य इस पाप या अनिष्ट का कारण सर्वत्र महीं जान सक्ता है। जानने की सामर्थ्य भी हो तो भी यह समझ कर कि हम नहीं जान सक्त, मनुष्य अनेक प्रकार पापों का भागी अनजाता है। इस लिये इसी अज्ञात या अजान पाप के पिपप में ही आज कुछ करना चाहते हैं। अतिशय स्त्री संसर्ग करने में शरीर धीरे २ टूट फूट जाता है. हस्त

ग्रारोग्यदर्पण।
amer
मैथुम पारने से भयानक अनिष्ट होता है, भारी खाना खाने से उदरामय
(पेचिस ) उपस्थित होती है, बहुत पढ़ने चिन्ता और गीत आदि के
फरने से मनाएति और विचार गक्ति बहुतही पिस्तेज हो जाती है,
इत्यादि ऐसे २ पापों और उनके कारणों को यहुत लोग जानते हैं और
जान फर यथा शक्ति उनसे बचने की चिन्ता करते हैं किन्तु पर-स्त्री
मिपयक चिन्ता और देहस्यशत धातु फेो तेज करनेवाले बहुत कारणों से
मनुष्यों का जो अनिष्ठ होता है, उसे कितने सादगी जानते हैं ! नहीं
जानते यही समसफर हम साज अलक्षित पाप या शनि के विषय
केर साधारण मनुष्यों के उपफररार्थ कहना चाहते हैं ।
महात्मा चरक
ने
कहा
रसदनौ यथा दधिन सर्पिस्तैलं तिले यथा ।
सर्वत्रानुगतं देहे शुक्र संस्पर्शने तथा ॥
सत् स्त्री पुरुपसंयोगे चेष्ठा सङ्कल्पपौड़नात् ।
शुक्रांपच्यवते स्थाना ज्जल माद्रीत् पटादिव ।।
हन्तिपीत् सरत्वाच्चपौछिल्या गौरवादपि ।
अनुप्लवन भावाच्च द्रुतत्वान्मारुतस्य च ॥
अष्ठाभ्य एभ्य देहेभ्यः शुक्र देहात् प्रसिच्यते ।
अर्थात् जैसे जस में रग, तिल में तेल और दधि में घी सर्वत्र
अनुगत माय से विद्यमान रहता है । वैमेही शुभ धातु मी सयंत्र देह
में अनुगत भाष से रहकर चर्म में अधिक रहता है । यही शुभ स्त्री
पुरुप के संयोग धेठा संकल्प और पीएन द्वारा भीगे यस्त्र से जल की
नायो अपने स्थान से गिर जाता है। उसी तरए हर्प द्वारा यह शुक्र
मी जष्ठ मूक्ष्म फिर भारी पञ्चल और चलायमान हो कर देव से निकलने
लगता है।
।

पारोग्यदर्पग। ११७ इन्हीं सारे महात्माओं के पाप के अनुवर्ती हे। कर पुरातन काल से ही हिन्दू शास्त्रों में शुक्र धातु के अव्यहित रखने के लिये बात से उपदेश पाये जाते हैं । मायुर्वेद तो है ही है, उसके सेवाय वेद पुराण स्मृप्ति, मनुसंहिता आदिक जिस किमी शास्त्र को सोठा देखोगे-सारे शास्त्र में ही स्त्री पुरुष के विषय में कैसी २ सुन्दर युक्ति और उपदेश हैं। कैसी पयश और कैसी अवस्था स्त्री पुरुष का मियाह उचित है । स्त्री पुरुप के कैसे संयोग से अच्छी सन्तान उत्पन्न हो सकती है, पुरुष के शुक्र और स्त्री के आर्तय में फैसा दोप हो जाने से सन्तान नहीं होती मधया विकृत सन्तान होती हैं, और दूषित शुक्र और रक्त के संशोधन का उपाय हम जितना कुछ जानते हैं उन सय यातों के विषय में शा. स्वाफार कुछ न कुछ मान्दोलन फर गये हैं। इन में शारीरिक सम्बन्ध हेत वैद्यक शास्त्रों में अच्छी प्रकार वर्णन किया गया है। वास्तयिक में वैद्य शास्त्र कार लोगों ने इस विषय में जो २ मूक्ष्म २ तत्य का अनुसन्धान फर गये हैं, उस्की तुलना में हम लोग मात कल के चिकित्सक गण कोई नई बात नहीं जानते हैं, क्यों नहीं जानते इस बात को हम धीरे २ यतायेंगे कुछ ही हे, वैद्यकशास्त्र में शुक्रधातु को सर्य प्रकार अचल रखने के लिये बहुतही उपदेश हैं । शुक्र तस्माविशेषण रक्ष्यमारोग्य मिच्छता। अर्थात् आरोग्य या मुख की अभिलापा करनेवाले लोग शुक्रधातु की सयंदा रक्षा करते हैं। क्योंकि शुक्र विशुद्ध न रहने से मनुष्य पुरुष- त्व या पौरुप से हीन हो कर एक प्राकर सारे सुखों से मञ्चित हो जाता है । * चाहे कोई हमारी इस बात को यहां न माने किन्तु जो पुरुष स्त्री संसर्ग नहीं करता, या जो स्त्री संसर्ग की भक्ति नहीं रखता वह सारे सुख सम्भोग से बंचित रहता है। अतएव वहां पर हमारे वक्तव्य का औरही ग- और उद्देश्य है। वह अवश्यही अपने पाठकगणों को किसी न किसी समय वसावेंगे।

पारोग्यदर्पण। यह तो शास्त्र को यात दुई। अय हम इस बात की मालोचना करना चाहते हैं, कि आज कल के हिन्दू लोग इन शास्त्र की यातों पर कहां तक चलते हैं। किन्तु आलोचना या करें, जिस हिन्दू धर्म की दोहाई देकर, जिन शास्त्रकारों के बाफ्यों, की श्रेहता प्रतिपादन करके जाज इम इन सारी बातों का सान्दोष्ठम करते हैं, पर अपशोमा क्या उन बातों के कहने को हमें स्थान मिला है ? कौन हिन्दू सन्तान इस गम्भीर वाययों के मर्म को जान फर इसपर काम देगा? हम यही नहीं कहते कि कोई नहीं सुनेगा। हम कहते हैं कि दो एक मनुष्य को .. मारी पात पर ध्यान देना असन्रुप हिन्दुओं में ग सुनने के ही बराबर ॥ जो हो, हम शुक्र धातु के दूपित गौर नष्ट होने के कुछ म फुरछ कारण यतलाही देते हैं । से इन सारे कारणों में सब से पहले बाल्य विवाहादिक किसने एक सामाजिक दाप हमारे सन्मुख खड़े हो जाते हैं, किन्तु हम कहते हैं कि हमारे देश में इस समय बहुत से लोग पूर्ण पौषम अवस्था में भी मियाह करके इन सारे देषों से नहीं बच सक्त हैं पोंकि जय गोपीस बरम के बलिष्ठ भाग्य बालक का आठ दश पा ग्यारह बरस की कन्या से विवाह हुआ उसी दिन से उस जवान चालक का इस लड़की के साथ विवाह करने के कारण शारीरिक अनिठं होना • गारंभ हो जाता है। देश की रीति अनुमार यह · जयाग उसी दिन से उस दुग्ध पोप्य बालिका को जधान स्त्री ममपाने लगता है। उस बालिका के साथ उनका सहवाम तो हमे ही लगता है । इसके मिषाय कोई २ भादगी पशुयत् व्यवहार करने से भी नहीं हटते इस सहवास से जो अपकार होता है उसे चाहे कोई सम न संघ किन्तु विचार करने से इसका अनिष्ट तो वश्य ही जाग मगे। कह चुके हैं कि इस सूक्ष्म अमिष्ठ फे विषय पर मालोचना करना इम मध का प्रघा उद्देश्य है । यद तो हमने पहिले कह दिपा, कि जैसा तिल में तेल भोर अस में रख चारोग्यदर्पगा। ११६ से भीगे बस्तु अनुगत भाध से विद्यमान रहता है, शुक्र धात भी ठीक पैसाही शरीर में विद्यमान रहता है। तिल या रुख के पेरने से जैसे तिलका तेल और अख का रस एकट्ठा हो कर निकल आता है, शारीरस्य शुक्र धातु भी ठीक वैसा ही स्त्री पुरुप के संयोग, चेष्ठा संकल्प और रगड़ से जल की तरह अपने स्थान से गिर जाता है। तिष्ठ या रुख को पेर कर उसी समय उसको न निकाल लें तो थोड़ेही दिनों में नष्ट हो जाता है। देव का शुक्र धातु भी चाहे किमी कारण अपने स्थान से हट जावे यदि उसी समय बाहर न हो जाय तो दूषित हो कर माना विध रोग उत्पन्न करता है । अब देखना चाहिये कि नाना कारणों से मनुष्य का धातु अपने स्थान से हिल जाता है या नही । फाई पर स्त्री पिपप की चिन्ता कर के कोई अपनी बालिका स्त्री के साथ प्रत्यह संसर्ग में ही रहकर कोई शुक्र के उद्दीपक या स्थान भ्रष्ट करने वाले कर्म करफे, श. रीरस्थ शुक्र धातु को यहां से यहां करके दूपित करते और नामा प्रकार रोग कमाने में कभी नहीं चूकते हैं। यह तो सूक्ष्म अनिष्ठ फी याप्त हुई अर्थात् इस सारे पूर्वोक्त कारणों से शरीरस्थ शुक्र धातु अपने स्थान से हटाता है या नहीं और हट कर कोई विशेष अनिष्ट करता है या नहीं, यह केवल सूक्ष्म घिन्ता के बिना ऐसी वैसी बातों से समझाना कठिन है । कुछ ही हो, शुक्र येग को रोकने या उसे स्थान से हटागे से केवल अदृश्य अपफारही नहीं होता। इसके सिवा कोई एक बाहरी रोग भी उपस्थित हो जाते हैं जैसा कि वैद्य शास्त्र में लिखा है। मेरे षणयोः शूल मङ्गमः हृदिव्यथा । भवेत् प्रतिहते शुक्रे विवन्ध मूत्रमेवच ॥ भर्षात शुक्र के उपस्थित येग के रोकने से पुरुप के, आज भीर केोप में तीव्र वेदना हड़ फूटन और हृदय में वेदना, और मूत्र रोग है। जता है। फिर कहा जाता है कि जो अनेक समय पालिका स्त्री के साथ बिना संसर्ग के रहते हैं उनको भयानक प्रमेह और धातु का रोग हो जाता है। परन्तु इसी अवस्था से धीरे २ एकशीरा और फार यह गादिक भारोग्यदर्पण। - श्रेष्ठ शुक्र धातु कठिन व्याधि भी उत्पन्न हो जाती हैं । और शुक्र धातु की इस अवस्था में धीरे २ बीर्य हीन हो जाने में कोई सन्देह ही नहीं है। यहां पर यह विचार करना पड़ता है कि यद्यपि देश में सब से में पद २ पर जो देोष उत्पन्न हो जाने की सम्भावना है, उसे कितने मनुष्य जानते हैं और जानकर भी कितने लोग इन देयों से । यचने की चेष्टा करते हैं। हमारा यहां तक विश्वास है, यहां तक हम कह सक्त हैं कि देश में इस प्रकार शुक्र धातु के उत्तेजित होने से भीतर और कभी २ बाहर भी बहुत सा अनिष्ठ होता जाता है। अनेक प्रकार से सिद्ध हो सक्ता है कि हिन्दुओं की देही के अध- मति का यही कारण है। विस्तार हो जाने के भय से हमने इस पर और कुछ अधिक नहीं लिखा। जितना कुछ हमने खिखा है उसे पढ़ कर अनेक पुरुष इन दोपों से यथा शक्ति बचने की चेष्ठा करेंगे। कुछ ही हे, इसके पीछे जो हम स्त्री पुरुष संसर्ग के विषय में लिखेंगे उसमें इन सारी बातों का भी आन्दोलन फरते जागे॥ स्वप्न दोप चिकित्सा ॥ आज कल यह रोग भी छोटी २ अयस्था वाले पुरुषों में अधिक तर फैला हुआ है । जागे के जमाने में इस घिमारी का कोई नाम भी नहीं जानता था और न पहरग्रंथों में इसका कहीं निदान और चिकित्सा है जय से थाल बियाह होना आरंभ हुभा है तभी से इसका भी जर जमा है, इसके अतिरिक्त रोगियों फि मधिकता, मूर्खता और विधाओं का झुपड, भारत, के धन का होम खसम जोरू में जूती जुतवल और आर्यावर्त की कुदशाओं का प्रधार यह सम बाल विवाह ही से हुमा है ममी पपा फुछ दिन बाद देखियेगा कैचे २ फटार यहादुर पैदा होंगे कि शायद पिष्ठस्त से कुछ ऊंचे हो सेर माघसेर बोका उठाने और मील आपमोल पल भी सके ।

आरोग्यदर्पण । १२१ स्वप्नदोप कई कारणों से होता है एक तो अकाल में हस्तमैथुनादि अनेक संसर्ग से धौर्य का, पतग होना, दूसरे तरह तरह की चिन्ता, ती सरे विषयसक्तों को सङ्गति, चौथे भंग चरस चण्डू शराब में दिनरात मस्त रहना, पांघवे अपनी स्त्री को देख गुस्सा करना और मा थाप से कहना कि हमैं खर्चा देशो नहीं तो परदेश चले जायगे, छठे मा बाप.की डांट ससुर तुम्हार बिपाह कर दिया गौना कर दिया मेहर का लेके रहौ पैदा फरी खाय । और भी बहुत से कारण हैं जिन्हें पीर्य देोप के मसंग में कहेंगे। चिकित्सा॥ सफेद मूसली २ भाग, मखानाकी ठुरी ३ भाग, तालमखाना ४ भाग, इन तीनों दवाइयों को ले कर कूट कपर छान कर राब की जाधी मिन्त्री गिठा छ २ मासे की पुड़िया बना ले शाम सबेरे एक पुड़िया मुहमें रख पाच भर गौ के दूध से सतार नावे इसी प्रकार ३ महीने यरायर खागे से स्वम देोप अवश्य बन्द हो जाता है । परन्तु गर्म चीज और नया वगैरह से पहरेज करना होगा। बहुत से मगजान लोग रात को सूम सन लँगोट बांध के साते है ताकि ख्याय न हे लेकिन इस्से और भी होता है । फिमी मनुष्य को रात के लँगोट यांध के न सेगा धाहिये बयय यह है कि रात्रिको सूत्र मूत्र का भंस अधिक हो जाता है पेशाय उगने पर ऑलस यस यदि उठ कर पेशाय न किया और सेो गया तो जयश्य स्थान है। पापगा ॥ अँगरेजी दवाइयों की समालोचना ॥ पाठक गणों के स्मार्थ कुछ डाक्तरी गोषध का भी गुपारगुण प्र. काश करते हैं कि नो गाज कल मर्यसाधारण में प्रचलित हैं, पर लोग आरोग्यदर्पण। १२४ वेदना निवारक मालिस ॥ /- बदाम का तेल २ भोंस, फपूर १ छाम, ठेगम आधा साम, एक. तित फरफे दर्द स्थान पर मर्दन करै । ऐल फितवेय । शीतल चिनी का तेल । इग तेल का रंग पिपरमेन्ट के सदृश है । मुशाफ, प्रनेह और प्रदर रोग में धम तेण को और २ मूरत्र फारक औषध के साथ पिलाने से फायदा होता है । • (गनेरिया [सुजाक] मिक्सचर) - शीतल चिनी का तेलु एफ ड्राम, बेडसग केोपेया २ ड्राम, नाई. द्रिकं इथर ३ छाम, लायकर पुटाम २० मिन्दु, गोंद का जाल ११. ओंस एकत्रित कर एक औंस के परिमाण दिन में दो तीन दफे के पीने से शीघ्र उपचार होता है। ऐल होम । याङ्ग का तेठ । इस तेलका रंग सुर्स है। इसफो वि. २चक जीपध के साप एफ पिन्दु गिला के देने में पेट के दर्द में बड़ा .फायदा करता है । इस तेल को रुई के फाहे में: थोर फर, दात फे तरे याने से दांत के दर्द को फौरन आराम करता है। दांत में फोड़े लग गये हों तो इस तेल का फाहा उस दन्त के छिद्र में रख देने से दन्त रूप नष्ट हो जाते है॥ ऐल नटमेग । जायफल का तेल। यह तेल भी किञ्चित हरिद्रा वर्ण होता है । जय हेजे की बिमारी में शरीर शीतल हो जाता है तो इम को कपूर के तेल के साथ हस्त पाद में नर्दन यरने से या एक दो बूंद किसी हैजे फी दवा के साथ खिला देने से फिर शरीर गर्म हेर जाता है इगफा मात्रा ३ से ५ बिन्दू पर्यन्त अधिक गात्रा खा लेने से गसा फरता पारीग्यदंगा। १२५ . ज्यर एवं हैजा रोग में यदि शरीर हिमाङ्ग हो जाय तो निम्न- लिखित औषध मर्दग करने से यथेष्ट उपकार होता है । जाय पाल का सेल १ छाम, केम्फर लिनिमेन्ट २ औंस, तारपीन का तेल १ औंस एकत्र फर हाथ पैर में मालिस फरै । ऐल मिगेगा दालचिनी का तेल । यह भी तैल हरिद्रा वर्ण हेाता है। इसको प्रायः अजीयादि रोगों में देते हैं मात्रा १ बिन्दु मे ३ बिंदु पर्यन्त है। इसको भी यदि रुई के फाहे में मोर कर दन्त छिद्र में रक्खे तो दन्तक्षत शीध्रारोग्य हो । अभिनिवेश चित्त से ध्यान देकर देखते हैं तो कतिपय अंगरेजी औषध ऐसे देखे जाते हैं कि जिनका गुण कथित रोगों पर यथार्थ लक्षित होता है पर उनकी दानायट ऐसे ढंग से है कि जिसकी व्यवस्था देखते ही पुराने लोग घृणा करने लगते हैं। जैसे कि गलहम कोई अंगरेजी मलाइम ऐसा नहीं है कि जिसमें सुभर फी : न पड़ती है ॥ '. जाइन्टमेन्ट (मलहम) माफ आईशोडिन फम्पौंड इस मलहम का रंग फिजित रक्तिम् वर्ण होता है और ॥) का एक औंस (आधी छटांक) अंगरेजी दया खानों में मिलता है । गलगण्ड, गण्डमाला, यकृत (लीपर) प्लीहा (स्लीन), कर्णमूल स्फीक गठा और अगल की गिल्टी एवं फेोप शिरा का सस्तपन इन सय रोगों पर उक्त गलाहम के गर्दन फरने से शोषण क्रिया द्वारा चाहे रोग समूल नष्ट न हो परंघ उपरोक्त रोगों का द्धि होना शीघ्र ही दूरी भूत होता है । भाई भीष्टिन २० ग्रेन (१० रत्ती) रेक्ट पाइह स्पिरिट १४ाग (३० रत्ती) भूकर २ औंम (एक छटांक) एकत्रित कर. घोंट ले पूर्वोक्त रोगों पर थोड़ा २ अंगुली से या किसी दूसरे पदार्थ से लेकर दिन में दो तीन यार गर्दन करे ॥ गाइन्टमेन्ट आईशोहाईट आफ पुटास इसका गुग्ण उपरोक्त गप- हालल १२६ पांगंग्यदर्पगा। । हग के सदृश है। विशेषतः इसमें यह है कि बालक के यकृत प्लीहा और गर्बुदादि रोग में थोड़ा २ मालिम करने से अधिक फायदा करता है। इससे जलन शादिक नहीं होता। अइंटमेन्ट आफ जिङ्क यह स्खेत रङ्ग का मलहम है। स्त्री के स्तन फा पाय । शिर के घाघ दाद रोग क्षत और जिम घाय में पानी गा पुषपुषाता है इस मलहम के लगाने से घाय शीघ्र शुष्क होता है और नेत्र के पलक पर इसका लेप करने से नेत्र दाह और सेतेि समय पलकों फा चपक जाना जाता रहता है । * अक्माईष्ठ आफ जिङ्क ० या १ ड्राम ऐल रोजमेरि.५ मिन्दु शुगर की चर्षी १ भौंस एफत्रित कर लिन्ट या फपड़े की पट्टी कतर उमपर म लहम लगा पाय पर लगा दे॥ मान्टिमेन्ट वेगाडेगा इसका गुण नेदना मिधारक है । शरीर के चाहे जिम स्थान में दर्द हो इस मलहम के मर्दन करने से अवश्य फायदा होता है। यह मलाहम फेवल एक्सट घट बेशा डोना और अगर को पर्यो में पता है ॥ { पाइन्टमेन्ट गलफर कम्पौंड गन्धका मलहम यह मलाहग सांगा की बिमारी को बहुत शीघ्र आराम करती है । पहिले खर्जुरी के पाय को गर्म पानी और साबुन से सूय घाँहाले याद यद मलहम लगावे। इस गलहस को इस तरे पना ले । साफ गन्धक इंडस, फिटकसी नाम सेरा १० ग्रेन, कोमल मायुन ६ छाम, ऐसबर्गेमेन्ट ५ यिन्दु, सुअर की पर्यो २ आँगन सय दयाइयों को एकंत्र फर सरल में सूय घोंद ठे॥ याकी दूसरे पक्ष में देश सूचीपत्र ॥ पृष्ट विपय पृष्ठ " कैमरा भोजन ३८ " ४० " " विपय" मालाचरण १/ मासन मिश्री प्रस्तावना २ याला का मुरब्बा मुख्य प्रयोजन ७ गोतुर पाक शोध प्रकर्ण दन्तधायन मीशन का तीसरा समय दन्त मञ्जनादि १०। केद्या पाक प्रातःकाल की हया सामा गात्रि भोजन | जूता पहिरने का गुण ११ अति लाभदायफ शिक्षा उड़ी लेने का गुणा मुबह का उठना तेल लगाने का कुण शरद मातु शिर में तेल लगाने का गुण १२ / आसूद जल की मिधि कान में तेल छोड़ने.फा गुण १४ | हेमन्त ऋतु शरीर में तेल लगाने का गुण मुमली पाक चन्दनादि तेल १५ रतियल्लम पाक स्नान करने का गुगा १६ हेमन्त ऋतु का पथ्य तेल लगाफे स्नान करने का गुण १० यमन्तत्रातु स्नान करने का समय १८) मुञ्जिस और जुलाय कमरत करने का गुण २१ हातरी मुलाय कसरत करने का समय सगीमातु चन्दन लगाने का गुण २४ पेठे का मुखा प्राएदातु मोजन २५ शाम के सयोग का गुण भोजन के पास भाग की जेली नपाक यंत्र मोशन करने का समय ३३ / जल का नाम निपिद्धान ३४ मयंसाधारण जल के जडेयी का गुण ३५ तालाय के जल का गुण ५० ५१ . ५३ ५५ पैर धोने का गुण ३१ जलप्रफर्ण " ६५ ( २ ) विपय पृष्ठ विपय पृष्ठ " कूप के 29 यमुना नदी के० गहा नदी के " " ॥ धातृ शिक्षा २०७ यावली के० की विधि ८१ हैजे की दवाइयां ६८ माध्यात्मिक भक्ति आध्यात्मिक शक्ति साधन रोगकारक जलका पहिचान लड़के फी पमुली की बीमारी १ अति शीतल जल का गुण पसुली रोग के लक्षण शीतल जल का निषेध ६० अनभूत् दया जादा पानी पीनेका निषेध | अद्भुत बालकों का स्नान १०० पामी से मूगा बालू निकलना 90 स्तन पान कराने की विधि १०२ बिना आग के आग जल उठे लढ़कों का कपड़ा पहिमागे की कई ढा से अक्षरों का उड़ जाना" घिधि माग की बत्ती विना जलाये जल लसफे के दांत का वधान १०८ १ मुख पाफ की चिकित्सा १११ परतनों पर चांदी चढ़ाना "बच्चों को पचा खिलाना ११२ परतग साफ करने की विधि ७२ ११४ सीसे (ऐने) पर कल्लाई करना भति वीर्य निकलने से रोग १२० यरतनांपर रांगेको फलई करना ७३ | स्वप्न दोप १२० गरमन सिलयर बनाने की विधि" स्वप्न दोष की चिकित्सा १२२ पुटीन य. १४ महरेजी दवाइयों की दो चीजों के मिलने से चमत्कार " समालोचना १२४ हजा प्रकरण ७५ / गुजाफ की दवा हिमा यों होता है 98| अगरेजी तल और मलहमे का सफाई १८ बयान हजाग होने का उपाय घर मे सराय हया निकालने धीर्य प्रकरण " "

आरोग्य दर्पण ॥
"द्वादश अङ्कों का एकजिल्द”
द्वितीयखण्ड
जिसमें भोजनान्त में मुरा धोने से लेकर गर्भाधान पर्यन्त
कर्म, अति लाभदायक शिक्षा आदि अनेक विपय
पूरित पण्डित जगन्नाथ शर्मा राजवैद्य ने
लोकोपकारार्थ रच कर प्रकाश किया ।
आयुर्वेदात औषधालय
मानसेनगञ्ज
प्रयाग
"धामिकयन्त्रालय में मुद्रितहुआ"
सिवाय ग्रन्थकर्ता के किसी को छापने
अथवा भापा अदल बदल
फरने का अधिकार
नहीं है।
द्वितीयारति १०० माह सेप्तम्यर सन् १८४४ मूल्य १)

सूचोपत्र। ३ करना ": विपय एष्टि। बिपर्यं दृष्टि आचमन १ भमयानुसार पुष्पों का धारण भोजनान्त में कर्म. भोजनान्त में शयन फर्म ४ ऋतु योग्य पुष्प २१ घामपार्य शयन कारण ४ पुष्पों के धारण करने की आयधि २१ भोजनान्त में स्मरण ५. पुप्पों के विशेष गुण तथा अन्यच पार्जित ७ खड़ाऊं ताम्यूला (पान) के २७ गुण ७/ सायं संध्या पलं २३ पान त्याप अंग लरात्रि में भोजन पान में चूना आदि लगाने का गद्यपान २५ प्रमाण १० विधि युक्त गद्यपान का फल २८ पान खाने का समय जाविधि मद्यपान अमीरी लटका गरीबी लटका १२ शय्या मिधारः, शिल्प शास्त्र संध्या समय का फर्म १३ शयग में दिशा का मिधार ३१ पोशाक १३ दीप काः ३२ १७ / दीप का मुस पायतामा या मोजह १७ उत्तम दीप माण पगड़ी १८ / पुरुष दीप गिर्मापणे दोषः ३३ भूपण १६ लालटेग का गुण ३४ पंचरवागि रत्न धारण के गुण १९ दिशा भेद से पाएर के दवे का पुष्प धारण के गुण १२/ निद्रा विधिः द्राता का गुण १८ पंसा । १५ सूचीपत्र। विपय एष्ठि। बिषय दृष्टि आचमन १ समयानुसार पुष्पों का धारण भोजनान्त में कर्म. ३ करना २१ भोजनान्त में शयन कर्म ४ ऋतु योग्य पुष्प २१ घामपार्य शयन कारण ४ पुष्पों के धारण करने की अवधि २१ भोजनान्त में स्मरण ५. पुप्पों के विशेष गुण २२ सपा अन्यच्च यर्जित ७ बहाऊ ताम्यूला (पान) के २७ गुण ७ सायं संध्या पालं पान त्याज्य अंग रात्रि में भोजन २४ पान में चूना मादि लगाने का मद्यपान १० विधि युक्त गद्यपान का फल २८ पान खाने का समय अनिधि गद्यपान प्रमाण १२ निद्रा विधिः अमीरी छटका गरीबी लटका संध्या समय का कर्म पोशाक छाता का गुण ३१ १२ शय्या पिधारः, शिल्पशास्त्र १३ शयन में दिशा का विचार १३ दीप फायः १७ / दीप का मुख १७ उत्तम दीप माक्षरा १८ पुरुष दीप गिर्मापणे दोषः १८ लाटेग का गुण पंखा १८ दिशा भेद से पाटर के दवे का गुण पायतामा या मेजिह पगड़ी সুমন্ত | पंचरत्नागि रन पारण के गुण पुष्प धारण के गुण ३३ २० ३५ ., ( २ ) ७४ ७४ १५ 99 -- विपय दृष्टि- विपय दृष्टि कान की रक्षा का गुण ३५ त्रिदेष क्षण ७३ अंजन ३५ उपद्रव सुरमा लगाने की विधि ३६ ममूरिका ( छोटी माता) ४ जांख दृखने का लेप ३६ | धर्म पीड़िका माता रतांधी अंजन ३६ अमाध्य लक्षण जादर्श (साइना)... ३७ गाता को चिकित्सा प्रसाधनी (कंघी) .३२ शीतला की टीका था छाप .:: शयन विधि (सिम्फ) शपने आवश्यक कम्माणि ३८ टीकालगाने के साधारण लक्षण ८० मैथुन विधि ३९ भायुर्वेद ८१ गर्भाधान के पूर्व स्त्री पुरुष को आयुर्वेद की परंपरा ८१ जयश्यकीय कर्म ४१ भाद्वाज मुनि ४४ | घरफ मुनि ८२ जति लापदायक शिक्षा ५४ घन्तरि कामातुर के लक्षण '८३ ५७ मधान चतुर्दश नाही' ५८ दशवायु गर्मिणी गमग निषेध ५८ नाही स्पर्श विधिः राष्टि के जल लेगका महज उपाय ६०) प्रकृत्यानुमार नाही अहिंसा परमो धर्मः ६५ मृत्यु नासी लक्षण ... ८७ घातृ शिक्षा ६८ | राग रहित शपमृत्यु गाड़ी को यालकों की सांसी की दया ११ | डाकृरी मतानुभारेण नाहीशानं ६ पाथ बिस्फोटक ७३ | रागपरीक्षा बड़ी माता का स्वरूप ७३ | जिहा परीक्षा ५६. नाड़ी साम स्त्री त्याज्य शुक्र दोष ५ है -- - उक्षण .29 साधारण लक्षण १० " विषय दृष्टि | विषय दृष्टि मस्त्र परीक्षा कफ केोपकारक वर्ग सूत्र लेने की विधि शिवसंहितासे ८० | श्लेम कोप के लक्षण गल परीक्षा ९१) कफ प्रकृति के लक्षण वर्ण परीक्षा २ डाकृतरी मतसे कफप्रकृति के लक्षण स्पर्श परीक्षा २ रक्त प्रकृति के लक्षण १०४ जातव परीक्षा ६२ | विचित्र प्रकृति ९३ / श्लेस केपि श्रद्धादि छारक यर्ग " स्वप्न परीक्षा दूत परीक्षा बैद्यक से १०५ 909 " ” " अशुभ सूचक दूत ९५ टक्षण १०६ शरीर लक्षण ५ | बीर्य देोप यातक्षय के लक्षण सु० ११० २५ ६ | रक्त सञ्चालन १०० बात शुद्धि के लक्षण पायुकेोप के लक्षण अन्भूत औपधियां। यात प्ररुत के लक्षण सिवाय डाकृरीगतमे गात प्रकृति के लक्षण " दूसरा अंगरेजी ११२ इंद्ध तथा काप यायु शान तीमरा कारक बर्ग चौथा ११४ पित्त शत्तायरि चूर्ण धातु पुष्टि पर पित्तक्षय के क्षण ce लिङ्ग स्थूग करने का लेप ११५ पित्त शुद्धि के लक्षण "तिना पित्त के काप करनेवाले बर्ग पातालयंत्र से तेल निकालने पित्तोप के लक्षण १०० की विधि पित्त प्रकृति के लक्षण चिकित्सा मिलनी सेभंग हापूरी मत से पित्त प्रकृति की शौषध हिंग्यायक चूर्ण घद्ध सपा प्रकोप पित्त के शमन ताकतवर शपथ ११७ कारक वर्ग ९१६ शीतोपलादि चूर्ण ११९ कफक्षय के लक्षण १०२ / सदिमादि बटी कफ एद्धि फै लक्षण पुराणग्यरे पथ्यम् " लक्षा " १०१ साक्षादि तेल . " १२० " आ " " " " " " " विपय पृष्टि विपय पृष्टि अघारबटी १२१ दूसरी पिघलागी क्षुधामागर १२३ । कुरा काटने की पिचकारी एण्या पाक सुजाक पर भजन १३८ अफीम खानेवालों के लिये कामेत्पिादक बटी अफीग पाक १४ खाने की विधि भांग का पाक १२५ वणभास्कर चूर्ण बनाने की विधि खाने की विधि १४. फामेत्तेजक चूर्ण १२६ / राहत हिंग्यादि वटी प्रदर रोग को अपूर्व भौषध १२८ खाने की विधि काले सांप के काटने का इलाज कृमिनाशक चूर्ण १४१ बी०सी० से "प्राप्त" अांध की दवा धास्तूरी को पहिचान "अंगरेजी काली रोशनाई १४२ कस्तूरी की उत्पत्ति १२९ इमरी, तीसरी, चौथी विधि सस्तूरी का गुण १३० / ब्ल्यूटलेक काली गीली स्याही १५३ मृगगाम्यादि बटी (कस्तूरी की ग्रोगलास या, गधुग स्याही गोली) घरी स्याही मनाने की विधि लाख स्याही १४४ फेशर की पहिचान १३१ मगहरी स्याही सफोदगन्दगके तेषका पहिचाग १३२ जालपानी अंगरेजी इमली की चटनी . फुल यगाने की सहा उपाय मांग को पटनी १३३ फुलकी की परफ सुजाता को दवा पर फे रा लायक थोड़ी सी विधकारी की दवा साधुन १४७ पिथकारी सब प्रकार के पालेगा यात्रा की सगालोचना मुगाफ को १३७ " " " " * इसमें दृष्टि दोष से अंगरेजो को जगह "अरेजो" छप गया, पापा हे शिपाठकगण सुधार लेंगे।

आरोग्यदर्पण द्वितीय खण्ड। प्राचमन । चिकगाई छुटाने के लिये भोजन के उपरांत चने के बेमा से हाथ मुंए गल कर जल से धो डालना उत्तम है। कितने लोग माबुग से भी धोते, ६, बिलायती सायुन तो बेशक अनेक जानवरों के घरधी आदि बुरी बस्तु से तैय्यार होता है किन्तु देशी साबुनमें कोई बुरे पदार्थ नाही हैं (चूना, सज्जी, गरी के तेल मादि यस्तुओं से बनता है जिसके मनाने की क्रिया भी आगे लिखेंगे) तथापि लोक गिन्दित होने से त्याज ही उत्तम है॥ यदि कोई महाशय सफाई के लिये देशी साबुन का इस्तेमाल करें तो कोई हर्ज भी नहीं है । भोजनांत में मुख धोने के समय चाहिये की जो कुछ दांतोंकी संधि में सच्छिष्ट लगा है। उसे आइस्ते से लकड़ी तिनका (खरचा) से या माने और चांदी के सूक्ष्म मुस सप्लाई से निकाल कर कुल्ली कर हाले, क्योंकि भोजनके उपरांत कई कुल्लों के करने से, कफ, तृष्णा, मुखका सूखना, नाश हा मुख की शुद्धि होती है । भोजन के उपरांत कितनी कुम्ली फर इसमें प्रमाण है। कुर्याहादशगण्डूषान्पुरीपोत्सर्जनेततः । मूत्रोत्सर्गेतु चतुरी भोजनान्तेतुषोडशः ॥ शीच के अनन्तर मनुष्य को १२ कुल्ले करने और सिर्फ मूत्र परित्याग में ४ कुल्ला और भोग के उपरांत मुख धोने के समय १६ कुम्मा करने चाहिये । बहुत से अमीर लोग जाड़े के दिनों में रात्रि के भोजनान्त में २ द्वितीयखण्ड । गरग जड से फुली करते हैं अगर किसी को मन्देश हो कि करना चा. हिये या नहीं ? यह भी शंका दूर किये देते हैं । सुखोपणोदकगण्डूपः कफामचिमलापहः । दन्तजाड्यहर- शापि मुखलाघवकारकः ॥ सुखेोपणोदक अर्थात् महने लायक गरम जल से जाले के दिनों में कुल्ली करने से कफ, समषि, मुख का मैप, दांतों का ठंढा हाना नाश हे। के मुख इतका होता है किन्तु गरम दिन विगारी के अलाया गर जल से कुल्ला करना नहीं चाहिये, और सुनिये जो आप लोगों के जा. नगा बहुत जरूरी है । प्रायः पाप लोगों ने वैद्यों के मुख से सुना होगा कि फल फलहरी खा के ऊपर से जल नहीं पीना चाहिये हम कहते हैं जल पीना तो निपेघ हो है साधन भी नहीं करना चाहिये पोंकि जिष्टा के नसे के द्वारा जल गलेगे जाके खांसी आदि रोग उत्पान करता है, विशेष कर निम्नलिखित चीजों को खाके तो कभी कुम्मा न करै । द्राक्षादीनि फलानीतून पयोमुलंघृतंदधि । ताम्बूलमी- षधं पत्रं हविर्भूतापिनाचमेत् ॥ मुनया से लेकर कच्चे फल, अख, (पौंडा ) दूध, मूल (शारद मादि ) घृत, दही । पान का बीड़ा, औषध, पत्र गौर हविष्यात पदार्थ को भोजन करने पर माचमन भी नहीं करना चाहिये पोंकिग चीजों को खाके ऊपर पानी पीने से अथवा फुल्ला करने से श्वासकास मादि रोग उत्पन्न हो जाते हैं। यदि किसी जन्न की कण दांतों के संधि से न मिले तो मनु जो के लेखानुमार उसे पवित्र या दांतों के समान पषित जान कर छोड़ देना चाहिये क्योंकि ताकत करके निकालने से दांत कमजोर जोर .

भारोग्यदर्पगा। my सांस युक्त हो जाते हैं। उसी अवस्था में जाल जांखों को धोने से दृष्टि में बल और ज्योति बढ़ती है इसमें भी बचन है यह कोई न कहै कि सम्पादक महाशप के जो जी में माता है उड़ाते जाते हैं । आचम्यजलयुक्ताभ्यां पाणिभ्यांचक्षुषीस्पृशेत्। भुक्तापाणि- तलेघृष्टा चक्षुषायदिदीयते । अचिरेणैवतद्वारि तिमिराणि- व्ययाहति माधमन करके अर्थात् मुख घोके भीजे हुये दोनों हाथों से नेत्रों को पोछ लेय, दूसरा बचन है कि भोजन के बाद मुख धोके भीजे हुये अपने दोनों हाथों को रगड़ कर नेत्रों को पोछ लेने से यह जल यात जल्द नेत्र रोग केो नाश करता है तात्पर्य यह कि भोजन के उपरान्त फुला वगैरह करने के उपरान्त नेत्र मुख अवश्य धो डाला करै ॥ भोजनान्त मे कर्म। भुक्त्वा शतपदं गच्छेत् बामपार्वे तु संविशेत् । शब्द रूप रसान् गन्धान् स्पी च मनस: प्रियान् ॥ भुक्तावानुपसेवेत् तेतान्नं साधु तिष्ठति सु. सूत्र स्थान अ० ४६ भोजन के बाद मनुष्य को अत्यावश्यक है कि सौ कदम टहलके गति कोमल शय्या पर यायें करवट लेट रहे, उस समय शब्द शत् शामा जादि मनोहर बोलने वाली पिड़ियों को मायाज सुनगा, रूप (तस्वीर वगैरह) देखमा, रस (पाम मादि) वस्तुओं का रस चूमना, गन्ध (इत. रादि का मूंगा) स्पर्श (रूई से भरे हुये कोमठ तकियों पर हाप फेरना) इत्यादि जिससे मन प्रसन्न हे, सेवन करने से भोजन किया हुमा मान पपार्थ पच जाता है, माद मीस पच्चीस मिनट फिर दहिने करपट १० - हितीयखण्ड। मिनट लेट कर उठ खड़ा हो भोजन के परे शत पद घटने से अन्न ख स्य और भायु की वृद्धि होती है, दौड़ने वाले के पीछे गीत दौड़ती है, टहलने के बाद किंचिन्मान पलंग पर लेट रहने से प.पुष्ट हे।सा है। भोजन के बाद बैठने से पेट में सली, तांद और तंद्रा बढ़ती है । अन्य मत से भोजनांत में शयन क्रम । श्वासानंष्टी समुत्तानस्तादिः पातुदक्षिणे। ततस्तुति- गुणान्यामे पश्चात्सुप्याद्यथा मुखम् ॥ अर्थ-मोजनान्तर भी कदम होल कर गाठ स्वास पर्यंत पित लेट जाये फिर सोलह श्वास दहनी करवट सेवि, फिर ३२ श्वास निकले इ. तनी देर तक बांई करवट साधे पीछे अपनी इच्छानुसार चाहिये जिधर की फरपट सेवे॥ वामपार्श्व शयन का कारण । वामदिशायामनलोनाभेरूास्तिजंतूनाम् । तस्मात्तुवाम पावेशयीत मुक्त प्रपाकार्यम् ॥ अर्थ-बांई तरफ नाभी के ऊपर अमि स्थान है, इसी से भोजन करे हुये अनुपके सामने परिपाका बाई फरषट शयन करनी चाहिये। अन शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गंध इन पांचों को भोजनान्त में जो बैद्यमों ने मनुष्यों के लिये सेवन करना हितकारी लिखा है उसका कारण दिखलात हैं। स्वास्थ्य के विषय में एक विलायती, डाकृर का लिपपर हमने एक किताब में पढ़ा है, उसमें लिखा है कि भोजन के बाद पित्त सेना उत्तम , भारोग्यदर्पण। ५ . है, किन्तु उन्हों ने यथार्थ कारण नहीं दिखलाया कि क्यों उत्तम है लेकिन इतना तो हमने भी अनुभव किया है कि चित्त सेोने से सारमा को मा. मन्द अधिक मिलता है ।। शब्द-नत्तम गान और पाजा एवं मनोहर चिहियोंकी बोल चित्त की बिभ्रमता, शोक और चिन्ता को हर लेता है । स्पर्श-त्वचा को. मलता यथार्थ रक्त संचालन और मौत पैदा करता है। रस गंध-पान इलायची को स्वाद और इतर आदि की सुगंधि सेवन करने से भोजन का जन्न स्वस्थ और सुख प्राप्त होता है। रूप-तस्वीरों के देखने से वीर्य एवं काम की वृद्धि और मन प्रसन्न होता है । भोजनान्त में स्मरण । हमारे हिन्दू मत में भी कोई २ बात किसी स्थल में चाहैं वे शारी. रफ हो, चाहे धार्मिक ऐसी लिखी हैं कि जिसे सुन कर ले गठीय पिदेशीय जन फेो कौन कहै एतद्देशीय माज काड के नव शिक्षित गण चकित है। झूठ २ कहने लगते हैं, किन्तु हम कहते हैं कि हमारे भूत पूर्व ऋषिगण चंडूयाज नहीं थे उन्होंने जो कुछ लिखा है उसमें भीतरी मतलप अवश्य गंभीर है किन्तु हम लोग यिद्या हीन होने से नहीं समझ सकते हैं तो सिधाय भूठ के और क्या कहेंगे? हमारे वैद्यक शास्त्र तथा अन्य ग्रन्पों में लिखा है कि भोजन के उपरान्त निम्नलिखित महात्मानों को स्मरण करने से भोजन किपा हुशा अन अच्छी तरह पच जाता है । अगस्तिकुंभकर्णच शनिचबड़वानलं । आहारपाचनार्थाय स्मरोमोमञ्चपञ्चमम् ॥शर्या सिंचमुकन्यांच च्यवनंशक्रमश्विनी। भुक्कामाचःमरेद्यस्तु चक्षुस्तस्यनहीयते ॥ जस्तिमुगि ( पार्यती जी के खिलाने से भी न अघाने) कुंभकर्ण (गोगा करने में प्रसिद्ध ही थे) शनिश्चर ( यह मसिद्ध है) पहचान हिशीयखण्ड। ( समुद्र अघय गये) और पञ्चग भीमसेन महाराज ( साने गौर यल दोनो में प्रसिद्ध) इन पांघों को जो भोजन के उपरान्त स्मरण फरफे पेट पर हाथ फेरता है भोजन किया हुमा जग उमना निर्विन पच जाता है। शर्याति, सुकन्या, पपषन, चन्द्र और अश्वनी कुमार जो मनुष्य मोग करने के उपरान्त उक्त पांचों को स्मरण कर नेत्रों को भीजे हुये हाथों मे पोखता है, चमके नेत्र कभी नष्ट नहीं होते ॥ भोजन के बाद अप्रिय शब्दों के सुगने, ग्लानिकर वस्तुओं के देखने और बहुत हंसने से काम हो जाता है। इस स्थल में थोड़ी सी वात और कहने की जरुरत है जो आरोग्य इच्छुक जनों के लिये निहायत उपयोगो है वह यह है कि भोजन के उपरांत जब तक भोजन पच कर पेट कुछ हलका न हो दूसरा भोजन न करे और न कुछ फल फलहरो खावे यहां तक कि बहुत पेट भरके पानो भो न पिधे, हां भोजन के उपरांत पोडे का चूसना और पियास होने पर थोड़ा २ करके कईबार जल पीने से लाभ है किन्तु उपरोक्त बााँ से अजीर्ण होने का खौफ रहता है। लिखा भो है:- अत्यम्बु पानाद्दिषमागनाहा संधारणात् खपविपर्यया । कालेऽपिसाम्यं लघुचापि मुलमनंन पाकं भगते नरस्य ॥ बहुत जल पोगा, मिया गोजम पर्थात् पूर्व त भोगन के अपरि- पक्क मेंही फिर भोजन कर लेगा, मल मूत्र के बेग का रोकना, दिन में सेना रात में जागना गोर पिमा भूष या भूख मार कर या ममय पर जाध से की जगह उँटाकही खा के रह गाना इन्हों का प्रकार के कुसं. यम से अजीर्ण भग्नि मंदादि रोग पैदा होते हैं, ईर्षा, भय, क्रोध, लोग, राग, द्वैप और शोफ युक्त है। का भोगग करने से जाहारका पाक - प न हो अजीर्ण हो जाता है, भोजन के बाद पन्द्रह २ मिनट में दो तीन मार पोदा २ जल पीना बहुत फायदा करता है। अगर भोजन के आरोग्यदर्पगा। परे शिर में भारी पन गति गिद्रा, धड़कन और मालस्य मालूम है। तो मिश्नी के सर यत में जरासा नीबू का अर्फ डाल कर पी जाय या पौंडे की गंडेरी चुहै। तथा अन्यच्च वर्जित। कुछ पच शयनं चाशनंचाति नभजेन्नद्रवाधिकं । नाग्न्यातपोनप्लवनं नयानंनापिबाहनं ।। व्यायामंच ब्यवायंच धावनंपानमेवच । युइंगीतंचपानंच मुहूर्तभुक्तवांस्त्यजेत् ।। भोजन करने के उपरांत दो तीन घड़ी तक जब तक भोजन न जाय निम्नलिखित कामे को न करे, जैसे-घोर निन्द्रा, पुनः भोजन करना, द्रव अर्थात् अत्यन्त पतले पदार्थो का पौना, जांच के सामने या घाम में रहना जल में तैरना या बहुत स्नान करना, रास्ता चलना, घोड़े हाथी प्रादि स- वारी पर बैठना, कसरत करना और स्त्री गमन करना, दौड़ना, बहुत चलना कुम्तो लड़ना, गाना और पढ़ना आदि कर्म न करें क्योंकि इन सब की से भोजन का परिपाक नहीं होता। तांबूल (पान) के २७ गुण । रोग, गरम, रोधक, कपाय, तीता, क्षार और हलका है, रक्त, पित्त, गौर मुह को साफ, काम और सुन्दरता बुद्धि, कफ, दुर्गन्धि खार, पंच्छा, इनु, दांत और जीभ का गल, गल रोग, यात ध्याधि और श्रम का नाश करता है गया पान मीठा, कषैला, भारी और कफका साग के बराबर है। पुरामा पाग थोड़ा पहुआ एलका गौर कफ नाशक है । पका हुआ मफेद पाग अधिक गुण दायक है। पहला पान कहुगा, दस्तायर, पाचक, पित्तकर और कफ नाशक है और देशावर बङ्गला के अपेक्षा कुछ कम गमे भीर मीठा है॥

दितीयखण्ड। ८ . सुपारी-भारी, शीतल, सूखी, पैठी, माह ( शिर में चक्कर ) मद (नशा) कफ और पित्त नाश एवं हाड़ों के यन्धन को ढीला करने वाली है, सब से उत्तम सुपारी जिसके बीच में सनी हो, कच्ची सुपारी कफ और जमि मन्द करने वाली होती है । बेहतर होगा कि पान के साप खाने के लिये एक रोज पूर्यही पकी सुपारी को महीन कतर कर गुलाय या चन्दनके सार्कमे न हो तो सिर्फ पानीही में भिगा रखे तथा दक्षिणी (चि. कनी) सुपारी पान के साथ खाना बहुत ही फायदा करती है । कत्या-कफ और पित समान कारी है। खासे हजारों साधारण २ धिमारियां मागम होती हैं जिसका बयान मागे करेंगे । सैर बहुत प्र. कार के हैं परंतु खाने और दवा के काम में सिर्फ देही अर्थात् रुपण खदिर (काले रंग का खैर जो उक्त नामक राक्ष के जाम्यान्तरिक काट के जलीय सार से प्रस्तुत होता है, पांडु खदिर (पपढ़िया खैर) जो ग्यास्विर नामक वृक्ष के पत्र एवं तरुण शाखाणों के अग्र भाग के जलीय अंश से तैयार होता है। सिंहपुर एवं भारत समुद्रस्य द्वीपों में बनाया जाता है। कृष्ण खैर की अपेक्षा पांडु सर उत्तम होता है। एतद्देशीय ब्यापारी लोग नमी खैर में ईंटा पत्त्या मिलाते हैं मसे पनियों के यहां का सै पिना साफ किये हुये कमी न खाना चाहिये । घूगा-वायु भीर कफ नाशक है, यानी यान हाती मने देख लो। पान, सुपारी कन्या भीर चूना मिल जाने से अद्भुत रंग का मन प्रसन्न करने वाला पदार्थ बन जाता है कि जिसके खाने से सुन्दरता, मुषु शुद्ध, सुगन्ध भीर विदेपि शांत होता है । पान के साथ प्रातः काल में सुपारी, मध्याहू ने सैर भोर रात में चूना अधिक खाना चाहिये, पाग को डपी भोर फुनगी निकाल कर खासा चचित है और इसके तीन पीक चूंक कर शेष रस खाने से अमृत समान गुण होता हे क्योंकि "शादीधि. घोपभपेयं द्वितीयं भेदि दुर्जर, तृतीयादि तु पातव्यं सुधातुल्यं रसायनम्" आरोग्यदर्पक्ष। ६ पान के त्याज अङ्ग। आयुरग्रे यशोमूले लक्ष्मीमध्येब्यवस्थिता । तस्मादयं तथा मूलं मध्यपर्णस्य वर्षयेत् ॥ पर्णमूले भवेत्याधिः पर्णाग्रे पाप संभवः । जौर्णपत्र हरत्यायुः शिराबुद्धि विनाशिनौ ॥ पर से लिख भाये हैं कि पान की जा तथा अग्रभाग और नश सार तघ खाध, उसे दिखलाते हैं । पान के अग्रभाग में आयु का नाश मूठ में यश और मध्य में लक्ष्मी (शोभा) की घास रहती है। इस कारण पान का मूल मध्य और अन माग त्याग फरणा क्ष्योंकि पान के मूड भक्षण करने से शरीर में रोग उत्पन्न होता है । अग्र भाग सेघग से (पाप) मन में ग्लामि और सहा तथा पासी पान खाने से आयु का नाश तथा शिरा युक्त (जापान के बीच में लकीर होती है यिना उसके गिकाडे) खाने से बुद्धि का नाश होता है। पान में चूना आदि लगाने का प्रमाण । गुञ्जाचें घूर्णकं चैव तत्सम खदिरंमतं । माषैकं क्रमुक सर्वे करादिगणं च यत्। मिश्रितं पूगतुल्यस्यात्ताम्ब ले मान मीरितम् ॥ डोग मायः पान खाने का शौक रखते हैं, परन्तु पान उगागा नहीं जागसे इसी से पान नुकसान करता है। घूमा भौर सैर माघ २ पत्ती वगाधे । सुपारी का कतरन ६ रत्ती धरै गौर कपूर, लौंग, छोटी डायधी नादि का पूर्ण सप गिलादे रछ ती हे इम रीतिसे पाग फातीमा य. पाना चाहिये भोर यो में दो पान से कम न रहे क्योंकि ठीक चूमा रहने से पान का पीक अत्यन्त रक्त प्रर्ण भौर सुपारी अधिक होने से १० द्वितीयखण्ड। रंग का नाश होता है। पान में चूना अधिक लगाने से मुख दुर्गन्धि क- रने लगता है। निम्नलिखित चीजों के हित लगाने से बोयर जायकेदार और सुगन्धित होता है-जैसे पान सुपारी खैर चूगा पगाई तगाकू छो- टी लायची जावित्री फकोल जाया कस्तूरी लौंग कपूर और केशर इन सहित बना पीडा मनुष्यको मदोन्मत्त मानन्द से मानन्दित करता है। यात से लोग पान न सके सिर्फ सुपारी घयाया करते हैं। जैसे रोषां मादि प्रदेश के लोग पतीखी साते हैं धर्म सम्बन्धी ग्रन्थों में पान रहित सुपारी साने का बहुत कुछ निपेष किया है। अनिधाय मुखपणे पुगंखादति योनरः । दशजन्म दरिद्रः स्यात्तताधो गतिं व्रजेत् ।। पान के बिना जो मनुष्य केवलसुपारी खाता है वाह दश जन्म दरिद्री छ। नर्फ को जाता है. इसमें संदेह नहीं फेषष्ठ सुपारी खानेसे मुख फोका जिहा कठोर शिर में कमजोरी और बुद्धि धम होता है और भी यषन है। विनापर्णमुखेदत्वा गुवाकुंभक्षयेद्यदि । तावङ्गवतिचा- ण्डाला याव गङ्गांनपश्यति ॥ बिना पान के जो मनुष्य फेयरस सुपारी खाता है वह जब तक गंगा जी का दर्शन न कर पायहाल रहता है, यह बचन धर्मशास्त्र का है धेयक का नहीं जोर धर्मशास्त्रों में ऐसे २ घधनों को देने का मुख्य प्र. योजात्राधियों का पह है कि डोग उस काम को अवश्य त्याग देय । वाचस्पती-तांबूलं विधवास्त्रीणां यतीनांब्रह्मचारिणाम्। तपखिनांचविप्रेन्द्र सर्वपुण्यहरस्मृतम् ॥

प्रारोग्यदर्पण। . - । विधवा स्त्री, यती, ब्रह्मचारी और तपश्वी याने संन्यासी मादि के शरीर का पुण्य पान खाने से. नाश होता है । वैद्यकशास्त्र में विधि युक्त पान खाने को किसी के लिये निषेध नहीं किया है, उक्त लोगों को जो धर्मशास्त्र पान खाने से रोकता है मुख्य तात्पर्य यह है कि एक तो पान खाना ङ्गार है दूसरे काम की वृद्धि होती है इमो लिये निषेध किया है अगर जितेन्द्रिय डोग सिर्फ मुख शुध्यर्थ पान खाधैं तो कोई हर्ज यष्ठ और भूख की हालत और मल त्याग करने के पीछे पाग न खाना चा- हिये । बहुत पान खाने से मुख, जिल्हा, नेत्र, केश दांत और कान में विकार एवं पित्त, घायु. रक्त और शोष (धातुक्षय) रोग की उत्पत्ति तथा क्षुधा का नाश होता है। स्नान भोजन और जल पीने के उपरांत या कहीं से यक्षा माया हो पान खाना बाच्छा होता है । "ग नेत्रकोपे नच रक्तपित्ते क्षतेनपाते नविपेनशोपे" मांख रोग रक्त पित्त घाय या फोडा फुन्सी, उष्ण वायु, पिप गौर शोष रोगों में पान खाना नु. सान करता है। ग्रंथान्तर मत से पान खाने का समय । रतोसुप्तोत्थितेस्नाते भुक्तवन्ते च संगरे । सभायां विदुषां राज्ञां कुर्यात्ताम्ब ल चर्वणम् ॥ स्त्री संभोगके समय, शयन से उठ कर जान पूजनादि से निरत छ। के, भोजन के उपरांत, बगम के अधवा दन्त घायन करके, फुश्ती और युद्ध में राजा एवं पपिहांकी समामें इतनी जगए पाग साना उत्तम । तमा पत्र-जहां तक परीक्षा से देखा गया है दवा के अतिरिक्त तमाफू खाने से नुकसान करता है, भारत में बिरडाही कोई ऐसा मनुष्य 'द्वितीयखण्ड । निमालेगा जो तगादूग खाता हो, ग अघि मपी जरामा पान छो के साप मा लेते हैं, धिकांश भगीर ग ऐमे सिर्फ पान के भाष तमाफू खाते हैं, हमाफू खाने से दांत, भांप और मस्तिष्क निर्या एवं । युद्धि मन्द पर जाती ये चाहे जो पह-मी प्रायः देखने में साप्ताद कि किमी वस्तु की गादत पर जाने से पानि देख कर भी लोगों में नहीं छोड़ा जाता । पहिले तो तमाफू किसी अयस्या में खागा लाभ नहीं | यदि खाने को ऐसाही इच्छा हे। तो चाहिये कि गिम्नलिखित रूप से तगाकू यनाय से गौर जरा सा पान में रख कर साथै ।। अमीरी लटका । पावसर पर समाकू के पत्ते केर ३ सेर पानी में रात को भिगा दे सवेरे उग पानी को फेक दूसरा पानी उतना ही गिदार ठार दे जिस शार के पद पानी फेक उतनादी मोर पानी छेर रात भर रख कर पुनः गयेरे उस पानी को फेक तमाफू मुखा ले। याद उस तगाफू के। महीन कतर कर सेरपर गुठाय के गर्क में घोगी गौच से पका ले जय डेढ़ पाय जर्फ वाकी रह जाय तो सूप मजकर छान और फिर उसे भोगी जांच में पफाना शुरु कर जम सिर्फ एक छंटाक रविजाय । उ- तार ले और गफेद चन्दग का बुरादा ६ मामा सफरफरहा६ मामा छोटी छायची का दागा १ ला जायगड ६ पासा जावित्री ३ भागा लैग ६ मासा केशर ५ मासा फपूर ३ मामा कङ्कोल ४ मासा कस्तूरी परती चांदी का धर्फ २० ताप सप को गहोग बूंक उक्त गर्फ में घोंट उर्द के परामर गोली चना ले और पान के साथ एक गोली खाये। गरमी के दिनों में लोग जावित्री गादि वस्तु का मात्रा कम कर दे ॥ गरीवी लटका। १ पाय तगाफू के पत्ते की गरमी पूर्व क्रियानुसार पानी में भिगा " ....

भारोग्यदर्पण। १३ कर निकाल हाल बाद सुखाय के महीन फतर ले फुटी हुई धनिया १ ताला, छोटी खायची १ तोला, चिकनी सुपारी २ तोला, लौंग ६ मासा, फायपास ६ मामा, फेवड़े से यासित खैर १ तोला, .सप को महीन कतर सगाल पत्र में मिला हिल्बी में रख दे मीर जरासा पास में छोड़ लिया पारे । फैसाहू उगदा तमाफू पों न पनी है। भोजन के उपरांत पान के पाथ भी न खाना चाहिये । संध्या समय का कर्म । शरीर आरोग्य रखने के निमित्त गनुष्य को उचित है कि द्रव्योपा- जनादि कामे से मित्त हो कर चार पांच बजे संध्या को शौष के सम. न्तर (अक्ता लेाग हैं जो दिन रात में सिर्फ एक दफे शौच जारी हैं परन्तु दोनों समय शौच जाना पत भच्छा है) पाथ पैर मोर मुख धो कर श्रम निवारणार्थ गौर यसौर जलसषा के थोड़ा सा बल बटुक मेदिक या पाच माधसेर अधावट दूध में एक तोला शहत और ताला भर मिश्री हाल पार पी जागा चाहिये बाद एक पान का घोड़ा खा के ऋतु के गनुसार पस्त्र धारण कर पूर्वोक्त कपमानुसार किसी यगीचे में या जहां मग प्रमस हो हया खाने के हेतु जाये या किसी दिव्य स्थान में धैठ कर एपं वृद्धि करने वाली पुस्तकों के। देसे पा सपने इष्ट मित्रोंसे पातालाप परै इत्यादि कर्म से श्रम, आलस्य गौर मा की उदासीगता नष्ट थे। कर चित्त प्रसा, धातु एवं भायु की वृद्धि होती है । पोशाक। यस्त्र धारण करने से जो कुछ ऊपरी सजावट है यह तो घई है विधेप इससे शरीर की रक्षा है। भागे समय में इस देश निवासियों के सिर्फ पोशाक यह ये जैसे पौत (धोती) मरक्षा (अंगरखा) उप्णीय (प. गी) भौर दोपट (दुपटा) जय से मुसलमानों का राज हुमा तय से सं.

द्वितीयखण्ड। सर्ग, बस भार्या गण भी कुरता, फतुही, नीमस्तीन, पापगामा, साफा, एका, इत्यादि पहने लगे। नंगरेजी राज हेने से औरही चाल यदल गई जिसे देखिये जाकट कोट पतलून ही में मस्त हैं . इसी प्रकार दूसरे के राज देने पर साक्षी वस्त्र धारण करने लगेंगें नपा नुकसान पर घि. लकुल ध्यान ही नहीं ईश्वर ने मनुष्य जे युति दी है कि निस्मे समस्त पदार्थों के छेतु यथार्थ प्रकृति जान कर अपने ग्राम के स्वार्थ लावै । हे प्यारे मार्य भाइयो भेटी मत बना अपने हित अहित घस्तुमों पर ध्यान दो जो यस्तु श्रेषका चा? स्वदेशीय हे पा घिदेशीप हे पक्षण करना और हानि कारक वस्तुओं को सर्वदा तिरष्कार करना बुद्धिमानों का माधीन अन्यों के देखने से जाना जाता है कि पूर्व समय में इस देश पाले काले कपड़े नहीं पहनते थे पोंकि सब स्थलों में श्वेताम्बर, पीताम्बर, रतांबर और विद्याम्बर, शब्द पाये जाते हैं । यास्तव में पी. शा- देश काल के अनुसार होना चाहिये अति उष्ण देश या गरम भातु में श्वेत या संदली रंग का शीतल और महीन वस्त्र धारण करने से मे- घा, पृति, शीतलता की प्राप्ति और गरमी की निवृत्ति होती है और सांग में श्वेताम्बर धारण से यश, जाग्यता, शोभा, शानन्द रुचि, काम और मोति होती हैं विशेष फर वर्षाकाल में तो गवश्य श्वेताम्बर धारण करना चाहिये । क्योंकि लिखा भी है। शीतकालेतुकौशेयं कषायधर्मवासरे। वर्षासुश्वेतवस्तस्या देववस्त्राणिधारयेत् ॥ शुलन्तुशुभरंवस्त्रं गोतातपनिवारणं । नचाणांनचवाशीतं तत्तुवर्षासुधारयेत् ॥ शीत काल में या ठगढ मुल्कों में रेशमी कपड़ा पहिनना, गरमी में गेरुवा बस्त्र और वर्षा काल में सफेद वस्त्र धारण करना चाहिये । सफेद पारोग्यदर्पग। १५ यस्त्र का गुण गायुधंद के जानने याले ने इस प्रक्षार कहा है कि सफेद बस्त्र शीत और गरमी दोनों को निवारण काता है, न यह गरम है और न शीतल है इसलिये मीत गरम ममान गुण विशिष्ट वर्षा काल में सफेद ही वस्त्र पहिनना लाभदायक है ॥ अति. शीत देश या ऋतु में पायु और कम समन करने वाली छा- लटी, टमरी, रेशमी और पशमीना श्वेत या सुर्ख रंग के कपड़े पहनना उत्तम ॥ पोंकि । कौशयं चित्रबस्वंञ्च रक्तवस्त्रंतधैवच । वासी महरंतत्त शीरावाले विधारयेत् ॥ रेशमी कपड़ा, रंग बिरंग के रंगे हुये कपड़े और डाल घस्त्र फफ बात को नाश करता है और शीतकाल या देश में प्रायः शीतवायु का जोर रहता है इसलिये शीतकाल में जहांतक हे रेशमीही यस्ता पहनने चाहिये घाई २ टीकाकार चित्र बस्त्र के स्थान में ऊनी वस्त्र, बनात, लोई, धुस्सा साल, कम्पछ आदि हा ग्रहण किया है। आयुर्वेद विद्वानों ने फयाय बस्त्र की बहुत कुछ तारीफ की है इस को पवित्र, शीतल पित्त का नाश करनेवाला लिसा है। धर्म के ग्रंथों में सन्यासियों के लिये जो कषाय (गेरुया) बस्त्र धारण करने को लिखा है सिर्फ मारोग्यतार्थ, क्योंकि फवहा पहिनने न पहिगने से मुक्ति लाभ नहीं है, और न किसी को नही में जानो पठता है ऋषियों ने उसके फायदे पर लक्ष्य करके धर्मशास्त्रों में इसलिये लिख दिया है कि एठात लोग उसे यहगाही करें। रुपाय यस्त्र एक तो जल्द मैला नहीं होता, दूसरे उसमें पसीने का बिफार नहीं होता, तीसरे नहा जल मिले पछार हाले बहुत जल्द साफ हो जाता है, साघुन वगैरह नहीं खोजना पड़ता, चौथे चतुर्थाश्रम का चिन्ह है ॥

द्वितीय वराड। चाहे गर्म ऋतु हे या सर्द मा कल जिसे देखिये सधी फाले . पड़े पहनते हैं एक यह भी देश में अधिस रोग फैलने सपा निता रो- गी बने रहने का एक मूग कारण जाग पड़ता है। पपछि काले कपड़े पहिगो मे रस, रत और योर्यो अपिल गर्गी पहुंचती है, कारण यह है कि शौर २ पदार्थों की अपेक्षा काली यस्तु से उष्णता मधिक निकलती है इसका प्रत्यक्ष प्रमाण यह है लिए पी. कोम टोन का पात्र बनामो उसके एक जोर काला नमो, दूसरी ओर सफेद काग़ज़ चिपका दो तीसरी तर्फ शीशा और पौधी भोर केयर टीन रहने दो फिर उस पात्र में गरम जल भर मुख ढांप दे और परमामेटर जिसे गरमी शरदो नापी जाती है उसके निकट घरो जय टीगकी और उसे लागोगे तष छिगिरी कम हो जायगी, शीशे के सगमुख करोसे पारा ऊपर को चढ़ेगा, काग़ज़ के मामने करने से अधिक ऊंगा होगा और काले रजको सर्फ ले जाने से मय से अधिक पारा ऊंचा हो जायगा स्से स्पष्ट है काठे तर्फ से उष्ण जय को गरमी अधिक मिलती है। पस लिये जा के दिनों के छोड़ और ऋतों में तो काला कपडा पहिरना आवश्यही नुकसान करता है क्योंकि काले कपड़े में सूर्य का तेज गधिका प्रवेश करता है इससे शरीर की उष्णता बाहर ज्यादा निकलती है यही कारण है कि उप्ण देश के मनुष्य काले शीर हिम देश के गौर होते है। यदि कहा कि यूरोपियन लोग तो प्रायः कालेही कपड़े मय दिग पहि- नते हैं उन्हें नुकसाग क्यों नहीं करता ? कारण यह है कि ये लोग अ. ति शीस देश के रहने वाले हैं। बहे गपास पो बात है कि अंगरेज लोग हिन्दुस्तानियों के चाल पठग की एक भी अनुकरण ग फिपा जीर हिन्दुस्तानियों ने यहां तक नक्षल किया कि पिफुल मका यन गये मर्थात् मिमा दुम के लंगूर हे गये धिक्कार है ऐसे मनुष्यों को जो नि. प्कलंकित अपने देश के प्राचीन गीतों को त्याग देते हैं । ..

आरोग्यदर्पक्ष। छाता का गुण । वर्षानिलरजोधर्म हिमादीनांनिवारणम् । वर्ण्यञ्चक्षुष्यमी जस्यं शङ्करंछत्रधारगम् ॥ खाता धारण करने से मङ्गल नेत्र को हित, उत्साह, बाल और सुख प्राप्त बर्षा, धूप, हया, धून भौर शीत से रक्षा होती है। धिगा काता के नीम काम के धूप में चलने से ज्वर हैजा आदि अनेक रोग होते हैं। इसी प्रकार जाड़े के दिनों में रात्रि में भी छाता लगाना मोस का बचाय देता है क्योंकि जाड़े के दिनों में रात में जय अधिक सरदी परती हो हिना छाता के घूमने से जुकाम खांसी और उधर जिसे शार- दीय उधर कहते हैं होता है । यही कारण है जो विलायत मादि सरद मुलकों में रात्रि में भी सर्वसाधारण लोग छाता लगाके बाहर निकलते हैं । अाजकल मा धर्त में जिस के हाथ में देखिये विलायती छाता मौजूद है, मौजूद क्यों न रहे. भिलायती छाते में जो रूप रंग गोफियानापन है कभी हिन्दुस्तानी खाते में मा सक्ता है इसीसे विक्री भी अधिक है, हम ने एक सम्बाद पत्र में पढ़ा है कि प्रति वर्ष विलायत से हिन्दुस्तान में ३ करोड़ रुपये का छाता जाता है । भारतवर्ष में एक से एक धनधान राणा पड़े हैं किसी सपूत से यह नहीं बन पड़ता कि छाता बनाने का कल हिन्दु- स्तान में खोल देंय कि जो करोड़ों रुपिये इस के जरियेसे पिलायन जा- सा है यही रहै । खैर इसको हम कहां तक रोयेंगे हमारा काम मारा. ग्यता के विषय में शिक्षा देगा सेा देते हैं। गरम दिगों में हरे रंग का छाता लगागा रुधिर और नेत्रों के लिये हित है और काले रंगका छाता जाहों के दिनों में रात्रि को लगामा लाभदायक है ॥ पायतावा या मोज़ह । पूर्व काल में यहां पायताबे का व्यवहार कहीं न था भाम सभी लोग - ।

द्वितीयखण्ड । इसे पहनते हैं। रात में पायताबा पहन कर किसी ऋतु में न माना पाहिथे, जूता और मोज़ा दोगों पहने हुये राह से घटकर जय कहीं स्थिर वैठना हे। ते। उस समय सर केो गुला रखना चाहिये । जिम के पैर के तलुये में जान हो या ज्वर है। उसे मोजाइ पानमा निषेध है परन्तु सर- सांम या उन्माद की बिमारी में जब मर पर भीगा कपड़ा रक्खा जाता है उस अवस्था में मोजह इस लिये पहिना देना दधित है कि सायत फग. जारी से अंग दर्द या शीस न भाजय ॥ पगड़ी। उपग्रीषंकान्ति कृत्केश्य रजोत्रात कफापहम् । लघुतच्छ स्यते यस्मा द्गुरु पित्ताधि रोगकृत् । पगड़ी पहनने से शोभा, बालों की रक्षा गौर फफा हा नाश हेता है परन्तु घोड़ी देर तक पगड़ी सर पर रखनी चाहिये सुसरा देर तक धारण फरने से पित्त और नेत्र रोग होता है या बहुत पछती पगड़ी बांधे ॥ पानु दक्षिणी प्रामाणों को इसका ध्यान भी नही दे दो और तीन २ सेरकी पगड़ी हर समय सिर पर घरे रहते हैं । भूपण। यिधि के पाच स्वर्ण और जवाहियों का भूपण यथा योग्य पहगने से सुन्दरता सन्तोप, यल, पुष्टी, शोभा, भोज जमिमाग, प्रीति और धा की दादि, पाप अमंगल ग्रह दूष्टि दोष भोर दुःस्वप्न का नाश होता है । भार्य ग्रन्थों के देखने में साप्त होता है कि शागे के समय भारत बाभूषण प. एनने की रीति अधिक थी पाल्मीश जी कहते हैं, कि रामराज में ऐसा मनुष्य हाई न था कि जिस के कान में स्वर्ण फुगडल और स्वर्ण गफुट न हो नस माप पोर हांफू का नाम मी नपा पोंकि सब जायंगण सम्प भारोग्यदर्प । न्न थे जप से लेखों का गम हुमा गाप ही साप चोर दुए डांकूओं की भी पद्धि हुई, इस में शक नहीं लि भाभूपण धारण में प्रत्यक्ष उपरोक्त गुण पाये जाते हैं परन्तु माज के समय में उक्त गुण के परिवर्तन में यहां ता जयगुगा देखने में जाता है कि नित नित हाजारों जन लूटे गौर संख्य मालक मारे जाते है। हमारे गिधार में उपरोक्त गुण लाभार्थ पञ्चरत्न में जो डाम हे। तत् जाहित सिर्फ एक अंगूठी धारण करना युवा पुरुषों को हानिकर नहीं है। पपोंकि गहना पहिनने के कारण कितनी जान जाती है छिपा नहीं हे मिशेष कर लड़कों को तो कभी गहना पहिगाना नहीं चाहिये । पंच रत्नानि । गौलक यज्ञकंचेति पद्मरागश्च मौलिकम् । प्रबालश्चेति वि. जेयं पञ्चरतं मनीषिभिः ॥ अन्यच्च-सुवर्ण रजतं मुक्ता रानायत प्रवाल कम् ॥ गोलक, हीरा, पाराग, माती और मूंगा यही पचान हैं, दूसरा सुपर्ण, चांदी, मेती, राजायर्त और मूंगा रखामाये सिर्फ मुवर्ण लेगा। रत्न धारण के गुण । ग्रह दृष्टि हरं पुष्टि कर दुःखप्त नाशनं । पापदार्भाग्य शमनं रत्नाभरगा धारणम् ॥ अंगूठी गादि में रखों को हो पहिलने में मूर्य।दि गय ग्रहों को दूर दृष्टि का नाश, शरीर में पलाधान, युरे स्थानों पा गाग, मन की ग्लानि भीर दुभाग्यता नाग होती है ( गवग्रहों के रा यह ) मूर्य का माधिक मणि, चन्द्रगाना माती, मंगल का मूंगा, पुप ला पा, T.

२० 'द्वितीयखण्ड । इस्पति का पुखराज, शुक्र का होग, शनि का नीलग, राहु का गाद, और केतु का बैडूर्य, जो ग्रह खराब दृष्टि है। उन्हींका रवधारण करने से वे प्रसन्न होते हैं। पुष्प धारण के गुण। सुपुष्पाणिसुगन्धौनि नित्यंशीर्षप्रधारयेत् । सुगन्धि पुष्प पत्राणां धारणं कान्तिकारणम् ॥ आयुष्यं बदिदं पुण्यं मल- क्ष्मी कलि नाशनम् ॥ सुन्दर शुगन्धित गुलाय, चमेली वेला आदि के पुष्प अषया सुगन्धित पत्रों को शिर पर धारण करने से उन फूलों से माला मादि बना के गले मादि मङ्गों से पहिले से सूप योधन प्रफुल्लित होता है, ओकाई; पालस्य, उदाशीनता और शरीर के दुर्गन्धि का नाश होता है । नेत्रों में तराबदः दाह जलन का नाश और मग प्रमान होता है। नातीपुप्पं तथा वेला जाम्भजं कुटजं तथा। पाटलञ्चव- इत्पुष्प वकुलं चम्पकंतथा ॥ श्रीखण्डञ्चव गौलालं कस्तूर्या सह धारयेत् । मन्दार मस्वञ्चैव नौलोत्पल कुमुहत रक्तोत्पल यूथिकाञ्च कुपुरैः सह धारयेत्। इस श्लोक का अर्थ यह है कि चमेली, बेला, नारंजी, (कुटज) फु- रेया वा इन्द्रजय का फूल, गुलाय, कूजा, मौलसिरी, चम्पा, और गुलाला इन पुष्पों के हार आदि गानों तथा पंसियों में कस्तूरी को सफेद च- न्दन में घिस के उन पर सूब छिरफ फर पहनने से अथवा पुष्पों के पं. सियों की हवा खाने से जितने प्रकार के रोग हैं सब शमन होते हैं इसी प्रकार मन्दार मरुआ, नील कमल के फूल, कुई (नीलोपार) लाल कमल और जूही इन पुष्पों की बस्तुओं पर कपूर जल छिरक के धारण int पारोग्यदर्पण। से भी समस्त रोगों का शमन होता है । विशेष कर घुमरी, हौल दिल, उन्माद, प्रमेह, लीवत्व, मस्तिप्फ की निर्बलता और मन का विकार तो बहुत शीघ्र नाश होता है । समयानुसार पुष्पों का धारण करना । स्नान करने के पहिले चमेली की माला पहिनता, स्नान करके जूही और बेले के फूल का धारण करना और तेल लगा के केतकी के पुष्प का धारण करना उत्तम लिखा है और कमल के पुष्पों को जब इच्छा हो काम में ला सक्ता है । ऋतु योग्य पुष्प । अर्थात् गरमी के दिनों में धारण करने लायक पुष्प यह हैं। पीली चमेली, कुन्द, नेवाड़ी, चन्दन के फूल, बेल पुष्प यह सब रस और बल में समान हैं, यह सय त्रिदोष नाशफहैं इस लिये हमेशा धारण करने के योग्य हैं परन्तु गरम दिनों में ज्यादे फायदेमन्द हैं । जाड़े के दिनों में या जिस देश में हमेशा जाड़ा पड़ता है उन देशोंमें केतकी, मौलसिरी, कमल, गुल्लाला और घम्पा लाभदायक है । क्योंकि ये पुष्प शीतयात के हरने वाले और तासीर में कुछ गरम हैं इसलिये इन्हें शीत काल में धारण करने से अधिक लाभ होता है। बर्षा काल में-देल, मरुपा, नोल शामल, गुलाब, पांडर और चन्दन के पुष्प ए मातदिल हैं, विदोष नाशक, स्वच्छ नेत्रों में ठंढक देने वाले और भिर को पुष्ट कारते हैं। पुष्पों के धारण करने की अवधि । जाई का फल छ पहर तक गुणवान रहता है वाद वेकाम हो जाता है। नेवारी का फूल चार घड़ी, कमल पुष्प तीन रात, केवड़ा ५ पांच रात, .

द्वितीयगड । . गुलाब दो रात, पगेनी पाधौरात तक, पम्पा १ दिन, जूहौ ४ घड़ी, वंगतो, मौलमिरी, चन्दग और योपर्णा इतने पप्प जव तथा अच्छे गाम हो धारण करे । मन्दार, अस्था, देवगा, पांडर, दराने पुष्प नत्र तक गान्धित र धा- रण करना चाहिये। पुष्पों के विशेष गुण । त्रिदोषशमनीनाती महादाघ विनाशिनी। सुगन्ध दोप समनं गौलालपुष्पमुच्यते ॥ पित्तदिगदञ्चैव चक्षुष्यचोत्पल- स्मृतम् । श्लेष्मवात प्रशमनमुष्णा वीर्यच्च निर्मलम् ॥ पुष्पाणां प्रवरञ्चैव केराकोपुष्पमुच्यते । ईपटुपणंसुगन्धञ्च सुशोतंदृष्टि- दायकम् ॥ शिरोभ्रम विनाशाह शतपत्रं तु शोभनम् । अधायं मल्लिका पुष्पं दृष्टिकानि वारपरम् ॥ चपकंवात शमनं चक्षुष्यं विशदं शुभम् । पाटलं च महाशीतं श्लेष्णवात प्रवचनम ॥ मन्दाग्नि पित्त दोषघ्नं कर्णव्याधि विनाशनम पाटलं धारयेद्यस्तु सम्पद्या स समन्वितम् ॥ ज्वर मी पिपासान मायुष्यन्दाइ नाशनम् । जाडौ मा पुष्प विदोष नायक और महा दाह का भान्त करने वाला है, गुलाले का पुष्प अति सुगन्धित और दषिों शमन करता है । कमल का पुष्प बात कफ नामक नयनों का हित पित्त कर्ता उप्पा वीर्य कुछ गर्म और निर्मल होता है । केतको पुष्प सब पुष्प में उत्तम है कुछ उपा सुगन्धित भीतल और दृष्टि को बढ़ाने वाला है, मस्त रु भ्रम का नाम मत पत्र है। चमेली का पुष्प दृष्टि का हानिकारक है पतः इसे ग धारण करे, चम्पा का पुष्प बात नामका नेवों का हित और शुभ है। पाटा पुष्प मोतल काफ वात का बईक मन्दाग्नि पित्त को दोष और कान की पीड़ा को दूर करता है। जो भारोग्यदर्पण। २३ मनुष्य पाटल पुष्प को धारण करता है वह धनी होता है ज्वर दाह प्यास भूका है। दूर करता है और वायु बर्द्धक है पाटल गुलाब का भी नाम है। खड़ऊं। भोजन के पहले और पीछे खड़ाऊ पहनने से काम आशु और नेव को हित है पधिका पहनने से दृष्टि को हानि होती है । हिमादि गणों को उचित है कि पूर्व खण्ड कथनानुसार समस्त कमी से निबत्ति हे। को सूर्यास्त समय में पथिम या उत्तराभि मुख बैठ के सायं संध्या को उपासना करें। सायं सन्ध्या फलम् । वौधायनः। यदपस्थ कृतं पापं यच्च योनि लतं भवेत् । सायं संध्या मुपस्थाय तेन तस्मात्यमुच्यते ॥ जो मनुष्य राग हेप छोड़ मौतर या जम्मादि मे वाहर पनिट एवं ए- काग्र चित्त हे। प्रसन्नता पूर्वक सायं संध्या तथा ईश्वराराधन कर्ता है वह प. वंत के समान दुःख और महा पापों को भी काट डालता है और जो मनुष्य प्रातणायं संध्या और परमेश्वर को स्तुति प्रार्थना नहीं करता वह कृतघ्न मूर्ख और महा पापी है उस का अमूल्य जीवन का दिन व्यर्थ नाता है और भो लिखा है ॥ मरीचिः-सध्या येन नवित्ज्ञाता संध्या येनानुपासिता। नौव माना भवे च्छूद्रो मृतः श्वा चाऽभिजायते । दक्षः-मध्याहोनाऽशुचिनित्यमनई: सर्व कार्मसु। यदन्य त्कुमते कर्म न तस्य पाल भाग्भवेत् ॥ मनुः-नतिष्ठति तु यः पूर्वी नापास्ते यस्तु पश्चिमाम । स साधुभियहिप्कार्यः सर्वरमादिन कर्म ग्यः ।।

२४ द्वितीयग्वगंड़। मरीचि महाराज कहते हैं। जो संध्या फर्म नहीं जानता और न संध्या का चन्दना करता है वह जीवन . माल शूद्र हो के याद मरने के कुत्ता के योनि में जन्म लेता है । दक्ष जी कहते हैं कि जो द्विजाति संध्याफर्म को नहीं करता यह हमेशा अपवित्र और सत्र उत्तम' कामों से बहिर्भूत रहता है। संध्याफर्म के अतिरिक जैसे गङ्गा नहाना एकादश्यादि व्रत करता है उसके फल का भागी नहीं होता । मनु का वाक्य है कि जो प्रातःकाल की संध्या नहीं करता और न सायं संध्या का उपाशक है यह द्विजादि सम्पूर्ण कर्मों से युट जाता है इसलिये सायं संध्या और प्रातःकाल की संध्या अवश्य करै जो वैदिक मंत्रों से न कर सके वह सिर्फ ईश्वरका ध्यान और प्राणायाम करें। मानसन्ध्या जपाहाम: खाध्यायोदेवतार्चनम् । यस्मिन् दिननसैन्यन्ते बथासदिवान्याम् ।। मिताक्षरा का यान हे हि नाग सन्ध्या जप होम और देवता का पूजन जिस दिन नहीं कतो मनुष्य का यह दिन पा जाता है पन्ध्या कर्म का विधानाध्यामिक शके प्रकर्ण में लिखेंगे। सन्ध्या काल भोजन करने से रोग, मैथुन करने से गर्म का विगाह, सोने से धन का, विद्या पढ़ने से गायु का नाश और राह पलने से भय होता है। शशि, शोभना राबी काम और भागन्द देनेपाली सन्धिपाली से भय भूल गौर दिशा भ्रम होता है। गिर्मठ और शीतल घायु शरीर में लगने से (विशेप कर गर्मी के दिनों में सन्ध्या सगप) पित्त और दाह रोग का नाश होता है। रात्रि में भोजन । रत्रीचभोजनं कुर्यात् प्रथमहरान्तरे। किञ्चिदूनं रामग्री- यादुर्जरंतववर्जयेत् प्रारोग्यदर्पण। २५ हुआ है। मनुष्य को उचित है कि रात्री में एक प्रहर के भीतर अर्थात् या १० बजे भरमें भोजन कर ये क्यों फि अधिक रात जाने पर भोजन करने से अजी या होने का डर है और रात्रि में कुछ कग भोजन करगा याने जितनी भूख हे। तमको चौथाई भाहार छोड़ देवै और जितनी चीजें देर में हसग होने वाली हैं उन्हें रात्रि में कभी न खाये। कारण यह है कि रात का भोजन न पचने से शीघ्र अजीर्ण हो हैगा आदि रोग उठ खड़े होते हैं । यह बात याद रहै कि अगर राशि के भोजन से मजी । दिन में दो बार भोजन न करै क्योंकि रात्रि के पानी में दूसरे दिन भोजन करने से मन्दामि रोग हेाताहै, यदि अत्यन्त मूख लगे तो बहुत हलकी और शीघ्र पाकी द्रव्य भोजन करें। संघ पाना आज कल हिन्दुस्तान में भी शराय पीने को लेागों को अधिक भादत पड़ गई है। कितने लेागों को इसके पीछे जाग जाती है छिपा नहीं है क्योंकि शराय और विष में कोई भेद नहीं है । ( येमिषस्यगुणाः प्रोक्तास्तेच गद्य प्रतिष्टिताः ) जितने गुण मिप में शास्त्रकारोंने कहा है धे सप मद्य में भी विराजते हैं । यद्यपि आयुर्वेद तत्व दर्शियों ने मद्यपान में अनेक गुणमौदिखलाया है और उसे स्वभाव में गदा के समान कहा है तथापि अयुक्त प्रमाण से पिया भया गद्य मनुष्य को शीघ्र हनन करता है । जैसे अन्न प्राणियों का प्राण है परन्तु धेप्रमाण खाया हुभा पन्न मनुष्य को शीघ्र मार डालता है। लिखा भी है। प्राणा: प्राणभृतामन्नं सदयुक्त हिनस्त्वसून्। विषं प्राणहर तञ्च युति युक्तं रसायनम् ॥ मन यह जीव मात्र का प्राण है लेकिन घेगन्दा भोजन किया जा मारा नाश होता है । विष यद्यपि माण नाशक है परन्तु युक्ति से सेवन किपा भया पिप भी अमृत के तुल्य रसाया होता है।

२६ द्वितीयखण्ड। तथापि जहां तक हो सके विप का त्याग करना ही शिष्ट जनों का काम है पोंकि सांप का पकहने वाला यद्यपि अपनी मंत्र की ताकत मे सांप को पता है लेकिन यह भी सिद्धान्त है कि गांप पकड़ने वाले मृत्यु सांप ही के द्वारा होती है। इसी प्रकार शराब पीनेवाले याद वे विधि से पिये वा अनिधि से अन्ततोगत्वा उनकी मृत्यु मद्य ही के द्वारा हाती है। यह कथन केवल इमारा कल्पना मात्र नहीं है टल्कि इसी विषय में विलायत के आयुर्वेद वेत्ताशों तथा विज्ञान शास्त्र के वे. ताणों ने अनेकानेक व्यवस्था दी है जिसे पाठकगणों के जयकतार्थ नीचे प्रकाश करते हैं। प्रोफेसर गिल्टन ने लिखा है "पद्य (शराय) एक प्रकार का विष है । रव शास्त्र और धनस्पति शास्त्र में यही स्थान अर्थात् यही उपनाम श्रेध है। पीनेपालेकी मात्रा अनुफूल याद शीघ्र अपना प्रभाव दिखलाता है अथवा पिणम्य में अर्थात् अकस्मात् शीघ्र प्राणघात करता है वा धौरे धीरे" ।। लाकर मुनरो का कथन हे “मद्य के विषय में प्रत्येक सिखने वालों ने लिखा है कि यह निद्रा कर विप है अर्थात धोसे से प्राण घात करने वाला है" छाकर डीज का बयान है "मैटीरियामेष्ठिका (वैद्यक ग्रन्य) सम्पूर्ण ग्रन्यकार अब सहमत है कि मद्य उद्भिश बिषों में सब से प्रधान और गृत्यु कारक पिप है"।। हार गार्डन ने लिखा है "तीक्षण मद्य से अधिक बलवान विष प्राप्त झाला पाटिन "। प्रोफेसर सेवाल का कथन है "मद्य मनुष्यों के स्वभाव और उसके रिमाणों पर नपा पाचन शक्ति पर चिपका प्रभाव उत्पन्न करता है और पदा दाइ नत्याग कर देता है। जिसका फल यह होता कि अनेक आरोग्यदर्पण। २७ प्रकार के प्रण और कच्छ्रे रोग हो जाते हैं और उदर के चारों जोर की त्वचा कट्टी हो जाती है और अन्त में मांस ग्रन्थि, मांसावुद और दूसरे इन्द्रिय सम्बन्धी विकार उत्पन्न हो जाते हैं" ॥ डाकर योमैनस कहता है कि मद्य जितने काठ तक उदार्गे ठहरता है यह पाचन शक्ति का सब से प्रबल शत्रु है" ॥ डाक्टर ग्रेगोरी का बचन है "मद्य उदर के लिये सप से हानिका. बका बस्तु है" इसके पीने से कुछ दिन के पश्चात् कलेजे में रक्त संचय हो जाता है फिर अन्यान्य पदार्थों की सृद्धिमे, पारलेजेके कहीं मोटे कहीं क्षीण होने के कारण, मद्यप मनुष्य अपना साधारण नित्यका कार्य करने में सर्वथा जरा- मर्थ हो जाता है जिससे न तो पित्तमाघ होता हैं और न रा शुद्धि होती है। धीरे २ दूसरे विकार उत्पन्न होकर एक प्रकार का रोग जि. सको अंगरेजी में "जिन्न्कर्स लीयर" या "आपनेल्ड लीयर" कहते हैं हो जाता है। बहुधा रक्त के रुकने से अत्यन्त दुखदाई पोहा सहित जादर रोग हो जाता है जो प्रायः साध्य रोग है । पुनः शरीर में अनेक प्रकार की नित्य नई पीडाणों को भोग कर मद्यप रोगी निराश हो मृत्यु का भाप लेता है ।। मोफोसर सस का वर्णन है " कि मैं ने गाठ मनुष्यों के कलेजे की परीक्षा ली थी जो कि गद्य के अधिक अभ्यासी होने के कारण मृत्यु एस्तगत हुये थे। उन सब के कलेजे के दशा में तनिक भी अन्तर न पा"। हार लिटल जान, जो कि एडिनपरा में सर्व गाघारमा की स्व. स्थता का द्रष्टा ( निगदयान ) गौर पुलिस सजग पा, लिखता है "मैं ने जहां तक परीक्षा की गद्यपों के फलों को रोग-ग्रसित पाया। मद्य न्यूनाधिक मात्राउनुकूल रोग की दशा भी वैसीपीयो" ॥ मिष्टर प्रान्सन कहते हैं चाहे जितना न्यून गद्य पीने का अभ्यास (गादत) प्यों न हो परन्तु पहुधा यह हैजा पैदा करता है और गद्यप को यह हैजा पैदा हो जाय तो असाध्य बनाता है। हाकर स्वाग का कपन "न्यूयार्क के सस्पताल में २०४ हेजे के रो. गियों में केवल ६ मनुष्य ऐसे घेतो मदिरा नहीं पीते थे।

द्वितीय वराड । २८ डाकार एलिस ने पार्लियामेंट सम्बन्धिनो एमासभा में कहा था "मादक मुख्य कर के मद्यपान अधिक विक्षिप्तता या हेतु हे क्ष्योंकि मिडल मेकम,, के पागल खाने में २८ विक्षिप्त (पागल) एक वर्ष में उन में १८ मदिरा पौने वाले थे। एउनबरा के रायल रासाइल्म के डाकर "के" का कथन है "मापान विक्षिप्तता ( पागलपन) का मुख्य कारगा है। १८० विक्षिप्त जिन के रोग का कारण ज्ञात हो गया था उन में पचास मदाप थे" केवल यही रोग नहीं प्रायः मापों को अनेक रोग हुप्रा करते हैं जो मदिरा के कारंण असाध्य हो जाते हैं। मद्य का प्रभाव केवल मय पीने होवाले पर नहीं समाप्त होता किन्तु एक दूसरे के पश्चात् अर्थात् उम को सन्तति भी वैसौमी होती जाती है। डाकर हाव, एक प्रसिद्ध अमेरिका निवासो, लिखता है कि दो मो विक्षिप्त मनुष्यों में से जिन का रोग निदान विदित हो गया था ४५ ऐसे थे जिन के माता पिता मदाप थे। डाकर कारपेन्टर कहता है "मुझे पूर्ण विश्वाम है कि मि जो मद्य के अभ्य स से उन्मत्त हो जाते हैं उन की सन्तति को भौ वंही कष्ट भोगना पड़ता है"। न्यूयार्क प्लुटाके का कथन है"मद्यप को सन्तान अवश्य मद्यप होती है". अब बुद्धिमानों को विचार करना चाहिये कि विलायत आदि जो एक प्रकार का अति हिम प्रधान देश है कि जहां मद्यपान अधिक हानिफर न होना चाहिये, जंव यहां के लोगों को नुकसान करता है तो यह आर्यावर्त जहां एक प्रकार की सर्वदा. आभ्यान्तरिक लो गों के अन्तस में गर्मी बनी रहती है यहां मद्यपान क्यों न हानि कर होगा ? अवश्य होगा यही कारण है जो भारत में प्रति दिन कोढ़ियों की वृद्धि होती जाती है । विधियुक्त मद्यपान का फल । विधिना मात्रया काले दितै ग्नै यथावलं । प्रहृष्ठो यः पि. वैनमद्य तम्य स्थादमृतामम् ॥ सिग्धैःसदन्नैर्मा सैच भक्ष्य च आरोग्यदर्पण। २६ सह सेवितं । भवेदायुः प्रकर्षाय वलायो पचयायच ॥ काम्य- ता मनसस्तुष्टि स्तेजा विक्रम एवच । विधिवत्सेव्यमानेतु मोसन्निहिता गुणाः ।। जो मनुष्य यिधि पूर्वक मात्रा सहित भोजन के साथ अपनी ताकत के अनुसार प्रसन्न चित से मद्य पीता है वह मद्य अमृत के समान गुण करता है। उत्तम बनाया धिकने मन ( ताजा घृत पहा दाल भात आदि) और मांभ ( सूरवा कबाघ आदि) और मनोहर खानों के साथ पिया भया सराव आयुः उमर ) बल और शरीर का बढ़ाने वाला होता है। बल बर्द्धक द्रव्यों से सिंघा हुमा उमदा सराय, आन्दाला में विधि पूर्मक पिये तो उसके पीने से रूप को सुन्दरता, मन का सन्तोष, शरीर का तेज और पराक्रम बढ़ता है, यदि मद्यपान न करें तो अति उत्तम है ॥ अविधि मद्य पान। निर्भत एकान्ततएव मद्यं निषेव्यमाणं मनुजेन नित्यं । उत्पादयेत्कष्ठतमाधिकारा नापादयेच्चापि शरीर भेदम् । कद्देन भौतेन पिपासितेन शाकाभितप्तेन भुक्षितेन । व्यायामभाराध्य परिक्षतेन वेगावरोधाभिहतेनचापि अत्य- म्न रक्षावतारेग सानौणभुक्तोन तथाऽवलेन । उणाभि तप्तेनष सेव्यमानं करोति मद्यं विविधान्विकारान् . जो मनुष्य विना भोजन अर्थात् खाली पेट में सराब पिया करता है। याने गिलास पर गिलास ढकोसे जाता है और उसके ऊपर कुछ खाना नहीं खाता एस के शरीर में प्रति कठ असाध्य रोग होते हैं और उसे वह मनुष्य मर जाता है। जो मनुष्य कोध के जपर, भय युक्त, पियास शोधग्रस्त में, भूखे पेट और मेहनत किये भये पर, वोझ उठाने के उपरान्त, कहीं से थक के माया हो, - ३. द्वितीयखण्ड। N दस्त मूत्र खुलासा नहुधा हो, या पेट में पित्त जमा हो या रुन पन्न खाये है। जैसे वजरा आदि, अजीर्ण से पेट भरा हो, अति धूप का तपा या गर्मी मे व्याकुल हो उस के जपर सराव पौने से वह शरीर में अनेक प्रकार का रोग उत्पन्न करता है। इसलिये जिसे मदा पीने को लत पड़ गई है विना पिये चैन नही या जो कमी २ मनप्रसन्नार्य सराव पौने को बादत रखते हैं। वे रावी में भोजन के साथ ही एक छंटाक या इस से कुछ कम पौ मते हैं परन्तु अति गरम ऋतु में वह भी निषेध है। भौर सव नियम भोजन करने के हो जो दिन के भोजन प्रकर्ण में लिखे हैं। भोजन करने वो दो अथवा एक घड़ी के वाद उत्तम पलंग पर सोना आरोग्य कर है। निद्रा विधिः। - . नित्यागन्त जंगदीश्वर ने मनुष्यों को क्या जीव माघ का दिन कृत परि- यम भाग्यर्थ रात में सोने से का नियम बना दिया है। सुख पूर्वमा रावि में सोने से परियम से उत्पन्न धान्नस्यादि जितने उपद्रव हैं वे सव मान्त हैति ई। रात में जागने से, या किसी बिघ्न से, अथवा विसो रेरोग के कारण से रात में नौं र ग पड़ने से पालस्य, झांप, सिरदर्द, भोकाई चौर अनौण प्रादि भनेक रोग खड़े हो जाते हैं। इसलिये मनुष्य को उचित है कि हजारों जरूरी कामों को छोड़ गत में अवश्य से।वे परन्तु छ. अथवा सात घंटे में अधिक न सोना चाहिये। झय्याविचारः, शिल्पशास्त्रे। चतुराशीतिपर्वागि दैर्येणपरिकल्पयेत् । षष्ठमुलानि विस्तार मञ्चकंहस्तमंस्मितम ॥ एवंशय्याविधातव्यं सर्वेषां शयनाचिता। मानाधिक्येदरिद्रः स्यान्मानहीनेसुखक्षयः । भावार्थ:--साढ़े तीन हाथ की लम्बी दाई हाथ पौड़ी और हाप अंधी ऐसी शय्यां होनी चाहिये इससे बड़ी दरिद्र और छोटी मुस एक पारोग्यदर्पगा। क्षय करनेवाली है। विष्णु पुराण में लिखा है कि न बहुत बड़ीही और न छोटी एव न मैली कुचैली हो और सटमल जिसमें न हो यह शय्या सुख की देनेवाली होती है। उत्तम पलंग पर सोनेसे त्रिदीप नाश होता है । तोशक पर सोने से वायु और कफ नाश हो रक्त रद्ध होता है । प- रंतु गरम ऋतु में सूती गलीचे पर सोने से बहुत फायदा होता है। ज- मीन तथा काठ की चौकी पर सोने से बात पित्त का कोप होता है। सुश्रुत --उपरोक्त लक्षण युक्त पलँग बल, पुष्टि प्रीति नींद और बुद्धि को बढ़ाने वाला त्वचा को मुलायम मांस और रक्त को मुनासिब अन्दाज से अंग में पहुंचाने एवं श्रम वायु और कफ रोग का हाने वाला है । मार्कण्डेय का वचन है कि भीगी, गम, उत्तर शिर और जिसमें म. सहरी न हो ऐसे पलङ्ग पर ग साये। गार्य ऋषि कहते हैं शून्यालय, स्मशान, धौरहा, शिवालय, मातृ वेश्मनि (मातृ वर्ग की निज कोठरी में) गोशाला, धान्याशय आदि स्थानों में, पलाश, आंच, जामुन इनके नीचे, अपरीक्षित स्थान ओर बिजुली से दग्ध स्थान में आरोग्य के चाहनेवाले जन कदापि न सोवै ॥ शयन में दिशा का विचार । मार्कण्डे यः-प्राशिरः शयनेविद्याधन मायुश्च दक्षिणे। पश्चिमे प्रवला चिन्ता हानि त्यु रथेोत्तरे। गायः-खगहे प्रायशिरः शेते प्रवाशर्ये दक्षिणाशिराः । प्रत्यवाशिम: प्रवासतु न कदाचिदुदक् भिरा।। विपापुराणे--प्राच्यां दिशिशिराशस्तं याम्याग्रमथवानृप । सदैवस्वपतः पुंसा विपरीतं तुरीगदम् । मार्कण्डेय का वचन है कि पूर्व घिर में सोने से विद्या, दक्षिण में। पायुः पो हाघि पयिम में गिन्ता और उत्तर में मृत्यु प्राप्त होती है। गाग्र्य कहते हैं अपने घर में पूर्व घिर, खसराल में दक्षिण घिर और यात्रा में पथिम पिर कर के सेगा परन्तु उत्तर गिर जामीन मावि विपु. में लिखा है पूर्व भिर मेगा शुभ है॥ - ३२. द्वितीयवगड " विपरीति साने में रोग होता है। और भी इसी प्रकार बहुत मे ऋ. षियों को बचन पाये जाते हैं तथा परीक्षा से भी जाना गया है कि उत्तर गिर सोने से अवश्य दुरखप प्रादि हति २ कोई न कोई रोग भी है। जाता है इसे उत्तर गिर कभी न सेना चाभिये । करवट सोने से वल, हमेशा चित सोने से नजला चौरसाती पर हाथ रख कर सोने से दुरखान होता है। भय्या पिर कौ पोर ऊंचो और पैर की तफ नौती होगी चाहिये एवं चारा पाये के तले जलयुक्त चार कूडी रहनी चाहिये ताकि चौंटी प्रादि कोई कृमि भय्या पर चढ़ न जाय। माने का कमरा रमणीय, सुगन्धित शोभा युक्त सुखद (तसबीर वगैरह) बस्तु से युक्त एवं जाड़े में गुलाबी, वर्षा काल में प्रवेत और गरमी में हरे रङ्ग से पोता होना चाहिये। सात समय निम्नलिखित पदार्थ खाट के समीप अवश्य रख लेवे। उपानही वेणुदण्ड मम्बु पात्र तथैव च । ताम्ब लादीनि रम्यानि समीपे स्थापयेद्ग्रहो । जून का जोड़ा या खड़ाऊं, बांस का सेटा या कोई हथियार हो, जल भरा पात्र और पान लायचौ अंतर भादि मन प्रसन्न कारक रमणोय वस्तुओं को मनुष्य मात्र सेते समय अपने पास अवश्य घर लेवें। दीप कालः मरीचिः। रवेरस्तं समारभ्य यावत्सूर्योदयो भवेत् । यस्यतिठे द्गुहे. दीप स्तस्यनास्ति दरिद्रता ।। सूर्यास्त से लेकर जय तक मूर्योदय न हो जिसके घरमें दीपक जलता है यह दरिद्र नहीं होता है एक तो यही प्रत्यक्ष है कि चोर का भय कम रहता है । दीपक का मुख पूर्व होने से आयु, उत्तर मुख होनेसे धन फो टदि पश्चिममुख होनेसे दुःख और दक्षिण मुख होनेसे हानि होताहै ।

श्राराग्य दपण। ३ दौप का मुख॥ प्रत्यङ्मुखोदुःखदोऽसौ हानिदोदक्षिणामुखः ॥ मरौषि का बचन है कि पश्चिम और दक्षिण मुख दीपक हानिकारक होता है कार्तवीर्य तन्त्र में लिखा है कि अनुष्ठान में प्रत्ययुख दीप स्थापन करना चाहिये इससे स्पष्ट हुआ कि गृह में सवंदा उत्तर और पूर्व मुख दीपक रखना उत्तम है। "उत्तम दीप लक्षणम्" सदभने । नेत्रहादकरः सात्रि ढूंरतापविवर्जितः। सुशिखः शब्दरहितो निर्धू मोनातिहखका ॥ नेत्रों को हर्षकारक, दूर तक निसको तेली न जाती हो अर्थात् ठण्णी रोमनो हो सन्दर गुल, धूम तथा भब्द रहित हो और टेम न प्रति इख और न दीर्घ ऐसा दौप मनुष्य को आरोग्य पद होता है। दीपक की बत्ती सूत या जन भादि बखों की न होनी चाहिये सर्वदा कपास की बत्ती भोर स्नेह में से घृत या तिल तथा सरसों का तेल दीपक जलाना वैद्यक का मत है परन्तु भान कल जहां देखिये ठाकुरहार से लेकर पाखाने को कोठरी तक करे- सन ऐल (मिट्टी का तेल) और विलायती चिमनी जलती है। इसमें संदेह नहीं कि एक लैम्प जला देने से कमरा भर चमक उठता है परन्तु चिमनी की तीन चमक नेत्र की ज्योति को मन्द करती है। पिछले समय में सौ वर्ष के हमको भी चश्मे को हाजत नहीं होती थी अब सोलह वर्ष के छोकड़ों को बिना परसा राह नहीं सूझता यह सव कारण माचीन व्यवहारों के त्याग का है। पारोग्येक्षुफ जन को उचित है कि आवश्यकीय कार्य के अतिरिक्त सव्वदा हरी चिमनी जलाया करें। लेस प्रकृति वाले के भयन गद्य में रात भर दीप का जखना लाभदायक है और वातपित्त प्रकृति वाले को हानिकारक है। "एरुपय दीपनिबारणेदोषः" यह बात प्रायः सभी जानते समते होंगे कि पुरुप को दीपफ धुताने में होप होता है इसीसे स्तियां पुरुष को दीप बुताने भी नहीं देती है।

दीप निव्वपिणात्पुंसः कूष्माण्डच्छेदनात् स्त्रियः। अधिरेणैव कालेन वंशनाशो भवेत् ध्रुवम् ।। पुरुप को दीपक बुझाने से और स्वियं को पेठा के चीरने से वंश क्षय होता है अर्थात् वौर्य तथा रन कुछ काल में मात्पादक कौन होजाता है। यदि कोई माधुनिक मतावलम्बी पाठक कहें कि यह किमी तन्त्र या पुराण को गप्प है? तो उसका उत्तर यही है कि कुछ दिन वैद्यक यास्त को पदी खयं यज्ञा जाती रहेगी। लालटेन का गुण.॥ मनुष्य को उपित है कि यदि अंधियाली रात में कहीं जाना हो तोलाल. टेन अवश्य ले लेय क्योंकि मार्ग में समादि जन्तुओं और शत्रु का भय नहीं होताहे॥ पहा॥ दयामय पिता जगदीश्वर ने मनुष्यों के रक्षार्थ निर्वाशु की अवस्था में व्यजन (पक्षा) बनादिया है पाझे को हवा दाह, मूछो, पमोनापौर थकावट दूर करती है । ताड़ के पडो की हवा त्रिदोष शमन करने वाली है। बांस के पशे की हवा गरन और रक्तरोग पैदा करती है । चवर, कपड़ा, मोर के पक्ष और बेंत के पझे की हवा प्रकृति के सम चिकनी, तर, सुख देनेवाली, ज्वर, दाह, भूज़, पमीना, बेकली और बात, पित्तं समन करनेवाली होती. है विशेष कर मसा मच्छड़ भादि दमन करने वाले जीवों में कम नहीं होता, भोजन करते समय में भी पझे से वायु,दिये जाय कि जिसमें मक्ती आदि जीव भी भोजन पर न बैठने यावं क्योंकि मसा मच्छड़ आदि के काटने से रक्त रोग और भोजन,पर बैठ नाने से इजा आदि रोग होताहे कारण यह है कि उक्त जीव गाय, गोरु, कुत्ता भादि अनेक जीवों के विकार रक्त को पान करते हैं और वही. रक्तयुत डङ्ग से मनुष्य के कोमल भरीर में काटते हैं इससे रक्त रोग होता है। और भोजन के द्रव्य पर बैठने से हैजा पादि पजीर्ण रोग होता है । ज्वर आदि किसी किस्म की बीमारी क्यों न हो जिस तर प्यास लगने पर जल का निषेध नहीं है उसी प्रकार गर्मी लगने पर पई की हवा का निषेध नहीं है। जो मनुष्य बाहर को हवा से परहेज. फर निरन्तर कपड़े के पकी हवा में रहते हैं उनकी पाय ओर भारोग्यता सदा बढ़ती है।

आरोग्य दपंगा। ३५ " "दिशाभेद से बाहर के हवे को की गुण" सुश्रुते । पूर्व की हवा भारी, गरम, मोठी (क्योंकि फलों में मौठे रस पैदा करती है) चिकनी, तर करनेवाली दाह और वायु रोग के बढ़ाने वाली पित्त रक्ता त्वचा दोप, बवासीर विष, कास, सन्निपात ज्वर, दमा, पामवात रोगात्पन्न करनेवाली है परन्तु मिहनती ( कसरती आदि ) भौर धातुक्षौण वाले को हित करती है। दक्षिण की हवा मौठौ, हलकी, ठण्डी बल और दृढ़ बनानेवाली पित्त और रक्तरोग नापिनी है।' पश्चिम की हवा तेज और सुखानेवाली हलकी वायु बढ़ानेवाली बल, मेद पित्त और कफ को नाम करती है । उत्तर की वायु-चिकनी, मीठी, ठण्डी कोमल बल और दोप बढ़ानेवाली है। "कोन को हवा का गुण पूर्व और दक्षिण कोण की हवा रूखी और दाह पैदा करती है। दक्षिण और परिम कोने को हवा ठणी है। पश्चिम और उत्तर कोने की हवा कड़वी, तीतो और वायु बढ़ाने वाली है। उत्तर और पूर्व कोने को हवा कड़वी और वायु रोगकारी है। हवा की उत्पत्ति, स्वरूप, वजन, ताकत और हवा से क्या २ बस्तुयें तैयार होती हैं यह सब पदार्थ विद्या से ज्ञात हो- सक्ता है मिल्पकर्ण में इसे भी लिखेंगे। "अन्जन" प्रति दिन आँखों में सरमा देना हित है। परन्तु लोग इसे शृङ्गार या असभ्यता,जान कम काम में लाते हैं। हमारी यह सम्मति है कि दूसरे तीसरे दिन दृष्टि के बढ़ाने के लिये आँखों में अच्चन अवश्य लगा लिया करें। "पालं विशदं कान्त मममोज्ज्वल मण्डलम्, नेत्रमञ्चन संयोगाद्भवेच्चामल तारकम् सुश्रुते" मेघ में भजन लगाने से पलकों के मल नष्ट हो नेत्र का फैलाव सन्दरता खेत मण्डल और कया तारा मल रहित रहता है । वैदाक में यह भी लिखा है कि हेमन्त और मिभिर ऋतु में दोपहर के समय ग्रीम और शरत में प्रातःकाल, वर्षा में संध्या समय, परन्तु जबतक मा. फागमाफ हो और.अधिक गरमी न हो वसन्त ऋतु में जब इच्छा होखि में सरमा लगाना उत्तम है। परन्तु सामान्य विधि से सबह या शाम को लगाना चाहिये। निषेध-बहत सर्दी, गर्मी, इवा, मेघ घिरेहये, रात में जागरण, वमन, मिर से स्नान, और भोजन करके और नवज्र रोग में स. रमा लगाना मना॥ "सुरमा लगाने की विधि", वाम सरमा जो सिन्ध पर्वत में पाता है बाज़ार में बनियों को दूकानों में ভিন ই গা মা লক্ষ খাম বা শব্দ নীন ২ বাংলাছুনন শিক্ষা को हाथ में, महद में, बकरी के दुग्ध में, भंगरा के रस में बुझा ले, वव साफ पानी से खूब धोकर साफ करके दाम शुद्ध कपूर मिलाय खूब महीन चूर्णकर किसी कागदार मौसी में रख लेय, यदि पूर्वोक्त द्रव्यों में गौरी को भी पिघला करके तीन २ वार भाषकर सलाई बना ले तो अति उत्तम हो, न सके तो साधारण शौरी को सलाई से पूर्वोक्त लेखानुसार अखिों में अच्चन लगाने से आंख को जलन,कीचड़ पाना, खुजलाहट, पानी वहना, दर्द, हवा और धाम का विचार जाता रहता है। भांख दूखने का लेप॥ छोटी धरै, सेंधा नमक, गैस, भोर रसवत इन चारों को समभाग ले.पानी मैं महीन पीस किचिन्मात्र गुनगुना कर सीती समय या जव इच्छा छ। पलकों पर लेप कर देय भौघको माराम होगा। रतौंधी का अचन॥ रमवत, हरदो, दास परदौ, चमेली और नीम के पास सबको वरावर ले गीवर के रस में घोंट गीलो बना ले दोनों समय पानी में घोंट प्रजनं करता नियय रतौंधौ छुट जाय परन्तु भिर में घमेली के तेल को लगाकर स्नान करें और दुग्ध प्रादि तर भौर भीतल धीज खा ॥ पति क्रोध, शोक, सदन, स्त्री प्रसाट्र' करने से, अति सूक्ष्म तथा पमकोली वस्तुषों के देखने से, नो पांव चलने से घाम तथा प्रांप में रहने से, मदिरा भादि नसों के पधिया सेवन से, गरमी के रोग से, सामथ्र्य से अधिक पढ़ने लिखने से मनुष्य जल्दी हौष्टिकोन या अल्पदृष्टि होजाता है। इमेभा अखिों में अमन लगाने से, भिर में तेल देकर स्नान करने मे, निरन्तर वीर्य की रक्षा करने में दिन में तीन चार बार पैर और मुख के धेाने से मूंग लाय धान, मो. घी, दूध मुनक्का, भांवला, केला, भांगरे को -- . , आरोग्य दर्पण:। माग, बनमुर्गा, हिरण, ककुंभा, काला तीतर इनके मांस और जिन २ चीजों के खाने से दिल और दिमाग में ताकत पहचती है, उन सबों के खाने से सर्वदा रमणीक भीतल मकान में रहने और सुखपूर्वक निर्विघ्न रात में सोने मनुष्य दृष्टिहीन नहीं होता। आदर्य (आईना) लोग कहते हैं कि रात में पाईने में मुख देखने से मुख में भाई पड़ती है परन्तु यह बचन हमें किसी अन्य में नहीं मिला, दर्पण देखने का कोई काल नियत नहीं है मनुष्य की इच्छा होने पर हर समय देख सकता है। पाईने में मुख देखने से मङ्गल, मोमा, बल, पुष्टि और आयु बढ़ती है। प्रसाधनी (कडी) इसका भी अमियत काल है आवश्यक होने पर मनुष्य बालों को झाड़ सक्ता है, पाबनूस या भैंसे को सौंग को कड़ी पच्छी होतीहै । कसौ से रोष बालों को साफ करने से बालेका मैल और कौड़े नाम होकर पोमा बढ़ती है लेकिन एक बचन भी है। शरीर शुद्धिं निवर्त्य कृतशीच विधिन्नरः । केशपाशे प्रकुर्चीत प्रसाधन्यादि शोधनम् ॥ भौचानन्तर नहा धो के संध्या से निवृत्ति हो कही से बालों को साफकर क्योंकि बाल झड़ने से बाल टूटते हैं और वाल टूटने से हिनातिगण अशुद्ध होजाते (ऐसी धर्मशास्त्र को जंज्ञा है) तो बिना तान किंधे संध्याकम निषेध है इसलिये संध्या में नित्ति होके तव बालों को झाड़े। एक स्थल में लिखा है कि कडी से वालों को सारमा कायस्थादि वर्णो' के लिये है, ब्राह्मणादि के लिये नहीं क्योंकि ब्राह्मणों को सदा मुखन या बहत छोटे २ बास रखने चाहिये, खैर इसका खण्डन तो हम नहीं करते किन्तु बाल रहने पर कमी से बालों को साफ करना सब वर्षों के लिये प्रायु- वंद का मत है। अयनविधि। उपानहौवेणुदण्ड मम्बुपाचं तथैवच । ताम्बूलादौनि र- द्वितीय खण्ड। न्यानि समोपे स्थापयेही ॥ नार्दवासांच नग्नच शून्येभ्यतच खेऽशुचिः॥ सोते समय पलंग के सभोप पहिरने का जूता या सिलपर अथवा खडाज बिस्तर के नीचे पलंग पर डण्डा, लाठी यां कोई हथियार, पलंग के पास सिसी तिपाई पर स्वच्छ जल और वीड़ी भादि रमणीक वस्तुओं को अवश्थ रखलेवे। किन्तु भोगे कपड़ों पर तथा नन होकर, अकेले घर में, भरीर में तैलादि मईन करके, उच्च स्थान अर्थात् बिना भाड़ के चबूतरा, घटारी अथवा मचान प्रादि पर न सोवे "शयने आवश्यक कर्माणि" मार्कण्डेयः- रात्रिसूक्तं जपत्सत्वा देवाच सुखशायिनः । नमस्कृत्वा व्ययं विष्णु सामाधिस्थंखपेन्निशि ॥ दक्षः-निद्रा समय मासाद्य तांबूलं वदनात्यजेत् । पर्य्यात्ममदा माला त्एण्डं पुष्पाणि मस्तकात सोते समय के जबरी काम माकण्डेय जो इस प्रकार लिखते हैं कि वेदोक रात्रिसूक्त पाठ करके पव्यय विष्णु भगवान और देवताओं को साणं करक अयन करै । दक्ष जो याहते हैं कि निन्द्रा प्राप्त समय मुख्न से पागको यू'कदेय, माथे का चम्दन भौर पुष्पों का माला बगेर भी गले से दूर करदेय ॥' तात्पर्य यह है कि पलंग के पास जूता रहने से मूत्रादि त्याग करने के लिये पहिरने के काम माताहै । अस्त रहने से दुःख का नाम और पत्रु का भय नहीं रहता, जल और पान प्रादि रखने से राधि में मुख धोने आदि और बीड़ी खाने में काम माता है, भौगे कपड़ों पर सोने से पङ्गा दर्द होने लगता ३. नग्न सोने से समादिदोष तथा दुःख होता है, तैलादि लगा के सोने से रोटी पाहि पलंग पर चढ़ने का भय और कपड़ा मेला होता,बिना भाड़ उच्च स्थान में सोने से गिरने का भय रहता है। जगत्पिता जगदीश्वर को भरण करके सोने से पड़ों की रक्षा और क्षम खोगों का फर्ज अदा होता है, मुख में पान का बीड़ा रखकर सो जाने से उस के कण वासहारा गले में जाके खांसी उत्पन्न करता है और गले में पुषों के आरोग्य दर्पण। ३९ माला आदि पहिन कार सोने से पतङ्गादिशमि प्रा खिपटते हैं। प्रायः ऐसे लोग हैं जिन्हें गोती समय जल पीने की आदत है कितने लोग रात में कई बार उठ को जल पीते हैं, परन्तु नुकसान करता है जिन्हें रातको ध्यास अधिक लगे वे भीतलचीनी चाबकर सोया करें तो टपणा न लगे। मधुन विधि। पूर्वराने व्यतीते तु सगच्छद्रतिमन्दिरं। पादौ प्रचालयत्पूर्व पश्चाच्छय्यां समाविशेत् ॥ जय महर भर रात्रि व्यतीत होनाय अर्थात् १२ बजे के उपरान्त नव मनुष्य रतिमन्दिर पर्थात् स्त्री के पास जावे तहां जाकर प्रथम पैरों को धोय पोंछ कर तब भय्या पर बैठे। जिस ग्रन्थ को देखिये रात ही में मैथुन करना सिद्ध होता है तिसमें भी मध्याह्न को छोड़ दे अर्थात् ११॥ १।२ और ३ बजे रात के अभ्यन्तरमें मैथुन श्रेष्ठ है। एकागत, रमणीक, सुगन्ध भीमा और सुखद वस्तु मुक्त सजे कमरे में चिड़ियों की सुरीली गान सुनते हुये, बदन में सगन्ध फूल इतर लगा कर और उत्तम भूषण बस्त्र धारण कर और बलकारी द्रव्य हलका भोजन करके इलायची, के भर, कस्तूरी प्रादि सुगन्ध ट्रय युक्त पान चावते हुये कामबाण से व्याकुल प्रीतियुक्त पुत्रार्थी पुरुष पूर्वोक्त उत्तम भय्या पर स्वीपमन करे। ऋतुवती स्त्री को भी चाहिये कि इसम बस्त, प्राभूपण और अनादि सान मृङ्गार कर परस्सर मौति में मग्न चिकना और थोड़ा भोजन निये काम में व्याकुल मानन्द सहित पतिक सङ्ग रति करानेको प्राप्त हो। परन्तुः- अति वायाँ दीर्घरोगिण्या भन्ये वा विकारणोपटछायां, गर्भाधानं नैव कुर्बोत् । पुरुषस्याप्य व विधस्य तएव, दोषाः सन्भवन्ति । अति बुढ़ापा (५० वर्ष से उध्व) दौध रोहिणी अन्य विकार युक्त जैसे भ- कामा नदीमा प्रादि स्तियों में गर्भाधान न कर इसी प्रकार पुरुष को मी जानना । जैसे बहुत भोजन विधि, अधीर, अवल, सुधा, टपा, व्यथा । और मसादि वेगयुत, वालक, बूढ़ा, रोगी और कामयेग रहिम पुरुप से (यदि उत्तम सन्तान की इच्छा रखती हो तो कभी गर्भाधान न करावे । और भो। ।

द्वितीय खण्ड। A पंचविशे तंतोवर्षे पुमान्नारी तु पोड़ो। समत्वागतवीटयौं तौ जानीयातकुशलोभिषक् ॥ सुश्रुते. सूत्रस्थाने ०.३५॥ शरीर की उन्नति वा अवनति की विधि जैसी वैद्यक भास्त्र में है वैसी अ. न्यत्र नहीं, किस समय और कैसा भोजन करके मैथुन करने से कैसा बालक उत्पन्न होगा और तुल पराक्रम, तेजवान, विद्यावान यादि गुण युक्त पुत्र हमलोग उत्पन्न करसक्त में ये सब वेदाक-मास्त्र में विधान' इसलिये विशेष कर गर्भाधानादि संस्कारों के करने में वैद्यकशास्त्र का भायय अवश्य लेना चाहिये । देखिये सुश्रुतकार परम वैदा (कि जिनका प्रमाण सब विहान लोग मानते २) गर्भाधान का समय कमसे कम १६.वर्ष की कन्या २५ वर्ष का पुरुष अवश्य हो, जितनी सामर्थ्य पच्चीसवें वर्ष में पुरुष के शरीर में होती है उतनी सामर्थ्य १६ वर्ष में कन्या के भरीर में होजाती है इसलिये वैध लोग उस अवस्था में दोनों को समवीर्य वाले जाने । उक्त अवस्था से न्यून समय में कभी गर्माधान न करे क्योंकि ॥ उन पोनश वर्षीया मप्राप्ताः पञ्चविंशतिम् । यद्याते पुमान् गर्भ कुचिस्थः स विपद्यते ॥२॥ जातो वा न चिरञ्जीवेज्जौवेद्दा दुवैलेन्द्रियः । तसादत्यन्त वालायां गर्भाधान न कारवेत् ॥ सुश्रुते शरीरस्याने ॥ १० १०॥ १५ वर्ष से कम अवस्था को खो में यदि २५ वर्ष से कम अवस्था वाला पुरुष मर्माधान करता है तो वह गर्भ उदर में ही बिगड़ जाता, अन्ततो. गत्वा यदि उत्पन्न भी हुआ तो घिरजीवी न होगा, कदाचित् जोवे भी तो अत्यन्त परीर का दुर्बल और रोगी हो इससे अत्यन्त वाला याने १६ बर्ष की अवस्था में कम अवस्था को स्त्री में कमी गर्भाधान न करना चाहिये. बालविवाह और न्यून अवस्था में गर्भाधान हौ का यह फख है कि लाखों पुत्रहीन हैं और होते लाते हैं, बावा ज़ी के यन्त्र विभूति से धन का भी सर्वख नाभ और दुराचार को हदि भाग्य का नाम ले ले भिर पोट कर रोना दृष्टि- आरोग्य दर्पण। । गोधर होरहे हैं यह क्या झूठी बात है एक २ स्त्रियों के दम २ लड़के हों और एक भीन जिये। प्रथम तो परस्सर चीति होने के कारण गर्भधारण ही नहीं होता यदि हमानी तो गर्म ही गिर जाता है या मरे लड़के पैदा होते हैं राम २ रटते पेदा भी हुये तो माता भवानी को दोषी कर भौघ्रही फिर जहाँ के तहाँही चले जाते हैं। हे पायं भाइयो । यदि पापलोग अपने कुल का दीपक उत्तम सन्तान सन्दरं सभील बुद्धि पल पराक्रम युक्त श्रीमान् पूर्ण चन्द्रकला के समान पदोप्तिमान चाहते हो तो (गौरीदद्याहिष्णुलोकं बैकुए रोहिणी ददी) इस लालच को त्याग और धपोकानन्दन पाधा पुरोहितों के जटपटांग कथा से बहिरे बन अवश्यमेव सोलहवें वर्ष की कन्या का २५ वर्ष के पुत्र के साथ दि. वाह करो इससे न्यून में कभी मत.फरो यही देम को उन्नति देश का सौभाग्य और देश का सुधार करनेवाला कर्म है। "गर्भाधान के पूर्व स्त्री पुरुष को आवश्यकीय कर्म" पुरुष को उचित है कि एक मास पर्यन्त ब्रह्मचर्य से रहै और धातु पुष्ट औषधि तथा धौ दुग्ध पादि बलकर पदार्थ का अधिक सेवन करे, विशेष कर निस दिन गर्माधान करनाही “सपिः स्निग्धः सपिः हीराभ्यां पायोद भुक्ता" पुराने चावल के भात में गोहत, गोदुग्ध और मिश्री मिला कर पथवा खीर मोजन करे। स्त्री को भी चाहिये कि उत्तम पाहार भोजनकर एक मास ब्रह्मचारिणी रहे विभेप कर॥ "ती प्रथम दिवसात् प्रभृति ब्रह्मचारिणी। दिवा स्वप्नाचनाश्रुपात सानानुलेपना । भ्यङ्गनख च्छेदन प्रधावन हसन कधनाति। शब्दयवणाव लेखनानि लायासान् परिहरेत्" रजोदर्शन (मासिक धर्म के प्रथम ही दिन से ब्रह्मचारिणी दिया स्वप्रा (दिनको सोना) पांखों में पलन लगाना, रोना, दाम, मोर में केक पोर घबटन का लगाता, नख अटाना, इसना, बगस वकवाद करना, गम्भौर भन्द उगना, नव जमीग लिखगा, सेन हवा और मेहनत लाग कर कोंकि द्वितीय खण्ड। ४२ दिवाखपन्त्याः खपशीलोऽजनादन्धो रोदनादिकृतदृष्टिः। स्नानानु लेपनादुखः शौलस्तैला भ्यङ्गात् कुष्ठौ ॥ नखोपकर्तनात् कुनखो प्रधावनाञ्चलो हसनाच्छयांव। दन्तौठतालजिःमलापौ पातिकवना दतिशब्द श्रवणा ॥ इधिरोऽवलेखनात् खलतिारता यास सेवना दुन्मत्तो। गौं भवतीत्येव मेतान् परिहरेत् ॥ सुश्रु ते शा००२॥ दिन के सोने से पपभील (पाषाणहृदय) अष्लन लगाने से अन्धा, रोने से विकृत दृष्टि (ऐंचाताना) क्षान और उबटन लगाने से दुःख युक्त तेल लगाने से कोढ़ी, नख कतराने से कुगखी (एक प्रकार का कुष्ट है) दौड़ने से चञ्चल, से काला दांत पीठ तालु निता और पान तान बकने वाला, अति बोलने और भब्द यवण से बधिर, पृथ्वी लिखने से दुष्ट और अति वायु सेवन तथा परियम करने से उन्मत्त गर्भ (लड़का पैदा) होता है इसलिये उक्त बातों को रजो युत स्तियां अवश्य त्याग करें। वैद्यक के पतिरिका पुराणों में भी रजो युक्त स्त्रियों को छूनेतक का निषेध है और प्रथम दिवस में घाण्जाली, दूसरे दिन ब्रह्मघातिनी और तीसरे दिन रजकी (धोविन) संज्ञा लिखा है, कारण यह सष्ट होताहै कि जिससे धर्म- वती तीन दिन सबसे भिन्न ऐकान्त स्थल में वास करे "न रहे बांस न वाने बासरो" तय अवश्यमेव रजोयुक्ता उक्त बातों से वचं सती है। कैमा मानन्द होताहै जबकि हमलोग पूर्व ऋषियों के रचहिये ग्रन्थों के अभिप्राय को पूर्ण रूपसे जान जाते हैं आज कल के सिर्फ अंगरेजी दूके हुए नवजवानों को अभिमाय तो सूझ पड़ता नहीं कोट पतलून की भान में झट कई देते हैं कि हमारे पूर्व ऋपिलोग तो बेवकूफ थे। दर्भ संस्तर शायिनों करतल-शरावपर्णा न्यतम भोजनौं इविष्यं ब्राहच भर्तुः संरचेत् । ततःशुद्धस्नाता चतुर्थे ऽहन्यहतवाससमलंकृतां ॥ कृत मङ्गल वस्ति वाचनां भारदर्शयेत् ॥ . ..

आरोग्य दर्पण। ४३. भावार्थ:-कुशे की चटाई पर सोवे, हाथ में या पत्र में रखकर खीर भोजन करे और तीन दिन पति से बची रहै, चौथे दिन स्नानकर मलिन बस्त त्याग सुन्दर भम्बर तथा आभूषण धारण कर कल्याणकारक वेदमन्त्र पढ़ के पतिका दर्शन करै। पतिही का क्यों दर्भन कर इसमें क्या हेत है। पूर्व पश्ये हतु खाता याहर्श नर मङ्गना । तादृशं जनयेत् पुन भर्तारं दर्शये दतः । ऋतुस्नाता अर्थात् मासिक धर्मा के शुद्ध होके जिस रूप रङ्ग के पुरुष या स्त्री को देखेगी तादृशाखप पुत्र अथवा कन्या को उत्पन्न करेगी इस कारण मत्ती ही को देखना उचित है। प्रथम हम दिखला चुके हैं कि ऋतुस्नाता मारी "मरिंदर्भ येत्” यहवात बहुत सत्य और परीक्षित है कि धर्मवती अपनी इच्छानुसार गौर या श्याम सन्दर रूप डोलयुत भोभायमान सन्तान उत्पत्ति कर सती है, यह कोई कल्पना वा सपक नहीं है किन्तु पूर्ण सत्य यथार्थ है कि उत्तम संतान करने का मुख्य हेतु यथोक्त बधू बर के प्राचार तथा पाहार पर निर्भर है। माग्य के भरोसे जो घोर अशान निद्रा में पड़े हैं वे ती अवश्य ही इसे मिथ्या कल्पित कहानियाँ जानेंगे। जो २ विद्यायें मनुष्यको भात्मा और मनसे सम्बन्ध रखती १ यदापि उसका अंकुर यही भारतवर्ष है परन्तु आज योस्प श्रामेरिका पादि अन्य दीपों के विद्वान और तत्वदर्शियों के भिर मौर होरहाई वे भी इसी बातको मानते हैं कि सन्तान का स्वरूपवान् बलवान् बुद्धिवान और तेज वान् होला माता के आधीन है प्रायः देखा भी गया है कि माता पिता गौरान और स्वरूप वाले हैं परन्तु लड़के बदमक और कालेहुधे हैं । अत्यन्त वात्या- वस्था में गर्माधान करने के कारण बालक गर्म ही में बिगड़ जाते हैं वा उत्पन्न ये पौर मरगये अथवा गर्भाधानही नहीं होता उस अवस्था में पुरुष अपने वीर्य (यह प्रकर्ण आगे लिखेंगे) और स्त्री रजको शुद्ध करै।खी नव देखे कि रजखला होने के समय में १२ १३ दिन शेष रहे तो दोनों समय सिर्फ खौर भोजन करे और अंत समय में शास्त्रे रीति (भाग कग) में गर्माधारण किया करे तो अवश्य उत्तम सन्तान हवि, यदि इस प्रकार करने से भी दो तीन ऋतुकास व्यर्थ नांय अर्थात् गर्भाधान किया निष्फल होयाने गर्भस्थिति न हो तो निम्नलिखित एस को बनाकर स्त्री पुरुष दोनों सेवन करें और मय । --- ।

द्वितीय खण्ड। मांसादि तमोगुण भोजन तथा ऋतुकाल ये अतिरिक्त मैथुनादि कुत्सितविहार त्याग करें, जिस प्रकार योगौ अपने तन मन मोर धन को योगाभ्यास में लगा देते हैं, मुक्ति के प्रार्थी भरीर को भी विष्णु में अर्पण करदेते हैं, विद्यार्थीगमा ट्रव्योपार्जन तथा सभ्यमण्डली में प्रशंसा प्राप्त विद्याध्ययन में दत्त चित्त से कटिबद्ध होलाते हैं उसी प्रकार उत्तम सन्तान चाहने वाले भी सिद्ध बावा आदि लुटेरों की मामा छोड़ वृत दुग्धादि चावल गेस्पादि जिससे अंत:- करण की शुद्धि बल पुरुषार्थ भारोग्यता और बुद्धि प्राप्त होती है भोजन करे, ब्रह्मचर्य से रहे और यथोषित काल में अपनी स्त्री का समागम कर। जैसे अन्य र पदार्थों को उत्कृष्ट करने की विद्या है वैसेही संतानको उत्पत्ति करने को यही वैद्यक विद्या है चाहिये कि इस पर लोग अधिक ध्यान देखें क्योंकि इसके न होने से भारत की उन्नति होमा सवथा असम्भव है। वृत। पामा हल्दी : ताला इल्दी, खेत पन्दन, मुर्रा, कूट, जटामासी, मारवेल (यह नाम दक्षिण में प्रसिद्ध है) शुद्ध पिलाजीत कपूर माया यह सब दो २ तोला ले फूट कपरछान कर दाई सेर गौ के दूध में मिलाय एक गूलर के काष्ठ पात्र में दही जमादेय और मातःकाल गूलर ही की मथानी से मथ करके उसमें से मक्खन निकाल उसको ताय करके उसमें केभर, जायफल, छोटी लायत्री दो २ मासा करतूरी ४ रत्तो मिला के नित्य प्रातःकाला २ ताले के अन्दाज से दोनों जने खीर अथवा मोठे भात के साथ मिला के यथासचि भोजन.करे, इत्यादि और भी कामदेव घत हहत्फलादि संतानोत्पादक वृत लिखे हैं किसी श्रेष्ठमिषक्कर ये स्वप्रकृत्यानुसार बनवाकर सेवन करें। स्वामी दयानन्द मी पपने संस्कारविधिमें उस चूत लिखाहे चोर यह कहा कि यदि उक्त वृत सेवन से भी दो काल व्यर्थ जाय तो तीसरे महीने में ऋतु समय जब भावे तब पुष्य नक्षत्र युत तुकाल दिवस में जिस दिन गर्भाधान करना हो (पुष्य नक्षत्र रहे) प्रथम प्रातःकाल उपस्थित होवे प्रथम प्रसूता(विपाई) गौ का दही दो मासा और यव के दानों को सेंक के पास दो मामाले दोनों को .एकत्र करके पनी के हाथ में देके उससे पति पूछे "किम्पिवमि” इस प्रकार तीन बार पूछे पोर स्वो भी अपने पति को “भवनम्" इस वाक्य को तीन बार बोल के उत्तर दिवे और.यव युका दही जोपोगाय, इसी रौति मे पुनः २ rari • आरोग्य दर्पण। ५ . " ३ धार विधि शरमा तत्पथात् मशाहली वा देत फलभो भेटकटाई एटशारि) पोपट को जल में महीन पीस के उसका रस कपड़े में छान के पति (पुरुष) पनी के दाहिने नाक के छिद्र में मिजन करे और पति निम्न लिखित मन्त्र से जगनियंता परमात्मा की प्रार्थना करके यथोक्त (पूच्चीत लेखानुसार उत्तम पाभूपणादि धारगार प्रसन्नचित्तही) तुदान करे यह सूत्रकार का मत है । ओम यमोषधी वायमाणा सहमाना सरस्वती। अस्या अहंघहत्याः पुत्रः पितुरिव नामनगमम् ॥ सुश्रुतकारका भी मत “लब्धगर्भायाचे तेवहःसुलक्षणा बट शुङ्गासहदेवा विश्वदेवानामन्यतमंचौरेणाभिपुत्वनी चतुरो वाविन्दून्दद्याइक्षिणे. नासापटे पुत्रकामायनपतावनठीवेत् पूर्वोक्त प्रकार सुलक्षणा वटशुङ्ग (वरगद के वृक्ष का सुनगा) सहदेवा विश्वदेवा (बूटी है) चौर भी जितने समान गुणकार दुधार वृक्ष हैं हाथ से | खुतुर कार उसका दूध तीन या पार बिंदु दक्षिगा नासा में दे खींचजाय और थूके न “पुत्रकामार्य" कहने का मुख्य प्रयोजन यह है कि उक्त बट दुग्धादि दक्षिण नामा पुट में देने से पुत्र और वामनामा पुट में इने से कन्या उत्पन्न होगी, वाग्भट्ट में भी लिखा है कि लक्षाणा बूटी वा बट जटा प्रथम व्याई गौ के दुग्ध में घोंट स्त्री ऋतुकाल में तीन चार बन्द बाममामा से चढ़ाय जाय तो नियय कन्या उत्पन्न होगी और मी अनेक उपाय सन्तानोत्पादक की जिन्हेंणगे क हैंगे। स्त्री स्वाभाविक रीति से प्रति मास ऋतुकाल रनवला होती हैं जिसदिन रजोदन होताहै उस दिन मे १६ दिनतक प्रमण करने की अवधि है उसी को समय और ऋतुकाल भी कहते हैं इसके बाद गर्म नहीं रहता, इसके माननेवाले चतुर व्यभिचारी पुरुष तथा व्यभिचारिणी स्त्रियां जो गुप्त रूपसे एक प्रकार का सम्बन्ध रक्खे हैं वे अवश्य १६ दिन त्याग के प्रसंग करते हैं कारण यह कि गर्भाधान होने का भय नहीं रहता है। प्रायः प्रज्ञान विधवायें जो अपने पातिव्रत धर्मा तथा शिक्षामास्वसे मना भिज्ञ है वे कामबाण से व्यथित हो भौघ्नही परपुरुष रत होजाती हैं फिर क्या खानमैथुन के समान क्षणमात्र को अानन्द अन्तिम दुःख की सीमा नहीं द्वितीय खण्ड। - (लोगों पर विदित है कि पान कल इशारों गर्भपात होते असंख्य सदाही के जन्मतुथै बालक दरिया, मण्डास और गढ़ों में फेके जानेह) उन अवलाची को यह बात पवश्य याद रखना चाहिये कि उक्त १६ रात्रियों के बाद दिन रात भानन्द में मग्न रहने से भी गर्भाधान नहीं रहता ॥ उपरोक्त १६ रात्रि यों में प्रथम की तीन राषियों में कदापि प्रसन्न करना चाहिये क्योंकि उन तीन रात्रियों में स्त्री के शरीर में से एक प्रकार मलीन रुधिर निकलता है जो कोई इन रात्रियों में प्रसङ्ग करते हैं उनका बल बुद्धि तेन पौर गायु का नाम होजाता है तथा गर्भ स्थिति नहीं रहता क्योंकिः- "नचप्रवर्त मानेरक्त वीजं प्रविष्टगुण करन्भवति यधानद्या प्रतिस्रोतः पाविद्रव्यं प्रक्षिप्त प्रतिनत्र वर्तते नोर्ध्वङ्गच्छति तदूदेवद्रष्टव्यं" वरते हुये रक्त में प्रसङ्गहारा प्रविष्ट वीर्य गुणकर नहीं होता अर्थात् खून के साथ बीर्य भी वह पाता है जैसे बहते जल में कोई उतरानेवाली वस्तु के फेकने से तत् स्थानमें ठहर नहीं सक्ती । राषिगणना इसलिये है कि दिग में ऋतुदान का निषेध है। श्री स्वामी दयानन्द जी ने संस्कार विधि में गर्भाधान के प्रकर्ण में और चिमनलाल मु० त० तिखहर माहजहां पुर निवासी ने एक छोटी सी पुस्तक गर्भाधान विधि को बनाई है उसमें लिखा है कि रजोदर्शन से ४ रात्रि तक प्रसङ्गनिपिध है, खैर स्वामीजी ने तो मनु का प्रमाण दिया है मला उक्त रिस जो प्रथम चार राधियों का निषेध किस खप में देखाई यह भी क्या भू- गोल का पढ़ाना है वैध सम्बन्धी व्यवस्था जो विना ततविषयक भास्त श्रव- लोकन के करता है उसे प्रबहनन का पाप होता है । वाग्मट्टादि सिद्धान्त आयुर्वेदीय ग्रन्यों में चतुर्य दिवस का निषेध कहीं नहीं लिखा है बल्कि चौथे दिन गर्भाधान का विधान लिखा यथा सगुते । तीन रात्रि त्याग कर चतुर्थ रात्रि में गर्भाधान करने से सम्पूर्ण अंग युक्त दीर्घायु मन्तान होती है, अन्यञ्च । इसलिये ऋतुवती तीन राधि पति का संग त्याग कर, अन्यच्च । "विकल्वेवञ्चतुर्थी मण्डग्रामन्यां दशम्यां द्वादश्यांचोपे आरोग्य दर्पण। - यादिति पुत्रकामः" पुत्र उत्पन्न करनेवाले चौथो, छठवौं, दसवीं और बारहवीं रात्रि में गर्माणान करें। "श्रतःपरं पञ्चग्यां सप्तम्यां नवग्यामेकादश्याञ्चस्त्रीकामः, त्रयोदशौ प्रभृतयोनिन्द्याः" कन्या को इच्छा करनेवाले पांचौं, सातवौं, नवौं, ग्यारहवौं रात्रि में प्रसङ्ग करे, तेरवौं रात्रि से सोलहवौं पर्थात् अंत कौ चार रात्रि निधि है। पहिले कहचुके हैं कि स्त्रियों का मासिक तीन ही दिन रहता है चौथे दिन से गर्भाधान की रानि होती है और सम रात्रियों में पुत्र तथा विषम रात्रियों में गर्भाधान रहने से कन्या होती है किसौ २ का मत है कि गर्माधान के समय में यदि स्त्री रजमाधिदय वालो हुई तो वान्या होगी शुक्र अधिक हुआ तो पुत्र होगा जो रज पोर शुक्र समान हुये तो नपुं एक लड़का पैदा होगा । गोरखपुर से एक महाभय लिखते हैं कि गर्भाधान में लिखा है कि । दिन धम्भवती स्त्री को त्याग करे और पाप भारोग्य दर्पण में चौथे दिन गर्मा- धान की विधि देते हैं और आज कल प्रायः ऐसा देखने में भी भाता है कि । ५ दिन अथवा क्रिसी २ का तो आठ २ दम २ दिन तक रक्त बन्द नहीं होता तो उस अवस्था में किस तरह मसंग मनुष्य करसक्ता है क्योंकि गर्म रह नहीं सक्ता तो प्रसंग करना व्यर्थ है। दूसरे ज्योतिष भास्त्र में लिखा है कि अमुक २ शुम दिग नक्षत्र भावे तब गर्भाधान करै यदि उत्तम मुहर्त न मिली और गर्भाधान का समय प्राप्त है तो इसमें क्या करना योग्य है। रुपाकर इसका उत्तर अवश्य दीनिये? (उत्तर)-प्रकृयावस्था और जिसका जैसा बल हे उरसे अधिक अथवा कम रक्त जाना और तीन दिन से अधिक दिन तक रक्तपाव बना राना रोग समझा जाताहै। रक्त दभनमान दिखलाई दे या पेट में अधिक दर्द होकर एक रक्त का गांठ गिर पड़े या सिर्फ एक ही दो दिन रक्तयाव होकर बन्द होगाय अथवा मास से और दो चार दिन चढ़ कर धर्म हो तो जानना चा- हिये कि रन क्षोणता से रक्त सूख गया है उसका उपाय यह है कि पनार इत्यादि रत्तोत्पादक द्रव्य खिलाकर रक्त को बहि करे और तीन दिनके अपर कई दिनतक रतनाव होना तथा पांच चार दिन मास पूर्ति को रह जायं द्वितीय खण्ड। . ! तमी रक्तयाव होजाना रक्त की जगाता जानना चाहिये, नव तीन दिन से अधिक दिनतक रक्तचाव होते.देखे तो भीघ्र ही प्रौपध होरा उमको बन्द करने की चेष्टा करै । जितनी भीषधिया रक्तप्रदर की ई वे सब स भवस्था में काम देसत्तौ है । ज्योतिष शास्त्र में सिर्फ गणितमात्रमाननीय है प.युर्वेद वित् चिकित्सिकगण पावश्यक कार्य में मुहर्तादि फलित अंगको नहीं मानते। दत्तात्रयो प्रादि कई ग्रन्थों में बंध्या की किकित्सा तथा निदान इस प्रकार से लिख है कि एक समय पार्बतो जी ने शिव जी से प्रश्न किया कि महाराज बात स्त्रियों के गर्भ ही नहीं रहता मो क्या कारण है ! शिव जौ यो कि स्त्रो लोग छः दषिों से बंध्या होती हैं उनमें भी कोई स्त्रियों को तो जन्मावधि संतान नहीं होता अर्थात् जन्मवंध्या होती है, किसीके होते हैं और मर जाते हैं उसे मृतबंध्या कहते हैं, किसीके सिर्फ एक संतान होकार वन्द होजाता है उसे काकबंध्या कहते हैं, उक्त वंध्यायें निम्नलिखित ६ दीपों से होती प्रथम फूल (गर्भाशय) के मध्य में वाय मरजाती है । २ फूल के ऊपर मांस हदही- जाता है । ३ फूल में कृमि होजाते हैं। ४ फूल वायुवेगमे धौलत होजाताहै। ५ पुष्प दग्ध होजाने से । ६ पुष्प उलट जाता है, के चित् भूत दोष और वा अष्टम कर्मदोष मानते हैं। फूल में दोप प्राप्त होने का मुख्य कारण बालवि. वाह है। स्त्री पुरुष में परसर अप्रौति और असमय मैथुन है । छोटी स्त्रीको जो बड़ा पुरुष मैथुन करताहै तो भी फूल जल जाता है । लक्षण-मासिकधर्म के बाद जब पुरुष रति करचुके तो पूछे कि तुम्हारा कौन मन दुखता है जो स्त्री ये कहै कि परीर कांपताहे तो जानना कि फूल में वायु है, कटि में दर्द कहे तो मांसवादि जानना, पिंडुरियों में दर्द बतलावे तो फूल में कृमि जानना। छाती में दर्द कहै तो भीतल माथ व्यथा में फूल दग्ध और जांघों में दर्द होना कहै तो जानना कि फूल उलट गया है। यदि कहीं दर्द न हो तो जानना कि पूर्वजन्म का दोष है। जब देख कि स्त्री के गर्भाशय का फूल जल गया तो समुद्रफल, सेंधा नोन चौर किञ्चिन्मात्र लहसन तीनों को महीन पीस रुई के फाहा में करके भग में रख दे अगर जलन मालुम हो.तो निकाल डाले इसी तरह तीन दिन करै चोथे दिन स्नान करके पति का सा करै निश्चय है कि गर्भाधान प्रवत्यु होगा। फूल मैं. हवा भर गया.हो. नी. हाँगको काले तिल के तेल में पीस राई .

आरोग्य दर्पण " . में मर कर भग में तीन दिन रखने से दोष नाश होता है। यदि फूल नैं मांस बढ़गया हो तो काखा जौरा, हाथी का नाखून और रेंडी का तेल तीनों को महीन पीस रुई में तर कर भग में रक्खे तीन दिम पर्यन्त चौधे दिन पुरुष का सन करे । ३ फूल में कौड़ा लगाहो तो हड़, बहेरा, कायफल तीनों को सा. बुन के पानी में महीन पीस रुई के फाहा में सरकार मग में रक्खे तो कृमिनष्ट हो गर्भ रहे। 8 फूल भोतल होगया हो तो वध, स्याह जौरा, असगन्ध तीनों को घोभिया सुहागा के पानी में पीस फाहा तर कर तीन दिन पर्यन्त भगमें रखने से पाराम होता है । ५ यदि गर्भाशय उलट गया हो तो कस्तुरी और के पर दोनों को पानी में पीस गाली बनाय भग में राख । चतुर्थ दिन स्नान पति का सत कर भाभा है कि पाधान रहेगा। एक महाभय हमारी बाग से पत्रहारा निम्नलिखित बातें पूछा है उसेमी इसी स्थल में पाठक गणों के अवलोकनार्थ प्रकाश करते हैं वह यह १३ राभि से १६ अन्त को रात्रि क्यों निधि है यदि इन रात्रियों में प्राधान हो- जाय तो उसका क्या फल होगा। दूसरा अगर पाधाग के प्रारम्भ ही से स्वी दो मास पर्यन्त रोगात रहै तो उसको चिकित्सा होनेसे बालक को कुछ केप होताहै या नहीं (उन्तर) मासिकधर्म के नामान्तर स्त्रियोंके गर्मामय (पुप्प) का मुख खुल जाता है और प्रायः पोड़प रात्रि पर्यन्त खुला रहता है तता. थात् रक्त का मैल उसमें पुनः सञ्चित होना प्रारम्भ होताहै इस कारण उस अवस्था में प्राधान नहीं रहता यदि किसी कारण वसात् रह भी गया तो निर्बल सन्तान हनिका तथा गर्भ गिरजानेका भी सम्भव है। एक बात परीक्षा से यह भी देखा गया है कि जिस स्त्री का मन पति से रुष्ट प्रथवा क्रोधित रहता है जब तक मन प्रसन्न न करेगी प्राधान न रहंगापौर जिस स्वीका मन परपुरुष पर लगा रहता है उसे भी निन पतिसना से प्राय पाधान नहीं रहता जव उस परम प्यारे का संगहोगा पौघ्र ही प्राधान रह जायगा। या पुरप खयं गर्भाधान के दिनों को किसी कारण से त्याग कर अथवा विदेश से पाया हो और ऋतुवती का दिन भी गत होगया हो तो भी गर्माधान हो। सत्ता है। भाधान रहने का दिन भी निशय, तभी होगा जब सिर्फ मासमें एक हो वार प्रसन करेगा। गर्मिणी स्वौ यदि किसी रोग में ग्रसित हो और ठ- सका यन कियानाय तो मो रोग से गर्भ में बालश दुःस्व पाकर मरजाता - द्वितीय खण्ड। . तभी रक्तयाव होनाना रक्त की जाता जानना चाहिये, जब तीन दिन में अधिक दिनतक रहयाव होते देखे तो शीघ्र ही चौपध होरा समको बन्द करने की चेष्टा करै । जितनी भीषधिया रक्तप्रदर की ह वे मन उस अवस्था में काम देसक्ती है। ज्योतिष भास्त्र में सिर्फ गणितमात्र माननीय है प.युर्वेद वित् चिकित्सिकगए प्रावश्यक कार्य में मुहर्तादि फलित अंगको नहीं मानते। दत्तात्रयो भादि कई ग्रन्यों में वंध्या. की किकित्सा तथा निदान इस प्रकार से लिखे हैं कि एक समय पार्वती जी ने मिव जी से प्रश्न किया कि महाराज बाजस्त्रियों के गर्भ ही नहीं रहता सो क्या कारण है ! शिव जो बोले कि स्त्री लोग छः दोषों से वंध्यां होती हैं उनमें भी कोई स्त्रियों को तो जन्मावधि संतान नहीं होता अर्थात् जन्मबंध्या होती हैं, किसीके होते हैं और मर जाते हैं उसे मृतबंध्या कहते हैं, किसीके सिर्फ एक संतान होकर बन्द होजाता है उसे काकबंध्या कहते हैं, उक्त बंध्यायें निम्नलिखित ६ दीपों से होती प्रथम फूल (गर्भाशय) के मध्य में वाय भर जाती है । २ फूल के ऊपर मांस वृद्धहो- जाता है । ३ फूल में कृमि होजाते हैं । ४ फूल वायुवेगमे शोलत होजाताहै। ५ पुष्प दग्ध होजाने से । ६ पुष्प उलट जाता है, केचित् भूतदोष और वा अष्टम कमदोष मानते हैं। फूल में दोप प्राप्त होने का मुख्य कारण बाग्न वि. वाह है। स्त्री पुरुष में परसर अप्रीति और असमय मैथुन है । होटौ स्त्रीको जो वड़ा पुरुप मैथुन करताहै तो भी फूल जल जाताहै । लक्षण-मासिकधी के बाद जब पुरुष रति करके तो पूछे कि तुम्हारा कौन सन' दक्षता है जो खी | क है कि परौर कांपताहे तो जानना कि फूल में दायुद्दे, कटिम दर्दक है तो मांसवद्धि जानना, पिंडरियों में दर्द वतलावे तो फूल में कृमि जानना । छाती में दर्द कहे तो शीतल माथ व्यथा में फूल दग्ध और जांघों में दर्द होना कहै तो जानना कि फूल उलट गया है। यदि कहौं दर्द न हो तो जानना कि पूर्वजन्म का दोष है। जब देख कि स्त्री के गर्भाशय का फूल जल गया तो समुद्रफल, सेंधा मोन और किञ्चिन्मात्र लहसन तीनों को महीन पीप राई के फाहा में करके भग में रख दे अगर जलन मालुम हो,तो निकाल डाले इसी तरह तीन दिन करे चोये दिन स्नान करके पति का मन करै निश्चय है कि गर्भाधान अवश्य आगा। फूल मैं. हवा भर गया हो तो, होगको काले तिल के तेल में पीस रुई , , आरोग्य दर्पण 88 में भर कर भग में तीन दिन रखने से दोष नाम होता है । यदि फूल मैं मांस बढ़गया हो तो काखा जौरा, हाथी का नाखून और रेंडी का तेल तीनों को महीन पीस सई में तर कर मग में रक्खे तीन दिन पर्यन्त चौधे दिन पुरुष का सङ्ग करे। ३ फूल में कीड़ा लगाही तो हड़, बहेरा, कायफल तीनों को सा. बुन के पानी में महीन पीस रुई के फाहा में तर कर मग में रक्खे सो कृमिनष्ट हो गर्भ रहे। 8 फूल भोतल होगया हो तो यध, स्याह जौरा, असगन्ध तीनों को पौकिया सुहागा के पानी में पौस फाहा तर कर तीन दिन पर्यन्त भगमें रखने से पाराम होताहै। यदि गर्भाशय उलट गया हो तो कस्तूरी और केयर दोनों को पानी में पौस गाली बनाय भग में राख । चतुर्थ दिन स्नान पति का सह कराया है कि भाधान रहेगा। एक महाभय इलारी वाग से पत्रहारा निम्नलिखित बातें पूछा है उसे भी इसी स्थल में पाठक गणों के अवलोकनार्थ प्रकाश करते हैं वह यह है राधि से १६ अन्त को रात्रि क्यों निधि है यदि इन राधियों में पाधान हो- जाय तो उसका क्या फल होगा। दूसरा अगर प्राधान के प्रारम्भ हो से स्त्री दो मास पर्यन्त रोगात्त रहै तो उसकी चिकित्सा होनेसे बालक को कुछ केश होताहै या नहीं (उत्तर) मासिकधर्म के नामान्तर स्त्रियोंके गर्भामय (पुष्प) का मुख खुल जाता है और प्रायः घोड़म रात्रि पर्यन्त खुला रहता है तत्य- यात् रक्त का मैल उसमें पुनः पच्चित होना प्रारम्भ होता है इस कारण उस अवस्था में प्राधान नहीं रहता यदि किसी कारण वसात् रह भी गया तो निर्बल सन्तान हेनिका तथा गर्भ गिरजानेका मी सम्भव है। एक बात परीक्षा से यह भी देखा गया है कि जिस स्त्री का मन पति से रुष्ट पथवा क्रोधित रहता है जब तक मन प्रसन्न न करेगी याधान न रहेगा और जिस स्त्री का मन परपुरुष पर लगा रहताहै उसे भी निन पतिसना से प्राय पाधान नहीं रहता जब उस परम प्यार का संग होगा भौघ्र ही प्राधान रहनायगा। या पुरप खयं गर्भाधान के दिनों को किसी कारण से त्याग कर अथवा विदेश से पाया हो और ऋतुवती का दिन भी गत होगया हो तो भी गर्माधान हो. एता है। भाधान रहने का दिन मी नियय तमौ होगा जब सिर्फ माध्में एक हो वार प्रसत करेगा। गर्मिणी स्त्री यदि किसी रोग में अमित शेऔर ह. सका यत्र न कियालाय तो मी रोग से गर्भ में वासक दुःख पामर मरनावा ।

द्वितीय खण्ड। ५० है अथवा तत्ररोग ग्रसित उत्पन्न होगा इमलिये बीमार गर्मिणी स्त्री की चि. फित्मा सत् वैद्य द्वारा अवश्य करावे । गर्मिस्थित होने न होने के अनेकानेक कारण हैं फिर भी कभी काम करेंगे। पारोग्यदर्पण के प्रथम पख से जो पातमनानापारम्य भयनांत पर्यन्त यावत्कम थे क्रममा प्रकाश कर स्त्रीप्रसंग के प्रकणं में ऋतुदान की भी व्यवस्था अपनी स्वल्प बुद्यानुमार साधारणतोर पर गाय गये, विशमर पाठक गण को यदि किसी स्थल में कुछ भ्रमदायक पथवा भराव देख परै तो कृपाकर स्वयं शुद्ध करलेंय और हमें पत्रहारा सु- चित करें ताकि प्रकाशित होनेवाले पलों में छप जाया करे। पागे हम में कुछ स्त्री प्रमन के विषय में लिख चुके हैं फिर भी उमी विषय को उठाते हैं पाठकगण उसे फाला ण मास का फगुपा जान ईसे न उसके तात्पर्य को समझे कि सम्पादक क्या कहता है। पान कल देखा जाता है कि भारत के तीन माग मनुष्य पर स्त्री गमनादि में रतई। इसमें शक नहीं है कि स्त्रीप्रसङ्ग में पति सुख है परन्तु क्षणमात्र के लिये पुनः अधिकांश पायु ऐसे दुःख से काटना पड़ता है कि जिसकी सीमा नहीं, मेरी यह राय नहीं है कि अपनी स्त्री से भी गमन न कर, मेरा तात्पर्य वेश्या भादि गमन पर है। क्योंकि आज कल ऐसे ही मनुष्यों को मंया अधिक तर है। उनमें भी कई भाति के लोग जैसे किसी का चित्त किसी रहस्य स्त्री के प्रेम में फंसा है और उसके पीछे लोकलना त्याग पागल वना फिरता है इस कोटि में गुमाई बैरागी और महंत आदि भी बहुत हैं और इन्हीं लोगों के कारण से बड़े २ आदमियों के घर के कामकान करनेवाली चाकरनियां कुटनी बनगई हैं। यह कोई सय बास नहीं है जिनका पित्त ग्रहस्थिनों में अटकता है वे उसके मिलने के लिये अनेक तोड़फोड़ के उपाय रपते हैं। दूसरे वैभ्यागामी दून में केवल भूर्खही नहीं बल्कि अधिकांश ऐसे पढ़े लिखे मनुष्य इस दुष्कर्म में लीन देख पड़ते हैं कि जिनपर अनाथ भारत की उन्नति निर्भर है लेकिन जब वे ही सारहीन होते जाते हैं तो भारत की उन्नति होचुकी। तीसरे गुदामैथुन करनेवाले इस कोटिमें मुसलमान.और रामफटाका वाले अधिक है। अपनी स्त्री से भोग करने से जो क्षति होती है उससे सतोगुण अधिक पति पर स्त्री गमन करने से होती है कारण यह है कि नव परस्पी गमन करने की इच्छा होती है तो उसके साथ हो काम इतना प्रबल हो उपस्थित ।

आरोग्य दर्पण। ५१ होताहै कि जिस कदर स्वकीय स्त्रीगमन में वीर्य पात होता है उससे कई अंश अधिक शुक्र पर स्त्री संग में निर्गत होनाता है। धातु निकल जाने का यह बहुत ठोस कारण है कि जैसी इच्छाको प्रबलता होती है उमौके अनुसार वौये भो स्खलित होनाता है। (प्रश्न) पर स्त्री के साथ शौघ्र हौ कामोत्तेजित और अधिक वीर्यपात क्यों होता है ? (उत्तर) अपनी स्त्री नित्यमः समीप रहने से वैमी प्रबल इन्शा नहीं होती जैसी पर स्त्री से होती है । इसका कारण यही जान पड़ता कि नित्य मः चित्त लगे रहने से और दूरसे कभी कभी चक्षुहारा दृष्टि संग करने मे निरन्तर कामाग्नि सुलगा करती है बस अकस्मात् प्राप्त होजाने पर मोघ्र ही पति कामोत्तेजित हो अधिकांश वीर्य निकल जाता है । (प्र०) किसौ २ कों पर स्त्री प्राप्त होने पर भी कामोत्तेन नहीं होता क्यों ? (०) उसका कारण डर है और बहुतेरों को यह होता है कि स्पर्श करते हो कपड़े में एक निर्गत होजाता है । इत्यादि कारणों से भरीर को बड़ा हो चपकार होता है इस लिये पूर्णावस्था में प्रसन्नतापूर्वक विवाह कर उससे भानन्द करना चाहिये । (३०) यह सब बातें स्वकीय स्त्री में क्यों नहीं होती ? (१०) उसका कारण यह है कि पनायास को मिली हुई वस्तु पर कोई अधिक चिन्ता नहीं करता क्योंकि वह तो मन के चलाय- मान हैतिही मिल सती है। दूसरे पर स्खो के प्रेम में अनेक प्रकार के भोक चिन्ता भी उत्पन्न होती है क्योंकि जिसके पाने में कष्ट है अर्थात् जो वस्तु भौघ्र नहीं मिलमती है उसके विषय में स्वभावता अधिक चिन्ता उपस्थित होती है यहां तक कि सभी फिक्र और गममें कितनों का अन्न नल्ल छुट जाताहे कितने लोकलज्जा कुटुम्ब का मोह छोड़ देश देशान्तरों को भग जाते हैं अनेकानेक यातना भोग करते हैं इससे पर स्वीगमन में कुछमी सुख नहीं है। (१०) बार आप क्या कहते हैं पर स्त्री में जो सुख है उस सुख का हाल वही जानमका है जो एक बार भी अपनी रम्य सरोवर प्राणप्यारी के प्रेमनपी भंवर में चकर खाया है "वन्दर क्या जाने अहरन का स्वाद" मला कन्दर्प विद्याहीन पुरुष इस सुख को जान सक्त में कभी नहीं १ (१०) दस बातो हम भी मानते कि राख अवश्य मिलता है परन्तु यह राख उन लोगों का भ्रम जान पड़ता है नहीं तो बास्तवमै दुःख के पतिरिक्त सुखका लेघमात्र भी नहीं है कोश पर स्त्री गमन करने में पहिले तो यह मय लगा रहता है कि देखन . द्वितीय खण्ड । ५२ ले अथवा कोई सुन न ले इत्यादि पन्हीं चिन्तामों से परीर दग्ध होमाता 'तो फिर जहाँ ऐसो चिन्तायें वर्तमान में वह क्षणकालीन सुख क्यांवर मुख देसता है कभी नहीं क्या तुमने रावणादि पर स्खौगामियों का वृत्तान्त कभी नहीं सुनाई तो सणकालीन सुख के लिये जन्मपर्यन्त दुःखका झलना मूखी का काम है। इस लिये युधिमान लेोग पर सो को "माटवत्परदारेषु" माता कहा है। (प्र०) अच्छा वेश्यागमन में तो दोष नहीं है क्योंकि न तो वह किमी की स्त्री है और न उसमें किसी प्रकार का मय तथा चिन्ता होती है किन्तु रुपये का खर्च. है ? (७०) वेश्यागमन में उससे भी अधिकांश वीर्य का नाम क्योंकि शुक्रामयमें विषयसमय शुक्र सदा प्रस्तुत नहीं रहता,जिस समय मन में काम विषयको चिन्ता उपस्थित होती है स्त्री को सर्म पथवा पालिन का उद्योग कियाक्षाता उसी समय वौर्यापय में धातु का थाना प्रारम्भ हो जाताहै अर्थात् जिसके साथ जिसका मन जितना ही अधिक चलायमान होता है उतना हो भीघ्रता से शुक्र प्रस्तुत होकर निर्गत होताद तो पर स्त्री वा वेश्यागमन से मन में जेसी भारी चञ्चलता उपस्थित होती है वैसी हर समय को मिलनेवालो अपनो स्त्री प्रति उदोग करने से भी वैसी पचलता कदापि नहीं होती तो बस यही जान लीजिये कि जिसके जपर मन अधिक दो. ड़ता है उमौके साथ अधिक परिमाण शुक्र मी निर्गत होता है और अधिक वीर्य के निकलने से शरीर और मन भी अधिकतर निवल एवं निस्तेज हो जाता है। दूसरे वेश्यागमन से उपदंभ (गरमी) और मूत्राघात ( सजाक) वद (वाघी) भगन्दर आदि रोग उत्पन्न होते हैं जिसमें दुःख से अतिरिका लोकनिन्दा भी होती है। जैसे एक बड़े पादनी के पुत्र के गरमी निकली किसी वैद्य ने पारद संघटित औषध खिलादिया कि जिससे उसका मुंह पा गया उससे थूका न जाय तो उसने अपने बाप से कहा कि बाप थूका नहीं जाता है उसके पिता ने उत्तर दिया कि बेटा तुमको जहान थूकता है एक तुमसे न थूका गया तो क्या हुमा । तो देखिधे वेश्यागमन से धन भर लोक. लच्या सवका नाम होजाता। वेश्यागमन के विषय में मध्यकठिक नाटक में यह बहुव ठीक लिखा है। इह सर्वख फलिनः कुल पुत्र महाद्रुमाः। निष्फलत्वमलं यान्ति वेश्या विहग भचिताः ॥ - आरोग्य दर्पण। अयंहि.सुरत ज्वालः कामानिः प्रणयेन्धनः । नराणां 'यत्र यते यौवनानि धनानि च ॥ अर्थात् कुलवालों के पुत्ररूपी बड़े वृक्ष जो सब प्रकार से फल सक्त है वह वैश्यारूपी पत्तियों करके भक्षण किये हुये निष्फल होजाते हैं या कामरूपी अग्नि निससे सुरत अर्थात् स्वौ सदरूपी ज्वाला उठती है और वह प्रौतिरूपी लकड़ी से जलती है ऐसी अग्नि में मनुष्यों का रूप तथा धन स्वाहा होजाता है। किसी कवि ने कहा है। सोरठा-यह तन हरियर खेत, तरुणी हरिणौ परि गई । अजहूँ चेत अचेत, अधपेट चरा वषाय ले॥ फिर जो मनुष्य वेश्यामें लोन रहते हैं उनकी कामानि तथा धनाग्नि नि. रन्तर दग्ध करती है कारण यह है कि वह भाज एक वेश्या पर आमत हैं घऔर उसी की चिन्ता में लगे हैं फिर उसके मिलते देर न हुई कि उससे भी चढ़बढ़ कर खूबसूरती में एक दूसरी दृष्टि पड़ी, बस अब उसको चिन्ता में लगे इसी प्रकार निरन्तर सप्ति नहीं होती और यावत् योवन इसी दुःख से काटते हैं इसमे वेश्यागमन को विहानों ने निधिही कियाहै । एक वेश्यागामी राजा को एक पण्डित हमेमा निन्दा करते थे कि तुम वेश्या के पाप से इस लोक में दुःख भोगकर नरक में जागोगे । एक दिन रामा ने अपनी वेश्या से कहा कि आज रातको तुम पण्डित के घर में जानी और पण्डितके साथ किसी तरह रमण करो तो पण्डित फिर हमारौ कभी निन्दा न करे। राक्षा की पात्रा पाय वेश्या सपना शृङ्गार कर सज धज कर पण्डित जीके पास गई और कहने लगी कि महाराज पाल अपाकर मेरे साथ गमन करिये। पण्डित जी ने वेण्या से कहा कि अच्छा तुम अपने शरीर के वस्त्रको उतार कर अलगधर कर नग्न हेलाव, वेश्या नग्न होगई, पण्डित नौ उसे नीचे से ऊपर तक नि. हार कर कहा कि जो २ वस्तु हमारी पण्डिताइन के हैं वही तुम्हारे में भी हैं उससे अधिक क्या तुम में है जो हम तुम्हारे साथ रमण करें तो यह मूखी का काम है जो पपनी स्त्री को त्याग वेश्या गमन करते हैं। वेश्या मे राजा से जाके यह सव वृत्तान्त सनाया, राजा को ऐमी लगा पाई कि वेश्यागमन करना छोड़ दिया यह बात बहत सत्य और परीक्षित है कि वेश्यागमन में , - ५४. द्वितीय खण्ड। मिवाय वृथा वीर्य नष्ट करने के और कुछ भी गुम्य नहीं है क्योंकि पुरुष वेश्या को प्यार करते हैं और वेश्या रुपये को प्यार करती है तो परसर प्रीति न ठहरी तो नहां परस्सर मीति नहीं वहाँ सुख कहा। अनेक पुरुपोंके सन से वेश्या का कामानन्द नष्ट होजाता है सिर्फ मनके मोहने वाली जपरकी जो कुछ सफाई और बनावट है वही देख लीजिये जिन महाभयको इस वातका विश्वास नहीं किसी सत्य बोलने वाली वेश्या मे कसम धरा के पूछो कि जैसे पुरुष को तुम्हारे साथ प्रसङ्ग करने से भानन्द होता है वैसाही तुमको भी होता है या नहीं तो वेश्या कहेगी कि चढ़ती जवानी में शायद चन्दरीज़ कभी होजाता था अव तो सिर्फ रुपये का प्रानन्द होता है प्रथम तो वेश्यागमन में परस्सर भानन्द नहीं, दूमरे जब वेश्या को बुलाते हैं पथवा टौके घर जाते हैं तो रुपये वसूल करने तथा नित्यशः अप्राप्ति जान चार पांच बार प्रसा करते हैं, तीसरे जव धातु में जातां पहुंच जाने के हेतु स्तम्भनक्ति जाती रहती है तो अफीम, चण्डू गादि नमा पौने लगते हैं जिसमें वीर्य और मा जल भुन खाक होजाता है, चौथे जब पास रुपया न रहा तो घरको वस्तु तथा औरत का गहना तक लेकर देशाते हैं, पांचवें गरमी सूजावा से पीड़ित हो वैद्य, डाकरों के पास दौड़ते हैं अन्त में आप भी नरक भोगते हैं और अपने कुटुम्ब को मी भोगाते हैं ! मेप तीसरे खरड में । अति लाभदायक शिक्षा॥ केवल पुरुष विषयक गतुष्य को उचित है कि बाद प्रसङ्ग के अवश्य दुग्ध पिये, सबसे उत्तम तो यह है कि जिस रात्रि में स्वीप्रसङ्ग करना हो पूर्वही से मित्रीयुत अधावट दूध रक्खा रहे और मैथुन के उपरान्त उठकर हाथ मुह धोय दूध पी ले इससे मेषुन को हरारत जाती रहती है, वौर्य में किमी प्रकार का दोष नहीं उत्पन्न होताहै। यदि रात्रि में दुग्ध लाभ न हो तो उचित है कि प्रातरणमय भौच दन्तधावन के बाद प्राध सेर टाटक गौ के दुग्ध में मियी डाल पीजाय, मैथुन के सवेरे यह भी करना योग्य है कि उस दिन काले तिल का तेल शरीर में मर्दन करके स्नान करे और दुग्ध भात मित्री या खोरया मोठा मात भोजन करे और दोपहर के दो तीन घण्टे तक भयन करे इस क्रिया से मनुष्य कभी वीर्यहीन निवल पुरुषत्व रहित न होगा। मेथुन हमेशा रात्रि में एक बार करना उचित है सिर्फ वर्षाकाल में जब आरोग्य दर्पण। . कि पाकाश अभयुक्त हा पोरहिमऋतु में दिन में भी मैथुन करसता है परन्तु एक बार। वेद को पाता तो यही है कि मनुष्य मासान्च में खकीय ऋतुवती स्त्री के साथ गमन कर, मन का भी वचन है। चरतुकालाभि गामौस्यात् स्वादर निरतःसदा । ब्रह्मचव्यव भवति यत्र तत्राश्रमे वसन् ॥ हमेशा जो मनुष्य अपनी ही स्त्री से प्रसन्न और ऋतुगामी होता है वर रहस्य ब्रह्मचारी के सहभ है । जो मनुष्य हथा वोयं नष्ट न करके निरन्तर उसकी स्थिरता रखता है वही पुरप बलवान, तेजस्वी और सम्पूर्ण उत्तम कार्यो का करनेवाला होता, अन्यथा वीर्य नष्ट करने से भायु पट जाती है और चगेक प्रकार के रोग होते हैं, विशेष कर रहस्थ को तो अवश्य ही अपने वीर्य की स्थिति और भोजन छादन इस प्रकार रखना चाहिये कि वीर्य कभी खप में मौ नट न हो कारण यह है कि जितना ही वीर्य पुष्ट होगा उतना ही उनके लड़के अत्युत्तम रूप,लावण्ययुक्ति पुष्टि,बल और पराक्रमयुक्त होंगे। महज्जनों को उचित है कि अपनी स्त्री से प्रेम, प्यार और प्रमङ्ग करें उसे ऐसा बर्ताव रखें कि वह सवंदा प्रसन्न रहे। क्योंकि ॥ सन्तुष्टी भार्यया भर्ता भर्नाभार्थी तथैवच । यस्मिन्नेव कुले नित्यं कल्याणं तत्रर्वध्रुवम् ॥ जिस कुल में स्त्री से पुरुष और पति ने पत्नी अच्छे प्रकार प्रसन्न रहती हैं उसी कुन में सर्वसौभाग्य और ऐश्वर्य निवास करते हैं। जहां कलह एवं दोनों में प्रमौति रहती है वहां हो दोर्भाग्य और दारिद्रवास करताहै इससे स्त्री का प्रसन्न रखना विहानों को श्रेय है क्योंकि स्त्रियों को दुःख न हो. ऐसा मनु नौका भी बचन है। शोपन्ति यामयो यत्र विनग्यत्याशु तत्कुलम् । न शीघन्ति तु यत्रता वईते तद्वि सर्वदा। जिस घर में स्त्री भोकातुर होके दुःख पाती है वह घर वा कुल शीघ्र ही सत्यानाश होनाता है और जिसमें स्तियां प्रानन्द में प्रमोद और प्रसन्नता मरीहई रहती हैं वह घर और कुल सर्वदा बढ़ता है। हे आर्यकुलाभिमा- यह. ५६. द्वितीय खण्ड। नियो यदि पापलोग. सच्चे मन से देश का कल्याण एवं उन्नति. चाहते हो तो विण्यायों के बाहरी जाल में फंसकर महणियों को भोकातुर मत करो उन्ही, के साथ भोग विलास करो, हों को अच्छे २ पाभूपए, और वस्त्र पहिनामी फिर देखो तुम्हें क्या प्रानन्द मिलता है, देख करके भी क्या अन्धे बने है। भोभाग्य अंग्रेजों का किस्से है ? हे ईश्वर दयानिधे इमारे पाय माइयों को भी बुद्धि दे। मनुष्य प्रति कामातुर हेनि पर नाड़े के दिनों में तीसरे दिन, गर्मी में पन्द्रहवें दिन और वर्षाकाल में जब मेघ की गर्जना हो मैथुन कर संक्ता है क्योंकि रतौमसंग की इच्छा हो तो कामके वेग को न रोकना चाहिये क्योंकि काम के बेग को रोकने से प्रमेह और मूत्रकृच्छादिक बीमारियां, पशि- थिलता और पुरुषत्व की हानि होती है.इससे कामातुर होने पर प्रसन्न करना उचित है। कामातुर के लक्षण ॥ चित्त घबड़ाय, कहीं मन न लगे, विना इच्छा ही किये उपस्थेन्द्रिय वली एवं कठोर हो प्रसन्न योग्य स्त्री को देखतेही समस्त भरीर सन्न होलाय और मूर्छा को प्राप्तहे तव जानना चाहिये कि यह कामातुर है उस अवस्था में सचित है कि पूर्वोक्त नियमित दिनों में स्वस्थ मैथुन करै । कोई यह भक्षा करे कि यदि उस अवस्या में स्ती गर्भिणी या रोगार्ति हो तो ? दूसरी स्वीसे गमन करे, (प्रश) "मारवत्परदारेषु" इत्यादि अनेक शास्त्रकारों के बचन कि पर स्त्री गमन न करना (उत्तर) दूसरी स्त्री से तात्पर्य है रोग रहित वेश्या अर्थात् कामातुर होने पर यदि स्वकीय स्ती गर्भिणी या रोगग्रस्त हो तो नियोग या वेश्यागमन करलेना कोई दोष नहीं है कारण यह है कि यदि उस अवस्था में स्त्री लाभ न हो तो भारीरक दशा में हानि पढ़ सती है (प्रन) ऐमा मत कहो वेश्या महा पापभौजा होती हैं उनके सर्ममात्रमें मनुष्य पापी होलाता है, पुनः “प्रायुः क्षतिफलता युपहास्यताच निन्दार्थ हानि लघुता विगतिः परति" वेशागमन से प्रायुको नाम निष्पल वीर्य पतन,हसी लेकिनिन्दा, ट्रव्यनाम और इलकई एवं पुर्वमें उत्तम गति नहीं होती (७०) यह सामान्य वचन उनके लिये है जो पहनिभ सौगै लिप्त रहते हैं, पापदं कालो नियोग या वैश्यागमनमें पाप नहीं है पयोंकि ईश्वर की सृष्टि क्रमानु- ।

आरोग्य दर्पण। ५७ कूल स्त्री पुरुपका स्वामाविक व्यवहार एकही नहीं सक्ता सिवायं वैराग्यवानं पूर्ण विहान योगियों के । नित्यप्रति स्त्री के साथ एक पलंग पर सोना भी नि- पेध है क्योंकि वीर्य मानिन्द घी के है जिस प्रकार वृतपिण्ड पग्निताप से एवं होजाता है तिमी प्रकार मनुष्य का वीर्य भी स्त्री के समागम अर्थात् सिर्फ अङ्ग सभी ही द्रवीभूत हो च्युत होजाता है । स्त्री से अलग रहने वाले पुरुष चिरायु और बलौ होते हैं और वे एकाएकी बहुत शीघ्र बुढ़ापा नहीं होते, उत्तम है कि जिस दिन प्रसङ्ग करना हो एक पलंग पर भयन करें। स्त्री त्याज्य । निन्तलिखित स्त्रियोंके साथ मैथुन करना शास्त्रमतसे कदापि न चाहिये, जैसे रजखला, प्रकामा ( जिस स्त्री का काम चैतन्य न हो) मलिना ( मैली कुाचैलो ) अप्रिया, हरा, रोगगुहा, अगहीना ( लँगड़ी लूली, अन्धौ भादि ): गर्भिणी, योनिरोगगुला अर्थात् निएको गर्मी, स्नाक, या प्रदरं की बीमारी हो, गुरुपत्नी, भत्रुपनी, कफोरिणी पौर निसमें छल छिद्र हो, ऐसी स्त्री रति नहीं करनी चाहिये क्योंकि रजस्वला के संग से दृष्टि आयु तेज और धमकी हानि होतीहै और रजखला के संगसे जो सनाक की बीमारी होती है उससे भगन्दर रोग होताहे और आराम नहीं होता, वृद्धा के साथ प्रायु का नाम, गर्भिणी के मन से भूणहत्या या गर्भपौड़ा, रोगिणी के सङ्ग बल का नाश, हौनाङ्गो, मलिगा, बैरगुता, अति दुबली, बन्ध्या और पकामा के संगसे धातुक्षीण रोग और मन मलीन होता है। दिशा पेभाव लगा हो उसे रोक कर मैथुन करने से, प्रसंग में वीर्य के रोकने से और चित्त सो कर अर्थात् स्त्री को अपर बैठा कर प्रसंग करने से बहुधा पथरी की बीमारी होती है। अपर लिख चुके हैं कि स्त्री को अपर बिठावर विपरीत रति करने से बहुधा पथरी की बीमारी होती है-यही नहीं परन्तु इससे और भी अनेक उपद्रव होते हैं यथा सुश्रुते भारीरक दो अध्याये। ऋतौ पुरुषवहापि:प्रवत्तेताङ्गनायदि। तत्र कन्या यदि भवेत् सा भवेन्नरचेष्टिता। प्रतुवती नारी यदि पुरुषवत् पर्यात् पुरुष,नीचे और स्त्री जपर बैठ कर ५८ द्वितीय खण्ड। । प्रसंग करे और यदि गर्भ रहजाय पोर जो कन्या उत्पन्न है। तो उस कन्या की चेष्टा पुरुपकी भी होती है याने उसका वोलपाल पामा धादिमब पुरुष के से होंगे और यह भी सम्भव है (नेमा कि कभी २ भम्बाद पत्र हारा सना जाता) भूए डाढ़ी में दाल मादि हों। योभार्याया मृतौ मोहा दङ्गनेव प्रवर्तते। ततः स्त्रौ चेष्टिताकारो जायते पण्ड संजितः। जो पुरुष मदोन्मत्तता से स्त्री को नाई नीचे होकर प्रसंग करते हैं रणे उत्पन्न पुत्र खण्ड अर्थात् जनाना होता है उस लड़के के सम्पूर्ण व्यवहार स्वी का सा होता है जैसा चटकना, मटकना, लहंगा पहिनना भादि दुर्गुगा । यदि कोई यह कहे कि दोनों लोकों के अभिप्राय तो एक ही से हैं याने पुरुप हो नीचे रहा तो फख भिन्न क्यों ना? तात्पर्य यह है कि स्त्री बिना प्रेरणा के मदसे मूच्छित हो पुरुषवान् चेष्टायुतं हो गमन करे तो निश्चय है कि रज- साधिक्य से कन्या ही उत्पन्न होगी और उसके सब पाचरण और कुछ मा. कार भी पुरुप के से होंगे। उसी प्रकार पुरुष को भी जानना। अभ्यन्तर परीक्षा करनेसे निश्चय हुाहे कि हैना भादि संक्रामक छुत हा रोगों से तत्काल मृत्यु तथा निरन्तर रोगी बने रहने का मुख्य कारण वीर्यकी अशचता है। यह तो सभी जानते हैं अर्थ धर्म काम और मोक्ष की प्राप्ति इसी देहसे होती है इसलिये देहको रोगसे रहित और सुखी रखनेका उपाय करना सवसाधारणको उचित है वे उपाय दया कि विहिताचरण और पश्च सेवन का परिधान ? विहिताचरण कौन है ? भायुर्वेद के मत से विवाह स्वी प्रसङ्ग आदि । पान कल के लोगों का ध्यान इन विषयों पर बिलकुल नहींह और स्वीप्रम में क्या हानि और लाभ है और किस प्रकार करना चाहिये इसे तो बहुत ही कम लोग जानते होंगे यह कहते हैं "कोक पढ़े बिग रति कर सो नर पशू समान" हम कहते हैं पशु तो पच्छे हैं सिर्फ रतिभाव नहीं जानते गर्भोत्पादन की सामर्थ्य तो रहती है उनका सम्भोग प्रायः सफल होता है और भाज कल के मनुष्य रतिभास्व न जानने के कारण वीर्य क्षीणा ऐसे होगये है कि जन्म भर नपुन्मक और अपुत्री कहलाते हैं अन्त में न यह लोक सधे न परलोक पन्ततोगला किसी न किसी रोगमें ग्रस्त हो अकाल कालग्रस्त होजाते हैं। इसलिये बुद्धिमानों को उचित है कि वौर्य की रक्षा अवश्य करें। ? द आरोग्य दर्पण। ५६ प्रसन चरक मुनि कहते हैं जिस प्रकार भन्नादिक बीज बहुत पुराना होने या कच्चा रहने से तथा नस से भीगने या कीड़ों के खाने या भागमें भुन नाने से बिगड़ जाताहै फिर वह जमता नहीं तैसेही मनुष्यों का वीर्य भी पास्त वि- रुद्ध व्यवहार चेष्टा और अनुविहित रति होने से सन्तान योग्य नहीं रहता यह भविचार राजा वाबुनों में अधिकांश पायाजाता जो बनिता और पुंडली के चर्म सङ्कर्षण को मुख्य रामसख समझते हैं जब वीर्य रहित होजाते हैं सो अन्त में बाबाजी की विभूति दूढ़ते हैं । शुक्रदोष ॥ निम्नलिखित कारणों से शुक्र अवश्य दूषित होजाता है । प्रतिपय स्त्री प्रति कसरत, अमात्म्य सेवन, अर्थात् प्रकृति विरुद्ध आहारादि, अकाल (रजस्वला) प्रयोनि ( योनि भिन्न अन्य स्थान गुदा पादि तथा हस्तमैथुन ) गमन, इच्छा प्राप्ति में मैथुन न करना, अति रूखा कटु, कसैला, लवण, अन्न पोर गरम चीज़ के सेवन से, अति वृद्धावस्था होने से, चिन्ता, भोक, भय, क्रोध बहुकाल व्याधियुक्त रहने से मलमूत्र अवरोध एवं चयादि कारण से वायु कफ वीर्य बहनेवालो नसों में प्राप्त होके भीघ्र ही वीर्य को दूपित करते हैं सो दूपित शुक्र ८ प्रकार के हैं। फेनयुक्त १ पतला २ सुखा ३ बदर ४ पूति (दुर्गन्धि युक्त ) ५ बहुत चि- कना ६ दूसरी धातुपरष्टि अर्थात् रक्त पादि धातु से मिलाहुआ यह ७ प्रकार पाठवा पवसादि याने ग्लानिकारक है, तन्मध्ये फनिल पतला शुष्क और पि- शिल वाय दूषित है इन धातुणे से गर्म उत्पन्न नहीं होता है और पित दूधित शुक्र नौला दुर्गन्धि युक्त प्रति गरम होता है और धातुच्युत समय सिङ्गा मार्ग में जलन होतीहै, लेमा हारा रुद्धमार्ग शुक्र प्रतिपय चिकना होताहै। अधिक स्लीप्रसंग से चोट लगने से क्षय से वेग रोकने से अति कुपथ्य करने से बहुधा करके रक्तयुक्त यो गठीला २ वीर्य लिंगमार्ग में एक के कष्टसे निक- लता है इसलिये चाहिये कि मनुष्य वीर्यरक्षा में निरन्तर तत्पर रहै। गर्भिणौगमन निषेध गर्भिणौ सप्तमान्मामादुपरिष्टाहिशेषतः । निषिद्धात्वष्टमेमासे मैथुनं न समाचरेत् ।

द्वितीय खण्ड। । गर्भिणी स्त्री के साथ सहवास करना तो सर्वयाहो निषि ऋषियों ने किया है परन्तु पातवें महीने से विशेष कर मैथुन करता निषेध है । जैसे ऋतुस्नाता स्त्री से सम्भोग न करने से एक बालहत्या का पाप होताहे वैसेही पूर्ण गर्भा- वस्था में प्रसंग करने से एक बालहत्या का पाप होता है." वर्षाऋतु में छपटन और तेल मर्दन करना, भरीरमें माटी लगाकर कस- रत करना, कूप का नल और दुग्ध पौना, घोड़े की सवारी करना बहुत फायदा करता है। पूर्व की हवा खाना, पानी में बढ़त भीगना, घाममें फिरना बहुत रूखा और भोतल भोजन, रोज २ मैथुन, दिन में सोना भोर नदी का जल पीना कदापि न चाहिये। जिनका मण हगेगा गंगा जल ही पौनेका है 'उन्हें भी उचित है कि थावण भादों दो महीना न पियें क्योंकि बर्षाकाल में बन, पर्वत, वाग इत्यादि स्थलों से सड़े मांस लता पत्तौ और भी अनेक प्रकार का मैला बहकर नदियों में आता है इमसे बर्षा में नदी का जल विष समान होकर भनेक रोगों को उत्पन्न करता है, दूसौ लिये शास्त्रकारों ने लिखा कि समुद्रगामिनी नदियों को छोड़कर सब नदियां वर्षाऋतु में रजस्वला हो- ती तान उनका जलसेवन उसी प्रकार निपिच और हानिकारक है जैसे ऋतुवती स्त्री का सेवन-वर्षा में प्राकामपतित धारा जल पमृत समान गुण 'करता है क्योंकि वर्षाकाल में प्रकाश की वायु पत्यन्त गौतल होनेसे वहां जो निर्मल जलीय बाष्प सञ्चित है वह हिम होकर हष्टि के प्राकार भूतल में गिरताहै भतएव वह जल प्रधोपसित होते ही पूर्ववत् निर्मल व्यवर (परि- प्कार जल) को प्राप्त होता है यह जल भमके से खिचेरी जल से भी उत्तम माल है इसलिये उक्त जल वर्षाकाल में पौना विशेषकर रोगियों को प्रति गुणकारी है। "ष्टि का जल लेने का सहज उपाय" एका अच्छे साफ बड़े कपड़े को ७१८ हाथ को ऊँचे बांस चार कोनों पर गाड़ उमौके ऊपर कपड़े को बांध देय और बोधमें कपड़े के ऊपर एक साफ इंट रख और उस कपड़े के नीचे ठीक.बीच में एक मिट्टी का कलमा सिपाईपर रखदेय वह शीघ्रको हष्टिके जल से.मर जायगा। परन्तु प्रथम.२१३ पल जो दृष्टि पड़े उसे वायुस्थ धूलमैला" वा नाना रोगकृत जान त्याग तिसके बाद निमाल जल ग्रहण कर यहाजल सिर्फ दो या तीन दिनतक काम पासताहै। . स नारोग्य दर्पण। ६१ किसी कार्य को हानि वा उद्योग निष्फल होने से कौन ऐसा मनुष्य है जिसके पित्त में उदविणता न होती है, मनुष्य पर मोह आपत्ति क्यों न भान पड़े कभी धैर्यहीन न आना चाहिये, मनको सन्नदा मानन्द में रखने पाला मनुष्य पायुमान होता और एण्के भरीर को पोमाग्नि कभी दग्ध नहीं करसती है बुद्धिमानों का मन सर्वस्व नाम होने पर भी कमी शोक समुद्र में नहीं आता वे लोग परिणाम देखकर कार्य सिद्धि होने का उपाय करते। मनुष्य को यह भी उचित है कि जेसे दीमक धौरे २ वाल्मोश (बाँयौ) को बनाती है वैसे ही उपकारी जौषों को पीड़ा न देकर पर जन्म के सखार्थ धौरे धर्म का सवय करें। क्योंकि:- नामुत्रहि सहायार्थ पिता माता च तिष्ठतः । न पत्र दारं न ज्ञाति धर्म स्तिष्ठति केवलः । परलोक में न माता न पिता न पुत्र न स्वीन जाप्त माई सहाय कर सक्त हैं किन्तु एक धमही सहायक होता है । विचार करने का स्थल है कि मनुष्य पनेक उपाय (मिथ्या भाषणादि महा पाप ) करके पदार्थ लाता है और सब कुटुम्ब प्रानन्द से भोग लगाते हैं चैन करते हैं, परन्तु दीपभागी नहीं होते किन्तु अधम्म का कर्ता ही दोष का भागी होता है, फिर देखिये मरने पर मृतक परीर को बन्धुबर्ग ले म मान में जा ढेवे के समान भूमि में हाड़ कर पौठ दे विमुख हो चले पाते हैं कोई उसके साथ जाने वाला नहीं होता फिन्तु एक धर्मम ही उसका संगो होता, हाय वे कैसे नरई को ऐसे सनी परम मित्रको त्याग कर देते हैं ! क्या यह नहीं जानते हैं कि मनुष्य अकेलाडी जन्म और मरण को मार हावाहै और पाप ही धमाका फल सुख तथा अधर्म का फल दुःख भोगता है। महाभारत के उद्योग पर्व में लिखा है कि मनुष्य कभी निकम्मा और प्रा. लौ न बने । सख, लाभ, मान, बड़ाई प्रादि पा के कभी हर्ष में मल न है। और न दुःख, हानि, पपमान और निन्दा सुनके रच्न और क्रोध करै क्योंकि अति हर्ष और भोक में मौनही भरीर में रोग होजाता है। गहस्थानियों को उचित है कि निम्न लिखित मनुष्य से सदा बचे रहें कभी उसका आदर न करें जैसा कि मनुलो ने कहा है।

द्वितीय खण्ड। गर्भिणी स्त्री के साथ सहवास करना तो सर्वथाहो निधि ऋपियों ने किया है परन्तु पातवें महीने से विशेष कर मैथुन करना निषेध है । जैसे ऋतुस्नाता स्त्री से सम्भोग न करने से एक बालहत्या का पाप होताहे वैसेही पूर्ण गर्भा- वस्था में प्रसंग करने से एक बालहत्या का पाप होताहै.॥ बर्षाऋतु में उपटन और तेल मर्दन करना, शरीर में माटी लगाकर कस. रत करना, कूप का नल और दुग्ध पीना, घोड़े की सवारी करना बहुत फायदा करताहै । पूर्व की हवा खाना, पानी में बढ़त भीगना, घाममें फिरना बद्त रूखा और गोतल भोगन, रोज २ मैयुन, दिन में सोना और नदी का जल पीना कदापि न चाहिये । जिनका मण हगेशा गंगा जल ही पौनेका है उन्हें मौ उचित है कि थावण भादों दो महीना न पियें क्योंकि बीकाल में बन, पर्वत, बाग इत्यादि स्थलों से सड़े मांस लता पत्ती और भी अनेक प्रकार का मैला बहकर नदियों में पाता है इससे बर्षा में नदी का जल विष समान होकर अनेक रोगों को उत्पन्न करता है, दूसौ लिये मास्तकारों ने लिखा? कि समुद्रगामिनी नदियों को छोड़कर सब नदियां वर्षाऋतु में रजस्वला हो- तो हैं स्नान उनका जलसेवन उमौ प्रकार निषिद्ध और हानिकारक है जैसे ऋतुबती स्त्री का सेवन-वर्षा में पाकामपतित धारा जल पमत समान गुण 'करता है क्योंकि वर्षाकाल में प्राकाश की वायु पत्यन्त भौतल होने से वहां जो निर्मल जलीय वाष्य सञ्चित है वह हिम होकर वृष्टि के पाकार भूतल में गिरताहै अतएव वह जल अधोपतित होते ही पूर्ववत् निर्भल व्यवस्था (परि- कार जल) को प्राप्त होता है यह जल भभके से खिचढ़ये जल से भी उत्तम जल है इसलिये उक्त जल वर्षाकाल में पौना विशेषकर रोगियों को प्रति गुणकारी है। "वृष्टि का जल.लेने का सहज उपाय" एक अच्छे साफ,बड़े कपड़े को ७।८ हाथ को ऊंचे बांस चार कोनो पर गाड़ उमौके पर कपड़े को बांध देय और बीच में कपड़े के ऊपर एक साफ. इंट रख पऔर उस कपड़े के नौवे ठीक बीच में एक मिट्टी का कखमा तिपाईपर रखदेय वह शीघ्रको हष्टिके जल से.मर जायगा। परन्तु प्रथम.२ १३ पल जो दृष्टि पड़े उसे वायुस्थ धूल, मैला" वा नाना रोगकत जान त्याग तिसके बाद निर्मल जल ग्रहप कर यहाजल सिर्फ दो या तीन दिनतक काममें भारताहै। . tra नारोग्य दर्पण। ६१ समुद्र में नहीं - किसी कार्य को हानि वा उद्योग निष्फल होने से कौन ऐसा मनुष्य है जिसके चित्त में उदविणता न होती हेा, मनुष्य पर कैमोह आपत्ति क्यों न पान पड़े कभी धैर्य हीन न होना चाहिये, मनको सन्चंदा मानन्द में रखने पाला मनुष्य पायुमान ताहे और उसके शरीर को पोकाग्नि कभी दग्ध नहीं करती है बुद्धिमानों का मन सर्वस्व नाश होने पर भी कमी भोक डूबता वे लोग परिणाम देखकर कार्य सिद्धि होने का उपाय करते। मनुष्य को यह भी एचित है कि जैसे दीमक धीरे २ वाल्मोश (बाँयौ) को बनाती है वैसे ही सपकारी जीवों को पीड़ाम देकर पर जन्म के सखार्थ धौरे २ धमाका सञ्चय करें। क्योंकि:- नामुत्रहि सहायार्थ पिता माता च तिष्ठतः । न पत्र दारं न ज्ञाति धर्म स्तिष्ठति केवलः । परलोक में न माता न पिता न पुत्रन स्त्री न जात भाई सहाय कर सके हैं किन्तु एक धर्ममही सहायक हेाताहै। विचार करने का स्थल है कि मनुष्य पनेक उपाय (मिथ्या भाषणादि महा पाप ) करके पदार्थ लाता है और सब कुटुम्ब प्रानन्द मे भोग लगाते हैं चैन करते हैं, परन्त दीपभागी नहीं होते किन्तु अधर्म का कर्ता ही दोष का मागी होता है, फिर देखिये मरने पर मृतक भरीर को बन्धुबर्ग ले म मान में जा ढेले के समान भूमि में हाड़ कर पीठ दे विमुख हो चले पाते हैं कोई उसके साथ जानेवाला नहीं होता किन्तु एक धम्म ही उसका संगौ होता, हाय वे कैसे नर जो ऐसे सही परम मित्रको त्याग करदेते हैं ! क्या यह नहीं जानते हैं कि मनुष्य अकेलाडी जन्म और मरण को प्राप्त होताहै और भाप ही धमाका फल सुख तथा अधर्म का फख दुःख भोगता है। महाभारत के उद्योग पर्व में लिखा है कि मनुष्य कभी निकम्मा और प्रा. लगै न बने । सुख, लाभ, मान, बड़ाई आदि पा के कभी हर्ष में मन न है। और न दुःख, हानि, अपमान और निन्दा सुनके रन और शोध करें क्योंकि प्रति ह और भोक से भीनही भरीर में रोग होजाता है। रहस्थायमियों को उचित है कि निम्न लिखित मनुष्य से सदा बचे रहे कभो उसका पादर न करें जैसा कि मतली ने कहा है।

हितोय.खण्ड. ६२ पापण्डिनो विकर्मास्वान वेडाल ति कान् शठान । हेतुकान बना हत्तीच्च वा मानेगापि नार्पयेत् ॥ (पाखण्डी) भीतर तो कपंट की वातरनी, दिखाने को जपरंसे भेप बनाये हो जैसे कि आज कल कितने ईसाई, सन्यासी बने लोगों को भ्रष्ट करते हैं और कसाई मिखा सूत्र धारण कर ब्राह्मणों के भेष से सैकड़ों गोनों को ले जाते हैं, (विकर्मस्य) जैसे विहान ब्राह्मण लोग प्रान कल लोभ मे ईसाइयों को संस्कृत पढ़ाते हैं, अपने धर्मखण्डन की व्यवस्था देते हैं, (वैडालहति) जैसे बिलार छिप और स्थिर रहकर ताकता २ झपट से भूपि को पकड़ मार अपना पेट भरता है वैसेही पाज कल सोना चांदी बनाने वाले भोर लड़का वाला. देनेवाले बाबा जी लोग रकम लूट २ कर मजा उड़ाते हैं। (गठं) अर्थात हठी दुराग्रहीं अभिमानी पाप जाने नहीं औरों का कहा माने नहीं जैसे हमारे निरक्षर सरयूपारी ब्राह्मण (हेतुक) कुती व्यथं वकनेवाले जैसे आज कल के स्वधर्म होन सिर्फ अंगरेजी बूं के हिनातियों के छोकड़े और स्वार्थ- परायण कोई २ सम्पादक गण जिस्से चार पेसा मिले कैसा कमाभ्रष्ट अंत्यज क्यों न हो उसकी तारीफ करने और काभौ प्रादिक ब्राह्मणों को कई कि वे मूर्ख हैं (बकवत्ति) बकुले की प्रति सभी जानते हैं वैसे आज कल के वैरागी और खाखौ आदि चेखा मूड़ छल छिद्र से लाखों रुपये ठग लेते हैं गांव खरीदते हैं, मुकद्दमा राड़ते हैं, गो भक्षकों को मालपुवा खिलाते हैं ऐसोका सत्कार वाणीमात्र से न करना चाहिये। मनुष्य को उचित है कि रोज़ सवेरे उठकर माता पिता को प्रणाम करे कोई अतिथि विहान संन्यासी को अथवा अपने कुल जाति के किसी को देखै तो अवश्य प्रणाम करै क्योंकि . अभिवादन शोलस्य नित्यं दोपसे विनः । चत्वारितस्य वन्ते आयुर्विद्या यशोवलं ॥ (१) मनुः ..जो मनुष्य सदा नम्म समोल विहान और हदों (माता पिता पादि) की सेवा करता है उसकी,पायु विद्या, कीर्ति और दख धे चार सदा बढ़तेहैं,यह भी चाहिये कि वैर बुद्धि छोड़के सव मनुष्यों से मेल मुलाकात और सदा मधुर सभोलता युक्त बाणो बोले परन्तु छलो दुष्टों का साथ कमी न करें क्योंकि संत आरोग्य दर्पण। जिस परह काजल को कोठरी में जाने से दाग लगनाता है साही दुष्टों के साथ में धज पुरुष भी पापयुक्त होनाते हैं। नानिम्मुखेनोपधमेन्न मान्नेक्षेत चस्त्रियम् । नामेध्यं प्रक्षिपे दग्नी नचपादौ प्रतापयेत् ॥ अधस्तान्नोपदद्याच्च नचैन मपि लइयेत् । मनुः ०४ अग्नि को मुख से न फूंकना (पग्निकण घड़कर मेघ में जाने से तथा वा- पोलों का रक्त जपा हाजाने से नेत्ररोग होनाता है) अग्नि में बिछा आदि अपवित्र बस्तु न डालना (वायु विष दूषित होजाती है ) पाव न तपाना (अति नाड़े के दिनों में भी पादको पग्नि में न तपावे इससे पाद दाह रोग होताहै) नी स्त्री को न देखना (वैराग्यवान पुरुष भी कामी होजाता है) पलंग के नीचे अग्निको न रखना (मायः देखने में पाया है कि खटिधे में भाग लग गई है ) अग्नि को न लडन करना और न पांव से छूना (इससे निश्चय पैरों में अगिया बराहो होगाती है) नख से पृथ्वी लिखना भिर को हमेशा रुक्ष रखना, बस्त रहित पलङ्ग पर सोना सूर्योदय और सूर्यास्त में सोना, हम २ कर भोजन करना मलिन वस्त्र धारण किये रहना त टुन्ध रहित रुच पदार्थ भोजन करना इत्यादि आरोग्य इक्षुक जन सदा त्याग करें । बहुत दिन जीने की इच्छा करनेवाला मनुष्य कपाट खोल कर न सोवे, बड़े राह में भी अकेला न सोवे, रजस्खला स्त्री से माषा न करे, रात को अकेला मार्ग में न चले, न बहुत कालतक पर्वत में वास करे, कांसके पात्र में पैर न धोवे, फूट पात्र में और जिस पात्र में मन की प्रसन्नता न हो उसमें भोनन न करे, अति भोजन न करे, दिशा पैमाव न रोके, बिना परीक्षा लिये एका एको किसी मनुष्यपर विश्वास न करलेय, विशेषकर रातको बिना छाने जल कभी न पिये भांग बूटी और पान माता पिता मित्र टहलू आदि से अतिरिक्त पुरुषके हाथ से कमी न खावे, जिससे एक बार शत्रुता हुई हो उसे कभी अपना मित्र न जाने, कोम भण हाड़ फूटा टूटा माटौ के पात्र का टुकड़ा, बेनटर भूसा इन सबोंपर न खड़ा रहै, वानर, न्योरा, बिल्ली और भेड़िया आदि-दुष्ट नौवों को न पाले, कोप से अपने भिर और के भ की प्रहार न करे, उपवास भी न करे, भोजन के उपरान्त बार-बार, भई रात्रि को और जो जलाशय नाना नहीं गया है उसमें स्नान न करें।

'द्वितीय खण्ड्। उम्र बढ़ाना चाहे तो भोग कम करे, जिसके निकल जाने में इतना सख है उसके रोकने में कितना सुख होगा यह बात विरने की पुरुष जान सके हैं। पगर चाहे कि बीमार न पड़ें तो पेट मर न खाय और छाती को हमेशा रक्षा करें। इनत के साथ रहना चाहे तो पा न ले और न किसीसे प्रश्न कारे, यदि चाहे कि जो मुह से कई बड़ी हो तो झठ न बोले । दुनिया का मजा चाहे तो मेहनत करके विद्या पड़े। पगर चाहे कि हमारे कोई भत्र न हो तो क्रोध न करे। दुनिया में सबसे मित्र बनना चाहे तो मोठा वचन वीन्ने परन्तु सत्य वचन हो । यदि चाहे कि इमेभा पारोग्य रहे कभी किसी रोगमें ग्रस्त न हो तो चारोग्यदर्पण में प्रातस्नानाधारभ्य भयनान्त पर्यन्त जो कभर मनुष्यों के लिये लिखे हैं उन्हें काम में लाये। अपनी आँख गैर जिहा को निरन्तर अपने वश में रक्खो। पपना कपड़ा और अपना शरीर पवित्र रक्सो प्रति दिन रात्रि को सोने के लिये जव पर्यच पर जावो तो जो कुछ तुमसे दिन में किसी किस्म का पस्कर्म ना हो तो वर से माफी मांगो पौर शपथ करो कि पुनः ऐसा न करेंगे। यदि कोई सकम्तमसे है। तो भूल जामी क्योंकि उसका स्मरण रखना प्रमिमान उत्पन्न करता है किसी की मड़ौ में पाकर अपने वित्त से बढ़कर काम मत करो नहीं पोछ पछतामोगे। जो भेद कहने योग्य न हो उसको कभी अपने मित्र से भी न कहो। अगर किसी से किसौका भला होता हो तो भांजी मत मारो और पञ्च बनके न किसीसे मिलो क्योंकि इससे बढ़ कर दूसरा पाप नहीं है । नव फिमी पुरुप से और कोई पुरुष बात करता हो तो तुम कभी उनके दोच में न बोलो क्योंकि लोग तुम्हें भूख सममें गे भूखं-को यह बड़ी पहिचान है जो विना पूछ बोल उठता है। जिस समय कोई पुरुष कुछ खा रहा हो तुम कभी उधर न देखो। जिस मार्ग में तुम्हारे पिता पितामह पल हो उसी मार्ग में तुम भी घलो परन्तु जो मत्यु- रुप पिता पितामह रहे हों, अगर दुष्ट रहे तो कभी उनकी राहपर मत चलो भूत पूर्व पार्यों के मार्ग पर चलो क्यों कि धर्मामा पुरुषों के मार्ग में चलने से दुःख कभी नहीं होता। विद्या पढ़ने का भोफ रखते हो तो दुष्ट विभयो जनों का संग, महादि नसे का सेवन पोर वेश्यागमनादि असत् व्यसन त्यागकरो यदि सके तो यथाशक्ति अन्न वस्त्र और पुस्तकादि विद्यार्थियों का कार झरो इससे बढ़ कर संसार में पोर पुण्य नहीं है". "विद्यादानात् परं दानं न Viya आरोग्य दर्पण। ६५ भूतो न भविष्यति" जल, पन्न, गौ, पृथौ पौर सवर्ण प्रादि मयखोकमें जितने दान है इन सब दानों में विद्या का दान अति श्रेष्ठ है यह जो आज कल राजा. महाराजा सेठ साहकारमादि प्रति दिन बुद्धि बल पराक्रमहीन होते जाते हैं क्यों ? विद्यादान न देकर कुणत्रों को दान देने से, कुपात्र कौन हैं ? महन्त, वैरागी, अंग्रेज और तीर्थों के पण्डे ! विमौ मित्र से जो वस्तु उसको पाव- श्यक की हो जहांतक बने मत मांगो । वीर पुरुष वही मनुष्य कहा जासका है जो विपत्ति के समय सन्तोष करे, हाय २ न करता फिरे। अहिंसापरमोधर्माः। इसे ऐसा मत मानो कि यह मूसे, वृथीक और गोजरों से भर जाय,खाट के खटमल और वस्त्र के चोलड़ों के मारने में भी दया लगे, व्याघ्रादि दुष्ट जीवोंके मारनेको हिन्ता नहीं कहते, उपकारी जीवों की रक्षा (गोरक्षा) में जहां तक हो धन लगादो चोर परिश्रम कर के गोरक्षिणी समास्यापित करो। पान कल के नवयुवकों ने यह एक सरल उपाय सोच लिया है और अपने तई ऐमा बाँध लियाहै कि बिना उसके पड़ी भर भी उनका काम पखना धाठिन है देखिये सब उनको प्रसङ्ग में रुकावट (स्तम्भन) नहीं होती तो भीघ्र ही कोई ऐसी पौषधि खा लेने का अभ्यास डाल लेते हैं जिससे उनकी मनी- बाञ्छा पूर्ण हो मितिने लोग वीर्यस्तम्भन के लिये केवल गांग अथवा मा ही नहीं पीते किन्तु अफीम गांजा चण्डू भी मेवन करने लग जाते हैं और उन वस्तुओं का अपने तई ऐसा बन्धन पोर नेह लगा होते हैं कि जिनका छुटमा जन्म पर्यन्त असम्भव होजाता है यही दमा विपली वस्तुओं की है जैसे - घसा, बचनाग, संखिया, धतूरा पादि । विपली वस्तुपों में कोई तो सहिया सेवन करते हैं, कोई कुपला, कोई बचनाग, कोई धतूरा पादि वस्तु सेवन कर अपने घरोर का राजा जो सम्पूर्ण पुरुषार्थ का देगेवाली रे उसको चणिक सर के लिये अनुषित रीति से हार कार कर जाते हैं। कितने लोग बाबा जी के गएडे पथवा तावीस पर ही अपना जीवन सम. भाते कितने वैध जी को गोली पर ही अपना पुरुषार्थ मानते हैं कितने मनुष्य तल पयवा हेपन (तिला) पड़ी पादि से स्वामाविक पर धर्म की बिगाड़ते हैं परन्तु यह धमकै सम्पूर्ण योग और उनको मनोवाशनिः- .

द्वितीय खण्ड। फेल और निष्प्रयोजनीय है यद्यपि उनको उस समय घोपधि अथवा नौनी बस्तु सेवन के बल पर कुछ ययेष्ठता जान पड़ती होगी और वैसा होना भी स्वाभाविक हे कारण यह कि नशे की वस्तुओं का स्वाभाविक गुण प्रत्येक नये पथवा और दूसरी औषधि के बलमे उम समय थोड़े काल पर्यन्त कुछ वीर्य रुक जाय तो कोई बड़े पायर्य की बात नहीं है पायर्य ही क्या जव पपने बल से कोई काम प्रत्यक्ष न हुआ तो दूसरे के दल मे पथवा पाधार से कितने दिन तक काम चल सक्ताई। स्मरण रहे कि उपरोक्त उपायों से मिवाय हानि के लाभ कुछ भी नहीं हां, लाम उन लोगों को कुछ है जिनका यौवन संपूर्ण नहीं तो प्राधा पवश्य बीत चुका है। उनके लिये स्वयं वैचाक भास्त्र में सक्ति युक्ति लिखी है और इन मनुष्यों को लाम भी उपरोक्त प्रकार से दृष्टिगाधर होसता है जिसमें किसी प्रकार की हानि नहीं जानी, परन्तु चाज कल के नवयुवकों को उपरील उपायों से लाम केवल क्षणिक है अनन्तर हानि ही हानि है। प्रथम यह कि नगीली अथवा विषेलो अथवा दूसरी वस्तु नो वीर्य स्तम्भन के लिये खाई जाती है उससे जबतक उसका गुण रहता है तब तक तो सुख मालूम होता ही है यह सब कोई जानते हैं परन्तु उसमें विचारना चाहिये कि जबतक नभा (तरङ्ग) मनुष्य में रहती है उसको गर्मी से धातु स्थान का सम्पूर्ण वीर्य पिघल कर मूत्र की थैलो में इकट्ठा होरहता है और ज्यों २ प्रसङ्ग पारिये त्यो २ वह पिघलताता हैई है परन्तु थैली में भी सब धातु पानी सोही रहती है और जहां नमा का बल, किचित् भी घटा तहां दवाडी जमी हुई धातु भीघ्रही बाहर निकल पड़ती है फिर क्या जव चार बार प्रसङ्ग करने पर जितनी धातु गिरती है उतनौ यदि एक ही प्रसङ्ग में वोये निकल जाय तो फिर भरीर का बल, नेत्रों की ज्योति,भूख भादि कम न हो तो फिर क्या हो। और यह भी प्रत्यक्ष है कि उपरोहा प्रकार जिस मनुष्य ने अपने तर बाँध लिये हैं उनकी परीक्षा भी उपरोक्त वर्णन के अनुसार होगई है अतएव मनुष्यमात्र को विभेप कर नवयुवकों को उचित है कि वीर्य स्तम्भन के लिये ऐसा भ्रष्ट अभ्यास कधी हालने का साहस न करें उनको चाहिये कि प्रथम ही से वे अपने प्रमूख्य भर के राजा का रक्षण करने में पालस्य छोड़ दे जिसमे पोई पछताना और हाथ न मलना पड़े और यदि उनकी किसी वि: ।

आरोग्य दर्पण। . चार मेष कारण से अधिक पुष्टता की आवश्यकता हो तो शास्त्रोमा बानीकरण पादि रसायन क्रिया का सेवन सहयों के उपदेश और सम्मति से करना उचित है। जो चाहे। कि हम किसी के फन्दे में न फंसें तो प्रत्येक विषय की मीमांसा करने का अभ्यास उत्पन्न करो और म.येक मनुष्य का सत्व पहिचानो । आनन्द से अपना जीवन काटना चाहो तो बिना विचारे कोई काम न करो "अग्रमोची सदा सखी" प्रथम भोचकर काम करने वाला सदा सुरन में रहता है। "शुष्क वैरं विवादञ्च न कुर्थात् केनचित् सह" बिना प्रयोजन के बैर और झूठा वकवाद किसीसे मत करो इसमें लोक- निन्दा और अपने को भी लज्जाप्रद है। जब तक जिसको परीक्षा न कर लो कदापि उसका सङ्ग न करो जिस प्रकार स्वर्ण को चार परीक्षा ३ ॥ "निघणं हेदन ताप ताड़ने घिसना वेदना ताव देना और पीटना तिस प्रकार मनुष्य की भी परीक्षा करले । "कुलेन शीलेन गुणेन कर्मणा" कुल भील गुणा और कर्मसे यदि चेत उक्त चारों में पूर्ण परीक्षा होजाय तब उसमे प्रीति मिलाप करना उत्तम होगा। सत्कमा में जितना होसके परि. श्रम करो जैसे गोरक्षा अनाथालय इत्यादि । अपनी प्रतिष्ठा चाहो तो.जब सभा में तुम कोई बात वाहा, सप्रमाण कहो। युवावस्था के दिन बड़े भयानक हैं, इनकी सत्कर्म करना परम पुरुयाथ है और जो युवावस्था में सत्कर्म नहीं करेगा वह फिर वृद्धावस्था में क्या करेगा, यह भूखों का कथन है कि हम हहावस्थामें धर्म करेंगे । किसी मनुष्य मे.त्यौरी पढ़ा कर बात मत करो चाहे वह मित्र हो चाहे शत्रु नब तुम्हारी वैसी प्रक्त पड़जायगौ तो हर एक से लड़ना पड़ेगा। मित्रों को सहायता और माता पिता की प्रतिष्ठा एवं धन पर ही भरोसा मत रक्खो वेदादि यत- विद्या तथा कार्य कालिक विद्याध्ययन कर अपने लिये भी उनता सम्पादन | करो। विद्या से मनुष्य को बुद्धि बढ़ती है और यम का प्रकाश होता। एवं अनुभव उसका हद होजाता है जो लोग विद्या के अनुरागी में उन्हें चाहिये कि नित्य संध्या के समय यह सोचे कि भाजके दिन कितनी नई बात निश्चय द्वितीय खण्ड। भई। इस मामा विधा मत सौखो कि जिससे केवल द्रव्य वा सांसारिश सुख मिलेगा वरच पपनेको मनुष्य और वुद्धिमान बनाने के लिये विद्यामीखो यदि संसार में अपनी कौत्ति चाहो तो सन्तानका विद्या और विनय सिखापो धन्य है उनके माता पिता को जो अपने शरीर पर अनेक केश राह कर भी सन्तानों को विद्या पढ़ाते हैं, वह कुल धन्य और वह सन्तान बड़ा माग्यमान है जिसके माता पिता विहान है क्योंकि जितना मातासे सन्तानों को उपदेश और विद्या का लान होता है उतना किसी से नहीं, बड़ों का वचन है कि माता जन्म से लेकर सन्तान जबतक पूरी विद्या न हो सभी लता का उपदेश करे। सश्रुत का मत है कि माता पिता गर्भाधान के कुछ मास पूर्व ही से पोर माता गर्भाधान के पशात् भी मादक द्रव्य, मद्य, दुर्गन्ध लहसुन मान्सादि, वक्ष बुद्धि नामक पदार्थों को छोड़ के जो शान्ति, आरोग्य, बल, बुद्धि, पराक्रम और सु- मौलता को प्राप्त करे जैसे घृत, दुग्ध, मिष्ठान्न भादि श्रेष्ठ पदार्थों का सेवनकर कि जिस्म रलवीयं भी दषिों से रहित होकर अत्युत्तम गुणयुक्त हे।। प्रत्यक्ष है कि जैसा जिसका रजवौर्य होताहे वैसोही सन्तान उत्पन्न होती है। . धावृशिक्षा प्रथम खण्ड के पागे से। पहिले बच्चे को हवा खिलाना अंगका परिचालन और बच्चे के भयनस्थान पादिया बयान कर चुके हैं। पर जो निम्नलिखित वाते हैं उनपर स्त्रियों को अवश्य ध्यान देना चाहिये। बच्चे की कोठरी में भाग या दीपक इस ढबसे रखना चाहिये कि जन्मतुए की पांख उसकी ज्योति पर चमकने न पाये क्योंकि जन्मतुए बहुधा चम- कौली चौलों को इकटक लगाके देखने लगते हैं इससे प्रांख सम्बन्धी रोग होने का डर रहता है और गर्म ऋतु में अर्थात् चैत्र, वैभाख, ज्येष्ठ और भाषाद दून चार महीनों में बच्चे की कोठरी में पाग कमी न रक्खे क्योंकि कोठरी अति गर्म होने से बच्चे की देह में लाल २ दाग पड़नाते हैं। बच्चे को प्यार करना चुम्मा लेना हो तो ठीक वो के मुखके सामने पपना मुंख रखना चाहिये प्रायः गॅवरदल स्थियां या पुरुष पौछे या बगल मेंसे झट अञ्च का मुख थाम अपनी तरफ कर चूमने लगती हैं इससे हसिये में दर्द और ऐंचाताना हो जा सका है।

आरोग्य दर्पण। जबतक बालक बर्ष डेढ़ बप का न होजाय कमी अकेले सलामा न चाहिये क्योंकि निरे बचपन की बय में विशेष कर नाड़े के दिनों में दूसरे को देह का दन्द (ताप) न पाने से सवपूर्वक नौंद बच्चे को नहीं आती, जो स्त्री बहुत बेहोम मोती हे। अर्थात् सो जाने पर यह न मालूम हो कि.मैं कहाँ पड़ी है और न नगाने से जल्द जागे उसे चाहिये कि एक हाथ की लम्बी और फलाई को बराबर मोटी तकिया सेतो.समय ठीच में रख ले ताकि बच्चे का हाथ पैर न दबजाय । प्रायः देखने में पाया कि बाज़ २ स्त्रियोंके अलमस्त और अचेत सोने से बच्चे विचारे नीचे दबकर मरगये हैं। ऐसौर दुर्घटनाओं का कारण मूल में इस देभके पदृष्ट का दोष है क्योंकि इतनी छोटी अवस्था में सन्तान होने लगते हैं कि माता खुद पपने ही भरीर को संरक्षण में अचान रहती हैं तो फिर वह बालक का सम्भाल और देख भाल क्या करती हैं। व का मुख मेती समय कपड़े प्रादि से भूलकर भी ढका रहने न देना क्योंकि इस अवस्था में शुद्ध वाय श्वास के हरि फेफड़े के भीतर जाना बहुत उचित है अगर मच्छड़, दंश गादि कोटों के काटने का डर हो तो बच्चे को मसहरी के भीतर लेटाये या मुखपर जालदार कपड़ा डाल दै । निट्रा लगती समय चेत करके बच्चों के बदन का कपड़ा मुख्य करके गर्दन पर का तो पवश्य दौलाकार देना उचित है। जो बालक ग्य होता है वह दूध पीने के अतिरिक्त समय में भी माया ही करता है। इसमें कुछ शक नहीं कि अधिक सेोने से बालकों के शरीर में बलाधान पौर स्वस्थ्यमा प्राप्त होती है और अच्छे हष्टपुष्ट बलवान सड़के को भी कुछ काल पच्छी तरह नौद न लगने से दुर्बल और रोगो जाते इमो लिये अच्छा उपाय न करके यहां की घाएडाल स्त्रियां नीद पाने के लिये बच्चों को अफीम खिताने लगती हैं जिसे कि वच्चा और भी दुर्बल होरी २ धारने लगता है और पन्त में उस मूर्खा माता के मुख में कालिख जगा यमा- लय को पला हाता है, इस बात का अनुभव किमको न होगा? पच्छ पढ़े लिखे लेाग ता पयम्य हो कर देंगे कि इस बच्चे को मृत्यु पफ्रीम कोर छ । यद्यपि दालकों को अधिक कानता आवारमाबड़त हो उत्तम है परन्तु किसी कारण वम अगर बच्चे को जल्द नौंद न पाती है। तानी मग द्वितीय खण्ड। - जाने के मतलब से कुछ पौषधि प्रादि देमा अनुचित है कारण यह है कि अलीर्ण या पेट में पौड़ा से वक्षों को सखनिद्रा नहीं लगती अतएव नोंद लगती न देख के पेट साफ कर देना प्रत्यावश्यक है। निम्नलिखित बातें बच्चेवाली स्ति” को अवश्य.याद रखना चाहिये । जैसे सन्तान के भयन का खटाला बढ़ा छोटान होके फरहरा होना चाहिये। धात्रौ बच्चे का मुख पपने पैट में दवा के न सुलाये क्योंकि वाम सक जाने का उर है, ऐमा हुमा मौ है। वालक पैट केया (मुहके वंश)न सेले पावे बच्चे को चित्त या करवट सलाना उत्तम है। माता अपने सोने के पूर्व वय याद करके देख लिया करें कि बच्चे का मुह कपड़े से फैमा तो नहीं है। बच्चे के सिर के नीचे एक नन्ही मी प्रति मुलायम तकिया जबर होगी चाहिये परन्तु ऐसी बड़ी बेढकी न हो कि कहीं दबाव आदि के कारण उलट कर बच्चे के मुह पर आ पड़े जिससे प्रवास रुकने का डर है, प्रारम्भ से तीन चार महीने तक वरावर रोजमर्रा माताको उचित है कि बालक मल मूत्र को देख के जान लिया करें कि वह मल मूष जैसा होना चाहिये वैसा ही है का कुछ अन्तर है यदि कुछ अन्तरर्थात् मूव कम करता या मूत्र करते काखता या मूध में पति गर्मास्ट दौखे माल. अधिक और पतला फटा २ मा दुर्गन्धियुत या एक दो रोन होता हो न दौखे तो तुरन्त उसका उपाय करें। वालकों को खांसी की दवा ।। अतीस, नागरमोथा और मुलेठी इन तीनों को बरावर ले कूट कर खूब महीन चूर्ण करले मात्रा प्राधी रत्तौमे ५ रचौ पर्यग्त है, बालकों की अवस्था माफिम मात्रा बना महद के साथ दिन में ४ बार चटाने से लाम होताहे यदि बालक न चाट सके तो पहिले महद में मिला बाद माता के दुग्ध में घोल कर पिलादे, डार लोग प्रायः पोकाकुपानां शहद के साथ चटाने को देते हैं और खिपिया कर डीभम पौडर भी कभी २ दे देते हैं लेकिन बालकों के में यह दोनों पौषधियां हानिकारक है पोकाकुभाना और हमारे देभी मार की जड़ की छाल का चूर्ण, गुण में दोनों बराबर में और डोस पी. डर में पफीम और इपीकाकुभाना आदि वस्तुयें मिली हैं, पर आज कल के लोग डाक्टरों को धन्वन्तरि का अवतार मान लियाई ।

'आरोग्य दर्पण। १ शौतला। HAL . बहुत से रोग है जिनका यत्न यथार्थ न होने से वह रोग बढ़ कर प्राण हरण करता है परन्तु हैना चोर भीतला कौ बीमारी यह तो यनरहित रोगी को भौघ्र ही यमालय पहचा देती है। इस रोग का भी आदि कारण विष दूषित वायु है, देखा जाताहै कि ऋतु के परिवर्तन में जिस तरह फसली ज्वर या हैजा एक के होते. ही नगर भर में फैल जाता है उसी प्रकार मौतला का भी स्वभाव है जहाँ एक को निकलौं तो उसके हेलमेल से और को भौ पदबटा के निकल जाती है वैद्यक में भौ- तला को मसूरिका और विस्फोटक रोग भी कहते हैं और बङ्गालमें इसे वसन्त कहते हैं, यह रोग माया लड़कों के अधिक होता है अच्छौ तददौर और पौषधि न करने से हजारों लड़के विचारे बिना मौत के मर जाते हैं। देखा गयाहै पर, अफसोस यहाँ के अज्ञान हिन्दू लोग सिर्फ देवी देवता के भरोसे रह कठिन माता में भी दवा नहीं करते, कहते हैं देवी नारान हानायगी बस इमो अज्ञानता से असंख्य लड़के अकाल काल ग्रास होत नते हैं, बहुधा नेत्रहीन या काने होनाते हैं और बहतों के हाथ पैर लक्ष या टेढ़े होजाते हैं। आज अल सरकार की तरफ से टीका लगाया जाता है और एतद्देशीय लोग अपनी बुद्धि बिहीनता के कारण इससे डरते हैं परन्तु यह कोई नई बात नहीं है प्राचीन लोगों की ज़बानी सुना जाताई कि इस देश में भी पहिले जब सरकार की तरफसे टीका लगाना नहौं नारी प्राथा) माली वगरः टीमा लगाते थे पोर उरखे बड़ा लाम होता था। साधारण लक्षण । विष दूधिर वायु स्वस्थ भरीर में प्रवेश करने से प्रथम तीन चार दिन बालक को ज्वर पाता है मुख सुखं रहता है प्यास लगती है बाद परीर में एक मषार छुद्र २ फुन्सिया निकल पाती है और छः सात रोज में मवाद भर पाता है पोर फुन्धियां बड़ी होजाती हैं किसी २ को भयानक ज्वर भी बना रहता रोग साध्य रहने से रोगी पन्द्रह सालह दिन में पाराग्य हो जाता है यह रोग एक जन का दावार नहीं होता और किसो २ कोदो बार पाभी है। १-साधारण गोतला को बिमारी में पोषध न देय यदि काई उपद्रव सेकधिक ज्वर, बहुत रोना, बदन मापना नौद का न पाना बारम्बार द्वितीय खण्ड। चौक उठना या अनर्थक बकना इत्यादि होता अवश्य शैषध करना चाहिये। २-रोगी को खूब ठणे मकान में रक्से और दरवाजों में खस या जवासे की टट्टी लगादे और कुछ नौम को टरियां बांध दे क्योंकि इस रोग में शीतल उपचार एवं निम्बपत्र का बन्धनवार बांधना पति हितकर है, लिखा भी है:- शीतलासु क्रियाका- शौतलार नद्यासह । वधियान्निम्ब पत्राणि परितेभवनान्तरे । भौतलारोग में रक्षा के पर्थ सब गौतल हौ उपाय करना और घर को भीतर चौतरफा नौंव के पत्ते बांधना उत्तम है दरवाजे में एक हौद पानी से भर कर रख दे घोर दरवाना पानी से हर समय तर रक्खे। ३-रोगी का विछौना सफेद और वङ्गत मुलायम हो एवं मेला होने पर मोघ्र ही बदल देना चाहिये । ४-जिस घर में रोगो हो वहां अग्नि चौर तेज रामनी न रहनी चाहिये यही कारण है जो मौतला देवी को पूजनमें हवन नहीं करते परन्तुः- कृमिपात भयाच्चापि धपयेत्सरलादिभिः । विष दूषित वायु के निराकर्णार्थ एवं बहतीहुई माता में कृमि न पड़ें इस वास्ते राल लाबाग वगैरह का धूप कभी र रोगी के और समस्त घर में देते रहना पति उत्तम है। ५-कोई कानुथ राखं वस्त्र धारण कार, पान खाकर, माथे में लाल टीका दे के या लालवस्तु ले के रोगी के यहं में न जाय, कारण यह कि ऐसे रोगी को प्रांख में सर्ख वस्तु को चमक न पड़नी चाहिये। ६-यदि रोगी बालक, माताका दुग्ध पीता हो तो उस माताको सिर्फ मूग को दाल नवा या गेई को रोटो, पुराने चावल का भात और गो का दुग्ध खिलाना पाहिये खेत या हरा वस्त्र पहिरे बहुत यम, क्रोष पोर उपवासन करे भोर में तेल न लगाने कारण यह कि कदाचित् बच्चे को देह में तेल लग जाय क्योंकि कांदण विधानच तेलादीन् वर्जयेचिरम्। इस रोग जैसा कोई का विधान वैसा ही उपचार करना परंतु तेखा दिकों का वधुत दिन दवाव रखना चाहिये। भ STA आरोग्य दर्य। ७-जब तक भीतला की बीमारी न पाराम है। घर में पूरी कचौरी बरा मसाले दार कलिया पादि व्यंजन न बने न मद्य का प्रचार हो क्योंकि भूजने तलने की भव्द एवं गर्म महक से रक्त कोप को प्राप्त होता है। अथ विस्फोटक। (बड़ी मात का कारण)-यहरोग, अति खट्टा तीक्षा (मिर्चा) गर्म दाह- कारक, (सिरका) क्षार (राई) द्रव्य के खाने से अशौर्ण से धूप में रहने से, ऋतु के विपरीत होने से (जाड़े में गर्मी और गर्मी में जाड़ा) बातादि दोष कुपित हो चर्म में घुस मुह रक्त को दूषित करके भयानक विस्फोटक रोग को उत्पन्न करते हैं, यदि उक्त कुपथ्य धाट ने किया तो माता का न हो के दुग्ध पीने वाले बच्चे को वही रोग होता है परन्तु प्रायः देखने में पाया है कि बच्चे को मसूरिका अर्थात् छोटौ माता अधिक निकलती हैं। वड़ी माता का स्वरूप ॥ अनिदग्धानिभास्फोटाः सज्वरारक्त पित्तजाः बाचित्सर्वत्र वा देहे विस्फोटा इति ते स्मृताः ॥ जैसे कि माग से नले के फफोले होते हैं वैसे ही फफोले देश में एक जगह अथवा समस्त देश में रक्त और पित्त के विगाड़ से ज्वर रहित पड़ जाते हैं उन्हीं को बड़ी माता कहते हैं। वाताधिक्ष्य में शिर दर्द फफोलों में दर्द और कुछ कालापन ज्वर प्यास और जोड़ों में दर्द होता है। पित्ताधिक्य में ज्वर, दाह, पङ्ग दर्द पिपासा फफोलों का जल्द पकना बहना और रङ्ग में पौला एवं बाल होता है। कफाधिक्य के, अरुचि फफोलों में खान चौर रह में पाण्डु, वेदना रहित और बहुत दिनों में पकता है हम्दन में २ दाय के लक्षण मिलते हैं। निदोप लक्षण। जो पिलोटक घिदोपज होता है सो बीच में गहिरा, किनारेचे कठिन अधपका दाऽयुत सलामो लिये, सया, देनौ, चांति मुझ, पोड़ा, स्वर, द्वितीय खण्ड। प्रलाप कम्पन और झपकी रन लक्षण युक्त उक्त रोग वहत कठिन होता अच्छा यत्न न होने से रोगो मर जाता है। रक्ताधिक्य और पित्ताधिक्य दोनों का लक्षण एक है। उपद्रव ॥ हिक्कावासोऽरुचिस्तृष्णा अङ्गसादोहदिव्यधा। विसर्पवर हलासा विस्फोटानामुपद्रवाः । जो विस्फोटक रोग त्रिदोषन हो और हुचको प्रवास, पियास अङ्ग मिथिल हृदय में पीड़ा, विसर्प ( फफोले फटनांय लासा सरीखा पानी वहै) ज्वर और जी मचलाता है। तो पसाध्य जानिये, इस अवस्था में अच्छे वैद्य का काम, है। विस्फोटक को चिकित्सा, छोटी माता का बयान और टीका लगाने का प्रकर्ण आगे लिखेंगे। मसूरिका (छोटी माता) इसका मी आदि कारण वही है जो बड़ो माता का है। मसूरिका के पूर्व रूप में ज्वर, खजुरी, भरीर में ऐंठन, पचि, भ्रम, त्वचा में सूजन, पन और नेत्र लाल होते हैं। प्रायः छोटी माता सरसों याराई के सरीख दाने निकल कर पांच ही चार दिन में मुझीय जाती हैं। दोपों के अधिक कोप होने से अपने २ दोपानुसार मसूर के सदृश सुख पीले रुखे बीव्र वेदना युक्त कठिन एवं देर में पकने वाले होते हैं त्रिदोष में नीले रंग की चिपटौ बीच में गहरी बगत काल में पकने और पीव बहने वाली होती हैं। - चांपीड़िका माता। ये माता औषधि के योग्य नहीं होती हैं। इसमें कद का प्रवरोध, तन्द्रा प्रलापादि अनेक उपद्रव होते हैं। एक रोमान्तिका नामक माता होती । वे रोमछिद्र समान अंधी लाल रज की होती हैं। और भी सप्तधातु गतादि मसूरिका के लक्षण हैं परन्तु ग्रन्थ बढ़जाने के भय से सम्पूर्ण नही लिखा नामता ..

आरोग्य दर्पण। ७५ ,असाध्य लक्षण। प्रवाल (मूगा) सट्टा लाल, जामुन सरीख काली, अलसी के फल के समान तथा लोहे की जाल के सदृश होने से कठिन चिकित्सा समझनी चा- हिये। जिस माता के निकलने में खांसी, इचकी, बेहोशी, तीव्र ज्वर, प्रलाप बेचैनी, मूछो, या, दाह, घुमरी, मुख नाकसे रक्त गिरना, नेत्र अति लाल कण्ठ में धुरधुर शब्द, प्रवास और अति उसास हो तो जानना कि यह निश्चय मरलायगा। मसूरिकान्ते शोफा खात्कर्षरेमणि बन्धके । तधास फलकेवापि दुचिकित्खासदारुणः । माता के अन्त में किङ्गनी, पहचा अथवा कन्धे में सूजन भाव तो असाध्य ही समझना। भास्त से अतिरिक्त परीक्षित पसाध्य लक्षा--कई साल की परीक्षा से निसय छपा है यदि माता को पाराम होने के बाद तीव्र ज्वर, अति प्यास, शांफो, गले में दर्द दस्त पतला हे यदि उस अवस्था में सहध हारा यथार्थ चिकित्सा न होगी तो नियय है कि उसके यकृत (लीवर) में भोय भौघ्रही मानायगी और पाश्चर्य नहीं कि किसी न किसी रग में रह जमकर फोड़े होजांय । जम रोगी को पानी पीने में क्लेम होगा अर्थात् प्यास हो परन्तु जल समीप जाते ही अनिच्छा प्रकट करे तो जबर है कि तीन चार दिन में रोगी मरजायगा। सन् ८७ में बहुत से लड़के उक्त कारण से मरे हैं, डाकर लोग देभीय चिकित्सा न जानने के कारण रोगियों की दमा को अनारेलो दवा ६१ के पोर मी गड़बड़ सड़बड़ कर डालते हैं अन्त में मौ नहीं नाम मक्त कि इस रोगो को मत्यु का कारण ठोक क्या पन्हें अपने स्वार्थ साधन से काम पाहे भारत वने वा बिगड़े, रहे हकीम सो उनसे माता को बीमारी में बहुत कम सहायता ली जाती है सो भौ हिंदुओं के यहां बिलकुल भी नहीं पोर निस किस्म के वैद्यों का पाल कल चार है वे लोग न तो किसी सद्गुरु के रारा मिचा पावे न उस भारत का मभ बूझे शिजिनसे इन महा कठिन रोगों की जानकारी और उनके पारोग्य करने की योग्यया प्राप्त हो. ।

नारोग्य दर्पण। ७७ भक्ति दक्षिणा या फीस देकर टीका लगवाती थी वही अब बरेली टीका पालो को गोदनहरा के नाम से कह कर ऐसौ घणा रखती र पिसब लोग थोड़ा २ चन्दा कर के टीकावाखों वो इस लिये राजी करते हैं कि वे उनके चालकों के टीका न लगावें। इस में विशेष कारण टीका से परहेज करने का यही है कि टीका के रिश्ते में अधिक मुसलमान होते हैं यदि अच्शेष मिष्ट पढ़े लिख हिंदू विशेष कर ब्राह्मण टीका के काम में नियत किये जाय तो यह काम पूर्ण रूप से प्रचलित है।जाय नहीं तो रंगद्ये काग़ज़ सर्कार देख लिया करे कार्रवाई कुछ और ही होती है जिसको हम जानते हैं। हमारे विचार में टीका दिलाना बहुत अच्छी बात है पर जिनमे न हो. मी १५ संख्या के लेखानुगर रोग का यत्न करो और माता पूज जाने के बाद कभी धोखा मत खायो तुरन्त भूभल भोपध हारा प्रवस्थानुसार (गीतल धौनी का चूर्ण १ । २ रत्ती दो २ घण्टे में जल के साथ पिलाओ) पाभ्यन्तरिया जपाता साफ यार के तत्पयात् कुछ दिन पर्यन्त जैसे सरबत पनार, सरबत मन्दल, सरबन बमप्पा, सरयत नीलोफर, सरबत उन्नाब, पकं गुलाब, अर्क धनिया, अकं कासगी, या कामनी को पत्तों को कूट दार रस निकाल ले या फाड़ ने उस में मिनी डालकर पिलावे, रुधिर के साफ करने में इसके बराबर दूसरी प्रौषध गहौं है परन्तु कासनी के पत्तों को धोना म पाहिये क्योंकि उसका पसर जाता रहता है। माता की चिकित्सा। उपद्रव रहित माता में सेवाय वाघ यन के धौपध न करना चाहिए। यदि ज्वर हो तो तान न करना बहुत हवा में न रखना, यमी २ मांग का चूर्ण देश में लगा देगा। माता के प्रारम्भ में तीन दिन दोनो समय दो गोन दामा कालीमिर्च के साथ रुद्रात को बासी पानी में घोट फार पिथावे जव देखे किमाता का जोर नहीं घटता है पिलाना बन्द कर देय । यदि माता उम- इती न दीखे तो एक दो पदाम का पानी में भिगा कर देय। हिच्या निकाल पानी में घोट कर पिया देय या ऐमही पिला देय, दिन में दो तीन दफे देने से बैठो हुई माता बल मर पाती है।

द्वितीय खण्ड । अंगर रोगो वाला बहुत रोवे और अपने हाथों में देश खनुवावे और बदन नीचे तो पोरने के सूखे हो या एक फल को दाधन्त कर एक मही के पाप में रात को भिगा दे चौर सवेरे खूद मल कर छान ले. पोर जरा सी मिश्री मिला कर पिला देसी प्रकार सर्वरे भिजावे तो मांम को पिलाये। - बाले वनों के पैर के तला चोर हथेरी में भी माता निकल पाती हैं जिर को खलुवा अधिक जलता है पाहिये कि पांवल के धोवन से दिन में कईवर तलवे को सौंप देंय। पाक काल में सब मसूरिकों को बायु सुखाता है तब हंहगा (रोपध) देना चाहिये गुच मुलेठी, मुनक्का, मौठा पनार और मिश्री संयुक्त दुग्ध फाड़ के उसौ का पानी पिलाना इस्मे जल्दी पकती है और वायु भी कोप नही करता परन्तु पाक देख लेना । अगर वायु कोप से पेट में दर्द पेट फूलना भरोर ऐंठन या कम्पन हो तो किश्चित् सेंधव नोन युक्त मसिरस के साथ कुछ मोनन देना, थोड़ी सी विजयसार को लकड़ी पौर खैर, सेरमाध सेर पानी में गरम कर छान ले गौर वही पानी पीने को देय और पाबदस्त लेने के लिये भी उसी माल को रक्खे । मुख में छाले पड़ गयेही या महीन २ फुन्धियां (माता) निकल पाई है.तो जाई के पत्ते, मजीठ, दारुहल्दी, सपारी, मां- वला और मुलेठी इन सबकी सम भाग में १६ हिस्से जल में चाय कर कुल्लो कारावे यदि पति बालक है। तो खेत खेर सुपारी दोनों को पानी में पोस लेप कर देय। दगापूर्ना पोर मुझेठी को पानी में घोट. उसे अधिक पानी में घोलकर रोज २ उस जल से रोगो की पांखों को सौंपने से नेत्र नाम या फूली पादि पड़ने भी भय नहीं रहता । यदि माता यहती हो तो बड़, पीपर, पाकरि, गूलर और ग्राम इनको छाल यो पत्रों को खुश्क घूर्ण कर वुरकावे, किसी किसी का मत है कि जालो कण्डों की राख बुरकाना प्रति खामदायक है। माता मैं कृमि न पड़े इसलिये कभीर राल लोबान प्रादि की धूनी देना भी उत्तम है। अगर माता के फोड़े दूषित हालांय तो भौघ्र ही जोक लगवा कर. रस निकलवा ॥

आरोग्य दर्पण। शीतला को टीका वा छाप (लिम्फ) -- पूर्व में यह बात लिख चुके हैं कि पूर्वकाल में माली लोग टीका लगाते थे उसो का अनुकरण प्रय सरकार की ओर से होता है, इसमें एक नहीं कि टीका लगाने में माता का जोर घट जाता है और टीका लगाने में बच्चे को कुछ कम भो नहीं होता है परन्तु अजान बस खोग इससे डरते हैं मरफार वौ तरफसे भो प्रथम हिंतुस्तानी के रोयानुमार टीका लगाया जाता था वह यह था कि चेचक के दाने में से जरामा चेप लेकर भलाका (नस्तर) की नोक में प्रारोग्य बालक के बाद में धर्म के प्रभ्यन्तर प्रवेश कर देते थे बस जब पावला पड़ गया तो उसी का चेप लिया या जब दाना मुरझाय गया तो दिष्ठली को उतार कर उममें लग सा पानी डाल महीन घोंट लेई साबमा टौका के काम में लाते थे पौरव भो कितनी जगहमी तरह से टोका लगाया जाता है परन्तु प्रायः देखा गया कि टीका लगाने पर भी कालान्तर में माना निकल जाती हैं। k पचामो वर्ष गत हुमा होगा कि डाकर जेनर नामक एक अंगरेज ने गायन टौका का प्रकाश किया प्रर्थात् गोगों के थनों पर जो दाने निकलते ६ उसके चेप से टीका लगाना प्रचार किया और उसका नाम "वैफिस नेसन" रक्सा प्रश्न अधिकतर सर्वत्र उसी से टीका लगाया जाता है और इस बात क लिने सरकारी कानून होगया है कि जब बच्चा कुछ सयाना हैगाय तो उसके मा बाप उसे अवश्य टीका लगवा देवें और बाज २ यह कहते हैं कि सिर्फ मुम्बई के लिये सरकारी कानून है.अन्य देशों में ऐसा कानून नहीं है परन्तु गवन्नमेण्ट की ओर से टीका लगानेवाले हिंदू मुसल्मान दोनों जाति के लोग नियत हैं और जो कोई इच्छा प्रकट करे कि हमारे बच्चे को टौका लगा देखो तो वे नियमित लोग धर्मार्थ टीका लगा देवें और २ होपों में इसका अधिक प्रचार है। विलायत में एक भी लड़के ऐसे न निकलेंगे कि जिनके टोका न लगाया गया हो, इसमें शक नहीं कि टीका लगाने से बहुत अधिक लाभ देखा गया है और हिंदू लोग जो प्रायः उससे डरते हैं, कई कारण हैं प्रथम तो यह कि देवी अप्रसन्न होगी। दूसरे प्रशिक्षितों में पूर्व हो यह एखाखात जमे है कि मरकार अपने मतलब (जिसकी बाइ से दूध निकलेगा उस बच्चे .

द्वितीय खण्ड। अंगर रोगो बालम बहुत रोवे और अपने हाथों से देह खलुवावे और वदन नोचे तो पोरने के सूखे दो या एक फल को कुचल कर एक मही के पाप में रात को भिगा दे और सवेरे खूब मल कर छान ले और जरा भी मिची मिला कर पिला देसो प्रसार सवेरे भिजावे तो भांम को पिलाये। वाजे बच्चों के पैर के सलश और हथेरो में भी माता निकल पाती हैं जिसे की सलुवा अधिक जलता है चाहिये कि चांवल के धोवन से दिन में कईवेर तलुवे का सौंच देंय। पास काल में मब मसूरिकों को वायु सुखाता है तब वहण (सरपोषध) देना चाहिये गुचं मुलेठी, मनका, मीठा पनार पोर मित्रो संयुक्त दुग्ध फाड़ के उसौ का पानी पिलाना इससे जल्दी पकती है और वायु भी कोप नहीं करता परन्तु पाक देख लेना । अगर बायु कोप से पेट में दर्द पेट फूलना परोर ऐंठन यो कम्पन हो तो किञ्चित् सैंधव नोन युक्त मांसरस के साथ कुछ भोजन देना, थोड़ीगी विजयसार को लकड़ी और खैर, मेरमाध सेर पानी में गरम कर कान ले और वही पानी पीने को देय और शवदस्त लेने के लिये भी उसी जलसो रक्खे । मुख में छाले पड़ गयेहो या महीन र फुन्धियां (माता) निकल पाई हो तो जाई के पत्ते, मजीठ, दारुहल्दी, सुपारी, मां. वला और मुलेठी इन सबको सम भाग ले १६ हिस्मे जल में साथ घर वालो करावे यदि पति वालक है। तो प्रवेश खैर सुपारी दोनों को पानी में पोस क्षेप कर देय। : दगापूर्ना और मुझेठी को पानी में घोट. उसे अधिक पानी में घोलकर रोज़ २ इस नख से रोगो को पांवों को मौचने से नेत्र नाथ या. फूली पादि पड़ने का भय नहीं रहता। यदि माता बहती हो तो बड़, पीपर, पाकरि, गूलर और पाम इनको हाल यो पत्रों को खुमक पूर्ण कर दुरकावे, किसी किसी का मत है कि बालो कण्डों की राख बुरकाना पति लाभदायक है। माता में कृमि न पड़ें इसलिये कभीर राख लोबान पादि को धनी देना भी उत्तम है। पगर माताके फोड़े दूषित होनाय तो भौघ्र ही नोक लगवा कर रम निकलवा ॥

आरोग्य दर्पण। ७६ शौसला कौ टीका वा छोप (लिम्फ) पूर्व में यह बात लिख चुके हैं कि पूर्वकाल में माली लोग टीका लगाते थे उसो का अनुकरण अब सरकार की ओर से होता है, इसमें शक नहौं शिटौका लगाने में माता का जोर घट जाता है और टीका लगाने में बच्चे को कुछ लोप भी नहीं होता है परन्तु अज्ञान बस लोग इससे डरते हैं सरकार की तरफ से भौ प्रथम हिंतुस्तानी के रौत्यानुसार टीका लगाया जाता था वह यह था कि चेचक के दाने में से जरासा चेप लेकर थलाका (नस्तर) की नोक से भारोग्य बालक के बाद में चर्म के अभ्यन्तर प्रवेश कर देते थे बस जय भावला पड़ गया तो उसी का चेप लिया या जब दांना मुरझाय गया तो दिसली को उतार कर उममें जग सा पानी डाल महौन घोंट लेई सावना टौका के काम में लाते थे और अब भो कितनी जगह इसी तरह से टोका लगाया जाता है परन्तु प्रायः देखा गया है कि टीका लगाने पर भी कालान्तर में माता निकल पाती हैं ‘पचामी बर्ष गत हा होगा कि डाकर जेनर नामक एक अंगरेज ने गाथन टीका का प्रकाश किया प्रर्थात् गौगों के थनों पर नो दाने निकलते है उसके चेंप से टीका लगाना प्रचार किया और उसका नाम "वैकिसनेसन" रक्सा अब अधिकतर सर्वत्र उसी से टीका लगाया जाता है और इस बात क लिटे सरकारी कानन होगया है कि जब बच्चा कुछ सयाना हेागोय तो उसके मा बाप उसे अवश्य टीका लगवा देवे और बाज २ यह कहते हैं कि सिर्फ मुम्बई के लिये सरकारी कानून है.अन्य देशों में ऐसा कानून नहीं है परन्तु गवन मेण्ट की ओर से टोका लगानेवाले हिंदू मुसल्मान दोनों जाति के लोग नियत हैं पोर जो कोई इसा प्रकट करे कि हमार बच्चे को टीका लगा देणेतो वे नियमित लोग धर्मार्थ टीका लगा देवे पोर २ हीपों में इसका पधिका मधार है। विलायत में एक भी लड़के ऐसे न निकलेंगे कि जिनके टोका न लगाया गया हो, इसमें शक नहीं कि टीका लगाने से बहुत अधिक लाभ देखा गया है और हिंदू सोग जो प्रायः उसे डरते हैं, तो यह कि देवी अप्रमन्न देगी। दूसरे प्रशिक्षितों में पूर्व हो यह खालात लगे हैं कि मरकार अपने मतलव (जिसकी बाइ से दूध निकलेगा उस बच्चे कई कारण हैं प्रथम द्वितीय खण्ड। को सरकार खेमी) B टीका जारी किया, धर्मावलम्बीनी वयं मुसल्मानों से छूने मै घणा करते हैं वे किस तरह पपने वक्षों को उनसे टीका लगवाना पसन्द करेंगे कभी नहीं। प्रजावत्सल सरकार यदि दत्तचित्त से बच्चों को पारोग्य प्रदान करना चाहती है तो अवगेव इस काम में सिर्फ प्राण ही भरती करे इससे फिर हिंदूमात्रको परहेजान होगा। . टोका लगवाने के साधारण नियम । १-जितना भीघ्र बने बच्चे को भीतला कराल खपी परिष्ट वैचालने का उपाय पूर्व ही से करना प्रति उत्तम है। यदि बालक पारोग्य और सवल हो मोही मासको पयस्या टोका दिला देना कोई अंदेशा नहीं क्योंकि बच्चे की अवस्था जितनीही घधिक होती जायगी उतनी ही टीका का स्थान हाथों से गिखार विखार डापने का डर हे पोर एक बार छाप लगा देने के बाद यदि सात बर्ष बीतने पर फिर टीका लगवा दिया जाय तो माता निकलने का खटका जन्म पर्यन्तन होगा। २-खूब सावधानता से टीका ( प्रथम ही जांच लेयं कि इस सूची से किसी रोगी बच्चे तो नहीं गादे गये हैं इत्यादि) लगाना उचित है, टीका देने की दो तीन दिन बाद तीन चार दिन तक बहुधा बच्चों को धीमा ज्वर, मुह मुष्का, रात में पल्प निद्रा और किसौ २ को दस्त पतला बना रहता है रछः सात दिन बाद टीका के पह पीर गाँस उमड़ कर लाल हो जाता है और मीठी २ टपक भी होती है परन्तु तीन चार दिन के वाद पाप पाराम हो जाता है पोषध करना उचित नहीं है। ३-जिम में बच्चे टीका के स्थल को न मलने पाव इस लिये जन प्रणा या कुरता को पांही दौली रखनी चाहिये, टौका के स्थान में सूजन और दर्द. विशेष मालूम हो तो उसके चई मोर नारियल का तेल या मक्खन या घी लगा दे, टोका सूख जाने पर पपड़ी को हाथ मे न उचारे पापही पाप सूख पर गिर जाने देव पानी का बाप रखना लाभ दायक है।

आरोग्यदर्पण। ८१ आयुर्वेद । यह अथर्व वेद का उपांग है । जैसे ऋगवेदादिकों के उपांग धनुर्वे. दादि हैं। ब्रह्मा जी ने सृष्टि के पूर्व ही एक सहस्र अध्याय युक्त एक पक्ष श्लोक गायुर्वेद बनाया, प्रथम, एकही भाग या मनुष्यों का अल्प आयुष्य धुद्धि, पराक्रम तथा बीर्य हीन देख ऋषियों ने निम्नलिखित नामांसे लाठ भाग कर दिया ॥ १-शल्य (अस्य चिकित्सा) २-शालाय ( मस्तिष्क सम्बन्धी रोगों के लक्षण और शांति ) ३-कायचिकित्सा ( ज्वरादि रोगों को शाम कर- ना) ४-भूत विद्या (यंत्र मंत्र या दानादि उपाय) ५-फीमार भृत्य ( यात रक्षण, धात्री. शिक्षा ) ६-अगदतंत्र (विष पीड़ित मनुष्यों को चिकित्सा) 9-रसायन तंत्र ( शीघ्र बुढ़ापा न होने की विधि) -याजी करण तंत्र ( बौर्य एति तथा स्त्री समागम में अति जागन्द उत्पन्न होने के उपाय ) इसी के। मायुधैद का अष्टांग कहते हैं, जिन्हें विस्तार सहित जागे लिखेंगे। आयुर्वेद की परम्परा। मयम ब्रह्मा जी ने गायुधंद को प्रगट कर दक्षप्रजापति जी को पढ़ाया, दक्षमजापति जी ने पड़े पिद्वान सूर्य के पुत्र अश्यमीकुमार ar पढ़ाया, यह महाशय वैद्यक्ष के यहे मारी पपिस्त हुये, एक समप प्रला का शिर भैरय ने काट लिया था जश्वनीकुमार ने जाप दिया, तय से भीर प्रतिष्ठा हुई गीर या में भाग पाने लगे। देवासुरसंग्राम में दैत्य। से घायल हुये देयताशों का पाय तुरन्त अच्छा कर दिया, इसी विद्या पाठ से इन्द्र का भुजस्तंभ, पूपा के गिरे दांत, मग देवता के फूटे नेत्र मौर चन्द्रमा का क्षयरोग अच्छा कर दिया । भृगुवंशी रपयापी मांस के अंधे गौर जति एह हो गये थे श्वनीकुमार ने उन्हें एक ऐसी ८२. द्वितीयखण्ड। . औषध का जाल बनाय स्नान करा दिया कि यह अति सुन्दर कमन के समान नेत्र युक्त गोहर रूप १६ बर्ष के युधा हो गये, अश्वनी कुमार से पढ़ कर इन्द्र ने ग.त्रेय मुनि को पढ़ाया, जात्रेप पड़े भारी वैद्य हुये जिन्हों ने जायमंहिता नामक ग्रंथ रचा और अग्निवेश, भेस, नातूकर्ण, पराशर, क्षारपाणि और हरीत का जायुर्वेद पढ़ाया, वे मय महाशय भी अपने २ नाम की महिना और ग्रंथ रचते भये जैसे अग्निवेश रचित अ- जननिदान, भीर हरीत कृत हारीतसंहिता जादि । भरद्वाज़ मुनि। भाद्वाजमंहिता के देखने से ज्ञात दुगा कि एक मगप हिमालय के सन्निकटवर्ती स्थान में बड़े २ तेजस्वी स्वाध्याय में तत्पर ऋषिगण पर. स्पर विचार करने लगे कि धर्म, अर्थ, काम, और मेखि का मूल यह शरीर है और इसमें रोग होने से जप, तप, स्वाध्याय, धर्म ब्रह्मचर्य आदि मय नष्ट हो जाते हैं यहां तक की निरन्तर ख शरीर रक्षा की चेष्टा रहित होने से शीघ्र ही कालग्रस्त होगा पड़ता है इसलिये शरीर का पालग मुख्य कर्तव्य है ऐसा सुन सत्र की तरफ से भरद्वाज मुनि इन्द्र खोफ में गये यहां इन्द्र से आयुर्यैद का मूल तत्व प्राप्त कर लोट जाये उन्हों ने गार्यावर्त के गनेक ऋषियों को भायुर्वेद पढ़ाया गौर भरद्वाज संहिता नाम श्रेष्ट ग्रंप पनाया ॥ चरक मुनि। यह गहाशय मात्रेय मुनि के पुत्र हैं इनका दृत्तान्त इस प्रकार लिखा है कि जब भगवान ने मत्स्यावतार ले बेदों का उद्धार किया उमी यस्था में उक्त मुनि ने मांगोपांग आयुर्घद पढ़ कर गात गनुष्यों के कल्याणार्थ मर्त्यलोक में उसका प्रचार किया और पाकसंहिता. नामक एक ग्रन्थ अनाया इनको लोग शेप का अवतार भी कहते हैं ।

आरोग्यदर्पण। धन्वन्तरि। पुराणों से जाना जाता है कि धन्वन्तरि का जन्म समुद्र से हुआ है एक समय एन्द्र ने भारत के प्राणी मात्र को रोगातुर देख धन्वन्तरि से कहा कि आप मनुष्यों के कल्याणार्थ काशी के राजा का तन धारण करें तब धन्वन्तरि जी ने इन्द्र से पढ़ कर के काशी के राजकुल में जना ग्र. १७ किया और दिवोदास इस नाम से प्रसिद्ध हुये.यह महात्मा पाए अवस्थाही से विरक्त हे। अनेक तपश्चर्या में प्रत्त हुये परन्तु ऋषियों ने इनके काशी राज्यपद पर बैठाया, उक्त काशीराज बड़े भारी बैद्य हुये । कुछ काल के पश्चात् विश्वामित्र ने अपने पुत्र मुश्रुत से कहा कि हे वत्स दिवोदाम काशी के राजा साक्षात् धन्वन्तरि हैं तुम काशी में जानो नगसे भायुर्वेद अध्यपन करके लेफिका उपकार करो, सुश्रुत पिता की शाज्ञा स्वीकार कर एक सौ ऋषियों के पुधों को साथ ले काशी में गये और अष्टांग नायुर्वेद अध्ययन कर सांगोपांग समस्त ऋषि पुत्रों के। पढ़ापा और वैद्यों के उपकारार्थ सुश्रुतसंहिता अपने नाम का अन्य स्था, यद्यपि मनुष्यों के विविध कल्याण एवं देह रक्षार्थ भनेक ग्रन्थ पृथ्वी तन्न में विख्यात हैं परन्तु सुश्रुत जैमा निदाम शारीरक और शास्त्र निकित्सा शादि विषयों में मांग्रगण्य और माननीय है ऐमा दूमरा नहीं इसके अध्यापम मे घेद्या मम्बन्धी समस्त शंका मित्त हो जाती हैं ऐमा लिखा है कि जिन वैद्यों का सुश्रुस नहीं भाता वे चार हैं और राजा से पंप दगड पागे योग्य हैं। नाडीज्ञान। पायुर्वेदाभ्यामी (वैद्य) को संभ्यन्तर रोग के पहिला के लिये गाती साम भयश्य हे।गा चाहिये क्योंकि विमा नांदीशान के गेगको माध्या- माध्य परीक्षा भीर रोगी के जीने मरनेकी गयघि नहीं मालूम हो सकी ८४ द्वितीयखण्ड। जैसे वैद्यकशास्त्र के जाननेवाले को विशेष कर नाली की धान, हार का विशेष कर गिड्डा और आंख को पहिचान, हकीम को विशेष कर मूत्र परीक्षा में पित्त अधित देगा चाहिये । इमलिये विचार है कि अब हम अपने पाठकगणों को संक्षेप से वैद्यक के संपूर्ण गो का मसला दें कि जिसमे वे अपनी और अपने कुटुम्य मात्र की चिकित्सा कर लिया करें किसी मरी बैद्य या यामागो के घोसे में माफर धन और प्राण दोनों न गंवाई। जीव धारियों के स्थल एवं भूक्ष्म सब साढ़े तोग को गाड़ी हैं । समस्त नाही नाभि मूल में बंध पक गई और अधस्थिति हैं । ए६ मध नाड़ियां आपस में एक के साथ एक मिलेकाम शरीर के ऊपर भाग में जाल के समान बन्धी हैं जिसे अंगरेजी में (सेल्यूलारटिस) कहते हैं अ. धात् एक प्रकार जाल सदृश किली। इसी प्रकार मनुष्य के देव में माडे तीग कोटि रोग भी हैं और रोम (पाल) की उत्पति नाहियों को मल से है यो समग्र नाड़ी मुख द्वारा धर्म (पपीना) विन्दु श्राप देता है। नाड़ी तीन नाम से प्रसिद्ध है १ घमनो से। २४ में भोजन का शारभूत रस इन्हीं नाड़ियों के द्वारा बान होता है इस्मे इसे रस वाहिनी नामी कहते हैं । से नाभि मूला १० नीचे हो गई हैं यात मल मूत्र, शुक्र, गौर मन्त्र रस नीचे पहुंचाना उपका काम है १० अर्बु गामी हैं से। शब्द रस गंध स्थांस जंभाई एकार क्षुधा और तृषा शक्ति इन सब को अपनी शक्ति से ताकत देती हैं और दो २ तिर्यग (टेढ़ी) हे। के फैली हैं। नामी के मध्य में मुपनामामाकसमापी है जिनमें कि संपूर्ण नाशिपांजेककेसमान लिपटी हैं। दूसरी का नाम शिरा (भेइन) हे वे सात सी हैं यह रक्त को बहग करती हैं रमे रक्त बाहिनी कहलाती हैं। तीमरे का नाम म स्नायु जिसे अंगरेजी में (म) कहते हैं मुख्य गो से हैं इनका कामहे पसीगा को बाहर करना भीर उसी मूक्ष्म छिद्र द्वारा लेपन तेलगदंग आदि पदार्थ शरीर में प्रवेश करते हैं ।

भारोग्यदर्पण। प्रधान चतुर्दश नाड़ी। ईदा पिता २ सुषुम्ना ३ सरस्वती यारुणी ५ पूषा ६ हस्तिजिहः । पस्थिगी ८ मिश्योदरी कुहू १० शसिमी ११ पपखमी १२ शलम्युषा १३ गांधारी १४ यही चतुर्दश नाली हैं-तिगमें से १० नाही निम्नलिखित १० व्यायु के साथ दशेन्द्रियों के मार्ग में पहन करती हैं। दश बायु।. माण १ अपान २ समान ३ उदान ४ ब्यान ५ नाग | म्म ७ कूकर ८ देवदत्त ८ धनंजय १• यही १० बायु इड़ा प्रभृति दम नाड़ियों में संचार क- रते हैं। नायिका के बाम भाग में बड़ा, दक्षिण भाग में पिंगला और ब्रह्म रंध में सपना है इस तरह वाम नेत्र में गांधारी, दक्षिण में हस्तिजिद्धा, दक्षिण कार्णमें पूषा, वाम कर्ण में यमखिनौ, मुख में पलम्बुषा, कुछ और गुदा हार में शंखिनो इस प्रकार दश हार को भाय कर के दम नाड़ी स्थिति है। नाड़ी स्पर्शन बिधिः। वैद्य रोगी के कूपर ( कलाई ) भाग को अपने बाम इस्स हारा दवा के और दक्षिण हस्त की अंगुलिप्रय उस के अंगुष्ट मूल मैं बायुगति बिशिष्ट ना- डो को सर्वदा परिक्षा पार वेदा का कर्तव्य-वैद्य भौचानन्तर प्रातस्संध्यादि कर्म में निवृत्त हो सख पूर्वक घासन पर बैठ एकाग्र चित कर रोगी को मल मूत्र त्याग कराके नाड़ी का सीन हारा परीक्षा करें। पुरुष के दाहिने और स्वी के बायें हाथ को नाड़ो देखे । इसका कारण यह है कि “स्वीणा मूर्ख मुखं कूम पुमा पुन रधो मुखः" स्तियों के नाभि में कूर्म ( जो एक प्रकार की वृहत् नाड़ी है ) का मुख ऊपर और पुरुष अधोमुख है इस से खियों के बाम नाड़ी हारा भरौर के सुख दुःख का ज्ञान होता है और पुरुष के दाहिने हाथ के अंगूठे को जड़ में जो माड़ो चलतो हे प्रथम बायु की दूसरी पित्त और तीसरो कफ की मानना । वात की नाड़ो सर्प और जांक इत्यादि जान- है हितीयखगंड। वरों की भांति तिरछी बांको चाल से चलती है। पित्त कि कोपा हिरन और मेढ़क आदि की तरह फुदकती हुई चलती है। कफ की गाड़ी ईम और कबूतर की नाई धौंरो पाल से चलती है जब राग ही विकारों से होता है तो नाड़ी को चाल भी दो दोषों से मिश्रित हो जाती है जैसे वात और पित्त के विकार से जब रोग उत्पन्न होगा तो नाड़ो को चाल भौ सर्प और मेढ़क को चालों से संयुक्त रहेगी इत्यादि और भी जानना । सन्निपात अर्थात् सौनों दोषों के मिथिति होने से नाड़ी को गति तीतर और बटर को चाल चलती है। ज्वर के कोप में नाड़ी गरम और जलदौ २ चलतो है। काम और क्रोध में माड़ी बहुत जलदी, भय चिन्ता और भोका कौ नाड़ी क्षीण (धौरी) म- न्दाग्नि और, धातु क्षीण वाले को नाडो पति धौमौ चलतो. है। रक्त विकार वाले की नाड़ी गरम पौर मारो तथा प्रामातिसार , पादि उदर व्याधि वाले को नाडी लादे हुये भैंसा के समान धौरो और भारी चलती है। अग्नि दीप्त वाले की नाडी हलको और जलदी; पारेरोग्य, पुरुष को गाड़ी वलवतो भूख की नाड़ो चपल और भीजग किये हुये की नाड़ो स्थिर चलतो है । प्रकृत्यानुसार नाड़ी। बात प्रकृत वाले को नाड़ी शिक्षित् मौन और सूक्षा गति होती है, पित्त वाले को तप्त दीर्घ और अति मीन वाहिनों होती है, कफ वाले को भी रों और धीमी गति होती है। परन्तु सिर्फ नाडोहो के भरोसे न रह रागी वो भवस्था बलावल आदि ऊपरी दा को देख'ले जैसे कि दुर्बल, धातु चो- ण, दोध रागी भौर सजागा वाले को गाड़ो अति धीमी चलती है, भोर कफ वाले को भी धोमो चलती है पित्त वाले और कठिनाहारे की नाड़ी एक सौ होती है, किसी कारण से जब मनुष्य के सिर पर गरमौ चढ़ जाती है तो वह विहाय हो जाता है उस अवस्था में भी नांडो धीमो चलने लगती है, वेध लोग मौत की नाडौ जान रस देना प्रारम्भ कर देते हैं सुतरां रोगो मोही यमपुर का गमन कर जाता है बसं उस समय अवश्य भोधक यंत्र (लेकर) मादि सा अनुसन्धान करलेगा उचित है। इसी से प्रायः सर्वाङ्ग लमयों से अनमिन वैद्य धोका खाजाते है।

पारोग्यदर्पगा। प्रातःकाल में नाड़ी स्निग्ध मयौ, मध्यान्ह में उपणा, सायंकाल में बेग- वतौ और रात्रि में बेग रहित होती है यह स्वभावज गुण है । मृत्यु नाड़ी लक्षणम् । जिस रोगो को नाडौ क्षण में बेग से गमन करें और क्षण में धीमी हे। के बन्द है। जाय तो जानना कि सात रोज के भभ्यन्तर में इसको मृत्य अवश्य होगो॥ माम्यन्तरिक अतिशय दाह से यदि गाड़ी शीतल एवं अति मन्दगत हो तथा भीतर शीत होने से जिगको गाड़ी तण। गौर वेगवान हो जाती है तसकी मृत्यु निश्चय होती है । जिसकी नाही की गति ऐमी मन्द हो जाय कि देखने मे मिलकुल. पता न लगे चाहे यह रोगी को इन्द्रियां स चैतन्य हेपैठने उठने की शक्ति भी यही हो परन्तु वह तोग महर में जयश्य मृत्यु को प्राप्त होगा, ऐगा एम ने कई एक रोगियों को देखा है ॥ पतित:सन्धिताभेदो नष्टशुक्रशयाभवत् । गाम्यतेषिमय- • स्तस्य नकिञ्चिन्मृत्युकारणम् ॥ (पसित) नच्च स्थान से गिरा हो, मन्धियों (जोहे।) में चोट लगी हो, न शुक भात पीय रहित एतादृश मनुष्यों की गाड़ी मृत्यु सदृश होती है, परन्तु मृत्यु का कारण म जामना चाहिये । रोग रहित अपमृत्यु नाड़ी का लक्षण । शरीर में कोई रोग नहीं है गौर किसी कारण से मृत्यु हो रही है तत्समय माही मनिपात सदृश हो जाती है।

द्वितीयखण्ड। डाक्टरीय मतानुसारेण नाडीज्ञानम् । --- जन्मकाल में एक मिनिट में नाही की गति १४० यार होती है, तत् ऊई एक वर्ष पर्यन्त पारेरोग्य पालकों को नासरी १३० घार चलाती है, उसके ऊपर द्वितीय यत्सर पर्यन्त एक मिनिट के मध्य में ११० बार चलायमान होती है, द्वितीय वर्ष के ऊपर तृतीय वर्ष पर्यन्त १० बार गति विशिष्टा होती है, चियर्ष के ऊपर सप्त वर्ष पर्यन्त एक मिनिट में ० पार, तिमके ऊपर १४ वर्ष तक ८४ पार और चतुर्दश वर्ष के कई त्रिंशत् (३०) बत्सा पर्यन्त ८० यार तपा पंचाशत (५२) वर्ष पर्यन्त एक मिनिट में ७५ पार नाही प्रकंपमाना होती है, पचास वर्षके ऊपर सरशी सर्प पर्यन्त स्वस्थ्य मनुष्यों की नाही की गति ६० बार पालती है तत्प. श्थात् यपः और यस्ता मम सरफे उत्तरोत्तर नाही की गति क्षीण हेती है, उक्त अवस्याओं में पदि उक्त संख्या में अधित गाही की गति को सो गरमी जामना और न्यून हो तो मरदी जानना चाहिये । हातरी विद्या में नालीजाम का प्रकर्ण विस्तार पूर्वक नहीं है हमी कारण डा. करों से गाड़ी द्वारा राग का यथार्थ ज्ञान नहीं होता है । रोग परीक्षा। - पूर्व में नापी द्वारा रोगों की परीक्षा तथा साध्या साध्य गागने की रीति लिख पाये हैं परन्तु सिर्फ नापीको देखने से रोगों का पपार्थ शान' नहीं होता इसलिये नेवादि अष्टांग परीक्षा भी संक्षेपसे लिखताई पाशा है कि पाठकगण शयश्य इसे अवलोकन करके हमारे परिश्रम को सफल নয় এগা~-গার বা প্রাপ্ত ক খ গ গীতা না । তা पोर कुछ भीतर के दबे हुये और तीव्र उरादि रोगों में एकटकी लगाये देखते हुये होते हैं और बात प्ररुत मनुष्य की जांख प्रायः तेजेाविशिष्ट गो भारोग्यदर्पण। ८६ लाफ उज्याल और पुतली कृष्ण वर्ण होते हैं । पित्त रोग पालेके नेत्र पीत मायया लाल रक्त सदृश किम्बा हरे रंग के होते हैं दाह युत गौर दीप देखने में क्लेश होता है, पित्त मिजान थाले जम की गांखों में डाल २ होरे नेत्र बड़े कटीले और तारे अधिक कृष्णवर्ण होते हैं कफ कोपमें नेत्र धिक्कग हर समय में पानी भरा सा रहे श्वेत भन्दज्योति और तेजहीन होते हैं, इस प्रकृत वाले की आखें प्रायः श्वेत और बलवाग होती हैं मिश्रित दोपों में मिले चुले रंग होते हैं और त्रिदेोप ( सविपात ) में भप रंग मिल जाते हैं परन्तु रक्त वर्ण अधिक होते हैं । कम रोग में नेत्र पीले हरदी के समान, हलीमक में हरे, प्लीह ज्वर में कुछ नीले, म. माध्य तपेदिक ( यक्ष्मा ) में स्वेत दूध के समान अधिक रक्त प्राय और हैजे में रक्तिम धूमपर्ण एवं भीतर को बैठे हुये होते हैं । हृदययंत्र भी मूत्र और पित्त की क्रिया में व्यतिकम होने से उदररोग होता है । नाम रोग में पलक बन्द करने में कष्ट होता है, मिरगीरोग में पटक कम्पित, फुस २ मस्तिष्क और हृदय के रक्तारोध से नेत्र फटे से बड़े हो जाते हैं, उमप नपन रक्त समान डाल होनेसे मस्तिष्क (शिर) में सून जम जाने का योष होता है, शिर में अधिक रक्त उष्ण हो जाने से, सन्यास रोग (इस रोगर्ने मनुष्य मरजाता है) में एवं महिफेन द्वारा विषाक्त होने से नेत्रों के तारा संकुचित ( सिकुड़) जिवा परीक्षा। बात रेरोग में जीभ मागवन के पत्र के सदृश खरखरी रुखी चोर फटो सो होती है पित्त में लाल किम्वा धूमर वर्ण होती है, कफ दोषसे लिपी मोदी और श्वेत रंग होतो है, मिले दोषों में रंग मिला रहता है परन्तु सन्निपात में कुछ कालो हो जाती है, दापों के कम साप से जिला कां ज्ञान भी कम होता है। रताधिक्य दाह वसतः निहारा और लाल वर्ण एवं हेजा मूळ पोरर स्वास रुक नाने में मौतल, कंठ के भीतर अति दाह द्वितीयखण्ड। होने से कृष्ण वर्ण, यकृत् प्लीहादि भाभ्यन्तरिक यंत्र को पोड़ा से मरण समय जिद्धा घाव मुक्त होतो है। भारोग्य पुरुष की जिहा हमेमा गोलो और गुलावी रंग लिये होती है, । मूत्र परीक्षा। जो मनुष्य रात में पथ्य भोजन किया हो और मात. काल जन न पिया हो एवं प्रसंग मद्य पानादि किसी प्रकार का कुपथ्य रात में न पिया हो तो उसके मूत्र की परीक्षा बहुत उत्तम हो सक्ती है क्योंकि रात में तुपथ्च करने और प्रातरणमय जल पौने तथा मूत्र को अधिषा काल तक घर रखने से प्रकृति विलोम मूव का रंग हो जाता है रोगका साध्या साध्य तथा प्रकृति की परो- क्षा नहीं हो सक्ती है और यथार्य परीक्षा न करने वाले वेदा की जय हनन का पाप होता है, कहावत है "वेद्य चूके रोगो मारे वकौल चूके सुप्रक्किल" इस लिये वद्य को दत्त चित्त से मूत्रादिकों को परोक्षा करनी चाहिये। लेने की विधि शिवसंहिता से। जब धार घड़ो रात वाकी रहै रोगो को उठाय के किसी स्वच्छ सफेद कांच को सौमी में पहिलो और पिछलो थोड़े से धार को मतग कराय दीप की धार मात्र उसी सौमौ में कराय काग से तंतक्षण भोसो को मुख बन्द कर- देय क्योंकि हवा लगने से मौ पेभाव का रंग बदल जाता है। बाद उस सोसो को धूप में रख कर वर्ण आदि को परीक्षा करे। सिर्फ वात रोग से मूव नोलता युक्त लाल रन होता है, परन्तु खभाव की प्रति गरमौसे भी उक्त प्रकार का रन हो जाता है, पित्त से पीलापन लिये लाल, कफ से फेन युक्त चिकना और खेतवर्ण होता, रक्त विकार में रक्त सम और सन्निपात में कुछ कपणा वर्ण हो जाता है, रस धातु अपक्ष रहने से मूध । कांजो किम्वा विजौरे के रस तथा पागो के समान हर समय होता है । ज्वर की अधिकता से प्रायः मूत्र पोला पौर पु. राने रोग में लाल हो जाता है। वात ज्वर में केपर के समान पोला पित्त धारोग्यदर्पगा। ज्वर में स्वच्छ पोला और कफ ज्वर में गाढ़ा तथा सफेद रंग होता है। तीव्र सन्निपात ज्वर में मूत्र प्रायः कृष्ण वर्ग हो जाता है और वही असाध्य समझा जाता है। विशूचिका में मूत्र रुक जाता है भूव छ ( सजाक वी प्राग्रूप) में जलन के साथ वूद २ मूत्र होता है। बहुसूत्र जिसे मूत्रातिमार भी कहते हैं उसमें मूत्र निर्मल ठंढा गन्धं और दर्द रहित सफेद दिग रात में बहुत बार होता है शीघ्र चिकित्सा न करने से वही सोम रोग हो जाता है अर्थात् शरीर के रसादिक अंश जलवत है। सर्वहा निरन्तरं मूत्रमार्ग हारा बहा करता है । मूत्र कुछ मूवा धात ( सुनाक ) अश्मरी ( पथरौ) प्रमेह और स्त्री के प्रदर आदि रोगों में तो अवश्यमेव मूत्र परोक्षा करना वैद्यों का भतियेय है। हर एक व्यक्ति को उचित है कि प्रति मास में निन मूल परीक्षा हारा बौर्य का दोषा दोष अवलोकग कर लिया करें क्योंकि परीक्षा हारा नहां तक सिद्ध हुआ है। वर्तमान समय में अधिकांश लोगों के मूत्र हारा घात जाता है पर उन्हें इस बात का ज्ञान नहीं है । उसको तरकौव यह है कि प्रात समय भौच को पूर्वको एक स्वेत कांच वो सो में भूत्र कार सोणे में काग बन्द कर किसो जघे रख देय। संध्या समय या दूसरे राज प्रात समय उस मूत्र युत मौसी को उठाय उजियाले की तर्फ देख यदि धात नाता होगा तो अवश्य मूव के अधोभाग में सफेदा वालाई सा या सई के भुषामा या दाना बिमिष्ट मटिमले रंग का कुछ पदार्थ जमा सा देख पड़ेगा। मल परीक्षा। वात रोग में मल (दस्त) बंधा भया, धूम्र वर्ण. और असा होता है पित्त में पीला और पतला, कफ में स्वेत गाढ़ा और बहुत होता है दो दोपों में मिश्रित और तीनों दोषों के मिल जाने में दस्त काला, कम और कुछ उष्ण होता है । अति फाला, अति पीला, अति स्वेत और पति साल दस्त से जानना कि बिमारी बढ़ी है रोग असाध्य होने का हर है वैद्यों को उचित है कि उदर सम्यन्धी रोगों में अवश्य मल ती परीक्षा फरें । आमयात में दस्त का होता है पेट फूला रहता है, नाव- द्वितीय खण्ड। .. सार में अति पतला मल युक्त, हैजामें पानी के समान पतला मल रहित और ग्रहणी रोग में कच्चा अन्न सहित दस्त होता है, जिसके पेट में रुम (केचुआ आदि) हो जाते हैं उसका भी दस्त पतला होताहै परन्तु उमफा जी भी मचलाता रहता है। : वर्ण परीक्षा। यात रोगी अर्थात् जिन्हें वायु दोष से रोगोत्पन्न हुआ हो उसका शरीर रूखा, रंग धूम, रोग रद्ध में फिञ्चित पीला होगा, पित्त रोगी का शरीर पीला तेल लगाया सरीखा, कफ रोगीका शरीर चिकना और स्वेत रंगका होता है मिश्रित रोगों में मिश्रित रंग जानना । किसी किस्म का रोग क्यों न हो अधिक दिन बना रहने से शरीरका रंग पीला हो जाता है ॥ स्पर्श परीक्षा। बायु कोप से रोगी का शरीर शीतल, कफ से शीतल और चिप- चिंपा तथा पिच से उष्ण होता है मिश्रित दोपों में मिश्रित जानना, ज्वर चाहे जिस देोप से हो परन्तु शरीर उष्ण ही होगा । - आर्तव परीक्षा। स्त्रियों के द्वादश बर्ष वयस से ५० वत्सर पर्यन्त प्रतिमास में जरायु से योनि पथ द्वारा रज का रक्त निर्गत.होता है स्वाभाविक मासिक रक्त का वर्ण शशा (सरगोस) के रक्त के समान अथवा लाही के रंग के भांति होता है विशुद्ध मासिफ रक्त यदि वस्त्र में लग जाय तो धोने से छुट जाता है। प्रति मास के अन्त में चिकनहट, दाह, शूल बर्जित. तीन दिवस स्थायी न बहुत अधिक न अति न्यून निःशत आतंध निर्दीप जानना, उपरोक्त प्रकार नियमित समय में मासिफ न होने ही से स्त्रियों भारोग्यदर्पण। ६३ को शारीरिक वा मानसिक विविध कष्ट दायक रोग उत्पन्न हो जाता है | मासिक की शुद्धता से स्त्रियां आरोग्य प्रसन्न चित्त सब अङ्गों में बलवती बनी रहती हैं अतएव स्त्रियों के आर्तव का अनुसन्धान सर्वदा करना अत्यावश्य है। स्वप्न परीक्षा। यद्यपि यह बात बहुत सत्य है कि जाग्रत अवस्था में जो कुछ म. नुष्य देखता सुगता है तज्जगित बासना निद्रा समय में यही प्रतीत होती है इस्से स्थान कोई वस्तु नहीं है तथापि स्थान का फलाफल भी असत्य नहीं है। जो मनुष्य स्वप्न में देखे कि एक भयङ्कर मनुष्य अंगभंग शिर मुहाये लाल काले बस्त्र पहिने हायमें फांसी या छूगे सलवार लिये किसी को मारता बांधता दक्षिण दिशाको लिये जाताई या चला माता है, अथवा गदहा ऊंट भैंसा पर मयार है, तो स्वप्न दर्शक यदि पारेरोग्य हो तो रोगग्रस्त हेाय और रोगी हेते मृत्यु को प्राप्त होय ॥ स्वप्न में ऊंचे से नीचे गिरा, जल में डूबा, भग्नि में नसा, बिपत्ति में पड़ा, जलघर मादि के मुख में लीलता हुआ, दीपक और नेत्रों का नाश दीखे, य तिल या सुरा पिये, पकवान खाये, तिल या लेहा पाये, कुमां में गिरे, रसातल में चला जाय, कीचड़ में फंसे, नाचे नंगा हो कर लाल माला शिर पर धारण करै, माता के गर्भ में प्रवेश कर ऐसे स्वप्न देखने वाला पाराग्य हो तो रोगी हेा, और रोगी हो तो मृत्यु को मास हे। । रात्रि के प्रथम प्रहर में स्वप्न देखने से उसका फल एक वर्ष में मिलता है, दूसरे प्रहर में देखने से.६ महीने में, तीसरे प्रहर में देखने से तीन महीने में और भूर्योदय बेला में स्वप्न देखने से दश रोज में शुभा. शुभ का फल मिलता है । दुस्स्वप्न देखने की शांति शास्त्रकारों ने इस भांति लिखा हैं, कि दुस्वप्न देख कर किसी से न कहै भबेरे स्नान करके बेंद का पाठ करे । वेदाध्ययन करने वाले विद्यार्थियों को स्वर्ण और - ६४. द्वितीयखण्ड। . तिल का दान देय तो दुस्खान नष्ट हो । यदि स्वप्न में देवता तीर्थस्थान मन्दिर राजा जीवित मित्र वालण गौ या देखे । तपा-मैले जाल में पैरते अटारी पर्यत हाथी और घोड़ा पर चढ़ा दीखे एवं स्वप्न में शत्रु का जीते और स्वेत पुष्प भूक्ष्म वस्त्र मांस मत्स्य फल इत्यादि अगर रोगी दीये ते भारोग्य हो, और सुखी दीखे तो धन प्राप्ति हे।। जिन स्त्रियों का गमग (प्रस) अयोग्य (दुर्लभ) हे स्वप्न में उगसे गमन करे, मल ल. पेटा, माता कच्चा मांस खाता और जोंक भवरी सर्प बिच्छू माखी इन्हे हुमते देखे तो उत्तम है॥ दूत परीक्षा । चिकित्सक को इतनी बातों पर जयश्य ध्यान रानापाहिये कि जो रोगी का मनुष्य युलाने को भाये तो उसकी चेष्टा, पिना, वर्ण, पस्त्र, पाय, समय, दिशा, धाएन, बेध तथा देश इत्यादि पच्छे प्रकार देख ले तप रोग जारामारने को जाये, इमो से हमारे भूतपूर्व वैद्यों का यश अर्थ तपा विख्यात है ये लोग इन्ही पक्षणों से घर बैठे रोगी की दशा और साध्या माध्य पता देते थे॥ यदि दूत (वैद्य को लेथा ले जाने वाला) सफेद वस्त्र पहिरे हुमा, गोरा स्वरुपयान, स्वाती, धीरज, वुद्धियुक्त, भाभूषण पहिरे, माल पदार्थ हाथ में लिये पाय पपादे मपया बैल घोड़े और पालकी पर स. चार मन्तीपी और स्वतन्त्र सपा उपरोक्त लक्षण युक्त मनुष्य वैद्य को घु लाने की जाये तो वैद्य नाम लेय कि रोग माध्य है और रोगी आराम हो सकता है । गौर घेद्य भी शुद्ध जगह पर पूर्षाभि मुख शान्ति रूप में बैठा हो । में पमीना युग मध्यान्ह काल में अग्निममीपस्य वैद्य के पाम पाया हुमा दूत काल रोग के लिये प्रेम है, परन्तु पित्त रोगके लिये अशुभ कामना तपा रक्त पित्त गयीसार, प्रमेह मोर संग्रहणी रोग जहां ।

पाराग्यदर्पगा। ६५ पानी आधा होय उस जगह पर दूत का गिणना श्रेष्ठ है, सुन्दर हया घ लते हुयेणे दूत पाया हुभा यातरोगी के लिये श्रेष्ट । पित्तरोगके वास्ते मधेरे, कफ रोग के वास्ते दोपहर को और यात रोग के वास्ते अर्धरात्रि को भाया हुमा दूत उत्तम जागना इससे अतिरिक्त शुभ जाना ॥ अशुभ सूचक दूत। पाल, पद्ध, स्त्री दो तीन या चार मनुष्य एकट्ठ मसभ्य बात कहते नैऋत्य भाग्नेय अषया दक्षिण से माते । शस्त्र पाषाण भस्म हाड़ इनको हाय में लिये तथा रोगी यहिरे दोन गस्तीन भूखे पिपासे पके महीन (काने इत्यादि) अधिक भङ्ग याठे (छंगुनारादि) भ्रमित नेत्र विकार वाले (ऐंचाताने) बच्चर शादि पर सवार ऊंचेस्वर से योलते भये पाखंडी लूले योदे लयाले तिगका तोड़ते भये जयदी घलो २ ऐवे कहते हुये इत्यादि दूत निन्दित है इनके सा में वैद्यों को जाना योग्य नहीं है और भी अ नेक पक्षण शशुभ दूतों के लिखे हैं ग्रन्थ बढ़जाने के भय से नहीं लिखा। शरीर लक्षण । बुद्धिमाग गनुष्यों को उचित है कि प्रतिक्षण अपने शरीर की समा. लोचना इस प्रकार किया करें कि जिन २ पदार्थों से शरीर स्थित है न में से कौग २ से पदार्थ कम हो गये हैं कौग २ से शुद्ध हो गये हैं और कौन २ अपने मर्जादा पर , अर्थात् सम हैं । शरीर में असंख्य ऐसे २ भाशय ईश्वर ने बना दिये हैं कि जिनके न्यूनाधिक होनेही से शरीर नष्ट भ्रष्ट होने का संभव है परन्तु विशेष कर बात पित्त कफ रस रक्त मांस मेद (बड्डी) मउगा शुक्र धातु पुरीष (मल) भूत्र और पसीना और स्त्रियों के रज इन में जहां एक माध भी कगजादा हुये कि बिमारीमाई इस लिये इनफे सम रखने में सर्वदा चैतन्य रहै ।'

हितीयखण्ड प्रत्येक देहधारी के लिये याह्यं और.अभ्यन्तर बायु को जरूरत है ऊपर की घायु जीध मात्र को चैतन्य रखती है और भीतर की मायु भय पदार्थों को मिल २ स्थानों में पहुंगा देती है क्योंकि पित्तंपंगुकफःपंगु पंगवामलधातवः । वायुनायवनोयन्ते तरगच्छन्तिमेघवत् । पित्त कफ मल मूत्र रस रक्त आदि सातों धातु यह मप लंगड़े हैं घायु जहां इन्हें पती शक्ति में ले जाती हे यहीं वे मेघ के समान चले | जाते हैं इसीसे घायु तीनों दोषों में प्रथलाहे और सुश्रुतगहाशप जी ने वायु हो को प्राणियों के स्थित तत्पत्ति और विनाश का कारण मामा है। बायुके प्रधान गुण सूक्ष्म शीतल रूक्ष हडकी और घरहे और शरोरके पांच भागों में पांच नाम से विख्यात है अर्थात् जो बायु मगाशय में है उस्का नाम (अपान वायु) हे मग्गिस्थान में (समान घायु) हृदय में (प्राणवायु) फरठ में (उदाम बायु) और सब शशीर में (ध्यान पायु) रहती है बायु के न्यूनाधिक तथा कोप से सम शिकार युत हे। जाते हैं और बायु के शुद्ध रहने से सब थद्ध रहते हैं । वातक्षय के लक्षण सु० अ० २५ । वातक्षये मन्द चेहताल्पशवमल्पवर्षो भूल संताघ । जब परौर के भीतर की वायु कम हो जाती है तो ( मन्दचेष्ठा ) भरीर ढोलो शिथिल और मन उदास रहता है पल्प वचन अल्प हर्ष संज्ञा नाम अर्थात् याद दास्त कम हो जाती है। पाठक गण ! सेवाय वायु बढ़नेके वायु का कम होना कम सना होगा। चात वृद्धि के लक्षण। वातबुद्धीत्वकपारुष्यं कायकापर्ण्य गावस्फुरण मुष्णकामिता निद्रानाशोल्पवलत्वं गाढवर्चस्त्वञ्च ।

आरोग्यदर्पण। वायु के अधिक हो जाने में बचा को परुषता कृमता सब भरीर फर- कना गर्मी की इच्छा गिदा नाश या निद्रा सघट जाना वल हीन पोर मल सूखा एवं थोड़ा होता है। वायु कोप के लक्षण । प्रायः बात प्रकृत वाले को बाडुमा तीता कषायल रुक्ष पन्त (बाजरा पादि) हिम पन्न (बासी चावल आदि) और सिरका खाने से उपवास से भय मे कामदेव निघालने से बहुत जल में पैरने से रुधिर निकलने से और बर्षा काल से अतिरिक्त दिनों में वादर घेरे रहने से वायु काप करता है। तब यह लक्षण हेति में गिर कनपटी भी छाती पीठ को रौर कमर हडडो और जोड़ों में दर्द दिमा पेभाब कम होना पेटफूलना और बोलना जी घबड़ावै नींद न भाव नेत्रों में नमा सा बना रहे परोर थकी और रूखो रहै इत्यादि उपद्रव होते हैं। वात प्रकृति के लक्षण । गिर के बाल महीन और कम परौर दुर्बल तथा रुक्ष बहुत बधावाद' करने वाला,मन चलायमान और आकाश चारी स्वप्न देख तो बातप्रकृत मान- ना इम प्रकृत के मनुष्य बिहान शास्त्रार्थ अधिक करता है और (मूर्ख ) डाकू एवं भागने वाला होता है और मस्त्र युद्ध में बड़ा बलवाग होता है आगवाल बहुत कम शुद्ध बासु प्रकृति के लोग दिखलाई देते हैं तांतियाभौल जिला चर्चा मायः सम्बाद पत्रों में रहता है वेशक उसकी शुवात कौ प्रक्रिति थी। डाक्टरी मत से वात प्रकृति के लक्षण । जिसका शरीर दुबला मांसपेभी संपूर्ण कोमल ओ पतला मुख खूबसू- रत केम साफ़ महौन और अलग २ एवं शरीर का रंग विञ्चित सुखी लिये सफेद मोठ पतला नैवं उल्लल तेनाविमिष्ठ नाडौ सूक्ष्म वेगवान मन के थोड़ी ६८ हितीयखण्ड। 4 मी वेगमे नाड़ी उत्तेजित हो नाय मस्तिष्क सह समस्त स्वायु, पदार्थ गुण विशिष्ट हो । स्यालात बहुत बढ़ के हो भनुमान प्रो कल्पनामक्ति तौक्षण अ- र्थात् मजमून बनाने में एकाही है। विषय चिन्ता तथा किमी कार्य के लिये शौघकी तैय्यर हो जाय और सामान्य २ वाते में भी क्रोध माय तो उसे वातप्रकृति जानना । इस प्रकृति वाले को भत्य द्रव्य खाने तथा सेवन से किसी प्रकार को पौड़ा प्रादि नहीं है।तो इमलिये अपनी प्रकृति शुद्ध रखने के लिये बात प्रकृति वाला प्रत्यव्य का सेवन प्रायः करे । वृद्धि तथा कोप बायुशमन, बर्ग । भरौर में तेल मर्दन करना तख्त पर सोना ऊपरी तेज हवा का बचा- ना गीता मार के स्नान करना भिर में तेल का पुचाड़ा देना, घो, नया उदं तिल गेई, भूग, लाल धान, गुनगुना जल, गेंडा, सुपर, मैंसे, हिरण, मुर- गा, मंगर, कछुआ, राहमछलो, पादि, जौधों को मांस, गौमूव, पियाज, ल. इसग, मनका, पका पाम, भावला, मीठा अनार, कथा, भड़, पका ताङ् का फल, चिनी गौ का दूध, सेंधव नेांन, इत्यादि गुण वैद्यों ने पथ्य कहा है। पित्त । रस का रक्त करना पचाना समर्थ तेज बुद्धि सप्णता कारक पित्त है सो पांच भेद से अनि फर्म करता है। प्रधान गुण पित्त के गर्म है और पंतला पोला नीला सत्तागुणो एवं रस उसका फटु हे तीता है और ज. छने से खट्टा हेर जाता है। शरीर के पांच स्थानां में रह कर पांच फर्म करने में पित्त का पांघ नाम है पाचक, भ्रामक, रंजक, भाषिक, और साधक जो पित्त पग्नि के स्थान में अन्न पचाने के लिये रहता है से ग्नि से भी अधिक ते सौर मिर्फ तिल के मान है किसी २ ग्रन्थों में लिया है कि भारी शरीर में अर्थात् एस्ती ऊंट आदि जीमोंके शरीर ii,कुछ कहा है परन्तु मनुष्य मात्र के शरीर में देश कालानुसार किञ्चित आरोग्यदर्पण। न्यूनाधिक तिल के समान है एवं कीट पतंगादिकों के शरीर में रोमान मम होता है । सेो पित्त का नाम (पाचक) है। जो पित्त तेल उपटन मादि जिल्द में लिपटे हुये पदार्थों को अपनी शक्ति से शोप देता है उसका नाम (भ्राजक) है । और जो रस केो रक्त मनाता है उस पित का नाम (रंजक) है । जो पित्त नेत्रों में रह कर रूप दिखाता है उसका नाम (मालोचक) है । और बुद्धि तथा धारणा चैतन्य रखनेवाला हृदय निवासी पित्त को (साधक) कहते हैं। पित्त के भी कम जादा और कोप से शरीर नाशक हैजा मादि उपद्रय खड़े हो जाते हैं । पित्तक्षय के लक्षण । "पित्तक्षये मंदोमाग्निता निष्प्रभत्वंच" पित्त के फम हो जाने से अन्तम में मन्द गरमी गौर प्रभा नाश होते हैं। पित्त वृद्धि के लक्षण । पित्तबद्धौ पित्तावभाषिता सन्तापः शौतकामित्व मल्प- निद्रता मूर्छा बलहानिरिन्द्रियदौर्बल्यं पीतविण्मूबनेत्रत्वंच ॥ पित्त के बढ़ जाने में शरीर का रंग पीला हो । बालन शीतल प. दार्थों का चाहना अल्प निद्रा शिर में घुमरी और भांखों के सामने अं. धियारा हो जाना पल हानि इन्द्रिय दुर्बल एवं नेत्र सौर मूत्र पीछेहे ॥ - । पित्त के कोप करनेवाले बर्ग। तिल शिरका शराब दादी मछली बहुत तेज और गरम द्रव्य पति द्वितीयखण्ड। मो बेगमे नाड़ी उत्तेजित है। जाय मस्तिष्क सह समस्त स्नायु. पदार्थ गुण निमिष्ट हो । खालात बहुत बढ़के हो भनुमान प्रो वाल्यगामक्ति तीक्ष्ण भ. र्थात् मजमून बनाने में एकही है। विषय चिन्ता तथा किमो कार्य के लिये शीघ्रको तैय्यर हो जाय और सामान्य २ वाते में भी क्रोध अजाय तो उसे वातप्रकृति जानना । इस प्रकृति वाले को मत्य द्रव्य खाने तथा मेवन से किसी प्रकार को पौड़ा आदि नहीं है।तो इमलिये अपनी प्रकृमि शुद्ध रखनेके लिये बात प्रकृति वाला प्रत्यद्रव्य का सेवन प्रायः करे । वृद्धि तथा कोप वायुशमन, बर्ग शरीर में तेल मर्दन करना तख्त पर सेना जपरी तेज हवा का वचा- गा गीता मार के स्नान करना गिर गें तेल का पुचाड़ा देना, घो, गया उदं तिल गेहू, मूग, लाल धान, गुनगुना जल, गेंडा, सपर, भैसे, हिरण, मुर. गा, मंगर, कछुआ, राइमछल्लो, पादि, जौगों के मांस, गौमूत्र, पियाज, ल. इसग, मुनका, पका भाम, पावला, मोठा अनार, कथा, भड़, पका ताड़ का फल, चिनी गौ का दूध, सेंधव नेांन, इत्यादि गुण वैद्यों ने पथ्य कहा है ।। पित्त । रस का रक्त करना पचाना समर्थ तेग बुद्धि उप्णता कारक पित्त है सो पांच भेद से हानि फर्म करता है। प्रधान गुण पित्त के गर्म है और पतला पोला नीला सतोगुणी एवं रस उसका कटु हे तीता है और ज. छने से खट्टा हो जाता है। शरीर के पांच स्थानों में बह कर पांच कर्म करने से पित्त का पांघ नाम है पापक, भ्रागक, रंजक, मालोचक, और साधक जो पित्त अग्नि के स्थान में अब पभाने के लिये रहता है से गि से भी अधिक तेज और मिर्फ तिल के भगान है किमी २ ग्रन्थों में लिया है कि भारी शरीर में अर्थात् हस्ती ऊंट आदि जीमों के शरीर if, कुछ पता है परन्तु मनुष्य मात्र के शरीर में देश कालानुसार किञ्चित भारोग्यदर्पण। 20351 करने से पित्त मिश्रित पमन हाथ पेट एवं पैर में जलन कमी २ खट्टी एकार जाने लगती है इमलिये उसे उपचास अपघा अधिक काल बिता कर भोजन करना तीव शकर्तव्य है और अनि सेवन अपधा शि के निकट भी न रहना चाहिये । ऐसे लोगों को दुग्ध सेवन गति श्रेयस्कर . 1 वृद्ध तथा प्रकोप पित्त के शमन कारक बर्ग । घी, दूध, मिश्री, मक्खन, सेवा, सफेद पुरानापाषष्ठ, गेहूं, अरहर, चना, मूंग, जौ, मसूर, पासी गाड़, धान का लावा, केला, कटहर, खीरा, मुनक्का, कोमल परषर, कुम्हड़ा, फकरी, करेला, अनार, मायला, कोमल ताके फल, छुहारा (भौषधवर्ग) त्रिपाला, पित्तपापड़ा, सतावरी, कुटकी, गींप, निसे।त, चन्दन, (बिहार) पाच्छा शीतल बाग फुधारों का घर केला और कमल के नमीन पत्तों की सेज कपूर भीर स्वेत चन्दनका लेप मित्र का मिलगा प्यारी बातें तथा मनोहर रागों का मुनगा अच्छे नाच का देखमा मन्द पयन जल का छिरकगा पन्द्रमा की ज्योत्स्ना जौर नामा प्रकार की शीतल बिधि पह वर्ग पित्ताधिकारियों के लिये पथ्य कहा गया है। कफ। संधि यंधा शरीर में स्निग्धता रोपण, पूर्ण बल स्थिरती कारक करा है पांच भेद से जल कर्म करता है । कफ का प्रधान गुण चिकना भारी स्वेत लपलमा ठंढा और मधुर है. परन्तु पिगट जाने पर नुनपरा है। जाता है कोई २ फफ को इसका कहते हैं इसलिये कि पानी पर तिरता है। इसका कारण यह है कि कफ स्निग्धता करके पानी में प्रवेश नहीं करता वास्तव में गुरुही है। भामाशय माथा कण्ठ हृदय भोर संधि इन्हीं पांचों स्थानों में कफ क्रमशः पांघ नाम से (कोदन, स्नेहन, रसन, जय- हितीयवगा। - खट्टाकोध घाम भीर पनि का मेगन (प्रत) उपचास और जिन द्रव्यों के सेवन से दाह है। प्रायः इनसे पित्त क्रोधित हो जाता है । पित्त-कोप के लक्षण। घुगरी अन्तर दाइ मूर्खा दस्त पताना पमीना त्वचा (नर्म) में जलंग जान तान पकना मुख नेत्र दिशा पेशाय और नरस पीले ने नशा पियास मुंख का स्वाद तीता अथवा खट्टा हो और सगस्त शोर पके फोड़े फे सगाम दूबै इत्यादि लक्षण पित्त केप में होते हैं । पित्त प्रकृति के लक्षण । लघु शरीर धुद्धि तीव्र गधिक क्रोध पसीना अधिक शरीरसे निकले स्वप्न में अनि मादि तेजा पदार्थ दीखे गफाल पलित अर्थात् बाल जल्द पकगाना साधारण लक्षण यह पित्त प्ररुत वाले मनुष्य को जानना ॥ डाक्टरी मत से पित्त प्रकृति के लक्षण । 'जिसका शरीर न भासि स्थूल और ग अति हस्व । मांस पेशी स. कल अधिक मरी, वन मूर्ति, मुख श्री तेजश्वी एवं मुख माउल शांतरिका भाध प्रकाशित (दगकता लुगा चेहरा) पाठ कड़े और काले नेत्र कृष्ण वर्ण कटीले, शरीर श्याग वर्ण रक्त पाही गासी साधिक विस्तृत एवं शं. रीर के ऊपर भाग में रंगें दृष्टिगोचर हो। स्वभाष उमका भनेका गुण मिशिष्ट क्या शारीरिक क्पा मानसिक कार्य में दृढ़ प्रतिध हे। नसे पि. ताधियय अथवा पित प्रकृति जानना। इस प्रकृति के मनुष्य को प्रायः पांडु यकृत (सोयर) शमीण रोग हो जाता है शराम पादि नशे की यस्तु सेवन से रक्त प्रकृति के समान खभाय हो जाने का सम्भव है । प्रायः इस प्रकृति के मनुष्यों को व्रत पाराग्यदर्पगा। दस्त खजुरी और अधि, सागा पाच्या न छगे, जिह। में कफ लपटा मा रहे जामा लगे पेट भरा पा रहे मुल का जायका नमकीन गौर मुख की रंगत मफेद इत्यादि लक्षण होते हैं । कफ प्रकृति के लक्षण। मोटी बुद्धि स्थूल शरीर चिकने केश महायल गौर स्वप्न में जल मादि बस्तुभों का अधिक देरी इत्यादि माधारण लक्षण कफ प्रकृति याले के देते हैं। शरीर का वर्ण पृथ्वी पर निर्भर है जहां जैसा पृथ्वी का गुण होता है यहां वैसेही रंग वाले जीष होते हैं बात पित्तादि प्रकृति के अनुमार जो केचित साधाों ने शरीरके रंग का वर्णन किया है से। प्रत्यक्षादि प्रमाणों से मिटु नहीं होता है क्योंकि जैसे मिलायत के मूमा आदि जीय गी गौरांग हे।से हैं काश्मीर पंजाब जादि स्थल के भी जग प्रायः गोरे होते हैं मद्राज के लोग मात्र काले होते हैं परन्तु प्रकृति मिन्न २ हैं तो इससे स्पष्ट है कि त्वचा की रंगत पृथ्वी के बनती है। डाक्टरी मत से कफ प्रकृति के लक्षण । गुण जिसकी शरीर मोदी और गोठ मांसपेशी समस्त कोमल बाल नेत्र और शरीर श्याम वर्ण ओठ गोरे रक्त बाही नाही सूक्ष्म और रक्त सं. घाटन अल्प यो शैत्य द्रव्य के सेवन से भी अमें दर्द होने लगै शा- गैरक या मानसिक क्रियां शक्ति मृदु अथवा माधूर्य हा इत्यादि उसे फफ प्रकृति जागना ।। कितने लोगों को सुरादि मादक द्रव्य के सेवन से हष्ट पुष्ट होते देखा गया है उसे भी कफ प्रकृति कहना चाहिये कारण यह है कि जिस को कफ प्रकृति है उसे अधिक नशा पान भी प्रपमतः हानि कारक नहीं .

१०२ द्वितीयखण्ड। उम्बन, गौर समगस्थित है। शरीर को पुष्ट-रसता तिम प्रकार तेल परमो जादि के संयोग से रथ की पहिया चलती है वैमाही कप के सं. योग से शरीर की हड्डियां स्नायु आदि यिना श्रम फिरा करती हैं । कफक्षय के लक्षण। ने मचये रुचतान्तर्दाह न्यामाशये तराशय शिरसां। शून्य- तासन्धि शैथिल्यं पणा दौर्बल्यं प्रनागरणञ्च ॥ कपक्षप में रुक्षता अन्तर्दाद मागाशय अन्तराशय और शिर शून्य मालूम हो जोड जोड़ ढीले पियास शरीर दुर्वल निद्रा नाय यह' लक्षण . कफ वृद्धि के लक्षण । श्लेमवद्धौ शौकल्यं गैत्यंस्थैर्य गौरव मवसादस्तन्द्रानिन्द्रा सन्ध्यस्थि विश्लेषश्च ॥ कफ के बढ़ने से मल मूत्र नेत्र और अंग में सफेदी शरीर में ठंढक गौर भारीपन, निद्रा अधिक, संधियां शिथिल उपकाई मुख से लार का गिरना ये लक्षण होते हैं । कफ कोप कारक वर्ग। दूध दही भारी नया और शीतल शान और शीतल जल अजीर्ण भोजन मति खट्टी बस्तु गति बैठना घी तिल मछली दिन के मेगा. त्यादि वर्ग कफ को क्रोधित करते हैं और बसंत ऋतु, तो अवश्यही ।। श्लेष्म कोप के लक्षण । शरीर भारी त्यघा भोदा शोप मालस्य अधिक निद्रा अधिक गाढ़ा पाराग्यदर्पगा। दस्त खजुरी और अधि, साना अच्छा न लगे, जिहा में कफ लपटा मा रहे जाटा लगे पेट भरा मा रहे मुख का जायका नमकीन गौर मुख की रंगत मफेद इत्यादि लक्षण होते हैं। कफ प्रकृति के लक्षण । मोटी बुद्धि स्थूल शरीर चिकने केश महाबल गौर स्वप्न में जल पादि यस्तुभों को अधिक देरी इत्यादि माधारण लक्षण कफ प्रकृति याले में होते हैं । शरीर का वर्ण पृथ्वी पर निर्भर है जहां जैमा पृथ्वी का गुण होता है यहां वैसेही रंग वाले जोध होते हैं बात पित्तादि प्रकृति के अनुसार जो के चित बाधाों ने शरीरके रंग का वर्णन किया है से प्रत्यक्षादि मगाणों से मिद्ध नहीं होता है क्योंकि जैसे मिलायत के मूसा आदि जीय गभी गौरांग होते हैं काश्मीर पंजाय आदि स्पल के भी जन प्रायः गोरे होते हैं मद्राज के लोग मात्र काले होते हैं परन्तु प्रकृति मिन्न २ हैं तो इमसे स्पष्ट है कि त्वचा की रंगत पृथ्वी के गुण से बनती है ॥ डाक्टरी मत से कफ प्रकृति के लक्षण । जिसकी शरीर मोटी और गोठ मांसपेशी समस्त कोमल बाल नेत्र और शरीर श्याम वर्ण ओठ गोरे रक्त बाही गाड़ी सूक्ष्म और रक्त सं. घाटन अल्प थे। शैत्य द्रव्य के सेवन से भी मन में दर्द होने लगें शा- रीरक या मानसिक क्रियां शक्ति मृदु अथया माधूर्य्य हा इत्यादि उसे कफ प्रकृति जानना ॥ कितने लोगों को सुरादि मादक द्रव्य के सेवन से हट पुष्ट होते देखा गया है उसे भी कफ प्रकृति कहना चाहिये कारण यह है कि जिस की कफ प्रकृति है उसे अधिक नशा पान भी मपमतः हानि कारक नहीं 1 द्वितीयखगड । १०४ होता परन्तु कमशः कफ को नष्ट कर के अन्त में शरीर को भी गष्ट कर देता है, म लिये कफ प्रकृत विशिष्ट जन कदापि मादक द्रव्य सेयर ग करें । ऐमे मनुष्य को जाने के दिनों में और यर्पा जाल में फलालैग का कपड़ा पहनना और साम मयेरे पाय पीना चाहिये और अन, दधि, माठा, यामी अन इत्यादि शैत्य कारक द्रव्य सेयग न करना चाहिये । जिस प्रकार से हमारे वैद्य शास्त्र में दो दोषों के लक्षण मिलनेमे द्वन्द प्रकृति कहा है. और तीनों के लक्षण मिल जाने मे त्रिप्रकृत कहा है उगी. प्रकार डाकृती में भी कहा है भेद इतनाही है कि हमारे यहां सिर्फ तीन प्रकृति प्रधान रक्खा है डाकृरी में पार अर्थात् एक रक्त प्रकृत. और भी कहा है जिसे गीचे लिसे देते हैं। रक्त प्रकृति के लक्षण । जिमका शरीर स्थूल या कृप हो पाल कड़े नेता नील वर्ण मुख चम कीला मुन्दर गुग्गाय के पुष्प के भांति, धमदा कोमल और पतला नाही वेगवान को पूर्ण रक्तवाही नाही त्वरित वेग से रक्त मच्चाप्लग, मगोप्टत्ति सफल शीघू उत्तेजित और गन की गति स्थिर ओ चञ्चल है। उसे रक्त प्रकृति कहते हैं । जिस प्रकार खेत में बीज डालने से शीघडी अंकुर गि. कल जाते हैं तद्रूप गद्यादि पानसरने का फल इम प्रकृति वाला प्राप्त करता है और विचारी स्त्री को पुत्रादिकों से अनाप कर अगति कामा गध्य मेही जाप भी देह भाव से विमुक्त होता है । इस प्रकृति वाले को मद्य पाम अति भोजन अत्याधिक स्त्री मायाम करने से प्रायः सक्षिज्वर पलयाम दाहरोग और रक्त प्राधादि रक्तरोग हो जाता है। विचित्र प्रकृति । *- इस प्रकृत के तीन प्रकार के मनुष्य हैं प्रथम -जिसे पारद घटित भोपध जप परिमाण अर्थात् एक रत्ती भी खा लेने से मुख आ जाताहे भारोग्यदर्पण । . अपया मुख से राख पहने लगता है और उतनाही पारा या उस से कुछ अधिक भी खा लेने से दूसरे को कुछ भी नहीं होता। द्वितीय-कितने लोग संसार में ऐसे देखने में माये हैं कि जिसे म. बली सजा गादि का मांस फल और शाग पात खाने से मनीण रोगहे। जाता है भौर किमी २ को जिल्द की बिमारी हो जाती है। वतीय-और कितने ऐसे स्वभाव के मनुष्य हैं जिन्हें घारक गोषध अर्थात मी खाने से पिचक गुण याने दस्त भाता है एवं चिरेषक भीषध ( एफसम् माल्ट ) के खाने से मादक गुण याने नशा करता है। ज्वरन औषध.( फुनाइन ) के सेवन करने से मुख मध्य में जो अन्यान्य स्थान में भी घाव हो जाता है । इसी प्रकार हरएक प्रकृत के लोग हैं हि एकाएको भएपज धिकित्सक मायः चीन्ह नहीं सक्ता इसी दोप के परिहार के लिये सरकार ने एक २ पारिवारिक चिकित्सक नियुक्त कर दिया है। श्लेष्म कोप वृद्धादि हारक बर्ग वैद्यक से । यमन ठंघन आंखों में अञ्जन देना स्त्री प्रसंग शरीरमें उबटन और रोल का गर्दन करना पानी कम पीना दांतून और कुल्ला देर तक करना हांपी घोड़े की सवारी अधिक कपड़ा पहनना अधिक परिश्रम तथा मार्ग चठमा फुस्ती पहना नाश लेना गरण द्रव्य अधिक खाना पुराने धान साठी के धान चना मूंग कुरथी गरम पानी मरू देश के जानवरों के मांस राई बैगन गूलर लहसुन पिमाज परवर केले का फूल जमीकन्द नीय कुटकी निसात शहद का शरयर पीमा जरा २ मा मद्य पीना त्रिफला का सेवन गो मूत्र अच्छा गरम घा इत्यादि गुण कफाधिकारियों के लिये हित कहा है।

हितीयखण्ड। १०६ लक्षण। डातरी मत से पति उष्णधातु या प्रकृति भी पित्ताधिक्य प्रकृति के भांति जानना सिर्फ इतनाही फर्क है कि इस प्रति वाले मनुष्य के चित्त में सर्वदा (जो खपवत है) पनेकानेका विषय प्राप्त होने की इच्छा उठा करती है और किसी कार्य की स्थिरता नहीं रहती जिसको क्षणिक युद्धी कहते हैं इस पति के मनुष्य प्रायः पागल हो जाते हैं और गांजा घरस अफीम इत्या. दि मादक द्रव्य सेवन करने से तो पागल होने में कुछ विलम्ब न जानना चाहिये। जिसमा जसा मरौर का रूप रंग होता है वैमाही रोग भी उसे होते है जैसे जिसका मुख सुन्दर गोल, वाल चिकने और भिन्न भिन्न नेत्र सवुज प्राकाश वर्ण नेव पलवा दोघे, और ऊपर का मोठ स्थल होने से प्रायः गण्ड- माला रोग होता है और ऊपर के समस्त लक्षण युत सिर्फ जपर को मोठ पतला होने से आयकाम होने का सम्भव है । और छाती दीर्घ मुख ची सन्दर, प्रोठ पतला और संधिस्थान के छोटे (गठोलो परीर) होने से मनुष्य बलवान होता है, और जिसको छातो छोटो, मुख गाल, जपर को भीठ ऊंच संधि एकल बड़े होने से शरीर दुर्वल और कमजोर होता है। थो बाबू गिरने भनियमिताचार से पायुक्षय का कारण देखलाया है जो लोग बड़े घादमी है अर्थात् धन सम्पन्न हैं खाना पीना कपड़ा पहनना भादि उत्तम है, अनेक नौकर चाकर खगे हैं सेवाय नौकरों के क्या भारीरक क्या मानसिक किसी प्रकार का परियम नहीं करते केवल अनर्थ कारी प्रामोद प्रमोद एवं बहुविध सुखद सामग्री पान भोजन तथा अहोराव सविना या नाच मुजरा देखना इत्यादि ऐसे मनुष्यों का जोवन थोड़े धो काल में अपने स्थान को त्याग देता है और नितने दिन वचा भी रहता है तो पाराग्य नहीं रहता है। संसार को देखने से पाया जाता है कि खेती करने वालों या सा- मान्य खागा पोना पहगना रहता है, वर्षा में भोजते हैं ग्रीमतों में धूप पाराग्यदर्पण। सहते हैं तो भी आरोग्य और दोघ स्थायी होते हैं। भरी तत्वज्ञ चिकित्सक महोदयों का परीक्षित पाया है कि खतिहारेकी अपेक्षा बड़े मनुष्यों का सौवन काला अल्प और बड़े आदमियों की अपेक्षा राना वा राजपरिवारस्य लेगिमा जोवनकाल अति अल्प होता है। यहारोर मानिन्द घड़ीके है भगर घड़ी बन्द कर रखदिया जाय तो थोड़े ही काल में मुरचा कग पर तमाम पुरजे खराब हो घड़ी सत्यानाश हो जाय गो वैशाली इस भरीर से वल को अनुसार काम न लेने से परोर सत्यानाश हो जाती है परन्तु पति से अधिक काम लेने में वही होता है। वीर्यज दोप। निय पवाार सन्तान पिता के धन आदि को उत्तराधिकारी (पानेवाला) होता है वैशाही माता पिता को रोगी का भी अधिकारी होता है। जिस के गण्डमाला, क्षय, काम, खास कुष्ट गठिया मृगी, उमाद वहुमूभ गरमो और प्रमेह होतो उसके सन्तान के भो वहो रोग होगा, कुठादि रोग ता तोन पुस्त तया होता है, हिताहित विवेक शून्य पुरुष इन्ट्रियापभोग में पलत है। भरीर को नाना प्रकार के रोगों से असखो करते हैं और जो सन्तान उत्पन्न होता है उसे भो रोग भोगना पड़ता है ॥ अथ रस रक्त मांस मेद इडौ मना शुक्र पुरीष भूव और स्वेद (पसोना) दूग के घट बढ़ जाने के लक्षण । सुश्रुत सूत्र स्थान प० । १५ ॥ रसचये हृत्पीड़ा कम्पशून्यता टपणा च रसोऽति । द्धो हृदयालदं प्रसयाचापादयति ॥ आहार पच कर जो कुछ पृथम शरीर में बनता है उसे रस कहते हैं वह रस कम हो जाने से छाती में दर्द कम्पन अङ्ग शून्य और पियास लगती है और बढ़ जाने में बमन और मुख से लार बहता है ॥

हितीयगड । चाड. शोणितक्षयेत्वक् पारुष्यमम्नशीतप्रार्थना । सिरागैथिल्य- च रक्तरित्ताङ्गाक्षतांसिरापूर्णत्वञ्च'। शरीर में लोड के कम होने से चमडा सखा खट्टा जायका गीत पदार्थ को चाल और नस ढीले हो जाते हैं रत वृद्धि में नसें लाल फूलो हुई तथा शरीर और पांख भौ लाल होते हैं मोघ यन न होने से जिल्द की विमारी हो जाती है जैसे सूजन दाह जलग बदग में फोड़े फुन्मी भरीर का रंग काला है।जाना बात रक्त कोढ़ पौलपाव गण्डमाला देह दुर्गन्ध यकृत प्लोहा विसर्प आदि । भरीर में रक्त एक प्रधान वस्तु है डाक्ततरों ने अनुमान किया है कि जवान मनुष्य को भरीर में पौड़ ( 3 सेर ) से ३० पौड (१५ मेर) पर्यन्त रक्त परीर विशेष में है। श्रीयुत भैलेनटोन साहव ने लिखा है कि पुरुष के शरीर में ३४॥ पौड (१७ सेर) भोर स्खो के परीर में २६ (१३ सेर) रक्त है। रत का वजन जल को अपेक्षा कुछ भारो है रसायन विद्या के जागने वाले विद्वानों ने इस प्रकार तुलना विाया है। एक पाव में जल भरेरा यदि वज़न में १• ताला हो तब उमौ परिमित गन्धक का तेजाव भर कर वजन करने से १८॥ ताला होगा और उतना हो तेल भर कर तौले तो सिर्फ ८ तोला ( अर्थात् तेल पानो से इलका है यही कारण है जो तेरुण जल के जपर रहता है ) इस वज़न को अंगरेजी में विशेष वजन कहते हैं। जिस पात्र में जल का विशेष वजन १००. ताला या रत्तो होगा उसमें उत्त. नाही रक्त १०५५ होगा विद्या को भी क्या महिमा है पणु से पर्वत तथा जीव से ब्रह्म पर्यन्त कौन सी ऐसी वस्तु है जो विद्या से न जानी जाती है। जिस प्रचार डाक्टरों ने शरीर को गरमो सरदी गापने को तापमान यंत्र (थरमा- गेटर) निकाला है वैसाहो जखोय ट्रव्य का लघुल गुरूल जानने के लिये एक यंत्र बनाया है उसके भी अधोभाग में पारद है पौर नल में चिन्ह बने तेल जल सरा रक्त आदि काई द्रव्य वस्त हो उस्में डाल तत्क्षण वजन कर लिया जाता है डाक्लरी मत से रक्त के १... भाग में ३ भतिः गादी वस्तु ( पठा) है, १२७ भाग कण है, खुर्दबीन के देखने से यह वस्तु बहुत सो भारोग्यदर्पण। छोटी २ नजर पावेगी इन में से बहुत सो सर्खरंग धौ धौर सफेद रंग की है जो सफेद रंग को चोले । उनको सूरत हरवक्त बंदला करती है और उक्त दोनों कणों में और पौनें भी हैं जैसे नेट्रोजन हैड्रोजन भासिनन कोयला गन्धक लोहा मादि । ८० भाग लवणांप अर्थात् निमफ का अंस हे पोर ७५० जल का पंस है परन्तु परौर रोगाभिभूत होने से पूति तोल का न्यूनाधिका है। नाता है। रक्त संचालन। एतांत बहुत शरीर के मध्य में ऐसा कोई स्थान नहीं है कि नहा रगों के द्वारा रक्त न पत्ता हे।। शरीर के किसी स्थान में सूक्ष्म सूची (सुई) द्वारा बिद्ध (छेदन) करने से सय गाड़ियों से रक्त पात हेाता है इस से स्पष्ट होता है हि रक्त की समस्त अंगों प्रत्यंगों को जिन्दा रखता है इसलिये पाठकगणा फेो सचित है कि रक्त शुद्ध तथा गम रखने में अधिक दृष्टि फरें । रक्त समस्त स्नायु शिराओं में घूम कर दिल में जाता है जिसका परन्तु जग स्थल में हम साधारण तौर पर पयान किये देते हैं । सादगी का दिल पांई छाती से दे। या तीन अंगुल नीचे र. इता है (वैद्यान में इसे हत्पिपट गयया शोधक यंत्र कहते हैं) और किसी किसी का दिख दहिनी तर्फ भी देखने में आया है परन्तु बहुत कम । दिल के नजदीक कान लगाने से आवाज सुनाई देती है। इसी मायाज को छाता लेग लकड़ी का घेांगा लगा कर कान से सुनते हैं, दिल से सिर्फ घर थांत जाहिर हे। गती है कि रक्त का गमनागमन फम जादा या रुक तो नहीं गया है क्योंकि दिल व शरीर रोगाकांत होने से जो | खाभार्थिक शब्द बदल जाता है यह शब्द कैसा है सेयाय श्वरई को दूसरे में सामर्थ नहीं है कि मके, दिल में से जो शब्द बोध होताई यह दिलो फैलने और सिकुड़ने से, कारण यह है कि ना दिलमें सून भाता है तब सिकुड़ जाता है और फैलने से रक्त बाहर निकल जाता हितीयखगए। मी से दिल धक २ किया करता है। जो रक्त छोटे बड़े रगों मं. चालन करता है वह रक्त प्रायः १ मिनट में १५० फुट पर्यन्त वेगवान है इभी प्रकार जो रक्त मल रगों मे धूम कर दिन में जाता है उसके जाने जाने में दिल एक रात दिग में १००००० एक यक्ष पारसे कुछ अधिक यार भी संकुचित सो प्रसारित होता है। और कितनों का मत है कि एक मिनट में दिल ७० घार फरकता तो इस हिसाब से मति घण्टा ४,२०० पार एवं ४ १ पठ लक्ष ८ मी गार होता है। यह काम यायज्जीवन क्या जाग्रतावस्था पया स्वप्नावस्था सुपुप्तघस्था फेोई भयस्था पपों गछ। कमी बन्द नहीं होता दिन रात में बाप हृदय से उतना राबहिर्गत अर्थात् मिल कर रंगों में जाता है कि गिरा के सुमने से एक सम्मा मालूम होगा । आयुर्वेद यित विद्वानों ने निरूपम किया है कि जिस श. गय प्रायः १३०० तेरा हजार पौराठ रत्ता हृदय मे भाइर हो तय जाके सप शरीर में व्याप्त होगा। यदि प्रतियार न्यूनाधिक १॥ स (तोला) परि गित रक्त हदय से यहिर्गम हे तय १००८०० बार १५१२०० औं रक्त होता है उसे १२ से माग देने में १२६०० पौंड रक्तरोगा। इतना यूग जोहा हदप के भीतर है से नहीं सिर्फ दिया रात्रि में इस कदर रक्त का गमनागमंग होता है । डाक्तरों का मत है कि रस से रस धन प्रपन हृदय में जा तप ममस्त प्राशय और नालियों में जाता है और सुश्रुनादि ऋषियों का मत है कि "मस्यापोरसे यकृतप्लीहानी रागमुपैति" गाय गप रस यकृत् प्लीहा में जाकर रक्तमाघ को मास होता है। श्रीगान् पं० भवदत्त शास्त्री जी ने हम से प्रण किया कि रूधिर लाल वर्ण पपों होता है ? (३०) रसायन विद्या से इस प्रकार सिद्ध होगा कि रस जाय पित्त की तेज से पचता है तो कुछ भनभाष को प्राप्त होता है पुनः ग. मनागमन की परिश्रम से गर्म है। का रस लाख वर्ण हो जाता है जैसे अंगूर जामुग इक्षु आदि का रम प्रथम गधुर धूमिल रहता है तीन दिन पाद सट्टा गन्त में तेग और पाठरंग हो जाताहै सुश्रुतकार ने लिखा है ।।

भारोग्यदर्पण। विसताट्रवतारागः स्पन्दनलघुवाराधा । भूम्यादीनांगुग्णा येते दृश्यन्तेचाचशागिते । अर्थात् रा में गन्ध ये पृथ्वी का गुण है, गीलापन जालका लालरक पगि का गुग, थोपा गच्चल यायु का गुण गौर लघुता णाकाश का गुण है थे पञ्चभूतके गुण रस, देसाईदेश । एक यह पात मायः लोगों के मुस से सुनने में भाती है कि ४ापं के पद्यात् रक्त का पनगा बन्द हे।जाता परन्तु भाज तक मुहको किसी ग्रन्थ में यह लेख नहीं मिला यदि किमी महाशप को मिला हो तो कृपा करके मुझे लिखें पति धन्यवाद दूंगा । स्त्रियों के विषय में तो सुशुत का यह वचन मिलता है। रसादेवस्त्रियारक्तं रनःसंजम्पवर्त्तते । तदर्पाद्दशाटूई या- तिपञ्चाशतःक्षयम् ॥ रमाही से स्त्रियों का रक्त रज संज्ञक ( मासिकधर्म ) होता है सो पारए घर्ष के ऊपर प्रकृति और पञ्चाश वर्ष से क्षय हो जाता है । अर्थात् रत यनना मन्द हो जाता है । अन्नूत औषधियां। खिजाव। भूजा हुभा गाजू ल ६ तोला, संगरासिख ( यह तांबे का मैल है अनियों के दूफानों में मिलता है चिपटाकार दुरुहा सा होता है वैसेही लोहे का भी होता है परन्तु तांधे का अच्छा होता है ) ६ मासा, नौसा दरं ४ मासा, तूतिया २ मागा, सेंधा निमक २ मामा इन सब को खरल करके बोतल में रख लेप (माजू भूगने की विधि) चूल्हे पर एक लोहेका परतन चढ़ाय उसमें छिद्र रहित नाजू फल को रख नीचे धीमी आंच देय माजू पल से धुयां मिलना भारम्भ होगा जैसाही धुवा बन्द हो फौरन दिसौयग्वगड ११२ तघे से गिकाण किमी वरतन मे ढांप देप जिस में राख न होने पाये रंग काला हो जायगा । "खिजाय उगाने की विधि" उगाने के छ घंटे पूर्व ही छोटी सी छोटी हरै को कुचल कर एक मिट्टी के बरतगमें भिगा देय धन लगाने के उसी घर के जल में उक्त पूर्ण को एक लोहे के पात्र में लोहे के डंडे से घोंट फर बालों में लगा देय, इसमें बांधने की जरूरत नहीं है दो तीन घंटे बाद धो डाले एकछी दफे के गाने में बाल काले हो जाते हैं यदि कुछ कसर रह जाय तो दूसरे दफे के उगानेसे सूप वाले हो जाते हैं, इससे पाल कड़े नहीं होते जोरन जिल्द काला होता ॥ दूसरा (अंगरेजी)। यह खिजाय प्रायः अंगरेजी दवा खानों में ढाई रुपये को मिलताहै मौर মুম से लगाया जाता 2 "यनाने की विधि १ नम्वर-काष्टिक (यह चांदी भोर एमिट से बनता सातर लोग जलाने का काम इसी से लेते हैं) ॥० औंध (१३ तोला) माफ का पानी यह जल डेग माके से खींचा जाता है । ३ भौंस (१॥ छंटाल) दोनों को हटफर एफसीपीमे भर. काग बन्द कर दो। २ नम्बर सलफिहरेट माफ पुटास 10 भौंस, माफको पानी औंस दोगों को हल कर इसे भी एक सीसी में चन्द करलो "8 गाने की विधि" पहिले नम्बर वाली सीसी का अर्क युरुशसे या लकड़ी में रूई (तूली) लपेट कर उसी से पहिले पालों में लगाये, जब सूख जाय तब दूसरे नम्बर घाला जर्फ दूसरी रुई पा युरुश से लगावे, लगातेही पाठ काले हो जायगे परन्तु दूसरे नर घाले कर्क के। सूप सावधानी से लगामा चाहिये पोंकि पमड़े में छू जाने से जिरुद काला पड़ जाताहे और देर में छुटता है । इसमें सिर्फ जरद याल काले होने के और कुछ गी गुण नहीं है यह भी जैसा हमारे देशी खिजामों से बाल काले होते है वैसा इस्ले नहीं परन्तु भाज कल जिसे देखिये उसी से मुह काला क. रना पसन्द करते हैं। ३ चारोग्यदर्पगा। ११३ तीसरा । भूजा हुमा माजू फल आधपाय हरै छोटी आधपाय ताये का बु. रादा दो तोला, कोसीस, नीसादर, दक्षिणी नीला थोथा, और लवङ्ग एक २ तोला, (माजू फल भूजने की विधि) एक लोहे की कढ़ाई में काले तिल का तेल इतना रहे की जिसमें माजू फल डूब जाय कड़ाही को घूल्हे पर चढ़ाय आंच दे जब तेल सोल उठे तय माजूफल उसी में डाल देय परन्तु माजूफल छिद्र रहित हो जब माजूकल फट फर उतराय आवै फोरन निकाल ले और एका कपड़े के तले दवाय तेय ताकि उसमें तेल का अंश न रहि जाय, (बनाने की विधि) पावभर सूखे आंवले को अध- पाचरा कर एक मिट्टी के बरतन में सेर भर जल में रात्रि को भिगोय स- बेरे जोश देय जब पावभर पानी रह जाय सूब मल कर छानले एक लोहे के सरल में प्रथन उसी आमले के जल से तांये के बुरादे को सूत्र महीन घोंट ले जव बुरादा मानिन्द सुरमें के हो जाय तय माजूफल आदि, स- मन औपधियों को कूट कपड़छान कर उसी में डाल दे और याकी आं- मले के पानी से इतना घोंटै की लसलसाहट से लोढ़ा चिपट जाय । (इस स्थल में सिजाब बनाने की परीक्षा मिल सक्ती है) यदि घोंटते २ लसलसाहट आगया तो जानना कि खिजाय सिद्ध हुआ और जो लस- लसाहट न आया तो जानना कि बिगड़ गया। जब देखै की लस आ सूब घोंट भी गया है एक २ उटांक की बत्ती बना कर सुखा ले, (लगाने की तरकीब) जब लगाने की इच्छा हो पूर्वोक्त लेखानुसार आंवले का पानी बना उसी में यत्ती को घोंट बालों में लेप कर ऐरंड का पत्र अथवा जिस किसी का पत्र चाहे बांध दे बाद तीन चार घंटे के खोल कर धो डाले पहले दफे इसी प्रकार तीन रोज बरावर लगाने से बाल काले होंगे फिर पन्दरहें रोज सिर्फ एक दफे लगाना काफी है इस्से त्वचा काला नहीं होता और न बाल कड़े हों। माजू का खिजार बस इस्से बढ़ कर नहीं है। गता और ११४ हिशीयखण्ड। चौथा। नील, केतकी की जस, केले की जड़, घमरा, पिपावासा, अर्जुनरक्ष फूल, कुसुम के बीज, कालातिल, तगर, कमल का सङ्गि, लोहचूर्ण, मालफगुनी अनार का छाल, गुर्घ, नील कमल फा जड़, यह सय औपर्धे दो २ तोला त्रिफला १ पाव भांगरे (भृङ्गराज) का रस ढाई सेर फालेतिल का तेल आधसेर एक लोहे के पात्र में सब औपधियां मै तैल आदि से भर फर मुस बन्द कर चारों तर्फ घोड़ेफी लीद दे पृथ्वी में गाड़ दे वाद ४० रोज के निकाल कपड़े में छान अग्नि में पचाय लेय जय रस सब जल जाय, तेल मात्र रहि जाय परन्तु तैल सरा न होने पावै क्योंकि विगष्ट जाता है तुरत छान बोतल में भर कर रख देय । चौधे २ रोज इस तेल को बालों में लगाये और तीन चार घंटे के याद हर के पानी से शिर धो डाले यह नुससा सुश्रुत का है हमारा आजमाया हुआ नहीं है परन्तु पूर्ण विश्वास होता है कि असत्य न होगा ॥ शतावरि चूर्ण धातु पुष्ट पर। 'पच्छाही शताबरि, यहा गोसुरु, देवाल के पोज को गरी, गुलसकरी (गैंगेसमा भी कहते हैं) परियारा के मीश, तालमखाना और सेमर का मूसरा (एक वर्ष से ऊपर का न हो) इग सप पौषधियों को पराया ले फूट कपरछान कर परापर की मिनो गिला. किसी उत्तम पात्र में रख दे, दोन समप अर्थात् प्रातः काल गौर संध्या गप भोजन के पूर्व ही १ ताला पूर्ण को मुख में रख पाव भर कच्चा गो से दूधने उतार जाये, दम पूर्ण के मेयम से केसाहू वीर्य निर्मल और पतला क्यों न हो गया है। और पुष्ट हो जाता है और प्रमा करने की शधिक इच्छा होती है, यदि प्रसन न कर के एक वर्ष पर्यन्त पथ्य सहित इस चूर्ण को सेधन करता जाप तो हस्ती के समान पलयाग और सत बर्ष की सायु माप्त हो और उसके बीर्य से उत्पन्न पुत्र सिंह के समान है। ।। निश्चय गाढ़ा भारोग्यदर्पण। ११५ लिङ्ग स्थूल करने का लेप । मिर्ष, मेन्या नोग, पड़ी पीपर, तगर, भटकटैया का फल किसी २ देश इरो भंटा भी कहते हैं । एटजीरा, फालीतिल, फूट, जी, नरद, पीरा सरसों और मसगन्ध इण सप दयाइयों को परामर फूट परयाग कर शरद में घोटे गाडी चना ले यह गोली मूखती फा है इसका फुछ जं. देशा महीं है ! किसी कारण से से फेोते के मूगन । गत की नियंलता शे या पति भरप धातु हेने से वि दुयला हो जाता है तो कुछ दिन परापर उक्त गालीको भेडी या यमरीके दृघ में घिसकर किचित गुगगुना हर सेती यगय पांघ छः मिनट रोज लिग (मग्र माग छोड़) पर मलने मे घश्य कुछ मोटा हो जाता है। भौर स्त्रियोंके स्तनों परमर्दन पारने से यह भी कुछ पढ़ा और कठोर हो जाता है यह शायर अन्यकी दया है परीक्षा में जो कुछ गुण देख पा पर लिख दिपा ॥ ! तिला। पर शिला एक पर्यत नामक ग्रन्य कागजमाने से फुध गुण पर देख पा इससे लिखते हैं। मारकरहा, पाठकगी, हालातिख, क्षपिता गन्दापिरोना, जायफर, सूसी जेांक मोर पोरगहूटी यह सम एका ताला ठे एका उँटाफ चमेली के तेल में घोंट कर पाता यन्त्र से तेल मि. फाल ले गौर फागदार मीमी में रख दे। रात को घोडे काल बिल पर मनफर ऊपरसे यंगलापान बांधदेय । इसी प्रकार पन्द्रह धीमराज परा पर इस्तेमाल करनेसे यदि गीर्य में किसी प्रकार देपन होगा सिर्फ हस्त मैथुग मादि मप क्रियाओं से मस निर्यठ हे लोवत्य ( नपुंगा) हुमा होगा सा अयश्य सायदा फरैगा ।। पाताल यंत्र से तेल निकालने की विधि। इस यन्टा को बेद्यक में भूधर यन्त्र कहते हैं । एक मातधी सीसी -- ११६ द्वितीयखण्ड। (पा सीमी गगिहों की दुहागों में मिलती है अधिक आप लग जाने पर भी गहीं फटती और मोमियां पट जाती हैं) दया भर मीमी का मुख मी या तार के पुंज मे पंन्द फर दे और मौसी पर३ रुपरीटीकर मुसा लेय । एसपीदे के पेंदी में सीसी के मुख परामर छेद करै तमो छिद्र में तली सीसी कर रस दे गौर छोदे को चूल्हे पर मढ़ा सीमी के पेंदोतक पाळू पा राख पर ऊपर फंडे की मांग करे, और चूल्हे के भीतर एक दू सरी सीसी पूक्ति सीसी के मुख में मिला कर रख देय अस कापरफे गांध की गरमाहट से तेल निकल कर नीचे की सीसी में टपकेगा परन्तु गांध पर सूप ध्यान रखना चाहिये जादा भांप है। से रोल जल जाता है । चिकित्सा सन्मिलनी से ध्वजभंग की औपध । . १ थिल्प पत्र का रस छंटाक, गो घृत १ उंटाक कमल के एक इंटी जला के पीस कर तीनों को एक पीतल के बरतन में मिला कर पी जाये, इसी प्रकार कई रोज प्रातःकाल पीने से नपुंसक्षपन जाता हता है। मांडी एक तोला, कुचिता जाधा दाना, कुषले के प्रांडी में घिस कर अग्नि में गरम करके रात को पेडू (अस्ति) पर लेप कर ऊपर से पान बांध देय भीर सयेरे खोल देप इसी प्रकार दो तीन रोज करने से ध्वज भंग गेग (गपुंसक) भारोग्य होगा । सम्पादक का अजगापा हुभा नहीं है। हिंग्याष्टक चूर्ण ।। .. स०, पीपर, मिर्च, अजमोदा, सेंघा निमक, ,स्याहगीरा, सौर सफेद जीरा, यह सब दे। २ तेोता हींग को ममि में मूंग लेय, रात्र कूट महोग पूर्ण कर ठेय, इसका मात्रा १ मासा से ३ मासा पर्यन्त है। - पारोग्यदर्पगा। भोजन करते समय भोजग करने के पूर्व ही इस चूर्ण को घी में मान पहिले कपल के साथ खाय जाय तय भोजन करता यथार्थ रूप से गोजगात परिपक्क अमि एद्धि होती है। ताकतवर शराब। किती १० सेर, मुनक्का । सेर, पयूल की छाल ना मेर, जायला दो उंटाफ, मुगठी दे। छंटाक, शैला, जटामासी, जयाग, खस, तग, रोजपास, नागरमोथा, नरकचूर, चन्दम सफेद और मेहदी का बीज ढाई ढाई तोला, मूसली सपोद, मूमली स्याह, पाहगन सफेद, यहमग सुख, मड़ी छायधी, इन्द्र गो, भौंक. दरी नगद, और सफेद, यह मप सवा २ सोला, किमुमिम पायर, बदाम पायमर, छोहारा पायमर, मुनक्का पाष भर उक्त सम दवाइयों का अधकचरा कर ४० सेर पानी में (जिस प्रकार से शराय का खमीर उठाया जाता है) भिगा कर सहाय लेय जप खमीर उठ जाय तप २॥ सेर गौ का दूध शोर जाधसेर संतरे का रस उसी में हाल ढेग भमके से जिस मांसि मद्य खींचा जाता है खिंचवा लेय । इम का गात्रा १ छंटाक से ३ छंटाफ तक है जिन महाशयों के शराय पीने की लत है और सेकड़े रुपया व्यर्थ अगरेजी मद्य में गए करते हैं, मि. छायत से आये हुये स्वदेशी भाइयों को जात च्युत करने में तो शीघ्रही कटिबद्ध हो जाते हैं और आप घर बैठे पिलायस के गायदानका पानी पी रहे हैं, प्यारे भ्रातृयों रंगे चुा टीकटदार बात पर मत शाशक हो भंगरेजी शराब पीने से गिश्चही धर्म का नाश होता है यदि जाप लोगों का गद्यही पाग स्वर्ग को प्राप्ति है गा सक्त शराम को या एम भौर भी उत्तम २ मद्य आप लोगों के लिये लिखेंगे, मजिस्ट्रेटी या तह सीलदारी में, के कागज पर दरखास्त देकर किसी कलवार (जो श- राव घुशाने जानता है।) से अपने घर पर तैय्यार करया ले और संध्या सगय भोगन के पूर्व ही कमी २ पी लिया करो लेाक निन्दा और आधार द्वितीयखगड । ११८ भ्रष्ट हा देगे से पच जागोगे, चतुर यदी मनुष्य कहा जा सक्ता है जो दोनों की साधना करते हैं । 000 जो जीर्णज्यर या खांमी ज्वर चौथे दरजे का जमाध्य न पुगा हो, हम रोग में वैद्यों की अनुमति से माउतीयसंत सादि रस राया जातरों की हानि कारक (डातरी औषध एतद्देशीय मनुष्यों के स्वभावके विरुद्ध है) मीपधियो न देकर यदि दे। मास पर्यन्त निम्नलिखित शीपों का सेवन करावे तो हम शपय महित कार सक्त हैं कि निश्चय समूल रोग गष्ट हो जायगा भीर यह भी कहते हैं कि यदि घेत इरमे कुछ उपकार नहुभा तो जान लेना कि यह रोग सांध्य हो गयाहे अय भाग्यता प्राप्त होना दुष्कर है। लाक्षादि तैल। लाख (पीपल वृक्ष को लाही) ३ सेर, बालेतिल का तेल १ सेर, दही का तोड़ ३ सेर, सॉफ, असगन्ध, इलदी, देवदारु, वाटको, मुर्रा रेसुका, कूट, मुरेठी, सफेद चन्दन, माथा और रासन ( यह भरहर के वृक्ष के आकार पौत पुष्प युक्त एक वृत्त होता है ) ये सब एषा २ ताला। प्रथम लाही का साफ फर १२ सेर पानी में लाही डाल एक बरतन में जोम देवे (उसो साधी में पाचपाव वर का पत्र लोध २-तोला, सलो ६ मासा कुचल कर छोड़ देय (निस से कि मलाभ सब क्वाथ में भाय जाय ) जव तीन सेर जल रहं जाय तव पीतल कर छान लेय, तत्पश्चात् एक पौतल या तांवे को कढ़ाई में उक्ता तेल डाल चुल्हे पर चढ़ाय उसी में लाहौ के पानी भोर दही के ताड़ तथा सौफ आदि उई लिखित दवाईयों को भी भिलपर पानी में पीस भाई (गोणा) कल्क (लुगदी) फर साल मन्द भांचरो पचाय जव पानो बिलकुल जलजाय (प- हचान यह है कि एक लकड़ो जपर के तेल में लगा कर भाग में छुलाने से चुरघुराहट शब्द न होगा तेल जपने न पावे ) फौरन चूल्हे से नीचे उतार “भाराग्यदर्पण। ११६. काढ़ाई के दौ में पानी या पुचारा दे मोनही भीतल कर लेय पोर छान कर बोतल में भर काग बन्द कार रखदे । राज सवेरे गरम ऋतु में ८ बजे जाड़े में १० बजे एक घंटे तक रोगो के समस्त भरौर में मईन कर के यदि रोगो सबल हो तो ताजे धाप जल से स्नान फारादे, अधिक निबल हो ता किंचित छपा जल से स्नान कराय यदि रोगो पनिक्षा प्रगट कर तो न स्नान करावे तपेदिक के अतिरिक्त इस तेल के मन से विषम जर फास खास अंग दर्द खाज देह दुर्गन्ध ज्वर हड़ फूटन चादि रुज पाराम होता है एवं गर्मिणो के शरीर में इस तेल वा मन वार प्रत्यह स्नान कराने से गर्भ पुष्ट हो पारेरोग्य बालक उत्पन्न होता है। शीतोपलादि चूर्ण । मियी १६ ताला बंशलोचन (जिसके भीतर नौला रंग हो) ८ ताला छोटो पीपर परन्तु प्रथम एक दिन रात पीपर की गोदुग्ध में भिगा रक्खे फिर सुखालय चार ताला छोटौ लायची के दाने दो ताला तन १ ताला इन सब दवाइयों को कूट कापड़छान कर तीन २ मासे को पुड़िया बना लेय साम सबेरे एक पुड़िया को महद के साथ घटा कर ऊपर से छटांफ या आधपाव कच्चा गज का दूध पिला दय, यदि रोगो को पतले दस्त हों तो इलायची को समूचा भेज कर तब दवा में मिलावे और महद के स्थान में सरबत अनार या सरबत नौलोफर देय और दूध भी न देय । खदिरादि वटी। खेर ४ तोला सेलखरौ ( सङ्गनरोहत) २ तोला कपूर एक तोला इन सोनों भौषधिशे को बबूल के छाल घााथ में घोट घने को बराबर गोलो बना घाममें सुखायलेय, सब खांसीभाव एकगाली मुखगें डाल चूछे। यदि भिर में दद या घुमरी होती है। तो चमेलो के तेल या नारियल के १ छंटाका तेल में कपूर ४ मासे, बड़ौ लायची के दाने १ मासे मौतलचिनौ २ मासे सेब को खुद महोन पौस राज घिर में मले । अधिक पिपासा हो तो मुख में शीतल चिनी द्वितीयवगड़। के दाने या सूख पावले के टुकरे मुख में डाल डाल कर चुके । पेट में दाइ या जलन बोध हो तो धान के लावे का माड़ बना उम मे मियो मिला धार पिलावे और पौत चन्दन अथवा सफेद चन्दन को पानी में थोड़े से कपूर के साथ घिस बार छाती और पेट में लेप कर देय । पुराने ज्वर में दस पोर भाव का अधिक स्याल रखना चाहिये क्योंकि खुलासा दस्त न होने से भिर गें गरमौ जो का घबड़ाना और खांसो का जोर बढ़ता है तथा दस्त पतला अधिक पौर दिन रात में कई बार होने से रोगी शौघक्षी यमालय को गमन करता है और प्रायः मूखों को चिकित्सा से मूत्र में जलन, रोध एवं मूव हारा घात का पाना इत्यादि दोष हो जाते हैं उस पर ध्याग न देणे. से एक भी पोषध गुण कारक नहीं होती। यदि रोगी को दस्त अधिया पाते हो तो लघु गङ्गाधर घूर्ण या वृहत् गङ्गाधर पूर्ण दे अथवा वेल या मुरब्वा या दूसरगोल की भूसी में जरा सा मियौ मिला के पानीमें घोल कर पिलावे कोष्टबह में अर्थात् दस्त न पाते हो तो त्रिफला चूर्ण ६ मासा या हड़ का चूर्ण या मुरब्वा सोते समय खिला देय । या जरा सा अंडी का तेल दूध में डाल कर पिला देय मूत्र जल के या कड़क हो तो दश २ दाना गौतलचिनो को घूर्ण कर पानी के साथ दिन में पार पांच दफे पिलावै मूष परीक्षा में यदि धातु का पाना सष्ट है। तो पूर्वोक्त मितोपलादि चूर्ण के बराबर ताल- मखाने के बोज का चूर्ण मिला महद को साथ न चटा के सिरफ गो या ववारी के दूध के साथ देवे॥ पुराण ज्वरे पथ्यम् । मासों में प्रजन लगाना, स्नान, माम सबेरे शुद्ध यायु मेघग, दाह शांत करने वाली औषधियों को छाती मीर पाये पर लेप करना जैसे स्वेत चन्दन, पीत चन्दन, कपूर, शीतलगिनी, घुस सुगन्धवाला इत्यादि यस्तुगों को योचित न्यूनाधित डे गुलाब के जर्फ में घोट पेट छाती शिर तथा अन्य अंगों में भी जहां अति दाह (जलन) हे। छेप करना भ. ति लाभदायक है । साने में मूंग तथा अरहर की दाल पुराने पावल आरोग्यदर्पण। १२१ का भात, गेहूं या जवेकी गोटी एवं कुलंग, हरिण खरगोश अपघा पकरी के गांस का सादा जूस (जिन्हे अरुचि अपया पहरेज है।वे न साधै) गौ तथा बकरी का दूध भयसन (नवगीत) अपवा ताजा गौ घृत, परवल, रागलीकी (कव) नेनुमा भूठी की जा और कोमल पीज रहित भांटे की तरफारी (भाजी) परिश्रुम जल (फिलटर बाटर) अधया स्वच्छ गजा जल या अन्य पहाड़ी कारणों का जाल । यह मप गण पुराने ज्वर वाठे को सुश्रुत मादि मतों से अधिकांस पुराने ज्वर ग्रस्त रोगियों को माराम किया इसे छग ठोकोपकारार्थ प्रकाशित कर देश हितैषियों सपा पि. कित्सकों (वैद्य) से सधिगय निवेदन करते हैं कि अवश्य पूर्वोक्त कपिता- नुमार प्राचीन ज्वरग्रस्त रोगियों को चिकित्सा करके मुझको चिरपाधित और नपात करें । निस्सन्देश का सक्ते हैं कि नियतकाल पर्यन्त में यदि प.क्त लिखित उपायों से कुछ लाभ प्राप्त न है। तो निश्वप जानना कि जाय सस रोगी का साराग्य होगा अति दुष्कर अचार वटी। हल्दी, दारुदी, मिर्घ, गांधागा, शेांट, हड़, चीता, कूट, पी. पर, सेंधानाम, एक २ रोला निम्ब पत्र और नीय परकी गुर्घ दो २ ताला मे।था ४ तोला, उक्त सब दवाइयों को कूट कपड़ छान कर शुद्ध जल में घोट का चने की घरायर गोलियां बना में सुखा ले यह पूर्ण मात्रा है, यालकों की अवस्था देख कर मात्रा धमा लेवे गौर बालको को मिर्फ दिन में दो या तीन मात्रा से अधिक न देय हग गोली को दिन में छः दफे अर्थात् दो २ घंटे में जन्म के साथ खिलाने से नित्य ज्वर अप्सरा तिजारी चौथिया और सूतिकच्चा आराम होता है । इसे पानी में घिस कर मांखां में मां. जो (अजग) से मांगों के भागने .अंधियारा हेाना स्त्री के दूध से सोते में पलकों का घिपट जागा पकरी के दूध से नयोग फूली छाया हिसोयखण्ड। १२२ तिल के तेल से रतौंधी और केले के पानी के माथ आंख में . गाने से पास से पानी का बहना बन्द होता है। स्वदेशीय मात दिल भोजन पथ्य है । पाठकगण ! नधित है कि शाप लेोग अवश्य उक्त बटी को तैयार कर रोगियों के। वांटिये भारत में देशीप सौ. पध के प्रचार होने की यही एक साधारण उपाय है । जिन्हे इम के भो बनाने में आलस्य हे।ये 5॥ का टीकट भेज यहांसे एक डिवो जिसमें १०० गोली हैं मंगा लेय ॥ ऊपर जो शताव|दि चूर्ण धातुपुष्टाधिकार में लिख गाये हैं उमार्ने अनुपान गो का दूध लिखा है, कितने पाठकगण पत्ता द्वारा पूछते हैं कि यदि गो का दुग्ध लाभ न हो तो किसके साथ सेवन करें? उत्तर, यदि गी का दूध न मिले तो भैस या बकरी के दूध के साथ सेवन करै यदि किमी फा दूध न मिले तो मिर्फ जलदी के साप सेवन करै, रहा यह कि जलके साथ खाने से फायदा बहुरा कग करता है । प्रायः ऐमे लेग है कि जहां माठ दस रोज कोई किस्म की दधा पापा और फायदा न देख पा फो. रन छोड़ देते हैं कहिी हैं कि पाह तो हमको फायदा नहीं किया विचार फरने का स्थल है की जन्म भर का कोढ़ एक रविवार में माफ हुदा है दूसरे भोर २ रोग नाशक औषधियों की अपेक्षा धातु भर्द्धक भौषध भ. धिक काल में गुण करती है कारण पह है कि धातु ४० दिन से कम में नहीं बनता इस लिये कम कम धातु पर्द्धक गोषध ८० दिन पर्यन्त प वश्य खाना चाहिये । कोई रोग नाशक औषधापपों न हो जय तक नि म्नलिखित मात बातों का संयोग न होगा कमी गुण न करैगो अर्थात् देश, काल, अवस्था, प्रकृति, बलाबल, रोग भीर औषध का पूर्ण रूप से संयोग होनेही से भाराग्यता लाम होती है यदि ऐमा न होता तो एक ही गोषध से समस्त भारत का रोग गाराम देता क्यों हमारे भूत पूर्व वैद्यया एक रोगों के नाशार्थ संस्य भीषधियों का विधान देते । दीर्घ काली रागियों के दीर्घ काल तक भीषध खाने का विधान सुद प्रारोग्यदर्पण। १२३ वैद्यक शास्त्रही में लिखा है पाठकगस स्वयं देख लेंय इस लिये सर्वसाधा. रण रोगग्रस्त यन्धु बगों को उचित है कि किमी भोप के सेयनसे यदि किसी प्रकार की हागि न देख पड़े (प्रकृति तथा रोग के विरुद्ध भौषध से शीघ्रही नुकसान होता है) तो उन औषध को घरायर सेवन करते जांय अपने समय पर अर्थात् जिस समय यह जीपघ रोग से बयान | होगी मिश्ववही गुण करेगी । क्षुधासागर अर्क। जवाखार अदरख का रस ३ पाय, घिउकुमार का रम माघ सेर यंगला पान का रस गाध सेर, फागजी नीबू का रस ३ पाय, जंभीरी नीबू का रस २. पाय लैंग यही छायधी, पीपर छोटी, दालपीनी, कालीगिर्ष, सज्जीसार, जीरा सफेद, जीरा स्याह, कालागोन, सांभरनान और सेंधव नाम हम सप जीपधियों को महीन कुभल कर राय रस को एक कर एक पही सीमी में अपवा किसी ऐसे मृतिका पात्र में जिम में कि कुछ रोज तक पानी भरा गया है। भर पात्र का मुख बन्द कर १५ दिन तक धूपों रक्ते बाद उसे कपड़े में छान बोतल में भर कर रख दे और जरूरत पड़ने पर पिये। इसका मात्रा ३ मासा से २ तोला त है इम को देानों मगय पार्षात् माम सधेरे पीने से शनि मन्द जीर्ण और अनेक उदर व्याधि नाश होता है परन्तु जिसकी प्रकृति गतिगर्म तपा धातु की कोई किस्म की बिमारी हेगी तो फायदा न करेगा । एरंड पाक । बिला हुशा एरंड का योज जाधसेर, दूध ४ सेर, घी पावभर, चिनी | ढाई सेर, सोंठ, पीपर, मिर्च, लौंग, छोटी लायंधी, तज, तेजपात, अस. गन्ध, सौंफ, रासन, तेजयल, शताधर, गदापूर्ना की जड़, खस कपूरकवरी यह सप जौषध सवा २ तोला जायफल १ तोला जावित्री मीर केशर १२४ द्वितीयखण्ड। छ. २ मामा (पाफ बगाने की यिषि) पिछले शङ्कों मैं लिय साया पान्तु साधारण रीति मे फिर भी लिसे देता हूं प्रथम दूध के। कढ़ाई. में चढ़ाप कर भौंटे जय साधा दूध जल जाये तब रेडीको गूदी के मिटपर पीस हाल देय और मीटता जाय जय रोया है। जाय तो नम रोये केो घी में भूज लेप पाद घिनी की तासनो बनाय (जय घामजी ठंढी हो जाय) उसी में सेोया और मगस्त उपरोक्त काहादि भौषधियों के। फूट कपरलान कर मिला देय । बादाम पिस्ताको गरी मुनक्का भौर किम. मिस माघ २ पाय ले महीन कसर उसी में मिला तीन २ ताले का लड्डू बना लेय । माग सवेरे एक मेदिक खाफर ऊपरसे किञ्चिन उप्ण पावभर गौ या यकरी का दूध पीने से गठिया उकया जा दर्द पांडु रोग उदर रोग भांत शुद्धि भाराम होता है बहामारी गुण इसा यह है कि कैसा हू फेष्टिबद्ध ययों न हो मेाते समय एक मेदिक खा कर ऊपर से गुनगुगा दूध पी लेने से सवेरे मामूली दस्त सूथ सुनामा भा जाना है। अफीम खानेवालों के लिये अफीम पाक । अफीम ३ तोला, दूध ४ सेर घृत जाध सेर चिनी ढाई सेर, तज, तेपात नागकेशर मिर्च साया जायफल कंकाल करफरहा सफेद मू- मली स्या मूमनी फेघाछ का बीज यह सब एक २ तेरणा शोंठ पीपण जावित्री और केशर छः २ मासा छोटी लायची २ ताला बन्शलोचन २ तोला, माती नयेधी ३ मामा कस्तूरी १ मामा चांदी का यर्फ ५ ताय (बनाने की विधि) अफीम का मात्रा खानेवाले पर निर्भर है चाहे जि- तना कम जादा रक्खे पहिले दूध को अधावट करै तब शफीमको पानी में घोल कर नसी में हाउ देय जब दूध रोषा हे जाप, घी में मूंग लेप याद घिमी को धामनी धनाय उसो में सोया और सगस्त औषधियोंको फूट पर छान कर उनी में डाल देय परन्तु मेोती को गुलाब के अर्फ में पोट कर हाले और 'मामयिक मेवा भादि हाल के पो बलापल पाराग्य दर्पगा। १२५ .- म अनुसार मात्रा यना ले एवं हर एक मेोदकों पर चांदी के वर्क लपेट देय और होनसाय अपवा एक समय दूध के साथ सेवन करें यह सर्द ऋतु का नुसखा है गर्म ऋतुभों में गर्म चीजों को निकाल हाले यदि माफीम खाने वाला वक्त विधि से पाक तैय्यार कर सर्वदा खाया करै तो कभी बीर्य होन और बद्ध न हो। इस मेदिक के खाने से शीत युक्त खांसी दमा प्रमेह अतीमार और सर्वाङ्ग पायु नाश होता है और वीर्य स्तंभन होता है प्रायः ठेग मजे के लिये अथवा रोग नाश के लिये अ. फीम खाने या चण्डू पीने लगते हैं परन्तु उसका मन्तिम फल यह हेाता है कि रोग नाश तपा मगा न मिल के पौर रोग वृद्धि हो जाता है ममग्र शरीर को नोड़ियां संकुचित हो जाती हैं, स्मृति ज्ञान बुद्धि भ्रष्ट और कुछ काल मनुष्य निकम्मा हो जाता है इसमे उचित है कि के. घण अफीम न खा के अफीम पाकही यनाकर खाये और फिर कुछ रोज के पाद छोड़ दिया करै। भांग का पाक । भांग के खानेवाले भी शाज दुनियां में कम न निकलेंगे। भांग के खाने से कुछ ऐसी हानि नहीं है कि शरीर नष्ट भ्रष्ट हे। जाप जैसा की आदिफेन के खाने में देता है रहा यह कि शी मिजाज वाले को कुछ चादी करता है उचित है कि शीत प्रकृति के लोग जाहे के दिनों में संध्या समय भांग का पाक बना कर खा । भांग १ पाय, गो का दूध ५ सेर, घी गाध सेर, तज, तेजपात नागकेशर काली मिर्च मूर्धा असगंध गदापुर्ना की जल केघाछ का बीज परियारा की जड़ कोवाटोंटीकी जड़ फकई की जा सय एफ २ ताला लौंग शोंठ पीपर जायफल जावित्री और केशर छः २ मामा छोटी लायची यंशलोचन और सौंफ, दोस्तोष्ठा। बनाने की विधि। पहिले मांग को तीन चार पानी से सूध धो कर सुखा लेय, दूध १२६ हितीयखण्ड। को कढ़ाई में हान औंटे बघ आधा दूघ रह जाय भांग को सूप गहीन चूर्ण कर उमी में डाल खेाषा कर लेय, सोवा को तमो घी में भूज चीनी की चासनी बना उसी में खोया पौर सगस्त शौषधियों को कूट कपर छान कर मिला अपने पाठ के भनुमार मोदक बना लेय। सांम भयेरे अषया सिर्फ मांग को एक लहडू खा कर ऊपरसे दूध पिये तो प्रमेहादि समस्त धातु का रोग काराग हो गौर बल तथा अग्नि को एद्धि हो । भांग और अफीम पाक विशेष कर उसीतो सायदा कर सक्ताहे कि जि. मका मिजाज शीत का है और उक्त नशा खाने का अभ्यास भी है। कामोत्तेजक चूर्ण । मफेद मूमली दिल्ली की, स्याह मूमली, शतायर, मकाफुल मिश्री, मालिग मिश्री, यह मब एक २ तोला, पहिमग दोनों दो ताला, दोतरी दोनों दे। ताला, इन्द्राव, मुरवारी का बीज, जावित्री, जायफल, शोंठ सौर कुलीजन छ: २ मामा उक्त सय शोषधियों को अलग २ फूट फपर छान कर एकत्रित कर पार २ गामे की पुरिया बना ले माम मधेरे एक पुड़िया शहद के पाप चाट कर अपरमे पाय भर दूध गिश्रीयुत पी जाय पदि गर्म ऋतु हो तो दूध के परिवर्तन में गागवां के अर्फ मिश्री गि- लाप कर पीगा उत्तम होगा। इस चूर्ण को दो मास पर्यन्त सेवन करने मे धातुक्षीण नयीन क्लीयत्व देोप भादि गाराम हेाता और रति कामग में भागन्दता प्राप्त होती है । भारोग्य पुरुषों के लिये वैद्य शास्त्र में दो भांति के प्रयोग कहे हैं। रमायन जोर वाजीकरण, इन दोनों यथावत बपान जागे करेंगे । रसायन किसे कहते हैं "पज्जराध्यातिनि. ध्यन्मि अपनतद्रमायगम्" जिग ३ गोषधि भौर उपायों से मनुष्य शुद्ध (पुढ़ापा) न है। अर्थात् मत्तर गस्सी पर्ष पर्यन्त संपूर्ण इन्द्रियों कि शक्ति यपावत् बनी रहे नवे रमापन यप स्थापन एवं करप भी कहते हैं। र. मापन प्रयोग श्यम के पूर्ष शपषा मध्य में पाराग्य जन को हो मुक्ता फा --- भारोग्यदर्पगा। १२७ है "नाविशुद्धिशरीरस्य युक्तोरासायने।यिधिः" रोगी तथा अति धातुक्षीण शरीर रसायन नहीं होता यदि हेाता भी है तो रोग आराम के बाद एक सघं से ३ वर्ष पर्यन्त मौषध के सेवन से । याशीकरण उसे कहते हैं कि "यस्मातद्रव्यं भवेत्स्त्रीपु होगाजी करंचतत्" जो क्रिया और भौषधियां स्त्री रति में मानन्द उत्पन्न करै । यह भी अति व्ययाय शील को पाजीकरण भी नहीं होता यदिचेत् हे। भी तो कुछ काल के भोपध सेधन मे होगा अन्यथा सम्भव है पाजीकर और रसायन कर 1- नेकानेक औषधहैं कि जिनके बनाने की क्रिया, खाने की विधि और गुण सुन्न कर पाठक गण चमत्कृत हे। जांयगे उमे आगे कहेंगे इस स्थान में हम सिर्फ दे। द्रव्य दिखलाते हैं सफेद मूसली ( रसायन) और फेवाल का बोज ( माजीकर है ) सफेद मूमली विलो की पाय माधमेर ले फूट कपर छान कर तीन २ गामा की पुड़िया बना ले इसका गामा ३ भासा से १ वाला तक है जैसी जिसकी शमि हे। साम मधेरे एक पुड़िया मुख में रख शीघ्रही पावं माध सेर गी के दूध से उतार जावे, घूर्णको टुघडावे न पोंकि मुषमें चिपट जाता है । यदि इस चूर्ण के खाने से कोटपटु जीर्ण मादि उपद्रव न हे। निरन्तर पघा जाय तो जय तक सूप योर्य पलयान पुष्ट और एद्धि न हो सागा चन्द न करै एक वर्ष तक इसके खाने से बीर्य मदायली हे। अनेक स्त्री गमन तथा पयाग पुत्रोत्पादन करने में रामर्थ होता है। यासीकर घनफेयाछ के बीज को छोड गरी नि- काठ पूर्ण कर ले इसका मात्रा ४ मासा से दो तोला ता है जैसी जमि हो मात्रा पना ठेय साम सवेरे एक मात्रा खा कर ऊपर से मित्रीयुक्त दूध पी जाय जग तक पूर्ण रूप से लाभ ग हे। यराया साता जाय किसी देय से रति शत्ति यों न जाती रही हो . वश्य इसे कुछ काउ सेवा करने से पुरुषत्व होगा .............

द्वितीयखगड। प्रदर रोग की अपूर्व प्रोपध । ग्रेग चन्दन जटामामी लोच रास पदम केगर नागकेशर बेलकी गती नागरमाथा मोंट लाहौर पाढ़ी कुरैया की छाल इन्द्रय अतीस गुमा प्रांगणा रमयत आमकी गुठली की गरी जामुन की गुठलीकी गरी पोरम कमनकी गरी (कमलगट्टे के भीतर वीचमें एक हरीवस्तु गहमी उगे निकाल छाले) मजीट छोटी लायची अनार का बीज श्रीर गट इन मय औषधियों को दो दो ताला ले फूट कपर छान पर योग में रग देय इमका मात्रा ६ मासा से दो ताला पर्यन्त । (पाने की विधि) दो तोला माफ पुराने चावल को कुचलकर ३ सेंटाफ जल में भिजा देय और वाद एक घंडे के मलकर उस्का पानी छान लेय ठमी जल से उपरोक्त चूर्ण की एक मात्रा शिल पर गोट फर १ मासा गहद डाल कर पी जावे इसी प्रकार दिन में तीग अया दो यार पीने से निश्चय है कि १५ दिवस में रोग शारण नष्ट हो जाय । इसी पूर्ण से रक्तप्राय भी बन्द होता है। फाले सांप के काटने का इलाज वी० सी० से । भाग के पत्ते को गति दो नाखून से उतार कर जमा करलेय और उस में पापा के पत्ते का दूध मिला पार चने को बराबर गोलियां बना ले जिसे गौ मादि उसे पा २ घण्टे के बाद एक एक गोली खिलावद्ध गोलियों तक othiamट हुए पादमी पा गुख मोठा मालूम है।गा साततौं गोली कड़वौ मालूम होगी पोर मरीज भच्छा हो जायगा । कस्तूरी की पहिचान। माय लाई के दिनोंगे नेपालो तथा पहाडीमनुष्य नकलौनाभौ वनाके महरों में सात लोगो से ठग लाते हैं, माघ मास में प्रयाग में सैकड़ों इसी भाति के उग होग पारी में पौर घोश दे के हजारों रुपये ले जाते हैं कुछ पाराग्यदर्पगा। १२६ प्रयागहो में नहीं ऐहो हरएक भारौर मेखों में होता है और जो जिस वस्तु कां पहचानता है वह उस्मे कमी ठगा नहीं जा सक्ता हिरणाके नामी की यह बहुत उत्तम परीक्षा है कि पांच चार लहसन के नवे को पत्थल पर महोग पोम उमो के रस में एक बिलस्त भर तागा तर कर उसे सूची (सई) में पिरोह नाभी में छेद कर डोरे को खोंच ले यदि उस नाभौ के भीतर प- मिल कस्तूरी होगी तो लहसुन को दुर्गन्ध जाती रहेगी कस्तूरो को सुगन्ध डोरे में आ जायगी “खुले कस्तुरी को परीक्षा" अक्सर ठगोग कायले पादि वस्तुओं का महीन रवा कर वाद असिल कस्तूरो का पानी में घोंट उसी में रवे को तर कर छाया में सुखा लेते हैं इसी प्रकारदातोन पुट देने से पसिल कस्तूरी की भांति महकदार हो जाता है बस मेलों में जाके उसे पाठ दस रुपये ताले के हिसाब से बेच भाते हैं। एक साफ पग्नि के पगारे पर एक रवे को रख देय और उसके घूम को सुगन्ध लेय यदि अभिल कस्तूरी होगी तो उसका धुवां वादि से अन्त तक महकदार निकलेगा पोर नकलौ होगो ता प्रथम धूम सुगन्ध सहित बाद धूम ( धुवां ) रहित अथवा जो वस्तु भोतर होगी उसका महका बोध होगा। कस्तूरी की उत्पत्ति । मृङ्ग विहीन नर हिरण को नामि में चर्म की एक पोटरो सौ होतो है उसो में कस्तूरी पैदा होतोहे पहिचान उसको यह है कि जिस हिरण के ना. भो में कस्तूरी रहिती है वह उसो के मद से चारो तर्फ बनों में पौधों को संघता फिरता है, कारण यह है कि उसको नाभि में से जो सगन्ध प्रगट हो- ती है तो उसे उस सगन्ध का अपनो नामि में न भान है। कर अन्य बस्तु- पो में भान होता है। लोग ऐसा कहते हैं कि उस हिरण के जंघा की अस्थि एकही होती है इससे वह बैठ भो नहीं सक्ता रात को हतादिकां में उठग कर से नाता है और वे ही हिरण वंशी के शब्द को सुन कर प्रसन्न भो हाते है। वधिक लोग जो उद्योगी हैं, बग में जहां मद युत मृग को देखा बंधी बजाते हैं और एक ही बांस के टेक में खड़ी कर देते हैं और उस बांस में १३० द्वितीयखण्ड। डोरो भो बांध देत व मग टहो में उंठग कर सोनाना है तव डोरो सो खोपते हो टहो गिर जाती है और उसी के साथ मग भी गिर जाता है व वधिका मृग का पेट फार कर कस्तूरी पो थैली निकाल लेते हैं। हर एक गा. भी में से ढाई तीन ताले से कम कस्तूरी नहीं निकलतो निमका मूल्य पालोम पचास रुपया होता है । इस प्रपञ्च का भी प्रभुत चरिव है जाव दो तीग रुपये की लालच में छोटे बच्चों को लोग मार डालते हैं ताजिय पशु भरीर में इस कदर मूल्य निम्मित बस्तु है उसमा जीवन कैसे वधकों से बच सक्ता है। कस्तूरी का गुण। इसका स्थगाध शति गरम, बालश्लेम नाशक, धातुत्तेजक, बाजीकरण पनि भौर पल बर्द्धक है मात्रा इसका अर्द्ध चायल से ४ घायल पर्यन्त है । प्रायः गौर लोग जाड़े के दिनों में पान में डाल कर खाते हैं, खाने गौर पीने की तमाकू, इसे डालने से तगाफू परत उमदा गुण दायक है। जाती है, हरएक पुष्ट दवाइयों में भी इसे डालते हैं। परीक्षा से ठीक जागाजाता है कि शीत मिजाज याले को रसकी अपेक्षा कस्तूरी अधिक गुण करती है ॥ मृगनाभ्यादि वटी (कस्तूरीकी गोली) कस्तूरी ६ मारा, आनधी माती १ तोला, जावित्री १ला, केशर २ ताला, जायफल २ तोला, छोटो छायची के दाने २ तोला सरकरहा २ सोडा, कोल मिर्ष २ शाला कपूर ६ भाषा, शुद्ध फुधाला अपवा फुषले का शत (स्टकमिया) ४ पायल, सेनेि का बर्फ १० ताय चांदी के २० साव वनाने की विधि। प्रपा मोती को घोंटने वाले खरल में लाल गुलाय के आर्फ में ४ आरोग्यदर्पण। १३१ पाहर घोंट ले । फुघला सेधिोको रोति यह है कि एयरतगर्ने कुघठे हो जल में मिजा दे और रोज उसका पानी पदखता जाय २१ रोज के पाद समे छील उसका दश निकाय मदीन कतर पूर्ण फर डेय, इस्टिहनिया चाहे गरेजी दवाखाने से ले लेप, सुघला हायसे सिर्फ प्रसार में स्तम्भन होता है उसे म छाडे तो कुछ गन्देशा भी नहीं है । सब दवाइयों को खर में हाल २ तोला शहद और गुप्लाय के पर्फमें घोंट मटर के परापर गोली बना लाया सुखाय सीसी में बन्द कर रख देय । एए पटी की गाना चोथाई गाली से २ गाठी पर्यन्त है जैसा जिमका यल हो गाना बना लेप । संध्या ममय एक मात्रा खा कर कपर रो दूध मिन्नी पीने से विपप में गति लानन्द और शक्ति बढ़ती है, परन्तु इस गोली के सेवन फरने वाला तेल मिर्चा सटाई शाक घरपन यासी म रुक्ष न माजरा बादि न साधे घी दूध गलाई पुराने धावठ का भात वेष मीठा पगार पौड़े की गहेरी गादि अधिक फापदा करता है इससे अतिरिक्त इस गोली के खाने से कासवास यक्ष्मा कथा गठिया और गपुन्सका मादि रोग शाराम होते हैं। केशरकी पहिचान । यह एक वृक्ष के पुष्प के भीतर कारण है, जैसे धरै के पुष्पके भीतर रण होता है इसके वृक्ष काश्मीर में होते हैं। ठग लग गफली केशर भी बना कर पायपर घेप जारी हैं, वे लोग केशर इस प्रकार बना लेते हैं, ससे भुट्टे में जो बाल मदृश पदार्थ हेासाहै अथवा भरै के फूलको उ केशर को पानी में गाड़ा घोंट कर उसी में तर कर छाया में सुपा लेत, एसी प्रकार पांच धार पुट देने से. केशर हो जाता है । असिल कंगर की पदि धाम यह है रङ्ग जचमेली (किञ्चित् सुर्खा लिये पीतवर्ण) सीमा सुगन्ध, घगा में हाका बाद में किञ्चित चार और घायल भर फेशर २० गिगट सक मुख में रखने से शिर में गरमी वेध है। इससे पिपरीत नही द्वितीय खण्ड । १३२ जानना । गुण, गरम मुस्वाद बायु सफा गाशक शशि तथा बलको एद्धि करता है । जाड़े के दिगों में प्रायः इसे पान के तथा और खाद्य वस्तु साप साते हैं। सफेदचन्दनके तेलका पहिचान । यह तेल मिलापत मे भी धग के पासा है .गीर एतद्देशीय इसर बनाने वाले गन्धी लेग भी बना लेते हैं पोंन्ति जितने प्रकार के तर ते. यार किये जाते हैं मय में चन्दन के तेल का पुट रहना है और जादातर धन्दा का तेल सुनाक के रोग में अधिक काम शाता है, परीक्षा जाना गया है कि सुजाक की बिमारी में और दयाइयों की अपेक्षा पदग हा तेल गधिक फायदा करताहे परन्तु जय असल पदार्थ नहीं गिनता ते कर अवगुण करता है फिर पाज के जमाने में जैसे और २ बातों को त. रको हुई है और होती जाती है पैसोही छल कपट फूट विश्वासघात मादि की भी ऐपी मुन्नति हुई है कि कहीं पैर धरने की जगहयाको म रही और भगय के प्रभुघर की रुपासे यठताही जाता है। खैर सफेद घ. न्दन के तेल की अमिल परीक्षा यह है कि एक सूथ साफ मफेद कागज पर थोड़ा तेल लगा दूर से कुयले की मांग देखाभो फौरन तेल उह जायगा जरा भी दाग न मालूग हेगा और नकली तेल का दाग पगा रहेगा। अरेजीइमलीकी चटनी। लिली इमिली २ सेर, मिरपा माधपाय, अदरख छिला हुगा माध पाय, लहसुन शिला माधपाय, दालचिनी १ छंदाक, करन (जरंक्त) एक पाव, किमगिम १ पाय, घिगी १ सेर, निमक ढाई तोला, मिलापती मिरा भंगूर का १ बेसिल (बनाने की मिधि) प्रथम किसमिस गौर क. रग का सूब साफ कर पानी में घी मुखा लेय और इमिलीफा थेहे पाणी 7 1 पाराग्यदर्पण। १३३ में मिजाजो दो घंटे के बाद मल कर मी फेक उसका गूला ठे ठेय बाद इसके डाल मिरपा अदरख वाग और दालचिनी पारी चीजों को शिलपर सिरका देकर सूप महीन पीस ठेय फिर सप चीजों को मै सि. रका चिनी भादि एक कलई दार बरतन में डाल चूल्हे पर चढ़ाय म. न्दाग्नि में पाये जब सूय सुगन्ध गाने गे सम उतार लेय और अमृत. घाम या अहे मुख के शीसे में भर कर रख देष यह चटनी बरसे रहती है, भोजन के समय या जम चित्त चाहे खाये । इस घटगी को बाट साहम तक खाते हैं। यांमकी चटनी। माम कच्चा ७ सेर, चिनी साढ़े तीनसेर, सिरका अंगूर का दो या. तल, लाल मिरचा २ छंटाक, मादाम को गरी १ पाव घमिया १ पाव, किसमिस तीन पाच, सदरख डेढ़ पाष, नमक डेढ़ पाच, लहसुन ) सोला (बनाने की विधि) यह चटनी दो प्रकार से बनती है एकमे जाम के कतरे रहते हैं और दूसरा नाम को पोम लुगदीकी जाती है । पहिले मांग को छील महीम कतर शिल पर पीस ले पाद इसके मिर्धा लहसुन धनियां अदरख पारे। केो शिल पर सिरका में पीस ले गौर यदाम को महीम कतर ले फिर सय चीजों को एक कलईदार यतन में डाल चूल्हे पर चढ़ाय धीमी जांच से पकाये और करछुल्ल से पराबर चलाता जाय जय देसै कि सूप पक गया महक भाने लगी तप उतार ले और किसी कांच के पात्र में रख ले पद चटिनो गति सुस्वाद ममिति गुण मिशिष्ट होती है यह चटमी प्रायः पनी बनाई मौदागरों की दुकानों में भी रहती है, और इसे मढे २ अंगरेज लोग खाते हैं। सुजाककी दवा। ऐसा कौम मनुष्य है जो इस रोग में ग्रसित न हे। इसे वैद्यक में हितीयखण्ड। मूत्रकृच्छ्र और मूत्राघात, हिकमत में सुधाक जोर शारी में गनेरिणा कहते हैं जिसका स्पष्ट लक्षण एवं चिकित्सा लिसेंगे गिद्वान से लेकर - ताई तक इसकी औषध जागते हैं परन्तु शिम प्रकार हैजे को भोपय साज तक उत्तम नहीं निकली वैमाही इस रोग की भी॥ शीतलचिनी आधपाय, सेलसरी आधी छंटाफ, कलमी सारी ॥ तोला, फिटफिरी ६ मासा, गेरू मही ४ मासा, कपूर ३ मासा मय जी- पधियों को महीम कूट कपरछन कर तीन २ मामे की पुड़िया बना लेय दिन में छः दफे अर्थात् दो २ घंटे पर एक २ पुड़िया मुरा में रस दूध पानी या सिर्फ आधपाव पानी से उतार जावै । आठ रोज इस औषध के खाने से पेशाव का जलन और मवाद का आना अवश्य बन्द होगा | यदि आठ गेज में मयाद न बन्द हो तो इस ओपध को भी साये और निम्नलिखित पिचकारी भी लेवै, ऐसा देखा गया कि बिना पिचकारीफे नहीं आराम होता। गेरह मही २ तोला मेहदी की ताजी पत्ती २ तोला सफेद मुरमा २ तोला रसयत २ तोला इन चारो औपपियों को डेढ़ सेर पानी में महीन घोंट पकाय लेय जय तीन पाय जल रह जाय छान कर योतल में भर लेप और दोनों समय इमी की पिचकारी लेवे ( पिचकारी लेने की विधि) जब पिचकारी लेना हो प्रथम पेशाव करे वाद एक चौकी पर उकुरू वैठ पिचकारी भर कर लिङ्गमार्गमें देव और तीन मिनट तक लिङ्ग का मुह बन्द करे ताकि शीघ्रही जल गिर न जाय जब पिचकारी. ले चुके तो आध घंटा तक पेशाव न करे इसी भांति तीन दफे सवेरे और तीन दफे साम को लेय पांच ही घार रोज में मवाद वन्द हो जायगा यदि इससे फायदा न हो तो यह पिचकारी लेवै ॥ •विकाला पाव भर नौव को पत्तो पाषपाव धनियां एक तोला अफीम ६ मासा सव दवाइयों को अधकचरा कर डेड़ सेर पानो में रात को भिजा देय और जोस देय नव प्राधा पानी रह जाय छान कर वोतल में भर लेय पूर्वोक्तानुगर पाठरेराज तक पिपकारी लेने से अवश्य फायदा होगा। प्रायः आरोग्यदर्पण। १३५ ? । १ लोग यह पसा करते हैं कि पिचकारी लेने से मूत्रमार्ग का छिट्र बड़ा है। जाता है ? पिचकारी लेनेसे मूत्रमार्ग बड़ा नहीं होता परन्तु अधिक पिचकारी लेने से पोते में पानी उतर पाता है । अगर पेशाब रुक २ होता है। या मूत्रमार्ग में कुढ़ा पड़ गया हो तो इम पोषध का सेवन करें। ऋच्ची फिटकरी १ तोला कबाब चिनौ २ तोला रेव- चिनी १ वाला कल्मो सारा १॥ ताला छोटो लायचो के दाने १ तोला सव दवाइयां कूट कपर छन कर चार २ मामे को पुड़िया बना ले आधसेर गो को दूध और मर भर पानी दोनों मिला एक मतिका पात्र में रख दे और उसी को साथ दो २ घंटे पर एक २ पुड़िया खाय । पथ्य मूग को खिचरौ दूस प्रकार तीन दिन सेवन करने से मूत्रमार्ग निरन्तर साफ हो जाता है । सजाक रोग प्रायः तोग वाारणों से होता है प्रातमक स्वन, दोष और बेश्यागमन पर- न्तु आजकल बेश्यागमन से यह रोग होते हुए भक्मर देना जाता है जब लोग बेश्या के पास जाते हैं तो उस समय यह नहीं जाना जाता कि दूस के सनाक है, परन्तु जब लिङ्ग योनि में पहुंचता है तो अतिगर्म अग्नि के समं सा मालूम होता है चाहिये कि मनुष्य उसी समय उण अलग हो जाय तो छ- तम है नहीं तो दो तीन दिन के बाद मूत्रमार्ग में दर्द और पौब पाने लग- दी है। इसे मैं प्रथमही स्पष्ट कर चुकाई कि एक औषध प्रत्येक व्यक्तियों को लाम कदापि नहीं पहुंचा सक्ता है। थोड़े राज हुए कि एक स्त्री जिस की .उमर २५ वर्ष को थो दो वर्ष से खेत प्रदर रोग में ग्रमित थौ निसने हर एक डाकार गौमों को दवा की परन्तु कुछ लाभ न हुआ पन्त में हमारे पास पाई दो मास पर्यन्त मैने भी भनेका पौषध हारा उसको चिकित्सा किया कुछ फायदा न हुआ तब एक माधारण प्रौषध बना कर दिया कि उणे वह १६ दिवस में पाराम हो गई । एकरकन्द और रतालु दोनों का महीन कतर छाया में मुखा कूट कपर छग कार एवा २ तोले को मावा बनाले, घर एक मात्रा में मामा मिचो और तीन मासा बरगद का दूध मिला गुख में रख पाव भर गौ के कच्चे दूध से उतार नावे इसी प्रकार दोनों समय १६ दिवस पर्यन्त सेवन करने से ममूल राग नट देखा गया । ।

हितोयगड १३६ कर १० • किमी किमो को स्वप दोषमे भी सजाश का रोग हो जाता है सवव यन्त्र है कि स्वप्न में काम विलाम प्राप्ति होने पर जहां वीर्य स्खलित हुआ फौरन मांख खुल जाती है इस से वीर्य बाहर निकले से रुक कर सजाक हो जाता है इसप्रकार से जिसे सजाक हुआ हो उसके लिये यह मौषध लाभकारी है, दाताले अलसी को रात में प्राधसेर जल में भिगो दे और सवेरे उसे खूब मलकर लुभाव निकाल कपड़े में छान । तेोला चिनो मिलाकर पो जाये पौर गर्म चौजे मे पहरेज करे पांच चार रेजि में पाराम हो जाय गा अगर दो फायदा न हो तो इसे पिये खौरे ककड़ी के बीज ४ तोला पलसौ 8 ता. ला गीषुरू ३ तोला विहौदागा ३ ताला बबुल का गांद ३ ताला धनिया ३ तोला इसरगील २ तोला पावला सूखा २ तोला सब दवाईयों को अधकचरा पुड़िया बांध ले एक पुड़िया रात को पाधसेर जल में भिगादे सवेरे खूब मल छानकर एक तोला चौनो मिला पौशावै सो प्रकार सवेरे भिगाव तो साम को मन छान कर चिनो मिला पिये नियय है कि सात मांठ रान में वि. लकुल जाता रहेगा। अगर आठ रे।ज में पूर्ण पाराग्यता लाम न हो तो यह दवा भी पिये जावे पो निम्नलिखित पिचकारी भो लेवे। हड़ वहेरा भावला तोना बरावर पावभर ले अधपारा कर रात को मेरभर पानी में भिगो दे प्रातः काल उसे छान एक मामा नौलाथोथा खूब महोन पौस मिला दे फिर इसकी चार पांच दिन तक दोनों समय पिचकारी लेवे अवश्य फायदा करेगा। खाने को मूज को दाल गेह को रोटी पुराने चावल का भात घौ गो का दूध उत्तम है। एक सजाक भी इसी प्रकार का हो जाता है जैसे कि फोम गादि स्त- म्भन को पौषध खाकर एक रात में तीन चार बार प्रमन करे और हर वार बाद मथुन के पेभाव न करे तो वीर्य को थोड़ी विंदु लिङ्ग के छिद्र में जम जाती है पौर सवेरे तक घाव कर देती है। यह सजाका विना पिचकारी के पाराम नहीं होता। पिचकारी की दवा। नीलाधोया पीली फोड़ी दोनों अग्नि में बूंज फर छः २ मासा आरोग्यदर्पगा। १३० विलायती नील एक तोला तीनों को खूब महीन पीस दो सेर जल में घोंट कर बोतल में भर लेय अन्दाज के माफिक दोनों समय पूर्वोक्तानुसार पिचकारी लेवै । और उपरोक्त औषध का सेवन करें। अगर पेशाब में जलन अधिक हो तो यह औषध का इन्द्री जुलाब लेवै। शीतलचिनी, कलमी सारा, सफेदजीरा और छोटी लायची यह सब दवा एक २ ताले सब को महीन पीस छान कर १६ पुड़िया बना ले दो २ घन्टे पर एक २ पुड़िया मुख में रख दूधपानी से उतार जावै इसी प्रकार दिनभर में पांच छः दफे पीवै और धोई मूंग की दाल और पुराने चाल का भात खाये मूत्र जलन जाती रहेगी ॥ पिचकारी सव प्रकार क सुजाक की। रसवत फिटकिरी सफेदखैर और कपूर दो २ मासा सफेदसुरमा एक ताला इन सब औषध को आधसेर जल में घोंट कपड़े में छान दोनों स- मय पिचकारी लेवै तो सब प्रकार की सुजाक आरम हो । दूसरी पिचकारी। स्थानजिहा (कुत्ता का जीभ) एक, उसे अग्नि में जलाय कोयला कर ले तूतिया १ रत्ती, रसकपूर १ रत्ती, सफेदसैर ५ रत्ती, उक्त सब औप- धियों को पावभर पानी में घोंट दोनों समय पिचकारी लेने से असाध्य मुशाक भी अच्छा हो जाता है ॥ कुराकाटने की पिचकारी। मनुष्य के शिर के बाल दो तोला प्रथम उसे कतरनी से सूय महीन फतर ले और एक पाव भेड़ी अघया घकरी के दूध में इतना सरल फरे फि एक दिल हो जाय याद दोनोसमय पिचकारी ठेवे । जो पुराना मुजाक हितीयखण्ड। होने से लिंगेन्द्रिय के भीतर मांस ग्रन्यि पड़ जाती है जिसके वजे से मूत्र रुक जाता है और सर्वदा एक प्रकार का दर्द, हुआ करता है। इस रोग कोडातर लोग इस्टिकचर अर्थात् मूत्रमार्ग छोटा है। जाना बतलाते हैं । और जिनकी दवा सेवाय सलाई के अन्य नहीं है यह रोग इस पि- चकारी से आरोग्य होता है। एक दो रोज इस पिचकारी के लेनेसे कुरा कट जाता है पहचान यह है कि मूत्र मार्ग से सून निकलेगा, बाद दो रोज के निम्नलिखित पिचकारी लेवे ताकि घाव सूस जावै आधपाव त्रि- फला, रसयत १ तोला सफेदखैर ६ मासा मुरदाशंख ६ मासा नीय और इमली की पत्ती एफ २ छटांक शव दवा की फूट कर रात को तीन पाय जलमें भिगा दे सधेरे जीस देय जब आधसेर जल रहजाय सूय मल कर छानले और दोनों समय चार पांच रोज तक पिचकारी लेवै ॥ सुजाक पर अंजन। गौ के यछड़े का एक सींग पुरामी रूई में लपेट कर यत्ती समाधे सौर फेरे दीपक में रख कर उसमें रेडी का तेल गर देवे फिर उसे नन्दा दे और उसके ऊपर एक कच्ची मिट्टी का पात्र रख कर काजप पारे और सम काजग के दोनों समप आंखों में सागाया करै खटाई और यादी पदायों से पहरेज करे तो सथ प्रकार का मुजाक माग हो ॥ कामोत्पादक बटी। जायफल १ तोला, अकरारहा १ तोला, सफेद्धन्दन १ तोला, क. सोख सोला, लोटीलायची १ तोला, जावित्री, शर, फोग, लौंग, मोठ, दक्षिणी तज, सेजपात, नागकेशर, गौर शुद्ध भाग ये छः २ मामा मी शांच का अभ्रक, शुद्ध सिमरस, शुद्ध काला धतूर का योग और क- पूर तीन २ गामा, कस्तूरी २ मामा इस्टिकनिपा (कुचलेशा सत्त) अंगरेजी १ .

पाराग्यदर्पण। १३६ --- के दाखाने में मिलता है २ रत्ती । मथम अफीम और सिगरख को परगद में घोट ६ छुहारे का पेट चीर उमका बीज निकाल उसी में दोनों को गर होरे से कम कर बांध दे जिसमें कि मन्धि न रहे पाद इसके १ पाय घरगद के में खूब पका ले फिर छुहारे को निकाल डोरा अलग कर सुखा लेय बाद इसके उपरोक्त औपधियों के। फूट कपरबाग कर पुस्ते के दुगढी १ छटांक (पुस्तका फष्ठ पोश समेत अधकचा कर १ पाच पानी में गन्दानि से पशाय ले जाय एक छंटाक पानी रह जाय गल कर छान ले) मै छ।हारे के घोंट उर्द की घरायर गोली बना लेय । हमारे औय. घालय में भी तैपार हैं जिनकी इच्छा हो) टिकट भेज ४ गोली मंगालें ॥ खानेकी विधि। यह पटी पूरी माना है फमजार की आधी गाली देगा उपित्त है, गन्ध्या समय १ गाली खाकर ऊपर से पधायट पायार दूध में ६ माया शएद छोड़कर पी जाय, इससे प्रसङ्ग में दूनी तेजी और स्तम्भन होताह । शीत यायु के कोप से उत्पत्ति रोग प्रमेह शरीर का दर्द, गठिया, मा का जकड़ जाना, पक्षाघात (लकवा) पमूल खांसी स्वास उक्त विधियत इस गोली के खाने से गाराम होता है । यदि पांच घार रात के सेवन से उपरोक्त रोगों में कुछ उपकार न हो तो जानना चाहिये कि यह विगारी सूग की गरमी से है । मगर गोली दोन समय सिठाना चाहिये ।। लवणभास्कर चूर्ण। सेको मरतये गाजमाया है । समुद्र एयण (सारा नग) सोला कालानगफ ५ तोला यिोग या जवाखार, सेन्यानोग, धनियां, पीपर पिपरामूल कालाजीरा, तेजपात नागकेशरतालीम और भसवेत दारताला मिर्च जीरा सफेद और सोंठ एक ताला, मगार का मूमा दाना ताला १४: द्वितीयखण्ड। छायची छोटी ५ मासा दालगिनी ५ मामा । इन मय दवाइयों को फूट कपड़छान कर योनल में भर रख दे या नीयू के मर्फ में घोट भरवेली की घरावर गेली यगा ले, चूर्ण को अपेक्षा बटी में शाधिक गुण एवं घूर्ण देई महीने में गुण रहित थे। जाता है और बटी पं पर्यन्त गुणदायक रहती है। खानेकी विधि। गुल्म, मंगणी और उदर मूजनमें गौ के गाठ के मज देना चाहिये अर्थात् १ मात्रा दषा मुख में रप गाठे से उतार जाधे। पिछी यादी प्रवासीर, कटिजयत् सामातिमार अलगमी सांभी, और स्वास फे रोग मह चूर्ण गरम जल या शराब के माथ खाना उगित है । इमका माला १ मासा से ३ मामा पर्यन्त बालक को माधा मापा या शैमा बलाप्रल है। देगा चाहिये। वृहत् हिंग्यादि वटी। हींग, जयापार, भज्जीसार, (मे।हा) सेन्धानान, कालानान, बिह- नान, छाटी पीपर, पिपरामूल, चीता, मिर्ष, कचूर, धनियां, इगिली, दुः धियावा, अजमेदा, पुष्करमूख, मोंठ, करज की गरी; जी.स्याह, हरें पाढ़ी, इन भय दवाइयों को एक २ तोला.ले होगा। भूजले याद मप है। कूट कपट छान कर कागजी नीयू के जर्फ में घोंट मेलो बैर की यरायर गोलियां बगाले ॥ खानेकी विधि। हृदय भीर गले की जलम एवं पिशूषिता (वैजा रोग) रोग में आई गुलाम, के साथ, पेट के फूडन (पेट मासा मालूम ३i) भोत द्धि और पारोग्यदर्पगा। १४१ मांग रोग में सौंफ के जर्फ या काय के माथ, पिलही बायुगोला, उदर शूल और हिचकी रोग में गरम जल और मन्दाग्नि सिर्फ साधारण जल के शाप दिन में दो, तीन या चारगाली खाना चाहिये मगर रोग प्रबल न हो तो सिर्फ दो दफे अर्थात् सांम सबेरे खाना काफी है। परीक्षा से सात हुशा है कि इस गोली के खाने वाला मनुष्य चाहे जहां का जाल पिये उत्से हैजे को घिमारी न होगी इससे उचित है कि हर एक गृहस्थ थाही २ इस गोली के अपने पास अवश्य रखें ॥ कृमि नाशक चूर्ण। रेधचीनी यायभिरंग और कबीना इन तीनो को पराया ले महीन चूर्ण कर ले मात्रा १ मामा से ३ भासा पर्यन्त माम मधेरे फांक कर क. पर से पाय जाधपाय गो का कच्चा दूध पी लेने से थोड़े ही दिनों में सगस्त उदा व्याप्ति ऋमि (केयुगा वगैरह) नष्ट हो जाते हैं । प्राप्त। प्रिय महाशय! इस मेरी विषारी औषधि को भी अपने अमृत मागर तुल्य ग्रन्थ में स्यान दीजिये ॥ सेठ, सौंफ, बोकड, इन तीनों पदार्थों को सम भागले एक भाग भूग हाले और दूसरा पचा रहने दे कूट कपड़छान कर उनमी हो कच्ची सांप मिला कर आधा तोला या कुछ ऊपर गात्रा बना शीतमा गाल साप,भोगम के जादि या अन्त में खा.ले तो शांय गिरना या सांय से सूम का गिरना अवश्य यन्द हो जायेगी। पंडित रघुनाथ एम० ए० क्लास परेडी कालेज

१४२
द्वितीयखण्ड।
अंगरेजी काली रोशनाई।
गाजू फल को पानी में भौटा कर उममें कौसीम गिलाने मे उसका
रंग काला हो जाता है और फिटकिरी गिलाने से और भी उत्तम होगा
जोर माजू फल को मोटाते समय किञ्चित मात्र लौंग डाल देगेसे स्याही
विगती मदीं है इम क्रिया में माजू
जल डेढ़ मेर साधा
जलजलजाग, कोमीस एक तोला फिटकिरी ६ गासा, लौंग ६ गामा
नत्तम होगा।
१
पाय
दूसरी विधि।
हए बहेड़ा गांवला न तीनों पीजों को बराबर ले अधकचरा कर
लोहे की कढ़ाई में चतुगुणा जल में डाल भिगा दे दूसरे रोज पांध दे
जय आधा जाड रहि जाय त्रिफला की चौथाई कोसीस डाल पांघ चार
दिग इसी तरह रहने दे पाद शाम काम में लावे ।।
तीसरी विधि।
माजूफल का चूर्ण २ पौंड कोसीस ५ पौंड प्रयूल का गांद ४ भौंस
पामी १२ ग्यालग क्रिपायोट पधा भावनतरे का तेल २ दाम ।।
चौथी विधि।
गाजू फठ १२ पौंड कोमोम ४ पौंड गांद ३॥ पौंड पानी
उग । अपर लिखो दो प्रकार की स्याही में जो पानी का भाग लिखा
१८ ग्या.

भारोग्यदर्पण। १४३ है उनमें से चार भाग का तीन भाग यांत तीन हिस्से पानी में पहिले माजूफाल के। शाग पर एक घंटा चढ़ाना चाहिये और गोंद का जो प. रिमाण लिखा है उस्से दूने पानी में गला के मिलाना होगा याकी चौ. थाई पानी में कौमीस मिला के सम का एक संग मिला डालना भीर पीछे से भालकतरे का तेल देना ।। व्ल्यू लेक काली नीली स्याही । फोसीस आधसेर गाजकल डेढ़सेर, पानी दससेर कत्या एक अटांक नीला रंग शापी छटांक पोली पुहिया को रंग (जार में मिलती है) २॥ रत्ती । पहले माजूफान को पीस के दससे पानी में भिगा रखे फिर भाग पर चढ़ामो जय गर्म हो जाय तय कोसोम गौर कत्या हाल देय लाप देखो की रंग सूम काला हे। गया है। तब उतार के छाग हा भोर आठ दश दिग उमी तरह रहने दो फिर दुसरी दफे छान के गीला रंग और पीला रंग मिटा दे। ।। ग्रीनब्लाक वा सवुज स्याही । पांच माग गाजूफल के पूर्ण को २०० सो माग पानी में मिला भाग पर चढ़ाय के जलाशो फिर छान लो फिर पांच भाग कोसीस को चार भाग लोहे के चूर्ण के साथ मिला के उममें भाधा पाइन्ट नील भोर तीग भाग मलफिसरिफ एसिड (गन्धक का सेजाब) मिला दे।। यह सा. दी लिखने के समय हरी दिसलाई पहेगी फिर काली है। जायगी । हरी स्याही। जंगात १ छटांक, शमशाफ टारटार (यह एक प्रकार का निमक है अंगरेजी दवा खा में मिष्ठता है) जाधी गटांक पानी सपापाय दोनों १४४ द्वितीय खण्ड। चीजों के पानी में मिला के पागपर चढ़ा दे। जय गाधा पानी रह. जाय तो छान लेय । यह स्याही बहुत उत्तम होती है जितने लोग इसे जंगाल के समान नीला थोपा भी डालते हैं। लाल स्याही। ढांक साथवा पीपल की लाख को जरासा लोप और बेर की पत्ती हाल कर चतुर गुण नल में पहाभो जय चौधाई जल रहताप ६ मामा फिटकिरी डाल दो। दूसरी विधि। बक्कम लकड़ी एक छटांक, फिटकिरी साधी छटार क्रिममाफ टार टार माधी छटांक इन तीनों चौजेांग सेरभर पानी हाल आगपर चढ़ाशो जब पानी आधा रह जाय त साधी बदांक ढाक का गेाँद मिला दे। जय गल जाप तय पौने चार ताना रेफ्टी काइड स्पिरिट भीर पांच भागा भर कचनियल का शर्फ गिला दे। यह स्याही बहुत ही सुन्दर होती है। सुनहरी स्याही। सेोने के बर्फ को गोंद के पानी में सूप महीन घोंटो भीर जरामा वर्ग रमकपूर मिला दे।। म स्याही से लिख कर किसी पिकली चीज के घोंटने से गक्षर घमफोठे हो जाते हैं यही तरकीय रुपहली स्याही को गौ है इसमें चाहे रसकपूर न मिलाये ॥

याराग्यदर्पगा। १४५ आतशवाजी। नाम " शोरा गंधक कोहना चूर्ण लहसुन तमागपत्र बराही बारूद ४ तोला १०ताला १राठा ९६ते।ल।१६ तोला गा.. गुलरे। ३ नामपाल १ सेर १ पाय ३छटोक फलाबेग १२तोला ताला तो० तो०५ घास करंग ६ " " " " " -१० ४ ५ C PTET १४ ४ ५ गुमरेज (फुल फरी) पहिले शोए गन्धक भौर कोयला तीनोंको मिला खूप महीन पीसा । फिर लेइ चूर पारद से कुछ मेटिा पार्थात बालू की तरह पीस के मियामी और एक इञ्ची से दो पञ्ची तक के खोल में भर दे। इसको छुड़ाने से जमीन तक फूडों का गजरा सा दीख पड़ेगा (जूही) यह मासयाजी बहुत ही सुन्दर होती है इसकी पारूद सूध म पीन होना चाहिये । फुलेल बनाने की सहज उपाय । मन्दूक के ढकने की तरह एक टीन का यातन धनाभो, जिसके पैदे में किनारे की तरफ एक भूराख रहै और उस सूराख में एक नल बाहर की तरफ लगान। । सूप ताजे और खुशबू दार गुलाब के फूलको पत्तियां ताए के उपरोक्त ढकने में बिछात्री (पत्तियों को पाक भाप इच्ची से ठे के एक इञ्ची त हेमो चाहिये) फिर उसमें पोहा सा तिल का तेल हाल दो जप पत्तियां तेल में अच्छो सरह भीग जाएं तब जिसके अपर और एक पाक पत्तियों को लगाो गौर तेल हाले। इसी तरह जितना तेल पगाना हे उत्तमोही पाक पत्तियों की लगात जाम्रो भोर तेल हालते द्वितीयखण्ड। लामो एक दिन तह तेल में पक्षियों को भीगने दे। (एक दिग ये ज्यादा नहीं रखना नहीं तो पत्ती महके तेल पराय हो जायगा) फिर कापी प्रेस में उस यरतनको रस दयाभो पयोंकि कापी प्रेमर्गे चीज सूप दपाई जाती है और तेल भी खराय नहीं जाता और नल के नीचे एक वामन . रख दे। जय दयाभोगे तय सय तेल उस गाल के रास्ते मे घातग में चला जावेगा यह तेल बहुत महज़ में गौर यहुत मुशबूदार यगता है इस रीति से घेला नमेली शादि जिम फूग का तेल घनामा चाहो वही या युक्ता है जितना ताजा और खुशयूदार फूल देगा उत. नाही तेल भी अच्छा बनेगा। कुलफी की बरफ। पहले धतूरे के फूलकी तरह धोनीमो टीमकी घोंगी चना रक्ता जि. सकी चौड़ाई की तरफ ढकना रहे और पतली तरपा मे चन्द रहे यदि मठाई की दुलफी पनाना हो तो दूध को जला के गाढ़ा कर लो और उमे चोंगे में भर के ढकने से बन्द करले और शाटेको लेई ढलने के चारो तरफ लगा दे। जिस में ढकना खुण्ठ न जाय फिर एक होष्ठी में परफ के टुझले भरदो और उग.घोगों को उसमें गाड़ दो परफ के पाप पोहाना नामक भी मिला देगा फिर उस हांसी का मुख ढांक उसके चारो तरफ फम्बल लपेटो.कम्बल में लपेट फे ठगढी जगह में रख देो । तीन चार घंटे याद दूध जम जापगा । जब परफ खामी हाय तब उसमें से एक पोंगे को निकाल कर उसका ढकमा खोले और दोनों एथेली से पकड़के रगड़े बस सस में से कुलगी निष्ठ भावेगी पदिनीयू को बनाना होय गोपिनी को पानी में घोल के उममें थोड़ा सा नीयू का रस मिला देगा और जगह उभी को चोंगे में भर देना ॥

पाराग्यपगा। १४७ घर के खर्च लायक थोड़ीसी साबुन । कार्यानेट साफ साहाको साफ जल में डाल सीपका या पत्याला चूना मिलायो, म पानी दूध की तरह हो जाय तम आग पर चढ़ासो पोड़ी देर बाद चगने से थाहाता निकालो पो २।४ बून्द नाइट्रिक एसिड पाने शेरिका सजाय छाल देखो कि उसमें घुलाला उउसो है पागही जय जुखयुला नहीं उठे उसी समय परतन को भाग पर से उतार लेओ और एक दिन तक ढका रहने दे, फिर ऊपर का सार छ (परन्तु गावधान रहना गिसमें बहुत हथा न लगे) फिर नारियल का या तिल का तेला या दोनों का तेल मिला कर एक कढाई में रख जाग पर |चढ़ामो जय तेल अच्छी तरह जल जाए उस रूपर लिखी खारफा पानी डालते जाओ और चलाते जाजो जिममें जले नहीं जप गाढ़ी होने लगे तब पोहासा मोन रख दो मोर घलाते जाओ इमी समय जे सुशयूको चीज डालनी है। से भी मिला दे। शोर वतार लो जय बह जग जाय तय गृहस्य के रोज के खर्घ डायक अच्छा साघुग या जायगा । इङ्गल्लेण्ड यात्रा की समालोचना । मम ब्राह्मणों को कौन पूछता है बहुत हाल पर्यन्त मे आशा रखरो माये कि जय ब्राह्मण लोग मिष्ठायत जाने की व्ययस्या देंगे अन्त में जय देखा कि यह लेग प्रांत, जदूरदर्शी, स्वार्थी, पच्चए, और ऐसे बहीण चित्त के हैं कि कमी खान में भी मिलायत जाने को न कहेंगे और यही लोग हमारी उमति के माधक हैं यदि इग लोग इनके बालों को पहिले ही काट डालो तो अप तक यहुप्त तनति कर लेते। कहने का तात्पर्य यह है कि जाला रोशनलाल जी परिष्टर हा पितायत से आये हैं दितीयखण्ड . तब भुज्यु ने द्वीपान्तर यी शत्रुओं से अत्यन्त उपद्रुत ही फर उनके जीतने के लिये अपने पुत्र भुज्यु को मेना के साथ नायपर समुद्र में भेजा, जब यह नाय समुद्र में यहुत दूर पहुंची तो हयां से टूट गई, ने अश्वनीकु- मारों की स्तुति की, उन्हों ने सेना सहित भुज्यु को अपनी नायों पर बिठला कर तीन दिन रातमें पहुंचा दिया । इस्ते भी समुद्र यात्रा सिद्ध होता है जिन्हें अर्थ में शंका हो गन्ध देस लें ॥ यह कथा लिखी है भविष्य पुराण में भीम युधिष्ठिर के सम्बाद कि कांचीपुरी में रत्नसेन नामका एक राजा था उसके देश में देव स्वांगी नामक वेद वेदांग पारग ब्रामण था जिसकी स्थी का नाम धनंयती धा उसके सात पुत्र और एक गुणवती नाम कन्या हुई एक दिन कोई भि- क्षार्थी मानण आया उसने गुणवती को देखकर कहा कि यह सप्तपदी में विधया हो जायगी सी सिंहल में सीमा नाम एफ धोविन है यदि वह तुम्हारे घर आये तो उसका वैधव्य नष्ट हो जाय अर्थात् विधया न हाय । यह यात कह कर ब्राह्मण तो भिक्षाटन को गया, उसकी माता धनवती ने अपने लड़कों से कहा कि जो पिता माता का बात माने यह बहन के साथ सोमा (धोपिन) लाने को सिंहल जाय । पुत्राऊघुः ॥ अन्तराटुस्तरःसिंधुः शतयोजन विस्तरः। अशक्यंगमनंतत्र नक्षमागमनेवयम् ।। लड़कों ने कहा यीच में समुद्र बड़ा दुस्तर है, सौ योजनका विस्तार है हम लोगों में सामर्थ नहीं है कि वहां जांय, तव देवस्थामी लड़की का पिता बोला कि मैं सात लड़के याला हे। फर भी अपुत्रहूं, तब छोटा लहफा शिवस्यामी बोला मेरे रहते कौन सिंहल द्वीप में जायगा यस घहिन के साथ यह मिहल को चला गया याहां सोमा के घरके पास रहा फिर क्षण भर में सामा ने दोनों को पार उतार दिया और कांची पुर - आरोग्यदर्पण। पहुंचे । जिस्का दृष्टान्त अब तक मौजूद है कि हिंदुओं में सप्तपदी के पूर्वही लड़कियों को धोबिन के घर सहाग लेने को भेजते हैं। बिचार । करिये कि यदि समुद्र यात्रा का निपेध होता तो शियस्वामी अपने - हिन को लेकर वहां क्यों जाता । गर्ग संहिता द्वारिका सरड के तीसरे अध्याय में लिखा है कि, आनर्त नाम राजा सूर्य बंश में हुआ जिसके नाम से समुद्र में आनर्त देश है । रैवत उसका पुत्र चक्रयर्ती था, उसने कुशस्थली बना कर राज्य किया । श्रीमद भागवत के अष्टम स्कन्ध के,२४ प. में सत्यव्रत राजा से भगवान ने कहा है कि तुम सब औषध और बीज लेकर सप्त ऋषियों के साथ बड़ी नाव पर बैठ समुद्र में अन्धकार में ऋषियों के तेज से विचारेगे ॥ . भारत सारे १४ अ०। "कृष्णार्जुनौ गतौलमा याज्ञौथै धन साधने” श्री कृष्ण और अर्जुन यज्ञ के धन लेने को लगा में गये। पद्म पुरागा क्रिया योगसार में लिखा है तुम दुःख को छोड़ दो, मेरौ वात सुनो। समुद्र के पार पक्ष दोप में दो- ब्यन्तौ नामक पुरी इन्द्र को पुरी के समान शोभायमान है उस पुरी के राजा का नाम गुणावार है उसकी स्त्री का नाम सभोला और कन्या का माम सले- चना है मेन तुमारे समान सन्दर और ग उसके ममान कोई सुन्दरी है यदि स्वर्ग भोग की इच्छा करना चाहते हो तो उसे विवाह करी ।। भारत के महा प्रस्थान पर्व का वाक्य है "क्रमेण ते ययुर्वीरा; लोहित्य सलिलार्णवम्” फिर वे क्रम से लौहित्य सागर (लाल समुद्र) को गधे । इत्यादि अनेक प्रमाणों से मिद होता है कि पूर्व समय में लोग किसो होप होपान्तर में या समुद्र पार जाना दोष नहीं समझते थे और भव मौ सेवाय एक विला. यत की अन्य देशों में जहान पर चढ़ के बराबर ब्राह्मण क्षवियादि जाते हैं उन्हें कोई जात च्युत गहौं कर सका । पोड़ हो राज हुये कि मिथ को युद्ध में हजारों हिन्दू गये थे, सब पर विदित है कि ब्रह्मा में अब तक हिन्दुओं वाले द्वितीयखण्ड। १५२ पलटने पड़ी हैं, चीन के को वन्दरों में हिन्दू रहते हैं मिर्च और कालेपानो बराबर हिंदू पाते जाते हैं हालही में एक हमारे परम मिव पं. रामसहाय डातर जे।कि पाज कल प्रागरे में डाक्तरौ करते हैं, सकुटुम्ब जहाज पर चड़ के कालेपानौ नामक प्रसिद्ध टापू में जा वहां से अपने स्वसुर को जो एका मु. बादमें में कैद कर के भेजे गये ये लाये। बालवात्ते से दिन रात में वहां जहाल पहुंचता है । बिलायत जाने में २१ दिन रात लगता है। उन्हें कोई भो दोषी नहीं कहान बात बिरादरी के लोग उन्हें जात से अलग दिया है। अब निषेधक वचन सुनिये जिन्हें मायः दुराभिमानो पुराने नौर के फकोर पोथाधारौ जो मूल मंत्र जान सदा निहाय में टुघलाते रहते हैं और जहां किसी ने पूछा महाराज विलायत जाना चाहिये या नहीं ? भौघ्रहो त-, म्बाकू चर्बित वाट मुखसे जहरके समान उगल देते हैं। समुद्र यात्रा स्खौ कारः वामण्डल विधारगाम् । इमान्कलियुगेधर्मान् वानाहुमनौपिंगणः ॥ समुद्र यात्रा करनेवाले का खौकार, कमण्डल धारण, इत्यादि धी का अनुष्ठान कलियुग में वर्जित है। यह वृहन्नारदोय पुराण का बचन हैं। आदित्य पुराणे। द्दिजस्याब्यौतु नौयातुः शाधितस्यापि संग्रहः । समुद्र में नाव पर यात्रा करनेवाले दिन को शुद्ध करके भौ ग्रहण न करना। निर्णय सिंधौ। प्रागार दाही गरदः समुद्र यायो च कुण्डश्वथ कूटपारी ॥ मकान ललाने वाला, विष,देनेवाला, समुद्र मे जानेवाला, कुण्ड (पिता के जोते दूसरे से उत्पन्न) के रखनेवाला पौर कपट करनेवाला ब्राह्मण याद में भोजन के लिये निषिद्ध है मगे खण्डन मण्डन दोनों के वचन लिख दिये गये है इससे अधिक प्रमाण मिलना पाठिन है बुद्धिमाग जिस पच को वलौ समझ मानें।

भारोग्यदर्पण।
तृतीयखण्ड ।
जिसमें
बेश्यादि ग़मन द्वारा एषा बोर्यक्षय पर पूर्ण दृष्टान्त से
लेकर नाम मतम उत्पन्न करने पर्यन्त तथा अनेछ
प्रकार की सिद्धनौषधियां नित्यकर्म प्रादि से
पूरित है जिसकी पं० जगमाघ शम्मा
राजवैद्य ने सर्वसाधारमा के
उपक्षागर्थ बनाया।
ANGEROIN
EDEREKETLEREcrirediididelicchier chalettitaide ECE DI
आयुर्वेदोक्त औषधालय
movcoenwoo.
VEDERILEZZE
जालसेनगर-इलाहाबाद
"धारिशयन्त्रालय" जयाग में मुद्रित हुभा ।
सिवाय प्रत्यक्षता जिसीको छापा प्रधिकार नहीं
द्वितीयभार १०००] परपरी सन् १८८८ [ ... मूल्य १६)
..."
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RAWAT

सूचीपत्र । 1 1 ४२ ४३ -- 'परकीया लक्षया মিয়: पृष्टाः। विषयः पृष्टाक्षः वेश्यादिद्वारीवीर्यक्षपपर व्याख्यान | गर्भवती होने का लक्षणे हस्तमैथुन निषेध गर्भपुष्टकारक उपाय : ३६ कामशास्त्र रहित गमन निषेध १२ जाहा लड़का होने का कारण ४० प्रसंगेच्छा १३ नपुंसक लएका होने का कारण ४१ स्त्रीयस्था विचार १४ भौगन्धिक नपुंसक ४२ प्रांतपरत्व प्रसङ्ग विचार 1 .. १५ कुम्भिक नपुंसक ४१ मैथन मिषेध १८ / ईर्षक नपुंसके। मधुन में समय १८ / निष्टि गर्भोत्पन्न प्रीति वर्णन, २० | स्वप्न मैथुन से गर्भोत्पन्न ४३ नैसर्गको भादि प्रीति के लक्षण २१ गूंगा आदि गर्भों के करण २३ भर्गमें बालकके न रोनेका समय ४५ गहिरी प्रीति के लक्षण है ' २४ पूर्वक मानुसार बुद्धि का होना ४५ परपुरुपरत स्त्रियों के संकेत २५ भदृष्टि मासिक लक्षण अलय स्त्री २५ व्यतीत ऋतु में मैथुन निषेध सहज प्राप्त स्त्री २६] दौहद के द्वारा सन्तान के ल. पतिध्रुक स्त्री के लक्षण २७ अस्वाभाविक जन्म का कारण स्त्रीणां वैराग्यहेतु २८/ मासभेद से अटों का बनना स्त्री के बिगड़ने का लक्षण २८ भाटयां महीने का बालक क्यों ] सम्भोग समय के भेष २६ नहीं जीता ५७ गर्भाधान विधि ३० गर्भगतमा प्रथम कौन मजयनतारे ५६ उत्तम सन्तान करने की विधि रसाल जन्य पदार्थ ३३ गर्म में पुत्रादि का पहचान सन्तागाय मेपुन विधि ३५ / नपुंमक गर्भ के लक्षण ... ४७ ४ ५४ ऋतुदान काल १९७ . '११९ . विषयः पृष्टाक्षः विषयः पृष्टाः डाकृरी मत से गर्भ का लक्षण ६२ डाक्तरी.से गोठ का गुण १०६ गर्भवती स्त्री के त्याग कर्म ६३ पुटपाक विधि १०७ योनिरोग ६५ हृदय दर्द पर हिरनपुट पाक १०८ २० प्रकारके यामिरोग के लक्षण ६६ | इम्फिउज्जा को दवा १०९ योनिकन्द रोग ६८ अंगोजी ज्वर से बचने की उपाय १११ योनिरोगकी चिकित्सा ६९ वीर्य नत्पन्न करनेवाली-भीषध ११२ योनिरोग पर उत्तम दवा 90 कानेश्वर, मोदक मासिक धर्म की चिकित्सा ७१ मिणमिंग मोदक योनिशूल की दवा ७२ बानरी पूर्ण ११८ बन्ध्या की चिकित्सा ७३ / बामभदनों मेदिक प्रदर रोग का निदान •१५/प्रफीम प्रकरण.. सोमरोग का लक्षण दवा ७६ अफीम का धर्श मूत्रातिसार 99 हारीमतसे अफीमका बयान १२१ चन्दगादि चूर्ण प्रदर रोग पर ७८ | हरदी के गुण १२२ परीक्षित औषधियां ८० दीपन पाचन आदि नाम अभ्रक शोधन मारण ८१ हरीतकी का गुण खेदप्रदर की औषधि ३ जुलाब १२८ डाकृरी से सर्पपिप को चिकित्सा ३ | सान्हिक कर्म सर्पदंश विषमकर्ण ८६ प्रातःकाल. उत्यान १३३ वैद्यक से सर्पदंशन की चिकित्सा ८६ | उपबीत धारण १३५ भों की उत्पत्ति ८शौचे मृतिका लेपन १३६ रक्त शुद्धफारफ मर्क ९९ दन्तधावन १३७ व्रणराक्षस तैल विषमज्वर पर निम्याद्य चूर्स १३८ २ तीर्थ स्नान नारायण तेल ९३ भारत के उन्नति का वैद्यत ] हिमसागर तल ९४ | प्रथमनङ्ग है उसपर व्याख्यान १से १६ रसे का पानी ५. शौषधों को विज्ञापन C७ प्रशंसापत्र यङ्गेस्वर बनाने की विधि १०० १०२ १०४ १२४ २ स्नान १४० . तिला २७ एक शोभाग्य शुण्ठीपाका अमृतमझातक पाक के शरायलेह आरोग्यदर्पण-तृतीय खण्ड । वेश्यादि गमनद्वारा वृथा वीर्य अपक्षय और शारीरक हानि पर पूर्ण दृष्टान्त । . दूसरे खगह में मैं एम विषय को भलीभांति दर्शाय चुका हूं कि जब तक भायंगया हस्तमैथुन वेश्यागमनादि द्वारा बीर्य के अपव्यय से मंरक्षित ग हेांगे भारत का कल्याण होना अति दुष्कर है, क्या यह मनुष्य जो अ- | कथनीय अमूल्यरत्न प्टिकारक जीवन मूल को उन्मत्तों के भांति प्रतिदिन निस्पही हेके असर भूमि में फेक रहा है अकाल मृत्यु से यच सका है ? पुग्न वाग, धनधान, विद्वान और यलयानोंकी कोटि में उसकी गणना होगी? कभी नहीं । अरप बीयं ही होने के कारण आर्यावर्त या राज्य मुस- समानों ने ले लिया और असंख्य मकुप्रा ऐय्यासों को लोढ़ी गुलाम बना के सर्वदा के लिये यिधारे मिटे मिटाये फघरे कचराये हिन्दुओं के छाती पर मारा चलाने के लिये इसी भारत में छोड़ गये । मुसलमानों ने भी जब ढाल तरचार जुगाहों के गले में डाल आप दिन रात वेश्यागम- नादि में लिप्त हुये और उधर माहटों के चित्त पर धीर रस को अंत. देशा प्राप्त हुई अथवा अंगरेजों के सौभाग्य देवता ने उनके द्वारा रास्ता साफ करा दिया कि बिना प्रयास प्रकंटक राज प्राप्त हुआ, जि. सको सौ वर्ष से अधिक हो गये कि बीर्य रक्षाही के प्रताप से भारत का शासन कर रहे हैं, तो भी कितने अन्धों को नहीं सूकता कि जब तक अंगरेजी विद्या पढ़ किसी बड़े राज्याधिकार में प्रकृति नहीं होते त्यतक विधाह नहीं करते क्योंकि अल्प बीर्य में बुद्धि विपर्यय रहती है और पूर्ण वीर्य की मनीषा शक्ति अनुमति पदार्थ पर झटपट दौड़ती है । देख लो एक पक्षयाले नैहाल कांग्रेस के लिये फटिगह हैं दूसरे लोग विपरीत कहते हैं कि यह न होना चाहिये । कांग्रेम धायया मितने टतोयवगड । देशोपकारफ कार्य होते हैं इनमें मपम बहुत परिश्रम और दी धूप 'करनी पड़ती है और बुद्धि शक्ति जो यीयं के माधीन है यह साक्ष्य देती है कि इस भारंभित कार्य में अवश्य भलाई होगी और इसका नन्तकात अच्छा होगा से जो लोग जितेन्द्रिय और योर्य के अपव्यय से बंधे पुए हैं उनकी युद्धि शक्ति किसी व्यापार अथवा पारमार्थिक कार्य को नहीं रोकती बल्कि और लोशित करती है और स्थार्थ रक्षा के उपरान्त पर- मार्थ में भी उनका मन उत्सुक रहता है और जो वेश्यादि गमन के द्वारा वीर्य का नाश कर चुके हैं यां कर रहे हैं उनका उत्साह दिन प्रति दिन हत और हीन होता जाता है उन्हें प्रावश्यक स्वार्थ और क्षणिक मुख जो लम्पटता का अन्तिम प्रमोद, है चित.में बसा रहता है उससे उनके मन को अवकाश नहीं मिलता महर्षियों ने जो वीर्य बढ़ाने की अनेक भौषधियां लिखी हैं वह फेवल लाम्पट्य और विपके लिये नहीं किन्तु मस्तिष्क शक्ति और अखण्डबल धारण और प्रबल साहस की वृद्धि प्रयोजन से और ब्रह्मचर्य व्रत का भी यही अभिप्राय है कि प्रथम वीर्य रक्षा से विद्योपार्जन होगा पश्चात् गृहस्थाश्रम भादि के प्रबन्ध में निपुणा- ई होगी से हमारे देश में शास्त्र के विपरीत ब्रह्मचर्य का प्रथमही लोप हो गया, साधारण जनों में तो अल्पावस्या के विवाह और वीमफे नीचे गर्भाधान के द्वारा श्रएप बीर्यता और मानुषी सृष्टि की दुर्यलता का विस्तार हो गया और धनवान तथा प्रभुता वालों का बीये वेश्या और ध्यमित्तारिणियों के हाथ विक गया यहां.तफ नीयत पहुंची कि जन्मा- प्टमी राममयमी आदि उपासना पर्व में भी बेश्याओं का हाव भाव फटाक्ष मुख्य पूजोपचार समा गया इस साल माघ मेले में एक नान्हक- शाही महन्थ के यहां महीना भर यही मदन महीपति का डंका वाजता रहा सदैव बार पनिताओं के फटाक्ष से दरबार भरा रहता था धन होने की पूर्णता का प्रमाण इस समय वेश्या. ही जिस के विषय भर्तृहरि राज पि ने यह लिखा है- "वेश्याभीमदन ज्वालारूपन्धनसमेधिता । कागि भिसावाहूयन्तेयोयना निधनागिन" ॥

पाराग्वदगा। ३ दोहा! गनिका कनिका अगिन की रूप समिध मजबूत । होम करत कामी पुरुप धन योवन पाहूत ॥ १॥ बुद्धि विवेक कुलीनता तबही लो मन माहिं । कामवाण की अगिन तन जबलों भभकत नाहिं ॥२॥ भगवान् मनु ने भी लिखा कि पर स्त्री गमन से पढ़कर भायुयल मा हरनेवाला कोई नहीं है "यथा-नातःपरमनायुष्यं परदारोपसेवन" कारण यह कि पुद्धि ज्ञान पराक्रम का मूल कारण जो बीर्य है सा उसी के नाश और अपहरण की चेप्टा वेश्या लोग करती हैं जिस प्रकार भेदक औषधियां फुट की शादि अताड़ियों के मल को ढूंढ़ २ के भेदन करती हैं ऐसे ही शुमतत्व को उत्तप्त करने और बाहर निकालनेकी विविध चेष्टा वेश्या लोग करती हैं लोग उसी को सुख समझते हैं यह नहीं सोचते कि निस नस का प्राण खींचे लेती हैं-जैसा किसी महात्मा का बघन है:- दर्शनातहरतेचित्तं स्पर्शनातहरतेवलम् । मैथुनात्हरतेबीयं वेश्याप्रत्यक्षराक्षसी॥ भर्तृहरि जी लिखतेहैं-संमोहयन्ति, मदयन्ति, वि- डम्बयन्ति, निर्भर्त्सयन्ति, रमयन्ति, विपादयन्ति, एताः प्रविश्यसदयं हृदयनराणां किंनाम वामनयना न समा- चरन्ति ॥ बस बहुत लिखने से शङ्गाररस के रसिक जन खिन्न हेांगे पर पपा किया जाय शास्त्रकारों ने ऐसाही कहा है ॥ सोरठ-गनिका के मृदु अोठ, को कुलीन चुम्बन करै नट भटं बिट ठग गोठ, पोकपात्र है सबनको ॥

'टतौयखण्ड शङ्गाररस के रसिक जन जो चाहे से समझे हे पर धातुक्षीणता और धिपय लम्पटता देोपसे जो २ प्रयगुण और युराश्यां उत्पन्न होती हैं उनकी गवाही अनेक पुराण और इतिहास दे रहे हैं देखिये ॥ "जघ गुलोर के राजा को मुसलमानांने रणमें जीता तो उस फौज के एक प्रधान मुसलमान सरदार खां ने घाहा कि गुन्नोरकी रानी नंति रुपयत्ती है किसी उपाय से उसके साथ भोग करें उसके मिलने की तत- बीर और वन्धिसे करने लगा एक दिन सरदार खां स्वयं रानी के महल में जा पहुंचा और अपने नौकर से उस रानीके दासी को बुलाके कहा कि तुम रानी से जाके बोलो कि सरदार खां बाप की खातिर सुद मुलाकात के लिये तसरीफ़ लाये हैं ताकि आप को रायाला न गुजरे फि हमारी किसी सूरत में तहफोर हुई, अब भाप को ज्यादः इसरार करना प्रयस है, अगर अब भी हमारी भरज़ ओ कयूल ग फ़रमाइयेगा तो यस यही समझिये कि मासिर को तो हमारे भरियार में हैं, मगर कोई काम सिताफ मरजी के हनिमें लुत्फ नहीं रह जाता मागे महा- रानी साहिया को अखियार है। दासी जाफे रानी से सब वृत्तान्त सुनाया रानी (शोकमें डूयफर मनही मन में विचार करने लगी) हाय एक तो पति के प्राण गये दूसरे यह नयाधम मुझे अपनी स्त्री बनाकर रखना चाहता है क्या मुझे योग्य है कि क्षत्री वंश में जन्म ले के अपने प्राणप्यारे पति के वध करनेवाले की रमणी बन कर जीड माण परि त्याग करना उत्तम है परन्तु भार्यकुल वैरी नच्छ की शय्या स्वीकार करना अच्छा नहीं दासी से कहा कि खां साहय से कह दो कि रानी भाप से व्याह करना पसन्द करतो हैं एक रात या अवकाश मिले फल खां साहव रंगमहल में पधारें। दासी ने भाके खां साहब से कहा खां साहय अति प्रसन्न है। डेरे में पहुंचे थे कि रानी के महलों से अमूल्य जहाज आभूपणादि और रेंगीले यस्त्र लेकर समानधी आया और सां साहब से कहा कि गरीय निवाज़ यह शादी की नज़र महारानी सा- हिया ने भेजा है और निवेदन किया है कि कल आप इन्हों यसत्र आभूपनों को धाररा करके रंगमहलों में पधारिये खां साहब ने कहा भारोग्यदर्पण। ग्रहुत अच्छा प्रातःकाल खां साहम गुस्ल कर बस्त्र प्राभूषण पहन सवारी पर बैठ महलों में गये रानी आदर पूर्वक सजी हुई मसनंद पर बैठाया पोहेही देर गुगरा होगा कि सरदार साहब के सकल शरीर में आग सी लग गई और मुरिएंत हो गिर पड़ा चेहरा नीला पड़गया नोकरचाकर सय पपड़ा उठे रानी (जब देखा कि पूरा काम हो गया) खां साहय से कहा कि जो होना थों से हो गया यह वस्त्र जो आप पहने हुये हैं विप से रंगे हैं शाप मेरी इज्जत लेने पर तैयार हुये उसके बदले में, मेरी और जाप की मृत्यु एक साथ होगी इतमा सुनते ही सरदारके नौकरों ने चाहा कि रागी को पकड़ में रानी महल पर से कूदपड़ी और प्राण त्यागदार स्वगंधाम का रास्ता लिपा इधर खां साहय भी सेमे में पहुंच फर दोज़र का रास्ता लिया पर स्त्री गामियों का यही नतीजा सय को मिलेगा और मिलता है। पाठकगण पो तिनकोडी यायू कलकत्ता नियासी के दुर्भाग्ययसार छोटी अवस्था में फांसी पानेका हाल याद होगा कि जिसका मान्दो- लन सन् ६ के आर्यावर्त भर के सम्बाद पत्रों में हुआया । तिनकौड़ी नामक एक धनाढय बंगाली का पुत्र जिसकी अवस्था सिर्फ १४ वर्ष की थी मद्य यो नशे में फ्रोधातुर हेा एक वेश्या (जिसे ५ हजार रुपया दे घुका था) को ३५ छूरी मारी जिसके कारण फांसी पाया, यह कोई नई बात नहीं है इसी प्रकार असंख्य आत्मघात रहियों की बदौलत हुआ फरता है क्योंशि वेश्या प्रसङ्गादि से अधिक शुक्र ध्यय जनित मन दुर्बल होने से स्वयं प्रात्महत्या करने की इच्छा कभी २ बलयती हो जाती है। हे प्यारे भातगणों ! पर मनी तथा वेश्या का विष के प्याले के समान दूरही से त्यागकरो और ऐमे इन्द्रियजित बनो कि अपनी स्त्रीके अति- रित्ता यदि घेत भाप से अप्सरा (परी) भी भाके गमनेच्छा प्रगट करै तो पं० लोलिम्बराज का अनुशरण करो तभी तुम्हारा कल्याण होगा और | देश का मंगल कर सकोगे ॥ देखिये, दक्षिण श्रीपुर नाम एक, नगर था तिस्में श्रीचन्द नाम एक तीयखुराड राजा रहता था उसी नगर में लालिम्बराज वैद्य भी रहते थे और यही सफल कला कोषिदा सर्वाङ्ग सुन्दरी रनकला नामक यारांगणा (बेश्या) भी रहती थी उस वेश्या और वह राजा से दोस्ती थी। एकदिन हॅमी २ में राजा ने पूछा, हे लोलिम्घराज ! वेश्यागमन में काफलहै ? लोलिम्यराज में कहा महाराज ! वेश्या महापाप शीला हेाती है "मायुःक्षतिविफलता" नादि अनेकप्रमाण शास्त्रों में मिलते हैं इससे वेश्यागमगकरना कोई घिद्वान थाछा न कहेगा। पह वचन सुम राजा सभाजनों का विसर्जन कर अंत: पुर (रनवास ) में जा रनों से जड़ित शय्या पर लेटगया परन्तु एम चि- न्ता से कि कौन उपाय से लोलिम्बराज धेश्यागमन करै निद्रा न माती भई, रत्नकला ने पूछा हे स्वामिन आपको नींद क्यों नहीं माती राजा ने कहा जिस उपाय से लोलिम्बराज बेश्यागमन करें यह विधि रची सा हमैं नींद आधै। वह हँस कर बोली कि आप चिन्ता त्याग मानन्द से शयन करें, हम कलही इस कामको करेंगी। मातःकाल रनकला पलङ्ग से वठ अपने गृह में प्राय निज गृह द्वार का कदली खम्भ वन्दनवार गन्ध माल्य भादि अलङ्कारों से धमत्कृत कर संध्या समय दरवाजे पर खड़ी हो लोलिम्बराज की राह जोहने लगी। लोलिभ्यराज के सभा में जाने को यही मार्ग था अस आही तो गये, रत्न कला को देख पूछा (कि- | मुत्सयमद्य) आज या उत्सव है उसने कहा कि त्रिभुवन जनमो भगवती का आज पूजन है हमारी इच्छा है आप भी चलिये दर्शन करिये। उसके मीठी बचन को लोलिम्यराज सुन देयी के दर्शनार्थ उसके साथ भीतर गये, दोनों के भीतर गये हुये देखकर पूर्व शिक्षित दास ने फेवाड़ा बन्दरलिया, लोलिभ्यराज भीतर भगवती की मूर्ति को न देख चन्द्र चिन्द्रकावत् | पलङ्ग को निरीक्षण कर पूछा कि यहपलङ्ग फिसलिये है ? रनकला ने कहा सम्भोगार्थ है, हमारी इच्छा थी कि आप को देषी दर्शन के बहानेसे यहां लाफर अपनी कामना पूर्ण करें। लोलिम्बराज ने फित चित हो धर्म विधार कर कहा कि मैं वेश्यागमन नहीं करता । ऐसा सुन वाह विषादवती हो योली “स्वागतां च स्त्रियं त्यक्त्या भ्रूण हत्या मवाप्नुयात्" यह धर्म ग्रंथ का मत है इसलिये आपको सम्भोग करना उचित है। लोलिम्बराज ल- भाराग्यंदपंगा। ज्जित होके घोले कि अच्छा तुम्हारे साथ वाणी. करके रति करेंगे शरीर और मन करके नहीं ( मैथुन आठ प्रकार का होता है )। स्मरणं कीर्तनं केलिः प्रेक्षणं गुह्यभाषणं । संकल्पी- ध्यवसायश्च क्रिया निप्पत्तिरेवच ॥ स्मर्ण (पारंवार चिन्तन करना) कीर्तन-(मुख अङ्गादि और उसके घोल चाल की वारंवार तारीफ करना) फेलि (हँसी दिल्लगी करना) प्रेक्षण (प्रेम से देखना) गुह्यभाषण (गुप्त बात करना.) सङ्कल्प ( सम्भोग करने की दृढ़ प्रतिज्ञा करना) अध्यवसाय.(:किसी प्रकार प्रसङ्ग उस्से अवश्य करें उस्में परिश्रमकरना) और (निष्पत्ति संभोग करना) ऋपियोंने यहा- ठों को मैथुनही में गणना किया है । बस लोलिम्बराज ताम्बूलरस से (मित्त) देवालों में हँसी दिल्लगी का सम्बोधन सहित. रात भर में १२०० पद्य युक्त लोक बना के लिखहाला । प्रातःकाल राजा के सभामें पहुंचे (राजा तो जानताही था) पूठा महाराज रात कहांरहे (ले०) धेश्याके घर (राजा) फलपामिला (लो०) एक पुत्र हुआ (राजा) वह पुत्र कहां है (लो०) उसीके घरमें है जाफे देख लो राजा जाके दिवालों में लोक लिखेहुये देख परम विश्मयापन्न होगया और लोलिम्बराज से क्षमा मांगी (लो०) ने कहा हमने तो क्षमा किया परन्तु अब तुम ऐसा कभी किसी विद्वान के साथ न करना । कहने का तात्पर्य यह कि जो लोग अपने अमूल्य जीवन को • आनन्द से काटना चाहते हैं वे कभी पृथा बीर्य नष्ट नहीं करते क्योंकि इन्द्रियों की संयमता यही शारीरिक बल है सो इस पर लोग बिलकुल ध्यान नहीं देते ॥ शाजकल वेश्या संसर्ग प्रभृति कारणों से देहमें शुक्र का भाग अत्यंत अल्प तथा दौर्बल्यादि अनेक देोप प्रायः देसे जाते हैं और धातु वृद्धि एवं पुष्ट होने के अर्थ वैद्यों के शरणागत हो अनेकानेक औषधों का से- वन पारते हैं । इस तरह औषध सेवन करना असङ्गत है, यह हम नहीं कह राहो हमारे कहने का प्रयोजन यह है कि जय तक मूल विषयों की भोर दृष्टि न दी जायगी अर्थात् जिन २ कारणों से उन दोष उत्पन्न होते हैं 'तृतीयखगड। पहलेही तत् विषय में मायधान न होकर अनर्धक औपा सेयन करने से क्या फल है ? कुछ भी नहीं । कारण यह है कि जैसे कोई धनयानं मनुष्य मूर्सता से परिमान धन सर्च करने से थोड़ेही साल में जिस तरह एक धारणी दरिद्र हो ऋण रूपी ज्वाला में जलने लगते हैं और येही अप- व्ययी धनवान स्वयं सावधान न हो के सर्च किया हुआ धन स्वयं न कमानेसे अन्त में सहस्त्रों चेष्टा करने पर भी ऋण परिशोधन तथा सम्पत्ति रक्षा में किसी प्रकार समर्थ नहीं होते और प्रायः देखा गया है कितने ऋणजाल में जर्जरित जन अन्तर्मे सब मुस विसर्जन कर दरिद्रों की भांति शाकान्न भोजन करके स्वकीय ऋण शोधन में कटिबद्ध हुये तथापि आशा सम्पूर्ण नहीं देखी गई। इसीतरह वे युवकगण वेश्यागमनादि में परि- माण धातुनफरनेयाले जिन्हें स्त्री प्रसङ्ग तथा सन्तानोत्पत्ति करनेकी पूर्ण सामर्थ थी, परन्तु अपमित शुक्र नष्ट करते २ अन्त में एकबारगी धातु हीन एवं धातु दौर्बल्य तथा प्वजभङ्गादि ( नपुन्सक) उत्कट २ रोगा- फ्रान्त हेर (ऋणग्रस्त धनी पुरुष की नाई) अपार दुःख भोग करते हैं और हजार औषध सेवन करने से भी तज्जनित रोग से नहीं छूटते। इतनाही नहीं बल्कि वेश्या और परस्त्री के प्रेम में कितने समूल अर्थात् तन मन धन सुख सौभाग्य सय रसातल को चले जाते हैं-देखिये ॥ लङ्केश्वरो.जनकजा हरणेन बाली तारापहारकतया प्यथ कीचकाख्यः । पाञ्चालिका ग्रहणतो निधनं जगाम तच्चेतसापि परदार रतिं न कांक्षेत् ॥ जानकी जी के अपहरण से रावण कैसी दुर्दशा के साथ मारा गपा, तारा (सुग्रीव की स्त्री) के हरण से पालीको मृत्यु हुई श्रीर दी- पदी के हरण से कीचक का बध हुमा, अतएव बुद्धिमानों को चाहिये पर स्त्री गमन करने की इछा कभी मन में भी न करें और भी देखिये पुरुरवा राजा तवंशी अप्सरा की प्रेम रापी फांसी में फसकर तहस नहस होगया इमलिये सरपुरुष इस अमूल्य जीवन को क्षणिक सुख लम्पटताप विनष्ट फरना नहीं चाहते।

६ पारोग्यदर्पणा। हस्तमैथुनादि निपेध। धेश्यादि गमग द्वारा जो फुछ अगिष्ट इस शरीर को होता है उसे भणी भांति दर्शा चुके हैं, येसाही धल्कि उस्से कुछ अधिक हानि शौर शरीरको मिर्षलता एवं अकाल मृत्यु हस्तमैथुम और गुदामैथुमसे होती है जिसका कुछ २ हाल हम भारोग्यदर्पण के द्वितीयसपउ में लिप्स भी इन दोनों कर्मों से लिनिवल, टेढा अग्रभाग स्थूल और शक्ति हीन हे जाताहै। मुनते हैं कुरानमें कोई आयतहे कि महम्मद ने कहा है कि यदि स्त्री गर्भवती हो और पुरूंप को कामकी इच्छा उत्तेजितहो तो यह गुदामैथुन करै, ऐसे पुरुप लखनऊ काशी आदि स्थानों में अधिक मिलेंगे । यद्यपि ऐसे २ अनाचार बन्द पारनेको हमारी सरकार ने सास फानून जारी कर दिया है परन्तु जो फुसंस्कार यहुत दिनों से मूरों के दिशा में जमा है एकाएकी छूट ना महा कठिन है। इस स्यण में हमारी राय है कि यदि अपनी स्त्री गर्भवती हो और ६ मास से ऊपर हो उस समय यदि पुरुष भति कामोन्मत्त हा (जिस्में प्रसंग म करनेसे रोग होने का सम्भव है) तो घेद फी माज्ञानुसार नियोग करना उत्तमहै, अगाधे- सति किसी आरोग्य येश्या से प्रसंग कर लेना अच्छाहे परन्तु गुदामैथुन करना पुरुप लिये किसी हालत में अच्छा नहीं है। यह यात हम निस्सन्देह कह सके हैं कि ऐसे २ दुष्ट कर्म प्रथम हमारे मार्य भाइयों में नहीं थे मुसलमानों के राज्यसे इसका प्रचार हुआहै और उन्हीं म्लेच्छों के साथ अधिक संसर्ग होने के कारण अार्य सन्तान गण भी नस दुर्गुणों में परिपक्क और निपुण हो गये हैं । हस्तमैथुन पहिले भी था प्रायः लोगों के मुख द्वारा श्रवण करने में माया है कि भगवान् विश्वामित्र प्राषि ने हस्तमैथु नसृष्टि को कियाधा परन्तु प्राचीन सत्ग्रन्थोंमें इसका कोई प्रमाण नहीं पाया जाता, लेकिन धर्मशास्त्र में इसके प्रायश्चित्त का विधान पाया जाना है और प्रायः नी० . सौयखण्ड। धेयक के सभी ग्रन्यों में गरमी रोग होने का ये कारण लिरो हैं (हस्ता- भिघातानखदन्त घातात) हस्तगभिघात (हस्तमैथुन) नख और दन्त के मभिघात (वाजे २ कुफर्मी लोग सरों के मुख में लिा डालते हैं) से उपदंश रोग होता है इसे जान पड़ता है कि यह कर्म यहुत काल से प्रचलित है । हस्तमैथुन में लोगोंकी क्यों प्रवृत्ति हुई यह निर्णय करना कदिन है। इतना कह सक्त है; एक तो पिताके स्वरूप और उण वीर्य का दोप, दूसरे ठीक २ चालकों को रक्षा का न करना, तीसरे शिशुकाल से ही बुरे २ यालकका संसर्ग इत्यादि कारणोंसे मुकुलित वीर्यका मुख असगयमें ही खुल जाता है । यस लिंग स्थान में जहां किसी वस्तु का रगड़ लगा सुरसुरी धोध होने से एक प्रकार का आनन्द पाना प्रारंभ छुपा तय उसे हस्त द्वारा शिश्न का अग्रभाग खोलने और बध्द करनेफी इच्छा होने लगी। थोड़ेही काल ऐसा करनेसे वीर्य स्खलित हो जाता है। यस जहां एक दफे उक क्रिया से अति आनन्द मिला मूर्ख लोग उसीमें लित हो जाते हैं और उमौ सुरा को अपने इष्ट मित्रों से कह कर भी अन्धफूप में गिरा देते हैं, यह नहीं जानते कि यही सुरा हमको कुछ काल पाकर सर्वनाश करैगा । शरीर क्षीण बल वीर्य विहीन रमणशक्ति से दीन और मन मलीन फर देगा, शरीर निस्तेज, बुद्धिका इस शारी- रिक और मानसिक स्फूर्ति नष्ट हो जायगी। हमको इस संसारमें जड़ पदार्थकी भांति होकर जीवन काटना पड़ेगा, हमको सन्तानरहित होने से दूसरे के बालकों को देख ललचाना पड़ेगा, जन्मभर वैद्य हकीमों की सामद करनी पड़ेगी ॥ कुछ दिन हस्तमैथुन करनेवाला वालक युवावस्था में शुक्र मेह आदि रोगों से ग्रसित होता है। शौच करते समय मूत्र के पहले या पीछे वीर्य का निकल जाना और स्वप्नदोष से भी पीड़ित होना, तपा प्रसंग में वीर्य का शीघ्र पात होना प्रादि उत्पात हेाता। लिंग. भी क्रमशः आहार में छोटा और निर्बल हो जाता है । शिर कमजोर, विधारहीन और नेत्र भी ज्योतिक्षीण हो जाते हैं। एक अंगरेजी यंत्र है उसके द्वारा तरल वीर्य को देखने से. जानागया है कि पतले वीर्य में छोटे २ - कुछ पाराग्यदर्पण। रूमि पड़ जाते हैं जिनका स्वरूप अण्डाकृति मस्तक और लम्बी पुछ धाले सूत्रवत् होते हैं। केवल इतनेही लक्षणों पर निर्भर नहीं है, इस नीचपत्ति क्षुद्र क्रिया इस्तमैथुन से इस शरीर को पा २ हानि पहुंचती है और उसके द्वारा कौन २ सा दुःख भोगना पड़ता है, लेखनी में ऐसी पूर्णशक्ति नहीं है जो चित्र खीसकर दिखा दे परन्तु उक्त घृणित कर्म करनेवाले युवक गण उ- परोक्त लेखोंको ध्यानदेके पढ़ेंगे तो आप ही उनके हृदय में चित्र खिच जायगी और धारयार अपने कियेहुये दुष्कोंपर पछताधेंगे और प्राशा है कि यहुतसे लोग जो प्रधानतायश इस अमूल्य जीवनमूलमें अपने हाथ से कुल्हाड़ी मार रहे हैं घेत जायगे, और कितने चेतते भी होंगे। जयसे प्रारोग्यदर्पया में हस्तमैथुन द्वारा शरीरनाशक बुरीलतसे वीर्यको सत्यानाश करने का दोष और भविष्यतमें अनेक क्रश होने का सम्भव दिखलाना आरंभ किया है तब से अनेक चिट्ठियां उम युवकगणों की हमारे पास आई हैं और माती जाती हैं जो अज्ञानतायश होकर इस सत्यानाशी कार्य में लिप्त हो अपने शमूल्य जीवन को स्था गॅधाने में कटिबद्ध थे । वे लोग लिखते हैं । महाशय ! भवदीय रचित भारोग्यदर्पणको जिसमें हस्तमैथुन द्वारा वीर्यपात का दोष दिखलाया पढ़कर पश्चात्ताप किया और शपथ किया कि आज से अप ऐसा दुप्टफर्म कभी न करेंगे परन्तु महाशय जो मैं इस काम को बहुत दिनों तक करता रहा उस कारणसे मैं इतना दुर्बल हो गया हूं कि मेरे कमर में दर्द रहताहै, पढ़ने में चित्त नहीं लगता, कितनाहू रटते हैं परन्तु याद नहीं होता है, शिर कमजोर होगया है कलेजा कभी धक २ करने लगता है, मन उदास रहता है और बुरे २ ख्यालात सूझते रहते हैं इत्यादि । इसकी कोई दया लिखिये या भाप के भौषधालय में तैयार हो तो भे०प० पारसल द्वारा भेजदीजिये ॥ पाठकगण, वे लोग उपरोक्त लेखों के अतिरिक्त और भी अपनी भीतरी माँको जो निरर्थक वीर्यपात के प्रभाव से उन लोगों को प्राप्त हुआ है लिखकर भेजते हैं, जिसका यथार्थ प्रकाश करना अनुचित जाम तौयखण्ड। नहीं लिखा । इससे जान पहता है कि चालकों के दिल पर उम लेखका असर अधिक भी है, ईश्वर ऐसाही अच्छा नसर मय के दिलपर पहुं. पाये । यस इस लेख को मैं यही समाप्त करताहूं। आगे कामशास्त्र के अनुसार संत्री पुरुषों के लक्षण और जो वेश्यागमन में लिप्त हैं और ऐसे पित के हैं कि उनके समझाने में विचारे प्रारोग्यदर्पणकी क्या ताफत है वे ब्रह्मा के उपदेश को भी न मानेंगे तो भी यिवेकियों के उपकारार्थ यथा शक्ति कुछ लेरा देता हूं। कामशास्त्ररहित गमन निषेध । पाठकगण को याद होगा मैं इस वाक्य को लिख चुका हूं "कोक पढ़े यिन रति फरै से नर पशू समान" जो मनुष्य कामशास्त्र के जाने बिना मैथुन करता है यह तद्विषयक सुख से यञ्चित है। शरीर से भी निपाम्मा हो जाता है। हमें यह कहते शोक होती है कि प्राज भारतके प्राणी गण अत्यन्त रोग ग्रस्त प्यों हो रहे हैं ? कामशास्त्रके न जागनेसें, शायद लोग यह जानते होंगे भार प्रायः यह भी कह देते होंगे कि काम शास्त्र विषयी पुरुषों का बनाया है। जैसे अपने प्रानन्द करने के लिये शामरा ब्राह्मणों ने स्थापन कर लियाहै, सो नहीं। व्यभिचारफर्म, परस्त्री गमन और अति विषयसेवन ये तो अवश्य लम्पट और कुत्सित पुरुषों के काग हैं परन्तु रीति पूर्वक स्वदार गमनादि में कामशास्त फा शान बहुत उपयोगी है, क्योंकि फामशास्त्र स्त्री पुरुष के प्रमोद का य- ढ़ानेवाला है कि जिसकी क्रिया से उत्तम सन्तान हो सक्के हैं। अतएय | उचित और प्रयोजन मात्र कागशास्त्र का जाग और पाणिगृहीता यधू का सङ्गम शिष्ट सम्मत है। यह भी ठीक है कि जो जिसके का नहीं जामता उपकी निन्दाही करता है । फामशास्त्र आयुर्वेद का अंतिम भागहै । प्रापियों ने जय देखा कि लोग अति कामातुर होकर अज्ञानता मे अमूल्य रन और जीवन के गर्घस्य वीश को वृथा नष्ट करने लगे हैं उस समय आयुर्वेदको मथकर लोकोपकारार्थ कामशास्त्र एक जुदा शास्त्र ही बना दिया। उसीसे घुन फर पं० कोफ जी नि नाम की संहिता - पारोग्यदर्पण। अर्थात् कोक नामक एक ग्रंथ बनाया, उसके भाशय ले और लोगेांने भी छोटी २ पुस्तके बनाई हैं फिर अल्पज प्राणियोंके समझाने के लिये कोक सार नामक संक्षेप भाषा का ग्रन्य बनाया है । संस्कृतमें पञ्चशायक और मनहरङ्ग नामक दो ग्रन्थ बहुत प्रामाणिक और उपयोगी हैं जिसे चतुर्थ या पञ्चमखण्ड के नारोग्यदर्पण में शाङ्गोपाङ्ग लिखेंगे। जिसमें रतिप्रिय नर नारी के प्रयोजनीय साहित्योंका संग्रह कियाहै। औषधों और ल. क्षणों के विशेष विवरण जिस देशकी स्त्री की प्रकृति रति क्रियाके जिस अंग में जैसी होती है उसे भी बर्णन कर दिया है । कामशास्त्र में चार प्रकार के स्त्री पुरुषों के लक्षण और स्त्री पुरुपका परस्पर बाघ, फोन पुरुप किस स्त्रीके साथ और शिस अवस्थामें विवाह कर सकता है, सत्य- शीला और दुष्टास्त्रियों का स्वभाव और उनके चरित्र और लक्षणद्वारा पएधान, निज स्त्री को बसीभूत रखने की यिधि, कामदेव का वर्णन, स्त्रियों के कौन दिन किस अंगमें काम का बास रहता है, आसनविधि, रूप यौबन सम्पन्न बने रहने, गुन्दर सन्तान उत्पन्न करनेको बिधि, स्त्री अपने पति को किस उपाय से अपने बस में रख सकी है, स्त्रियों को शहार करने की विद्या, यंत्र विद्या, तथा शिल्प विद्या सीखनेकी यिधि और बीर्यादि पुष्ट करने के अनेकानेक उपाय और औषध लिखे हैं। इस स्यसमें हम सिर्फ सोप से स्त्री पुरुष की परस्पर प्रीति, व्यय- हार और सहयास भादि मकर्णको लिखते हैं जिनका याद रखना गृह- स्थानमियों के लिये अति लाभदायक है । प्रसंगेच्छा। शरीरेजायतेनित्यंदेहिनांसुरतस्पहा । अव्यवाया- न्मोहमेदोवृद्धिःशिथिलतातनाः ॥ वीर्य पुष्ट रहने से स्त्री के साथ प्रभात फरनेकी इच्छा देहधारियों फेो नित्यप्रति होती है और गमनेच्छा होने पर न करनेसे प्रमेह (पातु रोग) मेद (शरीरका मोटा हो जाना) और सम्पूर्ण अंग शिपिल हे .

तृतीयखण्ड। जाते हैं। इसलिये अकस्मात् गमनेच्छा होने से गमन करना मनुष्यमात्र को जरूरी है। किस अवस्यावाली स्त्री के साथ कौन पुरुष और कैसे समयमै गमन करै से दिखलाते हैं। यह बात तो सभी को याद रखनी चाहिये कि अपनी अयस्था से अधिक उमरवाली स्त्री के साथ मैथुन कभी न करें । स्त्री अवस्था विचार। वालेतिगीयतेनारी यावद्वाणिपोडश । ततस्तुत- रुणीज्ञेयाद्वात्रिंशद्वत्सरावधि॥ तदूर्ध्वमधिरूढास्यात्पंचा- शद्वत्सरावधि । वृद्धातत्परतीज्ञेया सुरतोत्सववर्जिता ॥ सोलह बर्ष की उमरवाली स्त्री को बाला, सोलह से यत्तीमवर्प तक की अवस्थावाली को तरुणी, बत्तीसवर्षके ऊपर पासवर्पता को रस्त्री को प्रौढ़ा और पचास वर्षको अवस्था से उपरान्त उमरयाली स्त्री को शास्त्रकारों ने युद्धा कहा है। अपनी अवस्था से अधिक बयवाली स्त्रीके साथ सहयास करना तो निषेध हई है परन्तु वृद्धा स्त्रीके साथ तो पादापि प्रसङ्ग नहीं करना चाहिये । देखिये ऋषियोंने क्या कहा है। वृद्धोपितरुणींगत्वातरुणत्वमवाप्नुयात्। वयाधिका- स्त्रियंगत्वातरुणःस्थविरायते। आयुष्मन्तोमन्दजरावंपुर्व- णवलान्विताः। स्थिरोपचितमांसाश्वभवंतिस्त्रीपुसंयताः॥ यदि यद्ध पुरुपभी तरुण स्त्रो (अपनी उमरसे कम उमरवाली युवा स्त्री) से गमन करे तो युयत्व धारण की, अगर जवान मनुष्य युड्ढीस्त्री. से गगन करें तो वह भी युदा हो जावै । इसलिये वहा स्त्री के साथ कदापि गमन नहीं करना चाहिये । जो मनुष्य सर्षदा तरुण स्त्री से भोग' करते हैं ये (भापुरुमतः) - जादा तुमरवाठे (मन्दगरा) अल्पवृद्ध, उत्तम पारोग्यदर्पण। शरीर, सुन्दर वर्ण, बलयुक्त, बहुत दिनों तक जवान और मांस की सि- कुन रहित बने रहते हैं। पाठकगण-हमारे इस लेख को कि तरुण स्त्री के साथ मैथुन करने से बुढूढा भी जवान हो जाता है कहीं ढ़पकर न. नर्थ न कर बैठना कि किसी तरुण स्त्री को देख के उसे प्राप्ति करने की कोशिस और बंदिसें ठान, कुटिनियों को मालामाल कर दो। यह सब महा अधर्म और पाप जनक कर्म हैं, गमन का युक्तायुक्त विधान भागे स्पष्ट लिखते हैं । ऋतुपरत्व प्रसंगबिचार। निदाघशरदोर्यालाहिताविपयिणीमता। तरुणी- शीतसमये प्रौढ़ावावसन्तयोः ॥ गरमी (ग्रीष्म) शरद ऋतुओं में बाला स्त्री के साथ मैथुन करना विषयेच्छुकों को अति लाभदायक लिसाहै । जाड़े के दिनों में तरुणी स्त्री के साथ, घर्पा और बसन्त ऋतु में प्रौढ़ा के साथ गमन करना उत्तम कहा है । जो मनुष्य विषयी हैं और प्रारोग्यता भी चाहते हैं वे इसी बचनके अनुसार इस पर यह भी शङ्का होती है कि एक पुरुप को ऋतु २ में अदल घदल कर ४ स्त्रियां चाहिये, सेो इसका उत्तर यह है कि यह बघम फेयल एकही पुरुष के लिये नहीं है । तात्पर्य यह कि जिनकी याला स्त्री है वे गरमी और शरद ऋतु में प्रसङ्ग करें और जिनकी तरुणी स्त्री है ये शीत समय, में जिनकी प्रौढ़ास्त्री हे घे वर्षा और घसन्तऋतु में गमनकरें अन्य ऋतुमें नहीं। घाखा मादि स्त्रियों के साथ गसन करने का और भी एक विशेष बचन यह है:- नित्यंवासेव्यमानाहि बालाबर्द्धयतेवलं । तरुणी- हासंयेच्छक्तिं प्रौढ़ोद्भावयतेजरां ॥ स्त्री प्रसा करें।

तौयखण्ड। माला के साथ रोज २ गमन करनेसे भी, यल बढ़ता है और तरुणी स्त्री से रीज २ मैथुन करने से शरीरके धन हानि और प्रौढ़ा के साथ निरन्तर मैथुन करने से बहुत जल्द बुढ़ाई आशाती है।' याला स्त्री के साथ गमनकरगेका मुख्यसमय गरगी और शरदनातु कहा है सही, पर यदि उसके साथ नित्यही गमन करे तोभी पल को बढ़ावेगी, परन्तु फिसके यल को बढ़ावेगी ? तात्पर्य यह कि यली पुरुप के ही बल को बढ़ावेगी फिन्तु किसी रोग से क्षीण पुरुप के बलको पाभी 'नहीं बढ़ाय सकेगी और यह भी तात्पर्य है कि केवल पलको तो बढ़ावे गी परन्तु प्रागन्तुक रोगोंके प्राप्त होने से पूर्वोक्त रोगाती के रतिनिध की ही कोटिमें अपफारी है, इससे उत्तम यही है कि सर्वथा भारोग्यता चाहनेवाले पुरुप बाला के साथ भी उपरोक्त ऋतुओं में ही गमन करें, । क्योंकि बीर्यरक्षाही एफमधान फल है जो समस्त भारोग्यताका कारण है। पाठकगणों के विधेघनार्थ उपरोक्त लोक का विशेष,जाभ्यन्तरिक अभिप्राय प्रगट करते हैं। गरमीमें वांद्याभ्यन्तर की उष्णतासे.और श- रद ऋतु में पित्तकोप से वीर्य तरल भाव में रहता है और यौवन के बढ़ाय के कारण याला स्त्रीके रजमें रुक्षता और तरलता नहीं रहती, इससे भगाशय उपभाफ रहित रहता है। इसलिये गरमी और शरदऋतुओं में धालाफे साथ मैथुन करनेमे बलकी हानि नहीं होती और उत्तऋतुओं के अलावा याला के साथ मैथुन यलपर्दुक है । इससे यह मिद्धान्त ठहरा कि वाला स्त्री हो से मैथुन करना सर्व सम्मति है । शीतकाल में वीर्य गाढ़ा और शीतल रहता है, इससे तरुणो के साथ गमन करने से बीर्य अति शैत्यता से सब रास्ते में कहीं नहीं रुकके बाहर निकल आता है। उसी घर्षा और बसन्त ऋतु में वीर्य की बाढ़ होती है, उस अवस्या में प्रौढ़ा स्त्री के साथ भी गगन करना हानि कर नहीं है । परन्तु यह बात याद रखनी चाहिये फि कोई ऋतु क्यों न हो कम उमर का पुरुष अपने से अधिक उमरयाली स्त्री के साथ गमन करते २ अवश्य मलयुद्धि होग निस्तेज हो थोडेही दिनों में रोगग्रस्त हो यमालय की - - भाग्यदर्पगा। रास्ता पकड़ेगा। वैसा ही छोटी उमर की स्त्री: यदि बड़े बूढ़े के साथ गमना करावै ता.निस्सन्देहामेहुत जल्द प्रदर रोग अथवा खांसी ज्वर (तपेदिक) से पीड़ित हो भर जावेगः । भारतवर्ष में अधिक विषया होने का भी एक प्रधान.फारस यह विपर्यय. विवाह है, प्रायः इस देशमें विशेष कर उत्तमजातो.के.यहां छोटे २ लाहकांका वियाह.बड़ी तमरवाली लड़: कियोंके साथ होता है । और घाजो २.जगह ,देखने में आता है कि पुरुषों के विवाह पर विवाह होते जाते हैं और स्त्रियां भरती जाती हैं. इसके कारण दे हैं, प्रथम तो यह कि जिस पुरुषको स्त्री मर जाती है उसका दूसरा विवाह यही नव दश वर्ष की बालिका के साथ होता है । पुरुष साठ वर्षका..फयों न हो जाय उमका व्याह.दशही वर्षकी कुमारी के साथ होगा। दूसरे बहुत किस्म के ऐसे लोगहें जो फुलीन नहीं हैं अथया गरीब हैं ये लोग जघान हो जाते हैं विवाह नहीं होता, 'जय कुछ धनवान हुये ते धन दे कर छोटी २ लड़कियों के साथ वियाह करते हैं, 'गदी कारदा स्त्रियों के मरजाने का है। और योनिरोग सा..अवश्य ही होता है। देखिये लिखा भी है। अतिकायगृहीतायास्तरुण्याण्डिनीभवेत् । अल्प अवस्था की स्त्री के साथ यदि दीर्घ लिंग पाला कर ता. उमसे उसकी योनि कमल अगष्ठा के माफिक, लट कि आर्य से अपिटगी रोग है उससे सन्तान नहीं होते ॥ मैथुन निषेध । प्रत्याशिताधुतिःक्षुद्वान्सव्यथाङ्गपिपाशितः । वालोवृद्धोन्यरोगार्तस्त्यजेद्रोगीचमैथुनम् ॥ ऐसे पुरुषों के माथ चाहिये स्त्री गमन न करावे--जिसने अत्यन्त भोगन किया है, धैर्य रहित अर्थात् जल्दीयाज हो जिसके शरीर में दर्द हो, प्यासा हे पालक याने कम उमर का हो, अपया यह.स्त्रीके उमर मे यहुत भधिक उमरयाला हो और गरमी मुनाक मादिगों में, अति मेधुन .

हतोयग्वण्ड। पीड़ित हो. तो उस पुरुष को मैथुन नहीं परना चाहिये। यदि स्त्री भाग्यता की इच्छा रखती हो तो यह भी उक्त पुरुषों के साप.कभी भोग न करें। पदि तपरोहा क्षण युक्त पुरुप मैथुन कर तो स्त्री को तरोगिणी घमाही देगा लेकिन पुरुष को भी शुक्रकी दुर्वलता, वायुका कोप होगा और यदि रोगग्रस्त अवस्था में करें तो रोग की शुद्धि कर मत्यु 'को पत जपद प्राप्त होगा। मैथुन में समयः ।। सेवेतकामंतःकामवलाद्वाजीकृतोहिमे। प्रकामन्तु- निपेवेत मैथुनंशिशिरागमे ॥ व्यहाद्वसन्तशरदोःपक्षाद- दृष्टिनिदाघयोः। ' ' अथसुश्रुते--त्रिभिस्त्रिभिररहोरात्रै समयात्प्रमदा- तरः । सर्वैवर्तपुधर्मतु पक्षात्पक्षाव्रजेद्बुधः ॥ प्रातु के अनुसार मैथुन करने की विधि आयुर्वेदविदों ने इस प्रकार कहा है कि हेमन्त ऋतु में पुरुष बानीकर श्रोपों को सेवन करके रुप यौवन सम्पन्न स्त्रोके माघ रमण करे, शिशिर ऋतु में जब काम का बेग हे। मैथुन करे, बमन्त भऔर शरदऋतुओं में कामको पेष्ठा हेानेपर तीन ३ दिन के बाद गमन कर, वर्षा और गरमी की ऋतुप्रोंमें पन्द्रह २ दिन के अन्तर में गमन. करमा नाहिये । सुश्रुत. जी.भी यही कहते हैं कि सम्पूर्ण चतुओं में मनुष्य को पाठिये कि तीन २ दिनफे' अन्तरदे के और गरमीयो दिनों * बहुत सी स्त्रियां पुरुषों की तरह जैसे पुरुषों को इस बात का वि- खास जमा है कि वामसिंग औरत के माय भोग धारने से वन यढ़ता है वैसा हौ स्तियों को भी विश्वास है कि लड़को से मथुन कराने से स्त्रियां बुड्ढो नहीं तो राम प्रायः व्यमिनारिणो खियां कम उमर के सुन्दर बालकको खोज २ कर मेयन करातो ॥ .

पागग्यदर्पण। में पामोन्मत्त होने से पन्द्र३ दिन मैथुन करना चाहिये । कामम्मित्त होने का लक्षण हमने द्वितीयखण्ड के आरोग्यदर्पण में लिख चुके हैं। रुक्षाङ्गीवहुभोजनाचलमति गीतप्रियावातला। शै- लाम्भोनिधिपार्श्वदेशयनिता प्रायोभवेदीदशी॥वर्षायां- कुसुमागमेचवंहुशः सेव्यापरम्प्रीतिदा ॥ सूखे भाग को भर्थात् स्वेदादि रहित जिनके पा, रुघ भोजन हारनेवाली, युद्धिमान् गाम जिन्हें प्रति प्रिय है। और मात कति के लक्षण मिलते हों एतादृश लक्षण युक्त पर्वतीय और समुद्र के किनारे के रहनेवाली स्त्रियां होती हैं... इन स्त्रियों के साथ वर्षा आर. वसन्त ऋतु में मैथुन करने से अति मानन्द मिलता है अर्थात् इन ऋतुओं में उक्त देश की स्त्रियां अति सुख देनेवाली होती है। यह जो भारतवर्ष के गले महाराजे अनेक देश की स्त्रियों से विवाह करते थे यही कारण किसी २.के सौ सौ दो दो पौरानियां होती थीं इसका सबब भी यही है कि पूर्व समय के लोग विद्वानों से कामशास्त्र को अध्ययन करतेथे । गुर्वाहारसुगन्धमाल्यवसना स्निग्धाङ्गरागादिभिः ध्यक्तग्रंथिरहर्निशंचसकले गात्रेवहंत्युष्णतां । अम्भोज- प्रसरारुणोत्तमकरा शीतालयप्रेयसी ॥ सौराष्ट्राङ्गकलिङ्ग- सिन्धुयुवतीः कामंभवेत्पित्तला। हेमन्तेंशिशिरेनरैरनुदिनं सेव्यायथाकांक्षया ॥ भाव:-उत्तम पदायों के सूत्र भोजन करनेवाली, प्रतर, फुलेल, पुष्पों के माला सुगन्धित यस्त्रों के धारण करनेवाली, दिम रात जिग यही काम, शरीर को सुधारना, पान घाबना, गांग गुहगा, भाभूषणों सभा को सुशोभित करना इत्यादि जिसकी मांस पेशियां पुष्ट है, सम्पूर्ण शरीर बहुत सफीफ तक हो, हाय पैर के तलुए कमल के समान मुर्स को मार सर्वदा गिसे शीतल स्थान माधा गादि प्रिय हेर, सलित होने से जिसके धातू ( रन ) से कंगन को सी गन्ध पाये ऐसी भौगष्ट्र - २० ". 4 4 तृतीयवगड देश मा देश, और सिन्धुः कश्मीर देश की: पित्त प्रतिवाली स्त्रियों होती हैं। इन देशवाली स्त्रियों के साथ हेमन्त और शिशिर च्याभर मैथुन करे, इन प्रातुनों में यह स्त्रियां परयन्त मुखके देनेवाली होती हैं ज्ञेयंकोकिलकाकलीमृदुरवा नन्दैपिणीशीतला-। निद्रालुश्वशरीरकोमलतनुः स्निग्धाननाश्लेष्मला ॥ बङ्ग- श्रीहरकामरूपतरुणी. सुस्निग्धकेशोभवेत् । गन्तव्याशर- दिप्रदिष्टमदना ग्रोप्मेऽपिपुंभिर्वरैः ॥ मनाहर. कोकिल के समानं मीठी वचन बोलनेवाली, जिसकी समस्त शरीर शीतल, मानन्द इक ( निद्रालु ) नेत्र मद से पूर्णित हो प्रति कामलाङ्गी, निग्ध मुखी, गोल गोल भरे, दीप्तवान जिसके मुख के देखतही काम अस्थिर न रहै उसे स्निग्ध मुखी कहते हैं । कफ प्रकृति युक्ती ऐसी यङ्गाल, सिलहट और कामरु देश की स्त्रियां देती हैं इनके बाल भी बहुत गम्ये और काले धमर के समान होते हैं। इन स्त्रियों के साथ शरद और ग्रीम, ऋतु में काम क्रोदा करने से जो सुख मिलता है यह सुख के समान स्वर्ग का भी सुख धूल है। क्या कोई इस बात का खपान करसता ? पूर्ण यौधन प्राप्त काल में स्त्री पुरुष स्वतन्त्र प्रेमी- स्पन हो भर्थात् प्रधान अवस्था में माता पिता के द्वारा विवाह न हो के जवानी में स्त्री पुरुष दोनों के परस्पर प्रसन्नता पूर्वक विवाह उभा हो और देशकालानुसार मदोन्नत हो मैथुन करने में अकथनीय और जो अद्वितीय मुख हेक्पा उसकी बराबरी स्वर्ग का मुख कर सक्ता है ?,यदि स्वर्गीय मुख इमी सुख के कहैं तो कुछ आश्चयं न होगा। प्रीतिवर्णन होफसार यो मत मे नौ स्त्री पुरुष में चार प्रकार को प्रीति कह माये हैं, यथाः-नमर्ग को विषयजा, समा, और सम्याम की रन-चारों के लक्षण हम प्रकाश करते हैं और उसके नीचे प्रकाश करने का मुख्य प्रयोजन यह है कि जब तक स्त्री पुरुष में परस्पर प्रीत न होगी तब तक मैथुन का जो पूर्ण प्रानन्द है वह कदापि लाभ नहीं हो सका । जैसे'धेश्यागमन में जिसे हम भलीभांति प्रा० द० के दूसरे खण्ड में दिख- लो चुके हैं। .

। २१ - पाराग्यदर्पण। नैसर्गकी आदि प्रीति के लक्षण । अभ्यासविषयासाध्यादम्पत्योः सहजातुया । सा- न्द्रानिगड़भूताच प्रीतिनैसर्गिकीमता ॥ . मालाचन्दनभोज्यादौर्विपयैर्वर्द्धितातुया। प्रीतिर्वि- प्रयजाप्रोक्ता समयोगेसमास्मृता ॥ आखेटदेवपूजाांदकेलिसंगीतकर्मसु । अभ्यासयोग- द्यावृद्धिंयातिसाभ्यासकीमता... -::: ( अभ्यारा विषय साध्य ) पासही विषय है जिसमें कोई तरंदुत नहीं ऐसो स्वभावज प्रीति विवाह होतेही पोर बेटी के समान प्रापस में हो जावे जो छुड़ाने से न छुटै उसको नैसर्गि की प्रीति कहते हैं। यह प्रीति उसी अवस्था में होमती है जय १२ वर्ष से ऊपर उमरवाली स्त्री का २० वर्ष से ऊपर उमरवाले पुरुष के साथ विवाह हो, अन्यथा नहीं । जे. प्रीति माला, अतर, मिठाई, घस्त्र, आभूषण, अथषो कोई लालच बस्तु के लेने देने से प्रीति हो उस प्रीति को विषयजां प्रीति कहते हैं। समान योगों को करके अर्थात् स्त्री और पुरुष रूप से यौवन से, धन से तथा कुल प्रादि हर यस्तुओं में समान होने के कारण जी प्रीति भई हो उसे समां प्रीति कहते हैं। : अघ अभ्यास की प्रीति का वर्णन करते हैं। भाखेट पर्यात शिकार खेलते में जो प्रीति हो (इससे मालुम होता है कि पूर्व समय में स्त्रियां भी शिफार,सेलने, जाती. यी अपया पुरुषही. कहीं शिकार केो गया हो किसी स्त्री से प्रीति होवे, जैसे सकुन्तला और दुष्यन्त की प्रीति ) तपा देव पूजन में ( से प्रायः देखने में आता है कि मन्दिरों में नित्य २ देवपूजनार्थ स्त्री पुरुषों के जाने से किसी किसी से परस्पर घड़ी गहरी मीति होती है ! यहां तक कि देवपूजन कोड पूनीस और यकील मुहारों की पूजा करनी पड़ती है) केलि.अर्यात काम कोड़ा में (जैसे पुरुष संज .

२४ तौयग्वगड चूंघुट अवा प्रश्नल या प्रांड के ऊपर के बस्त्रों को पारंवार सुधारगा, बालों को पागे के तरफ छिटकाना, भौहों को चढ़ाके तिरछी निगाहोंने देखना.त्यादि लक्षणा परपुरुष के चाहने वाली स्त्रियों में देखे गये हैं। परन्त यहे लक्षण प्रथम प्रेम की सीढ़ी का है जन अधिक प्रेम पढ़ जाता है सिर्फ संहवाम करना बाकी रहता है उस अधस्थाके लक्षण यह हैं जैसे- प्रीतम प्यारेको देख के खखारकर पकना, बहुत-हँसना, या गीतंगाना सेज से उतर कर अथवा बिछौने से सरकार पास या बैठना, गहों को ताना, सा जमाई लेना, गरोष स्त्री. है तो कुछ द्रथ्य या घस्त्र, आभूषण की पाचना करना, स्त्री धनवान हे तर. उस पुरुष से कहना कि तुम्हारे शरीर पर अमुक गहना या वस्त्र बहुत बाछे लगते हैं. क्यों नहीं अनवा लेते हो अथवा कोई मातु या अपनी. अँगूठी: पहिरने को देना, उसे देस के अपने बालक का,अथवा किसी सहेली का. मुख चूमना.. या अपने घरायर की स्त्री के साथ हँसी दिलगी फरना, काम खजुषाना और पीठ. पीछे अपने प्यारे की बडाई करना....... ..... गहरी, प्रीति के लक्षण । “इमांचविन्द्यादनुरक्तचेष्टांप्रियाणिवक्तिखधनंददाति । विलोक्यसंप्यत्तिवीतरोपाप्रमाष्टिदोपानगुणकीर्तनेन ॥ तं- न्मित्रपूजातदरिदिपित्वंकृतस्मृतिःप्रोषितदौमनस्यम् । स्त- नौष्टदानान्युपगृहनेंचस्वेदोऽथचुम्बाप्रथमाभियोगः ॥ मोठी यचनों का बोलना, धनादि वस्तुओं से सहगार करना, पोसा हू क्रोध में बैठी हे देखत हो प्रसन्न होजाना, उसके दोषों पर ध्यान के हमेशा उसकी सारीफ करना, उनके मित्रों की खातिरदारी करना और वैरियोंसे प्रतिद्रोह रखना तथा अपने प्यारेके घोड़ोसी,भी. सत्कार को बहुत जानना और याद रखना; उसके परदेश में रहने से या परदेश जाने के नाम मुन्ने से निहायत करना, खासीफा छूना, मोठोंका धुम्बन पाराग्यदर्पण। २५ और छपटा लेना और बारंबार पसीने का शाजामामादि लक्षण अधिक दोस्ती होने से प्रायः देखने में माते हैं । परपुरुषरता स्त्रियों के संकेत। रात्रीविहारजागररोगव्यपदेशपरगृहेक्षणिकाः । व्यसनोत्सवाचसंकेतहेतवस्तेषुरक्ष्याश्च ॥?', रात में घर के बाहर निकलना, कहीं अपने भाई निरादरी पर जावता प्रायः दिया जलने के बाद अपने घर आवै, रतगेमें अदबंदायें के और रात भर लागना, रोग के बहाने से पड़े रहना और बैद्य हकीमें के घर दया करा में लाना, भोजन न करनी, नीच की स्त्री तथा पुरुषों से बात चीत करना, इधर उधर की बातें पूछना इत्यादि परपुरुषरता स्त्रियों के लक्षण होते हैं. इन स्त्रियों के दूती दूत भी प्रायः नीष जांति के लोग होते हैं. लिखा भी है। भिक्षुणिकाप्रव्रजितादासीधात्रीकुमारिकारजिका । मालाकारीदुष्टाङ्गनासखीनापितीदूत्यः ।। भीख मांगनेवाली. रागिनि, टहलनी, बुढ़िया लड़कियां, धोपिन, मालिग, बुरे घालवाली स्त्री, सखी, और नाइन, परपुरुषरता स्त्रियां उपरोक स्त्रियों से दूती का काम कराती हैं, इन के द्वारा अपना हाल अपने प्रीतम के पास पहुंचाना और उनका हाल मुन्ना-याजी २ स्त्रियां दूती कमें में ऐसी पक्की होती हैं कि पतिव्रता स्त्री को भी पर रता यगा देती हैं. और कितनों का तो पर फुटुम्यादि छुटाके भाजम के लिये वेश्या बना देती है। अलभ्या स्त्री। भर्टस्नेहवतोदृढ़ कवनिताप्रेम्णाविहीनाभृशं सेा- भूरिसुतानपाभरयुतागुर्वादिभीतिस्थिता। प्रायेणार्थवती- ती०४ गोयग्वगड । तथापरजनालापेविरक्तासदा नि भाव्यभिचारकर्मणि- बुधैर्दुःखेनसाध्यास्मृता ॥ जो स्त्री अपने पति में अत्यन्त प्रेम रखती हे, या एकही पुरुप में शासक्त हो, हरएक पुरुष के साथ मेमहीन हो, ई जिसमें अधिक है। और अधिक लड़केवाली, वहुत लगानेवाली, सास ससुर ज्येष्ठ प्रादि घर के बड़े पुरुषों से अधिक भय सानेवाली (अर्थवती) इसका भई यह है.फि, धन की कांक्षा रखती हो। इस अर्थ से यह भापति. मातीहै कि मायः स्तियां धन की लालच से पर पुरुषरता.हो जाती हैं. इसका अभि- माय यह है कि (अर्थवती) अर्थात् धनवान हो, परपुरुष, से.बातचीत करने में निरन्तर लज्जित और निलोभ, हा प्रायः ऐसी स्तियों व्यभिचार कर्म, में फुटमियों करके नहीं फंसती हैं। उपरोक लक्षण युत स्तियों को देख दुष्ट,पुरुष उनके मिलने की प्राशा न रखें वे प्रधर्मियों करके प्राप्त नहीं हो सकीं। सहज प्राप्ता स्त्री। मार्गादिश्रांतदेहांचिरयिरहवती मासमात्रप्रसूताग- र्भालस्याचनव्यज्वरयुततनुकात्यक्तमानाप्रसना । स्त्राता- पुष्पावसानेनवरतिसमयेमेघकालेनसन्ते । प्रायःसंपन्नरा- गामृगशिशुनयनास्वल्पसाध्यारतेस्स्यात् ।। भावार्थ:-इतनी स्ती अलबत्ता दल छिद्रयुत कुटनियों को अथवा चतुर, रूपवान्, धनवान् पुरुष को लाभ है। सती हैं ! जैसे मार्ग से धक गई हो या मार्ग से भूलगई हो • यहुत दिनों की विरहवती या जिसे * एकदिन एक विषयौ वाला इमसे बाहनेलगे कि हम मुहर्रम के नवई तारोखको १२ बजे रातका घोषागे रामनी देखने गये, जहां अधिक भौड़ भाइ यो देखा कि एक बहुत हसीन नवजवान किसौ पच्छे मुसलमागकै घर को पौरत,अपनी मंगको और तसे कुट कर व्याकुल पो इधर उधर घूमरहो २० भारोग्यदर्पण। अनेक दिनों से पुरुप से समागम न हुआ हो, महीना मात्र की प्रसूता हो गर्भवती ( लहफा होने को कुछ मास याद और-५-६ मास तक गर्भ रहरी स्त्रियों को मैथुनेच्या अधिक रहती है ) भालसयुक्ता, नवज्वरवाली, मानहीना, जो बहुत हसनेवाली हो, मासिक धर्म से स्नान कर चुकी है, मथम २ योधन का उमा उठा हो, वर्षा और बसन्त काल में तथा जि- सकी अत्यानन्दा योनि हो, ऐसी स्त्री रति के ग बहुत सहम में प्राप्त हे सक्ती हैं। पतिध्रुक स्त्री के लक्षण । नाभिपश्यतिभर्तारं नोत्तरंसम्प्रतीच्छति । वियोगे- सुखमाप्नोतिसंयोगेचातिसीदति॥शय्यामुपगताशेतेवदनं- मार्टिचुम्बने । तन्मित्रंटेष्टिमानविरक्तानाभिवांछति ॥ जो स्त्रियां अपने पति को नहीं चाहती उनके लक्षण इस प्रकार लिखते हैं। पतिके सन्मुख न देखना, इसके बोलना कौन कहे पति कुछ 'कहे भयया कुछ पूछे से उसकी बात का उत्तर भी न देवे, जप तक पति पर में रहे भुन २ करती रहे और मुख लटकाये रहे और जब पति घरसे है। हमने उस्से पूछा कि तुम कोन हो क्यों भटा तो फिरतो हो उसने बाचा शिम संग से छुटगयी है पर पर कैसे जाय, हमने पूछा कि तुम्हारा पर कहां है, अपने वाहा प्रमुख जगह पर है, इमने कहा कि तुम्हारा घरम. जामते हैं और तुम्हारे बाप से हमसे बहुत मुलाकात है जो हम तुम्हे तुम्हारे घर पहुंचा दें वह गिड़गिड़ा के बोलो कि हड़ो इगायत ।गी. तब उमगे उसे दो चार गलियों में घुमा पपने घर पर गाय पाडा ठहिरोरा पागो पोलें तो चले तुम्मो था गई है। यह थोड़ोसौ मिठाई खाको पालो पौगो पहले ते। गंगार किया चौर कहा कि जल्दो चलो हमको घर पहुंचा दो साथ हमने इसरार दिया और प्यार से चुम्मार के पाहा..मोरन रानो गई पोर मिठाई खाया युभो में बात चीत करने लगौ .मानों बहुत दिनों को. मुलाशात यो फिर तो कोई उजर उसे न रहो उसके साथ हमने पाप किया पोर उसे उसके घर पहुंचा पाय ।।

तृतीयवगड ।। बाहर चला जाये तो बड़ी प्रसन्न रहे और नमके घर में भाने में दुखी हो। पहले तो कभी अपने पति के साथ एक संग पण पर साये नहीं यदि पल पर जाय भी. कि तो सो रहे या फरयट फिर जाये, अगर पति मुख चुम्दै ती फट गाल पोछ हाले। पतिके मित्रों से शत्रुता.रखना और पति कैसाहू तसे पाहे परन्तु वह नराजाही रहे । स्त्रीणां वैराग्य हेतु। कार्पण्यादतिमानरोगविरहायोगादिपारुप्यतो मा- लिन्यासममज्ञतादिभयतःशोकाद्दरिद्रादपि । भर्तृणान्त- नुतादिभिश्चयपुपःकाठिन्यतःशङ्कना दोपााँचवृथाप्रया- न्तिवनितावैराग्यमुच्चैःसदा ॥ निम्नलिखित कारणों से प्रायः स्त्रियां उदाशीम धनी रहती हैं-जैसे अत्यन्त कृपणता से ( पति के अधिक सूम होने से स्त्री उदास रहती) मति मान (जादा प्यार करने से ऐसी घमपिछन हो जाती हैं कि हमेशा सानहीं मटका रहता है) पति के रोगी मने रहने प्रथया व्यापार पुनपार्थ रहित होनेसे असम-त् समानतामे नात्पर्य यह कि स्त्री पुरुष उमरमें, पौवन में, फुल प्रादिम परस्पर बराबर न है। पति की मूर्खता, (भयंतः) सास ससुरंज्येष्ठ और पति धिक्ष हरसे भी लियां उदाशीन रहती हैं श्रीक में, दरिद्रता सें, पति का देश अत्यन्त दुमला, हडीला, तथा अत्यन्त कौर होने से, अत्यन्त शङ्का युत रहने से, और व्यभिचारादि मिथ्या देष लागानेसे'रत्यादि कारणों से स्त्रियों में मन में पुरुष की भोर से गिरकता उत्पन होतो ". स्त्री के बिगड़ने का लक्षण । पिटसंदननिवासःसङ्गतेःपुंश्चलीभिः प्रवसनमपिप- युर्वार्धकसेय॑ताचावसतिरथचपुंभिर्दुष्टशीलैरत्ववश्यम् क्षतिरपिनिजवृत्तयोपितानाशहेतुः ॥ .

- भारोग्यदर्पण। २६ स्त्रियां नीचे लिये हुये कारणों से प्रायः बिगड़ जाती हैं-सधंदा पिता के घर में रहना ( पिता के गृह में निहर और परदा रहित रहती हैं) दुष्ट. स्त्रियों के साप बैठना उठना, उनसे मित्रता रखना, उनके साथ मेले ठेले में जाना, पति के परदेश रहने से और उन पर किसी का दाम म रहने से, अथवा बुढ्ढे पति के होने से ( भला बतलाइये जो लोग अपने बुढ़ाई अवस्था में बाला के साथ विवाह करते हैं मुमकिन है कि यह घाला पतिप्रंता हो ? कभी नहीं । बुढ्ढों को चाहिये कि जादा तमरयाली विषयायों के माध विधाह करें) पति के अधिक ईप करने से, संपा ऐपास पुरुषों में बैठ कर हँसी दिलगी करने से निज वृत्ति के लॉप होने से स्त्रियां व्यभिचारिणी होती है। यह तो अक्सर देखने में आया है कि यदि पति रूपवती स्त्री किसी नीच कुल में अपया किसी गरीब के घर में होने से व्यभिचारिंगी हे जाती है। सम्भोग समय के भेष यह है। सातश्चन्दनलिप्ताङ्गःसुगन्धःसुमनोन्वितः । भुक्तवृष्या- सुवर्सनःसुवेषःसमलवृत्तः ॥ ताम्बूलवदनःपत्न्यामनुरक्तो- ऽधिकस्मरः । पुत्रार्थीपुरुषोनारी मुपेयाच्छयनेशुभे यह बात हमने दूसरे खग में भली प्रकार दिखला दिया है कि पुत्रा- र्थी पुरुष ब्रह्मचर्य से रह कर ऋतु माता स्वकीय स्त्री से सहयास करे। परन्तु उस समय कैसा घेष चाहिये से लिखते हैं (स्रोतः) सुगन्ध तेलादि शरीर में मर्दन करके स्वान किये हे।, चन्दन, कपूर, कस्तूरी मादि सुगन्ध द्रव्यों का लेपन और भतर लगाये है।, प्रसन्न चित्त, बाजीकर भोपों से वीर्य को धनवान और पुष्ट कर रहा है, सुवासित वस्त्र, आभूषण तथा पुष्यों को पारण कर मसालेदार पान का घोड़ा घाघ, अपनी मानन्द कादम्बिनी में अनुराग युन, कामोन्मत्त हो रहा है, ऐसा पुरुष पुत्र की उत्तमपला पर अपनी स्त्री के पास जाये। जितनाही मानन्द ॥

टतोयखण्ड । युत. कामवान हो ममल करेगावैमाही रूप यौवन, यल युद्धि तेजः सम्पन्न सन्तान उत्पन्न करेगा। - जिस प्र- गर्भाधान बिधिः। पद्यपि गर्भाधान की विधि दूसरे सपा के भारोग्यदर्पण में लियचुके है तथापि वैद्यक मत से इस स्थला में पाठकगणों के उपकारार्थ और भी लिखते हैं । गर्भाधान किसे कहते हैं (गर्भस्याउधान वीर्यस्थापनं स्थिरी करणं यस्मिन्येन पा कर्मणा तद्गर्भाधनम् ) गर्भ का धारण पाने गर्भाशय में योग्य का स्थापन करमा जिस कर्म से होता है उसे गर्भाधान कहते हैं जैसे बीज भार क्षेत्र उत्तम होने और विधिपूर्वक बीज के बोने और उसे उत्तम प्रकार शींचने से अनादि पदार्थ मोटे घने और धयान पैदा हो हैं उसी प्रकार उत्तम बलधाम ब्रह्मचारिणी स्त्री पुरुषों के सयोग से सन्तान भी उत्तमही होते हैं मार सोके साथ यह भी है कि स्त्री पुरुष कार की चिन्तना कर ठमी प्रकार सन्तान होगा। वृहत्संहिता में लिखा भी है "चितन भावयति दूरगताऽपियं स्त्री गर्भ विभर्ति सदृशं पुरुपसतस्य" मैथुगे के समय यद्यपि स्त्री दूर है परन्तु चित्त से निम पुरुष को चिन्तन करेगी उसीफे मदूश गर्भ धारण होगा, यही बात परक से भी सिद्ध होती है " पपत्ती तु मनः स्त्रियायजन्तुं व्रजेत तत्सदृशं प्रसूते" इससे सा. बित होता है कि स्त्री पुरुष और कन्या की कामना करें तद्रूप जन पदों का चिन्तन करने से वैसाही सन्तान उत्पन्न कर सके हैं इसीलिये रजोधर्म से जान करके स्त्री को प्रथम पतिही का दर्शन करना लिया है। उत्तम सन्तान करने की विधि, सुश्रुत से पदि सी ऐसी इच्छा करें कि मेरे श्रेष्ठ पराक्रम यन बुद्धि युत उज्या मिह के समान तेजस्वी सन्तान उत्पन्न हो तो रजोधर्म को चौथे दिन शुद्ध नान कर उस दिन में सात दिन पर्यन्त कुछ जवों को सहत पृत में मि. लाप पा जिम गौ के नोधे शे ऐसी श्वेत गो के दूध में मिजाय, चांदी . SH - भाग्यदर्पगा। अथवा कामे के पात्र में भर प्रातःकाल नित्य सेवन करे या पुराना साठी का चायल अथवा जी के पदार्थों को पूर्वोक्त गौ के दही. शहद और घृत अथवा दूधही के साथ भोजन करे, नित्यप्रति सुधासित जल से स्नान करे, केशर कपूर और सफेद चन्दन गुमाय के प्रर्फ में घोट माह में लेपन करे, सूय मुलायम सधेत यस्तं धारण करै, सुन्दर आसन पर बैठे. सुखद शेग पर शयन कर, मन्दर सधारी रथ जाहीपर चढ़के भथयों उत्तम तुरंग पर बढ़के साम सबेरे आरोग्यकर वायु का सेवन करें, काम, क्रोध लाभ, माह भारसम्र्य रहित रहे, उत्तम सजे हुये कमरे में रहे, हर समय बित्तके प्रमन्न रक्ले. सुन्दर, स्वरूपयान, चतुर और मीठी वचन बोलने वाली ऐसी सहेली नथवा दहलुइम पास रहै (शब्द) गान या मनाइर बोलने वाली चिड़ियों की भावान (स्पर्श) तकिया मादि. मुलायम पदार्थ बार- चार छूना ( रूप ) तस्मीर भादि देखना ( रस ) ताम्बूल अषया. कोई रस को चाटना ( गन्ध ) अंतर सूंघना इत्यादि सेवन करे, शान्तिशील एवं अनेक चिन्तनों से रहित हो सात दिन तक पति से भिन्न रहे, भा. ठये दिन शिर से स्नान कर पोहश शङ्गार कर वेदानुसार संस्कार कर पति के साथ प्रसंग करे निस्सन्देह उत्तम, बली विद्वान् गर्भ धारण क- रेगी। पुरुप को भी चाहिये । ततोपरान्हे पुमान्मासं ब्रह्मचारीसर्पिःस्निग्धः सर्पिः- क्षीराभ्यांशाल्योदनंभुक्ता ॥ एक महीने पर्यन्त प्रलपर्यव्रत धारण करनेवाला पुरुष सायंकाल को शरीर में घृत मर्दन करके सुगन्धित जल से स्नान कर घृत और दूधसे धनाया साठी चायल अषया पुराने चावलों का सीर भोजन करके स्त्री के पास जाये परन्तु स्त्री खोर न खाके तैल और तरद का भोजन फरै । नारीतैलेनमापैञ्चसमुपाचरेत् ॥ स्त्री, कालेतिल का तेल शोर उरद के पदार्थों को तपा (पित्तले) रुधिर के बढ़ानेवाले पदार्थों को भोजन करके पति के समीप जावे।

के तृतीय खण्ड । ३२ किस स स्थल में पाबात विचार करना बहुत जरूरी है कि स्त्री पुरुष भवस्या में सन्तानोत्पत्ति करें सो हम प्रा०० के दूसरे सपा में लिसके इस स्थल में धारभह के मत से फिर भी दिखाते हैं। पूर्णपोडशवर्षास्त्रीपूर्णविशेनसङ्गता। शुद्धगर्भाशयेमार्गे- रक्तेशुक्रेऽनिलेढदि, ॥ वीर्य्यवन्तंसुतंसूते ततोन्यूनान्दयोः पुनः। रोग्यल्पायुरधन्योवा गर्भोभवतिनैववा ॥ सोलह वर्ष की त्री, भीम वर्षको अवस्था वाले पुरुषके साप सा- यास करने से, शुद्ध गर्भाशय और गर्भाशय का मार्ग तथा रुधिर वीर्य पवन और हृदय होने से स्त्री बलवान पुत्र को उत्पन्न करती है परन्तु सुश्रुत में १६ वर्ष की स्त्री और २५ वर्ष के पुरुष इसके नीचे म- षस्था में गर्भाधान निषेध किया है। प्रय इसका इस स्थल में पाठकगणों को चेत कराना बहुत सचित है कि जब तक शरीर में कुछ भी रोग रहे. मैथुन कदापि न करे और पुत्रोत्पादनार्थ मैथुन करने की इच्छा तो स्वप्नमें भी न लावै क्योंकि.जैसे अग्नि के छोटीसी चिन्गारीपर फूसफास झालनेसे अमि प्रज्वलित हाती है वैसाही थोडासा भी शरीर में रोग रहनेसे यदि मैथुन करता वह गेग पंर्यत के सभाग महा और यवान है।जाता और रोगग्रस्त अवस्थामें पुत्रोत्पादनार्थ प्रसङ्ग करना तो सन्तान को मानो माजन्म के लिये रोग रूपी जेहल में डालना है इसलिये जातक शरीरको भारोग्य और वीर्य को सूव पुष्ट न देखे कदापि मैथुन न करे बाग्भट में लिखा भी है शुद्धशुक्रातैवस्वस्थं संरक्तमिथुनंमिथः स्नेहैःपुंसवनैः स्निग्धंसुद्धशीलिंतर्वस्तिकं ॥ जिस पुरुप का वीर्य और स्त्री का धार्तव (रज) शुद्ध है भौर शरीर में कुछ भी रोग नहीं है उस अवस्या में दोनों, परस्पर अनुराग युक्त (ज) फलघृत कल्याणघृत प्रादि ने होंसे देदको नियंकर, बमन वि. .

आरोग्यदर्पण। रचना द्वारा धातु को भी गाढ़ा एवं निग्धं कर सप पुत्रार्थ मैथुन करै । ऋतुदान का काल । ऋतुकालाभिगामीस्यात्स्वदारनिरतस्सदा । पर्ववर्ज- ब्रजेचैनां तद्वतारतिकाम्यया ॥ऋतुःस्वाभाविकात्रीणां- रात्रयः पोडशस्मृताः । चतुर्भिरितःसाईमहोभिः सद्वि- गर्हितः ॥ तासामाझाश्चतस्त्रस्तुनिन्दितैकादशीचया । त्रयोदशीचशेपा स्तुप्रशस्तादशरात्रयः ॥ मगुजी महाराज ने भी ऋतुदान के समय का विधार अपने ग्रन्थ में इस प्रकार लिखा है कि मनुष्य को पाहिये हमेसा ऋतुकाल में अपनी स्त्री के साथ समागम फरै सेयाय अपनी स्त्री के पर स्त्री गमन करने की इच्छा मन में भी न लावै और पुत्रोत्पादन करने वाला पुरुष पर्ष, तिथियों को जैसे अमावस्या चतुर्दशी गप्टमी आदि को छोड़के स्त्री के साथ रति कि- याकर स्त्रियों का स्वाभाधिक ऋतुकाल १६ रात्रि का है अर्थात् रजोद. र्शनके दिन से लेकर सोलह दिन तक ऋतुकाल कहा जाता है। उनमें से ४ रात्रि अर्थात् जिस दिन रजोधर्म है। उस दिन से लेकर ४ दिन तक प्र- म करना महा निन्दित है और जैमे चारं रात्रि निन्दित है वैसाही ग्या. रहवीं और तेरहवीं रात्रि भी गिन्दित है शेषरहे दश रात्रि येही रास्त्रियां प्रातुदान के लिये, श्रेष्ठ हैं। ...युग्मासुपुत्राजायन्ते स्त्रियोऽयुग्मासुरात्रिपु । तस्मा- युग्मासुपुत्रार्थी संविशेदा-बेस्त्रियम् ॥ पुमानपुंसाधिके- शुक्रेस्त्रीभवत्यधिकेस्त्रियाः । समेपुमान् स्त्रियौवा क्षीयोऽल्पेचविपर्जयः... ती०५ .. - हतीयवगड । पुत्रोत्पत्ति की इच्छा करनेवाले पुरुष युग्म रात्रि अर्थात् रजोर्शन से छठवीं आठवीं दशवीं और बारहवीं रात्रि इनरात्रियों में गर्भाधानकर उत्तरोत्तर रात्रि और भी श्रेष्ठ हैं अर्थात् जैसा छटयों रात्रि में गर्भाधान करने से बलिप्ठ पुत्र.उत्पन्न होगा उससे अधिक बलिष्ठ पाठवीं रात्रिमें ऋतुदान करने से होगा उससे भी घलिष्ट दशवीं रात्रि में होगा इमीप्र- कार उत्तरोत्तर श्रेष्ठ जानना । जिनको कन्या उत्पन्न करने की इच्छा हो रजोधर्म के पांचवीं, सातवीं, नथीं और ग्यारहयों रात्रि गर्भाधान करें और इसमें भी उत्तरोत्तर रात्रियों को श्रेष्ठ जागना चाहिये । पुरुष के प्र. धिक वीर्य होने से पुत्र और स्त्री के अधिक रज हेने से कन्या उत्पन्न होती है। यदि पुरुप के घीर्य और स्त्री के रज दोनो वरायर होतो लहका पैदा होगा तो नपुंसक और कन्या पन्ध्या होगी । क्षीणयीय॑ अथया मारप धीर्य से गर्भका न रहना अथवा रहकर भी गर्भ का गिरजाना होता सुश्रुत जी भी कहते हैं । एपूत्तरोत्तरंविद्या दायुरारोग्यमेवच । प्रजासौभाग्य- मैश्चर्य बलंचाभिगमात्फलं ॥ इस बात को हम दूसरे खगड में लिख चुके हैं फि रजोदर्श निवृत्ति होने में पुरुष स्त्री के साथ गमन कर सकता है से तीन दिन स्त्री वर्जित है। चौथे दिन से प्रसार का दिन गिना जाता है चतुर्थ रात्रि में गमन फरने से मायुप्मान् और प्रारोग्य लड़का पैदा होता है, अठवीं रात्रिमें गमन करने से निस्सन्देह पुत्र उत्पन्न होता है, साठवीं रात्रिमें सौभाग्य वान्, दशौं रात्रि में ऐश्वर्ययान, और बारहवीं रात्रि में गमन करने से बलवान् पुत्र उत्पन्न होता है इसी प्रकार कन्या की इच्छा करनेवाला विपम रात्रियों में गमन कर और उत्तर २ वही फल होगा। इसी विषय में घारगष्ट जी भी कहते हैं.॥ ऋतुस्तुद्वादशनिशः पूर्वास्त्रिनवनिन्दिताः । एका- दशीचयुग्मासुस्यात्पुत्रोऽन्यासुकन्यका ॥

भारोग्यदयंगा। ३५ अर्थात् रजोदर्शग से लेकर धारह रात्रि पर्यन्त स्त्री मंतुषती रहती हैं। अब इससे तीन ही दिन ऋतुपती रहती हैं यह गठन हो गयो । इसका मतलय यह है कि तीन दिन र श्राप अधिक रहता है उसमें गमन करना निषेधं लिखा है क्योंकि उस तीन रात्रियों में ग. मन करने से गर्भाधान के रहने के अलावा स्त्री के भगके रुधिरको गर्मी पुरुप के लिङ्ग द्वारा भीतर जा के रक्त के परमाणुओं को अत्यन्त उप्पाकर गमनागमन में बाधा डालती है और वीर्य को द्रवीभूत करती है वही गर्मी शिर में प्रवेश कर मनुष्य को बुद्धिहीन बलहीन कर देती है। रजो धर्मवाली से अत्यन्त प्रसङ्ग करने से मूत्रकृच्छ्, मूत्राघात, भगन्दर और मुपदन्श शादि असाध्य रोग उत्पन्न होते हैं इसलिये रजो धर्मपाली स्त्री के साथ कदापि गमम न करै ।। यह बात जो वैद्यक शास्त्र में लिखी है कि विपग रातियों में गमन करने से कन्या और सम गलियों में गमन करने से पुत्र उत्पन्न होता है और उसका कारण यह दिखाया है कि सम रात्रियों में स्त्री के रज कम रहता है और विषम रात्रियों में पुरुप के वीर्य कम रहता है परन्तु यह नहीं लिखा कि पपों कम रहते हैं ? मालूम होता है कि यह सय यात वैद्यवरों ने प्रग रग मादि कामशास्त्र द्वारा परीक्षा करके सिद्ध किया है। सन्तानार्थ मैथुनविधिः। पुत्रोत्पादग के अर्थ मैथुन करने की विधि वेद तथा प्रायुर्वेद में यहुत कुछ लिखी है सयिस्तार लिसने में इसका यहाभारी एक अन्य हो जायगा और पाजकल ऐसे विद्याहीन पल मिहीन लोग हो गये हैं चाहे गाजन्म पुत्र हीन रहैं परन्तु विधिपूर्वक मैथुन कभी न करेंगे। तथापि हम पाठक गयों के उपचारार्थ कुछ मैघुग की विधि लिखते हैं । स्त्री पु. रुप को चाहिये कि पूर्वोक्त रीत्यनुमार भादारादि फी से नियातही भाभूपण और सुगन्ध यामित यस्त्र धारण कर दश ग्यारह यजे . + टतोयखण्ड। नस अवस्था में मनुष्य को उचित है कि पुनः पूर्वोक्त लेखानुसार स्त्री गमग करै और गर्भ रहने पर गमन कदापि न करें। गर्भवती होने का लक्षण । तृप्तिर्गुरुत्वंस्फुरणंशुक्रास्रावानुबन्धनम् । हृदयस्प- न्दनंतन्द्रा तृड्ग्लानिर्लोमहर्पणम् ॥ गर्भ रहजाने का लक्षण बाग्महमें इस प्रकार लिखा । चित्तप्रसन्न, शरीर में कुछ भारीपन, फोसे का फरफना, वीर्य जो गर्भाशय, गया है उसका न बहना तथा रक्तस्त्राय भी न होना, कलेजा धक २ करमा, नेत्रों पर श्रालस्य, पियास, खानेपर मनका न, चलना और रोमांका खड़ाना इत्यादि लक्षण होने से जानना कि यह स्त्री गर्भवती होगई है । गर्भपुष्टकारक उपाय। लब्धगर्भायाश्चैतेष्वहःसुलक्ष्मणावटशुङ्गा सहदेवा- विश्वेदेवामन्यतमाक्षीरेणाभिप्लुत्यत्रीं श्चतुरोवापिविंदून्द- दात् दक्षिणेनाशापुढे पुत्रकामानतानिष्ठीवेत् ॥ जिस दिन गर्भधारण कियाही विशेषकर उसीदिन अथवा तीनदिन के भीतर लक्ष्मणा यूटी या घरगद का सुनगा (कोपल) या पीले की कगही या गुग्नसकरी अवघा सफेद फूल का बरियारा इनमें से कोई भी एफ मिल जाय जिस गौ के नीचे यशरा हो और दोनेांका एकाही रंगहो उसके दूध में पीस पुत्र की छा रखनेवाली गर्भवती अपने दहने नाशा में तीन या चार बून्द सिञ्चन करै त् नाश लेबै यदि वह गले में उतर भाये तो उसे यूके नहीं (दक्षिणे नागा पुढे) इस लेख से सिद्ध होता है कि कन्या उत्पन्न करने की इच्छुक गर्भवती बाग नाशापुट में सिचन करै पारा में लिखा है ( पुत्रार्थ दक्षिणेसिंघे द्वामेदुहित यांक्षया ) उपरोक्त लिसेठुये पौषधों में गर्भधारण के लिये लक्ष्मणा यूटी एक प्रधान नौषध ॥ पारोग्यदर्पगा। है प्रायः गयाजी.की.ओर पर्वतोपर तथा उत्तरीय पर्वतोंपर भी मिलती है । लक्ष्मणा का सत यन तुलसी के समान बड़ा और प्राकृतिमें भी वै. साही होता है सिर्फ भेद इतना है कि.लक्ष्मणा के पत्ते पर घुघु के रुधिर के समान लाल २ छोटे जायजा होते हैं, पुत्रोत्पन्न करने की शक्ति ईश्वर ने इसी को दी है “लक्ष्मया को उखाड़ने को शास्त्रों में इसप्रकार विधि लिखते हैं कि शरद ऋतु में जब लक्ष्मणा फल पुष्पसहित हेातो शनिवार के दिन सन्ध्या समय पवित्र होके उसके चारों ओर खैर की लकड़ी की धार कोले गाड़ धूप दीपादि से पूजन कर निमंत्रण करावै जिस समय हस्त मूल या पुष्य नक्षत्र के सूर्य हों उसदिन जाके जड़ी बूटी उखाहनेका प्रसिद्ध जो मन्त्र है उस मंत्र से उखाड़ लावै और पीछे फिर कर न देखे और ऊपर लिखे . नुसार उमके जह को में पीस-गर्भवती के नाक में सिञ्चन करें, गर्भा- धान के न रहने के बहुत से हेतु हैं उन्हें और उसके रहने के उपाय मा० द० के चतुर्थखगच में लिखेंगे । इस समय गर्भ के कुछ विकारों केो दिखलाते हैं। जो गर्भाधान विधिपूर्वक किया जाता है उसका फल एवंजातारूपवन्तः सत्ववन्तश्चिरायुपः । भवन्त्यूण- स्याभोक्तारः सत्पुत्राःपुत्रिणोहिताः ॥ 1 ,विधिपूर्यफ ऋतुदान करने से कन्या अथवा पुत्र उत्पन्न होता है ये रूपयान, सत्वगुणविशिष्ट पूर्णप्रायु पर्यन्त जीनेवाले, अपने बाहुबल से पैदा करके खानेवाले, और माता पिता को 'मुखदेनेवाले होते हैं और जो ऋतुदान अविधि किया जाता है यही गर्भ दापसहित होता है . र्यात गर्म का न रहमा, या रह कर गिरजाना, गर्भही में बालकोंफा मर जाना अपया लॅगहे लूले वेढा कुरूप नपुंसक सन्तानों का उत्पन्न होना इत्यादि इसलिये सुन्दर सन्तान उत्पान करने की इच्छा रखनेवाला भनिधि गर्भाधान कदापि न करे ।

टतौयावगड जोड़ा लड़का होने का कारण बीजेन्तरवायुनाभिन्ने वघोजेकुक्षिमानिते। यमा- वित्यभिधीयेते धर्मतरपुरःसरौ ॥ रज वीर्य दोनों मिलकर जिस समय गभाशयमें जाता है यदि वह भीतर के बायु से दो भाग हो के रह जाय तो दो लड़का एक साथ 3. त्पन्न होगा और वह भाग रज योर्य की ताकत या मिकदार कम होनेसे हुप्रा होता लड़के जन्मताही मरजायेंगे । यदि एक भाग पुष्ठ और दूसरा भाग अल्प होतो उसमें से एक लड़का जीवैगा और एफ मर जावेगा। अगर दोनों भाग पुष्ट होता दोनों जोधेंगे ऐसा यहुतेरों जगह देखने में भाया है यदि उभी रज बीर्य की भीतर की वायु विरल फुल विभाग न कर सकी हो कुछ धिभाग हुभा हो और कुछ एकही साथ मिला होतेदो लड़के होंगे परन्तु जुटे होंगे ऐसे नह के भी कभी २ देखने सुनने में भाते हैं। इसीप्रकार तीन घार बालम भी होते हैं, एकही साथ पुत्र कन्याओं का उत्पन्न होना रण वीर्य ,के नून्याधिक पर निर्भर है ॥ को यिल्ली शादि पशुओं के जो अनेक बच्चे पैदा होते हैं उसका कारण यही है गर्भाशय में यायु कर के रज बीर्य का विभाग होना। एकही समय कई सन्तान होने के पिपप में अनुमान से हमको यह जान पड़ता है कि इस कार्य सम्पादन करने में वायु स्वतंत्र नहीं है। क्योंकि यद्यपि संरली पड़े में धाधु है पान्तु उसमें घी सहत पारा आदि वस्तु एकबारगी भर देने से घायु निकल जाता है यदि उमीमें गेहूं चना आदि भर दाता अवश्य खाली भागों में वायु बना रहेगा इसी प्रकार गर्भाशय में बीर्य रज पूरा मात्रा एकही बार पाने में यायु निकल जाता है और चार्य रज यदि गर्भाशय में कईयार कर के घाने से बीच में घायु रह जाता है इसी से कई लड़के होते हैं और इसका मुख्य कारण वीर्ये का . विकार है।

धागग्यदर्पण नपुंसक सन्तान उत्पन्न होने का कारण । सुश्रुत जो पांध प्रकार के पण्ड (नपुंसक ) माता पिता के रज वीर्य दोष से उत्पन्न होने का दिखलाते हैं जैसे । पित्रोरत्यल्पत्रीर्य्यत्वादासेक्यः पुरुपोभवेत् । सशुक्र- प्राश्यलभतेध्वजोछायमसंशयम ॥ गर्भाधान के समय माता पिता के अधिक कम धीर्य होने के सबंध से जो गर्भाधान रहता है, उससे जो सन्तान उत्पन्न होता है. यह मा. सेक्य नामक नपुंमक कहाता है उसका लक्षण यह है कि युवाअवस्था में, दूसरे मनुष्य के प्रसंग करने से जो धीर्य पात है। उस बीर्य को वह मा. सेयप नामक नपुंसक महाणा करै तब उसका लिंग उठे । सौगन्धिक नपुंसक। यःपूर्तियोनौजायेतससौगन्धिकसज्ञितः। संयोनिशेक सोर्गन्धमाघ्रायलभतेवलम् ॥ . जिसे स्त्री के योनि से मयाद जाता है। उनके साथ संभोग करने से भी लेटका पैद है। वह सौगन्धित नामक नपुंसक कहाता है । जब संक यह किसी अन्य पुरुपके लिंग फेो भयया स्त्री के भग को न सूंघेगा तयतक उसका लिंग चैतन्य नहीं होगा। कुंम्भिक नपुंसक । स्वेगुदेब्रह्मचर्य्याद्यः स्त्रीपुपुंम्बत्प्रवर्तते । कुंभिका- सतुविज्ञेयाईयकट्टणुचापरम् ॥ जो मनुष्य पहले किसी पुरुष से अपनी गुदामंजन कराये उसमे उम का लिंग चैतन्य हो तर यह श्री के साथ प्रमंग करने लायक हो उसको कुंभिक नपुंमक कहते हैं और कोई इसका हैं कि पहले जो पुरुप अपने शिपिललिंग से स्त्री को गुदामंजन कर तो ६ '. मं इस प्रकार करते - ས तृतीयम्बण्डा (अधिक ब्रह्मचर्य रहने से जो मधुमकता होती है उसके दूर करने के यही उपाय है ) जय लिंग उत्थान हो तब स्त्री के साथ प्रसंग कर भागे ईयक नपुंसक का लक्षण मुनियेगा। कुंभिक नपुंसकके उत्पत्तिका कारण पन्यांतरों में इसप्रकार लिखे हैं। गर्भाधान के समय माता के विलोम | मैथुन और पिता के प्ररुपबीर्य के प्रभाव से कुंभिक नामक नपुंसके लकड़ा पैदा होता है एक प्राचार्य कहते है कि गर्भाधानके समय कम रवाली भारत के साथ अत्यन्त शिथिल बीर्यवाला पुरुष गमन करे और उस पुरुप से उस स्त्री की तृप्ति गर्षात् काम की शांति न हो पुनार अथवा दूसरे पुरुष के साथ मैथुन कराने की इच्छा बनी रहे और वह मैथुन नं होने पाये वीचाही में गर्भाधान रहजाय उससे जो सन्तान होगी वह 'कुंभिक नपुंसक होगा। ईर्ण्यक नपुंसक के लक्षण । दृष्ट्राव्यवायमन्येपांव्यवायेयःप्रवर्तते। ईर्ण्यकः सतु- विज्ञोयोदृग्योनिरयमीर्यकः ॥ ईपक नपुंसक उसे कहते हैं जो दूसरे मनुष्य को मैथुन करता देख कर भाप मैथुन करने को उद्यत हो भार जयतक अन्य पुरुष को मैथुन करता न देख लिंग कभी प्रसंग करने लायक न हो। ईथ्यंक पाय पस प्रकार जन्मता है कि गर्भाधान के समय स्त्री पुरुष किसी ऐसे कार्य में परायण हों जो सहने लायकं न हो शोकातुर हर्ष रहित मैथुन करने से जो पुत्र हो वह ईर्षक संज्ञक नपुंमक होगा। स्त्री चेष्टाफार पांचवां नपुंसक का लक्षण और स्त्री पए के लक्षण अर्थात् जिस कारण से स्त्री नपुंसक होती हैं दोनों का ऐतान्त मारोग्य. दर्पण के दूसरे खगष्ठ में लिख चुके हैं इस स्थल में हम यह दिखलाते हैं कि उपरोक्त नपुंसकों के बीर्य है या नहीं। भासेक्यश्वसुगन्धोचकुम्भीकश्चमेकस्तथा । सरेत- संस्त्वमीज्ञेयाप्रशुक्रःपंडसंज्ञितः ॥ अनयाबिंप्रकृत्यातु- तेपांशुक्रवहाःशिराः । हर्षात्स्फुटत्वमायान्तिध्वजोछा- यस्ततोभवेत् ॥

योनि सूंघमा, १ चांगग्यदर्पण। ४३ 'भासेप, सुगन्धी, कुंभीक, और ईमेक इन चारों पंहों में तो बीर्य हैं परन्तु पांचधांड जो स्त्री कीसी चेप्टावाला नपुंसक है जिसका लक्षण भादके २ खण्ड में लिख चुके हैं उममें वीर्य नहीं है यदि कोई संका करे फि अघ बीर्यवान है तो नपुंसक फैसे हुआ ? उसका मतलब दूसरे शोक से स्पष्ट हो जाता है । यद्यपि उक्त पंहों में भी वीर्य नहीं है तथापि ऊपर लिखे हुये चेष्टा करने से जैसे वीर्य भक्षण, गुदाभंजन और अन्य पुरुष का मैघुन देखने से शुक्रनाड़ी शिराहर्ष युक्त होकर फूलती है इसे भी लिंग घेताय हेाता है। यही नपुंसकता देष स्त्रियों में भी होता है । निकृष्ट गीत्पन्न। यदानायाबुपेयातांवृपस्यन्त्याकथञ्चन । मुञ्चतःशु- क्रमन्योन्यमनस्थिस्तत्रजायते ॥ जिस समय दो स्त्री अति कामातुर हे पुरुषके साथ मैथुम म फरा के दोनों आपस में मिल कर भग से भग मिलाय कर दोनों अपने २ रज को त्याग फरें उस अघस्या में यदि गर्भ रहजाय ते उस गर्भसे बिना हड्डी का लड़का पैदा होगा, उस लड़के का लक्षण यह होगा कि यह अपने हाथ पैर सकेल घटोर न सके अन्य कोई उसके हाप पैर को चाहे जिम ओर झुका दे रश नहीं होगा ऐसे बालक अवश्य कभी २ देखने में माये हेगे परन्तु जीते नहीं ॥ स्वप्न मैथुन से गर्भोत्पन्न । ऋतुस्नातातुयानारी स्वप्नेमैथुनमावहेत् । आर्त्तवं- वायुरादायकुक्षौगभंकरोतिहि ॥ मासिमासिविबर्द्धत ग- भिण्यागर्भलक्षणम्। कललंजायतेतस्यावर्जितंपैतृकैर्गुणैः॥ यह सब श्लोक मुश्रुत के शारीर स्यान के हैं। इसका अभिप्राय यह है (ऋतुस्नाता) जो स्त्री रजो धर्म से शुद्ध हुई और पुरुप से समाः गम न मा हो यदि यह सी रजोधर्म के चार दिन के बाद और बारह तृतीयग्वगड । तानम दिन के भीतर स्वप्न में मैथुन कर भोर,रज, स्खलित है। गाय ममय उमी रस.को वायु लेफर गर्भाशयमें स्थापन कर देता है। यह गर्भ भी गर्भिणी के समान महीना २ वढ़ता है और उसमे, करतल भी उत्पम्म होताहे. है परन्तु पिता के लक्षण रहित अर्थात जो लड़का पैदा होगा. वह एक मांस का पिएच समान होगा क्योंकि फलल उसी को, कहते हैं। सो अखाया और भी. पाप की से. अनेक प्रकारफे विझत स्वरुपयाले स्त्रियों के सन्तान उत्पन्न होते. हैं । जैमा फि सुश्रुत में लिया है । सर्पवृश्चिककूष्माण्डविकृताकृतयस्तये । गर्भस्त्वेवं- विधास्त्वतेज्ञेयापापकृताभृशम् ॥ सांप, बिच्छू, कुम्हड़े के समान मांस, फा लेघड़ा.ऐसे भयानक स्व- रूपयाले, तथा अत्यन्त खराध खराय अंग याले गर्भ, प्रसूता के पाप क. रने से होते हैं ॥ ... गूंगा आदि गर्भो के कारण। गर्भावातप्रकोपेणदौहृदेचावमानिते। भवेत्कुजः- कुणि पंगुर्मूकोमिरिमणएवच ॥ गंभाशय में वात के प्रकोप से और माता के दौहंद. अपंचार से अर्थात् गर्भाधान के बाद गर्भावस्था में घुरे आपरणों से गर्भ में यालक फुवष्ठा, टेढा, लंगड़ा, गूंगा और मिनन्मिन बोलनेवाली होता है। इस स्थल में यह सन्देह हो सक्ता है कि यदि माता पिताही के अपचार आदि दोषों के कारण गर्भ ग्रिगड़ता है तो पूर्व, संस्कार मानना सर्वचा भगत है-? सो ठीक नहीं है । मुश्रुत ही में लिख दिया है (भाषितापूर्व देहेषु इत्यादि तथा अशुभैश्चपुरारुतेः) तात्पर्य यह है कि पूर्व जन्म के लिपिकों से गर्भाशय में वायु दुष्ट होती है. गर्भ में बालक के मल मूत्र न करने का सबब घेशक यह सन्देह तो सभी को उत्पन्न हो सकता है कि जप गर्माशप में पालक की सम्पूर्ण इन्द्रियां बन गई. और जीय संयुक्त हुआ तो वह RE मल . " भारोग्यदपंगा। बालक; गर्भाशय में दिशा पेशाब क्यों नहीं करता ? गर्भ में भालक को. मूत्र न करने का कारण यह है...' ...मलाल्पत्वादयोगाचं वायोःपक्वाशयस्यच । वात- मूत्रपुरीपाणिनगर्भस्थःकरोतिहि ॥ गर्भ के भीतर बालक के शरीर में मल बहुत ही अल्प हानेसे और पक्षाशय में वायु के भी अत्यन्त कर्म हीन होने से यालके गर्भ में भल मूत्र और बात का परित्याग नहीं करता, इसी प्रकार गर्भस्य लिंक के न रोने का भी कारण समुना ॥ गर्भमें बालक के न रोने का सबब । जरायुणामुखेच्छन्नेकण्ठेचकफवेष्ठिते । वायोर्मा- र्गनिरोधाच्चनगर्भस्थःप्ररोदिति । निश्वासाच्छाससंक्षोभ- स्वप्नानगीधिगच्छति। मातुनिश्वसिताच्छाससंक्षोभस्व- मसम्भवान् ॥ गर्भाशय के मुख माच्छादित होने से और कंठक करके वेष्टित होने से एवं यायुका मार्ग के रहने से, गर्भफे भीतर बालक नहीं रोता और गर्भ के.भीतर गालफ का. श्वास लेना, होलमा तथा निद्रा आदि क्रिया माता के श्वासादि लेने से होती है, याने माता जी जो श्या- सादिक चेष्टा करती है वही गर्भस्य बालक भी करता है॥ पूर्व कर्नानुसार बुद्धि का होना। भावितापूर्वदेहे पुसततंशास्त्रबुद्धयः । भवन्तिसत्वभू- यिष्टापूर्वजातिस्मरानराः ॥ पूर्व जन्म में जिस मनुष्य का जिम यिप में अत्यन्त अभ्यास रहता है येही गुण वर्तमान शरीर में भी हेाते हैं। जैसे जिस मनुष्यको माला पूर्व देह में जिस विद्या करके विशेष तन्मय रही होगी यह मनुष्य यर्स- ४ टतोयरवगड.। मान देह में अवश्य उसी शास्त्र का जानने वाला होगा। रमी प्रकार चोरी, धूर्तता, लम्पटता प्रादि युरे कर्मीका अभ्यासी भी वर्तमान देश में तदुर्गुण विशिष्ट अवश्य होगा। पूर्व देह में जिनके सत्वगुण प्रधान घे वत्तमान देह में भी येसाही गुणवान होंगे, तथा व्यतीत जन्म जाति के स्मरण रखनेवाले भी होते हैं । गर्भाधाम स्थितिके पश्चात् जब तक स्त्री पुनः रजीयती देख न पड़े तब तक उसके साथ मैथुन न करे, ऐमा भनेक शास्त्रों में बचन मिलेंगे दूसरी बात यह है कि प्रथम २ जयतक कन्या ऋतुमती न हो उसके साथ भी गमन न करे और तु होने का समय जो सुश्रुत में लिखा है वही ठीक है। तद्वर्षाद्वादशात्कालेवर्तमानमसकपुनः । जरापक्कश- रीराणांयातिपंचाशतःक्षयं ॥; : भोजन से सिंचा. हुश्रा जो रम उससे उत्पन्न होनेवाला.रज (मा- सिफ रुधिर) यारह वर्ष के उपरान्त प्रगट होकर जैसे शरीर में रसादि पढ़कर शरीर बढ़ता है तैसे २ रज भी घढ़कर महीने महीने योनिद्वारा प्रवत होता है और जब पचास वर्ष से कपर की अवस्था प्रारम्भ होती है तब युढ़ापा होने के कारण फ्रमशः रजनप्त होने लगता है और ६० वर्ष की अवस्था होते २ बिलकुल नष्ट हो जाता है। इस स्थल में यह वचन देने का हमारा मतलब यह है कि प्रथम २ मासिक रक्त स्त्रियों को बहुत कम होता है, यहां तक कि कितनी धर्मवती हो जाती हैं और रक्त नहीं देख पषता, कई महीनों के बाद कुछ २ मालूम होने लगता है। इस अवस्था में भी मैथुन करना नहीं चाहिये, क्योंकि गर्भ रहजाने से बालक का जन्म प्रति कष्टं से होता है इसलिये, जबतक सूपं खुलासा मासिक होना.प्रारम्भ न हो सन्तानार्थ मैथुन कदापि न करे, इसीलिये ऋषियों ने १६ वर्ष की अवस्था वालो स्त्री के साथ सन्तानार्थ मैथुन रने को लिखा ॥ अदृष्ट मासिक लक्षण । पीतप्रसन्नवदनांप्रक्लिन्नात्ममुखद्विजां.। नरकामां- पारीग्यदर्पगा। प्रियकथांसस्तकुक्ष्यक्षिमूर्द्वजांस स्फुरलुजस्तनश्रोणिनास्यू- रुजघनस्फिज। हौत्सुक्यपरांचापिविदनादृतुमतीस्त्रियम् जो स्त्री ऋतुमती होजाय और रतस्त्राव न हो उसके लक्षण सुश्रुत में इसप्रकार लिखे हैं । जिस स्त्री का मुख पीस ( यह पीतमुख कान्ति विशेष में जानना ) प्रसनतायुक्त हो एवं आत्म ( देह ) मुख, और दांत रमीलेहों ( नरकाम प्रिय कथा ) मैथुन सम्बन्धी धात अच्छी लगती हों कोख मांख और बाल विकसित याने कुछ फैले हों. माहु लासी कमर नाभि पिटरी जांघ. और धूत जिसके फरकें एवं प्रमंग कराने की प्र. त्यन्त इच्छा होती हो तो जानना यह स्त्री ऋतुगती हुई है परन्तु रक्त की पासपता के कारण यह नहीं देख पड़ता। व्यतीत ऋतु में मैथुन निष्फल है। नियतंदिवसेतातेसंकुचत्यम्बुजंयथा । ऋतीव्य- तीतेनार्यास्तु योनिःसंब्रियतेतथा ॥ जैसे फूला हुमा कमल अपने नियत समय में पहुंच कर संकुचित याने सिकुष्ट जाता है वैसाही ऋतु के व्यवीन होने पर भर्षात् रजोधर्म होने के १६ दिन याद स्त्री की योनि ( गर्भस्थान ) संकुचित होजाती है । उस अवस्था में मेधुन करना निष्फल है पोंकि बीर्य गर्भाशय में नही जाता। गर्भवती होने के पश्चात जो लक्षण होते हैं. पुत्र पुत्रो और नपुंसक प्रहचाम, गर्भिणी स्त्री के उपचार अपांत् गर्भयुक्त स्त्रियों को किस प्रकार रहना चाहिये । गर्भ के भीतर कीन महीने में बालक के कौन अप्रत्यात यनते हैं इन सबों को आगे प्रकाश करेंगे । इस समय इम इम यात के दिखलाते हैं कि गर्भवती के दुःख होने से यही दुःख भीतर गर्भगत पाल को होता है लिखा भी है। दोपामिघातैगर्भिण्यायोयोभागःप्रपोड्यते । सस- भागःशिशोस्वस्यागर्भस्थस्यप्रपोड्यते ॥ गर्भ रहने .

४८ -- तीयवाडा • यात पित्तादि दोपों करके कोई किस्म की धिमारी गर्भिणी को हो और उसे शीघ्र शांतन, किया जाय ता.वही रोग यालक का होगा याने बातादि दोष से तथा लकड़ी आदि के प्रहार से गर्भिणी का जो २ प्रङ्ग. दुःखित होता है वहीं अङ्ग गर्भ में रहने वाले बालक का पीडित होता है। इसलिये गर्भिणी स्त्री को मारना या किसी प्रकार का शोक देना, कदापि न चाहिये और जब गर्भिणी दोहदनी होजाती है उस समय स्त्री को अनेक प्रकार के सुख के द्वारा प्रसन्न रखना आयुर्वेद की सम्मति है। दीदनी उस स्त्री को कहते हैं जिसके गर्भ में ४ महीने का वालक होता है ४ महीने में गर्भस्थित बालक के जीय प्रगट होता है इससे शब्द स्पर्श रूप रस गंध इन विषयों में बालक का मन चालता है और गर्भ के बालक का जो हृदय है यह मावन है इसलिये चतुर्मास के ऊपर वानी गर्भिणी, स्त्री दीद वाली कहोती है इस से गर्मिणी का हृदय मन्तप्त छाने से गर्भ में जो बालक होता है उसका भी. उदय सन्तप्त होता है। इसलिये गर्भवती स्त्री का मनोर्थ पूर्ण न करना बहुत बुरा । सुश्रुत जी कहते भी हैं। दौहृदविमानात्कुब्जंकुणिंखजंजड़ बामविकृता- क्षमनवानारीसुर्तजनयति । तस्मात्सायदादिच्छेत्तत्त दस्यैदापयेत्” । लब्धदौहृदाहिंबीर्यवन्तचिरायुपम्पुत्र- जनयति ॥ जागर स्त्री की ,दोहदेवा (दोहद की इका) परिपूर्ण न होवै तो यह स्त्री फुडग, लूला, नपुंसफ, वीना ( ५२ श्रङ्गुल का लम्या मनुष्य ) ऐचीताना नेत्रवाला और अनेक रूप रङ्ग रोगयाले आदि ऐसे बालक नपान करती है। इसलिये चाहिये कि गर्भवती स्त्री जिस २ बात. की, इछा कर ( परन्तु यह इच्छो अत्याचारी न हो ) उसे अवश्य पूर्ण कर देना चाहिये क्योंकि जिस. गर्भवती स्त्री की इच्छा पूर्ण होती है यह, स्त्री वीर्यवान और दीर्घ उमर वाला सन्तान को पैदा करती है। इन्द्रियार्थोस्तुयान्यानसाभोक्तुमिच्छतिगर्भिणी । गर्भावाधभयात्तांस्ताभिपगाहृत्यदापयेत् ॥ साप्राप्नदी- दै ०४६ पारोग्यदर्पण। हृदापुत्रंजनयेतगुणान्वितं । अलब्धदौहृदागर्भलभेतात्म- निवाभयम् येपुयेष्विन्द्रियार्थेपुदौहृदेवैविमानता। प्रजा- येतसुतस्यार्तिस्तस्मिन्स्तस्मिन्स्तथेन्द्रिये ।। .. गर्भवती स्त्री के रन्द्रिय कोजोजो प्रिय हो, जैसे गान सुनना, उत्तमर गहना यस्त्र पहरने की इच्छा, दिव्य मूर्त्यादिकों का देखना, स्वादिक द्रव्यों | का भोजन, सुगंध द्रव्य का सूंघना, बन सपयन आदि स्थानों में हवाखाना आदि, जिस बात की इच्छा प्रगट हो उसके घरवालों को चाहिये कि भयंश्य पूर्ण करें, बल्कि गर्भवती स्त्री से पूंछते रहैं कि प्रोजकले उसकी तापयंत किस यात को अधिक चाहती है. उसे पूर्ण करै क्योंकि गर्भवतीफे इछानुमार सुख न मिलने से निस्सन्देह गर्भ की विरुति हो जाती है और इसा पूर्ण होने से गर्भवती उत्तम प्रकार में सन्तान को प्रसव करती है और अलब्ध दोहदा गर्भवती के गर्भ को अथवा उसके सुदही शरीर को है॥ शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध यह पांच विषय है और उक्त पांचों बि. पयों के भोग करनेवाली पांच इन्द्रियां हैं कान, त्वचा, नेत्र, जीम और नाक । भगर गर्भयती स्त्री को जो इन्द्रिय अपने विषय को चाहे और यह न मिले तो गर्भस्थित यालक की भी उसी इन्द्रिय को पीड़ा होगी। जैसे गर्भवतीको गान सुनने की इच्छा हो और वह न सुने तो गान (शब्द) के चाहनेवाला कान है, यह कर्ण न क्षप्ति होने से गर्भगत यालकके काम को दुःख होगा उसी प्रकार सय इन्द्रियों को समझना । दोहदकेद्वारा सन्तान के लक्षण । सुश्रुत गरीस्थान अध्याय ॥ ३ ॥ राजसन्दर्शनेयस्यादौहृदोजायतेखियाः । अर्थवन्तं- महाभागं कुमारसाप्रसृयते ॥७॥ दुकूलपट्टकौशेयभूपणादि पुदौहृदात् । अलङ्कापिणंपुत्रंललितंसाप्रसूयते ॥२॥ आश्र- भय रहता 1. -- ती --- H वतीयखण्ड। -मसंयतात्मानं. धर्मशीलंप्रसूयते । देवताप्रतिमायान्तुप्र- -सूतेपार्षदीपमं ॥३॥ दर्शनेव्यालजातीनांहिंसाशीलंप्रसूयते। गोधामांसाऽशनेपुत्रं सुपुप्तंधारणात्मकम् ॥४॥ गवांमांसे- चवलिनंसर्वक्लेशसहन्तथा । माहिपेदौहृदाच्छूरंरक्ताक्षलो- मसंयुतम् ॥ ५॥ जिस स्त्री की का राजा के देखनेको हो वह स्त्री धनयान और पुरपधान पुत्रको उत्पन्न करेगी ॥१॥ जो गर्भवती की इच्छा उत्तम २ मूतवस्त्र अथवा रेशमी वस्त्र (पीताम्बर श्रादि) पहरनेको होतो वह निस्सन्देह ऐसे रूपवान् पुत्र को उत्पन्न करेगी जो उत्तम २ आभूषण और बस्त्रको धारण करनेवाला हो ॥२॥ जिस स्त्री को महात्मा ऋषियों के स्थान देखने की हा.हा अथवा पवित्र देव स्थान में रहने की इच्छा हो यह धर्मज्ञ स. त्यवादी, दूदप्रति सन्तान को उत्पन्न करेंगी ॥ ३॥ अगर गर्भवती स्त्री को शेर चीता आदि हिंसक जानवरों को देखने का मन हो तो निस्स- देह वह स्त्री दुष्ट प्रतिवाला हिंसक वालक पैदाकरेगी। यदि गोह के मांस (गाह बिलखपट्टा वा साष्टाके प्राकार एकप्रकारका बड़ा जानवर है) खाने की इच्छा प्रगट करें तो वह स्त्री अनि हठी भऔर बहुत सेानेवाला वालक उत्पन्न फरैगी ॥४॥ गो मांस खाने की इच्छा करनेवाली स्त्री सेक्ष और कठिन दुःखों को भी सहनेवाला ऐसा पुत्र, तथा भैंस के मांस के खाने की इच्छुक स्त्री किसी से न हरनेवाला महा शूरवीर, जिस के नेत्र भयङ्कर लाल २ और समस्त शरीर में बाल हों ऐसे पुत्र को उत्पन्न करेगी। इसी प्रकार अनेक खाने पीने के वस्तुओं पर गर्भिणी स्त्री के मन चलने से वैसाही रंग बिरंग के स्वरूप, प्रकृति, और चाल चलनका पुत्र पैदा होता है, जिस्का सविस्तार वर्णन करने में बहामारी ग्रन्य हो जा. गा, मायुर्वेद विद्या के जाननेवाले इतनेही से अनुभव करसके हैं। वाराहमांसात्स्वप्नालुंशूरंसजनयेत्सुतं । मार्गाद्विक्रा- न्तजंघालंसंदायनचरंसुतं ।

पारे।ग्यदर्पण। जो दो हृदयवाली सी बनशुअर का मांस खाने की इच्छा - भंगट कर (इच्छा प्रगट करनेसे मतलय है वारंवार उसी बस्तुकी: वासना धनी. रहै) तो स्त्री अधिक सोनेवाला पहा शूरवीर जारणसे विमुख महा ऐसे- रणधीर पुत्र को निस्सन्देह उत्पन्न करेगी। उस वाक्यों से-जान पड़ता है: 'कि मांस खानेका प्रचार र-पूर्व में भी अधिक पा । भौर जो गर्भवती स्त्री 'चलने फिरने की इच्छा अधिक रखती हो वह बहुत चलनेवाला और हमेशा बममें घूमनेवाला पुत्र को पैदा करेगी। इसी प्रकार यारहसींगा के गांस की इच्छुक, चञ्चस चित्तवाला और तीतर का मांस चाहनेवाली- 'स्त्री'हरपोक बालकको उत्पन्न करेगी। यद्यपि इस स्थल में इसवातको नहीं: लिखा कि मांस खानेकी इच्छा करनेवाली किन जातिकी स्त्रियां हैं लेकिन यह जाना जाता है कि शूद्र की स्त्रियां अवश्य मांस खाती थीं बहुत सी; लियां गर्भावस्था में मट्टी खपरा आदि चीजें खाती हैं और उन्हीं चीजों पर उनका सदैव मन रहता है इसी से घे स्त्रियां फुरुप, दुर्वल, दरिद्र, पांडुरोगी, और जिस के पेट में फेघुये हो जांय ऐसा सन्तान उत्पात करती है। हममें सन्देह नहीं कि माता अपने गर्भिस्थित पालक पर अपने मानमिक विचार द्वारा बहुत कुछ अरछा बुरा प्रभाव उत्पन्न कर सकी है, यह तो स्पप्टही है कि गर्मिणियों के चित्त में अकस्मात् भय शोकादि छग होने से शीघही गर्भपात हो जाता है, या चालकको अत्यन्त क्रश होता और इस क्शका लक्षण उस बालक के उत्पन्न होने पर प्रत्यक्ष होनाता है । आत्म विद्या के एक बहेभारी विद्वान घोयोहाइम साहय अमेरिका ने दौदिमी के विषय में कई बातें प्रत्यक्ष देख करके लिखा है कि एक सी जय उमफा ३ मास का गर्भ था अचामफ एक जंगली रोक या को देखकर बहुत डर गई, उसको मन्तिम परिणाम यह हुमा कि उसके गर्भ से पायला लड़का पैदा हुमा और समान होने पर रोके समान रोलता पा वह लड़का,१४ वर्ष संक जिया । घोस्टन नगर में एक गर्मयती खी अचानक एक तोते से गई -- .

-- 1 तृतीयखण्ड। का ध्यान जिस २.पर पड़ेगा बालक का कोई न कोई ना उमौके समान होगा । जैसे मैथुन के समय स्त्री जिम पुरुष को ध्यान में लांचे बालक रूप रंग में उसी के समान होगा, यहां तक कि कोई व्यभिचारिणी उप पंति के साथै व्यभिचार करते समय अपने पतिका ध्यान कर तो बालक उसी के सर्दूश होगा मानो उसका औरम जात बालक नहीं है। यही कारण बालकों के मसे, लक्षण, कालेदाग प्रत्यादि का भी थे और उक्त महाशय एक कारण अधिक कामादि का भी कहते हैं। लड़को को विकृताकार तथा पद मूरत होने का कारण माता की अनेक वस्तुओं पर ध्यान देने का है. गर्भिणियों को चाहिये कि यदमूरत मनुष्यों को ध्यान देकर न देखें और अंदृश्य वस्तुओं पर इरछा न मंगंट करें। कदाचित् देख भी पढ़ें तो उनको ख्याल में न लाईं और सदी खूबसूरत तस्वीरें देखा करें। अस्वाभाविक जन्म का कारण । यह भी ईश्वरेस्छा से स्त्री पुरुष के सांसारिक और स्वाभाविक नियम उल्लंघन करने का पाप फ़ल रूप है । यह फल स्वाभाविक रूपसे. उत्पन्न हुये बालक पर होता है. क्योंकि विद्वजनों का मत है कि माता. पिता के पुण्य या पाप का भागी,उनका, सन्तान होता है। बालक का बदसूरत भङ्ग भंग का होना मैथुन की आधिपता और न्यूनतापर, नि: भैरहै जैसे कि मैथुनको आधिपता से हाथ पैर में उंगलियों का अधिक, होना और मैथुन की न्यूनता से एक हाथ या दोनों हाथोंका न होना भपषा उंगलियों का कम होना इत्यादि। स्त्री के प्रति विरुद्ध मैथुन कराने से अक्त्तर अस्वाभाविक मालक उत्पन्न होता है । सन् १६०३ ईस्वी में रङ्गलेण्ड देश में एक ऐसा.बालक उत्पन्न बुना था जिसका शिर से कमर तक शरीर मनुष्याकार था और कमर से पैर तक सलोम फूकुर के समान था। विद्वानों के अनुसन्धान करने से जाना गया कि उस स्त्री ने कूकुर के साथ मैथुन कराया था। .

५५ पागग्यदपंगा । एक स्त्री के विषय में लिखा है कि उसने मैथुन के समय, अधिक ध्यान से एक हवसी की तस्वीर देखी थी उसका बालक ठीक हपसी के समान हुभा॥ 'इङ्गलैपह के दूसरा राजा हेनरी के राज्य में एक स्त्री के लड़का हुआ जिसके दो शिर, दो मुख, चार हाथ, चार पांव दोनों शरीर पीटके तरफ जुड़े थे, बात करने के समय दोनों मुख एक साथ बात करते थे।और दोनों मुख से एकसाथही हँसते और रोते भी थे; यह लड़का कई वर्ष तक जीता. रहा लेकिन उनमें से एक 'तीन वर्ष के बाद मरगया और दूसरा कई दिन तक उस मृतक देहको लेकर जीता.रहा लेकिन उसके बोझसे और मृतक शरीर की दुर्गन्ध से यह भी मरगया ॥ सफक नामक एक नगर में एक गर्भिणी स्त्री के मुख पर मांसके एक बिन्दु रक्त के पड़ने से उत्पन्न बालक को देखा गया कि उसके मुख पर एक मसा है । पाठकगण को उपरोक्त लेखोंसे अवश्य मालूम हुमा होगा कि अच्छे और बुरे रूपं, स्वभाव के बालक का उत्पन्न हामा माता के ध्यान पर निर्भर है यदि उत्तग सन्तान उत्पन्न करने की इच्छा हो तर दोहदानियों के मनोर्थ को अवश्य पूर्ण करै । क्योंकि दो हृदयघाली ग- भिंगी के इच्छा पूर्ण न करने से अथवा न्यून अधिक मैथुन करने से जो सः न्तान होगा यदि यह विकृतम्यरूप न होगा तो आलसी बल विद्या बुद्धि हीन अवश्य होगा। इसके पश्चात् हम सुश्रुत से यह दिखलाते हैं कि गर्भगत यालक के कोन २ महीने में कौन २ बनते हैं । मासभेद से अङ्ग का बनना । तत्रप्रथमेमासिकललंजायते । द्वितीयेशीतोप्मानि- लैरभिप्रपच्यमानानां महाभूतानांसंघातीधनःसञ्जायते ॥ तृतीयेहस्तपादशिरसा: पञ्चपिण्डकानिवर्तन्ते ऽङ्गप्रत्यङ्ग- विभागश्चसूक्ष्मोभवति ॥..

५६ . । हतोयखण्ड। भावार्थ: :-जब स्त्री के गर्भाशय में गर्भ रहता है तो पहले महीने में पुरुष का वीर्य और स्त्री का रक्त दानों, समूर्छित हो कफ रूप कनल (पिण्डाकार) अवस्था को प्राप्त होता है। दूसरे महीने में शीत ( क ) गरमी (पित्त) और वायु इन्हीं से विपक्क पञ्च महाभूतों का शुक शोणि- तालक जो समूह वह. कुछ पना हो जाता। तीसरे महीने में दो हाय, दो पांच; शिर यह पांच पिण्ड एकही समय में पैदा होते हैं सिर्फःपिंडा कारही नहीं बल्कि उसके महीन'२ अङ्ग प्रत्यङ्ग भी उत्पन्न हो जाते हैं। जैसे हाथ पैर और शिर यह भ है और पैरों की उंगलियां तथा शिर के नाफ कान मोठ श्रादि प्रत्या कहाते हैं। गर्भगत बालक के जितने अंग होते हैं उनमें से कोई माता के अंग से और कोई पिता अग से उत्पन्न होते हैं। चतुर्थेसर्वाङ्गप्रत्यङ्गविभागः प्रव्यक्ततरोभवति । जो तीसरे महीने मे सूक्ष्म अङ्ग प्रत्या उत्पन्न हुये वे सब. चतुर्प महीने में अलग २ हो जाते हैं और इसी चौथे महीने में बालकका हृदय बनताह इसीसे गर्भिणी स्त्री चौथेमहीने में दाइंदयवाली कहातोहे परंतु चरक का मत है कि तीसरेही महीने में गर्भिणी स्त्री दोहदिनी होजाती है और घरक महराज चतुर्थ मास का वर्णन इस प्रकार करते हैं , चतुर्धमासेस्थिरत्वमापदाते गर्भस्तस्मात्तदागर्भिणी गुरुगात्रत्वमापद्यते॥ चौधे महीने में गर्भगत बालक (स्थिर) पुष्ट होता है इसी सवय से चौधे मास में गर्भवती को शरीर भारी हो जाती है । पञ्चमेमनःप्रतिबुद्धितरंभवति । पष्ठेबुद्धिः । सप्तमें- सर्वाङ्गप्रत्यङ्गविभागःप्रव्यक्ततरः ॥ पांचवें महीने में गर्भगत बालकका मन प्रर्थात् चेतना उत्पन्न होती

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हीयखराड।
लगते हैं। इसी प्रकार गर्भको भी उत्पत्ति समझिये, गर्भमें सप भययय
एकही साथ उत्पन्न होते है। परन्तु अत्यन्त मूक्ष्म होने के कारण देख
नहीं पड़ते जयं बड़े और मोटे हो जाते हैं .. सय अलग २ मालूम होने
लंगसे हैं।
वालक के शरीरमें कौन वस्तु माटज अर्थात् माता से
और कौन बस्तु पितृज अर्थात् पिता से उत्पन्न हैं
उसे प्रकाश करते हैं।
पितृज--गर्भस्यकेश्मयुलोमास्थि नखदन्तसिरा-
सायुधमनीरेतः प्रभृतीनिस्थिराणिपितृजानि ॥
माटज--मांसशोणितमेदोमज्जाहृन्नाभियकृत् प्ली-
हान्चंगुदप्रभृतीनिमूदूनिमावजानि ॥
पिता के अंश से बालक के शरीर में शिरके याल. डाढ़ी, मूल, रोग,
नख, दांत, छोटे नभ, बड़े नस, सब से बड़े नस, और वीर्य यह उत्पन्न
होते हैं, माता अंश से गर्भ में यालक के गांस, पीये, रक्त, पर्यो, मज्जा,
उदय, नाभि, पिलही, मांत और मलाशय मादि नरम पदार्थ उत्पन्न
होते हैं।
रसात्मजन्य पदार्थ।
शरीरोचलंवर्णःस्थितिहाँनिश्चरसजानि । इन्द्रिया-
णिज्ञानविज्ञानमायुः सुखदुःखादिकज्जात्मजानि ॥
रस की ताकत गर्भगत बालक के शरीर की वृद्धि, बल, स्वरूप
और स्थिति अर्थात गर्भ का वृहरजाना और हानि मर्यात गर्भ का न
उपरना' यह भी रसही से प्रगट होते हैं । तपा नेत्र कर्ण आदि इन्द्री,
धान विज्ञान (यूक्ष्म पदार्थजाम), बायुः सुख दुःख मादि यह सब आत्मा
से सत्पात्र छाते हैं।

. , . पाराग्यदर्पगा। गर्भमें पुत्र कन्या और नपुन्सक सन्तान होने की पहिचान । यत्रयस्यादक्षिणस्तने प्रापयोदर्शनंभवति दक्षिणा- क्षिमहत्वञ्चपूर्वदक्षिणंसकथिउत्कपतिबाहुल्याच्च पुन्ना- ममध्येयेपुद्रव्येपुदौहृदमभिध्यायति स्वमेपुचोपलभते प- नोत्पलकुमुदामातकादीनि पुन्नामान्येव प्रसन्नमुखवर्णा- चभवतितांब्रूयात् पुत्रमियंजनयिष्यतीति तद्विपर्ययेक न्याम् ॥ जिस गर्भिणी स्त्री के दाहिने छाती में प्रथम दूध देख पड़े, तथा दाहिनी आंख कुछ बड़ी मालूम हो, एवं दहना जांघ गर्भके भारसे कुछ वटा सा जान पहे और जितने पुरुप संज्ञका द्रव्य हैं जैसे आम, केला, भामरूद, जनार अपवा घोड़ा हाथी भादि जीवों में अभिलाप हे तथा में सफेद कमल, लाल कमल, कुमोदनी और मावड़ा प्रादि पुलिस फल देखे एवं जिसका मुख सर्वदा प्रसन्न चमकीलाग्द तो कहना कि यह पुत्र पैदा करेगी और उपरोक्त बातें सय उलटी होता जानना किस स्त्री के गर्भ से कन्या उत्पन्न होगी। मारमहजी तमा मिशेष कहते हैं "पूर्वतत्पार्थ वेष्टनी" और लक्षणों के अलावा जिस स्त्री के गर्भ में पुत्र है वह स्त्री की सम्पूर्ण चेष्टा दक्षिण तर्फ रहे याने घलेती पहले दहिना पैर उठावे, माने में भी मायः दहने करपद सावै । इमसे सस्टी चेष्टा में गर्भगत कन्या जानना चाहिये। नपुन्सक यस्या पार्श्वद्वयमुन्नतं पुरस्तान्निर्गतमुदरं प्रागभि- हितलक्षणच तस्यानपुन्सकमितिविक्षात् ॥. शिस गर्भधती की दोनों को संधीसे मालूमहों और मागेको मोर वाधक पुष्प गर्भ के लक्षण।

हतौयखण्ड। पेट बराबर साधिक दस्तूर हो और जो अपर लष्ठको लड़का होने का लक्षण लिखे हैं वे न मिलते हो तो जानना को इस स्त्रो के पेट में नपुंसक बालक है। यस्यामध्येनिम्नद्रोणोप्रभूतसुन्दर सायुग्मंप्रसूयतइति ॥ जिम गर्भिणी स्त्री का पेट बीच में कुछ साली सा पड़ जाय जैसे जल का पात्र और चारों तर्फ ऊंचे हो तो जानना कि इसके पेट में जोड़ा लड़का है॥ डाकृरीमतानुसार गर्भ का लक्षण । इस स्थल में हम संक्षेप से कुछ डायरी मत से भी गर्भगत भालक के लक्षणों को प्रकाश करते हैं । पुरुषका शुद्ध योर्य और स्त्री का रज जय गर्भाशय में जमता है तो यही बारह तेरह दिंग के बाद रक्त का एक गोला सा बन जाता है, और उसी गोले में कुछ दिन बाद प्रथम दिल बनता है और उसी गोलेमें सम्पूर्ण नसे महीन सूत के समान चारो तर्फ फैल जाती है। बाद उसके शिर बनता है और वालक के हाथ पैर नाफ मुह प्रादि स्थानों के सथ नमैं तैयार ऐॉ. जाती हैं। यदि यही पिण्ठ पुत्र है तो तीम दिन में जितने अङ्ग प्रत्यग है सव बन जाते हैं । अगर वही पिरतु कन्या की है तो वेही सव मा प्रत्यंग पैंतालिम दिनमें बनेंगे। चौथे महीने में लड़का हो चाहे लतको वाल नख आदि सय निकल पाते । मातये महीने का पैदा हुआ यालक जीता भी है परन्तु माठवें महीने 'को जला बालक अयश्य मर जाता है उसको सवय यही दिखलाया है कि ताकत स्थिर नहीं रहती. नवें और दशवे का जन्मा हुमा बालक जीता है। गर्भ में लड़का लड़की होने.को पहिचान । स्त्री के गर्भ में लहका रहने से पेट दहने तर्फ फूना रहता है लेकिन यह भी बहुत अधिक नहीं कम फूला. रहता है और वे स्त्री प्रायः - चारोग्यदर्पगा। दहिना हाथ जमीन में टेककर उठती है और चलने में भी अक्सर दहि- मा पैर उठता है । गर्भ में पुत्र के रहने से स्त्रियों के दहनी छाती कही और कुछ मुर्ख हो जाती है। प्रांख की पुनली के नीचे दी सपोदी है उसमें जो होरे रहते हैं दहिने तर्फ नीले होजाते हैं और नसे. देस पहने लगती हैं । कन्या गर्भ में रहने से उपरोक्त सय लक्षणों को नहलाटा सग. कना जैसे पेट का बायें तर्फ फूलना और अधिक फूला रहना और अक्तर यायां हाथ जमीन में टेक कर उठना, यांई छाती का कहा हाना थोड़ी ललाई लिये नेत्र के होरे यायें तर्फ गीले हो जाने इत्यादि । ग्रीस देश निवासी पुस्टाटल नामक फिलासफर कहते हैं कि यह घात हमने कई भरतवें श्राजमाया है और बहुत सत्य है। गर्भवती स्त्री की छाती से दूध निकाल पानी में डाल दे अगर दूध पानी के नीचे वैमाही बैठ जाय जरा भी न फैले तो जानना कि इसके पेट में लड़का है अगर यह दूध पानी पर उतराने लगे या पानी के ऊपर फैलजाय तो जामना कि गर्भ में कन्या है और यह बात तो प्रायः देखने में आई है कि लड़का पैदा होने में माता कोश कम देता है लड़की में अधिक ॥ गर्भवती स्त्री के त्याजकर्म । भावप्रकाश से। अतिव्यवायमायासं भारंप्रावरणंगुरूं । अकालजा- गरस्वप्नकठिनोत्कटकासनम् ॥ शोकक्रोधभयोद्वेग वेग- श्रद्धाविधारणम् । उपवासाध्वतीक्ष्णीष्ण गविष्टंभिभा- जनम् ॥ रक्तनिवसनंश्वभ्रकूपेक्षामदामामिपं । उत्तान- शयनयच्चस्त्रियोनेच्छन्तितत्त्यजेत् ॥तयारक्तसतिशुद्धि वस्तिमाभासतोऽष्टमात् । एभिर्गर्भःवदामः कुक्षीशुण्या- भ्रियेतवा ॥ यस प्रकरणा, अधिक मेहनत करना, मारी बोझ का उठाना, दिगम माना रातको जागना या समय से न साना, कुरुबैठना, गथया टतोयखण्ड। बहुत देर तक पेठे रहना, जादा रख करना, शोक करना, हरना या हरले के स्थान में जाना मनमें ग्लानि लाना, दिशा पेशाम लगा है और हवा छुटता हो उसे रोकठेगा, उपवास करमा, और दूर तक पैदल चलना • तेल, मिर्चा, खटाई, अचार, सिरका, आदितीक्ष्ण, देर हजम, और कड करनेवाले पदार्थों का भोजन, लाल अस्त्रों का पहनना महार, धावली और कुर्ये का साफना, शराब पीना, मांस खाना, हमेसा. वित्त सामा) इत्यादि कुपथ्य गर्भिणी स्त्री को चाहिये किं त्यांग करे क्योंकि वक्त प्रा. घरणों से प्रायः गर्भ गिर जाता है । तथा फस्त खोलाना, जुलाय लेना, दवा खा के बमन करना और पाठवें महीने के भीतर यस्ति फर्म अर्थात् पिचकारी मे गुदा मार्ग द्वारा मलाशय में दवा पहुंचाना (लाठये महीने में स्तिकर्म फरमा लिखा है) इसके अलावा भी जो स्त्री कईयार लड़का बन चुकी है और उसके जो अनुभव किये हुये पथ्य हैं उनकी भी शिक्षा को मानना गर्भिणियों के लिये हित है। ऊपर लिसे हुये कुपथ्यों के फरने में गर्भ गिरजाता या गर्भही में यालक मरजाता है इसलिये गधि- शियों को पथ्य से रहना चाहिये। इस स्थल में स्त्रियों के कुछ उन रोगों का बयान करते हैं जिसके समय से गर्भ नहीं रहता जैसे योनिरोग, प्रदररोग, भातंबरोग भादि । जिसमें हम प्रथम योनिरोग को कहते हैं। स्त्रियों के योनि (भग) बीस प्रकार का रोग होता है। * हमारे इस देश को मूर्खा स्त्रियां पूरे गर्भ धारण किये दो दो चार पार कोस पैदल गइ। नहाने दोड़ो जाती हैं, गर्भावस्था को फोन कर सोपर गै भो एसादभो ऐतवार का व्रत करतो हैं जव इन कुपथ्यों में गर्भ गिरजाता है पथवा बानक उत्पन्न हुप्रा मरगया ते घर को पोर मरे हुये पित्रों का दोष देती हैं। लाल वस्त्रों के ललाई को चमक मेत्रों के हारा भीतर जा के बालको नेत्र को गरम करता है इसोशिये समस्त बमकोकी चीजें गभिगो स्तियों को देवना मना किया है। -- . भाग्यदर्पण। योनिरोग। विंशतियोनिरोगास्युर्वातपित्तकफादपि । सन्नि- पाताच्चरक्ताच्च लोहिताक्षयतस्तथा ॥ शुष्काचवामिनी चैव पण्डीचांतर्मुखीतथा । सूचीमुखीविप्लुताचजातघ्नी- चपरिप्लुता ॥ उपप्लुताप्राक्चरणा महायोनिककर्णिका। स्यानन्दाचातिचरणा योनिरोगाइतीरिताः॥ स्त्रियों के योनि में बीस प्रकार का रोग होता है उनके नाम यह हैं। बतजा, पिता, कफना, सनिपातजा, रकमा लेाहिताक्षया, शुष्का, चामिनी, पगडी, नन्तर्मुखी, सूचीमुखी, विमुता, जासनी, परिप्लस उपमुता, प्राचरणा, महायोनिक, फर्णिका, नन्दा, गौर अतिधरणा यही २० रोग हैं। सुश्रुत आदि ग्रन्थों के मत से भी योनिरोग लिखते हैं क्योंकि नाग में शाईधर से और अन्य ग्रन्थों से कुछ भेद है। मुश्रुतादि में निरोग के नाम इस प्रकारसे लिखते हैं चि उदाता १ बंध्या २ धिनुता ई परि. नुत्ता और घातला यह पांयरोग यायु दोष से होते हैं । लेाहिताक्षरा १ प्रस्न सिनी २ यामिनी ३ पुत्रनी और पित्तला यप पांच रोग पित दोप से होते हैं। अत्यानन्दा १ फर्णिनी २ घरणा ३ प्रतिघरणी ४ कला यह पांच रूपा दोष से उत्पन्न होते हैं। पाठी १ अगिनी २ पहली मूधियात्रा ४ और त्रिदोपता यह पांच सन्निपात अर्थात् तीनों दोषों से है। इससे उत्पत्ति का कारण मुगुनमें इस प्रकार लिखा है:- विंशतियापदीयोनेनिर्दिष्टारोगसंग्रहे मिथ्याचार- णतास्त्रीणांप्रदुष्टेनातवेनच ॥ जायन्तेवीर्यदीपाच्चदेवा- चवणु ता:पृथक् ॥ मिथ्याचार अर्थात् झूमकन खाना प्रति मिन्टुं मौजा जमे गरम मिजाज है और गर्मही भोजन करना, मिथ्याविहार में दिन राम -- तीयखण्ड । मैथुनही करना इत्यादि कारणों से.मासिक धर्म का रू गरम हो यो. निरोग उत्पन्न होता है और माता पिता के बीर्य दोष से जिस कन्या का जन्म हुआ है उसे भी प्रायः योनिरोग हो जाता है। उदावृत्ता-जिस स्त्री के मासिक धर्म अति कष्ट से हेग, पेहू में पीड़ा रक्त का गांठ गिरे तो जानना कि उदात्ता है। बन्ध्या-जिसका मासिक धर्म शुद्ध और ठीक समय में न हो उसमें गर्माधान नहीं रहता। विप्लुता-योनिरोग में, योनि के भीतर हमेशा एक प्रकारका दर्द बना रहता है। परिप्लुता-योनिरोग में मेधुनके समय योनिके भीतर अधिक पीड़ा होती है। बातला योनिरीग में मासिक रत रुक्ष हो जाने से जैसे कोई सुई छेदे ऐसा दर्द हो । यद्यपि उपरोक्त धारो योनिरोगों में भी पायु का कोप है तथापि बातला योनिरोग में दर्द अधिक होता है। लोहिताक्षरा-जिस योनि के द्वारा गरम २ लाहू दाह सहित जारी हो उसे लोहिताक्षरा कहते हैं । वामिनी-जिस स्त्री को योनि पुरुष के मैथुन के वाद पुरुप के लिङ्ग द्वारा गिरा हुमा वीर्य और पात हुना स्त्री की रज दोनों को बाहर निकाल दे उसे यामिनी योनिरोग कहते हैं । संसिनी-जिस स्त्री की यामि अधिक देर मैथुन के होने से, या लिंग की रंगढ़ से बाहर निकल आधै घाह न मिनी योगि है, ऐसी स्त्री के गर्भ रहजाने से सन्तान बड़े मुस्किल से होता है । पुन्नन्नी-(दूसरा नाम जातनी) निस, स्त्री के मासिक रक्त गर्म तृतीयखण्ड महती -उम योनि को कहते हैं जो यहत फैली रहे यह भी रोग है। सूचिवक्ता-जिस योनि को छिद्र बहुत छोटी हो वह स्त्रो सिर्फ मून त्याग तो करमकै परन्तु मैथुन न फरासकै यह मूचिवका योनि कहाती है। यद्यपि ऊपर कहे हुये चारो योनिरोग यातादि दोष से हैं तथापि जिस योनि रोग में तीनों दोषों के लक्षण पाये जाय वह सक्षिपातजा योनिरोग कहाता है। योनिकन्द रोग। दिवास्वप्नादतिक्रोधाद्व्यायामादतिमैथुनात् । क्षता- चनखदन्तादौर्वातादाःकुपितायतः ॥ पूयशोणितसंकाशं लकुचाकृतिसन्निभं । जनयन्तियदायोनौनान्नाकन्दस्स- योनिजः ।। अत्यन्त दिन के माने से, अत्यन्त गुस्से में बने रहने से, बहुत.अधिक मेहनत कसरत करने से, दिन रास मैथुन करानेसे, योनि के छिलनानेसे और नख दांत भादिके लगनेसे, ( यदि कोई कहैि कि भगमें नरसे चोट' लगना तो कोई शफ की यात नहीं है क्योंकि मैथुनके पूर्व अक्तर विषयी गण घण्टों उसे अंगुलियों से टटोलते रहते हैं पर दांत कैसे लग सका है? यह भी कोई शंका नहीं है यहुत से ऐसे विषयी निकलेंगे जो भग को जीभा और दांतों से घाटते है । यहां एक गांव में घड़े रईश थे उनकी यह पादत थी कि जय तक भग के भीतर जीभ डालकर सरे घंटे दो घंटे सूय न चा लिङ्ग प्रभङ्ग लायफ न हो) जो भग के भीतर घायहो उससे यातादि दोष स्वप्रकृत्यानुमार कुपित होफे योनिके भीतर पीव और रक दोनों को समेट, बहछत के फल के प्राकार ग्रन्थि ( गांठ ) सत्पन्न करता है उसे योनिकन्द रोग कहते हैं। यह योनिकन्द वाताधिष्प से रुग्णा और फटा सा, पित्त से ललाई लिये दाहयुक्त जिसके तकलीफ मे ज्वरही फफसे खाजयुक्त गोलवर्ण का और जिसमें तीनों दोषोंके लक्षण मिले उसे सजि. पात से योनिकन्द जानना ।। क ला आरोग्यदर्पण। योनि रोग की चिकित्सा। योनि रोग की चिकित्सा साधारण प्रकार से जो अजमूदा है मुश्रुत संहिता, चक्रदत्त और अनार कामशास्त्र प्रादि ग्रन्थों के भतसे लिखते हैं जो सर्व साधारण अपने काम में रूपर कहे हुये योनिरोगों में कई रोग हैं जो असाध्य हैं परन्तु चिकित्सा सय की हो सक्ती है और कईयार पाराम देते हुये भी देखे गये हैं । प्रायः योनिरोग की दवाइयां इसप्रकार होती हैं, जैसे योनि में बफारा देना, तेल में रूई का फोहा तर करके योनि के भीतर रखना, गोली या यत्ती घना के योनि में रखना, पिचकारी देना, दवाइयों का पानी पना के भग को धोना इत्यादि और दवा भी खाने को दिया जाता है। जिस योगिरोग में खजुरी बहुत हो और मैथुन करने में गाय की जीभ सरीखी खरखरी मालूम होती हो तो उस रोग में हरदी, दारु- हरदी, और भटकटैया का फूल इन तीनों चीजों को बराबर घजम ले पानी में महीन पीस लुगदी पनाय योनि में रक्खे और उन्हीं दवाइयों की धुनी दे इसीप्रकार कई दिन करने से प्राराम होता है । बात करके जितने प्रकार के योनिरोग हैं उनमें गुरघ, त्रिफला और दातूनि की जड़ तीनों चीजों का काढ़ा बना के उसीसे योनि को धोना और तगर भटकटैया का फल, कूट, सेंधानान और देवदारु इन सब औषधों को एक २ छटांक ले कुचल फर ५ सेर पानी में काढ़ा बनावै जय एक सेर पानी रह जाय मलकर छाम डे और कढ़ाई में एक पाय झाले तिल का तेल हाल नसीमें उक्त काढ़े को छोड़ मन्दाग्नि से पचालेवै जब पानी जलजाप तेल मात्र रहमाप शीतलकर छानलेय उसी तेलका फाहा बार योनि में रक्खे इसी प्रकार 'जय तक रोग समूल नष्ट न श घरापर. फोहा रखता जाये। पित्तदोष से जितने प्रकारके योनिरोग हैं उन सयों में गरम उपचार कभी न करना चाहिये 1 शीतल दवाईयों को लेप, तथा धाना, और टतोयखण्ड । फोहा आदि रखना अत्यन्त फायदा करता है, उसी प्रनार कफ दूषित योनि में शीतल उपचार न करके गरम उपचार करने से जाम ऐसा है जैसे पीपर, मिर्च, उरद, सैफ, फूट और सेंधानान एम सब औधों को फूट पानी में पीस अंगुष्ठ प्रमाण पत्ती बनायं छायामें मुखायलेय। उस यतो हो योनि में रखने से कफ सम्बन्धी योनिरोग अवश्य आराम देता है। योनिरोग पर धातक्यादि तैल, चरकसे । धातक्यामलकीपत्रस्रोतोजमधुकोत्पलैः । जंव्वाम- मध्यकासीसलोध्रकटफलतेन्दुकैः ॥ सौराष्ट्रिदाडिमत्वग- उदुम्बरशलादुभिः। अक्षमात्रैरजामूत्रेक्षीरेचद्विगुणंपचेत् ॥ तैलप्रस्थपिचुतस्मात्योनौचप्रणयेत्ततः । कटीएष्ठत्रिका- भ्यंगस्नेहबस्तिचदापयेत् । पिच्छलस्रावणीयोनिर्विपलु- तोपप्लुतातथा.। उत्तानाचोन्नताशूना सिद्ध्येत्सस्फोट- शूलिनी ॥ घवपत्र, पावले के पत्र, कमलपत्र, कालासुरमा, मुठेठी, जामुन और माम की गुठली, कौसीश, लेोध, कायफल, तेंदू का फल या छाय, फिट. फिरी, अनार का छाल और गूलर के कपचे फल इन दवाइयों को सवा २ | ताला ले सब को कूट कर 5 एस मेर मढ़ाई पाय धरी के मूत्र में पीस लुगदी कर एक सेर कालेतिल का तेल कढ़ाई में डाल उसी में लुग- दी और जितना मफरी का मूत्र है उतनाही गौका दूध भी उसी में हाल. कर धीमी आंच से पकालेवै जब दूध वगैरह जल जाय तेल अकेला रह जाय अग्नि से उतार शीतल कर बोतल में भर के रखदेवै । इस तेल का | फोहा योनि में रखने से तथा पीठ, कमर, पीठ की रीढ़ में इस तेल के मालिस करने से और इसी की पिचकारी योनि में देने से निस्सन्देह योनि से पीच का यहना, योनि का मूजन और घाय तथा विप्लता, उपलता, उत्ताना आदि योनिरोग प्रति दर्द सहित भी श्राराम होता है। इस तेल के दवाइयों का तौल भाषा में ग्लोफ से कुछ फरक हे पाठकगण संदेह न करें।

आरोग्यदर्पण। चूहे का मांस तेल में पका के उसका फोहा योनि में धरने से प्र. थवा मूसे के मांस के भरता में सेंधा नोन मिला के भग में रखने से निस्सन्देह योन्यर्श और योनिकन्द रोग माराम होता है लेकिन जयतक रोग समूल नष्ट न हो घराबर उसका फोहा रखता जावै। महता योनि की चिकित्सा। मदनफल मधूक कर्पूर प्रपूरितं कामिनी जनस्य । चिरगलित यौवनस्य च बरांगमति गाढंसुकुमारं ॥ मैनफल, मुलेठी, और कपूर तीनों को महीन पीस तंजेब के कपड़े में पोटरी बनाय भग के भीतर रखने से अतिफैली तथा ढीली योनि संकुचित और सुकुमार हो जाती है । मासिक धर्म की चिकित्सा। यद्यपि इस रोग होने का कारण ऊपर लिख चुके हैं तथापि मुठ स्थल में इतना कहना जरूरी है कि स्त्रियों के माहवारी का धन्द हे जाना और भी बहुत से कारण हैं-जैसे अत्यन्तं गरम प्रकृति होने के सयब मासिक सूम का सूखजाना उसका लक्षण यह हेगा कि शरीर दुयला, शरीर में गरमी मालूम होना और भी जो सून कमी के लक्षण हैं वह भी पाये जाते हैं। चाहिये कि ऐसी अवस्था में पुष्ट और रक्त घईक औषधियां खिला के तम मासिक खोलने की चेष्टा करे। किसी को अति ठंढक पहुंच कर खून गाढ़ा होके जम जाता है इससे भी मा- -सिक रुक जाता है, किसी को योनि में पाय होके मघाद सूख जाता है उस्से या योनि के रंगों के मुख यन्द हो जाने से भी मासिक धर्म का ाना बन्द हो जाता है और किसी २ को अधिक मोटेपन से रुधिर निकलने के रास्ते धन्द हो जाते हैं। उक्त कारणों को और प्रकृति को अशी तरह देख भाल के चिकित्सा करना वैद्य को उचित है ॥ इक्ष्वाकुवीजदन्तीचलागुड़मदनफली कण्वयष्टवाहः। सांस्नुकक्षोरैवर्तिोनिगता कुसुमसंजनो॥ - - वतीयरवगड। ७२ कहुई तूम्यो के योज, अवाण गोटे के वृक्ष को 'गष्ठ की छाल, यही पीपर, पुरानागुए, मैनफल, दारू का कोट (मराव सिंघ जाने के बाद जो कीट नीचे सेग में जम जाता: ६). और मुलेठी इग मच घी महीन पीस के दूध में घोट उँगुलिया के घरायर यती वना के छाया में मुपाय लेप । इस यत्ती की योनि में रसने से अनाय रोग अर्थात् मासिक धर्म का न होना भाराम होके स्त्री महीने २ ऋतुमती होने लगती है। मालकांगुनी, राई, विजयमार लकड़ी, दुधियायच, इन सय प्रोपों को फूट कपड़छान कर तीन २ मासा की पुडिया बना ले शाम सवेरे १ पुरिया मुख में रप गीतल जलसे उतार जाये इस प्रकार पांघ मात दिन दवा खानेसे मासिक धर्म होने लगता है। अगर इस चूर्ण को भी खिलाये और योनि में पूर्वोक्त बाती रदखे तो बहुत शीघ्र फायदा ऐवै परन्तु यह चूर्ण गरम प्रकृति वाली को फायदा नहीं करता । गरम मिजान योली को सून पढ़ाने की घेप्टा करै और योनि में उक्त पत्ती को रपये । जिम. स्त्री के मासिक धर्म नहीं होता उसे गित्य मछली कालातिल, उरद और सिरका श्रादि खाना फायदा करता है । योनिशूल की दवा। पिचुमन्दरसेनमित्रितैः पिचुमन्दानिलशत्रुत्रीजकैः । घटितांबटिकांभगान्तरे भगशूलप्रशमायधारयेत् । नीय को नियेली और रेसी के बीज दानों को नींय के पत्तों के रसों में सूर्य महीन घोट फर धावला के समान गोली बनाय ले. इस गोली केो योनि के भीतर रखने से योनि का दर्द बहुतं शीघ्र नाराम होता है । इसी प्रकार इन्द्रायण को जड़ और शेठि पुन दोनों को सूप | महीन पीस बकरी के घी में घोट योगिमें लेप करनेसे योनि का दर्द तत्काल जाता रहता है। परन्तु जिस स्त्री के योनि में दर्द, गरमी मुनाफ धादि के कारण से होगा उसमें फायदा नहीं करेगा।

७३ भारोग्यदर्पण। वन्ध्या चिकित्सा। ऊपर कहे हुये योनिरोग में, और सात प्रकारके योनिफूलमें जो रोग होते है जिसके लक्षणा मारोग्य दर्पण के दूसरे खण्ड में लिख चुके हैं उन | रागों में गर्भ नहीं रहता, तपा माता पिता के अत्यन्य बीर्य कमजोर हो जागेसे भी गर्भ स्थित नहीं होता, इन सब बातों का विचार करके बन्ध्या की चिकित्सा करना उत्तम है क्योंकि जब तक योनिरोग आदि भारामन होगा गर्भस्थित होना अति दुष्कर है। रनावली में यध्या की चिकित्सा इस प्रकार लिखी है। काथेनहयगन्यायाःसाधितंसघृतपयः । ऋतुस्नाता- बलांपीत्वागर्भधत्तनसंशयः ॥ पिप्पलीटङ्गवेरचमरिचं. नागकेशरं । घृतेनसहपातव्यंवन्ध्यापिलभतेसुतम् ॥ दो तोला नागौरी असगन्ध को गौके दूधमें पीस लुगदी बनाय एक पाय गो का दूध और एक तोला गो के घृत में पकाय ले बाद उस दूध को कपड़े में छान कर ऋतुस्नान करके चौथे दिन यदि स्त्री पिये तो मिश्वप गर्भधारण करे। इसीप्रकार छोटी पीपर, सोंठ, मिरच और नाग. केशर इनका ६ मासा चूर्ण घी के साथ ऋतुस्नान के चौथे दिन चाटने से यन्ध्या भी सन्तान उत्पन्न करै । गर्भस्थिति के लिये वैद्यक शास्त्र में और मी अनेक दवाइयां हैं जैसे सामघृत, फलघृत सादि जिसका कि वर्णन मा० द० के दूसरे खगष्ट में कर चुका हूं कि जो घृत, स्त्री पुरुष दोनों के दूपित वीर्य को शुद्ध करके विद्वान तथा यलधान गर्भ को प्राप्त करता है। दत्तात्रयों में लिखा है कि तीन प्रकार की संध्या देती हैं "जन्मबंध्या काकवन्ध्या मृतवत्सा प कधिरित्रयः" एक जन्मग्रन्ध्या जिसके कमी गर्भ स्थित न हुभा हो, दूसरी कायन्ध्या जिसके एक सन्तान होके फिर गर्भाधान न रहे, तीसरी मृत बन्ध्या मर्यास् लड़के हों और मरजावें । और रसको चिकित्सा भी अनेक प्रकार की लिखी हैं अन्य अधिक बढ़जाने के समय से नहीं लिखते हैं। लेकिन गर्भ का न रहना मुख्य वीर्य दोष है ०१ करके . सायखण्ड। हमने कई बार स्त्री पुरंप के रज बोयं की परीक्षा करके वीर्य राद्ध भीष खिलाया है गर्भ अवश्य रहा है और पूर्ण गार में मुग्दर मगतान उत्पामा है। . : . पुरुष के वीर्य की परीक्षा इसप्रकारसे करे एक फूलके फटेारे में थोड़ा उष्णमल भर देय और उसी में पुरुष अपने वीर्य को हालै यदि वीर्य एकबारगी. जसके भीतर पलाजाय, तो जानना कि यह पौर्य गर्भाधाग करने लायक है और मौर्य बूंद २ करके पानी पर उतराने लगे या पानी पर फैल जाप तो जानना कि यह बीर्य गर्भाधान नहीं कर सकता। यदि वीर्य न पानी के भीतरही लाय और न ऊपर उतरावे पानी के बीच में जाके टरजाये तो जाना कि इस वीर्य से गर्गाधान होगा परन्तु सन्तान नहीं जियेगा। पसीप्रकार रश की परीक्षा कर एक गमले में थोड़े से सेना के पक्ष लगा दे और, स्त्री से उस वृक्ष की त में पेशाय फरावे यदि वृक्ष मुरमा नाये तो जानना कि इसका रण शुद्ध नहीं है शोर एस जप के तस यो रहें तो जानमा रज शुद्ध है। जब देखें कि पुरुष के बीर्य में दोष है तो नीचे लिखी हुई सीपध खिलाये जाम तक बीर्य शुद्ध न हो। सफेद मूसली बम्बई की, तालमखाना का बीज, योजयन्द, गुलमफरी, कामरान, मखाना भौर सेमरकर मूसहा इन सातों चीजों को घरायर भाग ले फूट परछान कर ः २ मासा को पुष्टिया पनाप ठेप, सामसधेरै एक्ष पुष्पिा मुख में रख पाय भर गी के दूध में २ तोला मिश्री और आधा ताला गो का घी हाल के पी जाये इसीप्रकार जय ता उत्तम बलवान घीयं न हो दया घराघर साता जाये और तेण मिर्चा खटाई सराय मांस सो प्रसङ्ग मादि से पहर करे। लीकरण शुद्ध करने के लिये यह दवा खिलाये। नागौरी असगन्ध, पच्याहींगताधर एक २ छटांक, यधूल का गोंद ३ तोला, छोटी लायची र तोला सब चीजों को महीन पीस फपर छान करलेय इसकी मात्रा ३ मामा एक ताला तक है पांम सयो देशनों समय गो के दूध से दवा खावेज तसर एनम हो और मद्यमांसादि गरम भोजन, और शोक कोष, " भारोग्यदर्पण। ७५ पुरुष. समागम प्रादि से पहरेम कर.जब देसे शि रज पीय दामों सूप शुद्ध । पूर्योक शिधिके अनुमार गर्भाधानकर गिस्सन्देह सन्तान सत्पन्न होगा। प्रदर रोग का निदान । , स्त्रियों के योनि के द्वारा रत, अथवा धातु का लामा प्रदर रोग सहाता है. और प्रायः यह रोग ऐसे २ कुपथ्यों से होता है-जैसे प्रति के विरुद्ध अधिक सस्था गरम भाशा करना, शराय पीमा, खाने पर तुरत फिर, खागा, कच्चे गर्भ का गिरजामा, मति मैथुन करना, सवारी पर चढ़ , के. अपघा पैदल यात घूमना, मधिक शोध और उपधाम म. पोत व्रतों का रहमा, असहन यो का उठामा, मधिक चोटसे पीड़ित 'हाना इत्यादि कारणों से पासादि दोय करके चार प्रकार का प्रदररोग होता है। असग्दरंभवेत्सर्वं सांगमदसवेदनम् । तस्यातिवृद्धो- दौर्बल्यं नमोभू मदस्तुपा । दाहाप्रलापःपांडुत्वं तन्द्रा- रोगाश्चवातजा ॥ इसका सामान्य रूप यह है मिचारी प्रकार के प्रदररोग में शरीर ऐउता है और सफीफ पीड़ा होती है। प्रदररोग के पहुत बढ़ जाने से शरीर दुयला हो जाता , बिना मेहमत किये शरीर पपीसी मालूमहो यह माना कि लेटे रहो फुछ फाम फाण मात करो, गिरमें पुमरी भोर मेन में गरमी मालूम होना, पियास की गाविषयता शरीर में जलग, जी फा चमडागा, शरीर की रंगत पीलाई और सफेदी भायल, मेत्रों पर पकी मीर भी यायु से अनेक उपद्रय थे जाते हैं । वातादि भेद से लक्षण । आमंसपिच्छाप्रतिमंसपांडु पुलाकतोयप्रतिमंकफा- तु। सपीतनीलासितरक्तमुणं पित्तार्तियुक्तंभूशवेगि- पित्तात् ॥ रुक्षारुणंफेनिलमरुपमल्पं यातातियातात्पिशि तोदकामम् । सक्षौद्रसर्पिहरिताठवणं मज्जाप्रकाशंकुणपं 1 तृतीयखण्ड। त्रिदोपम् ॥ तच्चाप्यसाध्यप्रवदन्तितंज्ञा न तत्रकुर्वीतभि- पक्चिकित्साम् ॥ गाधयनिदागसे यातादिभेदों करके लक्षण कहते हैं । जिस प्रदररोग में कफ का कोप होता है उममें योनि मे, प्रांव की तरह अथवा भातके मार के समान पोला सफेद मिश्रित रंग का या कादव धान के धोवन सरीसा धातु निकलता है। जिस प्रदर रोग में पित्त का कोप रहता है उसमें नीला, काला, पीला, लाल और प्रतिगाम पेट और हमें दर्द हो के योनि द्वारा लोह निकलता है। घायु दोष से प्रदर रोग में गुलाबी रंग का फेन सहित पोषा २ फमर और पेट में पीडाहोके अथवा मामले घोषन सरीखा योनि द्वारा घातु निकलता है और जिस प्रदर रोग में तीनों दोप मिले रहते हैं उसमें जैसे शहद और घी मिल जाने का रंग होता है उस रंग फा या हरताल के रंग के समान अथवा धरबी की भांति दुर्गन्धि सहित योनि के द्वारा घात का मवाद निकलता है यह असाध्य है सैकड़ों बार औषध खिला के परीक्षा लिया है कुछ फायदा नहीं ऐश्ता मिस्सन्देह विदेोप युक्त प्रदर रोगवाली स्त्री मर जाती है इसलिये युद्धिमान वैद्य उस प्रदर रोग को चिकित्सा न करे ।। सोमरोग का लक्षण । भावप्रकाश से। स्त्रीणामतिप्रसङ्गेन शोकाचचापित्रमादपि । अति- सारकयोगाद्वागरयोगात्तथैव च ॥ आपःसर्वशरीरस्थाः क्षुभ्यन्तिप्रसवन्तिच । तस्यास्ताःप्रच्युताःस्थानान्मूत्रमा- गैब्रजन्तिहि ॥ प्रसन्नाविमलाःशीतानिर्गन्धानीरुजाःसि- ताः । स्रवन्तिचातिमात्रंताः सानशक्नोतिदुर्वला ॥ वेगं- धारयितुंतासां न सुखविन्दतेक्वचित् । शिरशिथिलतात- स्या मुखंतालुचशुष्यति ॥ मूर्छाजुम्भाप्रलापश्च त्वकक्षा- चातिमात्रतः । भक्ष्य ज्यैश्चपेयैश्च न तृप्लिमतेसदा॥ सन्धारणाच्छरीरस्य ताप्रापःसोमसंज्ञिताः। ततःसोमक्ष- यात्स्त्रीणां सोमरोगइतिस्मृतः ॥

लतोयखण्ड। जिस प्रकार पुरुष को महुमूत्र रोग होताहै, और अधिक मूत्र द्वारा घात जाते २ मनुष्य मर जाता है। उसी तरह स्त्रियों को सामरोग होता है और यह भी ऐसा दुष्कर रोग है यदि प्रारंभमें सपाय न कियाजाप तो फिर पाराम हामा कठिन होजाता है और कुछ दिनों में स्त्री गलकर भर जाती है। यह रोग सिखयों के ही हेाता है और इसके हानेका भी कुपथ्य वही है जो प्रदर रोग में लिख पाये हैं जैसे-अति मैथुन, अति शीच अधिक मेहनत आदि विशेष यह कि जुलाय के बिगड़ जाने और जहरीली यस्तु के खाने से सम्पूर्ण शरीर का रस रक्तादि तर पदार्थ और जल का अंश अपना २ स्थान छोड़ भूवाशय में प्राप्त हो के योनिमार्ग द्वारा अनियमित समय में भी निकला करता है। यह जल के समान साफ, रंग रहिस, शीतल. जिसमें कुछ भी गन्ध नहीं न किसी प्रकारका दर्द सर्वदा दिया रात्रि निकला करता है। यही बीमारी जय अधिक बढ़ जाती है तय स्त्री घेगको नहीं रोक सक्ती अर्थात् पेशाम लगोसे सटते २ कपड़े में भी हो जाता है इस्से हर समय घेती भीनी रहती है। रोगवाली स्त्री के शिर में दर्द घुमरी, चक्कर, मुखका सूखमा, यदन रूखा, शरीर फमर, खाने पीने की चीजों से तृप्ति नहीं हाना बना रहता है। इस रोग में स्त्रीका रन आदि तर पदार्थ पानी सरीखा यहा करता है तथा उसके क्षीण होने से स्त्री के सोग रोग हेता है। मूत्रातिसार । सोमरोगेचिरंजातेयदामूत्रमतिस्रवेत् । मूत्रातिसारं तंपाहुवलविध्वंसनंपरम् ॥ जय स्त्री को सेमिरोग बहुत दिनों तक बना रहता है तो अन्त में ससे मूत्रातिसार हो जाता है अर्थात् बारम्बार और अधिक मिकदार से पेशाब आने लगता है और रोकने से रुकता नहीं इससे स्त्री का शीघ ही चल नाश हो जाता है और मर जाती है या कोई अति दुष्कर रोग उस्के शरीर में हो जाता है ।। प्रदररोग की चिकित्सा । यह सष आयुर्वेद वेत्ताओं का मत है कि जितनी भीषधियों रक्ता. तिसार, र पित्त और रमज बाधासौर के गाराम करनेवाली हैं वे सब चारों प्रकार के प्रदररोगों को भाराम करती हैं।

८ - आरोग्यदर्पण 'परीक्षित औषधियां। दारूहरवी, रसवत. चिरायता, ससा, नागरमाथा, वेलका गूदा और खद भेलायो न मय भौषधों को यरायर तोल दे ताला ले अपकचरा, कर एक पाव जल में एक मृत्तिका पात्र में रात को मिजा देवे मधेरे माग देवे. जब एक उँटाक जल रहजाय उतार शीतल करके छान लेप और छः मासा मिश्री मिला के पी जाये, मी प्रकार सुधेरे भिजाये तो शाम को पकाय कर पीये। यह पूरा मात्री है. यदि रोगी मार पा उमर कम है तो. मात्रा भी कम कर ले। भेगायां की विपुगी काट कर में फेक देवे और उसे फार फर बीज निकाल हाल.पश्चात बद्ध कर लेप । खाने को गर्म चीजन देधे ॥ चन्दनादिंचूर्ण प्रदराधिकारे । चन्दननलदलोध्रमुशीरंपाकेशरं । नागपुष्पंचविल्वं घभद्रमुस्तञ्चशर्करा॥ होवेरज्जैवपाठाचकुंटजस्यफलंत्वचं। पृङ्गवेरंसातिविषाघातकोचरसाञ्जन ॥ प्रामास्थिजबुसा- रास्थितथामोचरसोदभवः । नीलोत्पलंसमगाचसूक्ष्मैला- दाडिमोभयं ॥ चतुर्विंशतिमेतानिसमभागानिकारयेत् । तगडुलीदकसंयुक्तंमधुनासयोजयेत् । चतुःप्रकारंप्रदरर- तातिसारमुल्वणम् ॥ रक्ताशीसिनिहन्त्याशुभास्करस्ति- मिरंयथा । अश्विनोःसम्मतोयोगोरक्तपित्तनिवर्हणः ॥ यह नुसखा हम अपपरतावली से लिखते हैं, जिसे जनेक मार - जमाके देखा है जो निस्सन्देह प्रदररोग का माराम करता है। सफेद- चन्दन जटामासी, लोप, खस, कमलो फूलले भीतर का केशर मिलने पर कमलगट्टे की गरी, येणका गूदा, नागरमोथा, मिश्री, हाहूध, पाड़ी, पुरैया को छोला पन्द्रजय, वैतरासांठ, मतीस, पयो फूल, रसवतभाम भी गुटलीकीगरी, जामुनो गुठलीकीगरी; मोचरस, नीलकमलका पक्षण सौयगड । मिलगे पर बगलग को गरी, मजीठ, छोटो माययों और मारेकाल, रंग गय पोनिषों पीपंधों को समान भाग ले फूट कपाशान कर किसी शोगदार बोतल में रख दें। इस चूर्ण को मात्रा ६ माधा से दो तालाप: येन्त है, एस चूर्ण को चाबल के धोयन और महत के सायं पुदिन साने से चारो प्रकार का प्रदररोग रेतातिसार एवं रता माघासोर निस्सन्देह पाराम होताहे जिस तरह सूर्य के प्रकाश से अन्धकारका नाश होता उसी प्रकार रस चूर्ण के मेषमसे प्रदरगं का नाशाताई इस पूर्णका भश्विनी कुमार प्रकाश किया है इसे रक पित्त पा भी नाश होता है। चावल के घोषग को फ्रिपा यह है कि आधी उँटाक पुराने चावल को पाहा कुषल कर शिस्में दो तीन दुक हो जाय १ पाय जलमें भिजो दे घंटे दो घंटे के बाद सूच गलकर छागलेप और तस्मै ३ भासा सहत मिलाके सक्त पूर्ण के। मुखमें रख कपरसे चाय का घीवन-पोजाये, अपवा चावल के घायन में पूर्ण को घोट छानशर पोजावे इसतरह.पीने से और भी जल्द फायदा करता. खाने में गरम चीजों का पहरेज ॥ दो ताला अशक पृक्ष की छाल को दूध में पका के मिश्री मिलाके दानों समय पीने से रक्त प्रदरं भाराग देता है उसी प्रकार पके गूलर दो फलों को सुखाय चूर्ण कर मिश्री मिलाय एक तोला फे भन्दाज देनों के साए भपया पानी के साए सागे से रक्त प्रदर को फायदा करता है। सफेद चन्दन.१ तोला, खस १ तोला, कमलग को गरी ताला तीनों.को प्राधसेर चायल के थोषम सूप महोन घोंट छान कर दो साला मिश्री मिला के दिनभर में कई गरतमा फरके पीनेसे बार घ घायल मिश्री के भोजन करने से योनि द्वारा लाष्ट्र का नामां बन्द होता है । इसीमकार पक्का केले को छीमी को दूध में कई मरतया भाग कर खाने योनिद्वारा लेाहू का जाना चन्दादाता है । प्रदर रोग में पथ्यापथ्य । साठी के धान का मघवा पुराने चायश का भात, मंग मसूर और, चना को दाल, गेहूं गा जप की रोटी, गो या मरीका दूध, भैसका पी, AN समप . पारोग्यदर्पण। कटहर, केला, चौराई, परवर, पका कुम्मा, कमलकानाल और लौकी को तरकारी । चिरोंजी, अदरक, तार का फल, अनार दोनों प्रकार के, छुहारा, सिंघाड़ा, मामला, नारियल, कसेरू, कैपा, ठण्डा जल भादि जितने प्रकार के शीतल पदार्थ है सव फायदा करते हैं. (अपथ्य) बात नेहमत करना, रास्ता चलना, धूप और भाग के सामने बैठना, दिशा पेशाय का रोकना. समाकूपीना, मद्य मांस खाना, शोध और गुस्सा क. रना, गुष्ट भांटा, तिल, उरद, सरसों, दही, सिरका, अचार, लहसुन भादि जितने गरम और क्षार द्रष्य हैं सय नुकसान करते हैं ।। सोम और मूत्रातिसार की चिकित्सा । भिंडीकी गड़, सूखापिंडारू, सूमामामला, विदारीकंद यह धारर तोला उरद का चूर्ण. और मुलेठी दो २ तोला सबको महीन पीस ः २ मासा की पुलिया बनाय लेप शाम सबेरे एक पुड़िया मुसमें रख पावभर गौ के दूध में मिश्री मिला के ऊपर से पीनेसे सेमिरोग माराम देता है अपवा कुछ दिन बरावर दूधके साप परछाही शताधर पीने से भी रोग माराम होता है । और ऊपर लिखेहुये चन्दनादिचूर्ण से भी सामरोग भाराम देता है । भूत्रातिसार के लिये यह दया परीक्षित है ताड सक्ष की जड़, खजूर पक्ष की जड़, मुलेठी और बिलाईफन्द सय को सम भाग ले पूर्ण कर छः मासा के अन्दाज गौ के दूध अथवा चावल के धोवन के भाप दानों समय कुछ दिन घराबर सेवन करने से मूत्रातिसारंग मा. राम होता है इस रोग में भी यही पप है जो प्रदररोग के लिये कहा गया है। स्त्रियों के और रोगों का प्रकरण मारोग्यदर्पण के धतुर्थ खगह अथवा पश्चम खपत में लिखा जायगा ।। परीक्षित औषधियां। वैद्यक के ग्रंथों में अधक की उत्पत्ति इस प्रकार लिखी है कि जब समासुर मारने के लियेन्द्र ने बज उठाया तब उसमें से चिनगारियां निकल भरकाश में फैलकर पर्वतों के शिखरों पर गिरी उनसे अभ्रक उ. स्पन हुमा जहां का पत्थल.जिस रंग था वहां उसी रंक का अब तक 7 ६ अभक भारोग्यदर्पण। ८१ मिलता है परन्तु विशेष कर.. उत्तर के पर्वतों में उत्पन अभ्रक में बहुसत्य और ज्यों में अधिश गुणयान है ॥ अथ अभ्रक के शोधन मारण की विधि अभ्रक के दो भेद है संवेताभ्रक और कृष्णाम्रक, सो रस बनाने के कामामें काला 'अभक लिया जाता है क्योंकि काले अभ्रक पारद और सफेंद अभ्रक में पारा नहीं है। यह काला अभ्रक चार प्रकार का है पि: नाक-दर-गाग और यज (लक्षण) पिनाकको भाग में होलने से पत्रे सिल जाते हैं, दर्दुर भागमें डालनेसे मेढ़के समान शब्द देता है, और नाग को भाग में डालने से फुफकार देता वे तीनों अभूक खानेसे मृत्यु को देता है और यज नामक अभक प्रागर्ने हालने से कुछ रूपान्तर प्रया शब्दादि नहीं होता किचिन्मात्र फूल जाता है यही सभक खाने के योग्य है इसका भस्म घुढ़ापा तथा मृत्यु का हरनेवाला है। प्रशुद्ध अभक कोढ़, क्षयो, पांडु. हृदय पीडा, पसुरी में दर्द, देह का जकड़ना भोर भंग्मि को मन्द करता है। इसलिये पहले श्रमक को इस प्रकार शोध लेना चाहिये अभूत के सएट को ले कोयले के मांध में सूम लाल करै जय देखे कि अभक सुर्स हो गया है गौ के दूध में और बाद इमके धौलाई के साग का रस ३ भाग नींबू का रस १ भाग दोनों रस को एक पत्थल के पात्र में भर उसी में अभक का रात भिजा रक्खे दूसरे दिन जल में धाय हाप से सूब मल कर उसके पत्रों को भिन्न २ कर देबै तब उसे धान्याभफ करै । धान्याभ्रक की विधि । उपरोक प्रकार से शुद्ध किया हुमा अभूक को घाम में सुखाय सरल में महीन कूट लेय जितना कुंटा भया अभूक हो उसका पौधाई समूचे धान ले देोगों को एक. कम्बल में बांध तीन दिन रात पांगी में हुयो रपये तीन दिन के बाद उसे हापों मे सूप गर्दन करे जिस्से कि अभूक मष छन के पानी में निकल भाव और कमें जो कंकर पत्याल रहता . बुमाय लेय एक दिन --

--
के
'वतोयखण्ड ।
है वह धान के साथ कम्बल के पोटरी के भीतर रह जावै ! ओ अभंक
छन के पानी में आ गया है उसे धीर करके जल बहापं देये और अभक
को घाम में सुखाय ठेयं यही प्राक मारण प्रकार में श्रेष्ठ होता है।
मारण विधि ।
धान्याभूकको मदार (कहीं इसे भाक और अंकीया भी बोलते हैं)
में घोंट टिकरी यनाय संखायलेय बाद उसे मदार पत्र में लपेट
कपर फपरोटी कर गंजपुट में फूभ देवै इसी प्रकार सात दफे मदार के
दूध में घोंट और पत्र लपेट सम्पुट कर गजपुट में फूफे बादं उसी तरह
बरगद के जटा के काढ़े में घोंट टिकरी बांध मुखाय बाद ऊपर से कप.
रोटी कर गजपुट में फूंक देवे फिर फुमारीकन्द (घीकुमार) रससे सरल में
घाट प्रांच देखें इसी प्रकार २०२ गापुट का बांध देखें यह सो पुट का
अभक अन्य निधि अभूक भस्मों से अति उत्तम बल बीर्य वृद्धि कारक है
तथा सप से उत्तम भिक मस्म एक हजार प्रांच का होता है वैद्यक के
अनेक ग्रन्थों में प्रभूक फूकने को अनेक विधि लिखी हैं परन्तुं वन विधि
भय से उत्तम और सरल है (अमतीकरण) जितना अक भस्म हो उतनाही
गो घृत ले दोनों काले चूलहे पर रख इतना प्रोध देव कि पात्रं के अति
ठेपणा होने से घृत घल उठे जय पृत जल के शांति हे। जाय ते अभंक
मिकाल काम में लावै॥
मारितस्ये अम्कस्य गुणः ।
अभंकपायमधुरं सुशीतमायुष्करं धातुचिबईनंच ।
हन्यात्तिदीपंव्रणमेहकुष्ठं प्लोहोदरंग्रन्थिविपकृमींश्च ॥
रोगान्हन्याद्रढ़यति अपुीर्यवृद्धिविधत्ते। तारुण्याढ्यं-
रमयति शतयोषितांनित्यमेव ॥ दौर्घायुष्कान् जनयत्ति
सुतासिंहतुल्यप्रभावान् । मृत्योर्भीतिहरतिसुतरां सेव्य-
मानमृताभम् ॥ १॥

. भाग्यदर्पण ८३ यह गुण अभक भस्म के अनेक ग्रन्यों में लिखे हैं। अभक भस्म कसैला.. मधुर, शीतल, आयुष्य. का बढ़ाने वाला और धातु घईक है सक्षिापात, फोडा, धातु रोग, कोढ़, पिलही, मांसग्रंथि, यिष दोप, एवं कृमि रोगको नाश करता है, उक्त रोगों के नाश के बाद शरीर को पुए करता है और बीर्य को ऐसा बढ़ाता है कि नित्य सैकड़ों सियों का संभोग करने को समर्थ क्षता है और जिनके सिंह के समान बलबान तथा दीर्घायु पुत्र उत्पन्न करने की ताकत देता है एवं मृत्यु के भी मय से बचाता है। परन्तु यह नहीं लिखा कि कितने दिन के सेवन से उपरोक्त गुण लाभ होते हैं। स्वेत प्रदर की औपध । औरतों को चार प्रकार का प्रदर रोग होता है तिस्मै स्वेत प्रदर मति कठिन रोग है इस्मे योनि से कभीर या सर्वदा निरन्तर गाढ़ा सा पानी निकलता रहता है। एक हलवाइन जिसकी अवस्था २८ वर्ष की पी बहुत दिनों से नक रोग में पीड़ित थी' प्रयाग में उसने प्रायः छोटे यो सभी हकीम वैद्यों की दया की, परन्तु किसी से भी फायदान हुमा अन्त को हमारे औषपालय में माई हमने भी अनेक प्रसिद्ध २ औ. पधियां खिला लेकिन फायदा न हुना तय एक साधारण मौषध बनाके १मास दोनों समय खिलाने से रोग समूल नष्ट हो गया तत्पश्चात् उसी श्रीपप से कई एक रोगियों को पाराम हुमा से लिखते हैं। भिंडी (प्रसिद्ध तरफॉरी) को नह सुखा के पाय भर। पिडारू (सुधनी भी कहते हैं) सूखा हुआ पाय भर दोनो को कपर छाम कर छः छः मास को मार मा . सब मर गरे के दूध में एक लेसर शेनी मिला से एक पहिया मुख में रख नसी दूध से उतार जावे ऐसा ही साम सवेरे खाये, दूध न मिले तो दंया में जरामा मिश्री मिला के पानी से उतार जाये, तेल मिर्धा खटाई प्रादि गर्म चीजों से परहेज करें। डाक्टरी मत से सर्प विष की चिकित्सा। एनीमेल पाईजन (जीवविष) अर्थात् सपदि जीवों के काटने हतीयखगड। विष से पीड़ित होगा अगर पागल कुत्ता, स्यार प्रभृति सपदि जह. रीले जीव शरीर में जिस स्थान में काटे यहुंत गीत उसी स्थान के कुछ कई भाग में कपटा पा डेरे में सूब कस कर यांध देये, यांधने के बाद देखे कि काटे हुये. स्थान में आसार योप होता है कि नहीं और मी स्थान का पाल नपाइने से फुस २ बाल उसंद आता है कि नहीं प्रोत लोम उखाने से न उसड़े और दंशित स्थान में चुटकी काटने से बोध छोय तो जानना को रोगी आराम हो जायगा (धागा यांधने से तात्पर्भ यह है कि जो रक्त रंगों के द्वारा चारो तर्फ घूम रहा है वह रक्त विष के साथ मिल कर शीघ्रही हदय में न जाय मिले) तो बहुत जल्द दंशित स्थान को नस्तर जथया छूरी से छेदन कर कुछ रक्त निकाल डाले और घाय को गरम जल से धोफे जहां तक जल्दी हो सके उमी घाव पर फाप्टिक पिस देधै गौर एक लोहा गरम करके घाय को दाग देथे लेकिन | उहा ऐसा लाल करे कि उस स्थान का चमड़ा पुर चुराय जाय याद निम्नलिखित प्रौपध के पिलावै । 1 लापकर एमोनिपा.१ । २ ट्राम । ग्रांडी १२ आँस । टिचर गो. पिचाई १ श्राम । केफर, वाटर ६.धान सुधा औषधियों को एकत्रित कर, एक शीशी में भर १२: चिन्ह लगा दे श्राधे घंटे:पर. या आवश्यक जानने, परदेश मिनिट के अन्तर पिलाये, और रागी को बैठने किम्बा प्रथम २४ घंटा पर्यन्त माने न देव: दे। मनुष्य रोगी के यगल के भीतर हाथ देश, इधर उधर दहलाये.और सर्प फा भय ।गी के चित्त से समझा बूमा फर हटाये पश्चात् नीचे लिखे ननुमार, ऐमोनिया लिनीमेंट तैयार करके घाव पर लगावे, लाया एमेनिया ४ छाम, टिंचर भोपिपाई ४ छाम, मोलिभमा: यल म.सम को एक में मिला पाय पर भीर घाय को पारामीर मर्दन फरे । यह मालिस यिष्ट्रय गादिसे काटे ये स्थान में भी फायदा करता है। परन्तु पागल-सियार या कुत्ता काटने में पूर्वोक्त चिकित्सा अवश्य फरगा उचित है यद्यपि फूकुर काटने का जहर जल्दी असर नहीं करता, एक सप्ताह से लेकर ६ सलाह अथवा मप्ताह में' अथवा मास से ६ .

भाग्यदर्पण। मास के मध्य में ही रोगी अकस्मात जलाशप देख के घर जाता है और पानी पीने की शक्ति यिन हो जाती है और कुत्ते समान भूकने लगता है इस रोग को प्ररेजी में (हाईड्रोफोरिया) कहते हैं ! यद्यपि हम इस्का वर्णन फुत्ता काटने के स्थल में करेंगे तथापि हमें इस समय इतना क- हना बहुत जरूरी है कि स्वान और स्थार दंशित रोगी को पहले सूत्र सेज जुलाबकरा अल्प परिणाम अफीम खिंगाना आरंभ करा देना सय से उत्तम है एवं प्रति दिन शिर से स्नान और शरीर में 'धलाधान फरना उचित है। 'गनुष्य सृष्टि को बिनाश करने को सामर्थ्य अनेक नीयादि पदार्थों में देखा जाता है सिंच व्याघ्रादि मनुष्य को मार खाते हैं. सादि दंशम तथा मादक द्रव्य के खाने से । बहुत से वृक्ष ऐसे हैं जिनमें से घायु मि. कल कर शरीर में लगने से मनुष्य मर जाता है परन्तु और जीयों को कम हानि पहुंचती है अन्य २ जीवों में भी पाश्चर्यित गुण देखने में भाते हैं जैसे सर्प के काटने से योच्छू नहीं भरता और योच्छू के डंक मारने से सर्प तत्क्षण तड़फड़ा कर मर जाता है । कम मात्रा अफीम के देने से कूकुर नहीं भरते परन्तु उत्तनाही मात्रा चला खिला देने से फुत्ते भूक २ कर भर जाते हैं मन्दर को किसी किस्म का विष फैसाहू यस्तु के साथ मिला के देभो कभी न सांयगे इत्यादि अनेक तिलिस्म हैं न मालूम परमात्मा ने किस अभिप्राय से ऐसे पदार्थों को उत्पन्न किया है। मायुयद में भी धिप का भेद कहा है, स्थायर और जंगम । एक्षादि से उत्पाद विष को स्थायर और सर्पादि जनित विप को जंगम मिष कहते हैं उनमें प्रथम सर्प विष को चिकित्सा और निदान लिखा है। सपा की अनेक जाति है तिसमें मुस्य नव जाति है उसमें भी तीन भेद हैं (गोगी) फण याले सर्प ये यातास्मक होते हैं इनके काटने में बात को कोप करके चित्र पढ़ता है (मराठली) गिनके शरीर पर गाल २ पटे होते हैं पितात्मा है उनका विष पित्तात्मक है बिष पित्त विकारकारक होता है (राजिल) तो कहते हैं जिनके शरीर पर रेखा तोफा.

तृतीयखण्ड। स्मक दाते हैं कफ विकार-सहित इनका काटा हुभा. विप पढ़ता इसके अतिरिका और भी चिन्ह युक्त अनेक सर्प होते हैं। सर्प दंश विष देशकाल भेद से असाध्य। पीपलयक्षके नीचे, देवालपमें, बांयीमें, संध्या ममय और चौराहे पर काटने से तथा नस और मर्म स्थान में सा भया मनुष्य शीघ्र मर जाता है । जीर्ण, प्रमेही कुष्टी घायवाला अति गरम, मिजाजवाला यालम वृद्ध और अति दुर्यल को सर्प दंशन करे तो असाध्य जानना । ज्योतिष में लिखा है कि भरणी, मघा, प्रादा अस्लेखा मूल, फत्तिका यह नक्षत्र और पञ्चमी तिथिमें सर्पसे काटा भया मनुष्य असाध्य हताहे ॥ स से काटे हुये यिप में पाठ येग (लहर) प्राताह प्रथम, संताप, २ में देह कांपना, ३ में दाह, चौधे में यिहोश हो के गिरना, ५ में मुंहसे फैन निकलना, ६ मैं स्कन्ध टूटना, 9 में जीभूत होना और में मृत्यु । प्रायः देखने में आया है कि सर्प दंशित मनुष्य के चाबने से निम्य पत्र की तिक्तता नहीं बोध होती है। आयुर्वेदीय मत से सर्प विप की चिकित्सा । हाथ पैर वगैरह किसी स्थान में सर्प काटै तो अति शीघ्र उसके फिंधित कई में सूर्य कसके डोरी से यांध देय और संलाफा से दाग दे जहां धांधने की जगह न हो तो दंशित स्थान को छूरी से छोले, लोहे की शलाका सूय लाल करके दाग देय और तूंबी आदि से हवा खोंधे । एक स्थल में यह लिखा है कि जो सर्प काटे उस सर्प को तुरन्त पकढ़ के दांत से काटना अधषा एक मट्टी के ढेले को दांत से काटने से जहर नहीं चढ़ता। जय देखे कि जहर समस्त शरीर में फैल गयाहे तो हाथ पाद और शिरा का येधन करना कारण यह कि रक्त के निकलने से विष निकल जाता है। . मा गाना, चौधे में पारोग्यदर्पण । या दंशन के चारोश्रोर तूंपो लगाय के कुंछ सक निकालिमा और विष नाशक औषधों का लेप करना दूध पानी पिला के घर बर घर कराने से भी फायदा देखा गया है । जो फणवाले बड़े विषधर सर्प काटा हो तो जी आठ बेग पूर्व में हम कह भाये हैं पहले बेग में उपरोक चिकित्सा कर फस्त देना, दूसरे में विषघ्न औषधों को घी और शहद में मिला के पिलाना तीसरे में विघ' नाशक नश्य और अंजन ल. पानी पिला के औषध बमन कराना, पांच और छठवे धेग में शीतल उपचार करना या पिचकारी द्वारा कहा शुलाम देना और सातवें वेग में तेज अंजन तथा नस्तर से मस्तक में • काकपदं करके रकरहित मांस छीलना, गर्भिणी बालक और बद्ध इनके सर्प काटा हो तो फस्त न देके मृदु उपाय से विष दूर करना। बकरा आदि जान- बरों के सर्व काटे हाय ते मनुष्य के समान रक्त निकालमा, बैल और घोह के दूमा, भैंसे और ऊंट के तिगुना और हाथी के चौगुना रक्त का- ढ़ना चाहिये । जिन मनुष्यों की प्रकृति अति गर्म हो रकम निकाल के शीतल उपचार करना । रत्नावली ग्रन्थ में लिखा है कि मेष की संक्रान्ति के आरंभ में एक मसूर और दा नीषके पत्र खा लेप तो वर्षभर उसे विप का भय न हो। कुछ दिन पे कि मेरे मकान में एक ब्राह्मणी टिकी थी एक दिन नसे प्रातःकाल दक्षिण हस्ताङ्गुली में सर्प ने काटा और चल दिया, परीक्षा के लिये निम्ब पत्र दिया गया माधं पाव खागई मुंख कडू न हुआ तय मालूम फिया फि घटा जहरीला सर्पपा खैर, चिकित्सा हेना भारंभ हुभा कुछ फायदा न हुआअन्त में बेहोश होगई प्रोट और नख काले पड़ गये मुखसे फेन बहने लगा और मुख जकड़ गया लेग्गों को यह राप हुई कि रोगी दरवाजे पर लेटाय दीगाय और चारों तर्फ गुन कर दिया कि सर्प के माड़ने एवं दवा जानने वाले आयें धैसाही किया गया घड़ी भीड़ लगी कितने झाड़ने फूंकनेवाले प्राये कोई कानमें मन्त्र पढ़के चिलाता है कोई जल के छिट्टे मारता है इतने में पुलिस के दूत, दरोगा साहेब मी मा पहुंचे कहा कि इसे अस्पताल भेजा । उन्हें समझा दिया गया ये भी - - तृतीयखगड। बैठ गये, एक मुसलमान जाति का कमाई भी वहा सय चरित्र देख रहा पा उसने कहा भाई अन्त है.अपना २ करतब कर ले तो. हम भी पत्र करें यह कोई न कहे कि हम यन नहीं करने पाये, सम्र लोगों ने कहा भाई सब उपाय हो चुके तुगसे भी जो कुछ करते बने फरी' नभने कहा अच्छा हम भाते हैं एफ धनिये के दूकानमें कूछ सौदा लिया हाथ में मलते हुये प्राया और कहा कि दो आदमी उसका हाथ यांभो और दो प्रादमी पैर थांभो, कुछ युफनी दिया कि उसे पानी में घोल कर पिला देओ, कहने के मुताबिक पिला दिया गया पांच मिनट के बाद कुछ हाथ में लिये पा रोगी के नाफ में हाल नाक थाम लिया, रोगी पांच मिनट तक कुछ नहीं सनकी घाद तडफदाने लगी मियां ने कहा | खबरदार छोड़ना नहीं, चार मिनट के याद मियांने कहा बम अय.छोए दो और मियां ने भी नाफ छोड़ दिया, औरत उठ बैठी गौरं कहा गय हम अच्छी हैं मियां ने कहा इसे पाय, माधपाय घी पिलाओ माराम गई, सब लोग चले गये। हमको अत्यन्त उरकण्ठा तुई कि यह भीषध तस्से जागर लो पकारागे प्रकाश करें। यह ता.हमको विदित होगया था कि यह मुसंरगान बनिये के दूकान से नौसादर माल लियाथा परन्तु उसने और किस चीज का मेल किया था मालूम नहीं । एक दिन उस मुमुलमान को युलाया उमसे पूछा प्रथमतो उसने बहुत कुछ नकार किया परन्तु मन्त में कहा अच्छा हम बताये देते हैं इसमें कुछ है नहीं तिनका ओंट पहाड़ है। कहा कि मासा नीसादर प्रथम पानी में घोल कर पिला दे और. पांच मिनट के याद चूना और गोमादर दामों घराघर. वजन में छः छः भामा ले दोनों को एक में मिला वोटरी बना सुंघाये या जरा २ मा दोनों नाक में डाल नाक पाभलेय पांच मिनट में रोगी उठ खड़ा होगा। पापक गया जब से इस महौषधि को सुना है कोई सर्प दंशित मनुष्य नहीं मिला कि सत्यासत्य की परीक्षा करें लेकिन निश्चय होता है कि यह औषध प्रयश्व सत्य है क्योंकि विष रोग पर हाकृरी में अमोनिया (धूना नीमादर) प्रधान औषध लिखा है ॥ ३ &a तृतीयखगड । पो पाद दांत निकलता है और इक्कीस. दिन में तालू में विष भाजाताहे. काटने के समय विष त्याग देता है परन्तु फिर ममी.थेली में विष एक- त्रित हो जाता है पच्चीस दिन का सच्चा सर्प जहरीला हो जाता और ६ महीने में केचुन त्यागता है। दो सौ.धीस पैर सपा के होते हैं परन्तु ऐमे मूहम पाल सदृश होते है कि देख महीं पड़ते चलने के समय निकरण पाते है नहीं तो भीतर पेट में छिपे रहते हैं, उनके शरीर में पसुली और सन्धि (जाइ) यह भी २२० होती हैं । जो सर्प घे समय पैदा होते हैं उनमें कम विष होता है और पे सत्तर वर्ष से अधिक.जीते भी नहीं, जिन सों के दांत लाल पोले मोठे देते हैं उसमें भी यिष घात कम होता है और ये शरपोकने होते॥ सों के एक मुख दो जीभ यत्तीस दांत जोर' विष से भरी चार हाढ़ होती हैं उनके नाम मनरी, कराली, कालरात्रि, और यमदूती है। मकरी हाद का चिन्ह भाति मूक्ष्म नस्तर सा, कराली काम पादनख स. भाम, कालिरात्रि टकार अक्षर सदृश और यमदूती कुछ गहिराव लिये और सम डाढ़ों से छोटी होती है, इस से जिसको सर्प फाटता है घई तत्क्षण मर जाता है तंत्र मंत्र औषध गांदि कुछ काग नहीं पारता । सों की हाड़ों में सदा विप नहीं रहता विष के रहने का स्थान म दहिने नेत्र के समीप है सर्प जप क्रोध करताहे तब विष नाड़ियों के द्वारा दाढ़ में पहुंच जाता है, भक्तर सर्प दरसे पूर्व बरसे भयसे मदसे क्षुधा से विप का येग होने से और अपने बच्चों के रक्षा के लिये जीवों को,काटते हैं। जो सपं काटते ही पेट की ओर उलटा हो जाय तो जानना कि दबने से काटा है, जो घाव भली भांति न दीख पड़े तो भय से, रेखा की भांति हाढ़ लगे तो मद से, दो दाल लगे ते पक्षाने से भार जिसमें दो दा लगे एवं घाय में रुधिर भर जाय तो विष के.वेग से काटा हुमा जानना इत्यादि और भी लक्षण इनके काटने है जिसे मिर कभी लिखेंगे।

भाग्यदर्पण रक्त शुद्धकारक अर्क। काज की जय (गा किनारे कछार में होता है) रसवत, उसमा, उन्नाय, मेंहदी का फूल, पित्तपापड़ा (सहसरा) पित्तपापड़ा का बीज, | मेहदी की पत्ती, सीसम का छाल, मुगडी, छोटागोयुरू, यर्ग सरफोका, चिरयता, घशायन का छाल, जांया. यहेरा, गुलमगप्सा. सिरसा का छाल और कचनार का छाल ये सय तीन २ ताला बहिमन सुख, श्वेत धन्दन, रक्तचन्दन, और नीच का फूल दो दो ताला खुरादा भानूस अथवा प्रायनूम का हाल, घयून का छाल, बड़ाहड़, और नीयका बाल पांच २ ताला मर्फ मकोय एकसेर और सर्फ कासनी एक सेर इन सब दयायों के अधकचरा फर डेग में एक दिन रात भिजा रपये दूसरे दिन धक यन्त्र द्वारा (हेग ममका) धारह सेर भर्फ खींच ले ॥ सेवन करने की विधि । भयेरे दोपहर भोर शाम को गति दिन में तीन दफे गाध २ पाप भर्फ पीवे और सात या माठ बजे मधेरे दो तोला मछम (मयनीत) में ६ मासा उपरोक्त १ लेप का चूर्ण या जिस कदर मुगासिब समझे फेट कर जहां तक चर्म रोग हा लेपन करे और साध घंटेता या कुछ कम जि. तने देर में कि मक्खन पिघल कर शरीर में भीग जाप पाद पोड़ी सी किसी पेत की मुलायम मृत्तिका उनी पर सूप मलकर मान कर हाले और पीछे से कारयलिक सेपि या अन्य सायुनसे भलकर फिर काम कर हाले साधुन न भी मठे तो कोई हर्ज नहीं । लेग से दो चार घंटे बाद भपया सम्ध्या समप उक्त तेल मनके याद भी स्नान कर हालेनन्दा होग करे ( परहेज) तेल मिर्चा खटाई सिरका मांस मद्य स्त्रीमा शोष पूप अमि गुड़ मैंगन हद मादि चीजों का त्याग है, गेहूं की रोटी, पुराने घायल का भात भरहर या मा की दाल गो का दूध त मलाई लोकी कद्र नेनुमा परधर पालकका साग सनकी तरकारी खाये । -शरीर दाग या माडस या फोड़ा फुनगी जो कुछ ही बिलकुल तो लेप लगाना छोड़ देप सिर्फ तेल मन और सो मिटशाय टतोयखण्ड । प्रकार एक माम पर्यन्त लौषध सेवन करने से रोग ममूल नष्ट हो शरीर कुन्दन के समान हो जाती है जब देखे कि उपरोक्त औषधों को सेवन करते हुये दश बारह रोज हुआ और कुछ फायदा नहीं जान पडताता कोई उमंदा हलका जुलाब या प्रथम वर्षपष्ट में लिसे, अनुमार, हकीमी जुलाय लेके तम औषधं मेधन करना भारम्भ करै चमड़े पर लगाने का, लेप जो हम ऊपर लिख आये हैं अगर पांच चार दिन उसके लगाने में लाभ न हो तो इस चूर्ण' का लेप करे । खदिरानं चूर्णम् ।... ......। पपरियार (सफेद खैर) आधपाय, चौफिया सोहागा २ तोलाराला धूप २.तोला, नेनुमा गन्धक २. ताला, केपूर २ तोला सय को महीन चूर्ण फरले । थोड़े से चूर्ण को पानी में सूब मदीन घोंट जहां तक गरीर में फोड़े फुन्सी या सागर लेप करदे और चार घंटे के बाद साबुन अथवा घेसन से महा कर पानी से धो डाले और बदन पोंछ कर २ नम्बर का तेल लगा दें इस प्रकार पाठ दश रोज करने से में रोग धारागोता इस पूर्ण से खाज सेना, अपरस, और उपत रोगभरोग्य -- - . 17 1. व्रणराक्षस तैलम्.. पारा, गन्धक, इरिताल, सिंदूर, मैनसिल. लहसुन, नाग, और ताम्र का बुरादा ये मय शौषध दे. २ तोला ले पीली सरसों का तेल एक पाषा एक ताम्र पात्र में उपरोक्त दवाइयों के चूर्ण और तेल हाल ६ दिग सफ धाम में रख छोड़े, इस तेल के लगाने से कफ: विकार से दाद खाजा लालमंडल, नमूर और यिर्षिका रोग नाश होता है ..... निम्बाद्यं चूर्णम् विषमज्वराधिकारें। निम्यपत्र (नौब सूधे पत्ते) १० तोला, त्रिफला (इसबहेमा प्रापरता) ३ तोला, त्रिकटु (गोठं पीपर मिर्च) ३ तोला, अजवाइन ५ ताला, लवण त्रय (कालानोम सेंधानान बिहमोग) ३ तोला और जवाखार २ तोला क 4-5 गिश्री ! - प्रारोग्यदर्पण। इम सम दवाइयों को कूट कपरछान • कर चूर्ण बना ले । इसका मात्रा प्राधे मामा से तीन मासा पर्य्यन्त है। वह चूर्ण को प्रातःकाल और संध्या समय सेवन करने से.एकाहिक अंतरा-तिजारी और चौथिया ज्वर छूट जाता है, ऐसा कई बार देखा गया है । पथ्य - मूंग की दाल पुराने घाघल का भात गेहूं की रोटी और दूध । नारायण-तैलम्। काले तिल का तेल १६ सेर, बेल सूक्ष की छाला, अंगेथ (इसी को अग्निमधि गनियारी या कहीं २ अरनी कहते हैं) की छाल, (श्योनाक) सोनापाढ़ी (पाहर) नीय को छाल, गन्ध प्रसारिणी, असगंध, छोटी भट- फटेपा, बड़ी भटकटैया, (यन भांटा) यरियारा की जड़ प्रतियला, (कफही) गोसुरू और गदापूर्णा को जह यह सब दवाइयां दश २ पल अर्थात् प्रत्येक श्रीपध डेढ़ २ पाव तीन २ तोला चार २ मासा हुमा । मय दवाइयों को आपकचरा फरफे ६ गान १६ सेर पानी में रात को भिजा दे मधेरे जोसदेये जाघ ६४ सेर जा रहजाय ग़लकर छानले तैल को कड़ाही में हाल चूल्हे पर चढ़ाय,मंदाग्नि प्रांघ से उसमें थोड़ा.२.काढ़ा दे के पचाधे । जय, दे। मेर पानी जरने को रहनाय तय इन प्रोपों का कल्क यनाके उसी में डाल दे मांफ, देवदारु काठ, जटामासी, छरीला, दुधियायध, लाल चन्दन, तगर, कूद, छोटीलायची, पर्णी चतुष्टय अर्थात् सरिधन, पिपियन, यमर्दी और बनमूग, रासना, असगन्ध, सेंधानोन, और गदापू की नाह यह सय दवा गाठ २ तोला महोन फूट पानी डाल शिनपर पीस लुगदी बना तेल में छोड़ देगीर कपर मे १६ सेर शतावरका रस पचावे, यदि ताजा शतावर मिले तो कुचल कर रम निकाल हाले सूखी हा पाठसेर शतायर को कुचल कर चौसठ सेर पानी में पकाधे जय १६ मे जल रह जाय गलकर.छान उसे तेल में डाल पचाये जय शोधा जल रहजाय तय गोपना बकरी का दूध पीस सेर उसी में पधान जप दूध मिलकुल जल जाए यल तेजमान रहगया तो, उतार ले योतल में भर काग लगा दिया। इस तेल के पीरो से पिपनारी से शोर मदंग करने मेज सोड -- ६४ . टायगड । | घायु पोड़ा हाथी और मनुष्य का भी रोग भाराम होता है।स्से अतिरिक मिन्मिनत्य, ठोढ़ी जफहजाना, दन्तरोग, गले का दर्द, जम्ब जिला, मा को मूखना, पुराने ज्वर मे दुर्यल, धातु की क्षीगता, पाता जगह द्धि और मांत वृद्धि, इस सेल के मर्दन मे निश्चय आराम होता है। हमारी राय में इस तेल को पीना उचित नहीं है। हिमसागर तैलम् । कालेतिल का तेल ४ सेर. सतायर का रस ४ मेर, पताल कुष्माण्ड का रस ४ सेर, आंवले का रस ४ सेर, सेमर के जर का रम ४ सेर, घड़े गोखुरु का रस ४ सेर, नारियल का जल ४ सेर, और केले के वृक्ष का रम ४ सेर, गो का दूध १६ सेर ( फल्का) द्रव्य ) लाल चन्दन, सफेद चन्दन, तगर, फूट, मंजीठ, अगर, जटामासी, छरीला, मुलेठी, देवदारू, मख, हरै, मारि पारा, लोध, भाषा, दालचीनी, छोटीलायची, तेजपात, नागकेसर ठग, जावित्री, कचूर पोई का फल, हरदी यह सब दो देताला लेकर पानी में पीस काल बनाय ले प्रथम तेल को जांच पर चढ़ाय तमं कस हाल ऊपर से चौड़ा २ शतायर मादि कारस हालता जाय व मन जर्फ जल जाय सिर्फ तेल मात्र रहजाय तो उतार लेय यह तैले सणवायुमे जितने रोग जैसे अंग दाह अंग मूखना शरीर से चिमनी का उड़ना लकवा गठिया आदि अनेक रोग आराम होते हैं यह अगा। अन्तर्दाह पर धान्यक हिम । प्रातःपर्युपितधान्यंसलिलंसितयायुतं । अन्तर्दाह- हरेत्पोतंदुःखंदुर्गार्चनंयथा.... रात में मिजाया धनिया प्रातः उसी जल में चिनी मिलाकर पीनेसे मन्तादाद ऐसा नाश होता है जैसे भगवती के पूजन से दुःख नाश होता हैघिधिः) दो ताले धनिये को साफसर पावभर जल में एक मृत्तिका पात्र में रातम मिजा एक महीन बस से पान का मुख ढांप मोसमें रख .

पारोग्यदर्पण देवे और सधेरे मसंधार छान.ले. तोला चिनी मिला के पी जागेसे पेट का जलन कलेशा धक २ करमा शिर की घुगरी शादिभाराम हेाते हैं। इसी प्रकार २ ताला त्रिफला मिजा सधेरे धिनी हाल के पीनेमे गले का जलन पेट का हर समय पुह २ करना कट और नेत्र व्यथा आदि विकार शान्ति होता है और प्राथपाय त्रिफला सेढ़ सेर जल में रात को भिगाय मधेरे नसके जल से प्रत्यह नेत्र मुख और शिर घोनेसे समलवायु शिरकी पुमरी नेत्र का जलन वालों का जल्द पकना और मातों का भूल जाना यह सब माराम होते हैं और तसे नेत्र और शिर सम्बन्धी रोग कभी नदी हासका परन्तु त्रिफला में तीनों चीजों को बरायर म लेने चाहिये। एक भाग हड़, दो भाग बहेरा और चार भाग भांवला त्रिफला कहाता है। परीक्षित रूसे का जल । प्रत्येक बार अनमाने से देखा गया है पवश्व फायदा करता है लाह सहित रूसे के पक्ष को सुखा ले. जिस प्रकार लकही जलायकर फुइला बनाया जाता है बना ले, रूसे की लकड़ी को जलाय देप जब देरी की सपना गया धुआं नहीं है शीघ्रही उसके ऊपर एक यर्तन ढांप दे ताकि रास न होने पाये । धाद उस कोयले को ले एक पानीसे साफ कर एक पहे में भर दे और घड़े के दो में एक छेद कर कपड़े की पत्ती यना उसी में डाल दे, दो घड़े सालो और भी ले एक के पदी में छेदकर माती घणा के हाल दे जिस प्रकार गरम दिनों में शिय जी के ऊपर लाल टपकाने को घड़ा धनाया जाता है वैसाही दो पड़ा यमाले और तीनों प को रखने के लिये लकी का फार्म (जैसा तिअंगरेज लोग पामी छानने के लिये बनाये रहते हैं) पायाय नेय. भमके ऊपर वाले पड़े में पानी, पीप बाले परे में कोयला मार सय के नीचे पहा साली है। रूपर के पड़े से पानी कोयले वाले पड़े में भायेगा और हायले वाले पो जो पानी टपक कर मीधे गिरेगा यही पानी पीने लायक है। जय प्यासलगे यही पानी पीये और पीपे माठदिन कोपला यदल दिया को रस पानी से फैसाह पुरानी खांसी व दमेका रोग हो भाराम होता " मामा - . तौयखगड :- है। परन्तु कोस, स्वास रोग में जो पथ्याश्य है उसी पर चलना उत्तम होगा । त्रिफले के स्वरस में मोदी हरदी का रस अथवा नीम्ब का रस और शहद डालकर पीने में कमल रोग नाश होता है। FE निम्य पत्र स्वरम-जीव के पत्ते का स्वरस' वाला शहद ३ दोनों को मिला कर पीने से अनेक प्रशीर पमें सम्यन्धी रोग श्राराम होते हैं। निम्यपत्रं रस दो तीन बिन्दु नेत्र में टपकाने से नेत्रकी सुरखी कैंसाहू पुरानी हो और जाला माहा कट काता है।. . . तुलसी के पत्तो का स्वरस ६ मामा मिर्च का चूर्ण ४ रत्ती दोनेांको एकत्रित कर पीने से विषमज्वर (जो ज्वर नाड़ा देके माता है) आराम होता है, यदि एक समय के पीने में लाभ न दीख पड़े तो दिन में सीग दफे पूर्वोक्त प्रकार-तुलसी पत्र स्वरस पीने से निस्सन्देह - विषमज्वर छुट लाता है। डाकर लोग भी निम्य को ज्यराधिकार में प्रायः देते हैं डाकृती में निम्य बाल पत्र, और तेल भी.. काम में , लाते हैं । फ्रिया, घल फारक मटोचक, रुमिनाशक और ज्वर में विलक्षण उपेकार करता है। डाफर फर्णिम साहय ने इसे सिगकोना पार्क और मासैनिक के साथ परीक्षा. करके देखा है वे अपने किताब में लिखते हैं कि हमने ६० ज्वरादि रोगी को सिनामा प्रयोग करके छ: दिन के मध्य में ४६., जन को माराम किया और ३८ रोगी की भार्सेनिक प्रयोग से छः दिन में, २९: जन के मारेरोग्य, लाभ पहुंचाया,, परन्तु १३४ रोगी को गिम्य लाल प्रयोग से छः दिन के मध्य में १०८ जन धाराम हुये, इसके अतिरिक्त रोगान्त दुर्बलता में यह कारक हो उपकार करता है। अय, देशी औषध का गुण हातरी भौषध से अवश्य-अधिक है इसमें मन्देह नहीं रहा। टिंचर आफ निम्ब के बनाने की विधि : निम्यं को भीतरी छाल 1?; परीक्षित सुरों (रिप्रंट घाईन) पड ( माध सेर): ... २०ॉस ( ॥ छटाफ):

तृतीयखगड. शारा का पारारांगा जाधपाय और शुद्धताप की हरताल प्राध पाय दोनों को सरल, हाल फागदी नीयू के रस में एकपहर घोंटा गोला बनाय शराय सम्पद में वन्दार गजपुट में फूंक देय, जय शीतल हे जाप गोले को निकाल एक तोला फिर शुद्ध ताप फी, हरताल दे कागदी फे रस में एक पहर घोंट पूर्वोक्त प्रकार सम्पुट यगाय गजपुट में फूंक देवे । इसी तरह प्रत्येक बार एक २ तोला हरता दे गेयू के रसमें घोटं १० गापुट को पांच देनेसे निरुत्य भस्म होगा। निरुत्य भस्म उसे कहते हैं जो मित्र पञ्चस से भी न जीवे॥ मित्र पञ्चक-घृतमहत गूगल घुपची और सोहागा इगो मित्रपञ्चक कहते हैं जिस धातुं की कच्ची या पक्षों की परीक्षा फरगी छ उसको भस्म में उक्त पांचो बस्तु मिलाय घरिया में घर कर गलाने से कच्ची धातु जी उठती है और जो मिसत्य भस्म हैं फभी नहीं जीती । जो धातु मिरर पंचकसे जी उठे उमगे शुद्ध प्रविमा भार, गन्धक समानभाग देकर घीकु- भार के रस में एक दिन सूर्य घोंटें और संपुट में चन्दकर गजपुट में फूक देतेा निरुत्य भस्म हो । {"पूर्वोक्त प्रकार से भस्मानियां हुभा रांगा पथ्य सहित दुई दिन सेवन करने से संपूर्ण प्रमेह मात्र रोग नाश होता है । वेगानंपनी शक्ति रो दाह पांधु प्रमेह फमिरोग को नाश कर बुद्धि पराक्रम और कॉति को प्रकाश करता है । इसकी मात्रा दो पायल से ३ रत्ती तफ है, समसे. त तंग अनुपात है कि शहद के संग चाट कर कपर से गौ का दूध घतांश डाल के पीवे॥ 3 सौभाग्य शुगठी पाक । सेठ भी कहते हैं: यह,पाक प्रसूता स्त्रियों के लिये अति लाभकारी है। चाहिये कि बच्चा जनने के बाद स्त्रियों को मज. वाइन सेट गुष्ठ धादि न खिलाय इसी को पना के खिलावे तो बालक भारोग्य रहे. भोर धात्रीके शरीरमें किसी प्रकारका रोग.भी न हो।

20351 १॥ तोला १॥ तोला : २ तोला .१ ताला १तेला १॥ तोला २ तोला २ ताला २ तोला १ १॥ तोला | सेठ १॥ तोला | पीपर १ तोला मिर्च १ १॥ तोला ११ तोला २ ताला आरोग्यदर्पण। शोंठ बैतरा १॥ पाव मेघा, बकरी का दूध ५ सेर खस घी गी फा १ पाप नागारीअसगन्ध चिनी २॥ सेर सफेदचन्दन दालचिनी १॥ ताला | काला मगर । तेजपात ताला लांग छोटी लायची २ तोला शतावर नागकेशर १॥ तोला | सफेदमुसली धनियां: सफेदनीरा तोला स्साहजीरा शैफ १॥ तोला जायफल अकरकरछा १॥ ताला| सिंघाड़ा जावित्री १ तोला कंकाल बिधारा १। तोला अजमोदा हाला कागलकष्ट की गरी १॥ ताला | मुनक्का ११.छदाक त्रिफला २ तोला किसमिस, परिवारा की जाए २ तोला भखरोट पिपरामूलः ताला बदाम पाव चाव १ ताला | पिस्ता पांव चीता सय से प्रथम सेठ को फूट फपरछान करठे और दूध को कढ़ाई में गौटाये जय प्राधा दूध जल नावे उसी में युको दुई सांठ हाल देवे और फरछुलीसे घराघर चलाता गाये जिसमें दूध छै न । जप दूधका खोवा हो जाये कड़ाई चूल्हे से सत्तार लेधे और सोया अलग कर फिर कड़ाई चूराहे पर घड़ाय पी हाल देष सूर्य गरम हो जाय उसी में खोवे को सूष मूंग ठेवे, बाद साफ कड़ाई में घिमी हाल चासनी बना ले और समस्त पवारयों को कूट पहचान कर और मेवानों को साफ कतर कर १॥ ताला १ १ताला २०४ ३ मासा गामा उत्तम केशर . - २ तोला १॥ तोला १॥ तोला १सोला. १५ तोला तोला लोग १ १ तगर टतोयखण्ड। अति शौत मिजाज वालों के लिये। केशरावलेहः । रोटी पीपर पूर्ण १पाय कर २ छंटाकशोंठ गी का दूध ३ मेरधनियां सोणा १ गीका घी ३ सेबंसलोचन मिश्री २ सेर सिंघाडी १ताला कसेर १ तोलामोपा छोटी लापनो २ तोला माचरम माग ताला विचारा १ तोला देवदार ताला पिपरामून ६ मामा नीता जयाम ६मासा १ताला काला अगर सावित्री १ तोला फगल गठे की गरी तारमा शतावरी २ तोला भी मांग का प्राक ६ गामा १ तोला पारदमंघटित कांतीसार घड़ा गागुन १ तोला भस्म पीपर का और फेगर घूमकर दोनों को दूध में पचापलेप गय गोवा को जाप धीमे भूजले भार मित्री की शाममी था ले परना चा. भनो बाम गाली मानिन्द पहन के रहे पाद नमी लामी में पाया और अपाणिखित दवागयों को फूट कपरवान फर मिला के घोट ले । रसको मात्रा ३ मामा मे तोना पर्यन हे सानुमार मात्रा घगा ले काश्मीरकावलेहायं दुर्चलानां यलप्रदः । दोणेन्द्रिया नष्टशुक्रा अलमांसविवर्जिताः ॥ ध्यवाय रहिता नांच धानुद्धि करः परः । मामा जायफन १ समाय अगिग्यदधण। यह केशर का अवलेह दुर्बलों को यल देने वाला जिम मनुष्यों की सन्द्रियां कमजोर धातुक्षीण या शरीर दुर्बल और बलहीन हो पा यह रति शक्ति रहित हो गया हो उन्हें भारोग्य करता है परन्तु उष्ण प्रतिवालों के लिये लाभदायक नहीं होगा। मेरी प्रतिज्ञा पाठकगण को अवश्य स्मरण होगा, अन्य का नाम सिर्फ प्रमाण के लिये दियाजाता है, विषय चाहे जिस पाय का हे पिता परीक्षा के नहीं लिखा लाता ॥ 'जामुन, प्रांम और भावला इन तीनों पक्षों के पत्तियों का रस दो तोला शहद चार मासा मिला कर दोनों समय पोने से बहुत दिनों का मांव लोहू का पहना शीघ्र भाराम होता है । येसाही बयूल के छालका स्वरस शहद मिला के पीने से पतला दस्त गाढ़ा होता है। आर्द्रकस्वरसःक्षौद्रयुक्तोवृपणवातनुत् । श्वासका- साऽरुचीहंन्तिप्रतिश्यायव्यपोहति ॥ प्रादी को कुचल कर उमका रस निकाल दो तोले रस में ३ मासा शहद मिला कर पीने से शीत सम्बन्धी केति (मायनजूम) का मूमन दर्द दमा ग्वांसी नाक का बहना राग हेाता हे प्रादी और सोंठ इन द्रव्यों का व्यवहार जैसा भारतवर्ष में है भन्य द्वीपों में नहीं। भार्यावर्त में माने जाने के कारण कुछ यिलायतमें भी शुष्क मादक (शोंठ ) का प्रचार हो चला है .पर यहुन कम और इसके गुण में लिख भी दिया है जिसे नीचे प्रकाश करेंगे पाठकगण को यह भलीभांति मालूम होगा कि शादी और गोठ यह दोनों एकही यन्तु है गीले कन्दको आदी घोलते हैं सूखे को गोंट, मी इत्त से निघंटु में लिख भो दिपा है। येगुणाःकथिताःशुंट्या स्तेऽपिसन्त्याऽखिलाः ॥ जो गुण मोठ के कहे हैं वही सब भादी में भी जानना । - तृतीयग्वण्ड। • शादी का गुण गर्म तीपण कटु सौर पचने पर फुछ मीठा सक्ष तथा घात कफ का नाम और क्षुधांकर, हे ॥ १. भोजनांग्रेसदापथ्यलवणाकभक्षणमं । अग्निस- न्दीपनरुच्यजिहाकंठावशोधनम् ॥ भोजन के पहले शादी नौम का सांना प्रमिदीत भोजन में कृषि जीभ और गले में लपटा हुआ कर्फ साफ होता है। परन्तु निम्नलिखित रोग तथा समय में प्रार्द्रक सेयन भायप्रकाश में निषेध किया है। कुष्ठेपाण्डामयेकृच्छे रक्तपित्तेंव्रणेवरे । “दाहेनि- दाघशरदोतवपूजितमाकम् ॥ काढ़ पांडु मुनाफ प्रमेह रक्तपित्त फोला पाय ज्वर और दाह इस रोगों में तथा गरगी और शरत् प्रातों में शादी न पाना माहिये । मेटिरिया मेडिका से शुंठी का गुण अंगरेजी में शांठ फेो जिजर कहते हैं। क्रिपा, सणकर उत्तेजक और वायुनाशक । अनि माता सेयग से पाफाशय में जलन बोध करता है। चयाने से लारा निरसरग अर्थात् राल का बहना, और धाध प्रयोग मच में उग्रता प्राप्त होती है। हार टनंग का वाक्प है कि.नवीन नेत्ररोग मेठ स्थानिक प्रयोग अति लाभदायक होता है । उममा तेश टिचर जमे शांठ का पूर्ण एक भाग और स्पिरिटयाइग दो भाग दोगों को एकत्रित कर कपाल में मालिश करे तो उससे पञ्चम स्नान सम्पूर्ण सत्तेजित होने से उपकार होता है। पेट फूलम या उदरं शॉप यसात् दर्द में शोठ का टिश्वर पिलाने से फायदा करता है और दस्तावर औ. पधः को उग्रता दमन के लिये प्रायः शोठ गिला देते हैं । हाफर प्यारेरा कहता है कि शिर दर्द में शुण्ठी का पलस्तर शिर पर लगाने से यहुत फायदा होता है दांत के दर्द में शोठ पपया पद. रख चयाने से रात यहार दर्द कम हो जाता है। सम्पादक मत-ग्रंथकार .

" धागग्यदर्पण । १०७ का यह भूल बहुत भारी है कि उक्त गुण प्रकृति विशेष पर नहीं दिख- लाया क्योंकि "यद्वायोपश्यं तत्पित्तस्यापथ्यम्" जो पोषध वायुगाशक ६ अवश्य पित्तवर्द्धक या पित्तधिद्वेषक होगा, बहुत कम भौषध, जो तीनों दापों को समन करै । शुण्ठी पित्तरक प्रकृतिघाले लाभकारी कदापि नहीं हो सकी ॥ खड्गादिछिन्नगात्रस्यतत्कालंपूरितोत्रणः। गाङ्गेरुको मूलरसैर्जायतेगतवेदनः ॥ शस्त्र शादि से फटे हुये घाव में यदि उमो समय भाद्र गुलसकरी के जहका रस निकालकर भरे तो शीघ्रही दर्द जाता रहे । और कोई टीकायार ने इसी लोक का अर्थ इस प्रकार विदा । शस्त्र के कटे पाय में यदि परिधारा के लाह का रस डाले तो शीघ्रही धाव शुष्क हो जाय, परन्तु पंह ठीक नहीं है। दर्द निस्सन्देह जाता रहता है । पुटपाकबिधिः, शाङ्गधर से । पुटपाकस्यपाकोयंलेपास्याङ्गारवर्णता । लेपंधवन- गुलंस्थूलंकुर्याद्वंगुलमात्रकम्। काश्मरीवटजम्वादिपत्र- रावेप्टरयत्नतः । पलमात्रोरसेाग्राह्य कर्पमात्रंमधुक्षिपेत् ॥ कल्कचूर्णवाद्यास्तुदेयाकोलमितावुधैः ॥ रोगनाशक तानी भौषधी ले उसे शिण पर पी गौमा मासे तिसपर रामारी, बरगद जामुग हम तीनों पक्षों में से किसी प्रकार षों न हो लपेट होरे से बांध एक कपरीटी कर कपर देर संपुष को मुटाई माटी लपेट पाहे से मोटे कपडों के बीच में घर फर फूंक देय पद ऊपर की मृत्तिका पफ वाय. अग्नि से निकाल कुछ शीतल कर हा यहां पर "लेषस्याहारयता" जय सपा को मुक्तिका र (भगि) के ममान लाल है। जाय तय गोलेको निकाल ले या है. क्योंकि अधिफ़ ताप से रम भी तश माता सीलिये. हिमा में लिप्त मृत्तिका को अधपका कर लेना चाहिये। -- तौयखण्ड । सोप भीतर की लुगदी ठे मोटे रूप में पर गूध मसकर रस निचोरि ले यस उसी की पुटपाफ कहते हैं । पुटपाक के रस का माना गई तोले सेतीन तोला पर्यन्त है और उसमें शपद डालने की मात्रा १० मासा यदि कोई चूर्ण भर्फ मादि मिलाने की क्रिया लिखी होतो भाधाताला जाले ॥ 7 . कुरैयापुटपाक सातिसार पर । कुरेया एक वृक्ष का नाम है जिसकी कीमो में इन्द्रय ता है। कुरैपा की ताजी बाधपाय छाल ले शिण पर रख चावल के पावन में घोंट कर गोला बना ले और तमपर जामुन का पत्र लपेट सूत्र से धांध फिर गेहूं का आटा सान के लपेट बाद दो अंगुल माटी लपेटे और धिनुये कंडे की प्रांच में पका ले तत्पश्चात् अग्नि से बाहर कर गोला फोड ४ तोला शहद छाल दोनों समय पीने से बहुत दिनों का कांठन भी पतीसार रोग आराम होता है। चार तोला रस की गाना पड़े जवान के लिये है। उसी प्रकार साजे वेश का पुटपाक तैयार कर ३ मासा मेचिरस का पूर्ण मिलीय सातदिन दोनों समय खाने से कष्टसाध्य भतीसार माराम होता है। पके भनार पुटपाक से भी. मतीसार गाराम होता है। हृदय शूल पर हिरन 'शृङ्ग पुटपाक । हिरन के भींग को महीन २ दुकड़े कर शराब सम्पुट (दो व्यालों में मन्दकर) में घर ऊपर से तीन कपटी कर घाम में सुखाय १० सेर फंडे के बीच में रख फूंक देय जव शीतल हे जाप सम्पुट से भस्म ले कागदार गीशी में रख देशमका मात्रा आधा मामा से तीग मासा पर्यन्त है। दो तोला गाय के घी के साथ वास स्म दोनों समय पीने से हदयं भूले जातो का दर्द जिसे वैद्यन में सरकत कहते हैं पांव मात दिनके पिलने .

श्रा रोिग्यदर्पग। से निश्चय आराम होता है इस पूर्व भौषध से हमने अनेक रोगियाँको भाराम किया है। तंडुलजल (चावलका धोवन) बिधिः । कंडितंतंडुलपलं जलेऽष्टगुणितेक्षिपेत् । भावयित्वाजलंग्राह्यं देयंसर्वत्रकर्मसु । तीन तोला साफ पुराने घायल को अधकचरा कर (पूर्ण न होने पावै) सवापाय पानी में मृत्तिका पात्र में रात को भिजा दे सधेरे मल कर छान लेय । आवश्यक कार्य में एकही घंटे भिजाकर जल लेलेमा कोई अनुचित न होगा। यही जण सर्वत्र की में दिया जाता है । इनलिउच्चा। अङ्गनी बुखार । सुन्ते है रस ज्वर का जन्म इटाली में हुमा है इटालीसे रूस, रूस से इङ्गले गह, विनायत से प्रार्यावर्त में भागमन हुआ है । भारतमें कोई भी ऐसा मनुष्य है जिसे यह ज्यर न हुआ हो। यह एक प्रकार का सार्य देशिक सर्दी मूलक ज्वर है, सर्दी मूलक से शीतज्वर न समझना, पित सम्बन्धी भीतरी गर्मी और ऊपरी सर्दी के संयोग से यह ज्यर जाता है बल्कि न्यूनाधिक तीनों दोप के लक्षण मिलते हैं। कोई का मत है कि यह रोग विशेषकर विष दूषित वायु शरीर में प्रविष्ठ होने से यह रोग उत्पन्न होता है। कोई कहते हैं कि (घ्या. टेरिया) नामक एक उद्धिज्माणु के शरीर में प्रवेश करनेसे यह रोग होता है। कोई इस रोग को (स्पर्श झामक अर्थात् छुतहा रोग कहते हैं और कोई कहते हैं कि यह म्यलेरिया से जन्म ग्रहण करता है जो हो चाहे जहां माया हो भय तो समस्त भारतमें धमगगरी मचा राह पालक पद्ध पुष किसी को नहीं छोड़ता, जिसको जहां हो पाण पर पटका । हिमो को दही चार दिन में छोड़ दिगं, किसी को महीनों भुगाया, मगर तृतीयम्वण्ड । कोई जराभी चू-फिया तो फिर पपा यगालय का न भेगा तो मैं नू तो उसे अवश्पही बना दिपा ॥ इन्फ्लिजा ज्वर का लक्षण । इसका आगमन एक मगाम नहीं है। यह प्रकृति अवस्या बलाबल पर निर्भर है देखने में जाना गया है कि पाले घोड़ी हरारत मालूम हुई बाद हड्डियों में दर्द शिर भारी हाथ, पांच में ऐंठन, कुछ यमनेच्या हो फिर पर तेज हो जाता है । कभी सारे बदन में दर्द जुखाम भारी होके तष ज्वर भाया है। विशेष लक्षण । तीव्रज्वर, हाही जोड़ों और शिर में दर्द, हांप पैर में फाटन विव. मिपा (जी मचलाना) नाती बेगयाग स्यचा में जलन और जिE शुष्क हेरती है, कोष्ठबद्ध, या दस्त पतला, नाक बहना, खांसी, मांस लाल, नींद का ग पाना, अधिक पिपासा, पेट में दाह इत्यादि लक्षण होते हैं इस्से अतिरिक्त प्रलापादि और भी अनेक उपद्रव होते हैं। चिकित्सा। प्रथम बलानुसारं एक दो अथवा तीग दिन उपधाम कराना. तीन दिन से अधिक उपयास पल हानि फारक होगा और तीन दिन तक कोई औषध म खाधे बाद तीन दिग के निम्नलिखित काय को दोनों समय पौवे॥ । धमिपा २ तोला मुलेठी : १ तोला पदमाप .२ तोला लाल चन्दन २ ताला : : १०.दाना मुनक्का .१२ दाना गुलयनमा २.ताला गुर्च २ तोला २.तो निम्य शाल उक्त मध औषधियों को ले अधकचरा कर मात्रा यगा ले. मृत्तिका पान में एक मात्रा दवा को पावभर जल में हाल मंदाग्नि में पचाये जब उन्नाय - २ तोला , शारीग्यदर्पगा। १११ आधपाव से कुछ अधिक जल पचजाय प्रशि पर से उतार शीतल कर छ मासा मिनी हाल के पिला दे इसीप्रकार दोनों समय काढ़ा पिला. वै और जय सका भूख ना लगे खाने को न देवै । भूख लगने पर प्रपण साबूदाना पानी में पका गिन्नी मिला के खिलावे, या मूंग यी पोंकि एकबारगी पेटभर खालेने से दुधारा ज्घर हो जाता है। नपरेरा काथ को पांच छ दिन घरायर पीने से निस्सन्देह, स्वर गिर दर्द निद्रा नाश अग वेदना यमन आदि भाराम देता है ॥ इनफिउज्जा से बचने की उपाय । इसमें मन्देह नहीं कि यह ज्वर तु. के परिवर्तन में सर्वदा हुमा ना' सीसे इस ज्यर केतु पर्धर्तनीय या कुमार पाार्तिक मास में होने मे शारदीय ज्वर कहा जाता है गदा कि, आप को यह अधिक जार गे सब देशों में एकबारगी के नगया और यूरोपीय चिकित्सकों ने इसका नाम इफिउचा रक्खा । उर्दू ( हिकशनरो ) में इन्फिा के माने ओग्रा लिखा है हिन्दी में यहामारी की बिमारी कहते हैं । इस्से पधने की सहा उपाय यह है कि शिम ममप ज्यर का प्राग. मन देश में प्रारम्भ हो निम्नलिखित नियमों को गोधही. धारन करगे मे इम्ति उक्षा के बाप को भी शक्ति नहीं है कि जो उसका एक बाल भी यांका करसको । भय से प्रथम यह है कि गल पहुत विचार के साथ पिये, जैमे भनेक फूपों का जल पीना, तीन चार दिन का रक्खा हुआ जान, खालीपेट या साते से शीघ्रही उठकर या फल फलहरी खाके जल पीलेना । कहीं से घका हुभा आके ना पीना इत्यादि त्याग करै । एक फूष या नदी लाल छान के या जान को एक उघाल गर्म करके छान ले उम जन के। गोजगान्त में या आवश्यकमें थोड़ा दिये। भोजन सयेरे जीवों के भीतर और रात को भाठ घने करै । साग सात भाठ.पने सयेरे गर्म जल से पार भोजन के उपरान्त या संध्या समय कदापि स्नान न करें। यंदर्भ में का हतीयखण्ड। कोई धमा जरूर पहिरे रहै मग्न शरीर न रहे। खाने में मूंग की दाल पुराने चावल का भात गेहूं नये को रोटी गो का दूध घो लोको नेनुभा परधर की तरकारी संधानान होना चाहिये। तेल मिर्धा मांस शराब उर्द भालू भाटा बहुत गरम मसाला भाग पास इत्यादि भोजन तथा जूग कजून भोजन क्रोध शोक मैपुन रात का जागरण यह सब त्याग करें। वीर्य उत्पन्न करनेवाली औषधैं और उपाय। तत्काल का दुहा गौ का दूध ऊंटनी का दूध मित्री पियाज दोनों बहमन तोदरी परमी बादाम पिस्ता इन्द्र गौ नारियल कड़ीला केशरजेठी- मधु दालचीनी शशायरी अंभगन्ध, सूत्र पका नाम को खा के पीना मीठा अनार सेव तालमखाना गुलसकरी लालधान उरद दूध गेहूं की रोटी मक्खन घी यलाई छोटोलायची समय पर शीत भोजन मुलापम सेज मातशाल वायु सेवन सुगन्धित तेल नगा के स्नान करना, और प्रसन्न कारक विहारों से वीर्य उत्पन्न होता है ।। वीर्य को गाढ़ा और पुष्ट करनेवाली. औपधियां । सफेद मूसली स्याह मूमली एक वर्ष के सेमर' वृक्ष का मूल सेमर का गांद, गांदक्यूल कामराज बीजयन्द माना' मोचरस पातालफुल्ला | यसलेोचन शतावर कालीतिल असगन्ध सिंघापा सालिषमिश्री लोहा सूमीमसगी,त्यादि। हिकमत से प्रसंग को चाहना को बढानेवाले द्रव्य । गौ का घी गौ अथवा भेड़ के दूध में छुपा पका के पीना एकवर्ष का मकरे का मांस मुर्ग तीतर बटेर गोरखा का मांस मछली बदाम का हेलुगा पिस्ता चिलगोजा सानय सहाकुन फुलीग सकरकर हा गासुरू केवालयोन भार बहन गोठ तगर कस्तूरी माती अंगूर नारियलकी गरी गलगम गाज़र मूरी की जड़ प्याज और इन्हीं के घोन फिन्दक हव्युस्सा बूजीदान हाला दारफिनशिल समागमफेद गोठ उसना करफास नस. ममा भाग्यदर्पण। यासा मायासुतर जिरजोर सुरंजान फिस्तक हिनयून के योज इत्यादि नेकिन सिर्फ यही नहीं कि उपरोक्त दो एक द्रव्यही के खाने से विषप चाह बढ़शाय इसके भोर भी उपाय हैं जैसा सुश्रुत में बागीकरण विधि में लिखा है। भोजनानिविचित्राणियानानिविविधानिच। वाचः श्रोत्रानुगामिन्यस्त्वचःस्पर्शसुखास्तथा ॥ यामिनीसेन्दुतिलकाकामिनीनवयौवना । गीत- श्रोत्रमनोहारिताम्बूलंमदिराःस्त्रजः ॥ मनसञ्चाप्रतीघातीवाजीकुर्वन्तिमानवम् । चित्र विचित्र भोजन ( दूध खीर मालपूषा मांस रोटी एवं मुगन्धित मपालों से धूपित्त दाल तरकारी भादि ) तरह २ के पीने के पदार्थ जैसे भर्फ गुलाय केवहा खस पर प्रमार फा रम पांड्स स्पादि । कामों को भागन्द देनेवाले बचन स्पर्श मुख (जिम चोज के छूने में त्वचा को मुख मिले ) स्त्री कुत्रादि चांदनीरात नययोयना स्त्री मनोहर गान यात्रा पागका यौहा उत्तमशराय पुष्पों की माला और मन का प्रतीघात अर्थात् जिससे मन केो दुःख न हो यह कर्म ये सय पुरुष के मौर्य युक्त भोर विषय घाह एद्धि करने वाले हैं । बहुतसे लोग ऐसे धातुक्षीण पुमा बिहीन है जो मयंदा इधर सपर मे दया मँगा कर खाया करते हैं परन्तु उन्हें फायदा नहीं करता है और यह अक्सर कहा करते हैं कि हमने मयोंका दयाखाया कुछ फायदा नहुमा भय झूठे विज्ञापम छपते हैं यह नहीं बिमारते कि सबेरा होतेही नाम लकड़ी को फिकर पड़ती है दिन में दो पठे भी आराम नहीं मिलते विषय चाह रद्धि ल्पा पत्त्या हे। भीष पथ्य के साथ सेवन करने से पायदा करता है।

तृतीयखगड,। 3. • कपमधुकचूर्णस्यघृतक्षौद्रसमांशिक । प्रयुक्तेयःप- 'यश्वान्नंनित्यवेगःसनाभवेत् ॥ मुलेठी का पूर्ण दशमासा, गक्खन या गो का ताजा पृत इमा शहद पांच मासा इन मयों को एकत्रित कर घाट के ऊपर से • गो का दूध मिश्री डाल कर कुछ दिन पीने से और उत्तम पथ्य रखने से वीर्य स्त्री प्रसन करने लायक निस्सन्देह हो जाता है.॥ गरीबी.लटका। अश्वत्थफलमूलत्वक् शृंगासिटुपयानरः । पीत्वा- सशर्कराक्षौद्रं कुलिंगइवहृष्यति ॥ विदारीमुलकल्कंतु घृ- तेन पयसानरः । उदुम्बरमितंभुक्त्वा बहोपितरुणायते ॥ मापाणांपलमेकंतु संयुक्तक्षौद्रसर्पिपा । अवलिह्यपयःपी- त्वा-तेनवाजीभवेन्नरः ॥ क्षीरपक्वांस्तुगोधूमा नात्मगुप्ता- फलसह । शीतान्तयुतान्खादेत्ततःपञ्चांत्ययःपिवेत् ॥ स्वयंगुप्तक्षुरकयोः फलंचूर्णसंशर्करम् । धारोष्णेननरःपी- त्वा पयसानक्षयंब्रजेत् ॥ इन दवाइयों में कोई भी एक सौषध नियमानुसार पथ्य सहित तीन चार महीने निरन्तर सेवन करने से निस्सन्देह बीर्य पुष्ट हे साधा. रणालीवत्व नाश होता है। पीपर यक्ष जो गठीला और जिसमें लाही धादि कोई रोगन हो उसका फल का छाल दुनगा और गत्तरखान सब मिलाके दो तोला पावभर गौ के दूध पकाय ले बाद छान उसी दूधमें थोड़ा सङ्कुर शहद मिला कर पीने से प्रभा करने का पुरुषार्थ यढ़ता है। या पीपर कृक्षके पानग्यदर्पण। ११५ फल आदि पारो चीजों को ले छायामें सुखाय कूट कपरवान.कर एकर तोलाको पुहिया बनाले और नित्य भयेरे एक पुडिया दवा खाके ऊपर से पाच माधसेर गौ का दूध मिश्री युत पी जावै ॥ दो ताला ताजा पातालकुम्हड़ा को शिल पर महीन पीस लुगदी धना लेबै, पावभर दूध में एक तोला घी और एक तोला धिनी मिला। लुगदी मुख में रख उसी दूध से उतार जावै । अगर एकबार में, सघ लुगदी न निगला जाये तो दो तीन वार करके उसी दूध से उतार जावे तो फैमाहू वीर्य क्षीगा क्यों न हो गया है। अवश्य कुछ काल सेवन करने से स्त्री का प्यारा बन सकता है। उर्द का छिलका दूर कर चूर्ण कर लेप । उर्द का घूर्ण ४ ताला अषया दो तोला घरामर के घी में सान घाट कर ऊपर से दूध मिनी पीने से बल बीर्य का शुद्धि होता है। गेहूं और केवाछ की बीज दो दो ताला दोनों को प्राधसेर दूध में मन्दाग्नि से पधावै जब मानिंद खोरके हो जावै दो ताला घी और चार ताला मिश्री मिला के खा जाये तो कभी बीर्य क्षीया न हाय ॥ धनकेयाछ का बीज और तालमखाना दोनों के बराबर ले पूर्ण फर एक तोला अथवा छ मासा के अन्दा खाकर ऊपरसे ततकाल दुहा दूध पीने से धातुक्षीण मनुष्य बीर्यवान होता है। भांग खानेवाला बीर्य क्षीण घल हीन भयघा युढ़ापा हो अर्थात् शीतरल पदार्थों के सेवन से हानि पहुंचती है। उसके लिये यह मादन राम पाण कामेश्वर मोदक। चूर्णांशंगगनंघनाईविमलं गंधंचकुष्टामृता। मेथी मोचरसोविदारिमुसलीगोक्षुरकंचेभुरः ॥ भोरुश्चैवकसेरुक यमनिकातालांकुरंधान्यकम् । यष्टीनागवलातिलामधुरि- .

. पाव, उत्तौयग्वगड। बानरी चूा। जो नवौन प्रमेह को दूर कर यायं का पुष्ट करता है। वनक्षेपाछ के बीज की गरी, तालमखाना का योन, मफेद मुमली, उटङ्गन का बोन. मोधरम, उटकटेरा की जड़ का छाल, योजचन्द, बहुः फलो, कमरकम शतावर, समुद्रशोप और मूखासिंघाड़ा सयको बरायर भाग ले महीन चूर्ण करले इमका मात्रा २ मामा से ६ मामा सा है:चूर्ण की माधी मिश्री पूर्ण में मिमा मुख में रख पायभर गी के दूध मे पोजावे सिर्फ मधेरे प्रथयों दोनों समय सानेसे निस्सन्देह.उपरीकगुण होता है । धातु पुष्ट पर माषादि मोदक । धुली हुई दाल का चूर्ण। गेहूं का सत्त, लव का सत्त. यह तीन चीजें एक एक पाय, साठी धावत का चूर्ण माधपाव छोटीपीपल गोदुग्ध मे शुद्ध चूर्ण एक टाक घी तीन , धिनी, 1.5॥ सेर, प्रथम सव धूों को एकत्रित कर घी में सूत्र भूजे जप सुरखो भाजाय और सुगन्ध उठनेलगे अग्नि पर से उतारलेय। चिनी की चासमो बनाय उसी भंगा पूर्ण और बदाम पिस्ता किसमिस चिरोंजी माघ २ पाय कतर फर हाल दे और एक २ उँटाक का लडू बांध ले । सांम सबेरे एक २ लडू खाकर ऊपर से दूध पी । तेल मिर्च खटाई प्रादि गरम चीजों से पह- २ज रखे धातु गाढ़ा और पुष्ट हो और शारीरक बल की वृद्धि हे ।। अंथ काम मर्दनो मोदक। तालमखाना का बीज, नागोरी असगन्ध, पच्छाही शतावर, मुलेटी, धनवादका बीज की गरी, नागवला और प्रतिबला के जयका छाल उक्त प्राठों चीजों को एक २ उँटाफ ले फूटकर महीन चूर्ण करलेय धार सेर गौका दृध ले कढ़ाई में डाल चुरवै जथ एक हिस्सा दूध जल जाय उक्त माठों चीजों का चूर्ण उसी में डाल दे और करछुल से जाय जब दूध सोषा के समान हो जाय अग्नि पर से उतारले, बाद कदाई मापकर डेढ़पाव पी हाल खोवाको खूब भूजे, जम सुरखी भाजाय . । ।

लड्डू - पानग्यदर्पण और सुगन्धि नठने लगे दो सेर धिनी को चामनी धनाय उसी में खोया और थोडा बहुत मेवा मिना के एक २ उंटाक के बनायले सांम संधेरे एक लाडू खा कर ऊपर से दूध पीने से नष्ट हुमा उत्पन्न होता है, यह मोदक प्रायः प्रांजमाने में आया हे तीन मास पथ्यंन्त सेयन करने से यथार्थ वीर्य की ताकत फलक उठता है परन्तु गरम चीजों और स्त्री प्रमादि से पहरेज रखना होगा ।। गुप्ताफलंगोक्षुरकाच्चबीजंतथोच्चटांगोपयप्ताबिपाच्य । खाजाहतंशर्करयाचयुक्त पोत्त्वानरोहृष्यतिसर्वगात्रं ॥ 'केवाल को घी मासा, या गोखुरु ६ मासा. उदंगम का बोज मासा तोगों को महीन चूर्णकर १ सेर गौके दूध डाल गन्दाग्निमें पचाथै जब एक हिस्सा दूध जल जाय अग्नि से उतार ले और शीतल होने पर मथानी से सूब मथै और ३ तोला बिगो हाल के पोवै इसीप्रकार राज ५ या ६ बजे संध्या समय पीने से वीर्य प्रसंग में अति हर्ष प्रगट करने पाला हेाता हे। अहिफेन । भाषामें अफीम और अंगरेजी में (मोपियम) कहते हैं इसकी उत्पत्ति स्थाग भारत भूमि है। प्राण भारत में अफीम खानेवाले चौपाई मनुष्य से कम न होंगे और इसको लोग कई प्रकार से सेवन करते हैं, गोली, घोल के, वर्श (यह शब्द हिकमत का है) चण्डू मदक इत्यादि । भूतपूर्व समय में सिवाय औषध विधि के मौकिया लोग नहीं खाते ये मुसलमानों के बजे में भारत में जाग इसका बहुत कुछ प्रचार बढ़गया है यहां तक कोई रोग क्यों न हो जय देखा की नहीं माराम होता है तो अफीम खाने लगाते हैं, माया मिपयो लेग स्तंभन के लिये और बहुत से लोग गाई भर साते हैं लेकिन अफीम किस प्रकार किम योग के साथ और केसे प्रकृतिवाले को खाना चाहिये, यह न जाननेसे भक्तर अफीम खाने धाले निकम्मे और बेफाम हो जाते हैं इसलिये हम पाठकगणों के उप. कारा भफीम खाने की कुछ, विधि लिखते हैं।

१२० तृतीयगड । अफीम की प्रथम विधि । माधी छंटाक फोम को पावभर पानी में घोलकर विलायटिंग- पेपर में अथवा बहुत गफ बस्त्र का दो तीन परत करके छान लेवे त- त्पश्चात् उसे धूराहे पर चढ़ाय मन्दाग्नि में पचाव जब सूध गाढ़ा लेई के भमान हो जाय अग्नि पर में उतार लेप और यन्सोधन २ तोला, छोटी लायची का दाना १ तोला, जमरकरहा.६ मांसा, यहिमनमुर्ख ६ भासा लोट पीपर ३ मासा, कपूर ३ गामा, जायफल ३ मासा, जावित्री १॥ मासा, कस्तूरी ६ रत्ती, नांदी का यर्क २५ ताथ, सोनेका वर्क ५ ताथ सब दयाश्यों को पूर्ण कर उक्त अफीम में मिला अपने खाने के अन्दाज से गोली बनाले परन्तु कैवाहू अधिक खानेवाला हो ३ मासे अधिक न खाये और सर्व साधारण के लिये प्राधे मूंग से ले कर चने घायर गालियां बनावे । एक गोणी शाम को खाकर ऊपर से पाव भर दूध पका हुमा मिश्रीया बताशा हालकर पीने से-शरदी मजला कान के शब्द लकवा कम्पघायु मिर्गी कमलवायु मांगददं मसूड़ों का मूजन, मुख दुर्गन्धि मुख से लार पहना जिगर को निर्यलता और शीघ्र वीर्य पात का जाना इत्यादि रोगों को गाश करता है अगर मिशाल बहुत गर्म हो पात भादि का कुछ यिभार ऐधैि तो निम्नलिखित सूप में अफीम बमा के खाये। अफीम को दूसरी विधि। प्राची छंटाक अफीम की एक पाष अर्फ गुलाब और एफपाय पर्क केघड़ा दोनों को एक में मिला उसी में अफीमको घोल पिलायटिंगपेपर अथवा पूर्वक्ति प्रकार कहे हुये कपड़े में छान अग्नि पर चढ़ाय धोमो प्रांच से पकाये जब भीम शाद के समान गाढ़ा हे। जावै अग्नि परसे अतार नीचे लिखे हुये घायों को मिला के गोली यांप लेथे। बसले. चन २ नाता छोटीलायची के दाने १ तोला, मफेदचन्दन १ तोला, ६ मासा, शीतलचीमी ३ मामा, कपूर ३ मासा, चांदी का वर्फ २५ ताव भय का महीन पीस ममी में मिला पूर्व प्रकार गोली बना लेयरस ।

भारोग्यदर्पण। १२१ गोली को भी खाकर कपर दूध पीने से प्रथम मिधि के कहे हुये . समस्त रोगों का नाश होता है। डाकृरी मत से अफीम के गुणाऽगुण के लक्षण । डाकृरी मत में अफीम से अनेक औषधियां बनती हैं. और अनेक रोगों पर अनेक विधि से दी जाती है। अफीम का प्रत्यक्ष गुण है, म. स्तिष्क उत्तेजक निद्राकारक, दर्द नाशक, थकाईको दूर करनेवाला, पसीना लानेवाला और मादक है। योगी अफीम खाने से, प्रथम उसकी गरमी समुदाय शरीर में फैलकर तब शिर में नशा पहुंचता है और पूर्ण मात्रा अफीम के सेवन से दशही १५ मिनट के बाद माथे में भारी पम, और शरीर चैतन्य बोध होती है किसी प्रकार दर्द वगैरह हो वह भी हलका हो जाता है, मनोवृत्ति, बुद्धि पृद्धि धर्म प्रभृति मादि समु- दाय मानसिक धर्म उत्तेजित भोर प्रसारित होता है, बात घमानेवाली, बात करनेवाली, और बुद्धि धारण करनेवाली नाड़ियां बलवती होती हैं, साहस, पराक्रम और चातुरी बढ़ती है, अनेक मनोरम पदार्थों का भाच्या मालूम होना और सम्पूर्ण शरीर के जोड पुष्ठ हेरते हैं परन्तु ग- द्यपान से शरीर की संधियां पुष्ठ न । के और शिपिल हो जाती हैं । इस रूप अवस्थाके प्राध घंटावाद अथवा नस्से कुछ अधिक काला के बाद निद्रा का समागम होने लगता है वह निद्रा सुपुप्ति के समान स्वप्न हीन ८ । १० घंटा पर्यन्त रहता है याद अग्नि मन्दतादि उपद्रव होते हैं। अगर नींद लाने के लिये कम मात्रा अफीम खिलाये ते पूर्ण निद्रा न हो गई निद्रा इग्गां और नाना प्रकार के स्वप्न देखेगा परन्तु वह स्वम सुन्दर मनोहर और कहीं २ भय जनक भी होगा जैसे मति शोधग्रस्त मनुष्य को देख पाहता हे । प्रकृति भेद से अफीम के गुण भी भिन्न देखा जाता है जैसे किसी को अफीम से उसे जम फ्रिपा मधिन हो, किमी को मादकता अधिक हो किसी को कोष्ठबद्ध किमी का काष्ठ परिस्कार हो, कम उमरवाले को अफीम भंधिक नशा करता है, रोग विशेष खामकर दर्द रोग में कम १२२ तृतीयखगड। गशा होता है, सन्निकट मृत्यु अवस्था में नएप मात्रा भी अफीम गीघ्र मृत्यु कारक होता है । इपेकाकूञानाके माप अफीम पसीना लानेवाला और फलोमिल संघटित कोष्ठबद्ध का नाशक होता है । 'अफीम सेवन का अभ्यास करने में यदि मात्रा वृद्धि न हो तो शा. रीरिक अथवा मानसिक कोई विशेष पानि नहीं किन्तु अफीम की यह मोहनी शक्ति है कि प्रथम नियमित मात्रा किसी प्रकार रह नहीं मक्का फ्रमशः अवश्य ही बढ़ता जायगा इसी में अफीम खानेवाला अन्त होने से मालस्य ग्लानि उदाशीनता नेत्रश्राव और भुमाई आने लगती है जय तक अफीम ने खावै ऐसाही दशा रहती है। शेषमग्रे- - . हरिद्रा। अथवा द्रव्य संसार में जितनी यात प्रचलित है और जो जो धातु दिन रान हम अपने काम में बर्त रहे हैं खापो रहे हैं वे सघ किसी न किसी ऋपियों का अजमूह पृथ्वीभर में ऐसाही कोई देश बचा होगा | जहां हरदी काम में न भाती हो हम लोग पाक समय तरकारी दाल और मांस में हरदी हालते हैं यह तो माधारण हरिद्रा का व्यवहार है परन्तु हरदी को महतं उपकारी यस्तु जानना चाहिये । वैद्यक में हरदो को रजनी, गौरी, परवणिमी, वर्णवती, निशा और वर्णविलासिनी कहते हैं । गुण में कहवी, तेज, सूखी और गर्म है त्रिदोषनाशक त्यचारोग प्रमेह मूजन पांडुरोग फोड़े फुमी को नाश करती है । राजवाम ग्रन्य में शायरोग पर हरिद्रा को पानी में घिस कर लेप करने से शीघरोग नाशः होमा लिखा है। डाकृर लोग भी भाष कल. शोथरोग में, हरिद्रा का व्यवहार करते हैं । इसमें कृमि नाश करने की एक माश्चर्य शक्ति है. कि जिसे प्रायः ग्रामीण जन भी जानते हैं बालक के कृमि होने से स्त्रियां अक्तर पच्ची हरदी को गुरु के साथ खिला देती हैं बंगाल में अनेक स्त्री पुरुप सावुन, के तरह. समस्त शरीर में लेपना करके स्नान करते हैं इस मान्त में भी विवाह के पूर्व लाको को हरदो तेल . लगाते हैं. इसमें - .

मफिस साहय पारोग्यदर्पण। १२३ सन्देह नहीं कि तैल के साथ अथवा कोई लेपन बस्तुके साथ हरदी को शरीर में लगा के स्नान करने से शरीरका वर्ण उजधल सुन्दर शोभायमान होता है इसी से हरदी का नाम ऋषियों ने वर्णवती वर्णविलासिमी लिखा है ॥ डाकृरी किताबों को देखिये तो उसमें भी हरिद्रा के भनेकांश गुण लिखे हैं डाकर अपनी किताब में धर्म रोग पर हरदी को उत्कृष्ट महौषध लिखा है और किसी के मन में बहुमूत्र रोग में हरिद्रा अति उपकारी लिखा है ॥ विलायत के वैज्ञानिक डाकर लोगों ने हरिद्रा के सहायता से एक प्रयोजनीक विषय परीक्षा करने के लिये उपाय निकाला है (टारमेरिक) नामक एक विलायती कागज़ है उसे हरदी में तर कर लेय अर्थात् :- रदी को पानी में सूत्र महीन पीस फागज के चारोंतरफ लेपन कर छाया में यायु द्वारा सुखालेय । उस कागज़ को किसी वस्तु में डालने से यदि वह कागज़ लाल वर्ण हो जाय तो जानना कि उसमें क्षार पदार्थ है। हाकर लोग प्रायः इसी उपाय से भोपध अथवा कोई खाने की यस्तुहो, जल और मूत्र को परीक्षा कर लेते हैं कि इसमें क्षार पदार्थ है कि नहीं विख्यात हाकृर रईल साक्ष्य ने भी हरदी का बहुत कुछ गुण लिखा है हकीमी मत से भी हरदी का गुण पीड़ा शान्तिकारक और प्रमेह रोग. का परम भीषध लिखा है॥ वैद्यक में लिखा है कि हरदी के चूर्ण को कच्चे आंवले के स्वरसके साथ खाने से प्रमेह रोग नाश होता है । यह तो प्रसिद्ध है जिस स्थान में चोट लगी हों हरदी को-धूने के साप जल में पोम गरम कर लेप क- रनेसे दर्द और शोध माराम होताहै । कुछ शारीरकही उपयोगी नहीं है हरदी में और भी अनेक गुण हैं। रोली भी हरदीही से बनती है हम लोगों के यायत शुभ कार्य है सभों में हरदी की आवश्यकता होती है। हरदी का गुण केवल रोग हो पर निर्भर नहीं है किसी २.जीवों के लिये विष है जैसे किसी प्रकार पडिपाण के शरीर में हरिया प्रवेश .

. १२४ तृतीयखगड। करने से घड़ियाल शीघ्रही मर जाता है। अक्सर शिकारी लोग गोली के, जगह हरदी को भर कर घड़ियाल को मारते हैं। हमने सुना है कि सर्प को हरदी की गन्ध अच्छी नहीं मालूम होती। गुलाब प्रादि वृक्षों के जल में हरदो का चूर्ण डालनेसे फूल में रूमि नहीं लगता । साधाव भी हरदी से साफ होता है। यही कारण है जो धर्मकार लेग चमड़े के काम में हरदी का अधिक प्रयोग करते हैं । भांग को जरा सा हरदी के साथ घोंट कर पीने से जहर के समान मशा करता है। दीपन पाचन प्रादि नाम । वैद्यक के ग्रन्थों में बहुत से नाम ऐसे प्राते हैं जो बिना सुलासा किये कोष देखने से भी बोध नहीं होता जसे दीपन पाचन समन - 1 और गनु लोमन आदि। - दीपन । ... जा औषध आंव को न पचावै परंतु भनि को दीप्त कर तिसे दीपन फरते हैं जैसे ( मैफ) यह सौंफ का विशेष गुण है लेकिन मौंफ अपने साधारण गुण से पित्तवर्द्धक एवं ज्वर घायु कर्फ उदरशूल गांव और नेत्र रोग को नष्ट करता है। आमयात पांडे और ग्रहणी रोग में प्राय: वैद्य लोग (त) माठा के साथ औषध सेवन कराते हैं यदि तक के बदले में सैफ के मर्फ से लवणभास्कार मादि उत्कृष्ट पूर्ण सेवन कराध और पानी की जगह सैफ, का अर्फशी पीने को देवे तो बहुत अधिक फायदा करता है एवं भांग को फ. के संग घोट, कर पीने से भांग का उण वायु बर्द्धक विकार.जाता रहता है परंतु जो लोग सैफ का गुण नहीं जानते सैफ को शीत कारक समझ कर केवल भांग और मिर्चही घोंटकर पीते, हैं से उनकी भूल है इसे भांग प्रकर्ण में लिखेंगे । पाचन । माधाको पाचन करें और अनि, बुद्धि न करें वसे पाचन कहते हैं पागग्य दर्पगा। जैसे (नागकेशर) यह प्रधान गुण है परन्तु नागकेशर साज, अमन शरीर की दुर्गन्धि और अधिक पसीना माना इन रोगों को नाश करता है । और किसी दवा में दीपन पाचन दोनों गुण रहते हैं जैसे (चीता) यह गर्म है कटु है शोथ, 'कृमि रोग और बादी बवासीर को नाश करता है। समन। जो औषघ पेट शुद्ध करे और पतले मल को बांध न सके परन्तु पढ़े हुये दोषों को समन फरै उसे समन कहते हैं जैमें (गुरच) भारत के सभी स्थानों में गुडूपो मिलसक्ती है और प्रसिद्ध नाम इसका गुर्च या गिलोय है । यह गर्म और स्वाद में कटु हे ज्वर, संनिपात, प्रमेह बात- रक्त कोढ़ और पांडुरोग नाशक हे बलकर तथा रसायन है। कोई रोग क्यों न हो गुर्च सघ को समम करती है यही कारणा है जो वैद्य लोग अफ्तर गुर्घ के के स्वरस में औषध देते हैं । इसीको अस्सा भी कहते हैं वैद्यक में इसकी उत्पत्ति यों लिखी है कि जय बानारों की सेना सहित श्री रामचन्द्र जी ने रण में रावण को मारा तय राक्षसों के हाथ से मारे हुये बानरों पर इन्द्र ने अमृत की वर्षा की तो अमृत के प्रभाव से सय यानर उठ खड़े ये सनसे अतिरिक्त जो पृथ्वी में अमृत की यून्द गिरों तिमसे गिलोय उत्पन्न हुई इसी से इसका नाम भमता पहा है। अनुलोमन। ना प्रौषध प्रजोर्स मलको पचाये और Wधेहुये मलको फोड़के अधी- भार्ग से नीचे गिराये यह अनुलोमन कहाता:हे-जैसे (हड़ या,ह) इसकी उत्पत्ति घेद्यक शास्त्र में दो प्रकार से लिखी है भन्यन्तरिमादि.निघण्टों में तो यह लिखा है कि धन्वन्तरि महाराज हाथ में हर शियेहुये समुद्र से निकले हैं और हरोतम्यादि निघण्ट में लिखा है कि एक समय इन्द्र वर्ग, में मृत पान करते थे उसमें कुछ यून्द पथ्ली में गिरा उसी से रोतको + तृतीयखण्ड । उत्पन्न हुई जिसके पृपक नाम मातप्रकार हैं जैसे विजपा, १ रोहणी. २ पूतना, ३ अमृता, ४ अभपा. ५ जीवन्ती, ६ घेतकी,' ( लक्षण ) || (१) जिस्का तूंधी के समान गोल भाकार होता है यह घिशया कहातो. हे सब प्रकार को हड़ों में विजया नाम हा अतिश्रेष्ठ है किमी 'नौषध के प्रकर्स में किसी हड़ का नाम खोल के न लिखा हो सिर्फ हरीतकी या इडलिखा हो तो इसी को ले क्योंकि ग्रन्थों में इस को सब रोगों में देना लिखा है ॥ ( २ ) जो बिलकुन गोल. न है। यह गहणी है, फोड़ा फुन्सी और घाव में फायदा करती है इसीसे इसे प्रणरोपिणी भी कहते हैं. ॥ (३) जिसके भीतर गुठली हेलेकिन बहुत मोटी गुठली न के। (छोटी हरै).वह पूतना है इसको प्रलेप बादि में योजन करना उचित है । (४) जिस्में बहुत गूदा. हो यह अमृता कहलाती है दस्तायर हे रेघम कर्म में इसी को लेना उचित है। (५) जिस्में पांच लकीर हो वह अभया है नेत्र रोग में नार्थ इसी को लेना चाहिये । (६) पीले रंग की जीवंती होती है, नाग लेने के तेल मादि में अधिक गुण दापक है ।:: (७) जिसमें, तीन लकीरें हों वह घेतकी दो प्रकार की होती है.।' एक सफेद रंग ६ अङ्गुल की लम्बी से कम मिलती है किसी किसी को उमके देखने छूने या मूंघने से दस्त होता है दूसरी १ अंगुल की लम्बी काली होती है। ( उत्तम हड़ की पहचान )-जो हड़ नवीन चिकना गोल भारी जल में डालने से दूबै जाय वह बहुत गुरादायक होती है। (अन्पच्च) जो हरै का.फल तौल में १ तोला ८ मासा हो उसे भी प्रति गुणदायक समझना (हरीतको को साधारण गुण) हर को धाकर खाने से अग्निद्धि होती है पीसकर खाने से मले शुद्ध होता है, अर्क सोंचकर -- - आरोग्यदर्पगा १२० पीने से मोटी शरीर दुषली होती है ( परन्तु जिसे धातु की बिमारी न हो) और भूजकर खाने से त्रिदोष का नाश होता है ( अन्य प्रकार :) हरीतकी भोजन के साथ खानेसे बुद्धिषल और इन्द्रियों को चैतन्य करती है .. भोजन के पीछे खाने से अन्न तथा पानी के दोषों को करती है (अनुपान भेद से गुण) ,सेंधव अथवा सोचर लवण के साथ खाने से कफ दूर करती है, मिनी के साथ पित्त को और गुड़ के साथ घात के नाश करती है॥ योजे बाजे लोग हरै को चारों महीना खाते हैं उन्हें नीचे लिखित प्रकार पर खाने से अतिलाभ होगा जैसे, बर्षाऋतु में सेंधव लवणके माप, शरदनातु में मिश्री के साथ, हेमन्त ऋतु में शोंठ के साथ, बसन्तमें छोटी पीपल के साथ, ग्रीष्म में शहद के संग, और प्राकृऋतु में गुहके साप । निषेध-मार्ग से अति थकित, अति दुर्घल, रूखा, कमजोर, पित्तरोग युक्त, गर्भवती, उपबासी और जिस के शरीर से रक्त निकला हो इतने प्रकार के मनुष्य हए न खांय हरीतकी फरप में हइ . का बहुत कुछ माहात्म्य लिखा है परन्तु संक्षेप रूप से यह बाक्य प्रमिद्ध है। श्लोक-यस्यमातागृहेनास्ति तस्यमाताहरोतकी । कदाचित्कुपितामाता नोदरस्थाहरीतकी ॥१॥ अर्थात् जिसको माता घर में नहीं है उसकी माता हर हे कदाचित माता खफा हो जाय पर पेट में पड़ी हुई हड़ कभी कोप को नहीं प्राप्त हती मर्यात् विकार नहीं उपजाती ॥ अंसन और भेदन। 'जो भोजन किया हुभ्रा पदार्थ अनपध होकर कोठे में लपटके रहें गया हो (जिसे हिकमत में गांटे पर जाना कहते हैं) उसे फोड़ कर जो आप नीचे गिरावै उसे अंसन कहते हैं, जैसे प्रमिलतासकागूदां ।' यद्यपि ॥

१२८ तृतीयखंण्ड । भमिलतास के गूदे में कुछ जी मचलाना गुणहे परन्तु मल फोड़कर नों गिराने में प्रधान औषध है जो मल बातादि दोषसे बँधाहो या म बंधा हो या सूख गया हो. उमे फोह के जो मधोमार्गसे गिराये उसे मेदन क. हते हैं जैसे ( कुटकी) यह प्रमिलु औषध है, गुण में शीतल तीतो कहुई हलकी भेदनी कफ पित्तावर प्रमेहं श्याम कुष्ठ' और कृमि रोग नाशको और मुख का तीतापन नाश करने में भी कुटकी एकही है। बाजे २ ज्वर रोग वाले का मुख बहुत दिन तक कटु बना रहता है वह कडुभाई कु. टको क्वाथ से जाती रहती है जैसा कि लोलिम्बराज कवि ने परिहास पूर्यक कटुभाई पन की चिकित्सा बतलाई है और एक श्लाक भी कहा। ममद्वयंविस्मयमातनोति तिक्ताकपायोमुखतिक्तताप्नः । निपीड़ितोरोज सरोजकोपा योषाप्रमोदं प्रचुरंप्रयाति ॥ लोलिम्बराज कधि कहते हैं कि मुझे दो बिस्मप होते हैं एक या फि जिसका नाम तिक्ता अर्थात कुटकी है उसके हाथ से मुख को कडु। माहट दूर हो जाती है दूसरे स्त्री लोगों के कमल के समान कोमल स्तनों के मस्ति होने से उन्हें बहुत अधिक हर्ष होताहै। इसमें विस्मय की मात यह है कि प्रति तीता तिता मे तीतापन का नाश करे और अ.विशेष के पीड़ित हाने से प्रमोद की. अधिकता हो .सका कारण "विपस्स विषमौषधम्" दिखलाया है। रेचन (जुलाब) मल दोषों में विशेष. पक गया हो या.न पका होय या कुछ दिन का सञ्चित हो जो भीषध उसे अपने प्रधान गुणसे एकत्रित और पतला कर के नीचे या उमे रेषन कहते हैं जैसे.( निशोथ) म औषध पर पाठकगण को भपिस ध्यान रखना चाहिये क्योंकि रेधन कर्म में निशोथ अत्यन्त गुणकारी श्रीनधाई सुश्रुतमें इसकी ब{त कुछ प्रशंमा लिखी ॥ सुश्रुत सूत्र स्थान ४४वां अध्याय-विरेचन औषधों में जा किंचित मालवणं निशोत का (निशोतसे जाका उम्ल) छालों में (कोटीलोधका) - भाग्यदर्पग। १२६ फलों में (हड़) सेलों में (ऐरण्ड तेल) दूधों में थूहर का दूध दस्त लाने में श्रेष्ठ है। निशोतं का मात्रा एक मासा से एक तोला पर्यन्त है, निशोत सेंधानान शोंठ आदि के सङ्ग सेवन करने से वायु का, रुख के रस या मोठे अनारके रस अथवा दूध के सङ्ग पीनेसे पित्तका और गुर्घ त्रिफला नादि भौषधों के संग खाने में कफ रोग को नाश करता है। शे०- बमन । कच्चा पित्त और कथा कफ (जो कफ पित्त पक जाते हैं ये साप निकल जाते हैं) की जो औषध अपने बलमे अर्द्धमार्ग अर्थात् फै कराने के द्वारा बाहर निकाले नसे वमन कहते हैं । जैसे (मैनफल) यह औषध के कराने के लिये प्रति उत्तम है। मैमफल गुण में नया रूग्वा हलका फै लाने वाला, पोनम और फोडा फुन्सी रोग का नाशक है ॥ शरीर शोधन । जो मौषध अपने बल से कुपित मल, पित्त और कफ को कुपित. स्थान से छुटाय के उसे गर्द्धमार्ग या अधोमार्ग से गिरावै उसे शरीर शोधम कहते हैं। जैसे (देवदालो) इसको कहीं २ घघरवेलि, या नियालि, यंदाली भौर यंदाण भी कहते हैं। वैद्यक में इतने नाम हैं। कोटी, गरागरी, देवताही, वृत्तकोश और जीमृत । यह एक प्रकार की लता है. रोखमा को समान फल देता है उसमें भी देः भेद हैं. एक चिकगा दूमरा पीतवस और खरखरा हेता दे किमी २ वैद्यक ग्रन्यके टीकाकारोंने इसे धातुरूई करके लिखा हे देयदाली स्वाद में तीखी घरफरोहे यमन कराने थाली कफ, घावामीर, गोप पांहु. रुमि और उयर हो नाश पारती है। इसके फन फागु-परेक रोग नाशक श्रमन हे अर्थात् मलों को पताना करके बहानेयामा है। दूमरा फान जो पीत वर्ण और सरसरा है अपरेशन गुमा के अतिरिक्त ग्रिप का नाशक है । हम फान का एक परीक्षा हमने और लिया है, गिर में यलगा जम गयाहो भोर नाशिका द्वारा में मिलता है। में पानी में मिजाप निचोभी र निशील नाम भय का पानी है।कर यह निकन्नता है लेकिन यह निर्णय कर देने में मर तृतीयखगड । लेना चाहिये कि बलगम गिर में जमा है । पित्त कामाला (वन) रोग में भी इसके द्वारा पीले रंग का दूषित पानी नाशिका के द्वारा बहाया - जाता छेदन । जो मौषध बँधे हुये कफ भादि के दोपों को अपनी शक्ति में फोड़ कर बाहर निकाले उसे छेदन कहते । जैसे जघाखार, गोंठ मिर्च और पीपर ।। लेखन रस रक्त मांस आदि धातु और मम्न सूत्रादि, जे औषध इन्हें सुखा के शरीर को दुर्वल कर उसे लेखन कहते हैं। जैसे--शहद, गरम जल. और यय । यही कारण है जो गर्म मिजाजयाले को शहद और गर्मजन का सेवन निषेध किया है परन्तु पाठकगण को इस बात का अाश्चर्य हेगा कि यघ धातु शोषक है तो दाह रोग में ययमन्य (जी का सत्तू) पीने के पों लिखा ? इसका कारण यह है कि ममस्त औषध पांच रूप से गुणकारी होते हैं जेसे योर्य बिपाय और शक्ति शादि कोई औ. पध रस से कोई वीर्य से और कोई यिपाक में गुण करते हैं जैसे बर्फ पीने में शीतल दाह नाशक है परन्तु विपाक में गर्म है। धातु को दुर्बल और मूत्राशय के जल को शुष्क करता है। ग्राही--जिग भौषधियों में दीपन और पाचन गुण दोनों हैं परन्तु अपने सप्ण शक्ति मे कफ धातु और मल इनके रस को सुखावै उसे पाही कहते हैं । जैसे-शोंठ श्वेत जीरा और गज पीपर । इन तीनों औषधों का प्रयोग कंफ, अतीसार और ग्रहणी आदि रोगों में करना उचित है। स्तम्भन--जो औषधी रूखी और प्रकृति में शीतल तथा कषायल हो और पाचन शक्ति जिसमें बहुत कम हो परन्तु वातकृत अर्थात् मात कारी हो उसे स्तम्भन कहते हैं । जैसे कुरैया का छाल और सोहनपत्र । एम स्तम्भन शब्द को धातु स्तम्भन में न समझना यह मल स्तम्भन है - पारोग्यदर्पण। बहते हुये मल (भतीसार) को जो बांधे उसे स्तम्भन कहते हैं। फुरैया को धैद्यक में कुटज कहते हैं कुटज वृक्ष दक्षिण में बहुत होते हैं इस वृक्ष में लम्बी छीमी निकलती है उसके भीतर के बीज को इन्द्रजय पाहते हैं। फुटज अतीसार रोग में प्रधान औपध है । हारी में भी इस औषधका व्यवहार है ल्याटिन में (राईटिया एटिन्टि सेन्टेरिफा करटेक्स) और अंगरेजी में (फनेसाई वार्फ कहते हैं । i रसायन--जी औषध मनुष्य को शीघ्र शुद्ध होने न देय अर्थात् जिस सीपध को नित्यशा सेवन करने से जल्दी बुढ़ापा न होय उसे रसायन कहते हैं । जैसे-मुर्घ, रुद्रवन्ती, गूगुल, और हरीतकी ॥ की योगीकरणा--जिस प्रौपध के सेवन मे रिटायों के साथ मैथुनमें अ. धिक हर्ष उत्पा हो तिमे बाजीकरण कहते हैं । जैसे-बरियारा का जड़ गुप्लसकरी और केवाछवीज वीर्य में होत्पन्न करने में यह तीनों प्रधान पौषध हैं। शुक्रल--जो औपध धातु को बढ़ावे उमे शुफल पाहते हैं। जैसे असगन्ध, दानों मूसली और शतावर, यह नौपध योर्य को वृद्ध और भी करते हैं परन्तु असगन्ध विशेष कर स्त्रियों के रज को अधिक बढ़ाता है। दूध, सर्द और भांपला वे भी धातु को बढ़ाते हैं उसी से रेसजन्य कहे जाते हैं । यही भटकटैया का.फल स्त्रियों के धातुको रेचन करता है, फल यीर्य स्तम्भक है, वीर्य्य शोषक यमाहट और तबूंज है, विशेष हाल मालूम होगा। सूक्ष्म शरीर के महीन रोम मार्ग कूपों के द्वारा, सेंधवनोन. सहत निम्ब और ऐरपष्ट तेल देह में पैठते हैं इससे घे सूक्ष्म कहाते हैं. यही कारण है जो उक्त धारों औषध वातरोगाधिकार में श्रेष्ट कहे गये हैं। ध्यवायि-जो द्रव्य पहिलें समस्त शरीर के नालियों में मांस , तप उसका परिपाक हावै तिसे व्ययापि कहते हैं जैसे भांग और अफीम । जाय- मागे २३२ तृतीयखगड । विकाशि-उस द्रव्य को कहते हैं जो शरीर के बन्धन को ढीले कर और रसादिक धातु और शुक्र को क्षीण कर जमे सुपारी और केोदी का चावल " . प्रधान मादक-द्रष्य वाह है जो बुद्धि के। लोप करे और तमोगुण हो जैसे मद्य भादि । विष-व्ययायि और विफाशि है। छोटे २ नमों के द्वारा मद कत अग्नि बर्द्धन (समस्त शरीर में ज्यालः करदे) मृत्यु कारफ यह सन द्रव्य जिस प्रौषध में ( योगवाहि ) संग पावै सगुण करै, जैसे संखिया और सीगिया आदि। प्रमाथी-वे द्रध्य कहलाते हैं जो अपने से मंधित दोषों को प्रांतों से निकाल डालै जैसे मरिच और च ॥ अभिप्यन्दी-जो द्रव्य अपनी चिकनता गुण फरफे रम वाहिनी मा. हियों को निरोध पार गरीर को जड़ करै ठमे अभिप्यन्दी कहते हैं । जैसे (दही) यद्यपि जीव भेद मे दही के गुण भीर रूपान्तर होने से प्रकृत औरही हो जाती है तथापि दही अपने साधारण गुणा से श्लेष्म प्रकृति याले फेो दुर्गुणही है इसीसे शुश्रुत ने रात को दधि साना निषेध किया है "रात को दही न खाना और न बिमा घी के चिनी" ॥ आन्हिक कर्म। बहुत है गार्य हैं जो आजफान अपने नित्य कर्ममे ऐसे व्युत होगये हैं फि जिसका कुछ कथग नहीं है । अभिनिवेश चित्त से ध्यान देकर देखते हैं तो भूतपूर्व ऋषियों के कहे हमलोगों के लिपे यांयत् प्राधार हैं वे निश्चय भायु इमित सन्तान, और धन वृद्धि करनेवाले हैं पस में सन्देह नहीं वेद के न जानने से पाचार के छोसगे से, भालस्य से मृत्यु प्रायों को मारने की इच्छा करती है। कारण यह कि प्राधारन पालने मनुष्य मल्पायु होता है, सर्वदा रोग ग्रस्त रहताहे मग दीर्घष्य ग्लानि भारोग्यदर्पण। १३३ और गोकयुत रहता है हम लिय शारीरिक स्वास्थ्य लाभार्थ प्राचार पालन करना सयको नचित है। वसिष्टः, आचारःपरमोधर्मःसर्वपामितिनिश्चियः । वसिष्ट जी कहते हैं कि भाचार यह परम धर्म प्रथियों का मत । पराशरः दक्षः।... चतुर्णामपिवर्णानाप्राचारोधर्मपालनम् । आचार- भ्रष्टदेहानांभवेद्धर्मपराङ्मुखः ॥ दुराचारोहिपुरुपोलोके- भवतिनिंदितः। दुःखभोगीचसततंरोगोचाल्पायुपीभवेत्॥ पराशर और दक्ष कहते हैं कि धारोमणों को आधारसे रहना धर्म है आधार से भ्रष्ट मनुष्य धर्म से घञ्चित रहते हैं, दुराचारी पुरुष लोकमें निन्दित हमेशा दुःखका भोगनेवाला और शीघ्र मृत्युको प्राप्त होता है। है। कोट पतलून धारी हेटलमें महाप्रसाद खानेयाले इधर देखो मुम्हारे भूतपूर्ण ऋषीगण क्या कहते हैं । प्रातरुत्थानकालः॥ --- -- घेद से लेकर पुरान तक में यही बघन मिलेंगे मनुष्य को उचित है कि ब्राह्म मुहूर्त (धार घड़ी के तड़के) में उठकर प्रातः स्मरण करै । विष्णु पुराया में प्रातःकाल का प्रमाणं लिखा है। पञ्चपञ्चऊपःकालः सप्तपञ्चारुणोदयः । प्रष्ट पञ्चभ- वेत्प्रातस्ततासूर्योदयःस्मृतः ॥ ... सूर्योदय से ५५ घड़ी पर ऊपःकाल (कितनो के मत से यही ब्राल. मूहूर्त है और बहुतों के मत में ऊषःकाल से एक घड़ी पूर्व ब्राह्ममुहूर्त कहाता अर्थात् ३ घड़ी सूर्योदय होने को रहे उसे ब्रोसमूहूर्त कहते हैं) ५७ घडी पर अरुणोदय और ५८ घड़ी पर प्रातःकाल होता है। सब १३४ हतीयखण्ड । यों को चाहिये कि बात बहूर्त में ईश्वर का स्मर्ण कर अपने कृतकार्य को पिचार कर तब शौच को जावै॥ "ब्राह्ममुहूर्ते योनिद्रामा बलक्षयकारिणी" ब्राह्ममूहूर्त की निद्रा घल के नाश करनेवाली.है इसलिये स्वास्थ्य के चाहनेवले जन अवश्य उक्त समय में नठने का अभ्यास ॥ खकरतलाद्यवं लोकनम् । आचारप्रदीपे-कराग्रेयसतेलक्ष्मो प्रभातेकरदर्शनम् । अन्यच्च-भारद्वाजमयूराणांचापस्यनकुलस्यच। प्रभाते दर्शनंश्रेष्टं बामपृष्ठेविशेषतः ॥ श्रोत्रियंसुभगांगांच अमि- मग्निचितितथा।प्रातरुत्थाययःपश्येदापदभ्यःसप्रमुच्यते॥ हस्त के अग्रभाग में लक्ष्मी का वास है इस्से प्रातकाल उठ हाथ देखे, भारद्वाज (खरोट) मार; टिटहरी, और नेवरा, उन्हें प्रातःकाल देखना शुभ है यामभाग और पीठ पीछे देखे तो भधिक शुम ।। जो मनुष्य प्रातःकाल उठकर यज्ञ करानेवाले, सुन्दर गो यज्ञ के अग्नि का दर्शन करते हैं वह अनेक आपत्ति से छुटजाता है । नागदेव जी कहते हैं प्रातःकाल पापी, दरिद्र. अन्या, नकटा नग्न, फैलायाफल, बहेरा, कौवा, बिल्ली, मूम, नपुंमम और गदहा न्हें न देखे | यदि अकस्मात देख पड़े तो पुनः प्रांख बंद करले । ब्राह्ममुहूर्त में उठ पूर्योक्त पदार्थों को देख जल से तीन फुल्लीकर नेत्र भी मूख धो पषित हो के परमात्मा का ध्यान करै तंब निम्नलिखित । सोका के. पढ़ के पृथ्वी में पाद धरै ॥ .. समुद्रबसनेदेवि पर्वतस्तनमण्डले । विष्णुपत्निनम- स्तुभ्यं पादस्पर्शक्षमस्वमे।।.. ज """ -- : प्रारोग्यपंगा। विणमूत्रोत्सर्ग विधिः। पारस्कर गृह्यसूत्रे-तिष्ठन्नमृत्रपुरीपे. कुर्यात्स्वयं- प्रशीर्णन काष्ठेनगुदंप्रमुंजीत । विकृतंबासोनाच्छादयात् मूत्रपुरीपेष्ठीवनंचातपेनकुर्यात् ॥ खडा हाके दिशा पेशाब न करे, जल का प्रभाव हो अथवा जल दूर हो तो जीर्ण घाम फूस से गुदा पोछ हाले तय जाके शौच करै । जयतक जल मे शुद्ध न हो यस्त्र न पहरे, धूप में सूर्य के सन्मुख दिशा पेशाम न करै कारण यह है कि उस्से प्रायः गिर में दर्द हो जाता है। बौधायन ऋषि कहने हैं (जलाशय से दश हाथ और तीर्थ नदियों से ४० हाथ त्याग के दिशा पेशाम यार (निषेध करने का सषम यह है कि प्रायः जलों के समीप दलदल रहता है) पृथ्वी में तृण पिछा के मूत्र पुरीप त्याग करे (धिना तृण के मूत्र बिन्दु से पाद प्राङ्गादि अशुद्ध हो जाते हैं) पराशर और यम महाराज कहते हैं सबेरे पश्चिम मुख दोपहर उत्तर मुंख, संध्या समय पूर्व मुख. और रात्रिको दक्षिण मुख, बैठ के दिशा पेशाध्य करे। अंधियारी रात में गृह में ही मल मूत्र त्याग करै यह मनु जी की राय है । इस्से स्पष्ट होता हैं कि पहले समय में भाव्यतं बिलकुल जंगल था प्रायः शौचनार्थ बाहर जाना पड़ता था ॥ . शौचे उपबीत (जनेउ) धारणप्रकारः । . अङ्गिराः-मूत्रेतुदक्षिणेकणे पूरीपेवामकर्णके। उप- बीतंसदाधार्य मैथुनेतूपवीतिवत् ॥ पेशाब करने में दक्षिण और दिशा फिरने में बाग कर्ण में जनेऊ. धारण करें और स्त्री प्रसङ्गमें यथावत् रहे । सायणाचार्य का मत है कि यदि दिशा पेशाब करते समय कान पर जनेक चढ़ाना भूल जाय तो 'मधीन जनेऊ धारण करै। किसी २ ऋषियों का मत है कि मूत्र पुगेष - t १३८ तृतीयखण्ड। पियों और वैद्यक का मत भी है। प्रा०५० के १ खगड प्रथम अंक में जो जो विधि दन्तधावन करने के वैद्यक मत से लिख पाये हैं यही बाप भय ऋषियों के मन में पाये जाते हैं विशेष कर्क सिर्फ इतनाही है जैमा विष्णुपुराण लिखा है. प्रामुखस्य धृतिःमोण्यं प्रत्यादि पूर्व मुख दन्त- धायन करने से छडि मुख और शरीर प्रारोग्य, दक्षिण मुख कष्ट, पश्चिम मुख हारि, उत्तर मुख गौ स्त्री और कुटुम्बों का नाश होता है से स्पष्ट हुआ कि पूर्वही मुख वैठ के दतूंनि करना श्रेष्ट है। व्यास जी के मत से प्रतिपदा श्रमावश्या षष्टी नवमी और रविवार के दिन दतूनि करनेवाला सप्तकुल को दहन करनेवाला होता है। शुक्र काट को दतूनि करना ऋषियों ने निषेध किया है। 1 स्नान । स्नान करने की घिधि तथा स्नान के द्वारा आरोग्यता प्राप्ति मान. सिक ननति करना जैसा भार्यावर्त में है अन्य दीपों में नहीं है। वे द्यक मत से स्नान करने का लोभालाभ प्रथम खण्ड में दिया है अब जो कुछ प्राषियों की राय स्नान करने के विषय में है तसे भी प्रकाश करते हैं। इसमें शक नहीं कि जो स्नान और निर्मल बत्रादि से अपने शरीर को पवित्र नहीं रखते थे समंदा मन मलीन दुःखी थिधार होन बालसी और रोगात बने रहते हैं और उससे शारीरिक तथा मानसिक परिश्रम कभी नहीं हो सकेगा। स्नानात्पूर्व भक्षणयोग्याः पदार्थाः चतुर्विंशतिर्मताः। इक्षुरापःफलंमूल पयस्तावूलमौषधम् । भक्षयित्वा- पिकर्तव्याः स्नानदानादिकाःक्रियाः ॥ 'सव ऋषियों का मत है कि (स्तु). ऊख या जल कल कन्द दूध तांबूल और औषध इन्हें भोजन करके भी मनुष्य स्नान दानादिक क्रिया कर सकता है परन्तु बान करके भक्षण करना अति उत्तम है।

मागग्यदर्पण। १३६ हेमाद्री- - स्नानकालः। अरुणकिरणयुक्तां, प्राचीदिशमवलोक्य- सायादिति ॥ याज्ञवल्क्यः-अत्यन्तमलिनाकायो नवछिद्रसमन्वितः। सवत्येवदिवारात्री प्रातःस्नानविशोधनम् ॥१॥ किञ्चित् सूर्योदय देख स्नान करना उत्तम है। याजयएमय का वचन है कि नवछिद्र सहित अत्यन्त मेली यह शरीर है दिन रात रम आदि धातुओं का मल बहता रहता है उसके शुद्ध के लिये प्रातःकालमें स्नान करना उचित है। गुणादशस्त्रानपरस्यसाधी रूपंचतेजश्चवलंचशौचम् । भायुप्यमारोग्यमलोलुपत्वं दुःस्वप्ननाशश्चयशश्चमेधा॥ ऋषियों ने स्नान का दश गुण लिखा है। रूप तेज और घल की पति पवित्रता भायु तथा भारोग्यलाभ एषं (मल) शरीर की मलीनता और दुःखप्न का नाश और बुद्धिषर्द्धक है। खानार्थउक्तंजलम्--वाप्यांकूपेतड़ागे वा नांवाचो- प्णवारिणा । प्रातःस्रानंसदाकुर्यादुप्णोनैवंसदातुरः ॥ वृद्धमनुः-संक्रांत्यांरविवारेच सप्तम्यांराहुदर्शने । प्रा- 'रोग्येपुत्रमित्रार्थनस्नायाÉण्णवारिणा ॥ बायली कुमां सालाप और नदी में अथवा गरम जल से हमेशा सधेरे नाम करना उत्तम है परन्तु गरम जल सिर्फ रोगियों को लिखा। अर्थात् जिन्हें अति. ठंढे, दिनों में शीतल जल से स्नान करने से शरीर में दर्द आदि वायु का शिकार होजाता है उन्हें गरम,जल से स्नान करना निषेध नहीं है। मनु महाराज कहते हैं आरोग्यता पुत्र भित्र और धन ।

तौयग्वण्ड। और मन को शुद्ध रखना (मनस्सत्येनपद्ध्यसि. मन. सत्य बोलने से शुद्ध होता. है) तीयों का भी तीर्थ कहा जाता है ....: मनोविशुद्धपुरुपस्यतीर्थ वाचायमस्त्विन्द्रियनिग्रह- स्तपः । एतानितीर्थानिशरीरजानिस्वर्गस्यमार्गप्रतिबोध- यन्तिः॥... भावार्थ:-मन की शुद्धता पुरुषों का तीर्थ मत्य वचन और इन्द्रियों फा अवरोध तप है यह शरीर से उत्पन्न ती स्वर्ग के मांग के दिखलाते हैं । चित्तमन्तर्गतंदुष्टतीर्थस्नानान्तशुद्धयति । शतशोध- जलै(तंसुराभाण्डमिवाशुचि। भावार्थ:- जिन लोगों का मन्तप्करण दुष्कर्मों से दूषित ये तीर्थस्नान से भी नहीं शुद्ध होते जैसे भय पात्र सैंकड़ों घड़े गडाजल के धोने से भी नहीं शुद्ध होता ॥ शेष आरोग्यदर्पण के चतुर्थ खपत में लिखेंगे, --

'बिशेष बिज्ञप्ति।
पागग्य दर्पणा के टीय खगड के. लेख का अब हम यही
ममाप्त करते हैं । पसिग्य दर्पण के चतुर्थ खण्ड में प्रथम चंग
चिकित्सा लिख के जिसकी पत्यन्स पावश्यकता है क्योंकि
देशीय रौत्यानुसार ज्वरचिकित्मा न जानने के कारण तथा
अंगरेजी दवाइयां खा खा के पसंख्य प्राणी अकाल कालग्रास
है।ते नाते हैं। वह ज्वरचिकित्सा पंगैक्षित अंगालो हम ऐसे
सुगमता से लिखेंगे कि सर्वसाधारण जन चर गग से स्वयं
बचेंगे और अनेक ज्वरातियों को भारीग्य कर सकेंगे। उस
शैति का ज्वर चिकित्सा नामक अपूर्व ग्रंथ भाजतक देखने में
न पाया होगा। पश्चात् योगविद्या (माध्यत्मिकशक्ति छापा य
का पाद्यापान्त वर्णन करेंगे कि जिसके द्वारा भनेक जन अनेक
प्रकार के अपूर्व लाभ उठा सके जो बड़े २ महात्मामों को
टुर्लभ है। तत्पश्चात् भूत
महर्षियो के भनुमान किये हुये
दिनचर्या का बयान करेंगे। इस स्थल में "भारतनात का
वैद्यक प्रथम अङ्ग है" लिखकर ,ईस भायुर्वेदात औषधालय में
जो परीक्षित औषधियां हैं उनके सूचीपत्र लिखते हैं
आप लोगों का शुभचिन्तक
जगन्नाथ शर्मा गाजवैद्य
जानसेनगञ्ज :
इलाहाबाद
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भारत के उन्नति का वैद्यक प्रथम अङ्ग है । --- इस विषय में हमें बहुत लम्या घोड़ा लेख देना अमीष्ट नहीं है क्या पाठकगण नहीं जानते.जैसा कि ऊपर लिखा हुआ है "धर्मार्थकाम मोक्षाणामारोग्यं मूलकारणम्" फिर यह भी प्रधान २ ज्ञाताओं को वि. दित है कि प्रतिदिन भारत का द्रव्य पिलायत (इलिस्तान) को प्रका पंण रूपी नदी की अनेक धारा से बहा पाला जाता है, उनमें से अधि- कांश धन पाहिनी, धारा वही है जो अगरेजी दवाइयों के मूल्य के द्वारा संचित्र हेरकर समुद्र पार को राप लेती है प्राय: देश हितेपी विश लोग उसी द्रव्य के लिये उटपटाप,२ चारो ओर भनेक कानफरम (, जातीय समाज ) और भांति २ कमेटियां कर रहे हैं, उपाय शोष रहे हैं. देशी तिजारत शिएप विद्या भादि का प्रचार कर रहे हैं तो बताये बढे २ भारद्वाजादि महर्षियोंकी उपार्जित वैद्यकविद्या प्रादि को और देशी औषधी लोगों के प्रकृति के अनुकूल गुण की. देने याली, पवित्र धर्म रखनेवाली, प्रति सस्ती सर्वत्र मुलभ सहज में बनने वाली, आपका क्या बिगाहे हैं जिसको आप लोग दिन प्रति छोड़ते जाते है, यह नहीं मोचते कि उससे छोड़ने के माय हो यि हमारे अर्थ धर्म काम मोक्षमी छूटते जाते हैं। अर्थ के माधन हैं सा'बह धन जैसा कुछ हाकृरी पंधी में लगता है उसे वही सूय जानता है जिसको उनसे काम पड़ता है । यस धन इस प्रकार पर पिदा हुआ जिसके साथ ही साथ पवित्रता भी जो धर्म का प्रधान भा है. नष्ट हो जाती है, क्योंकि शूकरादि . नेक मलिन और अखाद्य जन्तुओं की चर्बी और भांति र के घृणित पदार्थ रचित मदिरा और प्रासंध और अनेक समस्त निर्जल रूप उन लोगोंकी बनाई हुई कि जिनके खान पाम व्यवहार को स्मरण कर सच्चे धर्मगील को यमन की दशा मा जाती है। यह कौन नहीं जानता कि पृणित द्रव्य मंयोजित मद्य से बनी हुई अंगरेजी औपधियां होती हैं जो पहले परिग्यदर्पण। कहीं स्वप्न में भी नहीं दिसलाई देती धों और हारों का. कहीं नाम निशान भी नहीं था, तो क्या 'हम लोग रोग में माही जाते.थे-१ कभी नहीं। कितने यह कहते हैं "निर्वाजापृथिवी निरीषध रसा" यहां की पृथियो निर्वीज, होगई और, भीषधियों का रस जाप्ता, रहा.हम कहते हैं जरा मांख खोल कर मैटीरिया मेहीका को देखे। आधी औषधियां भारत बकी है और शारीरक विद्या और प्रस्त्र चिकित्साके भी मूल सूत्र इसी भारतवर्ष से घिदेश गये हैं। यह यूरोप के प्राचीन इतिहास में, स्पष्ट रूपसे लिखे हुये हैं उन्हीं सब बातों को खूब फैला के अंगरेजों ने परीक्षा पूर्वक प्रकाशित की है. और भय कमी के द्वारा लक्षों रुपये पर बैठे भा. रत से खींचे लेते हैं, क्या उक्त लोक. नग लोगों के लिये चरितार्थ नहीं हो सका ? उक्त श्लोक का अभिप्राय यह है.कि पृथ्वी निबल हो जा- यगी अर्थात् जहां बड़े २ प्रलयान, शूर ,मीर पैदा होते थे. यहां निर्वल कायर कुपूत उत्पन्न होंगे क्योंकि पांध सत्यों में से पृथ्वी तत्व विशेष प्र. धान है, और सम.का पात्रप भूत है. और "निरौषधि रसाः निर्गता औषधि रसा:येभ्यः" अर्थात्, अच्छी २ संजीवनी औषधियों का रस जाता, रहेगा लोग आसुरी चिकित्सा और मसुर प्रिया पदार्थ के लोलुप हे। जायगे पोंकि "गोपामहत्वंगता" यदि कोई यह कहै कि यहां के वैद्य लोग मूर्ख हैं दो चार भाषा की शिताटा देख लिया वैद्य धन गये, रोगी जहन्नम में जांय अपनी हथपनीती से धार पैसा पैदा कर लेना उनका मुख्य कर्तव्य है । तो हम कहते हैं कि इसमें विद्या और औषध का या देष है राजा विदेशी ठहरा वह इस पर क्यों ध्यान देने लगे और न भारत में कोई ऐसा भायुर्वेद कालिज है कि जहां विद्यार्थी लोग पूर्ण रूप से शिक्षा पाएँ । अगर यह कहा जाय कि.यथा राजा तथा प्रजा, | मुसलमानों के राज हासे हकीमीको तरको हुई अङ्करेजी राज में हाक्तरी की इसी प्रकार जिसका राज्य हेगा मायू रक्षक तत् देशीय औषधों का. प्रचार भी अवश्य देगा और होता ही है देखिये अभी लाट डफरिन की रानी श्रीमती लेडी दफरिन ने हाफरी फराठ में लाखों रुपये का चन्दा एकत्र कर गई और उनका भार वर्तमान वाइसराय की लेही सांहमा ने - १६ तोयखण्ड। अपने ऊपर लिया है और प्रत्येक प्रान्त के गवर्नर लपटेगटं गवर्नर उस की शुद्धि में उद्यत हैं इस कार्य का प्रधान हेतु यह कहा जाता है कि उक्तलेही साहया को हिन्दुस्तानी स्त्रियों पर दयाआई है पर यह गूद बांत कोई नहीं कहता कि इङ्गलिस्तानी महाशयों (दवाइयों) के कार खामों पर अत्यन्त दया आई है आज तक किमी लैही को हिन्दुस्तान की अंसंख्य छुधातुर अनाथ अबलानों पर दया ना आई म उनकी मूर्खता के मित्त करने का विशेष प्रयत्न हुप्रा हा सर विलियम न्यूटन मी शिक्षा पर अधिक कंटाक्ष पात किया था सो धिल फुल ढीला हो गयां मारे खर्च की फसर सरिश्ते तालीम निकाली जाती है फ़ोस जाता है कि. नि- ईनी के चालक विद्या के भी निर्द्वनी यने रहैं। जबरदस्त का ठेंगा सिर पर तो भी हम लोगों को सोचना चाहिये कि हकीमी औषधियों से हमें तनी हामि नहीं हुई क्योंकि उनमें प्रायः घनौषधियों के सेवन का प्रयोग है परन्तु डोमरी पौषधियों से शारीरिक मनिसिर्फ दीरयंता और धन धर्म को शरेयीमाश हो रहा है। देखिये प्रथम तो ति हिम प्रधान या लगहनादि देशी मनुष्यों की प्रकृति के अनुकूल परीक्षित औषध इस घटऋतु सम्पन्न देशीय मनुष्यों के स्वभावानुफूरत नहीं हो सका है। दूसरे-प्रत्येक गीली दवाइयां भांति २ फे शराय से और गलहम वगैरह मुभर आदि की पर्ची से तैयार होती है। तीसरे-औषध बनाने का यंत्र घरतन स्थान और फिसताह कौन २ चीजों के मेल से कोल श्रीषध बनाया जाता है हम नहीं जान सक्ने । चौधे-भरेजी दवाइयों का दाम बहुत अधिक है जहां तक जिस्से लेते बन पड़े, चाहे उसमें दमड़ी को भी लागत में अच्छी शीशी और परछे २ टिकट चिपका देने से और प्रातुरता की तारतम्य से दाम वेही हिसाय पढ़ सका है पांच-प्रायः अंगरेजी औषधों में जहर का मेल रहता है कि धोखे में जरा भी अधिक पी जाय तो रोगी को यमालय पहुंचना दूर .

४ ग्रारोग्यपंगा। नहीं है और ऐसा प्राय: देखने में माता भी है । अभी इलाहाबाद में एक बहे भारी शोहदेदार का प्रापा सङ्कट में लग गया उसी रंगी चुंगी शीशी के धोखे में। छठे-यह विंध्य प्रान्तीय उष्ण प्रधान देश है और अनेक देशान्त- रोयालेागों के यहां जाने से इतना गर्म हो गया कि है शीत सतुओं में भी बिना कुछ ठंढी पोज खाये दर दाह शांत नहीं होता । अंगरेजी दिया. और व्यवहारों से यहां के लोगों का बल बुद्धि पराक्रम इतना कम- जोर हो गया है कि जिमका: अनुभव प्रत्येक व्यक्ति शिर को शून्यता से स्वयं सिद्ध हो रहा है वर्गान की कुछ भी आवश्यक्ता नहीं है सातवें-यह बात तो प्रायः सभी जान्ते हैं तथा पुराणों के देखने से भी जाना जाता है कि भूतपूर्व मार्य सन्तानगण विषयी कम होते थे इसी से वे लोग बलवान् पुरुषार्थी :अधिक होते थे जब से मुसलमानों का राज्य हुप्रा संस्कृत विद्या का सूर्य अस्त हो गया हिन्दू मुसलमानों में मेल मुलाकात अधिक बढ़जाने के कारण देखा देखी एतद्देशीय लोग भी इसने बिषयी हो गये कि आज के समय में बीर्य सम्पन्न बलवान बिरलें पुरुष पाये जायगे। जा रहा सहा सो भी अंगरेजों की संगति और मेल मुलाफारा चुरट एकसा धन बरांही गर्म दिनों में भी काले बनात का कोट पतलूम से और होटल का महा प्रसाद इतना हमलोगों को धोय हीन करदिया है कि जिसका कुछ ठिकाना नहीं उसी पर जहां अति तीक्ष्ण विषैली अंगरेजी दवा सेवन हुआ कि पच्चीसही सीस बर्ष की अवस्था में यमपुर यास करने का अवसर मिल जाता है । यह जो हमने लिखा है कि देशो श्रीषधियों की अपेक्षा अंगरेजी दवाइयों के मूल्य बहुत अधिक हैं, उसका कारण दिखलाते हैं । प्रायो: वर्तमें अंगरेजी औषधियां नहीं तैयार होती और न बननेको कोईमाशा है क्योंकि कलोमिल, क्लोरोफार्म आदि औषध बनाने के ध्यान और यंत्रादि यहां निरूपन करने में कई लक्ष रुपयों का सर्व तथा विलायत - ५ सौयगड । में प्रकृया फुगल चूरोपियन धैद्यों का गाना.मम्मय है और यहां ध. गंगे में बहुत से भेद खुलजाय तो दाग भी घट जाय और जो भक्ष्या भक्ष्य प्रमेध्यामेधा, मिश्रित प्रस्तुगों का मर्म प्रगट हो जाय तो बहुत रोगी कि जिनको परलोक का कुछ भी भय है उन श्रीपधियों के मेधन की अंपेक्षा मरनेही को अच्छा ममफने लगें, स्पष्ट है कि अंगरेजी दवा. इयों का मुख्य स्थान विलापत है और ममस्त प्रधान औषध पुटाम, प्रादि जो अंाज यहाँ घर २ में जारी है विनायत से बन के पाते हैं। विचार करने का स्थान है कि विलायत में इसका फैमा फुल्छ । कारखाना देगा और फितने बड़े २ फल देगे जिनके द्वारा हजारों भन दवाडया पहाड तैपार हो जाती हैं भौर, उन वस्तुओं का भेद अभी वही जानते हैं कि जो उनको कूट छान गला के. या मत्त निकाल के औषध के रूप में करते हैं उनमें से यहत सी चीजें ऐसी हैं कि हिन्दुस्तान में :सत में मिलती। केवल लेजाने में जो कुछ खरचा पड़ता है, . और... यहुत मे जीध गन्तु के तग मम्बन्धी पदार्थ उसी विलायत में मिल सके हैं . जो पहिले मिट्टी के माल विकते हैं पर औषध बन जाने और टिकट के चिपकाने पर सोने की कीमत को भी गात करते हैं बुद्धिमानों के निकट सोचने पर यह यात साफ जाहिर हे। सातो है कि यह यस्तु यहुत कम कीमत और कम कादर और येन्दरवालों हैं फिर उन्हीं से कितने लोग नफा उठाते प्रथम तो सुद इंगलिस्तान के बड़े २ सौदागर जो हि. न्दुस्तान के बड़े शहर कलकत्ता और यम्बई में कोठी रखते हैं और किस कदर नफा लेते हैं छिपा नहीं है. फिर इरएक गहर फे पोकपाले दू. . * करीय ३ वर्ष हुये में श्री युतं महाराजा डुमरांव को चिकित्सा करता रहा और उन्हीं के भाप कलकत्ते जाना पड़ा माया साहय के खास मुन्शी में रंगाचीर प्रसाद जी के दांत' बनवाने के लिये भाव में मुक्के भी कई अंगरेजों की दुकानों में जाना पड़ा पनि छः मौ रुपये में जिसी ने दांत को नाज (मूरप) कान लिया अन्त में वैसाई उत्तम दात खणे निर्मित पर बवामी महाशय ने १७५) में दिया ॥ .

टतायखराडा में न रखते हों बल्कि सैरातो अंगरेजी दवाई षटवाया भी, करते हैं फिर कौन ऐमा शहर है शष्टां दश बीम छाकर और दो. चार अंगरेजी दवाखाना न हो, यस एमी. मे जान लीजिये कि प्राषिर्त में कैसा कुछ अंगरेजी दवाइयों का प्रचार है। इस समय २०.हादि भारमवर्ष निवासिनी प्रजा है तिममें.५ कोटि हकीमी और ३, कोटि घेद्यम की औषध खानेवाले हेगे १२ करोड अंगरेजी दया के खानेवाले जानिये । हम कहते हैं २० करोड़ में :मिर्फ एक करोड़ ए में मनुष्य हैं तो प्रायः प्र- गरेजी ही दवा खाते हैं यदि चेत् पूर्वापर मिना के प्रत्येक मनुष्य प्रत्येक मास में मिर्फ दो रुपये के औषध खाते होंगे तो एक रुपया प्रत्येक व्य. क्ति का विलायत जाता है सहिमाम मे एक करोड़ रुपया महीना- और १२ करेराष्ट रुपया साल हुमा अर्थात् प्रति वर्ष कम मे का भारतसे अंगरेजी दवाइयों का दाम १२ करोड़ रुपया. विलायत जाता है ॥. हे भारत देशहितैषियों भारत मुदशा प्रवर्तक भारत के मित्रों आर्यसमाजियो व्रलममानियों और हिन्दूममाजियों क्यों आप लोग • काशी में सरकारी हास्पिटेल के अतिरिक्त कई महाराजों के सर्फ से भी अंगरेजी दवाइयां घटती हैं बल्कि इसी विषय में थोड़े दिन हुये कि, हमने विशुद्धानन्द स्वामी (जो. काशी में एक प्रसिद्ध संन्यासी हैं जिसे भारतके प्रायः महाराजे मानते हैं) से कहा कि यह कागो परम पुरुपमई नगरी में प्रायः धार्मिक गण बास करने के. अर्थ माते हैं जल दोप से जहां बीमार; ये वही मद्यमिश्रित, औषध, उन्हें सेवन करना पड़ता है यदि आप ऐसे धर्मशील. महात्मा बाहैं तो राजाओं के जोर से एक मायुर्वेदात औषधालय खोल, दिया जावे तो बहुत कुछ धर्म की रक्षा हो सकी हे ठसका उत्तर यही दिया कि अंगरेजों का राज है तो जि. सका राज उसी को विद्या, कोई राजा हमारी; क्यों सुनने लगे मम मत- लाइये जब ऐसे २ महात्माओं की यह दशा.हे भांग अफीम का गोला खाने और लाखों रुपये राज़ों से लेकर मौज उड़ाने,से काम, चाहे भा. रत जहन्नुम में जाय॥ -- भागगग्यदर्पण घोर निद्रा में सेा रहे हो ? भाप लोगों को इस पर दृष्टि पपों नहीं परती? सका आन्दोलन और विचार भाप लेग यों नहीं करते हो? समें केवान धन सम्बन्धी हानि नहीं है कि जिसको सय कोई जानते हैं, बरन धर्म सम्बन्धी हानि बड़ी भारी है हाय, आप लोग देवता और ऋषि मुनि की सन्तान होकर राक्षसी क्रिया और महा घृणित यस्तुओं से मिली हुई आपधियां कि जिनका नाम लेने और सुध करने से भी समान्त हो जाय दाम देकर खरीदने हो और कैसा दाम कि धारंधार हमों को देना पड़ता है लेफिल टैक्त के अनुसार ही सबसे रूपया लेकर शहरों और कसत्रों में छोटे बड़े हस्पताल जारी हैं सिसपर भी हाकिम लोग दवाय हाल कर बड़े २ भादमियों से चन्दा लिया करते हैं क्या प्राप लोगों को जोम में इतनी सामर्थ्य नहीं कहा कि हम लोगों की चिकित्सा के लिये पच्छे २ वैद्य और हकीम नियत किये जांय कि जिनके आपच सेवा में हमारा लोक परलोक दोनों बनता है इसके क. हने से किमी को फांसी नहीं हो भक्ती, यह बात सब कोई जानता है इस पर्णन के मूल मिद्धान्त पर ध्यान दो बड़ी भारी हामि है बल्कि प्रकृति के विपरीत देवी सृष्टि के लोगों को आसुरी सृष्टि को भोप- धियों के सेवन में बुद्धि को भन्दता आयुर्मल की घटती शारीरिक पुस्ता का विनाश ता जाता है जैसा कि ऊपर मैं लिख चुका हूं कि अति ठंडी विलायत की औषधियां इस गरम मुल्क वालों के स्वभावानुकूल गुणकारी नहीं हो सकीं ॥ साधने की बात है कि जिन हंस पक्षियों का आहार दूध और माती प्रभृति उत्तम २ पदार्थ हैं उनके बच्चों को यगुलों का भपया गृहा. दि मलिनाहारी पक्षियों का भोजन दिया जाय तो कर उन्हें लाभ होगा, यदि इस लेरा पर ई तर्क करै कि इस देश के. वैद्य हकीम अग- रजो भोधियों को यहाई द्वेषभाव और हाह बुद्धि मे नहीं करते और न करेंगे? यह याप्त ठीक नहीं हे उत्तम पदार्प को कोई भी धुरा नहीं दार सक्ता और न ही साली ऐ हम न्याय पूर्वक करते हैं केवल शारदीय याही को देखिये सो कारण हमारे प्राचीन आर्य महर्षि गण निर्देश - F - ततौयग्वगड ।... कर गये हैं बड़े २ पण्डिताभिमामी रोपीय चिकित्सक गण अद्यावधि उमी को सेवाय मेलेरिया फीयर,फे एवं फूईगाईन व्यवहार के कणमात्र अधिक कुछ कह सके हैं ? इसमें कोई सन्देह नहीं कि फूईनाईन ज्वर दमन करने में एक अपूर्व, औषध है परन्तु इम पर आर्य, मन्तान गम को पाश्चर्यित न होना चाहिये, यह तो प्रायुर्वेद ही कहता है "तिक्त. द्रव्यंज्वरांजयेत्" अर्थात् कटु, चीन ज्वर को जीतता है तो कूई नाईन के सेषन, से ज्वर छुट हो गया तो कौन भावपर्य हुमा लेकिन वरादि कोई रोग-पों न हे। अधिक तिक्त औषध का सेवन करना आयुर्वेद बिरुद्ध हे और कूई नाईन के सेवन से भारत की कमी दशा हो रही है और उस से फल की अपेक्षा भफल पाहे कोई भी दृष्टि नहीं देता है । :: प्रति तिक्त द्रव्य के अधिक मात्रा व्यवहार से निम्नलिखित रोग हो जाते हैं। : घरक सूत्र स्थान अध्याय:२६ में लिखा है। अधिक तित औषध के खाने से वह तिक्त अपने मक्षादियभाव से रस रुधिर।मांम मेद अस्थि मज्जा और शुक्र में रुक्षता..और शिरासमूहों में खरता उपस्थित करता है. शारीरक बल नाश; ग्लानि मेाह भ्रम मुख शुष्कता एवं अनेक बात- रोग उत्पादन करता है। यही दोष भाधप्रकाश के पूर्व खण्ड और सुश्रुतादि ग्रन्थों में भी पाये जाते हैं। अगर कोई कहे कि शुक ताररुप धातु को दौर्बल्यता आदि रोग भारतवासियों को कुईमाईन के खाने से हुभा है इसका पुर प्रमाण उपरोक्त प्रन्यों में केमे हा. सका हैं ?' योंकि हिन्दुस्तानी लोग लाल मिचादि तीतो यस्तु प्रदुत खाते हैं नसमे भी वही दोष हेाना सम्भय है ? हम कहते हैं उमे म मानिये अधिक कूई नाईन सेयन से यही म. करत कुफल सम्बन्ध में विलापत और अमेरिका के प्रमिद्ध २ हारों ने जे अपनी किताबों में परीक्षा पूर्वक लिखा है जिसे मैं संक्षेप से नीचे लिखता हूं में तो मानेांगे ॥ ए० वी० गारह एम० हि० एफ० एस ने अपने पुस्तक के द्वादश सं- किरण २६ पृष्ट में लिखा है कि अधिक मात्रा कूईमापन का मेयन . .

O हृदय संबन्धी 1 "HIN परिग्यदंपंगा। १० रुया को जता भाव करता है जिससे रक्त का गमनागमन अर्थात् कम होने में प्राक्षेप रेग मृत्यु पर्यन्त हो सक्ता है एम, डी, ने अपनी पुस्तक के कि कईनाईन अधिक दिन सेवन करने से निम्नलिखित उदर व्यथा उपः स्थित होती है जैसे पेडू में उष्णता और भारी मालूम हेमा सूखी ने की, भाना पा जी मचलाना मह क्या और भी प्रयल दारोग हो जाता फूईनाईन की कृपा संघन्ध में और, घातो. गतिरिका यह विषय ध्यान देने लायक है कि जो कूईनाईन का विकार, शरीर में व्याप्त हो यीच २ में देखा गया है एवं म्यलेरिया मिप शरीर में जा संपूर्ण उपद्रय स्थत कर उसके द्वारा शरीर में रक्त का परमाणं कम और विकृत भायापन्न है। शरीर रक्त हीनता पांडु.वर्णता प्रति राग, सङ्गिक दुर्व- लता अन्त में शय्यागत की भारत देशा प्राप्त करता है,ए, सी, काई,पार. खोपेट, एम, हो, पीएच, हो, एल, एल, ४ एडीसन २११ पेज़ देखा.॥ ॥ कई गाईन अधिक दिन सेवन करने से प्रसंग करने की शक्ति केयल घटही नहीं जाती किन्तु मैथुन शक्ति का एक बारगी छाप हो जाता है और रात को स्थमावस्था स्वप्नदीप भाय घेता, है,। टी, एफ, एंग, एम, एमाही, तृतीय चाप्टर के २३२ पप्ट में देखो। 'लोहा और यकृत् द्धि एवं शन हेाता है इमरी यफ एम, भार, सी, एम, १०२ पृष्ट में देखो। रिचार्ट हितजेस एल, मार, सी, पी, ने अपने पट में क्या लिखा देगे। अधिक फूहनाईन सेवन से दूपि में एक मिलक्षण देोष तत्पन होता है यदी तक कि अंधे जाते हैं एवं "शिरपीड़ा मूर्यायत शिर भारी होगा और मिनाथ फूटता है। इस स्थल में मोतिश देश धामी पुरुषों को यिधार करना पाय- कि प्रति दिम प्रधान देशीय अंगरेज लोग जो शरीर मे मति 25 मद्य भास गाने वाले और घलयोन ईज उन लोगो..tis . . A + तृतीयखण्ड । पूर्वोक्त प्रकार पर हानिकारक है तो तरुण देशीय. क्षोण देही शाकान भोजी नागा प्रकार के शौच ग्रस्त. आर्य सन्तानों को अधिक तर भव.. गुण करता है इसमें अणु मात्र भी सन्देह नहीं है। अन्त में हम अपने प्रिय देशी भाइयों से निवेदन करते हैं कि यदि. आप लोग उक्त भयङ्कर बिपद से उद्धार पाने की परछा रखते. हो और अपना धन धर्म और अमूल्य जीवन को नष्ट न करना चाहते हो तो भूतपूर्व ऋषियों की परीक्षित उपदेश और नियमावली का पालन करो मी में श्राप लोगों की कल्याण है। पाठकगण, जाप सत्य जानिये किसनातन वैदिकधर्मके परम वैरी मजदयो तास्मय से भरे हुये कहर अत्याचारी यवनों के राज्य होने से भी जो धर्म नष्ट नहीं हुये वे सब धर्म कर्म मान नीति अंगरेजी राज में सिर्फ विलायती अमेध्य दवाइयों के सेवन से धन और मानसिकशक्ति तथा शारीरक्ष वल समेत प्रतिदिन धर्मकर्म नष्ठ और निर्मूल होते जाते हैं, अंगरेजी औषधियों की बढ़ेतायत और गोरस की अल्पता ही को फारण है कि छोटे बड़े फे तना में प्रमेह और धातुर्माण का हङ्का धंज रहा है पन्द्रह सोलह वर्ष की अवस्था में गोल चुचुक जाते हैं जिस देश के पुरुष लोहे के फवध (अखर) अंगरखें की भांति पहनते थे वहां अंध लोगों को अच्छे मजबूत गाढ़े मोटे भूत-फी,धोती कि मालूम परतो हे जा; कई कोस. वरावर दौड़े चले जाते थे मा.उन्हें प्रव. बीघा दो बीघा चलने से भी माम फूलती है लड़कों के शक्ति बापदादे लोग सुदं अपनी शक्ति हीनता फे विधार पर शिक्षा देते हैं कि भैया, पाप-धीरे २. रक्सा करो कहीं गिर न पड़ा। सच है कि निर्मल कुतियों को पूंछ, ही भारी, पई जाती है.॥ कोई.२ कहते हैं कि "औषधजान्हवीतोयं वैद्योनारायणोहरित इमका यह अभिप्राय नहीं है कि जान यूकर महा अपवित्र तन धन धर्मनाशक मलिन पदार्थ खा लेप और यह भी कोई प्रमाणे. नहीं है कि खाद्य प्रताद्य वस्तु जैसे विष्टा और महामास की बनी हुई दवा बिना थिधारे खालेधे "अकर्तव्यं नकर्तव्यं प्राणःकंठ गतरपिण जी. साने योग्य । .

Fr:" । 'सौयग्वगड । कभी नहीं रस सा है हमारे लिये यही देशीय जंधी यूटी श्रेयस्कर है, जो हमारे प्रकृति के अनुकूल है। मनुष्य का जन्म पञ्च विकार से होता है जिस देश की जैमी हवा जाने पृथ्वी आदि के गुण हैं उसी के अनुसार मनुष्य का रंग अंग प्रकृति पन्द्रिय बोलचाल होता है (जैसे बिनायत और काश्मीर के मनुष्य गौरांग, मदरीम के कालें, नैपाल के चपटे मुसं वाले उत्तरीय पहाड़ों में अश्वमुखयाले होते हैं और वहीं के मिट्टी में जो धान्यादि उत्पन्न होते हैं उन्हीं को खाकर वे लोग जीयन फाटते हैं 'और' थिमार होने पर वही देगीय जड़ी बूटी के सेवन से तन्दुरुस्त हे। 'जाते हैं। देखि पश्चिम के लोग मायः ठर्द की दाल खाते हैं उन को साप्त यदादि कोई धिकार उत्पन्न नहीं होता है पूर्ववाले, एक दिन भी खा तो बीमार हो जाते हैं परन्तु चावल रोज खाते हैं और पश्चिम लोग घायल बहुत कम खाते हैं । इसका मुख्य कारण देश है पश्चिम में बाघल को तत्पत्ति कम है, पूर्व में उर्द कम होता है पैसाही औषधों को भी जानिये । ईश्वर ने जिस देश में जिसे उत्पन्न किया है. उसके शरीर रक्षा के अर्थ, समस्त पदार्थों को भी वहीं उत्पन्न कर दिया है. तो फिर हम लोग जान बूक कर अपने घन धर्म का नाश करते हैं तो मि- पापः मुर्खता के और पा है। अंगरेजी दवाइयों के खाने से धर्म नाश होने के अतिरिक्त एक यहीभारी हानि और भी है, कि जिसपर किसी देशीय चिकित्सक ने अब तक ध्यान नहीं दिया वह यह है कि, अंगरेजी. दयाइयों में अधिकांश भीषघ सही (सलफिनरिक एसिह दादुरिक एसिड और साईट्रिकएसिह वगैरह) शारद्रव्य ( कार्बोनेट माफ सोहा जांदि) निमक ( पुटामादि) और तीक्षण (लाय कर. मादि) है और हेर फेर कर सब रोगों में प्रायः दवाइयों के साथ इन्हों का योग रहता है और सोहा एसिड अर्थात सोडावाटर लेमनेट का तो भाग भारत में घर २ गंगा जल के समान थाथ हो रहा है और एसिड मादि याने अस क्षार तीक्ष्ण और लवण, धातु को दुल सत्वहीन और फार कर बहानेवाले हैं और बीयही मा का.मूल है ता.जिम औषधों से मूलही का नाश है नसके सेवन से 1331 T rn 5 . i बाराग्यदया। हम लोग भारोग्य और दीर्घजीवो कैसे हो सके हैं१ कदापि नहीं इस. विषय पर सर्वसाधारण धाम्भिक जनों को अवश्य, दृष्ठि देनी चाहिये, बस पाठकगण इतनाही से जान सक्ने हैं कि हम को अंगरेजी दवा खामा चाहिये या नहीं। 1:57 :::. : विज्ञापन TETPIT THE Tiris inni आयुर्वेदोक्त औपधालयाजानसेनगज इलाहाबाद। त्रियणी नल से आयुर्वेद को प्रसिद्ध और पवित्र भीषध बनायनाई चूर्ण घटी मामय रसादि जो कही न मिले यही लीजिये खराब या नकली निकले प्रत्यक्ष करा देने पर १०० रूपया दगई देव ". इस कारखाने में औषध धनानेवाले ब्राह्मणादि उत्तम जाति है और जा के स्थान में अमृतोपम त्रिवेणी जी के धारा का गंगाजल डाला जाता है ॥rre: Arti. :.. -जिन रोगियों.को हात्तर एकीमे की दया माफकत न करती हे, या उनके रोग का पता, न लगता है कि यह कौन रोग है वे लोग जयश्य हमें लिखें या हमारे पास भावे, हम-उनके रोग का नाम, दया, पषों फायदा नहीं करता कौन दवा से यह रोग कितने दिनों में माराम : होगा रोग साध्य है य, असाध्या प्रांत अच्छा, होगा या नहीदिमा भर यसलाय.देंगे , परन्तु पिढी-मै इतनी घात अवश्य लिखें कि रोगी स्त्री र है या पुरुष और कितने दिन से रोग है शरीर का रंग-कैसा हे शरीर मोटी:हेमा दुमली, चलने फिरने की ताकत कैसी है:खाना किस-किस्म का माफकत करता है दिशा पेशाय फैसा, गोर-किस रंग का हेगता पेशाय के साथ धातु का जाना या जल के पेशाध होना..त्यादि अगर कारूरा देश के लिखें, ता.भोर भी उत्तम । प्रेद में कहामन शिर में धुमरी जी मचलाना पेट में जलन, फलेजा.धक २ करना इत्यादि प्री: भी.जो प्रत्यक्ष लक्षण हो लिखें इसके अतिरिक्त और अनेक शरीर/- - - -- " -- तृतीयखण्ड। सम्बन्धी प्रण पत्र द्वारा पूलं संत हैं । जयावी कोई या जाय के लिये टीपट रख दे नहीं तो जवि वरंग दिया जायगा :: IPE IFirmisri भमिका । प्रायः लोगों के मुख से शिकायत सुनने में भाती थी कि वैद्यक मत की औषधियां उत्तम और ताजी कहीं नहीं मिलती और यह तो सभी जानते हैं. बानियों के दूकानों में तो भक्तर सही घुनी दवाइयां मिलती हैं:स प्रभाव कोदूरस्फरने के अर्थ यद्यपि यह दूकान तीस वर्षे में जारी है परन्तु संपूर्ण कार्य लोगों के कंधि पर निर्भर है...जम लोगों के चित्त में यह असर पैदा हुप्रा कि इस देश के स्वभाव पर सो देश की औषध अधिक गुणकर. है. क्योंकि जिस देश में जो रेग्ग उत्पन्न होता है उसी देश में उस रोग को औषधियां भी उत्पन्न हुआ करती हैं और अंगरेजी दयायो सिर्फ बनावटमात्र प्रति विरुद्ध है और भारत से प्रतिवर्ष जो १०0018, रुपया अंगरेजी अधों में मूल्य विलायत जाता है क्यों जाय, जय हमारे प्रकृति के अनुकूल देशी औषध मौजूद हैं दूसरे मायनोली 'अगरेजी दवाइयों शराय से और किसी 'गोली में सावुन पहता है और बिलार्यती सायुन गाय सुअर मोदि जीवों को चर्की मेधिनी' है 'ताज तक हम देशी औषधं जानिहा सक्ते हैं arयों अपने 'पने धर्म को नाश करें। तय से हम लोगों ने भी दूढ़ प्रति हो परोक्त अपधालय की वृद्धि करना प्रारम्भ किया है। यहां सर्व प्रकारका औषधियी शास्त्रोक्त रीति और सफाई से बनाई जाती हैं ।जही बूटी जिसका मिलना तो कठिन हईह लोग पाहते तक नहीं ये सब मिलों के द्वारा जगलों में मगाई जाती है जैसे सरिषन पियवनं श्योनाकसम्भारि बिधारी गुलसकरी दातूनि विलाईकन्दै नाली रुद्रयन्ती धादिसलिये मांग माने पर जंगली'प्रोपध भी' आज सक्त है। लेकिन यह यात प्रवश्य पादार कि तैलं वगैरह पी अधिक दवा रेल में मंगाने से मत कम महमूल में पहुंच जाता है और शीशी टूटने का रहता ...... भय नहीं Entrik . . " . यदि कोश देो कोश पर भी रेत का, स्टेशन हो.तो स्टेशनका नाम और किस लैन में है अवश्य चिट्ठी में लिख देवें ।। नियमावली ।... 'जिन महाशयों को विज्ञापन के अनुसार मैंगाई हुई.दया माफफत न करै यह औषध लक्षण सहित लिखकरें लौटा देनेसे दूसरी दया भेजी जायगी परन्तु दधी के माने जानेका हांक महसूल रोगीको,देना होगा। संचित है कि दवा का दाम पहले भेज देधैं वेल्यू पेबुल में मैंगाने से पोष्ट कमीशन अधिक देना-पता है । पोष्ट शापिम द्वारा डोया मह. मून निम्नलिखित हिसाब से लिया जाता है एक पाव तौलमें हो तो।) अधिसेर फा) इसके उपरान्त की प्राधमेर 'पर) महसूल लगता है शक आने पर सौल लेयें ॥ जो लोग पार पाने की भीतरही दाम की दवा परीक्षार्थ. मॅगावै और तेल न हो।)॥ जा टिकट भेज देने से उनके पास थैली में घन्द दया प्रहुंचःजायगी परन्तु टिफट ऐसे ढंग से बन्द करके भेजें -शि कपर, से दि- सलाई न दे क्योंकि अक्सर घोप्टमैन लोग निकाल लेते हैं। जो महाशप पारसल में दया मँगाय के (बिना किसी से कारणको जैसे पारमल टूट गया हो) यापस कर देंगे यह महा पापी समो गायगे और ना नाम दगांधीजों की श्रेणी में छपा दिया जायेगा। पोंकि या प्रौपघालय देशोद्धार के लिये जारी है.' TICS जगद्विख्यात नारायण तेल .... 'सं तेल के मर्दन से या नाश देने से या गुदा में पिचकारी देने से लफया मादि सय प्रकार के वायु रोग आराम होते हैं एक पावका दाम १) डाकय्यय । विषगर्भतैल-गीत वायु रोग के लिये इससे घटकर अन्य तेल नदी है यह तेल यहुत गर्म हैं शिमको अति गौतम गठिया मांदि घाँस । ' F . १६ रोग हुशा हो या जोड़ों में दर्द या सूजन भागया इस तेलो लगाने से बहुत जल्द धाराम होता है पावभर का दाम १) हाक ध्यप n) मापादितैल-रक्तं विकार से ही या गीत से हो दोनों प्रकार के घायु रोग गठिया मादि पाराम होते हैं और.जिसका शरीर मूखगया 'हे। या सूखा जाता है। थोड़े ही दिन इस तेल लगाने में मोटा हो जाता है और लड़कों का मिठवा रोग' भी छुटं जाता है। पाव भर का दाम १) डापाव्यय ॥). लाक्षादितैल-स तेल के लगाने में फैशाहू पुरानी बासी युखार क्यों न हो बहुत जल्द माराम होता पायभर का दाम'१) डाकव्यय ।) कामलाक्षादितैल-इस तेल के लगाने से शरीर में ताकत और धातु बढ़ता है और बदन का पीलापन जाता रहता है, पायभर. तेल का दाम २) हाकव्यय ।) चन्दनादितैल-इस तेले के लगाने से शरीर में सुरखो भाती है बल बढ़ता है शिर फी गांभी हाथ पैर का चलना उन्माद इत्यादि छुट जाते हैं पावभर तेल का दाम १) डाव्यय ।) त्रिफलादितैल-इस तेल के लगाने से घदन को खजुली जलान लाल २ पट्टे पड़ जाना नशों में सुरसुरापट हाना सून बिगह जाना ये सब बहुत जल्द आराम होता है और जो की बीमारी पुटास लमा आदि के पीने से नाराम हो तो इस तेल के लगाने से आराम धोता है इस तेल से एजारों धीगार अच्छे हुये हैं एक पाय का दाम ) डाकप्यय ।) अन्नूतदन्तरोगाशनि. चूर्ण-इस चूर्ण को दांतों में, रगहने से दन्त-शूल दांत से रक्त आना दांतों में पानी का लगना हिलना और मुख को दुर्गन्धि निस्सन्देह जाती रहती है। एक डिबी का दाम ।) सा- . हाफ ध्यप।।

11 .... वृहतूअपामार्ग क्षार तैल-इस तेल को साम सवेरे ५. विन्दु कान में डालने से निस्सन्देव वर्णशूल वार्णभाव कार्ण शब्द-और, थेगड़े दिन का बहिरापन आराम होता है एक शीशी तेल का दाम ।-) हाकश्यप।) व्याघ्रीतैल-इस तेल के नाश लेने से किसीहू पीनस की बिमारी क्यों न हो अर्थात् जिसके नाक से.मयाद और दुर्गन्धिाने उगती है एक पक्ष में माराम होता है. दाम 1) डाक्ष व्यय।) कुमारकल्पद्रुल बठी- "अर्थात् ( मिठवा की गोली ) कैसाहू बालक मिठवा रोग से क्यों न सूख गया हेअनुपान पत्र लेखानुसार इस गोली के खिलाने से बालक भाग्य हे तैय्यार हो जाता है दाम n) हाक व्यय ।) प्रमेहारि चूर्ण । आज कल आर्यावर्त में एक भी मनुष्य ऐसे न मिलेंगे कि जिन्हें धातु की शिकायत न हो, बालक से बूढ़े तक इस रोग में ग्रस्त हैं, यहु- तेरों को मालूम भी नहीं सिर्फ इतनाछी कहेंगे कि हम इतना खाते पीते हैं घदन में नहीं लगता है, फिर धातु रोग यह ऐसा खराव रोग है कि शीघ्र यन न करने से जप थाम लेता है और कुछ दिन बना रहने से दूसरी बिमारी खड़ी हो जाती है जैसे नजला, जीर्णज्वर, तपेदिक खांसी, दमा, मतीसार, कोष्टबढ, अग्निमन्द, नेत्र, दांत रोग इत्यादि और भी जितने रोग है सम धातु की कमजोरी से होते हैं। धातु दुर्यल होने का लक्षण यह यहुत ठीक है, फैसा ही तमदा खाना खाये शरीर तैयार चिकना ताकतयर न हो, शरीर मेटा भी हो तो आलस्य से भरा रहे, भीतर सफीफ गरमी घनी रहे, पढ़ने लिखने में चित्त न जमें, मन फिकर मन्द और उदास रहे, जैसे पहुंत रास्ता चलने में शरीर थक जाती है कैसा ही शरीर ढोली और सुस्त कमी २ हो जाया करै प्रभंग की को इच्छा कम हो, ह भी तो शोनही योर्यपात और,प्रागन्द रहित हो, ऐसे लोगों का पातु भी कई प्रकार से जाता है जैसे दिशा के.प.

4.1 1 -- हिले या पीले गिरना, दिशा फिरत समय मला उत्तरने के लिये कांखने से मूत्र मार्ग से धातु का ढरक भाना; मून मफेद जगजामा, स्पेन दोष होना, या सफेद शीशी में मूत्रको एक दिन रात काग से यन्द फर रखने से मूत्र में जाला २ मा या गदला नीचे जम जाना इत्यादि किसी प्रकार से धातु.क्यों न जाता है। प्रमेहारिचूर्ण समूल नष्ट कर धातु गाढ़ा करता है। नगर छ( महीने से रोग होता डिबी चूर्णसे पास होता है १. वर्ष से थे। तो २ डियो चूर्ण से और:५ दिवो चूर्ण के सानेसे कैसा पुरांना धातु रोग हा प्राराम हतिा मुशाफ भाराम होने के याद इस चूर्ण के खाने से फिर मुंजार नहीं तभक्ता कसा ही दुयला मनुष्प शे यदन की हड्डी तक दिखाती है। पिछी त चूर्ण खानेसे दूनी शरीर हो जाती है। मुख से या दिशा से सून का गिरना, भूखी खासी का सदा बना रहना, नजला भादि जोधातु में सम्यन्ध रखते हैं गप शा. राम, होते हैं, तारीफ इसमें :यह पे कि इस चूर्ण को सेवन से दस्त काज न. हो यो और, दस्त खुलासा होने लगता है। पिछी चूर्ण का दाम n) डाक, महमूल 4). और ॥॥) महसूल में डियो: धूर्ण जासक्ता हे चूर्ण खाने फा: विधान पन छपा हुभा दया के साथ है। कामदेवचूर्ण । इस चूर्ण के सेवन धात अत्यन्त गाढ़ा और धातु पुष्ट्र मारने वाला इस्से पढ़कर अन्य औषध नहीं है । माहू पतला पानी से सगान धातु पषों न हो गया हो .४० दिन के खाने, धातु: गाढ़ा हो जायेगा, हम शपथ पूर्मक कहते हैं. पाहै गर भी कुछ जादा गई, हो की लड़के नहीं ये दो, अगर स्त्री पुरुष दोनो छ मास पर्यन्त परहेज, सहित कामदेयं चूर्ण का मेयन करें तो निस्सन्देश गर्भाधान रखेंगा और ताकतयर लइका पैदा होगा अगर फर्क पड़े तो स्येत, पात होने पर गोलाकार जगा हुंघाजा:विभाग.रने से भी अंग T पष्ट होतो .

न हो और प्रसा में भानन्द फा देनेवाला हात यह कि पथ्यं से रहे एक रिचा चूर्ण का दाम ) हाक महसूल ) दो दिवा ) महमूल में जा सका है। 31 Mis: नयनामृतसलाई-घामा लगाने की जरूरत जाती रही । यह सलाई भतीय अम से अनेक नेत्र गुणकारी औषधियों के स्वरस में - शोधन कर यरसों में बनायो है नेत्रों में केवल सलाई फे, फेरनहीं से धुन्ध, माड़ा, जाला, आंसू का यहना खजुरी और रतौंधी जाती रहती इस सलाई को प्रतिदिन एक दफे श्रांस में फेरने से प्रांख में किसी किस्म की बिमारी न होगी और कुछ रोज में अभ्यास. में चश्मा लगाना- छूट, जाता है एक सगाई २० वर्ष के लिये काफी है हर एक सालाई मैं एक हिची अमृतार्जन, को दान in डायव्यय ।। में फई एकसलाई जाती है। विशूचिकान्तक बठी- शर्फ कपूर से भी बढ़ पार यह बड़ी गुणदायक है निश्चय है कि यदि हेमा के प्रारंभ होतेहो अनुपान पत्र | लेखानुमार पटी खिला 'दिई जाय। भाग्य की बात तो दूसरी है )तिर कमी हैजे से रोगी न गरे । इस गांली से असंख्य बिमार आरछे हुये हैं। सार्टिफिकाठ भी मौजूद हैं । ५० गोली का दाम ॥) डाकक्ष्याय - सुजाक को दवा: कैसाष्टू पुराना सुनाक थे। २० राज में प्र- वश्य आरोग होगा दाम २)साव्यय;1) t.. कोष्टबहारि चूर्ण--इस चूर्ण को रात्रि में सोते समय खाने से समेरे खुलासा दस्त होगा २० मात्राका दाम Dj हाकव्यय ।): आश्चर्यालकों को प्रीप हजारों लड़के मरने से बच गये इस दवा के खाने से पसुरी का चलना खाँसी बुखार पेट में दर्द होगा। इत्यादि जितने यालकों के रोग होते हैं प्राराम होते हैं, दाम) 21s), गर्भ चिन्तामणि रस-जिन स्त्रियों का कच्चा गर्भ गिर जाता है. इनके वास्ते यह असतही. एस औषधि के प्रभाव से पूरे महीने . ॥ .

." ,२३ में प्रारोग्य लड़का पैदा होता है.परंध गर्भाधन से लेकर जब तक लडका पैदा न हो घरावर दया खाना होगा पहरेज के माप दाम १०) डा० ।) उदरशूलघ्न बटी-यह उस पेट के दर्द को पारामः, करती है है जो प्रापः लोगों के महीने दूसरे महीने - चौथे छठे महीने घड़े जोर शोर से दर्द उठता है यहां तक कि मरने की नीयत खोज्ञाप्ती, हे यह विमारी औरतों को यहुत होती है इस गोली के खाने से पार पांच घंटे में दर्द जाता रहा है एक शीशी दया का दाम 1) डा० ) कामोत्पादक बटी--इस गोली को संध्या समय खाकर ऊपर से गर्म दूध पी लेने से शरीर में एक उत्तेजना आजाती है और प्रसङ्ग में कुछ स्तंभन और मानन्द होता है.। परंच अति गर्म प्रकत वाले कर फायदा नहीं करती एक शीशी जिसमें, ४० गोली हैं दाम 1) डा०1) नपुंसकार वटी और तिला-- "इस बदी के खाने से और तिला को लगाने से.४२ राज़ में पन्द्रह बीस वर्ष तक का नपुसक जो नस मारी गई होभाराम होता है तेल से छाले आदि नहीं पसते पूर्ण मात्रा.दोनों मोषध का दाम २) डा०1) बुढिबर्द्धक अर्क- इस भर्फ के पीने से घातों का भूलना शिर का घूमना जो मंचलानामांखों के सामने अंधियारा होना पेट या छाती का जलगा बुद्धि का भ्रम ये सक्ष माराम ते ई एक शीशी का दाम .॥) डाफय्यय ). अर्क खूनसफा-या अर्फ मुण्डी आदि प्रौषधियों से खींचा गया है इसमें सालसापरला श्रादि से भी अधिक गुण है १ बोतल का दाम ।) परन्तु यह अर्फ रेलद्वार जा सक्ता हैं, और ४ वोतल से कम न मंगा अपूर्व दाद औषध के समान काई अंगरेगी गोषष भी. ऐसा उग्र नहीं है. कैसीहू की दवा- निस्सन्देह इस महोपकारी देशी २४ न पुरानी दाद तमाम शरीर में क्यों न फैल गई है। दिन के लगाने से ममूल नष्ट हो जायगा और तारीफ इसमें यह है कि लगता बिलकुल नहीं । एक विी का दाम) हाकव्यय 1).. अमृतार्णवचूर्ण-कैसाहू पुराना प्रतीसार यो छांय सून का दस्त हो इस चूर्ण के सेवन से अवश्य आराम होता है यदि इस: चूर्ण से जाराम न हुआ तो फिर पारामाहोना मुमकिल है। दाम), होक- व्यंय ।) स्रक खांसी की गोली-जिसमें मुशकिल से कफ आता है और खांसते २ मनुष्य धमन कर देता है कुक्षिमें पीड़ा होने लगती है और गरमी से जी घपड़ा उठे इस गोली के सेवन से जाती रहती हैं 'दाम 10) डाकव्यय।) तर खांसी की गोली-वह खांसी जिसमें बलगम आता हो इस गोली को मुख में डाल कर चूसों से माराम होगी एक डिबी का दाम !) हाकव्यय ।) जूडीबुखार की अपूर्व बटी- कैसाहू जादा दे के बुखार बरसों से क्यों न भाताहो दैनिक (रोज) अंतरा.तिमारी और चौथिया शीघ्र ही छुट जाता है इसकी बहुत तारीफ करना निष्फल है - सिर्फ मर्ज यह है कि जो बुखार कूईनाईन आदि किसी दवा से न छुटा हो उस ज्वर वाले को यह घटी अवश्य खि नावें एक-डिबी जिस्म २०० सौ गोली हैं ।) हाफ महसूल !) में ४. डिबी, ला सक्ती है। जो लोग ५). को इकट्ठा मँगावैगे उनको ६) का याने ३५ हिंबी भेजी जापगी। जो लोग इस गोली को धर्मार्थ बांटना चाहैं उन्हें फी हिबी) में दिया जायगा परन्तु ५) रूपये से कम न मंगा। -::. : 13.53 2017 १. खड़विन्दु तैल-यह प्रसिद्ध तेल है माप डाग जानते हैं कि इसके नाश-लेनेसे-समलयायु शिर दर्द-शिर का -घूमना शिर धप करनी २५ शिर में जैसे कुछ चल रहा है या फाटता है ऐमा मालूम होना सखिों का हमेशा सुखं रहना या जलग मालूम देना आसों से फम मूकना इत्यादि अवश्य आराम होता है, दाम, शीशी का 1) डाकऽपय )) मस्तिष्कबल्लभः तैलयहुत दिनों से मालाधना क्षरते २ यह महोपकारक शिर का प्यारा तेल तैयार हुआ है। यहां विधि इस तेल को शिर में लगाने से निश्चय शिष्टयपाःघुमरी मस्तिष्क; शून्यता : नाहट पाखों के सामने अंधियारा हो जाना आदि और यावत् गिर के रोग हैं प्राराम होते हैं,तथा मस्तिष्क मुशीतल और नाखों की ज्योति बढ़ती है इमकोः सुगंध. अत्तीय मनाइर :राजा : महाराजाभो.से. मर्यदा लगाने योग्य है, । विदेशी तैलों की अपेक्षा. यह तेल भारतवर्ष में विशेष फल प्रद है । एक शीशी का दाम १) हाफमय ।) इफैटी १२ शीशी फा दाग १०) डाकट्य २) पामारि चूर्ण, केसाहू खजुरी तमाम शरीर में पक्षों न फेलागाई हो चाहे गीली हो या मूबी इस चूर्ण के लेपन मे शीघ्रही भाराम होतो हे दाम एक डिबी का 1) डाक महसूल ।) 7 '.. . . .लवर्णभास्कर चूर्ण यह प्रमिटु चूर्णले प्रायः वैद्यको ग्रन्यों में लिखा है तारीफे इममें यह है कि और चूर्गों की अपेक्षा मात दिला स्वादिक है खाने से मन प्रसन्न होता है, सम्पूर्ण प्रकार की उदर की बीमारी कैमाहू पुरानी क्यों न हो कुछ दिन इस चूर्ण के सेवा करने से प्रारम हो जाती हे प्रगर हममे माराम,न हुआ तो फिर आराम, हाने में कठिन समझना एक डिबी का दामः ॥) डाकव्यपः।) ..., PEN चन्दनादि चूर्ण-स्त्रियों के रक्तरोग पर जानुभूत औषध मासिक सून का अधिक बना रहना या बिना मासिके रक्त का जाना अतिरिम प्रदरकातिमार और सूनी धामोर को भी माराम करता है दाम" हाफट्यप महाज्वरांकुश बटी- यह बटी अति शुद्ध पारा, गन्धक, सी. गिया प्रादि तीक्ष्ण द्रव्यों से बनी है खाने में बिलकुल गरमी नहीं करती शीत पूर्धक ज्वर एकाहि अंतरिया तिजारी चौथिया चाहे जितने दिनसे भाते हों एक सप्ताह के अन्दर निश्चय यूट जाता है एक शीशी जिसमें १०० गोली हैं दाम 1) envi) अभ्रक भस्म एक सौ आंच का यह रस का गुया गुभ नहीं है.फैसाहू छोटी अवस्था के लोग इसे खाये यदि फायदा न करेगा तो नुक्तान भी न करैगा, विशेष कर वीमों प्रमेह.का नाशक धातु पर्द्धक आयु बटुक है,। जिस मनुष्य के धातु रोग हो और कोई दवा फायदा न करती हो और अवस्था भी ४० वर्ष से ऊपर हो तो इसी रस को खावे दाम फी तोला ६) हा०।) क्षारादिवूर्ण--यह चूर्ण अति मातदिल अनेक रोगों को हटाने वाला जैसे पेट का दर्द दाह वमन गले में जलन खही हपार पाना गले में कफ सूख कर लपट लाना इत्यादि अजीर्ण को सो पेट में जासेही भस्म करता है एक हिधी का दाम।) 8101) परीक्षित बवासीर को दवा--( तेल और चूर्ण ) इस घूर्ण के खाने और ममों पर तेल के लगाने से दोनों प्रकार के बवामीर रोग को फायदा पहुंचाता है दोनों का दाम Is) हा61) पञ्चामृतकल्याणचूर्ण- इस चूर्ण के मेयम से पेट का मालन हौल दिल (कलेजा धक २ करना ) जी घबहाना मन का उदास रहना अकस्मात् चित्त का इवाहाल होगा हरना रात को भयानक स्वप्नों का देखना बहुत पात भूलना घुमरी मांगों के सामने अंधियारा होना मलमूत्र जान कर होना इत्यादि प्राराम होते हैं गर्म दिगों में इसे प्रार रक्ष जानना चाहिये पूर्णमात्रा का दाम.) डा0 1) काशविजयभैरों चूर्ण- जय किसी भीषध से, सांकी है। इस पूर्ण का शेषन कर पा तन भी झांसी बनी रहेगी दाम ३ इस औषधालय में और भी अनेक प्रकार की वैद्यक मत से यगी हुई गोलियां चूर्ण अवलेहाभामय पाक, तेल, रम् शुद्धधातु उपधातु धिप उपविष तैयार रहते और जो लोग वैद्यक मत से कोई दवा बन |वाना था अपघा गा चांदीद धातुः अथवा उपधातु भस्म कराना थाहै हुकुम आने से बहुत उत्तमता के साथ तैयार करके भेजा जायगा । • हरएक: शहरों में एजेण्ट की जरूरत । जिग महाशयों को हमारे औपधों के एजेगट होने की इच्छा हो पत्र द्वारा लिखा पढ़ी करने से ते हो संसा:. Fr: मेनेजर वैद्यनाथ शम्मा आयुधदात आपलिय प्रयाग १ :: - is it. - प्रशंसापत्र । .., महाशयोसारिक जितने कम है जब तक प्रत्यक्षा नहीं देखें जाते लोग अमर विश्वास नहीं लाते पं० जगनाथ शर्माजवैद्य माहाबाद में योग पचीस वर्ष में चिकित्सा का काम करते हैं और फितलों धिमारों को माराम किया होगा करोय दम बारह वर्ष यो लगभग हुभा कि घमारे लड़के की बारात, मी में माधाममाद जी के यहां गई जमाही जारात दरवाजे पर लगी कि दुगहा के भाई छेदीलाल को महा घोर गया कि जिमको देख के हम सुंद पहा गये, और पं० जगन्नाथ जी बैद्य को युनाया तम्होंगे यह साइम में रातभर में पाराम कर दिया जिमका निधन्यबाद इन अप तक देते हैं। हाल में हमारे समंधी मलान जी उदर रोग में ऐसे पोदित हुये कि शिमका दुःख यही मान सहा है जिसकी वंदाच दा भनेक उपाय किये, मदों देखा गया अन्न में 4० जगनाथ शमां वैद्य शो ने एकही दिन रात मं.रोग समूल नष्ट पारे दिगा उस वगरकार श्रीपध और पं जगनाथ जी शमां वैद्य के हो त धन्यवाद दिपाशाय घोडा साशासि प्रार का - भी लाभ

लोग भी जो हारों को धन्वन्तरि का अवतार मान बैठे है प्रयश्य पं०
जी की विद्या बुद्धि और औषध की चमत्कारी देख नाश्चर्य करेंगे ।।
ठाकुरप्रसाद बैद्य'
महाजनी टोला-प्रयाग .
.
.
.
A
11
श्रीयुत वैद्यपर पं० शगन्नाथ शम्मा महाराज जी,
नमस्ते
मेरा.पुष,मिना माता का जो दो वर्ष का था ऐसी बीमारी दस्त
आदि में ग्रसित हुप्रा और उस समय इसकी विथा देख पत्थरका हिया
भी दाहिम सा दरकता था पदापि माशा बचने की न थी और वैद्य
हकीम हार आदि भी जयाब दिये यल्कि जन्मपत्री देख योतिषियों मे
भी.निराश किया वास्तव में ऐसाठी था याद इसके जब मैंने आप को
तमाम लक्षण रोग का लिखा और आपने जघी दया भेगी यस औषधी
खाते ही सारी बीमारी अल्प ही काल में जाती रही और तब से इस
पालक को कोई रोग न हुमा पुष्ट खेलसा बोलता भाराम में है-इसका
कहां तक धन्यबाद दू फुछ यही नहीं ।
सावन सम्बत् १९४५ में मुक्त ऐमी बीमारी रातों दिन हिचकी की
कि माया यचने की न घी और चैद्य हकीग हार जताई भादि
जघन अध्या करसके तय भी शापही ने इस पाजी गर्ज को भी अच्छा
किया तय से मैं बाप की उत्तम शिक्षा ग्रहण कर गौ मांस भदाण थोष्ट
दिया बल्कि हमारे खानदाम के जो कि इस देहात में सेकड़ों घर में इस
कुरीति को दिलो जान से एकबारगी उटादिये शुभ ॥
भाप का एक दास
सुदामरा दारादानगर
इलाहाबाद
"

३६
-लोहरडगा से
भिषापर.
अधक सेवन करो ये मास से अधिक दिवस मोते रोग में हिता
हित बोध नहीं होता पर बीर्य तो अवश्य बलवान प्रतीत होता है।
हमारे रोग दूर करने के निमित्त यदि आप दूसरी दवा तजवीज करेंगे
तो भी हम अभ्रक को न छोड़ेगे ! १ तोला अभ्रक शीशी में चन्द करके
भेजिये पुष्ट्रिये में नहीं और मस्तिष्क यालम द्वारा हमको आनन्द अनु-
भव होता है दूसरे के हदयस्य नहीं करा सक्से कभी अवमर पाकर लिखेंगे।
पारंमलंपाने का उत्साही,
येताभराय-रईभ
सिकाई पालकोट लाहरडगा
-
श्रीयुत पं० जी महाराज
महाशंप
'जो चूर्ण श्राप से लाया हूं खांसी पर रामघाण सा गुण प्रगट किया
ईसा पा कर यही चूणे गीघ्र भे दीजिये ॥
रामप्रसाद-दारानगर
।
।
.
भेमिहानुमाधं श्रीयुने वैद्यराज-नमस्ते
आप को दवा के इस्तेमाल से बहुत फायदा हुआ.और चूर्ण (प्रशं
नाशिक) घधामीर खतम होने पर है से रुपा फेरफे एक व्हिथिया पेल्यू-
पेषुल पारमल द्वारा जरदी भेज दीजिये तेलं न भेजना । चूर्ण ने मत
फायदा किया है और आप को पूर्णही काफी समझा जावै या तेल भी
जरूरी है।
टीकम सिंह जवां साफखाना
जिला अलीगढ़ अमृतसर पंजाब कटड़ा जैगलसिंह
1

१८ अप्रेल १०॥ प्रिय महाशय " . आप को दाद की दवा से मरीज को बहुत फायदा भया मापदया करके ४ डिबी दाद की दवा और भे०'० भेज दीजिये ॥ पंहरप्रसाद असिस्टर्ट सरजा-पञ्जाब . । जौनपुर से ता० १७ । ४ । १ श्रीयुत पं० जगन्नाथ शर्मा राजवैद्य महाशय जी नमस्ते । आपको कोटानुकोटि धन्यबाद है ईश्वर ने हम लोगों के उपका- रार्थ अनेक चीजें बना दी है लेकिन दुप पापी लोभी मनुष्यों ने नए भ्रष्ट कर डाला हे भाप सरीखे विद्वानी के हाथ लग जाने से अब दुनि- या के उपकार होने में कोई सन्देह नहीं..हम प्राप की रचित भाग्य दर्पण पढ़ कर बहुत प्रसन्न हुये और मेरा दिन बहुत २ ईश्वर को धन्य बाद दिया करता है जो आपने आ० द० में माघार घटी लिखा है उसे तैयार कर के बिना मूल्प बांटा करता हूँ तिजारी चौथिया ६ गोली से दूर होजाती है। भाप का रूपाकांक्षी शौसलसिंह बर्मा पोष्ठ० बरई जीमपुर . पं० जगन्नाथ शर्मा वैद्य ने हमे और हमारे परिवार को ४ वर्ष से दवा कर रहे हैं। हमने सब से उनका दया और योग्यताका अनेकानेक परिचय पाया है। उन्हें योमार का नाही ही से मर्ज मालुम हो जाता है और बीमारियों के इलाज में प्रायः चमत्कारी दिसाते है। वैद्यक के अलावा ताहोने पॅगला भाषा में मेटिरीया मेहीका प्रादि ग्रन्यों का भी अच्छी तरह से पड़ा है। उनके दवाइयों के दाम भी बहुत ही सस्ते हैं। तारिणीचरणघोष गवर्नमेण्ट पेनसेनर-इलाहाबाद .

I । ६ अक्टूया १८८२, पं0 जगन्नाथ शर्मा वैद्य ने बहुत दिनों में हमारी बात : पुरानी मांसाफी उठने की बीमारी बादाम-किया। हमने यहुत दिनोंसक अनेक दवाइयों का सेवन किया लेकिन किसी से कुछ भी फायदा नहीं हुआ। प्राचीर में, हमने उनकी इलाज किया और थोड़े ही दिन में हमारी प्रांप की दर्द और स्ललाई जाती रही । अब हम बिलकुल प्रारोग्य हैं । मनमोहनलाल • RTER इलाहाबाद +3577 10 511377 SAT bure kiwi अपरेल र .. हम अपनी तपास कह सक्ते हैं कि कानपुर लखनक और पना. रख में हमें जितने वैद्य मिले पं० जगन्नाथ शर्मा को हमने संघसे उत्तम पाया। थोड़े दिन ये कि हमारी यह को हैजा हुआ था और यह विनकुका होश थी तन्होंने या किया और गाध घटे ही घह होशं में आई और राज में वह संपूर्ण रूप से भाराम है। गई । BE tinni मोहनलाल " जागसेनगंज इलाहाबाद TRE1M room सी १५ ज्वलाई २ . . हमें पं. जगन्नाथ जम्मा के चैद्यक के लियाकत पर अपनी राय लिखने में यात मुशी हैं। करीमई महीना में हमारे पिता जो free वर्ष है जागीर यांनो मे पीड़ित थे और कोई दया से जगको फा- यदा नहीं मालूम होता पन्त एमने जमको पं० जगन्नाथ गम्मा वैद्य जी मे दग्नाश करपायोगहों ने ऐमा दिननगा के उनका दवा किया.शि वह बिलकुल श्राराम हो गये। वैद्य जी मिर्फ दगारे पिताही को नहीं भाराम्य किया.यल्कि हमारे भाई को स्त्री के। जो कि अंगरेज जाकर के पलाज में.मी. मरणापन्न अवस्था में ची उगको साल से भारोग्य हुई। नममें हमने पह,गुण, स्योपरि पाया कि यह मरीजपर अपना पूरा ध्यान २ देते और मेहनत करते हैं कि और २ धंधों में मुशकिल मे पाया जाता है । यह हरयत रोगी है। देखने के लिये मुसहर रहते हैं और वैद्यो यो माफिया सोमी नहीं है। उनके सामने गरीयोपोर धनवान सरायर हे॥ FFLIFir “विन्दप्रसाद कोर्ट इन्स्पेकर इलाहाबाद , . ता० १४ अपरैल १८८७, एम यहुत खुशी के साथ अपनाराय 40 अगनाथयैद्य के लिपायत पर लिखते हैं हमारे खात्र फिदाईसेम यति दिन सयुषार पार छाती के जलन से पीड़ित था। यह मेहुत दिन तिवनिंगरेज हारों का करता रहा लेकिन उसको फुछ फायदा नहीं हुमा । यीमारी बढती गई और उसकी बचने की कोई उम्मैद नहीं थी। उसका माप निराश हे। कर अन्त में पं० जगन्नाथ शर्मा से दया करागा प्रारम्भ किया और इ. तना फायदा हुआ कि दूसरे ही दिन नमकी हालत बदल गई । उनका दया घरायर होता रहा जब तक यह अच्छा में हो गया । सिवाय इसके हमने अपने पड़ोस में दवा करते देखा है और उनय अपने काम में निहायत पालांक और लायक प्राया.' महम्मद जहरई सेनरिबर गवर्नमेण्ट हाई स्कूल इशाहाबाद न क नाथ वैद्य की दया हमारे दहिने पैर में हाथीपांव हुमा था और हमने इस बीमारी के गाराम कराने के लिये बहुत हफोम डाकृरों का इलाज किया नेकिन किसी से मापदान हुन्नी । भाखोर में हमने प० किया और हमको बहुत जल्द आराम किया। हम मजब सही है शिवह बहुत चालाक और लायक चिकित्सक है-र किसकी रन यीमारिया भाम करते हैं bers हाहावाद ता० १५-मा . ० ० एच पेटरीज फायरमैन ई० माई चार- HTR ३३ ता० १ नवम्बर १८८० वैद्यराज पं० जगन्नाथ शम्मा ने-हमैं दो दिन में हेजा से प्रारोग्य किया वह हेना इस कदर बिगड़ गया था कि हमैं जीने का कुछ भी माशा नहीं था हमने उनको अपने काम में बहुत होशियार और चा- ताक पाया। -नारायणराव क्लर्क इलाहाबाद १ फरवरी, ..१८१ पं० जगनाथ शर्मा वैद्य ने हमारे लड़कों को हैजे की बिमारी में चिकित्सा किया इसमें कुछ सन्देह नहीं कि पं० जी अपने काम में बहुत लायक हैं। "कन्हैयालाल... इफ्टम्मैन घोई इलाहाबाद - •ता ८ फरवरी १८०१ इम पांच, महीने से ,सुजाक के रोग से पीड़ित थे भनेक. .हकीम और आकरों के चिकित्सा कराने के बाद हमने पं०.जगन्नाथ जी वैद्य की दवा किया. भोर मत-पोहे गर्भ में प्रारोग्य हुये ॥ जगन्नाथप्रसाद क्लर्क यहादुरगञ्ज-इलाहाबाद ता. मार्च १८८५ को यह निखने में धड़ी सुशी है कि हमें पं० जगनाथ शर्मा वेद्य में पुराने सुमाक से दो हम में बिना किमी तकनीफ के प्राराम किया। सिवाय सके हमने अपने भाई को भी चिकित्सा सनसे करवाया जा- कि सामी और बुखार से पीड़ित थे उनको भी पं० जी ने एक सप्ताह में माराम किया । जो कुछ हमने देखा और जाना प० जी को अपने काम में यात चालाक और परिश्रमी और वैद्या में पूर्ण पाया । 4

हमें यकीन है कि कोई प्रादमी कि पं० जो से चिकित्मा फरया
पेगा कभी निराश न होगा विशेष कर गरीय रोगी जिन पर यह अधिक
ध्यान देते और परिश्रा करते हैं।
जगनाथ प्रसाद तिवारी
पि०
इयलु
हो. एकामिनर्म
आपिास इलाहाबाद
-
सा० १६ अपरैल ९८८१...
हमारी स्त्री को इस कदर एक सन धिमारी हुई थी कि हमे त.
नंका जीयन का कोई भी भरोसा नहीं था हमने उनको प्राराम करवाने
के लिये बहुत रुपया सर्च किया और अनेक हाक्तरों से इलाकरवाया
लेकिन सब निष्फल हुभा। इस नाजुक मौके में हमने पं० जगन्नाय वैद्य
के नाम सुनकर उनसे अपनी स्त्री का इलाज करवाया और यह बहुत
थोड़े दिन में माराम हो गई । वह यहुत यनयान और मरीजों के
भोर ध्यान देते हैं और उनकी दयामों का फायदा पिलातेही मालूम
हो जाता है।
६
युगलकिशोर
इलाहबाद
- मवम्यर १८८१॥
पं० जगन्नाथ शर्मा ने हमारे सड़के का इलाज किया जिसे मामा-
शय कि बिमारी बहुत दिन से घी पं० जी बहुत ध्यान से बिगारी का
इलाज करते हैं।
हीरालाल-पार-एग-एस
इलाहावाद
,

परेली से ता० ११, १९९ महाशय मुझे ३ वर्ष से शांख की बिमारी पी यहां पाप की दूकानौ नयना- मृत सलाई कई भादमियों ने लिहा सयों को श्राराम होगया परन्तु को अब तक व तक पूरा फायदा नहीं हुआ और कोई दवा होता भेजा। गोबिन्दराम बजाज बरैली हम फतहगढ़ से : महाशय, थाप ने जो धन्दनादि पूर्ण प्रदर रोग के वास्ते भेजा पा उसे भाराम हुई। ..::. पं० शिवानन्द गदा पटवारी कूल : . फतहगढ़ । 1 " 1 .. : घांसवरैली से ता० २३ जुलाई श्रीयुत् वैद्य शिरोमणि महाशय परिडतं. जगन्नाप जी शर्मा पाला- गन, निवेदन यह है कि आप के अर्फ सून मफा का २० योतल मैं ने पिया जो मेरे शिर और चेहरे के बालों की जघे में मुसियां निकलती और खुजलाती थी से प्रध निकलना यन्द होगया मैं माप को बहुत २ धन्यवाद देता हूं मैं ने ठाकुर अंगरेश और हिन्दुस्तानी या हकीम यूनानी वगैरह का इलाज किया परन्तु कुछ फायदा न हुप्रा तो भाप की दया से भाराम हुधा एमलिये आप अधिक धन्यवाद के योग्य हैं परमात्मा गाप केा. यश कीर्ति लाभयुक्त करें। आप का रुपाभिलापी ठाकुर लाखन सिंह या रईस गु० युधौली यांसबरैली

३
जिला इजारीयाग से
महाशय
• पाप का सुजाक का दया भेजा हुप्रा मिला से बहुत बढ़िया था
उस्से तीन सादमी को आराम होगया बल्कि बड़ी शीशी में दया कुछ
बच भी गया है अघ रुपा कर एक आदमी के लिये मुजाया की दवा
घेलपेयुल पारसल में यहुत जल्द भेज दीजिये ॥
श्री शम्भराम गनपतराम
गामीभासा जिला राजरोमाग
मिन्नयर माप का दया विषगर्भ तेल पत फायदायाद है इसलिये
फिर एक शीशी पावभर का बी० पी० पार्सल द्वारा हमारे नाम जल्द
पापसी हांया भेजिये देरी न कीजियेगा दया ठीक होने को सबष दम
उम्नेध करते हैं कि प्रत दवाइयां बाप की दूकान से हम मैंगाधंगे ।
घन्य के प्यों न फायदा हो जब कि वेद की रीति से घना
पाप का कृपावांची
वायू रामसिंह--रेवती पलिया
.
हरदोई से
महाशय नमस्ते
दाद की दवा माप का अत्यन्त उत्तम हे मुतको समझे लगाने से
भतिलाम हुमा । यात्मपामार्गक्षार तैल की भी एक शीशी घेल्यूपेयुला
द्वारा भेज दीजिये।
भव्यूलाल भजनलाल दूबे
भाधनहरदोई

फंसायाद से महाशय पक्षात् नस्कार के विनय यह फशिवानन्द मिश्र को, मार्फत जो दवा दस्तों को हम अपने वास्ते श्राप के यहां से अमृतार्णव नागा चूर्ण मंगवाया यह तो रामबाण होकर हमारे उक्त शत्रु रोग को भगा दिया भय इस समय दस्तों के बारे में हमही शिकायत पाकी नहीं है. हमने दस्तों में बहुत हकीम व वैद्यों की मौषधी सेवन को मगर किमी की मौषमी मे भी फायदा न 'हुश्राव भापको भन्तःकरण सेधन्यवाद देते हैं श्रीप युखार की दवा वेल्यूपिथुल द्वारा निम्नलिखित पते से भेष दीशिप ॥ बद्रीप्रमाद घोवे राश-निवासी ग्राम माधीनगर-फरुवाबाद, ।

MPIRENTATER
आरोग्यदर्पण ॥
विविध वैद्यक विषयक सम्बन्धी अपूर्व पुस्तक
चतुर्थखण्ड
स
SZEREPELER TETT KELI GREETIEI REPREBETRETETLERLEITER INTERRURERIEZIEN normamaz
जिस्में आयुर्वेद मत से ज्वरचिकित्सा और आध्यात्मिकशक्ति
प्रकाशार्थ योगशास्त्र का सम्पूर्गा अङ्ग पण्डित जगन्नाथ
शर्मा राजवैद्य सम्पादक प्रयाग समाघार ने सर्व
साधारणके उपकारार्थ रचकर प्रकाश किया
जगद्विख्यात
आयुर्वेदोक्त प्रौपधालय जानसेनगज.
"धार्मिकयन्त्रालय में मुद्रितहुआ ।
सिवाय ग्रन्थकर्ता के किसी को छापने अथवा भाषा
अदल बदल फरने का अधिकार नहीं है।
द्वितीय घार १०००
मूल्य फी पुस्तक
सन् १९०१ ई.

सूचीपन्न । विपय ज्वर क्या है, ज्वरोत्पति ज्वर होने का सवव, ज्वर पूर्व रुप, वातवर लक्षण, पित्तज्वर लक्षण, फफज्वर लक्षण ज्वर में लंघन विचार, लंघन कराने का कारण, सन्निपात में लंघन, लंघन निषेध लंघन से उपद्रव, अपलेलंघन फा फल, जन पान विचार, जल गरम करने को विधि, गरम पानी के गुण घर में घर का विचार, दूध साने की विधि, दूध देने का प्रमाण औषध खिलाने की विधि, अपदा प्यर लवल, दवा देने का समय, बातचर पर पाथ, पित्तन्दर पर पवाय, दाए गन उपाय, फफज्वर की चिकित्सा, सन्निपात ज्वर के लक्षण १३ सन्निपात नामादि, सापासाध्य निर्वाय, फर्गनूत, पृष्ठ | विषय १. सन्निपात घर की चिमित्ता १ | संज्ञानाश की उपाय, ४.सन्निपात पर अंजन; ४४ .४ मूर्छा उपाय, .५ तेरहो सन्निपात की चिकित्सा, ४५ ६ विपन ज्वर लक्षण, ५३ ६ तृतीयक ज्वर का भेद, चातुर्थिक ज्वर का भेद, ८ प्रलेपफ ज्वर, ५ १६ सप्तगत ज्वर लक्षण, ११ जीर्णज्वर, ११ वात वलासक ज्वर, १२ | आगंतुक उमर, ज्वर से दश उपद्ध, १३ | ज्वर ले साध्य लक्षण, १४ | ज्वर के असाध्य लक्षण, १६ मन्धर ज्वर के लक्षण, १० विषमज्वर की चिकित्सा, शीत पूर्य बर पर फाढ़ा, अर्फ, अर्क गाजर २१/ महा ज्वरांकुश, ६७ २२ | कुईनाईन मिधि, २३ ज्वर में मूलिका धारमा, २३. चौथिया की उपाय, तिलांजलि, २९ ज्वर नाशक धूप, ३१ ज्वर नाशक दीप, ३३ जीर्णज्वर की चिकित्सा, ७५ ३७ कोप्ठबद्ध पियास उपाय, ७४-१५ ३ स्वरांते पर्व ७५ 90. ७३ ७४ .ज्वर। भाषा में इसे पुरवार. अगरेजी में फिवर (, Fever ) और यूनानी में तप कहते हैं । ज्वर वह रोग है जिसका अधिकार देश मात्र पर सर्वदा सर्व काल में बनाही रहता है, किसी २ वर्ष में सर्व देशों में अथवा एक दो देशों में ज्वर का.इतना प्रचंड वेग बढ़ता है कि मनुष्य मात्र को जड़ी भूत कर देता है उस समय लोगों की यह दशा होती है, कि कोई किसी को पानी तक देने लायक नहीं रहता ! इसके रोकने के लिये आयुर्वेदविद् विद्वानों ने तथा यू- रोपीय चिकित्सकों ने अनेक उपाय और यन किया. परन्तु कोई अत्यन्त उ: पयोगी तथा लाभ दायक यत्र न निकला और न कोई ऐसी औषधी किसी से निकाली जो मनुष्य मात्र के ज्वर को एक मात्र दूर कर देया यही सवव है कि जो प्रत्येक खण्ड के चिकित्सकों ने ज्वर कोही सब से बड़ा और भयानक रोग समझ कर अपने २ ग्रन्थ और चिकित्सा कर पुस्तकों में ज्वर का वि: स्तार और विशेप वर्णन और मतीकार लिरवा है इस लिये अधिकांश ग्राह: कों के अनुरोध से अाज हम मी भूत पूर्व भार्य चिकित्सकों के मतानुकूल ज्वर रोग की प्रधानता और पूर्व रूप, नाम, आदि कारण और परीक्षित चि कित्सायें लिखते हैं आशा है कि देशहितेपी गण अवश्य हमारे इस प्रमा, णित वर्णन पर ध्यान देंगे और निम्नलिरिवत लक्षणों से पूरा २ निदान एवं चिकित्सा करके महा कराल ज्वर रोग ग्रसित रोगियों के दुःख को दूर करेंगे। 'ज्वरोत्पत्तिः” पूर्व काल के महर्पियों ने ज्वर को सव रोगों का स्वामी और रुद्र कोप करके माना है और इसी को मृत्युराज और माण नाशक ठहराया है और महादेव जी के उस अर्द्ध नयन से इस की उत्पत्ति लिखी है कि जिस के स्पष्ट खोलने से मलय होती है। "ज्वरो रोगपतिः साक्षान्मृत्युराजो शानोऽन्तकः : क्रोधो दक्षा ध्वर, ध्वंसी रुद्रोई नयनोद्भवः । जैसा कि सुश्रुतं में लिखा है। है प्रारोग्यदर्पण। सन्निपात (सरसाम) या एक प्रकार के नवीन लक्षण युक्त जिसे अगरेजी में (एपोप्लेक्सि) कहते हैं हो जाता है और उस रोगको न थामने से रोगी बहुत जल्द मर जाता है, लेकिन वैय लोग. इस पर बहुत कम ध्यान देते हैं यहां तक कि आम ज्वर पर (कच्चा दुरबार) में भी उपण क्वाथ या रस देके पित्त विगाड़ देते हैं, हां, कुछ २. हकीमों का ध्यान इधर रहता है. लेकिन वे भी पित्त में ठण्डक अधिक पहुंचा देते हैं । जैसे मूढ़ वैद्य लोग शीतसे डरा करते हैं, कहीं शीत न आ जाय, वैसाही अज्ञानं हकीम लोग भी गरम से डरते हैं कि कहीं गरमी शिर पर न चढ़ जाय, इसलिये ज्वर की चिकित्सा बहुत | विचार के साथ करना चाहिये । ज्वर संप्राप्ति हेतु (ज्वर होने का सबब) मिथ्याहार विहाराभ्यां दोपाह्यामाशयाश्रयाः। वहिनिरस्य कोष्ठाग्नि ज्वरदाः स्यू रसानुगाः ।। (मिथ्याहार) ऋतु की मकतिके विरुद्ध भोजन, जून कजून भोजन, विना भूख में खाता, भूरव लगने पर न खाना, कच्चे फलों को खाकर पानी पीना वासी भात माठा या सेलका वरा खाना अथवा तेल दूध, दूध या दही मूली एक साथ में खाना इत्यादि (मिथ्या विहार) बहुत धूप में अथवा अग्नि के सन्मुख रहना वाद अति काल तक पानी में भीजना, वर्षा में बहुत बौछार में रहना, रास्ते से बहुत थके हुये आना तत्क्षण जल पी लेना या स्नान- कर डालना, कभी छाया कभी श्रोस में सोना, जुखाम की रक्षा न करना, प्रभात काल.में स्त्री प्रसङ्गादि. इन्हीं सब कारणों से ग्रामाशय में स्थित जो वातादिक दोप विंगड़ कर रस धातु में मिल के जठराग्नि (जिस्से खाना प- चता है) को वाहर निकास ज्वर रोग को उत्पन्न करता है । "ज्वर पूर्व रूपम्” अमोरतिर्विवर्णत्वं चैरस्यं नयन प्लवः । इच्छादेपो मुहुश्चापि शीतवाता तपादिपु ॥ जम्भांग मर्दोगुरुता रोमहोऽसचिस्तमः ।

'. आरोग्यदर्पणः।- अप्रहर्षश्च शीतं च भवंत्युत्पत्स्यति ज्वरेः॥ सामान्यतो विशेपातु जृम्भत्यर्थ समीरणात् । पित्तान्नयनयोर्दाहः कफान्नान्नाभिनन्दनम् ।। निम्नलिखित लक्षण यदि किसी व्यक्ति में पाये जाय तो जानना कि उसे ज्वर थानेवाला है जैसे विना चले फिरे थकाई मालूम होना, किसी बात में मन न लगना (विवर्णत्व) शरीर का रङ्ग और का और होना. अक्सर ज्वर | के पहले शरीर का रङ्ग कुछ बदल जाता है. 1- मुख वे स्वाद, नेत्र में आंसू भरि पाना (जैसे अभी सो के उठा हो) शीत, हवा और घाम कभी किसी को अच्छा लगे कभी बुरा मालूम हो, जंभुआई शरीरमें दर्द देह भारी रोम रबड़े होना या जाड़ा मालूम देना, अरुचि, आंख में गरमी, मन उदास और ठएढं का लगना यह सब लक्षण उपस्थित हो या दो चार लक्षण कम भी हो निस्सन्देह यह लक्षण ज्वर आने के पहले होता है यह सामान्य लक्षण है ।। अव विशेष लक्षण सुनिये अत्यन्त जंभुनाई और शरीर में दर्द वा ऐंठन हो तो जानना कि इस को वातज्वर होगा । नेत्र में दाह कुछ शिर दर्द पित्त ज्वर आनेवाले के पहिले और अन्न पर अनिच्छा. कफ ज्वर नानेवाले के पहिले होता है । ज्वर का सामान्य रूप केवल इतना ही है कि पसीना का न पाना, शरीर बहुत गरम, सम्पूर्ण शरीर जकड़ सी जाय. या दर्द, कर वस ।। वातज्वर, लक्षणम्।। वेपथुर्विपमो वेगः कंठोट मुख शोपणम् । निद्रानाशः क्षवःस्तम्भो गात्राणां रोक्ष्यमेवं च ॥ शिरो हृदात्र रुक् वक्र वैरस्यं वद्धविट्कता | शूलाध्माने भणं च भवत्यनिलजें ज्वरे ॥ वातज्वर में इतने लक्षण रहते हैं। शरीर में कम्प. जर, कभी बहुच जादा तेज हो जाय कभी कुछ कम हो जाय. गला, योउ. और मुन.सूबे.. नींद और छींक न आवै, शरीर रूरवी शिर-हावी और हाय पर वगैरह में ...

६ . प्रारोग्यदर्पण । दर्द या फाटन हो, मुख का जायका स्वराव, कोष्ठबद्ध (दम्न न हो हो भी तो सूखा और थोरामा) पेट में, कुछ हलकी पीड़ा और पेट फूला सा रहे एवं जमुहाई पाना, इतने सव लक्षण अथवा कुछ कम लक्षण होने से वातज्यर जानना ।। पित्तज्वर लक्षणम् । वेगस्तीक्ष्णो ऽतिसारश्च निद्राल्पत्वं तथा बमिः । कंठोष्ट मुखनासाना पाकः स्वेदश्च जायते ॥ प्रलापों बक्त कटुत्ता मूर्छादाहो मदस्तृपा । पीत विण्मूत्र नेत्र स्वक् पै- त्तिके भ्रम एव च।। बुखार बहुत तेज हो, दस्त पतला, नींद कम, गला, ओठ, मुख और नाक इनसे गरम भाफ निकले और वे सुग्व हो जाय, पसीना बहुत पावै या । कम बावै परन्तु कुछ न कुछ आता ही रहै मलाप (बड़बड़ाना, पानतान वकना) मुख कटु वेहोशी पेट में जलन या समस्त शरीर में दाह, नेत्र में ज- लन या नशासा मालूम हो, पिपासा वहुत, दिशा, पेशाव, प्रांख और शरीर कुछ पीले मालूम दे और घुमरी, यह लक्षण पित्तज्वर वाले के होते हैं !!.. श्लेष्म (कफ) ज्वर लक्षणम् । स्तैमित्यं स्तिमितो वेग आलस्यं मधुरास्यता । शुक्ल मूत्र पुरीपत्वक स्तंभस्तृप्तिरथापि च ॥ गौरवं शीतमुत्केदो रोमहर्षोऽतिनिद्रता । प्रतिश्यायोऽरुचिः कासःकफजेऽक्ष्णो- .. शशुकृता॥ अव कफ ज्वर का लक्षण कहते हैं। बहुत मन्द ज्वर रहै, देह चिप- चिपाय, पालस्य. मुरव मीठा, मल मूत्र का रंग सफेद, शरीर जकड़ी सी रहै.जैसे खूब खाये हुये का पेट भरा रहता है वैसे पेट भरा रहै शरीर भारी, जाड़ा मालूम होना, जी मचलाना, रोम खड़े होना, नींद अधिक आना, नाक वहना, अनि, खांगी और प्रांख सफेद हो तो जानना कि कफ ज्वर हैं । 4 आरोग्य दर्पण। द्वन्द्वज ज्वर के लक्षण का श्लोक न लिख कर खुलासा रीति पर.दि- खलाये देते हैं कि जिस ज्वर में कुछ वात ज्वर के लक्षण और कुछ पित्तज्वर के लक्षण मिले तो वात पित्त ज्वर जानना ॥ बात कफ ज्वर में-वात ज्वर और कफ ज्वर के कुछ २ लक्षण और जोड़ों में दर्द एवं शिर का जकड़ना यह विशेष लक्षण मिलते हैं। पित्त कर्फ ज्वर-जिस ज्वर में मुख लसलसां और कदुआ नेत्र में झांपी सी लगी रहै. वेहोसी, खांसी, पियास, कभी दाह कभी जोड़ा लगे उसे पित्त कफ ज्वर जानना । अव उपरोक्त कहे हुये ज्वरों की चिकित्सा लिरव कर वाद सन्निपातादि के लक्षण लिखेंगे ।। ज्वर रोग में लंघन बिचार । ज्वर चिकित्सा का पहला अंङ्ग यही है ॥ तिस्में प्रथम लोलिंब राज का बचन लिखते हैं। अधुना शृणुतन्विलंघनं ज्वरितानां प्रथमं प्रशस्यते । हेतन्वंगि, अधुना इदानीं, वसृणु, ज्वरितानां ज्वरयुक्तानां, प्रथमं लंघनं उपवासं, प्रशस्यते, सप्त दश हादश दिनानि, बात पित्त कफ क्रान्तानां, (बातिकः सप्त रात्रेण दशरात्रेण पैत्तिकः । श्लेष्मिको द्वादशाहेन ज्वरपाकमुपैतिह) इति बा- क्यात, आदौज्वरीतुलंघनं कुर्यात् ॥ हे सूक्ष्मांगि! इस समय तुम सुनो ज्वर वाले मनुष्य को प्रथमही (ज्व. रारम्भ) में लंघन (उपवास) कराना उत्तम है क्योंकि वातज्वर सात दिन में पित्त ज्वर दश दिन और कफ ज्वर वारह दिन में पचता है. इस बचन से प्रथम ज्वरवाले को उपवास करानाही अच्छा है ।। अन्यच्च-ज्वरादौ लंघनं कुर्य्याज्ज्वर मध्येतु पाचनं- सं० आद०-हमारे वैयों में ज्वर में उपवास कराने की परिपाटी ऐसी विगड़ी है जिसका कुछ ठिकाना नहीं, बरसों से ज्वर क्यों न पाता हो वैद्यराज पहुचतही डाटेंगे कि खाने को क्यों दिया उपवास करामो, रोगी प्रारोग्य दर्पण। भूरब से चिल्ला रहीं है. कहा खबरदार अभी खाने को न देना. यह वायु की भूख है, वस पाठकगण, इतनांदी में जान सकते हैं; वैद्य लोग आयुर्वेदविद् विद्वानों के लेख पर भी ध्यान नहीं देते हैं ।। ....1.:: लंघन कराने का कारण ॥ बाग्भट्टश्चाह-आमाशयस्थो हत्वाग्नि सामो मागान पिघाय येत् । बिदधाति ज्वरंदोपस्तस्माल्लंघन माचरेत् ॥ अस्यान्वयः-आमयुक्तोदोपः आमाशये स्थित्वामार्गान् आ- च्छाद्य अग्निहत्वा ज्वरंविदधाति तस्मात् लंघनं आचरेत् ॥ चक्रदत्तः-तरुणतुज्वरं पूर्व लंघने न क्षयं नयेत, अन्यञ्च- ज्वरितं पड़हत्तीते लंघनं प्रति भोजितं ।। लंघनार्थमुक्त सुश्रुतेन-शरीर लाघवकर यद्रव्यंकर्मवा पुनः, प्लंघन इंतिज्ञेय (कर्मोपवास लाहारांये) तथाच धन्वतरिः-ज्वराभिभूतः पड़हे व्यतीते विपक्क दोपः कृत लंघनादि । योभेपर्ज-खादति वैद्यवर्यो निःसंशयं । हत्यचिरात्सरोगान् ।। आदिशब्दात्परिपाक: वारिपान निर्वात सन:बासादि । भावार्थः-महर्षि वाग्भह कहते हैं कि दोपं ( वातादि.) श्राम में स्थित. हो के जठराग्नि को, ढांप और स्रोतों के 1 मार्गों को रोकता हुआ ज्वर को उत्पन्न करता है इस, वास्ते. लंघन कराना उचित है । चक्रदत, कहते हैं कि 'तरुण वर में प्रथमही उपवास कराने से दोप.पंच जाते हैं और छ दिन ज्वर गत होने पर लंघन युक्त रोगी को पथ्य' देना चाहिये। लंघन के विपय में श्री महर्षि सुश्रुत जी कहते हैं, कि जिस श्रीप से अथवा जिस कर्म से दोप पर्चकर शरीर हलकी हो उसको भी लंघन जानना, क्योंकि जो फायदा लं- घनं में है वही हलके भोजन में है ......, यथा- ये गुणाः लंघनेप्रोक्ता ते गुणा लघु भोजने- । -1-an.

.
प्रारोग्यदर्पण।
धन्वतरि जी की राय है की ज्वर आये हुये छ रोज हो जाय और
लंपन कराने से दोप पच गये हों उस समय औपध विलाने से निस्सन्देह
शीघ्रही ज्वर दमन होता है ।
अन्यच्च-सर्वज्वरेपु सप्ताह मात्रावत भोजनं हितम् ।
अन्नकालेह्य जानः क्षीयते म्रियतेथवा ॥ .
संपूर्ण ज्वरों में सात दिन तक बहुत हलका भोजन देना क्योंकि भूरव
लगने पर-भोजन न देने से रोगी कम जोर हो या मर जाय, इत्यादि.भनेक
ममाण मिलते हैं ग्रन्थ,बढ़ जाने के भय से नहीं लिखा इन सब वचनों से
ठीक सावित होता है कि विना श्राद्योपांत विचारे रोगी को अधाधुन्ध लंघन
न करावै. भूख लगने पर हलका भोजन अवश्य देव ।।
अस्नेहनीयोऽशोध्यश्च संयोज्यो लंघना दिना ।
जो ज्वर रोगी, स्नेह पान और वमन विरेचन कराने लायक नही
है उसको लंघनादि कराना, इस्से स्पष्ट होता है कि यदि रोगी बलवान
हो तो दोपाधिक्य देव के वमन जुलाव से मल निकाल कर ज्वर आराम
करना चाहिये ऐसी अवस्था में उपवास कराना निस्फल है. यदि उक्त
कर्म लायक न हो तो दो चार दिन उपवास करा के दोप पचाय देना,
उचित है-
अन्यच्च-मानद स्तिमितैर्दोषैर्यावंतः कालमातुरः।
कुर्यादनानं तावत्ततः संसर्गमाचरेत् ॥
जब तक यात पुरीप ( हवा का छूटना दस्त का होना ) वन्द रहे और
दोप बढ़े हों तब तक उपवास करावे बाद उसके मिश्रित उपाय करना
उचित है।
अन्यच्च-ज्वरस्य प्रथमोत्थाने लंघनं च दिनत्रयं ।
न देयं कथितंवारि न च भैपज्य दापयेत् ।।
वर के श्राराम्भ में पहले तीन दिन लंघन करावे, न शाथ का जल
M

आरोग्यदर्पण। पीने को दे और न किसी किस्म की श्रीपध, विलावै । जैसे जल के अधिक 'उद्वेग में मेंह यांधना उस की शक्ति को नहीं रोक सक्ता और क्रोध की तरु- णावस्था में उपदेश और शान्ति कारक वचन क्रोध को अधिक भड़काता है ऐसे ही डवर की अति तरूणावस्था में श्रौषध क्रिया उस के वेग को कई गुना बढ़ती है। सं० श्राद० ज्वररोग में उपवास कराने का नियम सिर्फ वैद्यक शास्त्र में है यूनानी'और डाक्टरी में इस का कुछ नियम नहीं है और वे लोग इस पर कुछ ध्यान भी नहीं देते हैं कैसाहू. ज्वर तेज हो रोगी के मांगने से पथ्य दे देते हैं इसी से वे लोग ज्वर रोग बहुत कम आराम कर सकते हैं ज्वर के प्रारम्भ में यदि ज्वर तेज बना हों तो दो तीन दिन तक रोगी के मांगने से भी खाना न देना चाहिये लेकिन उस के वल को देव के, जब देवे की ज्वर धीमा, हो गया और दोप भी कुछ पच गये हैं। एवं रोगी भी खाने को जिद्द कर रहा है तो शाम को साबूदाना या मूंग का जूस देवै । यह नियम सब से उत्तम है कि जब तक रोगी को खूब तेज भूख न लगै खाने को न | देय । क्योंकि " नहिदोपक्षये कश्चित् सहते लंघनादिकम् " दोप के पचंनाने पर उपपास आदि रोगी से नही सहा जाता शाम को जूस क्यों देय इस का कारण आगे दिखला गे॥ सन्निपात में लंघन विचारं ॥ त्रिरात्रं पञ्चरात्रं वा दशरात्रमथापिवा । लंघनं सन्निपातेपु कुर्य्यादारोग्य दर्शनात् ॥ तीन दिन, पांच दिन अथवा दश दिन सन्निपात में उपवास करावै जब तक आरोग्यता न दीरव पड़े। कोई २ " आरोग्य दर्शनात् । अर्थ करते हैं कि जब तक रोगी श्राराम न हो उपवास कराता जावै, यद्यपि पञ्चम्यंत शब्द से ऐसा अर्थ. हो यक्ता है, परन्तु ग्रन्थ कर्ता का अभिमाय यह नहीं है, यदि यह अभिमाय होती तो" त्रिरात्र पक्षरात्र" वा ऐसा न लि. रखते इसका अभिमाय यह है कि यदि दश दिन के भीतर ही कुछ फुरसत देख पड़े तो पथ्य दे देय, क्योंकि उपवास कराने से रोगी, कमजोर हो का यह आरोग्यदर्पण। "; बहुत उपवास कराने से वल का नाश.(कमजोरी.). पिपासा दिल दिमाग का कमजोरी, टकटका अधिक निद्रा (झांप ) घुमरी, श्रोकाई और दमा आदि उपद्रव अति लंघन. कराने से होता है. इस लिये, विना विचारे अधाधुन्ध,लंघन न कराना चाहिये ।। ....... ३. सम्यक् लंघन का फल । ज्वरनंदीपनं कांक्षा रुचिलाघव कारकं । सृष्टिमारत विण्मूत्रं क्षुत्पिपासाऽसहं लघुम् ॥ प्रसन्नात्मेन्द्रियं, क्षाम, नरं विद्यात्सुलंघितम् । लंघन कराने से दोप पचता है और दोप पचने से जव सव लाभ देख पड़ें सव जानना कि लंघन इस रोगी का अच्छा बन पड़ा है-जैसे अधो वायु | खुले. डकार साफ श्रावे तथा दिशा और पेशाब खुलासा हो, क्षुधा लगने पर विना पाये और पियास लगने पर विना पानी पिये रहा न जाय और शरीर हलकी मालूम हो, मन एवं इन्द्रियां सब प्रसन्न हों और शरीर ढीली आसक्त हो जाय तो जानना कि इसका लंघन ठीक हो चुका है । ज्वर में जल पान विचार चाहे कोई विमारी हो खास कर ज्वर और हैजा आदि विमारियों में बहुत जरूर है कि रोगी को साफ पानी ( परिष्कृत जल ) पीने को देय; क्योंकि अधिकतरं यह रोग जल विकार से होता है, और यही सवय है जो वैयक शास्त्र में गरम पानी पिलाने को, अधिक अनुरोध किया है, 'पानी गरम करने का कोई विशेष सवय नहीं है, पानी गरम करने से पानी के कीड़े मर कर पानी से अलग हो जाते हैं, और दान लेने से वह पानी कृमि रहित साफ और अग्नि पर्द्धक होता है। वैयक शास्त्र में जहां तक हमने देखा है नव ज्वर में शीतल जल का पान, निपेयही पाया है। यथा ।।

. आरोग्यदर्पण। १३ दिवास्वप्नं व्यवायञ्च व्यायाम शिशिरं जलम् । क्रोधप्रवात भोज्यांनि वर्जयेत्तरुण ज्वरी ॥ दिनमें सोना, स्त्री प्रसङ्ग. मेहनत. शीतल जलपान, क्रोध, अधिक हवा का सेवन और भोजन नया ज्वर वाला रोगी त्याग करै ।। अन्यच्च-पार्श्वशूले प्रतिश्याये वातरोगे . गलग्रहे । आघ्माने स्तिमतेकोष्ठे सद्यशुद्धो नवज्वरे ॥ अरुचि ग्र- हर्णागुल्मः श्वासकासेपु विद्रधी । हिक्कायां स्नेहपानं च शीताम्बु परिवर्जयेत् ॥ पसुरी की दर्द, जुरवाम, वात रोग ( सर्वाङ्ग दर्द आदि) गलग्रह, पेट फूला हो, अग्निमन्द हो, शीघ्र ही जुलाब लिया हो, नये वुरखार में अरुचि, (भोजन पर अरुचि) ग्रहणी (दस्त से कच्चा अन्न गिरता हो ) वायगोला आदि, दमा, खांसी, विद्रधि (गोल या लम्बी एक तरह के सूजन शरीर में पड़ जाते हैं और वही सूजन पक भी जाता है उसे विद्रधि कहते हैं) हुचकी रोग और स्नेह पान में शीतल जल पीने को न देना चाहिये । जल गरम करने की विधि। दिन में पीने के लिये सूर्योदय में पानी गरम कर और रात में पीने के लिये सूर्यास्तमें पानी गरम करै । वर्षा और वसन्त में कूप (कुआं) जल, हेमन्त और शिशिर ऋतु में कूप अथवा साफ तालाव का पानी ।। अभाव में सव ऋतों में कूप का जल लेवे क्योंकि कुंये का जल पान किसी ऋतु में निपेंध नहीं है इसलिये न मिलने पर कूपही का जल लेना। रोगी के पीने के माफिक जल लेकर चांदी अथवा मृत्तिकापात्र में गरम करै एक दो उफान आ जाय अथवा जितना गरम करना है गरम हो जाय वो पान को अग्नि पर से उतार ले और कुछ देर तक उसी पात्र में जल रहने दे जब जल स्थिर हो जाय और देवे कि मल नीचे जम गया होगा आइस्ते से दूसरे मिट्टी के वसन में चौपरता खूब गफ कपड़ा पात्र के मुखपर देके तीन हिस्सा पानी छान ले और एक हिस्सा जो नीचे का मैला पानी है फेंक दे, . आरोग्य दर्पण नही दो हैं। दरते हैं कि शीत करेगा यह उन की महा मूर्यता है क्योंकि " पितो मोहमायाति मोहान् माणं विमुभति पियाये को पानी न मिलने से बिहोसी आती है और मोह से प्राण छूटने का मय, इरा लिये पियारा लगने पर पानी अवश्य पीने को देय परन्तु,थोड़ा २ जल पिलाना शास्त्रोक्त विधि है ज्वर में ग्रहादि विचार । नवज्वरी भवद्यना गुरुप्णा वसनावृतः । सामान्यतो ज्वरापूर्व निवाते निलये वसेत् ॥ 'नये ज्वरवाले को याद करके कोई भारी वस्त्र से ढॉप देना । यद्यपि ज्वरवाला भारी वस्त्र के श्रोढ़ने से यवड़ावै गा लेकिन वस्त्र के श्रोढने से. भी पसीना निकल पाने से ज्वर वढने का भय जाता रहता है, अगर देखे कि भारी वस्त्र के उड़ाने से रोगी वहुत घबडाता है और स्वेद विल- कुल नहीं निकलता तो भारी वस्त्र न उदा के सिर्फ एक दोहर उदाय दे और पित्त ज्वर वाले को और जिस के शिर में अधिक दर्द हो वहुत गरम और भारी कपड़ा न उढ़ावै । नव ज्वरी कहने से यह मतलब है कि पुराने ज्वर में रोगी को कभी कपड़े में ढांक न रखना चाहिये । यह सामान्य बात है कि वुरवार वाले को हवादार मकान में न र- रखना, इस्से यह मत समझना कि रोगी को एक अन्ध कोठरी में वन्द कर देयो कि अच्छा भी आदमी धवड़ाकर मर जावै । रोगी को.एक साफ में- कान में जिस्में वड़ा केवाड़ और शुद्ध वायु प्राने जाने के लिये खिड़कियां लगी हों., हां, यदि उन खिड़कियोंसे वाहरी अधिक हवा.आती हो तो परदा डाल देवे (भवातसेवा) प्रथम ही कह दिया गया है कि रोगी को तेज हवासे बचाना चाहिये। इस बार को खूब याद रखना चाहिये। अगर रोगी को बहुत गर्मी लगै और वह परवा हांकने को कहै और जिसके बारम्बार पसीना आता हो और उस पसीना के प्राने ये ज्वर को कुछ भी फायदा न पहुंच कर उलटा रोगी गुस्तं और कमजोर होता जावे तो, उपके गरमी, पसीना. - १७. करता है। प्रारोग्यदर्पण। विहोशी शांति के लिये रोगी के मुरवपर वरावर परखग होकता रहै कभी वन्द न करै । किस परवेकी हवा देव ममाणके लिये सद्ग्रन्थोंका इलोक लिखते हैं ।। ... व्यजनस्यानिलस्तृष्णा स्वेदमूछी श्रमापहः। (व्यजन खर्जूरीपत्रभवश्रेष्ठं) तालवतभवोवातस्त्रिदोष शमनोमतः॥ बंश व्यजनजः सोष्णो रक्तपित्त प्रकोपनः॥ चामरो वस्त्र संभूतो मायूरो. बेत्रजस्तथा । एतेदोषहरावातास्निग्धा हृद्यः सुपूजिताः॥ परवे की हवा पियास, पसीना, विहोशी और थकाई को परवा खजूर पत्र का अच्छा होता है, ताड़ के परखे की हवा तीनों दोपको नाश करता है. वांस के परखे की हवा गरम, रक्त पित्त को विगाड़नेवाला है, चामर, कपड़े के पंखे, मयूरपंख और बेंत के परवे की हवा, दोषों को. हरने वाला, चिकना, दिल को ताकत देनेवाला और ऋपियों करके मशंसनीयहै। ज्वर रोग में दूध खाने की विधि । वैद्यक में तीन अङ्ग हैं निदान, निघंट, चिकित्सा-निदान पूर्व कारण को कहते हैं कि रोग किस सवव से होता है और उसका पूर्व रूप और सा- ध्यासाध्य का विचार निदान से जाना जाता है और निघंट में श्रीपधियोंकी उत्पत्ति लक्षण गुण विकार श्रादि वर्णन रहता है, निदान और नियंट यह दोनों प्रकर्ण चिकित्सा के सहायकहैं-"चिकित्सा" यह शब्द 'कित" धातु से बना है जिसका अर्थ है रोगों को दूर करना हटाना, भगाना, चिकित्या यह बड़ा कठिन काम है क्योंकि जैसे किले में अथवा, राज्य में दुशमन द. खल कर लेता है तो उसका निकालना बहुत कठिन हो जाताहै उस अवस्था में राजनीति विशारद पुरुष-साम, दाम दण्ड भेद, चार उपाय शत्रु को निकालते हैं यह चारों उपाय किस राजो के पास होते हैं कि जिसका राज्य सप्तांग से पूर्ण रहता है जिसका विस्तार. वर्णन नीति शास्त्र में लिखा है ऐसा ही पूरी चिकित्सा वह वैय कर सक्ता है जो आयुर्वेद के समस्त प्राः और शाखा मशाग्या के विज्ञान में दक्ष होता है और न केवल दसताही काम से ३ कशोऽल्पंदोपों दीनश्च नरो जीर्णज्वरादितः १८ प्रारोग्यदर्पण। | देसा है किन्तु सर्व प्रकार की सामग्री और सामान भी होना चाहिये जैसे नीति विशारद पुरुष किले से दुशमन को निकालना चाहता है. और निका- लने की एक विधि भी जानता है पर उसके पार-साम, दाम, भेद, दण्ड चारों सामान नहीं तो कहिये किस तरह निकाल सकेगा अथवा, सब सामान है पर उसको काम में लाने की क्रिया नहीं जानता तो भी वह शत्रु के है- टाने में असमर्थ रहता है बस इसी दृष्टान्त के मूल पर सज्जनों को सोचना चाहिये कि चिकित्सा कर्म बढ़ा सूक्ष्म और पूर्ण विद्या और शुद्ध बुद्धि के द्वारा ठीक किया जा सक्ता है जैसे शत्रु संकट में नीति विशारद लोग शान्ति के द्वारा अथवा कुछ दे लेकर अथवा शत्रुओं के आपस में भेद उपना के शत्रु पक्ष को निर्वल करते हैं पर. जब यह तीनों यत्र नहीं चलते तो, अस्त्र शस्त्र के द्वारा लड़ते हैं कि जिसके लिये बहुत घामर्थ्य और साहस चाहिये यदि राजकीय युद्ध से रोग और चिकित्सा की लड़ाई का मिलान किया नाय.तो मत्येक बात मिल सक्ती है. परन्तु लेख बढ़ने के कारण वह नहीं लिया जा सकता है. पर वृद्धिमानों के निकट इतनाही उपदेश बहुत है कि चिकित्सा कर्म बहुत गंभीर और बुद्धि विद्या साध्य है इसमें कुछ सन्देह नहीं है कि चिकित्ण शास्त्र के न जानने ही ये भारत की बड़ी हानि है, क्योंकि प्रारोग्यता ही जीवन का एक मात्र फल है और विधिवत आयुर्वेद के जाने विना आरोग्यता की रक्षा नहीं हो सकी है। हमारे इस देश में वैद्य लोग बुखार में दूध खाने को नहीं देते चाहै ज्वर नया हो या पुराना. और डाक्टर लोग नये ज्वर में भी दूध खाने को बता देते हैं अब हम फिन की: धातों पर ध्यान देंय: किसकी सम्मति से ज्वर में दूध खिलायें भव इम को वास्तविक धर्म है कि कुछ वैद्यक शास्त्र देखे सुने अपनी स्वास्थ्य रक्षा खुद करै । .दूध देने का प्रमाण । सृष्ठ वोपश्च रुक्ष पिचानिलज्वरी ॥ पिपासातः सदाही वा.

आरोग्य दर्पण। १९ पयसा स सुखीभवेत् । तदेव तु पयः पीतं तरुणी हन्ति मानवम् ॥ इतने लोगों को दूध अमृत के समान गुण करता है। अति दुर्वल, अल्प दोप युक्त, दीन अर्थात् घबड़ाया हुआ या डरा, हुआ.- और जीर्ण ज्वर से दुरिवंत (पुराना ज्वर ) जित रोगी.को दस्त न होगा हो करवा और पित्त वात ज्वर वाला, तुपा एवं दाह रोग वाले को दूध फायदा करता है और वही दूध नये ज्वर में पिया भया रोगी को मार डालता है।' अन्यच्च-जीर्णज्वरे कफेक्षीणे क्षीरस्यादमृतोपमम् । त- देवतरुणपतिं विषवतहन्ति मानवम् ॥ धारोष्णं वा पया शीतं पीतंसद्यो ज्वरंजयेत् । पुराने धुखार वाले को और जिस्का कफ सूख गया हो उसे दूध अमृत के समान गुण करता है और नये वुरखार में पिया भया, दूध विप के समान रोकी को मार डालता है । धारोपण अर्थात् संघही का दुहा हुआ गरम दूध जो पृथ्विी पर न करवा गया हो अथवा शीतल दूध पीने से शीघ्रही वह दूध ज्वर को नाश करता है। इससे स्पष्ट हुआ कि नवीन ज्वर में पांच सात दिन दूध न देना चाहिये वाद दूध पिलाना गुण दायक है इस में महर्षि सुश्रुत का भी वचन प्रमाण हैं। सूत्र स्थान अध्याय ४५ वातपित्त शोणित मानस विकारप्वविरुद्धम् जार्णज्वर कासस्वास'शोपक्षय गुल्मोन्मादोदर मूर्छा भ्रम मद दाह पिपासा दृस्ति पाण्डुरोग ग्रहणी दोपार्शः शूलोदावर्ताति- सार प्रवाहिका योनिरोग गर्भास्राव रक्त पित्त श्रमसम हर। पार पिच रक्त भोर मन के विकार में दूध पिलाना मना नहीं है. वया जीर्णनर जो चिरकाल से ज्वर न छूटा हो दमा रवांशी (शोप) शरीर को पति दिन सूखसे जाना (क्षय.) सपेदिक, गोला. उन्माद, बिहोसी. घुमरी.

२० आरोग्यदर्पण। नेत्र में नसा सा बना रहै, शरीर में जलन होना पियोग हृदय का दर्द नाभि, के नीचे दर्द होना, पादु, ग्रहणी, वावासीर. पेट का दर्द, उदावर्त, अतीगार, मवाहिका, योनिरोग गर्भ का न ठहरना, रक्त, पित्त, थकाई ( रूम ) विना परिश्रम किये शरीर का थकित हो जाना इत्यादि रोगों को दूध नाशं करता है। ज्वर में औषध खिलाने का नियम । ज्वर में औषध देने का नियम लोग. विलकुल नहीं जानते ज्वर पका हो या न पका हो: शीघ्रही दवा लिवा देते हैं इसी से ज्वर न छुट के दूना हो जाता है क्योंकि ॥ भामज्वरस्य निङ्गानि न दद्यात्तत्र भेपेजम्। भेपजह्याम दोपस्यभूयो बर्द्धयतिज्वरं । शोधन शमनीयंतु करोतिविप ज्वरम् । कच्चे ज्वर में पौधप न देय क्योंकि आम (कच्चा) ज्वर में औषध देने से और भी ज्वर बढ़ता है, और कच्चे ज्वर में शोधन अथवा शमनीय औः पधं दे तो मानों ज्वर को विषम करना है, इस लिये कच्चे, बुरवार में कभी, धोखे से भी औषध न-देय । ' मृदौज्वरे लघौदेहे प्रललेषु मलेपुच । पक्वं दोपं विज़ा- नीयाज्ज्वरे देयं तदोपधम् ॥ जब देखे कि ज्वर, कुछ-धीमा हुआ है और शरीर हलकी हुई है तथा बासादिक दोप- यथा स्थित हुये हैं सब जानना की अव दोप पचा: है उस अवस्था में दवा देने से ज्वर का नाश होता है। लेकिन इस विषय को ह. कीम साहब और डाक्तर पावू विलकुल नहीं जानते हैं: 'जाने कहां से, इस बात को तो हम कई स्थलों में दिखला. चुके हैं कि वैद्यक वियां देश काल पर निर्भर है, तो विलायत और अर्व देश की वैयक विद्या के. वल से, इस देशवाले की चिकित्सा करना बिना इस देश की, परीक्षा किये लाभ दायक हो, सक्ता है ? कदापि नहीं, इस लिये..डाक्तर हकीमों को भी वैद्यक যাণ, पढ़ना चाहि॥ - . * १ आरोग्यदर्पण। अपक्व ज्वर लक्षण। सुश्रुत उत्तर तात्रम् पध्याय ३६ हृदयोद्देष्टनं तंद्रा लालाश्रुतिररोचकः दोषाप्रव- तिरालस्यं विवंधो बहुमूत्रता ॥ गुरूदरत्वमस्वेदो न पक्तिः शकतोऽरंतिः। स्वापः स्तंभो गुरुत्वं च गात्राणां" बन्हि, मार्द्रवम् ॥ मुखस्याशुद्धिरग्लानिः प्रसंगी वलवानज्वरः। लिंगैरेभिर्विजानीया ज्ज्वरमामं विचक्षणः । यपि दोप पचने का यह पूरा साबूत है कि बात ज्वरादि में बात ज्वरादि के लक्षण कम न हुये हों तथापि अधिक चेत कराने के लिये फिर दिखलाया जाता है कि जब तक निम्नलिरिक्त लक्षण ज्वर रोगी में, पायां जाये तो जानना कि दोप अभी नहीं पचा उस अवस्था में औषध कदापि न | देवै । जैसे-जिस ज्वर में छाती जकड़ी सी मालूम हो. नेत्रोंपर झपकी, मुख से लार गिरना या पंच्छा टूटना, अन्न पर अरुचि, मातादि दोपों का स्वा- भाविक काम में अमति हो, सुस्ती दस्त का न होना और मूत्र जादा होना, पेठ,भरासा मालूम हो तथा पसीना न आवै, कल न पड़े, नींद न लगें, शरीर जकड़ी हो या दर्द हो. अग्निमन्द, मुरव का स्वाद खराव और पुरवार खूबः तेज हो तो जानना कि दोप अभी नहीं पचा । अगर कोई यह कहै कि बहुत लोग ऐसे कोमल मिज़ाज के होते है कि श्रङ्ग मर्दादि ज्वर:के लक्षण से यः पड़ाय जाते हैं, हाय २ मचाने लगते हैं, वस . उसी अवस्था में वैद्य लोग घबड़ाय के दवा देदेते हैं, तो उस समय उपद्रव शात्पर्य कोई औषध देय यां नहीं ? (१०) रोगी को अचैतन्य देव वैद्य का घबड़ाना शास्त्र सम्मति नहीं, है अन्ततोगत्वा जब किसी मबल उपद्रव से रोगी को अत्यन्तही क्लेशित देखे सो ऊपरी प्रयोग से सिर्फ उसी उपद्रव को शांत करे. दोप पचने की औपध न दे, यदि कहो कि बिना दोप पचाये उपद्रव कैसे शांत होंगे क्योंकि उपद्रव दोप के भङ्ग हैं (उ०) ठीक है बिलकुल शांति नहीं हो सक्तेहैं कुछ वेग कम हो जायगे और ज्वर में विन भी न होगा जैसे अङ्ग दर्द में अङ्ग मर्दन, क- २२ प्रारोग्यदर्पण राना (वात नाशाय मन) उस्से दर्द निश्शेप न हो के क्लेश कम हो जायगा और इस्से ज्वर में कुछ बाधा नहीं हो सक्ता, जैसे शिर के दर्द में दर्द नाशक लेप माथे में लगाना यपि वह लेप विना दोप"प शिर दर्द समूल नष्ट नहीं कर यक्ता है तथापि हानि मी नहीं पहुचाता इसलिये ऊपरी प्रयोग करना कोई हर्ज नहीं है परन्तु विना दोप पत्र दोप, पाचनार्थ श्रीपध कमी धोरवे से भी न देवे । ज्वर रोग विशूचिका आदि रोगके यमान भयंकर नहीं है यदि विचार सहित चिकित्सा की जावे तो. ज्वर रोग से एक भी.रोगी न मरै केवल भूल होने से उबर रोग में रोगी मर जाते हैं ।। औषध दान कालः। मृदौज्वरे लघौदेहेप्रचलेपुमलेपचा पदोपविजानिया ज्ज्वरे देयं तदौषधम् ॥ दोपप्रकृति वैकृत्यादेकेषां पक्व लक्षणम् । सप्तरात्रात्परं केचिन्मन्यन्ते .देय..मौषधम् ।। दशरात्रात्परं केचिदातव्य मिति निश्चता ॥ ज्वर, रोग में जो औषध देने का नियम ऋषधियों ने कहा है उसे दि- खलाते हैं। जब वुखार धीमा हो और शरीर हलकी हो और देवे की वासा- दिक दोष यथा स्थित हो गये हैं उस अवस्था में दोप पचा जान कर औपध देवै । किसी.२ विद्वान की राय है कि वातादि दोप जैसे ज्वर में वेगमान रहते हैं यदि उसमें फर्क पर जाय या उलटे हों जांय "तब भी जानना कि दोप पच गये हैं औषधं देना उचित है और भी किसी प्राचार्य का मत है कि सात दिन पीछे और किसी के मन से दशं दिन पीछे ज्वर रोगमें औपंध देने का काल है । परन्तु सिदान्त मस यही है कि ज्वर के प्रादि में लंघन से दोप अवश्य ही पचेगा धप कुछ भी दोप पचा देखे क्वाथादि गोपध देवें इसमें हमारी पूरी सम्मति है कि ज्वर रोग में घटी नदि न देके केवल पंचाय पिलाना अत्यन्त लाभदायक होता है । परीक्षा द्वारा यहां तक देखा गया है कि यदि ज्वर रोगवाले को क्वाथादि कोई औपध न देके लंधनादि टीक उपचार पहित रखनेहीं से ज्वर रोग छुट जाता है, उपचार बिगड़ जाने रो. अमृत पमान भी औषध पिलाने से ज्वर नहीं छुटवा वरिक बढ़ जाता है ।। -- २४ . प्रारोग्य दर्पण (अभया) वड़ा हड श्राधा भाग (जलं) सुगन्धवाला १, भाग सब दवाइयों को ढाई सोला. ले: पूर्वोक्त प्रकार दोनों समय क्वाथ पिलाने से बिहोसी (शोप ) गल तालु जीम का सूखना ( निदाघ ) ग्रीष्म कलोप्मणा जनिता ज्वरोनिदायः ( बद) वारम्बार पियास का लंगना (मलपन) अनर्थक बात || बकना और बुद्धि भ्रांति इत्यदि उपद्रव युक्त पित्तज्वर शांति होता है उसी सरह (दुस्पर्शा) यवागा (ममदा').मियंगु-मियंगु मालकगुनी को भी कहते हैं. यहां पर. भियंगु नामक फूल लेना (किरास) चिरायता, कुटकी (सिंहास्य) पारूसा ( रेणुः.) पिचपापड़ा इन सव औषधों का काढ़ा में (शर्कयान्वित्तः सितायुक्त.) एक तोला मिश्री या चिनी डाल के दोनों समय पिलाने से, | पियार. ( दाहः ) वन्दिस्पर्शवदुःरवा-जैसा अग्नि से जलने से दुख होता है वैसाही जलन शरीर में होने को दाह कहते हैं इत्यादि उपद्रव सहित रक्त पिचवर आराम होता है । यह हम मथही कह चुके हैं कि पित्तज्वर में दाई अधिक होता है; पिचवर अथवा कोई ज्वर दाहं युक्त हो सो निम्नलिरिवस पपाय को.पिपावें॥ जलजल जल वाहरेणु विश्वोषध शिशिरैः शिशिरं जलं शृतस्यात् । सपदि सुखकरं सदा सदाहज्वर तृपियोज्य- मिदं नवज्वरेपि । श्रीमता, चरकेणाप्युक्तम्-मुस्त पर्पट कोशीर चन्दनो- दीच्य नागरैः शृतंशीत जलं दद्यात्पिपासा ज्वरशांतये ।। (जल) खस (जल) सुगंधवाला (जलवाहो) मोथा (रेणु) पित्तपापड़ा (विषिध) शोठ (शिशिर) लालचन्दन उक्त गव औषधों को समान भाग ले अधकचरा कर दाई तोला ले एक पाव जल में पकावै जव भाधा रहै मल छान कर खूब शीतल, कर अथवा उस काढ़े के पात्र को बर्फ पर रख देय १ तोला मिधा मिला के पिला एक ही दो रोज के बाद देखें कि दाह शांत नहीं होवा तो काढ़ा न पका के सिर्फः रात को भिजा के प्रोग में रख देय और मास काल मल छान कर ? तोला मिश्री मिला के पिला देव इसी प्रकार भवरे भिना के किसी शीतल स्थान में रख देय और माम को. मल. छान के आरोग्यदर्पण। मिश्री मिला के पिलाने से अति पिपासा सहित.भी-पित्त ज्वर शांत होता है इसी पर चरक महाराज भी कहतेहैं। नागरमोथा, पित्तपापड़ा, खस, लाल चन्दन, सुगन्धवाला और शोठ इनका काढ़ा बहुत शीतल करके पिलाने से पिपासा सहित पित्त ज्वर शांत होता है ।। दाह ज्वरे दाहशमनोपायाः। सुश्रुत उत्तर तन्त्रम् ॥ दाहाभिभूते तु विधि कुर्यादाह विनाशनम् । मथु- फाणित युक्तेन निम्बपात्राम्भसापि वा ॥ दाहज्वरात मति- मान् वामयत् क्षिप्रमेव च । शतधौत घृताभ्यक्तं दिग्ध्यावयंच शक्तुभिः ॥ कोलामलक संयुक्तैः शूक धान्याम्ल- संयुतैः । अम्लपिष्ठ सूशीतैश्च फेणिला पल्लनैस्तथा ॥ अम्लपिष्टैस्तु शीतैर्वा पलाशतरुदिहेत् । बदरीपल्लवोत्थेन फेनेनारिष्ट- कस्य च । लिप्तेऽङ्गे दाहतृण् मूर्छासर्वथैव प्रशाम्यति । नया ज्वर हो अथवा माचीन हो जिस ज्वर में दाह अधिक हो उस | दाह की चिकित्सा अवश्य करनी चाहिये । अगर रोगी कुछ भी बलवान हो तो दो तोला निम्वपत्र को महीन घोट पाव भर. जल में छान उसमें छः मासा शहद और दो तोला मैंगरा सकर मिला के रोगी को पिला, के तुरंत वमन कराना. या शसवार का धोया भया घृव को शरीर में मर्दन कराना । या धान जो गेहूं तीनों को पाव भर ले. एक सेर पानी में दो या तीन दिन भिजा रखना जब पानी वहा हो जाय पानी को छान लेय. तब उसी पानी में जव का सत्तू वैर. और शावले को महीन पीस सम्पूर्ण प्रमों में अथवा जिन २ अङ्गों में दाह हो लेप करना. या वैर के पत्र को पानी में वाट पांच सेर पानी में घोल के मंथना उसमें जो फेन उठे उसे दाह जनित अहं में लेप करना उसी प्रकार रीठे के फेन का लेप करना इत्यादि उपाय से दाह, पि. यास, और. मूर्छा शांत होते हैं।

| कुचस्थलानियासां, कुचस्थलो वक्षनः, वैदग्ध्यं चातुर्य, तेनमुग्धवंचतां ॥ भापार्थः यति रूपवती स्त्री पोड़श वर्ष की जिनके कोमल अंङ्ग और | कठोर कुचा में चन्दन लगे एवं मोतियों के हार से कुच शोभित एवं जिसकी २६ आरोग्यदर्पण। दाह पर प्रहलादन तैल। यैवार्द्धकुडवंपिष्ट्वा मञ्जिष्ठापलंतथा । अम्लप्रस्थ शतान्मिश्र तैलग्रस्थं विपाचयेत् ॥ एतत्पलादनंतैलं ज्वर दाह विनाशनम् ॥ जव एक पाप, मंजीठ दो तोला, काले तिल का तेल १ सेर, दही का गोड २,मन । तेल को. चांदी की कढ़ाई या कलईदार कढ़ाई में चढ़ाय जय और मंजीठ को पानी में महीन पीस तेल में डाल दे और दही का तोड़ थोडा २ ढाल मंदाग्नि में पचावै जब सब पानी जलजाय तेल मात्र रहजाय अग्नि से उतार छान बोतल में भर दे इस तेल को शरीर में लगाने से दाह ज्वर शीघ्रदी शांत होताहै । अंगर श्लोकानुसार ७॥ मन दहीका तोड़ डाल के शैय्यार करें तो एकही बार उस तेल के लगानेसे दाहज्वर शांत होताहै ।। हमारे कविवर लोलिम्वराज महाशय ने दाह के शांत्यर्थ जो उपाय लिखे हैं. पाठकगणों के प्रसन्नार्थ उसे भी प्रकाशित करता हूं और काव्य का- अर्थ भापा में ललित नहीं होता इस हेतु से संस्कृतमें अन्यय लिरवे देताहूं । श्रीखंड मण्डित कलेवर बल्लरीणां मुक्ताफलाकुल विशाल कुचस्थलीनां । वैदग्ध्य मुग्ध वचसां सुविलाशिनी नामालिगनं सकल दाह मपाकरोति । श्रीखंडेति-विलाशिनी नामालिंगनं सकलदाई अपाकरोति दूरीकरोती- त्यर्थः कीदृशीनाम् श्रीखंडैमंडिता कलेवर वल्लरीयासां, श्रीखंड स्वेतचन्दन, कलेवर शरीरं. बल्लरीलता. तनुलतेत्यर्थः, मुक्ता फलैराकुलानि विशालानि चातुर्पता भरी मन्द मुसुकानि मन को मोहित कर रहा है ऐसी स्त्रियों को अपने प्रा में लपटाने से महा दाह शांत होता है.।।

.. आरोग्यदर्पण। शय्यापल्लव पद्मपत्र रचिता वासोवयस्यैः समं का- न्तरे कुसमस्फुरत्तरुवरे वीणान्वितं गायनम् । आलापाश्च शुकालिं कोकिलकत्ताः कान्ताश्चकान्ताः कथा वाताश्चामल वालक.व्यजनजो दाहं निरा कुर्वते ॥ शय्येति-पल्लवा वा लक्षदाः विभक्ति विपरिणामे न योज्य पल्लवों स्त्री किशलयमित्यमरः कदल्यादीना वा पद्मपत्र. (कमलपत्र ) रचिता शय्या दाहनिरा कुर्वते दूरीकरोति, वयस्यैः समंवासः वयस्यै समान कालिकैः सह- वाय इत्यर्थः, कथंभूत कुशुमस्फुरत्तरूवरे मफुल्लपुप्पयुक्तं वृक्षे, कांतारों महा. वनं, कांतारो स्त्री महारण्ये इतिमेदिनी, वीणावायेन युक्तं गायनं (वीनाशि- तारलोके) शुकालि कोकिलकृता, पालापाः अलिपरिभापणे इत्यस्यरूपं. शुकः प्रसिद्धः, अलिर्भमरः कोकिलः पिकः पालापाः वचांसि, कान्ता नवीननार्यः कांता मनोहरा कथा भरतादि ग्रंथोक्ता शृङ्गार भेदा, अमल चालक व्यजन जनिताः वाताः वालको वीरणमूलं स्वस इतिलोके दाहं निराकुर्वते-मत्येकम- संवध्यते ॥ भावार्थ:-कदली (केला) पत्र अथवा कमल पत्रोंका पलंगपर विछाय उस शय्या परं दाह युक्तं रोगी को सुलाने से दाह शांत होता है ।। (कान्तारे वासः) जो, वन प्रफुल्लित पुप्पों से युक्त वृक्षों से शोभाय- मान हो रहाहै ऐसे वन में रखने से (कांतार महा जंगल और स्त्री दोनों का वोधक है परन्तु इस स्थल में महावन लेना 1) शितार हारमोनियम् एवं वीन श्रादि वाजाओं करके संयुक्त गान भी दाह रोग को नाश करता है। तोता, कोयल की आवाज, भ्रमर गुंज, रूपवती युवा स्त्री का स्पर्श, मनोहर कथा और कहानियों का सुनना, नवीन खस के परवे की हवा, पित्त ज्वर जनित. दाह को नाश करता है। शेष पित्त ।।। पिच ज्वर शांत होने पर भी यदि कुछ पित्त का शेप देखे तो उसे शान्ति રિટ 5 प्रारोग्य दर्पण..। कर दे क्योंकि कुछ भी पित्त वाकी रहने से पुनः ज्वर होने का सम्भव है मायः पित्त रह जाने से विषम ज्वर हो जाता है उसे डाक्टरी में (इन्टर मि- टेन्ट फीवर) कहते हैं इस लिये शेप पित्त को शान्ति करना बहुत जरूरी है। हतावशेषपित्तंतु त्वस्य जनयति ज्वरम्। पिवेदिक्षु रसं तत्र शीतं वा शर्करोदकम् ॥ शालिपष्टिकयोरन्नमन्त्री यात्क्षीरसंप्लुतम् । १. जो पित्त,शान्त, भये,,पर कुछ. शेष रह के त्वचा में रह जाय तो वह पित्त, निस्सन्देह ज्वर पैदा करता है उस अवस्था में उसे पौड़े का रस या चिनी का, शरवत पिलाना चाहिये जव तक पित्त की शान्ति न हो। वैद्यक न जानने के सवव से चिनी के शरवत आदि शीतल चीजों से इतना लोग डरते हैं, रोगी को कौन कहै आरोग्य भी पीनेमें डरते हैं कि कहीं शीत न पाजाय,देखिये भाव मकाश में क्या लिखा है। शर्करोदकस्य गुणाः ॥ जलेन शीतले नैव घोलिता शुभ्र शर्करा । एला,लवंग कर्पूर मरिचैश्च समन्विता ॥ शर्करोदक नाम्नै तत्. प्रसिद्ध विदुषां मुखः शर्करोदक माख्यात शुक्रलं शिशिरं सरं ॥बल्यं रुच्य लघु स्वादु बात पित्तात्र नाशनम् ॥ मूर्छा छर्दि तृषा दाह ,ज्वर शान्ति करं परम् ॥ • शीतल जल में साफ चिनी अथवा मिश्री की शरवत बनायं उसमें छोटी लायची कपूर ल_ग और काली मिर्च पीस के मिलाने से शर्करोदक ऐगा नाम पण्डितों के मुख द्वारा सुना गया है। यह शर्करोदक वीर्यात्पन्न कारक. उदर दाइ निवारक और दस्तावर है बलकर. रुचिकर हलका स्वा- दिष्ट वात पित्त और रुधिर धिकार का नाश करने वाला, विहोशी शिरं की घुमरी चमन पियास और दाह ज्वर शांति करने में परम श्रेष्ट है। इसलिये पित्त शेप नाशार्थ चिनी का शरवतं अवश्य पिलाना चाहिये ।

पाराग्य दर्पण। २९: और भी लिखा है (शर्करा सहित नीरं कफ कृत्पवनापहम् ) सफेद शक्कर (चिनी) का सरवत कफ को बढ़ाता, हैं परन्तु वायु को, नाश करता है, जिस ज्वर में कफ का कुछ लेश न हो और पित्त का; महा कोप हो तो उस. अवस्था में मिश्री का सरवत देना कदापि हानि कर न होगा, बल्कि शीघ्रही रोगी को तसल्ली होगी। वात पित्त ज्वर पर फांट : 'मधूक पुष्पम्मधुकं चन्दनं सपरूपकम् । मृणालं कमलं लोध्र गम्भारी नागकेशरम् ॥ त्रिफला सारिवान्द्राक्षां लाजा- न कोणे जले छिपेत् । सितामधु युतः पेयः फांटो वा सौ हिमोऽथवा ॥ बातपित्त ज्वरं दाहं तृप्णा मूर्छा रतिभ्रमान् । रक्तपित्त मदं हन्यान्नात्र कार्यविचारणा ॥ यह फांट वातपित्त मिश्रित कञ्च को और वातज्वर तथा पिचवर को निस्सन्देह श्राराम करता है । महुआ का फूल. मुलेठी,लालचन्दन, (परूपक) फालसा के जड़ का छाल. कमल वृक्ष की हंठी. (न मिलने पर कमल-गहे का वीज ), 'कमल' कमलगट्टा, लोध. स्वम्भारि, नागकेशर, त्रिफला, सरि- वन, मुनक्का और धान का लावा । इन सब दवाइयों को ३ तोला ले अध.. कचरा कर अथवा कलई दार पात्र में एक पाच पानी एक मृत्तिका पात्र में खब गरम कर अग्नि पर से पानी को उतारं उसी में औषध को डाल कर ढांप.देचे जव शीतल होजाय-मल के छान लेय और एक तोला मिश्री २ मासा सहर हाल के पीजावै अथवा हिम बना के.पीचे .अर्थात् दवा को रात में. भिजा देव सवेरे मल के छान कर मिश्री मिला के पिये। इस कांट के पीने से बातपिच ज्वर, दाइ, पियास, मूर्दा (बेहोसी ) ग्लानि, युमरी, रक्तपिच और नेत्रों में नशा सा.मालूम देना आदि सवों को आराम करता है। कफ ज्वर की चिकित्सा। इस बात को खूब याद रखना चाहिये कि जब सक रोगी में ठीक २ . 17 आरोग्यदर्पण। चिभ्रमः॥ परिदग्धा खरंस्पर्शा जिव्हा स्रस्तांगता पराष्टी- वनं रक्त पित्तस्य कफेनोन्मिश्रितस्य च ॥ शिरसो लुण्ढनं तृष्णा निद्रा नाशो हृदिव्यथा। स्वेद मूत्र पूरीपाणां चिरा- दर्शनमल्पशः ॥ शत्वं नाति गात्राणां सततं कण्ठ कूज- नम् । कोठानां श्यावरतानां मण्डलानां च दर्शनं ॥ मूक- त्वंस्रोतसांपाको गुरुत्वमुंदरस्य च । चिरात्पाकश्च दोपाणां सन्निपात.ज्वराकृतिः॥ अर्य-सन्निपात ज्वर में कभी जाडा लगे और कभी दाह मालूम होः ह. ड्डियां, सन्धियों और शिर में दर्द हो, आरवों से आंसू बहे, नेत्र लाल या धू. मिल रंग के हों और भीतर को वैठे जान पड़े, कानों में सनसनाहट एवं दर्द हो, गला सूखा और गले में कांटेसे पड़ गयेहों, झपकी, वेहोसी आनतान वकना खांसी.हांपी,खाने पर मन न चलना और घूमरीहो। जीप ऐसा हो जैसा अग्निसे जल गया हो और छूने में खरखरी मालूम हो, संपूर्ण शरीर सुस्त वा ढीली हो जाय जो करवट लेने में भी आलस्य लगै, मुरव से थूक ललाई लिये हुये कफ पित्त के सहित निकले, शिर में ऐसा दर्द या बेचैनी हो कि शिर को इधर उधर हिलाता रहै, पियास की प्राधिक्यता, नोंदका न पड़ना और छाती में दर्दहो। पसीना बहुत कम निकले और दिशा पेशाव भी बहुत देर में और बहुत कम हो ललाई लिये। यहांपर- पाठहै."कशत्वनानिगात्राणां" और कहीं २ पेसा भी पाठ मिला है. "कृशत्वचातिगात्राणां'. अर्थात् शरीर बहुत दुर्बल होजाय (लेकिन देखने में दोनों पाते हैं हमने कई सन्निपात ज्वरी को बहुत दुर्वल देखा है और किसी२ को अतिदुर्वल भी नहीं पाया) रोगी हरसमय काखता रहे और पीत. काली अथवा लाल रंगके गोल २ चहे या फुसियां संपूर्ण शरीर में निकल पावे विशेपकर कोरगा, और जांघोंमें। अच्छीतरह वोल न सके या विलकुलही न बोले न कानसे सुने और न आँखाले देखे और नाक कान पक जाय, पेट भारी और फूला.सा रहै और उत्तम चिकित्या करने पर भी दोष बहुरादिनोंमें पचे इत्यादि लक्षण युक्तं रोगीको सन्निपातंज्वरी समझना.। उक्त - आरोग्यदर्पण। संपूर्ण लक्षण उपस्थित होने पर प्रसाध्यही समझना चाहिये । यद्यपि सन्नि- पात रोग एक प्रकार का है परन्तु दोपों के न्यूनाधिक से तेरह भेद कहा है- जैसे एक २ दोष की अधिकता से, अर्थात् किसी सनिपात ज्वर में बात का जोर अधिक रहता है, और वह इस वजे से मालूम होता है कि बात के जितने उपद्रव हैं स्वास, खांसी, घुमरी, पानतान वकना अंगों में दर्द, जभुआई अधिक आना इत्यादि होने से इसी प्रकार पित्ताधिक से शरीर में लालर दाने पड़- जाना, मुख पाक, अतीसार अंतरदाह आदि, कफाधिक से अंग की जड़ता, वाणी की स्तब्धता आदि इसी प्रकार लक्षणों की आधिकता से दोप की श्रा- धिकता जानी जाती है । इस तरह वातादि से तीन, इंदज से तीन, सभिपात से एक तथा वातादि दोप के अधिक मध्य और हीन होने से सब तेरह भेद कहे हैं शास्त्रज्ञ वैद्य लोग तत्क्षण अनुमान कर लेते हैं। अब वैयों के नाम करण किये हुये तेरह प्रकार के सन्निपात ज्वर के नाम और लक्षण लिखते हैं। त्रयोदश सन्निपात के नाम ॥ सन्धिकश्चान्तकश्चैवरुग्दाहश्चित्तविभ्रमः । शीताना- स्तन्द्रिका प्रोक्तःकण्ठकुब्जश्चकर्णकः ।। बिख्यातोभुग्ननेत्रश्चं रक्तष्टीवीप्रलापकः।जिहुकचेत्यभिन्यासःसन्निपातास्त्रयोदशः - सन्धिक अन्तक २ रुग्दाह २ चित्तविभ्रम ४ शीता ५ तन्द्रिक ६ कएठकुन्न ७ कर्णक भुग्ननेत्र ९ रक्तप्टीवी १० मलापक ११ जिहक १२ और श्रीभन्यास यही तेरह नाम सन्निपात के हैं। अब हम तेरहा मनिपात के. अवधि लिहले हैं, कि कौन मानणाल कितने दिनाक रहा है १३ सन्निपात की अवधि ।। सन्धिकेवासरःसप्तचान्तकेदशबासराः । रुग्दाइविंश- तिज्ञेया बन्ह्यष्टौचित्तविभ्रमे ॥ पक्षमेकन्तुशीताङ्गे इत्यादि । उक्त तेरहो सन्निपात के श्रायु के दिन रेलाक में पूर्ण न लिखके मापा ३४ आरोग्यदर्पण। में लिखे देते हैं । सन्धिकं सन्निपात की मर्यादा सात दिन है' अन्तक के दश दिन, रुग्दाह के २० दिन; चित्तविभ्रम के २४ दिन, शीतांग के १५ दिन 'सन्द्रिक के २५ दिन, कण्टकुब्ज के १३ दिन, कर्णफ के तीन मात, मुग्ननेत्र के दिन, रक्तष्टीवी पो दिन, प्रलाप के १४ दिन, जिहक के १६ दिन और अभिन्यास के भी १६ दिन की मर्यादा है परन्तु यथार्थ रक्षा अर्थात् चिकित्सा न होने से रोगी तत्काल भर जाता है इस का कोई नियम नहीं है, उत्तम उपाय द्वारा रक्षा करने पर भी उक्त दिन पर्यन्त मर्यादा रहता है। अब तेरहों मम्भिपात के विशेप २ लक्षण लिखते हैं । संधिक-सनिपात उसे कहते हैं, जिस ज्जर के पूर्वरूप ही में संधि (जय) में यात पीड़ा की आधिकता, फफ, संताप, थलदानि और नींद न पड़े । इस ज्वर का वेग सात दिन रहता है और मातदिल चिकित्सा करने से भारास देता है। . अंतक-उस -उस ज्वर को कहते हैं जिस में अति दाह, शरीर भाग सी जली जाय, मिठोसी, शिर दर्द फंपन, और हिचकी हो, इस ज्वर की भ- वधि दश दिन है लेकिन असाध्य हे रोगी मुस्किल से बचता है ।। .. 'रुग्दाह -स ज्वर को लक्षण यह है कि रोगो भान तान बहुत धके, ज्वर का जोर अधिक हो बिहोसी, घुमरी, जो वात पूछा ठीक २ जयाय न दे सके, कंठ और गले में दाह, पियास यहुत, कुछ २ सांसी और स्यास है। इस ज्वर की मर्यादा बीस दिन की है. कष्टसाध्य है अर्थात् उत्तम चिकित्सा करने पर आराम हो॥: चित्तविभ्रम -नाम ही से समझ सक्ते हो, जिस ज्वर के वेग से मनुष्य पागल हो जाप, कभी हंसे, कभी गाये, कभी नाच, कभी रोवै और मान तान धफता रहे, इस बुखार की आयु माठ दिन की है उपाय करने से आराम हो जाती है, चिकित्सा हाल दिल रोग के समान करना उचित है- m आरोग्यदर्पणः। :: शीताङ्ग समस्त शरीर चरफ के.समान शीतल होदेह कांपै. हाथ पैर सव ढीले हो गये हों किसी की बात न सुने, नेत्र में जलन, खांसी, व- मन, और दस्त पतले हों, यह ज्वर- पन्द्रह दिन रहता है ऐसा शास्त्रकारों ने कहा है परन्तु जल्द खून में गरमी न पहुंचाने से रोगी शीघ्र मर जाता है । यदि इसी ज्वर में अन्तस में अधिक दाह और पियास हो तो निस्सन्देह रोगी मर जायगा क्योंकि प्रायः ऐसा देखने में आया है कि भीतर अंधिक दाहं और ऊपर शीत होने से रोगी नहीं वच सका ।। तन्द्रिक : ज्वर. में अकसर रोगी एक टक निहारता है: शरीर बहुत गरम हो और बारम्बार गले में कफ आ जाय, जीभ में कांटे पड़जाय जीम काली और मोटी हो जाय, दस्त पतले, फानों में दर्द, गला अत्यन्त खुप्क जो वोलने में तकलीफ हो, ऐसी विहोशी हो मालूम हो कि रोगी सो रहा है। यह ज्वर पच्चीस दिन में पीछा छोड़ता है वह भी यदि यत्वैद्य चि- कित्सा करने वाला हो कहीं मूों के हाथ लगा तो सद्य ही यमालय का रास्तालियां कण्ठकुज-इस धुरवार में पहले ही गला रुन्ध जाता है और पानी पीने में रोगी को निहायत तकलीफ होतीहै, जैसे पागल कुत्ताके काटने से पीड़ित रोगी से पानी नहीं पिया जाता, वैसा ही करठकुन्ज ज्वर पाले से पानी नहीं पिया जाता, एक चूंट पानी पीने से प्राश छूटने का सा दुःख होता है. इस ज्वर में यद्यपि दाह, मोह, विलाप आदि और लक्षण रहिते हैं पर गला का पफहजाना इस ज्वर में विशेष लक्षण है। वैद्यों ने इस ज्वर को कट माध्य कहा है परन्तु असाध्य ही समझिये रोगी में एक दो माराम होता है । इसको चिकित्सा नारायण तेल गठे में मालिस फरके अचया राई के पलस्तर आदि से गला खोलने का उपाय घहुत जल्द करे. अगर फिठी उपाप से गला का खुलना-न-शान.पड़े तो गले में दो तीन जोंक.लगाके पून निकलवाय देय और शीतल जल आदि के जहर ३६ आरोग्यदर्पण। पीने को न देवे और न कोई बहुत गर्मही दवा,देवे जहां तक हो किञ्चित उष्ण गो का दूध अधिक पीने को देय ॥ कर्णफज्वर इस ज्वर में रोगी कान का बहरा हो जाता है यह विशेष लक्षण हैं। प्रलाप, कण्ठरुन्ध, दमा, खांसी मुखसे लार का बहना आदि लक्षण रहते हैं। इस ज्वर की आयु.वैद्यवरों ने तीन महीना लिखा है और अत्यन्त कठिनता से भाराम होता है ऐसा कहा है। किसी र रोगी को देखा भी गया है। भुग्ननेत्र-इस बुखार में नेत्र टेड़े हो जाते हैं, यह विशेष लक्षण है । तथा ज्वर की आधिक्यता, धुद्धि का नाश, मोहप्रलाप, भ्रम और काही २ सूजन यह भी. लक्षण होते हैं। इस ज्वर की माठ दिन की मर्यादा है परन्तु असाध्य है। रक्तष्टीवीज्वर-समें जीभ भतिशम'काली अथवा लाल, उसमें कत्ते पड़े गये हों जीभ तथा मोठ भी फट गये हों और उसमें रुधिर ध. हता हो यह विशेष लक्षण है, इसके अलावा बमन, पियास, मोर, पेट में दर्द, दस्त पतला, हिचकी, पेट का फूलना, घुमरी, और चित्तधम मादि लक्षण होते हैं। रकटीवी दश दिन रहता है, परन्तु रोग असाध्य है, धि- कित्सा इस में बहुत गरम नहीं करनी चाहिये ।। 'प्रलापक यह ग्यारहवा सन्निपात ज्वर है कि जिस में रोगो दिन रात यकसाही रहे, अपनी पढ़ाई की बातें की पवित्रता में पितराख, हर एक प्राणी को चिन्ता करें, बुद्धि स्थिर न रहे और चित्त भहां ध्या- कुल रहे । इस घर की अवधि चौदह दिन है परन्तु यमालय का रास्ता प्रत्येक समय निहारता रहता है। न जिव्हक-निपात उसे कहते हैं जिस में अति कठिन कंटक.युक गिहा होय, इस ज्वर में माया रोगी बहिरा और गंगा हो जाता है, खास आरोग्यदर्पण। फास आदि और भी उपद्रव होते हैं। इस ज्यर की मर्यादा सोलह दिन और कष्ट साध्य है। अभिन्यास- भय तेरहवां सन्निपात का लक्षण कहा जाता है। रोगी के मुख पर चिकनाई हो, निद्रा अधिक हो, इन्द्रियां शिथिल बल का नाश और बोला फम जाय एवं स्वास रुक २ के आये ता अभिन्यास ज्वर जानना, यह सन्निपात केवल मृत्यु तुल्य है । इस के आगे अब तेरहो सग्नि- पात के साध्यासाध्य का निर्णय करते हैं। अथ साध्यासाध्य निर्णयः॥ संधिस्तंद्रिकश्चैव कर्णकः कंठकुब्जकः। जिवकश्चित्त विभ्रंशः षट्साध्याः सप्तमारकाः॥ सन्धिक, तन्द्रिक, कर्णक, कण्ठकुछज जिहफ और चित्त यिनन्य यह छ सन्निपात साध्य अर्थात् सत् वैद्य द्वारा देशकाल पान के अनुसार उत्तम चिकित्सा होने से आराम हो सक्ता है । मन्तफ, रुग्दाह, शीतांग भग्नदूत रक्तटीयी, प्रलापक और अभिन्यास यह सात प्रकार के सन्निपात प्राण के हरने वाले हैं। हिकमत में सन्निपात को सरसाम फहते हैं और डाकृरी में सन्निपात का लक्षरा प्रायः एपोल क्त रोग में मिलता है और हायर लोग उसी के अनुसार घिफित्सा भी करते हैं इसी से सन्निपात प्रसित रोगी को फम भाराम कर सक्त हैं क्योंकि इस रोग में हांकर लोग शिर पर धर्फ रसाते हैं और सन्निपात में शीतल जल से सिंचन फरना निषेध किया है। लिसा भी है-रन्निपातेतु दाक्षात यः सिंचेच्चीत वारिणा । भातुरःसकथं जीवेद्भिपग्या ‘सफथंभयेत्" को वैद्य सन्निपात के दाह में शीतल जल से सिंचन करता है अर्थात् शिरं या छाती धगेर में धर्फ या शीतल जहा लगाता है यह वैद्य रोगी को कैसे माराम करेगा किंतु : मारहालंगा उस को वैद्य कैसे कहना चाहिये । पाठकगडा -- प्रारोग्यदर्पण। को स्मरण होगा, पूर्व में हम लिख भाये हैं कि ज्वर रोग में गरमी प्रधान रहती है उस गरमी से और मस्तिष्क से पूरा संबन्ध है उस पर ध्यान रखना चिकित्सक मात्र को जरूरी है ज्वर रोग में उसके निवारण के उ- पाय न कर के उलटी चिकित्सा जैसे आमंचर (कच्चा बुखार) में दया देना * अथवा खाने को देना, या मर्यादा से अधिक ठंघन कराना, यात पित ज्वर वाले को एकाएकी कोठरी के भीतर बंद रखना. या पियास लगने पर पानी पीने को न देना, .अथवा . गरम २ औषधियों का . काढ़ा या रस खिलाना इत्यादि उटपटांग उपायों से ज्वर रोग में सन्निपात हो जाता है और इस रोग से, विरले रोगी माराम होते हैं देखिये लो- लिम्बराज क्या कहते हैं। . सन्निपातस्य कालस्य कश्चिन्दो न विद्यते । चिकि- सको जयेद्यस्तं तस्माकोस्ति प्रतापवान..... :: .." सन्निपात रोग और फाल (मृत्यु) में कुछ भी भेद नहीं है जो वैद्य उस सन्निपात को जीते अर्थात् अपनी अनुभव प्रक्रिया के द्वारा उस काल रूपी रोग से रोगी को यचा तो उस से बढ़ कर संसार में और कौन प्रतापी है। *कपायं यः प्रयुजतिनरानां तरुणज्वरे। ससुप्तंकृष्ण- सपैतु कराग्रेण परामृशेत् ॥ जा वैद्य नये युसार में अर्थात् फच्चे. 1.ज्वर में काढ़ा आदि दवा पीने को देता है वह मूर्ख वैद्य मानों सोते . हुये काले सांप की उंगलियों से स कर जगाता है। तात्पर्य यह फि ज्वरारंभ में दवा खाने को देने से अथवा अन्य कुपथ्य के होने से सन्निपात हो जाता है जिस रोग से पिरसादी सोग यचते हैं ।

-- भारोग्यदर्पण । ३९ सन्निपात ज्वर में कर्णमूल ॥ सन्निपातज्वरस्यान्ते कर्णमूले सुदारुणः । शोथः स जायते तेन-कश्चिदेव प्रमुच्यते ॥ सनिपात ज्वर के अन्त में कान की जह खून जम कर महा. दुख• दायक एक सूजन पैदा होती है, उस सूजन में ऐसा ही कोई भाग्यशाली हो तो भारोग्य होता है क्योंकि वह सूजन मनुष्य के मारने को होती है यह सूजन भी बुखार विगहने के कारण से होती है क्योंकि ज्वर में जय भाभ्यान्तरिक बात पित्त की गरमी अधिक बढ़ती है और अजान वैद्य उसे शान्ति नहीं कर सक्त तो वही गरमी मस्तिष्क में पहुंच तत् सम्बन्धी नसे के खून को अत्यन्त उष्ण कर पतला कर देती है तय यही सून यहां से टेघर कर कान के नीचे नस में आ के जम जाता है उस्से जो सूजन पैदा होती है उसी को कर्णमूल कहते हैं ( सन्निपात ज्वरसान्ते) इस पाठ का तात्पर्य यह है कि ज्वर के अन्त में ही प्रायः कर्णमूल होता है, किन्तु ज्वर के आदि मध्य में भी कर्णमूल होता है जिसका प्रमाण ज्वरस्यपूर्व ज्वरमध्यतोवा ज्वरान्ततोबा श्रुतिमूलशोथः। क्रमादसाध्यः खलुकष्टसाध्यः सुखेनसाध्योमुनिभिःप्रदिष्टः।। भावार्थ:-अगर सन्निपात रोग के पूर्व ही में फर्श मूल शोथ उत्पन्न हो तो असाध्य जानना, मध्य में कर्णमूल होने से फट साध्य और मन्त में फर्णमूल होने से सुस साध्य जानना, यह घड़े २ वैद्यषों का अनुभय किया हुआ है। सन्निपात रोग में कर्णमूल क्यों होता है उसका ठीक कारण यही है कि मस्तिष्क में जो रक है गरम होने से पतला हो के नोचे को माता है किन्तु कर्णस्य मूल नाही के गाद रक्त के सम्बन्ध से वह मो गाढ़ा हो के जम जाता है और उसी से कान के पीछे नीचे की तरफ फूल भाता है, फिर रक्त ऊपर को नहीं जा सका इसी से वैद्यवरों आरोग्यदर्पण । उसके निकाल देने की राय प्रगट की है। बहुत से मूर्ख वैद्य जो मुश्रुतादि अन्य को देखा सुना नहीं है उर से कर्ण का रक्त नहीं निकालते जिससे रोगी मर जाता है। अहियापुर में एक प्रपागवाल के स्त्री को सन्निपात ज्वर यशात् फर्ण मूल हुमा और यहीं के एक नामी वैद्य की चिकित्सा होती थी, वैद्य महाराज डर से अथवा और किसी विचार से उस रक्त को मोक्षण न करके टिं घर आइयोडिन लगाना आरंभ किया, वह भला आराम फर हो सक्ता था अन्त में एक छाकर ने आ के चीरा, फरीय देर ढाई सेर के मवाद नि- फला फिन्तु जियादा दिन होने से वह मवाद ऐसा सह गया था कि जिस के यिप से स्त्री मर गई । लिखा है:- शांतेत्रिदोपे श्रुतिमूलजातःशोथस्य रक्तं प्रविमोचयेत् प्राक्, पश्चान्मुहुर्कटफलकृष्णजीरा विश्वाकुलथ्योत्भव लेपनसत् ॥ .. त्रिदीप अर्थात् सन्निपातज्वरके शांत होने पर फर्ण मूल में उत्पन्न शोथ से पहिले जलौका ( जोंक ) या नस्तर द्वारा रक्त निकाल बाद कायफल, कालाजीरा, शोंठ और कुरथी रन सयों को पानी में सूय माहीन पीस के मोटा लेप करें या अपनी विचार से अन्य लेपादि लगावै, जोक लगाने के उपरान्त एक दिन निम्ब पत्र बांध के तव कोई लेप.लगावै ॥ सनिपात ज्वर की चिकित्सा ॥ धुद्धिमान वैद्य को प्रथम ही यह निदान कर लेना बहुत उचित है कि १३ प्रकार के कहे हुये सन्निपातों में इसे कौन सन्निपात है और इसे ज्यरारंभ ही में सन्निपात हुआ है भयया अपथ्य से ज्वर विगह कर सग्नि- पात हुआ है। रोगी की प्राति अवस्था वल, देशकाल, इसके कोई प्रमे- दादि भन्य रोग तो नहीं थे या ज्वर के अतिरिक्त पूर्योपार्जित भन्य रोग आरोग्यदर्पण। भी उपस्थित है इत्यादि सय बातों को दवा देने के पूर्व ही जांच लेना धानिये एमोकि दिना सब बातों क्षा जांचे दया देना महा पाप है ।। यदि अपथ्य से ज्यर रोग निगड़ कर राग्निपात पुआ हो तो उसे लंघन नहीं घराना, हलका पथ्य देता जावै और बढ़े हुये शेयों को धोमिल घि- कित्सा से शांत करे, यदि प्रारंभही से सतिपात हुभा हो तो विधार के साथ ?:-११ पृष्ठ को अनुसार लंघन कराये, जल प्रकर्ण को देख के गरम जल पीने यो देय, सन्निपात रोगी का ऐसे मकान में रखना चाहिये ar यहुत साफ, सुखासा, जिसमें दो तीन दरवाजे हौं, जादा हवा होतो परदा दाग दे किवाड न धन्द करे और न रोगी को समीप बहुत भीड़ रहे भगर रोगी की होश हवास दुरुस्त हो तो वैध तीन २ घन्टे पर अथवा दोनों समय उस्ते भीतरी दुख पूछ लिया करे भौर साड़ी चिकित्सा करे अगर यतलाने की सामर्थ्य जाती रही हो तो बड़ी बुद्धिमानी के साथ चिकित्सा करनी चाहिये । यदि रोगी की चैतन्यता जाती रही हो अथवा फण्ठ का अवरोध हो तो वैद्य इस बात की कोशिस सबसे पहले करें जिससे रोगी कुछ होश में भाव और गला गुले जिससे वह अपना मुस दुस बयान कर सके। इस स्थल में यह पता देना बहुत ही उचित है कि विमा शिर पर - अधिक्ष गरमी पहुंचे न रोगी यिहोश होता है और न फंठ वन्द होता है इस लिये मूर्छित रोगी की चिकित्सा रसादित से कभी न करे अर्थात् रस साने की न देय॥ संज्ञानाश की उपाय। कम्पःप्रलपनंयस्य संज्ञानाशश्चदारुणः। रसैश्चला- ववतैश्च कुलिङ्गै शशतित्तिरै ॥ तर्पयेप्राक्पुराणेन सर्पिपाभ्यां- जयेन्नरं । बलारानागुडूच्यायैस्तैलैश्चपरिपेचयेत् ॥ जो सन्निपाती रोगी के शरीर में कम्पन अधिक हो, या किसी को धीन्हें आनतान पाता हो भयया इन्द्रियों को चैतन्यता मिलकुल जाती छाल, रासन के प्रारोग्यदर्पण। रही हो उस रोगी को लवा, घटेर, चिड़ा, खरगोस और तीतर इनके मांस रस अर्थात् पुरुवा को पहले पिलाय के फिर समस्त शरीर में पुराने भी को मालिस पर अपया परियारा के जड़ फी और गुरच काय से सिद्ध फिया तैल को मद्देन करे। अगर इस क्रिया से मूटिंत नजागे भर्थात् संज्ञा चैतन्य न हो तो निम्नलिखित पीपध का प्रयोग करें। मूर्छित सन्निपात पर लघु सूचिकाभरण रस ॥ 'विषंपलमितं सूतः शाणकश्चूर्णयेवयम् । तच्चूर्ण संपुटे क्षिप्त्वा काचलिप्तशरावयोः ॥ मुद्रांदत्वाच संशोप्य ततश्चुल्ल्यां निवेशयेत् । बन्हेिं शनैःशनैः कुर्यात् प्रहरद्वय संख्यया ॥ तत उद्धारयेन्मुद्रामुपरिस्थाशरावकात् । संलग्नो यो भवेत्सूतस्तंगृह्णीयाच्छनैः शनैः ॥ वायुस्पशों यथा नस्यात्तथा कुप्यांनिवेशयेत्।यावत्सूच्यामुखेलग्नः कुप्यानि यातिभेपजं ॥ तावन्मात्री रसो देयो मूञ्छिते संनिपातिनि। क्षीरेण प्रस्थितेमूर्ट्सि तंत्रांगुल्या च घर्पयेत् ॥ रक्त भेपजसं पर्कान्मुर्छितोपिहि जीवति । तथैव सर्प द्रष्टस्तुमृताव- स्थापि जीवति.। यदातापो भवेत्तस्य मधुरं तत्रदीयते ॥ यह श्लोक शारङ्गथर के द्वितीय खरष्ठ का है। (विष) शोगिया इसी का मीठा तेलिया भी कहते हैं २ तोला (सूत) पारा ४ मासे दोनों को एफ में मिला के सूघ महीन चूर्णकर, दो रफावी जिस में कांच का लुफ है। (यह रकापी सौदागरों के दुकानों में मिलती भी हैं) उस में पूर्ण को घर दूसरी रफापी ऊपर से ढक पांच फपरीटी करके सुखाय लेय बाद निर्धात कोठरी में उस प्याले, को घूसहे पर पढ़ाय दोपहर -पर्यन्त बहुत धीमी भांच से पक्षाये, उस के बाद सम्पुट को ठंढाफर मारस्ते से रफाधी को अलग कर लप, ऊपर की रफायी में जो पारा लगा हो, उसे निकाल लिसी आरोग्यदर्पण। १३ कांच की सीसी में रखा पाग से फौरन उस का मुख बंद कर दे, ताकी हवा न लगने पार्थे। मूर्छित रोगी का धीच में थोड़ा सा शिर मुहाय महीन मस्तर मार के जरा सा घाव फर देय जय उस में से रुधिर निफले, जितना सूचीका मुख होता है उतना सौसी में से रस लेके उस पाय में छोड़ उंगली से घिसे और थोड़े से दूध से धो हाले, वह रस रक्त से मिल मस्तिष्क में जाके जमे रुधिर और फफ को ठीक करता है. इस से पूर्छित जाग उठता है। उसी प्रकार सर्प दंशित (सर्प से काटा हुआ) मूठित (मरे के समान) के शिर पर उक्त रस का प्रयोग करने से आराम होता है। पूर्वोक्त प्रयोग द्वारा मूर्छित के जागने पर प्रथया न जागने पर ताप माय मर्यात् शरीर जादा गरम हो जाय या नाही देखने से भीतर गरमी अधिक बोध हो तो उसे पीछे का रस अथवा मीठे अनार फा रस पिलाधै यदि दोनों चीजों में से एक भी न मिले त गौ के ताजे दूध में मिनी मिला के अथवा केवल मिश्री का शरबत पिलाये। भूत पूर्ण मैद्यगण ऐसे ही ऐसे क्रियायों के द्वारा यश लाभ करते थे भाजपाल के धयों में फठिन हियायों का प्रयोग करना ते दुष्कर हई है, यथार्थ औपच तक नहीं बना सक्त तो रोगी कैसे आराम फर सर्फे । सन्निपात पर उन्मत्त रस का नस्य । रसगंधी समानांगौ घत्तूरफलजै रसैः । मर्दयेदिन- मेकंच तत्तुल्यंत्रिकटुक्षिपेत् ॥ उन्मत्ताख्यो रसोनाम नस्ये- स्यात्सन्निपातजित् ॥ पारा और भाभलासारगंधक दोनों को समान भाग ठे धतूर के पाल के रस में एक दिन अर्थात् चार महर घरायर सरल कदै उस फजली के घराघर विकटु (गोठ पीपर मिचं) महीन पीस के मिलाये इस का नाम उन्मत्त रस है इस का मारता मापी रत्ती से दो रत्ती तक्ष है इस रस को नाश देने से (सूंघाने से) भी सन्निपात मूर्छित जागता है।

१४ प्रारोग्यदर्पण'। सन्निपात पर अंजन ॥ निस्त्वक् जैपाल बीजंच दशनिष्कबिचूर्णयेत् । मरि- चंपिप्यलीसृतं प्रतिनिप्कविमिनयेत् ॥ भाव्योजबीरजै- वैः सप्ताह संप्रयत्नतः । रसायमंजनेदत्तः सन्निपातं विनाशयेत् ॥ छिला हुआ जमालगोटे के बीज ४ गासा मिरघ छोटीपीपर और पारा यह सय चार २ मासा ले के सयों को महीन चूरन पर खरल में हाल जमीरी नींबू के रस में सात दिन घोटे पश्चात् मुसराय के सूच महीन चूर्ण फर किसी कागदार सीसी में रख दे। इस चूर्ण को अंजन.देने से सन्नि- पात्त मूर्छिघ जागता और सन्निपात रोग विनाश को प्राप्त होता है- अगर कोई प्रश्र को दिन यहां पर मूछी सास रोग नहीं है सम्मिपात रोग का उपद्य है तो रानिपातही फा हाथ मेरद क्यों न देव मूळ आप हो जाती रहेगी ? या ठीया है, किन्तु यह वैद्यों का सिद्धान्त मत है, कोई रोग पों न हो जिस रोग में जो उपद्रय अधिक बढ़ा हो खासकर मूळ भादि जो शीघ्र ही मारा हरण करने वाले हैं उन्हें विशेष चिकित्सा द्वारा जाहा तफ हो सके जान्दु शांत करे । (शिक्षा) अंजनादि पूर्वोक्त प्रयोग करने के पूर्व ही वैद्य को यह जांच लेना पंहुत उचित है यि रोगी को वर्तमान रोग के पहले सुजाफ. गरमी, प्रमेह, अंतीसार, शिररोग होलदिल, उन्मादः रजययासीर, यमा, यमन, धातुशोप और उसयायु जादि कोई रोग तो नहीं था जथया वातपित्त प्रकृति युक्त महा निर्जल तो रोगी नहीं है पदि हो तो ऐसे रोगी को साथ उपरोक्त दवाईयों के प्रयोग न करो साधारण और मासंदिल भोपंधों के द्वारा मूर्छा को दूर पारे क्योंकि ऐसे रोगियों का मस्तिष्क निहायत निर्षण रहता है अति उग्र औषधों के प्रयोग, करने से रोगी के मर जाने का खौफ है। उपरोक्त रोग युक्त सन्निपात रोगीकी मूळ म प्रकार दूर करे। ܝܢ - प्रारोग्यदर्पण। ४५ मूर्छा की मातदिल उपाय । रोगी का शिर मुड़ाय देय भयया बाल महीन कसराय देय काछेतिख का तेल १ उँटाक, अंगूर अथवा नख का शिरका जिसमें मसाला वगैरह कुछ न पहा हो २ तोला, पानी उड़पाव सबों को एक में मिला लेय और उसी में फपहा तर कर के शिर पर रखे जय कपटा सूख जाय फिर उसी पानी में कपड़े को तर फर ले और शिर पर रक्खे लेफिन फपहा डुवाते समय हरबार पानी को हिला के तेल पानी को एकदिल कर लिया करे। इसी प्रकार जय सक होश न हो बराबर रखता जाये, पानी घुफजाय उसी प्र. फार दूसरा पानी तैयार कर लेय । चार पांच सेर पानीको ऐसा गरम कर लेय जो शरीर पर शलने से क्रश न हो, उसी पानी को एक टोंटीदार बरतन में भर एक भादमी रोगी के पैर के गांठ के नीचे तरेरा देवे और एक भादनी आस्ते २ पैर को धोये, जैसे गाय दुही जाती है उस प्रकार धोये नीचे से ऊपर को हाथ न लेजाये। पैर धोने के बाद पैर पोछ के जनी या सूती हो मोजा पहनाय देय भगर मेजा न मिले तो पैर में कपड़ा लपेट देश और घन्टा दो घन्टे के बाद खोला देय, इसी प्रकार दो तीन दफे करने से निस्संदेह मूर्छा जाती रहती है। हमारे देशी वैद्य प्रथम तो ऐसी घि. किया जानते नहीं यदि कोई हयाम या हिकमत का जागने वाला यह उपाय करे भी तो ट फाह देयगे फि शीत भाजायगी। हम कहते हैं दूध पी की कमी के बजे से घाल विवाह से, मांस भक्षियों के इस देश में अधिक भर जाने से, आशफल देश की दशा ऐसी बिगड़ गई है, कि समस्त भारत के लोग धातुक्षीण हो रहे हैं और धातु की निघलता के मयय से अत्यन्त गरम दवाइयां लोगों को कम माफकत करती हैं, हम ३० वर्ष से चिकित्सा फा काम करते हैं जितने समिपात रोगी साधारया मातदिल भीषधों के प्र. योग से भाग्य किया है उन और अत्यन्त उण भौषध द्वारा नहों।.. संधिक सन्निपात की चिकित्सा। नागरमोथा, देवदारु, गुरुच, रासन. शतावर, यह सय एकर तोला । रेप की जड़ का छालकचूर फुटको सना की पत्ती और शीठ पह सर .

भारोग्यदर्पण। छः छः मामाले अधमरा फर चार पुष्टिया धनाय एक पुहिया को एफ मृतिमा पात्र में पायभर जल डाल के धीमी धसे पकाये जय एफ उँटाफ जाल रह जाय शीत फर मल के छान लेप और एस मारा, गहद हाल के पिलाय देय इसी प्रकार दोनों समय पिलाधै ॥ जिस कमरे में रोगी हो उससे घाहर निर्गुण्ठी, गूगल, पीली सरसों, निम्बयन और रालाधूप पुसकी धूनी देय । इरसे संघिस सन्निपात का नाश होता है। संधिफ सन्निपात में हलका लंघन कराना मोर पसीना न भाता हो तो पसीना लाके शरीर की करना और यवागू भादि का पथ्य देना ।। अंतक सन्निपात ॥ पद्यपि अन्तक मनिपात त्याग पारने को लिखा है क्योंकि यह सनिपात मनुष्य को मारनेही के लिये भाता है पथापि फंठगत प्रावधालों की भी पिक्षिरसा फरमा ऐसा शास्त्रकारों ने आजादी है। फो पक्कल, रुसा फो पत्ती, अमलतास का गूदा, देवदारु, फुटकी, रामन, गुरष भौर फुलोजन सय को समान भाग ले अपकचरा पर एफ २ तोला की पुष्टिया अनार्य पूर्वोक्त प्रकार दोनों समय काढा पिला ॥ अन्तक सन्निपाते रोटिका बंधनं ॥ यह प्रयोग भनेक वैद्यों का अनुभव किया हुआ है। राई के चूर्ण को लहसुन के रस में सान के रोटी धनावे और तवे पर रख घी का पुचारा दे के सके बाद गरमागरम गिर पर बांध देय और तीन चार घंटे के पाद पोल देव एवं दोपहर के बाद दूसरा तैयार कर के फिर घांधे, इस रोटी के घांधने से मनुष्य के अन्त सन्निपात की मृत्युकारक व्यथा निस्सन्देह दूर होती है। लेफिन यह बात याद रहे कि.यदि रोटी बांधने से होस याला रोगी न घर- दास्त कर सके अपमा होस रहित रोगो अपना शिर झटके तो रोटी १५ मिनट रख के लोल लेप और एक दके में फायदा न जान पड़े तो उसी रोटी

।
आरोग्यदर्पण।
को ५ पा १० मिनट में फिर सिर पर रक्खे अगर रोटी सूख गई हो तो
दूसरी रोटी तैय्यार फरले फिन्तु दश पन्द्रह मिनट से अधिक न रपणे । मन्तक
सनिपात में गरम जल और मांस जूस इत्यादि पीने का देय शिन्तु ज्वरनाश
का महामृतुजय मंत्र का जप और शियान विद्वान ब्रह्मणों के द्वारा
अवश्य कराधै फ्पोंकि अन्तम सम्मिपात का भारोग्य होना अति दुष्कर एं
इसीधेयों में हार कर.यह सोका काहा है ।।
भिषभिरितिनिीतं सन्निपातेतकाभिधे । भेषजंजा-
न्हवी नीरं वेदो गोविन्द एवहि ॥
मन्ता सम्निपात में धधों मे पह ठीक निश्प कर के कदा है जिस
रोग में रोगी की पौषधी गंगाजल है और वेध विष्णु भगवान हैं।
रुग्दाह सन्निपात की चिकित्सा ॥
घलधर मलयजनागर सवालकाशीर पप्पटेक्वधितं ।
यः पिबतिपयः सुशीतंशाम्यति रुग्दाहकस्तस्य ॥
नागरमोथा,
1. लालपादन, सेठ, सुगंधवाला, खस भीर पित्तपापड़ा
पन घ दयाइयों को समान भाग कर भषफचरा कर के दो २ तोले की
पुलिया बना छे पूर्वोक्त प्रकार से ३ माशा मिनी डाल के दोनों समय फादा
पिला पदि रोगी के अन्तःफणं में दाह अधिक होतो यह काढ़ा न दे के
'मिन लिखित-काय पिलावे॥
उशीर चन्दनोदीच्य द्राक्षामलक पर्पटेः । शतं शीतं
जलं ददनाद्दाहटज्वर शांतये ॥
पुगंधयाला, लालन्दन, सस, मुमचा योग रहिस, सूनामावला बोज
रहित और पित्तपापड़ा रन का काम पूय शीतल कर मिश्री मिला के
पिलाने से दाय पियास भोर घुसार शांत होता है।

- आरोग्यदर्पण। धूप, भगर, कचूर, सप्तकी, नख, तगर, नेत्रवाला सफेदयन्दन और राला धूप सय को एक में मिला के फिमी पात्र में रख दे और दिनमें कई दफे रोगी के मकान के बाहर धूनी देय। अगर रोगी के शरीर में दाइ. अधिक हो खास कर कपर का चमड़ा जला जाता हो तो इस लेप को तैयार करके समस्त शरीर में लेपन को । वैर के पत्तों को दही में सूब म. हीन पीस के अथवा कपूर, सोदचन्दन और नीम पत्र · सब के दही में पीरा लेप करे । यदि समस्त शरीर में दाह न हो सिर्फ हाथ पैर के तलुए में जलन हो तो उसी में लेपन फो और धान के लाया का यूष यना के सममें मिश्री और मासा दे मासा शहद साल के पिलावे, या सावू. दाना गौ के दूध में पका के मिश्री मिला के पिलाये। रुग्दाह ज्वर सौर पित्तज्वर की चिकित्सा एक समान सामना । चित्तविभ्रम सन्निपात की चिकित्सा । ए. . इस सन्निपात में विशेष लक्षया, विहोसी, फिसीको न चीहिना पागल सरीखा मानताम घमना, हंसना गाना रहता है। गवार लोग सी को भूरा प्रेत की याचा समझ सतपद्यों के द्वारा उत्तम चिकित्सा न करा झाड फूफा में लग रोगो को यमपुरी की यात्रा कर देने हैं। चिकित्सफ फो धा- हिये कि साधारमा प्रयोग द्वारा मूर्जाको प्रथम शांति की लेकिन शिर में फिसी प्रकार पा विघ्न न पहुंचने पाधै। पध्यापर्पटकटुका मृवीका दारुजलद, भूनिम्बाः । शम्याकपटोलशिवा छायश्चित्तभ्रमंहन्ति.॥ बढ़ा पहफा यक्कल, पित्तपापड़ा, फुटफो, मुनक्का, देवदारु, नागरमोथा, चिरायता, समलतांस का गूदा, पंटेोलपत्र (परवल का पात) और सुशन भायला सय को समान भाग ले २ तोला मात्रा का पूरा प्रकार काढ़ा धना के पिलावे यदि रोगी के.पतले दस आते हों तो ममलतास का गूदा और ए६ फाड़े से निकाल देय ॥

. ' । प्रारोग्यदर्पण। :..:.:. चित्तविभ्रम पर अंजन। पीपर, कालीमिर्च, शोंठ, हींग, पोलीसरसों, हह, बहेरा, मांयला, हल्दी, कंजा के बीज, दुधियावध और सेंधानोन सबों को एफनित फर फूट कपड़छान कर बफरा के मूत्र में खरल कर के गोलो यांध छे और छाया में सुखाय ले। इस गोली को जल में घांट कर अंजन लगाने से चित्त विभ्रम, मृगी, भूतोन्माद और शरदी से शिर का दर्द भाराम होता है ।। शीताङ्ग सन्निपात की चिकित्सा । स बुखार में विशेष लक्षण शरीर फा अत्यन्त शीतल हो जाना. श. रीर का कांपना और भीतर दाह रहता है और इसीको प्रथम शांत करना श्रेयस्कर है ॥ मदार के जड़ की छाल, सफेद जोरा, त्रिकुटा (शोंठ पीपर मिर्च ) भारङ्गी भटकटैयाका पञ्चाङ्ग. काहासिंगी और पुरुफरमूल । इन सय दवा- इयों को समान भाग लेय, माना १ तोला से २ तोला, तप्त पूर्वोक्त प्रकार दोनों समय काढ़ा पिलावै । इसके पीने से शीताङ्ग सन्निपात, मूछो, श्याम और कफ दि इनका नाश होता है । शीताङ्ग पर धुरा। पित्तपापेठा, कुलथी, पीपल, धच, फायफर, मालाजीरा, चिरायता, चीता, पादुई तूम्बीको योज और हड़ इनका समान भ गले कूट कपड़छान फरले । इस चूर्ण को देह में मलने से शीताङ्ग सन्निपात का नाश होता है ॥ तन्द्रिक सन्निपात की चिकित्सा। इस ज्वर को स्पष्ट परीक्षा यह है कि हर समय मांखों के सामने अं. घियारा मालुम या आधी. पलक ढपो रहे। इस ज्वर में शिर को तैलों के द्वारा तर रक्ख गौर निम्नलिखित दवाइयों का अंजन नेत्र में देखें। सेंधानिमक, कपूर, मैनसिल, छोटीपीपर इन चारों, चीजों को घोड़े - । । ५० 'आरोग्यदर्पण। की लार और शहद में महीन घोट पर नेत्रों में अंजन लगाने से तंन्द्रिक सन्निपात का नाश होता है... 3. : कोढ़ा। मांर्गीगुडूची धनकण्टकारि हरीतकी पौष्करनागराणां । कृतःकपायखिदिनं निपीता घोरजये तन्द्रिकंसनिपातं ॥ भारङ्गी, गुर्च, नागरमोथा, भेंटकटैया को पचान हड़को यक्वला, पु. करमूल और मोठ रनका काढ़ा ३ दिन पीने से घोर तंट्रिकसन्निपात नाय (आराम) होता हे अगर यह.काढ़ा अधिक गर्मी करे या प्यास की आधिकता हो तो इस काथ को पिलाये। नीम पर की ताजी गुर्च ४ तोला, पर्यरफा हाल पात र तोला, रूसा की पत्ती १.तोला इन तीनों चीजोंका अधकचरा फर ४ पुडिया बनाले और पूर्वोक्तं प्रकार शाम सबेरे काढ़ा बनाके पिलावै। कण्ठकुब्ज सन्निपात की चिकित्सा।।::- संयुखार में शिर का दर्द फण्ठ का.अवरोध और मूलां विशेष कर लतण हैं इस घर में निम्नलिखित काथ को पिलावै। (ऋग्यादि काथ) कंफडासिंधी, नागरमोथा, गुष्कमावला. देवदारु घोड़ा और कुरेभा की डाल दो २ तोला, भटकटैया फा पञ्चाङ्ग ससा की पत्ती और इड़ का ब- कल एफ २ तोला, फचूर, चिरायता, भारती, हल्दो कुटको पुष्करमूल चीता, फालीमिर्च, चाय, सोंठ, पीपल और कायफल इन सबों को समान भाग ले अघकपरा कर हेद २ तोले की पुहिया बना ले और पूर्वोक्त प्रकार दोनों ममय फाढ़ा पिलाव और फिसी प्रकार का बलकार्रफ यूस भी देता जाये कि जिससे रोगी फा यलक्षीय न दोने पावै और न फण्ठ सूखे ॥ कर्णक सन्निपात की चिकित्सा। रस ज्वर में विशेष फर के हिरापन, मुख से लार का बहना, कान मौर गालों में पोहा त्यादि होता है। 1 -- .

. . म • आरोग्यदर्पण। रास्नाश्वगंधा घनकंटकारी भार्गीवचापौष्कररोहिगीनां । क्वाथाकृतः शृंगभयायुतानां पीताजयेत्कर्णकंसनिपातं ॥ फर्णफ सन्निपात में यह काढ़ा देने से प्रायः लाभ देखने में आया है, रासन, भटकटैया को जमा असगंध, नागरमोथा, भारङ्गी दुधियायच, पुह- फरमूल, कुटकी, फफरासिंगी, और सूखा आवला इन सब चीजों को समान भाग ले हेद तोले को मात्रा को पावर जल में वाथ बनाय दो मासा शहद डाल दोनों समय कई दिन पिलाने से निस्सन्देह कर्णफ सन्निपात दूर होता है । वैद्य को यह भी उचित है कि यात पित्तादि दोषों को न्यूना- धिक देख के औषधियों को मात्रा को फम जादा कर देव अथवा भोपको घंटा बढ़ा देय यिलकुल किताब के भरोसे से दया फरना उत्तम नहीं है। फर्णफ सन्निपात में कर्णमूल जारही होता है । उसमें इस लेप को लगाना अच्छा है। फुलथी, कायफल. शोंठ, और सौंफ एन पारों चीजों को समान भाग ठे पानी से सूय महीन पीस कुछ गरम कर लेप को, इस लेप से एक दो दिन में फायदा दृष्टिगोचर न हो तो नीचे लिसे हुये लेप को लगावै । गेरू.(..लाल मृत्तिका ) गापुरू, शोंठ, कायफल श्री घुमध- सयों को सिरका में खूब महीन गरम कर लेप करें, यदि इस्से भी लाभ.न देख पड़े तो जलौका द्वारा उस जगह का खून निकलवाय देय याद इस लेप को लगांधे। पीली सरसी, सेंधा नोन, वध, धुवां को फरखा, 'शोंठ, हलदी सबों को पानी में पीस लेप करने से सूजन सहित व्रण जाराम होता है अगर गले में सूजन हो तो भी इस लेप के लगाने से आराम होता है। संघानान और छोटी 'पीपल दोनों को गरम पानी में पीस नास देने से भी फायदा होता है। भुग्ननेत्र सन्निपातकी चिकित्सा ॥ इस ज्वर में दृष्टि का तिरछापना और स्मरण शक्ति माना विशेष लक्षण है, ईसी को प्रथम शोधन करना मुख्य काम है। तिल में दिल दि. . H 7 ५२ प्रारोग्यदर्पण। माग को शुद्ध करको स्मरण शक्ति को पतन्य फरना और भजन के द्वारा टेढ़ी दृष्टी को ठीक करना चाहिये । ... : 1, अवलेहादि ॥ भूनिम्बमाक्षिकवचा सहितंचकुर्या ल्लेहंकणोपण रसा- नक राजिकाभिः । नेत्राजनज लवणोत्तम. पिप्पलीभ्यां नत्यंवचा मरिचहिङ्ग मधूकसारैः ॥ चिरायता, शहत, दुधियायच, छोटी पीपल, काली मिर्च, लासुन और राई इन सबों को समान भाग ले. महीन चूर्ण फर एक एक मासा की पुड़िया बना ले और दिन में दो या तीन दफे शहत में गीला करके घंटाये । सेन्धा नॉन और छोटी पीपल पानी से सूब महीन घोंट भञ्जन को और यच, मिरच, हींग, मुलेठी इन सबों को मीठे अनार के रस में महीन घोंट नास देवें ॥ रक्तष्टीवी सन्निपातकी चिकित्सा ॥...:: इस ज्वर में धूम के साथ सून आता है और बमन भी हो जाता यह विशेष लक्षण है। पित्तपापड़ा, जयासा, रोहितपास एनका, फाढ़ा बनाय मिश्री मिला के पिलाये अथवा मुलेठी १ ताला, कतीरा.गांद १. ताला दोनों को महीन पूर्ण कर २८ पुपिया बनावे और.दिन. में चार दफे अथवा छ दफे अर्थात् दे दो घंटे पर सहत के साथ. पदावै । और फंकाल मिर्च का चूर्ण कर के नास देप इसे मुख से रुधिर का माना यन्द होता है। यदि एस्से रुधिर, म बन्द हो तो यह मादा देय ! नागरमोथा, पट्माप, पित्तपापड़ा, सफेदचन्दन, , लालचन्दन घमेली की पत्ती, शतावर, मुलेठी, नीय को छाल और भुगन्धयाला इन सबों को समान भाग ले दो तोला झी मावा का काथ बनाये दो मामा शहत डाल के पिलावै। इसी प्रकार दोनों समय .

, . आरोग्यदर्पण। ५३ पिलाने से रक्तष्ठीयी सन्निपात माराम होता है। इससे भी फायदा न देख पड़े तो यह कांथ पिलाये। महुभा, मुलेठी, फालसा.को छाल, लालचन्दन, तेजपात, देवदारू, और सागवन वृक्ष का · फल अथवा छाल सब समान भाग ले दो तोला की मात्रा डेढ़पाव पानी में पकावै एक उँटाफ पानी जल जाय मल के छान लेन और दो तोला मिश्री मिला के किसी बोतल में भर देय और दो २ घण्टे पर पिलावै । तथा दूय और अनार के फूल के रस की नास देवे। प्रलापक सन्निपात की चिकित्सा ॥ इस ज्वरमें अत्यन्त शिरमें दर्द, बुद्धिका नाश, और मान तान धकमा विशेष लक्षण है । यह वाघ पिलाथै नागरमोथा. सुगन्धवाला, पित्तपापड़ा, लालचन्दन, धी की छाल सयों को समान भाग ले पूर्वोक्त प्रकार काथ धना के दोनों समय पिलावै ॥ जिव्हक सन्निपात की चिकित्सा । इस सन्निपात में विशेष लक्षण-रोगी सन्ताप करके महा व्याकुल तथा कठिन कंटफ युक्त जिला एवं गूनापन आदि होता है। इसकी चिकित्सा रक्तष्टीवी के समान करनी चाहिये किन्तु जिहा को कपरी चिकित्सा से कोमल करना उचित है। और अभिन्यास सन्निपात की चिकित्सा प्रलापक सन्निपात के समान करना इत्यादि। सन्निपात बंर तथा साधारणज्वर के उपद्रवों (वृष्यादि) को चिकित्सा विषमज्वर एवं जीर्णधर आदि के लक्षण लिख के तत्पश्चात् लिखेंगे ।। अथ विषमज्वर लक्षणम् ॥ यःस्यादनियतात्कालाच्छीतोषणाभ्यांतथैवच । नेग तश्चापिविषमज्वरःसविषमस्मृतः ॥

५४ के प्रारोग्यदर्पण । घुसार सरदी तथा गरमी करके अनियत समय में पड़े और उतरे जिसका बेग विषम हो अर्थात कभी कम और कभी जादा हो जाय, उसको विषमज्वर कहते हैं। तात्पर्य यह कि.प्रथम ज्वर वात पित्तादि फिमी फिस्म का आया हो और वह ज्वर कुपथ्यादि कारण से रसादि में बना रहा हो और ऊपर से मालुम हुआ.हो. कि ज्वर विलकुल छुट गया फुल ! फाल याद पुनः ज्वर भाजाय उसे विषमज्वरं फहते हैं । इस ज्वर में एक प्रकार का युखार शरीर में बना रहता है किन्तु मालुम नहीं होता कपरी विकार से वही ज्वर तेज हो जाता है, इस ज्वर में पित्तप्रधान है. लेकिन इस बुखार फा कोई समय नहीं है जभी भाजाय और यह. ऐमा दुष्कर ज्वर हे फि लोगों की बरसे नहीं छोड़ता पदि उत्तम मौषध मिले. तेो. एकही दिन में कुट भी जाता है। इस विषमज्वर फा पांच भेद है जैसे:- सन्ततःसत्ततोऽन्येा स्तृतीयकचतुर्थिकौः ॥ १० ॥ सन्तत ज्वर, सततज्वर, अन्येद्युः ज्वर वतीयक ज्वर और धातुर्थिक ज्वर इन सबों के लक्षण नीचे प्रक्षाश करते हैं। सप्ताहवादशाहबा द्वादशाहमयापिवा। सन्तत्यायो ऽविसर्गीस्यात् सन्ततः सलिंगद्यते ॥ अहोरात्रेसततकी द्वौकालावनुवर्तते । अन्येद्युष्करत्वहोरात्रादेकंकालंपव- तते ॥ तृतीयकस्तृतीयेन्हि चतुर्थेऽन्हिचतुर्थकः ॥ सन्तप्तचर-उसे कहते हैं जो सात दिन फिम्या दश दिन या बारह दिन तक एक समान ज्वर यना रह के उत्तौ सात दिन से यातप्रधान ज्वर. दश दिन से पित्त प्रधान ज्वर और बारह दिन से कफ प्रधान वर जानना' चाहिये। 1 . सततम्बर-एक दिन रात भर में दो बसत, चढ़ता और उत्तरता है। सन्यु ज्वर-एक दिन रातभर में एकही बार चढ़ता और उतरताहे।

प्रारोग्यदर्पण। तृतीयक ज्वर-उसे कहते हैं जो तीसरे दिन ज्वर घड़े अर्थात् जिस दिन ज्वर उतर गया उसके तीसरे दिन फिर चढ़े अर्थात् एक दिन बीच में खाली देके भौर इसी ज्वर को कोई अंतरिया और कोई तिजारी कहते हैं । धातुर्थिक ज्वर उसे कहते हैं जो बुखार दो दिन बीच में छाइयो धौथे दिन भाये जिसे लोक में चौथिया कहते हैं । तृतीयकज्वर का भेद ॥ कफपित्तत्रिकंग्राहीपष्टावातकफात्मक वातपित्ताच्छि -रोग्राहीत्रिविधःस्यात्तृतीयकः॥ तिजारी धुखार अगर प्रथम कमर के पिछाड़ी जहां तीन में दर्द होके अथवा उसे जकड़ के घड़े तो कफ पित्त से जानना, यदि पीठ में दर्द वगैरह होके उष्ण शीतल होके घड़े से बात कफ से और जो प्रथम शिर में दर्द वगैरह उत्पन्न कर के घड़े उसे वात पित्त से जानना चाहिये, जिस ज्वर में जिस देष का अधिक काप देखे उसी के अनुसार चिकित्सा करे ।। विषमज्वर में जाहा और गरमी मालुम होती है उसया फारण दि. खलाते हैं जो विषम ज्वर में बायु ग्राफ के साथ मिल के जन रगों में बहती है तब ज्वर के प्रारंभ में जाहा मालुम होता है..और बाद उस के जब वायु फफ से अलग हो जाती है अन्त में पित्त दाह पैदा करता है यही कारण है जो जादा से ज्वर आने के अन्त में पियास अधिक लगती उसी तरह जाय वायु-पित्त को साथ-रगों में गमन करती है तब ज्वर के मा- रंभ में दाह और-शीत,होने के बाद यानी अन्त में श्लेष्मा अपने स्वभायज गुण से शीत उत्पन्न करता है,और जाड़ा मालुम होता है । यह दोनों दा- हादिफ और, शीतादिक ज्वर संसर्गो हैं अर्थात् द्विदोषज हैं, इन में शीत पूर्वक सुख साध्य और दाह पूर्वक कष्ट साध्य है ॥ चातुर्थिक ज्वरका भेद ॥ चातुर्थकोदर्शयति प्रभावंद्विविधज्वरः । जकाभ्यांश्ले- - - आरोग्यदर्पण। ष्मिकःपूर्व शिरसोनिलसम्भवः ॥ मध्यकोयन्तुगृन्हाति पूर्व यस्तुसपित्तजः। विषमज्वरएवान्यश्यातुर्थिकविपर्ययः॥ समध्येज्वरयत्यहन्यादावन्तेचमुञ्चति । चातुर्थि ज्वर दो प्रकार का प्रभाव देखाता है। जो चातुर्थिक फेफ जन्य है से पहिले पिडरिन से पढ़ता है और जो बातोत्पन्न है से शिरसे सुरू होता है । जो चातुर्धिक में पित्त प्रधान है वह. मध्य शरीर अर्थात् पेट चढ़ता है। एक प्रकार का विषम ज्वर और है जो चातुर्थिक ज्वर से विपरीत याने उलटा रूप से आता है यह कि धीचं से दो दिन बराबर ज्चर घना रहता है और' मादि का एक दिन अन्त का एक दिन छोड़ देता है। एक प्रकार का विषम ज्वर और कहते हैं जिसे किसी २ ग्रंथ में नरसिंह ज्वर नाम लिखा है। विदग्धेऽन्नरसेदेहेश्लेष्मपित्तव्यवस्थिते । तेनाशीतलं देहमर्द्धमुष्णप्रजायते ॥ कायेदुष्टंयदापित्तंश्लेष्माचान्तेव्य- वस्थितः। तेनाप्णत्वंशरीरस्यशीतत्वहस्तपादयोः ॥ काये- श्लेष्मायदादुष्टः पित्तंचान्ते व्यवस्थितम् शीतत्वं तेन गात्र- स्यादुष्णत्वंहस्तपादययोः ॥ शरीर में जय भोजन किया हुमा माहार फारस न पचने से (विदग्ध) जल गया तष कफ और पित्त दुष्ट होके कोप करते हैं उस अवस्था के ज्वर में माधो शरीर शीतल और माघी शरीर गरम रहती है। जब पेट में पित्त दूपित होके प्राप्त हो और हाथ पांव में फंफ रहे उस से जो ज्वर उत्पन्न हो उसमें पिठ से शिर से पेट पर्यन्त गरम रहता है और कफ से हाथ पांव शीतल रहते हैं । इसी प्रकार जब कोष्ट में कफ दूषित हो और ( मन्त) हाथ पांव में पित्त; तब शिर से पेट तक शीतल और हाथ प्रांप.गरम रहते हैं।

r . प्रारोग्यदर्पण.। प्रलेपक ज्वर का लक्षण। प्रलपन्निवगात्राणिघमणगौरवेणच । मन्दज्वरविलेपी चे सशीतःस्यात्प्रलेपकः ॥. जिस ज्वर में पसीना और शरीर भारीपन के वजे से शरीर के ऊपर का धमहा लिपासा अर्थात् मोधा सा मालूम हो और ज्वर बहुत तेज न हो एवं जाहा मालूम हो उसे प्रलेपक ज्वर कहते हैं। सुश्रुत जी कहते हैं । ( ज्वराश्चयिषमाः सर्वप्रायः क्लेशायशोपियाम्) भक्तर करके जितने विपम- ज्वर हैं सब क्लेश सहनेवाले और धातुक्षीयावाले को होते हैं। पाठकगरको यह भी याद रखना चाहिये कि ज्वर बिना किसी धातु से अपना पूरा स- म्बन्ध किये -अधिफ दिवस पर्यन्त शरीर में रह नहीं सका इस लिये जय देसै कि उत्तम औषध के भी योग से धुखार नहीं छोड़ता तो निम्नलिखित लक्षणों में मिला ले कि यह ज्वर किस धातुं में प्राप्त है उसे अलग कर देने | हो से ज्वर जाता रहेगा । से सात घातु है रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, (हाड़) मज्जा, और शुक्र ॥ सप्तधातुंगत ज्वर लक्षण । रसगतनर-शरीर में भारीपन, जी का मचलाना, शरीर में मालस्य अधि और उदासीनता यह लक्षण रस गत ज्वर में होते हैं। मांसगतज्वर में विशेष लक्षप. पैर में ऐंठन, पियास, पेशाय और दस्तों का अधिक होना, भीतर दाह और येनी होती है । मेदगतञ्चर-में अतिशप पसीना, पियार, यिदोसी, मानतान यफना, यमन, शरीर में दुर्गन्धि, मधि, ग्लानि और घेचैनी आदि लधरा होते हैं। रफगवज्यस्का लपण मुद से रक्त धूचना, दाद, यिहोसी, यमन पुमरी, प्रताप, शरीर में फुन्सियां या लाल र दांग पहनाना और पिपास धगैरह होता है.

प्रारोग्यदर्पगा। अस्थिगतज्वर-में हरफूटन. काल न पहना, हाथ पांव का पटकना, घमन, दस्त और श्वास का फूलना यह लक्षण होते हैं। मज्जागतज्वर-इसमें आंख के सामने अधियारा मालूम होना, चकी, महावास, खांसी, जाडालगना, वमन, अन्तर्दाह और मर्मस्थान में दर्द यह सब महा असाध्य लक्षण होते हैं। शुक्रगतज्वर-(मरणप्राप्नुयात्तत्र शुक्रस्थानगतेज्वरे) शुक्र गत वर होने से मनुष्य निस्सन्देद मर जाता है। इसमें विशेष लक्षवं मत्यन्त प्रसंगेक्षा और अकस्मात वीर्यपात होते हैं । उक्त सर्व धातु गत ज्वरों को चिकित्सा मुख्य यह है कि घड़े ये उप- द्रवों को दमन करना तथा क्षीण धातुओं के बढ़ा के सम करना और पढ़े हुओं को घटा के सम फरना जिसकी मिधि कुछ मागे लिखेंगे भी। अब सीवर के लक्षण फहते हैं। • जीर्ण ज्वर। योद्वादशेभ्यो दिवसेभ्यजवं दोपत्रयेभ्योद्विगुणेभ्यऊर्ध्व। नृणांतनौतिपति मन्दवेगाभिषभिरुक्ताज्वरएपजीर्णः ।। जो सुसार बाहर दिन के उपर निरन्तर घना रहे विशेष करके बात ज्वर चौदह दिन के उपरान्त पित्तज्वर बीस दिन के उपरान्त और कफवर चौविस दिन के ऊपर घना रहै एवं युखार बहुत तेज़ न हो फिन्तु मन्द वेग से बना रहे उसको जीर्णज्वर कहते हैं। जोय ज्वर के भेद से एक ज्वर का लक्षण और कहते हैं। बातवलासक ज्वर। नित्यमन्दज्वरोरुक्षः शूनःकृच्छ्रेणसिद्मति । स्तब्धांग: श्लेप्मभूयिष्टो नरोबांतवलासकी।

आरोग्यदर्पण। धीमा ज्वर निरन्तर शरीर में बना रहै. शरीर रुखी, हाथ पैर या समस्त शरीर में कुछ सूजन, तमाम वदन में दर्द अथवा शरीर के नसें ज- कड़ी सी मालूम हो कफ की अधिकता यह लक्षण होते हैं और ऐसे रोगी बहुत मुस्किल से माराम होते हैं। अथ आगंतुक ज्वर के लक्षण । अभिधाताभिपंगाभ्यामभिचाराभिशापतः । मार्ग- तुर्जायतेदोषैर्यथास्वंतं विभावयेत् ॥ भागंतुक ज्वर उसे कहते हैं जो बुखार मिध्याहार मिथ्या बिहार द्वारा न हो के अकस्मात् उत्पन्न हो जैसे अभिघात भर्थात् चोट लगने से (अभिषंग) भूतादिकों के लगने से • (अभिचार ) मंत्र यंत्र तंत्र के योग से इस में भी वही बात है, अभिशाप अर्थात् गुरू व्राह्मणादिकों के शाप से यथा दोष जो ज्वर होता है उसे आगंतुक ज्वर कहते हैं। भूत याधा से उत्पन्न ज्वर को लक्षण नीचे लिखते हैं। • असिल में भूत प्रेत कोई यस्तु नहीं है सिर्फ भय है, किसी कारण से क्यों न हो हृदय कंपित होने ही से (हास्य रोदन कंपनं ) त्यादि उपद्रय उठ खड़े होते हैं उसी को अज्ञानी लोग भूत प्रेत को याघा मानने लगते हैं और पस बजे से लोगों का विस्वास और भी जम जाता है कि इस प्रकार से रोग ऊपरी टोटका गादि उपायांसे छुट भी जाता है यद्यपि यह सय उपाय घेद्य विद्या से संबन्ध रखते हैं जैसे (धातोन्मादे त्रासनं ) जैसे यायु के उ. न्माद में (पागल) की भायनक तस्वीरें अर्थया रूपोंक्षी दिखलाना, धमकाना (यह भी हा सक्ता है जैसे रोगी के सामने दीपक जला के माला फूल धूनी मादिदे के डाटना कि घतला तू फोन है इसे छोड़ दे नहीं तो तुझको माग में जला देंगे) पिप रहित सर्प से कटवाने का मय देखाना इत्यादि उपायों से (विषयविषमौषधं) जैसे (मयात् घायु) हर में घायु विग जाता है वैसा हो हर दिखाने से यायु शुद्ध होता है किन्तु मानानात् लोगों को विस्वास हो लाता है कि अमुक मादमी मारने फूंकने से आराम हुमा है। इस लेख.से । - प्रारोग्यदर्पण। भूताभिपंगादुद्वेगो हास्यरोदनकंपनं । केचिदभूताभि- पंगोत्थं ब्रुवतेविषमज्वरं ॥ सब भूताभिपंग ज्वर के लक्षण दिखाते हैं। जैसे चित्त फा उचाट होना, हँसना, रोना और शरीर का कांपना और फितने आचार्य वि. पम ज्वर को भी भूत वाघा से उत्पन्न मानते हैं। मानने का कारण यह जान पड़ता है कि विषम ज्वर में खास कर, तिजारी चौथिया भादि ज्वर यंत्र मंत्र टोटका आदि प्रयोग से भी छुट जाता है. इन सय लेखों से जाना जाता है कि पूर्व भूताचार्य पदार्थ तत्वज्ञान ( फिमस्ट्रि सायन्स मादि) में माभ्यास कम रखते थे अथवा उसे याहियात समझते थे। तभी तो प्रत्यक्षादि प्रमाणों से सिद्ध यातों को भूत बाधा मान लेते हैं । यंत्र या कोई जड़ी बूटी हाथ की कलाई या बाहु, गले में बांधना ठीक रक के साथ उस का सम्बन्ध कराना है क्योंकि रोग पुराना होने से रुधिर के साथ उन का पूरा सम्बन्ध हो जाता है इसी से जल्द माराम नहीं होते आज कल के विधान दर्शियों ने इसी लिये विजुली की चीजें निकाली है कि जिस के पहरने अथवा बांधने से रुधिर, रोग से अपना सम्बन्ध छोड़ के विद्युत के साथ कर लेता है ॥ . हमे लोग नास्तिक न समझे क्योंकि यह हमारा कथन परीक्षित है, हम ने कितने रोगियों को मारोग्य किया है, उनमें से एफ दो रोगियों का हाल इस स्थल में लिसे भी देते हैं। 'जानसेनगञ्ज में सूर्यदीन ठठेरो का, पुत्र जिसकी अवस्था २ वर्ष की थो दो बजे रात.को बोतलों के गिरने की आवाज से पौफ उठा और हर कर पागल हो गया, तीसरे दिन दोपहर को सूर्यदीन हमको बुला ले गया, वहा हम जाके यह देखा फि.चंद झाड़ने फूफने वाले उफाली लोग इफला घजा रहे हैं और यह लाफा अलंग एक घटाई पर सफेद नई धोती और गले में फूलों का गजरा पहने बैठा हे पाहता है कि हम फलाने दरगाह के. माद है. हमारे साथ बहुत पलटने हैं देशो दे आदमी हमारा वह ताख पर ।

आरोग्यदर्पण। ज्वर के दश उपद्रव। श्वासामू ऽरुचिश्चर्दिस्तृप्णातीसार विग्रहः । हिवाकासेोऽङ्गदाहश्च ज्वरस्योपद्वादश ॥ १ (श्वास) अधिक हांफी या गले में फफ का घुरघुराहट अथवा सांस कष्ट से लिया जाय २ (मूळ ) बेहोसी या अधिक मुस्ती ३ ( अरुपि) खाना पीना अच्छा न मालूम हो अर्थात् किसी वस्तु का आयफ़ा यथार्थ बोध न हो ४ (छदि) यमन यानी कै होना अथवा जी मचलाना या मुख से पंछा टूटना ५ (णा) अधिक प्यास अर्थात् पानी से शांति न हो६ (भतीसार) दस्त पतले होना 9 (बिग्रह) या दस्त बिलकुल ही न होना । (हिका) हुधकी का भाना, खांसी और तमाम शरीर में जलन मालूम होना यह,दश उपद्रघ ज्वर में होते हैं। बैठा है । हम ने सब झाड़ने वालों को हटा दिया और लड़के को डांट के कहा कि लाओ हाथ तुम्हारी नाड़ी देखें उसने हाथ देदिया, उस समय उस की नाड़ी को गति अति बेगवान थी जैसे तीव्र ज्वर वाले की होती है हम उसे प्रोमाईट आफ पुटासियम् पानी में घोल के पिला दिया और सदों को यहां से हटा दिया सिर्फ दो आदमी नियत कर दिया कि जब तक यह से न जाय हाथ पैर धीरे २ दद्याते रश और यह उठ के भागने न पाये, यह लहका माघ घंटे के बाद से गया और ५ बजे भांम की जय बह से के | उठा तो हम उसे आरोग्य पाया ॥ सन् ८८ में हम श्रीमान् राजा माहा के छेस्टी रानी जी की चिकित्सा कर रहे थे, एक दिन की यात है कि राजा साध्य के एक भयवाद जिन का नाम याद नदों है पर्वत पर तीतिल पराने गये और यहाँ हरकर पागल हो गये राजा के सिपाद छुटे उन्हें ढूंद.फे पका. लाये और राजा साहय के मुमादय पं० भगयान दल के दालान में पैठाया' पार पांच आदमी उन्हें थांमे थे तभी उस का याहियात यकना, सोगों पर थूकना, दांत काटना मादि धंद नहीं था, राजा साध्य को मासानुसार हम भोर राजधानी के ठाकर दोनों ने जाके उन्हें देखा और दोनों ने राजा साहय से भाके पपान किया कि हर गये हैं और उसी से रन को गिर पर गरमी .

. ६२ प्रारोग्यदर्पगा। ज्चर के साध्य लक्षण । बलवत्स्वल्पदेोपेषु ज्वरःसाध्योऽनुपद्रवः । जो मनुष्य बलवान हैं, और जिन के, वातादि दोष स्वल्प हैं अर्थात देोप यहुत बड़े नहीं है. (उपद्रव से दोप बढ़े हुये जान पड़ते हैं) और जो ज्वर के दश उपद्रव ऊपर लिखे गये हैं उन में से स्वासादि कठिन उ- पद्रव न हो तो साध्य जानना 'सुख साध्य उसे कहते हैं जो शरीर के बाहरी भीतरी कुछ भी उपद्रव न हो सिर्फ ज्वर मात्र हो वह सुख साध्य है। मुस साध्य ज्वर स्वल्प ही चिकित्सा से आराम हो जाता है । जिस वुरवार में भीतर दाह और पियास जादे हो, कुछ प्रान तान व- कता हो. हांफी, घुमरी. शरीर में दर्द, पेट में शूल, पसीना न आता हो, नं दस्त हो और न हवा छूटै उसे कष्ट ज्वर जानना इसीको वैद्य लोग अन्तरवे- गी ज्वर कहते हैं। है, राजा साय ने कहा कि पंडित जी आप नहीं जानते न को एक दो यार पहले भी इसी तरह हो चुका है और व २ साड़ने वाले आये हैं तप आराम हुए हैं, यह एक दफे पाहाद पर लाल फंदाते थे एक लाल इन डे पिंजड़े में फंदा और थोड़ी देर के बाद मांस का लोपड़ा सा यन गया यह देख पिंजरा फेंक भगे और धीमार हो गये और धड़ो मुस्किलों मे भाराम हुये । राजा साहब से हम ने कहा कि हमारे पास एक पलीता है यदि आप यह तो उसे सुंघा के भूत उतार देय, राजा साहय ने कहा अवश्य भाराम फरना चाहिये । हमने चूना और नौसादर को मिला के एक पोटरी बनाया और रोगी के पास आके बैठ गये और दो आदमियों से कहा कि तुम लोग थांभे रहो और सब लोग छोड़ दो हम ने एक हाथ से रोगी की चोटी थांभ' के पूछा कि सच कह र कौन है छोड़ के चला जा नहीं तो अभी महावजू पलीता संघाताहूं तू जल जायगा इनना कह के नाक में पोटरी लगा दी ( किसकी नाक है जो अमोनिया की झार एक मिनट भी बरदास्त कर सकै) क्स फिर क्या बहादुर बोल उठे कि प्रारोग्यदर्पण। अथ ज्वरस्य असाध्य लक्षण ॥ ज्वरःक्षीणस्यशूनस्यगम्भीरोदैयरात्रिकः । असाध्यो बलवान्यश्चकेशसीमन्तज्ज्वरः ।। अब असाध्य ज्वर का लक्षण लिखते हैं । जो मनुष्य बुरवार में अति दुबला हो गया हो, सम्पूर्ण शरीर अथवा हाथ पैरों में सूजन आगयेहों, ज्वर पीछा न छोड़ता हो, शिर में चांद की जगह का वाल उड़ गये हों और वु- खार के दुप्कर लक्षणं मिलते हो तो असाध्य जानना ऊपर के श्लोक में जो गम्भीर शब्द आया है वह एक प्रकार का ज्वर होता है जिसे वैद्यक में गंभीर. ज्वर कहते हैं, उसके लक्षण यह हैं जैसे अन्तर्दाह, पियास, अंतिशय वातदोप से मल का विवन्ध तथा कास श्वास का मादुर्भाव हो उसे गम्भीर कहते हैं | इसे भी असाध्यही समझना और भी ज्वरों के असाध्य लक्षण लिखते हैं ।। असाध्य लक्षणानि ॥ हेतुभिर्बहुमितायलिभिर्बहुलक्षणः । ज्वरःप्राणान्त छदाश्चशीध्रमिन्द्रियनाशनः ॥ याहृष्टरोमारक्ताक्षोहृदिस- वातशूलवान्। वक्तेणचैवोच्छुसतितंज्वरोहंतिमानवम् ॥ हिक्वाश्वासपायुक्तंमूढविभ्रांतलोचनम्। सन्तताच्छासिन छोड़ दो मैं जाता हूं हम ने भी जोर से ताली पीटा कहा चल दे, रोगी चै- तन्य हो गया उसी समय वह दूध पिया और घर में जाके भोजन किया इस क्रिया से लोग बड़े आश्चर्यित हुये किन्तु हम ने सब लोगों को वह पलीता बता दिया और शिक्षा दिया कि मेत की बाधा. विलकुल झूठ है सिर्फ हृदय में भय का समाजानाही भूत प्रेत का वाधा है. इसी तरह हमने सैकड़ों मनुष्यों को मारोग्य किया है और सबों का हाल रजस्टर में दर्ज हैं किन्तु स्याना भान से नहीं लिया ।।

६४ प्रारोयग्दर्पण। क्षीणंनरक्षपयतिज्वरः ॥ आरम्भाद्विपमोयस्तुयस्यवादै- घरात्रिका | क्षीणस्यचातिरूक्षस्यगम्भीराहन्तिमानवं ।। जो ज्वर वलवान हो और अनेक कारणों करके उत्पन्न भया हो और अपने मर्यादा के भीतर ही श्रांरव कान आदि इन्द्रियों की शक्ति को नाश कर दिया हो वह ज्वर निस्सन्देह प्राण नाशक होता है ।। जिस ज्वर में रोगी के वारम्बार रोम खड़े होते हों, नेत्रं सुर्ख, छाती में दर्द, नासिका वन्द मुख से श्वास लेता हो तो जानना कि वह ज्वर रोगी को जरूर मारेगा। जो ज्वर रोगी. हुचकी, श्वास और पियास कर के अतिशय दुरिवत हो, संज्ञा रहित अर्थात् जिस के होस हवास दुरुस्त न हों, जिस के नेत्र बैठ गये हों या किसी को चीन्हवा न हो और मुख से श्वास लेता हो तथा श्रतिक्षीण हो गया हो उस को समझना कि अब यह यमलोक की यात्रा करेगा। जो ज्यर आरम्भ फाल ही से विषम हो गया हो और असाध्य के चिन्ह दृष्टिगोचर होते हों ऐसा गंभीर ज्वर दुयल मनुष्य को नहीं छोड़ता अर्थात् मारता ही है। क्षीरपाणि महाराज के मत से एक प्रकार का ज्वर मंधर नामक होता है उस का लक्षण श्लोक न लिख के सिर्फ पापा में नीचे प्रकाश करते हैं। . मन्थर ज्वरस्य लक्षणम् । प्रथम ज्यर उत्पन्न हो के तय सय निम्नलिखित लक्षया आमिले अथवा भतीसारादि अन्य रोग में मिले अवश्य असाध्य जानना जिस रोग में ज्वर, पुमरी, वेहोसी, अतीसार, कै. पियास निद्रा का न आना, मुख लाल, तालू और जीभ सूसे तथा मुख पाया और कण्ठ में सरसों सरो से फुसियां हों इत्यादि लक्षण युक्त रोग को मंथर कहते हैं। इस का कारण विशेष कर तरुंग ज्यर में घी साने तथा पसीना रोकने में होता है। हमारे हारीत मुनि कुछ औरदी पढ़ते हैं। जिस मनुष्य के ज्वर टकटका, दांत और मोठों में श्यामता, " प्रारोग्यदर्पण । नाक, जीभ, मुख और फण्ठं में ललामी, नेत्रयकर के नेत्र के समान निकल आये हों ऐसे रोगी को जो सात दिनों में मोतियों की माला गले में न पहराये तो २१ दिन के भीतर उस के सम्पूर्ण भा में सरसों के समान छाले पड़ जायगे और मुस्किल से आराम होंगे। .: विषमज्वर की चिकित्सा। वह विषमज्वर जा दिया रात्रि में सिर्फ एक बार आता हो, या दूसरे दिन, तीसरे दिन अथवा चौथिया आदि हो इसमें बहुत पहरेज कराने की जरूरत नहीं है, इतना अवश्य ध्यान रहे कि यदि कोष्टयद्ध हो तो मुलायम, रेचन दे देवे या वर किसी औषध से न छूटै तो अन्त में स्नेदादि क्रिया के घाद देश काल के अनुसार धमन विरेचन करा देनेही से ज्वर निर्मूल हो जाता है। 'अय जाहा दे के जो धिपमञ्चर भाता है जिसे शीत पूर्य ज्वर कहते हैं उसकी उत्तम २ परीक्षित औषधियां जिनसे असंख्य रोगी आराम हुये हैं नीचे लिएते हैं। शीतपूर्व ज्वर- पर काढ़ा ॥ भटकटैया (कटेरि वा कंटकारि) धनियां, शोंठ, निम्ब वृक्ष परके गुरच (गिलोय ) माथा, पद्माप, लालचन्दन, चिरायता, पटोल, (परवर का पत्र) रूसा, पुहकर मूल. कुटकी, इन्द्रजय, नीम की अतर छाल, भारङ्गी, पित्तपापंष्टा, कुन सथ दवाइयों को हम वजन ले अघकघरा कर दो ताला लेकर पावभर जल में रात को भिजा देय सयेरे जोस देवे जय एक छंटाफ पानी रह जाय शीतला फर मल छान के पी जाय, इसी प्रकार सबेरे मिजावै सांम को खास देके पिये यह पूर्ण मात्रा का धयान है, उमर कम हो अथवा रोगी कमजोर हो या रोगी के मिजाज में गरमी भधिक हो या गरमी अधिक पडती हो तो मात्रा कम कर देय । पथ्य-दूध भात अथवा मूंग की दाल पुराने घायल का भात, गेहूं की रोटी, लौकी की तरफारी आदि। इस प्रकार दोनों समय • पिलाने से कैसाह पुराना विषम ज्वर हो छुट जाता है ऐसा कितनी बार , प्रारोग्यदर्पण। आज़माया गया है। अगर रोगी के पेट में (दाह) जलन हो शिर में घुमरी आदि,वातपित्त के,उपद्रव हो तो इस भर्क को पिलावै । विषमज्वर पर अंर्क ! यह अर्फ शीतपूर्वज्वर और उष्णपूर्यज्वर देनों को आराम करता है तथा अन्तर दाह, घुमरी, जीमचलाना, हाथ पैर के जलन आदि को भी शांति करता है। धनियां, गाजयों के फूल, घगंगाजयां ( गाजवां के पत्ते ) लालचन्दन, सफेदचन्दनः कासनी, खीरा ककड़ी का वीज, काहू का घीज, कुलफा का वीज. वर्गयनंप्सा (वर्ग पत्ते को कहते हैं) गुलनीलोफर, गुलाब के फूल. यह सय एक २ उँटाफ, लौकी (घीयां) ३ पाव पेटा (श्वेत कूष्माण्ड) २ पाव, सेर कपूर छ मांसा, घीया और पेठे को छोड़ और सब दवाइयों को पानी में रात को भिजा दे सबेरे घीया और पेठे को दुफळे २ कर सब को डेगर्भभके में भर १५ सेर मर्फ खींच लें। साम सबेरे और देोपाहरको माघर पाव भर्फ उसमें जरासा मिश्री डाल के पिये। थोड़े,की दिनों के पीने से विषमज्वर सूट जाता है पथ्य यही जो ऊपर लिख आये हैं। यदि पन्द्रह दिन के पीने से ज्वर न पुटे, तो इस अर्क को पिला के दो चार दिन फिर कपर लिसे हुये फाड़े को पिलाये । ज्वर माते २ रोगो निर्बल पड़ गया हो और ज्वर भी न छूटता हो तो ज्वर सूटने की दवा देता जावै और, जिस्से रोगी का बल न पटै उपाय करे। अगर गर्म मिजज बाला-हो तो यह अर्क पिलाये ॥ अंर्क गाजर। गाजर हड्डी और छिलका दूर किया हुआ १ सेर.. फिस्मिस दोनों को एक हेग में मय २५ सेर पानी के हाल डेग का मुह ढोपके पफायै जिस्से धुवां ग निकलने पावै याद चार घंटे के वेग को उतार, शीतल, कर • लेंप और नीचे लिखी हुई दवाइयों को कुचल के उसी में बाल और ५ सेर P आरोग्यदर्पण। गौ का दूध हाल १५ सेर अर्क खींच लेबै । दवा यह है। दालचीनी, गु- लाय के फूल नागरमोथा, यिौरे का छिलफा: चोवधीनी, घहिमन सफेद यह सब धार २ तोला सफेद चन्दन दे ताली। इस भर्फ के पीने से मन प्रसन्न, जोहों में साकत, धातुपुष्ट और मन बलवान होता है अगर मिजाज़ सर्द अर्थात् अलगमी हो तो इस चूर्ण को दोनों समय शहद के साथ घटाये ॥ बन्शलोचन ४ तोला, छोटीलायची २ तोला सत्त गिलोय २ तेल, घहिमन सफेद १ तोला, छोटीपीपर शुद्ध ६ मासा, दक्षिणी तज ६ मासा, अफरकरहा ३ मासा, रूमीमस्तगी ३, मासा सब को महीन पूर्ण कर डेढ़ २ मासे को पुड़िया बना ले और शहद के साथ चाटै ॥. 'विषमज्वरे ज्वारांकुशो रसः। ताम्रताद्विगुणतालं मईयेत्सुपवारसैः । प्रपुटेत्भू- धरेशीते बज्जीक्षीरेणमईयेत् ।। प्रपुटभूधरेपश्चात्पंचगुंजा मितमजेत् । आर्द्रकस्यरसेनैव सर्वज्वरनिकृतनः ॥ एका- हिकं द्वाहिकंच व्याहिकचतुराहिकम् । विषमंचापि शी- ताढंच ज्वरंहन्तिज्वरांकुशः ।। शुद्ध तामा से दूना शुद्ध हरताल लेके फोले के रस में घोंटके भूधरयंत्र में आंच देव (भूधरयंत्र की क्रिया रस प्रकर्ण में लिखेंगे और बैद्य लोग प्रायः जानते भी हैं) शीतल होने पर निकाल के हैहुष्ट के दृधौ घोंटके फिर उसी प्रकार भूधरयंत्र को मांध देय घाद निकाल महीन चूर्ण कर शीशी में रख देय । इस ज्वरांकुश की माला एक रत्ती से पांच रत्ती तक है। दोनों समय मदरख के रस के साथ खाने से एकाहिक, अंतरिया, तिजारी और चौथिया ज्वर माराम होता है। महाज्वरांकुशोरसः विषमज्वरें। शुद्धसूताविपंगंधः प्रत्येकंशाणसमितः । धूर्तवीज -- 1. ।

| आरोग्यदर्पण। कुईनाईन । ... : यद्यपि हमने भारोग्यदर्पण के दूसरे खण्डं में अनेक द्विपान्तरीय चि- कित्सकों के मत द्वारा कूईनाईन.फा मलीभांति खण्डन किया है और यथार्थ में कूईनाईन से.बहुत हानि पहुंचती है। जयर को छूटा देता है यह परी क्षित है किन्तु उसी के साथही लोगों का. अन्धा लङ्गड़ा : लूला नपुंसफ. तक धना देता है, इसमें एक कारण और भी है कि हाकर लोग एतद्देशीय वैद्य विद्या के न जानने से यहां के मनुष्यों के प्रति से अपरचित रहते हैं। सर्व साधारण को ज्वर रोग में कूईनाईन और धड़ाधड़ चिरायते का अर्फ पिलाना सुरू कर देते हैं। बुखार तो जरूर छुट जाता है लेकिन फलेने पर ऐसी गरमी जमजाती है कि घरसे नहीं हटती। लेकिन जिस प्रकार हमने कुईनाईन के द्वारा. लोगों का असाध्य शीतपूर्व ज्वर छुटाया है पाठक गणों के उपकारार्थ प्रकाश करते हैं। ज्वर माने के दो घंटे पहले कूईनाईन को इसतरह देने से ज्वर छुट जाता है । कूईनाईन २ रत्ती, टाटारिक ऐसिड (एमलीका सत्त ) १८ रत्ती, मिनी २ तोला । पहले मिश्री को पत्थल की कूही में आधपाय पानी में सरयत घनाप उसी में कूईनाईन और इमली के सत्त का घोल के पिला देय अगर इमिली का सत्त न मिले तो एक या दो नीयू का रस हाल दे। अगर पारी टर जाय तो दो तीन घंटे पर फिर पिलायै । जिस ज्वर का कोई नियम न हो जून कजून भाये तो उस में पूर्वोक्त प्रकार से फूईनाईन को दिन में तीन बार पिलावे, देही तीन दिन में ज्वर नट हो जाता है । सियाय तेल फच्चे फलों के और सय पथ्य है। विषम ज्वर, यंत्र मन्त्र टोटका भादि से भी नष्ट हो जाता है ऐसा भनेफ पार अनुभव किया गया है। पन्द्रह अयया यीसा यंत्र को मङ्गल रधियार के दिन अष्टगंध से पीपल पत्र पर लिख कर लाल सूत्र में लपेट पुरुप के दक्षिण पाहु और स्त्री के धाम याहु में बांधने से 'ज्नर नष्ट हो जाता है। किन्तु यन्त्र लिसने वाला आधारशील ब्रह्मचारी, या कुमारी फंन्या या पतिव्रता धर्मयती स्त्री होनी चाहिये।

आरोग्यदर्पण । ज्वराधिकारे मूलिका धारणम् । .... द्रव्यों में अनेक गुण हैं और उनका रक्त मांसादिकों के साथ ऐसा 'सूक्ष्माति सूक्ष्म सम्बन्ध रहता है जिसका जानमा बड़े २. विज्ञानदर्शियों को दुर्लभ है किन्तु सम्बन्ध यशात् प्रत्यक्ष फल दर्शन होने से मान लिया जाता है कि अमुफ भीषधि अमुफ रोग को नाश करती है और बहुत सी ऐसी भी दवा हैं जो अपने प्रभाव से कार्य सिद्ध कर देती हैं जैसे ( ज्वरं हन्ति शिरावद्धा सहदेवी जटाययो ) शिर में पांघी सहदेई की जड़ ज्वर को नष्ट करती है। यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है किन्तु अज्ञानी लोग ऐसे २ प्रभावों को देख गुरुओं के वशीभूत और प्रेत याची मानने लगते हैं। एकाहिक ज्वरे मूलिका धारणम् । काकजंघाबलाश्यामा ब्रह्मदंडीकृतांजलिः । पृश्निप- गर्यप्यपामार्गस्तथागृङ्गरजोऽष्टमम्॥ एषामन्यतममूलं पु- येणाढत्ययत्नतः । रक्तसूत्रेणसंवेष्ट्य बद्धमैकाहिकंजयेत् ॥ औलूकंदक्षिणपक्षसितसूत्रेणवेष्टयेत् । बन्धयेत्यामकर्णेतुः हरत्येकाहिकंज्वरम् ॥ कर्कटस्यबिलोदभूतमृदातुतिलक- कृतं । एकाहिकंज्वरहन्ति नात्र कार्याविचारणा.॥ काकजंघा जिसको चकसेनी और मंसी भी कहते हैं, बरियारा काली तुलवी, ब्रह्मदण्डी, कृतांजलि. पिठिवन) अपामार्ग जिसे चिचराः तथा लट- जीरा भी कहते है और भांगरा इन पाठो.चीजों में से चाहे जिसे पुष्य नक्षत्र में विधिपूर्वक पवित्र होके उरवारि, लावै और उसकी जड़को लाल - सूत्र में लपेट कर हाय या गले में बांधने से. एकाहिक: ज्वर जिसे अन्तरा कहते हैं छूट जाता है । घुग्घु चिड़िया के दहिने तर्फ का पंख सफेद धागे में लपेट के वायें कान में बांधने से अन्तरा ज्वर नष्ट हो जाता है । कर्कटं अर्थात् केकड़ा के बिल की माटी का तिलक करने से भी एकाहिक ज्वर जाता रहता है.॥

प्रारोग्यदर्पण। तृतीयज्वरे मूलिका बन्धनं ॥ अपामार्गजटाकट्यालोहितःसप्ततन्तुभिः। वद्धावाररवे- स्तूर्णज्वरं-हन्तितृतीयकं ॥ कर्णस्यमलजालेनवर्तिकृत्वांप्रय- नतः। ज्वालयेत्तिलतैलेनकजलंग्राहयेच्छनैः। अअयेनेत्र- युगलंत्र्याहिकंज्वरशान्तये ॥ अपामार्ग ( लटजीरा) की जड़ को रविवार के दिन उखाड़ के उसे सात तार के लाल धागे से यांध बांह या गले में बांधने से तिजारी ज्वरका नाश होता है । कान का मैल रुई में लपेट के यत्ती यनावे और कालीतिल के तेल से फज्जल पार के नेत्रों में लगाये तो तिजारी ज्वर का नाश हो। चातुर्थिक ज्वरोपायः॥ चातुर्थिकोगच्छतिरामठस्य पृतेनजीणेन युतस्यनंश्यात् । लीलावतीनां नवयौवनानां मुखावलोकादिवसाधुभावः। अखण्डितशरत्काल कलानिधिसमानने । चातुर्थिकहरं नश्यं मुनिद्रुमदलांबुना ॥ मावार्थाः--(रामठ) हींग को पुराने घृत * में घोंट कर नाश लेने से चातुर्थिक ज्वर अर्थात् चौथिया वुरवार कैसे नष्ट होता है जैसे ( लीलावती) क्रीड़ा करनेवाली नवयौवना + स्त्रियों के मुरव देखनेसे साधु पुरुषोंका साधु भाव (धर्मशीलता) नष्ट हो जाता है। • जीर्णघृतो दशयदुईः-दश घर्ष के ऊपर होने से पुरानां घृत कहा जाता है। + नव (तरुण) यौयनानाम-प्रसूतानां-प्रसूतागतयोयना नवयौवनाः स्त्री तभी संक.कहाती है जब तक लड़का न हो, लहफा घाला होने से गत यौवना हो जाती हैं.

। आरोयग्दर्पण। लोलिम्बराज वैद्य, रनकला को समझा के कहते हैं कि हे शरतकाल | के पूर्ण चन्द्रमा के समान मुखवाली. (मुनिद्रुमः) अगस्तवृक्षके पत्तों का केवल रस सूघने से याने नास लेने से चौथिया' ज्वर नष्ट हो जाता है। अन्यच-"वसतिशिरसि मेघनादमूडे, व्रजतितराविषमोविलासटूट"हे पिलास दूंट, मेघनाद मूल अर्थात् चौराई की जड़ को शिर में .बांधने से विषम ज्वर शीघ्रही नाश होता है। सिर्फ मूलही को क्या बात है मला दिकों के कारने तथा उतारा आदि करनेसे भी विषम ज्वर नष्ट हो जाता है और उसका कारण रक्त को रोग से सम्बन्ध लाहाना है। तिलजलांजलि, तन्वङ्गिगडोत्तरतीर भूमौ ममारहाकोप्य सुतस्त-पस्वी । जलांजलिं तस्यकृतेददातु सैकाहिकस्यादादितेनुजन्मा । भावार्थ:-गड्डा जी के तेट को उत्तर भूमि पर कोई पुत्र होन तपस्वी मरा था उस.तपस्वी को वह मनुष्य जिसे अंतरा युखार भाता हो यदि तिल के सहित अषया सिर्फ जल की अंजुलि दे अर्थात् उस तपस्वी के नाम तर्पण करें तो एकाहिफ जर जाता रहै । यही यघन दालभ्य में भी लिखा है. (गणायामुत्तरेतीरे अपुत्रस्तापामृतः । तस्मैतिलोदकंदयान् मुच्यते सन्तप्तचरात् ॥ तन्त्रान्तरेतु-यानरस्यातिलिख्य पटिकायांपुनःशृणु । गन्ध पुष्पाक्षप रर्पयेत्तांभिषग्यरः) अन्य तन्त्रों में लिखा कि सरी से यानर के आफार एक मूर्ति लिखकर पन्दन अक्षत पुष्पादिसे पूजन करे और इस मन्त्र को पढ़े ज्वरागमन समय में तो ज्वर.फा. पिनाश हो ( मन्त्रः.) भों हो ही श्री मुग्रीवाय महायलपराक्रमाय सूर्यपुत्राय अमित तेज से एका. हिक द्वाहिक जवाहिक चातुर्थिक महायल-भूतज्जर भयज्वर शोकञ्चर क्रोध- * दालभ्य नामक एक बहुत प्राचीन स्तोत्र है उसके द्वारा मार्जन फरने से विषमज्वरादि रोग फुट जाते हैं। हमारे पुराने पण्डित लोग तो उसका प्रभाव ऐसाही वर्णन करते हैं। कहां तक सत्य है नहीं कह सक्त किन्तु इतना अवश्य कहेंगे कि मंत्र यन्त्रादि सर्वधा मिथ्या नहीं हैं।

आरोग्यदर्पण। ज्वर येतालज्वराणां दरादह पचपच भयतर अयतर कलितरय महावीर बा. नर स्वराणां यन्धयन्ध हां ह्रीं हुं फट स्वाहा और भी लिखा है:"समुद्रस्यो. त्तरेफूले कुमुदोनामयानरः । तस्यस्मरणामागाज्वरोपाति रसातलम् ॥. ज्वर नाशक माहेश्वर धूपः। हिंगुलंदेवकाष्टंच श्रीवेटघृतमेव गिध्यायोनि तथा ध्यामं निर्माल्यंकटुरोहिणी ॥ सर्पपनिम्बपत्राणि पिच्छाहि कंचुकं तथा । मार्जारविष्ठा गोशृंगं मदनस्यफः लानिच ॥ वैवहतीवचाचैव कार्पासास्थि तुपास्तथा। छागगोमायुविट्चैव हस्तिदंतस्तथैवच ॥ एतत्सर्वसमा- हृत्य छागंमूत्रेणभावयेत् । उदूखलेतुसंकुटन स्थापयेन्म, न्मयेशुभे ॥ घ्राणमात्रेणधूपायंदीयते यत्रवेश्मनि ! नत- सास्तिठन्ति नपिशाचान राक्षसाः- ॥ - एपमाहेश्वरी धूपः सर्वज्वरबिनाशनः। एकाहिकं द्ववाहिकंवा व्याहिकंच, चतुर्थकम्॥ एवमादीन् ज्यरान्सर्वान् नाशयन्नात्र संशयः॥ हिंगुल, देवदाम. (श्री वेष्ट ). जिस को पुष, यंगदेश में सरल वृक्ष और कही २ रालाधूप कहते हैं इसी से तारपीन तैय्यार होता है। घी गौ को हड्डी रोहित घास वेलपत्र, फुदकी; पीसीसी नीध के पत्र, मुरेले का पंस सांप को केंचुल, बिलार का विष्ठा, गौ को सींग, मैनफरला छोटी भटकटैया, और यही भटकटैया जिसे धनभांटा कहते हैं. दोनों का पंचाग यच वेनउर '(कपास का बीज ),धान की.भूमी, यकरी और सियार का पिठाहाथी दांत, इन सब चीजों को एफ में मिला के यफरी के मूत्र को भावना अर्थात् सी में सयों की तर कर के मुखाय लेप, बाद खरल में कूट महोन कर के किसी भर घरतन में रखदे गौर समय पर धूप देवे इस माहेश्वरधूप के प्रभाव से घर में सर्प पिशाच राक्षस रह नहीं सके और अन्तरा.आदि सय ज्वरों का नाश होता है। धूप देते समय इस मंत्र को पढ़े-मो नमो भगवते रुद्राय उमापतये सम्पन्नाय नन्दिकेश्वराय स्वाहा। अपराजित:भादि औरभी भनेक ज्वरनाशकाधूप हैं जिन्हें पांचवें खण्डमें ययान करेंगे। इस बयान से हमारे निवशिक्षितः गण जो प्राचीन पुरुषों के इतिहास को कभी नहीं देखा.मुना .

-- . . ७२ आरोग्यदर्पण। है और न उनके हृदय में ऐसी शक्ति है फि ओ स्वयं अनुभव कर सके हां यदि कोई-अंगरेज मां के लिचर में यही बात कहे ते। निस्सन्देह.ग्रला की • धात समझी जायगी। ज्वरनाशक दीपः॥ : - कृष्णोरगोन्मत्तवीजगन्धगोहतैलजः। मृतकर्पटवाच दीपःसर्वज्वरापहः ॥ कृष्णसर्पवसां, धत्तूरवीजतैलं, वृषभ- शृङ्ग तैलं एभिzतक वस्त्रवादीपः, सर्वज्वरापहः ॥ काले साप की धर्थी धतूर के योज,का,तेल गन्ध और बैल के सींग का तेल सब को एकत्रित. फर मुरदे के ऊपर के, कंपड़े ( कफ्फन) की बत्ती घनाय उक्त तेलों में दीपक जला कर गृह में रखने से सम्पूर्ण विषम ज्वरों का नाश होता है । यह फ्रिपा भीम यिनोद ग्रंथ में लिखा है। जीर्ण ज्वर की चिकित्सा॥ जीर्ण ज्वर में दोनों समय गुपं का काढ़ा पिलाने से यहुत फायदा दे खा गया है अथवा शितोपलादि चूर्ण को सहत में घटाय के ऊपर से.गुचं फा काढ़ा पिलाने से और भी जल्द फायदा होता है। लाक्षादि तैल को मर्दन करने से भी लाभ देखा गया है। उपद्रव शमनोपायः ।। ज्यर रोग में जो उपद्रव बढ़े हों उन के शांति फरने के उपाय अब संक्षेप.से प्रकाश करते हैं क्योंकि बढ़े हुये उपद्रव अत्यन्त क्लेशदायक होते हैं बिना उन्हें शांति किये रोगी को चन नहीं मिलता इस लिये जिस प्रकार धेशमन हों उसी तरह की चिकित्सा करना फिन्तु इतना अयश्यमेव ध्यान में रहे कि कोई क्रिया यर का विरोधी न हो। कोष्टबद्ध पित्ताधिकारी ज्वर में तो कुछ दस्त होता ही है, किन्तु षाताधि- कारो ज्वर में तो मला सूख जाता है, और बिना मल उवर, ज्यर नहीं घिमाता स लिये यह दवा देना जरूरी है। बड़ा हड़का पक्कल, हरीसभाय, शोठ और कालानोन सयों को बराबर ले कूट कपर छान कर लेय छ माला अथवा कुछ भधिक चूर्ण को रात में गरम - - आरोग्यदर्पण। ७५ जल के साथ खिला देने से सबेरे गुलासा दस्त आ जाता है। अगर मिज़ाज में गरमी अधिक हो तो दो तोला गुलाट का गुलफाप और देतोला सोरखिस्त दोनों को जल में पीस गुनगुना कर के पिलाय देयं दस्त अयश्य होगा। * पिपासा । भगर रोगी को पियास अधिक हो तो इस पानी को पिलाये। धान का लावा तोला, घरोह (परगद के पक्ष में जो जटा सा.लटकता है.) २ तोला, कमलगट्टे को गरी १ तोला, तीनों चीजों की पोटरो.पानी में डाल ६और उसी पानी को पिलाध, यदि रोगी गरम पानी पीता हो तो गरमही जल में पोटरी को डाल दे भथया घारम्यार शीतलचिनी को मुख में डाल के कुचले और जल से उतार जाये । अथया भायला, फमलगह की गरी, कूट, धान का लाया, घरोह सयों को यरायरले महीन पीस शहदमें सान के गोली यांध लेंय, इस गोली को मुख में रखनेसे पियास,की आधिक्यता और मुख का सूखना नाश होता है। रोगो की शरीर में दाह की माधि. क्यता हो तो पित्त ज्वराधिकार में जो दाह शान्तिकारक उपाय लिख आये हैं उन्हीं के द्वारा शान्ति करना । • मस्तक पीड़ा। मुलेठी, हरदी, नागरमोथा, अनारका फलावा छाल, अनयेत, काला सुरमा, तिन्तरीक, खस, तेजपात, फमलगह की गरी, दालचिनी, नख, पन सय दवाइयों को महीन चूर्ण कर बिजीरा नीयू का रस, शहद और मधु- सूक्त तीनों चीजों में महीन घोंट ज्वरात मनुष्य के शिर पर लेप करने से, शिर का दर्द, बिहोसी, जी का मचलाना, हुपकी और देह का कांपना यह सब शान्ति होते हैं। और जो मनुष्य पियास और मन्तर दाह करके अत्यन्त पीहित हो तेर बिदारीकन्द अनार, लोध, कथेका लाल नीयू का छिलफा सूधों को महीन पीस शिर पर लेप करने से शान्ति होता है। ज्वर चिकित्सा का शेष प्रकरणापञ्चम खण्ड में प्रकाश होगा अघ ज्वर के अन्तिम नियम को लिखते हैं ।। ज्वरान्ते पथ्यं ।। परिषेकावगाहांश्च स्नेहान् संशोधनानि । खाना भ्यंगदिवास्वप्न शीतव्यायाम योपितः । नमजेतज्वरो- - आरोग्यदर्पण। त्सृष्टा यावन्नोबलवान् भवेत् । त्यक्तस्यापि ज्वरणाशु 'दुर्वलस्याहितैज्वरः । प्रत्यापन्नोदहेद्देहं शुष्कवृक्षमिवा- नलः । तस्मात्कार्यपरीहारो ज्वरमुक्तन देहिना ।। ज्वर फुट जाने के बाद मनुष्य को चाहिये कि जय तह गरीर बलयान न हो जाय निम्नलिखित कम्मों से पहरेज रक्स, जैसे-जग से शोर को सींच. ना, बहुत पानी में रहना या डुबो मार के नहाना पृताति का पीना, गोधन करना स्नान करना उयटन तेल लगाना, दिन को सेना, बहुत शीतल प. दार्थीका खाना, कसरत अथवा बहुत दौड़ धूप करना स्त्री प्रसाद आदि। कारगा यह कि जिस फा-ज्वर छुट भी गया है कुपथ्य करने से पुनः वही ज्वर रक्त मांसादि में घुस कर मनुष्य के शरीर को ऐसा दग्ध करता है जैसे मूखे वृक्ष को अग्नि, इस लिये ज्वर फुट जाने पर भी जब तक ताफत न आये उचर नाशक पाय करते रहना अगर ज्वर बुट जाने के बाद अरुचि अज की शिथिलता, विवरणता और मलादिक वृद्धि हो तो शोधन उपाय फरगा, घोफि शोधन न करने से अन्य रोग उत्पन्न हो जाने का डर है और ज्वर फुट गया हो उसका कोई धिकार भी दृष्टिगोचर नहीं होता फिन्तु शरीर निर्मल है तौभी उसको एकाएको पौष्टिक द्रव्य (पाकादिन सेवन कराना चाहिये क्योंकि यिना धल भाये मग्नि नहीं सुलती और बिना अग्नि के पौष्टिक द्रव्य न पधेगा बल्कि जठराग्नि नष्ट हो के ज्वर का पुनरागमन होना सम्भव है । हतावशेपंपित्तंतुत्वकथंजनयतिज्वरम् । पिवेदिक्षु रसं तत्र.शीत:वा शर्करोदकम् ॥ in ' पित्त ज्वर शान्ति होने के बाद यदि चमहे में कुछ पित्त का अंश रह गया हो तो उसे जप का रस अथवा चिनी का सरबत पिला के ठीक करना क्योंकि यह पित्त फिर ज्वर को उत्पन्न कर सक्ता है। P आध्यात्मिक शक्ति । आध्यात्मिकशक्ति जिसका कुछ २ यपान भाग्यदर्पण के प्रथम और द्वितीय खण्ड में कर चुके हैं । उसको पढ़ के किसफा चित्त चाहता रहा होगा कि हृदय विद्युत प्रकाशक सम्पूर्ण क्रियायें दृष्टिगोचर हों इसलिये हम अपने प्रिय पाठकगणों के मझलार्थ योगाभ्यास का सम्पूर्ण सिद्ध भाग,जिस प्रकार घरगषु महाराज एडकपालि से वर्णन किया है प्रकाश करते हैं और आशा करते हैं कि लोगसमें अभ्यास याप के अपने जीवन को सुफल करेंगे।

. आरोग्यदर्पण प्रथम भाग उर्दू में। छप कर तैयार हो गया । श्लोक आदि संस्कृत देवनागरी अक्षरों में छपा है । देवनागरी के न जानने वाले अनेक उर्दू नवीसों के भवरोध से आरोग्यदर्पण उर्दू में छपवाना आरम्भ किया गया है जिसकी कीमत भी सवों के फायदेमन्द समझ कर १ न रख कर इसका भी al) • कर दिया है यल्कि मय हाक व्यय समेत ।।' कामशास्त्र का अपूर्व ग्रन्थ । जो आरोग्यदर्पण के सातवे खण्ड से उपना आरंभ होगा और दशवें सगा तक में इसकी पूर्ति होगी। आज हम वह फामशास्त्र फी वात कह रहे हैं जिस्से परे दूसरा ग्रंथही नहीं है । अनङ्ग रज पञ्चगायक भादि यह सय संग्रहीत और आधुनिक बहुत लघु ग्रंथ है। आज जितने कामशास्त्र के नाम ग्रंथ के नोटिस उपे देख पड़ते हैं सब उटपटांग पर उधर के चुटकुले निकाल छाप फामशास्त्र का भी नाम निशान मिटा रहे हैं पढ़नेवाले जा- मते होंगे यस यही फाम शास्त्र है । फामगास्त्र जनाय यह शास्त्र है जिस में तीनोलोफ पी चातुर्यता और कारीगरी भरी है । कामशास्त्र के जानने याले अलभ्य स्त्रियों को दासी और स्त्रियां पुरुष को दास बना सकी है। विषय गंभीर है विज्ञापन में सव विपय दिसलाना असम्भव है इसके माय पढ़ने ही से मालूम होगा। कोई पूछे इस ग्रंथ का नाम क्या है सो पाठक गण स्वयंही पढ़ लेंयगे जो भय तथा प्रायः लुप्त था । अनुवाद अधिक हो गया है प्रत्येक्ष मास या पक्ष में तीन फर्मे में छप फर निकलेगा । १२ कि. ताय का दाम ) पेगगी भेजना होगा क्योंकि पूरे फिताव फा दाम १७) होगा जिन्हें ग्राहक बनना हो अपना नाम पूरा पता लिख भेजे। पं० जगन्नाथ शर्मा राज वैदश आयुर्वेदोक्त औषधालय प्रयाग सूचीपत्र । - विषय पृथा| विषय पृष्टा १४ १ 9 V ६२ खांसी की.दवा मन्तव्य घिसप्ति जुकाम पर फायट जीज्यर चिकित्सा श्वासेपिद्रव पुगंगे स्वर में पथ्य मच्छो चिकित्सा स्वर्णमालतीप्रमन्त चिकित्सा घमन्तमानिमी चमन घादि एन विष्यस्यादि एम हिनकी ११ क्षीरघृत प्लीहाधिकार शिरलेप जीर्णज्वरे दुग्ध ज्वर छूट जाने का लक्षण १२ पञ्चमली क्षारपाक ज्वर छूट जाने पर परहेज सितादिक्षर राजयक्ष्मा (शोध) रोग १३ घषंगानपिप्पनी राजयक्ष्मा निदान १४ भाज्यरे राजयक्ष्मा संपानि शाक्षादि तेन यक्ष्मा का रूप निरपक्षय के लक्षण पट्तक ते. १६ लक्षण दुष्टुजल गित वर निरिसा किसतादि पूर्ण शौकशोपि लक्षण २० ज्या बांसी का उपाय जराशविलक्षण तरखासी पर गेो भयगोपि का लक्षण व्यापम चि का लक्षण २२ कमाकर वह ३२ रक्तक्षप पि और हाक्षन के नाशीफनादि चूर्ण दुग्यफेनम् पटा पक्षपर्क ४२ " विषय पृष्टाक विषय पृष्टा . "पिघ्यलो नम् . .. शर्यत अंजुबार श्रय द्राक्षारिष्ट ११४ जयत शतपत्रिका पाक भांग्यादिघृतं बातकासाधिकारे ११५ पकन खोरघृतं पित्तकासाधिकारे पंकत का निदान " व्योपाद्यंघृतं कफकासाधिकारे .११७ पंकृत की चिकित्सा .११ यक्ष्मा मादि रोगों पर मोती पारद को कजली का सेवन ८७ | ङ्गाराभ्रकम् कासाधिकार मोती की त्पत्ति छाती पर कफ का सूखना मोती शोधन लघणधार माती मारण विधि कोबा लटकने से खांसी मोती भस्ल का गुण সথ মুন্নাকাঙ্কিা १३. मूंगा की उत्पत्ति लक्षण पूर्वरूप और संप्राप्ति १२४ मूंगा के भस्म का गुण २०० | महाश्वास का लक्षण मंच कासरोगाधिकारस १०१ | ऊध्र्य श्याम कासगंग का आदि कारण लिन्न प्रवास के लक्षया घातादि खांसी का लक्षण १०३ | तमकश्वास के लक्षण पाय साध्याऽसाध्य लक्षया १०५ | प्रतमक श्वाम के लक्षण १२८ खांसी रोग में पथ्य १०६ श्वामकास खांसी रोग में अपथ्य १०७ श्वास रोग की चिकित्सा खांसी रोग की चिकित्सा ६फीगी फाढ़ा १०६ | विरुवादित १३४ विकास की चिकित्सा कफ गित खांसीको चिकित्सा १११ अथ भृजराज तेलम् नजला की खांसी की दवा ११२ कालेस्वरीरमः श्वामाधिकारे -मारिचादियटी- पायुलारिष्ट के लक्षण १६.. .. । . श्वासाधिकारे घृतम् . . २९० अन्यच्च घृत " ११३ बालक श्वामरोग अन्य लक्षण सुश्रुत से 981 आरोग्यदर्पण-पञ्चमखण्ड ॥ -:-0:*:-:- मन्तव्य । मायुर्थेद यया यस्तु है, आयुर्वेदीय चिकित्सा हम लेागो के लिये अत्यन्त उपयोगी है, हाकृरी दवाइयां हमारे प्रकृति के अनुकूल नहीं हैं और न कभी ना मम्भय है इत्यादि पातोंकी आलोचना आरोग्यदर्पण प्रथम तथा द्वितीय आदि खयहों में भलीभांति कर चुके हैं इस पांचयें खगह के आरोग्य दर्पण में सिर्फ इस कदर कहना जरूरी समझते हैं कि जय तक जायुर्वेदीय चिकित्सा का प्रचार भारत में न फैलाया जायगा, राजा महाराजा आयुर्वेदफे उद्धार की जोर दृष्टि नहींदेंगे भारत का करमाण होना अति दुष्कर है और यह जो अंगरेजी दया के प्रभाव से हमारे देशी राजा महाराजा सेठ साहूकार अमीर महाजन थोडीही अवस्था में यम लेोक की यात्रा करते जाते हैं यन्द नहीं होगा।' यह तो हमारे भारत का एक लहका मी कह सकता है कि चिकित्सा शास्त्र के प्राचार्य अस्वनी कुमारादि अनेक महर्षि हुये हैं कि जिनकी रचित चिकित्साशास्त्रद्वारा भारतको मन्तान हजारों पुस्तहापुस्तमे गारोग्य और दीर्घायु होती आई है और हो मक्ती है, कहते हुये रोमांध हो तेहैं वेही पुस्तकें और उन्हींदधाइयोंका प्रभाव कुछपहिले इस भारतवर्ग कैमा प्रदीप्तमान था छिपा नहीं है आज वही चिकित्सा शास्त्र किम दशा को और दुर्गति को प्राप्त है मभ्यों में यह भी छिपा नहीं है । वैद्यक की ऐमी दुर्गति क्यों है ? इस और राजाओं की दृष्टिग"प- हने से, अंगरेजी राज और अंगरेजी शिक्षा प्रघार होने पर भी जम तक वैद्य और वैद्यक पर राजाभों की प्रीति थी, हरएक राजधानी में दो चार वैद्य और एक दो छोटा मोटा चिकित्सालय पा कुछ २ सप्राण पा, आरोग्यदर्पगा। जब से राजा महाराजाओं ने चैद्यों को तिलांजुली. ही दे दिया, देशी दवा खाने से फसग खा गये डाक्टरों की मान मादा बढ़ चली, दोनों समय चाप सोडावाटर एक्तावन मापपीन की रंगीली रंग में रंगीन हो गये, दुधपिये बच्चे तक कुईनाईन सिनकोना की घूटी पीने लगे जो कुछ रहा सहा तय से और भी रमातल को धम गया । रहे हमारे प्रभु घर अंगरेज महाराज याह पपों ध्यान देने लगे, थोड़े दिन हुये यह मा. न्दोलन हुभा था कि देशी वैद्य एक नियम के द्वारा देशी लेागों की चिकित्सा करने से रोक दिये जायें अर्थात् जब तक यह सार्टिफिकेट नहीं प्राप्त फरले तय तफ चियित्सा न करने पायें, यद्यपि उसमें भी अ- नेक सन्देह उत्पन्न हुये थे कि कौन परीक्षा लेगा, किम प्रकार परीक्षा ली जायगी, जो लेाग उत्तीर्ण नहीं होंगे उनको पुनः पढ़ाने के लिये कोई कालिज खुलैगा या जम्म के लिये निकम्मे कर दिये जायगे तथापि याह माशाबंध चलीथी कि इमफा कुछ परिशोधन अवश्यहोगा परन्तु "खप्न. लब्धं यथाधन" के समान सय जान्दोलन गिट गया यदि कुछ फाल प. य॑न्त इभ वैद्य विद्या पर और भी ध्यान न दिया जायगा तो आयुर्वेद का भारत से समूल नष्ट हो जाना कोई मन्देह जनक बात नहीं है, सो धार्मिक देश हितैपी सत्पुरुषों को चाहिये कि इम भोर भी फुल २ ध्यान दें और उसका सहज उपाय यह है कि आयुर्वेद के जानने वाले मत् वैद्यों को सहायता देकर उनकी औषधियों के मेवन से शारोग्यता लाभ कर उनको उत्साहित करें और अपने मध शिक्षित सन्तानों को जो इग भोर से उलट रहे हैं ध्यान दिलाना चाहिये। क्रमश:- पाराग्यदर्पगा। विज्ञप्ति। पाठकगण को स्मरण होगा कि हमने चतुर्थखण्ड के प्रारम्भही में उपर रोग का प्राग्रूप निदान और चिकित्सा देश कालानुसार अनेक यो में जैमा परीक्षा मे मिद्ध देखा गया सबभाधारण गणों के उपकारार्थ प्रकाश किया और उसका अङ्ग जो कुछ बाकी रह गया है इस पञ्चगसण्ड में उसे तथा अन्य २ विषप भी क्रमशः प्रत्येक गास के आदि में प्रिय पाठकगणों की सेवा में अर्पण करते रहेंगे। हम निस्सन्देहकइसक्ते हैं यदि सम्य लोग नमे पढ़ पूर्यापर विचार करके द्रव्योपार्जनार्थ अथवा धर्मार्थ लोगों की चिकित्सा करेंगे तो अपश्य देश का मंगल एवं वैद्यत का पुनरुज्जीयन होना कोई कठिन याप्त नहीं है । किसी को कुछ दया बतादेगा या चूर्ण यटी यनी मनाई दे देना लोग साधारण यात समझते होंगे लेकिन यह ऐसे जिम्मेदारी का काम है जो लौकिक पारलौकिक दानों से सम्बन्ध रखता है याने दया देने याले के हाथ में रोगी अपना प्राण अर्पण फरता है तो कहिये बिना जाने बूने अटकर परचू दवा देने से रोगी की शारी- रक दशा कुछ भी बिगड़ गई तो चिकित्सक इस यातके ज़िम्मेदार हुगा कि नहीं जो मूर्ख वैद्यों के लिये संसार में राजकीय दगड, लोक निन्दा जादि और पारलौकिक बिगति । सेा हे मित्र यो चिकित्साकर्म बहुनकठिन और ज़िम्मेदारीका कामहै । इसी समय मूर्ख वैद्यों के लिये हमारे सुश्रुत महाराज ने बधकरजा लिखा है। . - यस्तुकर्मनिष्णाता धााछास्वयहिष्कृतः । ससत्सु पूजांनाप्नोति वधमर्हतिराजतः ॥ जो वैद्य कर्म में तो निपुण है अर्थात् काढ़ा चूर्ण अवलेह आदि उ. मदा घनालेता है या रोगीको ठोफसमयपर दया खिष्ठापिला सत्ता है किन्तु शास्त्र को नहीं जानता केवल ढिठाई से काम करता है यह विद्वानों में भागग्यदर्पगा। मान प्रतिष्ठा नहीं पायता किन्तु गजा करके यध करवे योग्य है अर्थात् ऐसे वैद्य को राजा भरवाय डाले ।। सात्पर्य यह है कि यहुतमे लेग ऐमे किस्म के भी हैं जो वैद्यघिद्या को नहीं जानते इधर उधर किसी से दे। चार प्रकार की दया मीख कर दवाकरने लगते हैं जहां विधारेरोगीमे कहा कि तुम्हैं हम तीनदिन चना फार देयेंगे "गरजमन्दा बावला होता है" ट विस्वाग कर देते हैं यह नहीं सोचते कि मूर्ख वैद्य के हाप का औषध नहीं खाना चाहिये अन्त में धन प्राण दोनों से हाथ धो बैठते हैं । इसी लिये मूर्ख वैद्यों के लिये यष की आज्ञा राजा को ऋषियों ने दिया है। भेषजंकेवलं कत्तुं योजानाति नचामयं । वैद्य कर्मसचेत्कु- र्यावधमहति राजतः ॥ जो वैद्य सिर्फ दया देना जागता है किन्तु यह नहीं मान सत्ता कि रोगी के भीतर कौन सी बिमारी है और वह किम धातु के साथ अपना पूरा सम्बन्ध किये है, देश कालानुमार कौन दवा से आरोग्य है। सक्ता है ऐसा न जानने वाला वैद्य यदि चिकित्सा करे तो उमे राजा अवश्य फांसी देदेये । से इस विषय में गवर्नमेंट का ध्यान न पहने मे माज कल जिसे देखिये चिकित्सरु का काम करने लगे इससे हजारों म. नुष्य बिना गीत के मर जाते हैं । इस यद्यपि बिना शास्त्र के जाने चिकित्सा करना महा दुष्कर पाप प्राप्त होना लिखा है किन्तु लोग लोभयस पापको कुछभीनहींमगाते और ब्रह्म इत्यादि अनेक पाप किया करते हैं लेकिन जय राजा की ओर से दड मिलता है तय कुछ मानते हैं पोंकि घी में सुमर गौ आदि की चर्बी मिलाने वाले हमारे हिन्दू भाई माएयारी ही लोग हैं, जुर्माना पर जु. यांना देते जाते हैं परन्तु चर्चा मिलाने से पाज़ नहीं पाते मुख्य कारण आरोग्यदर्पगा। ॥ यह है कि कमूर के माफिक दंड नहीं मिलता, हमारे हिन्दू शास्त्र में लिखा है कि जो कोई किमीका नियम धर्म बिगाड़े राजा उमफे शरीर में छेद कराके मब रुधिर निकलवाय लेय, येसाही दंड न अधर्मियों को दिया जाय तो स्वप्न में भी यह काम न करें। प्राचीन काल में यहां (आर्यावर्त में) पाप बहुत कम पा ऐसा पुराणों में लिखा है उसका स- अब यही मालूम होता है कि पाप करने वाले को एक तो यथार्थ दंड मिलता था दूसरे विद्या सृद्धि के प्रभाव से लोग पाप करने से डरते थे जैसा कि धर्मशास्त्र में लिखा है ॥ प्रायश्चितं चिकित्सांच ज्ये। तिष धर्मनिर्णयम् । बिगाशा- स्वेगायायातमाहुब्रह्मघातम् प्रायश्चित अर्थात् पापी पुरुषके लियेचान्द्रायणादि प्रायश्चित्त बतलामा (चिकित्सा) रोगी को आराम करने को दवा खिशामा (ज्योतिप) ग्रहा. दिकां का फल तथा चौरादि प्रण यतलाना (धर्मनिर्णय) ब्रतादिकों का अतलाना एवं दाय भागादि का विभाग कराना इनको जो बिना शास्त्र के जाने कहता है उसके। बड़े २ मुनीश्वरों ने ब्रह्म घातक कहा है ॥ अथ जीर्णज्वर चिकित्सा । जीर्ण ज्वर का आदि कारण, निदान और कुछ चिकित्सा धतुर्थ खंड में लिख चुके हैं इम स्थल में पूर्ण रूप से चिकित्सा लिखते हैं । गण को याद होगा कि जो ज्वा २१ दिन ध्यतीत होने पर शरीर में सूक्ष्म रूप हो कर बना रहै और सपतिल्ली मन्दामि भादि उपद्रव को उत्पन्न करै उसे जीर्णज्वर अर्थात् पुराना ज्यर कहते हैं इस बुखार वाले को उपवास, यमग, जुलाप और गरम दवा का उपचार कदापि न करै क्योंकि पुराने उधर में 'नुष्य का रक्त मांसादि सब क्षीण हो जाते हैं और लंघन आदि कराने से और भी क्षीण हो रोगी के मर जाने का पाठक पारोग्यदर्पगा। डर रहता है। यदि ऐमाही वातादि कोई उपद्ध बढ़ा देरे तो उमफे दमन के लिये सिर्फ एकदे। लंघन चाहे भलेही करा दे। इसमें यचम है । जीर्णज्वरीनर:कुय्या नापवासंकदाचन । ज्वरक्षीगास्यन- हित वमननविरेचनं ॥ कामंतुपायसंतस्य निरु हैवाहरेन्म- लान्। पुराने बुखार वाले को उपवास, बमन और विरेचन नाहीं कराना बल्कि उसको इच्छा पूर्वक गौ का दूध पिलाना और दस्त न होता हो तो निरूह वस्ति पाने पिचकारी के जरिये से सञ्चित मल को निकाल देना चाहिये। पुराणज्वरे पथ्यम् ॥ मूंग अपधा अरहर की दाल, पुराने चांवल का भात, गेहूं या जवे को रोटी, गाय यफरी का दूध घृत मातदिल और हलको तरकारी, धनिया, मफेद जीरा, कालीमिर्च, बदीलायची आदि भभाला, यदि खांमी न हो तो आलूघुसारा, जरेकम पा शोधला कैथे की चटनी जीरा मिर्च पुदीना सेन्धानान मिताके देय और ग्यांमी आती है। ते। खदाई फोई भी नहीं देनी चाहिये । शीतल दवाइयों का उपचार, शरीर में उपटन.आदि तथा गोपधियोंका यनायाआतेलको शरीरमें लगाके नाम करना, सफेद चन्दन, कपूर, केशर गुलाबजल में घिस कर अंग में खेप क- रगा, पुष्पों का माला पहिरना, गंगाजम्न या पहाडी करणों का जल या भागृद जल अपचा परिश्रुत गल ( फिल्टरवाटर ) का पीना शाम सवेरे शुद्ध यायु का मेधन, चन्द्र की चांदनी प्रियाका आसिन मय पुराने घर घालों को हित है।

आरोग्यदर्पगा। जीर्णज्वरपर स्वर्णमालिनीबसन्त ।। स्वर्ण मुक्तादरदमरिच भागबद्ध्यागृहीतं वर्पप्यष्टौप्रथम मखिलं मईयेन्मृक्षणेन । यावत्नेहाब्रजतिविलयं मईनेदी- यतेसौ गुनादमधुमगधया मालिनीप्राग्वसन्तः । शुद्ध मेाने का धर्क (तपक) १ मामा, मनवेधी छोटी माती दे। गासा, मामूदा यादी शुद्ध सिमरख तीन गासा, काली मिर्च बिलका सहित चार मासा, शुद्ध खपरिया, इसको रसफ * और सङ्गमिनी भी कहते हैं पाठ मासा, सषों को कुचल सूप महीन पीस एक तोला मक्खन और सय दया केो खरल में हाल एक प्रहर तक घोट याद उसके कागदी नीबू के रस हाल कर घोटे जय तक मक्खन को चिकनाई दया से बिल. फुल न निकल जाय, याद उसके तीन २ मासे की टिकिया बनाय के सुखाय लेय । इमका मात्रा एक रत्ती से ४ रत्ती पर्यन्त हैं। इस स्वर्ण मालती असन्त को दोनों समय एक मामा गुर्च का मत्त २ छोदी डा., यची और एक रत्ती छोटी पीपर मिलाय के सहत के संग चाटने से जीर्ण उधर का नाश होता है किन्तु खाने को कुछ दूध और रात में मलाई मिश्री मिला के अवश्य देवे ॥ * रस दो प्रकार का होता है । दर्दुर यह मेटा दलदार, दूसरा का- रवेल्लक नामक रसक पतला होता है। जो खपरिया रंग में पोलो पत्रवान है सी उत्तम है। खपरिया शुद्ध करने की वैद्यक में अनेक विधि लिखी है, जिसे रस प्रकरण में लिखेंगे। खपरिया क्या वस्तु है इसको उत्पत्ति स्थान काहां है कैसे होती है अब तक किसी ग्रंथ में दृष्टि गीचर नहीं हुआ। लोग कहते हैं टकसाल घर में निस्में सोना चांदी गलाया जाता है उसी घरिया को खपरिया कहते हैं। नागार्जुन आचार्ज कहते हैं कि काला पोला लाल खपरिया विसरी २ पृथ्वी में दीख पड़ता है।

आरोग्यदर्पण। वसन्तमालिनी। रस कयुगलभागं वलिजंभागमेकं हित्यमपिमुखल्वे मई- येन्मृक्षणेन । भवतितृतविमुक्ती निवुनीरेण यावज्जरहर म- धुकुल्यामालिनी प्रग्वसन्ता ॥ जीर्णज्वरेधातु गतेऽतिसारे रक्तान्विते रक्तनवेष्ट रोगम् । चारव्यथेपित्तकृतच दाहवल- प्रदेो दुग्धयुतंचपथ्य ॥ प्रदरंनाशयत्यासो तथाटुर्नाम सी- निता । विषमनेवरीगंव गजेन्द्रमिवकेशरौ ॥ साधी खपरिया १० तोला, काली मिर्च ५ तोला देानों को मदीन पीम ५ तोला मवखन डाल के एक प्रहर घोटें याद नींबू के अर्क में घोट जब तक मक्सग की चिकनाई दूर न हो, अंगर एक दो दिन के घोटने मे चिकनाई अच्छी तरह न निकले तो टिकरी बना के सुखाय लेप और फिर नींबू के रस में पोटें इसी प्रकार तीन चार मरतचे घो- टने से बिलकुल चिकनाई निकल जाती है। तीन २ मामे की टिकिया बना के मुखा लेप यह बसंत मालिनी काले रंग का होगा ॥ दूमरी रीति-भगर सपरिया अच्छा न मिले तो उसकी जगह शुद्ध जस्ते का भस्म लेये, किन्तु यह भस्म किसी गोषध के द्वारा न हुआ हो पूक्ति प्रकार उसे भी घोंट कर तैय्यार कर लेप यह यमन्त गालिनी मफेद रंग की होगी, एमकी तामीर शीतल, है, मात्रा एक रत्तो से चार रतो पर्यन्त इमको गुर्घ का सत्त छोटी लायची और महत के सा चाटने मे गरमी मे उत्पन्न जीर्णमा, फैमाहू पुराना हे। आराम होता दे। कुरैया के लाल के काढ़ा अषया गयलेह के माप घाटगे से रक्ता. तिमार, रक्त पित मे अपघा पीनस रोग से नाक के भीतर की प.

प्रारोग्यदर्पण। . पड़ी जमती हो तो यह यमंतगालिमी सहत के साथ या गायले फे रबा के माथ ग्वामे से निहायत फायदा होता है। इसको महत के साथ चाट फर ऊपर से गौ के करचे दूध में मिश्री मिला के पीने से रक्त धि- फार से या पित्त से अथवा धातुक्षय से उत्पन्न अन्तसकरगा का दाह शांत होता है । दे। रत्ती यसन्तमालिनी और एक गामा रमषत दोनों को सहत में मिला के खाने से खूनी यावासीर से लोहू का भागा, गुदा फी जान बादि उपद्रय दूर होता है। इसको चिकने पाथर पर पानी से गहीन घोंट अांखों में अनुन देने में धुन्ध, जाणा, नाखूना, आंखों से पानी का यहना बन्द होता है और नेत्र की ज्योति बढ़ती है । जीर्ण ज्वर की गरमी से रोगी की शरीर रूखी हो जाती है उसका फारया यायु का केोप है ऐमी अयस्या में जय तक घायु शमन नहीं कि- या जाता बिमारी नहीं छुटती इसलिये यायुशांति हेने केयास्ते घृत दुग्ध पाप करावै क्योंकि जैसे जलते हुये घर में जल डालने से अग्नि की शां. ति होती है वैसाही रूखे शरीर में घृन दुग्ध के डालने से घायु की शांति होती है इसमें बचन भी हैं-"लवणेन कहन्ति पित्तहन्ति ससर्फरा । घृतेनपासमानरेगा सबंरोगानगुडान्यिता" मगफ से कफ का नाश, मीठी चीजों से पित्त का नाश, घायु में उत्पन्न जितने रोग हैं घृत पाग से शांति होते हैं और प्राचीन गुड़ मिश्रित भौषधियों के द्वारा प्रायः सर्व रोगों का नाश होता है । यह सिद्ध हुशा कि पुराने धुखार (जीर्ण जबर ) में घृत पान कराना श्रेष्ट है किन्तु फिस विधि से पिलामा से कहते हैं। अगर बिमार बहुत दुर्वल यल होन है। गया हे, खाना न पचता हो या दस्त पतले आते हो तो आधा तोल घृत से प्रारम्भ कराये, मेरे घृत आधा तोला, सहत ३ गासा, मिश्री ३ मामा तीनों को एक में मि. ला के पहले ४ । ५ दाना गोल मिर्च मुख कुचल कर ऊपर से घृत पोजावे और उस समय पानी न पीये । अषया आधा तोला मक्खन . में आरोग्यदर्पगा। परायर की.मिश्री मिला के राज मयेरे विसावे और जम २ पचता जाग मात्रा बढ़ाता जाये 1 जागर रोगी का मल मूब गया हे ते माधपाव गरम पानी में आधा तोला घृत और मामा मंधानोन हाल के पिलावे। ३ वासादि घृत ॥ वासांगुडूचौचिफलां बाबमाणांदुरानभा । पक्षातनक- पायेगा पयसादिगुडे नच ॥ पिप्यले मुम्बम्होका चन्दनात्यन्त नागरैः । कल्कोकृतश्च विपचैत् घृतंनी ज्वरापह ॥ जिम जीर्णज्यर याले को खांसी सहित ज्वर यना रहता हो और शरीर मूखी जाती है तो यामादि घृत पिलावै । पनाने की विधि- समा की पत्ती, गुरिष, त्रिफला, पिधारा और जनामा इन पापों घीजों फेो एक २ उँटाफले अधकचरा कर एक मृत्तिका पात्र में चार सेर पानी में रात को भिजा देय संवेरे पकाये ाय चौपाई पानी रह जाय शीतल फंर गाल के छान लेय । गौ अथया पफरी का दूध २ सेर। छोटी पीपर, नागरमोथा, मुनक्कायोगरहित, लाल चन्दन, कमलगट्टे की गरीबीच में हरी पत्ती रहती है उसे निकाल डाले और वैतराशेांठ सयों को एक २ ताला ले शिष पर पानी पाठ के सूघ महीन पीस लुगदी बनाय ठेप, गौ अधया बकरी का घृत १ गेर रांगे की कलई की हुई कढ़ाई का चूराहे पर पढ़ाय घृत लुगदी दूध और काढ़ा को छोड़ धीमी जांच में पकाचे जय दूध फाढ़ा यगैरह मप गल जाय घृत मात्र रह जाय चूल्हे पर से उतार शीतल फर कार के पामृतयान में रख दे इसका गाना उ मासा में दो ताला तफ है । मधेरे रोगी पिलावे ऊपर से पानी पीने को देय गलेसे चिकनाई दूर करने के लिये संघानान जरा मा शिलावे या एक दे पान का बीड़ा खावे १५-२० मिनट के बाद पानी पीने में दर्ज नहीं हे भगर रोगी को दे।नां माप पूर्गा मात्रा पुत निर्विघ्न पप जाय तो - पारोग्यदर्पण। और अधिक घृत भी पी सक्ता है यह बासादि घृत जीर्ण ज्यर के गि- स्सन्देह नाश करता है। अगर घृत पान से खांसी कुछ पढ़ जाय तो घृत पिलाना बन्द नहीं करना चाहिये खांसी शमन होने का भी उपाय करता जाय घृत पचन हेाने उगने पर खांसी स्वय शान्ति हो जायगी ॥ पिप्पल्यादिवृत॥ यह घृत भी जीणंउघर को नाश करता है ऐसा कईयार अनुभव किया गया है। यदि उपरोक्त घृत पान करने से रोग में कुछ शमन न देख पड़े तो उसके बाद पिप्यल्यादि घृत अवश्य पिष्ठावे रामआसरे पर बैठा न रहै । छोटी पीपर, लाल चन्दग, मागरमोथा, सुगन्धवाला, कुटकी, इन्द्र जीय, आंवला, सरियन, अतीस, मुनक्का, गटकटैया का पञ्चाङ्ग इन समोफेो तीन २ तोला ले सयों को अधकचरा कर पूर्वोक्त प्रकार पांच सेर जल में भिजावे दूसरे दिन फाढ़ा बमाय गौ या यकरीका घृत एक सेर, दूध 5२॥ सत्रों को कढ़ाई में चढ़ाप मन्दाग्नि में पचा लेवे इस घृत का भी गाना यही है जो यासादि घृत का है । उपरोक्त दोनों घृतों की रोगी रोटी दाल के साथ भी खा सक्ता है यदि अच्छा लगे तो ॥ क्षीरघृत प्लीहाधिकारे ॥ अगर जीर्णज्यरी को सांसी ज्वर के अलाया प्लीहा भी हो जिसे फ. छुई, तिल्ली और घरपट भी कहते हैं इस घृत को अवश्य पिलावे ॥ पिप्पलौपिप्पलीमूल चव्यचित्रकानागरैः। ससैन्धवैचपलिक घृतास्थविपाचयेत् ॥ चीरञ्चतुर्गुणंदत्वारासिहंलोचनाशनम्। विपमञ्चरमन्दाग्निहरुचिकरंपरम् ।। ॥ छोटो पीपर, पिपरामूल, पाय, चीता, वैतरा सोंट और सेन्यानोन १२. पागेग्यदर्पगा। इन पांचों भोपों को एक २ उँटाफ ले पूर्वोत्ता प्रकार काथ बनाय एक सेर गौ के वृत में चार मेर गौ या यकरी के दूध के सहित मन्दाग्नि में पघाय घृत सिद्ध फरलेय इसका भी माला छ मामा से दो तोला तक है। या पृव प्लीहा रोग, जीर्णउघर विषमज्वर और मन्दामि को नाश. फर रुचि को बढ़ाता है॥ जीर्णज्वरे दुग्धयोगः॥ चौधेकफचरेजीअल्पदापापिपासते। दाहार्तेतुपयायो- ज्यंतेनैवतुविषम्भवेत् ॥ चौथे खण्ड के ज्वर चिकित्सा में यद्यपि ज्वर में दूध खाने की विधि निषेध लिख पाये हैं प्रसंगवस इस स्थल में भी दुग्ध योग पुनः लिखते हैं ।। निसे प्रमेह या प्रदर रोग होके ज्वर राग हुआ हो और वह ज्वर पुरागा हो गया हो, प्रथवा जिस पुराने ज्वर गे कफ सूख गया है। अथवा अल्प दोष होने के कारण पियाम भोरदाह अधिक बढ़ा होता उम रोगीका अवश्य दूध पिलावे चाहे धाराण दूध पिलावै या निम्नलिखित क्षोर पाका वनाके पिला फायदा निरन्दे ह कारेगा । पञ्चमूली क्षीरपाक ॥ सर्वज्वराणांनीणोनोचीरमीपश्यमुत्तमं । श्वासात्कासाछि रःशूलात्पाश्र्वशूलात्सपीनसात् ।। मुच्यतेज्वरित:पीत्वापञ्जमू- लौशृतं पयः। जो मोर्णज्वरवाला रोगी अत्यन्त दुर्वल हो गयाही कि निमे अत्यन्त दाइ रहने पर मो बलगम बढ़ने अथवा पसरी में दर्द होने का डर होता पंचमू- पारे।ग्यदर्पगा। लो चोर पिलाये। पंचमूलौ अर्थात् पांच वृक्ष की जड़ वह यह है सालपर्यो ('मरिवन ) पृष्टपर्णी (पिथिवन ) दोनों कटरी (छोटो भटबाटैया, बड़ी भटकटैया ) और बड़ा गोंषुरू इन पांचों वृक्षों की जड़ पांच तोला ले अध- कचरा कर एक मृत्तिका पात्र में प्राधसेर दूध और दो सेर पानी डाल के धौमौ अांच में पकावे जब पानौ जलजाय दूध अकेला रह जाय अग्नि पर से उतार भोतल कर छान लेय और उगो दूध को थोड़ा २ कर दिन भर रोगी को पिलावै, अगर फीका दूध पीने में रोगो अरुचि प्रगट बार तो थोडीसो मित्रो दूध में मिलादेय । किन्तु प्रथम उपरोक्त विधि से सिर्फ प्राधपाव दूध तैयार करके पिलावे फिर जस २ पचता जाय क्रमशः बढ़ाताजावै। इस दूधके पिलाने से स्वास, खांसी, घिरदर्द, पसरी का दर्द, जुकाम और पुराने ज्वर को फायदा होता है। -:-:*:0-:- शितादिक्षीर ॥ सिताज्यविश्वखनू रोमृद्दीवाभिःशृतं पयः । पृथ्वौचविल्व- वर्षाभूपयश्चोदकमेवच ॥ क्षौरावशिष्टतत्यौततदिसर्वज्वरापहं। मोठ, छहारा और मुनक्का बौन रहित तोनों चीजों को पूर्वोक्त प्रकार तौलमें ले उस्में दूधका पानोसहित तैय्यारकर थोड़ोमियो और सहत डाल के पिलाव, इस के पोने से ज्वर का नाथ, कोष्ठ परिश्कार और भेदे में ताकत मातो है। अगर मल पतला अथवा आम का पाछ उपद्रव हो तो यह दूध पिलावै । वेल यी गरी २ वाला, मोठ ६ मासा दोनों को एक पाव गौ के दूध में एक सेर पानी डाल के पकाचे शव दूध अकेला रहगावे तो थोड़ा २ कर के कई वार रोगी को पिलावै ॥

चागिग्यदनगा। वर्धमानपिप्पली ॥ विवध्या पञ्चध्यावासप्तबध्यायवाकगाः । गव्यक्षोरेगसं- पिष्टः पिवद्दशदिनानिह ॥ एवविंशहिनर्सिद्धं पिप्पलीवर्धमाः नकम् । अनेनपांडवातासकासखासरुचिच्चराः ॥ उदरार्थः क्षयश्लेष्मवातानण्यन्त्युराग्रहाः ॥ यद्यपि यह वर्धमान पौपाल का योग विशेष कर पाण्डुरोग परहै किन्तु अनेक वार देखा गया है कि श्लेस युक्त जो ज्वर को भी नष्ट करता है। शुद्ध छोटो पीपल को एक र तीन २ अथवा पांच २ कर के जैसो ताकत हो अर्थात् जहां तक पच सके गरमो, दाह, जलन, पियास की अधिकता उत्पन्न न कर, सेवन करे और उसके सेवन करने की दी विधि है, प्रथम यह कि पोपल को गो के दूध में पौस लुगदी वनाय मुख में रख दूध से उतार जावे अथवा पीपल का टुयाड़े २ वार पाव आधपाव दूध में चौगुना पानो दे के पका जव पानो जल जाय दूध मात्र रह जाय, पीपल निकाल के फेक देय और दूध पीजावे और कितने वैद्य प्रोपेल भी खिला देते हैं यद्यपि उसका खिला दैना कोई हानिकर नहीं है किन्तु वह पीपल सत्त रहित है। पूर्वीत प्रकार पोपर चाहे जिम रीति से खावे दश दिन तक वरावर बढ़ाता नावे । जैसे एक पीपल से प्रारम्भ करे तो दूसरे दिन दो तोसरे दिन तोग, इसी प्रकार अगर तीन पीपल मे प्रारंभ करे दूसरे दिन छ तोसरेदिन नो ऐसाही दस दिन तक वरावर बढ़ाता जावे पौर दम दिन के बाद प्रमशः वसाहौ घटाना प्रारंभ करें इस प्रकार वोग दिन पर्यन्त निरन्तर पोपल सेवन से जीर्ण ज्वर पांड- रोग, खांसी, खास, मन्दा. र कफ का नाम होता है। । .

आरोग्यदर्पगा। जीर्णज्वरे दुग्धफनम् ॥ गोटुग्धप्रभवं किम्वाछागौटुग्धमथापिवा । भवेत्फणं विदे। पघ्नंगचनंबलवर्धनम् ॥ वन्हिहिकरंपध्यं सद्यप्तिकरंलघु । अतिसारीग्निमांद्येचचरनोर्गाप्रशस्यते ॥ इस बात को हम कह चुके हैं कि जो ज्वरो रुच रागी कति अथ- वा दूध पिला के उसको रुक्षता दूर करना नितान्त आवश्यकता है और दूसो लिये कई क्रियायें घृत दूध को भी लिख दी गई हैं अब इस बात को दिखला- ना है कि अधिक दिन शरीर में बिमारी के रहने से मेदा ऐमा पामजार है। जाता है कि घो दूध को कौन कहे रोटी दाल का पचना मुस्किल पड़ जाता है, दूसरे भाज कल के हमारे सहयोगी वैद्यगण जीर्ण ज्वरी को सिर्फ रुखी अरहर की दाल और रोटी खिला के राग भराम करने के पलटेरागी के प्रांत रक्त मेदादि को इतगा सखा डालते हैं कि हजम होगा तो दूर है दो ताला भी अन्न पेट में जाने से दस्त हो जाता है तो ऐसो अवस्था में रुक्षता निवार्थ सिवाय दुग्ध फन सेवन काराने अन्य उपाय नहीं। जब देख कि रोगी निहायत निंबल और वमजोर हो गया है और अग्नि निहायत इदर्जे की दुर्बल है, तो टुगध फैन पिलाना प्रारंभ कर नब दूध का फेन पचने लगे तव तोर पाक अथवा पत पिलावे ॥ टुग्यफेम बनानेकी यिधि यह है कि जैसे भांग छागगेषाले भांगको दे। लोटोंमें यारम्यार मिलाते हैं नमीप्रकार तातकालिकदुहागो गया करी के दूध को दो लोटों में ले बारम्यार एकसे मरेगे ऊपरकी धार से नहेले नममें जो फेग उत्पन्न हो तमे किमी यतंग में निकालता जाये नम फोन भाना यन्द होगाय दुध ठग करदेय, दूधकाफेम दूध के मपने से भी मि आरोग्यदपगा। फल सत्ता है किन्तु मथानी के गथने ने फेग फे माग गरन ( घृत) आ जाता है. इमलिये मथन की पपेक्षा दुध फे। फेंट के फेन लेगा उत्तम है। यम नमी फेग में जरामा मिश्री डालके रोगी को पिलाये हमी प्र- कार दे।नों ममय पिलावे याह दुग्ध का फेन त्रिदीप नाशक, पिकारी, याब? +, जठराग्निपढे और एक प्रकार का पथ्य है तथा शीघ्रही तृप्ति का एयं हलका है । इम दूध के फेग को अग्निगन्द, अतीमार और जीर्णजयर में अवश्य पिलाना चाहिये । लाक्षादि तैल। लाक्षाढकंक्वाथयित्वा जलस्यचतुरादयोः । चतुर्थी शशत नीत्वा तेल प्रस्थं विनिक्षिपेत् ॥ मस्त्वाढकंचगादन स्तचैववि- नियोजयेत्। शतपुष्पामश्वगन्धां हरिट्रदेिवदारुच ॥ कटुकौं रेणुकांमूवी कुष्टंचमधुष्टिकाम् । चन्दनभुस्तकंगनां पृथ. क्वर्षपमाणत: ॥ चूीयेत्तत्रनिक्षिप्य साधयेम्मृटुवङ्गिना । अ- स्थाभ्यंगात्पुशाम्यन्ति सर्वेऽपिविषमज्वराः ॥ कासश्वासप्रति- 'ण्यायत्रिकपृष्टग्रहास्तथा । वातपित्तमपस्मार मुन्मादयक्ष. राक्षदान् ॥ कडूंशूलं चदौगंध्यं गात्राणांस्फुररजयेत् । पुष्ट- गर्भाभवेदस्य गर्भिण्यभ्यंगतोभृशम् ॥ इस् लक्षादि तेल. का गुण पिपगउपर नाशक लिखा है और श्लोक में जीणंउबर का नाम नहीं है लेकिन यह तेल जीर्ण उपर को भी नष्ट करता है ऐमा अनेकधार परीक्षाफर के देखा गया है । अनेक ग्रन्थों में लाक्षादि तेल गनेफ विधि सहित लिखे हैं किन्तु नपरोक्त औषधों के सहित यह तेल ६ सघ नैडों से उत्तम और गुणकर है ।

आरोग्यदर्पण। १७ पीपर की लाही तीन सेर १६ तोला ले के १२ मेर तीनपाय ४ तोला पानी में एक दिन रात भिजा रक्ख अगर मट्टी के घड़े में भिजावे तो १ सेर पानी अधिक देवे दूसरे दिन गन्दामि से पचावे.चौपाई जठ. याकी रहै शीतल कर छान लेय, काली-तिल का तेल तीनपाय पार ताला फड़ाई में हाल उसी में लाही का पानी और गौ के दही का तार तीन सेर तीन ताठ हा के पचाये और निम्नलिखित औषयों की लुगदी यना फे उसी तेल में डाल दे । सौंफ, असगन्ध, हरदी, देवदारु, कुटकी, रेणुका योज, मुर्ग, कूट, मुलेठी, सफेदचन्दन, नागरमोथा और रासन इन सय दवाइयों को ले पानी में सूय महीन पीस लुगदी अनाय तेल में डाल के धीमी आंच से पधावे जय पानी विपकुछ जल जाय तेल गात्र रह जाय अग्गि पर से उतार शीतल कर कपड़े में छान बोतल में भर कर रख देय । इस तेल को राज सबेरे रोगी के समस्त शरीर में धीरे२ दो तीन घंटा तक मालिस फरै अगर रोगी सपल हो और स्नान क. रने की इच्छा प्रगट करै तो तैल उगाने के एक घंटे के बाद स्नान करा देवे, अगर रोगी कमजोर है। शरीर पर जल पड़ने से जाडा मालूम होता हो तो सान न कराके बदन पोछ लिपा करै । इस तेल के 8- गाने से जीर्णघर, पिपमउधर, सांसी, स्वास, जुकाम, फमर पीठ का लकहन, यात पित्त, मृगोरोग; उन्माद भूतबाधा, खजुरी पेट का दर्द शरीर की दुर्गंधता और मङ्गों का फरफना भादि नाश होता है इस सेल के मालिश करने से गर्भिणी फा गर्भ पुष्ट होता है। अगर निम्नलिसिन रूप से लाही का रस तैय्यार करके लाक्षादि तेल पनाये तो और भी अधिक गुण फर हो और सिद्धान्त ग्रंपों फा गत भी यही है॥ दशांशलाध्रमादाय सद्दशांशंचलिकां । किंचियरी पच वारिपाड़श वा मतं ॥ वखपुतीरसाग्रायः साक्षाया:पाद तापितः ॥

पञ्चमखुण्ड । डाक्षादि तेल या ज्वर रोग पर प्रण्डि तय है और प्रायः रामी वैद्य इसे बनाते हैं परन्तु लाही का रस हिम प्रकार निकाला जाता है पने पिरलाही लोग जानते हैं इसफाफारण यह है कि एक दो पुस्तक पढ़ा यस वैद्य पन गमे यह सय यात अनेक ग्रन्थों के लयलेफर से होता है। लास का रस निकालने की विधि यह है कि जितनी लाए हो उसका दशयां भाग घ लेवे और लोध फा दशषां भाग गज्जी जोर अन्दाजन थोड़ी सी और की पत्ती । पहले लाही को एक दे पानी से धो हालै ताकी लाही का गरदा मैल निकल जाय और लाही मे मोठा गुगा पानी डाल के एक रात दिन मिजारको दूसरे दिन वाघ यगए हाल चूल्हे पर चढ़ाय धीमी मांच से पचावै जय चौथाई जल रह जाय उतार फर फपड़े से छान लेप इस लाह के रस से छाक्षादि तेल 'यनाना उत्तम होगा। जिम जीर्ण उपर में दाह अधिक हो हाथ पैर के तलुवे यहुंत पालते हो, गर्मी से बेचैन हो तो गिनलिसित तेल को गालिस करे ।। पट् तक तैल। . सुवर्चिकानागरकुष्ठमूर्वा लाचानिशालाहितयष्टिकाभिः। सिइहरेषट्गुणतनपक्क तैलंज्वरंदाहसमन्वितंच ॥ मज्जीसार, शोंठ, फूट, मूर्या, लाहो, हरदी, सफेदचन्दन और जेठी मंधु इन सम दवाइयों को समान भाग फरफे एक सेर ले अधधरा फर से- वहसेर पानी में रात को भिजा दे सवेरे अग्नि पर पकावै जय चौपाई पानी रए जाय मठ के छान लेय और एक सेर काले तिल का तेछ, जौर तेष्ठः से छ गुगा गौ का माठा या गौ के दही का तोड़ (पानी) मयों को क. साई में चढ़ाप धीमी जांघ से पचाप लेय जय तेल सिद्ध हो जाय शान कर वोतल में भर फे रख देय, इसके मालिस करने से. दाह ज्वर .और:

भारोग्यदर्पगा। शीतज्वर अर्थात् जीर्णज्वरी केो चाहे जन मालूम होता हो अथवा जाड़ा मालूम होता है। देाने शांति होते हैं। दुष्ट जल जनित ज्वर चिकित्सा । . बहुत दिनों का रखा हुमा जल के पीने से, रास्ते में ताठाय, कुण्ठ, साता के जल के पीने से; जिस जाल में फूल पत्ती पड़े के सह गये हों या मेहक मादि कीड़े पड़े हो उस जल के पौने अथवा उसमें स्नान करने से, भारम्बार बहुत जल के पीने से, अधया कहीं से थका गाया हो श्रमको विगा शांति कियेही अधिक जल पी लेने से प्रायः लोगो को ज्वर हो माता है और जो लोग कोमल प्रकृति के हैं, जिनका साना पीना एक समय में अन्दाज से धन्धा हैं, हमेसा एकही कुमां का जिस्के पीने में जाताह उन्हें दूसरे देश में जानेरो जुकाम या ज्वररोग प्रायः हो जाता है इस लिये विदेश जानेवाले को चाहिये कि रास्ते में जल यहुत बिधार के पिये या निर्मली जादि चीजों से लाल को रोज शुद्ध पर लिया करे अयथा निम्नलिखित जौषध को खाता जाये तो जल का यिफार न हो। माहाद्रंक यवक्षारी पौत्वाचोणेनवारिणा । नानादेश समुद्रुतं वारिदोषमपोहति ॥ अदररा आपया शोठ चार मासा, जयासार चार माया, दोनो को एस में मिठाय दो मात्रा फरै एक मात्रा सयेरे और एक मात्रा सामको गरम जल के साथ पीता जाय तो विदेश गमन के रास्ते में चाहे जहां का जल पीता जाय पानी का दोष न होगा । भोगनादौनरैर्भुक्त शुंठीराज्यमयोचितं । कल्लातुभयतेनि- त्यं नानादेशोभ्दवंगलं ॥

२० पञ्चमखण्ड। 0 शीठ, राई और इस का बल तीनों को घरायर तीन चार मासा लेकर शिल पर पानी के साथ पीस के लुगदी बनाय लेय, याद लुगदी को में रख पानी से उतार जावै । इस लुगदी को जो मनुष्य हमेसा मोजन के पहले खाता है उसे किसी देश का जल विक्षार नहीं करेगा यह अगभूत है । अथवा रोज सयेरे थोड़ी सी नींय की पत्ती पीर के जल के साथ पीता जाये तो भी किसी देश के जात का विचार नहीं हो गा। अगर दुष्ट जाट के पीने से ज्वर आगया हो तो इस चूर्ण को संहत के साथ पाटने से निस्सन्देह ज्वर जाता रहता है ।। किरातादि चूर्ण । कदुधिरायाता,काठीनिशोध, नागरमोथा, यायुधिरंग; फूट और शोंठ यह सष एक २ तोला, छोटी पीपल छ मासा सब फेो फूट 'বন कर दो दो मासे की पुलिया यनाय ठेग दिन में तीन दफे याने चार २ घंटे पर पर्षात् सयेरे, दोपहर और साम को सहत के साथ चाटे तो दुए जलजनित ज्वर रोग पशुत जल्द माराम हो । ज्वरं खांसी की उपाय । सांसी यात कारणों से छेागो को जाने लगती है किन्तु ज्वर रोग में अधिक्ष शीतल जल पीने से शरीर में अधिर्फ शद ईया के लगने से, (खही चीजों के खाने से, अपया यकृत अर्थात् फलेजे पर शीप होने से खांसी जाने उगती है। क्षयकास का लक्षण जैसा मायुर्वेद में लिखा है यही सम्पूर्ण लक्षण जीण ज्वर में जप कलेजे में शोप है। के खांगी जाने लगती है मिलते है .फर्फ यह होता है कि जीर्ण ज्वर होने के बाद खांसी माने लगती है गौरक्षयकापणे पहले सांसी जानेलगती है पीले वर होता है। साधारण प्रवर से लेकर जीर्णउवर तक किसी ज्यर में सांसी हो तो पाराग्यदर्पया। प्रथम इस बात को अवश्य यिधार लेना चाहिये कि यह खामो सुरक है या तर और उसका पहिचान यही है कि सुष्क सांसी में बलगम मु. सकिलसे निकलता है, और पतष्ठा यलगम आता है । तर सांमी बिना परिश्रम खांसी आतेही यलगम अंठा फा अंठा फट मे बाहर निकल माता है और खांसी बन्द हो जाती है। अगर तर खांसी आती होतो इस दवा को घटावे ॥ कासेकणाकणामूलं कलिटुमफलरनः । सविश्वभेषनं- लियान्मधुनावावृषारसं ॥ छोटीपीपष्ठ, पिपलामूख, यहेराकालिका और वैतरामोंठ इन धारों धीजों को समान भाग ले महीन चूर्ण फर दो दो मासे की पुड़िया बनाय ठेय, एक पुड़िया में तीन मासा रूसे की पत्ती का रस और तीन मासा सहत मिली के चटा दे इसी प्रकार शाम सवेरे घटाये अगर रात फो सांसी की तकलीफ भधिक हो तो नौ दस बजे रात को भी उसी म कार एक पुड़िया घटा देय अगर रूसे का रस न मिले तो फेघठ सहतके साथ घटावे और निम्न लिखित गोठी को तैयार फर रोगी को घुमने देप अर्थात् गोली रोगी के मुख में पड़ी रहै । 'तरखांसी पर गोली ॥ तुल्यालवङ्गमरिचाक्षफलत्वचःस्युः सर्वैसमानिगदितःखदि रस्थसारः। वय्यूलहक्षनकषाययुतंचचूर्णं यासानिम्तिगुटिका घटिकाएकान्ते ॥ छींग, काली मिर्च, घरा का लिष्ठका तीनों को समान माग हैन और तीनों चीजों के परायर सूय साफ पपरिया त्या भांद दिन चौपाय फत्मा कहते हैं डेय समों को गही पूर्ण कर हट हो बाट पञ्चमखण्ड । एक रोगी के काढ़े में सूब घोट कर मटर बराबर गोली बना लेय जय सांसोआवे एक गोली मुख में डाल के चूसे इमी प्रकार दिन रात में १२ गोली तक चूस सक्ता है किन्तु इस बात पर अवश्य ध्यान रहे कि 'बलगम सूखने न पावे । उपरोक्त अवलेह तथा गोली अगर रोगी को ग रमी करै याने पेट में जलन मालूग हो, पियास बढ़े, गला सूखे तो अय लेह और गोली की मात्रा कम कर देय और इस' अवलेह को बना के दिन में कई यार घटावे ताकि यठगम गीला यगा रहे और निफलता जावे॥ कफाईकर अवलेह ॥ हंगराज १ तोला, मुलेठी १ तेठा, तुरंभखतमा मासा, डावाय ॥ तोला, और तूफा ६ गागा इन सब दवाइयों को अपक्षघरा कर साधसेर जलमें रातको मिजादे, सयेरे मन्दाशिमें पचावे जय आचापानी जायजाय शीतष्ठ कर मल के छानखेप और साधपाय मिश्री डालके अयठेव यनाय लेप दिन रात में रोगी को जरा २ सा फई पार पटावे। इस अवलेह के घटाने से का मूखने गहीं पाता । उपरोक्त यटी धूर्णादिकों के देने से सांसी में शान्ति न देख पड़े ता.इस चूर्ण को सहत के साथ दोनों समय घटावे । यद्यपि यह पूर्ण ग्रहणी ग पर मधान है किन्तु सांसी जोर वाम में भी इस चूर्णकी सेयगफराफे देखा गया कि पहुत फायदों करता है। जातीफलादि चूर्ण नातीफललवंगेला पत्रत्वङ्नागकोशरम् ।.कपूरचन्दन- पिल खाचोरौतगरामलैः ॥ तालोसपिप्पलीपच्या कृपानी- रकचिवकः । शुंठीविडङ्गमरिचान् समभागानिचूर्णयेत् :- प्रारोग्यदर्पण। २३ यावत्येतानिसर्वाणि कुर्याझंगांचतावतीम् । सर्वचूर्णसमादेया शर्कराचभिषग्वरैः॥कर्षमाचंतत:खादेन मधुनाला वितंसुधौः। अस्यप्रभावात्ग्रहगी कासस्वासारुचिक्षयाः ॥ वातश्लेमप्र- तिक्ष्यायाः प्रससयांतिवेगतः । जायफल, लौंग, छोटीलायची के दाने, तेजपात, दालचिनी, नाग. केशर, कपूर, ॐ सफेदचन्दन, फालीसिष्ठ, बंशोधन, तगर, सूखागांध- ला, तालीसपत्र, छोटीपीपल, यहेकायकल, कालाजीरा, चीते. फौछाल, मोठः ,यायभिरंग, और कालीमिर्च इन सम पौषधियों को समान भाग ले फूट फपष्टयन कर उसनाही अर्थात् सय पूर्ण के परामर धुली हुई भांगके पूर्णको मिलाय, सपों के परामर मिनी मिठाय देय इसीका माम जातीफलादि चूर्ण है इसका एक कर्ष + का गाना लिखा है और * कपूर के तीन भेद हैं जैसे चौनियाकपूर, पत्रकपूर आदि किन्तु. शुद्धि कपूर लिखने से भीमसेनी कपूर समझना, लेकिन कहीं मिलता तो है नहीं, बार में मामूली कपूर जो विवाता है उसी को खूब साफ निर्मल देख के लेलेय.. + बैद्यक शास्त्र में कर्म के पर्याय १३ नाम लिखे हैं और वित्पत्ति से वे सब सापक समझ पड़ते हैं। जेसे अक्ष नाम भो कर्ष के हैं और अक्ष बड़े- डा का काइरो हैं तो बहेड़ा के बराबर दवा के तोल कर्ष समझना इसोप्रकार ( पाणित ) गदारोभर (तेंदुक ) तेंदू के फल के वरावर (पोडपिका) नोन से कार्य का प्रमाय १६ मांग का माना गया है। आज काल देकर कर्ष का मावा-एगा तोला मानते हैं किन्तु पप्रमाणिक है ।

२४ पञ्चमखण्ड। १६ मासा का होता है (जो वैद्य मनभिज्ञ हैं, जितायी नुमखा से रोगियों को दया करते हैं उनसे रोग का आराम होगा दूररहा और बिमारी बढ़ जाती है और अन्त में ठोग बैद्य और वैद्यक को निन्दा क रते हैं । क्योंकि १६ मासा के मात्रा में ४ मासा भांग हुआ से जो कभी भांग नहीं खाते उनके लिये ४ मासा भांग बहुत अधिक है किन्तु जो एक एक मुद्दत से बिमार है जिस्का दिल दिमाग निहम्पत कमजोर हो रहा है ४ भासा उसके लिये किम फदर हानिकर होगा ? एक छोटीसी युद्धि रखने वाला भी कह सकता है कि मिस्सन्देह नुकसान करेगा) इस पूर्ण की मात्रा एक मासा से ३ मामा पर्यन्त है और जो लोग भांग साते है। उन्हें भी ६ मासा से अधिक मात्रा नहीं देनी चाहिये । इस चूर्ण को सहत के साथ, या सरमत गुठयनप्ता या सरबत उलाय के साप पाटने से ग्रह- णी, मतीसार, खांसी, स्वास, रुचि, फक्षई, यात कफ. की एति और जुहाग माराम होता है । बहेरा फा छिलका, अनार का छिलका, मुछे- ठी, सैर की डली मुख में रख कर चूसने से भी खांसी में फायदा होता है। दिन में कई बार गुदा में तेल लगाना भी खांसी को फापदा करता है। खुश्क खांसी की दवा। 'फसीरागोंद २ तोला, गौद ययूल १ तोला, मुलेठी का पूर्ण १ तोडा यंमलोचन.१ तोला मीठीलीकोकीयोजकीगरी पाठ सयों को महीन पूर्ण कर तीन २ मासे की पुष्टिया या लेय, दिन में तीन दफे वरायर को मित्री मिलाय जरासा पानी डाल के गीला कर दो गांसा संहत मिष्ठा के घटाये जोर निम्नलिखित यदी तैयार कर चूमने को देय ।

श्रारोग्यदर्पण। २५ पपरिया फत्या १ छंटाफ, खतमी के बीज २ तोला, गांद ययूट १ तोला, फतीरागोंद १ तोला, महेरा का छिलका १ ताठा मुलेठी २ तोला, कपूर ६ माता । इन सय दयाईयों को खूब महीन चूर्ण कर बिहीदांना के लुभाव में महीन घोट के मटर बराबर गोली बनाय ले, जय खांसी आवै एक गोली मुख में डाल के चूमे, एक दिन रात में एक रोगी ८ १० गोली तक चूस सक्ता है । गोली चूसने की रीति यह है कि गाली मुखमें पड़ी रहे कुचल कर खा न जाये, जिल्हा के रस ( यूँक ) से गोली स्वयं पिघलेगी, जम २ पिघलतीजाय कुछ तो पीच उसका निगल पाय कुछ थूक दिया फरै। इस गोली के चूमने से खांसी में छाती पर का जमाभा कफ पक के निकल जाता है और खांसी जाती रहती है। अगर खांसी प्रतिश्याय याने नजने के साथ हो अर्थात पहले जुकाम हुधा हेा, इसमें भी लोग बिना समझे बूतो गरम दवा खिला देते हैं यहां तक कि उसे यही भारी सरदी समझ रसतक देदेते हैं सिस्से कि छाती का कफ सूप गला सांय २ करने लगता है और फिर भी बिना कारण सगळे रस की बढ़ती कियेही जाते हैं अंतता गत्या उस पिचारे पराधोग रोगी को यमाय का रास्ता तका देते हैं। पाठकगण यह सय अमूल्य विषय जो हमने बड़े परिश्रम गौर त. युर्धे से हासिल किया है भाप लेागों की सेवा में अर्पण करते हैं माशा है कि आप लोग इस ग्रन्थ के अनुसार रोगियों को चिकित्सा कर के जयश्य यश के भागी हेांगे, सम्पादक को भी यश और धर्म के भागी यगायेंगे। याद रहे मगर जुकाम से ज्वर हुआ हो तो कोई गरम औषध ग के मिनलिखित एकीमो फान्ट को पिलाये। -:- ::::-- पञ्चमखण्ड । जुकाम पर फान्ट । ५. गुलयनप्मा, ६ मासा, मुलेठी ३ मासा, तुमखतमी २ मामा, मुन- का ६ दाना, उन्नाव ४ दाना मीर मिश्री १ तोला। जाधपाय जल को एक गिलास में सूप गरम करै जघ उफान आनेछगै गमि पर से गिलास | को उतार ऊपर की सय दवाईयां कुचलकर मै गिनी के उसी गिलास में । डाछ के ढांप देय, जय शीतल हो मल के छान कर पिला देय; इसी प्रकार दोनों समय पिलावे, य सात दिन इस फांट के पिलाने से जुकाम विष्ठकुष्ठ पध कर माराम हो जायगा । यहुत से लोग जो इस यात को नहीं जानते कि जुकाम के रोकने से शरीर फो. या हानि पहुंच सक्ता है, जुकाम होतेही गरम दूध गुष्ठ, या गुट जयापन, अथवा अफीम या सराय पोलते हैं लेकिन इन चीजों के पीने से नजला रुक कर बाल- | गम मूष के छाती और मस्तिष्क में छपट जाता है जिस्से स्वास्वादि बिमारी लोगों को हो जाती है इस लिये मनुष्य फेो चाहिये कि जुकाम गरम दवाईयो से कभी न रोके । * श्वासोपद्रव । . । ज्वर रोग में प्रथम उपद्रय स्वास फा है से छाती पर कफ सूखजाने से होता है। यह भी उपद्रय ऐसा दुष्कर है कि शोध यन न करने से शीघ्रही प्राण हरण करता है। प्राण हरण रोग-तो पात से हैं परन्तु जितना शीघ्र स्वास और हिचकी माण हरण करते हैं. अन्य नहीं। * छोटी पीपल, फायफल और ककहासिंही तीनों को समान मांग डे महीन पूर्ण कर एक मागा अथया साधा गामा चूर्ण.को सहत में गीला कर के दिन गत में तीन बार बार घटाने से स्वास. दब जाता है। अगर बलगम का और बहुत अधिक हो और इस चूर्ण के चटाने गे एक दो रोल में न्याय दया न देस पड़े तो।

पाराग्यदर्पण। २७ दत्तंमृगमदचूर्ण गुंजै कञ्चाकरसेन । अपहरतिशीघ्रमेव- प्रवासंग्लमोल्वगत्वञ्च ॥ + फस्तूरी आधी रक्ती अण्या एक रक्ती को दो मांसे मादी के रस में घोट के पिला दे अगर रोगी कमजोर हो तो एकही दमे में न पि- लावै एक २ घायल या दो २ चायल भर तीन चार दफे फर के मादी के रस में घोट के पिलावै मगर इस्से भी स्वाए दया न देख पड़े । घतूरमूलमादाय छायाशुष्कंप्रकल्पयेत् । तत्त्वचोधूमपा: नेनश्वासानण्यतिसत्वरम् ॥. धतूर के लड़ की छाल को छाया में सुखाय तीन मासा के अंदाज चिलम में भर रोगी को धूमपान कराये, यदि रोगी धूमपान करने में असमर्थ हो तो न पिलाये । छाती.को धुरा अथया पोटली से सेंक करे । उडूलनप्रकर्तव्यं शुंठीमांधोश्चवक्षसि । तेनसाम्यतिशोधेन ..श्वासंपरमदारुणम् ॥ वालुकापुटकैःखेदीलवर्णवापियछति । प्रवासकासेप्रकर्त- व्यंकफस्तम्भवत्तिये ॥ धेतरागोठ को तवे पर अधमूंगा कर गहीन पूर्ण यनाय छाती पर मलने से बहुत जरद श्यास य जाता है यदि शोठ के धुरा से न दये तो निम्निलिखित पोटली से संक करे। भरभूजे के मार का बालू गौर सेंधानोन दोने को एकत्रित कर दो पोटली बनाये, एक सये को अग्नि पर घर उसी पर पोटली को पञ्चमखण्ड। गरम पर माईस्ते २ छाती गला और गले के रंगे फो सेफैं । यम अगर उपरोक्त उपायों से श्वास का दंबना दृष्टिगोचर न हो तो गरम दयाईयों फा देना बिलकुल बन्द कर देना चाहिये क्योंकि इससे अधिक गरम द- पाईयों को व्यवहार से निस्सन्देह रोगी मर जायगा, उग अयस्था में जान लेना चाहिये कि इसे श्वास फा जोर सादी से नहीं है बल्कि गरमी में है और उसे जुकाम और सुश्क खांसी की चिकित्सा जो ऊपर लिसमाये हैं उन प्रयोगों के द्वारा श्वास के सद्धि को शांति करै । ऐसी अवस्था में लोग छाती पर पलस्तर लगा देते हैं अथवा एक प्रकार का ऐन्टमेन्ट लिन्ट में उगा के घपका देते हैं। इससे भी कहीं लाभ देखने में आया है किन्तु श्वास के लिये यह उपाय जो ऊपर हम लिख आये हैं गिहा- यत परीक्षित हैं बिना किसी विशेष कारण के निस्फल नहीं जाता है । मू चिकित्सा ॥ ज्वर का दूसरा उपद्रव मूर्जा है, मूर्खा यिहोशी को कहते हैं, जि- सफे घेग से रोगी की चैतन्यता जाती रहे उसी को मूर्खा, मोह, यिहोशी गफलत और असंज्ञता कहते हैं। यह भी उपद्रव ऐमा दुष्कर है ( प्राणे विमुच्यतेशीघ्र मुत्यासद्यःफलाफ्रियां ) कि यदि उसमें तत्काल सिद्धिदायक घिफिरसा न की जाप तो गनुष्य शीघ्रही मरजाता है । मूर्छा को संस्कृत में असंज्ञता कहते हैं ( असंशतासंज्ञोपधातः) जा संजता उसे कहते हैं जिसमें संज्ञाका नाशहो । मूर्खा याने बिहेशी अन्य रोगों के बढ़ने में भी होता है किन्तु ज्वर रोग की गरमी मस्तिष्क में प. हुंचने मे अकसर मूर्छा हो जाता है इसी को वैद्य लोग सीत में डूया स: मा रसों की भरती कर रोगी को यमालय पहुंघाय देते हैं । मूविस्था में घेद्य को चाहिये की बष्टी युद्धिमानी के साथ चिकित्सा करके रोगीके प्राण की रक्षा करे क्योंकि जरा भी विपरीत चिकित्सा होने से रोगी महुत जरद गर जाता है॥

पाराग्वंदर्पण। २६ इस स्थल में हमै यह भी पतलादेना बहुत जरूरी है कि मूळ दो प्रकार का होता है, एक तो मस्तिष्क ( शिर का मध्य भाग ) का सून प्र थम गरम हो जाताहै बाद एलेमाके साथ मिल के जम जाताहे यह प्रायः सन्निपात ज्वर में होता है और उसका एलण यह है कि ज्वर होने ल. गता है और मूर्छावस्या में आई खून के समान लाल हो जाती हैं, आंखे पिटकुल ढपी रहती हैं अथवा कुछ खुली भी रहैं, इसमें शीतल चिकित्सा जैसे शिर पर. बरफ रखा देना अथवा शिर पर शीतल जल का धार देगा मना है ऐसी चिकित्सा करनी चाहिये जिस्से रक्त बलगम से अलग हो अधोगामी रगों में फैल जाय । दूसरा हृदय से बात पित्त की गरमी उठ कर मस्तिष्क में जाके भर जाती है जिससे रोगी पदहोश हो जाता है। चिकित्सा॥ मपम प्रकार की मूर्छा में जो मनिपात रोग में अञ्जनादि लिखे हैं उन उपायों से हटाना अपया निम्नलिखित गज्जन लगा के रोगी को स. चेत करना ॥ शरीषवीजंगामूचकृष्णामरिचसैंधवैः। अञ्जनस्यात्यवोधाय सरसानशिलावचेः॥ सिरमा के बीज, खोटी पोपर, काली मिर्च और मेन्धानोन एकर रत्ती मैनसिल भाषी रत्ती, सामुग का टुकड़ा दे। चायठ भर समों को घि कने पत्थर पर गोमूध में सून महीन काजलके ममान घोंट रोगीके शांख में अंजग उगाचे निश्चय है कि इससे रोगी चैतन्य होगा। लेकिन मूर्दा यस्था में सानेके लिये कोई गरम दया नहीं देना चाहिये । खोटी पीपर का चूर्ण १ मासा शहद के साथ घटाना, मोठे भगार का रस पिलाना, भापपा मुनक्का, छोहारा, रास, नागकेशर, काठग को गरी सन दशा- ३ पञ्चमखण्ड। इयों को समान भाग ले काय बना मिश्री हाटके दिनमें कई बार पि- लाने से फायदा देखा गया है । जो सिर्फ शिर पर गरमी पहुंचने से मूळ हुमा हो तो उसे निम्न. लिखित उपायों से शान्ति फरै ।। अंतर अंगूर अथया कस का मिरका जिसमें फुल मिला न हो २ तोला, गुलाबजल अथवा सिर्फ जल, १ पाथ, रोगनगुल यया गरी फा तेल दो ताला तीनों को एकमें मिला उसी में एक सफेद कपड़ा तर फरके शिरपर रक्खे और जय मूखजाय फिर भिजा दे, इसी प्रकार जबतक होश न मावे बराबर रक्खा रहै और सुंघने को हरा खीरा काटके या सस का , मूङ्घने को देय अगर देखे कि कई दिनोंसे दस्त नहीं हुआहे तो मुलायम रेचन द्वारा अथवा पिचकारी के जरिये से बहुत जल्द दस्त करा दे | ऐसी २ धिमारियों में मल मूत्र पर प्रथमही दृष्टि देनी चाहिये क्योंकि मस्त्र में गरमी पहुंचने से भी मनुष्य को सन्नि, मूर्खा, मलाप, हदक- म्प मादि तपद्य उठ खड़े होते हैं और उन्हें साफ करने से निवारण हो जाते हैं। मल मंगर बहुत दस्त माने से मूर्खा हुगा हो तो यहुत शीतल उपचार न करे, नाभी पर गरम तेल मढ़ और सांधी चीज सुंघाय तथा दस्त यन्द करने का उपाय करै । अगर हिचकी माते २ यिहासी हुई हो तो मुलेठी मैनफल का पानी पिला के बमन करावे इत्यादि किन्तु ऐसी अवस्था में विद्वान सत् वैद्य की सहायता लेना बहुत जरूरी है । अरुचि ।.. किसी चीज का स्वाद न मालूम हो उसे जरुचि कहते हैं यह सर्व ... साधारण ज्वर में हो जाता है और जय तक ज्वरं पूर्णरूप से निर्गत नहीं आरोग्यदर्पगा। ३ होता अरुचि नहीं जाती। अगर खांसी तेजी के साथ न हो तो कागजी नींबू में जरा मा काली मिर्च और काला नोन का पूर्ण भर भाग पर भूज रोगी को, चटाये। बमन । रोगी के पीने वाले पानी में थोड़ा सा पुराना चायम भिगा दे आध घंटे के पश्चात मल के छान ले और उसी जल को थोडा २ पि- छाये इस्से यमन बन्द हो जायगा, सायत इस्से न बन्द हो तो कमल गहे की गरी एक तोला पायभर पानी में पकाये जय माधपाय पानी रह जाय मल के छान ठेय और उसमें ६ मामा मिश्री जिला के दो २ घंटे पर पिठावै इस्से जरूर यमन सूखी ओंकी का मामा बन्द होगा । हिचकी। ज्वर रोग में विधफी का जाना माफाश यात्रा के लिये मानों यमराज का पुकारना है, ठीक हिचकी रोग वैसा ही है इसमें कोई संदेह नहीं है । वैद्य को चाहिये कि हिचकी प्रारम्भ होते ही चिकित्सा करना शुरू करें। नीरणसिंधुत्यरजातिसूक्ष्म नस्येतिनूनं विनहं तिहिक्कां । शुंठोठाहासितयासमेता धूपाचवा हिंगुसमुद्गवश्व । दो ताला पानी में तीन मासा मिमक सूय महीन घोंट नाश देने से शपया ६ मामा गोंठ को मापपाय पानी में पकाय गल छानकर एक तोडा मिश्री मिलाय उसे कईचार पिष्ठाने से अपधा हींग की नाक में धूनी देने से सिर्फ एकही प्रयोग पपया तीनों प्रयोग से हिचकी रोग का नाश होता है।

३२ पञ्चमखण्ड। . 1 शिर लेप। विशेषमपरंचात्र शृणुपद्रवनाशनम् । मधुकरजनीमुम्तं दाडिमच्चाम्नवेतसं ॥ अंचनंतिन्तिरीकञ्च- नलदंपत्रमुत्पलं । त्वचंच्याघ्रनखंचैव मातुलुङ्करसीमधु ॥ दियादेभिज्वरातस्य मधुशक्तयुतैशिरः । शिरोभितापसंमोह इमिहिक्काप्रवेवघुन् । प्रदेहानाशयत्वेष ज्वरितानामुपद्रवान् । सुश्रुत महाराज कहते हैं कि इसके , आगे विशेष मोषध ज्वर के उपद्रवों को नाश करनेवाली सुनों, महुभा के पक्ष का फल वा अंतर- छाल, एखदी, नागरमोथा, अनार का फूल वा छाल, अमवेत, अमिष्ठी की छाल, बरौला, बालछाड़, तेजपात, कमलगह की गरी, दालचीनी (व्याघ्रनस) नख मामक सुगन्धद्रव्य, बिजौरा नीयू का छिलका इन भवों को ले महीन चूर्ण कर थोड़ा सा सष्ठत और अंगूर अपया जामुम फा सिरका मिलाय जयर पीड़ित वाले के शिर और गाथे पर लेप करने से शिरको तीव्र पीड़ा, शिर फा जलन, बिहोसी, यमन : जथया जी का मचलाना या मुख से पंछ। छूटना, हिचकी और बदन का कांपना नष्ट होता है। बस जय ज्यर के उपद्रों को चिकित्सा समाप्त करके उपर छुट जाने के बाद पा पहरेज करना चाहिये से लिखते हैं । -:-.. ज्वर छुट जाने का लक्षण । मघुत्वंशिरसःखेदो सुखमापाण्डुपाकिच । चवधूथान्नका- चाच ज्वरमुक्तस्य लक्षणम ॥

भारीग्यदपंगा। ३३ . शरीर हलकी हो, शिर में खफीफ पसीना मध्ये, मुख की पियराई या मलीनता जाती रहे मुख कुछ पंक जाय अथवा न भी पकै, ठीक पाये, और भूख ठगे ते जागना की उबर छुट गया । ज्वर छुट जाने पर परहेज । परिषेषावगांशस्नेहान् संशाधनानिच । नानाभ्यङ्गदिवा- खप्न गौतव्यायामयोषितः । गभजेतज्वरोत्सृष्टो यावन्नावल- वान्भवेत् ॥ व्यक्तस्यापिज्वरेणाशु दुर्बलस्याहितेवरः । प्र- त्यापन्नादहदेह शुष्कबक्षमिवानलः । कारना या चौछार से भीडाना, नदी या ताठायादि गम्भीर जल में दुधी लगाना, सेठ घी का पकयाम खाना अपया स्नेहादि पीना, यमन घिरेषगादि शरीर शुद्ध करना, सूप शिर से स्नान करना, लेख उपटन लगामा, दिन में सोगा, अधिक शीतल पदार्थ का सेवन, कसरत और स्त्री मसंग आदि फर्मों से घर छुट जाने के पश्चात् जब तक शरीर सूब पलपान न हो जाप पहरेज करे प्योंकि ज्वर से छुटा दुर्यउ मनुष्य को उपरोत्ता शपथ्यों से पुनः ज्वर जाके ऐसे दग्ध करता है जैसे सूरो रक्ष को ममि ॥ यावन्नप्रकृतिस्थ: स्यादापतःपागातस्तथा । ज्यरोप्रमाहाम- वति स्वल्परप्ययचेष्टितैः ॥ निपण्णंभाजयेत्तस्मान्मूचोच्चारौ धारयेत् । भारोपकेगाचसाद वैवण्येऽङ्गमलादिपु । गांव ज्वरोपिशाध्यऽस्वादनुबंधभयानरः ॥ पस लिये घर से घुटे गनुष्य के नितो दोष हैं और मरने , - पञ्चमखण्ड । स्वमाय में स्थित न हो ले तितने अहित पदार्थ का परिहार करना उ. चित है क्योंकि घोड़े भी विरुद्ध चेष्टा अर्थात् बाल से अधिक खाना पीना घटना फिरना जादि भी फर्म करने से ज्वर सहित यिाशी जाने लगती है इस लिये वैद्य को चाहिये ज्वर से छुटे रोगी की जय तफ यथार्थ 4. छाधान न हो वैठेही रक्वे अर्थात् रोगी से कोई भी शारीरक काम न कराफे तसे दोनों समय अग्नि दोष के अनुसार भोजन कराये और ऐसी यस कारक गोषध दे जिस्से मल मूत्र भी साफ हेजावै ।। अगर अरुधि, यदन में दरद, मुस की पियराई, या रूखापन और शरीर का मैलापन ज्वर के छुट जाने पर भी बना रहै तो वैद्य को चा- |हिये कि फिर ज्यर होने के भय से उसके दोषों को शोधन करै ।। नाजातुतर्पयेत्पाजः सहसावरकशितम्। तेनसन्दूषिता-. ह्यस्य पुनरेवभवेज्जूरः ॥ चिकित्सेञ्चज्वरान्सानिमित्तानां विपर्ययः । श्रमक्षयाभिघातात्ये मूलव्याधिमुपाचरेत् ॥ युद्धिमान वैद्य, ज्वर से दुधले हुये रोगी को उमडी इच्छानुसार एक बार किमी चीज से कदाचित् तृप्त न करै ययोंकि एक बारगी तृप्त कर | देनेसे दूषित ज्वर तस मनुष्य को फिर हो जाता है । हमेसा निदान के व्यतिक्रमों से सम्पूर्ण ज्वरों की चिकित्सा करे और खेदज्वर, क्षयज्यर, अभिघासज्वा, एम ज्वरों में वैद्यको चाहिये कि मूल व्याधि को दूर करे। स्त्रीणामपप्रजातानां स्तन्यावतरणेचयः । रात्रसंशमनं कुयाद्ययादा विधानवित् ॥ जिन सित्रयों का पाठक मर जाय और दूध के उतरने में जो ज्वर उत्पन्न हुमा हो उस घर को पायुर्वेद विशागदी देोप अनुसार शांत करे । इति चाधिकाराः समाप्तः ॥

पारोग्यदर्पण। ३५ धमफे आगे अब हम राजपक्ष्मा रोग का निदान, कारण और पि- कित्सा लिखते हैं । यद्यपि प्राचीन ग्रन्योक्तानुसार ज्वर रोग के मागे अ. तीसार रोग का प्रर्ण कथन करना उचित है लेकिन यक्ष्मा के अनेक लक्षण जीर्णज्वरादि में मिलते हैं और जीर्णजयरादि के अनेक लक्षण य- क्ष्मा में मिलते हैं इस हेतु से इस स्थल में भतीसार रोग का प्रक्षण म दे के यक्ष्मा रोग का निदानादि लिखते हैं । राजयक्ष्मा (झोप) रोग। भनेकरीगानुगतो वहुरोगपुरोगमः। दुर्विज योदुनिवारः शाषाब्याधियोहावलः ॥ संशोपणाद्रसादीनां शापइत्यभिधी- यते । क्रियानयवारत्वाच्च चयइत्युच्यतेपुनः ॥ राजश्चन्द्रमसा- यस्माद्भदेष किलामयः । तस्मात्तरामयोति केचिदाहु- मनीषिणः । रागपुराजतेयस्मा त्तत्तायंरोगराडिति ॥ भावार्थ:-अनेक रोगों के पहले और बहुत प्रकार के रोगों के पशात होने वाला, यही कठिनता से जाना जाघे गांर जिसका नि.' दाम एकाएकी बहुत जल्द न मिल जाय, अत्यन्त दुःससे दूर कियाजाये ऐमा गहा बलवान शोषरोग गनुष्यों के शरीर में हो जाता है। यह रोग निरन्तर रस रक्त भादि साता धातुओं को मुखाता है इस लिये शोप गायक राग संशा पहा है और सम्पूर्ण इन्द्रियों के कर्मों को क्षय करता हैस पास्ते क्षय रोग भी कहाता है। एक समय बड़े तेस्त्री प्रतापी चन्द्रगा गामक राशा को यह रोग हुआ और उमे निर्मठ नष्ट करने में यद्यों को अति परिनाम पड़ा तम से वैद्य लोग शेष रोग का समा रोग पञ्चमखण्ड । पडाहने लगे और सम्पूर्ण रोगों में उग्रत्य.से मिराजमान है इस कारण से रोगराज या राजरोग भी कहते हैं । इतने प्रचलित शोष रोग के पर्याय नाम हैं, जैसे शोप, राजयक्ष्मा सई या फफसई, राजरोग, दिफ तपेदिक मादि । राजयक्ष्मा निदानं ।। वेगरोधात्क्षयाच्चैव साहसादिषमाशानात् । त्रिदोषोना- यतेयक्ष्मा गोहेतुचठयात् ॥ आय यक्ष्मा रोग का निदान कहते हैं, गिदान जादि कारण को करते हैं, याने जिन जपथ्यों से रोग उत्पात्र होता है उसे निदान पाहते है । ( वेगरोधात ) वेग ९३ प्रकार के हैं जैसे मल, सूय, छींक, जंभुगाई, जादि कि जिन्हों के रोकने से उदायत रोग होता है लेकिन यहां गधो. यात गाल मूत्र तीनही घेग का ग्रहण किया है। इसमें भरद्वाज का वचन है । "धातमूत्रपुरीपाणां होगयाथै यंदानराः ! वेगंनिरोधयेत्तेन राजयक्ष्मादि- संभवः" मनुष्य मायः किसी २ स्थान में गप अधया उज्जा घस रेचित्त धोयायु को रोक लेते हैं पैगाही गठ मूत्र को भी कदौं २ गेफना प. हता है किन्तु उस्से यक्ष्मा रोग होने का समय है (क्षयात् ) धातुक्षय से यह धातुक्षप गतिमैथुनादि से होता है, यातसे बिषयी कामोन्मत्ततासे दिनरात मैथुन क्रिया में लिप्त हो जाते हैं अन्तिम परिणाम उसका यह देता है कि यक्ष्मा रोग द्वारा यमालय को यात्रा करना पड़ता है ( ना. इसात् ) जो भार अघषा परिनग या कसरत गपने शरीर से करने ला. यजनोई उसे करना या लोग यग दिन रात फागही में लगे रहना उसे साहपात् कहते हैं इससे भी यक्ष्मा रोग होता है (विपमाशनात् ) मि. पम भोजन उसे कहते हैं जैसे फधी का कधी जादा, कधी सधेरे कधी दुपहर के भोगन करना, कधी सागही नहीं (ब्रम) कधी कई बार नो.

आरोग्यदर्पगा। पान करना । अक्सर औरतों को जो दिक का भारजा हे। जाता है घि. पम मशनही से उन्हें खाने पीने पर बिलकुल लिहाज नहीं रहता और पुरुषों की अपेक्षा व्रत भी बहुत करती हैं। यह धार कारण तीनों दोषों फरके यक्ष्मा रोग होने को वैद्ययरों ने दिखाया है किन्तु इसके अतिरिक्त और भी कारण हैं जैसे अतिशोफ, जराशोपि, अवशोषि, व्यायाग- शोपि, तरक्षत और व्रणशोपि जिसके लक्षण आगे लिसेंगे। राजयक्ष्मा संप्राप्ति। कफप्रधानैर्दोषस्तु मद्धेषुरसबमसु । अतिव्यवायिनावा- पि चौगोरेतस्यनन्तरा । चौयन्तेधातवः सर्वेततःशुष्यतिमा- नवः ।। । अय राजयक्ष्मा का सम्माप्ति अर्थात् शरीर के भीतर पपा विगए कर शोप उत्पन्न करता है उसे दिखलाते हैं। प्रथा शरीरको रक्षा या प- नायट रक्तादि अनेक यस्तुणों से है किन्तु शरीर में का प्रधान है। हम लोगों का चलना, फिरना, योहाना तथा मीत्तर गमग्र नस तथा नाशयों का काम भी कफ की चिकगइट से होता है। मा यातादिक कुपित होने से यथार्थ कफ न घर के स्थान से कफ च्युत हो मुखमार्ग से रेचन होने लगता है, उस अवस्था में रम की यहने वाली नाही पन्द हो जाती है, तम भोजन का रण म सिंघ कर यहभी कम हो जाता है इससे प्रतिदिन शरीर मृखता है। दूसरा मति मैथुन से जय पौर्य क्षीण होता है तो उसके क्षीण होने से दूसरे भी गांसादिक धातु भी होने लगते हैं। पजे से मनुष्य गित्यति मूसमे उगता है, यम यही शोष वा यमाग कहाता है । लेकिग जहां तक हमने परीक्षा किया ऐधिक .तर धातु सीन से यमारोग पागा है, खास कर भी टोग भएपयय में मतिमैथुन या एसमैथुन करते हैं उन्हें जोर ओ माता पिता धातुतीमावस्या में म- ।

पञ्चमखण्ड। थया सुशाक शादि धातु सम्बन्धी रोगातुरायस्पा में गर्भ स्थापन करते हैं उस गर्भ से उत्पन्न पुत्र था फन्या केो दश बारह भयवासालाए घरस की अवस्था में अवश्य यक्ष्मा गोग हो जाता है । यक्ष्माकापूर्वरूप॥ श्वासांगसादकफसंस्रवतालुशोप वम्यग्निसादमदपौनस कासहिका शाषेभविष्यतिभवन्तिसचापिजन्तुः शुलक्षणाम- वतिमांसपरोरिरंसुः ॥ जय गनुप्य केो यक्ष्मारोग का आरंभ हे।ता है तय निम्नलिसित छ क्षण दृष्टिगोचर होते हैं जैसे ( श्वास ) दम फा फूलना (अंगपाद) अंगों की शिपिलता याने हाथ पैर निहायत ढीले और सुस्त ( कफ संस्त्रय ) फफफा गिरना ( तालु शेप ) गला मूसना या गले में कांटा सरीखा गड़गा ( पमि ) जी मचलाना या के होना ( गनिसाद ) भूख का ग छ गना, किमी २ फेो इस रोग में अधिक भूख वाला देखा है (गद ) नेत्रों में नशा मा मालुम होना ( पीनस ) नाफ यहना याने जुकाम ( फास ) खांसी, किसी को सूखी खांसी आती है और किसी के खांसी में खांसते दो भंठा के अंठा फफ गिर पड़ता है * (हिका) हिचको यह लक्षण होते हैं तथा उस मनुष्य के नेत्र सफेद मांस खाने की इच्छा और मैथुन की चाह रहा करती है। किसी बिमार में यह सम लक्षण मिलते है और किसी में कुछ कम किन्तु कम लक्षण से भी विमारी अवश्य समझी जा- .यगी॥ * दूम जगह दो पाठ है हिका हिचको भाना और निद्रा अधिक नोंद भाना और दोनों लक्षप मिलते हैं। + मांस खाने की इच्छा उमौ मनुष्य को होगो जिसे पूर्व में मांस का खाद मिल चुका है।

सपा गांसजीर पक्षप उक्षण फायदमा रोगी होता तुमको पिरिमा | को गणाध्य कहा । ठिसते ६सम लक्षण युक्त अपया तीन लक्षपयुक्ता आरोग्यदर्पगा। त्रिरूपक्षयके लक्षण ॥ 'अंसपार्वा भितापश्चसन्तापःकरपादयोः । ज्वरःसर्वाङ्गक- शेतिलचगांराजयक्ष्मगाः ॥ त्रिरूपक्षय अर्थात् तोगों दोषों से जो साधारण यक्ष्मा के लक्षण हैं उसे कहते हैं । पन्धे गौर पसुरी में दर्द हाथ और पायों में दाह वा सगन शरीर में ज्वर गे राजयक्ष्मा के लक्षण हैं । इतने लक्षणों से जानना कि यक्ष्मा भी प्रपम दर्जे पर है अच्छा हो सकता है । पट् रूपक्षय के लक्षण । भक्तद्देषाज्वरःप्रवासः कासःशाणितदर्शनम् । खरभेदश्चना- यंते पद्भपराजयक्ष्मणि ॥ (भन प) सानेको फोन कर भोजन देखने की भी इच्छा न हो, ज्यर से शरीर तपा करे, दग फूले, सांसी, चूंक के लोहू का गिरना और स्वर भंग अयाज का बैठ जाना, यहां तक यक्ष्मा दूसरा दर्गा समझना अच्छे २ मत् वैद्य के द्वारा कोई २ माराम हो जाता है किन्तु तीसरा और चौथे दर्जे का पक्षमा पाराम नहीं होता। सर्वैरई स्विभिर्वापि लिंगमांसवलचयैः । युक्तोवय॑श्चियिा- त्यस्तु सर्वरुपाप्यतोऽन्यया ॥ हमारे भूरा पूर्व पद्यपरों ने उपरोक्त क्षण युक्त तपा गांमादि क्षय साप न करणा, किन्तु मा रोगी मांगादि रुप रहित हो और राग के संपूर्ण पञ्चमखण्ड। लक्षण भी मिलते हो तो उसकी चिकित्सा ईश्वर भरोसे पर करना पड़ों कि यह ऐसा दुष्कर रोगहै कि ईश्वर ही आरोग्य फरै । लिखाहै कि . गर सत् वैद्य यक्ष्मावाले को मारोग्य भी कर देय तो भी वह मनुष्य एक पगार दिन से अधिक न जियेगा एपोंकि हजार दिन के बाद फिर उसी रोग में ग्रसित हो मनुष्य इस असार संमार को परित्याग करता है । एक स्थल में लिखा है कि जो यक्ष्मा रागी औषध से जाराम हो जायं सो जानना कि तसे यक्ष्मा का रोग-गाहीं था। सा हे मेरे प्यारे पाठक वजह तक र सके वीर्य की रक्षा करो क्योंकि यमाही पर पपा निर्भर है यावत् रोग हैं सब धीर्य क्षय से होते हैं । जय हम धातु क्षयादि पट् कारण से जो यक्ष्मा होने की पूर्व में लिख आये हैं उसके लक्षण সূল से दिखलाते ॥ शोक शोपि लक्षण। प्रध्मानशीलः सस्तांगः शोशशाष्यपितादृशः। विनाश- क्रक्षयकृत विकाररूपलचितः ॥ मति चिन्ता शोफ करने से जो यक्ष्मा रोग होता है उस्में यह उ. पण होते हैं अंग का ढीलापन और धातुक्षयके बिना भी जो धातुक्षय के लक्षण हैं सय गिते हैं । शेफ यह है कि शरीर के रक्त मांसादि सभी को दहन कर देता है, जैसा किसी कवि ने कहा है "चिताचिन्ता समा. स्याता ततचिन्ता. गरीयसी । चितादापति निर्माष स्सजीमोदहति चिन्तपः" पिता (जिस चुनी हुई लकहियों पर मुस्दा रख के फूला जाता ये) और चिन्ता (शोक, फिर' रंगमादि) इन दोनों में कवियों ने स. मानस्य दिखाया है और अन्त में पिता मे चिन्ता को बड़ा माना है इम लिये हि पिता यिगा जोय के शरीर को जाती है और चिन्ता गीय महिरा एम रघूल शरीर को दहन करती ऐ तो भला फहिये जन पाराग्यदर्पगा। चिन्ता में ऐमी दाहकता शक्ति है कि बिना रोग हो रक्त मांसादि सगी को जला देती है तो इस स्थल में रोग एक नाम मात्र समझना चाहिये ऐसी अवस्था में (स्वयोनिपईन द्रव्यागयेयप्रतीकारः) क्या होगा? चिन्ता को दिल से हटाना । यदि कोई.सन्देह करें कि चिन्ता कारण है उसफा कार्य यक्ष्मा रोग है और प्रायः स्थलों में कार्य दृश्यमान होने से कारण नाश हो जाता है तो चिन्ता कारण है उसका यक्ष्मा रोग मा और उसके लक्षण अंग शिथिलतादि उपस्थित हैं उसके ऊपर ध्यान देके सिर्फ नाशमान कारण का शांतापाय,करने से यक्ष्मा रोग नाश कैसे होगा? यद्यपि कारण नाशमान सा देख पड़ता है किन्तु आभ्यन्तरिक उसका दोष यमा रहता है इसलिये यिनाकारण नाशकार्यका नाश नहीं होता, चिकित्सकगणों को चाहिये किं कारण पर ध्यान अवश्य रक्षा करें । जराशोषि, लक्षण। जराशाषीकृषामन्द चौर्यबुद्धिबलेन्द्रियः । कम्पनीमचि- मानभिन्न कांस्यपात्रहतस्वरः ॥ टीवतिय नाणाहीनं गौरवा- रुचिपीड़ितः। संप्रसुतास्थनासाक्षः शुष्करूचमलच्छविः ॥ एक प्रकार का यक्ष्मा घुढ़ापा होने से होता है जिसमें शरीर दुषली भएप वीर्य थुद्धि और इन्द्रियों का काम शिथिमा, शरीर जयथा हाथ मु.. ख का कांपना, खाना अच्छा न उगना और जैसा फूटा कांसे का परतन मजाने से बजता है वैसा गले से शब्द निकलें, खांगते २ पसीना निकल माये, याकुल हो जाय तो भी फफ न निकले, शरीर में योगायन, मुख का जायका सराध, मुख, नाक और गांसेमे पानीका बहना, सूखा और रूसा दस्त का होगा इत्यादि लक्षण होते हैं। यह यक्ष्मा उस धुढ़ापे में बहुत कम होता है जो क्रमशः अपनी अवस्या पर जाफे युढ़ापा होते हैं खाम कर उस युढ़ापे में होता है जो ४२ पञ्चमखण्ड । अफाट रद्ध हुये हैं अधिक तर ४० वर्ष की कम अवस्था वाले को यक्ष्मा रोग होता है । अध्व शोषि का.लक्षण। अध्वप्रशाषी सस्तांगः' संभष्टपरुषच्छविः । प्रसुप्तगाबाव- यव: शुष्कलोमगलाननः ॥ तीसरे प्रकार का यक्ष्मा रोग अधिक रास्ता चलने से होता है। जिस्का लक्षण यह है, सम्पूर्ण शरीर का शिथिल होना, कान्ति शरीर की जाती है, हाथ पैर शून्य हो जाय याने चुटकी काटने से बोध न' हे। (कोम) जो पिपासा स्थान है वह और गला मुख मूखता रहै इत्यादि । व्यायाम शोपि लक्षण। व्यायामशाषीभूयिष्ट मेभिरेवसमन्वितः । लिंगैमरःक्षत- करीः संयुक्ताक्षतंविना । . अधिक फसरत या अन्य प्रकारफी मेहनत करनेसे जा यक्ष्मारोग है उसमें पहुधा फरले पवशेषी के पक्षण मिलते हैं और क्षत रोग. के बिना जो उरक्षत रोग के लक्षण हैं यह भी मिलते है। कसरत करने की जैसी विधि प्रपा पुण्य के भाग्य दर्पण में लिपी है उसके पाखिलाफ फरगे से निस्सन्देह यक्ष्मा का रोग होता है। रक्तक्षय शोपी व्रण शोपी और उरक्षत के लक्षण । रतनयादिनाभिस्तथैवाहारयंचगान्।ब्रगितस्यभवेच्छोषः सधासाध्यतमस्त्वत: ॥ व्यायाममाराध्ययन रभिघाताति- १ मारोग्यदर्पण। ४३ मैथुन । कर्मणाचाप्युरस्येन बक्षीयस्यविदारितम् ॥ तस्योर- सिक्षतरक्तं पूयःोनाचगच्छति।कासमानच्छईयेच्च पीतरका सितारुणम् ॥ सन्तप्तबचाःसाऽत्यर्थं दूयनात्यरिताम्यति । दुगंधबदनाच्छासा भिन्नवर्गखरोनरः ॥ शरीर से लाहू के निकल जाने से अयंया अन्य किसी कारण यशात् रक्तक्षप से, अत्यंत नंग दर्द से, भोजन के कुपथ्य से और प्रण (फोडा) याले पुरुष को भी यक्ष्मा रोग हो जाता है यह अत्यंत असाध्य होता है अत्यंत कसरत करने से, घोका उठाने मे, बहुत दिन रात पढ़ने से, चोट के लगने से, अत्यंत मैथुन करने से, छाती के जोर से जादा काम करने से जिमका हृदय फट जाता है । उसके फटे हुये हृदय में रक्त के साथ पीय और फफ दौड़ता है और उसके खांसी में लार और पीठा, फाला लाल रंग का बमन होता है । उस रोगी का हृदय अत्यन्त गरम, पीड़ा से युक्त और कांपता है और मुज़ मे दुर्गन्ध आती है और ऊपर को स्वास घलती है और स्वर भंग याने गला बैठ जाता है । मैथुन शोपि के लक्षण । व्यवायशापौशुक्रस्य चयलिंगरूपद्रुतः । पांडुदेहायथापूर्व क्षीयंतेचास्यधातवः ॥ अस्ति मैथुन करने से जो यक्ष्मा होता है उसके उक्षण यह है । दे। की रंगत पोली हे। जाप, और मात घातु जो हैं वे क्रमशः उलटे और हो जेमे पीर्य से मना, मज्जा से छुट्टी भीर हड्डी से मेद इमो प्रस्त पर्यन्त क्षीण होता जाय तपा शुक्रलय के लक्षण भी मिले है पा० द. में लिस जाये हैं ।

पञ्चमखण्ड !
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असाध्य लक्षण ।
महौशिनचीयमाण मतीसारनिपीडितं । शूनमुको
दरंचैव यन्मिपरिवर्जयेत् ॥ शुल्लाक्षमवद्देष्टार मूर्ध्वश्वास
निपौड़ितं । कृच्छ्रेणवहुमेहंतं यन्माहतोमानवं ॥
जो राज रोगी भोजन अधिक करे और रोज २ दुपला होता जावे
दस्त पतले, अंडकोश और पेट पर सूजन होने से वैद्ययरों ने असाध्य
फहा है सुन्दर यश का चाहनेवाला वैद्य ऐने रोगी को त्याग करै। जि-
सके नेता सफेद, अन्न पर ग्लानि, अर्ध्व श्वास करके पोष्ठित और प्रमेह
सहित बहुत फठिन से बारम्यार मूसता हे। एतादृश लक्षण युक्त यक्ष्मा
रोगी को अवश्य मारता है ॥
अथ चिकित्सा योग लक्षण ।
ज्वरानुबंधरहितं वलवंतंक्रियासह । उपक्रमदात्मवंत दी
प्ताग्निमकृशंनरं ॥
जय जो यक्ष्मा रोग शाराम होने लायक है उसका लक्षण करते हैं!
जिस रोगी के शरीर में ज्यरका तपन न रहता हो, घटने फिरने को कुछ
ताफत धमी हो, तेज दया को सह मकता हेऔर पथ्य करनेवाला हो
जिसको खाना पच जाता है। गौर बहुत दुयडा न हो तो उसकी चि-
कित्सा फरना प्योंकि यहां तक प्रथम दरजा है रागी निस्सन्देह शाराम
हो सक्ता है।
NA
.
यक्ष्मा रोग में पथ्याऽपथ्य ।
, यक्ष्मा रोग वाले के लिये प्रथम पध्य लिखते हैं। पुराने धान का
भाषल, शपया साठी के चावल का भात, छिलका रहित मूंग की दाल,

पाराग्यदर्पण। '-साम संध्या समय भोजन के पहले थोड़ा सा यल कारक शरायका पीना, माम पाने वालों के लिये जघान बकरे के मांस का जूम और जिम रोगी का मांम मूखता जाता.हे। उसे केवल मांस खाने वाले जानवरोंका मांग (जैसे गिद्ध आदि) जीरा के साथ बना के खिलाना हितकारी है। गौ तपा 'बकरी का दूध, घी, मक्खन, तरकारी में केला, कटहर, परया, भालू किन्तु रोग २ नहीं। रामनेनुआ, (दू) और सहितान की छीमी, फली में पक्का केला, पका सूय मोठा माम, माघला, छुहारा, मोठा फा- लसा, ताजा नारियल, मयोन ताड़ का फठ और मुनक्का, मसाला में मौक, जीरा, कालीमिर्च, ग्लौंग, दालचिनी और पिआज । कर्म- सधेरे एया खागा, भीषधियों का बनाया उत्तम तेल शरीर में मर्दन' करा के जाड़े में गरम जन्म से और गरगी में शोनल जल से स्नान करना, गरमी में खुले छत या मैदान में, जाहे में पटे मकान में और बयां काल में हवादार कोठे पर सोना, चन्द्रमा की रोशनी में रहना, उत्तम सुगंधित पुष्पों का माला पहना, गान सुमना, रूपवती स्त्रियों से हँसी दिखगी करमा किन्तु संभोग नहीं करना इस प्रकार स्त्री भी रूपवान पुरुषों से । यदि शरीर की सामर्थ्य न की हो तो हाम, दान, देव पूजा भीर गिद्वारा ब्राह्मणों का रोज २ सप्तकार करता रहे भोर कोई किस्म का शारीरिक तथा मानसिक परिश्रम न करे, रंज शोक फिकिर क्रोध मन से भुला दे यदि संसार में कुछ दिन जीने की माशा रसता है ॥ अपथ्य । दस्त लाने की बहुत दया सामा, दिशा पेशाप को रोकना, स्त्री प्रसंग करना, शरीर से पसीना निकालना, बन्द गकान में या जहां भ. त्यन्त गरमी पड़ती। जिम स्थानमें पित्त ममसान है। यहां रहना, नेत्रों में रोज अंजन उगागा, बहुत जागना, फिमी प्रकार का मधिक परिश्रम करना, रूसा मान जैसे बाजरा जोमरी, अाहर चने का पर्थन मादि, • पञ्चमखण्ड। एक भोजन न पचा हे। दूमरा भोजन कर लेना, अधिक पान का बीड़ा चधाना, कुम्हड़ा, सेम ककड़ी, कुलथी, उरद, लहसुन हींग लाल मिरषा, पटाई अधार साग पात दही तेल की बनाई चीजें, मिरका रैतुआ व. हुत कटु यस्तु, इन सयों को क्षय रोग पाला पुरुप मायधानी से त्याग राजयक्ष्माचिकित्सा। सर्वस्विदोपजायमा दोषागांबलावलं । परोक्ष्यावस्थि- तंवैद्यः शाषिणंसमुपाचरेत् ॥ घरफ का मत है कि किमी किस्म का राज यक्ष्मा हो मयादी त्रि. दोपज हैं इसलिये पातादिक दोषों का बलाय विचार कर शोपवाले की चिकित्सा करमा उचित है। वलिनांबहुदापस्य पञ्चकर्मा गिदारयेत् । यक्ष्मिणःनीगा- देहस्य तत्कृतस्याविषोपमम् ॥ शुक्रायत्तवलंपुंसां मलायत्तं. हिजीवितं । तस्माद्यनेनसरक्षेद्यक्ष्मिंगामलरेतसौ ॥ मगर राजयक्ष्मा रोग याला मनुष्य हो र उसके वातादिफ दोष बढ़े हों तो यमनादि पञ्च कर्म अर्थात् स्नेह, खेद, यमन, घिरेधन और पस्ति क्रिया द्वारा रोगी के शरीर को शुद्ध करगा पोंकि उत्तम प्रकार पञ्चकर्म कराने से सय प्रकार के रोग नष्ट हो जाते हैं । यदि रोगी रक्त मांसादि से क्षीण हो तो उसे कभी पञ्चकर्म नहीं कराना चाहिये क्योंकि क्षीण देहयाले को पञ्चकर्म विप के समान गारता है । इसका सपब यह है कि मनुष्यों का बल धातुफे. भाधीगहे और जीवन मल (दस्त) के स्वाधीन है [ मी में प्रमेह और हैजा रोग में जीय जल्द मरजाते हैं ] तिस यास्ते यक्षमा रोगी के गल जोर धीर्य की रक्षा पंव से करनी चाहिये ।

आरोग्यदर्पगा। ४७ पञ्चकर्म । बलवान रोगी हो पाने चलने फिरने की अच्छी ताकत हा, भोजन का यथार्थ परिपाक होना आदि ठीक हो और रोग के लक्षण मिलते हो तो पञ्चकर्म जयश्य कराना । स्नेहकर्म। गमनागमन स्नेह क्रिया की विधि अनेक प्रकार की है जिसे पञ्चकर्म में लिखेंगे इस स्थल में साधारन प्रकार से लिखे देते हैं। मनुष्य के रक्त या धायु याहनी नसों में मैल चिपक जाता है जिससे रक्त वायु में र्ज पहता है, स्नेह क्रिया से सब मैल फूल जाते हैं और स्वेद फर्म द्वारा, यही सब मैल रोम मार्ग से याहर निकल जाते हैं जिससे समस्त गाड़ियां शुद्ध हो जाती हैं । यक्ष्मा रोग प्रायः नि।पा होता है किन्तु जिस देोप को बढ़ा देसे उसी के शमनार्थ स्नेहपान करावे । केवल पैत्तिके सर्पितिकलवणान्वितं । देयं वहुकफेवन्हि व्योमचारसमन्वितं ॥ यदि पित्ताधिक हो तो केयज घृप्त पान कराध, याताधिक में 8.. यण युत घृत पान कराधे और कफाधिक में चीता, शोंठ, पीपर, मिर्च और जयापार के साप पृतपान कराये । उसकी तरकीय यह है कि पित्ताधिपप में माधपाय गरम पानी में दो ताला घी डाल के पिलाये, माताधिक में भापपाय गरम जल में दो ताला घी ६ मामा सेंधानोन हालके पिलाये, कफाधिक में साधपाय गरम जठमें घी दो तोला, पीता ९मामा, गोंठ २ मासा, छोटीपीपर माघी, मिर्थ १० दाना जोर लवा- पञ्चमखण्डः। * खार ४ मासा सबों को महीन चूर्ण कर घृत समेत गरम जल में डाल के पिलादेवे। "शीतकादिवास्नेह मुणकालेपिवेमिशि"-शीतकाल हो तो दिनमें प्रातःकाल और गरम दिनों में दीपक जलने के बाद स्नेह पान फराधे । अगर स्नेह न पचै तो थोड़ा २ कई पार गरम जल पिल्लाये । जिन को स्नेह पीने में रुधि न हो तो उमी स्नेह को गरम भात में मिला के खिलाये । अपवा भात के साथ भी जिन्हे न पसन्द है। तो निम्निलि. - खित स्नेह पान यह बर्तन जिसमें शर्कराचूर्णसँयुक्त दोहनस्थेतृतेनुगां । टुग्धाचौरंपिवेटूक्षः सद्यःस्नेहनमुत्तम ॥ दूध दुहा जाता हे। तमी बर्तन में घी और मि.. श्री छाल के तमाम गौ केो दुइ के तत्क्षण गरमागरम उम दूध के पिला ने से तत्काल स्नेहन पाने स्नेह का काम होता हैं। इसी प्रकार पांच मात अपया दश दिन जब तक उत्तम प्रकार से.स्नेहन हो पान कराधे, सागे को मुलायम विधरी भादि खिलाये । स्नेह पाग करने वाला बहुत मेहनत, फल फलहरी अतिशीतल पदार्थ का सेवन, दिशा पेसाय का रोकना, रात को जागना दिन को सेना, कफकारक और रूरी मा इत्यादि त्याग करें। स्नेह का फल । दीप्ताग्निःशुदकोष्टय पुष्टधातुदृढ़ेन्द्रियः । निर्जरावलवर्या- ढ्यः स्नेहसेवीभवेन्नरः ॥

पाराग्यदर्पणं । ४६ स्नेह पान करने से अग्निप्रदीप्स, कोष्टपरिस्कार, धातुपुष्ट, बाल उत्- शाह की शुद्धि और शरीर का पीलापन नाश और मातादि यथा स्थान स्थित होता है । जय देखे कि स्नेहित रोगी का मल स्निग्ध और जहाँ में कोमलता तथा स्निग्धता, शरीर हलकी और इन्द्रियां निर्मल यह लक्षण देखपड़े तो साधारन प्रकार से स्वेद क्रिया द्वारा शिराओं भैठ निर्गत कर देय । लेकिन यदि रोगी दुर्वल है। गौर निम्निलिखित लक्षण मिलते हों तो स्वेद कर्म नहीं करना, जैसे-ममेह; घाघ, मतीसार घमन, जीघूमना, शिरदर्द होलदिख, गधिक पीया। ऐसाही - जरूरत जानप? तो मृदु स्वेद कराना । न स्वद कर्म विधिः। सर्वानखेदान्निवातेच जीर्णान्तेवाऽवचारयेत् । खेदादातु- स्थितादोषाः स्नेह लिन्नस्यदेहिनः ॥ द्रवतीप्राप्यकाष्ठांतर्गत्वा यांतिविरकता। जितने प्रकार के स्वेद हैं मयों को नियात स्थान ( जिस घर में इंया न जाता हो) में करना चाहिये । स्नेहपान से स्निग्ध हुये रोंगी के त्वचा कादि और धातुओं में जमेहुये जो दोपहें वे पतठे होके कोठेमें प्राप्त होते हैं वे ही सय पसीना से निजाते हैं। स्वेद • स्वेद भी चार प्रकार का प्रयान स्वेद मकर्ण में रैगर स्थल में यक्ष्मा वाले को जी वैद की मरत है उसे लिखते हैं । स्वेद फर्म इसलिये कराया जाता है हिजो स्नेह कर्म से घिराभों के भीतर का मैल फूल पाये हैं वे रोम मार्ग (बाल के शस्त) हाके निकल जाम ५०, पञ्चमखुण्ड। जिस्से नसे के मुख खुल जाय जिससे प्रायः रोगी को मुस्ती, जकहन, ऐं ठिन, भारीपन मालुम होता है न हो। एक बात इस समय हमको और कह देना चाहिये, वह यह है कि पञ्चकर्म में दो मत है, कितनों का मत है कि स्नेह, स्वेद, युगन, मिरेचन और बस्ति क्रिया क्रमशः कराना जौर केषित् भाचायों का.मत है कि "प्रपमं घमनं पश्चाविरेकश्चानुवास. नं.। एतानि पञ्च- काणिनिरूहा नायनं तपा" पहले अमन, फिर जु- छाब, फिर अनुवासन निरूह और नावन । इसमें हमारीसम्मति नहीं है क्योंकि इससे यथार्थ शरीर संशोधन नहीं होता क्योंकि शायरमें साफ लिख दिया है:- . येषांनस्यविधातव्यं बस्तिथापिहिदेहिनां। शोधनीयाच येकेचित्पूर्वस्वेद्याश्यतेमताः ॥ नस्य अर्थात् नाक में दधा सुखाने के डायक मनुष्य फो, बस्ति कर्म याने पिचकारी देने के योग्य और जुलाब दिवाने के योग्य पुरुषों को पहले शरीर से पसीना निकलवाय के पीछे नस्य आदि दिवाने का प्र. योग करना उत्तम है । और यह सिद्धान्त है कि बिना स्नेह के स्वेद उ. तग नहीं होता तो इन्हीं सब वजूहातों से सिद्ध होता है कि शरीर शु- घ्यर्थ स्नेहादि पञ्चकर्म यही लाभदायक है ॥ द्वस्वेद ॥ यक्ष्मा पाठे को सिवाय द्य स्वेद के अन्य स्वेद कदापि न देय पाह मूक्ष्म, कारण यह है कि मजीर्ण वाला, बहुत कमजोर, प्रमेह रोगी, घाव याला अपया जिभके मुख मे सून गाता हो, बहुत प्यास से युक्त, जिसे दस्त पतले जाते हों इत्यादि उपद्रवं संयुक्त रोगी को स्वेद न क- रांगा, मे यक्ष्मांरोग बिना धातुरोग के होताही नहीं इसलिये बहुत भूक्ष्म स्वेद कराना चाहिये ।

भारोग्यदर्पया। ५१ साधारन स्वेदविधि॥ जालमी, पीली सरसे, कुरथी, सौंफ, देवदारु, सफेद जीरा, भरगह की जह, सहिजन की छाल, असगन्ध, येल की छाल, समालू की पत्ती और मेन्धानोम, उक्त सम भौषधों को एक २ उँटाक ले एक बड़े बड़े भर जल में रात को भिजा देय, सबेरे पकावे, घड़ा का मुख ढपा.रहे जब पानी खूप पजाय चूराहे से उतार लेप जब पोड़ा गरम सहने लायक जल हो जाय, रोगी के समस्त शरीर में साक्षादि अथवा नारायण तड या कालीतिल का तेल मालिस करके नियात स्थान में जहां हवा का नाम न हो एक गहरी कठौती अथवा कोई चौकोन पापस जिसमें से पानी न यहै उमी में रोगी को बैठाप ऊपर से दोनों कान्धों से उसी काढ़े को महीन धार छोड़े उसी प्रकार एक दिन बीच में नागा दे के तीसरे दिन फिर स्वेद कर इसी तरह तीन या चार यार करै जम तक शरीर हलकी न हे। ॥ शिरामुखैरोमकूपैर्धमनीभिश्चतर्पयेत् । शरीरेवलमाधत्ते युक्तःस्नेहावगाहने। नातापरतरःकश्चि दुपायोवातनाशनः । शीतशूलाद्युपरमे स्तम्भगौरवनिग्रहे ॥ दीप्लेग्नौमार्दवेनाते खेदनाहिरतिर्मता। इस अवगाहन स्वेद से मष नमों का शोर रोमों का मुख तुल कर शरीर की तृप्ति होती है याने गाड़ियों के मुप जो बालों के छिद्र हैं उस में मयगाहग का गाप प्रवेश के फिर रक्तादिकों के यहने वाली ना. दियों में पहुंध कर मार को शुद्ध भोर पछ फेो प्राप्त करता है। पढ़कर दूसरा यायु नाशक उपाय नहीं है, जप गीत गौर शूडको dि हो एवं शरीर का कहन और मारोपन गाता रहे, मरण ५२: पञ्चमखण्ड । और शरीर मुलायम हो तब स्वेद करागा- यन्द कर देय और स्वेद क. राने के पश्चात् रोगी के शरीर में हया नही लगने पावे क्योंकि मुले हुये नसे में शीघही हवाप्रवेश हो जाता है किन्तु स्वेदके याद रोगी के नेत्र और हृदय को केवड़ा जल या गुलाब जल से धो देना चाहिये । सम्यखिन्नं विमृदितं स्नानमुषणांबुभिःशनैः। भोनयेचान मिप्यन्दि ब्यायामंचनकारयेत् । न पैदा स्वेद कराने के थोड़ी ही देर पीछे रोगी के समस्त शरीर में तेल गर्दन करके गरम जल से शनै २ स्नान करा दे गौर, कम होने पावे ऐसा मेोजन करावे किन्तु परिश्रम किसी किस्मका न करने दे। -arean बमन । . स्वेद कराने के दो तीन दिन के बाद बंगा कराने की क्रिया करै अगर कफ पित्त सूसा हे तो पहिले उसे तर कर उप तप यमन करावे, बढ़े हे तो उसी दिग बमन करावे किन्तु निम्न लिखित पक्षण युक्त रोगी को यमन करावे. जैसे-यगा. के लक्षरा के अतिरिक्त रोगी को नेत्र से का दिखाता है, पेट में कोई विमारी छो, यात. दुषला हो, अति सृद्धि, गर्भिणी स्त्री, पालक, शरीर में फोड़ा फुन्सी हो या मुख से रुधिर गिरता हो या भाप ही मगन होता हो, दस्त में कीड़े जाते हों और बोलने की शक्ति न हो तो उसे यमन गहीं कराना चाहिये और यजा लिया है। शरत्कारी वसन्तेच प्राउटकाखेच देहिनाम् । वमनं रे- चनंचैव कारयेत्कुशलाभिषा ॥

चारोग्यदर्पण। ५३ सापाढ़ और (भारत् ) कार्तिक एगहग ( बसन्त ) फाल्गुन और चैत्र ( माट) श्रावण इग माहीनों में चतुर बैद्य यमन कार्य और जुलाय देखें, सो यह नियम मारेरोग्य-पुरुषों के लिये बांधा गया है जो सालियाना जुलाय लिया करते हैं रोगियों के लिये नहीं क्योंकि रोगियों के लिये सगय परखा जाय तय तक गोगीही घल यमे, रोगियों के लिये हर म. मय हर महीना जुलायादि देने के लिये शास्त्रकारों ने कह दिया है ॥ अगन कराने के एक दो दिन पहले मुलायम मूंग की खिधरी, यवागू या दूध भात अथवा अन्य केाई कफ कृत पदार्थ भोजन करावे और जिस दिन के कराना हो उस दिन भी दो तीन घंटे पहले मूंग की पतली दाल यना के पिलावे ॥ फपा का बेग अधिक हो तो छोटी पीपर २ मासा मैगफल ६ गासा सेंधानान ६ गासा एक सेर पानी में जोस देव जय तीन पाय पानी रह जाय मलकर छान लेय कुछ गरम रहै तब पिला दे पाद पिलाने दया हे रोगी को गाड़े मेाहि के बैठावे जैसे ऊंट वैटते हैं अर्थात् ऊंट के शासन बैठाय के तम फै करावे । रोगी चाहै गले में अंगुली हाल के कर पाया एरंस पत्र की हंडी गले में प्रवेश कर यगम कर क्योंकि बिना किसी वस्तु से गले में मुरमुराहट पहुंचाये बमग अच्छी तरह नहीं होता भौर एक नादमी शिर फो और एक आदमी दोनों पसलियों को सह- राता रहै । वैद्य यहां अवश्य मौजूद रहै क्योंकि सापत रोगी धमहाकर के करने से हिचक जाय क्योंकि अच्छी तरह यमन ग होनेसे मुख से लार गिरने लगता है, हृदय में पीड़ा और फेोष्ट में सजुली होने लगती है सघाभ- धिक यमन होने से भी पियाम, हिचकी, मिहोसी, जीभ निकलगा, नेत्र का बच्चष्पना, ठोड़ी कह जाना, मुख से रुधिर धूंकगा, कण्ठ में पीडा गादि उपद्रय हो जाते हैं इस लिये पान कराते समय. वैद्य यात लाजमी है।

५४ पञ्चमखण्ड। थोड़े दिन की बात है कि यहां पाहगंन में लाला वावशाल कोठीवाल के छोटेदमाद लालाजोखई लालजी सवेरे सिर्फ भीतरी गर्मी निवारणार्थ वमन किया, अधिक बमन होने से ठोड़ी जकड़ गई और जोम घुस गई विहोम हो कर गिर पड़े, बाका बंद हो गया, लोग काठो में उटा लाये, गौ दान होने लगा, ब्राह्मणगण पूजन पाठ करने लगे बड़ा हाहाकार मच गया हमारे बुलाने का कोठो का मुरसार दौड़ा आया हम भी गये, देखा कि मे० फजले- इसन सहर के एक नामी हकोम वैठे हैं कपड़े की दी मोटी वत्ती बनाये छौंक लाने के लिये नाक में प्रवेम कर रहे हैं और दो कपड़ा गुलाव में तर कर छाती और पेट पर रखे हैं और वारम्बार गुलाब जल पिलाते हैं, किन्तु गुलाब जल मुख में देत हौ रोगी धन्वाकार हो जाता था हम भी बैठ गये और लोगों से विहार होने का कारण पूछा तो मालम हुआ कि वमन किया उसी के साथ ही बिहोस होकर गिर पड़े और बाका बंद हो गया,. .इकौम से हमने कहा आप यह क्या करते है, इगके पिर पर गरमी पढ़ने से ठोड़ी नहीं जकड़ी, गले का नस ढोला करिये और जीभ में पानी लाइये अधिक के होने से जीम भीतर चली गई है । वैद्यों को चिकित्सा इकोमों का कहां पसन्द, हकीमने काठोके गुमास्ता में हनुमान प्रभादसे कहा पाप वैद्यनी को दवा कीजिये हमको दारागंज जाना है और यह रोगी तोन चार घंटे में मर नायगा, केसाइलेोगों ने समझाया कुछ भी न सुना चल दिया, हमने गुलाब जल को जगह उष्ण गो का दूध पिलाना शुस्न किया, गले के रंगों में विषगर्भ तेल मदन फराय द्रव स्वेद करा दिया और थोड़ा सा नौंबू का प- चार मगाय जैसा ही उसका गूदा मुखगै दिया कि झट रोगी बोल उठा और कहा कि जरा सा यही दना और खिलापो, सब लोग अचंभेमें भा गये, रोगी फाइने लगा कि गुलाब जल मुख में देत ही मालुम होता था कि मानां छुरी. -- आरोग्यदर्पण। से किसी ने छाती को चाक कर दिया, बोलने को बहुत चाहते थे मुह नहीं उठता था होस हवास हमारा व दुरुस्तया, जब से आप दूध पिलाना शुरू किया उसे कुछ चैन मालुम होने लगाथा इस अधार के खिलाते ही हमारा बाक खुल गया और हम बोलने लगे अब हम मजे में हैं। इससे पाठकगरण मालुम र सक्त हैं कि चिकित्सा का कर्म करना सहन वात नहीं है कितने जुम्मेदारी का काम है कि यदि बिमारी पहचान में भागई और ठीक दवा दिया गया तो रोगो जल्द अच्छा हो गया न समझ में पाया तो रोगी को यमालय पहुंचा देना कठिन नहीं है इस लिये बिना भास्व का अध्ययन दवा करना महा हत्या का काम है। वमनान्तः प्रविष्टायां जिह्वायां कवलग्रहः । . अगर अधिक यमन होने से जीम भीतर घुस जाय तो फषलग्नए अर्थात् खट्टे पदार्थ का गोला बना के मुख में दे अपयां रोगी के सामने बैठ के अन्य गनुष्य पट्टे फलों को साधे तो उनके देखनेसे रोगीको जीभ में पानी जिस्से जीभ कोमल हो जाये । वमनपर पथ्य ॥ यमन कराए हुये रोगी को तीसरे पहर जप तेज भूख लगे तब धुली मूंग और पुराने चावल का यूप या साबूदाना या जङ्गली देश के जीवों के मांस का यूष रुषि के अनुसार देये और जिस दिन धमग कराये ग- रिए गोवा, शीतल जल, तेल की मालिस करमा भादि बर्जित करें। उत्तमवमन के लक्षण ॥ हत्कण्ठशिरसांशुद्धिं दीप्ताग्नित्वचलाघवम् । कफपित्तवि- नागथ सम्यग्वान्तस्यचेष्टितम् ॥ :- पञ्चमखगड़। बाच्छी तरह यमन होगाने से यह लक्षण देख पड़ते हैं-हृदय, गला और सिर की शुद्धि अर्थात् कपिल के वक्ट्रयों का पूर्ण रूप से शान्त होगा, भूस का लगना, शरीर का हलफापन भौर कफ का नाश हो त जानना चाहिये कि यमन अच्छा सुना है । यह यमन कराने का माधा- रन मियम कहा गया है विद्वान लेग इमो अतिरिक्त भी अपनी बुद्धि मता के अनुसार देश काल अवस्था रोगी की महति को परीक्षाकर अन्य जोषियों के द्वारा अथवा नपायों के द्वारा पान करा सकता है । विरचनविधि ।। यानान्ते घिरेधनं याने यमन कराने के बाद दस्त लाने की, दया जरुर देनी चाहिये । यह बात हम पहलेदी. कह चुके हैं कि रोग विशेष समय परखने की जरूरत नहीं है सिर्फ, थोड़ी सी. बुद्धि खरच करने का काम है. रो,शास्त्रकारों ने लिख भी दिया है:- निग्धस्विनस्यवान्तस्य दद्यासम्यग्यिरेचनम् । अवांतस्य त्वधासस्तो ग्रहगौंछादयेत्कफ: ॥ मन्दाग्निंगौरवंकुया ज्जन येहाप्रवाहिकां। पहले कोई पर, मिर खेदक पाद शान करके और जुम्लाम दिया जाता है वही उत्तंग जुलाच हेता है और जो लोग धिगा के किये जु- वाम ले लेते हैं तो उनका कफ नीचे की जांके ग्रहणी को मारमादित कर लेता है जिसमे समिकी मन्दता, देश में भारीपन और बड़ा भारी गतीमार का रोग होता है से प्राय: देखने में भी माता है कि जोलोग भटकठपरपू जुलाय ठे लेते हैं उनकी बिमारी और भी पिंगह जाती है। प्रभा बम जुलाय के योग्य और पोग्य रोगों को दिखलाते हैं। A प्रारोग्यदर्पण। . जुलाबके योग्य रोगी॥ जौर्णज्वरोगरव्याप्तो वासरतीभगन्दगै। अर्श:पांडूदरग्रंथि दृदिद्रोगामचिपीड़िताः॥ योनिरोगप्रमेहार्ता गुल्मप्लीहवणा- र्दिताः । विद्रधीछर्दिविस्फोट विषचौकुष्टसंयुताः ॥ कर्णना- .. शाशिगवक्त गुदमेढ़ामयान्विताः ॥ यकृच्छाधाक्षिरोगार्ताः कृमिक्षारानिलार्दिताः । शूलिनामूत्रघातार्ता विरेकानि- - रामताः। इसने रोगियों को जुलाय देगा लाभदायक है (जीर्णज्वरी) पुराना ग्वार जीर्णज्वर और यक्ष्मा पालेको (गरण्यास) जहर खालिया हो पा जह शैली चीजों के खानेसे शनिवगैरह जिसका बिगड़ गया हो, मात रक्तरोगी, भगन्दर रोगी (गः) मायासीरवाला, पांडुगेगो, उदररोगी, ग्रंपिरागी जि. सके हृदय में दर्द गीर खाना परछा न गालूम होता हो । योगिरोग से पीड़ित स्त्री, प्रमेह रोगी, गुरुम गादि उदर विकार से पीड़ित, पिलही रोग वाला और जिसके शरीर में फोड़ा फुन्मी हो, विद्रधीरोगी, समारोगी, (विस्फोटक) माता की बिमारी बाला (विभूचिका) हैजा यहां पर लोग सन्देह करेंगे कि जिसे सुदही दस्त जारी है उसे जुगाम देभा कैसा ? जुम्लाष देने की विधि इस लिये कहा है कि मिष दूपित मल माला- शय में न रहजाय क्योंकि उसके रहने से अन्ततोगत्या रुधिर पानी हो के द्वारा निर्गत होने लगता है। कुष्ट रोग से पीड़ित । काम, माक, शिर, मुंह, गुदा, लिङ्ग रोगधाला, यात्, शोषरोग, नेत्ररोग, कृमिरोग मौर मायुरोगवाटा, शूछे यागे उदर दई गया मग दर्दवाला ( मूत्राघात ) मुजार रोगवाली ग रोगियों को जुलाम देगा लाभदायक है।

५८ पञ्चमखण्ड। जुलाव के अयोग्य रोगी। वालवदापतिसिग्धःक्षतक्षीणोभयान्वितः। थांतस्टपातः स्थूलश्चगर्भिणी च नवज्वरी ॥ नवप्रसूनागारी च मदाग्निच मदात्ययो । शल्यादितश्वरक्षच नविरेच्याविनानता ॥ . ॥ निम्नलिखित मनुष्यों को जुलाय नहीं देना चाहिये, जैसे-यापक, | बुढ़ापा (पति स्निग्ध) अति स्नेह पानवाला (क्षत क्षीण) कफ के माप खूग या पीब जाने वाले को, भप युक्त तपा रास्ते से थका, अधिक्त पि. यास से दुखित, यहुत मोटा भादमी, गर्भिणी नपा ज्यर याला, जल्दीही जिसके उसकापैदा हुमा हे। ऐमी स्त्री, जिस्को मुतलक भूवन लगती हे। (मदात्यपी) नशीली चीके खाने पीने वाला जिसके शरीर, इथियार उगे हों, ( रुक्ष ) जिसकी शरीर धातु क्षीण वायु के बढ़ने से सूख गई हो. ऐसे लोग फेो धतुर वैद्य कमी जुलाय न देय यदि ऐसा हो. जरूरत संमा पड़े तो सोते समय कोई मृदु रेचन द्रध्य खिला के सबेरे एक दस्त करा दे। जुलाप तीन प्रकार का हेाताई। मुलायग, मध्यग मोर कहा, पित्त प्रकृति याले को मुलायम, कफ प्रकृति पाले केो मध्यग और मात प्रकृति वाले को कहा जुलाय देना वैद्य यरों को सम्मति है किन्तु यक्ष्मा घाले के। मध्यम जुलाप देना चाहिये . पोंकि पह रोग विदेोष अमित होता है। * इस सेह मे पंध वर्मवाला नेह नहीं समझना यहां पति से ता- त्पर्य पधिक घृत तेल, सूरवा चरवो आदि से है मतलब यह है कि जादा चिकनी चीन पौने वाले को यदि पना गया तो समस्त नाड़ियों की पौर मत को शुदी आप भी रहती है और न पचा ता.दस्त जारी होता है ग्रहणी कमजोर रहती है इस लिये जुलाव का मिषेध किया है। 2 ।

भारोग्यदर्पगा। मुञ्जिस । जुलाब के पहले सर्व माधारण के।, प्रकृति के अनुसार मुञ्जिरा ज. रूर देना चाहिये यद्यपि स्नेहादि कर्म से मल मुलायम रहते हैं तथापि अधो रेचनार्थ मल को प्रांत से अलग करना बहुत उत्तम है ॥ 'इमी हेतु से हकीमों ने मुञ्जिस निकाला है और निहाया लाम- दायक है । मुजिम पिनाने से एक बहामारी लाभ यह है कि यदि जु. लाय प्राप्त के अनुसार न पड़ा, दस्त जैसा होना चाहिये न हुमा ती भी कुछ नुकसान नहीं होता इसी लिये अमीर लोग हफीमी जुखाम प्रायः पमन्द करते हैं और हकीम लोग इमका घमंह करते हैं कि हमारे यहां जुलाय देने की जैसी उमदा रीति हे, वैद्यक और हाकृरी में नहीं है । जैसी युनानी जुलाय से रोगी के गल की सफाई होती है, नितम- सन्न रहताहै, घल नहीं घटता यह बात वैद्यकके जुलायमें नहीं है (मा० द०) हकीमों के इस बात को गर्यथा मिथ्या नहीं कह सक्त किन्तु इतना तो अवश्य कहेंगे कि जिस बिमार से दया अधिक न पिपा जाता हो और कफ गिजाग वाले को हकीमी जुलाय कम गुण कारक है ।। यक्ष्मापर मुञ्जिस। खीरा का मोज १ तोला, गुलाब का फूष्ठ २ तोला, मुलेठो ६ मासा, सौंफ ३ मामा उन्ताय १॥ तेलिा, मुनक्का यौज रहित २ तोला, इन संप दवाईयों के अधकचरा कर ३ पुष्टिया मनाले एक पुड़िया फे। गयापाय जाल में रात को भिजा देय मधेरे गन्दाग्नि में पचाय म हेढ़े उँटा जल रहमाय मल के छान छेय और १ तोला गुमाकन्द गुलाब, गुलकन्द न मि- लेती जाधाताला गिनी मिला के पिलाय देप, अगर मिजाज में मादी पाने कफ के अधिक लक्षण मिलते हैं तो सोरा के बीज की गहरेह की गई का छाल हाले गोर गुलकन्द की जगह २ मासा अधानान हाले पचमखगड़। इसी प्रकार सबेरे तीन दिन मुञ्जिम पिनाये, और मूंग की खिधरी, या, मूंग की दाल पुराने घायण का भात घी डाल के खिलाये । बाद चौथे दिन पित्ताधिक्य प्रकृत पाले को. भारोग्य दर्पण प्रथग खगह के ४३ सफे में जो हकीमी जुलाय लिखा है पिलाये मिर्फ अवस्था और रोगी का पलायस देख मात्रा को घटा बढ़ा लेना काफी है शीर क्रिया मय यही है । उसी के नीचे डारी जुलाय लिखा है घई जुगाम भी निहायत उमदा और सप प्रकृिति के लिये खास दायक है वैद्य चाहे तो पिला मक्ता है। एक एक दिन मीच में खाली देके जुलाब देय, जिस दिन जु- लाव देप, उस दिन घृत रहित मूंगकी खिचरी खिलाये और निम्नलिखिम पयों से बचाव . प्रवातसेवांगीताम्बु स्नेहाभ्यङ्गमजीर्णता । व्यायाममैथुन- चैव ग सेवेतविरचितः ॥ तेज हवा में गहमा गहुत शीतल जल का पीना, पी मलाई शादि का सामा, शरीर मे तेल नघटन का मन करना, सूप पेटभर कर भो- जन करना, किसी प्रकार का मेहगत करामा, भौर स्त्री प्रसा जुलाब के दिग कदापि सेवा न करे। खाली दिनों में अर्षात जिस दिन जुमाल का नहीं है खिघरी या भात के साप घी खाना निषेध नहीं है। श्लेष्माधिक्य प्रकृतिषाले को यदि हारी जुलाब देना राय न पर तो यह जुगाय देना। 'पिप्यशोगागरंसिंधु श्यामात्रियतयासह । लिहत्क्षौद्रेण- शिशरवसन्तेचविरेचनम् ॥ --- ' छोटी पीपा १ गामा, शोठ २ गासा, संधागोग ३ मासा, पिधारा पाराग्यदपंगा। के जह की छाल ६ मामा और निशोत ६ मामा सब को महीन पीस एक तोला महत, साग के खिलादे भौर ऊपरसे योहासा गरमजल पिला दे यह दया पूर्णमाना है बलाबल देखकर चिकित्सक मात्रा घटा बड़ा सत्ता है। 4 रेचन पर अभया मोदक । अमयामरिचंशुण्ठी विडंगामलकानिच। पिप्पलौपिप्पली -मूलं त्वक्पचं मुस्तमेवच ॥ एतानिसमभागानि दंतीचहिगुणा भवेत् । विश्वदष्टगुणाजे या षड्गुणाचात्रशर्करा ॥ मधुना मोदकंकृत्वा कर्षमाचप्रमाणतः। एकैकंभक्षयेत्पातः शोतं. चानुपिवेज्जलम् ॥ तावविरेच्यतेजंतु विदुर नंसेवते । पा- नाहारविहारेषु भवेन्नियंचांसदा ॥ अभया मोदक का गुण । विषमज्वर मन्दाग्नि पांडुकासभगंदरान । टुर्नामकुष्ठ" गुल्माी गलगंड व्रणोदरान् । विदाइली हमेहांश्च यक्ष्मागां नयनामयान् । वातरोगंतथाध्मान' मूत्रलच्छाणिचाश्म- रोम् ॥ यमयाभोदकाोते रसायनवराःस्मृताः । पृष्टपा- मनघन कय्युदरुनंजयेत् ॥ सततंगौलनादेप पलितानि विनाशयेत् ॥ (अभया) महान पानी में डूब जाता है wrrant पचमखण्ड । जा सय हड़ों से यहा और दस्तायर होता है १ तोला, काली मिर्च १ ताला, वैतरा शेठ ताठा, पायपिडंग १ तोला, आपला बीजरहित १ ताला, शुद्ध छोटी पीपर १ तोला, पीपलामूल १ तोला, . दालचिनी । ताला, तेजपात १ सोला, मापा १ तोला, जमालगोटे के ज.फी छाल (मी को लोग दातूगि भी कहते हैं) २ तोला, निगोत चाहे फाली हो या सफेद ताला, और मित्री या चिनी ६ ताला । सब दवाइयों के कूट कपरसन कर ऊपर से मिश्री मिला सहन में सान के धार २ मासे की गोली यनाय लेय, यह पूर्ण मात्रा है, ताकत के अनुमार यद्य मात्रा को घटा बढ़ा सक्ता है। प्रातःकाल एक गोली खा के ऊपर से शीतल जल पीने से दस्त भाते हैं । शीतल जल इस जुखाय फा लाग है, पीच २ में थोड़ा २ शीतल जल रोगी बराबर पीता जाय, गरम जल पीने से दस्त बन्द होता है इस लिये जय दस्त बन्द करना मंजूर हो तो गरम जल पी लेधे । किन्तु मुञ्जिस के बाद इस जुलाय का लेना बहुत अच्छा होता है । एक २ दिग बीच में खाली दे फे यह जुलाब लेवे, अभया मादक से निम्नलिखित मेग नष्ट होते है । विषमज्वर, मंदाग्नि, पांडु रोग, खांसी, भगन्दर, सम प्रकारका कार् गोला, पयासीर, गलगंष्ठ, फोड़ा फुन्सी, उदर रोग, दाह रोग, पिलही, ममेह, यक्ष्मा रोग (जिसके प्रकर्ण में लिख रहे हैं) और नेत्र रोग. यात रोग, पेटका फूलना, सुजाक एवं पथरी रोग, यहसब पारा होते हैं, या मोदक उत्तम रसापनहै पाने हमेशा इसी मादकका जुलाप खिया करता. यह मनुष्य जल्द बुढ़ापा न हो, इसके अलावा पीठ, पशुरी, आंध, पिंडरी, कमर और पेट इनके दर्द को भया मादक बहुत जल्द भाराम करता हे भगा इस मेदिक के द्वारा गनुष्य अपने को मर्यदा दूर करता रहे तो पाठ उसके यहत शरद न पके किन्तु यहां श्लोक के ठीक गाने हैं (मतसंशोउनादेप पलितागि धिमाशयेत् ) निरन्तर रूप मेदिक के मेषग करने से सफेद बाल काले हो जाते हैं यह बात भसम्भा जाम पता हे , पाराग्यदर्पण। दांमठ माफ लाने के लिये अगर जुलाधन भी दे के अभया मादक खिलाये तो कोई हर्ज नहीं है। इसके अलाया और भी अनेक प्रकार के उत्तम जुलाब है जिन्हें मि. रेधन प्रकर्ण में लिखेंगे। अगर जुलाश की तेजो मेदे पर पहुंच ने से दस्त अधिक जाये या दस्त न रुकै पापया पेट में दर्द आदि उपद्रव है। ते। दे। ताला भांम के छाल को पानी में महीन पीस लुगदी मनाय दही में मान नामी पर लेप कर देय और खाने को बकरी का दूध भात गिनी या मूंग की खि चारी खिलाये और पोड़े से घायल के धोषन में मिश्री मिला के पिलाये जौर गुलाब जल अथवा जल से पारम्बर नेत्र मुख धोदिया करे। जुलाय देने से दस्त खुलासा ग आय अषया जुलाय पचणाय तो बिना दस्त कराये रोगी को अन्य भोप न देय और घबहा के चुप चाप न हो जाय उसको सूय विचार करे कि जुलाप क्यों पच गया दस्त खुलासा क्यों नहीं पाया ? अगर रोगी को प्रकृति गरम है और गरमही जुलाय दिया गया है इस कारण जुखाय नहीं हुआ हो तो गु. लफन्द गुलाम सीरखिस्त वगैरह शीतल जुलाप पिला के दस्त कराये और सरद मिजाज चाले को सरद जुलाय के देने से दस्त न माया हो तो हए मनाप वगैरह देके दस्त कराये अगर खुश्कीफे बजे से ग हुणा । तो पुगः स्नेहपान या मुजिस अथवा भाग्यधादि काप पिला के माप के। गोला फरै और उसका फिर जुष्ठाय देवै । जुखाय देने के दो तीन दिन याद तय पस्ति क्रिया याने पिचकारी को विधि प्रारंभ करें ॥ है वस्ति कर्म। गुदा के भीतर पिचकारी देने को कस्ति फर्म कहते हैं, यह · पंच पसमग्वगड । कर्म की गन्तिम क्रिया है इस क्रिया मे मेदे की मफाई, मायु का नाश, दिल दिमाग में ताकत धातु और गायु की वृद्धि होती है। मा बस्ति दो प्रकार की है एक अनुशासन मस्ति, द्वितीय निम्हण मस्ति । यःस्नेहैर्दीयते सस्यादनुवासन नामकः। कषायक्षौरतले. निरूहः सनिगद्यते ॥ जिसमें घी तैलादि स्नेह युक्त पिचकारी दिया जाता है उसको शानुधामन बस्ति कहते हैं और जिगणे काढ़ा दूध तेल इत्यादि मिश्रित करके पिचकारी देते हैं उसको मिरुद बस्ति कहते हैं। पिचकारी के जरिये से गुदा द्वारा मलाशय में भीषध प्रवेश कर मल माफ करने की क्रिया डाकृती में बहुत अधिक है । वैद्यक में भी है किन्तु वैद्य लोग पहरेज के मारे किमी को भत्यावश्य पहने पर भी पि. चकारी नहीं देते और न अपने किसी शिष्य को मिखाते हैं कि उसी से काम लिया करैसो से और भी वैद्य विद्या प्रतिदिन नष्ट भ्रष्ट होती जाती है। पिचकारी की क्रिया ऐसी सहज है कि जरूरत पड़ने पर मनुष्य अपने लिये भाप खुद कर सकता है और भाज कल का अधिक रहने के कारण लोग प्रायः पिचकारी अपने व्यवहार में लाते हैं। कि- तो गरम जल से रोज मलाशय को धोते हैं । जुलाब लेने के बाद पि. चकारी लेने से अवस्था की स्थिति नादि गुण जैसा की बैद्यक शास्त्र में लिखा है अवश्य होता है। शरीरोपचयंवर्ण वर्लमारोग्यमायुषः। कुरतेपरिवद्धिं च बस्तिःसम्यगुपासितः॥

आरोग्यदर्पण। अच्छे मकार मस्तिषम होनेसे शरीर पुष्ट और बलवान, चेहरेपर रौनक जारोग्यता और मायु की वृद्धि होती है । मुश्रुत महराण भी चिकित्सा स्थान के नीम अध्याय में लिखते हैं। 'बौंगाबस्तिरादत्त दोषानापादमस्तकात्। पक्वाशयस्थोऽ- म्बरगी भूमेरोरसानिव ॥ जैसे भाकाश में नदय हुआ मूर्य अपनी किरणों के बल से पानी को खीच लेता है उसी प्रकार पक्षाशय में स्थिर हुई बस्ति अपनी ताकत से पैर से सिर तक के दोषों को नाश कर देती है ॥ सकरांपृष्ठकोष्ठस्थान्वीयेगलाड्यसञ्चयान् । उत्खातमू- लान्हरति दोषागांसाधुयोजितः ॥ मिधि पूर्वक दी हुई यस्ति (पिचकारी) अपने पराक्रम कार, पीठ और कोठे में गञ्चित दोषों को गाश कर देती ॥ दोषषयस्ययस्माच्च प्रकोपवायुरीश्वरः । तस्मात्तस्याति- वृद्धस्य शरीरमभिनिततः वायोर्विषहतेवेगं नान्यावस्तेते. क्रिया । पवनाविद्दतायस्य बेलावेगमिवादधः । यह शरीर के सथ दोपों में पायुही प्रधान है और मायुही के बने से कफ शीर पित्त भी बिगह जाते हैं। जम यायु अत्यन्त यढ़ कर शरीर को नाश करने लगता है उस समय पिधकारी को छोड़ कर फाई दूधरा कर्म ऐगा नहीं है जो उसे शान्ति कर सके। जिस प्रकार घायुं येग से उ. उखती हुई समुद्र की सरगों को येला विधाय मोर कोई नहीं रोक पासा, ऐसेवी उस यायु को सिवाय पस्ति ( पिचकारी) के दुमरी क्रिपा गों रोष सजी है । सम्पूर्ण पस्सिक्रिपा वस्तिमक्रियाफे प्रकर्ण टिसँग ।

पञ्चमखण्डं। इस स्थल में इतना कहना बहुत जरंग है कि पिचकारी किसी जानकार (जैसे डाक्तर या शिक्षित कम्पोहर मादि) से दिलाना उचित है अधिक अभ्यास परजाने पर मारोग्य पुरुप स्वयं पिचकारी भी ले सक्ताहे और प्रायः लोग पेट साफ रखने के निमित्त तथा योग साधन करने वाले सभ्यास रखते भी हैं। यह हम प्रथमही लिख चुके हैं कि बस्ति दो प्रकार को है मनुवा- सन और निरुह । निरूह बस्ति के बिना अनुषासन यति ठीक नहीं है क्योंकि जैसे पहिले नालियों में से कूड़ा निकाल कर फेकने से जल सुख से बहता है, ऐसेही निरूह वस्ति के द्वारा नार्ग शुद्ध होने पर स्नेह बस्ति देने से वह चिकनाई सुख से स स्थानों में पहुंच जाती है तथापि पञ्च- शरीर शुद्ध होगया है तो निरूप पस्ति की कोई जरूरत नहीं? इस लिये विरेचनादि करा के दो तीन मनुवासनमस्ति दे ।। अनुवासन बस्ति। विरेचनात्सप्तराचे गतेवातवलायच । कृतान्नायानुवांस- स्याय सम्यग्देयोऽनुवासनः ॥ उत्सृष्टानिलविण्मूचे नरेवस्ति विधापयेत् । एतेहि विहितःस्नेहा नैवान्तःप्रतिपद्यते ॥ स्नेह- - वस्तिर्विधेयस्तु नाविशुद्धस्यदेहिनः । स्नेहबीर्यतथादत्ते देह- चानु विसर्पति॥ जब जुलाब को दिये हुये सात दिन बीत जाय, रोगी बलवान हो जाप और चलमे गिरने की ताकत नाजाय और देसे कि अनुशासन देने की मावश्यकता है, तब उचित रीति मनुवासन बस्ति दे (विधिः) पसी देने के पूर्व रोगो को मउ मूत्र त्याग करादे क्योंकिशोरणे मलभूत्र पाराग्यदर्पगा। के रहने से स्निग्घता याने चिकनाई भीतर जाने नहीं पाती, इसी लिये स्नेह बस्ती अशुद्ध शरीर वाले को कभी न दे क्योंकि अशुद्ध रोगी के श- रीर के मलही चिकनाई के बीर्य को खींच कर अनेक रोग उत्पन्न करते हैं। यक्ष्मा रोगमें देने लायक अनुवासनमस्ति यह है-गधापुना का जड़, देवदारु, परियारा की जह, शतावर, लाल चन्दन, रासम, मैगफल, जेठी मधु, कमलगट्टे की गरी, मदुममाख, मोपा, पित्तपापडा, खस, निशोथ और सुगंधषाला, इन गघ भीषषों को दो दो तोलाले अधकचरा कर पांष सेर पानी में रात्रि को भिजा दे सधेरे चूल्हे पर चढ़ाय मांध देय जम चौथाई जठ रह जाय, चूल्हे पर से उतार शीतल होने पर मल कर छान लेय, माद एक सेर फाले तिल का तेल कड़ाही में मै उसी काढाके हाल धीमी गांव में पकाये और तेठ का चौगुगा गौ का दूघ सम्र को हाल धीमी मांध में पकाये, जब काढ़ा और दूध मिलकुल जा जाय तेल मात्र रह जाय छान कर बोतल में भर काग लगा के रख देय इसका मावा दो तोला से ५ तोला पर्यन्त है, रोगी के पल के अनुसार मात्रा को थोडे गरम जल के साथ नियोग करै भोर प्रकृति के अनुसार भोजन देय । मुलप्त में मनुषासन पस्ति की बहुत कुछ प्रशंधा लिखी है। (१) मस्ती से मूत्राशय और अंहकोश चिकने होते हैं । (२) से ग. स्तिष्क का बायु दूर होता है । (३) से पल और तेज बढ़ता है। (४) से रस (१) से रुधिर (६) से मांम (७) से मेदा (८) से मज्जा (c) से शुक्र पि. कने गीर सब दोष दूर होते हैं। जो गनुष्य विचार के साप १८ यस्तो संता है यह मप रोगो से रहित महा घठयाग होकर १२० वर्षका जीने | वाला होता है। 'मस्ति क्रिया.के पयांत शेष रोगों को निम्नलिखित दवाइयों में शांति करें। .

पचमखण्ड। इस बात को प्रथम ही लिख चुके हैं कि पंगफर्म यलबाग रोगी को कराता क्योंकि शीण मनुष्य की पंप कर्म पिप रागान मारफ होते हैं। कारण इसका यह कि मनुष्यों का धन योर्य के गधीग है और जीवन म से जधीन है इसलिये क्षीण रोगी के बीर्य और मल की रक्षा यन पूर्वक करना चाहिये । इसी प्रकार औषध को भी जानना गितना पल. धान जौषध और मात्रा है ययान रोगी के लिये दिया जाता है उसले माधी मात्रा तथा वैसाही बली जीपंध क्षीगरोगीको नापी देगा उचित विपरीति होने से लाभ की अपेक्षा हानि पहुंचना सम्भय है । --20:*:- लवंगादि चूर्ण यक्ष्माधिकारे । लवंगशुद्ध कपूर मेलात्वकोशरम् । जातीपालमुशौरंच नागरकृष्णजोरकम् ॥ कृष्णागुरुस्तुगाक्षौरौ मासौनीलोत्पलं कणा । चन्दनंतगरंवालं कंकालंचेतिचूर्णयेत् ॥ समभागा- निसर्याणि सर्वेभ्येांसिसाभवेत् । लवगाद्यमिदंचूर्ण राजाह वन्हिदीपनम् ॥ रोचनंतर्पणंवयं त्रिदोषघ्नंवलप्रदम् । दो- गंकंठरोगच वासंक्षिांचपीनसम ॥ यक्ष्मागतमकंश्वास मतीसारमुचतम । प्रमेहारुचिगुल्मादीन्ग्रहणीमपिना- 'शयत् ॥ पञ्चकर्म के पश्चात् इस पूर्ण को जिस की विधि नीचे लिखते हैं, दोनों समय सहत. के साथ या गुलभगता के सरपत के शाप घटा के ऊपर से माधपाष गो का दूध में मिश्री मिला के पिलाये ।

भारीग्यदर्पगा। छौंग (शुद्ध कर्पू* ) माफ कपूर ( ऐसा ) छोटी लापपी ( त्वङ् ) कलमी ता अर्थात् पतली दालचीनी, नागकेशर (जातीफल) जायफल (नशी र) खान (नागर ) वैतरा शेोठ, कालाजीरा (कृष्णागुरु) काला अगर (तुगाक्षीरी) नीलकण्ठ सलोघम (मांसी) जटामासी (गोलापलं) कम. छग की गरी (कणा) छोटी पीपर सफेद चन्दग (३ बालं) सुगन्धवाला और कोल इन सब दवाइयों को समान भाग ले फूट कपरछन कर सम दवाइयों की जाधी गिश्री मिलाय किसी अमृतमान भयया कागदार योसाल में भर कर रखदेय । इस चूर्ण को गात्रा माधे मासा से २ मासा पर्यन्त है, इसको लयमादि चूर्ण कहते हैं ( रागाह ) राजाभों के खाने योग्य है (पन्हिदीपन) ममि का खोलने याला (रोचन) खाद को बढ़ाने याता (तर्पण) हृदय को ताकत देता है (टष्यं ) शरीर को पुष्ट करता है विदेोप नाश और अल का बढ़ाने वाला है (हृद्दोग) छाती में दर्द या दिपा पर घमाहट मालूम होना (फंठ रोग) गले में दर्द होना या गले में घाला घगेरह पड़जाना, खांसी, हुचकी ( पौनसम्) जुकाम याने माक का पाहगा (यक्ष्मा) कफक्षई, तमक नामक स्वांस, अतीसार (उरक्षत) कफ के साथ रूधिर या मवाद का गाना, प्रमेह, अरुधि गुरु ग्रहणी मादि रोग को यह चूर्ण नाश करता है । , * भाफमें कपूर लमाय के शुद्ध किया जाताहे जिसको क्रिया काठिन है उसे रस मकर्ण में लिखेंगे इस स्थल में खूब सफेद भोप उड़ने वाला कपूर लेना वह भी शुद्धही है। +मीलोत्पल-कृष्ण कामल को कहते हैं, जहां कमल के किसी अंगका वर्षग न हो वहां कमल के फल ( कमलगट्टा) को लेना चाहिये, वजार में मनां विधाता है। यदि नीलकमल का फल न मिले त मामूली कमलगट्टा बाजार मे लेकर भोसर को गरी निकाल, उसके भीतर को हरी पत्ती रहती है फिका देवयोंकि उसमें दोष है ॥

पञ्चमखण्ड इस चूर्ण के खाने से गरमी मालूम हो और भाउ दग दिन खाने से कुछ भी फायदा म मालूम हे। जैमो लि तारीफ ऊपर लिखी है तो म येरे सिर्फ यङ्गादिपूर्ण साधे और शाम को निम्नलिखित जाती फलादि चूर्ण को घटावे क्योंकि जाती फलादि में विशेष कर भूख को खोलना, खाना हजम करमा, भौर दस्त की बिमारी को ठीक करना प्रधानगुणहे । जातीफलादि चूर्ण। जातोफललवंगैला पत्रत्वङ्नागकेशरान् । कपूरचन्दन तिलेस्त्वक्षीरौतगरामलैः ॥ तालीस पिप्यलोपथ्या चित्रक स्थूलजोरकः । शुंठीविरंगमरिचान् समभागानिचूर्णयेत् ॥ यावत्येतानिसर्वाणि कुर्याद्रंगांचतावतीम्। सर्वचूर्ण समादेया शकराच भिषग्वरः ॥कर्षमावंततःखादन्मधुनानावितंसुधीः । अस्य प्रभावादग्रहणी कासवासामचिक्षयाः ॥ वातले पा- प्रतिश्याया:प्रशमयांतिवेगतः ॥ जायफल, लौंग, लोटीलायची तेजपात, दालचिंगी, नागकेशर, कपूर, सफेदचन्दग, कालीतिल, बसलोचन, तगर बीजरहितसूखामांबडा, तालीसपत्र, मोटोपोपर, छोटी , चीता (स्थूल जीरक) कलौंजी, बैतराशीठ, पापविरंग और मिरच । इन सब जीवधियों को समानभाग फूट कपालान करय जोर जितना सब पूर्ण तौल में हो उसी के मा. घर.धुली हुई भांग केो महीन चूर्ण कर मिला दे और जिसना भांग सहित सप चूर्ण. तौलगे है। उतनाही मिश्री मिलादे। इस को जातीफला. दि पूर्ण कहते हैं । शापा जी इस चूर्ण का मात्रा एक कपं अर्थात् १० माला लिखा है किन्तु बर्तमान समय में जहां तक परीक्षा से विदित भारोग्यदर्पण। . हुआ है कि इस कदर मात्रा मियाय गहिरी भांग छाननेवाले के यदि अन्य रोगी को दिया जाय तो मायत यमालय को रास्ता न पकः किन्तु तलीफ निस्सन्देह भोगना पड़ेगा। इसका मात्रा माधा मासा से २ मासा पर्यन्त है । अगर गमा भौर गामो न करे तो ४ भासा सक भी खा सक्ता है। इस चूर्ण को संध्या समय सहत में घाट के ऊपर से गुम गुना दूध मिश्री मिला के पिये। जातीफलादि चूर्ण विशेषकर ग्रहणी, खांसी, श्वास, अरुधि, क्षई और बात कफ सहित जुकाम को बहुत शीघ्र माराम करता है और खोलता है । यक्ष्माधिकार में जो कुछ दया हम लिख आये हैं और लि. ख रहे हैं, ये सप पंच कर्म से निश्त रोगी के लिये भी है और जिन्हे। ने पंचकर्म नहीं लिया उनके लिये भी मुफीद है। मगर यक्ष्मायालेका मल शुद्ध न होता है। अपघा फफ के साथ कुछ सून या रंगीन और दुर्गन्धित कफ गिरता हो तो निम्नलिखित मरिष्ट उपरोक्त दोनों सोपों के भलाषा दिन में दो तीन मार भोर सोते समय पिलाये जयषा केश मरिष्ट पिठाधै ॥ - द्राक्षारिष्ट उरःक्षति पर । द्राक्षातुलाघहिद्रोणे नलस्यविपचेत्सुधीः। पादशेषेकपा- येच यूरोशौनेविनिक्षिमेत् ॥ गुडस्यधिगुणांतच खगेलापत्र केशरम । प्रियंगुंमरिचकृष्णां विडंगचेतिचूर्णयेत् ॥ पृथक्- पालान्मितैर्भाग स्तताभांडेनिधापयेत् । स्थापयत्वाततामास ततानातरसंपिवेत् । उरःक्षतंचयंहति कासश्वासगला- मयान् ॥ द्राक्षारिटायःप्रीतो वलसन्मलशोधनः ॥

७२ पञ्चमखण्ड। SN मेर ले सूथ नमदा बढे २ दानों का मुगका कलकतिया तौमा भीतर का पोज निकाय 5२० सेर पानी में धीगी गांध से पकावे जाम पौधाई जल बाकी रहे धूल्हे पर से उतार शीतल कर, गत्ल कर छानलेप पश्चात् २॥ से मिश्री और दालचिनी, छोटी लायची, तेजपात, माग- केशर, प्रियंगुफूग और पायमिरंग चार २ तोला । काली मिर्च और छोटी पीपा दो दो तोला सयों को अघकचरा कर उक्त मुनक्के के फाढ़ेमें डाल एक मृत्तिकापात्र अथवा चिनीके पात्रको चन्दन अगर शीर कपूरसे धूपित कर नम में भर उसका मुख प्याले और मट्टी में बन्द कर ( जिस्म हया भीतर न जाय ) एक महीना तक ऐसे स्थान में रख दे जहां दिन धूप और रात में मोम लगे पश्चात् एक महीमा के मल छान कर पोतल में भर लेय इसकी द्राक्षारिष्ट कहते हैं, यह भर्फ कमी षिगता पहीं । इस का मात्र छ गामा से दो तोला पर्यन्त है । अगर उपरोक्त देोगों चूर्णो को भी दिये जाय तो इस आरिष्ट केो १२ बजे जोर ४ पजे दिन में और एक मात्रा सेते समय पिलाथै । यदि कफ के साप रक्त के छोटे गरायर जाते हो तो एक २ मात्रा गरिष्ट दिनार से छ दफे याने दे। २ घंटे पर पिलावे । यह अरिष्ट सरक्षतके अतिरिक्त पावासीर, उदावर्त, गुल्म, उद रोग, कृमिरोप, रक्तदोष, भनेक प्रकार के कोंढाफुन्सी, नेत्र रोग, शिर रोग, गलरोग इन सबोंको नाश करता है, जमिको खोलता और मन्न को पचाता है एवं दस्त मुलासा खाता है द्राक्षादि घृतं.। प्रस्थमेकंतुट्रानातामधुयष्ट्या:पलाष्टकं । चतुःप्रस्थेनलेपक्षा पादशेषंसमुद्धरेत् ॥ पलंयष्ठीपलंद्राचा कणाचूर्णपलयं । प्रदायसर्पिषःप्रस्थं पचेत्तीरेचतुर्गुणे ॥ सिधेशीतेपलान्यष्टौ शर्कराया:प्रदापयेत्। एतत्वाचावृतसिइंचरावीणेसुखावई ॥

आरोग्यदर्पण। ७३ लेय, मुनक्का वौज रहित । सेर, मुलेठी डेढ़पाव दोनों को कुचल कर ५ सेर पागौ में रात को भिजा देय, सबेरे जोस देव जब चौथाई जाल रहनाय चूल्हे पर से उतार पीतल बार छान लेय। बाद उसको मुलेठो और नौपारमित मुगका दो दो ताले, छोटो पीपर 8 तेोला तौनांका शिन पर पानौसे पौस लुगुदी बना गौ का घी एक शेर किमी कलईदार कढ़ाई में चड़ाय तौनां दवाईयों की लुगदी और मुनहा मुलेठी का काढ़ा दानों को उमी पढ़ाई में डाल धौमौ मांच से पकावे और ऊपर ये ४ सेर गौ का दूध डालद जब पुरते २ पानी दूध सब काला कर घृत अकेला रह काय चूल्हे, पर से उतार छाग असतवान अथवा घो को नदियां में रख देय जिस रोगो को सिर्फ धो पिलाना हो तो उस धी में डेढ़ पाव मियौ पौस को मिला देय भगर घृरा दो भोजन के साथ खिलाने को राय होतो सिर्फ दाल रोटो को साथ देव और दूमौ धौ से दावा तरका- री वगैरह केक भी मक्त हैं क्योंकि मामूली घी गायः गगी को नुकसान कारता है खास बार निस यक्षावाले को खांसी अधिक रहती है कच्चाघी खांसी. बढ़ाता है इमोसे वैद्यलोग ज्वर खांसी में घी खिलाना बन्द कर देते हैं निरणे रोगी के भीतर खत्री पहुंच कर भरीर सूखनाती है। हकीम लोग इसी डर से धौ की जगह बदाम का तेल खिलाते हैं और उससे तरकारी वगैरह भी पकवाते । चन्दनादि तैलम् । चन्दनास्युनखेवाप्य यष्टौशैलेयपदाो । मंजिष्ठासरलंदाम शट्येलापुतिकरं । पयशैलंसुरामांसी यांकालंवनितांबुदं । हरिद्रेसारिवेतिक्ता लवंगागुरुकुमं ॥ त्वग्रेनलिकाचैवी भिस्तैलमस्तुचतुर्गुणं । लाचारसत्तमंसिद्ध ग्रनंवलवर्णकृत् ॥ अपसारच रोन्माद कृत्यात मोयिनाशम् । पायुःपुष्टिकर- चैव वशीवारणमुत्तम । विशेषात्नयरोगघ्नं रतपित्तहरंपरं । चन्दगावमिदंतल गानास्वातंजगया.॥ ।

पाराग्यहपंग। ७५ . 4 A थों से क्षयौवालों को पाराम होता कुल ग देख पड़े तो मान लेना चाहिये कि सप्त धातुओं में से जिसे यह शरीर रचित है अवश्य कुछ चीण होगये हैं क्योंकि धातुओं के क्षीगा होनेही से क्षयो रोग असाध्य हो जाता है। वद्य लोग इन विषयों पर काम विचार करते हैं। सप्त धातु यह हैं रस, रक्त, मांस, मेद, हड्डी, गज्जा और शुक्र याने वीर्य अथवा रजा । इसके क्षय होने का लणन ग्रंथ बढ़ जाने के भय से स्नोकों में न लिख कर पाठक गणों के बोधार्थ भाषा में लिसे देते हैं। रस क्षय लक्षण। रस के क्षप होने से शात्यन्त खुश्की, अमि की मन्दता, शरीर में क- म्पन या शरीर का घर पराना शिर, पीड़ा, उदाशीनता, साकस्मात् रंज का होना और घुमरी होती है । मांस क्षय का लक्षण । गांस के क्षय होने से शरीर का अत्यंत दुयला देगा, बाहों को शि- पिलता, नींद का नशामा अपघा अधि. नींद का माना, यातों का भूलना भौर पण का नाश यह उपद्रय होते हैं । मेदः क्षय की लक्षण । मेद के कमी होने में शरीर थकी मी, ममका कही ग लगा, यदग का टूटना, चलने फिरने की ताकत कम हे, स्वास अत्यन्त सामी, साने पर मन का न पटना और न साता हगा होना, इत्यादि क्षण होते अस्थि क्षय के लक्षण । पड़ी के तप होने में मन भति उदाग, भीर धातु की कमजोरी, पिक होती है तथा मेदा तप के जो कुछ लक्षण हैं यष्टगी गिलते हैं ।

७६ पञ्चमखण्ड ।' वीर्य क्षय के लक्षण । बीर्य के कगी हो जाने से किंधार का ठीक न रहना, अकस्मात् रंज करना या रोना अथवा अधीर्य होना और यारम्बार कवना को अपम नहीं जोगे, हाथ पैर मुख वगैरहमें सूजन होगा, रात में गींद ना ग भागा धीमा ज्वर का बना रहना जयंया दाह का होना इत्यादि छक्षण वीर्य क्षय के होने में होता है। रस रक्तादि वृद्धि कारक उपाय । वैद्यों को तथा न्य लोगों को जो साधारण चिकित्सा करते हैं उचित है कि गिदान के रूपर ध्यान अवश्य रखें । यक्ष्मा रोग पाले. के शरीर में यदि रए और रुधिर की फगी का लक्षण मिलते ही ar जितनी दवादे तस्में पसरतका पिरोपी फोई दया न हे। पल्कि जहांतक पदिकारक जीवपद जैसे गुरथ चाद पिसी पौषध के योग में है। अपया गुरुष फा पान्ट या शाप पिलाना या गुरघ का मात दाख साथ घटागा रम रक्त दोनों को पढ़ाता है और फालीगिरी में पाया हुपमा गी का दूध जपपा पता सुभा दूध मिशी सहित दश पन्द्रह दागा गोल मिर्ष, चाय कर राशी में पीना फायदा होता है अनेक बार देखा गया है कि यह प्रयोग से निस्सन्देह रसों की वृद्धि होती है और क्षय रोग छुट जाता है। - पध्य। एक साल का पुराना गेहूं का भूमी, सहित, भाटे की खमीर उठाकर रोटी शपषा जप की गूरी की रोटी, गाली.संज्ञक पुराना पाषष्ठ वैद्य जनों ने श्रेष्ट कहा है..

पारोग्यदर्पया। ७७ । रक्त वृद्धि कारक उपाय । वृतदुग्धसिताक्षीद्र मरिचानिचपिप्पलौ । पानंशस्तं मनु- .ष्यागां साधिकारंपरम् ॥ मह योग क्षई रोग में बहुत सरल और मामाया हुगा है। घी, दूध, मिनी, सहत और मिर्च इन्हों का पना यना कर पाना रक्त वृद्धि करने का श्रेष्ठ उपाय. है । जैसे १ पाय गौ का दूध पका हे। या कच्चा हो रोगी के मिजाज पर है उसमें ६ मामा महत, दश मासा घी, एक ताला मित्री २० दाना कालीमिर्च पा माधो पीपर पीस के मिगा कर सयों को एफदिल पर नाम सधेरे चाहे किमी दया के खिला कर ऊपर से पिता दे अथवा चल उगीको पिलाये यह योग भयश्य मृसे हुये रक्त को हराभरा करता है। पथ्य ॥ उपरोक्तं पथ्य के अतिरिक्त मुहं की दाल, म , मैंधव गान और मातदिल खान पान वगैरह । मेद वृद्धि कारक उपाय । जितने इलफे पान याने जल्द एजग हेने चाले हैं भय हित है। गलग, घी, दूध, गिनी भीर गोठे सरपत यगैरह उत्तम है। जक ए मकार का शराम है जिसका पयाग जागे करेंगे किमी २ को पराही फायदा करता है। जांगल देश के जीयों का रम याने मुरुया पिलाना वैद्ययरों ने श्रेष्ठ कहा है किन्तु हमारी राप में जप किसी अन्न खारा पान या दवा से लाभ न पहुंचे तो गन्त, अपकारी पुरुपक शारो. ग्या मांस खिलागा मनुषित नहीं है । शितोपलादि पूर्ण सहतगें घटा कर कपर से पका हुभा पकरी का दूध गिनी सहित माम गधेरे पिशा. मा भी मेद को वृद्धि कर क्षई रोग को जाराम करता है । अस्थि वृद्धि कारक उपाय । पक्कानियतशस्तारा क्षौराणि विविधानिच । भन्नानि मधुरानि सर्वाणि च प्रयोजयेत् ॥ करूप .

पञ्चमखरा । अधिक दिग सई रोग रएने से भपया जीर्णज्वर में मनुष्यको शख्यि या वो पतली पड़ जाती है जाम कर पाए पैर हमर और पमुखिये। को दुिपां जरूर पतली और कार की जाती हैं में गाया हुआ माने के प्रभारफे घी दूध, और अनेक प्रकारले मीठे मात्र मीरजांगल देशों के जोधों का गम हित है॥ शुक्र वृद्धि कारक उपाय। शुक्रपयेप्रपाकानि रसागिचविशेषतः। नवनीतंगधांक्षीरं मधुराणिच सेवयेत् ॥ कार्कटौमूल पयसा विदारीकंदशाल्म- सिताठ्यपानंच हितं शस्यतेमधुराणिच ॥ . यीय आप में अच्छे २ कार के भरवत दूध का निकाठा'एगा म- क्खन, तत्कांड का दुपा हुमा दूध, खोर गाउपुंया मादि पगे हुये मोठे भात शफाहो से जड़ की छाल, विषारीफेद शोर सेगम का मूसरा गिनी मिला हुमा दूध के साथ पिलाने से अत्यंत फायदा करता है अपया गीचे लिखी हुई दवाइयों को गौ को खिला र म गौ के दूध के भी पिणाने से अत्यन्त फायदा होता है जोर तारीफ भी यह है मि.फिर रोगी को धातु वृद्ध कर भीषध साना नहीं पता ॥ 'अश्वगंधादि चूर्ण । गागौरी अमगंध १ छंटा, शताया २ छंटाक, मफेदमुच्छी ३ उंटाफ तालमसानी ४.छंटाक मखाना.५ छंटाक सेगा का मूगरा ६ छंटाफ भीर विगी जाधमेर.सप दवाइयो. को फूट कपर जान कर उसीगे घिनी मिला अमृतवान रख देय पहिले साधी छंटा मधेरे और जाधी छंटामांम को जाधमेर की पत रोटी गाय रोटी को मठ कर उसी में एक गाना दया गौर साधपाय शहरं मिला पिताय देय पया' यानी में मिला. दिया करे किन्तु मानी जयका भूमा भौर भलसी ही खरी रहे उसी में -- मागग्यदर्पत। -- दधा गिला दे और उस गोसो देनां समय पेट मा माजी सिखाय, गी भूखीग रहमे पाय और गोगामें खास उप अगइ जहां गौका मुख पक्षता है एक यही इली रोन्धागोन की तार में बांध कर लटकाय देम ताफी गौ मृत्तिका वगैरव कोई चीन चाट कर जय इच्छा हा उभी नानको उली को चाटा करै इस्स गो का हागा दुरुस्त रहता है और मृत्तिका 'मादि चीजों के चाटने से जो गौ हे दूध में एक विकार पैदा होता है श्रह ग होगा. दम दिन दवा खिलाने के बाद उस गो का दूध रोगी को पिलाना शस वारे और उस पिलानेशी रीति यह कि दूध दुहकार भूमिमें न रक्खा जाय उमो समय दूधगै थोड़ो मियो मिला रोगी को पिला देय इसी तरह दोनों तमय वाछ दिनों तश पिनाने से अल्प वीर्य क्षगित आई राग का बड़ा फायदा होता है । क्षईवों अतिरिक्त प्रमेह, मूत्राघात दिल दिमाग को वामजोरी, भिर राग पाराम हो धातु अधिक पुष्ट हेाता है। पात बढ़ाने और धातु को अति बलिष्ट करने का इस दूध से बद कर दूसरा उपाय नहीं है अगर मनुष्य इस री- ति से दवा खाकर हमेशा दूध पोता रहै । कभी कमजोर हो और एक सौ बीस बरस तक जोने वाला है।। हमको कहतका मायुर्वदो थौमे प्रमाण मिले हैं यही पाया गया है, विप्रायः यक्षारोग धातुक्षीण होने में होता है वह भी अकाल पतित वीर्य से तो पसर होता है से। पाठकगगा अवश्य ही कम अवस्था वाले को इस रोग में अमित देखते होंगे वह भी स्त्रियों को और भी अधिक । उसका संबंव यह है कि एका ता कम वस्त्रा में व्याही नातो है काम कला को शान्तही नहीं किसे कहते हैं तभी पति की घर पाना पड़ता है इश्वरीक्षा से कहौं प. ति भी कमसिन हुआ तो भाग बचौ तौगी गम गन्दको झिड़की डपटसे दुर्बल, हुई जाता है और याहों पति नवागढ़या पथवाहितीयवतीय विवाहित हुपा .उसको रोग टूडोकी जरूरत हो नही पड़तो रात में पतिको प्रसन्न करना, दिन में चशरानो का काम करना, मास, गन्द के लात गालों में खालौन C.. पञ्चमखण्ड। रहना, रवाने पौने का कोई इंतजाम नहीं पाभो दोपहर दो बगौ मामको च- ही मवव है जो एका २ पुरुष के चार पांन मान्दो खेती नातो , सादी पर सादो करते जाते हैं स्त्रियां मरतो जाती। हरौत महाराज यत्माका निदान इस प्रकार कहते हैं। चतक्षयाच्छमाहापि सहसोपलवादपि । व्यवायाति प्रसने न तथा रूचाति सेवनात् ॥ तेन संचोयते गावं ज्वरो मन्द श्व जायते । ज्वगन्तेजायतेशोफो मल विट्चातिमूत्रता । अतिसारभवति भक्षणेनातिशेषते । फासतेष्टीयतेऽत्यर्थ शोषञ्चास्तेभृशम् ॥ (क्षत ) उरतत अथवा अधिक दिल कमजोर होने से (चय ) प्रमेह या पदर अथवा धातु पतला और कमजोर होने से अपनो तापात से अधिका परिश्रम करने मे, अत्यन्त प्रसंग पारने से, सखा मोजन कारने से, मनुष्य कमजोर होजाता है और वहो कमजोरी वनो रहने से भीतर थोड़ा २ धीमा ज्वर होने लगता है तथा उसी ज्वर के वजे से मनुष्य बहुत दुवमा हो जाता है अन्त में सूजन और दस्त पतला होने लगता है किसी को मूत्र बहुत बढ़ जाता है और थोड़ा भी खाया हुआ नहीं पचता, अत्यंत खांसी तथा वलगम अधिक निकलने लगता है। और भी चाहते हैं। ब्यायामयानसुरता गतिपौडिताङ्ग रोगणवा ब्रानिपो. डितक्षीणदेहात् । काधातिशोकानशनादि भयोपवासैः सं. जायते च मनुजस्यमहागदेोऽयम ॥ हरौत महाराज अपने शिष्यों से कहते हैं कि हे. पुत्र सुनो चार हेतुओं पार के निरसन्देह यह यक्ष्मा रोग होता है जैसे-भोजन काम यासरत अधिक करना, दिनरात प्रसवारों पर बैठ कर चलना, अधिक प्रसंग करना और बहुत राता चलना इन चारो कारणों के अलावा भी फाड़ा फुन्सियों का अधिक दिन बना रहने से चोण देह होने से तथा क्रोध, भोका, लंघन, भय, व्रतमादि के धारने से मनुष्य के शरीर में यक्ष्मा नामका महान रोग होता है। . f P पारोग्यदर्पण। कोई विमारी क्यों न हो पहरेज कराना बहुत जरूरी है और खास कर बड़े २ रोगों में जैसे यक्ष्मा जलोदर आदि कि जिस की उत्पत्तिही असाध्य लिख दिया गया है उम्में तो पहरेज अवश्य ही फराना घा. हिये क्योंकि बहुत सी बिमारियां हैं कि उस रोगी का पित्त उन्हीं चीजों के खाने पीने पर चलेगा कि जो चीज उस रोग के विरोधी हैं हारीत महाराज यक्ष्मा के विषय में लिखते भी हैं। यद्यदाहारमिच्छेदानरंवाराजयक्ष्मिणम् । तस्यत- स्यास्यलाभेन क्षीयन्तेतस्यधातवः ॥ यक्ष्मा रोगवाले को जिस २ भोजन पर इण्या पणती है उसी २ भोजन से उस रोगी की धातुक्षीण होती है इसलिये यक्ष्मायाले का मन जिस २ चीजों पर चले उन चीजों का सेवन न करने पाये। जहां तक होसके खाने को यही चीज देयै जिस्से धातु बढ़े और उसकी गरमी, हट लिसा भी है। यदन्नंयत्समाहारं यादृशेप्रतियाचते । तत्तस्यचप्र- दातव्यं मधुरंधनमेवच ॥ जो जो अन पाहारादि यक्ष्ना रोगयाले को दिया जाये यह मधुर और धन होना चाहिये पयोंकि मधुर और घन पदार्थ से धातु बनता है । यक्ष्मा रोगवाले को उमर । . सज्जीवेञ्चतुरामासान्पण्मासंवावलाधिकः। उत्क- टैश्चप्रतीकारैः सहस्राहंतुजीवति ॥ सहस्रात्परतो. , ८२ पञ्चमखण्ड । नास्ति जीवितंराजयक्ष्मिणः । गतप्राणोजोवीय॑श्च क्षीणश्चविकलेन्द्रियः। नभवेत्पुरुच्छायो याप्यरोगश्च मुश्चति । यस्तदायाससम्पन्नो भूयोऽपिकासिनाभवेत् ॥ तस्यप्राणापहारीस्याद्राजयक्ष्मनि दारुणः । त्रिभिर्मा- सैश्चषण्मासै वैचापित्रिभिःपुनः ॥ हिक्मतवालों ने यक्ष्मा याने तपेदिक की आयु की मर्यादा इस प्रकार बांधा है कि दो दर्जे तक आराम ही सक्ता है, तीसरे दर्जे में कष्ट साध्य और चौधे दर्जे में असाध्य माना है, जो आराम नहीं हो सका है और यह चारो दर्जे लक्षणों पर निर्भर रस्त्याहै किन्तु आयुर्वेद मतावलम्थियों ने इस प्रकार लिखा है । राजयक्ष्मा रोगयाला जिस्के सम्पूर्ण लक्षण मि. लते हो घार महीने तक जीता है, यदि घेत रोगी कुछ यलयान हुभा तो छ महीने तक गीता रहा, यदि चेत् रोगी कुछ यली भी रहा और सवैद्यों के द्वारा उत्तम चिकिरसा होती रही तो यक्षगा रोगवाला एक हजार दिनों तक जी सका है अन्यथा नहीं । राजयक्ष्मा रोगवाला एक हजार दिन से अधिक इसलिये नहीं जी सक्ता फि उतने दिनोंके उपरा. न्त माण, बल, वीर्य यह सब क्षीण हो जाते हैं और इन्द्रियां सब विकल हो जाती हैं । और वह यक्ष्मा रोग जो बारम्यार घटता बढ़ता नहीं, एक समान बना.रह के उत्तम दवा के योग से थोड़ा २ घटने लगता है और फिर नहीं बढ़ता यह रोग याप्य होता है अर्थात् उत्तम चिकित्सा होनेसे माराम होजाता है । तथा जो यक्ष्मा रोग यारम्यार सांसीसे युहरू हो जाताहै याने फभी खांसी कम होगई कभी फिर तेज होगई इसी तरह बलगम माना फभी यन्द होगया या कम पाने लगा और कभी फिर यढ़ गया याह यक्ष्मा का रोगी तीन महीने अथवा उ महीनेसे अ- धिक नही जीता रहता अयश्य प्राणका नाश होता है । अमृत पान कराने भारीग्यदर्पण। ८3 से भी प्राणको रक्षा नही होसकी प्योंकि अवधि का उम्मंघन करने की सामर्थ्य किसी में भी नहींहै दूसरे पक्ष्मा आदि महान रोग पूर्योपार्जित अत्यन्त दुष्कों के द्वारा होते हैं । लिखा भी है- कुष्टंचराजयक्ष्माच प्रमेहोग्रहणीतथा । मूत्रकृच्छ्- इमरीकास अतीसारभगंदरौ ॥ दुष्टंबणंगंडमाला पक्षा- घातोक्षिनाशनं । इत्येवमादयोरोगा महापापोद्भवाः- स्मृताः॥ 4 काढ़ रोग, राजयक्ष्मा, ममेह, संग्रहणी, सुजात, पथरी, खांसी, अ- तीसार और भगन्दर, नमूर, गगठमाला, लकवा, आंखों का फूट जाना यह सब रोग महा अर्थात् बड़े २ पाप करने से होता है। यह सब रोग जो ऊपर पहनाये हैं प्राणके साथ जाते हैं आराम भी होगये तो जड़ नहीं जाती कुपथ्य 'घस फिर उभड़ आते हैं अन्ततोगत्या अपने भयंकर लक्षणो को प्रगट फर मनुप्यके प्राणको हरण करते हैं यह महा पाप यह हैं जैसे- देवानांप्रकरोतिभङ्गमथवा भूणस्यसन्तापनं । गो पृथ्वीधरविप्रवालहनन मारामविध्वंसनम् ॥ सोयं: स्थानविनाशनंच कुरुते स्त्रीणांवधंयोनरस्तस्यैतैर्गुरुक- मभिःक्षयगदो देहापहारीमहान् ॥ जो पुरुप देवताओं के मूर्तिको तोड़ डालता है प्रथया धनादर क- रता है, जोनोंको सन्ताप देता अर्थात् सतायता है, गौ, राजा, मान और यालको की जो हत्या फरताह, फिसीके याग यगीया वाहता है किसी ऋषि महात्मा गरीय दुसियोंके स्थानको यिना करता है और - 1 पञ्चमवगड - स्त्रियोंको मार डालता है ऐसे ,२ दुष्ट फर्म करने वाले को प्राण हरण फरने वाला महानक्षयी रोग होता है। हम कहते हैं पापों का प्रत्यक्ष फल शरीरमें अनेक रोगांके द्वारा दुःस का भोगना देख पड़ता है यदि यह भी न होता तो ईश्यरको लोग और भी न मानते । यक्षमारोगे अमृत प्राशन घृतं । शतमूलीरसंप्रस्थं गुडूचीकल्कप्रस्थकम् । हरीतकी शतानांच कुटजस्यत्वचातुलां ॥ निष्क्वाथ्यचष्टयक्रेन पुनश्चैकत्र मिश्रयेत् । दाप्रिलेपनंकृत्वा गुडानांशत- पञ्चकम् । सिताचामलकीचूर्ण त्वगेलाचित्रकंशठी ॥ द्राक्षाकुष्टंशिलाजिञ्च शिलाभेदस्तुतालकं ॥ योज्यं- तत्राक्षमानेन भक्षयेच्छुद्धसर्पिपा। तस्योपरिपिवेत्क्षोरं भोजनञ्चततःपरम् ॥ राजयक्ष्मीलभेत्सौख्यं पाण्डका मलकाऊजयेत् । अतीसारंधिनश्यति वलेनागवलो भवेत् ॥ ताजे शतायरीफा रस ६४ तोता अगर शतावरी ताजी न मिले तो काय बनाके रस लेय गुरिचका फल्क ६४ तोला, एकासी बड़े हड़का बक्कल कुरैयापी छाल.४०० तोले इनको अठगुना जलोंमें अलग २ काड़ा बनावै पद्यात् सबों को एकत्रित कर पुनः अग्निपर पढ़ाय धीमी आंधमे पचाये जय पचते २ इतना गाढ़ा होजाय फि करछुल में घपफने लगे. तब ५ साफ सकर अथवा चिनी लोष्ट कर अशी तरह पकालेय बाद प्रांवला, भाग्यदर्पगा। दालचिनी, छोटी लायची, चीता कपूर मुनका फूट शुद्धशिलाजीत पा- पाणभेद और हरताल भस्म इन सबों को दश २ मासाले कूट कपड़ छान कर उसी में मिला अमृतयानमें पदेय । हुमका मात्रा मासासे तीनं तोला तक है । साम सधेरे मात्राको आधा गोघृत अथवा मिक्खन मिला का साके ऊपरसे गौ का दूध मिश्री मिला हुआ पीनेसे तथा उसके थोड़ी देखो बाद मीठी चीज भोजन करने से राजयक्ष्मा य लेको मुख लाभ होता है अर्थात् उहा रोग से छूट जाता है इसके अतिरिक्त पांडुरोग कामला अतीसार रोगका नाश होता है और यल पुरुपार्थ पढ़ता है । इति क्षय रोग निदान घिफिरसादि विषयः समाप्तः ॥ अथ उक्षित। अब इसके आगे हम तरःक्षत रोगका बयान करते हैं क्योंकि उस | रोगके लक्षण यक्ष्मा रोगमें मिलते हैं गौर आरोग्य न होनेसे उरःक्षत या ला भी हजार दिन से अधिक नहीं जीता । रहा यह कि जितना शीघ्र यक्ष्मा याला दुर्यल यलक्षीण होजाताहे तितना शीघ्र उरःक्षतयाला नहीं, यदि घेत मुरासे शून अधिक आने लगा तो अतिशीघ्र मर भी जाताहै। उरःक्षत होने का कारण । धनुपायम्यतीत्यर्थं भारमुबहतोगुरुम्। युद्धमानस्य वलिभिः पततोविपमोच्चतः । तृपंहयंवाघावंतं दम्य चान्यंनिगृह्णतः । शिलाकाप्टाइमनिर्घातान् क्षिपतो. निघ्नतःपरान् ॥".

पञ्चमवार । उरःक्षतरोग उसीको होता है जो मनुष्य अपनी आत्मायो यल से अधिक बल करता है उसकी छातो फटजाती है अर्थात् ( लंक्त ) जिसे शोधक यंत्र कहते हैं जिसके द्वारा होके समस्त शरीर में रुधिर जाता है उसका स्थान हृदय है जहां पर धक धक हुआ करता है वह नस फट कर मुख से सून आने लगता है वही जल्द उत्तम उपायों द्वारा उस फटे हुये नस को न पुराने से पक जाता है और उसी में से मवाद होके मुख के राह से गिरने लगता है और फिर नही पुरता अर्थात् नसूर हो जाता है इसीको तरःक्षतरोग पाहते हैं इस्में और यक्ष्मा में बहुत कम भेदं है । वैद्यों को सब से प्रथम उचित है कि रोगकी परीक्षा सूय करडेय तम घि. कित्सा पारे । मनुष्य के यकृत जिमे 'ठाकरी में ( लीवर ) और हिक्मत में ( फलेजा ) कहते हैं उस्में भी विकार पहुंचने से मुस खून भवाद आने लगता है जिस्का बयान भागे फरेंगे, जिस वजे से उरःक्षत होता है प्रथम उसे कहते हैं । धनुपादि जो मनुष्य धनुप घढ़ाने आदि में अति परिश्रम करता है. सधवा भारी यो लेके चलता है, अपने से अधिक जोरवाले से कुस्ती लड़ता है. टेढ़े मेढ़े जगह से और अंचे से गि- रता है, पोड़ा बैल आदि दौड़ते हुये. जानवरों को जो पकड़ता है.. जो साड़ी पत्थल, ईटा भारी घोज हाथ में लेके पोकता है अथया दूसरे को मारता है उसके छाती में सदमा पहुंच. कर छाती फटजाती है और जिन्हें इन सब बातों का अभ्यास है अर्थात् रोज २ उसी काम को करते हैं उनको उरःक्षत नहीं होता क्योंकि उनको अभ्यास पड़जाता है यदि इस तरह हो जाये तो सैकड़ों बोका उठानेवाले मजदूर अपनी ताकत से दूनी भारी यो, उठाले जाते हैं । फौजी सिपाहियों को युद्ध में हा. घही ने पन्दूस चलाना. पड़ता है, भाला फेकना पाता है सबी को हो जाया करे, सिर्फ दिलके कमजोर, मुलायम, कभी उस काम को न करने- वाले, एकाएकी उक्त कामों के करने से तरक्षत रोग होजाता है। इसी तरह यहुत जोरसे पढ़नेसे प्रथया गानेसे बहुत दूर तक अति भागग्यदर्पगा। - शीघ्रताको साथ चलनेसे यही पाट याली नदी को तैरकर पार करनेसे घोड़े के साथ दौड़नेसे अथवा दूरसे कूदनेसे या नारा साफनेसे बहुत जल्द २ नाचनेसे और किसी तरह खातीमें चोट लगनेसे उरःक्षत रोग होता है। जो मनुष्य रूसा तथा छोड़ा भोजन करके जादा मैथुन करता है अर्थात् उत्तम साने पीनेको. समय पर नहीं खाता, दिवारात्रि मैथुनासत रहताहै उसकी छाती अति पीड़ित होती है उसके सुई छेदने अथया फटनेसरीखे छाती फटने लगतीहै पसुलियों में दर्द होने लगता है अंगसूखने और कांपने लगता है बस क्रमशः वीर्य बल वर्ण और जठराग्नि हीन होने लगताहै पश्चात् ज्यर शरीर में पीडा मनमें उदासी दस्त का पतला हेना अनि मन्द साना का न पचना सांसनेसे दुर्गन्ध युक्त पीला गठीला रक्त सहित फफ गिरने लगता है तब यह रोगी यहुत दुधला और मि- स्तेज होजाता है। उरःक्षत का असाध्य लक्षण । उरोरुक् शोणितेच्छर्दिः कासोवैशेषिकः क्षते । क्षीणेतरक्तमूत्रत्वं पार्श्वपृष्ठकट्रिग्रहः ॥ (अन्यच्च) अल्प लिंगस्यदीप्ताग्नेः साध्योवलवतोनवः । परिसंवत्सरो- याप्यः सर्वलिंगविवर्जयेत् ॥ परंदिनसहस्रंतु यदिजी- वतिमानवः । सुभिपंग्भिरुपक्रांतस्तरुणःशोपपीड़ितः॥ अय उरःक्षत के असाध्य लक्षण फहते हैं जिन लक्षणांसे जाना जाता है फि यह रोगी अय नहीं जीवेगा। मुख यरायर सून का गिरना याने सूनं का वमन होना सांसी अत्यन्त तकलीफ अधिक क्षीणता कारण पेशाय के साथ रकका आना 'पचमम्वएडा पसुलियों में दर्द, पीठ और कमर को जकडना इन लक्षणों से उस को असाध्य जानना और भी कहते हैं। जिस रोगी के लक्षण फर्म मि. लते हो, अग्नि तेज हो, भूख लगती हो खाना हशम हो जाता हो और थोड़े ही दिनों का रोग हो तो आराम हो जाता और एक कप पीछे फपसाध्य और सय लक्षणों के मिलने में असाध्य हो जाताहै यदि किसी अरछे सद् वैद्य की चिकित्सा हुई तो वाह रोगी एक हजार दिनों तक जीता रहेगा अन्यथा मृत्युही सुभक्तिये ॥ अथ चिकित्सा। भूत पूर्व वैद्योंका यह सिद्धान्त मत है कि अगर उरःक्षत रोगी ग. नुष्य शोक, चिन्ता, क्रोध करना, स्त्री प्रसंग पराये को देख के जलना आदि कम्मो को त्योग देय और मन को प्रसन्न रखना पवित्रता से देय पूजन, ब्राह्मण अतिथियों का सत्कार, भगवत् भजन, वेद वेदान्त पुराण इतिहासादि ब्राह्मण के मुख से सुननेसे रोग यलपान नहीं होने पाता । पक्षमारोग में जे। जो दवायें लिखी हैं वे सव भी प्रकृति, देश का. लानुसार उसमतवाले को फायदा पर सतीं हैं । उरःक्षत पर एलादि बटी। एलापत्रत्वचोद्राक्षा- पिप्पल्यर्धपलंपृथक् । सिता मधुकखजूर मृदीकाश्चपलोम्मिताः ॥ सचूयंमधुना युक्ता वटिकाश्चप्रकल्पयेत् । अक्षमात्रास्ततश्चैव भ- क्षयेद्विदिनदिने ॥ क्षतक्षयंज्वरंकासं श्वासंहिकांवमि भ्रमं ॥ मूर्छीमदंतृपांशोपं पावसूलमरोचकम् । प्लीहा पाराग्यदर्पगा। ८६ नमाढयवांतंच रक्तपित्तज्वरक्षतं ॥ एलादिगुटिकाहंति वष्यासंतर्पणीपरा ॥ - छोटीलायची, तेजपात, दालचिनी पीन रहित मुनक्का, दूधसे शुद्ध किया छोटी पीपर यह सब आधा २ पल अर्थात् दो दो ताले, मिश्री, नुलेठी, खजूर, कायफल, और किसगिस यह सय चार २ तोले, सयों को सूय महीन चूर्ण कर प्रांधे २ तोले की गोली.यनाय लेय, यह पूर्णमाना हे अवस्था के अनुसार मात्रा घटा यढ़ा सोहैं । इस गोली को दोनों समयं खापर ऊपरसे यफरी अथवा गौ का ताजा दूध मिश्री मिला हुमा पीने से उरःक्षत रोग नाराम होता है इसके अलावा लिखा है । क्षयो, ज्वर, खांसी, स्वास हुचकी, यमन, घुमरी, मूर्छा, मद, पियास शोप, আয় शूल, अरुचि, लोहा, आढ्यवात और रक्त पित्त ज्वर आदि नाश होता है यह औषध कामोद्दीपन है । हमने जहां तक परीक्षा लिया है और रोगों की अपेक्षा उरःक्षतको कुछ दिनों तक लगातार पथ्य सहित सेवन करने से अवश्य भाराम करता है। उक्षत रोग का पथ्य वही है जो राजयक्षमा रोग में यह माये हैं। उक्षत याले को सरयत अनार, सर- यत उन्नाव, सरबत गुलयनपा आदि गौर भी तर पदार्थों को जो सून को शीता और शुद्ध पारनेवाले हैं सेवन कराये, दूध और मिश्री जहां तक हो पिलाये।। अगर सून फा यमन हेाताही भौर अनेक जतन करनेसे न रुका हो तो एक तोला फिट फिरी को एकसेर पानी में घोल नगर यरफ मिलवा हो तो उसी पानी में हाल सूप शीतल फर उसी जल में कपड़े फो भिगा कर छाती पर रक्खे और जय कपड़ा मूराजाय फिर मिनालेय और पीने को मिहीदाने का लुआप निकाल मिश्री मिला के एक २ चम्मच पन्द्रह २ योस र मिनट पर पिलाथै जय तक सून का भागी बन्द न हो और समस्त शरीर में नारायन तेल, अथवा मारादि तेल या मागलाक्षादि. * Pr ६२ पञ्चमवगड । कृतेतत्र निःक्षिपेदोपभिपक् ॥ सितोपलाचतुःप्रस्थं चातुर्जातंपलंपलं । मृद्दीकापटपलंचैव क्षिप्त्वामधुपला ष्टकम् ॥ धारासत्वंतवक्षीरी इवेंतजीरंपृथक्पृथक् ।. नागंवगंपलार्द्धच सर्वमेकत्रकारयेत् ॥ कपूरंवल्लमात्रंच दत्वास्थाप्यसुकुंभके । भक्षयनिष्कमावतु प्रातरेवहि पथ्यभुक् ॥ जीर्णज्वरक्षयेकासे अग्निमायेप्रमेहके। दिनरात्रिज्वरेचैव शिरोरोगप्रशस्यतेप्रदरेरक्तजानोगान् कुष्टाशीसिचनाशयेत् । नेत्ररोगान्सुदुष्ठाश्च तथासवा- नमुखेस्थितान् ॥ नाशयेन्नात्रसंदेहो मंडलस्यचसेव- नात् । महाकुमारीपाकोयं भरद्वाजविनिर्मितः॥ शत पत्रिका अर्थात् यह सेवती पाक भारद्वाज गुनिका बनाया हुशा है । जो कुछ दिनों तक पथ्य सहित सेवन करने से उरक्षत और यक्ष्मा- रोग दोनों को पाराम फरताहै । सून बन्द हेाजानेके बाद अथवा कुछ २ खून का छोटा आता भी रहै तो भी इस पाक को पांच छ महीने तक बराबर सेवन करता रहे। सेवती का एक हजार फूल, ताजा हो तो निहायत उत्तम है न मिले तो मूखा फूल ले, डेढ़ पाव घी में सूर्य भूज, जय सुरखी पर प्रा. जाय उसे अग्नि पर से उतार लेय और अढ़ाई सेर मित्रो को चासनी यनाय उसी में फूल को मिलाय वाद निम्नलिखित चीजों को फूट कपड़ छानफर उसी में मिलाय देय । दालचिनी, तेजपात, लोटी लायची, नाग फेशर यह गय तीन २ तोला, मुनका १६ तोला सहत २४ तोला गुरिघ, पागग्यदर्पगा। ६३ का सत्व तवासीर और सफेद जी. यह सय ठेढ़ २ तोला । यदि उत्तम निहायत शुद्ध रांगे का भस्मअर्थात् बंगेस्वर और सीसे का भस्म याने नागेवर मिले तो यह भी एफ २ तोला डाल देय फिन्तु जिस रोगी के मिजाज में गरमी अधिक हो पेट में जलन हो उसको दवामें रस न डाले क्योंकि रियाय हानिके लाभ होना अति दुस्करहै । साफ कपूर एक मासा हा- ले ययोंकि जिस दवा की मिकदार अधिक है जादा कपूर डाल देने से इतना पाहुआ हो जाता है कि रोगी बहुत कठिनतासे खाता है । सब दवाइयों को एकमें मिला घृत पात्र अथवा अमृतवानमें रख देय । इस का मात्रा ३ मासा से ६ मासा तक है बल के अनुसार दोनों समय खा- कर ऊपरसे दूध मिश्री पीनेसे उरक्षत और यक्ष्मा दोनों पाराम होते हैं. ऐसे तो लिखा है पुराना बुखार, क्षयी खांसी, मन्दाग्नि प्रमेह रात दिन बना रहने वाला ज्वर शिर दर्द प्रदर रक्त सम्यन्धी रोग कोढ़ बायाशीर नेत्र और मुख इन सब रोगों को यह पाक एक मण्डल अर्थात् उनचास दिन में आराम करता है। इति उरक्षत रोग सम प्तः ॥ प्रय हम यरुति जिसे डाकृरोमें लीयर और हिक्मत में कलेजा कहते हैं उसका बयान करते हैं यह मनुष्पके दहिने भाग पसलियों के नीचे होता है इसमें अक्तर पुराना ज्वर खांसी हेानेसे यक्ष्मा और उर- क्षत रोग में भी वरम (शोध) श्राजाता है और फलेजे पर यरम होनेसे उपरेक रोग असाध्य होजाते हैं, सबब यह है कि कलेजे पर बरम होते ही-यन न करने से शीघ्र उस में मयाद आ जाता है और वही मवाद भ. थवा उसी में से-जरा २ सा सून कफके साथ मुखसे गिरने लगता है उसी | को हकीम लोग सिल की बिमारी कहते हैं। हमारे वैद्य शास्त्र में इसका बयान यहुत कम है सिर्फ इतना लिख दिया है कि जो लोहाको दवा है यही यकृत की दवाहै और बंगसेनमें कुछ निदान भी लिखाहै । यथा- पञ्चमवयष्ट । मन्दज्वराग्निःकफपित्तलिङ्गै रुपद्रुतःक्षीणवलोति- पांदुः । सव्यान्यपाश्र्वेयकृतप्रदुष्टे ज्ञेयंयकृदाल्युदरं तथैव ॥ शरीर में धीमा ज्वर का यना रहना, भूख फ़ा न लगना, फफ पित्त का कोप रहना, बल का घट जाना, शरीर का रंग पीला होजाना तय जानना कि दक्षिण पशुरो के नीचे यकृत विगड़ गया है अर्थात् इस्में विमारी हुई है। प्रेहिदिष्टाःक्रिया:सर्वा यकृतःसप्रकल्पयेत् । का- य॑श्चदक्षिणेवाही तत्रशोणितमोक्षणम् ॥ जो जो क्रियायें तथा औपथ प्लीहा अर्थात् पिलही आराम करने की हैं वही सच यकृत रोग में फरपना करना चाहिये और दक्षिण हायके रक्त मोक्षण याने फस्त खुलवादेयं । फस्त खुलाने की विधि हिक्मतमें भी है, इलाजुलगुरवा में लिखा है। सिल- फेफड़े के घाव को कहते हैं, इस रोगवाले को ऐसा ज्वर आवै जो कभी न उतरै, कभी खांसी से रुधिर भी निकलता है और रोगी दिन २ क्षीण पड़ता जाता है । यद्यपि यह रोग असाध्य है परन्तु इसलिये कि रोगी शीघ्र न मरजाये, वासली का फस्तखोल फिर ज्वर और सांसी का यन्त्र करै । यह रोग जैसा कठिन है येमाही हमारे पुराने ढांचे के वैद्य उस्से अनभिज्ञ भी हैं, विलकुल नहीं जानते हैं कि कलेजा फिस चिड़िया को कहते हैं । अगर रोगी को भी यि हमारे पेट में दहिने तरफ दर्द होता है और 'दहिने फरयट लेटने में अधिक यांसी आती है तो आजकल के वैद्य फहेंगे कि तुम्हारे पेट में मल जमगया है।

आगग्यदर्पणा । । यकृत। यरुत यानी जिगर.जिस्को अंगरेजी में लीवर कहते हैं मनुष्य के शरीर में सब से बड़ा यंत्र है फि जिस्के बिगड़ जाने से मनुष्य को इस संसार में पादस्थित रखना महा दुष्कर हो जाता है नगर उसे हम म. नुष्य का जीवन प्रथया प्राण कहैं तो अनुचित न होगा। यह जिगर मनुष्य के दहिने तरफ पसलियों के नीचे घौड़ाई में ४ इञ्च लम्बाई में १० या ११ इञ्च मोटाई में तखमीनन २ इञ्च का यह यंत्र है. जो तोल में एक सेर नौ छैटाफ अथवा एक सेर दश उँटाक है उमर और शरीर की मोटाई अपया दुयलेपन के हिसाब से छोटा बड़ा भी हो मला है । इस का रंग भूरा अफसर सुरसी या किसी कदर जरदी मायल होता है। और कभी स्याही मायल भी हो जाता हैं लड़फपन, में मैगनी रंग और मुलायम, बुढ़ापेमें अफसर फीफा और पीले रंग का होता है, इस में दो पर्त हैं और दो किनारे हैं। ऊपर का परदा कुबड़ा और सामने को अया है, नीचे के तरफ भाडा और पीछे को धूमिल नजर आता है। यहत का मुख्य दो.फाम है पित्त और रुधिर को यनाना याकी हाल शारीरिक स्थान देखने से मालूम होगा । यकृत का निदान । यात फा भूजन अथवा उस्में मयाद पष्ट जाना यकृत के छूने से मालूम हो जाता है । दहिने तरफ पमुली के नीचे दयानेमे फैडा मालूम हो और दयाने से रोगी को कुछ दर्द मालूम हो, दहिने फरवट लेटने से रोगी को तकलीफ हो अथवा सांमी अधिक हो और जय यरुत को दवाने से रोगी को फोड़ा सा दूराने का दर्द माछूल हो तो जानना घा- हिये कि यहंत में गयाद आगया है। यकृत की चिकित्सा। मिफित्सक को चाहिये की पुराने ज्वर गंमी में परत की परीक्षा पञ्चमवण्ड। अवश्य करें क्योंकि जय तक फलेगे पर शोष नहीं होता. खांनी. चर को आराम करना कोई फठिन बात नहीं है किन्तु शोथ होनेही से असाध्य हो जाता है । जय देसे फि शोथ, नयोन है और रोगी भी बलवान है और उमर १६ वर्ष से अधिक है, शीघ दहिने, हाथ में फस्त.सुलपादेय और निम्नलिखित दवाइयों का लेप मूजन पर लगावै तथा रोगी को सूब पहरेज के साथ रक्दै। सुपारी गुलाब का फूल, सफेद चन्दन, चिरायता यह सब घार २ मासे, जौ का मैदा १ तोला कपूर ३ मासा.सयों को सिरकेमें सूय महीन पीस दिनमें तीन दफे कलेजे पर लेपकर और जय चाहे गरम जलसे पो डाला करै यदि फस्त न सोलावै तो भी इस लेप को लगाये ॥ अगर कलेजे पर सूपन गरमीक बजे से हो, उसकी पहिचान यह है फि यस्त में जलन हो या राजुरी मालूम हो, टोने से गरम लगे तो इस लेप को लगाये कपूर रूमामस्तगी, तेजपात तीन २ मासे गेरूमट्टी, गुल यनपसा गुलाब के फूल सफेद चन्दन, सूखा धनिया, छंछ मासे सोंको जएमें सूध महीन पीस दिन में तीन चार दफे लेप करै। अगर यरुत का सूजन सरदीसे हो उस की पहिचान यह है कि सूजन सरन हो छूने में शीतल मालूम हो किन्तु यह परीक्षा कर लेना चाहिये कि पसीना निकलने से तो शीतल नहीं मालूम होता यदि हे तो इस लेप को लगावै॥ " पालछड़, सुगंधयाला. और. दालचिनी.पांच २ मासे, केशर दो मासे सयों को बाबूने के तेल में पीस के दिन में तीन दफे भाइस्ते २ यकृतपर मईन करे और अधिक बढ़ी हुई बीमारी में किसी सत्वैद्य फी भी, राय ले। क्योंकि चिकित्सा का काम बड़ा नाजुक है जरा भी चूकने में रोगी का प्राणान्त हो जाता है। दूसरे यक्ष्मा आदि रोग ऐसे कठिन हैं कि उत्तम दवा से तो पच्छे होतेही नहीं, कहीं अनाड़ी के हाथ में पड़े तो शीघ्रही परलोफ यात्रा पर जाते हैं आप लोग सत्य जानिये वर्तमान समय में जहां तक हमने परीक्षा लिया है, एक हिस्से रोगी रोगसे मरते हैं और दो हिस्से अटकल पाचू प्रकृति विरुद्ध औषध के व्यवहारसे मरते हैं इसलिये चिकित्सा कर्म घड़े सावधानी से करनी चाहिये । ht पारोग्यदर्पग्छ। यक्षमा आदि रोगोंपर मोतीका सेवन । ... और रसों की अपेक्षा नंगा और मोतो यह दो बस्तु अच्छे हैं और गुणकारी भी हैं रसों में बड़ा भारी दोप यह है कि उत्तम रस प्रकृति के अनुसार पड़ा तो अमृत के समान गुण करता है और विपरीत में विष समान मनुष्य को मार डालता है । माती मूंगे में यह यात नहीं है प्रकृति विरुद्ध होने पर भी अधिक कोप नहीं करते ॥ मोती की उत्पत्ति । शुक्तिःशंखोमजः क्रोडफणीमत्स्यश्चदर्दुरः । वेणुश्चा- टोसमाख्याता सुर्मोक्तिकयोनयः ॥ जवाहिरातके जानने वाले विद्वानांने मोतीकी उत्पत्ति आठ तरह से लिखी है । सीपी से १ शंखसे २ हाथी से (जिसे गजमुक्का कहते हैं) ३ सुअरसे ४ सर्पसे ५ मउलीसे ६ मेढकसे ७ और यांससे और सय मा. तियोंकी पहिचान भी शास्त्रों में लिखे हैं ग्रन्ध बढ़जाने के भय से नहीं लिसाजो मेाती रग में फीकी, टेढ़ीमेढ़ी, पिपटी ललाई लिये मछली के आंखके समान, रूखी, ऊंची और नीधी ऐसी माती न पहरना चा- हिये और न साने लायक है। जो माती नक्षत्रके ममान चमकीलो गोल. चिकनी, मोटी, छिद्र र. हित, चन्द्रमाके समान खेत निर्मल यजम में भारी यही मोती दामी हैं धारण करने तथासाने लायक है निदीप मोतीको परीक्षा वैद्यकशालने इस प्रकार लिखी है।

पञ्चमखण्ड। लवणक्षारक्षोदिन पात्रेगोमूत्रपूरितेक्षिप्तं । मर्दित- मपिशालितुषैर्य दवितमौक्तिकंजात्यं ॥ एक पात्र में माधसेर गो मूत्र और श्राधी छंटाक . सांभर नान हाल उसी में दो पहर मोती को दोला यन्त्र के विधि से लटकाय देय पश्चात् निकाल चावल की भूमी में डाल के मले और पानी से धो डाले. यदि मोती का रूपान्तर न हो तो उस मोती को शुद्ध जानना वही माती साने लायक है। -- मोती शोधन । -- मोती को अनिमें तपाय २ कर सात.वेर घीकुमार के रसमें और ७ बार चौलाईके रसमें युझावै अथवा एकही चीजमें घुसावे ते. शुद्ध हो यही माती मालतीवसन्त में भी डाले.. हकीम लोग मोती को गुलाय या केवड़े के अर्क में सिर्फ ४ पहर 'पोटापके चूर्णकर लेते हैं और यही रोगी को खिलाते हैं और यही चाल सर्वत्र फैलीहै न कोई परीक्षा लेता है और न कोई शोधन करके भस्म करता है यही कारण है कि आरोगियों को फायदा नहीं करता। मोती मारण विधि। शुद्ध माती ४ तोला, शुद्ध पारा ६ मामा और शुद्ध आंवलासार गन्धक ६ माया पहले गन्धक और पारे को मिलाकर कजली कर पश्चात् उसी भासीमें छान कर घीकुमार से रनमें सूंघ महीन घोटै ४ पहर तक बाद गोरखा यनाय शरावसम्पुट में कपर मिट्टी करः गजपुट में पूर देय मांग गीतल होनेपर मोती भस्म को कांकी

पारोग्यदर्पण।
गन्धक और पारा, उड़ जाता है इस भस्म का मात्रा २ घावलसे १ रत्ती
तक है मोती को लोग सेना भाखी की तरह भी फूकते हैं।
मोती भस्म का गुण ।
'मौक्तिकसमधुरंसुशीतलं दृष्टिरोगशमनंविषापहं । रा-
जयक्ष्मपरिकोपनाशनं क्षीणवीर्यबलपुष्टिवर्द्धनं ॥
मोती का भस्म मधुर और शीतल है नेत्र रोग विष रोग और
राज यक्ष्मा उरःक्षत आदि रोगों को नाश करता है धातु की कमजोरी
और यलकी कमजोरी को दूर करता है।
कफपित्तक्षयध्वंसी कासवासाऽग्निमान्द्यजित् ।
पुष्टिदंवृप्यमायुष्यं दाह मौक्तिकंपरम् ॥
कफ पित्त कफक्षयी खांसी स्वास अग्निकी मन्दता को नाश करता है
पुप्टिकर शरीरमै तैयारी लानेवाला तथा उमर को बढ़ाता है।
मूंगा की उत्पत्ति लक्षण।
- मूंगे का वृक्ष समुद्रमै लालरंग का होताहै उसी से मूंगा उत्पन्न होता
है। पके कुंदुरू फल के समान लाल गोल, चिकना, धमकदार, छिद्र
रहित मूंगा अच्छो होता है। वही मूंगा पहरने और खाने लायक होता
है और जो मूंगा रंगमें पीतलके समान, प्रथया फीके रंगका, टेढ़ा मेढ़ा,
बारीक; छिद्र सहित, रूखा और कलोस रंग का मूंगा अच्छा नहीं होता,
ऐसे मूंगे को न पहरना चाहिये और न खाना पाहिये । आज कल के
वैद्य लोग बिना शुद्ध किये हाली अथवा मूंगे की जरुको भस्म करके रखते
"

१०.. पञ्चमवराड़। रहते हैं और असिल मूंगे के भस्म के नाम से वेच फर लोगों को ठगते हैं क्योंकि मूंगा और मूंगे की डाली का रंग एकही समान होता है सिर्फ गुण और भावमें फर्क है अच्छा मूंगा २) तोलेसे कममें नहीं मिलेगा और भूगे की जड़ ४) सेर अर्थात् तीन पैसा तोला यिकता है। पीसी दया और मुण्डा येोगी को, यिरलाही लोग पहचान सकते हैं, आज के समय में धर्म का डर तो नहीं रहा रोगी पाहे मरे या जिये यहां से पैसा पैदा करने से काम-दमी तरह लोग सीपी को भस्मकर मोती भस्मके नाम से वेचते | हैं, लोगों को नुफंसान करने से वैद्यक नाम और भी डूबा जाता है । "मौक्तिकस्य विधिप्रोक्तः प्रयालेपि तथा विधिः" जो जो विधि मोती शुद्ध करने और फूंकने की. हैं वही क्रियायें मूंगे की समझनी चाहिये और यही खाने की भी विधि है। मूंगा के भसम का गुण प्रवालंमधुरंसाम्लं कफपित्तार्तिदोपनुत् । वीर्य- कान्तिकरंस्त्रीणां धृतेःमंगलदायकं ॥ क्षयेपित्तास्त्रका-- सघ्नं दीपनंपाचनलघु । विपभूतादिशमनं विद्रुमनेत्र- रोगहृत् ॥ मूंगा-मधुर, सहा, दीपन, पापन तथा हलका, वीर्य और कांति को बढ़ानेवाला; एवं स्त्रियों को धारण करने से मङ्गल करता है । कफ, पिरा, त्रिदोष, यक्ष्मा, रक्तपित्त, सांसी, विषदीप और उन्मादादि दोषों को दूर करता है। पति यरुत रोग चारोग्यदर्पण। १०१ अथ कास रोगाधिकारः । • यहा रोग समाप्त करनेके बाद अब हम सांसी रोगका प्रकरण उठाते हैं क्योंकि इस प्रमंग में हम उन्हीं रोगों का ययान करना चाहते हैं जो सासकर धातु से मम्बन्ध रखते हैं । सांसी यह रोग भी ऐसी कठिन है, यदि कुछ दिन भी गफलत करे तो इसे पीछा छुडना कठिन पड़ जाता है। लोग मिसरा कहते हैं (रोग का घर सांसी और लपाई का पर हां. सी) क्योंकि यिना धातु से सम्यन्ध खांसी रह नहीं मली। जुकाम वगैरह से लोगों को खांसी आने लगती है अगर धातु शुद्ध है तो बिना दवा छुट जायगी, किन्तु धातु के विकार से ही सांसी जर पामती है ज्ञान लोग धातु पर ध्यान नहीं देते खांसी की दया गर्म शदं खिलाते जाते हैं और खांसी जावज्जीवन पीछा नहीं छोहती इमलिये हम पाठकगणों के उपकारार्थ देशकालानुमार कासरोग का निदानादि कारण और चिकित्सा लिखते हैं। कांस रोग का आदि कारण । धूमोपघाताद्रजसस्तथैवव्यायामरुक्षान्ननिपेवणाञ्च । विमार्गगत्वादतिभोजनस्य वेगावरोधात्क्षवथोस्तथैव ॥ प्राणायुदानानुगतःप्रदुष्टः संभिन्नकांस्यस्वनतुल्यघो- पः। निरतिवक्तात्सहसासदोपो मनीषिभिःकासइति- प्रदिष्टः॥ 20351 यह लोक भरद्वाज संहिता का है मुख और नाक में धुआं लगमे से अथवा धूरि गरदा नाक मुखमें हो के ठमका लगने से अथवा कसरत .

पञ्चमखगई। सते समय गरमी नालूम होना और कहुआ कफ का निकलना यह ल. क्षण होते हैं। कफ की खाँसी में मुख में कफ लपटा रहता है, यह मालूम होता है कि गले में कफ,भरा है, शिर में दर्द गरीर में भारीपन, भोजन अच्छा नहीं मालूम होना, शरीर में दर्द या शरीर जकड़ी सो मालूम हो, गले में खजुली अथया शरीर में खजुली मालूम हो और अत्यन्त सांसने से गाढ़ा कफ निकलता है। - सयकास के लक्षण और क्षतकास के यही हैं जो यक्ष्मारोग में और उरक्षत रोगमें लिख लाये हैं दुबारा लिखनेका कोई प्रयोजन नहीं, ग्रन्थ- कारों ने सांसी प्रकरण में क्षयमास अर्थात् यक्ष्मा रोग क्षतकास याने उरक्षत रोग जिसे ऊपर लिख आये पुनः मैनिदान नादि कारणके लिख डालाहै किंतु वातसय यही है गन्ध बदजानेके भयसे हमने नहीं लिखा । एक प्रकारको खांसी फौधा को कमजोरी अर्थात् कौवा लटफ जानेसे होती है। कौवा और भी कारणों से लटक जाता है उसमें भी खांसी आने लगती है और कमज़ारी के वजेसे खांसते २ भी कौवा लटक जाता है और लड़कों का फौधा प्रायः गिरजाता है, उसमें हर समय गला सर सराता रहता है और खांसी आती रहती है, उस रोगी को खांसो जरा भी चैन नहीं लेने देती या मालूम होता है कि गले में कुछ रुका है। कौवे पर ध्यान न देकर लोग,खांसीकी दवा देते जाते हैं किंतु खांसी और यढ़ती जाती है, इसके अतिरिक रोगों में भी खांसी हो जाती है जैसे- पाण्डुरोगेतयायक्ष्मे गुल्मेवातिक्षतक्षये । शोफाश- सांप्रतिश्याये चावश्यकाससम्भवः॥ बालानांजायते -। कासोधात्रीवैकल्ययोगितः॥

भारोग्यदर्पगा। १०५ पांडु रोग में, यक्ष्मा ( आगे लिख चुके हैं ) रोग में, गुल्मरोग में, चोटलगने, धातु क्षय में, सूजन रोग में, बवासीरमें और जुकाममें अवश्य खांसी शाने लगती है तथा धात्री अर्थात् माता के कुपथ्य से बालकों के भी खांसी आने लगती है। अथ साध्याऽसाध्य लक्षण । इत्येपक्षयजःकासः क्षीणानांदेहनाशनः । साध्यो बलवतावास्या द्याप्यस्त्वेवंक्षतोत्थितः ॥ नोकदा- चित्सियोतामपिपादगुणान्विता ॥ स्थविराणांजरा- कासः सर्वोयाप्यःप्रकीर्तितः। श्रीन्पूर्वान् साधयेत्सा- ध्यान पर्याप्यांस्तुयापयेत् ॥ पूराभमरुणश्यावं हरि- तपीतनीलकं । निष्ठीवेच्छ्वासकासातौनजीवतिहतस्वरः॥ अय कास रोग का साध्य और असाध्य लक्षण लिखते हैं। जो खां- सी यक्ष्मासे होती है वह तो बड़े बलवानके भी देहको नाशकर डालती है, कदाचित् बलवान पुरुपके अग्न्यादि प्रयलके फ़ारण साध्य हो किन्तु पूरे विश्वास लायक नहीं है। इसी प्रकार उरक्षित रोगसे भी उत्पन्न खांसी को जानिये, अगर यह दोनो रोग याने राजयक्ष्मा और सरक्षित नवीन हो और वैद्यादिक चारों चरण * युक्त हो तो रोग छुट वेद्यादिका चारों चरण यह है ( भियगद्रव्याण्युपस्थाता रोगीपाद चतुष्टयम् । गुणवत्कारण ज्ञेयं विकारस्योपशान्तये ॥.) ( भिषग) वैद्य जो भाख और देश काखा का जामनेवाला है। प्रथम पैर है। द्रव्य ) उत्तम पौषधी जो प्रकृति के मुवाफिक हो अथवा रोगो धगयाम हा वैद्य जिस भो-: - पञ्चमखण्ड। . - जाय, जो एद्धमनुष्यों के खांसी होती है जिसे जराकास कहते हैं यह भी प्रोपही समझिये जो प्रयन यातादि दोषों करके तीन प्रकारको सामी कई पाये हैं से साध्य हैं अंधात उत्तम चिकित्सा करनेसे छूट जाती है और याप्य हैं उन्हें यथार्थ पथ्यसे रखना चाहिये । जो सांसी वाला पीय सरीसा, लाल काला हरित, पीला और नीले रंग का कफ धूकता हो स्वास फूलता हो और गला पड़ गया हो ऐसा-सांसी याला विमार | कभी जी नहीं सक्ता॥ जुकाम से उत्पन्न जो खांसी है वह जुकामके शुद्ध करनेसेही पारा- म हो जाती है, अगर जल्द यत्र न किया जाय तो यह भी प्रसाध्य हो सक्ती है। खांसी रोग में पथ्य। . जय तथा गेहूं की रोटी, सांठी तथा पुराने चावल का भात, उरद मूंग और कुरथीको धुली दाल जिसमें छिलका न हो, परवर, नेनुश्रा खर- बूजा, फैली आदि की तरकारी, वैथुप्रा मकोई चौपतिया और कोमल . षध को बनाने अथवा मंगाने की इच्छा प्रगट कर शोघ्र भा जाय यह दूसरा पर है। रोगी के पास रहने वाला वह मौ.ऐसा लायक हो कि जो वैद्य व. तलाय जाय उस क्रिया में चावल मात्र फरक न पड़े और न रोगी कामुला- हिजा करें कि जो रोगौ मांगे वही पोज मंगा के खिला देय यह तीसरा पैर है। और रोगी, रोगी भी केसा हो ( वैद्यभक्तोजितेन्द्रियः ) वैद्य में भक्तौ हो, हृदय में विश्वास कर लेय कि यह हमको अवश्य भारोग्यकार देयगे और वैद्य जो खाने पीने को बता दे उसे रत्ती मात्र अपनी मन मौनी न करें यक्ष चौथा पर है यह चारो पर एकत्रित होने से असाध्य रोग भौ साध्य हो के धारांग हो जाता है पोर इंगको विना चिकित्मा कम नहीं हो सका है।

आरोग्यदर्पग। १०७ भूलीका साग, सूब मुलायम भांटाया भरता, गौ और बकरीका घी और मलाई अर्थात् दूधके ऊपरकी मोटी साढ़ी (वालाई प्रथया दूधके ऊपरकी मोटी मलाई साम को मिश्री गिला के साना और ऊपरसे पा नी न पीना सांसी को बहुत जल्द आराम करता है इसी प्रकार मधेरे मासन मिश्री का खाना भी यहुत फायदा करताहै, सांसी की विमारी में पुराना घी सिलाना लिखा है किन्तु इसमें हमारी सम्मति नहीं है क्योंकि पुराने घी से गले में जलन होने लगती है । साम को भोजनके साथ प्रकृति के अनुसार शरावा पीना हुक्का पीना खटाई में बिजौरा नीबू की अथवा कैथेकी घटनी मसालामें शोंठ, अदरख, गोलमिर्च, सफेद जीरा, छोटी लायची, लहसन और पियाज खांसी की बिमारी में जल बहुत साफ और शुद्ध पीना चाहिये फुर्य का जल जिसमें बहुत लोग पानी भरतेही उसे गरम करके उत्तम रीतिसे छानकर अथवा ताजा पानी पिये दिनमें साना, शहद घाटना धान का साया साना हलके पेट रहना खांसी रोग के लिये पथ्य है ॥ खांसी रोग में अपथ्य । दिशा मार्गमें पिचकारी लेना सुंघनी सूचना घाम और शांच के सामने रहना गरदा गुबार और धुर्येमें रहना बहुत रास्ता घलना स्त्री प्रसंग करना कबज करने वाली तथा बिदाही अर्थात् जो चीज खानेसे छाती पर जलन होती है और जितने प्रकारले रूखे अन्न हैं जैसे बाजरा आदि इनको न खावै दिशा पेशाब डकार खांसी और छींक इनके वेगों को रोकना मछली, बिरुद्धभन्न, सराबजल, खांसी रोग वाला त्याग करे। खांसी रोग की चिकित्सा। प्रथम हम,खांसी,रोगकी साधारण दवा लिखते हैं जो सर्व साधा- रण जन बना सक्त हैं ॥ . . *-- । पञ्चमखण्ड । , " विभीतकंपृताभ्यक्तं गोशठत्परिवेष्ठितं । खिन्नम- ग्नोहरेत्कासं धुवमास्यविधारितं ॥ वहेरे पर घी चुपरके ऊपरसे गौ का गोवर लपेटके आग में पकाय फिर उसको निकाल साफ करके रक्खे जव सांसी आचै एक टुकरा मुख में डाल कर चूसे और पथ्य से रहे तो अवश्य खांसी जाती रहेगी। शठीश्रृंगीकणाभार्गी गुड़वारिदयासकैः। सतैलेर्वात कासन्नों लेहोऽयमपराजितः ॥ कचूर, ककराशिंगी, छोटी पीपर भारंगी साफ गुड़, नागर मेथा और जवासा इन सब दवाइयों को कूट कपरछांन फर उसमें गुड़ मिला देय, इसका मात्रा मासा है, काले,तिलका तेलमें सानके दोनों.समय अथया तीन समय चाटनेसे वातज खांसी अर्थात् मूखी खांसी जिसमें बलगम नहीं आता आराम होती है यदि तेल पसन्द न होतो शहदके साथ पाटै किन्तु गुड़ न मिलावै ॥ लोग तेल का नाम सुन्तेही चकृत होंगे फि खांसीमें तेल चाटना यह कैसी यातहै । यांतज सांसो जब पुरानी होगाती है विना तेल घी पिये भाराम नही होती, शिव प्रसाद नामक एक फायस्य जिसकी उमर चौवीस पच्चीस वरसकोथी तीन बरससे उसे खांसीकी बिमारी रही कोई हकीम धैद्य ठाकरे न छूटाहोगा उसने सोंकी दयाइयांकी किसीके दवासे फायदा न पहुंचा अन्तमें हमारे पास आया हमने भी चार महीने तक सेफड़ों तरहकी दवा खिलाई किसी से कुछ फायदा न पहुंचा अन्तता गत्वा हमने पिप्पल्यादित यनाके पिलाना शुरूकिंयामहीने में बिलकुल रासी जाती रही चार महीने तक घरायरे घी पिलानेसे उसकी दूनी गरोर होगई जिसे चार वरस हुये प्रारोग्य है ॥ M भागग्यदर्पग। १०६ बातम सांसो में अलसी का. तेल पीना यहुत फायदा करता है कि- न्तु लोगोंसे तेल पिया नहीं जाता तेल पीने वालेको दूध नहीं साना चाहिये। हकीमी काढ़ा। जो यातज खांसीको निस्सन्देह फायदा करताहै । गुलबनपसा ६ मासा. हन्सराज ६ मासा मुलेठी ३ मासा सती का बीज ३ मासा अलगी ३ मासा उन्नाय ३ दाना सोको अधकचराफर मिट्टीके बर्तन में, एफपाव पानी में पकायै जय डेढ़-छंटाक.पानी रह जाय मल छानकर ३ मासा मिनी और तीन मासा शहद डालके पी जावै इसी प्रकार दोनों समय पीनेसे १५ दिनमें सांसी जाती रहैगी अथवा जवतक खांसी न आराम हो पी- ताजावै॥ बातज खांसी यालेको शाम को बलाई मित्री अथवा दूधके ऊपर की मोटी साढ़ी मिश्री मिलाकर खानेसे बहुत फायदा करता है जैसे सब प्रकारके पुरानी खांसी रोगमें माखन मिली। रोज दोनों समय गुदा पर किसी प्रकारका तेल हो मलना खांसी रोगमें फायदा करता है । केलेके पक्की छीमी में आधी पीपर अथया पांघ चार दाना गाल निर्घ गाड़ कर ओसमें रख देय और सबेरे छील कर पहले. पीपर को खाके ऊपरसे छीमी को खाजाय या पीपर को खाय एक मनुष्य बल के अनुसार. उसी तरह दो तीन छीमी तक खा सक्ता है। यह योग पित्त सांसी को भी आराम करता है ।।...

११० पञ्चमखुण्ड। पित्त कास चिकित्सा। -- द्राक्षामधुकरवर्जूरं पिप्पलीमरिचान्वितं । पित्तकास हरह्येतल्लिह्यान्माक्षिकसर्पिपा. ॥. बीज रहित मुनक्का मुलेठी और योज-रहित छोहारा तीनों चीजों को समान भाग २ तोलाले आध पाय पानी में पका जव.आधी छटांक जल रहजाय सूय मलके छान लेय छोटी पीपर आधी और गोल मिर्च ५ दाना महीन पीस उसी में मिलाकर चाटनेसे पित्तकी खांसी आराम होती है। इसी प्रकार दोनों समय चाटना चाहिये दधा चाटकर ऊपर से पानी न पिये पित्तकी खांसी में मीठी चीजे खाना फायदा करता है यदि पित्त अधिक बढ़ा हो तो मुलेठी का काढ़ा पिलाके धमन कर दे जिससे पित्त सय निकल जाय और मुन्जिस देके मुलापम रेचन द्वारा दो चार दस्त फरादे तो औरभी उत्तम हो । वासकस्वरसःपेयो मधुयुक्तोहिताशिना । पित्तश्ले- मकतेकासे रक्तपितेविशेषतः।। पित्त फफ जनित सांसीवाली और रक्त पित्तवाला अगर दोनों समय रूसे की पत्ती फा रस २ तोला, शहद६ मासा दोगों को मिला के घाट और यूध पथ्य से रहे तो प्रारोग्य हो। उसी प्रकार दिन में दे। या तीन दफे चाटना चाहिये। यह यात चिकित्सक को हर समय ध्यान में रखना चाहिये कोई किस्म की दवा किसी प्रकृति के लिये क्यों न हो, रोगी से हमेशा पूछता रहे कि तुम्हें दया गरमी तो नहीं करती अगर रोगी कहै कि यह दया हम को गरमी करती है अर्थात् गला सूखता है और पेट में जलन होती है तो उस दवा का देना फौरन बन्द कर देय क्योंकि जो दया रोगी को गरमी करैगी उस दवा से फायदा नहीं होगा।

चारोग्यदागा। कफ जनित खांसी की चिकित्सा। वलिनंवमनेनादौ शोधितंकफकासिनं । 'यवान्नैः कटुरूक्षोष्णैःकफनैश्चाप्युपाचरेत् ॥ स्वरसंगवेरस्य माक्षिकेणसमन्वितं । पाययेच्ट्वासकासघ्नं प्रतिश्याय- कंफापहं॥ "कफकास वाला अगर बलवान हो तो उसको प्रथम लवण द्वारा ब- मन फराय के कफ को निकाल देय और खाने को जवेका भात अथवा जवे की रोटी, कडुना, रूसा और कुछ गरम पदार्थ जो कफ का नाशक है खाने को देय । अदरख का ताजा रस दो तोला और शहद ६ मासा दोनोंको एकमें मिला के पिलावै इसी प्रकार दोनों समय पिलाने से और पथ्य सहित रोगी को रखने से; श्वास, खांसी, जुकाम और कफ का नाश होता है। मनःशिलालिप्तदलं वदर्याउपशोषितं । सक्षीरंधूम- पानंच महाकासनिबर्हणं ॥ शुद्ध मैनशिल को पानी में पीस के घर के पत्तों पर लेप कर लाया में सुखाय, चिलिम में भर उसका धुआं:पीके ऊपर से गो का दूध मित्री मिला कर पीने से कफ जनित कास रोग आराम होता है। अगर इसके | पीने से शिर में घुभरी या शिर में दर्द अथवा जी मचलायती न पाये। पा बहुत थोड़ा २ पीने का अभ्यास करै । इसी प्रकार छोटी हरे को चिलिम में पीकर ऊपर से दूध मिनी पीने से और दिन में कई दरे विहीदाने का लुनाव और मिश्री पीने से सय प्रकार की सांगी मार होती है।

११२ पञ्चमखण्ड। र नजला के.खांसी की दवा। : अगर नजला पुराना हो गया हो और सांसी पीछा न छोड़ती है। तो जातीफलादि चूर्ण जो पञ्चम खण्ड के ७० पेज में लिए आये हैं दोनों समय शहद के साथ अथवा सरबत उन्नाव या सरयत गुलवनप्सा के साथ धाट कर ऊपर से.मित्री सहित उष्ण दूध पिये या कुछ दिनों तक नोती का सेवन करे, और सूर्य पथ्य से रहै क्योंकि नजले की खांसी म. नुष्य का पीछा यहुत . दिक्कत से छोड़ती है सांसी अधिक उमर में जब नजले से सांसी आने लगती है ऐसही फिसीको छोड़ती। ऐसी अवस्था में लोग अफीम खाने लगते हैं और सिवाय अफीम के दूसरी दवा है भी नहीं जय देसे कि रोगी की उमर घालीस, पचास से अधिक है और अनेफ दया दे के थक गये खांसी पीछा नहीं छोड़ती उस समय आ० द. सएट के पेज में जो अफीम बनाने की क्रियायें लिखी हैं तैय्यार कर के यहुत कम मात्रा रोगी को देना, प्रारंभ फर और दूध, अधिक खिलावे, अगर रोगी पथ्य से रहेगा तो अवश्य सांसो की विमारी जाती रहेगी और थोड़ेही दिनों में रोगी रिष्ट पुष्ट हो जायगा । 'अगर थोड़ेही दिनों की सांसी हो चाहै नजला भी जारी हो निम्नलिखित दया को कुछ दिनों तक पथ्य सहित; खाने से निस्सन्देह फायदा होगा। बंसलोचन तोला; छोटीलायधी १ तोला, गुर्च का सत्त १ तोला, तीखुर ६ मासा, गोंद बबूल का ६ मासा, छोटी पोपर ६ मासा, दाल- चीनी ३ मासा समीमस्तगी ३ मासा, सब को महीन पीस चूर्ण करलेय इसका मात्रा १॥ भासा से ३ मासा तफहै शहद के साथ अथवा उक्त सरवतों के साथ दोनों समय चादकर ऊपर से यह जुादा को पिये। गुलवनप्- सा६मासा, उम्नाय ४ दाना, मुलेठी ३ मासा और मिश्री ६मासा घारौं चीजों को पावभर पानी में पकावै जय आधपांव रह जाय मल छान कर पी लावे. कुछ दिनों तक घरावर इस दवा को सेवन करने से नजले से उत्पन्न खांसी जाती रहती है। - 7 भारोग्यदर्पण। ११३ ; पहेहड़ का बक्कल १ तोला: वहेरा का बक्कल र तोला सूसा आवला बीज रहित ४ तोला छोटी पीपर २ तोला सबों को महीन चूर्ण करलेय इस चूर्ण को अन्दाज गाफिक दो समय प्रथया तीन समय सहत के साथ चाटने से खांसी, श्वास और ज्वर का नाश होता है। यह चूर्ण दस्त का लानेवाला और अग्नि को जगाता है । , मरिचादि बटी। मरिचकर्पमात्रंत्यात्पिप्यलीकर्पसंमिता । अर्द्धको यवक्षारः कर्पयुग्मंचदाडिमम् ॥ एतच्चूर्णीकृतयुंज्याद- टकर्पगुढ़ेनहि । शाणप्रमाणगुटिकां कृत्वाबक्तेविधारः येत् ॥ अस्याःप्रभावात्सर्वेऽपि कासायांत्येवेसंक्षयम् ॥ मिरयर ताला छोटी पोपर १ तोला, जवाखार आधा तोला, अनारदाना दो तोला इन सब दवाइयों को चूरण आठ तोले साफ गुड़ में सान घार २ मासे अथवा दो दो नासे की गोली बनाय ले, जय खांसी नावे एक गोली मुस में डाल कर चूसे, इस गोली के घूसने से सब प्रकारकी खांसी नाश को प्राप्त होती है अथवा खदिरादि बटी जो आर द० में लिख चुके हैं उसको भी चूसने से खांसी जाती रहती है। वब्बुलारिष्ट । : तुलादयंचवड्यूल्यंश्चतुर्दोणेजलेपचेता द्रोणशेषे रसेशीते: “गुडत्यत्रितुलांक्षिपेत् ॥ धातकीपोड़शपलों कृष्णांचदिपलांतथा । जातीफलानिककोल मेलाव- पञ्चमखण्ड । । - पत्रकेशरम् ॥ लवंगंमरिचंचैवं पलिकान्युपंकल्पयेत् । मासंभांडेस्थितस्त्वेष वव्वुलारिष्टकोजयेत् ॥ क्षयकुष्ट- मतीसार प्रमेहस्वासकासनुत् ॥ यह यन्युलारिष्टशारङ्गधरकाहै यईयारका परीक्षितहै, क्षईसे जोखांसी है अथवा धातुके समय से यदि खांसी मातीहो तो अवश्य फायदा होगा। बल्यूलरक्ष फी अंतराल पसेर ले अधकचराफर अठगुने जलमें पकावै जब चौथाईजल रहमाय शीतलकर उसी में १२ सेर साफ गुड़ डाल देय धधका फूल १ सेर छोटीपीपर तोला, जायफल कंकाल छोटीलायची दालचिनी तेजपांत नागकेशर लग और मिर्च ये सब चार ताले इन सबको एक | मट्टी के चिकने घड़े में डाल परई और मृत्तिका से मुख बन्दकर १ महीना पर्यन्त सुले स्थानमें जहां दिनमें धूप लगै रातमें ओस में रक्खें.१ महीने के बाद उसे छानफर बोतलमें भरदेय इसका मात्रा ६ मासासे दो तोला है दिनमें दो दफे अथवा तीन दफे पीनेसे कफक्षईसे सांसी कुष्ट मतीसार प्रमेह श्वास और अनेक प्रकारकी खांसी पाराम होती है किन्तु सास कर ममेहसे अथवा यमासे उत्पन्न खांसीको नाश करता है ॥ .: • अथ द्राक्षारिष्ट।. द्राक्षातुलाईद्विद्रोण जलस्यविपचेत्सुधीः । पादशे- पेकपायेच पूतशीतेविनिःक्षिपेत् ॥ गुडस्यद्वितुलांतत्र- खगेलापत्रकेशरम् । प्रियंगुमरिचंकृष्णां बिड़गंचेतिचू- र्णयेत् ॥: पृथकपलोन्मितै गैस्ततोभांडेनिधापयेत् । स्थापयित्वाततोमासं ततोजातरसंपिवेत् ॥ उरःक्षतं- स आरोग्यदर्पण। ११५ "क्षयंहति कासंश्वासगलामयान् । द्राक्षारिष्टोहयःप्रोक्तो वलसन्मलशोधनाः॥ मुनक्का बीज रहित रे सेर २० सेर पानी में बुद्धिमान् धीमी प्रांगेसे. पचाये, जब चौथाई जल बाकी रहे तय शीतल कर छान लेय । सिमें गुड़ ८ सेर लिसा है लेकिन साफ गुह ४ सेरष्टाले, दालचिनी छोटीवायची तेजपात नागकेशर, प्रियंगुफूल, गोल मिर्च, ठोटीपीपर और या यभिरंग यह सब घार २ तले घूर्णफर डाल पूर्वयत् मृतिका पात्र में एक महीना पर्यन्त पर रक्यै पश्चात् छानकर योसलमें भर देय, इसका भी मात्रा ६ मासा दो तोले पर्यन्त है । इस द्राक्षारिप्ठको पीनेसे तरःक्षत और क्षयोसे उत्पन्न खांसी श्वास, गले का दर्द गला सूज भाना या बैठ जागा आदि रोग नाश होते हैं । यह द्राक्षारिए पलको बढ़ाता है और मल को शुद्ध फरता है। भांर्यादि घृतं वात कासाधिकारे । भांर्गीकल्कैतिञ्चाथ पचेद्दधिचतुर्गणे । भार्गीरसं द्विगुणितं वातकासहरंपरम् ॥. एक पायं भारंगी यदि ताजी मिलें तो अति उत्तमहै नचेस् सूखी भारंगी एक पावले कुचलंकर रातको पानी में भिजादे सबेरे सिलपर पीस लुगदीपार एक कढ़ाई (जिसमें रागेको कलंई है।) उस्में एकसेर पी और पीसे चौगुना दही को पानी और भारंगीयो लुगुदी तीनोको एकत्रितकर धीमी आंच से पकाये ऊपरसे पुनः भारंगी का दूंना रस डाले। यहांभी उसी तरह समझिये यदि ताजी गिले तो कुचल कर रस निकाल लेय नचेत् सूखी भारंगी प्राधसेर ले कुचलकर ३६ सेरे जल में रातको भिजावै सबेरे धीमी -+----- ११८ पञ्चमखाएं। कर घृत "पिप्पली घृत। यह घृत बनाने में बहुत सहज है और सब प्रकार के नई पुरानी खांसी को आराम करता है. यह निहायत परीक्षत है। छोटी पीपर एक पाय बकरी के दूध में पीस कर लुगदी यनालेय, गोघृत ॥ ढाई सेर ब. फरी का दूध १० सेर तीनों को कढ़ाई में चढ़ाय धीमी आंच से पचाय तैय्यार करलेय, इस पृत के सेवन से सब प्रकार की खांसी आ• राम होती है। अगर पचनाय तो रोगी इस घृत.को चार, तोले तकपी सक्ता है । इस बातको हम फिर भी कहते हैं कि घी के ऊपर पानी धोखे से भी न पिये पंध्यं यही है जो ऊपर लिस आये हैं । पारद की कजली। वाई.रोगियों के पाराम होनेसे सिद्ध हुपा है कि जिनको अवस्था प. धिक है और बहुत दिने से खांसी को बिमारी घेरे है तथा भौशल पदार्थी के सेवन से या शीत स्थान में रहनसे खांसी पधिक होजाती है। जिनके कफ प्रधिका गिरता है लेकिन मौतर दाह गरमी नहीं मालूम होती है गरम चौ. जांके खाने से फायदा मालुम है। उस रोगौके लिये पारदको पाजली अमत है, जिन्हें जरूरत हो, और वे न वगा सकें ते। किसौ वैध से बनवाके रोगीको खिलावें, पौर रमांको पेक्षा यह पारदको कजली निहायत उत्तम है। इसके वगानको बिधि यह है॥ ६. कलाशव्योपसंयुक्तं शुद्धगंधविमर्दयेत् । अरनिमात्रे वस्त्रेतद्धिप्रकीर्यविवर्जयेत् ॥ सूत्रेणवेष्ठयित्वाच याम- तैलेनिमजयेत् । धृत्वासंदशतोवति मध्ये प्रज्वालये- ञ्चतां ॥ द्रुतोनिपतितोगंधो निर्दोषःकांचभाजने। तां- पारोग्यदर्पगा। १२६ द्रुतिप्रक्षिपेत्पात्रे नागवल्यास्त्रिबिन्दुकान् ॥ चलेनप्र. मितंशुद्धं सूतेन्द्रंचविमर्दयेत् । कासश्वासंचशूलानि- गृहणीयादपिदुर्धरं । आमविशोपयत्याशु लघुत्वाकरो. तिच ।। शुद्ध पावलासार गन्धक १६ ताला लेकर उममें एक ताला (व्योप) मोठ पीपर गौर मिर्च मिलाके खूब मौन खरतकर पयात् संवाहाथ सफेद कप- डाले उमो पर गन्धकको फैलाय देय और लपेटकर बत्ती वनावे पोर डोरेसे खूब लपेट देय ताकि दवा न गिरने पावै पथात् नमो बत्तौका पहरभर काले तिल के तेल में मिना रक्खे पीछे एक तरफसे चोमटामे पकडं दूसरी तरफ से झालावे और बत्तोके नीचे एक पाटोरा कांचना रखदै उसमें जो तेल टपके गिरे उसे लेवार सौमोमें धरै जितना वह तेल हो उतनाही पथवा उसका प्राधा संसकार किया हुषां पारा अथवा शुद्ध सिमरख का निकाला हुआपारे को ले काला खरत जिसमें पत्थल न छूटताहो अथवा पिनी के खरलगें डाल जितने पहर, सुन्दर फज़ली हो जाय बराबर धोटता रहे। जब देखे कि नियन्द्र वाजली होगई है कागदार सौमी में रखदे।इस कजली का मात्रा ४ चावल दोरतो तकस वाजली का दोनों समय सदके साथ चाटने से खांसी प्रवास भोर शूलरोग पसाध्य हो तो भी पाराम हेते तथा पामराग को दूरबार यह कजली भरीरको लकी.भारती.।। इस फसलीके खाने वाला बहुत नमकीन पदार्थ खट्टे पदार्थ मागपात तेलमिर्चा पांचार दही:पादिन खावें स्लो मसंग न करे रास्ता न घर और पिचकारो इन पथ वस्तु का त्याग कर -- शृगाराभुकम् कासाधिकारे।। मिस रागोको अवस्था ४० वर्ष से अधिक और मिजाज भोतल १२० : पचमखुण्ड। अर्थात् गर्मी चीन से फायदा होता है उनको लिये यह अभ्रमा अत्यन्त लाम दायवाद। - 38 शुद्ध कृष्णा पका- मम इनार.पांच का अथवा मो.पांचा ५ तोला; वापूर, नायफल, सुगन्धवाला गज पोपल तेनपात बोगनंटामामी तालीमपव दालचिनी, नागकोपर, कूट, और धवका फल, यह सब चार २ मासे वीजरहित हड़, बहेरा, पावला, मोठ, पीपल, मिर्च प्रत्येक छ छ मामे छोटोलायचोने दाने और जायफल पाठ ८ मासे भयो त। खव महीन चूर्ण फर पद्यात् शुद्ध पावलासारगंधक ६ मामे शुद्ध पारा ४ मासे दोनों को ८ पहर घोट कजली पर उसो में मिला पश्चात् सोका जल में घोट चनेले बराबर गोलों वाय छाया में सुखाय लेय इसका खोराक एषा गोलीमे ४ गोलो तक है इस गालो को साम मवेरे दोनों समय खाकर जपर से पान और प्रदरख का रस एक ताला अथवा दो तोला पिये अन्त में योजा जल पिधे दम गोली के सेवन से पुरानी खांसी प्रवास उदर रोग पादि पाठिग बिमारियां पाराम के होतो. हैं। वैद्यक में तो इस बटो की बहुत कुछ तारीफ लिखी है.जैसे- हन्यादामाशयोत्थान् कफपवनकृतान पित्तरोगान शेपान.। वल्योवृष्यश्चयोगस्तरुणतरकरः सर्वरोगेप्र- शस्तः ॥ पंथ्यमांसेश्चयूपैर्तृत परिलुलितैर्गव्यदुग्धैश्च भूयः । भोज्यंयोज्यंयथेष्टं ललितललनया दीयमानं- : मुदायत् ॥, शृंगाराभ्रेण कामीयुवतिजनशत भोगयो- गादतुष्टः । वयंशाकाम्लमादौदिन कतिपयचित्स्वेच्छ- पाभोज्यमन्यत् ॥ दीर्घायुःकाममूर्गितिवलिपलितो मानवोऽस्यप्रसादात् ॥ . 1 पारोग्यदर्पण। १२१ - प्रामायके विकारसे उठे जितने रोग हैं, कफ, बात और पित्त करके जितने रोग ने सब इस बटोसे नाम हेति हैं । बल पुरुषार्थबई का और वृद्धसे शान बनाने वाली यही वटी है । इस दवा का सब रोगी में देना उत्तम है। इस पर मांसका यूम, गो का घृत और दूध पथ्य है. इसके अतिरिक्त और भी प्रकृतिक प्रहार उत्तम भोजन किसी रूपवती स्त्री से बनवाय बार खावें। इस गरलोके खाने वाला पुरुष सौ स्त्रियों के साथ सहबास वारने से भी संतुष्ट नहीं होता। इसका सेवन करने वाला भाका और खटाई कुछ दिनों के लिये त्याग देवे और सब प्रकृति के पतुमार भोजन कर ता व पुरुष दौर्धायु हो और कामदेवके समाग दिव्य मूत्तिमान हो और उसके दोस्त की सफेद ग हो इत्यादि तारीफ लिखौहै किंतु इतना तो हम अवश्य कह सही है कि भोत मिजाज वालेषौ पुरानीखांसी में यह वटी निसन्देह फायदा करती है। छाती पर कफ का सूखना। खांसी रोगवाले के..छाती पर कभीर गरम भोपंधों के अथवा गरम चीजोंके भोजन करने से कफ सूख कर जम जाता है कि जिस्से रोगी को खांसने में तकलीफ होती है लाती पर कफ का घरप( शब्द होता है। और कफ मुसकिल से निकलता है और छातीसे कफ छुटते समय छाती में दर्द होता है ऐसी अवस्था में उस रोगीफो कोई गरमः औषध अथवा गरम यस्तु खाने को न दे जय तक कि बलगम छाती से छुट कर मुख अघया दस्त से बिलकुल निकल न जाय क्योंकि ऐसे समय में थोड़ा भी.गरम दया सिलाने से रोगी यमालय का रास्ता लेता है । अज्ञान वैद्य लोग ऐसे रोगी को भी प्रायः रस मिलाकर मार डालते हैं। ऐसी अवस्था में चाहिये कि निम्नलिखित दवाइयों से बलगम को साफ करें। लवणक्षार। संधानोन आधपाय सांभर गान आधपाय छुतिहा नोन प्राधपाय १२२ पञ्चमखण्ड अजवाइन प्राधपाय महागाधिपाय इन सर्व चीजों को मिट्टी के बर्तन में भर कपरौटी फर सुसाय हायभरका गढ़ा खोद बीचमें भैदिया और चारों तरफसे काटा देकर फूक दे शीतल होने पर उसमेंसे निकाल महीन चूर्ण कर बोतल में रख दे और दिन में कई दफै चार २ रत्ती खावे इसे बलगम ढीला होकर निकल जायगा यदि एक दो दिन इस औषधे के सेवन से लाभ न हो तो फौरन देवाको छोड़कर निम्नलिखित औषधका सेवन करे । पायभर गेहूंकी भूसी लेकर नाथसेर पानीमें १ घंटे तकभिजा के मलकर छान ले उसी पानी में छिला हुआ दश. बदाम और भाधा तोला बबूल का गोंद और ताला मिश्री डालकर धीमी आंच से पकावै जय आधा पानी रहजाय तो उसी पानी को. एक २ चम्मच कई दफे | करके पीवे इसी प्रकार दोनों समय इस हरीरा को बना कर दो तीन दिन तक पीने में होती पर का कफ.छुटकर निकल जाताहै अगर इससे भी लाभ न हो तो ३ तोला अलसी और १ तोला मिश्री दोनों को छेदपाय पानी में पकाय मल छानकर एक २ चम्मच दिनमें कई दफे करके पिलीव जब तक'कफ छाती से बिलकुल साफ न हो जाये रोज इसी तरह तैयार करके पिलांता रहे। कौव्वा लटकने से खांसी। अगर कौवा लटकनेसे खांसी हो उसका लक्षण यह है कि हर समय गले में सांसी की खुशखुशी लगी रहती है और यह मालुम होता है कि जैसे गले में कोई चीज अटकी हो। ऐसी अवस्था में सिवाय कौवा उठाने [फे अन्य उपाय नहीं हैं। माजूफल, वंशलोचन, छोटी लायची के दाने तीनों को बराबर ले महीन चूर्णकर उसीसे. कौवे को उठाये अथवा टिंचरस्टील याने लोहे का अर्फ, अंगरेजी दवाखानों में मिलता है फोहेमें बोरकर कौवे में लगाने भारोग्यदर्पण १२३ . . से भी लटका हुआ कौवा उठ जाताहै सैकड़ों बार परीक्षा लियागया है | किन्तु यह ब्राह्मणादिकोंके निय, उत्तम नहीं है इससे कि यह स्पिरिट मर्थात् शराबसे बनता है। एतयारके दिन कौवे की यीठ लेकर कपड़े में बांध यालकों के गलेमें बांधने से बालकों का कौवा उठ जाता है..तथा.दो चार दिन इसी.त. रह कौवा उठाने से भी उठजाता है, प्रायः स्त्रियां उठा देती हैं। अथ श्वासाधिकार। खांसी रोग के बाद अब हम श्वास रोग का प्रकरण उठाते.। खांसीके याद श्वास रोगके कथन का मुख्य प्रयोजन यही है कि कुछ दिनों तक खांसी बनी रहनेही से स्वास रोग होजाता है, दूसरे श्वासके कारण भी सय यही हैं जो यक्ष्माके हैं। तीसरे धातुशुद्ध और अवस्था पूर्ण रहनेसे श्वास रोग नहीं होता, धातुकी दौल्यता रहने पर, किसी फर्म अथवा खाद्याखाद्य द्वारा दिलपर सुष्की पहुंधनेहींसे रोग होजाता है। पाठकगण, श्वास रोग प्रायः युद्ध पुरुषों में जिनकी धातु स्वयं कम हो जाती है, और गांजा, परस घराष्ट्र प्रादि:नशाओं के ,साने वालों में कि जिनकी धातु, अत्यन्त हृदयमें गुप्की पहुंचनेसे सूख जाती है, देखते होंगे। आयुर्वेदके किसी २ ग्रन्थों में सांसी रोगके पयात हिचकी रोगका ययान करके तय श्वास रोगका प्रकरण उठायाहै उसका कारण यह है कि हिचकी और श्वास रोगका आदिकारण एक माना है और दोनों रोगों को .. साध्य कहा है। लिसा भी है... थैरेवकारणैर्हिक्का, बहुभिःसंप्रवर्तते । तैरेवकारणे:- श्वासोपोरोभवतिदेहिनां । विहायप्रकृतिवायुः प्राणो- ऽथकफसंयुतः । श्वासयत्यूर्ध्वगोभूत्वा तंश्वासंपरि- चक्षते ।।

पञ्चमखण्ड यह सुश्रुतका वचन है-जिन २ कारणों करके मनुष्यको-हिका अर्था- त् हिंधकी रोग होता है। उन्हीं २ कारणां करके मनुष्यको श्वास रोग भी होता है । हृदयस्थ प्राण वायु जिस अवस्थामें कफ युक्त होको अपने स्वभाव को याने जो उस्का निजकाम है उसे परित्याग करके कईगामी होता है अर्थात् ऊपरको चढ़ता है, बस उसको बाहर निकालने के लिये जो मनुष्य को वारम्वार मुख खोलना भूदना पड़ता है उसमे एक प्र- फारकी हांफी आने लगती है उसी. को वैद्य लोग श्वास (दमा) २ कहते हैं । यद्यपि श्यास रोग एकही प्रकार का है किन्तु निदानदिका. रणों करके पांच प्रकार का कहागया है । यथा - महोर्ध्वछिन्नतमक क्षुद्रभेदैश्चपंचधा । भिद्यतेस- महाव्याधिः श्वासएकोविशेपतः ।। महावास र ऊ वास २ हिन्नप्रवास ३ तमाश्वास ४ भोर क्षुद्रस्वास यह पानवास महा व्याधि किंतु पसिल में है एकही श्वास । इसमें ३ श्वास साध्य १ कष्ट साध्य पोर एका साध्य, है सा लिखा भी है। क्षुद्रःसाध्यतमस्तेषां तमकःकृच्छूउच्यते । त्रयःश्या- - सानसिद्धयन्ति तमकोदुर्बलस्यच ॥ . जब तक प्रवासके और भो समस्त लक्षण प्रत्यक्ष नहीं होरी राग साध्य रहता है और वह साधारण रोग समझा जागाहे किंत,सव लक्षण उपस्थित, हातही साध्या साध्य का निर्णय होजाता है जैसे क्षुद् ग्लास', साध्य और तमक प्रवास कष्ठ साध्य और-वाको तोन प्रवास रोग असाध्य हैं। : पूर्वरूप और संप्राप्ति । प्रायूपंतस्यहत्पीड़ा शूलमाध्मानमेवच । आनाहो- चक्रवरस्यं शंखनिस्तोदएवच ॥

भाग्यदर्पण। १२५ . + , यदास्रोतांसिसंरुध्य मारुतःकफपूर्वकः । विष्वग्ब्रज- तिसंरुद्धस्तदा श्वासान्करोतिसा प्रथम २. जब मनुष्य को श्वासरोग होनेवाला होता है तो निम्न- लिखित लक्षण उपस्थित होते हैं जैसे हृदय में कुछ दर्द या भारीपन मालूम हो जैसे बलगम जमा हैं, पेट प्रथया शरीरमें दर्द, पेटका फूलना अथवा यह मालूम हो कि पेट भोजन से सूर्य भरा है अथवा पेट के नसे तन जांय, मुख का स्वाद फोका और कनपटियों में दर्द का होना यह श्वास होने के पहिले होता है, इसी को प्राग रूप कहते हैं । श्वास की संप्राप्ति अर्थात प्रवास रोग शरीर के भीतर कैसे अपना घर करता है उसे लिखते हैं, प्रथम प्राणवायु कर्फके साथ मिलजाता है पश्चात उसी की सहायता से अन्न और जल के यहनेवाली नाड़ियों को रोफलेता है और आप उस- कफ कर के रुके भये नाड़ियों में चारो तर्फ फिर कर उर्द्धगामी. हा के निकल ने लगता है अर्थात् श्वास को उत्पन्न करता है इसी का नाम संप्राप्ति है । महा श्वास.का लक्षण । निम्नलिखित पांचों श्वासों के लक्षण श्लोकों के द्वारा न दिखला फे सिर्फ भाषा में लिखे देते हैं। उसका कारण यह है कि एक र लक्षणों को कई २ श्लोकों से पूरित किया है और इतने लोक किसी को नप. स्थित रह नही सक- क्योंकि प्रथम-तो. श्लोकोंको रटन कर कंठाग्रकरना, दूसरे सर्वदा उपस्थित रहने के लिये पाठ किया करना यहुतही कठिन है, सिर्फ आशय इदस्य रहना चहिये सो- भाषा के द्वारा यासूयी है। सक्ता है इसलिये हम श्लोकों को न लिख कर सिर्फ भाषामें लिखते हैं। जिस मनुष्य का प्राणेयायु शब्द करता हुआ अर्ध्वगति को प्राप्त १२६ पञ्चमखगड। - होता है उस श्वास से मनुष्य बहुतही दुखी होता है, वह श्वास कैमा चलता हुआ मालूम होता है जैसे कुछ दिनों का गाओं के साथ समागम न करनेयाला मस्त सांड़ श्यासे लेता है, वैसाही महाश्वास वाले रोगी का श्वास फूलता है, उस अवस्था में उस रोगी का पठित शास्त्र, विज्ञान शास्त्र आदि सय विस्मृति हो जाते हैं, और नेत्र और मुख फैल जाता है, दिशा: पेशाव कम उतरता है, स्वरभंग मन की उदासी और श्वास शब्द दूर से मन पड़ने लगता है। यह महाश्वास के लक्षण हैं यह श्वासवाला रोगी बहुत कम जीता है। ऊर्ध्वश्वास के लक्षण । यह श्यासाला रोगी ऊपर की लम्बी श्वास लेता है और वह श्यास नीचे को नहीं खींच सक्ता अर्थात् पेट में वायु नहीं. समाता है कारण यह है कि कर्थश्वास वायुके अधिक क्रोधित होने से होता है उस रोगी के नेत्र स्थिर नहीं रहते ऊपर को इधर उधर देखता है, शरीर में दर्दः मुख का सूखना, वेचैनी अधिक होती है, और जब'श्वास नीचे को कमाती है तब रोगी मूर्छित हो जाता है. ऐसाही बारम्बार होने से यह रोंगी उसी श्वास से प्राण को परित्याग करता है.। छिन्नश्वास के लक्षण । जो मनुष्य इन्द्रियों से शिथिल हो रहि रहि के स्वास लेताहै और हृदयादिक मर्मस्थानों में फादने या छेदने सरीखा दर्द हो श्वास लेते में. जिम, दर्द के.बजे से.यास.न.लिया जाय, पेटका फूलना, पसीनामाना यदहोशी का होना, नाभी के नीचे बस्ति अर्थात् पेडू में प्रति दाह,. | नेत्रों में पानी सा भरा रहना, शरीर शिथिल तथा क्षीण होना, एफ नेत्र । लाल, मुख का सूखना; चेष्टा का बदल जाना कुछ प्रान तान- बकना १ .इन सब लक्षणों के संयुक्त छिन्नःश्वास वाला रोगी व्याकुल हो, के. शीघ्र ही प्राण बिसर्जन करता है, इसमें कुछ भी संदेह नहीं जानना । तमक श्वास के लक्षण । जब प्राण वायु अपना मार्ग छोड़ के कुमार्गी हो के नाड़ियों में प्राप्त होता है तब गरदन और:शिर को जकड़ि के कफ को मढ़ाय पी- पारोग्यदर्पण। १२७ नस जिसे नाक यहना कहते हैं उस रोग को पैदा करता है। तब यह माण बायु उस पीनस सम्बन्धी कर्फ से रुका भया कंठ घुरघुर करता है और अत्यन्त असहन दर्द जो सहने लायक नहीं है ऐसा दर्द माणस्थान जो हृदय है हाके यह श्वास उत्पन्न होता है। तब यह रोगी. उस श्वासके बेग से व्याकुलता तथा कष्ट एवं त्रासाको प्राप्त होताहै जैसे अथाह जल में डूबते हुये को सहाई नौका,न.पाने वाला जनः। बारम्यार श्याम का रुफ जाना, खांसते २ यारम्बार मूर्छित हो जाना, छाती से कफ न छुटने की अवस्था में अति पीड़ित होना, कफ गिर जाने पर क्षण मात्र को आराम मिलना, सर्वदा गले में खसखसाहद, बना रहना,"और प्रयास फूलते अवस्या में बोलने में कष्ट होना, नीदको नहीं माना (संवयं यह है कि लेटे पर उसकी पसुरियोंकों बायुधरकर जकड़ लेता है) तय रोगी झंट उठ बैठता है तो चैन मिलता है, इसी से श्वास वाले सामने बड़ी तफिया पर उसी पर छाती को आड़कर अपने समय को काटते हैं जिनका चित्र यह है) नेत्रों का संचा रहना, मस्तक में पसीना का प्राना, मुख-सूखता रहना, श्यास फूलते स. मय जैसे हाथी पर बैठा हुआ पी. लपान हालता रहता है वैसाही वह रोगी हालता है। मायः तमश्वास मेघौके उठनेसे, पानी परसने से, ठंढे कानमें रहने से और शीतल तथा कफकारक पदार्थों के सेवनसे बढ़ता है। यह तमक प्रवास कष्टसाध्य है किंतु नधीन अवस्था में उत्तम चिकित्सा होने से आराम भी हो सकता है। खुरदाबादमें मुभी रामनलाल नामक एक कायस्थ रहते हैं और न्ह बहुत दिनों से खास रोग नगला के बने से है, कृपय यस कमी २ उमड़ पाता है। उनकी बिमारी उमड़ने से एक अपूर्व लक्षण मिलता है, जिस दिन उनको सास सभड़ता है वह करते हैं कि भाज के तीसरे दिन बादल ठेग और पानी बरसेगा वैसाही होता हे याने कई देर देखा गया का साफ - १२८ पञ्चमखण्ड। प्रतमक श्वास के लक्षण । . जो तमकश्वासके लक्षण जपर कह पाये है वही रोगी यदि ज्वरोर मूळ करके युक्त हो तो उस प्रवासको प्रतमक प्रवास जानना और क्रिसौ २ का मत है कि नाकमें मो मुख में धूरि गरदा के माने से, अंजोर्ण से, अधिक देर तक पानी में भीगने से तथा उदावत पर्थात् मलमूत्रादि वेगी के रोकने से प्रतमक प्रवास उत्पन्न होता है, यह खास चौतल उपायांसे मांतिरहता है क्यों कि मतमा वास वाले को भौतर ऐसो गरमी मालुम होतो है मानों किसीने उष्ण स्थान या अंधियारेगें वन्द कर दिया है। प्रतमक प्रवास ताला गरम भो- षों के उपचार से भौघडो यमालयके रास्तेको वैदाराज के यभवो गाते हुये समोभित करता है। यदि कोई पूछ वि वैद्यराजके यमको क्या गावेगा सुमिधे पाण कालको पायः लंठाधिराज वैध लोग निदान ते विचारते नहीं किसी तरहका प्रवास क्यों ग है। झोका झोक र सेवा पुडिया चटातेही नायगे निसमे रागौ सर्वदा के लिये पाराग्य हे!जाता है। हमारे पायुर्वेद, श्वास रोगका निदान यहीं तथा कहा है किंतु डारोमें कुछ अधिक वाहा है इस लिये इस स्थलगे हम कुछ डाकरी मतानुसार भो खास का निदान कहते हैं। -- है. वादल को नाम मात्रके नहीं देख पडते किंतु भाकाम वादले से पाहा. दित ने तीन दिन पूर्वही उठता है इस से मालुम होता है कुछ भाभार मेघौले उमी दिनसे होताहे किंतु सूक्ष्म होने के कारण अथवा अधिक दूर रहने के कारण देख नहीं पड़ते। वम पाठकगण इसी उदाहरणमे समझा सक्त हैं. गि वाध पंचतत्व का.भारोरिक पंचतलोंके साथ पितिना घनिष्ट सम्बन्ध है इमोसे बहुत विमारी हैं जो समयानुसार स्वयं उठा करती है. पौर, ग.न्त होती हैं।

आरोग्यदर्पण ।. १२६ ASTHMA. (श्वासकास) डाकरी में इस रोग को बयान इस प्रकार लिखा है। इस रोग का विशेष चिन्ह यह है कि इसके उपस्थित समय में वाम बड़े कष्ट से लियानाता है और जब खास दब जाता है वास लेने में कुछ कष्ट नहीं होता, यह रोग पांच प्रकार है। . Humoral Asthma or Bronchial Ftuex (वायु पयाई वासकास) यह रोग कुछ दिनों तक प्रवास नली दाह सहित रहने से पुनः भरदो पहुंचने से उत्पन्न होता है । इस प्रवास का लक्षण तमक प्रवास के साथ मायः मिलता है। २ Congestive Asthma (रक्त पूर्ण वाम कास) इसका लक्षण प्रायः धरःक्षत राग के साथ मिलता है। ३ Spasmodic Asthma (दर्दयुक्त प्रवासकास ) इसी को स्नायु सम्बन्धीय श्वासकास कहते हैं इसका सबब यह है कि वायु स्नायुओं में घुस कार नसों को खींचता है बस उन नसों में दर्द होने सेदो पदांस खांसी होती है दूसी से उक्त गाम पड़ा है। 8 Hay Asthma ( तणाघात श्वासकास ) यह रोग वायु नलो अ. त्यन्त शुष्क होने से होता है अथवा सड़े घास का भाफ गाफ में नाने से यह रोग होता है। ५'Hysteric Asthma (गुल्म प्रवास कास) यह रोग मकार स्त्रियों को गुल्मरोग होने से होता है अर्थात् पौरतों के रक्तं गुल्म कुछ दिनों तक ब- ने रहने से खांसी खास रोग हो नाता है। वायु पघाई प्रवासकास प्रात् वायु वाहिनो स्तायुमें भरदी पहपने से जो श्वास रोग होता है उसका संक्षेप मे विवरण करते हैं।

पञ्चमखण्ड । इस रोगके प्रारंभ के समय पेटमें वोझा मालुम होना, चेहरे का रंग फोक्रा, तन्द्रा भिर दद होता है। संध्या का मालुम हो जैसे कोई छातो ज. कड़ दिया है इस प्रकार: प्रवास लेने में कष्ट मालुम है। और खास धौरे २ लियाजाय एवं गलः सांय २ करे और सूखी खांसी भाव और जैसे चेहरा मुरझाय जाता है और खास लेने में इतना कष्ट होता है कि जैसा हमने चित्र दिया है, विना उसो सरह हुये रोगो क्षण मावको चैन नहीं पा सत्ता है क्योंकि श्वास लेते २ पेटके नसे खिंच जाते है, मांस पेसो भयानक रूप से काम करने लगते हैं। किसो २ रोगो को सहसा भई राति समय में भी उता लक्षण सहित प्रहासकास उठ खड़ा होता है जिससे एका एक घबड़ाकर छठ वठता है। : छातीके ऊपर अंगुलियोंके अग्रभाग हारा आघात (ठोकनेस) करने से टपटप ऐसा भन्द बोध होता है। किन्तु यहोराग जव कठिन तप से भाक्रमण करता है तब वोध होता है परन्तु इसौ रोगके प्रथम अवस्थामै छाती में यान लगा कर सने से वास नली में बहुविधि घड़धड़ाने का मन्द मालुम होता है पहले टबाट ठकठक एवं सांय २ तथा प्रवास पेथ में जैसे कोई वस्तु धिमता. दो वोध होता है.. भरौरको अभ्यन्तरस्थ इन्ट्रियांग हृदय प्रांत भादि पीडितावस्था के नि. दान जानने सिर्फ एकही उपाय है एक तो छाती पर अंगुली ठोकाकर और काम लगाफर गब्द सनना भिवाय इसके शोर नाड़ो भादिसे यथार्थ बोध क- रना बहुत कठिन है। उकरलोग पूवास राग में निम्नलिखित रौतिसे विमारी की परीक्षा करते है और इस प्रकारसे परीक्षा वारगी बहुत उचित है क्योंकि प्रवास रोग हातोसे होता है और छातीमें भनेफ मामय के प्रवास रोग में विपरोत गुष्प वाले तथा सकृत एवं वलहीन होजाते हैं उन सोमा हाल नाड़ी के हारा नहो मालुम हो सता । इसमें कोई सन्देह नहीं फि डायरीमें रोगी का निदान बहुत अच्छी तरह विधि से लिखा है और डार लोग उसो आरोग्यदर्पण। तरह परीक्षा भो धारते हैं डाकरौ दवा लाभ दायक कम होती है इस में देश कारण है। अंगुलियोंके अग्र भाग हारा ठोकनेसे अथवा एक छोटोसौ पतको ल- कड़ीका टुकड़ा लेको छाती पर घरकार उसके ऊपर अंगुलियांसे ठोके अथवा बाये हाथ की अंगुलियोंको धरकर जपर से दाहिने हाथ की अंगली हारा आघात करने से एक शून्यमय वा टप टप भब्द श्रवण गीचर होता है। जिस तरह खुखले बांस के ऊपर अंगुलियों के ठोकने से पन्द हेाताहे उसो प्रकार शब्दानुभव होताहै, तथा समस्त इन्द्रियादि पीड़ित होनेसे उपरोक्त भब्द का परिवर्तन हो जाता है जिस तरह बाहु वा जांध के जपर ठोकानेसे भब्द हो. ता है उसी तहर शब्द होने लगता है इत्यादि और भनेकशः परीता है जिसे डाकरी प्रमाणे में पूर्ण रीति से लिखेंगे - श्वास रोग की चिकित्सा । सर्वेषुश्वासरोगेपु वातश्लेष्मनिबर्हणं । विदधीत विधिविद्वानादौस्वेदं मृदुततः ॥ सय श्वासकी विमारी में पहले मृदुश्येद अर्थात् शरीर से हलका पसीना निकलवायके पश्चात् यात और कफ नाश करने का उपायकर । (प्रण) इस स्लोक, जो प्रथम पसीना निकालने का बयान किया है इसका क्या मतलब है रोग के प्रारम्भ में पसीना निकाला जावे या चिकित्सा के प्रारम्भ में किन्तु इस स्लेोक का तात्पर्य यह है यिदित होता है कि चिकित्साके प्रारम्भमें प्रथम हलका पसीना निर्गन्त द्वारा शरीर को हलका और कफको पतला फर लेय तय यात और कफ नाश करने का उपाय करे । यही आज कल के चैद्योंकी राय भी है।

१३२ पचमखण्ड . . .(उत्तर) प्रापका कथन भी ठीक है किन्तु इसमें यह आपत्ति श्रान पहेगी कि अधिक दिनों तक श्वास रासी बने रहने से रोगी का रक्त मांसादि सब क्षीण हो जाते हैं और रक्तादि शोपावस्था में स्वेदकम निषेध कर दिया गया है कारण यह है उणादि.रुया द्वारा जो कोई प्रयोग किया जाता है उसे सहन करने.याला . रक्तादि स्वप्तधातु है जब वेही मृव कम हैं तो सहन फौन करेगा उस अवस्था में स्वेदादि क्रिया से रोगी को मूळ पाना संभव है और मूर्खा से रोगी मर जाता है। खेदाः ध्याय देखो इस लिये रोगके प्रारंभ. कालमें खोद करना उचित है । (उत्तर) इस लिये फि आभ्यन्तरिक समस्त नाड़ियों में और छाती पर कफ जम जाता है और उस कफ के जमने से श्वास के नली का रास्ता जिसमें हो के यायु गमन करता है. रुक जाता है, इस लिये रोगी | को धारभ्यार श्वास लेना पड़ता है। स्वेद से फफ पतला पड़ जाता और यात श्लेष्म नाशक औषध के देने से वही पंतला बलगम दस्त के राह निकल जाता है । यात कंफ नाशक औषध यह हैं। जैसे- १, फाफराशिंगी, वैतराशोंठ, मिर्च, छोटीपीपर, हड़, यहेड़ा, और आपला यह तीनों बीज रहित, भटकटैया का. पञ्चांग, भारंगी, पुष्फर• मूल और पांचों नोन सयों सो महीन चूर्ण कर तीन मासा' अथवा छ मासा दोनों समय गरम जल के साथ पीने से बलगम छुट श्वास रोग शांत होता है. इसके अतिरिक्त यह पूर्ण हुचकी, श्वास, कईश्वास, खांसी और अरुचि रोग नाश करने में एकही है। श्वासाधिकारे वृत। हमारे श्रायुर्वेदीय ग्रन्थों में श्वासाधिकार में घृत का.प्रकर्ण बहुत अधिक दिया है और जहां तक परीक्षाद्वारा देखा गया है, अन्ततोगरवा (दमे की. बिमारी में घृत अधिक फायदा करता है। क्योंकि श्वास,रोग दी भारोग्यदर्पण। कारणों से कठिन और मसाध्य हो जाता है। एफ तो छाती पर कफ सूख कर जमाने से, यह कफ सूख कर ऐसे मजबूती के साथ छाती में चिपक जाता है जिसका एकाएक उस स्थान से छुटा देना सहज दया का काम नहीं है। उसी कफ के गांठ को कितने गवार लोग छाती में छि. पकिली तथा उसी आकार अन्य जानवरों का पैदा होना बतलाते हैं तथा उसकी दवा भी ऐसी २ तेज लोग बना कर रोगी को देते हैं जो रोगी वरदास्त न कर सका तो अपने जीवन से मानो हाथ धो चुका, हां उस श्वास रोग में घृत पिलाने से बहुत लाभ देखा गया है। दूसरे, श्वास रोग में जब यरुत अर्थात् लीवर बढ़ाता है अथवा कहा हो जाता है उस अवस्या में भी श्वास रोग अति दुष्कर हो जाता है किन्तु पृत पिलाने से इसमें भी फायदा देखा गया है, इसलिये इस स्थल में हम कुछ घृत का बयान करते हैं । एक प्रकार का घृत सर्व साधरन के प्रकृति के तुल्य हो नहीं सक्ला, इस हेत दो घार जो 'उत्तम २ फायदे मंद घृत हैं उसे लिसे देते हैं। कासेश्वासेचहिक्वायां हृद्रोगेचापिपूजितं । घृतं- पुराणंसंसिद्ध मभयाविड़रामठैः ॥ सांसोरोग, श्वासरोग, हिचकी, और हृदयरोग इन सय रोगों में अभया फहैं यहाहड़, यिह कहैं बिहनोन जिसे मनियारीनान भी कहते है और रामठ फहैं हींग इनसे सिद्ध किया हुआ पुराना पृत श्रेष्ठ भ. यांत लाभदायक है। विधि-यहाड़ जो जल में हय जाता.हो उसफा बीजा निकाल के प्राधसेर लेप उसे ४ सेर जल में क्वाथ बनाये जय प्राधा जल रहमाय, पानी छान लेय, कलईदार कढाई में एक सेर एक वर्ष के ऊपर का पी छोट और उसी में हड़ का पानी डाल धीमी धांध से पकाये जब सूब १३५ पञ्चमखण्ड । पकै लगै तय आधपाव मनियारीनोन और एक तोला अधपूंजी उत्तम हींग उसी में डाल पका लेधे जब पानी सब जल जाय घृत मात्र रह आय, अग्नि' पर से उतार शीतल कर छान अमृतवान में रख ले इसका मात्रा एक तोला से १ उँटाक तक है रोगी अपनी ताकत के अनुसार दोनों समय पिये, ऊपर से पानी न पिये, पान लायची वगैरह सालेवे तथा इस घी को भोजन के साथ दाल भात तरकारी आदि चीजों में भी मिला के खा सक्ता है, यह घृत आजमाया है कुछ दिनों तक लगातार वरावर इसे बना २ के पीता जावै । प्रथम २ घृत पीने से खांसी अथवा श्वास उभर आता है उससे यह न समझना चाहिये फि घृत नुकसान करता है उसको पीता जाय छोड़े नहीं श्वास दबाने के निमित्त कोई वटी जो ऊपर लिख आये हैं अथंघा मुलेठी, खैर, अनार या बहेड़ा की ঙ্কিা डाल कर चूसै ॥ मुख विल्वादि घृत। सौवर्चलाभयाविल्वैः संस्कृतंवानवंघृतं । जिस श्वास वाले रोगी को दस्त पतले आते हों वह कालानोन, हड़ और बेल से सिद्ध किया हुआ नये घृत को पिये । इस.घृत के बनाने फी यिधि यह है, ताजा घृत गौ का १ सेर, छोटे वेल की गरी १ पाव, हए आपपाय और कालानोन एक उँटाक । बिल्व और हड़ को पठ- | गुने जल में काथ फर जब चौथाई रहै मलशाल घृत में डाल धीमी प्रांच से परावै जब आधा पानी. जल जाय तय नोन छोड़ देय और धीमी आंच से पचाता जावै । पानी सब जल जाय, घृत मात्र रहजाय छान कर अमृतयान में रसदेय और पूर्वोक्त विधि से कुछ दिनों तक बराबर मेवन करता:जावे।

आरोग्यदर्यगा। अन्यच घृत । - हिंस्राबिडङ्गपूतीक त्रिफलाव्योपचित्रकैः । द्वि- क्षीरंसाधितंसर्पिश्चतुर्गुण जलान्वितं ॥ कोलमात्रै पिवेत्तद्धि श्वासकासौव्यपोहति । अशांस्यरोचकं- गुल्म शदभेदंक्षयंतथा ॥ बालउड़, वायविरंग, जंगीह, त्रिफला अर्थात् हद बहेरा आयला शोंठ, कालीमिर्च, छोटी पीपर और चीते का लाल सयों को एक २ उँटाक ले अधकचरा कर १२ सेर जल में रात को भिजा देय सधेरे प- कावै जब ३ सेर जल रहजाय मलकर छान लेय। तीन सेर घी कोई पर चढ़ाय उस तीन सेर काढ़े का पानी डाल धीमी आंच से पधा- ना सुरू कर और ३ सेर गौ का दूध ३ सेर बकरी का दूध इसे भी हाल के पचावे सबों के पश्चात् ४ सेर जल और छोड़ के पचा कर घृत तैय्यार करलेय इस घृत को भी पूर्वोक्त प्रकार सेवन करने की विधि समझना | चाहिये । इस घृत के सेवन से दमा खांसी कुछ दिनों में अयश्य आराम होती है । इसके अतिरिक्त बावासीर, अरुधि, गुल्म, टूटफर दिशा का आना, और कफ क्षई को भी यह घृत हटाता है ऐसा कई यार देखा गया है। अथ मृगराज तैलम् । पाठकगण इस नाम को सुनकर चमत्कृत होंगे, फि जहां खांसी में खाने को कौनकहै तेल मुरा पर नहीं धरते तहां रानी में तेल पीने की यिधि दी जाती है ? यह सब वे समझी है हां तीन ज्वर में तेल की चीज रा लेने से निस्सन्देह खांसी श्वास की बीमारी हो ताती है, पञ्चमखण्ड । यदि ऐसा होता तो श्वास रोग में डातर लोग मछली का तेल क्यों पिलाते । मछली के तेल के विधानपत्र में लिखा है कि इस तेल को तीन वरस तक बराबर पीता रहै । हम कहते हैं भृङ्गराज.तेल को छही महीने पथ्य सहित पीकर देखें श्वासरोग को जड़ से उड़ा देता है या नहीं॥ तैलंदशगुणेसिद्धं भृङ्गराजरसेशुभे । सेव्यमानंयथा न्यायं श्वासकासोन्यपोहति ॥ सुश्रुत उत्तरतंत्रम् ॥ काले तिल का तेल १ सेर को कढ़ाई में चढ़ाय .१० सेर भृगराज अर्थात् भांगरे का ताजा रस थोढ़ा २ डाल के पचा लेय जब स्वरस जल जाय तय उतार कर छान लेय इसका मात्रा-६ मासा से दो तोला तक है, अपने बलाबल के अनुसार दिनमें दो या तीन दफे पिये। यदि यह देखे कि छाती पर बलगम बहुत सूखा है किसी तरह नहीं निकलता है तो फालेतिल के तेल की जगह अलसी के तेल में भृङ्गराजतैल तैय्यार करें। इस तेल को बरावर पीने से निस्सन्देह श्वास खांसी पाराम होती है, अथवा ॥ हरिद्रांमरिचंद्राक्षां गुडंरानाकणांशठी। लिह्या- तैलेनतुल्यानि श्वासातौहितभोजनः ॥ हरदी, कालीमिर्च, मुनक्का, गुड़, रासन, छोटीपीपर और कपूर- कघरी सबों को समान भाग ले महीन चूर्णकर दो मासा या तीन मासा चूर्ण को काले तिल के तेल या अलसी के तेल में मिला के चाटने से | भी श्वास को नाश होने को कहा है। फिन्तु इस्से ऊपरवाला तेल उ- मारोग्यदए। १३० श्वासाधिकारमें कुछ रसों को समर्ण जो माननीय और उग्र है इस स्पल में लिखते हैं। इसमें सन्देह नहो यदि सप पदार्थ उत्तम मिलजाय और लालय त्याग द्रव्य सर्च कर उत्तमरीति से रस तैयार किया जाय तो चैत्यप्रकृति के तथा शैत्याधिकार रोगामान्त आतुरों के लिये अमृतही समझना चाहिये और विपमिश्रित अतितीव्र शीघ्रकार्यकारिणी अंगरेजी श्रीपधियोंसे सहन गुश अधिक लाभदायया होताहे किन्तु आजके समय में न उपम धातु उपधातु मिलते हैं और न यम बूटियां मिलती हैं कि जिनके स्वरस के प्रभावते फठिन से कठिन धातु भी निश्चन्द्र भस्मी भूत हो जाते से न यह समय रहा और न घह धीजें रहीं सिर्फ ठगविद्यई रहाई, न धर्मका ख्याल और नईश्वका हर पार पेमा पैदा कर पेट भरने से फाम पाघारम सैयार करना रोगियों को इन असार संसार के दुःख से निर्मुसा करना लोगों के हाथ रह गया। कालेखरोरसः श्वासाधिकारे । बंगलोहंतथानाम मभकंपारदंमतम् । गन्धर्कताप्य- दरदी दिपं जाती फलंतथा ॥ सूक्ष्मलादालचीनीच केशरं- विपक्रस्तं । धूर्तबीजं बजैपालं टंकणंचसममतं । सर्वेभ्य- त्रिगुणस्यामं क्षिपत्वाचूकृतंभिपक् । वृपायामार्गनि- गुण्डी भंग गरशेनच ॥ मर्दयेदिनमकैकं रसःकालेस्वरो भवेत् । एकगुंजद्विगुजब बलंज्ञात्वाप्रयोजयेत् । कासं. श्वासंनिहन्त्याशु कफरोगंचदारां ॥ 'यह कालेवारम निहायत उत्तनहै यदि सय पोजे उत्तम मिल जांय अपया किसी साक्षर घेद्य जो इतक्रिया मे चैतन्य तस्से द्रव्य खर्च त पचमखण्ड। .- कर बनाया जाय तो श्लेष्माधिक्य श्वास.रोगके लिये अमृत की जरूरत नहीं है (,कालेस्वर को यधि.) दश प्रांच का धंगेस्वर, कान्तीसार भस्म, ताम्येस्वर, मी प्रांघ का अभ्रक, चन्द्रोदय, शुद्धावलासार गन्धक. सुवर्ण- माक्षी का भस्म, शुद्ध मकसूदाबादी सेमरिख इन, मयों को दः २ मासा ले परल में खूप महीन चूर्ण पर रपदेय पचास लांग. जायफल, छोटी लायरी. दालचीनी, नागकेशर और शुद्ध मगिया, शुद्ध धतूरे का बीज पद्ध, जयानगोटे का बीज तेन रहिम, और शुद्ध सोहागा उपरोक्त श्रीगों के समान लो और भदों की भआधी शुद्ध छोटी पीपर ले पूर्ण कर एक एक दिन गना के पती के रम में पिपरी के रम में निर्गुगष्ठी के रम में भांग को रम में और गिरा के रस में भावना देने से कालेखर रम तैय्यार होता है : एक रकी प्रथया दो रक्ती बसावल के अनुमार मह के माथ रोगी को दोनों समय घटाने से कफ जनि कारावास रोग शीघ्री नष्ट होता है । यायु पित्त जनित श्वास रोग में यदि अतान यशात् देदिया जाय तो यही रस नेगी का काल के समान मारता है। बर्तमान समय के अनुपार इस रम की मात्रा चावल से ६ चावल तक है यहा देना चाहिये इत्यादि और भी अनेक औषधियां हैं जो देश काल, प्रवस्था भौर रोगो के बलायम के अनुसार दियाजाय तो लाभ को पता है किन्तु यह बात ध्यान देनेलायक है कि दवा को शीघ्रता के साप परिमतेन करना अच्छा नहीं होता क्योंकि श्वास रोग प्रथम तो वह भापही दुष्कर है. दूमरे कुछ काल पर्यन्त लगातार प्रौषधि न.खाने से, दिवा का पूरा असर रोग पर नहीं होता, हां यदि किसी औषधि से कुछ हानि बोष हो तो प्रकृति बिरुद्ध जान शीघ्रही त्याग दे तथा कभी.२ भायुर्वेद विधान दर्शियों से बिमारी के विषय में राय लेता है।

भाग्यदर्पण। वालक श्वासरोग। इसी के मायही हम आज मालकों के श्वास और सांमी रोगका भी निदाग और चिरित्सा लिखते हैं कारण यह है किसयांने मनुष्यों की अपेक्षा अवा को यह रो" यहा भयाम और दुष्कर होता है हि- न्दुस्तान न में औरतों के अज्ञानता यशात श्याम और खांसी रोग में हजारों एके यिना मौत के मरते हैं क्योंकि बच्चों का गेग माता को मदरहेगी से हेाता है और लड़कों के विगार होने पर और अपने दंपरहेगी पर तो ध्यान देनी नहो फाड़ फूक माता भवानी में पजाती है और अट- करपा प्रताइयों की दवाइयां देने लगती हैं इस्से प्रचार के काल काल ग्रास हो जाते हैं। लड़के सांमी श्वाम होने से हांफग लगते हैं, यम फिर क्या जहां पचों का पेट सरते देखा जाना कि पमुरी चल रही है शीघ्रही उमफे मारने की तदवीर में लग जाती हैं, इसलिये उन 'बच्चों के मायरक्षार्थ इस स्था में हम कासश्वास का प्रकर्ण लिखते हैं। पाठकग भाप निस्सन्देह समझिये। काम्श्य स रोग से साल भारत के लाखों यालक यिनामौत के मरते हैं और जो बच जाते हैं किमी पापुद यिज्ञानदर्शी के मम से प्रथया प्र ने भाग्य से, जिस प्रकार अनेक मनुष्य थिप खिला देने से भी बच जाते हैं अर्थात् महीं मरते समी प्रकार बालकों को समझिये क्योंकि बाका रहितं पालक विचारों का प्राण माता पिता और चिकित्सक के हस्तगतं रहता है। वह अपने मुख से अपने तकलीफों केर ययान नहीं कर सक, और सिवाय रोने से न प्यास लगने पर पानी और न भूख लगने पर खाना मांग सक्ता है भापही विधारिये ऐसी अक्षम्या में वोग के विपरीति दवा खिलाने से पालकों को कमीकलीफ होतीगी और किस भक्ट से उनका प्राण निकलता होगा कि बच्चे रुिवापोने के कुछ कह नहीं सके इस स्थल में अर का रोना, निस्सन्देह काटेजाने जानवरों के चिनोहद को चरितार्थ करती १४. पक्षमाड। है-जैसे फटेजाते सांय यकरियां में में करती हैं और कमाई उनकी गागणी आदत समझ कर उनके चिम्नाने पर ध्यान नहीं देता और छूरी रतना जाता है, शायद वे यही पाहती.हो । हग को यिनागुनाह के यो मारते हो हम येकसूर हैं। तुमारा कुछ नहीं बिगाहे, परमेश्वर तु- मारा भलाकरैगा तुम हमें लोहदो लेकिन कसाई यकरियों की बाली न समझने के कारण कुछ भी ध्यान नहीं देता और जल्द उसको खमम भर देता है । उसी तर उ. बच्चों की हालत संगकिये, पञ्चों का रोना लोग | गामूली आदत समाते हैं और न समझने के कारण अटकलपरत जो जी में माता है या खिलाते और यह काते जाते हैं। हाय २ जय हम कभी ऐमी दशा में बच्चों को देखते है तो छाती फटजाती है और सिंघाय ईश्वर से प्रार्थना करने के कि हे दयानिधि, शयामागर तू चालकों के मुख दुःख जानने और उनके अनुकूल प्रारोग्यं. तार्थ औषधि देने सचा यत्र करने की युद्धि मयों को झ्यों नहीं दी, क्या तुझे यह यांत पसंद है कि भारत के प्रमंख्य जन सन्तान रहित कहला और अपनेको स्थाजीवन तथा हतभागी गमों और कुछ मही मूमना । पठफगया हमारा कथन आप प यहत सत्य ममझिये बालक रोग नि. यित्सा हम भिन्न लिखनेवाले थे किन्तु अप की साल मंस्य वालकों को Hum काप्न ग्राम होने से पिता न घुमा और इसी . स्थल में बालकों के स्वार रोग की घिफिरसा लिखने को लेखनी तठ खड़ी हुई। ग साल अर्थात् सम्बत् १९५२के प्रासरी और ५३ पादिमें जितने नहोत्र (माता) और श्यास रोग से मरे हैं शायद ही कभी मह प्रलय के समय मरे हों। देखिये यह बहुत मोटी यात है कि भीतर गर्मी रहने से शुदै दया और भीतर शरदो होने से गर्म दयां रोगी को देना चाहिये। गरमी रहने से गर्म देवा गरदी रहने से गर्द दवा देने से रोग बई जाने एवं --- मागग्यदाय। गो के मृत्यु का कारण होता है, अगर कोई कहै कि (विपस्थयिषमी- पध) विप का पिंपही औषध है, गरगो गरम दया से हटता है और यथार्थ में मुखों को बुद्धि भी ऐसी ही होती है। यह मघम मिशेष रोग में जैसे जल में मेयानो और पटे पाय में मोन भर देना, यह पचम सर्य साधारण रोगों में संघटित नहीं होता। मच्चों के भीतरी गई शरदी जाननेको ऐसे तो अनेक लक्षपा है किंतु सपों से सहज लक्षण यह है कि पेशाब करते समय मन्त्रको हायपर रोक लेने से, अगर पेशाब गरम हो तो गरमी समझे और शीतल होती गर्दी सा जहां तक गरम गरंद न पाये उसी अनुसार निकिरसा करे। इस स्थल में एक बात और जता देने की जरत समझते हैं यह यह है कि शरद मुरुम और शरद पातु में प्र यः लोगों का मुत्र कुछ सा होता है, यहां मूत्र फ मिकदार पर भी ध्यान देना चाहिये, गरमी रहने से शाय गरम और यहुत काम होगा और शादी होनेसे भूत्र पहुत होगा एमी प्रकार दिशा का भी जानना चाहिये, गरमीसे दस पतला या फग और शरदी से गाढ़ा और अधिक होता है। अन्य लक्षण सुश्रुत से। अङ्गप्रत्यङ्गदशेतु रुजायत्रास्यजायते । मुहुर्महुः स्टश- तितं स्पृश्यमाने चं रोदति ॥ निमिलितालोमूर्द्धस्थे शिरो- रोगेनधारयेत । वस्तिस्थेमूत्रसङ्गगतॊ रुजातृप्यतिमूर्छिति ॥ विमूत्रसद्वर्य च्छाध्मानान्त्रकूजनैः । कोठेदोपान- विजानीयात् सर्वत्रस्थाश्चरोदनैः॥ पालक के जिस स्थान में दर्द होता है उसी स्थान को वह बार- यार एता है यदि ठीक स्थान पर हाथ नहीं पहुंचता तो इशारा उसी २४२, पञ्चमखण्ड.! सर्फ का रहता है, अंगर के ई-ठम स्थान को पुरै तो रोने लगता है। जय वालों के गिर में दर्द होता है. तय यह अपनी आंखें बन्द कर लेता है। वस्ति (पेटू) में बीमारी होनेसे मूत्र यन्द हो जाता अंथवा कांख कर तताहै. और इन रोगों मे तृपा लगती है और बेहोशी. अर्थात 'लपके सुस्त हो जाते हैं। यदि यालक का मन बन्द हो जाय मु मुर: 'याय. पेट फूल आवे, पेट में गुड़गुड़ शब्द हो तो जानना फि पेट में के ई रोग हमा है अथवा मन रुक गया है और सम्पूर्ण देह में रोग हाने से सड़क पत रोते है। श्वास रोग का लक्षण । नाम का बहना या नाम का सूम जाना और पपड़ी जम जाना, खांसी आना, छाती और गले में कर का शब्द होना, हांफना और पेट का उछलना (रसी को गयार लोग पसुरा का पलना बतलाते हैं और गरम २ दया देके बच्चों को मार डालते हैं जिस्का ययान हम आरोग्य दिपस के प्रथम खण्ड में कर चुके.. ६). मुख सूपना, पानी पर ज्यादा रुजू छाना, पहाना, चांक उठना अदनपर फपहा का न रखना आंख निकाल देमा, येहोश हो जाना इत्यादि लक्षण होते. हैं ... : बच्चों को भयानक यह क्यों है। बालकों के लिये पर दुष्कर रोग क्यों होता है उसका विवरण: पड़े मनुष्यों की अपेक्षा यह रोग बच्चों को भयानक इम बजे से होता है कि. यास लेनेकी नालियां बच्चों को बहुत ही छोटी होती हैं और खांसी के बजे से बहुत जल्द फेफड़े के भीतर प्रदाह पहुंच जाता है । बड़े मनुष्य को श्वास धमनी इतनी बड़ी होती है कि फेफड़े तक प्रयास का दोष घात, कठिनतासे पहुं है । जब बच्चों के फेफड़े तक यह रोग पहुंक्ता रे तब बड़ी तकलीफ होती है. क्योंकि यारीक नायुमा रक्तभर जाता ।

पागग्यदर्पया। १४३ है जिसे बच्चों का वास रुकने लगताहे जिस्से मौत का हर है। ययान कर चुके हैं कि इस रोग में पहले लड़कों का माफ बहता है जिमको जुकाम कहते हैं अगर उसी समय जुशाम पकाकर साफ कर दिया जाय तो कोई अंदेशे की बात नहीं है, यहां तो भूख जहां बच्चों की नाफ यही जाना कि महायज शरदो ने आधेरा धुगाधुन गरम चीज देना शुरू कर देते है । याद खांसी आने लगती है और खांसती समप एक फटका भा लगता है और बेली बढ़ती जाती तथा ज्वर भी होने लगता और धोकनी सी श्य स जल्दी २ चलने लगती है तथा यच्चा पेट के द्वारा श्वास लेने लगता है यही कारण है जो श्याम लेने में पेट फूलता और दयता है और मालूम होता है कि पच्चे का दम निकलने वादा है। खांसते समय मुख लाल हो जाता है, मुष याय देता है और सुस्त हो कर प्रांस फाड़ देता है, कभी कुछ लासेदार कफ भी मुख पर ना जाता है किन्तु बच्चे थूकना नहीं जामते फिर निगल जाते हैं, खांसते २ कभी कभी हो जाती है जिस्से यच्चों को कुछ धन मिलता है। भीतर बार हता है विन्तु यांमी और श्याम के तकलीफ के सयव से शरीर पसीनेसे तर हो जाता है जिसे गयांग्दल शरदी का जाना समझते हैं। में चालकों की भूख घट जाती है, दूध पीने वाले दूध महा पीते तालू खुष्क हे। जागसे माता का स्तन मुख से दवा नहीं मकत और मारे प्यास के यहां तक अरुषि हो जाती है कि स्तन मुख में लगा देनेसे याचे मुख हटा लेते हैं । जय बीमारी घर जाती है तो श्यांस खामी से विश्राम नहीं मिलता और चा पोहे ह। देर में नियंल पड़ जाता है, चेहरा पोला. होठ सूखा, मुख फटामा भौर श्यास लेती ममय नपुये फूलते हैं भोर यास मुश्किल से लिया जाता है और जो भीतर से श्याम माता है अधूरा भौर कठिनता से आता है यस ऐसी अवस्था में प्रधान लोग पढ़ी हुई शरदी समझ कर और भी गरम दया खिला देते हैं, जितना ही गरम दा दी जाती है उतनाही यास और यहता और बदहोगी १४४ पल्लमखण्ड । माती जाती है तथा बधा पीने से सूया जाता है अन्ततोगत्वा मूर्जा में ग्रसित हो पचा प्राण को परित्याग करता है। रोग घटने का लक्षण । जय बालक प्राराम हेानेवाला होता है तो न ही को गति धीमी, शरीर को सप्णता (भीतरोवर) न्यूग तथा श्वास कष्ट और धाकनी सी श्यास फा चलना बन्द हेाती जाती है. सांमी देर देर में पाती है नींद भरपूर और भूपभी लगने लगती। यरचा चैतन्य और खेलने लगताहै ॥ चिकित्ता और यत्न । त्रिविधाकधितोवाल: क्षीरानोभयवर्तनः । स्वा- स्थ्यंताभ्यामदुष्टाभ्यां दुष्टाभ्यांरोगराम्भवः ॥ दवा करने के पहले चिकित्सक को प्रघश्य जान लेगा गाहिये कि यालफ किस अवस्था का है क्योंकि बालक तीन प्रकार के होते हैं । एक तो केवल दूध पीनेवागा. दूसरा दूध और अन्न सानेवाला, तीमरा केवल अन पानेवाला देता है वहां बालक को शुद्ध दूध और मन मिलने से भारोग्यं रहते हैं तथा अशुद्ध याने दोष महित मिलने से रोगी होते हैं । क्योंकि जिस कारण से रो। उत्पप है जब तक उस कारण के शांत का उपाय न किया गायगा रोगका छूटना अति दुष्कर है जैसे यालक माता का दूध पीता है तो माताको दया न दे मिर्फ बालकही को दवा खिलाना मम्भवहे कि याला आराम हो इमलिये सबसे प्रपम यह देखना चाहिये कियाचा माताको बदपाहेजी से बीमार हुआहे या उसके ठीक साना नहीं मिला। माता को यररहेजी दुग्ध परीक्षा और पूछने से मालू हो संहा है।

भारोग्यदर्पया। .. 'क्षीरयत्यौपधंधाव्याः क्षीरान्नादस्यचभियोः । अ- नादस्यशिशोरेव प्रदक्षात्कुशलाभिषक् । यह घचन आत्रेयसंहिता की है इनका सिद्धान्त मत है कि जो पालक बोवल दूध पीता है तो उस बालक को दया न खिला के दूध पिलानेवाली माता अथवा दाई को दवा देना चाहिये। (प्रश्न) यदि बालक सिर्फ गौ या यकरीका दूध पीता हो तो ऐसी अवस्था में बच्चे को दया दे या यफरी गाय को दवा पिलावै ।। (उत्तर) प्रथम तो गौ या बकरी का दूध पीनेयाला बच्चा बीमार नहीं हो सक्ता पपोंकि गाय यकरियां आदि जीओं के दूध शुद्ध रहते हैं, उसका मुख्य कारण यह है कि उन लोगोंफा खाना पीना मनमौजी नहीं है, पँधे अन्दाश या समय के पास पात पर निर्भर है, हां दूध पिलाने का नियम ठीक न रहने से, जैसे-दूध पक्षानेवाली दोहनी (नंदिया) सूय मांज धो कर सांधई न गई हो, या अप्रमाण दूध पिलाया गया हो तो निस्सन्देह यालया दीनार हो सका है-यदि यह कारण दृष्टिगोचर न हो तो धात्री दुग्ध पराक्षा को भांति गयादिफे दूध की परीक्षा कर ठेथे जिराका ययान सपिरतार वर्णन यालपिशिरसामें करेंगे, अगर दूध दूपित जान पर तो उनके भी दूध के औषध द्वारा शुद्ध करे । सो बालक दूध भी पीता हो और मन मी साता हो तो चालक और यालफी माता दोनों को दया देये और नी यालक अनादि खाता हो माता का दूध ग पोता हे ते केवल यचा ही फेो दया देवै। आजकल के वैद्यों फा ध्याग माता के दूधं पर बिलकुल नहीं रहता झोकानोफ यच्चों ही को दया देना भारंभ पार देते हैं पस्से यथा शीघ्र ही मृत्युयश हो जाता है। इस स्थल में अधिक पर्सन न फर श्वानरोगपर दो चार औषध यच्चों से उपयोगी लिखते हैं जिससे प्रशंस्य याचे मारोग्य हुये हैं पश्चात् उन २४६ पञ्चमखण्ड। रोगों का वर्णन करेंगे जो पातु से पूरा सम्बन्ध रखते हैं और जिनकी चिकित्सा अति दुष्कर है। केवल दूध पीनेवाले बच्चेको श्वास कासादि रोग हुना हो तो बच्चे को बहुत नर्म स्थान में ढांप कर न रक्खे और न उसके शरीर में शरदी ही प्रवेश करने पाय पूर्वालानुसार जिस प्रकार मूत्रद्वारा घच्चेकी भीतरी गर्मी शरदी जाम पर उसी प्रकार स्यामादि का इन्तिजाम करें और दूध पिलानेवाली दाई को निम्नलिखित क्षाथ पिलावै। गुलयनमा ६ मासा, । मुख्नेठी ४ मासा, उन्नाय ६ दाना, अलसी मासा, इन सबों को मधक- घरा कर एफ.पाय पानी में एक तोला मिनी डाल कर पकावै जब माघ पाप पानी रह जाय, गरल शान कर, किर्थिन्मात्र गुनगुना रहै जैसे लोग चा पीते हैं उसीतरह दाईको पिलाये, इसी प्रकार दोनो समय फाढ़ेको पिलाना चाहिये अगर शादी अधिक्ष योधही तो एक भासा छोदीपीपर का चूर्ण शहद के साथ पाट फर ऊपर से फाढ़ा पीवे खानेको भातदिल पीजे देखें, तेल मिर्चा खटाई अचार दही, रायता आदि गरम और बादी श्रीज्ञांका खामा, उपवास करमा, आग तापना, मोघ करना आदि त्याग करे,। अगर बालफ माता का दूध भी पीता हो और कुछ ऊपर से प्रकार मी साता दो तो उपरोस काढ़े में से आधा चम्मच जैसी पालक की अवस्या हो बच्चे को भी पिला दे और बाकी दाई पी जाये, यदि बच्चा मा का दूध न पीता हो सिर्फ अन्नही खाता हो तो उसी पूर्वोक्त काढ़े को बालक के; अवस्थानुसार मात्रा घटा के तैयार कर के पिलावे पाठ दश दिन के दवा सेवनसे रोग नष्ट हो जायगा । ऐसे तो अनेक औषध है किन्तु इस औषध से असंख्य पालक मारोग्य हुये हैं, यदि इस प्रयोग मापदा कम बोध, हो तो किसी अच्छे लायक वैद्य हकीम को भी दिखला देय, किन्तु हम साहस पूर्वक कह सके हैं कि इसे बढ़कर बच्चों के श्वास काम रोग पर बहुत कम औषध हैं बाकी रोनों का प्रकरण बाल , पारोग्यदर्पण। १४७ चिकित्सा खण्ट में लिखेंगे। इसके पश्चात् अब हम प्रमेह का प्रकरण प्रकाश करते हैं जो आज समस्त भारत को अपने साधीन किये है। । । प्रमेहरोग। प्रास्यासुखंस्वप्नसुखंदधीनिग्राम्योदकानूपरसाःप- यांसि । नवान्न पानगुड़वैकृतंच प्रमेहहेतुःकफञ्चसर्वम् । अब हम प्रमेहरोग होने का कारण अर्थात् जिस वजेसे मनुष्य को प्रमेहरोग होता है उसे दिखलाते हैं (भास्यासुखं) जिनको पैठारहना ही परम सुख मालूम होता है, सिवाय चैठनेके चलना, फिरमा अधिकाम फार फरने में चित्त न लगना (स्वप्नसुखं) सोना ही जिनको धैफुण्ठ के सुख को भी हतास करनेघाला है अर्थात् कोई काम काज या किसी का हर न हो तर दिन रात सोता ही रहै अथवा शयम में जनेया रूपवती धारयिलाशिनियों के साथ रमण करना, जिनकी अयस्था कम होने के कारण घोर्य उत्तेजित हो रहा है, उस अवस्था में प्रत्येक व्यक्ति की पा- रम्यार कन्दर्प की गरमी शान्ति पारने की इच्छा यनी रहती है, उस अवस्था में मनोरमणी के प्रभाव में मनुष्य रात के स्वम में स्खी मसंग करता है और धीर्यपात हो जाता है जिसका स्वप्नदोष कहते हैं। (मन) इस शोफ के अन्त पद में लिखा है कि (फछकच्चसम्).स. मस्त कफकारी पदार्थों के सेवन से प्रमेहरोग होताहे मोर यह परीक्षित है कि पातपिचकारी द्रध्य पानी अति उष्ण द्रव्य सेवनसे मिस्साइव स्वम दोष होता है तो परस्पर विरोध हुमा । (उत्तर) कफकारी द्रव्य प्रायः प्रमेह के धारण होते हैं किन्तु इनको अन्तिम परिणाम प्रमेहरोग का हेतु समझना चाहिये, दधि का पति से- १४८ पञ्चमखण्ड। वग, याम के रहनेवाले भेड़ यकरी सादि जीव, जल के संचारी मछली फछुप्रा प्रादि जीव और अनूप अर्थात् जल के समीप अथवा जल के किनारे रहनेवाले जीव जैसे हंस, यतक, कई अफवा भादि ऐसे जीओं के मांस रस याने सुरुया, दूध, नया अन; और नया जल, (गुड़धकत) के विकार से जो सिरफा आदि बनता है उसके सेवन मे नक्सर प्रमेहरोग होता है और जितने कफकारक पदार्थ हैं सो सब प्रमेह होने के कारण हैं। (प्रश्न.) नगर जलघर मछली श्रादि, जल के किनारे रणनेवाले बत्तक आदि जीओं के मांस खाने से प्रमेह रोग होता हो तो बंगाली भौर केनी जून दोनों जाति मात्र को प्रमेह रोग होना चाहिये क्योंकि बहुधा इन दोनों जातों का भोजन उाही. जीणों पर निर्भर है से हम इन दोनों में प्रमेह रोग बहुत कम देखते हैं (उत्तर) इसका कारण यह फि यंगाली लेग पपूर्तल की भूजी हुई मछली खाते हैं, इसलिये विकार नहीं करता क्योंकि तेरा मसती के श्लेष्मकारी गुण को नष्ट करदेता है। और अंगरेजों को हंस प्रादि जान तटस्थ जीनों के मांस रस हानिकर इसलिये नहीं होता, सचय यह है कि प्रथम तो अंगरेज लोग इन्ही के.मांस पर निर्भर नहीं हैं, दूसरे भोजन के साथ प्रायः, मद्य निमलेट का. सेवन रहता है ठस्से विफार नहीं करता। सब से मिल बात तो यह है कि जब तक मैथुनादि से वीर्यक्षीण नहीं होता पाहे जो साया पिया फरो कुछ भी नहीं होता, वीर्य निर्वल हुधा कि जरा भी कुपथ्य से घिमारी धरदबाया प्रमेह रोग होने में सुश्रुत दिवास्वप्नाव्यायामालस्यप्रसक्तं शीतस्निग्धमधुरमे- दाद्रवान्नपानसेविनं पुरुपंजानीयात्प्रमेहीभविष्यति ॥ वह मनुष्य जो तु विरुद्ध दिन में यात ता है. दगड कसरत जी की राय।

आरोग्यदर्पण। १४६ " कुश्ती आदि शारीरक परिनन नहीं करता आलस्य में अत्यन्त ग्रस्त रहता है, अतिशोरक्षा, अति चिकना घी आदि गतिमीठा और मेदा के बढ़ाने वाले भोजन और पानादिक करता है जामना चाहिये कि ऐसे मनुष्य को प्रमेह रोग होने वाला है अर्थात् प्रमेह रोग अवश्य होगा। (प्रश्न-) उपरोक कारणों से स्त्री के भी प्रमेह रोग होता है या महीं । ( उत्तर ) स्त्रियों को प्रमेह रोग नहीं होता क्योंकि (रजःप्रसेका- नारीणां भासिमामिविशुद्ध्यति । सःशरीरदापाचनप्रमेहन्त्यतःस्त्रियः) महीने ३ स्त्रियों के रजोदर्शन द्वारा सम्पर्ग शारीरक दोष शुद्ध हो जाते है इस्से स्त्रियों को प्रमेह रोग नहीं होता. हा प्रमेह के स्याम में स्त्रियों को प्रदर और सेमि रोग होता है और ना स्त्रियों में प्रमेह रोग मागते हैं उनका मानना युक्त नहीं है। - प्रमेह रोगों को संप्राप्ति । मेदश्चमासंचशरीरजंचतेदंकफोवस्तिगतःप्रदूप्य । करोतिमेहान्समुदीर्णमुष्णैस्तानेवपित्तंपरिदूप्यचापि ॥ इत्यादि। वस्ति जो मूत्र के थैली के समीप स्थान है जिसे पेटू कहते हैं उसमें गत अर्थात प्राप्त जा.कफ यह मिगह फर भेद. मांस और शरीर के र को विगाह कर कफज प्रमेह को उत्पन्न करता है, उभीमकार गरम पदार्थों के मेपन से पिस कुपित हे.कर पूर्वोक्त मेद मांस को बिगाड़ कर पिता छ प्रकार के प्रगेड को उत्पन्न करता है। और यामु यह देोप क्षीया होने से धातू ( कहिये यमा मनादिक ) को ईध कर (बस्ती के मुख पर सापकर) प्रमेह को प्रगट फरसा कफ से उत्पन्न दस प्रमेह माध्य है कारस १५० पशमपण्ड। पस्का यह है कि कफ दोष और मेदः प्रभृति दूष्प इन पर फटु तितादि क्रिया ममान है इस रोग में रागाही प्रमाय ऐसा है कि इसमें तुल्य दूध को साध्यत्व' कहा है और प्रमेह के विना और रोगों को अतुल्य (असमान) दूष्यत्व साध्य का ऐतु होता है पिच के.छः प्रनेह, विषम चिकित्सा करने से याप्य होते हैं अर्थात पित्त हरण करनेवाले जो शीत मधुर मादि द्रव्य धो मेद को बढ़ानेवाले हैं और मेद हरणं कर्ता उप्ण कटुकादि द्रव्य वो पित्त कर्ता हैं ऐसे क्रिया विषम हैं । बादीसे प्रगट पार प्रमेह मज्जादि गंभीर शतू के प्रार्पण करने से अत्यन्त पीड़ा करते है और इनकी विषमही क्रिया दे इसीसे ए चार अंसाध्य हैं। इस स्थल में दोष और दूष्प दो शब्द पथित हुये हैं उनको स्पष्ट जानने के अर्थ नीचे शोक लिखा है। - । प्रमेह का दोष दूष्य संग्रह । कफासपित्तंपवनश्चदापामेदोखशुक्रांबुवसालसीकाः। मज्जारसौजःपिशितंचदूष्याप्रमेहिणीविंशतिरेवमेहाः ।। कफ पित्त और षायु यह तीनों दोप कहे जाते हैं और यही तीनों दोष फुपित होरस एक पातु को छोस मेदादि छ धातों को दूषित करता है इस्से मेदादि धातु दृष्य कहे जाते हैं । उक्त दोष मैदा. (अन) रुधिर (शुक्र) धीर्य (अंधु) जल अर्थात् जिमसे शरीर में तरौ रहती है। (सा) चरखी जो हड्डी के भीतर रहती है (लमिका ) मांस का जल, मज्जा रस, (ोज) पराक्रम और मांस इन सयों को दृष्य जानना, उक्त दोष और इन दोनों में २० प्रकार के प्रमेह उत्पन्न होते हैं। तात्पर्य यह है कि अन्य गोत्पत्र में पूर्वोत धातु ऐसे दूषित

पाराग्यदर्मय।
महीं होते जो द्रवीभूत हो और इस रोग में द्रवीभूत हों मूत्रमार्ग
द्वारा मूत्र के साथ मिल कर बहन फरते हैं और जो भोज का नाम
लिया गया है उसका कारण यह है कि जस २ मेदादि धातु कम होते
जाते है उसीके साथही ताकत भी घटती जाती है।
प्रमेह रोग का पूर्वरूप।
दन्तादीनांमलाढवत्वंमागूपंपाणिपादयोः ।दाहचि.
कणतादेहेतृट्श्वासश्योपजायते ॥
दांतों रापा मादि शब्द से जिला सालू जाममा सममें मेलका अधिका
अमला हाथ पैरो में जलन या बहुत गरम रहना, अंग.का चिकनापन,
प्यास की प्राधियता, थोष्ठे से भी काम करनेसे हांफमाना अथवा श्यांस
फा हामा, बालों में लटयंधना और मखों का अधिक बढ़ना समझना
पाहिये यह प्रमेह के प्रांग्रूप हैं अर्थात् ऐसे हाने से जानना की प्रमेह
रोग होनेवाला है। इसके बाद क्या होता है सो सुनिये।
प्रमेह का सामान्य लक्षण ।
सामान्य लक्षणतेपां प्रभूताविलमूत्रता।
भूष कुछ अधिक और कईयार तथा फुछ माढा माना मारम्भ हो
बस इस मादही प्रमेह होता है और दोष दूष्य के संयोग वशात् भूषों
फा रंग बिरंमापन और उसके साथ मानेवाले पदार्थ दृष्टि गोचर होने
लगते हैं।

१५२ पचमखण्ड। १-उदकममेट विंशति २० प्रमेह के नाम । कफदोष से १० प्रमेह । २-मील प्रमेह ३-कालप्रसेह ४-हारिद्रप्रमेह २-चप्रमेह ३-मांद्रप्रमेह ५-मांजिष्ठाप्रमेह ४-मुराप्रमेह ६-तप्रमेह ५-पिष्ठममेह वायुदोष से ४ प्रमेह होते हैं। ६-शुकप्रद -प्रसाप्रमेह -सिकाप्रमेह २-मनाप्रमेह ८-गीतप्रमेह ३-शौद्रप्रमेह -शनैःप्रमेह ४-हस्तीप्रमेह १० सालाप्रमेद यद राय मिला के २० प्रकार के पित्तदोप से ६ प्रमे । प्रमेह होते हैं जिनका लक्षण यह है। १-चारप्रमेय १० कफज प्रमेह के लक्षण । १-१दक प्रमेहयाले का मूत्र यात स्परछ मजेद, गीतज (मूत्र फरते . मय गोतल जल के समान मूत्रमार्ग में पोध हे) गन्ध रहित पानी है २-प्रमेह में जरा के रस से रामान रंगत और मीठा होता है उसमें चोट भी लगाई किन्नु रोग अंगापनों होता । ३- गांद्रप्रमेहपाठेशा मृत रात फेो. पात्र में घर रखने में गाढ़ा हो जाता है और नीचे गॅदला जग भी जाता है।

पारोग्यदर्पण। १५३ ४-सुराप्रमेह-यह मूत्र कासरे में देखने से नीचे गाढ़ापन और ऊपर का माग पतला रंगत मटमैला या कुछ सुरखी मायल होताहै ॥ ५-पिष्टममेहवाले का मूत्र पिसेहुये चावल के पानी के समान हेाताहै । ६-शुक्रममेह -इस रोग भूत्र के साथ मिलकर वीर्य निकलता है। 9-शिक्काप्रमेह इ-इस प्रमेह वाले के मूत्र के साथ बालू तथा नदी के रेत के समान वस्तु पाता है और किसी को उसके निकलने में दर्द भी होताह उसीको हिकमतवाले रेगमसाना रोगभी कहते हैं । -शीतप्रमेह-इसरोगवाला मधुर तथा अत्यन्त शीतल ऐसा बारम्बार मूतता है। किन्तु सुश्रुत प्रादि कई महाशयों ने मिज रचित सं. हिता में शीतप्रमेह को नहीं लिखा इस स्थल में उन्होंने लवण- मेह लिखा है (विशदलवणतुस्यलवणमेही) लयणप्रमेहवाले का मूत्र विशद लषण जल के समान होता है। -शनैःप्रमेह-इस रोग में बारम्यार और थोड़ा २ पेशाय होता है और उसमें किसी प्रकार की तकलीफ नहीं होती जैसा कि मूत्रकृच्छ्र में होता है काटने का समय यह है कि कितने लोग शनेः प्रमेह को' मूवरुष्ट समझते हैं से भूल है। १०-लालाप्रमेह-जिसका मूत्र लार के समान तारयुक्त और विशनाहीये यह लालाप्रमेह है किन्तु इस प्रमेह का भी मुश्रुत में ययान नहीं है बल्कि इस स्थल में फेन प्रमेह कहा है (सोफसोफसफेनं फेनमे होमेहति) यस्ति स्थान में योनासा प्रतीत हो और मत्र झागदार अर्थात् मूत्र के ऊपर न २ मा जमजाता है और प्रायः लाला मेह और फेनमेही दोनों देखने में प्राते हैं। २० १५४ पञ्चमग्नुण्ड ।. -- . ६ पित्तज प्रमेह के लक्षण । (-क्षारप्रमेह में खारीजल के समान गन्ध, वर्ण, रस और स्पर्श ऐसा मूत्र ।' होता है २-नीलप्रमेह-मीलेरंग का' भयोत् पपैया पक्षी के पंख के समान रंगको पेशाय होता है : ३-फोलप्रमेह-इस प्रनेह में काली स्याही के समान मूत्र उतरता है किन्तु मुश्रुते में इसको गणना नहीं है इसके स्थल में उन्हों ने असममेह फो फहा है (अन्नरसगन्धअसमेठी) जिसके मूत्र में राष्टी दुर्गन्ध आवे उसको असमेही कहते हैं ... ४-हारिद्रप्रमेह-इसमें गहरी हल्दी के रंग के समान और दाहयुक्त मूत्र होता है | ५-माजिष्ठम्मेद-उसमें मनुष्यं मजीठ के रंग के समान लाल और माम दुर्गन्धि सहित मृतता है। ६-रक्तप्रमेह-इस रोग में दुर्गन्धिं युक्त, गरम, सारा, और रुधिर के स. मान लाल रंग मूत्र उतरता है। घातज ४ प्रमेह । १.साममेह-इस रोग में मूत्र के साथ चर्बी मिलकर भाती है। -मज्जाप्रमेह-इसमें मज्ना के समान अथवा मज्जा मिला हुमा धार- म्यार पेशाब करता है . है .. ३-सौद्रप्रमेह-शहद के समान रंगयाला, अथवा मीठा फसेला. पेशाम होता है, जिसपर चींटी चोटे और गफ्षियां बैठती हैं। २.

पारोग्यदर्पण।
१५५
४-हस्तिप्रमेह-एस रोग में मस्त हाथी के माथे से जैसा मद पहता है
सम मद के समान निरन्तर धेग रहित जिसमें तार मिले और
जास्ते २ याने ठहर २ कर पेशाय होता है...
कफप्रमेह के उपद्रव ।
.
प्रविपाकोऽरुचिश्छी ज्वर कासःसपीनसः ।
उपद्वाःप्रजायन्ते मेहाना कफजन्मनाम् ॥
सन फा यथार्थ न पचना अथवा कभी पधना कभी न पचना,
याने भोजन पचने की शिकायत कुछ में कुछ बना रहना, भोजन पर
अरुचि, अमन याने कमी २ भीतर पित्त सञ्चित होने से जी मचलाना
या अमन होना, हरारत खांसी बारम्यार जुकाम हाना या जुकाम का
धना रहना यह फफजप्रमेह के उपद्रव है ॥
पित्तप्रमेह के उपदव ।
'वस्तिमेहनयोशूलं मुष्कावदरणंज्वरः ।
दाहस्तृष्णालिकामूर्छा विड्भेदापित्तजन्मनाम् ॥
। मति (पेडू) और लिंग में दर्द हो और किसी.२ को लिंग में दर्द
म हेकि सिर्फ पेट में दर्द हुमा करता है गथया ऐसा माणूम हो कि
पिंष्ट्र में कोई पोज'भरा है यह भी कभी २ चंडकोशों का फूलगा या पफ
कर फूटना जोर कभी २ हरारत का हेना प्यास को-माधिपता नही
हफार माना शिर में चक्कर या प्रांर तले अंधियारा हाना दस्त पतला
ये सय पित्त प्रमेह के उपद्रव हैं।

१५८
पञ्चमखण्ड।
है
प्रमेह पिड़का।
सराविकाकच्छपिका जालनीविनताऽलजी। मसू-
रिकासर्पपिका पुत्रिणीसविदारिका। विद्रधिश्चेतिपिडिकाः
प्रेमेहापेक्षयादश । संधिमर्मसुजायन्ते मांसलेपुचधामसु ॥
१-सराविका-(प्रन्तोन्नताचसद्पा निम्रमध्यासरापिका) जो पित्रिका
ऊपर के भाग में कुछ ऊंनी हा और बीच में बैठी सी हो जिस
मकार मट्टी का पिआला होता है उसको सराविका कहते हैं ।
२-ऋपिका-(सदाहाफूर्मसंस्थामा याकपिकायुधैः) जो पिष्ठिका
काभा के पीठ के समान कुछ उपर का उभसी पीर दाह युक्त
याने भीतर जलन हो उसे फरछपिका कहते हैं ।
३-जालिनी-(जालिनीतीनदाहा मासजालसमावृता) जो पिष्ठिका अ.
पिक दाह से युक्त और मांस जाल में व्याप्त छ। उसे जालिनी
कहते हैं।
४-यिनता-(अवगाहरुजोरदापृष्ठेवाप्युदरेऽपिया । महतीपिकानीला
साधुधैविनंतास्मृता) ओ पिडिफा पीठ और पेट में होती है अधिक
पीडा करती है उढी यही और नीले रंग की होती है उसकी
पिनता संज्ञा है.
५- मलजी-(रक्तासितास्फोटयती दारुणात्यलजीभवेत्) जो फुष्टिया लाल
और काले रंग की हो और उसके भास पास छोटी २ फुन्सियां
भी हो तथा जलन आदि अनेक उपद्रव करके युप्तहो उसको अलजी
कहते हैं यह पिष्टिका यहुत केशदायक होती है और बहुत,
ठिनता से माराम होती है और नहीं भी आराम होती।
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पारोग्यदर्पण। १५६ . '६-मरिका-(मसूरदल संस्थाना विशेयातुमसूरिका) जो पिहिका मसूर के दाल के समान हो जैसी मसूरिका गामक माता होती है उसको मसूरिका कहते हैं ... 9-सर्पपिका-(गौरसर्पय संस्थांना सत्प्रमाणायसर्पपी) जिन फुन्सियों का आकार सफेद सरसों के समान है। उनको सर्पपिका कहते हैं । -पुत्रिणी-महत्यल्पषिताशे या पिडिकाचापिपुत्रिणी) बीच में एक बा फुन्सी हो और उसके भासपास चारों ओर छोटी ३ अनेक फुसियों हो उसको पुत्रिणी कहते हैं । -बिदारिका-(विदारीकंदयबृता फठिनापसिदारिका) जो फोडा धि- दारीकंद के समान घटा हो और फरीघ २ उसी के प्राकार भी हो' फिन्तु गोलाकार और छूने से बहुत कहा मालूम हो उसे मिदारिका कहते हैं। १०-विद्रधिका-(नामा फुन्सी निद्रधि नामक पिटिका के समान होती। है, प्रायः यह फूट के यिधर भी नाती है यह दश प्रकार की पि- हिका प्रमेह रोग के बढ़ाने में होती भी चाहीं है जिनका अन्त अवस्था यह संसार परित्याग करने का है, यह मत माव- प्रकाश माधोनिदान आदि ग्रन्थों का हे फिन्तु भाजसंहिता और सुश्रुतसंहिता के गत से नौ पिटिका है और घरक के मत से, सात ही है। पिडिका उत्पन्न होनेका मुख्य कारण। येयन्मयाःस्मृतामेहास्तेपामेतास्तुतन्मयाः। विना- प्रमेहमप्येताजायन्तेदुष्टमेदसः । तावञ्चैतानलक्ष्यन्तेयात्र- वास्तुपरिग्रहः ॥

पञ्चमखण्ड। जो प्रमेह जिन २ दोषों के अधिक कोप होने से होता है उन्हीं दोपों के स्वण होने से प्रमेहपिहिकायें भी होती हैं और बिना प्रमेह रोग के भी दुष्ट मेद होने से पिडिका होती है इस शोक के लिखने का मुख्य प्रयोजन यह है कि पिहिका होने ही से प्रमेह रोग नहीं जान लेना क्योंकि विना प्रमेह के भी दुष्ट मेद से पिडिका होती है (इसमें धन्वन्तरि जी की राय है कि जितने प्रकार के प्रमेह होते हैं उतने ही प्रकार को ताजन्य पिष्किा भी होती है) और पिहिकाओं को जब तक गांठ नहीं बंधती तब तक यह नहीं दिखलाई देतों कहने का ता. त्पर्य यह है कि ममेह के अन्त में प्रमेह पिड़िका होना आरंभ होजाती है किन्तु जब मेद में पूर्ण रूप से दोष उत्पन्न होता है तब पिडिका की गांब जाती है। असाध्य पिड़िका। 2 गुदेहृदिशिरस्यंसे पृष्ठेमम्र्माणिचोत्थिताः । सोपद्वादुर्वलस्यपिड़काः परिवर्जयेत् । सपिडिका गुदायाने पाखाने के स्थान में होती है नवानने से लेग मी पिक्षिका को जब वह फूट कर वहजाती है और फिर सर्वदा चोड़ा सा करती है लोग भगंदर समझते हैं किन्तु भगंदर में और इन पिडका में पोहा भेद है, भगंदर में कई छिद्र हो जाते हैं और यह पिडका: एकही छिद्रवाली रहती है । इदि अर्थात् हाती या धुकधुकी, के अपर अपवा यत्रु के ४ अंगुल नीचे होती है और इस स्थान के बाजे २ फुरियो भुषामा एक प्रकार का गूदा निकलता है। कंघा और शिरा तपा पीठ में और मर्मस्थान में पिष्टिका होती है सो असाध्य होती है क्योंकि प्रायः उक्त पिडकाय प्रमेह से दुर्वल और उपद्रव युत पुरुष को होती है और बिना प्रमेह भाराम भये पिड़का भाराम नहीं होती

पारोग्यदर्पण।
यातजमेह आरन नहीं होता इसे प्रमेह पिरिकामी भारामनहीं होती,
उसे कहते हैं।
बातज प्रमेह असाध्य क्यों है ? .
कृत्स्नंशरीरंनिष्पीडयमेदोमज्जावसायुतः। .
अधःप्रक्रमतेवायुस्तेनांसाध्यस्तुवातजाः ॥
यातजप्रमेट जय शरीर को दुर्वल कर और संपूर्ण शरीर को पीड़न
करता है अर्थात् संपूर्ण शारीरिक धातुओं को मूत्र मार्ग से पाहर निकाल
देता है और मेद मजा एवं चर्बी से सुत छोफर वायु जय तन सघों को
नीचे का प्रेरण करता है तम पाता प्रमेह असाध्य होते हैं। यही का-
रणचे असाध्य होने का ॥
पिड़का के उपद्रव चरक से।
दृट्कासमांससंकोच मीहहिक्कामदज्वराः।
विसर्पमर्मसंरोधाः पिड़कानामुपद्रवम् ॥
पिपास का अधिक प्लगमा, सांसी, मांस का सिकुड़गा जिसे पुरी
परमा कहते हैं जैसा भति यति पुरुषों के शरीर में सिकुड़न पड़ जाता
है (मूगा) गशनाना या पदहोशी, हिचकी, नेत्रमें नशा सरीखा मालुम
होना सफीचर का मना रहना, पिसर्प गामक पुहिया, ममें मरोध
होना यह सम प्रमेह पिपिका के उपद्रव हैं।

१६२
पञ्चमखण्ड।
जब मनुष्य
असाध्य होने का पूर्व।
सचापिगमनात्स्थानं स्थानादासनमिच्छति ।
आसनावणुतेशय्यां शयनात्स्वप्नमिच्छति ॥
को
प्रमेह रोग अमाध्य होनेवाला होता है तो उसका
क्रमशः ऐसी सुस्ती प्राने लगती है कि चलने फिरने की ताकत कम हो
जाती है क्योंकि घलने से खड़ा रहना अच्छा लगता है, फिर राहा रहने
से बैठना अच्छा लगता है और पैठने से लेट रहना और लेट रहने से
साना अच्छा लगता है यह लक्षण क्रमशः होने से पाहे उपद्रव रहित
भी रोगी हो अन्त में शय्यागत हो प्राण परित्याग करता है।
मनुष्य को उचित है, प्रमेह के निदान शरीरमें कुछ भी दृष्टि होने
लगे उसके हटाने की चेष्ठा प्रथमही से करना प्रारंभ कर दे पोंकि बढ़
जाने पर प्रमेह रोग नहीं आराम होता है, और मृत्त्र का कुछ अधिक
शाना ढबैला या गाढ़ा पेशाब का होना तथा प्रतिदिन सुस्तीका घेरना
प्रादि देखने ही से चिकित्सा शुरू कर दे और सर्वदा अपने खाने पीने
प्रसंगादि का नियम ऐसे ढंग से रक्खे ताकि प्रमेह रोग शरीर में न होने
पावै॥
प्रमेह भेद ।
दौप्रमेहौसहजोऽपथ्यनिमित्तश्चभवतः । तत्रसहजो
मापिलवीजदोपकृतः । अहिताहारजोऽपथ्यनिमित्तः ।
तयोःपूर्वणोपद्रुतः कृशोरुक्षोऽल्पासीपिपासासुभृशं परि-
सरणशीलश्चभवति । उत्तरेणस्थूलोवहवाशीस्निग्धशय्या-

पाराग्यदर्पण। सनस्वप्नशील प्रायेणेति । तत्र, कृशमनपानप्रति संस्कृ- ताभिः क्रियाभिश्चिकित्सयेत् । स्थूलमपतर्पणयुक्ताभिः ॥ सुश्रुतसंहिता से अब हम प्रमेह के दो भेद दिखलाते हैं। एक सहज दूसरा अपथ्य निमित्त । इनमें से जो माता पिता के दूषित वीर्य और रज से उत्पन्न हुआ बालफ जिसको समय पाकर प्रमेह रोग हेाता है जिसका बयान हम ऊपर लिख आये हैं उसका सहज प्रमेह कहते हैं, और जिसे मिथ्याहार और मिथ्या बिहार अर्थात अहिताचार से जो प्रमेह उत्पन्न होता है, उसको अपथ्य निमित्तिज प्रमेह रोग कहते हैं, जिस मनुष्य के सहज प्रमेह होता है वह मनुष्य दुबला रुक्ष थोड़ा भोजन करनेवाला हेाता है और पियास उसे अधिक लगती है (परिसरणशील) अर्थात् बात चलने फिरने वाला होता है । सहज प्रमेह वालेको प्रायः यमा रोग हो जाता है विशेषकर स्त्रियों को दश बारह वर्ष के आयु होने से ही रोग प्रारंभ हो जाता है और क्रमशः बढ़ कर अन्ततोगत्वा असाध्य हो जाता है । यथार्थ परीक्षित है कि माता पिताके वीर्य्यदोष से उत्पन्न बालक के उप्णता पाकर प्रायः पेशाब चूना सरीखा जम जाया करता है और चिकित्सा न होने से वही अवस्था पाकर घोर रूप से निदान उपस्थित करता है ।। सहा प्रमेहयाले की चिकित्सा उत्तम अन्न पानादि मे संस्कार की हुई क्रियाओं के द्वारा कर पोंकि इस प्रमेहवाला स्वयं का रहता है यदि और भी कृश आदि क्रिया की गई तो रोगी शय्यागत हो जायगा और अपश्य जनित रोग में रुशकारक उपाय करना चाहिये क्योंकि उक्त रोगी स्यलकाय हेाता है यद्यपि उसमें शारीरिक पुष्ठता नहीं है सिर्फ देखने में मोटा ताजा मालूम होता है किन्तु बिना कशकारक क्रिया किये रोग समूल नष्ट होना अति दुष्कर है ।।

पञ्चमखण्ड। वस्तु। प्रमेह में बर्जित सर्वएवचपरिहरेयुःसौवीरकतुपोदकसुक्तमैरेयसुरास- वतीय पयस्तैलघुतेक्षुभिकारदधि पिष्ठान्नानपानकानि- ग्राम्यानूपौदकमांसानिचेति ॥ प्रमेह रोग प्राप्त होने पर रोगी को चाहिये की निम्नलिखित प- दायों को परित्याग कर जैसे (काजी) सिरका, रायता और काल पदार्थ आदि जैसे मूली आदि का प्राचार जो गरम पानी तेल में तीन चार दिन धूप में रखने से खष्टा हो जाता है (तुपोदक) भूषी आदि का जल जो धूप के योग से पहा भया हो (शुक्त) करा आदि का सिरका (मेरेय) यह भी मद्य विशेप है अर्थात् उक्त नाम फी शराय है (पुरा) मामूली शराव (आसव) जो जमीन में गाष्ट्र के बनता है कुमारी प्रामय आदि (ताय) अधिक जल का पीना (पय) दूध सहज रोग में अधिक निषेध नही है (तेल) सेल साने में बिलकुल परित्याग गर्दन में लाभ दायक है (पृत) अधिक घी न खावै किन्तु दाल तरकारी वधार सक्ता है तथा स- हम प्रमेहवाला कुछ अधिक्ष घी भी खा सक्ता है (क्षुधिकार) अखं का रस राय वगैरह, दही और पीसा अन्न सेतुमा श्रादि ( अन्नपानकानि) अमली पाम आदि खट्टे पदार्थों का सरयत तपानाम्प, औदक और भानूप पशुओं का मांस जिसका बयान ऊपर फरघुके हैं. रोगी यदि प्रारोग्य की इच्छा रखता हो तो अवश्य त्याग करै । प्रमेह में सेवन बस्तु । ततःशालिपष्टिकयवगोधूमकोद्रवोहालकाननवानभु- जोत । चणकाढकोकुलत्यमुग्द विकल्पेनतिक्तकपायाभ्यां 1 भरहर की |खिलाय रोगी को पाराम करदेते हैं, अज्ञान वैद्यं पुस्तक में खिली हुई। पारोग्यदर्पच । शाकगणाभ्यांनिकुभ्ये गुदीसर्पपातसीतैलसिद्धाभ्यां बहुमू- त्रैर्वाजाङ्गलैमांसैरपद्धृतमेदोभिरनम्लरघृतैश्चेति ॥ प्रमेह रोगवालों के सेवन योग्य यह धस्तु हैं. पुरामा बासमती भादि चावल और शाठी के घायल .का या कादव के चावल का भात, जाय और गेहूं की रोटी किन्तु सहजवाले को जोको रोटो लाभदायक कम होगी और उद्दालक आदि पुराने अन्नों का सेवन करें तथा चना भ. रहर कुरथी और मूंग की दाल किन्तु सबों से उत्तम मूंग मौर दाल दोनों को एक में मिला कर खाना अच्छा है, तरकारी में फरैला आदि चरपरे कमायले साग जो गांदी, सरसो, अलसी के तेल में अरछे प्रकार भूजेगये हों ( किन्तु तेल की भूगी तरकारी प्रादि सहज. प्रमेहवाले के लिये कदापि लाभदायक न होगा) अथवा जांगल जीभों के मांस के यूस के साथ भी रोटी का खाना उत्तम है किन्तु यलकारी मेद मज्जाबर्द्धक द्रव्य अवश्य प्रमेह रोगयाले को उत्तम नहीं है यदि खाने की इच्छा हो तो मांस के भीतर से मेदा निकाल कर और जिस्में घी खटाई न पड़े बनाकर खाधै । प्रमेह चिकित्सा। भय हम प्रभेह रोग के नाशनार्थ अनेक औषध लिखते हैं, जिनके द्वारा अनेक रोगियों को आराम किया और निदान पूर्वक चिकित्सा करने से आराम होने की पूरी सम्भावना है । भायुर्वेद में जिस तरह बीसों प्रमेह फेो कहकर पश्चात् सहज और अपथ्यनित दो प्रकार का प्रमेह दिखलाया है किन्तु उन दोनों के लिये औषध भिन्न २ नहीं लिखा, यह यिघार वैद्यों के बुद्धिपर छोड़ दिया है, जो लायक हैं वे रोगी को प्राति अवस्या समय और औषधियों का गुण देख कर उत्तम पिर पञ्चमखण्ड। तारीफी दवाईयों के गुणों को पढ़ ममी पर माहित हो जाते हैं और झट उन्हीं दवाईयों को बनाय रोगी को सिलाते हैं जिस्मे रोग न घटकर और भी बढ़जाता है। इसलिये हम उन दयाईयों को लिखते हैं, जो दोनों प्रकृति के रोगियों को लाभ पहुंचा सक्ता है। जय देखे कि रोग नबीन है अथवा कुछ २ निदान मिलते हैं तो रोगी को नेज दवा न देके साधारन दया से आराम करें और पथ्य ठीक ग्यै क्योंकि पथ्य ठीक न रखने से गेग नहीं छूटता विशेषकर प्रमेह रोग, इमी से सुश्रुत जी ने बड़े प्रादमियों के खाने पीने में बुरी बस्तु मिला देने को लिखा है जिस्से घृणा उत्पन्न होने से वह अपथ्य बस्तुओं को त्याग दे. सुश्रुतसंहिता के चिकित्सा स्थान ग्यारहवें अध्याय में लिखा भी है। कपायाणिवापातुं महाधनमहिताहार मौपधवे- पिणमीश्वरं वा पाठाभयाचित्रक प्रगाढ़मनल्यमाक्षिक मन्यतममासवं। प्रमेह रोगवाले को कषाय का पान कराना बहुत हित है किन्तु प्रायः धनवान.रोगी अपश्य करडालते हैं और कदषी औषधों को भी पीना नहीं चाहते इसलिये राजानों को पाढ़ी, हप और चीता के क्वाथ में बहुतसा सहत डालकर, पिलावै अपवा मदफारफ भासव, बनाकर पिलाये। मधुकपित्थमरिचानु सिद्धानिचास्मैपानान्युपहरेत् १ उष्ट्राश्वेतरखरपुरीपचूर्णानि चास्मैदददाशनेषु । हिंगुसै- न्धवयुक्तद्रूपैः सार्पपैश्चरागै जयेत् ॥ अविरुद्धानिचा- पञ्चमवण्ड। रोग में वायु गरम हो के मेदा के माथ मिल जाता है जिससे शरीर तै- यार होती जाती है और घाल घटता जाता है उसके दमना कसरत अवश्य करना चाहिये क्योंकि शारीरक परिश्रम से शरीर दुवली हेाती है ओ प्रमेह रोग में फायदा करता है। फिन्तु प्रायः यह नियम अपथ्य जनित प्रमेह रोग का ॥ यहत लोगों को विश्वास है कि प्रमेह रोग कसरत करमा निषेध है मे उनकी भूल है, क्योंकि कसरत न करने से प्रमेह रोग होता है. सिर्फ निम्नलिखित रोगों में कमरत न करना चाहिये। रक्तपित्तकृतःशोपो श्वासकासक्षतातुरः भुक्तवान्त्रीपुचक्षीणोभमार्तश्वविवर्जयेत् ।। रहरूपित्ती, दुर्यल और जो किमी रोग में सूखा जाता है। दमा, खांसी, और घाव से पीड़ित या भोजन के उपरान्त अति संत्री प्रसंग करनेवाला, क्षोण पुरुष और जो रास्ता चलनेसे थका हो इन मनुष्यों को कसरत नहीं करना चाहिये। प्रमेह पर औपध। उदकप्रमेह-उदकप्रमेह वाले को चाहिये कम मे कम एक मास प. प्यंन्त नीम के अतरवाल का काय पिये। जैसे दो ताला नीम के छाल को एक पाव पानी में मृत्तिका पात्र में पकाधे जय माधपाव या एक छंटाफ जल रह जाय मल छानकर एक नाला शहद डाल कर पिये। 'यदि खुष्की अधिक रहती हो तो, कायं न यना के माधपाव जल में नीष के छाल को हाल के भिजाकर श्रोश में रख देय और सबेरे मल छानकर शहद डालकर पिये भी प्रकार मयेरे मिगावै साम को पिये ॥ अपया धब का फूल. अर्जुन पक्ष और गालक्ष की छाल और मफेदनन्दन सयों को दो ताला ले काथ बनाय शहद डाल के यो रात में भिगा हिम बना कर शहद हाल के पिये, यह पूर्ण मात्रा है. रोगी बल.हीन हो ता मात्रा कम कर लेना चाहिये। .

भारोग्यदर्पगा। । १ : २-तुमेही को भरनी का काढ़ा या हिम पिलावै॥ ३ मान्द्रप्रमेह वाले को सातला के जड़ की छाल का काढ़ा या हिम-एक मास पर्यन्त पिलाना चाहिये ।। ४-सुराप्रमेह वाले को गीय वृक्ष के अतरछाल का काथ या हिम पिलावै॥ ५-पिंप्रमेह रोगीको दोनों हरदी अर्थात् हरदी और दारु हरदी का काढ़ा या, हिम पिलावै जयतक पेशाय से पिसान का माना बन्द न हे अथवा थे, दिनों तक पीने के पश्चात् भागे कही हुई औपधियां सेवन करावै ॥ ६-शुक्रमेही को सफेद दूब को जड़, शैवाल और कंजा की गरी का काढ़ा अथवा हिम पीना चाहिये । 9-शिक्ताप्रमेह में पीते की गह के छाल का काढ़ा या हिम बहुत फायदा करता है। शिक्काप्रमेह का निदान ठीक मिला लेना चाहिये क्योंकि शिक्ताप्रमेह के निदान से शर्करा रोग जो सुगाफके बजे से होता है जिसको हिक्मत में रेग मसाना कहते हैं और हकीम लोग शिक्ताम्र- मेह को भी रेगमसाना कहते हैं। इन दोनों में भेद , शिक्ताप्रमेह मूत्र के साथ सफेद रंग का बालू प्राता है और शर्करा में लाल रंग का रेत भाता है जैमा प्रायः नदी या नारों में पाया जाता है। -गीतप्रमेह-सुश्रत में शीतामे की जगह लवणमेट लिखा यह भी टीया क्योंकि निदान उसका भी मिलता है । अन्य ऋपियों ने जो शीतप्रमेह लिखा है उसका निदान प्रत्यक्ष । शीतप्रमेहवाला मूत्न करते समय कांप उठता है याने रोंगटे खड़े क्षेपाते हैं और कुछ जाड़ा सा बेस हेना है। इस प्रमेहवालों को कुछ दिनों तक, और अगर का काढ़ा अथवा हिग अवश्य पिलाना चाहिये .. में पाढ़ी २२ पञ्चमखण्ड। प ९-शनैःप्रमेह वाले को सैर वृक्ष की छाल का कांच या हिम पि. लामा उत्तम है। १०-लालाप्रमेह अथवा फेणममेह दोनों एकही का नाम इस प्र. मेहवाले को सिर्फ त्रिफला का काढ़ा या हिम पिलाना उत्तम है। वि. फला योग । हड़ का यक्कल १ भाग, धरा का बक्कल २ भाग, भांवला बीज रहित ४ भाग इसका नाम त्रिफला दे. उपरोक्त दशों प्रमेहों में काय या हिम में मिश्री की जगह शहद डालना चाहिये जिसकी मात्रा ३ मासा से लेकर एक ताला पर्यन्त है। फुछ दिनों तक यदि उपरोक्त कापों के पीते हुये मीमारी भाराम होते न देख पढ़े तो मागे प्रमेह रोग पर जो बड़ी २ दवाइयां लिखी है उसका सेवन करें। क्वाथ और हिम का निर्णय । जाना और वर्षा काल में काय और ग्रीष्मऋतु अर्थात् गरम दिनों में हिम बना के पीना चाहिये। दूसरे तरी और खुष्की पर निर्भर है, चाहे जो काल हो तर मिजाजयाले को काथ और सुष्क मिजाज वाले को हिम पिलाना चाहिये। पित्तज छः प्रमेह। ५-क्षारप्रमेह वाले को भी त्रिफला का हिम पिलाना उत्तम है। २-नीलप्रमेह वाले को पीपल वृक्ष की छाल का काय वा हिम अथवा पीपल सृक्ष के पश्चाग का चूर्ण गो दुग्ध के साथ पिलाने से लाभ होता है। अपवा खश, सांवला, नागरमोथा और इड, इन्हों का काय या हिम पीने से फायदा होता है।

भारोग्यदर्पण। १७१ उसका ३-कालप्रमेह वाले को परवल का हार पात, नीम का अतरछाल, आवला और गुर्ष (गिलाय) स्न धारों का काथ या हिम मिश्री डाल के या शहद डाल कर एक मास पर्यन्त घराबर दोनों समय पथ्य सहित पीने से अंधिक लाभ देखा गया है। ४-हारिद्र प्रमेह रोग में माथा, हड़, पद्माख और इन्द्रजी इनका काढ़ा या हिम अथवा पठानीलोध, सुगन्धमाला, पीत चन्दन या स्वेत चन्दन और धव का फूल इन चारों का काढ़ा या हिम पीना श्रेष्ठ है। यदि हारिद्र प्रमेहवाले को दस्त साफ न माते हों तो अमिलतास के गूदे का काला देके रेचन करादे पश्चात् पुनः उपरोक्त काढ़े को पीने को देय । ५-माजिप्ट प्रमेह पर नीम का छाल, अर्जुन वृक्ष का छाल और कमलगट्टा इन तीनों का काय या हिम पिलाना निस्सन्देछ फायदा करता है । अथवा शीतलचिनी,जिस को कवावधिनी कहते हैं, चूर्ण कर दो दो मासे की पुड़िया बनाठेय, देर दो घंटे पर एक २ पुहिया मुख में रखकर थोडे जज से उतार जाय, जल का कोई नियम नहीं है एक छंटाक से लेकर एक पाव तक जल मनुष्य पी सका है। प्रमेह रोग में अधिक जल पीने का निषेध है यहि सन्देह हो तो समझलेय कि इस दवा के साथ में जल पीना हानिकर नहीं है दूसरे इस औषध के साथ मिलाकर वह मूत्र के द्वारा निकल जाता है। दूसरे अधिक जल का पीना वायु और श्लेष्मा जनित प्रमेह रोग में बहुत निषेध है। ६-जब तक पेशाम सूध निर्मल जल के समान न हो जाप बराबर दवा खाता जाधै। मूत्र स्वच्छ निर्मल होने के बाद मांगे बयान की हुई कोई धातु गर्दुक औषध का सेवन कर जब तका प्रमेह का सन्देह बिलकुल जाता न रहे। यह प्रौषध जो सिर्फ गीतलधिनी हे खदों प्रकार के प्रमेह रोगों को मूत्रद्वारा बीर्य को गरमी बाहर निकाल बीर्य शीतल और प्रसन्न करता है। जैसे उदरस्थ रोगों के शांत्यर्थ वैद्यलोग प्रकृति के अनु- - १७२ पञ्चमवगंड। सारं रेधनद्वारा मलसाफ करके तव पोपमा प्रयोग करते हैं उसीप्रकार प्रमेह रोगों में उपरोक्त द्रव्यद्वारा मूत्रमार्ग से धीर्य का शिकार साफ कर के कोई उत्तम औषध सेवन करावे तो बहुत शीघ्र रोग जाता रहे । 9-रक्तप्रमेह में शीतलचिनी से मूत्र माफ करने की निहायत जरूरत है क्योंकि इस प्रमेह में शाम्यन्तरिक तप्यता मनुष्य के शरीर में बहुत फैल जाती है और उसका दिल इस कदर कमजोर हो जाता है कि बिगार की स्थिरता जाती रहती है । प्रथम तो रोगी का विश्वास दवाईयों से फम होजाता है दूसरे औषध देर में गुण दिखलाती है, उस्से मत्र साफ करदेने से रोगी का मिजाज शीतल हो जाता है और धाराम होने का विश्वास प्राजाता है पश्चात् इस. क्वाय को देय । --मियंगु का फूल, लाल कमल का फूल, नीले फमम्न का फूल्त पलास फा फूल इन चारों फो.मिश्री मिला के घी काढ़ा पिलाये या हिग पिलावै अवश्य लाभ होगा। अन्य प्रयोग। अमृतायारसःक्षौद्र युक्तसर्वप्रमेहजित् । हारिद्रचू- र्णयुक्तोवा, रसोधात्र्याःसमाक्षिकः ॥ ताजी गुर्च को शिस्त पर कुषा दी तोला उसका स्वरस ले उसमें छः मासा शहद डाल कर पीजावै इसी प्रकार दोनों समय गुर्च का स्व रस और शहद पीने से पित्त तथा वात गनित प्रमेह रोग प्राराम होता है इसी प्रकार ताजा जांवले का स्वरस ४ तोला, हलदी का चूर्ण एक मामा और शहद छः मासा मिला कर दोनों समय पीने से मब प्रमेझों का नाश होता है खासकर पित्तानित प्रमेहगत प्रपश्यही नाश होता है। किन्तु इस दवा को तीन महीने तक बराबर सेवन करना चाहिये ।

पञ्चमखुगड । . , के साथ खावै पीर दूध घंटे पश्चात् चार प्रांपला घी और शहद श्रादि-स्निग्ध पदार्थों का सेवन करै किन्तु हलफा भोजन करे ता कि अजीर्ण न हो पोंकि रसायन में कोष्ठबद्ध और दस्त का पतला होना दोनों हानिकर है । पुसताह एक वर्ष पर्यन्त त्रिफला रसायन का मेवन करता रहै तो अजर (बुढ़ापा न हो के ) और ममेहादि घ्याधि रहित होकर सौ वर्षे पर्यन्त मनुष्य जीता रहे ॥. रसायनविधिभंसाज्जायेरन्व्याधियोयदि । यथा- स्वमीपधन्तेपां कार्यभुक्त्वारसायनम् ॥ रसायन विधि में गड़गड़ हो जाने से यदि रोग उत्पन्न हो जाय अपया प्राचीन रोग उभट श्रावै तो रसायन बन्द करके अन्य भौषधियों से रोग को शीघ्र शान्ति कर पुनः रसायन सेवन करना, भारंभ करे ।। : रसायन सेयन करनेवाला फूठ बोलना, फ्रोध करना; शराब पीना, ती प्रसंग करना, जीव मारना, बहुत मेहनत करना, चिन्ता, शोक, जा- गरण, उपयास, निष्ठुरता मादि अपथ्यों को त्यागकर सत्यवादी, प्रिय बादी दयापरायण, उचित समय पर सोने, जागनेवाला, समय पर शौच दन्तधाधन, स्नान, दान, संध्या, भोजन करनेवाला, जितेन्द्रिय और वि. द्वानों का सेवक होना चाहिये क्योंकि । यथास्थलमनिर्वाहादापान्शारीरमानसान्। रसा- यनगुणैर्जन्तुर्युज्यतेनकदाचनः॥ इसका अर्थ यह है कि जो मनुष्य शारीरिक और मानसिक दोषों के बिना किये रसायग सेवन करता है उसको रसायन का विमान फल नहीं मिलताहे तात्पर्य यह है श्रारोग्यता प्राप्त करने में यथार्थ पथ्य सेवन करने की निहायत जसरत है ॥ .

पागग्यदर्वग्ण । १०७ कफपित्त प्रमेह पर लोधासर्व । लोभ्रंराठोपुष्करमूलमेला मूविडंगंत्रिफलायवा- नी। चव्यंप्रियंगुंक्रमुकविशालां किराततिक्तंकटुरोहिणी च ॥ भाी नतंचित्रकपिप्यलीनां मूलंसकुष्ठातिविषां च पाटाम् । कलिङ्गकंकेसरमिन्द्रसाहा नन्तासिपत्रमरिच- प्लवच ॥ द्रोणेऽभसःकर्षसमांश्चपक्त्वा पूतेचतुर्भागजलाव- शेपे । रसाधभागंमधुनःप्रदाय पक्षनिधेयोघृतभाजनस्थः । लोध्रासवाऽयंकफपित्तमेहान्क्षिप्रंनिहन्याद्विपलप्रयोगात् । पांड्डामयास्यिरुचिंग्रहण्या दोपंवलासंविविधंचकुष्ठम् ॥ (लाघ्र) पठानी लोध (शठी) कचूर (पुष्करमूलं) पोहकरमूल (एला) छेन्टीलायची के दाने (मूर्चा) मुर्रा (विहंग) वाययिरंग, त्रिफला, (यवानी) अजवाइन (धव्यं) पाव, प्रियंगुफूल (कमुक) दक्षिणी चिकनी सुपारी (यि. शाला) दारुण के जड़ की छाल (किराति) कठुमाधिरायता (कटुरो. हिणी) कुटको (भाही) भारगी (नत) तगर (चित्रक) चीतेको गहका हाल (पिप्पलीमूल) पिपरामूल (कुष्ठ) फूट (अतिविषा) अतीस और पाही (कलिंगक) इन्द्राय (केशर) नागकेशर मर्जुन वृक्ष को छाल, जयासा, ईख कालीमिर्च और मेथी हम भाइस प्रोपों को एक २ तोला से अधकचरा कर १२ सेर जल में रात को भिजा देय मृत्तिकापास अपया मलाईदार यर्तन है, सबेरे धीमी आंच चे पकाय जय चौपाई जल पाने ३ र पानी रह जाय शोतल कर मल के दाम लेय और उसमें १० सेर शहद मिला किसी चिकने पात्र भयया युपाम में भर मुख बन्द कर देता कि भीतर इया.म जाने पावे १५ दिन घर से बाद १५ दिन के फिर ससे छान घातलमें भर देय-रस पासव का मावा : मामासे.दो तोला पञ्चमखण्ड। तक पल के अनुसार मात्रा बना लेय, इस आसव को दोनों समय प. रहेज साप पोने से कफपित्त जनित प्रमेह रोग प्राराम होता है। यह धांसव पांडु और बादी बवासीर को भी फायदा करता है जिस प्रमेहवाले को इस आसव के पीने से दस्त जारी हो उसके दवा में इ. न्द्रायन न छोड़े। देवदार्वारिष्ट बात कफ प्रमेह पर ।.. तुलाईदेवदारुस्याद्वासाचपलविंशतिः । मंजिष्टेन्दु यवादन्ती तगरंरजनीद्वयम् ॥ रानाकृमिनमुस्तंच शिरी- पंखदिरार्जुनौ । भागन्दिशपलान् ददनाद्यवान्यावत्सक- स्यच ॥ चन्दनस्यगुडूच्याश्च . रोहिन्याश्चित्रकस्यच । भागानष्टपलानेतानष्टद्रोणेऽभसःपचेत् ॥ द्रोणेप्टोपेकपा- येच पूतेशीतेप्रदापयेत् । धातक्या:पोड़शपलं माक्षिकस्य तुलात्रयम् ॥ व्योपस्यद्विपलंददाात् त्रिजातस्यचतुःपलम्। चतुपलंप्रियंगुश्च द्विपलंनागकेशरम् ॥ सर्वाणयेतानिसंचूर्ण्य धृतभांडेनिधापयेत् । मासादूर्ध्वंपिवेद्देनं प्रमेहंहतिदुर्ज- यम् ॥ वातरोगान्गहण्यशी मूत्रकृछ्राणिनाशयेत् । देवदा- वादिकोरिष्टोदद्रुकुष्ठविनाशनः ॥ देवदारू तेलही गांठ १०० तोला, (वासा) रूसा को पत्ती २० ताला मगीठ, इन्द्रजय, जयालगोटेकी, तगर, घरदी, “वासहरदी; रासन, वायभिरंग, मोपा, शिरस की छाल, सैर वृक्ष की छाल, अर्जुन शुक्ष की छाल यह सब दर्श ३ तोला, अजमोदा, कुरैया की शाल, मफेदचन्दन, गुरिच, कुटकी, चीते के जड़ का हाल, यह उ. औषध माठ ताला ॥ .

पाराग्यदर्पण। १७६ लेप सब दवास्यों को अघकचरा कर सवामन ल में रात को भिजा देय सबेरे जांच पर चढ़ाय धीमी प्रांच से पकाये जब चौथाई जल म. र्थात् १२ सेर जल वाकी रह जाय चूल्हे पर मे उतार शीतल कर. छान लेय और उसे किसी घृत.पात्र अथवा बुयाम में भर तम उसमें घर का । फूल १६ तोला, शहद ३ सेर, गोठ छोटीपीपर. और कालीमिर्च. यह तीनों दो तोला, दालचीनी, छोटीलायची और तेजपात यह तीन चीज ४ तोला लेय, प्रियंगुका फूल, और नागकेशर दोदो तोला लेय इन सब दवाइयों को अधकचरा कर उसी काढ़ेमें डाल देय किसी लकड़ी से सबों को मिला के घरतन का मुख बन्द कर दे ताकि दवा न जाने पाये एक महीने तक खुले मैदान में रख देय जो फि दिनमें धूप और रातको बोस लगै एक महीने के बाद पुनः उसे छान बोतल में भरकर रख देस । इस मासव का मात्रा १ तोला से चार ताला तक है, रोगी की अवस्था और पलायल देख के मात्रा बना लेय । इस भासघ को दिन में दो या तीन बार पीने से उपद्रय सहित श्लेष्मा गोर यात जनित प्रमेह रोग नाश देता है इसके अलावा ग्रहणी, धायासीर और मुगाफ भी इसके सेवन से. शाराम देता थे किन्तु विशेषकर यह मासय प्रमेह रोग पर है। प्रमेह रोग पर बसन्तकुसुमाकर रस । द्वौभागौहेमभूतेश्च गगनंचापितत्समम् । लोहभस्म त्रयोभागाश्चत्वारोरसभस्मतः॥ बगभस्मत्रिभागस्यात्सं- मेकत्रमर्दयेत् । प्रवालमौक्तिकंचैव रससात्म्येनदाययेत् ॥ भावनागव्यदुग्धेन रसैदृष्ट्वाटरूपकैः । हरिद्रावारिणाचैव- मोचकंदरसेनच ॥ शतपत्ररसेनापि मालत्यास्वरसेनच । पश्चान्मृगमदश्चन्द्रस्तुलसीरसभावितः। कुसुमाकरइत्ये- पवसन्तपदपूर्वकः । गुंजाइयंददीतास्य मधुनासर्वमेहनुत् ॥ सिताचन्दनसंयुक्तवानपित्तादिरोगजित् ।

भागाग्यदर्पण। १८१ त्रिवदंतीपत्रकंचत्वगेलावंशरोचना । प्रत्येकंकर्पमात्रंच कुर्यादेतानिबुद्धिमान् ॥ द्विकर्पहतलहिंस्यावतुःकर्षासिता भवेत् । शिलाजत्वष्टकर्पस्यादष्टौकांस्तुगुग्गुलोः ॥ एभि- | रेकरसंक्षुण्यैः कर्तव्यागुटिकाशुभा। चन्द्रप्रभेतिविख्या- तासर्वरोगप्रणाशिनी । प्रमेहान्विंशतिछ मूत्राघात तथाश्मरीम् ॥ चन्द्रप्रभायांकर्पस्तु चतुःशाणाविधीयते ॥ (चन्द्रममा ) कधूर, दुधियायध, (-मुस्तं ) मागरमाया ( भूमिम्ब ) मिष्ठचिरायता ( अमृत ) गुर्घ धागिलोय, देवदारू, हरदी (अतिविषा) तीस, ( दारी ) दारुहरदी, पिपरामूल, चीता के जड़ की छाल, धनि- या, त्रिफला, चाव, बाधधिरंग, गजपीपर, (ध्योषं) शोंठ प्रीपर और मिर्च ( माक्षिक धातु ) सुवर्णमाक्षिक का शुद्ध भस्म, (द्वीक्षारी ). जथा. खार और सज्जीखार ( लवणत्रय ) सेंधानान, कालानीन कौर बिहान इन चीजों को सीन २ मासा लेय ( निषत) निशोप, ( दन्ती ) जवाल- | गोटे के जड़ की छाल, ( पत्रक) तेजपात, ( त्वग) दालचीनी, ( एला) छोटी लायची के दाने और बंसलोधन इन सब दवाईयों को दश २ मासा लेय । सूब शुद्ध कांतीसार अथवा पोलाद भस्म जो जल पर उत. राता हा २० भासा लेय सबों को चर्ण कर तथा अढ़ाई तोला मिश्री और.शुद्ध शिलाजीत पांच तोला उमीमें मिलादेय और शिलाजीत के बराबर बाधा उत्तम गुग्गुल मिलाय पानी का पुट दे धना बराबर गोली अमाय छाये में सुखाय पोताल में भर कर रखदेय इसको चन्द्रप्रभा गुटिका कहते हैं। इसको दोनों समय सेवन करने से कफ यात जनित प्रमेह रोग नष्ट होता है। चन्द्रप्रभा गुटिका का गुण दन्त नेवादि रोगोंका भी नाशक लिखा? किन्तु बिलकुन वाहयाप्त है जो यथार्थ गुण हे वह हमने लिख दिया।

१८२ पञ्चमवगड । . दूसरी बात, यह है कि चन्द्रप्रभायटी की तौल.एक कर्ष भर लिखा है (चन्द्रप्रभायां कर्षस्तु ) यदि कर्षभर याने दश मासा की गोली धना के रोगी को खिलाई जाय तो बिमार विधारे की क्या दशा होगी, रोग होना ता दूर रहा. उसे खुदी इम दुनिये को तिलांजुलि देना पड़े, माना मिथ्या नहीं है क्योंकि. उस जमाने में लोग वैसाही बलवान होते थे. जिस जमाने में यह पुस्तक रची गई है, शोक वर्तमान के वैद्यों पर होता है जो नई पुस्तक रचने अथवा टीका बनाने में तो धन्वन्तरि के भी गुरु यनजाते हैं किन्तु देश समय के अनुमार मनुष्य के बलावलपर बिल फुल ध्यान नहीं रखते। हमने ठीक देखाहे जिस भीषधकी मात्रा छ मासा हे प्राजकल के लोगों को एक मासा दवा पचना, मुस्किल पहजाता है। यही भषय है जो आजकल लोगों की बिमारी न माराम हो के जस २ दवा खाते हैं और भी.बिमारी बढ़ती है। दूसरे भाजकन के टीकाकारों में एक बड़ाभारी देोष और भी पाया जाता है, वैद्यक यांची जानते नहीं व्याकर्ण की शक्ति से शब्दार्थ निकाल कर रखदेते हैं यह भी औषधियों के नाम तो बढ़ाही गड़बड़ करडालते हैं उदाहरण में सिर्फ एक दवा को दिखलाते हैं । जैसे-पत्र जिसको प्रसिद्ध नाम तेजपात हे मसाला में भी पड़ता है उसके परयाय नाम में एक नाम तमाल पत्र है और भारत में यह प्रसिद्ध है कि तमाकू को लोग तमाल पत्र कहते हैं ता. यह समा 'साधारन लोगों में नहीं होता, भाषा की किताबों को देख के प्रायः प्रायुर्वेद विज्ञान रहित जन मोपंध बनाते हैं, तमाल पत्र को पढ़ कर तेजपात की जगह कहीं तगाफू । दिया तो रोगी को पा गसि होगी सीसे पापितों को सम्मति मार्थ ग्रन्थों में रहती है और भी अनेक भापतियां हैं जिन्हें समय पा के दिखलायेंगे। प्रमेह रोग पर शिलाजीत प्रयोग। वातंज चार प्रमेह ओ प्राय: पासाध्य होता है क्योंकि यह रोग पाराग्यदपगा। १८३ . मनुष्य के मारने के लिये भाताचे ऐसे दुष्कर रोगको यदि आराम करने फी सामथ्र्य तो शिलाजीत के यदि उत्तम शिलाजीत मिले शीर पंथ्य सहित सेवन किया जाय तो निस्सन्देह प्रमेह रोग माराम जाय क्योंकि उत्तम औषध के अलाभ से रोग मनुष्य को मारता है । शिलाजीत में वैद्यों को सम्मति । नसास्तिरोगाविसाध्यरूपो याह्यस्यजेयंनजयेत्प्र- सह्य । तत्कालयोगैर्विविधैः प्रयुक्तस्वास्थ्यंतनीयविपुलं ददाति ॥ ऐसा कोई असाध्य रोग पृथ्वी पर नहीं है जो शिलाजीत के खाने से न जाय, अनेक योगों के साथ शिलाजीत का सेवन करने से बहुत शीघ्र शरीर में भारोग्यता लाभ होता है। शिलाजीत की उत्पत्ति । शिलाजीत की उत्पत्ति शास्त्रकारों ने इस प्रकार लिखा है-समुद्र अमृत निकालने के समय जय देवता और दैत्यों ने मिलकर मंदराचल पर्पत को समुद्र में हालकर मथा था, ऐसा कहा जाता है कि उस समय गरमाहट पाकर उस पर्वत में पसीना निकला और समुद्र में गिरा, मथ ने के ममय यह भी देवतों को मिला, तब देवतों ने उस शिलाजीत को ग्रला शीर इन्द्र की राय लेकर मनुष्यों के उपकारार्थ उसे समस्त पर्वतों को दिया अर्थात् सब पर्वतों में उसका बेहन डाल दिया तभी से यह सेमि यागे शिलाजीत अमृत कल्प के समान ग्रीष्म रितु में सूर्य की धूप मे पर्वत तप्त होने से उसमें से बहता है जिस पर्वत में जो धातु हेाता है उसी यर्ण के समान उस पर्यत से शिलाजीत निकलता है। सोना, चांदी, रांगा, सीसा, तांबा और लेहे,से शिलाजीत की उत्पत्ति है अर्थात् जिन पर्वतों में उपरोक्त धातुओं में से किसी धातु का भागग्यदर्वगा। १८५ . निदाघेधर्मसंतप्ता धातुसारंधराधराः । निर्यासवत्प्र- मुंचन्ति शिलाजतुप्रकीर्तितम् ।। सूर्य के किरगों की गर्मी से जम पर्यत तप्त होते हैं तब उनमें से धातुओं का भार रूप (नियोमयत) याने गोंद के ममान पतला पदार्थ जिमे जिलागीत कहते हैं निकलता है और बहुत दिनों तक गांद के समान लसदार पना रहता है। कहने का तात्पर्य यह है कि जो शिला- जीत यागार में बनियों के यहां मूषा मिलता है दर हकीकत बन्दरों का विष्ठा है. अज्ञान लेग सो को शिलाजीत समझते हैं । शुद्ध असिल शिलाजोतंकी परीक्षा। वन्होंक्षिप्तन्तुनिषूमं एकत्वालिङ्गोपीभवेत् । तृणाये- जांभसिक्षिप्तमधोगलतितन्तुवत् ।। गोमूत्रगन्,मलिनं शुद्धं ज्ञेयंशिलाजतु ॥ जो शिलाजीत अग्नि में डालने से निर्धूम याने धुभां न देयं और पकने से या अग्नि पर रखने से लिङ्ग के समान खड़ा होजाय तिमका के अग्रभाग पर रखकर जल में डालने से तार तार सा होकर जल में नीचे बैठ जावै, और उसमें गोमून की सी दुर्गन्ध प्रावै, मलिन काले रंग का पतला गांद के समान हो उसे शुद्ध शिलाजीत जानना ॥ शिलाजीत के गुण। रसोपरसंसूतेन्द्र रत्नलोहेपुयेगुणाः । वसंतितेशिला- धातौः जरामृत्युजिगोषया ॥ शिलाजकतिक्तोष्ण कटु- पाकंरसायनम्। छदिरोगन्तथाहन्ति कम्पमेहास्मशर्करा २४ १८६ पञ्चमखण्ड। -मूत्रकृच्छूक्षयंश्वासं वातमीसिपांडुता । अपस्मारमथो- न्माद शोफकुष्टोदरहमीन् ॥ रस, उपरस, पारद, रत्र गौर लोहे में जो गुण हैं वह सब गुणा शिलाजीत में हैं यह वुढ़ापा और मृत्यु को जीतनेवाला है शिलाजीत षडशा, तीता, गरग, पाक में टु और रसायन याने बुढ़ापापन को नाश करनेवाला है । वमन, फान्पयायु, नौगोंप्रमेहरोग, पथरी, रोगममाना, सुशाफ, कपाक्षाई, श्वासरोग, यादीयावासीर, पांडुरोग, मृगी, उन्माद, मूजन, कोढ़ और कृनिरोसा नाय करता है। शिलाजीत का सामान्य लक्षण । यत्सर्वतिक्तकटुकं कपायानुरसंसरम् । कटुपाक्यु- एणवीर्यञ्च शीपणंछेदनंतथा॥ तेपुयत्कृष्णमलयु स्निग्धं- निःशर्करचयत् । गोमूत्रगन्धियच्चापि तत्प्रधानंप्रचक्षते.॥ यस प्रकार के शिलाजीत स्वाद में घरपरे, कडुये, कपायल, होते हैं गुगों में दस्तायर कदुपाकी, उप्णशोर्य, ( शोपी ) रमादि धातुओं का मुखानेघाला और छेदोलेकिन उन सषों में से जो शिलाजीत काले रंग का भारी चिकना कंकर रेत रहित गौर जिस्में गोमूत्र किसी दुर्गन्ध भाती हो यह शिलाजीत उत्तम होता है। शिलाजीत शुद्ध करने की प्रथम बिधिः । गरमी के दिनों में जय श्राफाश मेघ भौर घायु फर के रहित हे उस समय उत्तम स्थान में लोहे के चार पाल जो फटारे के भांति हो * पौषध मिले हुये कपादि देोपों को अपने शक्ति से यहां से एटाकर पाएर करदे नसे दी कहते हैं ।

पारोग्यदपगा। १८७ स्थापन गारै उनमें से पहले पाल में शिलाजीत को दुश २ कर के हागा दे गौर शिलाजीत से उसमें दूना जा हाल दे और ऊपर से थोड़ा गरम जल हाल के हाथ से सूप गल के मोटे कपड़े से छागले, उस लने जल को दूसरे पात्र में डालकर धूपमें रखदेव और उसके ऊपर जस २ मलाई नमतीजाय तीसरे पात्र में रखता जाय, जब मलाई का सामना बन्द हे जाय उस पानी को फेक घरतन साफ पारलेय और जिस बर्तन में मलाई रक्सी गई है उसमें भी गरम जल डाल के धूप में रख दे, जप उम्में भी मलाई जमना सुरू हो चौथे पात्र में रखताजाय जव मलाई जमना बन्द ा जाय तो उसका भी पानी.फेंक बर्तन साफ फरलेय और चौधे पात्र में फिर गरम पानी डाल के धूप में रख देय और जस २ मलाई जमती जाय पुनः प्रथम पान में रखता जाप और गरम पानी डाल के धूप में रखदेय इस प्रकार पांच छ बार पारने रो जय देखै की अव मलाई नहीं जामती पानी स्वच्छ बना है तब जाना चाहिये कि शिलाजीत शुद्ध हो गया उसे निकाल किसी उत्तम पात्र में रखदेय, यह उत्तम शुद्ध शिलाजीत द्वितीय बिधिः। शिलाजतुसमानीय ग्रीप्तप्तंशिलाच्युतं । गोदुग्धै- त्रिफलाक्वाथै मूंगद्रावैश्चमर्दयेत् ॥ आतपेदिनमेकैक तच्छुकंशुद्धतांब्रजेत् । ग्रीष्य तु अर्थात् गरमी यो दिनों में जब पर्यत अत्यन्त गरम हो जाता है तय पर्वतों मे शिलाजीत चूता है । उस शिलाजीत से मलिन दूरी कर गार्थ गौ का दूग, त्रिफला का काढ़ा और भांगरे का स्वरस में एक २ दिन भावना देके सुखाले शिलाजीत शुद्ध है।जायगा। किन्तु यह शुद्धता गध्यम दर्जे का है यह शिलाजीत गरम करता है। .

भाग्यगा। १८६ - नष्ट होता है क्योंकि इस भीषध का फल हुन शीघ्र दृष्टिगोचरं होता है । जय गौपच पच जायतम उत्तम गोगग करे। मधुमेह को चिकित्सा। सुश्रुत संहिता चिकित्सित स्थान:। मधुमेहित्वमापन्नं भिपग्भिःपरिवर्जितम् । योगेना- नेनमतिमान् प्रमेहिणभुपाचरेत् ॥ मासेशुक्रेशुचौचैवशैला: सूर्यांशुतापिताः। जतुप्रकाशंस्वरसं शिलाभ्यःप्रस्रवन्तिह। शिलाजत्वितिविख्यातं सर्वव्याधिविनाशनम् । त्रप्वादी- नान्तुलाहानां पण्णमन्यतमान्वयम्। ज्ञेयंस्वगन्धतश्चापि पेडूयोनिप्रथितंक्षितौ ॥ लोहात्भवतितद्यस्माच्छिलाजतु जतुप्रभम् । तस्यलोहस्यतद्वीयं रसञ्चापिविभर्तितत् ॥ नपुसोसायसादीन प्रधानान्युत्तरोत्तरम् । यथातथाप्रयो- गेऽपि श्रेष्टेष्ठगुणाःस्मृताः ॥ 'मधुमेहादि चार प्रकार के वातज प्रमेह रोग में सुश्रुत्त जी ने शिला. जीत को प्रधान औषध कहा है । सुश्रुत जी कहते हैं कि जिस मधुमेही को प्रसाध्य जानकर चैद्यों ने त्याग दिया है। उसकी चिकित्मा निम्न. लिखित उपाय से करना उचित है । ज्येष्ठ अथवा नापाढ़ के महीने में जब सूर्य की गरमी से पर्वत अत्यन्त तप्त हो जाते हैं तब पत्थरों के सन्धियों से पिघली हुई लाही के समान एक..मकार का रस निकलता है, उसी रस को वैद्य लोग शिलाजीत कहते हैं, और उसी नाम से घि- ख्यात है तथा शहरों में बिकता भी है। यह वास अवश्य है कि जो रोगकिमी १६० पञ्चमखण्ड । पौषध से भाराम न हो वह रोग शिलाजीत से दूर होता है अर्थात् शिलाजीत अनेक प्रकार के योगों से भनेक रोगों को नाश करता है। रांगा, सीसा, तांबा, रूपा सुवर्ण और लाहाछ धातुओं में से किसी एक धातु कि मुगन्धि शिलाजीत में अवश्य भाया करती है इसी मे शिलाजीत का खट्यानि भी कहते हैं इसका मुख्य कारण यह है कि उपरोक्त छः धातुओं में किसी एक धातु की सान या अंश जिस परबत में होगा उसी परपत मे शिलाजीत फि उत्पति होगी अन्य परयतों से नहीं इसे जो परवत में जिस धातु का अंश होगा उसी धातु कि गन्ध शोलाजीत में आवेगी. और उसी धातु का वीर्य सौर उसी का रस भी शिलाजीत धारण करता है। रांगा, सीमा, तांबा, लाहा इत्यादि सवे धातु गुणों में उत्तरोत्तर श्रेप्ट है उसी तरह शिलाजीत भी गुणों और प्रयोगों में श्रेप्ट है। तद्भावितंसारगणै हृतदेपोदिनोदये। पिवेत्सा- रोदकेनैव श्लक्ष्णपिष्टंयर्थीबलम् ॥ जाङ्गलेनरसेनान्न तस्मिन्जीर्णतुभोजयेत् । उपयुत्यतुलामेवंगिरिजादमृता- पमात् ॥ वपुर्वर्णवलोपेतो मधुमेहविवर्जितः । जीवद्वेप- शतपूर्णम् जरोऽमरसन्निभः ॥ शतंशतंतुलायान्तु सहस्र- शतौलिके । भल्लातकबिधानेन परिहारविधिःस्मृतः ॥ मेहंकुष्टमपस्मार भुन्भादंश्लीपदंगरम् । शोपंशोफार्शसी- गुल्म पाण्डुतांविपमज्वरम् ॥ अपाहत्यचिरात्कासाच्छि लाजतुनिपावितम् । नोऽस्तिरोगोयचापि निहन्यान्न- ।

भारोग्यदर्पण। १६१ 'शिलाजतु ॥ शर्करांचिरसम्भूतां भिनत्तिचतथाश्मरीम् । भावनालोड़नेचास्य कर्तव्येभेपजैहितैः । पूर्वोक्त प्रकार से शुद्ध किया हुआ शिलाजीत को अथवा शालि. सारादि द्रव्यों की भावना देकर धमन घिरेषतादि द्वारा दोषों के दूर होने पर सुर्योदय के पश्चात् उसी शालिमारादि फेजल में पीस के बल के अनुसार खाय उसके परजाने पर जांगल पशुओं के मांस रस के साथ पुराने चायल का भात या जय की रोटी भोजन करे इस रीति से भगृत के समान गुणकारी इस शिलाजीत के जो पांच सेर खालेगा उसका देव सुन्दरवर्ण और बल से युक्त हो जायगा, और मधुमेह भी जाता रहेगा। भजर अमर होकर सौ यरस की पूर्ण आयु को प्राप्त करेगा और एक पसेरो शिलाजीत सेवन करने से सोबर्प शायु बढ़ती चली जायगी आर्थात् भवामन खालेने से सहस्त्र बघ की अयस्या को प्राप्त होगा। मिलाये के विधान को समानही इसमें माहार विहार का नियम है । शिलाजीत से प्रमेह, फोढ़, मृगी, पागलपना, पीलपाय, शेय, शक, अर्थ, गुल्म, पाण्डु रोग, विषमज्वर इत्यादि सदर रोग यातही भरपकाल में नष्ट हेर जाते हैं । ऐसा कोई रोग नहीं है जो शिखरमीत से दूर हो। बहुत दिवस के उत्पन्न हुये शर्करा और पथरी रोग घट जाते हैं। इसमें सत्तम २ भोपों फी मायना देकर उत्तमही औषधों में इसे घोट । तात्पर्य यह है कि भूतपूर्व ऋषियों ने जिन औषधियों को अधिक गुणकारी पाया है ससोफे। अधिक पुष्टता के साप सिलाने को जोर दिपा सिर्फ भेद तिमाही पियों ने उसी समय के अनुसार पधियों के गुण मात्रा और खाने का विधान लिखा है, जिस माय कि सम्हों ने शपनी २ संहिता रची है तन और यह मालूम नहीं था कि भविष्य में इस शुद्ध भायाधतं में सबों का राज्य हेरगा भौर साग, पान, पञ्चमखण्ड। . व्यवहारादिक वर्तन से मनुष्यों की प्रकृति, वल, रोग, और समय का भी बहुत कुछ हेर फेर हो जायगा नहीं तो भविष्यत के लिये भी यही प्रषि गण सोपधियों के मात्रा को न्यूनाधिक करने की विधि लिसगाते । लिखा है कि इस शिलाजीत को एक तुला, याने पांच सेर जो खालेगा बिमारी माराम होने के बाद सी वर्ष जीवैगा, इसी तरह प्रति पांच सेर से सौ २ वर्ष की आयु समझना चाहिये इस प्रकार मे भवामन शिलाजीतखाने से मनुष्य एक हजार वर्ष जी मक्ता है। अगर यह यात सत्य हो तो फौम मनुष्य ऐसा है जो बहुत दिनों तक इस संसार में जीने की इच्छा न रखता हो । पाठकगण यह न समझे कि हम शिलाजीत के गुण फा जो ऋपियों ने लिखा है असत्य समझते हैं नहीं विलकुल सस्य है किन्तु अय मनुष्य में वह परम नहीं रहा जो दो तोलारोग खामकै । पूर्व जमाने में जिन औषधियों को मात्रा एक तोला पी उसकी मात्रा माज के जमाने में एक मासा पो अधिक से अधिक दो मासा समझना चाहिये, तो भोज के समय में यदि.५ सेर शिलाजीत खाना चाहे तो उसके लिये वर्ष ४ महीना की जरूरत है। वायु द्धयर्थ इतने दिनों तक किसी औषध का सेवन करना कठिन बात नहीं है, यहां तो लोग चाहते हैं। कि एकही दिन के औषध सेवन से जन्म के रोग छुट भाप यही में प्राण भारत में १०० में ८५ वे मनुष्य रोग ग्रस्त हो रहे हैं। ममेहरोग पर शिलाजीत का सेवन करना हमारी पूरी सम्मति है क्योंकि इसे हम स्वयं सेवन करके परीक्षा ले चुके हैं। भी तरह एक और प्रधान गोषध परीक्षित है जिसे छठवें सपा में प्रकाश करते हैं। . ।

Arogyadarpana Khand-i

Author
Sharma,.jaganath
Title
Arogyadarpana Khand-i
File name
Arogyadarpana Khand-i
Text
OCR done
Citation
1952
Published
2012/08
Publisher
Bombay,.shree Venkatesware Press.
Language
Sanskrit
Pages
694
Library
Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
DLI number
312314
Barcode
99999990321114.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
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R2dthKBHn17
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