Sanmati Library, Jaipur

Shribhagvatgeeta Bhasha

Harivallabha · 2009/10

PDF Proofread

Front matter

No text on this page.

৮ী নন। NARASI भीमगीता भाषा R प्रथम अध्याय मृत वाच । मात्र कुरक्षेत्र में मिले युद्ध के साज । संजय सोखत पांडवनि कीन्हीं कैले काज में संजय उवाच । पाण्डवसेना व्यूह लखि दुर्योधन लिग भाय। निज प्राचारज द्रोण सो बोले ऐसे भायं ॥२॥ पाण्डवसेना अति बड़ी प्राचारज तू देख । धृष्टद्युम्न तब शिम्य ने व्यूह रच्यो जु विशेख ॥ ३॥ र धनुपधारी बड़े अर्जुन भीम समान। .

श्रीभगवद्गीता भाषा।
हुपद महारथ और पुनि हैं विराट युयुधान ॥४॥
पृष्टकेतु अरु काशिपति चेकितान बलवंत ।
कुन्तिभोज अरुशैव्य पुनि पुरुजितशत्रुनिकंत॥५॥
युधामन्यु अतिविक्रमी उत्तमौज रणधीर ।
दौपदिसुत' अभिमन्यु ये महारथी वरवीर ॥६॥
मो सेना में जे बड़े ते सब गिन क्षितिराज ।
नांके जानो तुम तिन्हें धरे युद्ध के साज ॥७॥
तुम अरु भीषम कर्ण कूप जिन जीते संग्राम ।
भूरिश्रवा विकर्ण अरु अश्वत्थामा नाम ॥८॥
औरौ बहुते शूर हैं मो लमि. तजें जु प्रान ।
भाँति भाँति श्रायुध लिये सने युद्ध बलवान॥६॥
मो सेना असमर्थ सो भीषम राखत जाहि ।
पर सेना असमर्थ सो राखत भीम सुवाहि ॥१०॥
आसपास मो व्यूह के तुम सो ठाढ़े होहु ।
भीषमकी रक्षा करो मनमें धरिक कोहु ॥११॥
: दुर्योधनको हर्षको भीषमजू चित चाय ।
सिंहनाद उच्चै कियो दुस्सह शङ्ख बजाय ॥१२॥
तबहिं शङ्ख भेरी पणव ानक गोमुख भूरि ।
ताही छिन बाजत भये शब्द रह्यो भरिपूरि ॥१३॥

३
.
और सुभद्रापूत।
प्रथम अध्याय।
श्वेत बरन घोड़े लगे दीरघ स्थहि बनाइ ।
हरि अर्जुन तापर चढ़े रहसे शङ्ख बजाइ ॥१४॥
देवदत्त अर्जुन लियो पांचजन्य यदुराय ।
भीप्स भयानक भय दयो पांडव शङ्ख बजाय ॥१५॥
नृपति युद्ध सिरहू कियो अनंत विजयको घोष ।
पुनि सहदेव जुनकुलने मरिण पुप्पकरुसुघोष॥१६॥
महाधनुर्धर काशिपति रथी शिखंडी जान ।
धृष्टद्युम्न विराट अति वन्ती सात्यकिहि मान ॥१७॥
द्रुपद द्रौपदीसुत सबै
अपने अपने शङ्ख लै धुनि कीन्ही तासूत ॥१८॥
फटयो हियो कौरवनको शब्द सुन्यो ता बार ।
पृथ्वी अरु आकाश में पूरि रह्यो. गुंजार ॥१६॥
देखे सुत धृतराष्ट्र के अर्जुन धनुष सँभारि ।
कपिवर ताकी ध्वज लसै शस्त्र न परतनिहारि॥२०॥
अर्जुन उवाच ।
अर्जुन कहै जु कृष्णसों मेरे चित यह चिन्त ।
दुहुँ सेना के मांझ रथ ठाढ़े कर मो मित्त ॥२१॥
जब लग देखों हौं इन्हें जुरे युद्ध के दाय ।
कौन कौनसों हो लरौं या रण में सम पाय ॥२२॥

श्रीमंगवद्गीता भाषा। युद्ध करन. योधा जिते आये हैं या साज। दुखुद्धी कौरवन के भले करन के लाज ॥२३॥ संजय उवाच । ऐसे कहि श्रीकृष्ण जू मुनि अर्जुन की बात। दोऊ सेना मांझ रथ लै राख्यो ता घात ॥२४॥ भगवानुवाचा - भीपम द्रोणहि आदि दै नृप जुहते ता ठोर । अर्जुनसों बोलत भये कहि कौरवकी ओर ॥२५॥ अर्जुन ते देखे सबै पिता पितामह भाय। गुरु मामा भैया सखा सुत नाती के दाय ॥२६॥ ससुर सुहृद बंधू सकल दोऊ सेना साह । तिनहिं देखि करुणा भई तब बोले नरनाह ॥२७॥ अर्जुन उवाच। देखे सब में बन्धु ये कृष्णा युद्ध के दाय। मो सुख सूखत जात है अंग अंग शिथिलाय ॥२८॥ रोम हर्ष मो हृदय में और फरूप बहुभाय । धनुष गिरतमोहाथते लंचा तपत अधिकाय ॥२६॥ ठाडो छैहौं नहिं सकत भ्रमत जु मोमन सीत। केशवः शकुन न देखिये कैसी है यह रीत ॥३०॥ M ५ प्रथम प्राध्याय। सुनत हतौ संग्राम में ताते हरि इमि जान । अपनो मन्ती न देवियत है विपरीत सुजान ॥३१॥ विजयन नाही पण जनहिं चाहौलुख राज। सजभोग गोविन्दनीअर जीवहि किहि काज||३२|| बाजभोग सुम्ब कृपा करियत इनके काज । तरत जीव धन लांडिये हम नहिं चाहत गज ॥३३॥ गुरु मामा मुत ससुरजन सारे नाती देख । से मार मोको यदपि ही नहिं हनौं विशेख ॥३॥ राजतनौ तिहुँ लोक को किती इती यह भूमि। मुतन हनों धृतराष्ट्र के कित मुख रहिहै भूमि ॥३५॥ पाप होइ इनके हने यदपि लिये हथियार! तांत ये हनिये नहीं चन्धु सहित निरधार ॥३६॥ ऋषण मुजन को गारिक नुख लहिये का भाइ। ये जु मुलाय लोभनों नहिं देखें या दाइ ॥३७॥ जो रे बसें नहीं लोभ करहिं वेचेत। कुन्नक्षय मित्र द्रोह को सब अघ के जुनिकेत ॥३८॥ क्यों न काही या पापत हमहि निवारन काज । दोष जु कुलक्षव करत हूँ देखें श्रीयदुराज ॥३६॥ सुजक्षय भयेते धर्मकुल जात जु सबै नशाइ ।

.६
श्रीभगवद्गीता भाषा।
धर्म नशाहि कुल को तबाह होत अधर्म सुभाइ॥४०॥
कृष्ण अधर्महिं के बढ़े दुखी होहिं कुलनारि ।
होहिं वरणसंकर तबहिं तियहि दोप निरधारि॥४१॥
नरक पर संकर भये
कुलध
घाती जे लोइ।
गिरहि पितर तिन सबनके पिंड देइ नहिं कोइ॥४२॥
कुलहिं वरणसंकर भये डारत दोप बढ़ाइ।
जातधर्म कुलधर्म जे तेऊ देत नशाइ ॥४३॥
कुलधर्मन के नशतही निश्चय यह ही होय ।
सदा नरक में ते रहैं यह जुकहत सब कोय ॥४४॥
बड़े पाप के करन को निश्चय किया विचार।
चित में पान्यो राजसुख हनत कुटुंब निरधार ॥४॥
शस्त्र पाणिबिन मोहिं जो पकरिलेहिहथियार।
धार्तराष्ट्र मो को हरै सो मोहिं है सुखसार ॥४६॥
संजय उवाच।
ऐसे कहि अर्जुन तबहिं वैठि गयो रथ माह ।
करते डारे शर धनुष शोक बढ्यो नरनाह ||१७||
इति श्रीभगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुन-
संवादे अर्जुनविषादोनाम प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥

द्वितीय अध्याय।
संजय उवाच।
लै उसाँस अँखियाँ भर अर्जुन करुणा भाइ ।
बहु विपाद संयुक्त लखि बोले श्रीयदुराइ ॥१॥
श्रीभगवानुवाच ।
अर्जुन या संग्राम में कत दुख पायो मीत ।
कीरति अरु स्वर्गहि हरै कायर ज्यों भयभीत ॥२॥
कायरता तू जनि करै यह तोको नहिं योग।
छाँड़ि कचाई जीय की गहि शस्त्रन को भोग ॥३॥
अईन उवाच।
दुहुँ सेना में कृष्ण जी हैं भीपम अरु द्रोन ।
पूजों के शर सो हनों मोसों कहिये सोन ॥४॥
भीखमांगिवरु खाइये गुरु हनियोजो अनीति ।
गुरुहि मारि भोगहि करौं भी सुलोहू रीति ॥५॥
यहै जु हम नहिं जानहीं हारि होय कै जीत ।
जिन्हें मारि हम महि जिये ते गाढ़े हैं मीत ॥६॥
धर्म मांझ मैं मूढ़हीं पूछत. कृपण सुभाय ।
दीन तुम्हारी शरणहौं दीजै युक्ति. बताय ॥७॥

P श्रीभगवद्वीता भाषा संजय उवाच । ऐसे कहि श्रीकृष्ण से अर्जुन ताही वार । युद्ध न हौं हरि जू करौं कीन्हों यह निरधार ॥६॥ भूमि लोक सुरलोक को लहाँ कटक राज। इन्द्रिय सोखत जीव कोजाइन शोक समाज॥ ६॥ दोऊ सेना मांझ यो अर्जुन कियो विषाद । कृपावंत श्रीकृष्ण कीन्हों वचन प्रसाद ॥१०॥ TA श्रीभगवानुवाच। सोच अशोची क्यों करत कहतं ज्ञान की बात। शोचन पण्डित करतहैं जीवन उपजत जात॥१२|| हम तुम अरु नरपति जिते इनको नाश न होइ। 1 : तिहूं काल में थिर रहैं या देही में दोइ ॥१२॥ देही के निमि देह में कुमारादि जस..होय । तैमें देही नर लहै मोहत धीर न सोयः ॥१३|| अर्जुन इन्द्री चित्त मिलि.विषय जुदुखसुख देत। सीत उष्ण नहिं थिर रहै सहि तिल को तू हेत॥१४॥ ज़ाके व्यथा न होइछु सुख दुखगिनै समान। 1 जूड़े घरै मुक्तिहिां लहै बात यह परमान ॥१५॥ -- द्वितीय अध्याय जो है सो विनशै नहीं जो विनशै सो नाहिं। जो इन तत्वन को लखै गनिये ज्ञानिन माहि॥१६॥ जासों पग यह है भयो सो अविनाशी जान । जाहि विनाशिन कोउ सकै ताहिभातमामान॥१७॥ अंत वस्तु सब देह है जीव रहत है नित्त। अविनाशी यह वस्तु है युद्ध करै किन मित्त ॥१८॥ जो याको हंता गनै हन्यो गनत .जो कोय । यह न मरे मारै नहीं अज्ञानी वे दोय ॥१६॥ यह न मरै उपजै नहीं भयो न आगे होई.। अजर पुरातन नित्य है मारे मरै न सोइ.॥२०॥ जोजानत हैं श्रातमा अज अविनाशी नित्त। सो नर मार कौन को ताहि हने को मित्त ॥२१॥ जैसे पट जीरन तजै पहिरत नर जुनवीन । देह पुरांनी. जीव तजि नई गहत परवीन ॥२२॥ यह न कटै हथियार सो पावक. सकै नजारि । भीजिसकै जल नाहिने सोखिसकैन क्यारि॥२३॥ कटें जरै सूखे नहीं और न भीजने .योग नित्य रहै सम ठौर थिर अविनाशी बिन रोग ॥२४॥ प्रकटत नहीं अचिन्त्य है अविकारी तू.जान !

.१०
श्रीभगवद्वीता भाषा।
ऐसे याको जानि कै.शोक लहै जनि मान ॥२५॥
जो तू जानत जीव को जनम मरण पुनि होइ ।
तनक शोक तू जनि करै मन दृढ़ता में जोइ ॥२६॥
जो उपजै सो बिनशिहै मरै सो उपजै आइ।
होनहार सो होत है तहां न शोच बढ़ाइ ॥२७॥
पाछे जाइ न जानिये आगे परे न जान।
मांझहिये कुछ देखिये ताको शोच न मान ॥२८॥
जो याको देखै कहै सोऊ 'अचरज भाय ।
सुने अचम्भव सो लगे यह जान्यों नाहिं जाय ॥२६॥
जीवन मास्यो जात है बसत सबन की देह ।
तासों शोच न कीजिये करि काहू सों नेह ॥३०॥
अपनो धर्म विचार तू जनि छांडो संग्राम ।
धर्मयुद्धते छत्र यह और न कछु अभिराम ॥३१॥
अपनी इच्छाते लह्यो खुल्यो स्वर्ग.को द्वार।
भागवत क्षत्रिय लहैं ऐसो रण या बार ॥३२॥
और धर्म संग्राम को जो तू करि है नाहि ।
तजिकीरतिनिज धर्म अरु परिहैं पापनमाहि॥३३॥
सबैलोक कहि हैं अबर्हि तेरो अयश बढ़ाइ।
अयश प्रतिष्ठावन्त को मरणहुते अधिकाइ ॥३४॥

द्वितीय अध्याय । ११ भयते अर्जुन रण तज्यो यो कहिहैं ये वीर । तोहिं बहुत कर मानते अब लघु हैही धीर ॥३५॥ तेरे अरि सब कहेंगे जे अनकहनी बात । निजघाटा सुनि पाइकै बहु दुख लागत तात ॥३६॥ लरत मरे लहिहै स्वरग जीते पुहुमी भोग। उठि अर्जुन तू युद्धकर निश्चय तोको योग ॥३७॥ लाभहानि अरु दुःख सुख जीत्योहार समान । ताते अर्जुन युद्ध कर पाप लेहि जनि मान ॥३८॥ सांख्य बुद्धि तोसों कही कहत योगविधि तोहि । ता बुधि के संयोग से रहै न कर्मनि मोहिं ॥३९॥ कर्म करै बिन कामना ताको होइ न नाश । अल्प कियेहू धर्म तिन काटत भव भय फाँश ॥४०॥ बुद्धि जु निश्चयवंत को एकै है तू जान । जिनके निश्चय नाहिनै तिनहीं बहुविधि मान॥४१॥ जे नहिं मानत स्वर्गफल ते अज्ञानी लोइ । कहत जु ह्यों कछु औरही तिनमें ज्ञान न होइ ॥४२॥ स्वर्गलाभ की कामना रहित जु तिनके चित्त । भोग बड़ाई के लिये करत क्रिया सों हित्त ॥४३॥ भोग बड़ाई कामना तिनके चित हरि लेतः।

१२
श्रीभगवद्गीता भाषा।
निश्चय कर ते बुद्धि को नहिं समाधि में देत ॥४॥ .
त्रिगुण कर्स से कहत हैं वेद सु तू जिहि मित्त ।
धीरज़धरिदुखसुखहि सहियोगक्षेमतजिचित||५||
सरिता सागर कूप सो सरत जु एके काज.!
तैसे. जाने ब्रह्म को लहै वेद को साज ॥४६॥
तो अधिकार जुकर्म सो नाहि फलन सों हेत।
कर्मन के फल छोड़ि दे करि सुकृतहि में चेत.॥४७||
योगस्थित है कर्म करि सबै संग जो त्याग ।
सिद्धिसिद्धि संमान गनि यहै योग अनुरागा॥१८॥
बुद्धियोग सों कर्म को अर्जुन तू घटि जानि।
शरण होहि तू बुद्धि की दीन, कामना मानि ॥६॥
शुद्धि युक्ति दोऊ तजै. कहा पुण्यं कह पाप ।
बुद्धि कर्म में चतुरई सोई. करि तू आप ॥५०॥
चाहत नहिं जे कर्मफल ते पंडित बड़भांग।
जन्मबंध को छोड़ि कै लहैं मुक्ति अनुरांग ॥५॥
मोह. सघनताः जब तजै अर्जुन तेरी बुद्धि ।
तब लहिहै वैराग्य तू चित में कारकै शुद्धि ॥५२॥
तेरी बुधि वैराग्य में थिर रहिहै जब मित्त ।
तब लंग मेरे योगसे है है निश्चल चित्त ॥५३॥

. - द्वितीय अध्यायः। : अर्जुन उवाच जाली बुधि निहचल सदा ताके चिह्न वताइ । से बोलत क्यों रहत चलत जु है किहिमाइ ॥५॥ श्रीभगवानुवाच । जे हैं मन में कामना तिनको तजै जु कोइ । यातम सो संतोप गहि निहचल बुद्धि सुहोइ ॥५५॥ दुखको तजि भागे नहीं सुख चाहै नहिं चित्त । रहित नेह नौ क्रोध भय निहाल बुद्धि सुमित्त ॥५६॥ नेह न काहू सो करै भले बुरे को पाय। भले बुरे सो सुख नदुख सो थिर बुद्धि कहाये ॥५७॥ जो कछुवा निज अंग को लैचि श्राप में लेत। तैसे बँचै इन्द्रियन तजि विषयन सों हेत ॥५॥ विषय करत है दूर जो सो तजि है आहार । मातम देखे जातु है अमिलापा निरधार ॥५६॥ ज्ञानवंत जे पुरुष हैं यत्न कठिनता साधि । इंद्री अति बलवंत हैं तऊ लगावत व्याधि ॥६॥ ताते रोंकै इन्द्रियन मो में चित को लाइ। सब में कारकै ये सबै सो विर बुद्धि सुभाइ ॥१॥ नर बात है विषय को जाते उपजत संग ।।

१४ श्रीभगवद्गीता भाषा। काम जु उपजत संग ते ताते क्रोध अभंग ॥१२॥ मोह होत है क्रोधते मोहोते बुधिनाश । सुद्धि गये बुद्धी नशत बुद्धि गये मृतपाश ॥६३॥ राग द्वेष को जो तजै त विषय की सेव इन्द्री जो निज वश करै लहै शान्ति को भेव ॥६॥ शान्ति जबै यह गहत है होत दुखन की हानि । बुधि तबहीं थिर होति है यह लीजो तू मानि ॥६५॥ योगविनाबुद्धिहुनहींबुधि बिनहोइनध्यान । ध्यान विनासन्तोषनहिं सुख न शांतिविनजान॥६६॥ इन्द्रीजित जित फिरति है तितमनलावति चि। मन जु बुद्धि हरिलेत है वायु नाव ज्यों ऐंचि ॥६॥ जिन इन्द्री रोकी सबै ठौर ठौर ते आनि । विषय त्याग है जिन कियो थिरबुधिताहीमानि॥६॥ जागत हैं जहँ संयमी जहाँ सबन की राति। जीव सबैजागत तहाँसोमुनिको निशि भाँति॥६॥ जैसे जल सब सरित के मिलत समुद्रहिं जाय । त्योंही सबही कामना शान्त रहैं तहँ श्राय ॥७०॥ तजिकै सब मनकामना जो नर निस्पृह होय । अहंकार ममता तजै तामें शान्ति जु होय ॥७॥ -

द्वितीय अध्याय।
१५:
ब्रह्मज्ञान तोसों कह्यों जाते मोह नशाय ।
'बुधि जो अंत समय रहै मिलै ब्रह्म में जाय ॥७२॥
इति श्रीभगवदीनास्पनिपत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णा-
जुनसंवादे शान्तियोगोनाम द्वितीयोऽध्यायः ॥ २॥
तृतीय अध्याय।
...
अर्जुन उवाच ।
बुद्धि भली है कर्म ते कृष्ण कही तुम जोहि ।
कर्मनिधन में जो कहा संशय होत है मोहि ॥ १ ॥
वचन सुने सन्देह के मो. बुधि है भरमाति। ।
निश्चय करि याको कहौ लहाँ मुक्ति जा भाँति ॥ २॥ .
श्रीभगवानुवाच ।
नेष्ठा जो है भाँति की पहले कही बनाय ।
कर्म श्रेष्ठ है बुद्धि ते यहि बिन यह नशि जाय ॥३॥
कर्म विना कीये पुरुप ज्ञानहि लहै न कोय ।
किये विना संन्यास के दोऊ मुक्ति न होय ॥४
कर्म किये बिन क्षणकहू रहै न कोऊ जंत।
विवश भये कर्मन करें बँधि माया के वंत ॥५॥

१ १६ श्रीभगवडीता भाषा। कर्म इन्द्रियन रोंकि कै मन विषयन को ध्यान.1 'कपटी सूरखं है बड़ो ताको दम्भी जान ॥६॥ मन सौ रोकै इन्द्रियन कछु कर्मन परचाय ! फल अभिलाषा को तजै जाते यह अधिकाय ॥ ७॥ अन करिबे ते कर्म कहि भलो सुतू करि मित्त । बिन कीने ते कर्म यह देह निर्मित है नित्त ॥८॥ यज्ञ कर्म बिन कर्म जे.जग बन्धन ते होत । तिहि काजे कर्मनि करै मिटै फलन को गोत ॥६॥ यज्ञ सहितरचिजगतको पहले केहि विधिबात की उदय तिहारो जगत में कामधेनु यह बात ॥१०॥ यज्ञनि करि देवन भजौ देव तुम्हें फल देहि । वृद्धि परस्पर यों करो मन वांछित फल लेहि ॥११॥ इष्टभोग को देतः है देव भजे ते मित्त । बिन पूजे ते लेत हैं ते हैं. चोरनि चित्त ।।१२।। 'यज्ञशेष जे खाता है. पापन डारत धोय। यज्ञ विना जे खात है अघानित लहत हैं सोय ॥१३ जीव अन्न ते होत हैं अन्न: सेह ते होय।। मेह : यज्ञ ते होत है यज्ञ कर्म ते जोय ॥१४॥ कर्म जु उपजत. वेद ते वेद ब्रह्म ते माना है तृतीय श्रध्याय। बम जो भाषा सबनि में ताहि यज्ञ करि जान ॥१५॥ वेद बनाये कर्म जे वर्णन करत जे कोय । पाप :इन्द्रियन वश भये जन्म रहत हैं खोय. ॥१६॥ श्रातम सों सन्तुष्टं जे श्रातम सों रति होय।":" त्रिपत जु श्रातम सो रहै ताहि न करनो कोय ॥१७॥ जाहि करें जे पुनि नहीं बिन कीये नहिं होय । ब्रह्मादिक सों काम नहिं प्रातम ही सो मोय ॥१८॥ फल कामन को छांडिकै कर्म करो तुम नित्त । । संग विना कमन करै मुक्ति लहै नर मिच ॥१६॥ लही सिद्धि सनकादिहू कीन्हे कर्म समाज । लोकरीति जो देखिये तुमहूँ करो सुकाज ॥२०॥ बड़े जु श्राचारहि करें सोई माने. पान। ताही मग सब जग चलै बड़े करहिं जुप्रमान ॥२१॥ मोको कछु करनो नहीं तिहूं लोक में काज । नकछुलहौं लहबो न कछु कर्म करत यह साज ॥२२॥ जु ही कर्म बिनहीं करा रही बालसी मीत । तौह सब नरहू गहैं मेरे मग की रीत ॥२३॥ जो हौं कर्मनि नहि करों होइ सबन को नांश:। प्रकटाऊं संकर तबै इनहुँ, प्रजा, या पाश ॥२॥ .

१८ श्रीभगवनीता भाषा। मूरख जो कर्मनि करै करि बहु प्रीति सुभाय । लोकका ज्ञानी. करै मन तासों न लगाय ॥२५॥ तिनकी. बुधि भेद न तजै रहै कर्म लपटाय । सावधान.. ज्ञानी रहै - पेखे ते इन्द्राय ॥२६॥ माया के गुण कर्म हैं सबै कर्मः यह जानि । अहंकार कर, मूढ़ जे लेत अपनपो मानि ॥२७॥ गुण अरु कर्म विभाग को जानत तत्त्व जु कोय । इन्द्री विषयन सों पगी श्राप मगन नहिं होय ॥२८॥ माया गुण करि मूड जे रहे विषय लव लाय । ता सँग ते ज्ञानी तिन्हें देइ न कहूँ चलाय ॥२६॥ चित अध्यातम आनिकै कमन-मो में राख.। अहंकार ममता तजै युद्धहि को अभिलाख ॥३०॥ जे नितया मेरे संतहि श्रद्धा सा महि लेत। तिनको जिय निष्कर्म हैं कर्म तज करि चेत ॥३१॥ जे मेरे या. मतहि को करत न दोप लगाय । ते मूरख जानें नहीं हैं अचेत के भाव ॥३२॥ ज्ञानवन्तहू करत हैं अपनी प्रकृति संमान । सब कोऊ निज.प्रकृतिवश रोके ते जुअज्ञान ॥३३|| सब इन्द्रिनाको विषय में राग द्वेष जो होय।.. --

३
हैं
तृतीय अध्याय 1
तिनके वश नर नहि-रहै रहै जु अरि सम जोय ॥३४॥
न्यून होय.जो निज धरम पर ते.अधिको मान ।
मीच भली निज धर्म में पर धर्मे भय जान ॥३५॥
अर्जुन उवाच ।
कहिये प्रेरे कौन के पुरुष करत हैं पापं ।
जाके इच्छा नाहिने कर्म देत संताप ॥३६॥
श्रीभगवानुवाच ।
यह जु काम अरु क्रुद्ध है रजगुणही ते होय ।
क्यों पूरन होइ नहिं प्रपी को अरि जोयः॥३७॥
अग्नि ढपै जो धूम से दर्पण मल के भाय ।
गर्भ त्वचा सों व्यों दपै .जग इतने ही भाय ॥३८॥
ज्ञानी हू को ज्ञान इन वैरी राख्यो झापि ।
कथ दुःसह यह अग्नि है सकैन कोऊ ढापि ॥२६॥
इन्दी मन अरु बुद्धि है ये ही. या के थान।
इन करि के नाशन जु-है. ज्ञानी हू को-ज्ञान ॥१०॥
अर्जुन ताते प्रथम ही तू इन्द्रिन को रोंकि ।
हरत ज्ञान विज्ञान जो इन पापिन को ठोंकि ॥४१॥
इन्द्री हैं सबते परे ताते पर मन सोक।
मनते परे जु बुद्धि है ताते आतम जोय ॥४२॥

-. 4 २० श्रीभगवद्गीता भाषी। तिम लखि बुधिते परै मनःकों कर वश मोहः । कामरूप अरि दुसह को मारि डोरि नरनाहं ॥४॥ इति श्रीभगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यार्थी योगशास्त्रे श्रीकृष्णा- र्जुनसंवादे कर्मयोगोनाम तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥ चतुर्थ अध्याय। श्रीभगवानुवाच। यहै योग है मैं कह्यो पहिले रवि सों जाय। तिनहूँ तब मनुसौ कह्यो मनु इक्ष्वाकु सिखाय॥१॥ परम्परा या योग को जानत हैं ऋषिराया। बहुत दिना 'बीते गयो सोऊ योग नशाय ॥२॥ वहै पुरानो योग है तोको दियो बताय । याते तु मी मित्त है और भक्ति के भाय ॥३॥ अर्जुन उवाच । तुम तो प्रकट हो अबर्हि सूर पुरातन देव । तुम कब तासों है कह्यो हो जानौं यह भेव ॥४॥ श्रीभगवानुवाच । तेरे अरु मेरे जनम. बीते हैं बहु. बार। तू तिनकों जानत नहीं हो जानत निरधार ॥५॥ .

चतुर्थ अध्याय : २१ अज अविनाशी प्रकट हौं जगत ईश करतार। अपनी इच्छा लेत हौं शुद्ध तत्त्व अवतार ॥६॥ जब अर्जुन जग में घटत परम धर्म को भाय । बढ़त अधर्म जहां तहाँ तब मैं प्रकटत श्राय ॥७॥ साधुन की रक्षा करौं पापिन डारतं.मारि थापत रीति सुधर्म की युग युग:मांग:विचारि ॥८॥ जन्म कर्म मम दिव्य, हैं तत्व लहै ,जो कोय। देह तजै मो को मिलै बहुरि नं जन्म सोय ॥४॥ :: राग द्वेष भय को तजै मौ में राख भायं । बहुत ज्ञान तप करि गये मोही मॉझ समाय ॥१०॥ जो मोको जैसे भजै. तैसे फल देता अर्जुन ते सवःजगत में मेरों मतं गहि लेत॥११॥ कर्म सिद्धि की, चाह करि पूजत देवन लोय । कर्मन की नरलोक में सिद्धि वेगते होय ॥१२॥ ...चारों चरण जुभै रचे करि गुण कर्म विभाग। हो इनको करतार हूं नहिं मोहूं अनुराग ॥१३॥ कर्म न मोको लिप्त हैं मोहिं न फल की चाह । जैसे जो भोको. भजे कर्म, न बांधे ताहः ॥१४॥ जो चाहत हैं मुक्ति को, करें कर्म जो आयः । .. . .

,
२२ श्रीभगवंद्रीता भाषा।
ताते तू भी कर्म कर पहलेन'को मत पाय ॥१५॥
कौन अंकम सुकर्म को रहत पंडितो मोहि ।
मुक्ति काज सोई. करम कहे देत हो तोहि ॥१६॥
जान्यो चहिये कर्म को और विकर्म सुभाय।
सुनि अकर्म गति लीजिये गेहन कर्म के दाय ॥१७॥
कर्मन माझ अकर्म जे लखें, अकर्मनि कर्म ।
बुद्धिवन्त तिन संब किये मिटे मनन के मर्म ॥१८॥
जाके संब. आरंभ निज विना कामना होत।
तासों पंडिता कहत हैं। निज हैं कर्म के गोत गोर६॥
कर्म फलनि चाँडै सदा तृप्त करै नहिं पास ग
ताको कर्मन करत हूं लग ने यम की फ्रॉस ॥२०॥
“जीते,इन्द्रिय देह निज काम परिग्रह जाहि ।
देह कांज़ा कर्मनि करै पाप न लागै ताहि ॥२१॥
यथालाम संतोष जो दुख सुख गिनै न दोय ।
सिद्रिःअसिडिहि एकसी कर्म न बंधन होय ॥२२॥
'तजै सकल जो कामना ज्ञान लगावें चित्त ।
यज्ञकाज कर्मनि करै सो नर बांधिय मित्त पर।
होम अग्नि हवि ब्रह्म है अपरै ब्रह्महिं जानि ।
जाइ ब्रह्म में सो रहे कर्म समाधिहि ठानि ॥२४॥

:: चतुर्थ अध्याय देवन कोई भजन है करत पाप बहु भाइ । एक ब्रम में यजत है, ज्ञान योग के दाइ ॥२५॥ एक जु होमत इन्द्रियन संयम श्रानि स्वरूप । विषयिन होमत एक है इन्द्री अंगम' अनूप ॥२६॥ जो सब इन्द्रिन के करम और कर्म संव पाइ। होमत संयम अग्नि में प्रकट करै चित लाइ ॥२७॥ एक यजत है देवे सो एक तपस्या योग] एक जु पदवे ही भजै एक ज्ञान, सौ लोग ॥२८॥ होम अपानहि प्राण में प्राण अपांनहि माहि। प्राण अपानहि रोकि के रहत जुहै नरनाहि ॥२६॥ प्राणनहीं में प्राण को होमत तजि आहार । ये सब जानत यज्ञ को मेटतं सकल-विकार ॥३०॥ यज्ञ शेष अमृत भखत होम ब्रह्म में लीन। यहाँ लोक विन यज्ञ नहिं परलोकी है छीन ॥३१॥ बहुत भांति वेदन कहे यज्ञ सबै ये, मान । ते सर्व जानहु कर्मते लहौं मुक्ति सुख खान ॥३२॥ द्रव्य यज्ञते है बड़ों ज्ञान यज्ञ इहि दाय जितें कर्म वेदन कहें ज्ञानहि रहे संमाय ॥३३॥ FFER १ धन देना।

श्रीभगवद्गीता भाषा। काजै.. बहुते. नम्रता प्रश्न रु सेवा भाति । तुहि ज्ञानी उपदेश है ज्ञान जिनै है शांति ॥३४॥ अर्जुन तू या के लहे नहिं लहि है फिर मोह। सब जीवन को देखि हैं.आप मांझ के सोह ॥३५॥ सब पापनते जो बड़ो. पापीहू ते होई। ज्ञानयान चढ़ि उतरि. हैं पापसिंधु सम जोइ ॥३६॥ जैसे ज्वाल हुताश की डारै सब ही जारि । ज्ञान अग्नि त्यों प्रबल है परति कर्म निर्वारि ॥३७॥ ज्ञान समानहुँ लोक में पावन नाहीं और योग साधना जे करें लहैं ज्ञान को ठौर ॥३८॥ इंद्रीजित. श्रद्धा .सहित : पावै ऐसो ज्ञान। ता पाये तू तुरत ही- लहै जु-शांति सुजान ॥३६॥ जो मूरख श्रद्धा विना ताही को. जु-विनाश । जाके यह संदेह है. सो सुखलोक. निराश ॥४०॥ मो को, अरपै.. कर्म. करि. करि. संदेहै. दूर। ज्ञानी. बँधे न कर्म सो रहै: सदा सुख पूर ॥४॥ संदेह जु.अज्ञान.ते. उपज्यो अर्जुन आहि । ज्ञानखड सब छीन करि योग करें किन-ताहिः॥४२॥ इति श्रीभगवंद्रीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुन- संवादे ज्ञानयोगोनाम चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥ - :::पश्चम अध्याय पञ्चम अध्याय : अर्जुन उवाच । कबहुँ कहत संन्यास को कबहुँ कर्म को योग। निश्चय करि एकै कहौ जामें सुख-संयोग ॥१॥ श्रीभगवानुवाच। कर्मयोग संन्यास अरु यो दोऊ शुभदैन। कर्म योग संन्यास में कर्मनि लहि चित.चैन ॥२॥ द्वेष तजै चाहे तजै सो संन्यासी जानः। राग द्वेपते जे रहित ताहि छुटयो तू मान ॥३॥ योग सांख्य को है कहै मूरख पण्डित नाहिं । दोउन में एक भजै दोऊ फल. हैं ताहि ॥४॥ ठौर जु लहिये सांख्यते सोई योगते होई। सांख्य, योग एकै गनै ताको ज्ञानी जोइ ॥५॥ .. लहै सन्यासहि दुःख सो बिन कर्मणिरे मित्त । . योग युक्ति जे करत हैं लहैं. मुक्ति निश्चित ॥६॥ इंद्रियजित हैं शुद्ध हिय योगयुक्त जो कोय । जीवन जान श्रातमा कर्म लिप्त नहिं होय ॥७॥ 1. ज्ञानी कर्मनि करतहू लेइ किये नहिं मान।

२६ श्रीभगवदीता भाषा। सूंघतं देखत छुचत पुनि सुनत चलत हू जान ॥ ८॥ सोवत जागत चलत-अरु बोलत डारेहु देत । इन्द्रिय विषयनसों पगी जानत हैं यह हेत ॥६॥ कम करें तजि संगको सब को ब्रह्म जान । तोकों पोप न लगत है पद्मपत्र जल मान ॥१०॥ देही मन बुधि इन्द्रियन योगी है निहसंग । कर्म करत अति चावसों चित्त शुद्ध के ढंग ॥११॥ ज्ञानी हू मुक्तिहि लहै कर्म करै फल छाँड़ि। मूरखं फलं की प्राश करि बँधत कामना ऑड़ि॥ २॥ मनकर करमन जे त ज्ञानी तिन को मानि। नवे द्वार पुर में बसें लेत सुखन की खानि ॥३॥ ईश्वर नहिं करमनं करत नहिं करमन करतार । कर्मफलनिहूं नहि करत प्रकृति करै विस्तार ॥१४॥ सुकृत न काहू को गहै और पाप नहिं लेइ। ढाप्यो ज्ञान अज्ञान ते मोहन प्रकटन होइ ॥१५॥ दूर कियो अज्ञान जिन हिये ज्ञान प्रकंटाई। देखत ईश सुरूप. ते ज्ञानं सूर के दाइ ॥१६॥ जे मन को अरु बुद्धि को राखंत ईश्वर माह । जन्म मरण. तिनको नहीं मुक्ति होइ नरनाह ॥१७॥ HINI .

. पञ्चम अध्याय २७ विद्यावंत पुनीत द्विज गो गज कूकर जान । इनको ज्ञानी सब लखत भेद लेतं नहिं मान ॥१८॥ समता जिनके जीय में तिन जीत्यो संसार विना दोष मो ब्रह्मते ब्रह्मी ते निरधार ॥१६॥ मुख पाये हरषै न सो दुख पाये न रिसाय । राखै थिर निज बुद्धि को ब्रह्महि रहै समायः॥२०॥ बाहर के सुख को तजै हियंसे हरष सुजान ब्रह्म विषय चितको धरत है अक्षत सुख मान ॥२१॥ विषय जिते संसार के ते हैं दुख के मूल । उपजत विनशत हैं तिन्हें पण्डित गहैं न भूल ॥२२॥ काम क्रोध के वेग को जो सहि सकै सुभाइ। सो योगीं नित ही रहै थिर सुख में लिपटाइ ॥२३॥ जाके हिये प्रकाश है अंतर. सुखः आराम । वहयोगी परब्रह्म है लहै ब्रह्म को धाम ॥२४॥ जो ज्ञानी पापन तजंत होत ब्रह्म में लीन । भेद न तिनके जीय में रहत सबन सों दीन ॥२५॥ काम क्रोध जे रहित हैं वश कीन्हे जिन चिंत्त । ज्ञानवन्त ते हैं सदा ब्रह्म चहूँ दिशि मित्त ॥२६॥ वजै विषय संसार के दृष्टि भौंह मधि राखि ।

२८
श्रीभगवद्गीता भाषा।
प्रान अपानहिं सम करैःनासामधि अबिलांखि॥२७॥
:- जीतै इन्द्रिय बुद्धि मन मुक्तिहि में मन देइ ।
इच्छा भय क्रोधहि तजै मुक्ति पदारथ लेइ ॥२८॥
... तप यज्ञन को भोगता संव.लोकनि को ईश।
शांति लहै यो: जानिके मोको प्रभु जगदीश ||Rel
इति श्रीभगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णा-
र्जुनसंवादे. कर्मयोंगोनाम पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५।५ :-
षष्ठ अध्याय।
।
-
श्रीभगवानुवाच
कर्मफलन चाहै नहीं करे, कर्म निष्काम ।
योगी-संन्यासी वही पावे सुख को धाम ॥१॥
जाको संन्यासी. कहै सो तू-योगी जानि ।
बिन-संन्यासहि.योग नहिं यहै साँच तू मानि ॥२॥
योगहि कर्मनि लेत है. ज्ञानी चित्त विचार-
योग लहै शांतिहि गहै विषय-इन्द्रियन मार-।।३।।
- विषयन सो अरु कर्म सो होइ.प्रीति जब दूरि ।-
सब संकल्पन को तजे योग रहै : तव पूरि ॥४॥

. !' षष्ठ अध्याय। २६ निज प्रातम को उद्धरत अधोगमैन न करेइ । अतिमहीं रिपु श्राप को आतमही सुख देइ ॥५॥ श्रापहि जान्यो प्रोतमा सोई बंधु सुपाहि तिन जीत्यो नाहीं जनै बरि लै बरतत ताहि ॥६॥ जिन जीत्यो हैं श्रातमा शांति लही बहु ज्ञान । शीत उप्णसुखदुखजुसम अंरुअपमान समान। ७॥ : जानत ज्ञान विज्ञान जोश्ररु इन्द्रियजित होय । सोनों पाहन एक सम गर्ने सुयोगी कोयः ॥ ८॥ मित्र उदासी शत्रु पुनि अरु निज बन्धु समान । साधू: पापी चित्त में गनै एक उनमान ॥ ६ ॥ बैठि इकोसे इक चितों योगी साधै योग। एकाकी चाहै न कछु जोरे नहिं सुख भोग ॥१०॥ ठौर पुनीतं निहारि के करि असिन विस्तार । नहि ऊँचो नींचो नहीं पद कुश अजन विथा॥१२॥ करि बैठे मन को जुथिर सव इन्द्रिन को जीति। करिकै प्रातम शुद्धि को योग करै या रीति ॥१२॥ कीया शिर अंग्रीव को राखे एक समान । नासा अंग्रहि दीठि धरि देखे नहिं दिशि श्रीन ॥१३॥ शान्ति गहै भय को तजैब्रह्मचर्य व्रत लेय। , श्रीभगवद्गीता भाषा। मो में राखै रोकि मन लहै: योग के. भेय ॥१४॥ यहि विधि करैजुयोगको निजजनकोथिर राखि । .. शान्ति लहै मोको मिल रहै अमिय रस-चाखि ॥१५॥ योग-लहैं नहिं बहु भसै बिन पायेहू मित्तः। । सोवतहू सोवै नहीं अस जग जागहु नित्त-॥१६॥ युक्त बहार विहार जो कर्म युक्ति पुनि, होय । जागत सोचत जो युगत सोडारत दुःख धोय ॥१५॥ जब निजचित को रोकि के राखै प्रातम माहि। तजै सबै जो कामना सो योगी नर नाहि ॥१८॥ जैसे दीप समीर बिन रहै ज्योति ठहरायः। योगी निश्चल चित्त को उपमा है या भाय ॥१॥ योगी; सेवत योग को, चित्त जहाँ ठहस्यः-- निरखत आंतमको तहाँ रहतं सदा सुख-पाय ॥२०॥ जो सुख इन्द्रियते परे बहुते बुधि गहि लेत। वा :सुख को जानै तबै ता पाछे है नेत ॥२१॥ जा पाये लाभ न अधिक और हानि नर मित्त । थिरता कहि डोले नहीं बहु दुख पाये निचः॥२२॥ दुखहू के जो संग को माने लेत वियोग। निश्चय करि जो कहि करै ताको कहते योग ॥२३॥ . + . षष्ठ अध्यायाग धीरज धरि अरु प्रबंधिकर हर हरै सब त्यागी कछुवै करै न कामना प्रातम सों अनुराग २४॥ मन चंचल जित तित चलै ताको राखै रोंकि । कै संयम निज प्रातमा सजै जुत्ताको ठोंकि ॥२५॥ जाके मन में शांति है पार्य रहते जो कोइ । मगन जु ब्रह्म श्रनंद में ता योगी को जोइ ॥२६॥ जो योगी इहि विधि करै योग पाप को त्यागि। सहजै ब्रह्महिके सुखहि ल है रहत अनुरागि ॥२७॥ मोहि लखैसब ठौरजो अरु सबको म्बाहि माहि ।। मोको देखत सो सदा ही हूँ देखत ताहि ॥२८॥ व्यापक हौ. सब जगत में मोको सेवत कोई कैसे हूं कितहाँ रहौं ताको मो में जोइ ॥२०॥ सब प्राणिन में स्थित मुझे भजै एक मन होहिं ।। सर्व विषे अस्थिरंजुही यह लखि भ6 जु मोहि॥३०॥ सबको देखे श्राप समः सुख दुख एकै भाइ। सो योगी: सबते बड़ो.मो में रहै समाइ ॥३१॥ अर्जुन उवाच । : . योग कह्यो तुम कृष्णजू मोको एक समान ।' : रहै नमो चित चलतही जोतुम कियो बखानः ॥३२॥ . -- प श्रीभगवद्गीता भाषा। मन है चंचल कृष्ण जू बहु क्षोभक दृढ़ जान। ताको रोकत पवन सम है अति कठिन सुजान ॥३३॥ श्रीभगवानुवाच । अर्जुन तू साँची कही मन चंचल न गहाय । योग किये वैराग सो नीके पकस्यों जाय ॥३॥ जिन पकरो नहिं चित्त निज ताप योग न होइ। जिन अपनोमनवश कियोरहतयतन सोसोइ ॥३५॥ अर्जुन उवाच !" यजन और श्रद्धा सहित योग भ्रष्टता पाई। लहैनसिद्धि संयोग की कौन गतिहिं को जाइ ॥३६॥ किधौं दुहुन के भ्रष्टते वादर लो विनशाइ। ताको कछू न बासरों रह्यों मूढ़ के भाई ॥३७॥ मेरे या संदेह को दूरि करौ जगदीश । काढनहार संदेह यह तुम विन और न ईश ॥३८॥ श्रीभगवानुवाच । अर्जुन. दोऊ लोक में तांको होइ न नाश । भले कर्म जे करत हैं। तिनको नहिं अथवास ॥३९॥ पुण्यवन्त के लोक लहिं रहै बहुत दिन जाई । योग भ्रष्ट धनवंत अरु शुचि घर जन्मै आई ॥eok

.
षष्ठ अध्याय।
३३
बुद्धिवंत योगी कुलनि श्राइ लेइ अवतार ।
जन्म लहत ऐसे घरन दुर्लभ है निरधार ॥४॥
तिनहूँ पहली देह को -लही बुद्धि संयोग ।
यतन करत हैं सिद्धि को बहु विधि साथै योग ॥४२॥
मों तो अपने वश नहीं है पहिले अभ्यास ।
ताते उपजै योग जो ब्रह्म शब्द में वास.॥४३॥
योगी जो यतनहिं करै सब अघ डारे धोय।
बहुत यतन सिद्धै लहै ताहि परम गति होय ॥४॥
तपसीते योगी अधिक ज्ञानीहूं ते जानि ।
कर्मनिहते है अधिक अर्जुन योगनि ठानि ॥१५॥
जो योगी राखै मनहिं सो मैं निहचल भाय।
श्रन्द्रायुत मो को भजै सो सबते अधिकाय ॥४६॥
कर्मज्ञान व्रतयोग ते भक्ति सवनि शिरमौर। :
तिन अर्जुन मैं वश कियो मोविन छिन नहिं और॥४७॥
इति श्रीभगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुन-
संवादे श्रात्मसंयमयोगोनाम पष्ठोऽध्यायः ॥६॥

श्रीभगवद्गीता भाषा
सप्तम अध्याय।
श्रीभगवानुवाच ।
मेरोही करिः श्रासरो मोही में चित राखि ।
जानहिं निस्सन्देह यह मोहिते सब सुनिभाखि ॥१॥
ज्ञानो और विज्ञानहीं तोसों कहीं बखान ।
जाके जाने जानबो कछु न रहत है जान ॥ २ ॥
यतन करत है सिद्धि को एक हजारन माहि ।
तिनहूं में. कोऊ लखै
बहुत
लखै मुहिं नाहिं ॥३॥
भूमि नीर पावक पवन अंबर मन बुधि मान ।
अहंकार है पाठवों माया भेद न जान ॥४॥
अपरा. इनते और यह परा प्रकृति मम जान ।
जीवतत्त्व जिहि जगधरेउ यह अर्जुन मन मान।।५।।
माया, मेरी. एक. यह जिन जु गयो संसार ।
साँची मन में भानि ले जीवरूप निज धार ॥६॥
माया ते उत्पन्न है 'सबै जीव हो दाय।
हौं उपजाऊ सब जगत नाश करौं जु सुभाय ॥ ७ ॥
अर्जुन मोते जो परे और कछू जनि जान ।
ये सब मो में यों रहें ज्यों सूतहि मणि मान ॥८॥

: सप्तमःअध्यायः ३५ रस जल में शशि सूर में किरन सुमोको मानि। श्रुति में प्रणव मनुष्य में पौरुष सम धुनि जानि ॥६॥ पुनि सुगन्ध हौं भूमि में हौं पावक में तेजु । जीवन ई को जीव हूं तपसिन तप लखिलेजु ॥१०॥ सब जीवन को बीज हूं मोको जानहुँ लेहु । बुद्धिवन्त में बुद्धि हो सब तेजन को गेहु ॥११॥ बल बलवन्तन को जु हौं काम राग तिन नाहि । कामरूप ही ही जु हौं धर्म सबै मो माहि ॥१२॥ राजस तामस सत्त्व को जे. हैं सिगरे भाइ। यह सब मो में बसत हैं मोहिं न इनसों चाइ॥१३॥ तीनों गुण के भावते जिन मोह्यो संसार । मोको कोई नहिं लखत अव्यय इनते पार ॥१४॥ मेरी माया गुणमयी दुस्तर तरी न जाइ। पावै जो कोउ मो शरण सो जु तरै सुख भाइ ॥१५॥ पापी मूरख तो बड़े ते नहिं पावत मोहि ।.... ज्ञान जु.मायाते हत्यो असुरगणनि में घोहि ॥१६॥ पुण्यवन्त जे चारि विधि मोहिं भजै चित ऐन । ज्ञानी रोगी कामयुत विज्ञानी सुन बैन ॥१७॥ ज्ञानी जो भक्तिहि करै सो सबते अधिकाइ ।

३६
श्रीभगवद्गीता भाषा।
ज्ञानी को वल्लभ जु है ज्ञानी मोहिं. सौहाइ॥१८॥
"मेरे मत ये सब बड़े ज्ञानी मोको जानि..
उत्तमगति पाई जुतिन फलहिलेत नहि मानि ॥१६॥
बहु जन्मनि मो को लहै ज्ञानवन्त रे मित्त
वासुदेव सब में लखै सो दुर्लभ है नित्त ॥२०॥
नहीं ज्ञान जिनके हिये सेवत और देव ।
अपने काम स्वभाव सों बँध्यौ जुताही भेव ॥२१॥
श्रद्धायुत ते पूजहीं जा देवन चितचाइ ।
ताकी ताही मांझ ही श्रद्धा हुँ, बढ़ाइ ॥२२॥
सो वाही श्रद्धा सहित पूजत वाही देव
देत जु-हौं ही कामना वह जानत नहिं भेव ॥२३॥
फलं थोरों पावत जुवै विना ज्ञान है मूढ़ ।
देवभक्ति देवन मिलैः मेरो भो को गूढ ॥२४॥
जिनकी थोरी बुद्धि हैं जानत प्रकट न मोहि ।
अविनाशी उत्तम जु हौं संबते न्यारो जोहि ॥२५॥
ढप्यो जु माया योग हौं काहू के न प्रकास ।
मूरख मोहिं न जानहीं अजर अमर सुखवास ॥२६॥
वे जीते जानत नहीं वर्तमानहू मित्त । -
; होनहार सब को लखै मोहि लखै नहिं चित्त ॥२७॥

1
। सप्तम अध्यायः
३७
राग द्वेष अज्ञान सेः सबै जु मोहित होत ।
मन जु लेत है आप को हम हैं सुखनि उदोत ॥२८॥
पुण्य करें जे, जगत में दूरि करें निज पाप ।
तेई . छूटत मोहतें: मोको पावत आप ॥२६॥
जरा मरण की हानि को जो कोड़करत उपाय।
जानत ते अध्यातमहिं ब्रह्म कर्म के भायः ॥३०॥
अधिदैवत अधिभूत सो मो. सौ सेवत नित्त ।
अन्तः समय भूले नहीं योगी मेरो चित्तः॥३१॥
-
इति श्रीभगवद्गीतासूपनिपत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुन-
संवादे ज्ञानविज्ञानयोगोनास सप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥
m.
.
.
+
।
।
.
.
.
-
-
4.
न
अष्टम अध्याय।
{".... ::: "gi
अर्जुन उवाच।
अध्यातमातो ब्रह्म को कर्म कहा जगदीश
अधिदैवत अधिभूतः तुम जानत,बिस्वेबीसः॥ १ ॥
अधियज्ञहिकासों कहत या देही में कौनः।
कैसे तुम को जानहीं प्राण करत जब गौन ॥२॥

३८ . - श्रीभगवद्गीता भाषा। श्रीमगवानुवाच । " अक्षर सों ब्रह्महि कहत अध्यातम जु सुभाइ । जे उपजावत जगत को सोई कर्म सुदाइ ॥३॥ देह जु है अधिभूत यह अधिदैवत है जीव । सब देहन की देह में हौं अधियज्ञ सपीव ॥४॥ अंतसमय मोहिं शुद्ध करि तन त्यागै जो कोय । सोवत ही मोको मिलै तहां न संशय होय ॥५॥ प्राण तबै देहैं तजै सुमिरै जो जो काज। , पारथ शोचत भाव जे सो सो पावत साज ॥६॥ मेरो सुमिरन नित्य कर युद्ध करै किन मित्त । अपैं मो में बुद्धि मन हौं आऊं तब चित्त ॥७॥ योग और अभ्यास में जा को चित थिर होय । मो चिन्ता राई सदा पुरुष पावै सोय ॥८॥ सब करता सूक्षमजु अति कविसु पुरातन मान । रवि समान सबतों परै सुमिरन ताको ज्ञान ॥ ६ ॥ मरण समय मन थिर करै भक्तियोग बल पाय। भृकुटि मध्य प्राणैः धरै परम: पुरुष में जाय ॥१०॥ अक्षर जासों कहत हैं वीतराग.जहँ जात । ब्रह्मचर्य कौने करै ता पद की: यह बात ॥१२॥ :

३३ अष्टम अध्याय। सब द्वारन को वश करै मन रोकै हियमाहि । प्राणहि राखै शीश में रहै. धारणा गाहि ॥१२॥ प्रणवाक्षर को जप करै सुमिरै मो को नित्ता.. यहि विधि जो देहै तजै लहै परम गति मित्त ॥१३॥ स्थिर चित हु मोको भजै सदा निरंतर होइ । ता योगी को सुलभ है और लहै नहिं कोइ ॥१४॥ महापुरुष सिद्धिहि लहै मो को पाय प्रवीन । दुखको घर जो जन्म है ता में होत न दीन ॥१५॥ ब्रह्मलोकलों लोक जे तिनते फिर न जु लोइ । अर्जुन मो को पाइ के जन्म लहै नहिं कोई ॥१६॥ सहस युगनि के अन्त में ब्रह्मा को दिन जानि । रातहु इतनी होतिहै ज्ञानी कहै बखानि ॥१७॥ ब्रह्मा के दिन होत ही प्रकटन यह संसार। निशि के श्राये जात हैं माया में तावार ॥१८॥ बार वार उपजत सबै जीवन सब रे मित्त । ब्रह्मा के दिन रैनि में बहे जात हैं नित्त ॥१६॥ ब्रह्म जु माया ते परे इन्द्रिन गहो न जात । सब.जीवन के नशतहूं सो कबहूं न नशात ॥२०॥ सोई अक्षर परम गति ताहि न देखै कोइ ।

४.
श्रीभगवद्वीता भाषां।
फिरै न ताको पाइकै परम धाम मम जोइ ॥२१॥
भक्ति किये ते पाइहैं परम पुरुष को जान ।
जामें, संगरे जीव ये जग विस्तारो आन ॥२२॥
फिर आवत जा काल में नहिं श्रावत ताकाल ।
अर्जुन तोसों कहतहाँ सुन यह सीख विशाल ॥२३॥
अग्नि ज्योति दिन शुक्लपट उतरायणं के मास ।
जात जु ज्ञानी या समय लहै ब्रह्म में वास ॥२४॥
धूम निशा दक्षिण अयन कृष्णपक्ष जो होय ।
शशिमंडल योगी लहै फिर श्रावत है सोय ॥२५॥
शुक्ल कृष्णं ये गति कही ते संसारहि होत ।
फिर आवत है एक गति एक लहत है जोत ॥२६॥
जो जानै दोऊ गतिनि योगी मोह न होय ।
योगी है अर्जुन मुहूं सब कालनि में जोय ॥२७॥
वेद यज्ञ तप दान को फल जु होत है मित्त ।
योगी ता फल को लहै सदा रहै निहचित्त ॥२८॥
सब फलको फल सारफल योगी हरिसों योग।
भक्ति कर मोको मिलै फलं त्यागै करि भोग ॥२६॥
इति श्रीभगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णा-
जनसंवादेऽक्षरब्रह्मयोगो नामाष्टमोऽध्यायः ॥८॥

४१ ' नवम अध्याय नवम अध्याय. - श्रीभगवानुवाच । अर्जुन तोसों कहत ही एक गुप्त यह बात । समुझै ज्ञान विज्ञान को लहै मुक्ति की.घात ॥१॥ उत्तम विद्याराज है अति पवित्र तू जान । फल ताको प्रत्यक्ष है। करि बोहू सुखमान ॥२॥ करिबे को या धर्म के जा के श्रद्धा नाहि । ते मोको पावत नहीं डोलत हैं भव माहि ॥३॥ विस्तास्यो जब जगत में मोहिं न देखै कोइ ।.. सवै जीव मो में वसैं मोहिं न ता में जोइ ॥ ४॥ मो में कोऊ नहिं बस यह ईश्वरता देखि । उपजावत पाई मत जु नहिं तिनमें अवरेखि ॥ ५ ॥ जैसे पवन प्रकाश में फिरत रहै सब बार। त्यों मो में यह जीव सब फिरत ज्ञान निरंधार ॥६॥ मेरी माया में हैं प्रलय भये सब जन्त । कल्प आदि सिरंज्यों तिन्हें मो में तिनको तन्त ॥७॥ अपनी माया लेहु हौं सिरजित वारंवार । मायाही के वश पस्यो रहै सदा संसार ॥८॥ अर्जुन मोको कर्म यह कबहूं बाँधत नाहिं । .

१
४२. श्रीभगवद्गीता भाषा।
सद्य उदासी रहत ही आसक्त न तिन माहि ॥ ६ ॥
हौं प्रेरत मय ही जबै उपजत सब संसार ।
पारथ याही हेत ते फिरत सु वारंवार ॥१०॥
मोको मानस जानि कै आदर करै न कोइ ।
सूरख यह जानत नहीं इहै जु ईश्वर होई ॥११॥
नरतनु आश्रित जानि मोहि करत अवज्ञा मूढ़ ।
जानें नहीं प्रभाव मम सबको ईश्वर गूढ ॥१२॥
उनकी आशा सुफल नहिं ज्ञानकर्मता धाइ।
प्रकृति प्रांसुरी राक्षसी ता में बूड़े धाइ ॥१३॥
देव प्रकृति में जो मिलें काम क्रोध को त्यांगि
ते,मो को पावत सबै रहत जु है अनुरागि ॥१४॥
मिलजुमहात्मासुरप्रकृति पार्थजानिमोहिंधन्य।
अव्ययसब भूतादिनित भजत जुमनसानन्य ॥१५॥
नित कीर्तन मेरो करै यतनन मो व्रत राखि ।
भक्ति सहित मो को नवत मेरे ही गुण भाखि ॥१६॥
ज्ञानयज्ञ कोऊ भजत मो को सेवत मीत ।
कोऊ मानत एक करि कोऊ बहुत पुनीत ॥१७॥
हौं ही कंतु अरु यज्ञ हौं स्वधा ओषधी जानि ।
हौं: पावक अरु. होम हौ मंतर मोको मानि ॥१८॥

'नवम अध्याय ४३ माता पिता जु जगत को हौं ही हौं करतार । ऋग्यजुसाम पवित्र हौं और वेद ॐकार ॥१६॥ गति निवास भर्ती शरन साक्षी प्रभु अरु बंध। उत्पति प्रलयस्थान निधि अव्यय बीज अबंध ॥२०॥ तपत गहत त्यागत जु हौं वरपत मोहीं जान । अमृत कारन करन हौं हौं ही अर्जुन मान ॥२१॥ यज्ञ करत पापन दहन चाहत स्वर्गहि वास । इन्द्रलोक लहि भोगवें दिव्य भोग सविलास ॥२२॥ फिर श्रावत भूलोक में क्षीण पुण्यं जब होय। श्रावागमन ते करत हैं कामवंत जे लोय ॥२३॥ भक्ति करै जु अनन्य है मोही में चित राखि । योगक्षय तिनको करै निज जन को अभिलाखि॥२४॥ और देव के भक्त जे सेवत श्रद्धावन्त । विधि छोड़े मोको भजत लहत न मेरो तन्त ॥२५॥ सब यज्ञन को भोगता और सबन को ईश । जे मम सत्य न जानहीं डारत तिनको धीश ॥२६॥ देवभक्ति देवन लहँ पितृपूजि पितृथान ।, भूत भजै भूतादि लह मो पूर्जे भगवान ॥२७॥ पात फूल फल नीर को जो अपैं करि प्रीति ।

१४
--
दुराचार मो को भजै
श्रीभगवद्गीता भाषा।
लेड दियो हौ भक्त को देखि प्रीति की रीति ॥२८॥.
जो कछु करत जो अशन है जो होमत जो देत।
अर्जुन-जो तू तप करै- मोहिं देइ करि हेत ॥२६॥
भले बुरे जे कर्म हैं तिनते छूटहि मित्त ।
भक्तियोग:संन्यास करि मोहिं लहो इन चित्त ॥३०॥
हौं, सब ठौर समान हौं मेरे प्रीति, न द्रोह ।
मोको सेवत भक्त जे तिनसों मो सों मोह ॥३१॥
अनन्य के भाय-1
ताको तुम साधौ गनो शुभ निश्चय के दाय ॥३२॥
वेग होइ धरमातमा शांति लहै, बहु भाइ ।
अर्जुन निश्चय जान तू नहिं मोभक्ति नशाइ ॥३३॥
अर्जुन सेवत मोहिं जे पापयोनिहूं होय ।
त्रिया शूद्र अरु वैश्य पुनि लहै परम गति सोय॥३४॥
द्विज पुनीत अरु भक्तिवर राजा रिपु वह भाय ।
सुख.अनंत या लोक.को मोहि भजै चितलाय ॥३५॥
मोको भज तू नम्र है-मोही में मन राखि । -
यहीयुक्तितूमोहिं मिल प्रेमनि-सों अभिलाखि ॥३६॥
इति श्रीभगवद्गीतासूपनिपत्सु. ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णा-
र्जुनसंवादे राज़विद्याराजगुह्ययोगोनाम नवमोऽध्यायः ॥ ६ ॥

६५ दशम अध्याय दशम अध्याय। aon । . - श्रीभगवानुवाच । दुरी बात तोलों कहत सुन अर्जुन चितलीयः। प्रसन्न तोसी कहीं तेरे हित के भाय ॥१॥ देवो ऋषि जानत नहीं मो उत्पतिहू मीत । देव ऋषिन की श्रादिहौं नितही रहत पुनीत ॥२॥ अजअनादिजगदीशंनित मोकोलखतजुकोई।" सब में ज्ञानी वह बड़ो पापनि डारत धोइ ॥३॥ बुद्धि ज्ञान शमं दम क्षमा अव्याकुलता होय । सुख भव दुःख अभाव भव और अभयहू जोय ॥४॥ तोष अहिंसा दान तप सम यश अयशो जान । :जीवन को संब भाव यह मोतें होत सु मान ॥५॥ सांतों ऋषि अरु चारि मुनि मों मनते जुउदोता. सर्व लोकनि में हौं भरे ते इन्हीं के गीत ॥६॥ मेरे योग विभूति को तत्त्व जान जो लेत। निहाल जा गहि सो लहै रहत जुयाही हेत ॥७॥ जग को कर्ता ईश ही मोहीते सब होइ। :: ज्ञानतं यह जानिकै मोहीं सेवत सोइ ।।६॥

४६
श्रीभगवद्गीता भाषा।
प्राण चिच मो में, धरै बोध परस्पर देत ।
मेरे चरितनि कहत नित मानि तोप सुख लेत ॥ ६ ॥
सेवत मो को ते सदा भक्तियोग के भाइ ।
भली बुद्धि वे लहत हैं रहत जु मो में श्राइ ॥१०॥
सो अज्ञानहि दूर करि दयावंत वे होत ।
करत जु तिनके हिये में ज्ञानदीप उद्योत ॥११॥
अर्जुन उवाच ।
परब्रह्म पवित्र तुम' परमानंद को धाम ।
अविनाशी अज पुरुष हो श्रादि देव तव नाम ॥१२॥
सब ऋषि इहिविधि कहत हैं नारद देवल जान।
व्यासस्तुति तुम हूं कहत ताते. लीने मान ॥१३॥
जो कछु तुम मोसों कहत मानत हौं सत भाइ ।
दानव देव न जानहीं तुम प्रकटन के दाइ ॥१॥
आपुन पौ:आपुन लखौ तुम पुरुषोत्तम देव ।
जीवन उपजावत हरत पालत देवनिदेव ॥१५॥
निजविभूति मोसों कहौ दिव्यजुचितको चाइ।
जो विभूति श्रीकृष्ण जूं रही जगत में छाइ ॥१६॥
ध्यान. तिहारो करत.प्रभु जाने कैसे तोहिं।
कौन पदारथ में लखौ सो समझावो मोहिं ॥१७॥

दशम अध्याय
४७
योग विभूति सो श्रापनी कहिये मोसों देव ।
मोको तृप्ति न होत है सुनत अमिय रस भेव ॥१८॥
श्रीभगवानुवाच।
अर्जुन तोसों कहत हौं निज विभूति विस्तार ।
मुख जेती तेई कहत एकै हगन निहार ॥१६॥
सब जीवन के हिये में मोहिं प्रातमा जानि ।
आदि श्रन्त अरु मध्य में मोही सब में मानि ॥२०॥
आदित्यन में विष्णु हाँ ज्योतिन में रवि देखि ।
वायुन मांझ मरीचि हाँ नक्षत्रन शशि लेखि ॥२१॥
सामवेद ही वेद में इन्द्र श्रमरगण मांह ।
सर्व जीव में चेतना मन इन्द्रिन को नाह ॥२२॥
रुद्रन में शंकर जु हौं यक्षन मांझ धनेश ।
पात्रक हौं ही सवन में शैल सुमेरु सुदेश ॥२३॥
देव पुरोहित मुख्य जो मोहिं वृहस्पति मानि ।
षटमुख सेनापतिन में सर में सागर जानि ॥२४॥
हो जु महर्पिन माहिं भृगु वाणी में कार ।
यज्ञन में जपयज्ञ हौं थावर हिम आधार ॥२५॥
वृक्षन में पीपर जु हौं ऋपिन में नारद देव ।
गंधर्वन में चित्ररथ सिद्ध कपिल मो भेव ॥२६॥

श्रीभगवद्गीता भाषा। अश्वन में उच्चैःश्रवा : ऐरावत. गंज मांह । ... पोषत सबके काम हो नर में हों. नरनाह ॥२७॥ हथियारन में वज्र कामधेनु हो गाइ। काम प्रजाकर माह हौं वासुकि सर्पन राइ ॥२८॥ । नागन मांझ अनंत हो वरुण जु हौं जलजत । पितरन में ही अर्यमा यम ही संयमवंत ॥२६॥ दैत्यन में प्रहलाद ही प्रेरनहारो काल । सिंह जु हौं सब मृगन में पक्षिन में रिपुन्याल ॥३०॥ उत्तालन में पवन ही शस्त्रधरन में राम । जलजंतुन में मगर हौं नदियन गंगा नाम ॥३१॥ अध्यातम विद्यान में वाद विवादन माह । आदि अंत में मध्य हाँ सवै सृष्टि को नाह ॥३२॥ अक्षर मांझ प्रकार हौं इन्द्व समासन जानि । हौं ही अक्षय काल हौं धाता मो को मानि ॥३३॥ हौं सब को संहरत हों और उपावन हार। श्री कीरति सरसतु क्षमा होहिं बुद्धि संभार ॥२४॥ महासाम हौं साम में गायत्री मधि छंद । मार्गशीर्ष हौं मास में ऋतु वसंत सुखकन्द ॥३५॥ जूबा हौं: सब चलन में तेजस्विन में तेजु ।

.
४४
दशम अंध्याय।
जय अरु उद्यम सच ही संत सतवतन के जु ॥३६॥
बदुकुल माही कृष्ण हाँ अर्जुन पांडव माहि ।
मुनिनमांझ हौंव्यासमुनि गनौशुक्र कविताहि॥३७॥
दंडवंत में दंड ही जीतवंत में जीत ।
ज्ञानन हूं में ज्ञान शुभ मौन दुरावन रीत ॥३६॥
औषध में यव अन्न में कश्चन धातुन माह ।
सर्व तृणन में दर्भ हौं यों समझो नरनाह ॥३६॥
सब जीवन को जीव हौं अर्जुन मो को जानि।
थिर चर या संसार में मो विन कडून मान ॥४॥
मेरी दिव्य विभूति को अंत न जानो जाय।
यह तो थो। सो को मैं विभूति को भाय ॥४१॥
जो कछु या संसार में कतई गुण अधिकाय ।
सो सब मेरो तेज है दीनों तोहिं बताय ॥४२॥
बहुत कहा तोसों कहाँ अर्जुन बात बनाय ।
सब जग अपने अंग सों मैं राख्यों ठहराय ॥४३॥
इनि श्रीभगवीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशाखे श्रीकृष्णार्जुन-
संवादे विभूतियोगोनाम दशमोऽध्यायः ॥ १० ॥

५० श्रीभगवद्गीता भाषा। एकादश अध्याय। अर्जुन उवाच। मोहीं पर कीन्हीं दया अध्यातम प्रकटाय । वचन तुम्हारो सुनतही मोह जुगयो नशाय ॥१॥ जीवन की उतपति सुनी और प्रलय की रीति । कही जु तुम विस्तार सो श्रातम की शुभ नीति ॥ २॥ यों ही है जो तुम कहत हरि जू अपनो भेव । देखो चाहत हों अवै रूप तुम्हारो देव ॥ ३ ॥ देखन योगो मोहिं जो जानत हो यदुराय । अविनाशी निज रूप तुम दीजै मोहिं दिखाय ॥ ४॥ श्रीभगवानुवाच। अर्जुन अब तू देखि ले सत सहस्र मो रूप । बहुत भांति है दिव्य जो नाना वरण अनूप ॥५॥ देखि रुद्र आदित्य वसु अश्विनिसुत मो माहिं । औरो अचरज रूप जे पहिले देखे नाहि ॥६॥ एक ठौर मो देह में थिर चर रहै समाइ । देखो कळू सोई देउँ दिखाइ ॥७॥ इन नयनन नहिं देखिहाँ देउँ दिव्य हग तोहिं । . चाहत जो एकादश अध्याय ईश्वर योग संयुक्त तू जैसे मोटि - संजय उवाच। योगेश्वर श्रीकृष्ण जू कहि वचनन बहु भाइश परम रूप ईश्वर जु हौ सो दीनों प्रकटाइ ॥६॥ बहु आनन लोचन बहुत देखे अचरज होत । शोभित नाना भूषणनि शशि अनेक उद्योत ॥१०॥ दिव्य हार दिव्य वसन दिव्य सुगंध लगाइ । आनरूप तुम होतते शोभित नाना भाइ ॥११॥ सहस किरण आकाश में पूरि रह्यो सो ज्योति । दीपनता प्रभु की लहै तऊ न समता होति ॥१२॥ भिन्न भेद है जगत में देख सब इक ठौर देव देव की देह में अर्जुन देखै और ॥१३॥ ताको तब अचरज भयो रोम हर्ष के दाइ। ता देवहि परणाम करि बोल्यो चित के चाइ ॥१॥ अर्जुन उवाच । देखत हाँ तुम देह में सब सुर थिर चर सिद्ध । कमलासन शुभ ईश पुनि सर्वनाग शुभवृद्ध ॥१५॥ बहुत बाहु उदरा बहुत देखे बहुमीश अंत श्रादि मधि यह नहीं ऐसे तुम जगदीश ॥१३ १२ श्रीभगवद्गीता भाषा: मुकुट शीश कर चक्र गद रूप राशि भगवान । गनचौधचितवनलगे हौरवि श्रनल समान ॥१७॥ अक्षर हो तुम ही परम हो सब जगत निधान । अविनाशी रक्षक सबंनि उत्तम हो. उनमान ॥१ आदितमधिरहित तुमरवि शशि, तुव नैन! तेरे मुख दीपति अगिनि सब ही को. तू ऐन ॥१६॥ गगन भूमि मधिःसर्व दिश व्यापै तुम इक है जु । अद्भुत रूपजु उग्रलखिं प्रविशतलोकसबैजु॥२०॥ पैठत तो में देव सब अस्तुति कर भय मानि । ऋषिअरु सिद्ध महातमानवत सुतोको जानि ॥२॥ रुद्ररूप रवि विश्व कहु अश्विनिसुत अरु वायु। सिद्ध यक्ष गंधर्व सुर देखत अचरज पायु ॥२२॥ रूप बड़ो बहु मुख नयन भुज पद बहु उदरौजु । देखिभयानकदाढ़ बहु बियक्त लोक रु हौंजु ॥२३॥ पाय पुहुमि श्राकाशःशिर ग सुख दीरघ वाय । ऐसे तुमको देखि कै धीरज गयो पराय ॥२४॥ काल अग्नि.सम दाढ़ तुम ता देखत भयभीत । दिश भूली सुखहूं गयो अब कीजै बहु प्रीत ॥२५॥ पूत सबैः धृतराष्ट्र के सब नृपतिन के संग।

.
. एकादश अध्याय
कर्ण द्रोण भीषम. जिते. योधा है तो अंग ॥२६॥
प्रेरे तेरे बदन में सबै परत हैं जाय।
कोऊ दादन तर दले कोउ रहै लपटाय ॥२७॥
ज्यों सरिता वरपा ऋतै परत सिंधु में जाइ।
त्यों नृप तेरे बदन में सबै परत हैं धाइ ॥२८॥
ज्यों पतंग पर दीप में लहै अपनपो. नाश ।
तैसे सब नृप रहत हैं तेरे मुख के पाश ॥२६॥
लोलत हो तिनको जु ले. रसना सो लएंटाय ।
कान्ति रावरी जगत को देत तरप बहु भाय ॥३०॥
उग्ररूप तुम कौन हो मो सों कहिये देव ।
जानो चाहत ही अब तुम बातन को भेव ॥३१॥ :
श्रीभगवानुवाच ।
कालरूप है ही बढ्यो सब को मारणहार ।
तो दिन सब योवान को भखि जै हौं निरधारं ॥३२॥
तातेउठिरण जीति अंव चल कीरति अरु राज।
मैं हनि राखे हैं नृपति ये सब तेरे काज ॥३३॥
भीषम द्रोण जयद्रथ कणे श्रादि जे और।
भय तजि अर्जुन युद्ध कर अरिन मारि या ठौर ॥३४॥

५४ श्रीभगवद्गीता भाषा। संजय उवाच वचन सुने श्रीकृष्ण के कांपी अर्जुन देह । पुनिपुंनिप्रभुपगलगिसुडरिबोलोवचनसुयेह॥३५॥ अर्जुन उवाच । सब जग को यहि जगत में तुम से है अनुराग । सिद्ध नवत तोको सदा राक्षस जात जु भाग ॥३६॥ क्यों न नवों तुम को जु हाँ ब्रह्मा के करतार । जगत ईश अक्षर अनंत सब काहू ते पार ॥३७॥ पुरुष पुरातन आदि हो तुम ही जगत निधान । तुम यह संबजग विस्तस्यो जानत तुमहींज्ञान ॥३८॥ वायु प्रजापति अग्नि यम वरुण चंद्र तव रूप। वारंवार सहस्र शत प्रणमित तुम्हें अनूप ॥३६॥ आगे ते होते नवत पाछे हूं जु अनन्त । सर्वदिशनतुमकोनवत अमितप्रबलभंगवन्त ॥४०॥ मित्र जानि तोसों कही सो क्षमिये हो देव । । जानों कहा जु बापुरो तुम महिमा को भेव ॥४१॥ भोजन समय विहार में किये अनादर भाइ। ते जु क्षमा सब कीजिये प्रभुजी के सब राइ ॥४२॥ पिता जु तुम संसार के तुमहीं गुरु हो ईश।

एकादश अध्याया
५५
तुम पटतर कोउ नाहिंने कौन करे तो रीश ॥१३॥
तुमहिं दण्डवत प्रसन है क्षमहु दोष जो मोहि ।
व्योंपितुमुतको पतिनियहि मित्र मित्र कोजोहि॥४४॥
रूप लख्यो यह राबरो मोहिं हर्ष भय होय ।
पहिलो रूप दिखाइये ही जीवत जेहि जोय ॥१५॥
मुकुट विराजत शीश पर शंख चक्र गद हाथ ।
इहि विधि मोहिं दिखाइये प्रभु होतुम जगनाथ ॥४६॥
चारि भुजा धरि प्रकटहै मो को दरशन देहु ।
तुत्र सूरति जु अनंत है मो को जासों नेहु ॥१७॥
श्रीभगवानुवाच।
तोहिं दिखायो रूप में अति प्रसन्न चित होइ ।
आदि अन्त सो तेजमय देखि सकै नहिं कोइ ॥४८॥
वेद यज्ञ अरु तप किये और कियेहू दान।
एसे मेरे रूपको तो विन लखै न पान ॥४६॥
रूप भयानक देखि कै तू जनि जियहि डराय।
अब भय को तू दूरि करि मेरे रूपहि चाय ॥५०॥
संजय उवाच।
अर्जुन सों ऐसे कही पहलों वपु प्रकटाय ।
समाधान बहुविधि कियो भयते लियो बचाय ॥५१॥

1 ५६ श्रीभगवद्गीता भाषा। अर्जुन उवाच । रूप अनूप जु तुम धस्यो ता रूपै हौं देखि । प्रकृति लही मैं आपनी भयो सचेत विशेखि ॥५२॥ श्रीभगवानुवाच । देख्यो परसन रूप यह दुर्लभ दरश सुमित्त । ता स्वरूप को देवता देख्यो. चाहत नित ॥५३॥ दान यज्ञ तप विधि किये मोहिं न देखै कोइ । बिन श्रम पारथ तू अबै मोको रह्यो जु जोइ ॥५४॥ भक्ति अनन्य जु कोउ करै सो देखै या भाइ । नोके जाने तत्त्व सोमो में रहे समाइ ॥५५॥ मो निमित्त कर्मनि कर सृजै भक्ति तजि और । वैर न कोहू सौं धरै मो में लहै सुठौर ॥५६॥ इति श्रीभगवद्गीतासूपनिपत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णा- र्जुनसंवादेविश्वरूपदर्शनयोगोनाम एकादशोऽध्यायः ११ द्वादश अध्याय अर्जुन उवाच। . जे सेवत तुम को सदा करि कर्मन के साज । - , : हादरा अध्याय अक्षर ब्रह्महि जे भजत बड़ो कौन कहि राज ॥१॥ श्रीमगवानुवाच। जो मो में मन राखि कै सेवत सेवक भाय। बहु श्रद्धा सों जो जुगत सो सबते अधिकाय ॥२॥ जो धावत है अक्षरहि जो नहिं प्रकट स्वरूप । व्यापी मायाते परे अजर अचिंत्य अनूप ॥ ३ ॥ सवइन्द्रिन कोरोकिकै लखतजोसहि समान । सब जीवन को हित करत मोहिमिलै करज्ञान॥४॥ तिन कलेश बहु होत है ब्रह्म लगायो चित्त । रूप रेख जाके न सो दुख सो लहिये मित्त ॥५॥ जे सब करमन करत हैं अति मोको जानि । ध्यावत केवल भक्ति सों बहु उपासना ठानि ॥ ६ ॥ मृत्यु सहित भवउदधि ते ताको करत उधार । मो में चित राख्यो उननि बहु भाइन निरधार ॥ ७ ॥ ताते अर्जुन बुद्धि मन मोही में तू राखि । या धागे मो देह में बसिहै तू अभिलाखि ॥ ८ ॥ जो तू मो में नहि सकै चित अपनो ठहराय । कर अभ्यास मोमिलनको मोहिं निरंतर ध्याय ॥६॥ जो अभ्यास न करि सकै कर्म समर्पहु मोहिं ।

'. : मेरे मन
न काहू
५८
श्रीभगवद्गीता भाषा।
करतहू
सिद्धि होयगीः तोहि ॥१०॥
यहौ न जो तू करि सकै मो पर नहिं अनुराग ।
सबै कर्म के फलन को 'अर्जुन कर तू त्याग ॥११॥
ज्ञान भलो अभ्यासते ताते ध्यान विशेष ।
फल त्यागो ताते. भलो ताते शांतहि लेष ॥२॥
द्वेष न सो करै मित्रभाव कर. जानु।
अहंकार ममता तजै सुख दुख क्षमा समानु ॥१३॥
सदा रहै सन्तोष सो मन राखै निज हाथ ।
प्राण बुद्धि मो में धरै वह प्यारो मो साथ ॥१४॥
वह काहू ते नहिं डरै भय औरहि नहिं दें।
हर्ष क्रोध.दोऊ तजै सो मोकों हरिं लेइ ॥१५॥
चाह न काहू की करै रहै पुनीत उदासः ।
सब प्रारम्भन को तजै रहै सु मेरे पास ॥१६॥
प्रिय पाये आनन्द नहिं अप्रिय लहै न द्वेष ।
शोच कळू नाहीं करै तज शुभ-अशुभ विशेष ॥१७॥
शत्रु मित्र को सम लखै सबै मान अपमान ।
शीत उष्ण दुख सुख तजै संग करै नहिं आन ॥१८॥
अस्तुति निन्दा एकसी गहै मौन सन्तोष
घर न करै थिर मत रहै लहै मुक्ति को ओष ॥१६॥

द्वादश अध्याय।
५६
धर्म अमृत तोसों कह्यो ताहि जुसुनु सब कोइ।
श्रद्धाजित मेरो भगत मोहिं सु प्यारो होइ ॥२०॥
योग यज्ञ व्रत तप सवै कीन्हें एक समान ।
सरस सार फल सबनि को मेरी भक्ति प्रधान ॥२१॥
इति श्रीभगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविधायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुन-
संवादे भक्तियोगोनाम द्वादशोऽध्यायः ॥ १२ ॥
त्रयोदश अध्याय।
अर्जुन उवाच।
प्रकृति कौन अरु पुरुष को को क्षेत्रज्ञ कहाजु ।
यह जानन की लालसा ज्ञान ज्ञेय पुनि काजु ॥१॥
श्रीभगवानुवाच ।
क्षेत्र कहत यह देह सों अर्जुन ज्ञानी लोइ ।
जानत जो या देह को सो क्षेत्रज्ञ सु होइ ॥२॥
सो मम रूप जु प्रातमा बसत सबन की देह
सो है. ज्ञान को जान के मेरो मत है एहं ॥३॥
क्षेत्र जहांते ही भयो जो है जैसे भोइ ।
जो विकार ये मांझ है कहो संक्षेप सुनाइ ॥४॥

६० श्रीभगवद्गीता भाषा। ऋषिन कहो बहुभांति जो, अरु छेदनहू भाखि । हेतवादिनिश्चयजु करि कयो उपनिपढ़ साखि॥ ५॥ महाभूत अहंकार बुधि अरु मायाहू जानि । एकादश इन्द्री विपे पंच अगोचर मानि ॥६॥ इच्छा सुख दुख चेतना द्वेष धीरता देह । यह जो कहो संक्षेपसों क्षेत्र जानि तू लेह ॥ ७॥ क्षमा सरलता दम्भ बिनु हिंसा मद अभिमान । गुरुसेवा संयम करन थिरता शौच प्रधान ॥८॥ विषयनसों वैराग धरि तजे रहै अहंकार । जन्म मृत्यु दुख सुख जरा व्याधि दोष निरधार ॥६॥ नेह न पुत्र कलत्र सौ ता दुख दुखी न होय ! चित में धरै समानता भले बुरे को खोय ॥१०॥ अटल भक्ति मो में धरै सब में आतम जान । रहै सदा एकांत में तंजै सभा सनमान ॥११॥ अध्यातम ज्ञानै धेरै तत्त्वज्ञान को देखि। यह सब जो कछु मैं कह्यों यहै ज्ञान अवरखि ॥१२॥ कह्यो अमृतसम जानिबो जाते मुक्ति जो होय । कारण कारजते. परे 'आदि ब्रह्म को जोय ॥१३॥ सर्वत्रहि कर चरण शिर त्योंही मुख हग कान ।

में त्रयोदश अध्याय। ६६ व्यापि रह्योसब जगत मेंमोहिंदशोदिशिजान ॥१४॥ सब विषयनते है रहित शुभतन को अभ्यास । संग विना सब को धरत गुणातीत परकास ॥१५॥ जन्तु जिते चरहू श्रचर अन्तर बाहर सोइ । सबते दुरि मु निकट है सूक्ष्म लखै नहिं कोइ ॥१६॥ तामें भेद कछू नहीं सब रहतः विभाग। उपजावत नाशत सवनि पालत कर अनुरागः ॥१७॥ ज्योतिनहूं की ज्योति है अंधकार ते पार । त्यागजानिबो जीयमें सब के है निरधार ॥१८॥ क्षेत्र ज्ञान अरु ज्ञेय मैं. तोको दियो बताइ। . को जानै जो भगति लहै सु मेरो भाइ ॥१६॥ माया पुरुष अनादि हैं अर्जुन दोऊ जानि । गुण विकार जे सब भये माया ही तेः मानि ॥२०॥ कारण, कारज करतऊ माया. इन को हेत । दुख अरु सुख के भोग को वहै पुरुष गहिलेत ॥२१॥ पुरुष प्रकृति में पैठिक करत विषय को भोग। ऊंचे नीचे जन्म को कारण, गुण संयोगः ॥२२॥ परमातस को. देह ते न्यारो जानत 'लोइ । साक्षी भी भोगता ईश्वर निर्गुण होइ ॥२३॥ इन ६२ श्रीभगवद्गीता भाषा। जो कोऊ ऐसे लखै प्रकृति पुरुष गुण भाइ । सो क्योंहूं जग में रहै बहुरि न बहुरि न उपजै श्राइ ॥२॥ देह मांझ पातम लखै कऊ किये असथान । सांख्ययोग अरु कर्म कर लखै और सज्ञान ॥२५॥ जैसे सुनहीं जानहीं ते सुन,ौरन पैजु । मम उपासना करत है भवभय मृत्यु तरैजु ॥२६॥ जिते जीव या जगत में थावर जंगम होत । क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ ते ते सब लहत उदोत ॥२७॥ परमेश्वर सब जन्तु में बैठयो एक समान । तिनहिं सत्य बिनसे नहीं जो जानै सो जान ॥२८॥ ईश्वर को सब ठौर जो जानत समता भाय । आतम ही सो होइ नहिं रहै परम गति पाय ॥२६॥ माया करत जो कर्म सब जीव अकर्ता जोइ । जानत जो था भेद को लखत पातमा सोइ ॥३०॥ एक प्रातमा में स्थित सब प्राणन को भाव । आतम ही सों त्रिस्तरै लखै सु ब्रह्मै पात्र ॥३१॥ आदि अन्त निरगुण परम अव्यय सोई होय । देह मांझ यद्यपि रहै करै सु लिप्त न होय ॥३२॥ ज्यों प्रकाश सत्र में बसै सूक्षम परसत नाहि!

त्रयोदश अध्याय।
६३
त्योंही यह परमातमा लिप्त न देहन माहिं ॥३३॥
ज्यों प्रकाश एकै करै सब जग सूरज देव ।
त्योंही सब की देह में परमातम को भेव ॥३४॥
क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ को भेद लखै जो कोइ ।
जीव प्रकृति अरु मोक्ष को जानै मुक्ति न होइ ।॥३५॥
उनि श्रीभगवहीतापनिषत्सुब्रह्मविद्यायांयोगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे
प्रकृतिपुरुपनिर्देशयोगोनाम त्रयोदशोऽध्यायः॥ १३ ॥
चतुर्दश अध्याय।
-10:-
श्रीभगवानुवाच ।
परम जो उत्तम ज्ञान सो तोकों को बताय।
जाहि जानि के मुनि सबै रहै मुक्ति को पाय ॥ १ ॥
याही ज्ञानहि सेइकै मेरो लहौ स्वरूप ।
प्रलय विथा तिनको नहीं पर न ते भवकूप ॥२॥
ब्रह्म प्रकृति में योनि है तामें गर्भहि राखि ।
उपजावत सबसृष्टिहाँ अर्जुनचितश्रभिलाखि॥३॥
जे जे मूरत होत हैं सब योनिन में प्राय ।
तिनको हौं ही वीज ही हों ही पितु अरु माय ॥४॥

६४ श्रीभगवद्गीता भाषा-1 ; सत रज तम ये गुण भये मायाहीते जानि । देह माझ या जीव को येही बाँधत प्रानि ॥५॥ :: निर्मल और प्रकाशकर सतगुण शांति सुमाइ। ज्ञानसंग सुखसंग कर वांधत जीवहिं श्राइ ॥६॥ रजगुण रागस्वरूप है तृष्णा सँग को हेत। कर्मसंग करि जीव को ऐसे बंधनः देत ॥७॥ होत जु तम अज्ञानते मोहत सब को होय । पालम निद्रा विकलता इनसों बाँधत जोय ।।८।। सत्त्वमगुण सुख में बढ़त कर्म रजोगुण होय । आलस में तमगुण बढ़े रहत ज्ञान सब खोय ॥६॥ रजगुण तमगुण पेलि के रहै सत्त्वगुण पूरि । रज सब को पेले जु तम' सतते रजतम दूरि ॥१०॥ सब हारन में देह के जबर्हि प्रकारात ज्ञान । तबहिं बढ़ोहै सत्त्वगुण अर्जुन तू यह जान ॥११॥ बढ़त रजोगुण है जबहिं नर शरीर में पाय। लोभ करम उद्यम अरु नः इन्हें देइ प्रकटाय ॥१२॥ अर्जुन तवहीं करत है तमगुण श्राइ प्रकास । अलस मोह अंज्ञानता मन में करत विलासः ॥१३॥ जो सत्तगुण की बुद्धिं में तजै जीव निज देह ।

-
चतुर्दश अध्याय।
६५०
तौ ज्ञानी के लोक में जाय करै मो गेह ॥१४॥
राजस में तजि प्राण को कर्मवन्त घर जाइ।.
तमगुण में जे मरत हैं पशुन मांझ प्रगंटाइ ॥१५॥
सुकृत कर्म जे होत हैं सात्त्विक फल अनिमक्षः।
रजगुण को फल दुःख है तम अज्ञान फलतुक्ष ॥१६॥
लोभ रजोगुण सो भयो सतगुणते है ज्ञान ।
तम गुणते है विकलता मोह और अज्ञान ॥१७॥
सात्त्विक कंचन तुल्य है राजस मध्यम लोक ।
तामस जान अधोगती पावत बहुविधि शोक ॥१८॥
गुणही को करतारकर जानै ज्ञानी कोइ ।
मोहिं लखै गुणते परे मो में लीन सु होइ ॥१६॥
देह करत जे तीन गुण तिनको देह जु त्याग।
जन्म मृत्यु दुखते छुटै रहै मुक्ति में पाग ॥२०॥
अर्जुन उवाच ।
जिन माहीं नहिं तीन गुण तिनके लक्षण कौन ।
कैसे ताको श्राचरण प्रभु सोसों सु कहाँन ॥२१॥
श्रीभगवानुवाच ।
मोह ज्ञान अस कर्म को जो जाने हिय माहिं ।
विन पाये चाहै नहीं वह दुख पावै नाहिं ॥२२॥

श्रीभगवदगीता भाषा। ६६ उदासीन बैठयो रहै दुख सुख चपल न होइ । गुण सब कारज करत है यो जानै जो लोइ ॥२३॥ दुख सुख को समकर गनै कंचन माटी भाय। प्रिय अप्रिय को तुल्य गिनस्तुतिनिंदाइकदाय ॥२४॥ तुल्य मान अपमान श्ररु शत्रु मित्र इक जानि । सब प्रारंभन को तजै गुणातीत कहि तानि ॥२५|| मोकों जो दृढ़ भक्ति सो सेवै चित के चाइ। सो तीनों गुणते परे रहै ब्रह्म को पाइ ॥२६॥ अर्जुन हो ही ब्रह्म हाँ मुक्ती मेरो रूप। हौं अविनाशी हौ धरम अानंद परम अनूप ॥२७॥ आनंद को हौं धाम हाँ घनीभूत हों तेजु । मोको सोई वश कर नित्तहि भक्ति कहे जु ॥२८॥ इति श्रीभगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णा- र्जुनसंवादे गुणत्रयविभागयोगोनाम चतुर्दशोऽध्यायः ॥ १४ ॥ पञ्चदश अध्याय। श्रीभगवानुवाच । ऊरध जर शाखा तरे अविनाशी अश्वत्थ ।

पंचदश अध्यायः।
वेद पत्र जो जानहीं सो जानै सब अर्थ ॥१॥
गुण सींचे शाखा बढ़ी विषया पल्लव भाय।
जर फैली. कर्मन बँधी मनुज लोक में प्राय ॥२॥
आदि अन्त नहिं जानिये थानरूपनहिं जाहि ।
दृढ़ प्रसंग हथियार लै दुसह मूल तरु ढाहि ॥३॥
चाह करै जा ठौर की फिर न जाको पाइ ।
सृष्टि भई जा पुरुषते ताकी शरण जु भाइ ॥४॥
धामलोक प्रभुतनद्युतिसु ब्रह्महि कहकै अय॑ ।
झापि कर्म दृढ़ सुन महा वैकुण्ठहि सामथं ॥५॥
कामसंग अरु मोह तजि अध्यातम रत होइ ।
सुख दुख तजि ताको लहै अविनाशीजो कोइ ॥६॥
पावक रवि अरु चन्द्रमा तहाँ न करै प्रकास ।
फिरै न ताको पाइकै सो है मेरो बासः ॥७॥
जीवलोक में अंश मम अविनाशी मो रूप ।
मनहिं आदि इन्द्रीन को और प्रकृति को भूप ॥८॥
जा शरीर को तजत है जुहो करत सम्बन्ध ।
इन्द्री ईश्वर सँग रहै जाइ संग ज्यों गन्ध ॥६॥
श्रवण नयनरुनासिकात्वच अरसनामानि।
इनको गहि मन संगलै लहतजीव विष पानि ॥१०॥

६८ श्रीभगवद्गीता भाषा। इन्द्रीयुत नित सँग रहत करत विषय को भोग। मूढ़ जीव कोऊ नहीं लखे सु ज्ञानी लोग ॥११॥ योगेश्वर यतननि किये देखत है हिय माहि । मूरख यतनन करतहू जीवहि देख नाहिं ॥१२॥ धारत हो सब जगत को करि पुहुमी परवेश । पोषत हौं सब औषधी द्वैरस शशि मगवेश ॥१३॥ तेज जु है श्रादित्य में भासत सब संसार । चन्द्र मांझ अरु अग्नि में सो मेरो निरधार ॥१४॥ हो ही जठराग्नि हूँ सब देहन में प्राय । प्राण अपान सहाइ सो डारत अन्न पचाय ॥१५॥ सब के हिय में हो रहीं मोते ज्ञान विचार । वेद सबै मो को कहैं मैं तिन को करतार ॥१६॥ लोक मांझदै पुरुष हैं क्षर अरु अक्षर भाइ। क्षर शरीर सों कहत हैं अक्षर जीव गनाइ ॥१७॥ उत्तम पुरुष जो और है परमातम के वेश। तीन लोक जो धरत है करि कै निज परवेश ॥१८॥ क्षर औ अक्षरते परे हाँ सबतें अधिकाउँ। याते वेदरु लोक में पुरुषोत्तम मो नाउँ ॥१६॥ जो कोड़मो को नहिं भजत ते मूरख तू मान ।

.
e
पंचदश अध्याय
अर्जुन जे मो को भजत तेई जान सुजान ॥२०॥
छिपी वात ग्रंथनि जु ही सोतोसों कहि दीन ।
पारथ जे जानत यहै तेई बुद्धि प्रवीन ॥२॥
इति श्रीभगवद्गीतामुपनिषत्सु ब्रह्मविषायां योगशाने श्रीकृष्णा-
र्जुनसंवादे पुरुषोत्तमयोगोनाम पञ्चदशोऽध्यायः ॥ १५ ॥
षोडश अध्याय।
श्रीभगवानुवाच
अभय सत्व हिय साधता ज्ञान योग थिर होइ।
ज्ञान यज्ञ तप वेदरुचि धरम सरलता जोइ ॥१॥
सदा अहिंसा सत्य में रहै क्रोध बिन मित्त ।
दान शान्ति वह विधि रचै दोष न प्रानै चित्त ॥२॥
दया करै सब जंतु पर तजि चपलाई भाय।
लाज अकर्मनते सुमृदु व्यर्थ क्रिया छुटि जाय ॥३॥
तेज क्षमा शुचि धैर्ययुत तजै द्रोह अभिमान ।
देव संपदा जिन लंही तामें गुण ये जान ॥४॥
दंभ दर्प अज्ञान रिस 'अरु अभिमान कठोर ।
तामें ये गुण जिन लही असुर संपदा घोर ॥५॥

श्रीभगवद्गीता भाषा। देवसंपदाते मुकत बंध श्रांसुरी जोहि । शोचै जनि अर्जुन भई देव संपदा तोहि ॥६॥ देव आसुरी भेदते है विधि सृष्टि है वेह । पहिले कहि विस्तार सौ अब दूजी सुनि लेह ॥७॥ अविधौरविधिजगत की त्रासुरिजानत नाह। सत्य शौच प्राचार नहिं ये गुण हैं तिन माह ॥ ८ ॥ श्रुति पुराण ईश्वरहि जे मानत नाही मूढ़ । मैथुनते संसार यह काम क्रोध हिय गूढ ॥६॥ यह मैं पायों है अबै लहौ मनोरथ और । यह धन मेरे गेह में जारों है वह ठौर ॥१०॥ 'अल्प बुद्धि हैं नष्ट जे यहै दृष्टि गहि लेत। हिंसायुत कर्मनि करै रिपु युग छय के हेत ॥११॥ करताबिनमानत जगत अथिर असतसोजानि। उपजत है तिय पुरुषते ताके हित को मानि ॥१२॥ :, गहि कै ऐसी दृष्टि को नष्टचित्त जो बुद्धि। होत उग्र कर्मानुते.जगत सहित बिन शुद्धि ॥१३॥ '. भजत अयस्वज काम को दंभ मान मद पाइ। गहत बुराई मोहते मांस और मद खाइ ॥१४॥ जाको कछु. परमान नहिं ता चिंता में लीन । 1

षोडश अध्याय।
७१
काम भोग है अति भलो निश्चय मानत हीन ॥१५॥
ते श्राशा पाशन बंधे काम क्रोध चित चाह ।
जोरत धन अन्याय करि काम भोग निर्वाह ॥१६॥
मन वांछित में यह लहौं लहै न चाहत याह ।
यह धन मेरे है जुगै रहै जु और
उनाह ॥१७॥
यह वैरी है मो इनो करो और को अंत ।
ईश्वर ही भोगी जु हौं सुधी सिद्ध भगवंत ॥१८॥
में ही धनी कुलीन हों और न मोहिं समान ।
पयोदेहमें दहि लही मोहित यो अज्ञान ॥१६॥
उन को मनति भ्रमत है मोहजाल पर नित्त।
परत घोर अति नर्क में काम भोग के हित ॥२०॥
निजवडिभाईनित कहत नवत न धन अभिमान।
नाममात्र यज्ञन भजत दंभी विना विधान ॥२१॥
अहंकार बल दर्प अरु काम क्रोध गहि लेत।
दोषी निज पर देह में मो को ते दुख देत ॥२२॥
मो द्रोही श्रर मरतते पापी अधम निहारि ।
जगत श्रासुरी योनि में तिन्हें देत हौं डारि ॥२३॥
जन्म जन्मते मूढ़ ते होत जु आसुर श्राय ।
मो को ते पावत नहीं परत अधम गति जाय।॥२४॥

७२ श्रीभगवद्गीता भाषा। नरक हार शिधे तीनि हैं देत श्राप को नास । काम क्रोध अरु लोभ पुनि इन छोड़े सुख वास ॥२५॥ तीनों द्वार जु नरक के तिनमें छुटै जु कोय । यतन करै कल्याण को तबहि परम गति होय ॥२६॥ जे शास्त्रन विधि छोड़िकै करत क्रियावश काम । सिद्धि लहैं नहिं परमगति नहिं सुख में विश्राम ॥२७॥ ताते काज काज में तोको वेद प्रमान। कर्मन करि तूजानि कै तिनको विधसु विधान ॥२८॥ वेद कहत जु परोक्ष है मोको देत वताय । मेरेई. कर्मनि करै मेरी आज्ञा पाय ॥२६॥ परंपरा है जन्म के श्रद्धा होत समान । श्रद्धा ताहि प्रमान ॥३०॥ इति श्रीभगवतीतासूपनिपत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशाने श्रीकृष्णार्जुन संबादे दैवासुरसंपविभागयोगोनाम पोडशोध्यायः ॥ १६ ॥ श्रद्धामें यह पुरुष है सप्तदश अध्याय। अर्जुन उवाच । श्रद्धायुत यज्ञहि करत जे वेदन की नीति।

। ७३ - . सप्तदश अध्याय। सत रज तम जे थित कही कहिये तिन की रीति ॥१॥ श्रीभगवानुवाच। श्रद्धा नर की तीनि विधि होत जु सहज सुभाइ। सात्त्विक राजस तामसी सुनिये तिनके दाइ ॥२॥ परंपरा ही जन्मते श्रद्धा होत समान । श्रद्धा में यह पुरुष है श्रद्धा ताहि प्रमान ॥ ३ ॥ देवन सवै सात्त्विकी राजस राक्षस यक्ष । भूत प्रेत गण जे भनें ते नर नाम सयक्ष ॥ ४ ॥ चार तपस्या जे करें जे न वेद मत होहिं । भैरै दंभ हंकार से काम राग बल गोहिं ॥५॥ पंचभूत जे देह में तिन को वे दुख देत । हिय, में मोहूको हनत ते हैं असुर अचेत ॥ ६ ॥ तीनि भांति श्राहार हिय सब को रोवत होइ । यज्ञ ज्ञान तप भेद ये मोपै सुनिये सोइ ॥ ७ ॥ सुंदर थिर अति चीकनो सात्त्विक प्रिय आहार। आयु सत्य अरु अंगवल प्रीति बढ़ावनहार ॥ ८ ॥ दाहक रूखो उष्ण कटु तीक्षण खाटे खार । शोक रोग दुख देत हैं ये राजस आहार ॥ ६ ॥ जाहि रमे पहरुक भयो बासो उठो रिसाय। ।

'७४ श्रीभगवद्गीता भाषा। जूठो और पवित्र नहिं भोजन तामस खाय ॥१०॥ विधिविधान सों कीजियेछाडि फलन की श्राश । समाधान धरि हिये में शालिक यज्ञ विलाश ॥११॥ करिकै फल की कामना और दंभ के भाय। ऐसे जो यज्ञहि करै सो राजस. भाय ॥१२॥ बिनअन्नहि बिन दक्षिणा विना मंत्र विधिहीन । बिन श्रद्धा यज्ञहि करै सो है तामस दीन ॥१३॥ ज्ञानी द्विज अरु वेद को पूजै शुचि मृदु होइ । ब्रह्मचर्य हिंसा तजै तप शरीर कर सोइ ॥१४॥ भय न करे जे प्रिय वचन हितकारी सत भाइ। कर वेद अभ्यास पुनि वाचक तप या दाइ ॥१५॥ मन प्रसादजु मुखाद, मृदु इन्द्रीनिग्रह मौन । भाव शुद्ध यों कहत है मानस तपसी तौन ॥१६॥ श्रद्धासों नर तप करत सो है तीनों भांति । फल इच्छा छांई. करै सोई सात्त्विक कांति ॥१७॥ : पूजा श्रादर मान : को और दंभ के काज । सो तप राजस करत है चंचल छनक. समाज ॥१८॥ देहै दुख दे मूढ़ है अरु हठ सों तप होय । परको कष्ट दिखावही तामस. तप. है सोय ॥१६॥ - - 'सप्तदश अध्याय। ७५ दान देइ उपकार बिनु पात्र विप्र को देखि । देश काल को जानि के सात्त्विक दान विशेखि॥२०॥ कीजै जो उपकार को फल की श्राशा मानि । दीजै सो अति कष्टसों ताको राजस जानि ॥२१॥ विना देश अंरु काल बिन दीजै नीचहि दान । बिन आदर अधिकारता तामस जाय बखान ॥२२॥ ॐतत्सत् ये ब्रह्म के नाम जो तीन प्रकार। विप्र वेद अरु यज्ञ मुनि कीने पहिली बार ॥२३॥ क्रिया यज्ञ जप दान तप करि पहिले ॐकार । वेदवंत जे कहत हैं विधि विधान विस्तार ॥२४॥ तत यह करिकै कहत हैं क्रिया यज्ञ तप दान । फल अभिलाषा छोड़ि जे चाहत मुक्ति निदान ॥२५॥ साधुभाव सतभाव को सत को करत उचार। और भले पुनि करम हैं सत को गावत सार ॥२६॥ यज्ञ ज्ञान तप की जुतिय ताहि कहत सुतनाम । जा काजै ये कर्म हैं ताको सत विश्राम ॥२७॥ अर्जुन सब यह असन है दुई लोक में साज। श्रद्धा बिन हो मत जपत देत जु सबै अकाज ॥२८॥ सत रज तम जग दान तप व्रत है मोही हेत.।

७६ श्रीभगवद्गीता भाषा। काम क्रिया कृत मन्त्र सब सिद्ध एक हरि हेत ||२६|| इति श्रीभगवद्गीतासूपनिपत्सुब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुन- संवादे गुणत्रयविभागयोगोनामसप्तदशोऽध्यायः ॥ १७ ॥ अष्टादश अध्याय। . अर्जुन उवाच । त्यागतत्त्व जान्यौ चहत कहिये श्रीभगवान । तत्त्व और संन्यास को न्यारो करो बखान ॥१॥ श्रीभगवानुवाच । काम युक्ति कर्मन तजै ताहि नाम संन्यास । कर्म फलनि को त्याग यह त्याग कहत सुखरास॥ २॥ कर्म छोड़िये दोषलौं कोउ कहत या नीत । यज्ञ दान तप कर्म जिन तजे और यह रीत ॥ ३ ॥ या ठौरहि पारथ जु तू मेरो निश्चय जान। तीनि भांति को त्याग यह अर्जुन चित में आन।॥ ४ ॥ यज्ञ दान तप कर्म यह कीजै तजिये 'नाहिं। ताते पंडितजन इन्हैं गनत पवित्रन माहि ॥ ५॥ फल छाँडै संगहि.तजै कर्म करै चित्त लाय।

७७ अष्टादश अध्याय। अर्जुन यह मेरो जु मत निश्चय उत्तम दाय ॥ ६ ॥ जो अवश्य करनो करम ताको छोड़ न दे। ते छोड़े अज्ञानते सो तामस गति लेइ ॥ ७ ॥ यह जानि कर्मन तजै मत देहो दुख होइ । यह तो राजस त्याग है या में फल नहिं कोइ ॥ ८॥ करनो कर्म अवश्य यह जानि जु कीजै कर्म । संग और फल को तजै सात्त्विक त्याग सुधर्म ॥ ६ ॥ बुरे कर्म मनसों नहीं भले रहै नहिं लाग । बुद्धिवंत संदेह बिनु यह है सात्त्विक त्याग ॥१०॥ देहवंत ये कर्म सब नाहीं चाँडै ताहि । कर्म फलन को जो तजै सोई त्यागी माहि ॥११॥ इष्ट अनिष्ट रु मिश्र फल होत कर्म के तीन । अज्ञानिन को ये मिलें ज्ञानिन के हों छीन ॥१२॥ महाबाहु मोपे सुनहु एते कारण पांच। कहे सांख्य सिद्धान्त में काम सिद्ध को सांच ॥१३॥ अधिष्ठान कर्ता जु है कारन बहुते भाइ। नानाविधि व्यौपार अरु पंचम देव गनाय ॥१॥ मन अरु वचन शरीर करि कर्म करत या साज। भलो बुरो कोऊ करै इन बिन सरै न कांज ।।१५।। ।

७८ . श्रीभगवद्गीता भाषा। जो नर आतम एक को मानत है करतार । देखतहू देखत नहीं ते नर मूढ़ गँवार ॥१६॥ जाकी बुधि नहिं लिप्त है अहंकार नहिं जाय । सो इन लोगन को हनत हनै न बंधन ताय ॥१७॥ प्रेरक तीनों कर्म के ज्ञान ज्ञेय ज्ञातार । करण कर्म की करम संग्रह तीन प्रकार ॥१८॥ त्रिविधि होत गुण भेदते ज्ञान कर्म करतार। गुणसंख्या में एक है जैसे सुन ये बार ॥१६॥ जाकर देखै जीव में अविनाशी इक भाइ। न्यारे में न्यारो नहीं सात्विक ज्ञान सुभाइ ॥२०॥ नाना भाइन में लखै न्यारो न्यारो ज्ञान। भिन्न लखै सब जीव में राजस ज्ञान सुजान ॥२१॥ पूरन जावै एक में बिन कारण के मित्त। स्वारथ बिन है अल्प अति तामस ज्ञान सुमित्त ॥२२॥ संगराम अरु द्वैष बिन तीन कर्म जो होय । तज फलइच्छा कीजिये सात्विक कर्म जु जोय ॥२३॥ जो कीजै करि कामना कैधौं करि अहंकार । जामें श्रम है अति घनो सो राजस निरधार ॥२४॥ पौरुष हिंसा शुभ-अशुभ द्रव्य खरच विधिचार । ।

,
अष्टादश अध्याय।
७६
जो कीजै अज्ञानते तामस कर्म निहार ॥२५॥
धरि धीरज उत्साह को तजै संग अहंकार ।
निर्विकार सिधि सिधिसमसात्त्विक कर्म करतारा॥२६॥
रागी चाहै कर्म फल लुब्धक हिंसक होय ।
हर्ष शोक संयुक्त है अशुचि करै ता सोय ॥२७॥
मुध विन रहै विवेक बिनशठहि बालसी नित्त ।
सब ही की निंदा करै अरु विषादयुत चित्त ॥२८]
थोरे दिन के काज को वहुत लगावै बार।
ताही को सव कहत हैं यह तामस करतार ॥२६॥
बुधि अरु धीरज तीन विधि होत युगन केभाय ।
न्यारे २ सब कहों अवहीं तुमहिं सुनाय ॥३०॥
काज श्रकारज भय अभय और प्रवृत्ति निवृत्ति ।
जानै मुक्ति न बंध सो सात्विक बुधि की वृत्ति ॥३१॥
धर्मन को लखि कार्य में करै अकारज मानि ।
तैसे हौं तैसे गर्ने बुद्धि राजसी जानि ॥३२॥
जानै पापहि पुण्य कर दंभ अज्ञानी होय ।
लग्दै अर्थ विपरीत सब बुद्धि तामसी सोय ॥३३॥
जासों इन्द्री रोकिये चित्त क्रिया अरु प्रान।
योगयुक्ति निहचल महा धीरज सात्त्विक जान ॥३४॥

श्रीभगवद्गीता भाषा। धर्म अर्थ अरु कामना जो धारत है श्राय । चाहै फलहि प्रसंगते धीरज राजस भाय ॥३५॥ जो भय शोक विषाद मद स्वप्नतान ठहरात। दुष्टबुद्धि छाडै नहीं धीरज तामस जात ॥३६॥ अब अर्जुन मोपै सुनौ सुख के तीन प्रकार । जाके अभ्यास किये दुख को होइ निवार ॥३७॥ पहिले तो विषसो लगै बहुरि अमृत सो जोय । सो सुख सात्त्विक है कह्यो बुधिप्रसादते होय ॥३८॥ इन्द्रीविषय सँयोगते पहिले अमृत समान । पाछे जो विषसो लगै सो राजस सुख ज्ञान ॥३६॥ पहिले अरु पाछे दुखत मोहित करे जु देह । आलस निद्राते उठे तामससुख है येह ॥४०॥ सो पहुँची मैं कछु. नहीं सुर में अंरु आकास । सतरज तमतीनों गुनंनि बंध्यो न माया फांस ॥४१॥ द्विज क्षत्रिय अरु वैश्य के और शूद्र के कर्म । निज सुभाव गुणसों भयो न्यारे न्यारे धर्म ॥४२॥ शमअरुंदमंतपशौचपुनि सरलताजु-अरु शांति । आस्तिक ज्ञान विज्ञान अरु ब्रह्मकर्म की भांति ॥४३॥ शूर तेज धीरज चतुरं युद्धमाहिं न पराइ। .

अष्टादश अध्याय। तेई ठकुरई सो रहै क्षत्रिय कर्म सुभाइ ॥४४॥ खेती गौरक्षा वणिज वैश्यकर्म ये मानि । सबही की सेवा करै शूद्रकर्म ये जानि ॥४५॥ अपने २ धर्मते सिद्धि लहै सब कोइ । सो विधि अब मोपै सुनो कामसिद्धि जो होइ ॥४६॥ जाते उपजत जीव सब जिन कीनो विस्तार। कर्म करै ताको मजै सिद्धि लहै नर सार ॥१७॥ नीकेहू परधर्मते निगुन भलो निज धर्म । कछु पायन पावै नहीं करता अपनो कर्म ॥४८॥ : दोष सहित निज धर्म लख रहै न क्योंहू त्याग । दोप भरै प्रारंभ सब धूम सहित ज्यों आग ॥४६॥ लगनयुद्धि कह नहिं करें जीते मन तन आस । परम धर्म निहकर्म को पावै करि संन्यास ॥५०॥ सिद्धि पाइ परब्रह्म को जैसे पावै सार । कहाँ सु हौं संक्षेपसों निष्ठा ज्ञान अपार ॥५१॥ जगत रहे विधु सिन्धुसों धीरज सो मन धारि । शब्द आदि विषया तजै राग द्वेष को मारि ॥५२॥ रहै दुस्यो एकान्त में लघु भोजन मन जीत । ध्यानयोग तत्पर सदा यह विराग की रीत ॥५३॥ - .

८२ श्रीभगवद्गीता भाषा। क्रोध परिग्रह काम बल दर्प और श्राकार । ममता तजि निर्मल रहै शांतियोग में सार ॥५४॥ ब्रह्मभयो. परसन्न मन शोचत कर न चाह । सब जीवन को सम लखै पावै भक्ति प्रवाह ॥५५॥ पराभक्ति अति ऊँच है तामें कछू न हेत । सत संगतिते पाइये बसे प्रेम के खेत ॥५६॥ मोको जानै भक्ति कर जितनो होजा भाय । मोहिं जानि के तत्त्वसों मेरी भक्ति कराय ॥५७॥ मो. कर्मनिको नित करै मेरो आश्रम पाइ । मो. प्रसादते सो रहै अक्षय पदवी पाइ ॥५॥ मनसों मोको कर्म करि मो तत्परता .लेइ। बुद्धि योग को.सेइकै मोही में चित देइ ॥५६॥ मो प्रसादते दुर्ग सब तज जै है.अनयास । अहंकार तू बिनशनै लहिहै तू जु विनास ॥६०॥ लरो नहीं तू यह कहत अहंकार को मान । यह तोको आरूढ़ है प्रकृति लरै है श्रान ॥६॥ अर्जुन अपने कर्म को तू राखै है सोइ । करो न चाहत मोहते परवश करि है,जोइ ॥६२॥ ईश्वर सब क हिये में अर्जुन रहत सुगूढ़ ।

अष्टादश अध्याय।
३
जीव भ्रमावत है सदा करि माया श्रारूढ़ ॥३॥
होहु सदा वाकी शरण अर्जुन तू सब भाइ ।
अविनाशी थिर शांति पद ताप्रसादते पाइ ॥६॥
ज्ञान कह्यो तुमसों जु मैं सो जग परगट नाहि ।
जो जानो सोई करो याहि सजो जिय माहिं ॥६५॥
जो कछु है सबते अधिक परम दुरो यह ज्ञान ।
तू दृढ़ बुद्धि जो मित्र मो तो हित कहत बख़ान ॥६६॥
मोको भजि भजि नम्र है नमि मोमें मन राखि ।
अन्त समय हो मोहि में प्यारे यह तुम साखि ॥६७॥
सब धर्मन को छांडिकै मो शरणहि तू प्राइ ।
दूर करत सब पाप हों शोक तजो या भाइ ॥६॥
जाके तप नहिं भक्ति नहिं और शुश्रूषा नाहिं ।
तासों तू यह जनि कहै मो देखो जग माहिं ॥६६॥
मो भक्तन सों जो कहै परम दुसौ यह ज्ञान ।
सो मेरी भक्तिहि लहै मों में रहै निदान ॥७०॥
मोको प्यारो बहुत यह हौं प्यारो हों जाहि ।
वह मुहि राखत हिये में हौं राखत हिय वाहि ॥७१।।
धर्मवाद जो हम कियो परै जु कोऊ जानि ।
ज्ञानयज्ञ तिनहों भजों यह मेरो मत मानि ॥७२॥

SI श्रीभगवद्गीता भाषा। "श्रद्धायुत दोषनि विना याहि सुनै जो कोय । पुण्यवन्त लोकन लहै मुक्ति जु ताकी होय ॥७३॥ चित एकाकी हो सुनो तें अर्जुन यह धर्म। मिट्यो मोह अज्ञान तव और मिट्यो चितभर्म ॥७॥ अर्जुन उवाच। मोहूयो आई शरण गयो सो श्रीभगवान। भयो दूरि संदेह अब तुम आज्ञा परंधान ||७ संजय उवाच । हरि अर्जुन की बात ये सुनी जो यह मैं भाइ। अचरज रूप अनूप अति रोम हर्ष चित चाइ ॥७६॥ परम दुरग मत यह जु हाँ सुन्यो व्यास परसाद। योगेश्वर श्रीकृष्णजू निज मुख कियो विवोद ॥७७॥ बारबार सुमिरत जुहों कृष्णार्जुन श्राख्यान । हर्ष होत मोको महा पुण्यपवित्र महान ॥७८|| अद्भुत रूप श्रीकृष्णको सुमिरिसुमिरि हो जाहि हर्ष होत मोको महा विस्मय को निर्वाहि ||७|| योगेश्वर श्रीकृष्णजू अर्जुन हैं जा ठौर । तहां विजय अरु जीत है अटल संपदा और १०॥ यह अद्भुत रतनावली निज मुख कियोबखान ।

श्रष्टादश अध्याय बारबार निरधार करि पराभक्ति को ज्ञान ॥१॥ भक्तिवश्य श्रीकृष्णजू यहै कियो निरधार । करै भक्ति इच्छा सबै यहै भक्ति को सार ॥२॥ भगवद्गीता जो कोऊ पदै सुनै मन लाइ । पावै भक्ति अखण्ड सो श्री हरि सदा सहाइ ॥३॥ गीता दिन प्रति उच्चरै सदा सुखी जग माहिं। मनसा वाचा कर्मना तिहि सम कोऊ नाहिं ॥८॥ जो कोउ चाहै भव तस्यो कृष्ण कमलग पास । और सकल श्रम छोड़ि तो करि गीता अभ्यास ॥८॥ जब लग स्मृति भानु की ताप तपत सब देश। दृष्टि पस्यो तब लग नहीं हरि गीता राकेश ॥६॥ हरिबल्लभ भाषा रच्यो गीता रुचिर बनाय। सदाचार वरणन कियो अष्टादश अध्याय ॥८॥ इति श्रीभगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविषायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे मोक्षसंन्यासयोगोनाम अष्टादशोऽध्यायः॥१८॥ इति श्रीभगवद्गीता सम्पूर्ण BORN भागवत गुटका भ्रमनाशक कैवल्यफल्पनुम 1 वेदान्त और योगसम्बन्धी पुस्तकें। थनुरागसागर भक्ताम्बुनिधि १॥ मात्मअनुभवरातक आनन्दामृतवर्पिणी ॥ jr श्रीमाधवराम सुखसागर अन्य गुरु नानक साहब ६॥ मुक्तिमार्ग १-) सजिन्द | चैतन्यचन्द्रोदय क) याज्ञवल्क्यमैत्रीसंवाद तत्त्वज्ञान दर्शवनी ॥ युगलसंवाद बोधप्रकाश दोहावली on योगवाशिष्ठ भाषा वार्तिक 5) नृत्यराघवमिलन पारसभाग ३॥ विज्ञानलहरी भाषा प्रमोदवनविहार 10 वैराग्यप्रकाश विहारवृन्दावन वैराग्यप्रदीप । वीजक कबीरदास Jin Su| विवेक प्रकाश Dramaapaataan .. 7 १॥ वैराग्यविनोद JI|| वैराग्यसंदीपिनी प्रासार भगवद्गीता भाषा भकिसागर सिद्धान्तप्रकाश U ३) सुन्दरविलास ४) भक्तमाल (भाषावार्तिक ) २0 हरिहरसगुणनिर्गुण पदावली ) भक्तमाल सटीक १) ज्ञानतरङ्ग भक्तमाल सटीक ३॥) ज्ञानप्रकाश भक्तमाल सटीक 9) ज्ञानस्वरोदय U - अष्टादश स्मृति . निर्णयसिन्धु- मूल . है ज धर्मशास्त्र सम्बन्धी ग्रन्थ। ३) मनुस्मृति उर्दू अनुवादसहित २॥ कुलोचितधर्मशिक्षा भाषाटीका मानवधर्मसार सटीक सहित -२० मानवधर्मसार का सार सटीक - २० मिताक्षरा सटीक १५) निर्णयसिन्धु सटीक आचार काण्ड ४) भगवन्तभास्कर, N) व्यवहार काण्ड ६) मनुस्मृति सटीक ६) प्रायश्चित्त काण्ड मनुस्मृति भाषानुवाद सहित २॥ याज्ञवल्क्य स्मृति 1) नीतिसम्बन्धी ग्रन्थ। 'चाणक्यनीतिदर्पण भाषाटीका | मण्डलीमंडन 0 ४) सहित D| शुक्रनीति भाषा कर्मकाण्डसम्बन्धी ग्रन्थ । कातीय पितृदर्पण 50 व्रतार्क सटीक मन्त्रार्थदीपिका सटीक सदाचारप्रकाश .. धर्मनीतिदर्पण भाषानुवाद राजनीति भाषा a . इति ॥

Shribhagvatgeeta Bhasha

Author
Harivallabha
Title
Shribhagvatgeeta Bhasha
File name
Shribhagvatgeeta Bhasha
Text
OCR done
Citation
1921
Published
2009/10
Publisher
Lakhanow, Navalkishor Press
Language
Sanskrit
Pages
89
Library
Sanmati Library, Jaipur
Classification
Vaidik granth
DLI number
345548
Barcode
99999990233884.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
Rights
Copyright permitted
VMLT id
R5t8bdEZeaQ
Download PDF

Shribhagvatgeeta Bhasha