Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
Kaaratna Tantra
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M ॥ भूमिका ॥ प्रिय पाठकगण ! आज मैं भी एक नवीन उपहार लेकर सेना में उपस्थित होता हूँ। यद्यपि आप मेरे, परिचय से अनभिज्ञ हैं तथापि आशा करता हूँ कि अब से आप महाशय गण मुझे भी अपने सेवकों में गिनेंगे । अत्यानन्द को विषय. हैं कि आजकल तन्त्र शास्त्र की चर्चा अधिकाई से होने लगी है, जिधर तिघर तन्त्र शास्त्र का प्रचार होता जाता है। वास्तव में यदि इस शास्त्र का सदुपयोग कियाजाय तो सँसार का महान् उपकार होसक्ता है । तन्त्र शास्त्र में कामरन तन्त्र भी एक प्रधान तन्त्र है, इस तन्त्र में वह लटके हैं जिससे प्र. त्येक मनुष्य का महान् उपकार होसक्ता है। अतएव इसको अत्युत्तम जानकर भापा टीका किया। फिर यह विचार किया कि उस अनुपम ग्रन्थ को किस महोपकारी सज्जन की सेवा में प्रेपित करूँ जो मुद्रित करके प्रकाशित करे । इस विचारही मैं था कि इतने में मेडिकल यन्त्र कानपुर के सत्वाधिकारी ब्रह्मकुलभूपण सत्यसिन्य के प्रकाशक फं० हरिहरमसाद जी पाठक ने अपनी इच्छा इसके मुद्रित करने को प्रगट की। मैंने . भूमिका। अहोभाग्य जानकर इस कामरनं पुस्तक को इन महाशय की मेवा में अधिकार के साथ समर्पण किया। इन महाशय को कोटि २ धन्यबाद दियाजाता है, यदि इनका अपार अनुग्रह मुझ पर न होता, तो अभी तक इस ग्रन्थ को आप लोग न देख सकते। तन्त्र शास्त्र के देखने से ज्ञात हुआ कि कामरत्न तन्त्र ना. मक दो पुस्तक हैं, एक निलनाथ विरचित और दूसरा नाग- भट्ट विरचित है। अतएव प्रस्तुत पुस्तक नागभट्ट का ही बनाया हुआ है। दूसरे तन्त्र का कहो पता नहीं लगता। 1.. :यदि आप लोगों ने उत्साह दिखाया तो,बहुत शीघ्र कोई दूसरा पुस्तक लेकर आपको सेवा में उपस्थित हूँगा। मोहल्ला गुलावनगर पण्डित बांकेलालात्मन . भवतां कृपाभिलाषी (वांस) बरेली A श्यामसुन्दर शमी . Obcdicnt scrrant , SHYAN SUNDER SHARMA Johalla Gulab Nagar, Bareilly o.R.R.
॥श्रीः॥ ॥ कामरत्न तन्त्रम् ॥ ॥ अनुक्रमणिका ॥ ॥ अथ मङ्गलाचरणम् ।। यस्येश्वरस्यविमलं चरणारविन्द, संसेव्यतेविबुधसिद्ध मधुव्रतेन । निर्माणशातकगुणाष्टकवर्गपूर्ण, तंशङ्करंसकलदुःखहरं नमामि ॥१॥ देवतागण और सिद्धगण मधुकर रूप से जिनके अमल चरण कमलों की सेवा करते रहते हैं, जो सम्पूर्ण सृष्टि के मैंहार, गुण, ध्यान, धारणादि अष्टाङ्ग योग और धम्मादि चार बर्ग में विराजित हैं। उन्हीं सम्पूर्ण दुःखनाशक शकर को नमस्कार है॥शा Par- कामरत्न तन्त्र। . अथ ग्रन्थोक्त विषय निरूपणम् ॥श्रीनागभट्ट उवाच ॥ कामतब्रमिदंचित्रं नामशुश्रावयेन्मया । वश्यादियक्षिणीमत्र साधनान्तंसमुद्धृतम् ॥२॥ महा सिद्ध योगी नागभट्ट ग्रन्थ के प्रारम्भ में मङ्गला. घरण करके ग्रन्योक्त विषय का आदि और अन्त निरूपण करते हैं-मैं विचित्र कामतन्त्र प्रकाशित करता हूँ, श्रवण करो। इसमें पहले वशीकरण तत्व और अन्त में यक्षिणी साधन तत्व पर्णित है ॥२॥ अथ षट्कर्म निरूपणम् शान्तिपश्यस्तम्भनानि देपणोच्चाटनेतथा । मारणान्तानिशंसन्ति षट्कर्माणिमनीषिणः॥३॥ शान्ति कर्म, वशीकरण, स्तम्भन; विद्वेषण, उच्चाटन, और मारण इन के प्रकार के कम्मों का नामही षट्कर्म है ।। अथ पंटकम्मीणों ऋतु निर्णयः वश्याकर्पणकाणि घसन्तेसाधयेप्रिये ।
कामरतन तन्न। ग्रीष्मेविडेवणंकुर्यात् प्रावृषिस्तम्भनंतथा शिशिरेमारणञ्चैव शान्तिकंशरदिस्मृतम् । उच्चाटनंहेमन्तेच पटकाणिविशारदः ॥५॥ पटकम विशारद पुरुष गण वसन्त काल में वशीकरण और आकर्पण, ग्रोप्म काल में विद्वेषण वर्ण काल मैं स्तम्भन शीत काल में मारण शरद काल में शान्ति कम और हेमन्त काल में उच्चाटन क्रिया को करें ॥४॥५॥ वसन्तश्चेवपूबीने ग्रीष्मोमध्याह्नउच्यते। वीज्ञेयापराइनेतु प्रदोपेशिशिरःस्मृतः ॥६॥ अर्द्धरात्रौ शरत्काल ऊपाहेमन्त उच्यते । ऋतवःकथिताह्येते शास्त्रज्ञैःपूर्वसूरिभिः ॥७॥ दिन का पूर्व भाग वसन्त, मध्याह्न ग्रीष्म, अपराह्न वर्ग, प्रदोष शिशिर, आधीरात शरत्, और ऊपा (प्रातः ) हेमन्त जानना चाहिये । नित्य इस प्रकार (६) ॐ मातु उदय होती हैं इस प्रकार दिनमें सव ऋतुओं से ज्ञात होकर जिस समय जो ऋतु उदय है।, उस समय में उसी नातु विहित कार्य का अनुष्ठान करना कर्तव्य है। शास्त्रवित् पूर्व पण्डित गण इस प्रकार कहगये है॥६॥७|| ४ कामरत्न तन्त्र। तहिहीनानसिध्यन्ति.प्रयत्नेनायिकुव॑तः । अनन्यकरणात्तेहि ध्रुवंसिध्यन्तिनान्यथा ॥८॥ दिन में किस समय कौन ऋतु उदय होती है इसको न जानकर बहुत यन से षट्कर्म करने पर भी सिद्धि लाभ होने को सम्भावना नहीं है। इसलिये जिस जिस समय जिस २ क्रिया का अनुष्ठान करना कर्तव्य है, उसो समयं उस क्रिया का अनुष्ठान करने से ही सिद्धि लाभ होती.है ॥८॥ इति षटकर्म की ऋतु निर्णय समाप्त। अथ पट्कर्माणां तिथि निर्णयः वशीकरण कीणि सप्तम्यांकारयेद्बुधः ।. तृतीयायांत्रयोदश्यां तथाकर्षणकर्मच ॥९॥ -उच्चाटनंदितीयायां पष्ठाञ्चैवप्रसाधयेत् । स्तम्भनञ्चचतुर्दश्यां चतुर्थीप्रतिपद्यपि ॥१०॥ मोहनत्तनवम्याश्च तथाष्ठम्यांप्रयोजयेत् । हादश्यांमारणंशस्त मेकादश्यांतयेवच ॥११॥ पञ्चम्यांपौर्णमास्याञ्च योजयेच्छांतिकादिकम्। सर्वविद्याप्रसिद्धार्थ तिथयःकथिताक्रमात।१२। .
कामरन तन्न। पट् कर्म के मध्य में कौन तिथि में कौन कर्म करना कर्तव्य है, वही लिखते हैं-वशीकरण सप्तमी में, आकर्पण तृतीया अथवा त्रयोदशी में, उच्चाटन द्वितीया अथवा पष्ठी में, स्तम्भन प्रतिपदा चतुर्थी अथवा चतुर्दशी में, मोहन अष्टमी अथवा नवमी में और मारण कर्म दशमी, एकादशी, पूर्णिमा अथवा पञ्चमी में करे। सम्पूर्ण विद्या सिद्ध होने के अर्थ इस प्रकार तिथि निरूपण है ॥९॥ ॥१०॥ ॥१॥॥१२॥ इति पट् कर्म की तिथि निर्णय समाप्त । अथ षटकाणां माहेन्द्रादि निर्णयः स्तम्भनंमोहनञ्चैव वशीकरणमुत्तमम् । माहेन्द्रेवारुणेचैव कर्त्तव्यमिहसिद्धिदम् ॥१३॥ विदेयोच्चाटनेवनि वायुयोगेनकारयेत् 1-.. ज्येष्ठाचैवोत्तरापाढ़ा अनुराधाचरोहिणी। माहेन्द्रमण्डलस्थाचप्रोक्तकर्मप्रसिद्धदा॥१४॥ स्यादुत्तरपदामूला ऋक्षेशतभिपातथा । पूर्वाभाद्रपरश्लेषा ज्ञेयावारुणमध्यगाः ॥१५॥ + + - ६ कामरत्र तन्ना पूर्वाषाढ़ाततःकर्म सिद्धिदाशम्भुनास्मृता। स्वातीहस्तामृगशिराआदीचोत्तरफाल्गुणी॥१६॥ पुष्यापुनर्वसुबहनि मण्डलस्थाप्रकीर्तिता। अश्विनीभरणीचित्राधनिष्ठाश्रवणामघा॥१७॥ विशाखाकृत्तिकापूर्व फाल्गुणीरेवतीतथा । वायुमण्डलमध्यस्थातत्तत्कर्मप्रसिद्धिदा।१८ माहेन्दादि योग में वशीकरणादि कर्म करना होता है स्तम्भन, मोहन और वशीकरण कर्म जलतत्व के उदय होने पर, विद्वेषण वहित तत्व के उदय होनेपर और उचाटन वायु तल के उदय होने पर करे। ज्येष्ठा, उत्तरापाद, अनुराधा, और रोहिणी इन संघ नक्षत्रों को पृथ्वी तत्व, उत्तरा भाद्र- पद, मूल, शतभिपा, पूर्वाभाद्रपद और अश्लेषा इन सर्व न- क्षेत्रों को जल सत्वे, पूचीपाद, स्वाती, मृगशिरा, आदी, उ. तरा फाल्गुणो, पुष्य और पुनर्वस इन सब नसत्रों को वनि तत्व और अम्धिनी, भरणी, चित्रा, धनिष्ठा, श्रवण, मघा, विशाखा, कृत्तिका, पूर्वा फाल्गुणी और रेवतो इन सव.न. क्षत्रों को वायु तत्व जान ॥२३॥ ॥१८॥ } इति पटकमाणां माहेन्द्रादि निर्णय समाप्त ।
कामरत्न तन्त्र 1७ अथ पटकमणि अंगुलि निर्णयः । शान्तिकेपोष्टिकेचैव आभिचारिककर्मणि । तर्जन्यादिसमारूढ़ कु-यत्नातक्रमसुधीः । तत्रांगुष्ठसमारूढा सर्वकर्मशुभेरतः ॥१९॥ ॲगुष्ट और तर्जनी अँगुलि द्वारा शान्ति कार्य, मध्यमा और अगष्ठांगली द्वारा पौष्टिक कार्य,अनामिका और अँगु- पांगलोद्वारा मारणादि सम्पूर्ण अभिचारी क्रिया करनी होती है ...इति पटकमाणि अंगुलि निर्णय समाप्त । ;" अथ मूलिका,ग्रहण विधिः- विधिमत्रसमायुक्त मौषधंसफलंभवेत् । विधिमत्रविहीनन्तु काप्टव पजभवेत् ॥२०॥ औषधि यथाविधि मस्तुत और मन्त्र समन्वित होने पर हो फलदायक होती है। किन्तु विधि मन्त्र विहीन होन, पर यह काष्ठवत् विफल होती है, जिससे किसी फल के मिलने की आशा नहीं। अर्थात् पट्कर्म साधनाथ औपधि के सम्ब- न्य मैं जो समस्त मन्त्र और जिस प्रकार नियम लिखे हैं, १० कामरन तन्त्र। मैं तुमको नमस्कार करता हूँ.(यह कहकर नमस्कार करें)॥२५॥ । ततः खननम येनत्वांखनतेनमा येनत्वाखनतेभृगुः ।। येनइन्द्रोऽथवरुणो येनत्वामुपचक्रमे ॥२६॥ तेनाहखनपिष्यामि मंत्रपूतेनपाणिना ।। मातपातेमातिपाति मातेभेजोऽन्यथाभवेत् । अत्रैवतिष्ठकल्याणि ममकार्यकरीभव ॥२७॥ -डों ह्रीं क्षों फट् स्वाहा।अनेनमूलिकांछेदयेत्। इसके उपरान्त मूल लिखित "येनसांखनतेव्रामा” इत्यादि मन्त्र पाठ करके वृक्ष मूल खनन करता हुआ जो ह्रीं क्षों फट् स्वाहा” यह मन्त्र जपकर तरु मूल,छेदन करेः॥२६॥ ॥२॥ हेत्यवंसर्वविद्यानां षटकाणांसुसिद्धये । कथितञ्चात्रयत्नेन मलिकाग्रहणंशुभं ॥२८॥ 'इस प्रकार जिस भांति से पटकम्म और अन्यान्यविद्या सापने के लिये मूलिका ग्रहण करनी होती है वह लिखागया। इति मूलिका प्रण विधि समाप्त । मनः कामरन तन्त्र। , प्रतिदिन "डावश्यमुखोराजमुखोस्वाहा” यह मन्त्र कार' पुत्र, क्या मित्र, क्या राजा, क्या बन्धु बान्धव सभी वशीभूत होते हैं यह मन्त्र सिद्धियोग कहागया है|||||४॥ रोनमाकटविकट घोररूपिणिस्वाहा । सप्ताभिमत्रितंचान्नं भुक्तेसप्तप्रासंयदि । प्रत्यहंयस्यनाम्नातु वशीभवतिसध्रुवम् ॥५॥ ...प्रतिदिन डोनमाकटविकटघोररूपिणिस्वाहा” इस मन्त्र द्वारा सप्त ग्रास अन्न अभिमन्त्रित करके जिसका नाम उजा- रण कर भक्षण किया जाय, वह व्यक्ति निस्सन्देह वशीभूत होता है । डों वश्यमुखीराजमुखी खाहा। वशीभवन्तिसर्बेतु सप्ताभिक्षालितमुखे । सर्वेषुवश्यमन्त्रेषु मंत्रराजमिदस्मृतम् ॥३॥ सातवार मुख धोने से उसके निकट सभी वशीभूत होते हैं। डोंचामुण्डेजयजयस्तम्भयस्तम्भयमोहयोग सर्वसत्वान्नमः स्वाहाः॥
कामरल तन्त्रा :: मन्त्रेणमत्रितंपुष्पं .यस्मैकस्मैप्रदीयते । राजाबाराजपुत्रोश वशीभवतिनिश्चितम् ॥७॥ "डोंचामुण्डेजयजय' इत्यादि मन्त्र द्वारा,पुष्प अभिमन्त्रित करके वह पुष्प जिसके हाथ में दिया जाय, वह व्यक्ति राजा अथवा राजपुत्र होनेपर भी वशीभूत होगा, सन्देह नहीं ।।। डॉनसाकोदण्डशरविज्ञालिनीमालिनीसवः लोकवशङ्करीस्वाहा।। अष्टोत्तरसहस्रन्तु जप्त्वामन्त्रप्रसन्नधीः । अपामार्गस्यमूलंवै गोरोचनसमन्वितम् ॥८॥ संपिष्यतिलकंधृत्वा निलोकंवशमानयेत् ॥९॥ ऊपर कहा हुवा !"उगनमाकोदण्ड अष्टोत्तर 'सदस. जप करके चिरचिटे की जड़ और गोरोचन एकत्र पीसकर उसका ललाट में तिलक लगाने से तोनोलोक वश में करसक्ता है। अष्ठम्यामसितेपक्षे निराहारोजितेन्द्रियः। चतुर्दश्यांवलिंदत्वा दण्डोत्पलंसमाहरेत् ॥१०॥ संपिप्यताम्बुलेकृत्वा यस्मैकस्मैप्रदीयते। . सहस्रमनितंमन्त्र वशीभवतिनिश्चितम् ॥११॥ .
कामरत्न तन्त्र। उक्त मत्रो। यथा-डॉनमीभगवतिमातंगेश्वरिसर्च मुखरज्जेसर्वेषांमहामायेमातंगेकुमारिके लह लहजिह्वेसर्वलोकवशङ्करी वाहा।। • कृष्णपक्ष की अष्टमी वा चतुर्दशी (चौदस) तिथि में नि- राहार और जितेन्द्रिय होकर दण्डोत्पल की जड उखाडे । फिर यह जड पीस ताम्बूल (पान) में रखकर जिसको भक्षण करने के लिये दियाजाय, वहा व्यक्ति वशीभूत होता है। पिष्ट द्रव्य उपरोक्त "ओनमः भगवति” इत्यादि मन्त्र द्वारा अभिमन्त्रित करना होता है ॥१०॥ ॥११॥ri - दण्डोत्पलमूलंनीत्वा कटौवद्धाप्रयत्नतः।।. मंत्रमुच्चार्य्यपूर्वोक्तं नारीगच्छतियोनरः ॥१२॥ सावश्यंवशगानित्यं दासीवत्नात्रसंशयः। ; दण्डोत्सल को जड़ उखाड़ यन्त्र सहित कमर सेवांधकर पूर्वीक्त मन्त्र पाठ करता हुआ जो व्यक्ति स्त्री के समीप जाय यह नारो उसके निकट दासी की समान वंशीभूत होती है, इसमें संशय नहीं है ॥१२॥ श्वेतापराजितामूलं ,ग्रहणोतुचन्द्रस्यच ।। 7
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| मैल ग्रहण पूर्वक सुपारी के सङ्ग पीसकर मिश्रित कतिस।
जिसको भक्षण करने के लिये दियाजाय, वह व्यक्ति निस
सहस्रंमत्रितंतत्तु तेनाञ्जयेन्नेत्रयुग्मकम् /
व्यक्ति सब का मिय और विभवन उसके निकट बसीर/
कामरजतन्त्र
वत् उपरोक्त मन्त्र से अभिमन्त्रित कर-भक्षणार्थ,निसको दि.
याजाय, वही व्यक्ति वशीभूत होता है ॥१६...
नासानेत्रमलंपाद मलंगुवाकमिश्रितम् ।।
'मत्रितंदीयतेयस्मै वंशीभवतिनिश्चितम्
अपनी नासिका का मैल, नेत्र का मैल, और पांच
पीछे "कोपिङ्गलायस्वाहा" इस मन्त्र से अभिमन्त्रित
'न्देह वशीभूत होगा ॥१७॥
इन्दीवरमूलंपिष्ट्वा गोरोचनसमन्वितम् ।
सर्वेषांप्रियएवासौ त्रिलोकंवशमानयेत् ।
मवस्तुपूर्ववत् ।
कमल की जड़ और गोरोचन एकंत्र पीसकर
"ऑपिकलास्वाहा इस मन्त्र से सहस्रबार अभिनित
करके उसके द्वारा दोनों नेत्रों में अञ्जन लगावे ।
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तोमा
हाता है ॥१८॥१९॥
कामरव तन्त्र रोहिण्यांवटवृन्दाकं संग्रह्मधारयेत्करे । वश्यंकरोतिसकलं विश्वामित्रेणभाषितम्॥२०॥ रोहिणी नक्षत्र में वट वृक्ष का सुन्दा (वन्दा) लेकर हाय मैं रखने से सभी उसके वंशीभूत होते हैं, विश्वामित्र इसको कहगये हैं ॥२०॥ इति सर्वजन वशीकरण समाप्त । ॥ अथ राज वशीकरणम् ।। ह्रींसःअमुकमेवशमानाय स्वाहा । पूर्वमेवसहस्रंजप्त्वाततोहनेनमन्त्रेणसप्ताभिम त्रितंकुंकुमचन्दनगोरोचनकर्पूरकृतिलककार्यम। यह मन्त्र प्रथम सहस्रवार जप करके फिर सातवार उस- को पढ़कर रोली, चन्दन, गोरोपन और कपूर यह सब द्रव्य गाय के दूध में पीसकर कपास में तिलक लगाने से उसके निकट रामा मशीभूत गाशा इति राज वशीकरण समास ।
कामरवतन्त्रत वत् उपरोक्त मन्त्र से अभिमन्त्रित कर-भक्षणार्थ जिसको दि- याजाय, वही व्यक्ति वशीभूत होता है ॥१६।। नासानेत्रमलंपाद मलंगुवाकमिश्रितम् । मनितंदीयतेयस्मै वंशीभवतिनिश्चितम् ॥१७॥ अपनी नासिका का मैल, नेत्र का मैल, और पांव का मैल ग्रहण पूर्वक सुपारी के सम पीसकर मिश्रित करें। तिस पीछे "पिङ्गलायैस्वाहा” इस मन्त्र से अभिमन्त्रित करके जिसको भक्षण करने के लिये दिया जाय, वह व्यक्ति निस्से- 'न्देह वशीभूत होगा। इन्दीवरमूलंपिष्ट्वा गोरोचनसमन्वितम् । सहस्रंमत्रितंतत्तु तेनाञ्जयेन्नेत्रयुग्मकम् ॥१८॥ सर्वेषांप्रियएवासौ त्रिलोकंवशमानयेत्। मवस्तुपूर्ववत् । कमल की जड़ और गोरोचनं एकंत्र पीसकर पूर्ववत् "कोपिङ्गलायैस्वाहा” इस मन्त्र से सहस्रवार अभिमन्त्रित करके उसके द्वारा दोनों नेत्रों में अञ्जन लगाने। तो वह व्यक्ति सब का प्रिय और त्रिभुवन उसके निकट बशीभूत होता है ||१८|||९|| कामरत्न तन्त्र। १७ -- रोहिण्यांवटवृन्दाकं संग्रह्यधारयेत्करे । वश्यंकरोतिसकलं विश्वामित्रेणभाषितम्॥२०॥ रोहिणी नक्षत्र में वट वृक्ष का सुन्दा (वन्दा) लेकर हाय मैं रखने से सभी उसके वशीभूत होते हैं, विश्वामित्र इसको कहगये है ॥२०॥ इति सर्वजन वशीकरण समाप्त । , । - " - ॥ अथ राज वशीकरणम् ॥ जोह्रींसःअमुकमेवशमानाय स्वाहा । पूर्वमेवसहस्रंजप्त्वाततोहनेनमन्त्रेणसप्ताभिम नितंकुंकुमचन्दनगोरोचनकर्पूरकृततिलककार्यम्।। यह मात्र प्रथम सहस्रबार जप करके फिर सातवार उस- को पदका रोली, चन्दन, गोरोपन और कपूर यह सब द्रव्य गाय के दूध में पीसकर कपास में तिलक लगाने से उसके निकट राभा वशीभूत गाता इति राज वशीकरण समाप्त। 7 कामाल तन्त्रा -.. १८ ।। अथ दुष्टा स्त्री वशीकरणम् ।। काफजधावचाकुष्ठं शुक्रश्रोणितमिश्रितम् । तद्धस्तेभोजनेवाला श्मशानेरोदतिसदा ॥२॥ जॉनमोभंगवतेरुद्राय चामुण्डेअमुकी मेवश. मामय स्वाहाः। भायी दुष्ट होनेपर स्वामी यह मन्त्र पाठ पूर्वक वच व कूट ** और रुधिर में मिलाय कर दुष्टां स्त्री के हाथ में देने से वह नारी जीवन पर्यन्त पति के इस प्रकार वश में होगी कि स्वामी के मरजाने पर भी वह मशान में उसके लिये निरन्तर रुदन करतो फिरैगी। उक्त द्रव्य अर्पण करने के समय : जोनमः" इत्यादि मन्त्र पाठ करदेना चाहिये ता. कृष्णधुस्तूरजपुष्पं . पुण्यसंग्रह्ययमतः । भरण्यांफलमानीय विशाखायांशाखान्तथा ॥३॥ हस्तायांपनमाग्रह्य मुलायामलमेव । समंगोरोचनंदवा. समंकपूरकुंकुमो in तिलकंतेलकत्वातु. कुलटांवशमानयेत् ॥५॥ .
कामरन तन्त्रा + पुष्य नक्षत्र में काले धतूरे के पुष्प, भरणी नक्षत्र में फल विशाखा नक्षत्र में शाखा, दस्त नक्षत्र में पत्ते और मूल नक्षत्र मैं जड़ लाय सम परिमाण कपूर, रोलों और गोरोचन स- हिन यह सब द्रव्य एकत्र मर्दन करके यदि ललाट में तिल लगाया जाय, तो उसको सो कुलटा हानेपर भी अवश्य व- शीभूत होती है || || ili प्रातर्मुखन्तुप्रक्षाल्य सप्तवाराभिमंत्रितम् । यस्यनाम्नापिवेत्तोयं सास्त्रीश्यामवेदध्रुवम् ।।६।। ओनमःक्षिप्रकर्मणि अमुकीमेवशमानय स्वाहा। मातःकाल उठकर मुख धोने के उपरान्त जो स्वामी,अप- नी कुलटा भार्या का नाम उचारण कर उक्त मन्त्र से साठ Jट जल मन्त्रित कर पान करे, वह अपनी पत्नी को वशीभूत कर सकता है । कृष्णापराजितामूलं ताम्बूलेनसमायुतम् । अवश्यायस्त्रियदद्यात वश्याभवतिनान्यथा ॥७॥ अंडे खाहा। काली विष्णुकान्सा की जड़ ताम्बल के सत मिलाकर b. -- कामरत तन्त्र। . "मैं हुँ स्वाहा इस मन्त्र मे मन्त्रित करके दुष्टा सो को भक्षण करादेने से वह निस्सन्दो पति के वश में होगी। खनाम्नासहितंपनी नामउच्चार्ययातः । सप्ताभिमत्रितंपुष्पं भा-यप्रददेयदि ॥८॥ वशीभवतिसाभार्या नात्रका विचारणा ॥९॥ ों हू वाहा। अपने नाम सहित पत्रो को नाम उच्चारण करके एक पुष्प “ओं ईस्वाहा” इस मन्त्र से सातवार मन्त्रित करके अपनी उस भार्या के हाथ में देने से वह निश्रय वशीभूत हेरमी । पानीयस्याञ्जलीनसप्त दत्वाविद्यामिमांजपेत्। :सालकारानरकन्यां लभतेनात्रसंशयः ॥१०॥ विश्वावसुमगन्धर्वकन्यानामधिपतिःसु. रूपांसालङ्कारांदेहिमेनमस्तस्मै विश्ववसवेखाहा गोंविधावसुनीम इत्यादि मन्त्र जप करके सात अंजुलि जल प्रदान करने से पुरुष विभूषिता कन्या लाभे करता है, इसमें संशय नहीं ॥१०॥ गोरोचन कुंकुमाभ्यां भूर्जेयस्यानामाभिलिख्य कामरत्नःतन्त्र का लिङ्ग-स्पर्श करती है, वह अपने पति को दास की समान वशीभूत करने में समर्थ होती है ॥४॥ इति पति वशीकरण समाप्त । Hary ॥ अथ आकर्षण प्रकरणम्॥ 'चतुर्थवर्णमाकृष्टा द्वितीयवर्गसंस्थितम् । कृत्वात्रिंविधहाहान्तं तदन्तेहेद्वितीयकम् ॥१॥ अङ्कारंशिरसंकृत्वा प्रत्यक्षरपंजापनम् । सहस्रार्द्धस्यजापेन फलंभवतिशाश्वतम् ॥२॥ मनः । झां झां झां हां हां हां हे हैं, मानुषासुरदेवाश्च सयक्षोरगराक्षसाः ।:- स्थावराजङ्गमाश्चैव आकृष्टास्तेवराङ्गेने ॥३॥ "झा झां झां हां हां हां है है" इत्यादि का नामही आक- पण मन्त्र है। मनुष्य, असुर, देवता, यक्ष, नाग, राक्षस, और स्थावर, जगम सभी इस मन्त्र से आकर्षित होते हैं। च सत (५००) वार जप करने से सिद्ध होती है।शारास कामरव तन्त्र। "* हुँ.स्वाहा इस मन्त्र मे मन्त्रित करके दुष्टा त्रो को भक्षण करावने से वह निस्सन्दो पति के वश में होगी ॥७॥ स्वनाम्नासहितंपली नामउच्चाय॑यत्नतः । सप्ताभिमश्रितंपुष्पं भा-यप्रददेदयदि ॥८॥ वशीभवतिसाभा-नानकाऱ्यांविचारणा ॥९॥ ऊों हूंखाहा। अपने नाम सहित पत्नी का नाम उच्चारण करके एक पुष्प ओं स्वाहा इस मन्त्र से सातवार मन्त्रित करके अपनी उस भार्या के हाथ में देने से वह निश्चय वशीभून डामो। पानीयस्यांजलीनसप्त दत्वाविद्यामिमांजपेत्। सालङ्कारानरकन्यां लभतेनात्रसंशयः ॥१०॥ विश्वावसुणीमगन्धर्वःकन्यानामधिपतिःसु. रूपांसालङ्कारांदेहिमेनमस्तस्मै विश्ववसवेखाहा। विश्वावमुनीम इत्यादि मन्त्र जप करके सात अलि जलं प्रदान करने से पुरुष विभूषिता कन्या लाभे करता है, इसमें संशयं नहीं ॥१०॥ गोरोचन कुंकुमाभ्यां भूजेयस्यानामाभिलिख्य .
. कामरत्न तन्त्र का लिङ्ग स्पर्श करती है, वह अपने पति को दास की समान वशीभूत करने में समर्थ होती है ॥४॥ इति पति वशीकरण समाप्त। . 4 - 5 ॥अथ आकर्षण प्रकरणम् ॥ 'चतुर्थवर्णमाकृष्टा द्वितीयवर्गसंस्थितम् । कृत्वात्रिविधहाहान्तं तदन्तहेद्वितीयकम्॥१॥ अनारंशिरसंकृत्वा प्रत्यक्षरप्रजापनम् । सहस्त्रार्द्धस्यजापेन फलं भवतिशाश्वतम् ॥२॥ मनः। झां झां झां हां हां हां हैं हैं। मानुषासुरदेवाश्च सयक्षोरगराक्षसाः । - स्थावराजनमाश्चैव आकृष्टास्तेवराड्ने ॥३॥ "झा झां झां हां हां हां है है" इत्यादि का नामही आक- पण मन्त्र है। मनुष्य, असुर, देवता, यक्ष, नाग, राक्षस, और स्थावर, जङ्गम सभी इस मन्त्र से आकर्षित होते हैं। पांच सत (५००) वार जप करने से सिद्ध होती है।
कामरवातन्त्र दाहिम की जड़ छाला पत्ता कह फलालेकरासफेद सरसों में सङ्ग सईन: पर्वकोकाममालिनी" इत्यादि मन्त्र से सातबार अभिमन्त्रितःकर स्त्री योनि में लेपन, करने से पति को दास को समान वशीभूत करने में समर्थ होती है। 'गोरोंनतानलंद कुंकुंमभावितायाः। तस्यासदेवकुरुते तिलकवशित्वम् ।।२।। वात्स्यायनेनवहुधा प्रमदाजनाना। सौभाग्यकृत्यसमय प्रकटीकृतोऽसौ ॥३॥ वात्स्यायन नामक ऋपि ने कहा है कि गोरोनन, खस की जड़ और रोलो यह सई वस्तु एकत्र मईन करके उसका तिलक लगाने से पति दासं की समान वशीभूत होता है । सम्भोगशेषसमये। निजकान्तमेद्र । याकामिनीस्पृशर्तियाम, पदाम्बुजेनं ॥2॥ तस्यापतिःसपदि विन्दतिदासंभावं. गोणीसुतेनकथितः किलयोगराजः ॥५॥ जो नारी सम्योग होने के समय गाय चरण से प्रति कामरत्नःतन्त्र। का लिङ्ग स्पर्श करती है, वह अपने पति को दास की समान वशीभूत करने में समर्थ होती है ॥४॥ इति पति वशीकरण समाप्त । . -- ॥अथ आकर्षण प्रकरणम्॥ चतुर्थवर्णमाकृष्टा द्वितीयवर्गसंस्थितम् ।। कृत्वात्रिंविधहाहान्तं तदन्तहेद्वितीयकम् ॥१॥ अङ्गारंशिरसंकृत्वा प्रत्यक्षरप्रजापनम् । सहस्रार्द्धस्यजापेन फलं भवतिशाश्वतम् ॥२॥ मनः । झां झां झां हांहां हां हैं हैं। मानुषासुरदेवाश्च सयक्षोरगराक्षसाः ।। स्थावरजङ्गमाश्चैव आकृष्टास्तेवराङ्गने ॥३॥ "झा झा झां हां हां हां है है" इत्यादि का नामही आक- पण मन्त्र है। मनुष्य, असुर, देवता, यक्ष, नाग, राक्षस, और स्थावर, जङ्गम सभी इस मन्त्र से ऑकर्षित होते हैं। पांच सत (५००) वार जप करने से सिद्ध होती है ।।२।।
२४ कामरजातन्त्रा "गृहीत्वार्जुनबन्दाकम श्लेषायांप्रयत्नतः। 'अजामूत्रेणसम्पिष्टा निक्षिपेत्यस्यमस्तके ॥४॥ नारीवापुरुषोवापि सुतोवापशुरेवच । आकृष्टःस्वयमायाति,सत्यं सत्यंवदाम्यह॥५॥ अश्लेषा नक्षत्र में अर्जुन वृक्ष की जड़ लाकर बकरी के मूत्र में मर्दन करे। अनन्तर यह द्रव्य निस नारी या पुरुष अथवा जिस किसी पशु के मस्तक पर निक्षेप कियाजाय वह निस्सन्देहं आकर्षित होगा ||४iiiiil सू-वर्तस्यमूलन्तु पञ्चम्यांग्राहयेद्बुधः । ताम्बूलेनसमंदद्यात् स्वयमायातिभक्षणात् ॥६॥ हुडहुडिया की जड़ पञ्चमी तिथि में ग्रहण कर पान के सबै जिस नारी को भक्षण करा दोजाय, वह स्वयं आकर्पित होकर आगमन करेगी। इसमें सन्देह नहीं ॥६॥ इति आकर्षण प्रकरण समाप्त। ॥ अथ सौभाग्य विधानम्॥ पुप्योतसितार्कस्य मूलंबामेतरेभुजे। + कामरन.सन्त्रा लोष, नीम के पते और हरीतकी (ई) यह सब द्रव्य पीसकर गात्र में लेप करने से शीघ्र दुर्गन्ध का नाश होता है। इति देव रञ्जन-विधानम् । --- अथ मुख रंजन-विधानम् । पिप्पलीचूर्णमादाय घृतमधुसमन्वितम् । प्रभातेमक्षणाचैव सुगन्धोजायतेमुखे ॥१२॥ पीपल का चूरा, यो और शहत एकत्र मिश्रित कर पति- दिन माताकाल भक्षण करने में मुख में सुगन्ध उत्पन होती है। मामांसीवचाकुष्ठ नागकेशरमेव ।। संभूर्य रमणीयाचं प्रातेवासन्ध्ययामपि।१३। लिलात्तस्यामुवंशीघ्र भवेत्कर्पूरवासितम् । वष, कट और नागोचर यह सर द्रव्य एकत्र चूर्ण क- रफेना द्रव्य जो नारी भनिदिन मातःकाल और सन्ध्या स. मय में चाटे, उसके मुख में कपूर को समान मेंगन्य उत्पम होती है ॥१॥ आमास्थिपनामूलब पिष्वामधुसमन्वितम् ।
कामरत्न तन्त्र
| लोध, नीम के पत्ते और हरीतकी (ह) यह सब द्रव्य
पीसकर गात्र में लेप करने से शीघ्र दुर्गन्ध का नाश होता है।
इति देहरञ्जन विधानम् ।
+-
अथ मुख रंजन विधानम् :
पिप्पलीचूर्णमावाय धृतमधुसमन्वितम् ।
प्रभातेमक्षणाञ्चैव सुगन्धोजायतेमुखे ।।१२।।
पीपल का चूरा, पी और शहत एकत्र मिश्रित कर मति
दिन प्रातःकाल भक्षण करने से मुख में सुगन्ध उत्पम होती है।
मुवामांसीवचाकुष्ठं नागकेशरमेवच ।
संपूर्ण्यरमणीयाच प्रातेवासन्ध्ययामपि।१३॥
लिलात्तस्यामुर्खशीघ्रं भवेत्कर्पूरवासितम्।
: वर, कट और नागकेशर यह सब द्रव्य एकत्र चूर्ण क
रफेना द्रव्य जो नारी प्रतिदिन मातःकाल और सन्या स
मय में घाटे, उसके मुल में कपूर की समान मुंगन्य उपन
होती है ।शा
भाम्रास्थिपन्नमूलब पिष्ट्वामधुसमन्वितम् ।
-
.
।
कामरवातन्त्र। लोध, नीम के पते और हरीतकी (हर्र) यह सब द्रव्य पीसकर- गात्र में लेप करने से शीघ्र दुर्गन्ध का नाश होता है । इति देह-रञ्जन-विधानम् । -. अथ मुख रंजन विधानम् : पिप्पलीचूर्णमादाय घृतमधुसमन्वितम् । प्रभातेमक्षणाचैव सुगन्धोंजायतेमुखे ॥१२॥ पीपल का भूरा, यों और शहत एकत्र मिश्रित कर पति- दिन मातःकाल भक्षण करने मे मुख में सुगन्ध उत्पम होती है। मुवामांसीवचाकुष्ठ नागकेशरमेवच । .. संमूर्यरमणीयाचं प्रातेंवासन्ध्ययामपि ।।३। लिलात्तस्यामुवंशीघ्रं भवेत्कर्पूरवासितम्। वप, कट और नागकेशर यह सब द्रव्य एकत्र चूर्ण फ- रफेना द्रव्य जो नारी प्रनिदिन प्रातःकाल और सन्ध्या स. मय में घाटे, उसके मुख में कपूर को समान मुंगन्य अपन होती है ॥२॥ 'मानास्थिपन्नमूलच पिष्ट्वामधुसमन्वितम् ।
कामरवतन्त्र । - अथ केश-कृष्णी.करण विधानम् संग्गन्धथुपान्वर भषणानार 'नशोभतेशुक्ल शिरोरुहाणाम्। यस्मादतोमूर्द्धज, रागसेवां कुर्याद्यथैवाचन भूषणानाम् ॥१७॥ जिन स. मनुष्यों को मस्तक के बाल सफेद होगये हैं। उनको केश रजन करना कर्तव्य है, नहीं तो भूषण अञ्जनादि अङ्गराग की कुछ भी शोभा नहीं होती है ॥१७॥ त्रिफलाोहचूर्णञ्च इक्षुभृङ्गरसस्तथा । कृष्णमूर्तिकयांसाई भाण्डेमासंनिरोधयेत् १८ तल्लेपाजतेकेशान् चतुर्मासंस्थिरोभवेत् । त्रिफला, लोहचूर, ईख का रस, शृङ्गराज का रस, सब सम भाग (बराबर) और सब द्रव्यों से आधी कालोमट्टी एकत्र कर एक पात्र में एक महीने तक स्थापन करे। अनन्तर उसका केशों में लेप करने से चार महीने तक बाल काले रहते हैं। लोहकिटंजवापुष्पं पिट्वाधात्रीफलंसमम्। यह कामरत्न तन्त्र। . भर अथ केश-कृष्णी करणं विधानम् संग्गन्यपान्वर भूषणानों का नंशोभतेशुक्ल शिरोरुहाणाम। यस्मादतोमूर्द्धज. रागसेवां कुर्यायथैवाचन भूषणानाम् ॥१७॥ जिन सब मनुष्यों के मस्तक के बाल सफेद होगये हैं, उनको केश रञ्जन करना कर्तव्य है, नहीं तो भूषण अञ्जनादि अङ्गराग की कुछ भी शोभा नहीं होती है ॥२७॥ त्रिफलालोहचूर्णञ्च इक्षुभृङ्गरसंस्तथा । -कृष्णमूत्तिकयासाद्धं भाण्डेमासंनिरोधयेत् १८ तल्लेपाद्रञ्जतेकेशान् चतुमासंस्थिरोभवेत् । त्रिफला, लोहचूर, ईख का रस, भृङ्गाराज का रस, यह सर्व सम भांग (बराबर) और सब द्रव्यों से आपो कालोमट्टी एकत्र कर एक पात्र में एक महीने तक स्थापन करे। अंन्तर उसका केशों में लेप करने से चार महीने तक वॉल कालें रहते है। लौहकिटंजवापुष्पं पिष्ट्वाधात्रीफलंसमम् । 1 २ कामरन तन्त्र त्रिदिनंलेपयेत्शीर्ष त्रिमासंकेशरलनम् ॥१९॥ लोह किट, जवा फुसुम, आंवला यह कई द्रव्य बराबर लेकर मर्दन पूर्वक तीन दिन केशों मैं, लेप करने से तीन मही. ने तक केश काले रहते हैं, इसमें, सन्देह नहीं है ॥२९॥ “इति फेश-रञ्जन विधानम् । अथ यूक लिख्यादि विनाश विधानम् विड़नगन्धोपल कल्कयोगात् गोमूत्रसिद्धं कटुतैलमेतत् । अभ्यङ्गयोगेन शिरोरुहाणां यूकादिलिख्यंप्रचयंनिहन्ति ॥२०॥ वायविडन, गन्धक, गौमूत्र यह कई घंस्तु कड़वे तेल में पाक करके यदि उसको केशो में मला जाय, तो न लिख्यादि 4 (लोखे) निस्सन्देह नाश को माप्त होती हैं ।।२०॥ इति यूक लिख्यादि विनाश विधानम् । ... अथ इन्द्रं लुप्त-निवारण विधिः जापुष्पंसमानीय कृष्णगोमूत्रसंयुतम। .
कामरन तन्त्र Arr. .. दृढ़ाभवन्तिकेशाश्च तल्लेपानात्रसंशयः ॥२१॥ इन्द्रलुप्त अर्थत् उन्दरी रोग होने पर मस्तक को कुछभी शोभा नहीं रहती। इसलिये केश जिसमे सुदृड हैं, वह क. रना सब प्रकार से करव्य है। जवा कुमुम और काली गाय का मूत्र एकत्र मिलाय मईन करके उसका मस्तक में लेप करने से केश दृढ़ होते हैं. इसमें संशय नहीं है.॥२|| कुंकुममरिचञ्चैव गृहीत्वातुसमंसमम् । कटुतैलेनपक्कन्तु विम्वपुष्परसान्वितम् ॥२२॥ तल्लेपादचिरेणेव इन्द्रलुप्तविनाशनम् ॥२३॥ रोलो और मिर्च वरांवर लेकर कहवे तेल में पाक करे, फिर उसमें कन्दरी.के फल का रस मिलाकर मस्तक में लेप करे.तो इन्द्रलुप्त रोग विनाश को प्राप्त होता है ॥२२॥२३॥ गुलाफलन्तुसम्पिय कृत्वामधुसमन्वितम् । तल्लेपादचिरेणैव इन्द्रलुप्तविनश्यति ॥२४॥ गटली और शव एका मईन कर मस्तक पर लेप करने से इन्द्रस का नाश होता है २४||' जातोपुष्पंतथामूलं पिप्पलीद्विगुणातथा ।
कामरन वन्न। पिष्वाकृष्णगोमूत्रेण दीयतेप्रलेपोयदि ॥२५॥ पक्षाहासप्ताहाहापि इन्द्रलुतविनश्यति॥२६॥ : चैवेली के फूल और चैबेलो को जड सम भाग और इन दोनों द्रव्यों से द्विगुण (हनी) पोपल, यह सय द्रव्य एकत्रकर काली गाय के वध मैं मर्दन पूर्वक यदि उसका सप्ताह वा एक पक्ष मस्तक पर लेप कियाजाय तो इन्द्रलुप्त का नाश होता है।' . :: इति इन्द्रलुप्त निवारणं विधि: 1: प्रतिको मागमदं निरधित कामरत्न तन्त्र रुहेलखण्डान्तर्गत बरेती निवासी ब्रह्मकुलभूषण पं० बोक्रेलालास्मज श्रीयुत पं० श्यामसुन्दर द्या विरचित 'मापाटीकायां प्रथम परिच्छर समाप्तम् । :-:; --- IMPLIFinitil.. iiri कामरन तन्त्रा . htra M । द्वितीय परिच्छेद ।। irani... अर्थ स्तम्भतम् ॥...! तत्र शत्रु मुख स्तम्भनम मेघनादस्यमूलन्तु मुखस्थतारवेष्टितम् ।। परवादीभवेन्मूकोऽथवायातिदिगन्तरम् ॥१॥ :: श्वेतगुञ्जोत्थितंमूलं मुखस्थंपरतुण्डजित् । औंढारक्षचामुण्डेतुरुतुरुअमुकमेवशमानयस्वाहा। अपंचामुण्डामन्त्रः अनेकउक्तयोग-सिद्धिः॥२॥ मूल लिखित "डों हो रस इत्यादि चामुण्डा का मन्त्र प्रथम जप पूर्वक सिद्ध करके फिर ढाक को जड़ वार येष्टित क. र मुख में रखने से शत्रु का मुल स्वम्भन होता है। अथवा शत्रु यसरे स्थान में चलानाता है। सफेद गेटली को जद लाकर मुख में रखने से शत्रु का पद हेता है। यह भी चामुण्डा के मन्त्र में सिद्ध करके करे |||||||| पुष्यामधुवन्दाकं गृहीत्वाप्रक्षियेद्बुधः ।
कामरन तन्त्र। सभामध्धेचसर्वेषां मुखस्तम्भःप्रजायते ॥३॥ पुष्य नक्षन मैं मुलेठी का वन्दा यदि सभा मैं गलदिया जाय, तो सम्पूर्ण सभासदों का मुख स्तम्भन होता है ।शा 'अर्कपत्रे हरितालरसेन यस्यनामाभिलिख्य उद्यानमध्ये ईशानकोणेस्थापयेत् तस्यमुखबन्धन स्तम्भनंभवति ॥शा ' हरिताल के रस से आक के पत्ते पर जिसका नाम लिख कर किसी वाग के ईशानकोण में स्थापन किया,जाय, उसी व्यक्ति का मुख स्तम्भन होता है या - "इति मुख स्तम्भन . Pay अथ नौका स्तम्भनम - भरण्यांक्षीरीकाष्ठस्य कीलीपञ्चांगुलंक्षिपेत् । ". नौकामध्येतदानौका स्तम्भनंजायतेध्रुवम् ॥५॥ पञ्चांगुल प्रमाण शौरी कोष्ट लेकर जिस नौका में डाल दियाजाय, वह नौका निस्सन्देह,स्तम्भित होती है ।।५।। इति नौका स्तम्भन समाप्त । बट,पीपल, गूलर,पिलपन, मारसिरी इन पाच क्षाकामामक्षीरी वृक्षा है। - कामरत्र तन्त्रा अथ अग्नि स्तम्भनमः जप्वाजटीनरोदेवों तारीमहिषमर्दिनीम्। . खदिराङ्गारमध्येतु प्रविष्टोऽसौनदह्यति ॥६॥ :: मत्रो यथारों हो महिषमर्दिनीलहलहहल हल कठ कठ स्तम्भय स्तम्भय अनि स्वाहा। महिप परिनी का मन्त्र देश इजार जपकर खैर के अंगा- रों में प्रवेश करने से अधि स्वम्भिव हावो है, अर्थत् देह न. हो जलता । मन्त्र मूल मात्र लिख रहा है ॥६॥ कुमारीरसकंपिष्ट्वा लिप्तहस्तोनरोभवेत् । दीप्ताङ्गारेस्तप्ताहै मर्मवयुक्तंनदह्यति ॥७॥ पूर्वोक महिष महिनी.को मन्त्र पंदकर घोगुआर के रस का हाथ में लेप करने से जलते हुए अगलरे अथवा तपे हुए लोहे का दण्डा रखने पर भी हाय नहीं जलता ॥७॥ i. ' इति अनि स्तम्भन । Siaceadi कामरव तन्त्र। अथ शुक्र स्तम्भनम * इन्द्रवारुणिकामूलं पुष्येनग्नःसमुद्धरेत् । कुटत्रयैर्गवांक्षीरैः संपिष्टागोलकीकृतम् ॥८॥ छायाशुष्कस्थितञ्चास्ये वीर्य्यस्तम्भकरंपरम्। पुष्य नक्षत्र में इन्द्रायन की जड़ लाकर त्रिकटु अर्थात् सौंठ, मिर्च, पोपल सहित गाय के दूध में पोसकर गोलो व- नाये । यह गोलो छाया में सुखानी होती हैं । इस गोलो को मुख मैं रखने से शुक्र स्तम्भन होता है . नीलीमूलंघमशानस्थं कट्यांवद्धातुवीर्यधृक् ॥९॥ स्मशानस्थ नीली क्ष की जड़ कमर मैं बाँधने मै शुक्र स्तम्भन होता है। रक्तापामार्गमूलन्तु सोमवारेनिमत्रयेत् । भोमेप्रातःसमुधृत्य कट्यांवद्धातुवीर्यधृक् ॥१०॥ सोमवार के दिन लाल चिरचिटे की जद निमंत्रित करके * सामान्य उत्तेजना से वीर्यपात होना एक प्रकार रोग की गणना में है। इससे मनुष्य के देह की विशेष हानि होती है। इस कारण एक स्तम्भन की भीषधि लिखते है ॥
कामरत्र तन्त्र।' भोमवार के दिन प्रातःकाल. लाकर कमर में बांधने से शुक्र स्वम्मन होता है ।।१० इति शुक्र स्तम्भन समाप्त। . ॥ अथ वलाधानम् ॥ .।। तत्र श्रीमन्मदनमोदकः॥ त्रैलोक्यविजयापत्रं सबीजंघृतभर्जितम्। त्रिकटुत्रिफलाकुष्ठभृङ्गसैन्धवधान्यकम् ॥११॥ शटीतालीशपत्रञ्च कटफलंतागकेशरम् । अजमोदायमानीञ्च पष्ठीमधुकमेवच ॥१२॥ मेथीजीरकपत्रश्च गृहीत्वासमभागतः यावन्त्येतानिचूणानि तावदेवतर्दोषधम् ॥१३॥ समेशिलातलेपिष्ट्वा चूर्णयेदितिचिकणम् । 'तावदेवसितादेपा यावदायातिवन्धनम्॥१२ घृतेनमधुनामिनं मोदकंपरिकल्पयेत् । घृतभर्जितंतिलचूर्ण मोदकोपरिविन्यसेत् ।१५। त्रिसुगन्धिसमायुक्तं कर्पूरेणाधिवासितम् ।।
कामरत्न तन्त्र ३९ स्थापयेघृतभाण्डेतु श्रीमन्मदनमोदकम् १६ भक्षयेत्प्रातरुत्थाय वातश्लेष्मामयापहम् । प्रवृद्धमग्निंकुरुते मन्दमग्निश्चदीपयेत् ॥१७॥ कृशानामतिरुक्षाणां स्नेहनस्थौल्यकारणम् । काससर्वशूलनं आमवातनिवारणम् ॥१८॥ सर्वरोगहरंह्येतत् संग्रहग्रहणोहरं । एतस्यसतताभ्यासात् वृद्धोऽपितरुणायते॥१९॥ ब्रह्मणःप्रभुखात्श्रुत्वा वासुदेवोजगत्पति । एपकासस्यवृध्यर्थ नारदेनप्रकाशितः ॥२०॥ येनलक्ष्मौध्रुवंस्त्रीणां रेमेसयदुनन्दनः ॥२१॥ भङ्ग के पत्ते और भन के बीज एकत्र घी मैं भूनकर उसमें त्रिकटु (सोंठ, पीपल, मिर्च), त्रिफला, फूट, भांगरा, सैंधानमक, धनियां, कचूर, तालीशपत्र, कायफल, नागकेशर, जोरा, अजवायन, मुलेठी, मेथी, तेजपात यह सय वस्तु वरा पर मिलाकर शिल पर भलो भांति पीसकर शूक्ष्म चूर्ण करे। फिर यह सब चूर्ण जितना इकट्ठा हो, उतनाही बुरा (चीनो) मिलावे और उसमें यो व मधु (शहत) इतना डाले कि जिस । । कामरत तन्त्र। से लहू बन सके। अनन्तर इसके.आठ मासे के प्रमाण से लड्डू बनाकर इन लड्डुओं को यो में भून तिल चूर्ण मिलाय दालचीनी, छोटी इलायची, तेजपात, का चूर्ण करके कपूर से इन लड्डुओं को सुगन्धित करे । इनका ही नाम मदन्मोदक है। इनको यो के बरतन में रखदे, प्रतिदिन प्रातःकाल उठ- कर एक एक लड्डू जल के सङ्के मेवन करे। इनको गुण अ. सोम है। इससे बात, श्लेष्मा ध्वस होता है, मन्दामि नष्ट क- रके अग्नि की वृद्धि करता है, दुवले मनुष्य का अङ्ग पुष्ट होता और रुक्ष,मनुष्य का.मरोर स्निग्ध होता है। यह कास, शूल, आमवात और ग्रहणी इत्यादि रोग दूर करता है। यह महौषधि नियमानुसार सेवन करने से बृद्ध मनुष्यं भी तरुण की समान होजाता है। विश्वपति वासुदेव ने ब्रह्मा जी के मुख से यह महोपधि सुनकर देवर्षि नारद को इसके प्रचार करने की अनुमति दी, तब नारद जी ने इसका सर्वत्र प्रचार किया।१।।शामा।|१६||१४|१८||१९||गा। इति वलापान समाप्त। अथ कृष्ण केश शुक्ली करणम् वजीक्षीरेणसप्ताहं तच्छेषभावयेत्तिलम् ।
कामरन तन्त्र। तत्तैललिप्ता केशाश्च शुक्लाःस्युनीत्रसंशयः।२२५ थूहर के दूध में सात दिन भावना दे इन तिों का तेल निकालकर बालों में लेप करने से काले बाल सफेद होते हैं इसमें संशय नहीं है ॥२२॥ अजाक्षीरेणसप्ताहं भावयेद्भयाफलम् । तचूर्णसहतेलेन लेपात्शुक्लाभवन्तिहि ॥२३॥ एक सप्ताह तक हरीतकी फल को बकरी के दूध में भा: वना दे मुखाकर चूर्ण करे। वही चर्ण तेल में मिलाकर केशों में लेप करने से काले वर्ण के केश सफेद होनाते हैं। इसमें सन्देह नहीं है ।।२।। कुष्ठामलकचूर्णन्तु वजीक्षीरेणसप्तधा । भावयेत्तस्यलेपेन शुक्लतांयान्तिमूर्द्धनाः॥२४॥ कुंठ और आंवला यह दोनों द्रव्य समान ग्रहण पूर्वक चः ण करके थूहर के दूध में सात वार भावना दे। इसके पीछे यह भावित द्रव्य केशों में लेप करने से काले कैश उपेंदें हो जाते हैं। इति कृष्ण केश शुक्ली करण कामरन तन्त्र। H ॥ अथ निद्रालुकरण विधिः ॥ , गुवाकखादित्वातस्यावशिष्ट विवरंकृत्वा संप्रो: थयेत् तत्रप्रस्रावयेत् तस्यवाटिकायांयआयांति तस्यानेननिद्राभवति.॥२५॥ एक सुपारी का कुछेक अंश भक्षण करके शेष अंश किसी घर में गदा खोद मट्टी में दाब वहां पिसाब कर देने से उस स्थान में जो कोई आवैगा, वही घोर निद्रा में मम होजाय- गा, इसमें सन्देह नहीं ॥२५॥ नीलोत्पलंसमरिच नागकेशरमूलकम् । धृष्येत्तदञ्जयेच्चक्षु निद्रामामोत्यसंशयः ॥२६॥ नीलोत्पल, मिर्च और नागकेशर की जड़ यह कई द्रष्य एकत्र घिसकर अञ्जन लगाने से मनुष्य निद्रित होता है, इस * सन्देह नहीं ॥२६॥ काकजकाजटानिद्रां जनयेशिरसिस्थिता.।.. मूलंबाकाकमाच्याश्च कृष्णायास्तद्गुणस्मृतम् २७ चौटलो के वृक्ष की जटा व जड़ मस्तक में धारण करने सं शोध निद्रा में अभिभूत होता है। मकोय के वृक्ष की जड़
कामरव तन्त्र
और कालीविष्णुकान्ता की जड़ का भी यही गुण जानो।
अर्थात् इसको भी मस्तक में धारण करने से शीघ्र निद्रा आ-
--
जाती है ॥२७॥
इति निद्रालु करण विधि।
T
॥ अथ जय प्रकरणम् ॥
आद्रीयांवटवृन्दाकं हस्तेवद्धापराजितः ।
तदृक्षेचूतवृन्दाकं गृहीत्वाधारयेत्फरे ॥२८॥
संग्रामेजयमाप्नोति जयस्मृत्वाजयीतथा॥२९॥
आदी नक्षत्र में बट के वृक्ष का वन्दा अथवा आम बृ.
क्ष का यन्दा लेकर हाय में बांधने से अयवा धारण करने से
सङ्गामादि सब प्रकार के विवादस्थल में जय प्राप्त होती है।
कृत्तिकाचविशाखाच भौमवारणसंयुता।
तहिनेघटितवस्त्र संग्रामेजयदायकम् ॥३०॥
यदि मङ्गलबार के दिन कृतिका व विशाखा नक्षत्र का
योग हो तो उसो मङ्गलवार को वस्त्र प्रस्तुत करके वह वस्त्र
पहरकर युद्ध में गमन करने से निःसंदेह जय होगो ॥३०॥
कामरन तन्त्र करेसुदर्शनामूलं वद्धाराजकुलेजयी । जयामूलराजकुले मुखस्थञ्चजयप्रदम् ॥३१॥ शुकदर्शन वृक्ष की जड़ हाथ में बांधने से राजकुल, मैं जय लाभ होती है । जयन्ती को जड़ भी मुख में रखने से यही फल प्राप्त होता है ॥३॥ इति जयं प्रकरण । , अथईश्वरादीनांक्रोधोपशमन प्रकरणम् 'कन्टकेनतालपत्रेयस्य नामाभिलिख्य कर्दमे स्थापयेत् कुपितःप्रसन्नोभवति ॥३२॥ ताल पत्र पर कण्टक योग में जिसका नाम लिखकर की. में स्थापन किया जाय, वह क्रुद्ध होने पर भी प्रसन्न हो. जाता है, ॥३२|| गोरोचनयाभूजेंयस्यनामसमालिख्यपयोमध्ये स्थापयेत् कुपितःप्रसन्नोभवति ॥३३॥ गोरोचन द्वारा भोजपत्र पर जिस व्यक्ति कानाम लिस संकुल शव का अर्थ यहाँ मुकर का है। .
कामरत्न तन्त्र कर दूध में रक्खा जाय, वह बुपित होने पर भी उसका को- घ शान्त होता है ॥३॥ शान्तेप्रशान्तेसर्वक्रुद्धोपशमनिस्वाहा। अनेनमन्त्रेणत्रि-सप्तवारजप्तेनमुखंमार्जयेत्३८ क्रोधोपशमन कार्य का अनुष्ठान करने के समय "कों शा न्ते” इत्यादि मन्त्र इक्कीसवार जप करके मुख धोने से कार्य सि द होता है, इसमें सन्देह नहीं ॥३४॥ इति क्रोधोपशमन प्रकरण। अथ लोम नाशनम।* एकप्रदेयो हरिताल भागः पञ्चप्रदेयाजलजस्यभागाः। ब्रह्मतरोभस्म सएव पञ्च प्रोक्ताश्चभागाःकदलीजलादीः॥३५॥ * बहुधा देखागया है कि शरीर के किसी स्थान में फोड़ा मादि होनेपर, बिना चीर फारअच्छा नहीं होता। यदि फोड़े के अपर रोम शेतीबड़ी कटि- नाई पड़ती है। ऐसे स्थान में प्रथम लोमनाशन विधि के द्वारा लोम उखाड़कर धार कार करे। 2
४
कामरन तन्त्र।
*
समेत्यसप्ताहक भावयित्वा
कृत्वा
रोमाणिसवाणि
पुनर्नरोहन्ति कदाचिदेव ॥३६॥
हरिताल का चूर्ण एक भागे, पांच भाग शंछ की भस्म,
और पांच भाग पिलखन के काष्ट की भस्म, एकत्र मिलाकर
केले के रस में सिद्ध करे। फिर उसको सात दिन तक रखकर
लोम (रोम) युक्त स्थल में लेप करने से सम्पूर्ण लोम उखद
जाते हैं ॥३५॥ ॥३६॥
पलाशभस्मान्वित तालचूर्णे
रम्भम्बुमिरैः परिलिप्यभूयः।
रोमानिरोहन्ति कदापिनेव ॥३७॥
ढांक की लकड़ी की भस्म और हरिताल का चूर्ण यह दो
द्रव्य एकत्र मिलाकर केळे के रस मैं मर्दन पूर्वकालोम युक्त
स्थल में वार बार लेप करने से सम्पूर्ण लोम जड़ सहित उ.
खड़ जाते हैं ॥३॥
कामरत्न तन्त्र ४७ रम्भाजले सप्तदिनंविभाव्य भस्मानिकम्बोर्मसृणाणिपश्चात् । तालेनयुक्तानि विलेपनानि लोमानिनिर्मल यतिक्षणेन ॥३८॥ शङ्ख को भस्म को केले के रस में एक सप्ताह भावना दे- कर इसमें हरिताल मिलावे। फिर भली भांति मईन पर्वक लोम युक्त स्थल में लेप करने से शोघ्र लोम गिरजाते हैं।३८ तालकंशङ्खचूर्णश्च मञ्जिष्ठाभस्मकिंशुकम् । समभागंप्रलेपेन रोमखण्डनमुत्तमम् ॥३९॥ तुल्य परिमाण हरिताल चूर्ण, शङ्ख चूर्ण, मनीठ को भ- स्म, टेसू के काष्ठ को भस्म, लाकर जलके सङ्ग मिलाय लोम युक्त स्थल में प करने से लोम शीघ्र गिरनाते हैं ।।९।। शतालंयचंगुलं काजिकैःपेपयेत्सदा। लेपात्पतन्तिलोमानि पक्वपत्रमिवद्रुमात् 1201 लेपनात्हन्तिकेशाश्च कटुतैलैर्मनःशिला। शङ्ख, हरिताल, यव और चौटली इन सबको वरायरले चूर्ण कर कांजी सहित मदन पूर्वक लोम युक्त स्थल में लेप , ४८ कामरत्न तन्त्रा करने पर वृक्ष से पके हुए पत्ते गिरने की समान अङ्ग से रु. व गिरजाते हैं ॥४॥ तालकंशकचूर्णन्तु पिष्ट्वाचक्षारतोयकैः । तेनलिप्ताकचाचम्में स्थितेगच्छतितत्क्षणात् ४१ खारी जल से हरिताल और शङ्ख चूर्ण पीसकर मस्तक में अथवा अङ्ग के लोम युक्त स्थल में लेप करने से शीघ्र के. श और लोम गिरजाते हैं ॥४॥ पूगवृक्षस्यपत्रोत्थ द्रवैपिष्ट्वाधगन्धकम् । तेनलिप्त्वास्थितेचम्में, रोमखण्डनमुत्तमम् ४२ 'मुपारी के पत्तों के रस में गन्धक पीसकर लोम स्थान में लेप करने से शीघ्र रुवें गिरजाते हैं ॥४२॥.. इति लोम नाशन। 1 अर्थ वन्धनमोचनं निगडांदिभजनंच मार्गशीर्षस्यपूर्णिमायां शिखिमूलंसमुंद्धरेत्। बन्धनान्मुच्यतेतेन शिखावद्धोनसंशयः॥४३॥ मन्त्र । ऊोंनमःकमलपिङ्गलेरुद्रहृदयाङ्गे वेताल कामरख तन्न। तालअस्थिधारिणी तिष्ठतिष्ठसरसरसर्वानमोहय मोहयभगवतिशिखाजेतिमिरेमहामायेखाहा । अष्टोत्तरशतंजप्त्वा शिखायांपूर्वोक्तमौषधं वन्ध येत्तेनसिद्धिः । लक्षवर्णककारश्च लिखेहन्धन मोचनम्॥ अगहन मास की पूर्णमासी के दिन चित्रक को जड तोड़ कर "ओनमः" इत्यादि मन्न से अष्टोत्तर शतवार (१०८) अ भिमन्त्रित करके शिखा में बांधने से बन्धन मोचन होता है ” यह अक्षर लक्ष सॅख्यक लिख लेने से बन्धन मोचन होता है ॥४॥ -हस्ताकेंसिन्धुवारस्य मूलंचोत्तरगंहरेत । स्पर्शनंबन्धविच्छेदं कुरुतेशीघ्रमारुतः॥४॥ रविवार के दिन हस्तनक्षन आने पर उस दिन सम्हालू वृक्ष को उत्तर ओर वालो जड़ तोड़कर अङ्ग में स्पर्श करने से शीघ्र वैधन मोचन होता है ॥४४॥ को हुँओं आय आय चिंचिटि चिटी हांला वजनन्टिक कालिका स्वाहा।
कामरत्न तन्त्र। सफेद सरसो और तीन स्वेत जवा कुमुम यह मन्त्र में अभिमन्त्रिा कर प्रथम प्रवेश करने के द्वार पर डालने से.औ. र सबै द्वार अपने आपहो.खुलकर टूट जाते हैं मांसीरक्तोत्पलंतुल्यं कृकलासेवभोजयेत् । तन्मलेगुटिकास्पी त्तदावन्धभिनत्यलम् ४५ वालछड और रक्तोत्पल वरावर. लेकर एक गिरगट को भोजन करावे. फिर उसी गिरगट के विष्टा द्वारा गोली बना. य अङ्ग में स्पर्श करने से बन्धन मोचन होता है ॥४५॥ इति बन्धन मोवन और निगडादि भजन। अथ नष्ट पुष्पं पुष्पी करणम्।* ज्योतिष्मती कोमलपत्रमग्नौ ।' भृष्टंजरायाःकुसुमश्चपिष्टम् । गृहाम्बुनापीतमिदं युवत्याः करोतिपुष्पस्मरमन्दिरस्य ॥४६॥ * नारि जाति मे नष्ट पुष्प का होना भनेक रोगों का कारण है, सही कारण से नागभट् ने ऐसीभोपाधेि का मंधार किया है कि मिसरी मष्ट पुष्प पुष्पित हो।
कामरत्न तन्त्र। J मथम तो ज्योतिपमती (मालगुनो) के पसे अनि मैं झु लसाले । अनन्तर, जवा कुसुम के सङ्ग पीसकर बहुत दिनों तक वासी जल अथवा कांजी के सङ्ग मिलाकर सेवन करने से नष्ट पुण्या नारी पुनर्गर ऋतु मतो होती है ॥४६॥ दूर्वादलंतण्डुल' तुल्यभागं निप्पिष्यपिष्टं परिपाचितश्च । तद्भक्षयित्वा वनिताप्रणष्ट पुष्पलभेतख बलानुरूपम् ॥२७॥ दूर्वाधास और चावल बराबर ले एकत्र पीसकर पिछी करे। फिर यह पिछी अग्नि में भूनकर सेवन करने से नष्ट पु. प्प आरोग्य होता है॥४७॥ पारावतपुरीपञ्च मधुनासंपिवेत्ततः । रजखलाभवेन्नारी मूलदेवेनभाषितम् ॥१८॥ कबूतर की वीट शहंत के सङ्ग मिलाकर सेवन करने से नष्ट पुप्पा नारी पुनर्गर रतु मतो होती है। यह मूलदेव ने कहा है॥४८॥ क्वार्थगुडव्यषजं तिलभागोकृतंपिवेत् ।
कामरन तन्त्र। क्वार्थरक्तभवेगुल्मे नष्टपुष्पेचयोजयेत् ॥४९॥ त्रिकुट का काहा, गुद्द और तिलचूर्ण यह तीन द्रव्यं ए. कत्र कर सेवन करने से नष्ट पुष्पा नारी को फिर ऋतु होतो है। उक्त काही रक्त गुल्म को भी उपकारी हैं ॥४९॥ इति नष्ट पुष्प पुनः:पुप्पी करण। ॥ अथ अति रजो निवारणम् ॥ धात्रीश्चपथ्याश्च रसाञ्जनश्च ‘कृत्वाविचूर्ण सजलंनिपीतं । । 'अत्यन्त रक्तोत्थित मुगवेगं निवारयेत्सेतु मिवाम्बुपूरम् ॥५०॥ आंवला, हरीतकी, रसौत यह कई वस्तु अच्छी प्रकार चूर्ण कर जल के सङ्ग सेवन करने से पुल बँधने पर जल प्र. वाह रुकने की समान भयङ्कर रक्तस्राव निवारण होता है।५० .:: : शेलुत्वचामिश्रित तण्डुलेन विधायपिष्टं विनियोजनीयम् । कन्दर्पगेहे मृगलोचनाया -- *-
कामरव तन्त्र।
'रक्तनिहन्त्याशुहटेनयोगः ॥५१॥
लिसोडे के वृक्ष की छाल चावलों के सङ्ग पीसकर स्त्री
की योनि में लेप करने से रक्तस्त्राव निवारण होता है।
अपामार्गस्यमूलन्तु वृहपूगेनभक्षयेत् ।
रक्तस्रावनिहन्त्याशुसुखीभवतिसुन्दरी॥५२॥
पकी सुपारी के सङ्ग चिरचिरे की जड़ भोजन करने से
अति रजोसाव प्रशान्त होता है, अतएव वह मुन्दरो स्वास्थ'
अनुभव करती है ॥२॥
चन्दनक्षीरसंयुक्तं सघृतंपाययेद्भिषक् ।
शर्करामधुसंयुक्त मस्रकश्रावविनाशनम् ॥५३॥
चन्दन, क्षार, घृत, शर्करा, शहत, यह सब बस्तु वरा-
पर मिलाकर सेवन करने से रक्तस्राव शान्त होता है ।।५॥
इति अति रजो निवारण।
+
अथ वन्ध्या या गर्भधारण, प्रकरणम्
जन्मवन्ध्याकाकवन्ध्या मृतवत्साक्कचित्स्त्रियः ।
तासांपुत्रोदयार्थञ्च शम्भुनामूचितंपुरा ॥५४॥
कापरव तन्त्र .. पन्ध्या (बांझ) अनेक प्रकार की होती है, कोई जन्म व- न्ध्या, कोई काक बन्ध्या, और कोई मृतवत्सा होती हैं। जि- ससे यह सव बन्ध्या पुत्र लाभ कर, महादेव जो ने पूर्वकाल मैं इसका सम्पूर्ण उपाय कहा है, वही नीचे लिखते हैं ।।५४॥ तत्र जन्म बस्या चिकित्सा। समूलपत्रांसपीक्षी रविवारेसमुद्धरेत् । एकवर्णगवीक्षीरैः कन्याहस्तेनपेषयेत् ॥५५॥ ऋतुकालेपिवेहन्ध्या पलार्द्धतहिनेदिने। क्षीरशाल्यन्नमुदगञ्चलघ्नाहारंपदापयेत्॥५६॥ एवंसप्तदिनंकृत्वा वन्ध्याभवतिपुत्रिणी। . तद्वेगंभयशोकञ्च व्यायामञ्चविसर्जयेत् ॥५७॥ अनङ्गभयशोकञ्च दिवानिद्रांविवर्जयेत् । नकर्मकारयेतकिञ्चि हज़येच्छीतमातपम् ५४ नतयापरमांसेवा कारयेत्पूर्ववत्कियाम्। :: पतिसनादगर्भलाभोनात्रका-विचारणा ५९ रविवार के दिन जड़ और पत्ते सहित एक साक्षो वृक्ष कामरन तन्त्र लाकर उसको एक अविवाहिता कन्या के हाथ से एकवणी गा य के दूध में महन करावे । सात दिन तक यह औषधि प्रति दिन आधेपल प्रमाण सेवन करे। उन सात दिनों में दुग्ध, पसाई के चावलों का अन्न, मूंग इत्यादि लघु द्रव्य आहार क २। इस एक सप्ताह में उद्वेग, भय, शोक, कसरत, पतिसँस- र्ग, दिन मैं सोना, श्रम जनक कार्य शीत और गरमी परि- त्याग करनी होती है। इस प्रकार के नियम से रहकर फिर पति के सग सहवास करने से बन्ध्या भी गर्भ धारण करती है, इसमें सन्देह नहीं ॥५५॥ ॥क्षा५॥॥॥॥१९॥ एकमेवतुरुद्राक्षं सपाक्षीकर्षमात्रकम् । पूर्ववच्चगवांक्षीरैः ऋतुकालेप्रदापयेत् ॥६०॥ महागणेशमन्त्रेण रक्षांतस्याश्चकारयेत् । मप्रस्तु।डोंमदन्महागणपतेरक्षामृतंमतसुतंदेहि। एक रुद्राक्ष और दो तोले सपाक्षी एकवी-गाय के दूध में मर्दन पूफ ऋतु काल में सेवन करने से पन्ध्या नारी को गर्भ रहनाता है। इस कार्य का अनुष्ठान करने के समय मूल लिखित "मदन” इत्यादि गणेश मन्त्र से उसकी रक्षा करै पंत्रमेकंपलाशस्य गर्भिणीपयसान्वितम् । K
.
कामरत्न तन्त्र।
पीत्वातुलभतेपुत्रं रूपवन्तंनसंशयः ॥६१॥"
पथ्यमुक्तंयथापूर्व तहत्सप्तदिनावधि ॥२॥
• गर्भवती नारी के स्तनो के दूध में एक ढाक को पत्तापी.
सकर सेवन करने से बन्ध्या नारी भी स्वरूपयानं पुत्र लाभ
करतो है, किन्तु सातदिन तक पूर्व लिखित पथ्यादिक सम्पूर्ण
नियमों की रक्षा करनी उचित है ।शाशा
'देवदानीयभूलन्तु ग्राहयेत्पुण्यभास्करें।
निष्कत्रयंपिवेत्क्षीरैः पूर्ववत्कमयोगतः।६३
वन्ध्यापिलभतेपुत्रं देयं पथ्यंयथापुरा ।।
पुप्प नक्षत्र युक्तं रविवार के दिन बडो तोरई की जड
तोड़कर उसको तोनं मासे गाय के दूध में पीस कर सेवन
करने से जन्मवन्ध्या को पुत्र की प्राप्ति होती है, परन्तु पूर्व लि-
खित विधानानुसार नियमादि को रक्षा करनी होती है विमा
.: " तुरङ्गगन्धा घृतवारिसिद्धं
सज्यिपयः स्नानदिनेचपीत्वा ।
प्राप्नोतिगर्भ विपयंचरन्ति ।
वन्ध्यापिपुत्रं पुरुषप्रसङ्गात् ॥६॥
कामरन तन्त्र। ५७ घृतन्तु शयनसमये पेयम् । ऋतुस्नान के दिन वृत्त और जल के सङ्ग असगन्ध सि- द्ध कर घृत और दूध के सङ्ग उसका सेवन करके पति के स. असहवास करने से पुत्र लाभ होता है, इसमें सन्देह नहीं परन्तु शयन करने के समय घृत पान करै ॥४॥ कृष्णापराजितामूलं वस्तक्षीरेणसंपिवेत् । ऋतुस्नातात्रिंधायातुं वन्ध्यागर्भधराभवेत्।६५॥ ऋतुस्तान के उपरान्त बकरी के दूध में कालीविष्णुका- न्ता की जद पोसकर सेवन करने से बन्ध्या गर्भवती होती है। सपिप्पलीकेशरशृङ्गवर. .... :: .. क्षुद्रायणंगव्यघृतेनपीतं । .... :: . बन्ध्यापिपुत्रलभतेहटेन् ......" ......: योगोत्तमोऽयंमुनिभिःप्रदिष्ट ॥६६॥ पीपल, नागकेशर, अदरक, और छोटी गोल मिरच यह सव गाय के घी में पीसकर, भक्षण करने से पन्ध्या के होता है । यह योग मुनिगण कर्तृक निर्दिष्ट हुआ है। यह अत्युत्तम औषधि है ॥६६॥ इति जन्मवच्या चिकित्सा। T 1 पुत्र कामरत्न तन्त्र। अथ काकवन्ध्या चिकित्सा पूर्वपुत्रवतीभूत्वा पश्चान्नोभूयतेयदि काकवन्ध्याचसाज्ञेया चिकित्सास्याश्चकथ्यते,६५ केवल एकही पुत्र. होने के उपरान्त फिर जिसको गर्भ नहीं रहता, उसका नाम काक बन्या है, अब उसी स्त्री की चिकित्सा लिखो जाती हैं गाणी : विष्णुकान्तांसमूलन्तु पिष्ट्वादुग्धैस्तुमाहिये महिषीनवनीतेन ऋतुकालेचभक्षयेत् ॥६८॥ एवंसप्तदिमकुर्यात् पथ्यमुकञ्चपूर्ववत् । गर्भसालभतेनारी काकवन्ध्यासुशोभनं ॥६९॥ जद सहित एक विष्णुकान्ता का वृक्ष लाकर भैंस के दू. प में पीस ऋतुकाल में भैंस के मक्खन के सङ्ग सेवन कर- ने मे काक्वन्ध्या स्त्री:पुनर्गर गर्भवती होती है । जन्मबन्ध्या के लिये प्रथम जिस प्रकार.पथ्य और नियमादि लिखगये हैं। अब भी पैसेही एक सप्ताह करना होगा||६८।६९॥ अश्वगन्धीयमूलन्तु ग्राहयेतपुष्पभास्करे। योजयेन्महिषीक्षीरैः पलार्द्धभक्षयेत्सदा॥७॥ .
कामरत्न तन्त्र।
सप्ताहाल्लभतेगर्भ काकवन्ध्यानसंशयः ।
पुष्प नक्षत्र युक्त रविवार के दिन असगन्ध की जड़ ला-
कर भैंस के दूध में मर्दन पूर्वक अर्द्धपल प्रमाण सेवन करें।
सात दिन इसी प्रकार सेवन करने से काकवन्ध्या-स्त्री गर्भ
वतो होती है। इसमें संशय नहीं ||७०॥
इति काकवन्ध्या चिकित्सा।
प
अथ मृतवत्सा चिकित्सा
गर्भसञ्जातमात्रेण पक्षास्मासाच्चवसरात् ।
म्रियतेवित्रिवर्षी हायस्याःसामृतवत्सिका।७१।
जिस, स्त्री के गर्भ से केवल उत्पन्न होनेपर ही वालक की
मृत्यु हो अथवा एक मास, एक घर्प, तथा दो या तीन वर्ष
में मृत्यु हो और इसी प्रकार वार रार.होता हो, उसका ना-
म मृतवत्सा है। अब ऐसी नारी की चिकित्सा लिखीजाती है
यावीजपूरझुममूलमेकं
क्षीरेणसिद्धिंहवियाविमिश्रं ।
ऋतौनिपीयस्वपतिप्रयाति-
--
.
कामरन तन्त्र -- ६० दीघीयुषंसातनयंप्रसूते ॥७२॥ दाहिम को जड़ दूध के सङ्ग सिद्ध करके उसमें घृत मि- लावे। 'अनन्तर ऋतुकाल में यह औषधि सेवन पूर्वक ऋतु स्नान करने के उपरान्त पति का सहवास करने से मृतवत्सा नारी के सन्तान उत्पन्न होकर दीर्घ जीवो होती है। इसमें सन्देह नही ॥७२॥ इति मृतवत्सा चिकित्सा। अथ गर्भ रक्षा विधिः ॥ तत्र.प्रथम मासे... अकस्मात्प्रथमेमासे गर्भभवतिवेदना।। गोक्षीरे-पाययेत्तुल्यं पद्मकेशरचन्दनं ॥७३॥ पलमात्रंपिवेन्नारीत्र्यहंगर्भ:स्थिरोभवेत् ॥७॥ अव गर्भ रक्षा की विधि लिखी जाती है-मथम महीने मैं अकस्मात् गर्भ वेदना उपस्थित होकर गर्भस्राव की शका होने पर पन केशर और चन्दन बरीवर ले दूध के सङ्ग पो. सकरं चार तोला पीने से निःसन्देह गर्भ रक्षा होती है ७७४
कामरत्न तन्त्र
६.
॥ तत्र द्वितीय मासे॥
नीलोत्पलंमृणालञ्च पष्टिकर्कटशृङ्गिका।
गोक्षीरस्तुहितीयेपि पीत्वाशाम्यतिवेदना ७५
नीलोत्पल, मुलेठी, और काकडाशिङ्गी, यह सब गाय
दूध में पीसकर पीने से दूसरे महीने की गर्भ चेदना शा-
न्त होती है |७||
॥ तत्र तृतीय मासे॥
श्रीखण्डञ्चवचाकुष्ठं मृणालंपद्मकेशरम् ।
पिवेतशीतोकपिष्टं तृतीयेवेदनावती ॥७॥
'चन्दन काष्ठ, कुड़, खस, और कमल केशर शीतल जल
में पीसकर सेवन करने सेतीसरे महोने की वेदना कम होती है ।
'॥ तत्र चतुर्थ मासे॥
नीलोत्पलंमृणालानि गोक्षुरंञ्चकशेरुकं ।
तुर्यमासेगवांक्षीरैः पिवेत्साचातिवेदना ७७
नोलोत्पल, खस, गोखरू, और कसेरू यह सब द्रव्य गा-
य के दूध में पीसकर सेवन करने से चौथे महीने की वेदन्न
कम होती है।॥७॥
कामरत्न तन्त्र। तत्र पंश्चम मासे॥ पुनर्णवाञ्चकाकोली तगरनीलमुत्पलं । गोक्षीरंपञ्चमेमासि गर्भक्लेशहरपिवेत्॥७॥ खपरा, काकोलो, तगर पुष्पं नीलोत्पल, यह सब एकत्र पोसकर गाय के दूध सहित सेवन करने से पांचवें महीने की गर्भ वेदना शान्त होती है ॥७८॥ ॥ तत्र पष्ठ मासे॥ सिताकपित्थमज्जाच शीततोयेनपेषयेत् । पष्ठमासिगवां क्षीरें: पिवेतक्लेशनिवृत्तये ॥७९॥ शहत को बनीहुई चीनी और कैथा का गूदा शीतल ज. ल में पोसकर धेनु दुग्ध के सङ्ग, सेवन करने से छठे महीने को वेदना शान्त होतो है ॥७९॥ ॥ तत्र सप्तम मासे.. - कशेरुपौष्करमूलं शृङ्गाटनीलमुत्पलं, । पिष्ट्वाचंसप्तमेमासि क्षीरैःपीत्वाप्रशाम्यति ८० कसेरू, पोहकरमूल, सिंहाडे, नीलोत्पल यह संघ द्रव्य -- कामरन तन्त्र -- . - ": . पीसकर-धेनु दुग्ध के सा सेवन करने से सातवें महीने की गर्भ वेदना शान्त होती,है.॥८॥ ~॥ तत्र अष्टम.मासे.॥ । यष्टीपद्माख्यकमुस्तं कशेरंगजपिपली । नीलोत्पलंगवाक्षारै पिवेदष्टममांसके ॥८॥ , मुलैठी, कमलगट्टा, मोया, कमेह, गजपीपल और नी- लोत्पल यह सब एकर पोसकर गाय के दूध में सेवन करने से आठवें महीने की गर्भ वेदना दूर होती है ||८|| तत्र नवमामासे विशालावोजककोलं मधुनासहलेपयेत् । वेदनानवमेमासि शान्तिमाप्नोतिनान्यथा ८२ विशाला वीज, इन्द्रायन),और शीतलचोनी, यह दो द्रव्य एकत्र पोसकर शहत के सङ्ग सेवन करने से नौ महीने के गर्भ साव की वेदना कम होती है || ॥ तत्र दशम मासे॥ शर्करागोस्तनीकाथैः सक्षौद्रनीलमुत्पलं ।। पाययेदशमेमासि गवांक्षी प्रशान्तये ॥४३॥ 7 .
'कापरवातस्त्रा A ६४ i. अर्थवाशुण्ठीसंसिद्ध गोक्षीरेशमेपिवेत् ।' अथवामधुकंदारुशुण्ठीक्षीरेणसम्पिवेत् ॥८॥ चीनी, द्राक्षारस, शहत और नीलोत्पल यह सब द्रव्य पीसकर धेनु दुग्ध के सङ्ग सेवन करने में दशक महीने की गर्भ वेदना कम होती है. अथवागाय केबूध मैं सो पका- कर सेवन करने से घेदना कम होती है। मुलेठी, देवदारु और सोंठ दूध में पकाकर उस दूध का सेवन करने से दश में. हीने की गर्भ वेदना दूर होती है iitarरयो । धान्याञ्जनंसावरयष्टिकाख्यं यहनिप्रीतंप्रमदाहठेना 5 सप्ताहमात्रंविनियोज्यनारी. स्तम्भातिगर्भचलितंनचित्रा6५॥ धनियाँ, रसौता लोधा मुन्दी यह सब वस्तु मन पूर्वक काढ़ा निकालकर तीन दिन वा एक सप्ताह मेवन करने से चलित गर्भ स्थिर होता है |८|| :: कुलालहस्तोद्भव कर्दमस्य:- वस्तीपयाक्षौद्रयुतस्यमात्र :, .
कामरत्न तन्त्र। . ६५ गर्भच्युतिशूलनयोंनिवार्य करोतिगर्भप्रकृतंहठेन ॥८॥ कुम्हार जिस समय बरतन तैयार करे, तब उसके हाथ में स्थित हुई मट्टी में पकरी को दूध और कुछ महत एकत्र मिलाकर सेवन करने से निस्सन्देह विपम गर्भस्राव को-वेद- ना कम होती है ॥८॥ कशेरुशृङ्गाटक जीरकाणि , पयोधनेरण्ड शतावरीभिः । सिद्धपयःशर्करयाविमिश्र संस्थापयेद्गर्भ मुदीत्यशूलं ॥८७ कसेरू, सिंहाड़ा, जोरा, मोया, एरण्डा और कर्चरय- ह सब वस्नु दूध के सङ्ग पाक करके चीनी मिलाय.सेवन क- रने से चलित गर्भ स्थिर होता है ।। कुवलयकन्दसतिलं पीत्वांक्षीरेणमधुनावनिता। मुक्तिगुरुतरदोपैश्चलितंग संस्थायदा, कमल का कन्द, काले तिलों सहित पीसकर उसमें शं. इत मिलाय दूध के सहा सेवन करने में ललित स्थिर होता है |८८॥ इति गर्भ रक्षा विधि:
कामरत्व तन्त्र।
७
॥ सुख प्रसव योगगा
श्वेतपुनर्णवामूल चूर्णयोनोप्रवेशयेत् ।
क्षणात्प्रसूयतेनारी गर्भेणातिप्रपीड़ितेः॥८९॥
- सफेदं पुनर्नवा को जह पीसकर योनि में लगाने सेशी
घ मुख पूर्वक प्रसव होता है ||८९॥
उत्तराभिमुखंग्राह्यं श्वेतगुञ्जीयमूलकं ।
कठ्यांवध्वाविमुक्तञ्च गर्भपुत्रन्तुतत्क्षणात् ९०
गवती खो स्तराभिमुख होकर सफेद चौटली की उ.
भर दिशा की ओर वाली जड़ तोड़कर कमर में बांधने से
शोध सर्व होता है ॥९॥...
वासकस्यतुमूलन्तु चोत्तरस्थतसमुद्धरेत् ।
.क्रव्यांवध्वासमसूत्रः सुखनारीप्रसूयते ॥२१॥
वासक वृक्ष की उत्तराधिकस्य जडतोड़कर सात,होरों से
गर्भवती स्त्रों को कमर में बांधने से मुंख पूर्वकं प्रसव होता है।
सरेक्समालोडा श्वेतगुलाफलीयको
सुर्खप्रसवमामोति तदक्षणानात्रसंशयः ॥९॥
कामरन तन्त्र। V योनिवालेपयेत्तेन' सासुखेनप्रसूयते । सहदेव्याश्चमूलन्तु कटिस्थितप्रसवेत्सुखं ९३ सफेद चोटली के वृक्ष का उत्तर दिशा की ओर का फल गर्भवती नारी के केशों में बांधने से तिसी समय निःसन्देह मुख पूर्वक प्रसव होता है। अथवा यह फल मन पूर्वक योनि में लेप करने से भी मुख सहित प्रसव होता है। इसके अति रिक्त खरैटो की जड कमर में बांधने से भी मुख पूर्वक प्रस व होता है ।।९२॥ ॥९शा अपामार्गस्यमूलन्तु ग्राहयेञ्चतुरंगुलं । नारीप्रवेशयेद्योनो तत्क्षणात्साप्रसूयते ९४ चार अंगुल वरावर विष्णुकान्ता की जड़ लाकर गर्भवती, नारी की योनि में प्रवेश करने से शीघ्र प्रसव होता है ।।९४॥ तोयेनलांगलीमूलं पिष्टवायोनौप्रवेशयेत्। नाभिश्चलेपयेत्तेन क्षणात्प्रसूयतेसुख ॥१५॥ नारियल की जड़ जल में पीसकर कुछेक योनि में और कुछेक नाभिमैं लेप करने से शीघ्र सुख पूर्वक प्रसव होता है। गुञ्जातरोम्मूलयुगंविधाना . ~ New + ६८ कामरन तन्त्र - दुत्पाट्यपुष्येचरवौनिवद्धं कटीतटेमूर्द्धनिनीलसूत्रः :: शीघ्रप्रसूतिंकुरुतेगनायाः ॥९६॥ पुप्प.नक्षत्र-युक्त रविवार को चौटली के वृक्ष की जेड तोड़कर नोले डोरे:से,एक कमर में और एक शिर में बांध ने से शीघ्र प्रसव होता है,॥९६. :- ar.. समातुलूॉ. मधुकस्यचूर्ण : मधवाज्यमिश्र प्रमदानिपीय। च्याविहीनं प्रसवहठेन .:-"प्राप्नोतिनैवात्र विकल्पबुद्धिः ॥९७॥ अत्रमातुलुङ्गस्यमूलंयोज्य मतुफलं । क्वाथयेद्दापेयं ॥९८॥ नीबू की जद और मुलेठी एकत्र चूर्ण कर घी और श. हत मिलाकर सेवन करने से गर्भवती स्त्री मुख पूर्वक प्रसव करती है । मातुलुङ्गमूल के काटे को घी और शहत मिलाकर. पोने से भी यही फल होता है ॥९॥ दशमूलीशृतंतोयं घृतसैन्धवसंयुतम् ।
कामरत्न तन्त्र। ا शूलातुरापिवेदांशु सुखनारीप्रसूयते ॥१९॥ दशमूल का चूर्ण, घृत और सैन्धव ( सेंधानमक ) एकत्र मिलाकर पीने से गर्भवतो शीघ्र सुख पूर्वक प्रसव करती है।९९। ऊॉमन्मथवाहिनीलम्बोदरंमुञ्चमुश्चस्वाहा। अनेनमन्त्रेणजलंसुतप्तं पातुंप्रदयंशुचिनानरेण । :: तोयांभियानातूखलुगर्भवत्या प्रसूयतेशीघ्रतरंसुखेन ॥१०॥ -गरम जल से. मूल लिखित मन्त्र पढ़कर वह-जल गर्भवती स्रो को सेवन करने से शीघ्र सुख पूर्वकमसब होता है.।।१००|| ..::अंओं हां नमत्रिमूर्तये ।:: . अनेनैवतुमवेग जप्तव्यसूतिकायहे। सुखप्रसवमाप्नोति सापुत्रलभतेधुवम् ॥१०॥ मूले लिखित अँओं" इत्यादि मन्त्र सूतिका गृह में है. ठकर जप करने से गर्भवती स्त्री मुख पूर्वक पुत्र प्रसव करतो है। इसमें सलह नहीं किया ..
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TATIENCE
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। अर्थभूत ग्रहादि निवारणम्॥
विल्वमूलदेवदारु गोशृङ्गञ्चप्रियंगुन !
माजीरयमलकुष्टं वंशत्वग्गजमूत्रकः ॥१०॥
पिष्वाधूपोनिहन्त्याशु ग्रहभूतज्वरादयः ।
शाकिनीराक्षसाम्प्रेताः पिशाचाब्रह्मराक्षसाः॥
एकाहिकोहिकश्च ज्वरोनश्यतितत्क्षणात् ।।
ओं द्रावित तापेठठः स्वाहा । अनेनधूपंदद्यात् ।
बेल को जई, देवदार, बबर, फूलमियेंगु, बिल्ली का
मल, कूड़, वास की छाल और हायो का मंत्र यह सब द्रव्य
एकत्र पीसकर इसके द्वारा सोवर में और बालक के शरीर
मैं उक्त मन्त्र से धूप देने पर ग्रह दोष नष्ट होता है, भूतावे.
श प्रशान्त होता है। और ज्वरादिक कम होता है, साकिनी
राक्षस, प्रेत, पिशाच, और ब्रह्मराक्षस यह इस क्रिया मे दूर
भाग जाते हैं और ऐकाहिकादि -ज्वर का शोघ नाश हो;
जाता है ।।१०२।। ॥१०॥
श्रीवासंसैन्धवकुठं बचातेलंघृतवसा ।
धूपोबालगृहेदेयो महराक्षसशान्तये ॥१०॥
कामरत्न तन्ना
.
चिन्दना सैया कूट, पच, तेल, घृत, मांसरोहिणो (चर्वि)
इन सब वस्तुओं के द्वारा निरन्तर बालक के घर में धूप
से ग्रह शान्ति होती है और राक्षसादिदूर भागजाते हैं।१०४॥
शिरीषनिम्बयोपत्रं गोशृङ्गस्यत्वचावचा ।
बंशत्वशिपिपुच्छश्च कंगुनाचसमंघृतं ।१०५॥
धूपोवालग्रहान्हस्ति एतन्मत्रेणमप्रितः ।
ओं द्रुतंमुञ्चठड्डामरेश्वर आज्ञापयतिखाहा
धूपत्रयाणामेषमः।
सिरस, नौंव के पत्ते, बबूर की छाल, वच, वास, की
छाल, मोर को पूँछ, कांगुनीधान, और घृत उन सब वस्तुओं
के द्वारा उक्त मन्त्र पाठ करके धूप देने से बालक का ग्रह दो
प निवारण होता है ।।२०५॥
'पुनर्नवानिम्बपत्रसर्पय घृतैर्विरचितोधूपः ।
गर्भिण्यांबालानांसततं रक्षाकर कथितः१०६
पुनर्नवा, नीम के पत्ते, सरसों और धृत यह सव द्रव्य
वस्त्र द्वारा धूप वेने से गर्भवती और चालक को किसी प्रकार
का विघ्न नहीं होता। परन्तु निग्न्तर रक्षा होती है ||2||
J
७२
.
कामरन तन्त्र
दाडिमस्यचवन्दाकं ज्येष्ठानक्षेसमुद्धरेत् ।
दारवन्धेचंवालांनां सर्वग्रहनिवारणं ॥१०७
जेष्टा नक्षत्र में दाडिम के वृक्ष का बन्दा लाकर बालक के
गृह द्वार पर बांधने से बालक का सब प्रकार से गृहं दोष शा-
न्त होता है ।।१२७ :
पुष्या श्वेतगुजाया मूलमुत्यधारयेत्।
वालोनांकण्ठदेशेतु डाकिनीभयनाशनं. १०८।
सफेद चौटली को जड़ रविवार को दिन:पुएस नक्षत्र में
लाकर बालक के कण्ठ में वांधने से डाकिनी के भय का ना-
श.होता है,॥१०८) ..
श्वेतापराजितापत्र, जयापत्रंहूयोरसं :
11
नस्यंकुर्यात्पलायन्ते डाकिनीदानवादयः१०९
सफेद पुष्पलता, और-जयन्ती, इन दोनों वृक्षों के पतों
का रस मिलाकर बालक को.नस्य देने से..डाकिनी दानवा-
दिक भाग जाते हैं ।।१०९!! ...
नरसिंहस्यवीजन्तु सकृदुचरितहरेत् ।
डाकिनीप्रेतभूतानि तमःसूर्योदयेयथा ११०
कामरत्न तन्त्र। - ऑनमोनरसिंहायहिरण्यकशिपुवक्षःस्थलवि- द्वारणाय त्रिभुवनव्यापकाय भूत प्रेत पिशाच डाकिनीकुलोन्मूलनायस्तम्भोद्भवाय समस्तदो- पान् हरहर विसरविसर पचपच हनहन कम्पय कम्पय मथमथ ह्रीं ह्रीं ह्रीं फटफट ठाठः एढेहि रुद्र आज्ञा पयति स्वाहा । इति नरसिंहमनः । ओंओं ह्रीं ह्रीं हः हः फट स्वाहा । अनेन सर्षय मभिमत्रितंकृत्वारोगिणप्रहारयेत्तदा सर्वे ग्रहा पलायन्ते॥ कार्य कुशल व्यक्ति के एकाग्र चित्त से यह नरसिंह म- न्त्र एकबार पढ़ने से सूर्योदय के समय अन्धकार नाश होने की समान सूतिका गृह.और वालक के शरीर मे डाकिनी प्रेत, भूतादि, दूर भाग जाते हैं और सरसों "जो.को हो, इत्यादि मन्त्र मे अभिमन्त्रित करके यह सरसों रोमो के.मा: रने से सवप्रकार का ग्रह दोष दूर होता है. ॥११॥ '' इति भूत ग्रहादि निवारण समाप्त । !!.mastidadi -
७४
कामरव तन्त्र।
....
अथ दुर्भागां-करणम्
'ज्येष्ठानक्षत्रेनिम्बवन्दाक एस्याअङ्गेदीयतेसा
दुभांगांभवति ।।१११॥
'जेष्टा नक्षत्र में नीम के वृक्ष का बन्दा लाकर जिस स्त्री के शरीर
पर आक्षेप किया जायं, वहीखो दुर्भाग्य-शालिनी होती है।
अथ कलह-करणमः . ....
विशाखायांनिम्बबृक्षस्योत्तरमूलं विवस्त्रोविमु.
खीभूयोत्पाट्य मुखेनयस्यचालेप्रक्षिपेत् तस्यप्र
त्यहकलहोभवति। दूरेकृतेतुतइंक्षेभद्रभवति ११२
वस्त्र रहित और विमुख होकर विशाखा नक्षत्र में नीम
वृक्ष को उत्तरस्थ जैड मुख से तोरकर जिसके गृह में फे:
कदीजाय, उसके गृह में प्रतिदिन विवाद होता है और इ-
सीजद को वहां सेंदूर फेंक देने पर कलई शान्त होती है, ११२॥
ग्रलदण्डोसमूलाच काक्रमाचोसमन्वितम्।
जातीपुष्परसे पिष्टवा सप्तरात्रपुनःपुनः ॥११३॥
कामरत्न तन्त्र ७२ एपधूप-प्रदातव्यः शत्रुगोत्रस्यमध्यतः । यथागोत्रंसमाघ्राति पितापुत्र समंकलिः ॥११॥ जड़ सहित ब्रह्मदण्डी का पेड़ और मकोय का क्ष यह दो द्रव्य एकर जाति पुष्प के रस में सातदिन बारम्बार म. ईन करके इससे शत्रु के मध्य में धूप देने मे जो २ मनुष्य इस धूप को सँघेगा, उनके बीच में विवाद उपस्थित होगा। इस क्रिया में पिता-पुत्र में भी विवाद होता है ।।१३।। ||१४|| M अथ रक्षा विधिः। कादिहिरवसानञ्च अक्षरंखरभूषितं । ईकारेणापिसंयोज्य अधोरेफत्रयान्वितं ।११५। ओंकारंशिरसंकृत्वा जप्तव्यंसिद्धिमिच्छिता। जों क्रीं ह्रीं खीं। केचित्तु ओं क्रीं स्त्रों क्षीं। खसंयमनमत्रोऽयं शतार्द्धजापमात्रता। अशेषारिष्टनाशः स्यादित्याऽपुरसूदनः ॥११॥ "ओंकोंही स्त्रों अथवा ओंकों खौधों" यह सँयमन मन्त्र भक्ति सहित यया विधान केवल पश्चाशन बार जप क. -- - ७६ कामरत्न तन्त्रा रने से अशेष अरिष्ट ध्वन्श होते हैं। महादेव जो, ने स्वयं इस योग को कीर्तन किया है. ॥११५|| ११६॥ कपरंचपरंचैव टपरंतपरस्तथा । :.. पपरवर्णमाकृष्य ईकारेणसुपूजितं ॥११॥ अधोरेफसमायुक्तं ओंकारशिरसंतथा। ओं ह्रीं खों छींट्रोफ्री ह्रीं। 'श्रद्धयातुमहामन्त्रं येजपन्तिसदाहदि ॥१८॥ सर्वथात्तस्यपुन्सःस्यात् सर्वारिष्टविनाशनं। हस्तेनरक्तपुष्पेण प्रथितयामालिकया ॥१९॥ अभिमन्व्यशेतेनापि दद्यादेव्यसदानधे। यावज्जीवंसुखंतस्य सर्वलोभोदिनदिने १२० 'नराहेऽनिष्टपातास्या लिखित्वास्थापनेगृहे। जो व्यक्ति सँयभ होकर श्रद्धा सहित जो हो स्त्री छौं ठौ धों फों इस महामन्त्र का निरन्तर हृदय में ध्यान कर- ता है, उसके सब कल्याण के विधान होते हैं और सम्पूर्ण अ. रिष्ट ध्वन्श होते हैं और जो व्यक्ति अपने हाय से लाल फूलों की माला गूंथ कर, यह माला उक्त मन्त्र से सतवार अ. 4. on.. , 7 ७७ , कामरत्न तन्त्र भिमन्त्रित करके देवी को समर्पण करता है, वह जीवन पग्य न्त सुख भोगता है, संपूर्ण कामना सफल होती है और जि स गृह में यह महामन्त्र लिखकर रखा जाता है, उस गृह में किसी प्रकार का अनिष्ट नहीं होसकता ॥१७॥॥२०॥ अक्षराणामम्त्यवर्ण लिखित्वापञ्चधानधे । अधोरेफसमायुक्त मोद्धारशिरसंतथा ॥१२॥ इंकारेणचसम्पूज्य अन्तेफडक्षराश्वितं । कोंक्षी क्षों क्षीं क्षी क्षों फट । 'मम्रोऽयममरूपञ्च ध्यानंजापंतथैवच ॥१२२॥ सांस्यात्तदेगहेक्षेम सहस्रार्द्धस्यजापनात् । त्रैलोक्येतत्समोनास्ति नित्यंफलमवाप्नुयात्॥ .नितंसस्यद्यतेवासः पत्न्यापुत्रेणवान्धवैः ।.. ज्ञातिभिःसजनैश्चापिशत्रुभिश्चविवर्जितः१२) अन्यजन्मसुखीप्राणीशृणुदेविमहाफलं ।१२५॥ • महादेव पार्वती जी से कहते हैं कि हे देवि ? को भी श्री" इत्यादि मन्त्र मेरा स्वरूप है, यही मेरा ध्यान और जप जो व्यक्ति पांचशत बार इसका जप करता है, उसके घर --- ७८ कामरन तन्त्रा में कल्याण होता है, त्रिभुवन में उसकी समान कोई नहीं होसक्ती, और वह नित्यवांछिन फल लाम करता है। वह इ. स लोक में शत्रु हीन होकर पत्र, कलत्र, 'बन्ध बांधर और आत्मीय कुटुम्ब मे.परित होकर जीविका प्राप्त करता है और परलोक में महामुखी होता है ।१२।१२।१२।१२४१३१२५॥ श्वेताकमूलंपुण्यार्के समुद्धत्यविधारयेत् । वाहुभ्यांधारणात्तस्य तृनिष्टानिविशेषतः १२६ तदर्शनेननश्यन्ति डाकिनीप्रेतदानवः। 1: तद्भूपेनपलायन्ते श्रेताद्यादूरतोध्रुवं ॥२७॥ रविवार के दिन पुष्य नक्षत्र में सफेद आक को. जडला- कर बाहु में वांधने से सब प्रकार का अरिष्ट शान्त होता है, उस व्यक्ति के दर्शन मात्र से ही डाकिनी, प्रेत, दानवोदि, भाग जाते है और इसकी धूप देने से प्रेत प्रभृति दूर चले जाते हैं ॥१२६॥ ॥१२शा : : - पूर्वभाद्रपदेऋक्षे वन्दाकन्तुशिरीषज। संगृह्यशिरसिक्षिप्ते अभयभवतिध्रुवं ॥१२८॥ : पूर्वाभाद्रपद नक्षत्र में सिरस के वृक्ष का बन्दा लाकर जिस के मस्तक पर डाल दिया जाय, वह अंभय होता है। ।
कामरत्न तन्त्रा -- + 1 अथ ग्रह केश निवारणम तक्रपिष्ठेनतालेन लेपयेत्पुत्रिकाकृतीं। तामानायगृहायातिमक्षिकानात्रसंशयः १२९ छाछ के सङ्ग हरिताल पीसकर यह हरिताल एक कल्पि त पुतली के शरीर में लेप करके रखे। इसक देखने से घर की सर मक्खिये उस गन्ध से डरकर गृह से भागजाती हैं १२९ श्वेतार्कदुग्धकुल्मापं तिलचूर्णसमन्वितम् । अर्कपत्रेपुविन्यस्तं मूपिकान्तकरंगृहे ॥१३०॥ कांजी और तिल चूर्ण यह दो द्रव्य सफेद आक के दूध में मिलाकर उसको आक के पत्ते पर लेप करके घर में रख ने से उस घर मैं चूहे नहीं रहते ।।१३०।। तालकछागविन्मूत्रं पलाण्डंसहपेपयेत् । आलिप्यमूपिकतेन जीवितश्चविसर्जयेत् १३१ तंदृष्ट्वाचगृहत्यक्ता पलायन्तेहिमूपिकाः।१३२॥ हरिताल, अजामल, अज़ामूत्र, और प्याज यह सब द्रव्य एकत्र पोसकर एक चूहे के शरीर में लेप करने से उसकी मृत्यु होगी। इस पीछे उस मरे चूहे को चूहो के आने जाने ८० कामरव तन्त्र। के मार्ग पर रख देने से और मूपिकगण इस मृत चूहे के देख- ने मात्र से ही घर त्याग कर भाग जायगे ।।१३१।। ||१३२॥ गन्धकहरितालश्च ब्राह्मात्रिकटुकंसमं । छागलीमूत्रतःपिष्ट्वा लिप्तमूषन्तपूर्ववत् १३३ गन्धक, हरिताल, ब्राह्मो, मरिच, पीपल, और सोंठ यह सप द्रव्य सम भाग बकरी के मूत्र में पीसकर पूर्ववत् एक चूहे को देह में लेप करदेने से सब चूहे घर से दूर भागजाते हैं। मघायांवन्धकक्षेत्रे स्थापयेन्मधुकोद्भवं। मक्षिकामूपिकाणाञ्च जायतेतुण्डवन्धनं १३४ मघा नक्षत्र में सफेद आक की जड़ लाकर मुलेठी के सङ्ग मिलाय खेत में रखने से शस्य नाशक मक्खो और भूपकग- णों का मुख वन्द होजाता है ॥१३४॥ रोहिषतृणपुष्पन्तु वर्त्तिमध्येनिवेशयेत् । तदीपदर्शनादेव क्षिप्रनश्यन्तिमत्कुणाः १३५ वहेडे के वृक्ष का तृण और फूल वत्ती में प्रवेशित करके उसके द्वारा दीप जलाने से उस दीपक के देखने मात्र से ही खटमलों का नाश होजाता है॥१३५।।
कामरत्न तन्त्रा सोमराजस्यवृक्षस्य पल्लवाणवर्तिकां । कृत्वादीपंप्रकुर्वीत मत्कुणश्चविनश्यति १३६ सोमराज वृक्ष के पल्लव के अग्रभाग द्वारा बत्ती बनाकर उसका दीपक जलाने से खटमलों का नाश होता है ।।१३६॥ अर्कतूलमयींवर्ति भावयेत्तावकेनच । दीपंतत्कटुतैलेन निःशेषायान्तिमत्कुणाः१३७ आक के फल की तुला द्वारा बत्ती बनाकर इस पत्तो से आक का कड़वे तेल में दीपक जलाने से खटमलों का नाश होसा है ॥१३७॥ अर्जुनस्यफलंपुष्पं लाक्षाश्रीवासगुग्गुलं । श्वेतापराजितामूलं भल्लातकविडङ्गकं ॥१३८॥ धूपंसर्जरसोपेतं प्रदेयंगृहमध्यतः । सपश्चिमत्कुणामूपा गन्धादयान्तिदिशोयश ॥ अर्जुन वृक्ष का फल और फूल, लाक्षा, चन्दन, गल, सफेद पुष्पलता को जड़, भल्लातक, वायविडा, धूप, 'और सर्जरस इन सब वस्तुओं का चूर्ण कर एकत्र मिलाय और गू . । 'कामरन तन्त्र। घर में धूप देने पर उसकी गन्ध से सर्प, खटमल, मूषक इ. त्यादि दूर स्थान में चले जाते हैं.।।१३८।। १३९॥ गुड्श्रीवास-भल्लात--विडङ्ग-त्रिफलायुतं । लाक्षारसोऽर्कपुष्पञ्च.धूपोवृश्चिकसर्पहृत् १४० गुड़, चावल, भल्लातक, वायविडङ्गा त्रिफला, महावर और आक के फूल इन सब वस्तुओं को धूप से विच्छ और सर्प का विप नष्ट होता है ॥१४॥ सर्जरसकल्कमेदोऽर्जुनमूलमरुवककेतकनखविद्ध एतेषूपोरचितः कीटभुजगमशकमक्षिकादिहरः। राल, मांसरोहिणी, अर्जुन वृक्ष को जड, मरुवा, केतकी मूल, नखो, इन संघ द्रव्यों के द्वारा धूप देने से उस स्थान में कोट, सर्प, मच्छर, मक्खिये इत्यादि नहीं रह सकेतों ||१४१॥ इतिश्री नागभट्ट विरचिंत कामरल तन्त्र रुहेलखण्डन्तिर्गत बरेली निवासी ब्रह्मकुलभूषण पं० बांकेलालात्मज श्रीयुत पं: श्यामसुन्दर शम्मा विरचित भाषाटीकायां द्वितीय परिच्छेद समाप्तम् । .
कामरत्न तन्ना ८३ ॥ तृतीय परिच्छेद ॥ "" - . " अथ उच्चाटन विधिः। मङ्गलवारेरानोश्मशानाङ्गारकृष्णवस्त्रेणकृत्वा रक्तसूत्रेणसंवेष्ट्ययस्यगृहेपरिक्षिपेत् सप्ताहाभ्य- न्तरेतस्योच्चाटनंभवति ॥१॥ मङ्गलवार के दिन रात्रिकाल में कालेवस्त्र द्वारा श्मशा- नाङ्गार ग्रहणकर उसको लाल डोरे में बांधकर जिसके घर मैं फेंक दियाजाय, तो एक सप्ताह में उसका उच्चाटन होता है पञ्चांगुलंचित्रकस्य कीलंग्राह्यपुनर्वसौ। सप्ताभिमन्त्रितंगेहे खनेदुच्चाटनंभवेत् ॥२॥ मनस्तु । ऊोलोहितमुखेस्वाहा । अस्याष्टोत्तर सहस्रजपेनपुरश्चरणं॥ पुनर्वसु नक्षत्र में पांच अँगुल प्रमाण अण्ड का वृक्ष लाकर उक्त मन्त्र से सातवार अभिमन्त्रित कर जिसके घरमैं दाव कर रक्खा जाय, उसका ही उचाटन होता है। परन्तु अष्ठो.
८४ कामरत्न तन्त्र। त्तर सहसवार इस मन्त्र के जप से पुरश्चरण कर फिर इस प्र. कार करै ॥२॥ ख्यातमौडुम्बरंकीलं मत्रितंचतुरंगुलम् । तंयस्यनिखनेद्गृहे तस्योच्चाटनंभवेत् ॥३॥ मनस्तु । ऊों शिनिशिनी स्वाहा। चार अँगुल को वरावर गूलर को लकड़ो ले "डोंशिनि" इत्यादि मन्त्र से अभिमन्त्रित कर जिसके घर में दाबकर र- क्खो जाय, उसका हो उच्चाटन होता है। इसमें सन्देह नहीं ॥३॥ भरण्यासंगुलेकन्तु उलूकस्यास्थिकीलकं । सप्ताभिमत्रितंयस्य निखन्योच्चाटनं भवेत् ॥४॥ मनस्तु । ऊों दह दह हल हल स्वाहा। एक अँगुलिं प्रमाण उल्लू को अस्थि भरणी नक्षत्र में लाय उक्त मन्त्र से सातवार अभिमन्त्रित कर वह जिसके घर में दाबकर रक्खी जाय, उसका हो.उच्चान होता है ॥४॥ काकोलूकस्यपक्षांस्तु हुत्वामष्टाधिकंशतम्। यन्नाम्नामब्रयोगेन समस्तोच्चाटनंभवेत् ॥५॥ मनस्तु। नमोभगवतेरुद्रायहुंदंप्द्रोकरालाय कामरत्न तन्त्र। ८५ । अमुकंसपुत्रवान्धवेःसह हनहन दहदह पचपच शीघ्र उच्चाटयउच्चाटय हुं फट स्वाहा ठाठः। काक और उल्लू के पकों द्वारा उपरोक्त मन्त्र से अष्टोत्तर शतबार जिसके नाम से होम किया जाय, उसी व्यक्ति का उच्चाटन होता है,॥२॥ लेपयेत्काकपित्तेन कीलमंगुलसम्भवम् । निखनेद्यस्यभवनेतस्योच्चाटनंभवेत् ॥६॥ मत्रस्तु। ह्रीं दण्डिन्दण्डिन् महादण्डिन् नमोऽस्तुते ठाठः। एक अँगुलि प्रमाण एक कील पर काक के पित्त का लेप कर मूल लिखित मन्त्र से अभिमन्त्रित करके जिसके घर में यह कोल दावकर रक्खो जाय उसका उच्चाटन होता है ॥६॥ मृतकस्यपुरुपस्य निम्मील्यंचेलमेवच । प्रेतालयेसमागृह्य यस्यगेहेनिधापयेत् ॥७॥ अष्टम्याञ्चचतुर्दश्यां तथैवोच्चाटनंभवेत् ॥८॥ उधृतेन शान्तिः। अष्टमी अथवा चतुर्दशी तिथि में श्मशान में मृतक व्यक्ति - ८६ कामरत्न तन्त्र का जीर्ण वस्त्र और निमील्य लाकर जिसके गृह मैं दावकर रखा जाय, उसका उच्चाटन होगा। इन सब बस्तुओं के उ: खाड़ने से पुनः शान्ति होजाती है ॥७॥८॥ श्वेतलांगुलिकामूलं स्थापयेदयस्यवेश्मनि । निखन्यतुभवेत्तस्थ सद्योच्चाटनंध्रुवम् ॥९॥ सफेद कलिहारो की जड़ लाकर जिसके घर में दावकर रक्वै, तो उसको शीघ्र उच्चाटन होता है। इसमें सन्देह नहीं।। इतिश्री नागभट्ट विरचित कामरल तन्त्र रुहेलखण्डान्तर्गत बरेली निवासी ब्रह्मकलभूषणपंवांकेलालात्मज श्रीयुत पं० श्यामसुना शर्मा विरचित भाषाटीकायां तृतीयपरिच्छेदं समाप्तम्।
कामरत्न तन्त्र ८७ - ॥ चतुर्थ परिच्छेद ।।। अथ विद्वेषण विधिः- एकहस्तेकाकपक्षमुलुकृत्यतथापरे । मन्त्रयित्वामिलित्वाग्र कृष्णसूत्रेणवन्धयेत्।। अञ्जलिञ्चजलेचेव तपयेद्धस्तपक्षक । एवंसप्तदिनंकु-दष्टोत्तरशतंजपेत् ॥२॥ . -विद्देषोजायतेतत्र महाकौतुकमद्भुतम् ॥३॥ एक हाथ में काक के पक्ष और दूसरे हाथ में उल्लू के पक्ष ग्रहण पूर्वक महाभैरव का मन्त्र पढ़ इन दोनों पक्षों का अ- ग्रभाग एकत्र कर काळे सूत्र से वन्धन करै । अनन्तर जिनमें विदेप उत्पन्न कराना हो उनका नाम पढ़कर इन दोनों पक्षों को हाथ में ले जल से तर्पण करे। सातदिन इस प्रकार कर महाभैरव मन्त्र का एकसौभाउ बार पाठ करने से उन दोनों मनुष्यों में महाविद्वेष होजाता और महा अद्भुत कौतुक होना है | माजीग्मृपिकाविष्टा साध्यपुत्तलिकाकृता ।
८८ कामरत्न तन्त्र। नीलवस्त्रेणसंवेष्ट्य मन्त्रयित्वाशतेनच ॥४॥ विद्वेषोजायतेतत्र भ्रातरोतातपुत्रौ । मनस्तु।ॉनमोमहाभैरवायश्मशानवासिन्ये अमुकामुकयोर्विद्वेषंकुरुकुलकुं फट । " : विल्ली और चूहे के मल से दो पुतले बनाकर उनको नीले वस्त्र से ढककर जिन दो जनों में महाविद्वैप उत्पन्न कराना हो उनका नाम पड़कर महाभैरव मन्त्र में एकशत बार जप क- है। इस प्रकार करने से उन दोनों में महाविद्वेष उत्पन्न हो. ता है । इसके द्वारा दोनों भाइयों और पिता पुत्र में भीमहा विद्वेप उत्पन्न होसकता है ॥४॥ एकहस्तेकाकपक्ष मुलूकस्यतथापरे । दर्भणधारयेदयत्नात् त्रिसप्ताहंजलामलिं॥५॥ रक्ताश्वमारपुष्पैक मत्रयुक्तंजलाञ्जलिम् । नित्यनित्यंप्रदातव्य मष्टोत्तरसहस्रकम्॥६॥ परस्परंभवहेपः सिद्धयोगउदाहतः । ऑनमः : कटीटनीप्रमोटनीकौगोरीअमुकस्य अमुकेनसहकाकोलुकादिवत्कुस्कुरु स्वाहा। । -.
कामरत्न तन्त्र। एक हाथ में काक पक्ष, और दूसरे हाथ में यन व द- में सहित उल्लू का पस लेकर जिसमें ट्रेप उत्पन्न कराना हो उसका नाम उच्चारण कर उक्त मन्त्र पाठ पूर्वक एक एक लाल कनेर के फूल सहित अष्टोचर सहसयार जलाअलि दे । इस प्रकार प्रतिदिन करने से उनमें निःसन्देह देप उत्पन्न होता है। इति विद्वेषण विधि। SR- अथ व्याधिकरणं तन्निवारणंच ऊोंअमुकंहनहनस्वाहा । अनेनमन्त्रेणकटुतै- लोक्तंत्रिकटुजुहुयात्तदाशत्रु+धिरोभवति ॥७॥ कड़ये तेल में मिली हुई सोंठ, पीपल, और मरिच इन कई द्रव्यों को यदि शत्रु का नाम पढ़कर उक्त मन्न मे आई. ति दे, तो वही व्यक्ति वधिर होता है ॥७॥ भल्लातकरसेगुक्षां कुर्य्यादतिसुचूर्णितम् । क्षिपेदगानेभवेत्कुष्ठं सिताक्षीरैःपुनःसुखी। भिलावे के रस में चौटली को भलीभांति पीसकर जि- सके शरीर पर निक्षेप किया जाय, उसके हो,छा उत्पन्न होता है। किन्तु दूध के सङ्ग मधु,शर्करा अर्थात् शहत की ब- * कामरत्न तन्त्रा नो चीनी मिलाकर रोगी के शरीर पर लगाने से पुनवीर वह रोग शान्त होता है ॥८॥ वानरीफललोमानि विपंभल्लातचित्रकम् । गुञ्जायुतंक्षिपेदगाने स्याल्लुतोवेदनाम्विता।९। ऊशीरचन्दनञ्चैव प्रियंगूरक्तचन्दनं । तगरंपेखयेत्तोय लेंपाल्लुतादिनाशनं ॥१०॥ काछ के फल के रोम, विप, भिलावा, एरण्ड, यह सव वस्तु चौटलो के सङ्ग मिलाकर जिसके शरीर पर निक्षेप कि- या जाय; उसके शरीर में मकरी के विप की समान वेदना उत्पन्न होती है। किन्तु खस.की जड़ घिसकर उसमें चन्दन -फूल मियँगुलालचन्दा, तगर के फूल, यह समस्त जल में पीसकर गात्र में लेप करने से उक्त वेदना शान्ति होतो है.९१० शूकरपयतैललेपेन पानेनश्वेतकुष्टहृत् । ताम्बूलेइन्द्रगोपञ्च दत्वास्ये श्वेतकुछत् ॥११॥ 'शुअर का दूध और.तेल यहं दो द्रव्य एकत्र कर गात्र में लेप करने अथवा पान करने में सफेद अष्ट को शान्ति हो। ती है। इन्दगोर नामक लालरङ्ग का छोटा कोपा पान के स. मुख मैं रखने में सफेद कुछ उत्पन्न होता है ।।२।। ।
कामरत्न तन्त्र
"
करवीराकाष्ठेन तदादायसुचूर्णयेत् ।
खानेपानेऽपयेद्यस्य तस्यचक्षुःप्रणश्यति ॥१२॥
आई कनेर के काप्ट का चूर्ण करके जलके सङ्ग पान अ.
थवा अन्य वस्तु के सङ्ग जिसको संवन करा दियाजाय, वही
व्यक्ति अन्धा होता है ॥१२॥
ऊोंचामुण्डे हनहन दहदह पचपच अमुकं
गृहनगृहन खाहा।
अनेननिम्वपत्रंकुटुतैलेनमाध्यस्यनामगृहीत्वा
जुहुयात्सचाशुकुज्वरेणगृह्यते।अनेनलवणाहुति
मष्टसहस्रंजुहुयात् सशूलेनकुंज्वरेणगृह्यते ॥१३॥
जिसका नाम उच्चारण कर कडवे तेल में मिश्रित नीम
के पत्तों द्वारा उक्त मन्त्र से होम किया जाय, उसो को शीघ्र
दोप युक्त ज्वर रोग उत्पन्न होता है। और उक्त मन्त्र से आठ
हजार बार लवण (नमक) द्वारा होम करने से शूल और दोप
युक्त ज्वर रोग की उत्सक्ति होती है ।।१३।।
तालकंधूर्त्तवीजञ्च घनचूर्णन्तुभक्षणे ।
दत्तमत्तोभवेच्छत्रुःसिताक्षीरैःपुनःसुखी ॥१४॥
कामरत्न तन्त्र हरिताल और धतूरे के बीज यह दोद्रव्य भलोभांति ए. किन पीसकर शत्रु को सेवन कराने से वह पागल होजाता है। परन्तु उसको मिश्री और दूध का सेवन कराने से उसकी उन्मत्तता का विनाश होजाता है ॥१४॥ गोघृतंसैन्धवंतूलं वराहस्यचपित्तकम् । अजाक्षीरेणतद्योज्यं पानेनोन्मत्तनाशनम् १५ गाय का घी, सेंधानमक, और शुअर का पित्त यह तीन द्रव्य वरावर लेकर उसको बकरी के दूध में मिलाकर सेवन करने मे उन्मचता रोग कम होता है ।।१५।। इतिश्री नागभट्ट विरचित कामरत्न तन रुहेलखण्डान्तर्गत बरेली निवासी अग्रकुलभूषणबांकेलालास्मज श्रीयुत पं.श्यामसुमर वा विरचित भाषाटीकायां चतुर्थपरिच्छेद समाप्रम।
M कामरन तन्त्र। ॥ पञ्चमः परिच्छेदः॥ अथ मारण विधिः नरास्थिकीलकंपुष्ये गृह्नीयाच्चतुरंगुलम् । निखनेत्तुगृहेयाव त्तावत्तस्यकुलक्षयः ॥१॥ मन्त्रस्तु। ऊों ह्रीं फट् स्वाहा। सहस्त्रजपासिद्धिः चार अंगुल प्रमाण मनुष्य की अस्थि की कील पुष्य न. क्षत्र में लाकर जबतक किसी के घर में दावकर रखी जाय तबतक उसका बँश क्षय होता है। परन्तु उक्त मन्त्र हजारवार जप कर कार्य आरम्भ करना उचित है ॥२॥ सुरेश्वण्यस्वाहा । अनेनमन्त्रेण । सपीस्थ्यंगुलमात्रन्तु चाश्लेपायांरिपोहे। निखनेत्सप्तधाजतं मारयेद्रिपुसन्ततिम् ॥२॥ एक अंगुलि प्रमाण सर्प की अस्थि की कील आश्लेपा नक्षत्र में पूर्व मन्त्र से सातवार जपकर घर में दावकर रखने से शत्रु को सन्तान (सन्तति) का नाश होता है ॥२॥ अश्वास्थिकीलमश्विन्यां निखनेञ्चतुरंगुलम्।
कामरत्न तन्त्र । शत्रूगृहेनिहन्त्यांशु कुटुम्बवैरिणांकुले ॥३॥ मत्रस्तु।हुँहुं फट् स्वाहा। सप्ताभिमत्रितेनसिद्धिः चार अंगुल प्रमाण अश्व-अस्थि की कील पूर्व मन्त्र से सातवार अभिन्त्रित कर अश्विनी नक्षत्र में शत्रु के घर में दावकर रखने से कुटुम्ब और परिवार सहित वह, शत्रु शीघ्र शुमन भयन को गमनं करता है ॥३॥ ऊों डंडांडिंडीकुंडे.डोडौंडंडः अमुकं गृह्न गृड्न हुं हुं टाठ"अनेन नरास्थिकीलकं सहस्रा- सिमत्रितं चितामध्येनिखनेत्सज्वरेणनश्यति। अनेनमन्त्रेणमनुष्यास्थिकीलकं सहस्राभिम- त्रितयस्यगृहेनिखनेयस्यनाम्ना श्मशानेवानिख. नेत्तस्यनाशः स्यात् ॥५॥ उक्त मन्त्र से नरास्थि कील हजारवार अभिमन्त्रित कर के जिस व्यक्ति के नाम में चिता में दाधकर रखी जाय, उसको ज्वर रोग द्वारा नाश होता है ॥४॥ किम्या मनुष्यास्थि कील उक्तं मन्त्र से हजारवार अभि- मन्त्रित कर जिस व्यक्ति के घर में दविकर रखी जाय, .. क कामरन तन्त्र। r अथवा जिसं व्यक्ति के नाम से श्मशान में दावकर रक्खी जाय, उसका ही मरण होता है !!५!! :- आदीयांनिम्बवन्दाकं शत्रोःशयनमन्दिरे । निखनेनम्रियतेशत्रु रुधृतेचपुनःसुखी ॥६॥ तथाशिरीपवन्दाकं पूर्वोक्तेनोडुनाहरेत् । शंत्रोगेंहेस्थापयित्वा रिपोनीशोभविष्यति।। आदी नक्षत्र में नीम के वृक्ष का चन्दा लाकरं शत्रु के श- यन करने के स्थान में दावकर रखने से शत्रु को मृत्यु होती है। किन्तु उक्त वस्तु उखाड कर स्थानान्तर में डालने से य. ह दोप शान्त होता है। सिरस के वृक्ष का वन्दा आद्रा नक्ष. त्र में लाकर शत्रु के घर में रखने से भी उसकी मृत्यु होती है। कृष्णवृषभरक्तेन गङ्गामृत्तिकयासहः । तिलकंभालदेशेच कृत्वासम्भावयेत्तुयम् ॥८॥ विद्धास्यात्तत्क्षणादेव प्रोग्छितेचंशुभंभवेत्। काले बैल के खून में गङ्गाजी को मृत्तिका (रेणुका) मिला- कर ललाट में तिलक लगाकर जिसके सङ्ग प्रणय की जाय, वही शीघ्र विद्ध होता है। किन्तु तिलक छुटा डालने से फिर . + मङ्गलं होता है कामरत्न तन्त्र। : कृष्णच्छागाश्वपादस्य खुरस्थरोमकंहरेत् । कृष्णकुकुटकाकस्य ग्राह्यपक्षचतुष्टयम् ॥९॥ सर्वदग्ध्वातुभाण्डान्तस्तद्भमजलसंयुतम्। ललाटतिलकंकृत्वा वामहस्तकनिष्ठया ॥१०॥ यंशिरोनम्यतेतस्य वेधोभवतिनिश्चितम् ॥११॥ काले वर्ण को बकरो और घोड़े के खुर स्थित रुवें और काले मुरगे और काक के चार पक्ष, यह सब वस्तु एकत्र अ. नि में भस्म करके उस भस्म में जल मिलाकर वायें हाथ की कन अँगुलि द्वारा इसका ललाट में तिलक लगा शिर झुका कर जिसको प्रणाम किया जाय, वहीं व्यक्ति विद्ध होता है। वामदन्तंकुलोरस्य अयोभागस्यचाहरेत् । • शराग्रेकलकंफुपद्धनुश्चचितिजेन्धनैः ॥१२॥ गवांशिरांगुणंठत्वा शत्रुकु-चिमृणमयं । तहज्जातनवाणेन म्रियतेतत्क्षणाद्रिपुः ॥१३॥ फेरडे को याई सादका नीचे का दांत लेकर उस्मे तोर का फलका बनाये, चित्रक का धनुप बनाये धेनु की शिराका . --04 कामरत्न तन्त्रा इसमें डोरा डाले। फिर मिट्टो को मूर्ति शत्रु को बनाये, इस धनुष पर वही वाण चढ़ाय शत्रु को मूर्ति को वेबै, इसमकार करने से निश्चय तत्काल शत्र का दमन होवा है ॥१२॥ ॥१२॥ रिगुविष्ठांवृश्चिकञ्च खनित्वातुविनिक्षिपेत् । आच्छाद्यावरणेनाथ तंपृष्ठमृत्तिकांक्षिपेत् ॥१॥ म्रियतेमलरोधेन उधृतेनूपुनःसुखी । शत्रु का मल और बिच्छू, यह दो द्रव्य एकन कर एक ढके बरतन में रखकर मट्टी में दायकर रखने से शनु मल रोध रोग से मरजाता है। किन्तु उसको उखाड़ कर फैजद. ने से पुनर्गर शत्रु रोग से मुक्ति लाभ करता है ।।१४।। ॥अथ अवामारपाम् ।। कृष्णजीरकचूर्णेन अजिती धोनयति । तक्रेणक्षालयेचा सुस्योभवतिघोटकः ॥१५॥ काले जोरे के चूर्ण द्वारा घाडे के नेत्र में अजन लगाने से घोडा अन्या' होगाता है। परन्तु छा द्वारा ना धो देने से फिर अच्छा दोता है| 175c ९८' Ayumanand ... कामरत्न तन्त्रा 7. घाणेछुच्छुन्दरीचूर्ण दत्तेपततिघोटका सुस्थश्चन्दनपानेनं नासायान्तुनसंशयः ॥१६॥ मरी छुदरी सुखाय चूर्ण कर घोडे को सुगन्ध देने से घोड़ा शोघ्र गिरजाता है, और चन्दन जल के सङ्ग मिलाकर नासिका के छिद्रों द्वारा पान कराने से पनवार आरोग्यता लाभ करता है॥१६॥ अश्वास्थिकोलमश्चिन्यां कुर्यात्सतांगुलंपुनः। निखनेदश्वशालायां मारयेत्येवघोटकान् ॥१७॥ मवस्तु। औपचपचखाहा। उपयुतजपेसिद्धिः। अश्विनी नक्षत्र में, सात अंगुलि प्रमाण अश्वास्थि-कील ठाकर अयशाला में दावकर रखने से वहां के सब घोडे म- रजाते हैं। किन्तु प्रक्रियामल लिखित मन्त्र के दशहजार जप करने से होती है ॥१७॥ अथ रजकस्य वस्र नाश विधिः। ग्राहयेत्पूर्खफाल्गुन्या जातीकाष्ठस्यकीलकम्। अष्टांगुलप्रमाणन्तु निखन्याद्राजकेहे ॥१८॥ २. . an कामरत्न तन्त्र। ९९ शताभिमत्रितंतेन तस्यवस्त्राणिनाशयेत् ॥१९॥ ों कुम्भं स्वाहा। पूर्वाफाल्गुणी नक्षत्र में अष्टांगुलि प्रमाण जातो काष्ट को कोल लाकर मूल लिखित मन्त्र से एक शतवार अभिमन्त्रित करके धोबो के घर में दावकर रखने से उसके वस्त्रों का नाश होजाता है ।।१८। ॥१९॥ अथ धीवरस्य मत्स्य नाश विधि। संग्रामंपूर्वफाल्गुन्यां वदरीकाष्ठकीलकम् । अष्ठांगुलञ्चनिखने नाशयेद्धीवरेगृहे ॥२०॥ मनस्तु । ऊों जले वाहा। पूर्वाफाल्गुणी नक्षत्र में अष्टांगुल ममाण बेरी के काष्ट को कोल लाकर उक्त मन्त्र पाठकर धोवर के घर में दावकर र- खने से उसके जलाशय (तालाब) की मछलियों का नाश होजाता है ||२०॥ कृत्तिकायानर्ककाष्ठ कीलकंअंगुलंक्षिपेत् ।। शत्रोवापितडागादौमत्स्यस्तत्रविनश्यत्तिा२ १०० कामरव तन्त्र। कृतिका नक्षत्र में एक अंगुल प्रमाण आक के काष्ट की कोल लाकर शत्रु के तडाग अथवा, पुष्करिणी में डालदेने से उस जलाशय को सम्पूर्ण मलियों का नाश होजाता है ।।२।। अथ तैलिकस्त तैल नाश विधिः। मधुकाष्ठकीलन्तु चित्रायांचतुरंगुलं ।' निखनेतेलशालायां तैलंतत्रविनश्यति ॥२२॥ ओं दहदह वाहा। अनेनंमत्रेणसहस्रजपः। । मूल लिखित "जोंदहंदहस्वाहा” यह मन्त्र हजारवार ज. प कर चार अँगुल प्रमाण मुलेठी के वृक्ष की कील तेली के तेल गृह में दावकर रखने से उसके समस्त तेल का विनाश होजाता है,॥२२॥ भल्लातकाष्ठंचित्रायां निखनेत्तैलिकेगृहे। अष्टांगुलंतदातत्राग्राहकोनहिगच्छति ॥२३॥ चित्रा नक्षत्र में आठ अँगुलि प्रमाण मिलाने को काट ते. लो के घर में दायर रखने से उसके घर तेल का ग्राहक .. नहीं आम ॥२शा कामरन तन्त्र। F- अथ दुग्ध नाश विधिः। निक्षिपेदनुराधायां जम्बुकाष्ठस्यकीलकम् । अष्टांगुलंगोपगेहे गोदुग्धंपरिणश्यति ॥२४॥ अनुराधा नक्षत्र में आठ अंगुल प्रमाण के जामन की को ल लाकर ग्वालिये के घर में डाल देने से उसको गायों का सब दूध नष्ट होजाता है ॥२४॥ अथ शाक नाश विधि। गन्धकंचूर्णितंतत्र निक्षिपेजलमिश्रितम् । नश्यन्तिसर्वशाकानि शेषाण्यल्पवलानिच २५ जल सङ्ग गन्या का चूर्ण मिलाकर खेत में छिड़कने से वहां का सब शाक निस्तेज होकर क्रमसे ध्वन्श होजाता है २५ अथ ताम्बूल नाश विधि। नवांगुलंपूगकाष्ठ कीलकंनिक्षिपेद्गृहे । ताम्बूलिकस्यक्षेत्रेवा क्षेशतभिषाऽवये ॥२६॥ तदातस्यचताम्बूल नाशयत्याशुनिश्चितम् २७ , - :१०२ कामरत्न तन्त्र। शतभिषा नक्षत्र में नव अंगुलि प्रमाण सुपारी के काष्ट को कोल लाकर तैयोलो के घर अथवा खेत में डाल उसके ताम्बलों का नाश होता है, इसमें सन्देह नहीं २६ २७ . अथ मदिरा नाश विधिः। पोड़शांगुलकंकोलं कृत्तिकायांसितार्कजम्। शोण्डिकस्यगृहेक्षिप्त मदिरांनाशयत्पलम् २८ कृत्तिका नक्षत्र.मैं. सोलह अँगलि प्रमाण सफेद आक की कोल लाकर, शौण्डिक (अर्यात् कलार) के घर में डालने से उसको मदिरा का नाश होजाता है ॥२८॥ इति मारण। अथ काम्य सिंधिः। पुष्यातुसमागृह्य मूलंश्वेतार्कसम्भवं । अंगुष्ठप्रतिमांतस्य प्रतिमांतुप्रपूजयेत् ॥२९॥ गणनाथस्वरूपान्तु भक्त्यारक्ताश्वमारजैः। :: कुसुमैश्चापिगन्धादोर्हविष्याशीजितेन्द्रियः३० कामरत तन्न। पूजयेद्दाममन्त्रैश्च तद्दीजानिनमोऽन्तकैः । यान्यान्प्रार्थयतेकामान्मासैकेनतुतान्लभेत्। प्रत्येककाम्यसिध्यर्थ मासमेकंप्रपूजयेत् । गणेशवीजमाहापञ्चान्तकंडोअन्तरीक्षायस्वाहा।। अनेनपूजयेत्। ऊोह्रीपूर्वदयां जोह्रीफटस्वाहा। अनेनमन्त्रेणरक्ताश्वमारपुष्याणि घृतक्षारयुता- निजुहुयात्। वाञ्छितंददाति। ह्रीश्री मानसे सिद्धिकरि ह्रीं नमः। अनेनमन्त्रेणरक्तकुसुममेक जप्त्वानित्यंक्षिपेत् एवंलक्षंजपेत्। ततोभगवती वरदाअष्टगुणानामेकगुणंददाति। पुष्य नक्षत्र युक्त रविवार के दिन एक अँगुलि प्रमाण स- फेद आक को जड़ लाकर उसके द्वारा अंगुष्ठ प्रमाण गणेशजी को मूर्ति बनावे । फिर जितेन्द्रिय और हविग्यान्न भोगी हो- कर भक्ति सहित लालकनेर के पुष्प और गन्ध द्रव्यादि उप. हार द्वारा वीज मन्त्र से उसकी अर्चना करै। इस प्रकार कर ने से जिसकी जो वासना हो, एक मास में वह सफल हो- ती है। किन्तु प्रत्येक वासना की सिद्धि के लिये प्रतिवार एक . - १०४ कामरत्न तन्त्र। महीने तक इस मूर्ति की अर्चना करें "अन्तरीक्षायस्वाहा" इस मन्त्र से पूजा करनी कर्त्तव्य है। फिर “कोहीपर्खदयां फट्स्वाहा” इस मन्त्र से घृत और शहत मिलाकर लालकनेर के फूलों से होम में आहुति दे। इस प्रकार करने से ही दे. वता वांछा पूर्ण करते हैं। इसके अतिरिक्त प्रतिदिन "जोड़ों श्रीमानसेसिद्धिकरिहोंनमः” एक लाल पुष्प यह मन्त्र पढ़कर उसको निक्षेप करे । इस प्रकार से इस मन्त्र का एकलाख जप करने से वरदाता भगवती प्रसन्न होकर सब प्रकार के मनो- रथ पूर्ण कर देंगी ॥२९॥ ॥३०|| ॥३१॥ ॥३२॥ • 'अथ वाक् सिद्धिः कृत्तिकायांस्नुहोवृक्ष वन्दाञ्चधारयेत्करे । वाक्यसिद्धिर्भवेत्तस्य महाश्चर्यमिदंस्मृतं ३३ अनेनग्राहयेत्स्वाती नक्षत्रेबदरीभवं । वन्दाकंतत्करेधृत्वा यहस्तुप्रायंतेजनः।३४॥ तत्क्षणात्प्राप्यतेसव्वं मत्रमत्रैवकथ्यते। .. अन्तरीक्षाय स्वाहा। अनेनग्राहयेत् ॥३५
कामरत्न तन्त्र।
अव वाक्य सिद्धि कयन करते हैं। कृतिका नक्षत्र में
मूल लिखित मन्त्र से जप करके थूहर के वृक्ष का वन्दा हाथ
मैं धारण करने से वाक्य सिद्धि होती है। स्वांती नक्षत्र में
उक्त मन्त्र से बेरी के वृक्ष का बन्दा लाकर हाथ में धारण
करने से जिस जिस वस्तु को कामना की जाय, वही द्रव्य त.
सणात् माप्त होती है ॥३३॥ ॥३४॥ ॥३५॥
अथधन धान्यादि नामक्षय प्रकरणम्
वन्दाकन्तुमधाऋक्षे वहुवारकवृक्षजम् ।
धान्यागारेप्रदातव्य मक्षयंभवतिध्रुवम्॥३६॥
मघा नक्षत्र में बहुवारक वृक्ष का धन्दा लाकर धान्या-
गार में स्थापन करने से वहां का धान्य अक्षय होता है,
इसमें सन्देह नहीं ॥३६॥
शेफालिंकायांवन्दाकं हस्तायाञ्चसमुद्धरेत् ।
धान्यमध्येतुसंस्थाप्य तद्धान्यमक्षयभवेत् ३७
हस्त नक्षत्र में हारसिंहार का बन्दा लाकर धान्य में र-
खने से वह धान्य अक्षय होता है ॥३७॥
कामरत्न तन्त्र। ट . १०६. भरण्यांकुशवन्दाकं गृहीत्वास्थापये वुधः । सम्पूर्णधनधान्यान्तः स्थाकरोत्यक्षयंध्रुवं ३८ बुद्धिमान व्यक्ति भरणी नक्षत्र में कुशाका बन्दा लाकर धन धान्य में रखने से वह धन धान्यं अक्षय होता है, इस मैं सन्देह नहीं ॥३८॥ , उडुम्वरस्यबन्दाकं रोहिण्यांग्राहयेदवुधः । स्थापयेद्सञ्चितार्थान्तः सदाभवतिचाक्षयं ३९ ओनमोधनदायखाहा।मत्रेणमन्त्रितंकृत्वामन अत्रैवकथ्यते। 'बुद्विमान व्यक्ति रोहिणी नक्षत्र में गूलर के वृक्ष का बन्दा लाकर मूल लिखित मन्त्र से अभिमन्त्रित कर यह मन्त्र पाठ पूर्वक सञ्चित धन में रखने से वह अक्षय होता है ॥३९॥ अथ किन्नरी करणम् . अर्थात् . किन्नरी को समान मधुर कण्ठ ध्वनि करने का प्रकर्ण जातीपत्रंकणालाजा मातुलुङ्गदलंमधु । पलंलेाभवेन्नादः किन्नराधिकएवच 112010 कामरत्न तन्न। १०७ जाती वृक्ष के पत्ते, जोरा, खोलें, और विजौरा नोंव के पचे और शहत एकत्र मईन पूर्वक आठ तोला चाटने से कि- नर की अपेक्षा से भी उत्तम स्वर होता है ॥४०॥ शुण्ठीचशर्कराचैव क्षोद्रेणसहसंयुता । कोकिलखरएवस्याद् गुटिकाभुक्तिमात्रतः ४१ चीनी और शहत के सदसोंठ का चूर्ण मिलाकर गुटि- का करै । इस गुटिका का सेवन करने से ही कोकिला की स. मान कण्ठ का स्वर होता है ।।४।। निर्गुण्डीमूलचूर्णन्तु तिलतेलेनयोलिहेत् । कण्ठशुद्धीभवेत्तस्य किन्नरैःसहगीयते ॥४२॥ तिलों के तेल में निर्गुण्डो वृक्ष की जड़ का चूर्ण मिलाकर चाटने से वह किन्नर के सङ्ग गाने में समर्थ होता है॥४२॥ विभीतकंकणाशुण्ठी सैन्धवंत्वक्समंसमं... गोमूत्रेणपिवेत्कर्ष किन्नरैःसहगीयते ॥४॥ बहेड़ा, जोरा, सोंठ, सैंधा, और दाम्योनी तुल्य परि- माण लेकर गोमूत्र के सङ्ग मिलाकर दो तोला सेवन करने से कण्ठ स्वर ऐसा मधुर होता है कि वह पुरुप किन्नर के सन गान करने में समर्थ होजाता है ॥४॥ - १०८ कामरत्न तन्त्र। . . - अथं चक्षुष्य प्रकरणम्. श्वेतपुनर्नवामूलं घृतपिष्टंसदाञ्जयेत् । जलस्रावनिहन्त्याशु तन्मूलञ्चनिशायुतम् ४४ अञ्जनेनेत्ररोगानि.नभवन्तिकदाचन । सफेद विषखपरे की जड़ घी के सङ्ग पीसकर नेत्रों में अञ्जन लगाने पर आंखों से जल गिरने का रोग शान्त होता है। और यहो जड दारुहलदी के सङ्ग पोसकर जो व्यक्ति नेत्रों, मैं अञ्जन लगाता है, उसको कभी नेत्र रोग नहीं होता शम्बुकम्बावराटम्वा दग्धंशुष्कविचूर्णितं । अञ्जयेन्नवनीतेन हन्तिपुष्पंचिरन्तनं ॥४५॥ घोंगा या कौड़ी की भस्म का चूर्ण मक्खन के सङ्गमि- लाकर नेत्र में अञ्जन लगाने से नेत्र का पुरांना फूला नष्ट होजाता है ॥४५॥ वर्षाकालेकाकमाची समूलातेलपाचिता। खादेत्समासतश्चक्षु ध्रदृष्टिर्भवेत्समं ॥४६॥ वर्ण ऋतु में काकमाची नामक एक प्रकार का छोटा वृक्ष उत्पन्न होता है, उसको जह समेत तेल के सङ्ग पांक करके 1 कामरत्न तन्त्र। १०९ वह तेल एक महीने तक सेवन करने से गृद्ध की समान दृष्टि शक्ति उत्पन्न होती है ॥४६॥ अजस्यकृष्णमांसान्तः पिप्पलीमरिचंक्षिपेत्। कारयित्वाघृतेपाच्यं घटिकान्तेसमुद्धरेत् ४७ मध्वाज्यस्तन्यसंपिष्टं राज्यन्धहरमानं ॥४८॥ काली बकरी के मांस के बीच पीपल और मिर्च भरके एक घण्टा तक घी में पकाये। फिर इस पीपल और मिर्च को घी से निकालकर शहत, थो, और स्त्री के दूध के साथ मिलाकर घिसे । इसको आंख में लगाने मे रतौंधा जाता रहता है ॥४७॥ ॥४८॥ जयन्तीचाभयावाथ पिष्ट्वास्तन्यैनिशारुहत् । शोणितंचर्मकोपञ्च मांसवृद्धिश्चनाशयेत् ।।९। हरीतकी (हरड) अथवा जयन्तो के बीज स्तन के दूध मैं पीसकर आंखों में अञ्जन लगाने से रतोंघा, नेत्रों से ज. लसाव, चर्म कोप, और मांस बृद्वि आदि रोग का नाश होता है ॥४९॥ हरीतकीवचाकुष्ठं पिप्पलीमरिचानिच। .
कामावतन्त्र * ११० विभीतकस्यमज्जाच शयनाभिर्मन:शिला ५० सर्वमेतंसमंकृत्वा छागोक्षीरेणपेषयेत् । । नाशयेत्तिमिरंकण्डं पटलान्यर्बुदानिच ॥५१॥ अधिकानिचमांसानियस्यरात्रौनपश्यति '. अयिद्दिवार्षिकपुष्पं मासेमैकेननाशयेत् ॥५२॥ वर्तिश्चन्द्रोदयानाम नृणांदृष्टिप्रसादिनी। छायाशुष्कावटीका- नामचन्द्रोदयावटी ५३ हरीतकी, वच, कूठ पीपल, मिर्च, बहेडे को मज्जा, ना. मिशन, मनशिला, यह सब द्रव्य एक भाग लेकर बकरी के दूध माँ मर्दन पूर्वक गोली बनाय छाया में सुखाचे । इस गो- लोको चन्द्रोदया वर्ति कहते हैं । इसके द्वारा नेत्र में अञ्जन लगाने से.चक्षुतिमिर रोग, खुजली, पलट.अर्बुद, अधिकमां: स दृद्धि, रात्रि में न दोखना, इन सब का नाश होजाता है यह महौंपधि एक मास तक व्यवहार करने से दो वर्ष के फू- ले का नाश होता है, इस चन्द्रोदयावर्ति के द्वारा दृष्टि को प्र. सन्नता होती है, ॥५॥॥५॥ ॥५२॥॥५३॥ यस्त्रैफल्वंचूर्णमपथ्यश्वर्जी सायंसमनातिहवि . A कामरत्न तन्त्रा । मधुभ्यांसमुच्यतेनेत्रगतैर्विकारै त्यैर्यथाक्षीण धनोमनुष्यः ॥५॥ जो मनुष्य कुपथ्य त्यांगकर सन्ध्या के समय घृते और शहत मिश्रित त्रिफले का चूर्ण सेवन करता है, वह दरिद्रो के लिये भृत्य को समान सब प्रकार के नेत्र रोग से छूटनाता है ५४ वधिरतानाशनं कीटविनाशनं श्रुति शक्ति वृद्धि करणंच दशमूलकपायेण तैलप्रस्थंविपाचयेत् । एतत्कल्कंप्रदायैव वाधिय्यॆपरमौषधं ॥५५॥ दशमूल के काढे के साथ एक अन्श तेल डालकर अच्छो मकार पाक करे। पाक के समय पुनवीर दशमूल डालकर सि- द्ध करें। इस प्रकार जो औपधि होती है, उससे वधिरता का नाश होता है * ॥५॥ मनःशिलापामार्गोऽथ मूलंचूर्णमधुप्लुतं । *बल, पलाश कम्भारी यारुल, गणियारी दाल्पााण, चाकल्या सेमा गोखरू, व्याकुड, इमकाही नाम दशमूल है।
११२ कामरख तन्त्र। 1 . भक्षयेत्कर्षमात्रन्तु वधिरत्वप्रशान्तये॥५६॥ मनशिल, चिरचिरे को जड़ का चूर्ण शहत में मिलाकर | उसको दो तोला सेवन करने से बधिरता दूर होती है। लशुनामलकतालं पिष्ट्वातैलेचतुर्गुणे । ', '. तेलाच्चतुर्गुणंक्षीरं पाच्यतेलावशेषितं ॥५७॥ तत्तैलंनिक्षिपेत्कणेवाधिय॑ञ्चविनाशयेत् ५८ लहसुन, आमला, हरिताल, यह तीन बस्तु सम भाग ले. कर सब द्रव्यों से चतुर्गुण तेल सङ्ग यह सब द्रव्य मर्दन करै अनन्तर तेल से चतुर्गुण दूध के सङ्ग यह सब द्रव्य पाक क- । जब दूध जलकर तेल मात्र बाकी रहै, तो यही तेल कान में डालने से बधिरता दर होतो है जांदा । दन्तेनचर्वयेन्मूलं नन्द्याव-पलाशयोः। 'तन्नालीपूरितेकणे धुवंगोमक्षिकांब्रजेत् ॥५९॥ तगर, और ढाक के वृक्ष को जड़ दातों से चावकर वह चर्चित वस्तु अथवा उसका रस कानों में डालने से गोमति- का नामक कोडे का बिनाश होता है दि| नीलीबंधरसेतैलं सिद्धकाञ्जिकसंयुतं ।
कामरत्न तन्त्र। कदुश्चपूरणात्कणे निःशेषक्रमिनाशनः॥६०॥ नोलो आक वृक्ष को जड़ कांजी के सङ्ग मिलाकर तेल मैं पाक करके गर्म रहते रहते कान में डालने से कोड़ा नष्ट होता है ॥६॥ . वराहोत्थेनतैलेन लेपात्कर्णविवर्द्धयेत् । चर्मचटकरक्तेन लेपात्कर्णविवईयेत् ॥६१॥ शूकर का तेल अथवा चिडे के रक्त द्वारा कान में लेप म. दान करने से कानों की शक्ति बढ़ती है बंशा अश्वगन्धावचाकुष्ठं गजपिप्पलिकासमं । महिषीनवनीतेन लेपात्कर्णविवर्द्धते ॥६२॥ असगन्ध, वच, कूठ, गज पीपल, यह सव द्रव्य वरावर लेकर चूर्ण करके भैंस के मक्खन में मिलाकर कानों में लेप करने से श्रुति शक्ति की वृद्धि होती है ॥१२॥ सिद्धार्थवृहतीचैव ह्यपामार्गसमंसम । छागीक्षीरेःप्रलोपोऽयं कर्णपालीविवद्धयेत्।६३। सफेद,सरसों, इती, और चिरचिरे को जद यह सब समभाग लेकर मर्दन पूर्वक बकरी के दूध में मिलाकर कानों में लेप करने से कर्णपाली की वृद्धि होती है ॥६॥ -- .
११४ कामरन तन्त्र। ॥ दन्त दृढ़ीकरणम्॥ 'ताम्रपात्रेक्षणंपाच्य मभयाचूर्णकंमधु । पिष्ट्वाचगुटिकाका- दन्तैधा-क्रमिहरेत् ६४ हर्द का चूर्ण शहंत के सङ्ग मिलाकर तांबे के बर्तन में थोड़ो र पाक करे । अनन्तर भलो मकार पीसकर गोली ब- नायें । यह गोली.मुख में धारण करने से दांत के कीडे का विनाश होजाता है ।।६४॥ दन्तेधीय॑स्नुहीमूलं क्रमिनाशंकरोत्यलं । कासीसंघृतसम्पर्क धाय्यदन्तेव्यथापहम्॥६५॥ • कसीस के वृक्ष की जड दांतों में स्थापन करने से दांत के कोडे का नाश होता है। कसीस को घृत में मँनकर जिस दांत मैं चेदना हुई है, उसी में धारण करने से दांतों को व्यथा दूर होतो है ॥६॥ जातीकोलंकपत्रंवा चव्वयेत्प्रातरुत्थितः । स्थिराःस्युश्चलितादन्तास्तत्काष्ठेर्दन्तधारणात्६६ जातो वृक्ष के पत्ते, वा मरिच के पसे, मातकाल के समय चाबकर इन्हीं क्षों को शाखा द्वारा दतोन करने से चलित दन्त पुनगर बद्धमूलं होते हैं ॥६६ii कामरत्न तन्नः। ११५ उद्धृतदन्तस्थिरकर कार्यवकुलचर्वणं । वकुलस्यचवीजन्तु पिष्ट्वाकोष्णेनवारिणा।६७। मुखेचधारयेद्धीमान् दन्तदाएकरपरं । .जो दांत उखड़ने को होगया हो, मौलसिरी के फलं चा- पर्ने से वह मजबूत होजाता है। मौलसिरी के बीज कूट कर जल मैं पकाये, उसके पानी का कुल्ला करने से भी दांत ह- दे होते हैं ॥६॥ वकुलस्यत्वचाक्वाथ मुष्णरक्तेणधारयेत् दृढ़ास्युश्चलितादन्ताः सप्ताहानात्र संशयः ६८ मौलसिरी के वृक्ष को छाल जल में पाक करके उस गर- म काय का सातदिन कुल्ला करने से चलित दन्त पुनर्गर वद्धमूल होते हैं ।।६८ .: ।। सर्प विदया। ब्राह्मणाः श्वेतवास्तु क्षत्रियारक्तवर्णका। वैश्यास्तुपीतवास्युः कृष्णवर्णास्तुशूद्रकाः ६९ सफेदवर्ण का सर्प ब्राह्मण जाति, लालवर्ण का क्षत्रिय, कामरन तन्त्रा . . ११६ पीलेवर्ण का वैश्य और कालेवर्ण का सर्प शूद्र जाति का क- हा गया है.॥१९॥ अनन्तःकुलिकश्चैव वासुकिाशलपालकः। : तक्षकश्चमहापद्मः कर्कोट पद्मएवच ॥७॥ कुलनागाष्टकंह्येतत् तेषांचिह्नशिवोदितम् ७१ नांगकुल आठ प्रकार का है:-अनन्त, कुलिक, वासुकि, शङ्खपालक, तक्षक, महापद्म, कर्कोट, और पद्म । शिव जी ने इन आठ.प्रकार के नागों के जो समस्त पृथक चिन्ह कीर्तन किये हैं, , वह नोचे लिखे जाते हैं ॥७०।। |७|| श्वेतपद्ममनन्तस्य मूर्द्धनिपृष्ठेचदृश्यते। शङ्कुशेषस्यशिरसि वासुके पृष्ठउत्पलम्॥७२॥ त्रिनेत्राङ्कस्तुकर्कोट स्तक्षकःशशकाङ्कितः। ज्वलत्रिशूलचन्द्रार्द्ध शङ्खपालस्यमूर्द्धनि।७३। राजवत्तुसमोविन्दु महापद्मस्यपृष्ठतः । पद्मपृष्ठेचदृश्यन्ते सुरक्ताःपञ्चविन्दवः ॥७॥ एवंयोवेत्तिजात्यादीन नामचिह्नशिवोदितम्। तस्यमत्रौषधान्येव सिध्यन्तेनान्यथापुनः ७५ .
११७
कामरत्न तन्त्र।
दूरतस्तस्यसपीद्याः पतन्तिगरुडेयथा ।
कालाख्यानामतचिन्ह शिवोनोक्तंयथापुरा ७६
मस्तक और पीठ पर श्वेत पद्म चिन्ह होने से अनन्त,
मस्तक पर शत का चिन्ह होने से कुलिक, पीठपर कमल का
चिन्ह होने से वासुकि, अङ्क में त्रिनेत्र का चिन्ह होने से
कोट, गात्र में शशकाकृति चिन्ह होने से तक्षक, शिर में
त्रिशूल और अर्द्धचन्द्राकार चिन्ह होने मे शवपाल, राजवत्
बिन्दु पीठ में होने से महापद्म, और पीठ में रक्तवर्ण पञ्चवि
न्दु चिन्ह होने से पद्मनाग कहते हैं। इस प्रकार चिन्ह देख
कर जो व्यक्ति शिवोक्त सर्पगणो की जाति और नाम जा
नने में समर्थ होता है, उसके ही मन्त्र और औपधि सफल
होती है और गरुड़ के समान उसके दर्शन मात्र से ही सर्प-
गण दूर प्रस्थान करते हैं।७२।।७३।७४/७५।१७६।
ज्ञेयोदशविधोदंशो भुजागानांभिषग्वरैः।
भीतोन्मत्तःक्षुधातश्चआक्रान्तोविपदर्पितः७७
आहारेच्छुःसरोपश्च खस्थानपरिरक्षणे।
नवमोवैरिसन्धानो दशमःकालसंज्ञकः॥७॥
। . १ -- ११८ कामरन तन्त्र। सर्पगणों के दांत दशमकार के हैं, यथा-भात, उन्मत्त, क्षुधात, आकान्त, विपदर्पित, आहारच्छ, रोषयुक्त, अपने स्थान की रक्षा करने में चेष्टित, बैरो के हँढने में यनवान, और काल ॥७७७८. उद्यानेजीर्णरूपेच वटशृङ्गाटचत्वरे । शुष्कवृक्षेश्मशानेढ प्लक्षश्लेष्मातशिग्रुके ।७९), १" देवतायतनागारे तथाचशाकवृक्षके, एपुस्थानेषुयेदष्टा स्तेनजीवन्तिमानवाः॥८॥ ; वांग में, पुराने कुए पर, वट वृक्ष पर, सूखे वृक्ष पर, इम- शांन में, पाकद के वृक्ष पर, देवमन्दिर, और शाक वृक्ष पर इन सब स्थानों में काटने से मनुष्य की मृत्यु होती है ७९८० भ्रूमध्येचाधरेमूर्द्धनि जंघेनेत्रेभ्रुवोस्तथा। ग्रोवांचिवुकंकण्ठेषु करमध्येचतालुके ॥८१॥ स्तनयो स्कन्धयो कुक्षौ लिङ्गवृषणनाभिषु । मर्मसन्धिषुसर्वत्र सर्पदंष्टोनजीवति ॥८२॥ भ्रूमें, अधर, शिर, जवा, चक्षु, दोनों भौए, ग्रीवा, ठोड़ी, कण्ठ, हाथ, तालु, स्तन, कन्या, कोख, लिङ्ग, अण्ड- , कामरत्न तन्त्र कोप, नाभि, मर्म, और संन्धि स्थान में यदि सर्प काटे, तो वह मनुष्य शमन भवन में गमन करता है || ||८|| रखौभौमेशनिवारे सर्पदष्टौनजीवति अष्टमीपञ्चमीपूी अमावस्याचतुर्दशी ॥८३॥ अशुभास्तिथयःप्रोक्ता सर्पदष्टविनाशिकाः । रवि, मङ्गल, और शनिवार के दिन सांप के काटने से निश्चय मृत्यु होती है। अष्टमी, पञ्चमी, पूर्णिमा, अमावश, च- तुर्दशी तिथि को काटने से भी यही फल जानना चाहिये ८३ कृत्तिकाश्रवणामूला विशाखाभरणीतथा । .. । पूवीस्तिस्रस्तथाचित्रा श्लेषादष्टोनजीवति८ कृत्तिका, श्रवण, मूला, विशाखा, भैरणी, पूर्वीपाढ़, पू वीभाद्रपद, पूर्वाफाल्गुणो, चित्रा और अश्लेपा, इन सब न- क्षत्रों में काटने से उसके जीने की आशा नहीं है ॥८४॥ मध्याह्नसन्ध्ययोश्चैव अर्द्धरात्रेनिशात्यये। कालवेलावारवेला-सर्पदष्टोनजीवति ॥८५॥ मध्याह्न, दोनों सन्ध्या के समय, आधीरात, रात्रि के अ. न्त में कालवेला और वारवेला में जिसको सर्प काटता है, व हनहीं जीता है ॥८॥ -- १२० -- " कामरन तन्त्र सर्पस्यतालुकामध्ये दन्तोयोऽकुशसन्निभः । विमुञ्चतिविषंघोरं तेनाषंकालसंज्ञकः ॥४६॥ विप के दांत सर्प के ताळु में रहते हैं। उनके द्वारा सर्प कालकूट विष बाहर निकालता है। वहीं विष प्राणनाशक है, इसी कारण उसको कालस्वरूप कहा जाता है ॥८६॥ चक्राकृतिश्चवादशः पक्वजम्वुफलाकृतिः । 'सुनीलःश्वेतरक्कोवा त्रिदशोऽपिनजीवति ८७ जिस स्थान में सर्प काटे, वह थल'चक्राकृति, पाप की जामन की आकृति, वा नील, सफेद अथवा लालवर्ण होने से उस रोगो की रक्षा करने में देवता भी समर्थ नहीं हैं।८७ वेदनादशमूलेवा नष्टदशोऽथवाभवेत् तत्क्षणातीब्रदाहश्च सोऽपिकालेनभक्षितः८८ जिस स्थान में दांत लगे, वह स्थल अत्यन्त वेदना युक्त. होने से वा दांत के चिन्ह न दीखने से और काटने पर ही बदन में तीनदाह होने से वह मनुष्य मरजाता है ||४८॥ सेंचनादुदकेनाथ शीतलेनमुहम्मुहुः रोमाञ्चोनभवेद्यस्य तंविद्यात्कालभक्षितम्।८९॥
4 ' . कामरत्न तन्त्र। १२१ बारम्बार शीतल जल का छोटा डालने से भी यदि सर्प के काटे रोगी को देह पुलकित न हो, उसको शमन गृह में गमन करना होता है॥८९॥ स्रवेन्मूत्रपुरीषंवा हृच्छूलंछदिदाहकृत् । सानुनासिकयावाक्यं सन्धिभेदमथापिवा ९० ताम्राभनेत्रयुगलं अथवाकाकनीलकम्। वियोगोदेवदष्टाख्यस्तंविद्यात्कालपार्श्वगम्९१ सर्प से काटे हुए मनुष्य के मृत्यु लक्षण, यथा-मलमूत्र त्याग, हृदशूल, वमन, गानदाह, नाक के स्वरों से वात क- रना, सन्धिस्थल में वेदना, और दोनों ने ताम्रवर्ण अथवा नोलवर्ण ||९०॥ ॥९शा सोमंसूर्यंतथादीप्त नपश्यतिचतारकन् । दर्पणेसलिलेवाथ घृतत्तैलेथवामुखम् ॥१२॥ नपश्येद्दीक्ष्यमाणोऽपि कालदष्टोनसंशयः ९३ सर्प के काटने पर रोगी के नेत्रों से यदि चन्द्र, सूर्य, न- क्षन न दी और दर्पन, पानो, घृत अथवा तेल में अपना मुख न दोखे, तो उसे काल के गाल में जाना होता है, इस में संशय नहीं ॥९२॥ ॥९॥ - १२२ कामरत्न तन्त्र. ज्ञात्वाकालमकालञ्च पश्चाद्भेषजमाचरेत्। सर्पदंशेविषनास्ति कालंदष्टोनजीवंति ॥९४॥ तस्यतत्रापिकर्त्तव्या चिकित्साजीवनावधि । रसंदिव्यौषधीनाञ्च प्रभावात्कालजिद्भवेत् ९५ सर्प से काटे रोगी की अवस्था जानकर -पोछे औषधि प्रयोग करें। काटने पर ही जो शरीर विषाक्त हो, यही न- हो, वरन काल दँशन से मृत्यु निश्चय होती है, परन्तु तो भी जीवनावधि चिकित्सा करनो उचित है, क्या रस और दि- ज्य औषधियों के प्रभाव से काल पराजित नहीं होसकता है। सर्प विषौषधि कथनम् श्वेतापराजितामूलं देवदानीयमूलकम् । वारिणापेपितंनस्य कालदष्टोऽपिजीवति ९६ जल के सङ्ग सफेद विष्णु कान्ता और बड़ी तोरई की जद,पोसकर हुलास सूंघने से सर्प से काटा हुआ रोगी आ. रोग्यता लाभ करता है ॥१६॥ दधिमधुनवनीतं पिप्पलीशृङ्गवेरं...
१२३. r कामरत्न तन्न। मरिचमपिचकुष्ठं चाष्टमसैन्धवञ्च । . यदिदशतिसरोषस्तक्षकोवासुकिनी यमसदनगतःस्या दानयेत्तत्क्षणेन ।९७। दहो, शहत, मक्खन, पीपल, अर्दक, गोलमरिच, कठ, और सेंधा यह आश्वस्त सेवन करने से क्रुद्ध तक्षक वा वासको कर्तृ दष्ट व्यक्ति भी तत्क्षणात् यमालय से लौट आता है।९७१ कटुकीमपलीमूलं पीत्वातोयेविपापहः। वृश्चिकावीरणामूलं लेपात्सर्पविषापहम्।९८॥ जल के सङ्ग कुटकी और तालमूली चूर्ण मिलाकर सेवन करने से सर्प का विष ध्वन्श होता है । वोछू का भी खसकी जड़ पीसकर लेप करने से विप नाश होता है ॥९॥ सोमराजीवीजचूर्णं सकृदगोमूत्रभावितम्। चराचरविषघ्नन्तं मृतसञ्जीवमंपिवेत् ॥९९॥ गोमूत्र में सोमराजी के वोज के चूर्ण की भावना देकर लेने से वह मृत्यु सञ्जीवनी को समान होती है । इस औष- धि का सेवन करने से स्थावर जङ्गम दोनों का विषध्वन्य होता है ।।९९॥ .
. १२४ कामरत्न तन्त्र। गोमूत्रैर्नरमूत्रेवी पुराणेनघृतेनवा । हरिद्रापानमात्रेण विषहन्तिचराचरं ॥१०॥ दशवर्षात्परंसर्पिः पुराणमितिकथ्यते । गोमूत्र, नरमूत्र, अथवा पुराने घो में हलदी मिलाकर सेवन करने से सम्पूर्ण स्थावर जङ्गम का विष नष्ट होता है। दशवप से अधिक दिन का घृत होने से ही उसको पुरानायी कहते हैं ॥१००। यदिसर्पविषातीनां सर्वस्थानगतंविर्ष। 'गोक्षीरैरजनीकाय पिवेत्सर्प विपापहम् १०१ सर्प से काटे हुए व्यक्ति को सर्वदेह विषाच्छन्न होने पर गाय के दूध सहित हलदी का कादा सेवन करने से आरोग्य- ता लाम करता है ॥१०॥ गोक्षीरैरजनीकुष्ठं क्वाथ्यमा विषापहम् । . हरिद्राकुष्ठमध्वाज्यं भुक्तसर्वविषापहम् १०२ इलंदी और कूठ इन दोनों का काढ़ा गाय के दूध में मि- लाकर सेवन करने से विषध्यंन्श होता है। हलदो, कूठ, श. हत, और घृत, यह सब द्रव्य एकत्र कर सेवन करने से सब प्रकार का विष नष्ट होता है ॥१०२॥ .
कामरत्न तन्न। १०५ कटुकीजम्बुमूलम्वा तक्राम्लैव्वीपिवेजलेः । तत्क्षणाहमयेच्छीघ्र विषयोगादिमुच्यते १०३ देह में विप के पहुँच जाने पर कुटकी फल अथवा जामन को जड़ खट्टे मछे के सङ्ग पोसकर जलके सङ्ग सेवन करने से तत्काल वमन होकर देह स्वस्थ होतो है ॥१०३।। कुंकुमालक्तकंलोभ्रं शिलाचैवाथरोचना। गुटिकालेपनात्द्धन्ति विषस्थावरजङ्गमम् १०४ रोली, महावर, लोध्र, मनशिल, और गोरोचन, यह स- व द्रव्य एकत्र पीसकर गोली बनाये । देह में विप पहुँचजा- ने पर इस गोली का लेप करने से स्थावर, जङ्गम दोनों का विपश्चन्श होता है ।।१०४॥ पिप्पलीमरिचंकुष्ठं गृहधूमत्मनःशिलाम् । तालकंसर्षया श्वेता गवांक्षीरेणलाडयेत् १०५ गुटिकाअननस्येन पानाभ्यानलेपनात् । तक्षकेनापिदष्टस्य निर्विषीकुरुतेक्षणात् १०६ पीपल, मरिच, सुद, गृहयूम, मनशिल, हरताल और स. फेद सरसों, यह सब वस्तु एकत्र कर गाय के दूध में अच्छी १२६ कामरत्न तन्त्र। प्रकार मईन करै। अनन्तर उसका अञ्जन, नस्य (हुलास) अ-' भ्यङ्ग और शरीर-पर लेप करने से तक्षक दष्टरोगो शीघ्र आ- रोग्य होता है ।।१०।।।१०६|| अपराजितामूलन्तु घृतेनत्वग्गतंविषम् । पयसारक्तगंहन्ति मांसगंकुष्ठचूर्णतः ॥१०७॥ अस्थिगरजनीयुक्तं मेदोगंकाकलीयुतम् । मजागपिप्पलीयुक्तं चण्डालीकन्दसंयुतम् १०८ शुक्रगहन्तिलोहितं तस्मादेयापराजिता १०९ अपराजिता की जड़,घी में मिलाकर सेवन करने से च- मंगत विपध्वन्श होता है, अपराजिता की जड़ दूध के सङ्ग सेवन करने से रक्तगत-विप होता है । कुड़ के चूर्ण सहित उसका सेवन करने से मांसगत-विप, हलदी के सङ्ग सेवन करने से अस्थिगत-विष, काकलो के सङ्ग सेवन करने से मे- दोगत-विष, पीपल के सङ्ग सेवन करने से ममागतं-विप, और चाण्डाली को जड के सङ्ग सेवन करने से शुक्रगत-वि- पदूर होजाता है। अतएवं देह विष सँयुक्त होने पर हो अ- पराजिता की जड़ का प्रयोग करना कर्तव्य है ।१०७१।१०९। 1 अत्यन्तविपरोगातीन् जलमध्येविनिक्षपेत् ११० १२७ . कामरनन्नि। सर्पदष्टः रोगी को जल में डालने से भी विशेष फल दि. खाई देता है||१०ffferts Tara मसूरनिम्बंपत्राभ्यां खादेन्मेपंगतेरी। अब्दमेकंनभीतिःस्या हिपातस्यनसंशयः१११ । मेपःको सँक्रान्ति के दिन, मसूर और नीम के पत्ते सेवन करने से-एकवर्ष तक किसी प्रकार के विसोक्ताजन्तु का भ- य नहीं रहता ॥११ मसूरंनिम्बपत्राभ्यां योऽत्तिमेषगतेखो। अतिरोपान्त्रितस्तस्य-तक्षका किंकरिष्यति ११२ बैशाख के महीने में मसूर और नीम के पत्ते सेवन करने से अत्यन्त ऋद्र तक्षक भी उसका कुछ अनिष्ट नहीं करसक्ता। इति सर्प विष निवारण विधिः । अथ वृश्चिकं विप नाशन शिरीषवीजंगोमेदं दाडिमस्यचमूलकम् ।। अर्कक्षारयुतंहन्ति धूपोवृश्चिकजंविषम् ॥११॥ सिरस के वोन, गोमेद, और दाडिम की जड़ आक-के + . कामरंगतन्त्र दूध में मिमंकर भूप देने में पीडू का विष दूर होता है? हिंगचजललेपेन वृश्चिकोत्थंविषहरेत् ॥११॥ जल में हींग पीसकर,दष्ट स्थान में लेप करने से विष नष्ट होता है.mi कापसमूलंचर्चिवा विषजित्केणकूसकृते ११५ - कपास की जर दांत में वांवकर हरिकदष्ट रोगों में का नमें फूंक मारने से रिष दूर होता है ॥१५॥ सिक्यकसप्तधाभाव्यं स्नुहमपयसातपे । उत्तवहनिनास्पष्ट देशस्थाने विषहरेत् ॥११॥ किश्चित् सिम्य अर्थात् मोम लेकर यूहर और आक के में सातबार भावना है। अनन्तरं उसको अनि में तप्त करके दृष्ट स्थान में लगाने से दृषिक' का विप दूर होता है ११६ पुत्रजीवफलान्मजां पलाशोत्थंकरखजाम् । मजातोय प्रलेपोयं हन्तिवृश्चिकजंविषम ११७ ओरित्रिका, पलाश, और करज, इन समस्त फलों के पौगों की मजा जलमें मईन कर निकदष्ट स्थान में पक. रने में विध्वंस होता है ||१७||
क
कामरत्न तन्त्र।
: वकुलत्वचवीजंवा निष्पीडादशनस्थले ।
प्रलेपादवृश्चिकविष नाशनचाभिमत्रितं ११८
ओं झंडेंयंजवलक्ष ए ऐ ओ औ हहः ।
मौलसिरी के बीजों का गूदा मन पूर्वक दृश्चिक के दर
स्थान में लेप करने से निःसन्देह विष दूर होता है। इसमें
मसे औषषि अभिपन्त्रित करके प्रयोग करना कर्तव्य है १०
हां ही मच ओइति मत्रेणओलन्तमभि।
मन्त्र्यतेनमार्जनावृश्चिकविपनाशोभवति११९
"शिवेनभाषितोयोगो नावहेलनीयोलयम् १२०
मूळ लिखित "हांहों" इत्यादि मन्त्र से निमीकन्द ह.
न्ठल को अभिमन्त्रित कर उसके द्वारा दष्ट स्थान में मार्जन क
रने से विष दूर होता है। स्वयं भगवान् भूतनाथ भवानीपति
भोलानाथ ने यह कहा है, अतएव बिलम्ब न करे ।।१९।।१२।।
उति श्विक विष नाशनँ ।
अथ कुक्कुर विष निवारण विधिः।
गुडतैलार्कदुग्धञ्च लेपाच्छुनोर्बिर्षहरेत् १२१
"
कामरत्न तन्त्र गुड, नेला आकं काढूधायहासकएकत्रामिलाकर कुत्ते के दृष्ट स्थानीय लोकरने मेविन वर सेवा उन्मालशुनोर्वष्टानां कुमारीकलसैन्य सुखोषणपन्धयेमिष्ठंनिदिमान्तेसुखावहम् १२२ न्म अर्थात भागतीकुते के काटने पर घृतकुमारी उते. मैंधानमक पीसकर अबि बैंजोरम करके तीन दिन बांधकर रखने से आविष दूर होता है.॥१२॥ PARTNERATARTEETHATREATE अथ विविधि जान्तव विष निवारणं शङ्गिमत्स्यविपंखेदाकिञ्चिदंघृतसमन्वितात्१२३ यदि मछली सींग को आघात करें, तब उस स्थान में किंचित घृत मकर अमिका ताप देने से यन्त्रणा नष्ट होती है। निशादानिशाचैव मस्तिष्टानागकेशरम् । एपालेपोनिहन्त्याशु विपलूतादिसम्भवम्१२४/ हो दारुहलदी, मजीद और नामुकेशर यह सन दन्य एक पोसकर दष्ट स्थानमा लेप करने में मकरी का विप धन्य होता है। गोमindi .
. 'कामरजातन्त्र। करजवीजसिद्धार्थ तिलैलेंपोविषापहः । एरण्डतैललेपोवा सर्वकीटविषापहः ॥१२५॥ करर्ज के बोन और सरसो तिलों के सङ्गे पीसकर लेप करने से सम्पूर्ण कोट दन्शन का विपादूर होता है ॥१२५।। HTTतिाविपामकरणITTEN Nisha इतिश्री नागभट्ट विरचित कामरत्न सन्त्र रुहेलखण्डान्स गत बरेली निवासी ब्रह्मकुलभूषण पाबांकेलारामजश्रीयंत पश्यामसुनर शर्मा पिरति भापाटीकायां पंचमपरिच्छेद समाप्तम् । TRE | RATE H . 15 himire 2: : BEF } " परिच्छेदन ira अथ यक्षिणी साधनं ॥ . साधारण विधि: सीसांयक्षिपीनान्तुःध्यानंकुर्यात्समाहितः। भगिनीमातपुत्रस्त्री रूपतुल्यंयथेप्सितं ॥१॥ भोज्यंनिरामिषं चान्नवज्यताम्बूलभक्षणन् । उपविश्याजिनादौच प्रातःमात्वानकंस्पृशेत्।। नित्यकृत्यञ्चकृत्वातु स्थानेनिर्जनकेजपेत् । यावत्प्रत्यक्षतांयान्तिं यक्षिण्योवाञ्छितप्रदाः३ 'जो कोई यक्षिणी क्यों न हो, अफ्नो इच्छानुसार किसी को भगिनी, किसी को अननो और किसी को पुत्र वधू की .प्रकार से सम्बोधन देकर समाहित मन मे ध्यान करे। इस सा. धना में निरामिष अन आहार और ताम्बूल का सेवन परि त्याग करना होता है, और प्रातःकाल स्नान कर किसी का भी सर्य न करके विशुद्ध भाव में निर्जन स्थान में मृगला आ. दि शुद्ध चासन पर बैठ अपना नित्य कृत्य कर एकाग्र मन कामरन तन्त्र। मे यक्षिणी मन्त्र का जप करे। जब तक यक्षिणी प्रसन्न होकर अभिलापित वर ढ़ने के अर्थ आविर्भूत न हो, तब तक जप करना चाहिये । इस प्रकार करने से यक्षिणी निःसन्देह - स्या होती है शाशीशी है -- विभमा यक्षिणी साधनं जपेल्लक्षद्वयंमत्रं श्मशानेनिर्भयोमुनिः दशांशंगुग्गुलुंसाज्यं हुत्वातुष्यतिविभ्रमा ॥४॥ जो वो विनम रूपे विभ्रम कुरु कुरु एथेहि भगवति स्वाहा। 3- अव निभ्रमानामी-यक्षिणी साधन वर्णन किया जाता है निर्भय हृदय से अफेला श्मशान में बैठकर एकाग्र मन से “ओं हों” इत्यादि मूल लिखित मन्त्र दोलभ जप करे। जप के स- मास होने पर कृत-और-गुग्गुल द्वारा पचासहजार-बार आहु- ति देनी होती है। इस प्रकार करने से विभ्रमा यक्षिणी नि- स्सन्देह, प्रसन्न होती है । Pain m:TTTE कामरवतन्त्र। PESH , . ॥ रतिप्रिया साधनं ॥ - शङ्कलिमपटेदेवी गौरवणाधृतोत्पला सवालङ्कारिणीदिव्यां समालिख्याधयेत्सतः.५ जातीपुष्पैःसोपचारैः सहस्त्रैकंततोजपेत् । त्रिसन्ध्यसतरांवन्तु ततौरात्रिपुनिर्जपेत् ॥६॥ अर्द्धरात्रगतेदेवी समागत्यप्रयच्छति....... पञ्चविंशतिदीनारान प्रत्यहंतोषितासती ॥७॥ - जो,हीं रतिप्रिया स्वाहा। इस समय रतिप्रिया नाम्नी यक्षिणो का साधन लिखा जाता है। प्रथम शङ्खलिप्त पटपर दिव्य रूपिणों सर्ग सुन्द- रो विभूषिता उत्पल धारिणी गौरवर्णी देवों की मूर्ति च कर अनेक प्रकार के उपचार और नीती पुष्प द्वारा उस देगी को मर्सि को अर्चना करें पूजा केपि में इस मूर्ति का ध्या न कर जोड़ों इत्यादि मन्त्र से एकहजार बार जप करें। एक सप्ताह तक प्रतिदिन तोनों सन्ध्याओं में एवं सहरात्रि में इस मन्त्र का एकहजार जप करे। इस प्रकार करने से वो सब होकर आधीरात के उपरान्त साधक के समीप प्रगट होंगों - कामरन तन्त्री और उसको पञ्चविंशत्ति सुवर्ण मुद्रा दान करेंगी और इसी प्रकार प्रतिदिन अर्पण करती रहेंगी ||५|| 5. M वट यक्षिणी साधनम् त्रिपथेतुवंटस्थाने रात्रौमत्रंजपेच्छुचि। लक्षत्रयंततःसिद्धा देवीचंवयक्षिणी ॥८॥ वस्त्रालङ्कारकंदिव्यं रसंसवरसायन । दिव्याञ्जनञ्चसातुष्ठां साधकायप्रयच्छति ॥९॥ ऊोंहों वटवासिनी यक्षकुलप्रसूते वटयक्षिणी: एोहि स्वाहा:- ." -- रात्रिकाल के समय अकेला त्रिपथ में वट वृक्ष के नीचे जाकर विशुद्ध भाव से "जोंद्रों” इत्यादि मन्त्र दोलाख म। ऐसा करने से देवी चंट यक्षिणी सिद्धि होती है और वह में: सन्न होकर साधक को दिव्य वस्त्र विभूपर्ण सम्पूर्ण रसायन, भोज्यद्रव्य और दिव्य अञ्जन प्रदान करती हैं 10inen वटवृक्षसमारुह्य लक्षमेकंजपेन्मनु । .
कामरत्न तन्त्र। ..,'ततःसंप्ताभिमत्रेण काजिकैःक्षालयेन्मुख १०। मासत्रयंजपेद्रात्रौ वरयच्छतियक्षिणी। रसंरसायनंदिव्यं क्षुद्रकर्मायनेकधा ॥११॥ सिद्धानिसबका-णिनान्यथाशङ्करोग्रवीत्१२ निमश्चन्द्राद्यावा कर्णकारथस्वाहा । अथवा ऊों नमोभगवतेरुद्राय चण्डवेगिनेखाहा...मत्र इयस्यैकएवसिद्धिहेतुः रात्रिकाल में वट वृक्ष के नीचे जाकर मल लिखित दो अथवा एक मन्त्र का लक्ष जप करें। जप के शेष में सप्ताभि- मन्त्रित काजि से मुख धोत्रै । इस प्रकार तीन मास करने से यक्षिणी प्रसन्न होकर साधक को वर देती है एवं अनेक प्र- कार के रस रसायन, इत्यादि भोज्यद्रव्य प्रदान करती है और साधक के सष कार्य सिद्ध और मनोकामना पूर्ण करती है। शिवजी का वचन मिथ्या नहीं होसकता ॥१०॥॥१२॥१२॥ .: शुक्लपक्षेजपेत्तावन यावदृश्येतचन्द्रमा। प्रतिपत्पूर्वपूर्णान्तं नवलक्षमिदंजपेत् ॥१३॥ अमृतंचन्द्रिकादत्तं पीत्वाजीवोऽमरोभवेत् १४ १३७ कामरने तन्त्र "ओं ह्रीं चन्द्रिकेहंसाक्री की वाहा । शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि में मूल लिखित मन्त्र का जप आरम्भ करे। जबतक आकाश में चन्द्रमा दिखाई दे, तं- बत जप में रत होना चाहिये । इस प्रकार प्रतिदिन करके पूर्णिमा तक नव लाख जप करना होता है। इस साधना से चन्द्रिका देवी प्रसन्न होकर साधक को अमृत देती है, उस अ- मृत के पीने से साधक अमर होसकता है ॥१३॥ ॥१४॥ नरास्थिनिर्मितामाला गलेपाोचकर्णयो। धारयेज्जपमालाञ्चःतादृशीश्चश्मशानतः॥१५॥ लक्षमेकंजपेन्मन्त्रं साधकोनिर्भयःशुचिः । ततोमहाभयायक्षी दद्यादेवरसायनं ॥१६॥ तस्यभक्षणमात्रेण सर्वरत्नानिचालयेत् । वलीपलितनिर्मुक्त चिरजीवीभवेन्नरः ॥१७॥ ऊों की महाभये की स्वाहा। साधक नरास्थि द्वारा माला धनाकर गले अथवा कान मैं पहरकर पवित्र होकर निर्भय हृदय से अकेला श्मशान में वास करे। अनन्तर नरास्थि माला हाय में धारण कर अ-
कामरत्न तन्त्र ।
भया यक्षिणी का उक्त मन्त्र एक लक्ष जप करे। इस प्रकार
करने से महाभया-यक्षिणी प्रसन्न होकर साधक को रसायन
देती है। इस रसायन का सेवन करने से साधक इच्छानुसार
सर्व प्रकार के स्त्रों को यया स्थान से चलायमान करने में
समर्थ हो सकता है, इसके अतिरिक्त बुढ़ापा और जरा शून्य
होकर चिरजीवी होसकता है |१६|| ||१६|| ||१||
-
इतिश्री नागभेद निरचित कामरत्न तम्ब रुहेलखण्डान्तर्गत बरेली निवासी
अकुलभूषण जांकेलालालज श्रीयुत पं श्यामसुन्दर शर्मा विरचित
भाषाटीकायां समाप्ति मगमत् ।
1:-
शुभम्भूयात् ।
13
.
REET
कामरत्न तन्त्र। a ॥अथ वशीकरणतन्त्रमा अपामार्गस्यकीलन्तु मूलमुत्सायेण्यंगुलं। सप्ताभिमत्रितंयस्य गृहेक्षिप्त्वावशीभवेत् ॥१॥ "ऊों मदनकामदेवाय फट् स्वाहा । FET शतमष्टोत्तरंजप्त्वा पूर्वमेवाभवन्नरः । सिद्धोभवतितत्सत्यं तिलककुरुतेश ।। चिरचिरे को जड़ लाकर उसको तीन अँगल की वरा पर कील सातवार अभिमन्त्रित करके जिस घर मोडाल दोजाय, वही व्यक्ति वश में होता है जोमदनकामदेवाय फट्स्वाहा” यह मन्त्र अष्टोत्तर शतवार जपकर सिद्ध होनेपर यह कार्य करे। और चिरचिरे की जड़ द्वारा कपाल में ति लक लगाने मे वशीकरण होता है॥२॥ स्वयम्भकुसुमवस्त्रे गृहीत्वात्रिपथेदहेत् ।। शनिभौमस्यवारेवातिदस्मतिलकंकृतंगा- । वशन्नयतिराजान' मन्यलोकेषुकाकथा 1 ओनमोभैरवीतरेआज्ञाकालेकमलमुखे या कामरवतन्त्र राजमोहनप्रजावशीकरणे स्त्रीपुरुषरतमि लोक वश्यमोहनिमेसोहोंगुरुप्रसादेन ॥५॥ पवन का फूल बस में अहण कर त्रिपये के बीच स्था. नमें शनि अथवा महावार के दिन दान करें। इसके उप- रान्त इस बस को जलाई भस्म का कपाल में तिलक, लगाने से राजा भी पीभूत होता है, दूसरे को तो वातहो क्या है ? "जॉनमो भैरवों इत्यादि मन्त्र से उक्त कार्य करे शाथा। रात्रोकृष्णचतुर्दश्यां लागलीमूलमुद्धरेत् । श्वेतच्छागलिकाग) शय्यायांनरतैलकं ॥६॥ क्षौद्रतालकसंयुक्तं तिलकंसर्ववश्यकृत् ॥७॥ कृष्णपक्ष की चौदस की रात्रि में लागली वृक्ष की ज़र, नरतेल, शहत और हरताल इन सब द्रव्यों को एकत्र कर के- पाल में तिलक लगाने से सर्व लोक को वशीभूत किया जा सकता है ॥६॥ ॥ .. अजमोदस्यमूलेन. तुरगीगर्भशय्यया । हरितालचसम्पिप्प गुटिकामुखमध्यगा.॥८॥ यद्यस्मायाचतेवस्तु तत्तदेवददात्यसौः। . - में लेप करे। इसके उपरान्त यह लेप को हुई वस्तु जल में | | घिसकर तिलक लगाने से सर्वलोक वशीभूत होता है ।।२।।१०/ कामरजतन्त्रा मय, अस्मकर्णेश्वरिदुर्बलेआइकेशिकजटाकलापे। ढकारफेत्कारिणी खाहा । ... . अजमायन के वृक्ष की जद और हरतालं एकत्र पीसकर गुटिका बनाये। यह गुटिका मुख में रखकर जिसके निकट जिस जिस द्रव्य की याचना करे, वहो वही द्रव्य तिसी स. वह उस व्यक्ति का मदान करता है। जो अस्मकर्णेभरि इत्यादि-मन्त्र से उक्त कार्य करे ॥८॥ वटपत्रमयूरशिखयातुल्यं तिलंकैलोक्यवश्यकृत् । विष्णुकान्तामृङ्गराज रोचनंसहदेविका ॥९॥ श्वेतापराजितामूलं कन्याहस्तेप्रेलेपयेत् । धारिणांतिलककुर्यात् सर्वलोकवशङ्करं ॥१०॥ बड के पत्ते, और मोर शिखा वरावर लेकर तिलक कर. ने से सर्वलोक वशीभूत होता है और विष्णुकान्ता, भृङ्गराज को जह, गोरोचन, सहदेई, और सफेद अपराजिता की ज. द, यह सब द्रव्य एकत्र पीसकर अविवाहिता कन्या के हाथ कोमरवतन्त्र रक्ताश्वमारपुष्पञ्चाकुष्ठश्चश्वेतसः । श्वेतार्कमूलंतगरं श्वेतगुलाचवारुणी ॥१४॥ कृष्णाष्ठम्यांपुष्ययुक्तं चतुर्दश्यांतथाविधा पेषतकन्यकाहस्ते तिलकवेश्यकारक ॥१२॥ लालकनेर की फूल, कठ, सफेद सरसों, सफेद आक की जई, तगर, सफेदै पची, बारुणों की जड, यह संवद्र- व्यं पुष्य नक्षत्र युक्त कृष्णपक्ष की अष्टमी अथवा चतुर्दशी तिः थि:के दिन एकत्र,पीसले। अनन्तर इस पिसे हुए द्रव्य दारा तिलक लगाने, इससे सर्वलोक वशीभूत होता है ।।२२।। १।१२। अपामार्गस्यमलन्तु : पेषयेद्रोचनेनचर ललाटेतिलकंकृत्वा वशीकु-जगत्रयं ॥१३ जोनमोवरजालिनी सर्बलोकत्रशतरी स्वाहा। अयंमत्रउक्तयोगानां अष्टोत्तरसहस्रज़पासिद्धि चिरचिरे को जड़ और गोरोचनःएकत्र,पीसकर कपालं. में तिलक लगाने से त्रिजगत्यशोभूत किया जासकता है। ऑनपोषरणालिनी इत्यादि मन्त्र से पूर्वोक्त सब कार्य करना चाहिये |Rai T
गोरोचनसमंपिष्टं भक्षेपानेजगहशं ॥१८
१४३
कामरत्न तन्त्रा
उलूकचक्षुरादाय गोरोचनसमन्वितं ।
वारिणासहदातव्यं पानाहश्यकरंपरं ॥१५॥
.उल्लू के नेत्र लाकर उसमें गोरोचना मिलाकर जिसको
जल के सङ्गं पान करा दिया जाय, वदो व्यक्ति वशीभूत
होता है ॥१५॥
उलूकस्यतुक!हो चटकस्यविलोचनं ।।
तचूर्णतिलकेपाने भक्षणेगन्धपुष्पयोः ॥१६॥
क्षिपेहामस्तकेयस्य सवश्योजायतेचिरात् ।१७॥
उल्लू के दोनों कान और खुटयढे पक्षी के नेत्र इन दोनों
द्रव्यों का एकत्र चूर्ण करे। इस चूर्ण का कपाल में तिलक ल
गाने से जगत को वशीभूत कर सकता है। और यही चूर्ण
किसी व्यक्ति को भक्ष्यद्रव्य (साने का पदार्थ) और जल के
सङ्ग प्रदान करने से अर्थवा गन्धद्रव्य और फूल के सन मघा
देने से या किसी व्यक्ति के मस्तक पर डालने से यदी,व्यक्ति
वशीभूत होता है ।।१६।। ॥१॥
मांसंग्राह्यमुलूकस्य- कुंकुमीगुरुचन्दनं।
-
स्त्रियोवापुरुषोनापि सहस्त्रजपनाद्भवेत् ॥१९॥
१४४ कामरत्न तन्त्र। ह्रीं ह्रीं हः हः फट् नमः। उल्लू का मांस रोलो, अगर, लालचन्दन, और गोरो. चन, यह सब द्रव्य सम परिमाण एकत्र पीसकर भोजन वा पानो के सक्त देने से त्रिजगतःवशीभूत होता है.। “कोंडी छौं” इत्यादि मन्त्र हजारवार जपकर यह कार्य करे। स्त्री अ. थवा पुरुष कोई हो सभी वशीभूत होते हैं ॥१८॥ ॥१९॥ कृतोपवासीगृहनीयात् समूलेश्चन्द्रवारुणी । उत्तराभिमुखेनैव कुदृयेत्तदुदूखले ॥२०॥ तत्कल्कंत्रिकटुंतुल्य मजामूत्रेणपेषयेत् । छायांशुष्कवर्टीकुर्यात् सवटीरक्तचन्दनं ॥२१॥ घृष्ट्रोधवांगुलीलिप्त्वा तयास्पृष्ठेजगद्दशं ॥२२॥ । पहले दिन व्रत रहकर वारुणों को जडं ग्रहण करें। फिर उचर की ओर की मुख करके ओखलो में इस जड को - टळे । अनन्तर यह पिष्टदव्य और त्रिकटु अर्यात् (मरिच, पी- पल, और सोठ) समान लेकर ककरो के सूत्र में पीसकर छा- या में सुखाय गोलो बना। इसकं उपरान्त यह गोलो और लालचन्दन एकत्र घिसकर अपनी अंगुली में लेप करके इस कामरत्न तन्त्र। १४८ अँगुली से जिसको स्पर्श किया जाय, वही व्यक्ति वशीभूत होता है। इस वशीकार्य में त्रिजगत वश्य होता है २०२१२२ 'सावटीदेवदारुश्च तुल्यञ्चसितचन्दनं । --- जलेघृष्ट्वाविलेपाय दत्तंयस्यभवेशः ॥२२॥ पूर्वोक्त गोली, देवदारु और सफेद चन्दन समान लेकर एकत्र जल में घिसकर जिसके अनमें लेप करने के लिये दिया जाय, वही व्यक्ति वशीभूत होता है ।।२३।। सावटीरोचनंतुल्यं कृत्वातोयेनपेषयेत् ।। अनेनतिलकंकृत्वा सर्वत्र विजयीभवेत् ॥२४॥ नमःशची, इन्द्राणी सर्ववशङ्करीसार्थ साधिनीखाहा। अस्यसहस्रेजप्तेपूर्वयोगसिद्धिः पूर्वकृत गोली और गोरोचन यह दो द्रव्य परावर लेकर जलके सङ्ग पीस कपाल में तिलक लगाने से वह व्यक्ति स- चत्र जय लाभ कर सकता है । "जोनमःशचीइन्दागोहत्या. दि मन्त्र सहस्रजपकर पूर्वोक्त योगसब करने से सिद्धि होता है। कृष्णपक्षचतुर्दश्यामप्टम्यांवाउपोपितः।।। वलिंदत्वासमुद्धृत्य सहदेवींसुचूर्णयेत् ॥२६॥ . .
रे कामरवं तन्त्र। ताम्बूलेनतुतचूर्ण योज्यंवश्यकरपरं ॥२७॥ *कृष्णपक्ष की चतुर्दशी अथवा अष्टमी तिथि में उपवासी रहकररावेवता को.बलि देकर सहदेई की.जड़ लाकर चूर्ण क- । यह चूर्ण जिसको ताम्बूल के सङ्ग भक्षण, कराया जाय, वहो व्यक्ति वशीभूत होता है ॥२६॥ ॥२४ा.:: : रोचनासहदेवीभ्यां तिलकोवश्यकारकः। मनःशिलाचतन्मूल मञ्जयेत्सर्ववश्यकृत् २८ गोरोचन और सहदेवी एकत्र पोसकर तिलक करने से सम्पूर्ण लोक वशीभूत कर सकता है । अथवा. मनशिल और सहदेवो की जड़ एकत्र पीसकर अञ्जन लगाने से सर्वलोक पश्य होता है.॥२८॥ सप्ताहंताम्बूलस्यान्तः सहदेवींप्रयोजयेत् । राजावइयमवाप्नोति सर्वलोकेपुकाकथा २९ सहदेई की जंह एक सप्ताह तक ताम्बूल के सङ्ग भयोग करने में राजा भी वशीभूत होता है, और मनुष्यों की तो बात ही क्या है :.:, :: काकजज्ञाक्चाकुठं बिल्वपत्रजकुंकुम:
कामरन तन्न। खरक्तसंयुतंभाले तिलकंदारवश्यकृत् ॥३०॥ गुञ्जा, वच, कूठ, बेलपत्र, रोली, स्वीयरक्त, एकत्र क- रके कपाल में तिलक लगाने से स्त्री वश होती है ॥३०॥ काकजदावचाकुष्ठं शुक्रशोणितसंयुतं । दत्तेसाभोजनेवाला उमशानेरुदतेसदा ॥३१॥ गजा, वच, कुड, शुक्र, और शोणित यह सव एकर करके जिस स्त्री को भक्षण करादे, वह स्त्रो इस प्रकार बशीर भूत होती है कि पुरुप रे मरजाने पर भी वह श्मशान में जा कर रुदन करती है ॥३॥ कलविङ्गशिरस्तुल्यं श्वेतार्कस्यचमूलकं ।' मञ्जिष्टाखदिरंपाने दत्तकान्तांवशनयेत् ॥३२॥ खुटरवुटवदई पक्षी का मस्तक, सफेद आक की जड, म. जीठ, और खैर यह सब जिसको पान कराद, वही स्त्री व शोभूत होती है ॥३२॥ सर्पत्वग्वीजपूरञ्च तेलमेरण्डसम । योषितामोहकृद्धूपो रतिकालप्रपूजयेत् ॥३३॥ साँप की कैंचलो, दाडिम्ब, काष्ट और एरण्ड का तेल यह सव वरावर लेकर यूप देने से लो वशीभूत होती है | M १४८ कामरत्न तन्त्र। अश्विन्यांग्राहयेद्धीमान् पलाशस्यचंधकं । करेवद्धाभजेद्यान्तु नायिकावशगाभवेत् ॥३४॥ अश्विनी नक्षत्र में ढाक को जड़ा ग्रहण करके हाथ में वां. धने.मे नायिका वशीभूत होतो है ॥३४॥ उडुम्बरस्यत्रधन्तु मृगशीर्षेसमाहरेत् । हस्तेवद्धास्पृशेत्कन्यां सावश्याभवतिक्षणात् ३५ गुलर की जड़ मृगशिर नक्षत्र में लाकर ,हाथ में. बांध जिसके अंङ्ग में स्पर्श करायो जाय, वही कामिनी तत्क्षण ब- शीभूत होती है ॥३५॥ शिरीषस्यधनिष्ठायां वनमादयेवन्धयेत् । करेवाधातकीननं खातोरामविशंनयेत् ॥३६॥ 'धनिष्टा नक्षत्र में सिरस को जद ग्रहण करके और स्वा. ति नक्षत्र में धाय वृक्ष को जड़ लाकर हायमें रखने से नारी गण वशीभूत होती हैं ॥३६॥ अम्विन्याँग्राहयेद्धीमान् पलाशस्यचत्रक। कोवद्धास्पृशेद्यान्तु नायिकासावशीभवेत् ३७ अभिनी नक्षत्र में गा को जड़ प्रहण करके अपने हाय कामरत्न तन्त्रत -- में धारण पूर्वक जिस खो को स्पर्श करावे, वही स्त्री को ना यिका वशीभूत होतो है ॥३७॥ रेवत्यांवटशुङ्गश्च हस्तेवद्धावनियेत् । मूलेवावदरोननं भोजनेस्त्रीवशीभवेत् ॥३८॥ रेवती नक्षत्र में वटांकुर ग्रहण करके हाथ में बांधने से सबको वशीभूत कर सकता है और मूल नक्षत्र में येरो की जड़ लाकर जिस सो को भक्षण करादोजाय, वही स्त्री यशो- भूत होती है ॥३८॥ खणेतारपुष्पमूलं घृष्ट्वास्पष्टेस्त्रियोवशाः । एतान्सर्वप्रयोगांश्च चण्डमत्रेणयोजपेत् ॥३९॥ शतमष्टोत्तरंजप्त्वा.ततःसिद्धोभवत्यलं ॥४॥ सुवर्ण के पात्र में कुन्दे की वृक्ष की जड घिसकर जिस स्त्री की पीठपर लगा दीजाय, वह स्त्री निश्चय वशीभूत होती है। इसके पहले जो सब प्रक्रिया कहो गई है उसमें चण्ड म. न्त्र प्रयोग करे अर्थत् प्रक्रिया करने के पहले चण्ड मन्त्र अ. टोत्तर शतनप करके सिद्ध होनेपर कार्य करें ॥३९॥ ॥४०॥ मार्गशीपेतुपूर्णीयां शिखीमूलंसमुद्धरेत् । ८ कामरत्न तन्न। - मत्रेणदापयेत्स्त्रीणां भोजनेस्त्रीवशङ्करं ना४१॥ मन्त्रेण चण्ड मन्त्रेण अगहन मास.को पूर्णिमा तिथि में चिरविरे को जड़ ला- कर निस स्त्रो को भक्षण कराई जाय; वहो स्त्री वशीभूत हो. तो है। इस कार्य में भी चण्ड:मन्त्र का प्रयोग करे ॥४॥ श्वेतगुञ्जाभरंमन्त्रे मूलंपञ्चमलान्वितं.।, : भक्षेपानेचदातव्यं वश्येवामावशङ्करें ॥२॥ सफेद चौटली की जड और पञ्चमल अर्थात् (जिभ्या का मल, दन्तमल, चामल, कर्णमल, और नासिकोमल) यह सब एकत्र करके चण्ड मन्त्र पढ़कर जिस स्त्री को भक्षण कराया जाये। वही स्त्री वशीभूत होतो है॥४२॥ प्रातःस्वदन्तंप्राक्षाल्य सप्तवाराभिमवित। यस्यनान्नापिवेत्तोयं सावामावशंगाभवेत्।४३। ऑनमः क्षिप्रंकामिनीअमुकीमेवशमानय हुँ फदखाहा, प्रातःकाल के समय दतोन करके जिस सी का नाम ले. कर "औनमःशिम" आदि मन्त्र से सातवार अभिमन्त्रित कर सात पूंट जल पान.को, वही स्त्री वशीभूत होती है॥४॥ .
कामरन तन्ना अन्योनलयेल्लिङ्गं यानारीवीक्षतेचिर। इकारान्तंजपेत्तावत् सानारीवशगाभवेत् १४ नागपुष्पंप्रयंगुञ्च तगरंपद्मकेशरं । वचामांसीसमानीय चूर्णयेन्मववित्तमः ॥२५॥ खागन्तुधूपयेत्तेन भजन्तेकामवत्तियः । ऊोमूलिमूलिमहामूलि रक्षरक्षसर्वसाक्षेत्र येभ्योपरेभ्यः स्वाहा ॥४६॥ नागकेशर के पुष्प, मियँगु सगर काठ, कमल, केशर, वच, थालछह, इन सब द्रव्यों का एकत्र चूर्ण करके जो व्यक्ति “ोंमूलिमूलि” मन्त्र पढ़कर उक्त चूर्ण द्वारा अपने शरीर में धूपदे, उस व्यक्ति को कामदेव को समान जानकर स्त्रीगण उसके वशीभूत होती हैं ॥४४॥॥४५॥ ॥४६॥ जिह्वामलंदन्तमलं नासाकर्णमलंतथा। सुरापानेप्रदातव्यं वशीकरणमद्भुतं ॥४७॥ जॉनमः सवायनमः सवान्यच असुकीमेवश मानय स्वाहा। .
१५२
कामरत्न तन्त्र
अपनी जीभ का मैल, दांत का मैल, नासिका और का-
न का मैल, यह सब एकत्र कर "औनमःसवायै” इत्यादि म-
त्र पाठ पूर्वक मदिरा के सङ्ग जिस सो को भक्षण कराया
जाय, वह स्त्री निःसन्देह वशीभूत होती है ॥४॥
वाट्यालकस्यमत्रेण पुष्पंसप्ताभिमत्रितं ।
फलंबादीयतेवेश्ये सम्यग्वश्यकरंपरं ॥४८॥
नमोवाचाटपथपथहिटिद्रावहि स्वाहा ।
ऊोंनमोवाचाट इत्यादि मन्त्र से सातवार अभिमन्त्रित
कर बहेडे की जड़ अथवा फल लेजाकर जिस स्त्री को दिया
'जाये, वह स्त्री सम्यग प्रकार वशीभूत होतो है ॥४८॥
अपामार्गस्यमध्येतु चतुरंगुलकीलकं ।
सप्ताभिमवितंग्राह्यं क्षिपेद्देश्यागृहेवशा।१९।
औद्राविणीखाहाऊोहमिलेखाहा।
चिरचिरे के वृक्ष के मध्यभाग का चार अँगुल को वरा-
घर काष्ठ "औद्राविणीस्वाहा” इत्यादि मन्त्र से सातवार अ.
भिमन्त्रित कर वेश्या के घर निक्षेप करने से वह वेश्या वशी:
भत होती है ॥४९॥
कामरत्न तन्त्र। उलूकनेत्रमासञ्च चन्दनंचैवरोचनं । कुंकुममत्स्यतैलञ्च देहाभ्यङ्गाहशा स्त्रियः ५० ऊों ह्रीं ह्रीं प्लं प्लं फट् नमः। उल्लू की आंखें और मांस, लालचन्दन, गोरोचन, रो- लो और मछली का तेल, यह सब वस्तु एकत्र कर "ओही. हों" इत्यादि मन्त्र से अपने शरीर में अभ्यर करने से स्त्री- गण को वशीभूत कर सकता है ॥५०॥ विधिनाककलासस्य पादसंग्रह्यदक्षिणं । वेष्टनेरतिकालेतु मुखस्र्थनायिकावशाः॥५१॥ तस्यैववामनेत्रेण मधुतैलेनचाञ्जयेत् । यापश्यतिनरोमत्तां वामासातत्क्षणाशा ५२ आनन्दब्रह्म स्वाहा ों ह्रीं की प्लां कालि कपालि वाहा। एक गिरगट का दक्षिण पैर लाकर मुख में धारण करके जिस स्त्री के सङ्ग रतिक्रिया करे, वही स्त्री वशीभूत होती है। और गिरगट का वाम नेत्र, शहत एवं तेल, यह सव एकत्रकर नेत्रों में अञ्जन लगाकर जिस स्त्री पर दृष्टिपात करे, वही स्त्री . . - कामरत्न तन्त्र। . पोभूत होती है। इस प्रक्रिया में डोभानन्दप्रलस्वाहा” इत्यादि मन्त्र से कार्य करना चाहिये ||५|| ॥५२॥ तस्यैवदक्षनेत्रश्च सीवीरंमधुनासह । अञ्जिताक्षस्यसावश्या यास्त्रीरूपातिगर्विता ५३ पूजिताय स्वाहा । .. ... ....... :: गिरगिट को दाहिनो आंख, कांजो, और शहत यह स- व एकत्र कर नेत्रों में अञ्जन लंगा जिस लो पर दृष्टिपात का रे, वही स्त्री वशीभूत होती है। इस प्रक्रिया में "पूजि- तायस्वाही" इस मन्त्र से कार्य करे ॥५॥ त्रिसन्ध्यन्तुजपेन्मत्रं मन्मथस्यशतंशतं । सन्मन्त्रकामिनीमासान्मोहयत्यैवदर्शनात् ५४ नमःकामदेवाय सहकल सहदश सहयम सहालिमे वन्हेधूनन्जनंसमदर्शनं उत्कण्ठितं कुंरुकुरुदक्षदण्डधरकुसुमं वाणेनहनहनवाहा। जोनमः कामदेवाय इत्यादि मन्त्र तोनों सन्ध्याओं मैं एक शतजप करे। इस प्रकार एक सप्ताह जप करने से जो स्त्री. उसका दर्शन करे, वही नारी बशीभूत होती है रिया सप्ताहाद्रूपहीनोपि वशीकु-त्तिलोत्तमाः ५७ लवण, तिल, दूध, शहत, रिवृत्त, यह द्रव्य एकत्रकर १५५ कामरत्न तन्त्र। कामाकान्तेनचित्तेन नाम्नांमन्त्रजपेन्निशि। अवश्यंकुरुतेवश्यं प्रसन्नोविश्वचेटकः ॥५५॥ जोंसहवल्लींवल्लीकरवल्ली कामपिशाच अमुकी कामंग्राहयस्वप्न ममरूपेणनखैर्विदारयद्रावय स्वेदेनवन्धन श्रीफट् । रात्रि के समय कामाक्रान्त चित्त से जिसका नाम लेकर, "वल्लों” इत्यादि मन्त्र जप किया जाय, वह स्त्री अवश्य वशीभूत होती है ॥५५॥ चण्डमन्त्रेणहोमानि वश्यार्थेकारयेत्सुधीः । पूर्वमेवायुतेजसे सिद्धिःस्याहश्यकारकः ॥५६॥ वशीकरण कार्य में चण्ड मन्त्र से कार्य करना होता है पहले दसहजार जप कर पथात् वशीकरण कार्य करे । इस मकार कार्य करने से निश्चय सिद्वी होती है ॥५६॥ लवणंतिलसंयुक्तं क्षीरमधवाज्यसंयुतं ।
. १५६ कामरवतन्त्र एक सप्ताह होम.करने से रूप हीन.व्यक्ति भी तिलोत्तमा.को पशोभूत कर सकता है ।।२७॥ राजिकालवणंक्षीर मध्वाज्यैमिश्रितहतं । सप्ताहेनवशंयाति रामारूपगर्विता ॥५॥ सरसों, नमक, दूध, घृत, यह सब, एकत्र कर सप्ताह प. .यन्त होम करने से रूपगर्विता नारी को भी बशीभूत कर सकता है ॥१८॥ अष्टोत्तरशतंकाष्ठ मैरण्डंचतुरंगुलम् लवणंकटुतैलञ्च त्रिभिरेकत्रहोमयेत् ॥५९॥ चार.अँगुलि की वरावर एरण्ड के काष्ट द्वारा मन्त्र पढ़- कर कटुतैल और लवण के संङ्ग अष्टोत्तर शत होम करे| होम के समय मन्त्र से जिसका नाम लिखा रहेगा वही व्यक्ति वशीभूत होगा.॥१९॥.. महानिम्बस्यपुष्पाणि घृतेनसहहोमयेत् ।।.. सप्तरात्रेवशंयाति यदिरामांमनोरमा॥६॥ ओं ह्रीं रक्त चामुण्डे तुरु तुरु अमुको मेवश मानय स्वाहा।
. कामरत्न तन्त्रा १५७ महानीम के पुष्प में घृत मिलाकर प्रतिदिन अष्टोत्तर शत होम करे। इस प्रकार एक सप्ताह होम करने से मनोरमा नारी वशीभूत होती है। पहले जो सब होम का विधान लिखागया है, उसमें ओंदोरक्तचामुण्डे इत्यादि मन्त्र से कार्य करे ॥६०॥ *** त्रितयेचुल्लीं कृत्वापश्चान्नृमुण्डके। पात्रेशालिन्तुतल्लाजां चूर्णयेत्तबहिर्गतान् ६१ पात्रस्थन्तुपृथकचूर्ण मूर्द्धनिक्षिप्तेवशास्त्रियः। अन्तर्गतेनंचूर्णेन क्षिसंवश्यंनिवर्त्तते ॥२॥ सिद्धियोगोह्यसंख्यातो विनामन्त्रेणसिद्धिद६३ तीनं * * * लाकर उनके द्वारा चूल्हा बनाकर उसपर मनुष्य की खोपड़ी में धान डालकर खोजें भूने जो खोलें खो- पड़ी से बाहर निकले, उनका चूर्ण कर एक स्थान में रखे और खोपड़ी में स्थित खोलों का चूर्ण अन्य एक स्थान में स्थापन करे । इसके उपरान्त खोलों का चूर्ण जिस स्त्री के म- स्तक परं डालदे, वही स्त्री वशीभूत होजाय और मध्यगत खोलों के चूर्ण द्वारा वशीकरण निवृत होता है। इस योग में बिना मन्त्र से कार्य सिद्धि होता है ||६|| ॥२॥३॥ .
१५८ कामरत्न तन्त्र। गईभस्यशिरोमजा पूरयेन्नरपात्रके। भृङ्गराजरसेभीव्या वर्तिकापाससम्भवा ६४ सतवारन्तुसाशुष्का मजापानप्रदीयते । कंजलं नरपात्रेतु शनिवारेसमुद्धरेत् ॥६५॥ तेनाञ्जयेद्दशीकुर्यात् कामिनीनन्तुविलोकनात् ६६ मनुष्य के मस्तक का मध्यभाग गधे के मस्तक में रख म. जा द्वारा पूर्ण कर उसमें मैंगरे के रस की एक सप्ताह तक भावना देने पर शुष्क करे। अनन्तर कपास की बत्ती बनाकर मन्जा के पात्र पर जलावे शनिवार को इस.प्रदीप शिखा मे मनुष्य के कपाल पर काजल पार कर उस काजल द्वारा नेत्र अञ्जित कर जिस स्त्री को देखे, वही वशीभूत होजावे १६४ ६६) शिलातालंखवीर्यश्च अकोलतेलमिश्रितम्। गजगण्डमेदोन्मिनं तिलकंस्त्रीवशङ्करं ॥६७॥ मनशिल, हरितालअपना बीर्य अकोल के फल का तेल,'और हाथी को गण्ड का मल, यह सब एकत्र मिलाकर 'कपाल में तिलक लगाने खो वशीभूत होती है ॥णा: मनःशिलाप्रियंगुश्च .नागकेशररोचनं । . ..
१८९ कामरत्न तन्त्र। . अजिताक्षोनरोरामां वशीकु-न्मनोरमां ६८ मनशिल, प्रियंगु नागकेशर के फूल, और गोरोचन इन सब को एकत्र कर चक्षु मैं अञ्जन लगाने से मनोरमा स्त्री को वशीभूत किया जासकता है ॥६॥ प्रियंगुश्चवचापत्रं 'रोचनाञ्जनचन्दनं । अजिताक्षोनरोरामां दृष्ट्वामोहयतिध्रुवं ।।६९॥ पियगु, बघ, तेजपत्र, गोरोचन, रसाञ्जन, और लाल- चन्दन, इन सब द्रव्यों को एकत्र कर नेत्रों में अञ्जन लगा जिसके प्रति दृष्टि डाले, वही स्त्री वशीभूत होजावे ॥६९|| सोमराजीरवेमूलं मूलंबाचक्रमर्दनं ।। कटिस्थंनरनार्योवा परस्परवशङ्करं ॥७॥ सोमराजो, आक को जड, अथवा चकवड़ की जड़ क. मर में धारण करने से सो और पुरुष वशीभूत होते है ॥७॥ । कृष्णाष्टमोचतुर्दश्यां पीतधुस्तुरमूलकं । । हेमतारपुटीकुष्ठं देवदारुसमंसमं ॥७॥ चूर्णस्त्रीणांशिरःछिप्त पुन्सोवाथवशङ्करें ।।७।। कृष्णपक्ष की अष्टमी अयवा चतुर्दशी तिथि मैं पीछे धतूरे . ।
कामरन तन्त्र। की जड़ उखाड़ कर कूठ और देवदारु यह सब द्रन्य सम प. रिमाण लेकर चूर्ण करे। यह चूर्ण त्री अथवा पुरुष के मस्तक पर निक्षेप करने से वशीकरण होता है.॥७३॥ ॥७२॥..: जलेनसहपृष्ट्वातु सौधामलकमञ्जयेत् । .:. तिलकेबाकृतेवश्यं कुर्यात्त्रीमण्डलक्षणात्-७३ जस के सङ्गआमले के वृक्ष की जड़ पिसकर नेत्रों में अञ्जन अथवा.कपाल.में तिलक लगाने से तत्काल खी वा पुरुष को वशीभूत कर सकता है ||७३ : इन्द्रवारुणिकामूलं पुष्येनग्न समुद्धरेत् । कटुत्र]र्गवांक्षारैः पिष्ट्वातहटकीकृतं ॥७॥ चन्दनेनसमायुक्तं तिलकंस्त्रीवशङ्करं ॥७॥ इन्द्रायन को जह पुष्य नक्षत्र में नग्न होकर उखाडे । फि- र इस जड़ के सङ्ग मरिच, पीपल, और सौंठ यह सब द्रव्य गाय के दूध में एकत्र पीसकर गोली बनावे । इस गोली को लालचन्दन के साथ कपाल में तिलक लगाने से लीगंज को बसोभूत कर सकता है ॥७॥ ॥७५|'' ...', बर्बुटबनकखात्यां वदर्यास्त्वनुराधया।
कामरन तन्त्र। बनवांधारयेद्धस्ते पृथक्लीवश्यकारको ॥७॥ स्वाती नक्षत्र में वट वृक्ष की जड़ और अनुराधा नक्ष- त्र में देरी की जद उखाड़ कर हाथ में धारण करने से स्त्री- गण को वशीभूत किया जासकता है ।।७६|| उर्द्धपुष्पीअधःपुष्पी लज्जालुगिरिकर्णिका । सप्ताहंभावयेच्छुके पञ्चाङ्गमलसंयुते ॥७७॥ खानेपानप्रदातव्यं नारीवश्यकरंपरं ॥७८॥ उद्धपुप्पी अधःपुप्पी (सनाम प्रसिद्ध देश विशेपोत्पन्न औषधि विशेष ) लजावती और अपराजिता, इन सब वृक्षों पुष्प लाकर सप्ताह पर्यन्त अपने बीर्य की भावनादे, फिर उसके सङ्ग नेत्रमल, निहामल, दन्तमल, कर्णमल, और ना. सिकामल यह सब द्रव्य एकत्र कर जिस स्त्री को भक्ष्य द्रव्य अथवा पानी में भक्षण करादे, तो उसो नारो को वशीभूत कर सकता है ॥७७||७|| श्वेतार्कलाङ्गलीवचा लजालीविपमुष्टिका ।- तुल्यंतुल्यंप्रचूायाथ रुक्षःखानपयःस्तुतं.७९ धुस्तूरफलमध्यस्थ मेकीकृत्यप्रयोजयेत् । . .
। " १६२ कामरन तन्त्र कामवाणमिदंख्यातं भोजनेस्त्रीवशङ्करं11८०॥ उक्तानांसद्धयोगानां चण्डमनेणमनयेत् । सिध्यन्तिनानसन्देहः पूर्वमेवायुतेकिल ।८१॥ सफेद आक, नारियल, बच, लज्जावती को जह, यह सब द्रव्य बराबर ग्रहण पूर्वक चूर्ण कर स्वान के दूध के साथ मिश्रित करे, फिर यह औषधि धतरे के फल में रमते, यह औषधि कामबाण स्वरूप है। जिस स्त्री को इस औषधि का भक्षण करावे, वहो खो वशीभूत होजाय । पूर्वोक्त सब योग, में चण्ड मन्त्र का प्रयोग करे। प्रथम दशहनार चण्ड मन्त्र जप कर फिर कार्य करने से निधय सिद्धी होती है ७९८०.८१ कुंकुमचन्दनञ्चैव रोचनंशशिमिश्रितं । गांक्षीरेणतिलक राजवश्यकरपरं ॥८२॥ 7ौं क्लों सः अमुकमेवश्ये कुरुकुरु वाहा। पूर्वमेवसहस्रजप्त्वा ततोऽनेनमत्रेणसप्ताभि मनितपूर्वतिलककुयात् ।।८३॥ 'शेली, लालचन्दन, गोरोचन, और कपूर यह सब द्रव्य सम परिमाण लेकर गाय के दूध में मिलाकर काल में ति.
कामरत्न तन्न। लक लगाये। इसमें राज वशीकरण होता है । इस प्रक्रिया के पहले 'कोलोंसः' इत्यादि मन्त्र हजार जप करे। फिर तिलक का द्रव्य, उक्त मन्त्र से सातवार अभिमन्त्रित करके तिलक लगाना चाहिये ॥८॥1॥८॥ चक्रमईस्यमूलन्तु हस्तक्षेतुसमुद्धरेत् - । राजद्दारेभवेत्पूज्यो हस्तेवद्धाचवादजित् ८४ जो सुदर्शनाय हुं फट् स्वाहा। पूर्वमेवसहस्र जपेसिद्धिः। हस्त नक्षत्र में चकबड को जड़ उखाड़ कर हाथ में धा- रण करने से वह व्यक्ति राजद्वार में पूजनीय होता है और विवाद में जय लाभ करता है। इस प्रक्रिया के पहले "जो- सुदर्शनायहुँफट्स्वाहा” यह मन्त्र सहस्र जपकर सिद्ध होनपर कार्य करे।।८४|| पूर्वमेवायुतंजप्त्वा चण्डमत्रस्यसिद्धये । ततोह्योपधयोगाय कुरुसप्ताभिमनितं ॥८५॥ सिध्यन्तिसर्वकाणि पूर्वमेवप्रभावतः ८६ ओह्रीं रक्तचामुण्डे कुरुकुरुअमुकंमेवशमानय खाहा।अयंचण्डमत्रः सर्वसिद्धोभवति ।
- कामरन तन्त्र ..जिस स्थल में चण्ड मन्त्र द्वारा कार्य करना होता है, उ. स स्थल में मन्त्र सिद्धि के लिये प्रथम रक्तचामुण्टे इत्यादि मन्त्र जारवार जप करे। फिर औपधादि ग्रहण और प्रयोग काल में भी उक्त मन्त्र से सातवार अभिमन्त्रित कर कार्य करना चाहिये इस प्रकार करने से सम्पूर्ण कार्य सिद्ध होता है |८||||८|| मंजिष्ठाकुंकुमंचैव अजमोदाकुमारिका । चितिभस्मखरक्तश्च खरेतेनचमारयेत् ॥८७॥ पुष्यचटिकांकृत्वा भक्ष्येपानेचदाययेत् । स्पृष्ठेशाराजवश्यः स्याञ्चण्डमनप्रभावतः ८८ मजोठ, रोली, अजवायन, चीते की भस्म, और अपने शरीर का रक्त, यह सब द्रव्य एकत्र कर अपने बोर्य को भा. पमा कर पुष्य नक्षत्र में गोली बनाये। यह गोली जिसको भक्ष्य द्रव्य अथवा पाने के जल के संग भक्षण कराने। वह व्यक्ति निश्चय वशीभूत होता है, और गोली राजा को स्पर्श कराने से चण्ड मन्त्र के प्रभाव से राजा भी वशीभूत होताहै। श्वेतापराजितामूलं चन्द्रग्रहणउद्धृतः । : प कामरन तन्त्रा A- +ior . द. प्रभुणांभोजनेदेय चण्डमब्राहशङ्करं ॥८९॥ चन्द्रगहण के समय अपराजिता की जड़ उखाड़कर अप ने प्रभु को भोजन कराने से चण्ड मन्त्र के प्रसाद से वह प्रम तत्काल वशीभूत होजाता है।८९॥ उत्तरायांसमादाय प्रातरश्वत्थवनकं । करेवद्धातुसर्वत्र राजद्दारेज्यावहम् ॥९०॥ उत्तराफाल्गुणी, उत्तरापाड अया उत्तराभाद्रपद नक्षत्र में पीपल के वृक्ष की जड़ उखाड़ कर हाथ में बांधने से रा जद्वार और अन्यान्य सव स्थानों में जयलाभ प्राप्त होतोहे ९० धात्रीनंभरण्यान्तु विशाखामाम्रबधकं । पूर्वाफाल्गुणीनक्षत्रे ग्राह्यंदाडिम्बबनकं ९१ करेबद्धाभवेदश्यो यदिराजापुरन्दरः ॥९२॥ भरणी नक्षत्र में आमले के वृक्ष की जड़, विशाखा नक्षत्र में आम की जड और पूर्वाफाल्गुणी नक्षन में दाडिम्ब के. क्ष को जट ग्रहण करके हाथ में धारण करने से देवराज इन्न भी उसके निकट वशीभूत होजाते हैं ॥९॥९॥, अश्लेपायांगृहीत्वातु नागकेशरजनक ।
कामरत्न तन्त्र। ज करेवद्धाभवेहश्यो योराजापृथिवीपतिः॥१३॥ अश्लेषा नक्षत्र में नागकेशर की.जड़ ग्रहण करके हाथ में बांधने से पृथिवो का अधिपतिरांना भी वशीभूत होजाता है निघृष्याङ्गोलतैलेन रक्तमण्डलमूलक । " सप्ताभिमंत्रितंकृत्वा-तिलकराजवश्यकृत् ९४ ..' उक्तयोगानांचण्डमन्त्रेण सिद्धिी: रक्तोत्पलं को जड़ अकोल-फल के तेल में घिसकर पू. बक्ति चण्ड मन्त्र से सातवार अभिमन्त्रित कर कपाल में ति. लक लगाने से राजा वशीभूत होता है। पहले जो सम्पूर्ण प्र- क्रिया लिखो गई है, वह सब पूर्व लिखित चण्ड मन्त्र द्वारा करनी होती है ॥९४॥ .. होमयेत्कटुतैलेन रक्तचन्दनराजिका। “सहलाहुतिमात्रेण राजानांवशमानयेत् ।९५॥ लालचन्दन, और सफेद सरसों कडवे तेल में मिलाकर हजार आहुति होम में देने से तत्काल राजा को मो वश में कर सकता है |॥९ .. 1.
१६७ कामरत्न तन्त्रा ॥आकर्षणम्॥ आङ्कारेमत्रयेत्पाशं क्रोङ्कारेचांकुशंतथा । त्रिगुणंवामगंपाशं दक्षिणेज्वलितांकुशं ॥९॥ सन्धायेत्खकरोमन्त्री ततोमवमिमंजपेत् ९७ ओं ह्रीं रक्तचामुण्डे तुरुतुरु अमुको आकर्पय आकर्षय ह्रीं स्वाहा। अस्यमन्त्रस्यपूर्वमेवायुत- जपेसिद्धिः। अब आकर्षण मकर्ण लिखते हैं-आं इस मन्त्र से पाश और क्रों इस मन्त्र से अँश अभिमन्त्रित करे। इसके उपरांत वायें हाथ में त्रिगुणीत पाश और दहिने हाथ में ज्वलित अंकुश धारण कर 'होरक्तचामुण्डे' इत्यादि मन्त्र का जप करे।आकर्षण प्रक्रिया पहले उक्त मन्त्र दशहजार जपकर पश्चा. त् सिद्वि होनेपर कार्य करे ॥१६॥ ॥९॥ अथवानिजमवन्तु गुरुवक्तात्समागतं । पूर्बामेवायुतंजप्त्वा तेनैवाकर्षणंभवेत् ॥१८॥ ध्यात्वासाध्यञ्चमलिन मात्मानंदेवतानिभं। - * -- १६८ कामरत्न तन्त्र। ध्यायेत्साध्यगलेपार्श शिरोज्वलितमंकुशं ९९ त्रिसन्ध्यम्तुजपादेव दिनानामेकविंशति । ध्यानेमत्रेतायत्रे त्रैलोक्याकर्षणभवेत् १०० अथवा गुरु का दिया हुवा अपना इष्ट मन्त्र प्रथम दशह- जार जप कर आकर्षण कार्य में प्रवृत्त होना चाहिये। आक- पणीय व्यक्ति को चिन्ता करके आत्मा में देवता के रूप की चिन्ता कर, इसके उपरान्त आकर्षणोय व्यक्ति गले में पास और मस्तक पर ज्वलित अंकुश धारण कर तीनों सन्ध्याओं मैं मन्त्र का जप करे। इस प्रकार इक्कोस दिन तक ध्यान औं. र मन्त्र का जप करने से त्रिभुवन को आकर्षण कर सकता है। रक्तवस्त्रेलिखेद्यन्त्रं लाक्षयारक्तचन्दनैः। पूज्यंतद्धितंतोम्मूले लिखनेद्धरणीतले ॥१॥ त्रिसप्ताहंसदांसिंचेत् प्रातस्तत्तुण्डुलोदक। दूरादाकषयेन्नारौं यदिसानिगडान्विता ॥२॥ लालवस्त्र में लाखं का. रस और लालचन्दन द्वारा मन्त्र लिखकर उस यंत्र के उपर देवता की पूजा करे। अनन्तर यह यन्त्र वृक्ष को.जह की मट्टी में दांवकर प्रतिदिन सोनों सध्या- .73 कामरत्न तन्त्र। ओं में चावलों के जल द्वारा सोंचे। इस प्रकार तीन सप्ताह पर्यन्त सोंचन करने से दूर से वेदियों से बँधीहुई स्त्री भो आ- कृष्ट होकर आसकती है |शा ||२|| पूर्वोक्त पधैर्यन्त्रं रक्तवस्त्रेलिखेत्सदा । वेष्ठयेद्रक्तसूत्रेण जपेद्ध्यायेञ्चपूर्ववत् ॥३॥ तयन्त्रपूजयेन्मन्त्री निगलेखान्तरेततः । वद्वमाकर्षयेयन्तु निगडेप्रतिपीड़ितं ॥४॥ ""लाक्षारस और रक्तचन्दन द्वारा लालवस्त्र पर यन्त्र लिख कर यह वस्त्र लालडोरे से बांधे। इसके उपरान्त पूर्ववत् ध्यान पूजा और मन्त्र का जप करता रहै । इस प्रकार करने से नि- गढ़ (वैडियां) बद्ध (बँधा) व्यक्ति भी शीघ्र आकृष्ट होकर आ सकता है या पूर्वोक्तरोपधैर्यन्त्रं पूजयित्वातथाक्षिपेत् । नागवल्लीदलेयना जपेध्यायेच्चपूर्ववत् ॥५॥ त्रिसप्ताहेदिनप्राप्ते.सम्यगाकर्पणंभवेत् ॥६॥ लाक्षारस और लालचन्दन से ताम्बूल पत्र पर यन्त्र . चकर पूर्ववत् ध्यान, पूजा और जप करे। इस मकार तीन स. साइ तक ध्यान पूजादि करने मे शोध आकर्षण होनाता 4.
१७० कामरत्न तन्त्र। पूर्वोक्तरोषधैर्यध्र पूजयेन्मत्रसंयुत। वेष्टयेत्पद्मसूत्रैश्च निक्षिपेत्कलसान्तरे ॥७॥ तत्रैवपूजयेन्नित्यं समार्दाकर्षणंभवेत् ।' पूर्ववद्ध्यानमत्रेण शम्भुदेवेनभाषितं ॥८॥ पूर्वोक्त औषधि द्वारा ताम्बल पर यन्त्र बैंचकर उसको पद्मसूत्र से वेष्टन कर कलश में निक्षेप करे। इसके उपरान्त कलश पर पूर्ववत् पूजा करे। इस प्रकार एक मास पर्यन्त पू. जादि करने से आकर्षण होजाता है। इस स्थल मैं जो पूजा- दि लिखी गई है, उसमें चामुण्डा यन्त्र और रक्त चामुण्डा को पूजा जानना चाहिये ||9mjay अश्लेषायांतमादाय अर्जुनस्याथनक । अजामूत्रेणसम्पिय स्त्रीणांशिरसिनिक्षिपेत् ९ पुरुषस्यपशूनाञ्च क्षिपेदाकर्षणंभवेत् ॥१०॥ अश्लेषा नक्षेत्र में अर्जुन वृक्ष की जड लाकर बकरी के दूध में पीसले। यह औषधि किसों खो के मस्तक पर निक्षेप करने से उस स्त्री पर आकर्षण होजाता है। इसी प्रकार कि- सों पुरुष वा पशु के मस्तक पर डालने से वहो पुरुष और व. ही पशु आकृष्ट होता है||2ff 2011 , कामरत्न तन्त्र १७१ जलोकानीलसर्पश्च शोषयित्वाहरक्षितौ। जम्बीरकाष्ठैस्तचूर्णं धूपादाकर्षणंभवेत् ॥११॥ जोंक और कालासांप मारकर उसको सुखाकर चूर्ण क- रे।फिर नींबू की लकडी की अग्नि में इस चूर्ण को धूप देने से आकर्षण होजाता है ।।१।। । साध्यायावामपादस्थांमृत्तिकामाहरेक्षितो। कूकलासस्यरक्तेन प्रतिमांकारयेत्सुधीः ॥१२॥ साध्यानामाक्षरतस्या स्तद्रक्तैप्विलिखेबृदि । मूत्रस्थानेचनिखनेत् सदातत्रैवमूत्रयेत् ॥१३॥ आकर्पयेत्तुतांनारी शतयोजनसंस्थितां। चतुर्लक्षमितेजप्ते धुंधुतोनामचेटकः ॥१९॥ यत्रपुष्पफलादीनां करोस्याकर्षणध्रुवं ॥१५॥ ओघुघुताआकृष्ठिकत्तीसृष्टिपुरीअमुकीवरोहीहीं। जिसको आकर्षण करना हों, उसमें वायें पैर में स्थित मट्टी लाकर यह मट्टो और १ कृकलास, का रक्त यह दोनों द्रव्य मिलाकर एक प्रति मूर्ति बनाकर उसके वृक्ष स्थल में कृकलास के रक्त से आकर्षणीय व्यक्ति का नाम लिखना हो.
૭૨ कामरन तन्त्र ता है। अनन्तर यह प्रति मूत्ति मूत्र स्थान मैं दावकर उसके ऊपर पेशाब करे । इस प्रकार करने से शतयोजन दर वाली वो भी आकृष्ट होकर साधक के निकट उपस्थित होजातो है ॥१२॥ ॥१३॥ ॥१४॥ ॥१५ इतिकामौरतौग्राह्यो भ्रमरोयत्नतोवुधैः । भिन्नोकृत्वादहेत्तोतुं चित्तिकाष्ठेस्तयोःपुनः ॥१६॥ वस्त्रेणवेष्टयेद्भस्म. पृथक्तत्पोटलीद्वयं ।।. तयोरेकमज्जाश्रृङ्गे दृढ़वद्धापरिक्षिपेत् ॥१७॥ यदायातितुसामेषी तत्पृथग्वन्धयेवुधः । तद्भस्मशिरसिन्यस्तं क्षणादाकर्षयेत्रियं ॥१८॥ अपरंरक्षयेद्धस्ते यदिनायातिकामिनी ॥१९॥ ओंकृष्णवत्तीयवाहा । इममन्त्रपूर्वमेवायुतं जप्त्वाउक्तयोगेनामतिमन्त्रेणसिद्धिः। रति कार्य में निरत दो भ्रमर लाकर पृथक पृथक चीते के काष्ट की अमि में दग्ध करके उसको भस्म ग्रहण करे, फिर यह भस्म वस्त्र द्वारा ढक कर पृथकं दो पोटलो करे, इसके उ. परान्त उसमें से एक पोटलोबकरी के सोग में मजबूत बां.
५७३
कामरन तन्त्र।
.
धकर बकरी को छोंडदे। दूसरी पोटली अपने हाथ में पांधे,
यह बकरी जिसके निकट जायगी, वही व्यक्ति आकृष्ट होकर
आवेगा । यदि एकवार में कार्य सिद्धि न हो, तो हरतगत
पोटली पुनर्गर बकरी के सींग में बांधकर छोडते । अथवा
इस पोटली की भस्म अभिलापित स्त्री के मस्तक पर डालने।
इससे निश्चय आकर्षण होता है। इस प्रक्रिया के पहले "कों.
कृष्णवत्तीय स्वाहा” यह मन्त्र दशहजार जप करना होता है,
और इसो मन्त्रसे भस्म अभिमन्त्रित करलेनी चाहिये १६२९
इतिश्री नागमनिरषित वशीकरण मन्त्रे रुहेलखण्डान्तर्गत बरेली निवासी
ब्रह्मकुलभूषण ५०बांकेलालामज श्रीयुसप०श्यामसुन्दर शर्मा विरचित
मापाटीकायां श्री शिवार्पणमस्तु ।
इति ।
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1
' ॥ जागती कला ॥
...क्या खूब ! वाहवा यह किताब है कि अमूल्य रत्न इ
सके गुणों का कहां तक कथन करें बस इतना तो अवश्यही
कहेंगे कि बस जैसा नाम तैसाही गुण है मिथ्या जालो और
इन्द्रजालिक भ्रमो से छुड़ाने को कुञ्जी और जन्म मरण तथा
आवागमन वेदनाओ स निर्मुक्त करने की नसैनी है बहुत दूर
मत जाओ वडे झगडो में मत पड़ो इसमें ग्रन्थकार ने अपनी
आय भर के एकन किये हुए सच्चे २ विषय रकरखे है और
पुस्तक को चार भागो में विभाग किया है जिनका हम शूक्ष्म
कथन करते है ज़रा देखिये तो सहो।
प्रथमभाग-इसमें आत्मा अर्थात् मरेहए मनुग्यो की रूह
(आत्मा) को चलाना और उनसे बातचीत करना और गुप्त
भेट जानना बस यदि आपको अपने मरेहुए पियो से वात
चोत करना अपनो मृतक पत्नी से कथन करना है अपनो स
न्तान का हाल जानना है अपने मृतक मा वाप से उस गडे
हए धन आदि का हाल जानना है जिसको वह मरते समय
वे बताये छोडगये हैं तो मारे २ क्यो फिरते हो दीवारों से
शिर क्यो मारते हो इस कितार ला जबाव को लेकर मनो
कामना पूर्ण कीजिये यह कोई आश्चर्य का विषय नहीं है यह
वही विद्या है जिसके द्वारा नारद मुनि जी ने महाभारत में
मरेहए वीर पुरुषो की आत्माओ को उनकी प्रिया स्त्रियों के कह
ने मे बुलाया था जिसका कथन महाभारत में विस्तार पूर्वक है - दूसराभाग-इसमें मेसमैरिज़म-शायद बहुत से हमारे पाठकगण यह जानतेही न.हों कि मेसमेरिजम कौनसा जान- पर है.हम बहुतही अल्प विख्यात करते है यह वह विद्या.. कि जिसके द्वारा भूत, भविष्य, वर्तमान तीनों काल का हाल माननी औरों को बताना देश देशान्तरों के समाचार लेना असाध्य रोगों की चिकित्सा करना योगाभ्यास करना वस फिर अंघक्या आमिल हैं तो आप हैं और कामिल है तो आप की सभी दशा होजाती है। तीसराभाग-इसमें छाया पुरुष को बुलाना और उससे गुम भेद जानना औरों के मन का हाल जानना आदि सभी हैं। चौयाभाग-इसमें वह, यत्र, मैंत्र, तंत्र है जो बन्दक की गोली से अधिक गुण रखते हैं जिनका कथन करना मिथ्या, कांगज रंगना है हाथ कमान को आरसी क्या? बस यह सब सो अतिही सूक्ष्मता से कथन किये गये हैं अन्यकार ने यह अतिही देशहितपिता का काम जो आजकल' के भारतवासियों के सर्व भांति विरुद्ध है कर दिखाया,अर्थात् अपना इतना बड़ा कमाया हुआ धन दोनों हाथों लुगादिया. “जो महाशय इस.अमूल्य रत्र को न लूटेंगे वह हाय मल मल कर पखिताबैंगे।::: ऐप्रिय माइयो मापं,लोग हजारों रुपये खर्च करने हैं - . होसक्ता, जो कार्य हृदय का रुधिर दान करने से भी नहीं | और नानाप्रकार की सामग्री एकत्र करते हैं तहां इस, अनुपम पुस्तक को अवश्य लीजिये और एकवार पढ़कर तो देख जा इये फिर वस आमिल है तो आप हैं और कामिल है तो आप योगी है तो आप हैं और तेजस्वी है तो आप-मूल्य डांक- व्यय सहित १३ आना है। नित्यतंत्र भाषा टीका सहित दीक्षा, गुरूकरण, सन्ध्या, गायत्रो, जप, होम, पूजा, कु. ण्डादि का बनाना, शान्ति, सर्व प्रकार की सिद्धियों का प्राप्त होना अर्थात् मन्त्र और साधना के बल से भूत, प्रेत, अप्सरा पिशाच, शव, योगिनी, सुन्दरी आदि साधना द्वारा मनो. कामना का सिद्ध होना, अनेक प्रकार का ध्यान, देह तत्व, गुप्तसाधन, भूत भविष्यत् का ज्ञान होजाना, अनाहार रहना, नोद का आना, द्रव्य गुण से अनेक प्रकार के वशीकरण, विद्वेषण, मोहन, स्तम्भन, उच्चाटन, मृत्यु, सञ्जीवन आदि, विद्याओं की सिद्धि इस तन्त्र के अनुसार साधना करने से निश्चय प्राप्त होजाती है। रघनन्दन की स्मृति, कृष्णानन्द के तन्त्र सार, महा निर्गण तन्त्र और माणतोषिक आदि तन्नों 'का सार भाग यह तन्त्र है । आकाशचर, जलचर और थल- चर आदि प्राणियों के ऊपर भी इस तन्त्र के कार्य का प्रभाव पहुंच सक्ता है । जो काम सहस्त्र २ मुद्रा खर्च करने पर नहीं . । । होसक्ता है वह काम इस तन्त्र के अनुसार व्यवहार करने से अवश्य होजाता है। "जिन लोगों को सदा अपने स्टेडियों की याद बेचैन के रती है। जो लोग रुपये पैसे से सदा तङ्ग रहते हैं, जिन लोगों को अपने धर्म से प्रेम है, जिनको देवी देवताओं पर भी अपना प्रभाव पहुँचाना है, वह अवश्य एकबार इस तन्त्र को मँगाकर पढ़ें छापा उत्तम कागज़ बढ़िया दाम, डांकव्यय, : महानिर्वाण तन्त्रम. यह वन्य वेद 'प्रतिपाय है, सँसार को समस्त क्रिया मनुष्य के दशं संस्कार, देव देवो पूजा पद्धति, कलियुग के जोवों को अवस्था, साधनों को रोति, अधिकारी भेद से पृ. थक पृथक उपासना पद्धति, मन्त्रादि के द्वारा अभिषेक को रीति, मुक्ति का सीधा रास्ता, संन्यासो के सिद्ध होने की रीति सर्व प्रकार की सिद्धियों का इस्तगत होना, राज्य प्राप्त करना दरिद्र को भी महा सम्पत्ति प्राप्त करना, व्यवहाराध्याय कि- सको पिता का धन मिलसक्ता है किसको नहीं कैसे अप- राध पर अपराधी को फेसा दण्ड मिलना उचित है। वर्णस. करादि की उत्पत्ति और ब्रह्मोपलब्धि आदि विषय इस में- कार सरल भाषा टोका संहित लिखे गये हैं कि पालक तक सरलत में इसकी भाषा समझ जायेंगे. यह यही तन्त्रशास्त्र कि गितको कलियुग में जीयों की सामर्थ्य को हीन हुआ . देखकर पार्वती जी ने शिवजी से पूँछ और महादेव जी ने कहा.अनाचारी का अधिकार इस ग्रन्थ के पठन पाठन में नहीं है. मूल सहित यम्बई टाइप में उत्तम कागज़ वं उत्तमा टाइप में छापा है. सर्व साधारण के पास यह ग्रन्थ पहुँच जाय इस कारण इस बडे ग्रन्थ को मूल्य २, रु० डाकव्यय । आना है वी.पी. मैं लेने से शक लगेगा। ॥ गोपीचन्द नाटक ॥ : हिन्दी भापां में आजकल जिन नाटकों का अभिनयं होता है उन नाटकों में से यह भी एक उत्तम नाटक है। इ- सकों भापा शुद्ध और रसिक है। वङ्गाल देश के राजा गो. पीचन्द की माती का जालन्दर गुरू से उपदेश पाना, गोपी- चन्द का पारंह सौ रानियों को और राजपाट को छोड़कर. योगी होना, रानियों का महा विलाप कलाप, वन में जाकरे || मच्छेन्द्रनाथ के शिष्य और गोरखनाथ के समागम होने से कामदेश में जाने के लिये तैयार होना, मच्छेन्द्रनाय का त्रियाराज्य के मध्य कामकला के फन्दे में फंस जाना, गोपी. चन्द के बहनोई कन्दनसेन का भी सारिका के यहां कैद हो जाना, गोपीचन्द, कानीफ, गोरक्षनाथादि का नाटक करने के बहाने मच्छेन्द्रनाथ को छ्टाने जाना, वहां इन्द्रसभा का रुपक दिखाना उस रूपक को देखकर मच्छेन्द्रनाथ को अ पनी पिछली अवस्था को याद आना, मच्छेन्द्रनाथ का मूर्थि .
- त होना, गोरक्षनायादि का कामकला से इनाम में मच्छेन्द्र- नाथ तथा कँदनसेन को मांग लेना । मच्छेन्द्रनाय के गर्व को दूर होना और शिष्य गोरक्षनाथ से यह कहना। कि शार जी सधे हैं माया अजीत हैं। और गुरू से चेला बडा है। व हां से बहन चम्पावती के पास गोपीचन्द का आना, योग और गृहस्थ धर्मपर वादानुवाद फिर अपने नगर में आना मैना- वती का शरीर त्यागना, शोक की मूर्ति, गोपीचन्द का दुवा- रा राज्यपर बैठना। अनेक देशों के गवैयों का आना, अपनी अपनी भाषा में ईश्वर के गुणानुवादों का गाना । नाटक का समाप्त होना ।इन सब बातों का ऐसा वर्णन किया है कि-प- ढते. कभी २ हँसी आती है कभी शोकसागर उछल उठता है कभी अद्भुत रसकी लहरै भिगोती हैं। गोपीचन्द की रा नियों का बिलाप एक क्षण के लिये नहीं सिरेगा। ऐसे उ- त्तम नाटक का मूल्य डांकव्यय सहित पांच आना है। वी० पी० में लेने से सात आना लगेगा। चन्द्रकान्ता उपन्यास इस उपन्यास के पढ़ने से साफ मालम होगा कि पुराने ज- माने में राजदरबार में ऐयार लोग रहा करते थे। जो हरफन- मौला होते थे, उन ऐयारों को चालाकी का मंमा आप को इस किताब में मिलेगा सिवाय इसके पुरानी इमारतों तथा पहाडीर जवाड़ों के साथ साथ पहाड़ी और जाल सीनरी (च्या) का ( ७ ) || आनन्द विशेष मिलेगा, केवल इतना ही नही बल्कि तिल- स्म की अद्भुत कारोगरो तया कौतुहल वर्धक पातै पटवर जा. प बहुतही प्रसन्न होंगे विशेषता यह है कि इस पुस्तक का प. दने वाला धूतों और दगावाजों के धोखे में कदापि न फसे- गा। लोगों ने इस उपन्यास को बहुतही पसन्द किया और थोडेही दिन में इसको दूसरी दफे छपने को नौबत आई इ. स पुस्तक का आकार पांच सौ पृष्ठ से ज्यादे है मूल्य २, डा. क.महसूल, इस पुस्तक को नायिका चन्द्रकान्ता और ना- यक बोरेन्द्रसिंह का हाल पढ़कर पाठक इतने प्रसन्न हुये कि इसी ढंगपर चन्द्रकान्ता के लड़कों का हाल अर्थात् चन्द्रकान्ता सन्तति चन्द्रकान्ता से भो तिगुना उपन्यास लिखने को नो. वत आई अव वह भी छप कर तैयार है जिसका हाल आगे चलकर उपन्यासलहरी के विज्ञापन से आपको मालूम होगा। ॥ पुराणप्रतिपादन ॥ इस पुस्तक में आर्य समाज उपदेशक फारसी के पण्डित लेखराम जी की बनी हुई."पुराण किसने बनाये” पुस्तक का खण्डन और अनेक प्रमाणों से पुराणों को मण्डन और मा. चीनता सिद्ध कर मिथ्या आक्षेपों से बचाया है मूल्य | आ मार्थवांटने वाले धर्मावलम्बियों को रा), सैकडे में दोजायगी ॥ रुद्राष्टाध्यायी भाषाटीकासहित ॥ इस अन्य की महिमा को सब छोटे बडे जानते है। यह
( ८ )
अन्य बढेही काम का है। ऊपर मल श्लोक नीचे भाषा टीका
है मूल्य आना | डोकव्यया । आना।
॥ रुद्राक्षंधारणविधि
इस पुस्तक के पढ़ने मे अखण्ड पुण्य होता है, शिव पू.
जन करने वालों को इसको एक प्रति अवश्य लेना चाहिये।
ऊपर मूलश्लोक और नोचे भापाटोका है। मूल्य डोकव्यय
सहित केवलं आना।
॥ हनुमानज्योतिष ॥
यदि घर बैठे सहसौ रुपये लेना चाहते हो, नान की
हगो, मन्दी को जानना चाहते हो तो इस पुस्तक को पहो ।
भापा में आजतक ऐसो. पुस्तक नही छो। मूल्ये डांकव्यय
सहित केवल आना !!
हितोपदेशं.भापाटोका सहित दाम १७ रुपया।
धर्पयोध भापाटोका सहित दाम, आना।
योगिनी तन्त्र भापाटोका सहित छपता है।
यन्त्र चिन्तामणि भापाटीका सहित छपती है।
उपरोक्त पुस्तकों के अतिरिक्त हमारे यहां मैं ज्वाला-
प्रसाद जो मिश्र मुरादावाद निवासी रचित समस्त पुस्तके
मिल सकती है।
:: इस ठिकाने पर पत्र भेजों
“पण्डित बलदेवप्रसाद मिश्र
मोहल्ला दीनदारपुरा-मुरादाबाद
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