Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
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mr list-शिकनीके हारसे बेर सारहे है"
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(Kान रामपके अधिकाश देवालयो काम । मोम माजरा होता है।
(७) प्राचीन कालका प्राह्मण भाश्रममें बैटा राराको उपदेश देरहा है
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(१०) वर्तमान समयके अधिकांश मानप्रस्थी तथा संन्यास हापको पैसे केलिमे उएरहे है। (११) प्राचीन कालका पुट विपाधी । पर्तमान समयका दुईमग यामाधारी शिवा
श्रीमद्भगवद्गीता
गीतामाहात्म्य भाषाटीका दोहा सहित
॥ घरोवाच ॥
भगवन्परमेशानभक्तिरव्यभिचारणी ॥
प्रारब्धंभुज्यमानस्यकथंभवतिहेप्रभो॥१
दो०-धरती पूछौवष्णुपे, सुनियेमाधवराव ।।
कर्मभोगजीवनको, कैसेभक्तिप्रभाव ॥
हे भगवन् ! हे परमपुरुषोत्तम ! इस संसारसागरमें अनन्त जीव
अपने अपने कियेहुये कर्मोंका फल निरंतर भोगते हैं, ऐसे जीवोंको
आपकी अनन्य भक्ति कैसे मिल सकती है, वह उपाय कृपापूर्वक
मुझे बतलाइये ॥ १ ॥
॥ विष्णुस्वाच॥
प्रारब्धभुज्यमानोहिगीताभ्यासरतः सदा
समुक्तःससखीलोकेकर्मणानोपलिप्यते ॥
दो०-प्रारब्धीकर्मानको, भोगैजीवअनंत ।।
श्रीगीताकेपाठते, पावैभक्तिनिरंत ॥२॥
यह सुन विष्णु भगवान बोले-हे धरणी प्रारब्ध कमाको भोगते
हुये जीव जो सदा गीताके अभ्यासमें तत्पर रहते हैं, वेही मोक्षरूप हैं
वेही सुखी हैं और इस लोक में प्रारब्धकर्मभी उनका कुछ नहीं
करसकते हैं ॥२॥
भगवद्गीताभाषाटीका.
महापापादिपापानिगीताध्यानकरोतिचेत
कचित्स्पर्शनकुवैतिनलिनीदलगंभसा।३।
दोहा-महापातकी जो करै, गीताकोअभ्यास ।।
ताकोपातकनावै, कमलपातजलबास ॥३॥
जो कोई पुरुप बडेसे बडा पाप करके भी प्रतिदिन गीताको ध्यान
करता रहता है उसको वे पाप ऐमे स्पर्श नहीं कर सकते हैं जैसे कम-
लके यत्तेपर जल नहीं ठहर सकता है ॥३॥
गीतायाःपुस्तकंयत्रयत्रपाठःप्रवर्तते।
तत्रसर्वाणितीर्थानिप्रयागादीनितत्रवै।४।
दोहा-जाघरगीता बसै, पुस्तक पाठ करंत ॥
सर्वतीर्थवाठौरहैं, प्रयागआदि अनंत ॥४॥
जहाँ गीताका पुस्तक होता है अथवा जहाँ कहीं गीताका पाठ
होता है वहीं प्रयागराजसे आदि लेकर सब तीर्थ निवास करते हैं॥४॥
सर्वदेवाश्चऋपयोयोगिनःपन्नगाश्चये॥
गोपालागोपिकावापिनारदोद्धवपार्षदाः५
दोहा-सर्वदेवऋषियोगिजन,पन्नगगोपिगवाल॥
नारदटहवपारपद, बसौतहाँ नॅदलाल॥२॥
जहांगीताका पाठहोताहै वहां संपूर्ण देवता ऋषिमुनि,योगीजन
पन्नग, गोपाक, गोपी, नारद, उद्धव, आदि भगवान्के पार्षद निवास
करते हैं ॥५॥
मण्याप..
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सहायोजायते शीघ्रंयंत्रगीताप्रवर्तते ॥
यत्रगीताविचारश्चपठनपाठनंश्रुतम् ।।
तत्राहंनिश्चितपृथ्विनिवसामिसदैवहि।६।
दोहा-सहायक सवपारषद, जहँगीतासुखवास ॥
जोबांचैसीखैमुने, जिनकेरक्षकदास ॥६॥
जहां गीताका पठन पाठन होता है वहां किसी प्रकारकी विपत्ति
पडनेपर भगवान् तत्काल सहायता करते हैं, जहाँ गीताका विचार
होता है पठन पाठन होता है, श्रवण होता है, वहाँ हे पृथ्वी ! में
सदाही निश्चय निवास करताहूं ॥६॥
गीताश्रयेऽहंतिष्ठामिगीतामेचोत्तमंगृहम्
गीताज्ञानमुपाश्रित्यत्रींल्लोकान्पालयाम्यहम्।७
दोहा-मैंगीताके आसरे, सुखवासीसतिपाल ।
श्रीगीताकेइष्टसों, त्रैलोकीप्रतिपाल॥७॥
हे पृथ्वी ! मैं श्रीगीताजीके आश्रयपर रहताहूं गीताही मेरा पर-
मोत्तम घर है और मैं गीताहीके ज्ञानका आश्रय लेकर त्रिलोकीका
भरण पोषण करता हूँ ॥७॥
गीतामेपरमाविद्याब्रह्मरूपानसंशयः॥
अर्धमात्राक्षरानित्यास्वानिर्वाच्यपदात्मिका
दोहा-मेरीविद्यापरम है, गीताब्रह्मस्वरूप ॥
अक्षरमात्रानितप,पडेनभवकेकूप ॥८॥
भगवद्गीताभाषाटोका.
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यह गीता मेरी सबसे उत्तम विद्या है, यह ब्रह्मरूपा है इसमें कोई
संशय नहीं है, जो कोई इसका पद पदार्थ मांत्रा वा अक्षरभी नित्य
पढते हैं वे अनिर्वचनीय पदको प्राप्त होते हैं ॥८॥
चिदानंदेनकृष्णेनप्रोक्तास्वमुखतोऽर्जुनम्
वेदत्रयीपरानंदातत्वार्थज्ञानसंयुता ॥९॥
दोहा-चिदानंदघन कृष्णके, मुखतेअर्जुनधार ॥
वेदत्रयीआनंदमय, तत्वज्ञानकोसार ॥९॥
यह गीताचिदानन्द स्वरूप,आनन्दधन श्रीकृष्ण भगवान ने अपने
मुखसे अईनको सुनाई है इससे यह वेदत्रयीरूप कर्मकांडमय परमो-
स्कृष्ट, आनन्ददात्री और तत्वज्ञानके देनेवाली है ॥९॥
योऽष्टादश जपेन्नित्यं नरोनिश्चलमानसः॥
ज्ञानसिद्धिसलमते ततोयातिपरंपदम् १०
दोहा-जो अष्टादश अध्यायको, नित्यकरैपढजापा
ज्ञानसिद्धमोक्षहि मिलै, छूटजातसवपाप ।। १०॥
जो मनुष्य चित्तको स्थिरकर अठारह अध्यायका पाठ करता है।
उसको ज्ञानकी सिद्धि मिल जाती है और अन्त में परमपदको प्राप्त
होता है।॥१०॥
पाठेऽसमर्थःसंपूर्णतदईपाठमाचरेत् ॥
तदागोदानपुण्यलभतेनात्रसंशयः११॥
दोहा-जो अशक्तसबपाठमें,आधोकरैनिदान "
गऊदानके पुण्यसम, पावैपदनिर्वान ॥११॥
अध्याय १.
जो कोई.पूरा पाठ करनेमें असमर्थ होनेके कारण आधाही पाठ
करता है उसे गोदानका फल मिलता है,इसमें कोई संदेह नहीं है।।११
त्रिभागंपठमानस्तुगंगास्नानफलंलभेत्।
पडशंजपमानस्तुसोमयागफललंभेत् १२
दोहा-तीजेहिस्सेपाठते, स्नानगंगसमजान ॥
छठेमागकेपाठते, सोमयज्ञपरमान ।। १२॥
जो कोई तृतीयांश अर्थात् छः अध्यायकाही पाठ कर लेता है उसे
गंगास्नानका फल मिलताहै और जो छठे भाग अर्थात् तीन अध्याय-
काही पाठ कर लेता है उसे सोमयज्ञका फल मिलता है ।। १२ ॥
एकाध्यायंतुयोनित्यंपठतेभक्तिसंयुतः॥
रुद्रलोकमवाप्नोतिगणोभूत्वावसेचिरम्॥१३॥
दोहा-एकाध्यायजो पढतहैं, नित्यभाक्तिसंयुक्त ॥
गणस्वरूपकैवस, रुद्रलोकमें मुक्त ॥ १३॥
जोभक्तिपूर्वक एकही अध्यायका नित्य पाठ करलेताहै वह रुद्रलोकमें
जाकर महादेवजीका गण बन वहाँ बहुत दिनतक निवास करताहै१६
अध्यायश्लोकपादंवानित्यं यः पठतेनरः॥
सयाति नरतांयावन्मन्वंतरवसुंधरे॥१४॥
दोहा-एकश्लोकअध्यायपद, नित्यपढतनकोय ।
एकमनूके राजतक, नरतनधारीहोय ॥ १४ ॥
हे बसुन्धरे ! जो कोई एक अध्याय, एक श्लोक वा एक पादका
नित्य पाठ करता है वह एक मन्वन्तरतक मनुष्य देह पाताहै ॥१४॥
भगवडीताभाषाटीका.
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गीतायाःश्लोकदशकंसप्तपंचचतुष्टयम् ॥
द्वौत्रीनेकंतदर्धवाश्लोकानांयापठेन्नरः१५
दोहा-या गीताकेश्लोकदश सातपांचजोचार-॥
तीनदोनएकहुअरध, जोनितपढतसुधार ॥१५॥
जो कोई गीताके दस, वा सात, वा पांच वा चार वा दो,वा तीन
वा एक, वा आधा श्लोक प्रतिदिन पाठ करता है॥१५॥
चंद्रलोकमवाप्नोतिवर्षाणामयुतंध्रुवम् ॥
गीतापाठसमायुक्तीमतोमानुषतबिजेता१६।
दोहा-चंद्रलोकमेंबसत है, संमतदशजुहजार ॥
गीतापठनसमेतव्है, पुनिमानुषअवतार ॥१६॥
वह मनुष्य दशसहस्र वर्पतक चन्द्रलोकमें निवास करता है और
जो मनुष्य गीताका पाठ करते करते देह त्याग देता है वह मरकर
फिर मनुष्य देह पाता है ॥ १६ ॥
गीताभ्यासंपुनःकृत्वालभतेमुक्तिमुत्तमामा
गीतेत्युचारसंयुक्तोप्रियमाणोगतिलमंता१७
दोहा-गीताके अभ्यासते, उत्तममुक्तिलहंत ।।
गीताके उच्चारसँग मरेसुमुक्तकहंत ॥१७॥
। और फिर गीताकाअम्यास करनेसे मोक्ष पालेता है और जोगीता
गीता करतही प्राण त्याग देते हैं वे उत्तम गति पाते हैं ॥१७॥
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अध्याय ।
गीतार्थश्रवणासक्तोमहापापयुतोऽपिवा॥
वैकुंठंसमवाप्नोतिविष्णुनासहमोदते।१८०
दोहां-जोगीताकेअर्थविन, केवल करेंजुपाठ॥
* विष्णुसहितवैकुंठमें, टूटैकर्मकपाट ॥१८॥
यदि कोई मनुष्य महापापीभी हो और वह गीताके अर्थक सुनने में
आसक्त होता है वह कैकुंठधाम पाता है और विष्णु भगवान्के समीप
रहकर आनन्दमें रहता है ॥१८॥
गीतार्थध्यायतनित्यंकृत्वाकर्माणिभूरिशः॥
जीवन्मुक्तःसविज्ञेयोदेहांतेपरमपदम्१९॥
दोहा-बडेबडेकर्मजुकरें, हियगीताकोध्यान ॥
जीवन्मुक्तसुजानिये, मरेपरमपदमान ॥ १९॥
जो अनेक प्रकारके कर्मोको करता हुआ भी गीताके अर्थका नित्य
प्रति ध्यान करताहै वह जीवन्मुक्त होता है और मरनेपर परमपद
पाता है।॥ १९॥
गीतामाश्रित्यबहवोभूभुजाजनकादयः॥
निर्धूतकल्मषायातागीतागीताःपरंपदम्।२०॥
दोहा-गीताआश्रितहोयके, जनकादिकबड्डभूप ॥
गयेपरमपदपापतज, भयेपारषदरूप ॥२०॥
गीताका आश्रय लेकर बहुतसे जनकादि राजा पापों से छूट गये
हैं और गीता गीता करते हुए मोक्षपद पागये हैं ॥२०॥
A भगवद्गीताभाषाटोका. गीतायाःपठनंकृत्वामाहात्म्यनैवयःपठेत्। वृथापाठोमवेत्तस्यश्रमएवादाहतः।२१ दोहा-जोमहात्मकेपाठविन, करैसुगीतापाठ॥ प्रेमपंथपावैनहीं, चालेऊजडवाट ॥२१ ।। जो गीताको पाठ करके माहात्म्यका: पाठ नहीं करताहै उसका, गीतापाठ वृथाही है, केवल परिश्रम मात्र है ।। २१॥ एतन्माहात्म्यसंयुक्तंगीताभ्यासंकरोतियः सतत्फलमवाप्नोतिदुर्लभांगतिमाप्नुयाता२२ दोहा-यहमाहात्म्यसुंयुक्तकर, करगीताकोपाठ॥ दुर्लभफलजोहरिकह्यो, मिलैरतीनहिंघाट २२ जो माहात्म्य सहित गीताका पाठ करता है वही गोताके पाठका फल पाता है और उसको दुर्लभ गति मिलती है ॥ २२ ॥ ॥ सूत उवाच ॥ महात्म्यमेतद्गीतायामयाप्रोक्तंसनातनम्। गीतांतेचपठेद्यस्तुयदुक्तंतत्फलंलभेत् २३ दोहा-सूतपुराणिककहतहे, शौनकसौंसमुझाय॥ आदिअंतकरपाठके, गीतामाहात्म्यध्याय २३ सूतजी कहते हैं-हे शौनकादिऋषियो! जो गीताका माहात्म्य मैने तुमको सुनाया है यह सनातन है जो कोई गीताका पाठ करके इसका पाठ करता है वह गीताके पाठका फल पाता है॥२३॥ इति श्रीवाराहपुराणे श्रीगीतामाहात्म्ये श्रीघरकृतब्रजभाषान्तरं समाप्तम् ॥
मध्याय १३
॥ श्रीगणेशाय नमः॥
अस्यश्रीभगवद्गीतामालामंत्रस्य ॥ श्रीभगवान्वेदव्यासंऋषिः। अनुष्टु-
पछंदः॥ श्रीकृष्ण परमात्मादेवता अशोच्यानन्वशोचस्त्वंप्रज्ञावादा-
श्वभाषसइतिबीजम् ॥ सर्वधर्मान्परित्यज्यमामेकंशरणंबजेतिशक्तिः॥
अहत्वासर्वपापेभ्योमोक्षयिष्यामि माशुचइतिकीलकम् ॥ नैनंछिदंति-
शस्त्राणिनैनंदहतिपावक इत्यंगुष्ठाभ्यांनमः॥ नचैन क्लेदयंत्यापोनशोष-
यतिमास्तइतितर्जनीभ्यांनमः॥अच्छेद्योयमदायोयमक्लेयोशोष्यएव-
चेतिमध्यमाभ्यांनमःनित्यःसर्वगतः स्थाणुरचलोयंसनातन इत्यना-
मिकाभ्यांनमः । पश्यमेपार्थरूपाणिशतशोथसहस्रश इतिकनिष्ठिका
भ्यांनमःनानाविधानिदिव्यानिनानावर्णाकृतीनिवेतिकरतलकरपृष्ठा
भ्यांनमः॥अथ हृदयादिन्यासाननंछिदंतिशस्त्राणिनैनंदहतिपावक-
इतिहृदयायनमः॥नचैनक्लेदयंत्यापोनशोषयतिमारत इतिशिरसेस्वाहा
अच्छेद्योयमदाह्योयमक्लेद्योशोष्यएवचेतिशिखायैवषट्। नित्यःसर्व-
गतःस्थाणुरचलोयसनातनइतिकवचायहुम्॥पश्यमेपार्थरूपाणिशतशो
थसहस्रश इतिनेत्रत्रयायवौषट् ॥नानाविधानिदिव्यानिनानावर्णाक-
तीनिचेतिअसायफट् ॥ अथ ध्यानम्॥ पार्थाय प्रतिबोधितां भगवता
नारायणेन स्वयं व्यासेन प्रथितां पुराणमुनिना मध्ये महाभारतम् ॥
अद्वैतामृतवर्षिणीभगवतीमष्टादशाध्यायिनीमंवत्वामनुसंधामि भगव-
होते भवेद्वेषिणीम् ॥१॥ नमोस्तु ते व्यासविशालबुद्धे फुल्लारविंदा-
यतपत्रनेत्र ।। येन त्वया भारततैलपूर्णःप्रज्वालितोज्ञानमयः प्रदीपः
॥२॥प्रपन्नपारिजाताय तोत्रवेत्रैकपाणये ॥ ज्ञानमुद्राय कृष्णायगी-
तामृतदुहे नमः॥३॥ सर्वोपनिषदो गावो दोग्धा गोपालनंदनः॥
पार्थोवत्स सुधीभॊक्ता दुग्धं गीतामृतं महत् ॥ ४॥ वसुदेवसुतं देवं
कंसचाणूरमर्दनम्॥देवकीपरमानन्दं कृष्णं वंदे जगद्गुरुम् ॥५॥ भीष्म-
द्रोणतटा जयंद्रथजला गांधारनीलोत्पला शल्पग्राहवती कृपेण वहनी
कर्णेन वेलाकुला ॥ अश्वत्थामविकर्णघोरमकरा दुर्योधनावर्तिनी
सोत्तीर्णा खलु पांडवै रणनदी कैवर्तकः केशवः ॥६॥
भगवद्गीताभाषाटीका.
पराशर्यवचःसरोजममलंगीतार्थगंधोत्कटं नानाख्यानककेमरं हरिकथा:
संबोधनाबोधितम्॥लोके सज्जनषट्पदैरहरहा पेपीयमान मुदा भूया-
शारतपंकज कलिमलप्रध्वंसिनःश्रेयसे ॥७॥ मूकं करोति वाचालं
पंगुलंघयते गिरीन् । यत्कृपातमहं वंदे परमानंदमाधवम् ॥८॥ये
ब्रह्मावरुणेंद्ररुद्रमस्तः स्तुन्वति दिव्यैः स्तवैवेदैः सांगपदक्रमोपनिषदै-
यति यं सामगाः ॥ध्यानावस्थिततद्गतेन मनसा पश्यंति यं योगि-
नो यस्यांतं न विदुःसुरासुरगणा देवाय तस्मै नमः।९।इतिध्यानमः।
॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥
अथ श्रीमद्भगवद्गीताभाषाटीका.
दोहासहिता प्रारम्यते.
दोहा-हरिगौरीशगणेशगुरु, प्रनमौशीस नमाय
गीताभावारथकरूं, दोहासहितवनाय ॥१॥
सुथिरराजविक्रमनगर, नृपमणिपतिअनूप॥
थिरथाप्योपरधानयह. राजसभाकोरूप ॥२॥
नाजिरआनंदरामके, यहउपज्योचितचाउ।
गीताकीटीकाकरौं, सुनिश्रीधरकेभाउ ॥३॥
गीताज्ञानगंभीरलखि, रचीजुआनंदराम ॥
कृष्णचरणचितलगिरह्यो,मनमैंअतिअभिराम४
आनंदमनउत्सवभयो, हरिगीताअवरेप।
दोहारथभाषाकरी, बानीमहाविशेष ॥६॥
भक्तिवश्यश्रीकृष्णजू, निगमकहैनिरधार ।।
भक्तिकरोबहुभांतिसो.यहैवेदकौसार॥६॥
अध्याय
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॥धृतराष्ट्र उवाच ॥
धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः॥
मामकाःपांडवाश्चैव किमकुर्वत संजया।
दोहा-धर्मक्षेत्रकुरुक्षेत्रमें, मिलेयुद्धकेसाज ॥
संजयमोसुतपांडवनि, कीन्हकैसेकाज ॥१॥
धृतराष्ट संजयसे पूछते हैं कि-हे संजय ! धर्मके क्षेत्र कुरुक्षेत्रमें
युद्ध करनेकी इच्छासे इकठे हुए दुर्योधनादिक मेरे पुत्र और पांडुके
पुत्र क्या करतेभए ? ॥१॥
॥संजय उवाच ॥
दृष्ट्वा तु पांडवानीकं व्यूढंदुर्योधनस्तदा ॥
आचार्यमुपसंगम्य राजा वचनमब्रवीत् २
दोहा-पांडवसेनाव्यूहलख, दुर्योधनढिगआय॥
जिन आचारजद्रोणसौं बोल्योऐसेभाय ॥२॥
यह सुन संजयने कहा हे पृतराष्ट्र ! राजा दुर्योधन और पांडवोंकी
व्यूहरचना देखकर अपने आचार्य द्रोणाचार्य के पास जाकर बोले।२।।
पश्यैतांपांडुपुत्राणामाचार्यमहतींचमूम्॥
व्यूढांद्रुपदपुत्रेणतवशिष्येणधीमता ॥३॥
दोहा-पांडवसेनाअतिवडी. आचारजतूदेखि ॥
धृष्टद्युम्नतवशिष्यने, व्यूहरच्योजविशेषि ॥३॥
हे आचार्य आपके बुद्धिमान् शिष्य राजा द्रुपदके पुत्रने जिसकी
व्यूहरचना की है ऐसी पांडवोंकी बड़ी सेनाको तो देखिये ॥३॥
भगवद्गत्तिाभाषाटीका. अत्रशूरा महेष्वासा भीमार्जुनसमा युधि। युयुधानो विराटश्च द्रुपदश्च महारथः॥४॥ दोहा-शूरधनुषधारीवडे, अर्जुनमीमसमान ॥ द्रुपदमहारथऔर पुनि, हैं विराटयुयुधान ॥४॥ हे आचार्य ! इस सेनामें भीम और अर्जुनकेसमान बडेर धनुर्धारी शूर वीर इकट्ठे हुए हैं जिनमें युयुधान,विराट और महारथी द्रुपदहें। घृष्टकेतुश्चेकितानःकाशीराजश्ववीर्यवान्। पुरुजित्कुंतिभोजश्च शैव्यश्च नरपुंगवः५॥ दोहा-धृष्टकेतुअरुकाशिपति,चेकितानवलवंत। कुंतिभोजअरुशैव्यपुनि, पुरुजितशत्रुनित५ सृष्टकेतु, चेकितान और महाबली काशीका राजा है, तथा पुरु- जित, कृतिभोज और मनुष्यों में श्रेष्ठ शैव्यभी है॥५॥ युधामन्युश्चविक्रांतउत्तमौजाश्चवीर्यवान् सौभद्रो द्रौपदेयाश्च सर्वएवमहारथाः॥६॥ दोहा-युधामन्युअतिविक्रमी, उत्तमौजरणधीर । द्रौपदिसुतअभिमन्युए,महारथीवलवीर ॥६॥ पराक्रमी युधामन्यु, वलवान् उत्तमौज, सुभद्राका पुत्र अभिमन्यु और प्रतिविन्ध्यादिक द्रौपदीके.पांच पुत्र ये सबही महारथी है ॥६॥ अस्माकंतु विशिष्टाये तानिबोधद्विजोत्तम। नायकामससैन्यस्यसंज्ञार्थतान्ब्रवीमिते॥ .
मन्याय दोहा मोसेनामेंजेबडे, तेसवसुनिद्विजराज ॥ नाकजानतुमैतिन्है, खडेयुद्धकेकाज॥७॥ हे द्विजोत्तम ! अब हमारी सेनामें जो बडे बडे शूर वीर सेनापति हैं उनके नाम मैं आपके सम्मुख कहताहूं उन्हें सुनिये ॥७॥ भवान्भीष्मश्च कर्णश्च कृपश्च समितिंजयः अश्वस्थामाविकर्णश्चसौमदत्तिस्तथैवच८। दोहा-तुमअरुभीषमकर्णकृप, जिनजीतेसंग्राम॥ भूरिश्रवाविकर्णअरु, अश्वत्थामानाम॥८॥ हमारी सेनाके मुखियाओंमें एक आपहो, भीष्मजी हैं, कर्ण हैं, कृपाचार्य हैं, अश्वत्थामाह, विकर्ण हैं और सोमदत्तका पुत्र भूरिश्रवा है, ये सबही युद्धमें जीतनेवाले हैं ॥८॥ अन्ये च बहवःशूरामदर्थे त्यक्तजीविताः॥ नानाशस्त्रप्रहरणाःसर्वे युद्धविशारदाः॥९॥ दोहा-औरौबहुतेशूरहैं. मो हित तर्जेजुप्रान ॥ भांतिभांतिआयुधलिये, सवैयुद्धबलवान ॥९॥ औरभी बहुतसे शूर वीर हैं जो मेरेलिये अपने प्राणोंका मोह छोडकर आये हैं, ये अनेकप्रकारके अन शस्त्रोंसे सुसज्जित हैं और सवही युद्धमें बडे चतुर हैं॥९॥ अपर्याप्तं तदस्माकंबलं भीष्माभिरक्षितम् पर्याप्तंत्विदमतेषांबलं भीमाभिरक्षितम् १०॥
भगवद्गीतामाषाका.
दोहा-मोसेनाअसमर्थसी, भीषम राखत ताहि।।।
समरथसेनाजाहिकी,ताकोभीमसहाहि॥१०॥
हमारी सेनाके रक्षकभीष्मजी हैं इससे हमारी सेना सब तरहसे युद्ध
करनेमें समर्थ है (कारण यह है कि-भीष्मजी,युद्धमें विशारद,योग्य
और परिणामदर्शी हैं) तथा पांडवोंकी सेनाका रक्षकभीमसेनहै इससे
वह समर्थ नहीं है क्योंकि भीमसेन निरागवॉरहै और हमारी अपेक्षा
सेनाभी थोडी है) दूसरा अर्थ यह है किभीष्म वृद्ध और उभयपक्षपाती
हैं इससे हमारी सेना (असमर्थ दीखपडती हैं) और पांडवोंका सेना-
पति भीमसेन है इससे वह सेना समर्थ दिखाई देती है ॥१०॥
अयनेषुचसर्वेषुयथाभागमवस्थिताः॥
भीष्ममेवाभिरक्षतुभवंतः सर्वएवहि११॥
दोहा-आसपासमोव्यूहके, तुमसबठाढेहोहु ।।
भीषमकीरक्षाकरो, धरके मनमें मोहु॥११॥
इसलिये आप सब लोगभी युद्धके सब मोहॊपर अपनी अपनी
सेना लेकर भीष्मजीकी रक्षा करतेरहो।। (ऐसा करने में दो हेतु
कि-कहीं भीष्मजी शत्रुसे न जा भिलें अथवा कहीं ऐसा न हो जो
कोई शत्रुदल पीठेसे आकर इनको धर दबावै)॥११॥
तस्यसंजनयन्हकरुवृद्धःपितामहः।
सिंहनादंविनद्योच्चैःशंखं दध्मौप्रतापवान् १२
दोहा-दुर्योधनकेहर्पकों, भीपमचितलाइ ॥
सिंहनादऊंचौकियो, दुःसहशंखबजाइ ॥१२॥
अध्याय १॥ इतनेहीमें दुर्योधनके. उत्साहको बढातेहुए प्रतापी कौरवोंमें वृद्ध भीष्मपितामहने सिंहनादकरके उच्चस्वरसे शंख बजाया ।। १२ ।। ततःशंखाश्च भेर्यश्च पणवानकगोमुखाः ॥ सहसैवाभ्यहन्यंतसशब्दस्तुमुलोऽभवत्॥१३॥ दोहा-तबहिशंखभेरीपणव, आनकगोमुखभेरि ॥ ताहीछिनवाजतभए, शब्दरह्यो भरपूरि ॥१३ तब तौ शंख भेरी, पणव, आनक, गोमुख आदि अनेक प्रकारके समरोत्साही बाजे एकसाथ चारोंओर बजनेलगे, जिससे बडा भारी शब्द हुआ।॥ १३ ॥ ततःश्वेतैर्हयैर्युक्तेमहति स्पंदने स्थितौ ॥ माधवःपांडवश्चैव दिव्यौ शंखौ प्रदध्मतुः१४। दोहा-श्वेतवर्णघोडालये, दीरघरथहिबनाय॥ हरिअर्जुनतापरचढे, हरषेशंखबजाय ॥१४॥ तदनन्तर श्वेत घोडोंके जुते हुए बडे भारी ऊंचे स्थपर बैठकर कृष्ण और अर्जुनने अपने अपने दिव्य शंख बजाये ॥ १४ ॥ पांचजन्यं हृषीकेशो देवदत्तं धनंजयः॥ पौंडूं दध्मौ महाशंखंभीमकर्माकोदरः १५॥ दोहा-देवदत्तअर्जुनलियो, पांचजन्ययदुराय॥ भीमभयानकभेषसों, पौंड्रकशंखबजाय ॥१५ भगद्रीताभाषाटीका. श्रीकृष्णके शंखका नाम पांचजन्य था और अर्जुनके शंखका नाम देवदत्त था इसके पीछे वृकोदर (बहुभोजी) भीमसेनने अपना पौंड्रनामक बडा शंख बजाया॥१५॥ अनंतविजयं राजा कुंतीपुत्रो युधिष्ठिरः नकुलः सहदेवश्वसुघोषमणिपुष्पकौ॥१६ दोहा-नृपतियुधिष्ठिरनेकियो, अनंतविजयकेघोष पुनिसहदेवरुनकुलने, मणिपुष्पकजसुघोष ॥१६॥ फिर कुंतीपुत्र राजा युधिष्ठिरने अपना अनन्तविजय नामक शंख बजाया और नकुल तथा सहदेव अपने सुघोष और मणिपुष्पका- मक शंखको बजाते भये ॥१६॥ काश्यश्चपरमेष्वासःशिखंडी च महारथः। धृष्टद्युम्नोविराटश्चसात्यकिश्चापराजितः॥१७॥ दोहा-महाधनुर्धर काशिपति,रथीशिखंडीजानि॥ धृष्टद्युम्नाविराटअति बलीसात्यकिहिमानि॥१७॥ फिर धनु री काशीराज, महारथी शिखंडी पृष्टद्युम्न विराट और अजेय सात्यकी यादव ॥१७॥ द्रुपदोद्रौपदेयाश्च सर्वशःपृथिवीपते॥ सौभद्रश्चमहाबाहुःशंखान्दध्मु पृथक्पृथक्१० दोहा-द्रुपदद्रौपदीसुतसबै,और सुभद्रापूत ।। अपनेअपनेशंखले,धुनिकीनीतासूत ॥१८॥ .
अध्याय..
१७.
तथा हे राजन् ! राजाद्रुपद, द्रौपदीके पांचों पुत्र, तथा सुभद्राक
पुत्र महाबाहु अभिमन्युने अपने अपने शंख बजाये ॥ १८ ॥
सघोषोधार्तराष्ट्राणांहृदयानिव्यदारयत् ।।
नभश्चपृथिवींचैवतुमुलोव्यनुनादयन्।१९
दोहा-फटयोहृदयकौरवनको, शब्दसुन्योताबार॥
पुहमीअरुआकाशमें, पूर रह्यो गुंजार ॥१९॥
वह तुमुल शब्द आकाश और पृथ्वीको गुंजाता हुआ धृतराष्ट्र
के पुत्रोंके हृदयको विदीर्ण करनेलगा॥१९॥ .
अथव्यवस्थितान्दृष्टाधार्तराष्ट्रान्कपिध्वजः
प्रवृत्तेशस्त्रसंपातेधनुरुद्यम्यपांडवः ॥२०॥
दोहा-देवेसुतधृतराष्ट्रके, अर्जुनधनुषसंभार॥
कपिवर ताकेध्वजलसे शस्त्रनि परतप्रहार॥२०
जब सब कौरव युद्धके लिये सावधान होकर यथास्थान खडे
होगये और शस्त्रोंके चलनेकी तयारी होरही थी उसी समय कपिध्वज
अर्जुनने धनुष उठाकर श्रीकृष्णसे कहा ॥ २० ॥
हृषीकेशंतदावाक्यमिदमाहमहीपते ।
सेनयोरुभयोर्मध्येरथंस्थापयमेऽच्युत२१
दोहा--अर्जुनकहीजुकृष्णसों, मेरेचितयहचिंत ॥
दुहसेनाकेमांझरथ, ठाढोकरिमोभित ॥२१॥
१८
भगवद्गीताभापाटीका.
।
हे धृतराष्ट्र ! तब अर्जुनने श्रीकृष्णसे यह कहा कि हे अच्युत !
दोनों सेनाओंके बीचमें मेरा रथलेचलो ॥ २१ ॥
यावदेतानिरीक्षेऽहंयोडकामानवस्थितान्।
कर्मयासहयोद्धव्यमस्मिन्रणसमुद्यमे २२
दोहा-जवलगिदेखोहोंनहीं, जुरेयुद्धकेदाय ॥
कौनकौनसोहीलरों, यारनमेंसमपाय ।। २२ ॥
हे श्रीकृष्ण ! मैं यह देखना चाहता हूं कि, युद्ध करनेकेलिये कौन
कौन आये हैं और इस रणभूमिमें मुझसे कौन कौन लडेंगे ॥२२॥
योत्स्यमानानवेक्ष्येऽहं य एतेऽत्रसमागताः
धार्तराष्ट्रस्य दुर्बुद्धेर्युद्धे प्रियचिकीर्षवः।२३
दोहा--युद्धकरणधायेजिते, आयेहैं सजसाज ॥
दुरबुडीहितकौरवनि, भलोकरनकेकाज॥२३॥
धृतराष्ट्रके दुर्बुद्धि पुत्रका हित करने के लिये यहां कौन कौन एकत्र
हुये हैं मैं यहभी देखना चाहता हूं ॥२३॥
एवमुक्तो हृषीकेशो गुडाकेशेन भारत ।
सेनयोरुभयोर्मध्येस्थापयित्वारथोत्तमम २४
दोहा--ऐसेहैश्रीकृष्णजू. सुनिअर्जुनकी बात॥
दोउसेनामांझरथ, लैराख्योताघात ॥२४॥
अध्याय १॥ । हे वृतराष्ट्र ! जब अर्जुन यह कह चुका तब हषोकेश श्रीकृष्ण स्थको दोनों सेनाओं के बीचमें लेगये ॥२४॥ . ॥संजय उवाच ॥ भीष्मद्रोणप्रमुखतःसर्वेषांचमहीक्षिताम॥ उवाचपार्थपश्यैतान्समवेतान्कुरूनिति॥२५॥ दोहा-भीपमगुरुपुनिअमितनृप, तिनसनमुखसुविशोपि कहतकृष्ण अरजुनअबै, मिलेसबैकुरुदेशि ॥२५॥ और भीष्म, द्रोणाचार्य तथा सब राजाओंके सामने यह कहने लगे कि हे पार्थ ! इन एकत्रहुए कौरवोंको देखले ॥२५॥ तत्रापश्यत्स्थितान्पार्थःपितनथपितामहान् आचार्यान्मातुलान्भ्रातृन्पुत्रान्पोत्रान्सखींस्तथा दोहा-अर्जुनतेदेखेसबै, पितापितामहभाय गुरुमामाभैयासखा,सुत नाती समुदाय॥२६॥ तब अर्जुन क्या देखते हैं कि चारों ओर पिता,पितामह, आचार्य, मामा, भाई, पुत्र, पौत्र और मित्रादि खडेहुएहें ॥२६॥ श्वसुरान्सुहृदश्चैवसेनयोरुभयोरपि । तान्समीक्ष्यसकौन्तेयःसर्वान्बंधूनवस्थितान कृपया परयाविष्टोविषीदन्निदमब्रवीत२७ भगवद्गीताभापाटीका. दोहा-ससुरसुहृदबंधृसंकल, दोऊसेनामाहः ॥ तिन्हेंदेखिकरुणामई, तबबोल नस्नाहा२७॥ उनमें श्वशुरभी हैं, इष्टमित्रभी हैं ऐसे दोनों सेनाओंके भाईबंधु- ओंको खडे देखकर अर्जुनके जीमें करुणा उत्पन्न हो आई और विल- खते हुये यह कहने लगे।। २७ (अर्जुन उवाच ) दृष्ट्वेमंस्वजनंकृष्णयुयुत्सुंसमुपस्थितम् ॥ सीदंतिममगात्राणिमुखंचपरिशुष्यति२८ दोहा-देखेमैंसबबंधु ये, कृष्णयुद्धकेदाय॥ मोमुखसुखतजातहै, अंगअंगशिथिलाय॥२८ कि हे श्रीकृष्ण ! युद्ध करनेकेलिये आये हुए इस अपनेही कुटु- म्बके वर्ग और आत्मीयजनोंको देखकर मेरे अंग प्रत्यंग शिथिल हुएजाते हैं और मुख सूखा जाता है ।। २८ ।। वेपथुश्चशरीरे मे रोमहर्षश्च जायते ॥ गांडीवं स्रंसते हस्तात्त्वक्चैवपरिदह्यते॥२९॥ दोहा-रोमहर्षतनहोतहै, औरकंपहीभाय॥ मों हाथन धनुगिरै,जरतत्वचाअधिकाया२९ मेरा शरीर थरथराता है, रोमांच खडेहुएजाते हैं, हाथसे गांडीव धनुष गिरापडताहै और देहकी त्वचाभी जलीजाती है ॥ २९ ॥ नचशनोग्यवस्थातुंभ्रमतीवचमेमनः॥ निमित्तानिचपश्यामिविपरीतानिकेशव ३० अध्याय १। दोहा-ठांढौव्हेहींनहिंसकतु,भ्रमतजुहै मनमीत केशवशकुननिदेखियत,कैसी हैइहरीत ॥३०॥ हे केशव ! अब मुझमें खडे रहने की सामर्थ्य नहीं है, मेरा मन चकर खाता है, और शकुनभी बुरे दिखाई देते हैं ॥३०॥ नचश्रेयोऽनुपश्यामिहत्वास्वजनमाहवे दोहा-स्वजनहनौंसंग्राममें, धरिकरवानकमान । अपनौमलौनदेखिये, हविपरीतसुजान ॥३१॥ हे कृष्ण! समरमें अपने आत्मीयजनोंको मारकर मुझे कुछ भलाई नहीं सूझती है ॥ ३१ ॥ नकांक्षे विजयं कृष्ण नचराज्यं सुखानिच किंनोराज्येनगोविंद किं भोगै वितेनवा दोहा-विजयनचाहौंकृष्णजू ,नहिंचाहौंमुखराज। राज्यभोगगोविंदजू ,अरुजीवनकेहिकाज ३२ हे कृष्ण ! मुझे विजयकी इच्छा नहीं है. न राज्य और न सुख चाहता हूं. हे गोविंद! सब कुटुम्बका सत्यानाश करके राज मिलजाय तो क्या? भोग भोगनेसे क्या है ? और जीनेसे क्या लाभ होता है। येषामर्थकांक्षितंनोराज्यंभोगाःसुखानिच 'तइमेऽवस्थितायुद्धप्राणांस्त्यक्त्वाधनानिच दोहा-राजभोगसुखकृष्णजू, करियतइनकेकाज ॥ लरतजीवनइछांडिकै, हमनहिंचाहबराज॥३३
२२
भगवद्गीताभाषाटीका.
.
हे कृष्ण ! जिनके लिये हम राज्य भोंग और सुखोंको चाहतेथे वे
सब प्राण और धनोंका लोम छोडकर युद्धमें सन्मुख खडेहुए हैं।
आचार्या पितराः पुत्रास्तथैवचपितामहाः
मातुलाश्वशुरा:पौत्राःश्यालाःसंबंधिनस्तथा ३४
दोहा-गुरुमातुलसुतससुरअरु सारेहूअवरोषि ।
संबंधानातीनिरखि, पितापितामहषि ॥३४
इनमें आचार्य है, पिता है, पुत्र है, पितामह हैं, मामा हैं, श्वशुर'
हे नाती हैं, साले हैं, तथा और २ सम्बंधी हैं॥३४॥
एतान्नहंतुमिच्छामि नतोऽपिमधुसूदन॥
अपित्रैलोक्यराज्यस्यहेतोःकिंनुमहीकृते॥३५॥
दोहा-एमारेमोकायदापि, हौनहिंहनौंअकाज ॥
वंशकटेकिहिकामको, त्रैलोकीकोराज ॥३५॥
हे मधुसूदन ! जो ये मुझको मारेंगे, तोभी में इनको नहीं मारूं-
गा, चाहे त्रिलोकीका राज्यभी क्यों न मिले, पृथ्वीका राज्य तौ
किसी गिनतीहीमें नहीं है ॥३५॥
निहत्यधार्तराष्ट्रान्नःकाप्रीतिःस्याज्जनार्दन
पापसेवाश्रयेदस्मान्हत्वैतानाततायिनः३६
दोहा-पापहोयइनकेहनें, यदपिलियेहथियार ॥
तातेंयेहनियेनहीं,बंधुसहितनिरधार ॥३६॥
हे जनार्दन ! इन कौरवोंको मारने से हमें क्या मुख मिलेगा। इन
आतताइयों के मारनेसे तो केवल पापही लगेगा ॥३६॥
अध्याय १॥
तस्मानाहावयंहतुंधार्तराष्ट्रान्स्वबांधवान
स्वजनहिकथंहत्वासुखिनःस्याममाधव॥३७॥
दोहा-निजवांधवधृतराष्ट्रसुत,क्योंहनियेयदुराय॥
• : कृष्णसुजनको मारिक, सुखलहियतकाभाया।
क्योंकि इनके मारनेसे केवल पाप लगैगा, इससे हम इनको नहीं
मारेंगे. ये धतराष्ट्रके पुत्र हमारे बांधव हैं. (आपही बताइये) इन
आत्मीयजनोंको मारकर हम किस प्रकारसे सुखी होसकते हैं॥३७॥
यद्यप्येते न पश्यति लोभोपहतचेतसः॥
कुलक्षयकृतंदोषमित्रद्रोहेचपातकम्।३८॥
दोहा-एजुलुभानेंलोभसों, नहिंदेखत जो मोह ।।
कुलक्षयकीन्हेदोषहै, औरमित्रकोद्रोह ॥३८॥
लोभने इनके चित्तको भ्रष्ट कर दिया है इससे यद्यपि ये वंशना-
शके दोष और मित्रद्रोहके पातकको नहीं देखते हैं ॥३८॥
कथंनज्ञेयमस्माभिःपापादस्मान्निवर्तितुम्
कुलक्षयकृतंदोषप्रपश्यद्भिर्जनार्दन॥३९॥
दोहा- जानिबूझअघकीजिये, होतपापकोपोष ॥
क्योंनटरैहमदेखिकै, कृष्णकुलक्षयदोष ३९॥
तौ क्या हमकोभी यह उचित है कि हम इस पापसे दूर होनेका
यत्न न करें.हे जनार्दन ! हम तो कुलक्षय दोषको जानते हैं जा-
नकर न बचना महापाप है॥३९॥
भगवद्गीताभाषाटीका.
कुलक्षये प्रणश्यति कुलधर्माःसनातनाः ॥
धर्मेनष्टेकुलंकृत्स्नमधर्मोऽभिभवत्युत४०॥
दोहा-कुलक्षयकीन्हेकुलधरम, जानजुमनसाय
धर्मनसैंकुलकोजवै, होतअधर्मसुभाय ॥४॥
हे कृष्णा वंशके नष्ट होनेपर सनातन कुलधर्मों का नाश होजाता है
और धर्म नष्ट होनेपर छलका कुल अधर्मसे प्रतिष्ठाहीन होजाताहै ४०
अधर्माभिभवात्कृष्णप्रदुष्यंतिकुलस्त्रियः।
स्त्रीषुदुष्टासुवार्ष्णेयजायते वर्णसंकरः ४१
दोहा-कृष्णअधर्महिकेवढे,दुष्टहोहिंकुलनारि॥
होहिबरणसंकरजवै, त्रियादोपनिरधारि ४१
हे कृष्ण ! जब अधर्म कुलको ग्रसलेता हे तब कुलकी स्त्रियां व्य-
भिचारिणी होजाती हैं, उनके व्यभिचारिणी होनेसे सन्तान वर्ण-
नंकर होती है।। ४१ ॥
संकरो नरकायैव कुलमानां कुलस्य च ॥
पतंतिपितरोोपालप्तपिंडोदकक्रिया:४२
दोहा-नरकपरे संकरभये, कुलघातीजे जोय॥
पतितहोंहिंतिनकेपितर, पिंडनदेईकोय ॥४२
वंशके नष्ट करनेवालोंके कुलमें जो सन्तान उत्पन्न होती है वह
नरक में लेजानेहीके लिये होती है और इनके पित्रीवर पिंड और
तर्पणसे रहित होकर नरकमें गिरते हैं ॥४२॥
अध्याय २५ दोपरेतैः कुलनानां वर्णसंकरकारकैः ॥ उत्साद्यतेजातिधर्माःकुलधर्माश्च शाश्वताः ४३ दोहा-कुलहिवर्णसंकरभये, डारत दोप वढाय॥ जातिधर्म कुलधर्मते, तेई देत नसाय ॥४३॥ हे कृष्ण ! कुलघातियोंके इन वर्णसंकर कारक दोपोंके कारण स- नातन जातिधर्म और कुलधर्म नष्ट होजाते हैं ।। ४३ ॥ उत्सन्नकुलधर्माणांमनुष्याणांजनार्दन । नरकेनियतवासोभवतीत्यनुशुश्रुम॥४४॥ दोहा-कुलधर्मनकेनाशते, निःसंदेहयहहोय ॥ सदानरकमें तेरहैं, कहतजु यों सब कोय ४४ हे जनार्दन ! जिन मनुष्योंके कुलधर्म नष्ट होजाते हैं उनका निश्चयही नरको वास होताहै। ऐसा हमने सुना है ॥ ४४ ॥ अहोवत महत्पापं कर्तुं व्यवसिता वयम्॥ यद्राज्यसुखलोभेन हंतुं स्वजनमुद्यताः दोहा-बडे पापके करनको,निश्चयकियो विचार। तिनमेंजान्योराजसुख,हनतकुटुंबनिरधार४५ हाय ! हाय !! हम केसे भारी पापके करने में उद्यत होगये हैं कि- राज्यके लोभसे हम अपने स्वजनोंको मारनेके लिये कटिबद्ध हुए,४५ -
२६
भगवद्रीताभाषाटीका.
यदिमामप्रतीकारमशस्त्र शस्त्रपाणयः॥
धार्तराष्ट्रारणेहन्युस्तन्मेक्षेमतरंभवेत्४६
दोहा-करमेंलेहथियार ये, आवे, मो समुहाय ॥
मोहिंहनैजोसहजमन, मानिलेहुँसुखभाय.४६
हे कृष्ण ! यदि तराष्ट्र के पुत्र हाथोंमें शस्त्र ले लेकर मुझ शस्त्रही-
नको मारेंगेतौ मउनको नहीं रोकूँगाऔर न मैं शस्त्र चलाऊंगा और
इसी बातमें मुझको अत्यन्त कुशल और भलाई मालूम होती है ४६
॥ संजय उवाच॥
एवमुक्त्वार्जुनःसंख्ये रथोपस्थउपाविशत
विसृज्य सशरंचापं शोकसंविग्नमानसः ४७
दोहा-ऐसेकहिअर्जुनतबै, बैठिगयोरथमाहि ॥
करतेंडारेशर धनुप, शोकबढ्योमनमाहिं ४७
अब संजय कहते हैं कि हे वृतराष्ट्र ! संग्राममें अर्जुन ऐसे कहकर
धनुषवाणको फेंक शोकसे दुःखी हो रथमें जा बैठे ॥४७॥
इतिश्रीभगवद्गीतासूपनिषत्सुब्रह्मविद्यायांयोगशाखे श्रीकृष्णा-
र्जुनसंवादेअर्जुनविपादयोगो नामप्रथमोऽध्यायः ॥१॥
परब्रह्मणेनमः । * अथ विचार दर्पण भूमिका इस बातको लिखने की कुछ आवश्यका नहीं कि-हमलोगों की वह दशा नहीं रही है जो प्राचीन कालमें थी। कहाँ उस समयका हमारा बुद्धिबल और शारीरिक पराक्रम और कहाँ इस समयका, रातदिनका सा अंतर होगया है । इस अधोगतिको देखकर बहुत दिनोंसे हमारे चिचमें यह विचार उठरहा या कि कोई ऐसा उपाय किया जाय जिससे सब मनुष्यों को अपनी इस अधोगति का ज्ञान होजाय जिससे उन्नतिके उपायोंकी ओर लगकर पुनः उसी उन्नत दशाको प्राप्तकरलें जो कि पहिले थी, परन्तु यहभी बहुधा देखा जाता है कि जो उचम २ उपदेशकी पुस्तके निकलती हैं लोग एकवार उनको आधी या सारी पढकर एकओर फेंक देते हैं सदा अपने पास नहीं रखते इसलिये हमने यही उपाय सोचा है कि अपने विचार दर्पणको श्रीमद्भगवद्गीता की टीका के साथ जो सरल भाषा में हो प्रकाशित किया जाय जिससे दोलाभ होंगे जो पाठकरनेवालेहों उन कायान इन लेखोंकी ओर आकर्षितहोगाऔर जिनकोफेवल लेख आदिपढनेकी इच्छा रहती है उनको गीताके पाठ करनेकी अभिलाषा उत्पन्नहोगी गीताको वेदही समझना चाहिये क्योंकि इसके प्रथम छःअध्यायायों में तो कर्मकांडका उपदेश है और होनाभी ऐसाही चाहिये जब मनुष्य फल की इच्छा न करके कर्मयोगमें कुशल होजाता है तभी ईश्वरकी उपासनाका अधिकारी बनता है और पिछली छः मध्या यो में ज्ञानकांड है देखिये कर्म उपासना कर चुकनेके पीछे जानकी प्राप्ति होनेकी आशा होषकी है अजकलके अधिकांश साधुओंकी भॉनि आलसी बोर निरुत्साही और पुरुषार्पहीन मनुष्य कभी ज्ञानको प्राप्त नहीं होसके, केवल अहं ब्रह्मास्मि कहा ना ज्ञानी बनना नहीं होसका.
२८
भूमिका
आजकल ऐसा होना चाहिये कि जो उचम २ उपदेश समयानुकूल पाए जावें
वह धर्म पुस्तकोंके साप छपने चाहिये जिससे लोग उनको अपने पास रक्सें।
दमको पूर्ण विश्वास है कि अपना यह पुरुषार्थ अवश्य सफल होगा जहाँ कहीं कोई।
भूल हो उसको पंडितजन क्षपाकी दृष्टिसे देखेंगे, और हम यहभी आशा करते हैं कि
भारतवर्षकी उन्नति चाहनेवाले पुरुष इस विचारदर्पण गौर गाताके अर्थको जहाँ
तहाँ लोगोंको सुनाएगे। गुणीजन गुण ग्राहक होते हे दुष्टजन छिद्रही हृढते हैं ऐसा
विचार कर हमको पूर्ण आशा है कि गुणीजन हमारे "विचारदर्पण को जपनाएंगे
कलकत्ता अखिलके हिन्दू(आय)जाति,
पौष शुक्ल पौर्णिमा
( हितेच्छुक )
विक्रमीय सं०१९७० पं. सत्यचरण शास्त्री
सृष्टयब्द ३८९३०१३ तथा पं० श्रीराम शर्मा,
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India
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परब्रह्मणेनमः । विचार दर्पण दर्शन (१) श्रीमद्भगवद्गीताकी महिमा गीता संसार की सब धर्मपुस्तकों में प्रधानस्थान धारण करने वाली है। वेदोंकासार इसमें कूट २ कर भरा हुआ है इसीसे हिन्दुओं(आर्यों का यह मुख्यधर्म ग्रंथ है विधर्मी लोगभी अर्थात ईसाई मुसलमान आदि भीइसको उच्च मानकी दृष्टि से देखते हैं क्योंकि गीताके समानउच्च बिचार उनके धर्मग्रंथोबाइबल कुरान इत्यादिमेंनहीं मिलते,गीतामें | ऐसा एक उदाहरणभीनहींदिखलासक्तहजोविज्ञानके नियमों या प्रमाणोंके विरुदलिखा गयाहो और बाइबल कुरानके बहुत उदाहरणदिखासकेहैं जिनके देखनेसे पतालगताहै। कि यह बातें सर्वश विज्ञान और प्रमाणोंकेविरुद्ध है और इसीहेतुसे त्याज्य हैं. धर्मके सच्चे प्रेमियों की तृषा चाहे वह ईसाई मुसलमान क्यों न हों हमारे धर्म ग्रंथों अर्थात उपनिषद वेदांतदर्शन और गीताको देखे विना नहीं वुश सकी । गीतामें ब्राह्मणसे लेकर चांडाल पर्यत सबहिन्दुओं [आर्यों के लिये बिना पक्षपात कि ययाधिकार उपदेश दिया गया है भगवान श्रीकृष्णमहाराज सर्व व्यापक निराकार परब्रह्मके अवतार थे भक्तजनोंकी रक्षा औरधर्मका उपदेश करनेको उन्होंने अवतार लियाथा, आर्यसमाजी आदि कितनेही भाइयोंके मतमें परमेश्वरका अवतार लेना मसंभव माना है । यद्यपि सर्व शकिमानकोकोई बात असंभव नहीं होसकी, क्योंकि जब एक सिद्धयोगीको भी इतनी सामर्दी है कि अपने कई शरीर रचसका है तो पर- - विचार दर्पण। पात्मा यदि लीलासे अपना एकशरीर रचले तो उसकीव्यापकता क्या हानि होस- की है; तथापि यदि उनआर्यसमाजीआदिभाइयों के मतानुसार श्रीकृष्णमहराजकोप- रमेश्वरका अवतार नहीं मानाजावे तोभी कुछ हानिनहीं,क्योंकि श्रीकृष्णमहाराजको एक अद्वितीय महात्मा और पूर्ण योगेश्वर माननेमें तो उनकोभी सन्देह नहीं है। महाराज श्रीरामचन्द्रजीकपीछे श्रीकृष्णमहाराजके साकोई दूसरा महापुरुष इतिहा सो दृष्टिगोचर नहीं आता,भागवतादि ग्रंथोंश्रीकृष्णमहाराजका गोपियोवेसायचीरह- रणादिरासलीलाका वर्णन देखकर कितनेही विचारहीन और मूर्वजन यह कहने लगते है कि जिन श्रीकृष्णमहाराजको अवतारमाना जाता है उन्होंने कैसे २ व्यभिचार में काम किये में,यदि हमभी एसे कार्य करते हैं तो क्या दोषकी बात है परन्तु नका ऐसा विचार करना सर्वथा अनुचित और निंदनीय है क्योंकिश्रीकृष्णमहाराजने कदापि ऐसे चीरहरणाद बुरे व्यवहार नहीं किये ये श्रीकृष्णामहाराजके सम्बंधमें ऐसी रवातें वाममार्गी और कामी पुरुषोंनेभागवतादि ग्रंथोंमें धुसादी हैं ग्रंयका परा. पर देखनेसे पता लगसकता है, कि यह सब बातें प्रक्षिप्त हैं। जिन श्रीकृष्ण महाराजने जैसे उच्चर उपदेश गीतामें दिये हे उनपर एक दृष्टि डालनेसे पता लगता है, कि उनके चरित्रों पर कलक लगाना मूखता और पामरता नहीं है तो क्या है, हम उदाहरणार्थ उनके कुछ उपदेश नीचे दिखाते हैं, जिनको देखकर युद्धिमान मनुष्य स्वय विचार सकेंगे कि श्रीकृष्ण पहाराज काम सम्बन्धी लीलाओंको रोकनेवाले थे या करने वाले, श्लोक-इन्द्रियस्पेन्द्रिम्पार्थे रागद्देपो व्यवा स्थितो तयोर्न वशमागच्छेत् तौद्यस्यपार पंपिनो । गीता अध्याय ३ श्लोक ।। ३४ ॥ (अर्थ) एक २ इन्द्रियके अर्थमे अर्थात् शब्द, स्पर्श. रूप, रस, गन्ध विषयोंमें रागद्वेष स्थिर होते हैं। उन दोनोंके बशर्म न आवे यह रागद्वेप निश्चय करके इस जीवके शत्रु दें, अर्थात् उसके कल्याण के मार्ग विघ्नकर्ता होते हैं । श्लोक-कामएपकोष एपरजो गुणसमुद्भवःमहा शनी महापाप्मा विद्धनमिह बैंरिणम गीता अध्याय ३ श्लोक ॥३७॥ (मर्थ ) यह जो फाम है, क्रोधभी यही है, इसकी रजोगुणसे उत्पत्ति दै फिर वह कैसा पहुत स्वानेवाला है और बडा पापी है इसको बैरी समझो इसी की प्रेरणासे मनुष्य पाप करताहै। (श्लोक)इन्द्रियाणि मनो बुदिरस्याधिष्ठान मुच्यते ॥ एतैर्विमोहयत्येष ज्ञानमावृत्यदे हिनम्॥ गीता अध्याय ३ श्लोक ॥४०॥ अर्थ इन्द्रिय, मन, बुद्धि इस काम का स्थान है इन तीनोंपर अपना प्रभाव डालघर बीयात्मा के ज्ञान को ढक ये इसको मोह लेता है इसको कैसे रोफेयउपाय अगले १ खोकमें वज्ञाते हैं। vi दर्शन। ३१ (श्लोक तस्मास्वमिंद्रियाण्यादौ नियम्यभरतपभापाप्मानं प्रजहि ह्येनं ज्ञानविज्ञानना शनम् ॥ गीता अध्याय ३ श्लोक ४१॥ (अर्थ हे अर्जुन तू प्रथम इन्द्रियोंको अपने वशकरके ज्ञानविज्ञान दोनोंको नष्ट करनेवाले इस कामको नाशकर यह बडा पापी है।। ज्ञान-वात्यपदार्थों का जानना ।। विज्ञान--आत्मिक बातोफा जानना । (श्लोक)ये हि संस्पर्शजा भोगा दुःखयोनय एवंत । आयंतवंतःकौन्तेय नतेपुरमने बुधः ॥ गीता अध्याय ५ श्लोक २२॥ मर्थ) निश्चय करके इन्द्रियों के सम्बन्धसे जोभोग होते हैं वह दु.खके कारणही होते हैं वह स्थायी नहीं है, उनमें बुद्धिमान मनुष्य नहीं लगते। इसलिये जो पुरुष इन । इन्द्रियों के सुखोंमें न फंसकरयोगाभ्यासादिद्वारा परमात्माको प्राप्त होनेके साधनों में लगता है वही मुक्तिको प्राप्त होता है। (श्लोक) वाह्य स्पर्शप्पसकात्मा विन्दत्यात्मनि यत्सुखम् । सब्रह्मयोग युकात्मा सुखमक्षय्य मश्नुते ॥ गीता अध्याय ५ श्लोक २१॥ मर्थ-यारिके जोशब्द स्पर्श रूप,रस,नव विषय हैं उनमें जिसका आत्मा(मन फसाहुवा नहींजिसको अतरात्मा मेही सुख प्राप्त है ऐसा पुरुषब्रह्मको प्राप्तहोकर सदापोलयेस्थाई सुखकोप्राप्तहोगा श्लोक-काम क्रोधा वियुकानां यतीनां यतचेतसामू अभितो । ब्रह्मनिर्वाणं वर्तते विदितात्मनाम् ॥ गीता अध्याय ५श्लोक २६ ॥ (अर्थ ) काम लोध से रहित, और मनको जीतनेवाले, आत्मापरमात्मा कोजाननेवाले पुरुष जीवितदशा में भी ब्रह्मानन्दको भोगते हैं और मरण पीछे भी ब्रह्मको प्राप्त होंगे [श्लोक ] यते न्द्रिय मनो पुद्धिर्मनिक्षि परायणः। विगतेच्छा भय क्रोधोयः सदामुक्त एवसः ।। गीता अध्याय ५ श्लोक २८ ॥ (अर्थ) इन्द्रिय मन और बुद्धि को जिसने पापकोंसे हटाकर अपने आधीन कर लिया है और जिसको भोग विलासफे पदार्थोकी इच्छा नहीं है, और जिसको मय या क्रोध नदी है ऐसा मुनि पुरुष अर्थात् जो आत्मा परमात्मा आदि सूक्ष्म विपयोंको विचार करनेवाला पुरुपदे, वह सदा दुःखों से मुक्त रहता है (श्लोक) उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत् । वात्मैयद्यत्मनांवेन्धुरामव। रिपुरात्मनः ।। गीता अध्याय ६श्लोक ५ ॥ (अर्थ)अतःकरणको कामक्रोधादि वृत्तियों से रहित करके कल्याणको चाहनेवाला पुरुष अपना उद्धारकरे अपनी आत्माकी अधोगतिकमी न होनेदे, अपने घशमें किया हुवा मन अपना मित्र है और विषय सुखोमें लडाया हुवा मनही अपना शत्रु है । उपरोकश्लोकोंके पढनेसे विदित होता है,किश्रीकृष्णमहाराज इन्द्रियोंको दमनकरने और कामोधरूपी शत्रुओंको जीतने के कैखे पक्षपातीपे; और दूसरी बात यहभी है कि उनका अवतार धर्मको संस्थापन करनेको हवाधा, वह संसारमें धर्म . - - दर्शन। जन्मको विषमय करने वाला कालीनाग है. सो काल समझना, मुमुक्षु कालको मर्दन करनेसे कालातीत होते हैं. इसलिये कवियों ने कृष्णचन्द्रको कालीनागके फणपर नाचते वर्णन किया है। महाभारचके समयसे लेकर अबतक भारतवर्ष के बडे २ ऋषि मुनि और विद्वान्लोग श्रीकृष्णमहाराजको परमेश्वरका अवतार मानते चले आये हैं। इस पांचसहस्र वर्षके समयमें बुद्धदेवको छोडकर भारतवर्ष में किसीभी दूसरे मनुष्यको अवतार नहीं माना है। श्रीबुद्धदेवभी एक महापुरुष हुए हैं। वह जाति भेद नहीं मानते थे उनके उपदेश निम्न लिखित प्रकार हैं । सेब पापस्स अकरनम् कुशलस्स उपासम्पदसचित । परियोदापानम् एतंबुद्धन सासनम् ॥ तथा गातो ॥ (अर्थ) धुराकाम मतकरो, अच्छे काम वार २ करो, अपने अन्त करणको शुद्ध करो। दशपाप जिनसे बचना चाहिये “ दशअकुशल ” कहलाते हैं इनसे विपरीत 'दश कुशल " हैं जो इस प्रकार हैं। (१) शारीरिक-हिंसा नहीं करना, चोरी नहीं करना, परस्त्री गमन नहीं करना. (२) वाचिक-मिय्या भाषण नहीं करना,अश्लील शब्दोंका उच्चारण नहीं करना, कटुवचन किसीको नहीं बोलना । धर्म, अर्थ, मोक्ष जिससे सिद्ध न हो. ऐसी वार्तालाप नहीं करना । (३) मानसिक-किसीके धन हरने या किसीके अनिष्टकरनेको विचार नहीं करना, विज्ञान और प्रमाण विरुद्ध वागको नहीं मानना। इहलौकिक या पारलौकिक बातोंमें कार्यकारण का विचार करना अर्थात् अंध विश्वास नहीं रखना । (४) ककवचीसूत्र, दीर्घ निकायमें लिखा है कि भगवान बुद्धदेवने निम्नलिखित पांच उपदेश समस्त संसारके मनुप्योंकी भलाई के लिये दिये हैं यथा-किसीभी प्राणीका वध मत करो, बिना आज्ञा किसीकी वस्तु या सम्पनिकोमत लो, परस्त्रीसे सर्वथा बचो । मिय्या, कटु और अश्लील भाषण कदापि न करो। [फक्कवत्तीसूत्र एक बौद्धधर्म ग्रंथकानाम है जो पालीभाषा में है। पालीभाषा संस्कृतभाषाकी अपभ्रंश भाषा है] (५) मादक पदार्थोका सेवन कदापि मत करो. क्योंकि यह शरीर और मनबुद्धिको नाश करते हैं। यह उपरोक्त पांच उपदेश गृहस्प लोगों को नित्य पालने चाहिये. यह बुद्धदेवका अभिप्राय । भगवान बुद्धदेवके उपदेशोंका इतना भारी प्रभावपडाया कि, (१) देखो बुदका जावन चरित्र । अगारिक धर्मपालत अगीमाषा • ६९/७. था ६४ विचार दर्पण . एक समयमें समस्त भारतवर्षसे हिंसाका नाम उठगया था। चीन, जापान, श्यामक पचास करोड निवासी और भारतवर्ष के पचीस करोड हिंदु [आर्य ] बुद्धदेवको अवतक अवतार मानते हैं । श्रीकृष्णमहाराजके पीछे भारतवर्षम बुद्धदेवको छोड कर और किसीकोभी अवतार नहीं माना है. इसीसे जान पड़ता है कि भारतवासी बिना परीक्षा कियेही किसी साधारण व्यकिको अवतार नहीं मानते।। ऊपर जो हमने यह लिखा है कि, भागवतादि ग्रन्यों में श्रीकृष्ण महाराजके सम्बधमें काम सम्बंधी बातें वाममार्गी और कामी पुरुषोंकी घुसाई हुई हैं उससे यह अभिप्राय नहीं है कि, ऐसी सभी बातें ऐसे लोगों द्वारा डाली हुई है और मूलमें सेन था। सारांश यह है कि, बहुतसी बातें जो मूलमें अलंकार रूपसे लिखी गई थीं उनके अर्थ पलट दिये गये। माचीन हिन्दुओं (आयों) की यह शैली सदासे चली आई है कि, वह अपने अधिकांशविचार अलंकार रूपमें ही प्रगट किया करते थे,क्योंकि यहांपर कविता और साहित्य सदासे उन्नतदशामें रहें हैं । वेदोंमेंभी (ऐसे अलंकार बहुत देखने में आते हैं.यया (१) सरस्वती के पीछे ब्रह्माका भागना, यहां ब्रह्माका अर्थ है सूर्य और सरस्वतीका अर्थ है रात्रि, अर्थात् सूर्यदेव रात्रिको हटाकर प्रकाश करते हैं । (२) परमात्माके मुखाविन्द अर्यात् मुखसे ब्राह्मणों का उत्पन्न होना, वाहुसे क्षत्रियों का, जंघासे वैश्योंका और पैरोंसे शूद्रोंका । यहां उपदेश, बल, वाणिज्य, और सेवा प्रधान वृत्रियों के सम्बन्ध अलंकार कापमें लायागया है कोई साक्षात् मुखादि अंगोंसे परमात्माने चार वर्ण उत्पन्न नहीं किये। (३ )शुक्र उदय होनेपर विवाह संस्कार होना चाहिये, वहां प्रयोजन यह है कि, शुक्र अर्थात् वीर्य पकनेपर विवाह होना चाहिये, न कि इससे पूर्व छोटी अवस्थामें । अब लोगोंने इस अलंकार को न समझकर शुक्र अर्थ तारका मानलिया है. अबभी बहुधा कपिलोग अपने विचार अलंकारोंमें प्रगट करते हैं। और अलंकारोंके जानने वाले कार्यके तात्पर्यको ययार्प जान लेते हैं, परन्तु मलंकारोंको न जानने वाले यथार्य अर्थ नहीं समझ सके । प्राचीन कालके ग्रंथों की टीकाएं पिछले शृंगाररस प्रेमी टीकाकारोंने काम सम्पन्धोकर दी और बहुतसे श्लोक मूलमें स्वयं बनाकर मिला दिये और उनके अर्पभी काम सम्बन्धी हो करदिये । अतः हमें सभी बातोंको न तो प्रक्षिप्त जानना चाहिये और न सभी को अलंकार । सत्यापत्य के ठीक ठीक निर्णय के लिये विवेक से पूरा २ काम लेना चाहिये । पिछले दो सदस्य वर्ष में एक ऐसा अंधकारमय समय दर्शन - भारतवर्ष में आया था कि, जिसमें प्रमाद और अज्ञान अधिक बढ गये पे, उसी समय में इन्द्रियों के दास और विषय प्रिय पुरुषों ने वाममार्ग आदि घृणित मतोंका प्रचार किया और धर्मग्रंथों में भी उसी समय उन दुष्टोंने अपने कुत्सित और निन्दनीय बिचारोंको मूल या टीकारूप में प्रविष्टकर दिये जिनको साधारण मनुष्य पढकर भ्रममें पडजाते हैं परन्तु विहान् और विवेकी जन • तुरन्तही जानलेते हैं, कि अमुक २ बातें मिलावटी हैं । शोक है । कि, अब तक भी हमलोग इन मिय्या और अश्लील मूल, या टीकाओं को हमारे धर्म, ग्रंथों में से निकाल ने की चेष्टा नहीं करते । यदि कहीं २ थोडा बहुत परिश्रम इस ओर हुमा भी है, तो मूर्ख लोगोंके देष करनेपर लोग इसकामसे पीछे हट गये हैं परन्तु सत्यकी खोज करनेवालोंको ऐसे मूर्ख लोगोंकी धमकियों से न डरकर अपने कार्य में लगा रहना चाहिये, हो साथमें हमको इसबात का हर्ष है कि वेद, उपनिषद, दर्शनशास्त्र, और गीता में वह दुष्ट लोग अपने कुत्सित और निंदित विचारों को प्रविष्ट नहीं करसके । इसका कारण यह हुवा कि, वेदकी भाषा और ऋचाओंकी बनावटे अति कठिन हैं और गीता, उपनिषद और दर्शन शास्त्रोंको लाखों हिन्दु [ आर्य ] लोग कण्ठस्थ करते चलेआये हैं । अतः उनमें मिलावटी, मूलके श्लोक, सूत्र, और टोकाओं का प्रवेश कठिन होगया। भगवान् श्रीकृष्ण महाराजने यही जानकर गीताका उपदेश किया या कि, जब अभी से लोगेमि प्रमाद आना प्रारम्भ होगया है, तो भविष्य में संभव है कि, लोगोंकी अध्यात्म विद्यापर रुचि न रहे और सांसारिक सुखोंकी ओर अधिक प्रवृत्ति बढती जाए तो रातादेन ऐसार विद्याओंकी खोजमें पड़े रहेंगे जिनसे इहलौकिक सुखों के साधन प्राप्तहों । जिस प्रवृत्ति का फल यह होगा कि, वे दोंका पठन पाठन छूट जायगा और उनके गूढ तत्वों का समधनाभी उनके लिये कठिन होजायगा, तो गीताके द्वारा सरल रीतिसे वेदों के गूढ तत्व समय में आसफेंगे। किसी कविने सच कहा है कि-गीता सुगीता कर्तव्या किमन्यः शास्त्र विस्तरः॥ मर्थ-गीता के तात्पर्य को ही यथार्थ समझलेना बहुत लाभकारी होसक्ता है, बहुत विस्तार पूर्वक अन्य शाखों के पढने से क्या प्रयोजन । परंतु इससे यह अभिप्राय नहीं है कि अन्य शास्त्रोंको न पढे । कविका आशय केवल गीताकी महिमा दिखानेका है। श्लोक-सर्वोपनिषदो गावो दोग्धा गोपालनंदनः पार्थो वत्सःसपी का दुग्धं गीतामृतं महत् ।।
.६ विचार दर्पण।। अर्थ-सप उपनिषद गोरूप हैं. श्रीकृष्ण महाराज इस गोको दोहने वाले हैं, गोता रूपी/ अमृत अर्थात् दुग्ध दुहा गया, जिसका पान बुद्धिमान मान रूप वच्छा में किया। अपने २ घरोंमें रक्खें और नित्य इसके अमूल्य उपदेशोंका श्रवण, मनन करते रहे. क्योंकि इन उपदेशों द्वारा हमको इस लोक और पर रोक सम्बन्धी दोनों प्रकारके सुख प्राप्त हो सकेंगे। गीता माहात्म्य समीक्षा-- पृथ्वी और विष्णु भगवानके प्रश्नोचर रूप आख्यायका ( अलंकार) दारा गीतापाठका महत्व वर्णन किया गया है। पापी भी गीताके पाठसे उचमगति को प्राप्त होसका है, यह कोई असंभव बात नहीं है, क्योंकि गीताके पाट करनेसे अर्थी को जाननेकी रुचि होगी. अर्थ जाननेपर किये हुए दुष्कोंके लिये पश्चाचाप और प्रायश्चित्त करेगा ओर आगेको पापरूप कर्म करने से बचता रहेगा, इस प्रकार पापी भी गीताके पादसे कल्याण कोही प्राप्त होसका। और यहभी अर्थ है कि पृथ्वी अर्थात् भूमि के लोगोंने परमात्मा से प्रार्थना की कि, सब प्रकारके सुख देनेवाली आपको भकि माप्त करने को क्या करें तो उचर में यह प्रेरणा हुई कि, गीताम्पास ! गीता- भ्यास !! गीताम्यास इति प्रथम दर्शन समाप्तः
नावार२॥
द्वितीयोऽध्यायः॥ २॥
मंजय उवाच॥
ततथाकृपयाविष्टमश्रुपूर्णाकुलेक्षणम् ॥
विषीदंतमिदं वाक्यमुवाच मधुसूदनः॥१
दोहा-ले उसास अंसुवा भर, अर्जुनकरुणाभाया।
बहुविषाद संयुक्त लख, वोले श्रीयदुराय ॥१॥
राजा धृतराष्ट्रसे संजय कहने लगे कि इसप्रकार कृपासे परिपूर्ण
आसुओसे डबडबाये नेत्रवाले, विषाद करते हुये अर्जनसे मधुसूदन
भगवान् यह कहने लगे ॥१॥
॥श्रीभगवानुवाच ॥
कुतस्त्वाकश्मलमिदं विषमेसमुपस्थितम्
अनार्यजुष्टमस्वयंमकीर्तिकरमर्जुन ॥२॥
दोहा-अर्जुनया संग्राममें कत दुख पायो मीत ॥
कीरति अरु स्वर्गहिहरे, कायरज्यों भयभीता।
दि-हे अर्छन ! ऐसे कठिन समयमें तुझे यह मोह कहांसे हुआ,
ऐसा मोह नीच पुरुषोंको होताहै, इससे ( मरनेपर) नरक मिलेगा
और (इस लोकमें) अकीर्ति होगी ॥ २ ॥
लव्यंमास्मगम:पार्थनैतत्त्य्युपपद्यते ॥
क्षुद्रंढदयदौर्बल्यंत्यक्त्वोत्तिष्ठपरंतप ॥३॥
३८
भगवद्गीताभाषाटीका.
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दोहा-कायरतातूं जनिकरै, यह तो कॉनहिजोग
छांडिकचाईहीयकी, देशनुनकोरोग ॥३॥
हे पार्थ ! कायर मत बनै, तुझे यह उचित नहीं है, हे शत्रुसूदन !
अपने मनकी इस तुच्छ दुर्बलताको छोडकर खडे हो जाओ॥ ३ ॥
कथंभीष्ममहंसंख्येद्रोणं च मधुसूदन ।
इषुभिःप्रतियोत्स्यामिपूजाविरिसूदन ४
दोहा-हरिपूजा संग्रामम, हैंभीषमअरुद्रोन॥
पूजाँकै शरसोहनौ, मोसॉकहिये तौन॥४॥
हे मधुसूदन ! मैं संग्राममे भीष्म पितामह औरदोणाचार्यसे युद्ध
किसतरह करूं हे शवनिकंदन ! ये दोनों तौ पूजाके योग्य हैं. इनपर
बाण कैसे चलाऊं ॥४॥
गुरूनहत्वाहिमहानुभावाञ्छ्योभोक्तुंमै-
यमपीहलोके।हत्वार्थकामांस्तुगुरूनिहै
वभुंजीयभोगान् रुधिरप्रदिग्धान् ॥५॥
दोह-भीखमांगिबरुखाइये, गुरुहनिवौजुअनीति
गुरुहिमारिभोगहिकरौं, भषासुलोहराति ॥५॥
हे कृष्ण ! इस लोकमें महानुभाव गुरुजनोंको मारे बिना जो भी
खका अन्न खाकर कालक्षेप होजाय तो यह भी बहुत उत्तम है, जो
गुदओंको मारकर इन सांसारिक भोगोंको भागगा. वह संधिरसे
सनेहुए भोगोंको भोगैगा ॥५॥
अभ्याव। D नचैतद्विद्मः कतरन्नो गरीयोयद्वाजयेमय- दिवानोजयेयः॥यानेव हत्वा नजिजीवि- पामस्तेऽवस्थिताःसंमुखेधार्तराष्ट्राः ॥६॥ दोहा-इहौजुहमनहिंजानहीं, हारिहोइ कै जीत ॥ जिनहिमारिहमनहिंजिये, ते ठाढे हैं मीता हे कृष्ण ! जो हम अधर्म करनेको तत्पर हो भी जांय तौ हमको नहीं मालूम है कि हममें कौन बली है, ये हमको जीतेंगे वाहम इनको जीतेंगे. जिनको मार कर हम जीना नहीं चाहते हैं. वे धृतरा- ष्ट्रके पुत्र हमारे सन्मुख खडे हैं॥६॥ कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः पृच्छामित्वांध मसंमूढचेताः॥ यच्छेयःस्यानिश्चितंबहि- तन्मे शिष्यस्तेऽहंशाधिमांत्वांप्रपन्नम्। दोहा-धर्ममांझिहौंमूढहौं. पूछतकृष्णसुभाय॥ दीनतुमारोशरणहौं, दीजैयुक्तिवताय॥७॥ इनको मारकर हम कैसे जियेंगे यह कार्पण्य है और कुलक्षयका दोष है कार्पण्य और दोष इन दोनों बातोंसे मेरा स्वभाव विगड गया है. अब मेरा मन ऐसा मूढ होगया है कि मुझे धर्म अधर्मका कुछ ज्ञान नहीं रहा है. इसलिये मैं आपसे पूछता हूँ कि युद्ध करना वा भिक्षा मांगकर जीवन करना. इन दोनोंमें कौनसी बात श्रेष्ठ है
भापगीताभाषीका
इनमें जो बहुत ठीक होय सो कहिये में आपका शिष्य हूँ, आपके
शरण आया हूँ, जिस प्रकार मेरा धर्म बचे और निश्चय कल्याण
होनेवाला उपाय हो. वही कहिये ? ॥ ७ ॥
नहिप्रपश्यामिममापनुद्याद्यच्छोकमुच्छो
पणमिंद्रियाणाम् ॥ अवाप्यभमावसपल
मृद्धं राज्यंसुराणामपिचाधिपत्यम् ॥८॥
दोहा भूमिलोकसुरलोकको, लहोंअकंटकराज॥
इंद्रियशोकजीवको, जाइ न शोकसमाज ॥८॥
हे प्रभो ! जो संपूर्ण पृथ्वीकाभी मुझे निष्कंटक राज्य मिल
जाय और देवताओंकाभी अधिपति बनजाऊँ तौभी मुझे कोई उपा-
य नहीं सूझता है, जिससे इन्द्रियोंका दुखानेवाला मेरा यह शोक
दूर होजाय ॥ ८॥
एवमुक्त्वा हृषीकेशं गुडाकेशः परंतप ॥
नयोत्स्यइतिगोविंदमुक्त्वातूष्णींबभूवह ।
दोहा-ऐसेकहिश्रीकृष्णसों, अर्जुनताहीवार॥
युद्धनहींहरिजूकरौं, कीनोयहनिर्धार ॥९॥
तब संजयने कहा- हे वृतराष्ट्र ! निद्राको जीतनेवाला और शह-
ओंकों संताप देनेवाला अर्जुन श्रीकृष्ण यह कहकर चुप होगया
कि, मैं अब युद्ध नहीं करूंगा॥९॥
अध्याय २ तमुवाचहृषीकेशःप्रहसन्निवभारत ॥ सेनयोरुभयोर्मध्येविषीदंतमिदंवचः॥१० दोहा-दोङसेनामांझयों,अर्जुनकियोविषाद ।। कृपावंतव्हैकृष्णजू. कीनोबचनप्रसाद ॥१०॥ भरतवंशसमुद्भव स्तराष्ट्र ! दोनों सेनाओंके बीचमें खडे हुए अर्जुनको शोकयुक्त देख इन्द्रियोंके स्वामी श्रीकृष्ण कुछ हंसतेहुएसे यह कहने लगे॥१०॥ अशोच्यानन्वशोचस्त्वंप्रज्ञावादांश्चसापसे। गतासूनगतासंश्चनानुशोचंतिपंडिताः११ दोहा-शोचअशोचीक्योंकरत, करतज्ञानकीबात शोच न पंडितकरत हैं,जीवनउपजतजात११ प्रथम श्रीकृष्णने विचारकिया कि-अर्जुनको देह और आत्माके अविवेकसे शोक उत्पन्न हुवा है. सो जबतक इसको ज्ञान न होना तश्तक शोक न मिटेगा यह सोचकर कहने लगे कि हे अर्जुन ! जिन वस्तुओंका सोच करनाउचित नहीं है. उनका सोच करते हो और पंडितोंकीसी बाते बनाते हो. यह तुमारा हठ ठीक नहीं है. विद्वान लोग जीते और मरे हुओंका सोच नहीं करते हैं, क्योंकि जीना मरना दोनों मिथ्या हैं ॥११॥ समीक्षा-अर्जुनने जो " दृष्ट्वेमं स्वजनं कृष्णति " अध्याय १ श्लोक २८ से लेकर “ यदि मामप्रतिकारमिति " अध्याय १ श्लोक,४६ पर्यंत उन्नीसश्लो- कोंमें और "कथं भीष्ममहं संल्योति" अध्याय २ श्लोक.४ से लेकर "नदि प्रपश्यामीति १ अध्याय २ श्लोक ८ पर्यंत पांच श्लोकोंमें शोक मोह और संशयकी बातें कहीं तो श्रीकृष्ण महाराजने "अशोच्यानन्यशोचस्स्वामिति भगवद्गीताभाषाटीका. (अध्याय २ श्लोक ११ से प्रारम्भकरके " सर्वधमान्परित्यज्येति " अध्याय १८ श्लोक ६६ पर्यंत सिद्धांतरूपसे अनेक बातें अर्शनके शोक मोह और संशयको दूर करनेको कहीं, यथा अर्जुनको शोक और मोह होगया था, कि जब युद्धमें हमारे कुलके पुरुष सब मरखप जायेंगे तो हमारे स्वर्गस्थपितर, उनके नाम से श्रादादिक न होनेपर, नरकमें गिरपडेगें, तो इस शोक और मोहको यह कहकर निवृध किया कि "ते तं भुक्त्वा स्वर्ग लाकें विशालं क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशंतीनि? अध्याय श्लोक २ अर्थात् स्वर्ग में रहने वाले मनुष्य उचम स्वर्ग लोकळे सुखोंको भोगकर पुण्य क्षीण होनेपर मर्त्यलोक्में आजाते है. अतः हे अर्जुन ! तू इस मोहको त्याग दे कि, हमारे पितरोंके निमित्त जब कोई श्रादादिक्रिया न करेगा तो वह स्वर्गलोकस निकाले जायेंगे.इस बातकोतु सिद्धांत मान कि,दूसरोंके किये हुए पुण्योंसे जीव नतो स्वर्गमें ठहरसकेहैं, और न दूध कोकिये पापोंसे स्वर्ग निकालेजायकेहै,मला विचारों तो सहीक्या यह न्यायकी बात है कि,अपराध करे तो कोई और पकडा जावे कोई। ऐसा पदापि नहीं छोसक्ता यहापर एक सूक्ष्मरूपसे एक दृष्टात है कि जिप्ससमय बालमीक- जो बाल्यावस्थामें बलियाभेषमें भ्रमण करते हुये अमेक मनुष्योंको मार २ कर उनका पत्र) धन लेकर जीविका का कार्य करते थे. एक दिन सप्तऋषि उसी मार्मसे आते भये ज्योंही बाल- मीको अपने धन्वावाणसे मारना वादा त्योंही उन महर्षियोंने भाषाज दी कि ठहरो पहिले मारे प्रश्न का उत्तर देकर मारना उचित है. दूरदर्शी महर्षियोंने विचार करके कहा है वीर पुरुष । जो प्रतिदिन आप जीवर्तिसाकर धन जाते, क्या उस पाफ्के मागी केवल आपही हैं। या तुझारे कुटुम्बी भी हैं ? इतना सुन वाल्मीकजीने कहा अभी पूछकर उत्तर देता, घरमै जाकर सबसे पूछा, सब कुटुम्बियोंने पापके भाग लेने से इन्कार किया. उसी समयसे विचार बालमीक्जीके बदल गये और उन ऋषियोंके शरणमें जापडे. उन महर्षियों को शिक्षा दीक्षासे वाल्मीकी परमपदको प्राप्त होगये इससे सिद्ध होसता है कि जो पाप करेगा वही भोगेगा. नत्वेवाहंजातुनासनत्वनेमेजनाधिपाः ॥ न चैवनभविष्यामःसर्वेवयमतःपरम्॥१२ दोहा-हमतुमअरुनरपतिजिते, जिनकोनाशनहोइ । तिहूँकालमेंथिररह्यो, ऐसे सबकोजोइ ॥१२॥ हे अर्जुन ! क्या में, तुम और ये सब राजा पहिले नहीं थे ? क्या आगे नहीं होंगे ? यह बात नहीं है, पूर्वकालमें मैंभी था, और तुमभी थे और ये सब राजाभीथे, अबभी हैं और आगेभी हम तुम और ये राजाभी सब होंगे॥१२॥ . N अध्याय देहिनोऽस्मिन्यथादेहेकौमारंयौवनजरा। तथादेहांतरप्राप्तिर्षीरस्तत्रनमुह्यति ॥१३ दोहा-बालयुवा अरु द्धता,या देही को होय॥ तैसेदेहांतरलहै, धीरनमोहितकोय ॥ १३ ॥ हे अर्जुन ! जैसे इस देहमें जीवकी वाल्यावस्था, युवावस्था और वृद्धावस्था होती है. उसी तरह जीव इस देहको छोडकर दूसरी देह पालेता है, इसमें ज्ञानी पुरुषोंका मोह करना व्यर्थ है. समीक्षा-जिसप्रकार बाल्यावस्थाजाने पर कौमारावस्था आजाती है और कोमारावस्थाके पीछे यौवनावस्था आजाती है और यौवनाव स्थाके पीछे जरावस्था आजाती है और मनुष्य लोग एक अवस्थाके जाने और दूसरीके आनेपर चिंता और शोक नहीं करते और न रोते पीटते हैं इसीप्रकार एक देहके पीछे दूसरी देह प्राप्त होनेपरभी शोक- करना और रोना पीटना व्यर्थ है ॥ १३ ॥ मात्रास्पर्शास्तुकौंतेयशीतोष्णसुखदुःखदाः। आगमापायिनोऽनित्यास्तास्तितिक्षस्वभारत दोहा-अर्जुनइंद्रियचितमिली, विषयजुसुखदुखदेत॥ आवैजाइनथिररहै, सहतनयाकोहेत ॥१४॥ हे कौतय ! शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध जो इन्द्रियों के विषय हैं ये शरदी गरमी,और सुख,दुःखके देनेवाले हैं ये अनित्य हैं. और आते जाते रहते हैं अर्थात् कभी दुःख और कभी मुख, कभी सर्दी कभी गर्मी आती जाती रहती है इससे हे अर्जुन ! इनका सहना उचितहै१४ भगवद्गीतामाताटीका. यं हि न व्यथयंत्येते पुरुषपुरुषर्षभ । समदुःखसुखंधीरंसोऽमृतत्वायकल्पते१५ दोहा-जाकेविथा न होइ कछु, सुखदुखगिनैसमान ।। वहै धर्मकरिमोक्षहै, बातयहैपरमान ॥१५॥ हे पुरुषोमें श्रेष्ठ अर्जुन ! जिनको इन्द्रियोंके विषय नहीं सताते और जो सुखदुःखको समान जानते हैं वे धीर पुरुष मोक्षके अधि कारी होते हैं ॥१५॥ नासतोविद्यतेभावोनामावोविद्यतेसतः॥ उभयोरपिदृष्टोंतस्त्वनयोस्तत्त्वदर्शिभिः दोहा-जो है सो विनशैनहीं, जोविनशैसोनाहिं।। जोइनतत्वनकोलखै, गनियेज्ञानिनमाहि॥१६ हे अर्जुन ! असत जोसुखदुःखादि नाशवान् पदार्थ हैं. वे अनित्य हैं. और सत जोआत्मा है उसका नाश नहीं है.तत्वदर्शियोंने अभा- व और अनभाव इन दोनोंकाभी सिद्धांत देखा है ।। १६ ।। अविनाशितुतद्विद्धि येनसर्वमिदंततम् ॥ विनाशमव्ययस्यास्यनकश्चित्कर्तुमर्हति। दोहा-जासोंजगयह है भयो,सोअविनाशीजानि जाहिविनाशनकोउसकै. ताहिआतमामानि॥
मायाप२.. हे अर्जुन ! जो सबमें व्यापक है वह अविनाशी है और इस अ- विनाशीका नाश कोईभी नहीं करसकता है ।। १७ ।। अंतवंतइमेदेहानित्यस्योक्ताःशरीरिणः॥ अनाशिनोप्रमेयस्यतस्मायुद्धस्वभारत॥ दोहा-अंत्वंतसबदेहहैं, जीवरहतहनित्त ॥ अविनाशीवहवस्तुहै, युद्धकरौ किन मित्त१८ हे भारत ! यह देह बिनाशी है अर्थात् अवश्य नष्ट होजाता है और इसमें जो जीव रहता है वह अविनाशी और प्रमाणरहित है, फिर इस अनित्य देहके लिये अपना धर्म क्यों त्यागता है, तिससे हे अर्जुन ! खडा होकर युद्ध कर ॥ १८॥ य एनवेत्ति हतारंयश्चैनंमन्यतेहतम् ॥ उभौ तौनविजानीतोनायंहतिनहन्यते॥ दोहा-जोयाकोहन्तागने, हन्यौगनैजोकोय।। यह न मरैमारनहीं. अज्ञानीवेदोय ॥ १९॥ जो किसी आदमीको इस आत्माका मारनेवाला समझते हैं वा इस आत्माको किसीके द्वारा माराहुआ समझते हैं ये दोनोंही वाते 'अज्ञानकी हैं इस आत्माको न कोई मारही सकता है और न यह मरताही है इस श्लोको यह दिखाया है कि, तू जो भीष्मादिकक मारनेका सोच करता है वह व्यर्थ है क्योंकि आत्मा तोकिसी प्रकारसे मरनहीं सकती है और देह अनित्य है ।। १९ ॥
भगवद्गीताभाषाटीका.
नजायतेम्रियते वा कदाचिन्नायं भूत्वाभ-
विता वान भूयः॥अजोनित्यःशाश्वतोऽयं
पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरी॥२०॥
दोहा-यहनमरैउपजैनहीं, भयो न वहुयोहाइ।
अजरपुरातननित्यहै, मारेमरैनसोइ ॥२० ॥
हे अर्जुन ! यह आत्मा न कभी जन्म लेता है न मरता है न क-
भी पहिले हुआथा, न आगे होगा. यह जन्मरहित है, नित्य है,
पुरातन है (सदासे है यह बातभी नहीं है कि नया हुआहो) शरीरके
मारने परभी इसका नाश नहीं होता है ॥२०॥
वेदाविनाशिनंनित्यंयएनमजमव्ययम् ॥
कथंसपुरुपःपार्थकंघातयतिहतिकम् २१
दोहा--जोजानहैआतमा, अजअविनाशीनित्त ॥
सोनरमारकोनको, ताहि हनै को मित्त ॥२१
हे अर्जुन ! जो इस आत्माको अविनाशी, नित्य, अजन्मा, अ.
विकारी, समझता है. वह किसको मारता है ॥२१॥
वासांसिजीर्णानियथाविहायनवानिगृह्णा-
तिनरोऽपराणि ॥ तथाशरीराणिविहाय-
जीर्णान्यन्यानिसंयातिनवानिदेही॥२२॥
अध्याप२1.
दोहा-जैसेपट जीरन तजै, पहिरत नरजु नवीन।
देह पुरातनजीवताज, नईगहतपरवीन॥२२॥
हे अर्जुन ! जैसे मनुष्य पुराने वस्त्रोंका त्याग कर और नये वस्त्रों-
को धारण कर लेता है, वैसेही जीव पुरानी देहको त्यागकर नई दे-
ह धारण करलेता है. आशय यह है कि-जैसे पुराने वस्त्रोंको त्यागने में
कुछ कष्ट नहीं होताहै वैसेही पुरानी देहके त्यागने में भी कुछ कष्ट नहीं हैं
नैनं छिदंतिशखाणिनैनंदहतिपावकः॥
नचैनं क्लेदयंत्यापोनशोषयतिमारुतः २३
दोहा-यहनकटहथियारसों, पावकसकैनजारि ॥
भीजसकैजलनाहिंसो, सोखिसकैनबयारि॥
हे अर्जुन ! इस आत्माको शस्त्र छेद नहीं सकते हैं, अग्नि जला नहीं
सकता है,जल इसे भिगो नहीं सकता है,और यवन सुखानहीं सकताहै
अच्छेद्योऽयमदाह्योऽयमक्लेद्योशोष्यएवच।।
नित्यःसर्वगतःस्थाणुरचलोऽयंसनातनः॥
दोहा--कटेजरैसूखैनहीं, और न भिजवनयोग।
नित्यजवैसवठौरथिर, अविनाशीविनरोग।
हे अर्जुन ! यह आत्मा न छिद सकती है, नजल सकती है,न
भीग सकतीहै, न सूख सकतीहै ! क्योंकि नित्य है, सर्वव्यापक है,
स्थिर है, अचल है और सनातन है ॥२४॥
४८
भगवद्गीताभाषाटीका.
अव्यक्तोऽयमचिंत्योऽयमविकार्योयमुच्यते।
तस्मादेवं विदित्वैन नानशोचितुमर्हसि ॥
दोहा-प्रगटनहींजुअचिंत्यहै, अविकारीतजानि।।
ऐसे याकोजानिकै,शोकले जनिमानि॥२५॥
हे अर्जुन ! यह आत्मा इन्द्रियोंद्धारा जानानहीं जाता है, मनसे
विचारनेमें नहीं आता है और विकाररहित है,आत्माको उक्तरीतिका
जानकर इसके लिये तेरा सोच करना व्यर्थ है ॥२५॥
अथचैनंनित्यजातंनित्यंचामन्यसेमृतम्॥
तथापि त्वं महाबाहोंनैनं शोचितुमर्हसि ॥
दोहा-जो तुम जानोजीवको, जन्ममरणपुनिहोइ।।
तऊशोकतूजनिकरै, मनदृढतामेंहोइ ॥ २६ ॥
हे महाबाहो ! जो तुम इस आत्माको नित्यही जन्मा और नित्य-
हीमरामानते हैं तौभी इसके लिये तेरासोच करना अनुचित है।२६॥
जातस्य हि ध्रुवोमृत्युqवजन्ममृतस्यच॥
तस्मादपरिहार्येऽर्थेनत्वंशोचितुमर्हसि ॥
दोहा-जोउपजैसोविनसिहै, मरैसु उपजै आइ॥
होनहार सोहोत है, तहांन शोच बढाइ ॥२७॥
हे अर्जुन! जिसने जन्म लिया है.वह अवश्य मरेगा और जोमरा है
वह अवश्य जन्म लेगा,इससे उपाय रहित बातों के लिये तुह्मारा शोच
करना व्यर्थ है।॥ २७॥
"मम्याए । अव्यक्तादीनिभूतानिव्यक्तमध्यानिभारता। अव्यक्तनिधनान्येवतत्रकापरिदेवना।२८ दोहा-पाछे जाहि नजानिये, आगे परैन जानि ॥ मांझआयु कछु देखिये,ताको शोच नमानि।। हे भारत! मनुष्यादि प्राणी जन्मलेनेसे पहिले प्रकट नहीं हैं और न मरनेसे पीछे दिखाई देते हैं, केवल जन्ममरणके बीचवाली मध्यमाव- स्थामें दीख पड़ते हैं, फिर इसमें शोक करनेकी बातभी क्या है ॥२८ आश्चर्यवत्पश्यंतिकश्चिदेनमाश्चर्यवद्वदति- तथैवचान्यः।। आश्चर्यवञ्चैनमन्यःश्रृणोति श्रुत्वाप्येनं वेद नचैव कश्चित् ॥२९॥ दोहा-जो याको देखै कहै, सोई अचरज भाय ॥ सुनैअचंभोसोलगै, यहजान्योनहिंजाय॥२९॥ हे अर्जुन ! कोई तो इस आत्माको आश्चर्यवत् देखता है, कोई आश्चर्यदत् कहता है और कोई आश्चर्यवत् सुनता है और कोई इसे सुनकरभी नहीं समझता है ॥२९॥ देहीनित्यमवध्योऽयंदेहेसर्वस्यमारत ॥ तस्मात्सर्वाणिभूतानिनत्वंशोचितुमर्हसि३० दोहा-जीव न मायो जातुहै, वसेतसबनकीदेह ।। ताते शोच न कीजिये, करि काहसों नेह ॥३० .
५० भगवदगीताभापाटीका. हे भारत ! सबकी देहमें जो यह आत्मा है,वैद अवध्य है. अर्थात् इसे कोई मार नहीं सकता है, फिर इन माणियोंके लिये जो तुह्मारा सोच करना है सो व्यर्थ है ॥३०॥ स्वधर्ममपिचावेक्ष्यनविकंपितुमहसि ॥ धाद्धियुद्धाच्छ्रेयोऽन्यत्क्षत्रियस्यनविद्यते। दोहा-अपनोधर्मविचारतू, जनिछाँडैसंग्राम ॥ धर्मयुद्धतेक्षत्रियहि, औरनकछुअभिराम ॥३१ हे अर्जुन ! जो तू अपने क्षत्रियधर्म परभी दृष्टि करता है तौभी तु- झे डरना नहीं चाहिये, क्योंकि क्षत्री के लिये युद्ध धर्मसे उत्तम और कोई धर्म नहीं है ॥३१॥ यदृच्छयाचोपपन्नंस्वर्गद्वारमपावृतम् सुखिनःक्षत्रियाःपार्थलसंते युद्धमीदृशाम्, दोहा-अपनी इच्छा ते लह्यो,खुल्यो स्वर्गको भाग्यवंत क्षत्री लहैं, लरै सुरणहिं मझार ३२ हे पार्थी यह समय अपने आप उपस्थित होगया है इसमें स्वर्गला द्वार खुल जाता है,पुण्यवान् क्षत्रियोको ही यह युद्धसमागम मिलता है अर्थात् जोक्षत्री युद्ध में मरते हैं वे सीधे स्वर्गको चले जाते हैं॥३२॥ अथचेत्त्वमिमंधयंसंग्रामनकरिष्यास ॥ ततःस्वधर्मकीर्तिचहित्वार दोहा-यहीधर्मसंग्रामको,जो तू करिहै नाहिं ॥ तजिकै कीरत धर्मको परिहै पापनिमाहिं ३३ और जो तू (इस अवसरको पाकरभी) अपने क्षत्रिय धर्मरूप संग्रामको न करेगा तो तेरा धर्म नष्ट होजायगा, कीर्ति जाती रहेगी और तुझे पाप लगैगा ॥३३॥ अकीर्ति चापि भूतानि कथयिष्यतितेऽव्ययाम् संभावितस्य चाकीर्तिमरणादतिरिच्यते॥ दोहा-तेरो अपयश जगतमें, बोलैंगेसबकोय॥ मानवंतको मानघट, अधिकमरणतेहोय॥३४ और मनुष्य तुझको सदा बुरा कहेगे (देख) प्रतिष्ठिन पुरुषकी अपकीर्ति होना मरनेसेभी तुरा है ॥ ३४ ॥ भयाद्रणादुपरतं संस्यंतेत्वांमहारथाः॥ येषांचत्वंबहुमतोभूत्वायास्यसिलाघवम्॥ दोहा-भयते अर्जुनरणतज्यो, जगयोंकहिलैवीर। तोहिंबडतकरिमानते, अबलघुन्हैहोधी॥३५॥ ये सब महारथी तुझको रणभीरु कहेंगे और जो तुझको वडा मानते हैं उनकी दृष्टिमें तू तुच्छ हो जायगा ॥३५ ।। अवाच्यवादांश्चवहन्वदिष्यन्तितवाहिताः निंदंतस्तवसामर्थ्यततोदुःखतरं नु किम् ॥ माजकावमका शाखाम" भगवद्गीताभाषाटीका...... दोहा-तेरे अरिसबकहहिंगे, जो अनकहनी वाता निजघटियाईके सुने, बहदुखलागतात ॥३६॥ येही तेरे बडे बडे वैरी अनकहनी बात तुझसे कहेंगे और तेरे बल पौरपका तिरस्कार करेंगे.(कहो तो सही) इससे बडा दुःख कौनसा है। हतोवापाप्स्यसिस्वर्गजित्वावाभोक्ष्यसेमहीम तस्मादुत्तिष्ठकौंतेययुद्धाय कृतनिश्चयः ॥ दोहा- लरतमरैलहिहैस्वरग, जीतपुहमीभोग । उठिअर्जुनतूंयुद्धकार, शत्रुहतोयहयोग ।। ३७॥ हे अर्जुन! जो तुम इस संग्राममें मारेजावोगे तो सीधा स्वर्गको जा- वोगे और जोजीतोगे तौइस पृथ्वीकाराज्य करोगे तुह्मारीदोनोंत- रह जीतह) इससे दृढ विचारकर कमरकस युद्धके लिये खडे होजावो सुखदुःखेसमेकृत्वालाभालाभौजयाजयौ ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि दोहा-लामहानिअरुसुखदुखी जीत्योहारिसमान तातेअर्जुनयुद्धकार, पापलेट्ठजनिमान ॥३८॥ सुख दुःख, हानि, लाभ और जय, पराजयको समान जानकर युद्धके लिये तैयार होजाओ ऐसा करनेसे तुझे पाप नहोगा ॥३८॥ एषातेऽभिहितासांख्येबुद्धिोंगेत्विमांशृणु बुद्ध्यायुक्तोययापार्थकर्मबंधंग्रहास्यसि। .
दोहा-सांख्यबुद्धितोसोंकही, कहतयोगबुधितोहि ताधिकेसंयोगते, रहैनकनिमोहि ॥ ३९ ॥ हे अर्जुन ! जो कुछ मैंने अबतक तुझसे कहा है वह सांख्यशास्त्रके अनुसार आत्मा और देहका तत्व समझाया है.अब उसी बुद्धिको योगमें कहताहूं उसे सुन इस बुद्धिके द्वारा सुख दुःखादि जो कर्मबं- धन हैं उनसे छूट जाओगे॥३९ नेहाभिक्रमनाशोऽस्तिप्रत्यवायोनविद्यते स्वल्पमप्यस्यधर्मस्यत्रायतेमहतोभयात् दोहा-कर्मकरैबिनकामना, ताकोहोइ न नाश ।। अल्पकियेहूधर्मयह, काटतभवभयपाश॥४०॥ हे अर्जुन ! इस कर्मयोगमें प्रारंभका नाशं नहीं है अर्थात प्रारम्भ होनेपर समाप्त न भी होय तो भी उसका फल मिलताहै, न इसमें कुछ पाप है. इस धर्मका किंचिन्मान करनाभी जन्ममरणादिरूप बडे भयसे रक्षा करता है॥४०॥ व्यवसायात्मिकाबुद्धिरेकेहकुरुनंदन ॥ बहुशाखाह्यनंताश्चबुद्धयोऽव्यवसायिनाम् दोहा-बुद्धिजुनिश्चैवतसों, एकैहैतूजानि ॥ जिनकैनिश्चैनाहिने, तिनकीबड्डविधिमानि॥ हे कुरुनन्दन ! व्यवसायात्मिक बुद्धि एकही है अर्थात् जिनकी बुद्धि निश्चल होगई है वे मोक्षके साधनरूप इस कर्मयोगमें लग जा-
भगवद्गीताभाषाटीका.
तेहैं और जिनकी बुद्धि चलबिचल है उनकी बुद्धि अनेक हैं अर्थात
तरह तरहके झगडोंमें फंसजाती है और उनकी शाखाभी अनेक हैं।
यामिमांपुष्पितांवाचंप्रवदंत्यविपश्चिताः
वेदवादरताःपार्थनान्यदस्तीतिवादिनः।
दोहा-वेदहिमानतस्वर्गफल, तेअज्ञानीलोइ ॥
कहतजुयांकछुनाहने, तिनमेंज्ञाननहोइ॥४२॥
हे अर्जुन ! जो अविवेकीहै वे वेदवाणीमें कर्मफल दिखाय मीठी-
मीठी बातें कहते हैं और वे कहते हैं कि, कर्मके अतिरिक्त और कुछ
नहीं है ।। ४२॥
कामात्मानःस्वर्गपराःजन्मकर्मफलप्रदाम्
क्रियाविशेषबहलांभोगैश्चर्यगतिप्रति ४३
दोहा-स्वर्गलोककीकामना, रहतजुतिनंकेचित्त ।।
लोगबडाईकेलिये, करतक्रियायोहित ॥४३॥
इससे हे अर्जुन ! स्वर्गप्राधिकी है,अत्यन्त कामना जिनके, ऐसे स-
काम पुरुष भोग और सुखकी प्राप्तिके लिये अनेक प्रकारके यज्ञादि
क करते हैं, यह क्रिया, जन्म और कर्म फलकी देनेवाली है॥४३॥
भोगैश्वर्यप्रसक्तानांतयाऽपहृतचेतसाम् ।।
व्यवसायात्मिकाबुद्धिःसमाधौनविधीयते
दोहा-भोगवडाईकामना, तिनकोमनहरलेत॥
निश्चयकारकैवडिको, नहिंसमाधिमेंदेता॥४४॥
अध्याय २॥
हे अर्जुन ! भोग और ऐश्वर्यमें जिनके मन फंसगये हैं और कर्म-
फलके बतानेवाली बागीसे जिनके चित्तहरे गये हैं उनका मन निश्च-
यात्मक बुद्धिमें स्थित नहीं होताहै ॥४४॥
त्रैगुण्याविषयावेदानिस्वैगुण्योभवार्जुन ॥
निद्वो नित्यसत्त्वस्थोनिर्योगक्षेमआत्मवाना
दोहा-त्रिगुणकर्मकोकहत हैं, वेदसु तजितूमित्त ॥
धीरजधरिदुखसुखसहो,योगक्षेमतजिचित्त४५
हे अर्जुन ! ये वेद सत, रज, तम इन तीनों गुणोंके विषयहैंतू
इन तीनोंको छोड़ दे. दुख सुख, लाभ अलाम, इन इन्द्रोंको' छोड
निर्दन्द्ध होजा, नित्यही सत्वमें स्थितहो, अप्राप्तवस्तुकी प्राप्ति और
प्राप्तकी रक्षामें चित्त मत लगाओ और आत्मस्वरूपमें सावधान हो४५
यावानर्थउदपानेसर्वतः संप्लुतोदके ।।
तावान्सर्वेषुवेदेषुब्राह्मणस्यविजानतः४६
दोहा-जैसे वापीकूपसोंसरतजितेजलकाज ॥
जितेसवैइकठौरही, करतसरोवर राज ॥१॥
जैसेजितेकवेदमें. कहेसकलविधिकाज ॥
ज्ञानीमें इकठौरही, तेपैयैकुरुराज ॥२॥४६॥
हे अर्जुन ! जैसे तालाव, सरोवर आदि पानीसे भरेहुए हैं, इनमेंसे
मनुष्य अपने प्रयोजनमात्र जल ले लेता है ऐसेही ब्रह्मवेत्ता संपूर्ण
वेदोंमें अपने प्रयोजन मात्र ले लेता है ॥४६॥
भगवद्गीताभापाटीका. कर्मण्येवाधिकारस्ते माफलेषु कदाचन ।। माकर्मफलहेतुर्भूर्मा ते संगोस्त्वकर्मणि ॥ दोहा--तोअधिकारजुकर्ममें, नाहींफलसोंहेत ॥ कर्मनकेफलछोडिदे, करहुकामहीचेत ॥४७॥ हे अर्जुन ! कर्महीमें तेरा अधिकार है, फलमें कभीभी अधिकार नहीं और जो तू कर उसके हेतु वा उसके फलके भोक्ताभी मतहो, और जो तूने कहाकि "मैं युद्ध न करूंगा"ऐसे अकर्ममें तेरी निष्ठा न हो योगस्थःकुरुकर्माणिसंगत्यक्त्वाधनंजय। सिद्ध्यसिद्ध्योःसमोभूत्वासमत्वंयोगउच्यते दोहा--योगस्थितव्हैकर्मकरि, सबैसंगको त्याग ।। सिद्धआसिद्धसमानगनि, यहयोगअनुराग॥४८ हे धनंजय! सब संगको त्यागकर योगमें स्थितहो कर्म कर, सिद्धि और असिद्धिमें समान भावसे देख. क्योकि सिद्धि और असिद्धिकी समानताही योग है ॥४८॥ दूरेण ह्यवरं कर्म बुद्धियोगाद्धनंजय ॥ बुद्धौशरणमन्विच्छकृपणा:फलहेतवः४९ दोहा--बुद्धियोगतेकर्मको, अर्जुनतोघटिजानि॥ शरणहोहुतुमबुद्धिकी. दीनकामनामानि॥४९ मम्मा २॥ हे धनंजय ! बुद्धियोगसे कर्मनीचहै. इससे बुद्धिका आश्रय लेकर कर्म करो; जो फलशी कामनासे कर्म करतेहैं वे दीन है, सिद्धि और असिद्धिमें जो समत्व है उसीका नाम बुद्धियोग है ॥४९॥ बुद्धियुक्तो जहातीह उभेसुकृतदुष्कृते॥ तस्माद्योगाययुज्यस्वयोगःकर्मसुकौशलम दोहा--बुद्धियुक्तदोऊतजत, कहापुण्यकहपाप ॥ योगकर्मचतुरहैं, सोईतूकरिआप ॥५०॥ जोबुद्धियोगसे कर्म करता है वह इसी संसारमें संचित पापपुण्योंका त्याग कर देता है, इससे तुम बुद्धियोगमें प्रवृत्त होओ, ऐसा योगही सब कमि कुशलकारक है ॥५०॥ कर्मबुद्धियक्ताहिफलत्यक्त्वामनीषिणः जन्मबंधविनिर्मकाःपदंगच्छंत्यनामयम् दोहा-चाहतनहिंजेकर्मफल, ते पंडितबडभाग ।। कर्मबंधकोछांडिक, लहतमुक्तिअनुराग ।। ५१॥ हे अर्जुन !जो पंडितजन बुद्धियोगयुक्त हैं, वे कर्मफलको त्यागकर जन्मबंधनसे छूट कर निश्चय परमपदको प्राप्त होते हैं ॥५१॥ यदातेमोहकलिलं बुद्धिय॑तितरिष्यति ॥ तदागंतासिनिर्वेदश्रोतव्यस्यश्रुतस्यच
भगवद्गीताभापारीका.
दोहा-मोहसघनताजवतजै, अर्जुनतेरीबुद्धि ।
तबपैही वैरागको, चितौकरिकै शुद्धि ॥५२॥
हे अर्जुन ! जब तेरी बुद्धि इस मोहरूपी सुखदुःखके पार होकर
अत्यन्त शुद्ध होजायगी तब अबतक जो कुछ तू सुन चुका है,और
जो आगे सुननेयोग्य है उसके वैराग्यको प्राप्त होगा।॥ ५२ ॥ ,
श्रुतिविप्रतिपन्नातेयदास्थास्यतिनिश्चला।
समाधावचलावुद्धिस्तदायोगमवाप्स्यसि
दोहा-तेरीबुद्धिवैरागफै स्थिररहिहैनित्त ।।
तवसमाधिमेंजोलगहि, व्हैहैनिश्चलचित्ता॥५३
हे अर्जुन ! अनेक विषयोके सुननेसे जो तेरी बुद्धि अस्थिर होर-
ही है जब वह मेरे वाक्यमें स्थिर हो जायगी तब तू योग पावैगा५३
स्थितप्रज्ञस्यकाभाषासमाधिस्थस्यकेशव
स्थितधी किंमभाषेतकिमासीतव्रजेतकिम
दोहा-जाकीबुद्धिनिश्चलसदा, ताको चिह्नवताइ।
कैसेवोलतक्यारहत, चलतमुहैकेहिभाइ॥५४॥
जब श्रीकृष्ण यह कह चुके तब अर्जुनने पूछा कि हे सर्वान्तर्या-
मिन् केशव ! समाधिमें स्थित पुरुष जिसी बुद्धि स्थिर होगई है
उस स्थितप्रज्ञपुस्पके लक्षण क्या ? और ये किस तरह बोलते बैठतेहैं?
और किसतरह चलने फिरते हैं । ॥५४॥
अध्याय २१, - .. ॥ ॥ श्रीभगवानुवाच ॥ प्रजहातियदाकामान्सर्वान्पार्थमनोगतान आत्मन्येवात्मनातुष्ट स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते दोहा-जैहमनकीकामना, तिनकातजैजुकोय । * आतममेंसंतोपगहि, निश्चलबुद्धिसुहोय॥५॥ यह सुन भगवान बोले-हे अर्जुन ! जो प्राणी अपने मनकी का- मनाओंका सर्वथा परित्याग कर देता है और अपनी आत्माहीमें आत्मसुखका अनुभव करता है वही स्थितप्रज्ञ है ॥ ५५ ॥ दुःखेष्वनुद्विग्नमनाःसुखेषुविगतस्पृहः॥ वीतरागभयक्रोधःस्थितधीर्मुनिरुच्यते॥ दोहा-दुःखदेखिभागैनहीं, सुखचाहें नहिचित्त।। तजैनेहरुकोधमय, निश्चलबुद्धिसुमित्त॥५६॥ जिसका मन दुःख पडनेसे घबडाता नहीं है. और सुखमें जिसे हर्ष नहीं होता है, तथा राग, भय और कोध जिसके पासभी नहीं आते हैं वही स्थितप्रज्ञ है ।। ५६ ॥ यःसर्वत्रानभिस्नेहस्तत्तत्प्राप्यशुभाशुभम नाभिनंदतिनद्वेष्टिस्थितप्रज्ञस्तदोच्यते॥ दोहा-नेहनकाहूसोंकरें, भलेबुरेकीचाहि ॥ रागद्वेषहूनाकरै, थिरबुधिलाषियेताहि ॥२७॥ .
३० भगवद्गीताभापाटीका. अब अर्जुनने जो पूछाथा कि-स्थितप्रज्ञ किस रीतिसे बोलते हैं उप्त- के उत्तरमें भगवान कहते हैं कि-हे अर्जुन ! जिसका किसी पदार्थमें स्नेह नहीं है. और नशुभप्राप्तिमें हर्षित होता है और न अशुभमें शोक करता है, न किमीसे राग है न ढेप, वही पुरुष स्थितप्रज्ञ है ।। ५७ ॥ यदासंहरतेचायंकूौगानीव सर्वशः॥. इंद्रियाणींद्रियार्थेभ्यस्तस्यप्रज्ञा प्रतिष्ठिता॥५८॥ दोहा-जोकछुवानिजअंगको, बैंचिआपुलेत॥ तैसेखेंचोइंद्रियन, बुधिनिश्चलकेहेत ॥५८ ॥ जैसे कछुआ अपने सब अंगोको अपने भीतर सकोड लेता है.मी तरह वह मनुष्य जो अपनी इन्द्रियोंको उनके विषयोंसे मोडकर स- मेट लेता है उसी पुस्प की बुद्धि स्थिर होती है ॥५८ ॥ विषयाविनिवर्ततेनिराहारस्यदेहिनः ॥ रसवर्जरसोप्यस्यपरदृष्ट्वानिवर्त्तते॥५९॥ दोहा-विषयनकरतजुदूरिसों, तजतजुहेआहार ॥ आतमदेखेजातुहै, अभिलाषानिरधार॥ ५९॥ जो कहो कि-निराहार रहनेसेभी पुरुषोंकी विषयासक्ति दूरहोजा- ती है, सो ठीक है यद्यपि उसकी आसक्ति दृर होजाती है पर इच्छा बनी ही रहती है और स्थितप्रज्ञ पुरुषको परमात्माके दर्शनसे विषय- वासनाभी दूर होजाती है । ५९ ।।
अध्याय २॥ यततोगपिकौंतेयपुरुषस्यविपश्चितः ।।- इंद्रियाणिप्रमाथीनिहरंतिप्रसभमनः॥६. दोहा-ज्ञानवंत जे पुरुष हैं, जतनकठिणतासाधि इंद्रियअतिबलवंतहें, तऊलगावतव्याधि ॥६० हे कौन्तेय ! इन्द्रियां बडी प्रबल और क्षोभकारक है, यल करते करते ज्ञानी पुरुषके मनकोभी हठपूर्वक हरलेती है अर्थात् विना समा- धिर्म स्थित हुए इन्द्रियोका रोकना कठिन है ॥ ६ ॥ यानिसर्वाणिसंयम्ययुक्तआसीतमत्परः ॥ वशेहियस्येंद्रियाणितस्यप्रज्ञाप्रतिष्ठिता।। दोहा-तातेरोकैइंद्रियन, मोमेंचित्तलगाय ॥ वसकीनजिनएसबै, सोथिरबुद्धिस्वभाव ॥६॥ जो योगी इन सब इन्द्रियोंका दमन कर मुझमें तत्पर होरहा है अर्थात आत्मामें निष्ठा कर बैठे, और जिसके वशमे इन्द्रियां हैं वही स्थितप्रज्ञ है॥६१॥ व्यायतोविषयान्पुंसःसंगस्तेषपजायते ॥ संगात्संजायतकामःकामाकोधोभिजायते दोहा-ध्यानकरतनरविषयकौं, तासउपजतसंग। कामजुउपजतसंगते, तातेक्रोधउमंग॥१२॥ इन्द्रियोंके वशीभूत किये विना मन में विषयोका चिन्तवन बना Meri भगवद्गीताभापाटीका. रहता है, चिन्तवन करते करते उसमें आसक्ति उत्पन्न होजाती है,तथा आसक्तिसे कामना और कामनासे क्रोध उत्पन्न होता है ॥६२ ॥ क्रोधाद्भवतिसंमोहःसंमोहात्स्मृतिविभ्रमः स्मृतिभ्रंशाडुद्धिनाशोबुद्धिनाशात्प्रणश्यति दोहा-मोहहोतहैक्रोधत, क्रोधहितेबुद्धिनास ॥ शुद्धिगयेवुधिनसतहै, बुद्धिनशेयमपास ॥६३॥ हे अर्जुन ! क्रोधसे मोह उत्पन्न होता है और मोहसे मतिभ्रम होता है अर्थात् मति चक्कर में पडजाती है, मतिभ्रमसे बुद्धिका नाश होजाता है और बुद्धि नष्ट होनेपर प्राणी स्वयं नष्ट होजाताहै ।। ६३॥ रागद्वेषवियुक्तैस्तुविषयानिद्रियैश्चरन् ॥ आत्मवश्यैर्विधेयात्माप्रसादमधिगच्छति६४ दोहा-रागद्वेशकोजबतजै, करेविषयकीसेव ॥ इन्द्रियजोनिजवशकरै, लहै शांतिकोभेव॥३४॥ वह पुरुष जिसने अपना मन वश करलियाहै वह रागद्वेषसे रहित होकर इन्द्रियोंके विषयोंको सेवन करताहुआभी शान्ति पाता है॥६४ प्रसादेसर्वदुःखानांहानिरस्योपजायते ॥ प्रसन्नचेतसोह्याशुद्धिःपर्यवतिष्ठते॥६५॥ दोहा-शांतिजवहि यहगहतुहै, होतदुखनकीहानि।। बुद्धितवहिथिरहोतहै, तुमलीजोयहमानि ॥६५॥ ।
अध्याय २३ २॥ हे अर्जुन ! शान्तिको प्राप्त होनेपर पुरुषके सब दुःख मिट जाते हैं और उस शान्त चित्तवाले पुरुषकी बुद्धि शीघही स्थिर होजाती है नास्तिवुद्धिरयुक्तस्यनचायुक्तस्यभावना न चाभावयतःशांतिरशांतस्यकुतःसुखम् दोहा-योगविनाबुद्धिहुनहीं, वुधिविनहोइनज्ञान॥ ज्ञानविनाशांतीनहीं, ताबिनसुखनसुजान॥६६॥ जिस पुरुषने अपनी इन्द्रियों को वश नहीं किया है उसकी बुद्धि स्थिर नहीं हो सकती है और वह आत्माकी भावना(ध्यान) का भी अधिकारी नहीं होता और ध्यानरहितको शान्ति कहां और विना शांति के परमानंद जो मुख है सो कहां ॥६६ ॥ इंद्रियाणां हि चश्तां यन्मनोऽनुविधीयते। तदस्यहरतिप्रज्ञावायु वमिवभिसिा६७ दोहा--इन्द्रियजिततितफिरतुहैं,तितमनलावतुचि॥ मनजुवुद्धिहरिलेतुहै, वायुनाँवयोंऐंचि ॥६७ ।। मन विषयोंको भोगनेवाली इंद्रियों के पीछे लगा लगा फिरताहै और फिर वह मन बुद्धिकोभी खींचकर ऐसे लेजाताहै जैसे जलमें वायु नावको घुमाती है ॥६७॥ तस्माद्यस्यमहाबाहोनिगृहीतानिसर्वशः। इंद्रियाणींद्रियार्थेभ्यस्तस्यप्रज्ञाप्रतिष्ठिता६८ भगवद्गीताभाषाटीका। ४ दोहा-जिनइंद्रियरोकीसबै ठौरठौरतेआनि॥ विषय त्यागजिनहोकियो,थिरबुद्धिताहीमानि हे महाबाहो अर्जुन ! इसलिये जिसने इंद्रियाँको उनके विषयोंसे हटाकर दमन करदियाई उसीकी बुद्धि स्थिर है ।।६८॥ यानिशासर्वभूतानांतस्यांजागर्तिसंयमी॥ यस्यांजाग्रतिभूतानिसानिशापश्यतोमुनेः ॥ दोहा-ज्ञानतत्वसोइजगतनिशि, तहँजागतऋपिराय, जागतजीवअनेकतह,सोनिशियाकेभाव॥६९॥ जिसमें संपूर्ण प्राणी सोते हैं वह आत्मानष्ठावान पुरुषोका दिन है और जिसमे प्राणी जागते हैं वह आत्मनिष्ठावान् पुरुषोंकी रात्रि है अर्थात् विषयासक्त पुरुषोंको आत्मतत्वका ज्ञान नहीं है अर्थात् इस विषयमे उन्हें कुछ नहीं सूझता है इससे उनके लिये यह रात्रिरूप है और संयमी पुरुषोंको यह आत्मतत्व दिनके समान है, इसीतरह सां- सारिक विषयोका सुख मृढ प्राणियोंके लिये दिन है और योगियोंको रात्रिके समान है अर्थात् पे विषयभोगोंको कुछ नहीं जानते ॥६९॥ आपूर्यमाणमचलप्रतिष्टंसमुद्रमापाप्रविशं तियद्वत् ॥ तद्वत्कामायंप्रविशतिसर्वे सशां तिमानोतिन कामकामी॥ ७० ॥ दोहा--जैसेजवजलसरितको, मिलैसमुद्रहिजाय॥ त्यायामसवकामना, शांतिरहैतहआय ॥७० ।।
अध्याय २। ६५ . हे अर्जुन ! जैसे समुद्रमें पूर्णरीतिसे जल भराहुआ है और उसमें बहुतसी नदी और नदोंका जल चारोओरसे आकर गिरता है. परंतु तोमी वह अचल और प्रतिष्ठित रहताहै और अपनी मर्यादाका उ- ल्लंघन नहीं करता, इसीतरह विवेकी पुरुषोभी सब कामनालीन होती हैं और उसकी शान्ति बनी रहती है, परन्तु कामनाकी इच्छा करनेवालेको शान्ति नहीं मिलती है ॥ ७० ॥ विहायकामान्यःसर्वान्पुमांश्चरतिनिःस्टहः निर्ममोनिरहंकारःसशांतिमधिगच्छति॥ दोहा-तजिक सबमनकामना.जो नर निःस्टह होय। अहंकार ममतातजै लहैशांतिशुठि सोय ॥७१ ॥ जो पुरुष संपूर्ण कामनाओंका परित्याग कर निःस्पृह होकर वि- चरता है और ममता तथा अहंकारको छोड़ देताहै. वही शान्तिको. पाताहै ॥ ७१ ॥ एषाब्राझीस्थितिःपार्थनैनांप्राप्यविमुह्यति। स्थित्वास्यामंतकालेऽपि ब्रह्मनिर्वाणमृच्छति दोहा-ब्रह्मज्ञानतोसॉकह्यो, जातेमोहनसाय ॥ जोडिअंतरमरहै, मिले ब्रह्ममेंजाय ॥१॥ शोकपंकमेंमगनलखि, अरजुनकौंअनपार।। सांख्ययोगदुसरेकह्यो, हरिकीन्होउद्वार ॥२॥ सांख्ययोगवरन्योविषद, हरिकोंकरपरनाम ॥ पुरवोआनंदरामको, सकलमनोरथकाम ॥७२ भगवद्गीताभाषाटाका. 1 हे पार्थ ! यह मैंने तुमसे बह्मज्ञानको निष्ठाका वर्णन किया है. इस ब्रह्मज्ञानकी निष्ठाको पाकर फिर सांसारिक मोह नहीं रहताहै अन्त- समयमें जो क्षणभरभी इस ब्रह्मज्ञान निष्ठामें स्थित होजाते हैं वे बह्मा- ज्ञाननिष्ठामें स्थित होजाते हैं और ब्रह्मनिर्वाणपदको प्राप्त होतेहै ७२ इतिश्रीभगवद्गीतासुपनिषत्सुब्रह्मविद्यायांयोग- शास्त्रेश्रीकृष्णार्जुनसंवादेसांख्ययोगोनाम द्वितीयोऽध्यायः॥२॥ समीक्षा श्रीकृष्ण महाराजने इस दूसरे अध्यायमें अर्जुनको मोक्षका मार्ग कर्म, योग द्वारा बताया है अर्थात् फलकी इच्छा न करके सुख दुःखको समान समझकर कर्म करते रहनाही मोक्षका मार्ग है. अथ विचारदर्पण द्वितीय दर्शन प्रारम्भः प्राचीन हिन्दुओं (आर्थों) का गौरव. यह बात सवप्रकारसे प्राचीन इतिहास साओं द्वारा सिद्ध होगईहै कि हिन्दु [आर्य ] धर्म संसारके सब घों में सबसे माचीन है। सृष्टिके आदिमें यही धर्मथा। ईसाईमत १९०० उन्नीससौ वर्षसे और मुसलमानी मत १३००तेरहसौ वर्षसे प्रचलि- त हुए हैं। प्राचीन कालमें हिन्दुओं [ आर्यो ] का राज्य यावन्मात्र भूमण्डलमें फैला, हवाथा । हिन्दुओं (आयों को चक्रवर्ती राजाओगी यह प्रपालीपी कि किसी स्थानका राज्यलेकर एसी स्थानके पराजित राजाको दे देते योवर्तमान समयकी भांति अन्यरा: जाओंके देश और धन हरनेको उनकी अभिलाषा नहीं रहती थी। लोगोंके हृदयपर, उनका गौरव और यश जमारहे यही एकमावअभिलापा उनको रहती थी। जिससमय, पोरोपका अधिकांश भाग भएम्य और जंगली था और केवल चीन, अफगानिस्तान, ईरान, मिश्र और रूपादि देशही सभ्य थे, उससमय हिन्दु (आर्य ) जातिका प्रताप इसना रहा हवाया कि इन अपरोक चीनादि देशोंमें भी क्षत्री राजाही राज्य करते थे यहाँके रोग वैदिक धर्मको मानते थे और भारतवर्षके चक्रवर्ती राजाओंका विवाहादि दर्शन २॥ २७ समन्ध इन उपरोक देशोंके राजाओंके साथ इवा करताया। इनदेशोंके लोग भारतवर्ष में माया करते थे और यही काल वहां जाया करते थे, यही कारण था कि भारतवर्ष की विधाएं इनदेशोंमें फैलतीरयोरोप तक पहुंची जहाफि अंकगणित,रेखागणित,ज्यो- सिप, वैधक इत्यादि। योरोपवालोंने अधिक परिश्रम, धैर्य, और साज से इन्हीं वि- पामाद्वारा आमालकी आश्चर्यजनक कलाओं और यंत्रोंको निकालकर संसा रको मोहित कर दिया। यदि कोई यह प्रश्न करे कि जर भारतवर्ष के पूर्वज ऋषि मुनि इन विधाओंको जानतेपे तो उनके समयमें आजकल जैसे यंत्र क्यों न प्रचालित हुए, तो इसका यही उचर है कि प्राचीन ग्रंथों यद्यपि पुष्पक विमानादिका वर्णन है; और अन्य २ भी अनेक बातोंका वर्णन आता है, यथा रावणके घरमें पवन साडू देताया, वरुण देवता जलका प्रबन्ध करताथा, अनिदेवता दीपक जलाताया। इसका अर्थ यही है कि रावणके घरपर आजकल की भाति यंत्रोंस, विद्युत (विजली), और पवन आदिका व्यवहार किया जाताथा|इसी प्रकार अनिमुखवाण और ब्रह्मानसे प्रयोजन स्फोटक अर्थात् (भकस उडनेवालेोपदापोंसे था। शोका अब हमारे धनुर्वेदके लुप्त होनेसे हम अपनी प्राचीन अल, शस वियाको भूल गये। बात यह है कि आजालकी भाति उन्होंने कलों और यंत्रोंको रातदिन धनोपार्जनका साधन नहीं बना रक्खाया।उसमयके लोग इसभांति धन के दाम नहीं प्राचीनसमय के अधिक मनुष्योंकी प्रवृत्ति कवल इसी धुनमें यी किधर्मोपार्जन करके अनंत और स्थायी सुखको प्राप्त करें। इससमयके अधिकांश लोग केवल धनोपार्जनमें लगे हपहैं। यही कारण है कि नित्य नयेयंत्र और कलाएं निकालीजाती हैं।पुद्धिका धर्म है कि जिधर यह लगाई जाएगी उधरही अधिक खोज करेगी हमको अधिक शोकतो इसवातका है कि उन्हीं नीय ऋषिमुनियोंकी आजकलकी अधिकाश सन्तान इन यंत्रोंको देखकर बडे आश्चर्यमें आजाती है और अपने पूर्वजोंको अलौकिक बुद्धि वाले माननेमें सन्दह कर बैठती है । इससमय नधिकांश हिन्दुओं (मार्यो) की तो यह दशा होरही कि इन यंत्रादिकी बनावटोंकी विधानोंको सय जानना तो दूर रहा इनको समधानेपरभी नहीं समझ सक्ते । ऐसी अधात हानेका कारण यही है कि पहाभारतके समयमें जो विरोधकी अमि भडक उठायी उससे नित्य यहांपर लदाई अगडे रहने लगे और विपाओंका पठन पाठन ए, प्रकारका रुकगया और लोग शनैः२ मूर्ख होतेगये। उसी मूर्खताका परिणाम अब भाग रहे । अब समय आगया है कि हम सब परस्परका र छोरें और इसराज्य के शान्तिमय समयमें अनेक विधाऑको सीखकर पुनः अपनेको योग्य बनाएं और अपने पूर्वज ऋषियोंकी कीर्ति पताकाको पुनःउच्चशिखरपर पहुंचाएं। इति विचारदर्पण दर्शन द्वितीय समाप्तः । तृतीयोऽध्यायः। ॥ अर्जुन उवाच ॥ ज्यायसीचेत्कर्मणस्तेमतावुद्धिर्जनार्दन । तकिकर्मणिघोरेमोनियोजयसिकेशव ॥ दोहा-बुद्धिमलीहैकर्मते, कृष्णकहीतुमजोहि ॥ कर्मभयानकमैकहा, केशवडारतमोहि ॥१॥ अर्जुनने कहा कि हे जनार्दन! जो आप कर्मयोगसे ज्ञानयोगको श्रेष्ठ मानते हो तो आप 'तस्माद्युध्यस्व' 'तस्मादतिष्ठ' ऐसे ऐसे वाक्य कहकर क्यों मुझको घोर कर्ममें प्रवृत्त करतेहो ॥१॥ व्यामिश्रेणैववाक्येनबुद्धिमोहयसीवमे ॥ तदेकं वद निश्चित्ययेनश्रेयोऽहमाप्नुयाम्।। दोहा-वचनसुनेसन्देहको, मोवुद्धिहैभरमाति ॥ निश्चयकरियाकौकहौ, मुक्तिहोइजेहिभांति॥२ हे कृष्णा जो तुमने कभी कुछ और कभी कुछ अनेक प्रकारकी बातें कही हैं, इससे मेरी बुद्धि औरभी बडे संदेह में पड़ गईहै आपकी इन बातोंसे मुझे यह कुछभी ज्ञान नहीं हुआ कि-में क्या करूं? इससे अब एक बात निश्चय होके कहो जिससे मेरा कल्याणहो ॥२॥ लोकेऽस्मिन्द्विविधानिष्ठापुराप्रोक्तामयानघ न. .. 'कर्मयोगेनयोगिनाम - - अध्याय ३१ दोहा-निष्ठाजोरै भाँतिकी, पहिलेकहीबनाय॥ सिद्धनकोज्ञानीभलौ, कर्मनिकर्मवताय॥३॥ यहसुन श्रीकृष्ण वोले- हे अर्जुना मैंने जोप्रथम इस संसारमें तत्व- ज्ञान निष्ठा और कर्मयोगनिष्ठा जो दो प्रकारकी निष्ठा कहीहैं उनमें से सांख्यवालोंको तत्वज्ञान निष्ठा है और योगियोंको कर्मयोगनिष्ठाहै ।। नकर्मणामनारंभान्नैष्कर्यपुरुषोऽश्नुते॥ नचसंन्यसनादेव सिद्धिंसमधिगच्छति ४ दोहा-कर्मविनाकीन्हेपुरुष, ज्ञानहिलहै न कोय।। ज्ञानरहितसंन्यासके, कबहुँ न मुक्तिजुहोय॥४॥ हे अर्जुन ! कर्म किये विना मनुष्य नैष्कर्म्य जो तत्त्वज्ञान है, उसको नहीं पाताहै, क्योंकि केवल संन्यास लेनेहीसे निष्काम कर्म करते चित्तशुद्ध किये बिना सिद्धि प्राप्त नहीं होसकती है॥४॥ नहिकश्चित्क्षणमपिजाततिष्ठत्यकर्मकृत। कार्यतेदवशःकर्मसर्वःप्रकृतिजैर्गुणैः ॥५॥ दोहा-कर्मकरेबिनछिनकहू, रहेनकोऊजंतु ॥ विवशमयेकर्मनिकरे, बांधमायातंतु ॥५॥ किसी अवस्थामें कोई प्राणी कायिक,मानसिक, वा वाचिक, कर्म किये बिना क्षणभरभी नहीं रह सकताहै.क्योंकि प्रकृतिके जोराग, पादिगुण हैं उनके वशीभूत होकर सब प्राणियोंको कर्म करना पडताहै।। ,
७०
भगवद्गीताभाषाटीका.
कर्मेंद्रियाणिसंयम्ययआस्तैमनसास्मरन्
इंद्रियान्विमूढात्मामिथ्याचार सउच्यते
दोहा-कर्मेंद्रियनकोरोकिकै,मनविषयनकोध्यान
कपटीमूरखमेंबडो. तेहिकोदंभीजान ॥६॥
हाथ पांव आदि कर्म करनेवाली इन्द्रियोंको वशीभूत करके
भगवान्के स्मरणके बहानेसे मनमें इन्द्रियविषयोंका ध्यान करता,
रहताहै. वह मूढबुद्धि मिथ्याचारी कहाजाता ॥६॥
यस्त्विद्रियाणिमनसानियम्यारभतेऽर्जुन
कर्मेंद्रियैःकर्मयोगमसक्तःसविशिष्यते ॥
दोहा-रोकैइंद्रिनचित्तसों, कर्मनियमनिरचाई।
फलअभिलाषाकोतजै, तातेंयहअधिकाइ ॥७॥
हे अर्जुन ! जो कोई नेत्र आदि इंद्रियोंको मनसे रोककर अर्थात्
अपने सब कर्मों में अपनेको भगवान्के आधीन जान कर्मइन्द्रियोंसे
कर्मयोगका आरंभ करताहै और फलकी अभिलाषा नहीं करता
वही श्रेष्ठ है ॥७॥
नियतंकुरुकर्मत्वंकर्मज्यायोहकर्मणः॥
शरीरयात्रापिचतेनप्रसिद्ध्येदकर्मणः॥८॥
दोहा-अनकरिबैकर्महिकहै. भलेकर्मकरिमीत ॥
बिनुकीनेतेकर्मके, देह न निवहै रीत ॥८॥
यम्पाय। इससे हे अर्जुन ! तू निश्चय करके कर्म कर, कर्म न करनेसे कर्म करना श्रेष्ठ है और कर्म करना छोड देनेसे तेरे शरीरका निर्वाह होना भी कठिन होजायगा ॥८॥ यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्रलोकोऽयंकर्मबंधनः तदर्थ कर्म कौंतेय मुक्तसंगःसमाचर ॥९॥ दोहा-यज्ञसुकर्मविकर्मते, जंगबंधनतेहोत ॥ तिहिंकाजेकर्मनिकरो, मेटिफलनकेगोत ॥९॥ यज्ञ जो विष्णु भगवान उनके आराधनार्थ जो कर्म हैं, उन्हे छो- डकर जितने इस संसारमें कर्म, वे सब बन्धनरूप हैं. इसलिये हे अर्जुन ! विष्णुमगवानकी आराधनाके निमित्त तू निष्काम होकर कर्म करने में प्रविष्ठ हो॥९॥ सहयज्ञाःप्रजाःसृष्ट्वापुरोवाच प्रजापतिः॥ अनेनप्रसविष्यध्वमेषवोऽस्त्विष्टकामधुक दोहा-यज्ञसहितरचिजगतको, कहीविधाताबात। उदयतुह्मारोयज्ञतें, कामधेनु यह तात ॥१०॥ परमात्माने सृष्टि रचनेके समय यज्ञके साथ प्रजाको रचकर कहा कि, इससे तुह्मारी वृद्धि होगी और यही तुमारे सब मनोरथोंको पूर्ण करेगा॥१०॥ देवान्भावयतानेन ते देवा भावयतु वः॥ परस्परंभावयंतःश्रेयःपरमवाप्स्यथ ॥११ "- ७२ भगवडीताभापाटीका. . दोहा-यज्ञनिकरिदेवनितजो, देवतुझेफलदेड ।।. वृद्धि परस्परयोंकरौ, मनवांछितफललेहु॥११॥ तुम यज्ञादि कर्मसे देवताओंका पूजन कर उनकी वृद्धि करो, तब वे देवताभी वर्षादिसे अन्नादिकी वृद्धि कर तुह्मारी वृद्धि करेंगे. इस तरह आपसमें एक दूसरेकी वृद्धिकरने में तुम सवका बहुत भला होगा॥११ इष्टानभोगान्हिवोदेवादास्यंतेयज्ञभाविताः तैर्दत्तानप्रदायैभ्यो यो भुंक्त स्तेनएवसः॥ दोहा-इष्टभोगकँदेतहै, देवतजैतेमित्त ॥ बिनपूछेतेलेतहैं, तेहैंचोरनचित्त ॥ १२॥ यज्ञोंसे पूजे हुए ये देवता तुमको अभीष्ट भोग देंगे और जो कोई इनके दिये भोगोंको इनहीके निमित्त दिये बिना भोगेंगा वे चोर, १२ यज्ञशिष्टाशिनःसंतोमुच्यतेसर्वकिल्बिपैः। भुंजते तेत्वघंपापायेपचंत्यात्मकारणात्।। दोहा-यज्ञशेषजोखातहैं, पापनडारतधोइ ।। यज्ञविनाजोखातहैं, अघनि रहतहसोई ॥१३॥ हे अर्जुन! जो बलिवैश्वदेवादि पंचयज्ञकरके भोजन करते हैं वे महात्मा गृहस्थियोंके पांच पापोंसे छूट जाते हैं और जो कोई अपने लिये भोजन बनाते हैं और बिना देवताओंके अर्पण किये आपही सालेतेहै वे पापी पापोंको भोगते हैं।॥ १३ ॥ अन्नाद्भवतिभूतानिपर्जन्यादन्नसंभवः ॥ यज्ञाभवतिपर्जन्योयज्ञःकर्मसमुद्भवः १४ अध्याय ३ ७३ दोहा-जीवअन्नतेहोत है, अन्नमेहतेहोय ॥ मेहयज्ञतेंहोतहैं, यज्ञकर्मतेंजोय ।। १४ ॥ हे अर्जुन! संपूर्ण प्राणी अन्नसे होते. अर्थात् जब अन्न पेटमें जा- ताहै तबरसरूप होशुक्र शोणितकी वृद्धि कर प्राणियों कोउत्पन्न करताहै यह अन्न मेहसे होताहै. मेह यज्ञसे होता है और यज्ञ कर्मसे होताहै१४ कर्मब्रह्मोद्भवविद्धिब्रह्माक्षरसमुद्भवम् ।। तस्मात्सर्वगतंब्रह्मानित्यंयज्ञेप्रतिष्ठितम् ।। दोहा-कर्मजुउपजैवेदते, वेदब्रह्मतेमानि ॥ ब्रह्मजुभाषतसबनिमें, ताहियज्ञकरिजानि॥१५ कर्मकी उत्पत्ति धेदसे होती है और वेद अक्षर जो परब्रह्म उससे होताहै, वह ब्रह्म सबमें व्यापक है और यज्ञमें सदैव रहताहै इससे यज्ञादि कर्म अवश्यही कर्तव्यहै ।। १५ ।। एवं प्रवर्तितं चक्रं नानुवर्त्तयतीह यः ।। अघायुरिद्रियारामोमोघंपार्थसजीवति१६ दोहा-वेदवंतयाकर्मको, जे न करतजनकोय ॥ पापी इंद्रीवशमये, जनम रहतहखोय॥१६॥ हे अर्जुना वेदसे कर्म, कर्मसे यज्ञ, यज्ञसे मेह, मेहसे अन्न, अन्नसे प्राणी और प्राणियोंसे फिर कर्मकी प्रवृत्ति इस प्रकार ईश्वरने यह चक्र घुमायाहै इसलिये ईश्वराराधनरूप यज्ञादिके कर्ममें जो प्रवृत्त नहीं होते हैं केवल इन्द्रियों के विषय भोगामें लगेरहते हैं उनका जीवन निष्फलहै
भगवद्गीताभाषाटीका।
यस्त्वात्मरतिरेवस्यादात्मतृप्तश्चमानवः।।
आत्मन्येवचसंतुष्टस्तस्यकार्यन विद्यते ॥
दोहा-आतमसोसंतुष्टजे, आतमसोरतिहोय ।।
तृप्तिजुआतमसारहै, ताहिनकरनोकोय ॥१७॥
हे अर्जुन ! जिसकी आत्माहीसे भीति है, और जिसकी आत्माही
से तृप्तिहै और जो आत्माहीमें संतुष्ठ है. जिसे इन्द्रियविषयोंसे छ
आसक्ति नहीं है ऐसे तत्वज्ञानी पुरुषको किसी कर्मकै करनेकी आ-
वश्यकता नहीं है ।। १७॥
नैवतस्यकृतेनार्थोनाकृतेनेहकश्चन ।।
नचास्यसर्वभूतेषु कश्चिदर्थव्यपाश्रयः१
दोहा-जाहिकरेते पुनिनहीं, विनुकीन्हेंनहिंदोष ॥
ब्रह्मादिकसोकाजनहीं, आत्माहीसामोष।॥१८॥
ऐसे ज्ञानीपुरुषको कर्म करनेसे कुछ पुण्य नहीं है और कर्म न
करनेसे पापभी नहीं हैं। क्योकि ज्ञानी निरहंकार है, इससे उसे कुछ
विधि निषेध नहीं है, और न ज्ञानीको प्राणीमात्रका आश्रय लेने
कीभी कुछ आवश्यकता है ॥ १८॥
तस्मादसक्तः सततं कार्य कर्म समाचर ।।
असक्तो ह्याचरन्कर्म परमानोतिपूरुषः१९
दोहा-फलकामनिकाछॉडिके, कर्मकरोतुमनित्त॥
संगविनाकर्मनिकर, मुक्तिलहतहमित्त ॥ १९॥
बध्याय ३॥
.
इससे हे अर्जत ! कलकी अभिलाषाको छोड जो नित्यनैमित्तिक
कर्म हैं, उन्हें निरंतर कर। जो फलकी अभिलाषा छोड कर्म करते हैं
उन्हे अवश्य मोक्ष मिलती है।संध्यावन्दनादि नित्यकर्म हैं और पुत्रा-
दिके जन्म होनेके निमित्त जो कर्म किये जाते हैं जैसे जात
कर्मआदि, सो नैमित्तिक कर्म हैं ॥१९॥
कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिताजनकादयः
लोकसंग्रहमेवापि संपश्यन् कर्तुमर्हसि ॥
दोहा-लहीसिद्धिजनकादिहूं, कीन्हेकर्मसमाज ॥
तुमैंदेखिऔरउकरे,याते करोसुकाज ॥ २० ॥
जनकादिक जो ज्ञानी होगये हैं उनकोभी कर्म करनेहीसे सिद्धि
मिलीथी. इससे जो तू अपने को बडा ज्ञानी समझता है तोभी लोक
संग्रहके लिये तुझको कर्म करना उचित है । अर्थात् जो ज्ञानी कर्म
छोड देंगे तो उनकी देखा देखी अज्ञानीभी कर्मको त्याग बैठेंगे २०
यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरोजनः।।
स यत्त्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते २१
दोहा-बडेजु आचारहिकरें, सोईमानतआन ॥
ताही मगसबजनचलें, बडेकरैजुप्रमान॥२१॥
हे अर्जुन ! बडे आदमी जोजो कर्म करते हैं उन्ही कर्मोंको साधा-
रण मनुष्य किया करते हैं और जिन बातोंको वे प्रमाण मान-
हैं लोगभी उसीके अनुगामी हो जाते हैं ॥२१॥
७६ भयवद्गीताभाषाटीका. नि मे पार्थास्ति कर्तव्यं त्रिषु लोकेषु किंचन नानवाप्तमवाप्तव्यं वर्त एव च कर्मणि ।। दोहा-मोकोंकछुकरनोनहीं, तिहूंलोकमेंकाज ॥ कछुनलह्योलहिबेनकछु,कर्मकरतयासाज ॥२२ हे पार्थ! तू मुझको देखले,तीनों लोकमें मुझे कुछ करना नहीं है न कोई बस्तु मुझे अलभ्य है, न किसी वस्तुके प्राप्त करनेकी अभिला- षा है तथापि कर्म कियाही करता हूं ॥ २२ ॥ यदि ह्यहं न वर्तेयं जातु कर्मण्यतंद्रितः ॥ मम वानुवर्तते मनुष्याः पार्थ सर्वशः।। दोहा-जोहूँकर्मनिनहिंकरौं रहुँआलसहितमीत ॥ सोहीसबनरहूरहैं, मेरेमनयहरीत ॥२३॥ हे पार्थ! जो मेंही, आलस्य छोड सावधान हो कर्म करने में प्रवृत्त- न होऊं तो ये मनुष्य सब प्रकारसे मेरेही अनुगामी होंगे, अर्थात् कर्म करना छोड़ देंगें ॥ २३॥ उत्सीदेयुरिमे लोकान कुर्या कर्मचेदहम् संकरस्य च कर्ता स्यामुपहन्यामिमाःप्रजाः॥ दोहा-जोहाँकर्मनिनहिंकरों, होइसवनकोनास ॥ प्रगटाऊंसंकरतवै, हनोंप्रजायत्रास ॥२४॥ .
अध्याय" TRE हे अर्जुन ! जो मैं कमकरना छोड़ दूं तो कर्मके लोप होजानेसे धर्म नष्ट हो जायगा. जिससे ये सब लोक नष्ट हो जायंगे और सृष्टि वर्णसंकर होने लगेगी, तो यह संकरकर्ता मैंही ठहरूंगा और इस प्र. जाको नष्ट करनेवालाभी मेंहीं होऊंगा ॥२४॥ सक्ताःकर्मण्यविद्वांसो यथा कुर्वति भारत कर्याद्विद्वांस्तथासक्तश्चिकीर्षलोकसंग्रहम दोहा-मूरखजोकर्मनिकरै, करवहुप्राप्तिसुभाइ ॥ लोककाजज्ञानीकरै, ममतासोंनलगाइ ॥२५॥ हे भारत ! जैसे अज्ञानी लोग काम करनेमें आसक्त होकर कर्म करते हैं. वैसेही लोकसंग्रहके निमित्त अर्थात् सबको शिक्षा देनेके लिये विद्वान् लोग कर्ममें आतक्त न होकर कर्म करते हैं ॥२५॥ न बुद्धिभेदं जनयेदज्ञानां कर्मसंगिनाम् ॥ जोषयेत्सर्वकर्माणि विद्वान्युक्तः समाचरन्। दोहा-तिनबुद्धिभेदनतजै, रहैकर्मलपटाइ॥ सावधानज्ञानीरहै, पोपेतेईदाइ ॥ २६ ॥ हे अर्जुन ! जो अज्ञानी हैं और कर्म करने में आसक्त हैं उनको कर्म न करनेका उपदेश देकर उनकी बुद्धिमें भेद उत्पन्न न करै. विद्धान लोगोंको उचित है कि,आपभी सावधान होकर उनसे कर्म करावै२६ प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः अहंकारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते।
७t
भगरीताभानाटीका.
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दोहा-मायाकेगुणरहितहैं, सबैकर्मयहजानि॥
अहंकारकरिमूढजे, लेतअपनौमानि ॥२७॥
हे अर्जुन ! प्रकृति के गुणोंसे ये संपूर्ण कार्य हो रहे हैं, परन्तु
अहंकारसे विमूढ होगई है बुद्धि जिनकी सो अपनेको इन सब
बातोंका करनेवाला मानते हैं ॥२७॥
तत्त्ववित्तु महाबाहो गुणकर्मविभागयोः।
गुणा गुणेषु वर्तत इति मत्वा न सज्जते ।
दोहा-गुणअरुकर्मविभागको,जानततत्वजोकोय
इंद्रीविषयनसोंलगी, आपमगननहिहोय॥२८
और हे महाबाहो ! जो गुण और कर्मके विभागोंके तत्त्वको
जानते हैं वे यही मानते हैं कि, सत्त्वादिक गुण अपने २ कार्योमें
वर्तमानहैं. इससे उनमें आसक्त नहीं होते हैं ॥२८॥
प्रकृतेर्गुणसंमूढाः सन्जन्ते गुणकर्मम् ॥
तानकृत्लविदो मंदान् कृत्स्नविन्नविचालयते
दोहा-मायागुणकरिमूढजे, रविषयलवलाय।
तेहिमगतेजानैतिन्हैं, देइनकहूंचलाय ॥ २९॥
प्रकृति जो माया उसके सत, रज, तम गुणों में जो मनुष्य अत्यन्त
मोहित होरहे हैं वेही उसके गुणकर्ममें आसक्त होतेहैं उन अल्पज्ञ
मन्द पुरुषोंको ज्ञानी मनुष्य कर्ममार्गस न इटावै. इसका यह अ-
भिप्राय है कि तू अल्पज्ञ है अतः कर्मकर ॥२९॥
अध्याय मयि सर्वाणि कर्माणि संन्यस्थाध्यात्मचेतसा निराशीनिर्ममो भूत्वा युद्धयस्व विगतज्वरः दोहा-चितअध्यातमआनिकै,कर्मनसौंलौराखि। व्हैअकामममतातजौ,युद्धहिकौंअभिलााख ॥ हे अर्जुन ! क्षत्रियोंका जो शुरबीरपनेका स्वभाव है, उस स्वभावसे आत्मामें मन लगाव संपूर्ण काँको मुझमें आरोपण कर फलकी आशा और ममताको छोड सब संतापोसे रहितहो युद्ध करो ॥३०॥ ये मे मतमिदं नित्यमनुतिष्ठंति मानवाः॥ श्रद्धावंतोऽनसूयंतोमुच्यतेतेऽपिकर्मभिः३१) दोहा-जे नित या मरमतहि, श्रद्धासों गहिलेत ॥ जिनकेजियनिहकर्महै करैकर्मनहिंचेत ।। ३१ हे अर्जुन जो मनुष्य श्रद्धालु होय, और मेरे वाक्यकी निन्दा न करके इस मेरे मतको नित्य स्वीकार करतेहैं अथात् कर्म करने में प्रवृत्त होजातेहैं वेभी इन कर्म बंधनोंसे छूट जाते हैं ।। ३१ ।। येत्वेतदभ्यसूयंतोनानुतिष्ठंतिमे मतम् ॥ सर्वज्ञानविमूढांस्तान्विद्धिनष्टानचेतसः ॥३२॥ दोहा-जोयामेरेमतहिको, करतसदोषलगाय॥ तेमूरखजानतनहीं हैं अचेतकेभाय ।। ३२॥
८० "भगवद्गीताभाषाटीका. हे अर्जुन ! जो मेरे इस मतको अंगीकार नहीं करतेहैं और उसकी निन्दा करते हैं उनको किसी प्रकारका ज्ञान नहीं हैं और उनको विचारहीन तथा नष्ट समझो॥३२॥ सदृशं चेष्टते स्वस्याः प्रकृतेर्ज्ञानवानपि ॥ प्रकृतिं यांतिभूतानि निग्रहः किं करिष्यति ३३ दोहा-ज्ञानवंतजूकरतहैं,अपनीप्रकृतिसमान ॥ सबकाऊनिजप्रकृतिवश,एकैतेजुअज्ञान ॥ ३३ ज्ञानवान् मनुष्यभी अपने स्वभावहीके अनुसार काम करते हैं, फिर जो अज्ञानी अपनी प्रकृति के अनुसार चेष्टा करै तौ कहनाही क्या है, संपूर्ण प्राणी अपनी प्रकृतिके अनुसार काम करतेहैं क्योंकि प्रकृति ब- लवान है इसमें इन्द्रियोंका निग्रह कुछ नहीं कर सकताहै ।। ३३ ।। इंद्रियस्येंद्रियस्यार्थरागद्वेषौव्यवस्थितौ तयोर्नवशमागच्छेत्तौह्यस्यपरिपंथिनौ ॥ दोहा-सबइंद्रिनकेविपयमें रागद्वेषजोहोइ॥ तिनकेवशनरजाइनहिं रहैजुअरिसमहोइ॥ ३४ हे अर्जुन ! प्रत्येक इन्द्रियका अपने अपने विषयमें राग द्वेष है, इस राग द्वेषके वशीभूत होना उचित नहीं है, क्योंकि ये दोनों मो- क्षमें विघ्न करनेवाले हैं.॥३४॥ श्रेयान्स्वधमाविगुणःपरधर्मात्स्वनुष्ठितात स्वधर्मेनिधनंश्रेयःपरधर्मोभयावहः॥ ३५ अध्याय ३1 - . दोहां-उनहोयनिजधरमहू,परतें अधिकौमानि मीचंभली निजधर्ममें,परधर्महिमयजानि३५ हे अर्जुन! अच्छीतरह किये हुएभी परधर्मसे अपना धर्म अंगहीन अर्थात् गुणरहित होनेपरभी श्रेष्ठ है, अपने धर्म तौमरनाभी श्रेष्ठ है और परधर्म भयानक है अर्थात् तेरा जो युद्धरूप क्षत्रियधर्म है इसमें मरनेपरभी स्वर्ग मिलेगा और इसको छोड देनेसे नरक होगा॥३५॥ समीक्षा-यहां इस श्लोकके तीन अर्थ हैं. प्रथम तो यह कि शरीर मरण धर्मी है, आत्मा मरण धर्मी नहीं है, आत्मा तो केवल नवीन और जीर्णवोंकी भांति नवनि और जीर्ण शरीराका ग्रहण और त्याग करता है. अतः जो तू (अर्जुन ) यह समझता है कि इससमय यह जो मैं हूं और यह जो मेरे सम्बन्धी हैं,यदि हम युद्ध में मरखप जायेंगे (अर्थात् वर्तमान शरीरोंको त्याग देंगे) तो हम सदाके लियेही नष्ट होजायेंगे, यह तेरा समझना अज्ञान मात्रही है, क्योंकि नित्य (आत्मा) को अनित्य (शरीर) मानना मूढता नहीं तो क्या है ! अतः यह सिद्ध हुवा कि स्वधर्मको अर्थात् आत्माके नित्यतारूपी धर्मको छोड दूसरेका धर्म अर्थात शरीर के अनित्यता- रूपी धर्मको धारणकरना भयकारी है अर्थात् ऐसा माननेसे बहुत हानि है। अथवा इसी अर्थको इस प्रकार समझना चाहिये कि जी- वात्मा शुद्धस्वरूप है अज्ञानसे इंद्रियोंके धर्मोको अपने धर्म समझ बैठा है. इसलिये इस जीवात्माको अपने शुद्धस्वरूपमें स्थिर होनेकी चेष्टा करनी चाहिये अर्थात् आत्माको तोनिर्मल ब्रह्मज्ञानसेही आनंद प्राप्त होसक्ता- है, इंद्रियों के विषयोंमें फंसनेसे न तो बहुत हानि उठानी होगी. दूसरा अर्थ यह है कि अर्जुनने क्षत्रियधर्मके पालने की गुस्कुलमेंही जब गुरूके सामने प्रतिज्ञा कीथी तो इसको अबभी , भगवद्गीताभापाटीका. युद्धादि क्षात्रधर्मका ही पालन करना चाहिये. यदि ऐसा नहीं वरनाथा तो वहां बिना विचारे प्रतिज्ञा क्यों की, प्राचीन कालमें यही नियम था कि गुरूके सामने अपना२ वर्ण स्वीकार करना होताथा. तीसरा अर्थ यह है कि युद्ध भूमिमें आनेसे पूर्वही अर्जुनने दुर्योधनादिके साथ लडनेकी प्रतिज्ञाकीथी और इस समय युद्धसे हटना चाहता है तो इसमेंभी प्रतिज्ञाका भंग होता है, और यहभी बातथी कि श्रीकृष्ण महाराजका अभीष्ट दुष्टों को नष्ट करके लोक मर्यादा स्थापित करना था, जो इस समय अर्जुनको युद्धसे हटनेकी अनुमति देते तो लोकमें धर्ममर्यादा स्थापित नहीं हो सक्तीथी, अतः उन्होने वीरताके साथ युद्ध क्षेत्रमें रहकर फलाफल- का विचार न देखते हुए लडनेकाही उपदेश अर्जनको दिया. ॥अर्जुन उवाच॥ अथकेनप्रयुक्तोऽयंपापंचरतिपूरुषः॥ अनिच्छन्नपिवाष्र्णेयबलादिवनियोजितः दोहा-जाकेइच्छानाहि., कर्मदेतसंताप ॥ कहिये प्रेरैकौनके, पुरुषकरतहैंपाप ॥३६॥ हे वृष्णिवंशी कृष्ण ! पापकर्म करनेकी इच्छा किसीकी नहीं हो. तोहै.फिरभी ऐसे,जैसे कोई बलपूर्वक कराता है.वह मनुष्य पांप करने में प्रवृत्त होजाता है. इसलिये इस पापकर्ममें प्रवृत्ति करानेवाला कोई न कोई अवश्य है. सोहे कृष्ण ! वह कौन है ? ॥३६॥ ॥श्रीभगवानुवाच॥ कामएषक्रोधएषरजोगुणसमुद्भवः॥ महाशनोमहापाप्माविद्ध्यन मिहवैरिणम् सन्याय दोहा-यहजुकामअरुकोधहै, रजगुणहीतेहोइ ।। क्योंहूंपूरणहोइनहि,पापीकेअरिजोइ ॥ ३७॥ हे अर्जुन ! यह काम अर्थात कामनाही है.जो किसी प्रकारसे फल- वती न होनेपर क्रोधमे परिणत होजाती है, इस क्रोधकी उत्पत्ति रजोगुणसे है, यह काम बडा खानेवाला है, अर्थात अनेक प्रकारके भोगोंको भोगता हुआभी नहीं अधाता है और यह क्रोध बहा पापी है, इसे मनुष्योंका परम शट समझो॥३७॥ धूमेनानियतेवह्निर्यथाऽऽदर्शोमलेनच ॥ यथोल्वेनावृतोगर्भस्तथा तेनेदमावृतम् ॥ दोहा-आगिढपैज्योंधूम,दर्पनमलकेभाइ ॥ गर्भजरासोज्योंढपै, जगैन ताही दाइ ॥३८॥ जैसे अग्नि धुयें से ढका रहता है, दर्पण मलसे आच्छादित होता है और गर्भ जरासे आवृत रहता है.वैसेही यह ज्ञानभी कामनासे ढका- हुआ रहता है॥३८॥ आवृतं ज्ञानमेतेनज्ञानिनोनित्यवैरिणा ॥ कामरूपेणकौंतेयदुष्प्ररेणानलेनच ॥३९ दोहा-ज्ञानीहूकेज्ञानइन, वैरीराख्योढाँपि ॥ कामदुसहयहअग्नि है, सकैनकोऊदापि ॥३९॥ हे कुंतीपुत्र ! यह मनुष्यका सदा बैरी है, भोगोंका भोगतेहुएभी कभी नहीं अघाता है और जैसे अग्नि ईंधन मिलनेसे बढता है वैसेही ज्यों ज्यों इसेभोग्य वस्तु मिलती है वैसेही वैसे बढताहै और भोग्य
४
'भगवद्गीताभाषाटीका.
पदार्थोके न मिलनेपर अग्निकी तरह जलाता है. ऐसे इस कामने
ज्ञानियों का ज्ञानभी ढक रक्खा है ।। ३९ ।।
इंद्रियाणि मनो बुद्धिरस्याधिष्ठानमुच्यते।
एतैर्विमोहयत्येषज्ञानमावृत्त्यदेहिनम् ॥
दोहा-इंद्रीमनअरुबुद्धिहै, येईजाकौथान ॥
इन करिकैसोनसतुहै, ज्ञानीहकोज्ञान॥४०॥
हे अर्जुन ! संपूर्ण इन्द्रियां, मन और बुद्धि ये कामके उत्पत्तिस्था-
न और रहने की जगह हैं यह काम इन्हीके द्वारा ज्ञानको ढककर
आत्माको मोह उत्पन्न करता है॥४०॥
तस्मात्त्वमिंद्रियाण्यादौनियम्यभरतर्षभ
पाप्मानंप्रजहिह्येनं ज्ञानविज्ञाननाशनम्
दोहा-अर्जुनतातेप्रथमही, तूं इंद्रिनको रोकि।
हरतज्ञानविज्ञानको, पापमूल लखिठोकि ॥४१
हे भरतकुलभूषण ! ऊपर कहेहुए हेतुओंसे तू प्रथम इन्द्रियगण,
मन और बुद्धिको रोककर इस कामको वश करले क्योंकि यह बडा
पापात्मा है और आत्मज्ञान तथा शाखज्ञान दोनोंको नष्ट कर देता है
इंद्रियाणिपराण्याहुरिंद्रियेभ्यःपरमनः ।।
मनसस्तुपरा बुद्धिर्यो बुद्धेः परतस्तुसः४२
दोहा-इन्द्रियहसवतेपरे, तिनतेपरमनजोय ॥
मनतेपरेजुबुद्धिहै, तातेंआतमहोय ॥४२॥
अध्याय ३१.' बाह्य जो स्थूल पदार्थ हैं, उनसे इन्द्रिय पर और श्रेष्ठ हैं. इन्द्रियों से मन श्रेष्ठ है. मनसे बुद्धि श्रेष्ठ है और जो बुद्धिसे परे है वही आत्मा सर्व श्रेष्ठ है इसी आत्माको यह दुष्ट काम मोहित करता है ॥४२॥ एवंबुद्धेःपरं बुद्ध्वा संस्तभ्यात्मानमात्माना जहि शत्रु महाबाहो कामरूपंदुरासदम् ॥ दोहा-आतमलखियेबुद्धिपर, मनकोकरिवशमाह कामरूपअरिदुसहको, मारिडारिनरनाह ॥४३ कह्योतीसरेध्यायमें, कर्मयोगयदुनाथ ॥ पूजैयाकोभक्तिसों, हरितारैदेहाथ ॥१॥ कीनोआनंदरामयह, कर्मयोगबहुभाय ।। कृष्णकृपाकरिहरिये, रहियेसदासहाय ॥२॥ हे महाबाहो अर्जुन ! इस तरह बुद्धिसे परे आत्माको जानकर और मनको निश्चलरूपते वशमें लाकर इस महाअजेय कामरूप शचका दमन कर ॥४३ ॥ -इतिश्रीभवगद्गीतासूपनिषत्सब्रह्मविद्यायांयोगशास्त्रे श्रीकृष्णा- ऽर्जुन संवादेविचारदर्पणदोहासहितभाषायीकायोकर्म- योगो नाम तृतीयोऽध्यायः ॥३॥ समीक्षा-इस अध्यायमें श्रीकृष्ण महाराजने अर्जुनको यह उपदेश दिया है कि जो मनुष्य परोपकारादि कार्यों में कुछ भागनलेकर केवल अपने भरण पोषणमें लगे रहतेहैं.उनका जीना व्यर्थही है, अतः हम सबको चाहिये कि यथा संभव और यथाशक्ति “ यज्ञ” अर्थात् परोपकारादि कामोमें लगे रहें.
८६
भगवद्गीताभाषाटीका।
'यज्ञ' शब्द यज धातुसे बनता है. जिसका अर्थ यह है देवपूजा,
संगति करण और दान,
१-देव शब्द कई अर्थोंमें प्रयुक्त होताहै परंतु इस अध्यायमें मुख्य
दोही अर्थ है अर्थात् (क) विद्वानोंका संग करना 'देवपूजा' है
(ख) अग्निमें सुगंधित और आरोग्यकारक पदार्थोका हवन
करना 'देवपूजा' है।
विद्वानोंके संगसे ज्ञान विज्ञान की प्राप्ति होती है और अग्निमें हवन
करनेसे वायुके रोगकारक जंतुओंका नाश होकर, अथवा रोग
कारक सूक्ष्म पदार्थोंका परिवर्तन होकर हम लोगोंकी आरोग्यता
बढती है और वही अग्निमें दी हुई आहुतियां सूर्य किरणों
द्वारा आकाशमें जाकर उत्तम वर्षाकी हेतु होती हैं अर्थात् यथा-
समयपर वर्षा होने लगती है और अतिवृष्टि और अनावृष्टि
न होकर देश अकाल पीडित नहीं होने पाता है।
मेघ वर्षाने वाली परमात्माकी शक्तिका नाम इंद्रदेव है. हवन
करनेसे वह शक्ति विशेष उत्तम वर्षा देती है यह"इंद्रदेव "का प्रसन्न
होनाहै. अतः अग्नि, सूर्य, वायु आदि पदार्थीको यथावत जान
ना और उनसे कामलेना तथा विद्वानोंका संग करना “देव
पूजा 'हुवा।
२-संगति करण-प्रमाणों द्वारा अपने संशय और भ्रमको
दूर करना “संगति करण" है अथवा संसारमें न्यायसत्ताकी
व्यवस्था स्थापित करना संगति करण है.
३-देश हितकारी कामोंमें तन, मन, धनसे सहायक बनना
"दान" का अर्थ है.
“ यज्ञोवै विष्णुः ब्राह्मण ग्रंथों में लिखागया है, अर्थात
परमेश्वरका नामभी यज्ञ है, अतः
.
अध्याय ३॥ परमात्माकी इच्छा पर सब, काँका फल छोड निष्काम होकर कर्म करनाभी यज्ञ” कहलाता अध्याय ३ के दश, ग्यारह, बारह, तेरह श्लोकों में इसी आश- यको लेकर “यज्ञ कर्म" की महिमा बताई गई है अर्थात् तात्पर्य यह है कि अपने नित्यके भोजनमेसेभी कुछ भाग परोपकारार्थ निकाल देना चाहिये नहीं तो नित्य भोजन बनानेमें पांच पाप ही होतेहैं. यथा (१) चूल्हामें अग्नि जलाना (२) झाडू देना- [३] चाकी [४] ऊखल मूसलको काममें लाना और [५] वर्तनों में पानी रखना. इनसे छोटे २ जीव जंतुओंकी हिंसा होतीहै यही पंच पाप हैं. जब इन क्षुद्र पापोंके बंधनसे छुटकारा नहीं होसक्ता है तो बडे - पापोंकी वार्ताही क्या है. हम लोगोंको चाहिये कि सदा परोप- कारादि उत्तम पुण्य कार्योंको करते रहें, यही मेरणा सृष्टिके आदिमें परमात्माकी ओरसे वेदोंके रूपमें महर्षियोंके अंतःकरणमें हुईथी (देखो अ०३ श्लो० १०) अथ विचारर्दपण तृतीय दर्शन प्रारम्भः प्रचीन और वर्तमान समय के हिन्दुओं (आर्यों) में भेद [ हमने जो प्राचीन समय और वर्तमान समयका नीचे भेद दिखाया है उससे हमारा यह अभिप्राय नहीं है कि वर्तमान समय के सभी स्त्री पुरुप अच्छे नहीं हैं।परंतु प्रयो- जन यह है कि वर्तमान समयमें अधिक लोग प्राचीन समयके मनुष्योंकी अपेक्षा उचम गुणोंमें इस समर गिरे हुए दिखाई देते हैं । इसलिये इस भेद को देखकर हम, लोग अपनी २ दशाको सुधारें और हमारी भारत माताके मुखको उज्वल करें, हमको यही अभीष्ट है] हम नीचे यह दिखाना चाहते हैं कि पूर्व कालके हिन्दुओं (आर्यो) की शारीरिक, आस्मिक और सामाजिक दशा कैसी थी और आजकल हमारी दशा क्या होरही है।
विचार दर्पण. (१) प्राचीन समय-धामण लोग समस्त भूमंडरमें भ्रमण करनेवाले और योग, ज्योतिष द्वारा अखिल ब्रह्मांडका वृतांत जाननेवाले होते थे। वेद, वेदांगपारग होनेके कारण लोगोंको धर्म, अर्थ दोनोंके उपार्जन करनेकी विपि बता सकनेसे महाराज" कहलानेके योग्य थे। वर्तमान समय-अधिकांश ब्राह्मण लोग ऐसे कृपपडूक धनगये हैं कि लोक लोकांतरोंका वृचात जानना तो दूर रहा भारतवर्ष के मिन्न २ प्रांतोंकाही पूरा ज्ञान नहीं रखते। दूसरोंको अर्थोपार्जन की विधि बताना तो दूर रहा स्वयं) मांगने और सेवादृचि करने के अतिरिक कोई वृचिका साधन नहीं जानते जिसका फल यह हुवा कि “ भिक्षुक" और "महादास" कहलाने के योग्य विन गये हैं। (२) प्राचीन समय- क्षत्री लोग विद्वान, जितेन्द्रिय, न्यायकारी रक्षक और मजा पालक होते थे। वर्तमान ममय- अधिकांश क्षत्री अपठित विषयप्रेमी, स्वयं दीन और येन फेन प्रकारेण पर द्रव्य हरने की इच्छा वाले होने हैं। प्रायः अपना और अपने मुटुंबका भरण पोषण करनेमें भी असमर्थ दिखाई देते हैं। (३)प्राचीन समय वैश्य विद्वान, जितेन्ट्रिप, समुद्रयात्रा करके देशदे- शांतरों में व्यापार करने वाले, प्रायःसत्यवादी और सात्विक दान करने वाले थे, और इतने धनाइप होते थे कि जिनके पास हाथियों की अगणित संख्या रहती थी, जैसा कि नलदमयंती के उपाख्यानमें एक वैश्य के हाधियोंके गुपका वर्णन है। आबू पर्वतपर एक जैनी वैश्य का बनाया हुवा मंदिर है, जिसपर दश करोड रुपयोंसे अधिक लागत आई थी। वर्तमान समय-अधिकांश वैश्य ऐसे देखने में आते हैं जोदेवनागरीका लिखना पटना, भी नहीं जानते । यज्ञोपवीत संस्कारसे रहित, भीक, समुद्रयात्राकै नामसे डरने) वाले, नामके लिये कुपात्रों को दान देनेवाले, कामी, प्रतिज्ञा भंग करनेवाले, देशाभिमान शून्य, व्यापार विज्ञान न जाननेके कारण देशी दरिद्रताको बढाने) पाले परापीन व्यापार करते दीख पड़ते हैं। (४) प्राचीन समय-जो पुरुष मलीनता, पूसता और दरिद्रता लिये रहताया उसीको शुद्ध कहते थे। शूद शद की व्युत्पचिही स्पष्ट बतारही है कि शुद्धिको त्यागने वाला -- दसत ४॥ अर्थात्. मलीनता को धारणकरनेवालाही शूद्र कहलाता है यया- शूचं द्रवतीति शूदः।... (अर्थ)-शुद्धि अर्थात् स्वच्छता को जो त्यागता है वह शूद्र है । जन्मसे शूद्र होतेहुवेभी जो लोग विद्वान और धर्मात्मा बन जातेथे, उनका पूर्ण आदर और सन्मान भी होताथा. यथा विदुरमहाराज और वाल्मीकि मुनिका वर्णन हुवा; कितनेही मनुष्य कहतेहैं कि पुराणोंमें शूद्रोंकी उत्पचिश्रीविष्णु भगवानके, चरणोंसे लिखी है इसलिये वह इतर तीन वर्णोसे नीच माने जाने चाहिये और विहान धार्मिक होनेपरभी ब्राह्मणोंके सदृश पूजापानेके योग्य नहीं हैं। परन्तु उन्होंने इस बातपर कभी भी ध्यान नहीं दिया कि श्रीगंगाजीकी उत्पचि भी श्रीविष्णु भगवान के चरणोंसे मानी गई है।श्रीगंगाजी की कितनीवडी महिमा हिन्दुओं(आर्यो) के हृदयमें है? यहांतक कि श्रीगंगाजीके जल में नान करने से ब्राह्मण लोग अपना अहोभाग्य मानते हैं । इसीलिये प्राचीनकाल के शूद्र, शूद्रमाता पिताकी सन्तान होने परभी अपनी मलीनता, मूर्खता, और दरिद्रता का नाशकरतेहुए विहान धर्मात्मा और पूजनीय होनेकी चेष्टा करते थे, और अपनी सफलता का फल भोगसके थे। वर्तमान समय- शूद्र लोग अपनी जाति को नीची मानकर निरुत्साही और आलसी बनरहे हैं। उत्तमजनों द्वारा उपदेश मिलने परभी अपने शूद्रभावको न छोडने की इच्छापाले देखने में आरहे हैं। अपनी मलीनता और दरिद्रता और मूर्खता में ही संतुष्ट बन रहे हैं । धर्मसे सर्वथा अनभिज्ञ हैं। अज्ञानी होने के कारण भूत प्रेतादिको पूजते हैं। आर्य धर्मके गौरवसे शून्य दिखाई देरहे हैं, जिससे हिन्दू (आर्य) जाति सब प्रकार से बडी निर्वल होगई है । क्योंकि अधिकांश मनुप्य दरिद्रता, मलीनता और मूर्खताकं कारण शूद्रों और अतिशुद्रों की पंक्ति में होगये हैं। जबतक यह भाग नीचभावको त्यागकर अपनी योग्यता न बढालेगा तबतक यह हिन्दूसमाज पादापि सुखी नहीं बन सका। (५)प्राचीन समय-ब्रह्मचारी अर्थात् बिधार्षीजन चल युद्धि बढानेवाले साधन ब्रह्मचर्य को अधिक मानकी दृष्टि से देखते हुए बीस पचीस वर्ष की अवस्था पर्यंत पूर्णरूप से वीर्यरक्षा करके वलिष्ठ, दृढांग और नेत्रों की ज्योति पारण करने वाले और विहान होतेथे। वर्चमानसमय में विद्यार्थी प्रायःऐसेदेखने मेंआरहेहैं कि दशबारह वर्षकीअवस्थाविवाह होनेसे वह गृहस्थी बन जाते हैं। जिससे अल्पायु रोगी, निर्बल, और वेव हाकटरकी इच्छा रखनेवाले शोकातुर,आलसी, निरुत्साही और आंखोंकी ज्योति खो बैठनेवाले चश्माधारी दिखाई देरहे हैं. शोक! भारतर्वषकी उन्नतिकी जड इसीलिये निर्वल और होली होगई है। , ।
. ~ विचार दर्पण. (६)प्राचीन समय-गृहस्थजन माता पिता की सेवा करने वाले, विहान जितेन्द्रिय,धर्मात्मा,सन्तानोत्पचि के निमित्त ऋतु समय मेंही भपनी स्त्री से प्रसंग कना रने वाले यथाशक्ति उत्तम कार्यों में द्रव्य रगाने वाले, ईश्वरभक, विद्याप्रेमी और अपनी सन्तानोंको बालकपनसे विद्वान, धर्मात्मा और बलिष्ठ बनाकर वही अवस्था में उनका विवाह करनेवाले, कुरीतियों के शत्रु और शूर वीर होते ये । चतुर्धअव. स्था में घरका मोह डोडकर एकांत वास करके ईश्वरका भजन करने वाले होते थे उस समय के मनुष्य सो पीछे नब्बे पठित और विद्वान होते ये धन धान्यसे इतने समृद्ध थे, कि मूर्स और निर्धनता का कोई नाम नहीं जानता था। वर्तमान समय- अधिकांश गृहस्थ लोग जीवित माता पिताको दुःख देने, वाले, उनके मरने पर अपनी नाम बढाई के लिये उनके नाम पर पात्रों और मुखौको भोजन खिलाकर निरर्थक रुपये का व्यय करने वाले, देशसेवा और जाति सेवासे दूर भागने वाले, विद्या और उन्नति के कामों से पीछे हटनेवाले, अपने बालकों को विहान और धर्मात्मा न बनाकर छोटी अवस्था में ही उनका विवाह करके उनको मूर्स, निर्वल, और भीरु बनाने वाले, मरणांत समय तक अन्याय से द्रव्योपार्जन करते हुए सदा सांसारिक पदार्थों लिपटनेवाले दीसपडतेहैं। प्रतिसैकडापीछे तिरानबे अपठित हैं । देखो मनुष्य गणना रिपोर्ट सम्बत् १९६७।। भारतवर्ष भिन्न जापान, इंग्लेन्ड (बिलायत) आदि देशोंकी अत्यन्त विपरीत दशा अर्थात् सो पीछे पंचानवें मनुष्य पठित हैं, और उनकी वार्षिक आय प्रत्येक मनुष्य पीछे हम लोगोंकी प्रत्येक मनुष्य की माजीविका से बीस गुनी अधिक है। हमारी दशापर शोक ! शोक !! शोक !!! (७) प्राचीन समय वानप्रस्थी और संन्यासी लोग स्थान २ पर जाकर गृहस्योंको सदुपदेश देने वाले होते थे. और स्वयं अध्यात्म विया की खोजमें लगे हिए जितेन्द्रिय और ईश्वरभक पाये जाते थे। वर्तमान समय- अधिकांशवानप्रस्थी और संन्यासी मूर्स, गजेदी, भंगेडी फ्रोपी और अनेक प्रकारसे गृहस्योंको दुःखदायी देखने में आरहेहैं । अनेक प्रकारसे कपटके स्वांग रचकर देश को भार रूप होते हुए इन आश्रमों को लजा रहे हैं। स्मरण रखना चाहिये कि इन बावन लाख भिखमंगे नामधारी साधुओं के पालन पोषणकरने में हिन्दु (आर्य ) जातिको बीस क्रोह रुपया वर्ष भरमें निरर्थक नी करना पड़ता है जिससे देशी दरिद्रता दढ रही है। इसीसे राजा प्रजा दोनों को चाहिये कि इनमें पात्र कुपात्र देखकर इनके साप वर्ताव करें, जिससे मूखोंकी वृद्धि न हो। , दर्शन । (८)प्राचीन समय में स्त्रियां विदुषी, पंण्डिता, पतिव्रताऔर गृहकार्य में चतुरा, पति और सास ससुस्की आज्ञामें चलने वाली,कलह से दूरभागने वाली, और अपनी सन्तान को विद्वान, धर्मात्मा, और जितेन्द्रिय, शूरबीर, और बलवान बनाने वाली, उचम संगीत द्वारा अपने बच्चोंको नीति और धर्म के सद्धपदेश देकर उनको प्रसन्न करने वाली साक्षात् सरस्वती रूप होती थी और गृहस्थ आश्रम की शोभा बढाती थीं। वर्तमान समय-अधिकांश खियमूर्खा, कलहकारिणी,सास ससुर और पतिकी आज्ञा न मानने वाली,व्यर्थ रुपयेको नष्ट करके पतिको दरिद्र बनाने वाली,आभूषण और कपडोंसे कदापि तृप्त न होनेवाली, पीर पैगम्बर, प्रेतपिशाचोंको पूजने वाली मृतप्रेतोंकी अपने में लाया मानेका दंभकरके मूर्ख घरवालोंकोडराने वाली। (मारवाद प्रांतमें तो संगीत विधाकोन जानकर मागों और घरोंमें ऐसेअझील शब्दोंकाउच्चारण करती हुई व्यभिचारका मार्ग दिखाने वाली देखपडती हैं कि जिनको वेश्यामी अपने मुखसे बोलती समयलजोर। यद्यपि भारतवर्ष के सभी प्रांतों की खियां उपरोक्त विशेषण युक्त नहीं हैं । तथापि अधिक प्रांतोंमें तो यही दशा है जो ऊपर वर्णन की गई है। (९)प्राचीन समय- देवालय ऐसे होते थे,कि जहां नित्य भक्ति और शांति की कथाएं होती थी, जहांपर जाकर लोग हवन, जप, पूजा, पाठ करते थे। प्रत्येक देवालय में जो द्रव्य आताया, वह सब विद्यालय, महावियालय खोलने चलाने में और अन्य २ धर्म कायों में लगाया जाता था। वर्चमान समय-अधिकांश देवालयों की दशा प्राचीन कालसे विपरीत देखने में आरही है। भकजनों के भकिके गान होनेकी उपदेश वेश्याओं के मुखसे उत्सवों पर गान सुनने में आता है । शांतिरसकी कथाओं के स्थानपर बनावटी, मिय्या और व्यभिचार सूचक कामरस की कथाएं सुनाइ जारही हैं। जो द्रव्य देवालयों में आता है उसको अच्छे कामों में न लगाकर पुजारी और महंतलोग) भोग्य पदार्थों और व्यभिचारके साधनों की प्राप्ति में नष्ट कर देते हैं। १०-सारांश यह है कि:- प्राचीन समय का भारतवर्ष, वल, विद्या, बुद्धि और समृद्धि के कारण सब देशोंमें शिरोमाणि गिना जाता था। वर्चमान समय का भारतवर्ष, वल, विद्या, बुद्धि और समृद्धि में सब देशों से हीन हवादेख पडता है।
विचारदर्पण. उपरोक तुलनाकरने से हृदय विदीर्ण होजाता दे शोक ! शोक !! शोक !....... हमारी शारीरिक, मानसिक, आर्थिक, धार्मिक और सामाजिक दशावडीही गिरी हुई देखने में आरही है। कितनेही विचार हीन मनुष्य कहतेहैं कि कलियुग उन्नति होनी कठिन है ऐसा कह कर लोगों को निरुत्साही करदेते हैं। परंतु वेद और शास्त्रोंको देखने से और श्रीकृष्ण महाराजका गीता दिया हुआ उपदेश देखनसे यही परिणाम रिलता है, कि कलियुगको मानकर निरुत्साहीहोना बुद्धि- मचा नहीं है, क्योंकि हमारे ऋषीमुनि और अवतारों ने पुरुषार्थ कोही प्रधान और उन्नतिका कारणमाना है ।यह बात कहीं भी उन्होंने नहीं लिखा कि कलियुगमें पुरुषार्य करना व्यर्थ होगा । यहबात इस समपभी प्रत्यक्ष सिद्ध है कि पुरुषार्प करनेवालोंकी शारीरिक पानसिक, आर्थिक, धार्मिक और सामाजिक दशा उचम) देखने में आती है। वीसवर्षमें बौद्धधर्मीयजापान देश वालोंकी शारीरिक, मानसिक और आर्थिक दशा इतनी उन्नत होगई कि उसने रूस जैसे प्रपल राष्ट्र को भी युद्धमें हराकर विजय पाई, यह पुरुषार्थका ही तो फल है। भारतवर्ष भी पुरषार्थ करनेवाले अनेक मनुष्योंकी शारीरिक, मानसिक आर्थिक, और धार्मिक उन्नते प्रत्यक्ष देखनेमें आरहीहै। इसलिपे कलियुगको उन्नतिका बाधक माननेवाले मूखोंकी बातोंका विश्वास न करके पुरुषार्षियोपर परमेश्वरकी कृपा का भरोसाकरके हमको भी पुरुषार्थी बनना चाहिये हमको पूर्ण आशा है कि सर्वशक्तिमान जगदीश,पुरुषार्थ करनेपर हमको सञ्चामार्ग दिखाकर हमारा शीघ्र उद्धार करेंगे. जिससे हमारा भारतवर्षदेश भी अन्य उन्नत देशोंके सदृश कीर्ति पानेवाला होकर,देशोंकी गणनामें उच्चस्यान रखनेवाला होगा औरहिन्दू ( आर्य)जाति अपना खोयाहुआ गौरव प्राप्त करके संसारको उन्नत जातियों की गणनामें आएगी. [इति विचार दर्पणदर्शन तृतीय समाप्तः] . . ।
अथ चतुर्थोऽध्यायः॥ ॥श्रीभगवानुवाच ॥ इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम् ॥ विवस्वान्मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत दोहा-यहैयोगहैमैंकह्यो, पहिलेरविसीआय ॥ तिनहूँसवमनुसोंकह्यौ,मनुइक्ष्वाकुसिखाय॥१॥ हे अर्जुन ! यह कर्मयोग प्रथम मैने सूर्यको सनाया था सूर्यने मनुसे कहा था और मनुने अपने पुत्र इक्ष्वाकुसे कहा था. ( इससे यह दिखाया है कि यह कर्मयोग परम्परासे चला आताहै कुछ अर्जुनकोही नया उपदेश नहीं है) समीक्षा-उपरोक्त श्लोकमें सूर्यसे आभिप्राय तपोबलके तेजसे सूर्य सदृश तेजस्वी ऋषि विशेषसे है. एवं परंपराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः ।। सकालेनेह महता योगो नष्टः परंतप ॥ दोहा-परंपरायायोगको, जानतहैं ऋषिराय ॥ बहुतदिनाबीतेगयो, सोयहयोगनसाय ॥२॥ हे अर्जुन ! यह योग इसी तरह परम्परासे चलाआताथा. अर्थात् एकसे दूसरेने सना, दूसरेसे तीसरेने सुना, इसे राजऋषिलोग जा- नते थे,हे परंतप ! यही योग फिर बहुत काल बीतनेपर नष्ट होगया. स एवायं मया तेऽद्य योगः प्रोक्तःपुरातनः भक्तोऽसि मे सखा चेति रहस्यं ह्येतदुत्तमम
भगवद्गीताभाषाटीका.
दोहा-यहपुरातनयोगमें, तोसोंदियोवताय ॥
याते तू मोमीतहै, औरभक्तिकेभाय॥३॥
वही यह प्राचीन योग आज मैंने तुझे सुनाया और तुझे सुना-
नेका कारण यह है किन्तु मेरा परम भक्त है और सखाभीहै, इसो.
लिये यह उत्तम गुप्त भेद तुझे सुनायाहै ॥ ३ ॥
॥ अर्जुन उवाच ॥
अपरं भवतोजन्म परंजन्मविवस्वतः॥
कथमेतद्विजानीयांत्वमादौनोक्तवानिति।
दोहा-तुमतोप्रगटेहो अवै, सूर्यपुरातनदेव ॥
तुमकवतासोंयहकहो, क्योंजा यहमेव ॥४॥
यह सुन अर्छनने पूछा-हे कृष्ण ! तुह्मारा जन्म पीछे हुआ है
और सूर्यका जन्म पहिले हुआ है फिर हम यह कैसे जान सकते हैं।
कि आपने यह कर्मयोग सुनाया था ॥४॥
॥ श्रीभगवानुवाच॥
बहूनिमेव्यतीतानिजन्मानितवचार्जुन ॥
तान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वेत्थ परंतप
दोहा-तेरे औ मेरे जनम, बीतेहैबहुबार॥
तृतिनकोजानतनहीं, होजानतनिरधार ॥५॥
अर्जुनकी बात सुन श्रीकृष्णने कहा कि-हे अर्जुन ! मेरे और तेरे
बहुतसे जन्म व्यतीत होगयेहैं, हे शत्रुनिकंदन ! उन सब जन्मोंका
वृत्तान्त मैंही जानताहूं तुम नहीं जानते हो ॥५॥
अध्याय ४1.
अजोऽपिसन्नव्ययात्माभूतानामीश्वरोऽपिसन
प्रकृतिस्वामधिष्ठायसंभवाम्यात्ममायया
दोहा-अजअविनाशी प्रगटहौं, जगतईशकरतार
अपनीइच्छालेतहौं, सावधानअवतार॥६॥
हे अर्जुन ! यद्यपि मेरी आत्मा अव्यय अर्थात अविनाशी है. मैं
प्राणियोंका ईश्वरभी हूं और जन्मकर्मसे रहित भी हूं तौभी अपनी
सात्विकी प्रकृतिका अवलम्बन कर अपनी मायासे अवतार लेताहूँ६
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदाऽऽत्मानं सृजाम्यहम
दोहा-जबअर्जुनजगमेंघटत, परमधरमकेभाइ ॥
जहँतहबढतअधर्मअति, तबजनमतमैं आइ ७
हे भारत ! जब जब धर्मकी हानि और अधर्मकी वृद्धि होतीहै तब
तब मैं अवतार धारण करताहूँ ॥७॥
रित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम॥
धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे॥
दोहा-साधुनकीरच्छाकरौं, पापिनडा मारि॥
थापितयुगतजुधर्मकी,युगयुगमाहिविचारिक
हे अर्जुन! जो साधु महात्मा अपने धर्मपर स्थित हैं उनकी रक्षाके
लिये पापियों के नाशके लिये और धर्मकी संस्थापनाके निमित्त मैं
युगयुगमें अवतार लेताहूं ॥८॥
।
।
भगवद्गीताभाषाटीका,
जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्वत
त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सौर्जुन
दोहा-मेरेजन्मरुकर्मको, तत्वलहैजोकोय।
देहतजैमोकोमिलै, वहरिनजनमैसोय ॥९॥
हे अर्जुन! जो मेरे इन जन्म काँको अलौकिक जानकर इनके लिये,
तत्त्वको जान लेते हैं वे इस देहको छोड फिर जन्म नहीं लेतहैं और
मुझको प्राप्त होजाते हैं अर्थात् आवागमनसे छूट मुझसे मिल जातेहैं
वीतरागभयक्रोधा मन्मया ५.
बहवो ज्ञानतपसा पूता मनावमागताः॥
दोहा-रागक्रोधभयकोतजै,मोमें राखेभाय॥
वहृतज्ञानतपकरिसुजन, मोहीमांझसमाय १०
मेरे अवतारोंका अलौकिक तत्व जाननेसे बहुतेरे मनुप्योंके राणा,
भय और क्रोध जाते रहतेहैं और वे सब पदार्थोमें मेरा स्वरूप देखते।
हैं, मेरेही आश्रित रहेहैं, ऐसे पुरुष ज्ञान और तपसे पवित्र होकर मेरे
भावको प्राप्त होगये हैं ॥१०॥
ये यथामांप्रपद्यते तांस्तथैव भजाम्यहम्
मम वानुवर्तते मनुष्याः पार्थ सर्वशः।
दोहा-जोमोको जैसेभजे, हौतेसोफलदेत ॥ .
अर्जुननरसबजगतमें, मेरोमगगहिलेत ॥११॥
मपाव हे अर्जुन जो मुझे सकाम वा निष्काम जैसे भजता है में भी उसे वैसाही फल देता हूं अर्थात जो सकाम पूजन करतेहैं उनको कर्मानुसार फल देता हूं और जो निष्काम भजते हैं वे मेरे स्वरूपकोमाप्त होजाते है, ये सब मनुष्य मेरेही मार्गका अनुसरण करते हैं, अर्थात् ये चाहे जिसका भजन करें वे सब मुझी को प्राप्त होता है॥ ११॥ कांक्षतः कर्मणां सिद्धिं यजंत इह देवताः॥ क्षिप्रंहि मानुषेलोके सिद्धिर्भवति कर्मजा दोहा-कर्मसिद्धिकीचाहकार, पूजतदेवनिलोड ॥ कर्मनकीनरलोक में, सिद्धिवेगहीहोइ ॥ १२ ॥ इस संसारमें जो कर्मकी सिद्धिको चाहते हैं वे इन्द्रादि देवताओंकी उपासना करते हैं, क्योंकि मनुष्यलोकमे कर्मकी सिद्धि शीघ्र होती है और मेरी सक्षात् सेवासे ज्ञानका फलरूप जो मुक्ति है सो कठिन- तासे मिलती है ॥ १२॥ चातुर्वण्य मया सृष्ट गुणकर्मविभागशः ॥ तस्य करिमपि मां विद्धयकर्तारमव्ययम् दोहा-चा वर्णजुमैरचे, करिगुणकर्मविभाग ॥ मैंइनकोकरतारहौं, ताहिमोहिंअनुराग ॥१३॥ ब्राह्मण, क्षत्री, वैश्य और शुद्र ये चारों वर्ण अपने २ गुण और कर्मसे मनही बनाये हैं, यद्यपि इनका कर्ता मैंही हूं, तो भी मुझे अकर्ता समझो क्योंकि में अविनाशी हैं और इनमें मेरी आसक्ति नहीं है ।। १३ .
२८ भगमद्गीताभाषाटीका. नमा कर्माणि लिंपति न मेकर्मफले स्पृहा इति मां योऽभिजानाति कर्मभिर्न स बध्यते दोहा-कर्मनमोकोलगतुहै. मोहि न फलकीचाहि। ऐसोजोमोकोलखै. कर्मनवांधताहि ॥ १४ ॥ हे अर्जुन ! कर्म मुझको लिप्त नहीं होते हैं और न कर्मफलमें मेरी इच्छा है क्योंकि म पूणकाम हूं जो मुझको ऐसा जानते हैं वे कर्मसे नहीं बँधते हैं ॥१४॥ एवं ज्ञात्वा कृतं कर्म पूर्वैरपि मुमुक्षुभिः ॥ कुरु कर्मैव तस्मात्त्वं पूर्वैः पूर्वतरं कृतम् ॥ दोहा-जोचाहतहैमुक्तिको, करैकर्मतिनआइ। तातेंतूहूंकर्मकार, पहिलनकोमतपाइ ॥१५॥ पहिले जनकादिक मुमुक्षुजनोंने भी ऊपर कही हुई सब बातें सम- झकर कर्म किया था. इससे अब तुमभी वही कर्म करौ जो पूर्व पुरु- पोंने पहिले किया है ।। १५ ।। किं कर्म किमकर्मेति कवयोऽप्यत्र मोहिताः तत्तेकर्मप्रवक्ष्यामियज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात दोहा-कौनसुकर्मअकर्मकौं, नरहतपंडितमोहिं ॥ मुक्तिकाजसोईकरम, कहेदेतहाँतोहिं॥ १६॥ हे अर्जुन । कौनमा कर्म कर्तव्य है और कौनसा कर्म अकर्तव्य है इस बात के विचारमें घडे २ पंडितोंकी बुद्धि भी चकरमें पडजाती है, } मध्याद ४॥ उसी कर्मका वर्णन मैं तुमसे करूंगा, जिसे जानकर- संसारके बन्ध- नोंसे छूट जाओगे ॥ १६ ॥ कर्मणो ह्यपिबोद्धव्यं बोद्धव्यं च विकर्मणः अकर्मणश्चबोद्धव्यंगहनाकर्मणोगतिः॥ दोहा-जान्योंचहियेकमहूं, औरविकर्म सुभाइ ।। सुनिअकर्मगतिकीजिये, गहनकर्म केदाइ।१७ एक तो वे कर्म हैं जो शास्त्रोक्त रीतिसे अवश्य कर्तव्य है,एक वि- कर्म है जो निषिद्ध है और एक अकर्म है जिनका तत्त्वज्ञान होने पर त्याग कहा है. इस तरह इन तीनों प्रकारके कर्मोंका विचार करना बहुत आवश्यकीय है, क्योंकि कर्मोंकी गति बडी कठिन है ॥१७॥ कर्मण्यकर्मयःपश्येदकर्मणि च कर्मयः।। सबुद्धिमान्मनुष्येषुस युक्तः कृत्स्नकर्मकृत दोहा-कर्मनिमांझअकर्मजे, आवकर्मअकर्म ॥ बुद्धिवंततिनसबकिए, मेटेमनकेमर्म ॥१८॥ जो कर्मको अकर्म और अकर्मको कर्म समझता है अर्थात् कर्म करना जिसके ज्ञानमें बाधा नहीं करता है और शास्त्रोक्त कर्मके न करनेहीमें जो कर्तव्यता देखता है वही मनुष्योंमें बुद्धिमान है. वही योगी और संपूर्ण कामोंका करनेवाला है ।। १८ ॥ यस्यसर्वे समारंभाः कामसंकल्पवर्जिताः ज्ञानाग्निदग्धकर्माणतमाहुःपण्डितंवुधाः
भगवद्गीताभाषाठीका।
.
दोहा-जाकसवआरंभते, बिनाकामनाहोत ॥
तासोपंडितकहतजन, दहतकर्मकेगोत ॥१९॥
हे अर्जुन ! जो संपूर्ण कामोंको किसी प्रकारकी कामनाकी
इच्छासे नहीं करता है. और जिसके संपूर्ण कर्म ज्ञानरूपी अग्निसे
जल गये हे उसीको ज्ञानी पुस्प पण्डित कहते हैं ॥ १९॥
त्यक्त्वा कर्मफलासंगंनित्यतृप्तो निराश्रयः
कर्मण्यभिप्रवृत्तोऽपिनैव किंचित्करोतिसः
दोहा-कर्मफलनिछोडेसदा, तृप्तकरैनहिंआस ॥
ताकर्मनकेकरतही. लगैनभवकीफाँस ॥२०॥
जो कर्म फल की इच्छा नहीं करता है और न उनमें आसक्ति रखता
है और सबका आश्रय छोड नित्य संतुष्ट रहता है,यद्यपि ऐसा मनुष्य
कर्ममें प्रवृत्त रहता भी हो (पर यह समझलो कि) वह कुछ नहीं
करता है ॥२०॥
निराशीर्यतचित्तात्मा त्यक्तसर्वपरिग्रहः॥
शारीरं केवलं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्विषम्
दोहा-जीतेइंद्रियदेहनहिं.कामपरिग्रहजाहि॥
देहकाजकर्मनिकरत, पापनलागतताहि॥२१॥
जो संपूर्ण आशाओको छोड़ चित्त और आत्माको वशीभूत कर
सब संसारी झगडोंसे मुख मोड केवल शरीरमात्रसे कर्म करते हैं वे
भी कर्मबंधनोंसे पीडित नहीं होते हैं॥२१॥
अन्याय४॥ यदृच्छालाभसंतुष्टो द्वंद्वातीतो विमत्सरः समः सिंहावसिौचकृत्वाऽपिन निबध्यते दोहा-प्रथालाभसंतोषजो, सुखदुखरहैनकोइ॥ सिद्धि असिडीएकसो, कर्मनबंधनहोइ ॥२२॥ हे अर्जुन! वे पुरुष जो वस्तु अपने आप मिलजाय उसीपर संतोष करते हैं, दुख सुख हानि लाभसे जिनके मनको वेदना नहीं होती है, जो मत्सरतारहित हैं, जिनकी सिद्धि और असिद्धि में समान बुद्धि है, वे कर्म करकेभी कर्मबंधन में नहीं बंधते हैं ॥ २२ ॥ गतसंगस्य मुक्तस्य ज्ञानावस्थितचेतसः॥ यज्ञायाचरतःकर्म समग्रं प्रविलीयते॥२३ दोहा-तजैसबैजोकामना, ज्ञानलगावैचित्त॥ यज्ञकाजकर्मनिकरै, सोनबांधियेमित्त ॥२३॥ जो भाईबंधु स्त्रीपुत्रादिकीआसक्तिसे छूटगया है, सांसारिक विषय वासनासे दूर होगया है और ज्ञानमें जिसका चित्त स्थित है वह यज्ञ- के लिये जो कम करताहै वे सब कर्मवासनासहित लीन होजाते हैं। ब्रह्मार्पणंब्रह्म हविब्रह्माग्नौ ब्रह्मणाहुतम् ॥ ब्रह्मैव तेन गंतव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना २४ दोहा-होमअगनिहविब्रह्महै, अब्रह्महिजानि॥ जाइब्रह्ममेंसोरहै, कर्मसमाधिहिठानि ॥२४॥ ब्रह्मके अर्थ और ब्रह्मही हवि तथा ब्रह्मरूप अग्निमें ब्रह्महीने दिल १०२ भगवद्गीताधाषाटीका. या है. इस प्रकार जो जानता है अर्थात् होमें, अनि सुवा, हवि, कती घृत आदि सब सामग्री ब्रह्मरूप है, जिसकी ब्रह्मकर्ममें समाधि अर्थात् चित्तवृत्ति है वह अवश्य ब्रह्मको प्राप्त होता है ॥२४॥ दैवमेवापरे यज्ञं योगिनः पर्युपासते ॥ ब्रह्मानावपरे यज्ञं यज्ञेनैवोपजुहति ॥२५ दोहा-देवनकोइकयजतहै, करतयज्ञबहुभाइ ।। एकब्रह्ममें यजतुहै, ज्ञानयज्ञकेदाइ ॥२५॥ हे अर्जुन ! कितनेही कर्मयोगी श्रद्धापूर्वक इन्द्रादि देवताओंकी पूजा करते है और कितनेही ज्ञानयोगी ब्रह्मरूप आनिमें ब्रह्मयज्ञरूपसे इवन करते है ॥२५॥ श्रोत्रादीनींद्रियाण्यन्ये संयमाग्निषु जुहति शब्दादीन्विषयानन्य इंद्रियामिषु जुह्वति दोहा-एकजुहोमतइंद्रियनि, संयमअगनिस्वरूप विषयनहोमतएकही, इन्द्रीअगनिअनूप ॥२६ है,अर्जुन ! कितनेही ऐसे योगी हैं जो अपने नेत्र, कान आदि इन्द्रियोंको संयमरूप अनिमें होम देते हैं और कितनेही इन इंद्रियों के रूप शब्दादि विषयोंको इन्द्रियरूप आग्नमें होम देते है ॥२६॥ सर्वाणींद्रियकर्माणिप्राणकर्माणि चापरे॥ आत्मसंयमयोगानौ जुति ज्ञानदीपिते --
अध्याय ४॥
१०३
दोहा तेसवइंद्रिनकेकरम, औरकरमसवप्रान
होमतसंयमअग्निमें, प्रकटकरैविज्ञान ॥२७॥
कितनेही ऐसे योगी हैं जो कमन्द्रिय और ज्ञानेन्द्रियके कर्मोंको
तथा प्राण अपान आदि दस प्राणोंके कर्मको ज्ञानसे जलतीहुई
मनके निग्रहरूप अग्निमें होमते हैं अर्थात सब विषयबासनासे दूर
हो केवल ब्रझमें लीन होजाते हैं ॥२७॥
द्रव्ययज्ञास्तपोयज्ञा योगयज्ञास्तथापरे॥
स्वाध्यायज्ञानयज्ञाश्च यतयःसंशितव्रताः
दोहा-एकयजतद्रव्यसों, एकतपस्यायोग ॥
एकजुपढिवेदहिपजे, एकजुज्ञानसोलोग ॥२८
जो अपने नियममें बडे तत्पर हैं उनमें से कितनेही द्रव्यदानरूप
यज्ञ करते हैं, कितनेही कृच्छ्रचान्द्राययणादिरूप तपोयज्ञ करते हैं,
कितनेही योग यज्ञ करते हैं और कितनेही वेदका पठनं पाटनरूप यज्ञ
करते हैं ॥२८॥
अपाने जुह्वति प्राणं प्राणेऽपानं तथाऽपरे॥
प्राणापानगतीरुद्धाप्राणायामपरायणाः
दोहा-होमअपान हिप्रानमें, प्रानअपान हिमांह ॥
प्रानअपानहिरोकिकै, रहतजुहै नरनाँह ॥२९॥
और कितनेही प्राणायाममें तत्पर प्राण और अपानकी गतीको
रोककर अपानमें प्राणका हवन करते हैं और प्राणमें अपानका हवन
करते हैं ॥२९॥
भवदीताभापाटीका.
अपरेनियताहारा प्राणान्प्राणेषु जुहति॥
सर्वेऽप्येते यज्ञविदों यज्ञक्षपितकल्मषा :
दोहा-प्राणनहीमेंप्रानको, होमतजियतअहार ।।
एसबजानतयज्ञको, मेटतपापविकार ॥३०॥
क्तिनेही आहारको नियमितदर प्राणोंमें प्राणको होमते हैं
अर्थात् कुंभक करते है ये सब यज्ञको जानते हैं और यज्ञहीसे इनके
सब पाप दूर होगये हैं॥३०॥
यज्ञशिष्टामृतभुजोयांतिब्रह्म सनातनम्॥
नायंलोकोऽस्त्ययज्ञस्य कुतोऽन्य कुरुसत्तम ।।
दोहा-यज्ञशेषअमृतभपत, होतब्रह्मसोलीन ॥
यहौलोकविनुयज्ञनहिं, परलोक हैछीन॥३१॥
जो यज्ञ शेप अमृतरूप अन्नका भोजन करते हैं वे सनातन ब्रह्म
को प्राप्त होते हैं, हे अर्डन । जो यज्ञ:नहीं करते हैं उनको न यह
लोक है न परलोक ॥ ३१॥
एवं बहुविधा यज्ञा वितता ब्रह्मणो मुखे ॥
कर्मजान्विद्धि तान्सर्वानेवं ज्ञात्वा विमोक्ष्यसे
दोहा-चहतभांतिवेदनकही, यज्ञसबैलेमानि ॥
तेसवजानकर्मते, लेछ मुक्तिसुखसानि ।। ३२।।
ऐसे बहुत प्रकारके यज्ञ वेदमें वर्णन किये गये हैं. इन सबकी
उत्पत्ति कर्मसे है. इनको जाननेसे तेरी मुक्ति होजायगी ॥३२॥
अध्याय ४॥
श्रेयान्द्रव्यमयाद्यज्ञाज्ज्ञानयज्ञः परंतप ।
सर्व कर्माखिलं पार्थज्ञाने परिणमाप्यते३३
दोहा-द्रव्ययज्ञतेहैबडो, ज्ञानयज्ञइहभाय॥
जितेकर्मवेदनिकही. ज्ञानहिरहितसमाया॥३३॥
हे परंतप ! द्रव्ययज्ञसे ज्ञानयज्ञ श्रेष्ठ है, हे पार्थ ! जिनने कर्म हैं
से सब ज्ञानमें समाप्त होते हैं अर्थात् फल्सहित ज्ञानमें लीन होते हैं.
तद्विद्धिप्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेक्या।
उपदेश्यंति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः ॥
दोहा-कीजैबहुतैनम्रता, प्रश्नऔरअतिसेव ॥
तौज्ञानीउपदेशिहैं, तुम्हज्ञानकोभेव ॥३४॥
हे अर्जुन ! तत्त्वदर्शी ज्ञानीलोग इस तत्त्वज्ञानका तुझे उपदेश
कोंगे, जब तू उनकी सेवा करेगा, हाथ जोड़ेगा, प्रणाम करेगा और
अनेक भांतिसे पूँछेगा कि इस संसारसे मेरी मुक्ति कैसे होगी ३४
यज्ज्ञात्वा न पुनर्मोहमेवं यास्यसि पांडव
येन भूतान्यशेषण द्रक्ष्यस्यात्मन्यथोमयि
दोहा-अर्जुनयाकोलहतही, मोहनरहिहैतोहिं ।।
सबजीवनकौंदेखिहै, आपमांझकैमोहिं ॥३५॥
हे अर्जुन ! इस ज्ञानके प्रतापसे तुझको ऐसा मोह फिर कभी न
होगा और इसी ज्ञानसे संपूर्ण प्राणियोंको अपनी आत्मामें
और मुझमेंभी देखोगे अर्थात कुछ भेदबुद्धि न रहैगी ॥३५॥
भगवद्गीताभाषाटीका. अपिचेदसि पापेभ्यः सर्वेभ्यः-पापकृत्तमः सर्व ज्ञानप्लवेनैव वृजिनं संतरिष्यसि॥३६॥ दोहा-सवपापिनमेंजोबटो. पापीहूतूहोय ॥ ज्ञाननावचढिउतरिहै, पापसिंधुसमजोय ३६ जो तू सब पापियोंसेभी अधिक पापी होगा- तोभी तू इस ज्ञानरू- पी नौकापर चढकर विना परिश्रमही इस दुःखसागरसे पार होजायगा ॥३६॥ यथैधांसि समिद्धोऽग्निर्भस्मसात्कुरुतेऽर्जुन ॥ ज्ञानाग्निःसर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा दोहा-जैसेज्वालहताशकी, डारतसबहीजारि।। ज्ञानअग्निसोप्रबलहै, डारतकर्मनिवारि ॥३७॥ हे अर्जुन ! जैसे जलती हुई अग्नि काष्ठको जलाकर भस्म कर देती है.वैसेही ज्ञानरूपी अग्नि सपूर्ण कर्माको जलाकर नष्टकर देतीहै. केवल यह बात नही है कि ज्ञानद्वारा पापोसे पारही होजाते हैं ॥३७॥ नहि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते ॥ तत्स्वयं योगसंसिद्धःकालेनात्मनि विंदति दोहा-ज्ञानसमानजुलोकमें, पावतनाहींऔर ।।- योगसाधनाजोकर, लहैज्ञानकोठोर ॥३८॥ इस संसारमें ज्ञानके समान और कोई बात पवित्र अर्थात् चित्तके शुद्ध करनेवाली नहीं है यह ज्ञान कुछ कालपर्यन्त अभ्यास करते करते कर्मयोगके द्वारा सिद्ध हो अपने आपही उपस्थित होजाता।।३८ अध्याय ४॥ १०७ श्रद्धावॉल्लभते ज्ञानंतत्परः संयतेद्रियः॥ ज्ञानं लब्ध्वा परांशांतिमचिरेणाधिगच्छति दोहा-इंद्रियजितश्रद्धासहित, पावैऐसोज्ञान ॥ तापायेततकालही, पावैशांतिसुजान ॥३९॥ अपने गुस्के उपदेशमें श्रद्धावाले, ज्ञानकी प्राप्तिमें तत्पर जितेन्द्रि- य पुरुष ज्ञानको पाता है और इस ज्ञानको पाकर फिर थोडेही कालमें मोक्षको पा लेता है ॥३९॥ अज्ञश्चाश्रद्दधानश्चसंशयात्मा विनश्यति॥ नायं लोकोऽस्ति न परोन सुखं संशयात्मनः दोहा-जोमूरखश्रद्धाविना, ताकोहोइविनाश ।। जाकेयहसंदेहहै, सोढेलोकनिराश ॥४०॥ और जो अज्ञानी, श्रद्धारहित हैं और जिनके मनमें संदेह बना रहता है वे नष्ट होजाते है, संदेह रखनेवालेको न इसी लोकमें सुख मिलता है और न परलोकमें, कहींभी उसको सुखका नाममात्र नहीं मिलता ॥४०॥ योगसंन्यस्तकर्माणं ज्ञानसंछिन्नसंशयम् ॥ आत्मवन्तंन कर्माणिनिबनंती धनंजय॥ दोहा-मोकौंअकर्मकरि, करिसंदेहहिद्वार ॥ ज्ञानीबॅधैनकर्मसों, रहैसदासुखपूरि ॥४१॥ हे अर्जुन ! इश्वराराधनरूप योगसे जिसके कर्म छूट गये है और भगवद्रीताभावारीका. ज्ञान प्राप्तिद्वारा जिसके सब संशय छिन्नभिन्न होगये हैं ऐसे आत्म: बान पुरुषोंको कर्मोंका बन्धन नहीं होता है. कम तो केवल लोक संग्रहके लिये हैं॥४१॥ तस्मादज्ञानसंभूतं हृत्स्थं ज्ञानासिनात्मनः छित्वैनंसंशयंयोगमातिष्ठोत्तिष्ठभारता४२ दोहा-संदेहजुअज्ञानतें, उपज्योअर्जुनआहि ॥ ज्ञानखड्गसोंकाटिक, योगकरौकिनताहिए। याचौथेअध्यायतें, निष्ठाहद्वेभाय ॥ कहीअवस्था भेदतें, कर्मज्ञानसमुझाय॥१॥ कृष्णचरनपरनामकरि, वरन्योकर्मसंन्यास ॥ सकलजगतकेहितकह्यो, आनंदरामप्रकास २॥ हे भरतवंशीय अर्जुन ! इन ऊपर कहे हुये हेतुओंसे तेरे हृदयमें जो अज्ञानसे उत्पन्न हुवा संशय जम गया है. इसे ज्ञानरूपी खनसे काटडाल और युद्धरूप जो यह कर्मयोग उपस्थित हुआ है इसके कर- नेमें कटिबद्ध हो ॥४२॥ इतिश्रीमद्भगवद्गीतासंपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे विचारदर्पण दोहासहितमाषाटी. ० कायां कर्मसंन्यासयोगोनाम चतुर्थोऽध्यायः॥४॥ - प्रारम्भः दर्शन 1 अथ विचारदर्पणं चतुर्थ दर्शन हिन्दुओं ( आर्यों ) की उन्नतिके उपाय. [१] सबसे प्रथम, कुरीतियोंको देशमें से हटाना चाहिये । सबसे प्रधान हानि- कारक कुरीति वालविवाहवी है। लडकोंका अठारहवर्षसे पूर्व और लडकियोंका तेरह वर्षकी अवस्थासे पूर्व कदापि विवाह न होने पावे, पुरुषोंका बैंतालीस वर्षकी अवस्थासे उपरांत सर्वथा बिवाह न होना चाहिये । पंचायतों और राजाओं द्वारा कडाईके साथ ऐसे प्रवन्ध होने की आवश्यका है । हमलोग बाल विवाहसे अल्पायु, निर्बल, और क्षीणवार्य होगये है, और वृद्धविवाहसे विधवाओंकी संख्या मढरही है। इसी प्रकार वृद्धविवाह और बहुविवाह [एकसे अधिक स्त्रियों के साथ विवाहकरना कोभी रोकना चाहिये.जहाँतक वनसके पालविवाहकीकुरीतिको सबसेप्रथम हटानेकी चेष्टा करें. हम नित्य देखते हैं कि, उचम धा-यके वीजसेही उचम धान्यकी प्राप्तिहोतीई और उत्तम पशुओसेही उत्तमाशु उत्पन्न होते हैं परन्तु शोक तो इस बातकाई कि, बालांववाहके कारण पूर्ण अवस्थासे पूर्वही स्त्रीपुरुपोंकासंगमहोनेसे निर्बल, निर्बुद्धि और अल्पायु संतानोंकी उत्पचि हमलोग अपनी आँखों से देखते जाते हैं और इस हानिकारक प्रथाको रोकनेकी चेष्टा नहीं करते. देखिये पशिरोमणि वाग्भ आचार्य लिखते हैं कि, "पूर्ण पोडशस्त्री पूर्ण विशेन संगता। इत्यादि । वीर्यवंत सुतं सूते ततोन्यूनान्दयोः पुनः ।रोग्यल्पायुरधन्यो वा गर्भो भवति नैव वा वाग्भह-शारीरिकस्थान । (मर्थ) पूर्ण सोलह वर्षकी स्त्री पूर्ण वीसवर्षके पुरुषको साथ सम्म करनेसे पराक्रमी सतान उत्पन्न होती है एससे न्यून वर्षवाले स्त्री पुरपोके रोगी, अल्पायु अर्थात् छोटी अवस्थामें मरने वाली और निर्बल सतान होता है, अथवा गर्भक्षी म होगा इसलिये पुरुषोंको बड़ी अवस्था में विवाहकर भातुकालमही अपनी स्त्रीके साथसम्म करना चाहिये इसका नाम ब्रह्मचर्य का पालन करना है अतः पुरुपोंका अगरह वर्षके उपरांत और स्त्रियोंका तेरह वर्षके उपरांत विवाह दोना चाहिये। यहभी ध्यान रहे कि, गर्भिणी स्त्री के साथ कदापि संगम न किया जाए. जब पशुही ऐसा नहीं करते तो मनुष्यों का यह व्यवहार क्या अधिक लज्जाजनक नहीं है ? अतिरिक्त इसके,होनेवाली संतानके अंगोंमें विकार होनेकाभी भय है; अतः गर्भिणीके साथ संगम भूलकर भी न करें। [२] विवाहादि उत्सवों और मरणादि अवसरों पर रुपयेका अतिव्यय नहीं होना चाहिये। लोगों में देखा देखी अधिक और व्यर्थ व्यय करनेकी चाल पड़ी विरार दर्पण, हुई है. हमलोगोंको इससमय जातीय संस्थाओंके स्थापित करने और उनकी स्थिति को हट तथा स्थाई बनानेके निमिच मन खोलकर रुपया लगाना चाहिये, यया) विद्यालय महाविद्यालय, पुस्तकालय, सेवासदन, व्यायाममाला, फूष, तहाण, धर्मशाला आदिका बनाना और उनका चलाना । (जहांतक दान किया जाए ह सात्विक होना चाहिये जैसा कि श्रीकृष्णमहाराजने 4 दातव्यमिति गी० अ०१७ श्लो०२०] अर्थात् देशकाल और पात्रमे दिया हुआ दान सात्विक कहा जाता है। गंजेडी, भगेडी और मूखको दान देना देशको दरि- द बनाना है। [३] अश्लील गान और नित्य अश्लीलभाषण अर्यात् गालीका प्रचार सर्व पा अपने २ घरों से उठा देना चाहिये। छोटे २चालक, और बही अवस्थावाने) पुरुष शाला आदि शब्दोंका प्रयोग नित्य करते हैं । होली के त्यवहारपर पुरुषोंके, और बिवाहके समय त्रियोंके, मुखसे अश्लील गानोंका सुनना छोटी अवस्थावाले वालक, वालिकाओंके हृदयपर बुरे संस्कार जमाता है, इसलिये पुरुषों तथा खियोंके मुखसे अश्लील गान अथवा भाषण कभी नहीं होना चाहिये। [४] बालक और बालिकाओंकी शिक्षा का प्रबन्ध इसभाँति हो कि, छ. सात वर्षकी अवस्थासेही वह विद्यालयों में पढने को भेज दिये जावें और तेरहवर्षकी अवस्था तक निम्नलिखित पढाई समाप्त करलें, परन्तु अयमें यहभा ध्यान रहे कि, वह दुष्टजनोंके संगसे सर्वथा बचाए जावें। (क) हिन्दी (देवनागरी) भाषाका लिखना पढना. (स)साधारण गणित. (ग) भारतवर्ष तथा समस्त भूमंडलका माकृत तथा प्रातिक भूगोल. (घ) प्राचीन और वर्चमान समयके भारतवर्ष का इतिहास. (ड) साधारण संस्कृती पुस्तके यया हितोपदेश, आदि. (च) अंग्रेजी { आगलभाषा) की कुछ उपयोगी पुस्तके. (छ) साधारण चित्र लेखन. समीक्षा-गुरुजनों द्वारा धार्मिक शिक्षा भी दीजानी चाहिये. गीताफी कुछ अध्यायोंका आशय समझा दिया जाय और गीता कंठस्थ करादी जावे. स्वास्थ्यरक्षा सम्बंधी बातोंसे इसी अवस्थामें हमारे बालक और बालिकाएं भली प्रकार परिचित होजानी चाहिये । स्वास्थ्यरक्षासम्बन्धी कुछ उपयोगी २उपदेश नीचे दिये जाते हैं उनको उदाहरणार्थ समझें.
दर्शन नित्य शुद्ध वायु जलका सेवन करें. यथाशति नित्य व्यायाम करें. अर्थात् दंड मुगदर आदिका व्यवहार करें. ब्रह्मचर्यकी रक्षाके लिये मिरच, मसाला, अचार, अतिखटाई, चाय, काफी, तमाखू आदि सभी प्रकारके उत्तेजक और तीक्ष्णपदार्थोंका सेवन नहीं करें. इनसे बालकोंको प्रमेह, अर्यात् धातुक्षीण हो जाता है. दाल, भात, दूध, घृत आदि कोई भी उचम पदार्थ परिमाणसे अधिक अर्थात् भूखसे अधिक नसावें. शृंगार सम्ब किसी भी बातकर चिन्तवन या उसकी चर्चा करना उचित नहीं, क्योंकि इससे विषय वासना जागृतहोती है और वीर्यका स्थान भ्रष्ट होजाताहेगार रसके नाटक और खेल (ख्याल) तमाशंभी नहीं देखने चाहिये. आयुकी रक्षाके लिये ठीक समयपर सोना और उठना चाहिये. जहॉतक बनसके ऐसा भोजन खावें जिससे प्रतिदिन मलमूत्र ठीक होता रहे, अर्थात् कब्जी न रहे। गरिष्ठ, विष्टम्यक और प्रकृतिके विरुद्ध भोजन कदापि न करें। पय्यरूप हलका भोजन नित्य करना चाहिये। यदि सदेच कजी (विष्टव्यता ) रहती हो तो पेटको शुद्ध रखने के लिये रात्रिके समय त्रिफलोंका चूर्ण लेलिया करें मिलकर संचय पेटमें कदापि न रहने पावे क्योंकि सब रोग मायः मल संचय से ही होतेहैं. यया वाग्भट्टमें लिखा है:- रोगाः सर्वेऽपि मंदेऽनौ सुतरामुदराणि तु । अजीर्णान्मलिनैश्वान्जायते मलसंचयात्म वाग्भट्ट-निदान स्थान अ.१२॥ श्लो० १. (अर्थ) मल सचयसे मदाग्निहोजाती है मदाग्नि दोनेपर सभी रोग झोते हैं विशेषकर उदरके रोग नीचे दो श्लोक वाग्भह के दिये जाते हैं तदनुसार कार्य करने से मनुष्य रोगों से बचे रह सक्ते हैं। श्लो-नित्यं हिताहार विहार सेवी समीक्ष्यकारी विषयवसका। दाता मा सत्यपरः क्षमावानाप्तोपसेवी च भवत्यरोगः।
विचार दर्पण समीक्षा-खाया हुवा हान्न अच्छी प्रकार नहीं पचने से सभी रोमहोते हैं, एलोन्शीतोद्भवं दोपत्रयं वक्षते । विशोषयन् ग्रीष्मजमम्रकाले । धनात्यये वार्षिकमाशु सम्यम् । प्राप्नोति रोगान्जान जातु ।। | सूत्रस्थान म०४ श्लो०३६. . (अर्थ) जाडे में जो कफके दोषोंका सचय होगया हो, उस को पसंतमतु, और गरमी में जो यातदोक्या सचय होगया हो उसको वर्षाऋतुके प्रारभमें और वर्षाऋतु में होनेवाले पित्तको सचयको अन्वित विरेचनद्वारा विशुद्ध घरदेना चाहिये, ऐसायरनेसे ऋतुसे उत्पन्न होनेवाले रोगों मनुष्य बचा रखता है. अर्थात सदाही निरोग रहता है। जहाँ तक बन पडे खुली वायुमें शयन करना उचित शीतकालमें भी सिरहानेकी ओर स्वच्छ वायु आने को एक खिडकी अवश्य होनी चाहियो सोते समय औष- श्यकासे अधिक रखों को नहीं मोटें और न मुँहको कपड़ों से बंद करें, मलमूत्रादि का वेग कदापि न रोके सोलहवर्ष की अवस्था के पूर्व तमाखू, सिगरेट कभी न पावें । समीक्षा- यदि हम लोग स्वास्थ्यरक्षा सम्बन्धी बातोंपर अधिक ध्यान नहीं देंगे तो हिन्दु[आर्य ] जातिकी शारीरिक दशा औरभी विगहती जायगी.आजसे पचासवर्ष पहिले हमारी, प्रत्येक मनुष्य पीछे, आयु की गणना तेईस वर्षकी हुईथी, जो अठारह वर्ष होगई है और यूरोप, अमेरिका में पचास वर्ष पहिले प्रत्येक मनुष्पकी आयुकी गणना छब्बीस वर्षकी हुईथी, जो अब पैंतीस वर्ष की है। इसका कारण यही है कि, यदा बालविवाद की प्रथा नहीं है और स्वास्थ्य सम्बन्धी नियमोंका पालना छोटी अवस्थासेही प्रारम्भ हो जाता है। [५] ऊपरकी संख्याचार में लिखीहई शिक्षाप्राप्त करके तेरह वर्षको अवस्थाके 'पश्चात् जैसी रुचि बालकों और उनके संरक्षकों की हो उसी प्रकारको निम्नलिखित शिक्षा उनको दिलाई जाए । जहातक होसके जातीय विद्यालयों और महाविपाल- योंकी संख्या देशमें बढाकर उनमें सब प्रकारको विपाएं पढावें, जिससे हमारे देशवासियों को बहुत व्ययक रके और उगार दूसरे देशों में विद्याध्ययनके लिये न जाना पड़े। शोक ! एक वह दिन था कि, दूसरे देशोंके लोग भारतवर्ष में विद्याएं सीखनेको आते थे, अब यह समय आगया है कि, भारतवासियों को दूसरे देशोंमें जाना पडता है. पुरुषार्य करनेसे अपभी सब कुछ होसका है। [क] ब्राह्मणों के युवकों को मुख्यतया वेद, उपनिषद, पांख्य, योग, वेदांत, कर्मकांड,आयुर्वेद, डाकटरी [पाश्चात्य आयुर्वेदशास्त्र] में निपुण होना चाहिये अब घटकर दर्शन,४॥ ११३ [ख] क्षत्री, वैश्य और शूद्रोंके बालकोंको गीता आदि धर्मग्रन्यों को समझने में योग्यता प्रातही इतनी संस्कृत भाषा सीखकर यथा रुचिः- शिल्प, कृषि, वाणिज्य, भूगर्भविज्ञान (खनिज पदार्थों की विद्या ) इंजिनियरी (कलाओं और यंत्रोंकीविया), विद्युतशास्त्र, नैवीगेशन(जहाजोंको चलाना )बैंक और व्यापारी कम्पनियां खोलना तथा चलाना, शोर्टहँ राईटिंग [ संक्षिप्त लेखन ] इत्यादि विद्याओंको सीखना चाहिये। [६] हमारी बालिकाओं को प्राथमिक शिक्षाके उपरांत सोनापिरोना, सूपशास्त्र अर्थात् आयुर्वेद के नियमानुसार भोजन बनानेकी विधि, स्वास्थ्यरक्षा सम्बन्धी नियम, रोगीकी सेवाकरना, बालकोंकी चिकित्सा करना, बारकोंको शिक्षादेना, धर्म और नीति; इत्यादि बातोंका ज्ञान प्राप्त करना चाहिये. [७] वैश्य जातिको अन्य उन्नत देशोंमें जाकर वाणिज्य, व्यापार करना चाहिये, जिससे देशका गौरव बढे । जिस प्रकार यूरोप, अमेरिका के लोग बडी- वडी कम्पनियां तथा बैंक खोलकर और कलायंत्रोंकोकाममें लाकर व्यापार द्वारा करोडपति अर्ब ( अर्बुद) पति हो जाते हैं, उसीभाँति हम भी अपने बाणिज्यको बढाकर धनिक बन सके हैं. उन्हीं उन्नत देशोंकी भांति विज्ञान और यंत्रोंहारा कृषि करना सीखें और वैज्ञानिकरीतिदाराही पशुओंको पाला करें. स्वयं हल चलाकर योडीसी भूमिमेंही खेती करलेना कृषि करना नहीं कहलाता । कृषिविद्यापर आज कल जितनी उत्तमर पुस्तकें लिखीगई हैं उनको देखनेसे ही पता लगसक्ता है, कि, यूरोप, अमेरिकामें किस भाति कृषि हारा लोगोंको धन प्राप्त होरहाहै; वह लोग इतने निपुण बन गये हैं कि जितनी भूमिमें हम लोग फसलका एक भाग उत्पन्न करते हैं उतनीही भूमिमें वह लोग चार भाग प्राप्त करते हैं. भारतवर्ष में सूर्यप्रकाश, भूमि, और खात की नहीं सुगमता है और साथ में मजदूरी भी बढी सस्ती है. फिर भी यहाँ की पैदावार को हम लोग अन्य देशोंके बराबर नहीं लासक्त यहबडे शोककी बात है [८] चारों वर्षों में, जिनका सानपान और अन्य २ व्यवहार एकसा है यथा गोड और सारस्वत ब्राह्मणोंका, परस्पर विवाहादि सम्बन्ध होना चाहिये । बहुत जगह अब भी यह देखनेमें आता है कि, जैनी और वैष्णव वैश्योंमें परस्पर भिन्न २ सम्प्रदायी भेद होनेपर भी रोटी बेटीका सम्बन्ध होता है, तो एकही सम्प्रदाय और एकही आचार व्यवहार रखनेवाले मनुष्यों में यह सम्बन्ध क्यों नहीं होना चाहिये? [अपूर्ग] , ८ अथ पंचमोऽध्यायः। ॥अर्जुन उवाच॥ संन्यासं कर्माणां कृष्ण पुनर्योगं चशंससि यच्छेय एतयोरेकं तन्मे ब्रूहि सुनिश्चितम्। दोहा-कवहूँकहतसंन्यासको, कबहुंकर्मकोयोग ।। निश्चयकरिएकैकहो, मेटौकिनभवरोग ॥१॥ हे कृष्ण ! तुम कौके परित्यागका भी उपदेश देते हो और फिर कर्म करने के लिये भी कहते हो [यह क्या बात है ] इन दोनोंमें जो श्रेष्ठ है उस एक बातको निश्चय करके मुझसे कहो॥१॥ श्रीभगवानुवाच ॥ संन्यासः कर्मयोगश्च निःश्रेयसकरावुभौ॥ तयोस्तु कर्मसंन्यासात्कर्मयोगो विशिष्यते दोहा-कर्मयोगसंन्यासअरु, दोऊएशुभदैन । कर्मयोगसंन्यासमें, कर्मनलहियतचैन ॥२॥ यह सुन श्रीकृष्ण कहने लगे कि हे अर्जुन ! कर्मोंका त्याग और कर्मयोग अर्थात काँका करना ये दोनोंही कल्याण करनेवाले हैं किन्तु इन दोनों में कर्मसंन्याससे कर्मश्रेष्ठ है अर्थात् कर्म करते करते चित्तके शुद्ध होनसे संन्यास होताहै ॥२॥ HAGAL
अध्याय५॥
ज्ञयःसनित्यसंन्यासीयोनद्वेष्टिनकांक्षति
निहो हिमहाबाहोसखंबंधात्प्रमुच्यते ३
दोहा-देपतजैचाहहितजै, सोसंन्यासीजानि॥
रागद्वेषसोंजेरहित, ताहिछुट्योतूभानि॥३॥
हे महाबाहो! जो दुःख सुखसे रहित रहता है वही नित्य संन्यासी है
अर्थात वह सदाही कौका परित्याग किये रहता है जो न तो
किसीसे द्वेष करता है और न किसी बातकी इच्छा करता हैं !
| ऐसा पुरुषही सुखपूर्वक संसारबन्धनसे छूट जाता है ॥३॥
सांख्ययोगौपृथग्बाला:प्रवदंतिनपंडिताः
एकमप्यास्थितः सम्यगुभयोविंदते फलम्
दोहा-योगसांख्यकहत, सूरखपंडितनांहि ॥
दोउनमेंएकैभर्जे, दोऊफलहैताहि॥४॥
हे अर्जुन ! अज्ञानीही सांख्य और योगको जुदा जुदा कहते हैं,
परन्तु पंडितजन कभी ऐसा नहीं कहते, जो इन दोनों से एकभी
अच्छी तरह स्थित होजाता है. वह दोनोंका फल पाता है।॥ ४ ॥
यत्सांख्यैःप्राप्यतेस्थानंतयोगैपिगम्यते
एक सांख्यंचयोगच यःपश्यलिसपश्यति
दोहा-स्थानजुलहियेसांख्यते, सोइयोगतेहोइ ॥
सांख्ययोगएकोगनें, ताकोज्ञानीजोइ ॥५॥
५२६ भगवद्गीतामापाटीका. 1 हे अर्जुन! सांख्य अर्थात ज्ञानसे जो स्थान मिलता है वही कर्म- योगसेभी मिलता है. इससे जो ज्ञान और कर्मको एकही देखते हैं वही अच्छी भांति देखनेवाले विद्वान् हैं ॥५॥ संन्यासस्तुमहावाहो दुःखमाप्तुमयोगतः योगयुक्तो मुनिब्रह्म न चिरेणाधिगच्छति दोहा-लहसंन्यासहिदुःखसों, विनकर्मनुरेमिंत ।। योगजुगतजेकरतहै, रहतब्रह्मनिहचिंत॥६॥ हे महाबाहो अर्जुन ! विना कर्मयोगके संन्यासका प्राप्त होना बहुत कठिन है और कर्मके करनेवाले मुनिजन कर्म करनेसे चित्तशुद्धि- द्वारा बहुत शीघ्रही ब्रह्मको प्राप्त होजाते हैं ॥ ६ ॥ योगयुक्तो विशुद्धात्माविजितात्माजितेंद्रियः सर्वभूतात्मभूतात्मा कुर्वन्नपि न लिप्यते॥ 'दोहा-इंद्रीजितहैशुद्धहिय, योगयुक्तिजोकोय॥ जीवनजानैआतमा, कर्मलिप्तसुनहोय ॥७॥ हे अर्जुन ! जो कर्मयोगसे युक्त है अर्थात् कामनारहित कर्म कर- ताहै, जिसका चित्त शुद्ध है, जिसने अपनी आत्मा और इन्द्रियां जीत ली हैं और जो अपनी आत्माको संपूर्ण प्राणियों की आत्मासे भिन्न मानता है, वह कर्म करता है तौभी उनमें लिप्त नहीं होता है नैवकिश्चित्करोमीतियुक्तो मन्येत तत्त्ववित अध्याय ५। . ११७. - पश्यन् शृण्वन् स्पृशन जिघनश्नन् गच्छन् स्वपन श्वसन्॥८॥ दोहा-ज्ञानीकर्मानकरतहूं, किये लेइनहिंमानि ॥ सूंघतदेखतछुवतपुनि, सुनतचलतहूजानि॥८॥ हे अर्जुन ! कर्ममें युक्त तत्त्वज्ञानी लोग देखते हैं, सुनते हैं. स्पर्श करते हैं, सूंघते हैं, खाते हैं, चलते हैं, सोते हैं, श्वास लेते हैं तौभी यही जानते हैं कि मैं कुछभी नहीं करता ॥ ८॥ प्रलपन्विसृजन्गृह्णन्नुन्मिपन्निमिषन्नपि ॥ इन्द्रियाणींद्रियार्थेषुवर्ततइति धारयन् ९ दोहा-सोवतजागतगहतुहूं, बोलतढारिहुंदेत॥ इंद्रियविषयनमेंपरी जानतहैयहहेत ॥९॥ वे बोलते हैं, छोडते हैं, ग्रहण करते हैं, आंख खोलते हैं, बन्द कर तेहैं, परन्तु यही जानते हैं कि मैं कुछ नहीं करता और वे यही विचार करते हैं कि इन्द्रियांही अपने अपने विषयमें तत्पर हैं ॥९॥ ब्रह्मण्याधाय कर्माणि संगं त्यक्त्वाकरोति यः लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रमिवांभसा १० दोहा-कर्मकरैतजिसंगको, सबकोब्रह्महिमानि॥ ताकोपापनलगतुहै, पदमपत्रजलजानि ॥१०॥ -
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भगवद्गीताभापाटीका
जो मनुष्य कर्म करता है और उन कमाको ब्रह्ममें अर्पण कर
फलकी कामनाको छोड़ देता है उस पुरुषसे पाप ऐसे लिप्त नहीं
होते हैं, जैसे कमलपत्रपर जल नहीं ठहर सकता है ॥१०॥
कायेनमनसावुद्ध्याकेवलैरिन्द्रियैरपि ।
योगिनःकर्मकुर्वतिसंगत्यक्त्वात्मशुद्धये
दोहा--तनकरिमनकरिबुद्धिकरि पुनिइंद्रिनक्कीन
संगछांडिकर्मनिकर, योगीहोहिनलीन ।।११।।
हे अर्छन ! शरीर, मन बुद्धि और केवल इन्द्रियोंसे योगीजन
फलकी कामनाओंको छोड कर्म करते हैं वह कर्म करना चित्तकी
शुद्धिके लिये है ॥११॥
युक्तःकर्मफलं त्यक्त्वा शांतिमाप्नोतिनैष्ठिकीम
अयुक्तः कामकारेण फले सक्तो निवध्यते ।
दोहा-ज्ञानीहमुक्तीलहै, करै कर्मफलछांड ॥
मुरखफलकी आसकर, बंधतकामनाआड १२
हे अर्जुन ! जो कर्मफलकी कामनाको छोड कर्म करनेमे तत्पर
रहता है वह ईश्वरमें निष्ठारूप शांति पाता है और जो ईश्वरसे विमु-
खहै और फलकी कामना मन लगाकर काम करता है वही कर्मसे
बंधाहुआ है ॥ १२॥
सर्वकर्माणि मनसा संन्यस्यास्ते सुखंवशी
नवद्वारे पुरे देही नैव कुर्वन्न कारयन्॥१३॥
अध्याय ५॥ दोहा-मनकरिकर्मनिजेतजैं, ज्ञानीतेसुखआहि॥ नवेद्वारपुरभेवसत. करतकराक्तनाहि ॥१३॥ हे अर्जुन ! जितेन्द्रिय पुरुष इस नौ द्वारके पुर अर्थात् नौ इन्द्रि- योसे युक्त देहमें मनसे संपूर्ण कार्मोको त्यागकर सुखपूर्वक रहते हैं, वे अहंकारके न होनेसे स्वयं कोई काम नहीं करते हैं और ममताके अमावसे औरभी किसीसे कुछ नहीं कराते हैं ॥ १३ ॥ न कर्तृत्वं न कर्माणि लोकस्य सृजति प्रभुः न कर्मफलसंयोग स्वभावस्तु प्रवर्तते१४॥ दोहा-ईश्वरनहिकर्मनिकरत, नाहिकर्मकरतार॥ कर्मफलनहूनहिंकरत, प्रकृतिकरतविस्तार १४ प्रभु इस जीवके न कतीपन, न कर्म, न कर्मफलको सजता है,। इन सबकी प्रवृत्ति करानेवाली प्रकृति है अर्थात् जीव अपने पूर्वज न्मके कर्मानुसार कर्म करने लगता है ॥ १४॥ नादत्ते कस्यचित्पापनचैवसुकृतं विभुः। अज्ञानेनावृतं ज्ञानं तेन मुह्यति जंतवः॥ दोहा-सुकृतनकाहूकोगहै, औरपापनहिलेत ॥ ढाप्योज्ञानअज्ञानसों, मोहनप्रगटनदेत॥१५॥ हे अर्जुन ! ईश्वर न किसीके पापको ग्रहण करता है न किसीके पुण्यको ग्रहण करता है, इस जीवका ज्ञान अज्ञानने ढक रक्खा है,
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भगवद्गीताभापाटीका
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जो मनुष्य कर्म करता है और उन काँको ब्रह्ममें अर्पण कर
फलकी कामनाको छोड़ देता है उस पुरुषसे पाप ऐसे लिप्त नहीं
होते हैं, जैसे कमलपत्रपर जल नहीं ठहर सकता है ।।१०॥
कायेनमनसाबुद्ध्याकेवलैरिन्द्रियैरपि ।
योगिनःकर्मकुवैतिसंगत्यक्त्वात्मशुद्धये
दोहा-तनकरिमनकरिबुद्धिकरि, पुनिइंद्रिनहूंकीन
संगछांडिकर्मनिकर, योगीहोहिंनलीन ॥११॥
हे अर्जुन ! शरीर, मन बुद्धि और केवल इन्द्रियोंसे योगीजन
फलकी कामनाओंको छोड कर्म करते हैं वह कर्म करना चित्तकी
शुद्धिके लिये है ॥ ११॥
युक्तःकर्मफलं त्यक्त्वा शांतिमाप्नोतिनैष्ठिकीम
अयुक्तः कामकारेण फले सक्तो निवध्यते।।
दोहा-ज्ञानीहूमुक्तीलहै, करै कर्मफलछांड ॥
मूरखफलकी आसकर, बंधतकामनाआड १२
हे अर्जुन ! जो कर्मफलकी कामनाको छोड़ कर्म करनेमे तत्पर
रहता है वह ईश्वरमें निष्ठारूप शांति पाता है और जो ईश्वरसे विमु-
खहै और फलकी कामनामें मन लगाकर काम करता है वही कर्मसे
बंधाधुआ है॥१२॥
सर्वकर्माणि मनसा संन्यस्यास्ते सुखंवशी
नवद्वारे पुरे देही नैव कुर्वन्न कारयन्॥१३॥
अध्याय ५॥ ११९ दोहा-मनकरिकर्मनिजेतजैं, ज्ञानीतेसुखआहि ॥ : नवेंद्वारपुरवसत. करतकराक्तनाहि ।। १३ ॥ हे अर्जुन ! जितेन्द्रिय पुरुष इस नौ द्वारके पुर अर्थात नौ इन्द्रि- योसे युक्त देहमें मनसे संपूर्ण कामोंको त्यागकर मुखपूर्वक रहते हैं, वे अहंकारके न होनेसे स्वयं कोई काम नहीं करते हैं और ममताके अमावसे औरभी किसीसे कुछ नहीं कराते हैं ॥ १३ ॥ न कर्तृत्वं न कर्माणि लोकस्य सृजति प्रभुः न कर्मफलसंयोग स्वभावस्तु प्रवर्तते१४॥ दोहा-ईश्वरनहिकर्मनिकरत, नाहिकर्मकरतार॥ कर्मफलनहूनहिंकरत, प्रकृतिकरतविस्तार १४ प्रभु इस जीवके न कर्तापन, न कर्म, न कर्मफलको सृजता है, इन सबकी प्रवृत्ति करानेवाली प्रकृति है अर्थात् जीव अपने पूर्वज- न्मके कर्मानुसार कर्म करने लगता है ॥१४॥ नादत्ते कस्यचित्पानचैवसुकृतं विभुः ।। अज्ञानेनावृतं ज्ञानं तेन मुह्यति जंतवः ॥ दोहा-सुकृतनकाहूकोगहै, औरपापनहिलेत ॥ ढाप्योज्ञानअज्ञानसों, मोहनप्रगटनदेत॥१५॥ हे अर्जुन ! ईश्वर न किसीके पापको ग्रहण करता है न किसीके पुण्यको ग्रहण करता है, इस जीवका ज्ञान अज्ञानने ढक रक्खा है, भगवद्गीताभा याता. . इसीसे अज्ञानी जीव मोहमें फंसकर ईश्वरमै विषम हष्टि रखते हैं।।१५ ज्ञानेन तु तदज्ञानं येषां नाशितमात्मनः तेषामादित्यवज्ज्ञानं प्रकाशयतितत्परम् दोहा-ज्ञानभये अज्ञानवह जिनकोपावतनाश ॥ तिनकौरविसमज्ञानवह,करतसुपरमप्रकाश १६ हे अर्जुन ! जिनका यह विषय अज्ञान आत्मज्ञानसे नष्ट होगया है, उनका वह ज्ञान सूर्यकेसमान प्रकाश करता है और अंधकार- रूप सब दुख सुखको मिटा देता है ॥ १६ ॥ तहुद्धयस्तदात्मानस्तनिष्ठास्तत्परायणाः गच्छंत्यपुनरावृत्तिं ज्ञाननिर्धतकल्मषाः॥ दोहा-जेमनकोअरुबुद्धिको, राखतईश्वरमाँह॥ जन्ममरणतिनकोनहीं, सुक्तिहोतनरनाँह॥१७॥ उस परमात्माहीमें जिनकी बुद्धि है, उसहीमें जिनकी आत्मा है, उसहीमें जिनकी निष्ठाहै, उसीमें जो तत्पर हैं और उसी परमात्माकी कृपासे ज्ञानद्वारा जिनके पाप नष्ट होगये हैं वे इस संसारमें फिर जन्म नहीं लेते हैं अर्थात् मुक्त होजाते हैं ॥ १७ ॥ विद्याविनयसंपन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि । शुनि चैव श्वपाके च पंडिताः समदर्शिनः॥
अध्याय ५॥
१२१
दोहा-विद्याविनयसपन्नदिज, गोगजसुपचौश्वान
ज्ञानीइनकोसमगनत, भेदलेतनहिमान ॥१८॥
जो विद्धान हैं वे विद्या और विनयसे संपन्न ब्राह्मणमें गौ, और
हाथ में कुत्ते तथा चांडालमें समान दृष्टिसे देखते हैं अर्थात् अपने में
और उनमें कुछ भेद नहीं मानते है ॥ १८॥
इहैव तैर्जितः सर्गों येषां सास्ये स्थितं मनः
निर्दोषंहिसमंब्रह्मतस्माब्रह्मणितेस्थिताः
दोहा-समताजिनकेहीयमें. तिनजीत्योसंसार ॥
समताब्रह्महिकोकहत, ब्रह्मलीननिरधार॥१९॥
जिनका मन समानतामें स्थित है अर्थात जो सबको समान दृष्टिसे
देखते हैं उनने यहीं यह संसार जीत लिया है, क्योंकि ब्रह्म दोषर-
हित और समान है इससे ऐसे जन ब्रह्ममें स्थित होजाते हैं ॥१९॥
न प्रहृष्येत्प्रियं प्राप्य नोदिजेत्प्राप्य चाप्रियम्॥
स्थिरबुद्धिरसंमूढो ब्रह्मविद्रह्मणि स्थितः॥
दोहा--सुखपायहरफ्नहीं, दुखपायेनरिसाय॥
राखैथिरनिजबुद्धिको, ब्रह्महिरहै समाय॥२०॥
हे अर्जुन! जो प्रिय वस्तुको पाकर प्रसन्न नहीं होते हैं और अप्रि-
यको पाकर शोक नहीं करते हैं अर्थात् जिनके न हर्ष है न विषाद,
ऐसे स्थिर बुद्धिवाले,मोहरहित ब्रह्मवेत्ता ब्रह्ममें स्थित रहते हैं॥२०॥
१२२
भगवद्गीताभाषाटीका.
बाह्यस्पर्शष्वसत्तात्मा विदत्यात्मानि यत्सुखम्
सब्रह्मयोगयुक्तात्मा सुखमक्षय्यमश्नुते ॥
दोहा-बाहिरके सुखकोतजै, हियसुखरहै सुजानि।
ब्रह्मविषैचितकोधरै, लेहिसुआनंदमानि ॥२१॥
हे अर्जुन ! जो बाह्य इन्द्रियोंके रूपरसादि विषयों में आसक्त नहीं
है वे अपनी आत्मामें परम शान्तिरूप सुखका अनुभव करते है और
इस शान्तिसे वे ब्रह्मयोगमें अपनी आत्माको लगा समाधिद्वारा अ.
क्षय सुखका अनुभव करते हैं ॥२१॥
ये हि संस्पर्शजा भोगा दुःखयोनय एव ते
आयतवंतः कौंतेय न तेषु रमते वुधः॥२२
दोहा-विषयजितेसंसारके, तेहैंदुखकेमूल॥
उपजतविनशतहैंतिन्हैं, पंडितगहैनभूल॥२२॥
हे अर्जुन ! जो रूप रसादि इन्द्रियोंके भोगहै वे दुःखके मूल कारण
हैं. ये भोग उत्पन्न होते हैं और मिट जाते हैं. इससे विवेकी जन
विषयों में रमण नहीं करते हैं ॥२२॥
शनोतीहैव यः सोढुंपाकशरीरविमोक्षणात
कामक्रोधोद्भवं वेगं स युक्तः स सुखी नरः॥
दोहा-कामक्रोधकेवेगको, जोसहिसकैसुभाय॥
तेयोगीकितईरहैं, स्थिरसुखलपटाय ॥२३॥
अध्याय ५। १२३ . हे अर्जुन! जो मनुष्य जीतेजी अथवा जबतक शरीरमें शक्ति बनी रहै तबही तक क्रोधके बेगोंको जीत लेता है वही इस संसारमें योगी है और वही सुखी हैं क्योंकि पुरुषार्थ घटनेपर तो सभीके काम क्रोध घटजाते हैं जैसा कहा भी है “ धातुपु क्षीयमाणेषु शमः कस्य न जायते" ॥२३॥ योऽतःसुखोऽन्तरारामस्तथाऽतज्योतिरेव यः सयोगीब्रह्मनिर्वाणं ब्रह्मभूतोऽधिगच्छति दोहा-जाकेहियेप्रकाशहै, अंतरसुखआराम ॥ वहयोगीपरब्रह्ममें, लहैब्रह्मकोधाम ॥२४॥ हे अर्जुन ! जो अपनी आत्माहीमें सुखका अनुभव करता है और अपनी आत्माहीमें रमण करता है और जो अपने अन्तःकरणके आत्मसंबधी ज्ञानसे प्रकाशित है वही योगी ब्रह्मरूप होकर ब्रह्मके निर्वाण पदको प्राप्त होजाता है ।। २४॥ लभंते ब्रह्म निर्वाणमृषयःक्षीणकल्मषाः॥ छिन्नद्वैधा यतात्मानः सर्वभूतहिते रताः॥ दोहा--जोज्ञानीपापनितजै, होतब्रह्मलीन ॥ भेदनतिनकेजीयमें रहतसबनसोंदीन ॥२५॥ जिनके दोभाव नहीं है और अपनी आत्माको अपने बशमें कर रखखा है और जो प्राणीमात्रकी भलाई चाहते हैं, जिनके संपूर्ण पाप क्षीण हो गये हैं वेही निर्वाण पदको पाते हैं ।। २५ ॥
१२४ भगवद्गीताभाषाटीका. कामक्रोधवियुक्तानां यतीनां यतचेतसाम् अभितो ब्रह्म निर्वाणं वर्तते विदितात्मनाम् ॥ दोहा-कामक्रोधतेजेरहित निजवशकीन्होंचित्त। आत्मतत्वकोजानिकर, ब्रह्मचदिशिमित्त ॥ जो काम क्रोधसे रहित हो गये हैं जो संघमपूर्वक रहते हैं जिनने अपना मन वशीभूत कर रक्खा है और जो आत्मातत्त को जानते हैं उनके सब ओर ब्रह्ममुख वर्तमान रहता है ॥ २६ ॥ स्पर्शान्कृत्वा बहिर्बाह्यांश्चक्षश्चैवांतरे भ्रुवोः प्राणापानौ समौ कृत्वा नासाभ्यंतरचारिणो। दोहा-तजैविषयसंसारमें, दृष्टिभोहमधिराषि॥ प्रानअपानहिसमकरत, नासामधिअभिलापि॥ रूपरसादि इन्द्रियों के वाह्य विषयोंको वाहर करक और नेत्रोंकी दृष्टि को भौंहके मध्यमें रख प्राण और अपान वायुको समान रख कुंभक प्राणायाम करें, भूमध्यमें दृष्टि रखना इसलिये कहा है कि बन्द करनेसे तो निद्रा का भय है और खुले रखनेसे वाह्य विषयोंपर मन दौडताहै और अधखुले रहने से भ्रुकुटियोंके बीच दृष्टि निकट रहती है और दोनों वायु सम होकर नासिकारन्यसे संचार करतीहै अध्याय ५। १२५ जितेंद्रियमनोबुद्धिर्मुनिर्मोक्षपरायणः ॥ विगतेच्छाभयक्रोधो यःसदा मुक्त एव सः२८ दोहा-जीतैइद्रीबुद्धिमन, मुक्तिहिमेंमनदेय ।। इच्छाभयक्रोधहितजै, मुक्तिपदारथलेय ॥२८॥ वह मुनि जिसने अपनी इन्द्रियां, मन और बुद्धि जीत लिये हैं, जो मोक्षहीका आश्रय लिये रहता है और जिसके इच्छा, भय और क्रोध दूर होगये हैं वह सदा ही जीवन्मुक्त है ॥ २८ ॥ भोक्तारं यज्ञतपसां सर्वलोकमहेश्वरम् ॥ सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मांशांतिमृच्छति।। दोहा-तपयज्ञनकोभोगकै, सबलोकनिकोईश ।। शांतिलहैयोंजानिकै, मोकोप्रभुजगदीश॥२९॥ सांख्ययोगअरुकर्मको, दियोविकल्पमिटाय॥ यातेसेवनदुहुनको, कह्योपांचवेंध्याय ।। १ ।। कह्योजगतमनभावतो,वरन्योयोग संन्यास॥ यदुपतिआनंदरामको, दीजैभक्तिविलास ॥२॥ सव यज्ञोंऔर तपोंका भोगनेवालासंपूर्ण लोकोंका ईश्वर और सब प्राणियोंका सहद जो मुझे जानते हैं उन्हींकोशांति मिलती है २९ समीक्षा-उपरोक्त श्लोकमें जो यह कहा है कि मैं यज्ञ, तपका रक्षकहूं उससे आभप्राय यह है कि जो पुरुष यज्ञ अर्थात् परोपका- भगवद्गीताभाषाटीका. रादि कर्म और तप अर्थात् अपने मन और इन्द्रियोंके दमन रूप कर्म को करते हैं, उनको में विविध दुःखतापसे बचाता हूं. इतिश्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु बनविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे विचारदर्पण दोहासहितभाषा- टोकायां संन्यासयोगोनाम पंचमोऽध्यायः ॥५॥ समीक्षा-इस पांचवे अध्याय में श्रीकृष्ण महाराजने अर्जुन को यह समझायाहै कि मनुष्य को उत्तम कार्य करते यदि विघ्न उपस्थित हों तो चित्तमें घबराहट न आने दे, किंतु सुख दुःखको समान समझः ते हुए एक वीर पुरुष की भांति देश सेवाऔर जाति सेवा के कामों में आगेही आगे बढते जाना चाहिये न कि थोडा साविघ्न उपस्थित होने पर कायर होकर गीदड की भांति दुमदबा भाग जाना चाहिये। विजय की इच्छा करने वाले पुरुष को इंद्रियोंके भोग विलास का दास कदापि नहीं बनना चाहिये । जो केवल इन्द्रियोंके सुखोंकोही ढूंढनेवाले हैं चाहे उनकी ओरसे देश या जाति रसातलको जाए ! उनसे कदापि देश या जाति या स्वयं उनकी आत्मा की भलाईकी आशा बुद्धिमानोंको न रखनी चाहिये । यही गम्भीर उपदेश अध्याय ५ के श्लोक २० से लेकर २८ पर्यंत दिये गये हैं। और अंतके श्लोक २९ में किस सुंदरतासे यह दिखाया है कि जो उत्तम और धार्मिक पुरुष हैं उन को यह दृढविश्वाप्त रखना चाहिये "कि हमको हानि पहुंचाने की किसी को भी सामर्थ नहीं है, अतःहमको अपने लक्ष्यकी प्राप्तिमें दृढ पुस्पार्थ करते रहना चाहिये, ईश्वर सवप्रकारसे हमको सहायता देनेवाला है; कामी, धर्मध्वजी, पामर, अन्यायी और लालची मनुष्य, चाहे वह प्रत्यक्षमें कैसंही बली, धनान्य और स्मृद्धिमान क्यों न दीख पड़ें हमारा बाल भी बांका नहीं करसक्ते"। ~ दर्शन ५। १२७ . (पृष्ठ ११३ से आगे) [९.नीची' श्रेणीके मनुष्योंके साथ उच्च श्रेणी मनुष्योंको उचम वर्ताव करना चाहिये, उनको हिन्दु (आर्य) धर्मका गौरव और अभिमान सिखाकर उनके साथ इस प्रकार प्रेमका वर्ताव करना चाहिये कि वह ईसाई, मुसलमान नहीं बनने पावें और जब वह योग्य बनकर अपना मलीन धंधा छोडदें, तो उनके साथ छूआछूत करनी छोड दी जाय । उन में से जो लोग इस समय ईसाई, मुसलमान होगये हों उनकी प्रायश्चिच दारा शुद्धिकरलीजावे और पुनः हिन्दु (आर्य) धर्म की गोदमें उनको लाकर “शोधित आर्य (हिन्दु ) उनका जातिनाम रक्खाजाय । दिनप्रतिदिन हिन्दु [आर्य ] जाति की संख्या घट रही है. इस प्रवाहको यदि न रोका जायगा तो हिन्दु [आर्य ] जातिके नष्ट होनेका भय है। पिछले समयमें भी शुद्धि के अनेक दृष्टांत मिलते हैं यया:- (क) राजा जरासंघ का मगधदेश में लाखों शूद्रों को ब्राह्मण बनाना, जिनको अभी तक "जरासंघिया" ब्राह्मण कहते हैं (ख) शंकराचार्य का योद्ध पंथवालों को ब्राह्मणादि बनाना, जब कि वह एकही वर्ण हो रहे थे. शंकराचार्यने गुण कर्मानुसार यज्ञोपवीत संस्कार करके उनको फिरसे ब्राह्मण, क्षत्री, वैश्य बनाये (ग)दक्षिण निवासी ब्राह्मणों द्वारा म्लेच्छजाति के शक लोगों का जो दक्षिण भारतमें आये, शिवधर्मी वैश्य बनाया जाना (घ) राजपूताना प्रांत बीकानेर आदि राज्यों में दो सौ तीन सौ वर्ष पूर्व शूद्रों का ब्राह्मण बनाया जाना। अतिप्राचीन समय में भी योग्य होने पर गुणकर्म से ब्राह्मणादि बनने के कितने ही दृष्टांत मिलते हैं, परन्तु जन्मसे ब्राह्मणादि होनेवालोंका सम्मान अधिक होताथा. [१०] वर्तमान समय में जो लोग "पतित जाति के.नाम से पुकारे जाते हैं उनको चाहिये, कि अपना मलिन धंधा बताने में लज्जित न हों; और न उनको दुःखी और निरुत्साही ही होना चाहिये; क्योंकि प्रथम तो धंसे जातिका कोई सम्बन्ध नहीं है। दूसरी बात यहभी है कि- इतिहास, और उनकी दंतकथाओं के जानकारोंने पता लगाया है कि इस समय जो मोची चमार हैं, वह एक समय उच्चजाति वाले थे । अब भी मलिन धंधा छोडने पर उच्चजाति की गणना में आसक्त हैं क्योंकि प्रत्यक्ष में भी लोग प्रायः गुणकर्मानुसार ही मान पारहे हैं। भारतवर्ष के पूर्वज ऋषिगणोंने पादपूजा का उपदेश दिया है, इस बात पर ध्यान देनेसे पता लगता है कि, ऋषि लोग पैरों का कितना महत्व समझते थे । अभी तक भी पूजनीय मनुष्योंके पैरों की ही पूजा होरही है न कि शरीर के किसी दूसरे अंगकी । बिना पैरों के जेसे शरीर किसी काम का नहीं, वैसेही हिन्दु [आर्य] समाज रूपी शरीर भी शूद्ररूपी पेरोंके बिना किसी ૨૨૮ विचार दर्पण: . कामका नहीं; इसीलिये इन के साथ सबको प्रेम का वर्ताव करना चाहिये। इस दृष्टान्तसे हमारा यह अभिप्राय नहीं है कि शूद्रोंको पूजना चाहिये या हिजातिके मनुष्योंकी अपेक्षा उनको उत्तम समझना चाहिये, किन्तु आशय यह है कि उनको तुच्छ समझकर उनका तिरस्कार नहीं किया जाय. शूद्रों को यह जानकर उत्साह ग्रहण करना चाहिये कि,धर्म ग्रंथों में उच्चम शूद्र का वैसा ही सम्मान करना लिखा है जैसा कि एक बाह्मण का। हमारे अवतार और धर्म के आचार्योंने शूद्रों का आतिथ्यसत्कार ग्रहण किया है, जैसा कि रामचंद्रजी महाराज मुनियोंके आश्रममें न जाकर भीलनी के आश्रममें गये और उसके शुद्ध प्रेम से इतने संतुष्ट हुए कि, उसके हायके उच्छिष्ट बेरों को खाया. भरतजी महाराज और बशिष्ठ मुनि गुहक भीलके स्थानपर गये और उस का आति- श्य सरकार ग्रहण किया। आजकल यदि कोई विचारहीन मनुष्य उनके साथ उत्तम व्यवहार न करें तो उनको उस वातसे अप्रसन्न नहीं होना चाहिये, क्योंकि धर्म ग्रंथों में तो योग्यतानुसार उनका पूरार आदर और सम्मान करना लिखा है। शूद्र शब्द का अर्थ पवित्रताको त्यागनेवाला है,जैसा कि इस शब्दकी व्युत्पचिसे, स्पष्ट प्रतीत होता है; यथा--"शूचंद्रवतीति शूद्रः” अर्थात् जो शुद्धि और सात्विकताको त्यागकर मलीनता और दरिद्रता दोनों को धारण करता है वहीं शूद्र है। पवित्र, विद्वान् और धनवान होने पर उस की शूद्र संज्ञा नहीं रहती. [११] देशीशिल्प, कृषि और वाणिज्यको उन्नत करनेके लिये यहींपर उसर विद्याको जाननेवाले मनुष्य उत्पन्न किये जायें । एक समय ऐसा था कि भारत वर्षका बना हुआ कई करोड रुपयोंका कपडा बाहर यूरोप आदि देशोंको जाता था। परन्तु हम लोगोंने यंत्रादि की खोज न करके पुराने ढंग परही शिल्पादिका काम प्रारंभ रक्खा, और यूरोप अमेरिका आदि देशोंक लोग नये २ यंत्र कलायें निकालकर आगे बढते गये और इन विद्यामोंको बहुत उन्नत कर लिया। इस का परिणाम यह हुआ कि,हम लोग अपने लिये आवश्यकीय वस्तुएँ न बनासकने के कारण उन देशोंकी ओर ताकते रहगये। जबतक उन लोगों के समान हम भी मिलकर कम्पनिये नहीं खोलेंगे और यहाँके लोगों को विद्वान नहीं बनायेंगे, तब तक उन देशों के समान उन्नति नहीं कर सकेंगे। वहां के लोग व्यापारमें कितने उन्नत होगये हैं इसका पता इसी बातसे लगतकाहे कि अमेरिकाकी, स्टेंडर्डओईल कम्पनी अर्यात् "किरोसीन तेल का व्यापार करने वाली मण्डली" का स्वामी एक वर्ष में अगरह करोड रुपये की आय रखता है । यूरोप, अमेरिका में ही अनेक अर्बपति धनाढय लोग पड़े हैं। यह सब सम्पति समयानुकूल यंत्रा हारा व्यापार में उन्नति करनेका ही परिणाम है। [अपूर्ण] ------ ; अंथ षष्ठमोऽध्यायः॥ ॥श्रीभगवानुवाच॥ अनाश्रितः कर्मफलं कार्य कर्म करोति यः स संन्यासीच योगी चननिरग्निर्नचाक्रियः दोहा-कर्मफलनचाहनहीं, कर्मनिकरतजुआहि ॥ योगीसंन्यासीवही, अगिनिअक्रिया नाहि। हे अर्जुन ! जो अपने किये हुए कम्मोंके फलकी इच्छाको छोड अपना नित्य नैमित्तिक कर्म करते रहते हैं, वेही संन्यासी और वेही योगी हैं और जो अग्निहोत्रादिकर्म त्याग देते हैं और वापी कूप खननादि कर्मोंका परित्याग कर निप्किय हो जाते हैं नवे संन्यासी हैं, न वे योगी है, इसमें यह दिखाया है कि, संन्यास लेने परभी आन्हिककर्म करना अवश्य है और कर्म करते हुएभी कर्मफलकी इच्छा न करना संन्यास है ॥१॥ यं संन्यासमिति प्राहुर्योगं तं विद्धि पांडव न ह्यसंन्यस्तसंकल्पोयोगी भवति कश्चन दोहा-जाकौंसंन्यासीकहै, वहैयोगतूजानि ॥ . बिनुसंन्यासहियोगनहिं, यहैसाँचहूंमानि ॥२॥ हे अर्जुन ! जिसको संन्यास कहते हैं उसीको योगजान, ऐसा कर्म निष्ठ वाज्ञाननिष्ठ कोई नहीं है.जो विना फल संकल्पके त्यागेयोगी हो सकताहो क्योंकि कर्मफलका त्याग संन्यासमें भी है और योगमें भी है -- ana
भगवद्गीताभापाटीका.
आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते ।
योगारूढस्य तस्यैव शमः कारणमुच्यते
दोहा-योगहिकर्मनतेलहत. ज्ञानीचित्तविचारि॥
योगलहेशांतीगहै, विषयइंद्रियनमारि ॥३॥
जो ज्ञानयोगकी प्राप्ति करना चाहते हैं उनको ज्ञान प्राप्तिका कारण
कर्म कहा है क्योंकि निष्काम कर्म करनेसे चित्त शुद्ध होता है और
चित्त शुद्ध होनेसे ज्ञान की प्राप्ति होती है और उस ज्ञानमाप्तिसे मनु-
ध्यको शान्ति मिलती है ॥३॥
यदा हि नेंद्रियार्थेषु न कर्मस्वनुषजते॥
सर्वसंकल्पसंन्यासी योगारूढस्तदोच्यते॥
दोहा-विपयनसों अस्कर्मसों, होयप्रीतिजबदूरि।।
सवसंकल्पनकोत, योगरहैजबपूरि॥४॥
हे अर्जुन ! जब मनुष्य इन्द्रियोंके रूपरसादि विषयों में आसक्त
नहीं होता है और न कर्ममें आसक्त होता है, और संपूर्ण फलसंक-
ल्पोंका परित्याग कर देता है. वही योगारूड कहलाता है॥ ४॥
उद्धरेदात्मनाऽत्मानं नात्मानमवसादयेत
आत्मैव ह्यात्मनो बंधुरात्मैव रिपुरात्मनः
दोहा-निजआतमकोउदरत, अधोगमनजुकरेय
आतमहीरिपुआपको, आतमहीसुखदेय ॥५॥
अध्याय ६ हे अर्जुन ! विवेकी पुरुषको उचित है कि, अपनी आत्माका संसारसे आपही उद्धार करे, उसकी अधोगति न करे, क्योंकि काम- नासे रहित जो आत्मा अर्थात् अपना मन बंधुके समान उपकारी है और सकाम आत्माही अपना शत्रु है ॥ ५ ॥ बंधुरात्मात्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना जितः अनात्मनस्तु शत्रुत्वे वर्तेतात्मैव शत्रुवत्॥ दोहा-आपहिजीत्योआतमा, सोईबंधुजुयाहि । जिनजीत्योनाहीजुवह, अरिजानियेमुताहि॥६ हे अर्जुन ! जिसने अपनी आत्मासे आत्मा जीत ली है, तो वही आत्मा उसका बंधु है और जो आत्मा नहीं जीती है, तो उसकी आत्माही उसका शत्रु है अर्थात आपही अपना शत्रु है और आपही अपना मित्र है॥६॥ जितात्मनःप्रशांतस्य परमात्मा समाहितः शीतोष्णसुखदुःखेषु तथा मानापमानयोः दोहा-जिनजीत्योहआतमा, शांतलहै बट्टज्ञान । शीतउष्णसुखदुखसमें, अरुअपमानजुमान जिसने अपना मन अपने वशीभूत करलिया और शीत, उष्ण सुख, दुःख और मान अपमानमें जो सदा शान्त रहताहै, उसके हृदय में परमात्मा स्थिर है अथवा उसीकी बुद्धि अत्यन्त सावधान रहती है ज्ञानविज्ञानतृप्तात्माकूटस्थो विजितेंद्रियः युक्त इत्युच्यते योगी समलोष्ठाश्मकांचनः १३० भगवद्वीताभावाटीका. आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते ॥ योगारूढस्य तस्यैव शमः कारणमुच्यते दोहा-योगहिकर्मनतेलहत, ज्ञानीचित्तविचारि॥ योगलहेशांतीगहै, विषयइंद्रियनमारि ॥३॥ जो ज्ञानयोगकी प्राप्ति करना चाहते हैं उनको ज्ञान प्राप्तिका कारण कर्म कहा है क्योंकि निष्काम कर्म करनेसे चित्त शुद्ध होता है और चित्त शुद्ध होनेसे ज्ञानकी प्राप्ति होती है और उस ज्ञानप्राप्तिसे मनु- ष्यको शान्ति मिलती है ।। ३।। यदा हि नेंद्रियार्थेषु न कर्मस्वनुषज्जते॥ सर्वसंकल्पसंन्यासी योगारूढस्तदोच्यते॥ दोहा-विपयनसों अकर्मसों, होयप्रीतिजबदूरि।। सवसंकल्पनकोतजै, योगरहेजवपूरि॥४॥ हे अर्जुन ! जब मनुष्य इन्द्रियोंके रूपरसादि विषयों में आसक्त नहीं होता है और न कर्ममें आसक्त होता है, और संपूर्ण फलसंक- ल्पोंका परित्याग कर देता है. वही योगारूड कहलाता है॥४॥ उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत आत्मैव ह्यात्मनो बंधुरात्मैव रिपुरात्मनः दोहा-निजआतमकोउधरत, अधोगमनजुकरेय आतमहीरिपुआपको, आतमहीसुखदेय ॥५॥ - ---. मध्याप६ हे अर्जुन ! विवेकी पुरुषको उचित है कि, अपनी आत्माका संसारसे आपही उद्धार करै, उसकी अधोगति न करे, क्योंकि काम- नासे रहित जो आत्मा अर्थात् अपना मन बंधुके समान उपकारी है और सकाम आत्माही अपना शत्रु है ॥ ५ ॥ बंधुरात्मात्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना जितः अनात्मनस्तु शत्रुत्वे वर्तेतात्मैव शत्रुवत्॥ 'दोहा-श्रापुहिजीत्योआतमा, सोईबंधुजुयाहि ॥ जिनजीत्योनाहीजुवह, अरिजानियेसुताहि६ हे अर्जुन ! जिसने अपनी आत्मासे आत्मा जीत ली है, तो वही आत्मा उसका बंधु है और जो आत्मा नहीं जीती है, तो उसकी आत्माही उसका शत्रु है अर्थात आपही अपना शत्रु है और आपही अपना मित्र है॥६॥ जितात्मनःप्रशांतस्य परमात्मा समाहितः शीतोष्णसुखदुःखेषु तथा मानापमानयोः दोहा-जिनजीत्योहैआतमा, शांतलहै बहुज्ञान ।। शीतउष्णसुखदुखसमें, अरुअपमानजुमान जिसने अपना मन अपने वशीभूत करलिया और शीत, उष्ण सुख, दुःख और मान अपमानमें जो सदाशान्त रहताहै, उसके हृदय में परमात्मा स्थिर है अथवा उसीकी बुद्धि अत्यन्त सावधान रहती है ज्ञानविज्ञानतृप्तात्माकूटस्थो विजितेंद्रियः युक्त इत्युच्यते योगी समलोष्ठाश्मकांचनः भगवद्गीताभाषपटीका. दोहा-जानतज्ञानविज्ञानको, अंरुइंद्रोजितहोय सोनोपाहनएकसम, गनेजुयोगीकोय॥ शाख वा गुरुके उपदेशसे उत्पन्न जो ज्ञान और अनुभवसिद्ध जो विज्ञान इनसे सन्तुष्ठ है आत्मा जिनकी और जिनका मन कभी चलायमान नहीं होता है, इन्हीं कारणोंसे जिनकी इन्द्रियां वशीभूत होगई हैं और इसीसे वे मिट्टी, पत्थर वा सुवर्णको समान समझते हैं ऐसेही योगी योगारूढ होते हैं ॥ ८॥ सुहृन्मित्रायुदासीनमध्यस्थद्वेष्यबंधुषु । साधुष्वपि च पापेषु समबुद्धिर्विशिष्यते॥ दोहा-मित्रउदासीशत्रुपुनि, अरुनिजवंधुसमान॥ साधोपापीचित्तमें, गनैएकअनुमान ॥९॥ हे अर्जुन ! जो सुहृद, मित्र, शत्रु, उदासीन, मध्यस्थ, देषी, बंधुवर्ग, साधु और पापाचारियोंमे समान दृष्टि रखता है, अर्थात् सबको एक सा समझता है, वह योगियोंसे भी बढकर है ।। ९ ।। योगी युंजीत सततमात्मानरहसि स्थितः एकाकीयतचित्तात्मानिराशीरपरिग्रहः॥ दोहा-बैठएकोएकचित्त, योगीसाधैयोग ।। एकाकीचाहैनकछु, जोरेंनहिंसुखभोग ॥१०॥ हे अर्जुन ! योगीको उचित है कि-सदा एकान्तमें रहै, किसीको संग न रक्खे, अपने मन और आत्माको वसमें रक्खै, किसी बात- अध्याय ६॥ की आशा न रक्खै और न किसी वस्तु का संग्रह करै, इस प्रकार निरन्तर अपनी आत्माको परमात्मामें लगाता है ॥१०॥ शुचौ देशे प्रतिष्ठाप्य स्थिरमासनमात्मनः नात्युछूितनातिनीचंचैलाजिनकुशोत्तरम् दोहा-ठौरपुनीतनिहारिकै, करिआसनविस्तार ।। नहिंऊंचोनीचोनहीं, पटकुशअजिनविथार११ हे अर्जुन ! योगसाधन के लिये सुन्दर पवित्र भूमिमें जो न बहुत ऊंची हो, न बहुत नीची हो उसपर कुशाका आसन बिछावै उप्तपर मृगचर्मपर वस्त्र बिछाकर निश्चल मन होकर बेठे॥११॥ तत्रैकाग्रं मनःकृत्वायतचित्तेंद्रियक्रियः॥ उपविश्यासनेयुंज्याद्योगमात्मविशुद्धये।। दोहा-करिवैठेमनकोजुथिर, सबइंद्रिनकोजीति॥ करिकैआसनशुद्धको, योगकरैइहिरीति ॥१२॥ उस आसन पर बैठ ममको एकाग्र कर चित्तको, रोक, क्रियास रहित हो अपनी आत्माकी शुद्धिके लिये योग साधन करै ॥१२॥ समं कायशिरोग्रीवंधारयन्नचलंस्थिरम् ॥ संप्रेक्ष्यनासिकास्वं दिशश्चानवलोकयन दोहा-कायाशिरअरुग्रीवको, राखैएकसमान ।। दृष्टिकरैनिजनासिका, देखैनहिदिशिआन१३ भगवद्गीताभाणटीका. दोहा-जानतज्ञानविज्ञानको, अरुइंद्रोजितहोय ॥ सोनोपाहनएकसम, गनेजुयोगीकोय ॥८॥ शास्त्र वा गुरुके उपदेशसे उत्पन्न जो ज्ञान और अनुभवसिद्ध जो विज्ञान इनसे सन्तुष्ठ है आत्मा जिनकी और जिनका मन कभी चलायमान नहीं होता है, इन्हीं कारणोंसे जिनकी इन्द्रियां वशीभूत होगई हैं और इसीसे वे मिट्टी, पत्थर वा सुवर्णको समान समझते हैं ऐसेही योगी योगारूढ होते हैं ॥८॥ सुहृन्मित्रायुदासीनमध्यस्थद्वेष्यबंधुषु ॥ साधुष्वपि च पापेषु समबुद्धिर्विशिष्यते॥ दोहा-मित्रउदासीशत्रुपुनि,अरुनिजबंधुसमान।। साधोपापीचित्तमें, गनैएकअनुमान ॥९॥ हे अर्जुन ! जो सुहृद, मित्र, शत्रु, उदासीन, मध्यस्थ, द्वेषी, बंधुवर्ग, साधु और पापाचारियोंमे समान दृष्टि रखता है, अर्थात् सबको एक सा समझता है वह योगियोंसे भी बढ़कर है ॥९॥ योगी युंजीत सततमात्मानरहसि स्थितः एकाकीयतचित्तात्मानिराशीरपरिग्रहः॥ दोहा-बैठएकोएकचित्त, योगीसाधैयोग। एकाकीचाहनकछु, जोरेंनहिंसुखभोग ॥१०॥ हे अर्जुन ! योगीको उचित है कि-सदा एकान्तमें रहै, किसीको संग न रक्खै, अपने मन और आत्माको बसमें रस्सै, किसी बात- अध्याय ६.. 1. की आशा न रक्खै और न किसी वस्तु का संग्रह करै, इस प्रकार निरन्तर अपनी आत्माको परमात्मामें लगाता रहै ।। १० ॥ शुचौ देशे प्रतिष्ठाप्य स्थिरमासनमात्मनः नात्युछितनातिनीचंचलाजिनकुशोत्तरम् दोहा-ठौरपुनीतनिहारिक, करिआसनविस्तार ।। नहिंऊंचोनीचोनहीं, पटकुशअजिनविथार११ हे अर्जुन ! योगसाधन के लिये सुन्दर पवित्र भूमिमें जो न बहुत ऊंची हो, न बहुत नीची हो उसपर कुशाका आसन बिछावै उसपर मृगचर्मपर वस्त्र बिछाकर निश्चल मन होकर बेठे ॥११॥ तत्रैकाग्रं मनःकृत्वायतचित्तेंद्रियक्रियः॥ उपविश्यासनेयुज्याद्योगमात्मविशुद्धये। दोहा-करिबैठेमनकोजुथिर, सबइंद्रिनकोजीति॥ करिकैआसनशुद्धको, योगकरैइहिरीति ॥१२॥ उस आसन पर बैठ मनको एकाग्र कर चिंतकोरोक, क्रियासे रहित हो अपनी आत्माकी शुद्धिके लिये योग साधन करै ॥१२॥ समंकायशिरोग्रीवंधारयन्नचलंस्थिरम् ॥ संप्रेक्ष्यनासिकाग्रं स्वं दिशश्चानवलोकयन दोहा-कायाशिरअरुग्रीवको, राखैएकसमान ॥ दृष्टिकरैनिजनासिका, देखैनहिदिशिआन१३ भगवद्गीताभावाटीका. सर्व देह, सिर और ग्रीवाको सीधी रंक्दै, इधर उघर न हिलावै और स्थिर रक्खे और अपनी नासिका के अग्रभागको देखता रहै तथा किसी ओर दृष्टि न चलावै ।। १३ ।। प्रशांतात्माविगतभीब्रह्मचारिखते स्थितः मनःसंयम्यमच्चित्तोयुक्तआसीतमत्परः॥ दोहा-शांतिगहेभयकोतज, ब्रह्मचर्य्यव्रतलेय ॥ मोमेराखैरोकिमन, लहयोगकोभेय ॥१४॥ मनको शांतकर, निर्भय हो, ब्रह्मचर्यवृत्तमें स्थित रह, सुझमें चित्त लगाय मनको रोक मुझमें तत्पर हो. योगका साधन करै ।। १४॥ युंजन्नेवंसदात्मानयोगीनियतमानसः॥ शांतिनिर्वाणपरमांमत्संस्थामधिगच्छति दो -यहिविधिकरैजुयोगको निजमनकोथिरराखि शांतिलहैमोकोमिलै, लहैअमीरसचाखि ॥१५॥॥ मनको बसमें रखनेवाला लो योगी इस प्रकारसे सदा अपनी आत्मा को योगमें तत्पर करैगा. वह परम पदरूप और मुझमें स्थित ऐसी जो शांति अर्थात मोक्षको पावेगा।॥ १५ ॥ नात्यनतस्तुयोगोऽस्तिनचैकांतमनश्चतः नचातिस्वप्नशीलस्य जाग्रतो नैवचार्जुन।। दोहा-योगलहैनहिंबहुभखे, विनुखायेहूमित्त । सोवत नाहिहोतहै, नहिंअतिजागेनित्त ॥१६॥ + अध्याय ६॥ ... हे अर्जुन ! जो बहुत भोजन करता है उसका याग सिद्ध नहीं होता और जो-निराहार रहता है उसका योगभी सिद्ध नहीं होता जो बहुत सोता है वा बहुत जागताहै उसकाभी योग सिद्ध नहीं होता है१६ युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु ।। युक्तस्वप्नावबोधस्ययोगो भवति दुःखहा॥ दोहा-युक्तविहार अहारको, कर्मयुक्तपनिहोय॥ जागतसोवतजोजुगत, सोडारतदुखधोय॥१७ है अर्जुनाजो मनुष्य आहार और विहारप्रमाणसे करताहै और कर्मभी युक्तिपूर्वक प्रमाणसे करता है और जो प्रमाणहीसे जागता वा सोता है उसका योग दुःखोंका दूर करनेवाला है. इसका तात्पर्य यह है कि योगीको उचित है कि आहारादि उक्त कर्म परिमित और नियमानुकूल करै ॥ १७॥ यदाविनियतं चित्तमात्मन्येवावतिष्ठते । निःस्पृहःसर्वकामेभ्योयुक्तइत्युच्यते तदा दोहा-जोनिजचित्तकोरोकिकै, राखतआतममाहिं तजैसबजोकामना, सोयोगीनरनाहिं ॥१८॥ जब मनुष्य अपनी आत्माहीमें अपने चित्तकी वृत्तियोंको रोक- लेता है और संपूर्ण कामनाओंको छोडकर निःस्पृह होजाता है तवही वह पुरुष युक्त अर्थात सिद्ध योगी कहाता है ॥१८॥ यथादीपोनिधातस्थो नेगतेसोपमास्मृता योगिनोयतचित्तस्ययुंजतोयोगमात्मनः
भगवडीताभाषाटीका
दोहा-जैसेदीपसमीरविनु, रहेज्योतिठहराय॥
योगीनिश्चलचित्तको, उपमाहैयाभाय ॥१९॥
जैसे निर्वातस्थानमें रक्खे हुए दीपककी ज्योति हिलती झुलती
नहीं है ऐसेही उपमा उस योगीकी है. जिसने अपना चित्त वशीभूत
कररक्खाहै और सदैव योगाभ्यासमें मनलगाये रहताहै तो उसका मन
निर्वातस्थानमें खखेहुए दीपककी भांति चलायमान नहीं होता है।
यत्रोपरमतेचित्तं निरुद्धं योगसेवया ।।
यत्रचैवात्मनात्मानं पश्यन्नात्मनितुष्यति
दोहा-योगीसेवतयोगको, चित्तत्तिठहराय॥
निरखतआतमकोतहाँ, रहतसदासुखपाय २०
जिस अवस्थामें योगाभ्याससे अपनी चित्तवृत्तियोंके स्कनेपर
जहां विश्राम लेता है और जहां बुद्धिद्वारा आत्मस्वरूपको देखता है
और अपनी आत्माहीमें संतुष्ट होता है ॥२०॥
सुखमात्यंतिकंयत्तड्डुद्धिग्राह्यमतींद्रियम्॥
वित्ति यत्र नचैवायंस्थितश्चलतितत्त्वतः॥
दोहा-जोसुखइंद्रिनतेपरे, बहुतबुद्धिगहिलेत ॥
वासुखकोजानेतबै, तापाछेइहनेत ॥२१॥
हे अर्जुन ! जिस अवस्थाविशेषमें योगीजन किसी ऐसे अत्यन्त
सुखका अनुभव करते हैं जो इन्द्रियोंके विषयसे दूर हैं और केवल
बुद्धिद्वाराही जाना जाता है, इसीसे उस सुखमें स्थित हो योगी
आत्मस्वरूपसे चलायमान नहीं होता है।॥२१॥
अध्याय ६।
यंलब्ध्वाचापरंलाभमन्यतेनाधिकंततः
यस्मिन्स्थितो नदुःखेनगुरुणापि विचाल्यते॥
दोहा-जोपायेलाभनअधिक, औरजानिरोमित्त॥
स्थिरतागहिडोलैनहीं, बहुदुखपायेचित्त ॥२२॥
हे अर्जुन ! जो आत्मस्वरूपरूपी इस सुखको पाकर इससे अधिक
और किसी लाभको नहीं मानते हैं और उस सुखमें स्थित होकर
बडे बडे जो शीतोष्णादि सुख दुःख हैं उनसे भी विचलित नहीं
होता है ॥२२॥
तं विद्याहुःखसंयोगवियोगयोगसंज्ञितम्।।
सनिश्चयेनयोक्तव्योयोगोऽनिर्विण्णचेतसा॥
दोहा-दुखहीकोसंयोगको, मानलेतवियोग।
निश्चैकरियोगहिकरै, ताकौं कहत जु योग२३
जिस अवस्थामें दुःखकालेशमात्रभी नहीं रहता है. उसी अवस्था-
को योगावस्था समझना चाहिये, इससे स्थिरचित्त होकर यलपूर्वक
योगाम्यास करना उचित है ॥२३॥
संकल्पप्रभवान्कामांस्त्यक्त्वासर्वानशेषतः॥
मनसैवेंद्रियग्रामविनियम्यसमंततः२४॥
दोहा-संकल्पनि जोकामना, तिन्हेंतजैचितलाय
मनसोरोकैइंद्रियन. योगकरैयहभाय ॥२४॥
भाषद्वीताभाषाका.
संकल्पसे उत्पन्न होनेवाली जो योगसाधनमें बाधा डालनेवाली
कामनायें हैं उन सबको सर्वथा त्यागकर और इन्द्रियोंको मनसे
संपूर्ण विषयोंसे रोककर योगाभ्यास करै ॥२४॥
शनैःशनैरुपरमेध्या धृतिगृहीतया॥
आत्मसंस्थंमनःकृत्वान किंचिदपि चिंतयेत् ॥
दोहा-धीरजधरिअरुबुद्धिकार. परैरहसरत्यागि।
कछुवैकरैनकामना, आतमसोअनुरागि॥२६॥
प्रति जो धारण उस करके वशीभूत जो बुद्धि उससे मनको धीरे
धीरे आत्मामें लीन करें और फिर किसी बातका चिन्तवन न करें।
शीघ्रता करनेसे मन स्थिर नहीं होता है ॥ २५ ॥
यतोयतोनिश्चरतिमनश्चंचलमस्थिरम् ॥
ततस्ततोनियम्यैतदात्मन्यवक्शनयेत् ॥
दोहा-मनचंचलजिततितचले, ताकोराखैरोकि॥
करिसंयमनिजआतमा, सजेजुताकोठोंकि २६
यह मन बड़ा चंचल है किसी एकही जगह स्थिर नहीं रहता है,
इससे जहां २ यह फिर वहां वहांसे इसे रोककर आत्मामें स्थिर करै२६
प्रशांतमनसंह्येनं योगिनंसुखमुत्तमम् ॥
उपैति शांतरजसंब्रह्मभूतमकल्मषम् २५
दोहा-जाके मनमेंशांतिहै, ताहीकौमुखहोय ॥
मगनजुब्रह्मानंदमें, पापरहितमुनिसोय ॥२७॥
मण्याव६॥
हे अर्जुन ! जिसका मनं उपर लिखी रीतिसे शांत हो गया है,
रजोगुण नष्ट हो गया है और आत्मा निष्पाप हो ब्रह्ममें लीन हुआ
है. ऐसे योगीको समाधिका उत्तम सुख अपने आप प्राप्त होजाता है
युंजन्नेवं सदात्मानं योगी विगतकल्मषः॥
सुखेन ब्रह्मसंस्पर्शमत्यंतं सुखमश्नुते २८
दोहा-जोयोगीडहिविधिकरै, करैपापकौत्यागि॥
सहजहिब्रह्महिकेसुखहिं, लहैवहैअनुरागि २८
इस प्रकार सदा आत्माको लगाये रखनेवाला निष्पाप योगी
सुखपूर्वक बिनाही परिश्रम महान् ब्रह्मसुखको भोगता है ।। २८॥
सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि
ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्रसमदर्शनः २९
दोहा-मोहिलखैसबठोरमें, सबकोमोहीमहि ॥
मोकोदेखतसोसदा, हाँहूँदेखतताहि ॥ २९॥
सबको समान दृष्टिसे देखनेवाले योगाभ्यासी अपनी आत्माको
सब प्राणीमात्रमें देखते हैं और संपूर्ण प्राणियोंको अपनी आत्मा-
में देखते हैं ॥२९॥
यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वच मयि पश्यति
तस्याहंन प्रणश्यामि सच मेन प्रणश्यति
दोहा-जोमोकोसबमेलखै, सबजगमोहियमाहिं।
ताकेहौंढिगहीरहौं, सोमेरे ढिगआहिं ॥३०॥
भगवद्गीताभाषाटीका. हे अर्जुन ! जो मुझको संपूर्ण प्राणीमात्रमें देखता है और सब प्राणीमात्रको मुझमें देखता है उस योगीसे मैं अदृश्य नहीं रहता हूं और न वह मुझसे अदृश्य रहता है अर्थात् में प्रत्यक्ष होकर उसे दर्शन देता हूं ॥३०॥ सर्वभूतस्थितं यो मां भजत्येकत्वमास्थितः सर्वथा वर्तमानोऽपि स योगी मयि वर्तते॥ दोहा-सर्वविषेस्थितजुहो, इकलखिभजैसुमोहिं॥ रहाँकौनहूंभांतिवह, मोमैवर्तेसोहिं॥३१॥ जो अभेद बुद्धिसे संपूर्ण प्राणियोंमें स्थित मुझको भजता है वह योगी संपूर्ण कर्मोंको परित्याग करने परभी सर्वथा वर्तमान अ- यदि जीवित दशामें मुझसे मिलजाता है अर्थात जीवन्मुक्ति पाता है ॥३१॥ आत्मौपम्येन सर्वत्र समपश्यति योऽर्जुन सुखं वा यदि वा दुःखं स योगी परमो मतः दोहा-सबकोदेखेआपसम. सुखीदुखीइकभाय ।। सो योगीसवते बडो, मोमे रहै समाय ॥३२॥ हे अईन ! जो संपूर्ण प्राणियोंके दुख सुखको अपने दुःख सुखके समान मानता है और सबको एकसा देखता है वही योगी श्रेष्ठ है ।। ॥ अर्जुन उवाच॥ योऽयं योगस्त्वया प्रोक्तःसाम्येन मधुसूदन एतस्याहंन पश्यामि चंचलत्वात्स्थिति स्थिराम
अध्याय ६
दोहा-योगकह्योतुमकृष्णजू, मोकीएकसमान ॥
रहैनमोचितचपलहै, जोतुमकियोबखान ॥३३
श्रीकृष्णकी बात सुनकर अर्जुनने कहा कि हे मधुसूदन !
जो आपने योगकी यह रीति बताई कि सबको समभावसे देखे सो
मैं अपनी बुद्धिकी चंचलतासे यह समझताहूं कि इस प्रकारका
योग बहुत कालतक स्थिर नहीं रह सकता है ॥ ३३ ॥
चंचलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवदृढम्।।
तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम्
दोहा-मनहैचंचलकृष्णजू, बवृक्षाभकदृढजानि ॥
ताकोरोकनपवनसम,हैअतिकठिनजुमानि३४
हे कृष्ण ! यह मन बडा चंचल है देह और इन्द्रियगणोंको क्षोभ-
कारक है बडा बलवान् और दृढ है इस मनको रोकलेना मेरी समझ-
में ऐसा कठिन है जैसा प्रबल वायुका रोकना ॥३४॥
॥श्रीभगवानुवाच ॥
असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम्
अभ्यासेन तु कौंतेय वैराग्येण च गृह्यते ॥
दोहा-अर्जुनतुमसाँचीकही. मनचंचलनगहाय ।।
योगहितेवैराग्यतै, नीकेपकरोजाय॥३५॥
अर्जुनकी बात सुन श्रीकृष्ण बोले-हे महाबाहो! निस्संदेह मन
वडा चंचल है यह कर नहीं सकता है परन्तु हे कौन्तेय ! अभ्यास
और वैराग्यसे निग्रह हो सकता है।॥३५॥
.
भगवीताभाषाटीका।
असंयतात्मना योगो दुष्पाप इतिमे मतिः
वश्यात्मनातुयतताशक्योऽवाप्तुमुपायतः
दोहा-जिनपकोनहिचित्तनिजु, तापयोगनहोय
जिनअपनोमनवशकियो,लहतयतनसोसोय३६
हे अर्जुन ! मेरी समझमें तौ यह माता है कि जिसका मन बश-
में नहीं है वहभी योगसाधन नहीं करता है जो जितन्द्रिय हैं वेही.
यत्न पूर्वक योगसाधनकर सकते हैं ॥३६ ॥
॥अर्जुन उवाच ॥
अयतिः श्रद्धयोपेतो योगाचलितमानसः
अप्राप्ययोगसंसिद्धिं कांगतिंकृष्ण गच्छति।।
दोहा-अयतीअरुश्रडासहित, योगभ्रष्टतापाइ॥
लहनसिहसुयोगकी, कहौकौनगतिजाइ ३७
हे कृष्ण । जो प्रथमही श्रद्धापूर्वक योगसाधनमें प्रवृत्त हुआ परन्तु
पीछे ठीक उपाय न करसका अर्थात अम्यासमें शिथिल हो गया
और इस कारणसे उसका मन योगसे चलायमान हो गया तो ऐसा
मनुष्य योगकी सिद्धिरूप फलफोन पाकर किस गतिको भाप्त होता है
कच्चिन्नोभयविभ्रष्टश्छिन्नाभ्रमिवनश्यति
अप्रतिष्ठो महावाहोविमढोब्रह्मणः पथि ॥
दोहा-किधोंदुहुनजेभ्रष्टव्है, बादरज्योविनसाय ॥
ताकोकडूनआसरो, रगौमूढकेभाय ॥३८॥
अध्याय
.
हे महाबाहो ! न तो प्राणीमें निष्काम कर्म करके ईश्वरको समर्पण
किया और काम्यकर्म न करके स्वर्गादिकी प्राप्तिसेभी बंचित रहा
और योगसिद्ध न होनेसे मोक्षमीन मिली, वह मनुष्य दोनों ओरसे
भ्रष्ट और अप्रतिष्ठित होकर क्या उस मेधके समान नष्ट नहीं होता
है जो एक मेघसे निकल कर दूसरे में मिलनेसे वीचहीमें नष्ट हो
जाता है ॥३८॥
एतन्मेसंशयं कृष्ण छेत्तुमर्हस्यशेषतः ॥
त्वदन्यस्संशयस्यास्यछेत्तान ह्युपपद्यते॥
दोहा-मेरेयासंदेहको, करौ दूर जगदीश ॥
याकहिवेकोतुमउचित, नहीं शेषअजईश॥३९
हे कृष्ण ! मेरे इस संशयको पूर्णरीतिसे दूर करने के योग्य आपही
हैं क्योंकि इस संशयको दूर करनेवाला आपके सिवाय कोई नहीं है
॥ श्रीभगवानुवाच ।।
पार्थनैवेहनामुत्रविनाशस्तस्य विद्यते ॥
नहि कल्याणकृत्कश्चिदुर्गतिं तात गच्छति
दोहा-अर्जुनदोऊलोकमें, ताको होई न नास ॥
भलेकर्मजेकरतहैं, तिनकोनहिंअघबास ॥४०॥
अर्जुनकी बात सुन श्रीकृष्ण बोले-कि हेअर्जुन ! उस मनुष्यका
इस कोको वा परलोकमें कहीं भी नाश नहीं होताहै क्योंकि कोई
भी शुभकर्म करनेवाला दुर्गति नहीं पाता है॥४॥
'भगवद्गीताभाषाटीका।
प्राप्य पुण्यकृताँल्लोकानुषित्वां शाश्वती समाः
शुचीनांश्रीमतांगेहेयोगभ्रष्टोऽभिजायते
दोहा-पुण्यवंतकेलोकलहि, रहितबहुत दिनजाय
योगभ्रष्टधनवंतशुचि, तिनघरजनमतुआय।।
जो मनुष्य योगभ्रष्ट होकर उसीदशामें मरजाते हैं वे पुण्यात्मा
लोगोंके लोकोंमें जाकर बहुत दिन तक वास करते हैं और फिर
फिर पवित्र लक्ष्मीवान् पुरुषों के घर जन्म लेकर अनेक सुख भोगते हैं
अथवायोगिनामेव कुलेभवतिधीमताम्॥
एतद्धि दुर्लभतरं लोके जन्म यदीदृशम्॥
दोहा-बुन्डिवंतयोगीकुलनि, आनिलेतअवतार ।।
जन्मलहतऐसेघरनि, दुर्लभहैनिरधार ॥४२॥
अथवा वे योगभ्रष्ट फिर बुद्धिमान योगियोंहीके घर जन्म लेते हैं,
जो ऐसा जन्म है, वह इस लोकमें दुर्लभ है ॥ ४२ ॥
तत्रतंबुद्धिसंयोगलभतेपौर्वदेहिकम्॥
यततेचततोभूयःसंसिद्धौ कुरुनंदन.४३॥
दोहा-तिनहूपहिलीदेहको, लहतबुद्धिसंयोग।
यतनकरतहैसिडिको, बहुविधिसाधनयोग४३
हे अर्जुन : इस संसारमें जन्म लेकर फिर वह पूर्व जन्मके बुद्धि
संयोगको पाताहै और उस बुद्धिसंयोगद्वारा योग सिद्धिके लिये
फिर यत्न करता है।॥ ४३॥
मन्याव ६॥
पूर्वाभ्यासेनतेनैवहियतेह्यवशोऽपिसः॥
जिज्ञासुरपियोगस्यशब्दब्रह्मातिवर्तते ॥
दोहा-सोतोअपनोवशनहीं,हैपहिलोअभ्यास ॥
तातेउपजैयोगको, ब्रह्मसिंधुमेंवास॥४४॥
• अवश होनेपरभी अर्थात् सांसारिक विषयवासना काम क्रोधा-
दिमें लिप्त होनेपरभी वह उस पूर्वजन्मके अभ्यास के कारण योग-
संसिद्धिमें निरत हो जाता है और योगस्वरूपके जाननेकी इच्छा
करनेवाला भी केवल योगकोही नहीं पाताहै किन्तु वेदोक्त कर्म
फलसे अधिक फल पाकर मुक्त होजाता है ॥४४॥
प्रयत्नाद्यतमानस्तुयोगीसंशुद्धकिल्बिषः
अनेकजन्मसंसिद्धस्ततोयातिपरांगतिम्
दोहा-योगीजोजतनहिंकरे, डारैसबअघधोय ॥
बहुतजन्मसिद्धिहिलहै, ताहिपरमगतिहोय ॥
जो योगी इस प्रकार यल करता रहता है उसके सब पाप दूर
होजाते हैं और अनेक जन्मोंमें योगकी सिद्धि पाकर श्रेष्ठ गति
अर्थात् मोक्ष पाता है ॥४५॥
तपस्विभ्योऽधिको योगी ज्ञानिभ्योऽपि-
मतोऽधिकः ॥ कर्मिभ्यश्चाधिकोयोगी
तस्माद्योगी भवार्जुन ॥४६॥
१४६ भगवद्गीताभाषाटीका. दोहा-तपसिउते योगी अधिक,ज्ञानीहूते जानि॥ कर्मनिहूते है अधिक, अर्जुन योगहि मानि॥४६ हे अर्जुन । तपस्वियोंसे योगी अधिक होता है. ज्ञानियोंसे भी योगी अधिक है और जो वापी कूपादिके वनाने वाले कर्मनिष्ठ हैं उनसेभी योगी अधिक है. इससे हे अर्जुन ! तू योगी हो।। ४६ ।। योगिनामपि सर्वेषामन्नतेनांतरात्मना ॥ श्रद्धावान भजतेयोमांसमे युक्ततमोमतः दोहा-जोयोगीराखैमनहि, मोमेंनिश्चलभाय ॥ श्रद्धायुतमोकोंभजे, सोसवतेंअधिकाय ॥४७॥ कर्मज्ञानमतयोगते, भगतिसबनिसिरमौर॥ तिनअर्जुनहींवशकियो,मोविनुछिननहिंऔर। शुद्धचित्तसंन्यासते, ध्यानविनाकिहिमाय॥ मुक्तिहोययातेकह्यो, ध्यानछठेअध्याय ॥२॥ सोइध्याननिश्चैकह्यो, मन आनंदराम ।। जाहिनिरंतरकेकिये, होइहआतमराम ॥३॥ हे जर्जन ! जो श्रद्धापूर्वक मुझमें चित्त लगाय मेराही भजन स्मरण करता है वह संपूर्ण योगियों में श्रेष्ठ है यही मेरा मत है॥४७ इतिश्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे विचारदर्पण दोहासहितभाषाटी- कायां अभ्यासयोगोनाम षष्ठोऽध्यायः॥६॥ ॥ इति प्रथमपट्कम् ॥ AREERNA अध्याय ६ समीक्षा-इस अध्यायमें इस लोक और परलोक में उत्तम गति प्राप्तिके योगादिसौधनों का वर्णन कियागया है। परंतु योग आदि साधनं तभी प्राप्त होसकेंगे जब शरीर स्वस्थ और बल, वीर्य करके युक्तहोगा, शरीरका वालिष्ठ होना जाठराग्निके प्रवल रहनेपर निर्भर है। जाठराग्निका प्रबलहोना व्यायाम आदि पर निर्भर है। इसी लिये श्लो०१७ में युक्ताहार विहारके अभ्यासका उपदेश दियागया है। सारांश यह कि मनुष्य व्यायाम आदिका अभ्यास करके अपनी जाठराग्नि और बल, वीर्यको बढाएं जिससे वह दुष्ट 'प्राणियोंको दंडदेने में समर्थ होसके और भली प्रकार देश सेवा तथा जाति सेवा करसकें। जो दुष्ट प्राणी दूसरोंको दुःखदेने वाले होते हैं वह आततायी कहलाते हैं और आतताइयों का वध करना शास्त्रों में पुण्यकार्य "मानागया है। मनुष्य सदा सात्विक भोजन करता रहे आंतरिक और वाह्य शुद्धि में तत्पर रहे इससे बुद्धि और स्वभाव निर्मल रहेंगे और वह पाप कर्मों में न, फंसने पावेगा। शरीर और वस्त्रों को स्वच्छ रखना वाह्य शौच है। काम, क्रोध, लोभ, अहंकार, मान, मोहादिसे मनको शुद्ध ग्खनो आंतरिक शौच कहलाता है। जब मनुष्य जितेन्द्रिय, ब्रह्मचारी और व्यायामशील होकर अपने शारीरिक बलको बढायेगा तो दुष्ट जीवोंसे सताए जाने वाले दीन प्राणियोंकी रक्षा करसकेगा, जिससे दुष्ट और पामरों को दण्ड मिलकर संसारमें पाप नहीं फैलेगा। अतःकल्याण चाहने वाले मनुष्यों को चाहिये कि न्यायप्रिय और परोपकार प्रिय बने । प्राणीमात्र के साथ प्रेम रक्खे अर्थात् किसी भी उत्तम प्राणीकी मन वाणी और शरीर से हिंसा न करें भगवद्गीताभाषाका. मनुष्य सदा निर्मान, निर्मोह, निर्लोभ, सरलस्वभाव,सत्यवादी हो- कर परस्त्री और परधन की इच्छा न रखते हुए यश और प्रशंसा की इच्छा छोडकर परोपकार देश मेवा और जाति सेवामें तत्पर रहें। उपरोक्त गुणों वाले मनुष्य सदा कल्याणभागी रहते है यही श्रीकृष्ण महाराज का आशय इस अध्यायमें है। जो लोग यह कहते हैं कि प्रत्येक कामके लिये ठीक २ समय देनेकी शिक्षा हमको यूरोपियन लोगोंसे सीखनी चाहिये, उनकी यह भूल है। यदि वह गीताको पढ़ें तो देखेंगे कि गीता अध्याय ६ के श्लोक १७ में कई सहस्र वर्ष पूर्व ही हमको श्री- कृष्ण महाराज यह शिक्षा दे चुके हैं। कि ठीकसमय पर जागने- वाला, ठीक समय पर प्रत्येक कामको करनेवाला मनुष्य नीरोग, बलिष्ठ और प्रसन्न चित्त रहता हुवा पूर्ण सौ वर्ष की आयु पासक्ता है और उसके सब काम भी ठीक होतेहैं। यदि हममेंसे प्रत्येक मनुष्य अपना निम्नलिखित स्वभाव डाले कि नित्य प्रातः काल ब्राह्ममुहूर्त में अर्थात् सूर्योदय से अढाई तीन घडी पूर्व उठकर शौचादि से निवृत्त हो, प्रातःकाल की संध्योपासन करके एक घंटा बाहर की शुद्ध वायुका सेवन करे। पुनः घरपर आ थोडा बहुत पठन पाठन कर। दश बजे ठीक समय पर भो- जन करक, ग्यारह बजे या बारह बजे, अपने व्यापारादि कामों में लगजाए और ठीक चार या पांच बजे इस कार्यसे निवृत्त हो- कर, शुद्ध वायु को सेवन करने का नगरसे दूर चला जावे । यदि होसके तो अपनी एक मंडकी बनाकर वहीं पर खेलकूद में प्रवृत्त होकर ब्यायाम भी कर लिया करे। सात बजे तक पुनः घर पर लौट आए और सन्ध्योपासन करके पुनः आठ बजे, सा- यंकालके भोजन से निवृत्त होकर आधीघंटा या एक घंटा सुखपूर्वक मम्पाव बैठा या लेटा हुवा अपने इष्ट मित्रों से वार्तालाप करता रहे । पुनः नौ बजे से दस बजे तक कुछ लिखना पढना या अन्य काम करके ठीक दश बजे रात्रिको शयन करे। गीताके उपरोक्त श्लोकानुसार यदि आयुका भाग व्यतीत कि- या जाए, तो सब मनुष्य सुखी रह सक्ते हैं और सब काम भी ठीक हो सक्ते हैं । विपरीत इसके जिनका न खानेका समय नियत है न पोलेका, रात दिन वीस इक्कीस घंटे चलने वाली मशीन बने हुए काम में लगे रहते हैं तो परिणाम यह होता है कि मंदाग्नि, क्षय, धातुक्षीण, प्रमेह आदि रोग होकर तीस चाळीस वर्षको अवस्थामें ही उनको वृद्धावस्था या मौत आघेरती है और वह सब काम यहीं पडे रहते है अतः हमको चाहिये कि उपरोक्त गीता के श्लोकानुसार युक्ताहार विहार करते हुए बल, बुद्धि और धन की वृद्धि करके आनं- द का जीवन व्यतीत करें, जिससे भारतवर्ष भी उन्नत देशोंकी गणना में आये. [पृष्ठ १२८ से आगे] [१२] देश के लोगों को चाहिये कि, राजाओं से प्रार्थना करें कि, अपनेर राज्योंमें शिक्षा को अनिवार्य और विना शुल्क [फीस] की करें, और आज कल को नवीन यंत्रों और कलाओंको सिखाने वाले शिल्पवियालय [टकनीकल इन्स्टीटयूट्स] और आवश्यकीय वस्तु बमानेके कारखाने (शिल्पकार्यालय ) खोलें, जैसा कि, बौदा और मैसूर महाराज ने खोले हैं। राजाओं को चाहिये कि, प्रजा से लिया हुआ द्रव्य प्रजा के हितकारी कामों में लगाएं. न कि अपने भोग विलासके कामों में, कि प्राचीन नीति और धर्मशास्त्र के ग्रंथों में लिखा है.यथा रघुवंश काव्ये प्रथम प्रजानामेव भूत्यर्थ ताम्यो वलिमग्रहीत् :- अर्यात्-प्रजाओं के हितके निमिच उन प्रजाओं से कर लिया जाता था.
विचार दर्पण . [१९] प्रत्येक विद्यानातक को अर्यात् उपपुरुषको जो विद्या पढचुके यह प्रतिज्ञा करनी चाहिये कि न्यूनसे न्यून मैं दशमनुष्यों को अपने जैसे विद्वानों बनाऊंगा। और वे दमा भी यही प्रतिज्ञा करते जायें,तो देखेंगे कि शीघही भारतवर्ष में विद्यादेवी अपना राज्य करने लगेगी। प्राचीन कालमें विद्या इसी प्रकार फेलती थी और तभी विधाका आदर भी होता था, साथही प्राचीन काल में यहभी पाती, कि विद्या और गुण छिपाकर नहीं रखते थे, जो सीखनेकी इच्छा करता था (उसका प्रेमपूर्वक विधा सिखा देते थे । भारतवर्ष में एक सहस्रवर्षसे ऐसा अंधकार मय समय आगया कि लोगोंने विपाओंका छिपाना प्रारंभ कर दिया, जिसका फल यह हुआ कि भारतवर्षसे धनुर्वेदविद्या, यकशास्त्र और रसायनशास्त्र लुप्तप्राय होगये और योगविधाका तो अभाव सा ही होगया, इस लिये अब चाहिये कि विद्याका प्रचार अच्छी भांति करें और विधाको छिपाकर रखनेकी प्रयांका सर्वथा नाश ही करदें। [१४] मामरमें दैनिक समाचारपत्रों का प्रचार होना चाहिये और देशी राज्यों में राज्य के व्ययसे मायमिक शिक्षा की पाठशालाएं खुलनी चाहिये, जमा) कि, बडौदा, मैसूर राज्य में खोली जारहीं हैं। [१५] इमलोगोंमें विज्ञान, कृषि, वाणिज्य, शिल्प आदि विषयोंके ग्रंप बहत्त न्यून है अथवा नहींही है. आजकल यूरोप, अमेरिकाके लोगोंने इन विधामोंमें बहुत निपुणता प्राप्त की है और अपनी भाषाके साहित्यको इन विषयोंके ग्रंथोंसे बहुत बदालिया है, इसलिये हम लोगोंको चाहिये कि, अपने किसी एक प्रधान नगरमें "हिन्दी (देवनागरी) साहित्य वर्द्धक समिति" खोलें जिसमें एकलास या इससे अधिक मूलधन हो और जिसके द्वारा विद्वानोंसे विज्ञानादि विषयोंपर ग्रंथ लिखवायें या दूसरी भाषाओंसे हमारी हिन्दी (देवनागरी) भाषा अनुवाद करवायें, क्योंकि इन ग्रयोंकी बड़ी आवश्यकता है. इस समय उपन्याद्वारा साहित्यको बटनेका, समय नहीं रहा। [१६] उत्तम हिन्दी साहित्यकी सस्ती पुस्तकोंका प्रचार किया जाय गीताआदि धर्मपुस्तकें तो लागतसे न्यून मूल्यपर ही सर्व साधारण लोगोंको दीजाय और निर्धन मनुष्यों में बिना मूल्य ही बटवाई जाय। धर्मशास्त्रों में विपादान, पुस्तकदान सबसे श्रेष्ठदान माना है । हमारे धर्म ग्रंथोंसे जय हिन्दू आर्य ] जातिके सब स्त्री पुरुष पूरे जानकार होजायेंगे तो वह विधर्मी लोगों तथा पाखण्डियोंके फंदे में नहीं आसकेंगे। [१७]आजकल बहुत प्रांतोंमें यह देखनेमें आरहा है, कि लोग अपनी मातृभाषा से प्रम न रखकर विदेशी भाषा अंग्रेजी आदिमें ही बातचीत तथा पत्रव्यवहार करना और अपनी देशी मिती वया संपत्को न लिख कर विदेशी मिती तथा - है दर्शन। - । संवत्को रिखनादी अपना मुस्यकर्तव्य समचते हैं, और ऐसा करनेमेही अपनेको विहान समझते है. इससे बडी हानि यह होती कि, हम अपने देशी साहित्यको न बढाकर विदेशी साहित्य की उन्नति ही सहायक होते हैं. शनैः२ इसका फल यह होगाकि हम विदेशी वस्तुप्रचार और विदेशी चारदारको धारण करके अपने देशप्रेमको भी खो बैठेंगे। हमारा इस रेखसे यह प्रयोजन नहीं है, कि हम विदेशी भाषाका रिसना बोलनाही न सीखें, परन्तु प्रयोजन यह है, कि विदेशीभाषा विदेशियोंसे बातचीत या पत्रव्यवहार करनेको, तथा उस भाषा इंजिनीयरी, साइंस (विज्ञान)आयुर्वेद, गणित, ज्योतिष, व्यापार, भूगोल, खेती, खनिजविज्ञान आदि विधाओंपर जो उचम र ग्रंथ बने हुये हैं, उनसे स्वयं लाभ उठाने और उनके अनुवाद्वारा हमारे हिंदी(आय)भाषा के साहित्यको उन्नतकरनेके लिये सीखें और लेन बातोंको व्याख्यानहास हमारी जन समुदायमें फैला । केवल भाषाका मान करनेसे ही अपनेको कृतकृत्य नहीं मान लेना चाहिये । [१८]हम सब हिन्दुओं[आयो] को चाहियोंकि अपनी शुद्ध और पवित्र भाषा संस्कृत का अपने में पुनःप्रचार करके इसकी रक्षा करें।यूरोप के विद्वानों ने भी इस भाषा को संसारकी सबभाषामों में सबसे प्राचीन और सवभाषाओंकी जननी मान लियाहै।इसके वर्णमालाकी उचमता सबको स्वीकृत है, किसी भाषा में कोई वर्ण नहीं और किसी में कोई । इस में सम्पूर्ण वर्ण, यथा-अंग्रेजी भाषा में-आ, ऐ, ओ,अं, ख,घ,च छ। शत, थ,ध, ठ, भ,श, ष, नहीं हैं। इसी प्रकार अरबी भाषामें ख, घ,छ, श,थ, ध,भा आदि अक्षर नहीं है। ऐसी ही दशा फारसी आदि अन्य भाषाओंकी समझो।कोई२व उन भाषाओंमें व्यर्थ और अधिक भी है,यथा अंग्रेजी सी,क्यू आदि । और सब से बढा दूषण उन भाषाओं में यह है, कि उनमें लिखा तो जाय कुछ और बोला जाय कुछ, परन्तु संस्कृत में सालिसा जाता है वैसाही बोला भी जाता है। उदाहरणार्थ देखिये, अंग्रेजी में लिखा तो जाताहै 'कनाइफ और बोला जाताह'नाइफ' [चाकूलिखातो जाताहे लिएउटेट और बोला जाता है लेफटेनेंट किसीबडे अफसर के नीचे काम करने वाला अफसर]; ऐसेही अनेक उदाहरण देस हैं जिनमें लिखातो जाय कुछ और बोलाजाय कुछ।इससे यह सिद्धहुआकि हमारे पूर्वज ऋषियोंने अपनी भाषामें वह योग्यता प्राप्तकरलीपी जिसको यूरोप,अमेरिकाके विज्ञानवेचाऑनभीअन तक प्राप्त नहीं की है। अतः हमारा कर्तव्य है कि हम लोग संस्कृत भाषा के प्रेमी होकर इसको सीखें । प्राचीन काल्में भारतवर्ष के लोगोंकी एकही भाषा थी अव भी जब तक हम लोगों की एक भाषा न होगी तबतक हमारी उन्नति होना कठिन है । अधिक शोक इस बात का है कि यूरोप अमेरिका के लोग तो हमारी | संस्कृत भाषा को प्रेम से पढते हैं और हम इस से दूर भागते हैं । ऐसा होना हमारे। लिये लज्जाकी बात है। (अपूर्ण) N
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अथ सप्तमोऽध्यायः।
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श्रीभगवानुवाच॥
मय्यासक्तमनाः पार्थ योगं युजन्मदाश्रयः
असंशयं समग्रं मां यथा ज्ञास्यसितच्छृणु
दोहा-मेरोईकरिआसरो, मोहीमेंचितराखि ॥
मोकोजानसत्यवह, योसमझाऊंभाखि ॥१॥
हे पृथानन्दन ! अपना चित्त मुझमें लगाकर और मेरा ही
आश्रय लेकर जिस प्रकारसे संशय रहित हो मुझको पूर्ण रीतिसे
जानोगे सो मैं कहताहूं ॥१॥
ज्ञानं तेऽहं सविज्ञानमिदं वक्ष्याम्यशेषतः
यज्ज्ञात्वा नेह भूयोऽन्यज्ज्ञातव्यमवशिष्यते॥
दोहा-ज्ञान रूप विज्ञानहूं, तोसों कहाँबखानि ।।
जाकेजानेजानिबौ, कछुनरहतहैजानि ॥२॥
हे अर्जुन । में अब तुमको संपूर्ण ज्ञान विज्ञान सुनाता हूं इसे
जानकर फिर कुछ जानने योग्य बात न रहैगी ॥२॥
मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये॥
यततामपिसिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्वतः॥३
दोहा-जतनकरतहै सिधिको, एकहजारनमाहिं॥
तिनहूमेंकोऊलहै, बहुतलखतहनाहिं ॥३॥
अध्याय ७॥ १५३ सहस्रों मनुष्योंमें कोई ही ऐसा होता है जो आत्मज्ञान जानने के लिये यत्ल करता है और इन यत्न करनेवालोंमेंभी कोईही मुझको ठीक रीतिसे जानता है ।।३॥ भूमिरापोऽनलो वायुःखं मनो बुद्धिरेव च अहंकार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा ॥४ दोहा-भूमिनीरपावकपवन, अंबरमनबुधिमान। अहंकारहैआठवां, मायाभेदनिदान ॥४॥ पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि और अहंकार ये आठ प्रकार की मेरी जुदी जुदी प्रकृति है ॥ ४ ॥ अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम ॥ जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत॥ दोहा-मायामेरीएकयह, जिनजीत्योसंसार ॥ सांचीमनमेंजानिले, जीवहतैनिरधार ॥५॥ यह जो ऊपर आठ प्रकारकी प्रकृति कही गई है यह अपरा प्रकृति है और इससे अन्य जो जीवभूत प्रकृति है, वह परा प्रकृति है, इस बातको अच्छी रीतिसे ध्यानमें रख और हे महाबाहो ! इसी परा प्रकृतिसे यह जगत् धारण किया गया है ॥५॥ एतद्योनीनि भूतानि सर्वाणीत्युपधारय ।। अहं कृत्स्नस्य जगतःप्रभवःप्रलयस्तथा।।
भगवद्गीताभाषाटीका. दोहा-मायातेउतपन्नहै, सबैजीवहिदाय ॥ हौउपजाऊंजगतसब, नाशकरौंचितचायं॥६॥ हे अर्जुन ! संपूर्ण प्राणिमात्र मेरी इन दोनों प्रकृतियोसे उत्पन्न होते हैं इस वातको अच्छे प्रकारसे जानलो और मही इस संपूर्ण जगतका उत्पन्न कर्ता और नाश कर्ता हूँ॥६॥ मत्तः परतरं नान्यत्किंचिदस्ति धनंजयः मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव ॥ दोहा-अर्जुनमोतेजोपरे, और बातजनिजानि ॥ पोयेमनिया सूतमें, त्योमोमेजगमानि ॥७॥ हे धनंजय ! जैसे सूतमें मणि पोई जाती है इस तरह वह संसार) मुझमें पोयाहुवा है इसी लिये मुझसे परे कुछभी नहीं है ॥७॥ रसोऽहमप्सु कौंतेय प्रभाऽस्मि शशिसूर्ययोः प्रणवः सर्ववेदेषु शब्दः खे पौरुषं नृषु ॥८ दोहा-चंद्रसुरजकीजोतिहूं, जलरसप्रणवहुवेद ॥ गगनशब्दवलनरनको सवहीमेरोभेद ॥८॥ है कौन्तेय जलोंमें मैं रस हूँ सूर्य और चन्द्रमा प्रभा हूं सब वेदोंमें प्रणव ई आकाशमें शब्द हूँ और मनुष्योंमे पुरुषार्थ हूं ॥८॥ पुण्योगंध:पृथिव्यांचतेजश्चास्मिविभावसों जीवनंसवभूतेषुतपश्चास्मितपस्विषु॥९.
अध्याय ७॥
दोहा-गंधहौंहीभूमिमें, हौंपावकमेंतेजु॥
जीवनहूँकोजीवहौं, तपन नितपलखिलेजु ॥९
हे अर्जुन ! पृथ्वीमें जो पवित्र गंध है, वह मैंही हूं अग्निमें मै
तेजरूप हूँ सम्पूर्ण प्राणियों में जीवनरूप मैं हूँ, और तपस्वियोंमें
तप मेराही रूप है ॥९॥
बीजंमांसर्वभूतानां विद्धिपार्थ सनातनम्
बुद्धिबुद्धिमतामस्मितेजस्तेजस्विनामहम्॥
दोहा-सबजीवनकोबीजहौं, मोकाँजानिजुलेछ ।
बुद्धिवंतमेंबुद्धिहौं, सबतेजनिकोगेहु ॥१०॥
हे पार्थ ! मैं संपूर्ण प्राणियोंका सनातन वीज हूं अर्थात् मुझीको
सबका उत्पत्तिकारण समझ मैं बुद्धिवानों में बुद्धिरूप और तेजस्वि-
योमें तेज हूं ॥१०॥
बलंबलवतां चाहं कामरागविवर्जितम् ॥
धर्माविरुद्धोभूतेषुकामोऽस्मिभरतर्षभ।
दोहा-बलबलवंतनकोजुहू, कामरागजितनाहिं।
कामरूपहीहौंजुहूं,धर्मसबैमोहिमाहि ॥११॥
हे भरतर्षभ ! बलवान पुरुषोंमें जो काम और रागरहित बलहै सो
मैं ही हूँ और धर्म अविरुद्ध जो काम है सो भी पुरुषोमे मैंही
अर्थात् अपनी स्त्रीमे पुत्र उत्पन्न करनेमात्र जो भोग किया जाता है
वह मेही ॥११॥
. भगवद्गीताभाषाटीका
है
ये चैव सात्विका भावाराजसास्तामसाश्च ये।।
मत्त एवेति तान्विद्धि न त्वहं तेषु ते मयि
दोहा-राजसतामससत्वके, जैहैसिगरेभाय ॥
एसबमोंमेंबसतहैं, मोहिननसौंचाय॥ १२ ॥
हे अर्जुन ! जोशमदमादि सात्विक भाव हैं, हर्ष गदि राजस
भाव हैं और शोकमोहादि तामस भाव हैं. वे सब मुझहीसे उत्पन्नहुए
जान, तथापि मैं उनके वशीभूत नहीं हूं वेही मेरे वशीभूत हैं ॥१२
त्रिभिर्गुणमयैर्भावैरोभिः सर्वमिदं जगत् ॥
मोहित नाभिजानाति मामेभ्यः परमव्ययम् ॥
दोहा-तीयोगुनकेभावजे, तिनमोह्योसंसार॥
मोकोको उनहिलखें, इनतेपैलीपार ॥१३॥
इन ऊपर कहेहुए त्रिगुणमय भावोंही ने इस संपूर्ण संसारको मो.
हितकर रखा है इससे मुझे कोई नहीं जानता है, मैं इन भावोंसे
परे हूं और इनका नियन्ता हूं और अव्यय आर्थात् निर्विकार हूं.
इससे मुझे कोई नहीं जानता है ॥१३॥
ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया॥
मायामेतां तरंति ते॥१४
दोहा मेरीमायागुनमयी, दुस्तरतरीनजाय॥
जोकोउआवैमोसरनि सोजुतरैसंसार ॥१४॥
अध्याय ७॥ . १५७ हे अर्जुन ! यह मेरी माया त्रिगुणयुक्ता होने के कारण दैवी अथात् मानवीय पुरुषार्थसे परे है और बड़ी दुस्तर है इससे जो, कोई केवल मेरीही शरण आते है वे इस मायासे पार लगते हैं ॥ १४॥ नमांदुष्कृतिनोमूढाः प्रपद्यतेनराधमाः ॥ माययाऽपहृतज्ञानाआसुरंभावमाश्रिताः दोहा-पापीमूरखजेजगत, तेनहिंपावतमोहिं ।। ज्ञानजुमायाकरिहरयो, असुरगर्वमेंपोहि १५) हे अर्जुन ! मेरी मायाने जिनका ज्ञान हरलिया है और उस ज्ञानके दूर हो जानेसे असुरतुल्य बन गये हैं ऐसे पापी, मृढ, नरा- धम मुझे नहीं भजते हैं ॥१५॥ चतुर्विधाभतेमांजनाःसुकृतिनोऽर्जुन आतों जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ। दोहा-पुन्यवंतजेचारविधि, मोहिभजतचितऐन॥ ज्ञानीयोगीकामयुत, विज्ञानीसुनिवैन'॥ १६ ॥ हे अर्जुन ! हे भरतर्षभ ! आतुर (रोग पीडित) जिज्ञासु ( आ. त्मज्ञानके जानने की इच्छा करनेवाला) अर्थार्थी (ऐहिक वा पार- लोकिक भोग भोगनेवाला) और ज्ञानी ये चार प्रकारके मनुष्य मुझे भजते हैं. जब इनके पूर्वजन्मके पुण्यका उदय होता है ॥१६ तेषां ज्ञानीनित्ययुक्त एकभक्तिर्विशिष्यते प्रियोहि ज्ञानिनोऽत्यर्थमहंस च मम प्रियः ६११८ भगवतीताभाषाटीका। दोहा-ज्ञानी लोभक्तिहिकर, सोसवतेअधिकाय॥ ज्ञानीकोवलंभजुहौ, ज्ञानीमोहसुहाय ॥१७ इन चार प्रकारके पुरुषों में ज्ञानी विशेष है. क्योंकि वह सदा मु- झमें युक्त रहता है और केवल मुझमेंही भक्ति रखता है. इससे ज्ञानीको म बहुत प्रिय हूं और ज्ञानो मुझको प्यारा है ॥ १७ ॥ उदाराः सर्वएवैज्ञानीत्वात्मैवमेमतम्॥ आस्थितःसहियुक्तात्मामामेवानुत्तमांगतिम।। दोहा-मेरेमतएसबबडे, ज्ञानीसोकोजानि॥ उत्तमगतिपाइजुतिन, प्रलयलेतुन हिमानि १८ ये चारों प्रकारके प्राणीही उत्तम हैं, परन्तु ज्ञानी मेरेही समान है यह मेरा मत है. क्योंकि वह सदैव अपना चित्त मुझहीमें लगाये रहता है और सर्वोत्तम गतिरूप मेरेही आश्रित रहता है ॥१८॥ वहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान् मां प्रपद्यते वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः॥ दोहा-बहुजन्मनिमोकोलही, ज्ञानवंतरेमित्त ॥ वासुदेवसवमेंलखे. सोदुर्लभहैनित्त ॥ १९॥ हे अर्जुन ! बहुत जन्मतक ज्ञानको संचित करता हुआ जो इस संपूर्ण जगतको वासुदेवमय जानकर मेरा स्मरण करता रहता है वह महात्मा बहुत दुर्लभ है ॥ १९ ॥ कामैस्तैस्तैर्हतज्ञानाः प्रपद्यतेऽन्यदेवताः॥ . तंतं नियममास्थायप्रकृत्यानियताःस्वया अध्याय 1 . दोहा-नष्टज्ञानबहकामना, यजैअन्यदेवान ॥ तिहितिहिनियमवासना,स्वस्वप्रकृतिउन्मान हे अर्जुन ! अपनी अपनी प्रकृातके अनुसार मनुष्य धन जन श्रीपुत्रादिके लोमके वशीभूत होकर उन उन वासनाओंसे अज्ञानमें डूब उन फलोंकी चाहनासे अन्य देवताओंकी उपासना करते हैं २० यो यो यां यांतनुंभक्तःश्रद्धयार्चितुमिच्छति तस्य तस्याचलां श्रद्धांतामेव विदधाम्यहम् दोहा-श्रद्धायुतजेपूजहीं, जोदेवनिचितलाय ॥ ताकतेहीमांझहीं, श्रद्धादेउंबढाय ॥२१॥ हे अर्जुन! जो जो मनुष्य श्रद्धापूर्वक जिस जिस देवताके अर्चन पूजनकी इच्छा करता है. उन पुरुषोंकी उस श्रद्धाको में उनमें दृढ- कर देता हूं. अर्थात् उनका मन अपनी ओरसे हटाकर उन देवता- ओंमें मैं लगा देता हूँ. जिससे वे मुझे भूल जाते हैं ।। २१ ॥ स तया श्रद्धया युक्तस्तस्याराधनमीहते॥ लभतेच ततः कामान्मयव विहितान्हितान दोहा-सोवाहीश्रद्धाहितें, पूजतवाहीदेव ॥ देवजुहौंहीकामना, वहजानतनहिमेव ॥२२॥ तब वह मनुष्य उनही देवताओंमें श्रद्धा करके उनका आराधन- करता है और उनहीं देवताओंसे अपने अपने मनवांछित फलोंको पा लेता है. (जब में मनुष्यको मुझसे विमुख और अन्य देवतोंमें आसक्त देखता हूं तव) में भी उनको वैसीही प्रेरणा करता हूँ॥२२॥ A भगवद्गीताभाषाटीका. अंतवत्तु फलं तेषां तद्भवत्यल्पमेधसाम्॥ देवान्देवयजो यांतिमद्धक्ता यांतिमामपि दोहा-फलथोरोपावतुजुवै, विनाज्ञानकेमृढ ॥ देवभक्तदेवनमिलै, मेरोमोकोगूढ ॥२३॥ परन्तु उन अल्पबुद्धिवालोंका वह फल नाशवान होता है अर्थात् जो मुझे छोडकर अन्य देवोंकी उपासना करते हैं उनको फल मि- लता है परन्तु वे फल शीघ्रही नष्ट होजाते हैं, जो और देवताओंका पूजन करते हैं वे और देवताओंको प्राप्त होते है और जो मेरा यजन करते हैं वे मुझसे मिलते हैं ॥ २३॥ अव्यक्तं व्यक्तिमापनं मन्यते मामबुद्धयः परंभावमजानंतोममाव्ययमनुत्तमम् ॥ दोहा-जाकेथोरीबुद्धिहै, जानतप्रगटनमोहि ॥ अविनाशीउत्तमजुहौं, सवतेन्यारोजोहि २४ हे अर्जुन ! मैं विनाशरहित, सर्वोत्तम और परस्वरूपहूँ, जो धु- द्धिहीन मुझको ऐसा नहीं जानते हैं और मुझे मत्स्यकूर्मादिरूप मानकर मेरे स्वरूपको नहीं जानते हैं और अन्य देवताओंकी उपा- सनामें लगजाते हैं, इसीसे उनको नाशवान् फल मिलता है॥२४॥ नाहंप्रकाशःसर्वस्य योगमायासमावृतः मूढोऽयंनाभिजानातिलोकोमामजमव्ययम
अन्याय
दोहा-ढप्योजुमायायोगही, काहूकोनप्रकास ॥
मुरखमोहिंनजानहीं, अजरअमरसुखवास२५
मै योगमायासे आवृत हूं, इसलिये मैं सबके सन्मुख प्रकाशित
नहीं होता हूं, केवल अपने भक्तोंहीके सन्मुख प्रत्यक्ष होता हूँ और
मेरी योगमायासे आवृतहुए मूढ लोग मुझको अजन्मा और
अविनाशी नहीं जानते हैं ॥ २६ ॥
वेदाहं समतीतानि वर्तमानानि चार्जुन।।
भविष्याणि च भूतानि मां तु वेदन कश्चन
दोहा-जे बीते जानततिन्हैं, वर्तमानत्यौंजोय॥
होनहारसबकोलखौं, मोहिलखैनहिंकोय॥२६
हे अर्जुन ! मैं भूत, वर्तमान और भविष्यत् तीनों कालमें हुए
चराचर प्राणियोंको जानता हूं और मुझको कोई नहीं जानता है
क्योंकि वे मेरी मायासे आवृत हैं ॥२६॥
इच्छाद्वेषसमुत्थेन द्वंद्वमोहेन भारत॥
सर्वभूतानि संमोहं सर्गे यांति परन्तप ॥
दोहा-संगदेषअज्ञानते, सबैजुमोहितहोत ॥
मानिलेतहैआपको, हमसुखदुखनिउदोत ।।
हे अर्जुन ! हे परंतप ! इस संसार में आकर संपूर्ण प्राणी मुग्ध
होजाते है, क्योंकि इच्छा और देषसे उत्पन्न जो सुख दुख है, उनमें
पँस जाते हैं और इसीसे मुझे भूल जाते हैं ॥२७॥
१६२
भगवद्गीताभाषाटीका.
येषां त्वंतगतं पापं जनानांपुण्यकर्मणाम्
ते द्वंद्वमोहनिर्मुक्ता भजते मां दृढव्रताः॥
दोहा-पुण्यकियेजिनजगत में, दूरिकियेजिनपाप
तेईछूटतमोहसों, मोकोपावतआप ॥२८॥ ..
जिन पुण्यात्माओंके पाप दूर होगये हैं, वे इच्छा देषसे उत्पन्न
सुख दुःखादिसे छूट अपने चित्तको दृढकर मेरा भजन करते हैं २८
जरामरणमोक्षाय मामाश्रित्य यतंति ये॥
ले ब्रह्म तद्विदुः कृत्स्नमध्यात्म कर्म चाखिलम
दोहा-जरामरणकीहानिको, जेकोउकरतउपाय॥
जानततेअध्यातमाह, ब्रह्मकर्मकेमाय ॥२९॥
हे अर्जुन ! जो मेरा आश्रय लेकर जरामरणसे छूटने का उपाय
करते हैं वे उस ब्रह्म, संपूर्ण अध्यात्म और संपूर्ण कोको जानते हैं।
साधिभूताधिदैवं मां साधियज्ञं च येविदुः
प्रयाणकालेऽपि चमांते विदुर्युक्तचेतसः।।
दोहा-अधिदैविकअधिभूतसों. अधियज्ञौमुहिमित्त।
मरनसमैमुलतनहीं, योगीमोकोहित्त ॥३०॥
भजिवेलायकरूपनिज, कह्यो सातवेंऽध्याय ॥
विनायतनज्ञानहिलहै, कृष्णभक्तिअधिकाय ॥१॥
शर आनंदरामहै, यहयोगविज्ञान ।।
प्रभुमेरीविनतीयहै, भक्तिदेहभगवान ॥२॥
अध्याय। १६३ जो मुझे अधिमत, अधिदैव और अधियज्ञसहित जानते हैं, वे युक्तचित्तवाले मरनेके समयभी मुझको ऐसाही जानते हैं अर्थात् मरणकालंकी घबडाहटमेंभी मुझे नहीं भूलते हैं ॥ ३०॥ 'इतिश्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णा- र्जुनसंवादे विचारदर्पण दोहासहितभाषाटीकायां ज्ञानविज्ञानयोगोनाम सप्तमोऽध्यायः ॥ समीक्षा-प्रथमके ६ अध्यायोंमें कर्मकांड का वर्णन हुआ है. अब सातवें आध्यायसे वारहवें अध्याय पर्यंत भक्तिकांड का वर्णन किया जायगा. .जब मनुष्य यह बिचारता है कि, परमात्माने इस पृथ्वी जैसे कितनेही अनंत लोक अपनी सामर्थ्यसे रच रक्खे हैं, तो उसको परमात्माकी अद्भुत सर्वशक्तिमत्ता पर बडाही आश्चर्य होता है। जो हमारे शास्त्रोंमें प्रायः चौदह भुवनोंकाही वर्णन आता है, उसका कारण यह है कि, पूर्वकालमें महारे ऋपिमुनियोंका सम्बन्ध इन्हीं लोकों से अधिक था। जब इस प्रकार मनुष्य ईश्वर की सर्व- शक्तिमत्ता को देखता है, तो उसके मनमें ईश्वर की भकि उत्पन्न होती है, संसारमें यह नियम है कि, किसीमें जो प्रेम या भक्ति उत्पन्न होती है, वह उसके गुणों परही ध्यान देनेका फल है। जिनमें हम कोई गुण नहीं देखते हैं, उनमें हमारा प्रेम या भक्ति नहीं होती है, एक प्रकारकी उदासीनता सी रहती है। इस प्रकार लोक लोकांतरों पर ध्यान देते हुए मनुष्य के हृदयमें यह प्रश्न भी उत्पन्न होता है कि, परमात्मा ने किस प्रकार इस सृष्टिको रचा है। सृष्टिकी रचना में विज्ञानके नियमों का पालन किया गया है या नहीं इसी प्रश्नका उत्तर देनेको इस सातवें अ- भगवद्गीताभापाटीका। ध्यायका आरम्भ कियागया है और इसमें यह दिखाया गया है कि, इस सृष्टिकी रचनामें परमात्माने विज्ञान के नियमोंको स्थिर रखा है। अर्थात् प्रकृति के सत् , रज, तम रूप, तीन गुण वाले परमा- गुऑसे इस सृष्टिको रखा है। ज्यों २ मनुष्य अधिक खोज करेगा त्यों २ उसको पता लगता जायगा कि, सृष्टिकी कोई भी रचना बिना नियम के नहीं हुई है। जितना २ अधिक ज्ञान मनुष्यका बढता जायगा. उतना ही अधिक वह परमात्माका भक्त होता जायगा. साथ ही इस अध्यायमें यह भी दिखाया गया है कि, जो मनुष्य केवल प्रकृति के विचित्र पदार्थों में मोहित हो उन्हींके भोग विलासमें फंसकर देशसेवा और जातिसेवा के कामों से दूर भागते हैं। वह परमात्माकी भक्ति से वंचित रहकर सदाके स्थायी आनन्द अर्थात् मोक्ष को प्राप्त नहीं होसक्ते हैं। (देखो अ०७श्लो-१५ [पृष्ठ १५१ से आगे] [१९] केवल भारतवर्ष सम्बन्धी समाचारों पर इतने ग्रंप संस्कृत और अंग्रेजीमें, लिखे हुए हैं कि यदि लगातार कई वर्ष पर्यन्त चार पांच विद्वान हिन्दी (आर्य) भाषामें इनका अनुवाद करें तब पूरारअनुवाद होसका है । इस लिये सब ग्रंथोंके एकवार अनुवादित होजाने से पूर्व, एक मासिकपत्र "भारतवर्षीय समाचारसंग्रह नामसे निकारा जाय जिसमें उन ग्रन्थोंके अनुवाद पुरंतकाकार में प्रकाशित होते, रहे और लोगोंको एक बार मोल लेनेका बोझ प्रतीत न हो। इस समाचारपत्र में निम्नलिखित विषयविभाग हों, भारतवर्षीय इतिहासमाला और भूगोलमाला, उत्तम २ आर्य स्खीपुरुषोंके जीवनचरित्र, भारतवर्षीय प्राचीन विद्याये यथा आयुर्वेद, धतुर्वेद, ज्योतिषशास्त्र, मादि, भारतवर्षीय शिल्प, भारतवर्षीय राज्यप्रणाली अर्थात् आर्य प्राचीन राज्य पद्धति, यावनी अर्थात् मुसलमानोंके समय की राज्यप्रणाली, अंग्रेजी राज्य प्रणाली जो सत्मानोंके पीछेसे लेकर इससमय तककी हो.
दर्शन। नूतन समाचारसंग्रह जो शारीरिक, सामाजिक, मानसिक, व्यापारिक और राज्यकीय विषयोंका हो. इस प्रकार "भारतवर्षीय समाचार संग्रह' नामका मासिक या साप्ताहिक पत्र निकलनेसे लोगोको प्राचीन और आधुनिक समयके भारतवर्षीय समाचार मिलते रहेंगे और प्रत्येक विभागके यह समाचार पुस्तकाकार रूपमें निकलें, जिससे कि एक २ पुस्तक बनती जावे. पुस्तकका आकार और पृष्ठसंख्या पाठको या संचालकोंकी रुचि पर निर्भर रहे. [२०] हमारी ज्योतिषवियाका पुनरुद्धार होना चाहिये । भास्कराचार्य के पश्चात् हमारे प्रधान २ स्थानोंके ध्रुवोंका अभीतक संशोधन नहीं हुआ है वायुशास्त्र और जहाजों के चलाने की विद्यामें ज्योतिषशास्त्रही परम सहायक हो सका है, अतः इस ओर हम को पूरा २ ध्यान देना चाहिये । [२१] आयुर्वेदकी उन्नतिके लिये स्थान २ पर आयुर्वेदिक पाठशाला खोली जायँ । सुश्रुतादि सिद्धांतर्गयों को पढाकर पारद, हरताल, तांबेश्वर आदि घातुओंकी भस्म करनेकी विधि बताई जाय।आयुर्वेदकी रीतिसे मारीहुई धातुओंकी भस्म द्वारा असाध्य रोगोंका दूर होना देखनेमें आया है. जिसको देखकर यूरोपियन डाक्टर और यूनानी हकीम [वैद्य] चकित हुए हैं । शोक इस वातका है कि आयुर्वेदीय औषायाम असाधारण गुण होने पर भी आयुर्वेदीय पाठशालाओंके अभावसे यह हमारी विधा नष्टप्रायः हो रही है, उत्तमर विहान वयोंका मिलना कठिन होता जाता है। 'आयुर्वेदीय सम्मेलन" सभाओंका खोलना और उनको सहायता देकर स्थानरपर आयुर्वेदीय पाठशालाओं और औषधाल. योका खुलवाना हमारा परमकर्तव्य होना चाहिये, जिससे कि उचम और निपुण विप उत्पन्न होते रहें। [२२ ] हमारे पूजनीय ब्राह्मणों और संन्यासी महात्माओंका यह मुख्य कर्तव्य होना चाहिये,कि भारत वर्षका मुख उज्वल करनेवाली योगविधाको पुनर्जी- वित करें. यही विद्या है जिसके.कारण हमारा अध्यात्मशास्त्र इतनी उच्च कोटिको पहुंच गया था। अब हमको भय है कि कहीं अमेरिका, जर्मनी आदि देशोंके रहने वाले हमारेही ग्रंथोंको जानकर इस विद्यामें हमको शिक्षा देकर हमारे गुरू न कहलाने लगे। [२३ ] भिन्नर एकांत स्थानोंमें साधु पाठशालाएं खोली जानी चाहिये, जिनमें साधुओं को परमेश्वरभकि, देशभकि, जातिभक्ति और परोपकार की शिक्षा दीजाय । इस समय भारतवर्षमें बावनलाल हिन्दू आर्य] साधु हैं। उनमें अधिकांश मूर्ख, भंगेडी गंजेडी हैं, जो देश को भाररूप होरहे हैं (अर्पण) ,
अथ अष्टमोऽध्यायः॥
॥ अर्जुन उवाच ॥
किंतब्रह्म किमध्यात्मं किं कर्म पुरुषोत्तम
अधिभूतं च किं प्रोक्तमधिदेवं किमुच्यते॥
दोहा-अध्यातमकोब्रह्मको, कर्मकहाजगदीस ॥
अधिदैवतअधिभूततुम,जानतबिश्वावीसा
अब अर्जुनने पूछा कि-हे पुरुषोत्तम ! ब्रह्म क्या है ? अध्यात्म
क्या है ? कर्म क्या है ? आधिभूत क्या है ? और अधिदैव क्या है ?
अधियज्ञः कथं कोऽत्र देहेऽस्मिन्मधुसूदन
प्रयाणकालेचकर्थ ज्ञेयोऽसिनियतात्मभिः
दोहा-अधियज्ञहिकासोंकहत, यादेहीमेंकौन ॥
कैसेतुमकोजानिये, प्रानकरैजवगौन ॥२॥
हे मधुसूदन ! यहां इस देहमें अथियज्ञ कैसे हुआ और इस देही
में कौन है ? और इम लोकमें मरनेके समय संयतात्मा मनुष्य
आपको कैसे जान सकते है ॥२॥
॥श्रीभगवानुवाच ॥
अक्षरं ब्रह्म परमं स्वभावोऽध्यात्ममुच्यते
भूतभावोद्भवकरो विसर्ग:कर्मसंज्ञितः॥३
दोहा-अक्षरसोंब्रह्महिकहत, अध्यातमजुसमाय॥
जोउपजावतजगतको,सोईकर्मस्वभाय ॥३॥
अध्याय दी. यह सुन श्रीकृष्णं बोले कि हे अर्जुन ! जो परम अक्षर अर्थात् जगतका मूलकारण है वही ब्रह्म है, और स्वभाव जो जीव सो अ- ध्यात्म है तथा संपूर्ण प्राणियोंकी उत्पत्ति और वर्षा आदिका करने वाला जो द्रव्यत्यागरूप यज्ञ सोही कर्म है ॥३॥ अधिभूतं क्षरोभावः पुरुषश्चाधिदेवतम् ॥ अधियज्ञोऽहमेवात्र देहे देहभृतांवर ॥४ दो देहजु है अधिभूत यह, अधिदैवत है जीव ॥ सब देहिनकीदेहमें, हौंअधियज्ञ सुपीव ॥४॥ जोक्षर अर्थात् नाशवान है वह अधिभूत है,इन्द्रियोंके अधिष्ठाता देवताओंका अधिपती जो वैराजपुरुष है वह आधिदैवत है और हे नरोत्तम अर्जुन ! देहमें आधियज्ञ अर्थात देव पूज्य मैं हूं ॥ ४ ॥ अंतकाले च मामेवस्मरन्मुक्त्वा कलेवरम् ॥ यःप्रयाति स मदावं याति नास्त्यत्र संशयः दोहा-अंतसमैदेहहितजै, मौंसुमिरनजोहोय॥ सोतबहीमोकोमिलै, तहानसंशयकोय ॥५॥ हे अर्जुन ! जो अन्तसमयमें मुझको स्मरण करता हुआ देहको त्यागता है वह मेरे स्वरूपको पाता है इसमें संदेह नहीं है ॥ ५ ॥ यं यं वाऽपि स्मरन् भावंत्यजत्यंते कलेवरम तं तमेति कौंतेय सदा तद्भावभावितः॥६
१६०
भगवद्गीताभाषाटीका.
दोहा-पानीजवदेहहितजै, सुमिरैकोईकाज ॥
यामें संशय नाहिने, पावै सोई साज॥६॥
हे कौन्तेय ! जिस जिस भावको स्मरण करता हुआ मनुष्य देहको
त्यागता है वह मनुष्य उस भावमें भावित होनेके कारण उस उस
भावको ही पाता है ॥ ६ ॥
तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युद्ध्य च
मय्यर्पितमनोबद्धिमिवैष्यस्य संशयः७
दोहा-मेरोसुमिरन नित्यकरि, युद्धकरौकिनमित्त
अप मोमें बुद्धिमन, तामें आनउ चित्त ॥७॥
इसी हेतुसे तू सब समय मेरा स्मरण करता हुआ युद्ध कर, इस
प्रकारसे मुझमें मन और बुद्धि लगानेसे तू मुझे निश्चय पावैगाजा
अभ्यासयोगयुक्तेन चेतसा नान्यगामिना
परमं पुरुषं दिव्यं याति पार्थानुचिंतयन् ८
दोहा-योग और अभ्यासमें,जाकोचितथिरहोय
मोचिंताराबंसदा, पुरुषहिंपावैसोय ॥ ८॥
हे अर्जुन ! अम्यासयोगयुक्त होकर जो केवल परम पुरुषमेही
चित्त लगाकर उसीका ध्यान करते हैं वे निश्चय उसेही. पाते हैं ॥८॥
कविं पुराणमनुशासितारमणोरणीयांस-
मनुस्मरेद्यः॥सर्वस्य धातारमचिंत्यरूप-
मादित्यवर्ण तमसः परस्तात् ॥९॥
अध्याय ८।। १६९ दोहा-कविपुरानअनुशासिता, धातासुक्षम मानि राविसमानसवते परे, अतिअचिंत्यमुहिजानि।। जो सर्वज्ञ सकल विद्याओंके निर्माणकर्ता अनादि सिद्ध, सपूर्ण जगतके नियन्ता, सूक्ष्मसेभी अति सूक्ष्म, सबका पोषक, अचिन्त्य रूप, सूर्यके समान कान्तिमान् और प्रकृतिसे परे जो पुरुष उसका स्मरण करते हैं ॥९॥ प्रयाणकाले मनसा चलेन भक्त्या युक्तो योगबलेन चैव ॥ ध्रुवोर्मध्ये प्राणमावेश्य सम्यक् स तं परं पुरुषमुपैति दिव्यम् १० दोहा-मरणसमैमनुथिरकरै, भक्तियोगबलपाय ॥ भृकुटिमध्यप्रानहिधरै, परमपुरुषजाय ॥१० हे अर्जुन ! ऊपर कहे हुऐ लक्षणोंसे युक्त जो उस दिव्यरूप परम पुरुषका भक्तिपूर्वक और योगबलद्धारा मरणसमयमें प्राणोंको भृकु- टियोंके बीचमे अच्छी तरहसे सन्निविष्ट कर ध्यान करता है वह उससे मिलजाता है॥१०॥ यदक्षरं वेदविदो वदंति विशति यद्यतयो वीतरागाः ॥ यदिच्छंतो ब्रह्मचर्य चरंति तत्ते पदं संग्रहेण प्रवक्ष्ये ॥११॥ दोहा-अक्षरजासों कहत है. वीतरागजहॅजात ॥ ब्रह्मचर्यजोचाहते ता पदकी कहबात ॥११ २७० भगवद्गीताभाषाटिएका हे अर्जना जिसे वेदवेत्ताअक्षर अर्थात नाशरहित कहते हैं, जिनके रागदेषादि जाते रहे हैं वे यल करकरके ईश्वरको प्राप्त होते हैं जिस- के जाननेकी इच्छासे ब्रह्मचर्य व्रतका पालन करते हैं उस पदका सं. क्षिप्त वर्णन तुमसे कहूंगा॥११॥ सर्वद्वाराणिसंयम्यमनो हदि निरुद्धय च माधायात्मनःप्राणमास्थितोयोगधारणाम दोहा-सबहारनकोबशकरै, मनरोकैहियमाहिं।। प्रानहिरोकैसीसमहि, रहै धारणा गाहि ॥१२॥ हे अर्जुन संपूर्ण इन्द्रियोंका निग्रह करके और मनको हृदयमें रख अपने प्राणोंको भृकुटियों के बीचमें लेजाकर योग धारण करै१२ ओमित्येकाक्षरंब्रह्मव्याहरन्मामनुस्मरन यः प्रयाति त्यजन्देहं स याति परमां गतिम दोहा-प्रणवाक्षरकोजपकरै, सुमिरै मोकों नित्त । इहिबिधिजोदेहहितजै, लहपरमगतिमित्त १३ हे अर्जुन ! जो मनुष्य देहको त्यागते समय 'ओम' इस एकाक्षर ब्रह्मका ध्यान करते हुये मेरा स्मरण करते हैं वे अवश्यही मोक्षरूप परम पदको पाते हैं ॥१३॥ अनन्यचेताः सततं यो मांस्मरति नित्यशः तस्याहंसुलभःपार्थ नित्वयुक्तस्ययोगिनः अध्याय 11 १७१ दोहा-अनन्यचित है कै करें, मरोमुमिरनध्यान॥ ताको मैं नितसुलभहौं, योगयुक्तसोंजान॥१४॥ हे पृथानन्दन ! जो मुझहीमें चित्त लगाकर नित्यप्रति निरंतर मेरा स्मरण करते हैं वे एकाग्र चित्तवाले योगीजन मुझे बहुत सुल- भरीतिसे पाते हैं ॥१४॥ मामुपेत्य पुनर्जन्म दुःखालयमशाश्वतम नाप्नुवंति महात्मानः संसिद्धिं परमां गता दोहा-महापुरुषसिन्हिहिलहै, मोमेंहोतजुलीन ॥ दुखकोघरजोजन्महै, तामहोतनदीन ॥१५॥ हे अर्जुन ! मुझको मिलनेरूप परम सिद्धिको प्राप्त हुए महात्मा जब मुझको पालेते हैं तबू वे फिर अनित्य और दुःखोंके भंडार पुन जन्मको नहीं लेते हैं अर्थात् वे जीवन मरणके क्लेशोसे छूट जाते हैं१५ आब्रह्मभुवनाँल्लोकाः पुनरावर्तिनोऽर्जुन।। मामुपेत्य तु कौंतेय पुनर्जन्म न विद्यते ॥ दोहा-ब्रह्मलोकलौंलोकजे, तिनतॆआवनहोय ॥ अर्जुनमोकोपाइके, जन्मलहतनाहिंकोय ॥१६ हे अर्जुन ! ब्रह्मलोकतक जितने लोक हैं वे सब बार बार जन्म लेते हैं परंतु हे कौतय ! मुझसे मिलने के पीछे पुनर्जन्म नहीं होता है सहस्रयुगपर्यंतमहर्यद्रह्मणो विदुः ॥ रात्रियुगसहस्रांतांतेव्होरात्रविदो जनाः, "१७२ भगवद्गीताभाषाटीका, दोहा-सहसयुगनकेअंतलौं, ब्रह्माकोदिनजानि॥ रातौतितनीहोतहै, ज्ञानीकहैवखानि ॥ १७॥ ब्रह्माका दिन सहस्र चौकडी युगोंका होता है और रात्रिभी इतनी ही बड़ी होती है. जो इन बातोंको जानते हैं वे सर्व ज्ञाता हैं ॥१७ अव्यक्ताव्यक्तयः सर्वाः प्रभवंत्यहरागमे। रात्र्यागमे प्रलीयंते तत्रैवाव्यक्तसंज्ञके ॥ दोहा-ब्रह्माकेदिनहोतही, प्रगटतयहसंसार ।। निशिकेआयेजातुहै, मायामेंताबार ॥ १८ ॥ हे अर्जुन ! कारणरूप जो अव्यक्त ईश्वर है उसीसे चराचर प्राणी ब्रह्माके दिनके आगममें उत्पन्न होते हैं और रात्रिके आगममें उसी ब्रह्ममें लीन हो जाते है ॥ १८॥ भूतग्रामः स एवायं भूत्वा भूत्वा प्रलीयते रात्र्यागमेऽवशः पार्थ प्रभवत्यहरागमे ॥ दोहा-बारबारउपजतसबै, जीवनसुनुरेमित्त । ब्रह्माकेदिनरैनमें, वहेजातहनित्त ॥१९॥ हे अर्जुन ! प्राणियोंका यह संपूर्ण समूह दिनमें बार बार उत्पन्न होकर रात्रिके आगममें लीन हो जाता है और दिनके आगममें फि- र उत्पन्न होता है ।। १९॥ परस्तस्मात्तुभावोऽन्योव्यक्तोऽध्यक्तात्सनातनः यःस सर्वेषु भूतेषु नश्यत्सु न विनश्यति॥
अध्याय ८॥ . दोहा-ब्रह्मजुमायातेपरे, इंद्रीगह्योनजाय॥ सूबजीवनकेनशतही, सो कबहूंननसाय॥२०॥ हे अर्जुन ! चराचर प्राणियोंका कारण स्वरूप जो अव्यक्त है उस- कभी कारण स्वरूप एक और अव्यक्त है अर्थात् इन्द्रियों के विषयसे अगोचर और अनादि है जो संपूर्ण माणियोंके नष्ट होनेपरभी नष्ट नहीं होता है ॥२०॥ अव्यक्तोऽक्षर इत्युक्तस्तमाहुः परमांगतिम यं प्राप्य न निवर्तते तद्धाम परमं मम ॥ दोहा-सोईअक्षरपरमगति, अव्यक्तौपुनिसोय॥ फिरैनजाकोपाइकै, परमधामममजोय ॥२१॥ जो अव्यक्त अर्थात अगोचर और अक्षर अर्थात अविनाशी कहा गया है उसीको परमगति कहते हैं-जिसको पाकर फिर संसारमें नहीं आते हैं वही मेरा परम धाम है ॥ २१ ॥ पुरुषःस परः पार्थ भक्त्या लभ्यस्त्वनन्यया यस्यांतःस्थानि भूतानि येन सर्वमिदंततम दोहा-भक्तिकरतेपाइये. परमपुरुषसोंजानि ।। जामेसिगरेजीव हैं, जगसबरच्योसुआनि२२॥ हे पार्थ ! जिसके भीतर चराचर प्राणी हैं और जिससे यह संपूर्ण संसार व्याप्त है वह परमपुरुष अनन्य भक्तिसे प्राप्त होताहै ॥२२॥ यत्र काले त्वनावृत्तिमावृत्तिं चैवयोगिनः प्रयाता यांतितं कालं वक्ष्यामि भरतर्षभ।
भगवद्गीताभापाटीका. दो-फिरिआवतजाकालमुनि नहिंआवतजाकाल अर्जुनतोसोंकहतहौं. सुनियहसीखविशाल । हे भरतर्षभ ! जिस कालमें योगीजन देह छोडकर फिर नहीं आते हैं और जिस कालमें आते हैं. मैं अब उस कालका वर्णन करताहूं२३ अग्निज्योतिरहःशुक्ल षण्मासाउत्तरायणम तत्रप्रयाता गछतिब्रह्मब्रह्मविदो जनाः॥ दोहा-अग्निज्योतिदिनशुक्लषट्, उतरायणकेमास जातजुज्ञानीयासमैं, लहतब्रह्ममेवास ॥२४॥ हे अर्जुन ! अग्निज्योति, दिन, शुक्लपक्ष और उत्तरायणके छः म. हीने इनमें जो ब्रह्मवेत्ताजन प्रयाण करते हैं वे फिर नहीं आते हैं समीक्षा-यह रूपकाऽलंकार है अर्थात् उत्तरायण कालमें दिन शुक्क होता है और अमिज्योतिके समान होतीहै ऐसे प्रदीप्त ज्ञानकाल में जो लोग माणत्याग करते हैं वह ब्रह्मको प्राप्त होते हैं फिर उनको आत्मा वारे दृष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यः" अर्थात् आत्मा संवन्धी ज्ञानवशे सुने उस पर विचार करे और पुनः तदनु. सार धारणा करे इत्यादिजप यज्ञ करने की आवृत्ति (वार २ करना) नहीं करनी पडती क्योंकि दिव्यज्ञान की अवस्थामें शरीर छोड़ने से वह मुक्त हो जाते हैं." गीतार्थ भाष्य. धूमोरात्रिस्तथा कृष्णः षण्मासा दक्षिणायनम तत्र चांद्रमसं ज्योतियोगी प्राप्यनिवर्तते। दोहा-धृमनिशादच्छिनअयन, कृष्णपक्षजोहोय शशिमंडलयोगीलहै, फिरिआवैहेसोय ॥२५॥ " अध्याय १७५ धूम, रात्रि, कृष्णपक्ष, दक्षिणायन के छः मास और चन्द्रजोति इनमें जो योगी प्रयाण करते है वे फिर संसारमें आते हैं ॥२५॥ समीक्षा-इस श्लोक का आशय यह है कि, केवल कर्म कालमें जो योगी शरीर छोडता है वह धूम, रात्रि तथा कृष्णपक्ष के समान अज्ञानरूप अंधकार को प्राप्त होता है अर्थात् ऐसा योगी बारस्क- मोंकी आवृत्ति करता है। प्रयोजन यह है कि दक्षिणायन समयमें उत्तर ध्रुवके समीप घोर अधकार होता है ऐसी अज्ञान रूप अंधकार अवस्थामें केवल कर्मानुष्ठानी योगी भोगरूपी आनंदों को प्राप्त हो- ता है। इससे वार २ कर्मों मेंही लगा रहना पडता है मोक्षतोज्ञानाव- स्था में ही प्राण छूटनेपर हो सक्ता है" "गीतार्थ भाष्य. शुल्लकृष्णे गती होते जगतः शाश्वते मते॥ एकया यात्यनावृत्तिमन्ययाऽवर्तते पुनः॥ दोहा-शुक्लकृष्णकीगतिकही, तेसंसारहिहोति ॥ फिरिआवतुहैएकगति, एकलहतहज्योति २६ शुक्लपक्ष और कृष्णपक्ष ये दोनों योगियोंके आने जाने के सना- तन मार्ग है. जो शुक्ल मार्गसे जाते है वे मुक्त हो जाते हैं और जो कृष्ण मार्गसे जाते हैं वे फिर संसारमें आते हैं ॥ २६ ॥. समीक्षा-"अर्थात ज्ञानगतिसे मुक्तिको प्राप्त होताहै और कर्मगति से फिर वारर उपासनारूप कर्मोका अभ्यास करता है" मीतार्थ भाष्य नतेसृतीपार्थजानन योगीमुह्यति कश्चन तस्मात्सर्वेषु कालेषुयोगयुक्तो भवार्जुन।।
१७६
भगवद्गीताभाषाका.
।
दोहा-जोजानैदोऊगतिन, योगीमोहनकोय ॥
योगीव्हेअर्जुनवहू, सबकालनको जाय ॥२७॥
हे पार्थ ! जो योगी मोक्षके मार्ग और संसारके दाता इन दोनो
मागाको जानता है वह मोह नहीं पाता है इससे हे अहन ! सदा
योगयुक्त हो ॥२७॥
समीक्षा उत्तदेवयान और पितृयाण अर्थात् ज्ञान और कम
दोनों प्रकारके मागास किसी एक मार्गकोभी जानता हुआ योगी
मोहको प्राप्त नहीं होता। यह वही आशय है जो “नहाभिक्रम
नाशोस्ति " गी० २ । ४० इत्यादि श्लोको वर्णन कर आये हैं कि
योगके अंश मात्र काभी नाश नहीं होता " गीतार्थ भाष्य.
विदेषु यज्ञेषु तपस्सु चैव दानेषु यत्पुण्यफ-
लं प्रदिष्टम् ॥ अत्यति तत्सर्वमिदं विदि-
त्वा योगी परं स्थानमुपीत चाद्यम् ॥२८
दोहा-वेदयज्ञतपदानको, फलजुह्यहिमित्त ॥
योगीताफलसोंअधिक, रहैनसवदिनचित्त॥१॥
सबफलकोयहसारफल, योगीहरिसोयोग ।।
भक्तिकरैमोकोमिल, फलत्यागीकरिभोग २८
कृष्णचरणइकचित्तजे, जोजानतयहभाय ।।
ब्रह्मकर्मअधिभूतए, कहेआठवेध्याय ।।१।।
विनुकलेसइष्टहिलहै, महापुरुपयहयोग ।
आनंदरामप्रकाशकार, कियेयथारथलोग॥२॥
अध्याय ८॥ वेद, यज्ञ, तप, दान आदिमें जो फल कहे गये हैं उनसे अधिक जो योगरूप ऐश्वर्य है उसे पाते हैं और इसको पाकर परमपद जो स्थान है. उसपर पहुंच जाते हैं ॥२८॥ इति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृ- प्णार्जुनसंवादे विचारर्दपण दोहासहितभाषाटीकायां अक्षरब्रह्मयोगोनामाष्टमोऽध्यायः ॥८॥ समीक्षा-परमात्मा के जो भक्त हैं अर्थात जोयह जानकरही उत्त- म कर्म करते हैं कि परमात्मा उत्तम कर्म करनेवालों पर अपनी कृपा करते हैं उन भक्तजनोंके लिये इस अध्यायमें वह २ विधियाँ बता- ई हैं जिनको जानकर शरीर छोडनेके पश्चात् परमात्माकी प्राप्ति अर्थात् मुक्ति प्राप्त होसक्ती है। मरणकाल के समय गीतामें बताई हुई विधियों के अनुसार, (यथा ओंकार जपते २ शरीर छोडना) वही जन शरीर छोडसक्ते है जिन्होंने अपने जीवनकालमें धार्मिक एवं परोपकारवृत्तिको धारण करके अपने जीवन को व्यतीत करते हुए घंटे दो घंटे कर- के या अधिक समय तक नित्य जप आदिका अभ्यास किया हो और जिन्होने ऐसा नहीं किया होगा वह अंत समयमें सांसारिक पदार्थोके मोहरूपी जालमें फंस कर वारम्वार जन्म, मरण रूपी दुःख को भोगेंगे। सरांश यह है कि गीताके छठे अध्यायमें जो युक्ताहार विहार, आसन, प्राणायाम, धारणा और समाधिकी विधियाँ वताई हैं, तदनुसार अग्यास करनेवाले भक्त जनही मरण में सावधान होकर परमात्मा का स्मरण करते हुए अपना शरीर छोड सक्ते हैं, अन्य लोग नहीं. १२ ૨૭૮ विचार देषण - [पृष्ठ १६५ से आगे [२४] हिन्दुओं (आर्यों में इस समय अनेक पंथ प्रचलित है जिनमें मुख्य सनातनी, आर्य, जैन, सिक्स, बोहादि हैं, इन सभी को वैदिकधर्म की शाखाएं समझनी चाहियें; जैसा कि, गंगा नदी तो एक है और उसपर धाट अनेक हैं; ऐसेही विदिक आर्यधर्मरूपी गंगा तो एक हैं और उसके शाखा रूपी घाट सनातनी, आर्य, जैन, सिक्ख आदि अनेक हैं । इन भिन्नर सम्प्रदाय वालों को चाहिये कि, अपनी २ सम्प्रदायों में रहते हुए भी दूसरे हिन्दू (आर्य) सम्प्रदाय वालों को अपनादी “धर्म बन्धु" समझें । अपने से भिन्न हिन्दू (आर्य ) संप्रदाय की कुरीति- यों पर विचार और शास्त्रार्थ बहुत प्रेम से फरें। प्राचीन समय में भी एक वेद की सांख्य वेदान्त,न्याय आदि कई शाखाओंको माननेवाले,मत भेद रखते हुए भी एकही वैदिक मतको मानने वाले समझे जातेथे| और विचले समय में भी शैव,शाक,वैष्णव जादि भिन्न २ सम्प्रदायें इसी बैदिक आर्यधर्म की भिन्न२ शाखायें थी । सही अब भी सनातनी, आर्य, जैन, सिक्ख आदिका मूलधर्म एकही है । इनका, परस्पर में विरोध करना मानों अपनेही अंग को काटना है। सभी हिन्दू [आर्य ] समदायें एकही महान् वैदिक आर्यधर्मकी भिन्नरशाखाय है।देश,काल और मनुष्यों की प्रतियां भिन्नर होनेसे और समयरपर अज्ञानी मनुष्योंमें कुरीतियोंके फैलजाने से उन कुरीतियोंके हटाने के लिये बुद्ध, महावीर, शंकराचार्य, नागक, रामानुज; दयानन्द आदि आचार्यों को भिन्न २ रूपांतरोंमें समयानुकूल उपदेश करना पड़ा, इनके उपदेश ऊपर से भिन्न २ प्रतीत होते हुए भी वास्तवमें एक ही वैदिक आर्य सिद्धांतरूपी वृक्षकी भिन्नरशाखाएं हैं;परंतु आजकलके चीन,जापान, वौनिवासी बौद्धलोगोंके खानपानका व्यवहार भ्रष्ट होगया है। वह लोग नाममात्रके बौद्ध धर्मा- वलंबी हैं, उनमें अदिसा बसचर्य और योगाम्यास आदि नियमोंकापालन एक प्रकारसे सर्वपा टूट गया है। इसलिये उनके साथ हमारा ऐसा वर्ताव नहीं होसका, जैसा कि, यहां वाले जैन सिक्खादिवसाप है, तथापि वास्तवमें हम और वद एक ही हैं । हम यदि यहाँसे उनमें उपदेशक भेजपर केवल उनका गोमांसभक्षणादि भ्रष्टाचार छुढादे तोपडा लाभ यह होगा कि संसारमें हिन्दू(आय)जातिकी संख्या तेईसकरोडकी जगह सचर करोडोलगभग होजाएगी,जिससे हमाराजातीय बल और भी अधिक बढजाएगा. [२५] उस समय हिन्दू[मार्य जाति, तेईस (२३) करोडजनसंख्या होने पर भी, दूसरे धर्मवाले की दृष्टि में तुच्छ और अपमानित बन रही है, इसका निम्न लिखित कारण है, जो हमको दूर करना चाहिये:- दर्शन १७९ क-मात (७) करोड, अछूत गिने जाने वालों की संख्या है, जो अत्यंतमलीन दरिद्र और धर्म शून्य हैं। इनको योग्य बनाकर हिन्द (आर्य)धर्म के गीतादि ग्रंथ सिखाएं और अर्थोपार्जन का मार्ग सिखाकर और उनकी छुआछूत मेटकर, विधर्मी ईसाई आदि होनेसे रोकें. जहां २ वह लोग हों वहां उनके लिये रामकृष्णादि अवतारोंके मंदिर भी बना दिये जाएं । वहां जानेसे उनके हृदयमें धर्मभाव उत्पन्न होकर अपने महापुरुषोंके प्रति प्रेम उत्पन्न होगा। ख-बापन (५२) लाख साधु हैं.जिनको योग्य बनानेका प्रयत्न करना चाहिये ग-साठ (६०)लास विधवा स्त्री हैं. जिनमें बहुतसी तो पांच वर्ष के भीतरकी हैं शोक की बात है कि धर्मशास्त्र के विरुद्ध, अपनी मूर्खतासे हम लोगोंने बालिकाओं का विवाह दस बारहवर्षसे नीची अवस्थामें करके उनका सुख नष्ट करने पापका भाग लिया है। ययपि हम विधवा विवाह के विरोधी हैं, परंतु मन्यादि धर्मशास्त्रोंमें उन वाल- विधवाओंके पुनर्विवाह की आज्ञा भी देखने में आती है जिन्होंने कि पतिका संग नहीं किया है अर्थात जिनको कुमारी ही बोलसक्के हैं। इसलिये धर्मशास्त्रोंक, जानकार और धार्मिक विद्वानोंकी एक सभाद्वारा इस विषय का निर्णय करा- लियाजाए और उनकी सम्मतिमें यदि ऐसा विवाह करना शास्त्र सम्मत ठहरे तो बारह वर्ष से नीची अवस्पावाली पालिकाओं का पुनर्विवाह करदियाजाय; क्योंकि बहुत छोटी २ अवस्थामें विवाह होते समय इन वेचारी वालिकाओंको विवाह विषय का कछभी ज्ञान नहीं था। बहुधा ऐसा हुवा है कि बहुत छोटी अवस्था में ही इनके माता पिताओने, अपनी वेसमझके कारण इनका विवाह कर दिया है जिसका परिणाम वेचारी यह भोली,वालिकाएं भोगरही हैं। यह विषय विवादास्पद है इसलिये विद्वानोंकी सभा द्वारा इस का निर्णय होना अत्यावश्यक है। और बारहवर्षके उपरांत वाली विधवाओंको वैराग्य और धर्मका उपदेश देकर सीना, पिरोना, पढना, लिखना, मादि आजीविका के काम सिखाये जायें। और मागेको ऐसा प्रबंध किया जाप कि, भारतवर्ष में विधवाओं की संख्या बढने न पावे, मर्थात् तेरहवर्ष से न्यून अवस्या वाली कन्यामोंका विवाह कदापि न होने पावे । घ-सोलह (१६) करोड शेष हिन्द [मार्य] जातिके असंख्य भाग होरहे है। मिनमें प्रत्येक अपनेको एक दूसरे से भित्र समझता है । उनको विचार करना . , । विचारदर्पण चाहिये कि, मनुष्य अपने उचम कोसे वहा होता है, न कि मिथ्याभिमान.और बड़ाई करने से।यहां तक किसी २ स्थान पर मूर्खता बढगई है कि,. भाई,.भाई के हाय का, पिता, पुत्र के हायका और पति अपनी स्त्री के हायका, बनाया हुआ भोजन नहीं करता. खाने पीने के मिश्या आडंबर को ही धर्म समझ लिया है । ऐसे मिय्याभिमान और देष को छोडकर एकता और प्रेमका प्रचार करना चाहिये। २६] इस समय हिन्दुओं [आयों ] के सहस्रों जातिभेद देखनेमें आरहे हैं। प्राचीन समयमें तो केवल चारवर्ण थे और अबभी चारही रहने चाहिये। इससमय जो संकीर्णता जातिभाव की देखने में आरही है वह बडी भयानक है. कोई हिन्दू [ आर्य ] जातिवे. तो चारसी पांच सौ घरही है जिसका फल यह होता है कि-' उसी जातिके बाहर विवाहादि सम्बन्ध न करसकने के कारण बहुत से मनुष्यों को। आजीवन अविवाहित रहना पड़ता है। इस समय यदि अधिक से अधिक जाति के वर्ग स्वखे जाये, तो समस्त भारत वर्षमें बीस हिन्दू [आर्य ] जातिके वर्ग: के हैं, जो निम्नलिखित प्रकार हैं। अधारमासारहित जन्म से जात मानत इ. चार प्रकार के वह ब्राह्मण, क्षत्री, श्य, शुद्ध जिनका खानपान निरामिषी चारप्रकार-वह ब्राह्मण, क्षत्री, श्य, शूद्र जो जन्म से तो जाति मानते परन्तु जिनका खानपान निरामिपी नहीं है अर्थात् मासाहारी है. चार प्रकार के वह बाह्मण, क्षत्री, पक्ष्य, शुद्ध जो गुण कर्म से जाति मानते हैं। भार जन्म से नहीं; जिनका खान पान निरामिषी है, जैसा कि आर्यसमाज का एक दलं. इनके सिद्धान्तमें उच्चमवर्णवाला यदि हीन कर्म करे तो नीचे वर्णमं चला जाता है और उचम कर्म करनेवाला हीनवर्ण अंचे वर्ण में आजाता है चारप्रकारके वह बाह्मण, क्षत्री, श्य, शुद्र जो गुणमसे जातिमानते हैं, जन्म से नहीं; परन्तु जिनका सानपान निरामिषी नहीं जैसा कि आर्यसमाजका दूसरा दल. उचम वर्णसे हीनवर्ण बननाऔर हीनवर्णसे उचमवर्ण हो जाना गुणकर्मानुसार ही यह दल मानता है एक प्रकार के-जैन. एक प्रकारके-सिक्स. एक प्रकारक-बौद्ध जोगौरक्षक हों,क्योंकि जोगौरक्षण नहीं , उनको हम हिन्दु (आर्य) जातिकी श्रेणीमें स्थान नहीं देसक्के । यपि मुद्धभगवानका उपदेश तो किसी भी प्राणी की हिंसा करने को नहीं या; परंतु समय के फरसे आज उसी युद्ध भगवान के अनुयायी कहलाते हुए भी चीन, जापान आदि देशनिवासी दर्शन ४॥ .१८१ बौद्धधर्मी लोग इतने गिरगये है कि अन्य प्राणियों की रक्षा करना तो दूर रहा गोजातिकी हिंसा करने से भी नहीं हटते; इस लिये हम जो गौरक्षक हैं, उनको हिन्द [आर्य] जाति की श्रेणी में स्थान नहीं दे सके। और एकप्रकारके-वह सब लोग जो गौरक्षक होते हुए किसी भी हिन्दू [आर्य] जातिकी वेदानुकूल सम्प्रदायको मानते हैं; या हमारे धर्मग्रंथोंके किन्ही सिद्धांतोंके अनुयायी हैं, परन्तु जन्म से या गुणकर्म से जातिभेद नहीं मानते; केवल एकही आर्यजाति मानना चाहते हैं; जैसा कि "आर्य भ्राता मंडल,, "माझसमाज" आदि. इस प्रकार बीम वर्ग हिन्दू [ ] जानिके इस समय हो सके हैं। इन बीस वाँसे अधिक वर्गहोनेकी आवश्यकता नहीं,क्योंकि इस समय भी प्रधान २ साम्प्रदाः यिक भेद इन वीस वर्गों के अंतर्गतही हैं। [२७] भारतवर्षके सब हिन्दुओं[आयौ] की एक महासभा होनी चाहिये, जिसका वार्षिक अधिवेशन भारतवर्षके भिन्न प्रांतों में होता रहे । उस सभामे प्रांतिक हिन्दू [ भार्य सभाओं के प्रतिनिधिगण आयें और हिन्दू [आर्य जातिकी उन्नति के उपाय, सोचे और तदनुसार कार्य प्रारंभ करके हिन्दू [आर्य] जाति को उन्नत करें। (अर्पूण) . अथ नवमोऽध्यायः ॥ श्रीभगवानुवाच॥ इदं तु ते गुह्यतमं प्रवक्ष्याम्यनसूयवे ॥ ज्ञानं विज्ञानसहितं यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेशुभात दोहा-अर्जुनतोसोंकहतुहौं, एकगुप्तयहवात । समझज्ञानविज्ञानको, लहैमुक्तिविख्यात ॥१॥ हे अर्जुन ! तू परनिन्दक नहीं है इससे विज्ञानसहित जो यह अत्यन्त गुप्तज्ञान है वह मैं तुझे सुनाता हूं इसे जानकर तू सब अशुभ कर्मोसे छूट जायगा॥१॥ राजविद्या राजगुह्यं पवित्रमिदमुत्तमम् । प्रत्यक्षावगमं धम्यै सुसुखं कर्तुमव्ययम्।। दोहा-उत्तमविद्याराजहै, अतिपवित्रतजानि ॥ फलताकोप्रत्यच्छहै, करियतेमुखमानि ॥२॥ हे अर्जुन ! जो ज्ञान में तुझै सुनाता हूं वह सब विद्याओंका राजा है और सबसे अधिक गुप्त रखनेके योग्य है,अत्यन्त पवित्र है, जिसका जानना सुलभ है, वेदोक्त धोका फलस्वरूप है, सुख- पूर्वक साधनके योग्य है और नाशरहित है ॥२॥ अश्रद्दधानाः पुरुषा धर्मस्यास्य परंतप ॥ अप्राप्य मां निवर्तते मृत्युसंसारवमनि॥
अध्याय । दोहा-करिवेकोयाधर्मकौं, जाकेश्रद्धानाहिं॥ तेमोको पावनहीं, डोलतहैंभवमाहिं ॥३॥ हे परंतप ! जो मनुष्य इस धर्ममें श्रद्धा नहीं करते हैं, वे मुझको प्राप्त नहीं होते हैं और इस मरणशील संसारमें घूमते रहते हैं ॥३॥ मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना ।। मत्स्थानि सर्वभूतानिनचाहं तेष्ववस्थितः दोहा-विस्तारोसवजगतमें, मोहिनपेषैकोय ॥ सबैजीक्मोमवसैं, मोहिनतिनमेंजोय ॥४॥ यह संपूर्ण जगत मुझमें अव्यक्तरूप करके व्याप्त है, सम प्राणी मुझमें स्थित हैं और मैं उनमें स्थित नहीं हूँ॥४॥ नचमत्स्थानिभूतानिपश्यमेयोगमैश्वरम्। भूतभूनचभूतस्थोममात्माभूतभावनः॥ दोहा-मोमेंकोऊनहिंबसै, यहईश्वरतादेखि ॥ उपजावतपालतजुहौं, नहिंतिनमेंअवरेखि ॥५ ये सब प्राणीभी मुझमें स्थित नहीं है, जो कदाचित तू यह कहै कि, तुम पहिले कह चुके हो कि सब प्राणी मुझमें स्थित हैं, इससे पूर्वीपर विरोध है, हे अर्जुन ! सो नहीं है, तू मेरे ऐश्वर्यसंबधी योग बलको देख, प्राणियोंका भरण पोषण करनेवाला मेरा आत्मा प्रा- णियोंका लालनपालन करता है परन्तु उनमें स्थित नहीं है, यही मेरा योगबल है ॥५॥ M
भगवद्गीताभाषासका।
यथाऽऽकाशस्थितोनित्यवायु:सर्वत्रगोमहान
तथासर्वाणिभूतानिमत्स्थानीत्युपधारय॥
दोहा-जैसेपवनअकाशम, बिचरतहैसववार ।
त्योंमोमेंसबजीवए, फिरतजानिनिरधार ॥६॥
जैसे निरन्तर आकाशमे रहनेवाला वायु बड़ा है और सब जगह,
विचरता है परन्तु आकाशमें लिप्त नहीं होता है, ऐसेही सब प्राणी
मुझमें स्थित हैं. परन्तु में किसी में लिप्त नहीं होता हूं ॥६॥
सर्वभूतानिकौंतेयप्रकृतियांतिमाभिकाम्
कल्पक्षयेपुनस्तानिकल्पादौविसृजाम्यहम
दोहा-मेरीमायामेरहैं, प्रबलभयेसबजंतु ॥
कल्पआदिसिरजौंतिन्हें, मोमेंतिनकोतंतु ॥७॥
हे अर्जुन! प्रलयकालमें संपूर्ण प्राणी मेरी मतिमें लीन होजाते हैं
और उनको मै कल्पके आदिमें फिर छोड देता हूं अर्थात सृजता हूं
प्रकृति स्वामवष्टभ्य विसृजामिपुनःपुनः।।
भूतग्राममिमंकृत्स्नमवशंप्रकृतेर्वशात् ॥८
'दोहा-अपनीमायासंगले, सिरजतवारंवार ।
मायाहीकेबसपरयो, रहैसदासंसार ॥८॥
मैं अपनी प्रकृतिका आश्रय लेकर अपनी प्रकृतिके कारण पराधीन
इस संपूर्ण माणीसमूहको बारंवार सृजता हूं ॥८॥
अध्याय। १८५ -- नचमांतानिकर्माणिनिवनंति धनंजय ॥ उदासीनवदासीनमसक्तंतेषुकर्मसु ॥९॥ दोहा-अर्जुनमोकोकर्मवे, कर्महुबांधतनाहिं॥ सदाउदासीरहतहों, आसक्तनतिनमांहिं ॥९॥ हे धनंजय ! मैं उन सृष्टिरचनादि कर्ममें आसक्तहूं अर्थात कर्नामें लिप्त नहीं होता है और उदासीनवर स्थित रहता हूँ अर्थात किसीसे कुछ प्रयोजन नहीं रखता. इससे मैं कर्मबंधनोसे नहीं बंधता हूं।।९।। मयाऽध्यक्षेणप्रकृतिःसयतेसचराचरम् ॥ हेतुनाऽनेनकौंतेयजगद्विपरिवर्तते ॥१० दोहा-हौंप्रेरतमायाजवै, उपजतसबसंसार ॥ - पारथयाहीहेततें, फिरतमुबारंबार॥१०॥ हे कौन्तेय ! मैंही अध्यक्षाहूं. इस मेरी अध्यक्षताहीसे प्रकृति चराचर पाणीमात्रको सृजती है, इसी हेतुसे इस जगत्का परिवर्तन होता रहता है. इससे यह दिखाया है कि मैं कभी हूं और उदासीन भी हूं। अवजानतिमांमूढामानुषींतनुमाश्रितम्॥ परंभावमजानंतोममभूतमहेश्वरम् ॥ ११ .दोहा-मोकोमानसजानिकै, आदरकरतनकोय ॥ सूरखएजानतनहीं. यहैजुईश्वरहोय ॥११॥ हे अर्जुन ! मृढ मनुष्य मेरे सर्वभूत महेश्वर परमभावको नहीं जा. नते हैं, इसीसे मैंने जो यह मनुष्यरूप धारण कर रखा है. उसकी
१८६
भगवद्गीताभाषाटीका.
।
अवज्ञा करते हैं अर्थाव अपने समान जानकर मेरा आदर नहीं करते हैं
मोघाशामोधकर्माणोमोघज्ञानाविचेतसः
राक्षसीमासुरींचैवप्रकृतिमोहिनींश्रिताः॥
दोहा-उनकीआशासुफलनहि, ज्ञानकर्मताभाया।
प्रकृतिआसुरीराक्षसी, तामेंबूडतधाय ।। १२॥
हे अर्जुन ! ये मूढ मनुष्य इसलिये मेग अनादर करते हैं कि इनकी
आशा फलवतीनहीं है इनके कर्म निष्फल है, इनके ज्ञान फलहीन है
सांसारिक दुर्व्यसनासे इनका चित्त विक्षिप्त रहता है और राक्षसी तथा
आसुरी प्रकृतिका आश्रय रखते हैं जो मोहको उत्पन्न करनेवाली है।
महात्मानस्तुमापार्थदेवीप्रकृतिमाश्रिता॥
भजंत्यनन्यमनसोज्ञात्वाभूतादिमव्ययम्
दोहा-देवप्रकृति में जोमिल, कामक्रोधकोत्यागि।।
तेजानतमोकोसबै, रहतजुहैअनुरागि ॥१३॥
हे अर्जन ! दैवी प्रकृतिका आश्रय रखनेवाले महात्माजन तो
मुझे सम्पूर्ण प्राणियोंका आदिरूप और अविनाशी जानकर सब
ओरसे चित्त हटा मेराही भजन करते हैं ।। १३ ।।
सततंकीर्तयंतोमायतंतश्चदृढव्रताः॥
नमस्यंतश्चमांभक्त्यानित्ययुक्ताउपासते
दोहा-कीरतमेरीदृढ़करी, जानेंमोहिव्रतराखि ॥
भकिसहितमोकोनवत, मेरेईगुनभाखि ॥१४॥
है अध्याय। १८७ हे अर्जुन ! वे महात्मालोग निरन्तर मेरा कीर्तन करते हैं, दृढी संकल्प करके मेरी प्राप्तिका यत्न करते हैं, भत्तिपूर्वक मुझे नमस्कार । करते हैं और अहर्निश मुझमें ध्यान लगाकर मेरी उपासना करते हैं। ज्ञानयज्ञेनचाप्यन्येयजंतोमामुपासते॥ एकत्वेनपृथक्त्वेनबहुधाविश्वतोमुखम् ॥ दोहा-ज्ञानयज्ञकोऊयजत, मोकोसेवतमीत ॥ कोऊमानतएककरि, कोऊबहुतपुनीत ॥१५॥ हे अर्छन ! कितनेही मनुष्य ऐसे हैं जो एकमाव अर्थात अभेद बुद्धिसे मेरी उपासना करते हैं, कितनेही दास्यभावसे भेदबुद्धिद्धारा मेरी उपासना करते हैं. और कितनेही सब प्राणियोंका आत्मस्वरूप मुझे ब्रह्मरुद्ररूप समझकर मेरी उपासना करते हैं।॥ १५ ॥ अहंक्रतुरहंयज्ञःस्वधाहमहमौषधम् ॥ मंत्रोऽहमहमेवाज्यमहमग्निरहहतम् १६/ दोहा--होहीक्रतुअरुयज्ञहौं, स्वधाऔषधीजानि॥ हौंपावकवतहोमहौं, मंत्रोमोकोमानि॥ १६॥ हे अर्जुन ! वेदोक्त अग्निष्टोमादि यज्ञ मैही हूं, बलिवैश्वदेवादि, पञ्चमहायज्ञ मेंही हूं, स्वधा मैंहीहूं अन्नादि औषधभी मैंहूं, मंत्रमेंहूं, होमका साधन घृत में है, जिसमें हवन किया जाता है वह अग्नि मैं हूं, और होमभी मैंहीहूं ॥ २६ ।। पिताहमस्यजगतोमाताधातापितामहः वेद्यपवित्रमोंकारऋक्सामयजुरेवच॥१ भगवद्गीताभापाठीका. दोहा--मातपितायाजगतको, हाँधाताकरतार ।। ऋगयजुसामपवित्रहौं, औरवेदॐकार ॥१७॥ हे अर्जुन ! इस संपूर्ण जगतका पिता में हूं, माता में हूं, धाता में हूँ, पितामह मैं हूं जाननेके योग्य मैं हूं, पवित्र मैं हूँ, ओंकार मैं हूं, ऋग्वेद, सामवेद, और यजुर्वेद में हूं ॥१७॥ गतिर्भर्ताप्रभुःसाक्षीनिवासःशरणंसुहृत्॥ प्रभवःप्रलयःस्थानंनिधानंबीजमव्यम् ॥ दोहा-गतिनिवासभर्ताशरन, साक्षीप्रभुअरुबंधु।। प्रलयस्थाननिधानहूं,अव्ययबीजअबंधु ॥१८॥ हे अर्जुन ! इस सब जगतकी गति मैं हूं, सबका भर्ती अर्थात् पोषणकर्ता मैं हूं, सबका प्रभु मैं हूं, सब शुभ अशुभ कर्मोका साक्षी मैं हूँ, सबका निवासस्थान मैं हूं, सबका शरणस्थान में हूँ, मही सबका अहेतुक हितकारी हूं, मह। सबका उत्पत्तिस्थान है, मेंही प्रलय हूं, विश्वकी स्थिति और प्रलयकास्थान मैं ही हूं, सबका बोज- रूप में हूँ, और अविनाशी मैही हूं ॥१८॥ तपाम्यहमवर्षनिगृहाम्युत्सृजामिच।। अमृतंचैवमृत्युश्चसदसच्चाहमर्जुन ॥१९॥ दोहा-तप्तगहतछोडतजुहौं, वरपतहाँही जानि॥ अमृतमत्युकारणकरन. होहीअर्जुनमानि १९॥ हे अर्जुन ! मैंही सूर्यरूपसे सबको तपाताहूं, मैंहीजल बरसाताहूं और मैंही रोकदेताहूं, मैंही अमृत और मृत्युहूं, मैंही सत और असतहूं ।
अध्याय ९॥ विद्यामांसोमपाःपूतपापायज्ञैरिष्ट्रास्व- तिप्रार्थयते॥ते पुण्यमासाद्य सुरेंद्रलोक मश्नतिदिव्यान्दिवि देवभोगान्॥ २० ॥ दोहा-यज्ञकरत पापनदहत, चाहतस्वर्गहिवास ॥ इंद्रलोकलहिभोगवै, दिव्यभोगसुविलास ॥२० हे अर्जन ! ऋक्, यज, साम इस वेदत्रयीके ज्ञाता वेदोक्त यज्ञकर्म करके सोमरसक पान कर अपने पापोंसे पवित्र हो स्वर्गमें वास वा दिव्य भोगोंका भोग करते हैं ॥२०॥ ते तंभुक्त्वास्वर्गलोकविशालंक्षीणेपुण्ये मर्त्यलोकविशति॥ एवंत्रयीधर्ममनुप्रप- नागतागतंकामकामा लभते॥ २१॥ दोहा-फिरिआवतभूलोकमें, छीनपुन्यजबहोय।। पावैआवागवनवे, कामवंतजेसोय ॥२१॥ वे स्वर्गलोकमें अनेक भोगोंको भोगकर अपने पुर्योके क्षीण होने- पर फिर मृत्युलोकमें जन्म लेते हैं इसप्रकार वेदोक्त यज्ञादि कर्मों के करनेवाली अपनी कामनाकी सिद्धि के कारण कभी स्वर्ग में जाते हैं कभी मृत्युलोक में आते हैं इसी तरह आवागमन में फंसे रहते हैं .२१ अनन्याश्चितयंतोमायेजनाःपयुपासते ॥ तेषांनित्याभियुक्तानांयोगक्षेमवहाम्यम्।। --
अध्याय
१९१
६
दोहा-देवभक्तदेवनलहै, पितृपूजकपितृस्थान ॥
भूतयभूतहिलहैं, मोपूजैभगवान ॥२५॥
हे अर्जुन देवताओंके पूजनेवाले देवगतीको प्राप्त होते हैं पित्रोंके
पूजक पितगतिको पाते हैं भूतोंके पूजनेवाले भूत बनते हैं और मेरे
पूजनेवाले मेरे परमानन्दस्वरूप अचल पदको पाते हैं ॥ २५ ॥
पत्रपुष्पंफलंतोयंयोमेसत्याप्रयच्छति॥
तदहंभक्त्युपहृतमश्नामिप्रयतात्मनः ।।
दोहा-पातफूलफलनीरऊ, जोअकरिणीति॥
लेऊंदियोहौंभक्तको, कियेप्रेमकीरीति ॥२६॥
हे अर्जुन ! जो कोई भक्तिपूर्वक पत्र, फलं, फूल, जल जो कुछभी
मेरेको निवेदन करता है उस भक्तिपूर्वक दीहुई वस्तुको मैं वडी
प्रसन्नतासे अंगीकार करता है, इसका भाव यह है कि अन्य देवता-
ओंकी पूजाके किये बडी बडी सामग्रियोंकी आवश्यकता है मेरी
पूजाके लिये केवल भक्तिही बहुत है ॥२६॥
यत्करोपियदश्नासियज्जुहोपिददासियत
यत्तपस्यसिकौंतेयतत्कुरुष्वमदर्पणम्२७
दोहां-जोकछुकरतुजोखातुहै, जोहोमंतजोदेत ।।
अर्जुनजोतूतपकरै, सोकरिमोहीहेत ।। २७॥
कौंतेय! जो कुछ तू करता है, होम करता है, खाता है, देता है,
तप करता है, वह सब मेरे अर्पण कर ॥२७॥
भगवद्गीताभाषाटीका. शुभाशुभफलैरेवमोक्ष्यसेकर्मबंधनैः ।। सन्यासयोगयुक्तात्माविमुक्तोमामुपैष्यसि दोहा-भलेबुरेजेकर्म हैं, तिनतेछुटिमित ॥ जुगतयोगसंन्यासकार, मोमिलिहोनिहिचिंत हे अर्जुन ! ऐसा करनेसे कर्म बंधनरूप शुभ अशुभ फलोंसे बच जाओगे और संन्यास योगमें युक्त होकर मुक्ति पा, मुझको अवश्य पाओगे ॥ २८॥ समोऽहंसर्वभूतेषुनमेद्वेष्योऽस्तिनप्रियः॥ येमजंतितुमांभक्त्यामयिते तेषुचाप्यहम् दोहा-हौसवठौरसमानहौं, मेरेप्रीतनद्रोह ॥ मोकोसेवतभक्तजे, तिनसोंमोको मोह ॥२९॥ हे अर्जन! मैं संपूर्ण प्राणियों में समान रूप हूं, न कोई मेरा वैरी है, न कोई मेरा प्यारा है, जो मुझको कोई भक्तिपूर्वक भजता है वह मुझमें है और मैं उसमें हूं ॥ २९ ॥ अपिचेत्सुदुराचारोभजतेमामनन्यभाक् साधुरेवसमतव्यःसम्यग्व्यवसितोहिसः ॥ दोहा--दुराचारमोकोभज, व्हेअनन्यकैभाय॥ ताकोतुमसाधूगिनौ, सबनिश्चयकेदाय ॥३०॥ यदि कोई अत्यन्त दुराचारी मनुष्य भी हो और वह औरोकी भक्ति न करके केवल मेरीही उपासना कर वह साधुही है और उसीने सब बातों अच्छे प्रकार निश्चय करलिया है।॥३०॥ TRA अभ्यार ९॥ Rom क्षिप्रभवतिधर्मात्माशश्वच्छांतिंनिगच्छाता कौंतेयपतिजानीहिनमभक्तःप्रणश्यति ॥ दोहा-वेगिहोइधर्मातमा, शांतिलहैबहुभाय ॥ अर्जुननिश्चैजानितू, नहिंमोभक्तनसाय॥३॥ वह अनन्य भक्त शीघ्रही दुराचारीसे धर्मात्मा होजाता है और वह निरंतर शान्त रहता है. हे कौतेय ! इस बातको अच्छे प्रकारसे जानले कि मेरे भक्तका नाश कभी नहीं होता है।॥३१॥ मांहिपार्थव्यपाश्रित्ययेऽपिस्युःपापयोनयः खियोवैश्यास्तथाशवास्तेजपियांतिपरांगतिम दोहा-अर्जुनसेवतमोहिजो, सोयाजोनिहिखोय। नारिशूद्रअस्वैश्यपुनि, ताहिपरमगतिहोय ॥ हे पार्थ ! कोई कैसाही पापात्मा क्यों न हो,चाहै स्त्री हो, वा वैश्य हो, वा शूद्र हो, वह दयि मेरा आश्रय ले तो उत्तम गतिको प्राप्त होता है॥३२॥ समीक्षा-" यहां श्रीकृष्णजीने इस बातपर बल दिया है कि जो पूर्व प्रारब्ध कर्मसे निंदित कर्म करनेवाले हो चाहे स्त्रिय हो चाहे वैश्य हों वा शुद्र हों वहभी परमात्मा परायण होनेसेशुद्ध होजाते है, स्त्री. वैश्य तथा शुद्ध को कृष्णमहाराजने जन्मसे दुष्ट नहीं माना है। यदि ऐसा होता तो अज्ञात कुल गोत्र सत्य काम जावाल और बिदुर महाराज ब्रह्मविद्या पढकर और मैत्रेयी, कात्यायनी आदि खिये विदुषी बनकर कैसे पूर्वकालके ऋषि मंडलमें आदर और प्रतिष्ठा पालेते"गीतार्थभाष्य.
भगवद्गीताभाषाटीका.
किंपुनर्ब्राह्मणाःपुण्याभक्ताराजर्षयस्तथा।।
अनित्यमसुखलोकमिमंप्राप्यमजस्वमाम
दोहा-द्विजपुनीतअरुभक्तवर, राजऋषिनिसुखमाय
सुखअनित्ययालोकको, मोहिभजोचितलाय ३३
हे अर्जुन ! जो फिर पुण्यात्मा ब्राह्मण हैं भक्त राजर्षि हैं, उनका
तौ कहना ही क्या है ! अर्थात् वे तो मोक्ष पातेही हैं इसलिये हे
अर्जुन ! अनित्य सुखरहित, इस लोकको पाकर तू मेरा भजन कर
सन्मनाभवमद्भक्तोमद्याजीमांनमस्कुरु।)
मामेवैष्यसियुक्त्वैवमात्मानंमत्परायणः
दोहा-मोकोभजिभजिनम्र है, मोहीमैमनराखि
यहीयुक्तितूमोहिमिलि, प्रेमनसौंअभिलाखि॥
अपनीईश्वरताकही अचरजकैसेभाय ।।
भक्तिविभौकरिककृपा, कह्योनवमससुझाय ॥
राजगुह्यविद्यायहै, राजगुह्ययहयोग ॥
वरनीआनंदरामयह, प्रभुकीपूजाजोग॥२॥
हे अर्जुन ! तू अपना मन मुझमें लगा, मेराही भक्त चन, मेरीही
पूजा कर, मुझेही नमस्कार कर, मेरेहीमें तत्पर हो ऐसे अपनी आ-
त्माको मुक्त करनेसे मुझको पाओगे ॥ ३४ ॥
इतिश्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्ने
श्रीकृष्णाईनसंवादे विचारदर्पण दोहासहितभाषाटीकायां
राजविद्याराजगुह्ययोगोनाम नवमोऽध्यायः ॥९॥
मध्याय.. समीक्षा-इस अध्यायमें यह दिखाया गया है कि जब पापी मनुष्य अपने अंतःकरणको शुद्ध करके सर्वथा पापोंका त्याग करके परमा- त्माकी भक्ति करना प्रारंभ करता है, तभीसे उसको यह पूर्ण वि- श्वास रखना चाहिये कि ईश्वर मेरा अवश्य उद्धार करेंगे। (देखो अ. ९श्लो०३०). और जो उत्तम श्रेणी के भक्तजन केवल परमात्माके ध्यानमेंही मग्न रहने के कारण अन्य लौकिक कार्य नहीं करसक्ने उनके लिये योग क्षेमकी चिन्ता परमात्मा ही करते है। (देखो अ०९ श्लो०२२) ऐसा दृढ विश्वास उत्तम श्रेणोके भक्तों के लिये ही दिलाया गया है। अन्य साधारण मनुष्योंके लिये नहीं। (क) अप्राप्त वस्तुको प्राप्त करना योग" कहलाता है। (ख)प्राप्त वस्तुकी रक्षा करना “क्षेम" कहलाता है। जो लोग पाप कौमें रत रहते हुए केवल लोकवचना (लोंगों को ठगना) के निमित्त धर्मका बाह्य आडम्बर रखते हैं ऐसे धर्म- ध्वजी जन परमात्माकी कृपाके कभी पात्र नहीं बनसक्ते (देखो अ०९ श्लो० १२). सारांश यह कि जो मनुष्य मन वचनसे सच्चे बनकर पाप कर्मोको एकमात्र त्यागकर परमात्माकीशरणमें आते हैं वह शीघ्रही परमा- त्माकी कृपाके पात्र बन जाता है। (देखो अ० ९ श्लो०३१) यही इस अध्यायका सार है। [पृष्ठ १८१ से आगे] [२८] प्राप २ में हिन्दू (आर्य) सभाएं स्थापित की जायँ, सनमें स्वयंसेवक अर्थात् "जातिसहायक " उत्पन्न किये जायें, जो विपचि के समय में काम आसके और उन सभाओं में नीच धंधा करने वाले शूद्रों से लेकर पवित्र धंधा करने वाले ३ विचारदर्पण. . ब्राह्मणों पर्यंत सम्मिलित होकर हिन्दू ( आर्य) जातिका संगठन करें, जिससे कि दुःखके समयमें मिलकर काम करसकें । परस्पर विरोधके कारण पृथ्वीराज और जयचंद भारतवर्षके नाश करने के उदाहरण हैं। जिस भारतवर्ष में बारहसौ वर्ष पूर्व एकभी मुसलमान नहीं था. वहां हमारेही घरेल अगढों के कारण मुसलमान लोग आगये । हमने ही उनको यहां बुलाकर यहांका राज्य सौंप दिया और राज्यस्थापित रखने में भी हमही सहायक बने रहे, जिसका फल यह हुआ कि, हमारे भाइयों से ही छ करोड मुसलमान बन कर हमारे धर्म विरोधी हो रहे हैं। [२९] नीच धंधा करने वाले हिन्दू (आय)लोगोंको धर्मसे परिचित करनके लिये उपदेशकोंका प्रबन्ध किया जाय जिससे वह लोग भिमधर्मी न होसके और ल्योरवह लोग पलीन धंधा छोडते जायें वैसे २ ही उनके साथ छूआ छूत छूटती जानी चाहिये और उनके पढाने के लिये विद्यालयभी आवश्यकानुसार खोल दिये जायें । [३०] नाच अर्थात मलीन धंधा करनेवाले हिन्दुओं [आयों ] के लिये आय- श्यकानुसार उनके बीच में देवालय बना दिये जायें और जब वह पवित्र होकर शुद्ध यखोंको धारण करके देवालयों में आये, तो किसी भी देवालय में आने से उनको न रोका जाप क्योंकि वह हमारे स्वधर्मा हैं, श्रीरामचंद्रादि परमेश्वरके अव. तारोने और धर्मग्रंथोंने उनको दूसरे वर्गों के समान गिना है । परमेश्वरको तो निम्न लिखित गुणवाला मनुष्य प्रिय है चाहे वह किसी वर्णका क्यों न हो; यथाः श्लोक-यो न हप्यति न दृष्टि न शोचति न कांक्षति । शुभाशुभ परित्यागी भक्तिमान्यःस मे प्रियः॥गी. अ. १२ । हो. अर्थ-जोकि इष्ट वस्तु को प्रात होकर प्रसन्न नहीं होता है, मानेष्ट वस्तुको प्राप्त होकर म ट्रेप करता है, शोफ परता है,न इच्छा परता और शुभाशुभका भ्रम न करके सदा इश्वरमांतके कामो में लगा रहता है ऐसा मक्त मुझको दियो। समीक्षा-म कि अपने को जन्मसे उत्तम मानने वाला ईश्वर को प्रिय हो सकता है। [३१] भारतवर्षकी सब हिन्दु [आर्य] जातिका एक पहराव होना चाहिये,यदि सब वस्त्र एक प्रकारके न होसके तो सिरका वेप तो एकप्रकारका अवश्य होना चाहिये। यथा टोपी और पगढी । वह वेप जातीय त्यवहारों और सभाओंमें अवश्य दृष्टि गोचर होना चाहिये। आजकल भारतवर्षके मुसलमान रोगोंने भी कीटोपा को अपना जातीय सिरकावेप बना लिया है,तो क्या हमको अपना एक बेप नहीं बनाना चाहिये। [अपूर्ण] ७१॥
अथ दशमोऽध्यायः॥
॥श्रीभगवानुवाच ॥
भूयएवमहावाहो शृणु मे परम वचः॥
यत्तेऽहं प्रीयमाणाय वक्ष्यामि हितकाम्यया
दोहा-दुरीवातमोसोवहरि, सुनुअर्जुनचितलाय॥
लै प्रसन्नतोसोकहौं, तेरेहितकोभाय ॥१॥
हे महाबाहो ! मेरी औरभी उत्तम उत्तम बात सुन मैं तुझपर
बहुत प्रसन्न हूं इस लिये तेरी भलाईके लिये कहता हूँ ॥१॥
नमे विदुःसुरगणाःप्रसवं न महर्षयः॥
अहमादिहि देवानांमहर्षीणांचसर्वशः॥२
दोहा-देवऋपीनहिंजानहीं, मोउतपत्तिहिमीत ॥
देवऋषिनअरुसबनको, हाँहीआदिपुनीत ॥
मेरे जन्मको देवता वा महर्षि कोईभी नहीं जानते हैं क्योंकि मैं
संपूर्ण देवता और संपूर्ण ऋषियोंसे पहिले हुआ हूं और वे सब
मुझहीसे उत्पन्न हुए हैं ॥२॥
योमामजमनादिंचवेत्तिलोकमहेश्वरम् ॥
असंमूढःसमर्येषुसर्वपापैःप्रमुच्यते ॥३॥
दोहा-अजंअनादिजगदीशपुनि,मोकौंलखतजुकोय
सबमेंज्ञानीवहवडी, पापनि डारतधोय ॥३॥
भगवद्गीताभाषाटीका
-
हे अर्छन ! जो मुझे अज, अनादि और संपूर्ण लोकोंका ईश्वर
जानते हैं वे मनुष्योंमें मूढतारहित हैं और संपूर्ण पापोंसे छूट जाते हैं।
बुद्धिानमसंमोहःक्षमासत्यंदमःशमः ॥
सुखंदुःखंभवोभावोभयंचाभयमेवच ॥४
दोहा-बुद्धिज्ञानशमदमक्षमा, अव्याकुलताहोय॥
सुखभवदुखऔभावभय, औरअभयताजोय
हे अर्जुन ! बुद्धि, ज्ञान, अव्याकुलता, क्षमा, सत्य, दम, शम,
सुख दुःख, उत्पत्ति, लय, भय और अभय ॥४॥
अहिंसासमतातुष्टिस्तपोदानंयशोऽयशः।
भवंतिभावाभूतानांमत्तएवपृथग्विधाः॥
दोहा-तोष अहिंसा दानतप,समजसअजसौजान
जीवनकेसवभावए, मोतेहोतसमान ॥५॥
अहिंसा, समता.संतोष तपस्या, दान, यश, अपकीर्ति ये सब
प्राणियोंके पृथक् पृथक भाव मुशहीसे होते हैं।॥ ५॥
महर्षयः सप्त पूर्वे चत्वारो मनवस्तथा ॥
मझावामानताजातायेषांलोकइमाःप्रजाः
दोहा-सातौंऋषिमुनिचारिमनु, मोमनतेजुउदोत
सबलोकनमाहींभरे, हैं इनहींकेगोत ॥६॥
हे अर्जुन ! वसिष्ठादि सात महर्षि, सनकादिक चार आदि ऋषि
तथा चौदह मनु ये सब मेरे मनसे प्रकट हुए हैं, इन्हींसे यह संपूर्ण
मजा उत्पन्न हुई है॥६॥
अध्याय.१०।।
१९९
एतांविभूतियोगंचममयो वेत्तितत्त्वतः॥
सोऽविकंपेनयोगेनयुज्यतेनात्रसंशयः ७
दोहा-मेरीयोगविभूतिको, तत्वज्ञानजोलेत ॥
निश्चलयोगहिसोलहै, रहतजुयाहीहेत॥७॥
जो पुरुष मेरी इस विभूतिको तत्वसे जानते हैं वे निश्चलयोगसे
युक्त होते हैं इसमें सन्देह नहीं है ॥७॥
अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्व प्रवर्तते ॥
इति मत्वा भजतेमांबुधाभावसमन्विताः
दोहा-मैंहॉईश्वरजगतको, मोहीतेसबहोय ॥
ज्ञानवंतयहजानिक, मोहीसेवतसोय॥८॥
मैंही सबका उत्पत्ति कारण हूं और मुझहीसे सबकी प्रवृत्ति होती
है यह जानकर विवेकी पुरुष मेरा स्मरण करते हैं ॥८॥
च्चित्तामद्गतप्राणाबोधयंतः परस्परम् ॥
कथयंतश्चमानित्यंतुष्यति च रमंतिच॥९
दोहा-प्रानचित्तमोमेंधरत, बोधपरस्परदेत ॥
मेरेचरितनिकहतनित, प्रीतिपरमसुखलेत ॥९
हे अर्छन ! वे अहर्निशि मुझहीमें चित्त लगाये रहते हैं और
अपने प्राणोंको मुझहीमें अर्पण किये रखते हैं, आपसमें एक दूसरेसे
मेराही उपदेश करते हैं, मेरीही चर्चा करते हैं, इस प्रकार नित्य
संतुष्ठ रहते हैं और आनन्दमें मग्न रहते हैं ॥९॥
भगवद्गीताभाषाटीका।
हे अर्जन ! जो मुझे अन, अनादि और संपूर्ण लोकोंका ईश्वर
जानते हैं वे मनुष्योंमें मूढतारहित हैं और संपूर्ण पापोंसे छूट जाते हैं
बुद्धिानमसंमोहःक्षमासत्यंदमःशमः ॥
सुखंदुःखंभवोभावोभयंचाभयमेवच ॥४
दोहा-बुद्धिज्ञानशमदमक्षमा, अव्याकुलताहोय।।
सुखभवदुखीभावभय, औरअभयताजोय
हे अर्जुन ! बुद्धि, ज्ञान, अव्याकुलता, क्षमा, सत्य, दम, शम,
सुख दुःख, उत्पत्ति, लय, भय और अभय ॥ ४ ॥
अहिंसासमतातुष्टिस्तपोदानंयशोऽयशः।।
भवतिभावाभूतानांमत्तएवपृथग्विधाः॥
दोहा-तोष अहिंसा दानतप,समजसअजसौजाना
जीवनकेसवभावए, मोतेहोतसमान ॥५॥
अहिंसा, समता. संतोष, तपस्या, दान, यश, अपकीर्ति ये सब
प्राणियोंके पृथक पृथकू भाव मुझहीसे होते हैं ॥ ५॥
महर्षयः सप्त पूर्वे. चत्वारो मनवस्तथा ।।
मद्भावामानसाजातायेषांलोकइमा:प्रजाः
दोहा-सातौऋषिमुनिचारिमनु, मोमनतेजुउदोत
सबलोकनमाहींभरे, हैं इनहीकेगोत ॥६॥
हे अर्जन ! वसिष्ठादि सात महर्षि, सनकादिक चार आदि ऋषि
तथा चौदह मनु ये सब मेरे मनसे प्रकट हुए हैं, इन्होंसे यह संपूर्ण
प्रजा उत्पन्न हुई है ॥६॥
अध्याय १०
एतांविभूतियोगंचममयो वेत्ति तत्त्वतः ।।
सोऽविकंपेनयोगेनयुज्यतेनात्रसंशयः ७
दोहा-मेरीयोगविभूतिको, तत्वज्ञानजोलेत ॥
निश्चल्योगहिसोलहै, रहतजुयाहीहेत ॥७॥
जो पुरुष मेरी इस विभूतिको तत्वसे जानते हैं वे निश्चलयोगले
युक्त होते हैं इसमें सन्देह नहीं है ॥७॥
अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्व प्रवर्तते ॥
इति मत्वा भजतेमांबुधाभावसमन्विताः
दोहा-मैंहौंईश्वरजगतको, मोहीतेसबहोय ॥
ज्ञानवंतयहजानिक, मोहीसेवतसोय ॥८॥
मैंही सबका उत्पत्ति कारण हूं और मुझहीसे सबकी प्रवृत्ति होती
है यह जानकर विवेकी पुरुष मेरा स्मरण करते हैं ॥८॥
मच्चित्तामद्गतप्राणाबोधयंतः परस्परम् ॥
कथयंतश्चमानित्यंतुष्यंति चरमंतिच॥
दोहा-प्रानचित्तमोमेंधरत. बोधपरस्परदेत ।।
मेरेचरितनिकहतनित, प्रीतिपरमसुखलेत ॥९
हे अर्जुन ! वे अहर्निशि मुझहीमें चित्त लगाये रहते हैं और
अपने प्राणोंको मुझहीमें अर्पण किये रखते हैं, आपसमें एक दूसरेसे
मेराही उपदेश करते हैं, मेरीही चर्चा करते हैं, इस प्रकार नित्य
संतुष्ठ रहते हैं और आनन्दमें मन्न रहते हैं ॥९॥
२००
भगतिाभाषीका.
.
तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम्॥
ददामिबुद्धियोगंतयेनमामुपयांतिते॥१०
दोहा-सेवतमोकोलेसदा, भक्तियोगकेभाय ॥
भलीबुद्धिमोसोलहत, रहतजुमामेंआय १०॥
हे अर्जुन! जो इस रीतिसे निरन्तर लगे रहते हैं और प्रीतिपूर्वक मेरा
'भजन करते हैं उनको मैं ऐसी बुद्धि देता हूं जिससे वे मुझे माप्त होते हैं।
तेषामेवानुकंपार्थमहमज्ञालजंतमः॥
लाशयाम्यात्मभावस्थोज्ञानदीपेनभास्वता
दोहा-तमअज्ञान हिदूरकरि, दयावंतमहोत ॥
करहूंतिनकेहीयमें, ज्ञानदीपउद्योत ॥ ११ ॥
हे अर्जुन ! ऐसेही पुरुषोंपर अनुग्रह करनेके लिये आत्मभावमें
स्थित जो मैं हूं सो प्रकाशमान ज्ञानरूप दीपकसे उनके अज्ञानसे
उत्पन्नहुए अंधकारको नष्ट कर देता हूँ॥११॥
॥ अर्जुन उवाच ॥
परब्रह्मपरंधामपवित्रं परमंभवान् ॥
पुरुषंशाश्वतंदिव्यमादिदेवमविभुम् १२
दोहा-पारब्रह्मपवित्रतुम, परमानंदकेधाम ॥
अविनाशीअजपुरूषहो. आदिदेवतुमनाम१२
यह सुन अर्जुन कहने लगा कि हे श्रीकृष्ण । आप परब्रह्म हो,
परम तेजोमय हो, परम पवित्र हो, नित्य पुस्प हो, दिव्य हो,
आदिदेव हो, अज हो, विशु हो ॥ १२॥
मध्याय १०॥ पाहुस्त्वामृषयःसर्वेदेवर्षि रदस्तथा ॥ असितोदेवलोव्यासःस्वयंचैवब्रवीषिम॥१३ दोहा-सबऋषिइहिंविधिकहतहैं, नारददेवलजानि व्यासअसिततुमहूंकहत, तातैलीनैमानि ॥१३ हे कृष्ण ! सब ऋषि तथा देवऋषि नारद, असित, देवल और व्यास ये सब आपको परम पुरुष, अज, विभु कहते हैं और आ- पभी स्वयं अपने ताई ऐसाही बताते हो ॥१३॥ सर्वमेतदृत मन्ये यन्मां वदसि केशव ।। नहितेभगवनव्यक्तिविदुर्देवानदानवाः दोहा-जोकछुतुममोसोंकहत, मानतहौंसतभाया। दानव देवनजानहीं, तुमप्रगटेकोदाय ॥१४॥ हे केशव ! जो कुछ आप कहते है और जो कुछ ये सब ऋषिगण कहते हैं. इन सबको मैं सत्यही मानता हूं क्योंकि हे भगवन् । देवता न दानव आपकी उत्पत्तिके कारणको जानते है ॥ १४ ॥ स्वयमेवात्मनात्मानवेत्थत्वंपुरुषोत्तम ।। भूतभावन भूतेश देवदेव जगत्पते ॥१५ दोहा-आपुनिकौंआपुहिलखो, तुमपुरुषोत्तमदेव जीवनउपजावतहरत, पालतहोअधिदेव ॥१५ हे पुरुषोत्तम ! हे भूतेश ! (प्राणियोंके ईश्वर) हे भूतभावन ! (संपूर्ण प्राणियोंके नियन्ता) हे देवनके देव ! हे जगत्पते ! आपही
२०२
भगवद्गीताभाषार्टीका.
अपनेको जानते हो आपको दूसरा कोई नहीं जानता है ।। १५॥
वक्तुमर्हस्यशेषेणदिव्याथात्मविभूतयः॥
याभिर्विभूतिभिलाकानिमांस्त्वंव्याप्यतिष्ठसि
दोहा-निजविभूतिमोसौंकहो,प्रभुकीचितकोचाव
जोबिभूतिश्रीकृष्णसा, रहीजगतमै छाय॥१६
हे श्रीकृष्ण! आपकी जोजो दिव्य विभूति है सो संपूर्ण मेरे सामने
कहिये, जिन विभूतियों के द्वारा आप इन लोकों व्याप्त होकर स्थितहो
कथंविद्यामहंयोगिस्त्वांसदापरिचिंतयन्
केषुकेषुचमावेषुचित्योऽसिभगवन्मया ॥
दोहा-ध्यामतुमारोकरतप्रभु, जानौकैसेतोहिं॥
कौनपदारथमैंलखौं, सोसमुझावोमोहिं ॥१॥
हे योगीश्रीकृष्ण! आपका निरन्तर ध्यान करता हुआ मैं आपको
किस तरह जानू ! हे भगवन आपका ध्यान किन किन भावों में
करना योग्य है ? ॥१७॥
विस्तरेणात्मनोयोगविभूतिंचजनार्दन ॥
सूयःकथयतृप्तिर्हिशृण्वतोनास्ति मेऽमृतम् ।।
दोहा-योगविभूतिआपनी, कहियेमोसोदेव ॥
मोकोतपतिनहोतहै, सुनतअमीरसभेव ॥१८॥
हे जनार्दन ! आपकी प्राप्तिका उपाय योगैश्वर्य और विभूति
विस्तारपूर्वक मुझे सुनाइये, इस अमृतरूप आपकी बाणीके सुनते
सुनते मेरा मन तृप्त नहीं होता है।॥१८॥
अष्पाय..॥ २०३ REATI ॥श्रीभगवानुवाच॥ हंततेकथयिष्यामिदिव्याह्यात्मविभूतयः प्राधान्यतःकुरुश्रेष्ठनास्त्यंतोविस्तरस्यमे दोहा-अर्जुनतुमसोंकहतहों, निजविभूतिविस्तारि मुख्यजितीतेईकहत, हियकेहगनिनिहारि ॥१९ हे अर्जुन ! मेरी जो दिव्य विभूति है, उनमें मुख्य मुख्य तुझे सुनाता हूं, क्योंकि मेरी संपूर्ण विभूतियोंके विस्तारका अन्त नहीं है. इससे प्रधान प्रधान सुनाता हूँ॥ १९॥ अहमात्मागुडाकेशसर्वभूताशयस्थितः ॥ अहमादिश्चमध्यंचभूतानामंतएवच॥२० दोहा-सवजीवनकेहीयमै, मोहिंआतमाजानि॥ आदिअंतअरुमध्यहौं, मोहिसबनमानि ॥ हे गुडाकेश! (जितेन्द्रिय अर्जुन) संपूर्ण प्राणियों के अन्तःकरणमें रहनेवाला मैं संपूर्ण प्राणियोंका अन्तर्यामी हूं, नही उनका आदि, मध्य और अवसान हूं अर्थात् सबका उत्पन्न करनेवाला,' पालने- वाला और संहार करनेवाला मैंही हूं ॥ २०॥ आदित्यानामहविष्णुज्योतिषारविरंशुमान मरीचिर्मस्तामस्मिनक्षत्राणामहंशशी॥ दोहा-आदित्यनमें विष्णुही, ज्योतिनमेंरविदेखि वायुनमांझमरीचिहौं, नक्षत्रनशशिलेखि॥२१ हे अर्जुन ! बारह आदित्योंमें विष्णुनाम आदित्य मैं हूं, प्रकाश-
२०४
/
भगवडीताभाषाटीका
मान् ज्योतियोंमें अंशुमान् सूर्य मैं हूं,उनचास मस्तगणोंमें मरीचि-
नाम वायु मैं हूं, तारागणों में मैं चंद्रमा हूँ॥२१॥
वेदानांसामवेदोऽस्मिदेवानामस्मिवासवः
इंद्रियाणांमनश्चास्मिभूतानामस्मिचेतना
दोहा-सामवेदहौवेदमें इंद्रअमरगणमांहिं ।।
जीवनमैहींचेतना, मनइंद्रिनकैमांहिं ।। २२॥
हे अर्जुन ! वेदोंमें सामवेद मैं हूं, देवताओंमें, इन्द्र मैं हूं इंद्रियोंमें
मन मैं हूं और प्राणियोंमें चेतनाशक्ति में हूँ ॥२२॥
रुद्राणांशंकरश्वाऽस्मिवित्तेशोयक्षरक्षसाम्
वसूनांपावकश्चास्मिमेरुःशिखरिणामहम्
दोहा-रुद्रनमेंशंकरजुहा, यक्षनमांहिंधनेश ॥
पावकहाँहीवसुनमें, सैलसुमेरुसुदेश ॥२३॥
हे अर्जुन ! रुद्रोंमें शंकर मैं हू, यक्षराक्षणमें कुवेर में हूं; आठ
वसुओंमें अनि मैं हूँ, पर्वतोंमें सुमेरु में हूं ॥ २३ ॥
पुरोधसांचमुख्यंमांविद्धिपार्थबृहस्पतिम्
सेनानीनामहंस्कंदासरसामस्मिसागरः॥
दोहा-देवपुरोहितसुख्यहौं, मोहिबृहस्पतिमानि॥
षणमुखसेनापतिनमें, सरमेंसागरजानि॥२४॥
हे अर्जुन ! पुरोहितोंमें मुख्य बृहस्पति मुझकोही जान, सेनाप-
तिमि स्कन्द मैं हूं, सरोवरों में समुद्र मैं हूं॥२४॥
मध्याय १०॥ महर्षीणांभृगुरहंगिरामस्म्येकमक्षरम् ॥ यज्ञानांजपयज्ञोऽस्मिस्थावराणांहिमालयः दोहा-हौंजुमहर्षिमाहिभृगु, वरननमेंओंकार॥ यज्ञनमेंजपयज्ञहौं, स्थावरहिमआधार ॥२५॥ महर्पियोंमें भृगु मही हूं, बाणीमें एक अक्षर ओंकार मैं हूं, यज्ञोंमे जपयज्ञ मैं है, स्थावरोमें हिमालय मै हूँ॥२५॥ अश्वत्थःसर्ववृक्षाणांदेवर्षीणांचनारदः॥ गंधर्वाणांचित्ररथःसिद्धानांकपिलोमुनिः॥ दोहा-वृक्षनमेंपीपरजुमें, ऋषिमैनारददेव ।। गंधर्वनमै चित्ररथ, सिडिकपिलमैंभेव ॥२६॥ संपूर्ण वृक्षोंमें पीपल मै हूं. देवर्षियों में नारद मैं हूं, गंधों में चित्ररथ मै हूं, सिद्धोंमें कपिल मुनि में हूं ॥२६॥ उच्चैःश्रवसमश्वानांविद्धिमाममृतोद्भवम् ॥ ऐरावतंगजेंद्राणांनराणांचनराधिपम् २७ दोहा-अश्वनमै उचैःश्रवा, गजऐरावतनाम ॥ हाँहीपहोंनरन., पोपतसबुककाम ॥२७॥ हे अर्जुन ! घोडोंमें मुझे अमृतसे उत्पन्न उचैःश्रवा जान, हाथि- योंमें ऐरावत और मनुष्योमें राजा मेरीही विभूति है ॥२७॥ आयुधानामहंवबंधेनूनामस्मिकामधुक् प्रजनश्चास्मिकंदर्पःसर्पाणामस्मिवासुकिः
है
२०६
,
भगवद्गीताभाषाटीका.
दोहा-हथियारनमैवज्रही. कामधेनुहैगाय ॥
कामप्रजाकरमाझहौं, बासुकिसर्पनराय॥८॥
आयुधोंमें वत्र मैं हूं, गौओंमें कामधेनु मैं हूं, उत्पन्न करनेवाला
कामदेव मैं हूं और सों में वासुकि मैं हूं ॥२८॥
अनंतश्चास्मिनागानांवरुणोयादसामहम्
पितृणामर्यमाचास्मियमःसंयमतामहम्
दोहा-नागनिमांहिंअनंतहौं, वरुणजुहौंजलजंतु॥
पितरनमेंहौंअर्यमा, यमहौंसंयमवंतु ॥२९॥
हे अर्जुन ! नागों में शेषनाग में हूं, जलचरोंमें वरुण मैं हूं, पित-
रोमें अर्यमा मैं हूं, शासन करनेवालोंमें यम मैं हूं ॥२९॥
प्रहादश्चास्सिदैत्यानांकाल:कलयतामहम्
मृगाणांचम्गेंद्रोहं वैनतेयश्चपक्षिणाम्३०
दोहा-दैत्यनमें प्रल्हादहौं, प्रेरनहारोकाल॥
सिंहजुहोसबमृगनमें, पंछिनमेरिपुव्याल ॥३०
हे अर्जुन ! दैत्योंमें प्रल्हाद में हूं; गणना करनेवालोंमें काल में
हूं, मृगोंमें सिंह मैं हूं और पक्षियोंमें गरुड मैं हूँ ॥३०॥
पवनःपवतामास्मिरामःशस्त्रभृतामहम् ॥
झषाणांमकरश्चास्मिस्रोतसामस्मिजान्हवी
दोहा-बेगवानपवनहौं, शस्त्रधारिनमेंराम ॥
जलजंतुनमेंमकरहौं, नदीगंगअभिराम ॥३१॥
अध्याय १० २.6 पवित्र करनेवालोंमें पवन मैं हूँ, शस्त्रधारियोंमें राम मैं हूं, मछलि- योंमें मगर मैं हूं, नदियोंम गंगा मैं हूं ॥३१॥ सर्गाणामादिरंतश्चमध्यं चैवाहमर्जुन । अध्यात्मविद्याविद्यानांवादःप्रवदतामहम् दोहा-सवकैआदिरुअंतहीं, मध्यमोहिकोंमान ।। तत्ववोधवादीनमैं, हौंअध्यातमज्ञान ॥३२॥ हे अर्जुन ! सृष्टिका आदि, मध्य और अंत में ही हूं विद्यायोंमें अध्यात्मविद्या में हूँ, वादियोंमें सिद्धांत में हूँ ।। ३२ ।। अक्षराणामकारोऽस्मिद्वंद्वःसामासिकस्यच अहमेवाक्षयःकालोधाताहंविश्वतोमुखः ।। दोहा-अक्षरमाहिंअकारहौं, बंदसमासनजानि ।। हौंहीअक्षयकालहौं, धातासबमैमानि ॥३३॥ हे अर्जुन 1 अक्षरों में अकार भैही हूं, समासोंमें द्वन्द्व समास में हूँ, अक्षय काल मैं हूँ चारोंओर मुखवाला सबका भरणपोपण कर्ता में है। मृत्युःसर्वहरश्वाहमुद्भवश्वभविष्यताम् ॥ कीर्तिःश्रीक्चिनारीणांस्मृतिर्मधाधृतिःक्षमा दोहा-संबकोहोहीसंहरतु, औरउपावनहार ॥ श्रीकीरतिसरस्वतिक्षमा, धृतिमतिहीनिरधार हे अर्जुन! सवका संहारकर्ता,मृत्यु मैं हूं, सबका उत्पन्न करनेवाला मैं हूं, खिमों में कीर्ति, श्री, वाणी,स्मृति,मेघा, पृति और क्षमा में हु ३४ २०८ . भगवद्गीताभाषाटीका. वृहत्सामतथासाम्नांगांयत्रीछंदसामहम् ॥ मासानांमार्गशीर्षोऽहमृतूनांकुसुमाकरः॥ दोहा-महासामहौंसाममें, गायत्रीहोछंद ।। मारगसिरहौंमासमें, रितुवसंतसुखकंद ॥३५॥ हे अर्जुन सामवेदके मंत्रोंमें वृहत्साम भै हूँ, उन्दोंमें गायत्री छन्द में हूं, मासों में मार्गशीर्षमास में हूँ, ऋतुओंमें वसन्त ऋतु में हूं ॥३५ धूतंछलयतामस्मितेजस्तेजस्विनामहम् जयोस्मिव्यवसायोस्मिसत्वंसत्ववतामहमा दोहा-छलांधूतबलतेजहूं, विजयिनमैंजयजानि ॥ उद्यमउद्योगीनमें, सत्वसात्विकिनमानि॥३६) छलियोंमें जूआ, तेजस्वियों में तेज; विजयवर्ताओंमे जय, उद्य- मियों में व्यवसाय और सत्ववालोमें सत्व मैं हूँ॥३६ ॥ समीक्षा-यहां द्यूतसे अभिप्राय दिव्य नीतिसे हे. अर्थात् राज- धर्ममें जो राजाओं द्वारा वरती जानेवाली राज नीति है वह भी उन २ पुरपोंके मानुतार मुझसेदी हुईही जान. वृष्णीनांवासुदेवोऽस्मिपांडवानांधनंजयः मुनीनामप्यहव्यासःकवीनामुशनाकविः दोहा-यदुकुलमें मैं कृष्णहो, पार्थपांडवनमाहि॥ मुनिनमांझहीव्यासमुनि,गनोशुक्रकविताहिं। हे अर्जुन! वृष्णिवंशियोंमे वासुदेव मैं हूं,पांडवोंमें धनंजय अर्थात अध्याय १०॥ अर्जन मैं हूं, मुनियों में व्यास मैं हूं और कवियों में शुक्राचार्य में हूं। दंडोदमयतामस्मिनीतिरस्मिजिगीषताम मौनंचैवास्मिगुह्यानांज्ञानंज्ञानवतामहम् दोहा-दंडवंतमेंदंडहौं, नीतिवंतकोनीति ।। ज्ञानिनमेंहीज्ञानहौं, मौनदुरावनरीति॥ ३८॥ हे अर्जुन ! दंड देनेवालोंमें दंड मै हूँ; जीतनेकी इच्छा करनेवा- लोंमें नीति में हूं. गुप्त करनेवाले उपायोमे मौन मेंहूं और तत्त्वज्ञानि- योमे ज्ञान मैंही हूं॥३८॥ यच्चापिसर्वभूतानांबीजंतदहमर्जुन ॥ नतदस्ति विनायत्स्यान्मयाभूतंचराचरम दोहा-सबजीवनकोबीजहौं, अर्जुनमोकोजानि॥ थिरचरयासंसारमें, मोबिनकनहिंमानि ३९ हे अर्जुन !. संपूर्ण प्राणियोंमे उत्पन्न करने का बीज भूत कारण भैहीहं; चराचर प्राणियोमे ऐसा कोई नहीं है. जिसमे मै नहीं हूं अ- र्थात् मै सबमेहूं ॥३९॥ नांतोऽस्तिममदिव्यानांविभूतीनांपरंतप एषतूद्देशतःप्रोक्तोविभतेर्विस्तरोमया॥ दोहा-मेरीदिव्यविभूतिको,अंत न जान्योजाय॥ यहतोथोरोसोको, मोविभूतिकेभाय ॥४०॥ हे परंतप ! मेरी दिव्य विभूतियोका अन्त नहीं है। न कोई ।' भगवद्गीताभागाटाका. वर्णन कर सक्ता है और जो कुछ मैंने अपनी विभूतियोंका वर्णन किया है वह संक्षिप्त है ।। ४०॥ यद्यद्विभूतिमत्सत्वंश्रीमर्जितमेववा ॥ तत्तदेवावगच्छत्वममतेजोऽशमंभवम् ।। दोहा-जोकढयासंमाग्में, काहूगुणअधिकाय ।। सांसबमेरानेजहै, दीनोलोहिंवत्ताय । हे अर्जुन ! संसारमें जो जो वस्तु ऐश्वर्यवान् कान्तमान और श्रमान हैं उन मबको तू मेरे तेजसे उत्पन्न हुई माझ॥४१॥ अथवाबहुनैतेनकिनातेनतवार्जुन ॥ विष्टभ्याहमिदंकृत्स्नमेकांशेनस्थितोजगत दोहा-बहुतक हातोमोंकहौं, अर्जुनवातबनाय ।। मबजगअपनेअंशते. मैराख्यों ठहराय ॥ चितईदिन्केवशपच्यो जोध्यावै अनुभूति ।। सकलईशलखिरखिये, दशमेंकही विभूति ॥१॥ यह विभूतिप्रभुवीबरन. विनवैआनन्दराम । मोहिमहाप्रभुदीजिये, चिदानंदसुखधाम || अथवा हे अर्जुन ! इन सब बातोंके भिन्न भिन्न जाननेसे तेग क्या प्रयोजन सिद्ध होगा; तृतनाही जन ले कि मैंने इस मम्पूर्ण जगतको अपने एक अंधा कर रुखा है ॥४॥ समीक्षा-इस अध्यायमें परमात्माकी विकृतियोंवा विशेष रूस वर्णन किया गया है. जिससे मनुष्योंको ज्ञान हो जाय कि परमात्मा - अभ्यार...॥ १ की भक्ति और उपासन्दासे उपरोक्त विभूतियोमेसे भक्त और उपासक जन जिस २ विभूतिकी इच्छाकरके उसके लिये प्रयत्न करे तो उस २ विभूतिको पासक्ता है । इतिश्रीमद्भगवद्गीतारूपनिषत्सु बहाविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णा- नसंवादे विचारदर्पण दोहासहितभाषाटीकायां विभूतियोगोनाम दशमोऽध्यायः ॥ १० ॥ समीक्षा-इस अध्यायमें प.मात्माकी विभूतियोंका वर्णन किया गया है अर्थात् भक्तजनोंको यह समझाया गया है कि इस संसारमें जितने भी आर्यजनक और मनोहारी पदार्थ तुम देखो उनको देखकर उनमें मोहित मत होओ, प्रत्युतः यह विचार करो कि यह सब पदार्थ सर्वशक्तिमान् परमात्मा ने अपनी अद्भुत सामर्थ्य द्वारा प्रकृति (माया) परमाणुओंसे रचे हैं, अतः अनित्य हैं। बुद्धि- मानोंको अनित्य पदार्थोम न फंसकर उसी सर्वशक्तिमान् परमा. त्माकी भक्ति में ही तत्पर होना चाहिये। परमात्मा की भक्तिसे ही स्थायी और नित्य एकरस आनंद प्राप्त होसत्ता हैन कि इन अ. नित्य पदार्थों की मासे। यहा इस अध्यायका सारांश है। [पृष्ठ १९६ से आगे] [३२] देशी हिन्दूमार्य ] सभाओं, पंचायतों और विधानमंडलीयोंको चाहिये प्रिजापती उन्नतिके लिये समयरपर राजाओं द्वारा उचमनियम प्रजाकी कुरोति: यों को दूर करने के लिये बनवायें । राजाओंकी सेवामें प्रार्थनापत्र उक नियमों के मनाने और देवी प्रचलित करने निमित भेजनेका पुरुषार्थ बगवर करते रहें। एक दिन अवश्य सफलताप्राप्त होगी। राजाओंको भी चाहिये कि मजा जोर कुरीनिमें दखें उनकोबलपूर्वक हटाते जाप,जैसा कि बडोदा महाराजने बालविवाह की कुरीति बलपूर्वक इटादी मेर जोधपुर महाराजने प्रजाती विवादादि समपोंपर अतिम्पय करना हटा दिया, जिससे प्रजा बही सुखी हो रही है।
२१५ विचारदर्पण [३३] हम लोगों को चाहिये कि दुर्भिक्षके समय में भारत वर्षके सम्राट्,राजाओं और महाराजाओंसे प्रार्थना करें कि,भारतवर्षका अन्न यूरोप आदिदेशोंको,अर्थात् इस देशसे बाहर नहीं जाने पावोअन्न बाहर चलेजाने से भारतवासी भूखों मरजाते हैं। यहाँ की प्रजा इतनी दरिद्र होगई हकि पचास वर्षपहिले जहां राजासे लेकर प्रजातक सब की वार्षिक आय मिलाकर प्रत्येक मनुष्यके पीछे ३६) उत्चीस रुपया थी, वही आय अब प्रत्येक मनुष्यके पीछे२४ चोवीस रुपया वार्षिक रहगई है।सापही यह दुर्दशा हो। गई कि खाद्यपदार्थ भी पहिलेसे कई गुणे महंगे होगयेहैं,जिसका फल यह हुआ कि,यहाँ के सातकरोड मनुष्योंको दिन में एक बारहीभोजन मिलता है और वे मनुष्य यह नहीं जानते कि, पेट भरके खाना किसको कहते हैं।उपरोक बातें प्रमाणोंद्वारा विद्वानों ने सिद्ध वरदिखाई हैं। [३४] गाजा, भांग, मदिरा, अहिफेन (अफीम ) और अन्य२ मादक (नशीले) पदार्थों के प्रचार को कडाईके नियमों द्वारा रुकवा देना चाहिये। [३५] स्थान२पर गोचर भूमि छोडी जानी चाहिया राजाओंको चाहिये कि गौ रक्षाके लिय पूरा२ यत्न करें, क्योंकि गौ जैसा उपकारी और पवित्र दुसरा पशु नहीं है जैसा गुण गोंके दूध वैद्यकशास्त्र में लिखा है,वैसा गुण किसी भी पशुके दूध नहीं है। वैसेही सर्वोचम गुण गौके घृत,दधि और तक [छाछ में लिखे हैं।इसी प्रकार गोमूत्र और गोमय [ गोवर ] में भी बहुत गुण हैं। अधिक क्या कहें भारतवर्षकी प्रजाका जीवन घृत. दूध पर ही निर्भर है, जिस प्रकार 'गौ जातिका दिनाश इस समय हो रहा है यदि इसी प्रकार होता रहा तो योडे कालमें ही घृत, दृघ नामको भी नहीं रहेंगे । भारतवर्षमें आजप ल एक लाख गौ नित्य मारी जाती है; यह वप रुकना चाहिये; देशी राजाओं से प्रार्थना की जावै कि वह लोग अपने २ राज्य से गौ जातिको बाहर नहीं जाने दें।सनाजाना कि नरेंद्र शिरोमणि वर्तमान बीकानेर नरेश महाराज श्रीगंगासिंहजी बहादुर ने यह प्रबन्ध अपने राज्य में कर रखा है। [३६]भारतवर्ष के धनिक जमींदारों,तालुकेदारों और राजा महाराजाओं को चा हये कि, अपनी भूमियोंमें अपने व्ययसे वैज्ञानिक रीति द्वारा खेती कराएं। भूमिका आय बढनेसे देश को और उनको भारी लाभ होगा.दीन और दरिद्र कृपकों की सब प्रकारसे सहायता करें, इसी में देशका भला होसका है। [३७] स्वदेशकी बनी वस्तुओं, यथा कपडा आदिका सबको व्यवहार करना चाहिये । स्वदेशी शिल्पी लोगों और कलकारखाने वालोंको सहायता देनी चाहिये । देशी राजाओं को अपने २ राज्यों में कलकारखाने खोलने चाहिये, जिससे देशका व्यापार' उम्मत होकर देश में घन और सम्पति पढे। [ अपूर्ण] -
अथ एकादशोऽध्यायः।
।। अर्जुन उवाच ।।-
मदनुग्रहायपरमंगुह्यमध्यात्मसंज्ञितम् ॥
यत्त्वयोक्तंवचस्तेनमोहोऽयंविगतोमम १
दोहा-मोउपरकीन्हीदया, अध्यातम प्रगटाय॥
वचनतुह्मारोसुनतही, मोहगयोजनसाय ॥ १॥
भगवानकी विभूतियोंका वर्णन सुन अर्जुनने कहा कि हे श्री-
कृष्ण ! आपने मेरे ऊपर अत्यन्त अनुग्रह करके जो महागूढ यह
अध्यात्मज्ञान सुनाया है, इससे मेरा सब मोह दूर होगया है॥१॥
भवाप्ययोहिभूतानांश्रुतौविस्तरशोमया।।
त्वत्तःकमलपत्राक्षमाहात्म्यमपिचाव्ययम्
दोहा-जीवनकीउतपत्तिसुनि, औरप्रलयकीरीति
कहीजुतुमविस्तारसों, निजमहात्मकीनीति ॥
है श्रीकृष्ण! मैंने प्राणियोंकी उत्पत्ति और प्रलयका वृत्तांत आपके
मुखसे विस्तारपूर्वक सुना और आपका अक्षय माहात्म्यभी सुना ।।
एवमेतद्यथात्थत्वमात्मानंपरमेश्वर ॥
द्रष्टुमिच्छामितरूपमैश्वरपुरुषोत्तम ॥३॥
दोहा-योहीहोज्योंकहतहौं, हरितुह्मारोभेव ॥
देख्योचाहतही अबै, विश्वरूपजोदेव ॥३॥
२१४ भगवद्गीताभाषाटीका. हे परमेश्वर ! जैसा आपने अपना वर्णन किया आप वैसेही है, हे पुरुषोत्तम ! मै ज्ञान, शक्ति, बल, ऐश्वर्य, वीर्य और तेज इन छ: गुणोंसे युक्त आपके रूपका दर्शन किया चाहता हूं ॥३॥ मन्यसेयदितच्छक्यंमयाद्रष्टुमितिप्रभो॥ योगेश्वर ततो मेत्वं दर्शयात्मानमव्ययम्। दोहा-देखनयोगोमाहिजौ, जानतहोयदुराय ॥ अविनाशीनिजरूपतौ, दीजैमोहिदिखाय॥४ हे कृष्ण ! जो आप यह समझतेहौ कि-मैं आपका वह रूप देख सकता हूँ. हे योगेश्वर ! आप मुझे अपने इस अविनाशी रूपका दर्शन दीजिये ।। ४॥ श्रीभगवानुवाच ॥ पश्यमेपार्थरूपाणिशतशोऽथसहस्रशः॥ नानाविधानिदिव्यानिनानावर्णाकृतीनिच दोहा-अर्जुनअवतूदेखिले, शतसहस्रममरूप ॥ बहुतभांतिदिव्यजो, नानाबरणअनूप ॥५॥ अर्जुनकी बात सुन भगवान् बोले-हे अर्जुन ! तू मेरे सैकडॉ, सहस्रों रूपोंको देख, ये मेरे रूप अनेक प्रकारके हैं, दिव्य हैं, अनेक वर्ण और अनेक आकृतियोंके हैं ॥५॥ पश्यादित्यान्वसन्रुद्रानश्चिनौमस्तस्तथा चहून्यदृष्टपूर्वाणिपश्याश्चर्याणिभारत ॥
दोहा- देखिरुद्रआदित्यवसु, अश्विनिसुतमोमांहिं|
: औअचरजकेरूपजे, पहिलेदेखेनाहिं ।।६।।
हे अर्जुन ! (मेरे देहमें) आदित्य, वसु, रुद्र, अधिनीकुमार
और मद्धणों को देख और उन उन आचर्ययुक्त बातोंको देख जो
तेने पहिले कभी नहीं देखी हैं ॥६॥
इहैकस्थंजगत्कृत्स्नंपश्याद्यसचराचरम् ॥
ममदेहेगुडाकेशयच्चान्यद्रष्टुमिच्छसि
दोहा-एकठौरममदेहिले, थिरचररहेसमाय॥
देख्योचाहतजोक्छु, सोईदेउदिखाय ॥७॥
हे गुडाकेश ! इस मेरे देहमें चराचर संपूर्ण जगत्को एकही स्था.
नपर इकट्ठा देखले, औरभी जिन जिन बातोंको तू देखना चाहता
है वे सबही देसले ॥७॥
नतुमांशक्यसेन्ष्टुमनेनैवस्वचक्षुपा ॥
दिव्यंददामितेचक्षुःपश्यमेयोगमैश्वरम् ८
दोहा-इननयनोंन हिंदेखिये,देउंदिव्यहगतोहिं ।।
योगेश्वरसंयुक्तजो, जैसेदेखेंमोहिं ॥८॥
हे अर्जुन ! तू अपने नेत्रोंसे मेरे रुपको न देख सकेगा. इससे मैं
तुझे दिव्य नेत्र देता हूं इनसे मेरे षड्गुणसंपन्न रूपको देख ॥ ८॥
॥संजयउवाच॥
एवमुक्त्वाततोराजनमहायोगेश्वरोहरिः॥
दर्शयामासपार्थायपरमरूपमैश्वरम् ॥९॥
भगवद्गीताभावाटीका दोहा-हेराजन्योवोलिक, योगेश्वरहरिराय ।। विश्वरूपअर्जुनप्रती, अद्भुतदियोदिखाय ॥९॥ अब संजय तराष्टसे कहते हैं कि-हे राजन् ! यह कहकर महा- योगेश्वर श्रीकृष्णने अर्जुनको अपना परम ऐश्वर्य रूप दिखाया ॥९ अनेकवक्त्रनयनमनेकाद्भुतदर्शनम् ।। अनेकदिव्याभरणंदिव्यानेकोधतायुधम्॥ दोहा-बहुआननलोचनबहुत, देखेअचरजहोत॥ भूषितनानाभूषणनि, शस्त्रअनेकउदोत ॥१० उस रूपमें अनेक मुख और अनेक नेत्र है, अनेक अद्भुत अद्भुत निीय है, अनेक दिव्य आभूषण हैं। अनेक प्रकारके दिव्य आयुध हैं ॥ १०॥ दिव्यमाल्यांबरधरं दिव्यगंधानुलेपनम् ॥ सर्वाश्चर्यमयदेवमनंतविश्वतोमुखम् ॥११ दोहा-दिव्यहारदिव्यहिवसन, दिव्यसुगंधलगाय अनंतदेवमुखजिततितै, सबअचरजकेभाय ॥ है तराष्ट्र ! वह रूप दिव्य माला और दिव्य वखधारी है, अनेक प्रकारके चन्दनादि सुगंधित पदार्थोसे अवलिप्त है वह रूप सब प्रकारसे आश्चर्योत्पादक, प्रकाशयुक्त और अन्तरहित है उसमे चारों और जिधर देखो उधर मुख हैं ॥११॥ दिविसूर्यसहस्रस्य भवेद्युगपदुत्थिता ॥ यदिभाःसदृशीसास्याद्धासस्तस्यमहात्मनः अध्याय९१। २९७ दोहा-सहसकरविकाशमें, पूरिरहेसबज्योति॥ दीपतिताप्रभुकीलखें, तउनसमताहोति।।१२॥ जो आकाशमें सहस्र सूर्योका प्रकाश एक साथ होजाय तौभी उस विश्वरूप भगवान की कान्तिके ममान कदाचित् ही हो सकता है अर्थात् सहस्र सूर्योका प्रकाशभी उनकी कान्तिके समान नहीं है ।। तत्रैकस्थंजगत्कृत्स्नंप्रविभक्तमनेकधा ॥ अपश्यदेवदेवस्यशरीरेपांडवस्तदा ॥१३॥ दोहा-भिन्नभेदजेजगतमें, देखेसबइकठाउं ॥ देवदेवकीदेहमें, अर्जुनकितेगिनाउं ॥१३॥ तब अर्जुनने उस देवदेवके शरीरमें एकही स्थानपर अनेक प्रका- रसे स्थित संपूर्ण जगत देखा ॥१३॥ ततःसविस्मयाविष्टोदृष्टरोमाधनंजयः॥ प्रणम्यशिरसादेवंकृतांजलिरभाषत १४॥ दोहा-ताकोतबअचरजभयो, रोमहर्षकेदाय ॥ तादेवहिपरनामकरि,बोल्योचितकोचाय॥१४॥ तब उस विश्वरूपका दर्शन करके अर्जुनको बड़ा विस्मय हुआ, शरीरके रोमांच खडे होगये और वह सिर झुका हाथ जोड श्रीकृष्णसे कहने लगा ॥१४॥ पश्यामि देवांस्तव देव देहे सर्वांस्तथा भू- तविशेषसंघान् ॥ब्रह्माणमीशंकमलासन- २१८ भगवद्गीताभाषाटीका. aon स्थमृषीश्चसर्वानुरगांश्च दिव्यान् ॥ १५॥ दोहा-देखतौंतवदेहमें, सथिरचरसुरसिद्ध ॥ कमलासनऋपिईशपुनि, सबैनामसुमृड ।। १५ हे कृष्ण ! में आपके देह में संपूर्ण देवताओंको तथा संपूर्ण ऋषि- याँको तथा संपूर्ण दिव्य रूपोंको देखता हूँ॥१५॥ अनेकवाहदरवक्त्रनेत्रं पश्यामि त्वां सर्व- तोऽनंतरूपम्॥ नातं न मध्यनपुनस्तवादि पश्यामिविश्वेश्वर विश्वरूपम् ॥१६॥ दोहा-बहुतबाहउदरोबछत, मैंदेखौंबहुशीस॥ अंतआदिमधियहनहीं, तुमअनंतजगदीस ।। हे विश्वेश्वर। हे विश्वरूप आपके देहमें सब जगह मुझे अनेक भुजा अनेक उदर, अनेक मुख, अनेक नेत्र और अनन्त रूप दिखाई देते हैं, आपका आदि, मध्य वा अन्त कहीं भी दिखाई नहीं देता है।६ किरीटिनंगदिनंचक्रिणंचतेजोराशिं सर्वतो दीप्तिमंतम् ॥ पश्यामित्वांदुर्निरीक्ष्यं समं- तादीप्तानलार्कद्युतिमप्रमेयम् ॥१७॥ दोहा-मुकुटसीसकरचऋगद, रूपराशिभगवान् । सुगनिचौंधचितवतलगत, हौरविअनलसमान भगवन्! मुझे ऐसा दिखाई देता है कि आप किरीट, गदा और अध्याय १. चक्र धारण कर रहे हैं,आप तेजःपुंज हैं चागेरसे आप दीतिमान हैं, आपका अग्नि और सूर्यके समान ऐसा प्रकाश है कि देखनेसे आँखें चकाचौधौ पडती हैं,आपके अपरिमित रूप दिखाई देते हैं। त्वमक्षरंपरमदितव्यं त्वमस्यविश्वस्यपरं निधानम्॥त्वमव्ययःशाश्वतधर्मगोतास- नातनस्त्वंपुरुषो मतो मे ॥१८॥ दोहा-अक्षरहौतुमहीएरम, हौसबजगतनिधान । अबिनाशीरक्षकघरम, उत्तमहोअनुमान॥१॥ जान्यौचाहतहै जिते, जिनकेजाननयोग। तुमहिंसनातनहोसदा, कहतविवेकीलोग ॥१८ हे कृष्ण! मुमुक्षुजनोंसे जानने योग्य आपही अक्षर पाब्रह्म हो,इस संसारके परम आधार स्वरूप आपही हो,आपही सनातनधर्मके रक्षक विनाशरक्षित हो. आपही सनातन पुरुष हो; यह मेरा मत है ॥१८॥ अनादिमध्यांतमनंतवीर्यमनंतबाहुं शशि सूर्यनेत्रम् ।। पश्यामित्वांदीप्तहुताशवक्त्रं- स्वतेजसाविश्वमिदं तपंतम् ॥ १९॥ दोहा-आदिअंतमधिरहिततुम, बहुभुजरविशशिनैन तुमरेमुखदीपतिअगनिः जगतप्रकाशतऐन ॥ १९ हे कृष्णा आपका आदि,मध्य व अन्त कुछ नहीं है,आपका पराक्रम अनन्त है,आपकी भुजा असंख्य हैं, सूर्य और चंद्रमा आपके नेत्रह
भगवद्गीताभापाटीका.
प्रज्वलित अग्निके समान आपका मुख है, अपने तेजसे इस संपूर्ण,
संसारको आप तप्त कर रहे हैं आप ऐसे मुझको दिखाई देते हैं १९
द्यावापृथिव्योरिदमंतरहिव्याप्तत्वयैकेन-
दिशश्चसर्वाः ॥ दृष्ट्वाद्भुत रूपमुग्रं तवेदं लो-
कत्रयंप्रव्यथितंमहात्मन् ॥ २० ॥
दोहा-गगनभूमिमधिसर्वदिशि, व्यापैतुमइक हैजु॥
अद्भुतरूपसुउपलखि, प्रविशितलोकसबैजु ।।
हे कृष्ण । हे महात्मन् ! आकाश और पृथ्वीके बीचमें जो यह
बडाभाग अन्तरिक्ष अर्थात् पोल है इस सबमे आप अकेलेही व्याप्त
होरहे हैं, संपूर्ण दिशाओंमेंभी आपही व्याप्त होरहे हैं आपके इस प्रचंड
अहत रूपको देखकर यह त्रिलोकी व्यथित होरही है ॥२०॥
अमीहित्वांसुरसंघाविशंतिकेचिद्धीताःप्रां-
जलयो गृणंतिास्वस्तीत्युक्त्वामहर्षिसि-
संघाःस्तुवंतित्वांस्तुतिभिःपुष्कलाभिः
दोहा-पैठततौमें देवगण, विनयकरतभयमानि॥
ऋषिअरुसिद्धसमाजहू, तेऐकरतबखानि ॥२१
हे कृष्ण ! ये देवताओंके समूह भयके मारे आपके शरण आये हैं
क्तिनेही भयभीत होकर दूर खडे खडे हाथ जोड़े हुए आपकी
प्रार्थना करते हैं ये महर्षि और सिद्धोंके झुंडके झुंड स्वस्ति वचन करके
अनेक प्रकारको स्तुतिसे आपकी स्तुति कर रहे हैं ॥२१॥
अध्याय११॥ २२१ रुद्रादित्या वसवो ये च साध्याविश्वेऽश्विनौ मरुतश्चोष्मपाश्च ॥गंधर्वयक्षासुरसिद्धसं- घावीक्ष्यतेत्वांविस्मिताश्चैव सर्वे ॥२२॥ दोहा-रुद्रसिद्धआदित्यवसु, अश्विनिविश्वेदेव ॥ साध्ययक्षगंधर्वसुर, मस्तनपावभेव ॥१॥ पितरउष्मपा नामजे, दैत्यविरोचनआदि। एसबविस्मैपाइकै, देखततोहिअनादि ॥ २२ ॥ हे कृष्ण ! एकादश रुद्र, द्वादश आदित्य अष्टवसु, साध्यनामक देवता, विश्वेदेव, दो अश्विनीकुमार, उनचास मस्गण, ऊष्मपा ना- मक पितर और गंधर्व, यक्ष, देवता तथा सिद्धोंके समूह ये सब विस्मित होकर तुझैं देखते हैं ॥२२॥ रूपमहत्तेबहुवक्त्रनेत्रंमहाबाहो बहुबा हुरुपादम् ॥ बहूदरंबहुदंष्ट्राकरालंदृष्ट्वालो- काःप्रव्यथितास्तथाहम् ॥२३॥ दोहा-रूपवडोबहुमुखनयन, भुजपदअरुउदरौंजु देखिभयानकदाढबहु, विथितलोकअरुहाँजु ॥ हे कृष्ण! हे महावाहो! आपके असख्य मुख और नेत्र हैं, असंख्य भुजा, उरू और चरण हैं, आपके असंख्य उदर है और असंख्य। दाटोंसे आपका रूप बडा कराल दिखाई देता है. इस रूपको देखकर सब लोक डर गये हैं और मैंभी डरके मारे ब्याकुल हो रहा हूँ ॥२३
भगवद्गीताभावादीका।
.
नभःस्पृशं दीप्तमनेकवर्णव्यात्ताननंदीप्त-
विशालनेत्रम् ॥दृष्ट्याहित्वांप्रव्यथितांतरा-
त्माऽतिनविंदामिशमंचविष्णो॥२४॥
दोहा-पायपुहमिश्राकाशशिर. दीरघगमुखधाय ॥
ऐसेतुमकोदेखिकै, धीरजगयो पलाय ॥२४॥
है विष्णो! यह आपका देह इतना बड़ा है कि आकाशको
स्पर्श करता है, बडा प्रकाशमान है, अनेक वर्षों से युक्त है, उसमें बड़ा
विस्तीर्ण मुख है, प्रज्वलित इंडे व नेत्रा, इस रूपको देखकर मेरा
अन्तरात्मा बडा याकुल होरहा है और विसी प्रकारसेमी धीरज
और शान्ति ग्रहण नही करता है ।। २४ ।।
दंष्ट्राकरालानिचतमुखानिदृष्ट्वकालानल-
सन्निभानि । दिशोनजानेनलभेचशर्मग्र-
सीददेवेशजगन्निवास ॥२५॥
दोहा-कालअगनिसमदाढतव, नादेखेभयभीनि
विसभृलीमुखर्गयो, अबकीजैप्रभुप्रीति ॥२५
है देवेश हे जगवि स ! बालानल्के सदृश बडीबडी विकराल
दवाले अापके मुखोंको देस्वर मै ऐमा भयभीत होगया है कि
झे दिशाओंका ज्ञान नहीं रहा है. मुझमें शान्ति प्राप्त होती है.
इससे हे भगवन् ! आप मुझपर प्रस्त्र हजिये ॥२५॥
अध्याय ११॥ ૨ अमीचत्वांवृतराष्ट्रस्यपुत्राःसर्वेसहैवावनि पालसंधैःभीष्मोद्रोणःसूतपुत्रस्तथाऽसौ सहास्मीयैरपियोधमुख्यैः ॥२६॥ दोहा-पृतसबै धृतराष्ट्रके, सबपतिनकेसंग॥ कर्णद्रोणभीषमजिते, योधामोअंग ॥ २६ ॥ हे कृष्ण ! तरष्ट्रके दुर्योधनादिक सब पुन सम्पूर्ण गजाओंके समूहोंके साथ आपके मुह में प्रवेश करते दिखाई देते हैं. भीष्म द्रोणाचार्य और सूतपत्र कर्ण आयके मुखमें प्रवेश कर रहे हैं और हमाग्भी शिरडी. सृष्टद्यम्नादिक बडे बडे मुख्य योधा आपके मुखमें प्रवेश करते दिखाई देते हैं ॥२६॥ वाणितत्वग्माणाविशंतिदंष्ट्राकराला- निभयानकानिचिहिलनादशनांतरे- पुसंदृश्यतेचूर्णितरुत्तमांगः ॥२७॥ दोहा-तुरततिहारेबदन में, सबैपरतधाय ॥ कोऊटाढनतादले. कोउरहेलपटाय ॥२७॥ सब आपके कराल डाटाव'ले मुखामें जल्ली जल्दी प्रवेश कर रे हैं. इनमें से कितनाहीक सिर चूर्ण होगय हैं और वे आपक दांतोंमें उल्झरहे हैं॥२७॥ यथानदीनांबहवोंऽबुवेगा:समुद्रमेवाभि- - भंगवद्गीताभावाटीका. भुखाद्रवति ॥ तथातवामीनरलोकवीरा- विशंतिवाण्यभिविज्ज्वलंति ॥२८॥. दोहा-ज्योंसरिताबाऋतुहि, परतसिंधुमेंजाय। त्यानृपतेरेवदनमें, सबैपरतहैंआय ॥२८॥ हे कृष्णा जैसे नदियोंकी अनेक शाखा समुद्रहीकी ओर दौडती हैं. वैसेही ये नरवीर तुमारे जाज्वल्यमान मुखाशीप्रतासे प्रवेश कररहे । यथा प्रदीप्तं ज्वलनं पतंगाविशंति नाशा- य समृद्धवेगाः। तथैव नाशाय विशंति लोकास्तवापि वक्राणि समृद्धवेगाः॥२९ दोहा-ज्योंपतंगपरिदीप, लहतआपनोनास ॥ तेसेसवनृपपरतहै, तेरे मुखकेपास ॥२९॥ हे कृष्ण ! जैसे अत्यन्त वेगवती पतग अपने नाशके लिये बड़े बेगसे जलतीहुई अग्निमें धुसी चली जाती है. ऐसेही ये सब लोक अपने नाशके लिये आपके मुखमें घुसे चले जारहे हैं।॥२९॥ लेलिसे ग्रसमानः समताल्लोकान्समग्रा- न्वदनवलाद्भिः ॥तेजोभिरापूर्य जगत्स- मग्रं भासस्तवोग्राःप्रतपति विष्णो ॥३० दोहा-लीलतहोतिनकोजुलै, रसनासोलपटाय॥ कांतिरावरीजगतको. देततापबहुभाय ॥३०॥ !
अध्याय ११॥ २२५ - हे कृष्ण ! आप अपने प्रज्वलित सुखोंसे संपूर्ण लोकोंको चारों- ओरसे ग्रसते हुए चाटे जाते हो अर्थात आप सब दृश्यमान पदार्थों का भक्षण कर रहे हो, और आपकी उग्रकांति सब जगतको अपने तेजसे परिपूरित करके तप्त कर रहे हो ॥ ३० ॥ आख्याहि मे को भवानुग्ररूपो नमोऽस्तु ते देववर प्रसीद॥ विज्ञातुमिच्छामि भत्र- तमाद्यं नहि प्रजानामि तव प्रवृत्तिम् ३१ दोहा-उग्ररूपतुमकौनही, मोसोकहियेदेव ॥ जान्योंचाहतौं अवै, तुमचरितनकोभेव ॥३१ हे कृष्ण ! आप ऐसे उग्र रूपवाले कौन हैं ? सो कहो, मैं आपको वारंवार नमस्कार करता हूं, मैं आपकी प्रवृति अर्थात् आपकी कुछभी बात नहीं जानता हूँ, इससे में आप आदि पुरुषके विषय में जानना चाहता हूं, हे देवश्रेष्ठ ! आप कृपा करके मुझे बतलाइये ३१ ॥ श्रीभगवानुवाच ।। कालोऽस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धोलोकान्स- माहर्तुमिह प्रवृत्तः।। ऋतेऽपि त्वां न भवि- ष्यति सर्वेयेऽवस्थिताःप्रत्यनीकेषुयोधाः दोहा-कालरूप हैहोतहौं, सबको मारनहार ॥ तोविनुसबयोधानकौं, भखिौंनिरधार ३२ हे अर्जुन ! मैं लोकक्षयकारी प्रवृद्ध काल हूं, मैं यहां इन लोकोंका संहार करनेके लिये प्रवृत्त हुआ हूं, ये बडे बडे योधा जो सेनाओंमें २२६ भगवद्गीताभाषाटीका. खडे हुए हैं, इनको जो तू नहीं मारेगा तौभी ये तो मरेंहोंगे ॥३२॥ तस्मात्त्वमुत्तिष्ठ यशो लभस्व जित्वा श- न भुश्वराज्यं समृद्धम्॥मयैवैते निहताः पूर्वमेव निमित्तमात्रं भवसव्यसाचिन् ३३ दोहा-तातेउठिरणजीतले, लैकीरतिअरुराज ॥ मैंहनिराखेहनृपति, सवऐतेरेकाज ॥३२॥ इससे हे,अर्जुन! तू कमरकस खडा होजा, और शत्रुओंको जीतकर कीर्ति प्राप्तकरं इस समृद्धराज्यको भोग, ये तो सब मुझसे पहिलेही मारेहुए हैं, हे सव्यसाचिन् ! तू तो केवल निमित्तमात्र होजा ॥३३॥ द्रोणंचभीष्मंचजयद्रथंचकर्णतथाऽन्यान पियोधवीरान॥मयाहतांस्त्वंजहिमांव्य- थिष्ठायुद्ध्यस्व जेतासि रणे सपत्नान,३४ दोहा-भीष्मद्रोणअरुजयद्रथहि, करणआदिजेऔर मेरेमारेमारत, शत्रुयुदइकठौर ॥३४॥ ह अर्जुन! द्रोण भीष्म, जयद्रथ कर्ण तथा औरभी बडे बडे शूरबीर योधा मुझसे मारेहुए हैं तू इन मेरे मारेहुओही को मार, दुखी होनेकी कोई बात नहीं है, उठकर लड,तू रणमें अवश्य शत्रुओंको जीतेगा। HI संजय उवाच॥ एतच्छ्रुत्वावचनंकेशवस्यकृतांजलिर्वेप- अध्याय ११॥ २२७ मान:किरीटी|नमस्कृत्वाभूयएवाहकृष्णं सगद्गदंभीतभीतःप्रणम्य ॥३५॥ दोहा-बचनसुनेश्रीकृष्णके, कांपीअर्जुनदेह ॥ तंबप्रभुकोपदलागिकै, बोल्योबचनसनेह ॥३५ अब संजय धृतराष्ट्रसे कहते हैं कि हे राजन् । केशवकी ऐसी ऐसी बातें सुनकर अर्जुन कांपने लगा हाथ जोड बार बार नमस्कार करता था और डरके मारे व्याकुल हो फिर नमस्कार कर गद्गद वाणीसे कृष्णसे कहने लगा।॥३५॥ ॥ अर्जुन उवाच॥ स्थानदृषीकेशतवप्रकी-जगत्प्रहृष्य- त्यनुरज्यतेच॥रक्षांसिभीतानिदिशोद्रव- तिसर्वेतमस्यन्ति च सिद्धसंघाः ॥३६॥ दोहा-सबजगकोयजगतहै, रहतुमहिअनुरागि॥ सिडनवततोकोसदा, राक्षसजातजुभागि॥३६ हे हृषीकेश ! आपका प्रभाव अति अद्भुत और कीर्ति अतुलनीय इसीसे यह सब जगत् हर्षित होताहै, और आपमें अनुराग करता है राक्षस भयभीत होकर दिशाविदिशाओंमें भागे फिरते हैं और सं. पूर्ण सिद्धोंके समूह आपको नमस्कार करते हैं यह योग्यही है, इसमें कोई आश्चर्यकी बात नहीं है ।। ३६ ।। कस्माचतेननमरन्महात्मनगरीयसेब्रह्म- भगवद्गीताभाषाका. । णोऽप्यादिकत्र॥ अनन्तदेवेशजगन्निवास त्वमक्षरंसदसत्तत्परंयत् ॥३७॥ दोहा-क्याननवैतुमकोसबै, ब्रह्माकेकरतार ।। जगतईशअक्षरअनँत, तुमसबतेहौपार ॥३७॥ हे महात्मन् ! हे अनन्त । हे देवेश ! हे जगन्निवास । तुमको सब- लोक नमस्कार क्यों न करे, क्योंकि आप तो ब्रह्मासेभी बड़े हैं और सबके आदिका है तथा सत् और अमत के मूल कारणरूप अक्षर अर्थात् अविनाशी हैं ससे सबका आपको नमस्कार करना योग्यही है। त्वमादिदेवःपुरुषःपुराणस्त्वमस्यविश्वस्य परनिधानम् ।। वेत्ताऽसि वेद्यं च परंचधा मत्वयाततविश्वमनन्तरूप ॥३८॥ दोहा-पुरुषपुरातनआदिहो. तुमहीजगतनिधान। तुमयंहसवजगविस्तो, जानततुमहीज्ञान ।। हे कृष्ण ! आप आदिदेव और पुराणपुरुप हो, इस संपूर्ण विश्वके आपही लयस्थान हो, इस संपूर्ण विश्वकै ज्ञाता आप हो, जो कुछ जानने योग्य वस्तु है सो आपही हो, परंधाम अर्थात् मोक्षस्थानभी आपही हो यह संपूर्ण विश्व आपके अनन्त रूपसे व्याप्त है ॥ ३८॥ वायुर्यमोग्निवरुणःशशांक:प्रजापतिस्त्वंप्र पितामहश्च ।। नमोनमस्तेऽस्तुसहस्रकृत्व: पुनश्चभूयोऽपि नमोनमस्ते ॥ ३९॥ - अध्याय ११॥ दोहा-वायुप्रजापतिआनियम वरुणपितामहचंद बारवारसहसनि सतनि, प्रणवततोहिंमुकुंद ॥ हे कृष्ण ! वायु, यम, अमि, वरुण, चन्द्रमा, ब्रह्मा और ब्रह्माके पितामहभी आपही हैं इससे आपको सहस्रबार नमस्कार है और फिरभी आपको नमस्कार है नमस्कार है ॥ ३९ ॥ नमःपुरस्तादथपृष्ठतस्तेनमोऽस्तुतेसर्वतए वसर्व ॥अनन्तवीर्यामितविक्रमस्त्वंसर्व- समाप्नोषिततोऽसि संर्वः॥४०॥ दोहा-आगेतेतुमकोनवत, पाछेहूजुअनंत॥ सर्वदिशनितुमकोनवत, अमितप्रबलभगवंत हे सर्वेश्वर ! आपके सन्मुखसे नमस्कार है पाछेसे नमस्कार है, चारों ओरसे नमस्कार है, आप अनन्तवीर्य और अनन्त पराक्रमसे युक्त हो सबमें व्यापक हो इसीसे आप सर्व हो ॥४०॥ सखेतिमत्वाप्रसभंयदुक्तंहेकृष्णहेयादवहे. सखेति ॥ अजानता महिमानं तवेदं म- याप्रमादात्प्रणयेनवापि ॥४१॥ दोहा-मित्रजानिजोमैकही, सोसुनियेहो देव ॥ जानौकहाजुबावरो, तवमहिमाकोभव ॥१॥ हे यादव हे कृष्ण हे, सखाकह्यौं अनजानि॥ अथवाकह्योसनेहसों, क्षमियेसेवकमानि॥" - भगवदगीताभाषाटका. मैं आपको अपना सखा जानकर जो आपसे हे यादव ! हे कृष्णा हे सखा ! यह ढिठाईसे कहा करताथा इसका यह कारण था कि में आपकी इस महिमाको नहीं जानता था, यह मेरा बडा प्रमाद था अथवा स्नेहके वशीभूत हो (अर्थात आपको अपना मामाका बेटा नातेदार समझकर) मैं आपसे ऐसा कहा करताथा॥४१॥ यच्चावहासार्थमसत्कृतोऽसिविहारशय्या- सनभोजनेषु ॥ एकोऽथवाऽप्यच्युततत्स- मक्षतत्क्षामयेत्वा महमप्रमेयम् ॥४२॥. दोहा-भोजनशयनविहारमें,कियोअनादरभाय॥ तेजुक्षमासबकीजिये, प्रभुजूकेशोराय ॥४२॥ हे अच्युत ! खेलनेके समय, सोनेके समय, बैठने के समय, वा भोजन करते समय एकान्तमें अथवा बहुत लोगोंके सन्मुख जो मैंने आपकी हँसी की हो और इस प्रकारकी हँसीसे आपका अनादर किया हो सो मैं आपसे क्षमा कराता हूं. आपका प्रभाव अप्रमेय है अर्थात उसका किसी प्रकार परिमाण नहीं हो सकता है ।। ४२॥ पितासिलोकस्यचराचरस्यत्वमस्यपुज्य- श्चगुरुगरीयान् ॥नत्वत्समोऽस्त्यभ्यधिकः कुतोन्योलोकत्रयेऽप्यप्रतिमप्रभाव॥४३॥ दाहा-पिताजुतुमसंसारके, तुमहीगुरुहो ईश ।। तुमपटतरकोऊनहीं, अधिककोउजगदीश ॥ हे अपरमितप्रभावशालिन ! आप इस चराचर जगतके पालनकर्ता अध्याय११॥ -- पिता हों, आपही पूज्य हो और महान् गुरुहो तीनों लोकमें आपकी बराबर कोई नहीं है फिर आपसे अधिक और कैसे कोई हो सकता है। तस्मात्प्रणम्यप्रणिधायकार्यप्रसादयेत्वा- महमीशमीड्यम्॥पितेवपुत्रस्यसखेवस- ख्युःप्रियःप्रियायाहसि देव सोदुम् ॥४४॥ दोहा-अस्तुतियोग्यसुईशहौ,क्षमोदोषजोमोहि। ज्योपितमुतकोपतिप्रियहि,मित्रमित्रकोजोहि हे कृष्ण ! आप ईश्वर हो, आपही स्तुतिके योग्य हो ऐसे आपको मैं साष्टांग दंडवत करता हूं आप मुझपर प्रसन्न हूजिये, हे देव! आप मेरे अपराधोंको सहनकर ऐसे क्षमा कर सकते हो, जैसे पिता पुत्रके,मित्र मित्रके और पति अपनी स्वीके अपराधोंको सहनकर क्षमाकर देता है। अदृष्टपूर्वहृषितोऽस्मिदृष्ट्वाभयेनचप्रव्य- थितंमनोमे ॥ तदेवमेदर्शयदेवरूपंप्रसीद देवेश जगन्निवास ॥४५॥ दोहा-पहिलोरूपदिखाइये, हौंजीऊ वाजोइ ॥ रूपनिरखयहरावरो. मोहिहर्पभयहोइ ॥४५॥ हे कृष्ण! आपका ऐसा अद्भुत रूप पहिले कभी नहीं देखाथा इस अहुत रूपको देखकर मेरा मन बडा हर्षित हुआ है और भयके मारे | मेरा मन व्याकुल हो रहा है इससे मुझको वहीअपना पहिलारूप दि- खाइये. हे देवेश ! हे जगनिवास ! आप मुझपर प्रसन्न हूजिये ॥४५ भगवद्गीताभाषाटीका. किरीटिनं गदिनंचकहस्तमिच्छामि त्वां. द्रष्टुमहं तथैव ॥ तेनैवरूपेणचतुर्भुजेनस. हस्रबाहोभवविश्वमते॥४६॥ दोहा-मुकुटविराजैसीसपर, गदाचऋतुवहाथ ॥ इहिविधि मोहिदिखाइये, प्रभुहोतुमजगनाथ ॥१ चारिभुजाधरिप्रगट है, मोकोदरशनदेव ॥ तवमूरतिजुअनँतहैं, मेरोवासोंनेह ॥४६॥ हे सहस्रबाहो ! हे विश्वमूर्ते । मैं आपका वही किरीट मुछट युक्त गदाचक्रधारी रूप देखना चाहता हूं अतएव वही पहिलासा चतु- झुंज रूप धारण करलीजिये ।। ४६ ॥ समीक्षा-यहां चतुर्भुजरूपसे यह अभिप्राय है कि आप धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष, चारों पदार्थोंको स्वयं रखते हुये, भक्तजनोंको उनकी प्राप्तिका मार्ग बताकर उनकी प्राप्तिमें सहायिक बन सक्ते हो. ।।श्रीभगवानुवाच॥ मयाप्रसन्नेनतवार्जुनेदंरूपंपरंदर्शितमात्म योगात॥तेजोमयविश्वमनन्तमाद्ययन्मे- त्वदन्येन न दृष्टपूर्वम् ॥४७॥ दोहा-तोहिंदिखायोरूपमैं, अतिप्रसन्नचितहोय।। आदिअंतसोंतेजमय, देखिसकैनहिंकोय॥४७ यह बात सुनकर भगवान् बोले-हे अर्जुन ! मेरा यह तेजोमय, -- अध्याय ११॥ - विश्वरूप, अनन्त और आद्यं परमरूप है, यह तेरे सिवाय अबतक किसीनेभी नहीं देखा है, तुझपर अत्यन्त प्रसन्न होकर आत्मयोगसे तुझे दिखाया है (इसे देखकर तू क्यों डरता है ?) नवेदयज्ञाध्ययनैर्नदानैर्नचक्रियाभिनत. पोमिस्त्रैः॥ एवंरूपःशक्यअहंनृलोकेद्र- ष्टुंत्वदन्येनकुरुपवीर ॥४८॥ दोहा-वेदयज्ञअध्ययनतप.क्रियाकरतपुनिदान॥ ऐसेमेरेरूपको, तो विनुलखै न आन॥४८॥ हे कुस्श्रेष्ठ ! मेरे इस रूपको तेरे सिवाय कोई बेदाध्ययन, यज्ञसा- धन, दान, अग्निहोत्रादिक कर्म. वा उग्र तप करके देखना चाहै, तो नहीं देखसकता है ॥४८॥ मातेव्यथामाचविमूढभावोदृष्ट्यारूपंघोर. मीदृङ्ममेदम् ॥ व्यपेतभी प्रीतमनाःपु- नस्त्वंतदेवमेरूपमिदंप्रपश्य ॥४९॥ दोहा-रूपभयानकदेखिकैतू जनि हियहि डराहि अबभयकोतूदूरिकरि, मेरेरूपहिचाहि ॥३॥. घोररूपदेखौविथा, पावैजनिपुनिमोय ॥ लखिपहिलोईरूपयह,परसननिरभयहोया।४९ हे अर्जुन! मेरे इस घोर रूपको देखकर तू क्यों व्यथित होता है. व्याकुल मत हो और अपनी मूढताको छोडदे. निडर होकर प्र- सन्न चित्तसे मेरे इस पहिले रूपको फिर देख ! ४९॥
भगवद्वीताभाषाटीका ॥संजय उवाच ॥ इत्यर्जुनंवासुदेवस्तथोक्त्वास्वरूपदर्श यामासभूयः॥ आश्वासयामासचभीतमे नभुत्वापुनःसौम्यवपुर्महात्मा ॥५०॥ दोहा-अर्जुनसोंऐसेकयो, पहिलोवपुप्रगटाय ।। समाधानबहुविधिकियो, भयतेलियोबचाय॥ अब संजय कहते हैं कि-हे वृतराष्ट्र ! श्रीकृष्णने अर्जुनसे यह कह अपना पहिला चतुर्भुज रूप फिर दिखाया और उस' महात्माने अपना पहिला सा शान्तरूप फिर धारण कर डरे हुए अर्शनका आश्वासन किया ॥५०॥ ॥ अर्जुन उवाच॥ दृष्टेदमानुपंरूपंतवसौम्यं जनार्दन ॥ इदानीमस्मिसंवृत्तःसचेताःप्रकृतिंगतः। दोहा-रूपअनूपमतमधन्यौ, तारूपहिकोदेखि ॥ प्रकृतिलहीमैंआपुनी भयोसुचेतविशेपि॥५१ तब अर्जुन कहने लगा कि-हे जनार्दन ! आपका यह शांतिमय मनुष्य रूप देखकर अब में सावधान होगया है और मेरा जी ठिकाने आगया है, सब भय जाता रहा है ॥५१॥ ॥श्रीभगवानुवाच ॥ सुदुर्दर्शमिदंरूपं दृष्टवानसि यन्मम ॥ देवाअप्यस्यरूपस्यनित्यदर्शनकाक्षिणः ५२ ।
अध्याया।। २३५ दोहा-देख्योपरतनरूपयह, जो देख्यो नैमित्त । तास्वरूपकोदेवता, देख्यो चाहत नित्त ॥५२॥ भगवान् बोले-हे अर्जुन । जो मेरा अत्यन्त दुर्दर्श रूप तैंने देखा है इस रूपको देखने को देवताभी सदा तरसते रहते हैं ॥५२ ॥ नाहं वेदै तपसा न दानेन नचेज्यया ॥ शक्यएवंविधोद्रष्टुंदृष्टवानसिमांयथा ॥ दोहा-दानयज्ञतपविधिकिये, मोहिनदेखैकोय॥ विनश्रमपारथतूअबै, मोकोरह्या जु जोय॥५३ हे अर्जुन ! जैसा मेरा रूप तुमने देखा है ऐसे मेरे रूपको कोई वेदा ध्ययन, तपस्या, दान वा यज्ञादि कर्मद्वारा नहीं देख सकता है।५३ भक्त्यात्वनन्ययाशक्यअहमेवंविधोऽर्जुन ज्ञातुंद्रष्टुं च तत्त्वेन प्रवेष्टुं च परंतप ॥५४ दोहा-भक्तिअनन्यजुजोकरै. सोदेखैयाभाय॥ नीकेजानेमोहिसो, मोमेंरेहै समाय ॥५४॥ हे अर्जुन ! हे परंतप ! मेरा जो ऐसा विश्वरूप है इसको मनुष्य अनन्यभक्तिद्वारा जान सकते हैं वा देख सकते हैं और तत्त्वज्ञान- दारा इसमें लीन हो सकते हैं ॥५४॥ मत्कर्मकृन्मत्परमोमद्भक्तःसङ्गवर्जितः। निर:सर्वभूतेषुयःसमामेतिपाण्डव ।।५५ दोहा-मोनिमित्तकर्मनिकरै,सभक्तितजिऔर।
भगद्रीतामाषाटीका. । वैरनकासाकरे, मोनें लहै मुठौर ।। ५५ ॥ वेदयज्ञतपकोटिते, कबहुनदेख्योजाय ॥ विश्वरूपभगवानसो, भक्तहिंदियोदिखाय॥१॥ एकादशअध्यायमें, विश्वरूपकोभेव ॥ कह्योकृष्णसमुझाईकै, लखिअर्जुनकीसेव ॥२॥ विश्वरूपनीकेवरनि, इहिविधिआनंदराम ॥ पायोप्रभुपूरनपरम, उरमेंधरिघनश्याम ॥३॥ हे अर्जुन ! जो कोई मनुष्य मेरीही प्रीति के लिये लौकिक वा वैदिक कर्म करते है। मुझीको अपना पुरुषार्थ मानते हैं, मुझमें भक्तिरखते है; सब सांसारिक संगोसे मुख मोड चुके हैं; सम्पूर्ण प्राणिमात्रसे बैर छोड प्रीति रखते हैं, वेही मुझको प्राप्त हो सकते हैं।॥५५॥ इतिश्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे विचारदर्पण दोहासहितभाषाटीवायां विश्वरूपदर्शनयोगो नामैकादशोऽध्यायः ॥११॥ समीक्षा--इस अध्यायमें अर्जुन को विश्वदर्शन करानेका वर्णन है। विश्वदर्शन के ज्ञान से अर्जुनको यह पूर्ण विश्वास होगया कि कठिन से कठिन कोई भी ऐसा कार्य नहीं है जो मरमात्माकी शक्ति से परे हो अतः परमकल्याण की इच्छा करने वाले मनुष्योंको मरमात्माके अनन्य भक्त होनेका प्रयत्न करना चाहिये। यही इस अध्यायका सारांश है। INDI [पृष्ठ २१२ से आगे] [३८] हमारे देश में यह बडी कुप्रथा पडगई है कि संतान नहीं होनेपर सम्पति एक नवयुवक को दसक पुत्र बनाकर दे जाते हैं और प्रायः इस बात -- दर्शन। कोई भी ध्यान नहीं रक्खाजाता कि वह नवयुवक धर्मात्मा, देशभक और पूर्ण विहान् हो सकेगा या नहीं। इसका भयंकर परिणाम बहुत जगह तो यह देखने में। माता है कि, वह नवयुवक उस सम्पचिको नष्ट भ्रष्ट कर देताहै और अपनेको तथा अपने कुटुम्बवारोंको कलंकित बनादेता है.इस लिये हमको चाहिये कि,यदि अपने कुटुम्बमें कोई योग्य और धर्मात्मा पुरुष अपना भाई या उसकी संतानसे हो, तो सम्पति का कुछ भाग उस की देवर शेष सम्पचि किसी उचम जातीय संस्था में लगा दें। एकही मनुष्यको अपनी सम्पति देनेकी जगह किसी जातीय संस्थाके एक से अधिक मनुष्यों को सम्पति सौंपकर जाना अधिक उचम और श्रेष्ठ कार्य है। हम लोगों को यहभी चाहिये कि, अपने २ पुण्य सम्बन्धी कामों को मिलकर विचार के साथ करें। विसी एक सभा द्वारा यह रुपया व्यय विया जायगा तो बहुत उपयोगी कामों में लग सकेगा, यह ध्यान रहे कि मनुप्यकी दशा सदा एकसी नहीं बनी रहती है; आज जो धनिक हे कल देवयोगसे वही निर्धन होसका है ।अतःहमको चाहिये कि अपनी उचम दशा- में ही अपना बहुतसा रुपया जातीय संस्थाओंमें लगादें, इससे बडा भारी लाभ यह होगा कि हमारी हीन दशामें हमारी संन्तानोंको इन्हीं जातीय संस्थाओं द्वारा ज्ञान और विद्या प्राप्तिमें पूर्ण सहायता मिलसकेगी जिससे यह पुनः अपनी पूर्व उत्तम दशाको प्राप्त करलेंगे। इससे यह सिद्ध हुआ कि इन जातीय संस्थाको रुपये की सहायता देना एक प्रकारका अपना ही स्वार्य है। [३९] प्राचीन मंदिरोंका जीर्णोद्धार होता रहना चाहिये,चाहे वह किसीके बनाये हुए हों और नये मंदिर बनाने वालोंको चाहिये कि अनेक देवोंके नाम से मंदिर न बनवाकर श्रीविष्णु भगवानके अवतारों [ श्रीरामचन्द्र और श्रीकृष्ण महाराज आदि ] और शिव तथा देवीके नामसे बनवावें ।छोटे२ देवताओं की मूर्चियां इन्हीं प्रधान देवोंकी मूर्चियों के साथ रहें यथा रामचंद्र के मंदिरमें हनुमानजीकी प्रतिमा और शिवजी के मंदिर में श्रीगणेशजी की और देवी मंदिरमें भैरवकी प्रतिमा रहे. स्मरण रखना चाहिये कि ब्रह्मा, विष्णु,शिव,देवी यह सब एक ही परमेश्वर के अनंत नाम हैं, कोई उसको देवी के नाम से माता करके पूजता है और कोई विष्णु,शिवादि के नामसे पिता करके पूजता है; इस लिये एक परमेश्वर को छोड कर अन्य क्षुद्रदेवों को नाम से मंदिर न करावे. गीतामलिखा है- श्लोक-अंतवतु फलं तेषां तद्भवत्यल्प मेधसां। देवान देवयजो यांति मद्धकायोति मामपि॥गी. अ.७ श्लो० २३ ॥ (अर्थ) देवता आदिको जो पूजने वाले है या अल्प वृद्धि वाले मनुष्य है, क्योकि उनकी भक्ति प्राप्त फल मतदाता । देवत भोको पूजनेवाले दधतामोको और मेरभक्त मुझको प्राप्त होते हैं।
विचारदर्पण जब हिन्दू [आर्य ] जाति के क्षुद्र देवताओं का पूजना इतना तुच्छ कहा है तो मुसलमानों के पार पैगवरों को तो भूलकर भी न पूजे, क्योंकि गीतादी में लिसाहे- श्लोक-पोति देवव्रता देवान् पितन्योति पितृवताः । भूतानि याति भतेच्या याति मपाजिनोऽपिमाम् ॥गी. स.९ श्लो०२५॥ मर्य-देवताओं को पूज्ने वाले देव होते हैं पिरोका ध्यान करने वाले पितर और भूत पिशाचा को पूजने वाले मरकर भूत पिशाच, अत: पीर पेगबरों को पूजने वाले भरकर "यवन प्रेव" मोमें इसीप्रकार मुसलमान, ईसाईमत के धर्म और व्यवहारों को हिन्दू (माय)ोगममाने नसा कि मोहर्रम पर साजियोंको पूजना या उनको अपने व्यय से बनवाना इत्यादि [अपूर्ण] 7-
अथ द्वादशोऽध्यायः॥
। अर्जुन उवाच ॥
एवंसततयुक्तायेभक्तास्त्वांपर्युपासते॥
येचाप्यक्षरमव्यक्तंतेषांकेयोगवित्तमाः॥१
दोहा-जेसेवततुमकोसदा, करिकर्मनकेसाज ॥
अक्षरब्रह्महीजेभजति, बडोकौनकहिराज ॥१॥
यह सुन अर्जन पूंछने लगे कि हे भगवन जो निरन्तर भक्ति में
लयलीन होकर सदा आपके सगुण विश्वरूपकी उपासना करते है वे
उत्तम है ? अथवा जो आपको अक्षर अविनाशी अव्यक्तमानकर आ-
पकी उपासना करते हैं वे उत्तम है ? इन दोनोंमें कौन उत्तम है॥१॥
॥ श्रीभगवानुवाच ।।
मय्यावश्यमनोयेमांनित्ययुक्ताउपासते॥
श्रद्धयापरयोपेतास्तेमयुक्ततमामताः ॥२
दोहा-जोमोमेमनराखिकै, सेवतसेवकभाय॥
बहुश्रद्धासोंजोभजत, सोसबतेअधिकाय ॥२॥
श्रीकृष्ण बोले-हे अर्जुन! जो निरन्तर भक्तियोगसे युक्त होकर
केवल मुझही में मन लगा कर अत्यन्त श्रद्धापूर्वक मेरी उपासना
करते है वेही मुझको श्रेष्ठ मालूम होते हैं ॥२॥
येत्वक्षरमनिर्देश्यमव्यक्तंपर्युपासते ॥
सर्वत्रगमचित्यंचकूटस्थमचलंध्रुवम् ॥३॥
भगवद्रीताभाषाटीका।
दोहा-जोध्यावत हैं अक्षरहि जोनहिंप्रगटस्वरूप
व्यापीमायातेपरे, अचलअचिंत्यअरूप॥३॥
जो मुझे, अक्षर (अविनाशी), अनिर्देश्य (जो कहने में न आवै)
अव्यक्त (इन्द्रियोंसे अगोचर), सर्वत्रग (सर्वत्र विद्यमान), अचिन्त्य
(जो,ध्यानमें न आवै), कूटस्थामायाप्रपंचका आधारस्वरूप), अचल
(व्यापाररहित)और ध्रुव(नित्य और स्थिर)जानकर उपासना करते हैं।
संनियम्येद्रियग्रामसर्वत्रसमबुद्धयः ॥
तेप्राप्नुवंतिमामेवसवभूहितेरताः॥४॥
दोहा-सवइंद्रिनकोरोकिकै, सबकोलखैसमान ॥
1; सबजीवनकोहितकरत, मोहिमिलैकरज्ञान॥४
हे अर्जुन ! अपने सब इन्द्रियसमूहोंको वशीभूत करके संपूर्ण
माणियोंके हितमें रहनेवाले और सबको समान बुद्धिसे देखनेवाले
जो मेरे ऊपर कहेहुए रूपकी उपासना करते हैं वेही मुझे प्राप्त होते हैं।
क्लेशोऽधिकतरस्तेषांमव्यक्तासक्तचेतसाम् ।
अव्यक्ताहिगतिर्दु:खंदेहवद्भिरवाप्यते ॥५
दोहा-तिन्हेंक्लेशबहुहोतहैं, ब्रह्मलगायोचित्त ।।
रूपरेखजाकेनसो, दुखसोलहियतमित्त ॥५॥
हे अर्जुन ! जिनका चित्त मेरेः अव्यक्तरूपमें आसक्त है. उनको
केशबहुत होता है क्योंकि देहधारियोंको भव्यक्तकी उपासना
करना महान् कष्टकारक है॥५॥
अध्याय १२। २४१ . येतुसर्वाणिकर्माणिमयिसंन्यस्यसत्पराः। अनन्येनैवयोगेनमांध्यायंतउपासते॥६॥ दोहा-जेसवकर्मनिकरतहैं, अर्पतमोकोजानि॥ ध्यावतकेवलभक्तिसों, बहुउपासनाठानि ॥६॥ हे अर्जुन ! जो मेरे भक्त हैं। वह मुझमें तत्पर होकर संपूर्ण कोको मेरे निमित्त अर्पण करते हैं और अनन्य योगद्वारा ध्यान करतेहुए मेरा स्मरण करते हैं ॥६॥ तेषामहंसमुद्धर्तामृत्युसंसारसागरात् ।। भवामिनचिरात्पार्थमय्यावशितचेतसाम् दोहा-मृत्युसहितभवउदधिते, ताकोकरतउधार॥ मोमेंचितराष्यौजुउन, बहुभाइननिरधार ॥७॥ हे अर्जुन ! जो केवल मुझहीमें मन लगाकर मेरी उपासना करते हैं उनको मैं शीवही इस मृत्युरूप संसारसागरसे बचा लेताहूं ॥७॥ मय्येवमनआधत्स्वमयिबुद्धिंनिवेशय ॥ निवसिष्यसिमय्येवअतऊवनसंशयः॥८ दोहा-तातेअर्जुनबुद्धिमन, मोहीमनतूंगषि ॥ याआगमोदेहमें, वसिहयहअभिलापि ॥८॥ हे अर्जुन ! इससे तू अपना मन मुझमें लगा दे, अपनी बुद्धि मुझहीमें सन्निवेशितकर, जब तू अपना मन और बुद्धि मुझमें लगा देगा तब तू निश्चय अनन्त कालतक मुझहीमें निवास करेगा॥८॥ १६ २४२ भगवद्गीताभाष टीका अथचित्तंसमाधातुंनशक्नोषिमयिस्थिरम्। अभ्यासयोगेनततोमामिच्छाप्तुंधनंजय ॥ दोहा-जोतूंमोमेंनहिंसकत, चितअपनोठहरान।। करअभ्यासमोमिलनको,मोहिनिरंतरध्याय॥ हे धनंजय ! जो तुम अपने चित्त स्थिाताके साथ मुझमें नहीं लगा सकते हो तो इन चंचल चितको विषयोंसे वारवार रोककर अभ्यासद्वारा मेरी प्राप्तिकी इच्छा करते रहौ ॥९॥ अभ्यासेऽप्यसमर्थोऽसिमत्कर्मपरमोभवा। मदर्थमपिकर्माणिकुर्वन्सिद्धिमवाप्स्यसि दोहा-जोअभ्यासनकरिमकै, कर्मसमर्पोमोहि।। मेरेकर्मनिकरलहूं, सिडिहोइगीतोहिं ॥१०॥ हे अर्जुन ! जो तू अभ्यास करनेमेंभी समर्थ न हो तो मेरी प्रस- नताके कर्मोको कर, मेरी प्रसन्नताके कर्मोको करनेसेभी तुझे सिद्धि प्राप्त होजायगी॥१०॥ अथैतदप्यशक्तोसिकर्तुमद्योगमाश्रितः॥ सर्वकर्मफलत्यागंततःकुरुयतात्मवान् ॥ दोहा-यहैनजोतूकरिसक, मोसरनहिंअनुराग ॥ सबैकर्मकेफलनको, अर्जुनदेतूत्याग ॥११॥ जो तू यहभी न करसकै तौ अपनी इन्द्रियाको वशीभूतकर एक मात्र मेरा आश्रय लेकर संपूर्ण कर्मोंके फलकी वासनाको त्याग दे।
अध्याय " श्रेयोहिंज्ञानमभ्यासाज्ज्ञानाड्यानं विशिष्यते ध्यानाकर्मफलत्यागस्त्यागाच्छांतिरनंतरं॥ दोहा-ज्ञानभलोअभ्यासते, तातध्यानविशेखि ॥ फलत्यागेतातेभलो, तातेशांतहिलेखि ॥१२॥ हे अर्जुन ! अभ्याससे ज्ञान श्रेष्ठहै, ज्ञानमे ध्यान श्रेष्ठ है और ध्यानसे कर्मफलका त्याग श्रेष्ठ है, कर्मफलके त्याग करनेपर शीघ्रही चित्तको शान्ति मिलजाती है ॥ १२ ॥ अद्वेष्टासर्वभूतानांमैत्रःकरुणएवच ॥ निर्ममोनिरहंकारःसमदुःखसुखःक्षमी ॥ दोहा-देपनकाहूसोंकरै. मित्रभाइकरुनाजु । अहंकारममतातजै,दुखसुखसमक्षमताज्जु॥१३ हे अर्जुन ! जो प्राणिमात्र0 द्वेष नही रखते हैं, ससे मैत्रीभाव रखते हैं सबपर करुणा करते हैं, जो समता और अहंकार रहित हैं जो मुखको समान जानते हैं उन पर मैं शीघ्र कृपा करता हूँ॥१३ संतुष्टःसततंयोगीयतात्मादृढनिश्चयः। नयर्पितमनोबुद्धिोमद्भक्तःसमेप्रियः॥ दोहा-सदारहैसंतोषसों, मनराखैनिजहाथ ॥ प्राणबुद्धिमोमेंधरै, वहप्यारोमोसाथ ॥१४॥ हे अर्जुन ! जो मनुष्य जितना मिलजाय उत्तीपर संतोष करता है, निरन्तर योगमें लीन रहता है, अपने आत्माको यम नियमद्वारा वशीभूत रखता है,जो मेरे विषय दृढ निश्चय रखते हैं, जो मन और २४४ भगवद्गीताभाषाटीका. बुद्धिको मुझहीमें लगादेते हैं, ऐसे मेरे भक्तजन मुझे प्यारे लगते हैं।। यस्मान्नोद्विजतेलोकोलोकानोद्विजतेचयः हर्षामर्षभयोद्वेगैर्मुक्तोयःसचमेप्रियः॥१५ दोहा-वहकाइसोंनहिंडर, भय औरहि नहिंदेय ।। हर्षक्रोधदोऊतजै, सो मोको हरिलेय ॥ भयउद्वेगही तजैसब, कहूंमानिनहिलेत ॥ जोऐसो मो भक्तहै, तासोंमेराहैत ।। १५॥ जिससे कोई प्राणी उद्वेग वा त्रास नहीं पाता है और जो स्वयं किसी प्राणीसे उद्धेग वा त्रास नहीं पाता है, जो हर्ष, क्रोध, भय और उद्वेगसे रहित है वह मेरा अत्यन्त प्यारा है ॥ १५ ॥ अनपेक्षःशुचिर्दक्षउदासीनोगतव्यथः॥ सर्वारंभपरित्यागीयोमद्भक्तःसमेप्रियः॥ दोहा-चाहनकाहूकीकरै, रहै पुनीतसुदास ॥ सवआरंभनकोतजै, रहैजुमेरे पाम ॥ १६ ॥ हे अर्जुन ! जो मेरा भक्त किसी वस्तु की चाहना नहीं करता है, जो अपने मन,वचन और कर्मसे पवित्र रहता है,जो चतुर है,जो शत्रु मित्रसे रहित है, जिसको किसी प्रकारको मानसिक व्यथा नहीं है, जिसने सब प्रकार के उद्यम त्याग दिये हैं वही मुझे अत्यन्त प्रिय है योनदृष्यतिनद्वेष्टिनशोचतिनकांक्षति ॥ शुभाशुभपरित्यागीभक्तिमान्यःसमेप्रियः .
अध्याय.१२॥ २४५ Shcoom दोहा-प्रियपायहरपैनहीं, अप्रियलहनदुःख । सोचकांक्षानहिंकरै, तजिशुभअशुभविमुक्खा ऐसोव्हेकजोपुरुष, भक्तित जो होय ॥ अर्जुनमेरेअधिकवह, सुप्रियताकोजोय ॥१७॥ हे अर्जुन ! जो प्रिय वस्तुको पाकर प्रसन्न नहीं होता है, अप्रिय वस्तुसे द्वेष नहीं करता है, जो इष्ट वस्तुको नष्ट होनेपर शोच नहीं करता है, अनमिलकी चाह नहीं करता है, शुभ अशुभ का परि- त्याग कर देता है वही भक्त मेरा प्रिय है ।। १७ ॥ समःशत्रौचमित्रेचतथामानापमानयोः शीतोष्णसुखदुःखेषुसमःसंगविवर्जितः॥ दोहा-शत्रुमित्रको समलखै, सहैमानअपमान ॥ शीतउष्णसुखदुखसहै, संगकरनहिआन ॥१८ हे अर्जुन! जो शत्रु भित्रको समान जानता है जो मान अपमनिको तुल्य समझता है, जो सर्दी, गर्मी तथा सुख दुखमें समभावसे रहता है और किसीमें आसक्त नहीं होता है वही मुझे प्रिय है ॥ १८ ॥ तुल्यनिंदास्तुतिौनीसंतुष्टोयेनकेनचित अनिकेतःस्थिरजतिभक्तिमान्मेत्रियोनरः दोहा-स्तुतिनिंदाएकसी, गहेमोनसंतोष। गृह न करै थिरमतिरहै, लहै भक्तिसोंमोषा॥१९ | हे अर्जुन ! जो निन्दा स्तुतिको समान जानता है, थोडा बोलता है, जो कुछ मिलजाय उसमें संतुष्ट रहता है, जो किसी एक जगहमें ! A . भगवद्गीताभाषाटीका. घर वसकर नहीं रहता है जिसको बुद्धि चलायमान नहीं है वही भक्तिमान पुरुष मेरा प्रिय है ॥ १९ ॥ येतु धामृतमिदं यथोक्तं पर्युपासते ॥ श्रद्दधानामत्परमाभक्तास्तेऽतीवमेप्रियाः दोहा-धर्मामृतजोमैकह्यो, ताहिजुसवैकोय॥ . श्रहायुतमेरोभगत, मोहिसुप्यारोहोय ॥२० दुःखरूप अव्यक्तगति, औरविधनबहुमान। तबैबारसुध्यायमें, भक्तिकहीभगवान ॥१॥ निर्गुनसगुनउपासना, इनमें कान विशेखि ॥ वरनीआनंदरामयह, अधिकभक्तिअवरेखि॥२ "हे अर्जुन ! जो कोई श्रद्धापूर्वक मेरे परम भक्त इस यथोक्त धर्मा- मृतरूप भक्तियोगकी उपासना करते है वेही मुझे अत्यंत प्रिय हैं २० इति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सुब्रह्मविद्यायां योगशाखे श्रीकृ- प्णार्जुनसंवादे विचारर्दपण दोहासहितभाषाटीकायां भक्तियोगोनामद्वादशोऽध्यायः ॥१२।। समीक्षा-परमात्माके जो भक्त होते हैं उनके क्या लक्षण होते हैं. यह सब विषय इस बारहवें अध्यायमें वर्णन किया गया है और इस अध्यायमें सगुण और निर्गुण उपासनाकामी भेद दिखाया गया है. सगुण उपासना करने वालोको लौकिक सुखोंके साधन धन, सम्पत्ति आदि मिलते हैं और निर्गुण उपासना करने वालोंको सर्व श्रेष्ठ मुक्ति फलही मिलता है इसलिये निर्गुण उपासना डयो कठिन और दुस्साध्य है, क्योंकि धनसम्पत्तिको लात मारने वाले विरलही भक्त होसक्ते हैं। - ww दर्शन। को पुरस्कार [पृष्ठ २३८ से आगे] [४०] मंदिरों में जो आय होती है, वह अच्छे कामों में लगाई जाय । यथा- विद्यालय, महाविपाल्य आदि उत्तम संस्थाओंका सोलना और साथही विद्वानों दिलाना, जिससे वह उत्साह पूर्वक नई २ विधाओंकी खोज करते रहें; जैसा कि अमेरिका और यूरोप देशोंके विद्वानकर रहे हैं कुरीतिखंडनपर मंदिरों विद्वानों के व्याख्यान होने चाहियें और गीता आदि धर्मग्रंथोंकी कथायें कराई जायँ । ऐसा प्रबंध भी किया जाय कि पूजारी और महंतलोग मंदिरोंके द्रव्य अपने निजके कामों में न लगा सके । दुष्ट पूजारी और महंतोंको मंदिरोंमें से निकलवा देना चाहिये । मंदिरों की आयव्ययका लेखापडताल पंचायती के लोगों के हाथ में रहना चाहिये, क्योंकि मंदिरों में द्रव्य देनेवाले मनुष्यों का यह अभिप्राय नहीं होता कि उनकी दी हुई संपचियां पूजारी गुसाई और महंत लोगों के भोग में आयँ । दूसरी बात यह भी है कि महन्तो, पूजारियों और गुसाई लोगोंके पास रुपया रहना उनकी आत्माके लिये भी हानिकारक है देशके लिये तो प्रत्यक्ष मेंहीं है। [४१]भारतवर्ष के राजाओं को और प्रजाकं प्रतिनिधियोंको चाहिये कि मंदिरों के पूजारी और महंतोंके पास जो अगणित द्रव्य पडाहै उसको मजाके उपयोगीऔर उत्तमरकामों में लगाने का उपाय करें । ठाकुरजी को समय२पर,भोगलगाना, जगाना सलाना, रोगी बनाकर औषधि देना और वस्त्र आभूपणादि पहिराना आदि कामों पर जो निरर्थक अगणित रुपया लगाया जाता है वह सर्वथा रोक देना चाहियोपरमा- त्मा सर्वशक्तिमान, सर्वव्यापक है और भक्ति से प्रसन्न होनेवाला है न कि वखादिपर, व्यय करनेसे । भक्तिपूर्वक जल,पुष्प,धूपादि चढाकर हाथ जोडने और दंडवत प्रणाम करने से जिन्ना वह प्रसन्न होताहै उतना द्रध्य नष्ट करके आभूषणादि लेकर प्रसन्न नहीं होता। आभूषणादि बहुमूल्य दस्तुओ से तो पूजारी और महंत लोगों को प्रसन्न करना है न कि परमात्मा को । मंदिर भी एक जातीय संस्था है न कि पूजारी लोगों की हार [ दुकान ] मूर्तियों के लिये वरुाभूषण वाहर के न रहें, केवल मूर्तियों के साथ ही खुदे हुए और रंग दिये हुए रहें, परमेश्वर भक्ति प्रिय है वस्त्र आभूषण प्रिय नहीं । यदि सुवर्ण रत्नादि और जाभूषण हमारे मंदिरों में नहीं होते तो महमूदगजनवी द्वारा हमारे मंदिरोंपी टूर और उनका निरादर नहीं होता और आज क्ल भी मंदिरों में चोरों का भय बनाही रहता है, इसलिये इन के आभूषण उसी वस्तु के खुदे रहने चाहिये जिस वस्तु की वह मूर्ति हो, यथा-काठ, पाषाण, घानादि । ऊपर से वखाभूषण पहिनाना व्यर्य है, क्योंकि उसमें चोरों का भय रहताहै और निरर्थक व्यय भी होता है।
विचारदर्पण [४२] विधर्मी लोग अर्यात-मुसलमान, ईसाई लोग यदि हमारे देवालयोंमें प्रेम आजाय तो उनको दर्शन करनेसे न रोका जाय क्योंकि जिन मूर्तियोंको. हमने, "परमेश्वर के अवतारों का चिन्ह मान रक्खा है उनको किसी के दर्शन से अपवित्र का होजाना मानना विद्वानों की दृष्टिमें रुपणता और मूर्खता का चिन्ह है। जैसाकि प्रोफेसर डयूसन [ देवसेन] "मेरी भारतवर्षयात्रा सम्बन्धी स्मरणीष बाते" नामकी पुस्तक पृष्ठ १४६ में लिखते हैं कि:- हम रामके बडे मन्दिरके समीप पहुंचे । मैने अन्दर जाना चाहा, परन्तु मुझे बडी असभ्यतासे ,अन्दर जानसे रोकदिया । मैंने संस्कृतभाषामें उनको Kपूजारीलोगोंको) कहा कि "मैंने रामायणका अभ्यास किया है, यपपि में भारत- वासी नहीं, तथापि मैं बहुत अधिक मनुष्योंकी अपेक्षा वीर रामके प्रति अपनी आदरपूर्वक भाके प्रगटकरनेका अधिक अधिकार रखताई" । मेरा यह सब समझाना निष्फल हुआ स्यात इसका कारण यह था, कि वह संस्कृत भाषामें मेरा कपन नहीं समझ सके । अन्तमें मैं मुह होगया और उनके विरोधमें बहुतसी बातें कहीं; अन्त को उन आतिथ्यसत्कार रहित मनुष्योंको "होरिन (मैं कुछ कहता हुआ लौट आया। समीक्षा-पाठक विचारसते हैं क्या यह आश्चर्य और शोककी बात नहीं है कि एक विदेशी सभ्य विहान दूरसे कष्ट उठाकर भक्तिपूर्वक हमार मन्दिरमें आये और जसको मूर्तिके दर्शन कराना तो दूररहा मन्दिरकी देहली के अन्दरता नहीं घुसनेदें साय में विचित्रता यह कि अधिकाश मान्दरोंमें सत्सवोंके अवसर पर यवन भहवें और यावनी वेश्या गाना बजाना करने को मूर्तिके सामने बैठे या खडे रहसकें । और इससे अधिक लज्जाकी बात क्याहोसकीहै कि एक विदेशी पुरुष जो संस्कृत को जानते हुए रामायण का ज्ञाता होकर श्रीरामचन्द्रजी के सच्चे गुणोंका भक होकर अपने हृदय का भाव संस्कृत में प्रगट करें और पूजारीजीपहाराज, जिन्होंने विद और परमेश्वरके अवतारों की मूर्तियों को अपना कहनेका ठेका ले रक्खाया। संस्कृत भाषा में होने के कारण, उस भावको समझेही नहीं । बलिहारी है. हमारी इस हीन दशा पर और इस अविद्या पर। [४३ ] वर्तमान समयके तीर्षस्थानोंको सुधारनेकी बड़ी आवश्यकता है। तीर्थ, स्थानोंपर लोग जाते तो हैं शांति और ज्ञान प्राप्ति करने के लिये; परन्तु शोकह। कि शांतिके स्थानमें मूर्व पंडों, साखियों, और भिखारियोंसे पीछा छुटाना कठिन हो जाता है. गैया आदि तीर्थस्थानों पर कर्मकाण्ड करानेका ठेका जो पंडोने अपने हाथमें ले रखा है वह सर्वथा धर्मशास्त्र और युक्ति विरुद्ध है।जो विद्वान और धार्मिक ब्राह्मण हों वही कर्मकाण्ड कराने के अधिकारी है, नकि मूर्ख और प्रमादी) B दर्शन, २४९ -- पंढे। परन्तु इसमें भूल हमारी ही है, यदि हम सुपात्रों को दान देने लगजाय तो पोढे ही दिनों में तीवासी ब्राह्मण,पंडे सच्चे पंडित बनजाय; परन्तु आश्चर्यकी बात ह कि-हमारे अधिकांश भाई समझाने पर भी नहीं समझते और कुपात्रोंके बहकावमें आकर उपदेश देनेवालोंको ही नास्तिक, दुष्ट आदि कहकर उनका उपदेश नहीं मानते और न अपनी युद्धिसे ही काम लेते हैं। "कहे भली माने बुरी, यही मूढकी रीतारज्जव कोठी गारकी ज्यों धोये त्यों कीच तीर्थोपर जाने वालोंको चाहिये कि उन्हीं पडोंसे कर्मकाण्ड करानेकी अभि- लापान रखें, जिन के पास कि उनके पाप दादोंके नाम मिलें, किन्तु विचार यह होना चाहिये कि जो भी उचम विद्वान और धार्मिक ब्राह्मण मिलें उन्होंसे कर्मकाण्ड करायें। इस प्रकार कर्मकाण्ड कराने का फल यह होगा कि विद्वानों का ही सत्कार होने से तीर्यवासी ब्राह्मण, पंडे विद्वान और धार्मिक होनेका प्रयत्न करने लगेंगे। हमारा इस लेखसे यह प्रयोजन नहीं है कि लोग तीर्याटन ही न करें, परंच तीर्थाटन करें तो वहाँपर विहान और धर्मात्मा ब्राह्मणों,पंडोपिंडितो] हाराही कर्मकाण्ड करावें [अपूर्ण] -
अथ त्रयोदशोऽध्यायः
! अर्जुन उवाच ॥
प्रकृतिपुरुषञ्चैवक्षेत्रक्षेत्रज्ञमेवच ॥
एतद्वेदितुमिच्छामिज्ञानज्ञेयंचकेशव ॥१
दोहा-प्रकृतिकवनअरुपुरुषको.क्षेत्रक्षेत्रज्ञकहाया।
यहजाननकीलालसा, ज्ञानज्ञेययदुराय ॥ १ ॥
अब अर्जुन कहते हैं कि हे केशव ! मैं प्रकृति और पुरुष, क्षेत्र
और क्षेत्रज्ञ तथा ज्ञान ज्ञेयको जानना चाहता हूँ ॥ १ ॥
।। श्रीभगवानुवाच ।।
इदंशरीरंकौंतेय क्षेत्रमित्यभिधीयते ॥
एतद्योवेत्तितंपाहुःक्षेत्रज्ञ इति तद्विदः॥२
दोहा-क्षेत्रकहतयादेहको, अर्जुनज्ञानीलोय ॥
जानतहजोदेहको, सोक्षेत्रज्ञजुहोय ॥२॥
अर्जुनका प्रश्न सुन.श्रीकृष्ण बोले कि हे अर्जुन ! यह शरीर संसार
रूपी सस्यके उपजनेकी भूमि है,इससे यह क्षेत्र रहलाता है और जो
मनुष्य इसे जानता है उसको इसके जाननेवाले क्षेत्रज्ञ कहते हैं।।२।।
क्षेत्रज्ञंचापिमांविद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत ॥
क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोनियत्तज्ज्ञानमतमा ॥३॥
दोहा-क्षेत्रज्ञमोकोजानतू . बसतसवनकी देह ॥
यहैज्ञानकोजानिवौ, मेरोमत है एह ॥३॥
अध्याय१३॥ हे अर्जुन ! संपूर्ण क्षेत्रोंमें क्षेत्रज्ञ जो संसारी जीव है उसे और पर- मात्मा जो मैं है सो मुझे भी जानौ. और मेरे मतमें क्षेत्र और क्षेत्र- ज्ञका जो ज्ञान है सोही मोक्षका कारण और सर्वोत्तम है. इस ज्ञानके विना सब व्यर्थ हैं ॥३॥ तत्क्षेत्रंयच्चयाक्चयद्विकारियतश्चयत् ॥ सचयोयत्प्रभावश्चतत्समासेनमेशृणु॥४॥ दोहा-क्षेत्रतहांतेहैभयो, जोहैजैसेभाय । जोविकारयामांझहै, कहुँसंक्षेप सुनाय ॥४॥ हे अर्जुन । वही क्षेत्र जिसका मैं पहिले नाम ले चुका हूं वह जिस जड पदार्थ से बना हुआ है और जिन दर्शनादि स्वभावोंसे युक्त है और जैसे इच्छादिक धर्मोंसे युक्त है और जैसे इन्द्रियादिक विकारोंसे युक्त है और जैसे प्रकृति पुरुषके संयोगसे उत्पन्न हुआ है और जैसे स्थावर जंगमादि भेदोंसे नानारूपका है और क्षेत्रज्ञभी जैसे स्वरूप और अचिंत्य ऐश्वर्य के प्रभावसे युक्त है सो सब मैं संक्षेपसे कहता हूं तू सावधान होकर सुन ।। ४ ऋषिभिर्बहुधागीतंछंदोभिर्विविधैःपृथक्॥ ब्रह्मसूत्रपदैश्चैवहेतुमानिर्विनिश्चितैः ॥५॥ दोहा-ऋषिनकहेबहुभाँतिज, औरन हूंयोभाखि हेतुवादनिहचौजुकरि, कह्योउपनिषदसाखि॥ हे अर्जुन ! यह क्षेत्रक्षेत्रज्ञका रखरूप वसिष्ठ पाराशरादि सषियोंने योगशास्त्रादिद्वारा धारणा करके अनेक प्रकारसे वर्णन किया है, अ. नेक प्रकारके नित्यनैमित्तिक और काम्य कर्मके उपदेश कर्ता ऋक २५२ भगवद्गीताभाषाटीका। सामादि वेदोन जिसका स्वरूप अनेक रीतिनिरूपण किया है,तथा ब्रह्मके प्रतिपादन करनेवाले व्यासकृत ब्रह्मसूत्रोद्वारा हेतु मान निश्चित बातोंसे जिसका स्वरूप वर्णन किया गया है उसे भै संक्षेपसे कहता हूँ। महाभूतान्यहंकारोबुद्धिव्यक्तमेवच ।। इंद्रियाणिदशैकंचपंचचेंद्रियगोचराः॥६॥ दोहा-महाभूतअहंकारबुधि, अरुमायाहूजानि॥ एकादशइंद्रीविषय, शब्दादिकहूंमानि॥६॥ पंचमहाभूत अहंकार, बुद्धि अर्थात महत्तत्त्व, अव्यक्त अर्थात् मूलप्रकृति, दस कर्मेन्द्रिय और ज्ञानेन्द्रिय, एक मन और पांच इन्द्रि- योंके विषय येही क्षेत्र स्वरूपके चौवीस तत्त्व कहे गये हैं॥६॥ इच्छाद्वेषःसुखदुःखसंघातश्चेतनाधृतिः ॥ एतत्क्षेत्रंसमासेनसविकारमुदाहृतम् ॥७ दोहा-इच्छासुखदुखचेतना, द्वेषधीरताएहि ॥ यहमैंकह्योसंक्षेपसों, क्षेत्रजानिर्गुलेहि॥७॥ हे अर्जुन ! जो चौवीस तत्व कहे हैं वे और इच्छा, द्वेष, मुख दुख, संघात अर्थात शरीर, चेतना अर्थात् ज्ञानात्मक अन्तःकरणकी वृति, ति अर्थात् धीरज इन सबसे यह क्षेत्र बना है, यह सब मन संक्षेपसे वर्णन किया है ॥७॥ अमानित्वमदंभित्वमहिंसाक्षांतिराजवम् आचार्योपासनंशौचंस्थैर्यमात्मविनिग्रहः ।
अध्याय १३॥ दोहा-क्षमासरलअरुदभतजि, हिंसादमअभिमान। गुरुसेवासंयमकरन, थिरतासोचप्रधान ॥८॥ अब क्षेत्रज्ञके जानने के साधनोंको विस्तारपूर्वक कहते हैं, हे अर्जुन! अमानित्व (मानकी इच्छा न करना) अदभित्व (दंभ न करना) अहिंसा (प्राणिमात्रको पीडा न पहुंचाना)शांति(क्षमा)आर्जव (सरल स्वभाव रखना) गुरुसेवा, पवित्रता, आत्माको निग्रहमें रखना ॥८ इंद्रियार्थेपुवैराग्यमनहंकारएवच ॥ जन्ममृत्युजराव्याधिदुःखदोषानुदर्शनम् दोहा-विषयनसों वैरागधरी, तजेरहै अहंकार ।। जन्ममृत्युसुखव्याधिजरा.दुखदोषननिरधार॥ इन्द्रियोंझे रूप स गंधादि विषयों में वैराग्य उत्पन्न होना; अहं- कार न होना; पैदा होना; मरना बुढापा; रोग और दुख इनके दोषोंको बारबार विचारना ॥९॥ असक्तिरनभिष्वंगःपुत्रदारगृहादिषु ॥ नित्यंचसमचित्तत्वमिष्टानिष्टोपपत्तिषु ॥ दोहा-नेहनपुत्रकलत्रसों, तादुखदुखी न होय ।। चितमेंधरैसमानता, बुरेभलेकोखोय ॥ १० ॥ पुत्र, स्त्री, घर तथा धनादिकोंमें आसक्ति न होना, तथा स्त्रीपुत्र दिकोंके सुख दुःखमें सुख दुःख न मानना, और चाही या अनचाई जैसी वस्तु (दैवसंयोगसे) आमिलै इसमें चित्तको सावधानीमे समान रखना ॥ १० २५४ भगवद्गीताभाषाटीका. मयिचानन्ययोगेनभैक्तिरव्यभिचारिणी। विविक्तदेशसेवित्वमरतिर्जनसंसदि॥११॥ दोहा-अटलभक्तिमोमेधरे, सबको आतमजान।। रहैसदाएकांतमेंतजैसभासनमानि ॥ ११ ॥ मुझ परमेश्वररूपमें अनन्य योग अर्थात सर्वत्र आत्मदृष्टिसे एकान्त भक्ति होना, एकान्त स्थानमें रहना और सांसारिक विषयोमें लीन मनुष्यके संगमें अरुचि ॥११॥ अध्यात्मज्ञाननित्यत्वंतत्वज्ञानार्थदर्शनम एतज्ज्ञानमितिप्रोक्तमज्ञानंयदतोऽन्यथा॥ दोहा-अध्यातमज्ञानहिधरै, तत्वज्ञानकोदेखि ।। यहसबजोकछुमैकयो, यहैज्ञानअपरेखि ॥ १॥ त्वंपदार्थसोधनकर, देखै मोक्ष विशेखि ॥ यहैज्ञानइनते अवर, अज्ञानौ करलेखि ॥१२॥ अध्यात्मज्ञानमें सदा नित्यभाव और तत्वज्ञानका विषय जो मोक्ष उसको सर्व श्रेष्ठ मानना, ये 'अमानित्व' से लेकर 'तत्वार्थदर्शन तक क्षेत्रज्ञज्ञानके बीच साधन कहे हैं और इससे विपरीत मान,दंभ आदि अज्ञान है ।। १२॥ ज्ञेयंयत्तत्प्रवक्ष्यामियज्ज्ञात्वाऽमृतमश्नुते॥ अनादिमत्परंब्रह्मनसत्तन्नासदुच्यते॥१३॥ दोहा-वहअमृतसमजानिवो, जातेमुक्तिजुहोय ॥ कारनकारजतेपरै, नाहिब्रह्मकोजोय ।। १३॥ ॥
अध्याय१३॥ है अर्जुन ! जो जानने के योग्य वस्तु है सो मैं तुझसे कहता हूँ, जिसके जाननेसे मनुष्य मुक्ति पाता है, (वह जाननेके योग्य पदार्थ कैसा है!) कि उसका आदि नहीं है, परब्रह्म है, वह न सत् है न असत है अर्थात् न विधि कह सकते हैं न निषेध ॥ १३ ॥ सर्वतःपाणिपादंतत्सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम् सर्वतःश्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्यतिष्ठति१४ दोहा-सर्वत्राहि करचरणसिर,त्यौंहीमुखगकान।। व्यापिरह्योसबजगतमें, मोहिंदसौदिसजान । हे अर्जुन ! यह परब्रह्म सब ओर हस्त और पांव वाला है, उसके सब जगह नेत्र, शिर और मुख हैं, उसके सब जगह काल है और सम्पूर्ण लोकमें व्याप्त होरहा है अर्थात् चराचरात्मक है, अनन्त शक्तियों से युक्त है ॥१४॥ सर्वेन्द्रियगुणाभासंसर्वेन्द्रियविवर्जितम्॥ असफसर्वभृच्चैवनिर्गुणगुणभोक्तच॥१५॥ दोहा-सबविषयनतेहैरहित, सबताको आभास।। संगबिनासबकौंकरै, निर्गुणगुणनप्रकास॥१५॥ वही नेत्रादि सब इन्द्रियां और रूपादि विषयों में व्याप्त है और उनमें अनेक प्रकारसे भासता है, तथा सब इन्द्रिय विषयोंसे रहित है अर्थात् उनके बिनाभी सबको जाननेकी सामाथ्य रखता है, संगरहित है सबका आधारस्वरूप है, सत्वादि गुणोंसे रहित है तथा उन गुणोंका भोक्ता है॥ १५ ॥ ।
२५६ भगवद्गीताभाषाटीका बहिरंतश्चभूतानामचरंचस्मेवच ।। सूक्ष्मत्त्वात्तदविन्नेयंदरस्थंचांतिकेचतत॥ दोहा-जंतुजितेचरहूअचर, अंतरवाहिरसोय ॥ सबतेंदूरमुनिकटहै, सूक्षमलखैनकोय ॥१६॥ वही संपूर्ण चराचर प्राणियोंके भीतरवाहर है जैसे सुवर्ण केकण कुण्डलादिम भीतर और बाहर वर्तमान् है स्वयं चरावर स्वरूप हैं। अत्यन्त सूक्ष्मरूप होनेसे वह जानने में नहीं आसक्ता है इससे अज्ञा- नियोंसे अमित दूर है और ज्ञानियों के अत्यन्त निकट है ।। १६ ।। अविभक्तंचभूतेषुविभक्तमिवचस्थितम् ॥ भूतभर्तृचतज्ज्ञेयंग्रसिष्णुप्रभविष्णुच ।। दोहा-तामेंभेदनकछुनहीं, सबमेंरज्जुविभाग ।। उपजावतनासतसवनि, पालतकरिअनुराग ।। हे अर्जुन ! वह संपूर्ण प्राणियोंमे कारणरूपसे अभिन्न है परन्तु भिन्नके समान स्थित है, संपूर्ण प्राणियोंका पोषक है, सबका संहा- रकर्ता है और सबका रचनेवाला है।॥ १७॥ ज्योतिषामपितज्योतिस्तमसःपरमुच्यते ज्ञानज्ञेयंज्ञानगम्यहृदिसर्वस्यधिष्ठितम् दोहा-ज्योतिनहूंकीज्योतिहै, अंधकारतेपार ॥ ज्ञानजानिवोहीयमें, सबकेहैनिरधार ॥ १८॥ जो सूर्य, चन्द्र, तारागण आदि ज्योतिष्मान पदार्थ हैं उनकाभी ३ - अध्याय १३॥ ३५७ प्रकाशक है अर्थात् ये सब उसीके तेजसे चमकते हैं, इसीलिये तम जो अज्ञान उससे परे है अर्थात् वहां अज्ञानका लेशमात्रभी नहीं है, ज्ञानस्वरूप है, ज्ञेय अर्थात् जाननेके योग्य हैं, प्रथम कहेहुए अदभित्वादि ज्ञानके साधनोंसे पाया जाता है और प्राणिमात्रके हृदयमें नियन्तारूपसे स्थित है ॥१८॥ इतिक्षेत्रंतथाज्ञानज्ञेयंचोक्तंसमासतः॥ मद्भक्तएतद्विज्ञायमझावायोपपद्यते ॥१९ दोहा-क्षेत्रतथाअनुभवजुमै, तोकोंदयोबताय ॥ इनकोजानैजोभगत, लहैजुमाभाय ।। १९ ।। हे अर्जुन ! इस प्रकार मैंने क्षेत्र, ज्ञान और ज्ञेय इन तीनोंका वर्णन संक्षेपसे तेरे सन्मुख किया है इसीको वसिष्ठादि ऋषियोंने विस्तारपू- र्वक वर्णन किया है,इसे जानकर मेरा भक्त मेरे भावको प्राप्त होजाताहै प्रकृतिपुरुषचैवविद्धयनादीउभावपि ॥ विकारांश्चगुणांश्चैवविद्धिप्रकृतिसंभवान् ॥ दोहा-मायापुरुषअनादिहै, अर्जुनदोऊजानि ॥ गुणविकारसबजेभये, मायाहूतेमानि॥२०॥ हे अर्जुन ! प्रकृति और पुरुष इन दोनोंको अनादि जानौं क्योंकि ईश्वर अनादि है और उसकी प्रकृतिभी अनादि है और पूर्णपुरुषका अंश है इससे पुरुषभी अनादि है तथा देह इन्द्रिय आदि विकार और सुख दुःख मोहादिक गुण उन सबको प्रकृतिसेही उत्पन्नहुए,मान २० कार्यकारणकर्तृत्वेहेतु प्रकृतिरुच्यते ॥ पुरुषःसुखदुःखानांभोक्तृत्वेहेतुरुच्यते ॥
२५८ भगवद्गीताभाषाटीका. दोहा-कारजकारणकर्तऊं, मायाइनकोहेत.॥ दुखअरुसुखकेभोगको, वहैपुरुषगहिलेत॥२१॥ हे अर्जुन! कार्य जो शरीर और कारण जो इन्द्रियां इनके कर्तृत्वमें प्रकृतिही हेतु कही गई है और सुखदुःखोंका भोगनेवाला पुरुष कहा गया है यह कपिलादिक ऋषियोंने कहा है इसका भावार्थ यह है कि यद्यपि प्रकृति अचेतन है इससे स्वतः कोई काम नहीं कर सकती है और पुरुष अविकारी है इससे स्वतः भोग नहीं सकता है, तथापि पुरु- पके निकट होनेपर प्रकृति कर्ता है और प्रकृतिके निकट होनेसे पुरुष भोक्ता है ॥२१॥ पुरुषःप्रकृतिस्थोहि भुक्तेप्रकृतिजान्गुणान् कारणंगुणसंगोऽस्यसदसद्योनिजन्मसु । दोहा-पुरुषजवहिप्रकृतिभजत,तबहिकरतगुणभोग ऊँचनीचजनमहिलहत, जानिगुन केयोग ॥२२॥ हे अर्जुन ! वह पुरुष प्रकृतिका कार्य जो देह उसमें तदात्मरूपसे स्थित हो प्रकृतिसे उत्पन्न सुखदुःखादि गुणोंको भोगता है. इससे यह पुरुष जो अच्छी चा बुरी योनियों में जन्म लेता है उसका मूल- कारण प्रकृतिके गुणोंका संगही है ।। २२॥ उपद्रष्टाऽनुमंताचकर्ताभोक्तामहेश्वरः ।। परमात्मेतिचाप्युक्तोदेहेऽस्मिन्पुरुषःपरः दोहा-परमआत्मादेहते, न्यारोजानतलोय॥ साक्षीभाभोगता, ईश्वरनिर्गुणहोय ॥२३॥ हे अर्जुन ! इस देहमें यह पुरुष वर्तमान रहकर देखनेवाला
अध्याय. १३ ।
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अर्थात साक्षीभूत है, अनुमति (सलाह) देनेवाला है, पोपण कर-
नेवाला है, भोगनेवाला है. महेश्वर अर्थात् ब्रह्मादिकोंकाभी ईश्वर
है और परम आत्माभी कहागया है ॥२३ ।।
यएवं वेत्ति पुरुपं प्रकृतिंचगुणैःसह ॥
सर्वथावर्तमानोऽपिनसभूयोऽभिजायते॥
दोहा--जोकोङऐसेलखै, पुरुषप्रकृतिगुणभाय ।
सोकैसेजगभरहै, बहुरिनउ आय ॥ २४ ॥
हे अर्जुन ! जो इस रीतिसे पुरुषको जान लेता है और गुणोंस-
हित प्रकृतिको जान लेता है वह सर्वथ। संसारमा वर्तमान रहनेपर भी
फिर जन्म नहीं लेता है ।। २४ ॥
ध्यानेनात्मनिपश्यंतिकेचिदात्मानमात्मना
अन्येसांख्येनयोगेनकर्मयोगेनचापरे ॥
दोहा-देहमांझआतमलखे, कोऊकीयेध्यान ॥
सांख्ययोगअरुकर्मकरी, लखतदोनहूज्ञान॥
हे अर्जुन ! कितने ही मनुष्य मनसे पान करके अपनेहीमें आ-
त्माको देखते हैं, कितनेही सांख्ययोग अर्थात प्रकृति रूपके विवे.
कसे देखते हैं और कितनेही कर्मयोगसे देखते हैं ॥२५॥
अन्यत्वेवमजानंतःश्रुत्वान्येभ्यउपासते॥
तेऽपिचातितरंत्येवमृत्युंश्रुतिपरायणाः ॥
दोहा-जेऐसेनहिंजानहीं, सुनिऔरनपैलेतः॥
ममउपासनाकरतहैं, भवभयमृत्युतरेत ॥२६॥
गाणा , भगवडीताभापाटीका। हे अर्जुन ! कितनेही ऐसे हैं जो सांख्ययोग वा कर्म योगको नहीं। जानते हैं वे दूसरोंसे सुनकरही उपासना करते हैं वेभी श्रद्धापूर्वक उसके श्रवणमें तत्पर होकर इस संसारसागरसे तर जाते हैं ||२६ ॥ यावत्संजायतेकिंचित्सत्वंस्थावरजंगमम् क्षेत्रक्षेत्रज्ञसंयोगात्तद्विद्धि भरतर्षभ २७ दोहा-जितेजीवयाजगतमें, स्थावरजंगमहोत ॥ क्षेत्रऔरक्षेत्रज्ञमें, सबैलहतउद्योत। २७॥ है अर्जुन ! जो कुछ स्थावर जंगम प्राणिमात्र उत्पन्न होते हैं, उनकी उत्पत्ति क्षेत्रक्षेत्रज्ञके संयोगसे जान लेना ॥२७॥ समंसर्वेषुभूतेषु तिष्ठतंपरमेश्वरम् ॥ विनश्यत्स्वविनश्यतयःपश्यतिसपश्यति दोहा-परमेश्वरसंबजगतमें, बैट्योएकसमान॥ । तिन्हेंनसतविनसेनहीं, सोजानसोजान हे अर्जुन ! जो सम्पूर्ण प्राणियों में समान भावसे स्थित परमेश्वर- को देखते हैं और भूतोंके नष्ट होने.परभी जो आत्मा को अवि- नाशी देखता है वही देखता है ॥२८॥ समपश्यन्हिसर्वत्रसमवस्थितमीश्वरम् ।। --
अध्याय १३॥
हे अर्जुन ! ईश्वर सब स्थानोम समान भावसे स्थित है, ऐसीही
दृष्टिसे जो ईश्वरको समान मानता है वह आपही अपने आत्माको
नष्ट नहीं करता है. तबही वह मोक्षको प्राप्त होता है और जो ऐसी
दृष्टिसे नहीं देखता है वह देहात्मदर्शी अपनी आत्माको नष्ट करता
है और मरने के पीछे प्रकाशरहित अंधकारमें प्रवेश करता है ।।२९॥
प्रकृत्यैवचकर्माणिक्रियमाणानिसर्वशः॥
यःपश्यतितथात्मानमकर्तारंसपश्यति ॥
दोहा-मायाकृतजूकर्मको, जीवअकर्ताजोय ॥
जानतजोयाभेदको, लषतआतमासोय॥३०॥
हे अर्जुन ! पुरुष जो संपूर्ण कर्मों को प्रकृतिके किये हुए मानता
है और आत्माको उन काँका कर्ता नहीं मानता है अर्थात् मात्मा
देहाभिमानसेही काँका कर्ता है वास्तव में आप किसी कर्मका कर्ता
नहीं है वह मोक्ष पाता है ॥३०॥
यदाभूतपृथग्भावमेकस्थमनुपश्यति ॥
ततएवचविस्तारब्रह्मसंपद्यतेतदा ॥३१॥
दोहा-प्रलयसमैप्राणीनको, प्रकृतिलीनरिषिलोय
बहुरिप्रकृतितेबिस्तरै, लखैसुब्रह्महिहोय॥३१॥
हे अर्जुन ! जो पुरुष स्थावर जंगम सब माणियोंके जुदे जुदे
भेदोको प्रलयकालमें ईश्वरकी शक्तिरूप एकही प्रकृतिम स्थित मान-
ता है और उसी प्रकृतिमें सब प्राणियों के विस्तारको मानता है। तब
वह ब्रह्मस्वरूप होजाता है॥३१॥
२६२ भगवद्गीताभावाटीका. अनादित्वान्निर्गुणत्वात्परमात्माऽयमव्ययः शरीरस्थोऽपिकौंतेयनकरोतिनलिप्यते ॥ दोहा-आदिअंतसोरहितहै, निरगुणआतमसोय देहमांझयद्यपिरहै, करैनलिपताहोय॥३२॥ हे कौन्तेय ! यह परमात्मा अनादि और निर्गुण है इससे विनाश रहित है क्योंकि जो आदिसहित और गुणोंसे युक्त होता है वह नाशवान् है इसलिये देहमें वर्तमान होनेपरभी न कर्म करता है न कर्मफलमें लिप्त होता है॥३२॥ यथासर्वगतंसौम्यादाकाशंनोपलिप्यते। सर्वत्रावस्थितोदेहेतथात्मालोपलिप्यते ॥ दोहा-ज्योंअकाशसक्षमवसै, सबमेंपरसतनाहिं। त्योंहीहैयहगातमें, लिप्तनदेहनिमांहिं ॥३३॥ हे अर्जुन ! जैसे आकाश सब जगह व्याप्त है परन्तु सूक्ष्म होनेके कारण वहीं लिप्त नहीं होता है, इसीतरह संपूर्ण देहमें स्थित आत्मा- भी देहके गुणों में लिप्त नहीं होता है ।। ३३ ।। यथाप्रकाशयत्येक कृत्स्नंलोकमिमरविः क्षेत्रक्षेत्रीतथाकृत्स्नप्रकाशयतिभारत।३४ दोहा-ज्याप्रकाशएकैकरत, सबजगसूरजदेव ॥ त्योंहीसबकीदेहमें, परमातमकोभेव ॥३४॥ हे अर्जुन ! जैसे एकही सूर्य इस संपूर्ण भूमंडलको प्रकाशित - अध्याय १३॥ २६३ करता है, उसीतरह क्षेत्री अर्थात जीव संपूर्ण क्षेत्र अर्थात् देहको प्रकाशित करता है ॥३४॥ क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोरेवमंतरं ज्ञानचक्षुषा । भूतप्रकृतिमोक्षचयेविदुर्योतितेपरम्॥ दोहा-क्षेत्रऔरक्षेत्रज्ञको, भेदलखेजोकोय ।। भूतप्रकृतितेमोक्षको, जानेमुक्तसुहोय ॥ ३५ ॥ भगतजगततैउद्धरो, कहेकृष्णएबैन । तेहिकारणमैंयहकह्यो, तत्वज्ञानसुखदैन ॥१॥ तत्वज्ञानउपदेशबिनु, मृत्युतरैनहिंकोय ।। तातेकह्योविवेकयह, प्रकृतिपुरुषकोजोय ॥२॥ सबजगसोअनुरागकरि,आनन्दविमलविवेक क्षेत्रक्षेत्रज्ञकोयोगहै, वरन्योतत्वविवेक ॥३॥ हे अर्जुन ! जो ज्ञानचक्षुओंसे क्षेत्र और क्षेत्रज्ञका अंतर भली प्रकार जानते हैं और पहिले व हीहुई प्रकृतिसे मोक्षका उपायरूप धारणादि जानते हैं वे परमगतिको प्राप्त होते हैं ॥३५॥ इतिश्रीमद्भगवद्गीतासपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णा- र्जुनसंवादे विचारदर्पण दोहासहितभाषाटीकायां क्षेत्रक्षेत्रज्ञ- निर्देशयोगोनाम त्रयोदशोऽध्यायः ॥ १३ ॥ समीक्षा-पूर्वके बाहर अध्यायोंमें कर्मकांड और भक्तिकांडका वर्णन होकर अब शेषके छः अध्यायोंमें ज्ञानकांडका वर्णन किया जायगा। बुद्धिमानों को उचित है कि स्वयं ज्ञानवान होते हुए भगवडीताभाषारीका अपने मूर्ख भाइयोंकोभी विद्वान और ज्ञादीनाए। आजकल प्रायः यह देखाजाता है कि, लोग रातदिन यही कही करते है कि 'देश की उन्नति करो जिसका अर्थ यही है कि देशवासियोंको विद्वान , बुद्धिमान, स्मृद्धिमान और बलवान बनाओ। देशका क्या उन्नत होना है वह तो जड पदार्थ है। देशसे अभिप्राय किसी देश विषे- पके वासीयोंसे ही होता है। परंतु भारतवर्षमें आजकल बहुधा यह देखने में आरहा है कि देश की उन्नति चाहनेवाले विद्वान, अपने ।। मूर्ख भाइयों से मिलना, बातचीत करना और उनके बीचमें बैठना अपनी योग्यताको या अपनी मानप्रतिष्ठाको खो बैठना समझते हैं। जबतक उनमें मिलजुलकर विद्वान लोग उनको शिक्षा और ज्ञान नही देगें तबतक यह बात कैसे संभव है कि भारतवर्षके सौ पीछे पंचाननवे अपठित स्त्रीपुरुष विद्वान होकर देशके भले बुरेका ज्ञान प्राप्त कर सकें। गीताका उपदेशही है कि तुम परस्पर मिलकर अपने बोध (ज्ञान) को बढाओ (देखो गीता अ० १० श्लो० ९) अतः आशा है कि हमलोग समग्र गीताके तात्पर्यको रातदिनके श्रवण मनन द्वारा भलीभांति जानकर अपना और अपने अपठित भाइयोंका कल्याण करेंगे। अध्याय तेरहसे अध्याय अठारहकी समीक्षा हम पाठकों परही छोडते हैं। अतः क्षमाप्रार्थी हैं। गीताका विपय अतिगंभीर है इसके आशयको समझनेके लिये जितना जितना अधिक प्रयत्न किया जाएगा उतना २ ही अधिक और नया २ अर्थका भान होता जाएगा। और यह भी ध्यान रहे कि गीतामें सब उपदेश अधिकारी. भेदसे दियेगये है। जहां गृहस्थोंको युद्धादिमै प्रवृत्त होकर शत्रुको मारनेका या दुष्ट प्राणियोंकी हिंसा करनेका उपदेश दिया गया है, वहीं बानप्रस्थी और संन्यासी लोगोंको प्राणीमात्र अध्याय ५३ २६५ की हिंसा करनेसे रोका।इनके लिये दुष्ट-माणियोंके दिये कष्टोंको सहना और उनके अपराधके लिये उनको क्षमा करनेका उपदेश दिया गया है। वानप्रस्थी, संन्यासी तथा ऋषिमहात्माओंके लिये शाखाका ऐसा उपदेश प्राचीन कालसेही चला आता है यथा विश्वामित्र ऋषि रवयं राक्षसोंको मारनेमे समर्थ होतेहुएभी शत्रुओंसे यज्ञकी रक्षाके लिये रामन्द्रजी को जो क्षत्री थे ले गये। [पृष्ठ २४९ से आगे] [४४] तीर्थस्थानोंपर जो बातें धर्मविरुद्ध देखने में आरही हैं, उनको सर्वथा हटानेकी चेष्टा काजानी चाहिये,जैसा कि पुरी में वर्चमान समयके जगन्नाथजीके मंदि रको देखने से घुद्धिमान् मनुष्यको बहाही दुःख होता है, क्योंकि मंदिरके शिवरपर महा अश्लील अष्टपुतलिया रक्खी हुई हैं। उच्छिष्ट भात आदिका भोजन खाना पडता है। जिस मूर्तिको हम परमेश्वरके अवतारोंकी रूपसूचक मानते हैं वह भग्नहो और उसीको प्रत्येक बारहवें वर्ष असाध्य रोगी बनाकर मृतक बनायें और उसीके स्थानपर वैसीही दूसरी मूर्ति रक्खें, जिस क्रियाका नाम "कलेवरयात्रा रक्खा है । विचार करनेकी बात है कि ऐसी २ बातें उपहास करानेवाली और आश्चर्यजनक हैं । वहाके आचायाँको चाहिये कि ऐसी कुप्रथाओं को रोककर शास्त्रानुसार कार्य करनेपर उपतहो यशके भागी बनें । ऐसे स्थानोंपर जावर सब प्रकारकी हानि उठानेके अतिरिक्त और क्या लाभ उठाया जासका है। ऐसा प्रबन्ध अतिशीघ्र किया जाय कि धर्मशास्त्रके सिद्धान्तोंके विरुद्ध जिन २ तीर्थस्थानोंपर जो २ भ्रष्टाचार और पाखण्ड फैल रहे हों उनको सर्वधा हटाकर प्राचनिकालके सदृश " तीर्थस्थान बनायें, जैसाकि अपभी कोई २ स्थान तीर्थ कहलानके योग्य हैं; जहा जाकर अबभी शाति मिलती विहान और धार्मिक पंडितों और साधुओंके संगसे कई प्रकारके लाभ पहुंचते हैं। बहुत से तीर्थस्थानोंके संबन्धमें तो भोले भाले यात्रियोंको ठगनेके लिये "तीर्थमाहात्म्य" वनगये हैं। इन बनावटी तीर्थमाहात्म्योंकी जगह सच्चेधर्मक गंध-गीता, उपनिषद, वेदात, योगदर्शन आदिकी कथायें होनी चाहिये । तीर्थस्थानों पर विपालय और महाविद्यालय खुलने चाहिये, जिनके लिये यात्रियोंसे सहायता लीजाया करे, जिससे उनका दान और तीर्थयात्रा सफल हो विचारदर्पण car है . [४५] दरिद्र स्थिति के पुरुषोंको चाहिये किन्दरके तीर्थस्यानोंको न जाकर अपार पासके ही तीर्थस्थानों पर जायें क्योंकि परमेश्वरतो सबजगह है और भक्ति से प्रसन्न है. रेल्वे तथा जहाजी कम्पनियोंको करोडों रुपया किराये का कुम्भादि मेलापर देकर और सब प्रकार का अकथनीय कष्ट उठाकर अपनेको अधिक दरिद्र बनाने की, अपेक्षा यदि वह रुपया अपने कुटुंबके भरणपोषणमें लगावे तो उनके गृहस्थाश्रम का सुखपूर्वक निर्वाह होगा। [४६] बुद्धिमान मनुष्योंको चाहिये कि मूर्ख नामघारीसाधुओं और ग्रामणोंको सर्थियात्राके निमिव रेल्वे तथा स्टीमर [ जहाज ] की टिकट न दिला; क्योंकि ऐसा करनेसे व्यर्प धन का नाश होता है और न देशको ही वहां पर उनके जानेसे क लाभ होता है. विदान साधु तीयों पर जाकर उपदेशकरें तो अवश्य देशको लाभ हो सकार, परन्तु विद्वान साधुओं को भी चाहिये कि जहाँतक बनसके वहाँतक रेल्वे, और स्टीमरकम्पनियोंको देशका रुपया न देकर, पैदलही जैन साधुओंकी भाँति पात्रा किया करें, जिससे ग्रामरमें लोगोंको साधुओंके उपदेशोंका लाभ हो और साधुओंको भी देशकी स्थितिका पूर्ण यथावत् ज्ञान प्राप्त होजाय ॥ [४७] भारतवर्षकै भिन्न २ प्रांतोंमें "नवयुवक हिन्दू । आर्य ] मण्डल" होने चाहिये, जिनके उद्देश्य निम्नलिखित हो । [क] नवयुवकोंमें इसबातका प्रचार करना कि मादक पदार्थोंका सेवन न, करें और सोलहवर्षसे पहले तमाखू सिगरेट न पीवें । अपने चरित्र उचम रखने को अपने पास घरोंमें अश्लील चित्र न रखें; कामोचेजक खेल तमाशेकदापि नदेखें आजकल राधाकृष्णकी बाडमें कामोचेजक गीत, खेल, तमाशे, चित्र, बहुत देखने में आरहेहैं; अतः ऐसी लीलायें कभी न होनेपावें. वेश्याओंके यहां वदापि न जावें. यदि विवाहादि उत्सवापर कहीं वेश्या नाचकी बात हो तो जहाँतक होसके विवाह करानेवालोंसे अनुरोध करें कि-वह सर्वथा वेश्या नाच न होने दें, किन्तु अच्छे विहानों को बुलाकर धर्म विषय पर व्याख्यान दिलायें जिससे अत्यंत लाभ हो. [स] नवयुवकोंमें वलपराश्रम बढाने के साधनों यथा-दंड, कसरत, फुटबाल, टेनिस, क्रिकेट,कवड्डी,घोडासवारी.दूरदोडना भागना,आदि खेलोपा प्रचार करना, [ग] जहां कहीं अपने हिन्दु [ आर्य भाइयोंको सहायताकी आवश्यका हो वहां सहायक बनें. यथा पानीकी बाद आने तथा अमिलगने आदि किसी भाकस्मात दुर्घटनाके समयमें । [1] लोगोंमें विज्ञान फैलाने के निमित्त सप्ताहमें एकवार उपदेश देने या पहनेका प्रयत्न करना.
दर्शन । २६७- [] भारतवर्ष से बाहर देशोंमें जानेवाले अपने भाइयोंकी दुर्दशाको साधारण (लोगोंको बताना, कि वहापर कैसे २ भयानक अत्याचार विदेशियों द्वारा होरहे हैं। अतः हमको प्रयलं करना चाहिये कि, हमारे भाई वहा कुरी बनकर न जाये, उनके लिये यही वृचिका प्रबन्ध कियाजाय. और लोगोंको यहभी बताना कि इन भोले भाले लोगोंको बहकाने वाले हममें से ही नीच और लोभी पुरुष हैं. जहार लोगों को बहका कर भरती करनेवाले ऐसे पुरुषोंका पता लगे उनको, धिकारने और इस कामसे हटानेका प्रयत्न करें। यदि वह न मानें तो उनके साथ सब प्रकारका व्यवहार बंद करवा देना चाहिये। अफ्रिका आदि देशोंमें हमारे देशवासी कुलियोंको इतना कष्ट मिलता है कि वह थोडेही समयमें मर जाते हैं. इसी प्रकारके अन्य २ उचम कामोंको सोचना चाहिये, क्योंकि मनुष्यशरीरको धारण करनेका उद्देश्य अपना पेटही भरना नहीं है. जैसाकि लिखा है:- [श्लोक ] आहार निद्रा भय मैथुनं च सामान्यमेतत्पशुभिर्नराणाम् । धर्मोहि, तेषामधिको विशेषः धर्मण हीनो पशुभिः समानः ।। | (अर्थ) भोजन, निद्रा, भय, स्त्रीसम, मनुष्यों और पशुओं में समान में मनुष्योमें विशेष- ता यही है कि यह धर्म और अधर्मका ज्ञान रखते हैं परतु पशु नहीं रखते इसलिये इमको परोपकारादि धर्मकार्योंमें सदा तत्पर रहना चाहिये (च) हमारे नवयुवकोंको चाहिये कि विद्यालय में पढते समयही जीवनका अपना एक लक्ष्य बनावें. अथीत् इसी समय इस वातका दृढ निश्चय भलीभाति सोचत्रि: चारके साथ करलें, कि में अमुक धंधा करताहुआ स्वतंत्रतासे अपने जीवनका निर्वाह करूंगा। यथा वैद्यक, डाकटरी, इजिनियरी, वकालत, वैरिस्टरी, वाणिज्य, व्यापार, कृषि, धर्म और शिक्षाप्रचार इत्यादि अनेक प्रकारके जो उन्नतिकारक और स्वतत्र पधे हैं उनमें से एक्को अपना मुख्य लक्ष्य बनाकर उसी में पूर्ण निपुण होनेकी, पूरी २ चेष्टाकरनी चाहिये, क्योंकि जो मनुष्य किसी विद्यामें पूर्ण निपुण नहीं है। उनको वह आदर और द्रव्यकी आय प्राप्त नहीं होसक्ती जोकि एक पूर्ण विहानको प्राप्त होसक्तीहै यदि इसी अवस्थामें इसबातका विचार न किया जायगा तो गृहस्था- श्रममें वहा कष्ट उठाना पडेगा । पराधीन होकर अनेक मनुष्योंकी सेवा करनी होगी। " विद्यार्थी जीवन " आदि अनेक म २ पुस्तकें अभीसे पढनी चाहिये (छ) ऐसा प्रयत्लकरना कि एक हिन्द( आर्य ) धर्मप्रचारक मडल" स्थापित पोजाए इस मडल द्वारा तीन प्रकारके उपदेशक नियत किये जाने चाहिये प्रथम उत्तम श्रेणी के उपदेशक, जो घेद वेदांग पारग होनेके साथ कई भाषाओंफे विद्वान हो और पाश्चात्य विज्ञानसेभी पूर्ण जानकारहो प्राचीनकालमे तो हमारे विद्वान यथा “ साहित्य दर्पण"के कर्ता, चौदह २ भाषा जानते थे अबभी हमारे विद्वानोको न्यूनसेन्यून चार पाच भाषा तो " विचारदर्पष। २ अवश्य जाननी चाहिये दूसरे मध्यम श्रेणी के उपदेशक जो किन्हीं अशोमें उस श्रेणीके उपदेशकोसे न्यून हो. तीसरे कनिष्ट श्रेणी के उपदेशकमा मध्यम श्रेणी वालों से योग्यता, मे किन्हीं अशो में न्यून हो। इन उपदेशकों द्वारा भारतवर्ष के भिन्न नगरों और ग्रामों में धर्म मंदन और कुरीति संडन पर व्याख्यान दिलाये जावें । यथा लोगों को समझाया जावे कि, माजकल जो होली के त्यवहार पर अपशब्दोंका बोलना, मदिरा अदि मादक (पदार्थों का खाना पीना, और अन्य २ प्रमादके कामों का करना है यह सब हमारे धर्म शास्त्र के विरुद्ध हैं, ऐसी ममादमय बातों में लगने से शरीर मन और वाणी को अपवित्र करके इनकी शक्तियों को घटानका महापाप लगताहै, अतः इन (बुरे पापके कामों कोन करके धर्म के कामोंमें हमको लगना चाहिये. यया व्या नोंका देना प्रेम पूर्वक मिलकर देश और जाति के हितकार्यों को शोचना इत्यादि। M [ अपूर्ण] अथ चतुर्दशोऽध्यायः। ॥ श्रीभगवानुवाच ॥ परंभूयःप्रवक्ष्यामिज्ञानानांज्ञानमुत्तमम् ॥ यज्ज्ञात्वामुनयःसर्वेपरांसिद्धिमितोगताः। दोहा-परमज्ञानउत्तमसोई, तोकोंदेउँबताय॥ जाहिजानिकमुनिसबै, रहेमुक्तिकोपाय ॥१॥ भगवान् बोले हे अर्जुन ! मैं संपूर्ण ज्ञानों में उत्तम ज्ञान फिर तेरे सन्मुख कहताहूं, इसी ज्ञानके सहारेसे संपूर्ण मुनिजन इस जगहसे सर्वश्रेष्ठ मोक्षको प्राप्तहुए हैं ॥१॥ इदंज्ञानमुपाश्रित्यममसाधर्म्यमागताः॥ सर्भेऽपिनोपजायतेप्रलयेनव्यथंतिच ॥ दोहा-यहीज्ञानको सेइके, मेरोलह्योस्वरूप ॥ प्रलयसृष्टितिनकोंनहीं, परैनतेभवकूप ॥२॥ जिस ज्ञानको मैं अब तुझे सुनाऊंगा उसीका आश्रय लेकर जो मुनि- गण मेरे साधर्म्यको प्राप्त होगये हैं, वे सृष्टि कालमें उत्पन्न नहीं होते हैं और न प्रलयकालमें दुःख भोगते हैं अर्थात जन्ममरणसे रहित होगये हैं। ममयोनिर्महद्रह्मतस्मिन्गर्भधाम्यहम् संभवःसर्वभूतानांततोभवतिभारत ॥ ३॥ दोहा-ब्रह्मप्रकृतिमोयोनिहै, तामैंगर्भहिराखि ॥ उपजावतसवसृष्टिहौं,अर्जुनचितअभिलाखि॥
भगवद्गीताभाषाका. हे अर्जुन ! महत्बह्म अर्थात् प्रकृति मेरे योनि है इसीमैं मैं गर्भ- धारण करता हूं उसी गर्भसे सम्पूर्ण प्राणियोंकी उत्पत्ति होती हैं।॥३॥ सर्वयोलिषुकौंतेयमूर्तयःसंभवंतियाः॥ तासांब्रह्ममहद्योनिरहंबीजपदापिता ४॥ दोहा-जोजोमूरतिहोतेहैं, सवयोनिनमेंआय ।। तिनकोहीहीवीजहौं, मेंहिपिताअरुमाय ॥४॥ हे कौतय ! मनुष्यसे आदि लेकर यावन्मात्र स्थावर जंगम उत्पन्न टुआ करते हैं उन सबकी योनि अर्थात् उत्पत्ति स्थान प्रकृति है और बीज देनेवाला गर्भाधानका कर्ता पितास्वरूप भैही हूं ॥ ४ ॥ सत्वरजस्तमइतिगुणा:प्रकृतिसंभवाः ।। . निबध्नतिमहाबाहोदेहेदेहिनमव्ययम् ॥५ दोहा-सतरजतमजंगुणभये, मायाहीवेमानि ॥ तममअव्ययजीवको, तेगुणवांधतिआनि ॥ है महाबाहो ! सतोगुण; रजोगुण और तमोगुण, प्रकृतिसे उत्पन्न हुए, ये गुण अविनाशी जीवका इस देहमें बन्धन करते हैं अर्थात् उसे दुखसुखरुप बन्धनमें डालते हैं ॥५॥ तत्रसत्वंनिर्मलत्वात्प्रकाशकमनामयम् ॥ सुखसंगेनवनाति ज्ञानसंगेनचानघ ॥६॥ दोहा-निर्मलअरुपरकासकरि, सतगुणशांतिसुभाय ज्ञानसंगसुखसंगतों, आवतजीवहिआय॥६॥ .
अध्याय,१४॥ २७१ हे अनध! उन तीनों गुणोंमेंसे सतोगुण निर्मल है और अनामय अर्थात् रोगरहित शान्तिस्वरूप है इसीसे यह सतोगुण शान्तिके कार्य सुख और प्रकाशके कार्य ज्ञानसे बांधता है अर्थात् मैं सुखी हूँ मैं ज्ञानी हूँ इस प्रकार अहंकारसे जीवका बन्धन करता है ॥६॥ रजोरागात्मकंविद्धितृष्णासंगसमुद्भवम् ॥ तन्निबनातिकौंतेयकर्मसंगेनदेहिनम् ॥ ७ दोहा-रजगुणरागस्वरूपहै, तृष्णासंगकोहेतु ॥ कामसं कारिजीवको, एसेबंधनदेतु ॥७॥ हे कौन्तेय ! रजोगुणी उत्पत्ति तृ णा और स्त्रीधन पुत्रादिको आ- सक्तिसे हैं हमसे यह रागात्मक है अर्थात् सांसारिक विषयों में स्नेह करा- नेवाला है तू ऐसा जानले, स यह रजोगुण जीवको कर्मोकी आस- क्तिमें बांधता अर्थात् रजागुणद्वारा मनुष्य कर्म करने में प्रवृत्त होताहै तमस्त्वज्ञानविद्धिमोहनं सर्वदेहिनाम् ।। प्रमादालस्यनिद्राभिस्तन्निबध्नातिमारत दोहा-होतजुनमअज्ञानतें, मोहितसवकोहीय ॥ आलसन्द्रिाविकलता, , इनसौंबांधतजीय हे भारत ! तमोगुण अज्ञानसे उत्पन्न होता है इसलिये इसे संपूर्ण प्राणियोंका मोहनेवाला जानौ, इसी हेतुसे यह प्रमाद, आलस्य । और निद्राद्वारा जीवको बांधता है ।।८॥ सत्वंसुखेसंजयतिरजःकर्मणिभारत ॥ ज्ञानमावृत्यतुतमःप्रमादेसंजयत्युत ॥९॥ - ।
२७२ भगवद्गीताभाषाटीका. दोहा-सतगुणसुखसनमुखकरै, रजगुणकर्मनिलीन॥ तमगुणआलसयुतकरै, होतज्ञानसबछीन ॥९॥ हे भारत ! सत्वगुण जीवको मुखमें प्रवृति कराता है. रजोगुण कर्म करने में प्रवृत्ति कराता है और तमोगुण ज्ञान को आच्छादित कर जीवको प्रमादमें लगाता है ।। २ ॥ रजस्तमश्चाभिभूयसत्वंभवतिभारत॥ रजःसत्वंतमश्चैवतमःसत्वरजस्तथा ॥१ दोहा-रजगुणतमगुणपेलिकै, रहैसत्वगुणपूरि॥ सततमकोपेलैजुरज, तमतसतरजदूरि ॥१०॥ हे अर्जुन ! जब रजोगुण और तमोगुण इन दोनोंको जीत कर सतोगुणकी आधिकता होतीहै, तब यह सतोगुण प्राणियोंको सुख और ज्ञान संयुक्त करताहै, इसी तरह रजोगुणभी सतोगुण और तमोगुणका पराभव करके तृष्णा आदि अपने कर्मों में प्रवृत्त करताहै इसीतरह तमोगुण सतोगुण और रजोगुणका पराभव करके अपने आलस्य और अज्ञानादि कार्योंमें प्रवृत्त करता है ॥१०॥ सर्वद्वारेषुदेहेऽस्मिन्प्रकाशउपजायते । ज्ञानंयदातदाविद्याद्विवृद्धसत्वमित्युत ॥ दोहा-सवद्वारनतेदेहमें, जवहिप्रकासतज्ञान॥ तबहिबढ्योहैसत्वगुण, अर्जुनयहतूजान ॥११॥ हेअर्जुन ! जब इस देहमें नेत्रादि संपूर्णहारोंमें होकर प्रकाश अर्थात् स्पादिका यथार्थ ज्ञान उत्पन्न होता है तब सतोगुणकी वृद्धि अध्याय १४॥ . जानी जाती हैं क्योंकि सतोगुणहीसे इन्द्रियां अपने यथार्थ काममे प्रवृत्त होती हैं ॥ ११॥ लोभःप्रवृत्तिरारंभःकर्मणामशमःस्पृहाः॥ रजस्येतानिजायंतेविवृद्धेभरतर्षभ ॥१२ दोहा-बढतरजोगुणहैजबहि, नरशरीरमेंआय ।। लोभकर्मउद्यमअसम, इनाहिदेतप्रगटाय ॥१॥ कामविषैनितहीजव, अर्जुनहोतप्रत्त ॥ अरुलालचतेजानिये, बढ्योरजोगुणमित्त १२ हे भरतर्षभ ! जब रजोगुण बढताहै तब लोभ, कार्यमें नित्यप्रति प्रवृत्ति, काँका आरंभ, चित्तमें अशान्ति और स्पृहा ये उत्पन्न होते हैं इन्हीं चिन्होंसे रजोगुणकी वृद्धि जानी जाती है ॥ १२ ॥ अप्रकाशोऽप्रवृत्तिश्चप्रमादोमोहएवच ॥ तमस्येतानिजायतेविवृद्धेकुरुनंदन ॥१३ दोहा-अर्जुनतबहीकरतहै, तमगुणआयप्रकाश ॥ आलसमोहअज्ञानता, मनमेंकरतविलास १३॥ हे कुरुनन्दन ! तमोगुणके बढनेपर ज्ञानका नाश, उद्यम हीनता, प्रमाद अर्थात कर्तव्य कर्मोंसे विमुखता और मिथ्या पदार्थोंमें प्रीति ये सब उत्पन्न होते हैं अर्थात् जब ऐसे ऐसे कर्म मनुष्य करता है तब तमोगुणके बढने के चिन्ह जाने जाते हैं ॥ १३ ॥ यदासत्वेप्रवृद्धेतुप्रलयंयातिदेहभृत् ॥ तदोत्तमविदांल्लोकानमलान्प्रतिपद्यते १४ १८ २७४ भगवद्गीताभाषाटीका। दोहा-जोसतगुणकीछिमें, तुजैजीवनिजदेह ।। तोज्ञानिनकेलोकमें, जाइकरसोगेह ॥ १४॥ हे अर्जुन ! जिस समय सतोगुणकी वृद्धि होती है यदि उस समय पाणी देह साग देवै तौ वह उन निर्मल लोकोंको प्राप्त होता है जहां हिरण्यगर्भादिकी उपासना करनेवाले रहते हैं, अथवा आत्मज्ञानि- योंके कुलमें उत्पन्न होताहै क्योंकि लोक शब्द 'भुवन' और 'जन, दोनों अर्थोका बाचक है॥१४॥ रजसिप्रलयंगत्वाकर्मसंगिषुजायते ॥ तथापलीनस्तमसिमूढयोनिषुजायते,१५ दोहा-रजगुणमैतजिजीवको, कर्मवतघटिजाय॥ तमगुणमेंजोमरतहै पशुनमांझप्रगटाय ॥१५॥ हे अर्जुन ! और जो प्राणी रजोगुणकी वृद्धि में मरता है वह उन मनुष्योंमें जन्म लेताहै जो कम्मामें आसक्त हैं तथा जो तमोगुणकी वृद्धिमें मरते हैं वे मूढयोनि अर्थात पशुओमें जन्म लेते हैं।॥ १५ ॥ कर्मणःसुकृतस्याहुःसात्विकंनिर्मलफलंम् रजसस्तुफलंदुःखमज्ञानंतमसःफलम् १६ दोहा-सुकृतकमतेहोतहै. सात्विकफलअतिसुच्छ रजगुणकोफलदुःखहै, तमअज्ञानफलतुच्छ १६ सुकृत कर्मोका फल सात्विक और निर्मल है, रजोगुण संबंधी काँका फल दुःख है और तमोगुण संबंधी कर्मों का फल अज्ञान है ये सब कपिलाचार्यादि ऋषियोंके वाक्य हैं ॥ १६ ॥ + मध्याय १४॥ २७५ . सत्वात्संजायतेशानरंजसोलोभएवच ॥ प्रमादमोहौतमसोभवतोऽज्ञानमेवच १७ दोहा-लोभरजोगुणतेभयो, सतगुणतेहैज्ञान ॥ तमगुणतेहैविकलता, मोहआर अज्ञान ॥१७॥ हे अर्जुन ! सतोगुणसे ज्ञानकी उत्पत्ति होती है और रजोगुणसे लोभ उत्पन्न होता है तथा तमोगुणसे असावधानता, मोह और अज्ञानकी उत्पत्ति होती है !! १७॥ ऊर्ध्वगच्छन्तिसत्वस्थामध्यतिष्ठन्तिराजसाः जघन्यगुणवृतिस्थाअधोगच्छन्तितामसाः दोहा-सात्विकऊंचेजातुहैं. राजसमध्यमलोक ॥ तामसजातअधोगतिनि, पावतबहुविधिशोक हे अर्जुन ! जिसकी सतोगुणी वृत्ति है और सात्विक कर्म करते हैं वे सत्यलोकमें जाते हैं और मोक्षगामी हैं और जिनकी रजोगुणी वृत्ति है वे इस मृत्युलोकमें जन्म लेते हैं और अनेक प्रकारके जन्म- मरणादि कष्ट सहते हैं और जिनकी तमोगुणी वृत्ति है और नीच कर्म करनेमें प्रवृत्त रहते हैं वे अधोलोकको जाते हैं ॥१८॥ नान्यंगुणेभ्यःकर्तारंयदाद्रष्टाऽनुपश्यति॥ गुणेभ्यश्चपरंवेत्तिमझावंसोऽधिगच्छति ॥ दाहा--गुणहीकोकरतारकरि, जानेज्ञानीकोय॥ मोहिलखैगुणतेपरे, मोमेंटीनसुहोय ॥१९॥ .
२७६
भगवद्गीताभाषाटीका
जब द्रष्टा जो देखनेवाला विवेकी पुरूष है वह सत्वादि गुणोंके
अतिरिक्त किसी औरको की नहीं जानता है अर्थात् यह समझता
है कि-ये सब कर्म गुणहीद्वारा होते हैं और गुणोंसे परे साक्षीरूप
आत्माको जानता है वे मेरे रूपको प्राप्त होते हैं ॥ १९ ॥
गुणानेतानतीत्यत्रीन्देहीदेहसमुद्भवान् ॥
जन्ममृत्युजराव्याधिविमुक्तोऽमृतमश्नुते
दोहा-देहकरतजोतीनगुण, तिनकोदेहजुत्यागि।।
जन्ममृत्युतेदुखछुटे, रहैमुक्तिरसपागि ॥२०॥
यह देहधारी प्राणी देहसे उत्पन्न हुये इन तीनों सत्वादि गुणोंका
उलंघन करके जन्म, मृत्यु, जरा और व्याधियोंसे छूटकर अमर
होजाता है अर्थात् ब्रह्मपदको प्राप्त होता है ॥२०॥
॥ अर्जुन उवाच॥
कैलि खान्गुणानेतानतीतोभवतिप्रभो॥
किमाचारःकथं चैताँस्त्रीन्गुणानतिवर्तते ॥
दोहा-जोत्यागतहतीनगुण, ताकोलक्षणकौन ॥
कैसेताकेआचर, तुममोसाँसुकहोन ॥२१॥
यह सुन अर्जुनने पूछा कि हे प्रभो! जो इन तीनों गुणोंका
उल्लंघन करता है उसका लक्षण क्या है ? अर्थात वह किन लक्षणोंमे
पहिचाना जाता है, इसका आचरण केसा है ? और किस तरह इन
तीनों गुणोंका भतिकमण होता है।॥२१॥
अध्याय १४ २७७ . श्रीभगवानुवाच ॥ प्रकाशंचप्रवृतिंचमोहमेवचपाण्डव ॥ नद्वेष्टिसंप्रवृत्तानिननिवृत्तानिकांक्षति ॥ दोहा-मोहज्ञानअरुकर्मको, जोजानैहियमाहिं । विनुपायेचाहतनहीं, लहिसुखपावैनाहिं ॥२२॥ यह सुनकर भगवान वोले हे अर्जुन ! सतोगुण रजोगुण और तमोगुणके जो जो प्रकाश, प्रवृत्ति और मोह ये तीन कार्य हैं इनके प्रवृत्त होनेपर जो इनके त्यागनेकी इच्छा नहीं करता है और निवृत्त होनेपर ग्रहणकी इच्छा नहीं करता है वही पुरुष गुणातीत है ॥२२॥ उदासीनवदासीनोगुणैर्योनविचाल्यते ॥ गुणावर्तन्तइत्येवयोऽवतिष्ठतिनेङ्गते २३ दोहा-उदासीनबैठारहै, सुखदुखचपलनहोय ॥ गुणसबकारजकरतहैं, योजानैंजोलोय ॥२३॥ हे अर्जुन ! जो उदासीनकी तरह स्थित रहता है और सत्वादि गुणोंके सुखदुःखादिरूप कार्योसे विचलित नहीं होता है और ऐसा जानता है कि ये गुण अपने अपने कार्यों में स्वतःही प्रवृत्त रहते हैं, जो पुरुष ऐसे रहते हैं और चलायमान नहीं होते वेही गुणातीत हैं। समदुःखसुखःस्वस्थःसमलोष्ठाश्मकाञ्चनः तुल्यप्रियापियोधीरस्तुल्यनिन्दात्मसंस्तुतिः है 'भगवद्गीताभाषाटीका. जो सुख दुःखमें समान हैं, स्वस्थ अर्थात् मानसिकादि विका- रोसे रहित हैं जिनके कंकर पत्थर और सुवर्ण समान है जिसके प्रिय अप्रिय समान है जो धैर्यवान है, जिनके स्तुति और निन्दा समान है. ऐसेही पुरुष गुणातीत हैं ॥ २४ ॥ मानापमानयोस्तुल्यस्तुल्योमित्रारिपक्षयोः सर्वारम्भपरित्यागीगुणातीतःसउच्यते ॥ दोहा-तुल्यमानअपमानअरु, मित्रशत्रुसममान सवआरम्भनिजोतजै, गुणातीतकहिजान२५॥ हे अर्जुन ! जिसकी दृष्टिमें मान अपमान तुल्य हैं, और जो शत्रु मित्रको समान जानता है जो किसी कार्यको आरंभही नहीं करता है वह गुणातीत है ॥२५॥ मांचयोऽव्यभिचारेणभक्तियोगेनसेवते ॥ सगुणान्समतीत्यैतान्ब्रह्मभूयायकल्पते॥ दोहा-मोकोजोदृढभक्तिसो, सवैचितकेचाय॥ सोतीयोगुनकोलहै, रहैब्रह्मको पाय ॥२६ ।। हे अर्जुन ! जो कोई अनन्य भक्तिसे मेरा सेवन करता है वह इन तीनों गुणोंका उल्लंघन करके ब्रह्मभावको प्राप्त होजाता है ॥ २६ ॥ ब्रह्मणोहिप्रतिष्ठाहममृतस्याव्ययस्यच ।। शाश्वतस्यचधर्मस्यसुखस्यैकान्तिकस्यच विचारदर्पण। के भी बाल श्वेत नहीं होते इसका कारण यही है कि वह ब्रह्मा कडुवा तेलही काम में लाते हैं। [४५] मारवाड प्रान्तमें बहुत जगह यह चाल पड़ती जा रही है कि, स्त्रिये धूंघट का प्रचार रखती हुई भी बारीक कपडोंको धारण करती हैं, जिससे उनका प्रायः सब अंग दिखाई देता है। घर वाले मनुष्योंको बडी । लज्जा आती है; एक प्रकार की मानसिक निर्वलता के कारण वह कुछ बोल नहीं सके; परन्तु पढे लिखे और विद्वान् पुरुषों को चाहिये कि, इस बुरीचालको तुरंत हटा दें। और यह भी चाहिये कि, मारवाड़ी जाति में जितनी भी प्रकार की कुरीतियां हैं, उन को हटाने, के लिये एक सभा बनावें जिस का "मारवाडीसमाज सुधारक समिति" या दूसरा नामरक्खा जाय. यदि ऐसा न किया जायगा तो कलकत्ता आदि नगरों में, विदेशी लोगों की हंसी से घटना तो दूर रहा, हमारे ही वंगाली आदि हिन्दू (आर्य) भाईयों की हंसी से भी छुटकारा नहीं मिलेगा। इसलिये मारवाडी समाज के बुद्धिमान् पुरुष इस ओर अवश्य ध्यान दें। [४६] मारवाडमांतमें बहुधा यह देखने में आरहा है,कि हमारे यहत ब्राह्मणमाई यजमानोंको रुपया देनेका एक यंत्र समझकर विद्याध्ययन,योगसाधन आदि वाह्मणों के गुणोंको न धारण करके सुलफा, गांजा, भांग आदि नशेके पदार्थों का सेवन करके और तीतर, कचूतर, हिरण, मेंढा आदि पशुओंको पालकर अपने अमूल्य जन्मको वृपाही सोबैठते हैं. यह यजमान पुरोदितकी प्रणाली जिसप्रकार प्राचीनकार में थी, उसी प्रकार होनी चाहिये, जैसे तीर्थस्थानों में घरू पंडोंका होना हानिकारक है, वैसेही योग्य तथा अयोग्य का विचार न होकर जन्मसेही यजमान पुरोहितोपा सम्बन्ध होनाभी हानिकारक है, इसलिये इस (प्रपामें फेरफार होना अत्यावश्यक है। [४७] भारतवर्ष के प्राचीन कालका एक चम और वृहत, प्रामाणिक इतिहास' बनाया जाय, जिससे सब रोगोंको विदित होजाय कि आजतक अर्थात् पौषशुक्ला पोर्णिमा, विक्रमीय सम्वत् उनीससौ सचर पर्यंत हिन्दू (आर्य जातिको इस पृथ्वीपर निवास करते हुए अटतीस लास तिरानवेसहसं चौदहवर्ष होगये. सष्टिको आदिसही समस्त भूमंडलपर यहां क्षत्री राजा राज्य करते रहे. युधिष्ठिर महाराज तक तो बराबरही क्षत्रियवंशी राजाओंका राज्य समस्त भूमंडल पर फैलाहुआथा, सन्त उनके पश्चात्भी महाराज चन्द्रगुप्त तक भारतवर्षीय राजामोंका राज्य दूर २ जिक रहा. चन्द्रगुप्त महाराज का राज्य जिसको अब दोपदस वर्षके आसपाच - दर्शन ४॥ २८१ होगये सिंघल्द्वीप (सिलोन) काबुल, वर्मादेश, श्याम और यवहीप [जावा] तक फैला हुभाया। चंद्रगुप्तके पोते महाराज अशोकके पीछेही, भारतवर्षका राज्य और प्रताप भारतवर्षसे बाहरके देशोंमें नहीं रहा। उसी समय रूम, ग्रीस आदि देश स्वतंत्र राज्य वनंगये और तभी से उन्होंने आर्यधर्मको भी छोड़ दिया और संसार में ईसाई, मुसल्मान आदिमतभी फैरगये जो संसारको केवल पाचसहस्र वर्षसेही उत्पन्नमानतेहैं, परंतु उनका ऐसा मानना विज्ञानवेचाओं द्वारा सर्वथा प्रमाण विरुद्ध सिद्धहोगया है विक्रम सम्वत् १९४९ में महाराज पृथ्वीराज को उस मुहम्मदगोरीले पारना पड़ा मिसकॉन्दोंने कईवार पकड २.कर दयावश हो जीवदान दिया था। हम यहा सूक्ष्मरूपसे उस आर्यवीरकी दशा और इस यवनके वर्तावका दिग्दर्शन कराते हैं जिससमय पृथ्वीराज पराजित हुए शहाबुद्दीन इनको गजनी अपने साथ लेगया वा केवल इस क्षत्रिय कुलकमल देवाकरको ही नहीं लेगया था किन्त भारतवर्षसे जितना धन वह लेजासका अपने साथ लेगया हा! भारतभूमि भू भिखारी निघतो कोनो जिसके गर्भ से इसी प्रकार कितनेही वार जिन यवनोंने असह्य धन लेफर अपने देशको समृद्धशाली बनाया था, उन्हीमें एक यह गोलभी था यदि वह इसवीर राजपूतसे वैधाही वर्ताव करता जैसा इसने उसके साथ किया 'था, तो भी ठीक होता परन्तु नहीं जब वह उनको गजनी लेगया तब वहा एक सूनसान कारागृहमें बदकरके इनकी दोनों आखों में तप्तलो की सलाई फिरवा दी, तबसे महाराज अधे दा उसी में अपने जीवन के दिन बिताते थे भारतवर्ष केवल वीरही नहीं उत्पन्न करता था बरन । धर्मवीर, और नीतिज्ञभी इसने अनेक उत्पन्न किय इसमें स्त्री पुरुपोंका प्रेम यातक था कि खियें पतिके मरनेपर उसके शवके स प्रेमके आधेशमें आफर भस्म हो जातीर्थी इसी प्रकार एक मित्र दूसो भिषके लिये तन | मन, धन अर्पण कर देताया, देखो दुर्योधन और वर्णकी कैसा मित्रता थी कि जबस इनकी मित्रता हुई एक दूसरेके लिये तन, मन, धन अर्पण किये हुएथे, अपने मित्रक शशुओं को अपनेही शड समझते थे महाभारत जैसा रणरगम रचाथा और दुय्योधन वर्ण के बल पर ही था.केवल पाण्डवोंके आक्षेप परही कर्णको तिलकधारी राजा बनाया था। इसी प्रकार की मित्रता महाराज पृथ्वीराज और चदक विमें थी चाहे पृथ्वीराज उनको अपना आश्रयी (आधीन) ही क्यों न समझते हों किन्तु यह कविवर उनको हृदयसे प्रेम करताथा; इसीलिये जब महाराज फैदमें होकर गजनी जानेल्गे तो यह चंदकवि भी उनके प्रेमवे बंधन में बंधकर उन साथ चला और गजनी पहुँचा; देखिये जिस क्षत्रियवीरने अपने इस शत्रुको कितनेही वार जीवदान दियाथा आज उसी यवन शहने इनके साय बहा कुत्सित वर्ताव कर अपनी कुनीतिका परिचय दिया । परन्तु कहते हैं कि इन्हीं कविवर चंदकी सहायतासे पृथ्वीराज अंसमें अपना बदला लेसके थे। भारतवर्षके सौभाग्य का तारा पृथ्वीराजके साथही अस्त हुआ और सैकड़ों विचारदर्पण , वर्ष अनेक धार्मिक विपचिये और बाधाय सहनेके पश्चात् सम्बत् १९१४ में यह भारतवर्ष राजराजेश्वरी महारानी विक्टोरियाके हाथमें आया, तबसे लोगोंको अपनी उन्नति करनेका सौभाग्य प्राप्त हुआ ॥ श्रीमान् महाराज"स्वायंभुव मनुसे लेकर महाराज युधिष्ठिर पर्यतका इतिहास, महाभारतादि ग्रंथोंमें लिखाहै । हमको चाहिये कि सब स्थानोंपर महाभारत और रामायणकी कथाओंका प्रचार करायें और इनकी एक २ प्रति उत्तम भाषाटीकाओं, सहित हमारे पुस्तकालयोंमें रखवायें जिससे सबलोग इनको देखसकें. इनकी उत्तम भाषाटीका आजकल लाहोरमें "हिन्दी [आर्य ] प्रचारिणी कम्पनी द्वारा बनवाई गई है और "भारतवर्षका प्राचीनइतिहास" नामकी एक छोटीसी पुस्तक प्रोफेसर रामदेवजीने बनाईहे वह सवको मंगवाकर देखनी चाहिये, यह पुस्तक भी लाहोरसे) मिलसकी है। महाराज युधिष्ठिरके पश्चात् एकसौ सोलह कई प्रतापी राजा हुए हैं यथा-परीक्षित महाराज और महाराज चन्द्रगुप्त, महाराज अशोक; महाराज विनम, जिनका सम्वदी अबतक चलता है। महाराज पृथ्वीराज, महाराज भोज जो इतने विद्याप्रेमी थे कि जिनके राज्य में रक्से लेकर रावतक सब बड़े विद्वान और कवि होते यहातक कि लकडहारे भी संस्कृत कवितामें ही बातचीत किया करतेथे; महाराज रानामतापसिंहजीजो मेवाड के राजा ये और जिन्होंने आजन्म कष्ट उठाकर भी अपनी कन्या यवनराजाको नहीं दी; छत्रपति शिवाजी, जिन्होंने मुसलमान बादशाह औरंगजेवको कई वार नीचा दिखाया, यहांतक कि अंतमें मुसलमानी राज्या की जडको खोखला करडाला, महाराज रणजीतसिंहजी जिनको पंजाबकेसरी भी कहते हैं। इत्यादि प्रसिद्ध २ वीर राजा हुये हैं। जब हम सब लोग आर्य राजाओंके इतिहास पढेंगे तो स्वयं वीर, उत्साही और धार्मिक बननेकी चेष्टा करेंगे, जिससे भारतवर्षका गोग्य और यश बढेगा। यूरोपियन लोगोंने जो हमारे भारतवर्षका प्राचीन इतिहास लिखाद वह कई अंशों में ठीक नहीं है; जैसा कि मोफेसर रामदेवजीने अपने "भारतवर्ष के प्राचीन इतिहास में प्रमाणों द्वारा सिद्ध किया है। यूरोपियन लोगोंने जो मध्यएशियासे हमारा भारतवर्षमें आना बताया वह मनुस्मृति आदि प्राचीन प्रयासे विरुद्धहै.हम तो सृष्टिकालसेही इस भारतकी पवित्रभूमिमें निवास करते आये. [भारतहितैषी अन्य विद्वानो के भारतोन्नतिविषयक विचार ] अब हम कुछ भारततिथी विद्वानों के सुधार विषयक विचारोंको प्रगट करके अपने इस ख को समाप्त करते हैं।
पर्शन ४॥ २८३ [क] "यह बतला देना आवश्यक है कि परोपकार करना प्रत्येक वर्णका कर्तव्यहै। हर्ट स्पेंसर इत्यादि पश्चिमीय विद्वानोंने भी हमारे देशकी वर्णव्यवस्था को बहुत उचम मानाहै।पूर्वकालमें चारोंवोंके पालक एक वर्ण होकर गुरूके संनिकट विचार ध्ययन करतेयें । गुरुके कुलसे निकलनेपर वर्णव्यवस्थाके अनुसार गृहाश्रमी बनक अपने २ कर्तव्यका पालन करते थे । ब्रह्मचर्याश्रममें ज्ञान, विज्ञानका अभ्यास किया जाताह, गृहस्थाश्रम में संसारका अनुभव प्राप्त होता है, वानप्रस्थाश्रममें तपस बझज्ञानको मांजा जाता है और संन्यासाश्रममें ब्रह्मज्ञानका अनुभव तथा प्रचार करते हुए परमपिता की गोदको प्राप्त किया जाता है।" In "बामण-वास्तवमें सम्पूर्ण जगत का स्वामी है. तप, ज्ञान, विद्या, स्वार्थत्याग, निर्भयता बामणों के प्रधान गुणहैं.ये बातें जिनमें नहीं हैं, उन्हें अपने को ब्राह्मण नहीं कहलाना चाहिये। न्यायाध्यक्ष निस्पृह ब्राह्मणही होना चाहिये । जहां निस्पृहता और त्यागहै वहीं सत्य और न्याय है। प्राचीन मार्यो में न्यायाध्यक्ष और मंत्री माधणही होते थे और इसीलिये यह निष्पक्ष होकर दूधका दूध और पानीका पानी कर देते थे, परन्तु जबसे प्रातिष्ठा से धनक सम्बन्ध करदिया गया, तभीसे न्यायाध्यक्ष लोग लालची होगये, यहाँतक कि खुल्लमखुल्ला, घूस (रिश्वत ) चलने लगी । प्राचीन कालमें, महाराज दशरथ के समान चक्रवर्ती राजा विश्वामित्र ब्राह्मणकी खड़े होकर प्रतिष्ठा करते थे। प्रधान मत्री वशिष्ठ व्राह्मण हीये । राजा दशरथ सदा उनकी सम्मति को शीश झुकाते थे । श्रीरामचद्रजीक बनको जाने और दशरथके दिहान्त होने पर भी राजविद्रोह नहीं हुआ। इसका कारण यही था कि राज्यके रक्षक सय वाझण। "क्षत्रिय-समाज की वाहुके तुल्य है, यह सारे शरीरकी अपने पलसे रक्षा करता है। सारांश यह है कि क्षत्रियोंको शारीरिक बल, चातुर्य, राजनीतिज्ञता, प्रजाहितैपिता, युकि, शकि इत्यादि गुणों की आवश्यकता है। शरीरम मेदे (पकाशय) का जो कामहै वहीं समाजमें वैश्य का काम है । वैश्यको चाहिये कि शिल्पशास्त्रके अनुसार सब पदार्थों को उपयोगी बनाकर सारे समाजकी आवश्यकताओं की पूर्ति करे । वैश्यके लिये अर्थशास्त्रका जानाना भी बडा आवश्यक है. वास्तवमें बामण से शिल्पशास्त्र, कृषिविज्ञान, अर्थविद्या जानकरही वैश्यों को व्यवसाप में पडना चाहिये, तभी वे अपने काममें सफलता माप्त करपके हैं।" "शूद्रों का काम सेवा करनाहे.उनसे यदिआप उचित रीति से काम लेंगे तो) आपको सुख संतोष होगा,उन्हें आप यदिपीडित करेंगे तो स्वयं आपको भी कष्ट होगा। चलना जब कभी होगा तव पावों केही वलसे होगा। शिरसे या बाइसे या पिटसे चलना कदापि नहींहोसका है। शूद्र वहींहै जिसमें मास्तिष्क [विचार]बल नहीं, जो मूर्ख और अज्ञानी है । अतएव निर्बुद्धि मनुष्योंको शूद्र मानना चाहिये: आज कल वर्णव्यवस्था ठीक न होनेके कारण सब अंग अपना २ काम नहीं, करते इसीसे अशांति है."पौषशु० २ सं० १९७०को वृन्दावनमें एक अनुभवी और विचारदर्पण . - " भारतहितैषी प्रोफेसरहारा वर्णव्यवस्थापर दियेहए व्याख्यानका सार. (ख) “ जबलक शिक्षा सर्वत्र नहीं फैलेगी देशमुधार कभी नहीं होसत्ता । अनपढी टगाई में बहुत आते है, और इनमेही कुमति वदुत्त फेलरही है। न केवल रोटी कमाने के लियेही शिक्षाकी आवश्यक्ता है, किन्तु धर्मके लिये शिक्षाकी आवश्यका उससे अधिकई आज ग्रेग अपनेधर्मसे अनजान ही मिलते हैं, बहुतसे माझण गायत्री का फरना तथा जपना तो दूररहा वहतसे विष्णुको अपना इष्टदेव लिखाया फिर जब उनसे दूसरी पार पूछा गया तो भूलगये । धर्मकी सीमा केवल यही रहगई है, कि स्नान करके सूर्यके सामने हाथ जोडे लिये, या सत्यनारायण की कथाको सुनलिया या श्राद्ध में ब्राह्मण मिमादिये इत्यादि और यहभी सबमें नहीं।" "वेदोंका गौरव सबमे है, परन्तु वेदोमे क्या है यह सामान्य पुरुष क्या, पडित भी कम (जानते हैं जब धर्मशिक्षाका ऐसा अभाव है तो देशमें धर्मकी वृद्धि कैसे होसक्ती है इसलिये अब माता पिता अपनी सततिको केवल विद्यालय और कालिजों में भेजकर सतोष न करले किन्तु अपने धर्मानुकूल शुद्धाचारसे उनके लिये आदर्श बनें।" अनपढ पुरोहितपाधोंको कदापि दान न दिया जाय । समय २ पर महानुभावों के चरित्रॉपर व्याख्यान दियेजावें, रामायण, महाभारतादिकी कथा कराना बड़ा उपयोगी होगा मोर लडकोंसे सन्ध्योपासना कराई जावे ।" "वीशक्षा की दशा बहुतही शोचनीय है । भारतकशी खिया निनके चरित्र इतिहासो और पुराणों मे मिलते हैं, वह सब पढौलिखी सुशिक्षिता होती थी, और सुशिक्षिता होने के कारणही वे अपने पत्तियो की आपकाल्में सहायता करसक्तीथी। सतिा,सावित्री,दमयती, और द्रौपदी आदि कभी भी वद्द कर, जो उन्होंने अपने पतियों के साथ वा उनके वियोगमे उठाय न उठातीं, यदि उनको धर्म में पूरी २ शिक्षा न होती। देशसुधार मे स्त्रियोंका मूढ रहना एक बडा प्रतिबन्ध ह न उनसे सन्तानकी शिक्षा होसती है न वे दूसरोके धोखेसे, | मप सती" "इसदेशमे सदा लाखों रुपयो का दान होता है, परन्तु इसमें बहुतसा दुराचारियो मालसियो और मूढोंको पुष्टि के छ ' जाता है, विद्या या धर्मकी वृद्धि में पदुत कम खर्च वियाजाता है।" "कुमों पर एक २ अखाड या मडली वालों को देशके एक २ गृहस्थ दश २ बोस २) सहन रुपये देता है, वे महीनोंतक संकडो मनुष्यों को जो उनके मत मे हों, खूब मार दिलाते और यानन्द भोगते हैं। इस दानसे कानसे धर्म या विद्याको वृद्धि होती है। (अर्थात् किसीकोभी नहीं ) तीपोंके पडे या गुसाई और ब्राह्मण जिनको खूब दान मिलता है, वे मग विचारे यात्रियों की परिश्रमकी कमाई, मद्यपान और वेश्याओं में प्राय. उडादेते हे बलभकुल के आचार अदाटतोतक मे प्रगट हुए हैं। चोवे कहते हैं कि औरोंकी विद्या भार चौबोंकी महाविद्या, जिसका अर्थ यह है कि भगपीना, ल्हखाना इत्यादि(महाविद्याई), जब देशमें दान देनेवालों और दान लेने वालोंकी यह व्यवस्था है तो धर्मकी हानि नहीं तो और क्या होगा। इसका सुधार यही है कि पात्र कुपात्र का विचार करके दान दियाजाए।" , दर्शन "जातिके सुधारकी बड़ी आवश्यक्ता है, पृथ्वीभरमें किसी न किसी रीतिसे जाति भेद तो सर्वत्र है, परन्तु यहा जैसा तो कहीं नहीं है अयसब विचारशील पुरुषोकी इसबातमे सम्मति है 'कि नबतक एकही जातिके वह छोटे २ मेद, जो स्थान या धन्धेके कारण हुए हैं, दूर न होंगे तो सुधारको कोई आशा नहीं होसक्ती। इस समयके जातिके भेद और उनके अवातर भेद जितने द्रोह और द्वेष के कारण है और वृद्धि और सुधारके मागे. में जैसे प्रतिबन्धक हैं वह सब को प्रतीत है।" "समुद्रयात्रा" वेदो और इतिहासो के समय मे निषिद्ध नहीं थी। अब यद धोनर चाहिये कि हर जाति के लोग अपनी २ एक सभा बनावे और उप्त जाति के जो मनुष्य समुद्रयात्रा करें और विदेशमें आचार व्यवहार को शुद्ध रक्खें तो वह जाति सेन निकाले जावें ॥धविचार पृष्ट १११ से ११७ ।। समीक्षा और जिन्होंने अपना आचार भ्रष्ट कर लियाहोउनको प्रायश्चित कराके जातिमें लेवें. हिन्दू (आर्य) जाति,संख्या में ऐसेही घटरही है, यदि प्रायश्चितहारा, अपने भाइयोंको अपने में न सम्मिलित करेंगे तो वह शनैः२ विधर्मी बनते जाएंगे, जिससे हमको भविष्यमें बड़ी हानि होगी.इसलिये हिंदू (आर्य) जाति के नेताओंको इसबातपर ध्यान देना अत्यावश्यक है ॥ [पूर्ण]
अथ पञ्चदशोऽध्यायः॥
॥श्रीभगवानुवाच ॥
ऊर्ध्वमूलमधःशाखमश्वत्थंप्राहुरव्ययम् ॥
छदांसियस्यपर्णानियस्तं वेदसवेदवित् ॥
दोहा-ऊरधजरशाखातरे, अविनाशीअश्वत्थ ॥
वेदपत्रजोजानई, सोजानैसवअर्थ ॥१॥
वैराग्य बिना ज्ञान और भक्ति का होना बडा दुर्लभ है इसलिये
इस अध्यायमें भगवानने वैराग्य सहित ज्ञानका उपदेश दिया है
और यह कहचुके हैं कि "मांच योऽव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते"
अर्थात् जो अनन्य भक्तिसे मेरी उपासना करते है वे मुक्त होजाते हैं
सो जबतक वैराग्य उत्पन्न नहीं होता है तबतक न तो अनन्य भक्ति
होती है और न ज्ञानही होता है, इसीसे वृक्षके रूपकालंकारसे संमा.
रके स्वरूपका वर्णन भगवान करते हैं कि हे अर्द्धनं । क्षर अक्षरसे
भी ऊर्ध्व अर्थात सबसे ऊंचे और सबसे उत्कृष्ठ पुरुषोत्तम भगवान्
इसके मूल हैं इससे इस संसारको ऊर्धमूल कहते हैं अर्थत् इम
संसारकी जड ऊयरको है, इसमें नीचेकी ओर कार्यकी उपविरूप
हिरण्यगर्भादिक तथा मनुष्यसे कीट पतंग पर्यन्त सब वृक्ष शाखा
हैं इसीसे इसे अधाशाख कहते हैं यह संसाररूप अश्वत्थ वृक्ष अवि-
नाशी है क्योंकि बार बार नष्ट होकर फिर बनजाता है इससे इसका
नाशही नहीं है, वेद इसके पत्ते हैं अर्थात वैदिक कर्मों के कानेसे यह
संसार चलता है और जैसे वृक्षक पत्तोंकी छायामें आश्रय लेकर
संसारी मनुष्य त्रितापसे सुरक्षित होजाते हैं जो इस संसार वृक्षके
ऐसे रूपको जानता है वही चेदको जानता है ॥१॥
अध्याय १५॥ २८७ - अधश्चोर्ध्वप्रसूतास्तस्यशाखागुणप्रवृद्धा- विषयप्रवालाः॥अधश्चमूलान्यनुसंतता- निकानुबन्धीनिमनुष्यलोके ॥२॥ दोहा-गुणसींचीसाखावढी. विषयापल्लवभाय ॥ जरफैलीकर्मनबँधी, मनुजलोकमेंआय ॥२॥ संसार वृक्षकी ये शाखा सतोगुणादिरूप जलसे सींचे जानेके कारण ऊपर और नीचे चारों ओर फैलती चली गई हैं इनमें इन्द्रियोंके शब्दरूप रसादि विषय नई कोपलोंके समान है अर्थात् जो साविक कर्म करते हैं वे देवता और देवताओंसे भी उत्तम योनियोंको प्राप्त करके ऊर्ध्व लोकों में निवास करते है और जो नीचकर्म करनेवाले हैं वे पशुआदि नीच योनियों में पडकर अधोलोकमें निवास करते और मनुष्य लोकमेंभी अच्छे बुरे कर्मों के अनुसार मूल फैले हुए हैं अर्थात् जो जैसा कार्य करता है उसीके अनुसार वह सुख दुःखादिको भोगता है॥२॥ नरूपमस्येहतथोपलभ्यतेनान्तोनचादि- नवसंप्रतिष्ठा ॥ अश्वत्थमेनं सुविरूढमू- लमसङ्गशस्त्रेणदृढेनछित्वा ॥३॥ दोहा-आदिअंतन हिंजानिये, स्थानरूपनहिंजाहिं। दृढ असंगहथियारले, दुसहमूलतरुढाहि ॥ ३ ॥ हे अर्जुन ! जो मनुष्य इस संसारमें रहते हैं वे इस वृक्षक यथार्थ
२८८
भगवद्गीताभाष टीका.
रूपको नहीं जान सकते हैं कारण यह है कि, इसका मूल उपरको,
है और शाखा नीचेको हैं. इससे ऊपर नीचेका ज्ञान अल्प बुद्धिवाले
मनुष्योंको नहीं होसकता है, इसका आदि अंत जानने में नहीं आ-
सकता है और न इसकी स्थितिका कोई अनुमान करमकता है ऐसे
इस दृढ मूलवाले वृक्षका छेदन महा कठिण है क्योंकि इसकी जी
बडी विस्तृत और गहरी हैं अहंकार और ममताका त्यागही एक
ऐसा दृढ कुठार है जिससे इस संसारका छेदनकर पार हो सकते हैं ॥३
ततःपदंतत्परिमार्गितव्यंयस्मिन्गतान-
निवर्तन्तिभूयः॥ तमेवचाद्यपुरुषं प्रपद्ये
यतः प्रवृत्तिःप्रसृता पुराणी ॥४॥
दोहा-चाहिकरेताठौरकी, फिरैनताकोपाय ॥
सृष्टिभईजापुरुषते, ताकीशरनजुआय ॥४॥
तदनन्तर सांसारिक मूल कारण स्वरूप ईश्वरपदको खोजकरना
उचित है उस पदको प्राप्त होकर फिर संसारमें आवागमन नहीं होता
है (उस पदके ढूंढनेका उपाय है) कि जिस पदसे इस पुरातन संसारकी
प्रवृत्ति हुई है उसी आदिपुरुपकीशरणमें जाकर अनन्य भक्ति करै ।।४
निर्मानमोहाजितसङ्गदोषा अध्यात्मनि-
त्याविनिवृत्तकामाः॥ द्वन्द्वैर्विमुक्ताःसुख
दुःखसर्गिच्छन्त्यमूढाःपदमव्ययं तत् ५
दोहा-कामसंगअरुमोहताज, अध्यातमरतिहोय ।।
सुखदुखतजिताकौलहै, अविनाशीपदजोय ॥५॥
अध्याय १५, २८२ उस पदकी प्राप्तिके लिये दूसरा उपाय कहा,जाता है कि वे मनुष्य जिनके मानोपमान वा मोह नहीं है,जिनके खोपुत्र धन ऑदिदी आ सक्ति जाती रही है, जो दिन रात अध्यात्मज्ञानमे लीन रहते हैं, जि- नकी सब सांसारिक वामना दूर होगई है, जो सुख दुःख, शीत उष्ण, हानि लाभ आदि द्वन्द्रोंसे छूट गये हैं ऐसेही ज्ञानीजन उस अव्यय पदको पाते हैं ॥५॥ नतदासयतेसूर्योनशशाङ्कोनपावकः ॥ यद्त्वाननिवर्तन्तेतद्धामपरमंमम॥६ दोहा-पावकरबिअरुचंद्रमा, ताहिकरैनप्रकाश ॥ फिरैनताको पाइकै, सोहै मेरो वाम ॥६॥ अब उस पदका विशेषरूप कहते हैं कि हे अर्जुन जहां सूर्य, चन्द्रमा और अग्निका प्रकाश नहीं पहुंचता है और जो कोई इस पदको प्राप्तभया है वह संसारमें आने जानेसे छूट जाता है वही हमारा तेजोमय स्वरूप है वहा सुख दुःस्वादिका कामही क्या है ॥ ६ ॥ ममैवांशो जीवलोके जीवभूतःसनातनः।। मनःषष्ठानीन्द्रियाणिप्रकृतिस्थानिकर्षति दोहा-जीवलोकजीवजे, अविनाशीमोरूप ।। मनहिआदिइंद्रियानिको, बैंचतप्रकृतिहिचूप॥ हे अर्जुन! जीवलोकमें यह जीव मेराही अंश है, यही जीव अवि- द्याके कारण सनातन अर्थात् संसारी कहलाता है और सुषुप्ति तथा प्रलयके समय प्रकृतिमें लीन होकर रहता है इस तरह मन और पाच ज्ञानेद्रिय इन छःओके सासारी भोगोंकेलिये खेचता है, इसका तात्पर्य ।।
२९० भगवद्गीताबमाटीका। यह है कि विवेकी जीव तो मुझमें लीन होकर आवागमनसे निवृत्त होजाता है और अविवेकीको संसारमें बारबारं जन्म लेना पड़ता है। शरीरंयदवानोतियच्चाप्युत्क्रामतीश्वरः ॥ गृहीत्वैतानिसंयातिवायुर्गन्धानिवाशयात दोहा-जाशरीरकोतजतयह, जहांकरैसंबंधः॥ इंद्रीईश्वरसंगरहै, वायुसंगज्योंगंध ॥ ८॥ हे अर्जुन ! जब यह देह और मन और इन्द्रियोंका स्वामी कर्मों- की वासनासे दूसरा धारण करता है अथवा जब मरने के समय वर्तमा- न देहको छोडता है तब अपने प्रथम देहके मन और इन्द्रियोको साथ लेकर दूसरे शरीरमें ऐसे प्रवेश करता है जैसे वायु पुष्पवाटिकासे गंधों को ग्रहण कर अन्य स्थानोमें चला जाता है॥८॥ श्रोत्रंचक्षुःस्पर्शनञ्चरसनंप्राणमेवच ॥ अधिष्ठायमनश्चायंविषयानुपसेवते ॥९॥ दोहा-श्रवणनेत्रअरुनासिका,त्वच अरु रसनाजानि इनकोगहिमनुसंगले, लहतजीवविषयानि ॥९ हे अर्जुन ! यह जीव कान, आंख, त्वचा, जिव्हा, नासिका और आश्रय लेकर विषयोंको भोगता है॥९॥ 1 मन इ अध्याय ५ यहां यह शंका है कि जीवका यह देहपरिवर्तनरूप कर्म सबको क्यों नहीं दिखाई देता है। इसपर कहतेहैं कि हे अर्जन! मूढ मनुष्य इस बातको नहीं देख सकतेहैं कि-यह जीवात्मा इस गुणयुक्त देहको कैसे छोडता है और दूसरे देहमें रहकर विषयोंका उपयोग कैसे करता होइन बातोंको केवल वेही देख सकते हैं जिनके ज्ञानचक्षु खुलगये। यतंतोयोगिनश्चैनंपश्यंत्यात्मन्यवस्थितम् यतंतोऽप्यकृतात्मानो नैनंपश्यत्यचेतसः दोहा-योगीश्वरयतनहिकिये, देखतहहियमांहि ॥ मुरखजतनहिकरतहै, जीवहिदेखतनांहि॥११॥ हे अर्जुन ! योगीजन समाधिस्थ होकर यत्न करते हुए अन्तःकरण में वर्तमान इस आत्माके पृथक स्वरूपको देखते हैं और अकृतात्मा यत्न करनेपरभा इतके स्वरूपको नहीं देख सकते हैं क्योंकि उनका चित शुद्ध नहीं होता है ॥ ११ ॥ यदादित्यगततेजोजगद्भासयतेऽखिलम्॥ यच्चंद्रमसियच्चानौतत्तेजो विद्धिमामकम् दोहा-तेजजुआदित्यमें, भासतसवसंसार । चंद्रमांहिअरुअग्निमें, सोमेरानिरधार ।। १२॥ हे अर्जुन ! सूर्यका वह तेज संपूर्ण संसारको प्रकाशित करता है, और जो तेज चन्द्रमा और अग्निमें वर्तमान है उसको मेराही तेजजान गामाविश्यचभूतानिधारयाम्यहमोजसा पुष्णामिचौषधीःसर्वाःसोमोभूत्वारसात्मक:
+ 1: 1 . भगवदगीताभाषाका. दोहा-धारतहौंजबजीवको पठिपहमिपरवेस ॥ पोषतहाँहीऔषधी, व्हेरसशशिकेमेस.। १३ , हे.अर्जुन ! मैंही.पृथ्वीमें मवेश ,करके सब.चराचर..प्राणियोंको धारण करता हूं और रसात्मक सोम होकर, सम्पूर्ण औषधियोंका पोषण करताहूं अर्थात उन्हें बढताहूं ॥ १३ ॥ अहवैश्वानरोभूत्वापाणिनांदेहमाश्रितः प्राणापानसमायुक्त. दोहा-मैहीजठराअगिनिव्है, सबदेहिनिमेआय प्राणअपानसहाइसों, जारतअन्नपचाय ॥१. हे अर्जुन ! मैंही वैश्वानर अर्थात् जठरामि होकर प्राणियों के देहमें प्रवेश करक प्राण और अपान वायुको संग ले भक्ष्य, भोज्य, चोष्य । लेह्य इन चारों प्रकारके अन्नौका पचाताहूं ॥१४॥ सर्वस्यवाहंदिसन्निविष्टोमत्तःस्मृतिर्जा- नमपाहनंच ॥ वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यो वे दांतकृद्वेदविदेवचाहम् ।। १५ ।। दोहा-सबने हियमेंहरहों,मोतेंज्ञानविचार॥ वेदसवैमोकोकहें, मैंतिनकोकरतार ।। १५॥ हे अर्जुन ! मैंही सम्पूर्ण प्राणियोंके हृदयमें अन्तर्यामी रूपसे श करताहूं इसीलिये मेरेहीद्वारा पहिले किये हुए विषयोंका. होता है इन्द्रियोंके संयोगसे रूपादि विषयों का ज्ञानभी., * अम्माय । क होता है,इन सबका विचारभी मेरेही द्वारा होता है,मैंही सब वेदोसेजा नने योग्यहूं और वेदांतकां कर्ता तथा वेदोकांजाननेवालाभी मैहोई द्वाविमौपुरुपौलोके क्षरश्चाक्षरएवच ॥ क्षर सर्वाणिभूतानिकूटस्थोऽक्षरउच्यते । दोहा-लोकमाझवैपुरुषहै, क्षरअरुंअक्षरभाय ।। क्षरशरीरकोकहतहैं, अक्षरजीवगिनीय ॥१६॥ अब अपना सर्वोत्कृष्टत्व दिखाते हैं कि हे अर्जुन! इस लोकमें क्षर और अक्षर दो प्रकारके पुरुषहै,इसमें जो ब्रह्मादिक देहधारी हैं वे क्षर हैं और जो कूटस्थ अर्थात विकाररहित स्थित है वह अक्षर है ॥१६॥ उत्तमःपुरुषस्त्वन्यःपरमात्मेत्युदाहृतः ॥ योलोकत्रयमाविश्यबिभर्त्यव्ययईश्वरः। दोहा-उत्तमपुरुषसुऔरहैं, परमातमकोभेव । तीनलोकसोधरतुहै, करिकरिनिजपदसेंव'१७॥ इन दोनोंमें एक उत्तम पुरुष और है जिसे परमत्मा कहतेहैं,वहीअवि नाशी ईश्वर तीनों लोकों में प्रवेश करके त्रिलोकीका पालन करताहै। यस्मात्क्षरमतींतोहमदक्षरादपिचोत्तमः। अतोऽस्मिलोकेवेदेचप्रथितःपुरुपोऽत्तमः दोहा-क्षरअरुअक्षरतेपरे, हौंसबतेअधिकाम । तांतेवेदरुलोकमें पुरुषोत्तम ममनाम।। १८॥
मानवतावामावाटीका.
...
अब भगवान् अपने पुरुषोत्तम नामकी.यथार्थता दिखाते हैं कि-
हे अर्जुन! क्षर जो जड पदार्थ है उनसे मैं उत्तमह और अक्षर जो चे-
तन पदार्थहैं उनको मैं प्रेरणाकर्ता हुँइसलिये अक्षरसेभी उत्तमहूं इन्हीं
इतुओंसे में लोक वेद दोनों में पुरुषोत्तम नामसे प्रसिद्ध हूँ॥८॥
योमामेवमसंमूढोजानातिपुरुषोत्तमम् ॥
ससर्वविद्भजतिमांसर्वभावेनभारत ॥१९
दोहा-पुरुषोत्तममोनामको; जोजानैं इहिभाय॥
सोसबविधिमोकोंभजै, सकलज्ञाननिधिमाय
हे भारत ! जो पूर्वोक्त लक्षणोंसे निश्चयात्मक बुद्धिद्वारा मुझको
पुरुषोत्तम जानता है वह सर्व ज्ञाता संपूर्ण भावोंसे मुझको भजता।
इतिगुह्यतमंशास्त्रमिदमुक्तं मयाऽनघ ॥
एतडट्माबुद्धिमान्स्यात्कृतकृत्यश्वभारत ।
दोहा-छिपीवांतग्रंथनरही, मोतोसोंकहिदीन ।
पारथसोजानेयहै, सोईबुद्धिप्रवीन ॥२०॥
ज्ञाननही बैरागविनु, औरभक्तिनहिंहोय ॥
तवैज्ञानदैरागयुत, कह्योरहैसोजोय ॥ १ ॥
इहांप्रकटकरिकैकह्यो, जगतक्षकोरूप ॥
छेदँदृढबैरागसों, पावैज्ञानअनृप ॥२॥
बरन्योआनंदराम, यहपुरुषोत्तमयोग।
कीनोपरउपकारहें, रहोसुखीसब लोग ॥३॥
। हे निष्पाप अर्जुन ! इसप्रकार बहुतही गुप्त रखनेके योग्य यह शास्त्र मैंने तुझे सुनाया है,इसको जान लेनेसे मनुष्य बुद्धिमान और और कृतकृत्य होजाताहै ॥२०॥ इतिश्रीमद्भगवद्गीतासुपनिषत्सु बझविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णा- EMनसंवादे विचारदर्पण दोहासहितभाषाटीकायां पुराणपुरुषो- त्तमयोगोनामपंचदशोऽध्यायः॥१५॥ विचार दर्पण दर्शन ५ । वर्तमान समयका भूगोल वृत्तान्त. मनुष्यको संसार का यथावत् ज्ञान तभी प्राप्त हो सकता है जब कि वह भलीमकार तिहास और भूगोलको जानना हो हम भारतवर्षके इतिहासका दिग्दर्शनमात्रतो पिछले दर्शनमें कराचुके, अव भूगोलसम्बन्धी कुछ मूल बातें लिखते हैं । स्मरण हे कि भूगोल विद्याकी यथावत् ज्ञानप्राप्तिमें निम्नलिखित विधाओंके जाननेकी आवश्यकता है। [१) ज्योतिष (अस्ट्रोनोमी ) (२) भूगर्भविया (जिओलोजी ] [३] रसायन शास्त्र (केमिस्टरी) (४ ) वायुशास्त्र मिटिओरोलोजी (५ वनस्पतिशास्त्र बिोटनी] (६)जीवजन्तु शास्त्र [ जुओलोजी) (७) मनुष्यजाति विज्ञान (ऐनथोपोलोजी) (८) इतिहास [हिसटरी ] भूगोल विधा चार भागोंमें बांटी गई है । (१) गणितमूगोल, जिसमें सूर्यके चारों मोर पृथ्वीपी चाल आदिया वर्णन है (२)प्राकृतिकभूगोल,जिसमें पृथ्वीकी ऋतुओं और उसके तलपर जो २ पहाड वनस्पति आदि हैं उनका वर्णन है ।। ३ प्रान्तिका मूगोल,जिसमें पृथ्वीके भिन्न देशों और नगरोंके नाम, क्षेत्रफल आदिका वर्णन है। (४) व्यापारिक भूगोल, जिसमें भिन्न देशोंकी व्यापार सम्बन्धी वस्तुओंकातणा उनको एक स्थानसे दूसरे स्थान पर लेजानेके मार्गों मादिका वर्णन है। . हमारा जो पृथ्वी मंडल है वह नारंगीकीभाँति गोलहै, इसी लिये इस समस्त पृथ्वीमंडल का नाम "भूगोल,, रक्खा गया है। परमात्माकी सृष्टि में ऐसे अनेक अर्थात् अनंत गोले आकाशमें घूमरहे हैं इनसबको, विचारदर्पण। * मिलाकर बमाडकहते हैं हमारे पूर्वजऋषिगण योगबबहारा बझावका बहुतकुछ धांत जानते थे,परंतु जब इस समयके हमलोग सौ पीछे पंचानवे मनुष्य अपनी मात्र भाषाका लिखना पढनाही नहीं जानते, तो ब्राह्मांडका वृतांत कैसे जान सहै।हमारे, ब्राह्मण और साधुलीगोंने योगवियाका अभ्यासही छोड दिया; उनमें से अधिकाश, तो भारतवर्ष के भिनर प्रातोका नामतक नहीं जानते, जो बडे शोक की बात है। पृथ्वीमंडलके बीचों बीच उचर दक्षिणको यदि एक शंकु [कीली) निकालाजाय तो नह सातप्तहस नौ सौ मील लंबा होगा और पूर्वपश्चिम निकाला जाय तो सातसहसा (नोसो छब्बीस मील लंबा होगा अर्थात् उचर दक्षिणवाले शंकुसे छब्बीस मील बडा । पृथ्वीकी परिधि घर चोचीस सहन नौसौ मील लंबी है। पृथ्वी मी एक ग्रह है। अब ग्रहोंमें प्रधान ग्रह सूर्य है, उसके चारोंओर दूसरे ग्रह पृथ्वी, चन्द्रमा शुक्र, शनि आदि घूम रहे हैं। सूर्य एक आगका मोला है यह चारों ओर प्रकाश और तेज देरहा है । उसकी गमिसे पृथ्वी केवल बाईस करोड सत्ताइस राखों भाग लेती है, तो भी यह उष्णता Kगर्मी सर्वजीव जन्तुओंकी मायुकी रक्षाके लिये पर्याप्त है । सूर्य एकवर्ष में जो उष्णता आकाशमें विस्तारित करता है, उसका अनुमान इसीसे होसका है कि यदि पृथ्वी जैसे बड़े साठ कोपलेके टुकडे जलाये जायें तो भी वह उतनी उष्णता नहीं पृथ्वी सूर्यके चारों ओर अपने. ध्रुवपर घूम रही है. इस धुरीके, उचरके सिरेको उचरघुव और दक्षिणके,सिरेको दक्षिणभूव बहत हैं.इन ध्रुवापर चारों ओर हिम (वर्फ) ही हिम फैलीहुई है. वहों तक पहुंचनेकी चेष्टा अब कोजारहीहै । कुछ पुरुषार्थीलोग उनके आसपास पहचे भी हैं, परंतु पूरा पता अभीतक नहीं लगा कि उनको आगे क्या है। [जल भाग] ,पृथ्वीमंडलमें तीन भाग जल है और एक्भाग स्थल है. जलके पाच घटे भाग है, जिनके नाम निम्न लिखित हैं (१) पैरिफिक अर्थात् शांत समुद्र, अमेरिका और एशियाकै बीचमें है,यह बहुत पहा समुद्र अर्थात पृथ्वीमंडर का तिहाई भागधेरे हुए है और शेषके चारों समुद्रोंके बराबर इस का क्षेत्रफल आपकरोड वर्गमीरहे, इसमें वायुका बल अधिक नहीं रहता है, इसकी गहराई सच्चाईस सहन नोसो तीस फीट मापीगई. (एटलांटिक अर्थात् वायुप्रधान महासागर,यूरोप, अफ्रिका अमेरिकाके, बीरमें लाहमा है। यहाँका वायु बढी प्रबल है। इसील्पेिजहाजोंको पहाँ अषिक तूफान का भय रहता है, इसके किनारेकी भूमिका क्षेत्रफल बावन . . .
- दर्शन ५। २९७ :- सहन मील है और इसका क्षेत्रफल दोकरोद पचास काख मील है। , (३)भारतवर्षीयमहासागर,यह समुद्र एशियाके दक्षिण भागमें फैला हआई, इसके उचर अधिक भाग भारतवर्षका है. क्षेत्रफल दोकरोड चामील है। (४)उचरीयधुव महासागर, प्रायः हिमाच्छादित है अर्थात् इसमें वही वर्फ फैल हआहे, इसका पूर्णवृचात अभीतक नहीं जातहुआ. क्षेत्रफल पचासलाख वर्गमील खममाजाता है। (५) दक्षिणीयधुवमहासागर, प्रायः हिमाच्छदित है। इसका वृचांत भी पूरी २ नहीं जानागया, इसका क्षेत्रफल अस्सीलाख बर्गमील समझा जाता है । [स्थलभाग] स्थलके निम्नलिखित छः बढे भाग. हैं:- (१) एशिया, इसका क्षेत्रफल एक करोड साठ लाख वर्ग मील है, स्थल भागमें यह सबसे बडा भाग है। (२) यूरोप, इसका प्राचीन नाम हरिचर्षदेश था,इसका क्षेत्रफल चालीस लाख वर्गमील है. यह सबसे छोटा स्थल भाग है।। (३) अफ्रिका, इसका क्षेत्रफल एककरोड बीसलास वर्गमील है। (४) दक्षिण अमेरिका, इसका क्षेत्रफल सचर लास वर्ग मील है। (५) उचरअमेरिका, इसका क्षेत्रफल नव्येलास वर्गमील है। '--.६) ओशीनिया, (बहुत से बढे टापुओंफा समूह) इसका क्षेत्रफल चालीस लाख वर्गमील है। इसप्रकार समस्त स्थल भाग का क्षेत्रफल पांच करोड बीसलाख वामील हुआ. मनुष्यसंख्या-समस्त पृथ्वीमंडलकी मनुष्यसंख्या सर्वत् १९५७र्को मनुष्यगणनाके अनुसार, एकअर्व बावनकरोड समझी जाती हैं। इनमें ईसाई - सैंतालीस करोड़हैं. और बौद्ध पैतालीस करोड है. हिन्दू(आर्य ) बीस करोड ६.मुसलमान उन्नीसकरोड हैं. युददी बस्सीलाख और अन्य, २ मतावलंबी लोग उन्नीस करोड हैं। समीक्षा-हिन्दू(आर्य लोग दिन प्रतिदिन घटते जातेहैं; अतः हिन्दू (आर्य.) जातिक हितैषी लोगोंको चाहिये कि अपनी शारीरिक, मानसिक और सामाजिक सुधारें और अपने अछूत भाइयोंकी ओर भी ध्यानदें। भाषायें-पृथ्वीमंडलपर लगभग चारसहस्र भाषायें बोली जाती हैं परन्तु सातभाषायें जिनको चार २ करोडसे अधिक मनुष्य बोलते हैं, चीनी, अंग्रेजी, हिन्दी जर्मन, फ्रेंच, स्पेनिश, और रशियन भाषायें हैं। (१) एक मील चौडो एक मोल टम्वी भूमि एक १ वर्गमील कालातीहै । - fo है - M विचारदर्पण पृथ्वी के महादीप पृथ्वीके उसभागको,जिसमें बहुतसे देशहों ।' महादीप'' कहते हैं. इससमय पृथ्वोमंडल्में एशिया आदि छ। महादीप है. जैसा कि- ऊपर वर्णन किया गया है. १-एशिया. मनुष्य संख्या छियासी करोडोप्रात् पृथ्वीके मनुष्यों से आधी से अधिक है, यह गणना सन् १९०१ अर्पात् सम्बत् १९५७की मनुष्यगणना के अनुसार है, लंबाई पूर्व पश्चिम छः सहस्त्र सातसो मील और चौडाई उतर दक्षिण पांच सहस्त्र तीनसो, मील है । सम्पूर्ण क्षेत्रफल एक करोड साठलाख वर्गमाल है ।। एशियाके देश. १-भारतवर्ष यहाँका राज्य अंग्रेजीगवर्नमेंट करती है। क्षेत्रफल सचरलाख तेहचर सहस्त्र वर्गमाल है और मनुष्यसंख्या उन्तीस करोड चवालीस लाख है. -अबस्तान; यहाँका राज्य सुलतानरूम करते हैं. क्षेत्रफल बारहलाख वर्गाल है, और मनुष्यसख्या साठ लाख है। ३-शगहरूमा यहाँका राज्य सुलनान रूप करते हे. क्षेत्रफल सात गव वर्ग- मील है. आर मनुष्यमान्या दा कराड बासलाख है ॥ ४-ईरान यहांका राज्य राजा और प्रजाप्रतिनिधिसभा करते हैं. क्षेत्रफल छ.लाखअहार्डम सहस्र वर्गमाल है, और मनुष्यमल्यापचानब लास है. ५-अफगानिस्तान: यहाँका राज्य एक राजा द्वारा होता है; क्षत्रफल दो लाख पचास सहस्र वर्गमोल है और मनुष्यसल्या पेनालामलाख ६ सालान (सहलढाप ?; यहाँका राज्य अंग्रेजी गवर्नमेंट करती है, क्षेत्रफल पानीस सहस्त्र वर्गमील हैं. और मनुष्यसख्या छत्तीस लाख है ॥ ७-श्यापदेश: यहाँका राज्य स्वतत्र एक राजाही करता है, क्षेत्रफल दो लाख घवालास महत्र वर्गाल है. और मनप्यसख्या पचास लाख है। ८-चइडोचाइना; इसका राज्य फेंचगवर्नमेंट करती है, क्षेत्रफल दा लाख छप्पन सहस्र वर्गमील है, और मनुष्य संख्या एक करोड सचर लाख है। ९-चीन; यहाँका राज्य प्रजातंत्र है. क्षत्रफल बियालीस लाख सतचरसहस्त्र वर्गमील है, और मनुष्यसंख्या तियानीसफरोर पेतालीस लाख है ।। . १०-एशियाईरूस; यहाँरूसका जार स्वतत्र राज्य करता है. क्षेत्रफल बासठलात इक्कीस सहस्त्र वर्गमील है, और मनुष्यसंख्या एक करोड बानो राख है।
२-यूरोप. मनुष्य संख्या-उनतालीसकरोड नव्वेलाख है. लम्बाई पूर्वपश्चिम चौतीससौ मील है. चोद-उत्तर दक्षिण चौपीस सौ मील है. भारतवर्ष से तीनगुणा बडा है.सम्पूर्ण क्षेत्रफल चालीस लाख वर्गमील है । यूरोपके देश. १--ग्रेटमिटेन और आपलेंड अर्थात् अंग्रेजोंकादेश, जिसे हम लोग विलायतकहते हैं. जहाँ राजा और प्रजाप्रतिनिधि सभा राज्य करते हैं. इनका क्षेत्रफल एकलाल इकीससहर तीनसौ वर्गमील है और मनुष्यसंख्या चारकरोड उनीस लास ॥ २-फ्रान्स; यह राज्य प्रजातंत्र है क्षेत्रफल दोलास सातसहस्र वर्गमील है और मनुष्य संख्या तीन करोड नवासी लाख है। ३-स्विट्जरलैंड-यहाँका राज्य प्रजातंत्र है, क्षेत्रफल पंद्रह सहस्र नौसौ वर्गमील है। और मनुष्य संख्या तेतीसलाख है॥ ४-जरमनी-यहांका राज्य राजा और प्रजा प्रतिनिधि सभा दाराचलाया जाता है। क्षेत्रफल दोलाख आठसहस्त्र आठ सौ वर्गमील है, मनुष्यसंख्या छःकरोड 'दोलाख है। ५ आस्ट्रियाहंगेरी-यहाराजा और प्रजापतिनिधि सभा राज्य करते हैं क्षेत्रफल दो- लास पैंसठ सहस्त्र वर्गमील है और मनुष्यसंख्या चारकरोड सचर लाख है ७-यूरोपियनरूस-यहां का राज्य राजा और नाममात्र की प्रजाप्रतिनिधिसभा करते हैं. क्षेत्रफल उन्नीस लाख छिआनवे सहस्त्र सातसो वर्गमील है. और मनुष्यसंख्या दप करोड चौहचर लास्य है ७-इंटेली यहां का राज्य राजा और नाममात्र की प्रजाप्रतिनिधिसभा करते हैं, क्षे- प्रफल एक लाख दश सहस्त्र पांचसौ वर्गमीलहे और मनुष्यसंख्या दश करोड चाहेच. र लाख है॥ ८-स्पेन यहां का राज्य राजा और नाम मात्र की प्रजाप्रतिनिधिसभा करते हैं। क्षेत्रफल एक लाख चौरानवे सहस्र सातसौ वर्गमील है; मनुष्यसंख्या एक करोड डियालसिलाख है॥ ९-पोर्तगाल-यहां का राज्य राजा और नाममात्र की प्रजाप्रतिनिधिसभा करते हैं क्षेत्रफल पैंतीस सहस्र चारसौ वर्गमील है और मनुष्यसंख्या चौवन लाख है। २-ना-यहां का राज्य राजा और नाममात्र की प्रजापतिनिधि सभा करते है. क्षेत्रफल एकलाख चौवीस सहस्र चारसौ वर्गमील है और मनुष्यसंख्या बाईसलास ११-स्वीडन-यहां का राज्य राजा और नाममात्र की प्रजापतिनिधिसभा करते है।
विचारवर्ष क्षेत्रफल एकलाख बहचर सहस्र आठसो वर्गमलि है और मनुष्यसल्या इक्यावन लाख है। - १२-डेन्मार्व-यहा का राज्य राजा और नाम पाने की प्रजातिनिधिसभा करते हैं। क्षेत्रफल पंद्रह सहस्र तीनसो वर्गमील है और मनुष्य संख्या चौथी लाख है ॥ १३-हाड-यहा का राज्य राजा और नाममात्र की प्रजाप्रतिनिधिसभा करते हैं क्षेत्रफल बारह सहस्र सौ वर्गमील है और मनुष्यसंख्या पचपन लाख ३ ।। १४-वेलजियम-यहा काराज्य राजा और नाममात्र की प्रजापतिनिधिसभा करतेहै, क्षेत्रफल ग्यारह सहस्र तीनसो, वर्गमील है और मनुष्यसख्या बहचर राख है। १५-रोमानिया-यहा का., राज्य राजा और नाममात्र की प्रजाप्रतिनिधिसभा करते हैं, क्षेत्रफल पचास सहन सातसौ वर्गमील है और मनुष्याल्पा उनसर लाख है॥ १६-वलगेरिया-यहा का राज्य राजा और नाममात्र की प्रजापतिनिधिसभा करते हैं; क्षेत्रपाल सैंतीस सहस्र दोसौ वर्गमील है और मनुष्यसख्या सेंतीस लाख है।) १७-सर्विया-यहां पा राज्य , राजा और नाममात्र की, प्रजाप्रतिनिधिसभा करते क्षेत्रफल अठारह सहस्र छ.सौ वर्गमील हमार मनुष्यसख्या चोवीस लाखहै ।। १८-ग्रीस [यूनान यहाँका राज्य राजा-और नाममात्र की, प्रजाप्रतिनिधिसभा करते हैं; क्षेत्रफल पच्चीससहस्र वर्गमील है और मनुष्य संख्या चौवीस लाख हैं। १९-यूरोपियन टर्की-यहां का राज्य राजा,और प्रजामतिनिधिसभा करते हैं, क्षेत्रफल पैसठसहस्र तीनसो वर्गमील है और मनुष्यसख्या इक्सठ लाख है ॥ ३-अफ्रिका. यह पदादीप उत्तरदक्षिण पाचसहस्र मील लम्बा है और पूर्वपश्चिम पारसहस्र छःसौ मीलचौदा है। इसका क्षेत्रफल एक करोड बीसलाख वर्गमील है मनुष्यसल्या-पदहकरोटसे बीसकोट समझी जाती है। इदेशमें प्रधानत, अंग्रेजी, फ्रॉच, जर्मन, वेजियम, इटालियन, पौगीज, स्पेनिश,टी गवर्नमेंट राज्य करही हैं । प्रधान २ देशोंके नाम-इजिप्ट, पोरोको, ट्रिपोली, अलजेरिया, सौहान, बाँगो, दासवाला आदि। सहापर प्रधानता यहाँ निवासी, शी आदि काले रंगके लोगोंकी यूरोपियनलोग राज्यहोने पर भी बहुतं, पोडे ,इसदेशके बहुतसे भागों जगही सोगही बसते हैं जो प्रायः न अवस्था में रहते हैं। - - way
दर्शन ५॥
४--उत्तरीय अमेरिका.
क्षेत्रफल-नब्बेलास वर्गमील, है ।
मनुष्यसंख्या-दुशकरोड तीनलाख है जिनमें गौरांग लोग सातकरोड पचासलाखहै।
प्राचीन निवासी पचासलास, हमलोग एककरोड, चालीसलाखें और अन्य
लोगनब्बे लाख हैं।
प्रसिद्ध २ देश-चनेडा, ग्रीसलेंड, यूनाईटे टस्टेट्स, मेकसिको आदि हैं।
५-दक्षिण अमेरिका.
क्षेत्रफल-ससरलास वर्गमील है।
मनुष्यसंख्या-दोकरोड चौबीसलाख है।
प्रसिद्ध २ देश-पानामा कोरिया, ग्याना लापलाटा, चिल्लीआदि ।
६-ओशीनिया.
पैसीफिकमहासागरमें बहुतसे टापू हें; जिन में से प्रधान मैलोशिया, आस्ट्रेलिया,
मेलेनशिया, माइक्रोनेशिया और पॉलीनेशिया है; इनको मिलाकर 'ओशीनियां
बोलने हे.
इनसबका क्षेत्रफल चालीस लाख वर्गमील से अधिक है अर्थात भारतवर्षसे
तीनगुणा अधिकक्षेत्रफल है। और इन सब मनुष्यसंख्या चारकरोडके आसपास है।
वर्तमानभारतवर्षके, भूगोलका
मंक्षिप्त वर्णन.
मीमा-उत्तरमें हिणाल्यपर्वत जो पृथ्वी के ममस्त पर्वतोंसे ऊँचा है । पूर्वमें
बंगालपीपाडा और चीन, दक्षिण भारतवर्षका महासागर जिपको " इाडयन
आशन " कहते हैं, पश्चिममें अफगानस्थान और अरबका समुद्र है लंबाई उतरसे
दक्षिण तक और चाडाई पूर्वस पश्चिमनक समानहीं है अर्थात् अठारह २ सो
(२८.०)पील है.
क्षेत्रफल-पदहलाख वर्गमील है।
मनुष्यसख्या-इकतीस करोड चौवीस सहस्र है; इनमें हिन्दू (आर्य) लोग तेईस
करोड है और शेष इतर लोग हैं.
पर्वतभणिया-मुख्य २ ये हैं:-हिमालयपर्वत, विंध्याचलपर्वत, सतपुरापर्वत,
अरवरीपर्वत जिसकी सबसे बडी चोर्टी"आबू' कहलाती है। पश्चिमीघाट और
पूर्वीपाटके पर्वत.
विचार दर्पण. . , नदियों-मुख्पर ये हैं:-सिन्धनदी जो भारतवर्ष में सबसे लंबी नदी है शेलय, चनाव, रावी, व्यास, और सतलज ये पांच बड़ी नदियाँ सिन्धनदीम) मिलती है. यह सब पंजाब (पंचाल) देशकी प्रधान नदियां हैं। ब्रह्मपुत्र, गंगा, यमुना, नर्मदा, ताप्ती, महानदी, गोदावरी, कृष्णा और कावेरी क्रमशः वडी २ नदियां हैं, ऐरावती नदी वर्मामें है। देशके विभाग-इससमयका भारतवर्ष दो भागोंमें विभक्त है [क] ब्रिटिशइडिया अर्थात् भारतवर्षका वह भाग, जिसका शासन मुल्यतया सरकार अंग्रेजी के हायमें है. इस भागका क्षेत्र फल अनुमान दशलाख अठानवे सहस्र वर्गमील है. मनुष्यसंख्या चौबीसकरोड है. (स)भारत वर्षका वह भाग जिसका शासन मुख्यतया देशी राजा महाराजाभों के हायमें है। देशी छोटे बडे रजवाडोंकी संख्या छःसौ छयालीस (६४६) है। इनका क्षेत्रफल चारलाख दोसहस्र वर्गमील है और मनुष्य संख्या छः करोड) इकहचर लाख ( ६७१.०...) है विटिश इंडियाफे भागोंके नाम इनमेंसे प्रत्येक भाग "प्रान्त कहलाता है; सब प्रान्त यह हैं. बंगाल, मद्रास, बंबई संयुक्तप्रान्त आगरा और अवघ,पंजाब,आसाम और चटगाम, वर्मा, मध्यप्रदेश मौर बरार, संयुक्तमान्त विहार और उडीता, कुर्ग, अजमेर (मेवाड ). देशीरजवाडोके नाम मुख्यतया ये हे. नेपाल, हैदराबाद, मैसूर,काश्मीर, जम्बु,बडोदा. कोल्हापुर, जयपुर, जोधपुर, बीकानेर, उदयपुर, इन्दोर, ग्वालियर, रीवा, भोपाल, भरतपुर परोली, शीद, नाभा, पटियाला, सिरोही,काटा, बूंदी. समीक्षा-जलवायु और ऋतुओंकी अपेक्षासे भारतवर्ष पृथ्वीके सब देशोंमे) सर्वशिरोमणि माना गया है यहापर सब देशोंकी अतुयें, सब देशोंकी उत्तम वनस्पतिय प्राप्त हैं. हमारे प्राचीन ऋषियोंनेभी इसी देशका निवासउचम माना है. श्लोक-सरस्वतीदृषदत्योर्देवनयोर्यदन्तरम् ॥ त देवनिर्मित देशं ब्रह्मावर्त प्रचक्षते ॥ मनुः॥१७॥ (अर्थ) सरस्वती और दृषद्वती ओ देवनदिया हैं, इन दोनों के मध्यका) माग देवनिर्मित है अर्थात देवताओं द्वारा उत्तम बनाया हुआ है इस शको मुनिजन प्रमावर्त देश कहते हैं । समीक्षा--पूर्व कालमे ये दोनों नदियों कुरुक्षेत्रमें यों ॥ लोक-तस्मिन्देशे 4 आवारः परंपार्य क्रमागतः । वर्णानां प्रातरालानांस बड़ा चार उध्यते मनुः अ.२ भो.१८ दर्षन ५। आचार, (अर्थ) उसदेशमे रहनेवाले ब्राहाणादिका नो परपरासे माया हुआ अर्थात् रहने संहनेका ढग है उसीको सदाचार कहते हैं. समीक्षा-आशय यह है कि भेष्ठ पुरुष " ब्रह्मावर्त " निवासियोंके तुल्यही आचरण करें । श्लोक-कुरुक्षेत्रं च मत्स्याम पंचालाः शूरसेनकाः । एषः ब्रह्मर्षिदेशो व ब्रह्मावर्तादनंतरः । २।१९। (अथ ) फुरुक्षत्र, मत्स्य, पचाल शूरसेन (मथुरा प्रान्त) ब्रह्मविदेश ह ।। (लोक) आसमुद्रातु र पूर्वादासमुदात्त पश्चिमात् । तयोरेवान्तरं गिोरायवित विदुर्बुधाः॥म०२॥ २२ ॥ :(अर्थ) पूर्वके समुद्रसे पश्चिम और पश्चिम के समुद्र से पूर्व तथा हिमालय और विध्याच के बीचके देशको "आर्यावर्त " कहते हैं। समीक्षा-इस देशका यह नाम सनातन है। आर्यजन सदासे इसमे बास करते आये हैं इसा इससे देशका नाम आर्यावर्त हुआ । जो लोग कहते हैं कि हिन्दू ( आर्य ) लोग यहापर मध्य एशिया या ईरानसे आये वह प्रमाणविरुद्ध हीकहते हैं. श्लोक-एतद्देशप्रसूतस्य सकाशादग्रजन्मनः । स्वं स्वं चरित्रं शिक्षरन्पृथिव्या सर्व मानवाः ॥ मनुः अ०२ श्लोक २० ॥ (अर्थ) इन उपरोक्त वक्ति, ब्रह्मपिदेश तथा आर्यवर्त देशोभे जो लोग ब्राक्षणादि) द्विजातिवर्ग है उनके समाशसे पृथ्वाके सब मनुष्य अपन २ ०ध और आचारषि- चारकी शिक्षा ग्रहणकरें. समीक्षा--पाठविचार सते हैं कि जिससन्य यह लोक बना है उससमय यह भारतव देश कैसा उन्नतथा, यहातक कि संसारभरके सब मनुष्योको अपने २ आचार व्यवहार इस आर्यावर्तदेश निवासियोका सा करना पडता था और अब वह समय आगया है कि हमारे देश निवासियोंगी, (विपकर रिलित युवकोपो) २६सहनमे विदशी शेगोका अनुकरण करने की बड़ी इच्छारहती है और इस पिशी नाचारको वद फैशनके नामले पुकारते हैं। इसका कारण यह है कि वह अपनी रीति, नीति और धर्मसे अत्यन्त अनभिज्ञ हैं. मनुष्यका धर्म उसके भाषा, भेष, भावसे पहिचाना जासका है और यह तीनोंही उसकी प्रतिष्ठाके कारणभी है । इनकी उन्नति दशकी उन्नति, और अवनति से अवनति होती है। इसके लिये प्रमाण देनेकी आवश्यकता नहीं. प्रत्यक्ष सिद्ध है कि जबतक भारतवर्ष उपरोक तीनों बातोंको धारण किये हुएघातबतक · इतनी हीनदशा इस देशकी नहीं हुई थी, कि उन्नति होना तो दूर रहा, रही सही धर्मरूपी गाउकी पूंजीभी खो बैठनेका भय उत्पन्न होगया आजकलके नवयुवक इन बातोंकी ओर ध्यान नहीं देकर अपनी उन्नति विदेशी भेष ग्रहण करनेमें ही मानते हैं. कोट, पैंट और हेटको धारणकर अपने को कृतकृत्य समझते हैं, जिसका फल यह होता है कि काकमयूरन्याय की भाति अपनी समाजसे भी तिरस्कृत होते हैं, और अभिलषित भी हास्यका कारण बनते है ।
४.४
विचारदर्पण,
+
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जिस समय भाषा, भेष, भाव. यहतीनों ही मनुष्यके' बदल गये,
उस समय सपझलेना चाहिये कि उसको अपने धर्म और देश के गौरव
की परवाह नहीं रही और न उससे अपने देश अथवा. समाज को कुछ
लाभही होता है । यद्यपि भारतवर्ष के कितने ही नवयुवकों में भाषा तथा मेनका
परिवर्तन भारंभ हुआ है...किन्तु धर्मभाव का परिवतर्न अभी तक नहीं हुआ,
है, यह देशका पौभाग्य ही समाना चाहिये। जिस , दिन यह पिछला परि
वर्तन होना मारंभहोजायगा उसदिन भारतवर्ष की न जाने क्या, गति होगी।
...इसालये नवयुवकों से हमारा अनुरोध है कि वह अपनी
अपने धर्म,
घमा और भेषकी उत्रतिमें ही समझें। [पूर्ण
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अर्थ.पोंडशोऽध्यायः॥ ।। श्रीभगवानुवाच॥ अभयंसत्वसंशुद्धिर्ज्ञानयोगव्यवस्थितिः।। दानंदमश्चयज्ञश्चस्वाध्यायस्तपआर्जवम् दोहा-अभयहियेकी शुद्धता, ज्ञानयोगथिर होया। दानयज्ञतपवेद रुचि, दमजुसरलता जोय ॥१॥ पन्द्रहवें अध्यायमें जो भगवान्ने कहा कि मेरे कहे हुए ज्ञानको जो जानलेते हैं वे बुद्धिमान और कृतकृत्य होजाते है इसलिये इस अ ध्यायमें तत्वज्ञानके अधिकारी और अनधिकारी मनुष्योंका वर्णन करतेहुए उस तत्त्वज्ञान के अधिकारके निमित्त देवीसंपदाका वर्णन करते हैं कि हे अर्जुन ! निर्भयता, चित्तकी प्रसन्नता, आत्मज्ञानमें निष्ठा, सुपात्रको दान, इन्द्रियोंका निग्रह,पंचमहायज्ञोंका अनुष्ठान, वेदोंका पठनपाठन, तपश्चर्या, नम्रता ॥१॥ अहिंसासत्यमक्रोधस्त्यागःशांतिरपैशनम् दयाभूतेष्वलोलुप्त्वंमार्दवंहीरचापलम्॥२ दोहा-अनहिंसाअरु सत्युसव, रहैक्रोधविनुनित्य त्यागशांतिवहुविधरचे, दोपनआनैचित्त ॥७॥ दयाकरसवजंतुपर, तजिचपलाईभाय। लाजकर्महूहृदयमृदु, व्यर्थक्रियाछुटिजाय॥२॥ किसीको पीडान पहुंचाना, हितकारी सत्यभाषण करना, क्रोध न करना, त्याग अर्थात् प्रिय अप्रिय बातोंको छोड देना, शान्ति भमाद्रीवाभावाटीका, (चित्तमें उद्विग्नतान होने देना) निन्दा न करना प्राणिमात्रपर दया, स्थिर चितत्ता, स्वभावमें कोमलता, अकरणीय कर्मोंसे लाज करना चंचला को छोड़ देना ॥२॥ तेजःक्षमाधतिःशौचमद्रोहोनातिमानिता भवंति संपदं दैवीमभिजातस्य भारत ॥३ दोहा-तेजछमाशुचिधर्म धृति,तजैद्रोहआभिमान दैव संपदा जिन लही, तामें एगुण जान ॥३॥ तेज, क्षमा, ति (दुःखमें चित्तको स्थिर रखना), शौच (मनको बुरी वातासे पवित्र रखना), किसीसे गोह न करना, अपने में पूज्य होनेका अभिमान न करना, ये उब्चीस देवीसंपदा हैं, ये उसी मनुष्य के होती है जिसका आगेको कल्याण होनेवाला है॥३॥ दभोदर्पोऽभिमानश्चक्रोधःपारुष्यमेवच ॥ अज्ञानंचाभिजातस्थपार्थसंपदमासुरीम् दोहा-दभदर्पअज्ञानरिस, अरु अज्ञानकठोर॥ जाएगुणतीनलहि, असुरसंपदाघोर ॥४॥ दंभ (धर्मकी ओटमें कपट व्यवहार रखना), दर्प (धन और विद्याका गुमान) अभिमान, अति निष्ठुरता और अज्ञान ये छः आसुरी संपदा उसके होती हैं जिसका अफल्याण होनहार है॥४॥ देवीसंपद्विमोक्षायनिबंधायासुरीमता ॥ माशुचःसंपदंदैवीमभिजातोऽसिपांडव ॥
अध्याय २६॥
दोहा-दैवसंपदाते मुकति, बंधआसुरीजोहि ॥
सोचेजनि अर्जुन भई, दैवसंपदा तोहि ॥५॥
हे अर्जुन ! जो देवीसंपदासे युक्त हैं वे तत्त्वज्ञानके अधिकारी हैं
और इस तत्त्वज्ञानसे मोक्ष होजाता है और जो आसुरी संपदासे
युक्त हैं वे बन्धनमें पड़ते हैं (यह सुन अर्जुनको संदेह हुआ कि मैं
तत्त्वज्ञानका अधिकारी हूँ वा नहीं ? अर्जुनके मनकी यह बात
जान श्रीकृष्ण बोले) कि हे अर्जुन ! तेरा जन्म तो देवीसंपदाक
अभिमुख है तू शोच मत कर ॥५॥
द्वाभूतसौलोकेऽस्मिन्दैवआसुरएवच ॥
देवोविस्तरशःप्रोक्तआसुरंपार्थमेशृणु॥६॥
दोहा-देवआसुरीभेदतें, हिविधि सृष्टि है एड्छ ।
प्रथम कही विस्तारसों, अब दूजी मुनि लेड६
हे अर्जुन ! इससंसारमें दो प्रकारकी प्राणियोंकी सृष्टि है, एक
दैवी, दूसरी आसुरी इनमें से दैवाका तो विस्तारपूर्वक वर्णन कर
दिया है, अब आसुरीका वर्णन सुन ॥ ६ ॥
प्रवृत्तिचनिवृत्तिंचजनानविदुरासुराः॥
नशौचनापिचाचारोनसत्यंतेषुविद्यते॥७
दो-अविधि औरविधिजगतकी,आसुरजानतनाहिं
सत्यशौचआचारशुभ,नहिं एगुणतिनमांहिं॥
हे अर्जुन ! जो मनुष्य आमुरी स्वभाववाल हैं सांसारिक धर्मोमें
प्रवृत्त होना नहीं जानते हैं और न उनसे छूटना जानते हैं, न
उनमें पवित्रता है न आचार हैं और न सत्यही है ॥ ७॥
भगवद्गीताभाषाका. असत्यमप्रतिष्ठतेजगदाहुरनीश्वरम् ॥ अपरस्परसंभूतंकिमन्यत्कामहैतुकम् ॥८ दोहा- वेदपुराणजुईश्वरहि, एनहिंजानतमृढ ॥ मेथुनते संसार है, काम हेतु यह गूढ ॥८॥ हे अर्जुन ! जो आसुर हैं वे यह कहते हैं कि यह जगत् असत्य, है. इसको कोई आधार नहीं है और यहभी कहते हैं कि यह जगत् अनीश्वर है इसका कर्ता कोई नहीं है और अपरस्परसंभूत अर्थात् खीपुरुषके संयोगसे उपजा है इस लिये स्त्रीपुरुषका जो काम है सोई प्रवाहरूपसे इस जगतका कारण है, यह नास्तिकोंका मत है ॥८॥ एतादृष्टिमवष्टभ्यनष्टात्मानोऽल्पवुद्धयः॥ प्रभवंत्युग्रकर्माणःक्षयायजगतोऽहिताः। दोहा-अल्पबुद्धिहै, नष्ट जे, यहै दृष्टिगहिलेत ॥ हिंसायुत कर्मनिकरै, रिपुजयक्षयकेहेत ॥९॥ है अर्जुन ! नष्ट जिनके आत्मा होगये हैं ऐसे अल्पबुद्धि अनीश्वर- वादी जगतको ऐसी दृष्टिसे देखते हैं केकर काँके करनेवाले जगत्के हितकर्ता नहीं हैं, ये तों जगत्के नष्ट करने के लिये उत्पन्न होते हैं। काममाश्रित्यदुष्पूरंदभमानमदान्विताः मोहाऽगृहीत्वासग्दाहान्प्रवर्ततेशुचिव्रताः दोहा-भजत अपूरन कामको, दंभमान मदमाय, गहन बुराईमोहते, मांस और मदखाय ॥१ अध्याय १६॥ हे अर्जुन ! जो असुर हैं वे दंभ, मान और मदसे युक्त होकर । ऐसी कामनाकि लिये जो अत्यन्त कष्ट उठानेपरभी पूरी नहीं हो सकता है क्षुद्र देवताओंकी आराधनामें तत्पर हो जाते हैं और मोहमें पडकर मारण मोहन, उच्चाटनादि असदाह मंत्रोंको जपते है जिनसे ऐहिक वा पारमार्थिक कुछ लाभ नहीं होता है, ऐसे लोगोंका आचरण बडा घृणित होता.है ॥१०॥ चिंतामपरिमेयांचप्रलयांतामपाश्रिताः॥ कामोपभोगपरमाएतावदितिनिश्चिताः॥ दोहा-जाको कछू प्रमान नहि, ताचिंतामें लीन। कामभोग हहै भलो, निश्चै मानतदीन ॥१॥ हे अर्जुन ! आसुरी स्वभाववाले ऐसी चिंतामे कसे रहते हैं जि- सका कुछ प्रमाण नहीं है और जिसका अंतभी जीवनके अन्तके साथही होता है और कामभोगको सुखकी परमावधि और परम पुरुषार्थ मान उसी में लगे रहते हैं ॥११॥ आशापाशर्शतबद्धाःकामक्रोधपरायणाः॥ ईहतेकामभोगार्थमन्यायेनार्थसंचयान् ॥ दोहा-आशाफांसनिसोबँधे, कामक्रोधचितचाह जोरत धन अन्यायकरि, कामभागनिवाह॥ अनेक प्रकारकी असंख्प आशारूपी फांसियोंमें बंधेहुए काम और क्रोधके आधीन होकर कामनाओंके उपभोगके लिये अनक तरहके अन्याय कर करके धनादिकोंका संचय करते हैं ।।१२।।
भगवद्गीताभाषाटीका। इदमद्यमयालव्धमिमंगॉप्स्येमनोरथम इदमस्तीदमपिमेभविष्यतिपुनर्धनम् ॥ दोहा-यह मैं पायो है अबै. लहें मनोरथ और ॥ यहधन मेरे गेहमें, जो गो बहुठोर ॥१३॥ वे रात दिन ऐसे झगडोंमें फँसे रहते है कि 'आज मुझको यह मिला 'मेरा यह मनोरथ पूरा हुआ' 'आज मेरेपास इतना धन है' 'अब इतना होजायगा ॥ १३ ॥ असीमयाहतःशत्रुहनिष्येचापरानपि ॥ ईश्वरोऽहमहंभोगीसिद्धोहंगलबानसुखी ॥ दोहा-यहवैरीमहोहन्यो. करौंऔरकोअंत ।। ईश्वरहीमोगीजुही, सुखीसिद्धबलवंत ॥१४ आज मैने अमुक शत्रुको मारलिया है, कल औरोंको मारूंगा, महा ईश्वर है, मेंही भोगी हूं तथा सिद्ध, बलवान् और सुखी हूं॥१४ आट्योऽभिजनवानस्मिकोऽन्योऽस्तिसदृशोमया यक्ष्येदास्यामिमादिष्यइत्यज्ञानविमोहिताः॥ दोहा-मैहींधनीकुलीनहीं. औरनमोहिसमान ॥ यजीदेवैमोदहितहां, मोहितव्हैअज्ञान ॥१५॥ मेही धनाक्ष्य हूँ, उत्तम कुलमें जन्म है तो मेरा है, मेरे समान और इसरा कौन है? महायज्ञ करूंगा,मैही दान दूंगा और मेंहीआनन्दक- गा.ऐसेर विफल मनोरथ आसुरी बुद्धिवाले अज्ञानी किया करते हैं।
अध्याय २१ अनेकचित्तविभ्रांतामोहजालसमावृताः॥ प्रसका कामभोगेषुपतंतिनरकेऽशुचौ ॥ दोहा-उनकोमनबहभ्रमतुहै, मोहजालपरिनित्त परतघोरअतिनरकमें कामभोगकेहित्त॥१६॥ हे अर्छन ! इस प्रकार इनका चित्त मोहजालरूपी अनेक मनोर- थोंमें फंसाहुआ भ्रमता रहता है और ये कामोपभोगोंमें आसक्त रहनेके कारण घोर अपवित्र नरकॉमें पड़ते हैं ॥ १६ ॥ आत्मसंभावितास्तब्धाधनमानमदान्विताः यजतेनामयजेस्तेदभेनाविधिपूर्वकम् ॥ दो-निजबडियाईनितकहत,नवतनधनअभिमान नाममात्रयज्ञहिकरत, दंभीविनाविधान ॥७॥ हे अर्जुन ! ऐसे मनुष्य अपनेलिये सबसे श्रेष्ठ मानते हैं, किसीको झुकतेतक नहीं हैं तथा धन, मान और मदसे युक्त होने के कारण बिना बिधिके ऐसे नाममात्र यज्ञ करते हैं. जिनमें ऊपर धर्मका आडंबर हो और भीतर कपट भराहो ॥१७॥ अहंकारंवलंदकामक्रोधंचसंश्रिताः ॥ मामात्मपर देहेषुप्रद्विषंतोऽभ्यसूयकाः॥ दोहा-अहंकारबलदर्पअरु, कामक्रोधगहिलेत ॥ द्वेषीनिजपददेहमें, मोको तेदुखदेत ॥८॥ हे अर्जन ! ये आसुरीबुद्धिवाले अहंकार, बल, दर्प, काम और - भगवद्गीताभावारीका. क्रोधके आश्रित रहते हैं और अपनी तथा पराई देहोंमें अन्तर्यामी. रूपसे रहनेवाले मुझ परमेश्वरसे द्वेष रखते हैं और निंदा करते हैं। तानहंद्विषतःक्रूरान्संसारेषुनराधमान् ॥ शिपाम्यजस्रमशुभानासुरीष्वेवयोनिषु ॥ दोहा-मोद्रोही अरुङ्करको, पापीअधमनिहारि ॥ जगतआसुरीयोंनिमें, तिनहिंदेतही डारि १९ हे अर्जुन मुझसे द्वेष करनेवाले उन नराधमोंको मैं इसी संसारकेवी च आसुरीयोंनियोंमें बराबर डालताहूं ये बडे क्रूर अर्थात दुष्ट स्वभाववा लेहें और ऐसे अशुभ है कि इनकी सूरत देखनेसेभी पाप लगताहै। आसुरीयोनिमापन्नामूढाजन्मनिजन्मनि मामप्राप्यैवकौन्तेयततोयांत्यधमांगतिम् दोहा-जन्मजन्ममेंमूढते. होतजुआसुरआय ॥ मोकोतेपावतनहीं, परतअधमगतिजाय॥२० हे अर्जुन! ये मूढ जन्म जन्ममें आसुरीयोनिको पातेहैं मुझको क- दापि नहीं पाते और इस तरह सदा अधभगतिमें पड़े रहते हैं ॥२०॥ त्रिविधंनरकस्येदवारनाशनमात्मनः॥ कामक्रोधस्तथालोभस्तस्मादेतत्रयंत्यजेत॥ दोहा-नरकद्वारविधितीनहैं, करतआत्मकोनाश कामक्रोधअरुलोभपुनि इन्हेंछांडिसुखवास अध्याय १६॥ ३१३ हे अर्जुन ! काम, क्रोध और लोभ ये तीनों नकरके द्वार हैं, यही आत्मा कोनष्ट कर देते हैं, इससे हरएकरीतिसेइन तीनोका त्यागना उचित है ॥२१॥ एतैर्विमुक्तःकौंतेय तमोद्वास्तिभिर्नरः॥ आचरत्यात्मनःश्रेयस्ततोयातिपरांगतिम् २२ "दोहा-तीन्योहारजुनर्कके,तिनतेछुटैजुकोय॥ यतनकरैकल्यानको, तबहिपरमगतिहोय २२ है कौंतेय ! जो मनुष्य नरककेद्वार इन तीनों काम,क्रोध,लोभको छोड देताहै वही अपनी आत्माके कल्याणसाचनका उपाय करता है और अन्तमें परमगति पाता है ।। २२ ।। यःशास्त्रविधिमुत्सृज्यवर्ततेकामकारतः॥ नससिद्धिमवाप्नोतिनसुखनपरांगतिम् २३ दो-जो शास्त्रहिविधिछोडिकै, करतक्रियाबसकाम सिद्धलोकनहिंपरमगति, नहिंसुखमें विश्राम ॥ जो मनुष्य शास्त्रोक्तविधियों को छोडकर स्वेच्छाचारसे काम करता है उसको न तौ सिद्धि मिलती है,न सुख मिलताहै और न मोक्ष मि लती है अर्थात उसके हायसे यह लोक और वह लोक दोनोंजातेरहते हैं। तस्माच्छास्वंप्रमाणंतेकार्याकार्यव्यवस्थितौ ज्ञात्वाशास्त्रविधानोक्तंकर्मकर्तुमिहार्हसि भगवद्वीताभाषाटीका दोहा-तातेकाजअकाजमें ताकावेदप्रमाण ॥ कर्मनकरितूंजानिक, तिनकोंविधिसुविधान ।। वेदकहैनुपरोक्षको, मोकोदेवबताय॥ मेरेईकर्मनिकरै, मेरीआज्ञापाय ॥ १ ॥ तजैआसुरीसंपदा, दैवी संपति पाय ।। ते नर मुक्ति लहै यही, कह्यो सोरहेऽध्याय॥२॥ दैवासुर संपत्तिको, कयो विभागविचार॥ तातेसाविककोकरयो, तत्वज्ञानअधिकार ३) दैवासुरसंपतिवरनि, आनंदरामविशेष । बिन बनवारीजिंसों, हियमनटवरभेष ॥४॥ इन ऊपर क्हेहुए हेतुओंसे, हे अर्जुन ! कर्तव्य और अकर्तव्य कर्माकी व्यवस्था शाखको प्रमाण संमझकर शास्त्रोक्त विषिसे कर्म करना उचित है ॥२४॥ इतिश्रीमद्भगवद्गीतापनिषत्स् ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जनसंवादे विचारदर्पण दोहासहितभापाटीकायो दैवासुरसंपद्विभागयोगो नामषोडशोऽध्यायः ॥१६॥ विचार दर्पण दर्शन ६. (सुसलमान, ईसाईपत समीक्षा) इम कुछ बातें सत्यार्यप्रकाशसे उदृत करके इस दर्शनमें लिखते हैं, जिनको पड़कर इदिमानों को स्वयं अनुमान हागा इमारे हिन्दु [ आप] धर्मग्रन्यो, गीतादिके वाक्योंके सामने यह कैसे युकिन, विज्ञानादि हर हैं।
दर्शन ६ कुरानके वाक्य । [१] निश्चय तुह्मारा मालिक अल्लाह है जिसने आसमामों और पृथ्वीको छः दिनों में उत्पन्न किया फिर करार पकडा अरिपर । मंजिल २ सिपारा८सूरत ७आयत . समीक्षक- "भला जो छ दिनों में जगत् को बनाये और अर्श अर्यात् ऊपरके जाकाश में सिंहासनपर आराम करे वह सर्वशकिमान और सर्व व्यापक कैसे है। [२] क्या नहीं देखा तू ने यह कि भेना हमने शयतानों को ऊपर काफिरोंके बहकाते है उनको बहकानेपर ॥६. ४ सि.१६सू.१९ना.८१ [समीक्षक]-जब खुदाही शयतानों को बहकानेके लिये भेजता है तो वहका- नेवालों का कुछ दोष नहीं होसका । और न उनको दंड होसका है और न शयसानाको, क्योंकि इय खुदाके हुक्मसे सब होता है. [३]फिर निश्चय तुम दिन कयामतकेउठाये जाओगे।।.४ सि.१८सू.२३.१६ [समीक्षक] "कयामत तफ मुरदे कवररहेंगे व किसी अन्य जगह।जो उन्होंमें रहेंगे तो सहे हुए दुर्गन्ध शरीरमें रहकर पुण्यात्माभी दुःखभोग करेंगे यह न्याय नहीं अन्याय है,॥ [४] और जिसदिन कि फटजावेगा आसमानसाथ बदलीकेमिं.१९ सू.२५.२४ (समीक्षक) यह बात कभी सच नहीं होसक्ती कि आकाश वद्दलोंके साथ फटजावेगा भारतवर्षका हिन्दू (आर्य) जो साधरणभी पठित है जानता है कि आकाश कभी फट नहीं सक्ता, क्योंकि आकाश निराकार और शून्य और अनंत अनादिहे वह कोई फटनेकी नहीं है। [५] और जबकि आसमान फट जावे । और जब तारे झड जावें और जब दर्याचीरे जावें और जब कबरें जिलाकर उठाईजावें ॥ पं.७ सि.३०सू. ८२ आ. ११२३३१४॥ समीक्षक-यह सब बातें विज्ञान शून्य प्रतीत होती हैं। हमने ग्रंथ बढानेके भयसे अन्य बातें नहीं लिखी, पाठकों को यदि अधिक बातें जाननेकी इच्छा हो तो सत्यार्यप्रकाश या पंडित भोजदच कृत करानका भाषा अनुवाद मंगाकर देखें। वाईबल के वाक्य। १] तब ईश्वरने कहा कि हम आदमको अपने स्वरूपमें अपने समान बनायें तब ईश्वरने आदमको अपने स्वरूप में उत्पन्न किया उसने उस ईश्वरके स्वरूपमें उत्पन्न किया उसने उन्हें नर और नारी बनाया और ईश्वरने उन्हें आशीर्वाद दिया तारते पर्व १आपत २६ । २७ १२८॥ - ३१६, 'विचार दर्पण. [समीक्षक]"यदि आदमको ईश्वरने अपने स्वरूप बनाया तो ईश्वरला सरूप पवित्र ज्ञानस्वरूप आनंदमय आदि लक्षणयुक्त हैं उसके सहश आदम क्यों न हा । जन आदुम ईश्वरके सदश वनातो ईश्वर आदमके बहा अवश्य होना पाहिये। वार कैसी प्रमाणाशून्य ये बातें लिखी है" ॥ (२) तब परमेश्वर ईश्वरने भूमिकी धूलसे आदमकोबनाया और उसके नयनाम 'जीवनदा श्वास फूंका और आदम जीवता प्राणी हुआऔर परमेश्वर ईश्वरने अदन में पूर्व की ओर एक वाटी लगाई और उस आदम को जिसको · उसेन बनायाथा उसमें रक्खा । पर्व २.७-८ ( समीक्षक ) जब ईश्वरने अदनमें वाडी बनाकर उसमें आदमको रक्खा, तब ईश्वर नहीं जानताया कि इसको पुनः यहांसे निकालना पड़ेगा और जब ईश्वर मादमको धूलीसे बनाया तो ईश्वरका स्वरूप नहीं हुआ और है तो ईश्वरभी पूलीस बनाहोगा जब उसके नय:- नोंमें ईश्वरने श्वास फूंका तो वह श्वास ईश्वर का स्वरूप या या भिन्न जो भिन्न पा तो ईश्वर आदमके स्वरूपमें नहीं बना। (३) और परमेश्वर ईश्वरने आदमकोबडी नींदमें डाला और वह सो गया और आदमकी पसली से एक नारी बनाई और उसे आदमके पास लाया । पर्व २ आ. २१॥२२॥ [समीक्षक]"जो ईश्वरने आदमको धूलीसे बनाया तो उसकी स्त्रीको धूलीसे क्यों न बनाया? देखिये कैसी किलो सोफी है ।जो आदमकी एक पसली निकालकर नारी बनाई तो सब मनुष्यों की एक पसली कम क्यों होता ॥ [४] तब वह उनसे जो वाई ओर कहेगा कि हे शापित लोगो मेरे पाससे उस अनंत भागमें जाओजोशैतान और उसके दूतोंको लिए तैयार कीगई है। इंजी- लमती प.२५आ.४१ [समीक्षक] "मला यह कितनी वही पक्षपातकी बात है जो अपने शिष्य है। उनको स्वर्ग और जो उनके दूसरे हैं उनको अनंत आगमें गिराना परन्तु जब आकाशही न रहेगा तो अंनत आग, नरक,स्वर्ग कहा रहेंगे जो शैतान और उसके इतोको श्विर न बनाता तो इतनी नरककी तयारी क्यों करनी पडती और एक शयतानहो ईश्वरके भय से न डरा,तो वह ईश्वरही क्या है? क्योंकि उसका दूत होकर उसीके विरुद्ध होगया और ईश्वर उसको प्रथमही पकड़कर दीगृहमें न डालसका न मारसका पुनःउसकी ईश्वरता क्या ? जिसने इसको चालीस दिन दुःखदिया? ईसाभी उसका कुछ नहीं कर सका तो ईश्वरका बेटा बनना । (नोट) अरब देश के दक्षिणाभार्गक नगर, दर्शन। [५] और एक बडा आश्वयं दिखाई दिया अर्थात् एकस्त्री जो सूर्य पहिने है और चांद उसके पाँवतले है और उसकेशिरपर बारहतारों का मुकुट है । और वह गर्भवती होके चिल्लाती है क्योंकि प्रसवकी पीहा उसे लगी है और वह जना पीडित है और दूसरा आश्चर्य स्वर्गमें दिखाई दिया और देखो एक बड़ा लाल अजगरे है जिसके सात शिर और दशसोंग हैं और उसके शिरोपर सात राजमुकुट है और जिसकी पूंछने आकाशके तारोंकी एक तिहाई को बैंचकर उन्हें पृथ्वी पर डाला || योहन्ना प्रथमपव १२ । शायतें १।२।३॥४॥ [समीक्षक ] स्वर्गमें भी बिचारी स्त्री चिल्लाती है उसका दुःख कोई नहीं सुनता न मिटासक्ताहै और उस अजगरकी पूँछ कितनी बडीयी जिसने तारोंको एकतिहाई। पृथ्वीपर डाला भला पृथ्वी तो छोटी है और तारे भी बडे २, लोक हैं इस पृथ्वीपर एकभी नहींसमासका कैसा आश्चर्य [६] और वह बडा अजगर गिराया गया हाँ वह प्राचीन साँप जो दियावलं और शतान कहावता है जो सारे संसारका भरमाने हारा है ॥ यो०प्र०प०१२ आ०९॥ [समीक्षक "क्या.जब वह शैतान स्वर्गमें था तब लोगोंको नहीं भरमाता था उसको जन्मभर बंदीमें घिरा अथवा मार क्यों न डाला उसको पृथ्वीपर क्यों डाल दिया ? जो सब संसारका भरमाने वाला शैतान है तोशतानको भरमाने वाला कौन है ?यदि शैतान स्वयं भरम है तो शैतानके विनाही भरमने हारे भरमेंगे और जो उसको भरमाने हारा परमेश्वर है तो वह परमेश्वर नहीं होसक्ता है, जानतो यह पडता है कि ईसाइयोंका ईश्वरभी शैतानसे डरता होगा? जगतमें शैतानका जितनाराज्य है उसके सामने सहस्रांशभी ईसाइयों के ईश्वरका राज्यनहीं इसीलिये ईसाइयोंका ईश्वर उसे हटा नहीं सक्ता होगा। [७] जिसके सन्मुखसे पृथ्वी और आकाश भाग गये और उनकेलिये जगह मिली और मेंने क्या छोटे क्या बडे सब मृतकोंको ईश्वरके आगे खडे देखा और पुस्तक खोलेगये और दूसरा पुस्तका अर्थात् जीवनका पुस्तक खोलागया और पुस्त तकोंमें लिखीहुई बातों मृतकोंका विचार उनको काँके अनुसार फियाग या ॥ यो०म०प०२० आ०११॥१२॥ [समीक्षक]-"भला पृथ्वी और आकाश कैसे भागतकेंगे और वह फिसपर ठहरेंगे? जिनके सामनेसे भगे उसका सिंहासन और वह कहां ठहरा ? और मृतकलोग परमेश्वरके सामनेसे खड़े कियेगये तो परमेश्वरभी बैग होगा वा खडा होगा? क्या यहांकी कचहरी और दुकानके समान ईश्वरका व्यवहार है जोकि पुस्तक लेखानुसार होता है और सबजीवोंका वृचांत ईश्वरने लिखाया उसके कर्मचारियों? .
विचार दर्पण. ऐसी २ बातोखे अनीश्वरको ईश्वर और ईश्वरको अनीश्वर ईसाई आदि मतवालोंने बनादिया है" समीक्षा-अब पाठक जानगये होगें कि मुसलमान, ईसाई लोगोंके धर्मग्रंथों में जीव, प्रकृति ईश्वर और कर्म फिलोसोफीका यथार्थ निर्णयहाँनहीं कियागया है। यदि वर्णन होता तो ऐसी प्रमाणिक विरुद्ध वाते से लिखीजाती। हमारे धर्मप्रथों घेद,उपानेषद आदिमें लिखा है कि ईश्वर प्रकृतिके परमाणुओंसे अपनी शकि (धारा ससारकी रचना करताहै और एक अवधिक पाछ इन परमाणुओं को भिन्नकर देता है तो इस संसारका संहार होजाता है अर्थात् वही प्रकृति अथवा परमेश्वरकी मायामपन सुक्ष्मरूप परमाणुओंमें मिलजातीह इसीफोमेल्यकालकहते हैं इतने समय तक जीव निद्रारूपमें अपने २ कोंको सापरिये अनंत आकाशमें रहते हैं और एक अवधिके पश्चात् परमात्मा पुनःजन्ही सूक्ष्म परमाणुओंक स्थूल रूपमें लाकर पृथ्वी, जल, वायु, अनि मादिको रचता है और सब जावोंको पुनासपने २ पूर्व उन्हीं कमाँ द्वारा भोग भोगनेको पकार, थाना पडता हैं जीव अपने ५ कमको अनुसारही सुखी दुख होते हैं। जैसा यह पृथ्वीमहल दीखता है सीप्रकारका अंनत र लोकान्तर जैसा कि गीताके पडनेसे विदित होसकता । विशेष 'हमलोग ईघरको फिसी स्थान पर बैठाहा यही २ दाढीवाला वा अन्यरूपयाला नहीं मानते हम ईश्वरका ग्नाकार सर्वशक्तिमान और सर्वव्यापक मानते हैं उसको अपने कर्मचारी रखनेकी आवश्यकता नहीं कि वह जीवोंके मौके लेखे लिसारे जीवके पाप में पन्त.करण ऐसा नादिया है कि जो जीवके मौका रेखा रखताई । और न हमलोग मलपकालतफ जीवोंका कवरमें पटा रहना और एकदिन उठकर परमात्माके सामने जारर हिसाब देना और मोहम्मद् या ईसा कहनेपर खुदाका उनके ऊपर दया करना मानते हैं। हमतो कहते हैं कि जीव एक्शरीर छोडकर अपने कर्मानुसार दूसरा शरीर धारणकर रेता है इसी रिये हिन्द[ आर्य] लोग मृतक शरीरको जलादेते हैं । यह जलानेशी प्रथा हमलोगों प्राचीनबालसे चरीआती है अब यूरोप, अमेरिकामभी बहुत लोगोंने अपने मृतकोंको जलाना प्रारंभ किया है। यूरोप अमेरिकाके सहस्त्रों मनुष्य ईसाई धर्मको छोड़कर इसप्रकाशसमयमें हिन्दू(आय)धर्मके अनुयागंबनते, जाते हैं ऐसा देखकर हमारे हिन्दू (आर्य भाइयोंको हमारी प्राचीनयोग विद्या और वेदान्त विद्याकी खोजनेतन,मन,धन लगा देना चाहिये एक दिन शीवीआनेवालाई कि यूरोप,अपेरिका आदिदेश निवासी हिन्दू [ आर्य वैदिकसिद्धान्तोंको मानने वाले [पूर्ण] रोजाएंगे।
अथ सप्तदशोऽध्यायः
॥ अर्जुन उवाच॥
येशास्त्रविधिमुत्सृज्ययजतेश्रद्धयान्विताः
तपांनिष्ठातुकाकृष्णसत्वमाहोरजस्तमः॥
दोहा-श्रद्धायुतयज्ञहिरच, तजिवेदनकी नीति ।।
सत रज तम सौंथितिकहौ,कहियेतिनकारीति
अब अर्जुन पूछते हैं कि हे कृष्ण ! जो किसी प्रकारसे शास्त्रकी
विधिको तो छोड़ देते हैं और श्रद्धापूर्वक यज्ञ करते उनकी स्थिति
कैसी है ? वह सतोगुणी हैं, कि रजोगुणी है,कि तमोगुणी हैं,अर्थात
वे जो देवपूजनादिमें प्रवृत्त होते हैं मो उनकी प्रवत्ति सतोगुणी है
वा रजोगुणी है वा तमोगुणी है!! १ ॥
॥श्रीभगवानुवाच ।।
त्रिविधाभवतिश्रद्धादेहिनांसास्वभावजा
सात्विकीराजसीचैवतामसीचेतितांशृणु।
दोहा-श्रद्धानरकीतीनविधि,होतजुसहजसुभाया।
सात्विक राजस तामसी, सुनियतिनकीदाया।
भगवान कहते हैं कि हे अर्जुन ! परमेश्वरकी पूजासंबंधिनी श्रद्धा
तो एकही प्रकारकी है वह सात्विकी है परन्तु लोकाचारके अनुसार
सात्विकी, राजसी और तामसी तीन प्रकारकी श्रद्धा होती है. यह
श्रद्धा स्वभावजा होती है क्योंकि यह पूर्वजन्मके संतारोंसे उत्पन्न
होता है उसका मै वर्णन करताहूं ॥२॥
३२० 'भगवद्गीताभापाटीका. -- सत्वानुरूपासर्वस्यश्रद्धाभवतिभारत ॥ श्रद्धामयोऽयंपुरुषोयोयच्छ्रद्धःसएवसः ३ दोहा-श्रद्धाधर्मजुपुरुषको आप आपनोरूप ॥ सतरजतमजोजिहिंमजे, सोताहीकोरुप ॥३॥ हे अर्जुन ! सबकी श्रद्धा प्रकृति के अनुसार होती है जैसे जिसकी प्रकृति है वैसोही उसकी श्रद्धा है, इमलिये यह पुरुष श्रद्धामय होती है जिसको जैसी श्रद्धा है वह वैसाही है, इससे यहां तीनों प्रकारको श्रद्धा दिखाई गई है जैसे सात्विकी श्रद्धावाला सात्विक, रजोगुणी श्रद्धावाला रजोगुण युक्त और तमोगुणी श्रद्धावाला तमोगुणवि- शिष्ट होता है ॥३॥ यतेसात्विकादेवान्यक्षरक्षांसिराजसा॥ प्रेतान्भूतगणांश्चान्येयजंतेतामसाजनाः दोहा-देवनसेवैसात्विकी, राजसराक्षसयक्ष ॥ भूतप्रेतगणते यजै नरजुतामसीपक्ष ॥४॥ हे अर्जुन ! जो सात्विकी पुरुष है ये मत्वगुणविशिष्ट देवताओंका यजन करते हैं, जो रजोगुणी है वे यक्ष और राक्षसोंका पूजन करते है और जो अन्य तामसी पुरुप हैं वे प्रेत और भूतगणोंकी उपा- सना करते हैं ॥४॥ अशाखविहितं घोरंतप्यतेयेतपोजनाः॥ दभाहंकारसंयुक्ताः कामरागबलान्विताः अध्याय १७॥ ३२१ दोहा-घोरतपस्याजकरें, जेनवेदमतिहोहिं ।। भरेदंभअहँकारसौं, कामरागबलगोहिं॥५॥ हे अर्जुन ! पाखंडसे मिले हुए, कपट और अहंकारसे युक्त, काम, विषयानुराग और आग्रहसे जो मनुष्य ऐसे घोर तपोंको करते हैं जिनका शास्त्रमें कुछ विधान नहीं है वे असुर हैं ॥५॥ कर्षयंतःशरीरस्थंभूतग्राममचेतसः॥ मांचैवांतःशरीरस्थंतान्वियासुरनिश्चयान६ दोहा-पंचभूतदेहमें, तिनकोवेदुखदेत ॥ हियमेंमोहूकोहन, तेहैं असुर अचेत ॥६॥ हे अर्जुन ! ऐसे असावधान पुरुष जिनको कुछभी ज्ञान नहीं है वे घोर तप कर करके शरीरमें वर्तमान जो पृथिव्यादि पंचमहाभूतों. का समूह है उसे त्रास देदेकर वृथा दुर्बल और क्षीण करदेते हैं और अन्तर्यामीरूपसे देहमें स्थित मुझकोभी दुर्बल और क्षीण करते हैं उनको तू निश्चय असुर अर्थात् ऐसा जान कि इन आसुरी कर्मों- होमें उन्होंने मोक्षका मार्ग निश्चय करलिया है॥६॥ आहारस्त्वपिसर्वस्यत्रिविधोभवतिप्रियः यज्ञस्तपस्तथादानंतेषांभेदमिमंशृणु ॥ दोहा-तीनभांतिआहारयह, सबकोरोचकहोय॥ यज्ञदानतपभेदए, मोसुनियेसोय॥७॥ हे अजुन ! अन्नादि आह.रभी तीन प्रकारका सब मनुष्योंको अ- ,
३२२
भगवद्गीताभाषाटीका.
च्छा लगता है, वैसेही यज्ञ, तप और दान भी तीन प्रकारके हैं,
इनके भेद सुन आशय यह है कि भगवान् उस वातको कहना चा-
हते हैं कि राजसातामस आहार और यज्ञादिकको छेडेकर सात्विकी
बुद्धिका उपाय करै ।। ७॥
आयुःसत्वबलारोग्यसुखपीतिविवर्द्धनाः॥
रस्था:स्निग्धाःस्थिराद्याआहाराःसात्वि
कनियाः॥८॥
दोहा-सुंदरथिरअतिचीकनो,सात्विक प्रियआहार
आयुसत्व आरोग्यवलप्रीतिबढावनहारं ॥८॥
हे अर्जुन ! आयु,सत्व,बल,निरोगता,सुख और मीनिकेवढनेवाले
रसोले,चिकने स्थिर अर्थात अपने रसांशसे बहुत कालाक देहमें रह
नेवाले हृदयको हितकारी आहार सात्विक जनोंको प्रिय होते हैं ८॥
कटल्ललवणात्युष्णतीक्ष्णरूक्षविदाहिनः
आहाराराजसस्येष्टादुःखशोकामयप्रदाः।।
दोहा-दाहकरूपोउष्णकटु,तीच्छनखाटोखार।।
शोकरोगदुखदेतहैं, राजसप्रिय आहार ॥९॥
हे अर्जुन ! कडवे, खट्टे,नमकीन, अत्यन्त गर्म, अत्यंत तीक्ष्णा,
अत्यन्त रूखे और जलन उत्पन्न करनेवाले आहार रजोगुणवालोंको
प्रिय लगते हैं, इनके सेवनसे खाते समय दुःख,भोजन करने के पीछे
अप्रसन्नता और परिणाममें रोग उत्पन्न होते हैं ॥ ९ ॥
अध्याय १७॥
३२३.
.
यातयामंगतरसे पूतिपर्युषितं च यत् ॥
उच्छिष्टमपिचामेध्यंयोजनंतामसप्रियम १०
दोहा-जिहिरांधेपरप्रहरगत,वासो उठ्योबुसाय ॥
जूठोऔरपवित्रनहिं, भोजनतामसखाय॥१०॥
:: हे अर्जुन ! जिस अन्नको पक्क करने के पीछे एक प्रहर बीत गया-
होजिसमेंसे रस निचोड लियाहो, जो दुर्गन्धियुक्त हो, जो बासीहो,
जो उच्छिष्ट अर्थात किसीके भोजनमेंसे बच रहाहो और अपवित्रहो
ऐसा भोजन नामसी प्रकृतिवालोंकी प्रिय लगता है ॥ १० ॥
अफलाकांक्षिभिर्यज्ञोविधिदृष्टोयइज्यते।
यष्टव्यमेवेतिमनःसमाधायससात्विकः॥
दोहा-लखिविधानसों कीजिये छांडि फलनकी आस
समाधान घर हीयमें,सात्विकयज्ञ विलास ११
हे अर्जुन! यज्ञ करनाही है,यह मनमें ठान जो बिना फलप्राप्तिकी
इच्छाके विधिपूर्वक यज्ञ किया जाता है वह यज्ञ सात्तिकी कहता है।
अभिसंधायतुफलंदभार्थमपिचैवयत ॥
इज्यतेभरतश्रेष्ठतंयज्ञविद्धिराजसम् ॥१२
दोहा-करिकैफलकीकामना, औरदंभकीभाय॥
ऐसेजोयज्ञहिकरै, राजसयज्ञसदाय ॥१२॥
हे भरतश्रेष्ठ । जो यज्ञ फलकी कामनासे कपटयुक्त किया जाता
है उसे राजस यज्ञ समझना ॥१२॥
भगवद्गीताभाषाटीका. विधिहीनमसृष्टान्नं मंत्रहीनमदक्षिणम् ॥ श्रद्धाविरहितंयज्ञंतामसं परिचक्षते॥१३॥ दोहा-विनुअन्नहिविनुदच्छिना, विनामंत्रविधिहीन॥ विनुश्रद्धायज्ञहिकरै, सोहै तामसलीन ॥ १३॥ हे अर्जुन ! जो यज्ञ शास्त्रविधिसे हीन, यज्ञोचित अन्नसे रहित, मंत्रहीन, दक्षिणारहित और बिना श्रद्धा नो यज्ञ किया जाता है वह तामस यज्ञ कहाता है ॥ १३ ॥ देवद्विजगुरुपाज्ञपूजनशौचमार्जवम् ॥ ब्रह्मचर्यमहिंसाचशारीरंतपउच्यते॥१४॥ दोहा-ज्ञानीगुरुद्विजदेवकों, पूजैशुचिमृदुहोय॥ ब्रह्मचर्यहिंसातजै, तपशारीरकसोय ॥ १४॥ (अब तीन श्लोकों में कायिक, वाचिक और मानसिक तपोंको कहते हैं) हे अर्जुन ! देवता, द्विज, गुरु और तत्त्वज्ञानियोंका पूजन करना वाह्य अभ्यन्तर पवित्र रहना,सबसे नम्रता रखना,ब्रह्मचर्य व्रत धारण करना,क्सिीको कष्ट न देना ये शारीरिक तप कहता है॥१४ अनुद्वेगकरंवाक्यसत्यंप्रियहितंचयत् ॥ स्वाध्यायाभ्यसनंचैववाङ्मयंतपउच्यते॥ दोहा-भयनकरैजेप्रियवचन, हितकारीसतभाय।। करैवेदअभ्यासपुनि, वाचिकतपयादाय ॥१५॥ हे अर्जुन ! जिप्त वाक्यसे किसी के मनमें उद्वेग वा घबडाहट न
अध्याय १७॥
हो, जो सत्यहो, सुननेवालोंको प्रिय लगे, परिणाममें हितकारीहो
और वेदपाठका निरन्तर अभ्यास ये वाचिक तप हैं ॥ १५ ॥
मनःप्रसादःसौम्यत्वंमौनमात्मविनिग्रहः
भावसंशुद्धिरित्येतत्तपोमानसमुच्यते ॥
दोहा-मनप्रसादमुखमृदुबचन, इंद्रीनिग्रहमान॥
भावशुद्वियहकहतहैं, मानसतपसीतौन ॥१६॥
हे अर्जुन ! मनको प्रसन्न रखना, चित्तमें शान्ति रखना, मौन
धारण करना, विषयोसे मनको रोकना,लौकिक व्यवहारमें अन्तःक-
रणको शुद्ध रखना यह सब मानसिक तप हैं ॥ १६ ॥
श्रद्धयापरयातप्तंतपस्तत्रिविधनरैः॥
अफलाकांक्षिभिर्युक्तैःसात्विकंपरिचक्षते॥
दोहा-श्रद्धासोंनरतपकरै, सोईतीन्योभांति ॥
फलइच्छाछाडेकर, सोईसात्विककांति ॥१७॥
(अव सात्विकादि भेदोंसे तीन प्रकारका तप कहते हैं) हे
अर्जुन ! जिन भनुष्योंको फलकी कामना नहीं है वे अत्यन्त श्रद्धा-
पूर्वक जो कायिक, वाचिक और मानसिक तीनों प्रकारका तप
करते हैं वह सात्विक कहाता है ॥१७॥
सत्कारमानपूजार्थंतपोदंभेनचैवयत् ॥
क्रियतेतदिहप्रोक्तंराजसंचलमध्रुवम् ॥१८
दोहा-पूजाआदरमानपुनि, और दंभको काज ॥
सोतपराजसकहतुहै चंचलक्षणिकसमाज॥१८॥
A ३२६ भगवद्गीताभाषाटीका। हे अर्जुन ! जो तप आदरसत्कार पानेकी इच्छा, अपनी बडाई करानेके मनोरथ और दंभसे किया जाता है वह तप राजस अनित्य और क्षणिक कहाता है ॥ १८ ॥ मूढग्राहेणात्मनोयत्पीडयाक्रियतेतपः॥ परस्योत्सादनार्थवातत्तामसमुदाहृताम्॥ दोहा-देहहिदुखदैमृढ है, हठसौंतपजोहोय ॥ परकौंकष्टदिखावहीं, तामसतपव्हैसोय॥१०॥ हे अर्जुन ! जो तप अज्ञानके आग्रहसे, अथवा अपने शरीरको कष्ट देकर अथवा औरौंका मारण, मोहन उच्चाटनादि करने के नि- मित्त किया जाता है वह तामस कहाता है ॥१९॥ दातव्यमितियदानंदीयतेऽनुपकारिणे देशेकालेचपात्रेचतदानंसात्त्विकंस्मृताम् दोहा-दानदेइ उपकार बिनु. पात्रविप्रकोंदेखि॥ देशकालकोजानिक, सात्विकदानविशोषि२० हे अर्जुन ! वह दान सात्विक कहाता है जो देनाही है ऐसा निश्चय करके ऐसे मनुष्यको दिया जाता है जिससे फिर बदलेमें कोई वस्तु लेनेकी इच्छा नहो, तथा देश काल औरै पात्रका विचार करके जो दान दिया जाता है वह सात्विक दान कहाता है॥२०॥ यत्तुप्रत्युपकारार्थ फलमुद्दिश्यवापुनः॥ दीयतेचपरिक्लिष्टताजसमुदाहृतम् २१ अध्याय १७, ३२७ दोहा-कीजै जोउपकारको, फलकीआशामानि॥ जोदीजैअतिकष्टसों, ताकोंराजसजानि ॥२१॥ जो दान इस इच्छासे दिया जाता है कि दान लेनेवाला किसी दिन मेरे साथ उपकार करैगा, वा स्वर्गादिक फरकी इच्छासे दिया जाता है दा देते समय चित्त दुःख होता है वह दान राजस कहातीहै। अदेशकालेयदानमपात्रेभ्यश्चदीयते॥ असत्कृतमवज्ञातंतत्तामसमुदाहृतम् २२|| दोहा-विनादेसअरुकालविनु, दीजैनीचहिदान ।। विपुआदरसत्कारविनु, तामसताहिवखान२२ जो दान निरादर और तिरस्कारसे दिया जाता है,वा देशकालका विचार कियेविना अयोग्योंको दिया जाताहै वह तामसी दानहै२२ ओतत्सदितिनिर्देशोब्रह्मणस्त्रिविधःस्मृतः ब्राह्मणास्तेनवेदाश्चयज्ञाश्चपिहिताःपुरा॥ दोहा-ॐतत्सत् एब्रह्मके, नामजुतीनप्रकार ॥ विप्रवेदअरुयज्ञत्रिय, कीनेपहिलीवार ॥२३॥ ओं, तत, सत् ये तीनों शब्द परमात्माके नामके अनुरूप निर्दि- ट हैं इनमें अकार, उकार और मकारका स्वरूप जो ओं हैं सो यह ओ शब्द ब्रह्महीका नाम है और जगत् के कारण हेतुसे ज्ञानियोंको अपरोक्ष है इससे तत् शब्दभी ब्रह्मका नाम है और परमार्थ, सत्व, साधुत्व और प्रशस्तत्वादि करके जो सत् शब्द है वहभी ब्रह्मका नाम है, इससे यह त्रिविधनाम निकृष्टकोभी उत्कृष्ट करनेमें समर्थ है भगवद्रीताभाषाटीका इसीसे कहते है कि-विधाताने सृष्टिके आदिमें इस परमात्माके त्रिविधनामका उद्देश करके ब्राह्मण, वेद और यज्ञ निर्माण किये इससे 'ओतत्सत् ' इस नामक उच्चारण अतिही प्रशस्त है ॥ २३॥ तस्मादोमित्युदाहृत्ययज्ञदानतपःक्रियाः प्रवर्ततेविधानोक्ताःसततंब्रह्मवादिनाम् ।। दोहा-क्रियायज्ञतपदानअरू, कहिपहिलेॐकार ॥ : वेदवंतोंकहतहैं, विधिविधानविस्तार ॥२४॥ (अब इन तीनों शब्दोंकी भिन्न २ महिमा दिखाते हैं, क्योंकि ओं शब्दसे परमात्माका निर्देश है इससे ओं शब्दका उच्चारण करके जो यज्ञ, दान, तप आदि शास्त्रोक्त क्रिया की जाती हैं वे यथावत सङ्गोपाङ्ग न होनेपरमी सव भांति पूर्ण होती हैं ॥२४॥ तदित्यनभिसंधायफलंयज्ञतपःक्रियाः ॥ दानक्रियाश्चविविधाःक्रियतेमोक्षकांक्षिभिः॥ दोहा-तत्यहकरिकैकरतहैं, क्रियायज्ञतपदान ॥ फलअभिलापाछोडिकै, चाहतमुक्तिनिदान ।। फलकी कामनाको त्यागकर जो मुमुक्षुजन तत्' शब्दका उ- वारणकरके यज्ञ, तप तथा अनेक प्रकारके दानोंके करने में प्रवृत्त होते हैं वे शुद्ध चित्त होजाते हैं और संकल्पके त्याग मुमुक्षु होजाते है इससे तत शब्दका उच्चारण बहुतही पवित्र है ॥२५॥ सद्भावेसाधुभावेचसदित्येतत्प्रयुज्यते ॥ प्रशस्तेकर्मणितथासच्छब्दःपार्थयुज्यते ।।
अपाय १५॥
३२९
दोहा-शुद्धभावसतभावमें, सतकोकरतउचार ॥
और भले पुनि कर्ममें, सतकोगावतसार ॥२६
हे अर्जुन ! सत् शब्दका प्रयोग सद्भाव और साधुभावमें किया
जाता है तथा माङ्गलिक किवाहादिक कर्ममेंभी सत् शब्द प्रयुक्त
किया जाता है ॥२६॥
यज्ञेतपसिदानेचस्थितिःसदितिचोच्यते॥
कर्मचैवतदर्थीयंसदित्येवाऽभिधीयते ।।
दोहा-यज्ञदानतपकीजुथिति, ताहिकहतसतनाम ।
ताकेजेजेकर्म हैं, ताकोसतविश्राम ॥२७॥
हे अर्जुन ! यज्ञ, तप और दान में जो स्थिति है उसे सब कहते हैं
तथा परमात्माके निमित्त जो कर्म किये जाते हैं वे यदि विगुण और
अङ्गहीन हों पर परमात्माके अति पवित्र ओं तवं सत् ' इन नामोंसे
युक्त हों तौ सर्वोत्कृष्ट होजाता हैं ॥२७॥
अश्रद्धयाहुतंदत्तंतपस्तप्तंकृतंचयत् ॥
असदित्युच्यतेपार्थनचतत्मेत्यनोइह ।।
दोहा-श्रद्धाविनुहोमतयजत, देतसबैंजुअकाज॥
अर्जुनजोयहअसतहै, दुहूंलोकनहिंसाज ॥२८
एकहिश्रद्धासात्विकी, मुख्यकहीसमुझाय ॥
और त्रिविधगुणभेदतें, कहैसत्रहेध्याय ॥१॥
जबैराजसीतामसी, श्रद्धाकोतजिदेत ॥
रहैसात्विकीमतवै, तत्वज्ञानगहिलेत॥२॥
!
३३०
भगवद्गीताभाषटीका.
जोईअर्जुनसोंकयो, कृष्णसघनघनश्याम ॥
श्रद्धाविधीविवेकसों, वरन्यौआनदराम ॥
हे पार्थ ! जो यज्ञ, दान, तप और अन्य कर्म विना श्रद्धाके किये
जाते हैं वे सब असत् है,क्योंकि विनाश्रद्धाके विगुण और अङ्गहीन
हैं और ऐसा होनेसे उनका कुछभी फल न परलोकमें है न इस लो-
कमे है किन्तु फेवल अयशस्कर हैं तथा श्रद्धा इनके करनेसें शरी-
रको कष्ट देना और धन खराब करनाभी व्यर्थ है ॥२८॥
इतिश्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णा-
र्जुनसंवादे विचारदर्पण दोहासहितभाषाटीकायां श्रद्धात्रयवि-
भागयोगोनामसप्तदशोऽध्यायः ॥१७॥
विचार दर्पण
र दर्शन ७। 8
(वेदों के उपदेश)
तपीशानं जगतस्तस्थुषस्पति जित्वमवसेहूमहे वयम् । पूषा नो यथा वेदसामसदृधे
रक्षिता पायुरदब्धः स्वस्तये ॥ ऋग्वेद अष्टक १ अध्याय ६ वर्ग १५ मंत्र ५ ॥
अर्थ-" हे सर्व स्वामिन् आपी चर और अचर जगत्के ईशान (रचने वाले )हो, सर्व
विद्यामय विज्ञान स्वरूप बुद्धिको प्रकाशित करनेवाले प्रिय स्वरूप हो, सबके पोषक हो,
उन मापका हम अपनी रक्षाके लिये माहाहन करते हे जिसपकार से आप हमारे विद्यादि।
धनोंकी वृद्धि वा रक्षा के लिये निश्वय रक्षा करने में तत्पर हो वैसे ही कृपा करके आप
इमारी स्वस्थताके लिये निरतर रक्षक हो, आपसे पालित हमलोग सदैव उत्तम कामोमे
उन्नति और आनद को प्राप्त हों"।
वयं जयेपत्वयागुजावृतमस्माकमंशमुदवा भरे भरे । अस्मम्यमिंद्र वरिवः सुग
कृषि प्रशत्रूणां मघवन्वृष्ण्या रुज ॥ १ ॥७॥१४॥४॥
'दर्शन ७ PADAM ॥ - -- ॥ अर्थ."हे इन्द्र (परमात्मन्) आपकी सहायतासे हमलोग दुर शत्रुजनको जीते, केसा है, व शत्रु कि हमारे वरसे घिरा हुआ है. अर्थात् हमारी सेना उस शत्रुको घेर रक्खा है हे महाराजाधिराजे भ्वर युद्ध २ में हमारी सेनाकी उत्तम सातसे कृपा करके रक्षण क्रो, जिससे किसी युद्ध क्षीण होके हम पराजयको न प्राप्तहों. किन्त जिनको आपकी सहायता है उनका सर्वत्र विजय होती है। हे महाध नेश्वर हमारे शत्रुओके ६र्य पराक्रमादि को प्रभन्न और रुग्ण करके नष्ट करदो, हमारे लिये चक यती राज्य और साम्राज्य धनको सुखसे प्राप्तकरो अर्थात् आपकी करुणास इमारा राज्य और धन सदा पृद्धिकोही प्राप्त " समीक्षा-आशय यह है कि काम क्रोधा भानुमोके जीतने में नात्मा से सहायता मांगने चाहिये तदेवामिस्तदादित्यस्तदायुस्तदुचन्द्रमाः तदेव शुक्र व तांआपः सप्रजापतिः। यजुबैद अ०३२ मं० अर्थ--"जो सब जगत्का कारण एक परमेश्वर है उसी । नाम आधि है, सर्वोत्तम ज्ञान स्वरूप, पूज्यतम प्रापणीय स्वरूप आग्ने शब्दका अर्थ ६ जिर.... कभी नाश न हो और स्वप्रकाशस्वरूप है इससे परमात्मा का नाम आदित्य है ! सब जगत का धारण करने वाला अनंत वलवान प्राणोंसे भी जो प्रिय स्वरूप इससे ईश्वर का नाम वायु है । आनदरवरूप और स्वसेषकोंको परमानंद देनेवाला होनेसे परमात्माका नाम चन्द्रमा है। चेतन स्वरूप सब जगत्का की होनेसे शुक्र है,सबसे बडा होनेके कारण परमात्मा का नामब्रह्म है।धर्मात्मास्वभक्तोंको अत्यंत सुख और विद्यादि सद्गुणोंसे पढाने वाला होनेसे परमात्माका नाम आप "जल" है,वह सब जगत्का पति तथा स्वामी होनेसे प्रजापतिकहलाता। सबका पालन करनेवाला अन्य कोई नहीं है, उसीको हमलोग इष्टदेव तथा पालक माने अन्यको ना" ॥ तेजोऽसि तेजो मयि घेहि । वीर्यमसि वीर्य मयि घेहि । बलमसि बलंमयि धेदि मोजोऽस्योजो मयि धेहि । मन्युरास मन्यु मयि धेहि सहोऽसि सहो मयि धेहि ॥ यजु०अ०१९मं०९ मर्थ-हे स्वप्रकाश 1 अनंत तेज ! आप यविद्यान्धकारसे रहित हो, किंच मत्य विज्ञान तेजस्वरूप हो आप कृपादृष्टिसे मुझमें वही तेज धारणकरो, जिससे मैं निस्तेज, दीन और भोर कहीं और कभी न होऊ, अनंतवीर्य परमात्मन् आप पराकम स्वरूपहो, आप सर्वोत्तम पराक्रम मुझमें भी रक्खो आप बल स्वरूपहो मुझे भी यलदो, आप अनंत सामर्थ्यवान हो मुझको भी सामर्यवान परो; दुष्टों पर क्रोधकर्ता हो, में भी आपकी कृपासे दुष्टोंपर क्रोध करनेवाला बनूं आप अनंत सहन स्वरूप हो अतः मैं भी आपकी कृपासे उत्तम कामोंफी प्राप्तिमें आने वाले कष्टोका सदन फर्ता बनूं: शरीर, इद्रिय, मन और आत्माके तेजादि गुण कभी मुझमें से दूर हो,जिसस मैं आपकी मां का स्थिर अनुष्ठान कर और आपके अनुग्रह से संसारमें भी सदा सुखी रहूं"। कया नश्चित्र मामुवदूती सदावृधः सखा । कया शविष्ठया वृता ॥ सामवेद उचरार्चिक अध्याय१ सं०४०॥
विचार दर्पण. (अर्थ) "सदावृध ) सर्वदा वृद्धिको प्राप्तहोने वाला (चित्र पूजनीय (सखा) मित्रभूत इन्द्र-परमात्मा (कया, उती) कैसीरक्षासे और ( कयावृतः) कैसेवादसे (न.) हमारे, (आभुक्त् समुख हो । (उत्तर )[ शचिष्ठया श्रेष्ठधुद्रियुक्त होनेसे" समीक्षा-परमात्मान इसमत्रमें प्रश्नोत्तररूपसे जीवों को यह उपदेश किया है कि परमा, त्माको अनुक्लता अच्छे बुद्धियुक्त वर्तावसेही होसक्ती है अत हमको चाहिये कि हम सदा ऐसे कामों में लगे रहे जिनसे प्रतिदिन बुद्धि की उज्वछता और बुद्धिही होती रहे । जब मारतसतान बुद्धिप्राप्तिके साधनोंमें गीहुई थी तब परमात्मा की भी अनुकूलता प्राप्तयो- अब आलस्य और इन्द्रियों के सुखों के आधीन होकर वेदारी बुद्धको पक्षाघात [लकवा) रोगने पीडित कर लिया तो परमात्माकी कृपा भी हमसे दूर होगई, क्योंकि परमात्मा तो न्यायकारी है, वद मोह और अज्ञानसे सदा दूर रहने वालोंकोही सहायता करता है- तं सभा च समितिश्च सेना च ।। अथर्व० कोड१५ अनुवा २ वर्ग ९ मंत्र २५ सम्प सभा मे पाहि ये च सम्याःसभासदःअथर्ववेद-काड१९अनु०७वर्ग ५५मत्र६॥ अर्थ ) "उस राज्यधर्म को तीनों समा और सेना मिलकर पालन करें, अर्थात् राजा और प्रजाके पुरुष मिलकर विद्यासभा, धर्मसभा और राज्यसभा नियतकरें जिससे सुखको शद्धि होती रहे राजा सभासदों को आज्ञा देवे कि हे समा के मुत्यलोगो तुम मेरी सभाकी, धर्मयुक्त व्यवस्याका पालन करो। समीक्षा राजा सभाके आधीन रहे और सभा राजाके आधीन रहे। इस प्रकार राजा और "प्रजा प्रतिनिधिसभा" मिल्फर राज्यके नियमादि बनायें और शासनकरें, यदि इस प्रकार मिलकर काम न होगा तो राज्यकार्यमे गध्घट रहगी ॥ [समीक्षा ] जबसे भारतवर्षकी मजाको राज्य कार्यो में भाग मिल्ना छूट गया तमोसे प्रयम मुसलमान लोग यहा आपर हमारे ऊपर राज्य करने ठगगये । आजकल यूरोप, जापान, अमेरिका क राज्योंकी जड़ इसी कारण दृढ होरही है कि वह। प्रजाको पार्लियामेंट द्वारा ग्यकार्यामे भाग मिटरहा है । अव यहापर भी कई देशीराजाओंने अपने २ राज्यों में" प्रज्ञाप्रतिनिधि मडल " अर्थात् पार्टियामेंट स्थापित की हैं । राजा निम्नलिखित ६ महाराजा बड़ौदा, महाराजा मैसूर और महाराजा बीकानेर । [उपनिषदोंके उपदेश] शापास्यमिदं सर्व यत्विञ्च जगत्यां जगत् तेन त्यकेन भुञ्जीया माधः कस्यई स्विद्धनमाईशोपनिषत् मन ॥ (अर्थ)- जगन् में जो कुछभी है वह परमामा करके व्याप्त है अर्थात् कोई भी ऐसा रधान न हो जहा परमात्मा न हो, इसलिये उस पर विश्वास रख, निस्पृह होकर जीवन व्यतीत करते हुए किसीके धनकी अकाक्षा मत करो ॥ इह चेदवेदीय सत्यमस्ति नदिहावेदाम्महती विनाष्टः । भूनेषु भूतेषु विचिन्त्य धीरा प्रेत्यास्माल्रोकादमृता भवन्ति । केनोपनिषद वि० सं० म० ५॥
पर्शन (अर्थ) यदि मनुष्यने परमात्माका यंधार्थ ज्ञान इसी जन्ममें प्राप्त करलिया तो ठीक है नहीं तो बड़ी हानि उठानी घोगी (क्योकि म जाने मनुष्यदेह पुनः कब प्राप्त हो और कब ब्रमज्ञन प्राप्तिका, भवसर मिले ) जो विधेकोजन इसी जन्ममें प्राणीमात्र पर ध्यान देते हुए (उन के सुख दुःखोंपर विचार करते हुए ) वैराग्यको प्राप्त होकर परमात्माकी. शरणमें आकर अपने प्राणोंको त्यागते हैं, वह मरकर ससारके बन्धनोंसे घट जाते हैं। शविष्ठत जाग्रत प्राप्यवरान्निवोधत । क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्यया दुर्गपथस्तत्का. वयो वदन्ति ॥ कठोपनिषत् प्रथमोऽतृतीयावल्ली मं० १४ ॥ हे मुमुक्षुजनो ! उठो, जागो; ज्ञानीपुरुषोंके पास जाकर ज्ञानका मार्ग प्राप्त करो, यह मार्ग वडा दुर्गम है अर्थात् जिसपर चलनेमें बडा कष्ट होता है. इसधिद्वानलोग छुरेकी धारसा तीक्ष्ण बताते हैं (समीक्षा)-प्रयोजन यह है की परमारमाकी भाक्त करने में जो विन शीघ्र २ आया कर- ते घह वास्तव का ८ अशुभ प्रारब्धको काही फल , जो बिन्नवाधारूप होकर शीघ्रतासे नाशको प्राप्त होरहे हैं। इसलिए इस मंत्रमें उपदेश दियागया है कि तुम इन अस्थाई विनोंके उपस्थित होनेपर वीच में मत रुको ; धर्मपय पर चले जाओ, एक दिन तुम्हारा अभीष्ट अवश्य सिद्ध होगा। तेषामेवेष ब्रह्मलोको येषां तपो ब्रह्मचर्य येषु सत्यं प्रतिष्ठितम् । तेषामसौ विरजो ब्रह्मलोको न येषु जिह्ममनृतं न माया चेति ॥ प्रश्नोपनिषत् प्रथम प्रश्नः मं० १५। १६ (अर्थ) ब्रह्मकी प्राति उन्होंको “ होसक्ती है जिनमें तप [ मन और ईन्द्रियों को पिपय विकारों से दूररखना) ब्रह्मचर्य [ वीर्यरक्षा) और सत्य। यथार्थ भाषण ) रूपीगुण शुद्धब्रह्मानको वही लोग प्राप्त सक्ते हैं, जिनमें कुटिलता (धर्मात्मा पुरुषोंसे विमुखता) मस्त [ मिथ्या भाषण ] भार माया (छल कपट ) नहीं होते। सत्यमेव जयते नानृतं सत्येन पंथा विततो देवयानः । येनाकामन्त्यूषयों हाप्तकामा यत्र तत्सत्यस्य परमं निधानम् ॥ मुंडकोपनिषत् तृतीयमुंडके प्रयमखंडे 4. मं०६॥ [अर्थ ] सत्यका ही अंतमें जय होता है,सत्य करके ही ब्रह्मज्ञान खुलता है,सब सांसारिक कामनामोंसे दूर धोनेवालेही महात्माजन इस सत्य के सहारेसे ही सत्यस्वरूप परमात्मा को प्राप्त होते है ओमित्येतदक्षरमिद सर्व तस्योपव्याख्या नमूतं भवद्भविष्यदिति सर्वमोंकार एवं यच्चान्यत्रिकालातीतं तदप्योङ्कार एव॥ मांडूक्योपनिषत् मं० १॥ (अय) जो कुछ दृष्टिगत है वह सब परमात्माकी ही विभूति समझो, भूत, भविष्य, वर्तमान तीनों कारों में परमात्माकी स्थिति रहती है अधिक क्या पहे यदि कोई वस्तु कालके वश में नहीं है तो वह परमात्मा है।
विचारदर्पण . समीक्षा-परमात्मा मतोंको इस मंत्रसे यह पदेश मिलता है. कि किसी स्थानको किसी पारमे भी परमात्मासे शून्य मत समझो,किसो कपिने ठोक कहा है। जिधर देखता हूं उपर तू ही तू है। हरशय वस्तु] में हंगुल फूल)में तेरीसी रंगत न तेरोसी बू है ॥ वेदमनूच्याचायन्ते यासिनमनुशास्ति सत्यं वद,धमं चास्वधायान्माप्रपद : इत्यादि। तेचिरीयोपानेषन् एकारशानुपाकःमंत्र १॥ [ अर्थ ] समग्र वेदोंकी शिक्षा देकर आचार्य अनेवासो (मे शिष्य रातदिन विद्याध्ययन के निमित अपने घर को छोडकर गुरुके घरपर हो ब्रह्मचारी होकर रहता है. को घर गाते समय उपरा देता है कि, सदा सत्य वेलना, सदा धानुकूट दो व्यवहार करना जो बल पढा है उसका अभ्यास रखना। । समीक्षा प्राचीन में नियम था कि अप शिष्य सपूर्ण विद्या पढनुकना था तो गुरु उसको अपने पासत जाते समय उत्तम २ उपदेश दिया करताया ॥ शिष्य भी पुनः घरो लोटसर अपनी सामयानुकूल गुरुदक्षिणा देता था, पानेमास फोस चुकानेश चोझ मायाफे शिरपर नहीं रहता था जिस चोझके मारे आजकल सदसो नवयुवक इच्छा होने हुये भो यथेष्ट विद्या प्राप्त नहीं कर सते, ऐसी दशा वह भूख निर्धन रहकर अपनी और अपने दशकों क्या उन्नति कर सके है ? शोक ! आत्मा वा इदमेर एवान आसीन्नान्यत्किंचन मिपत् स ईक्षत लोकानुसृजाइ तिाऐतेश्योपनिषत् प्रथमः खंडः मंत्र १॥ (अर्थ) ल्यकाल एक परमात्माही आदिमें था और कुछ दिखाई नहीं देता था (अन्याल अवधि समा जाने पर) उस परमात्माने विचारा कि मैं प्रजाको (उनके पूर्व यानुसार उत्पन्न करू ) समीक्षा- इस उपनिपष्टिकोरचनाका वैज्ञानिक रोतिसे बडा सुन्दर वर्णन किया गया है यदि किमीको विस्तारपूर्वक सृष्टिको रचना का यधार्थ वृत्तांत जानना होता ऐतरेयोपनिषत् को स्वयं पटे या किसी दूसरे से सुने । अभ यदिदमस्मिन् ब्रह्मपुरे दहर पुंडरीक वेश्म दहरोऽस्मिन्नन्तराकाशस्त स्मिन यदंतस्तदन्वेन्यं विनिवास्तिव्यमिति छांदोग्योपनिषत् अष्टप प्रपाठक मंत्र ९॥ (अ) जो इस ब्रह्मपुर (हृदय) में यह सूक्ष्म पुडरीक (कमल) घर है और इसम को सूक्ष्म अंतवर्ती आकाश है उस आकाश में जो (ब्रह्म) हे उसको दूदनाचाहिये और जानना चाहिये। समीक्षा यद्यपि ब्रह्म सर्वत्र व्यापक है, परन्तु उन मनुष्यों के लिये जो ममी योगासन अवस्थाको प्राप्त नहीं हुये हैं इसमत्रमें यह उपदेश दिया गया है कि अपनी मनोवृत्तियाको स्थिर करने के लिये नित्य गुरूपदिष्ट मार्य द्वारा अपने हदयाकाश्में ब्रह्मके दर्शन करें अयोव अपनी मनोवृत्तियोंका ब्रह्माकार बनावें दर्शन ७॥ ३३५ ते य एवमेतद्विदुर्य चामी अरण्ये अासत्यमुपासते तेऽर्चिरमाभसंभवति इत्यादि वृहदारण्यकोपनिषत् पष्ठोऽध्याये । द्वितीयं ब्राह्मणं मंत्र १५ ।। अर्थ)जो लोग देवयान और पियाण की विद्याओं को जानते हैं वह बनमें श्रद्धा पूर्वक ब्रह्मको उपासना करते हुए देवयाने मार्गद्वारा ब्रह्मको प्राप्त होते हैं। समीक्षा यहां धन से अभिप्राय निर्जन बन या ग्राम से दूर कोई उत्तम एकान्त स्थान है। अथ ये यज्ञेन दानेनतपसा लोकाञ्जयोत ते धूपमभिसंभवति । इत्यादि । वृ० षष्ठोऽध्याये दिवा मंत्र १६ ।। (अर्थ)जो यज्ञ, दान, तपसे लोफोको जीतते हैं वह धूमको प्राप्त होते । इत्यादि ॥ समीक्षा--उपरोक्त दोनों मंत्रों में देवयान और पितृयाण मागों का वर्णन किया गया है। यह विषय गीता अ० १० के श्लो०२४।२५।२६॥ की समीक्षा में समझाया गया है, मुमुक्षजनोंको वही देख लेना चाहिये। य एतो पन्यानो न विदुस्ते कीटाः पतङ्गायदि दं दंदशूकम् ॥ वृ० अ० ६हि० वा. मं०१६॥ (अर्थ) जो मनुष्य इन दोनों मार्गोमें से किसी एकको भी नहीं जानते हैं वह मरकर कोट पतङ्गादि पापयोनियों को प्राप्त होते हैं. समीक्षा-इन उपरोक्त मत्रों में यह दिखाया गया है कि देवयानसे गमन करनवाले अर्याव) ज्ञानावस्था में मरनेवाले मोक्षको प्राप्त होते हैं और जो पिश्याणसे गमन करेत हे अर्थात सासारिक भोगोधी वासनासे यज्ञ, दान, तपस्या करने के कारण इन्ही भोग वासनाओं को लेकर मरते ३ वह बार २ जन्म मरणरूपी चक्करमें घूमते रहते हैं, परतु इस सोलहवें मत्रकेमतका भाग यहभी बताता है किजो मनुष्य अज्ञान और आलस्यमें पडे हुए इन उपरोक्त दोनों मामिसे किसीको भी प्राप्त करने की चेष्टा नहीं करते थ६ मरफर कोट पतगादि पापयोनियोंको प्राप्त होते हैं। [ षड्दर्शनोपदेश] तस्य देहरविद्या ॥ योगदर्शन, साधना सूत्र २४ ।। (अर्थ)आत्माके बन्धनका हेतु आवद्या है। समीक्षा--जितने दास हे उन सबका मूलकारण महर्षि पतञ्जलिको सम्मतिमें विद्या है मतः हम सबको चाहिय कि अविद्याके नाश करनेके लिये पूर्ण प्रयत्न करें। अत्यन्तदुःखनिवृत्या कृतकृत्यता ॥ सांख्यदर्शन अ०६सूत्र ५ ॥ [भ] मनुष्य अपनेको कृतकृत्य तभी समझे, जब अपने पुरुषार्थ द्वारा त्रिोवोध तापोंसे। अत्यंत निवृत्ति प्राप्त करचुके ।। त्रिविध ताप निम्नलिखित हैं: आध्यात्मिक-शारीरिक और मानसिक व्य धियोंसे होनेवाले दुःख. माविमतिक-सिंह, सादिक हिंसक जीवों या चोर, डाकू और शत्रुओंसे होनेवाले दुःख माधिदैविक इतिवृष्टि मनावृष्टि और विद्युतादिद्वारा होनेवाले दुःख- - ३३६ विवार दर्पण. समीक्षा-उपरोक्त तीन प्रकारके दुःखोसे अत्यन्त निति बरी प्राप्त होसक्ती है, जब मनुष्य धर्मका सेवन करे । धर्मका रक्षण कणादमुनिने अपने वैशोषक दर्शनमें किया है यथा:- यतोऽभ्युदय निश्श्रेयस सिद्धिस्स धर्मः ॥ वैशेषिकदर्शन अध्याय १ सू-२॥ [ मर्य] जिस के करनेसे लौकिक और पारलौकिक सिद्धि प्राप्त हो वही धर्म है। समीक्षा-ऐसे कर्म जिनसे हम इस लोकमें विद्या ऐश्वर्यमारोग्यता और स्वात्रता मादि सात्विका पदायों की प्राप्ति करतेहर मरण पोछे क्रमश. परमोत्तम गति मोक्षको प्राप्ति हों वह धर्मशब्दस। बोले जाते है । गौतम मुनिने अज्ञान निवृत्तिसे मोक्षका होना माना है सो भी ठीकधी है, क्योंकि (जब मनुष्य का मिथ्या ज्ञान दूर होगा तभी यह धर्ममें प्रवृत्त होगा। गौतम मुनिका क्या है कि- दुःसजन्ममवृविदोषमिय्याज्ञानानामुचरोचरापाये तदनंतरापायादपवर्गः॥न्याय- दर्शन अध्याय १ सू० १॥ (मर्य) मिथ्या ज्ञानके नाश होनेपर दोषों (रागपादि) का नाश होता है, दोषकिनाश होनेपर प्रवृत्ति (धर्मविरुद्ध कामोंका करना का मार, प्रवृत्तिके नाश से जन्मका नाश और जन्मक नाशसे सम्पूर्ण दु.सों का नाश होता है अतः सम्पूर्ण दुःखोका नाश होभादी मोक्ष है समीक्षा- वेदान्ताचार्यमा ब्यासजीकाभी ऐसा ही मत है अर्थात् धर्माचरणको मोक्षका द्वारा मानते हैं ययाः तनिष्टस्य मोक्षोपदेशात् ॥ वेदान्तदर्शन अध्याय १ सू० ७॥ (अर्थ) उस परमात्मा निष्ठावान पुरपके लियही मोक्षोपदेश दिया गया है । समीक्षा-परमात्मा निष्ठा रखनेशले यही पुरुष समझे जाते हैं जो उसकी आज्ञाओंको मर्यात धर्मका पालन करते हैं और दूसरोंको ऐसा करने का उपदेश देते हैं । धर्माचरणसे ज्ञानकी शति होती है और ज्ञानसे मुक्ति मिलती ई । मदि ममिनीजी महाराज तो (चरणसेही मोक्ष की प्राप्ति मानते हैं यह यात भारवर्षके सब लोगों पर विदित है उनका उपदेश कि- अथातो धर्मजिज्ञासा । पूर्वपीमान्सा अध्याय १ सूत्र १॥ अर्थ-(अप) जव मनुष्योंका दु.खोंसे निवृत्तिको इच्छा दोनेपर यह ज्ञान होजावे कि धर्मही ऐसी वस्तु निसके आचरणसे दुःस्त्रोको अत्यत निवृत्ति होसकती है, तो उस शान्ये अनन्तरही के मनमें यह इच्छा हो कि (मत ) इसलिये (धर्मजिज्ञासा तव्या)। हमें धर्मको जानना चाहिये। समीक्षा-महर्षि जमिनितीका सिद्धात है कि मनुष्य क्मकाण्डरूपो धर्माचरणसे शुद्धान्त करणी बनता हे शुद्धान्तःकरणसे ज्ञानप्राप्ति होती है और ज्ञानसे मोक्ष मिलताई ।। [ मनुस्मृति] श्लोक-इन्द्रियाणांविचरतां विषयेन्चपहारिषु ॥ अयमेयल मातिष्ठविद्वान्यन्तेय बाजिनाम् ॥२॥८८॥ (अर्थ) विषयोंको सप प्रकारसे हानिकारक समझ कर विद्वान पुरुष इनमें विचरती हुई अपनी ।
दर्शन। M इन्द्रियोको रोके, जिस प्रकार रकम जुडे हुए छोडौंको सारथी वशमे करनेका यल करता है 'उसी प्रकार यत्न करे।। श्लोक-अनारोग्यमनायुध्यमस्वयंचाति भोजनम् ॥ अपुण्यं रोगविदिष्टं तस्मात्तत्प रिवर्जयेत् ।। अ०२ । ५७॥ अर्थ-आधिक भोजन करना अर्थात् जिह्वा के वशमे आकर मिष्ट, स्वादिष्ट और गरिष्ठ पदार्थ मा सादिकी बनी हुई वस्तुए मात्रासे अधिक खाना रोगका हेतु अवस्था(आय)को घटाता है, कारण कि अजीर्णको उत्पन्न करके रोग औरमरणका हेतु बनता है इससे भजन स्मरण,यज्ञ मा. दिशात्रीय कर्मभी नही ठीक हो सत्तेजिससे स्वर्ग आदिक उत्तमसुस प्राप्त नही हो सक्त इनते। पवित्रतामीमही रहसती इस रिये यह फाम अपवित्रभी है और लोक्में भी निन्दनीय है। क्योंकि लेग कहते कि नबइस मनुष्यपी एकजिवा इन्द्रीही वशमें नहीं तो और क्या करता है। लोक-उत्पादक ब्रह्मदात्रोरीयान्ब्रह्मदः पिता ॥ ब्रह्मजन्महि विप्रस्प मेत्य चह च शाश्वतम्॥२॥ १४६।। (अर्थ) जाम देने वाले और शास्त्रका उपदेश करने वाले पिताओं में पिछला साधक श्रेष्ठ है क्योंक दिशातियोकाजो दूसरा जन्म अर्थात गुरुद्वारा विद्या घ्ययन रूप जो नई बुद्धि और निये २ विचार उत्पन्न फरन वाला जन्म है. वही इस लोक और परलोक नित्य । आशय यह कि हमार शस्त्रकरोंने दो जन्म माने हैं, पहिला तो माता के गर्भ से ससार में आना इस (जन्म को ले पशुमो के लमसे बुर विशेष नहीं माना (देखो मनु२११४७)क्योंकि जिस प्रकार पशु जन्मस र्ख और शूद्र रहते हैं इसी प्रकार मनुष्य भी समझो, परन्तु दूसरा जन्म जो गुरू देता है वही उत्तम है और वही नित्य है। पस्तुत मनुष्य तभी मनुष्य काला सक्ता है जाकि गुरूरूप पिता द्वारा विद्यारुपी माताको (गोद में दूसरा जन्म लेता है। श्लोक आचार्यस्त्वस्य यां जाति विधिवद्देदपारगः । उत्पादयति साविन्या सा सत्या जरामरा॥२॥१४८॥ (अर्थ) वेदया पारगामी भाचार्य जिस जातिमें शास्त्रकी विधि के अनुसार इस मनुप्यको विद पढा कर उत्पन करता है वही इसकी स्थ यो जाति समझो ॥ समीक्षा-जो लोग यह समझते है कि हमने उत्तम कुल जन्म कोटिया अब हमको क्या भय हे वादे विद्या पढ़े चाई म पढेचाहे शास्त्रीय उत्तम कर्म करें चाहे न करें हम उत्तम कुल की कटो) प्रतिष्ठा पात रद्दमे जोकि हमारे विद्वान पिता, पितामहादि पाते आये हैं, यह उनकी भूल प्राचीनकाल्म यर शैली थी जैसा कि इससोको वर्णन है, कि वेद वेदागमें निपुण भाचार्यो समीप जाकर लोग पूर्ण विद्वान बनतेथे फिर परीक्षा लेकर जिस वर्णके योग्य वह आचार्य अपने शिष्योंको समझता या रसीवर्णमें रहनेका उसका माधिकार देता था. वह शिष्यमी माजीवन उस वर्णकी मर्यादाका पाटन करताया।तभी इसदेशम सबप्रकारकी उन्नति हुआ करतीथी, पति अपना दर्शन भी नही दिसथा सती थी। द्विजशब्ददी बताता है कि उत्तम मनुष्य वदीय दो जन्म दो, अर्थात् एक जन्म मावाके गर्भसे निकलना दूसरा जन्म गुरुकी सेवा में रहकर विद्यार्य રર विचार दपण. -- T- अवस्या समाप्त करनेपर गुणमसे ब्राह्मण, क्षत्री मार्दै वश धारण करके, तदनुसार कार्य करनको भतिज्ञा करना. इसमकार पूर्वकालमें शूद्र मायापके जन्म लेकरभो लागअपने .गुणकर्मस गुरुके, यहां वर्ण धारण करने के कारणही द्विज नाम प्रचलित हुभा ॥ श्लोक-पथा काष्ठमयो हस्ती यथा चर्ममयों मृगः । यच विप्रोऽनधोयानत्रयस्ते नाम विनति ॥२॥ १५७ (अर्थ) जेसे पाठसे दमाहुना हायो, धर्मसे बनाया हुआमृग आर विना पढ़ा द्विमातिवर्णका नरम, ये तीनों नाम मात्रको धारगकिये हुए हैं अर्थात् ये अपने नाम अनुसार कार्य मी रेन से पर्शनमात्र के हो हैं ॥ श्लोक-अज्ञो भवति वै वालः पिता भवति मंत्रदः। अशं हि पालोमत्याह पित्त्येव तु में प्रदम् ॥२॥ १५३ ।। (अर्थ) मूख दे वही बालक है और वेद पदे सत्शास्त्र का वान वाला है यो सिंह मामलोग अचीनकालमें मूसको वालक अति विद्याहीन, निर्बुद्ध कहते थे अरे शाखकज्ञान दिनमालेको पिना जयात् इसोक और परलोक कं दुखासे रक्षा करनेवाला कहन थे। श्लोक धृतिःक्षमादमाऽस्तयं शौचमिद्रिय निग्रहः । घर्विया सत्यमझापा दशक धर्म लक्षणम्॥६॥९२।। (अर्थ) धय ( दुःख घबराना नहीं) क्षमा (जहां तक होसक, एकबार मा अधक धार अपराध करने वालको दड न देना या न दिशाना ) दम (मनका राकता व वश करना) अस्तेप (किलो प्रकार को भी चोरी नहीं करना ) शोच ( शरीर और मनप्त पवित्र रहना ) इन्द्रियनिग्रह (पापक्मास इन्द्रियों को रोकना ) धी (बुदेको शास्त्र के सत्व मया सूक्ष्म २ वातोंको जानने वाली बनाना ) विद्या(इहलोकिफ और पारलौकिक अक पदायाको जानना जिससे थम, अर्थ, काम, मोक्ष, चारांपदार्थ प्राप्त होसके ) सत्य (जैसा मानता हो और जसा जानना हो उसको यथार्थ भापणकरना या प्रगट करना ) और अकाध (किमोसे उपदेशक कटुवदन अपने से छोटॉक पराध पर अप्रसन्नन होना समीक्षा- ये दश लक्षण धर्मके हैं इमने यहा बहुत:ो सक्षेमन इसके अर्थ खोलनको चेष्टा को है, यदि किसी को विस्तारपूर्वक अर्थ जानने की इजा हो तो नवजोवन प्रेस काशी में प्रकाशित पाटेत केशवदेवशास्त्री कृत"धर्म दश लक्षण" नामकी पुस्तक देखें। श्लोक-दूषितोऽपि चरेड यत्र तत्राश्रमे रतासमःसर्वेषु भूतेषुनलिंगंधर्मकारणमुदा६६ (अर्थ) चाहे जिस आश्रममें मनुष्य स्थित हो पायाप्रय हाकर पिता पक्षात के सबके साथ व्यवहार करता हुवा उपराक धृति क्षमा मादि धर्ना को धारण को। चाहे उस वाश्रमके चिन्द धारण न करें क्योंकि बाबर के चिन्ह यया बडे २जिक धारण करना, हाथ में नाला रखना, या यही २ जटा बढाना, सडाउऑपर चना, गनने पर बउआ, या विशेष करके गरे आदि भेष धारण करना इत्य दि धर्मक कारण नहीं होसक्त, धर्म तो घृति क्षमा दश महासोको सपन २ समय पर धारणकरलेका नाम है।
दर्शन ७ .... श्लोक-दुराचारोहि पुरुषो'लोके भवति निन्दितः! दुःखभागी च सतत ध्यापितोऽल्पायुव च ॥४॥ १५७ ।। (अर्थ) खोटे आचरण वाला पुरुष निन्दित दुःखका भागने वाला; सदा रोगोप्स साहित, गौर थोडी आस्था भोगने वाला होता है; इसकारण दुराचार (कुकर्म ) को छोड सदाचारका आचरण करे श्लोक-ययत्परक्शं कर्म तत्तयलेन व जयेत् यद्यदात्मवशं तु स्यावत्तसेवेत यत्नतः ४१५९ (अर्थ)ो काम दूसरोके वशमें हों, उनका यत्न करके त्याग करद और जो २ माधीन धों उनका यन्त्र कामाको यत्र पूर्वक केर । समीक्षा-विदेशी वस्तुपरको निर्भर रहनाएक प्रकारश परवश काम थे। लोक-सर्व परवशं दुःसं सर्वमात्मवशं सुखम्एदांदयात्समासेन लक्षणसुखदुम्स्त्रयो। ४॥१६० अपन पर प्रथमवार तुवर्जयेत् ॥ ४॥ १६१॥ (अर्थ) जिस कके करनेसे अपने अन्तारात्माको सतोष हो उसको यत्न से कर और जिससे जन्तरात्माका सतेप प्राप्त न हो ऐसे कामोको कदापि न करें। (समीक्षा) इसझोकमें धर्म ओर मधमके ,रक्षण बताये है, यदि हम ध्यान पूर्वक अपन अतःकरणकी वृतियोंको देखते जायें ता अवश्य पता लगेगा कि धर्म कामोके काने अन्तरात्मा प्रसन्न होता है और पापफमाके फरनेपर अतरात्माम एकप्रकारका ग्लानि सी होताहै; तो लोग चोरी, व्यमिवार, हिंसा आदि करते हैं उनके चित्तम अवश्य एक खटकासा होता है। श्लोक-यत्र श्यामो लोहिताक्षो दण्ड श्चरति पापहा । प्रजास्तत्र न मुह्यति नेता चेत्सायु पश्यति ॥ तस्याहुः संप्रणेतारं राजानं सत्यवादिनम् ।समाक्ष्यकारिणम् प्रानं धर्मकामार्थ कोविदम् ॥ तं राजा प्रणय- सम्यक् त्रिवर्गणाभवईते । कामात्मा विपमः क्षुद्रो दंडेनैव निहन्यते ॥ मनुः १०७ श्लोक २५-२६-२७ ॥ (अर्थ) जहाँ कृष्ण (काले) वर्ग वाला, लालनेत्र भयकर पुरूषके ममान पापों का नाश कर, नेवासा दट विचरता है, वहीं प्रजा पापी नहीं होसक्ती परन्त बात यह है कि दंडका चलान वाला पक्षपात रहित विद्वान होनाचाहिये ॥ ॥जो उमटेडका चलानेवाला मत्यवादी, विचारके साथ काम करने वाला; बुद्ध मान्, धर्म, अर्थ. और कामकी सिद्धि करने में पांडत है।विधान लोग उसी राजाकोदंडका चलानवाला कहते हैं। जो गजाटण्डको अच्छेप्रकार, चलाता है, वह धर्म, अर्थ औरकामको सिद्धिको बढाता है परतु विषयमें लम्पट कुटेिल, टेढाऐंठकरचलनेवाला ] द्वेपो (दृप्सरको सम्पत्तिको देखकर सहन न करनेवाला.) क्षुद्र, छोटे हृद् ) नाचबाद राजा उसोदंडसे मारा जाता है ॥ ३ ॥ श्लोक-सेनापत्यं च राज्यं च दण्डनेतृत्वमेव च ।। सर्वलोकाधिपत्यं च वेदशास्त्र ३४० विचार दर्पण विदहति ॥१॥ दशावरा वा परिषयं धर्म परिकल्पयेत् ॥ त्र्यवरावापि वृवस्था धर्म न चालयेत् ॥२॥ त्रैवियो हेतुकस्ती नैरुक धर्मपाठकः । अयश्चाश्रमिणः पूर्व परिपत्स्या देशावरा ॥ ३ ॥ ऋग्वेदवियजुर्विच्च सामवेद विदेव च. न्यवरापरिषज्ञेया धर्मसंशय निर्णये ॥ ४ ॥ एकोऽपि वेदविद्धमं व्यवस्येद् हिजोत्तमः । स विज्ञेयः परोपी नाज्ञानामुदितोऽयुतः ।। अवतानाम- मन्त्राणां जातिमात्रोपजीविनाम् ।सहस्रशः समेतानों परिपत्वं न विद्यते ॥६॥ किंवदति तमोभूता मूर्खा धर्ममताईदः तस्यापंगतधाभूत्वातहतमनुगच्छति ॥ ७ ॥ मनु. अ. १२ श्लोक १००-११० से ५१५ पर्यंत. (अमुल्य सेनापति, मुख्य राज्याधिकारी मुख्यन्यायाधीश और राजा ये चारों सब विद्याला पूर्णविद्वान होने चाहियें ॥ १॥ न्यूनसे न्यून दशविद्वाना अथवा बहन्यूनतो तीन विद्वानोंकी सभा जैसी व्यवस्थाधर्म, की करे उस धर्म अथोत् व्यवस्थाका काई भी उल्लघन नहीं करे ॥२॥ इस सभामे चारा घद, मोमान्सा (कानूनकी विचार विद्या, जितको आजक्ल पूरिसडेस करते हैं, न्यायशास, निरक ( वेदकै शब्दोकामर्थज्ञान) धर्मशाप्त मादिके जाननेवाले . दलाता यादवदा मलाका जानन वाला एकमावानएकाका निय कर दे तो उसका धर्मका निर्णय (सलामान, परन्तु सहसा मूर्ष मिलकर जसबातका निर्णय कद उसको राजा कभी न माने । समीक्षा-देखिये अगले समयमै विद्वानों की बात का फितना आदर और मान होता था, लोगजोमूर्व होते थे और जो अपन पापकों को छिपाने के लिये झूठा धर्मका आइपर रिखोलोगोको बुरा कहकर और धमकी देकर ठगना चाहते थे, उनकी बातोंकी कोई नी मानता था । आजकल बहु स्थानों पर देसनेमे आरहा है कि लोग अपने दूपणों को छिपाने के लिये और अपनी पोल खुल जानेके भय से उन्नति के कामो को रोकने के लिये अपने को सनातनी कहकर और उन्नति करने वालों को "नास्तिक पासण्ड" इत्यादि कहकर सच्चे सनातन धर्म को कलक लगा रहे हैं। इसलिए सच्चे धमके, मियो को चाहिये कि वे ऐसे मिथ्या मामधारी सनातमनमी बननेवालों की धमकी में न आवें सच प्राचीन सनातनवर्म के मार्ग पर चलवे जाय जैसा कि मनुमहाराजने इस श्लोक्में हमको ज्ञा दी है।। ५॥ जो मनुष्य ब्रह्मचर्य (वरिक्षा ) स्त्य माषणादि व्रत और शानविद्या से शून्य ( खाली ह और जन्मसे ही शूद्रवत् वर्तमान ई उन सदसों मनुष्यों के मिलमेसे भी सभा नहीं बनसक्ती, दश पंद्रह की तो बातही क्या ॥ ६॥ जो मूर्ख लोग वेदोंको अर्थात् सभी धर्मशाखाको न जानकर जिसबात को धर्म करें उसकोकभी न मानना चाहिये, क्योंकि जो मूख के कहे हुये धर्म के अनुसार चलते हैं उनके पीछे सेबडो प्रकरके पाय लग जाते हैं, जसा कि मारवाड आदे प्राता में विवाहादि दर्शन ७ ॥ सिस्कारों के समय मूर्ख स्त्री और पुरुष "नेगचार" नाम के धर्म बताते हैं, वे बहुधा त्यागने योग्य है,इन को न त्यागा जाय गा तबतक दुःखों मे छुटकारा कदापि नहीं मिलसकेगा श्लोक-धर्म एव एतौ इतिधारक्षतिरक्षितःतस्माद्धर्मोनहन्तव्योमानोधर्मोवधीत्।। (आमनु०अ० ८ श्लोक १५ ।। (मर्य) बुद्धिमानों को चाहिये कि धर्माचरणसे कमी न इटें क्योंकि ऐमा नियम है कि धर्मा- चरणसे मनुष्यों को सुख सम्पत्ति प्राप्त होते हैं और धर्म के विपिरीत चलेन से अर्थात मिथ्यामा पण, परस्त्रीगमन, परधन हरण आदि पाप करने वालों का नाश होता है; इमलिये कल्याण की इच्छा करने वालों को मानी जाति के सब मनुष्यों को धर्मात्मा बनाना चाहिये जिससे देश की उन्नात हो, धर्माचरण करने वाले मनुष्य जाति में बढ़े यही उन्नतिका उप य है। [हितोपदेश] लोक-विवादशातिविनयविनयावातिपात्रताम् । पात्रत्वादनपानोति धनादम ततःसुखम् ॥१॥ (मय) विद्यास मनुष्य बडा नौतिमान होता दे नीतिमान होनेमे श्रेष्ठ, विद्वान और धामेफ पुरुषोंकास्गोतम रहनके योग्य बनता है। इनकी संगातसे सात्विक धनप्राप्त होतादे,धनप्राप्त होनसे आत्मोन्नति. देशमेरा ओर जातिसेवास आदि धर्मक काम को भली प्रकार करसता a; जिससे सदा सुसी रहता है॥१॥ श्लाक-अनेकतशयोच्छाद परीक्षार्थस्यदर्शकम् । सर्वस्य लोचन शास्त्रं यस्य नास्त्यन्ध व सः॥ २ ॥ (अर्थ) विद्यावाला मनुष्य प्रत्येक वस्तुको निश्चय पूर्वक जानसक्ता है; विद्याबलसे गप्त २ रहस्यों को जानता है (जैसा कि विद्यावलसे लोगाने रंल, तार, मांटग्गाडी, कायन आदि प्रकातक अनेक भेनाको जानालया और जानरह है) जिमको विद्यारूपी मंत्र वही आवागला ऐ शेष विद्याराहेत मनुष्य अधेहा ॥२॥ समीक्षा-जिन मनप्याके घर धन सम्पति हो और जिनकी सतान मवयवकहा उनको तो सपना सतानको अवश्य पहाना चाहियः नदी तो बडाहा हान होगा जमा कि लिखा है । यथा:- श्लोक-यावरंधनसम्पत्ति प्रभुत्वविवेकता एवं कमप्यनायरिमु यत्रचतुष्ट भूशा (अ) गया पयत्या के साथ धनपम्पातेहो लोगोंका प्रभुदो अर्थात् राजकमार कद्दाववालाहाआर साथ विद्या हान हो; एफरभी माधन अनर्थ कराने वाला है, जयये चारों साधन एकदा स्थानपर मिजाय त अनयंका कुछ ठिकाना ही नहीं. समीक्षा--सबका चाहिये कि अपनी संतानको विधान बनायें और जो लोग कहते हैं कि भागमें लिखा है सा हागा लडकाफी विद्या पढ़ाने का क्यों पर किया जाय, ऐसे मूखों की बात नसुनें ॥३॥ श्लोक-अजरामरवत्माज्ञो विद्यामर्थ च चिन्त येत् । गृहीत इव केशेषु मृत्युना धर्ममाच रत् ॥ ४॥ - दर्शन ! ragarmireonmen- (अर्थ) इन शोको समुद्रमेंट नावके समान छोडेदेना चाहिये। जो यज्ञोपवीत डालकर गुरु तो बननाये और कुछ पढा न सके, न उत्तम उपदेश देसफै ऐसे गुरु को, मूख पुरोहितको, ऐसे राजा को जो दुष्टोंसे रक्षा न करे, शास्त्र विरुद्ध कटु वचन बोलने वाली अपनी खीको, जो गौ को बनमें चरानकी प्रतिज्ञा करें और अपना कर्तव्य पालन न करने ग्राममें रहने की इच्छा परे ऐसे ग्वाटको और जो नाई और ( हजामत ) आदि कामोंकी प्रतिज्ञ करके ग्राम को न रहे और चनों में ही खेती बाड़ी करने की इच्छा करे ऐसे पुरुषोंकी Halesi (उडक में अपने काय न बिगडने दे। श्लोक-इदं च त्वां सत्यपरं ब्रवीमि, पुण्यं पदं तात महाविशिष्टम । न जात कामान भयानलोमांढर्म जह्याज्जीवितस्यापि हेतोः ॥ १॥ नित्यो यः सुखदुःखे त्वनित्ये. जीवो नित्यो हेतुरस्य त्वनित्यः। त्यत्वाऽनित्यं प्रतितिष्ठस्व नित्ये संतुष्य : त्वं शोषपरो हि लाभः ॥ २ ॥ (अर्थ) हे तात (प्यारे ) तुमसे एक यह अत्युत्तम (सबसे श्रेष्ठ ) मत कहता कि कामस, लोभसे, मयसे और जीवनकभी लिये कभीधर्भको नहीं छोड़ना चाहिये ॥१॥ क्योंकि धर्म नित्य है और सुख दुःख अनित्यअर्थात् कभी आते हैं कभी चले जाना जीव ( अपने शुद्धस्वरूपसे)नित्य है। इसको वन्धन में रखने वाली शरीरादि उपाधियां मनित्य हैं, इसलिये हे राजन् ! अनित्य वस्तुओंमें मन न लगा कर नित्य की भोर ध्यान दो। [चाणिक्यनीति] श्लोक-गुणाः सर्वत्र पूज्यते न महत्योऽपि संपदः ॥ पूर्णेन्दुः किं तया पो निष्कलंको यथाकृशः ॥ १॥ (अर्थ) सब स्थानों में गुण पूजे जाते हैं बडी सम्पति नहीं, पुर्णिमाका पूर्णभी चंद्रमा, क्या वैसा दन्दित छोता है जैसा विना कलेकके द्वितीयाका दुर्वटभी चद्रमा ॥ श्लोक-वृशं रघु राणास्तूलं सूलादपि च याचकः ॥ बायुना किन नीतोऽतो मामयं यायिप्यति ॥२॥ (अर्थ) तृण (घासतिनका) हलका है, तृणसे हलकी रूई है और रूईसे भी इलका याचक (मांगनेवाला) है, वायु रूको तो अपने साथ लेजाती है, क्योंकि उसको यह भय नहीं है कि रूई मुझसे कुछ मॉगगी. परन्तु याचक को अपने साथ नहीं ले। जाती इस भयसे कि यह कुछ मुझसे माग न लेवे। श्लोक-पृथिव्यां त्रीणि रत्नानि जनमाप सुभाषितम् । मू: पाषाणखंडेषु रत्नसंज्ञा विधीयते ॥३॥ (अर्थ) पृथ्वीपर जल,अन्न और प्रिय हितकारी बचन तीनही रल है, मूल्ने .. टुकडों को रत्न गिना है। --- ३४४ विचार दर्पण, श्लोक-धनहीनो न हीनश्च धनिकः स सुनिश्चयः । विद्यारत्नेनं हीनो यः स हीनः सर्व वस्तुषु ॥४॥ (अर्थ) दोहा-दीन नहीं धनहीन जन, धन थिर नाहि प्रवीन हीनन और विवानिये, विद्या हीन सु होम ॥ श्लोक-अंतःसारविहीनानामुपदेशो न जायते ॥ मलयाचलंसंसान वेणुश्चन्द- नायते ॥५॥ (अ) गमोरता विहीन पुरुषों को शिक्षा देना सार्थक नहीं होता । मलयाल सगले बाँस चन्दन नहीं होजाता ॥ (समीक्षा) यदि उपदेष्टा लोगोंको उपदेश करते समय ऐसे मनुष्योसे भी काम.पडे, जिनपर उनके उत्तम उपदेशका कुछभी प्रभाव न पडे तो उनको खिन्न नहीं होना चाहिये, क्योंकि संसारमें सभी मनुष्य उत्तम ममें होसते, वर्षाती सभा जगह होतो है परन्तु उपर भूमि कभी फल नहीं देती फलंदने वाली भूमि दुसरीही होती है । श्लोक-मुहूमीपजीवच्च मरम्शोनकर्मणा नकल्पमपि कप्टेन लोकहपविरोधिनाद [मर्थ ] उत्तम कर्मसे मनुष्योंको मुहूर्त्तभर का जीनाभी श्रष्ध है, दोनों लोकोंके विरोधी दुष्ट फर्गसे कल्प (कई लाख वर्ष) भरका भी जीनाउत्तम नहीं है ॥ [ तत्त्वार्थाधिगम सूत्र.] [जैनसिद्धान्त का एक माननीय ग्रंथ] फुत्नकर्मक्षयो मोक्षः । अ० १० सू० ३॥ अर्थ-सम्पूर्ण कमोंका क्षय होनाही मोक्ष है यह मोक्ष केवलज्ञान उत्पन्न होने वाले जीवोंको प्राप्त होता है। मोक्षा-जैनसिद्धान्तानुसार जवाामा अनादिकालसे कर्मवन्धनोंमें फसाहुमा अनादि कालसे ही जन्ममरण रूपी दुःखशं भोग रहा है ! जिन संसारेक भागोको यहां सुख मानेहए है वह वास्तवमे दुख रूप ही हैं ! क्योंकि वह अस्थायी, और विन्न संयुक्त है । अतः जीवात्माको चाहिये कि ऐसा प्रवल पुरुषार्य कारकि सम्पूर्ण कोमोक्षय करके येवल ज्ञान के उदय होने पर मोक्ष भागी होजाए । मन, वचन, कायाकी सभी प्रिया धर्म शब्दसे शोली जाती है। जिस सपप जो किया हाती है पह, भविष्य में या तत्कालही आउ प्रकार का फल देनेवाली होताहै । कर्ममें मित्र २ फल देने का गुणही "धर्म प्रकृति वाला जाता है। जैन सिद्धान्तानुसार 'कर्म प्रकृतियाँ,, आठ हे अयीत् "मोदनीय, ज्ञानावरणीय, दर्शनावरणीय, अन्नराय, वेद: नीय, नाम, गांव और आयु" मुक्तारण आत्मा अपने शुद्ध स्वरूपमें होता है। वह उस अवस्थामें चराचर सब वस्तओको इस्तापालकवत् जानता है, देखनाहै और अपने आत्म स्वरूपमें रमण करता है। या यों कह मके हैं कि अपने ज्ञान, दर्शन और चारित्र रूप शक्तियोंको पूर्ण रूप धारण किये रहता है। .
दर्शन ७ जो कर्म जीवात्माको अपने स्वरूप से हटाकर सांसारिक भोग विलासों फंसाते हैं वह मोहनीय कर्म है जो अठाईस प्रकार के होते हैं। जो कर्म जीवात्माको ज्ञानशक्तिको ढाप लेते हैं वह ज्ञानावरणाय कर्म यह पांच प्रकारके होते हैं। जो कर्म जीवात्माकी दर्शन शक्तिको हक लेते हैं वह दर्शनावरणोय कर्म नो(९ प्रकार के होते हैं। जो कर्म जीवात्माकी भोग आदि शक्तियोंको ढकते हैं वह अंतराय कप कहलाने है पद्द पांच प्रकारके हैं। जो कर्म जावात्माशे सुख दुःखका भान कराते है यह वदनीय कर्म कहलाते हैं। जो कर्म जीगत्माको शरीर इन्द्रियादिके धारणा रखनेय सहायक बनते हैं वह नाम कर्म है । इनक तिरानवे भेद हैं। जो कर्म जीशत्माको उच्चनीच कलमेजन्म दिलाने वाले हैं वह गोत्र कर्म कहलाते हैं इन के दो भेद हैं जो कर्म किसी शरार विशेष के साथ किसी अवधि विशेष तक जीवात्माका संयोग रसाते हैं वह आयुकर्म बहलाते है । इसके चार भेद हैं।इसरकार एकसो अडतालीस [१४८] "कर्म प्रकारेगांगहे। हम विस्तार भयसे इन सब बातोंका विवरण यहां नहीं लिखसके. जिनको इस विषय में अधिक ज्ञान प्राप्ति की इच्छाही तो तत्वाधिगम सूत्र, योर' 'आप्तनिश्चय लङ्कार, ग्रंणकोदेखें मोहक्षयाज्ञानदर्शनावाणान्तरायक्षपाचकेवलम् । अ०१० सू.१ अर्थ- मोहनीय, ज्ञानावरणीय, दर्शनावरणीय तथा अन्तराय फमप्रकृतियों के क्षाणा होनेपर वलके ज्ञान प्रगट होता है। समीक्षा कर्मक्षय और कर्म के उपशममें यह भेद कि "कर्मफा क्षय" तो ऐसा है जैसे वीज की उगने रूप शक्तीको जला देना और वीजका जल पृथ्वीका सयाग न हाने देनेसे उसकी प्ररोह शक्तिको नष्ट नही करके उसको निर्वल रखनेके ममान उपशम है परंतु जब कभी पृथ्वी और जल का संयोग प्राप्त होगा तभी वीज उग आयेगा इस लिये तपस्यादि साधनोंहारा प प्रछातयोंके क्षय करने में नथा मि. ध्याज्ञान (अविधा ) कषाय (लोभ क्रोगदि ) अविरति ( हिंपादि कामांमे न हटना) प्रमाद [ मोक्षमार्गमें न लगना और प्रवृत्ति [सांसारिककामोंमे लगना. जैनशाखों प्रकृतिका दूसरा नाम योग है; इन पांच बन्धातुओंके अभावम ही केवल ज्ञान उदय हाता है अब हम एक और. सूत्र लिखकर इस प्रकरणका समाप्त करते हैं। अनित्याशरणसंसौरैकत्वाऽन्यत्वाशुचि त्वानवसंवरनिर्जगलोकबोधिदु- लभधर्मस्वाख्याततत्त्वानुचिन्तनगनुप्रक्षाः ॥ अ० ९ सू०७॥ (अर्थ) अनित्पत्यानुप्रेक्षा, अशरणानुप्रेक्षा संसारानुप्रेक्षा, एकत्यानुप्रक्षा, अन्पत्या दर्शन ७॥ ३४७ [४] इस संसारमें मैं एकाकी अफेटा) ही हूं मेरा कोई भी स्वकीय [ अपना] परकीय (दुसरा) नहीं है। इसतिसे रागपके अभाव होनेसे निःसंगताको प्राप्त जीव मोक्षकेही अर्थ प्रयत्न करताहै,यह चतुर्य एकत्वान प्रेक्षा । आत्माको शारीरसे पृथक् चिन्तनकरना चाहिए शरीर अन्य पदार्थ है, मैं शरीरादिसे विलक्षण पदार्य .शरीर तो इन्द्रियोंका विषय है और मैं यतीन्द्रिय हूं। शरीर जड है और मैं ज्ञान- स्वरूप चेतन हूं। इसप्रकार यह अन्यत्वाऽनुप्रेक्षा व्याख्यात हुई ॥ ५॥ 'यह शरीर अशुचि अर्थात् आशयों से अपवित्र है ऐसा चिंतन करना चाहियों श्लेष्माशय, पित्ताशय, तपा वाताशय तीन आराय होते हैं, श्लेष्मा,पिच तथा वायु इन धातुओंसे शरीग्की स्थिति चाक्रिया होती है। यह तीनों भुक आहारको श्लेष्मान स्थिति से क्रमशः वीर्य दशा तक पहुंचाते हैं। ग्लानि होनेसे वह जीव शरीर के नाश तथा मोक्षकाप्राप्तिके लिये चेष्टा करता है. इस सैतिसे यह पाठ अशुचिस्वानुप्रेक्षा कही गई ॥६॥ इसलोक क्या परलोकमें भी विन्न कारक बढी २ नदियोंके प्रवाहक वेग सदृश अति उग्र अकुशल [ मूर्य ] तथा शास्त्रकुशल दानोंको भी काँफे आगमनके हारमृत आघव ! पापकों का करना] रूप इन्द्रियोंको कल्याणमार्ग से खंडित करने वाली चिंतन करना चाहिये। यह आस्वानुप्रेक्षा हुई॥ ७॥ अहिंसा, सत्य, अस्तेय (चौरीत्याग) ब्रह्मचर्य ( मैथुन त्याग अपरिग्रह शरीरको स्थिर रसने के लिये आवश्यकीय भोजनववादिके अतिरिक सांसारिक पदायोंका त्याग,यह पांच महावतों द्वारा मन,वाक्काया के पापों को रोकना संवर कहलाता गो मात्मा संकृत है अथात् संवर गुण सहित है उन जायकों आरवके जोसम दोष कहे गये हैं वे सभी नहीं होते । इस प्रकार चिंतन करनेवा ली हि संवरके लिये समर्थ होती यह संवरानुप्रेक्षा व्याल्यात हुई ॥८॥ कर्मपन पर चिन्तन करता मामाणी कमों का निरण अर्थात नाश करनेही में समर्थ होता है,इस रीति से निजतनुप्रेक्षा व्याल्याताई ॥९॥ उत्पचि, स्थिति, अन्यभावकी प्राप्ति तथा नाशसे युक्त यह संसार है ऐसा चिंतन करे । इसप्रकार विचार करते हुए जीवका तत्वज्ञानकी शुद्धता प्राप्त होती है। इस रीतिसे दशम लोकानुप्रेक्षा व्याख्यात ६९० अनादिकाल से सिद्ध इस संसारमें, अनेक बार जन्मोंको धारण करके, अनंत वार भ्रमणकारते हुए, अनेक प्रकारके दुःखों से पीडित, मिय्यादर्शन आदिसे नरवद्धि तथा ज्ञानावरणीय, दर्शनावरणीय, मोहनीय और अन्तरायभूत कमोंके उदयसे पराजित इसजीवको सम्यग्दर्शन आदिसे सर्वथा शुद्ध ज्ञानकी ३४८ •विचार दर्पण. . ." प्राप्ति अतिदुर्लभ है, ऐसा चिन्तन यरे में इस प्रकार घोधि [बोघ] दुर्लभताका भनुचिंतन करते हुए इस जीवको बोषिकी प्राप्ति होती है और दोधकी प्राप्ति करनेसे प्रमाद अर्थात् अशुभ आपरण नहीं होता,इस प्रकारसे यह एकादश कोधिदुर्लभत्वानुमक्षा वर्णित हुई ॥११॥ सम्यग्दर्शनका हारभूत अर्यात् सम्पग्दर्शनकी प्राप्तिका हार, पञ्चमहावत रूप साधनोंसे सयुक्त, हादश अङ्गोंसे युक्त, सब जीव आदि नौ तत्वोंका उपदेश वरनेवाला, गुप्ति आदिकी अतिशुद्ध मा सहित ससारस उतारनेगाला ,तथा माक्षका प्रापब,यह जनधर्म सा उत्तम है ऐसा चिन्तन रुदा करना चाहिये। पसा करनेसे धमार्गके अनुकूल अनुष्ठान करनेमें व्यवस्थिति होती है । इस रीतिसे यह हादश "धर्मसाल्यात तत्यानुप्रेक्षा" समाप्त हुई ॥ १२॥ [तुलसीहतरामायण] ॥चौपाई॥ सोपिय विप्र जो वेद बिहीना, तज निज धर्म विषय व रीना ॥ सोचिये नृपति जो नीति न जापा, जिहिं न मजा गिय प्राण समाना ॥ सोचिय वैश्य करण धनवानू, जो न अतिपि शिवभक सुजानू ।। सोयि वटु निज व्रत परिहरिही, जो नहिं गुरुभायस अनुसरही । खानस पोहि सोचन योग, पविहाय जिहिं भाव भोगू ॥ ॥दोहा॥ सोविय गृही जो मोह बश, करें धर्म पप त्याग । सोचिय यती प्रपंचरत विगत विवेक विगग । ॥चौपाई॥ दामिनि दमा रहार घन्माही, सलगी प्रीति यथा घर नाहीं।। यूद निघात सहें गिरि से, खलके वरन सत सहें जैसे ॥ दाम वान फरोभ अपारा, मोघ विच नित छाता जारा। प्रीति पाहिं जो तीनों भाई, उपनै सन्निपात दुःखदाई ॥ [भर्तृहरिकृतवैराग्यशतक] छप्पय-सहें खल्लो बैन इतपर तिनदि रिझाये, नैननको जलरोक शून्यमन, मुख मुसकाये । देतनही बछु विच तेऊपर जोर दिखाये, करसर चाव करोर भोरही दौरत आये ।। सुनि "आश" प्यास तरी प्रत तू अति अद्भुत गति, गहत । इहभाति नचायो मोहि अब और कहा कारवो चहत ॥
दर्शन ७॥ ORE उप्पय-उदै अस्त, रवि . होत धायुको क्षीण करत नित । गृहधंधेके माहि समय बीतत अजानचित- । आंखिन देखत जन्म जरा अरु विपति मरन नित तहुँ डरतनहिं नंफ शंकहू नाहिं करत चित । जग जीव मोह मदिरा पिये छाके फिरें ममादमें ॥ गिरत उठत फिर२ गिरत विषय वासना स्वादमें। कुण्डलिया-चेही निशि वे. दिवस ही तिथि के बार । उपमा वही क्रिया केही विषय विकार वेही विषय विकार तुरत देवत अरु सूंघत विही भोजन भोग जागिसोक्त अरु ऊँघत ! महा निलज्ज यहजीव भोगमें भयो विदेदी । अजहूं पलटत नाहिं वाढत गुण वेके घेही ॥ छप्पय-पृथ्वी परम पुनीत पलंग ताको मन मान्यों । तकिया अपनो हाथ गगनको तम्बू तान्यों । सोहतचंदचिराग बीजना करत दशों दिशि । वनिता अपनी वृधि संगही रहत दिवस निशि । अतुलित अपार सम्पति सहित सोबत हैं - सुखमें मगन । मुनिराज महानृपराज व्यों पौढे देखे हमहगन ॥ छप्पय-धीरज जाको पिता क्षमा है जाकी जननी । सत्य वचन है मित्र दया है। जाकी भगिनी । शांति सुवाला नारि भूमितल नौया सोहै । संयम मनको बंधु वसन दिक् दिनकू मोहै । जिन ज्ञान सुधाको असन रसि सब एते परिजन लहैं। फिर योगीको क्यों डर रहे सदा मुदित मन है रहे ।। छप्पय-भोगरहे भरपूर आयु यह भुगत गई सबा तपो नाहि तप मूढ अवस्पानपत भई अब काल न कितहूं जात वयस यह चली जात नित । वृद्धभई नहिं आस वृद्ध वय भई छांडि हित । अजहूँ अचेत निच चेतकर देह गेहसों नेह तन । दुःख दोपहरन मंगलकरन श्रीहरि हरके चरण भज ।। महात्माचरणदासजीकृतभक्तिसागर ॥ चौपाई ब्राह्मण सों जोब्रह्म पिछाने बाहर जाता भीतर आने । पांचों वशकरि झूठ न भावै। दया जनेऊ हृदये रासै । आतमविया पटै पढावै । परमात्माका ध्यान लगावै काम क्रोध मति लोभ न होई । चरणदास कहैं ब्राह्मणसोई। कविच-दीसत न वारपार परिरह्यो जगत सार, ऐसोही अटल नेक टारो ना टरत है। ताको तौ नहिं नाश और ठौर रह्यो भास । जैसे रहत पुष्पवास पासही रहता है ॥ लोचन रह्यो समाय वेदह सके न गाय । पुस्तक लिखो न जाय जारो ना जरत है ॥ शुकदेवजीकी दया चरणदासको प्रकाश भयो जैसे मैं खोजिपायो पायों न परत है ।।
३५० | विचार दर्पण. मा- . . ग्रंथसाहिव हजारकेशब्दः सूहीमो०१ पंचग्रंथी (गुरुनानकजी प्रणीत) जोगन खिंया जोगन डंडे जोगन भसमचढाईये जोगन मुंदी मूंड मुडाइये जोगन मांगी वाईये अंर्जन मांहि निरंजन रहिये जोगजुगत इंवपाईये ॥१॥ गल्लो जोगन होई, एक दृष्टि कर समसर जाने, जोगी कहिये सोई जोग न बाहर मढी मणी जोग न ताडी लाईये । जोग न देसदिसतर भगिये, जोग न तीरथ न्हाईये ॥ अंजन माहि निरंजन० ॥२॥ सत्गुर भेटे तां सरसा टूटे, घावन वर्ज रहाईये निसर झरे सहज धुन लागे,घरही परचा पाईये। अंजन,मांहि ॥३॥ मानक जोरत्येयां मरणहोय.ऐसाजोगकमाईये पाजे वाजहो सिंगी वाजे, तो निभॊ पद पाईय। अंजनमाहि ॥४॥२-धनाशरी मोहल्ला ९ साधो इदो जग भरम भुलाना, रामनामका सिमरन छोडधा मायाहाय विकाना रहा नमातापताभाईसुत,नितातांकेरसलपटाना जोवन धनमभुताके मदमें नहिनेिश रह दिवाना दीनदयाल सदा दुःखभजनतासों मन, नलगाना जन मानक कोटिनमें फिन्गुरुमुखहोईछिपाना :-तिलग मु. ९ काफी चेनन है तो चेतले निश दिनमें प्राणी । छिन २ अवध विहात है फूटे घट ज्यो पानो [रहा ] हरगुन कान गाव हो मूरख अज्ञाना झूठे लालव लागके न्ह मरन पिछाना। जजहूं कछु विगस्यो नहीं जो प्रभुन गावे महो नानक तेहं भगनते निर्भय पदपाव ( फुटकर दोहा श्रादि) (१) भारतीय कृपक पुकार दोहा विना ज्ञान विज्ञानको कृषिजो करत सदादि । तेहि कारण दुखको लदै, कृपजनभारत नोट-(१) सिंथा, गुदड़ी [२] मुंदी, मुद्रा [३] वाईये, वजाईये [४] अंजन माया (५) निरंजन, निलेर [६] गल्ली, वातोंसे [७ ] सनसरा, समदृष्टि [[८] मदी, मठमसाणी, ९ श्मसानसेवन [१०] ताडी त्राटकमुद्रा [११] भेटे, मिले.
दर्शन ७ ।'
माहि ॥ भारत के अपमानखों, यही विनय सब ठोर शिक्षा ज्ञान विज्ञानसों, कारि
प्रचार शिरमौर
-
t
(२) अमेरिकन कृषक का कथन
जोनर ज्ञान विज्ञानलों, कृषिको करत बनाय एसी रहें यह जन्मभर, हृदय न हप
समाय
(३)चारों वर्णीका कथन
आयहि आदि समाज के, हम, चारों अंग विना परस्पर मेनके, भयो रंग भंग ॥
४) पंवसमाजके आचार्योंका कयन
यांग भकि गोरक्ष ये, मूल धर्म है एक । देश कालके भेदसों, शाखा भई अनेक ॥
पुरख जन अज्ञान वश वर्मत भेद विचारावियोन्नति सब मिह करहु होपहि वेद प्रचार
(पूर्ण)
H
पं० श्रीधर शिवलालात्मज पंकिसनलालजीने
अपने ज्ञानसागर" यंत्रालय में मुद्रित करप्रकाशित
किया.
स्थान माटुंगा बम्बई
अथ अष्टादशोऽध्यायः॥ ॥ अर्जुन उवाच॥ न्यासस्यमहाबाहोतत्त्वमिच्छामिदेदितुम त्यागस्य च हृषीकेश पृथक्केशिनिषूदन । दोहा-त्यागतत्वजानौंचहत, कहियोजोभगवान॥ तत्वऔरसंन्यासको, न्यारोकरोवपान ॥१॥ अर्जुन पूछताहै कि हे महाबाहो! हे हृषीकेश ! (इन्द्रियों के नि- यन्ता)हे केशिनिपूदन ! मैं संन्यास और त्यागके तत्वोंको भिन्नर सुनना चाहता हूँ आप कृपा करके कहिये ॥१॥ ॥श्रीभगवानुवाच ॥ काम्यानकर्मणांन्यासंसंन्यासंकवयोविदुः सर्वकर्मफलत्यागंप्राहुस्त्यागंविचक्षणाः॥ दोहा-कामयुक्तकर्मनितजै, कहैताहिसंन्यास ॥ कर्मफलनकोत्यागयह, त्यागकहतबुधिदास ॥ अर्जुनके प्रश्न के उत्तरमें भगवान् कहते हैं कि पंडितजन सकाम क माके छोड देनेको संन्यास कहते हैं और सत्यासत्यकी विवेचना करने वाले पुरुप सम्पूर्ण काँके परित्यागको त्याग कहते हैं ॥२॥ त्याज्यंदोपवदित्येकेकर्माहर्मनीषिणः॥ यज्ञदानतपःकर्म नत्याज्यमितिचापरे ॥
अध्याय १८. दोहा-कर्मछांडियदोपते, कोउकहतयारीति ॥ यज्ञदानतपकर्मजिन, तजौऔरयहनीति ॥३॥ कितनेही ज्ञानापुरुष यह कहतेहैं कि दोषवाला कर्म छोडदेना- चाहिये और कितनेही यहभी कहते हैं कि यज्ञ, दान और तप आदि काँका त्याग करना उचित नहीं है ॥३॥ निश्चयंत्रणुमे तत्र त्यागंभणासत्तम । त्यागोहिपुरुषव्याघत्रिविधःसंप्रकीर्तितः॥ दोहा-याठौरहिपदअर्थतू, मेरौनिश्चयजानि । तीनभांतिकौत्यागयह, अर्जुनचितमेंआनि ॥ हे भरतर्षभ ! हे पुरुषसिंह ! इस त्यागके विषय में जो कुछ मैंने निश्चय किया है सो सुन, यह त्याग तीन प्रकारका कहा गया है। यज्ञदानतपःकर्मनत्याज्यंकार्यमेवततः ॥ यज्ञोदानंतपश्चैवपावनानिमनीषिणाम् ॥ दोहा-यज्ञदानतपकर्म ए, कीजैतजियेनाहिं। यातेंपंडितजनइन्हैं, गिनत पवित्रनमांहिं॥५॥ हे अर्जुन ! यज्ञ, दान और तपादिक जो कर्म हैं उनका त्यागना ठीक नहीं है, किन्तु इनका करना अवश्य है, क्योंकि यज्ञ, दान और तप विवेकी पुरुषों के चित्तको शुद्ध करते हैं ॥५॥ एतान्यपितुकर्माणिसंगत्यक्त्वाफलानिच कर्तव्यानीति मेपार्थनिश्चितंमतमुत्तमम्।। .
भगवडीताभावाटीका.
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दोहा-फलछांडेसंगहितजे, कर्मकरैचितलाय॥
अर्जुनयहमेरौजुमत, निश्चय उत्तमदाय ॥६॥
(परन्तु ) हे अन । ये कर्म आसक्ति और कर्मफलको आशा
छोडर करने चाहिनं, केवल ईश्वराराधनके निमित्त इन काँका
करनाही मनको पवित्र करता है यह मेरा निश्चय है ॥ ६ ॥
नियतस्यतुसंन्यासःकर्मणोनोपपद्यते ॥
मोहात्तस्यपरित्यागस्तामसःपरिकीर्तितः
दोहा-जोआवश्यककर्महै, ताकौंछांडिनदेय ॥
जोछांडेअज्ञानतम, सोतामसगहिलेय ॥७॥
हे अर्जुन ! नित्य जो संध्या और पंचमहायज्ञादि कर्म हैं इनका
त्याग देना उचित नहीं है क्योंकि इनके करनेसे चित्त शुद्ध होकर
मुक्तिके मार्गका अगलंबन होता है और जो मोहसे इनको त्याग
देते हैं उनका यह त्याग तामप्सी कहाता है॥७॥
दःखमित्येवयत्कर्मकायक्लेशभयात्त्यजेत
सकृत्वाराजसंत्यागंनैवत्यागफलंलभेत् ॥
दोहा-यहैजानिकर्मनितजै, मतिदेहीदुखहोय ॥
सोतोराजसत्यागहै, निरफल कहियेसोय ॥८॥
हे अर्जुन ! जो इन कर्मोंको दुःखरूप समझकर कि इनके करने से
केवल शरीरको कष्ट होता है, छोड देते हैं वह त्याग राजस कहाता
है, परन्तु इस त्यागसे त्यागफल कुछ नहीं मिलता है॥८॥
अपाय१८ कार्यमित्येवयत्कर्मनियतंक्रियतेऽर्जुन ॥ संगत्यक्त्वाफलंचैवसत्यागःसात्विकोमतः दोहा-करनोकर्मअवश्ययह, जानजुकीजकर्म ॥ संग औरफलकूतजै, सात्विकत्यागसुधर्म ॥९॥ हे अर्जुन ! यह कर्म अवश्य करना है यह जानकर नियत जो नित्यकर्म सो अवश्य करे और आसक्ति तथा कर्मफलको आशाका परित्याग करदे, ऐसाही त्याग सात्विक कहाता है ॥९॥ नद्वेष्टयकुशलं कर्म कुशले नानपज्जते । त्यागीसत्त्वसमाविष्टोमेधावीछिन्नसंशयः दोहा-बुरेकर्मनिंदैनहीं, भलेरहै नहिलागि। बुद्धिवंतसंदेहविनु, यहैसात्विकी त्यागि।॥३०॥ अब सात्विक त्यागीके लक्षण कहते हैं, हे अर्जुन ! जो सात्विक गुणोंसे युक्त है, बुद्धिमान है जिसके संशय दूर होगये, ऐसा त्यागी अकुशल काँसे द्वेष नहीं करता है और कुशल काँसप्रीति नहीं करता है अर्थात जिन कर्मोंसे शरीरको किसी प्रकारका कष्ट पहुंचता । है उनको करने में अरुचि नहीं दिखाताहै और जिनकसि शरीरको सुख पहुंचता है उनके करने में रुचि नहीं करता है ॥१०॥ नहिदेहभृताशक्यंत्यक्तुकर्माण्यशेषतः॥ यस्तुकर्मफलत्यागीसत्यागीत्यभिधीयते दोहा-देहवंतसों कर्म ए, नाही छाडै जाँहिं॥ कर्म फलनिको जो तजे, सोई ज्ञानी मांहिं॥
३५६ भगवद्गीताभाषाटीका हे अर्जुन ! देहधारी संपूर्ण कर्मों को करता रहता है परन्तु कर्मफ- लॉको त्याग देता है वही त्यागी है ॥११॥ अनिष्टमिष्टमिश्रंचत्रिविधकर्मणः फलम् ॥ भवत्यत्यागिनांप्रेत्यनतुसंन्यासिनांकचित दोहा-स्वर्गनरकअरुभूमिमय, त्रिविधकर्मफलजानि कर्मवंतकोहोत है, मंन्यासी नहिं मानि ।।१२।। अनिष्ट ( अनचाही वस्तुका मिलना), इष्ट (चाही वस्तुका मि- टना) मिश्र (चाही अनचाही वस्तुओंका मिलना) ये तीन प्र- कारके कर्मफल कर्मफलाभिलापियों को मरनेपर मिलते हैं और जो संन्यासी हैं उनको ये नहीं मिलते हैं ॥१२॥ पंचैतानिमहाबाहोकारणानिनिबोधमे ॥ सांख्येकृतांतेप्रोक्तानिसिद्धयेसर्वकर्मणाम दोहा-अर्जुन मोपै सुनियतू, कारणहैं ए पांच ॥ कह्यो सांख्य सिद्धांतमें, कर्म सिडको सांच ॥ १३॥ हे महाबाहो! संपूर्ण कर्मोंकी सिद्धिके जो पांच कारण जो सांख्य सिद्धान्तमें कहे हैं उनको तू सुन ॥ १३ ॥ अधिष्ठानंतथाकर्ताकरणंचपृथग्विधम् ॥ विविधाश्चपृथक्चेष्टादैवंचैवात्रपंचमम् ॥ दोहा-अधिष्ठान कर्ता है, और करन बहुभाय ॥ नानाविधि व्यापार अरु, पंचम दैव गिनाय ॥१४ अध्याय १८! ३५७ अब उन पांच कारणों को कहते हैं १ अधिष्ठान अर्थात् शरीर, २ कर्ता अर्थात् जीव, ३ करण अर्थात् मन और चक्षुरादि इन्द्रियोंके कार्य, ४ प्राण अपानादिक पांच वायुओंकी चेष्टा और५ इन्द्रियोंका प्रेरक दैव अर्थात् अन्तर्यामी ये पांचों सिद्धिके कारण हैं ॥ १४ ॥ शरीरवाङ्मनोभिर्यत्कर्मप्रारसतेनरः॥ न्याय्यवाविपरीतवापंचैतेतस्यहेतवः ॥ दोहा-मन अरुबचनशरीरसों, कर्मकरतयासाज॥ भलोबुरौकोऊ करौ, इन बिनसरैनकाज ॥१५॥ हे अर्जुन ! शरीर, वाणी और मनके द्वारा मनुष्य जिस न्याय अथवा अन्याय्य कर्मको करता है उसके हेतु येही उक्त पांचों कारण तत्रैवसतिकर्तारमात्मानंकेवलंतुयः॥ पश्यत्यकृतबुद्धित्वानसपश्यतिदुर्मतिः॥ दोहा-जे नर आतम एकको, देखत हैं कर्तार ॥ ते कछु वे देखत नहीं, हैं वे मृढ गँवार ।। १६॥ हे अर्जुन ! उक्त पांच कारण हैं ऐसा निश्चय होनेपर भी जो के- बल अपने आत्माको कर्त्ता मानता है वह दुर्बुद्धि यथार्थ ज्ञानका जाननेवाला नहीं है इससे यथार्थ बातको नहीं देखता है ॥ १६ ॥ यस्यनाहंकृतोभावोबुद्धिर्यस्यनलिप्यते ॥ हत्वापिसइमाँल्लोकान्नहंतिननिबध्यते ॥
३५८
भगवद्गीताभाषाटीका.
जाकी बुद्धिनलिप्तहै, अहंकारनहिंजाहि॥
सोइनलोकनको हन, हनेनबंधनताहि ॥१७॥
हे अर्जुन ! जिसको यह अहंकार नहीं है कि मैं कहूं और जि-
सकी बुद्धि कमोमें लिप्त नहीं है वह इन सब लोकोंको मारता है तो
भी उसे मारनेका पाप नहीं लगता है इसका यह आशय है कि तुम
जो इस संग्राममें मनुष्योंके बधसे डरते हो सो जो तुम अहंकारको
त्याग कर्म फलमें अलिप्ततासे जो इनका बध करो (जो) तो कुछ
पाप नहीं होगा ॥१७॥
ज्ञानज्ञेयंपरिज्ञातात्रिविधाकर्मचोदना॥
करणकर्मकर्तेतित्रिविधःकर्मसंग्रहः ॥१
दोहा-प्रेरकतीनों कर्मके, ज्ञानज्ञेयज्ञातार ।
करण कर्म कर्ता कहै, संग्रह तीन प्रकार ॥१८॥
हे अर्जुन ! यज्ञादि कर्तव्य कर्मोंका जानलेना ज्ञान है जानने
योग्य कर्म जेय है, और शास्त्रोक्त रीतिसे जान लेनेवाला परिज्ञाता
है, ज्ञान, ज्ञेय और परिज्ञाता इन तीनोंसे कर्मकी प्रवृत्ति होती है
तथा इन्द्रियादिक करण कर्म और करनेवाला कर्ता ये तीनों कर्मक
रनेके संग्रह हैं अर्थात इन तीनोंसे कर्मको प्रवृत्ति होती है।॥१८॥
ज्ञानकर्मचकर्ताचत्रिधैवगुणभेदतः॥
प्रोच्यतेगुणसंख्यानेयथावच्छृणुतान्याप
दोहा-त्रिविध होत गुन भेदते, ज्ञानकर्म करतार ।
सांख्य शास्त्र में जे कहे, तेमुनिलेयाबार ॥१९॥
अध्याय १८. हे अर्जुन ! सांख्य शास्त्रमें भी गुणोंके भेदरो ज्ञान, कर्म और का तीनही प्रकारके कहे गये हैं उनको भी यावत् सुन ॥१९॥ सर्वभूतेषुयेनैकंभावमव्ययमीक्षते ॥ अविभक्तविभक्केषुतज्ज्ञानं विद्धिसात्विकम दोहा-जो करिदेखैजीवमें, अविनाशीइहिभाय॥ न्यारे में न्यारेनहीं, सात्विकज्ञानबतायः॥२० 'हे अर्जुन! जिसज्ञानके द्वारा स्थावर जंगमादि संपूर्ण भिन्न भिन्न प्राणियों में अभिन्न और अविनाशी एकहीभाव दिखाई देता है अ. र्थात् जिस ज्ञानसे छोटे बडे सब एकही दिखाई देते हैं वही सात्वि- क ज्ञान है ॥२०॥ पृथक्त्वेनचयज्ज्ञानंनानाभापान्एथग्विधान वित्तिसर्वेषुभूतेषुतज्ज्ञानं विद्धिराजसम् ॥ दोहा-नानाभावइनमें लखें, न्यारोन्यारो ज्ञान॥ भिन्न लखें सब जीवको, राजस ज्ञानसुज्ञान । हे अर्जुन ! जिस ज्ञानसे संपूर्ण देहोंमें रहनेवाला एकही क्षेत्रज्ञ भिन्न भिन्न दिखाई देता है वह राजस ज्ञान है ॥ २१ ॥ यत्तुकृत्स्नवदेकस्मिन्कार्येसक्तमहैतुकम् ॥ अतत्वार्थवदल्पंचतत्तामसमुदाहृतम् ॥ दोहा-पूरनजानो एकमें, विनुकाइजरेमित्त॥ तत्वअर्थविनुअल्पमति, तामसज्ञानसुनित्त ॥
भगवद्गीताभाष टिका. जिस ज्ञानसे एकही देह अथवा एकहीं प्रतिमामें संपूर्णरूपजाना जाता है अर्थात् यह कि शरीर ही आत्मा है और प्रतिमाही ईश्वर है जो ज्ञान निर्मूल है, जिस ज्ञानमें परमार्यरूप जो ईश्वर उसका अ. वलंबन नहीं है, ऐसे ज्ञानको तामस ज्ञान कहते हैं ॥ २२॥ नियतंसंगरहितमरागद्वेषतःकृतम् ।। अफलप्रेप्सुनाकर्मयत्तत्सात्विकमुच्यते ॥ दोहा-संगरागअरुद्वेषविनु, नियतकर्मजोकोय॥ तजिफला च्छाकीजिये,सात्विककर्मसुहोय ॥ अब तीन प्रकार । कर्म कहते हैं, हे अर्जुन ! जो कर्म नित्य किया जाताहै जिस कर्ममें मनुष्य आसक्त नहीं होता है, जो विना किसी प्रकारके राग द्वेषके किया जाता है और जिस कर्ममें फलमा- तिकी बाधा न हो, वह कर्म सात्विक कहाता है ॥२३॥ यत्तुकामेप्सुनाकर्मसाहंकारेणवापुनः॥ क्रियतेबहुलायासंतद्राजसमुदाहृतम् ॥ दोहा-जोकीजैकरिकामना, कैघोंकरिअहँकार ॥ जामेंश्रमहेअतिघनौ,सोराजसनिरधार॥२४॥ हे अर्जुन ! जो कर्म फल की इच्छासे किया जाता है वह राजस कर्म है।॥ २४॥ अनुवंधंक्षा इसामनपेक्ष्यचपौरुषम् ।। मोहादारभ्यतेकर्मयत्तत्तामसमुच्यते।
अध्याय १८ दोहा--पौरुषहिंसाशुभअशुभ, द्रव्यखरचनविचार। जोकीजै अज्ञानते, तामस कर्मनिहार ॥२५॥ अनुबंध (आगामि जन्ममें इस कर्मका फल शुभ होगा वा अ- शुभ ), धनव्यय, हिंसा और अपनी सामर्थ्यके विचारे बिना,जो कर्म किया जाता है उसे तामस कर्म कहते हैं ॥२५॥ मुक्तसंगोऽनहंवादीधृत्युत्साहसमन्वितः॥ सिद्ध्यसिद्धयोर्निर्विकारःकर्तासात्विकउच्यते दोहा-परिधीरजउत्साहसों, तजैसंगअहँकार ॥ निर्विकारसिधअसिद्धसम, सत्वकर्मकरतार ॥ अब तीन प्रकारका कर्ता कहते हैं, जो कर्ममें आसक्त नहीं होता है, जिसको अपने कर्तापनेका अभिमान नहीं है, जो धीरज और उत्साहसे युक्त है, जो कामके सिद्ध होने अथवा असिड होनेमें वि- कार रहित है अर्थात कामके होजानेपर प्रसन्न नहीं होता है और न होनेपर शोक ग्रस्त नहीं होता है वही कर्ता सात्विक है ।। २६ ॥ रागीकर्मफलप्रेप्सुलव्धोहिंसात्कोऽशुचिः हर्षशोकान्वितःकर्ताराजसःपरिकीर्तितः॥ दोहा--रागीचाहतकर्मफल, लुब्धकहिंसकहोय ॥ हर्पशोकसंयुतअशुचि, राजसकर्तासोय ॥२७॥ हे अर्जुन ! जो स्त्रीपुत्रादिकोंमें स्नेहयुक्त होकर कर्मकरने में आ- सक्त होता है, जिसे कर्मफलके प्राप्त होनेकी इच्छा है, जो लोभी है, जो औरोंका बध करने वा उनको पीडा पहुंचाने में उत्सुक रहता है,। . N भगवद्गीताभाषाटीका. जो अपवित्र है जो हर्ष और शोकसे युक्त है, वह कर्ता राजसः- हाता है।॥२७॥ अयुक्तःप्राकृतःस्तब्धःशठोंनैष्कृतिकोलसः विषादीदीर्घसूत्रीचकर्तातामसउच्यते ॥ दोहा-सबदिनरहैबिवेकविनु, सदाआलसीनित्त॥ दीरघसोचनवैनहीं, अरु विषादयुतचित्त ॥३॥ थोरेदिनके कामको, बहुत लगावे वार ॥ ताहीसों सवकहत हैं. यहतामसनिरधार॥२८॥ हे अर्जुन ! जो शास्त्रोक्त विधियोंमें असावधान होता है विवेकसे रहित होता है, स्तब्ध अर्थात किसीसे नम्र नहीं होता है, जो शठ होता है जो औरोंका अपमान करनेवाला होता है, आलस्यसे युक्त होता है शोकसे भराहुआ रहता है और जो कामको यथासमय न करके समयका टाला करता है वह कर्ता तामस कहाता है ॥२८॥ बद्धभेदधतेश्चैवगुणतस्विविधंशृणु ।। प्रोच्यमानमशेषेणपृथक्त्वेनधनंजय ॥ दोहा-बुधिअरुधीरजतीनविधि, होतजुगुनकेभाय॥ न्यारोन्यारोसबकहत, होंअवतु.सुनाय ॥२९ हे धनंजय ! सात्विक, रानस और तामस इन तीनों गुणों के का. रण बुद्धि और तिके भी तीन भेद हैं इनको में पूर्ण रीतिसे भिन्न कहताहूं उन्हें सुन ॥२९॥ ५ .
अध्याय ९८
ग
प्रवृत्तिंचनिवृत्तिचकार्याकार्येभयाभये॥
बंधमोक्षंचयावेत्तिवुद्धिःसापार्थसात्विकी
दोहा-काजअकारजभयअभय, औरप्रत्तिनिवत्ति
जानबंधनमुक्तिजो, सात्विकबुधिकीरति ॥३०॥
हे अर्जुन ! जो बुद्धि कर्तव्य कर्मों में प्रवृत्ति और अकर्तव्य कर्मों
में निवृत्तिको जानती है, कार्य और अकार्यको जानती है,, भय
और अभयको जानती है, तथा बंध और मोक्षको जानती है वह
सात्विकी बुद्धि है ॥ ३०॥
ययाधर्ममधर्मचकार्यचाकार्यमेवच ॥
अयथावत्प्रजानातिबुद्धिःसापार्थराजसी॥
दोहा-धर्मअधर्मनिकोलखै,कार्जअकारजजानि॥
जैसे है तैसेनहीं, बुद्धिराजसी मानि ॥३१॥
हे पार्थ ! जिस बुद्धिद्धारा धर्म, अधर्म और कार्य अकार्यका यथा-
वत् ज्ञान नहीं होता है वह बुद्धि राजसी कहाती है ॥३१॥
अधर्मधर्ममितियामन्यतेतमसावृता ॥
सर्वार्थाविपरीतांश्चबुद्धि,सापार्थतामसी
दोहा-जापापहिपुण्यकार दभअज्ञानीहोय ॥
लखैअर्थविपरीतसम, बुडितामसीसोय ॥३२॥
हे अर्जुन ! अज्ञानरूप अंधकारसे ढकीहुई जो बुद्धि कर्मको अ-
धर्म समझती है और संपूर्ण वस्तुओंको उलटा समझती है वह ता.
मसी कहाती है॥३२॥
भगवद्गीत,भाषाटीका वृत्याययाधारयतेमनःप्राणेंद्रियक्रियाः॥ योगेनाव्यभिचारिण्याधृतिःसापार्थसात्विकी दोहा-जासों इंद्रीरोकिके, एजुक्रियाअरुमान॥ योगयुगतनिहचलमहा, धीरजसात्विकजान ।। हे पार्थ 1 जो अव्यभिचारिणी अर्थात् किसी और वस्तुपर न ल- लचानेवाली ति एकाग्रतासे मन, प्राण और इन्द्रियोंके काँको धारण करती है वह सात्विकी धति कहाती है ।।३३ ॥ ययातुधर्मकामार्थान्धृत्याचारयतेऽर्जुन॥ प्रसंगेनफलाकांक्षीधृतिःसापार्थराजसी ॥ दोहा-धर्मअर्थअरुकामको, जोधारतचितचाय । चाहैफलहिप्रसंगसों, धीरजराजसभाय ॥३४॥ हे अर्जुन ! फलकी इच्छा करनेवाला फलप्रसंगसे जिस पृतिके द्वारा धर्म, अर्थ और कामको धारण करता है वह ति राजसीक- हाती है॥३४॥ ययास्वप्नभयंशोकविषादमदमेवच ॥ नविमुंचतिदुर्मेधाधुतिःसापार्थतामसी॥ दोहा-जोमयशोकविषादमद,सुपनमाहिठहरानि दुष्टबुद्धिछाँडैनहीं, धृतिजुतामसीजानि ॥ ३५॥ हे अर्जुन ! जिस धति द्वारा अज्ञानी पुरुष स्वम, भय, शोक, वि
अध्यय१८
३६५
पाद और मदको छोडते नहीं किन्तु ग्रहण करते है वह धति ता-
मसी कहाती है ॥३५॥
सुखंत्विदानींत्रिविधंशृणुमभरतर्षभ ।।
अभ्यासाद्रमतेयत्रदुःखांतंचनिगच्छति
दोहा-अवअर्जुनोसुनो, सुखकेतीनप्रकार ॥
जाकेअभ्यासहिकिये, दुखकोहोइ निवार॥३६
हे भरतर्षभ ! अब में तीन प्रकारके सुखोंको कहताहुं इस सुखका
अभ्यासकरनेसे बडा आनंद होताहै और दुःखकानाशभी होजाताहै
यत्तदग्रेविषमिवपरिणामेऽमृतोपमम् ॥
तत्सुखंसात्त्विकंप्रोक्तमात्मबुद्धिप्रसादजम्
दोहा-पहिलेतोविषसौलगै,बहुरिअमृतसोजोय॥
सोसुखसात्विकहैकह्यौ. बुद्धिप्रसादतेहोय ३७॥
हे अर्जुन ! जो सुख पहिले विषके समान लगता है, और परि-
णाममे अमृतके समान सुखदायी होता है वह आत्मबुद्धिकी प्रसन्न-
तासे उत्पन्न हुआ सुख सात्विक कहाता है ॥३७॥
विषयेंद्रियसंयोगाद्यत्तदग्रेऽमृतोपमम् ।।
परिणामेविषमिवतत्सुखंराजसंस्मृतम् ॥
दोहा-इंद्रियविषयसंयोगसुख, पहिलेअमृतसमान
पाछेजोविषसौलगै, सोराजससुखमान ॥३८॥
भगवद्गीताभापाटीका. हे अर्जुन ! इन्द्रियगण और विषयों के संयोग से उत्पन्न हुआ सुख प्रथम अमृत के समान होताहै और परिणाममें विषके समान होता है उसे राजसी सुख कहते हैं ॥३८॥ यदग्रेचानुबन्धेचसुखंमोहनमात्मनः ॥ निद्रालस्यप्रमादोत्थंतत्तामसमुदाहृतम्॥ दोहा-पहिलेअरुपाछेसुखद, मोहितकरजुदेह ॥ आलसनिद्रातेंउठे,तामसकहियेएह ॥३९॥ हे अर्जुन ! जो सुख आगे और परिणाममें भी आत्माको मोह- ता है तथा निद्रा, आलस्य और प्रमादसे उत्पन्न होता है उसे ताम- सी सुख कहते हैं ।॥ ३५॥ नतदस्तिपृथिव्यांवादिविदेवेषुवापुनः॥ सत्वंप्रकृतिर्मुक्यदेभिःस्यानिभिर्गुणैः दोहा-सोपुहिमी नहिंकछु, सुरमें अरुआकाश ॥ सत्वजुडनतीन्योगुननि, बँध्योनिमायापास। हे अर्जुन ! जो प्राणी प्रकृतिसे उत्पन्न सत्यादि इन तीनों गुणांसे निर्मुक्त हो ऐसा न तो कोई पृथ्वीमें है न स्वर्गमहै न देवताओमें है ब्राह्मणक्षत्रियविशांशूद्राणां च परंतप ॥ कर्माणिप्रविभक्तानिस्वभावप्रभवैर्गुणैः ।। दोहा-द्विजक्षत्री अरु वैश्यको, औरशूद्रकोकर्म ।। निजस्वभावगुणसोंभयो, न्यारेन्यारेधर्म ४१ अध्याय १०.. . हे परंतप ! ब्राह्मणात्रिय, वैश्य और शुद्र इन चारोंके कर्म प्रकृ- तिसे उत्पन्न सत्वादि गुणों के कारण पृथक पृथक् बनाये गये हैं ४१ शमोदमस्तपःशौचंक्षांतिराजवमेवच ॥ ज्ञानविज्ञानमास्तिक्यंब्रह्मकर्मस्वभावजम् दोहा-शमअरुदमतपशौचपुनि,क्षमानम्रताभाव आस्तिकज्ञान विज्ञानयह, ब्रह्मज कर्मस्वभाव • अब ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शुद्रोंके स्वभावसे उत्पन्न अलग काँका वर्णन करते हैं-हे अर्जुन ! शम (मनका निग्रह). दम बाह्यन्द्रियों की शान्ति,) तप (शारीरिक तपस्या), शौच (अन्तःक रणकी पवित्रता), क्षान्ति(क्षमा), आर्जव (नम्रता) ज्ञान (शा: सज्ञान), विज्ञान (अनुभवसे उत्पन्न ज्ञान) और आस्तिक्य (परलो कादिमें सत्यबुद्धि) ये सब ब्राह्मणों के स्वाभाविक कर्म है ॥ ४२ ॥ शौर्यतेजोधृतिक्ष्यिंयुद्धेचाप्यपलायनम् दानमीश्वरभावश्चक्षाकर्मस्वभावजम् ।। दोहा-शूरतेजधीरजचतुर, युद्धमाहिनपलाय॥ ठकुराईरुउदारता, क्षत्रीकर्मसुमाय ॥४३॥ शौर्य (शरवीरता), तेज, धीरज, चतुराई, युद्धसे न आगनाः दानदेना और ईश्वरभाव (प्रजाको नियमबद्ध रखनेके लिये दंड आदि देलेकी शक्ति) ये सब क्षत्रियों के स्वाभाविक कर्म हैं ॥४३॥ कृषिगोरक्ष्यवाणिज्यवैश्यकर्मस्वभावजम् परिचर्यात्मकंकर्मशूद्रस्यापिस्वभावजम् .
भगवद्गीताभासाहीका.
.
दोहा-लगनिबुद्धिकहुनाकरै, जीतैमनतजिआस
परमसिधिनहिंकर्मकी, पावकरिसंन्यास ४९॥
हे अर्जुन ! जिसकी बुद्धि किसी वस्तुमें आसक्त न हो, जिसको
किसी प्रकारका अहंकार नहीं है, जिसकी कर्मफलसे स्पृहा दूर होगई
है, ऐसा पुरुष त्यागरूप सन्यामसे निष्कर्म अर्थात सब काँसे नि
त्तिरूप सिद्धि प्राप्त करता है ॥ ४९॥
सिद्धिप्राप्तोयथाब्रह्मतथाप्नोतिनिबोधमे ॥
समासेनैवकौंतेयनिष्ठाज्ञानस्ययापरा५०
दोहा-सिद्धिपायपरब्रह्मको, जैसेपावेंसार॥
कह्योजुहौंसंक्षेपसों, निष्ठाज्ञानअपार ॥५०॥
हे कौन्तेय ! जो निष्कर्मरूप सिद्धिको पाकर जिस तरह ब्रह्मको
प्राप्त होता है सो मैं संक्षेपसे कहताहूं तू सून, यह ईश्वरीय ज्ञानको
परानिष्ठा है ॥ ५०॥
बुद्धशाविशुद्धयायुक्तोधृत्यात्माननियम्यंच॥
शब्दादीन्विषयांस्त्यक्त्वारागद्वेपौव्युदस्यच
दोहा-युक्तरहैधिबुद्धिमें, धीरजसोंनिरधार ॥ ·
शब्दआदिविपयनतजै, रागहेपकोंमार ॥५१॥
जिस प्रकार ब्रह्मकी प्राप्ति होती है सो कहते है कि हे अर्जुन! जो
पुरुष सात्विकीबुद्धिसे युक्त है, जिसने ति अर्थात् धारणासे अपनी
आत्माको वशीभूत कर लिया, शब्दरूप रसादिक विषयोंका परि-
त्याग करदिया है और राग और द्वेष दूर कर दिये हैं वही ब्रह्मभाव
को प्राप्त होता है॥५१॥
अध्याय १८ . ३७१ - विविक्तसेवीलध्वाशीयतवाकायमानसः ध्यानयोगपरोनित्यं वैराग्यसमपाश्रितः॥ दोहा-रहैदुोएकांतमें, लघुभोजनमनजीति ॥ ध्यानयोगअंतरसदा, वह बैरागकिरीति ॥५२॥ हे अर्जुन ! जो पुरुष एकान्तमें वास करता है, थोडा भोजन कर ताहै, जिसने वाणी, काया और मन वशमें कर रखे हैं, जो नित्य ही ध्यान योगमें तत्पर रहता है और मन में दृढ वैराग्य रखता है वही ब्रह्मपदको प्राप्त होताहै ॥५२॥ अहंकारंबलंदर्पकामक्रोधपरिग्रहम् ॥ विमुच्यनिर्ममःशांतोब्रह्मभूयायकल्पते ॥ दोहा-क्रोधपरिग्रहकामबल, दर्प और अहँकार॥ ममतातजिनिर्मलरहै, शांतिब्रह्ममयसार ॥५३ हे अर्जुन ! जो अहंकार, बल ( अपना पराक्रम), दर्प, काम, क्रोध, वस्तुओंका संग्रह इन सबको छोड ममताको त्याग शान्त- चित्त होजाता है वही ब्रह्मभावको प्राप्त होता है ॥ ५३ ॥ ब्रह्मभूतःप्रसन्नात्मानशोचतिनकांक्षति ॥ समःसर्वेपभूतेषमतिलभतेपराम् ॥ दोहा-ब्रह्मजुभयोप्रसन्नमन, शोचनकरैनचाह ॥ सबजीवनकोसमलखै. पावैभक्तिप्रवाह ॥५४॥ हे अर्जुन ! जो ऊपर कहे हुए तीनों श्लोकोंके भावानुमार ब्रह्ममें भगवद्गीताभाषादीका निश्चलचित्त रहता है, मनको प्रसन्न रखता है, न किसी गई वस्तका शोच करता है, न किमी वस्तुकी इच्छा करता है और संपूर्ण प्रा- णियों में समबुद्धि रखता है वही मेरी परमोत्तम भक्तिको पाता है ।। भक्त्यामामभिजानातियावन्यश्वास्मितृत्त्वतः ततोमांतत्त्वतोज्ञात्वाविशतेतदनंतरम् ॥ दोहा-मोकोजानोभक्तिकरि,जितनाहौंजिहिभाया मोहिजानिकैतत्वसों, ब्रह्मरूप हैजाय ॥५५॥ हे अर्जुन ! उस श्रेष्ठ भक्तिद्धाग मेरे सर्वव्यापी रूपका प्रमाण और मेरे सचिदानंदघनस्वरूपको तत्वसे जानताहै,इस तत्वज्ञानके उत्पन्न होनेपर फिर मुझमें प्रवेश होता है अर्थात मेरे परमानंद रूपको प्राप्त होजाता है ।। ५ ।। सर्वकर्माण्यपिसदाकुर्वाणोमद्यपाश्रयः॥ मत्प्रसादादवाप्नोतिशाश्वतंपदमव्ययम् ॥ दोहा-मोकर्मनिकोंनितकरै, मेरोआश्रयपाय ।। मोप्रसादतेजारहै, अक्षयपदकोंजाय ॥५६॥ केवल मेराही आश्रयरखनेवाला पुरुष जो सदा नित्य और नैमि तिक कर्मोको करता भी रहता है तो भी मेरी कृपासे वह अनादि और अनन्त पदको प्राप्त होता है॥५६ ॥ चेतसासर्वकर्माणिमयिसंन्यस्यमत्परः॥ सिद्धियोगमुपाश्रित्यमच्चित्तःसततंभव ।।
अध्याय दोहा-मनसोंमोमेंकर्मधरि, मातत्परतालेय ॥ बुद्धियोगकाँसेइकै, मोहीमेचितदेय ।। ५७॥ हे अर्जुन ! इससे अपने मनको मुझमें लगाकर सावधानहो, सब काँको मुझमें अर्पणकर ज्ञानयोगका आश्रय ले निरन्तर अपना चित्त मुझमें स्थिर करदे ॥ ५७॥ मंञ्चित्तःसर्वदुर्गाणिमत्प्रसादात्तरिष्यसि॥ अथचेत्त्वमहंकारान्नश्रोष्यसिविनंक्ष्यसि॥ 'दोहा-मोप्रसादतेंदुखसबै, तरि हैनिरआस ॥ अहंकारतबिनुसुनें,लहियेतजुविनाश॥ ५८॥ हे अर्जुन ! जो तू अपना चित्त मुझमें लगायो रक्खेगा तो मेरी कृपासे इस संसारके दुःखोंसे तरजायगा और जो तू अहंकारके का रण मेरी शिक्षा न मानेगा तो तू नष्ट होजायगा॥५८॥ यदहंकारमाश्रित्यनयोत्स्यइतिमन्यसे । मिथ्यैषव्यवसायस्तप्रकृतिस्त्वांनियोक्ष्यति दोहा-ल नहींतूजोकहत, अहंकारको मानि॥ यहतुवनिश्चैझूठहै, प्रकृतिकरावतआनि ॥५९॥ जो तू अहंकारका आश्रय लेकर यह समझताहै कि मैं युद्ध न क रूंगा, यह तेरा व्यवसाय मिथ्या है ( ऐसातो होही नहीं सकता), तेरा जातिस्वभावही तुझे युद्ध में प्रवृत्त करावैगा ॥ ५९॥ स्वभावजेनकौंतेयनिबद्धःस्वेनकर्मणा ॥ कर्तुनेच्छसियन्मोहात्करिष्यस्यवशोऽपितत ह १५४ भगवद्गीतामाताटीका. दोहा-अर्जुनअपनेकर्मसो, तूबांध्योहैनित्त॥ करयोनचाहेमोहते, परवशकरिहौमित्त ॥३०॥ हे अर्जुन ! जिस कामको तू अज्ञानसे नहीं करना चाहता है वही कर्म तुझको परवश होकर करना पडेगा, क्योंकि तू अपने स्व भावजन्य क्षत्रियधर्मसे बंधा हुआ है ॥६०॥ ईश्वरःसर्वभूतानांहदेशेऽर्जुनतिष्ठति ॥ भ्रामयन्सर्वभूतानियंत्रारूढानिमायया दोहा-ईश्वरसबकेहीयमें, अर्जुनरहतसमूढ॥ जीवभ्रमावतुहैसदा, करिमायाआरूढ ॥६१॥ हे अर्छन । ईश्वर संसाररूपी चक्रपर बैठेहुए संपूर्ण प्राणियोंको अ पनी मायासे घुमाता हुआ उनके हृदयमें निवास करता है ॥६॥ तमेवशरणंगच्छसर्वभावेनभारत ॥ तत्प्रसादात्परांशांतिस्थानप्राप्स्यसिशाश्वतम् दोहा-होड्सदावाकीशरन, अर्जुनतूममभाय॥ अविनाशीथिरशांतिपद, ताप्रसादतेपाय ६२॥ हे भरतवंश, अर्जुन ! सब प्रकारसे तुम उसी ईश्वरकी शरणमें जाओ उसीके अनुग्रहसे तुमको परमशान्ति प्राप्ति होगी और अवि नाशी पदको प्राप्त होओगे ।।६२॥ इतितेज्ञानमाख्यातंगुह्याद्गुह्यतरंमया ॥ विमृश्यैतदशेषेणयथेच्छसितथाकुरु६३॥
अध्याय १८ दोहा-ज्ञानकझोतोसोंजुमै जोजनप्रगटजुनाहि ॥ जोजानैंसोईजुकरि, धरिबिचारजियमाहिं६३ हे अर्जुन ! यह गुप्तसेमी गुप्त ज्ञान मैंने तुझको सुनाया है इन सबको अच्छी तरह सोच विचारकर जैसी तेरी इच्छा हो वैसा कर।। सर्वगुह्यतमंभूयःशृणुमेपरमंवचः।। इष्टोऽसिमेदृढमतिस्ततोवक्ष्यामितेहितम् दोहा-जोकळुहैसबतेपरे, परमवचनसोमानि । तुदृढबुद्धीमित्रमम, तोहितकहौंबषानि ॥३४॥ : हे अर्जुन ! और भी एक अत्यन्त गोपनीय बात कहताहूं उसे सुन, तू मुझको अत्यन्त प्याराहै इसीसे तेरी भलाई के लिये कहताहूं। मन्मनाभवमद्भक्तोमद्याजीमांनमस्कुरु॥ मामेवैष्यसिसत्यंतेप्रतिजानेपियोऽसिमे।। दोहा-मोकोंयजतूसत्ययह, नमिम , नमिमोमेमनरापि॥ अंतसमैहोमोहिमें, प्यारेतुमयहसापि ॥६५॥ हे अर्जुन! तू मुझहीमें चित्त लगा,मेरीही भक्ति कर,मेराही पूजन कर,मुझीको नमस्कार कर,जो तू ऐमा करेगा तो मुझीमें आकर मि लजायगा तू मेरा प्यारा है इससे मैं सत्य प्रतिज्ञाकरके कहताहूं३५॥ .
३७६ भगवद्रीताभाषाटीका. दोहा-सबधर्मनिकोंत्यागिके, मोसरनहितूआय दुरिकरोंसवपापकों, शोकतजोयामाय ॥६६॥ हे अर्जुन ! संपूर्ण विधि विधान और धर्मोंको छोडकर एक मेरी शरणमें आ, मैं तुझे संपूर्ण पापोंसे मुक्त करदूंगा जो तेरे मन में यह शोच है कि अब इनके मारनेका पाप लगेगा इसका भी शोच मत कर, मै तेरे सब पाप दूरकर दूंगा॥६६॥ इदंतेनातपस्कायनाभक्तायकदाचन ॥ नचाशुश्रूपवेवाच्यनचमायोऽभ्यसूयति॥ दोहा-जाकेतपनहिभक्तिनहिं, औरशुश्रुषानाहिं ॥ तासें तृयहजनिकहे, जेमोद्वेषीहि ॥६७॥ हे अर्जुन ! जो ज्ञान मैंने तुझे सुनाया है वह ऐसे आदमियोंसे कहे जानेके योग्य नहीं है जो तपस्वी नहीं है, मेरा भक्त नहीं है,जो ईश्वरकी शुश्रूषा नहीं करता है और जो मेरी निन्दा करता है ॥६७॥ यइदंपरमंगुह्यमद्भक्तेष्वभिधास्यति । भक्तिमयिपरांकृत्वामामेवैष्यत्यसंशयः दोहा-मो भक्तनसोंजोकहै, परमदुरयोयहज्ञान । सोमेरीभक्तिहिलहै, मोमेरहनिदान ॥६८॥ हे अर्जुन ! जो इस अत्यन्त गोपनीय ज्ञानको ,मेरे भक्तों को सु नावैगा वह मेरी परम भक्ति पाकर अन्तमे निश्चयही मुझमें लीन होजायगा ।। ६८॥
अध्यय:१८ नचतस्मान्मनुष्येषुकश्चिन्मप्रियकृत्तमः भवितानेचमेतस्मादन्यःप्रियतरोभुवि ॥ दोहा-मोकोंप्यारेबहुतवह, होप्यारोहंताहि ॥ वहमनुरापैजीयमें, हौंराषौहियमांहि ॥६९ ॥ है अर्जुन ! जो गीताको उपदेश करता है वे मनुष्यों में उससे अ धिक मेरा कोई प्रिय करनेवाला नहीं है और न 'पृथ्वीमें उससे अ धिक कोई प्यारा होगा ।। ६९॥ अध्येष्यतेचयइमंधय॑संवादमावयोः॥ ज्ञानयज्ञेनतेनाहमिष्टःस्यामितिमेमतिः॥ दोहा-धर्मवादजोहमकियो, पढेजोकोऊजानि॥ ज्ञानजज्ञतिनहोंजज्यो, यहमेरोमतमानि७०॥ हे अर्जुन ! जो कोई हमारे तुझारे इस धर्मसंबन्धी संबादको पढे- गा वह ज्ञानयज्ञद्वारा मेरा यजन करेगा यही मेरा मत है ॥७॥ श्रद्धावाननसूयश्चशृणुयादपि योनरः॥ सोऽपिमुक्तःशुभाँलोकान्प्राप्नुयात्पुण्यकर्मणाम दोहा-श्रद्धायुतपनविना, याहिसुनैजोकोय॥ पुण्यवंतलोकनिलहै, मुक्तजुताकोंहोय ॥७॥ हे अर्जुन ! जो कोई मनुष्य श्रद्धापूर्वक गीताको पढता है और नि न्दक नहीं है वह मुक्त होकर उन शुभलोकोंको जाता है जहां पुण्य करनेवाले रहते हैं ।।७१ ॥
१७८ भगवद्गीताभाषाढीका कच्चिदेतच्छ्रतंपार्थत्वयैकाग्रेणचेतसा ॥ कच्चिदज्ञानसंमोहःप्रणष्टस्तेधनंजय ७२ दोहा-चित्तएकहीव्हेसुन्यौं, तैंअर्जुनयहधर्म ॥ मिव्योमोहअज्ञानको, औरछुटैचितमर्म ॥७२॥ हे पार्थ! जो उपदेश मैंने तुझे दिया है वह तैंने एकाग्रचित्तसे सुना है वा नहीं और हे धनंजय ! इसके सुननेसे तेरा अज्ञानज- न्य मोह दूर हुआ वा नहीं ॥७२॥ ॥ अर्जुन उवाच॥ नष्टोमोहःस्मृतिर्लब्धात्वप्रसादान्मयाच्युत स्थितोऽस्मिगतसंदेहःकरिष्येवचनं तव ॥ दोहा-मोहगयोआईसुरति, एहोश्रीभगवान ।। गयोदूरसंदेहअब, तुमआज्ञापरधान ॥७३॥ यह सुन अर्जुन कहने लगा कि हे अच्युत! आपके अनुग्रहसे मेरा मोह जाता रहा है. ज्ञान प्राप्त होगया है और अब मुझे किसी प्रकारका सन्देह नहीं रहा है अब मैं तुह्मारी आज्ञाका पालन करूंगा ॥संजय उवाच ॥ इत्यहवासुदेवस्यपार्थस्यचमहात्मनः॥ संवादमिममौषमद्भुतंरोमहर्षणम् ७४॥ दोहा-हरिअर्जुनकीबातए, सुनीजुमैयाभाय॥ अचरजरूपअनूपति, रोमहर्पचितचाय ७४ अध्याय९८ अब संजय कहता है कि हे.टतराष्ट्र ! मैंने महात्मा वासुदेव और अर्जुनका यह अहुत संवाद सुना, इसके सुननेसे शरीर रोमांचित होरहा है॥ ७४॥ व्यासप्रसादाच्छतवानेतद्गुह्यमहंपरम् ॥ योगंयोगेश्वरात्कृष्णात्साक्षात्कथयतःस्वयम दोहा-परमदुर्योमतयहजुहौं,सुन्योव्यासपरसाद योगीश्वरश्रीकृष्णजू, निजमुखकियोबिवाद। हे वृतराष्ट्र :-व्यासजीकी कृपासे साक्षात् योगेश्वर भगवान् श्रीकृ- प्णके स्वयं मुखसे निकलते हुए इस परम गोपनीय योगको मैंने सुना ।। ७५ ॥ राजन्संस्मृत्यसंस्मृत्यसंवादमिममद्भुतम् केशवार्जुनयोःपुण्यं दृष्यामिचमुहुर्मुहुः॥ दोहा-बारबारसुमिरतजुहौं,वासंवादहिराज। हर्षहोतमोकोमहा, अतिपवित्रकेसाज ॥७६।' हे राजन् ! केशव भगवान् और अर्जुनके इस परम अद्धन और पुण्यकारक संवादको स्मरण करकरके बार बार हर्षित होताहूं और मेरे रोमांच खडे होते हैं ॥७६ ।। तच्चसंस्मृत्यसंस्मृत्यरूपमत्यद्भुतंहरेः॥ विस्मयोमेमहान्यजन्दृष्यामिचपुन:पुन दोहा-अद्भुतरूपश्रीकृष्णको सुमिर२ हौंताहि ।। हर्षहोत में विस्मयमानतवाहि
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भगवद्गीताभाषाटीका.
हे राजन् ! भगवान्के उस अद्भुत विश्वरूपका स्मरण करकरके
मुझको बडा विस्मय होताहै और हर्षके मारे बार बार मेरे रोम खडे
हुये आते है ।। ७७॥
यत्रयोगेश्वरःकृष्णोयत्रपार्थोधनुर्धरः॥
तत्रश्रीविजयोभूतिधंवानीतिर्मतिर्मम ॥
दोहा-योगीश्वरश्रीकृष्णजू,अर्जुनहैजाठौर ॥
तहांविजयअरुनीतिहै, राजसंपदाऔर॥७८॥
कृष्णकृपातेंहोतहै, भक्तियुक्तकोध्यान॥
तोतेबंधनतेछुटै, यहगीतारथजान ॥१॥
इहिंअठराअध्यायमें, कह्योमोक्षसंन्यास ॥
अर्जुनसोंश्रीकृष्णजू,जानिआपनोदास ॥२॥
कहोमोक्षसंन्यासजो, कृष्णकमलदलश्याम ॥
उरमेंधरिगिरिधरनको, वरन्यौआनंदराम ॥३॥
गीताअद्भुतपरम, श्रीमुखकियोवपान ।।
वारवारनिरधारकिय, पराभक्तिकौज्ञान ॥४॥
भक्तिवश्यश्रीकृष्णजू, यहैकरीनिरधार॥
भक्तिकरोबहुभांतिसो, यहैवेदकोसार ॥५॥
भगवद्गीताकोउपरै, औरसुनैचितलाय॥
पावभाक्तिअखंडसो, श्रीहरिसदासहाय ॥६॥
गीताप्रतिदिनउच्चरै, सदास्वच्छमनमाहि॥
मनसावाचाकर्मणा, तिनसमकोऊनाहिं॥७॥
अपदण.८ प्रारंभ . - . भूत उतारो ।जन्म m विविध रागरानियो भजन भक्तिसागर.राग देवगंधार (१)॥ मनुवा रामके व्योपारी । अवकैलेप भकिकी लादी वनिप्रकियो ते भारी पचिों चोर सदा मगरोफत इनसोकर छुटकारी । सतगुरुनायकके प्रगपिलिचसास- किनहिरी दो ठग मारगमाहि मिलेंगे एक कानक एकनारी सावधानी पेच नसायो हियोआप बंभारी हरिके नगरमें जा पहुंचोगे पेही लाभ अपारीपरमतोको समठा ये मन वारवारी ॥ (२) रागआसावरी। साधो भक्ति नफा करिलीजादिन २ काया डीजे ॥ मदन त तोपधुरामनमें, कपट तजे तो कासी । और तीर्थ सुनही जगन्हाया नाहिं कुटी यांनी भारतले तिरवेणीराजे रिले जन कोई न्हा । सारा होयसो नित उद पर निगरा जान न पावै ॥ कायामंदिरमें हरि कहिये वेद पुराण वतावें। इस उत म लगेग फिरत हैं धोखेको शिरनारे यंतर टोना मदहलावन ताई साँच नमानौ । तजिक) सार असार गयो है तापर भयो सयानों ॥ चरणदास शुकदेव कहत है निजकार मल गहीने । पारब्रह्म जिन सृष्टि उपाई ता ओरी पित दीजे ॥ २ ॥ (३) राग कल्याण। सवगुरु पांचों २ के लागे हि आये दे मंतर अतिन्हें पिडारो। काम कोष मोह लोभ गई मन बोराप किया अप भायो जिनके हाप पो जिय मेरो घेरी घेरा बहुत दुख पायो । एकघरी मोहि छाइत नाही लहरि चढाय के बहुन निवावो । कपि यो घर हा नवा उचम हरिको नाम छुटायो । अबके शरण नहीं है तुझरी चरणहिंदास अजाने । किरपा करि यह न्याधि टुटावो गुरु शुकदेव सयाने ॥३॥ (४) राग विलावल। प्रभुजी शरण तिहारी आयो । जो कोई शरण तिहारी नाहि भर्मिरदुख पायो। जोगनके मन देवी देवा मेरेमन ताहि भायो। जवसों सुरति संभारी जगमें और न शीश नवायो। नरपति सुरपति प्राश तिहारी यह सुनकर मैं पायो । तीरप वरत सकर फल त्यागे चरणकमल चिच लायो ॥ नारदमुनि अरु शिव ब्रह्मादिक तेरो। ध्यान लगायो | अब हरि क्यों न हो बार मेरी तुप काहे विसरायो। चरणदास पहें करता त हो गुरु शुकदेवबनायो ॥ ४ ॥ (५) रागरामकली- चारी वरणसो हरिजन ऊँचे। भपे पविचर हरिके समिरे तन के के सूने ॥ जो न पतीने सास्ति बताऊं शवरीके झूठे फल साये । बहुत पांचाराई रहने तिनके घर रघुपनि नहिं आये। भीलनी पाव दियो सरिता भयो जल सब कोई जाने । मंद हतो सोनिपत हो अभिमानी नर लिपाने ॥ ब्राह्मण भत्री भूपहत्ते बह गयो शंख श्वपच जब आपोषालांकि जकीयो नगर कारभगोपश गाया । जातिवरण कुडसोई नीको जाके पो परकामा गुरु शुकदेव कान तो कोहरिजन सेवचरणही दासा ॥५॥ इति विचारण 4 दर्शन समास अय दर्शन.८ प्रारंभ ५ भूत उतारो ॥ विविध रागरानियो भजन भक्तिसागर..राग देवगंधार (१) मनुवाँ रामके व्यापारी । अवकै खेप भक्तिकी लादी वणि कियो ते भारी पांचों चोर सदा मगरोकत इनसोंकर छुटकारी । सतगुरुनायककेसगामिलिचन्टूडम- किनहिरी ॥ दो ठग मारगमाहि मिलेंगे एक कानक एकनारी वावधानले पेच नसायो रहियोआप संभारी हरिके नगर में जा पहुंचोगे पैहो लाभ अपारोवरमको, समझा ये मन वॉरवारी ॥१॥ (२) रागआसावरी। साधौ भक्ति नफा करिली। दिन २ काया छीन : ॥ मदन त तोपधुरामनमें कपट न तो कासी । और तीर्थ स्व.ही जगन्हाया नाहिं बुटी यमफांसीसभालतले, तिरवेणीराज चिरले जन कोई न्हाव । सुगुरा होयसो नित उडि परशै निगरा जान न पावें ॥ कायामंदिरमें हरि कहिये वेद पुराण वता। इत उत मुले लोग फिरत है धोखेको शिरना। यंतर टोना मूड इलावन ता. साँव न मानो तजिकै सार असार गयो है तापर भयो सयानी ॥ चरणदास शुकदेव कहत है निजकार मूल गहीने । पारब्रह्म जिन सृष्टि उपाई ता ओरी चित दीजे ॥२॥ (३) राग कल्याण । सतगुरु पांवों जन्म २ के लागे हि आये दे मंतर अब तिन्हें विडारो। काम क्रोध मोह लोभ गर्द में मन बौराय कियो अप भायो, । जिनके हाथ परो जिय मेरो घेरी घेरा वहुत दुख पायो । एरुघरी मोहि छाइत नाही लहरि चढाय के बहुन निवावो । कपि ज्यों घर २ बानचा उत्तम हरिको नाम छुटायो । अबके शरण गही है तुझरी चरणहिंदास अजाने । किरपा करि यह व्याधि छुटावो गुरु शुकदेव सयाने ॥३॥ (४) राग विलावल। प्रभुजी शरण तिहारी आयो। जो कोई शरण तिहारी नाहि भर्मि२दुख पायो। आग्नके मन देवीदेश मेरेमन तहिं भायो। जवसों हरति संभारी जगमें और न शीश नवायो । नरपति सुरपति आश तिहारी यह सुनकर मैं धायो । तीरप वरता) सकल फल त्यागे चरणकमल चिच लायो ॥ नारदमुनि अरु शिव ब्रह्मादिक तेरो। ध्यान लगायो ॥ अब हरि क्यों न गहो बांह मेरी तुम काहे विसरायो चरणदास पहें करता तू ही गुरु शुकदेवबतायो ॥ ४ ॥ (५) राग रामकली- 'चारि वरणसों हरिजन ऊँचे। भये पविचर हरिके समिरे तनके उबल मन के सूचे ॥ जो न पत्तीने पाखि बताऊँ शवरीके झूठे फल खाये। बहुत धिर हाई रहते तिनके घर रघुपनि नहिं आये ॥ भीलनी पाव दियो सरिता शुद्धभयो जल सब कोई जाने । मंद हतो सो निर्मल हुओ अभिमानी नर भये सियने । ब्राह्मण क्षत्री भूपहते बह नाजो शंख श्वपच जब आयोगालांकि यापूर कीन्हो जपर कारभगोयश गाया । जातिवरण कुरोई नीको जाके पो भकि परकासा । गुरु शकदेव कहन है तो को हरिजन सेवचरणही दासा ॥५॥ इति विचार दर्पण आ.ब्वाँ दर्शन समाप्त.