Acharya Shri Vinaychandra Gyan Bhandar, Jaipur
Latisanhita
Front matter
प्रकाशक नाथूराम प्रेमी, मन्त्री, श्रीमाणिकचन्द-दिगम्बर- जैनप्रन्थमालासमिति, हीराबाग, पो० गिरगांव-दम्बई। मुद्रक विनायक यामकृष्ण परांजपे, नेटिव ओपिनियन प्रेस, आंग्रेवाडी, गिरगांव-बम्बई।
सुप्रसिद्ध शास्त्रदानी,
जिनवाणीभक्त
श्रीमान् लाला उम्मेदसिंह मुसद्दीलालजी
अमृतसरनिवासीकी
स्वर्गीया साध्वी धर्मपत्नीके
स्मरणार्थ ।
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ग्रन्थकर्ताका परिचय। इस ग्रन्थके रचयिताके विषय, इस ग्रन्थसे और इसकी प्रशस्तिसे बहुत कुछ परिचय मिल जाता है। अनुमान है कि पंचाध्यायी भी इन्हींकी बनाई हुई है। इसके विषयमें प्रसिद्ध साहित्यसेवी पं० जगलकिशोरजी मुख्तारने एक लेख 'वीर' नामक पत्रके वर्ष ३ अंक १२-१३ में प्रकाशित कराया है, उसको हम यहाँ उद्धृत कर देना आवश्यक समझते हैं। "कवि राजमल्ल और पंचाध्यायी। जैन ग्रन्थों में 'पञ्चान्यायी । नामका एक प्रसिद्ध ग्रन्थ है । यह महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ, आजसे २० वर्ष पहले प्रायः अप्रसिद्ध था-कोल्हापुर, अजमेर आदिके कुछ थोडेसे ही भंडारों में पाया जाता था और बहुत ही कम विद्वान इससे परिचित थे। शक संवत् १८२८ (वि० स० १९६३) में गांधी नाथारंगजीने इसे कोल्हापुरके जैनेन्द्र मुद्रणालय में छपाकर प्रकाशित किया; तमीसे यह ग्रन्थ विद्वानोंके विशेष परिचयमें आया, विदर्य पं० गोपालदास ने इसे अपने शिष्योंको पढ़ाया, पं०मक्खनलाल- जीने इसपर भाषाटीका लिखी, और इस तरह पर समाजमें इसका प्रचार उत्तरोत्तर बढ़ा । अपने नाम परसे-ग्रन्थके आदिमें मद्रपद्यमें प्रयुक्त हुए 'पंचाध्यायावयव । इस विशेषण पद परसेभी यह अन्य पांच अध्यायोंका समुदाय जान पड़ता है । परन्तु इसवक्त जितना उपलब्ध है उसे अधिक से अधिक हेद अध्यायके करीव कह सकते हैं, और यह भी हो सकता है कि वह एक अध्याय भी पूरा न हो । क्योंकि प्रन्यमें अध्या- यविभागको ठिये हुए कोई सन्धि नहीं है और न पांचों अध्यायोंके नामोंको ही कहीं पर सूचित किया है । शुरुमें 'न्यसामान्यनिरूपण नामका एक प्रकरण प्रायः ७७० श्लोकॉमें समाप्त किया गया है, उसे यदि एक अध्याय माना जाय तो यह ग्रन्थ डेढ़ अध्यायके करीब है और यदि अध्यायका एक अंश (प्रकरण ) माना जाय तो इसे एक अध्यायसे भी कम समझना चाहिये । बहुत करके वह प्रकरण अध्यायका एक अंश ही जान पड़ता है, दूसरा-द्रव्यनिशेषनिरूपण नामका-अंश उसके आगे प्रारम्भ किया गया है जो, ११४५ श्लोकोंके करीब होनेपर भी अधूरा है । परन्तु वह आय प्रकरण एक अंश हो या पूरा अध्याय हो- कुछ भी सही-इसमें सन्देह नहीं कि प्रकृत ग्रन्थ अधूरा है-उसमें पांच अध्याय नहीं है और इसका कारण ग्रन्थकारका उसे पूरा न कर सकना ही जान पढता है । मालूम होता है ग्रन्थकार महोदय इसे लिखते हुए अकालमें ही कालके गालमें चले गये हैं और इसीसे यह ग्रंथ अपनी वर्तमान स्थितिमें पाया जाता है-उसपर ग्रन्थकारका नाम तक भी उपलब्ध नहीं होता । अस्तु; जबसे यह अन्ध प्रकट हुआ है तबसे जनता इस बातके जाननेके लिये बराबर उत्कंठित है कि यह अन्य कौनसे आचार्य अथवा विद्वानका बनाया हुआ है और कब बना है । परन्तु. विद्वान् लोग अभीतक इस विषयका कोई ठीक निर्णय नहीं कर सके और इसलिये जनता बराबर अँधेरेमें ही चली जाती है । ग्रन्थकी प्रोढता, युक्तिवादिता और विषय-प्रतिपादन-कुशलताको देखते हुए, कुछ विद्वानों-. का इस विषयमें ऐसा खयाल रहा है कि यह ग्रन्थ शायद पुरुषार्थ- सिन्युपायादि अन्योंके कर्म श्रीअमृतचन्द्राचार्यका बनाया हुआ हो। पं० माखनलालजी शास्त्रीने तो इसपर अपना पूरा विश्वास ही प्रकट कर दिया और पंचाध्यायी-मापाटीका की अपनी भूमिकामें लिख दिया कि "पाध्यायीके कर्ता अनेकान्तप्रधानी आचार्यवर्य अमृतचन्द्र सूरि ही परन्तु वास्तवमें बात ऐसी नहीं है, और न अमृतचन्द्राचार्यको इस अन्धका कर्ता माननेके लिये कोई युतियुक्त अथवा समर्थ कारण ही प्रतीत होता है । यह ग्रन्थ अमृतचन्द्राचार्य से बहुत पीछेका-शताब्दियों बादका बना हुआ है और इसके कृती, सोन करनेपर, 'कवि राजमल्छ।
. (७) मालूम हुए हैं, जो कि एक बहुत बड़े प्रतिभाशाली विद्वान थे और जिनके बनाये 'अध्यात्मकमलमार्तण्ड तथा 'लाटी संहिता (श्रावकाचार) नामके दो उत्तम ग्रन्थ और भी उपलब्ध होते हैं आज इसी विषयको स्पष्ट करने और अपनी सोजको पाठकोंके सामने रखनेका प्रयत्न किया जाता है:- सबसे पहिले मैं अपने पाठकोंको यह बतला देना चाहता हूं कि पंचाध्यायीमें, सम्यक्त्व के प्रशम संवेगादि चार गुणोंका कथन करते हुए, नीचे लिखी एक गाथा ग्रन्थकार द्वारा उधृत पाई जाती है:- संवेओ णिव्येओ जिंदण गरुहा य उपसमो भत्ती । पच्छल्लं अणुकंपा, अट्ठगुणा हुंति सम्मत्ते ।। यह गाथा, जिसमें सम्यक्त्वके संवेगादिक अधगुणोंका उल्लेख है, वसुनन्दिश्रावकाचारके सम्यक्त्व प्रकरणकी गाथा है-वहाँ मूलरूपसे नं. ४६ पर दर्ज है और इस श्रावकाचारके की वसुनन्दी आचार्य विक्रम की १२ वीं शताब्दीके अन्तिम मागमें हुए हैं । ऐसी हालतमें यह स्पष्ट है कि पंचाध्यायी विक्रमकी १२ वीं शताब्दीसे बादकी बनी हुई है और इसलिये वह उन अमृतचन्द्राचार्यकी कृति नहीं हो सकती जोकि वसुनन्दीसे बहुत पहले हो गये हैं। अमृतचन्द्राचार्य के 'पुरुषार्थसिद्धयपाय' ग्रन्थका तो 'येनांशेन मुदृष्टिः' नामका एक पद्य भी इस ग्रन्थमे उधृत है, जिसे ग्रन्थकारने अपने कथनकी प्रमाणतामें 'उक्तं च' रूपसे दिया है और इससे भी यह बात और ज्यादा पुष्ट होती है कि प्रकृत्त ग्रन्थ अमृतचन्द्रा- चार्यका बनाया हुआ नहीं है। यहा पर मैं इतना और भी प्रकट कर देना उचित समझता हूं कि पं. मक्खनलालजी शास्त्राने अपनी भाषाटीकामें उक्त गाथाको 'क्षेपक' बत- लाया है और उसके लिये कोई हेतु या प्रमाण नहीं दिया, सिर्फ फुटनोटमें इतना ही लिख दिया है कि "यह गाया पंचाध्याय में क्षेपक रूपसे आई है"। इस फुट नोटको देखकर बड़ा ही सेद होता हे और समझमें नहीं आता कि उनके इस लिसनेका क्या रहस्य है !! यह गाथा पंचाध्यायों में - किमी तरह पर मी क्षेपकबादको मिलाई हुई नहीं हो सकती, क्योंकि ग्रन्थकारने अगले ही पयमें उसके उद्धरणको स्वयं स्वीकार तथा घोषित किया है और वह पय इस प्रकार है:- उक्तगाथार्थसूत्रेऽपि प्रशमादिचतुष्टयम् । नातिरिक्तं यतोऽस्त्यत्र लक्षणस्योपलक्षणम् ॥ ४६७ ।। इस पथपरसे यह स्पष्ट जाना जाता है कि ग्रन्थकारने उक्त गाथाको उधृत करके उसे अपने ग्रन्थका एक अंग बनाया है और उसके विषयका स्पीकरण करने अथवा अपने वृथनके साथ उसके कथनका सामंजस्य स्थापित करनेका यहाँसे उपक्रम किया है--अगले कई पयोंमें इसी विषयकी चर्चा कीगई है-फिर उक्त माथाको क्षेपक कैसे कहा जा सकता है ? आतु यह तो हुआ अमृतचन्दाचार्यके द्वारा प्रकृत ग्रन्थ के न रचे जाने आदि विषयक सामान्य विचार, अब ग्रन्थ के बारतविक कर्ता और उसके निर्माणसमयसम्बन्धी विशेष विचारको लीजिये। ऊपर यह जाहिर किया जा चुका है कि 'लाटीसंहिता' नामका भी एक प्रथ है । यह संस्कृत भाषामे श्रावकाचार-विषयका एक सप्तसात्मक अन्य है और इसकी पयसरन्या १६०० के करीब है । इस ग्रन्थके साथ जब पचाध्यायीकी तुटनात्मक दृष्टिसे आन्तरिक जाँच की जाती है तो यह मालूम होता है कि ये दोनों अन्य एक ही विद्वानकी रचना हैं। दशेनोंकी कथनशैली, लेसन-प्रणाली अथवा रचना-पद्धति एक जैसी है; ऊहापोहका दंग, पदविन्यास और साहित्य मी दोनोंका समान है; पंचाध्यायीमें जिस प्रकार किंच, ननु, अथ, अपि, अर्थात, अयमर्थः, अयंभाव , एव, नेवं, मैत्र, नोह्यं, न चाशय, चेत्, नो चेत्, यतः, ततः, अत्र, तन, तयथा, इत्यादि शब्दोंके प्रचुर प्रयोगके साथ विषयका प्रतिपादन किया गया है, उसी तरह वह लाटीसहितामें भी पाया जाता है । संक्षेपमें, दोनों ग्रन्थ एक ही लेसनी, एक ही टाइप और एक ही टकसारके जान पड़ते हैं। इसके सिवाय, दोनों प्रन्यों में सफडी पन भी प्राय. एक ही पाये जाते हैं और उनका सुलासा इस प्रकार है:- । - (क) लाटीसंहिताके तीसरे सर्गमें, सम्यग्दृष्टिके स्वरूपका निरूपण करते हुए, 'ननोतः किमेतावान इत्यादि पद्य नं. ३४(मुद्रितमें २५)से 'तद्यथा सुखदुःखादि। इस पद्य नं०६०(मुद्रितमें५४)तक जो२७पद्य दिये हैं वे वे ही हैं जो पंचाध्यायी टीकाके उत्तरार्ध नं. ३७१ से ३९९ तक और मूल प्रतिमें नं०३७४से १०१तक दर्ज हैं। इसी तरह ६१(मद्रितमें ५५)वें नम्बरसे १२६ मुद्रितमें ११६वें नं० तकके ६६ पद्य भी प्रायः वे ही हैं जो सटीक प्रतिमें नं०४१० से ४७६ तक और मूल प्रतिमें ४१२ से ४७९ तक पाये जाते हैं। हाँ. 'अथानरागशब्दस्य' नामका पद्य नं० ४३५ (४३७) पंचाध्यायीमें अधिक 1 हो सकता है कि वह लेखकोंसे छूट गया हो, लाटीसंहिताके निर्माण समय उसकी रचना ही न हुई हो या ग्रन्थकारने उसे लाटीसंहिता देनेकी जरूरत ही न समझी हो। इनके सिवाय, इसी सर्गमे, ने. १६१ मुद्रितमें १५२ से १८२ मुद्रितमें १०३ तकके २२ पथ और भी हैं जो पंचाध्यायी (उत्तरार्द्ध) के ७२१ (७२५) से ७४२ (७४६ ) नम्बर तकके पोंके साथ एकता रखते हैं। (स) लाटीसंहिताका चौथा सर्म, जो आशीर्वादके बाद 'ननु सुदर्श- नस्येतत् । पद्यसे प्रारम्भ होकर 'उक्तः प्रभावनांगोऽपि । पयपर समाप्त होता है, ३२३ पयोंके करीबका है । इनमें से नीचे लिखे दो पद्योंको घोटकर शेष सभी पद्य पंचाध्यायीक उत्तरार्धमें नं० ४७७ (४८०) से ७२० (७२४) और ७४३ (७४७ ) से-२१ (२५) तक प्रायः ज्योंके त्यों पाये जाते हैं:- येनांशेन शानं तेनांगेनास्य यन्धनं नास्ति । येनांशेन तु रागस्तेनांशेनास्य यन्धनं भवति ।। २६८ ।। येनांशेन चरित्रं तनांशेनास्य बन्धनं नास्ति । येनांशेन तुरागस्तेनांशेनास्य बन्धनं भवति ।। २६९ ।। ये दोनों पर 'पुरुषार्थ सिद्धपाय । अन्यक पर है और 'येनांशेन मुदृष्टिः' नामके उस पपके बाद 'उतं. २ मपमे उधृत किये गये हैं . जो.पंचाध्यायीमें भी नं० ७७४ (७७८) पा उधृत हैं । मालूम होता है ये दोनों पय पंचाध्यायीकी प्रतियोंमें छूट गये हैं। अन्यथा प्रकरणको देखते हुए इनका भी सायमें उद्धृत किया जाना उचित था। इसी तरह पंचाध्यायीमें भी 'यथा प्रज्वलितो वह्निः' और 'यतः सिद्धं प्रमाणाद्वै ये दो पय (न० ५२८, ५५७), इन पदोंके सिलसिलेमें, बढ़े हुए हैं। सम्भव है कि वे लाटीसंहिताकी प्रतियोंमें छूट गये हो । इस तरह पर ४३८ पद्य दोनों ग्रन्थों में समान हैं-अथवा यों कहना चाहिये कि लाटीसंहिताका एक चौथाई से भी अधिक भाग पंचाध्यायीके साथ एक-वास्यता रखता है । ये सब पय दूसरे पद्योंके मध्यमें जिस स्थितिको लिये हुए हैं उस परसे यह नहीं कहा जा सकता कि वे 'क्षेपकर हैं या एक अन्यकारने दूसरे प्रन्यकारकी कृति परसे उन्हें चुराकर या उठाकर और अपने बनाकर रक्सा है । लाटीसंहिताके कर्ताने तो अपनी रचनाको 'अनुच्छिष्ट । और 'नवीन' सूचित मी किया है और उससे यह पाया जाता है कि लाटीसंहितामें थोडेसे 'उक्तं च 'पयोको छोडकर शेष पद्य किसी दूसरे अन्थकारकी कृति परसे नकट नहीं किये गये हैं। ऐसी हालत पद्योंकी यह समानता मी दोनों प्रन्योंके एक-कर्तृत्वको घोषित करती है । साथ ही लाटीसंहिताके निर्माणकी प्रथमताको भी कुछ बतलाती है। इन समान पोमसे कोई कोई पद्य कहीं पर कुछ पाठभेदको भी लिये हुए हैं और उसमे अधिकांश लेखकांकी लीलाका अनुभव होने के साथ यथा-- सन्य धर्मरसायनो यदि नदा मा शिक्षपोम्मान् । सारोदारमिवाप्यनुपहनया स्वसाक्षां सारपन् । भार चारि भूनिमि. स्फुटमनुन्छिा नदीनं मह- निमाण परिधेहि मर नृपनि योध्यवादादिनि ॥ ५५ ॥ श्रत्येल्यादिवर. शत मृदुचिनिर्दिशनामा कविः । ने यारदमोधनामभिमन सोपशमयोद्यतः॥
साथ पंचाध्यायीके कितनेही पद्योंका संशोधन भी हो जाता है, जिनकी अशुद्धियोंको तीन प्रतियों परसे सुधारनेका यत्न करनेपर भी पं० मक्ख- नलालजी सुधार नहीं सके और इसलिये उन्हें गलतरूपमेंही उनकी टीका प्रस्तुत करनी पडी । इन पद्यों से कुछ पद्य नमनेके तौरपर लाटीसंहितामें दिये हुए पाठभेदको कोष्टकमें दिखलाते हुए नीचे दिये जाते हैं- द्रव्यतः क्षेत्रतश्चापि कालादपि च भावतः । नात्राणमंशतोप्यत्र फुतस्तद्धिम (दीर्म ) हात्मनः ॥ ५३५ ।। मार्गो (ग) मोक्षस्य चारित्रं तत्सद्भक्ति (सहग्ज्ञप्ति) पुरःसरम् । साधयत्यात्मसिद्ध्यर्थं साधुरन्वर्थसंशकः ॥ ६६७ ॥ मद्यमांसमधुत्यागी त्यक्तोदुम्बरपंचकः । नामतः पावकः क्षान्तो (ख्यातो) नान्यथापि तथा गृही ।। ७२६ ।।. शेपेभ्यः क्षुत्पिपासादि पोहितेभ्योऽशुभोदयात् । दीनेभ्यो दया (ऽभय ) दानादि दातव्यं करुणाणवैः ।। ७३१ ।। नित्ये नैमित्तिके थैवं (त्य) जिनविम्यमहोत्सवे । शैथिल्यं नैव कर्तव्य तत्वहरतद्विशेपतः ।। ७३६ ॥ अथातद्धर्मणः पक्षे (अर्थानाधीर्मणः पक्षो) नायद्यस्य भनागपि । धर्मपभक्षतिर्यस्मादधर्मोत्कर्ष पोप (रोप) णात् ॥ ८१४ ॥ इन पर्यो परसे विज्ञ पाठक सहज ही में पंचाध्यायीके प्रचलित अथवा मुदित पाठकी अशुद्धियोंका कुछ अनुभव कर सकते हैं और साथ ही टीकाको देखकर यह भी मालूम कर सकत है कि इन अशुद्ध पाठौंकी वजहसे उसमें क्या कुछ गडबड़ी हुई है। किसी किसी पयका पाठभेद स्वयं मन्यकर्ताका किया हुआभी जान पड़ता है, जिसका एक नमूना इस प्रकार है:- उक्कं दियात्रमयापि प्रसंगाद् गुरु लक्षणम् । शेप विशेपतो यह (शेयं) तत्स्यरूप जिनागमात् ॥ १४ ॥ यहां 'याये' की जगह 'शेय' पदका प्रयोग लाटीसंहिताके अनुकूल जान पड़ता है; क्योंकि टाटीसंहितामें इसके बाद गुरुका कोई .
(१२)
विशेष स्वरूप नहीं बतलाया गया जिनके कथनकी 'वक्ष्ये पदके द्वारा
पंचाध्यायीमें प्रतिज्ञा की गई है, और न इस पदमें किसी हदयस्थ या"
करस्थ दूसरे ग्रन्थका नाम ही लिया है जिसके साथ उस स्वरूप कचनकी
प्रतिज्ञा-सिनाको जोडा जा सकता । ऐसी हालतमै यहाँ प्रत्येक ग्रन्थका
अपना पाठ उसके अनुकूल है और उसे ग्रन्थकर्ताकी ही कृति
समझना चाहिये।
यहा नमूनेके तौर पर लाटीसंहिताके कुछ ऐसे पद्य भी उचित जानकर
उद्धृत किए जाते हैं जो पञ्चाय
यायीमें नहीं है:-
ननु या प्रतिमा प्रोक्ता दर्शनाख्या तदादिमा ।
जैनानां सास्ति सर्वेपामर्थादयतिनामपि ।। १४४ ।।
मैवं सति तथा तुर्यगुणस्थानस्य शून्यता।
नूनं दृकूप्रतिमा यस्माद् गुणे पंचमके मता ॥ १४५ ।।
तृतीयसर्गः ।
ननु व्रतप्रतिमायामेतत्मामायिकं व्रतं ।
तदेवात्र तृतीयायां प्रतिमायां तु किं पुनः ।। ४ ॥
सत्यं किंतु विशेपोऽस्ति प्रसिद्ध परमागमे ।
सातिचारं तु तत्रस्यादनातीचारवर्जितं ॥५॥
किं च तत्र त्रिकालस्य नियमो नास्ति देहिनां ।
अत्र त्रिकालनियमो मुनर्मूलगुणादिवत् ॥ ६ ॥
तत्र हेतुवशात्क्वापि कुर्याकुर्यान वा क्वचित् ।
सातिचारपतत्वाद्वा तथापि न प्रतक्षति. ॥ ७॥
अनावश्यं त्रिकालेऽपि कार्य सामायिकं च यत् ।
अन्यथा प्रतहानिः स्यादतीचारस्य का कथा ॥ ८ ॥
अन्यत्राप्येवमित्यादि यावदेकादश स्थितिः ।
प्रतान्येव विशिष्यन्ते नार्थादातर क्यचित् ॥ ९॥
(१३) शोभतेऽतीय संस्कारात्साक्षादाकरजो मणिः । संस्कृतानि व्रतान्येव निर्जराहेतवस्तथा ॥ १० ॥ सप्तमसर्ग । सारी लाटीसंहिता इसी प्रकारके ऊहापोहात्मक पद्योसे भरी हुई है। यहां विस्तारभयसे सिर्फ थोडे ही पय उद्धृत किए गये हैं; इन पद्योंपरसे विज्ञ पाठक लाटी संहिताकी कथनशैली और उसके साहित्य आदिका अच्छा अनुभव प्राप्त करनके लिये बहुत कुछ समर्थ हो सकते हैं; और पश्चाध्यायीके साथ तुलना करनेपर उन्हें यह मालूम हो सकता है कि दोनों ग्रन्थ एक ही लेखनीसे निकले हुए हैं और उनका टाइप भी एक है । पश्चाध्यायीके शुभमें मंगलाचरण और ग्रन्थ करने की प्रतिज्ञारूपसे जो चार पद्य दिये हैं वे इस प्रकार है:- पंचाध्यायावयवं मम कर्तुम्रन्थराजमात्मवशात् । अर्थालोकनिदानं यस्य वचस्तं स्तुवे महावीरम् ॥ १॥ शेपानपि तीर्थकराननन्तसिद्धानहं नमामि समम् । धर्माचार्याध्यापकसाधुविशिष्टान्मुनीश्वरान्वन्दे ॥ २ ॥ जीयानं शासनमनादिनिधनं सुवन्द्यमनवद्यम् । यदपि च कुमतारातीनदयं धूमध्वजोपमं दहति ॥ ३ ॥ इति वन्दितपश्वगुरुः कृतमङ्गलसक्रियः स एप पुनः । नाम्ना पश्चाध्यायी प्रतिजानीते चिकीर्पितं शास्त्रम् ॥४॥ इन पयोंमें क्रमशः महावीर तीर्थकर, शेष नीर्थकर, अनन्तसिद्ध और आचार्य, उपाध्याय तथा साधुपदसे विशिष्ट मुनीश्वरोंकी वन्दना करके जैन शासनका जयघोष किया गया है । और फिर अपनी इस वन्दना क्रियाको 'मङ्गलसस्क्रिया' बतलाते हुए ग्रन्थका नामोल्लेख पूर्वक उसके रचनेकी प्रतिज्ञा की गई है । ये ही सब बातें इसी क्रम तथा आशय- को लिए हुए, शब्दों अथवा विशेषणादि पदोंके कुछ हेर फेर या कमी वेशीके साथ लाटसिंहिताके शुझमें भी पाई जाती है । यथा-- ज्ञानानन्दात्मानं नमामि तीर्थंकर महावीरम् । यश्चिति विश्वमशेपं व्यदीपि नक्षत्रमेकमिव नभसि ॥१॥ नमामि शेपानपि तीर्थनायकाननन्तबोधादिचतुष्टयात्मनः । रमृत यदीय किल नाम भेषजं भवेद्धि विघ्नौघगदोपशान्तये ॥ २॥ प्रदुष्टकर्माष्टकविप्रमुक्तकांस्तदत्यये चाष्टगुणान्वितानिह । समाश्रये सिद्धगणानपि स्फुटं सिद्धेः पथरतत्पदमिच्छतां नृणां ॥३॥ वयी नमस्यां जिनलिंगधारिणां सतां मुनीनामुभयोपयोगिनां । पन्द्रयं धारयतां विशेषसात्पदं मुनेरद्वितयादिहार्थतः ॥ ४ ॥ जयन्ति जैनाः कवयश्च तगिरः प्रवर्तिता यैषमार्गदेशना | विनिर्जितं जाड्यमिहासुधारिणां तमस्तमोरेरिवरश्मिभिर्महत ।।५।। इतीव सन्मङ्गलसत्कियां दधन्नधीयमानोन्वयसात्परंपराम् । उपक्षलाटीमिति संहितां कविश्चिकीर्पति श्रावकसव्रतस्थितिम् ॥६।। इस मङ्गलपयोंको पञ्चाध्यायीके उक्त मङ्गलपद्योंके साथ, मूल प्रतिपाय विषयकी दृष्टिसे क्तिनी अधिक समानता है इसे विज्ञ पाठक स्वयं समझ सकते है । दोनों ग्रन्धोंके मङ्गलाचरणोंके स्तुतिपात्र ही एक नहीं बल्कि उनका क्रम भी एक है । साथ ही, 'महावीर', 'शेषानपि तीर्थकरान्', 'शेषानपि तीर्थनायकान् ।, अनन्तसिद्वान्', गणान्', जीयात्'-'जयंति', 'इति', 'कृतमङ्गलसक्रियः।- सन्मङ्गलसक्रिया दधन् , 'चिकीर्षित', 'चिकीपति , ये पद भी उक्त समानताको और ज्यादा समुद्योतित कर रहे है । इसी तरह पञ्चा- ध्यायीका 'आत्मवशात्' रचा जाना और लाटी संहिताका 'उपज्ञा (स्वोपज्ञा ) होना भी दोनों एक ही आशयको सूचित करते है। अस्तु; मगल पयोंकी इस स्थितिसे यह बात और भी स्पष्ट हो जाती है कि दोनों मन्थ एक ही विद्वानके रचे हुए हैं। इसके सिवाय, पश्चाध्यायीमें ग्रन्थकारने अपनेको 'कवि' नामसे उल्लेखित किया है, अर्थात् 'कवि । लिसा है । यथाः- 'सिद्ध- (१५) . - ...... अत्रान्तरंगहेतुर्यद्यपि भावः कवेर्विशुद्धतरः। हेतोस्तथापि हेतुः साध्वी सर्वोपकारिणी बुद्धिः ॥५॥ तत्राधिजीवमाख्यानं विदधाति यथाधुना । कविः पूर्वापरायत्त पर्यालोचविचक्षणः ॥ उ०, १६० ॥ उक्तो धर्मस्वरूपोपि प्रसगात्संगतोंशतः । कपिलब्धावकाशस्तं विस्तराद्वा करिष्यति ॥ ७७५ ॥ लाटीसंहितामें भी ग्रन्थकार अपनेको 'कवि । नामसे नामाड़ित करते और 'कवि । लिखते हैं । जैसा कि ऊपर उद्धृत किए हुए पद्य न०६ नं०७७५ (यह पय लाटीसंहिताके चतुर्थ सर्गमें नं० २७० पर दर्ज हैं) और नीचे लिसे पयोंपरसे प्रकट है:- .,तत्रस्थितः किल करोति कविः कवित्वं । तवद्धतां मयि गुणं जिनशासनं च ।। १-८६ ।। मु० ८७ ।। प्रोक्तं सूत्रानुसारेण यथाणुव्रतपञ्चकं । गुणप्रतत्रयं वक्तुमुत्सहेदधुना कविः ॥ ६-११७ ।मु०१०९।। इसी तरह और भी कितने ही स्थानोंपर आपका 'कवि' नामसे उल्लेख पाया जाता है, कहीं कहीं असली नामके साथ कवि-विशेषण जुड़ा हुआ भी मिलता है यथा, 'सानन्दमास्ते कविराजमल्लः' (५६)-और इन सब उल्हखोंसे यह जाना जाता है कि लाटीसंहिताके कर्ताकी कवि पसे बहुत प्रसिद्धि थी, 'कवि' उनका उपनाम अथवा पदविशेष था और वे अकेले ( एकमात्र ) उसीके उल्लेख द्वारा भी अपना नामोल्लेख किया करते थे । इसीसे पञ्चाध्यायीमें जो अभी पूरी नहीं हो पाई थी, अकेले 'कवि' नामसे ही आपका नामोल्लेख मिलता है । नामकी इस समानतासे मी दोनों ग्रन्थ एक ही कविकी दो कृतियां मालूम होते हैं । इसमें सन्देह नहीं कि कविराजमह एक बडे विद्वान् और सत्कवि हो गये हैं । कविके लिये जो यह कहा गया है कि 'वह नये नये संदर्भ, १ कवितनसंदर्भ। . ।
नई नई मौलिक रचनाएँ-तय्यार करनेमें समर्थ होना चाहिये' वह बात उनमें जरूर थी और ये दोनों ग्रन्थ उसके ज्वलंत उदाहरण जान पडते हैं । इन ग्रन्योकी लेखनप्रणाली और कथनशैली अपने ढंगकी एक ही है। लाटीसंहिताकी सन्धियोंमें राजमहको 'स्याहादानवद्य-पद्य-गय-विधा- विशारद-विद्वन्मणि' लिखा है और ये दोनों कृतियाँ उनके इस विशेषणके बहुत कुछ अनुकूल जान पड़ती है । लाटीसंहिताको देखकर यह नहीं कहा जा सकता कि पंचाध्यायी उसके कतीसे भिन्न किसी और ऊँचे दर्जे के विद्वानकी रचना है । अस्तु । मैं समझता हू, ऊपरके इन सब उल्लेखों प्रमाणों अथवा कथनसमुञ्चय परसे इस विषयमें कोई सन्देह नहीं रहता कि पंचाध्यायी और लाटी- संहिता दोनों एकही विद्वानकी दो विशिष्ट रचनाएँ है, जिनमेंसे एक पूरी और दूसरी अधूरी है । पूरी रचना लाटीसंहिता है और उसमें उसक कर्ताका नाम बहुत स्पष्टरूपसे 'कविराजमल्ल । दिया है । इसलिये पंचाध्यायीको भी 'कविराजमल्ठ' की कृति समझना चाहिये, और यह बात बिलकुल ही सुनिश्चित जान पड़ती है। लाटीसहिताको कविराजमलने वि० सं० १६४१ में आश्विन शुक्ल दशमी रविवार के दिन बनाकर समाप्त किया है । जैसा कि उसकी प्रशस्तिके निम्नपद्यासे प्रकट है.-- श्रीनृपतिविक्रमादित्यराज्ये परिणते सति । सहैकचत्वारिशद्भिरदानां शतपोडश ॥२॥ तत्राप्यश्विनीमासे सितपक्षे शुभान्विते । दशम्या दाशरथेः (श्च) शोभने रविवासरे ।। ३ ।। २ एक सन्धि नभनेके तौर पर इस प्रकार है:-इति श्रीस्याद्वादानवयपय विद्याविशारदविद्वमणिराजमविचिनायर्या श्रावकाचारापरनाम लागसद्भितायो साधुदात्मनफामनमनःसरोनारविदर्विकाशनकमाण्डमण्डलायमानायां कभामुख वर्णन नाम प्रथमः सर्गः । - (१७) F पञ्चान्यायीभी इसी समयके करीबकी-विक्रमकी १७ वीं शताब्दीके मध्यकालकी-लिसी हुई है । उसका प्रारंभ या तो लाटीसंहितासे कुछ पहले हो गया था और उसे वीचमें रोक लाटीसंहिता लिखी गई है और या लाटीसंहिताको लिखनेके बाद ही, सत्सहायको पाकर, कविके हृदयमें उसके रचनेका भाव उत्पन्न हुआ है अर्थात् यह विचार पैदा हुआ कि उसे अब इसी टाइप अथवा शैलीका एक ऐसा ग्रन्थराज मी लिखना चाहिये जिसमें यथाशक्ति और यथावश्यक्ता जैनधर्मका प्रायः सारा सार सींचकर रख दिया जाय । उसीके परिणामस्वरूप पंचाध्यायीका प्रारम्भ हुआ जान पड़ता है और उसे 'ग्रन्थराज' यह उपनामभी अन्यके आदिमें मंगलाचरणमें ही दे दिया गया है । परन्तु पंचाध्यायीका प्रारम्भ परले माननेकी हालतमें यह मानना कुछ आपतिजनक जरूर मालूम होता है कि, उसमें उन सभी पद्योंकी रचना भी पहलेहीसे चुकी थी जो लाटीमहितामें भी समानरूपसे पाये जाते हैं और इसलिये उन्हें पंचान्यायी परसे उठाकर लाटीसंहितामें रखा गया है । क्योंकि इसके विरुद्ध पंचा- ध्याय में एक पद निम्नप्रकारसे उपलब्ध होता है:- ननु तद (सुद) शनस्यतहक्षणं स्यादशेपतः । किमयास्त्यपरं किंचिहक्षणं तद्वदाय नः ॥ ४७७ ॥ यह पन लाटीसहितामें भी चतुर्थसर्गके शुरुमै कोष्टकोप्टेखित पाठ भेदके साथ पापा जाता है । इसमें सदाय नः' इस वायरसण्डके द्वारा यह पूछा गया है तो 'उसे आज हमें बतटाइये । इस प्रश्रमें 'आज हमें यतलाइये' (बद अप नः) इन शब्दोंका पंचाध्या के साथ कोई सम्बन्ध स्थिर नहीं होता-यही मालूम नहीं होता कि यहाँ 'नः' (हमें) शब्दका वाच्य कौनसा व्यक्ति विशेष है; क्योंकि पंचाध्यायी किसी ग्यक्तिविशेषके प्रश्न अथवा प्रार्थना पर नहीं लिखी गई है । प्रत्युत इमर, लाठीसंहितामें उक्त शन्दोंका सम्बन्ध सुम्पट । टाटीसंहिता अपालवंशावतंस माटगोत्री साह वाके पुत्र संपाधिपति 'फामन' नाम एक धनिक विदान के लिये, उसके प्रभ तथा प्रार्थना पर लिखी B Eie EL गई है, जिसका स्पष्ट उल्लेख संहिताके 'यामुसवर्णन' नामके प्रथम समें पाया जाता है । फामनको संहितामें जगह जगह आशीर्वाद भी दिया गया है । उक्त पदसे ठीक पहले भी, चतुर्थसर्गका प्रारम्भ करते हुए आशीर्वादका एक पद पाया जाता है और यह इस प्रकार है:- इदमिदं तय भो पनिजांपते भवतु भावितभान सुदर्शनं । विदितफामननाममहामते रसिकधर्मकथामु यथार्थतः ॥ १॥ इससे साफ जाना जाता है कि इस पद्यमें जिस व्यक्ति विशेपके सम्बोधन करके आशीर्वाद दिया गया है वही अगले पदका प्रश्नको और उसमें प्रयुक्त हुए 'नः। पदका वाच्य है । लाटी संहितामें प्रश्नकती फामनके लिये 'न' पदका प्रयोग किया गया है, यह बात नीचे लिरो पासे और भी स्पष्ट हो जाती है:- सामान्यादवगम्य धर्म फलितं ज्ञातुं विशेषादपि । भक्त्या यस्तमपीछद् वृषरुचिर्नाम्नाधुना फामनः ।। धर्मत्वं किमथास्य हेतुरथ किं साक्षात्फलं वत्यतः । स्वामित्त्वं किमति सूरिश्वदत्सवं प्रगन्नः कविः।।७७(मु०७८।। ऐसी हारतमें नहीं कहा जा सकता कि उक्त पय नं०४७७ पचा- ध्यायीसे उठाकर लाठीसहितामें वसा गया है बल्कि लाटीसंहितासे उठाकर वह पचाध्याधीमें पता हुआ जानपड़ता है। साथ ही, यह भी मालूम होता है कि उक्त पयके उस वास्य-खण्डमें समुचित परिवर्तन- का होना या तो छूट गया और या ग्रंथके अभी निर्माणाधीन होने के कारण उस वक्त उसकी जरूरत ही नहीं समझी गई और इसलिये पंचाध्यायी का प्रारंभ यदि पहले हुआ हो तो यह कहना चाहिये कि उसकी रचना प्राय उसी हद तक हो पाई थी जहाँसे आगे लाटीसंहितामे पाये जाने वाले समान पयोंका उसमें प्रारंभ होता है। अन्यथा, साटीसं- हिताके कथनसंबंधादिको देखते हुए, यह मानना ही ज्यादा अच्छा और अधिक संभावित जान पडता है कि पंचाध्यायीका लिखा जाना 1 - लाटीसंहिताके बाद प्रारंभ हुआ है । परंतु पंचाध्यायीका प्रारंभ पहले हुआ हो या पीछे, इसमें संदेह नहीं कि वह लाटीसंहिताके बाद प्रकाशमें आई है और उस वक्त जनता के सामने रक्सी गई है जब कि कविमहो- दयकी इहलोकयात्रा प्रायः समाप्त हो चुकी थी । यही वजह है कि उसमें किसी सन्धि, अध्याय, प्रकरणादिक या ग्रंथकर्ताक नामादिक की कोई योजना नहीं होसकी और वह निर्माणाधीन स्थितिमें ही जनताको उपलब्ध हुई है । मालूम नहीं ग्रंथकर्ता महोदय इसमें और किन किन विषयोंका किस हद तक समावेश करना चाहते थे और उन्होंने अपने इस मेयराजके पाँच महाविभागों-अध्यायों-के क्या नाम सोचे-थे । निसंदेह ऐसे ग्रंथरत्नका पूरा न हो सकना समाजका बडा ही दुर्भाग्य है । कवि राजमछने लाटीसंहिताकी रचना 'वेराट । नगरके जिनालयमें वैठकर की है । यह वैराट नगर वही जान पडता है जिसे 'वैराट, भी कहते है और जो जयपुरसे करीब ४० मीलके फासले पर है। किसी समय यह विराट अथवा मत्स्यदेशकी राजधानी थी और यही पर पांडवोंका गुप्त वेशमें रहना कहा जाता है । 'भीमकी दूंगरी' आदि कुछ स्थानोंको लोग अब भी उसी वक्त के बतलाते हैं । लाटीसंहि- तामें कविने इस नगरकी मुक्तकण्ठसे प्रशंसा करते हुए, अपने समयका कितना ही वर्णन दिया है और उससे मालूम होता है कि यह नगर उस समय बडा ही समृद्धशाली था। यहां कोई दरिद्री नजर नहीं आता था, प्रजामें परस्पर असूया अथवा ईपदेपादिके वशवर्ती होकर छिद्रान्वेषणका माव नहीं था, वह परचक्रके मयसे रहित थी, सबलोग सुशहाल तथा धर्मात्मा थे, चोरी वगैरहके अपराध नहीं होते थे और इससे नगरके लोग दंडका नाम भी नहीं जानते थे। अकबर बादशाहका उस समय राज्य १ लाटीसहितार्मे भी पांडवोंकि इन परपरागत चिन्हक अस्तित्वको धूचित किया 1 यथा-- ...कीडादि श्रृगेच पडिवानामयापि चाश्चर्यपरंपंगकाः । या वापदालोक्य मलावनिनादी विपुंचन्ति महामला (२०) था और वही इस नगरका स्वामी तथा मोक्ता थी। नगर कोटसाइस युक्त और उसकी पर्वतमालामें कितनी ही ताँबे की सान था जिनसे उस वक्त ताँवा निकाला जाता था और उसे गलागलूकर निकालनेका एक वडा मारी कारखाना भी कोटके बाहर, पासमें ही, दक्षिण दिशाकी और स्थित था । नगरमें ऊँचे स्थान पर एक सुंदर प्रोत्तुंग जिनालय- दिगंबर जैन मंदिर-था, जिसमें यज्ञर्थभ और समृद्ध कोष्ठों (कोठों) लिये हुए चार शालाएँ थीं, उनके मध्यम वेदी और वेदीके ऊपर उत्तम शिस्तर था । कविने इस जिनालयको वैराट नगरके सिरका मुकुट बतलाया । साथही, यह सूचित किया है कि वह नाना प्रकारकी रंगबिरंगी चित्रावलीसे सुशोभित था और उसमें निम्रन्थ जैन साधुमी रहते थे। इसी मंदिरमें बैठकर कविने लाटीसंहिताकी रचनाकी है । संभव है कि पंचाध्यायी भी यही लिसी गई हो। यह मंदिर साधु दृदाके ज्येष्ठपुत्र और फामनके बड़े भाई ‘न्योता ने निर्माण कराया था; जैसा कि संहिताके निम्न पद्यसे प्रगट है:- तत्राद्यस्य वरो सुतो वरगुणो न्योवाइसंघाधिपो । येनैतज्जिनमंदिरं स्फुटमिह प्रोनुंगमत्यद्भुतं । पैराटे नगरे निघाय विधिववत्पूजाश्च वहयः कृताः । अत्रामुन सुसप्रदः स्वयशसः स्तंभः समारोपितः॥७२॥ आजकाल दैराट ग्राममें पुरातन वस्तु-शोधकोंकि देखने योग्य जो तीन चीजें पाई जाती हैं उनमें पार्श्वनाथका मन्दिरभी एक खास चीज है और यह संभवतः यही मन्दिर मालूम होता है जिसका कविने लाटीसंहितामें १ अक्यरके पिना हुमायूँ ओर पितामह 'वायर का भी फदिने उहेस किया है ओर इन सन को 'गत्ता' जानिके बतलाया है। २ बैगायाम और उसके आस पासका प्रदेश आज भी धातुके मैलसे आन्यादित है, ऐमा डा. भांडारकग्ने अपनी एक रिपोर्टमें प्रकट किया है, जिसका नाम अगले फुट नोटमें दिया गया है।
(२१) उल्लेस किया हैं। इस संहितामें संहिताको निर्माणकरानेवाले साहू -फामनके वंशका भी यत्किंचित् विस्तारके साथ वर्णन दिया है और उससे फामनके पिता, पितामह, पितृव्यों, भाइयों और सबके पुत्र-पौत्रों तथा स्त्रियोंका हाल जाना जाता है । साथ ही, यह मालूम होता है कि वे लोग बहुत कुछ वैभवशाली तथा प्रभाव सम्पन्न थे, इनकी पूनिवास- भूमि 'होकनि' नामकी नगरी था और ये काष्ठासंघी भट्टारकोंकी उस गद्दीको मानते थे-उसके अनुयायी अथवा आम्नायी थे-जिसपर क्रमशः कुमारसेन, हेमचन्द्र, पद्मनदी, यशःकीर्ति और क्षेमकीर्ति नामके भट्टारक १ पाश्वनाधका यह मदिर दिगंबर जैन है, और दिंगबर जेनोके ही अधिकारमें है । इस मंदिरके पास के कंपाउंड (अहाते) की दीवारमें एक लेखवाली शिला चिनी हुई है और उसपर शक संवत १५०९ - वि० सं० १६४४--में 'इंद्रबिहार । अपरनाम 'महोदयमासाद' नामके एक श्वायर मंदिर के निर्धापित तथा प्रतिष्ठित होनेका उल्लेख है । इस परसे डा० आर माडारकरने, 'आर्किओलॉजिकल सर्वे वेस्टर्न सर्किल. मोयेस रिपोर्ट मन् १९१० में यह अनुमान किया है कि उक्त मंदिर पहले श्वेतांबरीको मिलक्षित था (देखो 'प्राचीन लेस संयह द्वितीय भाग)। परतु भांडारकर महोदयका यह अनुमान, लाटीसहिताके उक्त क्धनको देखते हुए समुचित प्रतीत नहीं होता और इसके कई करण है-एक नो यह कि लाटी संहिता उक शिलालेखसे साडे तीन वर्षके करीब पहलकी लिखी हुई है और उसमे वराट-जिनालयको, जो कितनेही वर्ष पहले बन चुकाथा, एक दिगबर लेनद्वारे निर्मापित लिखा है ! दूसरे यह कि शिलालेवमें जिस मदिरका उस है उसमें मूल नायक अनिमा विमलनाथकी चतलाई गई है, ऐसी हालतमें मंदिर विमल- नायके नामसे प्रसिद्ध होना चाहियेधा, पार्थनाथके नामसे नहीं, और तीसरे यह कि शिलालेख एक पाउडकी दीवार पाया जाता है जिससे यह बहुत कुछ सथव है कि यह दूसरे मंदिरका शिलालेय हो, उसके गिरजाने पर पाउंडफी नई रचना अथवा मरम्मत के समय वह उसमे चिन दिया गया हो। इसके सिवाय दोनों मदिरीश पास पाम तथा एकही अहाते में होनाभी कुछ असभक्ति न है। पहले क्तिनेही मदिर दोनों संप्रदायोंके सयुक्त रहे हैं, उरा वन आनकल जैसी बेहदा कशाशी नहीं थी।
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प्रतिष्टित हुए थे । क्षेमकीर्ति भट्टारक उस समय मौजूद भी थे और उनके
उपदेश तथा आदेशसे उक्त जिनालयमें कितनेही चित्रोंकी रचना हुई
थी । वैराटनगरमें उस समय भट्टारक हेमचन्द्रकी प्रसिद्ध आम्नायको
पालनेवाले 'ताहू' नामके एक विद्वानभी थे, जिनके अनुगृहसे फामनको
धर्मका स्वरूप जानने आदिमें कितनीही सहायता मिली थी । परन्तु
उसका वह सब जानना उस वक्त तक प्रायः सामान्य ही था जब तक
कि कविराजमछ वहां पहुंचे और उनसे धर्मका विशेष स्वरूपादि पूछा
जाकर लाटीसंहिताकी रचना कराई गई।
इस तरह पर कविराजमल्टने वैराट नगर, अक्बर बादशाह, काठासंघी
भट्टारक वंश, फामन कुटुम्ब, स्वयं फामन और वैराट जिनालयका
कितनाही गुणगान तथा वखान करते हुए लाटीसंहिताके रचना सम्बन्धको
व्यक्त किया है । परन्तु खेद है कि इतना लम्बा लिखने परभी आपने
अपने विषयका कोई सास परिचय नहीं दिया-यह नहीं बतलाया कि
आप कहाँके रहनेवाले थे, किस हेतुसे वैराट नगर गये थे, कौनसे वंश,
जाति, गोत्र अथवा कुलमें उत्पन्न हुए थे, आपके माता पिता तथा गुरुका
क्या नाम था और आप उस समय किस पदमें स्थित थे। लाटीसंहितासे--
अ यात्मकमलमार्तण्डसेमी-इन सब बातोंका कोई पता नहीं चलता। हाँ,
साठीसंहिताकी प्रशस्तिमें एक पद्य निम्न प्रकारसे जरूर पाया जाता है:-
एतेषामस्ति मध्ये गृहपरुचिमान् फामनः संघनाथ-
स्तेनोशः कारितेयं सदनसमुचिता संहिता नामलाटी ।।
१ कवि रानमल वैराट नगरके निवासी नहीं ये दल्लि स्वयही क्सिी अज्ञान
काण व वहां पर गये थे, यह बात नीचे रिसे पद्यसे प्रकट है, जो सहितामे
कामन का वर्णन करते हुए दिया गया है---
येनानन्तस्मिाभियानदिविना सप्राधिनायेनयद्-
धारामयशोमय निनवपुः पर्नु चिरादीप्सिनं ।।
तन्मन्ये फलवत्तरं कृतामिद लावा मुना सविम् ।
घेराटे स्वयमागत शुभकशाशिमहाद्वयं ॥ ४५ ॥
(२३) श्रेयोथं फामनीयैः प्रमुदित मनसा दानमानासनाद्यैः । r स्वोपज्ञा राजमहेन विदितविदुपाम्नायिना हैमचन्द्रे ॥४॥ इस पयसे ग्रन्थकनीके सम्बन्धमें सिर्फ इतनाही मालूम होता है कि वे हेमचन्द्रकी आम्नायो एक प्रसिद्ध विद्वान थे और उन्होंने फामनके दान-मान आसनादिकसे प्रसन्नचित्त होकर लाटीसंहिताकी रचना की है । यहाँ जिन हेमचन्द्रका उल्लेस है वे ही काष्ठासपी भट्टारक हेमचन्द्र जान पडते हैं । जो माथुरगच्छ पुष्कर गणान्वयी भट्टारक कुमारसेनके पट्ट-शिष्य तथा पद्मनन्दि भट्टारकके पट्ट गुरु थे और जिनकी कविने संहिताके प्रथमसर्गमें बहुत प्रशंसा की है-लिखा है कि, वे भट्टारकोंके राजा थे, काष्ठासंघरूपी आकाशमें मिथ्यान्धकारको दूर करनेवाले सूर्य थे और उनके नामकी स्मृतिमात्रसे दूसरे आचार्य निस्तेज हो जाते थे अथवा -सूर्यके सन्मुस सयोन और तारागण जैसी उनकी दशा होती थी और वे फीके पड़जाते थे। इन्हीं भ० हेमचन्द्रकी आम्नायमें 'ताल्हू । विद्वानको भी सूचित किया है । इस विषयमें कोई सन्देह नहीं रहता कि कविराज- मल्ल एक कामासंघी विद्वान् थे । आपने अपनेको हेमचन्द्रका शिष्य या प्रशिष्य न लिखकर आम्नायी लिसा है और फामनके दान-मान-आसना- दिकसे प्रसन्न होकर लाटीसंहिताके लिखनेको सूचित किया है, इससे यह स्पष्ट ध्वनि निकलती है कि आप मुनि नहीं थे । बहुत सभव है कि आप गृहस्थाचार्य हो या ब्रह्मचारी आदिके पद पर प्रतिष्ठित रहे हों। परन्तु कुछ भी हो, इसमें सन्देह नहीं कि आप एक बहुत वढे विद्वान थे, सत्कवि थे, अच्छे अनुभवी थे और आपकी कृतियां मबोंके पढ़ने तथा संग्रह करनेके योग्य हैं । विद्वानोंको आपके ग्रन्थोंकी सोज करनी चाहिये । सम्भव है कि आपके लिखे हुए कुछ और भी ग्रन्थ मिल जायें । यहाँ पर मैं इतना, और भी प्रकट कर देना उचित उमझता हूं कि दो एक विद्वान् 'रायमल्ल' नामसे भी हुए है, जिन्हें कहीं कहीं 'राजमल्ट' भी लिखा है । जैसे हंबडजातीय ब्रह्मचारी रायमल्ल, जिन्होंने वि० सं० .
(२४) १६६७ में 'भक्तामर स्तोत्रकी सस्कृत टीका लिसी है, और दूसरे पाण्डे रायमल्ल, जिन्होंने समयसारकी वह बालबोध भाषा टीका लिसी है जिसका कविवर बनारसीदासजीने अपने समयसार नाटकमें उल्लेख किया है । ये लोग लाटीसंहिताके कर्ता कविराजमलसे भिन्न थे । अतः कविराजमल के ग्रन्थोंकी खोज करनेवाले विद्वानांको इस विषयका ध्यान रखना चाहिये।"
ॐ श्रीवीतरागाय नमः। श्रीस्थाहादानवद्यपधगधविद्याविशारदविद्वन्मणि- राजमल्लविरचिता लाटीसंहिता । प्रथमः सर्गः। ज्ञानानन्दात्मानं नमामि तीर्थंकर महावीरम् । योति विश्वमशेष व्यदीपि नक्षत्रमेकमिव नभसि ॥ १ ॥ नमामि शेपानपि तीर्थनायका- मनन्तबोधादिचतुष्टयात्मनः । स्मृतं यदीयं किल नाम भेपर्ज भवेद्धि विनौषगदोपशान्तये ॥२॥ प्रदुष्ट्रकर्माष्टकविप्रमुक्तकां- स्तदत्यये चाष्टगुणान्वितानिह । समाश्रये सिद्धगणानपि स्फुटं सिद्धेः पथस्तत्पदमिच्छतां नृणाम् ॥ ३॥ १ यस्य महावीरस्य । २ ज्ञाने। ३ नाशे।
२ टाटीसंहितायां- , 7 प्रयी नमस्यां जिनसिद्गधारिणां सतां मुनीनामुमयोपयोगिनाम् । पदप्रयं धारयतां विशेपसान पदं मुनेरद्विनयोदिहार्यतः ॥ ४ ॥ जयन्ति जनाः कवयश्च तद्विरः प्रवर्तिता यैपमार्गदेशना। विनिर्जितं माध्यमिहामुधारिणां ।। तमस्तमोरेरिख रश्मिभिर्मइन् । ५ ॥ इतीव सन्मद्गटसस्त्रियां दध- नधीयमानोऽन्वयसात्परंपराम् ।- उपहलाटीमिति संहितां कवि- श्चिकीर्पवि श्रावकसतस्थितिम् ।। ६ ।। द्वीपान्तरीयनिकरैः परितः परीतः स्वर्णाचलच्छलठातपंपारंशोऽमी। गोषचामरविराजित एप जम्बू- द्वीपोधिराज इव राजति मध्यवर्ती ॥५॥ परीत्य जम्यूतमालपालव- द्रीयसोचैः परिसानिधनाते अकृत्रिमं क्षेत्रमिदास्ति मारतं पहंशमात्रीकृतकालभारतम् ।। ८॥ तत्रार्द्धचन्द्राक्रतिकायमाने सण्डानि पट् सन्ति सरिनगेभ्यः । सण्डोत्रविख्याततमायनामा निःश्रेयसहास्ति वृपार्जनामा ॥९॥ १ दर्शनज्ञानयारिम् । अथवा आचार्योपाध्यायसाधुरूप पदचयभू । ३ द्वितया- दित्यपि पाटः । ३ सूर्यस्य रश्मिभिः । ४ स पुस्तके "एक" इति पाठः। ५ दृपार्जनापाः इति साधुः प्रतिमाति ।
कयामुखत्रर्णनम् । तत्रास्ति देशो मगधाभिधेयो मध्ये यथाद्स्य मुसं सुवृत्तम् । नानापगाकाननभूधराणा- मालीभिरालिगितविग्रहोऽसौ ॥१०॥ सन्यत्र केचिन्नगराधिपास्ते वक्तुं क्षमो ज्ञोऽपि न यन्महत्त्वम् । वैराटनामा किल तत्समोपि चक्रीय दृष्टः कियदद्भुतश्रीः ।। ११ ।। इयन्महीमन्यनगैरनाक्ता- मृगँ विमुक्तानतिवृत्तिहेतोः स्थानोपविष्टं यमुपेत्य चक्रा-- कारा स्थितासीदिव भूभृदाली ॥ १२॥ विलोक्य दंड्यानिय दूरवर्तिनः खनिवछिन्नानपरांश्च भूभृतः । अमी विदग्धाः समुपासते पुरं विराटसंज्ञं कृतमण्डलच्छलात ॥ १३॥ पुष्पाणां वाटिकाभ्यः प्रचलितमरुवोत्थापितो यः परागः पुजीभूतोद्रिसङ्गानभसि परिगतः, शारदीमभ्रशोभाम् । अर्वाक् पौरागनाभिः प्रशमलवामतः कुंकुमाढ्यद्रवाये- रूद वैराटसम्राडिव शिरसि वलादातपत्रं निदध्यौ ॥ १४ ॥ यदभ्रमभ्रंलिहसौधमण्डली शिरस्थितस्तम्मनियंत्रिताभिः । अयं पताकाभिरुपास्यमानो रराज सम्राडिव चामरौधैः ॥ १५ ॥ विद्यन्ते निधयोऽप्यनादिनिधना नातीव दूरेप्यथो नान्यारानु दपुरतः भूमौ लुछन्त्यो नेव। १स पुस्तके "नगराभिधा" इति पाठः । २ स पुस्तके "नवा" इति पादः ।
2 - . . साटीसंहितायां- सुप्राप्याः मुलमास्त्ववार्यविषयाश्यावालगोपालक विख्याताः पृथिवीपु ताम्रसनयो वैराटकट याश्रिताः ॥१६॥ रत्नान्येव चतुर्दशति नियमतत्रास्ति नाति यद्-, . . . यत्रास्तां गजवानिराजितरथा योपिन्महस्त्राणि च । सिद्धयन्तीह पदे पदेऽनवरतं धर्मार्थकामादयो , हेतुश्चाप्यपवर्गसंज्ञकगतेः सम्पद्यते प्राणिनाम् ॥१७॥ धार्यन्ते शिरसीव दामनिवदा मात्राङ्कमुद्रान्विता वैराटे घटिताः पयोधिवलयादांगटन्त फ्रमात् । नोटंध्या जगतीह, सर्वनृपतेश्चाज्ञा इवोल्लेसिता न्यायादागतमेतदेव नियमात्सलाध्यतां तत्समः १८ ॥ हस्त्यश्वपादातिरथाः प्रकामं चमूरिवाभान्ति ययोपमानम्। यत्रानि संप्रति वर्तमाना:।। साम्राज्यभाजोस्य किमस्ति शेपः ।। १५॥ भटाः प्रचारोद्भूटसौष्ठवोत्कटाः । करे ललग्जिह्वयमासिधारिणः । इतस्ततोऽटन्ति रणे समुत्सुका यदन सम्राट् स समर्थितोऽर्थतः ॥ २०॥ प्राकारो वलयाकृतिः परिलसन्नानाश्मनिर्मापितो वैराट प्रविवेष्टय भाति परतः सर्वान्यचकोम्झितम् । मध्याह्ने किल दृष्टनष्ट इव यद्भावानिहाँधेलिहि तन्मन्ये परिवेप एप शशिना सेवाझवे प्रेक्षितः ।। २१ ॥ उपर्युपरि शालमशेषत क्रमान्' पुरःस्थिताः कंगुडसंझया मवाः । मन्ये नु वैराटनृपस्य नेमे- रारा दरिद्रारिविनाशनाय ॥२२॥ "" "म पुग्नक्यो. "सार्वभौमस्याना" इति पाठः । २ आकारास्मृशि: 4 । H म कयामुखवर्णनम् । ५ प्राकारात्परितोऽप्यनन्तरतमो यस्यास्त्यपाच्यां दिशि , r 'विख्यातो भुवि यन्हिना द्रवंकरो. नाम्नापि ताम्राकरः ।। कोष्टामेर्वडवानलानलमपां घोपाश्च भखारवैः किझोर्दिधता यमार्यशकलोऽनेनैव खण्डाधिना 11,२३ ।। पातालमादातुमपीहकामो वैराटनामा परिखोन्मिपाद्वै जिष्णुर्यतानेरुपदाहवे य- स्तृणाय मन्येत जगत्रयं यन् ।। २४ ।। विरेजुरत्रापि च सोधपंक्तयः सितादिवर्णोपलचित्रभित्तयः । उपर्युपर्याजलंदाध्वगामिनो गृहोपरिष्टाद्गणनातिगां गृहाः ॥ २५ ॥ मनुजनामविधेरुदयात्परं जनितमानतया नरजागनाः । सुतनुकान्तिभरादतिशायिना- च्छुशुभिरे किमिहामरयोपितः ॥ २६ ।। मुधावधूलीकृतगात्रयष्टयो यीयसौधाः स्वगुणातिशायिनः । हसन्ति यद्वा कुकवीनमीभिः समं विमानान्युत्प्रेक्षितो दिवः ।। २७ ।। गृहाप्रसंलममृगाककान्तयो विघोः कराशेषवशात्सवन्ति वा। जितो हि वैराटवधूजनाननै रुदनिवेन्दुः प्रताधिकारतः ॥२८॥ हागणेपु सचितस्फटिकोपलेपु काचिच बालवनितानुपति नवोढा । दक्षिणदिशि । २ अप्रिना नानं इव भवति । ३ आर्श मर्यादीस्त्य । १ मनुष्यगनिनामको दयात् । ५ पानीयं सदन्ति ।
६ लाटीसंहितायां- - . ५ - -- " दृष्ट्वात्मनः प्रतिनिधि किल शकितासी' । दक्तेक्षणा क्षणममर्पधिया सपल्याः ॥ १९ ॥ वभुः सरांसीव भुवो यदन्तरे । गृहागभागेपु मणिविपां चयाः । वराङ्गनाः संवरिताम्बराः क्षणं ययुखपान्तास्तरणातुराः पुनः ।।,३०।। यत्रात्र कान्ता रतवेश्मनीह निवेशितादर्शशवाश्मभित्तौ। बाला प्रतिच्छायमवेक्ष्य रूपं। वृथाऽकरोन्मानमनल्पसंभ्रमात् ।। ३१|| विचित्रचित्राणि यदीयसद्मसु ।' व्यलीलिखत्कर्मसु सूत्रधारः।। नूनं विलोक्येतदकारि सद्विधिः । जगत्यरं चात्मकृतार्थतां गतः ।। ३२॥ यदङ्गनामङ्गलगानकोटिभिः प्लुते मुदातोघरवैर्विहायसि ।। विधूपिताशामुखधूपधूम्रकै रिहानिशं रौति शिसी स्म वेश्मसु ॥ ३३ ॥' विद्यन्ते नगराण्यनन्तगणितान्यासागराणासि वै' तत्रापि प्रतिपत्तनं युवतयस्तारुण्यतायोर्मयः । किन्त्वनत्यवराङ्गनापरिलसट्टकोणलीलावली वाणास्त्रैर्मनुतेस्म दुर्गमतुलं वैराटकं मन्मथः ॥ ३४ ॥ आसीदयलादपि जागरूको जगजिगीपुः कुसुमायुधश्च । लीलारणन्नूपुरतार्यनादै . निशाहि वैपटपुराङ्गनानाम् ॥ ३५ ॥ १ प्रतिविम्यम् । ३ दशदिवशब्दैः। ३ आकाशे । . , कयामुखवर्णनम् । - यदीयहानियद्धपद्धती दुकूलरत्नाभरणाद्यलंकृताः ।। वधूरुपेत्येन्द्रधनुःशताकृति- मगादकालेऽपि विराटपत्तनम् ।। ३६ ॥ विराटवीथीपु नवोढयोपिता गमागमाभ्यासवशानुसारिभिः। सदाननामोदमदालिनिःस्वन रयं मधुः कोऽप्यपरः सदातनः ।। ३७ ॥ घनाघनाशेपजगञ्जनौधै- वैराटहट्टाध्वसु पर्यटद्भिः। गतेः प्रचारोपि च दुर्गमोऽभू-, द्वारांनिधेः पार इयोम्मिजालैः ॥ ३८ ॥ अनेकदेशीयजनैरनेकै श्चितः सरिद्भिः सरितांपतियथा । तदागमिप्यनिसिलोपमेयता यदा स सिन्धुर्मधुरोऽभविष्यत् ॥ ३९ ।। वेदाः प्रमाणं हि पठद्भिाच्चै विप्रैरनूनरिह सम्मृतोऽसौ। शुक्लाम्बरांगश्च चतुर्मिरास्यै वैराटनानावततार धाता ॥ ४०॥ उर्वी यदन्ते विपुला स्वसीम्नः सस्यारुहा. सप्रसवेव योपित् । धान्यानि सूते विविधान्यजस्रं रत्नानि यद्वा सुसुतोपमानि ॥४१॥ सार्द्राणि यत्रोपवनानि नित्यं नम्राणि भूयो मरुतेरितानि । १ शब्दः । २ मार्गपु । ३ उवी इति पृथ्वी । यथा योपित् सप्रसवा तथेत्र उदी सस्यासदा। - ८ लाटीसंहिताया- . - . - T . - वाचालितानीव पिस्वनाद्यः सप्रनयाणीव हि पापदानि ॥४२॥ , यस्यान्तिके कृपत्तडागवाप्य: । सुधावलिमोञ्चलकण्ठदेगाः । । । परीत्य पूर्ण प्रतिविम्वमिन्दोः स्थिता:बिरजुनभसीव ताराः ॥ ४३ ।। मरस्म वापीपु कुशेशयानां वचित्सहस्राणि शतानि यत्र। वैराटसम्राज्यमुसेन्दुशोमा दृष्टुं धरित्र्याः धृतलोचनानि ।। ४४ ॥ लोलोम्मयो यत्र जलाशयपु श्रण पवित्वाथ समुत्पतन्ति । मन्ये मुसं वीक्ष्य विराटराजः स्सलन्त्यनगादपला: पदे पदे ।। ४५ ॥ वापीकूपतड़ागचत्वरमठक्रीडाद्रिवाट्यादिषु : भामिन्यो रमणैः सहोत्सुकतयोडेकाद्रमन्ते रहः तन्मन्येऽमरदम्पतीशतमिदंस्वर्गात्ममुत्तीर्य यत् दृष्टाश्चर्यपरंपरां मुदमगावराटपार्श्वे स्थितम् ॥ ४ ॥ गमागमाभ्यामटतां जनानां श्रेणी चतुर्दिनु चतुर्मुखेभ्यः । 'अत्राकरिष्यदलमेव सुरापगायाः पूरेण सा चेटभविष्यदेका ।।१७।। यतो वहिभागधरामु संस्थिताः कृषीवलाः साकवन्धुयोपितः। पदिममार्या योग्यानि पार्षदानि मनीपवर्नानि मेवानि । २ वेट ३ वमन्ननिराशापादोयमरनानिमध्य भागतनः । ४ वैराटनगरगन् । ।
न -- । कयामुखवर्णनम् । मनागमनागन्तरमाश्रिताश्रमाः धुर्दिवाप्रामशतोपमेयताम् ।। ४८ ॥ कोडाद्रिश्रृङ्गेषु च पाण्डवाना मद्यापि चाश्चर्यपरंपराः । यान् कांश्विदालोक्य वलावलिसा दप्पं विमुञ्चन्ति महावला अपि ॥४९॥ जले जने नक्रमहानियोजन धनुर्भृता ज्या निहतिर्न सम्पदाम् । रणे यती चापगुणे न संग्रहो विशालता यत्र न सा विशालता ॥५०॥ दण्डोस्ति छत्रे न किल प्रजायां बन्धोऽस्ति हारे न जने कचिद्वै । गन्धापहो गन्धवहोस्ति तस्करो न तस्करः कोपि परार्थसड्प्रहे ।। ५१ ॥ नवोढवध्या नवसङ्गमे भयं न जातु भीतिः परचक्रिणो रणे । वस्त्रापहारो रतकर्मणि ध्रुवं यत्रापहारोस्त्यपरो न कश्चित् ॥ ५२॥ छिद्रग्रहो मौक्तिकदामगुम्फे न सूययान्योन्यजनेषु कश्चिन् । द्यूते ध्वनिर्मारय मारयेति न वालगोपालमुखेषु यत्र ॥ ५३॥ साम्बूलभुक्तावितिखण्डनं का भौगोपभोगे न च तत्कदाचित् । १'क' पुस्तके " माश्रिता श्रमा" इति पाठः । २ 'ख' पुस्तके 'सा' इति पाठः। KAHAL क १० लाटीसंहितायां- प 7 क्षतं नखावरयोपिदङ्गे सौध्यावलीसंहनने न यत्र ।। ५४ ।। रागोऽधरे यत्र नितम्बिनीनां नान्यस्वदाराधनवञ्चनपु। नेत्रद्वयो रजनमगनानां पापाचनं नैव जनेष किञ्चित् ॥ ५५ ॥ पयोजनाले परमस्ति कण्टको न कण्टकः कोऽपि मिथः प्रजायाम् । नूनं सरोगो न जनोऽन्न कश्चित् परं सरोगो यदि राजहंसः ॥५६॥ दरिद्रता दातृजने न यत्र परं प्रतिग्राहिणि सास्ति पात्रे । नान्तस्तदाश्चर्यपरंपराणा मापूर्यतां चेत्कविधर्मशक्तिः ॥ ५७ ॥ इत्याद्यनेकैमहिमोपमानै वैराटनाम्ना नगरं विलोक्य । स्तोतुं मनागात्मतया प्रवृत्तः सानंदमास्ते कविराजमल्हः ।। ५८ ॥ आसीदुप्रसमप्रवंशविदिता यां स्वधुनीवामला नानाभूपतिरत्नभूरिव परा जातिश्च गत्ताभिधा । तस्यां बावरपातिसाहिरमवनिर्जित्यशन यला- दिल्लीमण्डलमण्डितात्मयशसा पूर्णप्रतापानलः ।। ५९ ।। तत्पुत्र समजीजननिजकुले व्योम्नीव चण्डांशुमान, दोर्दण्डैरिव खंडनोद्भूटमना नाम्ना हुमाई नृपः । दुर्यारो विलसातापमहिमा चकांतपात्राङ्कितो विख्यातो भुवि यः समुद्रपरिखापर्यंतभूमीश्वरः ॥ ६० ।। सरसि गतीति सरोग. । .
कथामुखवर्णनम् ।
तत्पुत्रोऽजनि सार्वभौमसदृशः प्रोद्यत्प्रतापानल--
"ज्वालाजालमतल्लिकाभिरभितः प्रज्यालितारिवजः।
श्रीमत्साहिशिरोमणिरत्वकयरो निःशेपशेषाधिपः
नानारत्नकिरीटकोटिघटितः सृम्भिः श्रितांहिद्वयः ।। ६१ ।।
श्रीमइिंडीरपिण्डोपमितमितनमः पाण्डुराखण्डकीया
कृष्टं ब्रह्माण्डकाण्डं निजमुजयशसा मण्डपाडम्बरोऽस्मिन् ।
येनासौ पातिसाहिः प्रतपदकयरमख्यविख्यातकीर्वि-
र्जीयागोवाथ नाथः प्रभुरिति नगरस्यास्य वैराटनानः ॥ ६२ ।।.
जैनो धर्मोनवद्यो जगवि विजयतऽद्यापि सन्तानवी
साक्षादैगम्वरास्ते यतय इह, यथा-जातरूपाङ्करक्षाः।
तस्मै तेभ्यो नमोस्तु बिसमयनियतं प्रोल्लसद्य प्रसादा-
दर्वागावर्द्धमान प्रतिषविरहितो वर्तते मोक्षमार्गः ।। ६३ ।।
'श्रीमति काष्ठासंघे माथुरगच्छेऽथ पुष्करे च गणे।
लोहाचार्यप्रभृतौ समन्वये वर्तमाने च ॥ ६४ ।।
आसीत् सूरिकुमारसेनविदितः पट्टस्थभट्टारक:
स्याद्वादैरनवद्यवादनसरैर्वादीभकुम्भेभमित् ।
येनेदं युगयोगिभिः परिमृतं सम्यग्दृगादित्रयी
नानारत्नचितं वृपप्रवर्ण निन्येऽद्य पारंपरम् ।। ६५ ।।
तत्पट्टेऽजनि हेमचन्द्रगणभृद्भहारकोर्वीपतिः
काष्ठासड्धनभोगणे दिनमणिर्मिध्यान्धकारारिजित् ।
यन्नामस्मृतिमात्रतोन्यगणिनो विच्छायतामागताः
खद्योता इव चायवाप्युडुगणा भान्तीव भास्वत्पुरः ॥ ६६ ।।
तत्सद्देऽभवदर्हतामययवः श्रीपद्मनन्दी गणी
वेद्यो जिन धर्मकर्मठमनाः प्रायः सवामग्रणीः ।
भव्यात्मप्रतिबोधनोद्भटभतिर्भट्टारको वाक्पटु-
र्यस्याद्यापि यश: शशाङ्कविशदं जागर्ति भूमण्डले ।। ६७ ॥
सिंहः। २ तीर्थस्पतिहरः।
१२ लाटीसंहिताया-- - 1 - H 11 है तत्पट्टे परमाख्यया मुनियश कीर्तिश्च भट्टारको, नैर्मध्यपदमाहतं श्रुतवलादादाय निःशेषतः ।। सर्पिर्दुग्धद्धीक्षुतैलमसिलं पञ्चापि यायद्रसान् । त्यक्त्वा जन्ममथं तदुअमकरोत् कर्मक्ष्यार्थं तपः ॥ ६८ ॥ तत्पढेऽस्त्यधुना प्रतापनिलयः श्रीक्षेमकीर्तिमुनिः ।। हेयादेयविचारचारुचतुरो भट्टारकोणांशुमान् । यस्योषधपारणादिसमये पादोदविन्दूरकरै- जातान्येय शिरसि धौतालुपाण्याशाम्बराणां नृणाम्।।। ६९ । तेषां तदानायपरंपराया मासीत्पुगे डौकनिनाम धेयः । तद्वासिनः केचिदुपासकाः स्युः सुरेन्द्रसामग्र्युपमीयमानः ।। ७० ।।। उपापोतकवंशशंशितपदप्रोगतजन्माश्रमः . ' ।। श्रीमन्मङ्गलगोत्रलाञ्छनतया दक्षैः सुलक्ष्यो भुवि । मासीच्छ्रीयनिजांपतिपमतिर्भारू स्वरंशे रविः साधुः साधुरितीह लोकविदितो धर्मकतानो धनी ।। ७१॥' तस्यासन्निह सूनवः क्रमभुवो वेदैरिवोत्प्रेक्षिताः- दूदाद्य. उकरोथ नाम जगसी तुर्यस्तिलोकायः । शासाकल्पतरोरिवात्मजनतावर्गस्य संपोपकाः चत्वारोऽपि निजान्वयोज्ज्वलयशोधानः सुपक्षा इव ।। ७२ तत्राद्यस्य सुतो वरो घरगुणो न्योताहसंघाधिपो येनैतजिनमन्दिरं स्फुटमिह प्रोनुगमत्यद्भुतम् । वैराटे नगरे निधाय विधिवत् पूजाश्च बढ्यः कृत- मत्रामुत्र सुखप्रद स्वयशसः स्तम्भ, समारोपितः ॥ ७३ ।। श्रीसहाधिपतिः प्रतापत्तपनो भोल्हा द्वितीयोगजो दुर्दान्तारिखलाचलाधरशिरः पाताय वझायितः । 1 -- । १ ॥ .
कयामुखवर्णनम् । पार्याख्यायित्तविक्रमः स्वशरणायायातधात्रीभुजां वैराटीयमहत्तरेष्वपि महत्सूत्रायितं यद्वचः ।। ७४ ।। उक्तभ्रात्युगावरोपि जननोपक्षीणहेतोः क्रमात् सवैरेव गुणेवरस्तदुभयप्रोक्तोक्तिसंसूचितः । अन्यैः कैश्चिदपि प्रकर्षकरणलब्धावकाशो गुणे- नाना 'फामन' साम्यधर्मनिरतो जीयादुपक्षाप्रणीः ।। ७५ ।। येनानन्तरिताभिधानविधिना सदाधिनाथेन य- च्छारामयशोमयं निजवपुः कर्तुं चिरादीप्सितम् । तन्मन्ये फलवत्तरं कृसमिदं लब्ध्वाधुना सत्कविम् वैराटे स्वयमागतं शुभवशाभूमीशमलाइयम् ।। ७६ ।। प्रागज्ञायि महात्मनात्ममतिनो येनैतध्यक्षतः धर्मादेव सुखश्चितो यदसुखं प्रायोस्त्यधर्मादिति । तत्ताल्हूविदुपः कृपापरतया देशोपदेशद्वया-- च्छाभट्टारकहेमचन्द्रविदितानांये कृतानात्मनः ॥ ७ ॥ सामान्यादवगम्य धर्मफालतुं ज्ञातुं विशेषादपि भक्त्या यस्तमपीपृच्छयूपरुचिर्नानाध्रुना फामनः । धर्मत्वं किमथास्य हेतुरथ किं साक्षात्फलं तत्त्वतः स्वामित्वं किमथेति सूरिरवदन सर्व प्रणुन्नः कविः ।। ७८ ॥ धर्मः प्राणिदया तदर्थमथ यत् सत्यव्रतादि स्फुट यद्वाईप्रतिविम्बपूजनमत्तः सत्पात्रदानादि यत् । तद्धेतुर्वहिराप्तवागथ फलं स्वर्गापवर्गश्रियो भव्यस्तत्पदमागुपासकमणे धर्म कुरुप्वादरात् ।। ७९ ।। सत्यं धर्मरसायनो यदि तदा मां शिक्षयोपक्रमात १ 'स ' पुस्तके " जनतो " इतिपाठः । २ ' क ' पुस्तके " सत्कविः" इतिपाठः । । 'क' पुस्तके " मल्हादयः " इतिपाठः किन्तु न साधुः प्रतिभाति । "क" पुस्तके “ सुसाश्चिनो" इतिपाटः अयमपि न साधुः। ५ पुस्तकयोः " आम्नाये " इतिपाठः । ६ उद्यमात् ।' . . न.
लाटीसंहितायां- , .. सारोद्धारमिवाप्यनुमहतया स्वल्पाक्षरं सारवत् । आपं चापि मृदूक्तिभिः स्फुटमनुच्छिष्टं नवीनं मह- निर्माण परिधेहि सघनृपतिः भूयोप्ययाद्रीदिति ।। ८.10. श्रुत्वेयादिवचःशतं मृदुरचिनिर्दिष्टनामा कवि नेतुं यावदमोघतामभिमत स्वोपक्रमायोद्यतः । तनत्यं जिनमन्दिर कविमनोहगोचरं व्यार- त्तावञ्चति सहायतां गुरुवचो द्रव्यादिलन्यात्रिय 1 ८१॥ उच्चैरुञ्चतरस्थलादापढपाश्चिता भिचयः पश्रेस्तम्मसमृद्धकोष्टघदिताः शालावतस्रः शुभाः ।। मध्ये स्याद्वरवैदिकोत्तमतनुः यूटोस्ति मन्येत्वहं वैराटस्य शिरकिरीटघटित चैतग्जिनानां गृहम् ।। ८२॥ अनुपमशरसंख्यापूर्णवर्णावलीभि र्लिसितमनुजनागामर्त्य सर्वस्वसारम् । ध्वजचमरमृगेन्द्रस्यासनातोद्यछत्रैः समवसरणशोभोद्भासि सफ़ेदमत्र ।। ८३ ॥. " चित्रालीर्यदलीलिसत्रिजगतामासृष्टिसर्गक्रमा दादेशादुपदेशतश्च निया श्रीक्षेमकीर्ते: गुरोः । गु ज्ञानतित्तितश्व विदुषस्वाल्हूपदेशादपि वैराटस्य जिनालये लिपिकरस्वत्सायनामाप्यभूत ।। ८४ ॥ यत्र श्रावकसङ्घमाण्डवमही स्वर्गाचले वायुतत स्याद्वादोद्यदमन्दवादविदितास्तिष्ठन्तियत्राहताः । निम्रन्याः शमिनस्तपोनिभरतो, निर्दिग्धकम्र्मेन्धनाः श्रीवैराटपुरास्थितं जिनगृई तत्केन संवर्ण्यते ॥ ८५ ॥ पात्रेभ्यो गृहधर्मकर्मनिरतैर्नित्यं सदाचारिभिः दीयन्तेऽभयमेषजानुमवनान्नादानि दानानि च । पूज्यन्ते जिनविश्वशाखमुनयो यत्रानिशं श्रेयसे श्रीवैराटजिनालयः प्रतिदिन जीयाद्वरेण्यो वरः॥ ८६ ॥ - कथामुखपर्णनम् । इत्याद्यनेकगुणराजिविराजमान संप्रेक्षणीयमनिशं जगदीक्षणानाम् । तत्र स्थितः किल करोति कविः कवित्वं तद्वद्धतामपि गुणं जिनशासनं च ॥ ८७॥ इति श्रीस्याद्वादानयद्यपधगधविद्याविशारदविद्वन्मणिराजमल्लवि- रचितायां श्रावकाचारापरनामलाटीसहितायां साधुश्री दूदात्मजफामनमनःसरोजारविन्दविकाशनक मात- पहमण्डलायमानायां कथामुखवर्णनं नाम प्रथमः सर्गः। अथ द्वितीयः सर्गः। एतत्कथामुखरसे रसिकाग्रणीर्यो दूदात्मजो जयति फामननामधेयः । वैराटपमहतां महनीयकीर्ति- रुप्रोतकान्वयमयो गरिमाम्युराशिः ॥ १ ॥ इत्याशीवादः। अहिंसा परमोधर्मः स्यादधर्मस्तदत्ययात् । सिद्धान्तः सर्वतन्त्रोयं तद्विशेषोऽधुनोच्यते ॥ १ ॥ सर्वसावद्ययोगस्य निवृतिव्रतमुच्यते । यो मृपादिपरित्यागः सोस्तु तस्यैव विस्तरः ॥ २ ॥ तहत सर्वतः कतुं मुनिरेव भूमो महान् । तस्यैव मोक्षमार्गश्व भावी नान्यस्य जातुचित् ॥ ३॥ अत: सर्वात्मना सम्यक् कर्तव्यं तद्धि धीधनैः । कृच्छ्लब्धे नरत्वेऽस्मिन् सूकविन्दूदकोपमे ।। ४ ।। १ अहिंसाधर्मनाशात् ।
६ 'लाटीसंहितायां- -- . तत्रालसो जनः कश्चित्कपायभरगौरवान। असमर्थस्तथाप्येप गृहस्थतमाचरेत् ॥ ५ ॥ उक्तंच। गुण वय तब सम पडिमा दाणं जलालणं च अणत्थिामयं । दसणणाणचरितं किरिया तेवण्ण सावयाणं च ॥ १ ॥ 'तथा चोक्तम् । - दसण वय सामाइय पोसह सचित्त रायभत्ते य । वंभारंमपरिग्गह अणुमणमुदिड देसविरदो य ॥२॥ अष्टमूलगुणोपेतो द्यूतादिव्यसनोज्झितः । नरो दर्शनिकः प्रोक्तः स्यात्सद्दर्शनान्वितः ॥ ६ ॥ मद्यं मांस तथा क्षौद्रमथोदुम्वरपञ्चकम् ।। वर्जयेच्द्रावको धीमान् केवलं कुलधर्मवित् ॥ ७॥ । ननु साक्षान्मकारादित्रयं जैनो न भक्षयेत् । तस्य किं वर्जनं न स्यादसिद्ध सिद्धसाधनात् ॥ ८॥ मैवं यस्मादतीचाराः सन्ति तत्रापि केचन । अनाचारसमाः नूनं त्याज्या धर्मार्थिभिः स्फुटम् ॥ ९॥ तद्भदा बहवः सन्ति माशां वागगोचराः। तथापि व्यवहारार्थ निर्दिष्टाः केचिदन्वयात् ॥ १० ॥ चर्मभाण्डे तु निक्षिप्ताःघृततैलजलादयः । } } } त्याध्या यतस्त्रसादीनां शरीरपिशिवाश्रिताः ।। ११॥', नचाशङ्कचं पुनस्तत्र सन्ति यद्वान सन्ति ते। संगयोऽनुपलव्धित्वाद् दुर्वारो व्यामचित्रवत् ॥ १२॥, १ गुण शब्देन अशे मूलगुणा ज्ञेयाः -1 गुणाः , यतानि १२, तर १२. समता १, प्रतिमा ११, दान १, जनगालनं, च अनस्तिमितम् १ । दर्शन- ज्ञानचरित्र ३, कियाः बिपञ्चाशत् श्रावकाना च। . + मूलगुणाष्टकप्रतिपाटसप्तव्यसननिरोधवर्णनम् । सर्व सर्वज्ञज्ञानेन दृष्टं विश्वकचक्षुषा । तदाज्ञया प्रमाणेन माननीय मनीपिभिः ॥ १३ ॥ नौद्यमेतावता पापं स्याद्वा न स्यादतीन्द्रियात् । अंहो मांसाशिनोऽवश्यं प्रोकं जैनागमे यतः ॥ १४ ॥ तदेवं वक्ष्यमाणेषु सूत्रेपूदितसूत्रयन् । संशयो नैव कर्तव्यः शासनं जेनमिच्छता ॥ १५॥ अनं मुगादि, अ॒भ्यादि भेपजं. शर्करादि वा। खाद्यं, स्वायं तु भोगार्थ ताम्यूलादि यथागमान् ॥ १६ ॥ पेयं दुग्धादि लेपस्तु तैलाभ्यङ्गादि कर्म यत् । चतुर्विधमिदं यावदाहार इति संज्ञितः ।। १७ ।। अथाहारकृते द्रव्यं शुद्धशोधितमाहरेत् । अन्यथामिपदोपः स्यात्तदनकासाश्रितात् ।। १८॥ विद्धं प्रसाश्रितं यावद्वर्जयेत्तदभक्ष्यवन् । शतशः शोधितं चापि सावधानादिभिः ॥ १९ ॥ संदिग्धं च यदन्नादि प्रितं वा नाश्रित सैः । मनःशुद्धिप्रसिद्धर्थ श्रावकः कापि नाहरेत् ॥ २० ॥ अविद्धमपि निर्दोष योग्यं चानाश्रितं सः । आचरेच्छ्रावकः सम्यादृष्टं नाष्टमीक्षणः ॥ २१ ॥ ननु शुद्धं यपन्नादि कृतं शोधनयानया। मैवं प्रमाददोपत्वाकस्मपस्यानवो भवेत् ।। २२ ॥ गालितं दृढवस्त्रेण सर्पिस्तैलं पयो द्रवम् । तोयं जिनागमानायादाहरेन्स न चान्यथा ॥ २३ ॥ अन्यथा दोप एवं स्यान्मांसातीचारसंज्ञकः । अस्ति तत्र प्रसादीनां मृतस्याङ्गस्य शेषता ॥ २४ ॥ १न विचार्यम् । २ पापम् । ३ " क " " " पुस्तक्योः "अभक्षवत्" इति पाठः । 7 नेत्रादिभिः। २ला. स.
टाटीसहिताया- - . दुरवधानतया मोहात्प्रमादाद्वापि शोधितम् । दुःशोधितं तदेव स्याद् ज्ञेयं चाशोधितं यथा ॥ २५ ॥ तस्मात्सबूतरक्षार्थ पलदोपनिवृत्तये । आत्मग्भिः स्वहस्तैश्च सम्यगन्नादि शोधयेत् ।। २६ ॥ यथात्मार्थ सुवर्णादिक्रयार्थी सम्यगीक्षयेत् । अतवानपि गृहीयादाहारं सुनिरीक्षितम् ।। २७ ।। मधर्मेणानभिज्ञेन साभिज्ञेन विधर्मिणा । शोधित पाचितं चापि नाहरेद् व्रतरक्षकः ।। २८ ।। ननु केनापि स्वीयेन सधर्मण विधर्मिणा । शोधितं पाचितं भाज्यं सुज्ञेन स्पष्टचक्षुषा ।। २९॥ मैवं यथोदितस्योञ्चविश्वासो व्रतहानये । अनार्यस्याप्यनांद्रस्य संयमे नाधिकारिता ।। ३० ॥ चलितत्वात्सीम्नश्चैव नूनं भाविव्रतक्षतिः । शैथिल्याद्धीयमानस्य संयमस्य कुतः स्थितिः ॥ ३१॥ घोधितस्य चिरात्तस्य न कुर्याद् ग्रहणं कृती। कालस्यातिक्रमाद्भूयो दृष्टिपूतं समाचरेत् ॥ ३२ ।। केवलेनाग्निना पर मिश्रितेन घृतेन वा। उपितानं न भुञ्जीत पिशिताशनदोपवित् ॥ ३३ ॥ तत्रातिकालमात्रत्वे परिणामगुणात्तथा । सम्मूच्छर्यन्ते त्रसाः सूक्ष्मा: झेयाः सर्वविदाक्षया ॥ ३४ ॥ शाकपाणि सर्वाणि नादेयानि कदाचन । श्रावकमांसदोषस्य वर्जनार्थ प्रयत्नतः ।। ३५ ॥ तनावश्यं त्रसाः सूक्ष्मा केचित्स्युष्टिगोचराः । न त्यजन्ति कदाचित्तं शाकपन्नाश्रयं मनाम् ॥ ३६॥ तरमाद्धार्थना नूनमात्मनो हितमिच्छता । आताम्बूलं दलं त्याज्यं श्रावकैदर्शनान्वितैः ॥ ३७॥ १पन शून्यतया । २ निर्दयस्य । ३ वामितम् ।
मूलगुणाष्टकप्रतिपाटसप्तव्यसननिरोधवर्णनम् । . रजन्यां भोजन त्याज्यं नैष्ठित्रतधारिभिः । -पिशिताशनदोषस्य त्यागाय महदुद्दामः ॥ ३८ ॥ ननु रात्रिमुक्तित्यागो नात्रोद्देश्यस्त्वया कचित् । पष्ठसंज्ञकविख्यातप्रतिमायामास्ते यतः ॥ ३९ ॥ मत्यं सर्वात्मना तत्र निशाभोजनवर्जनम् । हेतोः किन्वत्र दिग्मात्रं सिद्धं स्वानुभवागमान ॥ ४० ॥ अस्ति कश्चिद्विशेपोत्र स्वल्पाभासोर्थतोमहान् । मातिचारोऽत्र दिग्मात्रे तत्रातीचारवर्जिताः॥४१॥ निपिद्धमन्नमात्रादिस्थूलभोज्यं व्रते दृशः । न निषिद्धं जलाधन ताम्यूलाद्यपि वा निशि ॥ ४२ ।। तत्र ताम्बूलतोयादिनिपिद्धं यावदञ्जसा । प्राणान्तेऽपि न भोक्तव्यमौपधादि मनीषिणा ॥ ४३ ।। न वाच्यं भोजयेदन्नं कश्चिद्दर्शनिको निशि । अतित्वादशक्यत्वात्पक्षमात्रात्सपाक्षिकः ॥ ४४ ॥ अस्ति तन्त्र कुलाचारः सैपा नाम्ना कुलकिया। तां विना दर्शनिको न स्यान्नस्यानामतस्तथा ॥ ४५ ॥ मांसमात्रपरित्यागादनस्तमितभोजनम् । व्रतं सर्वजघन्यस्यात्तदधस्तात्स्यादक्रियाः ॥ ४६॥ नेत्थं य: पाक्षिकः कश्चिद व्रताभावादस्त्यव्रती। पक्षमावावलम्बी स्याद्वतमान नचाचरेत् ॥ ४७ ॥ यतोस्य पक्षणाहित्वमसिद्धं बाधसम्मवात् । लोपात्सर्वविदाज्ञाया: साध्या पाक्षिकता कुतः ॥ ४८॥ आज्ञा सर्वविदः सैव क्रियावान् श्रावको मतः । कश्चित्सर्व निकृष्टोपि न यजेत्स कुलक्रियाः ॥ ४९ ॥ , अल्पमानम् । २ क स पुस्तकयोः "स्यान्नस्याहानामतस्तथा" इति पार किन्त्वनेनेकाक्षराधिक्यम् ।
२० टाटीमहितायां- । उक्तपु वश्यमाणेपु दर्शनिकयतेषु च । सन्देहो नेय कर्तव्यः कर्तव्यो व्रतसंग्रहः ।। ५ ।। प्रमिद्धं सर्वलोकेस्मिन निशायां दीपयन्निधौ।। पतङ्गादि पतत्येव प्राणिजातं सात्मकम् ।। ५१ ।। नियन्ते जन्तवस्तर अम्पापातासमक्षतः। तत्कलेवरसम्मिथ तत्कुतः स्यादनामिपम् ।। ५२ ।। युक्तायुक्तविचारोपि नास्ति या निशि भोजने । मक्षिका नश्यते सम्यक् कथा ममकस्य तु 1) ५३ ।। तस्मारसंयमद्धयर्थ निशायों भोजनं यजेत् । शक्तितस्तचतुष्कं स्यादन्नाद्यन्यतमादि वा ॥ ५४ ।। यत्रोपित न भश्यं स्यादन्नादि पलदोषतः । आमवारिष्टसन्धानाथानादीनां कथात्र का ॥ ५५ ॥ म्पगन्धरसस्पर्शाचलितं नैव भक्षयेत् । अवश्यं त्रसजीवानां निकीतानां समाश्रयात् ॥ ५६ ।। दधितकरसादीनां भक्षणं वदयमाणवः । कालादाक् , ततस्तूद्ध न भयं तदभश्यवत् ।। ५७ ।। इत्येवं पलदोषस्य दिग्मानं लक्षणं स्मृतम् । फलितं भक्षणादस्य वक्ष्यामि श्रृणुताधुना ॥ ५८ ॥ : सिद्धान्ते सिद्धमेवैतन् मयत: मर्वदेहिनाम् । मांसांशस्याशनादेव भावः संशितो भवेत् ।। ५९ ॥ न कदाचिन् मृदुत्वं स्याद्यद्योगं अवधारणे । द्रव्यतो कर्मरूपस्य तच्चतरनविक्रमान् ॥ ६०॥ अनाद्यनिधना नूनमचिन्त्या वस्तुशक्तयः । न प्रता कुतकैयन् स्वभावोऽतर्कगोचरः ।। ६१ ॥ अयस्कान्तोपलाष्टसूचीवत्तवयोःपृथक् । अस्ति शक्तिर्विभावास्या मिथो यधादिकारिणी ।। ६२।।
मूटगुणाष्टकप्रतिपाल समयसननिरोधवर्णनम् । न वाच्यमकिश्चित्करं वस्तुबाह्यमकारणम् । 'धनरादिविकाराणामिन्द्रियार्थेषु दर्शनात ॥ ६३ ॥ उक्तं च। यद्वस्तुवाहां गुणदोपसूतनिमित्तमभ्यन्तरमूलहेतोः । अध्यात्मवृत्तस्य तदङ्गभूतमभ्यन्तरं केवलमप्यलं ते ॥ ३ ॥ एवं मांसाशनाद्भावोऽवयं संश्लेशितो भवेत् । तस्मादसातवन्धः स्यात्ततो भ्रान्तिस्ततोऽसुखम् ॥ ६४ ।। एतदुक्तं परिज्ञाय श्रद्धाय च मुहुर्मुहुः । ततो विरमणं कार्य श्रावकैधर्मवेदिभिः ॥ ६५॥ मद्यं त्यक्तवतस्तस्य वच्म्यतीचारपर्जनम् । यत्यागेन भवेन्छुद्धः श्रावको ज्ञातस्वर्णवत ॥ ६६ ॥ हपीकज्ञानयुक्तस्य मादनान्मद्यमुच्यते । ज्ञानाद्यावृत्तिहेतुत्वात्स्यात्तदवद्यकारणम् ॥ ६७ ॥ भङ्गाहिफेनधत्तूर खस्ससाटिफलं च यत् । माद्यताहेतुरन्यद्वा सर्व मद्यवदीरितम् ॥ ६८ ॥ एवमित्यादि यद्वस्तु सुरेव मदकारकम् । तन्निखिलं त्यजेद्धीमान् श्रेयसे ह्यात्मनो गृही ॥ ६९ ।। दोपत्वं प्राग्मतिभ्रंशस्ततोमिथ्याववोधनम् । रागादयम्ततः कर्म ततो जन्मेह क्लेशता ॥ ७० ॥ दिग्मात्रमत्र व्यारयातं तावन्मात्रैकहेतुतः । व्यारयास्यामः पुरो व्यासात्तंद्रतावसरे वैयम् ।। ७१ ।। मानिक मक्षिकानां हि मांसासृक् पीडनोद्भवम् । प्रसिद्धं सर्वलोके स्यादागमेष्वपि मूचितम् ॥ ७२ ।। न्यायात्तद्भक्षणे नूनं पिशिताशनदूपणम् । त्रसास्ता मक्षिका यस्मादामिपं तत्कलेवरम् ।। ७३ ॥ १ उन्मादकारणात् । २ सोक्मात्रम् ।३विस्तरतः । क ' पुस्तके " स्वयम् " इतिपाठः। r २२ टाटामहिनायां- फिच तर निकीतादिजीवाः ममर्गजा क्षणान् । मन्मूच्छिमा न मुश्वन्ति तत्सङ्ग जातु कत्र्यवत् ॥ ७ ॥ यथा पकं च शुष्कं वा पलं शुद्धं न जातुचिन् । प्रामुकं न भवत्कापि नित्यं माधारणं यतः ॥ ४५ ॥ अयमों यथानादि कारणायामुकं भवेन् । शुष्कं वायमिपा वा प्रामुकं न तथामियम् ॥ ७६ ॥ प्राम्बवायनाचारा: मन्ति केचिबिनागमान् । यथा पुष्परमः पात: पुष्पाणामामयो यथा ।। ७७ ।। उदुम्बरफलान्येव नांदयानि दृगात्मभिः । नित्यं माधारणान्येव त्रमादराश्रितानि च ।। ७८ ॥ अनादुम्बरमब्दम्नु नूनं स्यादुपलअणम् । नेन माघारणान्याच्या यं वनम्पतिकायिकाः ॥ ७९॥ मूलग्गपारवीआ माहा तह संघकंदवीधरहा। मम्मुच्छिमा य भणिया पत्तयाणंतकाया य ॥2॥ १ अपाय:-या प्रत्येकवनम्रतानां कदस्य वा मृगम्य वा शमाया र कन्यम्यापि वा नबललग स्परतरा मवन्ति नेप' अनन्तनीवाः अनन्तग्य- निगोदना महिला प्रतिविषयेकाः इत्यर्थः । तु पुनः ये फन्दादीनां त्वा ननु प्रयगाने अप्रतिष्टितयत्येकाः भान्ति । मल बोन येषां ने मृटना" अकादय, अन यीन ये ने अमयीना. आर्यकोटीन्यादयः । काम कत कानन्यादय । पद यान येवा ने पीना. भुवप्रादयः । कन्दो बान येन ने कटयता विराट मुग्णदष । स्कन्धो यौन परी ते कन्धाना: माया काय पानात गलानि यानम्दाः । शानिगोमादयः । सम्पन्न मभान यमनपरामधेन वा मम्मनिगमा । अनानानन्नानिगोदीवाना कायाः दायका । प्रादत अभिनयका सनार। एने मूल दागाई मम्म उनमयना निपिनमा येसाजीवादी सम्मटिमा एवं भवन्ति । भनिन म प्रयय ये शुगर पेशं ते निष्ठिता या अटाकामा एक गाय ।
मूलगुणाष्टकप्रतिपाटसमत्र्यसननिरोधवर्णनम् । २३ साहारणमाहारं साहारणमाणपाणगणं च । साहारणजीवाणं साहारणलक्सणं भणियं ॥५॥ जत्येकमाइ जीवो तत्थ दु मरणं वे अणंताण । चंकमइ जत्थ इको चंकमणं तत्थ पंताणं ॥६॥ मूलबीजा यथाप्रोका फलकाबादकादयः । न भक्ष्या दैवयोगाद्वा रोगिणाप्यौपधच्छलात् ।। ८० ॥ तदक्षणे महापापं प्राणिसन्दोहपीडनात् । सर्वज्ञाज्ञावलादेतदर्शनीयं दृगशिभिः ।। ८१ ॥ ननु केनानुमीयेत हेतुना पक्षधर्मता । प्रत्यक्षानुपलब्धित्वाजीवाभावोवधार्यते ।। ८२ ।। मैवं प्रागेव प्रोक्तत्वात्स्वभावोऽतर्कगोचरः । तेन सर्वविदाज्ञायाः स्वीकर्तव्यं यथोदितत् ॥ ८३ ॥ नन्वस्तु तत्तदाज्ञाया पृष्ठमीहामहे परम् । यदेकाक्षशरीराणां भक्ष्यत्वं प्रोक्तमहता ।। ८४ ॥ १ यत्साधारणनामकदियवशदत्यनन्तजीवाना उत्पन्नप्रथमसमये आहारपर्याप्ति. नकायंचाहारवर्गणायातपदलस्कन्धाना सलग्सभागपरिणमन साधारणसदरा समकाल च भवति । तथा शरीरपर्याप्ति. तत्कायचाहारवर्गणायातपात स्कन्धानां शरीगकार- परिणमन । इन्द्रियपर्याप्तिः तत्कार्यं च स्पर्शनादौन्द्रियाकारपरिणमनम् । आनपान पर्याप्तिः तत्कायं च उवासनिन्यासपहण । साधारण समकाल च भवति । तथा प्रथमसमयोत्पन्नानामिव तव शरीरे द्वितीयादिसमयोत्पन्नानामप्यनन्तानन्तनीदाना पूर्वपूर्वसमयोत्पन्नानामनन्तानन्तनादेः सहआहारपर्याप्त्यादिकं सर्व सदृश समकालं च भवति । सदिई साधारणलक्षणं भणितम् । नि-नियमादनन्तसम्यावच्छिन्नानां जीवाना गोदं क्षेत्र स्थान ददातीति निगोद कर्म । तद्युक्ता जीवा निगोदा इत्युच्यते। अथवा नियताना अनन्तानन्त जीवाना एका एवं गा भूमि क्षेत्र निवास ददातीति निगोद नत् शरीर येषां ते निगोदा. । एकोन्छासनियासे अष्टादश वार जन्म रूत्वा अगदशवार मरण कुर्वति ॥ २ यत्र एकः निस्ते जीवः तत्र तु मरण भवेत अनन्तानाम् चक्रमते या एका चक्रमण तत्र अनन्तानाम् 1 3 आगमनम-जन्म । विगारगोचरो नास्ति ।
२४
लाठीसहितायां-
.
1
सत्यं बहुयधादन भक्ष्यत्वं नोक्तमहता ।
कुतश्विरकारणादेव नालंध्यं जिनशासनम् ॥ ८५ ॥ ,
एवं चेत्तत्र जीवास्ते कियन्तो यद कोविद ।
हेतोर्यत्र सर्वहरभक्ष्यत्यमुदीरितम् ।। ८६ ॥
पना गुलासंख्यभागभागैकं तद्वपुः स्मृतम् ।
तस्मिन् शरीरे स्युःप्राणिनोऽनन्तसंनिताः ।। ८७ ॥
उक्त च।
एयणिगोयसरीर जीवा व्यापमाणदो दिहा।
सिद्धेहि अणतगुणा सव्येण वितीदकालेण ।। ७ ॥
इदमेवात्र तात्पर्य तावन्मात्रावगाहके।
केचिन्मियोवगाहाः स्युरेकीभावादिवापरे ।। ८८ ॥
उक्तंचा
जंबूदीने भरहे. कोसरसकेय तरपरा च ।
ग्धंडर आवासा पुलविसरीराणि दिहता ॥ ८ ॥
एतन्मत्वाहता प्रोक्तमाजवंजवभीमणा।
कन्दादिलक्षणत्यागे कर्तव्या सुमति' सती ।। ८९॥
एवमन्यदपि साम्यं यत्साधारणसभणम् ।
असानितं विशेपेण तद्वियुक्तस्य का कथा ॥ ९ ॥
साधारणं च केपांचिन्मूलं स्कन्धस्तथागमात् ।
शासाः पत्राणि पुष्पाणि पर्वदुग्धफलानि च ।। ९१ ॥
सत्र व्यस्तानि फेपांचित्समस्तान्यथदेहिनाम् ।
पापमूलाग्न सर्वाणि ज्ञात्वा सम्यक् परित्यजेत् ।। ९२ ।।
मूलसाधारणास्तव मूलकाश्चाद्रकादय.।
महापापप्रदा सर्वे मूलोन्मूल्या गृहिवतः ॥ ९३ ।।
स्कन्धपत्रपयः पर्व तुर्यसाधारणा यथा ।
गंडारकस्तथा चार्कदुग्ध साधारणं मतम् ॥ ९४ ॥
२५ मूलगुणाष्टकप्रनिपाटसप्तव्यमननिरोधवर्णनम् । पुष्पसाधारणा: केचिरकरीरदार्पपादयः । पर्वसाधारणाश्चेक्षुदण्डा: माधारणामकाः ॥ ९५ ।। फलसाधारणं ख्यातं प्रोक्तोदुम्बरपञ्चकम् । मासासाधारणा ख्याता कुमारीपिण्डकादयः ॥ ९६ ।। कुंपलानि च सर्वपां मृदूनि च यथागमम् । मन्ति साधारणान्येव प्रोक्तकालावधेरधः ॥ ९७ ।। माकाः साधारणा: केचित्केचित्प्रत्येकमूर्तयः । वल्यःसाधारणा:काश्वित्काश्चित्प्रत्येककाः स्फुटम् ।। ९८ ॥ तत्स्वरूपं परिज्ञाय कर्तव्या विरतिस्ततः । उत्सर्गात्सर्चतस्त्यागो यथाशक्त्यापवादतः ।। ९९ ।। शक्तितो विरतौ चापि विवेकः साधुरात्मनः । -निर्विवेकात्कृतं कर्म विफलं चाल्पफलं भवेत् ॥ १० ॥ कदाचिन्महतोऽज्ञानादुर्दैवानिर्विवेकिनाम् । तत्केवलमनाय कृतं कर्म शुभाशुभाम् ॥ १०१ ।। यथात्र श्रेयसे केचिद्धिंसां कुवन्ति कर्मणि । अज्ञानात्स्वर्गहेतुत्वं मन्यमाना: प्रमादिनः ।। १०२ ॥ तदवइयं तत्कामेन भवितव्यं विवकिनाम् । देशतो वस्तुसंख्याया. शक्तितो व्रतधारिणा ।। १०३ ॥ विवेकस्यावकाशोस्ति देशतो विरतावपि । आदेयं प्रासुकं योग्यं नादेयं तद्विपर्ययम् ।। १०४ ॥ न च स्वात्मेच्छया किंचिदात्तमादेयमेव तन् । नातं यत्तदनादेयं प्रान्तोन्मत्तकवाक्यवत् ।। १०५।। तस्माद्यत्प्रासुकं शुद्धं तुच्छहिंसाकरं शुभम् । म सक्तुमशक्येन ग्राह्य तत्वचिदल्पशः ॥ १०६ ॥ १ दुर्मयोगात् । २ विरतिसभीहकेन । ३ गृहीतम् ।
२६ साठीसंहितायां- Muraree यावत्साधारण साज्यं सायं यावलसाधितम् । एतत्यागे गुणोवश्यं संग्रह स्वल्पदोपता ।। १०७ ।। ननु साधारणं यावत्तत्सवं लक्ष्यते कथम् । सत्यं जिनागमे प्रोत्साहक्षणादेव लक्ष्यते ।। १०८ ॥ तल्लक्षणं यथा भने समभाग: प्रजायते । सावत्साधारण मय शेप प्रत्येकमेव तन् ।। १०९॥ तनाध्यत्यल्पीकरणं योग्यं योगेषु वस्तुपु । यतस्तृष्णानिात्यर्थमेतत्सर्व प्रकीर्तितम् ।। ११०॥ इति संपत स्यातं सान्ना मूलगुणाष्टकम । अर्धादुत्तरमंज्ञाश्च गुणा:स्युगृहमेधिनाम् ॥ १११ ।। तांस्तानवसरे तत्र वश्यामः स्वल्पविस्तरात् । इत. प्रसङ्गतो वक्ष्ये तत्सप्तव्यसनोझनम् ॥ ११२।। द्यूतमांसमुरावश्यारेटचार्यपराङ्गनाः । महापापानि सप्तति व्यसनानि त्यजेयुधः ॥ ११३ ।। अभपासादिनिक्षिप्त वित्ताजयपराजयम् । कियायां विद्यते यत्र सबै घृतमिति स्मृतम् ॥ ११४ ॥ प्रसिद्धं द्यूतकर्मेदं सद्यो वन्धकर स्मृतम् । यावदापन्मय ज्ञात्वा त्याज्यं धर्मानुरागिणा ॥ ११५ ॥ तत्र बद्ध कथा सन्ति यूनस्यानिष्टसूचिकाः । रतास्तत्र नरा. पूर्व नष्टा धर्ममुतादयः ।। ११६॥ भ्रूयते दृश्यते चैव द्यूतस्यैतद्विजम्भितम् । दरिद्रा. करितोपागा नरा. प्रास्ताधिकारकाः ।। ११७ ॥ न वाच्यं द्यूतमात्रं स्यादेकं तव्यसनं मना । चौर्याटि सर्वव्यसनपतिरेप न संशयः ।। ११८॥ १ उत्तागुणान् । फरम्।
मूलगुणाष्टकप्रतिपालसप्तत्र्यसननिरोधवर्णनम् । २७. विद्यन्तेत्राप्यतीचारास्तत्समा इव केचन । "जेतव्यास्तेपि दृग्मार्गे लग्नः प्रत्यप्रयुद्धिभिः ।। ११९ ।। अन्योन्यस्येपया यत्र विजिगीपा द्वयोरिति । व्यवसायाहते कर्म द्यूतातीचार इप्यते ॥ १२० ॥ यथाहं धावयाम्यत्र यूयं चाप्यत्र धावत । यदातिरिक्तं गच्छेयं त्वत्तो गृह्णामि चेप्सितम् ।। १२१ ।। इत्येवमादयोप्यन्ये द्यूतातीचारसंज्ञिकाः । क्षपणीया क्षणादेव द्यूतत्यागोन्मुसैनरैः ॥ १२२ ।। मांसस्य भक्षणे दोपाः प्रागवान प्रपश्चिताः । पुनरुक्तभयाभूयो नीता नोद्देशप्रक्रियाम् ॥ १२३ ।। कर्म तत्र प्रवृत्तिः स्यादासक्तिर्व्यसनं महत् । प्रवृत्तिर्यत्र स्याज्या स्यादासक्तस्तत्र का कथा ।। १२४ ।। "मैरेयमपि नादेयमित्युक्तं प्रागितो यतः । ततोद्य वक्तव्यतायां पिष्टपेपणदूपणम् ।। १२५ ॥ प्राग्वत्र विशेपोस्ति महानप्यविवक्षितः । सामान्यलक्षणाभावे तद्विशेपर्कतिर्यथा ॥ १२६ ।। प्रवृत्तिस्तु क्रियामात्रमासक्तिर्व्यसनं महत् । त्यक्तायां तत्प्रवृत्तौ वै का कथा सक्तिवर्जने ।। १२७ ॥ तदलं बहुनोक्तेन तद्न्धोऽवद्यकारणम् । स्मृतमात्रं हि तन्नाम धर्मध्वंसाय जायते ॥ १२८ ॥ पण्यत्री तु प्रसिद्धा या वित्तार्थ सेवते नरम् । तन्नाम दारिका दासी वेश्या पत्तननायिका ।। १२९ ।। उत्त्यागः सर्वतः श्रेयान् श्रेयो) यत्ततां नृणाम् । मद्यमांसादिदोपान्वै निःशेपान त्यक्तुमिच्छताम् ।। १३० ।। आस्तां तत्सङ्गमे दोपो दुर्गती पतनं नृणाम् । इहैव नरकं नूनं वेश्याव्यासक्तचेतसाम् ॥ १३१ ॥ १ दिना। • अधिकम् । । मद्यम् ! हानिः । ५ यलकुर्वताम् ।
२८ लाटीसंहिताया- । Newers उक्त च। या सादन्ति पलं पिबन्ति च सुरां जल्पन्ति मिथ्यावयः । स्निह्यन्ति द्रविणार्थमेव विदधत्यर्थप्रतिष्ठाक्षतिम् । नीचानामपि दूरवक्रमनसः पापात्मिका कुर्वते । लालापानमनिशं न नरकं वेश्यां विहायाऽपरम् ॥ ९॥ रजकशिलासहशीभिः कुक्कुरकर्परसमानचरिताभिः ।। वेश्याभिदिसङ्गः कृतमिव परलोकवार्ताभिः ॥ १० ॥ प्रसिद्धं बहुभिस्तस्यां प्राप्ता दुःखपरंपराः । श्रेष्टिना चारुदत्तेन विख्यातेन यथा पराः ॥ १३२ ।। यावान् पापभरो यादृग्दारिका दरिकर्मणः । कविनापि न वा तावान् क्वापि वक्तुं च शक्यते ॥ १३३ ॥ आस्तां च तद्रतादन चित्रकादिरजो नृणाम् । नारकादिगतिप्रान्तेर्यद् दुःखं जन्मजन्मनि ॥ १३४ ॥ . न वाच्यमेकमेवैतत्तावन्मात्राल्पदोपतः । द्यूतादिव्यसनासक्तः कारणं धर्मध्वंसकृत् ॥ १३५ ।। सुगमत्वाद्धि विस्तारप्रयासो न कृतो मया । दोप. सर्वप्रसिद्धोत्र वायंदूकतया कृतम् ॥ १३६ ।। सन्ति तत्राप्यतीचाराश्चतुर्थत्रतवर्तिनः । निर्देश्यामो वयं तांस्तान तत्तत्रावसरे यथा ।। १३७ ॥ रयात. पण्याङ्गनात्यागः संश्लेपादक्षप्रत्ययात् । आसेटकपरित्यागः साधीयानिति गस्यते ।। १३८ ।। अन्तर्भावास्ति तस्यापि गुणाणुव्रतसंज्ञके। अनर्थदण्डसागाख्ये पाह्यानर्थक्रियादिवत् ॥ १३९ ।। तत्तत्रवसरेऽवश्य वक्ष्यामो नातिविस्तरान् । प्रसगावा तदनापि दिग्मा वस्तुमर्हति ॥ १४ ॥ १ अतिवाहनया । २ अतिशयेन साधः पनिट्वान् । 1 मूलगुणाष्टकप्रतिपाटसप्तव्यसननिरोधवर्णनम् । २९. ननु चानर्थदण्डोस्ति भोगादन्यत्र या:क्रियाः। आत्मानन्दाय यत्कर्म तत्कथं स्यात्तथाविधम् ।। १४१ ।। यथा सूकचंदनं योपिद्वसामरणभोजनम् । सुखार्थ सर्वमेवैतत्तथाखेटक्रियापि च ॥ १४२ ।। मैवं तीवानुभागस्य वन्धः प्रमादगौरवात् । प्रमादस्य निवृत्यर्थ स्मृतं ब्रतकदम्बकम् ॥ १४३ ॥ सूक्चंदनयनितादौ क्रियायां वा सुखाप्तये । भोगभावो सुखं तत्र हिंसा स्यादानुपत्रिकी ।। १४४ ।। आखेटके तु हिंसायाः भावः स्यारिजन्मिनः । पश्चादैवानुयोगेन भोगः स्याद्वा नवा चित् ॥ १४५ ॥ हिंसानन्देन तेनोचरौद्रध्यानेन प्राणिनाम् । नारकस्यायुपो बन्धः स्यानिर्दिष्टो जिनागमे ॥ १४६ ।। ततोवश्यं हि हिंसायां भावश्चानर्थदण्डकः । त्याज्यः प्रागेव सर्वेभ्यः संक्लेशेभ्यः प्रयत्नतः ॥ १४७ ।। तत्रावान्तररूपस्य मृगयाभ्यासकर्मणः । त्यागः श्रेयानवश्यं स्यादन्यथाऽसातवन्धनम् ॥ १४८ ।। अतीचारास्तु तत्रापि सन्ति पापानुयायिनः । यानपास्य प्रतिकोपि निर्मली भवति ध्रुवम् ॥ १४९ ॥ कार्य विनापि क्रीडार्थ कौतुकार्थमथापि च । कर्तव्यमदनं नैव वापीकूपादिवर्मसु ॥ १५० ॥ पुष्पादिवाटिकासूञ्चर्वनेपूपवनेषु च । सरित्तडागक्रीडाद्रिसरःशून्यगृहादिषु ॥ १५१ ॥ शस्याधिष्ठानक्षेत्रेषु गोष्ठीनेप्वन्यवेश्मसु । कारागारगृहेपूतैर्मठेषु नृपवेश्मसु ।। १५२ ।। १ अनर्थदण्डाग्व्यम् । २ प्रसङ्गोद्भवा । ३ प्रचुरसंसारिणः । ४ क स पुस्तक्यो.. 'नारकस्यभ्युजोयन्धः" इतिपाटः ।
०
खाटीसंहितायां-
एवमित्यादिस्थानेषु विनाकार्य न जानुचित् ।
कौतुकादिविनोदाथ न गच्छेन्मृगयोन्झितः ॥ १५३ ।।
तम्करादिविधातार्थ स्थानेषु चण्डभीरूप ।
योध्दुमुत्सुकभूपादियोग्यामु युद्धभूमिषु ॥ १५४ ।।
गीतनादविवाहादिनाट्यशालादिदमपु ।
हिंसारम्भेषु कूपादिसननेषु च कर्ममु ॥ १५५ ।।
न कर्तव्या मतिधार स्वप्नमात्रे मनागपि ।
केवलं कर्मबन्धाय मोहस्पतद्धि स्फूर्जितम् ॥ १५६ ॥
गच्छन्नप्यात्मकार्यार्थ गच्छेद् भूमि विलोकयन् ।
युगदनां दृशा सम्यगीर्यासंशुद्धिहेतवे ॥ १५७ ॥
तत्र गच्छन्न छिन्वेद्वा तरूपर्णफलादिकान् ।
पद्भ्यां दोभ्यां न कुर्वीत जलस्फालनकर्म च ॥ १५८ ॥
शर्करादिपरिक्षेपं प्रस्तभूमिकुटनम् ।
इतस्ततोऽटनं चापि क्रीडाकूर्दनकर्म च । १५९ ।।
हिसोपदेशमित्यादि न कुर्वीत विचक्षणः ।
प्रापव्यामिवारूढ सर्वतोनर्थदण्डमुक् ॥ १६० ।।
व्याख्यातो मृगयादोषः सर्वज्ञाज्ञानतिक्रमात ।
अगलेवाऽत्रतादीनां प्रतादीनां सहोदरः ॥ १६१ ।।
अथ चौर्यव्यसनस्य त्याग. श्रेयानिति स्मृतः ।
तृतीयाणुव्रतस्यान्तर्भावी चाध्यत्र भूत्रितः ॥ १६२ ।।
तक्षणं यथा सूत्रे निर्दिष्ट पूर्वसूरिभिः ।
यद्यदचादानं तस्तेयं स्तेयविवर्जितैः ॥ १६३ ।।
च्यसन स्यात्तत्रासक्तिः प्रवृत्तिर्या मुहुर्मुहुः ।
यद्वा ब्रतादिना क्षुद्र परित्यक्तुमगक्यता ॥ १६४ ॥
वदेतद्व्यसनं नूनं निषिद्धं गृहमेधिनाम् ।
मंसारटुसमीरणामशरीरमुपैषिणाम् ॥ १६५ ॥
भूटगुणाटयाप्रतिपालमप्तव्यसननिरोधवर्णनम् । तत्स्वरूप प्रवक्ष्यामः पुरस्तादल्पविस्तरात् । उच्यतेत्रापि दिग्मानं सोपतोगि प्रसङ्गसात् ।। १६६ ॥ उक्त: प्राणियों हिंसा स्यादधर्मः स दुःसदः । नार्थाज्जीवस्य नाशोस्ति किन्तु बन्धोत्र पीड्या ॥ १६७ ॥ ततोऽवश्यं हि पापः स्यात्परखहरणे नृणाम् । यादृशं मरणे दुःखं तादृगं द्रविणक्षतौ ॥ १६८ ॥ एवमेतत्परिज्ञाय दर्शनश्रायकोत्तमैः । कर्तव्या न मतिः कापि परदारधनादिपु ।। १६९ ॥ आस्तां परस्वस्वीकाराद्यद् दुःखं नारकादिषु । यत्रैव भवेद दुःखं तद्वक्तुं का क्षमो नरः ॥ १७ ॥ चौर्यासक्तो नरोवश्यं नासिकादिक्षति लभेत् । गर्दभारोपणं चापि यद्वा पञ्चत्वमाप्नुयात् ।। १७१।। उद्विग्नो विनशंकी च प्रान्तोनवस्थचित्तकः। न क्षणं तिष्ठते स्वस्थः परपित्तहरो नरः ॥ १७२ ॥ परस्वहरणासक्तैः प्राप्तादुःखपरंपरा: । श्रूयते तत्कथा शास्त्राच्छिवभूतिर्दिजी यथा ॥ १७३ ।। न केवलं हि श्रूयन्ते दृश्यन्तेऽत्र समक्षतः । यतोद्यापि चुरासक्तो निग्रहं लभ्यते नृपात् ।। १७४ ।। सन्ति तत्राप्यतीचाराश्चार्यत्यागनतस्य च । तानवश्यं यथास्थाने बूमो नातीवविस्तरात् ।। १७५ ॥ अथान्ययोपिव्यसनं दूरतः परिवर्जयेत् । आशीविपमिवासां यच्चरित्रं स्याज्जगत्त्रये ॥ १७६ ॥ तुर्याणुव्रते तस्यान्तर्भावः स्यादस्य लक्षणात् । लक्ष्यतेत्रापि दिग्मानं प्रसगादिह साम्प्रतम् ॥ १७७ ॥ १ यौणाम्।
टाटीसहितायां- - Ninnn vownAmar देवशास्त्रगुरून्नत्वा बन्धुवर्गात्मसाक्षिकम् । पत्नी पाणिगृहीता स्यात्तदन्या चेटिका मता ॥ १८ ॥ तत्र पाणिगृहीता या सा द्विधा लक्षणाद्यथा । आत्मज्ञातिः परज्ञातिः कर्मभूरूढिसाधनात् ॥ १७९ ।।- परिणीतात्मज्ञातिश्च धर्मपत्नौति सैव च । धर्मकार्ये हि सधीची यागादौ शुभकर्मणि ॥ १८० ।। सूनुस्तस्या समुत्पन्नः पितुर्धर्मेधिकारवान् । स. पिता तु परोक्षः स्यादवात्प्रत्यक्ष एव वा ॥ १८१ ॥ सः सूनुः कर्मकार्येपि गोत्ररक्षादिलक्षणे । सर्वलोकाविरुद्धत्वादधिकारी नचेतरः ॥ १८२ ॥ . परिणीतानात्मज्ञातिर्या पितृसाक्षिपूर्वकम् । भोगपत्नीति साझेया भोगमात्रैकसाधनात् ॥ १८३ ।। आत्मज्ञाति परज्ञातिः सामान्य वनिता तु या । पाणिमहपाशुन्या चेचेटिका सुरतप्रिया ।। ८४ ॥ चेटिका भोगपत्नी च द्वयो गागमानतः । लौकिकोक्तिविशेषोपि न भेदः पारमार्थिकः । भोगपत्नी निपिद्धा स्यात्सर्वतो धर्मदिनाम् । ग्रहणस्याविशेषेपि दोषो भेदस्य सम्भवात् ।। ८६ ॥ अस्ति दोपविशेषोऽन्न जिनदृष्टश्च कश्वन । येन दास्याः प्रसङ्गेन वजलेपोषसंचयः ॥ १८७॥ । भावेषु यदि शुद्धत्य हेतु. पुण्यार्जनादिपु । एव वस्तुस्वभावत्वाचगतात्तद्धि नश्यति ॥ १८८ ।। उक्तंच। मुनिरेव हि जानाति व्यसयोगजं गुणम् । मक्षिका वमनं कुर्यात्तीद्वट् छर्दिप्रणाशिनी ॥ ११ ॥ ननु यथा धर्मपन्यां यैव दास्यां क्रियैव सा। विशेपानुपलब्धेश्व कथं भेदोवधार्यते ।। १८९ ॥
मूलगुणाष्टकप्रतिपालसप्तव्यसननिरोधवर्णनम् । मेवं यतो विशेपोस्ति युक्तिस्वानुभवागमात् ।' 'दृष्टान्तस्यापि सिद्धत्वाद्धेतोः साध्यानुकूलतः ।। ९०॥ मैवं स्पर्शादि यद्वस्तु वाह्यं विपयसंक्षिकम् । तहेतुस्तादृशो भावो जीवस्यैवास्ति निश्चयात् ॥ ९१ दृश्यते जलमैवैकमेकरूपं स्वरूपतः । चन्दनादिवनराजिं प्राप्य नानात्वमध्यगात् ।। ९२ ।। न च वाच्यमयं जीवः स्वायत्तः केवलं भवेत् । वाद्यवस्तु विनाश्रित्य जायते भावसन्ततिः ।। ९३ ॥ ततो यानिमित्तानुरूपं कार्य प्रमाणतः । सिद्धं तत्प्रकृतेऽप्यस्मिन्नस्ति भेदो हि लीलया ॥ ९४॥ अत्रोभिज्ञानमप्यस्ति सर्वलोकाभिसम्मतम् । दासाः दास्याः सुता ज्ञेया तत्सुतेभ्योहनादेशाः ।। ९५ ।। कृतं च बहुनोक्तेन सूक्तं सर्वविदाज्ञया । स्वीकर्तव्यं गृहस्थेन दर्शनव्रतधारिणा ।। ९६ ॥ भोगपत्नी निषिद्धा चेत्काकथा परयोपिताम् । तथाप्यत्रोच्यते किञ्चित्तत्स्वरूपाभिव्यक्तये ।। ९७ ॥ विशेपोस्ति मिर्थश्चात्र परत्वैकत्वतोपि च । गृहीताचागृहीता च तृतीया नगरागना ॥ ९८ ॥ गृहीतापि द्विधा तत्र यथाद्या जीवमर्तृका ।। सत्सु पित्रादिवर्गेषु द्वितीया मृतभर्तृका ।। ९९ ।। चेटिका या च विख्याता पतिस्तस्याःस एव हि । गृहीता सापि विख्याता स्यादगृहीता च तद्बत् ॥ २०० ।। ३ जीवत्सु बन्धुवर्गेपु रण्डा स्यान्मृतभर्तृका ! मृतेषु तेषु सैव स्यादगृहीता च स्वैरिणी ।। २०१॥ १ परिचयः २ अन्यदृशाः । ३ प्रमाणम् । १ एकटनाय । ५ क पुस्तके स्थादगृहीतानदती " इतिपाठः । " wwwin-r V Fil , - लाटीसंहितायां- अस्याः संसर्गवेलायामिङ्गिते नरि वैरिभिः । सापराधतया दण्डो नृपादिभ्यो भवेधुवम् ॥ २०२ ॥ , केचिजैना वदन्त्येवं गृहीतैपा वलक्षणात् । नृपादिभिर्गृहीतत्वान्नीतिमार्गानतिक्रमात् ।। २०३ ।। विख्यातो नीतिमार्गोयं स्वामी स्याज्जगतो नृपः। वस्तुतो यस्य न स्वामी तस्य स्वामी महीपतिः ॥ २०४।। तन्मतेपु गृहीता सा पित्राचैराहतापि या। यस्याः संसर्गतो भीतिर्जायते न नृपादितः ।। २०५॥ तन्मते द्विधैव स्वैरी गृहीतागृहीतभेदतः । मामान्यवनिता या स्याद्गृहीतान्तर्भावतः ।। २०६ ॥ एतत्सर्व परिज्ञाय स्वानुभूतिसमक्षतः । परागनासु नादेया बुद्धि(धनशालिभिः ॥ २०७॥ या निषिद्धास्ति शास्त्रेषु लोकेत्रातीव गर्हिता। सा श्रेयसी कुतोन्यत्री लोकद्वयहितपिणाम् ।। २०८ ।। त्याज्यं वत्स परस्त्रीपु रतिं तृष्णोपशान्तये । विमृश्य चापदां चक्र लोकद्वयविध्वंसिनीम् ।। २०९ ॥ भूयन्ते बहवो नष्टाः परस्त्रीसङ्गलालसाः । ये दशास्यादयो नूनमिहामुत्र च दुःखिताः ॥ २१०॥ श्रूयन्ते न परं तत्र दृश्यन्तेऽद्यापि केचन । रागागारेषु संदग्धा दुःखितेभ्योपि दुःखिताः ॥ २११ ॥ आस्तां यन्नरके दुःसं भावतीवानुवेदिनाम् जातं परागनासक्ते लोहागनादिलिङ्गनात् ।। २१२ ॥ इहैवानर्थसन्दोहो यावानस्ति सुदुस्सहः।। तावान्न शक्यते वक्तुमन्ययोपिन्मतेरितः ।। २१३ ॥ आदापुत्पद्यते चिन्ता दृष्टुं वक्तुं समीहते । ततः स्वान्तभ्रमस्तस्मादरतिर्जायते ध्रुवम् ॥ २१४ ॥ .
सम्यग्दर्शनसामान्यरक्षणवर्णनम् । ३५ ततः क्षुत्तृविनाशः स्याद्वपुःकाश्यं ततो भवेत् । ततः स्यादुद्यमाभावस्ततः स्याद्रविणक्षतिः ।। २१५ ।। उपहास्यं च लोकेस्मिन् ततःशिष्टेप्वमान्यता। इंगिते राजदण्डः स्यात्सर्वस्वहरणात्मकः ।। २१६ ।। भवेद्वा मरणं मोहादन्यत्रीलीनचेतसः । चित्र किमत्र रोगाणामुद्भवोपि भवेद् ध्रुवम् ।। २१७ ।। यद्वाऽमुत्रेह यददुःखं यावद्यादृक् च दुःस्सहम् । अन्यत्रीव्यसनासक्तः सर्व प्राप्नोति निश्चितम् ।। २१८ ॥ अस्मदीयमतं चैतद्दोषवित्तद्धि मुशति । न मुश्चति तथा मन्दो ज्ञातदोपोपि मूढधीः ।। २१९ ॥ इतिश्री स्याद्वादानवद्यगधपयविद्याविशारदापद्वन्माणेराजमल विरचितायां श्रावकाचारापरनाम लाटीसंहितायां साधुश्री दूदात्मज फामनमनःसरोजारविन्दविकाशनकमार्तण्ड मण्डलायमानायां दर्शनप्रतिमा महाधिकारमध्ये मूलगुणाटकप्रतिपाल सतव्यसनरोधवर्णनो नाम द्वितीयः सर्गः। अथ तृतीयः सर्गः। दूदागज: फामननामधेयः खवंशवेश्मज्वलदच्छदीपः। जीयाजिनेशांहिसरोरुहालि- रस्यां कथायां रसिकावतंसः ॥ १॥ इत्याशीवाद सम्यक्त्वं दुर्लभं लोके सम्यक्त्वं मोक्षसाधनम् । ज्ञानचारित्रयोधीजं मूलं धर्मतरोरिव ॥ १ ॥ . ज्ञाते सति । १ मुकुदः ।
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लाटीसंहितायां-
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तदेव सत्पुरुषार्थस्तदेव परमं पदम् ।
तदेव परमं ज्योतिः तदेव परमं तपः ।। २ ।।
तदेवेष्टार्थसंसिद्धिस्तदेवास्ति मनोरथः ।
अक्षातीतं सुसं तत्स्यात्तरकल्याणपरंपरा ।। ३ ।।
विना येनात्र संसारे भ्रमतिस्म शरीरमाक् ।
भ्रमिष्यति तथानन्तं कालं भ्रमति संप्रति ।। ४ ।।
अपि येन विना ज्ञानमज्ञानं स्यात्तदक्षयत् ।
चारित्रं स्यात्कुचारित्रं तपो वालवपः स्मृतम् ॥ ५ ॥
अत्रातिविस्तरेणालं कर्म यावच्छुभात्मकम् ।
सर्व
तत्पुरत: सम्यक सर्व मिथ्या तदत्ययात् ।। ६ ।।
तश्च तन्वार्थश्रद्धानं सूत्रे सम्यक्त्वलक्षणे ।
प्रामाणिकं तदेव स्याच्छूत केवलिभिर्मतम् ॥ ७ ॥
तत्त्व जावास्तिकायाद्यास्तत्स्वरूपार्थसंज्ञकः ।
श्रद्धानं चानुभूतिः स्यात्तेपामेवेति निश्चयात् ॥ ८॥
सामान्यादेकमेवैतत्तद्विशेषविधेर्द्विधा ।
परोपचारसापेक्षाद्धेतोद्वैतवलादपि ॥ ९॥.
तद्विशेषविधिस्तावन्निश्चयाब्यवहारतः।
सम्यक्त्वं स्याद्विधा तत्र निश्चयश्चैकधा यथा ॥ १० ॥
शुद्धस्थानुभवः साक्षानीयस्योपाधिवर्जितः ।
सम्यक्त्व निश्चयान्नूनमर्यादेकविधं हि तत् ॥ ११ ॥
उक्तंच।
दर्शनमात्मविनिश्चितिरात्मपरिज्ञानमिध्यते बोधः ।
स्थितिरात्मनि चारिनं कुत एतेभ्यो भवति बन्धः ।।१।।
व्यवहाराच सम्यक्त्वं ज्ञातव्य लक्षणाचंथा।
जीवादि सप्ततावानां श्रद्धानं गाढमव्ययम् ॥ १२॥
सम्यग्दर्शनसामान्यलक्षणवर्णनम् ।
उक्तंच।
जीवादीसद्दहणं सम्म तेसि मधिगमो णाणं ।
रायादीपरिहरणं चरणं एसो हु मोक्खपहो ॥२॥
यद्वा व्यवहृते वाध्यं स्थूलं सम्यक्त्वलक्षणम् ।
आताप्तागमधर्मादिश्रद्धानं दूपणोज्झितम् ॥ १३ ॥
उक्तं च ।
नास्ति चाहत्परो देवो धर्मोनास्ति दयापरः ।
तपःपरं च नैर्पन्ध्यमेतत्सम्यक्त्वलक्षणम् ।। ३ ॥
हेतुतोपि द्विधोद्दिष्टं सम्यक्त्वं लक्षणाद्यया।'
तन्निसर्गादधिगमादित्युक्तं पूर्वसूरिभिः ॥ १४ ॥
निसर्गस्तु स्वभावोक्तिः सोपायोधिगमो मतः ।
अर्थोयं शब्दमात्रत्वादर्थत मूच्यतऽधुना ॥ १५ ॥
नाम्ना मिथ्यात्वकमैंकमस्ति सिद्धमनादितः ।
सम्यक्स्योत्पत्तिवेलायां द्रव्यतस्तत्त्रिधा भवेत् ।। १६ ॥
अधोऽपूर्वानिवृत्त्याख्यं प्रसिद्ध करणत्रयम् ।
करणान्तर्मुहूर्तस्य मध्ये त्रेधास्ति नान्यदा ॥ १७ ॥
उक्तंच।
जंतेण कोदवं वा पढमुवसमसम्मभाव जंतेण ।
मिच्छादव्यं तु तिहा असंखगुणहीण दव्वकमा ॥ ४॥
विधाभूतस्य तस्योचरेवं मिथ्यात्वकर्मणः ।
भेदात्रयश्चतुष्कं च स्यादनन्तानुवन्धिनः ।। १८॥
एतत्समुदितं प्रोक्तं दर्शनं मोहसप्तकम् ।
प्रागुपशमसम्यक्त्वे तत्सप्तोपशमो भवेत् ॥ १९ ॥
उक्तंच।
पढमं पढमे णियदं पढमं विदियं च सव्वकालसि ।
याइय सम्मत्तो मुण जच्छ जिणा केवलं तसि ॥ ५॥
लाटीसहितायां- " निसर्गेऽधिगमे वापि सम्यक्त्वे तुल्यकारणम् । इग्मोहसप्तकस्य स्यादुमयाभावसंज्ञकः ॥ २०॥ उक्तं च। सत्तहं उवसमदो उयसमसम्मो सयादुखइओय । विदिय कसाउदयादो असंजदो होदि सम्मो सौ ॥ ६॥ । किन्तु सत्यन्तरगॅस्मिन हेतावुत्पद्यते च यत् । नैसर्गिकं हि सम्यक्त्वं विनोद्देशादि हेतुना ।। २१।। यत्पुनश्चान्तरनेस्मिन् सति हेतौ तथाविधि । उपदेशादिसापेक्षं स्यादधिगमसंज्ञकम् ।। २२ ।। याचं निमित्तमत्रान्ति केपाञ्चिद्विम्वदर्शनम् । अहंतामितरपां तु जिनमहिमदर्शनम् ।। २३ ।। - धर्मश्रवणमेकेषां यद्वा देवर्द्विदर्शनम् । जातिस्मरणमेकेषां वेदनामिभवस्तथा ॥ २४ ॥ एवमित्यादि वहवो विद्यन्ते वाह्यहेतवः । सम्यक्त्वप्रथमोत्पत्तावन्तरङ्गानतिकमात् ॥ २५ ॥ अस्यैतल्लक्षणं नूनमस्ति सम्यग्हगात्मनः । जिनोक्तं श्रद्दधात्येव जीवाद्ययं यथास्थितम् ।। २६ ॥ उक्तच जो इंदिएमु विरदो णो जीवे थावरे तसे चादि। जो सद्दहदि जिणुत्तं सम्माइही अविरदो सो ॥ ७ ॥ नल्लेग्य. किमतावानस्ति किंवाऽपरोऽप्यतः ।, लक्ष्यते येन सदृष्टिलक्षणेनाञ्चितः पुमान् ॥ २७॥. अपराण्यपि लक्ष्माणि सन्ति सम्याहगात्मनः । सम्यस्त्वेनाविनाभूतैयैश्च संलक्ष्यते सुदृक् ।। २८॥ १ क्षीणोदये मिथ्यात्वमिश्रानन्तानुबन्धिषु । लचोदये च सम्पदे क्षायिकोपशम भवेत् ॥ २ तासन्न क्षणश्यनम् । ३ वा अन्यत् लक्षणम् । ४ युनः । 1. 4 1. १ सम्यग्दर्शनसामान्यलक्षणवर्णनम् । उक्तमाक्षं सुसं ज्ञानमनादेयं दृगात्मनः । 'नादेयं कर्मसर्वस्वं तद्वदृष्टोपलब्धितः ॥ २९ ॥ सम्यक्त्वं वस्तुतः सूक्ष्मं केवलज्ञानगोचरम् । गोचरं वावधिस्वान्तपर्ययज्ञानयोर्द्वयोः ॥ ३० ॥ न गोचरं मतिज्ञानश्रुतविज्ञानयोमनाई। नापि देशावधेस्तत्र विषयोनुपलब्धितः ॥ ३१ ॥ अस्त्यात्मनो गुणः कश्चित्सम्यक्त्वं निर्विकल्पकम् । तद्ग्मोहोदयान्मिथ्यास्वादरूपमनादितः ।। ३२ ।। दैवात्कालादिसंलब्धौ प्रत्यासन्ने भवार्णवे । भव्यमावविपाकाद्वा जीवः सम्यक्त्वमर्नुते ॥ ३३ ॥ प्रयत्नमन्तरेणापि इग्मोहोपशमो भवेत् । अन्तर्मुहूर्तमानं च गुणश्रेण्यनतिक्रमात् ।। ३४ ॥ अस्त्युपरामसम्यक्त्वं रम्मोहोपामाद् यथा । पुंसोऽवस्थान्तराकारं नाकारं चिद्विकल्पकैः ॥ ३५ ॥ सामान्याद्वा विशेषाद्वा सम्यक्त्वं निर्विकल्पकम् । सत्तारूपं पारिणॉमि प्रदेशेषु परं चितः ॥ ३६ ।। तत्रोल्लेखस्तमोनाशे तमोरेरिव रश्मिभिः । दिशः प्रसादमासेदुःसर्वतो विमलाशयाः ।। ३७ ॥ हग्मोहोपशमे सम्यग्दृष्टेसैलेख एप वै । शुद्धत्वं सर्वदेशेपु त्रिधा चन्धापहारि यत् ।। ३८॥ यथा वा मद्यधत्तूरपाकस्यास्तंगतस्य वै । उल्लेसो मूर्छितो जन्तुरुलाघः स्यादमूर्छितः ॥ ३९ ॥ दृग्मोहस्योदयान्मूछीवैचिंत्यं वा तथा श्रमः । प्रशान्ते तस्य मूर्छाया नाशाज्जीवो निरामयः ॥ ४० ॥ १ऐन्द्रियिकम् । २ अदधिमनःमयययोः । पानोति । चिना। ५ सय पुस्तकयोः परिणामि इति पाठः । ७ सूर्यस्य । निर्मलताबापः । ५ दृष्टान्तः इति उलेख.। मनःशून्यत्वम् । .
लाटीमंहितायां- प्रदानादिगुणा.याही लक्ष्म सम्याहगात्मनः । न मम्यक्त्यं तदेवति सन्ति शानस्य पर्ययाः ॥ ४ ॥ अपि चात्मानुभूतिश्च ज्ञानं कानस्यपर्यपात् । अादतानं न मम्यक्त्यमस्ति दाहालक्षणम् ।। ४२।। योलामो हि दुर्दश्यो लक्ष्यते स्थूललक्षणैः । याग्मनःकायचेष्टाणामुल्माहादिगुणात्मकैः ॥४३॥ नन्यात्मानुभवः साक्षात्सम्यक्त्वं वस्तुत स्वपम् । सर्वतः सर्वकालस्य मिध्यादृष्टेरमम्भयान् ॥ ४४ ।। नयं यतोऽनभिज्ञोऽसि सत्सामान्यविशेषयोः । अप्यनाझारमाकारलिङ्गयोस्तद्यथोच्यते ॥ ४५ ॥ आकारोऽर्थविकल्पःस्यादयःस्वपरगोचरः। मोपयोगो विकल्पो वा ज्ञानस्यत्तद्धि लक्षणम् ।। ४६ ।। नाकारः स्यादनाकारो वस्तुको निर्विकल्पता । नेपानन्तगुणानां तहणं ज्ञानमन्तरा ॥ ४ ॥ नवरित यास्तवं सर्व सामान्यं च विशेषवत् । तरिकश्चित्स्यादनाकारं किश्चित्साकारमेय तत् ॥ ४८ ॥ मयं मामान्यवद्ज्ञानमर्थाचास्ति विशेषवत । यत्सामान्यमनाकारं साकार यद्विशेषमा ॥४९॥ मानाद्विना गुणा सर्व प्रोतसाधणाहिताः । सामान्याद्वा विशेषाद्वा सन्त्यनाकारलक्षणाः ॥ ५० ॥ ततोवक्तुमशक्यत्यानिर्विकल्पस्य वस्तुनः । तदुल्लेसं समालेरस्य ज्ञानद्वारा निरूप्यते ॥ ५१ ।। स्वापूर्थियोरेव ग्राहक शानमेकशः । मात्र ज्ञानमपूर्वार्थो ज्ञानं ज्ञानं परः परः ।। ५२ ॥ स्वार्थोहि ज्ञानमात्रस्य ज्ञानमेकं गुणश्चितः । परार्था स्वात्मसम्बन्धिगुणाः शेषाः मुखादयः ।। ५३ ॥ . आगेन्यभावः । २ स्वरमयोरित्यपि पाठः । । आत्मनः ।
सम्यग्दर्शनसामान्यलक्षणवर्णनम् । तद्यथा सुखदुःखादिभावो जीवगुणःस्वयम् । ज्ञानं तद्वेदकं नूनं नार्थावानं सुग्गादिमत ।। ५४ ॥ अपि सन्ति गुणा: सम्यक् श्रद्धानादिविकल्पकाः । उद्देशो लक्षणं तेषां तत्परीक्षाधुनोन्यते ।। ५५ ॥ तत्रोद्देशो यथा नाम श्रद्धारुचिप्रतीतयः। चरणं च यथाम्नायादर्थात्तत्त्वार्थगोचरम् ।। ५६ ॥ तस्वार्थाभिमुखी बुद्धिः श्रद्धा सात्म्य सचिस्तथा। प्रतीतिस्तु तथेति स्यात्वीकारश्चरणं किया ॥ ५७ ॥ अर्थादाद्यत्रिकं ज्ञानं ज्ञानस्यैवार्थपर्ययान् । क्रिया वाचायचेतोभिर्व्यापारः शुभकर्मसु ।। ५८ ।। व्यस्ताश्चैते समस्ता या सद्दष्टेलक्षणं न वा । मपक्षे वा विपक्षे वा सन्ति यद्वा न सन्ति था ।। ५९ ॥ स्वानुभूतिसनाथाश्वेत्सन्ति श्रद्धादयो गुणाः । स्वानुभूतिं विनाभासा: नार्थाद्धादयो गुणाः ॥ ६॥ तस्माच्छद्धादयःसर्वे सम्यक्त्वं स्वानुभूतिवत् । न सम्यक्त्वं तदाभासा मिथ्याश्रद्धादिवञ्चितः ॥ ६१ ।। सम्यग्मिथ्याविशेषाभ्यां विना श्रद्धादिमात्रकाः। मपक्षवद्विपक्षेपि वृत्तित्वाद् व्यभिचारिणः ।। ६२ ।। अर्थाद्धादयः सम्यग्दृष्टिश्रद्धादयो यतः । मिथ्याश्रद्धादयो मिथ्या नार्थाच्चद्धादयो यत: ॥ ६३ ।। ननु तत्त्वरुचिःश्रद्धा श्रद्धामात्रैकलक्षणात् । सम्यग्मिथ्याविशेषाभ्यां सा द्विधा तु कुतोऽर्थतः ॥ ६४ ।। नैवं यतः समन्याप्तिः श्रद्धास्वानुभवद्वयोः । ( नूनं नानुपलब्धार्थे श्रद्धा खरविपाणवत् ।। ६५ ।। विना स्वात्मानुभूति तु या श्रद्धा श्रुतमारतः । तत्त्वार्थानुगताप्यर्थाच्छ्रद्धा नानुपलब्धितः ॥ ६६ ।। १ भिन्ना भिन्नाः । २ अप्राने वस्नुनि ।
लाटीसंहितायां-- सन्धिस्यादविशेषाा सदसत्तोगन्मत्तवन । नोपलब्धिरिहाख्याता तच्छेपानुपलन्धियत् ॥ ६७ ॥ ततोस्ति यौगिकी दिः श्रद्धा सम्यक्त्वलक्षणम् । अर्यादप्यविरुद्धं स्यात्सूक्तं स्वारमानुभूतिवन् ॥ ६८॥ गुणाश्चान्ये प्रसिद्धा ये सदृष्टेिः प्रामादयः । यहिष्टया यथा स्वं ते सन्ति सम्यक्त्वलक्षणम् ।। ६९ तवाद्याप्रशमो नाम संवेगश्च गुणः ऋमात् । । अनुकम्पा तथासिक्यं वक्ष्ये तल्लक्षणं यथा ॥ ७॥ प्रशमो विषयेपूधैर्भावक्रोधादिकेषु च । लोकासंस्यातमात्रेपु स्वरूपाच्छिथिलं मनः ॥ ७१ ।। सद्य. कृतापराधेपु यद्वा जीयेपु जातुचित् । तधादिविकाराय न घुद्धिः प्रशमो मतः ।। ७२ ।। हेतुस्तत्रीदयाभाव' स्यादनन्तानुबन्धिनाम् । अपि एमएएयएएं सून सन्ददगडातः ५५३.५ आरम्भादि क्रिया तस्य देवाद्वा स्यादकामतः । अन्तः शुद्धेः प्रसिद्धत्वान्नहेतु प्रशमक्षतेः ।। ७४ ।। सम्यक्त्वेनाधिनाभूतः प्रशमः परमो गुणः । अन्यत्र प्रशमं मन्ये प्याभास. स्यात्तदत्ययान् ॥ ७५ संवेगः परमोत्साहो धर्म धर्मफले चितः। सधर्मेष्वनुरागो या प्रोतिर्या परमेष्ठियु ७६ । धर्मः सम्यक्त्तमात्रात्मा शुद्धास्यानुभयोऽथवा । तत्फलं सुसमत्यक्षमभयं क्षायिकं च यन् ।। ७७ ॥ इतरत्र पुनारागस्तद्गुणेष्वनुरागतः । नानद्गुणोनुरागोपि तत्फलस्याप्योलप्सया || ७८ ॥ अत्रानुरागशब्देन नामिलापो निरुच्यते ।। किन्तु शेपमधर्माद्वा निवृत्तिस्वकलादपि ॥ ७९ ॥ १ शमनाशहेतुर्न भवति । २ मिथ्यादृष्टो। - - सम्यग्दर्शनसामान्यलक्षणवर्णनम् । नचाशङ्कयं निपिद्धः स्यादमिलापो भोगेष्वलम् । शुद्धोपलब्धिमाञपि हेयो भोगाभिलापयत् ।। ८० ॥ अर्थात्सर्वोमिलाप: स्यान्मिध्या कर्मोदयात्परम् । स्वार्थस्यार्थक्रियासिद्धथै नालं प्रत्यक्षतो यत्तः ।। ८१ ।। कचित्तस्यापि सद्भावे नेष्टसिद्धिरहेतुतः । अभिलापस्याभावेऽपि स्वेष्टसिद्धिस्तुहेतुतः ।। ८२ ॥ यशःश्रीसुतमित्रादि सर्व कामयते जगत् । नास्य लाभोऽभिलापेऽपि विना पुण्योदयात्सतः ।। ८३ ॥ जरामृत्युदरिद्रादि नापि कामयते जगत । तत्संयोगो वलादस्ति सतस्तत्राशुभोदयात् ॥ ८४ ॥ संवेगो विधिरूपः स्यान्निर्वेदस्तु विशेषसात् । स्थाद्विवक्षावशावतं नार्थादर्थान्तरे तयोः ।। ८५ ॥ सागः सर्वाभिलापस्य निर्वेदो लक्षणात्तथा । संवेगोऽप्यथवा धर्मसामिलापो न धर्मवान् ॥ ८६ ।। नापि धर्मः क्रियामानं मिध्यादृष्टेरिहार्थतः । नित्यं रागादिसद्भावात्प्रत्युताऽधर्मएव हि ॥ ८७ ॥ नित्यं रागी कुदृष्टिः स्यान्नस्यात्वचिदरागवान् । अस्तरागोस्ति सदृष्टिर्नित्यं वा स्यान्नरागवान् ८८ ।। अनुकम्पा कृपा झेया सर्वसत्त्वेष्वनुग्रहः । मैत्रभावोथ माध्यध्यं निःशल्यं वैग्वर्जनात् ।। ८५ ।। दृग्मोहानुदयस्तत्र हेतुर्याच्योस्तिकेवलम् । मिथ्याज्ञानं विना न स्याद्वैरभाषः कचिद्यया ॥ ९॥ २. मिथ्या यत्परतः स्वस्य स्वस्माता परजन्मिनाम् । इच्छेत्तत्सुसदुःसादि मृत्यु जीवितं मनाक् ।। ९१ ॥ अस्ति यस्यैतदक्षानं मिध्यादृष्टिः सः शल्यवान् । अज्ञानाद्धंतुकामोपि क्षमो हंतुं न चापरम् ॥ ९९ ।।
१४ टाटीसंहितायां- । समता सर्वभूतेषु यानुकम्पा परत्र सा । अर्थतः स्वानुकम्पा स्याच्छल्यवच्छल्यवर्जनात् ॥ ९३ ।। रागाद्यशुद्धभावानां सद्भावे वन्ध एव हि । न बन्धस्तदसद्भाव तद्विधेया कृपात्मनि ॥ ९४ ॥ आस्तिक्यं सत्त्वसद्भावे स्वतः सिद्ध गतिश्चितः । धर्मे हेतौ च धर्मस्य फले चात्मादि धर्मवित् ।। ९५ ।। अस्त्यात्मा जीवसंजो यः स्वतःसिद्धोप्यमूर्तिमान् । चेतनः स्यादजीवस्तु यावानप्यस्त्यचेतनः ॥ ९६ ॥ अस्त्यात्मानादितो वद्धः कर्मभिः कार्मणात्मकैः । कर्ता भोक्ता च तेषां हि तत्क्षयान्मोक्षभाग्भवेत् ॥ ९७ ।। अस्ति पुण्यं च पापं च तद्धेतुस्तत्फलं च वै आस्रवाद्यास्तथा सन्ति तस्य संसारिणोऽनिशम् ।। ९८॥ अस्त्येवं पर्ययादेशाद्वन्धो मोक्षस्तु तत्फलम् । अपि शुद्धनयादेशात शुद्धः सर्वोपि सर्वदा ।। ९९ ॥ तत्राय जीवसंज्ञो यः स्वयंवेद्यश्चिदात्मकः । सोहमन्ये तु रागाद्या. हेयाः पौढलिका अमी ॥ १०० ।। इत्याद्यनादिजीवादि वस्तुजातं यतोऽखिलम् । निश्चयव्यवहाराभ्यामास्तिस्यं तत्तथामतिः ॥ १०१॥ सम्यक्त्वेनाविनाभूतस्वानुभूत्येकलक्षणम् । आस्तिक्यं नाम सम्यक्त्वं मिथ्यास्तिक्यं ततोन्यथा ॥ १०२॥ ननु वै केवलज्ञानमेकं प्रत्यक्षमर्थतः । न प्रत्यक्षं कदाचित्तच्छेषज्ञानचतुष्टयम् ।। १०३ ।। यदि वा देशतोध्यक्षमाक्ष्यं स्वात्मसुसादिवत् । स्वसवेदनप्रत्यक्षमास्तिक्यं तत्कुतार्थतः ॥ १०४॥ मत्यमाद्यद्वयं ज्ञानं परोक्षं परसंविदि । प्रत्यक्षं स्वानुभूतौ तु इग्मोहोपगमादितः ॥ १०५ ॥ प्रतीति.. 7 - सम्यादर्शनसामान्यलक्षणवर्णनम् । स्वात्मानुभूतिमात्रं स्यादास्तिक्यं परमो गुणः । भवेन्मा वा परद्रव्ये ज्ञानमात्रे परत्यतः ।। १०६॥ अपि तत्र परोक्षत्वे जीवादी परवस्तुनि । गाढं प्रतीतिरस्यास्ति यथा सम्यग्दृगात्मनः ।। १०७॥ न तथास्ति प्रतीतिर्वा नास्ति मिध्यादृशःस्फुटम् । दृग्मोहस्योदयात्तत्र भ्रान्तेः सद्भायतोऽनिगम् ।। १०८ ॥ ततः सिद्धमिदं सम्यग्युक्तिस्वानुभवागमात् । सम्यक्त्येनाविनामूतं सत्रास्तिक्यं गुणो महान् ॥ १०९ ।। उत्कं च। संवेओ निवेओ जिंदण गरहा य उवसमो भती । बच्छल्लं अणुकंपा अहगुणा हुंति सम्मत्ते ॥ ८॥ उक्तं गाथार्थसूत्रेपि प्रशमादिचतुष्टयम् । नातिरिकं यतोऽस्त्यत्र लक्षणस्योपलक्षणम् ॥ ११ ॥ अस्त्युपलक्षणं यत्तल्लक्षणस्यापि लक्षणम् । तद्यथास्त्यादिलक्ष्यस्य लक्षण चोत्तरस्य तत् ।। १११ ।। यथा सम्यक्त्वभावस्य संवेगो लक्षणं गुणः । संचोपलक्ष्यते भक्त्या वात्सल्येनाथवाहताम् ।। ११२ ।। तत्र भक्तिरनौद्धत्यं वाग्वपुश्वेतसां गमात् । वात्सल्यं तद्गुणोत्कर्षहेतवे सोद्यतं मनः ॥ ११३ ।। भक्तिर्वा नाम वात्सल्यं न स्यात्संवेगमन्तरा। संवेगो हि दृशो रक्ष्म द्वावेतावुपलक्षणौ ॥ ११४ ।। दृग्मोहस्योदयाभावात्प्रसिद्धः प्रशमो गुणः । तत्रापि व्यञ्जकं बाहान्निन्दनं चापि गर्हणम् ।। ११५ ॥ निन्दनं तत्र दुर्वाररागादौ दुष्टकर्मणि । पश्चात्तापकरो बन्धो नोपेक्ष्यो नाप्यपेक्षितः ।। ११६ ॥ १ अन्यत् न। २ सवेगः ।
लाटीसंहितायां- 7 - गहणं तत्परित्यागः पञ्चगुत्मिसाक्षिकः । निष्प्रमादतया नूनं शक्तितः कर्महानये ॥ ११७ ॥ अर्थादेव द्वयं सूक्कं सम्यक्त्वस्योपलक्षणम् । प्रगमस्य कपायाणामनुदेकाविशेषतः ॥ ११८ ॥ शेपमुक्तं यथानाया हातव्यं परमागमात् । आगमान्धे परंपारं माइग्गन्तुं क्षमः कथम् ॥ ११९ ॥ एनमित्यादिसत्यार्थ प्रोक्तं सम्यक्त्वलक्षणम् । कैश्चिलनजिकैः सिद्धैः प्रसिद्ध सिद्वसाधनात् ।। १२० ।। भवेद्दर्शनिको नूनं सम्यक्त्वेन युतो नरः । दर्शनप्रतिमामासः क्रियावानपि तद्विना ।। १२१ ।। देशत. सर्वतश्चापि क्रियारूपं व्रतादि यन् । मम्यक्त्वेन पिना सर्वमन कुतपश्च तत् ।। १२२ ।। - ततः प्रथमतोऽवयं मान्यं सम्यक्त्वधारिणा । अप्रतिनाणुमतिना मुनिनायेन सर्वतः ॥ १२३ ॥ ऋते सम्यक्त्वभावं यो धचे प्रततपःक्रियाम् । नग्य मिध्यागुणस्थानमेकं स्यादागमे स्मृतम् ॥ १२॥ प्रताप नरो नेय मुच्यते कर्मयन्धनात् । मपच मुच्यनेऽयश्यं यदा मभ्यस्त्वमश्नुते ॥ १२५॥ किय प्रोक्ता क्रियान्येषा दर्शनप्रतिमात्मिका। मम्यक्त्वन युवा पेत्ता नगुणस्थानवर्तिना ॥ १२६ ।। तमायम्ति विशेषोऽयंतुर्यपश्नमयोयोः । योगावा दिनचापि गुमग्थानविशेषयोः ॥ १२ ॥ मयेका क्रिया मानारामूलगुणात्मिका । व्यसनाम्निता चापि दर्शनेन ममन्यिता ॥ १२८ ।। नी। है
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लाटीसहितायां- - किञ्च मूलगुणादीनामादानेऽथापि वर्जने । समस्ते प्रतिमास्त्याद्या व्यस्तेसति कुलकिया ॥ १४२ ॥ यथा चैकस्य कस्यापि व्यसनस्योज्झने कृते । दर्शनप्रतिमा न स्यात्स्यादा साध्वी कुलक्रिया ।। १४३ ।। यदा मूलगुणादानं द्यूतादिव्यसनोज्झनम् । दर्शनं सर्वतश्चैतत्त्रयं स्यात्प्रतिमादिमा ॥ १४४ ।। दर्शनप्रतिमायास्तु कियाया व्रतरूपतः । तस्याः कुलक्रियायाश्चाविशेपोप्यस्ति लेशतः ॥ १४५॥ प्रमादोद्रेकतोवश्यं सदोपाःस्यात्कुलक्रियाः ।। निर्दोषा. स्वल्पदोषा वा दर्शनप्रतिमाक्रियाः ॥ १४६ ॥ यथा कश्चित्कुलाचारी द्यूतातिव्यसनोज्झनम् । कुर्यादा न यथेच्छायां कुर्यादेव हगात्मकः ॥ १४७ ।। अथ च पाक्षिको यदा दर्शनप्रतिभान्वितः । प्रकृतं न परं कुर्यात्कुर्यादा वक्ष्यमाणकम् ।। १४८ ॥ प्रामाणिकः क्रमोप्येप ज्ञातव्यो व्रतसंचये। भावना चागृहीतस्य व्रतस्यापि न दूपिका ॥ १४९॥' भावयेद्भावना नूनमुपर्युपरि सर्वतः । यावनिर्वाणसंप्राप्तौ पुंसोवस्थान्तरं भवेत् ॥ १५० ॥ उक्तं च । जं सकइ तं कीरइ जं च ण सका तहेव सदहणं । सद्दणमाणो जीवो पावइ अजरामरं ठाणं ॥९॥ यथान पाक्षिकः कश्चिदर्शनप्रतिमोऽथदा। उपर्युपरि शुद्धयर्थ यद्यत्कुर्यात्तदुच्यते ॥ १५१॥ सर्वतोविरतिस्तषां हिंसादीनां व्रवं महत् । नैतत्सागारिभि. कर्तुं शक्यते लिङ्गमहताम् ॥ १५२ ।। १व्यसनानाम्।
सम्यग्दर्शनसामान्यलक्षणवर्णनम् । मूलोत्तरगुणाः सन्ति देशतो वेश्मवर्तिनाम् । तयानगारिणां न स्युः सर्वतः स्युः परेऽथ ते ॥ १५३ ॥ तत्र मूलगुणाश्चाष्टौ गृहिणां व्रतधारिणाम् । कचिवतिनां यस्मात्सर्वसाधारणा इमे ॥ १५४ ।। निसर्गाद्वा कुलाम्नायादायातास्ते गुणाःस्फुटम् । तद्विनापि व्रतं यावत्सम्यक्त्वं च गुणोगिनाम् ॥ १५५ ।। एतावता विनाप्येप श्रावको नास्ति नामतः । किं पुनः पाक्षिको गूढो नैष्ठिकः साधकोऽथ या || १५६ ॥ मद्यमांसमधुत्यागी यथोदुम्बरपञ्चकम् । नामतः श्रावकः ख्यातो नान्यथापि तथा गृही ॥ १५७ ।। यथाशक्ति विधातव्यं गृहस्थैर्व्यसनोज्झनम् । अवश्यं तद्वतस्यैस्तैरिच्छद्भिः श्रेयसी क्रियाम् ॥ १५८ ॥ त्यजेद्दोपांस्तु तत्रोक्तान् सूत्रेऽतीचारसंक्षकान् । अन्यथा मद्यमांसादीन श्रावकः कः समाचरेत् ॥ १५९॥ दानं चतुर्विधं देयं पात्रबुद्धधाथ श्रद्वया । जघन्यमध्यमोत्कृष्टपात्रेभ्यः श्रावकोत्तमः॥ १६० ।। कुपात्रायाप्यपात्राय दानं देयं यथोचितम् । पात्रबुद्धया निपिद्धं स्यान्निपिद्धं न कृपाधिया ॥ १६१ ॥ शेपेभ्यः क्षुत्पिपासादि पीडितेभ्योऽशुभोदयात् । दीनेभ्योऽभयदानादि दावव्यं करुणार्णवः ॥ १६२ ।। पूजामप्यर्हतां कुर्याद्या तत्प्रतिमासु च । स्वरव्यवजनान् संस्थाप्य सिद्धानप्यर्चयेत्सुधीः ॥ १६३ ।। सूर्युपाध्यायसाधूनां पुरस्तात्पादयोः स्तुतिम् । प्राविधायाष्टधा पूजां विदध्यात्स त्रिशुद्धितः ।। १६४ ॥ तथानगारिणां ने + स्युः सर्वतः स्युः * परेऽपि ते। + मूलगुणाः । * उत्तरगुणाः । इत्यपि वा पाटः। ४ला. सं.
साटीसंहितायां- 1 . सन्मानादि यथाशक्ति कर्तव्यं च सर्मिणाम् । प्रतिनां घेतरेषां या विशेषाद ब्रह्मचारिणाम् ।। १६५ ।। नारियोपि प्रतादधाम्यो न निषिद्ध जिनागमे । देयं सन्मानदानादि टोकानामविरोधतः ॥ १६६॥ जिनचैत्यगृहादीनां निर्माणे सावधानता। यथासम्पद्विधेयास्ति दूप्या नावद्यलेशतः ।। १६७ ! सिद्धानामहतां चापि यन्त्राणि प्रतिमा गुमाः। चैत्याभयेपु संस्थाप्य द्रा प्रतिष्ठापयेत्सुधीः ।। १६८ ॥ अपि तीर्थादियात्रामु विदभ्यासोद्यतं मनः। आयकः स च बत्रापि संयमं न विराधयेन् । १६९ ॥ नित्से नैमिचिके चत्यजिनविश्यमहोत्सवे । शैथिल्यं नैव कर्तव्य तत्त्वहस्तद्विशेषतः ॥ १७० ।। संयमो द्विविधश्चैव विधेयो गृहमेधिभिः । विनापि प्रतिमारूपं व्रतं यद्वा स्वशक्तितः ।। १७१ ॥ तपो द्वादशधा द्वेधा याह्याभ्यन्तरभेदतः । कृत्स्नमन्यतम वा तत्कार्य चाततिवीर्यवान् ।। १७२॥ उक्तं दिग्मात्रतोप्यत्र प्रसङ्गाद्वा गृहिनतम् । वश्ये चोपासकाध्यायं सावकाशं सविस्तरम् ॥ १७३ ।। इति श्री स्याहादानवद्यगद्यपधविद्याविशारदविद्वन्मणिराज- महाविरचितायां श्रावकाचारापरनामलाटीसहितायां साधूश्री दूद्वात्मजफामनमन सरोजारबिन्द विकाशनकमार्तण्डमण्डलायमानायां दर्शन' प्रतिमाधिकारमध्ये सम्यग्दर्शनसामान्य. लक्षणवर्णनो नाम तृतीयः सर्गः। .
-~ सम्यग्दर्शनवर्णनम् । अथ चतुर्थः सर्गः। इदमिदं तव भो पनिजांपते भवतु भाविवभावसुदर्शनम् । विदितफामननाममहामते रसिकधर्मकथासु यथार्थतः ॥१॥ इत्याशीर्वादः। ननु सुदर्शनस्यैतल्लक्षणं स्यादशेषतः । किमथास्त्यपरं किञ्चल्लक्षणं तद्वदाद्य नः ॥ १ ॥ सम्यग्दर्शनमष्टाद्गमस्ति सिद्ध जगत्रये । लक्षणं च गुणश्चाङ्गं शब्दाश्चैकार्थवाचकाः ॥२॥ निःशङ्कितं तथा नामा निःकांक्षितमतः परम् । विचिकित्सावज चापि यथादृष्टेरमूढता ॥३॥ उपईहणनामाथ सुस्थितीकरण तथा । वात्सल्यं च यथाम्नायाद्गुणोप्यस्ति प्रभावना ॥ ४ ॥ शङ्का भीः साध्यसं भौतिर्भयमेकाभिधा अमी। तस्या निष्क्रान्तितो जातो भावो निःशङ्कितोर्थतः ॥ ५ ॥ अर्थवशादत्र सूत्रार्थे शङ्का न स्यान्मनीषिणाम् । सूक्ष्मान्तरितदूरार्थाः सन्ति चास्तिक्यगोचराः ॥ ६ ॥ तत्र धर्मादयः सूक्ष्माः सूक्ष्माः कालाणवोऽणवः । अस्ति सूक्ष्मत्वमेतेपां लिङ्गस्या:रदर्शनात् ॥ ७ ॥ अन्तरिता यया द्वीपसरिनाथनगाधिपाः । । दूराा भाविनोऽवीता रामरावणचक्रिणः ॥ ८ ॥ न स्यान्मिध्यादृशो ज्ञानमेतेषां काप्यसंशयम् । संशयादय हेतों इग्मोहस्योदयात्सतः ॥ ९॥ , इन्द्रियः । २ अंतरिताः कालविरुष्टाः दायाः देशविपस्याः इति ग्रन्या सोषु ।
५२ नपारायं परमात सांगोपरा:पुनः। सेः सह सनिकाय माभिकरयायमम्मवान् ॥१०॥ अलि समापि सम्यक्त्यमाहाम्यं मदता महन। पदम्य जगतो कानमारयास्लिामपुरमरम् ॥ ११ ॥ नासम्मयमिदं यम्माम्यमायोऽनगंगापरः। अतिगयोऽनियागास्त योगिनां योगिनियत ।। १२ अग्नि पामपारादि मान सम्यग्टगात्मनः । स्थमयदनप्रत्यक्ष सुद्धं मिदारपदीपमम् ॥ १३॥ यत्रानुभूयमानापि संधरावालमामनि । मिध्याकर्मविपाकादे नानुभूतिः शरीरिणाम् ॥ १४ ॥ सम्यग्दृष्टेः पुदष्टेश्च स्वादुर्भदोम्ति यम्नुनि । न तर याम्नयो मेदो यम्नुमानोऽनतिक्रमात ।। १५ ।। अत्र सापर्यमेवैतसत्वेपत्येपि यो प्रमः । शहायाः सोऽम्त्यपराधी मास्तिमिथ्योपजीविनी ॥१६॥ ननु शानो दोषी यो मियानुमरो नृणाम् । सा शहापि पुनो न्यायाति मिथ्योपजीयिनी ॥ १७॥ अवोत्तरं फुदृष्टियः म सप्तभिर्भयेयुतः । नापि स्पृष्टः मुष्टियः सप्तभिः स भयेमना ॥१८॥ पात्रात्मानुभूने पिना भौतिः कुतस्वनी। भीतिः पर्यायमूदाना नात्मवत्वैकचेतसाम् ॥ १९ ॥ तती भीत्यानुमयोस्ति मिथ्या मायो जिनागमार । सा च भौतिरयश्यं स्याद्धेतोः स्यानुभवक्षः ॥२०॥ अस्ति सिद्ध परायत्तो भीत: स्वानुभरच्युतः। स्वस्यस्य स्वाधिकारित्वान्नून भीतरसम्भयान ॥२१॥ ननु सन्ति चतस्रोपि संशास्तस्यास्य कस्यचित् । अर्वा तत्तत्स्यितिच्छेदस्थानादस्तित्यसम्भवान् ॥ २२ ।। ऐन्द्रियकस्य ।
सम्यग्दर्शनवर्णनम् ।
५३
तत्कथं नाम निर्भीकः सर्वतो दृष्टिवानपि ।
-अप्यनिष्टार्थसंयोगादस्त्यध्यक्षं प्रमत्तवान् ।। २३ ।।
सत्यं भीतोऽपि निर्भीकस्तत्स्वामित्वाद्यभावतः ।
रूपिद्रव्यं यथा चक्षुः पश्यन्नपि न पश्यति ॥ २४ ॥
सन्ति संसारिजीवानां कमांशाश्चोदयागताः ।
मुह्यन् रज्यन् द्विपस्तत्र तत्फलेनोपयुज्यते ॥ २५ ॥
एतेन हेतुना ज्ञानी निःशङ्को न्यायदर्शनात् ।
देशतोऽप्यत्र मूर्छाया शङ्काहेतोरसम्भवात् ॥ २६ ।।
स्वात्मसंचेतनं तस्य कोहगस्तीति चिन्त्यते ।
येन कर्मापि कुर्वाणो कर्मणा नोपयुज्यते ॥ २७ ॥
तत्र भीतिरिहामुत्रलोके वा वेदनाभयं ।
चतुर्थी भीतिरत्राणं स्यादगुप्तिस्तु पञ्चमी ॥ २८ ॥
भौतिः स्याद्वा तथा मृत्यु(तिराकस्मिकी तत्तः ।
क्रमादुद्देशिताश्चेति सप्तैताः भीतयः स्मृताः ॥ २९ ॥
तह लोकतो भीतिः क्रन्दितं चात्रजन्मनि ।
इष्टार्थस्य व्ययो मामून्मा मेऽनिष्टार्थसङ्गमः ॥ ३० ॥
स्थास्यतीदं धनं नो वा देवान्माभूद्दरिद्रता ।
इत्याद्याधिश्चिता दग्धुं ज्वलितेवाऽहंगात्मनः ।। ३१ ॥
अर्थादज्ञानिनो भीति(तिन ज्ञानिनः कचित् ।
यतोस्ति हेतुतः शेषाद्विशेषश्चानयोर्महान् ॥ ३२ ।।
अज्ञामी कर्म नोकर्म भावकर्मात्मकं च यत् ।
मनुतेऽहं सर्वमेवैतन्मोहादद्वैतवादवत् ॥ ३३ ॥
। विश्वाद्भिन्नोपि विश्व स्वं कुर्वन्नात्मानमात्महा ।
भूत्वा विश्वमयो लोके भयं नोन्झवि जातुचिन् ।। ३४ ।।
तात्पर्य सर्वतोऽनित्ये कर्मणां पाकसम्भवात ।
नित्यं बुध्वा शरीरादी भ्रान्तो भीतिमुपैति सः ॥ ३५ ॥
५४
लाठीसंहितायां-
सम्यग्दृष्टिः सदेकत्वं स्वं समासादयनियत् ।
यावकर्मातिरिकत्वाच्युद्धमभ्येति चिन्मयम् ।। ३६ ॥
शरीरं सुखदुःसादि पुत्रपौत्रादिक तथा।
अनित्यं कर्मकार्यत्वादस्वरूपमवैति यः ।। ३७ ।।
लोकोयं मे हि चिल्लोको नूनं नित्योस्ति सार्थतः ।
नापरो लौकिको लोकस्ततो भौतिः युतोस्ति मे ।। ३८ ।।
आत्मसंचेतनादेवं ज्ञानी ज्ञानेकतानतः ।
इह लोकभयान्मुक्तो मुक्तस्तत्कर्मबन्धनात् ॥ ३९ ॥
परलोकः परत्रात्मा भाविजन्मान्तरांशमा ।
ततः कम्प इव त्रासो भौतिः परलोकतोस्ति सा॥४॥
भद्रं चेजन्म स्वलॊके मामून्मे जन्म दुर्गती।
इस्पाधाकुलितं चेतः साध्वसं पारलौकिकम् ॥ ४१ ॥
सिध्यादृष्टेस्तदेवास्ति मियाभावककारणात
तद्विपक्षस्य सदृष्टेनास्ति तत्तत्र व्यत्ययात् ॥ ४२ ।।
वहिदृष्टिरनात्मज्ञो मिथ्यामात्रैकभूमिकः ।
स्वं समासादयत्यज्ञः कर्म कर्मफलात्मकम् ।। ५३ ॥
ततो नित्यं भयाक्रान्तो वर्तते प्रान्तिमानिय ।
मनुते मृगतृष्णायामम्भोभारं जनः कुधीः । ४४॥ ।"
अन्तरात्मा तु निर्भीकः पदं निर्भयमाश्रितः।
भीतिहेतोरिहावश्यं मिथ्यानान्तरसम्भवात् ॥४५॥
मिथ्याभ्रान्तिर्यदन्यत्र दर्शनं चान्यत्रस्तुनः ।
यथा रज्जो तमोहेतोः साध्यासाद्वत्यंधीः ॥ ४६॥
स्वसंवेदनप्रत्यक्षं ज्योतियों वेत्त्यनन्यसात् ।
स विभेति कुतो न्यायादन्यथाभवनादपि ॥ ४७ ।।
वेदनागन्तुका वाधा मलानां कोपतस्तनौ ।
भीतिः प्रागय कम्पोऽस्या मोहाद्वा परिदेवनम् ॥ ४ ॥
सम्यग्दर्शनवर्णनम् । ४ उल्लाघोऽहं भविष्यामि मामून्मे वेदना क्वचित् । मूच्छैव वेदना भीतिश्चितनं वा मुहुर्मुहुः ॥ ४९ ॥ अस्ति नूनं कुदृष्टेः सा दृष्टिदोपैकहेतुतः । नीरोगस्यात्मनो ज्ञानान्न स्यात्सा ज्ञानिनां क्वचित् ॥५०॥ पुद्गलादिन्नचिद्धानो न मे व्याधिः कुतो भयम् । व्याधिः सर्वः शरीरस्य नामूर्तस्येति चिन्तनात् ।। ५१ ।। स्पर्शनादीन्द्रियार्थपु प्रत्युत्पन्नेपु भाविपु । नादरो यस्य सोस्त्यान्निीको वेदनामयात् ।। ५२ ॥ व्याधिस्थानेषु तेपूचे सिद्धो नादरो मना । वाधाहेतोः स्वतस्तेपामामयस्याविशेषतः ।। ५३ ॥ अत्राणं क्षणिकैकान्ते पक्षे चित्तक्षणादिवत् । नाशात्मागंशनाशस्य त्रातुमक्षमतात्मनः॥ ५४॥ भीतिः प्रागंशनाशात्स्यादशिनाशनमोन्वयात् । मिथ्यामात्रैकहेतुत्वान्नूनं मिध्याहशोस्ति सा ।। ५५ ।। शरणं पर्ययस्यास्तंगतस्यापि सदन्वयम् । समनिच्छन्निवाज्ञः स त्रस्तोस्त्यत्राणसाध्यसात् ।। ५६ ॥ सदृष्टिस्तु चिदंशैः स्वैः भणे नष्टे चिदात्मनि । पश्यन्न नष्टमात्मानं निर्भयो त्राणभीतितः ।। ५७ ॥ द्रव्यतः क्षेत्रतश्चापि कालादपि च भावतः । नात्राणमंशतोप्यत्र कुतस्तद्धीमहात्मनः ।। ५८ ॥ हम्मोहस्योद्यावुद्धिर्यस्यैकान्तादिवादिनः । तस्यैवागुप्तिमीतिः स्यानूनं नान्यस्य जातुचित् ॥ ५९॥ असजन्म सतो नाशं मन्यमानस्य देहिनः । कोऽवकाशस्ततो मुक्तिमिच्छातोऽगुप्तिसाध्यसात् ॥ ६० ।। सम्यग्दृष्टिस्तु स्वं रूपं गुनं वै वस्तुनो विदन् । निर्मयोऽगुप्तिवो भीते तिहेतोरसम्भवान् ।। ६१ ।।
Lur टाटीसहिताया- मृत्युः प्राणात्ययः प्राणाः काययागिन्द्रियं मनः । निश्वासोच्छासमायुश्च दौते वाक्यविसगन् । ६२ ॥ तद्भीति वित्तं भूयान्मामन्मे मरणं इचित् । कदा रेभेन वा देयादित्याधिः खे तनुव्यये ।। ६३ ॥ नूनं तद्री: कुदृष्टानां नित्यं तत्वमनिच्छनाम् । अन्तस्तत्त्वैकरताना तभीतिशानिनां पुतः ॥ ६४॥ जीवस्य चेतना प्राणा नूनं स्वात्मोपजीविनी । नाथान्मृत्युरतस्तदीः पुनः स्यादिति पश्यतः ॥६५॥ अकस्माजातमित्युचराकस्मिकभयं स्मृतम् । तद्यथा विद्युदादीनां पातात्पातोऽमुधारिणाम् ६६ ।। भाति भूयाचया सौरभ्य मामूदौरप्य कदापि मे । इत्येवं मानसी चिंतापर्यालितचेतसाम् ।। ६७ ११ হেবিবির খোকন। फुनो मेक्षिोऽस्ति तदीनि कैकपदच्युतेः ॥ ६८॥ निर्भीककपदो जीवः स्यादनन्तोप्यनादिमान् । नास्त्यावस्मिक धन कुतस्तद्भीरतमिच्छवः ।। ६९।। काक्षा भोगामिलाप: स्यात्कवे मुख्यक्रिया था। कमणि तरूले स्वात्म्यमन्यदृष्टिप्रशंसनम् ।। ७०।। हपीका रुचितेचद्वेगो विपयेषु यः। स स्याभोगामिलापस्य लिङ्गं स्वष्टार्थरग्जनान् ॥ १॥ तद्यथा न रतिः पने विपक्षे वारति विना । नारतिर्वा स्वपपि तद्विपश्रति विना ।। ७२॥ शीत्तद्वेपी यथा कश्चिदुष्णपर्श समीहते । नेच्छेदनुष्णसंस्पर्शमुष्णपर्शामिलापुकः ।। ७३ ।। यस्यास्ति कांक्षितो भावो नून मिध्याहात्ति सः। यस्य नास्ति स सदृष्टिः युक्तिस्वानुभवागमान् ।। ७४ ।।
सम्यग्दर्शनवर्णनम् । ५७ आस्वामिष्टार्थसंयोगोऽमुत्रभोगामिलापतः । "स्वार्थसाथैकसंसिद्धिर्न स्यानामहिकापि सा ।। ७५ ।। निस्सारं प्रस्फुरत्येप मिथ्याकमैकपाकतः । जन्तोरुन्मत्तयच्चापि वाातोत्तरवत् ।। ७६ ।। ननु कार्यमनुद्दिश्य न मन्दोपि प्रवर्तते । भोगाकांक्षा विना ज्ञानी तत्कथं व्रतमाचरेत् ॥ ७७ ।। नासिद्धं यन्धमात्रत्वं क्रियायाः फलमद्वयम् । शुममात्रं शुभायाः स्यादशुभायाश्चाशुभावहम् ।। ७८ ॥ नचाशक क्रियाप्येपा स्यादवन्धफला क्वचित् । दर्शनातिशयादे॒वोः सरागेपि विरागवत् ॥ ७९ ॥ सरागे वीतरागे वा नूनमौदयिकी क्रिया । अस्ति वन्धफलावश्यं मोहस्यान्यतमोदयात् ।। ८०॥ नच वाच्यं स्यात्सद्दृष्टिः कश्चित्प्रज्ञापराधतः । अपि बन्धफलां कुर्यात्तामवन्धफलां विदन् ।। ८१ ।। यतः प्रज्ञाविनाभूतमस्ति सम्यग्विशेपणम् । सस्याश्वाभावतो नूनं कुतस्त्या दिव्यता दृशः ।। ८२ ॥ नैवं यतः सुसिद्धं प्रागस्ति चानिच्छतः क्रिया। शुभायाश्चाशुभायाश्च को विशेषो विशेपभाक् ॥ ८३ ॥ नन्वनिष्टार्थसंयोगरूपा सानिच्छतः क्रिया। विशिष्टेष्टार्थसंयोगरूपा सानिच्छतः कथम् ॥ ८४ ॥ तक्रिया प्रतरूपा स्यादर्यान्नानिच्छतः स्फुटम् । तस्याः स्वतंत्रसिद्धत्वात्सिद्ध कर्तृत्वमर्थसात् ।। ८५ ॥ । नैवं यतोऽस्त्यनिष्टार्थः सर्वः कर्मोदयात्मकः । तस्मानाकांक्षते ज्ञानी यावत्कर्म च तत्फलम् ।। ८६ ॥ यत्पुनः कश्चिदिष्टार्थोऽनिष्टार्यः कश्चिदर्थसान । तत्सर्व दृष्टिदोपत्वात्पीतशंसायलोकवत् ।। ८७ ॥
टाटीमंहितायां-
हम्मोहस्यात्यये दृष्टिः साभातायदर्शिनी ।
तस्यानिष्टेस्यनिष्टायवुद्धिः कर्मफलात्मके ॥ ८८ ॥
नचासिद्धमनिष्ठत्वं कर्मणस्नफलम्य च।
सर्वतो दुपहेतुत्वाद् युक्तिस्वानुभवागमात् ॥ ८९ ।।
अनिष्टार्थफलत्वात्स्यादनिष्ठा प्रतकिया ।
दुष्टकार्यानुरूपस्य हेतोदुष्टोपदेशयन् ।। ९० ॥
अथसिद्ध स्वतन्त्रत्वं क्रियायाः कर्मणः फलान् ।
ऋते कर्मोदयाद्धेतोस्तस्याश्चासम्भयो मतः ।। ९१ ।।
यावदक्षीणमोहस्य क्षीणमाहस्य चात्मनः ।
यावत्यस्ति क्रिया नाम तापत्यौदायिकी स्मृता ।। ९२ ॥
पौरुषं न यथाकामं पुंस: कर्मोदित प्रति ।
न परं परिपापेको देवापेक्षा हि पोम्पः ।। ९३ ॥
सिद्धो नि कांक्षितो ज्ञानी कुर्वाणोप्युदितां क्रियाम् ।।
निष्कामतः कृतं कर्म न रागाय विरागिणाम् ।। ९४ ॥
नाशय चास्ति निकांक्षः सामान्योपि जनः कचित् ।
हेतोः कुवश्विदन्यत्र दर्शनातिशयादपि ॥ ५५ ॥
यती निःकांक्षिता नास्ति न्यायासदर्शनं पिना।
नानिच्छास्याक्षजे सौप्ये तदत्यक्षमनिच्छतः । ९६
सदत्यक्षसुर मोहान्मिध्यादृष्टिः स नेष्यति ।
दृग्मोहस्य तथा पारशक्त. सद्भावतोऽनिशम् ॥ ९७ ॥
उक्तो निःकांक्षिती भागे गुणो सद्दर्शनस्य ।
अस्तु का नः क्षतिः प्राक् चेत्सरीमानमता मता ॥ ९॥
अथ निर्विचिकित्साख्यो गुणः संलश्यते स यः ।
सहर्गनगुणस्योचगुणो युक्तिवादपि ॥ ९९ ।।
आत्मन्यात्मगुणोत्कर्पबुद्धया स्वात्मप्रशंसनात् ।
परत्राप्यपकर्येषु बुद्धिर्विचिकित्सा स्मृता ॥ १० ॥
सम्यग्दर्शनवर्णनम् । ५९ निष्कान्तो विचिकित्सायाः प्रोक्तो निर्विचिकित्सकः। गुणः सद्दर्शनस्योचैर्वक्ष्ये तलक्षणं यथा ॥ १०१ ॥ दुर्दैवादुःखिते पुंसि तीव्रासाताधृणास्पदे । यन्नासूयापरं चेतः स्मृतो निर्विचिकित्सकः ॥ १०२ ॥ नैतत्तन्मनस्यज्ञानमस्म्यहं सम्पदा पदम् । नासावस्मत्समो दीनो वराको विपदा पदम् ॥ १०३ ॥ प्रत्युत ज्ञानमेवतत्तत्र कर्मविपाकजाः। प्राणिनः सदृशः सर्व सस्थावरयोनयः ॥१०४॥ यथा द्वावर्भको जातौ शूद्रिकायास्तथोदरात् । शूद्रावधान्तितस्तौ द्वौ कृतं भेदभ्रमात्मना ।। १०५ ।। जले वालवज्जीवे यावत्कर्माशुचि स्फुटम् । अहं ते चाविशेषाद्वा नूनं कर्ममलीमसाः ॥ १०६ ।। अस्ति सद्दर्शनस्यसौ गुणो निर्विचिकित्सकः । यतोऽवश्यं स तत्रास्ति तस्मादन्यत्र न कचित् ॥ १०७ ॥ कर्मपर्यायमात्रेपु रागिणः स कुतो गुणः । सद्विशेपेऽपि संमोहाद् द्वयोरैक्योपलब्धितः ॥ १०८ ॥ इत्युक्तो युक्तिपूर्वोऽसौ गुणः सद्दर्शनस्य यः । नाविवक्षोपि दोपाय विवक्षो न गुणाप्तये ॥ १०९॥ अस्ति चामूढष्टिः सा सम्यग्दर्शनशालिनी । ययालस्कृतमानं सद्भाति सदर्शनं नैरि ।। ११०॥ अतत्त्वे तत्त्वश्रद्धानं मूढदृष्टिः स्खलक्षणात् । नास्ति सा यस्य जीवस्य विख्यातः सोस्त्यमूढदृक् ॥ १११ ।। अस्त्यसद्धेतुदृष्टान्तर्मिध्यार्थः साधितोऽपरैः । नाप्यलं तत्र मोहाय दृम्मोहस्योदयक्षतेः ।। ११२ ।। सूक्ष्मान्तरितदूरार्थे दर्शितेऽपि कुदृष्टिमिः । नाल्पश्रुतः समुह्येत किं पुनश्चेदहुश्रुतः ।। ११३ ॥ मनुष्ये ।
६० स्ट्राटीसंहितार्या- अर्थाभासेपि तत्रायः सम्यादृष्टेन भूढवा । स्थूलानन्तरितोपातमिप्याऽस्य कुतो भ्रमः ॥ ११४॥ तद्यथा लौकिकी रूढिरस्ति नाना विरुत्सप्तात् । निःसारराश्रिता पुंभिरयानिष्टफलप्रदा ।। ११५ ॥ अफला कुफला हेतुशून्या योगापहारिणी । दुम्याज्या लौकिकी रूदि कैघिददुष्कर्मपाकदः ।। ११६ ॥ अदेचे देवबुद्धिः स्यादधर्मे धर्मधीरिह । अगुरी गुम्युद्धिया ख्याता देवविमूढता ॥ ११७॥ कुदेवाराधनां कुर्यादेहिकश्रेयसे कुधीः । मृपालोकोपचारत्वादश्रेया लोकमूढता ।। १९८॥ अम्ति श्रद्धानमेकेपा लोकरूढिवशादिह । धनधान्यप्रदा नूनं सम्यगाराधिताम्यिका ।। ११९ ।। अपरेपि यथाकामं देवानिच्छन्ति दुर्धियः । सदोपानपि निर्दोपानिय प्रज्ञापरावतः ।। १२०।। नीक्तस्तेषां समुद्देशः प्रसङ्गादपि सङ्गवः । लंब्धवों न कुर्याद्वै निस्मारं ग्रंथविस्तरम् ।। १२१ ।। अधर्मस्तु कुदेवानां यावानारापनोधमः। तै प्रणीतेषु धर्मेपु चेष्टा वाकायचेतसाम् ॥ १२२ ॥ कुगुमः कुत्सिताचारः सशल्यः सपरिप्रहः । सम्यक्त्वेन व्रतेनापि युक्तः स्यात्सद्गुरर्यतः ॥ १२३ ॥ अदिशोपि न श्रेयान्सर्वतोऽतीवविस्तरात् । आदयो विधिरत्रोक्तो नादेयोऽनुक्तएव मः॥ १२४ ॥ दोपा रागादिघिद्धावः स्यादावरणं च कर्म तत् । तयोरभावोस्ति निःशेपो यत्रासौ देव उच्यते ॥ १२५ ॥ अम्त्यत्र केवलं ज्ञानं क्षायिक दर्शनं सुखम् । वीर्य चेति सुविख्यातं म्यादनन्तचतुष्टयम् ॥ १२६ ॥ पण्डितः।
सम्यग्दर्शनवर्णनम् । एको देवः स सामान्याद् द्विधाऽवस्थाविशेषतः । संख्यधा नामसंदर्भागुणेभ्यः स्यादनन्तधा ।। १२७ ॥ एको देवः स द्रव्यात्सिद्धः शुद्धोपलब्धितः । अईनिति च सिद्धश्च पर्यायार्थाद्विधामतः ।। १२८ ॥ दिव्यौदारिकदहस्थो धौतघातिचतुष्टयः । ज्ञानाचार्य सौख्यादयः सोऽहन धर्मोपदेशकः ।। १२९ ।। मूर्तिमद्देहनिर्मुक्तो लोको लोकाप्रसंस्थितः । ज्ञानाद्यष्टगुणोपेतो निष्कर्मा सिद्धसंज्ञकः ।। १३०॥ अर्हन्निति जगत्पूज्यो जिनः कारिशातनात् । महादेवोऽधिदेवत्वाच्छंकरोमिसुखावहात् ॥ १३१॥ विष्णुर्भानेन सर्वार्थविस्तृतत्वात्कथंचन । ब्रह्मा ब्रह्मज्ञरूपत्वाद्वरि. दुःखापनोदनात ॥ १३२ ।। इत्याद्यनेकनामापि नानेकोस्ति स्वलक्षणात् । यतोऽनन्तगुणात्मैकद्रव्यं स्यास्सिद्धसाधनान् ।। १३३ ॥ चतुर्विशतिरित्यादियावदन्तमनन्तता । तद्बहुत्यं न दोपाय देवत्वैकवियत्वतः ।। १३४ ॥ प्रदीपानामनेकत्वं न प्रदीपत्वहानये । यतोऽत्रकविधत्वं स्यान्नस्यान्नानाप्रकारतः ॥ १३५॥ नचाशङ्कर्ष यथासंख्यं नामतोप्यस्त्वनेकया। न्यायादेकगुणं चैकं प्रत्येकं नाम चैककम् ॥ १३६ ।। नामतः सर्वतो मुख्य संख्या तस्यैव सम्मयात् अधिकस्य ततो याचा व्यवहारस्य दर्शनात् ॥ १३७ ॥ पृद्धः प्रोक्तमतः सूत्रे तत्त्वं वागतिवति यत् । द्वादशाङ्गागबाह्यं च श्रुतं स्थूलार्थगोचरम् ।। १३९ ॥ कृत्स्नकर्मक्षयाज्ञानं क्षायिकं दर्शनं पुनः । अत्यक्षं सुसमामोत्थं वीर्य चेति चतुष्टयम् ।। १३९ ।। 'दुःसविनाशनान् । २ पचनागोचरम् ।
६२ लाटीसंहितायां-. . . - - ३ मम्यक्त्वं चैव सूक्ष्मत्वमच्यावाधगुणः स्वतः । अस्त्यगुगलघुत्वं च सिद्ध चाष्टगुणाः स्मृताः ॥ १४०॥' इत्याद्यनन्तधर्मान्यः कर्माष्टकविवर्जितः । मुक्तोऽष्टादशभिर्दोषैर्देवः सेन्यो नचेतरः ॥ १४१ ।। अर्थाद्गुरुः स एवास्ति श्रेयोमार्गोपदेशकः । भगवांस्तु यतः साक्षान्नेवा मोक्षस्य वमनः ॥ १४२ ।। तेभ्योऽर्यागपि छद्मस्थरूपा तद्रूपधारिणः । गुस्वास्युचुरोन्यायान्न्यायोऽवस्थाविशेषभाक् ॥१४३ ।। अन्त्यवस्थाविशेपोऽत्र युक्तिवानुमवागमात् । शेपसंसारिजीवेभ्यस्तेषामेवातिशायनात् ।। १४४ ॥ भायिनैगमनयायत्तो मूष्णुस्तद्वानिवप्यते । अवश्य भावतो व्याप्तेः सद्भावात्सिद्धमाघनान् ।। १४५ ॥ अस्ति सद्दर्शनं तेषु मिथ्याकर्मोपशान्तितः । चारित्रं देशतः सम्या चारित्रावरणक्षते: ॥ १४६ ।। तत सिद्धं निसर्गाद्वै शुद्धत्वं हेतुदर्शनात् । मोहकर्मोदयाभावात् तत्कार्यस्याप्यसम्भवात् ॥ १४७ ।। तच्छुद्धत्वं मुविख्यातनिर्जराहेतुरंजसा । निदानं संवरस्यापि क्रमानिर्वाणभागपि ॥ १४८॥ यहा स्वयं तदेवाग्निर्जगदित्रयं यतः । शुद्धभावाविनामावि द्रव्यनामापि तत्त्रयम् ॥ १४९॥ निर्जरादिनिदान यः शुद्धो मावश्विदात्मकः । परमाईः सएवास्ति तद्वानात्मा परं गुरुः ।। १५०॥ न्यायाद्गुरुत्वहेतुः स्यात्केवलं दोपसंक्षयः । निदापो जगतः साक्षी नेता मार्गस्य नेतरः॥ १५१ ॥ नालं छद्मस्यताप्येपा गुरुत्वक्षवये मुनेः । रागाद्यशुद्धभावानां हेतुर्मोहककर्म तत् ॥ १५२ ॥ १'क' पुस्तके " नान्यो-वरभाविशेषभाक" इति यातः । . T . .
सम्यग्दर्शनवर्णनम् । नन्वावृतिद्वयं कर्म वीर्यविध्वंसि कर्म तत् । अस्ति तत्राप्यवश्यं वै कुतः शुद्धत्वमत्र चेत् ॥ १५३ ।। सत्यं किन्तु विशेपोस्ति प्रोक्तकर्मत्रयस्य च । मोहकर्माविनाभूतं बन्धसत्त्वोदयक्षयम् ॥ १५४ ।। तद्यथा बव्यमानेस्मिन् तद्वन्धो मोहबन्धसात् । तत्सत्वे सत्वमेतस्य पाके पाकः क्षये क्षयः ।। १५५ ।। नोह्यं छद्मस्थावस्थायामयोगेवास्तु तत्क्षयः । अंशान्मोहक्षयस्यांशात्सर्वतः सर्वतः क्षयः ।। १५६ ।। नासिद्धं निर्जरा तत्त्वं सद्दष्टेः कृत्स्नकर्मणाम् । आदृग्मोहोदयाभावात्तच्चासंख्यगुणा क्रमात् ॥ १५७ ॥ ततः कर्मत्रयं प्रोक्तमस्ति यद्यपि सांप्रतम् । रागद्वेषविमोहानामभावाद्गुरुता मता ॥ १५८ ॥ “अथास्त्येक' स सामान्यात्सद्विशेषात्रिधामतः । एकोप्यग्निर्यथा तार्ण्यः पार्योदाळखिघोच्यते ॥ १५९ ॥ आचार्यः स्यादुपाध्यायः साधुश्चेति त्रिधागतिः । स्युर्विशिष्टपदारूढायोपि मुनिकुञ्जराः ॥ १६० ॥ एको हेतुः क्रियाप्येका विद्यश्चैको बहिः समः। तपो द्वादशधा चैकं व्रतं चैकं च पञ्चधा ! १६१ ॥ त्रयोदशविधं चैकं चारित्रं समतैकया। मूलोत्तरगुणाश्चैको संयमोप्येकधा मतः ॥ १६२ ।। परीपहोपसर्गाणां सहनं च समं स्मृतम् । आहारादिविधिश्चैकश्चर्यास्थानासनादयः ॥ १६३ ॥ -1 मार्गों मोक्षस्य सदृष्टिः ज्ञानं चारित्रमात्मनः । रत्नत्रयं समं तेषामपि चान्तर्वहिस्थितम् ॥ ६४ ॥ १ नो विचारणीयम् । १ 'ख' पुस्तके " क्षये " इतिपाठः । ३“गुणं इनि पचाध्यायी पाठः। विहारः ।
यत्र सावद्यलेशोपि तनादेशो। - दीक्षाचार्येण दीक्षेव दीयमानास्ति गातेः ॥ १४६ ।। ... ननिषिद्धस्तदादेशो गृहिणां शान्तितःक्रिया ।। १७०॥ छेदोपस्थापनं चात्र क्रियतेऽन्येन तेन वां। हिंसकश्वोपदेशोपि नोपयुज्योत्र कारणात् ।। १७१॥ मुनिव्रतधराणां वा गृहस्थव्रतधारिणाम् । आदेशश्चोपदेशो वा न कर्तव्यो बधाश्रितः॥ १७२।। मूर्तिमच्छक्तिसर्वस्वं हस्तरेखेवदर्शितम् ॥ १७३ ॥ नचाशङ्कय प्रसिद्धं यन्मुनिभिर्वतधारिभिः। नूनं प्रोक्तोपदेशोपि न रागाय विरागिणाम्। रागिणामेव रागाय ततोऽवश्यं स वर्जितः ॥ १७४॥ न निषिद्ध स आदेशो नोपदेशो निषेधित । नूनं सत्पात्रदानेपु पूजायामहतामपि ।। १७५ ॥ लाटीसंहितायां- ध्याता ध्यानं च ध्येयश्च ज्ञाता ज्ञानं घ शेयसात् । चतुर्विधाराधनापि तुल्या क्रोधादिजिष्णुता ॥ १६५ ।। किंवात्र बहुनोक्तन तद्विशेषोऽवशिष्यते । विशेषाच्छेपनि शेपो न्यायादात्यविशेषमाम् ॥ १६६ ॥ आचार्योऽनादितो रूढे योगादपि निरुच्यते। पञ्चाधारं परेभ्यः स आधारयति संयमी || १६७ ॥ अपि छिन्न व्रत साधोः पुनः सन्धानमिच्छत्तः। तत्समादेशदेशानेन प्रायश्चित्तं प्रयच्छति ॥ १६८ ॥ आदेशस्योपदेशे पात त्याद्विशेषः स भेदभाक् । आइत्ते गुरुणा दत्तं नास्तवेतदेशेष्वयं विधिः ॥ १६९ ॥ सनिषिद्धो यथाम्नायादप्रतिनां मनागपि । . . यद्वादेशोपदेशोस्तो तो द्वौ निरवटामणि । त् ॥ १७६५ पप्पडूक्तिः । ३ पक्षान्तरे। "ग" पुस्तकयो सम्यग्दर्शनवर्णनम् । ६५ । सहासंयमिभिर्लोकः संसर्ग भापणं रतिम् । कुर्यादाचार्य इत्येकेनासौ सूरिनचाहतः ।। १७७ ।। संघसम्पोपकः सूरिः प्रोक्तः कैश्चिन्मतेरिह । धर्मादेशोपदेशाभ्यां नोपकारोऽपरोऽस्त्यतः ।। १७८ ॥ यद्वा मोहात्ममादाद्वा कुर्याद्यो लौकिकी क्रियाम् ।। तावत्कालं स नाचार्योऽप्यस्ति चान्तर्वताच्युतः ।। १७९ ।। इत्युक्तनततपःशीलसंयमादिधरो गणी । नमस्यः स गुरुः साक्षात्तदन्यो न गुरुर्गणी ।। १८० ॥ उपाध्यायः स साध्वीयान् वादी स्याद्वादकोविदः । वाग्मी वाग्ब्रह्मसर्वज्ञः सिद्धान्तागमपारगः ॥ १८१ ।। कविः प्रत्यप्रसूत्राणां शब्दार्थैः सिद्धसाधनात् । गमकोऽर्थस्य माधुर्ये घुर्यो वक्तृत्ववर्त्मनाम् ।। १८२ ।। उपाध्यायत्वमित्यत्र श्रुताभ्यासोस्ति कारणम् । यदध्येति स्वयं चापि शिष्यानध्यापयेद्गुरुः ॥ १८३ ॥ शेपस्तत्र व्रतादीनां सर्वसाधारणो विधिः । कुर्याद्धर्मोपदेशं स नादेश सूरियत्कचित् ।। १८४ ।। तेपामेवाश्रमं लिङ्गं सूरीणां संयम तपः। आश्रयेत् शुद्धचारित्रं पञ्चाचारं स शुद्भधीः ॥ १८५॥ मूलोत्तरगुणानेव यथोक्तानाचरेचिरम् । परिपझोपसर्गाणां विजयी स भवेद्धवम् ।। १८६ ।। अत्रातिविस्तरेणालं भूनमन्तवहिर्मुनेः । शुद्धवेषधरो धारो निर्मन्यः स गणामणीः ॥ १८७ ।। उपाध्यायः समाख्यातो विख्यातोस्ति स्वलक्षणैः । अधुना साध्यते साधोर्लक्षणं सिद्धमागमान् ॥ १८८ ।। मार्ग मोक्षस्य चारित्रं सरझप्तिपुरस्सरम् । साधयत्यात्मसिद्धयर्थ साधुस्वर्थसंज्ञकः ॥ १८९ ।। गुणनिप्पननामा । ५ला.सं.
लाटीसंहितायां-- - f -- ' नोंचे वाचंयमी किश्चिद्धस्तपादादिसंज्ञया । न किश्चिद्दर्शयेत्स्वस्थो मनसापि न चिन्तयेत् ।। १९० ।। आस्ते स शुद्धमात्मानमास्ति नुवानश्च परम् । स्तिमितान्तर्बहिर्जल्पो निस्तरङ्गान्धिवन्मुनिः ॥ १९१ ॥ नादेशं नोपदेशं वा नादिशेत्स मनागपि ।' ... स्वर्गापवर्गमार्गस्य तद्विपक्षस्य किं पुनः ।। १९२ ।। । । वैराग्यस्य परां काष्ठामधिरूढोऽधिकप्रमः । .. दिगम्बरो यथाजातरूपधारी दयापरः ॥ १९३॥ निप्रन्थोन्तयहिौहान्थेरन्यको यमी। . कर्मनिर्जरकः श्रेण्या तपस्वी स तपःशुचिः ।। १९४ ।। परिपहोपसर्गाधरजप्यो जितमन्मथः । एपणाशुद्धिसंशुद्धः प्रत्यारयानपरायणः ।। १९५ ॥ इत्याधनेकधाऽनेकः साधुः साधुगुणैः श्रितः। नमस्पः श्रेयसेऽपश्यं नेतरो विदुषां महान् ।। १९६।। एवं मुनित्रयी ख्याता महती महतामपि ।। तद्विशुद्धिविदशेपोस्ति कमात्तरतमात्मकः ।। १९७।। तत्राचार्य प्रसिद्धोस्ति दीक्षादेशाद्ग्रणामणीः ।। न्यायाद्वा देशतोव्यभान् सिद्धः स्वात्मन्यतत्परः ॥ १९८ ।।। अर्थान्नातत्परोप्येष दृम्मोहानुदयात्सतः।। अस्ति तेनाविनाभूतशुद्वात्मानुभय. स्फुटम् ॥ १९९॥.' अप्यस्ति देशतस्तत्र चारित्रावरणक्षतिः। याम्यार्थात् केवलं न स्यात्क्षतिर्वापि तदक्षतिः ॥ २०॥ तथापि न यहिवस्तु स्यात्तद्धतुरहेनुनः । अन्युपादानहेतोश्च तत्क्षति वदक्षतिः ॥ २० ॥ , 'मारयात् 'त्यापिपाटः । साथः " वायमे " इति पुन पर । परनरिवाहित ।। भावा ।
सम्यग्दर्शनवर्णनम् । ६७' . - -- - संति संज्वलनस्योः स्पर्द्धकाः देशघातिनः ।, तद्विपाकोस्त्यमन्दो वा मन्दो हेतुः क्रमाद्वयोः ।। २०२०।। संक्लेशस्तत्क्षतिनं विशुद्धिस्तु तदक्षतिः । सेपि तरतमत्वांशः साप्यनेकैरनेकधा ।। २०३॥ अस्तु यद्वा न शैथिल्यं सत्र हेतुबशादिह । तथाप्येतावताचार्यः सिद्धो नात्मन्यतत्परः ।। २०४।। तत्रापश्यं विशुद्धघंशस्तेषां मन्दोदयादिह । संश्लेशांशोऽथवा तीवोदयान्नायं विधिः स्मृतः ॥ २०५॥ किन्तु देवाद्विशुद्ध चंशः संछेशाशोथ या कचित् । तद्विशुद्धविशुद्ध-यंशः संशांशादयं पुनः ॥ २०६ ॥ तेषां तीनोदयात्तावदेतावानत्र बाधकः । सर्वतश्चेत्प्रकोपी च नापराधोस्त्यतोपरः ।। २०७।। तेनातायता नूनं शुद्धस्यानुभवच्युतिः । फतुं न शक्यते यस्मादत्रास्त्पन्यः प्रयोजकः || २०८ ॥ हेतुः शुद्धात्मनो भाने शमो मिथ्यात्वकर्मणः ।। प्रत्यनीकस्तु तत्रोभेरशमस्तस्य व्यत्ययात् ।। २०९ ॥ दृम्मोहेऽस्तंगते पुंसः शुद्धस्यानुभयो भवेत् । न भवेद्विनकरः कश्चिमारित्रावरणोदयः ॥ २१०॥ नचाकिञ्चित्करश्चैवं पारिवाधरणोदयः । दृग्मोहस्य क्षतेनालमलं स्वस्य कृते च यः ।। २११ ।। 'फायं पारित्रमोहस्य पारिवाञ्च्युतिरात्मनः । नात्मदृष्टेन्तु रष्टित्यान्न्याय्यादितरराष्टिवत् ॥ २१२॥ यया घक्षुः प्रसन्नं वै फस्यीयदेवयोगतः । इतरत्राभतापेऽपि दृष्ट्राध्यक्षान्न तत्क्षतिः ॥२१३ ॥ , सक्ले । २ सा अपिविशतिः। पत्यान् । प लाटीसंहितायां- कपायाणामनुद्रकश्चारित्रं तावदेव हि । नानुद्रेकः कपायाणां चारित्राच्च्युतिरात्मनः ॥ २१४ ॥ ततस्तेषामनुद्रेकः स्यादुद्रेकोऽथवा स्वतः । अथ सूरिरुपाध्यायः द्वावेतौ हेतुतः समौ । नापि कश्चिद्विशेषोस्ति द्वयोरतरतमो मिथः । नात्मदृष्टेः क्षतिनं दृग्मोहस्योदयाहते ।। २१५॥ . साधुरिवात्मज्ञौ शुद्धौ शुद्धौ शुद्धोपयोगिनौ ॥ २१६ ।। , नैताभ्यामन्तरुत्कर्षः साधोरप्यतिशायनात् ॥ २१७ ॥ लेशतोस्ति विशेषश्चेन्मिथस्तेषां वहिः कृतः। नास्त्यत्र नियतः कश्चिद्युक्तिस्वानुभवागमात् । मन्दादिरुदयस्तेषां सूयुपाध्यायसाधुपु ।। २१९॥ का क्षतिर्मूलहेतोः स्यादन्त शुद्धिसमन्वितः ॥ २१८ ॥ प्रत्येक बहवः सन्ति सूर्युपान्यायसाधवः । जघन्यमध्यमोत्कृष्टभवैश्चकैकशः पृथक् ॥ २२० ॥ कश्चित्मूरिः कदाचिद्वै विशुद्धिं परमां गतः । मध्यमा वा जघन्यां वा स्वोचितां पुनराश्रयेत् ॥ २२१ ।। हेतुस्तबोदिता नानाभावाशैः स्पर्द्धकाः क्षणम् । धर्मादेशोपदेशादिहेतुर्नात्र बहि. कचित् ।। २२२ ॥ परिपाट्यानया योज्याः पाठकाः साधवश्च ये। न विशेषो यतस्तेपा नियत. शेपो विशेषभाक् ।। २२३ ।। ननु धर्मापदेशादि कर्म तत्कारणं बहिः । हेत्तोरभ्यन्तरस्यापि वाह्य हेतुर्वहिः फचित् ॥ २२४ ।। नैवमर्थाद्यत सर्व वस्त्वकिञ्चित्करं बहिः । तत्पदं फलवन्मोहादिच्छतोऽप्यान्तरं परम् ॥ २२५ ।। किं पुनर्गणिनस्तस्य सर्वतोनिच्छतो यहिः । धर्मादेशोपदेशादिस्वपद तत्फलं च यत् ।। २२६ ।। 401 . - सम्यग्दर्शनवर्णनम् । नास्यासिद्धं निरीहत्वं धर्मादेशादिकर्मणि 1 : न्यायादक्षार्थकांक्षाया ईहा नान्यत्र जातुचित् ॥ २२७ ।। ननुनेहांविनाकर्म, कर्मनेहां विना क्वचित् । तस्मान्नानीहितकर्म स्यादक्षार्थस्तु वा नवा ॥ २२८ ॥ , नैवं हेतोरतिव्याप्तेरारादाक्षीणमोहिषु । बन्धस्य नित्यतापत्तेर्भवेन्मुक्तेरसम्भवः ।। २२९ ॥ ततोऽस्त्यन्त कृतो भेदः शुद्धनांशांशतत्रिपु । निर्विशेषात्समस्त्वेप पक्षो माभूहिः कृतः ॥२३० । । किश्चास्ति यौगिकी रूढिः प्रसिद्धा परमागमे । विना साधुपदं न स्यात्केवलोपत्तिरजसा ॥ २३१ ॥ .. तत्राकूतमिदं सम्यक् साक्षात्सर्वार्थदार्शिनः । क्षणमस्ति स्वतः श्रेण्यामधिरूढस्य तत्पदम् ।। २३२ ॥ यतोऽवश्यं स सुरिर्वा पाठकः श्रेण्यनेहसि । कृत्स्नचिन्तानिरोधात्मलक्षणं ध्यानमाश्रयेत् ।। २३३ ।। ततः सिद्धमनायासात्तत्पद्रत्वं तयोरिह । नूनं वायोपयोगस्य नावकाशोस्ति तत्र यत् ॥ २३४ ॥ न पुनश्चरणं तत्र छेदोपस्थापना वरम् । प्रागादाय क्षणं पश्चात्सूरि. साधुपदं श्रयेत् ॥ २३५ ॥ उक्तं दिग्मात्रमत्रापि प्रसङ्गाद्गुरुलक्षणम् । शेषं विशेपतो ज्ञेयं तस्वरूपं जिनागमात् ।। २३६ ॥ धर्मो नीचपदादुचैः पदे धरति धार्मिकम् । तत्रांजवंजयो नाचः पदमुश्चैस्तदत्ययः । २३७ ॥ सम्यग्दृरज्ञप्तिचारित्रं धर्मो रत्नत्रयात्मकः । । तत्र सद्दर्शन मूलं हेतुरद्वतमेतयोः ॥ २३८ ॥ ततः सागाररूपो वा धर्मोऽनागार एव वा । सहा पुरस्सरो धर्मो न धर्मस्ताद्विना कचित् ।। २३९ ।। १ दिवत् इति पारः 'ख' पुस्तके पश्चाध्याय्याश्च । २ संसारः । ३ संसारना:- मोक्ष. ।
साटीसंहितायां- । रूढितोधियपुर्वाचां किया धर्मः शुभावहा ! तत्रानुकूलरूपा या मनोवृत्तिः सहानया ।। २४०।। सा द्विधा स च सागारानागाराणां विशेषतः। .' यत. क्रियाविशेपत्वाचूनं धर्मो विशेषतः ॥ २४१॥ तत्र हिंसानृतस्तेयाब्रह्मकरस्नपरिग्रहात् । देशतो विरतिः प्रोक्तं गृहस्थानामणुप्रतम् ॥ २४२ ।। यतेर्मूलगुणाश्चाष्टाविंशतिर्मूलवत्तरोः । नात्राप्यन्यतरणोना नातिरिक्ता कदाचन ॥ २४३ ।। मरेव समस्तैश्च सिद्धं यावन्मुनिप्रतम् । न व्यस्तैर्व्यस्तमात्रं तु यावदंशत्रयादपि ॥ २४४ ।। उक्तंच। वंद समिर्दिदियरोधो लोचो आवसयमचेलमन्हाणं । खिदिसयणमदंतवणं ठिदिमायणमेयभत्तं च ॥ २४५।। ऐते मूलगुणाः प्रोक्ताः यतीनां जनशासने । लक्षाणां चतुरशीतिगुणाश्चोत्तरसंज्ञकाः ।। २४६ ।' ततः सागारधर्मोवाऽनगारो वा यथोदितः । प्राणिसंरक्षणं मूलमुभयत्राविशेषतः ।। २४७ ।। उक्तमस्ति क्रियारूपं व्यासाद्रतकदम्बकम् । सर्वसावद्ययोगस्य तदेकस्य निवृत्तये ॥ २४८ ॥' .. अर्थाजैनोपदेशोयमस्त्यादेशः स एव च । सर्वसावद्ययोगस्य निवृत्तिव्रतमुच्यते ।। २४९ ॥ सर्वहाब्देन तवान्तवहिवर्तिपदार्थतः । प्राणोच्छेदो हि सावध सैव हिंसा प्रकीर्तिता ॥ २५० ॥ योगस्तत्रोपयोगो वा वुद्धिपूर्व, स उच्यते । सूक्ष्मश्चाबुद्धिपूर्वो य. स स्मृतो योग इत्यपि ।। २५१ ॥ १ बतानि समितयः इद्रियनिरोधाः लोच. आवश्यकानि अचेलं अस्नानम् । क्षितिशयन स्थितभोजन एकभक्त च ।२ विस्तारान् । - , सम्यग्दर्शनवर्णनम् । तस्याभावो निवृत्तिः स्याद्वतं चादिति स्मृतिः । अंशात्सायंशतस्तत्सा सर्वतः सर्वतोपि तत् ।। २५२ ॥ सर्वतः सिद्धमेवैतद् व्रतं याचं दयाङ्गिपु । ब्रवमन्तः कपायाणां त्यागः सैवात्मनि क्रिया ।। २५३ ॥ लोकासंख्यातमात्रास्ते यावदागादयः स्फुटम् । हिंसायास्तत्परित्यागो व्रतं धर्मोऽथवा किल ॥ २५४ ॥ आत्मेतरागिणामङ्गरक्षणं यन्मत स्मृतौ । तत्परं स्वात्मरक्षायाः कृतेनातः परत्रतत् ।। २५५ ।। सत्सु रागादिभावपु वन्धः स्यात्कर्मणां वलात् । तत्पाकादात्मनो दुःसं तत्सिद्धः स्वात्मनो वधः ॥ २५६ ॥ ततः शुद्धोपयोगो यो मोहकर्मोदयादृते । चारित्रापरनामतव्रतं निश्चयतः परम् ।। २५८ ।। रूढ़े. शुभोपयोगोऽपि ख्यातश्चारित्रसंज्ञया। स्वार्थक्रियामकुर्वाणः सार्थनामा न निश्चयात् ।। २५९ ॥ किन्तु बन्धस्य हेतुः स्यादर्थात्तत्प्रत्यनीकवत् । नासौ वरं वरं यः स नापकारोपकारकन् ॥ २६० ॥ विरुद्धकार्यकारित्वं नास्यासिद्ध विचारसात् । वन्धस्यैकान्ततो हेतोः शुद्धादन्यत्र संभवात् ।। २६१ ।। नोरं प्रज्ञापराधत्वानिर्जराहेतुरंशतः । अस्ति नावन्धहेतुर्वा शुभो नाप्यशुभावहात् ॥ २६२ ।। कर्मादानक्रियारोधः स्वरूपाचरणं च यत् । धर्म शुद्धोपयोगः स्यात्सैप चारिनसंज्ञिकः ॥ २६३ ॥ उक्तंच चारित्तं सलु धम्मो धम्मो जो सो समोत्तिणिदिहो। मोहक्सोहविहीणो परिणामो अप्पणो हु समो ॥ २६४ ॥ १ न विचारणीयम् । १ लाटीसंहितार्या- । नूनं सद्दर्शनज्ञानचारित्रैमोक्षपद्धतिः । समस्तैरेव न व्यस्तैस्तक्ति चारित्रमात्रया ॥ २६५।। सत्यं सद्दर्शनं ज्ञानं चारित्रान्तर्गतं मिथः। त्रयाणामयिनाभावाद् रत्नप्रयमपण्डितम् ।। २६६ ॥ किन्च सदर्शनं हेतुः संबिमारित्रयोदयोः । सम्यग्यिशेपणस्योद्वा प्रन्यप्रजन्मनः ।। २६७ ॥ अर्थोयं सति सम्यक्त्वे ज्ञानचारित्रमत्र यत् ।। भूतपूर्व भवेत्सम्यक् सूते वा भूतपूर्वकम् ।। २६८ ।। शुद्धोपलन्धिशक्तिर्यालयिज्ञानाविशायिनी । सा भवेत्सति सम्यकवे शुद्धोभावोयवापि च ॥ २६९ ।। यत्पुनद्रव्यचारित्रं श्रुतज्ञानं विनापि । न तहानं न चारित्रमस्ति चेत्कर्मवन्धकन् ।। २७० ॥ सेपामन्यतमोद्देदो नालं दोपाय जातुचित् । मोक्षमार्गकसाध्यस्य साधकानां स्मृतेरपि ॥ २१॥ चन्धो मोक्षश्च ज्ञातव्यः समासा प्रश्नकोविदः । रागांशैर्वन्ध एव स्यानारागांशैः कदाचन ॥ २७२।। ।। उच। येनांशेन सुदृष्टिस्तेनांशेनास्य वन्धनं नास्ति । येनांशेन तु रागस्तनांशेनास्य वन्धनं भवति ।। २७३ ।।। येनांगेन तु ज्ञानं तेनांशेनास्य बन्धनं नास्ति । येनांशेन तु रागस्तेनांशेनास्य बन्धनं भवति ।। २७४ ।। येनांशेन चरित्रं तेनांशेनास्य वन्धनं नास्ति । येनांशेन तु रागस्तनांशेनास्य बन्धनं भवति ॥ २७५॥ उक्तो धर्मस्वरूपोपि प्रसङ्गात्मगतांशतः । कविलब्धावकाशस्तं विस्तराद्वा करिष्यति ॥ २७६ ॥ १ पूर्व भन उत्पन्न भतपूर्व सम्यक्त्वम् । २ मग्णात् । । संक्षेगन् । . T - सम्यग्दर्शनवर्णनम् । देवे गुरौ तथा धर्मे दृष्टिस्तत्त्वार्थदर्शिनी ।। ख्याताप्यमूढदृष्टिः स्यादन्यथा मूढदृष्टिता ॥ २७७ ।। सम्यक्त्वस्य गुणोप्येष नालं दोपाय लक्षितः । सम्यग्दृष्टिर्यतोवश्यं यथा स्यान्न तथेतरः ॥ २७८ ।। उपहणमत्रास्ति गुणः सम्यग्दगात्मनः। लक्षणादात्मशक्तीनामवश्यं हणादिह ।। २७९ ॥ आत्मशक्तरदौर्बल्यकरणं चापबृंहणम् । अर्थादृग्ज्ञप्तिचारित्रभावास्खलनं हि तत् ।। २८० ॥ जानन्नप्येप निःशेपात्पौरुपं नात्मदर्शने । तथापि यत्नवानत्र पौरुपं प्रेरयन्निव ॥ २८१ ॥ यद्वा शुद्धोपलब्धार्थमभ्यसेदपि तद्वहिः । सत्कियां काश्चिदप्यात्तत्साध्यानुपयोगिनाम् ॥ २८२ ॥ नायं शुद्धोपलब्धौ स्याप्टेशतोपि प्रमादयान् । निष्प्रमादतयात्मानपाददानः समादरात् ॥ २८३ ॥ रसेन्द्र सेवमानोपि काम्यपध्यं न पाचरेत् । आत्मनोनुल्लाघतामुज्झन्नोज्झन्मल्लापतामपि ।। २८४ । यद्वा सिद्ध विनायासात्स्यतस्तत्रोपहणम् । उर्ध्वमूदवं गुणश्रेणी निर्जरायाः सुसम्भवात् ।। २८५ ॥ अवश्य भाविनी तत्र निर्जरा कृस्नकर्मणाम् । प्रतिसूक्ष्मक्षणं यावदसंख्येयगुणक्रमात् ।। २८६ ॥ न्यायादायातमेतद्वै यावतांशेन तल्लिती। वृद्धिः शुन्दोपयोगस्य वृद्धिवृद्धिः पुनः पुनः ॥ २८७ ॥ यथा यया विशुद्धिः स्याबृद्धिरन्तःप्रकाशिनी। तथा तथा हपीकानामुपेक्षा विपयेष्वपि ॥ २८८॥ ततो भूम्नि क्रियाकाण्डे नात्मशक्ति म लोपयेत् । किन्तु संयर्द्धयन्नूनं यत्नादपि प रष्टिमान् ॥ २८९ ।। १ अकक्षाधिस्यम् । ३ परियारो । ३ लाटीसंहितायां- -- . उपहणमामापि गुणः सद्दर्शनस्य यः । .. गणितो गणनामध्ये गुणानां नागुणाय च ॥ २९० ॥ : सुस्थितीकरण नाम गुणः सद्दर्शनस्य यः । धर्माच्च्युतस्य धर्मे तन्नाधर्मे धर्मिण: अतेः ॥ २९१ ॥ न प्रमाणीकृतं वृद्धधर्मायाधर्मसेवनम् । भाविधर्माशया केचिन्मन्दाः सावद्यवादिनः ॥ २९२ ॥ परंपरेति पक्षस्य नावकाशोऽत्र लेशतः । मूर्खादन्यत्र को मोहात्शीतार्थी वन्हिमाविशेत् ॥ २९३ ॥ नैतद्धर्मस्य प्रागरूपं प्रागधर्मस्य सेवनम् ।' ध्यातेरपक्षधर्मत्वाद्धेतोर्वा व्यभिचारतः ॥ २९४ ॥. प्रतिसूक्ष्मक्षणं यावद्धतोः कर्मोद्यात्स्वतः। . धर्मो वा स्यादधर्मो वाऽप्येप सर्वत्र निश्चयः ॥ २९५ ॥ तस्थितीकरण द्वेधा साक्षात्स्वपरभेदतः । स्वात्मनः स्वात्मतत्वेर्थात् परतत्त्वे परस्थ तत् ॥१२९६ ॥. तत्र मोहोदयोद्रेकाच्च्युतस्यात्मस्थितेश्चितः । भूयः संस्थापनं स्वस्य स्थितीकरणमात्मनि ॥ २९७, अयं भावः क्वचिदेवाद्दर्शनारस पत्तत्यधः । व्रजत्यूवं पुनर्दैवात्सम्यगारुह्य दर्शनम् ॥ २९८ ॥ अथ क्वचिद्यथाहेतोर्दर्शनादपतन्नपि । भावशुद्धिमधोधोंशैर्गच्छत्यूदल स रोहति ॥ २९९ ।। क्वचिद्वहि शुभाचारं स्वीकृतं चापि मुञ्चति । .1 न मुश्चति कदाचिद्वै.मुक्त्वा वा पुनराचरेत् ॥ ३०० ॥ । यदा वहि क्रियाचारे यथावस्थं स्थितेपि च । कदाचिद्धीयमानोऽन्तर्भावैर्भूत्वा च वर्तते ॥ ३०१ ।। नासम्भवमिदं यस्माचारित्रावरणोदयः । अस्ति तरतमस्वांशैः गच्छनिम्नोन्नतामिह ।। ३०२ ।। A . , सम्यग्दर्शनवर्णनम् । अत्राभिप्रेतमेवैतत् स्वस्थितीकरणं स्वतः । न्यायात्कुतश्चिापि हेतुस्तत्रानवस्थितिः ॥ ३०३ ॥ सुस्थितीकरण नाम परेपां सदनुमंहात् । भ्रष्टानां स्वपदात्तत्र स्थापनं तत्पदे पुनः ।। ३०४ ॥ धर्मादेशोपदेशाभ्यां कर्तव्योऽनुग्रहः परे । नात्मवृत्तं विहायाशु तत्परः पररक्षणे ॥ ३०५ ॥ उक्तंच। *आदहिदं कादव्य जइ सक्षह पर हिंदं च कादव्यं । आदहिदपरहिदादो आदहिदं सुद्छुकादव्यं ॥ ३०६ ॥ उक्तं दिग्मावतोप्यत्र मुस्थितीकरणं गुणः । निर्जरायां गुणश्रेणी प्रसिद्धः मुगात्मनः ॥ ३०७ ।। वात्सल्यं नाम दासत्वं सिद्धार्हद्रिम्बवेश्ममु । संघे पतुर्विधे शाम्ने स्वामिकार्य सुभृत्यवत् ॥ ३०८।। अर्थादन्यतमस्योगद्दिष्टेषु मुदृष्टिमान । सत्सु घोरोपसर्गेपु तत्परः स्यात्तदत्यये ॥ ३०९ ॥ यद्वा न हात्मसामध्यं यावन्मंगासिकोशकम् । ताबददृष्टुं च श्रोतुंचताधां सहते न सः ।। ३१० ॥ तद्विधाऽय च वात्सल्यं भेदात्स्वपरगोचरान । प्रधानं स्वात्मसम्बन्धिगुणो यावत्परात्मनि ।। ३११ ॥ परीपदोपसर्गायः पीडितस्यापि कस्यचिन् । न शैथिल्य शुभापारे शाने ध्याने तदादिमम् ॥ ३१२ ॥ इतरत्यागिहाण्यातं गुणो रष्टिमतः स्फुटम् । शुद्ध यानवलादेव सतो याधापकर्पणम् ॥ ३१३ ॥ • आत्महितं कर्तव्यं यथा नाति पर हितं घ कर्तव्यम् । आत्महितपरहिताम्यामात्महितं सुप्तुकर्तव्यम् ॥ १ आत्मोपदेशान् । २ करपाइंटिम्पादः।
साटीसंहितायां- V . 1 प्रभावनागसंशोस्ति गुणः सद्दर्शनस्य थे। उत्कर्षकरणं नाम लक्षणादपि लक्षितम् ॥ ३१४ ॥ अर्थात्तद्धर्मणः पक्षे नावद्यस्य मनागपि । धर्मपभक्षतेयस्मादधर्मोत्कर्षरोपणात् ।। ३१५ ॥ पूर्ववत्सोपि वैविध्यः स्वान्यात्मभेदतः पुनः तत्रायो परमादेयः स्यादादेयोऽपरोप्यतः ॥ ३१६॥ उत्कर्षो यद्वलाधिक्यादधिकीकरणं युपे । असत्सु प्रत्यनीकेषु नालं दोपायतत्त्वचिन् ॥ ३१७ ॥ मोहारातिश्तेः शुद्धः शुद्धाशुद्धतरस्ततः । जीयः शुद्धतमः कश्चिदस्तीत्यात्मनभावना ।। ३१८॥ नायं स्यात्पौरुपायत्तः किन्तु नून स्वभावतः। अर्ध्वमूर्ध्वं गुणश्रेणौ यतः शुद्धियथोत्तरा ॥ ३१९ ॥ बाहप्रभावनाङ्गोस्त विद्यामन्त्रासिभिले: तपोदानादिभिर्जनधर्मोत्कर्पो विधीयताम् ॥ ३२० । परेपामपकाय मिथ्यात्वोत्कर्पशालिनाम् । चमरकारकर किश्चित्तद्विधेयं महात्मभिः ।। ३२१ ।। उक्त प्रभावनागोपि गुणः सद्दर्शनस्य वै। येन सम्पूर्णतां याति दर्शनत्य गुणाष्टकम् ॥ ३२२ ॥ . " इति श्रीस्याद्वादानवद्यगद्यपद्यविद्याविशारद विद्वन्मगिराजमहल विरचितायां श्रावकाचारापरनाम लाटीसंहितार्या साधुश्री दूदात्मन फामन मनःसरोजारविन्दविकाशनक- मार्तण्डमण्डलायमानायामप्टासम्यादर्शन- ' वर्णनो नाम चतुर्थ. सर्गः। 7 . . -- जैनशत्रु ।
प्रथमाणुव्रतवर्णनम् । ७७. अर्थ पञ्चमः सर्गः। अष्टाङ्गदर्शनं सम्यग्भूयादः श्रेयसे दृढम् । साधु दूदात्मजोदामधर्मारामैकफामन ॥ १ ॥ इत्याशीषीदा। शुद्धदर्शनिकोहान्तो भावैः सातिशयः क्षमी। ऋजुर्जितेन्द्रियो धारो प्रतमादातुमर्हति ॥ १॥ शरीरभवभोगभ्यो विरक्तो दोपदर्शनात् । अक्षातीतसुखैपी यः स स्यान्नूनं प्रताईतः ॥ २ ॥ न स्यादणुव्रता) यो मिध्यान्धतमसा ततः । लोलुपो लोलचक्षुश्च वाचालो निर्दयः कुधीः ॥ ३ ॥ मूढोमूढो सच (?) प्रायो जामन्मू»परिग्रहः । दुर्विनीतो दुराराध्यो निर्विवेकी समत्सरः ।। ४ ।। निन्दकश्च विनास्वार्थ देवशास्त्रेवसूयकः । उद्धतोऽवर्णयादी चं यावदूकोप्यकारणे ॥५॥ आततायी क्षणादन्यो भोगाकांक्षी प्रतच्छलात् । सुखाशयो धनाशश्च बहुमानी च कोपतः ॥ ६ ॥ मायावी लोभपात्रश्च हास्यायुद्रेकलक्षितः । क्षणादुष्णः क्षणाच्छीतः क्षणाद्भीरुः क्षणाद्रटः ।।७।। इत्याद्यनेकदोपाणामारपदः स्वपदस्थितः । इच्छन्नपि प्रतादीश्च नाधिकारी स निश्चयात् ॥ ८॥ न निपिद्धोऽथवा सोऽपि निर्दम्भश्चेदावोन्मुसः । मृदुमतिभॊगाकांक्षी स्याञ्चिकित्स्यो न पञ्चकः ॥ ९॥ अर्याकालादिसंलग्यो लम्पसद्दर्शनान्वितः । देशतः सर्वतश्चापि प्रती तत्त्वविदिप्यते ॥१०॥ १व्यारः। २ समत्सरः।
. लाटीसंहितायां- विनाप्यनेहसो लब्धेः कुर्वन्नपि प्रतक्रियाम् ।। हठादात्मवलाद्वापि तंमन्योऽस्तु का क्षतिः ।। ११ ॥ किश्चात्मनो यथाशक्ति तथेच्छन्वा प्रतिक्रियाम् ।' करकोपि प्राणिरक्षार्थ कुर्वन्नायन वारितः॥ १२॥ द्रव्यमानक्रियारूदो मावरितो यहच्छतः । सल्पभोगं फलं तस्यास्तन्माहाल्यादिहाश्नुते ॥ १३ ॥ निर्देशोयं यथोकायाः क्रियायाः प्रतिपालनात् । छद्मनाऽथ प्रमादाद्वा नायं तस्याश्च साधकाः ।। १४ ।। अमध्यो भन्यमानो वा मिध्यादृष्टिरपि क्वचित् । । देशतः सर्वतो वापि गृह्णाति च व्रतक्रियाम् ॥ १५ ॥ हेतुश्चारित्रमोहस्य कर्मणो रसलाघवात । शुखलेश्यावलात्कश्चिदाश्तं व्रतमाचरेत् ।। १६ ।। यथास्य व्रतमादाय यथोक्तं प्रतिपालयेत्। सानुरागः क्रियामात्रमतिचारविवर्जितम् ॥ १७ ॥ एकादशाङ्गपाठोपि तस्य स्याद् द्रव्यरूपतः । आत्मानुभूतिशून्यत्वाद्भावतः संविदुझितः॥ १८॥ न वाच्यं पाठमात्रत्वमस्ति तस्येह नार्थतः ।। यतस्तस्योपदेशाद्वै ज्ञानं विंदन्ति केचन ॥ १९॥ . . ततः पाठोस्ति तेपूचेः पाठस्याप्यस्ति ज्ञातृता । ज्ञातृत्तायां च श्रद्धानं प्रतीतीरोचन क्रिया ।। २० ।। अर्थात्तत्र यथार्थत्वमित्याशवयं न कोविदः । जीवाजीवास्तिकायानां यथार्थत्वं न सम्भवात् ॥ २१ ॥ किन्तु कश्चिद्विशेपोस्ति प्रत्यभानगोचरः । येन तज्ज्ञानमात्रेपि तस्याज्ञान हि वस्तुतः ॥ २२॥ : तत्रोलेसोस्ति विख्यात. परिक्षादिक्षमापि यः। न स्याचुदानुभूतिः सा तत्र मिध्यादशि स्फुटम् ।।२३।। १ः कोऽपि - - 3 F ॥
प्रथमाणुव्रतवर्णनम् । अस्तु सूत्रानुसारेण स्वसंविदविरोधिना। -परिक्षायाः सहत्वेन हेतोर्वलवतापि च ॥ २४ ॥ , दृश्यते पाठमात्रत्वाद् ज्ञानस्यानुभवस्य च । विशेपोध्यक्षको यस्मादृष्टान्तादपि संमतः ॥ २५ ॥ यथा चिकित्सकः कश्चित्परागगतवेदनाम् । परोपदेशवाक्याद्वा जानन्नानुभवत्यपि ॥ २६ ॥ तथा सूत्रार्थवाक्यार्थात् जाननाप्यात्मलक्षणः । नास्वादयतिमिध्यात्वकर्मणोरसपाकतः ।। २७ ।। सिद्धमेतायताप्येतनमिध्यादृष्टेः क्रियावतः । एकादशाङ्गपाठेपि ज्ञानेप्यज्ञानमेवतत् ॥ २८ ॥ नचाशङ्कय क्रियामात्रे नानुरागोऽस्य लेशतः । रागस्य हेतुसिद्धत्वाद्विशुद्धस्तत्र सम्भवात् ॥ २९ ॥ - सूत्राद्विशुद्धस्थानानि सन्ति मिध्यादृशि क्वचित् । हेतोश्चारित्रमोहस्य रसपाकस्य लाघयात् ।। ३० ॥ ततो विशुद्धिसंसिद्धरन्यन्यानुपपत्तितः । मिथ्यादृष्टेरवश्यं स्यात्सद्बतेप्वनुरागिता ।। ३१ ॥ ततः क्रियानुरागण क्रियामात्राच्छुभानवात् । सव्रतस्य प्रभावारस्यादस्यप्रैवेयकं सुसम् ।। ३२ ॥ किन्तु कश्चिदिशेपोस्ति जिनदृष्टो यथागमात् । क्रियावानपि येनायमचारित्री प्रमाणितः ॥ ३३ ॥ सम्यग्दृष्टेस्तु तत्सर्व यथाणुव्रतपञ्चकम् । महाव्रतं तपश्चापि श्रेयसे चामृताय च ॥ ३४ ॥ । अस्ति या द्वादशागादिपाठस्तम्ज्ञानमित्यपि । सम्यग्ज्ञानं तदेवैकं मोक्षाय च दृगात्मनः ।। ३५ ॥ एवं सम्यक् परिज्ञाय श्रद्धाय श्रावकोत्तमैः । सम्पदमिहामुत्र कर्तव्यो प्रसंग्रहः ॥ ३६ ।।
८० टाटीसंहितायां- सम्यग्दृशाऽथ मिथ्यात्वशालिनाप्यथशक्तितः। अमव्येनापि भव्येन कर्तव्यं प्रतमुत्तमम् ।। ३७ ॥ यत: पुण्यक्रिया साध्वी कापि नास्तीह निष्फला। यथापात्रं यथायोग्य स्वर्गभोगादिसल्फा ।। ३८॥ पारंपर्येण केपांचिदपवर्गाय सत्किया। पञ्चानुत्तरविमाने मुदे वेयकादिपु ॥ ३९ ॥ केपांचित्कल्पवासादिश्रेयसे सागरावधि । भावनादित्रयेपूधः सुधापानाय जायते ॥ ४०॥ मानुपाणां च केपाश्चित्तीर्यकरपदाप्तये । धक्रित्वार्याचक्रित्वपदसंप्राप्तिहेतवे ॥४१॥ उत्तमभोगभूपूरैः सुखं कल्पतरूद्भवम् । एतत्सर्वमहं मन्ये श्रेयसः फलितं महत् ।। ४२॥ सत्कुले जन्म दीर्घायुर्वपुर्गाद निरामयम् । गृहे सम्पदपर्यन्ता पुण्यस्यैतत्फलं विदुः॥४३॥ साध्वी भार्या कुलोत्पन्ना भर्तुम्छन्दानुगामिनी। सूनवः पितुराज्ञायाः मनागलिनाशयाः ॥ १४ ॥ सधर्मभातृवर्गाश्च सानुकूलाः मुसंहताः। स्निग्धाश्चानुचरा यावदेतत्पुण्यफलं जगुः ॥ ४५ ॥ जैनधर्म प्रतीतिश्च संयमे शुभमावना । ज्ञानशक्तिश्च सूत्रार्थे गुरवश्वोपदेशकाः ।। ४६ ।। सर्मिणः सहायाश्च स्पष्टाक्षरं वारपाठवम् । सौष्ठवं चक्षुरादीनां मनीपा प्रतिभान्विता ॥४७॥ मुयशः सर्वलोकेस्मिन् शरदिन्दुसमप्रभम् । शासनं स्यादनुलंध्यं पुण्यमाजां न संशयः ॥ ४॥ विजय स्यादरियंसात्प्रतापस्तच्छिरोनदिः। दण्डारर्पोऽप्यरिभ्यश्च सर्व सत्पुण्यपाकतः।। ४९ ॥ "स' पुलके " मिानेगु इत्यपिः।
८१ प्रथमाणुव्रतवर्णनम् । चरित्वं सन्नृपत्यं वा नदि पुण्याहते कचित् । अकस्मादवलालाभो धनलाभोप्यचिन्तनात् ॥ ५० ॥ ऐश्वयं च महत्त्वं च सौहादं सर्वमान्यता। पुण्यं विना न कस्यापि विद्याविज्ञानकौशलम् ।। ५१ ॥ अथ किं वहुनोक्तेन त्रैलोक्येपि च यत्सुसम् । पुण्यायत्तं हि तत्सर्व किश्चित्पुण्यं विना नहि ॥ ५२ ॥ तत्प्रसीदाधुना प्राज्ञ ! मद्वचः श्रृणु फामन । सर्वामयविनाशाय पिव पुण्यरसायनम् ।। ५३ ।। प्रोवाच फामनो नाना श्रावकः सर्वशास्त्रवित् । पुण्यहेतौ परिज्ञाते तत्कर्तुमपि चोत्सहेन् ।। ५४ ॥ श्रृणु श्रावक : पुण्य कारणं वच्मि साम्प्रतम् । देशतो विरतिर्नान्नाशुव्रतं सर्वतो महत् ।। ५५ ॥ ननु विरतिशब्दोपि साकांक्षो व्रतवाचकः । केभ्यश्च कियन्मात्रेभ्यः कतिभ्यः सा वदाद्य नः ।। ५६ ॥ हिंसायाः विरतिः प्रोक्ता तथा चानृत्यमापगात् । चौर्याद्विरतिःख्याता स्यादब्रह्मपरिग्रहात् ।। ५७ ।। एभ्यो देशको विरतियिोग्यमणुव्रतम् । सर्वतो विरति म मुनियोग्यं महानतम् ॥ ५८ ॥ ननु हिंसात्वं किं नाम का नाम विरतिस्ततः । किं देशत्वं यथाम्नायाब्रूहि मे वदतां घर ।। ५९ ॥ हिंसा प्रमत्तयोगाद्वै यत्प्राणव्यपरोपणम् । सक्षणाल्लक्षिता सूत्र लभदाः पूर्वसूरिभिः ॥ ६ ॥ प्राणाः पञ्चेन्द्रियाणीह वाग्मनोद्गबलत्रयम् । निःश्वासोच्छाससंज्ञः स्यादायुरेकं दशेति च ॥ ६१ ॥ पुण्याधीनम् ।
ट्राटीसंहितायां- उक्तंच! - पंचवि इंदिय पाणा मण धयकायेण तिण्णिवल पाणा। आणपाणप्पाणा आउगपाण हुंति दह पाणा ।। .. एकाक्षे तत्र चत्वारो द्वीन्द्रियेषु पहेय ते । ध्यक्ष सप्त चतुराक्षे विद्यन्तेष्टो यथागमान् ।। ६२ ।। नवासंझिनि पश्चाक्षे प्राणा: संज्ञिनि ते दश । मत्त्वेति किल सद्मस्थैः कर्तव्यं प्राणरक्षणम् ।। ६३ ।। अत्रैकाक्षादिजीवाः स्युः प्राणशब्दोपलक्षणात् । । प्राणादिमत्त्वं जीवस्य नेतरस्य कदाचन ॥ ६४॥ प्रसङ्गादत्र दिग्मानं वाच्य प्राणिनि कायकम् । तत्स्वरूपं परिज्ञाय तद्रक्षा कर्तुमईति ।। ६५ ।। सन्ति जीवसमासास्ते संक्षेपाय चतुर्दश । छ्यासादसंख्यभेदाश्च सन्सनन्ताव भावतः ।। ६६ ।। तत्र जीवो महीकायः सूक्ष्मः स्थूलश्च स विधा। पर्याप्तापर्याप्तकाभ्यां भेदाभ्यां स द्विधाथवा ।। ६७ ।। प्रत्येकं तस्य भेदाः स्युश्चत्वारोपि च तद्यथा । शुद्ध भू भूमिजीवश्च भूकायो भूमिकायिकः ॥ ६८॥ शुद्धा प्राणोज्झिता भूमिर्यथा स्याहग्धमृत्तिका । भूजीयोऽद्यैव भूमौ यो द्रागेष्यति गत्यन्तरात् ।। ६९ ॥ । मूरेव यस्य कायोस्ति यद्वानन्यगतिर्भुवः ।, भूशरीरस्तदात्वस्य सभूकाय इत्युच्यत ॥ ७० ॥ भूकायिकस्तु भूमिस्थोऽन्यगतौ गन्तुमुसुकः । न्स समुद्घातावस्थायां भूकायिक इति स्मृतः ।। ७१ ॥ १पश्चअपि इन्द्रियप्राणाः मनोवत्र कायेन प्रयम्बलपाणाः । आनाणप्राणा आयु पपाणेन भवन्ति दश प्राणाः ।
प्रथमाणुव्रतवर्णनम् । एवमनिजलादीनां भेदाश्चत्वार एव ते । 'प्रत्येकं चापि ज्ञातव्याः सर्वज्ञाज्ञानतिक्रमात् ॥ ७२ ।। सूक्ष्मकर्मोदयाजाताः सूक्ष्मा जीवा इतीरिताः । सन्त्यघातिशरीरास्ते वनानलजलादिभिः ।। ७३ ।। उक्तं च। .णहि जेसि पडिखलणं पुढवीताराहि अग्गिवाराहिं । ते टुति सुहमकाया इयरे पुण थूलकाया य ॥२॥ स्थूलकर्मोदयाजाताः स्थूला जीयाः स्वलक्षणात् । सन्ति घातिशरीरास्ते वानलजलादिभिः ॥ ७४ ॥ उक्तंच। घादिसरीरा थूला अघादिसरीरा हवे सुहमा । किश्च स्थूलशरीरास्ते क्वचिच क्वचिदाश्रिताः । -सूक्ष्मकायास्तु सर्वत्र त्रैलोक्ये घृतवद्घटे ॥ ७५ ॥ उक्तंच। आधारधरा पढमा सव्वत्थ णिरंतरा सुहमा ।। प्रत्येकं ते द्विधा प्रोक्ताः केवलज्ञानलोचनैः। पर्याप्तकाश्वापर्याप्तास्तेषां लक्षणमुच्यते ।। ७६ ॥ पर्याप्तको यथा कश्चिदैवाद्गत्यन्तराच्च्युतः । अन्यतमां गतिं प्राप्य गृहीतुं वपुरुत्सुकः ॥ ७७ ।। उदयात्पर्याप्तकस्य कर्मणो हेतुमुत्तरात् । सम्पूर्ण वपुरादत्ते निष्पत्यूहतयासुमान् ॥ ७८ ॥ अपर्याप्तकजीवस्तु नाश्नुते वपुःपूर्णताम् । अपर्याप्तकसंज्ञस्य तद्विपक्षस्य पाकतः ॥ ७९ ।। -! अष्टादशैकभागेस्मिन् श्वासस्यैकस्य मात्रया । आयुरस्य जघन्यं स्यादुत्कृष्टं तावदेव हि ॥ ८॥ १ पुढवी पुदवीकाओ पुढचीकाइयय पुढविजीयो य । साहारणोपमुक्को सरीरगहिदो भवंतारिदो ।
८४ साठीसंहितायां- क्षुद्रभवायुरेतद्वा सर्वज्ञधन्यमागमात् । बदायुर्विशिष्ट्रान्ते जीवाश्चातीय दुःसिताः ॥ ८१ ।। उक्तचा . तिषिणसयाम्चीसाठायहिसहरसवार मरणाई । अंतोमुहुत्तकाल तावदिया चेव गुद्दमया ।। अत्रापर्याप्तशब्देन लभ्यपर्याप्तको मतः । अपर्यामजीवस्तु स्यात्पर्याप्रक एव हि ।। ८२॥ एवं ज्ञेयं जलादीनां लक्ष्म नो देशितं मया । प्रन्थगौरवभौता पुनरुक्तभयादपि ।। ८३ ।। किश्चिदम्पादिजीवानां चतुणां प्रोकलक्ष्मणाम् । धातुचतुष्कमेवेषां संज्ञास्याग्जिनशासनात् ।। ८४ ॥ अथ धातुचतुष्कागाः सम्भवन्त्यप्रविष्टिनाः । साधारणनिकोतारेस्तैर्वनस्पतिकायिकैः ।। ८५ ॥ उच। पुढची थाइचउण्डं तित्ययराहारंदवणिरयंगा। अपदिहिदा जिगोदै पदिहिदंगा हवे सेसा ॥ किन्तु धातुचतुष्कम्य पिण्डे सूत्र्यममात्रके। एकाक्षाः सन्त्यसंख्याता नानन्ता नापिसंख्यकाः॥८६॥ अयमर्थ पृथिव्यादिकाये पन्द्रो विधीयताम । तद्रयादिपरित्यागवृरमावेपि श्रावकैः ।। ८७ ॥ अनन्तानन्तजीवास्तु स्युर्वनस्पतिकायिकाः । पूर्ववत्तेपि मूक्ष्माश्च वादरावति भेदतः ।। ८८ ॥ पर्याप्तापर्याप्तकाश्च प्रत्येक चेति दे द्विधा । प्रत्येकाः साधारणाश्च विज्ञेया जैनशासनात् ॥ ८९ ।। सूक्ष्मवादरपर्याप्तापर्याप्तानां च रक्षणम् । ज्ञातव्य यमागत्रैव निर्दिष्टं नातिविस्तयत् ।। ९० ॥
प्रपनामनामनम् । गाधारणा निपानास मन्येपैकार्यवापका: । गुलपटपदोः समेटोपीय संगनोरिटः ॥ ११ ॥ रायगुन्या पादगः स्युः कपित्यारिम् । र प्रनिनिमा पिभियानामनिष्टिनाः ।।९।। पिता या प्रोमाः मागितो मूलधारयः । अनाधिता गरेभनीहयभागमादयः ॥ ९ ॥ नोमिन रेपि मन्यनन्ताय मामिनः । प्ररंगा निना नाना गयेपु मंतिताः ॥ ९५ ।। पुनःपा सप निगोगगरी जीवरायलमाणी दिस Male अनगुना मागविलीदवान। फारसेगा पायापपानः । गमा पाप गरभिः ॥ १५ ॥ imilarat Timri पपा । माधिपादनां मानां पक्षिम मानम ॥ ५६ ।। गगा गं मान्दिपादपः । पांमारना मनोहा मना ॥९॥ इमोटिमा मानपाभाटिया Train माया. 16॥ पता:PT irriginaनपा। iiiranu पनामा ॥१९॥ निम RAIN nirizilsनना। या गाAlaurent: ॥ Tiमोगा। eethrvatar 11 ॥ Narent FIREFirmit ram18|| लाटीसंहितायां- - व्यपरोपणं प्राणानां जीवाद्विश्लेषकारणम् । नाशकारणसामग्री सांनिध्यं वा बहिष्कृतम् ॥ १०३॥ अर्थात्तजीवद्रव्यस्य नाशो नैवात्र दृश्यते । किन्तु जीवस्य प्राणेभ्यो वियोगो व्यपरोपणम् ॥ १.४ ।। ननु प्राणवियोगोपि स्यादनित्यः प्रमाणसात् । यतः प्राणान्तरान प्राणी लभते नात्र संशयः ।। १०५॥ मैवं प्राणान्तरप्राप्ती पूर्वप्राणप्रपीडनात् । प्राणभृदु:समानाति निर्वाच्यं मारणान्तिकम् ।। १०६ ।। कर्मासात हि वनाति प्राणिनां प्राणपाडनात् । येन तेन न कर्तव्या प्राणिपीडा कदाचन ॥ १०७॥ ततो न्यायागतं चैतद्यद्यद्वाधाकरं चितः । कायेन मनसा वाचा तत्तत्सर्व परित्यजत ॥ १०८ ॥ तस्मात्त्वं मा वदासत्यं चौयं माचर पापकृत । माकुरु मैथुनं काञ्चिन्मूच्छा वत्स परित्यज ॥ १०९॥ यतः क्रियाभिरेताभिः प्राणिपीडा भवेद् धुवम् । प्राणिनां पीडयावश्यं बन्धः स्यात्पापकर्मणः ॥ ११०॥ तदेकामादिपश्चाक्षपर्यन्ते दु:समीरुणा । दातव्य निर्भयं दानं मूलं अवतरोरिव ॥ १११ ॥ नन्ववमार्यासमिती सावधानमुनावपि । अतिव्याप्तिर्भवेत्कालप्रेरितस्य मृतौ चितः ॥ ११२ ।। मैवं प्रमत्तयोगत्वाद्धेतोरध्यक्षजाप्रतः । तस्यामावान्मुनो तत्र नातिव्याप्तिमविष्यति ।। ११३ ।। एवं यत्रापि चान्यत्र मुनी वा गृहमेधिनि । नैव प्रमत्तयोगोलिन बन्धो बन्धहेतुकः।। ११४ ।। पानं। २ जीवस्य। - प्रयमाणुस्तयनम् । ८७ उकंचा मेरदुर जीय जीवो अयापाररस शिविदा दिसा। पपदरस नस्थिपंधी हिंसामिग विरदरम ।। गनु प्रमरायोगी पररयाम्यो देयः म पर । भागिपीटा भन्मा या सामधारोरगुदिनाम् ।। ११५॥ भेष ग्यासमपारोऽनिमपाय प्रागिरीदना । पिना प्रमपयोगात कामपामायते ।। ११६ ।। उतच. गयापिन निरगलं परिगुमिण मानिनाम् । मापनप गामि निरगं याति সামছুত মশাল নিমা। इनहिसिन रिमु कति aate | मिमंगाना नून स्यापा दिगादिका किया। বলা মাতসুপ্তাঘ নি । आगागादिरियागंपन भार प्रमानिनवापिमि॥११en HT मापारी समायो। मानहापिविधी या पानी ॥१९॥ ARIfver पापनामा I र मिनापन: ॥१२॥ Emmignामन । Fridian म गरम १२१॥ whinmarrier मामा पर shamam टाटीसंहितायां- देशशब्दोऽत्र स्थूलार्थे तथा भावाद्विवक्षितः । कारणास्थूलहिंसादेस्यागस्यैवान दर्शनान् ॥ १२३ ।। स्थूलत्वमार्दवं स्थूलत्रसरक्षादिगोचरम् । अतिचाराविनाभूतं सातिचारं च सास्रवम् ।। १२४॥ तद्यथा यो निवृत्तः स्याद्यावत्रसवधादिह । न निवृत्तस्तथा पंचस्थावरहिंसया गृही ॥ १२५ ॥ बिरताविरताख्यः स स्यादेकस्मिन्ननेहसि । लक्षणास्त्रसहिंसायास्त्यागेऽणुव्रतधारकः ।। १२६ ॥ उक्तंच. जो तसवहाउविरओ अविरओ तह थावर वहाओ। एकसमयम्हि जीयो घिरदाविरदो जिणेकमई।। अत्र तात्पर्यमेवैतत्सर्वारम्मेण भूयताम् । सकायबधाय स्याक्रिया त्याच्या हितावती ॥ १२७ ।। क्रियायां यत्र विख्यातनतकाचषको महान् । तो तां क्रियामवश्यं स सर्वामपि परित्यजेत् ॥ १२८ ।। अत्राप्यारावते कश्चिदात्मप्रज्ञापराधतः । कुर्यादिसां स्वकार्याय न कार्या स्थावरक्षतिः ॥ १२९॥ अयं तेपां विकल्पो यः स्याद्वा कपोलकल्पनान् । अर्थाभासस्य भ्रान्तेर्वा नैवं सूत्रार्थदर्शनान ॥ १३०॥ तद्यथा सिद्धमूत्रार्थे दर्शितं पूर्वसूरिभिः। तत्रार्थीयं विना कार्य न कार्या स्थावरक्षतिः ।। १३१ ।। एतत्सूत्र विशेषार्थेऽनयत्वावधानकै । नूनं ते स्पलित मोहात्सर्वसामान्यसङ्ग्रहात् ।। १३२ ।। किश्च कार्य विना, हिंसा न कुर्यादिविधीमता। इप्रेस्तुर्यगुणस्याने कृतार्थत्वाद्गात्मनः ।। १३३ ।। तदुक्कं गोम्मटसार सिद्धान्ते सिद्धसाधने । तत्सूत्रं च ययानायाप्रतीन्यै धमिसान्प्रतम् ।। १३४ ॥
अपमानार्गनम् । सम्माजीयो उप पययणं प मदददि । माद अमम्मायें अनागमागी गुगांगयोगा। अग्य पधारप प्रदतं पिप सुटम् । गायाष्टीयाफारत टीपा प्ररटीरः ॥ १३५ ।। शेका स्यारया पपा कमिमीयो यः सम्पष्टिमान । पदिष्ट प्रापनं जिनो भएपनि मः ॥ १३६ ।। परापहनादेप न पुपाचगदिंगनम् । पिना कार्य पारपारमामादिगुणान्वितः ॥ १३ ॥ एपमित्र विया पापित शिनागमे । गएपापों पर नियंदिनोऽपरः ।। १३८॥ গানন বিনা প্রম। माया पाकिया साम्पाम्पियापि ॥ ११९॥ मा जनानन्यमानरनिरप। मामासाना माना गया था ।। १४॥ भरोगापार पपिपलान्। नियमान रमणे पन १११॥ एवं मादी दोगुनारमा । आरिमामराण ॥१४॥ रिमनिनादिभारपाया। अमनोगापमापार पचास गाभार ४३॥ है प्रसाद न विस्माता शिविर ४॥ trisatilar Maitri jilentinue लाटीसंहितायां-- 1 * चम्यहं लक्षणं तस्य सावधानतया श्रृणु । क्षणं प्रमादमुत्सृज्य गर्हितावद्यकारणम् ॥ १४६ ॥ अणुत्वमल्पीकरणं तच गृद्धेरिहार्थतः 1 1 यथावद्यस्य हिंसादेहपीकविषयस्य च ॥१४७॥ कृष्यादयो महारम्भाः क्रूरकर्मार्जनक्षमाः ।.: । तक्रियानिरवो जीवः कुतो हिंसावकाशवान् ॥ १४८ ॥ नचाशङ्कयं हि कृष्यादिमहारम्भे क्रिया तु या। सस्वस्पीकरणं चार्थाद्धिसाणुव्रतमिष्यते ।। १४९।। यतः स्वल्पीकृतोप्यत्र महारम्भः प्रवर्तते ।। महावद्यस्य हेतृत्वात्तद्वान्नाणुवती भवेत् ॥१५० ॥ । अलं वा यहुनोक्तेन वावदूकतयाप्यलम् । असहिंसाक्रिया त्याच्या हिंसाणुव्रतधारिणा,॥ १५१ ॥ ननु त्यक्तुमशक्यस्य महारम्भानशेषतः।। इच्छतः स्वल्पीकरणं कृष्यादेस्तस्य का गतिः॥ १५२॥ अस्ति सम्यग्गतिस्तस्य साधु साधीयती जिनः।. कार्या पुण्यफलानाध्या क्रियामुत्रेह सौख्यदा ॥ १५३ ।। यथाशक्ति महारम्भात्स्वल्पीकरणमुत्तमम् । विलम्वो न क्षणं कार्यों नान कार्या विचारणा ॥१५४॥ १५॥ हेतुरस्त्यत्र पापस्य कर्मणः संवरोंशतः। न्यायागत: प्रवाहश्च न केनापि निवार्यते ॥ १५५ ।। साधितं फलवन्न्यायात्प्रमाणितं जिनागमात् । । । युक्तः स्वानुभवाचापि कर्तव्यं प्रकृतं महत ॥,१५६ ॥ तत्रागमो यथा सूत्रादाप्तवाक्यं प्रकीर्तितम् । पूर्वापराविरुद्धं यत्प्रत्यक्षाद्यैरवाधितम् ॥ १५७ ॥ उक्तं च। यथार्थदर्शिनः पुंसो यथादृष्टार्थवादिनः । उपदेशः परार्थो य. स इहागम उन्यते।। ३ , प्रपनायतनम् । आगमः स यया या दिमादेरपरपंगम । पमा लिायंगु नियनादेव रेयला ॥ १५८॥ यमत्र यया गावग्जीयनं प्रनिगलनम् । देवादपोरोपमर्गेपि ओ यामरगायधि ॥ १५९ ॥ पमापि हिविधी यः प्रपमः प्रनिरान्यितः । अन्य: मामान्यमानत्यागपष्ट नभयं यया ॥१६॥ বাধা মানা যাবে। পথশিগগিমামনুন ?? अपमामान लीपर मना । गायत्रीपनमप्यतरंगटोन (B) मन॥ १६॥ भारपट भिगिनं न परोम्पदम् । सनमा परियामि नमाम्यनारमा ॥ १६॥ नियमानहाय. गावापनापधि । মােফাহাম বাণ ।। मा पायापरपांगर ममाधिः । पायमान सन १६५ ।। उन पुनमा पुरा पुनपण। नरनाatru ॥ in rivinitiपंनिस्मयो। निमापनि यो मन आमा बिभिमागतार। nt IIT ToR PERetu fterfagainना।
साटीसहितायो- उक्तं सम्यक् परिमाय गृहस्थो तमाचरेत् । यथाशक्ति यथाकालं ययादेश यथावयः ।। १७० ॥ त्रसहिंसाक्रियात्यागो यदि कतुं न शक्यते । प्रतस्थानाप्रहेणालं दर्शनेनैव पूर्यताम् १७१ ॥ प्रवस्थानक्रियां फतुमशक्यापि यदीप्सति । व्रतमन्योपि संमोहाबताभासोस्नि न प्रती ।। १७२ ॥ अलं कोलाहलेनालं कर्तव्याः श्रेयसः क्रियाः। फलमेव हि साध्यं स्यात्सर्यारम्भेण धीमता ॥ १७३ ॥ वसहिंसाक्रियात्यागदाब्दः स्यादुपलक्षणम् । तेन भूकायिकादींश्च निःशद नोपमर्दयेत् ॥ १७ ॥ किन्तु चैकाक्षजीवेषु भूजलादिपु पञ्चम् । अहिंसावतसुद्धपयं कर्तव्यो यत्रो महान ।।५।। त्रसहिंसाक्रियात्यागी महारम्भं परित्यजेत् । नारकाणां गत्तेजिं नूनं तदुःसकारणम् ॥ १७६ ॥ उक्त च। मिच्छो हु महारंभो निस्सीलो तिब्बलोहसंजुत्तो । निरयाग णिवद्धद पावमयी रुद्दपरिणामो॥ पूरं कृप्यादिकं कर्म सर्वतोपि न कारयेत् । वाणिज्या विदेशेषु शकटादि न प्रेपयेत् ।। १७७ ।। ऋयविक्रयवाणिज्य क्रयेद्वस्तु प्रसोज्झितम् । विक्रयेद्वा तथा वस्तु नूनं सावधवर्जितम् ।। १७८ ।। वाणिज्यार्थ न कर्तव्योऽविकाले धान्यसंग्रहः । घृततैलगुहादीनां भाण्डागारं न कारयेत् ।। १७९ ।। लामालोटक्षणक्षारशस्त्रचर्मादिकर्मणाम् । हस्त्यश्वषादीनां चतुष्पदानां च यावताम् ।। १८०॥ द्विपदानां च वाणिज्यं न कुर्याद्ब्रतवानिह । महारम्भो भवत्येव पशुपाल्यादिकर्मणि ।। १८१ ।।
प्रपमाननयनम् । गुफपुरमाजारीकपिमिदनगादयः । --मरणीयाः म्यामित्य महाहिंसाफरा यतः ॥ १८२॥ इत्यादि यायन्त्यः क्रियाप्रमपचामिकाः । म म्यानमानां दि हिमाशुप्रतधारिभिः ।। १८३ ।। गर्षमागारधर्मेपु देशालोऽनुरतते । गनानगारयोग्यायाः कांध्याता अपि क्रियाः ।। १८४ ॥ पपा गमिमय: पत्र मन्ति निया गुमयः । अहिंसामा प्यारातापि : १८५॥ तस्यायंगणेषु पनत्रायमरे पथा। प्रतापीय फम्या भाषना पत्र पाए । १८६ ॥ तगू गया-"पत्यांचे भाषना पत्र पा" मारिदिगा- स्थागत ---" वाग्मनोगुमागांधामनिपामिरपालीफिनपान भोजनानि पप" নখাগামিমা: থম মাখনা এলাশ। म पुनभानीपाना देशमा प्रापारिभिः ॥ १८॥ पोसाको दिमामागुन । rai TREATRA भवे ॥१८॥ ril या भाषनामा । लिंगानुपादियम् ।। १८९ ।। पर पानि म पगः। मBATE RUrपानिपपरम ॥१५॥ अपामाशिल गरेपनन् । पमा यौन समाग umruनाम पनि। गाने artik १९॥ Mantra fote sexficirrjit १५ लाटीसंहितार्या- नैष्टिकोऽपि यदा क्रोधान्मोहाद्वा सङ्गरक्रियाम् । कुर्यात्तायतिकाले स भवेदारमत्रताच्युत्तः ॥ १९४ ॥ वसहिंसाक्रियायां या नापि व्यापारयन्मनः । मोहाद्वापि प्रमादाद्वा स्वामिकार्यकृतेऽपि वा।। १९५ ॥ वीतरागोकधर्मेषु हिंसावधं न वर्तते । द्विधर्मादिकार्येषु न कुर्यात्रसहिंसनम् ॥ १९६ ।। महिधर्मे निपिद्धा चेकामार्थयोस्तु का कया। मज्जन्ति द्विरदा यत्र मशास्तत्र कि पुनः॥ १९७॥ हपीकार्थादिदुर्थ्यानं यश्चनार्थ स नैष्ठिकः । चिन्तयेत्परमात्मानं स्वं शुद्धं चिन्मयं महः ।। १९८ ।। यद्वा पश्चपरमेष्टिस्वरूपं चिन्तयेन्मुहुः । यद्वा त्रैलोक्यसंस्थान जीयास्तद्वर्तिनोऽथवा ॥ १९९ ।। जगत्कायस्वभावौ वा चिन्तयेत्तन्मुहुर्मुहुः । द्वादशात्राप्यनुप्रेक्षाः धारयेन्मनसि ध्रुवम् ॥ २० ॥ यद्वा दृष्टिचरानत्र जिनविम्वांश्च चिन्तयेत् । मुनीन् देवालयांश्चापि तत्पूजादिविधीनपि । २०१ ।। इत्याद्यालम्बनौश्चित्ते भावयेद्भावशुद्धये ॥ न भावयेत्कदाचिद्वै प्रसहिंसा कियां प्रति ॥ २०२ ॥ उक्ता वाग्गुप्तिरत्रैव मनोगुप्तिस्तथैव च। अधुना कायगुप्तेश्च भेदान् गृह्णातिसूत्रवित् ॥ २०३॥ तर्यादाननिक्षेपभावना कायमश्रिताः। भावनीया. सदाचारराजवंजवविच्छिदे ॥ २०४ ॥ अत्रेयांवचनं यावद्धीपकरणं मतम् । तस्यादानं च निक्षेपःसमासात्तत्तथा स्मृतः ।। २०५ ।। अस्यार्थी मुनिसापेक्ष. पिच्छका च कमण्डलः। सरक्षात्रतापेक्ष पूजोपकरणानि च ॥ २०६ ।। - अपमागुननम् । ०५ पण्टापामादीपाम्मः परययनादिकान् । नानाप जलादी धोनपानादिकानपि ॥ २७ ॥ देशनापगरे मार दानफाटे गु भोजनम् । भासपादिक गुर फाले सामायिऽपि प ॥२८॥ ग्यापन भवानि धोरफरणानि । निष्पनादया सम कार्यों पत्नी पुधैर्यया ।। २०९ ॥ मां गायपिंगणारी पत्ननः प्रगिलाया । गमानपान वा प्यागारपरपरि ॥२१॥ rier गया विपि पया स्मृतः। या पानादिवंगुर मात्र तानि पिनिरिपेण ॥ २११॥ इम. ममिल पायन्स नामिपिरमरान । प्रत्यारोप नागाना: मंपनपिणा ॥२१॥ गंपायनापाम्य प्रताप रहमेधिनः । मपिना योग्य पुगताः मामि॥२१॥ पागमनिरनिया गामधिना। प्रोमो मायाम्नि मार्गोऽयं गमिगोपा ॥२१॥ ga mui पुर। निसमादी मिति १५॥ Foun विपि पिंपळगा। परगाने माणगान पर पाना। HTTARitrinter In PANER NE मा attramari iiriefriger पा९८॥ བཙཡཾཝtt {པfiར་ན། Kriti irriere at ६ लाटीमंहितायां- . वीरकर्म यथा तत्र पयवाद्यासनेन वा । कायोत्सर्गेण वा विष्ठेद्योगिवद्योगमार्गवित्त ।। २२० । यावत्तस्योपसर्गस्य निवृत्तिवा वपुःअतिः । पदावधियथाकालं नीत्वाऽस्तीतस्तता गतिः ॥ २२१ ।। सर्वारम्भेण तात्पर्य प्रत्यक्षात्रससफुले । मार्गे पादा न क्षेतच्या प्रतिनां मरणावधि ॥ २२२ ॥ किञ्च रजन्यां गमनं न कर्तव्यं दीप॑ध्वनि । दृष्टिचरे शुद्धे स्वल्पे न निषिद्धा मार्गेगतिः ॥ २२३ ॥ अश्वाचारोहणं मार्गे न कार्य व्रतधारिणा । यासमितिसंशुद्धिः कुतःस्यात्तत्र कर्मणि ॥ २२४ ॥ इतीर्यासमितिः प्रोक्ता संक्षपादप्रवधारिणः । यद्वीपासकाध्ययनात् ज्ञातव्यातीवविस्तरात् ।। २२५ ॥ अप्यस्ति भापासमितिः कर्तव्या सद्मवासिभिः । अवश्यं देशमानत्वात्सर्वथा मुनिकुञ्जरैः ।। २२६ ॥ वचो धर्माश्रितं वाच्यं वरं मौनमथाश्रयत् । हिंसाश्रितं न तद्वाच्य भाषासमितिरिष्यते ।। २२७ ॥ इतिसंक्षेपत्तस्तस्या रक्षणं चात्र सूचित्तम् । मृपात्यागवताख्याने वक्ष्यामीपत्सविस्तरात् ॥ २२८॥ एपणासमितिः कार्या श्रावकैर्धमवेदिभिः । यया सागारधर्मस्य स्थितिमुनित्रतस्य च ।। २२९ ।। यतो प्रतसमूहम्य शरीर मूलसाधनम् । आहारस्तस्य मूलं स्यादेपणासमितावसी ॥ २३०॥ एपणासमिति ना संक्षेपालक्षणादपि । आहारशुद्धिराख्याता सर्वप्रतविशुद्धये ॥ २३१ ॥ उत्तमांसाधतीचारैवर्जितो योऽशनादिकः। स एव शुद्धो नान्यस्तु मांसातीचारसंयुतः ।। २३२ ।।
प्रमागुमनार्गनन् । -- मापि शुसो याममं यथाकार यथाविधिः । अन्यया यमुनोऽपि पाशुदपदेनात् ॥ २३ ॥ काले पूपाक्षिक यापत्परतोसरावऽपि । यामपाले न भोम्यं निगाया पापि दुर्दिने ॥ २३४ ॥ पाममन भायं पामयुग्म म लंपयेत् । आहारापास्य पालो नौपादेशलाप पा॥२५॥ गममादिदिन हिंग पन्द्रमायुपपदं । भन्यायपोगेषु भोजनं भय कायेन ॥ २६ ॥ पिभिरवापि भीजपेमाभिदं । नमाऽप प्रारिपनन्गुममाभिने ।। २३७ ॥ जमनीपारितोपाना हिना रष्टिगांपर। अपादिम म्याने भाग्यं न आगुपिग ।। २३८ ॥ भनगाम मतपत्र प्रापमापारगीपराः । अपर पानीपान प्रमदिमानित ॥२९॥ नानापि मननि मानादपि । सपनामापरि सामानरास ॥४॥ TAIT मा मांग मागिरम् । andit माना हान भोरम् ॥२५॥ ཁ་ཙམtitstrif༣ntarit iཝན quakeirmiram १६ ॥ TERRA SE । wrmis पारित ॥१५॥ RuTI पाता। PratirgingR:५४॥ ,"serer terrainrarrrrian, लाटीसंहितायां- आमगोरससंपृक्तं द्विदलान्नं परित्यजेत् । लालायाःस्पर्शमात्रेण त्वरितं बहुमूर्च्छनात् ॥ २४५ ॥ भोग्यमध्यादशेषांश्च दृष्ट्वा उसकलेवरान् । यद्वा समूलतो रोम दृष्ट्वा सद्यो न भोजयेत् ।। २४६ ।। चर्मतोयादिसम्मिश्रात्सदोपमशनादिकम् । परिज्ञायेद्गितैः सूक्ष्मः कुर्यादाहारवर्जनम् ।। २४७ ।। श्रवणादिसकं शब्दं मारयामीति शब्दवत् । दग्धो मृतः स इत्यादि श्रुत्वा भोज्यं परित्यजेत् ।। २४८ ।। गोकाश्रितं वचः श्रुत्वा मोहाद्वा परिदेवनम् । दीनं भयानकं श्रुत्वा भोजनं त्वरितं त्यजेत् ।। २४९ ।। उपमानोपमेयाभ्यां तदिदं पिशिवादिवत् । मनःस्मरणमात्रत्वात्कृत्स्नमन्नादिकं त्यजेत् ।। २५०।। सूतकं पातकं चापि यथोक्तं जैनशासने । एपणाशुद्धिसिद्धयर्थ वजेयच्ड्रावकाप्रणीः ।। २५१ ।। एपणासमिति ख्याता संक्षेपात्सारसंग्रहात् । तत्रान्तराद्विशेषज्ञातव्यास्ति सुविस्तरात् ।। २५२ ।। अस्ति चादाननिक्षेपस्वरूपा समितिः स्फुटम् । वखाभरणपानादिनिसिलोपधिगोचराः ।। २५३ ।। यानन्त्युपकरणानि गृहकर्मोचितानि च । तेपामादानानि पो कर्तव्यो प्रतिलेख्य च ।। २५४ ।। प्रतिष्ठापननानी च विरयाता समितियथा । श्रवद्वपुर्दशद्वारा मलमूत्रादिगोचरा ।। २५५ ॥ निश्छिद्रं प्रासुकं स्थानं सर्वदोपविवर्जितम् । दृष्ट्वा प्रमाज्य सागारो वर्चामत्रादि निक्षिपेत् ॥ २५६ ॥ अस्ति चालोकितपानभोजनास्याय पञ्च ताः । भावना भावनीया स्यादहिंसातहेतवे ।। २५७ ॥
. प्रयनागुनपर्णनम् । शुद्ध गाभिनं पारि मिल मादिभोजनम् । मापपानना भूगो दृष्टिसंग भोग्यम् ।। २५८ ॥ নষণাযন বলাবধান। मपाएपरं पान्मत्या मोपं न भोजयेत् ॥ २५९ ।। एसपि मत गादि गुदमन्नादि निभिसम् । गपारि दोप एप स्याप्रमादादिएना महान ॥२६॥ मनि नयापाराः पा सूत्रपि सनिनाः । प्रमादिसारिन्लागलऽशुभनाइये ।। २६१ ।। मामूपा-पान्धवानिमारानामानिरापाः। पान मारने पष्टिकादिमिः । मामेष प्रतिपिशवारमानिनन पी ।।२६॥ पणना गोमहिपादिगपापयाजिनाम् । मम्मामानिनि पापान पुगत कादिभि६॥ पपी मvिi गागर गगनादिभिः । भा) मानान गंगापनमः ॥२४॥ मntion पामग्लाभिः मामागप्रविभव प्रतिमानिधी ॥१५॥ पा मारमा नाम । में नहा १९॥ भारम् । jit Ragfuity:॥ पार पसार नियन्। Firerrit नि:८॥ Reautaमार। HTTERailrave.१५॥ xrmiciमः । Forestrairmenu
लाटीसंहिनायां-
नराणां गोमहिप्यादितिरश्चां घा प्रमादतः ।
तृणाद्यन्नादिपातानां निरोधो व्रतदोपकृत् ।। २७१ ।।
बहुप्रलपितेनालं ज्ञेयं तात्पर्यमात्रतः ।
सा क्रिया नैव फतच्या यथा प्रसवधा भवेत् ।। २७२ ।।
इत्युक्तमात्रदिग्मात्रं सागाराईमणुननम् ।
त्रसहिंसापरित्यागलक्षणं विश्वसाक्षिभिः ।। २७३ ।।
इति श्रीस्याद्वादानवद्यगद्यपद्यविद्याविशारद विद्वन्मणिराजमल्ल.
विरचितायां श्रावकाचारापरनाम लाटीसंहितायां साधुश्री
दूदात्मज फामन मनःसरोजारविन्दविकाशनक-
मार्तण्डमण्डलायमानायां प्रसहिंसापरित्याग
प्रयमाणुवत वर्णनो नाम पञ्चमः सर्गः ।
अथ पष्ठः सर्गः।
त्रसहिंसापरित्यागंलक्षणं यदणुव्रतम् ।
साधुदूदागजोद्दामफामनाख्यं पुनातु तत् ॥ १॥
इत्याशीवांदः ।
अथमृपापरित्यागलक्षणं व्रतमुच्यते ।
सर्वतस्तन्मुनीनां स्यादेशतो वेश्मवासिनाम् ॥ १ ॥
ग्राह्या तत्रानुत्तिः सा प्राग्वदवापि धीधने ।
प्रोक्तमसदभिधानमनृतं सूत्रकारकः ॥ २॥
असदिति हिंसाकरमभिधानं स्याद्भापणम् ।
शब्दानामनेकार्थत्वाद्गतिश्चार्थानुसारिणी ॥ ३॥
नात्रासदिति शब्देन मृपामानं समस्यते ।
साकारमन्त्रभेदादी सूनृतत्वानुपगतः ॥ ४ ॥
देशतो विरतिस्तत्र सूत्रमित्यनुवर्तते ।
प्रसवाधार तस्मादचो वाच्यं न धीमता ॥५॥
সালথাগদান। गयमप्यमन्यतां याति पारिद्धिमानुपन्धतः । मनग्नन याय यया पोरादिदगंनम् ॥ ६ ॥ अमनं मत्यतो पानि पापिनीयम्य सामाग। अपना मया गाराम रोजीन पपाभ्यनि ॥७॥ गग्रामायणम्यागराधमाधमप याः। भापना: पहा मूगाण मापनो मताधिमिः ॥८॥ सत्यं गया वोरटोगमीरपदास्यत्याग्यानाम्यनुपौरिमापणं कोपरगान पणा पायं मनीषिभिः। गगभिरदिन पाहिलाय ॥९॥ पोधन गावाम मापदापन । २ पाप पगारे प्रोपपारणम ॥१०॥ पया पानामा मापा सोभसपप । गुलं पादापि সাল প ব ন গ াপি খা। गति समयभेदाः ॥10॥ पहाता या प्रमाण म पापो सभापनि ॥१५॥ minारपाला भी। गरिया Tamirmपिय॥१४॥ Hritीपा । Kutty EMERE १५॥ मनाया। पापमपाrimum
१०२
लाटीमहितायां-
अनासत्यपरित्यागवतेऽतीचारपश्चकम् ।
प्रामाणिक प्रसिद्ध स्यात्सूत्रेप्युक्तं महर्षिभिः ।। १७ ॥
तत्सूत्रं यथा-मिथ्योपदेशरहोभ्याख्यान फूटलेसक्रियान्यासाप
हारसाकारमन्त्रभेदाः ।
तत्र मिथ्योपदेशाख्यः परेषां प्रेरणं यथा ।
अहमेवं न वक्ष्यामि यद त्वं मम मन्मनात् ॥ १८॥
रहोभ्याख्यानमकान्ते गुहवाताप्रकाशनम् ।
परपां शवया किनिद्धतोरस्त्यत्र कारणम् ।। १९ ।।
फूटलेखक्रिया सा स्याद्वंचनाय लिपिम॒षा ।
सा न साक्षात्तथा तस्या मृपानाचारसम्भात् ॥ २०॥
किन्तु स्वल्पा यथा फश्चिस्किश्चित्प्रत्यूहनिस्पृहः ।
इ मदीयपत्रेषु मदर्थ न लिपीकृतम् ॥ २१ ॥
न्यासस्याप्यपहारो यो न्यासापहार उच्यते ।
सोपि परस्य सर्वस्वहरो नैव स्वरक्षणात् ॥ २२ ।।
कित कश्चिदाथा सार्यः कस्यचिद्धनिनो गृहे।
स्थापयित्वाधनादीनि स्वयं स्थानान्तरं गतः ॥ २३ ॥
वदत्येये स लोकानां पुररतादिह निन्यान् ।
धृतं न मे गृहे किशित्तेनाऽमाऽर्थेन गच्छता ॥ २४ ॥
उत्तो न्यासापहारः स प्रसिद्धोऽनर्थसूचकः ।
मृपात्यागातस्योरा दोप: स्यात्सर्वतोमहान् ॥ २५ ॥
साफारमन्त्रभेदोपि दोषोतीचारसंशकः ।
न मान्य कदाचित मेष्ठिरः पात्रकोसमः ॥ २६ ॥
दुलंश्यमय गुपं यत्परेषां मनमि स्थितम् ।
कचिदितिमात्या न प्रकाश्यं प्रताधिभिः ।। २७ ।।
ननु पे मदीयोऽयं प्रामो देशोऽपया नरः।
एप पनगरम पदत्यनन्मृपा पयः ॥ २८॥
अनुप्रतापसालसमकानम् । मेवं प्रमसयोगा स्मादित्यनुयतने । सग्गामापाप दापास्ति सदाय रोप एय हि॥२९॥ एवं मध्यपहाराय ग्यारसोपी नयारमफे। नाभि प स्थापनायां प द्रव्य मारे जगत्यये ॥३०॥ अस्ति नेपपरित्यागी प्रतं पाणु गथा महन् । समपंगापि त्याग:पिभ्यगम्भयात् ॥ ३१ ॥ वारमा पपा गो गई मूविशारदः। अदनादानं मग म्यानमः फष्याभुना ॥ ३॥ भदाय पदादानं पीमियुग्यो पुः । अपमामिहीला महम्प नेगरे पुनः ॥ २३ ॥ अन्यथा गडमिनिम्यातिः पद पर। अनगारे दुपारा विशालगोपुगदिषु ।। ३४ ।। गपंचमपपिपपदेशगमनापाम। पनी गागारिमा नपारिपरिपनन ॥ ३५ ॥ देशमपराग दिनो ग्राम। बसपा मादय मिल माधप ॥१६॥ Pापा भाषना पनि मन मुनिनाना भा.॥ ent -गागारिकोषिकापाग पपारामार- FEERAI पस wriry भागमा मुसा मगर । MRAryना ॥३॥ fota नाrnati CHER R॥ randum: EN} errfan || १०४ लाटीसंहितायां- . . स्वामित्वेन वसत्यादि परैः स्यादुपरन्धितम् । परोपरोधाकरणमाहुः सूत्रविशारदाः ॥४१॥ तत्स्वामिनमनापृच्छय स्थातव्यं न गृहिवतैः । स्थातव्यं च तमापृच्छय दीयमानं तदाज्ञया ॥ ४२ ।। भैक्ष्यशुद्धयविसंवादो भायनीयो व्रतार्थिना । सर्वतो मुनिनाथेन देशतो गृहमेधिना ।। ४३ ॥ नादेयं केनचिदत्तमन्येनातत्स्वामिना । तत्स्वामिनश्च प्रच्छन्नवृत्त्या तत्स्याददत्तवत् ।। ४४ ॥ आत्मधर्मः सधर्मी स्यादर्थाजैनो प्रतान्वितः ।। तेन कारापितं यावजिनचैत्यगृहादि यत् ॥ ४५ ॥ तत्रापि निवसेद्धीमान् क्षणं यावत्तदाशया। तदाज्ञामन्तरेणेह न स्थातव्यमुपेक्षया ।। ४६ ।। भावनापञ्चकं यावदन्नोक्तं चांशमात्रतः । स्वर्णाद्यपि च नादेयमदत्तं वसनादि वा ।। ४७ ॥ अत्रापि सन्त्यतीचारा' पञ्चेति सूत्रसम्मताः । त्याज्याःस्तेयपरित्यागवतसंशुद्धिहेतवे ॥ ४८॥ । उक्तं च-" स्तेनप्रयोग तदाहृतादान विरुद्धराज्यादिक्रम होना• धिकमानोन्मान प्रतिरूपक व्ययहाराः। परस्य प्रेरणं लोभारस्तेयं प्रति मनीषिणा । स्तेनप्रयोग इत्युक्तः स्तेयातीचारसंज्ञकः ।। ४९ ॥ अप्रेरितेन केनापि दस्युना स्वयमाहृतम् । गृह्यते धनधान्यादि तदाहृतादानं स्मृतम् ॥ ५० ॥ नादेयं दीयमानं वा पुण्यदानेन चापि तत् । रतेयत्यागवतस्यास्य स्वामिनात्महितैषिणा ।। ५१ ॥ राज्ञाज्ञापितमात्मेत्य युक्कं याऽयुक्तमेव तत् । क्रियते न यदा स स्याविरुद्धराज्यातिक्रमः ॥ ५२॥ - . - - अगुवचनुमाननम् । फनन्यान कदाचिरम प्रमनप्रवपारिणा । आसामगुप्र रोनामिरिहानपरंपरा ॥ ५५ ॥ प्रेर्नु मानाधिकं मानं पिक न्यूनमात्रम् । समाधिस्मानान्माननामातीपारगारः ॥ ५४॥ गवारगमन रणाग्यो मदन प्रतार्थिना। पापीमितानयादमुत्र दुगः ॥५१॥ निगमपंप महा यानागया। प्रकिनामा ग्यार प्यपदाग प्रमती॥५६॥ गयानाम्नदिप मापनमः। लापरतोरि गाधिपो मदान ॥ ५४॥ शानिपानि नोपानुगमम् । पर गिराय ग्यालरीरमुगाय ॥५०॥ पापं माप पन्तपदिनम् । RT परेप मा मुनिनायक ॥ १९ ।। मिमिनापारय निमः । मा परी मा मेयमेच्या गपंगा ॥६॥ REM यापनमापना। arminागिः ॥६॥ HT TI-पापमहानिjrg. मा TagmriNTERT. पत्र। cिhinापा विधानि Trird Remerginsen Finger गान irriti TREE arrer | THE HIRENikram लाटीसंहितायां- चक्षुर्गण्डाधरप्रीवास्तनोदरनितम्यकान् । पश्येत्तन्मनोहरागनिरीक्षणमत्यादरात् ।। ६४ ॥ न कर्तव्यं तदगानां भापणं वा निरीक्षणम् । कायेन मनसा वाचा प्रमाणुप्रतधारिणा ।। ६५ ।। रवं मोहोदयात्पूर्व सार्द्धमन्यागनादिमिः । तस्मरणमतीचारं पूर्वरतानुस्मरणम् ।। ६६ ॥ ब्रह्मचर्यग्रतस्यास्य दोपोयं सर्वतो महान् । त्याज्यो ब्रह्मपयोजांशुमालिना ब्रह्मचारिणा ।। ६७ ॥ वृपमन्नं यथा माषा:पयश्चेष्टरसः स्मृतः । वीर्यवृद्धिकरं चान्यत्त्याज्यमित्यादि प्रमणे ॥ ६८ ॥ स्नेहाभ्यङ्गादिस्नानानि माल्यं सृक चन्दनानि च । कुर्यादत्यर्थमानं चेद् ब्रह्मातीचारदोपळत् ।। ६९ ॥ स्वशरीरसंस्काराख्यो दोपोयं ब्रह्मचारिणः । सर्वतो मुनिना त्याज्यो देशतो गृहमेधिभिः ॥ ७० ॥ भावनाः पञ्चनिर्दिष्टाः सर्वतो मुनिगोचरा। तत्राशक्तिहस्थानां वर्जनीया स्वशक्तितः ॥ ७१ ॥ लक्ष्यन्तेऽत्राप्यतीचाराः ब्रह्मचर्यव्रतस्य ये। पश्चैवेति यथा सूचे सूक्ताः प्रत्यश्वादिभिः ।। ७२ ॥ उक्तं च-परवियाहकरणेत्वरिका परिगृहीतापरिगृहीवागमनानग-- कोडाफामतीग्राभिनिवेशाः । परविवाहकरणं दोषो ब्रह्मत्रतस्य यः। व्यको लोकप्रसिद्धत्वात्मुगमे प्रयासो पृथा । ७३ ।। थयं भाव. स्वसम्बन्धिपुत्रादींश्च विवाहयेत् । परवर्गविवाहांश्च कारयेनानुमोदयेत् ॥ ७४ ॥ इवरिका स्थात्पुंश्चली सा द्विधा प्राग्यथोदिता। काचिसरिगृहीसा स्यादपरिगृहीता परा ॥ ७५ ।।
१०७ अगुवनचतुवाशाउमानसर्गनन् । साम्पा मरागयागादियपुरषोऽयया रतम् । दापोऽमीपासंगऽपि प्रमपर्यस्य दानये ॥ ६ ॥ दोभानकोटायः म्यनादी शुयायिध्युतिः । पिनापि फामिनीमारिकपा या पुस्मिनोदिता ॥ ७ ॥ फामाताभिनिषको दोपानापारमशरः। दुपान्तपेदनाकान्नस्मरमाकापीrean s८ ॥ ना पारित गारो दुम्याग्या मानमा किया। प्रदीतरग मात्र पद का गतिः ॥७९॥ यो गरियास्ति : गो प्रमागिता । पपा पपंतिम सामनाना प्रभातक्रिया ॥ ८॥ प.प मामनिपापियतिम् । ,पानीपं मापारगंमभिमुगमदम् ॥ ८ ॥ দাখিলগার না। गरिमादिगाना याममा विनिमनि ॥ ८२॥ সাবা ননমাসংগে। नयामि पाहिमादिधान ॥ ४॥ Liri परिमानं परिषद। नारि गाgi ८४ ।। བit། ཝུ་པརྟན་དi ནiན་ अभारापापा मुनियमित गोदा ॥ ४५ ॥ नापि मम्। मानीimirma rishn८॥ अNिAIHITEM मानm rinaiगायि॥ माम। काया मानम् ॥ ८ ॥ -- ११० टाटीसंहितायां- पूर्वस्यां दिशि गच्छामि यावद्गद्गाम्बु केवलम् । तविपुपानेन न गच्छामि सचेतनः ॥ ११३॥ , एवं कृतप्रतिज्ञस्य संवरः पापकर्मणः । तददिः सर्वहिंसाया अभावात्तन्मुनेरिव ॥ ११४ ।। परिपाट्यानयोदीच्यां पश्चिमायां दिशि स्मृताः। मर्यादोद्धमघश्चापि दक्षिणस्यां विदिक्षु च ॥ ११५॥ तत्करणे महच्छ्यो हिंसा तृष्णाद्वयात्ययात् । करणीयं ततोऽवश्यं श्रावकैतधारिभिः ।। ११६ ॥ मन्ति तत्राप्यतीचाराः पञ्चेति सूत्रसाधिताः । सावधानतया त्याज्यास्तेपि वहातसिद्धये ।। ११७ ॥ तत्सूत्रं यथा-उध्यास्तिर्यग्व्यतिक्रम क्षेत्रवृद्धिस्मृत्यन्दरा नानि । उर्घात्रीघरारोहे भवेदू व्यतिक्रमः । अगायभूधरावशाद्विख्यातोऽधोव्यतिक्रमः॥ ११८॥ चिदिकोणदेशादौ क्षेत्रे दीर्घाध्ववर्तिनि । कारणागमनं लोमाद्भवेत्तियंग्यविक्रमः॥ ११९।। यथा सत्यमितः कोश शतं यावद्गतिर्मम । क्रोशा मालयदेशीया क्षेत्रवृद्धिश्च दूपणम् ।। १२० ।। स्मृतं स्मृत्यन्तराधान विस्मृतं च पुनः स्मृतम् । दूपणं दिग्विरतेः स्यादनिर्णीतमियत्तया ॥ १२१ ॥ प्रोचिता देशविरतिर्यावत्कालात्मवर्तिनी । तत्पर्यायाः क्षणं यामदिनमासर्नुयत्सरः ।। १२२ ।। तद्विपयो गतित्यागम्नथा चाशनपर्जनम् । मैथुनस्य परित्यागो या मौनादिधारणम् ॥ १२३ ॥ यथाच यदि गच्छामि प्राच्यामेवेति फेवलम् । कारणानापि गच्छामि शेषदिक्विनयेषशात् ॥ १२४ ।।
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ग १०८ टाटीसंहितायां- सत्रोत्सर्गों नृपर्यायस्थितिमानते धनम् । रक्षणीयं प्रतस्यैस्तस्त्याज्यं शेपमशेषतः ।। ८९ ।। अपवादस्तूपाचानां प्रतानां रक्षणं यथा । स्याद्वा न स्यानु नद्धानिः संख्यातव्यस्तयोपधिः ॥ ९॥ रक्षार्थ तदनतस्यापि भावना: पत्र सम्मताः । मावनीयाश्च ता नित्यं यथा सूपि लक्षिताः। ९१ ।। उत्सूत्रं यथा-मनोज्ञामनोजेन्द्रियविषय रागद्वेषवजनानि पञ्च । इन्द्रियाणि स्फुटं पन पञ्च तद्विषयाः स्मृताः । यथास्वं तत्परित्यागभावनाः पञ्च नामवः । ९२।। पञ्चस्वेषु मनोज्ञेषु मायना रागवर्जनम् । अमनोज्ञेषु तेपूर्भावना द्वेपवर्जनम् ।। ९३ ॥ अयमों यदीष्टार्थसंयोगोस्ति शुभोदयात् । तदा रागो न कर्तव्यो हिरण्याद्यपकर्पता ।। ९४ ।। अथानिष्टार्थसंयोगो दुर्दैवाजायते नृणाम् । सदा द्वेपो न कर्तव्यो धनसंख्यातेप्सिना ।। ९५ ॥ इष्टानिष्टादिशब्दार्थः सुगमत्वान्न लभितः । रागद्वेषौ प्रसिद्धौ स्तः प्रयासः मुगमे धृथा ।। ९६ ।। अत्रातीचारसंज्ञाः स्युः दोषाः संख्याग्रतस्य च । उदिता सूचकारेण स्याज्या प्रतविशुद्धये ।। ९७ ॥ उक्तं च-क्षेत्रवास्तुहिरण्यसुवर्णधनधान्यदासीदासकुप्यप्रमाणाति- क्रमाः। क्षेत्रं स्याद्वसतिस्थान धान्याधिष्ठानमेव वा । गवाद्यागारमात्र वा स्वीकृवं यावदारमना !! ९८॥ ततोऽतिरिक्त लोमान्मृछावृत्तिरविक्रमः । न कर्तव्यो प्रतस्थेन कुर्वतोपधितुच्छताम् ॥ ९९ ॥ १ त्याग.। . है
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११०
लाटीसंहितायां-
पूर्वस्यां दिशि गच्छामि यावद्गगाम्बु केवलम् ।
ताहियपुपानेन न गच्छामि सचेतनः ।। ११३॥
एवं कृतप्रविज्ञस्य संवरः पापकर्मणः ।
तदहिः सर्वहिंसाया अभावाचन्मुनेरिव ॥ ११४।।
परिपाट्यानयादीच्या पश्चिमायां दिशि स्मृताः।
मर्यादो मघश्चापि दक्षिणस्यां विदिक्षु च ॥ ११५ ॥
सत्करणे महच्छ्यो हिंसा तृष्णाद्वयात्ययात् ।
करणीयं ततोऽवश्यं श्रावकैतधारिभिः ॥ ११६ ॥
मन्ति तत्राप्यतीचारा पश्चेति सूत्रसाधिताः।
सावधानतया त्याज्यास्तपि तद्रतसिद्धये ॥ ११७॥
तत्सूत्रं यथा-ध्यास्तिर्यग्व्यतिक्रम क्षेत्रद्धिस्मृत्यन्तराधा-
नानि ।
उधैर्यात्रीधरारोहे भव_व्यतिक्रमः ।
अगाधभूधरावेशाद्विख्यातोऽधोव्यतिक्रमः ।। ११८ ।।
वचिद्दिकोणदेशादौ क्षेने दीर्याध्यवर्तिनि ।
कारणाद्गमनं लोमाद्भवेत्तिर्यग्व्यतिक्रमः ॥ ११९ ।।
यथा सत्यमित्तः भोग शतं यावदतिर्मम ।
फ्रोशा माटवदेशीया क्षेत्रवृद्धिश्च दूपणम् ।। १२० ॥
स्मृतं स्मृत्यन्तराधान विस्मृवं च पुनः स्मृतम् ।
दूपणं दिग्विरते. स्यादनिर्णीतमियत्तया ॥ १२१ ।।
प्रोचिता देशविरतिर्यायकालात्मवर्तिनी।
तत्पर्यायाः भणं यामदिनमामर्नुवत्सराः ॥ १२२ ॥
तद्विपयो गतित्यागसथा घाशनवर्जनम् ।
मैथुनस्य परित्यागी यहा मौनादिधारणम् ॥ १२३ ॥
यथाच यदि गच्यामि प्राच्यामेवेति केवलम् ।
कारणानापि गच्छामि शेषादिवित्रतयेवशात् ॥ १२४॥
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टाटीसंहितायां- on यथानाम विनोदाथं जलादि वनक्रीडनम् । कायेन मनसा वाचा तद्भदा वह्व. स्मृताः॥ १३८ ।। कृतकारितानुभननैत्रिकाल विषयं मनोवचःकायैः ।। परिहत्य कर्मसकलं परमं नैष्कर्म्यमवलम्बेत् ।। १३९ ।। दोपाः सूत्रोदिताः पञ्च सन्त्यतीचारसंज्ञकाः । अनर्थदण्डत्यागस्य प्रतस्यास्यापि दूषिकाः ॥ १४० ।। तत्सूत्रं यथा-कन्दपोत्कुच्यमौसर्यासमीक्ष्याधिकरणोपभोग- परिभोगानर्थक्यानि । अस्ति कन्दर्पनामापि दोष प्रोक्तवतस्य यः । रागोद्रेकात्महासादिमिश्रोवाग्योग इत्यपि ।। १४१ ।। दोप. कौत्कुच्यसंज्ञोस्ति दुष्टकायक्रियादियुक् । परागस्पर्शनं स्वाङ्गरदिन्याङ्गनादिपु ॥ १४२॥ मौसर्यदूपर्ण नाम रतप्रायं वचःशवम् ।। अतीच गहित धाष्टयोद्यद्वात्यथै प्रजल्पनम् ॥ १४३ ॥ असमीक्ष्याधिकरणमनल्पीकरणं हि यत् । अर्थात्स्वार्थमसमीक्ष्य वस्तुनोऽनवधानतः ॥ १४४ ॥ यथाहारकृते यावजलेनास्ति प्रयोजनम् ।.. नेतन्यं तावदेवात्र दूपणं चान्यथोदितम् ॥ १४५ ॥ . भुग्यते सहदेवान स्यादुपभोगसंज्ञकः । यथा सृश्चन्दनं माल्यमनपानापधादि वा ॥ १४६ ॥ परिभोगः समाख्यातो मुज्यते यत्पुनः पुनः । । यथा योपिदलंकारवनागारगजादिकम् ॥ १४७ ।। नर्थक्यं तयोरेव स्यादभिविनोद्वयोः । अनात्मोचितसंख्यायाः करणादपि दूषणम् ॥ १४८ ॥ यथा दीनश्च दुर्भाग्यो वस्तुसंख्यां चिकोर्षदि । गृहाम्यशाश्वतं यावन्न गृह्णामि ततेोधिकम् ॥ १४९॥ *.
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लाटीसंहितायां- T हेतुस्तेषां समुत्पत्ती काललब्धिः परं, स्वतः ॥ १६१ ।। :, इत्यादि जगत्सर्व स्वं चिन्तयेत्तन्मुहर्मुः।। नूनं मंवेगवैराग्यवर्द्धनाय महामतिः ।। १६२ ।। उक्तं च-जगत्कायस्वमावौ वा संवेगवैराग्यार्थम् । । । चिन्तनानन्तरं चेति चिन्तयेदात्मनो गतिम् । ।' कोहं कुतः सभायातः क यास्यामि जयादितः ॥ १६३॥ १. हेयं किं किमुपादेयं मम शुद्धचिदात्मनः।। कर्तव्यं किं मया त्याज्यमधुना जीवनावधि ॥ १६४ ।।। इति चिन्तयतस्तस्य संवेगो जायते गुणः । संसारभवभोगेभ्यो वैराग्यं चोपवृंहति ॥ १६५ ॥ ततः साघुसमाधिश्च सामायिकत्रतान्वितः ।। ततः सामायिकी क्रियां कुर्याद्वा शल्यर्जितः ॥ १६६ ॥ जिनेन्द्रगुणस्तोत्रं पठेत्पद्यादिलक्षणम् । सिद्धानामथ साधूनां कुर्यात्सोपि गुणस्तुतिम् ।। १६७१।। नतोईद्वारती स्तुत्वा जगच्छान्तिमधीय थ । क्षणं ध्यानस्थितो भूत्वा चिन्तयेच्छुद्धचिन्मयम् ॥ १६८ ॥ ततः सम्पूर्णतां नीत्वा ध्यान कालानविक्रामात् । संस्तुतानां यथाशक्ति तत्पूजां कर्तुमर्हति ॥ १६९ ॥ म्नानं कुर्यात्प्रयनेन संशुद्ध प्रामुकोटकैः । गृहयाद्धौतवमाणि दृष्टिपूतानि प्रायशः ॥ १७० ।। । ततः शनैः शनर्गत्वा स्वसद्मस्थाजिनालये। द्रव्याण्यष्टौ जलादीनि सम्यगादाय भाजने ॥ १७१ ॥ तमस्थान जिनविम्बांश्च सिद्धयन्त्रान् समर्चयेत् । दर्शनज्ञानचारित्रम्य स्थाप्य समर्चयेत् ।। १७२।। शेपानपि यथाशक्ति गुणानप्यर्चयेद्बती । अत्र संश्लेपमात्रत्वादुक्तमुल्लसतो मया ॥ १७३ ।। -
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Mom AAAM लाटीसंहितायां- तत्राद्धरात्रके पूजां न कुर्यादहतामपि । हिंसाहतोरवयं स्याद्रात्रौ पूजाविपर्जनम् ॥ १८ ॥ एवं प्रवर्तमानश्च सागारो व्रतवानिह । स्वर्गादिसम्पदो मुक्त्वा निर्वाणपदमाग्मवेत् ।। १८८ ॥ सामायिकग्रतस्यापि पञ्चातीचारसंतकाः । दोषाः सन्ति प्रसिद्धास्ते साज्या: सूबोदिता यया ! १८९ ।। तत्सूत्रं यथा-योगदुष्पणिधानानादरस्मृत्यनुपस्यानानि । सामायिकादितोन्यत्र मनोवृत्तिर्यदा भवेत् । मनोदुष्प्रणिधानाख्यो दोषोतीचारसंझकः ॥ १९० ॥ वाग्योगोपि तवोन्यत्र हुट्कारादिप्रवर्तत । वचोदुप्पणियानाप्यो दोपातीचारसंज्ञकः ॥ १९ ॥ काययोगस्तवोन्यत्र हस्तसंहादिदर्शने । वर्तते तदतीचारः कायदुष्पणिधानकः ।। १९२ ।। यदाऽऽटस्यतया मोहात्कारणाद्वा प्रमादतः । । अनुत्माहतया कुर्यात्तदाऽनादरदूपणम् ।। १९३ ॥ अस्ति स्मृत्यनुपस्थानं दूपगं प्रतस्य यत । न्यूनं वर्णः पदेर्वाक्यः पठ्यते यत्प्रमादतः ।। १९४ ॥ ग्यात सामायिक नाम प्रवं चाणुग्रतार्थिनाम् । अतीवारविनिमुक्तं भवेत्मसारविच्छिदे ।। १९५ ।। स्यात्प्रापोपवासान्यं प्रतं च परमौषधम् । जन्ममृत्युतरातवविध्वंसनविचरणम् ।। १९६ ।। - चतुर्दाशनसंन्यासो यायद्यामाश्च पादृश । स्थितिनिरपद्यस्याने प्रतं प्रोपयसनम्म् ॥ १९ ॥ कर्तव्यं तदवश्यं स्यात्सर्यण्यां प्रापघनतम् । अष्टम्यां च चतुर्दश्यां ययाशस्यपि चान्यदा ॥२९८।। धारणाहि त्रयोदश्यां मध्याहे तमोजनः ।
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लाटीसहितायां- . 1. । 1. R- . * अनैकाम्यं तदेव स्याल्लभणादपि लक्षणम् ॥ २११ प्रोपधोपवासस्यात्र लक्षणं कथितं मया । इत: संख्योपभोगस्य परिभोगस्य घोच्यते ॥ २१२॥ निर्दिष्टं लक्षणं पूर्व परिभोगोपभोगयोः । तयोः संख्या प्रकर्तव्या सागारव्रतधारिभिः ॥ २१३ ॥ सन्ति तत्राप्यतीचाराः पञ्च सूत्रोदिता बुधैः ।। परिहार्याः प्रयत्नेन श्रावकैर्धर्मवेदिभिः ॥ २१४॥ . तत्सूत्रं यथा-सचित्तसवन्धसन्मित्राभिषवदुःपकाहाराः। चिकीर्पन्नपि तत्संख्यां सचित्तं यो न मुञ्चति । दोप: सचित्तसंझौस्य भवेत्संख्यावतस्य सः ॥ २१५ ॥ तथाविधोपि यः कश्चिञ्चेतनाधिष्ठितं च यत् । वस्तुसंख्यामकुर्वाणो भवेत्सम्बन्धपणम् ॥ २१६ ।।... - मिश्रितं च सचित्तेन वस्तुजातं च वस्तुना । *स्वीकुर्वाणोप्यतीचारं सन्मिश्राख्यं च न त्यजेत् ॥ २१७ ।। आहारं स्निग्धप्राहिश्च ? दुर्जरं अंठराग्मिना । असंख्यातवतस्तस्य दोषो दुष्पकसंज्ञकः ।। २१८॥ उतातिचारनिर्युक्तं परिभोगोपभोगयोः । संख्यावतं गृहस्थानां श्रेयसे भवति ध्रुवम् ॥ २१९ ।। अतिथिसंविभागाख्यं प्रतमस्ति प्रतार्थिनाम । सर्वव्रतशिरोरत्नमिहामुत्र सुखप्रदम ॥ २२० ॥ ईपन्न्यूने च मध्याहे कुर्याद् द्वारावलोकनम् । दातुकामः सुपात्राय दानीयाय महात्मने ।। २२१ ॥ तत्पात्रं त्रिविधं ज्ञेयं तत्राप्युत्कृष्टमादिमम् । द्वितीयं मध्यमं शेयं नृतीयं तु जघन्यकम् ॥ २२२ ।। उक्तं च। उत्कृष्टपानमनगारमणुव्रताढ्यं । मध्य प्रतेन रहितं सुदृशं जपन्यम् । " । । अणुव्रतचतुष्याशीलसप्तकवर्णनम् । निर्दर्शनं व्रतनिकाययुतं फुपानं युग्मोज्झितं नरमपात्रमिदं हि विद्धि । एतेष्वन्यतमं प्राप्य दान देयं यथाविधि ) मासुकं शुद्धमाहारं विनयेन समन्वितम् ।। २२३ ।। पात्रालाभे यथाचित्ते पश्चात्तापपरो भवेत् । अधमे विफलं जन्म भूयोभूयश्च चिन्तयेत् ॥ २२४ ॥ कुपात्रायाप्यपात्राय दान देयं यथायथम् । केयलं तकृपादानं देयं पात्रधिया न हि ॥ २२५ ।। अस्ति सूमोदितं शुद्धं तमातीचारपश्चकम् । अतिथिसंविभागाख्यग्रतरक्षा परित्यजेत् ।। २२६ ॥ तत्सूत्र यथा-सचित्तनिक्षेपापिधानपरव्यपदेशमात्सर्यकाला. तिकमाः । सचित्ते पापनादौ निक्षेपोऽन्नादिषस्तुनः । दोरः सचित्तनिक्षेपो भवेदन्वर्थसंज्ञकः ॥ २२७ ॥ अपिधानमायरणं सचित्तेन कृतं यदि । स्यात्सचित्तापिधानाख्यं दूपणं प्रतधारिणः ।। २२८ ।। आस्माकीनं सुसिद्धानं त्वं प्रयच्छेति योजनम् । दोपः परोपदेशस्य करणाख्यो प्रतात्मनः ॥ २२९ ॥ प्रयच्छन्नच्छमन्नादि गर्वमुद्रहते यदि । दूपणं लभते सोपि महामात्सर्यसंगफम ।। २३०।। ईपन्न्यनार मध्यान्हादानकालादघोषया । उद्धं सद्भायनाइतोर्दोष: फालव्यतिक्रमः ॥ २३१ ॥ एतदपिपिनिर्मुकं पाने यो दानमुत्तमम् । अतिथिसंविभागारयमतं तस्य मुग्गतये ।। २३२ ।। यथात्मानमारण्यातं सम्यानतपतुष्टयम् । अस्ति सट्टेसना कार्या मदतो मारणान्तको ॥ २३३ ।। सोस्ति सहसनाकाला जीर्णे षयसि पायवा।
- १२० लाटीमंहितायां- - 1 T म दैवाखोरोपसर्गेऽपि रोगेऽसाध्यतरेऽपि च ।। २३४ ॥ क्रमेणाराधनाशास्त्रोक्तेन विधिना प्रती । वपुषश्च कपायाणां जयं कृत्वा तनुं त्यजेत् ॥ २३५॥ धन्यास्त वीरकर्माणो ज्ञानिनस्ते व्रतावहाः । येषां सल्लेखनामृत्युः निष्प्रत्यूहतया भवेत् ॥ २३६ ।। दोषाः सूत्रोदिताः पञ्च सन्त्यतीचारसंज्ञकाः । अन्त्यसल्लेखनायास्ते संत्याज्याः पारलौकिकैः ।। २३७ ।। तत्सूत्रं यथा-जीवितमरणाशंसा मित्रानुरागसुखानुपन्धनिदा- . नानि । 1 दुतम् । आदांसा जीविते मोहाद् यथेच्छेदपि जीवितम् । यदि जीव्ये वरं तावदोषोऽयं यत्समस्यते ॥ २३८ ।। आशंसा मरणे चापि यथेच्छेन्मरणं वरं मे मरणं तूर्णं मुक्तः स्यां दुःखसंकटात् ।। २३९ ।। दोपो मित्रानुरागाल्यो यन्नेच्छेन्मरणं कचित् । पुरस्तान्मित्रतो मृत्युवरं पश्चान्न मे घरम् ॥ २४० ॥' दोपः सुखानुबन्धाख्यो यथात्रास्मीह दुःसवान् । मृत्वापि व्रतमाहात्म्याद् भविष्येऽहं सुखो कचित् ।। २४१ ॥ दोषो निदानबन्धारन्यो यथेच्छेन्मरणं कुधीः । भवेयं व्रतमाहात्म्यादस्य घाताय तत्परः ।। २४२॥ यदि वा मरणं चेच्छेन्मोहोद्रेकारस मूढधीः । भवयं चोपकाराय मित्रस्यास्य प्रतादितः ।। २४३ ॥ यदिवा मरणं चेच्छेदशानाद्वा सुसाशयाः । भूयान्मे व्रतमाहास्यास्वर्गश्रीरद्विवादिनी ।। २४४ ॥ गतैर्दोपैर्निनिर्मुक्तमन्त्यसलेसनावतम् । स्वर्गापवर्गसौख्यानां सुधापानाय जायते ॥ २४५ ।।
सामायिकादि प्रतिमावर्णनम् ।
१२१
उक्ता सल्लेखनोपेता द्वादशशतमावनाः ।
"एताभितप्रतिमा पूर्णतां याति मुस्थिता ॥ २४६ ॥
इति श्रीस्याद्वादानवधगद्यपद्यविद्याविशारद विद्वन्मणिराजमल्ल
विरचितायां श्रावकाचारापरनाम लाटीसंहितायांसाधुश्री
दूदात्मज फामन मनःसरोजारविन्दविकाशनक-
मार्तण्डमण्डलायमानायां मृपात्यागादिलक्ष-
णाणुव्रतचतुष्क गुणव्रतत्रिक शिक्षाप्रत
चतुपय प्रतिमा प्रतिपादकः पठःसर्गः ।
अथ सप्तमः सर्गः।
द्वादशव्रतरूपं यद् व्रतं सद्गृहमेधिनाम् ।
साधुदूदागजोद्वारभूयाद्वो नामफामनः ॥ १ ॥
इत्याशीवादः।
द्वादशग्रतशुद्धस्य विशुद्धश्चातिशायिनः ।
युक्तमुत्कृष्टाचरणमिच्छतस्तत्पदं मुदे ।। १॥
स्यात्सामायिकप्रतिमा नाम्ना चाप्यस्तिसंख्यया ।
नृतीया प्रतरूपा स्यात्कर्तव्या वेश्मशालिभिः ॥२॥
ग्रतानां द्वादशं पात्र प्रतिपाल्यं ययोदितम् ।
विशेषादपि कर्तव्यं मम्यक् सामायिक प्रतम् ॥ ३ ॥
ननु प्रतप्रतिमायामेतत्सामायिकग्रतम् ।
तदेवात्र तृतीयायां प्रतिमायां तु किं पुनः ॥ ४॥
मत्य किन्तु विशेपोस्ति प्रसिद्धः परमागमे ।
मातिचारं तु सत्र स्यादनातीचारवियर्जितम् ॥ ५॥
किन सत्र निकालस्य नियमो नास्ति देहिनाम् ।
अत्र निकालनियमो मुनेमूलगुणादिवत् ॥ ६ ॥
१२२
लाटीसंहितायां-
तत्र हेतुवशात्कापि कुर्यात्यांप्रया कचित् ।
सातिचारमतत्वाद्वा तथापि न प्रतभतिः ॥७॥ ।
अनावश्यं त्रिकालेपि कार्य सामायिक जगन् ।
अन्यथा प्रतहानिः स्यादतीचारस्य का कया ॥८॥
अन्यत्राप्ययमित्यादि यायदेकादशस्थितिः ।
प्रतान्येव विशिष्यन्ते नार्थावान्तर फचिन् ।९॥
शोभतेऽतीव संस्कारात् साक्षादाकरजो मणिः ।
संस्कृतानि प्रतान्येव निर्जराहेतवस्तथा ॥१०॥
स्यात्प्रोषधोपवासाख्या चतुर्थी प्रतिमा शुमा ।
कर्तव्या निर्जराहतुः संवरस्यापि कारणम् ॥११॥
अस्त्यत्रापि समाधान वेदितव्यं तदुक्तवत् ।।
सातिचारं च तत्र स्यादवावीचारवर्जितम् ।। १२ ।।
द्वादशग्रतमध्येपि विद्यते प्रोप, प्रतम् ।
तदेवात्र समाख्यानं विशेषस्तु विवक्षितः॥ १३ ॥
अवश्यमपि कर्तव्यं चतुर्यप्रतिमात्रतम् ।
कर्मकाननकोटीनामस्ति दावानलोपमम् ॥ १४॥
पञ्चमी प्रतिमा चास्ति प्रतं सागारिणामिह ।
तत्सचित्रपरित्यागलक्षणं भक्ष्यगोचरम् ।। १५ ।।
इत:पूर्व कदाचिद्वै सचित्त घस्तु भक्षयेत् ।
इतः परं स नास्नुयात्सचित्तं तजलाधपि ॥१६॥
भक्षणेऽत्र सचित्तस्य नियमो न तु स्पर्शने ।
तत्स्वहस्तादिना कृत्वा प्रासुकं चात्र भोजयेत् ॥ १७॥
रात्रिभक्तपरित्यागलक्षणा प्रतिमास्ति सा ।
विरयाता संख्यया षष्ठी समस्यश्रावकोचिता ।। १८॥
इतःपूर्व कदाचिद्वा पयःपानादि स्थाग्निशि।
इत. परं परित्यागः सर्वथा पयसोपि तत् ॥ १९॥
सामादिकादिप्रतिमावर्णनम् ।
१२३
यद्वा विद्यते नात्र गन्धमाल्यादिलेपनम् ।
नापि रोगोपशान्त्यर्थ तैलाभ्यगादि कर्मतत् ॥ २० ॥
किच रात्रौ यथा भुक्कं वर्जनीय हि सर्वदा ।
दिवा योषिद्मतं चापि पष्ठस्थानं परित्यजेत् ।। २१ ॥
अस्ति तस्यापि जन्मार्द्ध ब्रह्मचर्याधिवासितम् ।
तदद्धसर्वसन्याससनाथं फलवन्महत् ॥ २२ ॥
नहि कालकलैकापि काचित्तस्यास्ति निष्फला ।
मन्ये साधुः स एवारित कृती सोपीह युद्धिमान् ॥ २३ ॥
सप्तमी प्रतिमा चास्ति ब्रह्मचर्याह्वया पुनः ।
यत्रात्मयोपितश्चापि त्यागो निःशल्यचेतसः ।। २४ ।।
कायेन मनसा वाचा त्रिकालं यनितारतम् ।
छतानुमननं चापि कारितं तत्र पर्जयेत् ॥ २५ ॥
अस्ति हेतुवशादेप गृहस्थो मुनिरर्थतः ।
ब्रह्मचर्यत्रतं यस्माद् दुर्धरं प्रतसन्तती ॥ २६ ॥
हेतुस्तत्रास्ति विख्यातः प्रत्याख्यानावृतेर्यथा ।
विपाकात्कर्मणः सोपि नेतुं नाईति तत्पदम् ॥ २७ ।।
उदयात्कर्मणो नाग्न्यं कर्तुनालमयं जनः ।
क्षुत्पिपासादि दुःरी च सोढुं न क्षमते यतः ॥ २८॥
ततोऽशक्य. गृहत्यागः समन्येयात्र तिष्टते ।
वैराग्यस्य परां काटामधिरूढः म शुद्धधीः ॥ २९ ॥
इतः प्रभृति सर्वेपि यायदेकादशस्थितिः ।
इयतस्त्रावृताश्चापि विशेया मुनिसमिमाः ॥ ३०॥
अष्टमी प्रतिमा साथ प्रोवाच यदतां वरः।
सर्वतो देशतश्चापि यप्रारम्भस्य पर्जनम् ॥ ३ ॥
इतः पूर्वमतीचारो विद्यते यपकर्मणः ।
सचित्तरपनत्वामी स्वहस्तेनाम्भसा यया ॥ ३२॥
१२४ लाटीसहितायां.in है 1 . - इतः प्रभृति यद्व्यं सचित्तं सलिलादिवत् । न पर्शति स्वहस्तेन वह्वारम्भस्य का कथा ।। ३३ ।। तिष्ठेत्स्ववन्धुवर्गाणां मध्येप्यन्यतमाश्रितः । सिद्धं भन्न्यादि भुञ्जीत यथालन्धं मुनिर्यथा ॥ ३४॥ कापि केनावहूतस्य बन्धुनाथसधर्मिणा । तद्हे भुञ्जमानस्य न दोपो न गुणः पुनः ॥ ३५ ॥ १ किश्चार्य सप्रस्वामित्वे वर्तते व्रतवानपि । अर्वागादशमस्थानान्नापरामपरायणः ॥ ३६ ॥ प्रक्षालन च वस्त्राणां प्रासुकेन जलादिना । कुर्याद्वा स्वस्य हस्ताभ्यां कारयेद्वा सर्मिणा ॥ ३७॥ बहुप्रलपितेनालमात्मार्थ वा परात्मने । ...: यत्रारम्भस्य लेशोस्ति न कुर्यात्तामपिक्रियाम् || ३८।। । नवमं प्रतिमास्थानं व्रतं चास्ति गृहाश्रये। यत्र स्वर्णादिद्रव्यस्य सर्वतस्त्यजनं स्मृतम् ॥ ३९ ॥ इत' पूर्व सुवर्णादिसंख्यामात्रापकर्पणः । इतप्रभृतिवित्तस्य मूलादुन्मूलनं प्रतम् ॥ ४०॥ अस्त्यात्मैकशरीरार्थ वसवेश्मादि स्वीकृतम् । धर्मसाधनमात्रं वा शेपं निःशेषणीयताम ।। ४१ ।। स्यात्पुरस्तादितो यावत्स्वामित्व समयोपिताम् । तत्सर्व सर्वतस्त्याज्यं निशल्यं जीवनावधि ॥ ४२ ।। शेषो विधिस्तु सर्वोपि ज्ञातव्यः परमागमात् । सानुवृत्त व्रते यावत्सर्वत्रवैप निश्चयः ॥ ४३ ॥ प्रतं दशमस्थानस्थमननुमननाहयम् । यत्राहारादिनिष्पत्तौ देया नानुमतिः कचित् ।। ४४ ॥ आदेशोनुमतिश्वाशा सैवं कुर्वितिलक्षणा। "ता स्वत्तः कृतेनादौ प्रशंसानुमतिः स्मृता ॥ ४५ ॥ 2
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१२६ लाटीसंहितायां- - . सूक्ष्मं चापि न गृह्णीयादीपत्सावद्यकारणम् ॥ ५७ ॥ कोपीनोपधिमात्रत्वाद् विना वाचंयमिक्रिया। विद्यते चलकस्यास्य दुर्द्धरं व्रतधारणम् ।। ५८ ॥ तिष्ठेचैत्यालये संघे वने वा मुनिसन्निधौ । निरवद्ये यथास्थाने शुद्धे शून्यमठादिषु ।। ५९ ।। पूर्वोदितकमेणैव कृतकर्मावधावनात् । - ईपन्मध्याह्नकाले वै भोजनार्थमटेत्पुरे ॥ ६ ॥ ईर्यासमितिसंशुद्ध पर्यटेद्गृहसंख्यया । द्वाभ्यां पात्रस्थानीयाभ्यां हस्ताभ्यां परमभुयान् ॥ ६१ ॥ दद्याद्धर्मोपदेशं च निर्व्याजं मुक्तिसाधनम् । तपो द्वादधा कुर्यात्प्रायश्चित्तादि वाचरेत् ॥ २॥ क्षुल्लक: कोमलाचारः शिसासूत्राङ्कितो भवेत् । एकवलं सकौपीतं वस्त्रपिच्छकमण्डलुम् ।। ६३ ।। भिक्षापात्रं च गृह्णीयात्कास्यं यद्वाप्ययोमयम् । एपणादोषनिर्मुक्त भिक्षाभोजनमेकशः ॥ ६४ ॥ और श्मश्रुशिरोलोनां शेपं पूर्ववदाचरेत् । अतीचारे समुत्पन्ने प्रायश्चित्तं समाचरेत ॥ ६५ ॥ यथा निर्दिष्टकाले स भोजनार्थ च पर्यटेत् । पात्रे भिक्षा समादाय पश्चागारदिहालिवत् ।। ६६ ॥ तत्राप्यन्यतमे गेहे दृष्ट्वा प्रामुकमम्युकम् । श्रणं चातिथिभागाय संप्रेक्ष्यावं च भोजयेत् ॥ ६७ ॥ दैवासात्रं समासाद्य दद्यादानं गृहस्थवत् । तच्छेपं यत्स्वयं भुक्ते नोचत्कुर्यादुपोपितम् ।। ६८॥ किञ्च गन्धादिद्रयाणामुपलब्धौ सधर्मिभिः । अहद्विम्पादिमाधूनां पूजा कार्या मुदात्मना ।। ६९ ॥ किश्चात साधका केचित्केचिद्गूढाइयाः पुनः ।
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१ .१२८ लाटीसंहितायां- प्रायो दोपेऽप्यतीचार गुरो सम्यनिवेदिते । उद्दिष्टं तेन कर्तव्ये प्रायश्चित्त तपः स्मृतम् ।। ८२ ॥ गुर्वादीनां यथाप्येयामभ्युत्थानं च गौरवम् । क्रियते चात्मसामाद्विनयाख्यं तपः स्मृतम् ॥ ८३ तपोधनानां देवाद्वा ग्लानित्वं समुपेयुपाम् । यथाशक्ति प्रतीकाये वयावृत्यः स उच्यते ॥ ८४ ।। . नैरन्तर्येण यः पाठः क्रियते सूरिसन्निधौ । यद्वा सामायिकी पाठः स्वाध्यायः स स्मृतो बुधैः ।। ८५ । । शरीरादिममत्वस्य त्यागो यो ज्ञानदृष्टिभिः । तपःसज्ञ सुविख्यातो कायोत्सर्गो महभिः ॥ ८६ ॥ कृत्स्नचिन्तानिरोधेन पुंसःशुद्धस्य चिन्तनम् । एकाग्रलक्षणं ध्यानं तदुक्त परमं तपः ॥ ८७ ॥ एवमित्यादिदिग्मानं पोढा चाभ्यन्तरं तपः। निर्दिष्टं कृपयाऽस्माभिर्देशतो व्रतधारिणाम् ॥ ८८ ॥ अक्षरमात्रपदस्वरहीनं व्यञ्जनसन्धिविवर्जितरेफम् । साधुभिरत्र मम क्षमितव्यं को न विमुह्यति शाखसमुद्रे ॥ ८९ ॥ 1 । * इति श्रीस्याद्वादानवद्यगद्यपद्यविधाविशारद विद्वन्माणराजमल- विरचितायां श्रावकाचारापरनाम लाटीसंहितायां साधु- श्रीदात्मजफामनमन सरोजारविन्दविकाशनमार्त. ण्डमण्डलायमानायां सामायिकपतिमायेकादश- प्रतिमापर्यन्तवर्णन नाम सप्तमः सर्गः।
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लाटीसंहितायां- M नाना तत्रादिमा मेघी द्वितीया नाम रूपिणी । रत्नगर्भा धरित्रीव तृतीया नाम देविला ॥११॥ योपितो देविलास्यायाः पुंसो भारूसमाहयात् । चत्वारस्तत्समाः पुत्राः समुत्पन्नाः क्रमादिह ।। १२॥ तत्रादिमः मुवो दो द्वितीयः ठुकरादयः । तृतीयो जगसी नाना तिलोकोऽभवतुर्यफः ॥ १३॥ दूदामार्या फुलांगासी नाम्ना ख्याता उवारही। तयोः पुत्रालयः साक्षादुत्पन्नाः कुलदीपकाः ॥ १४ ॥ आद्यो न्योता द्वितीयस्तु भोल्हा नानाथ फामनः । न्योता संघाधिनायस्व द्वे भार्ये शुद्धवंशजे ॥ १५॥ आधा नाना हि पाही गौराही द्वितीया मता। पद्माहीयोषितस्तत्र न्योतसंघाधिनायतः ॥१६॥ पुत्रश्च देईदासः स्यादेकोपि लक्षायते । गौराहीयोपितः पुनाश्चत्वारो मदनोपमाः ।।१७।। न्योतासंघाधिनाथस्य खवंशावनिचक्रिणः । तत्राद्योगजो गोपा हि सामा पुत्रो द्वितीयकः ॥ १८॥ तृतीयो घनमल्लोस्ति ततस्तुर्यो नरायणः । भार्या देईदासस्य रामूही प्रथमा मता ।। १९॥ कामूही द्वितीया श्रेया मर्तुश्च्छन्दानुगामिनी । रामूहीयोपित पुत्रा देईदासस्य सदनि ॥ २० ॥ प्रथमाश्चाख्यया साधू द्वितीयो हग्दासकः । ताराचन्द्रः तृतीय स्याचतुथस्तेजपालकः ॥ २१ ॥ पञ्चमो रामचन्द्रश्च पश्चापि पाण्डवोपमाः । साधूभार्या मथुरी च या गङ्गा शुद्धवाजा ।। २२ ।। '' पुलके देवला इनिपारः।
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१३२ लाटीमहिनायां- ज्झारू द्वितीयपुत्रस्य कटुराख्यस्य धर्मिणः । मार्या तिहुणाहि नाम्ना नाथू नाम मुतस्तयोः ॥ ३५ ॥ नाथूभाया चिताल्ही म्यात्पुत्रो रूढा तयोर्द्वयोः । ज्झारू चतुर्थपुत्रस्य भार्या चुंही समाग्यया ।। ३६ ।। तयोः पुत्रस्तु गांगू स्यादात्मवंशावतसंकः । एसे सर्वेपि जैनाः स्यु. कीर्त्या संघेश्वराः स्मृताः ॥ ३७ ॥ एतेपामस्तिमध्ये गृहपरुचिमान् फामन संघनाय स्तेनोचैः कारितेयं सदनसमुचिता संहिता नाम लाटी । श्रेयोय फामनीय प्रमुदितमनसा दानमानासनाद्यैः स्वोपज्ञाराजमलेन विदितविदुषा मापिना हैमचन्द्रे ॥ ३८ ॥ इतिश्रीवंशस्थितिवर्णनम् । यावव्योमापगाम्भो नभसि परिगती पुष्पदन्तौ दिवीशी थावक्षेत्रे व दिव्या प्रभवति भरतो भारती भारतस्मिन् । वावसिद्धान्तमेतजयतु जिनयतेराज्ञया ख्यातलक्ष्म वावत्वं कामनाख्यः श्रियमुपलभतां जैनसंघाधिनायः ॥ ३९ ।। इत्याशीर्वादः। यावन्मेरधरापीठे यावचंद्रदिवाकरौ । वाच्यमानं बुधैस्तारश्चिरं नन्दतु पुस्तकम् ।। ४०॥ 'प्रापिना' अथवा 'मापिना उनि म पन्न।
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दुकर
जगसी
तिलोक
না
गागू
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न्योता
भोल्हा
फामन
भाईदास
फोनू
भीषसी
रायदान
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