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ताजिकनीलकंठी

महिधर · 2009/06

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॥श्री॥
Jain Va
ताजिकनीलकण्ठी
ज्योतिर्विद्वरिष्ठश्रीनीलकण्ठविरचितार
AO
LAON
पण्डितमहीधरकृतभाषाटीकासमलकृत ।
जिसको
लोकोपकारार्थ
खेमराज श्रीकृष्णदासभेष्टिने
मुंबई
निज "श्रीवेङ्कटेश्वर'' स्टीम्-मुद्रणालयमें .
मुद्रितकर प्रकाशित की।
संवत् १९६४, शके १८२९.
इस ग्रंथका रजिस्टरी हक "श्रीवेङ्कटेश्वर " यंत्रालयाधीशने
स्वाधीन रक्खा है,
'.-....-----

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भूमिका। . , . अहो ! ईश्वरने ज्योतिषशास्त्र संसारमें कैसा अद्वितीय रत्न दियाहै जिसके प्रभावसे मनुष्य पुराकत और अक्तिन जो अपने कृतकर्म और उनका परिणाम है संपूर्ण जान सकते हैं. इस अपार संसारमें समस्त वस्तुमात्र उद्यमी मनुष्यके हस्तंगत हैं. ऐसा कोई पदार्थ नहीं कि, जिससे बुद्धिबलवाला मनुष्य न जान सके वा न करसके. केवल जन्म और मरण मनुष्यके अगोचरे हैं इसीसे ईश्वरकी ईश्वरता विदित होतीहै. परंतु ज्योतिषशास्त्र ऐसा अनमोलमणि है कि, जिसकी सलाई नेत्रों में देनेसे परोक्षीय जन्ममरणभी प्रत्यक्ष दिखाई देतेहैं. ब्रह्माजीने जब वेदके चार भाग करदिये तब उसके अंग "शिक्षा,कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द,ज्योतिष" ये छः शास्त्र बनायें इनमें से प्रत्यक्ष तात्पर्य और चमत्कृत होनेसे ज्योतिष शिरोमणि गिना जाता है. अब ऐसा समय आया कि, वह ऐसा अद्वितीय रत्न शिरोमणि कैसा गिरता पड़ता दूर भागता जाता है. कोई इसे पूछताभी नहीं कि, आप कहांके और : कौन हैं. कदाचित किसीने पहचान लिया तो भर्त्सना करताहै कि हां ! ' तू वही है जिसने हमारे पितृपितामहादिकोंको अपने चमत्काररूपी अपंचमें लुभाकर समस्त धन तन दान धर्मादि व्यर्थ कार्योंमें व्ययकरायके उन्हें अधोगामी और हमारे तिरस्कार योग्य करदिया, तेरे. प्रपंचमें वे नहीं 'फँसते तो उनका उपार्जित द्रव्य सब हमहींको अनायास मिलनाथा. हमें अनेक प्रकारके परिश्रम आजीवनार्थ क्यों करने पडते. अब हम तो तेरा आदर क्या करेंगे. बाप दादे अज्ञान हुये तो हुये अब हम तो कभी न भूलेंगे. जाइये अपनी इज्जत बचाइये "कुछआगेबढ़कर" एक और महाशय मिले. देख- कर बोल उठे कि, अजी साहब ! अलग ही अलग चले जाइये अपना परछावां .. हमारे ऊपर न पड़ने दीजिये तुम अमंगली हो. हमने सुना है कि, हमारे माताके विवाहपूर्व तुम्हारे अंजन नेत्रवाले किसीने कहाथा कि, इस कन्याके वैधव्ययो- ग है अकस्मात विवाहोत्तर अल्पकालमें वैसाही होगया. उपरांत उसी वैधव्य योगवालीके गर्भसे हम ऐसे हृष्ट पुष्ट और शास्त्रज्ञ पैदा हैं कि, को कभी विध- - (४) ताजिकनीलकण्ठी-भा० टी०। वा नहीं मानते संसारमें सभी पुरुष ईश्वरके अंश हैं स्त्रियोंको पुरुपोंकी कमी नहींहै.इन अबला बिचारियोंका जीवित वैधव्यरूपमें क्यों व्यर्थ करावें. हमारी माताको केवल तेरे दुर्वचनसे कुछ दिनों वैधव्य मानना पडा फिर तो ईश्वर कपासे ऐसा सौभाग्य हुवा कि, जिसके प्रतापसे हम ऐसे पंडित भंड संसारमें अवतरित हैं. अब कहिये । हमारी माताके वैधव्ययोग है वा सौभाग्य ? तुम झूठे तुम्हारे पाठक झूठे हायरे कलियुगातुझे अपना अधिकार प्रथम क्या इसी अद्भुत रत्नपर करना था,क्या इसीके साथ तेरी मुख्य शत्रुता थी. हां ! तेरा यह प्रयोजन अग्रेसरहै कि, प्रथम शिरोमणि शास्त्रको आक्रमण करूं तो और सभी अंतर्गत होजायँगे परंतु यह अनादि शास्त्र सहसा तेरे आक्रमणमें आक्रमित इस दशामेंभी नहीं होनेका; कुछ दिन समय प्रभाव सार्थक करनेके लिये ज्योतिष रत्नराज पक्षसंकोच किये प्रतीक्षु हैं परिणाममें रलरत्नहीहै. इस समयमें ज्योतिपकी प्रभुता न्यूनहोनेके कारण यहहै कि, ज्योतिपियोंके कहे फल पूरे ठीक नहीं लगते. क्योंकि कलिराजने प्रथमावेश ज्योति- पियोंसेही आरंभ उठाया. पूर्व ऋपिलोग यमनियमादि तप और मिताहारी और अप्रतिग्राही, योगाभ्यासी, सर्वशास्त्रज्ञ वेदान्यासी और नित्य अमिहो- त्री थे. इससे भूत, भविष्य, वर्तमान, समाधि, अर्थात् एकाग्र विचारसे कहतेथे. अब ज्योतिषी लोग यमनियमादिके स्थानमें दंभलोभादि और मिताहारके स्थानमें अनिसम और अप्रतिग्राही के स्थान में सर्वग्राही, योगा- क्यासके स्थानमें द्रव्यार्जन, प्रपंच शास्त्र, वेदान्यासके स्थानमें वेदविक्रय, तप और जितेंद्रियताके स्थानमें खीलोलुपता, अग्निहोत्रके स्थानमें तम्बाकू. एवं प्रकारके सांप्रतीय ऋषि होगये तो सर्व शास्त्रज्ञताके योग्य बुद्धि कहांसे हो ? विना बहुज्ञता और बिना दमादिकोंके चमत्कार फल क्योंकर कहसकें. वा ण सर्वस्व गायत्रीके उपदेश मात्रसे दक्षिणा निमित्त जप विक्रय और यथेच्छा प्रतियह ग्रहण करने लगे तो बुद्धि निर्मल और कही बात सच्ची क्यों होवे. कदाचित् किसीने कुछ परिश्रम पठनपाठनमें किया और कुछ शा ज्ञता पाईभी तो दंभ और मत्सरमें परिपूर्ण होजाते हैं. ज्योतिषमें अधिकांश गुरुलक्ष्यस्थान हैं उन युक्तियोंके दूसरेकी प्रभुताका मत्सर, भूमिका। . मानकर किसीको नहीं बतलाते. पुनः आगे विद्याका प्रचार कैसे बढे ? ऐसे २ आचरणोंसे यह अद्वितीयशास्त्र लोप होता २इस दशाको प्राप्त होगया. सर्वसाधारणको इस अद्भुत रत्नके उन्नतिका यत्न सर्व प्रकारसे करना योग्य है. फिर ऐसा अमूल्यमणि मिलना असंभव है. विशेषतः ज्योतिषी लोगोंको इसकी उन्नतिका उद्यम करना चाहिये कि, उनका यह आजीवन पूर्वसे और पश्चातके लियेभी उपयोगी है. इसमें अतिशयश्रम पठन पाठनसे करना योग्यहै जिससे लोक प्रत्ययकारक ठीक फल कहसकें.दोखये ! पहिलेके महात्मा आचार्योंने सर्व साधारणके भूति और प्रत्ययके लिये कितनाश्रम उठायके यह शास्त्रप्रचार किया कि, जिसे अब बहुधा लोग कहते हैं कि, ज्योतिषशास्त्र कुछ वस्तु नहीं न ग्रहोंकोही शुभाशुभ देनेकी सामर्थ्य है जैसा जिसका कर्म वैसा अवश्य होगा. इस अवसरमें कोई नास्तिक कहते हैं कि, यह तो ब्राह्मणोंने केवल अपनी अज्ञान और अल्पश्रमी संवानके उपकारार्थ यह प्रपंच किया है. अब इसमें वक्तव्य यह है कि पूर्व लिखित दशा जब इस प्रत्यक्ष शास्त्रकी होगई तो जनश्रुतिभी ऐसी होनी आश्चर्य तो नहीं तथापि इस शास्त्रका मूल तात्पर्य उन्हें विदित नहीं है नहीं तो सहसा कभी ऐसा न कह सकते. भोक्तव्य तो कर्मफल है यह बोध नहीं कि, वह क्या है और उसका परिणाम कब और क्या होगा इसका विचारद्वारा पूर्वाचार्योंने जन्मसमय इष्ट मानकर ऐसे हि- साब बनाये कि, जिससे वह अलक्ष्यकर्म फल हित प्रत्यक्ष होजाता है. उन हिसाबोंके नाम सूर्य्यादि नवग्रह और मेषादि १२ राशि तिथ्यादि पंचांग स्थापन करदिये ग्रह आप न तो कुछ देवे न कुछ अशुभ कर सकते जैसा जिसका कर्म उपार्जित होवे वैसा ही फल होगा, परन्तु महरूपी हिसाबके द्वारा वह अलक्ष्य लक्ष्य होजाताहै. अब इसमें ऐसा आभास हुवा कि यह असमर्थ हैं फल कर्मानुसार भोक्तव्यहीहै तो ग्रहार्चन दानादिभी निष्पयोजन है परंतु यह स्थूल विचार "श्रृंगमाहिन्याय" है. प्रयोजन उसका कैसा उत्तम है कि, हमने पूर्व ऐसा कर्म किया था, कि जिसका परिणाम हमको अरिष्ट धन ना- शांदि मिलना है यह कर्म और फल तो अदृश्य था परंतु सूर्य वा कोई ग्रहके दशा कष्टी होनेसे हमको आरष्ट ज्ञात हुवा. यह कर्मफलबोधक एक हिसाब - (६) ताजिकनीलकण्ठी-भा०टी०। सूर्य हुवा अब वह कर्म हमें पहलेही ज्ञात होता तो उसका प्रतीकार करते. केवल ज्ञापक यहां सूर्य है तो हमको सूर्येहीके द्वारा कर्मनिहारोपाय सूर्य्यकी वेदबोधित शांत्यादि करनी चाहिये यह शांति सूर्यकी क्या उस उपार्जित, दुष्कर्मकी है! जैसे सूर्य्यद्वारा कर्मफलं. ज्ञात हुवा ऐसे सूर्य्यहीके द्वारा प्रती- कार करना योग्य है इसमें दोप्रकार शुभत्व होगा कि एक तो अति प्रयत्नोंसे जो द्रव्य उपार्जन कियाहै उसके अकस्मात् व्यय होजानेमें कष्ट अपनेही हाथसे होगया सूर्यदशाबोधित कर्मफल मिलगया और अपने हाथके व्यय करनेसे पश्चाताप न होगा.दूसरा लाभ यहहै कि वेदबोधित और शास्त्रसंमत विधिसे जो कुछ शांत्यादि करी जाती हैं उनके कर्मनिर्हार और चिचानंदवा और पारि- कशुभत्व और सद्व्यय गणनामें होगा.विधिसे न करेंगे तो असव्यय ( जिसमें फेर कभी काम नहीं आता) और इस समयमें चित्त संताप करनेवाला होगा जैसे वैद्यको देने वा दंडमें वा चोरी वा अग्नि जलादि पातमें व्यय होजानेसे कर्मफल तो मिलेगाही. कर्मसे कर्मनिहार होताहै इसमें चित्तशुद्धि मुख्य है कर्मवासना पुनर्जन्म भी फलभोगके लिये देती है सांप्रतमें साधारण की बुद्धि ऐसी ससंश्चम होरहीहै कि, जन्म देहादि न पहिले था न फिर होगा केवल पंचतत्त्व अपने २ स्थानोंमें मिलजायँगे. जन्म फिर कौन लेता है.मरेमें कोई हटकर किसी प्रकार न आया पहिले जन्म भयाथा पीछे जन्म होगा यह चांति मिथ्या है प्राण नाम वायुका है वहभी वायुमें मिलजाता है जन्म लेनेको स्थूल दृष्टिसे तो कुछभी अवशेष नहीं रहता परन्तु मूलज्ञान यह है कि जिस कर्मके अभ्यासमें शरीर रहता है उसकी वासना बीज मात्र स्थित रहती हे उसीके अनुसार कर्मफल भोगनेको दूसरा प्रपंच पंचतत्वकी वासना बलसे उत्पन्न होजाता है इसके बहुतसे प्रमाण हैं और बहुत कुछ वक्तव्यहैं विशेष विस्तार इस विषयका पुनः किसी औरग्रंथके अनुवाद व्याजसे लिखने की इच्छा है "ज्योतिषामयनं चक्षुनिरुक्तं श्रोत्रमुच्यते । छंदःपादौ तु वेदस्य हस्तौ कल्पः प्रचक्षते॥यथा शिखा मयूराणां नागानां मणयो यथा । तद्ववेदांगश णां ज्यो- तिष मूर्द्धनिस्थिवम"॥प्रथम श्रुतिनेत्र ज्योतिष शास्त्रका एक स्कन्ध जन्मफल - भूमिका । (७) बोधक जातकोत्तम बृहज्जातककी भाषाटीका सर्वसाधारणमें थोडा कुछ ज्यो- तिषका मार्ग जिन्होंने देखा है और बड़े ग्रंथ संहितादिकोंमें गति नहीं है ऐसे बालकोंके सुगम बोध निमित्त और गुरुजनोंके पाठनमें अल्प श्रमके निमित्त मैंने करी.उपरान्त इच्छा हुई कि, जातकके फल स्थलकालीन और बहुश्रमीहैं अर्थात् प्रथम सर्वग्रहोंके षड्वल दृष्टि बलेष्ट कष्टबल निसर्गादि बल गणितसे दशांतर्दशा मिलतीहै इसमें सिद्धांत मतसे सूक्ष्म विचार किया तो बहुश्रमसे स्थूलकाल फल मिलताहै जैसे माहेश्वरी दंशामें शुक्रके २० वर्ष निसर्ग दशामें शनिके५०वर्ष और उच्चादिबल पूर्ण होनेमें चन्द्रमाके १५वर्ष दशाहै ऐसेही अंतर्दशाभी५।६वर्षसे कम न होंगी तो जातकोतफल तो एकही हैक्या समस्त अंतर्दशा ५/६ वर्ष पयंत एकसाही फलं होगा इसनिमित्त ब्रह्मादि अष्टादश आचार्योंके उपदेष्टा श्रीसूर्य ने ताजिकशास्त्र बनाया जिससे वर्षप्रवेश मासप्रवेश दिनप्रवेश पर्यंत गिननेसे दिन २ पर्यंत फल ज्योतिषी कहसकते हैं अतएव बृहज्जातकके अनुवाद करने उपरान्त ऐसाही कुछ ताजिक ग्रंथकाभी अनुवाद करना चाहिये ताजिक ग्रंथों में मुख्य जीर्णवाजिक है उसीकी सारणी नीलकंठ दैवज्ञ विरचित नीलकंठी है. यहग्रंथ पाठमें थोडा अर्थ बहुत और संमत होनेसे इसकी भाषाटीका सर्व साधारणके बोधन योग्य डी बोलीमें परमकारुणिक श्रीबदरीशमूर्ति गढवाल राज्याधीश श्री ५ महाराजा कीर्तिशाहसाहबकी . आज्ञानुसार करताहूं. इस ताजिक शास्त्रमें कोई धर्मशास्त्रके वचन "नावदे द्यावनी भाषां नगच्छेज्जैनमंदिरम्। हस्तिनापीब्यमानोपि प्राणैः कंठगतैरपि"। इत्यादिसे दोषारोपण करते हैं कि, इसमें इकवाल इस्सराफ, इत्थशालादि बहुतसे फारसीके शब्दहैं इससे बा णोंको पाठयोग्य नहीं है" किंतु उनका स्थूल विचार है किं, ऐसे अन्य जातिके भाषा अवाच्य हैं तो प्रथम अमरकोश पांडित्यमूलही दूषित होता है और ज्योतिषके अष्टादश संहिता कारक "पिता- मह, व्यास, वसिष्ठ, अत्रि, पराशर, कश्यप, गर्ग, मरीचि, मनु, अंगिरा,लोमश पुलस्य, गुरु, शौनक इत्यादि हैं। इन्हींसे ज्योतिषशास्त्र प्रवृत्त भयाहै. यवना- चार्य कत यवनजातक भी सर्वसंमत प्रमाणग्रंथहै और यवनाचार्य्यने कुछ अपनीही कल्पना नहीं करी किंतु गुरुपदिष्ट वैसाहीथाः उक्तंच रोमकेण- .

(८), वांजिकनीलकण्ठी-भा० टी०।. "ब्रह्मणागदितं भानोभानुना यवनाय ततायवनेनच यत्लोक्तं ताजिकं तत्प्रचक्षते" इति और टोडरानंद, खत खुत रोमक हिल्लाज धिषणा दुर्मुखाचार्य, इतने ताजि काचार्य्य हैं येभी तो ब्राह्मणहीथे इत्यादि प्रमाणसे ताजिकमें पारशीयशब्दोंका दूषण नहीं है कदाचित कोई कहै कि "नवदेवावनींभापां" इस धर्मशास्त्रोक्त वाक्यका खंडन होगया है तो मैंने खंडन नहीं किया. यह श्लोक तो सत्यही है परंच उसकी घटना काव्यालंकारादि विषयोंमें है पारशीयशब्दपक्ष में यहां तो "फलें प्राप्ने मूले किं प्रयोजनम्" यह न्याय है. आम खानेसे काम है न कि वृक्षगणनासे, जैसे पंकोद्भव कमल देवपूजाही और विषधर सर्प मस्तकोद्भूतमणि, मुकुटयोग्य होताहै ऐसाही यहां भी शास्त्रके प्रयोजनसे प्रयोजनहै. जाति द्वेष फलित शास्त्रमें क्या ताजिकशास्त्र इस समयमें तात्पर्य फल बतलानेवाला है और गर्ग वचन है. कि, "म्लेच्छा हि यवनास्तेषु सम्प शा मिदस्थितम् । ऋषियचेपि पूज्यते किंपुनर्वेद विद्विजाः"। और ग्रंथांतरीय कथानक है कि, किसीकालमें ज्योतिष शास्त्रके अनुसार ज्योतिप लोग भूत, भविष्य, वर्तमानकी बातें कहकर ईश्वरकी ईश्वरताको स्पर्धा करने लगे. यह दशा देख ब्रह्माजीने उन शास्त्रोंके चमत्काररूपी किरणोंको शापानलसे छादित करदिया. इस दशामें श्रीवसिष्ठादि मुनियोंने अपने प्रकाशित शा के योतन निमित्त वाजिकशाखापेक्षा औरभी. चमत्कृत बनाया.जिसको अष्टादश संहिताकारक आचार्योंने अनेक प्रकारके ग्रंथ उन्हीं पारशीय शब्दोंको संस्कृत शब्द मणियोंमें प्रथनकर प्रगट करदिया और मूल इसकाभी जन्मसमय प्रथमस्वासा लेनेकाही क्षण है. इसका विस्तार बृहज्जात- कानुवाद"महीधरी भाषा के सूतिकाध्याय प्रारंभमें मैंने लिखाहै अब इस ग्रंथके सब प्रकारके हक हम अपनी प्रसन्नतासे लोकहितार्थ प्रकाशित करनेको सेठ खेमराज श्रीकृष्णदासजी श्रीवेंकटेश्वर"यन्त्रालयाध्यक्षकोसमर्पण कियेहैं।। आपका कपाभिलाषी- टिहरीनिवासी ज्योतिर्विद् पं० महीधर शर्मा.

॥श्रीः॥ अ ताजिकनीलक ठी भाषाटीकासमेता। शिवं शिवकरं शिवायुतमजं धाप्लावितं समातृगुरु रूपिणं निखिलभैरवैः सेवितम् ॥ प्रणम्य शिरसा मुदा सर- भसा परं दैवतं सहस्रदलकर्णिकांतरगतं गभीरं महः॥१॥मही- धरधरासुरो विबुधधर्मदत्तात्मजो विधाय खलु जातके ह- ति भाषया व्याकृतिम् ॥ तनोति किल ताजिके त्रिगणनील कंठ्याह्वये शुभां विवृतिमत्र वै नरगिरा हिमाहीधरीम् ॥२॥ भाषाकार निर्वित्रतापूर्वक ग्रंथसमात्यर्थ परब्रह्म गुरुरूपी शिवको प्रणाम सहित स्वकर्म प्रकाश कर्ता है। मंगल मूर्ति, सर्वथा श्रेय करनेवाला, सशक्तिक अर्थात् उमासहित शंकर, स्वतःसिद्ध, सहस्रदल कमल कर्णिकांड वर्गत अतिरहस्य अलख अगोचर स्थानमें परमामृतसे प्लावित प्रसन्नवदन बैठा हुवा, चतुःषष्टि मातृका और समस्त भैरवोंसे समंतात्परिवेष्टित, यदा मातृका स्वर, भैरव व्यंजन इनसे सेवित प्रणवरूप परमदेवता गुरुरूपी ईश्वर को ( ससंचम) आनन्दपूर्वक सशिरस्क प्रणाम करके विबुध धर्म- दत्तात्मज महीधरनामा बाह्मण, बृहज्जातककी भाषाटीका करने उपरांत सांप्रतमें इसी ज्योतिष प्रकरण "ताजिकनीलकंठी” तीनों तंत्रकी सुगम सरल भाषामें माहीधरी टीका विस्तारित कर्ता है ॥ १ ॥२॥ ग्रंथकर्ता आचार्य्य मुनिश्रेष्ठ गर्गवंशावतंस समस्तविदैवज्ञमुकुटमणि त्रिस्कंध ज्योतिश्शासनिबंध की चिंतामणि ज्योतिर्विद पौत्र अनंत ज्यो- विवित्पुत्र श्रीनीलकंठ ज्योतिर्वित् जीर्ण ताजिक शास्त्रके संज्ञातंत्र, वर्षतंत्र, प्रश्नतंत्र, तीन प्रकरणोंके निर्माणोत्सुक होकर प्रथम संज्ञाविवेक नामक

(२)
ताजिकनीलकण्ठी।
प्रथम तंत्रारंभमें निर्विघ्नता सहित ग्रंथसमाप्त्यर्थ गणेश सूर्य्य पितृचरणकमल,
को नमस्कार तथा विषय प्रयोजन संबंध उपजाति छन्दसे कहताहै ॥
उपजातिच्छंदः-प्रणम्य हेरम्बमयो 'दिवाकरः गुरोरनंतस्य
तथा पदाम्बुजम् ॥ श्रीनीलकंठो विक्निक्ति सूक्तिभिस्तत्ता-
जिकं सरिमन प्रसादकृत् ॥१॥
श्रीनीलकंठनामा दैवज्ञ गणेश और सूर्यनारायण तथा अपने पिता अ-
नंतनामा दैवज्ञ गुरुके चरणकमलको प्रणाम करके जीर्ण ताजियथको
विचारके इंद्रवजा रथोद्धतादि सुन्दर छन्दोंमें बडेवडे ताजिक ग्रंथोंके.
प्रयोजन स्वल्पतरग्रंथसे बोधननिमित्त विद्वान् ज्योतिषियोंके मन प्रसन्न
करनेवाली नीलकंठी नामक ताजिक प्रकट करताहै ॥ १ ॥
उपजा-पुमांश्चरो : दृढश्चतुष्पाक्तोष्णपित्तोतिखोद्विरुपः ।
पीतो दिनं प्राग्विषसोदयोल्पसंगप्रजो रूक्षनृपः समोजः ॥२॥
प्रकरणमें प्रथम राशिस्वरूप वर्णन करते हैं; यथा-मेष, मेंढाका
आकार, पुरुष राशि, चरसंज्ञा, अमितत्त्व, बलवान्, चौपाया, रक्तवर्ण, सोष्ण
अर्थात् तप्तदेह, पित्त प्रकृति, बडाशब्द करनेवाला, पर्वतचारी, वनचारी
वा, दूरस्वभाव, पीतवर्ण [ यहां रक्त पीत दो वर्ण कहनेसे दोनों रंग
मिलकर पाटल वर्ण शरीर ] दिवा बली, पूर्वदिशा, अल्प स्त्रीसंगकरनेवाला,
और अल्पाजा, रूक्षकांति, क्षत्रियजाति और राशिसंख्यागणनामें विषम
किंतु कार्य्य यह राशि सम काम देती है इसकारण यहां संज्ञा ही है
इतने गुण मेषके हैं ॥ २॥
उपजा-वृषः स्थिरः क्षितिशीतरूक्षो याम्येटू सुभूर्वा
निशाचतुष्पात् ॥ श्वेतोतिशब्दो विपमोदयश्च मध्यप्रजा
संगशुभो हि वैश्यः ॥३॥
वृष, बैलका आकार, स्थिरसंज्ञा, खीराशि, भूमितत्त्व, रूक्षकान्ति,
शीतस्वभाव, दक्षिण दिशा, सरलभूमिचारी, वातप्रकृति, रात्रिबली, चारचुरण,
श्वेतवर्ण,बडा शब्दकरनेवाला, विषमलन, न, तो अतिकामी नअल्पकाम, सौम्य
राशि, वैश्यजाति, दृढांग, बलवान् शरीर इतने लक्षण वृषराशिके हैं ॥३॥

, भाषाटीकासमेता। (३) इन्द्रवज्रा- त्यक्समीरः शुकमा द्विपाना बंद द्विमूर्तिर्विषमोदयोष्णः।। मध्यप्रजासंगवनस्थशूद्रो दीर्घस्वनः स्निग्धदिनेट् तथोग्रः ॥४॥ एकत्री एकपुरुषके ईदको मिथुन कहते हैं. ऐसाही आकारभी है और यह राशि पश्चिमदिशाकी स्वामी, वायुतत्त्व, (वायुप्रकृति), शुकपक्षीकासा हरितरंग, दोचरण, सौम्य, पुरुषरूप, द्विस्वभाव, पूर्वाईस्थिरस्वभाव और उत्तराईका 'चरस्वभाव, विषमराशि उष्ण, स्वभाव, त्रीसंगमें मध्यम, संतान भी बहुत अल्प, वनचर, शूद्रजाति, दीर्घ शब्दवाला ग्ध (चिकना) शरीर, दिनमें बलेवान, क्रूरसंज्ञा, दृढ शरीर इतने ल ण मिथुन राशिके हैं ॥ ४ ॥ उपेंद्रव०-ब जासंगपदः कुलीरश्चरोंगनापाटलहीनशब्दः ॥ शुभः कफी स्निग्धजलांबुचारी समोदयी विप्रनिशोत्तरेशः ॥५॥ कर्कराशि कीटाकार अतिस्वीसंगी, बद्धचरण, चरराशि, खीजाति, पाटल अर्थात् श्वेतरंग, शब्दरहित, सौम्य, कफप्रकृति, स्निग्ध (चिकना) शरीर, जलतत्त्व, जलचारी, समसंज्ञक बाह्मणजाति रात्रिबली उत्तरदिशाका स्वामी, दृढशरीर, इतने लक्षण कके हैं ॥ ५॥ उपजा.- मान्स्थिरोनिर्दिनपित्तरूक्षः पीतोष्णपूर्वेशदृढश्चतुष्पात्।। समोदयो दीर्घरवोल्पसंगप्रजो हरिः शैलनृपोप्रधूम्रः ॥६॥ सिंहाकार पुरुप, स्थिरसंज्ञा,अमितत्त्व, दिनबली,पित्तप्रकति रूक्ष शरीर,पीला- रंग, उष्णस्वभाव, पूर्वदिशाकास्वामी, बलवान् अंगप्रत्यंग, चारचरण, समसंज्ञा, दीर्घशब्द, स्वल्पस्त्रीसंगी, अल्पही संतान, पर्वतचारी, नृपति, धूम्रवर्ण यहांभी दारंग कहेगये हैं, प्रयोजन मेषवत् है कि पूर्वार्द्ध इस्का पीत उत्तराई धूम्र पूर्वे कासा रंग है इतने लक्षण सिंह राशिके हैं ॥ ६॥ उपजा-पां द्विपात्स्त्रीद्वित र्यमाश नशामरुच्छीतसमोदयामा।| कन्याईशब्दा भभूमिवैश्या लक्षाल्पसंगप्रसवा शुभा च ॥७॥ कुमारीरूप, पांडु ( पिंगल) वर्ग, दोचरण, स्त्री राशि, द्विस्वभाव (मि- ताजिकनीलकण्ठी। थुनवत् ) पूर्वाई स्थिर, उत्तरार्द्ध चर, दक्षिणदिशा स्वामी, रात्रिवली, वा- युतत्त्व, शीतप्रकृति, समलग्न इसका भूमितत्त्व भी है और आधाशब्दवाली, सरलभूमिचारी, वैश्यजाति, रूक्ष शरीर, अल्पस्वीसंगी, अल्पसंतति, समराशि, इतने लक्षण कन्या राशिके हैं ॥ ७ ॥ उपजा- मांश्चरश्चित्रसमोदयोष्ण प्रत्यङ्मरुत्स्निग्धरवोन वन्यः॥ स्वल्पप्रजासंगमशूद्र उग्रस्तुलोधुवीयर्यों द्विपदः समानः ॥८॥ तुला; तराजूकासा रूप, पुरुषराशि, चरसंज्ञा, चित्रवर्ण, समलम, गरम, पश्चिमदिशाका स्वामी, वायुतत्त्व, स्निग्ध (चिकना) शरीर, शब्दरहित, वनचारी क्रूर, अल्पखीसंगी, अल्पसंतान, शूद्रजाति, दिवा बली, दोचरण, बलवान अंग इतने लक्षण तुलाराशिके हैं ॥ ८॥ उपजा-स्थिरः सितःस्त्रीजलमुत्तरेशनिशाखो नोबहुपात्कफीच।। समोदयोवारिचरोऽतिसंगप्रजः भः स्निग्धतनुद्धिजोऽलिः॥९॥ बीछूकासा रूप, स्थिरसंज्ञा, श्वेतरंग, स्त्रीराशि, जलतत्त्व, उत्तर दिशा पति, रात्रिचर, शब्दरहित, बहुपाद, कफप्रकृति, समलम, जलचारी, अतिखीसंगी, बहुतसंतति, शुभराशि, स्निग्ध (चिकना) शरीर, ब्राह्मण जाति, स्थूल अंग ये लक्षण वृश्चिक राशिके हैं ॥९॥ उपजा-नास्वर्णभाः शैलसमोदयोतिशब्दो दिनप्राम्हढरूक्षपीतः।। राजोष्णपित्तो धनुरल्पसूतिसंगोदिमूर्तिपिदोऽग्निरुयः॥१०॥ धनुपाकार, पुरुष, सुवर्णसमानकान्ति, पर्वतचारी, समलम, अति शब्दवान्, दिनबली, पूर्वदिशाका स्वामी, बलवान् शरीर,रूक्षतनु, पीलारंग, क्षत्रिय जाति, गरम, पित्तप्रकृति, अल्पसंतान, अल्पस्त्रीसंगी, द्विस्वभावराशि, पूर्वाई स्थिर, उत्तरार्द्ध चर,दोचरण, अमितत्त्व, क्रूरसंज्ञा; इसके भी दोरंग और दो रूप हैं जैसे पूर्वाई सुवर्णवर्ण और उचराई पीतवर्ण और कटि ऊपर मनुष्य और नीचे घोडा ये लक्षण धनराशिके हैं ॥ १०॥ " भापाटीकासमेता। उपजा०-मृगश्चरः माईखो यमाशास्त्रीपिंगरूक्षः शुभ- . भूमिशीतः ॥ स्वल्पप्रजासंगसमीररात्रिरादौ चतुष्पा- द्विषमोदयो द्॥११॥ आकार तो नाकुका परंतु मुख मृगकासा, चरसंज्ञा, भूमितत्त्व, अईस्वरवान, दक्षिणदिशापति, स्त्रीराशि, पिंगल वर्ण, रूक्षशरीर, सौम्य, भूमिचारी, शीतप्रकृति, अल्पस्त्रीसंगी, अल्पप्रजावान्, वायुतत्त्व, रात्रि बली, पूर्वार्द (चतुष्पाद) पशु, और उत्तराई जलचर पादरहित, विषम लम और वैश्यजाति ये लक्षण मकरके हैं ॥ ११ ॥ उपजा-कुंभोऽपदो ना दिन ध्यसंग सूः स्थिरः धूर वन्यवायुः ॥ निग्धोष्णखण्डस्वरतुल्यधातुः शूद्रः प्रतीची विषमोदये ॥ १२॥ कुंभ, कलशका आकार, पादरहित, पुरुष, दिवाबली, अल्पस्त्रीसंगी, अल्पसंतान, स्थिरसंज्ञा, विचित्ररंग, वनचारी, वायुतत्त्व, चिकना शरीर, संतप्त देह, अर्द्धस्वरवान, तुल्यधातु (वात पित्त कफ तीनों प्रकृति ), शूद्रजाति, पश्चिमदिशापति, विषमलग्न, दृढ अंगप्रत्यंग इतने लक्षण कुंभके हैं ॥१२॥ उपजा०-मीनोपदः । कफवारिरात्रिनिःशब्दबभ्रुति- नुर्जलस्थः ॥ स्निग्धोऽतिसंगप्रसवोपि विप्रः भोत्तराशेद विषमोदयश्च ॥ १३॥ मीन राशिका आकार परस्पर एकके मुखपर दूसरीका पुच्छ ऐसी दो मछली और स्त्रीराशि, कफप्रकृति, जलतत्त्व, रात्रिबली, शब्दरहित, पिंग ल, भूरारंग, द्विस्वभाव, पूर्वाई स्थिरवत, उत्तराई चरतुल्य, जलचारी, चि- कनाशरीर, अति स्त्रीसंगी, बहु संतति, ब्राह्मणजाति, शुभराशि, उत्तरदिशा पति और समलम इतने इसके लक्षण हैं ॥ १३ ॥ उपजा०-धरांबुनोरगिसमीरयोश्च वगै सुहत्त्वं परतोऽरिभावः ॥ चापांत्यभागस्य चतुष्पदत्वं ज्ञेयं मृगांत्यस्य जले चर- त्वम् ॥ १४॥ - .

(६)
ताजिकनीलकण्ठी।
पूर्व जो तत्त्व कहे गये हैं उनके प्रयोजन कहे जाते हैं, कि--तत्त्व और
वर्गीकी प्रीति स्त्रीपुरुषमेलमें स्वामिसेवक में और गुरु शिष्यादिमें विचार-
नी चाहिये; जैसे पृथ्वीतत्त्व और जलतत्त्वकी तथा अभिवायुकी परस्पर
प्रीतिहै, भूमि अग्नि और जल वायुकी परस्पर शत्रुता है, पूर्वोक्त स्त्री पुरुषा-
दिकोंके राशि एकही तत्त्व होनेमें अधिक प्रीति है, धनुराशिका उत्तराई
चौपायाहै, पूर्वार्द द्विपदहै, मकर उत्तरार्द्ध जलचारी पादरहित और पूर्वाई
द्विपद स्थलचारी है ॥ १४ ॥
इंद्रवज्रा -पित्तानिलौ धातुसमः कफश्च त्रिमेषतः सूरिभिरू-
हनीयाः ॥ राजन्यविशुद्धरासुराश्च सर्व फलं राश्य-
नुसारतः स्यात् ॥ १५॥
धातु और जाति गिननेकी युक्ति सुगम प्रकारसे कहते हैं, कि-पित्त
वायु समधातु अर्थात् तीनों धातु और कफ इतने मेपादि राशि तीन
आवृत्ति करके जानना. जैसे मेष सिंह और धनका पित्त धातु, वृष कन्या
मकरका वायु, मिथुन तुला कुंभका समधातु अर्थात् वात पित्त कफ
तीनों मिलकर होताहै; एवं कर्क वृश्चिक मीनका कफ धातुहै. इसी क्रमसे
जाती भी जानी जाती हैं, जैसे--मेष सिंह और धन क्षत्रियजाति, वृषकन्या
व मकर वैश्य जाति, मिथुन तुला व कुंभ शूद्रजाति कर्क वृश्चिक व मीन
ब्राह्मणजाति है. राशियोंके गुण जाति धात्वादि जितने कहेहैं. जन्म वर्ष प्रवेश
और प्रश्नादि विचारों में जैसे जिनके नामहैं वैसेही फल विचारके कहना,
जैसे क्रूर राशिसे क्रूरस्वभाव, सौम्यसे सौम्य और चरराशिसे चरता,
स्थिरसे स्थिरता, द्विस्वभावसे दोनों मिलाकर. ऐसेही सम्पूर्ण राशिगुणोंका
फल जन्म वर्ष और प्रश्नादिकों में बुद्धिसे कहना । शा बुद्धिका सहायक
है. विशेष विस्तारराशिगुणोंका बृहन्नातक की महीधरीभाषाटीकामें स्पष्ट-
तर लिखाहै ॥ १५॥

भाव भाव. भाव. ३ कृश, दृढ. कृश. दृढ. दृढ़. दृढ. दृढ, भाषाटीकासमेता। (७) अनुष्टुप् -गताः समाः पादयुताः कृतिनसमागणात् ॥ खवे- दाप्तघटीयुक्ता जन्मवारादिसंयुताः ॥ अब्दप्रवेशे वारादि सप्ततत्र निर्दिशेत् ॥ १६॥ ग्रहोंके चालन और ग्रह गणितैक्य स्थापनमें प्रथम वर्षेष्टकाल आवश्यक है. यह गणित आचार्योंने वर्षतन्त्रमें लिखाहै. यहांभी अपेक्षित होनेसे वही यह श्लोक है कि-जन्म शककाल, वर्ष शककालमें घटायके शेष गतवर्ष होतेहैं उनमें उन्हीं का चतुर्थीश जोड़ देना पुनः वही गतवर्ष २१ से गुनाकर चा- राशिगुणादिचक्रम् । संज्ञाः | मेष. | वृष, मिथुन | कर्क. | सिंह, कन्या. तुला. वृश्चिक, धन. मकर. | कुंभ, मीन. | १ पुत्री पुरुष. स्त्री. पुरुप. स्त्री. पुरुष. स्त्री. | पुरुष. स्त्री. | पुरुष. | स्त्री. पुरुष. | स्त्री, २ चिरस्थि द्विस्व- द्विस्व चर. | स्पिर. रादि चर, स्थिर, द्विस्व. चर, | स्थिर. चर, स्थिर, भाव. तत्त्व. अग्नि. पृथ्वी. वायु, जल, अग्नि. पृथ्वी. वायु. | जल. अग्नि. पृथ्वी वायु. | जल.. पुष्टकृश दृढ. हढ. मृदु. | मृदु दृढ चतुष्प. चतुष्प. द्विपद. | अपद, चतुष्प. द्विपद. द्विपद. वक्रपद.द्विपद. चतुष्प. अपद. अपद.. संज्ञा. वर्ण, श्वेत. हरित | पाटल. धूम्र. पांडुर, विचित्र श्वेत. वर्ण: २/ पीत. कर्वर. धूम्र, गुण. तेप्तदेह. शीत. तप्त. शीत. उष्ण वायु. | उष्णः वायु. | उष्ण. शीत. | उष्ण. शीत .. धातु. पित्त. वायु. वायु. | कफ, पित्त. जल. | पित्त. कफ, पित्त, वायु. | वायु. कफ. अति | अति खंड शब्द शब्द. अतिरवाअतिरवा दीर्घश होनश. दीर्घश. भर्द्ध. शब्दर, शब्द. शब्द. रहित. हीन. पर्वत शुभ पर्वत वन पर्वत भूमि. चर. भूमि. | चारी. भूमि. जलचर करादि. उग्र. सौम्य. उग्न, सौम्य, उग्र. सौम्य. उग्र, सौम्य. उग्र. सौम्य, उप्र. सौम्य. १२ दिनादि दिवा. रात्रि. दिन. संध्या. दिवा. रात्रि. दिवा. रात्रि. दिन. | रात्रि. दिन. | रात्रि. १३ चल. वली. समवि- विपम. सम. विपम. सम, | विषम, सम, विषम, सम. विषम. सम. विपम. सम. १४ दिशा: | पूर्व. दक्षिण पश्चिम उत्तर. पूर्व, दक्षिण पश्चिम. उत्तर. | पूर्व. दक्षिण पश्चिम, उत्तर, १५ श्रीसंग अल्प. मध्य. | मध्य.] बहु. अल्प. अल्प. अल्प. अति. अल्प. अल्प. मध्य. अति. १६ कांति. रुक्ष. स्क्ष, स्निग्ध, स्निग्ध, रूक्षरूक्ष. स्निग्ध, स्निग्ध रुक्ष. रूक्ष. सिग्ध. स्निग्ध. १७ जाति. क्षत्रि. वैश्य. | शुद्ध ब्राह्मण, क्षत्रि. वैश्य. शूद. ब्राह्मण, क्षत्रि. वैश्य. | शून. ब्राह्मण. १८ समादि | सम, विपम. विषम. सम. सम, | सम. | सम. सम. सम, विषम विषम. विषम. १९ पाद- पाटल शब्द रहित. सम वन चार स्थान. वनचर, जलचर जलचर चर. चर. - षम. मत.

- (८) ताजिकनीलकण्ठी। लीससे भाग देकर लब्धि स्वचतुर्थांश युक्त राशिके दूसरे स्थानमें स्थापन कर- ना. शेष ६० से गुनकर४० से भाग देना,लब्धि तीसरे स्थानमें स्थापन कर- ना. ये तीन अंक वार, घटी, पल इनमें जन्मके वार इष्ट घटी पला यथाक्रमसे जोड़ने घटी पल ६० से अधिक हों तो ६० से शेषित करके लब्धि ऊपरकी राशिमें जोड़देना. वारकी राशि ऊपरका अंक जो गतवर्ष चतुर्थांश युक्तहै वह ७ से ऊपर हो तो ही से तष्ट करदेना. यही प्रयोजन दूसरे प्रकारसे यह है कि 'सपदा दलिता सदला' अथवा (वर्ष सवाया आधा ड्योढ ) अर्थात् गत- वर्ष सपाद ' उसकी चौथाई उसीमें जोड़के बार हुवा, फिर ' दलिता' उसका आधा करके घटिका हुई फिर उसका आधा उसीमें जोड़के पला हुई, जन्मवार इष्ट घटीपल क्रमसे जोड़दिया तो वर्षका ध्रुवक वारघटी पल होते हैं. उहाहरण-इस्का प्रथम श्लोकोक्तप्रकार तो यह है कि जैसे जन्म संवत् १९०६वर्षप्रवेश संवत् १९४३ में घटाया,शेष३७वह जन्मशक१७७१ वर्षशक १८०८ घटाया शेष ३७ गतवर्ष हुआ, इसमें इसीका चतु- ीश ९ । १५ जोडदिया तो वार ४६ घटी १५ हुई, उपरांत गतवर्ष ३५ गुणक २१ से गुणना किया तो ७७७ हुये, इसमें४० से भाग लिया, लब्धि १९ घटी मिली वार राशि ४६ के नीचे घटिकाकी राशि १५ में जोड़दिया ३४ घटी हुई शेष अंक ६० गुणकर ४० से भाग दिया लब्धि २५ पला और ३० विपला मिली, इन्हमें जन्म वारादि २ ३९ २९ जोइदि- या तो वर्ष वारादि होगया. सरा प्रकार यह है कि गतवर्ष सवाया ४६ दि. १५५. गतवर्ष आधा घ. १८५.३० तीसरे गतवर्ष ड्योढा प.५५ वि. ३० सबको यथाक्रम स्वस्वजातियोंमें मिलाय दिया. जैसे विपल तो ३० रहे पल ३० और ५५ जोड़के ८५ यह ६० से उद्धृत करदिया तो पल २५रही लब्धि १ घटी १८।१५ तीनों जोडके ३४ घटी मिली, वह ४६ ही हैं इन वारादि ४६।३४।२५।३०। में जन्मवार २ घटी३९ पल २९जोड़ दिये दो बार ७ घटी १३ पल ५४.३० यह वर्षेष्ट हुवा ॥ अन्यप्रकार १ । १५। ३१।३।को गतवर्षसे पृथक् २ गुणदिया. यथाक्रम वारादि भुरक होजा- ताहै इसके और प्रकारभी बहुतहैं इस्की उत्पत्ति यह है कि सूर्यके पूरी १२ - भाषाटीकासमेवा। (९) राशिमें एक सौरवर्ष होताहै, जन्मसमयमें सूर्य स्पष्ट जितना राश्यादिहै उत- नाही पूरा पूरा जिस समयपर हो वह काल पुनर्वर्ष प्रवेशकाहै सावनमास से दिन ३६५ घटी १५५० ३१ विपल ३० में सूर्य उसी स्पष्टपर आजाताहै इससे यह क्षेपक नियत है इसक्षेपक को पृथक् २ चारों स्थानोंमें गतवर्षसे गुनाकर स्वस्वजातिके पूर्ण अंकोंसे ऊपर ऊपर चढायके आयुके सावन वर्षादि होतेहैं; जैसे १ । १५। ३३ । ३० गतवर्ष ३७ से गुनदिये ३७। ५५५ । ११४७ । १११० इनको घटी पल विपल ६० से उद्धृत कर- दिये ३७ वर्ष ४६ दिन ३४ घटी २५ पलं ३० विपल० सावन माससे गत हुये. यही रीति सर्वत्र जाननी. यहां वही ४६ आदिकोंमें जन्म वारादि जोड़नेसे वर्ष प्रवेश वारादि होगा ॥ १६ (अनु.) शिवघ्नोब्दः स्वखादींदुलवाढ्यः खा शेषितः॥ जन्मतिथ्यन्वितस्तत्र तिथावब्दप्रवेशनम् ॥ १७॥ पूर्वोक्त विधिसे वर्षप्रवेश वारादि ज्ञातहुये में यह वर्षप्रवेश किसति- थिको होगा इसनिमित्त तिथ्यानयन प्रकार यह है कि गतवर्ष ११ ग्यारह से गुनदिया दो स्थानोंमें स्थापन करके एक में १७० का भाग देकर लन्धि दूसरे स्थानकी राशिमें जोड़ दिया, उपरांत ३० वीससे भाग देकर जो शेष रहै उसमें जन्मतिथि शुक्लपतिपदादिक्रमसे जोड़नेसे वर्षप्रवेश तिथि मिलतीहै. उदाहरण गतवर्ष ३७१११ से गुनदिये ४०७ दो स्थानोंमें स्थापन करके एक जगह १७० से भाग लिया लब्धि २ दूसरे में जोड़ दिया ४०९ इसमें जन्मतिथि ९ जोड्दी तो ४१८ हुये ३० से तष्ट करके शेष २८ कृष्ण त्रयोदशी के दिन वर्षप्रवेश हुआ. इसमें भी विथि एकदिन आगे पीछे हो जाती है. गणिवागत तिथिके पहिले वा पिछले वा उसी दिन वर्ष- गत वार जिस दिन मिले वही ठीक होतीहै. यहां वारकी मुख्यताहै तिथिकी आवश्यकता वारको निश्चय करने निमित्त है कि एकमहीनेमें एकवार ४।५ आवृत्ति करता है तो उनमें से तिथि एकको निश्चय कर देतीहै. जैसे इस उदाह- रण में २८ कृष्णत्रयोदशी मिलीहै और वर्षप्रवेश बादशीके दिन शनिवार होने " (१०) ताजिकनीलकण्ठी। से वर्षप्रवेश होगया. अथवा जन्मके (सूशितुल्य) सूशिदिन वह वार मिलनेपर वर्षप्रवेश दिन निश्चय होताहै किसी किसी देशोंमें संक्रांतिदिन गि- नती मानतेहैं उन्हें गत प्रविष्टा और पैट कहते हैं उस प्रविष्टाके दिन अथवा एकदिन आगे पीछे उक्त वार मिलनेसेभी दिन निश्चय होताहै ॥ १७ ॥ गतैष्यदिवसायेन गतिनिघ्नी खषहृता ॥ लब्धमंशादिकं शोध्यं योज्यं स्पो भवेद्ग्रहः ॥१८॥ फल स्पष्ट ग्रहाधीन है. वह गणित सिद्धांत और ग्रहलाघवादि लधुकर- णोंसे साधन करने में श्रम बाहुल्यहै, यहां आचार्य ने सुगमोपाय ग्रहस्पष्टका इसप्रकार कहाहै कि, पंचांगस्थित अवधिकी गति इष्ट समयसे स्पष्टा- वधिपर्यंत दिनोंसे गुनकर अवधि स्पष्टमें संस्कार करना तात्कालिक स्पष्ट सिद्ध होजाता है. उदाहरण-संवत् १९४३ वैशाख वदि द्वादशी शनिवार इष्टघटी १३ । ५४ में वर्षप्रवेश है. और वैशाख वदि अष्टमी सोमवारके दिन ग्रहलाघवीय प्रातःकालीन स्पष्टावधि पंचांग में स्थापित है अब स्पष्टावधि प्रातःकालसे ५ दिन १३ घटी ५४ पल इष्टकालपर्यंत अधिक है. एष्यदिन हुये उस अवधिके सूर्य, स्पष्ट० । १३ । ३७ । ५२ रा- श्यादि और गति ५८ । १४ है. एष्यदिनादि ५ । १३ । ५४ से गति गोमूत्रिका क्रमसे या भिन्न गुणनविधि से गुनदिया ५। ४ । ३९ अंशादि हुये. अवधि स्पष्ट में० । १३ । ३७ । ५२ अवधिसे उत्तरदिन होनेसे एष्य हुवा. जोड़ देनेसे ० । १८ । ४२ । ३१ यह तत्काल सूर्य स्पष्ट होगया. ग्रही रीति भौमादि सभी ग्रहों की जाननी. दूसरा प्रकार विना ही अवधि स्पष्ट केवल पंचांगीय ग्रह चालक से ग्रह स्पष्ट करनेका यह है कि . वर्षप्रवेश दिनसे पहला जो नक्षत्र चरण पर ग्रह चालक है और इष्टदिनसे जो पुनः अंत्यचरण पर चालक है इनका अन्तर करके त्रैराशिक करना कि अन्तरीय अमुक संख्यांक दिनोंमें ३ । २० अंशकला स्पष्ट होताहै तो पूर्वचालक से इष्टसमय पर्यन्त अन्तरांकमें कितना होगा. जो उत्तर मिले उसमें राशिसंबंधि नक्षत्रोंके जितने चरण ग्रहके मुक्त करलिये उतने ३ । २० । जोड़ते जाना भाषाटीकासमेता। (११) जहांतक इष्टदिन समय का पूर्व चालक मिलता है. जितना समय हो उसमें त्रैराशिकका गत फल जोड़देना यह स्पष्ट होजाता है. इतना स्मरण इसमें मुख्य चाहिये कि ९ चरण नक्षत्रोंकेसे एक राशि होती है, एक चरण नक्षत्र भोग में ३ अंश २० कला स्पष्ट होता है, एवं ६ । ४० में दो चरण १० । ० में तीन चरन १३ । २० में चार चरण १६ । ४० में पांच चरण २० । ० में छः चरण २३ । २० में ७ सात चरण । २६ । ४० में आठ ३० । ० में नौ चरण पूरे होजाते हैं, यही नवांशक क्रमभी है, एकचरण अर्थात् ३।२० अंशकी २०० कला होतीहैं, ये सभी अंक त्रैराशिक में काम आताहै.उदाहरण-संवत् १९४३ वैशाखबदि द्वादशी शनिवार १३ घटी५४पला में वर्षप्रवेश है। इसके पूर्वदिन शुक्रवार ४१ घटी ४६ पलोंमें रेवतीके तीसरे चरणपर चालक है, और चतुर्दशी सोमबार को ५३ घटी ३ पलोंमें रेवतीके चौथे चरणपर चालक है, इनका अंतर ३ दिन ११ घ०१७ पल हुवा. प्रथम चालक से इष्ट समय पर्यंत, दिन ।३२ घटी ८ पल अंतर हुवा अब त्रैराशिक है कि ३ । ११ । १७ दिनादि अंतर में ३ अंश २० कला स्पष्ट हुवा, तौ अंतर दिनादि । ३२॥ ८ में कितना होगा ३२२० से ० १३२।८ गुननाहै ३ । ११ । १७ से भाग देनाहै गुणन भाजनक्रम गोमूत्रिका और भिन्नकी रीतिसे है. सुगमतासे समझनेके लिये वह विधि ऐसी भी है कि ३ अंशको ६० से गुनदिया. २० कला जोड़ दी २०० कला पिंड गुणक हुवा, दूसरी राशि ० । ३२ । ८ शून्यके स्थान में कुछ अंक होता तो ६० से गुनकर३२ जोड़ना था यहां शून्य ही में ३२ गये अब ३२ को ६० से गुनकर १९२० में आठ जोड़ दिये १९२८ गुणक हुवा. गुण्यगुणक को परस्पर गुण देने से ३८५६०० हुवा इसमें ३।११।१७ के पिंड ११४७७ से भागदिया.३३ कला मिलीं, शेष अंक- को ६० से गुणकर भाग हारसे भाग देकर लब्धि उसके ऊपर अंश होते शेष कला रहती यहां ३३ साठसे न्यून है तो यही कला रही अंश ० । इसमें अब विचार है कि रेवती के तीसरे चरण में । ३३ । ३६ अंशादि 1 (१२) ताजिकनीलकण्ठी। स्पष्ट बुधका हुवा इसके पूर्व एक चरण पूर्वाभाद्रपदका ४ चरण उत्तराभाद्रपदका दो चरण- रेवतीका यह सब सात चरण भुक्तहुयेमें २३ अंश २० कला स्पष्ट मुक्त हुवा अब शेष रेवती तृतीय चर- णके अनुपातागत अंशादि ।३३। ३६ जोडदिये २३३५३३३६ अंशादि स्पष्ट हुवा, बुध मीनका होनेसे राशिके स्थानमें ११ लिखना योग्यहै ११॥ २३।५३ । ३६ राश्यादि धका तत्काल र होगया यही रीति और की भी जानना यह दोनों प्रकार सुगमता निमित्त स्थूलतर कहे हैं- स्थूल कायं इनसें साधन करते ही हैं सूक्ष्म विचार तो ग्रहलाघव महादेवी मकरंद रामविनोदादि करणसारणियोंके होतेहैं और इनसे भी सूक्ष्म सिद्धांतों से होताहै ऐसी ही विधि चंद्रस्पष्टकी भी है सो आगे है ॥ १८ ॥ (भुजंगप्रयातम् ) खषड् भयातं भभोगोघृतं तत्सतर्कन- धिष्ण्ये तं द्विनिघ्नम् ॥ नवा शशी भागपूर्वस्तु : खखाभ्राष्टवेदा भभोगेन भक्ताः ॥ १९ ॥ जिस दिनका चंद्र स्पष्ट करना हो उसदिन नक्षत्र का इष्ट कालमें भुक्तभो ग्य सर्वभोग्य करलेना. रीति यह है कि इष्टसमयपर्यंत उक्त नक्षत्र जितनाघटी पलभुक्तहुवा उसे भुक्तकहते हैं, जितना बाकी रहा उसे भोग्य और दोनों को मिलाकर सर्व भोग्य होता है. भुक्तको ६० से गुनकर सर्व भोग्यके भाग लेनेसे जो मिले उसे षष्टि प्रमाण मुक्त कहते, हैं वर्तमान नक्षत्रसे पूर्व अश्चिन्यादि जितने नक्षत्र व्यतीत हुये उतनी संख्याको ६० साठसे गुणाकर वर्तमान नक्षत्रकी भभोगके भागसे मिली हुई घट्यादि जोड देनी सभी अतीत घटिका हुई उपरांत दोसे गुणाकर नौ ९ से भाग लेना लब्धि अंश होतेहैं, शेष साठसे गुनाकर नौसे भाग देना लाभ कला होतीहैं. पुनः शेष साठसे गुणाकर नौसे भाग देना लाभ विकला मिलतीहैं, अंश ३० तीससे अधिक हो तो तीस हीसे भाग देना लाभ राशि शेष अंश होतेहैं, यह चंद्रमा स्पष्ट सिद्धि होजातीहै, उदाहरण-संवत् १९४३ वैशाख वदि द्वादशी शनिवार इष्ट घटी १३ पल ५४ इस समय पर उत्तराभाद्र नक्षत्रकां भुक्तघटी ५४ पला १३ भोग्यघटी १० पला ४१ सर्व भोग्यघटी ६४ पला ५४ षष्टिप्रमाण भुक्त भाषाटीकासमेता। (१३) घटी ५० प० ८ अश्विनीसे पूर्वाभाद्रपर्यंत २५ नक्षत्र मुक्त हुये, इस अंकको ६० साठसे गुना किया १५०० हुए वर्तमान उत्तराभाद्र षष्टि मान भुक्त ५०। ८ जोडदिया १५५० । ८ इस्को दुगुना किया ३१०० १६ नौसे भाग लिया लाभ ३४४ अंश हुये शेष ४ आठसे गुनाकर अव- शिष्ट १६ जोडदिये २५६ नौसे भाग लिया लाभ २८ कलाहुई शेप ४ पुनःसाठसे गुनाकर २४० नौसे भाग लिया; लाभ २६ विकला हुई.अंशा- दिचंद्र स्पष्ट ३४४ । २८ । २६ हुआ अंशस्थानमें अंक तीससे अधिक होनेसे ३०से भागलिया. लाभ११ राशि शेष १४ अंश हुये ११।१४।२८॥ २६ यह चन्द्र स्पष्ट होगया.दूसरे प्रकार उदाहरण यह है कि, अश्विनीसे पूर्वा भाद्रपदाके तीन चरणपर्यंत ग्यारह राशि पूरी भुक्त होगयीं, शेष पूर्वाका चतुर्थ चरण और उत्तराभाद्रके ४५ घटी षष्टिमान मुक्त पर्यन्त तीन चरण मुक्त होजानेसे १३ अंश २० कला भुक्त होगयीं अर्थात् उत्तराभाद्रके ४५ घटी भुक्त पर्यन्त चन्द्रस्पष्ट ११ । १३।२०। ० होगया, अब उत्तरा भाद्रके ५ घटी ८ पल अवशेष भुक्तमें हैं इसका त्रैराशिक यह है कि१५घटी भुक्तमें ३ । २० अंश स्पष्ट होता है तो ५ घ. ८ पः में कितना होगा ! ५। ८ घटीके पिंड ३०८ को ३१२० के पिंड २०० से गुनाकिया६१६०० इसमें १५ घटीके पलात्मक पिंड ९०० से भागदिया, लाभ ६८ कला हुई शेष ४०० को साठसे गुनाकर २४००० भाग हार ९००से भाग लिया लाभ २६ विकला हुई. यहां कला ६० से ऊपर होनेसे साठहीसे भागदिया लाभ १ अंश शेष ८ कला रहीं, १।८।२६ इस समलग्न लाभको पूर्वागत ११।१३।२०।० में जोडदिया ११ । १४ । २८ । २६ यह चन्द्र स्पष्ट होगया, दोनहूं प्रकार एकही स्पष्ट मिलताहै यहां दूसरा उदाहरण पूर्व लिखाहै. ( अब चन्द्रमाको गति बनानेकी रीति ) एक नक्षत्रका स्पष्ट १३ अंश २० कला हैं इसकी कला ८०० को साठसे गुनाकर ४८००० विकलापिंड होताहै, इसमें नक्षत्रके सर्व भोग्यसे भागलेना जो मिले वह चंद्रमाकी स्पष्टगति होतीहै. उदाहरण-४८००० में (१४) ताजिकनीलकण्ठी। उत्तराभाद्रके सर्वभोग्य ६४ । ५४ का पलात्मक पिंड ३८९४ से भाग देनेके लिये, इस्को ६० से गुनाकर पला पिंड किया तो भाज्य भी ६० से गुणदिया २८८०००० भागहार ३८९४ से भागलेकर ७३९ लब्धि+शेष २३३४ को ६० से गुनाकर भागहारसे भागलिया लब्धि ३५ यह ७३९ । ३५ चंद्रमाकी गति होगई ॥ १९ ॥ (उ॰जा॰)पूर्व नतं स्यादिनरात्रिखंडं दिवानिशोरिष्टघटीविहीनम् । दिवानिशोरिष्टघटीषु शुद्धं धुरात्रिखंडं त्वपरं नतं स्यात् ॥२०॥ ग्रहस्पष्टके उपरांत भाव स्पष्ट के फलके निमित्त आवश्यकता है, लमदशम स्पष्टसे भाव स्पष्ट होतेहैं,प्रथम दशम स्पष्टसाधनार्थ नतसाधन कहते हैं कि अर्द्ध रात्रिसे उपरांत दिनाईपर्यंत पूर्वनत और मध्याह्नसे उपरांत सायंकालपर्यन्त दिवापश्चिमनत होताहै. सूर्यास्तसे अर्द्धरात्र पर्यन्तरत्रिका पूर्व नत होताहै- अर्द्ध रात्रिके बाद सय्योदय पर्यन्त रात्रिका पश्चिमनत होताहै. मध्याह्नके भीतरका इष्टकाल हो तो दिनार्धमें इष्टकाल घटा देना. शेष दिवा पूर्वनत होगा मध्याह्नके बाद सूर्यास्त तक इष्टकाल होतो इष्टकालमें दिनाई घटा देना, शेष दिवा पश्चिमनत होगा. सूर्यास्तके बाद अर्द्धरात्र तक इष्टकाल हो तो राज्यमें इष्टकाल को घटा देना शेष रात्रिका पूर्वनत होताहै, और अर्द्धरात्रके बाद सूर्योदय तक इष्टकाल हो तो इष्टकाल में राज्यई घटा देना, शेष रात्रिका पश्चिमनत होगा. यहाँ १५ में नत घटाने से उन्नत होताहै परंच उन्नत का कोई प्रयोजन नहीं है इस लिये उन्नत का नाम नहीं लिखाहै. इन नतोंका प्रयोजन दशम स्पष्टमें लगेगा. उदाहरण-यहां इष्टकाल घ.१३ प.५४है,दिनाई घ.१६ १.३१ है, दिनाईमें इष्टकाल घटाया तो शेष रहा घ. २ ५.३७ यह दिनका पूर्वनत हुवा ॥२०॥ (अनु०) तत्काले सायनार्कस्य भुक्तभोग्यांशसंगुणात् । स्वोदया त्खाग्निलब्धं यद्भुक्तं भोग्यं खेस्त्यजेत् ॥२१॥ इष्टनाडीपले- - भाषाटीकासंमेता। (१५) भ्यश्च गतगम्याग्निजोदयात् ॥ शेष खव्याहतं भक्तमशुद्धन लवादिकम् ॥ २२ ॥ अशुद्धशुद्धमे हीनं युक्तनुर्व्ययनां- शकम् ॥ एवं लंकोदयैर्भुक्तं भोग्य शोध्य पलीकृतात् ॥२३॥ तात्कालिक सूर्य स्पष्टमें अयनांश जोड़ना जो अंकराशिका है, उसके आगेकी राशि स्वोदय हुवा शेष अंशादि मुक्त हुये, तीसमें घटायके भोग्यांश होतेहैं इन भोग्यांशादिकोंको वा भुक्तांशादिकोंको स्वोदय अर्थात् जिस राशिका अंशादि था उसी संख्याका स्वदेशीय लमखंडसे तीनों स्थानोंमें पृथक् २ गुनाकर तीससे भाग लेना लब्धिपलादि सूर्यके भुक्त वा भोग्य होतेहैं अर्थात् भुक्तांशादिकोंसे स्वोदयको गुनते हैं तो३०तीसका लाभ भुक्तसंज्ञक हो ताहै और भोग्यसे कियेहैं तो भोग्यसंज्ञक होताहै इन पलादिकोंको इष्टघटीकी पलाओंमें घटाय देना जो शेष रहै उसमें स्वोदयकी राशिसे नीचे अथवा उपरांत जितने लमखंड घटें एक एक करके घटाते जाना जो लमखंड न घटे उस्की अशुद्ध संज्ञा हुई घटानेसे जो शेष रहा उसे३०तीससे गुनदेना. अशुद्ध- संज्ञक लग्नखंडसे भाग लेना लाभ अंशादि हुये स्वोदयसे लेकर जितने लग्नखंड पूर्व घटाये उतनी संख्याकी राशि उन लब्ध अंशादिकोंके. पूर्वमें स्थापन करनी यह भोग्य रीतिका क्रम है, भुक्त रीतिमें अशुद्धमें घटादेना उपरांत अयनांश घटाय देना यह लम स्पष्ट होजाताहै. उदाहरण-संवत् १९४३ वैशाख कृष्ण द्वादशी शनिवार इष्टघटी १३ पला ५४ सूर्य स्पष्ट ०१८ ४२॥३१अयनांश२२१४४ जोडदिया. ११११।२६।३१ यह सायन सूर्य्य हुवा इसमें राशि है यह वृषस्वोदय हुवा शेष अंशादि ११।२६।३१भुक्तहुये ३० तीस में घटायके १८१३३।२९ ये भोग्यांशादि हुये अब इनको स्वोदय खंडोंसे गुनदेनाहै. लमखंडोंकी रीति यह है कि लंकोदय२७८।२९९।३२३ कमसे. और यही उत्कमसे ३२३।२९९।२७८हैं इनमें अभीष्ट देशके चर- खंडोंको एक आवृत्ति तीनोंमें जोडदेना दुसरी आवृत्ति तीनोंमें घटाय देना- लमखंड होते हैं, जैसे श्रीनगरके पलभा७ । ० (त्रिछा हवाः स्युर्दशभिर्भुजंगै- (१६) ताजिकनीलकण्ठी। दिग्भिश्वरानि गुणोद्धृतात्या ) इस विधिकरके ७० ।५६ । २३ चर- खंडहैं इनको एक आवृत्तिमें घटाय दिया तो मीन मेषके २०८ वृषकुंभके २४३ मिथुन मकरके ३०० और दूसरी आवृत्तिमें चरखंड जोड़दिया तो कर्क धनके ३४६ सिंह वृश्चिकके ३५५ कन्यातुलाके ३४८ ये श्रीनगरके लग्नखंड हुये, यहां स्वोदय वृष २४३ से भोग्यांश गुनदिये४३७४।८०१९। ७०४७ नीचेके दो अंक ६० से चढायदिये तो ४५०९ । ३६ । २७हुये ३० से भागलिया लाभ १५०।१९।१२ भोग्य कालहुवा ऐसी ही रीति भुक्तांशादिसे भी होतीहै. अब इष्ट घटी १३ । ५४ की पलाओंमें ८३४ भाग्यांश १५० । १९ । १२ घटाय दिये ६८३ । १० । ४८ हुये अब इसमें स्वोदय वृषसे उपरांत मिथुन ३०० घटाया ३८३ इसमेंभी कर्क ३४६ घटाया तो ३७१४०।४८ इसमें सिंह ३५५ घटाना था नहीं घटता तो इसकी अशुद्ध संज्ञा हुई शेष ३७ । ४० । ४० को पृथक् तीससे गुन- दिया११३० । २४ । ० इसमें अशुद्ध ३५५ से भाग लिया लाभ३।११। ३ अंशादि हुये कर्क पर्यंत घटगये इससे ४ राशिके स्थानमें स्थापन कर दिया ४ । ३११ । ३ इसमें अयनांश २२ । ४४ घटादिया तो ३। १० । २७ । ३ यह लग स्पष्ट होगया, जब स्वोदय न घटे तो, इष्टको ३० से गुनाकर सायन सूर्यके लमखंडसे भाग लेना तो अंशादि मिले वह सूर्योदयसे पूर्वका इष्टकाल होय तो सायन सूर्यमें घटायके और परका होय तो जोड़के अयनांश घटायके लम स्पष्ट होजाताहै ॥ २१-२३ ॥ (अनुष्टुप् ) पूर्वपश्चान्नतादन्यत्प्राग्वत्तद्दशमं भवेत् । सषड्भे ल खे जायातुय्यौँ लग्नो न तुर्य्यतः ॥ २४ ॥षष्टांशयुक्तनुः संधिरने पष्ठांशयोजनात् त्रयः ससंधयो भावाः पटांशो नैक- युक्सुखात् ॥ २५॥ अग्रे त्रयः षडवं ते भाईयुक्ताः परेपि- षट् ॥ खेटे भावसमे पूर्ण फलं संधिसमे तु खम् ॥ २६ ॥ अब दशम लग स्पष्टकी विधि कहते हैं, कि पूर्वोक्त प्रकारसे नतोन्नत .. भाषाटीकासमेवा। (१७) सूर्य तात्कालिक स्पष्ट सायन स्वोदयगुणित भुक्तभोग्यांशऋणसंज्ञकलम क्रमसे करके भोग्य भुक्तका पलात्मक सूर्य स्पष्ट करके लनस्पष्टमें इष्टकालकी पलावोंमें घटाया, यहां नत वा उन्नतको इष्ट मानकर उसकी घटिकाकी पलाओं में घटाना और विधि सभी लग स्पष्टोक्तवत् करनेसे दशम लग्न स्पष्ट होताहै. जैसे-पूर्व लग्न स्पष्ट करनेमें तात्कालिक सूर्य स्पष्ट लियागया, वही यहांभी लिया जाताहै. उनका भुक्तांशादिकोंमे उसीके राशिसंख्यक लमखंड गुनके तीससे भाग लेनेसे लाभ पलादि सूर्य्यकी होंगी, पश्चात् उन्नत पलाओंको इष्ट- काल मानकर इनमें सूर्यके पलादि बटाय देना, उपरांत सूर्यराशि लम- खंड घटाना, यदि न बटे तो शेष पलादिकोंको तीससे गुनकर पूर्व अशुद्ध लमखंडसे भाग देना, लब्धि अंशादि हुये.अशुद्ध लग्न राशिमें घटायके अय- नांश घटाय देना वह लग्नस्पष्ट राश्यादि होजायगा, इस प्रकार देशम होता है यह ऋणसंज्ञक विधिहै यहां वही तत्काल सूर्य स्पष्टके अंशादि ३० में वटायके स्वोदय में गुनना ३० से भाग लेकर लब्धि पलादि सूर्यका भोग्य हुवा इसे पश्चिम नत जो इष्ट मानाहै उसके पलावों में घटाय देना. जो न घटे तो शेष ३० से गुनाकर अशुद्ध लग्नसंडसे भाग लेना लाभ अंशादि राश्यादि यथाक्रमसे योजित करके अयनांश घटाय देना, राश्यादि दशम लम स्पष्ट हो जाताहै यह धनसंज्ञक विधिहै इस प्रकार लग्न दशम स्पष्ट करके लग्न स्पष्टमें छः राशि जोडके सप्तम भाव स्पष्ट होताहै. ये ४ भावोंके स्पष्ट होगये. और भावसंधियोंकी रीति इस प्रकार है कि चतुर्थभावस्पष्टमें लग्नस्पष्ट घटाय देना. शेषमें छः से भाग लेनेसे लाभ षष्ठांश हुवा. यह लग्नमें जोडनेसे तनुधनकी संधि होतीहै इस संधिमें जोडनेसे द्वितीय भाव होता है. ऐसेही द्वितीयभावमें जोडनेसें २।३ की संधि, इसमें जोडनेसे तृतीय भाव और इसमें भी जोडनेसे ३ । ४ की संधि होगी इस संधिमें जोडनेसे सुखभाव जो दशममेंराशि जो डके बनाहै वही मिल जायगा. उपरांत पूर्वानीत षष्ठांशको एक राशिमें घटा- यके जो क्षेपकहो वह चतुर्थभावमें जोडनेसे ४ । ५ की संधि होगी. संधिमें .

(३८) ताजिकनीलकण्ठी। जोडनेसे पंचमभाव और इस भावमें जोडनेसे ५१६ की संधि संधिमें जो- डनेसे पष्टभाव. इसमें जोडनेसे सप्तमभाव जो लममें ६ राशि जोडकर हुई. वही मिलजायगी.अव सप्तमभावसे उपरांत लग्नादिकोंमें राशि जोडते जाना. सप्तमादि स्पष्ट होजायँगे, जैसे लग्नमें ६ जोडनेसे सप्तमभाव हुवाहै, लम धन- संधिमें जोडनेमे सप्तमाष्टमभावकी संधि होगी. एवं द्वितीयभावसे अष्टमभाव, संधिमे सन्धि तृतीयसे नवम सन्धिसे संधि चतुर्थ से दशम संधिसे सन्धि, पंचम भावसे लाभभाव सं०से सं०छठेमें बारहवां सं०से सं० इस प्रकार बारह भावोंके स्पष्ट सन्धियोंसहित होते हैं. अति सुगम होनेसे उदाहरण न लिखा. इन भाव- स्पष्टोंका प्रयोजन यह है कि, ग्रहस्पष्ट जिस भावस्पष्टपर मिले वह यह उसी भावका फल देताहै. सन्धिगत यह मिश्रित फल दोनों भावोंका देताहै. परंतु यह फल युक्तिसिद्ध है. ग्रंथकर्ताकी उक्ति तो यह है कि जो यह स्पष्ट जिस भावस्पष्टके तुल्य है वह उस भावका फल पूर्ण देताहै. सन्धिगत यह फल नहीं देता इनके फल अगले तंत्रमें हैं ॥ २४ ॥ २५ ॥ २६ ॥ शालिनी -युक्तं भोग्यं स्वेष्टकालानशुदेत्रिशन्निनात्स्वोदया- लवाद्यम् ॥ हीनं युक्तं भास्करे तत्तनुः स्याद्रात्रौ लयं भाई- युक्तावेस्तु ॥ २७॥ जब इष्टकाल सूर्योदयसे पूर्व वा पश्चात् दो घटी हो अर्थात् लग्न और सूर्य एक राशिमें हों तो पूर्वोक्त विधिसे सूर्यके मुक्त वा भोग्य पला बना कर इष्टकाल पलाओंमें घटे तो चटार देना. न घटे तो अल्पेष्टकाल पलाओंको तीससे गुनाकर स्वोदयसे भाग लेना, फल अंशादि तत्काल सूर्य स्पष्टमें पूर्वोक्त ऋण धन कमसे हीन वा युक्त जैसा संभव हो करना, उपरांत अश्नांश घटायके लनस्पष्ट होताहै. ऐसे ही दशम लमके लिये नतेष्ट- काल पलाओंसे करना. रात्रिका इष्टकाल हो तो सूर्य स्पष्टमें ६ राशि जोडके पूर्वोक्तविधि करनी. हेतु इसका यह है कि उदयकालिक सूर्यसे रात्रि इष्टकालपर्यंत बहुत लग्नखंड घटाये जाते हैं इसमें , न कुछ

.
भाषाटीकासमता।
(१९)
अंतर हो जाताहै छः राशि जोड़नेसे बहुत लगखंड न घटेंगे अंतर मी नहीं
पड़ेगा सुगमता भी है ॥ २७ ॥
अनुष्टुप्-खेटे संधिद्वयांतःस्थे फलं तद्भावजं भवेत् ॥
हीनेऽधिक द्विसंधिभ्यां भावे पूर्वापरे फलम् ॥२८॥
दो संघियोंके अन्तर्गत जो ग्रह है वह वही भावका फलं देताहै, और भावकी
पूर्वसंधिमें ग्रह छटै तो पूर्वभावका फल देता है और ग्रहस्पष्टमें परसंधिस्पष्ट
स्टे तो परभावका फल देता है ॥ २८ ॥
अनु०-ग्रहसंध्यंतरं कार्य विंशत्या गुणितं भजेत् ॥
भावसंध्यन्तरेणाप्तं फलं विंशोपकाः स्मृताः ॥ २९ ॥
यहस्पष्ट जिस भावमें या उसके परसंधिमें हो तो उसी संधि और ग्रहसे
अंशादि अंतर करना. उस अंतरको २० से गुनकर भाव और संधिके अंतरसे
भाग देकर जो मिले वह विंशोपका बलं होताहै बलशून्य होनेमें फलशून्य,
बलमध्यममें मध्यम और पूर्णबलमें पूर्णफल ग्रह भावका देताहै, ॥ २९ ॥
उपजा०-भौमोशनःसौम्यशशीनवित्सितारेज्यामिंदांगिरसो
गृहेश्वराः ॥ आधाः जाया रक्तिोपि मध्यमाः सितात्तृतीयाः
क्रियतोह ण ॥३०॥
दश के निमित्त बलाबल विचारना चाहिये इसलिये स्वगृह उच्च हद्दा
नैराशिक मुशल्हः पंचवर्गी बलगणनामें प्रथम राशिस्वामी इक्काणस्वामी
कहते हैं. कि, मेषका स्वामी मंगल, वृषका उशना (शुक्र) मिथुनका
बुध, कर्कका चंद्रमा, सिंहका सूर्य्य, कन्याका बुध, तुलाका शुक्र, वृश्चिक
का मंगलं धनका बृहस्पति, मकरका शनि, कुंभका शनि और मीनका बृहस्पति
ये राशिस्वामी हैं. द्रेष्काण विभाग को कहते हैं. एकराशिके ३० अंश होतेहैं
दश दश अंशका एक एक द्रेष्काण होताहै. लम ग्रहस्पष्ट प्रथम २ ११०
अंश के भीतर हो तो मंगलसे गिनना, १० अंश ऊपर २० के भीतर दूसरा
द्रेष्काण हो तो मंगल से छठा सूर्यसे और २० अंश ऊपर ३० के भीतर
तीसराद्रेष्काण हो तो सूर्यसे छठा शुक्रसे गिनना प्रगट चक्रमें लिखा है।॥३०॥

(२०) वाजिकनीलकण्ठी। शशाराहा७१८।९।१०१शश्शराशि बु बृ शु श स च न तु वृ शु श अंश स.चं में वुशुश रचं मं बु || अंश शुश सचं शु श स चं मं! अंश . इंद्रवज्रा-सूर्यादितुगमजोक्षनक्रकन्याकुलीरांत्यतुलालः स्युः ।। दिग्भिर्गुणैरष्टयमैः शरैकैर्भूतैर्भसंख्य खसंमितैश्च ॥३१॥ सूर्यका उच्च मेषके दश अंशपर, चंद्रमा का वृषके ३ अंशपर, एवं मंगल का मकर के २८ पर, बुधका कन्याके १५ अंशपर, बृहस्पतिका कर्कके ५ पर,शुक्रका मीनके२७अंशपर,शनिका तुलाके २० अंशपर परमोच है॥३१॥ ग्रहा: सु. चं . म. बु. बृ. १ or शु. श. १२ ७६ २० m १० २८ १५ ५ नीच. ur ३ ११ २८।१५ ९ ५ १० m २७ २० स पजा-तत्सप्तमं नीचमनेन हीनो ग्रहोऽधिकञ्चेद्रसभा- द्विशोध्यः ॥ चक्रात्तदंशाङ्कलवो बलं स्याक्रियेणतौलीदु- भतो नवांशाः॥३२॥ उच्चराश्यंशक पूर्व श्लोकमें कहे गये उससे सप्तम नीच होता है. उच्चराश्यश- कमें ६ राशि जोडनेसे नीचराश्यंश परम होता है. उच्च बलकी विधि कहते हैं। ग्रहके नीच स्पष्टको तत्काल स्पष्ट ग्रहमें घटा देना न घटे तो ग्रहस्पष्ट में १२ जोडके घटाना, शेष ६ राशिसे ऊपर हो तो १२ में घटाके षड्भाल्प कर लेना, फिर उसका अंशादि करके ९ का भाग देना, लब्धि उबबल होता है. उदाहरण-संवत् १९४३ वैशाखकष्ण द्वादशी शनिवारको इष्ट घटी १३ पल ५४ सूर्यस्पष्ट ००।१८१४॥३१ सूर्यका उच्चस्पष्ट ३७ । . । नीचस्पष्ट ६।१०11' को रविस्पष्ट में घटाया शेष ६।८। २।३१ इसको १२ में घटाके षड्भाल्प किया ५।२१ । १७ १२९

भाषाटीकासमेता।
(२१):
अब यही ५। २१ । १७ । २९ के राशिको ३० से गुनाकर १५०अंश
इसमें२१ जोडदिये १७१ १ १७१२९ हुये इसमें ९ से भाग लेकर १९।१।
'. ५६।३३ । २० यह उच्चबल हुवा ऐसेही सभी ग्रहोंके उच्चबलकी रीतिहै ।
मुशल्लह नवांशको कहते हैं. एक राशि ३० अंश नौभाग ये हैं.
९
२०६४।१०।१३।२०।१६८०/२००२३/२०२६/८०३००
मेष सिंह धनके नवांश मेषसे गिनना. वृष कन्या मंकरके मकरसे. मिथुन
तुला कुम्भके तुलासे, और कर्क वृश्चिक मीनके कर्कसे यह नवांशक 'मुश-
लह' की रीतिहै ॥ ३२॥
उपजा०-मेगताष्टशरेषु भागा जीवास्फुजिज्ज्ञारशनैश्चराणाम् ।।
वृषेष्टपण्नागशरानलांशाः शुक जीवार्किकुजेशहदाः ॥३३ ॥
हदा के स्वामी कहते हैं-मेषके ६ अंश पर्यन्त बृहस्पति की हद्दा ६
से १२ लौं शुक्रकी १२ से वीस २० लौं बुधकी २० से २५ तक मंगल
की २५ से ३० लौं शनैश्चर की; वृषके ८ अंशपर्यन्त शुक्रकी ८ से १४
लौं बुधकी १४ से २२ लौं बृहस्पति की २२ से २७ लौं शनिकी २७ से
३० तक मंगलकी 'हद्दा' होतीहै ।। ३३ ।।
उपजा०-ग्मे षडंगे नगांगभागाः सौम्यार जिज्जीवकुजाहिद्दाः
ककेंद्रितकोगनगाब्धिभागाः कुजास्फुजिज्ज्ञज्यशनैश्चराणाम् ॥३॥
मिथुनके ६ अंश पर्यंत बुधकी ६ से १२ लौं शुक्रकी १२ से १७
लौं बृहस्पतिकी ३७ से २४ लौं मंगलकी २४ से ३० लौं शनिकी
के ७ अंश पर्य्यन्त मंगलकी ७ से १३ लौं शुक्रकी १३ से १९ लौं ध
की १९ से २६ लौं बृहस्पतिकी २६ से ३० लौंशनिकी 'हवा' होतीहै॥३४॥
उपज़ा-सिंहेंगभूतादिरसांगभागा देवेज्यशुक्राकिंबुधारहदाः ॥
स्त्रिया नगाशाब्धिनगाक्षिभागा सौम्योशनोजीवकुजार्किनाथा ॥३०॥

(२२)
ताजिकनीलकण्ठी।
सिंहके ६ अंश पर्यन्त बृहस्पतिकी ६ से ११ लौं शुक्रकी ११ से १८
लौं शनिकी १८ से २४ लौं बुधकी २४ ते ३० लौं मंगलकी; और ‘क-
न्याके ७ अंश पर्यन्त बुधकी ७ से १७ लौं शुक्रकी१७ से २१ लौं बृहस्प-
तिकी २१ से २८ लौं मंगलकी २८ से ३० लौं शनिको 'हवा' होतीहै॥३५॥
उपजा-तुले रसाष्टाद्विनग क्षभागाःकोणज्ञजीवास्फुजिदारनाथा॥
कोटे नगान्ध्य शरांगभागा भौमास् जिज्ञज्यशनैश्चराणाम्॥३६॥
तुलाके ६ अंश पर्य्यन्त शनिकी ६ से १४ लों बुधकी १४ से २१
लों बृहस्पतिकी २१ से २८ तक शुक्रकी २८ से ३० लों मंगलकी; और
वृश्चिकके ७ अंश पर्यन्त मंगलकी ७ से ११ लों शुक्रकी ११ से १९ लों
बुधकी १९ से २४ लों बृहस्पतिकी २४ से ३० लों शनिकी ॥ ३६॥ .
पजा०-चापे खीष्वंबुधिपंचवेदा जीवास्फुजिज्ज्ञारशनैश्चराणाम् ।।
मृगे नगाब्ध्य युगश्रुतीनां सौम्येज्य कार्किकुजेशहदाः॥३७॥
धनके १२ अंश पर्यंत बृहस्पतिकी १२ से १७ लों शुक्रकी १७ से
२१ लों बुधकी २१ से २६ लों मंगलकी २६ से ३० लोशनिकी. और
मकरके ७ अंश पर्यन्त बुधकी ७ से १४ लों बृहस्पतिकी १४ से २२ लों
शुक्रकी २२ से २६ पर्यंत शनिकी२६से३० तक मंगलकी 'हदा होतीहै३७॥
उपजा०- भे नगांगादिशरेषुभागाः ज्ञशुक्रजीवारशनैश्चराणाम् ॥
मीनेकवेदानलनंदपक्षाः सितेज्यसौम्यारशनैश्चराणाम् ॥ ३८ ॥
कुंभके ७ अंश पर्यन्त बुधकी ७ से १३ लों शुक्रकी १३ से २० लों बृह-
स्पतिकी २० से २५ लों मंगलकी २५ से ३० लों शनिकी; और मीनके
१२ अंश पर्यन्त शुक्रकी १२ से १६ लों बृहस्पतिकी १६ से १९ लों बुधकी
१९ से २८ लों मंगलकी २८ से ३० लों शनिकी 'हद्दा' होतीहै ॥ ३८॥
उपजा०-त्रिशत्स्वमे विंशतिरात्मतुंगे हहेक्षचंद्रा दशकं हकाणे ॥
मुंशल्लहे पञ्चलवाः प्रदिष्टा विंशोपका वेदलवैः प्रकल्प्याः॥३९॥

॥ भाषाटोकासमेता। (२३) पंचवर्गी बलके न्यास इस प्रकार हैं, कि, गृहबलमें ३० विश्वेवल पाता । है, उच्चबलमें २० विश्वे, हद्दामें १५ विश्वे, द्रेष्काणमें १० विश्वे और मुशल्ल- हमें ५ विश्वे; इन सबमें मिलेहुये जोड़के ४ भाग देनेसे लब्ध विंशोपक बल होताहै ॥ ३९ ॥ हदाचक्रम् । मे वृमिक सिकातु| व | धमाकुमी राशयः बृ शु/बु में बुशमं बु बु शु ग्रहाः १२७७१२ अंशाः शुबु शु शु शु शु बु शु शु शुबु तथा ६४ वु बुशबुबु 809 तथा R मशमं तुम वृमं श मं मं तथा ५/५/४५ शमं शशमश मंशश मंशश तथा ५/३/६४/६/२/२/६/४/४/५/२ इंद्रवज्रा-स्वस्वाधिकारोक्तबलं हृढ़े पादोनमर्दै समभेरिभेनिः॥ एवं समानीय बलं तदैक्ये वेदोद्धृते हीनबलः शरोनः॥४०॥ पूर्वश्लोकोक्त पंचवर्गी बलका नियम है कि, यह अपने गृहादि अधिकारोंमें पूर्ण बल और मित्रकेमें चौथाई कम, समग्रहके में आधा, शत्रुके अधिकारमें चतुर्थांश बल पावाहै. जैसे-पहिले स्थानबलमें अपनी राशिका ग्रह पूरे ३०। ० बल और मित्र राशिमें पादोन २२ । ३० समकी राशिमें आधा • शत्रु राशिमें चौथाई ७ । ३० पाताहै. दूसरे उच्चबलमें परमोच्चपर पूरे २० । ० और परम नीचमें ० । • बीचके राशियोंमें अंतर करनेसे मिलताहै. उसकी विधि (३२) श्लोक ( वत्सप्तमं नीचमनेन हीने- त्यादि) में कहागयाहै ( तीसरे) हद्दाबलमें अपनी हद्दाका ग्रह १५॥ पूरा और मित्रहदामें पादोन ११ । १५ में आधा ७ । ३० शत्रुमें चौ- थाई ३। ४५ बल पाताहै. चौथे द्रेष्काण बलमें अपने द्रेष्काणका ग्रह पूरे १०। और मित्रद्रेष्काणमें पादोन ७।३० सममें आधा. ५। शत्रुमें १५१० . . ३ २२ ३० ११ १५ ३० १५ उपरांत अनुपातसे २ ३० ० २० ३ २ १ शत्र ३० ० १५ (२४) ताजिकनीलकण्ठी। चौथाई २ । ३० पांचवाँ ( मुशलह ) नवांश अपने नवांशका पूरे ५। ०. बल मित्रका पादोन ३ । ४५ सममें आधा २॥ ३० शत्रुनवांशमें चौथाई १ । १५ बल पाताहै. इस प्रकार पांचों बल लेकर सबका ऐक्य एक जुदे गृह | उच्च | हद्दा देष्का-नवांश कोष्ठमें स्थापन करना, उसमें ४ * से भाग लेकर लाभ विंशोपका- पल होताहै. उसे भी जुदे जुदे मित्र स्थानों में स्थापन करता ग्रह ५ सम अंक पर्यन्त निकृष्ट बल ५ से * १० पर्यन्त हीनबल १० से १५ लों मध्य बल १५ से २० लों पूर्ण वली कहाताहै; जैसा जिसका वल वैसा ही फलभी देताहै ॥ ४० ॥ शालिनी-क्षेत्रं होरा व्यब्धिपंचांगसप्तवस्वकांशेशार्कभागास्सुधीभिः॥ विज्ञातव्या लग्नसंस्थाः शुभानां वर्गाःश्रेष्ठाः पापवर्गास्त्वनिष्टाः॥११॥ अब दादशवर्गी बल कहतेहैं. राशि ३ होरा २ द्रेष्काण ३ चतुर्थांश ४ पंचमांश ५ षष्ठांश ६ सप्तमांश ७ अष्टमांश ८ नवमांश ९ दशमांश१० एका- दशांश ११ द्वादशांश १२ ये द्वादश वर्ग हैं. पापवर्ग और शुभ वर्ग अलग करके देखना, शुभवर्ग अधिक पापवर्ग हीन हो तो वह वर्ष शुभ होगा, विप- रीत होनेमें फलभी विपरीत होताहै ।। ४१ ॥ इन्द्रन-ओजे रवींद्वोः सम इंदुरव्योहोरे गृहाईप्रमिते विचिन्त्ये ॥ नेष्काणपाः स्वेषु नवक्षनाथास्तुर्याशपाः स्वजिकेंद्रनाथाः॥४२॥ प्रथमवर्ग राशीश हैं. यहां आचार्याने पंचवर्गी प्रकरण ३० वें श्लोकमें कहदियाहै. ग्रन्थांतरोंमें, "भौमशुक्रवचंद्रार्कबुधशुकारमंत्रिणः ॥ शौरिश्शनि- स्तथा जीवो मेषादीनामधीवराः ॥” ऐसा है. प्रयोजन वही है १. दुसरा बल होरा विषम राशिके १५ अंश पर्यन्त सूर्यकी ३५ उपरांत चंद्र- भाकी समराशिमें १५ अंश पर्यंत चंद्रमाकी १५ से ३० पर्यंत सूर्यकी होरा " १ भाषाटीकासमेता। (२५) होतीहै. तीसरा, द्रेष्काण प्रथम ३० अंश पर्यत उस राशिसे नवमीं राशिके स्वामीका द्रेष्काण होताहै. इसीको त्रिभाग भी कहतेहैं. चौथा, चतु- ीश १ राशिके ४ चारोंभागोंमें ४ केंद्रों के स्वामी जैसे ७।३० अंशप- पर्यत उसी राशिके स्वामीका ७ । ३० से १५ अंश पर्यंत उस राशिसे चौथी राशिके स्वामीका १५ से २२॥ ३० लो उससे सातवीं राशिके स्दानीका २२ । ३० से ३० । ० पर्यंत उससे दशवीं राशिके स्वामीका चतुर्थाश होताहै ॥ ४२ ॥ अनु:-ओजः पंचमांशशाः कुजार्कीज्यज्ञमार्गवाः ।। समभे व्यत्ययाज्ञया द्वादशांशाः स्वभात्स्मृताः॥४३॥ पाँचवा, पंचमांश विषम राशिमें ६ अंश पर्यत मंगलका ६ से १२ - यत शनिका १२ से १८ लोंबृहस्पति १८ से २४लों बुधका २४ से ३० लों शुक्रका, और समराशिमें विपरीत ६ अंशपर्यंत शुक्रका ६ से १२ लों बुधका १२ से १८ लों बृहस्पतिका १८ से २४ पर्यंत शनिका २४ से ३० लों मंगलका पंचमांश होताहै. बारहवां ( द्वादशांश) १ राशिके बारह विभाग २ अंश ३० कला होतेहैं. जितने भागमें स्पष्टहों स्वराशिसे उतने संख्यक राशि स्वामीका द्वादशांश होताहै ॥ ४३ ॥ उपजा-लवीकृतो व्योमचरोंगशैलवस्वंकदिषुद्रगुणाः खरामैः।। भक्तो गतास्तर्कनगाष्टनंददिगुद्रभागाः कुयुताः क्रियात्स्युः ॥४४॥ पूर्द श्लोकोंमें ६ । ७।८।९।१०।११ अंश छोडकर द्वादशांश कह दिया. अब इनके लिये यह रीति है कि लमादिभाव वा ग्रहस्पष्टकी राशिको ३० से गुनाकर अंश छोडदिया. सभी अंश होगये. उपरांत षष्ठां- शको ६ से सप्तमांशको ७ से अष्टमांशको ८ से नवमांशको ९ से दशमां- शको ३० से एकादशांशको ११ से गुणाकर ३० से भाग लिया लब्धि छोडदेना शेषमें १ जोडके वर्तमान अशेश होताहै १२ से अधिक रहे तो १२ से शेष करदेना. यह श्लोकार्थ है. प्रकट यह है कि षष्ठांशको ३० १ (२६) ताजिकनीलकण्ठी। अंशसे गुनकर ६ से भाग लिया लब्धि ५ एक भाग भया. विषम राशि हो तो मेषसे गिनना, समराशि हो तो तुलासे गिनना. जैसे-विषम राशिमें ५ अंश पर्यंत मेषके स्वामी मंगलका ५ से १० लों वृषेश शुक्रका इत्यादि. समराशिमें ५ अंश लों तुलेशशुक्रका ५ से १० लों वृश्चिकके मंगल का इसी प्रकार सब राशियोंके षष्ठांशेश जानना. सातवां सप्तमांश ३० अंशमें से भागदेके४।१७। १८. १४ यह अंशादि सप्तमांश हुवा. विषम राशि हो तो अपनी राशि से गिनना समराशि हो तो उससे सातवीं राशिसे गिनना, जैसे-विषम राशिमें ४। १७ । १८३४ अंशादि पर्यंत उसीराशिके स्वामीका ८।३४ । १७ । ८ अंशादि तो उससे दूसरी राशिके स्वामीका और सम राशि हो तो ४। १७ । १४ । ३४ अंशादि पर्यंत उस राशिसे सप्तमराशिके स्वामीका इससे ८॥ ३४ ॥ १७॥ ८ पर्यंत. इससे दूसरा अर्थात् स्पष्ट राशिस अष्टम राशिके स्वामीका सप्तमांश होताहै. ऐसेही सभीको जानना. आठवां: अष्टमांश ३० अंशमें ८ से भागलेकर ३ अंश ४५ कला होतीहैं चर राशिमें मेषसे गिनना. स्थिरमें धनसे और द्विस्वभावमें सिंहसे. जैसे-चर राशि १।४।७।१०में ३२४५ अंशपर्यंत मेषका ७ । ३० लों वृषका. और स्थिरमें ३ । ४५लो धनका ७ । ३० लों मकरका और द्विस्वभावमें३ । ४५ लौं सिंहका ७ । ३० लौं कन्याका इत्यादि सभी अष्टमांश जानना. नवें नवमांश. ३० अंशमें ९से भागलेकर ३ अंश २० कला हुई; मेष, सिंह, धनका मेषसे, वृष, कन्या, मकरका मकरसे, मिथुन, तुला, कुंभका तुलासे, कर्क, वृश्चिक मीनका कर्कसे, अर्थात त्रिकोण राशि विभागमें प्रथम चर-. संज्ञकसे गिनना. जैसे-मेष सिंह धनके ३ । २० लौं. मेषका ६।४० लौं वृषका और वृष कन्या मकरके ३ । २० लौं मकरका, ६।४० लौं कुंभका नवमांश होता है. ऐसेही सब राशियोंके नवमांश जानना. दशवां दशमांश ३० में १० का भागदेनसे ३ अंश दशमांश हुआ. मेप और तुलाका मेषसे, वृष वृश्चिकका कुंभसे, मिथुन धनका तुलासे, कर्क मकरका सिंहसे, सिंह कुंभका कुंभसे. कन्या मीनका मिथुनसे गिनना. जैसे-रोष और -

॥
भाषाटीकासमेता ।
(२७)
तुलाके ३अंश लौं मेषका, ६ लौँ वृषका, वृश्चिकके ३ लौं कुंभका ६ लौं
मीनका इत्यादि जानना, ग्यारहवां एकादशांश ३० अंशमें ११ से भाग
लेकर २-अंश४३ कला३८ विकला होतीहैं. गणना सब राशियोंमें प्रथम मे-
षका, दूसरा मीनका, तीसरा धनका, चौथा मकर का, पांचवां मिथुनका,
छठा वृश्चिकका, सातवां तुलाका, आठवां कन्याका, नवां सिंहका, दशमाँ
कर्कका, ग्यारहवाँ वृषका एकादशांश होताहै. वारहवां द्वादशांश ३०
अंशमें १२ से भाग देनेसे २ अंश ३० कला हो, जिस राशिका द्वादशांश
रनाहो प्रथम उसीसे गिनकर बारह राशिपर्यंत अढाई अढाई अंश
प्रत्येक राशिस्वामीका द्वादशांश होताहै. कोई २ अंश गणनाके मूल-
वाक्य स्पष्टतर हैं, यहां आचार्योने ग्रंथभूयस्त्वके कारण न लिखे. ग्रंथांतरों
में ये हैं,-भौमशुक्रज्ञचंद्रार्कबुधशुक्रारमंत्रिणः॥ शौरिः शनिस्तथा जीवो मेषा-
दीनामधीश्वराः १॥लगाई जायते होरा सर्वलग्गेषु सर्वदा।।ओजराशिभवान्दोः
समे चंद्रार्कजा मताः॥२॥मेषादिसर्वराशीनां त्रिभागेषु यथाक्रमम् ॥ आवं पं-
चनवेशानां द्रेष्काणा भणिता बुधैः॥३॥एकद्वित्रिचतुर्थेषु लग्नपादेषु चक्रमात्॥
स्वस्वराश्यादिकेंद्रेशा पादांशनायका मताः ॥ ४ ॥ कुजार्कीज्यबुधाः शुक्रः
पंचमांशेषु नायकाः॥ओजराशिषु युग्मेषु ग्रहा व्यत्ययतः स्मृताः॥५॥ मेषाद्या
विषमे राशौ समराशौ तुलादिकाः ॥ विज्ञेया विधुधैरेवं राशिषष्ठांश-
नायकाः॥६॥ओजराशौ स्वराश्याद्यास्समे सप्तमराशितः॥सप्तांशनायकाः सर्वे
विज्ञेया विबुधैः स्फुटाः॥७॥ मेषाद्याश्चरराशीनां चापायाः स्थिरराशिषु॥द्वि-
स्वभावेषु सिंहाचा ज्ञेयाश्चाष्टांशनायकाः ॥८॥ मेषमृगतुलाकर्कमुखाः स्युर्नव-
मांशकाः॥मेषकेशरिधन्वादिराशिचके व्यवस्थिताः ॥९॥ अजकुंभधनुस्तौलि
सिंहयुग्मक्रमेण तु॥दशांशभावका लग्ने बहानेवं विदुर्बुधाः॥१०॥ मेषमीनघटा
नक्रचापालितुलकन्यकाः॥सिंहकर्कटकामोक्षादिका रुद्रांशनायकाः ॥११॥
स्वस्वराश्यादिका ज्ञेया द्वादशांशकनायकाः ॥ एवं लग्नेत्र विज्ञेया बुधैर्वादश-
वार्षिकाः ॥१२॥ 'ये वामनोक्त श्लोक हैं.' प्रयोजन इनका पूर्व लिखागयाहै
इसप्रकार द्वाशवर्गी जानना.॥४४॥

(२८) नाजिकनीलकण्ठी। अनु०-एवं द्वादशवर्गी स्यावहाणां बलसिद्धये ॥ . स्वोच्चमित्रशुभाः श्रेष्ठा नीचारिकूरतोऽशुभाः॥४५॥ इस प्रकार ग्रहोंके वल सांधनेके लिये द्वादशवर्गी है, शुभग्रह और अपने उमगत ग्रह मित्र राशिस्थ ग्रह शुभ होताहै, पापग्रह और नीचराशि- शत्रुराशिगत ग्रह अशुभ होताहै. उच्च वा मित्र क्षेत्रगत ग्रह पाप भी शुभ पंक्तिमें और नीच राशिगत शुभ भी पापपंक्तिमें गिना जाता है. शुभपंक्ति अधिक होनेमें शुभ, अशुभ पंक्ति अधिक होनेमें अशुभ बादशवर्गी कहाती है. शनेही फल भी जानना ॥ ४५ ॥ उपजा-एवं ग्रहाणां शुभपापवर्गपंक्तिद्वयं वीक्ष्य शुभाधिकत्वे।। दशाफलं भावफलंच वाच्यं शुभं त्वनिष्टं त्वशुभाधिकवे॥४६॥ इस प्रकार गृह होरादि द्वादश वर्ग स्थापन करके शुभ पंक्ति जुदी पाप 'पंक्ति जुदी स्थापन करनी; शुभपंक्ति अधिक हो तो वह ग्रह दशाफल और भावफल शुभ देगा, पापपंक्ति अधिक हो तो अनिष्ट फल देगा यही विचार द्वादशवर्गीमें है ॥ ४६॥ उपजां०- रोपि सौम्याधिकवर्गशाली भोतिसौम्यः शुभखेच- स्श्वेतासौम्योपि पापाधिकवर्गयोगानेष्टे तिनिधःखलु पापखेटः४ ॥ शुभग्रह शुभ वर्गाधिक हो तो अति शुभ होताहै. पापवर्गाधिक होनेसे सौम्घभी निंद्य होताहै. ऐसेही पापग्रह शुभ वर्गाधिक होनेसे शुभ और पाप दर्गाधिक होनेस अति निय होताहै.द्वादशवर्ग में भी यही विचार मुख्य है।।४७॥ उपजा०-राशीशमित्र रियुक्रमेण चिंत्यस्तनोस्तच तथैव युक्त्या।। भावेषु सर्वेष्वपि वर्गचक्रं विलोक्य तत्तत्फलमूहनीयम् ॥१८॥ ग्रहोंकी द्वादशवर्गी २ पंक्ति करके भावोंके साथ उनका संबंध देखना चाहिये. जैसे--लग्नेश शुभग्रह शुभ राशिमें वा मित्रराशि वा उच्च राशिमें स्थित हो तो लग्न शुभवर्गाधिक भया. इससे लमसंबन्धी सभी शुभ फल होंगे, जो लन्न पापारिकवर्ग हो और उसका स्वामी पाए या पापराशिगत का शत्रु राशि वा नीचराशिमें हो तो लशसंवन्धी अनिष्ट फल अधिक होगा.

भाषार्टीकासमेता । (२९) जहां एक प्रकार शुभ एक प्रकार अशुभ होंगे; जैसे-लमेश शुभ शुभराशिमें नीच वा शत्रुराशिस्थ हो अथवा लग्नेश पाप मित्रोच राशिस्थित हो तो मिश्र फल कहना. ऐसे ही द्वितीय तृतीय भावादिकोंसे भावसंबंधी फल विचारना. किस भावमें कौन २ विचार चाहिये यह आगे कहते हैं ॥४८॥ अनु०-शरीरवर्णचिह्नायुर्वयोमानं सुखासुखम् ।। जातिःशीलं च मतिमाँल्लनात्सर्वं विचिंतयेत् ॥ १९॥ तनु १ धन २ सहज सुहृत४सुत परिपुदजाया७मृत्युटधर्म ९ कर्म १० आय ११ । व्यय १२ ये दाहश भावों के नाम हैं. लग्नमें शरीरका शुभाशुभ कशता वा पुष्टता वर्ण रक्तश्वेतादि (रंग) मशक तिलादि चिह्न, आयु बालं यौवनादि, अवस्था लघुदीर्घादि मान, बल(पराक्रम)सुखदुःख, ब्राह्मणादि जाति और आचरण इतने विचार करना यहां लक्षणमात्र कहाहै बुद्धि विशेष इन्हींमें जानलेना ॥ ४९ ॥ .. अनु०-सुवर्णरौप्यरत्नानि धातुर्दव्यं सखा धने । विक्रमे भ्रातृभृत्याध्वपित्र्यस्खलितसाहसम् ॥५०॥ . सुवर्ण, चांदी, रत्नजात, लोहा, शीशकादि धातु, धनादि और मित्र उपलक्षणसे वस्त्र, मोती, पशु आदि धनसंज्ञक वस्तु इतनोंका विचार धनभावसे करना, और भाई, भगिनी, नाकर, मार्ग, पैत्रिक कर्मकी हानि; साहस, उपलक्षणसे व्यापार पराक्रम, उद्यमादि इतनोंका. विचार सहजभावसे करना ॥ ५० ॥ अनु०-पितृवित्तं निधि क्षेत्रं भूमि च तुर्यतः ।।. पुत्रे मंत्रधनोपायगभविद्यात्मजेक्षणम् ॥६॥ पितृसंबंधि वित्त शेवधि (हंडेडा ) खेती आदि भूमि कर्म, घर उपलक्षण से जलज कर्म, भूमिशोधनादि, पाताल कर्म, माता सौख्य, मित्र बांधव, वाहन (यानादि) चतुर्थभावसे विचारना, और पुत्र मंत्र धन उपाय गर्भस्थिति विद्या संतान वृद्धिप्रबंध उदरकर्म विनयादि पंचमगावसे विचारना. यहां पुत्र आत्मज जो वाक्य एकही अर्थके लिखेहैं इसका हेतु यह है कि दत्तकादि बारह प्रकारके पुत्र होते हैं आत्मज औरस ही होता है ।। ५१ ।। .

(३०) नाजिकनीलकण्ठी। अनु०-रिपोमातुलमांद्यारिचतुप्पादधीत्रणान् ।। छूने कलत्रवाणिज्यनष्टविस्मृतिसंकथा ॥१२॥ छठे भावमें मातुल ( माताके भाई,).रोग, शत्रु, चौपाया, पराश्रय, भय, (व्रण) विस्फोटकादिसे शक्का दाग, और सप्तम भावमें स्त्री व्यापार (न- टता ) कुछ वस्तु खोयेजानेका विषय, विस्मरण, भूलका विचार करना. लसमें शररिके तुल्य सप्तममें कि शरीरका विचार है. ऐसेही चतुर्थसे,मातृ- शरीर, दशमसे पिता, पंचमसे पुत्रका इत्यादि जानना ॥ ५२ ।। अनु०-हताध्वकालमार्गादि चिंत्यं धूने ग्रहोऽशुभः ।। मृत्यौ चिरंतनं व्यं मृतवित्तं रणो रिपुः ।। ५३॥ दुर्गस्थानं तिर्नष्टंपरीवारो मनोव्यथा ॥ सप्तमस्थानमें और भी विचार विशेप है कि चोरीकी वस्तु, कलह,मार्ग, काभी विचार इसी भावसे होताहै. और ७ में सभी यह अशुभ हैं अष्टममा- वमें पूर्वसंचित द्रव्य, आयु, धन, ऋण, संग्राम, शत्रु कोट दुर्गादि ( कठिन स्थान) मृत्यु द्रव्यादि नष्ट, मानसी व्यथा इतना विचार है ।। ५३ ॥ अनु -धमरतिस्तथापन्थाधोपायं च चिंतयेत् ॥५४॥ व्योम्निमुद्रां परं पुण्यं राज्यं वृद्धिं च पैतृकम् ॥ नवम भावमें धर्मकार्य में प्रीति अप्रीति मार्ग पुण्य पाप भाग्य ऐश्वर्यका विचार॥५४॥और दशम स्थानमें मुद्रा (मोहर) पुण्यकर्म, राज्यवृद्धि, पितृ- द्रव्य, और पितृशरीर इतने विचार करने । अनु०-आये सर्वार्थधान्यार्घकन्यामित्रचतुष्पदाः ॥ ५५ ॥ राज्ञोवित्तं परीवारलाभोपायांश्च भूरिशः॥ व्ययैवैरिनिरोधार्तिव्ययादि पारचिंतयेत् ॥५६॥ गुप्त प्रकट धन, सुवर्ण, मणि, मुक्तादिकोंका लाभ, चतुष्पद, राजद्रव्य, मित्र, परिवार, कन्या, भूषण वस्त्रादि अनेक वस्तुओंका लाभ, हानि ग्यारहवें भावसे विचास्ना. बारहवें भावमें शत्रु का निरोप. पीडा. धनव्यय. नेत्र कर्ण रोगादि और नीच में इत्यादि विचार करना ॥ ५५॥ ५६ ॥ .

: भाषाटीकासमेता। (३१) अतु-लग्नांबुजूनकम्माणि केंद्रमुक्तं च कंटकम् ।। चतुष्टयं चात्र खेटो बलील विशेषतः ॥ १७ ॥ लग्न १ चतुर्थ ४ सप्तम ७ दशम ११ इन भावों की संज्ञा केंद्रकंटक और चतुष्टय है चकारसे अनुक्त यहभीभास होताहै कि, केंद्रोंसे द्वितीयस्थान २।५।८।११ एणफर और इनसे भी दूसरे ३ । ६ । ९ । १२ ये आपोक्किम कहाते हैं केंदमें जो ग्रह है वह बली होताहै केंद्रोंमें भी लग्नका विशेष बलवान् होताहै जन्म वर्ष प्रश्न मुहूर्तादिकों में ऐसेही सर्वत्र विचार करना चाहिये ॥ ५७.॥ अनु०-लग्नकर्मास्ततुर्यायसुतांकस्थो बली ग्रहः ॥ यथादिमं विशेषेण सत्रिवित्ते. चंद्रमाः ॥१८॥ बलवान् ग्रह लग १ कर्म १० अस्त ७ तुर्य ४ आय ११ सुत ५ अंक इन स्थानों में अधिक बली होकर शुभफल अधिक देताहै इसमें भी विशेष यह है कि, नवम की अपेक्षा पंचम इससे ग्यारहवां ग्यारहवेसे चतुर्थ चतुर्थसे सप्तम सप्तमसे दशम दशमसे लग्नका क्रमसे अधिक बली होताहै.. यह नैस- गिक बलहै. और चन्द्रमा नवमें द्वितीय भावोंमें भी पूर्वोक्तभावों के तुल्य बली होताहै इमसें भी द्वितीय से नवम विशेष है ॥ ५८ ॥ अनु०-कुजः सत्रि पृच्छायां सूतौचान्यत्रचिंतयेत् ॥ भावानवेत्थंशस्ताःस्युः स्वामिसौम्यैयुतक्षिताः॥१९॥ पूर्वोक्तभावों से विशेष मंगल नवम भावमेंभी बलाधिक होताहै. यहवि चार प्रश्न जन्म और वर्षमुहूर्नादिकोमें सर्वत्र करना ये भावशुभ हैं इनमें ग्रह बली होकर शुभ फल अधिक देताहै. और अपने स्वामी व शुभ ग्रहसे युक्त का ट जो भावहै वह अपने संबंधी फलको अच्छा देताहै. स्वामी और शुभ ग्रह युक्त वा दृष्ट न हो तो अपना (फल) मध्यम न अतिशुभ न अति नेष्ट

(३२)
ताजिकनीलकण्ठी।
देता है. जब पापग्रह और स्वामीके शत्रुमहसे भावयुक्त वा दृष्ट हो तो अपने
फलोकों ( अनिष्ट ) बुरा करदेताहै, जब स्वामीसे अन्य ग्रह कुछ शुभ और
कुछ अशुभ हो तो मिश्रफल देताहै जब भले या बुरे किसी ग्रहत्ते युक्त वा
दृष्ट न हो तो मध्यम फल देताहै ॥ ५९ ॥
अनु०-दीप्तांशातिक्रमेशस्ताइमेपीति विचिन्तयेत् ॥६० ॥
पूर्वोक्त स्वामी शुभग्रह योगदृष्टिमें बुध बृहस्पतिके योगदृष्टिमें चन्द्रमा
शुक्रकी अपेक्षासे विशेष शुभ होता है. रिष्फ १२ अष्ट ८ रिपु ये स्थान
नेष्ट हैं इनको त्रिकभी कहतेहैं इसमें ग्रहबल हीन होकर अशुभ फल वि-
शेष देताहै इनमें ग्रह अपने दीप्तांशोंके भीतर उक्त फल देताहै जब दीप्तांश
से अधिक अंशपर पहुँच जाय तो अशुभ फल नहीं देता दीनांश सूर्यके १५
चन्द्रमाके १२ मंगलके ८ बुधके ७ बृहस्पतिक ९ शुक्रके ७ शनिके ९
इस प्रकार सर्वत्र भाव तथा ग्रहोंकी प्रीति विचारनी ॥६० ॥
उपजाति-त्रिराशिपाःसूर्यसितार्किशुका दिनेनिशीज्येंदु-
बुधक्षमाजाः ॥ मेषाच्चतुणौ हरिभादिलोमं नित्यपरेखा-
किंकुजेज्यचंद्राः॥६॥
अत्र त्रिराशीश कहते हैं, मेवसे कर्क लौं सिंहसे वृश्चिक लौं धनसे मीन
पर्यंत राशिचक्र के ३ भाग हुये इससे त्रिराशीश नाम हुआ इनके स्वामी
ऐसे हैं कि दिनके वर्षप्रवेशमें मेपका सूर्य, वृषका शुक, मिथुन का शनि,
कर्क का शुक्र और रात्रिवर्षप्रवेशमें मेषका बृहस्पति, वृपका चंद्रमा,मिथुनका
बुध, कर्कका मंगल, अब सिंहसे विपरीत अर्थात मेषादिकोंके जो दिनके
वे सिंहादिकोंके रात्रिके और रात्रिबाले दिनके जैसे दिनके सिंहका गुरु,
कन्याका चंद्रमा, तुलाका बुध, वृश्चिकका मंगल, उपरांत धनका शनि मक-
रका मंगल, कुंभका बृहस्पति, मीनका चंद्रमा ये दिन रात्रिके वही स्वामीहैं
जिसका विस्तार चक्रमें भी लिखा है ॥ ६१ ॥

भाषाटीकासमेता। (३३) १/२/३/४/५/६/७/८/९/१०/११ १२ राशि. स शुश शुचं | म श में वृचं दिनमें. गुचंबु में सु शु श शु श में वृचं रात्रिमें (अनु०)-वर्षेशार्थदिननिशाविभागोक्तास्त्रिराशिपाः॥ पंचवर्गीबलाद्यर्थद्रेष्काणेशान्विचिंतयेत् ॥ ६२ ॥ एकवो त्रिराशीश, द्रेष्काणको कहते हैं. दूसरे मेवादि दिनरात्रिविभाग- कोभी त्रिराशीश कहते हैं. इसमें कौनसा लेना इस लिये यह श्लोक है कि, दिनरात्रि विभागका त्रिराशीश तो वर्षेश निर्णयको लेना. क्योंकि पंचवर्गीमें अधिकंबली वर्षेरा होताहै. परंतु पंचाधिकारियोंमें नहीं होगा तो वर्षेश नहीं होता. पंचाधिकारी जन्मलग्नेश वर्षलग्नेश मुन्थेश त्रिराशीश दिनमें सूर्य राशिपति रात्रिवर्ष प्रवेशमें चंद्रमाके राशीश ये ५ होतेहैं, इन्हीके बीचका कोई जिसकी लग्नपर दृष्टि अधिक होवे वह वर्षेश होताहै.पंचवर्गी वर्गमें बली हो तो. विशेष है हीनबली मध्यबली हो तोभी पंचाधिकारियों से लग्नपर दृष्टिवाला वर्षेश होताहै. कहीं चंद्रमा वर्षेश नहीं होता है ऐसाभी लिखा है, जहां सर्व- था चंद्रमाहीकी प्राप्ति वर्षेश होनेकी हो तो कैसे करना. इसकी व्यवस्था ऐसी है कि, चंद्रमा जिसके साथ इत्थशाल कर्ताहो वहवर्षेश होगा. फल चंद्रमाके तुल्य देगा. चंद्रमा स्वयं वर्षेश तोभी नहीं होता. दूसरे त्रिराशीश द्रेष्काण कोभी कहतेहैं वह पंचवर्गीवलमें लेना यहां पंचाधिकारियोंमें त्रिराशीश इत्यादि. यही लेना ॥ ६२ ॥ (शार्दूलविक्रीडित)-श्रीगर्गान्वयभूपणं गणितविचिंतामणिस्त- त्सुतोऽनंतोनंतमतिय॑धात्खलमतध्वस्त्यैजनुःपद्धतिम् ॥ तत्सनुः खलु नीलकंठविबुधो विद्रच्छिवानुज्ञया संतुष्टचैव्यदधाग्रहप्रकरणं संज्ञाविवेकेऽमलम् ॥ ६३॥ ग्रंथकर्ता अध्यायके स्थानमें अपने नामादि श्लोकसे प्रकाश कोहै कि, ३

(३४)
ताजिकनीलकण्ठी।
श्री शोभा विद्याविलासयुक्त गर्गाचार्यके वंशका भूषण स्वरूप और
गणितशास्त्रज्ञ चिंतामणि नामा आचार्यका पुत्र, अंनत नामा दैवज्ञ जिसकी
ज्योतिष शास्त्रमें अनंतबुद्धि थी और जिसने जनुःपद्दति (जातक ग्रंथ)
दुष्टजनोंके मत काटनेनिमित्त रचे. इनका पुत्र नीलकंठ नामा पंडित महाभा-
ब्यादि शाश्नपारंगमने वेदशास्त्र और औतस्मात्त कर्मानुष्ठान शील दाक्षिणात्य
शिवनामाब्राह्मणके आज्ञानुसार समरसिंहोक्त ताजिक शास्त्रके आर्म्या-
छंदोंको दुर्योजक समझकर इंद्रवंशा प्रभृति अनेक छंदोंमें और ताजिक
ग्रंथोका प्रकार सहित, इस संज्ञा प्रकरणमें ग्रह प्रकरण बारह भाव पंचवर्गी
द्वादशवर्गी प्रभृति सविस्तर कहे॥६३॥ इति महीधरकंतायां ताजिकनीलकंठी-
भाषायां राशिस्वभावनिर्माणपंचवर्गाभावकत्यप्रकरणग्रहाध्यायः स्थमः॥१॥
( उपजाति )-सूयॉनृपोनाचतुरस्रमध्यंदिनद्रदिक् स्वर्ण
चतुष्पदोगः ॥ सत्त्वं स्थिरस्तितपशुक्षितिश्च पित्तंजरन्पाटल
मूलवन्यः॥१॥
अब ग्रह स्वरूप प्रकरणमें प्रथम सूर्यका स्वरूप कहतेहैं कि, जातिमें
राजा ( क्षत्रिय ) पुरुष, चतुरस्र मध्याह्नबली, पूर्वदिशाका स्वामी, सुवर्ण
धातु स्वामी अश्वादि चतुष्पदोंका स्वामी, पाप ( क्रूर ) सत्वप्रधान.
सद्गुणवान् स्थिर प्रकृति. तिक्त (वीता ) रसको प्रियमाननेवाला पशु भूमि-
चारी पित्तप्रकृति वृद्धावस्था. श्वेतरक्तवर्ण मूलवस्तु वनचारी ॥ ३ ॥
( उपजातिच्छन्दः. )-वैश्यः शशी स्त्रीजलभूस्तपस्वी गौरो
पराहांबुगधातुसत्त्वम् ॥ वायव्यदिकश्लेष्मभुजंगरूप्यस्थूलो युवाक्षा-
शुभासिताभः॥२॥
चंद्रमाको स्वरूप, वैश्यजाति वणिग्वृत्ति स्वीबह जल भूमिचारी. तपकर.
नेवाला. उज्ज्वल वर्ण ( गौररंग ) अपराहुबली जलचारी गैरिकादि धातु
स्वामी सत्वप्रधान वायव्यदिशाका स्वामी, श्लेष्म ( कफप्रधान ) भुजंग
(सो) का स्वामी रौप्य द्रव्यका पति. स्थूल तरुणावस्था. लवणादिक्षार
रसप्रधान, सौम्यग्रह शुभवर्ण. इतने रूपादि चंद्रमाके हैं ॥ २ ॥

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भाषाटीकासमेता
(३५)
(उप०)-भौमस्तमः पित्त वोग्रवन्योमध्याह्नधातुर्यमदि चतुष्पात् ॥
नाराटूचतुष्कोणसुवर्णकारोदग्धावनीव्यंगकटुश्च रक्तः ॥३॥
: मंगल तमोगुणी. पित्त प्रकृति युवावस्था, उग्र, पापग्रह, वनचारी, मध्या-
लंबली. धातु प्रधान, दक्षिण दिशाका स्वामी, चौपाया पुरुष यह. राजा यदा
क्षत्रियजाति. चौकोण रूप. स्वर्णकारादियोंका स्वामी. दग्धभूमिचारी
अंगहीन. कड़वारसप्रिय. ताम्रवर्ण. ताम्रादिद्रव्यका स्वामी. इतने •
मंगलकेहैं ॥ ३॥
(उप०)-ग्राम्यःशुभोनीलसुवर्णवृत्तःशिश्वि कोचः समधातुज ॥
श्मशानयोषोत्तरदिक्प्रभातं शुद्धः खगः सर्वरसो रजो. ॥४॥
बुध ग्राम्य सौम्यग्रह नीलरंग सुवर्णधातुका स्वामी (वर्तुल) वृत्ता-
कार बाल्यावस्था ईंटोंसे ऊंची भूमिका चारी, सम धातुजीव वात पित्त कफ
तीनों बराबर जीवरक्षा करनेवाला श्मशानवासी ग्रह उत्तर दिशाका स्वामी
प्रातःकालवली शूद्रवर्ण पक्षिजाति कटुकादि सर्व रसप्रधान रजोगुणी है ॥४॥
उप०-गुरुः प्रभाते नृशुभेशदिग्विजः पीतो द्विपादाम्य त्तजीवः ॥
वाणिज्यमाधुर्य रालयेशो वृद्धः सुरत्नं समधातृसत्त्वम् ॥ ५ ॥
बृहस्पति प्रातः काल बली, पुरुष, सौम्यग्रह, ईशान दिशाका स्वामी बा
णवर्ण, पीतरंग, दोपैया, यामांवरचारी, सुवृचाकृति, जीवप्रधान, वाणिज्य
का स्वामी. मधुर रसप्रिय. देवतालय स्वामी, वृद्धावस्था, पुष्परागादि सुरत्न
स्वामी, समधातु ( वातपित्तकफात्मक.) सत्त्वगुण प्रधान है ॥ ५॥
उपजाति-शुक्रः शुभः जिलगोपरा : श्वेतः कफी रूप्यरजोम्लमू-
लम्।।विप्रो दिङ्मध्यवयोरतीशोजलावनिः स्निग्धरुचिर्द्विपाच ॥६॥
शुक्र सौम्यग्रह स्त्री जलचारी अपराहुबली श्वेतवर्ण कफप्रकृति रूपा
धातु रजोगुणी, खट्टा रसत्रिय. मूल वस्तुस्वामी ब्राह्मण वर्ण. आग्नेय
दिशाका स्वामी. युवावस्था. रति क्रीडारसप्रियः जलमयभूमिवासी कोमल.
पु द्विपाद मनुष्यजाति है ॥ ६॥

(३६) ताजिकनीलकण्ठी। उपजाति-शनिर्विहंगोनिलवन्यसंध्याशूद्रांगनाधातुसमःस्थिरश्चा प्रतीचीतुवरोतिवृद्धोत्करक्षितीड् दीर्घसुनीललोहम् ॥ ७ ॥ शनि पक्षिजाति, वायु प्ररुति. वनवासी संध्यावली शुद्रजाति. स्त्रीयह समधातु. स्थिर क्रूर पश्चिम दिशाका स्वामी कृपाय ( क्वाथ कांजिक आदि) रसप्रिय. अतिवृद्धावस्था उत्कर भूमिका स्वामी. दीर्घाकति मुन्दरनी- लवर्ण लोहधातु. ऐसा रूप शनिकाहै ॥ ७ ॥ उपजाति-राहुस्वरूपंशनिवन्निपादजातिर्भुजंगोस्थिपनैर्ऋतीशः ॥ केतुः शिखी तददनेकरूपः खगस्वरूपात्फलमित्थमृह्यम् ॥ ८॥ राहुका स्वरूप शनिके तुल्यहै. परन्तु निपाद जाति. साकार मृत हड्डियों का स्वामी. नैर्ऋत्यदिशाका स्वामी. इतना विशेपहै. और केतुका रूप शनि यहा राहुके तुल्यहै. परन्तु शिखाबान और तुल्य बहुस्वरूपवालाहै इतना विशेषहै, यहस्वरूपका प्रयोजन जैसे राशि स्वरूपादि बतलानेमें, ब्राह्मणादि जाति, वाल्यादि अवस्था, ग्रामारण्यादि स्थानज्ञान, वाय्वादि प्रति. चतुरस्त्रादि आकति पाटलादि वर्ण विचार कहते हैं अथवा कैसा शत्रु वा मित्र मिलेगा, इत्यादि प्रश्नमेंभी यही विचार है बलवान् ग्रहके सदृश मूर्ति और ताम्रादि धातु. जन्म वर्ष यात्रापश्नादिमें कहतेहैं ॥ ८ ॥ वर्पलेखनक्रम, शक मास तिथ्यादिके उपरान्त ग्रहतात्कालस्पष्ट, भावस्पष्ट ग्रहकुंडली, तदनंतर मुन्था कुंडली, नवांश अर्थात् मुशल्लह द्रेष्काण अर्थात् द्रिकाण हवा और जन्म कुंडली स्थापन करके, पंचवर्गी द्वादशवर्गी चक्र स्थापन करना, तदनंतर पंचाधिकारी और पोडश योग विचारार्थ स्पष्ट दृष्टिचक्र स्थापन करना, उपरान्त सहम और. दशा अन्तर दशाका न्यास होताहै, यहसूक्ष्म न्यास है, विशेष वर्पपत्रमें बहुत प्रकार चक्र और दशा लिखीजातीहैं, भाषाटीकासमेता। (३७) अथ ग्रहाणां वर्णादिच । प्रह। सूर्य चंद्रमा मंगल बुध शुक्र | शनि | राहु | केतु ति वर्ण क्षत्रिय वैश्य क्षत्रिय शूद्र ब्राह्मण ब्राह्मण निषाद शूद्र निषाद निषाद पुंस्त्री | पुरुष | स्त्री पुरुष स्त्री पुरुष खो | स्त्री पुरुष पुरुष -वर्तुल चतु आकार चतुरस्र पुच्छ स्थूल को. | वृत्त | वृत्त | दीर्घ | दीर्घ | दीर्घ समय | मध्या अपरा मध्याह्न, प्रभात प्रभात अपरा अपरा अपराह अपराह्न दिशा पूर्व वायव्य दक्षिण उत्तर ईशान आभय पश्चिम निर्ऋत्य नैर्ऋत्य धातु सुवर्ण रौप्य सुवर्ण कांस्यादिहीरसुव रोप्य लोह | लोह मि. वा. ण लोह चतु चतु भुजंग पाद वहुपाद द्विपाद द्विपाद दिपाद ष्पाद ध्पाद सौम्या उग्र सौम्य उग्र | शुभ | शुभ शुभ पाप पाप पाप दि अपाद अपाद अपाद गुण सत्त्व सत्त्व तम रजसत्त्व । रज तम | तम तम चरादि स्थिर चर चर | द्विस्व स्थिर चर भा. पक्षी स्थिर चर पक्षी भूमि पापा कषाय रस | तिक्त क्षार | कटुक सर्वरस मधुर अम्ल कषाय कषाय क्वाथ वाणि. जलभू दग्ध स्मशा. जलभू उत्कर ऊपर ऊपर य सुराल. पित्तादि कफ पित्त श्लेष्म पित्त समधा. समधा. वायु वायु वायु धातु गुक्र अस्थप अव अ० वृद्ध वृद्ध | युवा । युवा | युवा | वृद्ध । युवा स्था वृद्ध वर्ण गोर पाटल रक्त | नील पीत, श्वेत नील नील श्वेत धूम्र धात्वा दि मूल जीव | धातु जीवं जीव | मूल | मूलं धातु यातु स्थान वन जल वन ग्राम ग्राम ग्राम | संधि | विवर विवर

(३८)
ताजिकनीलकण्ठी।
(शार्दूलवि० )-दृष्टिः स्यानवपञ्चमे बलवती प्रत्यक्षतः स्नेहदा
पादोनाखिलकार्य्यसाधनकरी मेलापकाख्योच्यते ॥ गुप्तस्नेहकरी
तीयभवने कार्य्यस्यसंसिद्धिदात्र्यंशोना कथिता तृतीयभवनेषड्भा-
गदृष्टिर्भवे ॥९॥
अब दृष्टिका विचार कहतेहैं. कि यह अपनी आक्रांत राशिसे नंवम और
पंचमस्थ ग्रह. अथवा भावको पादोन ४५। ० दृष्टिसे देखताहै यह बल-
वान् दृष्टिहै. मेलापका इस्का नामहै परस्पर प्रीति देतीहै. मित्रस्वजनादियोंका
सुख और धन सम्पत्ति देतीहै. यह प्रत्यक्ष स्नेहदृष्टि हुई सम्पूर्ण कार्य यह
भावजन्य साधन करतीहै. । द्वितीय स्वकीय स्थानसे तृतीय ३ स्थानमें
और ११ एकादशस्थानमें क्रमसे तृतीयांशोन ४०० तथा पड्भाग १००.
दृष्टि होतीहै इस्कानाम गुप्तस्नेहा. और सर्वत्र कार्य सिद्धि देनेवाली दृष्टि
होतीहै. ये दोनहूं ३।११ दृष्टिस्नेह बढ़ावनेहारी पुत्रसुख और आयु धनको
बढ़ातीहै ॥ ५॥
(शार्दूल०)-दृष्टिःपादमिता चतुर्थदशमे गुप्तारिभावास्मृतान्योन्यंस-
प्तमभेतथैकभवनेप्रत्यक्षवैराखिला॥दुह त्रितयक्षुताह्वयमिदं कार्य-
स्य विध्वंसकृत्संग्रामादिकलिप्रदं दृशइमास्युादशांशांतरे ॥१०॥
यह अपनी आक्रांत राशिसे चतुर्थ ४ दशम १० स्थानमें चतुर्थांश १५
कलादृष्टि देखताहै. इस्का नाम गुप्तारि दृष्टिहै, और परस्पर सप्तम ७ भावमें
पूर्णदृष्टि ६० कला देखताहै, इसका नाम प्रत्यक्षवैरा है, और ऐसेही एक
भावस्थ ग्रहोंमेंभी प्रत्यक्षवैरादृष्टि होती है. ये तीनों दृष्टि क्षुत संज्ञक हैं अनि-
एफल देती हैं कार्यका नाश करनेवाली. संग्राम कलह आदि क्लेशफल
करती हैं. यहां प्रत्यक्षलेहा १ गुप्तस्नेही २ गुंतवैरौं ३ प्रत्यक्षवैरा ४ और
एक स्थानस्थिता. अत्यन्तवैरा ५ पांच प्रकार दृष्टि कही हैं. परन्तु बारह
अंशके भीतर अर्थात् जो देखनेवाला है उसके स्पष्ट अंशोंसे जिसे देखता
इसके स्पष्ट अंश बारह १२ अंशके भीतर हो तो इष्टिका उक्तफल पूर्ण देताहै
बारह अंशके उपरांत कुछ लक्षणमात्र उक्तफलको देता है. पूराफल नहीं देता
है इसका गणित उदाहरणसहित आगे कहते हैं ॥ १० ॥

भाषाटीकासमेता। (३९) (उपजाति०)-अपास्यपश्यन्निजदृश्यखेटादेकादिशेषेधुवालि- प्तिका स्युः।। पूर्णखवेदास्तिथयोक्षवेदा खंषष्टिरभ्रंशरखेदसंख्या।।११॥ तिथ्यःखचंद्रावियभ्रताः शेषांकयातैष्यविशेषघातात् ॥ लब्धं खरामैरधिकोनकैष्येस्वर्णधुवेताः स्फुटदृष्टिलिप्ताः॥१२॥ इन दोश्लोकोंका युग्म होनेसे अर्थ दोनोंका इकडे लिखतेहैं कि, जो ग्रह देखता है वह द्रष्टा और जिसे देखता है वह दृश्य कहाताहै. दृश्य ग्रह राश्या- दिमें द्रष्टाग्रह राश्यादि स्पष्ट घटाय देना. शेष एक आदिक राशिमें शून्या- दि कलात्मक दृष्टि ध्रुवक होताहै. जैसे एक शेष होतो दृष्टि ध्रुवक शून्य हुवा. दो शेष रहनेमें ४० तीन शेष में १५ चारमें ४५ पांचशेषमें ० छः में ६० सातमें० आंठमें ४५ नौमें १५ दशमें ११ ग्यारहमें बारहमें ६० जहां शून्यरहै, जैसे १।५।७।११ में है तो दृष्टि साधन प्रकार ऐसाहै कि, दोनों १. २/३ | ४.५६/ ७८९/१०/१२/१२ ४०१५/४५/०६०/०६५/१५/१० स्पष्टोंके अंतरसे शेष अंशादिका शेषांक नामहै तथा प्राप्त ध्रुवक और ध्रुवकको अंतरयातैष्य विशेष नामक हैं. शेषांकको यातैष्य विशेषसे गुणना वीससे भागलेना लब्धि, पूर्वोक्त ध्रुवकोंमें जैसा गत गम्य है. आगेका अधिक होतो धन करना आगेका ध्रुवक पूर्व ध्रुवकसे न्यून हो तो ऋण करना. इस प्रकार दृष्टिकला सिद्ध होतीहै. ( उदाहरण ) भौमस्पष्ट ४।१३ । ३७ । ९ शुक्र १ । २४ । ५२ । ४५ इनकी आपसमें चतुर्थ दशम दृष्टिहै. यहां द्रष्टा शुक्र और दृश्यमंगल है. भौमस्पष्ट में शुक्रस्पष्ट घटाया शेष २।१८।४४।२४ राशिशेष रही तो २ का ध्रुवक ४० गत ध्रुवक हुवा. एष्य ध्रुवक ३ के नीचेका १५ है.इन्का अंतर २५ शेष अंशादि १८१४४। २४ गुन दिये ४६ ८।३०।० अंशके स्थानमें ३० से भाग दिया लब्धि कलादिफल १५।३७ । 0 अग्रिम ध्रुवक अधिक होता तो यह गत ध्रुवकमें जोड़ देनाथा. यहां अग्रिम १५ गत ४० से न्यून होतो ४० में लब्धि घटाय दियाशेष २४।२३।० यह कलादि दृष्टि हुई जब मंगलकी दृष्टि शुक्र परगि- मात्र जैसे ०।० ताजिकनीलकण्ठी। ननी है तो द्रष्टा मंगल दृश्य शुक्र हुवा पूर्ववत् विधीसे दृष्टि १३१७।२४ होती है ऐसेही सभीका जानना ॥ ११ ॥ १२ ॥ . (शार्दूल वि०)-पश्यन्मित्रहशा सुहृद्रिपुदृशाशत्रुः समास्त्वन्यथा तिथ्यकाटनगांकशैलखचराः सूर्यादिदीप्तांशकाः॥ चकेवामगु च्यते बलवती अध्यायथावेश्मनीत्येकपिटगुच्यतेर्थजननीत्येके विदुःसूरयः॥ १३॥ नवम पंचमकी प्रत्यक्ष लेहदृष्टि जो ग्रह देखता है. वह तत्काल, अधि- मित्र होता है. और जो तीसरे ग्यारहवेमें गुप्त स्नेह दृष्टि देखता है. वह तात्का- लमें मित्र है, जो ग्रह चतुर्य दशममें गुप्त शत्रु दृष्टि देखता है वह तात्कालमें शत्रु होता है; और जो ११ ७ स्थानों में प्रत्यक्ष शत्रु दृष्टि देखता है वह अधि शत्रु होता है इनसे उपरांत २।६।८।१२स्थानोंमें दृष्टि तो गणितसे क्रियदाग- कही ० भी होजाती है, परंतु तत्कालमें पूर्णभाग दृष्टि न होनेसे वह सम कहाता है यह तात्काल मैत्री हुई और नैसर्गिक मैत्री वाजिकांतरोंसे यह है कि, "मित्राण्यारशशांकशक्रसचिवाः सौम्याकदेवाचि- ता.जीवाक्षणदाधिपा शनिसिती मंदज्ञशुक्रा इमे ॥ सूर्यात्स्यू रिपवश्च ता- जिकमते शेपा बुधैश्चोदिताः” इति १ इसका अर्थ चक्रसे समझना ये नियत नैसर्गिकमैत्रीचक्रहै। मित्र शत्रु हैं. प्रयोजन कहते हैं कि जो ग्रह नैसर्गिक मैत्री और तत्का- लमेंभी मित्र है वह अधिमित्र होता है, जो नैसर्गिक शत्रु और तात्काल मेंभी शत्रु है वह अधिशत्रु होता है. व जो एक चक्रमें मित्र दूसरेमें शत्रु है वह समकहाता है. परंतु यह मत जातकोंका मुख्य है. मित्रामित्रीका विचार पूर्वोक्त पंचवादिविचारमें काम आता है. लग्नादि द्वादश भाव चक्रमें ग्रहाः सूच में बु। बृ शु शरा चं वुसू शुशुबु बुबु मित्राणि मंसू सूचेश वृवृक बुबु बुसू शत्रवः शुशुशु शशश में माम माम 혈 भाषाटीकासमेता। (४१.) वाम दक्षिण दो प्रकार दृष्टि होती है. जैसे लग्नसे सप्तमपर्यंत दक्षिण दृष्टि और सप्तमसे लगपर्यंत वामदृष्टि होती है; प्रयोजन यह है कि, एक भावस्थदृष्टि निर्बल और वामदृष्टिकी अपेक्षा दक्षिण दृष्टि बलवती होती है इसमें इनमेंसे दशमस्थ ग्रहपर सप्तमस्थके चतुर्थ होनेसे अतिबलवती दृष्टि होती है और किसी २ आचार्योका मत है कि एक स्थान स्थित ग्रहोंकी परस्पर दृष्टिमी अति बलवती अर्थात् कार्य साधन करनेवाली होती है. विशेषतः शुभफल देती है. अब दीप्तांश कहते हैं-सूर्यके १५ अंश एवं चन्द्रमाके १२मंगलके ८ बुधके ७ गुरुके ९ शुक्रके ७ शनिके ९ राहु केतु शनिवत् ९ । ९ दीप्तांश हैं, मतान्तरसे सभी ग्रहोंके दीप्तांश बारह मात्र हैं, दृश्यग्रह द्रष्टाग्रहके दीप्तांशके भीतर होवे तो इत्थशाल तथा सम्बन्ध योगादिफल शुभ वा अशुभ पूरा देता है. दीप्तांशसे ऊपर होजानेमें फल पूरा नहीं देता. यही दीपांशोंका तात्पर्य है, आगे षोडश विशेष योगमें काम आयेगा ॥ १३ ॥ (अनु.)-पुर:पृष्ठेस्वदीप्तांशैविशिष्टंफलंग्रहः ॥ दद्यादतिक मेतेषांमध्यमंहक्फलं विदुः ॥ १४॥ इति नीलकंठयां ग्रहचारदृष्टि- विचाराऽध्यायो द्वितीयः॥२॥ दीप्तांशोंका प्रयोजन विशेष कहते हैं कि जो ग्रह नवम पंचमादि दृष्टि देखताहै और जिसे देखता है ये दोनहूं अपने दीप्तांशोंके भीतर हो तो इत्थशाल और दृष्टि आदिका नियत फल विशेप देते हैं. जो दीप्तांशोंसे अधिक अंशपर द्रष्टा दृश्य ग्रह हों तो उक्त फल साधारण देते हैं ॥ १४ ॥ इति महीधरकतायां नीलकंठीभाषायां ग्रहचारदृष्टिविचारोध्यायवि० ॥२॥ अथ षोडशयोगाध्यायः । ( उपजाति० )-प्रागिकबालोऽपरइंदुवारस्तथेत्थशालोऽपरई- शराफः ॥ नक्तंततःस्याघमयामणूऊकंबूलतोगैरिकबूलमुक्तम् ॥ १॥ ( इंद्रवज्राउं० ) खल्लासरं रद्दमथोदुफालिकुत्थंचदुत्थोत्थ दिवीरनामा ॥ तंवीर त्था दुरफश्च योगाः : षोडशेषां कथयामि लक्ष्म ॥२॥ .

(४२)
ताजिकनीलकण्ठी।
अब पोडश योगाध्यायमें प्रथम इनके नाम कहते हैं. पहिला इक्क-
वाल, दूसरा इंदुवार एवं इत्थशाल ३ ईशराफ ४ नक्त ५ यमया ६ मणूऊ७.
कम्बूल ८ गैरिकंबूल ९ खल्लासर १० रद्द ११ दुफालिकुत्थ १२ दुत्थो-
त्यदिवीर १३ तंवीर १४ कुत्थ १५ दुरफ १६ ये संज्ञा हैं इनके लक्षण
आगे कहते हैं ॥ ० (२)
( वसन्तति० )-चेत्कंटकेपणफरेचखगाःसमस्तास्यादिकबाल-
इतिराज्यसुखातिहेतुः ॥ आपोक्किमे यदि खगाः सकिलेंदुवारो
न स्याच्छुभः वचन ताजिकशास्त्रगीतः॥३॥
जो सभी ग्रह कंटक १४। ७ । १० और पणफर २ । ५।८।११.
स्थानों में हों अर्थात् आपोलिम ३।६।९ । १२ में कोई ग्रह न हो..
तो इस योगका नाम, इकवाल है, इसका फल, राज्य सुख है, वह मनुष्योंको
कुलानुमान होता है, अथवा जिसके वर्षमें अरिष्ट योग हो, वह आरिष्टही
इक्कवाल योगके फलसे भंग होजायगा, दूसरे येभी ग्रह आपोक्लिम ३ । ६ ।।
९ । १२ में हों अर्थात् इक्वालोक्त कंटक १ । ४।७ । १० पणफर
२। ५। ८ । ११ में कोई ग्रह न हो तो इस योगका नाम इंदुवार है,
इसका फल अनिष्ट है, इन्दुवारनामहीका अर्थ शुभका विपरीत अर्थात् अशुभ
है, ऐसाही फलभी है, इनका उदाहरण कुण्डलियोंमें लिखा है ॥ ३ ॥
इक्कवालयोग.
इन्दुवारयोग.
वृरा१२
tom
१२.
रा
११
शु
१
११
३
३
.१०
कुंडली.
१०
५
चंप
के
७
९
शमंके
मं८
(इं०व०)-शीघ्रोल्पभागैर्धनभागमदेऽअस्तेनिजतेजउपाददीत ।।
स्यादित्थशालोयमथोविलिप्तालिप्ताईहीनोयदिपूर्णमेतत् ॥४॥

३ . भाषाटीकासमेता। (४३) मंदगतियह बहुत अंश होके आगे बैठा हो और शीघ्र गति अल्प अंशपर हो और दृष्टि दोनों की दीप्तांशके भीतर होतो शीघयह अपना तेज अग्रगत मंदग्रह को दे देता है इसको मुथशिलयोग कहते हैं. यह योग चार प्रकारका होता है. प्रथम वर्तमान मुथशिल पारपूर्ण मुथशिल२राश्यन्त राश्यादि स्थित शीघ मंद ग्रहोंसे वर्तमान मुथशिल ३ भविष्यन्मुथशिल ४ शीघ्र और मंदगति स्पष्टसे जाननी, यहां मंदगतिका प्रयोजन नहीं है. तत्काल स्पष्टकी गतिसे शीघ्र वा मंदग्रह समझना. और मुशिल नाम इत्थशालका है. यहां प्रथम वर्तमान मुथशिल योगका उदाहरण कहतेहैं. शीघ्रगतिवाला ग्रह मंद- गतिवालेसे न्यून अंशपर हो, वस्तुतः शीघके दीप्तांश संख्याके भीतरहो और दोनोंकी परस्पर. नवम पंचमादि उक्त दृष्टि होतो इसका नाम. वर्तमान इत्थ शाल हुआ फल है कि शीघ अर्थात् पृष्ठगत ग्रह अपना तेज (सामर्थ्य ) मंद- गति ग्रहको देदेता है इसका फल पूर्ण मुथशिलसे न्यून होता है. अब पूर्ण मुथशिलयोगका उदा- हरण कहते हैं, वर्तमान परिपूर्ण इत्थशाल के तरह दृष्टि १० वर्तमान मुथाशिल और शीघ्र और अल्प मुथशिल भाग मंदग्रह बहुत अंश- पर हो परंतु शीघ्र ग्रह मंदग्रहके बराबर अंशके पर हो केवल कला अथवा विकलामात्र न्यून हो तो इसको पूर्ण इत्यशाल कहते हैं फलभी इसका पूर्ण होता है; ५ में दो प्रकारके हुये ॥ ४॥ इंद्रवज्रा-शीघ्रोयदाभात्यलवेस्थित सन्मदेऽन्यभस्थे निदधाति तेजः॥ स्यादित्थशालोयमथैषशीघ्रदीप्तांशकांशैरिहमंदपृष्ठे ॥६॥ तदाभविष्यद्गणनीयमित्थशालं विधैवं थशीलमाहुः ॥ लग्नेश कार्याधिपयोर्यथैष योगस्तथा कार्यमुशंति संतः॥६॥ शीघ्र ग्रह २९ अंश राश्यंतमें हो अर्थात् जिस राशिसे मंद ग्रहपर पूर्ण अंशाः सू श १० ४ १२॥

बृ २९ राश्यां- तराश्यादिस्थ शिल (४४.) ताजिकनीलकण्ठी। १ष्टि होती है उसमें जाता हो और मंदग्रह स्वल्प अंशपर हो जैसे मंगल २९ अंश धनस्थानमें है. तीसरे स्थानमें जाना चाहता है. दूसरा मंदग्रह शनि ग्यारहवें भावमें ४ अंशपरहै यहभी वर्तमान मुथशिल योगहै. राश्यंत राश्या- दिस्थ वर्तमान, इसे कहतेहैं अर्थात् मंगल तीसरे भावमें जानेको तैयार है वहां पहुंच कर शनिसे इत्थसालकरने वालाहै ३ चौथा शीघ्रग्रह मंदग्रहसे न्यून अंशपर और पूर्ण दृष्टि परस्परहो परंतु शीघ्र ग्रहके, उक्त दीप्तांशों के अंतर्गत मंद न हो किंतु शीघ्र स्वदीप्तांशोंके में अंतर मंदग्रह को लेना भविष्यन्मुथशिल वर्तमानमुथ चाहता हो, जैसे तीसरे भावमें बुध १२ अंशपर और ग्यारहवेमें बृहस्पति २० अंशपरहै तो बुधके दीप्तांश ७ से अधिक परहै ‘परंतु बुध बृहस्पतिका स्वदीप्तांशांतर्गत करना चाहता है. इसको भविष्य मुथशिल योग कहते हैं ये ४ चार उदाहरण हैं. प्रकार तो मुख्यतः तीनहीं हैं वर्तमान, पूर्ण, और भविष्य, परंतु वर्तमानके २ प्रकार होनेसे यहां उदाहरणमें चार भेद करदिये और मुथशिल भुत्थशिल मुत्थशील मूथशील ये चारप्रकारके नाम एक इत्थशालकेहीहैं. अब इनके फल कहतेहैं कि जिस भाव संबंधी कार्यहै उसके स्वामी और लग्नेशका इत्थशाल होनेमें उसकार्य की सिद्धि होती है. कार्य. भाइयोंके निमित्त तृतीयेश संतानार्थ. पंचमेश राज्यार्थ. दशमेश. और जायार्थ सप्तमेश इत्यादि पू- वोक्त भाव कर्मोंसें कार्येश जानना जैसे संतान प्रश्नमें लग्नेश पंचमेशका इत्थशाल योग और स्त्री प्रश्नमें लंगेश सप्तमेशका, एवं राज्यप्रश्नमें लग्नेश दश- मेशका योग विचारना. और इन प्रकार के इत्थशालोंमें यह विचारभी मुख्य चाहिये कि ३ । ११ और ५।९ भाव संबंधी इत्थशाल तद्भावजन्य शुभफल करतेहैं, क्योंकि ये मित्र दृष्टिसेहैं और १७तथा ४ । ३० इन भाव संबंधी इत्थशाल तद्भावोक्त फलको अनिष्ट कर देतेहैं, . अर्थात् तद्भावोत्थ्- भाषाटीकासमेता। (४५) कार्यको नाश करदेतेहैं.. यह शत्रुष्टिका प्रभाव है यहफलका शुभाशुभ, पूर्वदृष्टि विचार दशवें श्लोकमें कहाहै, इत्थशाल का लग्नेश कार्यशके अंशोंका अंतर करके जो शेष रहे उसे बारह १२ से गुनदेना, इतने दिनोंमें उस इत्थशालका फल होगा ऐसे सर्वत्र जानना ॥ ५॥ ६॥ ( उपजा० ) लग्नेशकााधिपतत्सहायायत्रस्युरस्मिन्पतिसौ म्यदृष्टे । तदाबलायंकथयंतियोगं विशेषतः स्नेहहशापिसंतः॥७॥ लग्नेश और कार्येशके मित्र ग्रहभी उन्हींके सदृश फलदेतेहैं परंतु, लग्ने- शादियुक्त ग्रह जिस भावमें हैं वह अपने स्वामी और शुभग्रहोंसे दृष्ट हों तो पूर्वोक्त योग बलवान होताहै उक्तग्रह इत्थशालके फलोंको ( उत्कृष्ट ) विशेष करदेतेहैं, पण्डित लोग स्नेहदृष्टिसें फलकी विशेषता कहते हैं, इत्थशाल हुये में इतना विचार और भी चाहिये कि इत्थशाली मन्दग्रह वक्र हो तो उक्त- फल अधिक होगा, यह विचार युक्तिसिद्धहै ॥ ७ ॥ स्त्रीमाप्तिप्रश्ने. स्त्रीशमशे धनलाभप्रश्ने. ३ ३ ४ 30 १ 'राश्यांत शुराम स्थितव, ११ वर्तमान नथशिल परिपूर्ण मुथशि राश्यादि 'वत्त. २९ १२ १ वृ४ १२ केवलार्थप्रश्न 149 भविष्य १० ( उपजाति० )-स्वादिसत्स्थानगतः शुभैश्चेद्युतेक्षितोभद्भविताऽथवास्ते ॥ तदा शुभंप्रागभवत्सुपूर्णमग्रे भविष्यत्यथवर्त्त- तेच ॥८॥ ४शुन ११ मुथाश) १४ /मं२ इत्यशाल योग कर्ता लग्नेश और कार्याधीश वा दोनहूं गृह उच्च वा मित्र राशि, वा स्वहद्दा, स्वत्रिंशांश, स्वमुशलहादि सत्स्थानमें प्राप्तहो, और शुभ- (४६) ताजिकनीलकण्ठी। ग्रहोंसे युक्त वा घट हो तो, इत्यशालोक्त शुभफल तत्कालही होगा. जो स्वरा- श्यादि शुभस्थानमें प्राप्त होनेवाला हो और शुभग्रह युक्त वा दृष्ट होनेवाला हो तो, उक्तफल पीछे होगा, यदि स्वादि शुभ स्थानसे दूसरे स्थानमें प्राप्त हुये, थोडाही कालबीता हो तो पूर्वोक्त फल होगयाहै, कहना. ये विचार वर्ष और प्रश्नादियोंमें सर्वत्र बुद्धिबलसे करना, ॥ ८ ॥ (उपजा.)-व्यत्यस्तमस्माद्विपरीतभावस्वेष्टक्षतोनिष्टगृहं प्रपन्नः।। अभूच्छुभं प्रागशुभत्विदानी संयातुकामेनचभाविवाच्यम् ॥९॥ पूर्वश्लोकमें जो स्वादिस्थ इत्थशाली. ग्रहोंसे भूत भविष्य वर्तमान का- लिक शुभफल कहेहैं तैसेही शत्रुराश्यादि अनिष्टस्थान और पापग्रह योग- दृष्टि से अशुभ फलभी होताहै, जैसे लग्नेश कार्येश वा दोनहूं शत्रु वा नीच राशिमें वा शत्रुके हद्दा, मुशल्लहादि दुष्ट स्थानोंमें हों, और पापग्रहोंसे युक्त वा दृष्ट हों तो इत्थशालोक अनिष्ट फलंतत्कालही होगा, आगे पीछे शुभहोगा जो ऐसाही स्वोचादिराशिगत पापयुक्त दृष्ट होकर वर्तमान राशिमें आया हो तो उक्तफल भी पूर्वही देदेवेगा, पीछे शुभ फल देगा, जो स्वोचादि राशि प्राप्त और पापयुक्त दृष्ट होनेवाला हो तो उक्ताल भी आगे होगा इन योगोंमें अनिष्ट फलकी प्राप्ति होनमें शुभाशुभ दोनों यथोक्तकालपर दोनहूं होते हैं, शुभफलकी प्राप्तिमें सर्वदा शुभही होताहै, उदाहरणके वास्ते तीसरे मुथशि- लका रूप कहतेहैंकि चन्द्रमा राश्यंत २९ अंशपर है और सूर्य राश्यादि १० अंशपर है. चन्द्रमाके दीप्तांश १२ के भीतर होनेसे इत्थशाल हुवा, अब इसमें यह विचारना चाहिये कि चन्द्रमा वर्तमान कुम्भराशिमें होनेसे शत्रुराशि गत है, आगे १२ राशि मित्रराशिमें जाता है तो प्रथम अशुभ फल पीछे शुभफलं होगा, इसी प्रकार सर्वत्र गतागत वर्तमान कालिक फल कहना ॥ ९ ॥ (ई०व०)-शीघ्रो यदा मंदगतेरथैकमप्यंशमभ्योतितदेशराफः ।। कार्यक्षयोमूशरिफेखलोत्थेसौम्येनहिल्लाजमतेनचित्यम् ॥ १० ॥ पूर्वोक्त इत्थशाल योगका विपरीत ईसराफ योग कहतेहैं कि शीघ्रगति

१०,
११
१२
१
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५
भाषाटीकासमेता।
(४७)
ग्रह जो मंदगति ग्रहके एक अंश भी आगे बढ जाय तो ईसराफ योग होता
है. इसको मूरिफ भी कहते हैं. यह कार्यका नाश अर्थात इत्थशाल
होनेमें जो कार्यसिद्धि होनीथी उसको विपरीत करदेता है. इसमें
हिल्लाजमतसे इतना विचार है कि यह मूशरिफ पापग्रहोंका हो तो
कार्य विपरीत अर्थात् शुभके बदले अशुभ करेगा. जो उक्त योग शुभ-
ग्रहोंसे हो तो कार्यको विपरीत तो नहीं करेगा, किंतु शुभफल जो
इत्थशालसे होनाथा उसे न होने देगा उदाहरण ९ वृ?
लग्नमें बृहस्पति १६ अंश लग्नमें व सप्तमेश बुध मि-
१६
थुनमें १७ अंश पर है तो मंदगति बृहस्पतिसे शीघ्र
गति बुध एक अंश अधिक बढगया, इसका नाम
ईसराफ वा मुशरीफ हुआ, स्त्रीप्राप्ति कार्य था यह सिद्ध नहीं होगा. यह
दोनों पापग्रह होते तो स्त्रीप्राप्तिके बदले स्त्री संबन्धी कर्मसे अनिष्टहोता, ऐ-
साही सर्वत्र जानना ॥ १: ॥'
उपजा०-लग्नेशका-धिपयोर्नदृष्टिमिथोऽथतन्मध्यगतोपिशीघ्रः ॥
आदाय तेजोयदिपृष्ठसंस्थान्यसेदथान्ये यदि न मेतत् ॥ ११॥
लग्नेश और कार्याधीशकी परस्पर दृष्टि न हो किंतु इन दोनोंके बीच
किसी भावमें उन दोनोंसे शीघ्र ग्रह लग्नेश और कार्येशको भी देखता हो
तो अपने पीछेवाले स्वल्पांश ग्रहका तेज,लेकर आगेवाले बृहदंशको देदे-.
ताहै, परंतु यह शीघ्रगति अल्पांश ग्रहसे अधिक और मंदगति, बृहदंश
ग्रहसे न्यून अंशपर होवे, यह योग अन्यद्वारा कार्यसिद्धि करता है, इस-
कानाम नक्तयोग है, उदाहरण आगे कहतेहैं ॥ ११ ॥
( उपजा. )-लाभ च्छातनुरस्तिकन्या स्वार्म धासिंहगतो
दशांशः॥सूर्यांशकैर्दैवगुरुः कलत्रेदृष्टिस्तयोनास्तिमिथोथचंद्रः॥१२॥
चापेवृषेचोभयदृश्यमूर्तिः शीघ्रोकभागैरथवाभवांशैः ॥ आदायतेजो
बुधतोददौयजीवायलाभः परतः स्त्रियाःस्यात् ॥ १३॥

for ट ९वं Aur (४८) ताजिकनीलकण्ठी। नक्तयोगका उदाहरण जैसे स्त्रीलाभ प्रश्नमें कन्या लम, लग्नेश शीघ्रगति बुधसिंहके दश अंशपर कार्ये शस्त्री प्रश्नहोनेसे सप्तमेश मंदगति बृहस्पति मीनराशि के बारह अंश परहै इनकी परस्पर दृष्टि होती तो, शीघोल्पभागेत्यादि इत्थशाल हो तो यहां इनकी ६८ स्थानों में होनसे दृष्टि नहींहैं, परंतु इनके बीच धनराशिमें या वृपराशिमें 'लग्नेश और कार्यशके अंशोंके मध्यवर्ती बारह वा ग्यारह अंशपर चंद्रमा दोनोंसे शीघ्रगति है, और दोनोंको नवम चतुर्थ वा लाभ चतुर्थ पूर्णदृष्टि से देखताहै, इस व्यवस्था चंद्रमा अपने पीछेवाले शीघ्रबुधका तेज लेकर अपने अग्रवर्ती मंदगति बृह- स्पतिको देदेवाहै, प्रयोजन है कि बुध गुरुकी दृष्टि होती तो इत्थशाल योगसे अपनीही हाथसे स्त्रीप्राप्ति होती यहां नक्तयोग. चन्द्रमा तीसरे ग्रहसे है तो स्त्रीप्राप्ति भी तीसरे किसी मध्यस्थ मनुष्यके हाथसे होगी. ऐसाही सर्वत्र जानना. यहां तेरहवें श्लोकमें (शीघ्रोभागः) के स्थानमें ( शीघोप्टभागः) ऐसा पाठहै, प्रयोजन यह है कि, चन्द्रमा८अंशपर होनेसे लग्नेश कार्यशके बीच तो न हुआ परंतु अति शीघहै, बुध १० अंशवालेको लाँधकर बारह अं- शवाले बृहस्पति को पहुँच सकताहै, इसकारण नहयोग संभावना होती है, यह ताजिकांतर मतहै और यहां १०११३ । १२ अंश इन तीनोंके उप- लक्षणार्थ लिखे हैं, दीनांशोंके भीतर किसी अंशपर क्रमसे हो तो नक्तयोग होजाताहै, आगे बुद्धिके बलसे विचारना ॥ १२॥ १३ ॥ इंद्रवज्रा-अंतःस्थितोमंदगतिस्तुपश्येदीतांशकैविथशीघ्रतस्तु । नीत्वामहोयच्छतिमंदगायकार्य्यस्यसिद्धययमया प्रदिष्टः ॥ १४ ॥ लग्नेश और कार्येश किसी भावोंमें हों उनकी परस्पर दृष्टि न हों किंतु एक शीघ्रगति एक मंदगति हो और दीप्तांशोंके भीतर हो मध्यस्य स्थानग तदोनोंसे मंदगतिको ही ग्रह उक्त ग्रहको देखता हो तो ग्रहसे तेजलेकर मेवा। १८ १२ २चं१० भाषाटी (४९) मंदग्रह को देदेताहै. इस योगका नाम यमया है. कार्यकी सिद्धि दूसरेके द्वारा करताहै ॥ १४ ॥ इं०व० राज्याप्तिपृच्छातुललग्ननाथोमेसितस्त्वष्टलवैवषस्थः ॥ चंद्रोदशाशयंदिराज्यनाथोदृष्टिस्तयोनास्ति रुस्तुमंदः॥१५॥ उ०व०-दिगंशगः कर्कगतस्तुपश्यन्नुभौमहोदीप्तलवैः सचांद्रम् ॥ ददौसितायेतिपदस्यलाभोमात्येन भावीतिविमृश्यवाच्यम् ॥१६॥ यमया योगका उदाहरण, जैसे राज्यप्राप्ति प्रश्नमें तुलालनका स्वामी शुक्र सप्तम भावमें मेषक ९ ८ अंशपर और कार्य्य दशम स्थान सम्बन्धी होनेसे दशमेश चन्द्रमा वृषके १० अंशपर अष्टम १०यमयावृ.१० स्थानमें है, इन लग्नेश कार्येशोंकी परस्पर दृष्टि ११ नहीं है, दीप्तांशोंके अन्तर्गत हैं. योग होने में केवल दृष्टिकी न्यूनता रही यह कार्य्य, तीसरा ग्रह अर्थात् बृहस्पति सम्पा- दन कर्ता है कि, यह स्थान दृष्टिसे १० । ११ स्थानमें, शु० चंद्र० दोन हूंको देखता है तो शीघ्र चन्द्रमासे तेज़ लेकर, उससे मन्द शुक्रको देताहै इस योगका नाम यमया है. फल यह है कि, लग्नेश कार्येशका इत्थशाल होता तो आपही राज्यप्राप्ति होनीथी, यहां बृहस्पतिसे योग पूर्ण हुआ वो दूसरेके द्वारा राज्यप्राप्ति होगी, बृहस्पति देवगुरु यद्वा देवमन्त्री है इससे फल (राज्यप्राप्ति ) पुरोहित वा अमात्यके द्वारा होगी ऐसे सभी संबं- धी फल अपनी बुद्धिसे विचारके कहना, यहां राज्यप्राप्ति प्रश्न केवल उपल- क्षण मात्रहै ॥ १५॥ १६ ॥ (इन्द्रवज्रा )-वक्रः शनिर्वा यदि शीघ्रखेटात्पश्चात्पुरस्तिष्ठति तुर्य्यदृष्टया ॥ एकक्षस क्षभुवादृशावा पश्यंस्तशिरधिकोनकै- श्चेत् ॥ १७॥ (उपजाति ) (पूर्वार्द्ध) तेजोहरेत्कार्यपदेत्थशा- स्थितोपिवासौमणउःशुभो.न॥ मणऊ योगका लक्षण कहते हैं, यह नक्तयोगके तरह है परन्तु शनि वा मंगलकी ऐसी प्राप्तिमें फल विपरीत होजाता है, इसकारण यह मंणऊ नाम ताजिकनीलकण्ठी। योग पृथक् है, मणउ पारशीय (मन) पदका पायहै. प्रयोजन है कि, कार्य करनेमें (मन) अर्थात् विघ्न करदेताहै. लक्षण यह कि, लग्नेश और कार्येश इत्थशाली अर्थात् शीघोल्पभाग मन्द धन भाग और परस्पर दृष्टियुक्तहों, परंतु इनके बीच मंगल वा शनि शीघ्रगति ग्रहके समीप उसके दीप्तांशोंके भीतर आगे वा पीछे हो और चतुर्थ सप्तम वा एक दृष्टिसे उसे देखे मन्दग्रहकोभी किसी दृष्टि से देखे और इसके दीप्तांशोंके अन्तर वह मन्दग्रह होवे जो कि लग्नेश वा कार्येश है, तो शीघ्र ग्रहका तेज हरलेताहै. मन्दग्रहको वह तेज नहीं देता यह मंगल शनिकी प्रकृति और शत्रुदृष्टिका फल है, इसको मणउ योग कहतेहैं इत्थशालका विरुद्धफल अर्थात् कार्यनाश कर्ता है ॥ १७ ॥ पजा.- स्त्रीलाभपृच्छातनुरस्तिकन्यात्रज्ञोदिगंशस्तिथिभिः सुरेज्यः ॥ १८॥ कलत्रगःखेवनिजो भवशिःपूर्णबुधोभौमह- तस्वतेजाः ॥ जीवनपश्चान्मिलतीतिलाभोना-स्तुनो पृष्ठ- गतेथवास्मिन् ॥ १९॥ मण मणउँ मण ७. ५ ११ ३ story 09 श१५ २चमा mr.R' ११) १ १० १२:२ (६८ १० १२ ११ मणउं योगका उदाहरण स्त्रीलाभ प्रश्नमें कन्या लग्न लग्नेश बुध लगके दश अंशपर स्त्रीलाभ कार्य होनेसे सप्तमेश सप्तम बृहस्पति मीनके १५अंशमें हैं, इनका इत्थशाल स्त्रीलाभकारी था, परन्तु मंगल मणउं अर्थात् मनै कर- वाहै कि यह दशम स्थानमें मिथुनके ग्यारह अंशपर स्थित होकर लग्नेश बुधको तुर्य्यदृष्टि अर्थात् शत्रुष्टिसे देखता है, और बुधके अंश समीपवर्ती है इस हेतु बुधका तेज मंगलने हरणं किया, बुध निस्तेज होगया, अर्थात फल देनेको सामर्थ्य इसको न रहा, मंगलने हानि अर्थात् मणउं मनै कली

भाषाटीकासमेता।
(५१)
है। लग्नेश का>श बु० बृ• के इत्थशालसे श्रीप्राप्ति होनीथी, मंगलके
मणउं करनेसे यह कार्य नहीं होगा, प्रत्यक्षतः स्त्रीसम्बन्धी हानि होगी ऐसे
ही शनिसेभी मणउं योग होता है, दूसरा उदाहरण मीनलग्न मन्द लग्नेश बृह-
सति ८ अंश सप्तमेश बुध ८ अंश सप्तम स्थानमें शनि मीनके ९ अंशपर
यह एक अंश अधिक होनेपरभी मणउं योग हुवा. तीसरा उदाहरण, लाभ
प्रश्नमें कर्क लग्नसे लग्नेश चंद्रमा वृषके दश अंशपर लाभेश शुक्रलममें कर्कके
११ अंशपर इनके इत्थशाल होनेसे धनलाभ होना था, परन्तु वृषके१६अंश
पर चन्द्रमाके साथ एक भावगत शत्रुद्दष्टि देखनेवाला मंगल वा शनि होनेसे
मणउं योग होगया, शीघ्र चन्द्रमाके तेज मंगलने शुक्रको न देने दिया,आष-
ही नाश करदिया. फल इत्थशाल होनाथा नहीं होगा प्रत्युत हानि होगी,
यहां इस योगके मूल वाक्यमें, " अंशैरधिकोनकैश्चेत् ” अर्थात् मणउं करने
वाला ग्रह शीघसे पीछे वा आगे अंशोंमें समीपहो कहा है युक्तिसे यह भी
विचार चाहिये कि, जो शीघ्र ग्रहसे आगे हो तो इससे भी आगे कार्येश
। जो ग्रह है वह मणउं करनेवाले ग्रहले मन्दगति हो. क्योंकि यह उसको
अपनी गतिसे आक्रमण करसके तो मणउं योग होगा जब मणउं करनेवालेसे
आगेका लग्नेश शीवसे मन्दग्रह मणउवालेसे शीघ्र हो तो मणउं करनेवालेसे,
क्योंकि इसमें उसको आक्रमण नहीं की है दूसरा जब शीघ्र ग्रहसे पीछे
मगउं करनेवाला मंगल वा शनि होतो यह इतना शीघ्रगति होनाचाहिये कि
कार्येश वा लग्नेश पूर्वोक्त शीघ्रगति ग्रहको आक्रमण करके आगेवाले योग
कारक मन्द ग्रहको पहुँचसके तो मणउं ठीक होगा. जब इसकी इतनीशीघ्र
गति नहीं है कि पीछेवाले शीघ्र ग्रहोंको उल्लंघनकर आगेवाले मन्दगति तीसरे
ग्रहको न पहुँचसके तो म]उ योग नहीं होगा, लग्नेश कार्येशका पूर्वोक्त
इत्थशालही रह जायगा ऐसे विचार औरभी स्वबुद्धिसे चाहिये. यहां शनि
और मंगलके मणउं योग तीन तीन प्रकारके होनेसे छः भेद हुये, उपरान्त
शीघ्र ग्रहके पीछे और आगे मणउवाला ग्रह होनेसे बारह भेदहैं, शेष बुद्धिसे
विचारना, भाषा बहुत बढ़ जानेके कारण मैंने सूक्ष्मही लिखा है॥ १८॥१९॥

६ (५२), ताजिकनीलकण्ठी। उपजा-यदीत्थशालोस्त्युभयोःस्वदीतहीनाधिकांशैः शनि भूसुतौचेत् ॥ एकक्षगौलनपकार्य्यपौस्तस्तेजोहरौकार्यहरौ निरुक्तौ ॥२०॥ नक्तयोगका भेद औरभी है कि, जब लग्नेश कार्येशका पूर्वोक्त प्रकारसे इत्थशालहो और इनके दीप्तांशोंके भीतर आगे वा पीछे शनि मंगल दोनहूं वा एक ग्रह उन दोनोंके समीप-दीप्तांश भीतर आगे वा पीछे हो अथवा लग्नेश कार्येशमें एकके साथ शनि वा मंगल उसके दीप्तांश भीतर आगे वा. पीछे हो तो यहभी मणउं योग कार्यनाश करनेवाला होताहै. ॥ २० ॥ उपजा-राज्याप्तिपृच्छातुललग्ननाथः कसितोशैस्तिथिभि- दिगशैः॥ वृषेशशीभूपलवैःकुजश्चहरेद्दयो हरतेचराज्यम् ॥२१॥ इस मणउं योगका उदाहरण राज्यप्राप्ति प्रश्नमें तुला- लग लगेश शुक्र दशम कर्कके पंद्रह अंशपर राज्येश चंद्र- मा अष्टम वृषके दशअंशपर उच्चवर्ती तथा मंगलभी अष्टम- वृषके १६ अंशपर है और शनिभी अष्टम वृषके दश अंशपर है मंगल शनिमें से एकके होनेसेभी योग होजाता है, यहां उपलक्षणार्थ दोनहूं लिखे हैं. प्रयोजन यह है कि, लग्नेश कार्येशमेंसे एकके भी दीप्तांश भीतर आगे वा पीछे भौम शनिमेंसे एकभी होनेसे योग सम्पन्न होता है, यहां लग्नेश कार्येशके शुक्र चंद्रके इत्थशालमें राज्यप्राप्ति होनीथी मंगल शनि कार्येशके साथ उसके दीप्तांशोंके समीप होनेसे इन्होंने उसका तेज नाश करदिया इसका नामभी मणउं योग है, राज्यप्राप्ति नहीं होने देगा प्रत्युत राज्यहानि करेगा, यहभी मणउंका भेद है ॥ २१ ॥ अनुष्टुप्-लनकायॆशयोरित्थशालेनोद्वित्थशालतः। कंबूलं श्रेष्ठमध्यादिभेदैर्नानाविधंस्मृतम् ॥२२॥ लमेश कार्येशका पूर्वोक्त प्रकारसे. इत्थशालहो, और चन्द्रमा लग्नेश कार्येश वा दोनोंके साथ इत्थशाली रहे तो इसका नाम कबूल योग - १२ વાર ।

भाषाटीकासमेता। (५३) होताहै, कंबूल पारशीय पद कबूलका पर्यायहै इसके श्रेष्ठ मध्य अध भेदोंसे अनेक प्रकार हैं. उच्च स्वगृहसे उत्तमाधिकार स्वहद्दा द्रेष्काण नवां- शकसे दूसरा मध्यम अधिकार शत्रु नीचगृहावस्थितिसे तीसरा अधमा- धिकार जहां इन तीनोंमेंसे एकभी अधिकारी न हो तो यह चौथा समा- धिकार है, इससेभी चन्द्रमा उत्तमाधिकारी हो और लमेश कार्येशमेंसे कोई प्रत्येक भेद करके चार अधिकारोंमें होनेसे चारभेद, ऐसेही चन्द्रमा मध्यमा- धिकारी और अधम तथा समाधिकारी होनेमें उनके प्रत्येक अधिकारों करके ४। ४ भेद होतेहैं. समस्त सोलह १६ भेद हुये, पुनः १६ भेद लग्नेशके १६ कार्येशके होनेसे संपूर्ण ३२ बत्तीस भेद होतेहैं, इनके नाम उत्तमोत्तम १ उत्तम मध्यम २ उत्तम सम ३ उत्तमाधम ४ मध्यमो- त्तम ५ मध्यम मध्यम ६ मध्यमाधम ७ मध्यम सम ८ समोत्तम ९ मध्यम १० सम सम १३ समाधम १२ अधमोत्तम १३ अधममध्यम १४ अधम सम १५ अधमाधम १६ ये सोलहविकल्पोंके नाम हैं, लग्नेश कार्ये- शके प्रत्येक करके ३२ बत्तीस होते हैं, उनमें उत्तम सम और समोत्तम ये दोनों मध्यमहीके हैं.४ाटभेद सभीके होते तो३२ सेभी अधिक विकल्प होने थे किंतु यहां लमेश कार्यशकी उच्चादिकल्पना आवश्यक नहींहै, इत्थ- शालमात्र चाहिये, केवल चन्द्रमाके उच्चादिभेद आवश्यक होनेसे यहां १६ ही भेद होतेहैं लग्नेश कार्यशके पृथक् गणनासे ३२ बत्तीस होतेहैं ॥२२॥ अनु०-यदीन्दुःस्वगृहोच्चस्थस्ताहशील कार्यपौ इत्थशालीकबूलंतदुत्तमोत्तम च्यते ॥२३॥ चन्द्रमा स्वराशि में अथवा अपने उच्च राशिरमें ऐसे हीस्वराशि वा स्वोचराशिगत लग्नेश और कार्येशभी हो लग्नेश कार्येशका इत्यशाल हो चन्द्रमा दोनोंके इत्थशाली हो तो इसका नाम उत्तमोत्तम कंबूल होताहै यहां ग्रंथकर्त्ताने केवल उत्तमोत्तम उत्तमाधम दोनों आद्यन्तवालोंके उदा- २ ३ (मसू१ १७२० चं१४ १० (५४) ताजिकनीलकण्ठी। हरण कहेहैं. पूरेग्रन्थ बढजानेके भयसे न लिखे, अपनी बुद्धिसे समझलेना कहाहै इस भाषामें और ग्रन्थसे ग्रंथकर्ताका अभिप्राय पुष्ट करनेको मैं उदाहरण लिखताहूं कि, "मेपेरविःकुजेवापि वृपेकर्केथवाशशी ॥तोत्थशाला- कंबूलमुत्तमोत्तमकार्यकत्॥१॥"अर्थ-संतती होगी वा नहीं ऐसे प्रश्नमें मेप लम लग्नेशमें २० अंशपर संतानप्रश्न होनेसे पंचमेश आवश्यकहै सोही पंचमेश सूर्य लग्नमें मेप १७अंशपर होनेसे एकराशिस्थ दृष्टि और दीतांशा- भ्यंतर होनेसे इत्थशाल हुआ. अब कम्बूल करनेवाला चन्द्रमा स्वगृही चतुर्थ थानमें कर्क १४ अंशपरहै लगेश कार्येश मं० शु० दोनहूंके साथ इत्थ- शाल करता है, यह उत्तमोत्तम कबूल हुवा, कार्यभी उत्तमोत्तम करेगा. उत्तमोत्तम कंवूलर उ० त० कंबूल ४ १२, ११ १ उ० त० कंधूल ३ १२ १२ ९ २ २ मर५ ११ च ४ सू२२ च१० ४ १० न 10 १४ ४ ब ३ ६ इस विषयके उदाहरण तीन कुंडलियोंमें औरभी लिखेहैं और लग्नेश कार्यशमेसे एक ग्रहके साथभी चन्द्रमा मुथशिल करे तो यहभी कंबूल होताहै ॥२३॥ अनु०-स्वीयहद्दाद्रिकाणांकभागस्थेनेत्थशालतः ।। मध्यमोत्तमकबूलंहीनाधिकृतिनोत्तमम् ॥ २४ ॥ लग्नेश कार्यश अपने हद्दा स्वद्रेष्काण वा स्वनाशकमें परस्पर मुथशिल कारी हो, और चंद्रमा स्वराशि वा उच्चराशिमें बैठकर उनके साथ इत्थशाल करे वो. उत्तम मध्यम संज्ञक कंबूलयोग होता है. यहां ग्रंथकर्त्ताने श्लोकमें छन्दोभंगके भयसे मध्यमोत्तम लिखाहै. संज्ञा इसकी उत्तम मध्यमहै. इसका उदाहरण भाग्यवृद्धिमें तुलालम लमेश शुक्र दशम स्थानमें कर्कका ६ ५ १० ३ बु २ भाषाटीकासमेता। उत्तममध्यम कबूल१ अपनी हद्दामें और भाग्यभावाधीश बुध सप्तमस्था नमें अपने हद्दा में १४ अंशपर है इनकापरस्पर मुथ शिलयोगहै अब कंबूली चन्द्रमा स्वराशिगत कर्ककेट अंशमें लग्नेश कार्यश दोनहूंके साथ मुथशिल करता ११ है, योगपूर्णहुवा. यह लग्नेश कार्यशके स्वहद्दामें और /१२ चन्द्रमाके स्वोच्च वा स्वराशिगत होनेसे उत्तम मध्यम कंबूलहुआ. ऐसे लगेश कार्येशके स्वद्रेष्काण वा स्वनवांशगत और चन्द्रमा स्वोच्च वा स्वराशिगत होनेमें उत्तम मध्यम कबूल होते हैं, जब लगेश कार्येश समगृहेश हद्दा: द्रेष्काण नवांशमें स्थित होकर परस्पर मुथशिल करे और चन्द्रमा स्वगृह वा स्वोच्चगत होकर मुशिली हो तो उत्तम सम कंबूल होता है, इसका उदाहरण राज्यप्राप्तिप्रश्नमें मिथुनलम लग्नेश बुध समयह मंगलकी राशि में और राज्यभावेश बृहस्पति समगृह बुधके ६ राशिमेंहै, कंबूली चन्द्रमा अपने उत्तम सम कबूल उच्चराशि वृषमें है स्वराशि कर्कमें होनेसेभी यही होता है यहां अंशकन्यांश दीप्तांशोंके अंतर मुथशिल ५ योग होनेके योग्य चाहिये. यह उत्तम सम कंबूला र ६ हुआ, राज्यप्राप्ति उत्तम होगी ॥ २४ ॥ ४ चं२ १ १२ ११ १ १० अनुष्टु०-उत्त धिमतानीचारपुगेहस्थितेनचेत् ॥ स्वद्रेष्काणांशगश्चंद्रः स्वभोवस्थेत्थशालकृत् ॥ २५ ॥ नीचराशि वा शत्रुराशिमें लगेश वा कार्येश परस्पर मुथशिली हों और चन्द्रमा अपने उच्च वा अपनी राशिमें बैठा दोनहूंके साथ इत्थशाल करे तो उत्तमाधम कंबूल होता है, यह योग चन्द्रमाके उत्तमाधिकारी और लग्नेश कार्येशके निकष्टाधिकारी होनेसे है, उदाहरण खीमाप्तिप्रश्नमें तुलालन लग्नेश शुक्र कन्याके १० अंशपर नीच राशिगत और सप्तमेश मंगल नीच .

(१ १० चं? १५॥ ३॥ २ ताजिकनीलकण्ठी। उत्तमाधम कंचूल राशिगत कर्कके १५ अंशपर शुक्रके साथ इत्थशाली है. चन्द्रमा स्वराशि ४ गत कर्कक १० अंशपर बैठकर शु० म० के साथ मुथ शिली है. इस हेतु यह उत्तमाधम कंवूल हुआ, ११ स्वी प्राप्ति थोडे प्रयाससे होगी यह फल है. यह/१२ पचीसवें श्लोकके पूर्वार्धका अर्थ हुआ इसके उत्तराई और छब्बीसवेंके पूर्वाई 'मध्यमोत्तम'इसमें मध्यमोत्तमकंवूल इसप्रकारका है कि चन्द्रमा अपने द्रेष्का- ण वा अपने नवांशमें स्थितहो और लग्नेश कार्येश अपने अपने स्थानोंमें बैठ परस्पर इत्थशाली मध्यमकंवूलके तरह यहभी है, उदाहरण स्त्रीप्राप्तिप्रश्नमें तुलालम लमेश शुक्र लपमें सप्तमेश मंगलमेवका मध्यमोत्तम कबूल और चन्द्रमा मकर राशिमें २२ अंश अपने नवां शपर है, शुक्र मंगलका परस्पर मुथशिल और चंद्रमा दोनहूंसे मुशिली है, यह मध्यमोत्तम कंबूल हुआ; फल पूर्ववत् है ॥ ५२ ॥ ८. १०च 0.. ११/१ मं १२ अनु०-मध्यमोत्तममेतच्चपूर्वस्मानविशिष्यते ॥ स्वहदादिपदस्थेनकंवूलंमध्यमध्यमम् ॥ २६॥ इस श्लोकके पूर्वार्थका अर्थ पूर्व २५ श्लोकार्थके साथ संबंधवशसे लिख दिया है, उत्तराईसे मध्यम कंबूल इसप्रकार है कि स्वहद्दा द्रेष्काण वा नवां- शमें स्थित लग्नेश वा कार्यशहो दोनहुं परस्पर मुथशिली हों और चंद्र- माभी स्वद्रेष्काण वा स्वनवांशमें बैठकर इनके साथ मुथशिली हो तो मध्यममध्यम कंबूल होता है, यहां तीनहूंकी स्वगृहस्वोचराशि छोडकर स्वहद्दादि मध्यमाधिकारोंकी आवश्यकता है. उदाहरण, स्त्रीलाभ प्रश्नमें मिथुन लग्न लग्नेश बुध धनके १८ अंशपर अपने हदामें सप्तमेश बृहस्पति ४ २ १६ ५ वृ ६ १२ १० भाषाटीकासमेता। (५७) मिथुनके १६अंशपर अपने हद्दामें और चंद्रमा मीनके मध्यम मध्यम कंचूल दूसरे द्रेष्काणमें १२ अंशपर अपने द्वादशांशपर है. यहां तीनहूंकी परस्परस्थान दृष्टि होनेसे एवं मुथशिल परस्पर होनेसे मध्य मध्यम कंबूल हुवा.स्त्री प्राप्ति अति यत्नसे होगी यह फल है. ॥ २६ ॥ अनु०-मध्यमध्यमकंबूलंहीनाधिकृतखेटजम् ।। मध्यमाधमकंबूलं नीचारिभगखेटजम् ॥ २७ ॥ स्वगृह स्वोच हद्दा द्रेष्काण नवांश और शत्रु नीचाधिकार रहित अर्थाद समगृह हद्दा द्रेष्काण नवांशमेंसे किसीमें लग्नेश कार्येश हों और चंद्रमा मध्यमाधिकार अर्थात् स्वनवांश वा स्वद्रेष्काणमें हो परस्पर इत्थशाली हो तो मध्यमसम कंवल होता है. उदाहरण, संतान प्रश्नमें वृप लम लगेश शुक्र मकरके चार अंशपर सम बुधकी हद्दामें मध्यम सम कंबल और पंचमेश बुध तुलाके पांच अंशपर सम हदामें ४ और तुलाका चंद्रमा २ अंशपर है अपने द्रेष्काणमें है. यह मध्यमसम कंचूल हुवा. संतति प्राप्ति यत्नसे होगी. और लग्नेश कार्येश नीच वा घुईचर शत्रुराशिमें परस्पर मुथशिल हों, चंद्रमा अपने द्रेष्काण वा नवांशकमें बैठकर दोनोंके साथ मुथशिली हो तो मध्यमाधम कंबूल होताहै. उदाहरण, मेष लम लमेश मंगल कर्कका नीच राशिम और भाग्याधीश मध्यमाधम कंवूल वृहस्पति मकर अपने नीच राशिमें चन्द्रमा तुलाके ३ पांच अंशपरहै,मंगल बृहस्पनिके अंश मुथशिल योग्य मं९ नी११ लिखने चाहिये. जैसे यहां उदाहरण कुंडलीमें मंगल ९ अंश बृहस्पति १० अंश लिखाहै इनका परस्पर मुथशिल हुआ और चंद्रमा दोनहूके साथ मुथशिली अपने विभागमें है. यह अधमाधम कंबल हुवा, भाग्य प्राप्ति अतिकष्टसे होगी ॥ २७ ॥ . २ १२ ११ ६ १२ १ ११ 'वस्त्र ९) १०८ ६ ५ 'गुरु शु -10 d. (५८) ताजिकनीलकण्ठी। अनु०-इन्दुः पदोनः स्वोच्चयुतेनाप्युत्तमंतुतत् ॥ स्वहदादिगतेनापिपूर्ववन्मध्यमुच्यते ॥ २८ ॥ चंद्रमा अधिकाररहित होनेसे पदोन होता है. यह दोप्रकारका है; पहि- ला समग्रहके हवा द्रेष्काण नवांश, और दूसरा सूक्ष्म है. कि समग्रह हद्दा द्रेष्काण नवांशोंके आदि वा अंतमें संधिगत होनमें यह दोपकार पदोन कहाताहै, लग्नेश वा कार्येश अपनी राशि वा अपने उच्चराशिमें हों परस्पर इत्थशाली लग्नेश कार्येश हों और पदोन चंद्रमा इनसे मुथशिली हो तो समोत्तम कबूल समोत्तम कबूल होता है, उदाहरण, धन लाभ प्रश्नमें तुला लग्न लग्नेश शुक्र लममें अपने घरका धनेश मंगल अपने उच्चराशि मकरका और चंद्रमा मिथुनका समके हद्दा में है. यहां अंश कल्पना इत्थशाल योग्य करनी चाहिये. यह समोत्तम कंबूल योग हुवा. फल धनप्राति उत्तम होगी. और श्लोकोत्तरार्धसे दूसरा योग यह है कि चंद्रमा पूर्ववत् पदोन हो और लग्नेश कायॆशमें से एक अथवा दोनहूं अपने हद्दा द्रेष्काण नवांशकमें हो परस्पर लगेश कार्यशका इत्थशालहो. चंद्रमा भी इत्यशाली हो तो यह सममध्यम कंचूल होता है, उदाहरण, धनलाभ प्रश्नमें तुलालम. लग्नेश शुक्र ग्यारहवां सिंहके दश अंशपर सम मध्यम कबूल अपने हद्दामें. और धनेश दश अंशपर तीसरा और चंद्रमा मिथुनके दश अंशपर समकी हद्दामें है, इनका परस्पर मुशिल योग होनेसे यह समकंबूल हुवा, धनलाभ यत्नसे होगा, यह इसका फल भया ॥ २८ ॥ अनुष्टु०-पदोनेनापिमध्यस्यादितियुक्तंप्रतीयते ॥ नीचारिस्थेनेत्थशालोऽधर्म कबूलमुच्यते॥२९॥ ११ १२ .... ४ m. G १२ समसमाख्य मध्यम कं० or १२ . शु११ १० मि१०/१० ह १२ भाषाटीकासमेता। (५९) लगेश और कार्येश पादोन होकर परस्पर इत्थशाली हों और चन्द्रमाभीः पदोनहोकर लग्नेश और कार्येशके साथ इत्थशाली हो तो समसमाख्य मध्यम कंबूल प्रतीत होताहै "उदाहरण" धनलाभ प्रश्न मेषलंग लगेश · मंगल सिंहके दश अंशपर धनाधीशशुक्र कुंभके . दशअंशपर और चन्द्रमा तुलाके दश अंशपर तीनहूं द्रेष्काणोंके । संधियोंमें पूर्वोक्त दूसरा प्रकार सूक्ष्म पदो-ह नता हुई इन तीनहूंका परस्पर मुथशिल है, यह समसमाख्य मध्यम कंबूल हुआ फल धनलाभ मध्यम अर्थात् न बहुत अधिक न अत्यंत अल्पहोगा अथवा वही लगलग्नेश भौम सम और सूक्ष्मके २६अंशपर धनेश शुक्रसम शनि हद्दामें २६ अंशमें और चंद्रमा सम बृहस्पतिके द्रेष्काण में २० समासमाख्य कंबल अंश परहै ये तीन-स्पर मुथशिली हैं यह भी प्रका- रांतरसे समसमाख्य मध्यम कंबूल है. फलभी पूर्वोक्त- ही होगा. यह श्लोक पूर्वाईका है अबउत्तरार्धसे समाधम कंबूलका लक्षण कहते हैं कि लग्नेशं वाह/६ कार्येश नीचराशि वा शत्रु रोशिमें होकर पस्पर मुशिली हो और पूर्ववत् पदोन चंद्रमा उनसे इत्थशाली होतो समसमाख्य कंबूल होता है. उदाहरणं, पुत्र प्रश्नमें मिथुनलग्न लगेश बुध नीचका मीनमें पुत्रभावेश शुक्र नीचका न्यामें चं द्रमा बृहसतिके द्रेष्काणमें है, यहांभी अंश कल्पना इत्थशालयोग चाहिये. यह तीनोंके परस्पर मुथशिल होनेसे समाधम कंबूल हुआ फल संतानप्राप्ति अल्पयत्नसे होगी ॥२९॥ ३ १ Phon है चं७ . ५ २ ७२० समसमाख्य मंध्य के १२ साथ शु६ ९चं बृ १२ धमाख्य कंधूल ४ १ अघमोत्तम क० चं २ ११ मं१०/१२ (६०) वाजिकनीलकण्ठी। अनुष्टु०-नीचशत्रुभगश्चंद्रःस्वभोच्चस्थेत्थशालकृत् ॥ अधमोत्तमकंबूलं स्वहदादिगतेनचेत् ॥ ३० ॥ चंद्रमा नीच राशि वा शत्रु राशिमें हो. और लग्नेश वा कार्येश अपनी राशि वा अपने उच्च राशिमें दोनहूं वा एक भी हो तो चंद्रमाके अधम और लग्नेश कायॆशके उत्तमाधिकार होनेसे यह अधमोत्तम कंबूल योग होता है. इसका फल पूर्वोक्त अधमोत्तम कंबूलके सदृश जानना उदाहरण; सुख प्राप्ति प्रश्नमें सिंह लग्न लग्नेश सूर्य अपने उच्चमका और चंद्रमा अपने नीच वृश्चि कका है. यहां अंश इत्थशाल योग्य रखने चाहिये जिनसे परस्पर तीनहूंका मुथशिल होजाय. फल इसका सुख थोड़ा प्रयत्नसे प्राप्त होगा. यह श्लोकके तीन चरणोंका अर्थ हुआ. अब चौथे चरण और दूसरे श्लोक पूर्वार्द के अर्थसे अधममध्यम कंबूल इसप्रकारका है कि जब चंद्रमा नीच वा शत्रु राशिमें हो और लग्नेश वा कार्येश वा दोऊ अपने हद्दा द्रेष्काण नवांशकमेंसे किसीमें हों परस्पर तीनहूं इत्थशाली हो तो चंद्रमाके निकष्टाधिकार और लग्नेश कार्यशके मध्यमाधिकारी होनेसे यह मध्यममध्य कंबूल होताहै. " उदाहरण पुत्रप्राप्ति प्रश्नमें कन्यालम लमेश बुध मक रके तीन अंशपर अपनी हद्दा पुत्रभावेश शनि मीनके ५ अंश अपने द्रेष्काणमें और चंद्रमा वृश्चिकके तीन अंशपर है. इनका परस्पर मुथशिल है यह अधममध्यम कंबूल हुवा. फल इसको संत तिप्राप्ति अति कष्टसे होगी. इसीमें अधमसम कबूली है कि चंद्रमा नीच -वा शत्रु राशिमें हो और लग्नेश कार्येश दोनहूं वा एक पदोन हो (पदोनका अर्थ पूर्वोक्त जानना) तो अधमसम कंबूल होता है. उदाहरण, राज्यप्राप्ति " मध्यममध्य कं० ५ चं३ ६ ३ श १ aw . १२ ११ अघमसम का ३ १ श१० १२ पशु६ ११ ६८चं३ ८चं३१० अधमाधम कं भाषाटीकासमेता। (६१) प्रश्नमें वृष लग्न लग्नेश शुक्र सिंहके ६ अंशमें सूर्य एक राशिमें है, और राज्य भावेशशनि वृषके १०॥ अंशमें और चंद्रमा नीच वृश्चिकके ३ अंशमें है सबकी परस्पर दृष्टि होनेसे इत्थशालभी है, यह अधम सम कम्बूल है, फल राज्यप्राप्ति कठिन उपायसे होगी ३० अनु०-नीचारिभस्थखेटेननीचारिभगतः शशी ॥ इत्थशालीकंबूलंतदधमाधममुच्यते ॥३१॥ अधमाधम कम्बूलका लक्षण कहते हैं कि चन्द्रमा, नीच वा शत्रु राशिमें हो, और लग्नेश कार्येशभी नीच वा शत्रु राशियों में हो तो यह अधमाधम कम्बूल होता है, उदाहरण, पुत्रलाभ प्रश्नमें धन लग्नेश बृहस्पति अपने नीच मकर राशिमें पुत्र भावेश मंगल अपने नीच कर्कका और चंद्रमाभी अपने नीच वृश्चिकका है, यहां अंश कल्पना इत्थशाल योग्य चाहिये यहां इन तीनहूके परस्पर मुथशिल हैं, अध- १९ माधिकार होनेसे यह अधमाधम कंबूल हुवा पुत्रलाभ र नहीं होगा यह फल है. ऐसेही इनके शत्रु राशिगत होने में भी निकष्टाधिकारसे यह योग है ॥ ३१ ॥ अनुष्टु०-मेपेरविः कुजेवापिवृषेककैथवाशशी ॥ तोत्थशालात्कंबूलमुत्तमोत्तमकाय्यकृत् ॥ ३२॥ प्रथमं भेद उत्तमोत्तम और अंतिम भेद अधमाधम उपलक्षणार्थ पुनः प्रकारांतर सुगमार्थ अन्योक्तिसे कहतेहैं कि किसी लग्नसे मेषका सूर्य अथवा मंगल हो और चंद्रमा उच्च वृषका वा स्वराशि कर्कका हो इनकी परस्पर दृष्टि और दीप्तांश इससे इत्थशाल हो तो यह उत्तमोत्तम कबूल कार्य कर्ता होताहै यह हेतु लग्नेश कार्येश और चंद्रमाके उत्तमाधिकार होनेका है ॥ ३२॥ च ११ ६ ४म (६२) ताजिकनीलकण्ठी। अनुष्टु०-वृश्चिकस्थः शशीभौमः कतत्थशालतः ॥ अधमाधमकंबूलंकार्यविध्वंसदुःखदम् ॥३३॥ जो जन्द्रमा बृश्चिकका और मंगल कर्कका हो परस्पर इत्थशाली हो तो अधमाधम कबूल कार्य्यनाशक होता है, इसका हेतु इनके अधमाधिकारी होनेसे है ।। ३३ ॥ अनु -एवंपूर्वोक्तभेदानामुदाहरणयोजना ॥ उक्तलक्षणसंबंधाहनीयाविचक्षणः ॥३४॥ ये भेद आदि अंतमें मुख्य हैं, इनके बीचके चौदह भेद उक्त लक्षण संबंधसे जानने एवं प्रकार सोलह भेद जो प्रकट हैं, इनके तो पृथक् २ उदाहरण कहदिये हैं, उपरांत इनके बहुत भेद होतेहैं बुद्धिमानोंने अपने बुद्धि बलसे उक्त लक्षणोंके आधारसे जानलेने ॥ ३४ ॥ अनुष्टु०-मेषस्थेब्जेशनीत्यादि दृष्टांती मंदशीघ्रयोः । एकावस्थितावित्थशालादीनपरेजगुः ॥३५॥ प्रकारांतरसे एक राशिस्थ शीघमंद ग्रहोंके मुथाशिल कहते हैं, कविता, मेपस्थेजे शनिना कर्कस्थे भूभुवास्त्रिया । मकरस्थेन गुरुणा सहमनिस्थज्ञं न शुभं च" यह आ`छंदका भेद समरसिंहकृत है। जिसका प्रतीक मेषस्थे ब्जेशनीत्यादि, आचार्य्यने कहाहै, अर्थ इसका यह है कि, मेषके चंद्रमा और शनि परस्पर अंशोंसे मुथशिली हो तो मध्यमाधम कंबूल अशुभ फल का होता है यहां चंद्रमा मेषमें स्वगृहोच्चाधिकारी भावहै,परन्तु स्वीय नवांशमेंहै और शनि नीचका हुवा ऐसे इस योगकी प्राप्ति हुई १और चन्द्रमा मंगल कुर्कमें इत्यशाली हो तो एक स्वगृह एक नीचका होनेमें उत्तमाधम कंबूल होताहै २ तथा चंद्रमा शुक्र कन्यामें परस्पर इत्थशाली हों तो शुक्र नीचका और चन्द्रमा कन्यामें अपने अंशपर होनेसे यह मध्यमाधमकंबूल होताहै३तथा चंद्रमा बृहस्पति मक रमें परस्पर मुशिली हों तो बृहस्पति नीचका चन्द्रमा स्वनवांशका होनेसे मध्य- माधमकंवूल होताहै४तथा चन्द्रमा बुध मीनमें इत्थशाली हो तो बुध नीचका और चन्द्रमा स्वनवांशका होनेसे मध्यम मध्यम कंवूलहोता है, ५ ये. १ भाषाटीकासमेता। (६३) पाचौं उदाहरण अशुभफल देनेवाले होते हैं, आचार्य्यने मेषस्थेब्जेत्यादि समर सिंहवाक्यके दृष्टांतसे शीघ्र मंदगतिग्रहोंके एकराशिस्थ होनेमें कहा इत्यादिभेद औरभी होते हैं यह अभिप्राय प्रकट कियाहै ॥ ३५ ॥ अनु०-तदयुक्तंनीचगस्थनीचेनरिपुणारिपोः ॥ इत्थशालंकार्य्यनाशीत्युक्तंतत्रयतः स्फुटम् ॥३६॥ लमेश कार्येश और चन्द्रमा नीच वा शत्रुराशिमें हो तो इत्थशाल कार्य नाशक कंबूल होताहै यह पूर्वोक्तवाश्य और आचार्येतरोक्तिहै और यहां कार्य नाशक एक राशिस्थ इत्थशाल भेदभी कहा हैं तो इसमें अतिव्याप्ति होतीहै. इसके शंकानिवृत्त्यर्थ आचार्यकृत यह श्लोक है, प्रयोजन है कि, नीचराशि गतग्रह नीचस्थ ग्रहसे और शत्रुराशिस्थ ग्रहसे इत्यशाली हो और चन्द्रमा नी- चशत्रुगत इत्थशाली हो तो यह अन्यत्र तो संभव है परन्तु एकराशिस्थ जो होकर अशुभफली कंबूल भेदकहेहैं उनमें अयुक्त हैं क्योंकि नीचराशि दोन- हकी एक नहीं होती तथा शत्रुराशि दोकी एकभी यहां असंभव है, जहां शत्रुता होगी वहां दृष्टि न होगी,दृष्टिविना इत्थशालही नहीं होताहै.यहा लग्नेश कार्ये- शकी परस्पर दृष्टि न होनेमें बीचवाले किसी ग्रहके दोनहूँके समीपांशषर्ती होनेसे इत्थशाल संभावना मानी जाय तो इसप्रकार होनेमें नक्तयोग ही होगया, यदा दोनहूं के बीच तीसरा एकसे तेज लेकर दूसरेको देता है, यह मानाजाय तो यह यमया योग होजाताहै, ऐसी ही शनि मंगल से मणउं योगभी संभव है तो प्रथम भिन्न राशिगत चतुर्थ सप्तम दृष्टेत्यादि स्पष्टही कहा है, अब मेषस्थे- ब्जेत्यादि दृष्टांतको अंगीकार नहीं करते तो उक्तनतादि योगोंमें व्यत्यास पडताहै तस्मात् सभी योगोंमें मुथशिल विचार भिन्न राशि वा एक राशिस्थ अहाँका होताही है यह सिद्धांत हुआ ॥ ३६ ॥ अनुष्टु०-लग्नकार्यपयोरित्थशालेकोस्तिनीचगः ॥ स्वादिपदहीनोन्योऽवेंदुः कबूलयोगकृत् ॥३७॥ कंबूल योगकां भेद और प्रकारभी है कि प्रथम लग्नेश कार्येशों से एकभी अपने अधिकारमें होकर मुथशिली होनेसे सम कहा, जो लग्नाधीश " (६४) ताजिकनीलकण्ठी। वा कार्येश एक नीच राशिमें हो और दूसरा स्वादि पदहीन अर्थात् सम द्रेष्काणादिकोंमें हों और चन्द्रमाभी पदहीन इन तीनहूंका परस्पर मुथशिल हो तोभी कंबूल योग होता है ॥ ३७ ॥ अनुष्टु०-तत्रकार्याल्पताज्ञेयायथाजात्यन्यमर्थयन् ॥ अन्यजातिपुमानर्थतथैतत्कवयोविदुः ॥ ३८॥ इस कबूल भेदका फल दृष्टांत सहित कहते हैं कि, जैसे एक जाति दूसरे जातिवालेसे याचना करके स्वल्पलाभी होता है, तैसेही यह कबूलभी स्व- ल्पलाभ देता है, प्रकट यह है जो यजमान ब्राह्मणको आपही बुलायकर देगा तो उसकी इच्छानुकूल देगा जो ब्राह्मण आपही जायकर मांगेगा तो यजमान स्वल्पही देगा, ऐसा फल इस कबूलका कविजन कहते हैं ॥ ३८॥ अनुष्टु-यस्याधिकारः स्वादिशुभोवाप्यशुभोपिवा ।। केनाप्यदृश्यमूर्तिश्चसशून्याध्वगइप्यते ॥३९॥ अब गैरिकवूलके लक्षणके लिये प्रमम शून्य मार्गगत यह लक्षण क- हते हैं कि, जो यह स्वगृह वा स्वोच्च वा स्वद्रेष्काण स्वनवांशमें कोई भी शुभाधिकारी नहींहै तथा नीच शत्रु राश्यादि अशुभाधिकारीभी नहीं है, तथा (पदहीन) समद्रेष्काण हद्दा नवांशाधिकारीभी नहीं है, और उसपर पाप वा शुभ किसी ग्रहकी दृष्टि नहीं है तो वह यह शून्याध्वग कहाता है ॥३९॥ अनुष्टु०-लग्नकार्येशयोरित्थशालेशून्याध्वगः शशी ।उच्चादिपद शून्यत्वान्नेत्थशालोस्यकेनचित् ॥ ४० ॥ यद्यन्यक्षपविश्यैपस्व- शौच्चस्थेत्थशालवान् ॥ गैरिकंबूलमेतत्तुपदोनेनाशुभस्मृतम् ॥४१॥ चन्द्रमा शून्य मार्ग हो और लग्नेश कार्येश एक वा दोनहूं ऐसेही शून्या ध्वग हो चन्द्रमा इनसे इत्थशाली तो नहो किंतु चन्द्रमा राश्यांतर अर्थात दूसरी ऐसी राशिमें प्रामहोनेवाला हो कि वह राशि जिसका स्वगृह वा जिसका उच्च हो वह यह उसीमें बैठा हो अंशोंमें ऐसा हो कि चंद्रमा प्रवेश करतेही उस ग्रहसे इत्थशाली होजाय, इसप्रकार होनेमें गैरिकबूल योग होताहै, यहभी कबूल भेदके तुल्य फल देताहै, दूसरे जो अन्य राशिस्थ भाषाटीकासमेता। (६५) शून्याध्वग चंद्रमा उसी राशिस्थित शून्याध्वंग ग्रहसे इत्थशाली हो तो यह गरिकम्बूल अशुभ फल देताहै, यह गैरिकम्बूल पारसीय पद (गैरकबूल ) अंगीकार न करनेका अर्थ कबूलका विपरीत अशुभही है यहां जो कम्बूल भदेके तुल्य फलदेना एक पक्षकाहै इसमें राश्यंत राश्यादिवर्तमान इत्यशाल भाव प्राप्त होनेसे तहत हुवा, अगरिकम्बूल गैरकम्बूलही है, यह ताजिकवेचा आचार्योका सम्मतहै ॥ ४०॥ ४१ ॥ अनुष्टु०-लप्स्येसुखमितिप्रश्ने सिंहल रविःक्रिये ॥ अष्टांशैः खपः भेभौमोंशैरविभिस्तयोः॥४२॥ इत्थशालोस्तितत्रे कन्यायांचरमेशके ॥ स्वादिपदहीनस्यनेत्थशालोस्यके- नचित् ॥ ४३ ॥ स्वस्वोच्चगेनशनिनाऽन्यक्षस्थेनेत्यशालक- तु ॥ गैरिकंबूलमन्येनसहायाल्लाभदायकम् ॥४॥ गरिकम्बूलका उदाहरण, सुखप्राप्ति प्रश्नमें सिंह लग्न लग्नेश सूर्य्य मेषके आठ अंशपर नवम स्थानमें, कार्येश मंगल सप्तम ,कुम्भके १२ अंशपरहै, इनका परस्पर मुथशिलहै, अब इस योगमें चन्द्रमा द्वितीय भावमें, कन्याके अन्त्य २९ अंशमें पूर्वोक्त प्रकारसे शून्यमार्ग है, इसका लग्नेश गैरिकम्बूल, वा कार्येशसे मुथशिल नहीं है, परन्तु चन्द्रमा गैरिकवूल. तुलाका . होनेवालाहै, यह राशि शनिका उच्चहै शनि यहां तुलाके इत्थशाल योग्य अंशपर है कि... लग्नेश कार्येश सू० मं० के साथ इत्थशाली हो सकता है, अब चन्द्रमा तुलाके होनेपर शनिके साथ इत्थशाली होना चाहताहै ऐसा होनेमें शनिका दोनहूंके साथ इत्थशालीका प्रयोजन चन्द्रमाने ग्रहण किया. यह गैरिकम्बूल योग चन्द्रमाके प्रभावसे शनिने किया. अर्थात खमाप्ति फल तीसरे मनु- प्यके सहायतासे होगा, यह प्रथम प्रकार हुवा. पुनः लम और सभी यथा- चत हैं, और तुलामें जैसा शनि पूर्व कहा था वैसा बुधादिकोही ग्रह शून्या- चं ५ १२ म११ ९. १० १२ -- ९ सू १० १२ श ताजिकनीलकण्ठी। गैरिक. ध्वग हो तो यह गैरिकम्बूल अशुभ फल देताहै अर्थात् सुखप्राप्ति नहीं होगी इस उदाहरणमें तुलाके शनिके स्थानमें बुध जानना ॥ ४२ ॥ ॥४३ ॥४४॥ अनुष्टुप्-शून्येध्वनीदुरुभयोनेत्थशालोनवायुतिः ॥ खल्लासरो न शुभदः कंबूलफलनाशनः ॥ ४६॥ चन्द्रमा शून्य मार्गमें हो और लग्नेश कार्येशके साथ इत्थशाली न हो अथवा उनसे युक्तभी न हो तो यह खल्लासर कंबू- लके फलका नाशक है, यद्वा अशुभ फल देता है, खल्लासर, पारसीय खल्लासर शब्द बलवाची है, "खल्लासरयोगोदाहरण"सिंह लम लग्नेश सूर्य मेष-1. के तीन अंशपर,पुत्र भावेश बृहस्पति कुंभके पांच अंशपर, परस्पर इनका मुथशिल है,चन्द्रमा कन्याके२०अंशमें है यह किसीके साथ इत्थशाल नहीं करता लग्नेश कार्येशसे युक्तभी नहीं है यह खल्लासर योग पुत्रप्राप्तिमें बाधा करेगा यह इसका फल है ॥ ४५ ॥ रथोद्ध-अस्तनीचरिपुवक्रहीनभादुर्बलोसुथशिलंकरोतिचेत् ॥ नेतुमेपनविभुर्यतोमहोतेमुखपिनसकार्यसाधकः ॥ ४६॥ रद्दयोगका लक्षण कहते हैं-रद्द शब्द पारसीय (निकम्मा ) निर्बलका पर्याय है जो ग्रह अस्त वा नीच राशिगत वा शत्रुराशिस्थ वा वक्रगति का (हीनभा) अस्त होनेवाला समीपही उदय हुवा अर्थात् बाल वा वृद्ध हो और उपलक्षणसे ( खलस्थान) तत्काल शत्रुस्थान वा पापयुक्त वा क्रूरा- कांत हो यह दुर्बल कहाता है, ऐसा निस्तेज ग्रह जब किसीके साथ इत्थ- शाल करे तो आदि वा अन्तमें इत्थशालका तद्भाव जन्यफल नहीं दे सक- वा, क्योंकि यह निर्बल होनेसे न किसीका तेज आप ले सकता न अपना वेज किसीको देसकता, इस योगका नाम रद्द योग है ॥ ४६ ॥ Now १० १२ . भाषाटीकासमेता । (६७) उपजाति केन्द्रस्थआपोक्लिमगंयुनक्तिभूत्वादितोनश्यतिकार्य- मते॥आपोक्किमस्थोयदिकेंद्रयातंविनश्यपूर्वभवतीहपश्चात् ॥४७॥ रद्दयोगका लक्षण फलसहित प्रकारांतरसे यहभी है, कि जब पूर्वोक्त दुर्बल बहके साथ इत्थशाल कर्ता कार्येश ग्रह केन्द्रमें हो और लग्नेश दुर्बल कायंशसे आपोक्लिममें हो तो यह समस्त फल सर्वदा रद्दही न होगा किन्तु प्रथम वह कार्य सिद्ध होकर अन्तमें नष्ट हो जायगा यहां आपोक्लिम कहेसे तीसरा और नवमस्थान लिये जाते हैं ६ । १२ स्थानों में दृष्टि न होनेसे इत्थशाल योगकी सम्भावनाही नहीं जो कार्येश दुर्बल होकर आपोक्किम स्थानमें बैठा केन्द्रस्थानगत लग्नेशके साथ मुथशिल कर्ता हो तो उक्त भावोत्थ कार्यको प्रथए नष्ट करके पश्चात् उस कार्यकी सिद्धि करदेगा ' रद्दयोगका प्रथमोदाहरण' मेषलग्न लग्नेश मंगल भाग्येश बृह- . प्राशुभपश्चादशुभरद्द. १२ ११ स्पति और सूर्य शनि छठे स्थान में कन्याके १० । १० अंशमें है यहां लग्नेश कार्येश अस्तं- गत और पापयुक्त तथा छठे स्थानमें होनेसे १९/ ६ रशम २ १० १० यह रद्द योग हुआ, फल भाग्यप्रश्न था भाग्यनाश होगा यहा 'दूसरा उदाहरण' यही मेपलग्न · लग्नेश बारहवां प्राकशुभपश्चाच्छुभरद्द. मं१० मंगल दुर्बल और भाग्येश बृहस्पति मकर नीचका दश अंशमें है यहां शीघ्र मंगल • आपोक्किममें बैठकर केन्द्रस्थ मन्दगति गुरुके साथ इत्थशाली होनसे यह रहयोग प्रथम अशुभ पश्चात् शुभ फल कर्ता है यहा तीसरा उदाहरण शीघ्र ग्रह १० वृ१० --- वृ१२ १ -- ४ मं १० (६८) ताजिकनीलकण्ठी। रद्दोदाहरणम्. निर्बली केन्द्रमें कर्कके दश अंशपर नीचंका मंगल और कार्येश बृहस्पति आपोक्लिम बारहवें । स्थानमें है मंगल बृहस्पतिसे इत्थशाली है यह रद्दयोग पूर्व शुभ फल पश्चात् अशुभ फल कर्ता है ॥ ४७ ॥ उपजाति-मंदःस्वभोचादिपदेस्थितश्चेत्पदोनशीघ्रणकृतेत्थशालः।। तत्रापिकार्यभवतीतिवाच्यंवक्रादिनिवार्यपदेनचेत्स्यात् ।। ४८॥ दुष्फाली कुत्थयोगका लक्षण कहते हैं-जब मन्दगति यह अपनी नीच राशि वा उच्च वा स्वद्रेष्काण स्वहदा नवांशकमें हो और शीघ्रग्रह पदोन अर्थात् स्वभोच्चादि शुभाधिकार रहित इत्यशाली हो तोभी कार्यसिद्धि कठिनसे होजायगी कहना किंतु शीघयह अस्त नीच शत्रु वक्र और वाल- वृद्ध निर्वल स्थानास्थित होकर इत्थशाली हो तो अनिष्ट फल कहना यह दुष्फाली कुत्थयोग है, पारतीय दुःफालीशब्द दुःसाध्य और कुत्थशब्द शुभ- वाची है,दुष्फालीकुत्थ दुःसाध्य शुभवाचकहै, उदा- दुःफालिकुन्थयोग. हरण, सौख्य प्रश्नमें मेपलग्न लग्नेश मंगल लग्नमें मेपके बारह अंशपर सुखभावेश ग्यारहवाँ कुम्भके दश अंशपर चन्द्रमा इत्यशाली है, मंगल पदयुक्त और चन्द्रमा पदहीन है, ऐसा दुष्फालो कुत्थयोग हुआ, सुखप्राप्ति यत्नसे करता है ॥ १८ ॥ इंद्रव०-वीयोनितौकार्यविलमनाथौरवांदिगर्नान्यतरोयुनक्ति ॥ अन्यौयदादौबलिनौतदान्यसाहाय्यतःकार्यमुशंतिसंतः॥१९॥ दुत्थोत्थदिवीरयोगका लक्षण कहते हैं-लग्नेश कार्येश दोनहूं बल- हीन (अस्त नीच रिपुवकहीनभा) इत्यादिसे हों परस्पर इत्थशालीभी हों और इनमेंसे शीघयह अपनेसे मन्दगतिवाले किसी अन्य तीसरे स्वादि बलयुक्त ग्रहसे युक्तहो, विशेषतः मुथशिलीभी हो तो अन्यद्वारा कार्य- २ १२ १ म२२ 'च ११ ६९ ५ ७ ६ ४ ७ ८ ११ im4 १२ भाषाटीकासमेता। (६९) सिद्धि होगी, अथवा अन्य कोई स्वादि पदयुक्त दो ग्रह शीघ्रगति हों और लग्नेश वा कार्येश हीनबलीसे युक्तहो वा मुथशिल करें तोभी किसी औरकी सहायतासे कार्य सिद्ध होगा. यह सज्जनोक्तिहै, "उदाहरण" स्त्रीलाभ प्रश्नमें सिंहलग्न लग्नेश सूर्य नीचराशि तुलामें, कार्येश सप्तम भावका स्वामी शनि नीच राशि मेषकाहै, अथवा राश्यंतरमें वक्रीहै. दुत्योत्यदिवीरयोग.._तात्पर्य्ययहहै कि दोनहूं निर्बलहैं इनमेंसे शनि मंगलसे युक्तहै यह स्वगृही होनेसे बलवान है, लगेश कार्येशके निर्बल होनेसे कार्यसिद्धि नहीं होनीथी. परंतु बलवान् मंगल तीसरे ग्रहसभी युक्त होनेसे दूसरेके सहायत स्त्रीप्राप्ति होगी कहना. १ अथवा दो शीघ्र ग्रह सूर्य मंगल मेषमें अपने २ उच्च स्वगृह होनेसे बलवान् हुये शनिके. ३ |साथ दोनहूँके इत्थशाल करनेसे योग होजा- ताहै पूर्वोक्तही फल देताहै. यहां अंश कल्पना सुश मुथशिल योग्य करनी. इस योगका नाम १२ । दुत्थोत्थदिवीर. पारसीय शब्दहै ॥ ४९ ॥ अनु०-बलीराश्यंतगोन्यक्षगामीदीप्तांशकैर्महः ॥ दत्तेन्यस्मैकार्यकरस्तंबीरोलनकार्ययोः ॥५०॥ तंबीरयोगके लक्षण कहते हैं. जब लग्नेश कार्येश किसी स्थानोंमें हों इनका परस्पर इत्थशाल न हो परंतु इनमें से कोई राश्यंतगत हो और जिस. राशिको गंतव्यहै उसमेंसे कोई अन्यग्रह बलवान् और इत्थशाल संबंधि अंशोंपर हो. वस्तुतः इसके साथ वह भविष्य इत्थशालकारी हो तो वह तीसरेको तेज देताहै यह तंबीरयोग हुवा. फल इसका कार्य साधकहै. ५ २ - . तंवीरयोग. ८ ६ ९ ७ १० शु१० . (७०) ताजिकनीलकण्ठी। उदाहरण सुखप्राप्ति प्रश्नमें तुला लग्न लग्नेश शुक्र कर्कके दश अंशमें सुख भावेश शनि कुंभके उनतीस अंशपर है. इनका इत्थशाल नहीं है, परंतु हस्पति मीनके पांच अंशपरहै श इसको शीघ्रगति शनि कुंभके २९ अंशपर मीनको गंतव्य होनेसे और बृहस्पतिके साथ भविष्य मुशिल करनेसे अपना वेज बृहस्पतिको देताहै यहभी कार्य्यसाधक योगहै.सुखप्राप्ति करेगा ॥५०॥ उपजा-लगेऽथकेन्द्रनिकटेपिवास्यविलग्नदर्शीस्वगृहोच्चहक्के । शल्लहेस्वेनिजहद्दगोवाबलीग्रहोमंदगतिस्त्वशीघ्रः ॥५१॥ पंद्रहवां कुत्थयोगका लक्षण, कुत्थ पारसीय शब्दसे बलीग्रह लिया- जाता है वह बहुत प्रकारका है. इस कारण प्रथम बलवत्ता कहते हैं कि और स्थानोंसे लगगत ग्रह बली. तदभावमें अन्य केंद्रगत४। ७ । १०वली होता है तथापि लग्नकी अपेक्षा न्यून ही होता है इनसेभी पणफर आपोक्किम २।५।८।१३।३।६।९।१२ में न्यून होता है. दुरफमें तो६।८।१२स्थानों में निर्बली कह दिया है. केंद्रपणफर आपोक्लिममें क्रमसे बल न्यून होता है और लग्नदर्शी तथा स्वोच्च स्वद्रेष्काण स्वनवांश स्वहद्दामें ग्रह बली होता है तथामध्यगति. (नंदाक्षा भुजगारवेः ) इत्यादि पूर्वोक्त मध्यगतिपर जो ग्रह हो वह बलवान् और अल्पगति उससे न्यूनवली विशेष गति अधिक बली होता है. इसमें युक्ति यह है कि लग्नगत ग्रह पूर्ण (६०)बली, पणफरमें आधा (३०) आपोलिममें चरण (१५) वीर्य होता है, संधिमें अनुपात करना तब लग्नदर्शी ग्रह"अपास्य पश्यन्निजदृश्यखेटेत्यादि से पूर्ण पापदृष्टिसे पादोन इत्यादि. तथा स्वगृही ग्रह पूर्णवीर्य स्वगृहसे सप्तममें निवार्य और अंतरमें त्रैराशिक विधिसे बल लेना. दुरफमें स्वगृहीभाव बल पावै इत्यादि अंतरका त्रैराशिक. उच्चबल विधिवत् करना. सूर्य चंद्रमा के एक गृह होनेसे १ भाषाटीकासमेता। (७१) यही होगया भौमादियोंके दोराशि गृह होनेसे अपने गृहसे सप्तम गृह शोधके ६से न्यून हो तो वही रखना,६से अधिक होतो बारहमें शुद्धकरलेना उपरांत उसके अंशादिमें ३० का भाग लेना लब्धिकलादि फल होगा, यह संप्रदाय युक्त है, यहभी स्मरण चाहिये कि स्वगृहारंभमें पूर्ण बल (६०) और उसके सप्तम भावारंभमें • अंतरमें अनुपात जैसे १ राशि षष्ठ्यंश १८० से पूर्ण ६० बल मिलता है तो अ क इष्टराशिसे कितना मिलेगा, यहां६०से अपवर्तन करदिया तो गुणक १ भाजक ३० हुआ इत्यादि। उच्चबल पूर्वोत ही है २ द्रेष्काणारंभमें ५ बल और समातिमें पूर्ण १० और समाप्त होही गया तो० शून्यबल होता है. जैसे द्रेष्काण मुक्त भोग्यांशोंका अंतर अंशादि बारह से गुनकर बल मिलता है-पांचःअंशसे ६०है तो शेषसे कितना इत्यादि ३ ऐसाही मुशल्लहमें और हद्दामें भी आनना. गतिबलके निमित्त सूर्य चन्द्रमा नित्य शीघ्र होनेसे गति बल तुल्य है, मौमादियों के ५ होताहै इति॥५१॥ ( जा०)-कृतोदयोमार्गगति शुभेन तेक्षितेः रखगस्यदृष्टया ॥ क्षुताख्ययानाधिगतोनयु: रेणसायंचसितेंदुभौमाः ॥५२॥ और प्रकारसे बलवत्ता कहते हैं, कि जो ग्रह उदय. हुआहै जो मार्ग गति अर्थात् वक्र होकर मार्ग हुआहै जो शुभ ग्रहयुक्त वा वीक्षितहै और जिसपर क्रूर ग्रहकी क्षुत १० । ४ । ७ । १ दृष्टिहै तथा जो क्रूरयुक्त नहीं है, वह बलवान् होताहै, समय बलके निमित्त 'सायंचसितेंदुभौमा' इस पदका अर्थ आद्यश्लोकमें कहेंगे. यहां बलंगणनेकी विधि यह है कि उदय बलके वास्ते उदयदिनमें पूर्ण ६० बल अस्तदिनमें • शून्यबल होताहै अंतर दिनोंका अनुपात करना. जैसे उदय दिनसे अस्तदिन पर्यंत जितने दिन हैं उनका आधा करके जो उसमें ६० बल होताहै तो इष्ट दिनोंमें कितना होगा यह त्रैराशिक विधिहै. १ मार्गगति ग्रहका बल पूर्ववत ही जानना, २ शुभ युक्तं बलके लिये उसके समानलिप्ता पर्यंत होतो ६० बल, न्यूनाधिक हो तो दोनहूंका अंतर करना वह अंश ३० से न्यून होगा, पुनः वे अंशादि दुगुणे करनेसे बल होताहै ३ शुभ दृष्टि बल दृश्य ग्रहकी - १ " म - (७२) ताजिकनीलकण्ठी। पूर्वोक्त प्रकार दृष्टिमें उसकी चौथाई घटायके दृष्टिबल होताहै, ४ ऐसेही औरभी जानने ॥ ५२ ॥ (उ॰जा॰)-यदोदयतेपररात्रिभागेजीवार्कजावह्निनराः सवीर्याः।। अन्येनिशीनस्यनचैकभागे स्थिताः स्थिरक्षेचबलेनयुक्ताः ॥५३॥ शुक्र चंद्रमा मंगल सायंकालमें उदय हों तथा बृहस्पति शनि अर्द्ध रात्रिसे उपरांत, जिस समयमें उदय हों, तथा पुरुष ग्रह सूर्य भौम बृहस्पति, दिनमें श्री ग्रह चंद्रमा वुध शुक्र शनि रात्रिमें तथा स्थिर राशि, २॥ ५॥ ८॥ ११ में जो ग्रहहो, इतने सभी बलवान् होतेहैं, बलानयन प्रकारहै कि सायं समयोदयी शुक्र तो होताही नहीं चन्द्र भौमका व सूर्य स्पष्टका अंतर करके उसमें छः घटाय देना, शेपके अंश करके तीनसे भागलेना लाभबल होगा यहां भी पूर्णबल साठ ही है उत्पत्ति उच्चबल तुल्य है शुक्र के, व सूर्य के अंतर करके छः से गुनदेना पांचसे भागदेना लाभ बल शुक्रकाहोगा इसकी उपपत्ति, जो पचास अंशोंसे ६० बलमिलता है तो इष्टांशके कितना यह त्रैराशिक है, इनमें १० से अपवर्तन करके गुणक ६ भाजक ५ होताहै १ अपररात्रिस्थ वृहस्पति शनि बल निमित्त जब अर्द्धरा- त्रोत्तर काइष्ट हो तो अईरात्रिसे तीसरे प्रहर पर्यंत क्रम से बल पर्ण और तीसरे प्रहरसे क्रम करके चौथे प्रहर होनेमें बल शून्य होजाता है, अर्द्धरात्रिसे उपरांत इष्ट काल हो तो उसमें राज्यई घटायदेना तीसरे प्रहर उपरांत हो वो रात्रिमानमें घटाय देना शेष साठसे गुनाकर प्रहर प्रमाण घट्यादिसे भागलेना लब्धि गुरुशनिका वंल होगा २ दिवाग्रहबलविधि यह है कि जो इष्टकाल प्रातः कालसे मध्याह्नके भीतर हो तो दिनगतलेना मध्याह्नोत्तर सायंकालके अंतर हो तो दिनशेष लेना उसे ६० से गुनाकर दिनाईसे भागलेना दिवाबल ग्रहोंका बल मिलेगा उपपति यह है कि जब दिनाईमें६० बल मिलताहै तो दिनगत वा दिनशेष अमुक संख्यासे कितना मिलेगा ३ इसी विधिसे रात्रि बली ग्रहोंका बल राज्यईसे मिलता है. ४ सूर्यके भावबलविधि यह है कि ग्रहमें सूर्य घटाय देना, शेप अंशादि त्रिगुना करके ६० से शुद्ध करना बल " -- ६ भाषाटीकासमेता। (७३) होता है इसमें सूर्य के प्रवृत्ति निवृत्तिके २० अंशहैं इनमें ६० बल मिलता है तो पूर्वोक्त अंतरसे कितना मिलेगा, गुणक भाजकके २० से अपवर्तन करके गुणक तीन भाजक १ एक होता है. ५ स्थिर राशिबल यह है कि राशिके आरंभमें , बलका आरंभ १५ अंशमें पूर्ण ६०. पंद्रह अंशमें ३० तो शून्यबल क्रमसे घटता बढता है ग्रहराशिके पूर्वार्धमें हो भुक्तांश उत्तराई में हो तो भोग्यांशलेने वही चतुर्गुणा करके बल होता है अनुपात यह है कि ३५ अंशसे पूर्ण६० बल होता है तो मुक्त वा भोग्यांशोंसे कितना होगा किसीका मत यह है कि यह राश्यादिमें पूर्ण बली मध्यमें मध्य अंतमें शून्य बली क्रमसे होता है, तो ग्रहके अंशादि३०से शुद्धकरके शेष द्विगुण करना वही बल होता है "अनुपात" जो ३० अंशसे पूर्ण बल ६० मिलता है तो यह भोग्यांशोंसे कितना मिलेगा यहां दोनहूँमें ३० से अपवर्तन करके शेषधि- गुण बल होगा, यह अर्थयुक्त है ॥ ५३ ॥ उद्भव-स्त्रियश्चतुर्थात्पुरुषावियद्भागषटूकगाओजभगाःपुमांसः ।। समेपरेस्युर्बलिनोविमृश्यविशेषमेतेषुफलंनिगद्यम् ॥५४॥ और प्रकारसे बल कहते हैं कि स्त्री ग्रह चं. बु. शु. श. चतुर्थ भावसे दशम पर्यत छः स्थानमें और पुरुष ग्रह सू. म. वृ. दशमसे चतुर्थ पयंत बली होते हैं तथा विषम राशियोंमें पुरुष ग्रह सम राशियोंमें स्त्री ग्रह बली होते हैं यहां स्त्रीयह चतुर्थसे दशम और पुरुषग्रह दशमसे चतुर्थ पर्यंत, सभी भावोंमें तुल्यही बल पातेहैं यही उपपत्ति है और विषम सम राशिगत पुं- स्त्री ग्रहोंका बल स्थिर राशिसंस्थ ग्रहवत् पूर्वोक्त प्रकारसे जानना इतने प्रकार वलांबल कहनका प्रयोजन यह है कि इत्थशाल कर्ता वा इत्थशाल कर्ना चाहता ग्रह उक्त प्रकारोंसे जैसेमें हो वैसाही फल कहना, यहां उक्त वल भेदों से किसी प्रकार बली जो इत्थशाली ग्रह. है उसीको कुस्थ योग कहते हैं न कि कुत्थ शन्दसे बली ग्रह लिया जाताहै ॥ ५४ ॥ स्रग्धरा-लग्नात्पष्ठांत्यमेंत्येऽनुजुररिगृहगोनीचगोवक्रगामी०रैर्युक्तो- स्तगोवा यदिचसुथशिलीकरनीचारिभस्थैः ॥ क्षुदृष्टयाकूरह- (७४), ताजिकनीलकण्ठी। धोव्ययरिपुमृतिगैरित्थशालंविधित्सुःकुर्वन्वानिर्बलोयंस्वगृहगन भगोराहुपुच्छास्यवर्ती ॥५५ ।। उपजा०-अनीक्षमाणस्तनुम स्तभागस्थितः स्वभोच्चादिपदैश्चशून्यः ॥रेसराफीनसवीर्ययु- तः काय्यविधातुंनविभुर्यतोसौ ॥५६॥ अब सोलहवें दुरफ योगका लक्षण कहते हैं, पारशीय दुरफ शब्द निर्बलवाची है यह निर्बलता बहुत प्रकार होतीहै इसलिये निर्बलप्रकार प्रथम श्लोकसे यह है कि वर्ष प्रश्न वा दिन लग्नसे जो ग्रह छठे आठवें बारहवें स्थानमें हो तथा गतिरहित यहा शत्रुराशिस्थ नीचराशिगत वक्रगतिवाला, तथा पापयुक्त और अस्तंगत ग्रह यहा जो शत्रु ग्रहसे वा नीच शत्रुरा- शिगत ग्रहसे इत्थशाली हो और जिस पर पापग्रहकी क्षुत दृष्टि ४ । १० । ७ । १ हो और छठे आठवें बारहवें स्थानगत ग्रहसे जिसका इत्थशाल हो वा कर्ना चाहता हो, यद्वा अपनी राशिसे सप्तम राशिमें हो, तथा राहुके पुच्छ वा मुखमें हो राहुके भुक्तोंश पुच्छ भोग्यांरा मुख होताहै इतने, प्रकार युक्त ग्रह निर्बल होताहै. इसके निर्वलांक गणितकी पूर्ववतही विधिहै. जैसे शत्रु राशिगतका स्थिर राशिगत ग्रह तुल्य विधिसे करना वक्रयहके लिये वऋदिनोंमें पूर्ण फिर क्रमसे पूरे दिनोंमें शून्य होताहै, मध्यदिनोंसे पूर्ण (६०) मिलता है तो इष्टदिनोंमें कितना मिलेगा इति । तथा क्रूर युक्त यह नौ . अंशके भीतर शून्य उपरांत भाव फलके तुल्य बललेना, अस्तग्रहको उदित ग्रहवत् विधिसे नैराशिक करना, उपरांत ६० से शुद्ध करके अशुभ बलमिलताहै इत्यादि पूर्वोक्त विधियोंसे सभीका हीन बललेना ॥५५॥ और प्रकार अशुभ बल प्रकार कहते हैं कि जो यह लग्नको नहीं देखता वह निर्बल होता है जिस भावमें जिस ग्रहकी दृष्टिका अभावहै उसमें, गणितसे जो कुछ अंक पायाहै वह उसके आगेके भावके अंकमें घटाय देना शेष अशुभ दृष्टि होतीहै १ तथा अस्तंगत सूर्य्य जिस नवांशकमें है उससे सप्तम नवांशमें जो हो वह निर्बल होताहै. पूर्वविधिसे जो बल अस्तका आताहै। - - भाषाटीकासमेता। (७५) उसे ६० में शुद्ध करके अशुभ बल होताहै, किसीका मत है कि सूध्य जिस राशि नवांशमें अस्त होता है उसमें वर्तमान ग्रह निर्बल होताहै परंतु जिस दिन सूर्य उदय नवांशसे अन्यमें अस्त हो उस दिन यह विचार है. सूर्य्य तो सर्वदा उदय नवांशमें अस्त होताहै कदाचित् बदलता है.२ तथा स्वगृह उच्च हद्दा द्रेष्काण नवांश संज्ञक पदोंसे रहित यह निर्बल होता है यहभी स्वगृहादियोंका शुभ बल जो पूर्व कहा गया है उसे ६० में शुद्ध करनेसे अशुभ बल होताहै और (क्रूरेसराफी ) ईसराफ योग पूर्व कहा गया है, जो ग्रह पाप ग्रहके साथ ईसराफी अर्थात् शीघ्र धन भाग मंद अल्प भाग हो तो यह अपना तेज दूसरेको नहीं देसकता इसकारण यहभी निर्बली होता है मंदग्रहसे पीछे शीघ्रग्रह स्वदीप्तांशोंके अंतर हो तो शून्य बल इसके उपरांत क्रमसे मंदग्रहोंके अंशोंके समान होनेपर पूर्ण बली होता है, बीचमें हो तो अनुपात जैसे यदि अमुक दप्तांशोंसे पूर्ण ६०) बल मिलता है तो दीप्तांशोंमें भुक्त.अंशोंका कितना मिलेगा ऐसाही ईसराफकीभी रीति है, इत्थशालीग्रह इत्युक्त प्रकारोंमें किसी प्रकारसे निर्बल हो तो इत्थशालोक्त फल नहीं देता, इसका नाम दुरफ योगहै ॥५५॥५६॥ शालि०-चंद्र-सूर्य्याहादशेवृश्चिकायेखंडेनेष्टोंतेतुलायांविशेषात् ॥ राशीशेनादृष्टमूर्ति सदृष्टो यःशून्यमार्गःपदोनः॥१७॥ सब ग्रहोंके दुरफ कहने उपरांत केवल चद्रंमाका दुरर्फ कहते हैं कि जो सूर्यसे बारहवें स्थानमें चंद्रमा हो तो निर्बल होताहै तथा वृश्चिकके पूर्वाई १५ अंशपर्यत और तुलाके उत्तराई १५ अंश उपरांत तद्वत् चंद्रमा जिस राशिमें है उसका स्वामी इसको न देखे, तथा चंद्रमाको कोई ग्रहनदेखे तथा शून्याध्वग जर्थात् स्वोच्चादि शुभाधिकार रहित हो तो इतने प्रकारसे चंद्रमा निर्बल होताहै. ग्रंथांतरोंमें चन्द्रमाके निर्बल होनेके दश प्रकार ये हैं कि नीचगत १ नीचस्थ ग्रहसे मुथाशली २ सूर्यके समीप १२ अंशके आयं- तर ३ (राहुमुख) राहुके भोग्यांशोंमें ४ पापग्रहके साथ १२ अंशकेभीतर ५ अपनी राशिसे सप्तम मकरका ६ धन राशिमें धन नवांशका, अपनी राशीसे सप्तम राशिमें ग्रह निर्बल होता है, जो कहा ,वह उससे.

(७६) ताजिकनीलकण्ठी। पूर्व राशिके एक नवांशको लेकर होता है ७अस्तंगतके ८ अस्तंगतके साथ मुथशिली९ शत्रुक्षेत्रगत १० इतने प्रकारोंसे चंद्रमा निर्बल होताहै ॥ ५७ ॥ शालि०-क्षीणोभतिनाशुभोजन्मकालेपृच्छायांवाचंद्रएवंविचित्यः॥ शुक्लेभौम कृष्णपक्षेकसूनुः क्षुदृष्टयेंदुंवीक्ष्यतेनोशुभोसौ ॥ ५८ ॥ और चंद्रमा कृष्ण पक्षकी एकादशीसे शुक्लकी पंचमी पर्यंत तथा राशिके अंत्य २६ । ४० अंशसे ऊपर अर्थात नवम नवांशको (क्षीण) अशुभ होताहै यह विचार जन्मकाल वा प्रश्नादिमें करना तथा मंगल शत्रु दृष्टि ४ । १०।७१ से शुक्ल पक्षक चंद्रमाको देखे और शनि ऐसी दृष्टिसे कृष्ण पक्षके चन्द्रमाको देखे तो वह चन्द्रमा संपूर्ण कार्योंमें अशुभ होताहै ॥ ५८ ॥ वसंततिलका-शुक्छेदिवानगृहगोर्कसुतः शशांक कृष्णे कुजो- निशि समक्षगतःप्रपश्येत् ॥ दोषाल्पता वितनुतेऽपरथाबहुत्वं प्रश्नेथवाजनुपिबुद्धिमतोहनीयम् ॥ ५९॥ जो शुक्लपक्ष और दिनमें (पुरुष राशि) विषम राशिमें बैठा शनैश्वर चन्द्रमाको देखे तथा कृष्णपक्ष और रात्रिमें ( समराशि ) स्त्री संज्ञक- राशिमें बैठा मंगल इसे देखे तो चन्द्रमाका पूर्वोक्त (दुरफ ) निर्बलताका दोष न्यून हो जाताहै इसप्रकार श. मं. की दृष्टि न होनेमें दोष प्रबलही रहताहै यह विचार जन्म तथा प्रश्न उपलक्षणसे वर्षादियोंमें विचारना चाहिये, इन दोनहूंको ( कुत्थ) बलवान् और (दुरफ) निर्बल योग सभी ग्रहोंके सर्वदा विचारने चाहिये. इन दोनोंका बल उक्त प्रकारसे गिनकर इनका अंतर करना जो 'कुत्थ बल अधिक हो तो वह ग्रह अशुभ स्थानमेंभी शुभ देताहै, वह शुभ स्थानमें अत्यन्तही शुभ देता है जो. दुरफ बल अधिक हो तो वह यह शुभ स्थानमेंभी अशुभ फल देताहै अशुभ स्थानमें अत्यंत अशुभ देताहै यह बलवारतम्यसे फल सर्व विचारना. इति १६ योग स० ॥ ५९ ॥ अथ हर्षबलानयनम् । ३० जा०-नंदत्रिषड्लमभवक्षपुत्रध्ययाइनादर्पपदंस्वभोचम् ।। --

१
भाषाटीकासमेता।
(७७)
त्रिभंत्रिभंलग्नभतः क्रमेणस्त्रीणांनृणांरात्रिदिनेचतेषाम् ॥ ६॥
अब सामान्यतासे चार प्रकार हर्षस्थान कहते हैं कि सूर्य नवम
स्थानमें चद्रमा तीसरे मंगल छठेमें वुध लग्नमें बृहस्पति ग्यारहवेमें शुक्र
पंचम शनि बारहवेमें हर्षबल पातेहैं। दूसरा सूर्य्यादि ग्रह अपने.२ उच्चतथा
अपनी राशिमें हर्ष बली होतेहैंतीसरा जैसे १ । २।३ भावों में स्त्री ग्रह
४।५।६ में पुरुष ग्रह तथा ७ । ८ । ९ में स्त्री ग्रह१० । १३१२
में पुरुष यह ३ चौथे रात्रिमें स्त्री ग्रह दिनमें पुरुष यह बल पातेहैं ४
यह बल प्रश्न और जन्म वर्षादियोंमें भी विचारना. इनका न्यास चक्र
बनायके,जिस स्थानमें जो ग्रह बल पावे उसके उससंज्ञाके कोष्ठमें ५
PREM
श्री० रचं मं बु बृ शु श
कुण्डली वर्ष.
स्थान ०
०
.
.
.
.
०
टके
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.
स्वरा००
०
.
o
हर्षबलचक्रम् ।
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.
.
५
०
-
m
११ सू१
शु१२॥ वर्मरामु
स्वोच्च ५०
स्त्री.पु.०
५
स.दि ५/०
योग. १००
०/५/१०/५/५
जैसे
अंकलिखना और स्थानोंमें शून्य करदना. पीछे सबका योग करना.
कोई ग्रह एक स्थान में बल पावे तोपही योगहुवा दोनोंमें बली हो तो १०
तीनमें १५चारोंमें २० योग होगा इसे हर्ष विंशोंपका बल कहतेहैं
इसके अनुसार फल कहना विशेष विचार यह है कि जो पूर्व कुत्थ दुरुफ
बल त्रैराशिकसे मिलेहैं उनको और हर्षबलको त्रिगुण करके मिलायदेना
शुभाधिक हो तो शुभफल विशेषहीन बलाधिक हो तो अंतर करके अशुभ
फल विशेष कहना. यह ताजिक शास्त्रवेत्तावोंका संप्रदायहै ॥ ६ ॥
शार्दूल०-श्रीगर्गान्वयभूपर्णगणितविञ्चितामणिस्तत्सुतोऽनं-
तोनंतमतिबंधात्खलमतध्वस्त्यैजनुःपद्धतिम् ॥ तत्सूनुः
खलु नीलकंठविवुधोविद्वचि वानुज्ञया योगान्पोडशहर्षमा-
निच तथासंज्ञाविवेकव्यधात् ॥६॥

(७८) ताजिकनीलकण्ठी। प्रथम संज्ञा प्रकरणमें आचार्य्यने स्वनाम गुणादि प्रकट किये वही इस दूसरे प्रकरणमें भी जानना इतना विशेष है कि षोडशयोग हर्षस्थान इस दूसरे प्रकरणमें कहेहैं ॥६१॥ इति महीधरकतायां ताजिकनीलकंठीभाषायां यहस्वरूपदृष्टिषोडशयोगहर्षस्थानविवरणनामाध्यायः ।। इन्द्रवज्राछन्दः-पुण्यंगुरुनियशोथमिर्चमाहात्म्यमाशाच समर्थताच ॥ भ्राताततोगौरवराजतातमातासुतोजीवितमवु कर्म ॥ १ ॥ (वसंतति०) मांचंचमन्मथकलीपरतःक्षमोक्तं शास्त्रसबंधुसहमंत्वथबंदकंच ॥ मृत्योश्वसमपरदेशधनान्यदा- रा स्यादन्यकर्मसवणिक्त्वथकार्यसिद्धिः॥२॥ (अनु.) उदाहसतिसंतापाःश्रद्धाप्रीतिर्बलंतनुः॥ जाडचव्यापारसहमे पानीयपतनंरिपुः॥३॥ अनुष्टुप-शोर्योपायदरिद्रत्वंगुरुताजलकर्मच ।। बंधनंदुहिताश्वश्चपंचाशत्सहमानिहि ॥४॥ अब सहम विचार कहतेहैं (संहम ) पारशीय पद सम्मवाची हैं. यह समर सिंहमतसे ४८ और यक्लादियोंके मतसे ५० हैं कोई अधिकभी कहते हैं यहां ५० के नाम कहे जातेहैं कि पुण्य १ गुरु २ ज्ञान ३ या ४ मित्र ५ माहात्म्य ६ आशा ७ समर्थता ८ जाता ९ गौरव १० राजा ११तात १२ माता १३ सुत १४ जीवित १५ जल १६ कर्म १७ मांय १८कामदेव १९ कलह २० क्षमा २१ शास्त्र २२ बन्धु २३ बंदक२४मृत्यु २५परदेश २६ धन २७ अन्यदारा २८ अन्यकर्म २९ वणिक् ३० कार्यसिद्धि ३१ विवाह ३२ प्रसूति ३३ संताप ३४ श्रद्धा३५प्रीति ३६ बल ३७ तनु ३८ जाड्य ३९ व्यापार४०पानीयपतन ४१शत्रु४२शौर्य ४३उपाय ४४ दरिद्र ४५ गुरुता४६जलकर्म४७बन्धन ४८ दुहिता४९अश्व५० ये तो आचाय्य कथितहैं और इनमें परदेशही मार्ग विवाहही स्त्री ज्ञानही विद्या सहम जानना. और आचार्य मतसे सहम औरभी हैं कि भार्या ५१ मोक्ष ५२ वसु५३पितृव्य ५४क्लेश ५५ गमागम ५६ गज ५७ सन्मति ५८ घात ५९ कोष्ट ६० चतुष्पद ६१ व्यसन ६२ कृषि ६३ दृष्टि ६४ आखेट ६५

भाषाटीकासमेता।
(७९)
भृत्य ६६ अंग ६७ प्राप्ति ६८ निधि ६९ ज्ञाति ७० ऋण ७१ बुद्धि ७२
आधान ७३ धैर्य ७४ सत्यक ७५ इतने औरभी हैं ॥ १।२।३।४॥
इन्द्रव०-सूर्योनचंद्रान्वितमह्निल वींदर्क तनिशिपुण्यसंज्ञम् ।।
शोद्ध्यर्वशुद्धयाश्रयमांतरालेलग्ननचेत्सैकममेतदुक्तम् ॥५॥
अब सहमोंकी बनाने की रीति कहतेहैं प्रथम पुण्य सहमके लिये यह
है कि, वर्षप्रवेश वा जन्मादि काल दिनका हो तो तात्कालिक स्पष्ट
चन्द्रमामें तात्कालिक सूर्य्य स्पष्ट घटायके तात्कालिक लग्न स्पष्ट जोडदेना,
रात्रिका लम हो तो सूर्यमें चंद्रमा घटायके लग्न स्पष्ट जोडदेना; यह पुण्य-
सहमका राश्यादि स्पष्ट होताहै, परन्तु जिसमें संस्कार औरभी है, जो ग्रह
घटाया जाताहै वह शोध्य और जिसमें घटायाजाताहै वहशुद्ध्याश्रय कहावाहै
शोध्यक्षं और शुद्ध्याश्रयकेबीच अर्थात् शोध्य ग्रहकी राशिसे शुद्धयाश्रयग्रह
स्थित राशि पर्यंत लम न हो तो पूर्वानीत पुण्यसहममें एक(१)राशि जोडदे-
ना ऐसा न हो तो न जोडना ( उदाहरण ) सूर्य स्पष्ट राश्यादि ४ । ८
१०चन्द्र स्पष्ट राश्यादि ६।१२।१० लग्न स्पष्ट । ८।१०।१०दिनके
वर्ष प्रवेशमें सूर्य चन्द्रमामें घटाया शेष२।४।' लग्न जोडदिया तो १०
१४।१०अब संस्कार है कि शोध्यक्ष सिंह ८ अंशसे शुद्ध्याश्रय तुला१२
अंशकेभीतर लग्न न होनेसे एक जोडदिया तो १३॥ १४ ॥१० यह पुण्यसहम
हुआ, रात्रिका वर्षप्रवेश हो तो उदाहरण सूर्य ८।४।१०में चन्द्रमा६।१२
१०घटाया शेष । २२ । ० लग्न ०।१०।० जोडदिया तो भया
२।२।० सूर्यमें चंद्रमा घटाया इस लिये तुला १२ अंशसे धन ४ अंशप-
यंत लग्न न होनेसे सैक करना इससे ३।२।०यही पुण्यसहम भया शोझ्याश्रय
राश्यंतर लग्न न हो तो, राशिमें १. जोडना यह संस्कार सभी सहमोंमें
जानना ॥५॥
उ० जा-व्यत्यस्तमस्मा रुविद्ययोस्तुसंसाधनंपुण्यवियुक् रे
ज्यः॥ दिवाविलोमंनिशिपूर्ववत्तुयशोभिधंतत्सहमंवदंति ॥६॥

(८०) ताजिकनीलकण्ठी। अब गुरुविद्या और यश सहमकी विधि कहते हैं, इनमें गुरु और विद्या, सहम तो पुण्य सहमके विपरीतहै जैसे दिन में सूर्यमें चन्द्रमा घटायके रात्रिमें चन्द्रमामें सूर्य घटायके लग्न जोडदेना 'शोद्धय:त्यादि' संस्कार करके गुरु और विद्यासहम होतेहैं विद्यासहमको ज्ञानभी कहतेहैं ३ यश समहके लिये दिनमें बृहस्पतिमें पुण्य सहम घटायदेना रात्रि में पुण्य सहममें बृहस्पति घटा- यदेना शोद्धयर्वेत्यादि सर्वत्रहीहै यह यशसहम होताहै ॥ ६ ॥ रथोद्ध-पुण्यसद्मगुरुसमतस्त्यजेयत्ययोनिशिसितान्वितंचतत्॥ सैकतातनुवदुक्तरीतितोमित्रनामसहमविदुर्बुधाः ॥७॥ मित्र सहम निमित्त दिनमें गुरु सहममें पुण्यसहम घटायके शुक्र जोड देना, रात्रिको पुण्य सहममें गुरु सहम घटायके शुक्र जोडना शोद्ध्यर्फ शुझ्याश्रय भांतराल लम हो तो १ जोड़देना मित्र ५सहम होताहै ॥ ७ ॥ शालिनी-पुण्याद्भौमंशोधयेदुक्तवत्स्यान्माहात्म्यंतन्नक्तमस्मादिलो- मम्।।शुक्रमंदादह्निनक्तंविलोममाशाख्यंस्यादुक्तवच्छेषमूह्यम् ॥ ८॥ माहात्म्य और आशा सहमके लिये पुण्य सहममें मंगल घटाके लग्न जोड़देना शोध्यक्षैत्यादिसे सैक प्राप्ति हो तो १ जोडदेना दिनका माहात्म्य सहम ६ होताहै रात्रिको विपरीत, जैसे मंगलमें पुण्य सहम घटायके शेष पूर्ववत् करना आशा सहमको शनिमें शुक्र घटायके शेष लग्नमें जोडना एक योगकी प्राप्ति हो तो जोड़ना, दिनका आशा सहम होताहै, रात्रिको विपरीत जैसे शुक्रमें शनि, घटायके शेष पूर्ववत् करना. आशा इच्छाका नामहै॥८॥ इन्द्रवज्रा-सामर्थ्यमारात्तनुपविशोध्यनक्तविलोमंतनुपेकुजेतु ॥ जीवाद्विशुध्येत सततंपुरावद्धातार्किहीनाद्गुरुतःसदोह्यः ॥९॥ दिनको लग्नेश मंगलमें घटाना रात्रिको मंगल लमेशमें घटाय देना जब लग्नेश मंगलही हो तो दिन तथा रात्रि में बृहस्पतिमें शुद्ध करना सामर्थ्य- सहम होताहै तथा दिन रात्रिमें बृहस्पतिमें घटायके शेष पूर्ववत् करना यह मातृसहम होताहै ॥९॥ उपजाति-दिनेगुरोश्चंद्रमपास्यनक्तरविक्रमादकविधूचदेयौ ।

१ भापाटीकासमेता। (८३) रीत्योक्तयागौरवमर्कमार्केरपास्यवामंनिशिराजतातौ ॥ १० ॥ दिनको बृहस्पतिमें चन्द्रमा घटायके शेपमें सूर्य जोड़ना, रात्रिको बृह- सतिमें सूर्य घटायके चन्द्रमा जोड़ना शोध्यक्षैत्यादिसे अन्तरालमें सूर्य वा चन्द्रमा न हो तो 3 जोड़ना गौरवसहम होताहै १० तथा दिनको शनिमें सूर्य घटायके और रात्रिको सूर्यमें शनि घटायके पूर्ववत् लम जोड़ना, शोध्यः त्यादि संस्कार करके राजसहम होताहै ११ यह पितृसहम १२ भी है॥३०॥ इंद्रव०-मातेन्दुतोपास्यसितं विलोमं नक्तंसुतोहनिशामिदुमीज्यात्।। स्याज्जीविताख्यंगुरुमार्कितोहिवामंनिशीदंसममंवयां ॥ ११ ॥ दिनको चन्द्रमामें शुक्र घटायझे रात्रिको शुक्रमें चन्द्रमा घटायके लम जोड़ना, मातृ और अंबु अर्थात् जलसहम होताहै १३ दिनको और रात्रि- कोभी गुरुमें चन्द्रमा घटायके लग्न जोड़ना पुत्रमहम होताहै १४ दिनको शनिमें बृहस्पति घटायके रात्रिको बृहस्पतिमें शनि घटायके लग्न जोड़ना जीवितसहम होताहै ३५ इसीको ऐश्वर्य्यसहमभी कहते हैं अम्बुसहम मातुं सहमही होता है सो कह चुके हैं १६ ॥ ११ ॥ इं०७०-कर्मज्ञमारानिशिवाममुक्तंरोगास्यमिदंतनुतःसदैव ॥ स्यान्मन्मथोलग्नपमिदुतोति वामंनिशीइंतनुपंसदाऽर्कात् ।। १२॥ दिनको मंगलमें बुध रात्रिको बुधमें मंगल घटायके लग्न जोड़ना कर्मन- हम १७ होता है, लममें चन्द्रमा पटाय लग्न जोड़के रोगसहम १८ दिनरांनि का होताहै,लग्नमें चन्द्रमा घटायके रात्रिको विपरीत करके लग्न जोड़ना काम- सहन १९ होता है चन्द्रमाही लमेश हो तो दिन तथा रात्रि सूर्यमें चन्द्रमा घटाना ॥ १२ ॥ उजा-कलिक्षमेस्तोगुरुतोविशुद्धेकुजेविलोमंनिशिपूर्वरीत्या ॥ शास्त्रंदिने सौरिमपास्यजीवादाम निशिज्ञस्यतिःपरावत् ॥ १३॥ बृहस्पतिमें मंगल घटायके लग्न जोड़ना दिनका कलिसहम २० होताहै, रात्रिको मंगलमें बृहस्पति घटायके लग्न जोड़ना क्षमासहमभी इसी प्रकारका ६ (८२) वाजिकनीलकण्ठी। है २१ दिनको बृहस्पतिमें शनि रात्रिको शनिमें बृहस्पति घटायके शेपमें बुध जोड़ना शास्त्रसहम होताहै २२शोध्यक्षैत्यादि संस्कार सर्वत्रही है ।।१३॥ जा-दिवानिशंज्ञाच्छशिनंविशोध्यबंधवाख्यमेतनिशिबंदकस्यात् वामंदिवैतन्मृतिरष्टमादिंदुविशोध्योक्तवदार्कियोगात् ॥ १४ ॥ दिनको बुधमें चन्द्रमा घटायके लग्न जोड़ना रात्रिकोभी यही करना बन्धुसहम होताहै २३ दिनको चन्द्रमामें बुध और रात्रिको बुधमें चन्द्रमा घटायके लग्न जोड़ना बंदकसहम होताहै २४ दिन तथा रात्रिमें मृत्युभावमें चंद्रमा घटायके शनि जोड़ना मृत्युसहन २५ होताहै ॥ १४ ॥ उपजा-अहर्निशवित्तपमर्थभावाद्विशोध्यपूर्वोक्तवदर्थसम ।। देशांतराख्यंनवमाद्विशोध्यधर्मेश्वरसंततमुक्तवत्स्यात् ॥ १५॥ दिवा और रात्रिमेंभी धनभावमें धनभावेश घटायके लग्न जोड़ना धन- संहम २६ होताहै तथा दिवा रात्रि धनभाव धर्मभावेश घटायके लग्न जोड़- ना परदेशसहम २७ होताहै ॥ १५॥ उपजा-सितादपास्यामथान्यदाराह्वयंसदाप्राग्वदथान्यकर्म ॥ चन्द्राच्छनिवाममयोनिशायांशश्वदणिज्यंदिनबंदकोत्या ॥ १६ ॥ दिनरात्रि शुक्रमें सूर्य घटायके लग्नं जोड़ना परस्त्री सहम २८ होता है, दिनको चन्द्रमामें शनि रात्रिको शनिमें चन्द्रमा घटायके लग्न जोड़ना पर- कर्म २९ सहन होताहै, दिनरात्रि चन्द्रमामें बुध घटायके लग्न जोड़ना वा- णिज्य सहम ३० होताहै ॥ १६ ॥ उपजा-शनेर्दिवानिशिचंद्रमाविंशोध्यसूयदुभनाथयोगात् ।। स्यात्कार्यसिद्धिःसततंविशोध्यामंदसितात्स्यात्तुविवाहसम्म ॥ १७ ॥ दिनको शनिमें सूर्य्य घटायके सूर्यराशिनाथ जोड़ना, रात्रिको शनिमें चंदमा घटायके चंद्रराशिस्वामी जोड़ना कार्यसिदि.३१ सहम होताहै, दिन- रानि शुक्रमें शनि घटायके लग्न जोड़ना विवाहसहम ३२ होताहै ।। १७ ॥

भाषाटीकासमेता । उपजा०-गुरोर्बुधप्रोज्झ्यभवेत्प्रसूतिवामंनिशीदुशनितोविशोध्य ।। पष्टंक्षिपेदुक्तदिशासदैव संतापसमारमपास्यशुकात् ॥ १८॥ दिनको बृहस्पतिमें बुध रात्रिको बुधमें बृहस्पति घटायके लग्न जोडना प्रसूतिसहम होताहै ३३ दिनरात्रि शनिमें चन्द्रमा घटायके रिपुभाव जोडना संतापसहम ३४ होताहै ॥ १८ ॥ उन्जा-श्रद्धासदाप्रोक्तदिशाथपुण्यविद्याख्यतः प्रोज्झ्यसदापुरोक्त्या प्रीत्याख्यमुक्तंवलदेहसंज्ञेयशःसमेजाडयमपास्यभौमात् ॥ १९॥ दिनरात्रि शुक्रमें मंगल घटायके लग्न जोडना श्रद्धासहम ३५ होता है, दिनको रात्रिकोभी विद्यासहममें पुण्यसहम घटायके लग्न जोडना प्रीतिसहम३६ होताहै, वलसहम ३७ और देहसहम ३८ यशसहमके तुल्य जानने और दिनको मंगलमें तथा शनि रात्रिमें विपरीत करके बुध जोडना जाड्य ३९ सहम होगा ॥ १९॥ : उपजा-शनिविलोमंनिशिचांद्रयोगाद्व्यापारमाराज्ज्ञमपास्यशश्वत्॥ पानीयपातः शशिनंविशोध्यसोरेविलोमंनिशिपूर्ववत्स्यात् ॥२०॥ दिनरात्रि भौममें बुध घटायके लग्न जोडदेना व्यापारसहम ४० होताहै दिनको शनिमें चन्द्रमा रात्रिको चन्द्रमामें शनि घटायके लग जोडना पानीय- पतनसहम ४१ होताहै ॥ २० ॥ उपजा-मन्दंकुजात्प्रोज्यरिपुर्विलोमंरात्रीभवेद्भौमविहीनपुण्यात् ।। शौर्यविलोमंनिशिपूर्ववत्स्यादुपायईज्यंशनितोविशोध्य. ॥ २१॥ दिनको मंगलमें शनि रात्रिको शनिमें मंगल घटायके लग्न जोडना शत्रु ४२ सहम होताहै, दिनको पुण्यसहममें मंगल रात्रिको मंगलमें पुण्यसहम घटायके लग्न जोडना शौर्यसहम ४३ होता है, दिनको शनिमें बृहस्पति रात्रिको बृहस्पतिमें शनि घटायझे लग्न जोडना, उपायसहम४४होताहै२१॥

(८४) ताजिकनीलकण्ठी। उपजा०-वामंनिशिझंतुविशोध्य पुण्याज्ज्ञयुग्विलोमंनिशितदरिद्रम् ।। सूर्योच्चतःसूर्यमपास्यनक्तं चन्द्रंतदुच्चाद्गुरुतापुरोक्त्या ॥ २२ ॥ दिनको पुण्यसहममें बुध घटायके बुध जोड़ना रात्रिको बुधमें पुण्यसहम घटायके बुध जोड़ना तो दारित्र्यसहम ४५ होता है, दिनको सूर्यके उच्च । १० में सूर्य घटायके लग जोड़ना, रात्रिको चन्द्रमाके उच्च १।३ में चन्द्रमा घटायके लग्न जोड़ना गुरुसहम ४६ होताहै, शेपकर्म शोध्यक्षैत्यादिसे संस्कार सर्वत्रही देखना चाहिये.॥ २२ ॥ अनु०-कात शनिप्रोज्झ्यस्याजलाध्वान्यथानिशि ॥ पुण्याच्छनिविशोध्याहिवामंनिशितुबंधनम् ॥ २३ ॥ दिनको कर्कके आधा३ । १५ में शनि घटायके रात्रिको विपरीत करके लग्न जोड़ना जलमार्गसहम ४७ होताहै, दिनको पुण्यसहममें शनि और रात्रिको शनिमें पुण्यसहम घटायके बंधन ४८ सहम होताहै ॥ २३ ॥ सहमसारणी। सं० | १ | २ ३ ४ ९ ज्ञान यशव ना० | पुण्य गुरु मित्र विद्या लवपु माहा त्म्य आशा समर्थ. भ्रात गौरव दिवा लग्न चंद्रे | खो खो जावे पु. स. | शनौ भामे |जीवे / जीवे सहम ऋण .रवि चंद्र चंद्र पु. स. पु. स. भीम शुक्र तनुपः ,शनि | चंद्र धन ल . शुक्र ल. रखो रा. ल. खो | चंद्र चंद्रे पुण्ये पुण्ये भौमे शुक्रे तो गुरौ | गुरी #. चंद्र रवि रवि जीवे गु.स.पु. स. शनि भोम | शनि | रवि धन ल. ल. ल . शुक्र ल. ल. ल. चंद्रः भाषाटीकासमेता। (८५) सं० ११ १२ १३ । १४ १५ १६ १७ १८ १९ १९ २० ना०.राज तात. माता जल. सुत. जीव. अंबु. कांति. कर्म. रोग. काम. दे० कालि. दिवाशनौ. शनौ. | चंद्रे. | गुरौ. शनौ. चंद्रे. भौमे शनौ. | चंद्रे. गुरौं, लग्न. ऋण. रवि. रवि. शुक्र. | चंद्र. जीव | शुक्र. | बुध. | चंद्र. | लग्नेश. भौमे. धन. ल. रात्रौ रखौ. रवी. भृगौ. गुरौ गुरौ. शुक्रे. बुधे. | तनौ. लग्नेश भौम. ऋण. शनि. शनि. चंद्र. चंद्र शनि. चंद्र. | मौम. चंद्र. चंद्र- गुरौ. धन. ल. ल. ल. ल. ल. ल. . ३ ३ . सं. २१ २२.२३ २४ २५ २७ २८ | २९ ३१ ३२ अन्य ना. क्षमा शास्त्र बंधु वंदक मृत्यु | परदेश | धन परकम वणिक कार्य विवाह. दारा दिवाल. शनी | जीवे बुधे . चंद्रे | मृत्यु धर्ममा धनभा शुक्र | चंद्र | चंद्रे | शनी शुके माव ऋण भौम शनि - चंद्र | बुध | चंद्रः धर्मेश धनेश रवि शनि | वुध | सूर्य | शनि सूर्यरा- लम । वुध . लग्न शनि | ल. शीश रा.ल.भौमे | शनौ | बुधे मृत्यु धर्मभा धनमा. शुक्रे | शनी चंद्रे | शनी | शुक्के धन ल. वुधे हुधे । भावे ऋण | गुरु | जीव | चंद्रचंद्र | चंद्र | धर्मेश धनेश रविः चंद्र: वुधः चंद्र: शनि धन, ल. वृष ल. शनि | ल. ला चंद्ररा शीश ल.

(८६) ताजिकनीलकण्ठी । वल सै० ३४ १५ ३७ ३८ | ३९ ४२ पानी ना० / प्रसूति संताप श्रद्धा प्रीति तनुजाय व्यापार रिपु शौर्य उपाय यपात विद्या दि.ल. गुरौ शनी शुके पुण्य | गुरौ | गुरौ | भौम भौमे शनी कुजे सहमे शनी सहमे बुध चंद्र मौम पुण्य सहमे पु. स.इ.स. शनि वुध / चंद्रे शे. भोम | गुरु . व. ल, रिपुभाव ल. ल. बुध ल. ल. (रा.ल. बुधे | शनी शुके विद्या पुण्यस.पु. स. शनी भौमे | चंद्रे शनौ भामे गुरी भाव ऋ गुरु चंद्र भीम पुण्यस. गुरु गुरु ! भी. बुध शनि | कुजं पुण्यस. शनि घ. ल रिपुमाव ल. बुध ल. ल. I सं. ४५ ४६ । ५०/५१ ५२ | ५३ | ५४ / ५५ ना. दरिद्रः गुरुता जल मार्ग बंधन कन्चा अन्च गज हस्त | मार्ग ऐचय स्खी देशांतर दिवाल. पुण्यस 0110 ३ पुण्य ९५ / सहमे शुक्र . स. चंद्र चंद्रे धर्म भाचे शनी | शुके धर्मेश सू... श. चं. सू. श. (धर्मश, गुरु जायेश धर्म भाव बु. तु. ल, ៗ, ल. ल. ल. प.भा रात्रि.ल बुध १३ शनौ श. चं. धर्म भाव गु. धर्म भावे A- . पु.स./ चंद्र | ३३१५ पुण्य सहम चंद्र | पु.स.गु. चं. धर्मशाश. जायेश धर्मेश -- घन बु. आय भाव ल. जाया भाव अनुष्टु०-चंद्रसितादपास्योक्तं सदाकन्याख्यमुक्तवत् ।। पुण्यादर्कमपास्याययोगादश्वोन्यथानिशि ॥२४॥ दिन तथा रात्रिको शुक्रमें चंद्रमा घटायके लग्न जोडना कन्यासहम४९ होताहै, दिनको पुण्यसहममें सूर्य घटायके लग्न जोडना रात्रि को सूर्यमें भाषाटीकासमेता। (८७) पुण्यसहम घटायके ग्यारहवां भाव जोडना अश्वसहम ५० होताहै, ये ५० सहम. आचार्योंक्त कहेगये. मतांतरसे जो अन्य सहम हैं उनमेंसे कोई तो इनहीमें अंतर्भावहै कोई सारणीमें लिखेंगे सहमसारणी आवेहै सहम विचार जिसके निमित्त करनाहै उसीके संबंधी भावसे सहमकल्पना करनी. जैसे भाइयोंके वास्ते तृतीयभावको स्त्रीके निमित्त सप्तम भावको लम जानकर पुण्यादि सहम कल्पना करनी यहभी किसीका मत है ॥ २४ ॥ उपजा--स्वनाथहीनं सहमं तदंशाः स्वीयोदयन्ना वि- हृतास्त्रिशत्या ॥ तत्समपाको दिवसैहि लब्धैः स्यात्तदशायां तदसंभवेवा ॥२५॥ सहमका फल पाकसमय कहतेहैं कि, सहमका फल पाकसमय चाहिये उसमें उस भावके स्वामीका स्पष्ट घटाय देना शेषके अंश करके स्वदे- शीय लग्न खंडसे गुणना. ३०० तीनसौसे भाग लेना लुब्धि उस सहमफल पाकके दिन जानना. किसीका मत है कि पूर्वविधिसे जो दिन मिले हैं उनमें .३०का भागदेके लब्धि राशि जाननी तदनंतर वर्षप्रवेशकालिक सूर्यराश्यादि कलापर्यंत में जोडदेना राशिस्थानमें १२ से अधिक होनेपर १२ से शेषकर देना यह सूर्य स्पष्ट जिस समयपर आवे. वह समय सहम फल पाकका जानना कोई कहतेहैं कि, हीनांश पात्यांश क्रमसे जब सहमेशकी दशा हो तब फल होगा, यह सर्व संमत है. इन दो मतोंमें यह निश्चय है कि, पूर्वोक्त प्रकारसे जो दिन मिले हैं, यदि उनके भीतर तत्स्वामीकी दशा हो तो दशाहीमें फल होजायगा. जब उक्तदिनोंसे उपरांत दशा हो तो दशाप्रारंभ दिवससे उतने दिनोंमें फल होगा. इसमेंभी स्मरण चाहिये कि ऐसी विधिसे वर्षात होजाय तो दूसरे वर्षमें फल कहना, परंतु इसमें बहुत शंका होतीहैं इस लिये यादववाक्यहै कि, "सहमेश्वरयोः कार्यमं- तरं पूर्वराशिकम् ॥ तयुक्तोर्को भवेद्यावांस्ताक्संक्रांतिभे फलम् ॥" अर्थात जिस भावसंबंधी सहमका फल चाहता है उसके पूर्वभावसे उसका अंतर (८८) ताजिकनीलकण्ठी।.. करके दशाप्रवेशसामयिक सूर्यस्पष्टमें जोडदे उसकें जितने अंश हों उतने सौर दिनोंमें फल होगा यह निश्चय है ॥ २५ ॥ इति महीधरहतायां नीलकंठीभापायां सहमाधिकारः समाप्तः । वसंततिलका-स्वोचादिसत्पदगतो यदिलग्नदर्शी वी- न्वितस्सहमपोयदिनेक्षतेंगम् ॥ नासौवलीरविशशिश्रितभेद दर्शपूर्णातलग्नपबलस्य विचारणेत्थम् ॥२६॥३॥ सहमेशोंका बलावल कहतेहैं कि, अपने उच्चादि पूर्वोक्त शुभ स्थानोंमें होकर लग्नको यद्धा अपने सहमको सहमेश देखें तो बलवान होतेहैं. जो लग्नको न देखें तो सप्तपदगतभी निर्बल होताहै और इसमें जन्मकालिक सूर्यराशीश १ जन्मकालिक चन्द्रराशीश २ जन्ममासकी पूर्णमासी जिस- लगमें अंत हो इसका स्वामी३जन्ममासकी अमावास्या जिस लममें अंत हो उसका स्वामी ४ इनका बलाबलभी इसी रीतिसे विचारना, इनके बलाबलसे पुण्यसहमके तुल्य फल कहना ॥ २६ ॥ १ ॥ अनु०-पंचवर्गीबलेनोनो नहर्पस्थानमाश्रितः॥ अवलोयं लग्नदर्शी बलीस्वल्पेस्तिचेत्पदे ॥ २७॥२॥ जो ग्रह पंचवर्गीमें (हीन ) पांचसे कम बली हो तथा हर्षस्थानमें न हो उपलक्षणसे लग्नदी भी न हो वह निर्बल होताहै.जो त्रैराशिक मुसल्लहसंज्ञक लधुस्थानमेंभी हो और लग्नको देखे तो बली होताहै, स्वगृहोच्च " महाधि- कारी" स्वहदा मध्यम और स्वराशिक स्वमुसल्लह स्वल्पाधिकार कहेहैं यह सर्वत्र जानना ॥ २७ ॥ २॥ वसंतति० स्वस्वामिनाशुभखगैःसहितंचदृष्टस्वामीवलीचय- दितत्सहमस्यवृद्धिः ॥ यत्स्वामिनाशुभखगैश्चनयुक्तदृष्टंतत्सं भवोनहि भवेदितिचिंत्यमादौ ॥२८॥३॥ जो सहम अपने स्वामी शुभ यदा पापसे युक्त वा दृष्ट हो तथा शुभ ग्रहसे युक्त वा दृष्ट हो तथा सहमेश पूर्वोक्त प्रकारसे बली हो तो उस सह- भाषाटीकासमेता। (८९) मकी वृद्धि होती है और जो सहम शुभग्रह तथा स्वस्वामीसे युक्त दृष्ट नहो. वह सहम निर्बल होता है फल देनेकी सामर्थ्य उसको नहीं होती है॥२८॥३॥ रथोद्ध०-अष्टमाधिपतिनायुतेक्षितंपापदृग्युतमथेत्थशालितम् ॥ संभवेऽपिविलयंप्रयातितत्तेनजन्मनिपुरेदमीक्ष्यताम् ॥२९॥४॥ जो सहम वर्षलग्नसे वा अपने स्थानसे अष्टमभावेशसे युक्त वा दृष्ट हो तथा पापग्रहसे युक्त वा दृष्ट हो यदा पूर्वोक्त अष्टमेशसे वा पापग्रहसे सहमेश इत्थशाली हो तो पूर्वोक्तं शुभफलदातृलक्षणयुक्तभी हो तोभी निर्बल कहाता है फलदेनेकी सामर्थ्य नहीं होती है जन्ममें प्रथम इसी बलको देखलेना ॥ २९ ॥ ४ ॥ अनुष्टु०-आदौजन्मनिसर्वेषां सहमानांबलाबलम् ॥ विमृश्यसंभवोयेषांतानिव विचिंतयेत् ॥३०॥५॥ सहमोंका प्रथम बल सहम बलादि सर्वप्रकारसे सहमोंका बलाबल जन्ममें तदुत्तरवर्षमें देखके जिनका बलाधिक हो फल देनेकी सामर्थ्य हो उन्हें वर्षमें स्थापन करना जिनको फल देने की सामर्थ्य न हो उन्हें छोड- देना ॥ ३० ॥ ५॥ अनु०-सबलेपुण्यसहमेधर्मवृद्धिधनागमः॥ शुभस्वामीक्षितयुतेव्यत्ययेव्यत्ययंविदुः ॥३१॥ ६॥ अब सहमोंके फल कहे जाते हैं. प्रथम पुण्यसहमका. फल यह है कि पुण्य सहम पूर्वोक्त लक्षणोंसे बलवान् हो तो धर्मकी बुद्धि धनका आगमन होता है शुभग्रह स्वस्वामियुक्त दृष्ट होनेमें भी ऐसा ही फल है जो इनसे विपरीत पूर्वोक्त प्रकारसे बलरहित वथा पापयुत दृष्ट हो तो फल भी विपरीत अर्थात् धर्म धन हानि होगी ॥ ३३ ॥ ६॥ . अनु०-लग्रात्पष्टाष्टरिःफस्थंधर्मभाग्ययशोहरम् ॥ शुभंस्वामिदृशाप्रांतसुखधादिसंभवः ।। ३२ ॥७॥ जो पुण्यसहम लग्नसे ६। ८1१२ इन स्थानोंमें हो तो भाग्य ऐश्वर्य ) यशका हरण करताहै और शुभग्रह स्वस्वामीसे युक्त वा दृष्ट

(९०) ताजिकनीलकण्ठी।
हो तो सुख और धर्मादि शुभ फलका संभव करता है, स्वस्वामी वा शुभसे
युक्त दृष्ट सहम वर्षके उत्तराई अर्थात् प्रवेशसे ६ महीने पीछे सौख्यादि
फल देता है, जो पापादि युक्त दृष्टसे अशुभ फल है, वह वर्ष पूर्वार्द्ध में
होता है ॥ ३२ ॥ ७ ॥
अनुष्टु०-पापयुक्छुभदृष्टंचेदशुभप्राक्ततःशुभम् ॥
शुभयुक्तंपापदृष्टमादौशुभमसत्परे ॥ ३३ ॥ ८॥
संसर्गसे स्वभाव गुण बदल जाताहै पुण्यादिसहम पापयुक्त और शुभ दृष्ट
हो तो वर्षके पूर्वाईमें अशुभ, उत्तराईमें शुभ फल देते हैं. जो शुभ युक्त
और पाप दृष्ट हों तो पूर्वार्द्धमें शुभ फल उत्तराईमें अशुभ फल देते हैं जो युक्त
और दृष्टभी पापहीसे हो तो समस्त वर्षमें अशुभही फल होगा; जो शुभहीसे
युक्त और दृष्टभी हों तो समस्त वमें शुभही फल होगा ॥ ३३ ॥ ८॥
अनु०-यत्राब्देपुण्यसहमंशुभंसोऽत्रशुभावहः ॥
अनिष्टेऽस्मिऊ भनेतिपुण्यमादौविचारयेत् ॥ ३४ ॥९॥
जिस वर्षों पुण्यसहम पूर्वोक्त विधिसे शुभ हो वह समस्तही शुभ होताहै
और सहम अशुभ भी हों तो अनिष्टफल सहसा नहीं देसकते जिसमें पुण्य
सहम (निर्बल) अशुभ है वह वर्ष अशुभही व्यतीत होता है. और सहम
शुभ भी हों तो शुभ फल नहीं देते इसकारण पुण्यसहम सभी "जन्मवर्षमें"
मुख्य विचार्य्यहै ॥ ३४ ॥ ९ ॥
अनु०-सूतौषष्ठाष्टरिःफस्थेमध्येपापहतंपुनः॥
पुण्यधर्मार्थसौख्यनंपत्यौदग्धेफलंतथा ॥३५॥१०॥
जन्ममें पुण्यसहम लमसे छठा आठवाँ वा बारहवाँ हो और वर्षमें
पापयुत हो तथा सहमेश (दग्ध ) अस्तंगत हो, तो धर्म, धन और सुखका
नाश करता है ॥ ३५॥ १०॥
अनु०-सहमान्यखिलानीत्थंसूतोवर्षेविचिंतयेत् ॥
मांद्यारिकलिमृत्यूनांव्यत्ययादादिशेत्फलम् ॥ ३६ ॥ ११ ॥

भाषाटीकासमेता। (९१) उक्त प्रकारसे सम्पूर्ण सहम जन्म तथा वर्षमें विचारने पुण्यसहमके बल- वान् होने द्रव्यादिक लाभ होतेहैं, परंतु रोग आरे कलि झकटक मृत्यु इन सहमोंके बलवान् होनेमें विपरीत फल, उनके नामसदृश होताहै. यदि रोगादि पांच अनिष्ट सहम निर्बल अशुभफलदाता हों तो वर्षादिमें शुभ फल जानना ॥ ३६॥ ११ ॥ रथोद्ध-कार्यसिद्धिसहमयुतंशमैदृष्टमूथशिलगंजयप्रदम् ॥ संगरेथशुभपापदृष्टियुक्क्लेशतोजयउदीरितोबुधैः ॥३७॥१२॥ कार्यसिद्धि सहम शुभ ग्रहोंसे युक्त वा दृष्ट हो अथवा शुभयहसे मुथ- शिलकारी हो तो संग्राममें जय देवा है. शुभयुत दृष्ट और शुभमुथशिली भी हो तो विशेषतर जय देता है. जो दृष्ट युक्त वा मुथशिली शुभ और पापों सेभी हो तो संग्राममें क्लेशसे जय देता है ऐसा ही विचार विवाहादिसहमोंमें करना. या कार्यसिद्धि हर किसी कार्यकी होती है ॥ ३७ ॥ १२ ॥ मंजुभा०-कलिसद्मपापखगदृष्टिसंयुतंयदिपापमूथशिल- गंकले तिम् ॥ अथतत्रसौम्यसहितावलोकितेजयमेतिमि श्रदशितेकलिव्यथे ॥३८॥ १३॥ कलि कलह सहम पापशुभ दोनोंही से दृष्ट वा युक्त हो तथा पापग्रहसे मुथशिली हो तो कलहमें मरण होवे जो वही कलिसहम शुभग्रहसे युक्त वा दृष्ट हो तो थोडेही कलहमें जय होवे. जब पाप और शुभ ग्रहोंकी दृष्टि तुल्य हो वा दोनोंहीसे युक्त हो तो कलह वा व्यथा पारश्रममात्र होती है। जय वा पराजय परिणाममें कुछ भी नहीं ॥ ३८ ॥ १३ ॥ उपजा०-विवाहसमाधिपसौम्यदृष्टंयुतंशुभैमूथशिलंशुभाप्तिम् ॥ कुर्याद्यदामिश्रसमेतदृष्टंकष्टादथक्रूरमृतीश्वरैर्न ॥३९॥ १४ ॥ विवाहसहम स्वस्वामी वा शुभ ग्रह युक्त वा दृष्ट हो और शुभग्रहके साथ मुथशिल करे तो विवाहप्राप्ति करेगा जो शुभ और पाप ग्रहोंसे युग- पत् युक्त वा दृष्ट हो उपलक्षणसे मिश्रहीके साथ इत्थशाली हो तो विवाह (५२) ताजिकनीलकण्ठी। प्राप्ति कष्टसे करेगा. जब पापहीसे युक्त दृष्ट और. मुथशिली हो तो विवाह प्राप्ति नहीं होने देगा ॥ ३९ ॥ १४॥ उपजा-यशोधिपैनधनगेखलेनयुतक्षितेसघशसोविनाश:- 1. पापा जितस्यायशसोस्तिलाभोनष्टौजसिस्यात्कुलकीर्तिनाशः॥४०॥१५॥ यशसहमाधीश अष्टम स्थानमें हो और पापयुक्त वा दृष्ट हो तो अपने प्राप्ति किये. यशका नाश होवे. किंच स्वयमजित महापातकों से किसी एक. पातक संबन्धी अयशका लाभ होवे जब यही यशसहमेश अष्टम और पापयुत दृष्ट होकर अस्तंगत भी हो तो अपने वंशसे चलाआया पितृ पितामहादिकोंका जो यश उसे नाश करता है अर्थात् अपने सारे वंशकी कीर्ति नाशक है ॥ ४०॥ १५ ॥ उपजा-शुभेत्थशालेशुभग्युतेवाबलान्वितस्यायशसोभिवृद्धिः ।। युद्धजयोवाहनशस्त्रलाभः पापेसराफादयशार्थनाशः ॥४१॥१६॥ यशसहमेश शुभग्रहसे मुथशिली अथवा शुभदृष्ट वा युक्त हो तो यशकी वृद्धि होते. उपलक्षणसे धर्मवृद्धि धनलाभभी होवे तथा संग्राममें जय, अश्वादि- वाहन और धनुषादि शस्त्रोंका लाभ होवे जो यशसहमेश पापग्रहसे मुथशिली यद्वा शुभग्रहसे ईसराफी उपलक्षणसे नष्टबली हो तो अपयशवृद्धि और धन- नांश होवे ॥ ४१ ॥ १६ उपजा०-आशातदीशचषडरिःफविवर्जितःसौम्ययुतेक्षितश्च ॥ स्याद्वांछितार्थाबुरखाहनादिलामःखलेक्षायुतितोतिदुःखम् ॥४२॥१७॥ आशासहम और इसका स्वामीभी६।८।१२स्थानों में न हों तथा शुभम हसे युक्त वा दृष्ट हो तो इच्छानुकूल.हिरण्यादि द्रव्य वस्त्र, वाहन आदि और शस्त्रसे भूमिलाभ होता है, जो दोनोंही. पूर्ववर्जित स्थानों में हों तथा पापग्रह युक्त वा दृष्ट हों तो अतिदुःख और बांछितार्थनाश होवै ॥ ४२ ॥ १७ ॥ उ०जा-मांद्याधिपःपापयुतेक्षितश्चपापःस्वयंरोगकरोविचिंत्यः॥ . चेदित्थशालोमृतिपेनमृत्युस्तदाभवेद्धीनबलेतिकष्टात् ॥४३॥ १८॥ --

भाषाटीकासमेता।
(९३)
रोगसहमेश आप पापग्रह हो तथा पापग्रहोंसे युक्तः वा दृष्ट हो तो वह
रोगकर्ता जानना; पुनः लग्नसे अष्टमभावेशसे इत्यशालीभी हो तो मृत्युकरे
गा, इसमें हीनबल हो तो मृत्यु भी अविकष्टसे होगी बलवान् होनेमें अल्प-
से मृत्यु होगी, इसप्रकार कष्टाधिक्यकी प्राप्ति होनेमें धर्मशास्त्रोक्त
शांति करनी चाहिये जैसे उक्तभीहै कि "केशेषु शांविरुक्ता ज्ञातव्या
तत्र शास्त्रज्ञैः" इति ॥ ४३,॥.३८ ॥
उपजा-स्वस्वामिसौम्येक्षणभाज़िमांद्यनाथेसवीय्यष्टपडत्यवयंः ।।
रोगस्तदानैवभवेद्विमिङयुतेक्षितेरुग्भयमस्तिकिंचित् ।। ४४ ॥ १९॥
मांयसहम अपने स्वामी वा शुभग्रहोंसे युक्त वा दृष्ट पूर्वोक्त रीतिसे हो
और छठा आठवां बारहवां न हो तो रोग नहीं होगा सुखी रहेगा जो सौम्य
पाप दोनहूंसे युक्त दृष्ट होतो स्वल्परोगभय होगा जो वह सहमेशं बली होकरं शुभ
ग्रहंसे मुथशिलकारी होतो वाहनादिप्राप्ति भी होगी उपलक्षणसे रोग सहमेश का
शुभग्रह मुथशिली भी ऐसाही होताहै, यह रोग न होनेका योंग सिद्ध होजावे
तो समझना कि, पूरेतौर से रोग होगा क्योंकि पूर्वमें लिख दिया है आचा-
य॑ने कि, "मान्यारिकलिमृत्यूनां व्यत्ययादादिशेत्फलम्" ॥४४॥ १९॥
-शार्दूलवि० अर्थाख्यंशुभनाथदृष्टिसहितद्रव्यागमात्सौख्यदं
पापैदृष्ट्युतंचवित्तविलयंकुर्यादथोपापयुक् ॥ संदृष्टंचशुभे-
त्थशालियदितत्पूर्वधननाशयेत्पश्चादर्थसमुद्भवचससुखव्य-
त्यासतोव्यत्ययः॥४५॥२०॥
अर्थाख्यसंहम स्वस्वामी वा शुभयहसे युक्त दृष्ट हो तो व्यकी प्राप्ति
करके सुख देताहै, जो पापग्रहों से युक्त दृष्ट हो तो व्यका नाश करता
है, शत्रुग्रहसे युक्त दृष्ट हो तो शत्रुसंबंधी कर्मसे धननाश होताहै, जो
पापयुक्त और शुभदृष्ट भी हो और शुभग्रहके साथ इत्यशाली भी हो तो
पूर्वसंचितद्रव्यंका नाश करके पुनः अपने पुरुषार्थसे द्रव्यसंचय सुखसहित
करता है, केवल पापयोग दृष्टिसे सर्वथा धननाश करताहै ॥ ४५ ॥ २०॥

(९४) ताजिकनीलकण्ठी। अनु०-रिपुदृष्ट्यारिपोभौतिस्तस्करादेर्धनक्षयः ।। मित्रह यामित्रयोगाद्धनमानोयशःसुखम् ॥४६॥२१॥ सहमसहमेशपर शत्रुदृष्टि हो तो शत्रुभय और चोर आदिसे धनक्षय होताहै, मित्रदृष्टि हो तो मित्रके संबंधसे धनप्राप्ति मानोदय यशलाभ और सुख होताहै ।। ४६ ॥ २१ ॥ इन्द्रव-सत्स्वामिदृष्टयुतमात्मजस्यलाभंसुखंयच्छतिपुत्रसम॥ पापान्वितंसौख्यखगेत्थशालीप्राग्दुःखदंपुत्रसुखाय पश्चात् ४७॥२२. पुत्रसहम स्वस्वामी शुभ ग्रहयुक्त वा दृष्ट हो. तो पुत्रसुख अर्थात् पुत्रो- पत्ति और उत्पन्न पुत्रोंका सुख देताहै, ऐसाही शुभ मुथशिलसेभी कहना. जो पुत्रसहम पापयुक्त और शुभ ग्रहसे इत्यशाली होतो प्रथम पुत्रसंबंधी दुःख पश्चात पुत्रसौख्य देताहै; योगफल प्रथम दृष्टिफल पीछे होताहै ॥४७॥२२॥ इन्द्रव-पापान्वितंपापकृतेसराफनाशायपुत्रस्यगतौजसीशे ।। सूतौसुतेशःसहमेश्वरोब्देपुत्रस्यलब्ध्यैशुभमित्रदृष्टः॥४८॥२३॥ जो पुत्रसहम पापयुक्त वा दृष्ट हो और पापग्रहसे इसराफी हो तथा पुत्र- भावेश निर्बल ‘अस्तंगत हो तो पुत्रनाश करताहै, जो जन्मलग्रसे पंचमेश वर्षमें भी पंचमेश वा पुत्रसहमाधीश हो और शुभयह स्वस्वामि स्वमित्र युक्त दृष्ट हो तो पुत्रप्राप्ति करताहै ॥ ४८ ॥ २३ ॥ वसंतति-पित्र्यंसदीक्षितयुतंपति तदृष्टं तातस्ययच्छतिध नांबरमानसौख्यम् ॥ पत्यौगतौजसिमृतौखलमूसरीफेनाशः पितुश्चरगृहे परदेशयानात् ॥ ४९ ॥२४॥ पितृसहम शुभग्रह वा स्वस्वामि युक्त वा दृष्ट और शुभग्रहसे इत्थशा- ली हो तो पितृसंबंधी धन वस्त्र मान सुख देता है, जो पितृसहमेश अस्ता- दिसे निर्बल हो वा लमसे अष्टम स्थानमें हो पापग्रहसे मूसरीफी हो और भाषाटीकासमेता.। (९५) चरराशिमें हो तो पिता विदेशमें मरजावे, स्थिरराशिमें हो तो स्वदेशमें मरे ॥ ४९ ॥ २४ ॥ उपजा-शुभेत्थशालेखलखेट्योगेगदप्रकोप प्रथममहान्स्यात् ॥ पश्चात्सुखंविंदतिपूर्णवीय्यनाथेनृपान्मानयशोऽभिवृद्धिः॥५०॥२६॥ पितृसहम स्वस्वामीसे वा शुभग्रहसे इत्थशाली हो और पापग्रहसे युक्तभी हो तो वर्षके पूर्वार्द्ध में रोगवृद्धि होवेउत्तराईमें सुख होवे, जब पितृसहम स्वामी पूर्णवीर्य १५ विश्वासे अधिक बल होकर शुभस्थानमें हो तो राजासे मान तथा यशकी वृद्धि होवे, मातृसहममेंभी ऐसाही जानना ॥ ५० ॥२५॥ रथोद्धता-बंधनाख्यसहमयुतेक्षितस्वामिनानहितदास्तिबंधनम् ॥ पापवीक्षित तेस्तुबंधनं पापजे सुथशिलेविशेषतः ॥५१॥२६ वन्धनसहम स्वस्वामी वा शुभग्रह युक्तं दृष्ट हो तो बंधन ( कारागार ) आदिका भय नहीं होता, पापयुक्तवीक्षितसे तथा पापेत्थशालसे बंधन होता है यहभी फल विपरीतही जानना चाहिये ॥ ५१ ॥ २६ ॥ रथोद्ध०-गौरवाख्यसहमयुतेक्षितं स्वामिनाशुभखगैः सुखाप्तये॥ राजगौरवयशोंबरातयःपापवीक्षणयुतेपदक्षतिः ॥ १२॥ २७ ॥ गौरव सहम स्वस्वामी वा शुभयहसे युक्त दृष्ट हो तो सुख प्राप्ति और राज्य गुरुता अर्थात् बडप्पन और यश तथा वनप्राप्ति होतीहै इत्थशाली शुभग्रहसेभी हो तो धन, वाहन, यश और सुख मिलते हैं जो पापग्रहसे युक्त दृष्ट वा इत्थशाली हो तो पद ( अधिकार ) तथा धननाश सौख्य नाश करता है ॥ ५२ ।। २७ ॥ उपजा-शुभाशुभैईष्टयुतंखलैश्चेत्कृतेत्थशालंधनमाननाशम् ॥ पूर्वविधत्तेचरमेशुभेत्थशालेसुखवाहनशस्त्रलाभम् ॥ ५३ ॥२८॥ गौरवंसहमका फल और भी कहते हैं कि जो यह शुभ पाप दोनहूं प्रका- रके ग्रहोंसे युक्त वा दृष्ट हो और पापग्रहसे इत्थशाली हो तो पूर्वार्धमें धन -

(९६)
ताजिकनीलकण्ठी।
तथा मानका नाश कर्ता है। उत्तराईमें शुभ फल देताहै, जो पाप शुभसे दृष्ट
युक्त होकर शुभ ग्रहसे इत्थशाली हो तो वर्षपूर्वार्द्ध में शुभ उत्तराईमें अशुभ
फल देताहै सभी प्रकार मिश्र हो तो संपूर्ण वर्षमें मिश्रही फल करता है,
केवल इत्थशालीभी एक राशि साहित्यसे पूर्वाईमें भिन्नराशि साहित्यसे उत्त-
राईमें शुभ फल सौख्य वाहन शस्त्रांदि वा वस्त्रादि लाभ देताहै ( वस्त्रलाभम)
ऐसा भी पाठहै ।। ५३ ॥ २८ ॥
रथोद्ध-कर्मभावसहमाधिपाःशुभैःस्वामिनामुथशिलाबलान्विताः ॥
हेमवाजिगजभूमिलाभदाःपापदृष्टियुतितोऽशुभप्रदाः ॥५४॥२९॥
कर्मभाव, कर्मभावेश, तथा कर्मसहम, कर्मसहमेश, ये चारों प्रागुक्त
रीतिसे बलवानहों अर्थात् स्वस्वामी शुभग्रह युक्त दृष्ट तथा शुभग्रहके साथ
इत्थशाली हो तो सुवर्ण घोडा हाथी भूमि इनका लाभ देतेहैं जो पापयुत दृष्ट
वा पापग्रहसे इत्थशाली होतो व्यका नाशादि अशुभ फल देतेहैं॥५४॥२९॥
शालि०-दग्धावकारकर्मवैकल्यदास्तेयुक्तादृष्टाःसौरिणातेविशेपात् ॥
राज्यभ्रंशाकर्मनाशश्चराजकौशौचेन्मृशरीफौखलेन ॥ ५५ ॥३०॥
पूर्वोक्त कर्मभाव सहमाधिपति पापग्रह युक्त वा दृष्ट अथवा पापसे
इत्थशाली हो तो कर्मकी विकलता ( नाश ) देताहै, यदा शनिसे युक्त वा
दृष्ट हो तो विशेष करके कर्मका नाश करताहै, ऐसे ही दग्ध ( पापका-
दिसे उपद्रुत ) तथा वक्र (विपरीत गति) होनेमें भी फल देतेहैं तथा राज्य
सहमेश, कर्मभावेश, राज्यभावेश, कर्मसहमेश, जो पापग्रहसे मुथशिली हों
उपलक्षणसे क्रूरयुक्त दृष्ट हों तो राज्यनाश पापमूशरीफसेभी यही फलहैं तथा
सुवर्णादि द्रव्यका नाश करतेहैं शुभ पापसे तुल्य योग दृष्टि वा मूशरीफ हो
तो फल बलावलके तारतम्यसे विचारके कहना इसीप्रकार माता आदि. सह-
मोंका विचार करना ॥ ५५॥ ३० ॥
अनु०-उपदेशागुरुनि विद्याशास्त्रंश्रुतिस्मृती ॥
मोहोजाड्यंवलंसैन्यमंगंदेहोजलंद्युतिः॥५६॥३१॥

4 भाषाटीकासमेता। (९७) किसी २ सहमोके पदार्थसे अर्थ भ्रम होताहै. जैसे गुरु, गौरव, कर्म, राज, बल, वपु, इत्यादि इसके सन्देह निवारणार्थ कहतेहैं कि, गुरु उपदेश कर- नेवाला, विज्ञान विद्यामात्र विषयिक बुद्धि विद्या (वेदन ) जानना, शास्त्र श्रुति स्मृति ज्ञान, जाड्य अज्ञान ग्रन्थविस्मरणादि, बल सेना, सामर्थ्य शारीरादिक बल, देह हस्तपादादि पिंड देह, जल काति, हीरकादि मणि, कांतिवत, जलपथ जलमार्ग, इत्यादि इनके पर्याय हैं ॥ ५६ ॥ ३१ ॥ अनु०-गुरुतामंडलेशत्वंगौरवमानशालिता ॥ निग्रहानुग्रहविभूराजा त्रादिलिंगभाक् ॥१७॥३२॥ गुरुता, मण्डलेशत्व, सामान्यराजा गौरव, श्रेष्ठ, मानी, राजा निग्रह कारा- गार, बंधन, सामर्थ्य, तथा अल्पानल्प देश, द्रव्य, दान, सामर्थ्य, तथा छत्र चामरादि राजचिह्नधारीको राजा कहते हैं ॥ ५७ ॥ ३२ ॥ अनुष्टु०-माहात्म्यमन्त्रगांभीर्यधृतिबुद्धयादिशालिता। सामर्थ्यदेहजाशक्तिःशौर्ययत्नोरिनिग्रहे ॥५८॥३३॥ माहात्म्य मन्त्र गांभीर्यका नाम है धृतिनाम बुद्धिमानीका है सामर्थ्य शरीर शक्तिको और शौर्य शूर वा वीरत्व शत्रुनियहत्व सामर्थ्यको कहते हैं ।। ५८ ॥ ३३॥ अनुष्टु०-आशेच्छो मितिधाश्रद्धावंदम्पराश्रयः॥ पानीयपतनं वृष्टिर्जलेऽकस्माचमज्जनम् ॥ ५९॥३४॥ आशा इच्छाका नाम है दिशाकाभी नाम है, श्रद्धा, धर्म कार्यकी मतिको कहते हैं तथा यहां विश्वासताका अर्थ लेना मुख्य है. वन्दनाम पराश्रयका है पानीयपतनका प्रयोजन वृष्टयादि ऊपरसे गिरनेवाला पानीका है जलमें डबनेकाभी अर्थ है ॥ ५९ ॥ ३४ ॥ अनुष्टु०-आधिव्याधीतापमांधेसपिण्डाबंधवः स्मृताः ।। सत्यालीकंवणिग्वृत्तिराधानप्रसवःस्मृतः॥६०॥ ३५ ॥ आधि मानसी व्यथा, व्याधी रोग, ताप संताप, ये सब मांधके पर्यायहैं, .

. (९८). 'ताजिकनीलकण्ठी। बांधव, सपिण्ड सातपुरुष पर्यन्तका नाम है, सत्यालीक वणिग्भावका पाय है प्रसव गर्भाधान सन्तानोत्पत्तिका नाम है ॥ ६० ॥६५॥. अनुष्टु०-दासत्वं परकर्मोक्तमन्यत्स्पष्टस्वनामतः॥ निरूप्याणियथायोग्यंकुलजातिस्वरूपतः ॥ ६ ॥३६॥ परकर्म दासत्वका पर्याय है इतने सहमाके नाम व्यर्थ होनेसे पाय कहे गये शेष सहमोंके प्रकट नाम हैं जैसे पुण्य विवाह आदि यथायोग्य कुल, तथा जाति विचारके फल कहना ॥ ६१ ॥ ३६ ॥ अनुष्ट-शुभयोगेक्षणात्सौख्यपत्युर्वीर्यानुसारतः॥ दारिद्यमृतिमांद्यारिकलिषूक्तोविपर्ययः ॥ १२॥ ३७॥ - सम्पूर्ण सहम शुभग्रहके दृष्टि तथा योगसे सहमेशके वीर्यानुसार शुभफल देते हैं परन्तु दारिय, मृत्यु, मांय, कलह ये ४ सहम विपरीत फल देतेहैं अर्थात शुभयोगेक्षण, तथा स्वामी बलवान् होनेमें भावसदृश अशुभ फल और पापयोग दृष्टि तथा सहमेशके निर्बल होनेमें नाम गुणसे विपरीत शुभ फल देते हैं ॥ ६२ ॥ ३७ ।। अनुष्टु०-प्रश्नकालेपिसहमविचार्यप्रष्टरिच या ॥ सर्वेषामुपयोगोत्रचित्रपृच्छतियजनाः ॥ ६३॥ ३८॥ जिसका जन्मपत्र हो तो प्रथम जन्मके तदुत्तर वर्षके सहम विचारने जन्म पत्र जिसका न हो उसके प्रश्न लग्नसे पुण्यादि सहम विचार करना ( यतः ) अटा अनेकप्रकार प्रश्न पूछते हैं सहमोंसे सभी प्रकार कहदेना ॥६३॥३८॥ वसंत०-आसीदसीमगुणमंण्डितपण्डितायोव्याख्यद्भुजं- गंपदवीःश्रुतिवित्सुवृत्तः ॥ साहित्यरीतिनियुणोगणिताग- मज्ञश्चिन्तामणिर्विपुलगर्गकुलावतंसः॥ ६४ ॥३९॥ इस तंत्रकी समाप्तिमें ग्रंथकर्ता अपने नामादि कहताहै कि साधुत्व शास्त्र पांडित्यादि निःसीम गुणोंसे भूपित तथा पंडितोंमें श्रेष्ठ तथा शेषनागके वाणी पातंजलादि महाभाष्यकी व्याख्या करनेवाला तथा. वेदज्ञान जाननेवाला तथा शुभाचरण युक्त और गणितादि ज्योतिश्शास्त्र पारंगम साहित्य का- (९९) भाषाटीकासमेता। व्यादिकी रीतिमें निपुण होरहा ऐसा चिन्तामणि नामा दैवज्ञ गर्गमहर्षिके कुलका भूषण हुआ ॥ ६४ ॥ ३९ ॥ उजा-तदात्मजोनंतगुणोऽस्त्यनंतोयोऽधोक्सदुक्तिकिलकामधेनुम् ।। संतुष्टयेजातकपद्धतिचन्यरूपयदुष्टमतंनिरस्य ॥६५॥ ४०॥ तिसका पुत्र अगणित. गुणशाली अनंत नामा दैवज्ञ है जिसने सुन्दर वाणीयुक्त गणितरूपी कामधेनु जैसी कामधेनुका दोहन किया, अर्थात काम- धेनुगणितकी टीकाकी तथा गुणज्ञ सज्जनोंके प्रसन्नतार्थ जन्मपद्धति सम्प्रदायके अनभिज्ञ दुष्ट जनोंके दुष्ट मतको नाश करके गणितग्रन्थविशेष जातकपद्धतिभी निर्मित करी ॥६५॥ ४०॥ इंद्रव-पांव्यासाविततोविपश्चित नीलकंठाश्रुतिशास्त्रनिष्ठः॥ विद्वच्छिवप्रीतिकरंव्यधात्तंसंज्ञाविवेकंसहमावतंसम् ॥६६॥४१॥ ऊपर अपने पिताका नाम अनन्तज्योतिर्विद् ग्रन्थकर्ताने प्रकट किया पुनः पद्यानामा अपनी मातासे उत्पन्न पण्डित वेद तथा शास्त्र व्याकरण मीमांसा ज्योतिष तन्त्रादि पारंगम श्रीनीलकंठ नामा दैवज्ञने संज्ञाविवेक नामा ताजिकग्रंथका एक तंत्र जिसमें सहमरूप भूषण है ऐसा - शिवनामा पाठ क पंडित महाराष्ट्रदेशीय ब्राह्मणकी प्रीति करनेवाला यदा, विद्वद् भूत भविष्य दर्तमान त्रिकालज्ञ सर्वांतर्यामी शिव सकलदुःखापनोदन पूर्वक कल्याण कर- णशील श्रीमहादेवजीकी प्रीति करनेवाला यह ग्रन्थ निर्माण किया ॥ ६६ ॥ ४१ ॥ इति महीधरकतायां नीलकंठीभाषायां सहमविवेको नाम तृतीयं प्रकरणम् ॥३॥ श्रीनीलकंन्याविदधान्महीधरस्संज्ञाविवेकस्यमतिप्रवद्धिनीम् ॥ माहीधरांसज्जनतोषकारिणीभाषाविवृत्तिंसुमनःप्रसादिनीम्॥४२॥ श्रीनीलकंठ दैवज्ञकृत ताजिकनीलकंठीके संज्ञाविवेक नाम एक प्रथम तंत्र की बुद्धि बढानेवाली तथा सज्जनोंको संतोष करनेवाली सद्बुद्धिपाठकोंके मन प्रसन्न करनेवाली माहीधरी नाम भाषाटीका महीधरने रची ॥४१॥ इति महीधरकृतनीलकंठीभाषाटीकायां प्रथमं संज्ञातंत्रम् ।

अथनी श्रीगणेशायनमः। "द्वतीयतंत्र र भः उपेंद्रवज्राछन्दः स्वस्वाभिलाषनहिलब्धुमीशानिर्विघ्नमीशानमुखाः सुरौघाः॥ विनाप्रसादंकिलयस्यनौमितंढुंढिराजमतिलाभहेतुम् ॥१॥ ग्रंथकर्ता आचार्य नीककंठ दैवज्ञ ताजिकनीलकण्ठी द्वितीय फलतंत्र- प्रारम्भमें निर्विघ्नतार्थ गणेशजीको प्रणाम करताहै कि, जिसके कपा विना महादेव प्रभृति देवसमूह अपने अपने अभिलापोंको निर्विघ्नतासे पानेको समर्थ नहीं हैं ऐसे ढुंडिराज गणेशको सद्बुद्धिप्राप्ति के लिये प्रणाम करताहूं ॥ १ ॥ रथोद्धता-जातकोदितदशाफलंयतःस्थूलकालफलदंस्फुटनृणाम् ॥ तत्रनस्फुरतिदेवविन्मतिस्तद्ववेन्दफलमादिताजिकात् ॥२॥ जातकोंमें दशाफल बहुत कालपर्यंत एकही फलदाता . मनुष्योंको कहेहैं यहां ज्योतिपीकी बुद्धि स्फुरित नहीं होती जैसे शुक्रकी दशा २० वर्ष पर्य- तंकी कहीहै तो इतने समय पर्यंत एकहीसा किसीकोभी नहीं रहता इस लिये सौर वर्ष मात्र समयावधिवाला सूक्ष्म फलविचार मैं शचीन ताजिकके अनुसार कहताहूं ॥२॥ (गाथा) तत्कालेको जन्मकालरविणा स्यायतःसमः ॥ एकैकराशिवृद्धयाचेत्तुल्योंशाचैर्यदारविः ।। तदामासप्रवेशोधुप्रवेशश्चेत्कलासमः ॥३॥ जन्म कालका सूर्य स्पष्ट राश्यादि पूरा वही जब मिले वह वर्ष प्रवेश- का समय होता है, उसी स्पष्टमें एक राशिमात्र जोडके अंशादि वही स्थापन करके मास प्रवेशका सूर्य स्पष्ट होताहै तथा इसी स्पष्टमें एकएक अंश जोडके जिस महीनेका दिन प्रवेश करना है उसकी राशि उसी महीने लौं रखके तथाकला विकला पूर्ववतही स्थापन करके दिनप्रवेश होता है । इस सूर्य स्पष्टसे भाषाटीकासमेता। (१०१) लनस्पष्टसे इष्टकाल निकालनेका "उदाहरण" जन्मकालका सूर्य • । १८॥ ४२ ॥ ३३ है; संवत् १९४३ वैशाख कृष्ण द्वादशी शनिवार इष्टघटी १३ । ५४ वर्ष प्रवेश३८ में भी सूर्य स्पष्ट यही०।१८।४२।३१ है अब इससे लग्नस्पष्ट और लगस्पष्टसे इष्टकाल लेनाहै सूर्यस्पष्टसे लगस्पष्टकी विधि उदाहरणसहित प्रथम संज्ञातंत्रके २१ ॥२२॥ २३ श्लोकके टीकामें प्रकट लिखाहै. सूर्य्यस्पष्टसे इष्टकालके लिये ग्रहलाघवका श्लोका " अर्कभोग्यस्तनोर्मुक्तकालान्वितो युक्तमध्यादयोष्टिकालोभवेत् ॥ यह है, इसके क्रमसे लगस्पष्टसे इष्टघटी साधन होताहै, " उदाहरण ” सूर्य स्पष्ट राश्यादि० । १८ । ४२। ३१ लग्न स्पष्ट ३ । १० । २७ । ३ सायन सूर्य १३ । २६ । ३१ अंशादि ३० में घटायके भोग्यांश १८॥ ३३ । २९ हुये, ३० से उद्धृत करनेपर भोग्य काल १५० । १९ । १२ हुवा, सायन लग्न ४।३।११।३३ सोदयसे गुनके ३० से भाग दिया तो भुक्तकाल ३७ ॥ ४०४५ हुवा, अर्क भोग्य काल १५० | १९ १२ में जोड दिया १८७ । ५९ । ५७ अब सूर्य और सायन लग्नके बीच जितने लगहैं उनके स्वदेशीय खंड जोडने हैं यहां मिथुन ३०० कर्क३४६ ये दो जोड दिये तो ८३३ । ५९ । ५७ हुये इनमें ६० से भागदेकर लन्धि १३ घटी शेष ५३ पला और विशेष विपलभी ५९ । ५७ जानना अधिक्ये रूपम् १ के प्रमाणसे १३ । ५४ यह इष्टकाल होगया जो. किसीकारण इष्टकाल खोगया हो और लग्न स्पष्ट सूर्य स्पष्ट हो तो ऐसेही इष्ट निकाललेना यह प्रसंगसे लिख दियाहै ॥ ३ ॥ वसंतति० तात्कालिकास्तुखचराः सुधिया विधेयाः स्प : विलग्नसुखभावगणो विधेयः॥वीर्य तथोक्तविधिना निखिलग्रहा णामब्दाधिपस्यविधयेकथयामियुक्तिम् ॥४॥ ग्रंथकर्ता कहताहै कि प्रथमोक्त प्रकारसे तात्कालिक यह स्पष्ट लग्नादिभाव स्पष्ट करके सदबुद्धिमान ज्योतिषीने ग्रह तथा भावोंका बल उसप्रकार सभीका (१०२) वाजिकनीलकण्ठी। करके वर्षेश नियत करना इसके विधिनिमित्त आगे युक्ति.कहताहूं ॥ ४ ॥ रथोद्धता-जन्मलग्नपतिरब्दलग्नपो मुथहाधिप इतित्रिराशिपः।।' सूर्यराशिपतिरह्निचंद्रभाधीश्वरो निशि विमृश्यपंचकम् ॥५॥ कि जन्मलनका स्वामी १ तथा वर्ष लमका स्वामी २ मुंथाराशिका स्वामी ३. त्रिराशीश, (त्रिराशिपाः सूर्य सितार्कि शुक्रेत्यादिसे ) ४ और दिनमें वर्ष प्रवेश हो तो सूर्य राशीश रात्रिका वर्ष प्रवेश हो तो चंद्र राशीश ५ये पांच अधिकारी हैं इनकी विधि पूर्व संज्ञातंत्रमें कहीहै ॥५॥ उपजाति-बलीयएषांतनुमीक्षमाणस्सवर्षपो लग्नमनीक्षमाणः ॥ नैवाब्दपोदृष्टयतिरेकतः स्याइलस्यसाम्ये विदुरेवमायाः ॥६॥ उक्त प्रकार पंचाधिकारियोंको स्थापन करके इनका दृग्वल. पंचवर्गी बल देखके, जो ग्रह बलसे अधिक हो तथा लनकोभी देखे तो वह वर्षेश होताहै, बलाधिक हो और लमको न देखे तो वर्षश नहीं होता, बलाधिककी दृष्टिभी पूर्ण हो तो वही होगा इसके अभावमें इससे न्यून वली तथा इससेभी न्यूनबली दृष्टि विशेषः वर्षेश होताहै, जो वर्षमें सभी वा २ तुल्यबली हों तो जिसकी दृष्टि अधिक हो वही होगा, लमपर दृष्टि जिसकी नहीं है वह बलाधिक हो तौभी वर्षेश नहीं होताहै ॥ ६ ॥ उजा--दृगादिसाम्येप्यथ निर्बलत्वे वर्षाधिपः स्यान्मुथहेश्वरस्तु।। पंचापिनोचेत्तनुमीक्षमाणावीयांधिकोव्दस्यविभुर्विचित्यः ॥७॥ जो पंचाधिकारियोंमें सभीकी दृष्टि लग्नपर वरावरहो तथा बलवानभी सभी तुल्य हों यदा(हीनबलःसरोनः)इत्यादिसे सभी हीनबल हों तो मुंथाराशिपति वर्षेश होताहै, जो पांचोंमें कोई.लग्नको न देखे तो वलाधिक ग्रह वर्षेश होताहै जो लमपर दृष्टि पांचोंकी पूर्णही हो तो उनमेंसे बलाधिक वर्षेश जानना, कोई कहते हैं कि, पांचौंमें बल तथा दृष्टि पूर्ण कोई न हो तोवर्ष लग्नेश राजा होताहै, किसी- का मत है कि ऐसी प्राप्तिमें जिसके स्वोच्च गृह नवांश द्रेष्काण हद्दादि बहुत अधिकारहैं वह राजा होगा, किसीका मत है कि पांच अधिकारियोंमें जिसके भाषाटीकासमेवा। (१०३) दो तीन वा चार अधिकार मिलेहों वह राजा होताहै. इतने मतोंमें प्रमाणभी अन्यग्रन्थोंसे है, इनमें भी जिसका बल यद्दा दृष्टि अधिक हो वही वर्षराजा करना ॥ ७ ॥ उपजा-बलादिसाम्येरविराशिपोनिनिशीदुराशीडितिकेचिदाहुः ।। येनेत्थशालोग्दविभुःशशीसवर्षाधिपश्चंदभपोऽन्यथात्वे ॥८॥ किसीका मत है कि बल तथा दृष्टिके तुल्य पांचौंके होनेमें दिनका वर्ष हो तो सूर्यराशीश रात्रिका वर्ष हो तो चन्द्रराशीश राजा करना. पूर्वोक्त प्रकारोंसे चंद्रमा वर्षेश हो तो यह वर्षेश न करना, पांच अधिकारियों मेंसे जिसके साथ यह इत्थशाली हो उसे वर्षेश करना, जब किसीके साथ इत्थशाल भी न हो तो जिस राशिमें चन्द्रमा बैठा है उसके स्वामीको वर्षश करना, जो चंद्रमा करका हो तो चंद्रराशीश चंद्रमाही हुआ, तब तो चन्द्र- माही वर्षेश करना पड़ा इसी हेतु आचार्य्यने आगे चंद्रमा वर्षेशके फल भी लिखेहैं. नहीं तो चंद्रमा राजा न होता तो इसका राजत्व फलभी नहीं होनाथा ॥ ८॥ वसंतति-अब्दाधिपोव्ययपडष्टमभिन्नसंस्थो लब्धोदयोब्द जनुपो सहशो बलेन ॥ निःशेषमुत्तमफलंविदधातिकायेनैरुज्य, राज्यबललब्धिमतीवसौख्यम् ॥ ९॥ अब वर्षशका सामान्य फल कहतेहैं कि, वर्षेश व्यय १२ षट् ६ वा अष्ट८ इन स्थानोंमें न हो तथा जन्मवर्षमें उदयी हो अस्तंगत न हो बलमें पूर्ण हो यद्वा जन्ममें तथा वर्षमेंभी बली हो तो संपूर्ण उत्तम फल देताहै तथा शरी- रमें नीरोगिता कुलानुमान राजसुख और बल तथा अतिसौख्य देता है।९॥ अनु०-बलपूर्णेब्दपे पूर्ण शुभं मध्ये च मध्यममम् ॥ अधमे दुःखशोकारिभयानि विविधाः शुचः॥ १० ॥ वर्षेश पूर्वोक्त गणितागत बलसे पूर्ण बली हो तो शुभ फल पूर्ण देताहै मध्यबली हो तो मध्यम अर्थात् शुभ न अशुभ और अधम बली हो तो - (१०४) ताजिकनीलकण्ठी। रोगादि दुःख तथा स्वजन वियोगादि शोक शत्रुभय और नानाप्रकारी चिंता उत्पन्न करताहै ॥१०॥ • वसं तिल-सूर्यब्दपे बलिनि राज्यसुखात्मजार्थलाभः कुलोचितविभुः परिवारसौख्यम् ॥ पुष्टं यशो गृहसुखं विविधा प्रति शत्रुविनश्यति फले जनिखेटयुक्त्या ॥ ११ ॥ सूर्य उत्तम बली होकर वर्षेश हो तो कुलानुमान राज्य तदीय सुख और पुत्र तथा धनलाभ होवै कुलानुसार प्रभुता और कुटुंबका सौख्य मिले शरीरमें पुष्टता होवै यश बढे गृहसंबंधि सौख्य होवै, अनेक प्रकारकी प्रतिष्ठा बढे शत्रुनाश होवे इतने फल जन्मकेभी स्वोच्च गृहादि उत्तम बली होनेमें होता है जन्मका हीन बली हो . तो फल पूरे नहीं होते, मिश्रतामें मिश्रही फलभी होतेहैं ॥ ११ ॥ वसं ति०-मध्ये रखी फलमिदं निखिलं तु मध्यं स्वल्पं सुखं स्वजनतोपि विवादमाहुः ॥ स्थानच्युतिर्न च सुखं कृशता ऽपि देहे भीतिर्नुपान थशिलोनशुभे न चेत्स्यात् ।। १२॥ सूर्य मध्य बली होकर वर्षेश हो तो पूर्वोक्त उत्तम बलका फल मध्यम होता है सुख थोडा होताहै और अपने मनुष्योंसे कलहभी कराता है, तथा स्थान वा पदसे नष्ट हो जाना सुख न मिलना शरीरपीडा होजाना राजासे भय होना, और इतने फल होतेहैं परंतु.यह सूर्य शुभग्रहसे इत्थशाली हो तो उत्तम बलोक्त फल होतेहैं ॥ १२ ॥ वसंति-सूयें बलेन रहितेब्दपतौ विदेशयानं धनक्षयशुचो ऽरिभयं च तंद्रा ॥ लोकापवादभयमु रुजोतिदुःखं पित्रादितो पिनसुखंसुतमित्रभीतिः ॥ १३॥ सूर्य बलरहित होकर वर्षेश हो तो विदेशगमन तथा धननाश चिंता शत्रुभय तंद्रा (आलस्य सहित अर्धनिद्रा) होवे, तथा संसारमें अपवाद (झूठे कलंककी भय ) होवै, उग्ररोग उत्पन्न और अति दुःख होवै पिता माता आ- दिसेभी सुख न मिलै, तथा पुत्र और मित्रोंसेभी भय होवै ॥ १३ ॥ भ

भाषाटीकासमेता। (१०५)
अनुष्टु०-चंद्रेन्दपे मुथशिलं येनासावब्दपेनचेत् ॥
कंबूलमिन्दुना जन्म निशिवर्षे तदोत्तमम् ॥ १४॥
चंद्रमाकी वर्षेशप्राप्तिमें जिसके साथ यह मुथशिल करता हो वह
वर्षेश होताही है. परंच उसके साथ चंद्रमा यदि उत्तमादि भेदसे कंबूल करे
और रात्रिका वर्षप्रवेश हो तो यह ग्रह हीनबलीभी हो तौभी वर्षमें उत्तमही
फल देता है. पूर्ण बली वह ग्रह हो तोक्याही कहना पडता है अर्थात् अत्यु-
चम फल देता है. जो दिनका वर्ष हो तो सामान्य फल जानना ॥ १४ ॥
व ति०-वीर्यान्विते शशिनिवित्तकलत्र त्रमित्रालयादिवि-
विधंसुखमाहुरार्याः॥ नग्गंधमौक्तिकदुकूलसुखानि भूतिलाभः
कुलोचितपदस्य पैःसखित्वम् ॥ १५॥
चंद्रमा जब किसीके साथ इत्थशाली न होकर वर्षेश पूर्वोक्त विधिसे
होही जावै तो उत्तम बल होनेमें धन स्त्री पुत्र मित्र गृहादि अनेक प्रकारके
सुख देताहै ऐसे श्रेष्टजन कहतेहैं. तथा भंगारी वस्तु माला चंदन मृगमदादि
सुगंधि मोती वस्त्र आदिकसे सुख देताहै. ऐश्वर्य, लाभ तथा कुलानुमान
अधिकार देता है और राजाओंसे मैत्री होतीहै ॥ १५॥
वाति-वर्षाधिपे शशिनि मध्यबले फलानि मध्यान्यमूनि
रिपुतासुतमित्रवर्गः ॥ स्थानांतरे गतिरथो कृशता शरीरे
श्लेष्मोद्भवश्च यदि पापकृतेसराफः ॥ १६ ॥
चंद्रमा वर्षेश मध्य बली हो तो उत्तम बलोक्त फल सभी मध्यम
होते हैं तथा पुत्र और मित्रवर्गसे शत्रुता होतीहै एक स्थानसे दूसरे स्थानमें
गमन और शरीर में पीडापन होतीहै. जो पापग्रहके साथ ईसराफ योगभी
करता हो तो श्लेष्मविकारसे क्लेश भी देताहै ॥ १६ ॥
व०ति-नष्टेन्दपे शशिनिशीतकफादिरोगश्चौर्यादिभिः स्वज-
नविग्रहमप्युशंति ॥ दूरगतिः सुतकलत्रसुखात्ययश्च स्यान्मू-
त्युतुल्यमतिहीनबले शशांके ॥ १७ ॥

(१०६) ताजिकनीलकण्ठी। नष्टबली चंद्रमा वर्षेश हो तो शीत तथा कफ आदिक रोग हों चोर ठग आदिसे भय हो और अपने मनुष्योंमें कलहभी कहतेहैं दूर गमन होवै पुत्र व बीका सुख नष्ट होवै और यह अविहीनबली हो तो शीतकफादि रोगोंसे मृत्यु समान कट होताहै ॥ १७ ॥ व० ति०-भौमब्दपे बलिनिकीर्तिजयारिनाशः सेनापतित्व- रणनायकता प्रदिष्टा ।। लामाकुलोचितधनस्य नमस्थता च लोकेषु मित्रसुतवित्तकलत्रसौख्यम् ॥ १८॥ बलवान् मंगल वर्षेश हो तो कीर्ति बढ़े शत्रुसे जीत मिले तथा शत्रुनाश होवे सेनापतिका अधिकार तथा रणमें श्रेष्ठताभी होवै है और कुलउचित धनकी प्राप्ति होवै. मंसारमें साधारण मनुष्योंसे नमस्कार प्रणाम करनेके योग्य होते. मित्र पुत्र धन स्त्रीका सौख्य मिलै ॥ १८ ॥ व ति-मध्येब्दपेवनिसुते रुधिरतिश्चकोपोधिकोझकट शस्त्रहतिक्षतानि ॥ स्वामिस्वमात्मगणतो बलगौरवं च मध्यं सुखं निखिलमुक्तफलं विचित्यम् ॥ १९ ॥ मध्यबली मंगल वर्षेश हो तो शरीरसे किसीप्रकार रुधिर गिरै. कोष बहुत आवै, शस्त्रकी चोट लगनेसे घाव होवै और अपने जनोंमें स्वामित्व तथा बल और गुरुता मिले. सौख्य मध्यम होवे इसप्रकारका कहा हुआ फल मध्यबलमें मध्यमही विचारना ॥ १९ ॥ व०ति-हीनेब्दपेऽसृजिभयं रिपुतस्कराग्निलोकापवादभय मात्माधिया विनाशः॥ कार्य्यस्य विघ्नमतिरोगभयं विदेशयानं क्षयोपनयतो गुरुदृष्टयभावे ॥२०॥ हीनबली मंगल वर्षेश हो तो शत्रु चोर और अभिसे भय होवे. झूठा कलंक लगनेका भय होवै; और अपनीही बुद्धिसे वस्तु वा कार्यका नाश होवे. तथा कार्यमें विन्न होवे, बहुधा रोगभय तथा परदेशगमन होवे. और उद्धतपनसे धन एवं कार्यादिक्षय होते; परंतु इतने फल ऐसे मंगलपर बृह- सतिको दृष्टि न होनेमें होते हैं, गुरुकी दृष्टि होनेमें सभी शुभफल कहेहैं ॥२०॥ .

भाषादीकासमेता। (१०७) वसंतति०-सौम्येब्दपे बलवति प्रतिवादलेख्यसच्छास्त्रसद्वयव- हतौ विजयोऽर्थलाभः॥ ज्ञानं कलागणितवैद्यभवं गुरुत्वं राजा- श्रयेण नृपता नृपमंत्रिता वा ॥ २१ ॥ बुध पूर्ण बली वर्षराजा हो तो विवादमें तथा लिखनेके कर्मसे और शुभ शास्त्र शुभ व्यवहारसे विजय तथा धनलाभ होवे. मंत्रादि कला वैद्यत्व गणित शास्त्र, इनसे गौरवता मिले, ज्ञान होवे और राजाके आश्रयसे राज्य मिले. अथवा राजमंत्रित्व मिले ।। २१ ।। वसंतति-अन्दाधिपे शशिसुते खलु मध्यवीय्ये स्यान्मध्यम निखिलमेतदथाध्वयानम्।। वाणिज्यवर्तनमथात्मजमित्रसौख्यं सौम्येत्थशालवशतोऽपरथानसम्यक् ॥२२॥ मध्यबली बुध वर्षेश हो तो पूर्वोक्त उत्तम बलीका फल समस्त मध्यम होताहै और मार्ग चलना पडताहै. व्यापार तथा पुत्रमित्रोंका सुख होताहै. परंतु शुभयहसे इत्थशाली हो तो उक्तफल है अन्यथा अशुभ फल देताहै२२॥ वसंतति०-सौम्येब्दपेऽधमबलेबलबुद्धिहानिर्द्धर्मक्षयः परिभवो निजवाक्यदोपात् ॥ निक्षेपतो विपदतीव मृषैव साक्ष्य हानिः परव्यवहतेः सुतवित्तमित्रैः ॥२३॥ अधम बली बुध वर्षेश हों तो बल तथा बुद्धिकी हानि धर्मका क्षय होवे वथा अपनेही वचनसे अपमान पावे इत्यादि निशेप ( निधानसे) विपत्ति बहुत होवे झूठी साक्षी ( गवाहीमें ) कठिनाई आनपड़े पराये व्यापारमें अपनी धनहानि और पुत्र मित्र धनकीभी हानि होवै ॥ २३ ॥ व०ति-जीवेऽब्दपे बलयुते परिवारसौख्यं धर्मों णपहिलता धनकीर्तिपुत्राः ।। विश्वास्यतोजगति सन्मतिविक्रमाप्तिाभो निधनपतिगौरवमप्यरिघ्नम् ॥२४॥ बृहस्पति उत्तम बली वर्षेश हो तो कुटुंबका सुख तथा धर्म होवे शौर्यादि गुणोंका आयह होवे अर्थात् ये गुण मिलें धन यश और पुत्र प्राप्ति होवे .

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(१०८)
ताजिकनीलकण्ठी।
संसारमें सभी विश्वास माने अच्छी बुद्धि होवे पराक्रमासद्धि तथा निधि
वस्तु मिलें राजासे गुरुवा मिले, शत्रुनाश होवे ॥ २४ ॥
वसंतति-अब्दाधिपे सुरगुरौ किलमध्यवीय्य स्यान्मध्यम
फलमिदं नृपसंगमश्च ॥ विज्ञानशास्त्रपरताप्यशुमेसराफे दारि
द्यमर्थविलयश्चकलत्रपीडा॥२५॥
मध्यबली बृहस्पति वर्षेश हों तो पूर्वोक्त उत्तम बलके फल मध्यम होतेहैं.
'तथा शुभ ग्रहसे इत्थशालभी करता हो तो राजाका संगम होगा. ज्ञान तथा
शास्त्रमें तत्पर रहताहै जो पापग्रहसे ईसराफ योग कर्ता हो तो दरिद्र और
धननाश और स्त्रीसे कष्टभी करेगा ॥ २५ ॥
वसंतति-जीवेन्दपेधमबले धनधर्मसौख्यहानिस्त्यति सुत
मित्रजनाः सभार्याः ॥ लोकापवादभयमाकुलताऽतिक वृत्ति
स्तनौ कफरुजोरिपुभीः कलिश्च ॥२६॥
अधमबली वर्षेश बृहस्पति हो तो धन धर्म और सुखकी हानि होवे, तथा
पुत्र मित्र लोग और स्त्री उसे त्यागदेवें..संसारमें झूठे कलंक लगनेकी डर होवे.
चित्त व्याकुल रहे आजीवन बडे कप्टसे होवे. शरीरमें कफ रोग होवे. शत्रुसे
भय तथा कलहभी होवेहै ॥ २६ ॥
वसंततिलकाछंद-शुक्रब्दपेबलिनिनीरुजताविलासस स्त्ररत्न
मधुराशनभोगतोपाः ॥ क्षेमप्रतापविजयावनिताविलासो
हास्यनृपाश्रयवशेन धनं सुखंच ॥२७॥
उत्तम बली वर्षेश शुक्र हो तो शरीर नीरोग रहै. नित्यसुखसे विलास
करे. शुभ शास्त्र तथा मिष्टान्न भोजनादि भोगोंसे प्रसन्नता रहै सर्वथा कुशल
प्रताप बढे शत्रुसे जय मिले स्त्रीविलासका सुख रहै. प्रसन्नता रहे और राजा
के आश्रयसे धन तथा सुख मिले ॥ २७ ॥
वसंततिः-अब्दाधिपे भृगुसुते खलुमध्यवीय स्यान्मध्यम
निखिलमेतदथाल्पवृत्तिः॥ तं च दुःखमखिलं सुनिबद्धवृत्तिः
पापारिवीक्षितयुते विपदोऽर्थनाशः ॥२८॥

। भाषाटीकासमेता। (१०९) मध्यबली शुक्र वर्षेश होतो पूर्वोक्त उत्तमबलीका फल सभी मध्यम होतेहैं तथा आजीवनार्थ थोडा द्रव्यादि मिलते हैं गुप्त प्रकारसे दुःख लगा रहे, वाच्य अथवा अवाच्य सुख मध्यम वृत्ति जीवनोपाय अल्प रहे; जो पापग्रह शत्रुसे युक्त दृष्ट हो तो विपत्ति होवे धननाश भी होवे ॥ २८ ॥ व०ति-शुक्रब्दपेधमबलेमनसोऽतितापो लोकोपहासविप दो निजवृत्तिनाशः॥ द्वेषः कलवसुतमित्रजने कष्टाद शनं च विफलक्रियता न सौख्यम् ॥२९॥ अधम बली शुक्र वर्षेश हो तो मनमें अति संताप रहे लोगोंसे उपहास होवे, अपनी आजीवनकी वृत्ति नष्ट होवे, स्त्री पुत्र मित्रजनोंसे वैर होवे, भोजन भी अति कष्टसे प्राप्त होवे. जो कुछ कर्म भलाई निमित्त करै वही निष्फल होवे, सुख न मिले ॥ २९ ॥ व०ति -मंदेऽब्दपे बलिनि नूतनभूमिवेश्मक्षेत्राप्तिरर्थनिचयो यवनावनीशात् ॥ आरामनिमितजलाशयसौख्यमंग : लोचितपदाप्ति णाग्रणीत्वम् ॥३०॥ उत्तम बली शनि वर्षेश हो तो नवीन गृह भूमि (खेती) मिले, धन बहुत मिले, यवनावनीश ( मुसलमान आदि जाति राजा) वा राजतुल्यसे मिले, उपवन (बगीचा ) बनावे, जलाशय, कूप तडागादिका सुख मिले, शरीर पुष्ट रहे.अपने कुलयोग्य अधिकार मिले अपने समाजमें श्रेष्ठ रहे ॥ ३० ॥ व ति०-अब्दाधिपेरविसुते खलुमध्यवीर्यस्यान्मध्यमं नि- खिलमन्नभुजिस्तु क ात् ॥ दासोष्ट्रमाहिष लान्यरतस्तुलाभः पानं फलं भवति पापयुगीक्षणेन ॥३१॥ मध्यबली शनि वर्षेश हो तो पूर्वोक्त फल उत्तम सभी मध्यम होवे तथा अन्न खानेमें किसी प्रकार (अपची) अरुची, आदिसे होवे और दासः ऊंट भैंस तथा अपनेसे हीन कुलमें तत्पर रहे कहीं 'कुधान्यरत' ऐसा पाठ भी है अर्थात दुष्ट अन्न कोदव, सांवा, जुवार, बगड आदिमें तत्पर

(११०) ताजिकनीलकण्ठी।
रहे. इतनी वस्तुओंका लाभ भी होवे, और पापग्रहसे युक्त वा दृष्ट हो तो
समस्त फल दुष्टही होंगे शुभ दृष्टिसे शुभं जानना ॥ ३१ ॥
व०ति-मंदेबलेन रहितेऽब्दपतौ क्रियाणां वंध्यत्वमर्थविलयो
विपदोरिभीतिः ॥ स्त्रीपुत्रमित्रजनवरैकदन्नमुक्तिः सौम्येत्थशा-
लयुजिसौख्यमपीपदाहुः॥ ३२॥
शनि हीनबली वर्षेश हो तो कर्ममात्रकी बंध्यत्व ( निष्फलवा )
होवे, (कुत्सितअन्न ) कुलत्थ, कोद्रव, जुवार; सांवा, आदि भोजनको
मिले धननाश तथा विपात, शत्रुभय और स्त्री पुत्र मित्र जनोंसे वैर होवे, जो
शुभग्रहसे इत्थशाली वा युक्त हो.तो थोडा सुख भी होगा ऐसा कहतेहैं।॥३२॥
व०ति-वर्षेश्वरो भवति यः सदशाधिपोन्दे ज्ञेयोऽखिलोब्दज
नुषोर्बलमस्य चिंत्यम् ॥ वीर्यान्वितेच निखिलं शुभमब्दमाहु-
हीने त्वनिष्टफलतासमतासमत्वे ॥३३॥
पूर्वोक्त प्रकारसे जो वर्षेश हुआ वही प्रथम दशाधीश भी जानना यतः
सभीदशाधीश ग्रहोंका यह राजा होताहै इसका फल थोडा २ सभीके
दशाओंमें होताहै, और वर्षेश बल जन्ममें भी. पंचवर्गी क्रमसे वर्षतुल्य
गिनना, जन्म वर्षका बल मिलायके बलाबल : जानना, दोनहूमेंसे वली
होनेसे पूर्णबली कहाताहै, संपूर्ण वर्षमें शुभही फल देताहै, इसी क्रमसे उत्तम
मध्यम कनिष्ठ भी बल जानना, हीनबलमें मध्यम फल कनिष्ठमें अशुभ
सममें समफल समस्त वर्षमें विचारसे कहना बलाबल विधि पूर्ण
कही हैं ॥ ३३ ॥
उजा०-येनेथशालोब्दपतौग्रहाऽसौस्वीयस्वभावात्सुफलंददाति ।।
शुभेसराफे शुभमस्तिकिंचिदनिष्टमेवाशुभसूसरीफे ॥३४॥
वर्षेश जिस ग्रहके साथ इत्यशाल करता हो वह ग्रह अपने पूर्वोक्त
स्वभावानुसार शुभ फल देताहै. जो शुभयहसे ईसराफ़ योग हो तो शुभ फल
थोडा देताहै, और पापग्रहसे इत्थशाल हो तो अनिष्ट फल देताहै. बलाबलसे
उत्तम मध्यम व अधम फल का विचार करना ॥ ३४ ॥

भाषाटीकासमेता। (११३) अनुष्टु०-हद्दे याहर्शि यः खेटः आधत्तेवचयोमहः ॥ जन्मन्यव्देचताहक्त्वे तदात्मफलदस्त्वसौ ॥ ३५ ॥ जन्ममें जो ग्रह जिस प्रकारकी हद्दामें होकर दूसरेका तेज ग्रहण करता हो वर्षमेंभी उसी प्रकार हृद्दामें हो तो अपना फल अपने संबंधी ग्रहको देदे- ताहै अर्थात् जन्ममें जिस हद्दामें यह हैं उसी हद्दामें जो कोई ग्रह हो उसके -साथ मुथशिली हो तो जन्मके उस ग्रहका तेज लेलेताहै, जैसे जन्ममें राज्य भावेश मंगल मेषके २० अंश अपने हुदामें हैं, और शुक्रादि कोई ग्रह सुखाधीश १६ अंशपर स्थित होकर मुथशिली होनेसे तेज ग्रहण करता है. एवं वर्षमें मंगल स्वहद्दामें होकर शुक्रले मुथशिली हो तो शुक्र अपनी दशामें मंगलके स्वभाव तुल्य फल दशम भावसंबन्धी फल भी देगा ॥ ३५॥ अनुष्टु०-योजन्मनिफलं दातुं विभुर्मूसरिफोस्यचेत् ॥ अब्दलग्नाब्दपतिनातस्मिन्नव्देनतत्फलम् ॥ ३६ ॥ जो ग्रह जेन्मसे शुभ वा अशुभ फल देनेको समर्थ है वह वर्षमें वर्ष- लग्नेश वा वर्षेशके साथ मूसरिफ योग करता हो तो जन्मकालोक्त फल वर्षमें नहीं होताहै, जो इनके साथ ईसराफ हो तो जन्मकालोक्त फल वर्षमें होताहै, ईशराफ, मूसरिफ कोई भी नहीं हो तो जन्मोक्तफल जन्महीमें वर्षोक्त वर्षहीमें फल देताहै इसका उदाहरण अगले श्लोकमें है ॥ ३६॥ इन्द्रवज्रा-पुत्राधिपोजन्मनि पुत्रभावं पश्यन्सुतंदातुमसौसम- मर्थः।वर्षेत्रपुत्राब्दपमूसरीफी पुत्रस्य नाशोभवतीहवर्षे ॥ ३७ ॥ जन्मकालमें पुत्रभावेश पुत्रभावको देखे "उपलक्षणसे” वा पुत्र स्थानमें हो तो अपनी दशामें इसे पुत्र देनेकी सामर्थ्य है, वर्ष यही जन्मका पुत्रभा- वेश वर्षलग्नेश वा वर्षेशसे वा पंचमेशसे मूसरीफ योग करें तो इस वर्षमें अवश्य पुत्रनाश करेगा यह पर्व श्लोकका उदाहरण है, ऐसेही सभी भावोंका विचार करना ॥ ३७॥ अनुष्टु०-अब्देश्वरीगुरुमित्रहमित्रहशाशशी ॥ महोत्राधाद्यमुद्दिश्यवर्षेशस्तेनशोभनः ॥ ३८ ॥ .

(११२) ताजिकनीलकण्ठी। वर्षमें वश बृहस्पति हो और जन्ममें बृहस्पतिसे चन्द्रमा इत्यशाल करता हो, परन्तु बृहस्पति अपनी हद्दामें हो और वर्षमें चन्द्रमाको देखे तो जन्ममें चन्द्रमा बृहस्पतिको तेज देनेसे यह वर्ष शुभफलदेनेवालाहोगा॥३८॥ अनुष्टु०-एवमुन्नेयमन्यच्चशुभाशुभफलं धैः ॥ बलाबलविवेकेन योगत्रयविमर्शतः॥३९ ॥ इतिश्रीनीलकंठदैव कृतायां नीलकंट्यांफलतंत्रे वर्षपति फलानि समाप्तानि ॥१॥ इसी प्रकार जन्मका तथा वर्पका बलाबल संबंध देखके तथा भविष्य मुथशिल वर्तमान मुथशिल ईसराफ तीन योगोंसे पंडितोंने विचार करना चाहिये, यह लक्षण मात्र कहा है ऐसेही औरभी विचार सर्वत्र करलेना ॥ ३९ ॥ इति महीधरकृतायां नीलकंठीभापायां वर्षतंत्रे वशफल- निरूपणं नाम प्रथमं प्रकरणम् ॥ १ ॥ अथ मुंथानिरूपणम् ॥ उ०व०-स्वजन्मलग्नात्प्रतिवर्षकैकराशिभोगान्मुथंहाभ्रमेण ॥ स्वजन्मलग्नरवितष्टयातंगताब्दयुक्तंभमुखेंथिहास्यात् ॥ ३ ॥ जन्मलग्नका नाम मुंथाहै प्रतिवर्ष एक एक राशि भोगनेके क्रमसे नमण, करती है. जैसे जन्मका सिंह लग्न हो तो दूसरे वर्षमें कन्याकी तीसरेमें तुलाकी इत्यादि, पुनः तेरहवें वर्षमें जन्मलग्न सिंहकी चौदहमें कन्याकी यही क्रमहै, जन्मलग्नमें गतवर्ष जोडके बारहसे भाग करके शेष राशिमें मुंथा वर्षकी होतीहै, जन्मलनका जो स्पष्ट है वही मुंथा स्पष्ट रहताहै केवल एक एक राशिमात्र प्रतिवर्ष बढती है ॥ ३ ॥ अनुष्ट-प्रत्यहंशरलिप्ताभिर्वर्द्धते सानुपाततः ॥ साईमंशद्वयंमासइत्याहुः केपिसूरयः ॥२॥ मासप्रवेश दिनप्रवेशमें मुंथाके लिये अनुपात त्रैराशिकसे है कि सौर- मान १ वर्षमें १ राशि भुगती है तो एक महीनेमें कितना एक राशिके ३०

भाषाटीकासमेता।
(११३)
अंश; १ अंशकी ६० कला प्रसिद्ध हैं त्रैराशिक करनेसे एकमहीनेमें २ अंश
३० कला और एकदिनमें ५ कला मिलतीहैं : मासप्रवेशमें वर्ष मुंथाके
१ में २ अंश ३० कला जोडके दूसरे मासकी मुंथाका स्पष्ट होताहै पुनः
प्रतिमास २ अंश ३० क० जोडतेरहना दिनप्रवेशमें केवल ५ कला प्रतिदिन
जोडना॥२॥
अनुष्टु०-स्वामिसौम्येक्षणात्सौख्यंक्षुतदृष्टयाभयंरुजः ॥
भावालोकनसंयोगात्फलमस्यानिरूप्यते ॥३॥
मुंथाका फल कहतेहैं कि, जिस राशिमें मुंथा है उसका स्वामी मुंथेश
कहाताहै मुंथा स्वस्वामी वा शुभ ग्रहके देखनेसे सुख देतीहै तथा शत्रु और
पाप अल्पवली ग्रहके दृष्टि से भय तथा रोग देतीहै, भाव दृष्टि और योगके
अनुसार इसका फल कहा जाताहै ॥ ३ ॥
अनुष्टु०-वर्षलग्नात्सुखास्तांत्यरि रंध्रेष्वशोभना ।।
पुण्यकर्मायगाः सौख्यदत्तेऽन्यत्रोद्यमाद्धनम् ॥४॥
मुंथा वर्षलग्नसे सुख ४ अस्त ७ अंत्य १२ रिपु ६ रंध्र ८ स्थानों में
शुभ नहीं होती, पुण्य ९कर्म १० आय ११ स्थानोंमें ख देनेवाली होती
है इनसे उपरांत १।२।३। ५ स्थानोंमें उद्यम करनेसे धन देतीहै ॥ ४॥
उपजा०-शत्रु यं मानसतुष्टिलामं प्रतापवृद्धि नृपतेः प्रसादम् ।।
शरीर ष्टिविविधोद्यमांश्चददातिवित्तं मुथहातनुस्था ॥५॥
मुंथाके भावफल कहते हैं लग्नमें मुंथा हो तो शत्रुक्षय होवे मन. संतुष्ट
रहे प्रताप बढे राजासे प्रसाद हो शरीर पुष्ट रहे अनेक प्रकारका उद्यम होवे
वथा धन देवे ॥५॥
उपजा उत्साहतोर्थागमनंयशश्च स्वबंधुसम्माननृपाश्रयश्च ॥
मिष्टान्नभोगोबलपुष्टिसौख्यं स्यादर्थभावमुथहायदादे॥६॥
मुंथा द्वितीय स्थानमें हो तो उत्साहसे धन आवे यश बढे (बंधु)
स्वजातिमें सन्मान होवे तथा राजाका आश्रय मिले मोठे पदार्थ खानेको
मिलें. शरीरमें बल तथा पुष्टता होवे और सुख मिले ॥ ६ ॥

(११४) ताजिकनीलकण्ठी।
उपजा-पराक्रमाद्वित्तयशःसुखानिसौंदर्यसौख्यंद्विजदेवपूजा ।
सर्वोपकारस्तनुपु िकांतिनृपाश्रयाश्चन्मुथहातृतीया ॥७॥
मुंथा तीसरे स्थानमें हो तो अपने पराक्रमसे धन यश और सुख होवे,
सुरूपता और सौख्य होवे, देव ब्राह्मणोंकी पूजा अपनेसे होवे. सभीका उप-
कार अपनेसे बने शरीर पुष्ट कांतिमान होवे, राजाका आश्रय मिले ॥ ७ ॥
उपजा०-शरीरपीडारि भीः स्ववर्गवैमनस्तापनिरुद्यमत्वे ॥
स्यान थहायांसुखभावगायां जनापवादामयवृद्धिदुःखम् ॥ ८॥
मुंथा चतुर्थ स्थानमें हो तो अपने समुदायमें वैर होवे मनको संताप म्है
उद्यमहानि अर्थात् आलस्य रहै लोगोंमें झूठा कलंक लगे अनेक प्रकारके
रोग और दुःख ब. ॥ ८॥
उपजा-यदीथिहापंचमगाब्दवेशे सद्बुद्धिसौख्यात्मजवित्तलाभः।
प्रतापवृद्धिर्विविधाविलासादेवद्विजार्चानृपतेःप्रसादः ॥९॥
मुंथा पंचम स्थानमें हो तो भली बुद्धि तथा सुख पुत्र धनलाभ होवे, प्र-
बाप बढे अनेक प्रकार हर्षप्राप्ति होवे देव ब्राह्मणोंका पूजन अपनेसे होवे॥९॥
उपजा.-कृशत्वमंगेपरिपूदयश्चभयंरुजस्तस्करतानृपावा ॥
कार्यार्थनाशोमुथहारिगाचेहर्बुद्धिवृद्धिः स्वकृतोनुतापः॥१०॥
मुंथा छठे स्थानमें हो तो सभी अंग मांडे होजावें शत्रु बढें रोग उत्पन्न
होवे चोरसे वा राजासे भय होवे कार्य तथा धनका नाश होवे, दुष्टबुद्धि बढे
अपने किये कामसे आपही पछतावे ॥ १० ॥
उपजा०-कलत्रबन्धुव्यसनारिभीतिरुत्साहसंगोधनधर्मनाशः ॥
द्यूनोपगाचेन्मुथहातनौस्याद्रुजामनोमोहविरुद्धचेष्टे ॥ ११ ॥
स्त्री और बांधव पक्षमें कष्ट होवे द्यूतादि व्यसनसे हानि शत्रुभय उद्यम-.
हानि धन और धर्मका नाश होवे शरीरमें रोग होवे, मनकी अज्ञानता पा
चंद्रादिसे विपरीत कर शारीरी चेष्टाओंको बिगाड देवे ॥ ११ ॥

भाषाटीकासमेता।
(११५)
उपजा-भयंरिपोस्तस्करतो विनाशोधर्मार्थयोर्दुर्व्यसनामयश्च ॥
मृत्युस्थिताचेन्मुथहानराणां बलक्षयः स्याद्गमनंसुदूरे ॥१२॥
मुंथा अष्टम भावमें हो वो शत्रुसे भय चोर धन धर्मका नाश दुष्ट
व्यसन, जुवाँ चोरी वेश्या आदिमें नाश हो रोगभी पैदा हो बलहानि हो बहुत
दूर गमन निरर्थक करना पड़े ॥ १२ ॥
इंद्रवं०-स्वामित्वमर्थापगमो नृपेभ्योधर्मोत्सवः पुत्रकलत्रसौख्यम् ।।
देवद्विजा परमंयशश्च भाग्योदयो भाग्यगतेथिहायाम् ॥१३॥
नवम स्थानमें मुंथा हो तो सब लोगोंमें स्वामित्व मिले, राजासे धन
आवे, धर्म संबंधी. उत्साह होवे पुत्र और स्त्रीका सुख मिले, देव ब्राह्मण
यूजन होवे, पूरा यश मिले ऐश्वर्य बढे ॥ १३ ॥
उपजा०-नृपप्रसाद स्वजनोपकार सत्कर्मसिद्धिं द्विजदेवभम् ॥
यशोभिवृद्धि विविधार्थलाभ दत्तेवरस्था सुथहा पदाप्तिम् ॥ १४ ॥
मुंथा दशम स्थानमें हो तो राजासे प्रसाद मिले अपने मनुष्योंका उपकार
होते. भले कर्मकी सिद्धि तथा देवता ब्राह्मणकी भक्ति अपनेसे बने यश
बढे, अनेक प्रकार धन लाभभी देतीहै और(पदाप्तिम)उत्तमस्थानभी देतीहै१४
उपजा०-यदीथिहा लाभगता विलास सौभाग्यनरुज्यमन प्रसादाः ॥
भवंति राजाश्रयतो धनानि सन्मित्रपुत्राभिमतामयश्च ॥ १५ ॥
मुंथा ग्यारहवें स्थानमें हो तो अष्ट प्रकार श्रृंगारका विलास और सौ-
भाग्य नोरोगिता मनकी प्रसन्नता होवे, राजाके आश्रयसे धन मिले, अच्छे
मित्र और पुत्र मिलें मन मानती भलाई होवे ॥ १५ ॥
उपजा०-व्ययोंधिको दुष्टजनैश्च संगोरुजातनौ विक्रमतोप्यसिद्धिः ।।
धर्मार्थहानिर्मुथहाव्ययस्था यदातदास्याजनतोऽपिवैरम् ॥ १६ ॥
मुंथा बारहवें स्थानमें हो तो व्यय बहुत होवे दुष्टमनुष्योंकी संगति .
मिले शरीरमें रोग होवे पराक्रम करनेमें परिश्रम व्यर्थ जावे. धर्म, और
धनकी हानि होवे सज्जनोंसे वैर होवे ॥ १६ ॥

(११६.) . ताजिकनीलकण्ठी। अनु -क्रूरैदृष्टः क्षुतदृशा योभावो थहाऽत्रचेत् ॥ भंतद्भावज नश्येदशुभंचापि वर्द्धते ॥ १७॥ मुंथाफल विशेष कहते हैं कि जो भाव पापयुक्त हो वा जिसपर क्रूरग्रही शत्रु दृष्टि हो उसीमें मुंथा हो तो शुभस्थानगतभी हो तो भी उस भावका शुभ फल नहीं देती है, प्रत्युत अशुभ फल बढता है ॥ १७ ॥ भुजंगप्रयात-शुभस्वामियुक्तेक्षितावीर्ययुक्चथिहास्वामि- सौम्येत्थशालम्प्रपन्ना ॥ शुभंभावजंवर्द्धयन्नाशुभंसान्यथात्वे न्यथाभाव उह्यो विमृश्य ॥ १८॥ जो मुंथा स्वस्वामी वा शुभ ग्रहसे युक्त वा दृष्ट हो तथा स्वामी बलवान् हो. अथवा अपने स्वामी यहा शुभ ग्रहसे इत्थशालिनी हो तो जिस भावमें है उस भाव संबंधि शुभ फलको बढाती है अन्यथा शुभ फलको नहीं बढाती तथा अन्यथामें अन्यथा जैसे शुभ ग्रह स्वस्वामीसे युत दृष्ट न होनेसे निर्बल हो यद्वा पापग्रहसे मूसरीफ करती हो तो उस भाव संम्बंधि शुभ फल को नाशकर अशुभ फलको बढातीहै ऐसे भाव संम्बंधि फलका. शुभाशुभ मुंथाके बलसे विचारके कहना ॥ १८ ॥ ०प्र०-जनुर्ल तोऽस्तांत्यपण्मृत्युबंधुस्थिताब्देहता रखेटै- स्तुसाचेत् ॥ विनश्येत्समयत्रंथिहाभाव एवं शुभः स्वामिदृष्टी ननाशःशुभंच॥ १९॥ मुंथा जन्मलमसे छठे आठवें वा चौथे स्थानमें हो तथा वर्षमें पाप- युक्त पापाक्रांत हो तो जिस भावमें मुंथाहै उस भावको नाश करती है. जैसे द्वितीयमें धनका तृतीयमें भाईका इत्यादि परन्तु वर्षमें स्वस्वामी शुभग्रहसे. युक्त दृष्ट हो तो यह फल नहीं होता प्रत्युत शुभ फलदेती है ॥ १९ ॥ अनुष्टु०-यदोभयत्रापिहता भावो नश्येत्ससर्वथा ॥ उभयत्रशुभत्वेतुभावोऽसौवर्द्धतेतराम् ॥२०॥ मुंथा जन्मलनसे तथा वर्षलग्नसे शुभ स्थानमें हो पापाक्रांत न हो तो उसभावसम्बंधि शुभ फल, अर्थात् वह भाव बढताहै जैसे जन्मलमसे.

भाषाटीकासमेता। (११७) वर्षलग्नसे मुन्था पंचम शुभ ग्रह स्वस्वामियुक्त दृष्ट हो तो पुत्रवृद्धि करती है इत्यादि जो जन्म तथा वर्षलगसे अनिष्ट स्थानमें हो तथा पापयुत दृष्ट वा पा- पत्थशालिनी हो वह भाव अवश्य नष्ट होगा ॥ २० ॥ अनुष्टु-वर्षेप्यनिष्टगेहस्था यद्भावे जनुपिस्थिता ॥ क्रूरोपघातात्तंभावनाशयेच्छुभयुक्छुभा ॥ २१ ॥ जन्मलनसे ४।६।८।१२ दुष्ट भावमें तथा वर्षमें ऐसेही अनिष्ट स्थानों- में हो तथा पापग्रहयुक्त वा दृष्ट स्वामीके अस्तंगतादिसे निर्बल हो तो . उस भावको नाश करतीहै और स्वस्वामियुक्त दृष्ट वा इत्थशालसे शुभ फल देती है ॥ २१ ॥ भुजंगप्रयात-जनुर्लग्नतस्तुर्यगासौम्ययुक्ताब्दवेशेपितुर्द्रव्य- लाभंविधत्ते ॥ नृपाभीतिदापापयुक्तातिकष्टाष्टमादावपीत्थंवि- मशॉविधेयः ॥२२॥ जन्मलनसे मुंथा चतुर्थ भावमें शुभग्रहयुक्त हो तो पिताका द्रव्य धन भूम्यादिलांभ करती है, ऐसेही पापयुक्त हो तो राजासे भय और आजीवन अति कष्टसे होवे, ऐसेही जन्म लग्नसे अष्टमगत शुभयुक्त हो तो शुभफल तथा पापयुक्त होनेमें अनिष्ट फल देतीहै ऐसेही षष्ठादि स्थानोंमेंभी बुद्धि विचारसे मुंथाका तारतम्य देखके फल कहना ॥ २२ ॥ शालिनी यस्मिन्भावे स्वामिसौम्येक्षिताचेद्भावोजन्मन्येषय- स्तस्यवृद्धिः ॥ एवंपापै शक्तस्तुतस्येत्यांवीर्यावर्षपस्या- स्ति सौख्यम् ॥२३॥ वर्षलग्नमें मुंथा स्वस्वामी शुभग्रह दृष्ट युक्त जिस भावमें हो वह जन्म- लग्नसे जो भावमें हो उस भावकी वृद्धि करतीहै, जैसे वर्षों मुंथा चतुर्थ शुभग्रह वा स्वामियुक्त वा दृष्ट है और जन्मलनगणनासे यह भाव तीसरा होता है तो इस वर्षमें चातृसम्बन्धी शुभफल होगा तथा पापग्रहयुक्त वा दृष्ट जिस भावमें हो वह जन्मलग्नसे जो भाव हो उसकी हानि होती है परन्तु वर्षेश बलवान् तथा शुभग्रह हो तो मुंथा पापयुक्तका पूर्वोक्त - फल न होगा ॥ २३॥ ॥ इति मुंथाभावफलम् ॥

(११८) ताजिकनीलकण्ठी।
अथ ग्रहयुक्तदृष्ट थाफलम्।
उपजा-यदीथिहासूर्यगृहे युतावा सूर्येणराज्यं नृपसंगमंच ।।
दत्तगुणानांपरमामवाप्तिस्थानांतरस्येतिफलंदशोपि ॥२॥
मुंथाको प्रत्येक ग्रह युक्तका फल कहते हैं सूर्यकी राशि ५ में हो
अर्थात् सूर्यके साथ वा सूर्य्यसे दृष्ट हो तो कुलानुमान राज्य मिले तथा
राजाकी संगति मिले, स्त्री व भूषणादि श्रेष्ठ भोग मिलें ॥ २४ ॥
उपजा०-कुजेन का जमे कुजेन दृष्टा च पित्तोष्णरुजविधत्ते ॥
शस्त्राभिघातं रुधिरप्रकोपं सौरीक्षिता सौरिगृहे विशेपात् ॥२५॥
मुंथा मंगलसे युक्त वा दृष्ट हो मंगलकी राशि १ । ८ में हो तो पित्त
विकार उष्ण रोग देतीहै, और शस्त्रसे घात रुधिर कोपसे कटभी करती है,
ऐसी मुंथा शनिसे युक्त वा दृष्टभी हो यद्वा शनि राशिमें मंगलसे युक्त वा
दृष्ट हो तो पूर्वोक्त फलको विशेष बढायदेती है शनि मंगलका मुन्थाके नि-
मित्त परस्पर तुल्य फलहै ॥ २५ ॥
उपजा-चंद्रेण युक्तंदुगृहेथदृष्टंदुनापि वा धर्मयशोभिवृद्धिम् ॥
नैरुज्यसंतोषमतिप्रवृद्धि ददाति पापेक्षणतोऽतिदुःखम् ॥२६॥
मुंथा चन्द्रमासे युक्त चन्द्रमाके राशि ( ४ ) में अथवा चन्द्रमासे दृष्ट
हो तो धैर्य तथा यशकी वृद्धि करतीहै नीरोगिता तथा प्रसन्नताकी तो अतिही
वृद्धि देती है और पापग्रहकी दृष्टि भी हो तो अतिदुःख करतीहै ॥ २६ ॥
उपजा-बुधेनशुक्रणयुतेक्षितावा तद्भपिवास्त्रीमतिलाभसौख्यम् ॥
धर्म यशश्चाप्यतुलं विधत्ते कटंच पापेक्षणयोगतःस्यात् ॥२७॥
मुंथा बुध अथवा शुक्रसे युक्त वा दृष्ट अथवा इनके राशि २ । ३ ।
६।७। में हो तो स्त्री तथा बुद्धिलाभ और सुख होवे तथा अनुपम धर्म और
यशभी देती है इसमें पापग्रहकी दृष्टि वा योगभी हो तो कष्ट होताहै ॥२७॥
उपजा-युतेक्षिता वा गुरुणा गुरोमें यदीथिहा पुत्रकलबसौख्यम् ॥
ददाति रत्नांबरधर्मसौख्यं शुभेत्थशालादिहराज्यलाभः ॥२८॥

भाषाटीकासमेता। (११९) मुंथा बृहस्पतिसे युक्त वा दृष्ट तथा गुरु राशि ९ । १२ में हो तो पुत्र तथा स्त्रीका सुख और रत्न व धर्मका देती है शुभग्रहसे इत्थशालि- नीभी हो तो कुलानुमान राज्य मिलताहै ॥२८॥ उप-शनहतेनयुतेक्षितावायदीथिहावातरुजंविधत्ते ॥ यानक्षयंवह्निभयंधनस्यहानिचजीवेक्षणतः भाप्तिम् ॥ २९ ॥ मुंथा शनिकी राशि १० १.११ में यदा शनिसे युक्त वा दृष्ट हो तो वात संबन्धि रोग उत्पन्न करती है वाहनहानि भी करतीहै जो इसपर बृहस्पतिकी दृष्टिभी हो तो शुभ फलभी देतीहै ॥ २९ ॥ ०व०-तमोमुखेचेन्मुथहाधनाप्तिर्यशः खंधर्मसमु तिश्च ।। सितेज्ययोगक्षणतः पदाप्तिःसुवर्णरत्नांबरलब्धयश्च ॥ ३० ॥ मुंथा राहुके मुखसंज्ञक अंशोंमें हो तो धनप्राप्ति और यश सौख्य धर्मकी उन्नति होतीहै. शुक्र बृहस्पतिसे युक्त वा दृष्टभी हो तो अधिकार प्राप्ति और सुवर्णरत्न वस्त्रलाभभी होते हैं ॥ ३० ॥ अनुष्टु०-भोग्याराहोर्लवास्तस्य मुखं पृष्ठगतालवाः॥ ततःसप्तममे च्छंविमृश्यतिफलंवदेत् ॥३१॥ राहुके मुखपुच्छलक्षण कहते हैं राहुकी वक्रगति स्पष्टही है जो राहुके एक राशिमें भोग्य अंश हैं वह मुख और भुक्तांशको पृष्ठ कहतेहैं किसी२ मतहै कि मुखपृष्ठ में राहु स्थित अंशसे १५ । १५ अंश पूर्व और पीछेके लेते हैं और इससे सप्तम राशिमें केतु रहताहै यह पुच्छ कहाता है. तारतम्य विचारके फल कहना ॥ ३१ ॥ इं०व-तत्पृष्ठभागेनशुभप्रदास्यात्तत्पुर भागाद्रिपुभीतिकष्टम् ॥ पापेक्षणादर्थसुखस्यहानिश्चेजन्मनीत्थंगृहवित्तनाशः ॥३२॥ राहुके पृष्ठभाग अर्थात् राहुस्थित अंशसे विपरीत पूर्व पंद्रह वा राश्यंतप- र्यन्त अंशके आत्यंतर मुन्था हो तो शुभ फल नहीं देती और पुच्छगत अर्थात् केतुयुक्त हो तो शत्रुसे भय और कष्ट. देती है तथा पापयह दृष्टिसे धन सुखकी हानि करती है ऐसेही जन्ममें मुंथा हो तो गृह और धनका नाश करती है ॥ ३२॥ - (१२०) ताजिकनीलकण्ठी। उपजा-ये जन्मकाले बलिनोब्दकालेचेडुर्बलास्तैरशुभं समांते ॥ विपर्ययेपूर्वमनिष्टमुक्तं तुल्यंफलंस्यादुभयत्रसाम्ये॥ ३३ ॥ जो ग्रह जन्म लमें बलवान् और वर्षाकालमें निर्बल हो वह वर्षके पूर्वार्द्धमें शुभ और वर्षके उत्तरार्द्धमें अशुभफल निर्बलताका देते हैं इनसे विपरीत अर्थात् जो जन्ममें निर्बल और वर्षमें बलवान् हैं वे वर्षपूर्वार्द्धमें अशुभ उत्तराईमें शुभ फल देते हैं दोनों कालमें तुल्यही हों तो सम्पूर्ण वर्षमें तुल्यही फल देते हैं ॥ ३३ ॥ उपजा-षष्ठेष्टमेंत्येभुविवेंथिहेशोस्तगोथवको शुभदृष्टयुक्तः ॥ कृराच्चतुर्थास्तगतश्चभव्योनस्यादुजंयच्छतिवित्तनाशम् ॥३४॥ मुंथाका स्वामी छठे आठवें बारहवें वा चौथे स्थानमें हो अथवा अस्त- गत हो वा वक्री हो तथा पापग्रहसे युक्त वा दृष्ट हो अथवा क्रूर ग्रहसे चौथा वा सप्तम अर्थात् शत्रुदृष्टिमें हो तो शुभ फल देनेवाला नहीं होता है और रोगोत्पत्ति धननाशभी करता है ॥ ३४ ॥ उप०-यद्य मेशेनयुतोथह क्षुताख्यदृष्टयान भस्तद ॥ योगदयेस्यानिधनंयदेकयोगस्तदामृत्युसमत्वमा ॥३५॥ जो मुंथेश वर्षलग्नसे अष्टमेश युक्त अथवा १ । ४ । ७/१० क्षुत दृष्टिसे दृष्ट हो तोभी शुभफल नहीं देता, ऐक योग यहहै एक योग पहिले श्लोक (षष्ठेष्टमेंत्ये) इत्यादिमें कहाहै जिस वर्षमें ये दोनों योग होवें वो मृत्युफल देतेहैं जो एकही हो तो भी मृत्युसमान कष्ट देताहै ॥ ३५ ॥ अनुष्टु०-थहातत्पतिवापि जन्मनीक्षितयुक्छुभैः ॥ वरिंभेशुभंधत्तेऽन्देचेदंत्येन्यथाशुभम् ॥ ३६॥ इति नीलकंठयां फलतंत्रेमुथहाफलाध्यायः ॥२॥ जो जन्मकालमें मंथा वा मुंथेश शुभग्रहसे युक्त वा दृष्ट हो तो पूर्वार्द्ध में शुभ फल देताहै मुन्था पुन्थेश दोनों शुभग्रहयुक्त वा दृष्ट हों तो अतिशुभ फल वर्षपूर्वार्द्धमें देतेहैं तथा वर्षकालमें मुंथा वा मुंथेश शुभयह युक्त वा हों तो वर्षके उत्तरार्द्ध में शुभफल देतेहैं तथा मुंथा मुंथेश दोनों शुभ- 1 भाषाटीकासमेता। (१२१) ग्रहयुक्त दृष्ट हों तो अति शुभफल वर्षोंत्तराईमें देतेहैं और ऐसेही जन्ममें मुंथा मुंथेशमेंसे एकभी पाप ग्रहयुक्त वा दृष्ट हो तो वर्षपूर्वाईमें अशुभ फल जो दोनों पापयुक्त दृष्ट हों तो अति अशुभ फल देतेहैं. एवं वर्षमें मुथा मुंथेश मेंसे एकग्रह पापयुक्त दृष्ट हो तो वर्ष उत्तराईमें अशुभ फल तथा दोनों हों तो अति अशुभ फल देते हैं ॥ ३६ ॥ इति महीधरकतायांनीलकंठीभाषाटीकायां फलतंत्रेमुंथाफलप्रकरणं द्वितीयम् २ अथ वर्षारिष्टविचारः। अनुष्टु०-लग्नेशेष्टमगेष्टेशेतनुस्थेवाकुजेक्षिते ॥ ज्ञजीवयोरस्तगयोःशस्त्राघातो विपन्मृतिः॥१॥ व्याकरणमें 'रुष रिष हिंसायां' इसमें रिषु धातुसे अनिट् क्तः' प्रत्ययका आदान करके रिष्ट पद सिद्ध होताहै, नन् समाससिद्ध आरष्ट पदका अर्थ विपरीत जान पढता है. परंतु ज्योतिपयंथोंमें सर्वत्र रिष्ट और अरिष्ट पद तुल्यार्थवाची होतेहैं. अब आरटयोग कहते हैं कि वर्षलनका स्वामी अष्टम स्थानमें हो इसपर मंगलकी दृष्टि हो अथवा अष्टमेश लग्नमें भौमदृष्ट हो उपल- क्षणसे पापदृष्ट हो अथवा बुध बृहस्पति अस्तंगत हों तो शस्त्रसे चोट लगे, विपत्ति होवे और मृत्यु होवे ये तीन फल निर्बलताके क्रमसे हैं, जैसे प्रथम सामान्य बलमें शस्त्राघात, हीन बलमें विपत्ति, अतिहीन बलमें मृत्यु इस क्रमसे जानना. इस श्लोकमें तीन योगहैं ॥ १ ॥ अनुष्टु०-अब्दलग्रेशरंशाव्ययाष्टहिबकोपगौ। मुंथहासंयुतौ मृत्युप्रदौ तद्धातुकोपतः ॥२॥ वर्षलग्नेश वा अष्टमेश मुंथा सहित बारहवें आठवें चौथे स्थानमें हो तो उस ग्रहके पिचादि धातु उक्तसे मृत्युसमान कष्ट होवे, जो मुंथासहित लरेश अष्टमेश दोनों उक्त स्थानोंमें से एकमें हों तो मृत्यु देतेहैं ॥२॥ . अनुष्टु०-जन्मल धिपोऽवीय्यों मृतीशोलग्नपोयदा ।। सूर्यदृष्टो मृतिं धत्ते ष्ठं कई तथापदः ॥ ३॥ जन्मलग्नेश जन्म तथा वर्ष में निर्बल हो और वपमें अष्टमेश लममें हे

(१२२) ताजिकनीलकण्ठी।
मृर्यकी दृष्टिभी हो तो मृत्यु वा कुष्ठ कडू (खुजली) और आपत्ति देताहै॥३॥
अनुष्टु०-क्रूरमूसारिफोब्देशोजन्मेशः रितः शुभैः ।।
कंबुलेपि विपन्मृत्युरित्थमन्याधिक रतः॥४॥
वर्षेराके साथ क्रूर ग्रहका भूसरीफ हो तथा जन्मलमेश क्रूर होगया
हो जैसे पापयुक्त वुध क्षीणचंद्रमा शुभभी कर है और चंद्रमादि शुभग्रह
कंबल योगभी करे तो विपत्ति अथवा मृत्यु होवे. ऐसेही जन्मलग्नेश वर्ष-
लग्नेश मुंथेश आदि पंचाधिकारियोंसे भी यही योग होताहै, जैसे यहां वर्षेश.
क्रूर मूसरीफी कहा तैसेही मुंथेशादि क्रूर मूसरीफी और कंबूल पर्वचंद्रमाका
ही कहाहै यहां उसी विधिसे सभी शुभ ग्रहोंका विचारना ॥ ४ ॥
अनुष्टु-अस्तगौ मुथहालग्ननाथौ मदेक्षितौ यदा ॥
सर्वनाशो मृतिः कष्टमाधिव्याधिभयं भवेत् ॥५॥
मुंथेश और लमेश अस्तंगत हों इनपर शनिकी दृष्टिभी हो तो स्त्री
पुत्रादि सर्वनाश अथवा मृत्युतुल्य कष्ठ वा कुष्ठ और मानसीचिंता शरीर-
: पीडा आदिसे भय होवे ॥५॥
अनुष्टु०-क्रूरावी-धिकाः सौम्या निर्बला रिपुरंध्रगाः॥
तदाधिव्याधिमीतिः स्यात्कलिहानिस्तथा विपत् ॥६॥
ऋरग्रह बलवान अर्थात पंचवर्गीमें १५ से अधिक बली और ३ ।
६ । ११ स्थानोंमें हों तथा शुभग्रह निर्बल अर्थात पंचवीमें ५ से न्यून
बल हों और ६ ।८।१२ स्थानोंमें हों तो मानसीव्यथा और रोग भय हो.
तथा कलह धनहानि और विपत्ति होवे ॥६॥
अनु -नीचे शुक्रो गुरुः शत्रुभागे सौख्यलवोपि न॥
लगेशेऽष्टमगेष्टेश तनौ वा मृतिमादिशेत् ॥ ७ ॥
शुक्र नीचराशि ६ में और बृहस्पति शत्रुके अंशकमें हो तो उस
वर्षमें सुखका अंशभी न होवे १. और लग्नेश अष्टम अष्टमेश लग्नमें हो तो
मृत्यु होवें ये २ योग हैं ॥ ७ ॥

-
भाषाटीकासमता। (१२३)
अनुष्टु०-निर्बलो धर्मवित्तेशौ दुष्टखेटास्तनौस्थिताः॥
लक्ष्मीश्चिरार्जिता नश्ये दिशोपि रक्षिता ॥ ८॥
धर्मस्थान ९ का स्वामी तथा धन स्थान २ का स्वामी निर्बल हो और
पापग्रह लग्नमें हो तो इंद्र भी रक्षा करने आवे तो भी बहुत दिनोंका संचित
धन नष्ट होजावे ॥ ८॥
अनुष्टु०-नीचेचंद्रेस्तगास्सौम्यावियोगःस्वजनैःसह ॥
शरीरपीडा मृत्यु साधिव्याधिभयं द्रुतम् ॥ ९॥
चंद्रमा नीचराशि ८ में हो तथा शुभग्रह अस्तंगत हो तो अपने मनुष्यों
साथ बिछोह होवे तथा शरीरपीडा वा मृत्यु अथवा मानसीव्यथा रोग-
भय शीघही एकसे एक होवे ॥ ९ ॥
अ.-अब्दल जन्मलग्नराशिभ्यामष्टमं यदा ॥
कष्टं महाव्याधिभयं मृत्युः पापयुतेक्षणात् ॥१०॥
वर्षलग्न जन्मलग्न जन्मराशिसे अष्टम हो तो कष्ट और महारोग क्षया-
दिका भय होवे, ऐसे अष्टम लग्नपर पापग्रहकी दृष्टि वा पापग्रहका योग होवे
तो मृत्यु होवे ॥१०॥
अनुष्टु०-जन्मन्यष्टमगः पापो वर्षलग्ने रुगाधिदः ॥
चंद्राब्दल पो नष्टबलौ चेत्स्यात्तदा मृतिः ॥११॥
जन्मकालमें जो ग्रह अष्टम है वही वर्षमें लग्नका हो तो रोग तथा मान-
सीव्यथा देता है, जो चंद्रमा और लमेश दोनों (नष्टबल) ५ से हीन होवें तो
मृत्यु होवे ॥ ११ ॥
अनुष्टु०-जन्माब्दलग्नपौ पाप पतितभस्थितौ ॥
रोगाधिदौमृत्युकरावस्तगौ नेक्षितौ भैः ॥ १२॥
जन्मलगेश तथा वर्षलमेश भी पापयुक्त होकर अष्टमस्थानमें हों तो
रोग और मानसीव्यथा देते हैं और अस्तंगत तथा शुभग्रह दृष्टिरहित भी हों
तो मृत्यु करतेहैं ॥ १२ ॥

(१२४) ताजिकनीलकण्ठी।
व्ययांबुनिधनारिस्थाजन्मेशाब्दपमुंथहाः ॥
एकसंगास्तदामृत्युः पापातशा ध्रुवम् ॥ १३॥
जन्मलग्नेश वर्षे और मुंथा तीनों बारहवें चौथे आठवें और छठे,
स्थानोंमेंसे किसीमें साथही हों तो मृत्युतुल्य कष्ट होवे, जो इनपर पाप,
अहोंकी क्षुताख्य दृष्टि भी हो तो अवश्य मृत्यु ही होगी ॥ १३ ॥
अनुष्टु०-चंद्रोव्ययेशनियुतः शुक्रः षष्टोर्थनाशकृत् ॥
चित्तवैकल्यमशुभेसराफानशुभेक्षणात् ॥ १४ ॥
शनिके साथ चंद्रमा वारहवाँ हो और शुक्र छठा हो तो धननाश करता
है और शनि शुक्रके साथ किसी पापग्रहका ईसराफ योग हो तो चित्त विक-
ल रहै, इनपर शुभग्रहकी दृष्टि न हो तो धननाश तथा चित्तवैकल्य दोनों
कल होवें ॥ १४ ॥
अनुष्टः-चंद्रोर्कमंडलगतोरिपुरिःफाष्टबंधुगः ॥
त्रिदोपतस्तस्यरुजाविवुधेज्यदृशा शुभम् ॥ १५॥
चन्द्रमा अस्तंगत होकर छठे, बारहवें, आठवे, वा चौथे, स्थानमें हो तो
(त्रिदोष) वात पित्त कफके विकारसे सन्निपातादि रोग होवें जो इस पर
बृहस्पति की दृष्टि होजाय तो परिणाममें नीरोगी होजायगा ॥ १५॥
अनु -हदाहायनलग्नेशौ सप्ताष्टांत्येखलान्वितौ ॥
स्वदशायां निधनदौ शुभदृष्टया शुभं वदेत् ॥१६॥
लग्नमें जिसकी हद्दा तत्काल हो वह और लग्नेश सप्तम अष्टम वा बारहवें
पापयुक्त हों तो अपनी दशामें मृत्यु देते हैं इनपर शुभग्रहकी दृष्टि भी हो तो
रोग भोगकर परिणाममें सुख होगा कहना ॥ १६ ॥
अनुष्ट-अब्दलमाहज्वनृजूव्ययार्थस्थौरुजातदा ॥
एवंवब्दलग्नेशजन्मेशैरपिबंधनम् ॥ १ ॥
वर्षलग्रसे बारहवां मार्गीयह द्वितीय स्थानमें वक्री ग्रह हो तो रोग होताहै
इसका नाम करयोग है, ऐसेही जन्मलनेश वा वर्पलग्नेश वा वर्षेशसे कर्तरी
हो तो बंधन कहना और सप्तम स्थानपर भी कतरीयोग रोग वा दुष्ट उपद्रचोंसे
बंधन देताहै ॥ १७ ॥

भाषाटीकासमेता। (.१२५) अनुष्टु०-नीचे त्रिराशिपे पापदृष्ट कार्य विनश्यति ॥ इंथिहेशेब्दपे वारिभेस्तंयाते रुजा विपत् ॥ १८॥ त्रिराशिपति नीच राशिमें पापदृष्ट हो तो अभिलषित कार्यका नाश होता है १ और मुंथेश तथा वर्षेश छठा वा उपलक्षणसे आठवाँ अस्तंगत हों तो रोगों से विपत्ति होवे'यह २ दो योगहैं ॥ १८॥ शार्दूलवि०-चंद्रोरिःफषड भूधुनगतो दृष्टोऽशुभैनों भैःसोरिष्टं विदधातिमृत्युमथवाभौमेक्षणाद भीः ॥ श द्वाशनिराहुकेतु- भिररीतिरुजां वायुजां दारिदयं रविणाशुभं भहशेज्यालो- कनादादिशेत् ॥१९॥ चन्द्रमा बारहवें छठे आठवें प्रथम वा सप्तम स्थानमें हो इसपर पाप ग्रहोंकी दृष्टि हो शुभ ग्रहोंकी न हो तो आरष्ट वा मृत्युही देदेताहै, दृष्टिवशसे विशेष फल यह है कि उक्तप्रकार के चन्द्रमा पर मंगलकी दृष्टि हो तो अमिका भय वा शस्त्रसे भय देता है शनि राहु वा केतुकी दृष्टि हो तो शत्रुभय तथा वात- रोगसे पीडा तथा सूर्य्यकी दृष्टि हो तो दरिद्रता देताहै, जो शुभग्रहकी विशेष करके बृहस्पतिकी दृष्टिभी हो तो उक्तपीडा परिहार उपरांत कल्याणदेताहै १९ वति-ऋरान्वितेक्षितयुताशनिनेंथिहाधिव्याधिप्रदाजनुषि रिःफसुखारिरंधे ॥ यूनेच वर्षतनुनैधनगा मृति सा दत्ते ले- क्षितयुतेत्यपिचिंत्यमाय्यः ॥२०॥ इतिनीलकंठयांफलतंरिष्टाध्यायः ॥३॥ मुंथा क्रूरग्रहसे युक्त हो और शनि उसे देखे अनिष्टस्थान ६।१२ 1८।४ में हो तो मानसीव्यथा तथा शरीरमें रोग देती है १ यही मुंथा जन्मकालमें अर्थात् जन्मलग्नसे १२।४।६।८। ७ स्थानमें हो तथा वर्षमें अष्टम स्थानगत हो पापमहसे युक्त वा दृष्ट हो तो मृत्यु देतीहै इस प्रकार विद्वानोंने विचार करना ॥ २० ॥ इतिमहीवरकृतायां नीलकंठीभाषाटीकायांफलतंत्रेअरिष्टविचाराध्यायस्तृतीयः३

( १२६) ताजिकनीलकण्ठी।
अथारिष्टभंगाध्यायः।
अनुष्टु०-लनाधिपोवलयुतःशुभेक्षितयुतोपिवा ॥
केंद्रत्रिकोणगोरिष्टनाशयेत्सुखवित्तदः॥१॥
पूर्वोक्त आरट योगोंके परिहारार्थ अरिष्टभंग योग कहते हैं कि वर्षलम
स्वामी बलवान् पंचवर्गीमें १५ से अधिक बली हो शुभग्रहसे युक्त वा दृष्ट
हो तथा केन्द्र १।४।७।१० वा त्रिकोण ५। ९ में हो तो पूर्वोक्त
दुष्ट योगोंका अरिष्टफल नाश करके सुख और धन देताहै ॥ १ ॥
• अनुष्टु०-गुरु केंद्रेत्रिकोणेवापापाह शुभेक्षितः ।।
लग्नचद्रंथिहारिष्टविनाश्यार्थसुखं दिशेत् ॥२॥
बृहस्पति केंद्र वा त्रिकोणमें शुभ ग्रहोंसे दृष्ट हो और इसपर पापग्रहकी
वष्टि न हो तो लम चन्द्रमा और मुन्थाजन्य पूर्वोक्त आरिष्टका नाश और
सुसमाप्ति कहना ॥ २॥
अनुष्टु०-सुखस्वामियुतंसद्भिर्ट सौख्ययशार्थदम् ।।
लग्नेतृतीयेऽथगुरुर्जन्मेट्सौख्यार्थदःसुखे ॥३॥
चतुर्थभाव अपने स्वामीसे युक्त तथा शुभग्रहसे दृष्ट वा युक्त हो तो यश
और थन देता है और बृहस्पति लग्न वा तृतीय स्थानमें तथा जन्मलग्नेश
मुख ४ स्थानमें हो तो सुखपूर्वक धन देता है ॥ ३॥
उपजा०-लग्नेयुनेशस्तनुगः सुरेज्यः रैरदृष्टःशुभमित्रदृष्टः ॥
रिष्टं निहत्यर्थयशःसुखातिं दिशेत्स्वपाके नृपतिप्रसादम् ॥४॥
सप्तमेश लग्नमें बृहस्पतिके साथ हो क्रूरग्रह इसे न देखें शुभग्रह तथा मित्र-
ग्रहोंसे दृष्ट उपलक्षणसे युक्तभी होवे तो आरिष्टको नाशकर धन यश और
सुख देताहै तथा अपने दशामें राजप्रसादमी देगा कहना ॥ ४ ॥
उपजा--बलान्वितौधर्मधनाधिनाथौरैरहष्टौ तनुगौ यदास्ताम् ।
राज्यं गजाश्वांवररत्नपूर्णरिष्टस्यनाशोप्यतुलं यशश्च ॥५॥
नक्मेश तथा धनभावेश बलवान् और लग्नमें हों पापग्रह इन्हें न देखें
खो हाथी घोडा वस्त्र रत्नोंसे पूर्ण राज्य मिले तथा अरिष्टका नाश हो और
अनुपम यशभी होवे ॥ ५॥

भाषाटीकासमेता। (१२७) जा-त्रिषष्टलाभोपगतैरसौम्यैः केंत्रिकोणोपगतैश्चसौम्यैः।। रत्रांबरस्वर्णयशःसुखाप्ति शोप्यनिष्टस्यतनोश्च ष्टिः॥६॥ पापग्रह तीसरे छठे ग्यारहवें स्थानोंमें हों तथा शुभग्रह केंद्र वा त्रिकोण- णमें हों तो रत्न वस्त्र सुवर्ण यश और सुख मिलें और पूर्वोक्त आरिष्टका नाश होवे तथा शरीरमें पुष्टिभी होवे ॥ ६ ॥ उजा-यदासवीर्योमुथहाधिनाथोल धिपोजन्मविलापोवा ॥ केंद्रत्रिकोणायधनस्थितास्तेसुखार्थहेमांबरलाभदाः स्युः॥७॥ जो मुंथेश वा लग्नेश अथवा जन्मलमेश पूर्ण बली होकर केंद्रत्रिकोण वा ग्यारहवें वा द्वितीय स्थानमेंसे किसीमें हों तो सुख तथा धन सुवर्ण वस्त्र देतेहैं तीनों ऐसे हों तो विशेषतर उक्त लाभ देतेहैं ॥ ७ ॥ उपजा-तुंगेशनिर्वाभृगुजोगुरुवाशुभेत्थशालाधवनादनाप्तिम् ।। बली जो वित्तगतोयशोथतेजांस्यकस्मा सुखानिदद्यात् ॥ ८॥ शुभग्रहसे इत्थशाली उच्चराशिका शनि वा शुक्र अथवा बृहस्पति हो तो श्रेष्ठ यवनसे धनलाभ होवे शनियोगसे और शुक्ररुत योग हो तो स्त्रीसे और गुरुकृत योग हो तो ब्राह्मणसे यवनावके माने यवनादि ग्रहानुसार जाति- योंसे. जो तीनों उक्त ग्रह उच्चवर्ती तथा शुभ ग्रहत्थशाली हों तो यवन रा- जासे बहुत धन मिले औरनसे थोडा २ और बलवान् मंगल धनस्थान में हो तो यश धन और तेज मिलें तथा अकस्मात सुखभी प्राप्त होवे ॥ ८॥ इंद्रव०-सूर्येज्यशुकामिथइत्थशालं युस्तदाराज्ययशःसुखार्थाः॥ सूर्यः जोवोपचयेददातिभद्रयशोमंगलमिथिहायाः॥९॥ सूर्य बृहस्पति शुक्र परस्पर इत्यशाल करें तो राज्य यश सुख और धन- मिलें १ तथा सूर्य वा मंगल मुंथासे उपचय ३।६।१०।११ स्थानमें हों तो कल्याण अतियश और मंगल देते हैं ॥ ९ ॥ अनुष्टु०-शुक्रज्ञचंद्राहद्देस्वेपापाख्यायगतायदि ।। स्वबाहुबलताहेमसुखकीर्तिनरोश्नुते ॥१०॥ शुक्र बुध और चन्द्रमा अपनी हद्दामें हों और पापग्रह तीसरे ग्यारहवें स्थानमें हो तो मनुष्य अपने बाहुबलसे सुवर्ण सौख्य और कीर्तियोंका भोग करताहै।

(१२८)
ताजिकनीलकण्ठी।
अनु -बुधशुक्रौमूसरिफौ गुरुविक्रमभावगः ॥
तदाराज्ययशोहेममुक्ताविद्रुमलब्धयः ॥ ११॥
बुध शुक्रका मूसरीफ योग हो और बृहस्पति तृतीयस्थानमें हो तो राज्य
यश और सुवर्ण मोती मूंगे आदि रत्न मिलें ॥ ११ ॥
अनु -भौमोमित्रगृहेऽव्देशकबूलीस्वगृहादिगैः॥
गजाश्वहेमांबरभूला दत्तेसुखाधिकम् ॥ १२ ॥
मंगल वश होकर मित्रके राशिम हो और स्वगृहादि पदस्थित किसी
ग्रहसे मुथशिली तथा चन्द्रमासे कंबूलीभी हो तो हाथी घोडे सुवर्ण वस्त्र भमि
का लाभ और अधिक सुख देते हैं ॥ १२ ॥
अनु ०-इत्थंजन्मनिवचयोगकर्तुर्बलाबलम् ।।
विमृश्यकथयेद्वाजयोगंतद्भगमेवच ॥ १३ ॥
इस प्रकार जन्म तथा वर्षमें योग करनेवाले ग्रहोंका बलावल विचारके
राजयोग तथा राजयोगभंग कहना. जैसे योगकर्ता ग्रह उच्चादि पदस्थ वा
पूर्णबली हो तो राज्यप्राप्ति निर्वल होनेमें राज्यादिहानि इत्यादि ॥ १३ ॥
उजा०-अब्देंथिहेशादिरखगाःखलैश्चेद्युतेक्षिताह्यस्तगनीचगावा।।
सौम्यावलोनानृपयोगभंगंतदाभवेद्वित्तसुखक्षयश्च ॥ १४ ॥
वर्षमें मुंथेशादि ग्रह जो पापयुक्त वा पापदृष्ट वा अस्तंगव नीचगत हों.
तथा शुभयह . बलरहित हों तो राजयोगभी हो तो भी भंग होगा और धन
तथा सुखकाभी क्षय कहना ॥ १४ ॥
शा०वि०-श्रीगर्गान्वयभूपणंगणितविचिंतामणिस्तत्सुतोऽनंतोनंत-
मतिबंधात्खलमतध्वस्त्यैजनुःपद्धतिम् ॥तत्सूनुःखलुनीलकंठविवुधों
विच्छिवानुज्ञयाऽवोचद्वर्पपमुंथहाफलमथारिष्टादिसद्योगयुक् ॥१६॥
इस श्लोकका अर्थ पूर्वोक्तही है विशेप यह है कि वर्षेश मुंथाफल आरिष्ट-
योग आरिष्टभंग राजयोग इस अध्यायमें ग्रंथ क ने कहेहैं ॥ १५ ॥
इति महीधरकतायां नीलकंठीभापाटीकायां फलतंत्रे अरिष्टभंगराजयोग-
राजयोगभंगकथन नाम चतुर्थोऽध्यायः ॥४॥

भाषाटीकासमेता। (१२९) अथ भावविचारेषु तावत्प्रथमभावविचारः। अनुष्टु०-योयोभावःस्वामिसौम्यदृष्टोयुक्तोयमेधते ॥ पापदृष्टयुतेन शोमिर्मिश्रफलंवदेत् ॥१॥ जो जो भाव अपने स्वामीवाशुभ ग्रहसे युक्त वा दृष्ट हो उस भावकी वृद्धि और जो भाव पापग्रहसे युक्त वा दृष्ट हो उसकी हानि होती है, शुभ पाप दोनोंसे युक्त वा दृष्ट वा एक प्रकारसे युक्त दूसरे प्रकारसे दृष्ट हो तो मिश्रफल कुछ शुभ कुछ अशुभ कहना, सभी भावोंमें यह विचार है ॥ १ ॥ इंद्रव-लयाधिपेवीर्ययुते खानिनैरुज्यमर्थागमनंविलासः ॥ स्यान्मध्यवीयॆल्पसुखार्थलाभक्केशाधिकत्वंविपदल्पवीर्ये ॥२॥ लग्नेश पूर्वोक्त प्रकारसे बलवान् हो तो सौख्य तथा नीरोगता धनप्राप्ति और हास विलासादि सुख होवें. जो मध्यवीर्य हो तो सौख्य और धनलाभ थोड़ा थोड़ा होते हैं जो अल्प वा हीनवीर्य्य हो तो अधिक क्लेश और विपत्ति होती है ॥२॥ शार्दूलवि०-जन्माब्दांगपतींथिहापतिसमानाथायधीकारवा- न्सूर्योनष्टबलस्त्वगक्षिविलयंकु-निरुत्साहताम् ॥ नीचत्वं पितृमातृतोऽप्यमिभवश्चंद्रेक्षिकार्यक्षयोंदारियंचपराभवोगृह- कलिाध्यादिभीतिस्तथा॥३॥ अधिकारी ग्रहोंके निर्बलतामें प्रत्येकके फल कहते हैं कि जन्मलग्नेश वा वर्षलगेश वा मुंथेश अथवा वर्षेश नष्टबली पंचवीमें ५ से न्यून होने में यह फल है कि, सूर्य हो तो नेत्ररोगसे दृष्टिहानि कुष्ठ छु आदि त्वचारोग उत्साहभंग होवें तथा नीचकर्म करने पड़ें माता पितासे "पराभव" अधि- कारहानि होवे चन्द्रमा हो तो नेत्रक्षय कार्य्यहानि दरिद्र अपमान घरमें कलह मानसीव्यथा रोगभय होते हैं ॥ ३॥ अनुष्टु०-भौमेऽबलत्वं भीरुत्वं बुधे मोहपराभवौ ॥ जीवे धर्मक्षयः कष्टफलाजीवनवृत्तयः॥४॥ पूर्वोक्त प्रकारसे मंगल-बलहीन अधिकारी हो तो शरीरमें निर्बलता और ९

(१३०) ताजिकनीलकण्ठी।
भय प्राप्त होते. बुध हो तो.मूर्छा वा अज्ञान और अपमान होवे बृहस्पति हो
तो धर्मक्षय और जीविका कष्टसे होवे ॥४॥
अनु -शुक्रेविलाससौख्यानां नाशः स्त्रीभिः समं कलिः ॥
सौरो भृत्यजनादुःखं रुजो वातप्रकोपतः॥५॥
ऐसाही शुक्र हो तो हास विलास सुखका नाश और स्त्रियोंसे कलह
होवे शनि हो तो भृत्यमनुष्यसे दुःख और वात पिसे रोग होवे ॥ ५ ॥
अनुष्टु०-ल पापयुतं सौम्यैरदृष्टसहितं नृणाम् ।।
विवादंवञ्चनंदुष्टमशनंच प विंदति ॥६॥
लम पापग्रहसे युक्त हो तथा शुभ ग्रहोंसे दृष्ट युक्त वा न हो तो मनुष्यों-
को कलह होवे कोई ठगलेवे दुष्ट वस्तु खानेको मिले इतने फल होतेहैं ॥६॥
शार्दूलवि०-जन्माब्दांगपुरंध्रपाब्दमुथहानाथाबलाब्यास्तदा
रम्यवर्षमुशंतिसर्वमतुलं सौख्यंयशोर्थागमः ॥ षष्ठाटांत्यगता
नचेदिहपुनस्तेदुःखभौतिप्रदानिर्वीर्य्यायदिवमेतदशुभंवाच्य
शुभेक्षांविना ॥७॥
जन्मलग्नेश वर्षलग्नेश अष्टमेश वर्षेश और मुंथेश बलवान हों तथा छठे
आठ बारहवें स्थानोंमें न हों तो सम्पूर्ण वर्षमें दैवज्ञ शुभही फल कहते हैं
और अगणित सुख तथा यश और धनागमभी होते हैं जो उक्त ग्रह वलरहित
हों और इनपर शुभ ग्रहोंकी दृष्टि भी न हो तो दुःख तथा भय देते हैं और
सम्पूर्ण अशुभ फलही देते हैं, यदि निर्बल अशुभदृष्ट ६।८ । १२ में भी हों
उक्त ग्रह तो मृत्युही देते हैं ॥ ७ ॥
अनुष्टु०-सूतौधनप्रदःखेटोधनाधीशब्बतौयदि ॥
वर्षनष्टौचित्तनाशान्यनिक्षेपापवाददौ ॥८॥
जन्ममें जो ग्रह धन देनेवाला है वह और जन्महीका धनभावेश वर्षमें
नष्टवली हो तो धननाश तथा ( अपवाद ) कि मैंने इसको कुछ धन धरो-
हर दियाथा इसने चुरालिया ऐसा कलंक लगे, जो उक्त दोनों बलवान हों
वो धन देते हैं ॥ ८॥
अनु ०-एवंसमस्तभावानां सूतौनाथाश्चपोषकाः ॥
अब्देनष्टबलास्तेषां नाशायोद्याविचक्षणैः ॥९॥

भाषाटीकासमेता। (१३१) इसी प्रकार सम्पूर्ण भावोंके स्वामी जन्ममें बलवान् वर्ष भी बलवान् हो तो उस भावको पालते हैं जो भावेश जन्ममें तथा वर्षमें भी निर्बल हों तो बुद्धिमानोंने उस भावका नाश कहना ॥ ९ ॥ इति महीधरकतायां नीलकंठीभाषाटीकायां वर्षतन्त्रे प्रथमभावफलाध्यायः॥१॥ अथ धनभावविचारः। उपजा०-वित्ताधिपोजन्मनिवित्तगोब्देजीवोयदालग्नपतीत्थशाली। तदाधनाप्तिः सकलेपिवर्षे क्रूरेसराफे धनधान्यहानिः॥१॥ जो जन्मका धन भावाधीश बृहस्पति वर्षमें धनभावगत हो और लग्नेश के साथ इत्थशाली हो तो सम्पूर्ण वर्षमें धनप्राप्ति होवे, जो उक्त बृहस्पति पापग्रहसे ईसराफी हो तो धन तथा अन्नका नाश करे ॥ ३ ॥ अनुष्टु०-जन्मन्यावलोकीज्योऽब्देब्देशोबलवान्यदा ॥ तदा धनाप्तिबहुलाविनायासेनजायते ॥२॥ जन्ममें धनस्थानको बृहस्पति देखे और वर्ष में वर्षेश होजावे बलवान भी होवे. तो विना परिश्रम.बहुत धनप्राप्ति होवे ॥२॥ अनुष्टु०-एवंयद्भावपोजन्मन्यब्देतद्भावगोगुरुः ॥ ल शेनेत्थशालीचेत्तबावज खंभवेत् ॥३॥ ऐसेही जन्ममें जिस भावका स्वामी बृहस्पति है वर्षमें उसी स्थानमें हो और उपलक्षणसे वर्षेश हो जावे, लग्नेशसे इत्थशाली हो तो उस भावका सुख होता है जैसे जन्ममें तृतीयेश बृहस्पति वर्षमें तीसरा वा वर्षेश होकर लग्नेशसे इत्थशाली हो तो भातृसुख होगा ऐसेही संपूर्ण भावोंमें विचार करना ॥३ अनुष्टु०-तथाजनुपियंपश्येद्भावमब्देब्दपो रुः॥ तदातद्भावजंसौख्यमुक्तंताजिकवेदिभिः॥४॥ जैसे पूर्व कहा गया ऐसेही बृहस्पति वर्षमें वर्षेश हो और जन्ममें वह जिस भावको देखे उस भावजन्य सुख देताहै ताजिकशास्त्र जाननेवालोंका यह मत है ॥ ४ ॥ अनुष्टु०-जन्मपष्ठाधिप धःषष्ठोब्देस्वल्पलाभदः ।। पापादिते औरंधेऽथैवादंडापतेद्भुवम् ॥५॥ 3.

(१३२) ताजिकनीलकण्ठी। जन्ममें बुध षष्ठेश हो और वर्षमें छठे स्थानमें हो तो थोड़ा लाभ देता. है: चार प्रकारके ग्रहयुद्धसे पापपीडित बृहस्पति अष्टम वा धनस्थानमें हों तो निश्चय राजासे दंड पडे ॥ ५॥ अनुष्टु०-गुरुवित्तेशुभैदृष्टोयुतोवाराजसौख्यदः ॥ जन्मन्यब्देचमुथहाराशिंपश्यन्विशेषतः॥६॥ बृहस्पति धनस्थानमें शुभग्रहोंसे युक्त वा दृष्ट हो तो राजासे सुख देता जन्म और वर्षमें भी मुंथा राशिको बृहस्पति देखे तो विशेष राजसुख देताहै ॥ ६॥ अ...-एवंसितेब्दपेभूरिद्रव्यंधान्यंचजायते ॥ वित्तल शसंयोगो वित्तसौख्यविनाशदः ॥७॥ बृहस्पतिके तरह शुक्र धनस्थानमें शुभग्रहोंसे युक्त वा दृष्ट हो और वर्षे- शभी शुक्रही हो तो बहुतसा धन तथा अन्न होता है और धनेश लग्नेश एकही स्थानमें हो तो धन सुखका नाश करते हैं, इसमें भी विचार है कि, इनका इत्थशाल हो तो धनसुख होताहै "ईसराफ हो तो धन सुखका नाश होता है" और इत्थशाल वा ईसराफ न हो केवल संयोगमात्र हो तो भी धन सुख होताहै यह अर्थ बहुत संमत है ॥ ७ ॥ अनुप्र०-एवंबुधेसवीय्यस्याल्लिपि नोद्यमैर्द्धनम् ॥ जन्मलग्नगताःसौम्यावर्षेर्थेधनलाभदाः॥ ८॥ ऐसेही बुध बलवान् वर्षेश धनस्थानमें शुभ युक्त दृष्ट हो तो लिखनेके काम तथा ज्ञान शास्त्र और उद्यम ( व्यवसाय ) से धन मिले और जन्ममें जो शुभग्रह लग्नमें हैं वही वर्षमें धनस्थानमें हों तो धनलाभ देते हैं ॥ ८॥ अनुष्ट-मालसमनिवित्ते वा बुधेज्यसितसंयुते ॥ . तैर्वादृष्टेधनंभूरि स्व लेराज्यमाप्नुयात् ॥ ९॥ पारसीय भाषामें (माल) धनको कहते हैं मालस्थानमें वा मालसहममें बुध बृहस्पति और शुक्र हों वा ये तीनों उसे देखें तो बहुत धन तथा अपने कुलका राज्य मिले ॥९॥ .

भाषाटीकासमेता। (१३३)
अनुष्टु०-अर्थार्थसहमेशौचेच्छुभैमित्रहशेक्षितौ ॥
बलिनौसुखतोलाभप्रदौयत्नादरेईशा ॥ १० ॥
धनभावेश और धनसहमेश पर शुभ ग्रहोंकी मित्रदृष्टि हो तथा बल-
वान्भी हो तो
पूर्वक धनलाभ होवे, जो इन्हें शुभ ग्रह शत्रुदृष्टिसे देखें
तो यत्नसे धनलाभ देते हैं ॥ १०॥
अ...-मित्रदृष्टयामुथशिलेागयोः खतोधनम्
तयोर्मुसरिफेवित्तनाशदुर्नयभीतयः॥११॥
लग्नेश धनेशका मित्रदृष्टिसे मुथशिल योग हो तो अनायाससे धन मिले
जो इनका शारिफ योग हो तो धननाश तथा दुर्नय (त्र ) भय होवे॥११॥
अ...-जन्मनीज्योस्तियद्राशौसराशिवर्षल :॥
भस्वामीक्षितयुतो नैरुज्यस्वाम्यवित्तदः ॥ १२ ॥
बृहस्पति जन्ममें जिस राशिका होवे वह राशि वर्षमें लम हो शुभग्रह
तथा स्वस्वामियुक्त दृष्ट हो तो नीरोगता, अपने देशका स्वामित्व और धन
देता है ॥ १२॥
अनुष्टु०-सुतौलग्नेरविवर्षे धनस्थोधनसौख्यदः ॥
शनोवित्तकार्य्यनाशोलाभोल्पोऽथधनव्ययः॥ १३॥
जन्ममें सूर्य लग्नका और वर्षमें धनस्थानका हो तो धनका देता
है. ऐसाही शनि धनस्थानमें कार्य्यनाश थोडा लाभं बहुत धनहानि.
करता है ॥ १३॥
अनु - तृसौख्यंगुरुयुतेभूतयःस्युः भेक्षणात् ॥ :
क्रूरयोगक्षणात्सर्वं विपरीतं फलं भवेत् ॥१४॥
परंतु यह उक्त प्रकार शनि बृहस्पतियुक्त तथा शुभ यहसे. दृष्ट हो तो
ऐश्वर्य और भाइयोंका देता है. क्रूर ग्रहोंके योग तथा दृष्टिसे उक्त
शुभ फल संपूर्ण विपरीत होता है ॥ १४ ॥
अनु -वित्तेशोजन निगुरुवर्षेवर्षेशतांदधत् ॥
यद्भावगस्तमाश्रित्य लाभदोल आर नः ॥ १५॥

(१३४) ताजिकनीलकण्ठी।
जन्ममें बृहस्पति धनभावका स्वामी हो और वर्षों वर्षश हो जाय तो .
जिस भावमें बैठा हो उस संबंधी लाभ देता है, जैसे उक्त बृहस्पति लयमें हो
तो अपने पुरुषार्थसे लाभ देवाहै और आत्मनः-शरीरको सुख देताहै ॥१५॥
अनु -वित्ते सुवर्णरूप्यादेोत्रादेः सहजसंगः ॥
पितृमातृक्षमादिभ्योवित्तंसुहृदि पंचमे ॥१६॥
उक्त कार बृहस्पति धन स्थानमें हो तो सुवर्ण रौप्यादि लाभ हो ती-
सरा होतो वातादिकोंसे, चौथा हो तो पिता माता वा उनके सहशोंसे 'पंचमे'
इसका अर्थ दूसरे श्लोकार्थमें है ॥ १६ ॥
अनुष्टु०-सुहत्तनयतःपष्टेरिवर्गाद्धानिभीतिदः॥
स्त्रीभ्योधूनेष्टमेमृत्युरर्थहेतुस्तथांकगे ॥ १७ ॥
और पंचम होनेमें मित्र वा मित्रपुत्र वा आत्मपुत्रसे धनलाभ और
छठा हो तो शत्रुवर्गसे धनहानि और भय देता है. सातवें हो तो स्त्रियोंसे
धन देता है, आठवें हो तो मृत्युतुल्य धनक्लेश देता है, नववें हो तो अनेक
प्रकारसे धन देता है ॥ १७ ॥
अनुष्टु०-खेनृपादेनुपकुलादायेंत्येव्ययदो भवेत् ।।
इत्थंविमृश्यमुधियावाच्यमित्यपरेजगुः ॥१८॥
दशवें हो तो राजा मंत्री आदिकोंसे ग्यारहवां हो वो राजकुलसे धन
देता है. बारहवां हो तो व्यय देताहै. बुद्धिमानोंने इस प्रकार विचारके फल
कहना, ऐसा और आचार्यभी कहते हैं ॥ १८ ॥
इति महीधरकतायां नीलकंठीभाषाटीकायां फलतंत्रे धनभावविचाराध्यायः२॥
अथ सहजभावविचारः।
अनु -अव्देशकैसितेवापि सबलेपापवर्जिते ।।
सौख्यंमिथःसोदराणां व्यत्ययाव्यत्ययंवदेत् ॥ १॥
वर्षेश सूर्य अथवा शुक्र बलवान हो तथा पापग्रहोंसे युक्त न हो तो
परस्पर भाइयोंका सुख होवे. जो पापग्रहयुक्त होतो विपरीत. फल कहना
अर्थात् भाइयोंके साथ परस्पर कलहादि उपद्रव होवें ॥ ३ ॥

. भाषाटीकासमेता। (१३५) वसं तिल-दग्धेकलिः सहजपेब्दपतौतयोजिीवबलेनरहिते सहजेसहोत्थैः ॥ वैरंतृतीयभवनाधिपतीसराफेमांचंकलिंस्व- जनसोदरतश्चविदेव ॥२॥ तृतीयस्थानका स्वामी ( दग्ध ) दुष्टस्थान अस्तंगतादि दोषसहित हो तो भाइयोंके साथ कलह होवे; शुक्र वा सूर्य दग्ध हो तो भी यही फल. और बृहस्पति बलरहित तृतीयस्थानमें हो तौभी यही फल होताहै. तथा आकुलता भी उनको होतीहै ( बलवान् बृहस्पति तृतीय भातृसुख देता है) और वर्षेश तथा तृतीयेशका ईसराफ योग हो तो भाई तथा अपने मनुष्योंसे कलह और उनके शरीरमें कष्टभी जानना ॥ २॥ उपजा०-यदेत्थशाल सहजेश्वरेण गुरुस्तृतीयेसहजात्सुखाप्तिः॥ सारेविधौस्यात्कलहस्तृतीयेदृष्टौयुतौनोगुरुणायदातौ ॥३॥ "यदि निर्बलभी बृहस्पति तृतीयमें हो पर तृतीयेश से शुभ दृष्टिका इत्थ- शाल करता हो तो भाईसे सुख कहना सबल होके ३ में इत्थशालके विना भी भातृसुख देताहै, यह पूर्वसिद्ध है, मंगलसहित चंद्रमा तीसरे स्थानमें हो तो भाइयोंके साथ कलह होवे परन्तु इनपर बृहस्पतिकी दृष्टि न हो तो यह फल है गुरु दृष्टि से शुभ फल होजाताहै ॥ ३ ॥ अनुष्टु०-सहजेसहजाधीशेधिकारिणिसमापतेः॥ लग्रपेवामुथशिलेमिथ-सौख्यंसहोत्थयोः॥४॥ तृतीयेश तृतीय स्थानमें हो और अधिकारयुक्त हो तथा वर्षेश लग्नेशसे मुथशिली हो वो परस्पर भातृसौख्य होवे ॥ ४ ॥ अनुष्टु०- रेसराफेकलहःशनौभौमसंगेरुजः॥ क्षेभौमेनुजेमांचंवदेत्सहजगेस्फुटम् ॥५॥ तृतीयेशसे पापग्रहोंका ईसराफ योग हो तो भाइयोंसे कलह होवे. शनि मंगलकी राशि १ । ८ में तीसरा हो तो भाइयोंको रोग उत्पन्न होवे तथा बुधकी राशि ६३ में मंगल तीसरा हो तो भाईयोंको क्लेशी कहना ॥५॥ अनुष्टु०-मंदर्भगेसृजिबुधेकुजासहजेशुभैः ॥ युतेक्षितसोदराणांमिथःसौख्यंसुखंबहु ॥६॥ १ .

. (१३६) ताजिकनीलकण्ठी। शनिकी राशि १०। ११का मंगल तृतीय स्थानमें यद्दा मंगलकी राशि १ । ८ का बुध तीसरा हो शुभ ग्रहसे युक्त वा दृष्ट हों तो भाइयोंका परस्पर बहुत सुख होवे ॥६॥ वसन्तति-जन्माब्दपौबुधसितौसबलौतृतीयेसोदर्यबंधुगण- सौख्यक गुरुश्च ॥ वीर्यान्वितेंदुगृहगोभृगुजोधिकारी सूत्य- ब्दयो सहजबंधुगणस्यवृद्धयै ॥७॥ जन्म तथा वर्षलगेश बुध यद्वा शुक्र बलवान् होकर तृतीय स्थानमें हो तो सहोदर भाई तथा और बंधुगणका सुख करते हैं, इस प्रकार बृहस्पतिभी उक्त फल देता है और अधिकारी शुक्र जन्म तथा वर्षमें बलवान हो तथा चंद्रमाकी राशि ४ में हो तो भाई तथा बंधुगणकी वृद्धि करता है ॥ ७ ॥ वसन्तन्ति-पापान्वितेतुसहजेसहमेशभावनाथेक्षणेनरहिते सहजस्य दुःखम् ॥ एवंसहोत्थसहमपिवदेत्तदीशौ दग्धौयदा सहजनाशकरौ विचिंत्यौ ।। ८॥ तृतीय भाव पापग्रह युक्त हो तथा तृतीयेश वा सहजेश सहजसहमेशकी दृष्टि इसपर न हो तो भाईको दुःख मिले, इसी प्रकार सहोत्थ सहममेंभी कहना और तृतीयभावेश तथा सहज सहमेश दग्ध ( दुष्ट स्थानगत ) अस्तंगतादि दोष सहित हों तो भाइयोंके नाश करनेवाले जानना शुभ युक्त दृष्ट हों तो भाईयोंको शुभ जानना ॥ ८॥ उपजा-तृतीयपादब्दपतौधुनस्थे लग्नेश्वरेवासहजैविवादः ॥ तृतीयपोजन्मनिताहगब्दे शुभक्षितस्तत्रसहोत्थतुष्टयै ॥९॥ तृतीयभावेशसे वर्षेश वा वर्पलग्नेश सप्तम हो तो भाइयोंसे लह होवे और जन्म तथा वर्षमेंभी तृतीयेश तृतीयगत हो शुभ ग्रहकी दृष्टिभी इसपर हो तो परस्पर भाइयोंका आनंद देनेवाला होताहै ॥ ९ ॥ इति श्रीमहीधरकृतायां नीलकंठीभाषाटीकायां वर्षतंत्रेतृतीयभावविचारः॥३॥ अथ खभावविचारः।। उपजा-तुयरवीन्दूपितृमातृपीडापापान्वितोपापनिरीक्षितौच ॥ जन्मस्थसूर्यक्षगतेपुत्रेऽवमानता वैरकलीचपित्रा ॥ १ ॥ .

भाषाटीकासमेवा । ( १३७) चतुर्थ स्थानमें पापयुक्त वा पापदृष्ट सूर्य हो तो पिताको और ऐसाही चंद्रमा हो तो माताको पीड़ा करता है. जो सूर्य चंद्रमा साथही चतुर्थ हों वा सूर्य चंद्रमा पापयुक्त दृष्ट हों तो पिताको पीडा देते हैं और जन्ममें सूर्य जिस राशिकाहै वर्षमें उस राशिका शनि हो तो अपमान होवे तथा पिताके साथ कलह वैर होवें ॥३॥ उपजा-चंद्रजनन्येवमुशतिबंधौसुखाधिपे. तिसुखानिपित्रोः ॥ तु-धिपेल पतीत्थशालेवान्वितेसौख्यमुशंतिपित्रोः ॥ २ ॥ जन्ममें चंद्रमा जिस राशिमें है वर्षमें उस राशिकाशनि हो तो मातासे वैर तथा कलह होवे, चतुर्थ स्थानका स्वामी चतुर्थहीमें हो तो मातापिताके साथ प्रीति तथा उनका सुख कहते हैं, उपलक्षणसे पितृ वा मातृ सहम भी चतुर्थ होनेमें यही फल देता है तथा चतुर्थेश चतुर्थभावको देखे तो पितृ मातृ- सुख देता हैं और बलवान् चतुर्थेश लग्नेशसे इत्थशाली हो तो पितृ मातुं सुख होवे उपलक्षणसे लग्नेश चतुर्थेशका योगभी उक्तफल देनेवाला होताहै ॥२॥ व०ति-सौख्याधिपोजनुषिनष्टबलोब्दसूत्योः पित्रोरनि दथोसहमेशयोस्तु ॥दग्धेतुरीयगृहगेचयथिहायांनाशस्तयोः सहमयोरपिदुग्धयोःस्यात् ॥ ३ ॥ जन्मका चतुर्थभावेश वर्ष तथा जन्ममें बलहीन हो तो माता पिताको अशुभ फल करता है ऐसाही मातृपितृसहममें भी विचारना तथा इन सह- मोंमें दग्ध पापग्रह हों और मुंथासे चतुर्थ पड़ें तो पिता माताका नाश होवै तथा मातृ पितृ सहमोंके स्वामी नष्टबल वा पापाक्रांत और अस्तंगत हों तो यही फल देतेहैं सुखेश वा उक्त सहमेश बली हो तो मातापिताको शुभ फल देतेहैं ॥३॥ अनुष्टुव-जन्मन्यबुगृहयच्चतत्पतिस्तत्पदोपगौ ॥ शन्यारौक्केशदौपित्रोनचेत्सौम्यनिरीक्षितौ ॥४॥ जन्ममें चतुर्थभाव और चतुर्थेश के आश्रितराशियोंमें शनि और मंगल बैठे होंय तो माता पिता को क्लेश करते हैं पापदृष्ट भी हों तो अधिक श T (१३८). वाजिकनीलकण्ठी। करते हैं, शुभ दृष्ट हों तो नहीं क्लेश देते हैं अथवा चतुर्थेशके साथ शनि मंगल हों तो पूवाक्त फल देतेहैं. जो ये शनि मंगल सुखमें वा सुखेशके साथ हों और शुभयह भी साथ हों वा देखें तो पिताको कष्टहोकर परिणाममें सुखभी होताहै। वसन्तति-मातुः पितुश्चसहमेतनुपेत्थशालेतुय्यपिचेत्थमव- गच्छसुखानिपित्रोः ॥ चेदष्टमाधिपतिनाकृतमित्थशालंपि- त्रोविपद्भयमनिष्टकृतसराफे॥५॥ मातृपितृसहममें वर्ष लग्नेशका इत्थशाल हो तो माता पिता का सुख जानना ऐसेही चतुर्थभावमें वर्षलपके स्वामीके इत्थशालसे भी मातापि- ताको सुख जानना और मातृ पितृ सहम वा सुखभावमें वर्षलमसे अष्टम- भावेशका इत्थशाल हो तथा अशुभफल दाता ग्रहसे ईसराफ योग हो तो मातापिताको विपत्ति तथा भय जानना ॥ ५॥ इति श्रीमहीधरकतायां नीलकंठीभाषाटीकायांवर्षतंत्रे चतुर्थभावविचारः॥४॥ अथ सुतभावविचारः। उपजा-पुत्रायगोवर्षपतिगुरुश्चेत्सुय्यारसौम्योशनसोऽथवेत्थम् ॥ सत्पुत्रसौख्यायखलादितास्तेदुःखप्रदाःपुत्रतएवचिंत्याः ॥७॥ वर्षेश:बृहस्पति पंचम वा ग्यारहवें स्थानमें हो अथवा सूर्य मंगल बुध शुक्रमेंसे कोई वर्षेश होकर पांचवां वा ग्यारहवां हो तो सत्पुत्रसे सुख मिले और यही ग्रह उक्तप्रकार होकर पापपीडित भी हों तो पुत्रजनित अस्वा- स्थ्य कलहादि क्लेश विचारना ॥ १ ॥ वसन्तति०-पुत्रेमुतस्यसहमेसबलेसुताप्तिः सौम्येक्षितप्यति- सुखयदितत्रवर्षेट् ॥ सौम्यक्षितःशुभगृहेसकुजोबुधश्चेत्पुत्रा- यगःसुतसुखंविबलाःसुतातिम् ॥२॥ पंचमभाव वा पुत्रसहम बलसहित हो तो पुत्रप्राप्ति होती है. शुभग्रह- की दृष्टि भी उसपर हो तो अति सुख पुत्रसंबंधी होता है, जो वर्षेश भी पंचम हो तो उक्त फल देता है और शुभ ग्रहोंकी राशिमें मंगलके साथ बुध पंचम बा ग्यारहवाँ हो शुभ ग्रह भी इन्हें देखें तो पुत्रसुख देते हैं ऐसा निर्बल बुध पंचम वा ग्यरहवां हो तो पुत्रको पीड़ा करता है ॥ २॥ - J

1
भाषाटी समेता।
अनुष्टु०-जीवोजन्मनियद्राशावब्दसौ तगोबली ॥
पुत्रसौख्यायभौमोज्ञोवर्षेशोत्र सुताप्तिदः ॥ ३ ॥
जन्मकालमें बृहस्पति जिस राशिमें है वह राशि वर्षमें पंचम हो तथा
बलवान् वह राशि हो तो पुत्रप्राप्ति सौख्य देता है और मंगल वा बुध
वर्षेश होकर जन्मकी गुरु राशिमें पंचमस्थानगत हों तो वे भी पुत्रप्राप्ति
करते हैं ॥ ३ ॥
हर्षिणी-योज्यो जनुषिगृहेविलग्नमेतत्पुत्रात्यै बुधसितयो-
रपीत्थमूह्यम् ॥ यदाशौ जनुषिशनिः कुजश्वसोब्दे पुत्रार्तित-
नुसतगःकरोतिनूनम् ॥४॥
जन्मकालमें बृहस्पति जिस राशिमें है वह वर्षमें लग्न हो तो पुत्रप्राप्ति
करता है ऐसेही बुध शुक्रका फलभी जानना. जैसे बुध और शुक्र जन्मके
जिस राशिमें हों वह राशि लग्नमें होनेसे पुत्रप्राप्ति कहना, और जन्ममें जिस
राशिका शनि वा मंगल हो वह राशि वर्षलग्नमें वा पंचम में हो तो पुत्रकष्ट
करता है, यहां शनिकी राशि लममें मंगलकी राशि पंचम होनेमें यह योग
होता है यह निकष्टफल है ॥ ४ ॥
अनुष्टु०-पुत्रसुतस्य सहमे त्रात्यैशुभाष्टियुक् ।।
ल पुत्रेश्वरौपुत्रेपुत्रदौबलिनौयदिः॥५॥
चंद्रोजीवोथवा कास्वोच्चगः सुतःसुते ॥
वक्रीभौमःसुतस्थश्चेदुत्पन्नसुतनाशनः ॥६॥
जो लग्नसे पंचमभावमें तथा पुत्रसहममें शुभ ग्रह हों वा इनकी दृष्टि
हों तो 'पुत्रप्राप्ति करते हैं और लग्नेश पुत्रभावेश बलवान् होकर पंचममें
हों तो भी पुत्रप्राप्ति करते हैं ॥ ५॥ तथा चंद्र बृहस्पति वा शुक्र अपनी
उच्चराशि उपलक्षणसे उच्चांशकका पंचम वा लग्नमें हो तो पुत्र देते हैं और
वक्रगति मंगल पंचम हों तो पुत्रनाश करता है ॥ ६ ॥
जा०-सुताधिपोजन्मनिभार्गवोब्दपत्रेविल धिपतीत्थशाली ॥
त्र दो मंदपदस्थपुत्रे पापाधिकारीक्षितआत्मजातिः॥७॥

(१४०) ताजिकनीलकण्ठी। जन्मकाल में पंचमेश शुक्र हो वर्षमें बलवान् होकर पंचममें हो तथा लग्नेशसे इत्थशाली हो तो पुत्र देता है और जन्मका शनि जिस राशिमें हो वह वर्षमें पंचम हो तथा कोई अधिकारी पापग्रह उसे देखे वा पंचम हो तो पुत्रको पीडा देता है ॥ ७ ॥ अनुष्टु०-यद्राशिगोग्रहःसूतौसराशिस्तत्पदाभिधः॥ वलीजन्मोत्थसौख्याय वषैतदुःखदोन्यथा ॥ ८॥ जन्मकालमें जो ग्रह जिस राशिका है वह उसका पद कहाता है वह पदसंज्ञक वर्पराशिमें उसी भावमें हो, यद्वा वह ग्रह उसी पदमें हो तथा वह ग्रह उसी भावमें हो तो बलवान होनेमें तद्भावसंबंधी शुभ फल देता है इसमें विचार बहुत हैं सभी भावोंमें बुद्धिबलसे विचारना ॥ ८॥ इति श्रीमहीधरकृतायां नी० भा० पंचमभावफलानि ॥ ५॥ अथ षष्टभावविचारः॥ व०ति-मदेव्दपेनृजुगते पतितेरुजातिःस्यात्सन्निपातभव- भीररिंगेत्रशूलम् ।। गुल्माक्षिरोगविषमज्वरभीगुरौतु पापादिते- निलरुजोपिकंवूलशून्ये ॥१॥ वर्षश शनि वक्रगति होकर छठे स्थानमें हो तथा पापाक्रांतभी हो तो वातसंबंधी रोगसे पीडा तथा सन्निपात(वात पित्त कफ) तीनोंके साथही कोप होनेसे भय तथा शूलरोग पेटमें गुल्मरोग नेत्ररोग और विषम ज्वरका भय होवे, जो बृहस्पति कान्गति पापाक्रांत छठे स्थानमें हो और चंद्रमासे कंबूल योग न हो तो वातरोग कमलवातादि तथा नेत्ररोगभी होवे ॥१॥ व०ति--स्यात्कामलाख्यरुगपीत्थमसृज्यसृग्भीः पित्तंचरि- फगरवौशिशूलरोगः ॥ पित्तंपुनारिपुगृहेत्रभृगौमेरौश्लेष्मा- भयेक्षितयुतेपिकफोरिगेंदौ ॥२॥ मंगल वक्रगति होकर छठे स्थानमें पापपीडित हो और वर्षेशभी हो तो रुधिरविकारसे रोग होवे. पित्तरोग भी होवे ( इस श्लोकमें कामलाख्य रोग पूर्वश्लोकोक्त योगका संबंधी है ) और ऐसाही सूयं छठा हो तो नेत्रशूलादि भाषाटीकासमेता। (१४१) अक्षिरोग होवें तथा ऐसाही शुक्र छठे स्थानमें हो तो पित्तरोग होवे, जो पुरुष राशिका शुक्र छठा हो और षष्ठेशकी दृष्टिभी इस पर हो तो श्लेष्मरोग. होवे और ऐसाही चन्द्रमा छठा हो तो कफसंबंधी रोग होवे ॥२॥ इं०व०-एवं बुधेपापयुतेब्दपेऽरौवातोत्थरोगोजनिलग्ननाथः ।। पापोब्दपेनक्षुतदृष्टिदृष्टो रोग दोमृत्युकर-सपापः॥३॥ जो वर्षेश बुध पापयुक्त वक्रगति होकर छठे स्थानमें हो तो वातप्रधान रोग होवे, जो जन्मलमका स्वामी पाप हो और वर्षेश इसे क्षुतदृष्टि से देखे तो रोग देनेवाला होताहै जो वही पाप जन्मलमेश और पापयुक्त भी हो तो मृत्युतुल्य कष्ट फल देताहै ॥ ३॥ अनुष्टु-सूत्यार्किभेल गरूक्षशीतोष्णरुग्भयम् ॥ शनी तेयाप्यतास्यात्सपापेमृत्युमादिशेत् ॥४॥ जन्ममें जिस राशिका शनि है वह राशि वर्षका लम हो तो रूक्ष एवं शीतपित्तके द्वंद्व व रोगका भय होवे इस पर शनिकी दृष्टिभी होवे तो और नियरोग होवे और वही जन्मकी शनि राशि वर्षलपमें हो शनिकी दृष्टि और पापयुक्त भी होवे तो मृत्युभय होवे ॥ ४॥ अनुष्टु-एवंभोमेक्षुतदृशारक्तपित्तरुजोग्निभीः । ततोन्येबहुलारोगा शुभदृष्टौरुजाल्पता ॥५॥ ऐसेही जन्मकालीन मंगलकी राशि वर्षलग्नमें हो पापग्रह क्षुतदृष्टिसे देखें तो र एवं पित्तरोग तथा अग्निभय होवे, जो यही जान्मिक मंगल राशिवर्ष में होकर इसीमें मंगलभी हो यदा मंगलकी दृष्टि भी उस पर हो तो उक्तरोग अल्पही होवें ॥ ५॥ वसंतति-ल धिपाब्दपतिषष्ठपतीत्थशालोरोगप्रदःखचर- धातुविकारतः स्यात् ॥ स्मारोगदोजनिसिताश्रितभाजिसू- य्यषष्ठेसितेपततिरुक्सहमं सपापम् ॥६॥ लग्नेश वा वर्षेशसे षष्ठेशका इत्थशाल हो तो वातादि धातुमें जो उस 1 - (१४२) ताजिकनीलकण्ठी। ग्रहका धातु संज्ञाप्रकरणमें कहा है उसके विकारसे रोग होवे और जन्ममें जिस भावका शुक्रहै उसमें वकालका सूर्य हो तो धातुविकारसे रोग होवे, यहां श्लोकमें जन्मकी शुक्रराशिका सूर्य्य ऐसा अर्थ प्रकट होताहै, परन्तु जन्ममें सूर्य जिस राशिका है वर्षमें भी उसी राशिका होगा शुक्रकी राशिमें कैसे जानना संभवहै,जो सूर्य्य शुक्र एकही राशिमें किसीके साथ हों तब यह सम्भावना है तो उसके नित्यही यह योग होगा इससे यह अर्थ वर्षमें योग्य नहीं है, इसलिये शुक्रभावका सूर्य होना प्रमाणहै. जो जन्ममें सूर्य शुक्र एक राशिमें हों और वर्षमें शुक्र छठे पडजाय तो स्माररोग ( कामविकार ) रोग होताहै रोगसहम सपाप हो तो विशेषसे कहना ॥ ६ ॥ भुष्य-सपापेगुरौरंध्रगेलनआरेसतंद्रास्तिमूछोगनाशःसचंद्रे ॥ खला मुतिकेंद्रेव्दलग्नेरुणात्यैकफोद्वयंत्रिगैरीक्ष्यमाणेसितेस्यात् ॥७॥ पापयुक्त बृहस्पति अष्टम और मंगल. लग्नमें तो तन्द्रा (आलस्य सहित मूर्ग) हो, जो चन्द्रमायुक्त अष्टम बृहस्पति और लममें मंगल हों तो किसी रोगसे किसी अंगका नाश ( अति पीडा ) होवे, जो पापग्रह जन्मके केन्द्रमें हों और वर्षमें लग्नके हों तो रोगोत्पत्ति करते हैं. यथा नरराशिमें बैठे हुये पापग्रहोंसे शुक्र क्षुतदृष्टिसे देखाजाय तो वर्षमें कफरोग होताहै ॥ ७ ॥ सु०प्र०-दिनेब्दप्रवेशोविलग्नेन्दसूत्योर्यदाहकहदागृहायोधिकारः ॥ रखेर्वाकुजस्यात्रपीडाज्वरात्स्याहशासौम्यखेदोत्थयावैसुखाप्तिः ॥८॥ दिनका वर्षप्रवेश हो और जन्म तथा वर्षकालके लग्नमें सर्य वा मंगलका स्वगृह हद्दा द्रेष्काण आदि कोई अधिकार हो तो उस वर्षमें ज्वरसे कष्ट होवे, जो लग्नपर शुभ ग्रहकी दृष्टि भी हो तो परिणाममें सुख होगा ॥ ८ ॥ अनुष्ट-निशिसुतोवर्द्धमानेचन्द्रेभौमत्थशालतः ॥ रुनश्येदेधतेमंदत्थशालाद्वयत्ययोन्यथा ॥ ९ रात्रिका जन्म हो तथा चन्द्रमा वर्दिष्णु (शुक्लपक्षका ) हो और वर्षमें मंगलके साथ मुथशिली हो तो रोगनाश होवे और ऐसाही चन्द्रमा शनिसे भाषाटीकासमेता। (१४३) मुथशिली हो तो रोग बढताहै, विपरीतमें फलभी विपरीत जानना, जैसे दिनका जन्म हो और कृष्णपक्षका चन्द्रमा मंगलसे मुथशिली हो तो रोग करताहै, ऐसाही चन्द्रमा शनिसे मुथशिली हो तो, रोगनाश करताहै ॥९॥ अ...-ख हिशिवित्केतुयुतेब्दनिखिलंगदाः ।। अधिकारीबलीसूतावब्देकेतुज्ञयु था॥१०॥ ऐसाही सूर्य मंगल वा शनिके साथ मुथशिली तथा बुध केतुयुक्तभी होवे तो सम्पूर्ण वर्षमें रोग रहे तथा जन्मकालका अधिकारी बुध वर्षमें केतुयुत हो तो वही फल देता है ॥ १० ॥ अनु ०-चतुर्थेस्तेचमुथहाक्षुतह चाशनीक्षिता ॥ शुलंपापखगैई तच्छूलपरिणामजम् ॥११॥ चतुर्थ वा सप्तम स्थानमें मुंथा हो शनिसे युक्त वा शत्रुदृष्टिसे दृष्ट हो तो शूलरोग होता है तथा चतुर्थ सप्तममें मुंथा किसी पापग्रहसे युक्त वा दृष्ट हो तो किसी कर्म वा किसी रोगसे शूल उत्पन्न होवे ॥ ११ ॥ वसंततिल-जन्मस्थजीवसितराशिगतेमहीजेमू-शुगेपि- टकशीतलिकादिमा म् ॥ शीतोष्णगंडभवरुक्सबुधेचसेंद ष्ठभगंदररुजोपि सगंडमालाः ॥१२॥ जन्ममें जिस राशिका बृहस्पति वा शुक्र हो उसी राशिका वर्षमें मंगल अस्तंगत हो तो पिटका (फुन्शी ) शीतला, ददु आदि रोग तथा शीतपित्त और गंडमाला आदि रोग होवें और जन्मका बृहस्पति शुक्रको राशिका बुध वर्षमें चन्द्रमा सहित हों तो कुष्ठादि रोग होवें ॥ १२ ॥ अनुष्टु०-जन्मलनेथिहानाथौष पापान्वितेक्षितौ ।। निर्बलौज्वरपीडांगवैकल्याद्यतिकष्टदौ ॥ १३ ॥ जन्मलग्नेश एवं मुंथेश छठे स्थानमें पापयुक्त वा पापदृष्ट और निर्बल हों तो ज्वरपीडा तथा किसी अंगकी विकलतासे अति कष्ट देते हैं ॥ १३॥ अनुष्टु०-मुथहालमत था पापांतःस्थास्तुरोगदाः॥ ष शेपष्टगेसौम्येत्रियःप्राप्तिरितीर्यते ॥.१४ ॥ .

(१४४)
ताजिकनीलकण्ठी।
मुंथा और मुंथेश लम और लग्नेश ये चारों पापग्रहोंके बीच हों तो रोगोत्पत्ति
करते हैं. यहां एक वा दो के पापांतःस्थ होनेमें रोग, चारोंसे मृत्युतुल्य कष्ट
जानना, और पटेश शुभग्रह छठेही स्थानमें हो तो स्त्रीप्राप्ति होतीहै, परन्तु
कन्या मिथुन तुलाका शुक्र छठे कफरोग करता है यह ताजिकांतर-
मत है ।। १४ ॥
अनुष्टु रोगकर्तायत्रराशावशेस्यादनयोवेली ॥
तत्स्थानंतस्यरोगस्यवाच्यराशिस्वरूपतः ॥ १५॥
उक्तयोगोंसे रोगकर्ता यह जानकर रोगका स्थान जाननेकी यह विधि
है कि वह यह जिस राशिमें एवं जिस नवांशकमें है उनमें से जो अधिक वली
उसका कालांग राशिस्वरूपमें जो स्थान है उसमें रोग उत्पन्न करता है
बुद्धिसे बलावल विचारके कहना ॥ १५ ॥
अनुष्ट-जन्मपठाधिपेभौमे वपष्टगतेरुजः ।।
क्रूरेत्थशालेविपुल शुभग्योगतस्तनुः॥ १६॥
जन्मका पष्टेश मंगल वर्षमें छठाही हो तो रोग करता है, इसमें भी विशेष
विचार है कि, इसके साथ पापग्रहका इत्थशाल हो तो रोग बहुत, शुभग्रह
का हो तो अल्यरोग होता है ॥ १६ ॥
इति श्रीमहीधरकतायां ता० नीलकंठीभापाटी० पष्ठभावफलाध्यायः॥६॥
अथ सप्तमभावविचारः॥
उपजा-बलीसितोन्दाधिपतिःस्मरस्थःस्त्रीपक्षतः सौख्यकरो
विचित्यः ॥ ईज्येक्षितोत्यंतसखंकुजेनाधिकारिणाप्रीतिकरो
मिथःस्यात् ॥ १॥
वर्षेश शुक्र बली होकर सप्तमस्थानमें हो तो स्त्रीपक्षसे सुख करता है, और
बृहस्पतिको दृष्टिभी इस पर हो तो अत्यंतही स्त्रीसुख करता है, जो ऐसे शुक्रपर
अधिकारी मंगलकी दृष्टि हो तो स्त्रीपुरुपकी परस्पर प्रीति बढाता है, ( जो
शुक्र सप्तम निर्बल नष्ट दग्ध हो तो स्त्रीसे कष्ट देता है) ॥३॥
अनुष्टु- धेक्षितेजारतास्यालच्यामंदेनवृद्धया ।
गुरुदृष्टयानवाभाऱ्या संततिस्त्वरितंततः ॥२॥

भाषाटीकासमेता। (१४५) वही वषश शुक्र यदि अधिकारी बुधसे देखा जाय तो ( लघ्व्या) थोडी अवस्थाकी परस्त्री वारस्त्रीसे जारता उक्त शुक्र अनधिकारी शनिसे देखा जाय तो वृद्धा परस्त्रीसे जारता होवे-उक्त शुक्र पर अधिकारी अनधिकारी गुरुकी दृष्टि होने से विवाहिता नवीन भायासे संयोग तथा शीघ्र सन्तानोत्पत्ति होती है, इस श्लोकमें 'गुरु दृष्टया' यह पाठ प्रमादसे है, क्योंकि पूर्व पद्यमें निरुक्त है यहां 'गुरुयोगात्' ऐसा पाठ होना चाहिये, उक्त भी है ताजिकसुधानिधिमें 'गुरुयुतेऽपि च नतनवल्लभा भवति तत्र च सन्तति. राशु हि" ॥२॥ अनुष्टु०-जन्मलयाधिपेऽस्तस्थेदारसौख्यंबलान्विते ॥ जन्मशुकक्षमस्तेब्दे लाभायसितेब्दपे ॥३॥ जन्मलग्नेश वर्षकालमें सप्तम बलवान् हो तो स्वीसुख होता है, जन्मकी शुक्रराशि वर्षमें सप्तम हो और शुक्रही वर्षेश हो तो स्त्रीलाभ होवे ॥ ३॥ अनुष्टु०-जन्मलग्नाधिपेवर्षे लनात्स मगेसति ॥ उदितेसबलेचैवदारसौख्यंप्रजायते ॥४॥ जन्मलग्नेश वर्षलग्नेश सप्तम हो और उदित तथा. बलवान हो तो स्त्रीसौख्य होवे ॥४॥ अनुष्टु-शुकोजन्मनियद्राशीवलग्नेश्वरोयदि ॥ तद्राशौसप्तमस्थेपिपुंसम्परिणयस्तदा ॥५॥ जन्मका शुक्र जिस राशिमें है उसमें वर्षलग्नेश हो, अथवा वह राशि सप्तममें हो तो पुरुषका इस वर्षमें विवाह होगा, यह योग ताजिकसारमें "शुक्रस्य लग्नपतेर्विवाहः" अर्थात् शुक्रकी राशिका लग्नेश हो ऐसा लिखाहै यह भी प्रमाणही है ॥ ५॥ अनुष्टु०-नप्टेंदौशुक्रपदगेमैथुनस्वल्पमादिशेत् ॥ जन्मशुक्रर्दागोभौमः सुखोत्सवकृद्धली ॥६॥ जन्मको शुक्रराशिमें वर्षमें क्षीण चन्द्रमा हो वो इस वर्षमें मैथुनसुख थोडा होवे, जो जन्मकी शुक्रराशिमें वर्षका बलवान मंगल हो तो स्त्रीसुख उत्सवकारी होवे ॥६॥ १०

(१४६)
ताजिकनीलकण्ठी।
व०ति-जन्मास्तपेन्दपसितेलयुगीक्षितस्यात्स्त्रीसंगसोबहुवि-
लाससुखप्रधानः ॥ केन्द्रत्रिकोणगगुरोजनिशुकभस्थेत्रीसौ-
ख्यमुक्तमितिहहविवाहयोश्च ॥ ७॥
जन्मका सप्तमेश वर्षय शुभसे युक्त या इट किसी स्थानमें हो तो स्त्रीसं-
गम बहुत विलास हास सुखपूर्वक हो। १, जन्मका शुक्र जिस. राशिमें हो
उसमें वर्षका बृहस्पति लग्नसे केन्द्र वा त्रिकोण हो तो स्त्रीमुख होवे २,
वर्षलग्नकी हद्दाका स्वामी जन्मकी शुक्रराशिमें वर्पलग्नसे केन्द्र त्रिकोणमें
हो तो बीसौख्य होवे ३, ऐसा ही वर्षका विवाहसहमस्वामी, जन्मके
शुक्रराशिका वर्पलग्नसे केन्द्रनिकोणमें हो तो लीप्राप्ति होवे ये चार योग हैं॥७॥
अनुष्ट-अधिकारिपदस्थेशीयोव्याकुलतानिशम् ॥
इशिहाधिकृतस्थानेगुरुदृष्याविवाहकृत् ॥ ८॥
पंचाधिकारियों से किसीकी राशिमें सूर्य हो तो स्त्रियोंसे नित्य व्याकुलता
रहे, एवं मुंथेशकी राशिका बृहस्पति हो वा मुंथाकी राशिमें बृहस्पति हो वा
मुंथा राशिको बृहस्पति देखे तो विवाहयोग कहा है ॥ ८ ॥
अनुष्टु०-इंथिहाकारयुलेरितेसहमखियाः ।।
स्त्रीपुत्रेभ्योभवेत्कष्टं पापहष्टयाविशेषतः॥९॥
सूर्य मंगलके साथ मुंथा सप्तम स्थान हो तथा खीसहम पापात्रांत होवे
तो स्वीसे एवं पुत्रसे कष्ट होवे पाएमहकी दृष्टि भी उसपर हो तो चीपुत्रोंसे
अधिक ही कष्ट होगा ॥ ९ ॥
अनुष्ए०-सूतौद्यूनाधिपः कोदेनेवलवान्मवेत् ।।
लग्नेशेनेत्थशालश्वेत्त्रीलाभकुरुतेसुखम् ॥ १० ॥
जन्मका सप्तमेश शुक्रवपमें बलवान होकर सप्तम स्थानमें हो तथा लग्ने
पके साथ इत्थशालीभी हो तो सुश्चपूर्वक श्रीप्राप्ति होवे ।। १० ॥
अनुष्टु०-भौमेव्दपेसितदृशाशुक्रव्देशेकुजेशया ।।
तदृष्टेदारसहसेनीलामोभवतिधुक ॥ ११ ॥

भाषाटीकासमेता । (१४७) वर्षेश मंगलपर शुक्रको दृष्टि हो तो स्त्रीलाभ होता है तथा वर्षेश शुक्रपर मंगलकी दृष्टि हो तो यही फल होताहै. इन दोनों योगोंके भेद हैं कि शुक्रकी दृष्टि में मंगल हो तो विवाह होगा १, मंगलकी दृष्टिमें शुक हो तो भी विवाह होगा २, और जन्मकी सीसहम राशिपर वर्षमें मंगल शुक्रकी दृष्टि हो तो निश्चय विवाहयोग होता है ॥ १३ ॥ अनुष्टु०-सूतौवादारसंहमेतदृष्टेयोपिदाप्यते ॥ स्वामिदृष्टस्त्रीसहमंशुक्रदृष्टंविवाहकृत् ।। १२ ।। जन्मके वा वर्षके स्त्रीसहममें मंगल शुक्रकी दृष्टि हो तो विवाहमाप्ति होती है और स्त्रीसहमपर शुक्र तथा सहमेशकी दृष्टिसे यही फल है ॥ १२ ॥ अनुष्टु०-सूतौयूनाधिपेवर्षेसहमेशस्त्रिया सुखम् ।। जन्मास्तथिहानाथवर्षेशाः खेद्युनतथा॥ १३ ॥ जन्मका सप्तमेश वर्षमें स्त्रीसहमका स्वामी हो तो खीसे सुख मिले और जन्मका सप्तमेश मुंथेश तथा वषेशमी दशम वा सप्तम हो तो स्त्रीसे सुख होवे ॥ १३ ॥ अनुष्टु०-भुथहातोयूनसंस्थःस्वगृहोच्चगतःशशी ॥ विदेशगमनकुर्यात्क्लेशः पापेक्षणाद्भवेत् ॥१४॥ चंद्रमा अपने गृह वा अपने उनका मुंथासे सप्तम हो तो विदेशगमन करता है, इस पर पापग्रहकी दृष्टि हो वो विशेष कष्टमे गमन अन्यया सुखसे होताहै ॥ १४ ॥ इति श्रीमहीधरकतायां नीलकंठीभाषाटीकायां सप्तमभावफलाध्यायः॥७॥ अथाष्टमभावविचारः। अनुष्टु०-भौमेन्दपे रहतेऽयसाघातोबलोज्झिते ।। अग्निभीरग्निभेकरनरातिपदभेमृतिः॥१॥ वर्षेश मंगल बलरहित और पापपीडित हो तो लोहाके शनसे किसी अंगपर क्षत होवे, अंगकी निश्चयता द्रेष्काणवशते संज्ञाध्यायमें कही है तथा अमिराशि मेष सिंह धन ३ । ५ । ९ में यह होवे तो अनिमय होवे.

(१४८) वाजिकनीलकण्ठी। और यही मंगल द्विपद मिथुन कन्या तुला और धनके पूर्वार्द्धमें हो तो चौरादि दुष्ट मनुष्यसे मृत्यु होवे ॥ ३ ॥ अनुष्टु०-वियत्यवनिपामात्यरिपुतस्करतोभयम् ॥ तुयेमातुःपितृव्याद्वामातुलात्पितृतो गुरोः ॥२॥ इसी प्रकार वर्षेश मंगल निर्बल तथा पापपीडित होकर दशम स्थानमें, हो तो राजा वा राजमंत्री वा शत्रु वा चोरसे भय होवे और ऐसा ही मंगल चहुर्थस्थानमें हो तो माता वा ताऊ वा चाचा वा मामा वा पितासे भय होवे ॥२॥ वति-लग्नेथिहापतिसमापतयोमृतीशाश्चेदित्थशालिनइमे निधनप्रदाःस्युः ॥ चेत्पाकरिष्टसमये मृतिरेव तत्र साकुजे नृपभयं दिवसेऽब्दवेशे ॥३॥ लग्नेश मुंथेश और वर्देश अष्टमेश इत्थशाली हों तो मृत्युफल कहाहै, परंतु जिस वर्षमें यह योग है उससे मारक दशा वा दशारिष्ट किसी प्रकार- काभी हो वो मृत्यु होती है. केवल उक्त इत्थशाल ही हो तो मरणतुल्य कष्टमात्रही होताहै और दिनके वर्षप्रवेशसे वश मंगल सूर्य्यसहित हो तो राजासे भय होवे ॥ ३ ॥ शार्दूलवि०-सूर्येमूसरिफेसितेनजननेवर्षेधिकारीतथा केंद्रेरा जगदाद्भयंचरुगसक्स्थानेधिकारीदुजे ॥ सौम्यक्रूरदृशाकुज- स्यरुगसक्दोषादिनांशस्थिते दग्धेबंधमृतीविदेशतइतिप्राहुर्बुधे तादृशे ॥४॥ जन्ममें सूर्य शुक्रसे मूसरिफ कर्चा हो तथा वर्षमें पंचाधिकारियों से किसी अधिकारवाला होकर केंद्रमें हो तो रानरोग (क्षयरोगं) का भय होवे १ और जन्मके भौमराशिस्थितमें अधिकारी बुध वर्षमें हो तो यही फल देताहै २ तथा अधिकारी बुधपर मंगलको क्रूर दृष्टि हो तो रुधिर दोपसे रोग होवे ३ तथा अधिकारी बुध अस्तंगत और मंगलयुत दग्ध हो तो विदेशमें बंधनसे मृत्यु होवे ॥४॥ १ भाषाटीकासमेता। (१४९) अनुष्टु०-भौमस्थानेधिकारीदौ नृपभयंरुजः ॥ मंदोधिकारीखेलोहहतेपीडाकरःस्मृतः ॥५॥ जन्मकी मंगलस्थित राशिमें वर्षका अधिकारी चंद्रमा हो तो गुप्त (अनजाने) में राजभय होवे एवं रोगभय भी होवे १. और अधिकारी शनि दशम स्थानमें हो तो लोहाके प्रहारसे पीडा करनेवाला कहाहै ॥५॥ अनु -भौ मे भयं वह्ने प्रहारोवानृपाद्भयम् ।। आरेखस्थेचतुष्पद्भयपातोदुःखंरुजोसृजा ॥६॥ अधिकार रहित मंगल अष्टम हो तो अमिका भय अथवा श देसे चोट और राजासे भय होवे, और अधिकारी मंगल दशम हो तो घोडा आदि चौपाया से पतन तथा श और रुधिरसंबंधि रोग होवे ।। ६ ॥ अनुष्टु०-वित्तेष्टगेज्योधनहा यद्यब्देशोऽशुभेक्षितः ॥ 'देयूनेदुर्वचनापवादकलिभर्त्सनम् ॥ ७ ॥ वर्षेश बृहस्पति पापग्रहदृष्ट द्वितीय तथा अष्टम हो तो धननाश होने और शनि सप्तम हो तो बुरे वचन झूठाकलंक कलह और झिडकन मिले ॥ ७ ॥ अनुष्टु०-पतितेशेकूरदृशाऽऽरेत्थशालेमृतिवदेत् ॥ कुजहदास्थितेनाश सौम्यदृष्टयाशुभं वदेत् ॥८॥ बुध पापाक्रांत हो और मंगलके साथ क्रूर दृष्टि से इत्यशाल करता हो तो मृत्यु होवे तथा बुध मंगलकी हद्दामें पापदृष्ट हो तो अश्व आदि द्रव्यका नाश होवे और इसपर शुभग्रहकी दृष्टि हो तो शुभफल देताहै ॥ ८ ॥ अनुष्टु०-लग्राधिपनष्टदग्धेयोषिद्वादोऽशुभान्विते ॥ जन्मन्यष्ट गोजोनाधिकारीकलिम्पृ : ॥ ९ ॥ लगेश पापयुत बलहीन और अस्तंगत हो तो किसी से कलह होवे, और जन्ममें बृहस्पति अष्टम हो वर्षमें अधिकाररहित हो तो बडा कलह होवे ॥९॥ अनुष्टु०-जयःशुक्रेक्षणादु प्रत्युत्तखशेनतु ॥ भौमत्यगेधनेमुय्येवादारे शेविनिर्दिशेत् ॥ १० ॥ - (१५०) ताजिकनीलकण्ठी।। जन्मका बृहस्पति अष्टम वर्षमें अधिकाररहित हो और शुक्र इसे देखे तो विवादों प्रत्युत्तर देनेसे जय होवे, और मंगल बारहवें स्थानमें सूर्य द्वितीय स्थानमें हों तो विवादसे क्लेश होगा. कहना ॥ १० ॥ अनुष्टु०-रिपुगोत्रकलिभीतिः संख्येकुजहतेव्दपे । दग्धोजन्मांगपोवष्टमोरोगकली दिशेत् ॥ ११ ॥ वपेंश भौमसे पीडित हो तो'शत्रुवोंसे और अपने कुलकभी शत्रुवोंसे कलह होवे तथा संग्राममें भय होवे और जन्मलग्नेश अस्तंगत हो वर्षमें अष्टम हो तो रोग तथा कलह होवे कहना ॥ ११ ॥ अनु०-सूत्यदयोरधिकृतौभौमस्थानेगुरुर्हतः ॥ पापैर्वादःस्फुटोप्येवंताशीदौशनेःपदे ॥ १२॥ बृहस्पति जन्मकाल और वर्पकालका अधिकारी होके जन्मकालिक मंगलके आक्रांत राशिमें हो पापग्रहसे हत होय तो लोगोंके साथ बहुत कलह होगा और जन्मकालिक शनिराशिके जन्म और वर्षकालका अधिकारी चंद्र पापग्रहते हत होय तो ऐसाही फल जानना ॥ १२॥ अनुष्टु०-सूत्यव्दयोरधिकृतेचंद्रेवुधपदेहते ॥ रैविदेशगमनंवादास्याद्विमनस्कता ॥ १३॥ जन्म तथा वर्षका अधिकारी चंद्रमा जन्मके बुधकी राशिमें पाप- पीडित हो तो विदेशगमन कलह और मानसी क्लेश होवे ॥ १३ ॥ अनुष्टु०-मेगेसिंहेधनुष्यारेब्दपेरंधेऽसितोभयम् ॥ मृत्यौमृतीशलग्नेशामृत्युदौपापहग्युतौ ॥१४॥ मेष सिंह धनका मंगल वर्षेश होकर अष्टममें हो तो तलवारसे भय होवे और अष्टगेश एवं लग्नेश अष्टमं स्थानमें पापग्रहोंसे युक्त वा दृष्ट हो तो मृत्यु देते हैं ॥ १४ ॥ अनुष्टु०-यत्रःजन्मनिकुजःसोव्दलगोपगोयदा ।। बुधोवर्षपतिर्नष्टबलस्तत्र नशोभनम् ॥ १५ ॥ .

१
भाषाटीकासमेता। (१५१)
जिस राशिमें जन्मका मंगलहै वही वर्षका लग्न हो और वर्षेश बुध भी
नष्टबल होवे तो वह वर्ष अच्छा नहीं होगा ॥ १५
अनुष्टु०-सार्केशनोभौमयुतेखाष्टस्थेवाहनाद्भयम् ।।
सार्केभौमेष्टमस्थे तु पतनं वाहनाद्भवेत् ॥ १६॥
शनि सूर्य्य मंगल सहित दशम वाअष्टममें हो तो वाहन (सवारी) से भय
होवे और सर्म्य सहित मंगल अष्टम हो तो वाहनसे पतन होवे ॥ १६ ॥
अनुष्टु०-सारेव्दपेष्टमेमृत्युश्चंद्रेत्यारिवृतौमृतिः ।।
उदितमृतिस शेनिर्वलेजीवितेमृतिः ॥ १७॥
वर्षेश मंगल सहित अष्टम हो तो मृत्यु फल देता है तथा चन्द्रमा भौम
युक्त छठा आठवां बारहा हो तो भी मृत्यु देताहै और मृत्युसहमेश उदय
हो जीवितसहमेश निर्बल हो तो मृत्यु होता है ॥ १७ ॥
अनुष्टु -पुण्यसभेश्वरःपुण्यसहमादष्टमोयदा ॥
- सूत्यष्टमेशःपुण्यस्थो मृतिदःपापडग्युतः॥ १८॥
पुण्यसहमेश पुण्यसहमसे अष्टम हो पापग्रहसे युक्त वा दृष्ट भी हो
तथा जन्मका अष्टमभावेश पुण्यसहम राशिमें पापयुक्त वा इष्ट हो तो
मृत्यु देताहै ॥ १८॥
अनुषु०-सूत्यष्टमगतोराशिःपुण्यसद्मनिनाथयुक ।।
अब्दलमाष्टमःवाचेदित्य॑स्यान्मृतिस्तदा ॥१९॥
जन्मकी अष्टमभावराशि वर्षमें पुण्यसहम होके निजनाथसे युक्त हो
तथा वर्षलग्नसे अष्टमेश अष्टमगत हो तो मृत्यु होतीहै ॥ १९ ॥
'अनुष्टु०-पुण्यसमाशुभाक्रांतमृतीशोंत्यारिरंध्रगः॥
मुथहेशोब्दपोवापिमृत्युंतत्राविनिर्दिशेत् ॥२०॥
पुण्यसहममें पापग्रह हों और अष्टमेश त्रिकस्थान ६ ८१२ में हो
तो मृत्यु होवे और वर्षेश वा मुंथेश पापाकांत त्रिकस्थान ६ । ८, १२
में हो तो मृत्यु देताहै कहना ॥ २० ॥

(१५२)
वाजिकनीलकण्ठी।
अनुष्टु०-सकूरेजन्ममृत्यौमृतिश्चेदिथिहार्कियुक् ।।
भौमक्षुतेक्षणेतत्रमृत्युःस्यादात्मघाततः ॥ २१ ॥
जन्मलग्नेश वा जन्मराशीश पापग्रहयुक्त वर्षलग्रसे अष्टम हो तो मृत्यु
होतीहै और मुथा भी कहीं बैठी होय पर शनैश्चरके साथ होय और जो इसपर
मंगलकी शत्रुदृष्टि भी हो तो आत्मघात (अपनेही हाथसे) मृत्यु होवे ॥२१॥
अनुष्टु०-मंदोष्टमोमृतीशत्थशालान्मृत्युकरःस्मृतः॥
शुभेत्थशालात्सपियोगानाशुभदायकाः ॥ २२ ॥
अष्टम शनि अष्टमेशसे इत्थशाली हो तो मृत्यु देनेवाला कहा है और
जो ग्रह उक्त योगोंमेंसे मृत्युफल करनेवाले हैं वे किसी शुभग्रहसे इत्थशाल
करते हों तो मृत्यु नहीं होती प्रत्युत शुभफल देते हैं ॥ २२ ॥
अनुष्टु०-सूतिरंध्रपतिमैदोष्टमोब्देलगपेनचेत् ।।
इत्थशालीक्रूरदृशातत्कालेमृत्युदायकः ॥२३॥
जन्मका अष्टमेश शनिवपमें अष्टम हो तथा लग्नेशसे क्रूरदृष्टिका इत्थशा-
ल करता हो वो वर्षप्रवेशहीमें मृत्यु देताहै ॥ २३ ॥
स्थोद्धता-पुण्यसद्मनिविधुस्तनौतथास्तेखलोमृतिरथार्थरिःफगौ ।।
मृत्युदौखलखगावथोजनुवर्षवेशतनुपौमृतौमृतिः ॥२४॥
पुण्यसहममें वा लग्नमें चन्द्रमा और इससे सप्तम पापग्रह हो तो मृत्युतुल्य
कष्ट देताहै तथा लग्नसे दूसरे बारहवें पापग्रह हों तो भी यही फल देते हैं,
पुण्य सहम और चन्द्रराशिसे भी द्वितीय द्वादश पापग्रह होनेमें यही फल है,
इसमें पापकर्तरी विशेषहै. और ऐसाही विचार जन्मलग्न वर्पलग्न पुण्यसहम
चन्द्रराशिका भी करना और वर्षलग्नेश वा वर्षश और अष्टमेश अष्टम
हो तो मृत्यु देताहै ॥ २४ ॥
इति श्रीमहीधरहतायां नीलंकठभिापाकायाम सभावाध्यायः ॥ ८॥
अथ नवमभावविचारः।
अनुष्टु०-भौमेब्दपेचिनवगेकरायुक्तबलान्विते ।।
गुणावहस्तदामार्गश्चरंकायस्थिरततः॥१॥

भाषाटीकासमेवा। (१५३) वर्षेश मंगल तृतीय वा नवम स्थानमें बलवान हो और पापयुक्त न हो तो मार्ग अर्थात् सफर गुणदायक होवे. चरकार्य भी स्थिर होजावे अर्थात जलकर्म नहर आदिसे शुभत्व होवे ॥ १ ॥ अनुष्टु०-विधर्मस्थोब्दपासूर्यकंबूलीमार्गसौख्यदः ॥ अन्यप्रेषणयानस्यात्सचेन्नाधिकृतोभवेत् ॥२॥ वर्षश सूर्य्य तृतीय वा नवम स्थानमें अधिकारयुक्त हो और चन्द्रमारे कंबूली भी हो तथा स्वगृहोच्चादिमें होवे तो अपनी इच्छासे मार्ग चलना पडे, मार्गमें सुखभी होवे, जो वह सूर्य स्वग्रहादि अधिकारयुक्त न हो त दूसरेके प्रेषणसे गमन होवे मार्गमें सुख भी न होवे ॥२॥ अनुष्टु-शुक्रब्दपेत्रिनवगे मार्गसौख्यंविलोमगे ॥ अस्तेवाकुगतिः सौम्येदेवयात्रातथाविधे ॥ ३ ॥ वर्षेश शुक्र तीसरे वा नवम स्थानमें कूररहित हो बलवान् भी हो और वक्रगतिमें हो तो गमन होनेमें मार्गमें सौख्य होवे, जो यह अस्तंगत होकर उक्तस्थानोंमें हो तो कुगति इच्छासे विरुद्ध गमन होवे, और वर्षेश बुध पापरहित बलवान् तीसरे नवम स्थानमें वक्री हो तो तीर्थ वा देवता- संबंधी यात्रा होवे ॥३॥ अनुष्टु०-ऋरार्दितेकुयानस्यानुरावेवविचिंतयेत् ।। इत्थशालेलग्नधर्मपत्योर्यात्रास्त्यचिंतिता ॥४॥ पूर्वोक्त बुधके सदृश वर्षस्वामी बृहस्पति पापग्रहरहित ३ । ९ स्थानों में होनेसे तीर्थ देवसंबंधी यात्रा देता है. जो हीनवली वा क्रूर पीडितादि हों तो कुयान अनिष्टगमन देताहै, और लग्नेश नवमेशका परस्पर इत्थशाल हो तो अकस्मात् गमन होवे, जहांका स्मरण नहीं गमन संभावनाभी नहीं ऐसा गमन होता है ॥४॥ अनुष्टु०-लग्नेशोधर्मपंय स्वंमहाश्चितिताध्वदः । एवंलग्नाब्दयोर्योगे मुथहांगपयोरपि ॥५॥ लग्नेश अपना तेज नवमेशको देवे अर्थात् लग्नेश शीघ्रगति अल्पांश और नवमेश अधिकांश मंदगति हो, दोनों दीप्तांशोंके भीतर हों तो पूर्वनिश्चित (१५४). ताजिकनीलकण्ठी। यात्रा होबे और नवमेश अपना तेज लग्नेशको देता हो तो अचिंतित यात्रा होवे, ऐसे ही वर्षलग्नेश वर्षेशका तथा लग्नेश मुंथेशका योग भी फल देताहै ॥ ५॥ अनुष्टु०-गुरुस्थानेकुजेधर्मेसघात्राभृत्यवित्तदा । ज्ञस्थाने लशपाड़ौमोदृष्टम्सद्यानसौख्यदः ॥६॥ जन्मकालमें बृहस्पति जिस राशिका है उसीमें वर्षका मंगल नदमस्थान में हो तो गमनमें मृत्यु और धनकी प्राप्ति होवे, और जन्मका बुध जिस राशिमें है उसी राशिमें वर्षका मंगल हो और लमेशकी दृष्टि उसपर हो तो गमन में सौख्य होवे ॥६॥ अनुष्टु०-स्वस्थानगोवावलवॉल्लग्नदशीसुयानदः ।। जन्माधिकारीज्ञोमंदस्थाने क्रूरतोयदा ॥ ७ ॥ पंथारिपोझकटकाहरुरध्वंदुजीवयोः ।। धर्मेशनिर्माधिकारीपंथानमशुभंवदेत् ॥ ८॥ जन्मका मंगल अपनी राशि १॥ ८ में हो वर्षमेंभी अपनी राशिका नवमस्थानमें हो और सावयव दृष्टि स्पष्टसे भावानुसार लमको देखता हो तो गमनमें खुशी होवे, शुभकार्यसंबंधी गमन होवे १ और जन्मका अधिकारी बुध शनिकी राशिम होवे और वर्षमें पापयुक्त नवम स्थानमें हो तो शत्रुकलह सम्बन्धी मार्ग चलना होवे. ऐसेही चन्द्रमा और बृहस्पति का भी जन्ममें शनि सहित और वर्षमें पापयुक नवम स्थान में हो तो विना प्रयोजन दीर्घमार्ग चलना होवे, मंगलसे भी ऐसा योग होताहै, और अधिकार रहित शनि वर्षमें. नवम स्थानगत हो तो चौरादि उपद्रवयुक्त मार्गमें गमन होवे ॥ ७ ॥ ८॥ अनुष्टु०-इत्थंगुरौदूरयात्रानृपसंगस्ततोगुणः॥ कुजेब्दपेनष्टबलेस्वजनाद्दरतोगतिः॥ ९॥ ऐसेही बृहस्पति अधिकार रहित नवम स्थान हो तो दूरगमन और राजाका संग तथा द्रव्यलाभादि गुण होवें तथा वर्षेश मंगल बलरहित होकर नवम स्थानमें हों तो अपने बन्धुजनोंसे दूर गमन होवे ॥ ९ ॥ १

भाषाटीकासमेता। (१५५)
अनुष्टु०-यूनेंथिहाधर्मइंदौ संबलेऽध्वाविदेशजः॥
वर्षेशोबलवान्पापायुत केंदेधिकारवान् ॥ १० ॥
जो मुन्था सप्तम और चन्द्रमा बलवान होकर नवमस्थानमें हो तो
विदेशसंबंधी मार्ग चलना होवे और वर्षेश बलवान किसी पापसे युक्त न होके
केंद्रमें हो तो परदेशमें अधिकार मिलनेसे गमन होवे अथवा सेनापति होकर
विदेशगमन करे ॥१०॥
अनुष्टु०-आधिकारेगतिःसंख्येसेनापत्यपिवावदेत् ॥
एवंबुधेकुजे जीवयुतेकान्निगते पुनः॥११॥
पूर्वाईश्लोकका अर्थ पूर्वश्लोकके अर्थमें लिखागया है, उत्तराईका प्रयो-
जन यह है कि, बृहस्पतिके तरह बुध वा मंगल केंद्रवत्ति बलवान् अधिकार-
वान् और उदयी तथा बृहस्पति युक्त हो तो जय यश और सुख देनेवाली
यात्रा होवे ॥ ११ ॥
अनुष्टु०-परसैन्योपरिगतिर्जयख्यातिसुखावहा ।।
जीवानवमगेभौमेशुभायात्राणांभवेत् ॥ १२ ॥
इस श्लोकके पूर्वार्द का प्रयोजन सम्बन्धवशसे पूर्व ११ वें श्लोकके साथ
लिखाहै उत्तराईसे यह है कि बृहस्पतिसे नवम मंगल बलवान् हो तो मनु-
प्योंकी शुभ यात्रा होवे ॥ १२ ॥
इति श्रीमहीधरकतायां नीलकंठीभाषाटीकायां.नवमभावफलाध्यायः॥९॥
अथ दशमभावविचारः।
अनुष्टु०-सबलेब्दपतौखस्थराज्यार्थसुखकीर्तयः॥
स्थानांतराप्तिरन्यस्मिन्केन्द्रेगृहसुखाप्तयः ॥१॥
बलवान् वर्षेश दशम स्थानमें हो तो कुलानुमान राज्य तथा धन सुख
और कीर्ति मिले जो अन्य केंद्र लम चतुर्थ सप्तममें हो तो गृहसम्बन्धीः
सुख मिले ॥ १॥
अनुष्टु०-इत्थंबलीरविर्भूस्थःपूर्वार्जितपदाप्तिकृत् ॥
एकादशस्मिन्सख्यस्यानृपामात्यगणोत्तमैः ॥२॥

-- (१५६) ताजिकनीलकण्ठी। वर्षश सूर्य बलसहित चतुर्थ स्थानमें हो तो पितृपितामहादिकोंका उपा- जित राज्य वा कोई अधिकार मिले, जो ऐसाही सूर्य ग्यारहवाँ हो तो राजाके उत्तम अमात्य (वजीर) आदिकोंसे मैत्री हो ॥ २॥ अनुष्टु०-रविस्थानेंथिहाललेखेवाराज्याप्तिसौख्यदा ॥ नीचे पापसंयुक्तोभूपाधव,दिशेत् ॥३॥ जन्मके सूर्यस्थित राशिकी मुन्था वर्षके लग्न वा दशम स्थानमें हो तो राज्यप्राप्ति और सुख देतीहै, और वर्षेश. सूर्य नीच राशिका दशम स्थानमें पापयुक्त हो तो राजासे मृत्यु वा बंधन कैद होना कहना ॥ ३ ॥ अनुष्टुर-सिंहेरविलीखस्थास्थानलाभोनृपाश्रयः ॥ स्थानांतराधिकप्राप्तिरिन्दुरारपदेवली ॥४॥ जन्मका सूर्य्य सिंहराशिमें हो और वर्ष में बलवान होकर दशम स्थानमें . हो तो नवीन स्थानप्राप्ति और राजाका आश्रयभी होवे और जन्मकी मंगल स्थित राशिका वर्षमें चन्द्रमा हो तो अन्य स्थानमें अधिकारप्राप्ति चा राज्यप्राप्ति होवे ॥४॥ अनुष्टु०-खेशलग्नेशवर्षेशत्थशालोराज्यदायकः ॥ वर्षेशेराजसहमेऽत्थशालोमहान्नृपः ॥५॥ दशमेश लग्नेश और वर्षशका परस्पर इत्थशाल हो तो राज्य देता है और वर्षेश राजसहममे होकर सूर्यसे इत्थशाली हो तो महाराजा होवे ॥ ५ ॥ अनुष्टु०-शनिस्थानेकुजःपश्यन्मुथहांपापकर्मतः ॥ कृपभीतिवित्तनाशंदद्यादशमगोयदि ॥६॥ जन्मको शनिस्थित राशिमें वर्षका मंगल दशमस्थानमें हो और मुन्थाको देखे तो कुकर्मसे राजभीति और धननाश होवे ॥ ६ ॥ अनुष्टु०-ईदृशेत्रिनवस्थेस्मिन्दग्धनष्टेऽघसंचयः ॥ मन्दोऽन्दपोऽधिकारीविधर्मगोधर्मवृद्धिदः ॥७॥ जन्मकी शन्याक्रांत राशिमें वर्षका मंगल तीसरे वा नवम स्थान नष्टबल दग्ध वा अस्तंगत हो तो पुण्यनाशद्वारा पापवृद्धि होवे और

भाषाटीकासमेता।
वर्षेश शनि अधिकारी होकर तीसरे वा नौवें स्थानमें हो तो पापनाशद्वारा
धर्मवृद्धि होवे ॥ ७ ॥
अनुष्टु०-अस्मिन्दग्धेविनष्टेचपापकृद्धर्मनिंदकः ॥
ईदृशीहक्फलंमूर्ये गुरावित्थंनयार्थभा ॥८॥
तथा अधिकारी वर्षेश शनि दग्ध वा नष्ट हो तो इस वर्षमें पाप करने
वाला तथा धर्मकी निंदा करनेवाला होवे ऐसा. ही वर्षेश सूर्य अधिकारी
वर्षमें तीसरे वा नवम स्थानमें हो तो ऐसाही फल होताहै, और ऐसेही
वर्षेश बृहस्पति अधिकारवान ३ । ९ स्थानमें नष्ट वा दग्ध हो तो न्यायसे
द्रव्यप्राप्ति होती है ॥ ८॥
अनुष्टु०-तत्रस्थामुथहा प्रयागर्मपापंखलाश्रयात् ॥
सूतौखेशेरवौखस्थेवर्षेमुथशिलंयदि ॥९॥
मुंथा तीसरे नववें स्थानमें पुण्यागम करती है और इन्हीं स्थानोंमें
पापयुक्त मुंथा हो तो पापकी प्राप्ति करती है और जन्मका दशमेश सूर्य
वर्षमें दशम हो बलवान् भी हो तथा ( मंदगामी) लग्नेशसे इत्थशाली भी
हो तो अपने बलके अनुसार राज्यप्राप्ति करता है ॥ ९ ॥
अनुष्टु०-ल धपेनराज्याप्तिरुक्तावी-नुमानतः॥
धर्मकर्माधिपौदग्धौधर्मराजक्षयावहौ ॥१०॥
लग्नेश बलवान होनेमें इसके बलानुसार राज्यप्राप्ति होती है और
नवमेश एवं दशमेश दग्ध वा पापपीडित हो तो धर्म तथा राज्यको क्षय
करते हैं. यहां दशमभाव राज्यसहम कर्मसहम और लग्न तथा इनके
स्वामी बलवान् और शुभग्रहोंके साथ होनेमें शुभ फल तथा वक्रदग्धादि
निर्बल और पापयुक्त होनेसे अशुभ फल देतेहैं यह विचार विशेष है॥१०॥
इतिश्रीमहीधरकृतायां नीलकंठीभाषाटीकायां दशमभावकलाध्यायः ॥१०॥
अथ भिभावविचारः।
अनुष्टु०-अब्दपे थेगेलाभो वाणिज्याच् भहग्युते ॥
सैथिहेस्मैिं ते लाभ-पठनलेखनात् ॥ १॥

. (१५८) ताजिकनीलकण्ठी। वर्षश बुध धनस्थानमें शुभ ग्रहों से युक्त वा दृष्ट हो तो अन्नादि द्रव्यके व्यापारसे धनलाभ होवे जो यही बुध मुंथासहित लममें हो तो पढने लिखनेसे लाभ होवे ॥१॥ अनुष्टु०-अस्मिन्पष्टाष्टांत्यगतेसङ्करेनीचकर्मकृत् ।। रक्षणेललामोस्तंगतेनलिखनादितः ॥२॥ वर्षेश बुध छठे आठवें वा बारहवें स्थानमें पापग्रह सहित हो तो नीच कर्म कराताहै,जो इस पर पापग्रहकी दृष्टि हो तो श्रम करनेमें भी लाभ न होवे जो यह अररंगत हो तो लिखने पढनेमें व्यर्थ श्रम होवै लाभ न होवे ॥२॥ अनुष्टु०-लमेन्दुपेकूरहते लग्नहानिर्भयनपात् । अस्मिन्नधिकृतेयूनव्यवहाराद्धनाप्तयः॥३॥ लग्नेश वा वर्षेश पापपीड़ित होकर लग्नमें हो तो राजा भय होवे यही अधिकारी, सप्तम स्थानमें हो तो व्यवहारसे धनप्राप्ति होवे ॥ ३ ॥ अनुष्टु०-लनायेशेत्थशालेल्यालाभः स्वजनगौरवम् ॥ सर्वेलामेच वित्तायै सवला निर्बला न तु॥४॥ लाभेश लग्नेशका इत्थशाल हो तो बडा लाभ होवे, अपने मनुष्योंसे गौरवता भी मिले तथा कोई भी ग्रह ग्यारहवें स्थानमें बलवान् हो निर्बल न हों तो धनप्राप्ति करते हैं ॥ ४ ॥ अनुष्टु०-सवीर्योज-ससुथहोलमेर्थसहसे शुभाः॥ तदाखनितद्रव्यस्यलाभ पापदृशानतु ॥६॥ बलवान् बुध मुंथाके साथ लग्नमें हो और अर्थसहममें शुभग्रह हो तथा लग्नपर शुभग्रहोंकी दृष्टि हो तो खान ( धात्वादि भूमि ) संबंधी द्रव्यका लाभ होवे लग्नमें पापमुष्टि हो तो उठलाभ नहीं होगा ॥ ५ ॥ इति श्रीमहीधरहतायां नीलकंठीभाषाटीकायां लाभभावकलाध्यायः ॥ ११ ॥ अथ व्ययभावविचारः। वसन्ततिः-लग्नाब्दपौहतबलीव्ययपण्मृतिस्थौयद्राशिगौतदनु सारिफलंविचिंत्यम् ।। पोन्दपेमृगुसुतेथविनवीयदृष्टेखलैःशुतह शाद्विपदक्षसंस्थे ॥ ३॥ भृत्यक्षतिस्तुरगहाचतुरंनिभस्थेन्यस्मिन्न- भाषाटीकासमेता। (१५९) पीदमुदितफलमब्दनाथे ॥ खस्थेकुजेशशियुतेतुरगादिनाशः स्वाध्या- कुलत्वमशुभोपहतेव्ययेवा ॥२॥ लग्नेश तथा वर्षेश बलहीन छठे आठवें बारहवें स्थानमें चतुष्पदादि जैसी राशिमें हो उसके सदृश फल देते हैं. जैसे चतुष्पदराशि उक्त स्थानोंमें हो तो चौपायाका वा उससे नाश होवे यह इस भावका सामान्य विचार है. और विशेष शुक्र नष्ट बल छठे स्थानमें पापगहोंसे क्रूरदृष्टि दृष्ट हो तथा मनुष्यराशिमें हो तो सेवकोंकी हानि होवे तथा ऐसाही शुक्र चतुप्पदराशिमें हो वो हाथी घोडे आदि चौपायोंकी हानि करताहै ऐसेही वषेशके अष्टम द्वादश स्थानगत होनेमें फल कहना और वर्षेश मंगल चंद्रया सहित दशम स्थानमें हो तो घोडे आदिकोंका नाश करताहै तथा मनमें व्याकुलता भी करता, तथा पापपीडित मंगल छठे होनेसे भी यही फल देताहै ॥ १ ॥२॥ व. ति-षष्ठेरबौखलहते चतुरंत्रिभस्थेभृत्यैःसमंकलिरथा- ष्टमरिष्फगेपि ॥ मंदेब्दपेबलयुतेरिपुरिष्फसंस्थेसूवासनंदु- मजलाशयनिर्मितिश्च ॥३॥ वर्षेश सूर्य्य स्थानमें पापपीडित और चतुष्पदराशिमें हो तो अपने नौकरोंके साथ कलह होवे तथा आठवाँ और बारहवाँ होनेमें भी यही फल होता है. और वर्षेश शनि बलयुक्त छठा वा वारहवाँ हो तो त्याग करीहुई भूमिमें नवीन वसती बनानेसे आजीवन होवे तथा वृक्षारोपण, जल- स्थान, कप, तलाव, धारा आदिकोंका निर्माण होवे ॥ ३ ॥ उपजा-स्वोच्चगेकमणिसूर्य नरुज्यमाधिगमश्वजीवे ॥ सूर्यनृपादाहुबलात्कुजेथोबुधेभिषगज्योतिषकाव्यशिल्पैः॥४॥ वषश शनि अपनी राशि १० । ११ का वा उच्च ७का दशमस्थान में हो तो शरीर नीरोग रहै तथा धनागम भी होवे जो ऐसाही बृहस्पति वर्षेश अपनी राशि ९ । १२ वा उच्च ४ का दशम हो तो यही फल देता है तथा वर्षेश सूर्य स्वराशि ५ वा उच्च का दशम हो तो राजासे धन मिले तथावर्षेश मंगल स्वराशि १ १८ वा उच्च१० का दशम हो तो अपने बाहुबलसे धनागम प । 4 - (१६०) ताजिकनीलकण्ठी। होवे, तथा वर्षेश बुध स्वराशि ३।६ उच्चका दशम हो तो वैद्यक ज्योतिष और शिल्प ( कारीगरी) से लाभ होय ॥ ४ ॥ अनु ०-मंदेब्दपेगतबलेनैराश्यंदौरस्थ्यमादिशेत् । सूर्येन्देशेशशिस्थानेमंदेब्दजनुषोर्हते ॥५॥ वर्षेश शनि निर्बल पापाक्रांत हो तो नैराश्य (प्राप्तिका) नाश होवे तथा एकजगह स्थिति न होवे जो वर्षेश सूर्य हो और जन्मके चन्द्रमाकी राशिका वर्षमें शनि हो तथा जन्मकाल वर्षकालमें पापाक्रांत निर्बल शनि हो तो संपूर्ण शुभ कर्मोंमें विकलता (असिद्धि ) होवे. और ऐसाही शनि वक्र वा अस्तंगत हो तो उक्तफलही होताहै ॥ ५॥ अनुष्ट-सर्वकर्मसुवैकल्यंवक्रेस्तेचतथापुनः॥ कर्मकमशसहमनाथाः शनियुतेक्षिताः॥६॥ इस श्लोकके पूर्वार्द्धका अर्थ पूर्व ५ श्लोकोंमें लिखाहै उत्तराईका यह है. दशमस्थान तथा दशमेश और कर्मेश और कर्म सहमेश शनिसे युक्त वा दृष्ट हो तो ( कर्मवैकल्य) कार्यहानि व्यर्थपरिश्रम होवे ॥६॥ अनुष्टु०-पडष्टव्ययगेन्देशे कौशेचबलोज्झिते॥ सूतावब्देचनशुभंतत्राब्देमृतिपेतथा॥ ॥ वर्षश छठा आठवाँ वा बारहवाँ होवे तथा जन्म और वर्षका दशम भावश निर्बल हो वर्पका अष्टमेशभी ६।८।१२ स्थानमें हो तो इस वर्षों शुभ फल नहीं होगा ॥ ७ ॥ अनुष्टः-यत्रभावेशुभफलोदुष्टोवाजन्मनिग्रहः ॥ वर्षेतद्भावगस्ताहक्तत्फलंयच्छतिध्रुवम् ॥ ८॥ जन्ममें जो ग्रह जिस भावमें शुभ वा अशुभ देनेवालाहै वर्षमेंभी वह ग्रह उसी स्थानमें हो तो निश्चय वही फल विशेषतासे देताहै ॥ ८॥ इंद्रव०-येजन्मनिस्युःसबलाविवीर्यावर्षे सुखप्राक्चरमेत्वनिष्टम् ॥ दुयुर्विलोमविपरीततायांतुल्यंफलंस्यादुभयत्रसाम्ये॥९॥ जो ग्रह जन्ममें बलवान् और वर्षमें निर्बल है वह वर्षके पूर्वार्ध में शुभफल भाषाटीकासमेवा । (१६१) और उत्तरार्द्धमें अशुभ फल देते हैं जो जन्ममें निर्बल और वर्षमें बलवान हैं वे वर्षके पूर्वाईमें अशुभ उत्तराईमें शुभ फल देते हैं दोनों कालमें (तुल्य) बली हों तो समान फल देते हैं ॥१॥ इति श्रीमही० व्ययभावफलाध्यायः ॥ १२ ॥ शार्दू-श्रीगर्गान्वयभूषणंगणितविचिंतामणिस्तत्सुतोनंतोऽनं तमतिबंधात्वलमतध्वस्त्यैज पद्धतिम् ॥ तत्सूनुःखलुनी- लकंठवि धोविद्विति वानु यासन्तुष्टचैव्यदधाद्विवेचनमिदं 'भावे सत्ताजिकात् ॥१०॥ इति ताजिकनीलकंठ्यां द्वादशभावविचारः । यह श्लोक अध्यायका है इसका अर्थ पूर्ववतही है इतना विशेष है कि अच्छे ताजिकग्रन्थोंके मतसे भावफलविवेचना इस अध्यायमें रक्खी है॥१०॥ इति श्रीमहीधरकतायां नीलकंठीभाषाटीकायां भावफलप्रकरणं पंचमम् ॥५॥ अथ वर्षदशाक्रमविचारः। उपजा०-स्पष्टान्सल न्खचरान्विधायराशीन्विनात्यल्पलवंतुपूर्वम्।। निवेश्यतस्मादधिकाधिकांशक्रमादयस्यात्तुदशाक्रमोन्दे ॥१॥ पात्यांशी दशाका कम कहते हैं. प्रथम लग्नसहित सभी ग्रहोंको स्पष्ट करके राशियोंको छोड देना अंशादिदशाक्रमसे स्थापन करना उसका क्रम यह है कि सबसे अल्प अंशवाला यह पहिले और उससे अधिकांश उससे आगे फिर अधिक अधिक अंशवाले काक्रमसे आगे आगे स्थापन करते जाना,अन्तमें सबसे अधिकांश ग्रह आवेगा,यह दशाका स्थापनक्रम है उदाहरण चक्रमेंहै ॥ ३ ॥ स्पष्टाः अंशादयः रचं म वुशुशल ९/२८१९/२ १९/१६२१८ ३६१६५७१८२३४४५७/५७ ५७३१.८/२८३७२६३/२ राचं मैंबु बृ शु।शल ३९/८४/३/४/३/४ ९।२८१९/२/१९/१६२१८ ३६१६५७१८२३४४५७/५७ ५४३११८२८३७२६ ३/२ ५७३२४/७५/८/१३७ ७ ५/३१/३०/५४३६३२,५२). ११ .

वाजिकनीलकण्ठी। होनांशादिक्रमः बु. मू.. शु. म. [ श. २ १६ १९.१९ २१ | २८ ५७, ३६ / ४४ २३ ५७ ५७ १६ २८ २ २६ ३७ ८ ३ ३१ चं . उजा-न्यूनविशोध्याधिकतक्रमणांशाद्यविशुद्धांशकशेषकैक्यम् ॥ सर्वाधिकांशोन्मितमेवतत्स्यादनेनंवर्षस्यमितिस्तुभाज्या ॥ २ ॥ सभीसे न्यूनांश जो यह है वह उससे अधिकांशमें घटावना; नः वह अधिकांशभी उससे अधिकांशमें घटावना, ऐसेही सभी घटायके अत्यमें जो ग्रह सभीसे अधिकांश है उसके तुल्य सब हीनांशोंका योग होगा, तब ठीक समझना. उदाहरण-सबसे हीनांश बुध २ । १८।२८ अंशादि है यह यथा- स्थित रहा, इसके आगे इससे अधिकांश लम ८ । ५७ । २ है इसमें बुध घटाया तो ६ । ३८ ॥ ३४ यह लगके पात्यांश हुये, अब इसके आगे सूर्य्य ९ । ३६ । ५७ है इसमें लग्नांश ८१५७।२ घटाया,शेष९ । ३९ । ५५ यह सूर्य हुआ, ऐसेही सभीको पात्यांश करके अंत्यमें सर्वाधिकांश चन्द्रमा २८ । १६ । ३१ है इतनाही सभीका योगभी है, यह निश्चयार्थ पात्यांशाः युक्तिहै-हीनांश करके भी चन्द्रमा सर्वाधिकांशही. बु. ल. सू. शु. ब. मि. (श. चं रहता है और पात्यांश करके सब अंशादिकोंके २६२ ० १ ६योगसे सर्वाधिकांशही होताहै, अंत्यके सर्वाधिका- १२८३४/५५।२९/१३३१५५/२० पारशसे वर्षकी मिति सौरकी ३६० वा सावनकी ३६५ ॥१५॥ ३१॥ ३० से भाग दैना जो लाभ हो वह वर्षमें लब्ध ध्रुवांक झागा ॥२॥ उपजा-शुद्धांशकाँस्तान्गुणयेदनेनलब्धध्रुवांकेनभवेदशायाः ॥ मानंदिनाघखलुतगृहस्यफलान्यथासांनिगदेत्तुशास्त्रात् ॥३॥ उक्त प्रकारके लन्ध ध्रुवांकसे प्रत्येक ग्रहके पात्यांशादि गोमूत्रिका क्रमसे वा हीनजाति पिंड करके गुणना, दिन घटी पलात्मक ३ अंक. ११८३८३९/७३९/३३/५९/१२ भाषाटीकासमेता। (१६३) रखना यह उसी ग्रहके नीचे स्थापन करना दिनादि दशा होतीहै ऐसेही सभी ग्रहोंकी दशा दिनादि निश्चय करके प्रथमवाले ग्रहके दिनादि सूर्यके अंशा- दिकोंमें जोडकर आगेके ग्रह यथाक्रम जोडने और उसके नीचे लिखते जाना अन्त्यमें अगले वर्षका सूर्य स्पष्ट ठीक मिल जायगा अथवा वर्षप्रवे- शके दिनघटीपलाओंमें प्रथम दशामान जोडके कमसे सभी जोड़ने अंत्यमें अगले वर्षके दिन घटी पला ठीक मिलेगी, ऐसेही सावनक्रम तिथ्यादि जोडनेसे अग्रिम वर्षके तिथ्यादि मिलते हैं, उदाहरण-सब पात्यांशोंका जोड़ २८ । १६ । ३१ यही अंत्यवाले चंद्रमाके अंशादि हैं, अब इससे वर्षकी मितीमें भाग लेनाहै. प्रथम योगको एकजाति करना, जैसे २८ को ६० से गुना१६८०कला १६ जोडदी १६९६ हुवा, इसे भी ६० से गुना १०१७ ६० हुवा विकला ३१ जोडदिया १०१७९१ यह सवर्णित भाजक हुवा, इसीप्रकार भाज्य ३६० को भी दोवार ६० से गुनाकर १२९६००० यह सवर्णित भाज्य हुवा, इसमें उक्त भाजकसे लब्ध १२ मिला, फिर शेष ७४५०८ को ६० से गुनाकर भाजकसे भाग लिया४३मिला, फिर ऐसाही करनेसे ५५ मिला यह ११ । ४३ । ५५ ध्रुवांक हुवा इससे सभी ग्रहोंके अंशादि गोमूत्रिका क्रमसे प्रत्येक गुणके प्रत्येकके दिनादि दशा होतीहै, उपरांत अथम दशावालेके दिनादि वर्षप्रवेश समयके सूर्य्य स्पष्टमें जोडने फिर उसमें उसके आगेवाली दशा जोडना ऐसे क्रमसे सभोंको जोड़कर अंत्यमें अगले वर्षप्रवेशसमयका सूर्य स्पष्ट मिलेगा, अथवा प्रथम दशा वालेके दिनादि कोंमें वर्षप्रवेशसमयके गत दिन पैट वा प्रविष्टा और घटी पला जोड़के फिर उक्तक्रमसे सभोंको जोड़ना, अंत्यमें अगले वर्षप्रवेशका दिन घटी पला आवेंगे. उदाहरण-वर्षप्रवेशमें सर्य स्पष्ट ३ । ९।३६ । ५७ इसी समयमें बुधकी दशा प्रारंभ हुई, बुधके पूर्वक्रमसे दिन २९ घटी २२ पला ६' हैं, सूर्य स्पष्टमें जोडकर ४ । ८ । ५९ । ३ इतने सूर्य्यस्पष्ट पर्यंत बुधकी दशा पहुँची, उपरांत दूसरे लमकी दशा प्रवेश हुई, विशेष उदाहरणार्थ पाकदिनादि और सूर्यस्पष्ट चक्रमें लिखेहैं, ऐसे संक्रांतिमानके दिनादि जोड़नेसे संक्रांतिकम दिनादि मिलते हैं. ॥ ३ ॥ " -- , १६४) सूर्यः ताजिकनीलकण्ठी। बुल/सू शु/मंशच योग ग्रह २९/८/९/९०३३७२५८०/३६० दशापाकदिन २२४४/१९४२४६६२६३१ घटी ૬ર૮ર૪૧૭૪ દદરર ૦ पला सू सू सू सू सू सू सू सू स्मू ३१७/७/१०/११/११/० ३ स्पष्ट ९ ८/२/१२/१२/१६२३/१९, ९ राश्यादि ઉ૭ ૨૨૧ રર હજાર ૯૭ उपजा-शुद्धांशसाम्येवलिनोदशाद्यावलस्यसाम्येल्पगतेस्तुपूर्वा ॥ साम्येविलग्नस्यखगेनचिंत्या वलादिकालग्नपतेविचित्या ॥४॥ दशाक्रमहीनांश प्रथम उससे अधिक उसके आगे लिखना कहाहै, यदि अंशादि दो आदियोंके तुल्य ही हों तो उन्मेंसे जो अधिक बलीहै वह प्रथम दशेश होगा, यहां 'शुद्धांशसाम्ये' यह पाठ अनुचितहै किंतु 'हीनांशसाम्ये'यह पाठ उचित है; जब बलभी समान हो तो मन्द गतिवाला प्रथम शीघ्र गतिवा- ला उपरांत लिखना,यह और लमके अंशादि साम्य होनेपर लग्नेशसे बलादि- कका विचार करके जिसकी प्रथम हो उसकी दशा प्रथम लिखनी, यही क्रम है ॥ ४ ॥ अन्तर्दशाके लिये ग्रन्थान्तरका श्लोक है कि, "शुद्धां- शयोगेन भजेत्स्वकीयदशादिनायं स्वलनिहन्यात् ॥ शुद्धाशकांशान्निजतः क्रमेण चांतर्दशाथो विदशापि चैव ॥ १ ॥" अर्थात् जिस ग्रहकी अन्तर्दशा करनीहै उसके शुद्धांशको पहिले उसीके शुद्धांशसे गुणना फिर जिन २ की अन्तर्दशा लानी हैं उन्हउन्हके शुद्धांशसे गुणना तथा सर्वाधिकांशसे भाग लेना लब्धभाजक जात्यनुसार अन्तरदशा- मान होताहै अथवा (प्रकारांतर ) उसके मासादिसे जिसकी दशामें अन्त- देशा करनी हो उसके मासादि गुन देने और हीनांशयोग जो सर्वाधिकाशहै उससे भागदेना, लब्धिदिनादि अन्तर्दशा होतीहै, ऐसेही प्रत्येक ग्रहमें सभीकी भाषाटीकासमेता। (१६५) अंतर्दशा होती है उदाहरण-लमकी दशादिनादि ८३.। ४४ । २८ इसमें सबहीकी अंतर्दशा करनीहै प्रथम बुधहै इसके दिनादि २९ । २२ । ६ सभी ग्रहोंके दशाका योग दिनादि ३६० । ०० है तो गोमूत्रिका क्रम करके बुधसे लम गुनदिया २५०९ । २० । १३ हुआ इसमें ३६० से भाग दिया तो ६ । ५८ ॥ १३ दिनादि लग्नदशामें बुधकी अंतर्दशा हुई ऐसेही और ग्रहोंकीभी अंतर्दशा लेनी सबका योग जिसकी अंतर्दशाहै उसके दिनादि पर ठीक मिले तो सत्य जानना, मासप्रवेशमेंभी दशाका यही क्रमहै, जैसे " पात्यांशयोगेन भजेद्रतैष्यमासांतरस्याद्गुणकोत्थितेन ॥ पात्यां शकाःसंगुणिवादशाःस्युरुक्तकमान्मासफलेदशानाम् ॥.१ ॥" मासमिति- ३० ग्रहं पात्यांशोंसे गुनाकर पात्यांश योगसे भाग लेना प्रत्येक ग्रह पात्यां- शसे ऐसेही रीतिसे प्रत्येककी दशा होतीहै. गौरीमतसे प्रथम दरोशके लिये मासप्रवेशदिननक्षत्रमें जो ग्रह दशेश आवै कृतिका उत्तरा फाल्गुनी उत्तरा- पाढसे आ० चं० कु० रा० जी० श० बु० के० शु० ये तीन आवृत्तिसे हैं. यही प्रथम दशाधीश होगा इन सबके दिनादिमान यह है ऐसेही दिन मं । रा J१॥ २॥ ॥ प्रवेशमें दिननक्षत्रसे जानना, और जैसे जातककी मुख्यदशा दशहैं ऐसेही- वर्षकीभी पात्यांश १ तासीर २ भावतासीर ३ स्थलभावतासीर ४ काल- होरादशा ५ हहादशा ६ नैसर्गिकदशा ७ तनुभावदशा ८ मुद्दादशा ९ बल- राममतीदशा १० दश दशा हैं. यहां ग्रन्थभूयस्त्वभयसे ग्रंथकर्त्ताने मुख्य पांत्यांशीही स्थित करीहैं तथापि सर्व साधारणमें जैसे जातककी महादशा ऐसे वर्षमें भी उसी छायासे मुद्दादशा प्रमाण प्रचलित और फलमें अनुभव करीहै, इसलिये इस दशाका क्रम लिखताहूं. "जन्मसिंख्यासहिता गताब्दा हगूनितानंदहृतावशेषाः ॥ आ. चं. कु. रा. जी. श. बु. के. शु. पूर्वा ग्रहा दशास्वामिन इत्थमब्दे ॥ १ ॥” जन्मनक्षत्रमें गतवर्ष जोडके दो घटायदेना शेष ९से भाग देकर जो शेष रहैं वह आ. चं.कु. रादि क्रमसे दशेश जानना. सू । चं वृ श ४॥ के १॥ शु ५ ४|| ४॥

१
(१६६) ताजिकनीलकण्ठी।
जैसे जन्मनक्षत्र रोहिणी ४ गतवर्ष ८ जोडके १२ हुये दो घटाये ३० रहे
९ से भाग देकर १ शेष रहा तो सूर्यकी दशा प्रथम हुई २ शेषमें चंद्रमा
में मंगल ४ में राहु ५ में बृहस्पति ६ में शनि ७ में बुध ८ में केतु ९ में शुक्रकी
दशा होतीहै उपरांत ग्रहोंके जो जातकोक्त दशावर्प सू.६चं. १० मं. ७ राहु.
१८. १६ श. १९ बु. १७ के. ७ शु.२० है इन्है तीनसे गुनाकर वर्षके दिन
होतेहैं. जैसे सूर्यके १८ चंद्रमाके ३० मंगल २१ रा. ५४ बृ. ४८ श. ५७ बु.
५१ के. २१ शु.६० दिन होतेहैं. अब इसकी अन्तर्दशाके लिये सुगम रीति है.
कि "वेदा ४ नागाः ८ शराः५ सप्त ७ दिग् १० रसां ६ क.९ शरा ५रसाः६॥
सूर्यादीनां च गुणकास्तैनिन्नास्वदशामितिः॥१॥पष्टयानांतर्दशास्तस्यजायतेऽति-
मुद्दादशाक्रमः।
सू | चं
म
रा
वृ
श
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शु ग्रहाः
कृ
रो
मृ
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पु
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पू नक्षेत्र
ह
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श
३
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३
३
३
१८
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५४
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५७ ! ५१ २१
६. दिनयो
शा
२॥
१॥ ४॥
४ा
३
९
९॥८॥
१॥ ५ योग ३०
३॥ | १० | योग ६०
परिस्फुटा ॥ यस्यवर्षेभवेत्तस्य प्रथमांतर्दशाभवेत् ॥२॥ अन्यास्तदनिमस्था-
नाज्जायतेंतर्दशाअपि ॥३॥" इन क्षेपकोंसे प्रत्येक ग्रहके दशादिन गुननेसे .
प्रत्येककी अंतर्दशा होतीहै । जैसे गु० सूर्यके दिन १८ से गुने ७२ साठसे
भाग दिया । १२ यह सूर्य्यकी दशामें सूर्यका अंतर हुवा उपरांत चंद्रमाका
गुणक ८ से सू० १८ गुना १४४ हुवा ६० से भाग दिया तो २।२४यह
सूर्य चंद्रमांकी अंतर्दशा दिनादि हुई ऐसेही सभी ग्रहोंको जानना प्रकटताको
चक्रमें लिखेहैं ॥ ४॥

भाषाटीकासमेता। अंतर्दशाकमः। (१६७) बृ सू चं भौ १८ । ३० | २१ बु के ५१ । २१ शु ६० ग्रहाः १८ ४८ ६९ २२८२७९| ३०० ३६० योग ४ ५ ७ १० ६ ६ गुणक सू चं ग्रहः गुणक भौ १।१२/११२४1०११४५ चं | भौ रा वृ २।२४२।३०२।२७ ९/० भो श ११३०३३०३।३० ५।२४ २७ . बु 'बु श बु के शु ६१८ ८1०५१४२७३९ ११४५ बु के श ४/१८८३३४१५/२६ ४१ बु के आ चं ७/१२।१५/५६११२४ ८1० के शु आ चं भौ ४.० ४४८४८३१४८ २४५ शु आ चं भौं रा ४४८ ३१४८/६४८/१।४५ आ चं भौ रा ३।१२।६।२४।५।१५/२।२७/ १०० चं वृ श ६२.४५५४५७/३।३० ६० भो रा ४.० ६३०८१३०१६ ९० वृ श के ५/३६ २।३१५।६. ३९ ५० २ ५1०।६ ८६ श के ३.० ३.० ३।४४॥३० श शु १४४।३०/११४५ ५।२४ के शु आ २।४२/१।३० २२६ २३६ के आ चं ११३०३०२४७१२ शुभ आ भौ ૪૮૦ રાત્રી રૂ૦ 46 Img भौ । रा . . ० अथ दशाफलानि। अनु०-हेममुक्ताफलद्रव्यलाभमारोग्यमुत्तमम् ।। कुरुतेस्वामिसम्मानंदशालग्नस्यशोभना ॥५॥ लमकी उत्तम दशाका फल-सुवर्ण, मोती, द्रव्य, इनका लाभ, उत्तम आरोग्य और स्वामीसे सन्मान देती है ।। ५॥ लाभंदिष्टेनवित्तस्यमानहीनस्यसेवनम् ।। मनसोविकृति दिशाल स्यमध्यमा॥६॥ लमकी ध्यम दशाका फल ऐसा है कि लग्नकी मध्यम दशा दिष्टेन (भा;

(१६८) ताजिकनीलकण्ठी।
ग्यसे) द्रव्यका लाभ मानहीनकी सेवा.मनका और विकार करती है "दिष्ट
दैवं भागधेयमित्यमरः" ॥६॥
विदेशगमनक्लेशबुद्धिनाशंकदव्ययम् ॥
मानहानिकरीत्येवंक लग्नदशाफलम् ॥७॥
कष्टालनदशाका फल-विदेशमें जाना क्लेश. वुद्धिका नाश युद्ध व्यय
और मानकी हानि कष्टालग्नदशा करतीहै यह कष्टालग्नदशाका फल है।॥७॥
रल दशामध्यासौख्यंस्वल्पंधनव्ययम् ॥
अंगपीडांत्व ष्टिंचकुरुतेमृत्युविग्रहम् ॥८॥
क्रूर लग्नकी दशा मध्यम रहती है. वह स्वल्प सौख्य धनका व्यय
अंगमें पीडा कशता मृत्यु और झगडा ये करती है ॥ ८॥
उपजा-दशारवेःपूर्णबलस्यलाभं गजाश्वहेमांबररत्नपूर्णम् ॥
मानोदयंभूमिपतेर्ददाति यशश्चदेवद्विजपूजनादेः॥९॥
अब ग्रहदशाका फल कहते हैं-पूर्णवली सूर्यकी दशा हो तो हाथी
घोडे सुवर्ण रत्नादिसे पूर्ण लाभ होवे तथा राजासे मानोदय और देवता बा-
ह्मण पूजनादिसे यश देताहै ॥ ९ ॥
उपजा०-दशारवेमध्यबलस्यसर्वमिदंफलंमध्यममेवदत्ते ॥
ग्रामाधिकारव्यवसायधैर्यैःकुलानुमानाच्चसुखादिलाभः ॥१०॥
जो सूर्य्य मध्यबली हो तो अपनी दशामें पूर्वोक्त फल मध्यम और कुला-
नुमान मानादियोंका अधिकार व्यवसाय धीरतासे सुखादिलाभ देवाहै॥१०॥
उपजा०-दशारवेरल्पबलस्यपुंसांददातिदुःखंस्वजनैर्विवादात् ॥
मतिभ्रमपित्तरुजस्वतेजोविनाशनंधर्षणमप्यरिभ्यः ॥ ११ ॥
अल्पबली सूर्य अपनी दशामें अनेक प्रकार दुःख तथा अपने मनुष्यों
के साथ विवाद बुद्धिनम पित्तरोग धनहानि और शत्रुसे पराभव ( हार) भी
देताहै ॥ ११ ॥
उपजा-दशारखेर्नष्टबलल्यपुंसांनृपादिपोभियमर्थनाशम् ।।
स्त्रीपुत्रमित्रादिजनैर्विवादं करोतिबुद्धिभ्रममाभयंच ॥ १२ ॥

भाषाटीकासमेवा। (१६९) नष्टबली सर्म्य अपनी दशामें पुरुषोंको राजासे भय धननाश श्रीपुत्रामि- वोंसे धनसंबंधी विवाद बुद्धिलम और रोगभी करता है ॥ १२ ॥ उपजा०-लगादविषविदशायसंस्थोनियोपिदत्तेशुभमर्द्धमेव ॥ मध्यत्वयूनःशुभतांचमध्यायातीत्थमत्यंतशुभःशुभ स्यात् ॥ १३ ॥ जो सूर्य लमसे६।३।१०।११स्थानमें हो तो निर्बलभी हो तो भी आधा फल शुभ देताहीहै आर हीनबली होके पूर्वोक्त स्थानोंपर हो तो मध्यत्वका फल देता है और मध्यबली हो के होय तो पूर्णबलका फल देता है तथा उत्तमबली होके होय तो अत्यंत शुभ फल देताहै ॥ १३ ॥ उपजा०-इंदोर्दशापूर्णबलस्यदत्तेशुक्लांबरवङ्मणिमौक्तिकाद्यम् ॥ स्त्रीसंगमराज्यसुखंचभूमिलाभंयशः कांतिबलाभिवृद्धिम् ॥ १४ ॥ पूर्णबली चंद्रमाके दशामें श्वेत वस्त्र माला मणि मोती आदिकोंका लाभ होवे और स्त्रीसंगमसे तथा राज्यसे सुख भूमिलाभ और यश कांति बल बढ़ १४ इंदोर्दशामध्यबलस्यसर्वमिदंफलंमध्यममेवदत्ते ॥ वाणिज्यमित्रांबरगेहसौख्यंधर्मेनतिकर्षणतोन्नलाभम् ॥ १५॥ मध्यवली चंद्रमा अपनी दशामें पूर्वोक्त संपूर्ण फल मध्यम देताहै तथा व्या- पारसे लाभ मित्र वस्त्र घरका सुख धर्मको वृद्धि और कृषिकार्यमें लाभ देताहै १५ इंदोर्दशास्वल्पबलस्यदत्तेकफामयंकांतिविनाशमाहुः ॥ मित्रादिवैरंजननंकुमार्याधर्मार्थनाशंसुखमल्पमत्र ॥१६॥ अल्पबली चंद्रमाकी दशा कफरोग तथा शरीरकी कांतिका नाश मित्रादि कोंसे वैर कन्याका जन्म धर्म धनका नाश और सुख अल्प देतीहै ॥ १६ ॥. इंदोर्दशा नष्टबलस्यलोकापवादभीतिधनधर्मनाशम् ।। शीतामयंस्त्रीसुतमित्रवैरंदौःस्थ्यंचदत्तेविरसानभुक्तिम् ॥ १७॥ नष्टवली चंद्रमाकी दशा शीतरोग पुत्रमित्रोंसे वैर और शरीरका अस्वास्थ्य स्वादरहित अन्नके भोजन झूठा कलंक और धन तथा धर्मका नाश करतीहै १७ पाष्टमांत्येतरराशिसंस्थोनियोपिदत्तेईसुखंदशायाम् ।। मध्यत्वमूनःशुभंतांचमध्यो यातीत्थमिदुःशुभगःशुभःस्यात् ॥ १८॥ जो चंद्रमादा८३२स्थानोंमें न हो तो हीनबलभी आधा शुभ फल देता - (१७०) ताजिकनीलकण्ठी। है, हीन बल उक्त भिन्न स्थानोंपर हो तो मध्यबलका फल देताहै और मध्य- बली हो तो शुभ फल देताहै और उत्तमबली हो तो अत्यंत शुभफल देताहै १८ दशापतिःपूर्णबलोमहीज सेनापतित्वंतनुतेनराणाम् ॥ जयरणेविद्महेमरत्नवस्त्रादिलाभप्रियसाहसत्वम् ॥ १९ ॥ दशापति मंगल पूर्ण बली हो तो मनुष्योंको सेनापतित्व, बहुतोंका अय गण्य करताहै तथा संग्राममें जय मूंगा सुवर्ण रत्न वस्त्रोंका लाभ और साह- सभी देता है ॥ १९ ॥ दशापतिमध्यबलोमहीजः कुलानुमानेनधनंददाति ॥ गजाधिकारोप्यथतत्परत्वं तेजस्वितांकांतिबलाभिवृद्धिम् ॥२०॥ दशापति मध्यवली मंगल कुलानुमान धन देताहै तथा हाथियोंका अधिकार और हाथीकी सवारीमें प्रसन्न रहै तथा तेजस्वित्व कांति और बलकी वृद्धि देताहै ॥ २० ॥ उपजा-दशापतिःस्वल्पवलोमहीजोददातिपित्तोष्णरुजंशरीरे ॥ रिपोर्भयंबंधनमास्यतोसृक्स्रवंचवैस्वजनैश्चशश्वत् ॥ २१ ॥ दशापति मंगल अल्पबली हो तो अपनी दशामें पित्त और गरमीके विकारसे शरीरमें रोग देताहै तथा शत्रुभय यद्दा बंधन तथा मुखसे रुधिर- स्राव और अपने मनुष्योंके साथ निरंतर वैर होवे ॥ २१ ॥ उपजा०-दशापतिर्नष्टवलोमहीजोविवादसुग्रंजनयेद्रणंवा ॥ चौराद्भयरक्तरुजंज्वरंचविपत्तिमल्पस्वहर्तिचरखम् ॥ २२ ॥ दशापति मंगल नष्टवल हो तो उत्कट कलह अथवा रणही करदेताहै तथा चोरसे भय रुधिरसंबंधि रोग, विपत्ति, थोडी धनहानि और खुजली का रोग करताहै ॥ २२॥ अनुष्टु०-त्रिपष्टायगतोभौमोनटवीर्य शुभार्द्धदः ॥ मध्योहीनः शुभोमध्यः शुभोत्यंतशुभावहः ॥ २३ ॥ मंगल दशापति श६११ स्थानमें नष्टबली हो तो शुभफल आधा देता होनवली हो तो मध्यवलीका फल देताहै और मध्यबली होके शुभ फल देता है और उत्तम बली हो तो अत्यंत शुभ फल देता है और. भावोंका उत्तही जानना ॥ २३ ॥ .

भाषाटीकासमेता। (१७१) उपजा०-दशापतिःपूर्णबलोबुधश्चेवशोभिवृद्धिगणितार शिल्पात ॥ तनोतिसेवांसफलांनृपादेर्दूत्यंचवैदूष्यगुणोदयंच ॥ २४ ॥ दशापति बुध पूर्णबली हो तो गणित एवं शिल्पविद्यासे यश बढे राजादि- कोंकी सेवा सफल होवे दूतत्व मिले और निर्दोष गुणोंका उदय होवे ॥२४॥ उपजा०-दशापतिमध्यबलोबुधश्चेदरोस्सुहृद्भयोलिपिकाव्यशिल्पैः । धनाप्तिदोथोसुतमित्रबंधुसमागमान्मध्यममेवसौख्यम् ॥२५॥ दशापति बुध अल्पबली हो तो गुरुजन मित्रजन एवं लिखने पढ़ने और शिल्पविद्यासे धनप्राप्ति होवे, और पुत्र मित्र बंधुजनोंका समागम होने सुख मध्यम होवे ॥ २५॥ उपजा०-दशापताक्ल्पबलेवुधेस्यान्मानस्यनाशःस्वजनापवादः ।। अकार्यकोपस्खलनायनिष्टधनव्ययरोगभयंचविद्यात् ॥ २६ ॥ दशापति बुध अल्पवली हो तो माननाश अपने जनोंसे झूठा कलंक विना प्रयोजनका कोप अपनी वाणी चकजानेसे बुरा धन खर्च और रोगभय भी जानना ॥ २६ ॥ उपजा०-दशापतौहीनबलेवुधेस्यात्स्व द्विनाशोवधबंधभीतिः॥ दूरेगतिर्वातकफामयातिनिखातवित्तस्यचनापिलाभः ॥२७॥ हीनबली बुधके दशापति होनेमें अपनी बुद्धिका नाश और बंधन, वा वध, कार्यसंबंधी भय, दूरगमन वातकफसंभव रोगसे पीडा होवे और अपना ही स्थापित द्रव्य नहीं मिले ॥ २७ ॥ अनुष्टु०-पडष्टांत्येतरक्षस्थोनष्टोज्ञोर्द्धशुभप्रदः ॥ मध्योहीनःशुभोमध्यःशुभोत्यंतसुखावहः ॥२८॥ दशापति बुध ६।८।१२ स्थानोंसे रहित और किसी स्थानमें हो तो नष्टबलीभी आधा शुभ फल देता है. जो षडष्टांत्य भिन्नस्थानोंमें नष्टबल बुध मध्यबलका फल और मध्यबली शुभ फल देताहै, उत्तमबली अत्यंत शुभ- फल देता है ६।८।१२ स्थानोंमें उत्तमबली भी अशुभ हीनबली अत्यंत अ- शुभ फल देता है ॥ २८॥ उपजा०-गुरोर्दशापूर्णबलस्यदत्तेमानोदयंराजसुहद्धरुभ्यः॥

. (१७२) ताजिकनीलकण्ठी। कांत्यर्थलाभोपचयंसुखानिराज्येसुत तरि रोगनाशम् ॥ २९॥ पूर्णबली बृहस्पतिकी दशा राजा मित्र और गुरुजनोंसे मान देतीहै तथा कांति बढतीहै धनलाभ बहुत राज्यका सुख पुत्रप्राप्ति शत्रु और रोगका नाश होता है २९॥ उपजा०-गुरोर्दशामध्यबलस्यधर्मेमतिसखित्वंनृपमंत्रिवगैः ॥ तनोतिमानार्थसुखाभिलाभसिद्धिसदुत्साहबलातिरेकाम् ॥३०॥ मध्यबली बृहस्पतिकी दशामें राजासे मित्रता पुत्र स्त्री सुख और मित्र व धर्मके लाभ होतेहैं ॥ ३० ॥ दशागुरोरल्पबलस्यदत्तेरोगंदारिद्रत्वमथारिभीतिम् ।। कर्णामयंधर्मधनप्रणाशंवैराग्यमर्थच पंचकिंचित् ॥३१॥ अल्पबली बृहस्पतिकी दशा रोग दरिद्रत्व और शत्रुभय देती है तथा कानोंमें रोग धर्म तथा धनका नाश होताहै परंच चित्तमें वैराग्य और थोडा धनागम और स्वल्प गुणभी देती है ॥ ३१॥ उपजा-दशागरोनष्टबलस्य सांदद तिदुःखानिरुजंकफातिम् ॥ कलत्र त्रस्वजनादिभीतिधर्मार्थनाशंतनपीडनंच ॥ ३२॥ अल्पबली बृहस्पतिकी दशा पुरुषोंको अनेक दुःख एवं रोग कफवि- कारसे कष्ट और स्त्री पुत्र एवं अपने मनुष्यादिकोंको भय धर्म और धनका नाश तथा शरीरपीडा देतीहै ॥ ३२॥ अनुष्टु०-पडष्टरिष्फेतरगोगुरुनिद्यो सत्फलः ॥ मध्योहीनःशुभोमध्यःशुभोत्यंतशुभावहः ॥ ३३॥ दशापति बृहस्पति ६८१२ भावोंसे अन्य स्थानों में हो तो नष्टबली भी शुभफल आधा देताहै और हीनबली मध्यफल और मध्यबली शुभ फल देताहै और पूर्णबली अत्यंत शुभफल देताहै ६।८।१२ स्थानों में उत्तमबली भी शुभफल पूर्ण नहीं देता ॥ ३३ ॥ उपजा-दशाभृगोःपूर्णबलस्यसौख्यंलग्गंधवेश्मांबस्कामिनीभ्यः॥ हयादिलाभःसुतकीर्तितोपानरुज्यगांधर्वरतिः पदाप्तिः ॥ ३४ ॥ पर्णबली शुक्रकी दशा, माला सुगंधि वस्तु गृह व श्रीजनोंसे सुख दे- - भाषाटीकासमेता। (१७३) तीहै तथा घोडा आदि वाहनलाभ पुत्रसुख कीर्ति नीरोगता गायनादि आनंद और पदलाभ देतीहै ॥ ३४॥ उपजा०-दशाभूगोमध्यबलस्यदत्तेवाणिज्यतार्थागमनकृषेश्च ॥ मिष्टा पानांबरभोगला मित्राणिश्चयोपित्सुतसौख्यलाभम्।।३६॥ मध्यबली शुक्रकी दशामें व्यापारसे तथा कृषिकर्मसे धनलाभ और मीठा अन्न सवारी वस्त्रादि भोगलाभ और मित्र पुत्र स्त्रीसे सुख मिले ॥३५॥ उपजा०-दशाभृगोरल्पबलस्यदत्तेमतिभ्रमंज्ञानयशार्थनाशम् ।। कदन्नभोज्यव्यसनामयात्तिस्त्रीपक्षवैरंकलिमप्यरिभ्यः ॥३६॥ अल्पवली शुक्रकी दशा बुद्धिनम ज्ञान यश और धनका नाश करतीहै तथा जुंवार बाजरा आदिक अन्न भोजन व्यसनवृद्धि रोगपीडा स्त्रीपक्षसे वैर शत्रुसे कलह होताहै ॥ ३६॥ उपजा०-दशाभृगोष्टबलस्यदत्तेविदेशयानंस्वजनैर्विरोधम् ॥ पुत्रार्थभायांविपदोजश्चमतिभ्रमोपिव्यसनमहच्च ॥ ३७॥ नष्टबली शुक्रकी दशा विदेशगमन अपने मनुष्योंसे विरोध पुत्र धन स्त्री आदिकी विपत्ति और रोग बुद्धिमम तथा बडा व्यसन देतीहै ॥ ३७ ॥ अनुष्टु०-षडष्टरिष्फेतरगोभृगुनिंद्योईसत्फलः ॥ मध्योहीनःशुभोमध्यःशुभोत्यंतशुभावहः ॥ ३८ ॥ दशापति शुक्र ६।८।१२ से अन्य स्थानों में नष्टबलीभी शुभ फल आधा देताही है और हीनबली मध्य फल'मध्यबली शुभ फल देता है, उत्तम बली अत्यंत शुभ फल देताहै६।८।१२स्थानों में शुमभी अशुभ देताहै॥३८॥ उपजा०-दशाशनेःपूर्णबलस्यदत्तेनवीनवेश्यांबरभूमिसौख्यम् ।। आरामतोयाश्रयनिर्मितिश्चम्लेच तिसंगान्नृपतेर्द्धनाप्तिः ॥३९॥ पूर्णबली शनिकी दशा नये घर वस्त्र भूमिका सुख देती है वा जलस्थान निर्माण और म्लेच्छसे वथा राजासे धनप्राप्ति होतीहै ॥ ३९ ॥ उपजा०-दशाशनेमध्यबलस्यदत्तेखरोष्टपाखंडजतोधनाप्तिम् ।। वृद्धांगनासंगमदुर्गरक्षाधिकारचिंताविरसान्नभोगः॥४०॥ मध्यबली शनिकी दशा गंधा ऊंट एवं उडदआदि अन्न और (पाखंडज).

(१७४) ताजिकनीलकण्ठी। मिथ्या धर्मसंचारसे धनप्राप्ति होवे तथा वृद्धावीका संगम होवे किलाआदि की रक्षा अधिकारकी चिंता होवे रसरहित अन्न भोजनको मिले ॥ ४० ॥ उपजा०-दशाशनेःस्वल्पबलस्यपुंसांतनोतिदुःखरिपुतस्करेभ्यः॥ दारिद्यमात्मीयजनापवादरोगंचशीतानिलकोपमुग्रम् ॥ ४॥ अल्पबली शनिकी दशा पुरुषोंको शत्रु और चौरोंसे दुःख देतीहै तथा दरिद्रता अपने मनुष्यसे झूठा कलंक और शीत तथा वातके कोपसे उग्र- रोग उत्पन्न होवे ॥४१॥ उपजा०-दशाशनेर्नष्टबलस्यपुंसामनेकधादुर्व्यसनानिदत्ते ॥ स्त्रीपुत्रमित्रस्वजनैविरोधरोगादिवृद्धिमरणेनतुल्याम् ॥४२॥ नष्टबली शनिकी दशा पुरुषोंको अनेक व्यसन देती है तथा पुत्रमित्रादि अपने मनुष्योंसे विरोध रोगादिकोंकी वृद्धि मरणतुल्य करती है ॥ ४२ ॥ अनुष्ट-त्रिष लाभोपगतोमंदोनिचोर्द्धसत्फलः॥ मध्योहीनःशुभोमध्यःशुभोत्यंतशुभावहः ॥४३॥ शनि ३।६।११ स्थानोंमें नष्टबली भी आधा शुभफल देताही है तथा होनबली मध्य मध्यवली शुभ फल देताहै उत्तमबली अत्यंतही शुभ फल देताहै ॥ ४३॥ उपेन्द्रव-दशातनो स्वामिबलेनतुल्यंफलंददातीत्यपरोविशेषः ॥ चरेशुभामध्यफलाधमाचदिसूर्तिमेल्यादिपरीतसूहाम् ॥४४॥ लगको दशा अपने स्वामिबलके सहश फल देतीहै. जैसे उदित स्वगृहा- दिगत लग्नेश हो तो उसका उत्तमबली दशोक्तफल और अस्त नीच होने में हीनबलोक्त स्वदशा फल देताहै इसमें यह विशेष है कि चरलग्नमें प्रथम द्रेष्का- ण हो तो दशा शुभ दूसरे द्रेष्काणंमें मध्यवलोक्त और तीशरे द्रेष्काणमें हीनबलोक्त दशां फलं देतीहै द्विस्वभाव राशिमें चरसे विपरीत अर्थात् प्रथम द्रेष्काणमें अधम द्वितीय, मध्यम तृतीयमें उत्तम बलीका फल देतीहै ॥४४॥ उपें०१०-अनिष्टमिष्टचसमंस्थिरक्षकमाहकाणैःफलमुक्तमाद्यैः॥ सत्स्वामियोगेक्षणतःसुखस्यात्पापेक्षणात्कष्टफलंचवाच्यम् ॥४५|| स्थिरराशिमें प्रथम द्रेष्काण हो तो हीनबलीका दूसरा हो तो उत्तमवली .

भाषाटीकासमेता। (१७५)
का तीसरा हो तो मध्यमबलीका फल देताहै. इसप्रकार पूर्वाचार्योने लग्नदशा
का फल द्रेष्काणवशसे कहा है तथा लग्नपर लग्नेशकी दृष्टि हो वा लग्नमें लग्नेश
हो तो सु और पापयोग पापदृष्टिसे कष्टफलभी कहना ॥ ४५ ॥
अथांतर्दशाप्रकारः। अ०-दशामानसमामानंप्रकल्प्योक्तेनवर्त्मना ॥ .
अंतर्दशाःसाधनीयाःप्राक्पात्यांशवशेनतु ॥ १६ ॥
अंतर्दशाकी रीति कहते हैं कि,पहिले जिसविधिसे पात्यांशी दशा कही वही
इसकीभी है और सावनवर्षमितिका जहां काम है वहां दशेशकी दशा दिनादि
लेलेने यही विशेषहै, जैसे पहिले हीनांशवशसे पात्यांश लियेहैं वहां पात्यांश-
योगसे सौर वा सावन दिनादि दशामिति भाजनेसे मिलेहैं, वही अंतर्दशाभी
ध्रुवक जानना उसीसे सभी पात्यांश गुनाकर प्रत्यककी अंतर्दशा मिलतीहै.
शुक्रान्तर्दशादिनोंदाहरणम् ।
शु. व. म.श. चं, बु. ल. सू.या. अ.
२२/७/१६२०७२१/२९०
५१/५१४७२४/१७२४/१८४७४२
१६३७३०३९/१४९३०/१७१७
१८/२९/५०५७४१३३/४८२४/००
# | सौरसावनाहानि
सौरा:प्रवेशाकीः
७/८/८/८/९/९/१०१०
१२४/१२/१४/२०११/१०/११२
३५४४५३३५८१५/३९/५८४५
५२१५८/२९/९२४३३४२२
४७३७३४/१५/४८६३६०
उदाहरण-शुक्रदशादिनादि ९० । ४२ । १७ सवर्ण करके पहिलोंका
साधा सवर्णित पात्यांश योगसे भाग लिया तो लब्धिं ३ । १२॥ २८ ध्रुवक
हुवा इससे प्रत्येकके पात्यांश गुनाकरके प्रत्येककी अंतर्दशा होतीहै उपरांत
सूर्य स्पष्ट वा संक्रांतिदिनोंसे पूर्ववत् जोडकरना ॥ ४६॥
अनुष्टु०-आदावंतर्दशापाकपतेस्तक्रमतोपराः॥
भेक्षणान्वयान्मैत्र्यातत्फलंपरिकल्पयेत् ॥ १७ ॥

(१७६) ताजिकनीलकण्ठी। अंतर्दशा में प्रथम दशापति अर्थात् जिसका अंतर है तदनंतर जिसक्रमसे उक्त दशाका न्यास है वैसेही सभी ग्रह लिखने अंतर्दशा स्वामीकामी चारप्रकारका बल देखके फल कहना, जैसे अंतर्दशापतिसे शुभग्रहोंकी दृष्टि वा योग हो उसके अनुसार स्थान उच्चनीचास्तोदयमें दशेशका फल शुभाशुभ कहना ऐसेही पापयोग दृष्टि सेभी अंतर्दशाका फल जानना ॥ ४७ ॥ अनुष्टु०-चंद्रारजीवाःसौम्येज्यशुकोरविविधस्तथा ॥ मदेज्यशुक्राःसूर्य्यदुभौमा सौम्येज्यसूर्यजाः ॥१८॥ जीव शुक्राः सूर्यादेः शुभा देशाइमाः॥ अन्येषामशुभाज्ञेया इति वामनभाषितम् ॥ १९॥ सूर्येकी दशामें चंद्रमा मंगल बृहस्पति चंद्रमाकीमें बुध बृहस्पति शुक्र, मंगलमें सूर्य चंद्रमा बुधमें शनि बृहस्पति शुक्र बृहस्पतिमें सूर्य चंद्रमा मंगल शुक्रमें बुध बृहस्पति शनि और शनिमें बृहस्पति बुध शुक्रकी अंतर्दशा शुभ फल देतीहै. यह वामनाचार्य्यने कहाहै, परंतु ऐसा फल वर्तमानमें यथार्थ मिलता नहीं है, शुभाशुभ ग्रहोंका बलाबल विचारसे फल यथार्थ मिलतो है॥४८॥४९॥ इति महीधरकतायां नीलकंठीभा०दशाफलाध्यायः ॥१३॥ अथ ग्रहाणां भावफलानि । उपजा०–सूर्यारमंदास्तनुगाज्वरातिधनक्षयंपाप गिदुरित्थम् ॥ शुभान्वितःपुष्टतनुश्चसौख्यंजीवज्ञशुक्राधनराज्यलाभम् ॥५०॥ अब ग्रहोंके भावफल कहतेहैं कि सूर्य मंगल शनि प्रत्येक वा सभी लग्नमें हों तो ज्वर संबंधी पीडा धनहानि करते हैं. पापयुक्त चंद्रमाभी लग्नमें यही फल देताहै जो पूर्ण और शुभयुक्त हो तो सुख देता है पर अल्पमें अल्प अधि- कमें अधिक ऐसा वुद्धिसे समझ लेना तथा बृहस्पति बुध शुक्र लम में धन और कुलानुमान राज्यसुख देते हैं, बुध लग्नका केवल वा सशुभ हो. हर्ष देताहै ॥ ५० ॥ उपजा.-चंद्रज्ञजीवास्फुजितोधनस्थाधनागमंराज्यसुखचदधुः ।। पापाधनस्थाधनहानिदास्युपायंका-विघातमार्किः ॥११॥ धनस्थानमें चंद्रमा बुध बृहस्पति और शुक्र धनागम तथा राज्यसुख तो भाषाटीकासमेता। (१७७) देते हैं पूर्ण चन्द्रमा शुभयुक्तभी यही फल देता है और पापग्रहयुक्त चन्द्रमा धनस्थानमें धनहानि देता है विशेषतः शनि तो राजासे भय और कार्य- नाशभी करता है ॥ ५१ ॥. वसन्तति-दुश्चिक्यगाः खलखगा धनधर्मराज्यलाभप्रदाब- लयुताः क्षितिलाभदाः स्युः ॥ सौम्याः सुखार्थव लाभयशो- विलासलाभाय हर्षमतुलं किल तत्र चन्द्रः॥५२॥ तृतीयभावमें पापग्रह धन धर्म और राज्यसुख देते हैं बलवान हों तो भूमिलाभभी करते हैं शुभग्रह सुख धनलाभ कार्यसिद्धि यश विलासादि सौख्य करतेहैं और चन्द्रमा अनुपम हर्ष देता है पूर्ण . क्षीणका यहां उपचय होनेसे अपेक्षा नहीं है ॥ ५२ ॥ वसन्तति०-चन्द्रःसुखेखलयुतोव्यसनरुजंचपुष्टश्शुभेनसहितः सुखमातनोति ॥ सौम्यःसुखंविविधमत्रखलाःसुखार्थनाशंरुज व्यसनमप्यतुलंभयं वा ॥१३॥ चतुर्थभावमें चंद्रमा सुख देताहै पापयुक्त हो तो यूतादि व्यसन और रोग करताहै शुभयुक्त पूर्ण हो तो सुख देताहै और शुभग्रह अनेक प्रकार सुख देतेहैं, पापग्रह सुख और धनका नाश तथा रोग व्यसन वा अनुपम भय देतेहैं ॥ ५३॥ रथोद्ध०- वित्तसुखसंचयंशुभाः पुत्रगा भृ सुतोतिहर्षदः । पुत्रवित्तधनबुद्धिहारकास्तस्करामयकलिप्रदाःखलाः ॥५४॥ पंचम भावमें शुभग्रह पूर्ण चन्द्रमा पुत्र धन और सुख बढातेहैं शुक्र तो अतिही हर्ष देताहै पापग्रह पुत्र मित्र धन तथा बुद्धिहरण और चौरसंबंधि व्यसन रोग कलह करतेहैं ॥ १४ ॥ शालिनी-पष्ठेपापावित्तलाभंसुखाप्तिंभौमोत्यंतहर्षदः शत्रुनाशम् ॥ सौम्याभीतिवित्तनाशंकलिंचचंद्रोरोगंपापयुक्तः करोति ॥५५॥ छठे भावमें पापग्रह धनलाभ सुखप्राप्ति करतेहैं मंगल अतिहर्ष तथा श- त्रुनाश करताहै शुभग्रह भय धननाश कलह करते हैं पापयुक्त चन्द्रमा रोगो- त्पत्ति करताहै ॥ ५५ ॥ १२

(१७८)
ताजिकनीलकण्ठी।
भुजंगप्र०-सपापःशशीस मोव्य धभीतिखलाः स्त्रीविना-
शंकलिंभृत्यभीतिम् ॥ शुभाःकुर्वतेवित्तला सुखाप्तिय-
शोराजमानोदयबंधुसौख्यम् ॥५६॥
सप्तमभावमें पापयुक्त चन्द्रमा रोग भय तथा पापग्रह स्त्रीहानि कलह
भृत्यसंबंधी भय करते हैं, शुभग्रह धनलाभ सुखलाभ यश राजमान युदय
और बंधुसुख करतेहै ॥ ५६ ॥
वसन्ततिः-चंद्रोष्टमेनिधनदुः खलखेटयुक्तः पापैश्चतत्रमृतितु-
ल्यफलं च विद्यात् ।। सौम्याःस्वधातुवशतोरुजमर्थनाशं
मानक्षयंमुथशिलेशुभजेशुभंच.॥२७॥
अष्टमभावमें पापयुक्तं चन्द्रमा मृत्यु पापग्रह मृत्युतुल्य कष्ट फलदेतेहैं. शुभ-
ग्रह अपने उक्त धातुके वशसे रोग तथा धननाश मानहानि करतेहैं ।। ५७॥.
द्रुतविलंबि-तपसिसोदरभी पशुपीड़नंखलखगेति दोरविरत्रचेत् ॥
शुभखगाधनधान्यविवृद्धिदाखलखगेपिशुभान्यपरेजगुः॥१८॥
नवमभाव में पापग्रह भाइयोंको क्लेश तथा पशुसंबंधि पीडा देतेहैं परन्तु
सूर्य तो अति हर्षही देताहै तथा शुभग्रह धन अन्न वढातेहैं किसी आ-
चार्यके मतसे पापग्रह भी शुभ फल देते हैं, यह बलाधीन है ॥ ५८ ॥
द्रुतविलंबित-गगनगोरविजः पशुवित्तहारविकुजौव्यवसायपराक्रमौ. ॥
धनसुखानिपरेचधनात्मजावनिपसंगसुखानिवितन्वते ॥१९॥
दशमभावमें शनि. पशु धननाश करताहै सूर्य मंगल व्यवसाय तथा
पराक्रमसे अनेक सुख करतेहैं. शुभग्रह धन पुत्र और राजसंबंधि सुख
करतेहैं ॥ ५९ ॥
वसन्तति-लाभेधनोपचयसौख्ययशोभिवृद्धिसन्मित्रसंगब-
. लपुष्टिकराश्वसर्वे ॥ कूराबलेनरहिताःसुतवित्तबुद्धिनाश
शुभास्तुशुभतांस्वफ़लस्यकुर्युः ॥६॥
ग्यारहवें भावमें सभी ग्रह. यशकी वृद्धि भलेमित्रोंका संग शरीरमें बल
पुष्टि करते हैं, बलहीन पापग्रह पुत्र धन बुद्धिसंबंधि हानि और शुभग्रह
अपने उक्त शुभ फलकी शुभता बढाते हैं ॥ ६॥

. भाषाटीकासमेता। (१७९) इंद्रव-पापाव्ययेनेकरुजविवादहानिधनानांनृपतस्करादेः ॥ सौम्याव्ययंसब्यवहारमागें कुर्युःशनिहर्षविवृद्धिमत्र ॥ ६ ॥ व्ययभावमें पापग्रह अनेक रोग कलह धनहानि राजा तथा चौरादिसे करतेहैं शुभग्रह शुभव्यय यदाशुभ मार्गमें धनव्यय और शनिहर्षवृद्धि करताहै ॥६१॥ शार्दूल-श्रीगर्गान्वयभूषणोगणितविचिंतामणिस्तत्सुतोऽ- नंतोऽनन्तमतिय॑धात्खलमतध्वस्त्यैजनुःपद्धतिम् ॥ तत्सूनुः खलुनीलकंठविबुधोविद वानुज्ञयाभावस्थग्रहपाकदौस्स्थ्य- सुखतायुक्तंफलंलोव्यधात् ॥६२॥ इति भावफलध्यायस्तृतीयः॥३॥ इस श्लोकका अर्थ पूर्वववही है विशेष इतना है कि दशाका शुभाशुभ फल और ग्रहभावफल इस अध्यायमें आचार्यने कहे ॥ ६२ ॥ इति श्रीमहीधरहतायां नीलकंठीभाषाटीकायां ग्रहभावफलाध्यायः ॥ १४ ॥ अथ मासदिनप्रवेशानयनं तत्फलानि च । अनुष्टु०-मासार्कस्ययदासनपंक्त्यकेंणसहातरम् ॥ कलीकृत्याकंगत्याप्तं दिनाचेनयुतोनितम् ॥ १॥ तत्पंक्तिस्थंवारपूर्वमासायिकहीनके ॥ तद्वाराद्येमासवेशोयुवेशोप्येवमेवहि ॥२॥ अब मासप्रवेश दिनप्रवेशकी रीति कहतेहैं कि, जन्मकालका तात्कालिक स्पष्ट सूर्य सबही वर्षप्रवेशमें तुल्यही होता है जितने मासका प्रवेश उतनी संख्या १ घटायके वर्षप्रवेशकी राशिमें जोड देना जैसे दूसरे मासप्रवेशमें १ तीसरेमें २ इत्यादि जोडके मासंप्रवेशका- लीन सूर्य स्पष्ट होता है ऐसेही दिन प्रवेशमें १ अंश जोडना इस सूर्य स्पष्टके समीपकी स्पष्टावधि पंचांगमें देखके उस अवधिमें जो सूर्य स्पष्ट वह पंक्त्यर्क हुआ. मासप्रवेशका जो सूर्य स्पष्ट है वह मासार्क हुआ इन 'दोनोंका अंतर करना उपरांत कला करके गतिसे भाग देना वारादि ३ अंक लेने इस लब्धिको मासार्ककालीन वार घटी पलाओंमें न्यूनाधिक करना. जैसे मासार्कमें पंक्त्यर्क घटाया हो तो अवधिस्थ वारादिमें यह जोडदेना पं- स्त्यर्कमें मासार्क घटाया हो तो घटाय देना यह मासप्रवेशका वार घदी पला. .. करना

(१८०) वाजिकनीलकण्ठी।
मिलेंगी ऐसेही दिनप्रवेशभी जानना इसकी युक्ति इसी तंत्र के प्रथमाध्याय तीसरे
श्लोककी टीकामेंभी लिखीहै, उदाहरण-पूर्वलिखित जन्मकालीन सूर्यस्पष्ट
०।१८ । ४२ । ३१ है संवत् १९४३ वैशाख कृष्ण द्वादशी शनिवार
इष्टघटी १३ । ५४ वर्षप्रवेश ३८ में भी सूर्य स्पष्ट ० । १८ । ४२ । ३१
मासप्रवेशके लिये इसमें एक जोड़के १ ।१८।४२। ३१ मासप्रवेशका-
लीन सूर्य्य स्पष्ट हुआ इसीका नाम मासार्कहै, दूसरे महीने ज्येष्टको कृष्ण-
द्वादशीके समीप ज्येष्ठकृष्णषष्ठी सोमवारके दिन पंचांगमें अवधि उदयकाल-
की है यह हाल २ । ० । • वारादि जानना इस दिन उदयकालिक सूर्य
स्पष्ट १ । १० । ३५ । ३ गति ५७ । २७ है यह पंक्त्यर्क हुआ; इनका
अन्तर करनाहै मासार्क १ । १८१४२ । ३१ अधिक होनेसे इसमें पत्त्यर्क
१1१०1३५। ३ घटायके । ८ । २८ रहा इसकी कला
४८७ । २८ हुई. गति ५७। २७ है५७ को ६० से गुनाकर २७ जोड़-
दिये ३४४७ हुये, कला४८७को ६० से गुनाकर२८जोडदिये २९२४८
हुये गतिपिंड ३४४७ से कलापिंड २९२४८ में भाग लिया लब्धि ८
दिन हुये शेष १६७२ को ६० से गुनाकर १००३२० भागहार३४४७
से भाग लिया लाभ २९ घटी हुई शेष ३५७ को ६० से गुनाकर २१४२०
भागहारसे भागलिया लाभ ६ यह ८ । २९ । ६ वारादि पंक्त्यर्क कालिक
वारादि २१ । ० में न्यूनाधिक करना है यहां मासार्कमें पत्त्यर्क घटाया
गया इस लिये ८।२९ । ६ वारको ७ से शेषकरके १।२९।६ पंक्ति
वारादिमें जोडदिया तो मासप्रवेशका वारादि हुआ ३ । २९ । ज्येष्ठकृष्ण
चतुर्दशीको मंगलवारहै इस दिन २९ घटी ६ पलामें द्वितीय मासप्रदेश हुआ
ऐसेही दिनप्रवेशभी जानना इसकी कल्पित रीति उदाहरण सहित इसी तंत्रके
प्रथमाध्याय तीसरे श्लोककी टीकामें लिखीहै दोनों प्रकार सिद्धहैं. विशेष
बोधके लिये जगह २ लिखाहै ॥३॥ २ ॥
अनुष्टु-मासप्रवेशकालेपिग्रहान्भावाँश्चसाधयेत् ॥
तत्रमासतनो थोमुन्थेशोजन्मपस्तथा ॥३॥
त्रिराशिपोदिननिशोरवींदुभपतिस्तथा ॥
अब्दप्रवेशलग्नेश एषांवीर्याधिकस्तनुम् ॥ ४॥

भाषाटीकासमेता।
(१८१)
अनु०-पश्यन्मासपतिज्ञेयस्ततोवाच्यं भा भम् ॥
अपरेमासले शंमासांधिपतिमूचिरे ॥६॥
जैसे वर्षप्रवेशमें वर्षेशके लिये पंचाधिकारी हैं तैसेही मासप्रवेशमें मा-
सेशके लिये षडधिकारी ये हैं कि प्रथम मासप्रवेशके तत्कालीन यह स्पष्ट
करके प्रथम मासलग्नेश १ उससे उपरांत माससंख्या ढाई २।३० अंशसे गुना-
कर वर्षकी मुंथा स्पष्टमें योग करनेसे मासकी मुंथा होतीहै इसका स्वामी २
जन्मराशिस्वामी ३ त्रिराशीश "त्रिराशिपाःसूर्यसितार्किशुकाः” इत्यादिसे
पूर्वोक्तही ४ दिनमें सूर्य राशिस्वामी रात्रिमें चंद्रराशिस्वामी ५. वर्षप्रवे-
श लमस्वामी ६ ये षडधिकारी होते हैं इन छहोंमेंसे जो बलाधिक और
लगको देखता हो वह मासाधिपति होताहै. कोई कोई आचार्य मासप्र-
वेश लग्नेशकोही मासेश मानते हैं उनके मतसे घडधिकारीयोंकाभी प्रयोज-
न नहीं है स्वामीका निर्णय पूर्ववतही है ॥ ३ ॥ ४ ॥ ५ ॥
अनुष्टु०-दिनेशं दिनलग्नेशं तथाप्रोचुर्विचक्षणाः ॥
मासघनेशयोर्वाच्यंफलं वर्षेशवबुधैः॥६॥
दिनेश दिनप्रवेशके लग्नेशकोही बुद्धिमान् कहते हैं. फल इसका वर्षे-
शके समान वलावल विचारसे शुभाशुभ बुद्धिमानोंने कहना ॥ ६ ॥
शार्दूलवि०-लग्नांशाधिपतिविलग्नपनवशिशेनमैत्रीहशादृष्टोवा
सहितः शशीच यदितौ मैत्रीहशालोकते ॥ तस्मिन्मासितनौ-
सुखं बहुविधं नैरुज्यमित्थंफलंतावद्यावदिमेस्यारत्थमथता
न्संचाय॑वाच्यंफलम् ॥७॥
मासप्रवेश लमके नवांशका स्वामी लग्नेशसे वा उसके स्थित नवांश-
स्वामीसे मित्रदृष्टि हो वा दोनों एक साथ हों तथा चंद्रमा उन दोनोंको
मिनदृष्टिसे देखे तो उस महीनेमें मासप्रवेशवालेके शरीरमें बहुत. प्रकारके
मुख और नीरोगता जबलौं यह मासप्रवेश है तबलौं रहे ऐसेही गणितव-
शसे ग्रहोंका बलाबल दृष्टियोग विचारके फल कहना ॥ ७ ॥

(१८२)
ताजिकनीलकण्ठी।
शार्दूलवि-तौचेच्छचशा मिथश्वशशिना.. दृष्टौ मनोदुःखदौ
रोगाधिक्यकरौच कश्चिदनयोनीचेस्तगोवायदि ॥ कष्टात्सौ.
ख्यमिहदयं यदिएननींचास्तगंस्यान्मृतिः मृत्यब्दोद्भवरिष्टतो
मृतिसमस्यादन्यथेत्यूचिरे ॥८॥
जो वही लग्नांशेश और लग्नेश्वरांशेश परस्पर शत्रुदृष्टिसे देखते हों वा चंद्र-
माभी शत्रुदृष्टिसे देख तो मानसी दुःख देते हैं जो लग्नेश और लग्नेश्वरांशेश
मेंसे कोई नीच वा अस्तंगत हो तो बडा कष्ट भोगकर सुख पावें जो लग्नांश-
नाथ लग्नेश्वरांशनाथ नीच एवं अस्तंगत हों और चंद्रमा शत्रुदृष्टिसे देखे तो
मृत्यु देते हैं, परन्तु इसी महीनेमें जन्म तथा वर्षकाभी आरिष्ट हो तो मृत्यु
होतीहै अन्यथा मृत्युतुल्य कष्ट होताहै जो जन्मका आरेष्ट जिस
महीनेमें हो वर्षका न हो तो मासपूर्वाईमें मृत्युतुल्य कष्ट और वर्षका
अरिष्ट हो जन्मका उस महीनेमें न हो तो मासोत्तरार्द्धमें उक्त अरिष्ट मिलता है
यह कोई आचार्य कहते हैं ॥८॥
शार्दूलवि०-भावांशाधिपतिः स्वभावपनवशिशेनमैत्रीहशा
होवासहितः शशीचयदितौ मैत्रीहशालोकते ॥ तद्भावो-
त्थसुखविलोममथतद्वयत्यासतः कीर्तितं नीचास्तादिफलं
चलनवदिदंविद्भिरूगंधिया ॥९॥
ऐसेही संपूर्ण भावोंका विचार है कि जिस भावका नवांशस्वामी तथा
भावनाथनवांशस्वामी परस्पर मित्रहटिसे देखें तथा :चंद्रमाभी इन्हें मित्र-
वष्टिसे देखे तो इस महीने में उस भावसंबंधि शुभफल मिलताहै जो उक्त
ग्रह परस्पर शत्रुदृष्टि से देखें अथवा युक्त हों तथा चंद्रमाभी इन्हें शनुदृष्टि से
देखे तो तदारसंबंधि कष्टफल अवश्य मिलताहै ऐसेही नीच वा अस्तंगत
एक वा दोनो हों वोभी कष्टफल मिलताहै विद्वानोंने लमके सहश सबही
भायोंमें ऐसा विचार करना ॥ ९ ॥
इंद्रव०-लग्नेशमासेशसमेश्वरांशनाथायदंशाधिपमित्रदृष्टया ॥
दृष्टायुतावाशशिनाचतद्वद्भावोत्थसौख्यायनचेदनि म. ॥१०॥

भाषाटीकासमेता। (१८३) लमेश मासेरा वर्षेश और लमांशनाथ ये चारो वा इनमें से कोई जिस भावनवांशस्वामीसे मित्रदृष्टिसे देखे वा युक्त हों तथा चंद्रमाभी मित्र- दृष्टि से देखे वा युक्त हो तो उस भावसंबंधी सुख देताहै. ऐसे योगमें जो जन्मकाल योग उससे उस भावसंबंधी अनिष्ट फल हो तो यहां मध्यम फल जानना. जो जो जन्मसेभी शुभफली हों तो यहां अधिक शुभ जानना ऐसेही निर्बल और शत्रुदृष्टिसें अनिष्ट फल होताहै फल तारतम्यसे कहना अनुष्टु०-निर्बलाव्ययषष्ठाष्टपतयःशुभदायकाः ॥ अन्येसवीर्या शुभदाव्यत्ययेव्यत्ययःस्मृतः ॥ १३ ॥ बारहवें छठे आठवें भावके स्वामी तथा इनके नवांशस्वामी निर्बल और भावोंके स्वामी सबल हों तो शुभ फल देतेहैं और ६।८।१२ भावोंके स्वामी सबल और भावोंके अबल कष्टफल देतेहैं ॥ ११ ॥ उपजालमेशमासेशसमेशमुंथाधिपाः षडष्टोपगता सपापाः ॥ दृष्टाःखलैं शवशात्रमासेव्याध्यादिविद्विड्भयदुःखदास्युः॥१२॥ लग्नेश मासेश वर्षेश और मुंथश ६ । ८१ १२ भावोंमें हों पापयुक्तभी हों और पापग्रह शत्रुदृष्टिसे देखते हों तो इस मासमें रोगादि क्लेश तथा शत्रु: घातादि दुःख देतेहैं ॥ १२॥ इंदूव० केंत्रिकोणायगतास्तुलग्नमासाब्दपावीर्य्ययुतानराणाम् ॥ नैरुज्यशत्रुक्षयराज्यलाभमानोदयाद्भुतकीर्तिदास्युः ॥ १३ ॥ लग्नेश मासेश और वर्षेश बलवान हों तथा केंद्र त्रिकोण और ग्यारहवें हों तो नीरोगवा शत्रुक्षय कुलानुमान राज्यलाभ मान उदय अद्भुत कीर्ति देतेहैं ॥ १३॥ अनुष्टु०-इंथिहालप्रयोराशियोवलीतत्रहद्दपाः ।। दशेशाःस्वांशतुल्याहैरित्युक्तंकैश्चिदागमात् ॥ १४ ॥ यह सामान्य मासफल कहेहैं इसमें भी सूक्ष्म दशा और अंतर्दशासे जान- ना पात्यांशी दशाकी विधि पूर्ववतही है, जहां सौर वा सावन दिन३६० का (१८४) ताजिकनीलकण्ठी। कार्य है तहां मासदिन ३० से कार्य करना अन्यत् उसी रीतिसे मास प्रवेशकी दशा होतीहै,इसका प्रकट विवरण दशाविधिमें प्रथम लिखाहै. तैसेही अंतर्दशा गिननी चाहिये इनके अनुसार उच्च नीचादि बलाबल विवेकसे फल हना दशाभी अनेक प्रकारको हैं, जैसे पात्यांशी मुद्दाश्देवकीर्तित हद्दादशा ३ अनेक भेदसहित तासीरदशाधनिसर्गदशा ५ कालहोरा ६ लग्नादि राश्यादि. ग्रहदशा ७ भोग्यांशदशा ८ महादेवमतदशा ९ बलभद्रमताख्या १० गौरी- मताख्या ११ राममताख्या१२इन । विशेष विस्तार ताजिक मुक्तावलीमें है. यहां ग्रंथभूयस्त्व भयसे केवल प्रधान अंशदशाही आचार्य्यने कही है. मास- दशादिनादिज्ञानार्थ उपाय यह है कि मुंथा और मासलनमेंसें जो बलवान हो उस राशिमें जो भौमादि हृद्दास्वामीहैं वे अपने अपने अंशतुल्य दिन पाते हैं, जैसे वर्षलग्न स्पष्ट देखना 'मेगतो.' इत्यादिसे जो हदेश हैं वह प्रथम दशास्वामी तदनंतर क्रमसे होंगे, जैसे राशिक ३० अंश हैं इन्हें १२ से गुनांकर ३६० होते हैं ये सौरदशादिन हैं तदवही जितने हदांशहों उन्हें १२ से गुनाकर भौमादिकोंके दशादिनादि होते हैं प्रथम दशेशके भुक्तांश और ओग्यांश पृथक् १२ से गुनाकर भुक्त और भोग्य दशादिनादि होते हैं भुक्तदिनादि दशाके अंत्यमें आवेंगे यह देवकीर्तिमतले हद्दादशा प्रकार है इसी रीतिसे दिनप्रवेशमेंभी करना पात्यांश दशा उसीके उक्तभकारसे है ॥ १४ ॥ अनुष्टु०-वींदोरसमावेशान्नैतद्युक्तंपरेज ॥ दशांतरदशाब्देशफलमाब्दंतु युज्यते ॥ १५॥, जो किसीके मवसे सूर्य चंद्रमा और लग्नकी छोड दीहै यह प्रमाण नहीं है दशांतरदशाओंका फल वाँकही है तो यह भी दशामें होनेही चाहिये इसलिये पात्यांश मुद्दही मुख्य है ॥ १५ ॥ इति श्रीमहीधरकतायां नीलकंठीभाषाटीकायां मासप्रकरणम् ॥१५॥ अनुष्टु०-दिनप्रवेशकालेपिग्रहान्भावांश्वसाधयेत् ।। चंद्रलयांशकाभ्यांतुफलंतत्रवदेवधः ॥१६॥ दिनप्रवेशके लिये वर्षके तात्कालिक सूर्य स्पष्टमें जितना संख्याक

भाषाटीकासमेता।
(१८५)
दिनका दिनप्रवेश हो उसमें १ न्यून करके जोडदेना, कला विकला वही
रहँगी यही दिनप्रवेशका सूर्य स्पष्ट होगा इष्टकाल निकालनेकी युक्ति पूर्वो-
क्त ही है. उपरांत इस यके ग्रहस्पष्ट भावस्पष्ट करके चंद्रमा और लग्नके
नवांशवशसे मासप्रवेशतुल्य फल पंडितोंने कहना ॥ १६ ॥
अनुष्टु०-चतुष्कमिथिहेशादिदिनमासाब्दलग्नपाः ।।
एषांबलीतर्नुपश्यन्दिनेशः परिकीर्तितः।। १७॥
मुंथेश १ त्रिराशीश २ जन्मलग्नेश ३ दिनका सूर्यराशीश रात्रिका
चंद्रराशीश ४ दिनलग्नेश ५ मासलमेश ६ वर्षलग्नेश ७ ये दिनप्रवेशमें
अधिकारी हैं इनमेंसे लम देखनेवाला दिनेश होताहै विचारके पूर्वोक्तही
फल कहना ॥ १७ ॥
उपजा०-त्रिकोणकेन्द्रायगताष्शुभाश्चेचंद्रात्तनोबिलिन खलास्तु ॥
पव्यायगास्तत्रदिनेसुखानिविलासमानार्थयशोयुतानि ॥ १८॥
दिनप्रवेशके फल कहते हैं कि, शुभ ग्रह बलवान् लय वा चंद्रमासे
केंद्र ३।४।७।१० वा त्रिकोण ५।९ में हों तथा पापग्रह ३।६।११
स्थानोंमें हो तो इस दिनमें विलास सन्मान धन और यशसहित सुख होवे१८॥
उपजा०-पडष्टरिःष्फोपगतादिनाब्दमासेंथिहेशाःखलखेटयुक्ताः।
गदप्रदामानयशोहराश्च केंद्रात्रिकोणायगताः सुखात्यै ॥ १९॥
दिनेश वर्षेश मासेश और मुंथेश पापयुक्त ६।८।१२स्थानोंमें हों तो
इस दिन रोग देते हैं मान तथा यशकी हानि करते हैं जो केंद्र त्रिकोण और
ग्यारहवें हों तो सुख देते हैं ॥ १९ ॥
इंद्रव०-लग्नांशक सौम्यखगैःसमेतोदृष्टोपिवामित्रशेंदुनापि ॥
नैरुज्यराज्यादिशरीरपुष्टिमासोक्तिवदुःखमतोन्यथात्वे ॥२०॥
लयका अंश वा उसका स्वामी शुभयहोंसे युक्त वा दृष्टहों तथा चंद्रमा
उसे मित्रदृष्टि से देखे तो नीरोगता राजप्रबंधादि सुख शरीरकी पुष्टि होवे
जो वे निर्बल वादांच१२स्थानों में हों तो मासोक्त तुल्य दुःख होवे ऐसेही
सभी भावोंके अंशोंसे प्रत्येक भावोक्त शुभाशुभ कहना ॥ २० ॥

(३८६) वाजिकनीलकण्ठी।
इंद्रव०-यदंशकासौम्ययुतेक्षितोवास्निग्वेक्षणादावजसौख्यकृत्सः ॥
दुःखप्रद प्रोक्तवदन्यथात्वेभावेघुसवेष्वियमेवरीतिः ॥ २१ ॥
यहां नवांशविचार सभी भावोंमें तुल्य है जिस भावमें जो भाव स्पष्टका
नवांश है वह शुभग्रह वा मित्रग्रहोंसे युक्त वा दृष्ट तथा चंद्रमासे भी मित्र-
दृष्टि से देखाजाये तो उक्त भावसंबंधि सुख होवे यदि वह पापग्रहोंसे युक्त वा दृष्ट
तथा चंद्रमासे शत्रुदृष्टि करके देखा जावे तो उक्तभावसंबंधि क्लेश देता है
यही रीति सभी भावोंकी है ॥ २१ ॥
अनु०-पष्टांशक सौम्ययुतो रोगदापापयुक्छुभः ।।
व्ययांशे शुभयुग्दृष्टे सद्ययः पापतस्त्वसत् ॥ २२ ॥
किसी भावोंमें विचार औरतरहभी है जैसे छठे भावका नवांश शुभ-
ग्रहोंसे युक्त वा दृष्ट हो तो रोग करता है पापग्रहोंसे युक्त वा दृष्ट हो तो शुभ
अर्थात् नीरोगता देताहै ऐसेही बारहवें भावका अंश शुभ युक्त दृष्ट हो तो
(सध्ययः) देवता वालण आदिके कार्य व्यय और पापयुक्त दृष्टसे चोरी
दंड आदिसे व्यय होवे ॥ २२ ।।
अनुष्टु०-जायांशः सौम्ययुग्दृष्टः स्वन्त्रीसौख्यविलासकृत् ॥
पापग्रहः कलिवुःखं पापांतःस्थे मृति वदेत् ॥ २३ ॥
सप्तम भावांश शुभग्रहोंसे युक्त वा दृष्ट हो तो अपनी बीसे विलासादि
सौख्य करता है पापग्रहसे युक्त वा दृष्ट हो तो स्त्रियोंसे कलह, स्त्रीसंबंधी दुःख
होवे. जो वह नवांश पापोंके बीच हो तो स्त्रीमरण होवे, जो पाप ग्रह सप्तम
भाव में हो तो अन्यत्रीसंगम होवे शुभग्रहोंसे बहुत स्त्रीसौख्य होवे ॥ २३ ॥
अनुष्टु०-शुभमध्यस्थितेव्यंशे बहुलंकामिनीसुखम् ।।
स्वस्यारतिर्मुरावन्यखगेन्यासुरति वदेत् ॥२४॥
सप्तम भावांश जो शुभग्रहोंके बीच हो तो कामिनीसुख बहुत होने
बृहस्पतिसे युक्त वा दृष्ट हो तो अपनी त्रीसे, अन्य शुभग्रहोंसे हो तो
अन्यस्त्रियों से रति होवे ॥ २४ ॥

भाषाटीकासमेता। (१८७)
अनुष्टु०-मृत्यंशे मृत्युगे सौम्यैर्युग्दृष्टेमरणरणे ॥
मिमिश्रंखलै सौख्यंवर्षलग्नानुसारतः ॥२५॥
अष्टमभाव वा अष्टमभावनवांशकमें जो शुभ ग्रह हों वा देखें तो संग्राममें
मरण देतेहैं जो शुभग्रह तथा पापग्रहोंसेभी युक्त वा दृष्ट हों तो युद्धमें जय
वा नीरोगता होवे जो केवल पापग्रह अष्टमभाव तथा अष्टमभावनवांशमें हों
तो युद्धभी न होवे मरणभी न होवे अर्थात् नैरुज्य रहे ॥ २५ ॥
अनुष्ट-द्विादशेखलाहानिव्ययेसौम्बाःशुभंव्ययम् ॥
कर्तरीपापजारोगंकरोतिशुभजाशुभम् ।। २६॥
दूसरे बारहवें स्थानमें पापग्रह हानि और धन स्थानमें शुभ ग्रह धनलाभ
बारहवें शुभव्यय करते हैं यदि लपमें पापग्रहोंकी कर्चरी हो तो रोगादि
दुःख देतीहै शुभ ग्रहोंकी करी हो तो शुभ फल देतीहै ॥ २६ ॥
अनुष्टु०-लग्नेष्टमेवाक्षीणेंदुर्मृत्युदःपापदृग्युतः ॥
रोगोवाग्रहणवापिरिपुतःशस्त्रभीरपि ॥२७॥
लग्नसे अष्टम स्थानमें क्षीण चन्द्रमा पापयुक्त वा दृष्ट हो तो मृत्यु देताहै
अथवा रोग वा बंधन और शत्रुसे शस्त्रका भय होवे ॥ २७ ॥
उपजा०-चंद्रेसभौमेनिधनारिसंस्थेनृणांभयंशस्त्रकृतंपशोर्वा ॥
पापैःसुखस्थैःपतनंगजाश्वयानात्तनौस्याबहुलाचंपीडा ॥२८॥
चंद्रमा मंगल सहित छठा वा आठवां हो तो मनुष्योंको शस्त्रसे वा (पशु)
व्याघ्रादिसे भय होवे जो पापग्रह चतुर्थस्थानमें हों तो हाथी घोडा पालकी
आदि वाहनसे पवन होवे तथा शरीरमें बहुतसी पीडाभी होवे ॥ २८ ॥
अनुष्टु-शुभाछूनेविजयदाबूतादथसुखावहाः ।।
नवमेधर्मभाग्यार्थराजगौरवकीर्तयः ।। २९ ॥
शुभवह सप्तम स्थानमें जय करते हैं जुवामें धनलाभ तथा सुखभी
करतेहैं नवम स्थानमें शुभग्रह ऐश्वर्य धन राजासे गुरुता और कीर्ति
बढ़ातेहैं ॥ २९॥

(१८८) ताजिकनीलकण्ठी। अनुष्ट-दिनप्रवेशेस्तिविधुरवस्थायांतुयाशि॥ तदवस्थातुल्यफलमसौदत्तेनसंशयः॥३०॥ दिनप्रवेशमें चन्द्र जिस प्रकारको प्रवासादि अवस्था होवे उसी अवस्था के तुल्य फल देताहै मासप्रवेशमेंभी निस्संदेह ऐसाही विचार करना ॥३०॥ अनुष्टु०-विहायराशीश्चंद्रस्यभागाद्विनाःशरोद्धृताः॥ लब्धंगताअवस्थास्युभोंग्यायाःफलमादिशेत् ॥ ३० ॥ . अवस्थाके लिये तत्काल चन्द्रमाके स्पष्ट राशिको छोडकर शेष अंशा- दिको दोसे गुनाकर पांचसे भागलेना जो मिले.वह मुक्त अवस्था हुई उससे आगेकी भोग्या जो हो उसके अनुसार फल कहना अवस्थाओंके नाम.प्रवास, नाश, मरण, जय, हास्य, रति, क्रीडित, सुप्त, भुक्ति, ज्वराख्य, कंप, स्थिर यह ३२ हैं मेपके प्रवाससे वृषके नाशसे मिथुनके मरणसे ऐसेही मीनके स्थिरसे गिनतीका क्रम है अवस्था बारहही हैं यहां इनमेंसे प्रत्येक राशिके पांचपांच ही लिये हैं कोई सभी राशियोंमें प्रवासहीसे गिनतेहैं सो पक्षांतर है ॥३१॥ भुजंग-प्रवास प्रवासोपगेरात्रिनाथेऽर्थनाशस्तुनष्टोपगेमृत्युभीतिः॥ मृतावस्थितस्याजयायांजयस्तुविलासस्तुहास्योपगेकामिनीभिः॥३२॥ चंद्रमाकी अवस्थाओंका फल कहते हैं कि प्रवास अवस्था में चंद्रमा प्रवासही करताहै तथा नाशमें धननाश मरणमें मृत्युभय जयामें विजय हास्यमें स्त्रियोंसे विलास देताहै ॥ ३२॥ मु०-रतौस्यादतिःक्रीडितासौख्यदात्रीप्रसुप्तापिनिद्रांकलिंदेहपीडाम् ॥ भयंतापहानीसुखंस्युस्तुभुक्ताज्वराकंपितासुस्थितासुक्रमेण ॥३३॥ रतिमें (प्रीति ) प्रसन्नता क्रीडितमें सुख सुप्तामें निद्रा और कलह और देहपीडा भुक्तामें भय और ज्वराने संताप और कंपामें हानि स्थिरामें सुख ये क्रमसे अवस्थाओंके फल हैं यथार्थ मिलते हैं परन्तु चन्द्रमा अष्टम हो तो विपरीत फल देताहै ।। ३३ ॥ इति श्रीमहीधरकतायां नीलकंठीभाषाटीकायां दिनप्रवेशप्रकरणम् ॥१६॥ - भाषाटीकासमेता। (१८९) अथ मृगयाविचारः। भु० ०-सवीय्यौंकुजज्ञौनृपाखेटसिद्ध्यैनसिद्धयैयदावीर्य- हीनाविमौस्तः ॥ जलाखेटमा सवीय्यग्रहःलाख्यैनंगा- ख्यैर्नगारखेटमाहुः ॥ ३४॥ दिनप्रवेश लमसे जो मंगल बुध बलवान् विहित स्थानमें हों तो इस दिन प्रष्टा राजाको सिकार खेलनमें कार्यसिद्धि होगी जो उक्त ग्रह बलहीन हों तो सिकार नहीं मिलेगी पूर्व संज्ञाप्रकरणमें जलचर पर्वतचर, राशि और ग्रहभी कहेहैं उनके अनुसार फल कहना जैसे जलचर राशि एवं ग्रह बलवानहों तो जलचर जीवोंकी सिकार होगी जो पर्वतचर राशिमह बल- वान हों तो वनचरमृगया होगी विशेषतः दिनप्रवेश लग्न जलचर राश्यादि जैसे स्वभावका हो तथा जैसे स्वभावके ग्रहोंसे युक्त वा दृष्ट हों वैसी ही मृगया मिलतीहै, मिश्रितमें फलभी मिश्रितही कहना ॥ ३४ ॥ अनुष्टु०-लग्नास्तनाथौकेन्द्रस्थौनिर्बलौक्केशदायिनी ॥ मृगयोक्ताशुभफलाबलाढ्यौयदितौपुनः ॥ ३९॥ लग्नेश सप्तमेश केंद्रमें हों तथा बलवान हों तो खसे और उक्त ग्रह निर्बल हों तो क्लेश देनेवाली मृगया होगी ॥ ३५॥ अथ भोजनचिंता। लग्नाधिपोभोज्यदातासुखेशोभोज्यमीरितम् ।। बुभुक्षामदपःकर्मपतिभोक्तेति चिंतयेत् ॥ ३६॥ दिनप्रवेश लनसे वा प्रश्नलनसे लग्नस्वामी भोजनदेनेवाला चतुर्थेश भो जनयोग्य अन्न सप्तमेश भोजनकी इच्छा अर्थात् भूख वा रुचि और द- शमेश भोजन करनेवाला जानना इनके बलाबलसे उक्त कामोंकी प्राप्ति अ- प्राप्ति कहनी जैसे लग्नेश शुभस्थानगत बलवान् हो तो भोजन देनेवाला भो- जन श्रद्धासे देवे निर्बल हो तो वह ( अश्रद्धा) कोपादिसे देवे ऐसेही चतुर्थेश बलवान हो तो भोज्य अन्न अच्छा मिलेगा निर्बल होने न मिले वा निंद्य (१९०) वाजिकनीलकण्ठी। अन्न मिले सप्तमेश बलवान हो तो रुचि भोजनमें अच्छी होगी, निर्बलहो तो क्षुधामंद अरुचि आदि होंगी, दशमेश बली हो तो खानेवाला प्रसन्नतापूर्वक भोजन करेगा निर्बल हो तो भोजनमें किसी प्रकारका विघ्न होजायगा॥३६॥ अनुष्टु०-लग्नेलाभेचसत्खेटयुतह सुभोजनम् ॥ जीवेलग्नेसितेवापि भोज्यंदुःस्थितावपि ॥ ३७॥ लग्न तथा लाभस्थानमें शुभग्रह हों अथवा इन्हें देखें तो सुभोजन दूध दही घृत मीठा आदि मिलेंगे तथा लममें बृहस्पति वा शुकहों तो क्लेशनिवा- समें भी सुभोजन मिले ॥ ३७ ॥ अनुष्टु०-मंदतमसिवालग्ने सूर्येणालोकितेयुते ॥ लभ्यतेभोजनंनात्र शस्त्रादीतिस्तदा क्वचित् ॥ ३८॥ शनि वा राहु लग्नमें हो सूर्य्यकी दृष्टि भी हो तो यत्न करनेसे भी भोजन इस दिन प्राप्त न होवे कहीं शस्त्रका भय तो होवे ॥ ३८ ॥ अनुष्टु-रविदृष्टयुतंवापि लग्नंयदिनतत्रहि ॥ . उपवासस्तदावाच्योनक्तं वाविरसाशनम् ॥ ३९ ॥ जो लम सूर्यसे युक्त वा दृष्टभी न हो तो प्रथम तो निराहारही होवे अथवा रात्रिको निरस भोजन रूखा सूखा मिले ॥ ३९ ॥ अनुष्टु०-चन्द्रे कर्मगतेभोज्यमुष्णशीतंसुखेकुजे ॥ तुर्यस्थखेटवशतो भोज्यानरसमादिशेत् ॥४०॥ जो दिन वा पृच्छा लग्नसे चन्द्रमा दशम हो तो ( उष्ण ) गर्मागर्म भोजन मिले जो मंगल दशम हो तो (शीत ) ठंढावासी भोजन मिले और चतुर्थ- स्थान में जो ग्रह हो उसके उक्त रसानुसार मिले जैसे सूर्यसे कडुआ चन्द्रमासे सलोना, मंगलसे तीखा, बुधसे मिलाहुआ. बृहस्पतिसे मीठा शुक्रसे खडा शनिसे ( कषाय) क्वाथ कांजी सिरका आदि बहुत दिनका संपादित मिलतेहैं ॥ ४०॥ अनुष्टु०-स्निग्धम सितेतुय्यतैलसंस्कृतमर्कज ॥ नीचोपगेकदशनंविर नमसंस्कृतम् ॥११॥ -

भाषाटीकासमेवा ।
(१९३)
शुक्र चतुर्थ हो तो धोके पकवान शनि चतुर्थ हो वो तेलके पकवान
तथा सरस मिलें, जो चतुर्थमें नीचगत ग्रह हो तो निकम्मा स्वादरहित
कच्चा पदार्थ भोजन मिले ।। ४१ ॥
उपजा०-सूर्यादिभिर्लग्नगतैः सवय्ये राजादिगेहे भुजिमामनंति ॥
सुखसुखेशेसबलेसुभोज्यं चरादिकेस्यादसकृत्सकृतिः॥४२॥
सूर्यादिकोंमें जो उच्चादि बलयुक्त लमगत- हो उसके जातिअनुसार
राजादिके घरमें भोजन होवे जैसे सूर्यसे राजगृह चंद्रमासे वैश्य मंगलसे
क्षत्रिय बुधसे शूद्र बृहस्पतिसे ब्राह्मण शुक्रसेभी ब्राह्मण और शनिसे शूद्रके,
जो चतुर्थेश बलवान् चतुर्थहीमें हो तो अनेक पकवान युक्त भोजन मिले
जो चतुर्थमें दुष्ट ग्रह हो तो कष्टसे मिले जो लग्नमें चरराशि तो अनेक-
वार, स्थिरराशि हो तो एकवार मिले द्विस्वभाव हो तो दोवार ॥४२॥
अनुष्टु०-मूलत्रिकोणगेखेटेलनेपितृगृहेशनम् ॥
मित्रालये मित्रभस्थे शत्रुगेहोरंगेहगे ॥४३॥
लग्नगत ग्रह अपने मूलत्रिकोणमें हो तो पिताके वा अपने घरमें मित्ररा-
शिका हो तो मित्रके शत्रुराशिका हो तो शत्रुके घरमें भोजन होवे लममें कोई
ग्रह न हो तो जिसकी पूर्ण दृष्टि लग्नपरहो उसके अनुसार भोजनगृह कहना४३
शुभेक्षितेयुतेलग्नेबलाढये स्वगृहे जिः ।।
ग्रहराशिस्वभावेन यत्नादन्यत्रचिंतयेत् ॥ १४ ॥
लग्न शुभ ग्रहसे युक्त वा दृष्ट हो बलवान् भी हो वो अपने घरमें भोजन होवे
ऐसेही ग्रहकी राशि स्वभावके अनुसार यत्नसे औरघरभी भोजनके कहना४४
उपजा-तिला मर्के हिमगौसुतंडुलाभौमे मसूराश्चणकाश्चभोज्यम् ।।
बुधे समुद्गाः खलु राजमाषा गुरौ सगोधूमभुजिः सवीये ॥ ४६॥
लग्नगत जो बलवान हो तथा लममें न हो तो दृष्टिवालेसे अन्न कहना
जैसे सूर्यसे तिल चंद्रमासे चावल मंगलसे मसूर और चना, बुधसे मूंग तथा
राजमाष ( खांश) बृहस्पतिसे गेहूं ॥.४५ ॥
उपजाति - क्रेयवाबाजरिकायुगंधराःशनौकुलित्थादिसमाषम म् ॥
भोज्यंतषानीशखिराहुवी-च्छुभंग्रहालोकनतःसहर्षम् ॥ ४६॥

(१९२) वाजिकनीलकण्ठी।
शुक्रसे जौ, बाजरा आदि शनिसे कुलत्य कैथ मक्का खिसरी उडद
आदि राहु केतुसे कोदों कांगनी सामा आदि भूसी सहित ( वेछाँटे ) अन्न
मिले ये प्रधान अन्न हैं. उक्तान आदि भोजन मिलेंगे कहना. उस ग्रह-
पर शुभग्रहकी दृष्टि हो तो शीसे पापयुत दृष्टि हो तो सकोप ( कलहा-
दिसे ) भोजन होवे ॥ ४६॥
सूय्यमूलंपुष्पमिन्दौकुजेस्यात्पत्रंशाखाचापिशाकंसवीर्ये ।।
शुक्रेज्यज्ञैव्यंजनभूरिभेदमन्दनत्थंसामिपंराहुकेत्वोः ॥४७॥
भोज्यरूप सूर्य हो तो मूल (जडका ) शाक चन्द्र हो तो पुष्प कुज हो तो
पत्ता और डार शुक्र गुरु निष्पाप बुध हों तो अनेक तरहके व्यंजन शनि राहु
केतु हो तो मांस वा तेलकी बनी तरकारी मिलै ।। ४७ ॥
अथ स्वप्नचिन्ता।
शालिनी०-लग्नांशगेकै तनुगेपिवास्मिन्दुःस्वप्नमीक्षेतयथाविवम् ॥
रक्तांबरं वह्निमथापि चंद्रे शुभ्राश्वरत्नांबरपुष्पवज्रम् ॥४८॥
अव स्वमविचार दिनप्रवेश वा प्रश्नलग्नसे कहते हैं कि जो सूर्य लग्न वा
लग्ननवशांकमें हो तो इस दिन दुःस्वम देखेगा जैसे स्वममें सूर्यवि रक्त वस्त्र
अथवा अग्नि देखे चंद्रमा हो तो श्वेत रंग घोड़ा वस्न पुप्प हीराआदि देखे४८
उपजा-स्त्रियः सुरूपाश्च कुजे सुवर्ण रक्तांबरस्रक्पशविद्माणि ॥
बुधेहयः स्वगतिधर्मवार्ता गुरोरतिधर्मकथा सुरक्षा ॥ १९ ॥
चंद्रमा हो तो सुरूप स्त्री भी देखे. मंगल हो तो सुवर्ण रक्तवत्र रक्तपुष्प
मुर्ख रंगके पशु और मूंगा आदि. बुध हो तो घोडा और स्वर्गगमन वा स्वर्ग-
सम सुख तथा धर्मसंबंधि वार्ता बृहस्पति हो तो अपने प्रीत्यनुसार वस्तु
धर्मसंबंधि कथा और देवताओंका दर्शन देखे ॥ ४९ ॥
उपजा-सबंधुसंगश्च सितेजलानां पारेगतिर्देवरतिविलासः॥
शनावरण्यादिगतिश्चनीचैः संगच राहौ शिखिनीत्थमेव ॥५०॥
शुक्र हो तो सुबांधवोंका संगम तथा जलोंको तिरके पारगति देवताओंसे
प्रीति विलासादि सुख देखे. शनि हो तो वन पर्वत गमन नीचजन संगति
होवे राहु केतुकाभी ऐसाही फल है ॥ ५० ॥

भाषाटीकासमेवा। ( १९३) सहजधीमदनायरिपुस्थितों यदि शशी रुभानुसितेक्षितः॥ नवमकेन्द्रगते शुभेचस्वबलयामनुजोरमतेतदा ॥५१॥ चन्द्रमा ३।५। ७ । १३ । ६ इन स्थानों में हो और बृहस्पति सूर्य शुक्रसे देखा जाताहो और ९।१।४।७।३० इन स्थानों में सबमें वा कोईमेंभी शुभ ग्रह हों तो मनुष्य स्वनमें अति सुन्दरीत्रीसे रमण करताहै ॥ ५१ ॥ वसंतति -आसीदसीमगुणमंडितपंडिताग्र्यो व्याख्यद्भुजंगप- गवीश्रुतिवित्सुवृत्तः ॥ साहित्यरीतिनि जोगणितागमज्ञश्चिंता- मणिवि लगर्गकुलावतंसः॥१२॥ आचार्य स्वनामधेय प्रकट करता है कि अगणित गुणोंसे भषित पंडितोंमें मुख्यतम भुजंगपगवी अर्थात् शेषभाग्यको पढ़ावनेवाला वेदका जानने- वाला साहित्यशास्त्र परिपाटी निपुण गणितादि समस्त ज्योतिषशास्त्र पारंगम, गर्गकुलमें उत्पन्न चिंतामणि दैवज्ञ हुए ॥ ५२ ॥ उपजा०-तदात्मजोनंतगुणोस्त्यनंतो योऽधोक् सदुक्तिं किल काम- धेनुम् ॥ संतुष्टयेजातकपद्धतिचन्यरूपयदुष्टमनिरस्य ॥ ५३॥ चिंतामणि दैवज्ञका पुत्र असंख्यगुणयुक्त अनंतनामा हुवा जिसने काम- धेनु गणितकी टीका करी तथा सदैवज्ञोंको संतुष्ट करनेके लिये जन्मपद्धति संप्रदायानभिज्ञोंका दुष्ट मत निराकरण करके जिसने जातकपद्धति बनाई ५३ उपजा-पांबयासाविततो विपश्चिच्छीनीलकंठःश्रुतिशास्त्रनिष्ठः॥ विच्छिवीतिकरंव्यधासीत्समाविवेकंमृगयावतंसम् ॥५४॥ शाके नन्दा १५०९भ्रबाणेन्दुमित अश्विनमासको।शुऽष्टम्यांसमातं- नीलकंठबुधोऽकरोत्।।९||इतिश्रीगर्गवंशो नील वर्षतंत्रसमाप्तम् ॥ अनन्त दैवज्ञका पुत्र जिसकी माताका नाम पद्मावती है विद्वान् वेदशा- स्त्रज्ञ श्रीनीलकंठ दैवज्ञ हुआ जिसने समाविवेकनामक ज्योतिषका एक प्रकरण वर्षफल सूचक शिवप्रीतिकारक बनाया ॥ ५४ ॥ ५५ ॥ इति श्रीमहीधरकतायां नीलकंठीभाषाटीकायां फलतन्त्रे दिनप्रवेश- भोजनस्वमचिंताकथनं नाम सप्तदशोऽध्यायः ॥ १७ ॥ १३

श्रीगणेशाय नमः ।
अथ नीलकंठीप्रश्वतंत्रःप्रारभ्यते
शूमिका।
नीलकंठदैवज्ञलत नीलकंठी तीन तंत्रकी प्रथा है परन्तु तीसरा प्रश्नतन्त्र
केवल नीलकंठाचार्यरुत सांप्रतमें समय प्रभावके कारणांतरोंसे दुष्प्राप्य है,
जन्मविचारवैपयिक ग्रंथ बृहज्जातक एवं वर्षवैषयिक ताजिकनीलकंठी दो
तंत्रोंके भाषाटीका सर्वसाधारणके प्रसन्नतानिमित्त यथामति बनाये उपरांत
तदनुगामी प्रश्नप्रकरण जो कि, जातक ताजिक ग्रन्थ देखनेवालोंको अवश्यही
उपयोगी है. यद्यपि उक्तजातक ताजिकोंमें बहुधा यही विचार प्रश्नमें भी करना
लिखनेसे प्रश्नग्रंथका अंतर्भाव अर्थात् प्रश्नपथका प्रयोजन उन्हीमें आलिया,
तथापि पूर्वाचार्यो शिष्टाचार एवं प्रकटताके लिये अनेकानेक ग्रन्थ नीलकंठ-
मतानुसारी होनेसे नीलकंठीनाम भयाहै, चमत्कारी प्रश्नग्रंथकी भाषाटीका
यथामति करताहूं सज्जनजन स्वीय सौजन्यतासे अंगीकार करें, संस्कृत विद्या
अद्वितीय है कोई वस्तुमात्र इससे रहित नहीं है जो रहित हो वह चतुर्दश
भुवनमें हैही नहीं परन्तु भारतवर्षमें विद्याके नाश होनेका मुख्य कारणं यही
है कि जो लोग कोई अनूठी विद्या वा कला एवं औषधि मन्त्र आदि चमत्कृत
जानते हैं वे दूसरेको सिखलानेमें मत्संरी होकर प्रकट नहीं बतलाते, उनके
देहांत समयमें वह उन्हीके साथ गई आगे विद्या कहांसे बढ़े ! इस वातको
विचार मैंने बृहज्जातक एवं नीलकंठी तीनहूं तंत्रोंमें ज्योतिपशाखमें जो
बहुधा संकेत रहते हैं वे यथावकाश प्रकटही करदियेहैं।
अनुष्ट-दैवज्ञस्यहि देवेन सदसत्फलवां या ॥
अवश्यं गोचरे मर्त्यः सर्वः समुपनीयते ॥१॥
प्राक्तन कर्मको दैव कहतेहैं जैसा मनुष्यने कर्म किया वैसेही फलभी अ-
वश्य पावैगा उसके शुभाशुभ परिपाको जानने की इच्छा दैवज्ञकी हो तो ग्रह
गोचर अर्थात् यहचारसे सम्पूर्ण कहसकताहै ॥ १ ॥

भाषाटीकासमेता। (१९५) अनुष्टु०-अश्रौषीच पुराविष्णोर्ज्ञानार्थे समुपस्थितः॥ वचनं लोकनाथोपि झा प्रश्नादिनिर्णयम् ॥२॥ पहिले किसी कालमें लोकनाथ ब्रह्मा कर्मपरिपाकके जाननेके लिये विष्णुके पास गये उनसे प्रश्न स्वर शकुनादिकोंके निर्णयवचन सुनकर संसा- -रमें ज्योतिषहारा प्रकटकिया ॥२॥ वसन्त०-तस्मान्नृपः कुसुमरत्नफलाग्रहस्तः प्रातः प्रणम्य वरयेदपि प्राङ्मुखस्थः । होरांगशास्त्रकुशलान्हितकारिणश्च संहत्यदेवगणकान्सकृदेव पृच्छेत् ।।३।। तस्मात् प्रश्न पूछनेवाला राजा [यहां राजा उपलक्षणार्थ कहा गया] पुष्प रत्न फल आदि मंगल वस्तु दाहिने हाथमें लेकर प्रातःकाल प्रणामपूर्वक ज्योतिषीका वरण प्रश्ननिमित्त करे, तदनन्तर होरानामक ज्योतिषश रंगीभू- तके जाननेवाले हितकारी गणकोंको इकठा करके स्वल्पाक्षरोंसे एकहीवार प्रश्न पूछे ॥३॥ आर्या-दशभेदं ग्रहगणितं जातकमवलोक्य निरवशेषमपि । यः कथयति शुभमशुभं तस्य न मिथ्या भवेद्वाणी ॥४॥ प्रश्न पूछने उपरांत जो गणक दशप्रकार स्पष्टभाव बलाबलस्थानादियहग- णित एवं जातक मत सम्पूर्ण देखकर शुभाशुभ फल कहता है उसकी वाणी मिथ्या नहीं होती ॥४॥ अथादौ प्रष्टुः परीक्षा। आर्या-ऋजुरयमनजुर्वायंभ्रष्टा पूर्व परीक्ष्यलग्नबलात् ॥ गणकेन फलं वाच्यं दैवं तचित्तगं स्फुरति ॥१॥ पूछनेवालेका चित्त सरल वा वन कैसाहै इस विचारमें गणकने ल लसे प्रथम परीक्षा करके फल कहना. प्रष्टाले चित्तानुवर्ती दैव प्राक्तन कर्म- पाक लग्नविचार द्वारा गणकको स्कुरण होजाताहै ॥ १ ॥ आर्या-लनस्थे शशिनि शनी केंद्रस्थेने दिनेशरश्मिगते । भौमज्ञयोः समदृशा लग्नगचंद्रेऽनृजुः प्रष्टा ॥२॥ जैसे लग्नमें चंद्रमा केंद्रमें शनि और बुध अस्तंगत हो तथा लयमें चन्द्रमा

.
(१९६) . ताजिकनीलकण्ठी।
मंगल बुधकी पूर्ण दृष्टि से दृष्ट हो तो प्रष्टा कुटिल जानना ॥२॥
आर्या-लग्नेशुभग्रहयुते सरल क्रूरान्विते भवेत्कुटिलः ॥
लग्नेस्ते सौम्यदृशा विधुगुरुदृष्ट्या च सरलोयम् ॥ ३॥
लग्नमें शुभग्रह हों तो सरल और पापग्रह हों तो कुटिल तथा लम और
सप्तम स्थानमें शुभ ग्रहोंकी दृष्टि हो वा चन्द्रमापर बुध बृहस्पतिकी दृष्टि हो
तो सरलचित्त जानना ॥३॥
आर्या-यदिगुरुबुधयोरेकः पश्यत्यस्ताधिपंचरिपुट्ट या।।
तत्कुटिलः प्रष्टा खल्वनयोः सौम्यदृष्टितः साधुः ॥ ४॥
जो बुध बृहस्पति सप्तमेशको शत्रुदृष्टि से देखें तो कुटिल और इनकी
उसपर मित्रदृष्टि हो तो सरलचित्त प्रष्टा जानना ॥ ४ ॥
आर्या-सम्यग्विचार्यलगंब्रूयात्प्रभंसकृयथाशास्त्रम् ॥
यस्त्वेकंब्रूतसौतस्यनमिथ्याभवेद्वाणी ॥१॥
ज्योतिषी भले प्रकार लग्नविचारके थोडे प्रश्नको शास्त्रकी आज्ञानुसार
जो एक प्रश्न कहता है उसकी वाणी मिथ्या नहीं होती अर्थात् एक लपमें
बहुत प्रश्न सत्योत्तर नहीं होते ॥ १ ॥ बहुप्रश्शेविषये-
अनु०-बहून्प्रश्नानथो प्रष्टा युगपद्यदि पृच्छति
तत्रतेषांविधिवक्ष्येशास्त्रतोलोकतुष्टये ॥२॥
जब प्रष्टा एकहीवार बहुत प्रश्न पूछताहै तो उनके. उत्तरके कहनेकी
विधि लोकोंकी तुष्टिको शास्त्रसे कहताहूं ॥ २ ॥
आर्या-आदिमंलग्नतोज्ञानं चन्द्रस्थानाहितीयकम् ।।
सुर्य्यस्थानात्तृतीयस्यात्तुर्यजीवगृहाद्भवेत् ॥३॥
धभृग्वोबलीयः स्यात्तदहापंचमंपुनः॥
राश्यानुरूपंकथयेत्संज्ञाध्यायोक्तवद्धः॥४॥
पहिला प्रश्न लमसे दूसरा चन्द्रस्थानसे तीसरा सूर्य स्थानसे चौथा बृह,
स्पतिकी राशिसे पांचवां बुध शुक्रमेंसे जो बलवान् हो उसकी राशिके अनुसार
जो राशियोंका धातु रूप रंग आकार गुण संज्ञाध्यायमें कहे हैं उनके प्रभावसे
प्रश्न कहना, वह विस्तार आगे लिखा जायगा ॥३॥४॥

भाषाटीकासमेता। (१९७)
अथावस्था।
अनुष्टु०-दीप्तोदीनोथमुदितः स्वस्थःसुप्तोनिपीडितः॥
मुषित पारहीनश्चसुवीर्यश्वाधिवीर्यकः ॥ १॥
ग्रहोंके दश भेदोंके नाम दीन, दीन, मुदित, स्वस्थ, सुप्त, पीडित, मुषित,
परिहीन, सुवीर्य और अधिवीर्य ये दशभेद हैं ॥ १ ॥
अनुष्टु०--स्वोच्चेदीप्तःसमाख्यातोनीचेदीनःप्रकीर्तितः ॥ मुदितोमित्र
गेहस्थःस्वस्थश्च स्वगृहे स्थितः॥२॥शत्रुगेहे स्थितःसुप्तोजितो-
न्येननिपीडितः॥ नीचाभिमुखगोहीनोमुषितोऽस्तंगतोग्रहः ॥३॥
सुवीर्यःकथितः प्राज्ञैः स्वो राभिमुखसंस्थितः ॥ अधिवीयों
निगदितः सुरश्मिः शुभवर्गगः॥४॥
अपने उच्चराशिका ग्रह दीप्त, नीचका दीन, मित्रराशिका मुदित, अपनी
राशिका स्वस्थ, शत्रुराशिका सुप्त, अन्यपापसे आक्रांत पीडित, नीचाभि-
लाषी हीन, अस्तंगत मुषित, उच्चाभिलाषी सुवीर्य्य और रश्मि अधिक तथा
शुभांशकमें अधिक अधिवीर्य कहाताहै ॥ २॥ ३ ॥ ४ ॥
अनुष्ट-दीप्तेसिद्धिश्चकार्याणां दीनदुःखसमागमः।स्वस्थेकी-
त्तिस्तथालक्ष्मीरानंदोमुदितमहान् ॥ ५ ॥ सुप्तेरिघुभयंदुःखं
धनहानिनिपीडिते॥ मुदितेपरिहीनेचकार्य्यनाशार्थसंक्षयः॥
॥ ६॥ गजाश्वकनकावाप्तिःसुवीय्यर संपदः ॥ अधिवीर्य
राज्यलब्धिहैमित्रार्थसंगमः ॥७॥
अवस्थाओंके फल कहते हैं कि दीप्त अवस्थामें ग्रह कार्यसिद्धि
करताहै, तथा दीनमें दुःखागम, स्वस्थमें कीर्ति और लक्ष्मी, मुदितमें बड़ा
आनंद, सुप्तमें शत्रुभय तथा दुःख, पीडितमें धनहानि, मुषित और परिहीनमें
कार्य्यनाश धननाश, सुवीर्यमें हाथी घोडे सुवर्ण और रत्नोंकी संपत्ति, अधि-
वीर्यमें राज्यलाभ, तथा मित्र और धनका संगम होताहै ॥ ५॥ ६॥ ७ ॥
अथ ग्रहस्वरूपम् ।
अgo-पूर्वःसत्त्वंनृपस्तातःक्षत्रंग्रीष्मोऽरुण लः ॥
मधुदृक्पत्तिकोधातुःशूरःसूक्ष्मकचोरविः ॥१॥

गौरवर्ण, " (१९८) ताजिकनीलकण्ठी। पूर्वदिशाका स्वामी, सत्वगुण, राजा, पिता, क्षत्रिय जाति, भीष्मऋतु, रक्त- वर्ण, चपलस्वभाव, शहतके रंग सदृश नेत्र, पित्तधात्तु शूरमा और बारीक केश ये रूप गुण सूर्यके हैं ॥ १॥ कफोवर्षामृदुर्मातापयो गौरश्चसात्त्विकः॥ जीवावश्यश्चरोवृत्तोमारुताशोविधुः सुह..॥२॥ कफ धातु, वर्षा ऋतु, कोमल शरीर, मातास्थान, जलतत्त्व सत्वगुण, प्राणदाता, वैश्यजाति, चरस्वभाव, गोलाकार, वायव्य दिशाका स्वामी, सुहावने नेत्र ये रूप गुण चंद्रमाके हैं ॥ २ ॥ ग्रीष्मःक्षत्रतमोरलोयाम्यासेनाग्रणीश्वरः। युवाधातुश्चपिंगाक्षःक्रूर पित्तंशिखीकुजः॥३॥ ग्रीष्मऋतु क्षत्रियजाति तमोगुण रक्तवर्ण दक्षिण दिशाका स्वामी सेनापति चरस्वभाव, युवावस्था शुक्रधातु पीले नेत्र क्रूरमकति पित्तप्रधान. अनि ये रूप गुण मंगलके हैं ॥ ३॥ शरदीशोहरिदीर्घःपंढोमूलंकुमारकः ।। लिपिज्ञउत्तरेशश्चशूद्रःसौम्यस्त्रिधातुकः ॥ ४॥ शरदऋतु हरितरंग लंबा. शरीर नपुंसक मूर्लवस्तुका स्वामी कुमार अवस्था लिपि ( शिल्पविद्या जाननेवाला ) उत्तरदिशाका स्वामी शूद्रजाति सौम्य प्रकृति वातादि तीनों धातु ये रूप गुण बुधकेहैं ॥ ४ ॥ सत्त्वंपीतोहिमश्लेष्मादीघोंमंत्रीद्विजोनरः ।। मध्वैशानीकफोजीवोमधुपिंगलहक्तथा ॥६॥ सत्वगुण, पीलारंग, हिमस्वभाव, श्लेष्मप्रकृति, लंबा शरीर, मंत्रज्ञ, ब्राह्मण जाति, पुरुष, मधुरप्रिय, ईशानदिशाका स्वामी, कफयांतु, शहतसे नेत्रोंका रंग ये गुण बृहस्पतिके हैं ॥ ५॥ अनुष्टु०-शुक्रःशांतो द्विजोनारीवैश्यो मंत्री चरः सितः ॥ आग्नेयीदिकूकफश्वाम्लः कुटिलासित र्द्धजः॥६॥. - -

7
भाषाटीकासमेता।
(१९९)
शांतस्वभाव बालगजाति स्त्रीवेषधारी मंत्रज्ञ चरस्वभाव श्वेतरंग आनेय-
दिशापति कफप्रधान खट्टारस श्याम और कुंचित केश ये गुण शुक्रके हैं॥६॥
कृष्णस्तमाकृशोवृद्ध पंढोमूलांत्यजोऽलसः॥
शिशिरःपवनः रम्पश्चिमो वातुल शनिः॥७॥
कृष्णरंग तमोगुण कशअंग वृद्धावस्था नपुंसक मूलवस्तु चांडालेश
आलसी शिशिरऋतुका स्वामी वायुधातु करस्वभाव पश्चिमदिशाका स्वामी
वाचाल ये रूप गुण शनिके हैं ॥ ७ ॥
राहुर्धातुःशिवीमूलं शेषमन्यच्चमंदवत् ॥
चिंतनीयं विलमेशात्केंद्रगाद्वाबलाधिकात् ॥ ८॥
राहु धातुप्रधान जटाधारी मलवस्तु है, शेष गुण शनिके तुल्य जानना
केतु भी ऐसाही जानना, लग्न वा लग्नेश अथवा जो ग्रह सर्वोत्तम बली है
उसके अनुसार प्रश्नमें ल ग कहने विशेष गुण तथा राशियों के गुण प्रथम
तंत्रसंज्ञाध्यायमें चक्रन्यास सहित प्रकट लिखेहैं ॥ ८॥
अथ भावनिर्णयः।
सौख्यमायुर्वयोजातिरारोग्यंलक्षणं णम् ॥
केशाकृतीरूपवर्णस्तनोवित्यं विचक्षणैः॥१॥
ख, आयु, अवस्था, जाति, नैरुज्य, शरीरलक्षण, गुण, क्लेश, आकति
रूप और रंग इतने विचार लमभाव विचक्षणोंको विचारणीय हैं ॥१॥
मुक्ताफलंचमाणिक्यरत्नधातुधनांबरम् ॥
हयकार्याध्वविज्ञानं वित्तस्थानादिलोकयेत् ॥२॥
मोती माणिक आदि रत्न, सुवर्णादि धातु वस्त्र अश्वकार्ये मार्ग संबंधी
ज्ञान इतने वस्तुके विचार दूसरे भावसे करना ॥ २॥
भगिनीभ्रातृभृत्यानांदासकर्मकृतामपि ॥
कुर्वीतवीक्षणं विद्वान् सम्यग्दुश्चिक्यवेश्मतः ॥३॥
बहिन भाई, नौकर दास और कार्य करनेवाला उपलक्षणसे व्यापार
पराक्रम भी विद्वानोंको तीसरे भावसे विचार करना योग्य है ॥ ३ ॥

. (२००) ताजिकनीलकण्ठी। वाटिकाखलकक्षेत्रमहौषधिनिधीनपि ॥ विवरादिप्रवेशच पश्येत्पातालतोबुधः॥४॥ बावडी खरिहान खेती औषधि अन्नादि निधि ( उत्तमयस्तु ) भूमिगत द्रव्यादि और रंध कंदरा सुरंग आदिकोंमें प्रवेश,इतने चतुर्थभावसे देखने ॥४॥ गर्भापत्यविनेयानां मन्त्रसन्धानयोरपि । विद्याधुद्धिप्रबंधानां सुतस्थाने विनिर्णयः॥५॥ गर्भधारण, सन्तान, नम्रता, बुद्धि, मन्त्रका सन्धान, मसोदा आदि विद्या तथा बुद्धिका प्रबन्ध इत्यादि पंचम भावसे विचारना ॥ ५॥ अनु -चौरभीरिपुसंग्रामखरोष्टक्रूरकर्मणाम् ॥ मातुलातंकभृत्यानां रिपुस्थानाद्विनिर्णयः॥६॥ चौरभीति, शत्रु संग्राम, और खर, ऊंट तथा क्रूरकर्म, मातुलपक्ष, रोग, चाकर, इनका विचार छठे स्थानसे करना ॥ ६ ॥ वाणिज्यं व्यवहारंच विवादंचसमंपरैः। गमागमकलत्राणि पश्येत्प्राज्ञः कलत्रतः॥ ७ ॥ व्यापार वणिग्वृत्ति अन्यके साथ विवाद वा संधि तथा गमन आगमन स्त्री इतने विचार सप्तमभावसे करने ॥ ७ ॥ नद्युत्तारेध्ववैषम्ये दुगै चश संकटे । नष्टेदुष्टेरणेव्याधौछिदेछिद्भनिरीक्षयेत् ॥ ८॥ नयादितारण, मार्गविचार, विषमस्थान, किला, शस्त्रसंकट आदि कठि- नाई, तथा नष्टता, दुष्टता, रणरोग, छिद्रता,गृहच्छिद्र वा विवरादि इतने विचार अष्टम भावसे देखना ॥ ८॥ वापीकूपतडागादि प्रपादेवगृहाणिच ॥ दीक्षायात्रांमठंधमै धर्मानिश्चित्यकत्तियेत् ॥ ९॥ बावडी, कृप,तालाव आदि जलाशय, तथा प्रपा ( पाउ) देवमंदिर, उप- देश, यात्रा, मठ, और धर्मकार्य नवमस्थानसे विचारके कहना ॥ ९ ॥ . .

भाषाटीकासमेवा । (२०१)
राज्यमुद्रांपरंपुण्यंस्थानंतातं प्रयोजनम् ॥
वृण्यादिव्योमवृत्तांतव्योगस्थानानिरीक्षयेत् ॥१०॥
राज्य, मुद्राआदिचिह्न और पुण्य, निवासस्थान, पिता तथा प्रयोजन,
वर्षाआदि आकाशका वृत्तांत, दशमभावसे देखना ॥ १० ॥
गजाश्वयानवस्त्राणि सस्यकांचनकन्यकाः॥
विद्वान् विद्यार्थयोलाभ लक्षयेल्लाभभावतः ॥ ११ ॥
हाथी घोडे डोली आदि सवारी वस्त्र अन्न सुवर्ण कन्या विद्या तथा
धनका लाभ पांडित्य ग्यारहवें स्थानसे देखना ॥११॥
त्यागभोगविवादेषु दानेष्ट पिकर्मसु ।।
व्यवस्थाने सवै विद्धि विद्वन्व्ययं व्ययात् ॥ १२ ॥
त्याग भोग कलह दान दुष्टवस्तु कृषिकर्म, व्ययके सबस्थान विद्वान्
व्ययभावसे जानें ॥ १२॥
षटूपंचाशिकायाम् ।
इं०व०योयोभावःस्वामिदृष्टोयुतोवासौम्यवास्यात्तस्यतस्यास्तिवृद्धिः
पापैरेवंतस्यभवस्यहानिनिर्देष्टव्या पृच्छतां जन्मतोवा ॥ १३ ॥
जो जो भाव अपने स्वामीसे वा शुभग्रहोंसे युक्त वा दृष्ट हों उन २ की
वृद्धि और जो पापोंसे युक्त दृष्ट हो उसकी हानि होतीहै यह विचार प्रश्न
तथा जन्ममें भी सर्वत्र विचारना ॥ १३॥
उपजा-सौ विलग्नेयदिवास्ववर्गेशीषोंदयसिद्धिमुपैतिकार्यम् ॥
अतो विपर्यस्तमसिद्धिहेतुः कृच्छेणसंसिद्धिकरं विमिश्रम् ॥ १४ ॥
सौम्यराशि लग्नमें हो यदा अपने अंशपर हो वाशीर्षोदय हो तो कार्य-
सिद्धि होतीहै, इससे विपरीत अर्थात क्रूर लग सत्वादि अंश पृष्टोदय लम
हो तो कार्यसिद्धि नहीं होती. जो कुछ शुभ कुछ अशुभ मिश्रित हो तो
बडे श्रमसे कार्यसिद्धि होवे ॥ १४॥
भुवनप्रदीपे।
आ--लमपतियंदिल कार्याधीशश्चवीक्षतेकार्यम् ॥
लग्नाधीश कार्यकायशःपश्यतिविलग्नम् ॥ १५ ॥

--
(२०२) ताजिकनीलकण्ठी।
लग्नेशःकार्येशविलोकयेल्लग्नपंतुकायशः ॥
शीतगुदृष्टौसत्यापरिपूर्णाका-संसिद्धिः॥१६॥
जो लग्नेश लमको देखे १ कार्येश कार्यस्थानको देखे २ लमेश
कार्यस्थानको देखें ३ कार्येश लमको देखे ४ लग्नेश कार्येशको देखे ५
कार्येश लग्नेशको देखे ६ ये छः प्रकार हैं। इनमें यदि चंद्रमाकी दृष्टि हो तो
एकही योग पूर्ण कार्य सिद्धि करलेताहै ॥ १५ ॥ १६ ॥
आर्या-कथयतिपादयोगपश्यतिसौम्योनलनपोलग्नम् ॥
लग्नाधिपंचपश्यतिशुभग्रहश्चाईयोगोऽत्र ॥ १७ ॥
जो लग्नेश तो लमको न देखे किंच शुभ ग्रह देख तो चौथाई योग'
कहाताहै तथा केवल लग्नेशको शुभ ग्रह देखे और छहों से कोईभी योग न
हो तो आधा योग होताहै फल भी ऐसाही जानना ॥ १७ ॥
आर्या-एक शुभग्रहोयदिपश्यतिलग्नाधिपविलग्नंवा ।।
पादोनयोगमाहुस्तदाबुधाःकार्यसंसिद्धये ॥ १८॥
एक शुभ यह जो लग्न वा लग्नेशको देखे तो उसे बुधजन पादोन
योग कहते हैं यह कार्यसिद्धि करता है ॥ १८ ॥
आ०-लग्नपतौदर्शनेसतिशुभग्रहोद्रौत्रयोथवालग्नम् ।।
पश्यंतियदितदानीमाहुयोगविभागोलम् ॥ १९ ॥
लमेशको दो वा तीन शुभग्रह देखें अथवा लग्नको देखें तो इस योगको
त्रिभागोन कहतेहैं कार्यसिद्धि देताहै ॥ १९ ॥
क्रूरावेक्षणवय॑श्चंद्र-सौम्योवालमपंचलग्नंच ॥
पश्यतःपूर्णतयोगंकार्यस्यससिद्धयै ॥ २० ॥
पापग्रहहष्टिरहित चन्द्रमा और शुभ ग्रह लंन तथा लग्नेशको देखें तो
पूर्ण योग कार्यसिद्धि देनेवाला होताहै ॥ २० ॥
अनुष्टु०-यूराक्रांत क्रूरयुतःकरदृष्टश्चयोग्रहः ।।
विरश्मितांप्रपन्नश्वसोनिष्टफलदायकः ॥२१॥
जो कार्यकर्ता ग्रह पापाक्रांत या पापयुक्त पापदृष्ट हो वा. रश्मिरहित
हो तो अनिष्ट फल कार्य्यनाश करताहै ॥ २१ ॥

-
भाषाटीकासमेता। (२०३)
समरासिँहे।
आर्या-अमुकंवदेतिकार्यकदाभविष्यत्यमुत्रपृच्छायाम् ॥
ल'लग्नाधिपति कार्यकार्याधिपःपश्येत ॥ २२ ॥
ल स्थःकाय्यॆशःपश्यतिचे अपंतदेवभवेत् ।।
तत्काय॑यद्यन्यःस्थितःसत्वरंतदानस्यात् ॥२३॥
जब कोई पूछे कि हमारा अमुक कार्य कब होगा तो इस प्रश्नके में
कार्येश कार्यको देखे अथवा लग्नेश लमको देखे तो कार्य शीघ्र होगा कहना
जो कार्येश लग्नमें हो लगेशको, देखे तौभी शीघ्र होगा, जो. लगेश अन्यत्र
हो तो शीघ्र न होगा ॥ २२ ॥ २३ ॥
पश्यतियदाचल द्रक्ष्यतिचंद्रोविलग्नपंचयदा ॥ लगेकार्येचयदा
द्वयोश्चयोगेतदासिद्धिः॥२४॥ यदिलनपोनपश्यंतिकार्याधीशोवि-
ल थतस्य कार्यस्यहानिरुतालममृतेकिमपिनोवाच्यम् ॥२६॥
जो चन्द्रमा लमको तथा लग्नेशको देखे अथवा लमेश कार्येश एकही
स्थानोंमें हों तो कार्यसिद्धि होगी ॥ २४ ॥ जो लग्नेश कार्येशको न देखे
या कार्यस्थानको भी न देखे तो कार्यहानि कही है, लमको छोडकर
और भावोंसे . भी विचार न कहना ॥ २५ ॥
न्थान्तरे प्रकीर्णकम् ।
अ. लग्नपोमृत्युपश्चादिमृत्यौस्यातामुभौयदि ॥
स्थितौद्रेष्काणएकस्मिन टुभिस्तदाध्रुवम् ॥२६॥
जो लग्नेश और अष्टमेश दोनों अष्टम स्थानमें एकही द्रेष्काणमें हों तो
पूछनेबालेको निष्वय लाभ होगा ॥ २६ ॥
एवंद्वादशभावेषु द्रेष्काणैरेवकेवलम् ॥
वुधोविनिश्चयंब्रूयाद्योगेष्वन्ये निस्पृहः॥२७॥
ऐसेही समस्त भावोंका विचार केवल द्रेष्काणोंसे पंडितने निश्चय करके
कहना और योगोंसे यही बली रहताहै ॥ २७ ॥
अनुष्टु०- श्रकालेसौम्यवर्गों लग्नेयद्यधिकोभवेत् ॥
ग्रहभावानपेक्षेण दाख्येयंशुभफलम् ॥२८॥

2
(२०४)
ताजिकनीलकण्ठी।
प्रश्नकालमें जो लग्नमें शुभवर्ग अधिक हो तो ग्रहभावफलकी अपेक्षा न कर
शुभ फलही कहना, भावफलसे वर्गफल बली फलमें होताहै ॥ २८॥
लग्नाधिपश्चलाभस्याधीशश्वदायकोभवेत् ।।
लग्नाधिपस्ययोगोवालाभाधीशेनलाभदः ॥ २९ ।।
लग्नेश और लाभेश धनदाता हैं इनका योग लाभ देनेवाला होताहै२९॥
आर्या-भवतिपरमलाभकरस्तदेवसयदिचंद्रदृग्लामे ॥
योगा सर्वेष्वफलाश्चंद्रमृतेव्यक्तमेवच ॥३०॥
जो लग्नेश वा लाभेश ग्यारहवें स्थानमें चन्द्रमासे दृष्ट हों तो परमलाभ कर-
ताहै चंद्रमाके दृष्टि वा योगविना सभी योग निष्फल होतेहैं यहतो प्रकटही है ३०
आर्या-कर्माधीशैनैवंकमांधीशेनवृत्त्यधीशेन ।
मृत्युपतिनाचयोगेलामाधीशस्यवक्तव्यम् ॥ ३१ ॥
ऐसेही दशमेशकाभी विचार करना, क्योंकि वह आजीवन भाव है!
और लाभेश अष्टमेशयुत हो तो लाभ न होवे ॥ ३१ ॥
तत्तत्स्थानेक्षणतःपुण्यविवृद्धिश्चकर्मवृद्धिश्च ॥
विबुधैस्तदा निवृत्तिभृत्युर्भावापरेप्येवम् ॥ ३२॥
चन्द्रमा जिस स्थानको देखे उसकी वृद्धि जैसे नवममें पुण्यवृद्धि
दशममें कर्मवृद्धि करता है जो अष्टम भाव वा अष्टमेशपर चंद्रमाकी दृष्ठि
चा योग हो तो विपरीत फल कहना ऐसेही सभी भावोंमें विचारना ॥ ३२॥
लशोयदिष : स्वयमेवरिपुर्भवत्यात्मा ।।
मृत्युकृदष्टमगोसौव्ययगःसततंव्ययं कुरुते ॥ ३३ ॥
लग्नेश छठा हो तो अपनी आत्मा भी शत्रु होतीहै अन्योंकी क्या कथा?
जो लग्नेश अष्टम हो वो मृत्यु और बारहवां हो तो बहुत व्यय करताहै ३३
लग्नस्थं चंद्रजंचंद्रः क्रूरोवायदिपश्यति
| धनलाभोभवत्याशुकित्वनोंपिपृच तः ॥ ३४ ॥
लग्नस्थित बुधको चंद्रमा वा पापग्रह देखें तो धनलाभ तो शीघ्र हो
किच प्रष्टाको कोईप्रकार अनर्थभी होवे ॥ ३४ ॥

५ . भाषाटीकासमेता। (२०५) तामान्यभाव विचारे । अनु०-इंदुःसर्वत्रबीजाभो लगं च कसुमप्रभम् ॥ फलेनसदृशोंशश्चभावःस्वादुसमप्रभः॥३५॥ यह विचारमें सर्वत्र चंद्रमा बीजके लग्न पुष्पके अंश फलके और भाव- स्वादके समान हैं ॥ ३५॥ अथ लाभादौ कालनिर्णयः। आर्या-उदयोपगतरार्शितत्कालीकृत्यलि कांगुणयेत् ॥ यांगुलञ्चकुर्याद्धृत्वामुनिभिस्ततःशेषः ॥ ३६ ॥ गणयित्वैवं ग्विद्धृत्वासौम्यस्यभवेदुदयः ॥ कार्यप्राप्तिः ष्टुर्व व्यानेतरैहैर्भवति ॥ ३७॥ लाभादि समस्त प्रश्नोंमें समय जाननेके लिये तत्काल लग्नका लिप्तापिंड करके उस समयमें द्वादशांगुलकी छायाके अंगुलोंसे गुनाकर चौदहसे भाग- देना जो शेष रहै वह मेषादि राशि जाननी, वह जो शुभग्रहकी राशि हो बो कार्यप्राप्ति और पापकी हो तो कार्यहानि कहनी ॥ ३६ ॥ ३७ ॥ ग्रहगुणकारोज्ञेयोदैवविदा पंच ५ विंशतिः सैकः २१॥ मनवो १४ का ९ टोटत्रितयं३भवाः ११ सूर्यादितोज्ञेयः॥३८॥ णकारैक्यविभक्त सूर्यादिगुणकसंशुद्धः॥ यस्यनशुद्धयतिवर्गोवि यस्तद्वशात्कालः ॥३९॥ सूर्यके ५ चंद्र २१ मं० १४७० ९ बृ० ८ शु० ३शनिके ११ये ग्रहोंके गुणक हैं इनका योग ७१ से पूर्वोक्त जो तत्काल लमका कलापिंड छायाँ- गुलोंसे गुणाहै उसमें भागलेना लब्धिमें सूर्यादिकोंके गुणक सयंसे लेकर एकएक करके घटावै जहांतक घटें घटातेजाना जिसका गुणकांक न घटें उससे समय कहना वह आगे कहते हैं ॥ ३८ ॥ ३९ ॥ आरदिवाकरशेषेदिवसापक्षाश्चभृगुशशिनोः ॥ गुर्ववशेषे मासो ऋतवः सौम्येशनैश्चरेब्दाःस्युः॥४०॥आधानेथप्राप्तौगमनागमने पराजयविजये ॥ रिपुनाशेवाकालंपूच नयां निश्चितंब्रूयात्॥४१॥ उक्त क्रमसे जो सूर्य वा मंगलका गुणक न बटे तो उतने दिन, शुक्र

(२०६)
वाजिकनीलकण्ठी।
चंद्रमासे पक्ष हस्पतिसे महीने बुधसे ऋतु -शनिसे वर्ष जानने. आधानके
सय वा धनादिप्राप्ति तथा गमन आगमन जयपराजय, शत्रुनाशादि कार्यों
को इसप्रकार समय निश्चय करके कहना ॥४०॥४१॥
अकचटतपयशवर्गारविकुजसितसौम्यजीवसौराणाम्।। चंद्रस्य
चनिर्दिष्टास्तैः थमोद्भवैवर्णैः ॥ ४२ ॥ ज्ञात्वातस्माल्लग्नं
विज्ञायशुभाशुभंचवदेत् ॥ वर्गादिसध्यात्यैर्वणः प्रश्नोद्भवै-
विषमराशिः॥४३॥ ल ज्ञानेश्वदेत्पृच्छायुग्मंकुजज्ञजीवा-
नाम् ।। सितरविजयोश्चनैरविशशिनोरकराशित्वात् ॥४४॥
तस्मात्प्राग्वत्प्रवदत्पृच्छासमयेशुभाशुभंसर्वम् ॥ कालस्यच
विज्ञानोदतचित्यंबहुप्रश्ने ॥४५॥
अवर्गका स्वामी सूर्य. एवं क का मंगल. च का शुक्र. ट का बुध. त
का हस्पति. प का शनि. य का चंद्रमा शकाभी चंद्रमा ये वर्गाके स्वामी हैं.
जहां लमज्ञान न होसके वा २ । ३ आदि बहुत प्रश्न एक ही लममें हों तो
वर्गेशसे लम इसप्रकार लेनां कि, प्रश्नके प्रथमाक्षर वर्गके जो स्वामी हैं
उनकी राशिलम जानना. उसलग्नसे उक्तप्रकार योगादि विचारके शुभाशुभ
फल कहना. प्रत्येक ग्रहमी २ । २ राशि हैं इनमें विषमराशि जानना. जैसे
मंगल वर्गेश हो तो मेष समझना. चंद्रमाकी एकही है वह वही जाननी.
जहां बहुत प्रश्न हों तो प्रथम प्रश्नमें प्रश्नाक्षरके प्रथम वर्ण दुसरे में मध्यवर्ण
तीसरे अंत्यवर्ण से लग्न जानना. तथा मंगल बुध बृहस्पतिके राशि लग्न
ज्ञात हों तो दो प्रश्न जानना. शुक्रशनिसे अनेक. और सूर्य चंद्रमासे
एक राशि होनेसे एकही प्रश्न जानना. बहुत प्रश्नोंमें इसप्रकार लमसे
शुभाशुभ फल तथा वर्गेश ग्रहके गुणकसे पूर्वोक्त कममें विचारकर सभी
कहना ॥ ४२ ॥ ४३ ॥ ४४ ॥ ४५ ॥
प्रश्नवस्तुज्ञाने।
स्वशिविल यदिवात्रिकोणेस्वांशस्थितःपश्यतिधातुचिंताम् ।।
परांशकस्थश्चकरोतिजीवमूलंपरांशोपगतःपरांशम् ॥४६॥

(२०७). भाषाटीकासमेता। मुष्टि वा मूकमश्नमें जो लग्नेश वा चन्द्रमा अपने अंशमें वा लग्नमें यद्वा त्रि- कोण ९४५ में हो अथवा और किसी स्थानमें हो किंतु अपने अंशमें होकर लमको देखे तो धातुचिंता तथा शत्रु वा समांशकमें होकर लमचन्द्रमाको देखे तो जीवचिंता और परांशकमें बैठकर परांशकी ग्रहोंको देखे वा लग्नेश चंद्रमा परांशकी हों लग्नमें कोई ग्रह परांशकी हो तो मूलवस्तुसंबंधी प्रश्न कहना४६ धातुर्मूलंजीवमित्योजराशौयुग्मेविद्यादेतदेवप्रतीपम् ॥ लग्नेयोंशस्तकमागण्यएवंसंक्षेपोयंविस्तरात्तत्पमेदाः॥४७॥ विषम राशि लग्नमें हो तो प्रथम नवांशमें धातु दूसरेमें मूल तीसरेमें जीव चौथेमें धातु पांचवेंमें मूल छठेमें जीव सातवेमें धातु आठवमें मूल नवमें जीव चिंताकहनी, जो समराशि लममें हो तो विपरीत, जैसे ११४१७ मेंजीव २।५।८ में मूल ३।६।९ में धातुचिंता कहनी ॥ ४७ ॥ बलिनौकेंद्रोपगतौरविभौमौधातुकरौप्रश्ने । बुधसौरीमूलकरौशशिगुरुशकाःस्मृताजीवाः ॥ १८॥ जो सर्म्य वा मंगल बलवान् और केंद्रगत हों तो धातु, बुध शनि हो तो मूल, चन्द्रमा बृहस्पति शुक्र. हों तो प्रश्नमें जीवचिंता जाननी ॥४८॥ मेषालिसिंहलग्नेकुजार्कयुक्तनिरीक्षितेप्यथवा ।। धातोश्चितांप्रवदेयुगघटकन्यागतैर्लनैः ॥ १९ ॥ बुधरविजयुतैर्मूलंघृषतुलाहरिमीनचापकर्कटकैः ।। चन्द्रगुरुशुकयुतैर्दष्टजीवोविनिर्देश्यः॥६॥ लग्नमें १.टाएराशि हो और मंगल वा शनिसे युक्त वा दृष्ट हों तो धातु, तथा ३ । ११४६ राशि बुध शनि युक्त दृष्ट हों तो मूल और२।७।५।१२ ९।४राशि चन्द्रमा वृहस्पति शुक्रसे युक्त दृष्ट हों तो जीवप्रश्न कहना॥४९।५० भावप्रश्नज्ञानम् । लग्नलाभपयोःप्राणीतयोर्यज्ञावगः शशी॥ तस्यभावस्ययार्चिताप्राः साहदिवर्तते ॥५१॥ एवंलग्राधिकाचंद्रालग्ननाथोयतःस्थितः ।। दैवज्ञेनविनिर्णय प्रश्नस्तद्भावसंभवः ।। ६२ ॥

(२०८)
ताजिकनीलकण्ठी।
लग्नेश वा लाभेशमें जो बलवान हो अथवा इनके अंशेशोंसे जितने भावमें
चन्द्रमा हो उसभावसंबंधी प्रश्न जानना जिस भावमें जो विचार चाहिये वह
प्रथम कहा गयाहै, ऐसेही बलाधिक चन्द्रमासे लग्नेश जितनेमें हो उसके संबंधी
प्रश्न पूछनेवालेके हृदयमें ज्योतिषीने जानकर आय.विचार करना॥५१॥५२॥
आत्मसमंल गतैस्तृतीयगैर्धातरः तं तगैः ॥मातावाभगिनी
वाचतुर्थंगैःशत्रुगैःशत्रुः ॥५३॥ जायासप्तमसंस्थैर्नवमेधर्माश्रि-
तो गुरुर्दशमे ॥ स्वांशः पतिमित्रशत्रु तथैववाच्यंबलयुतेषु॥५॥
सर्वोत्तम बलीग्रह वा तत्काल लमका नवांशेश लग्नमें हो तो अपने शरीर-
संबन्धी, तीसरा हो तो भातृसंबन्धी एवं पंचममें पुत्र संबन्धी चतुर्थमें माता
बहिनके विषय, छठा हो तौ शत्रुसंबंधी सप्तममें स्वीसंबंधी नवममें धर्मसं-
बन्धी दशममें गुरु वा राजसंबंधी प्रश्न कहना, तथा बली ग्रहका बल लग-
का अशेश मित्र राशिमें हो तो मित्रसंबंधी, शत्रुराशिमें हो तो शत्रु-
संबंधी जानना इतनोंमें जो बलवान हो उससे प्रश्न कहना ॥५३॥५४॥
चरलग्ने चरभागे मध्याद्रष्टे वासिचिंतास्यात् ॥
भ्र : स मभवनात्पुनर्निवृत्तो यदि न वक्री ॥५५
पूर्वोक्त ग्रह चरराशि चरनवांशकमें दशम स्थानसे ऊपर १०११११२
में हो तो प्रवासिसंबंधी प्रश्न कहना तथा चरराशिनवांशमें सप्तमाधिक ७
८। ९ में हो तो उसका निवृत्ति के ( लौटने ) विषयमें जानना यदि वह वक्री
न हो, जो वक्री हो तो उक्तसे विपरीत जानना ॥ ५५ ॥
अस्तेरविसितवः परजायां स्वां गुरौ धे वेश्याम् ॥
चंद्रेचवय-शशिवत् प्रवदेत्सोरेंत्यजातीयाम् ॥५६॥
सप्तम स्थानमें सर्य शुक्र वा मंगल बली हों तो परस्त्री बृहस्पति हो तो
अपनी खी बुध हो तो वेश्या चन्द्रमा हो तो भी वेश्या तत्काल चन्द्रमाके सहश
अवस्था कहना और शनि हो तो हीन जाति प्रष्टाके मनमें चिंतित ५६
कुमारिकांबालशशीबुधश्चवृद्धाशनिःसूर्यगुरूप्रसूताम् ॥
स्त्रींकर्कशांभौमसितौचधत्तएवंवयःस्यात् रुषेषुचैवम् ॥१७॥

भाषाटीकासमेता।
(२०९)
बाल चन्द्रमा वा बुध हो तो कुमारी कन्या शनिसे वृद्ध स्त्री सूर्य तथा
बृहस्पतिसे प्रसूतवती मंगल शुक्रसे कठोर स्वभावकी स्त्री प्रश्नसंबन्धी कहनी
तथा पुरुषकी अवस्थादिभी ऐसेही विचारसे कहनी ॥ ५७ ॥
इति महीधरकतायां प्रश्नतंत्रभाषाटीकायां संज्ञाप्रकरणम्॥ १॥
यह प्रकरण समस्त आउछंदमें है ॥
प्रथमलग्नभावप्रश्न कहते हैं।
भूतंभवद्भविष्यन्मम किं कथयेतिजातपृच्छायाम् ॥ लग्नपतेः
शशिनोवाबलमन्वेष्यंबलाभावे,॥१॥ दृष्ट्वानवांशकबलंशुभ-
दृग्योगचसर्वकार्येषु।प्रष्टुःशुभमादेश्यविपरीतंव्यत्ययादेव ॥२॥
जो कोई पूछे कि मेरा भूत वा भविष्य क्या हुवा वा होगा तो इस
प्रश्नमें लग्नेश तथा चन्द्रमाका बल देखना. जो ये बली न हों तो नवांश बल
देखना बलाधिक्य और शुभग्रह दृष्टि योगसे प्रष्टाके समस्त कार्योंमें शुभ
इससे विपरीत हो तो अशुभ कहना ॥ १ ॥२॥
ल शोमूसरिफो यस्मात्तस्मादतीतमाख्येयम् ॥
येनयुतस्तस्माद्भवदेष्ययेनेक्ष्यते तस्मात् ॥३॥
लग्नेशका जिस ग्रहसे मूसरिफ हो उसके अनुसार भूत कहना
जैसे मूसरिफ होकर ईसराफ होगया हो तो कार्य होगया और इत्थशाल
हो तो कार्य होताहै कहना और दृष्टि से होनेवाला कहना, इत्थशालोंके भेद
पहिले कहदियेहैं ॥ ३॥
यदिलग्नेलग्नपतिःसौम्ययुतोवाविलोकित सौम्यैः॥
तत्प्रष्टुर्व्याकुलताशरीरदोषाविनश्यति ॥ ४ ॥
जो लग्नेश लग्नमें शुभग्रहोंसे युक्त वा दृष्ट हो तो प्रेष्ठाके मन व्याकुलता
और शरीरके समस्त दोष नाशहोते हैं ॥ ४ ॥
पापोयदिल पतिस्तदाकलिव्याधिधननाशाः॥
सौम्येनिर्वृतिवुद्धिव्याप्तिःसौख्यमतुलंच ॥५॥

५ (२०) ताजिकनीलकण्ठी। जो लग्नेश पापग्रह हो वा लंगमें पाप हो तो कलह रोग धनहानि हो; जो शुभग्रह हो तो बुद्धि निर्मल धनलाभ और अतुल सुख मिले ॥५॥ इति श्रीमहीधरकतायांनीलकंठीभाषाटीकायां लग्नभावप्रश्ननिरूपणम् ॥ १ ॥ अथ द्वितीयभावफलम् ॥ धनलाभस्यप्रश्नेलग्नेशेनेंदुनाथधननाथी॥ कुरुतोयदीत्थशालंशुभ तिहग्भ्यांभवेल्लाभः ॥६॥ धनलाभप्रश्नमें लग्नेशसे चन्द्रराशीरा तथा धनभावेश इत्यशाल करें शुभ- ग्रहोंसे युक्त दृष्टभी हो तो धनलाभ होगा ॥ ६ ॥ कूरग्रहैर्धनस्थैरेलामोऽन्यदप्यशुभम् ॥ कूरमथशिलेधनेशेप्रष्याम्रियतेथवाविलग्नेशे॥७॥ जो पापयह धनस्थानमें हों तो लाभ बहुत कालमें हो और कु अशुभ भी होवे धनेश वा लगेश पापसे इत्थशाली हो तो प्रष्टा अरिष्ट पावे ॥ ७ ॥ धनधनपेयथेत्थशालोदगतिर्यत्रभावानाम् ।। तनुधनसहजादीनांप्रष्टुस्तहारतोलाभः ॥ ८॥ धनेश मंदगामी तनु धन सहजेशादिकों से जिससे इत्यशाली हो उस भावसंबंधी जनके द्वारा धनलाभ होवे ॥ ८ ॥ अनुष्टु०-प्रश्नचतुर्थाधिपतिस्तत्रस्थोवावलोकते ॥ अवश्यवर्ततेतत्रधनचंद्रेथवावदेत् ॥ ९ ॥ स्थापित वा चौरादि धनकी भांतिमें चतुर्थेश चतुर्थभावमें हो वा उसे देखे अथवा चन्द्रमा चतुर्थ हो तो धन अवश्य तहां होगा यह कहना ॥ ९॥ . . वित्तेशेधनगेबंधीवास्तितत्रधनंबहु ॥ पापेतुर्यगतेद्रव्यस्थितंतूर्णनलभ्यते ॥१०॥ धनेश धनभावमें चतुर्थ हो तो प्रश्नस्थानमें बहुत धन है: जो पापग्रह भी चतुर्थ हो तो धन तो है किंतु शीघ नहीं मिले ॥ १० ॥ । भौमेसप्ताष्टराशिस्थेधनमन्यत्रनाप्यते ॥ लग्नेतमोरविच्छिद्रेत- दाद्रव्यनलभ्यते ॥ सप्ताष्टदशपातालेधनदौचन्द्रमागुरुः॥११॥ जो मंगल सप्तम वा अष्टम हो तो धन औरस्थानमें है नहीं मिलेगा, जो भाषाटीकासमेता। (२११) लग्नमें राहु अष्टम सूर्य हो तो द्रव्य नहीं मिले, ७॥ ८।१०।४स्थानों में चंद्रमा और बृहस्पति हों तो चिंतित धन देतेहैं ॥ ११ ॥ लग्नेश्वरेयूनगतेविल जायेश्वरेनष्टधनस्यलाभः ॥ जायेशल धिपतीत्थशालेयूनेविनष्टंधनमेतिमर्त्यः ॥ १२॥ लग्नेश सप्तम सप्तमेश लग्नमें हों वा लग्नेश सप्तमेशका इत्यशाल हो तो नष्ट वा विस्मृत धन प्रष्टा पावे ॥ १२ ॥ लग्नेशजायाधिपतीत्थशालेल श्वरंयच्छतितस्करोर्थम् ॥ सूर्यविलग्नेस्तमितेशशांकनलभ्यतेयद्गविणविन म् ॥ १३॥ लग्नेश सप्तमेशका इत्यशाल हो तो चोर आपही धन देदेगा, जो सूर्य लग्नमें चन्द्रमा सप्तममें हों तो नष्टधन न मिले ॥ १३ ॥ कौशलग्राधिपतीत्थशाले चौरःस्वमादायपुरात्पलायते ॥ चंद्रस्तपेचार्ककरप्रविष्टेतल्लभ्यतेनष्टधनंसतस्करम् ॥ १४॥ दशमेश और लग्नेश इत्यशाली हों वो चोर धन लेकर नगरसे भागगया; चंद्रमा और सप्तमेश अस्तंगत हों तो धनसहित चोर पकडा जायगा ॥१४॥ अस्तेश्वरेकेंदगतेस्तिचौरस्तत्रैवनान्यत्रपुराद्विनिर्गतः ॥ धर्मेशदुश्चिक्यपतीत्थशालेजायेश्वरेन्यत्रगतःसचौरः ॥ १५ ॥ सप्तनेश केंद्रमें हो वो चोर तहांही है नगरसे अन्यत्र नहीं गया, नवमेश दशमेशसे इत्यशाली सप्तमेरा हों तो अन्यत्र चलागया ॥ १५ ॥ कौशलग्नाधिपतीत्थशालेतलभ्यतेराजकुलाच्चचौर्यम् ॥ विधर्मपानपतीत्थशालेत्वन्यत्रदेशाद्मनेतदाप्तिः ॥ १६ ॥ दशमेश लग्नेशका इत्यशाल हो वो राजकुलसे चोर पकड़ा जावे; तृतीय नवमके स्वामी सप्तमेशसे इत्यशाली हों तो और देशमें पकडा जावेगा॥१६॥ शुभेत्थशालेहिमगौविलग्नेखस्थेथवानष्टधनस्यलाभः ।। सुनेहष्टचारविणाशुमेनहष्टेविलग्नेहिमगौचलाभः॥ १७॥ चंद्रमा शुभग्रहसे इत्यशाली लग्न वा दशममें हो तो नष्टधन मिले; जो लम- गत चंद्रमाको सूर्य्य तथा शुभग्रह मित्र दृष्टि से देखें तौभी वही फलकहना१७॥

(२१२) ताजिकनीलकण्ठी। ० स्थिरोदयेस्थिरांशेवावोत्तमगतेपिवा ।। स्थितंतत्रैवतद्रव्यस्वकीयेनैवचोरितम् ॥१८॥ लममें स्थिर राशि वा स्थिर नवांश अथवा वर्गोत्तमांश हो तो वह धन दहीं है किन्तु अपनेही मनुष्यने चोरी करी ॥ १८॥ आदिमध्यावसानेषुद्रेष्काणे विल तः॥ परदेशथवामध्यगृहान्तेचवदेद्धनम् ॥ १९ ॥ लगमें प्रथम द्रेष्काण हो तो घरके द्वारसमीप वस्तु है, मध्य द्रेष्काण हो तो घरके बीचमें और तीसरा द्रेष्काण हो तो घरके पीछे होगा ॥ १९ ॥ पतितधनस्यप्रश्नेमिथोगृहस्थौविल सप्तेशौ ॥ यदि थशिलंतयोःस्यात्तदाशुतत्रैववदंतिधनम् ॥ २० ॥ नष्ट द्रव्यके प्रश्नमें लग्नेश सप्तम सप्तमेश लग्नमें वा इनका मुथशिल हो तो वह धन वहांही है शीघ्र मिलेगा ॥ २० ॥ नष्टक्वंदिशिप्राप्यंपृच्छायांलग्नगेविधौ च्याम् ॥ खस्थानेयाम्यायामस्तेवारुण्यांवा व्युदीच्याम् ॥२१॥ नष्टवस्तु कहां मिलेगी ऐसे प्रश्नमें चंद्रमा लमका हो तो पूर्वदिशामें दशम हो तो दक्षिण, सप्तम हो तो पश्चिम, चतुर्थ हो तो उत्तरमें मिलेगी ॥२१॥ यदिनेदुःकेन्द्रेतच्चत्वारिंशांशकैश्चपंचयुतैः ।। भागोदिक्कमउक्तोवह्नयवनीवायुवारिराशौवा ॥ २२॥ जो चन्द्रमा केन्द्रमें न हो तो चन्द्रस्थित अंशकसे ४५ वे अंशमें जो राशि है उसकी जो दिशा वा उपदिशा अथवा अमि, पृथ्वी, वायु, जलमेंसे जो उस राशिका तत्त्वहै उसमें नए द्रव्य कहना ॥ २२ ॥ नष्टहतवित्तलब्धःपच यांचौरसप्तमंततोलाभः ।। हिबुकंद्रव्यस्थानल चंद्रश्वधननाथः ॥२३॥ नष्ट वा चोरित धनलाभ प्रश्नमें सप्तम स्थानसे चोर चतुर्थ से उसकी प्राप्ति , लग्नसे द्रव्य और चन्द्रमा धनका स्वामी जानना ॥ २३ ॥ .

. भाषाटीकासमेता। (२१३) लगेशोस्तेस्तपतिनाचेन्मुथशिलीततोलामः-॥ यद्यष्टेशोलनेतदास्वयंतस्करोर्पयति ॥ २४ ॥ लगेश सप्तममें जो सप्तमेशसे मुथशिली हो तो हृतद्रव्यका लाभ होवे. जो अष्टमेश लममें हो तो चोर आप ही धन देदेवे ॥ २४ ।। रविरश्मिगेधनेशेवास्तमितेतस्करस्यलाभ स्यात् ॥ लग्ने- शदशमपत्योर्मुथशिलतः प्राप्यतेर्थवॉश्चौरः ॥ लग्नेशदृष्टय- भावेचौर सहमात्रयायाति ॥ २५॥ धनेश सूर्यके साथ वा अस्तंगत ही हो तो चोर एकडा जावे, लगेश दशमेशका इत्थशाल हो तो धनसहित चोर मिले जो लग्नेशकी दृष्टि सप्तम पर न हो तो चोर धनसहित आवेगा ॥ २५ ॥ अस्ताधिपतौदग्धेरविरश्मिगतेथलभ्यतेचौरः।। लग्नपकृतेत्थशालेराजभयानमिदंस्वयंदत्ते ॥२६॥ सप्तमेश दग्ध वा अस्तंगत हो तो चोर पकडा जावे, लग्नेशसे सममेश इत्थशाली हो तो राजाके भयसे चोर आपही धन देदेवे ॥ २६ ॥ लग्नास्तपयोर्नस्याचदिदृष्टिलग्नपस्तथाविकलः॥ तत्तस्करःस्वहस्ताददातिचौय्यहिंराजकुले ॥२७॥ लग्नेश सप्तमेशकी दृष्टि न हो तथा लग्नेश कलाहीन हो तो चोर अपने हाथसे राजसभामें धन चोरीका देदेवे ॥ २७ ॥ लग्नपमध्यपयोगेराजकुलंप्राप्यलभ्यतेचौर्यम् ॥ रंधंचोरस्यधनंधनपतत्राथसप्तमेनाप्तिः॥२८॥ लग्नेश दशमेश साथही हो तो राजद्वारसे चोरी मिले, अष्टमस्थान चोरका धन होताहै धनेश इसमें वा सप्तम हो तो धन न मिले ॥ २८ ॥ रंध्रपतौधनपस्यतुमुथशिलयोगेतुप्राप्यतेवित्तम् ॥ रंध्रपतौदशमपतेर्मुथशिलगेचौरपक्षकृद्भूपः ॥२९॥ अष्टमेश धनेशका इत्थशाल हो तो धन मिले अष्टमेश दशमेशका मथशिल हो तो राजा चोरका पक्षपात करे ॥ २९ ॥ - - (२१४) ताजिकनीलकण्ठी। चौरस्थानज्ञानम्। चौरज्ञानप्रश्नेलनेरविशशिशास्वगृहचौरः ॥ अनयोरेकहशागृहसमीपवत्तीवसत्येपः॥३०॥ चौर कहां है ऐसे प्रश्नमें लगपर सूर्य चंद्रमाकी दृष्टि हो तो प्रष्टाके घरहीमें और इनमेंसे एककी दृष्टि हो तो पडोसमें रहताहै ॥ ३० ॥ लग्नस्थलग्नपतावस्तपयुक्तेचगृहगतश्चौरः ॥ अस्ताधिपतावंत्येसहजेवास्वीयभृत्योयम् ॥ ३१ ॥ लग्नेश लममें सप्तमेशयुक्त हो वो चोर प्रष्टाके घरहीमें रहताहै, जो सप्तमेश बारहवां वा तीसरा हो तो चौर अपनाही नौकर है ॥ ३१ ॥ अस्तेशेवेंगस्थेस्वगृहेवातस्कर प्रसिद्ध स्यात् ॥ लग्नदशमा- स्तभावाःक्रमेणवीक्ष्याःस्वतुंगभवनादौ ॥३२॥ यःखेटःस्याद्ध- लवान्सज्ञेयस्तस्करस्यबली ॥ लग्नादिषुयोग्रहः स्वोच्चादिब- लीसयजातिः॥ एवंयोगंतुविनायूनेशस्यैवबलमभिग्राह्यम् ॥३३॥ सप्तमेश उच्चमें वा स्वगृहमें हो तो वह चोर नामी है कहना तथा॥१०॥ ७ भाव क्रमसे देखने इनमें जो कोई उच्चादि बली हो वह चोरका बल जानना और उनके अनुसार फल कहना. जब ये योग न हों तो सप्तमही केवल लेना, बली ग्रहकी जातिरूपवाला चोर होगा वा चोरकी सहाय करेगा ३२॥३३ इत्थंचौर नेचौरःसूयेंगृहेश्वरस्यपिता ॥ चंद्रेमाताशुकेभा- मिंदसुतोभवे चे ॥ ३४ ॥ जीवेगृहप्रधान भौमे त्रोथवा भ्राता॥ स्वजनोमित्रवाज्ञात्वेत्थंपुण्यसहममावेश्यम् ॥३५॥ उक्त प्रकारोंसे चोर जाननेके और ज्ञान हैं कि वह योगकर्ता सूर्य हो तो उसघरके स्वामीका पिता चोरहै; एवं चन्द्रमासे माता, शुक्रसे स्त्री शनिसे पुत्र वा दास बृहस्पतिसे घरका श्रेष्ठ मंगलसे पुत्र भाई बुधसे मित्र होगा ऐसा जानकर पुण्यसहम देखना ॥ ३४ ॥ ३५ ॥ . तस्मिन्क्रूरादृष्टेपुरानचौरोस्तपेपुरापिस्यात् ।। अस्तेशान्मूसरिफेभौमेचौर पुरापिनिगृहीतः ॥ ३६॥ पुण्यसहम कर दृष्ट न हो तो यह पहिले चोर नहीं था, सप्तमेश पाप-

भाषाटीकासमेता। (२१५)
दृष्ट हो वो पहिले भी चोरथा. सप्तमेशसे मंगलका मूसरिफ हो तो यह चोर
पहिले भी चोरीमें पकडा गया था ॥ ३६ ।।
सप्तमगेरविपुत्रेचंद्रहशातस्करोहिपाखंडी।।
वोविलोक्यलोकंभौमेखातेनतालकंभक्त्वा ॥३७॥
शनि सप्तम चंद्रदृष्ट हो तो चोर पाखंडी होगा, बृहस्पति उसे देखे तो चोर
लोकविदित होते. सप्तम मंगल चंद्रदृष्ट हो तो कुम्हल वाला जंजीर आदि
वोडकर चोरने चोरी करीहै ॥ ३७॥
प्रतिकुंचिकयापहतंसितेतिथिज्ञेप्रपंचकराचौरस्यवयोज्ञानेसितेयुवा
ज्ञेशिशगुरोमध्यः॥तरुणोभौममदेवृद्धोकस्यादतिस्थविरः ॥३८॥
सप्तममें शुक्र चंद्रदृष्ट हो तो दूसरी कूची (चाबी) से खोलकर चोरी भई
तथा बुध हो तो अपूर्व मनुष्य प्रपंची चोर है और चोरकी अवस्थाके ज्ञानमें
शुक्से युवा. बुधसे बालक. बृहस्पविसे मध्य अवस्था. मंगलसे तरुण.
शनिसे बूढा. सूर्यसे अतिबूढा जानना ॥ ३८ ॥
त नभसोःस्वमंदिरेस्मरभूम्योभूमिलाभयोर्मध्यम् ॥
चरतिरवौनवमध्यमवृद्धवयोतीतकाक्रमशः ॥३९॥ ..
सूर्य १ । १० स्थानके बीच अपनी राशिमें हो तो नया जवान
७१४ स्थानोंके बीच स्वराशिका हो तो मध्यमावस्था, ४ । ११ के बीच
हो वो बूढा, इतनी अवस्था कमसे व्यतीत जाननी ॥३९ ॥
नष्टस्थानप्रश्नतुय्यभूम्यग्निवायुजलमध्यात् ।।
योभवतिराशिरस्मात्स्थानंज्ञेयंगतधनस्य ॥४०॥.
चोरीका द्रव्यस्थानके प्रश्नमें चतुर्थ स्थानमें भुमि वायु जलमेंसे जिस
वत्त्वकी राशि हो उसका विशेष स्थान कहना ॥ ४.० ॥
अथचतुर्थगृहेतुयश्वरोथयःस्याग्रहस्ततोज्ञेयम् ।।
मंदेमलिनस्थानेचंद्रेबुनिंगीपतौसुरारामे ॥११॥
भौमेवह्निसमीपरवौगृहाधीश्वरासनस्थाने ॥
तल्पेशुकेसौम्येपुस्तकवित्तानयानपार्थेच॥ १२॥

. (२१६ वाजिकनीलकण्ठी। चतुर्थमें चतुर्थश वा जो यह बली हो उससे चोरी द्रव्यका स्थान कहना; जैसे शनिसे. मैलास्थान चंद्रमासे जलाशय वा हाथ पैर धोवनेके स्थान बृहस्पतिसे देवससीप वा बगीचा, मंगलसे अग्निसमीप, सूर्यसे गृहपतिके बैठने के स्थान, शुक्रसे शयनस्थान, बुधसें पुस्तक धन अन्न वा डोली आदि सवारीके समीप कहना ॥ ४१ ॥ ४२ ॥ चौरोयमथनवेति. रेंद्रोर्मुथशिलेचचौर स्यात् ॥ सौम्यशशिमुथशिलेखलुनभवतिचौरःप्रवक्तव्यम् ॥४३॥ यह चौर है वा नहीं ऐसे प्रश्नमें चंद्रमा पापग्रहमें सुथशिली हो तो चोर होगा. जो शुभसे मुथशिली हो तो चोर नहीं है कहना ॥ ४३ ॥ किमनेनतस्करत्वंकदापिविहितंनवेतिपृच्छायाम् ॥ लनपशशिनोरकस्मादपिमूसरिफेस्तपेविहितम् ॥ १४॥. इसने कभी चोरी करी वा नहीं ऐसे प्रश्नमें लग्नेश वा चंद्रमासे सप्तमेश . मूसरिफी हो तो पहिले भी चोरहै ॥४४॥ , चोर स्त्री रुषोवापृच्छायामस्तपेस्त्रियोराशौ ॥ 'स्त्रीखेटेस्त्री चौर स्त्रीव्यत्ययात्पुरुषः ॥ ४५ ॥ चोर श्री वा पुरुष कौन होगा ऐसे प्रश्नमें सतमेश स्त्रीराशिमें और त्री ग्रह वा स्त्रीयदृष्ट हो तो चोर स्त्री होगी जो पुरुष राशिमें सप्तमेश पुरुषयह पुरुषदृष्ट होतो पुरुष चोर होगा ॥४५॥ लशे नवमांशतोवयाप्रमाणंजायतेज्ञेयः ॥ चौरोयमिहानंतशास्त्र कथिता यमुद्देश ॥१६॥ लग्न वा लग्नेशके नवांशवशसे चोरको अवस्थाका प्रमाण जातिरंग आ- दि और द्रेष्काणसे उसका रूप कहना. शेष विचारको शास्त्र अनंत है यहा बुद्धिमानोंको उद्देशमात्र कहाहै ॥ ४६ ॥ इति श्रीमहीधरकतायां नील प्रश्नतंत्रभाषाटीकायांधनभावप्रश्ननि० ॥२॥ अथ तृतीयभावप्रश्नः। सहजपतियदि सहज पश्यतिचेयंशुभेदृष्टम् ॥ तद्भातरो गतरुजःस्वस्थाः रेक्षितेवामम् ॥ १॥ :

भाषाटीकासमेता।
( २१७)
तृतीयेश तृतीय भावको देखे तथा तृतीयभाव और तृतीयेशको शुभग्रह देखें
तो भाई सुखी सावधान और पाप दृष्टि योगसे रोगी वा अस्वस्थ कहना॥१॥
यदि सहजपतिः षष्ठेतत्पतिना मुथशिलेऽथतन्मांद्यम् ॥
षष्ठेशे सहजस्थे सहजपतौकरिते वापि ।
सूर्यस्यरश्मिसंस्थेभयावह प्रष्टुरादेश्यम् ॥ २॥
तृतीयेश छठा वा आठवां होकर षष्ठेशसे इत्थशाली हो तो भाई मांदे
कहने, वा षष्ठेश तीसरा वा तृतीयेश पापयुक्त हो तो भी यही फल है, जो
अस्तंगत हो तो प्रष्टाको भय देताहै ॥ २॥
ष टमभावेशौ यद्भावेशेनेत्थशालिनौस्याताम् ॥
पीडांतस्य प्रवदेष टिमभावगे वापि ॥३॥
'छठे आठवें भावके स्वामी जिस भावेशके साथ इत्थशाली हों वा जिस
भावमें हों अथवा जिस भावका स्वामी ६ । ८ स्थानमें हो उस भावसंबंधी
पीडा कहनी ॥ ३ ॥
एवं सर्वेपि यथापित्रोस्तुयेसुतानांच ।।
पंचमभावे भृत्यचतुष्पदस्त्रियाः हृदकःसप्तमे ॥४॥
ऐसे सभी भावोंमें विचार करना जैसे चतुर्थेशसे षष्ठेश वा अष्टमेशका
इत्थशालहो, यहा इन भावोंके स्वामी चतुर्थ वा चतुर्थेश इन भावोंमें हो तो
माता पिताको पीडा होवे, ऐसा पंचम भावसे पुत्रोंको सप्तमसे भृत्य, स्त्री
चतुष्पद इत्यादि जानना ॥ ४ ॥
अथ क्रयविक्रयौग्रन्थान्तरे।
अनु०-क्रेता लग्नपतिज्ञेयो विक्रेतायपतिःस्मृतः ।।
गृह्णाम्यहमिदंवस्तुप्रश्न एवंविधेसति ॥५॥
बलशालि विलगंचेद्बह्मतेतत्कयाणकम् ॥
तस्मात्त्रयाणकाल्लाभप्रष्टुर्भवति निश्चितम् ॥ ६॥
मैं यह सौदा करताहूं इसमें लाभ हानि क्या होगी ऐसे प्रश्नमें लेनेवाला
लग्नेश बेचनेवाला लाभेश होता है, इनके बलाबलसे विचार कहना,जैसे लम
लमेश बलवान हों तो यह द्रव्य लेना इसमें प्रष्टाको निश्चयलाभ होगा ॥५॥६॥

( २१८) ताजिकनीलकण्ठी।
विक्रीणाम्यमुकं वस्तुप्रश्न एवं विधेसति ॥
आयस्थाने बलवति विक्रेतव्यं कयाणकम् ॥ ७ ॥
मैं यह वस्तु बेचताहूं कैसा होगा ऐसे प्रश्नमें आयस्थान वा तत्स्वामी
बलवान् हो तो इस विक्री में लाभ अन्यथा हानि होगी.॥ ७ ॥
इति श्रीमहीवरकतायां प्रश्नवंभापाटीकायां तृतीयभावप्रश्ननिरूप० ॥३॥
अथ चतुर्थस्थानप्रश्नः।
लग्नपतींदचतुर्थपतिमुथशिलमथवागृहे गमनम् ॥
प्र: पृथ्वीलाभदमसौख्यदृग्योगतोनैव ॥१॥
लग्नेश चन्द्रमा और चतुर्थेश परस्पर इत्थशाली वा एकही स्थानमें होतो
प्रष्टाको भूमिलाभ होवे पापग्रहोंसे युक्त वा दृष्ट हों तो लाभ नहीं होगा,
विशेष बलाबलसे फल कहना ॥ १ ॥
यदि पृच्छति कृषिकोमेक्षेत्राल्लाभो भवेन्नवा ।।
लगंकृषिकस्तुय्य भूमिधूनंच कृपिस्तरुर्दशमम् ॥२॥
खेतीवाला जो पूछे कि मेरी खेतीसे लाभ होगा वा नहीं तो.लग्नं कृषि-
कर्ता चतुर्थ भूमि सप्तम कपि दशम अन्न वृक्षादि होते हैं इन भावोंके बला-
बल निरूपण करके उक्त कामोंमें शुभाशुभ कहना ॥२॥
लग्नेबूरोपगते स्याचौरोपद्रवस्तुकृषिकर्तुः ॥
वक्रातिचारवज्यूकूरे चौरस्यकृषिलाभः ॥३॥
लग्नमें पापग्रह हों तो कृषिकर्ताको चौरादि उपद्रव होंगे जो वह पापग्रह
वक्री वा अतिचारी न हों तो चौरसे फिरभी लाभ होवे ॥ ३ ॥
लग्रस्थे शुभखेटेसाफल्यंकर्षकस्य कृषितः स्यात् ॥
तुर्येच रंगते त्यक्त्वा भूमि प्रयात्येषः ॥४॥
लग्नमें शुभग्रह हों तो खेतीवालेको खेतीमें अच्छा लाभ होगा जो चौथा.
पापग्रह हो वो समयपर खेती छोडकर भागजायगा ॥ ४ ॥
घूने च शुभोपगते शुभंकृपेस्त्वन्यथातुविपरीतम् ।।
दशमे दशमपतौ वा शुभयुतदृष्टेशुमा वृक्षाः॥५॥

, 1 भाषाटीकासमेवा। (२१९) सप्तम स्थानमें शुभग्रह हो तो कषी अच्छी होगी पापग्रह हो तो अन्नादि अच्छा नहीं लगेगा तथा दशमेश दशममें शुभग्रहोंसे युक्त वा दृष्ट हो तो वृक्ष अन्न आदि अच्छे होंगे ॥ ५॥ भूभाटकपृच्छायां प्रष्टा च भाटकं चूने ॥ तस्योत्पत्तिर्दशमे तथावसानं चतुथें स्यात् ॥६॥ भूमिसंबंधी महसूल किराया किस्त आदिके प्रश्नमें लग्नसे प्रष्टा सप्तमसे किराया उसकी उत्पत्ति दशमसे और उसका परिणाम वा क्षय चतुर्थ स्थानसे विचारके कहना ॥ ६ ॥ लग्रस्य लमपस्यच शुभयोगेशुभमशोभनंवामे ।। यूनेक्रोपगते यस्मादपि भाटकस्ततोनर्थः॥ ७॥ लग्न तथा लग्नेश शुभग्रह युक्त दृष्ट हों तो: भाडाविषयक समस्त शुभ, पापग्रहयोग दृष्टि हों तो सर्व अशुभ फल जानना, जो सप्तममें भी पापग्रहही हों वो भाडामें किसी प्रकार अनर्थ होगा ॥ ७ ॥ दशमे क्रूरोपगते नोत्पत्तिर्बहुतराभवेत्प्रष्टुः ॥ क्रूरादितेतु तुय्यस्यादवसाने शुभंनास्य ॥८॥ दशमस्थानमें पापग्रह योग दृष्टि हो तो प्रष्टाको भाडा बहुत न मिले, चतुर्थ । स्थानमें पाप हो वो भाडेका परिणाममें कारखाना डूबजायगा ॥ ८॥ ग्रन्थांतरे नौकाप्रश्नः। नौलाभदास्यान्ममनतिप्रश्ने केंद्रेशुभाश्चेदितरेषुपापाः॥ बलोज्झिताक्षेमजयादानौ भावीतिवाच्यं विदुषा विमृश्य ॥९॥ नाव (जहाज ) आदिके काममें लाभ होगा या नहीं ऐसे प्रश्नमें केंद्रोंमें बलवान् शुभयह अन्यस्थानोंमें निर्बल पापग्रह हों तो नाव लाभ देगी, विशेष वारतम्यसे विद्वानोंने विचारकरके फल कहना ॥९॥ लग्नाधिपेवक्रिणिचास्यनाथेव्यावृत्यनौरोतचःमार्गतःस्यात् ।। चेत्सौम्यदृष्टः शलेन पापैदृष्टस्तदावस्तुविनेति वाच्यम् ॥१०॥ 1

(२२०.) वाजिकनीलकण्ठी।
लग्नेश वक्रगति और उसके स्थानका स्वामी वा चतुर्थेश शुभयुत दृष्ट
हो तो नाव मार्गसे कुशलपूर्वक हटि आवेगी; जो पापग्रहसे युत वा दृष्ट हो तो
वस्तु विनाही लौट आवे ॥ १० ॥
विलग्नरंध्राधिपतीस्वगेहेप्रवेक्ष्यतश्चेव्यवहारलाभः ॥
यदाष्टमेसौम्यखगाबलाव्यास्तदातरीलीभमुखप्रदास्यात् ॥ ११ ॥
लग्नेश और अष्टमेश अपने २ राशिमें हों वा अपने भावोंको देखें तो
नायव्यवहारलाभ होवे. जो बलवान् शुभग्रह अष्टम हो तो नाव लाभ और
सुख देगी ॥ ११ ॥
कुशलायातिपृच्छायांमृत्युयोगेसमागते ॥
तदानौतिशीघ्रणलाभाचंचान्ययोगतः ॥ १२॥
नाव कुशलसे आवेगी, ऐसे प्रश्नमें जो मृत्यु फल देनेवाला योग प्रश्न
लग्नमें हो तो नाव शीघ्र अपने स्थानमें आवेगी जो कोई आरिष्टदायक योग
हो तो लांभ अच्छा होगा, जो और काममें बुरे योगहैं उनमें से कोईभी हो सों
यहां शुभदायक है ॥ १२॥
लग्नेशचंद्रनाथवाचंद्रवामृत्युपोयदि ॥ तदायानस्यवक्तव्यनि-
श्चितंमज्जनंबुधैः।तावुभौसप्तमस्थौचेजलेवापतितांवदेत् ॥ १३॥
लंग्नेश वा चंद्रराशीश वा चंद्रमाको अष्टमेश देखे या युक्त हो विशेषतः
इत्थशाली हो तो नाव द्रव्यसहित डूबजायगी ऐसा निश्चय कहना, जो वे
दोनहूं सप्तमस्थानमें हों तौभी नावका द्रव्यं डूब जायगा नाव मात्र बचेगी
कहना ॥ १३॥
लग्नचंद्रपतीकूरदृष्टयान्योन्यंयदीक्षितौ ॥
तदापोतजनानांचमिथ कलहमादिशेत् ॥ १४ ॥
लग्नेश और चन्द्रमा परस्पर शत्रुदृष्टि से देखें तो नाववाले मनुष्योंका
परस्पर कलह होवे ॥ १४ ॥
इति श्रीमहीधरकृतायां प्रश्नतंत्रभाषाटीकायां चतुर्थभावप्रश्ननिरूपणम् ॥ ४ ॥

-
भाषाटीकासमेता।
(२२१)
अथ पंचमस्थानप्रश्नः।
यदिपृच्छत्येतस्या योभवेन्मे जानवाकात्रित् ॥
लगेशेंदोःसुतपतिनामुथशिलभावप्रसूतिःस्यात् ॥१॥
जो प्रष्टा पूँछे कि, मेरी स्त्री प्रसूती होगी वा नहीं तो लग्नेश चंद्रमा पंच-
मेश परस्पर इत्थशाली हों तो संतती होगी ॥ १ ॥
यदि तपतिविलग्नेलग्नपचंद्रौसुतेथवास्याताम् ।।
सत्वरितमेववाच्यासविलंबनक्तयोगेन ॥२॥
जो पंचमेश लग्नमें वा लग्नेश और चंद्रमा पंचममें हों तो शीघ्र संतति
होगी. जो इनका नक्तयोग हो तो विलंबसे होगी ॥ २ ॥
द्विशरीरेचविलयेशुभयुतपुत्रेद्यपत्ययोगोस्ति ॥
यदिलग्नपत्रपतीपुंराशीतत्सुतोगौ ॥३॥
लग्नमें द्विस्वभाव राशि शुभग्रहसे युक्त वा दृष्ट हो तो, गर्भमें दो. अपत्य
होंगे, जो लग्नेश पुत्रेश पुरुषराशिमें हों तो गर्भ में पुत्र होगा वीराशिमें हों
तो कन्या होगी ॥३॥
अथचंद्रापुंराशौ ग्रहकृतमुथशिलस्तदापिसुतः।।
अथवाविधुरपराह्नेसूर्य्यात्पृष्टतदास्त्रीस्यात् ॥४॥
जो चंद्रमा पुरुष राशिमें पुरुष बहसे युक्त वा मुशिली हो तो गर्भ में पुत्र
होगा अथवा चंद्रमा अपरा समयका वा कृष्णपक्षका तथा सूर्यसे पीछे
हो वो गर्भ में स्त्री होगी ॥ ४ ॥
होरास्वामींपुरुषःपुंराशौचत्तथापिसुतंगर्भः॥
तुंगेंदुसौम्ययुक्तंगभेदीर्घायुः संभूतिः॥५॥
लग्नेश पुरुषग्रह पुरुष राशिमें हो तौभी गर्भमें पुत्र होगा जो उच्चका
चंद्रमा शुभग्रहोंसे युक्त दृष्ट पंचम हो तो दीर्घायु पुत्र होगा ॥ ५ ॥
एषागर्भवतीकिल नवा प्रमाणं प्रयाति गर्भोयम् ॥
श्रेलमपशशिनोः सुतस्थूयोर्गर्भवत्येव ॥६॥
जो प्रश्न हो कि यह स्त्री गर्भवती है या नहीं तो प्रश्नमें लग्नेश और
चंद्रमा पंचम हो वा उसे देखे तो गर्भवती है ॥ ६॥

(२२२) ताजिकनीलकण्ठी।
यद्येतयोर्सथशिलंकेंद्रसुतऐनगर्मिणीतदपि ॥
आपोछिमेथशालादनीक्षणालमपुत्रयोनॆवम् ॥ ७॥
जो लग्नेश और चंद्रमाका केंद्रमें सुथशिल हो तोभी गर्मिणी है जो
इत्थशाल आपोक्किममें हो यहा लग्नेश पुत्रभाव वा पुत्रेश परस्पर न देखें तो
गर्भवती नहीं है ॥ ७ ॥
चरलग्नेकुरेंद्रोर्मुथशिलभावे विनश्यतिहिगर्भः॥
लमपशशिनोस्तत्पतितत्रस्थेवक्रमुत्थशिलेपितथा ॥८॥
चरलग्नमें पापग्रह चंद्रमासे मुशिली हो तो गर्भ नष्ट हो जायगा. लग्नेश
तथा चंद्रमाका नीचादि पतित वा वक्री ग्रहसे मुशिली हो तोभी गर्भनष्टहोगाट
जीवितमरणप्रश्नेबालानामंत्यपेशभर्दष्टे ॥
केंद्रस्थे सितपक्षे शुभयुक्तेत्ये विधौजीवेत् ॥ ९ ॥
वालकके जीवित और मरण प्रश्नमें जो व्ययेश केंद्रों शुभ ग्रह दृष्ट हो
तथा शुलपक्षका चंद्रमा शुभ युक्त बारहवां हो तो वालक बचेगा ॥ ९ ॥
रैश्चेदंत्यपतिर्दग्धश्चापोक्किमयुतःकरैः ।।
दृष्पश्चजातमात्रो म्रियतेवालोऽथवागीं ॥१०॥
जो व्ययेश पापग्रह दग्ध तथा आपोक्लिम स्थानमें पापयुक्त दृष्ट हो तो
बालक जन्ममें वा गर्भहीमें मरजावे ॥ १० ॥
प्रसवज्ञानप्रश्नमुक्ताँल्लग्नांशकान् परित्यज्य ।।
भोग्याद्विचित्यशेपाननुमित्येवंवदेदिवसान् ॥ ११॥
प्रसवदिन ज्ञान प्रश्नमें लमके भुक्तांशकोंके तुल्य गर्भके भुक्त मास भोग्या-
शोंसे शेपदिन अनुमान करके कहना ॥ ११ ॥
लगायतमेस्थाने शुक्रस्तावद्देन्मासम् ।।
यदिधर्मादूर्द्धस्थस्तद्वदेत्पंचमस्थानात् ॥ १२॥
लग्नसे शुक्र जितनेवें स्थानमें हो उतने महीनेका गर्भहै कहना. जो नवम
स्थानसे ऊपर शुक्र हो तो पंचम भावसे शुक्रपर्यंत भाव गिनके गर्भ मास
कहना ॥ १२॥

भाषाटीकासमेता। (२२३)
लग्नांतर्दिनराशिर्दिवाग्रहो लग्नपश्चदिनराशौ।
तदिवसे जन्मस्याद्विपरीतव्यत्ययश्चैषाम् ॥ १३॥
जो लग्न दिवाबली और लग्नेश भी दिवाबली राशिमें हों तो दिनमें और
ये रात्रिमें बली हों वो रात्रिमें जन्म होगा ॥ १३ ॥
तत्कालेद्विरसांशश्चन्द्रमसस्तत्समेचन्द्रे ॥
गर्भस्यप्रसवःस्यादनुपातःशास्त्रतःकार्यः॥ १४ ॥
प्रश्न वा आधानकालमें चन्द्रमा जिस द्वादशांशमें हो उसीके तुल्यराशिस्थ
चन्द्रमामें नवम वा दशम महीनेमें जन्म होगा. इसका अनुपात अन्य शास्त्रोंमें
विशेष प्रकट कहाहै, बृहज्जातक महीधरीभाषामेंभी विशेष विस्तार है॥ १४ ॥
अस्मिन्वऽपत्यंभविताविलगपंचमाधीशौ।
भजतो यदीत्थशालंतत्रैवाब्दे भवेन्नूनम् ॥ १५॥ .
इससालमें मेरे संतान होगी वा नहीं ऐसे प्रश्नमें जो लग्नेश पंचमेश इत्थ-
शाली हों तो निश्चय संतान होगी. ईसराफसे न होगी ॥ १५ ॥
यदिवा मिथोगृहगतौस्यातामेतौचसंततिस्तदपि ।
वाच्या तस्मिन्वर्षे शुभयोगादन्यथानपुनः॥१६॥
अथवा लग्नेश पंचमेश एकही स्थानमें वा एककी राशिमें दूसरा दूसरेकीमें
एक हो तथा शुभयुक्त हो तो संतान होगी. इतने से कोईभी योग न हो
तो संतान नहीं होगी ॥ १६ ॥
सूताप्रमृतयुवतिज्ञाने तपोथषष्ठपःसुर्यात्।नित्योदयमायात्ततः
प्रसूतेचनारीयम् ॥ अथजीवभौमशुक्राआकाशउदयिनस्तथाप्ये-
वम् ।। १७॥
यह स्त्री प्रसववती होगी वा नहीं ऐसे प्रश्नमें पंचमेश वा षष्ठेश सूर्यके
साथसे उदय होगया हो अथवा बृहस्पति मंगल शुक्र दशम स्थानमें हों तो
प्रसूति होगी ॥ १७ ॥
ग्रंथांतरे।
लग्नेश्वरेणाथनिशाकरेणयदीत्थशालंकुरुतेसुतेशः ॥
भःशुभैःसंयुतईक्षितःस्यात्सत्संतति ष्टुरसौविदध्यात् ॥ १८॥

(२२४) ताजिकनीलकण्ठी। जो पंचमेश लग्नेश वा चन्द्रमासे इत्थशाल करे तथा पंचमेश शुभ ग्रह हो शुभग्रहसे युक्त वा दृष्टभी हो तो प्रष्टाको संतति देताहै ॥ १८ ॥ पुंस्त्रीग्रहाः पुत्रगृहविलनात्पश्यंतियावंतइहातिवीर्याः ॥ तत्संख्यकाःस्युस्तनयाश्चकन्याःशुभेशयोगात्सुतभांशतुल्याः॥१९॥ जितने पुरुष यह अतिबली होकर पंचम भावको देखें उतने पुत्र तथा जितने स्त्रीग्रह अतिबली होकर देखें उतनी कन्या होंगी वा पंचममें जितने भुक्त नवांशक हों उतने होंगे किंतु ये संख्या पूर्वोक्त इत्यशाल हुयेमें और स्वस्वामी शुभयुक्त पंचम होनेमें होती हैं ॥ १९ ॥ लशपुत्राधिपतीपरस्परंनपश्यतश्चेदुदयंचपंचमम् ॥ पापेत्थशालोसुतलनपोचप्रष्टुस्तदासंततिनास्तितांवदेत् ॥२०॥ लग्नेश और पंचमेश परस्पर न देखें तथा लग्न और पंचमकोभी न देखें वा लग्नेश पंचमेश पापेत्थशाली हों तो संतति नहीं है कहना ॥ २० ॥ पुत्रालयसिंहवृषालिकन्या प्रश्नोदयाजन्मभतस्तथेदोः ।। अल्पप्रजःसंततिपृच्छकास्यात्पापैःसुतःसहितक्षितेवा ॥२१॥ पंचमेश ५। २।८।६ राशि प्रश्न वा जन्मलग्न अथवा चन्द्रमासे हों तो प्रष्टाको अल्प संतान होगी, पापग्रहोंसे पंचमस्थान युक्त दृष्ट होनेमेंभी यही फल है ॥ २१॥ स्वःस्थितौरंध्रगतौयमार्कोप्रष्टुस्त्रियंसंदिशतश्चवंध्याम् ॥ छिद्रस्थितीचंद्रवुधौसदोपांवाकाक्रवन्ध्यांतनयाप्रसूतिम् ॥ २२ ॥ अष्टम स्थानमें शनि सूर्य ५। १० । ११ राशिमें हो तो प्रष्टाकी स्त्री वंध्याहै जो चन्द्रमा बुध अष्टम हों तो उसपर किसी देवताभूतप्रेतादिका दोपहै, अथवा १ संतान होकर क्या होवे वा कन्याही होवे इसमें विशेष विचार यह है कि, उनमें से चन्द्रमा बली हो तो कन्याप्रजा होगी यदि उसपर पुरुष ग्रहकी दृष्टि हो तो काकवंध्या, जो बुध वली हो तो धंध्या होवे ॥ २२॥ ' .

भाषाटीकासमेता। (२२५) मृतप्रजाछिद्गयोःसितेज्ययोर्गर्भस्रवाभूमिसुतेष्टमः ॥ द्रेिश्वरेछिद्गतेतिवीर्येपुष्पंनविंदत्यबलासुतप्रदम् ॥ २३ ॥ जो शुक्र बृहस्पति अष्टम हों तो मृतप्रजाअर्थात् जितने संतान हों मरतेही रहें मंगल अष्टम हो तो गर्भ गलते रहें जो अष्टमेश अष्टम भावमें बलवान हो तो पुत्र देनेवाला पुष्प (रज ) भी उस स्त्रीका न होवे ॥ २३ ॥ शुक्रायोरष्टमसंस्थयोर्वाक्रूरेद्धवांत्याष्टमराशिसंस्थैः ।। जातापुरस्तान्प्रियतेप्रजावैप्रष्टुनचाग्रेशुभसंततिःस्यात् ॥ २४ ॥ शुक्र सूर्य्य अष्टम हों तथा दूसरे और बारहवें पापयह हों तो सन्तान होतेही मरजाया करें, आगेभी शुभ सन्तति न होवे ॥ २४ ॥ रिष्फेश्वरेकेन्द्रगतेचसौम्यैर्युतेक्षितेजीवतिबालकश्च ॥ आपूर्णमासेशुभयुक्तइंदौकेंद्रेशिशु वतिदीर्घकालम् ॥ २९ ॥ अष्टमेश शुभ ग्रहोंसे युक्त वा दृष्ट केन्द्रमें हो तो बालक बचजायगा, शुकुपक्षका चन्द्रमा शुभयुक्त केन्द्रमें हो तो पुत्र दीर्घायु होगा ॥ २५ ॥ पंचमेशोथल शोविषमस्थानगौयदा ॥ पुत्रजन्मप्रदौ यौ कन्यानां समराशिगौ ॥२६॥ पुत्रवान् योग प्राप्तहुयेमें विशेष विचारहै कि पंचमेश वा लग्नेश- विषम स्थानमें हो तो पुत्र और सम राशिमें हो तो कन्या देताहै ॥ २६ ॥ युग्मराशिगते लग्ने यदातत्रशुभग्रहाः ॥ गर्भपत्यद्वयं वाच्यं देव न विपश्चिता ॥ २७॥ लग्न द्विस्वभाव राशिहो उसमें शुभग्रह हों तो चतुरज्योतिषीने गर्भमें दो बालक कहने ॥ २७ ॥ विषमोपगतो लगा निः पुत्रसुखप्रदः॥ समभेयोषितांजन्मविशेषोजातकोक्तिवत् ॥२८॥ लमसे शनि विषम स्थानमें पुत्र और सप्तममें कन्या देता है विशेष विचार जातकोतही यहांभी जानना ॥ २८॥ १५

(२२६)
ताजिकनीलकण्ठी।
विषमः विषमनवांशसंस्थिता गुरुशशांकल कोः॥
पुंजन्मकराः समभेषु योषितां नृराश्यशाः ॥२९॥
बृहस्पति चन्द्रमा लग्न और सूर्य विषम राशि विषम नवांशमें पुत्र और
समराशि नवांश अर्थात् पुरुषराशि नवांशकोंमें कन्या देते हैं ।। २९ ॥
इति श्रीमहीधरकवायां तानी मा०पञ्चमस्थानप्रश्ननिरूपणम् ॥ ५॥
अथ षष्ठस्थान श्रः।
रोगादय त्थास्यति नवेतिलगंभिषग्यूनम् ॥
व्याधिदशमं रोगीहिचुकंभेषजमिहाहुराचार्याः॥१॥
रोगी मनुष्य रोगसे आराम होगा वा नहीं, ऐसे प्रश्नमें लग्नसे वैद्य सप्त
रोग दशमसे रोगी चतुर्थ से औषधी आचार्य कहते हैं ॥ ३ ॥
ऋरादित विलग्ने वैद्यानगुणास्तदोषधादोगः ॥
वृद्धिमुपयाति दशमे निजबुद्धितोप्यगुणः ॥२॥
लम पापाक्रांत हो तो वैद्यसे गुण न होवे उसकी औषधिसे रोग बढ़ेगा
दराममें पापग्रह हों तो अपनीही चूक ( गलती ) से रोग बढ़े ॥ २ ॥
अस्तेचक्रूरयुक्ते मांद्यान्मांद्यतथौषधादंधी ॥
सौम्योपगतरेतैररोगिता रोगिणो भवति ॥३॥
सप्तममें पाप हों तो रोगमें रोग खडा होवे, चतुर्थमें हों तो औषधीसे रोग
वृद्धि होवे. इन १ । १०। ७ । ४ स्थानोंमें शुभग्रह हों वा ये भाव बली
हों तो नीरोगता होगी ॥ ३॥
लगेशेंदो सौग्येत्थशालतो रोगनाशनं वाच्यम् ॥
वक्रतुतत्रखेटे भूयोपिगदासमुपयाति ॥४॥
लग्नेश तथा चन्द्रमाका शुभग्रहसे इत्थशाल हो तो रोगनाश होवे ईस-
राफ हो वा चक्रगति हो तो फेरफेर रोग उत्पन्न होवै ॥ ४ ॥
भूमिस्थे लग्नानाथेशशिमुथशिले भवेन्मृत् ॥
लग्नस्थेरंध्रपती लग्नपशशिनोविनाशेवा ॥५॥
: लग्नेश चतुर्थ हो चंद्रमाके साथ मुथशिली हो तो मृत्यु होवे, वा लमम
अष्टमेश और लग्नेश एवं चन्द्रमा अष्टम हों तौभी मृत्यु होवे ॥५॥

भाषाटीकासमेवा। (२२७) लग्नाधिपति सूर्यचंद्रः सप्तेशमुथशिलविधायी ॥ सप्तेशे षष्ठस्थे तन्मरणं रोगिणो वाच्यम् ॥ ६॥ लग्नेश चतुर्थ हो तथा चन्द्रमा सप्तमसे मुशिली हो वा सप्तमेशसे हो वो रोगीकी मृत्यु होगी ऐसा कहना ॥ ६ ॥ रंध्रेशे न विनष्टे नास्तमिते नापिकेन्द्रस्थे । लग्नेशस्यमुथशिलेमृत्युःस्याद्रोगपृच्छायाम् ॥७॥ अष्टमेश अस्त वा नष्ट बली होकर केंद्र हो लग्नेशसे मुशिल करता हो तो रोगप्रश्नमें मृत्यु होगी कहना ॥ ७ ॥ अथवातयोश्चकेन्द्र सुथशिलतःक्रूरपीडितेमरणम् ॥ यदिकेन्द्रे क्रूरग्रहस्तदापिपीडाष्टमेशेपि ॥ ८॥ जो लग्नेश अष्टमेशका केंद्रमें मुथशिल हो क्रूर पीडितभी हो तो मृत्यु होवे जो केंद्रमें पापग्रह वा अष्टमेश हो तो रोगपीडा होवे ॥ ८॥ सुर्यद्वादशभागे प्रविष्टेलग्नेश्वरेप्येवम् ॥ तनुमृत्युभावनाथावन्योन्याश्रयगतौमरणम् ॥९॥ लग्नेश सूर्यके द्वादशांशमें हो तो मृत्यु होवे वा लश्नेश अष्टम अष्टमेश लग्नमें वा परस्पर दृष्ट हों तौभी मृत्यु होवे ॥ ९ ॥ लग्नेचरेचरोगीक्षणेक्षणस्यादरक सरुक्चापि ॥ द्विशरीरे पररोगः स्थिरैर्गदस्यैकरूपत्वम् ॥१०॥ लग्न चरराशि हो तो क्षणमें सुखी क्षणमें दुःखी होतारहै,द्विस्वभाव हो तो एकरोगसे दूसरा रोग होवे, स्थिर हो तो आय अंतमें एकही रोग रहै ॥ १० ॥ शशिनो वक्रमुथशिले स्थिररोगोमंदमुथशिलेपूर्वम् ।। मूत्रनिरोधाद्रोगोत्पत्ति याकृतेप्रश्ने ॥ ११ ॥ चन्द्रमा वक्री ग्रहसे मुशिली हो तो रोग स्थिर रहै, शनिसे मुयशिली हो तो अपूर्व रोग होने तथा मूत्रके बंद होनेसे रोगोत्पत्ति होवे ॥ ११ ॥ अथ पृच्छायाः पूर्वं सप्ताहानिच विलोक्यचत्वारि ॥ यदितेषुशशांकरखी भयुतदृष्टौसदाशस्तम् ॥ १२ ॥ .

(२२८)
ताजिकनीलकण्ठी।
प्रश्नके पहिले ७ वा ४ दिनमें सूर्य चन्द्रमा शुभग्रहसे युक्त दृष्ट हों तो
रोगीको शुभ होगा ॥ १२॥ .
"दोयमथनवेति प्रश्नेलग्नेश्वरोथचंद्रोवा ।।
षष्ठेश थशिलीस्यादस्तमितोवातदामंदः॥१३॥
यह रोगी होगावा नहीं ऐसे प्रश्नमें लग्नेश वा चन्द्रमा षष्ठेशसे मुथरिली
हो वा अस्तंगत हों तो रोगी होगा ॥१३॥
स्वामिभृत्यचतुष्पदप्रश्ने।
ईशोन्यो ममभवितानवेतिलग्नेश्वरस्ययदिकेन्द्रे ॥
नोभवति थशिलंषष्ठांत्यपतिभ्यां तदानान्यः॥ १४॥
मेरा और स्वामी होगा या नहीं अर्थात् और जगे नोकरी लगेगी वा
नहीं, ऐसे प्रश्नमें जो लग्नेशका केन्द्रमें षष्ठेश तथा व्ययेशसे मुथशिल न हो
वो और स्वामी नहीं होगा ॥ १४ ॥
वक्रीवान्येनसमंलग्नपतिः सहजनवमसंस्थेन ।
रुते यदीत्थशालं तदान्यनाथो भवेत्प्रष्टुः॥ १५॥
जो लग्नेश वक्री और किसी तृतीयनवमस्थानस्थ ग्रहसे इत्थशाली हो
तो और स्वामी होगा ॥ १५ ॥
ल पतीकेन्द्रस्थे रिपुदृष्टयाक्रूरवीक्षितेसुखपे ।
रविरश्मिगतेथभवेद्यावजीवनचान्यपतिः ॥ १६॥
लग्नेश केन्द्रमें हो तथा चतुर्थेश पर पापग्रहकी शत्रुदृष्टि हो एवं लग्नेश
अस्त हो तो जीवितपर्यंत औरपति नहीं होगा ॥ १६ ॥
अयमीशोभद्रोमे पृच्छायां लग्नपस्यकंबूले ॥
स्वामीसएवभव्योधूनेशस्यचशुभोन्येशः ॥ १७॥
यही स्वामी अच्छा होगा वा अन्य ऐसे प्रश्नमें लग्नेश शुभ ग्रहसे कंबू-
ली हो तो उसी स्वामीसे शुभ होगा, जो सप्तमेशका कम्बूल शुभ ग्रहसे हो
चौ अन्यस्वामीसे शुभ होगा ॥ १७ ॥
गृहभूमिस्थानानां चलनप्रश्ने पुरोक्त एवविधिः।।
सम्यग्विचार्यावाच्यं भमशुभं पृच तःस्वधिया ॥ १८॥

भाषाटीकासमेवा। ( २२९) गृहभूमि जगहके स्थिर रहने वा चलायमान होनेमें भी ऐसाही विचार अच्छे प्रकारसे करके अपनी बुद्धिसे शुभाशुभ प्रष्टाको कहना ॥ १८ ॥ भृत्यचतुष्पदलाभप्रश्नेलग्नेशशीतगूषष्ठे ।। षष्ठेशमुथशिलो वा लग्नेष श्वरोथतल्लाभः ॥ १९॥ भृत्य तथा चौपायाके लाभमें लग्नेश एवं चन्द्रमा छठे हों वा षष्ठेशसे मुथशिली हों अथवा षष्ठेश लममें हो तो उनका लाभ होगा ॥ १९ ॥ भृत्यस्यवाहनस्यचयद्वाप्रश्नेचल लग्नपती ।। अर्थीदातासप्तमसप्तमपौतबलात्प्राप्तिः ॥२०॥ भृत्य और सवारीके प्रश्नमें लग्न और लग्नेश लेनेवाले तथा सप्तम और सप्तमेश देनेवाले, इनका बलाबलसे प्राप्ति अप्राप्ति कहनी. जैसे लग्नेशका सप्तमसे सप्तमेशका लमसे, वा लग्नेश सप्तमेशका परस्पर मुथशिल संबंध हो तो भृत्य वाहनकी प्राप्ति, इनके ईसराफ वा असंबंधसे निर्बलतासे अप्राप्ति होगी ॥ २० ॥ थांतरे कलहः। क्रूरःखचरोल विवादपृच्छासुजयतिविवादतम् ॥ सर्वावस्थासुपरंनीचेस्तेजयतिनद्विपतः ॥२१॥ विवादप्रश्नमें क्रूर ग्रह लममें बलवान हो तो विवादमें प्रष्टा जीतेगा जो नीच वा अस्तंगत हो तो विवादमें शत्रुसे जीत नहीं सकेगा ॥ २१ ॥ लग्नघूनेतुयदापरस्परं रयोझकटदृष्टी ॥ विवदेत्तद्वादि गं तच्छारकाभ्यांप्रहरतितदैवम् ॥ २२॥ लग्न तथा सप्तममें क्रूरग्रह शत्रुदृष्टिदृष्ट होनेमें वादी प्रतिवादी परस्पर विवादमें छूरी आदि चलाय बैठेंगे ॥ २२ ।। लग्नेछूनेचयदिकर खचरोविवादिनोनतदा ॥ कलहनिवृत्तिःकालेजयतिहिबलवानगतबलंतु ॥ २३ ॥ लग्नमें तथा सप्तममें पापग्रह हों तो लडनेवालोंका झगडा निवृत्त नहीं होने . ..

.
(२३०) वाजिकनीलकण्ठी।
इनमें जो बलवान हो वह निर्बलको दाबलेताहै यहा लग्न, प्रष्टा सप्तम
प्रतिवादी जानना ॥ २३॥
लशःसुतगःसौम्या केंद्रसंधिर्नचान्यथा ॥
लमधूनेशषष्ठेशारित्वेप्यन्योन्यविग्रहः ॥२४॥
पंचममें लग्नेश और केंद्रोंमें शुभग्रह हों तो वादी प्रतिवादियोंका
मेल होगा अन्यथा न होगा. लग्न सप्तम छठे भावोंके स्वामी परस्पर
तत्काल वा नैसर्गिक शत्रु हों तो कलह बढेगा ॥ २४ ॥
गृहमागतोनयदासौकिंबद्धः किमथवाहतः प्रश्ने।
मूतौरोयदिसनिहतोबोथकापुरुषः ॥२५॥
कलही वा कोई अन्य घरमें नहीं आया, मारागया वा कहीं बंधनमें
पडगया,ऐसे प्रश्नमें लग्नमें पाप ग्रह हो तो मारागया वा बंधनमें पडगया॥२५॥
त्रिकोणचतुरस्रास्तस्थित पापग्रहोयदि ।।
ग्रहनिरीक्षितः पापैनबंधनमादिशेत्॥२६॥
पापयह ९।५ । ८१७ में हो तथा लग्नेशकोभी पापग्रह देखें
वो निश्चय बंधन होगया कहना ॥ २६ ॥
सप्तमगो मगोवाचेत्क्रूरतद्धतोपिवाबद्धः ॥
मृतौचसप्तमेवायद्वालटमेपिभवेत् ॥२७॥
सप्तम वा अष्टम पापग्रह हों तो हत वा बछ कहना और लग्नमें वा सप्तममें
तथा लग्न और अष्टम पापग्रह युगपत् हों तौभी वही फल है ।। २७ ।।
बद्धमोक्षे।
बदोस्तितत्किभवतीतिप्रश्नेविमुच्यतेसौखलमृत्युयोगे॥
कदाविमुंचेदितिपृच्छयमानेशुभंकदाभाविचतैर्मृतिःस्यात्॥२८॥
बँधाहुवा मनुष्य कैसा होगा कब छूटेगा, ऐसे प्रश्नमें जो मृत्यु-
दायक योग कोईभी हो तो बंधनसे छूट जायगा. उक्त योगका परिणाम
समय जबहो तब टनेका समय कहना, दीर्घायु योग हों तो नहीं छूटेगा
वा बंधनहीमें मरजायगा ॥ २८॥

' भाषाटीकासमेता। (२३) मुक्ति श्रेयदाकेंद्रेकेंद्रेशा स्युनमोक्षदाः ॥ तस्मिन्वर्षेथलग्ने श:पतितकेंद्रगेनच ॥ २९ ॥ संबंधेप्सुःसचेर रोमृतीशः स्यात्तदामृतिः॥ लगेशेस्तमितेंवुस्थेकुजदृष्टेतदास्मृतिः॥३०॥ बद्धमोक्ष प्रश्नमें केंद्रेश केंद्रोंमें हों तो बंधन से न छूटे, जो केंद्रगत पतित ग्रहसे संबंधी लग्नेश हो तो इसी वर्ष छूटेगा और अष्टमेश क्रूर, लग्नेश कर ऋरसे संबंधी हों तो मृत्यु होवे ॥ २९ ॥ ३० ॥ चन्द्रश्चांबुगपापेनमृत्युनाथेनयोगकृत् ।। तदागुप्त्यांमृतिश्चंद्र केंद्रेमंदयुगीक्षितः ॥३१॥ अष्टमेश पापग्रह चतुर्थ होकर चन्द्रमासे युक्त वा संबंधी इत्थशाली हो वा केंद्रगत चन्द्रमा शनिसे युक्त दृष्ट हो तो कैदहीमें मृत्यु होवे ॥ ३१ ॥ दीर्घपीडाथभौमेनयुग्दृष्टौबंधताडने ॥ दृश्यादैलनपश्चेत्स्याययपेनेत्थशालवान् ॥३२॥ केंद्रगत चन्द्रमा मंगलसे युक्त वा दृष्ट हो तथा लग्नेशके दृश्याईमें व्ययेश इत्थशाली हो तो बंधन होगा और ताडन हो(वेत कुर्रा आदिभी लगें)॥३२॥ पलायतेतदाबद्धो व्ययगेल गेपिवा ॥ तृतीयनवमस्वामीव्ययगोलग्नपेनच ॥३३॥ यदीत्थशालयोगेप्सुस्तदापिचपलायते ॥ लमेश व्ययभावमें हो तो बद्ध मनुष्य भाग जावे अथवा ३९ भावोंका स्वामी बारहवां होकर लग्नेशसे इत्थशाल चाहताहो तौभी भाग जायगा३३॥ दृश्यादैछुपचारेण चन्द्रोमुथाशलस्तदा ॥ ३४ ॥ बंधमोक्षस्त्रिधर्मेशःसग्रहःशीघ्रमोक्षकृत् ॥ लमेशके दृश्याईमें चन्द्रमा मुथशिली हो तो बदमोक्ष करताहै तथा तृती- येश वा नवमेशसे भी चन्द्रमा मुथशिली हो तो शीघ्र बद्धमोक्ष करता है ३४ पतितेंदुस्त्रिधर्मस्थग्रहसंबंधकृत्तदा ॥ ३५॥ केंद्रस्थस्त्रिभवेशेनयोगेप्सुश्चेत्तदाचिरात् ।। तीसरे वा नवम स्थानगत ग्रहसे क्षीण चन्द्रमा संबंधी हो ३ वा ११

(२३२) ताजिकनीलकण्ठी।
भावका स्वामी जो केंद्रमें हो उसको मिलना चाहता हो तो बंधनसे शीघ्रही
छूट जावे ॥ ३५॥
यावच्छुकोबलील तावत्कर्ता बलाधिकः॥३६॥
अस्तंगतेतनौशुक्रबद्धमोक्षादिसंभवः ॥
यतेयेनयोगेनतेनयोगेन च्यते ।। ३७॥
शुक लग्नमें हो तो वह शुक्र गोचरमें जबलौं उस राशिमें रहे इतनेही
वीच ट जावे जो शुक्र लग्नमें अस्तंगत हो तो वद्धमोक्ष होना संभव है वा
जिसयोगसे मृत्यु होती है उससे बद्ध भी मोक्ष होताहै ॥ ३६ ॥ ३७ ॥
मेषेतुलेचशीघ्रस्यार केनक्रेसकष्टता ।।
स्थिरेचिराविदेहस्थेमोक्षोमध्यमकालतः ॥ ३८॥
लग्नमें शुक्र ।। ७ का हो तो शीघ्र तथा ४।१० का हो तो कष्टसे स्थिर
राशिका हो तो बहुत दिनोंमें द्विस्वभावका हो तो मध्यमकालमें छूटे शुक्र
न हो तो लमहीसे यह फल कहना ॥ ३८ ॥
रोगिप्रश्ने विशेषः।
विलग्नेषष्ठपः पापोजन्मराशिनिरीक्षते ॥
रोगिणस्तस्यमरणं निश्चयेनवदेदुधः॥ ३९ ॥
षष्ठेश पापग्रह लग्नमें होकर जन्मराशिको देखे तो रोगीकी मृत्यु नि य
पंडितने कहनी ॥ ३९ ॥
चतुर्थाष्टमगेचन्द्रपापमध्यगतेपिवा ।।
मृतिःस्यादलसंयुक्तेसौम्यदृष्टयाचिरात्सुखम् ॥ १० ॥
चन्द्रमा ४ वा ८ में हो तथा पापग्रहों के बीच हो तो रोगीकी मृत्यु हो
वे जो उसे बली शुभग्रह देखें तो शीघ्र सुखी होजावे ॥ ४० ॥
विधौलग्नेस्मरेभानौरोगीयातियमालयम् ॥
श्रेकरग्रहेलमेरोगवद्धिश्चिकित्सकात् ॥११॥
चन्द्रमा लग्नमें सूर्य सप्तम हों तो रोगी यमालय पहुँचे जो प्र में पापग्रह
लग्नमें हो वो वैद्यसे रोग बढे ॥ ४१ ॥

भाषाटीकासमेता। (२३३) तथालग्नगतेसौम्यवैद्योक्तममृतंवचः॥ ल वै नंव्याधिःखरोगीतुर्य्यमौषधम् ॥४२॥ जो लग्नमें शुभग्रह हो तो वैद्यका वचन अमृततुल्य होवे, लग्नसे वैद्य सप्तमसे रोग दशमसे रोगी चतुर्थसे औषधी जाननी ॥ ४२ ॥ गोगणोभिषजोमैत्रीमैत्रेभेषजरोगयोः॥ व्याधरुपशमोवाच्यःप्रकोपःशात्रवेतयोः ॥४३॥ रोगी और वैद्य अर्थात् दशमेश लग्नेशकी तथा औषधी और रोग अर्थात ४। ७ भावोंके स्वामी परस्पर मित्र हो वा अन्योन्य इत्थशाली हों तो रोग शांत होवे, जो उक्तग्रहोंकी परस्पर शत्रुता वा इसराफ हो तो रोग औरभी कोपको प्राप्त होगा ॥ ४३॥। लग्ननाथेचसबलेकेंद्रसंस्थेशुभग्रहे ॥ उच्चगेवात्रिकोणेवारोगीजीवतिनिश्चयम् ॥ १४ ॥ लमेश बलवान् हो केंद्रों शुभग्रह उच्चका हो अथवा त्रिकोणमें हो तो निश्चय रोगसे बचजायगा ॥ ४४ ॥ एक: भोवलीलनेत्रायतेरोगपीडितम् ॥ सौम्याधारिलाभस्थास्तृतीयस्थागदापहाः॥ ४५ ॥ एकभी बलवान् शुभग्रह लग्नमें हो वो रोगीकी रक्षा करता है, शुभग्रह ९।६।११। ३ स्थानोंमें हों तो रोग नाश करते हैं ॥ ४५ ॥ देवदोषज्ञानम्। वह्नयंकद्वादशेषष्ठेलग्नात्पापग्रहोयदि ॥ हतोगदैर्जलेश्शस्त्रैस्तस्यदोषःकुलोद्भवः॥ ४६॥ रोगीके वा संततिबाधादिमें देवदोष ज्ञानमें से ३।९।१२।६ स्थानोंमें जो पापग्रह हों तो रोगी वा जलशस्त्रादिसे पीडितको अपने कुलपू- जित देवताका दोष कहना. उसके पूजनेसे नीरोग होगा ॥ ४६ ॥ देवस्यमेषगविपितृपक्षआकाशदेव्यामिथुनेथ ॥ स्याच्छा- किनी क्षेत्रपतिस्तुसिंहेस्त्रियांकुलाचितुलेतुमातुः ॥ १७ ॥ L (२३४) ताजिकनीलकण्ठी। नागस्त्वलौयक्षपतिर्धनुष्येनकें देव्यास्तुघटेतुयक्षी ॥ झपे लोपासितदैवतस्यदोषंभवेद्धर्मबहिष्कृताय ॥४८॥ जो मनुष्य धर्मी नहीं है उन्हें ये दोष लगते हैं कि मेप लग्न प्रश्नका हो तो अपना इष्ट देवताका एवं वृषसे पितरोंका, मिथुनसे आकाशदेवी मातृका परी आदियोंका,कर्कसे शाकिनी डाकिनी आदि, सिंहसे भूमिपाल देवता, कन्यासे, कुलपूजित देवता, तुलासे मातुलपक्षका देवता, वृश्चिकसे नाग देवता धनसे यक्षपति महादेव नारसिंह भैरव आदि मकरसे जलदेवी, कुंभसे यक्षिणी पिशाच आदि, मीनसे कलदेवता का दोष जानना ॥४७॥ ४०॥ प्रेताश्चराहोपितरः सुरेज्येचंटेंबुदेव्यास्तपनेपिदेव्यः॥ स्वगोत्रदेव्यश्वशंनौवुधेचभवंतिभूताव्ययरंध्रसंस्थे॥१९॥ राहु ८ । १२ स्थानोंमें हो तो प्रेतदोष,तथा बृहस्पति हो तो पितरोंका, चंद्रमा हो तो जलदेवी, सूर्य हो तो देवी, शनिबुधसे अपने कुलकी पूज्य देवीका दोष कहना ॥ ४९ ॥ शाकिन्यआरेभृगुजेंबुदेव्योगृहतिमत्यविमुखमुकुंदात् ।। स्वौचगेवीर्ययुतेचसाध्याश्चंद्रेचनीचेविबलेनसाध्याः॥ ५० ॥ मंगल८1१२ में हो तो शाकिनी डाकिनी और शुक्र हो तो जलदेवी- का दोष होवे. जो मनुष्य इश्वरसे विमुख हैं उनको ये दोष होतेहैं. उक्तयह जिससे दोष ज्ञात भया वह यदि अपनी राशि वा उच्चादिमें हो तो उपायोंसे दोष साध्य होगा. जो चंद्रमा बृहस्पति निर्बल हों तो असाध्य जानना॥५०॥ केंद्रस्थैलिभिःपापैरसाध्यादेवतागणाः ॥ सौम्यग्रहश्चकेंद्रस्थैःसाध्यामंत्रस्तवार्चनैः ॥५१॥ 'केंद्रमें बलवान् पापग्रह हों तो वे देवता असाध्य और शुभ ग्रह केंद्रों हों तो मंत्र स्तोत्र पूजनादिसे साध्य जानना ॥ ५१ ॥ कंटकाष्टत्रिकोणस्था शुभाउपचयेशशी ॥ लग्नेचशुभसंदृष्टेरोगीरोगाद्विमुच्यते ॥१२॥ ।

भाषाटीकासमेता।
(२३५)
केंद्र त्रिकोण और अष्टममें शुभग्रह तथा चंद्रमा उपचयमें हों और
लग्नको शुभग्रह देखें तो रोगी रोगसे छूटे ॥ ५२ ॥
इति महीधरकवायां नीलकंठीभाषाटीकायां षष्ठभावप्रश्ननिरूपणम् ॥ ६ ॥
अथ सप्तमस्थानप्रश्नः।
स्त्रीलाभस्यप्रश्श्रेस्मराधिपेलनपेनशशिनावा ॥
कृतमुथशिलेयुवत्याअयाचितायाभवे भः ॥१॥
स्त्रीलाभके प्रश्नमें सप्तमेशका लग्नेश वा चंद्रमासे इत्थशाल हो तो स्त्री
विना मांगेभी मिले ॥१॥
यदिलग्नपोविधुर्वायूनेतदयाचितांस्त्रियंलभते ॥
लमेशान्सूसरिफेचंद्रेस्तपमुथाशिले स्वयंलाभः॥२॥
जो लग्नेश वा बलवान् चंद्रमा सप्तम हो तथा लग्नेशका सप्तम भावसे
मूसरिफ और चंद्रमाका सप्तमेशसे मुथशिल हो तो भी विना ही प्रयास
स्त्रीलाभ होवे ॥२॥
येनसमंमुथशिलंतत्रविनष्टेचपापयुतदृष्टे ॥
निकटीभूतंतदाकिलविनश्यतिस्त्रीगतंकार्यम् ॥ ३॥
जिसके साथ मुथशिल हो वह नष्ट वा पापयुक्त वा दृष्ट हो तथा सप्तम-
में नष्टबली वा पापग्रह हो तो स्त्रीप्राप्ति संबंधि कार्य समीप भी आयगया
हो तौभी नष्ट होजायगा ॥ ३ ॥
पापेत्ररंध्रनाथेस्त्रीजातेवविघटतेकार्यम् ॥ सहजपतौ
भ्रातृभ्यस्तुय्यॆशे पितृभ्यएवनान्येभ्यः ॥ सौम्यकृत-
युक्तिहरभ्यांपूर्वोक्तस्थानतःशुभंवाच्यम् ॥ ४॥
सप्तममें पापयह वा अष्टमेश हो तो स्त्रीसंबंधि कार्य्य, तृतीयेशसे संबंध
हो तो भाइयोंसे, चतुर्थेशसे हो तो पितासे ऐसे और जिसमावेशका संबंधहो
उसके द्वारा कार्यहानि होवे जो सप्तम वा सप्तमेशपर शुभग्रहका योग- वा
दृष्टि हो तो उक्त संबंधवानसे स्त्रीलाभ होवे ॥ ४ ॥
जामित्रधनोपचयोपगतःशशीजीववीक्षितः ॥
कुरुते लाभपापयुतोवलोकितोवापितन्नाशम् ॥५॥

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(२३६) वाजिकनीलकण्ठी।
सप्तम द्वितीय और उपचय ३।६।१०।११ स्थानोंमें चंद्रमा जो
बृहस्पतिसे दृष्ट हो वो स्त्रीलाभ, पापयुक्त दृष्ट हो. तो स्त्रीहानि करताहै ॥५॥
दुश्चिक्यतनयसप्तमलाभगतः शशीविल ात् ॥
गुरुरविसौम्यैई विवाहदास्यात्तथासौम्याः ॥६॥
लग्नसे चंद्रमा ३।५।७।११ स्थानमें बृहस्पति सर्म्य बुधसे दृष्ट हो तो
विवाह देता है तथा शुभग्रह भी ऐसे होनेमें यही फल देते हैं ॥६॥
केंद्रधिकोणसंस्थाः सप्तमभवनंशुभग्रहस्ययदि ।
शय्यायालभतेसौपापोंविगतरूपाच ॥७॥
केंद्र १।४।७।१० त्रिकोण ९ । ५ और सप्तममें शुभग्रहकी राशि तथा
शुभग्रह हो तो शय्या स्त्रीप्राप्ति होवे, पापराशि उक्तस्थानोमें हो तो मिलेतो
सही परंतु कुरूपा मिलै ॥ ७ ॥
अथ स्त्रीस्नेहः।
प्रीतिस्थानप्रश्नेस्मरपतिलगेशमुथशिले हः॥
सझकटककःशत्रुदृशाशशिकंवूलेतुसापिशुभा ॥८॥
स्त्रकिी प्रीतिके प्रश्नमें सप्तमेश लग्नेशका मुथशिल हो तो उससे प्रीति शत्रु-
दृष्टि उनकी हो तो उससे कलह और चंद्रमा कबूल भी करता हो तो स्त्री
सरल स्वभाव होगी ॥ ८॥ .
यदिमंदोलग्नेश केंद्रेचस्यात्तदाबलीप्रष्टा ॥
अस्तेश्वरेचमदेकेंप्रतिवादिनोस्तिबलम् ॥९॥
जो लग्नेश और शनि केंद्रमें हो तो स्त्री विवादमें पूछनेवाला बली रहेगा.
जो सप्तमेश और शनि केंद्र में हो तो प्रतिवादी बली रहेगी ॥ ९ ॥
उभयोरेकस्थितयोज्ञातव्यासझकटकंतयोःप्रीतिः॥.
सूयेनशुभविबलेनरस्यशुक्रेतयोतिययोः ॥ १० ॥
लग्नेश सप्तमेश पापयुत एकही स्थानमें हों तो स्त्री पुरुष लडाई उपरान्त
प्रीतिमान होंगे जो सूर्य्य युक्त हों तो कलहमात्र होगा जो निर्बल उक्त
योगकर्ता हों तो दोनहूं रुष्टही रहेंगे ॥ १० ॥

भाषाटीकासमेता। (२३७)
रुष्टागमने।
ममगृहिणीरुष्टापुनरेष्यतिवाथभूम्यधःस्थरखौ ॥
भूपरिंगतेचशुक्रेनैतिपुनर्वक्रितेभ्येति ॥ ११॥
मेरी स्त्री रुष्ट होकर गयी फिर आवेंगी वा नहीं ऐसे प्रश्नमें लग्नेश चतुर्थ-
पश्यैव सूर्य वा शुक्र हो तो नहीं आवेगी, शुक्र वक्री हो तो आवेगी, लमसे
चतुर्थपर्यंत स्त्रीके हर्षस्थान हैं, चतुर्थसे सप्तमपर्यंत पुरुषके हर्षस्थान, इनमें
स्त्री पुरुष ग्रहोंके वशसे फल कहना ॥ ११ ॥
सू-निर्गतशुक्रवक्रेपिसमेतिचान्यथारुष्टा ।।
क्षीणेंदौबहुदिवसैःपूर्णविधौचद्रुतमुपैति ॥ १२ ॥
शुक्र समीपही उदय भयाहो अथवा वक्र हो तो रुष्ट खी आपही लौट
आवेगी, जो क्षीण चंद्रमा इससे संबंध करे तो बहुत दिनोंमें, पूर्ण चंद्रमा
संबंध करे तो शीघही आवेगी ॥ १२॥
अथकन्यापरीक्षा।
एषा मारिकाकिलनिदोषाकिनवेतिपक्ष याम ॥
लग्नेस्थिरोस्थिरक्षेलग्नपशशिनोश्वनिर्दोषा॥ १३॥
यह कन्या निर्दोष होगी वा कैसी इस प्रश्नमें लग्न तथा लगेश और
चन्द्रमा स्थिर राशियोंमें हों तो निर्दोष होगी ॥ १३ ॥
चरराशिगतैरतरियं मायंपिचजातदोषास्यात् ॥
द्विशरीरस्थेचंद्रेचरलग्नेस्वल्पदोषास्यात् ॥१४॥
जो लम लग्नेश और चंद्रमा चरराशिमें हों तो कन्या सदोषा और चं-
द्रमा द्विशरीर राशिमें लग्न चरराशिमें हो तो अल्पदोषा होगी ॥ १४ ॥
शनिभौमावेकौंस्थिरवजेतत्परेणगुप्तमियम् ।।
रमिताशनिचंद्रमसोर्लग्नगयोःप्रकटसुपभुक्ता ॥ १५ ॥
जो शनि मंगल एक स्थानमें स्थिरराशिवर्जित हों तो यह कन्या
किसीने गुप्त रमाहै, जो शनि चंद्रमा लममें हों तो प्रकट भोगी है ॥ १५ ॥

-.
(२३८)
वाजिकनीलकण्ठी।
यदिभौमशनीकेंद्रविधुदृष्टोवृश्चिकेथशुक्रास्यात् ।।
तद्रेष्काणेऽथतदानिधीतंजातदोपैपा ॥ १६॥
जो मंगल शनि केंद्रमें चन्द्रमासे दृष्ट हों अथवा शुक्र वृश्चिकका वा वृश्चिक
द्रेष्काणमें हो तो निस्संदेह सदोषा होगी ॥ १६॥
अथ प्रसूतिज्ञानम् ॥
एषाकिलप्रसूतासितेघटेशेहरौचनोसूता ॥
अनयोरलिवृपगतयोःसूतानारीपरिज्ञेया ॥ १७॥
यह स्त्री प्रसूती हुई वा नहीं ऐसे प्रश्नमें जो शुक्र कुंभका वा बुध सिंहका
हो तो प्रसूती नहीं भई, जो शुक्र वृश्चिकका वा बुध वृपका हों तो प्रसूती
भई है जाननी ॥ १७ ॥
भौमबुधशुक्रचंद्राद्विशरीरेचापवर्जितेचेत्स्युः ॥
अग्रेस्तितत्प्रसूतिश्चापेनागेनपृष्टतःसूता ॥ १८॥
मंगल बुध शुक्र और चंद्रमा धनरहित द्विस्वभाव राशियोंमें हो तो
प्रसूति आगे होगई धनक हो तो प्रसूति हुई न होगी ॥ ३८ ॥
कुरश्चेञ्चरराशौपरतःसूतास्थिरतुनिजपर।
मिश्रेतुमिश्रमांजातकसंदेहपृच्छायाम् ॥ १९॥
प्रसूतीके संदेहमें लग्नेश वा पंचमेश पापग्रह चरराशिमें हो तो परपुरुषसे,
स्थिर राशिमें हों तो अपने पतिसे प्रसूती होगी. लमेश वा पंचमेश पापग्रहसे
मुथशिली हो तो भी परपुरुषसे जानना, मिश्रित हो तो व्यभिचारिणी
कहना. शुभग्रह योग दृष्टि वा मुथशिलसे अपने पतिसे गर्भ जानना ॥१९॥
अथ पातिव्रत्यपरीक्षा।
टिलासतीयमथवेतिलग्नपतिश्चंद्रमाश्चभौमेन ॥
एकांशेमुथशिलकृत्तथैकंभवनेभजत्यन्यम् ॥ २० ॥
यह स्त्री पतिव्रता होगी वा नहीं, इस प्रश्नमें लग्नेश तथा चन्द्रमासे मंगल
एकांश समीप मुथशिली हो तो परपुरुषरता होगी ॥ २० ॥

-- भाषाटीकासमेता। (२३९) यदिनिजगृहगोभौमस्तदान्यदेशंप्रयातिजारकृते । - रविणेतिमुथशिलेसत्युपभुक्ताराज रुपेण ॥२१॥ जो लग्नेश चन्द्रमासे मुथशिली मंगल अपनी राशिमें हो तो जारके साथ परदेश चली जायगी, जो सूर्ग्यसे मुथशिल उनका हो तो यह थी राजकीय पुरुषने रमी है ॥ २१ ॥ सौम्येनलेखकवणिनिजभेशुक्रेणयोषयवस्त्री ॥ एतैयौगैरसतीविपरीतेसुचरितेतिवि यम् ॥ २२ पूर्वोक्तमकार मंगल बुधसे इत्थशाली हो तो लि नेवालेसे वा बनि- से रमी. जो शुकसे हो तो स्त्री समान पुरुषने भोगी है ॥ २२ ॥ लग्नपतिनाथशशिनामूसरिफेभूसुतेभवेजारः॥ त्यक्तःपुनर्गुरुहशापुत्रभयादविहशाचराजभयात् ॥ २३॥ लग्नेश वा चन्द्रमासे मंगलका मूसरिफ हो तो जाररता होवे जो उसपर बृहस्पतिकी दृष्टिभी हो तो पुत्रके भयसे सूर्य की दृष्टि हो तो राजभयसे जारता त्यागकरे ।। २३ ॥ सितदृष्टयापरनारीभयात्सितर्रकराशिगतदृष्टया। जारस्यस्थविरत्वाल्लग्नित्वात्यजतिजारंसा ॥२४॥ जो उक्त मंगलपर शुक्रकी दृष्टि हो तो जारके 'स्त्रीके भयसे स्त्री जारको त्यागे. जो शुक्र बुधकी एकराशि दृष्टि हो तौ जारके बृढे होनेसे लज्जा मान कर स्त्री जारको छोड देवे ॥ २४ ॥ ग्रन्थांतरेसुरतप्रश्नाः । भेत्थशालेहिमगौचतुष्टयेसौख्यातिरेक-सविलासहासः ॥ रेत्थशालेहिमगौसरोप-क्रूरान्वितेभूत्कलहोनृवध्वोः ॥२५॥ चन्द्रमा केंद्रमें शुभयहसे इत्यशाली हो तो संभोग विलासहासादियुक्त और पापग्रहसे इत्थशाली हो तो कोपसहित होते. जो चन्द्रमा पापयुक्त हो तो स्त्री पुरुष कलही होवें ॥ २५ ॥ .

(२४०) ताजिकनीलकण्ठी। पीडाथवासीत्सुरतेयुवत्यारजोयथास्तक्षमुपैतितद्वत् ॥ लग्नेसुरेज्येभृगुजेकलत्रेतुहिमांशौसविलासहासः॥२६॥ जो पापग्रह सप्तम हो तो सुरतमें स्त्रीको क्लेश रजोदोषादिपीडासे होवे, लग्नमें बृहस्पति सप्तम शुक्र चतुर्थ चंद्रमा हों तो सुरत विलासहाससे होवे, जैसा सप्तम स्थानहो उसके अनुसार सुरत कहना ॥ २६ ॥ शुभग्रहोत्थेचकंबूलयोगेयुतोरजःपुष्पसुगंधियुक्तम् ॥ स्वक्षोंचगेहारतंनिगद्यस्थितेद्विदेहेवनितास्वकीया ॥२७॥ शुभग्रहोंका कंबल योग लग्नेश वा सप्तमेशसे हो तो रजपुष्पकी सुगंधि- 'युक्त पाप कंबूलसे दुर्गंधि होगा, उक्त यह स्वराशि वा उच्चमें हो तो अच्छे घरमें अन्यथा सामान्य स्थानमें तथा नीचादिमें होनेसे मार्ग ऊपर कंटकादि- प्राय स्थानमें सुरत हो, तथा द्विस्वभाव राशिमें हो तो अपनी स्त्रीसे स्थिर हो तो वेश्यादिसे संभोग कहना ॥ २७ ॥ चरोदयेसारमतेपरस्त्रीकेंद्रेशनौसासरजादिवारतिम् ।। निशोदयेरात्रिखगेचरात्रौदिवानिशंतद्विदलेद्विखेटयोः ॥२८॥ चरराशि लग्नमें हो तो परस्त्रीसे भोग होवे, शनि केंद्र में हो तो रजोवतीसे होवे, लम दिवाबली हो तो दिनमें रात्रिबली हो तो रात्रिमें और संध्याबली से संध्या कालमें द्विस्वभावसे दिन तथा रात्रिमेंभी सुरत कहना ॥ २८ ॥ इति श्रीमहीधर०नी प्रश्नतंत्रभाषाटीकायां सप्तमभावप्रश्ननिरूपणम् ॥ ७ ॥ अथाष्टमस्थानप्रश्नः। नृपसंग्रामप्रश्शेविलग्नलग्नेशसंस्थितात्खेटात् ।। शशिमूसरिफात्प्रष्टास्तास्तपसंस्थेंदुमुशिलाच्छत्रुः ॥१॥ राजाके संग्रामप्रश्नमें लग्न तथा लग्नेश प्राप्तग्रहसे चंद्रमाके मूसरिफादि होनमें और सप्तम सप्तमेशके चन्द्र मुथशिलसे शत्रुका जय पराजय कहना लम .लमेश संबंधी शुभयोगमें अपना जय सप्तम सप्तमेश संबंधीसे शत्रुजय इत्यादि १॥ अथवाशनिकुजजीवाःशीचेभ्योबलयुताउपरिचराः॥ बुधसितचंद्रास्तेभ्यश्चदुर्बलाधश्चराध्वसंचिंत्याः॥२॥ .

भाषाटीकासमेवा। (२४१) अथवा शनि बृहस्पति बलवान् अधिकांश तथा बुध शुक्र चन्द्रमा उनसे हीनबली अल्पांश हों अर्थात् "शीघोल्पभागेधनभागमदे"इत्यादि इत्थ- हो तो शत्रुसे जय इससे विपरीत ईसराफ हो वो शत्रुकी जय होगी॥२॥ पतावस्तपतेःषत्रिहशाथमुथशिले द्वयोः स्नेहः ॥ वर्गद्वयमध्याधः पतितः सोन्येन छः स्यात् ॥ ३॥ लमेश सप्तमेशकी द्रेष्काण दृष्टि से मुथशिली हो वो अन्योन्य स्नेह हो जावे, जो छठे वा बारहवें हो तो शत्रुको कोई अन्य बांध लेवे ॥३॥ वर्गद्वयाधिपानांमसारफेऽस्तंगतेनरणदैय॑म् ॥ लग्नस्वा निमंदेकंबूलंउपरिगेजयः ष्टुः॥१॥ योदा प्रतियोद्धाके वर्गस्वामी मूसरिफी तथा अस्तंगत हो वो दीर्घरण - नहीं होगा, लग्नेश मंद अधिकांश और सप्तमेश शीघ्र स्वल्पांश बली हों तो प्रष्टाकी जय होवे ॥४॥ एवंगुणेतुतस्मिन्विप्रविनष्टेस्तपतितनीचस्थे। केंद्रेस्तेवास्तपतौप्रष्टुहानिःप्रवक्तव्या ॥५॥ जो मंदयह अधिकांश शीघ्र अल्पांश चन्द्रमासे मुथशिली अस्तंगत नीच- • गव हो. वा सप्तमेश केंद्रमें इसी प्रकार अस्व वा नीचगत हो तो रणमें प्रष्टाकी हानि कहनी ॥ ५॥ लग्नाद्धःशुभेसत्युपरिचमंदे भःसहायः स्यात् ।। पतौरंध्रस्थेरंधपमुथशिलेहतिःप्रष्टुः ॥६॥ लग्नके अधः अर्थात् दशमसे लमपर्यंत शुभग्रह और लग्नसे ऊपर से ४ स्थान पर्यंत शनि हों तो युद्धमें सहाय अच्छा मिलेगा. जो लगेश अष्टमहो वा अष्टमेशसे मुथशिली हो तो प्रष्टा हारेगा ॥ ६ ॥ लमेशेधनसंस्थेवनेशकृतमुथशिलेरिपोनाशः ॥ लगेशदशमपत्योर्मुथशितः पृच्छकस्यजयोवीयें ॥७॥ सप्तमेश धन स्थानमें, धनेशसे थशिली हो तो शत्रुनाश होवे, लग्नेश. दशमेशका मुथशिल हो बलीभी हों तो शत्रुसे जय होवे ॥ ७ ॥ १६ - (२४२.) ताजिकनीलकण्ठी। तुर्यास्तपयोरेवंशत्रोयोगेजयो यः॥ भयवपि केंद्रेतत्पतिकृतमुथशिलेबलंज्ञेयम् ॥ ८॥ सप्तमेश चतुर्थेशका मुथशिल हो वा योग हो तो शत्रुकी जयहो, दोना- के वर्गस्वामीमें जो केंद्रमें स्थानेशसे मुथशिली हो उसका पक्ष बलवान् रहेगा॥ ८॥ चरराशौसबलत्वजित्वाप्रांतेविनाशस्तु । लग्नपतावंत्यस्थेप्रष्टानश्यतिपरोस्तपेषष्टे ॥९॥ जिसका वर्गेश चरराशिमें बलवान्हो वह प्रथम शत्रुको जीतकर आपभी क्षय हो जायगा, जो लगेश बारहवां हो तो नष्ट होगा. जो सप्तमेश छठा हो तो शत्रुनाश होगा ॥ ९ ॥ खपतौलग्नेप्रष्टस्तुय्येशेस्तेरिपोःसहायबलम् ।। यन्मुथशिलौरवींदूतस्यबलंमूसरिफेहानिः ॥१०॥ दशमेश लग्नमें वा चतुर्थेश छठा हो तो शत्रुकी सेना अपनी सहाय करे सूर्य चन्द्रमा मुथशिली का मूसरिफी जिसके वर्गेशसे हों उसकी सेना की हानि होवे ॥१०॥ परचक्रागमपृच्छाग्रंथांतरे। मार्गानिवर्तते शत्रुः पापैःशवगृहावितैः । चतुर्थगैरपि प्राप्तः शत्रुर्भो निवर्तते ॥ ११ ॥ शत्रुके आगमप्रश्नमें पापग्रह छठे हों तो शत्रु, मार्गसे हट जावेगा जो चतु- में पापग्रह हों तो शत्रु पहुंचभी गयाहो तोभी भागकर हटजायगा ॥११॥ झपालि भकर्कटारसातलेयदास्थिताः ॥ रिपोः पराजयस्तदा चतुष्पदैः पलायते ॥१२॥ चतुर्थ स्थानमें १२ । ८1११ । ४ राशि होतो शत्रुको हार होवें और चतुष्पदो सहित वा उनकी सवारीमें भाग जावे ॥ १२॥ मे धसिंहवृषायद्युदयस्थाभवंति हिबुकेवा ॥ शत्रोनिवर्तनकराग्रहयुक्तावावियुक्तावा ।। १३ ॥

भाषाटीकासमेवा । (२४३)
लम वा चतुर्थमें।।९।५।२ राशि ग्रहसहित रहित हों तो शत्रु
लौट जावै ॥ १३ ॥
नागच्छतिपरच यदार्कचंद्रौचतुर्थभवनस्थौ ॥
गुरुबुधशुक्राहिबुकेयदातदाशीघ्रमायाति ॥ १४ ॥
जो सूर्य चन्द्रमा चतुर्थ हों तो शत्रुसेना नहीं आवेगी, जो बृहस्पति
बुध शुक्र चतुर्थ हों वो शत्रुसेना शीघही आवेगी ॥ १४ ॥
स्थिरोदयेजीवशनैश्चरेस्थिते गमागमौनैववदेत्तुपृच्छतः॥
त्रिपंचषष्ठारिपुसंगमायपापाश्चतुर्थाविनिवर्तनाय ॥ १५ ॥
स्थिर राशि में बृहस्पति और शनि हों तो गमन तथा आगमनभी
न होगा कहना, पापग्रह ३ । ५। ६ स्थानोंमें हों तो शत्रुसे संगम
होगा, चतुर्थमें पाप हों तो शत्रु हट जायगा ॥ १५ ॥
दशमोदयसप्तमगा सौम्यानगराधिपस्यविजयकराः॥
आरार्कि सिताःप्रभंगदाविजयदानवमे ॥ १६॥
शुभ ग्रह १० । ११७ स्थानोमें नगरेशकी जय करतेहैं और नवममें
मंगल शनि उसकी हार बुध बृहस्पति शुक्र जीत करते हैं ॥ १६ ॥
उदयच्चिन्द्रभवतिचयावदिनैश्चतावद्भिः॥
आगमनस्याच् त्रोर्यदिमध्येनग्रहःकश्चित् ।। १७ ॥
लमसे चन्द्रमा जितने रोशिपरहो उतने दिनोमें शत्रु आवे यदि उनके
बीचमें कोई ग्रह न हो ॥ १७ ॥
जयपराजये।
दैत्येज्यवाचस्पतिसोमपुत्रैरेकर्दागैर्लग्नगतैर्बलाढ्यैः॥
द्वाभ्यामज्येभृगुजेथलग्नेहन्याद्रणेयायिनृपंपुरेशः॥ १८ ॥
शुक बृहस्पति और चन्द्रमा एक राशिमें हों विशेषतः बलवान् वा
गत दोनहूं हों वा बृहस्पति शुक्रमें एकभी हो तो जानेवाला राजाको पुर वा
किलेमें बैठा राजा जीते ॥१८॥
सूय्यदुभौमार्कजसँहिकेयैःसर्वेश्चतुर्भिस्त्रिभिरेवलग्नगैः ॥
हन्यात्तदास्थायिनमाशुयायीयूनस्थितैर्यायिनृपंपुरेशः ॥ १९॥

(२४४) वाजिकुनीलकण्ठी।
सूर्य चन्द्रमा मंगल शनि-राहु सभी वा इनमेंसे तीन लममें हों वो अपने
स्थानस्थित राजाको गमन करनेवाला राजा मारे, जो उक्त ग्रह सप्तम हों
तो स्थानस्थित राजा गमन करनेवालेको मारे ॥ १९ ॥
शुक्रेज्यशीतांशुबुधाःसुरेज्यैःसवैत्रिभिधूनगतैर्बलाढ्यैः ॥
हन्यादणेस्थायिनमाशयायीसुखास्पदस्थैश्चशुभैःसुसंधिः॥२०॥
शुक्र बृहस्पति चन्द्रमा बुध सभी बृहस्पति सहित उत्तों से तीन शुभयह
बलवान् तथा सप्तममें हों तो जानेवाला स्थानस्थ राजाको रणमें मारे, जो
उक्त ग्रह चतुर्थ हों तो शीघ्र मिलाप होजावे ॥ २० ॥
कुजेत्थशालेहिमग विलग्नेबन्धौचमृत्युयुधिनागरस्य ।।
भौमत्थशालेचविधौकलत्रेबन्धमृतिवालभतेत्रयायी ॥२१॥
चन्द्रमा लम वा चतुर्थमें मंगलसे इत्थशाली हो तो युद्ध में स्थायी राजाकी
मृत्यु होवे, जो ऐसेही चन्द्रमा सप्तम हो तो यायी राजाका मृत्यु वा बंधन
होवै, स्थाई अपने किलामें बैठाहै यायी दूसरेपर जाताहै, ये संज्ञाहैं ॥२३॥
लग्नेशजामित्रपयोश्चमध्येभवेद्वहोयःस्वगृहोच्चसंस्थः॥
तदर्गमांनृपयोश्चसंधिज्ञेयोबुधलेखकपंडिताभ्याम् ॥ २२ ॥
लग्नेश सप्तमेशसे जो ग्रह स्वगृह वा उच्चमें हो तो उसके पक्षके मनुष्योंसे
संधि (मैत्री ) करावेगा, यदि बुध स्वगृहोच्चमें हो तो लेखक या पंडितों के
द्वारा मैत्री होवे, “वर्ग सू० चं० राजा, मं० सेनापति, बुध युवराज, बृ०शुल.
मन्त्री, श० दास" ये जानने ॥ २२ ॥
क्रूरेकलत्रेादयेशुभग्रहोयच्छेदनंयायिनृपायनागरः ।।
विपर्ययाद्यायिनृपःपुरेश्वरंदुर्गादिनिष्कास्यददातिवास्पदम् ॥ २३ ॥
सप्तममें पाप लग्नमें शुभग्रह हों तो यायी राजाको स्थायीराजा धन देके
शांत करावे, जो लग्नमें पाप सप्तममें शुभ ग्रह हो तो यायीराजा स्थायीको.
किलासे निकालकर फिर स्थान देवे ॥ २३ ॥
खीत्थशालेशशिजे गुप्ताश्वराभवेयुश्च जेसराफात् ॥
ग्रहाच्छशांकेनयुताश्वतस्मिन्येयेन्यवेषाश्चभवंतिचाराः ॥२४॥

।
भाषाटीकासमेवा । (२४५)
बुध सूर्यसे इत्थशाली हो वो चार पुरुष जासूस अति . रहैं, जो बुधसे
मंगल का ईसराफ हो चन्द्रमासे युक्त भी हो तो वे और वेष रक्खें ॥२४॥
दुर्गप्रश्ने।
श्रेविलमेरेवादुर्गभंगोनजायते ॥
"शेषतोभूमिपुत्रेराहौवामूर्तिगेसति ॥२५॥
प्रश्नलममें पापग्रह हो विशेषतः मंगल राहु हो तोकिला नहीं टूटेगा२५
सप्तमेसिंहिकास गशीघेणलभ्यते ॥ जामित्रोदयगेकूरे
रिष्फगेलग्ननायके ॥२६॥ द्वितीयेवाष्टमेषष्ठतदादुर्गनल.
भ्यते ॥ सकूरोलमपोवकीयुद्धदःसंस्थितः॥२७॥
सप्तममें राहु हो तो किला शीघ्र लियाजायगा,जो सप्तम तथा लग्नमें पाप-
ग्रह और लमेश बारहवां हो यहा२।६ाटमें हो वो किला नहीं लियाजायगा,
जो लग्नेश वक्री और पापयुक्त तथा केंद्रों हो वो युद्धही होवे ॥२६॥२७॥
षष्ठाधिपधूनगतेपापेवायुद्धमादिशेत् ॥
पृच्छायांकेंद्रगैःक्रूरै कोटेदुर्गंवधोनृणाम् ॥ २८॥
षष्ठेश सप्तममें वा पापग्रह सप्तम हों तो युद्ध होवे, तथा प्रश्न से केंद्रोंमें
पापग्रह हों तो किलामें मनुष्य मारे जावें ॥ २८ ॥
भौमाष्टमेशावेकवाददतोनिधनंनृणाम् ॥
स्वायपुत्रस्थितेजीवकोटमध्येभयंनहि ॥ २९॥
मंगल तथा अष्टमेश एकही भावमें हों तो प्रष्टाकी सेनामें बहुत मनुष्य
अरेंगे ॥११॥५भावमें बृहस्पति हो तो किलामें भय न होगा ॥ २९ ॥
शनौभौमचकेंद्रस्थेबहूनांवधबंधनम् ॥३०॥
शनि मंगल केंद्रमें हों तो बहुत मनुष्य मारेजायँगे तथा बांधे जायँगे ३०
लग्नगतोयदिपापापापेनयुतेक्षितोजयेद्वात्र ॥
लग्नात्पूर्वापरगौपापौयुद्धंतदाघोरम् ॥३३॥
लग्नमें पापग्रह पापहीसे युक्त वा दृष्ट हों अथवा दुसरे बारहवें पा ह
हों तो घोर युद्ध होगा ॥ ३१ ॥
इति श्रीमहीधरकतायां प्रश्नतंत्रभाषाटीकायामष्टमभावप्रश्ननिरूपणम् ॥८॥

(२४६) ताजिकनीलकण्ठी। अथ नवमभावप्रश्नः। ममगमनंभवितानवेतिलगेश्वरेथवाचंद्रे ॥ नवमेशमुथशिलेसतिनवमेवास्याद्भवेद्गमनम् ॥१॥ मेरा गमन होगा वा नहीं ऐसे प्रश्नमें लग्नेश वा चन्द्रमासे नवमेशका मुथ- शिल हो वा लमेश नवम हो तो गमन होगा ॥ १ ॥ लग्नस्थेनवमपतौल धिपमुथशिलेचसंचारात् ॥ रहितोयातिपुनर्नानवमहशावर्जितेयोगे ॥२॥ नवमेश लग्नमें लग्नेशसे मुथशिली हो तो चलता फिरता रहे जो. लग्नेश वा नवमेशका नवमस्थानमें दृष्टि न हो तो गमन भी न होवे ॥ २॥ लग्नपतोकेंद्रस्थेसहजेश थाशिलेचविक्ररे॥ गमनस्यादस्मिन्वाकेंद्रेङ्करेचनास्तिगतिः॥३॥ लग्नेश केंद्रमें तृतीयेशसे मुथशिली निष्पाप हो तो गमन होवे, जो केंद्रोंमें क्रूरग्रह हों तो गमन नहीं होगा ॥३॥ अस्तेरेचयत्काय्यनिर्यातिविघ्नमतएंव ॥ आकाशस्थेपापेराजकुलाज्ज्येष्ठतोनिजादापि ॥४॥ जो सप्तम स्थानमें पापग्रह हों तो जिस कार्यके लिये गमन करे उसमें विन होवे जो दशममें पाप हों वो राजकुलसे वा अपने ज्येष्ठसे वा अपने- हीसे विघ्न होवे ॥ ४ ॥ नवमेशे थशिलगेलगाधीशनपापरिपुदृष्टे ।। गमनेवसानतःस्यात्प्रष्टुःकष्टंक्षयोर्थस्य ॥५॥ लग्नेशसे नवमेशका मुथशिल हो किंतु पापयुत और शुक्रदृष्ट हो तो गमन वो होवे किंतु अंनमें कष्ट और धनहानि होवे ॥ ५॥ लगेशेनवमेशेमुथशिलकृतिरंध्रसप्तमेकष्टम् ॥ उदितेस्मिन्वायायाद्विनिःसृतिःस्यात्सुखकर पंथाः॥६॥ जो लग्नेश नवमेशका मुशिल सप्तम वा अष्टमस्थानमें हो तो गमन: में हो, जो वह अस्तसे उदय होगया हो तो मार्ग खकारी होगा ॥६

भाषाटीकासमेवा।
(२४७)
लग्नान्मार्गानुभवोव्योम्न कार्य्यस्मरागतिस्थानम् ॥
भूमेःकाय॑परिणतिरेवंलग्नेशरीरसुखम् ॥७॥
लम जैसा दीर्घ वा हस्व हो वैसाही मार्ग कहना,तथा दशमसे कार्य्य, सप्त-
मसे गति, चतुर्थसे गमनका परिणाम, और लग्नसे शरीरसुख जैसे इनका बला-
तथा स्वभावादि संज्ञाप्रकरणोक्त हों वैसेही इनके लक्षण कहे ॥ ७ ॥
दशमेशुभेचसिद्धिःकार्य्यस्यास्ते यातियत्स्थाने ।
तत्रशुभेचचतुर्थेपरिणामःसुंदरःकाय ॥ ८॥
दशममें शुभग्रह हों तो कार्यसिद्धि, सप्तममें हों तो गमन , से, चतुर्थ
हो तो कार्यका परिणाम शुभ होगा ॥८॥
लग्नेशंशशिनंबाय-फरस्तुदतितत्र तुजः ।।
मनुजत्रिराशिकेवातदाभयद्विपदतोगंतुः ॥९॥
लग्नेश वा चंद्रमाको जो पापग्रह पीडित करे वह पुरुषराशि वा पुरुष
इकाणमें हो तो गमनवालेको दोपैरवालेसे भय होवे ॥९॥
जलराशीवारिभयंचतुष्पदःतथाश्चादेः॥
घटचापेद्रुमकंटकभयंहरौव्याघ्रसिंहादेः॥१०॥
जो उक्तयह जलराशिमें हो तो जलसे, चतुष्पद राशिमें हो तो चतुष्पद
घोडा आदिसे, धन कुंभका हो तो वृक्ष कंटकादिसे, सिंहका हो तो व्याघ्र सिंहा-
दिसे भय होवे ॥ १० ॥
नगरप्रवेशतोस्मान्फलमस्तिनव वेशलग्गमिह ।।
तस्मिन्धनपेक्रेनोरहणकार्यसिद्धिा ॥ ११॥
उक्त जो फल हैं ये नगरसे गमन और पुनः नगर प्रवेशपर्यंत हैं, जो
धनेश वक्री हो तो स्थिति न होवे वा कार्य धन न होवे ॥ ११ ॥
अतिचरितेबहुदिवसरहणनोकायसिद्धिरीषदपि ॥
नवमतृतीयगेस्मिन्कायंकृत्वांशुनिजपुरंयाति ॥ १२ ॥
जो धनेश अतिचारी हो तो बहुत दिन सफरमें रहना पड़े कार्य सिद्धि-
भी न होवे जो धनेश नवम वा तृतीय स्थानमें हो तो कार्य करके शीघ्र
अपने नगरमें आवेगा ॥ १२॥

(२४८) ताजिकनीलकण्ठी। लग्नकर्मण्यायेधनपयुतेशोभनंज्ञेयम् ॥ सङ्करसप्तमस्थेपथिविनाञ्झकटकश्चतुर्थस्थे ॥ १३ ॥ लग्न दशम वा ग्यारहवें में नवमेश धनेश युक्त हों तो यात्रा शुभ होगी, जो धनेश वा नवमेश पापयुक्त सप्तममें हों तो मार्गमें विघ्न, तथा चतुर्थमें सपाप हों तो कलह होवे ॥ १३ ॥ ग्रंथांतरेपांथागमनम् । आगमनेपच्छायांलग्नेशेलग्नमध्यसंस्थेन । कृतमुथशिलेसमेतिहिसुखमस्ततुरीयगेकष्टात् ॥१४॥ पथिकके आगमनप्रश्रमें लग्नेशसे लमस्थित ग्रह इत्यशाली हो वह सुखसे तथा ४ । ७ स्थानमें हो तो कष्टसे आवेगा ॥ १४ ॥ स्थानाचलितप्रश्रेलग्नपतौसहजनवमगृहसंस्थे॥ लमस्थेनमुथाशलेपंथानवहतिपथिकोयम् ॥ १५ ॥ स्थानसे मार्गको चला वा नहीं ऐसे प्रश्नमें तृतीयेश ३ वा ९ स्थानमें होकर लगस्थ कित्ती ग्रहसे मुशिली हो तो पांथ मार्गमें है ॥ १५॥ रंधेयधनेतस्मिन्नाकाशसंस्थेनमुथशिलेप्येवम् ।। केंद्रस्थितेत्थशाललग्नेक्षणवर्त्यमेतिनकदापि ॥ १६ ॥ लमेश अष्टम वा धनस्थानमें होकर दशमस्थ किसी ग्रहसे मुशिली हो तो भी मार्ग चलताहै कहना. केंद्रमें होकर दशमेशसे इत्थशाली हो तोभी यही फल है. जो लग्नेश लमको न देखे तो पांथ नहीं आवेगा कहना ॥ १६ ॥ लगाधिपतौवकेल पश्यत्यमुत्रचंद्रेवा ॥ वक्रगमुथाशिलेसतिसमेतिपथिकःसुखंशीघ्रम् ॥ १ ॥ लगेश वक्र होकर लमको देखे अथवा चन्द्रमा वक्री ग्रहसे मुथशिली हो तो पथिक शीघ्र आवेगा॥ १७ ॥ अंत्यस्थितलग्नपतौशशिनाकृतमुथशिलेद्वतमुपैति ।। लनाद्वापिचतुर्थाच्छुभाहितीयतृतीयगावापि ॥ १८॥ लग्नेश बारहवां चंद्रमासे मुथशिली हो तो पांथ शीघ आवेगा लपसे चतुर्भसे दूसरे तीसरे शुभग्रह हों तोभी शीघ आवेगा ॥ १८ ॥ .

भाषाटीकासमेवा । (२४९) कथयतिनष्टलाभप्रवासिनश्चागमत्वरितम् ॥ १९॥ इन दो योगोंमें सीका शीघ्र आगमन तथा नष्टवस्तुका शीघ्र लाभ. होताहै पथिकका आगमन वा रोधके योग द्रव्यके लाभालाभमें भी मिलते हैं ॥ ११ ॥ शुभेषष्ठेथजामित्रेवाक्पति कटकेस्थितः॥ पथिकाग नंबतेसितेशेवात्रिकोणगे ॥२०॥ शुभ वा सात हो तथा स्पति केन्द्रमें हो अथवा शुक्र वा बुध त्रिकोण ९ । ५ में हो तो पथिक शीघ्र आवेगा ॥ २० ॥ षष्ठोदयेपापदृष्टे भग्वर्जितबुधः॥ लनात्षष्ठेयदापापायातुश्चनिधनंवदेत् ॥ २१ ॥ षष्ठ तथा लग्नस्थानमें पापग्रहोंकी दृष्टि हो शुभग्रहोंकी न हो तथा ल- असे छठे स्थानमें पापग्रह हों तो पंडितने जानेवालेकी मृत्यु कहनी ॥ २१ ॥ यदाकरास्तृतीयस्थादेशाद्देशांतरंगतः ॥ चौरेणैवहतस्वश्चपथिक केंद्रगायदि ॥२२॥ जो पापयह तीसरे हों तो पथिक एक देशसे दूसरे देशको चलागया ज सभी केन्द्रोमें पाप हों तो उस चोरोन लूट लिया ॥ २२ ॥ पापैः त्रिलाभस्थैःकंटकस्थैःशुभग्रहैः ॥ वासी खमायातिदूरस्थोपिसुनिश्चितम् ॥ २३ ॥ पापग्रह ६।३ । ११ में और शुभयह केन्द्रोंमें हों तो पथिक दूर भी हो तोभी निश्चय करके खपूर्वक घर आवेगा ॥ २३ ॥ चतुरस्रत्रिकोणेवापापगेहस्थितःशनिः ॥ पापा श्चनियतंबंधनंयातुरादिशेत् ॥ २४ ॥ केन्द्र वा त्रिकोणोंमें पापग्रह तथा पापराशिमें पापदृष्ट शनि हो तो अवश्य पथिक बंधनमें पड़गया है ॥ २४ ॥ शुभ स्थिरेलग्नेस्थिरोबंधश्चरेऽन्यथा ॥ द्वितनौसौम्यसं तेबंधमोक्षीक्रमेणतु ॥२५॥ स्थिर लग शुभयुक्त उक्तयोगोंमें हो तो बंधन स्थिर होगा.चर हो तो नाममात्र और द्विस्वभाव हो वो बंधनसे छटगया है ॥ २५ ॥. -

(२५०) वाजिकनीलकण्ठी।
पापास्त्रिकोणजामित्रेविलग्नेपृष्ठकोदये।।
श.भिवाक्ष्यमाणेचयातुःकप्टवदेत्सुधीः ॥२६॥
त्रिकोण तथा सप्तममें पापग्रह और लग्न पृष्टोदय हो शत्रुसे देखा भी
जावे वो पांथको बुद्धिमानने कष्ट कहना ॥ २६ ॥
मार्गस्थानगतैःसौम्यैर्मागतस्यशुभंवदेत् ॥
क्रूरैर्दुःखविलनस्थैःपापै केशमवाप्नुयात् ॥२७॥
मार्गस्थानमें शुभग्रह हों तो पांथको मार्ग सुखकारी और पाप हों तो
दुःखकारी होगा, तथा लममें पाप हों तो पांथको क्लेश होगा ॥ २७ ॥
चरलग्नेचरांशवाचतुर्थेचंद्रमाःस्थितः॥
प्रवासीसुखमायातिकृतकार्यश्चवेश्मनि ॥२८॥
चरराशि लममें तथा चरराशि चरांशकमें चन्द्रमा चौथा हो तो प्रवासी
कार्य करके सुखसे अपने घर शीघ्र आवेगा ॥ २८ ॥
कंटकैः सौम्यसंयुक्तः पापग्रहविवर्जितः ॥
प्रवासीसुखमायातनिधनस्थेनिशाकरे ॥२९॥
केंद्रोंमें शुभ ग्रह हों पाप ग्रह न हों अथवा चन्द्रमा अष्टम हो तो प्रवासी
सुखसे घरमें आवेगा ॥ २९ ॥
गमागमौतुनस्यातायोगेदुरुधराकृते ॥
शुभैःशुभकृतोरोधःपापस्तस्करतोभयम् ॥३०॥
जो दुरुधरा योग अर्थात् चन्द्रमासे दूसरे बारहवेंभी कोई ग्रह हों तो
गमन तथा आगमनभी न होवे, जो यह योग शुभ ग्रहोंसे हो तो शुभ
काठमें अटकाव पापोंसे चोर आदिसे हानिये होवें ॥ ३०॥
गमाग ौतुनस्यातांस्थिरराशौविलग्नगे।
नरोगोपशमोनाशोद्रव्याणांनपराभवः ॥३३॥
स्थिर राशि लममें हो तो गमन रोग, शांति वा वृद्धि और हारजीत द्रव्य
नाश वा. लाभ कोईभी शुभ एवं अशुभ न होवे ॥ ३१ ॥
विपरीतंचरेवाच्यफलंमिश्रंदिमूर्तिषु ॥
स्थिरवत्प्रथमेखंडेपराबैचरराशिवत् ॥३२॥

भाषाटीकासमेता। (२५१)
चरराशि लममें हो तो पूर्वोक्त फल विपरीत जानना जो द्विस्वभाव हो .
वो पूर्वार्द्ध में चरराशिके और उत्तराईमें स्थिरके तुल्य फल कहना ॥३२॥
प्रवासीसुख यातिगुरु त्रिवित्तगौ ॥
चतुर्थस्थानगावे शीघ्रमायातिकार्यकृत् ॥३३॥
बृहस्पति शुक्र तीसरे वा दूसरे हों तो प्रवासी सुखसे आवेगा जो यही
चतुर्थमें हों तो कार्य करके शीघही आवेगा ॥ ३३ ॥
इंदुः मगोलग्नात्पथिकंवक्तिमार्गगम् ॥
गाँधिपश्चराश्य‘त्परभागेव्यवस्थितः॥३४॥
चन्द्र लमसे सप्तम हो तो प्रवासी मार्गमें है कहना, मार्गस्थान ९ का
स्वामी राशिके उत्तराईमें हो तोभी यही फल कहना ॥ ३४ ॥
कार्कजीवसौम्यानामेकोपिस्याद्यदायगः ॥
तदाशुगमनंबतेप्रष्टुर्नगमनंव्यये ।। ३५ ॥
शुक्र सर्म्य बृहस्पवि बुध से एकभी ग्यारहवां हो तो प्रवासी शीघ आवे
जो बारहवां हो तो गमागम नहीं होंगे ॥ ३५ ॥
लग्राद्यावतिथस्थानेबलीखेटोव्यवस्थितः॥
ब्रयात्तावतिथेमासेपथिकस्यनिवर्त्तनम् ॥ ३६॥
लजितने स्थानमें बलाधिक ग्रह हो उतनी संख्याके महीनों में
प्रवासी लौटेगा यहां मास स्थानमें दिन वा वर्ष बुद्धिसे देशकाल देखके
कहना ॥ ३६॥
एवंकालंचरांशस्थेद्विगुणंचस्थिरांशके।
द्विस्वभावांशगेखेटेत्रिगुणंचितयेत्सुधीः ॥३७॥
यह बली यह चरांशकमें हो तो वह समयही ठीकहै जो स्थिरांराकमें
हो तो द्विगुण द्विस्वभावमें हो तो त्रिगुण समय कहना ॥ ३७ ॥
यातर्वि
मित्रभवनाधिपतिर्यदा॥
करोतिवक्रमावृत्ते कालंतंब्रुवतेपरे ॥३८॥

. (२५२), ताजिकनीलकण्ठी। गमन रनेवालोंको गमन वा प्र लमसे सप्तमेश जब वक्र होवे तब हट- नेका समय हना यह किसीका मत है ॥ ३८ ॥ चतुर्थेदश आपियदिसौम्यग्रहोभवेत् ॥ तदानगमनरस्त स्थैर्ग नंभवेत् ॥३९॥ चतुर्थ वा दशममें शुभग्रह हो तो गमन न होवे होतो गमनहोताहै॥३९॥ द्विालग्ननाथाद्वायत्संह कुरखेचराः ॥ नवमेद्वादशेवापितत्संख्या स्युरुपद्रवाः ॥४०॥ लग्न वा लगेशसे नवम वा बारहवें स्थानमें जितने पाप ग्रह हों उतने उपद्रव गमनमें होगे कहना ॥ ४०॥ लनाद्वालमनाथाद्वायावतःसौम्यखेचराः॥ मागैतत्रोदयावाच्या स्थानेस्थानेविचक्षणः ॥११॥ लम लगेशसे जितने शुभग्रह नवमहों उतने स्थानोंमें पांथका उदय, हर्ष होगा यह दानोंने विचारसे कहना ॥१॥ रयुक्तेक्षितो दः भग्योगवर्जितः॥ धर्मस्थस्तनुतव्याधिप्रोषितस्याटगो मृतिम् ॥ १२ ॥ नवम स्थानमें शनि पापग्रहयुक्त दृष्ट हो शुभग्रहकी दृष्टि योग रहित हो। तो पथिकको व्याधि और अष्टममें होतो मृत्यु होवे ॥ ४२ ॥ .. जामित्रस्यशुभोत्थेयातानायातिदुरुधरायोगे ॥ मित्रस्वामिनिषेधात्पापोत्थेशत्रुरुक्चौराव ॥ ३॥ . सप्तममें शुभ ग्रहोंसे दुरुधरा योग हो तो जानेवाला मित्र अथवा स्वामीके मना करनेसे फिर आवे नहीं जो पापोंसे हो तो शत्रु वा रोग और औरसे मृत्यु वा मृत्युतुल्य चंद्रायोरि गयोर्यमेनसंदृष्टयोःस्यात्पथिशस्त्रभीतिः ।। रंसितेजेचसुख तिरारे देभयंपापयुगीक्षितध्वनि ॥ ४ ॥ चन्द्रमा सूर्य्य अष्टम हों शनि उन्हें देखे तो मार्गमें शस्त्रभय होवे, अष्टम स्थानमें शुक्र बुध हों तो सुख मिले, मंगल शनि पयुक्त वा दृष्ट अष्टम हों तो मार्गमें भय होवे ॥ ४४ ॥ पावे.॥४३॥ --

।
भाषाटीकासमेवा । (२५३.)
दूरस्थजीवितमृत ने।
श्वरेशीतकरेथषष्ठेतुर्येष्टमेवाप्यतिनीचगेवा ॥
अस्तंगतेच्छिद्रपतीत्थशालेयु शुभैर्दूरगतोमृतःस्यात् ॥ १५॥
प्रवासी जीवित है वा मरगया ऐसे प्रश्नमें लग्नेश तथा चंद्रमा छठे हों
अथवा चतुर्थ अ में अति नीचराशिस्थ अस्तंगत हों और अष्टमेशसे
इत्थशाली और पाप युक्त हों तो प्रवासी दूर पहुँचकर मरगया होगा॥४५॥
भूमेरधःस्थेनचवक्रगेनयदीत्थशालंकुरुतेशशांकः ॥
सौम्यैरदृष्टेमरणप्रकुर्यादूरस्थितस्यापिविदेशगस्य ॥४६॥
लग्रसे चतुर्थके बीच स्थित किसी ग्रहसे चंद्रमा इत्थशाल करे तथा
शुभग्रह उसे न देखें तो दूरदेशस्थकी मृत्यु होती है ॥ ४६ ॥
सौम्यैः 'त्यरंध्रस्थैविबलैश्वशुभेक्षितैः॥
पापयुक्तौशशांकाकांतदादूरस्थितोमृतः ॥१७॥
शुभग्रह ६ । ८1१२ । स्थानोंमें निर्बल शुभ ग्रहोंसे दृष्ट तथा
पापग्रहोंसे युक्त हों और सूर्य चंद्रमा पापयुक्त हों तो दूरस्थित जन मर-
गया है ॥ ४७॥
पृष्ठोदयेपापयुतेत्रिकोणकेंद्राष्टषष्ठोपगतैश्चपापैः॥
सौम्यैरदृष्टैःपरदेशसंस्थोमृतोगदात्तौनवमेचसूर्ये॥१८॥
पृष्ठोदय १।२।४ । ९ राशिमें पापग्रह त्रिकोण केंद्र और अष्टम
स्थानमें हों शुभग्रह उन्हें न देखें वो परदेशमें रोगी मरगया है, जो नवम
सूर्य हो तोभी यही फल कहना ॥ १८॥
तुर्योपरिस्थेनखगेनचंद्रमायदीत्थशालंकुरुतेशुभेक्षितः॥
सौम्ययुतोवापरदेशसंस्थितःसुखीचजीवेत्पथिसौख्यमेति ॥१९॥
चतुर्थसे सप्तमके भीतर किसीयहशे चंद्रमा इत्थशाल करे शुभग्रहसे दृष्ट वा
युक्तभी हो तो परदेशवाला खी जीताजागता है मार्गमेंभी सुखसे आवेगा४९
इति श्रीमहीधर • ता. नी. भा० नवमस्थान प्रश्न नि०॥९॥

-
(२५)
वाजिकनीलकण्ठी।
अथ दशमस्थानप्रश्नः।
राज्याप्तिप्रश्नलग्नलग्नेशेशशिनिवानभःपतिना॥
तमुथशिलेवरहशाराज्यरूपक्रमाद्भवति ॥१॥
राज्यलाभ प्रश्नमें लग्नेश वा चंद्रमा दशमेशसे मुशिली हो मित्रदृष्टि भी
हो वो कुलानुमान राज्य ख मिले ॥१॥
अन्योन्यभवनगमनाराभावेथचिंतितप्राप्तिः ।।
लग्नेशेनान्येनचसौम्येनांबरस्थमुथशिलप्येवम् ॥२॥
लग्नेश दशम दशमेश लग्नमें पापरहित हों वो चिंचित राज्य सुख मिले,
तथा मेशसे किसी दशमस्थ शुभग्रहका मुथशिल हो तौभी यही फल होगा २
मंदाहेबलवतिक्रूरवियुक्तोयदाशशीविबलः ॥
मदेबलिनिभ्रमणाद्राज्यप्राप्तिर्भवे ॥३॥
योगकर्ताओंमें मन्दगति , ह ब वान् पापरहित चंद्रमा भी निर्बल हो
शनि बलवान् हो तो भ्रमणसे प्रश्नवालेको राज्यसुख मिले ॥ ३ ॥
लग्नाधिपतौस्वगृहेलाभोराज्यस्यतुंगगेभोमे॥ ।
लग्नांबराधिपौयदिकंबूलौकेंद्रगेंदुमुथशिलतः॥ ॥
अपनी राशिमें लग्नेश और अपने उच्चमें मंगल हों तो राज्यलाभ होवे. जो
लग्नेश और दशमेश मुथशिली केंद्रमें चंद्रमासे कंबूली हों तो वही फल हना ४
उत्तमराज्याप्तिःस्वौच्चइंदुतोविपुला ॥
यत्रलग्नेशस्तत्पतिर भेगृहेतदाकार्यम् ॥५॥
नस्थादस्तेक दशमहशाकटुकताकायें।
राज्यप्राप्तीसत्यायदिपुच्छतिकोपिपरिणतिंचतदा ॥६॥
लग्नेश दशमेशके इत्थशालमें चंद्रमा स्वराशि वा उच्चगत कंबूली अर्थाद
उत्तमोत्तम कबूल हो तो राज्यप्राप्ति उत्तम और बहुत होवे जिस राशिमें
लग्नेश है उसका स्वामी अशुभ राशिमें हो तो राज्यसंबंधी कार्य न होवे जो
वह अस्तंगत हो तो कष्टसे होगा जो शत्रुद्दष्टि से दृष्ट हो तो कार्यमें कोई
प्रकार कडुवाई आवेगी ॥ ५॥६॥

भाषाटीकासमेता। (२५५) ल शरीरकार्यगृहकार्मास्तनभश्चराज्यार्थम् ॥ लाभोमि स्यार्थचतुर्थकंकर्मणोवसतयेच ॥७॥ जो कोई राज्यकत्यप्राप्ति हुयेमें उसका परिणाम पूछे तो लमसे शरीरका- N, सप्तमसे गृहकार्य, दशमसे राज्यकत्य, लाभसे लाभ चतुर्थसे तथा मित्रसंबंधी कार्य और दशमसे निवासके विषयमेंभी विचार करना ॥ ७ ॥ द्रव्यंधनायसहजभृत्येभ्योरिपुश्ववैरिभ्यः॥ एतैःशुभैःशुभंस्थादशुभेवामंचसर्वकार्याणाम् ॥८॥ दूसरे भावसे धन कार्य्य, तीसरेसे भृत्य, छठेसे वैरी संबंधी कार्य विचारना, यदि इनपै शुभग्रह हों वा इनके स्वामी बली होंतो यथोक्त कार्य शुभ अन्यथा अशुभ होगा ॥ ८॥ वित्तस्वामिनिभौमेऽनौचित्येपारदारिकेव्ययकृत् ॥ जीवधर्मायरिपौगुरुपूजायैसितेविलासाय ॥९॥ धनेश मंगल लमेशसे मूथशिली हो तो अनुचितकर्मोंमें तथा परस्त्री संबंधी व्यय करे धनेश बृहस्पति हो तो धर्ममें सूर्य्य हों तो गुरु ब्राह्मणकी पूजामें शुक्र हो वो विलासादि समें धनव्यय होवे ॥९॥ वाणिज्याय पुनरिंदै थशिलिनिचान्यथान्यार्थम् ॥ लग्नपतौपतितस्थेविबलेराज्यात्ययस्तुकंबूले ॥ कोपिगुण स्यात्पापानांतरशुभंच्युतौभवति ॥ १० ॥ जो उक्त प्रकार बुध हो तो वाणिज्यमें धनव्यय होवे चन्द्रमा सुथ शिली भी हो वोभी व्यापारमें व्यय होवे जो मुथशिली लग्नेशसे न हो तो अन्यकोलि- ये वाणिज्यकरे तथा लयेश पतित स्थानमें तथा निर्बल हो तो कंबलीमें कुछ गुणभी होताहै पापाक्रांत हो तो राज्य नाशही होताहै ॥ १० ॥ नरपतिसचिवस्नेहप्रश्नकबूलेलग्नसप्तपयोः॥ मथशिलयोःशुभदृष्ट्याशुभताराज्येमिथः नेहः ॥११॥ राजा और राजमंत्री के स्नेहप्रश्नमें लग्नेश सप्तमेशका कंबूलसहित, मुथशिल हो तो परस्पर स्नेह रहे शुभदृष्टिभी हो तो राज्यमेंभी शुभता रहै ।। १३ ॥ -

(२५६) वाजिकनीलकण्ठी।
राज्यंचरंस्थिरंवालग्नपगगनेशयोःसहयोः ।।
यद्यकोमंदास्यात्केंद्रेतत्स्थितमथोन्यथावाच्यम् ॥ १२॥
यह राज्य चर वा स्थिर कैसा होगा ऐसे प्रश्नमें लगेश दशमेश साथही
केन्द्रमें हों उनमेंसे एक मन्दगति उपलक्षणसे अल्पांश हो वो राज्य स्थिर
होगा अन्यथा अस्थिर कहना ।। १२ ।।
यदिवासवाममार्गेभूमे प्रच्युतिर्भवत्पूर्वम् ॥
कंबूलेसतिलभतेशीघ्रमूसरिफेतुनपुनः ॥ १३॥
जो उक्तयह वक्री हो तो प्रथम राज्यकी हानि पीछे उन्नति होगी, कंब-
ली हो तो शीघ राज्यलाभ और मूसरिफी हो तो लाभ नहीं होवे ॥१३॥
ग्रन्थांतरेस्वामिभृत्यप्रश्नः।
शीषोंदयेसौम्ययुतेक्षितेवासौम्यद्वितीया मसप्तमस्थैः ॥
तृतीयलाभारिंगतैश्वपापैःसौख्यार्थलाभोनृपसेवकस्य ॥१४॥
स्वामी भृत्य प्रश्नमें शुभयह शीर्षोदय राशिमें शुभग्रहोंसे युक्त दृष्ट २८७
में और३।११।६स्थानोंमें पाप हों तो राजसेवीको सुख तथाधनलाभ होवे १४
लग्नाद्वितीयेमदनेष्टमवित्तक्षयंसंभ्रममातिमृत्युम्
कुतिपापाःक्रमशोनरेंद्राद्धृत्यस्यतस्मात्परिवर्जयेत्तम् ।। १५ ।।
लग्नसे दूसरे हों तो भृत्यका राजासे धनक्षय होवे. जो सप्तम हों तो सनम
और अष्टम हों तो मृत्यु होवे तस्मात् इन स्थानोंमें पाप हों तो स्वामीसेवा
न करनी ॥ १५॥
लग्नाद्वितीयाष्टमसप्तमस्था-पापा-प्रणाशनृपभृत्ययोद्धयोः॥
कुवैतितेष्वेवगताश्चसौम्या कुर्युर्धनारोग्यसुखानिचोभयोः॥१६॥
लग्नसे २१८१७ स्थानों में पापग्रह स्वामी सेवक दोनहूंका नाश और शु-
भग्रह दोनहूंको धन आरोग्य और सुख करतेहैं ॥ १६ ॥
शशांकसौम्यैरुदयास्तभावौदृष्टौयुतौवासबलैनपापैः॥
प्रष्टुस्तदास्तोहदिपार्थिवस्यनेहप्रसादावकृपाप्रतीपात् ॥ ३ ॥

भाषाटीकासमेता ।
(२५७)
बलवान् चंद्रमा और बलवान् शुभग्रह करके लग्न तथा सप्तमभाव देखा
जाय और उक्त स्थानोंपर पापग्रह की युति दृष्टि न हो तो के लिये
राजाके हृदयमें स्नेह तथा कपा रहे, यही योग विपरीतभी है कि, शुओंके
स्थानमें पाप हों तो विपरीत फल कहना ॥ १७ ॥
अन्यस्वामिप्रश्नः।
षष्ठेश्वरेणव्ययपेनकेंद्रयदीत्थशालंकुरुतविलनपः ॥
प्रष्टुस्तदान्यःप्रभुरर्थदःस्यादतःप्रतीएंनभवेत्परःप्रभुः ॥१८॥
षष्ठेशसे वा व्ययेशसे जो केन्द्रमें इत्थशाल लग्नेश करे तो प्रष्टाको और
स्वामी धन देनेवाला होगा, विपरीतमें अन्य प्रभु न होवे ॥ १८ ॥
लग्नेश्वरस्वक्षेगतेस्वतंगकेंद्रास्थितेशीतकरेथशाले॥
शुभग्रहैदृष्ट तेबलान्वितेप्रष्टनिजस्वाम्यमितार्थलाभः॥ १९॥
लग्नेश अपनी राशि वा उच्चमें केन्द्रस्थित होकर चन्द्रमासे इत्थशाली
हो तथा शुभ ग्रहोंसे युक्त दृष्ट और बलवान् हो तो प्रष्टाको अपनेही स्वामीसे
अगणित धन मिले ॥ १९ ॥
जायेश्वरेस्वोचनिजसंसंस्थेकेंद्रस्थितेशीतकरेत्थशालगे॥
भग्रहैदृष्टयुतेबलोत्कटैःप्रष्टुस्तदान्यप्रभुरर्थदोभवेत् ॥२०॥
सप्तमेश अपनी राशि वा उच्चका केन्द्रगत चन्द्रमासे इत्थशाली हो तथा
बलवान् शुभग्रहोंसे युक्त वा दृष्ट हो तो प्रष्टाको अन्य स्वामी धन देवे ॥२०॥
इदंगृहवाशुभमन्यदालयंस्थानत्विदवाशुभमन्यदेवमे ।।
ममात्रभद्रगमनात्तुतत्रवापृष्ठोदयेत्थंविधिनाविमृश्य ॥ २१ ॥
प्रष्टा पूँछे कि, मुझको यह धर शुभहोगा वा अन्य, तथा यह स्थान शुभ वा
अन्य, और हमको यहां शुभ है यागमनमें वहांशुभ होगा इतने प्रश्नोंमें इतने
ही भावोंसे कार्येश जानके इत्थशाल इसराफ आदि योगोंसे विचारकरना २१
अथ स्व प्रश्नः।
लग्नेकनपतिवदिशस्वपश्यंतिलोहितम् ॥
श्वेतंपुष्पंसितंवस्त्रंगधनारीचशीतगौ ॥ २२॥

(२५८) वाजिकनीलकण्ठी।
• लममें सूर्य हो तो राजा,अमि, श और लाल रंग देखे, चन्द्रमा हो वो
श्वेत रंगके पुष्प, व , चंदन और दे॥२२ ॥
रक्तमांसंप्रवालंचसुवर्णधरणीसुते॥
घेखेगमनंजीवेधनंबधुसमागमम् ॥२३॥
मंगल हो तो रुधिर मांस मूंगा वर्ण, बुध हो तो. आकाश पर्वतशंगादिमें
गमन, हस्सविसे धन तथा बंधुसंमेलन ॥ २३ ॥
जलावगाहनंशुक्रेशनौतुंगावरोहणम् ॥
लग्नलमांशपवशात्स्व वाच्योथवावुधैः ॥ २४ ॥
शुक्र हो तो जलक्रीडा शनि हो तो ऊंचे स्थानारोहण होवे अथवा लम
तथा लग्ननवांश पतिसे पंडितोंने स्वम कहना ॥ २४ ॥
सर्वोत्तमबलाद्वापिखेटाबुद्धयाविचिंतयेत्।।
बलसाम्येफलंमिश्रंदुःस्वप्नोनिर्बलैःखगैः॥ २५ ॥
अथवा र्वोत्तम बलीग्रहसे बुद्धिसे विचार करना जो बहुतोंका बल
मान हो वो फल मिश्रित और निर्बलसे दुःस्वम होवे ॥ २५॥
रविलग्नेशशिष्टेरविशशिसमेतविलग्यादा ।
स्वप्नदृष्टंप्रवदेत्प्रष्टुर्लयांतरात्कालः ॥२६॥
सूर्य लपमें चन्द्रमासे दृष्ट हों वा सूर्य चंद्रमा लममें हों तो स्वम देखाहै
और स्थानों में हो तो देखेगा कहना ॥ २६ ॥
अथाखेटकः ।
लगेशजामित्रपतीत्थशालेसुनेहदृष्टयात्वनयोयोश्च ॥ आखे-
टकःस्यात्सफलोरिदृष्टयास्यानिष्फलोवाल्पफलोतिकष्टात् ॥२॥
लमेश सप्तमेशका इत्थशाल मित्रदृष्टिसे हो तो आखेटक (शिकार )
कल होगी उनकी शत्रुदृष्टि हो तो निष्फल वा बहुत कष्टसे अल्पफली होवे २७
लग्नेश्वरद्यूनगतेविलनेजायेश्वरेस्यान्मृगयाप्रभूता ॥
यामित्रनाथेहिवुकेनभःस्थेचाखेटक स्वल्पतरोपिनस्यात् ॥२८॥

भाषाटीकासमेता।
(२५९).
लग्नेश सप्तममें सप्तमेश लममें हो तो शिकार बहुत मिले, जो सप्तमेश
चतुर्थमें वा दशममें हो तो शिकार थोडाभी न होवे ॥ २८ ॥ .
भौमौसबलौसिद्धिरस्तांशेमृगयाच्युतिः॥
लग्नघूनेतत्पतीचहेतुस्तै लजादिगैः॥२९॥
बुध मंगल बलवान हों तो मृगयासिद्धि होवे जो वे सप्तम राश्यंशमें हो
चो शिकार हाथसे छूटजावे; लग्न और सप्तम राशि वा उनके पति स्थल जला-
काश जैसी राशियोंमें वाजैसे स्वभावके हों वैसीही शिकार भी कहनी ॥२९॥
राक्रांतानियावंतिमन्येभानीदुल योः॥
तावंत प्राणिनोवाच्याद्विविघ्नाःस्वांशकादिषु ॥३०॥
लग्न और चन्द्रमाके बीच जितनी राशि पापग्रहोंसे दबी हों उतने प्राणी
शिकारमें मिलेंगे जो वे अपने अंश वा उच्च मित्रांशकोंमें हों तो द्विगुण त्रि-
गुण और वर्गोत्तममें बहुतगुना कहना ॥ ३० ॥
अथ किंवदंती।
श्रुतिस्तुलग्नेश्वरशीतगूदयैःशुभान्वितैःकेंद्रगतैस्तुसत्या ।।
पापान्वितैःपापनिरीक्षितैश्च त्रिकस्थितैर्वाभवतीहमिथ्या ॥३१॥
लग्न, लमेश और चंद्रमा शुभयुक्त केन्द्रगत हों तो जनश्रुति सच्ची. और
पापयुक्त दृष्ट वा त्रिक ६।०१२ में हों तो मिथ्या कहनी, लोगोंमें अफवाह
कहावत को जनश्रुति वा किंवदंती कहते हैं ॥ ३१ ॥
शुभदृग्योगतःसौम्यांवातीसत्यांविनिर्दिशेत् ॥
पापडग्योगतोदुष्टावातीसत्येतिकीय॑ते ।।
लग्नेश्वरेभाविवक्रेमिथ्यावा भविष्यति ॥३२॥
लग्न लग्नेश और चन्द्रमापर शुभग्रहोंकी दृष्टि वा योग हो तो सौम्य
वार्ता सत्य क्रूरवार्ता हो तो असत्य जानना. पापदृष्टि योगसे क्रूर
वार्ता सत्य, सौम्यवार्ता हो वो असत्य जानना और लग्नेश वक्र होनेवाला
हो तो सभी वार्ता मिथ्या होवें ॥ ३२ ॥
इति श्रीमही नी० प्रश्नतंत्रभाषाटीकायां दशमभावप्रश्ननिरूपणम् ॥१०॥

२६०) ताजिकनीलकण्ठी।
अथ एकाशस्थानप्रश्नः।
नृपतेर्गौरवलाभाशादिममस्यानवेतिपृच्छायाम् ।।
आयेशलग्नपत्योःस्नेहहशा थशिलेद्रुतंभवति ।।३।।
राजासे गौरव तथा धनादिलाभ मेरे होंगे वा नहीं ऐसे प्रश्नमें लाभेश
लग्नेशकी स्नेहदृष्टिसे इत्थशाल हो तो शीघ लाभ होगा ॥१॥
रिपुद याबहुदिवस केंद्रेचायेशचंद्रकंबूले ।
वाच्यापूर्णैवाशाचरस्थिरद्विस्वभावगेस्वनामफलम् ॥२॥
जो उनके परस्पर शत्रुष्टिसे इत्थशाल हो तो बहुत दिनोंमें लाभ होगा
जो लग्नेश लाभेशका इत्थशाल केन्द्र वा लाभस्थानमें चन्द्रमाके कंजूल सहि-
व हो तो आशा पूर्ण होगी कहना, परंतु वह जैसी राशिमें हों वैसा राशि-
नामसदृश फलभी देते हैं जैसे चरमें चर स्थिरमें स्थिर इत्यादि ॥२॥
लाभेशे रहतेभूत्वाशाशुप्रणाशमुपयाति ॥
रायुक्तेशुभयुज्यधिकारवशेनलव्याशा ॥३॥
जो लाभेश अस्व वा पापपीडित हो तो आशा पूर्ण होकर फिर
नष्ट होजावे. पापरहित शुभयुक्त हो तो अधिकारके सदृश लघु वा बृहत्
आशापूर्ति कहनी ॥३॥
मित्रेणसहप्रीतिर्भवितालग्नेश्वरायपत्योश्च ॥
प्रियदृष्टयामुथशिलतःप्रीतिर्वान्योन्यगृहयानात् ॥ ४॥
मित्रसे प्रीति होगी या नहीं ऐसे प्रश्नमें लग्नेश लाभेशकी मित्र दृष्टि मुथ-
शिल हो अथवा लग्नेश लाभमें लाभेश लग्नमें हों तो प्रीति बढेगी ॥४॥
केंद्रस्थितयोरनयोमैत्रीकिलपूर्वजातैव ॥
पणफरगतौपुरस्तादापोकिमतोमहानीतिः ॥५॥
लाभेश लग्नेश केन्द्रमें हों तो.मैत्री उनकी पहिलेहीसे होरही है, जो
पणफर २।५।८।११ में हों तो आगे होगी आपोक्किम २६९/१२
में हों तो प्रीति बहुत बढेगी ॥ ५ ॥

.
भाषाटीकासमेता । (२६१)
गुप्तकार्यमिदंमेसिद्ध्यतिलग्नेश्वरथचंद्रमास ॥
भमुथशिलगेकेंद्रेत कटेवाथसिद्धिःस्यात् ॥६॥
मेरा गुप्त कार्य सिद्ध होगा वा नहीं, ऐसे प्रश्नमें लग्नेश तथा चंद्रमा शुभ
ग्रहसे मुथशिली केंद्रों वा उसके समीप हों तो गुप्त कार्य सिद्ध होगा ॥६॥
ग्रंथांतरेसमचिंता।
मेष षेचमिथुनेशुभयुक्तदृष्टेनौष्मिकंतुसुलभभवतिपृथिव्याम् ॥
सौम्यैर्धनुर्मूगघटेषुचशारदीयं उत्समर्घमशुभैःसहितोमहर्घम् ॥७॥
शुभ ग्रह युक्त दृष्ट १ । २।३ राशि हों तो श्रीष्म ऋतुकी फसल, और
९।१०। १३ में हों तो शरद् ऋतुकी फसल अच्छी होगी. लग्न लग्नेश
और चंद्रमा शुभयुक्त दृष्ट हों तो सुकाल ( समय अच्छा ) होगा और
अशुभ ग्रहोंसे युक्त हो तो महर्षता होवे ॥ ७ ॥
लग्नेबलान्येनिजनाथसौम्यैर्युक्तक्षितकेंद्रगतैः भैश्च ॥
सर्वैःसमर्घ विबलैर्विलोकेंद्रे पापैःसकलंत्वनर्धम् ॥ ८॥
लग्न बलवानु स्वस्वामि शुभयुक्त दृष्ट हो केंद्रोंमें शुभ ग्रह हों तो सुकाल,
जो लग्न निर्बल केंद्रोंमें पाप हों तो अन्नका काल होवे इस भावमें लाभविषय-
विचार विशेष है वह धनभावमें कहा है वही यहां भी जानना ॥ ८ ॥
इति श्रीमही नीलकण्ठीभा० लाभभावप्रश्ननिरूपणम् ॥ ११ ॥
अथ द्वादशस्थानप्रश्नः।
रि विग्रहपृच्छायांबलवतिषष्ठेरि सबलः॥
द्वादशपेशुभदृष्टेबलवतिवाच्यं भंप्रष्टुः ॥१॥
शत्रुसे युद्धके प्रश्नमें छठास्थान बलवान् हो तो शत्रु बलवान् होवे जो
व्ययेश शुभदृष्ट तथा बलवान हो तो प्रष्टाको शुभ होगा ॥१॥
.' शुभयुतदृष्टेसद्वययोऽशुभेक्षणयोगतोव्ययमनर्थात् ॥
एवंभावेष्वखिलेषूांसदसत्फलंसुधिया ॥२॥
व्ययेश शुभग्रहसे युक्त दृष्ट हो तो शुभकार्यमें पापयुक्त दृष्ट हो तो अशुभ
कार्यमें अनर्थ व्यय होगा. इसीप्रकार सद्बुद्धिवालोंने समस्त भावोंका शुभा-
शुभ फल कहना ॥ २॥

-
(२६२)
ताजिकनीलकण्ठी।
अथ ग्रंथांतरे भोजनचिंता।
कटुकोलवणस्तिक्तोमिश्रितोमधुरोरसः॥
आम्लाकषायःकथितःसूर्यादीनांक्रमादसाः॥३॥
सूर्यका कडुवा चंद्रमाका सलौना मंगलका तीतां बुधका मिश्रित बृह-
स्पतिका मीठा शुक्रका खट्टा शनिका कषाय(काथ कांजिकादि) रसहैं ॥३॥
लग्नंपश्यतियाखेटस्तस्ययाकथितोरसः॥
भोजनेसौरसोवीर्यक्रमादाच्या परेरसाः॥४॥
जो ग्रह लग्नको देखे वा सबसे बलवान् जो ग्रह हो उस्का जो रसहै वह
भोजनप्रश्नादिमें कहना ॥ ४ ॥
चंद्रस्ययेनमुथाशलस्तस्यविशेपंवदेद्वतौ ॥
भोजनविधौविशेषकथितस्पष्टंद्वितीयतंत्रस्य ॥५॥
चंद्रमा जिससे मुशिली हो उसका रस भोजनमें विशेष कहना और
भोजन प्रश्नका विचार विशेष स्पष्टतर इसग्रंथ (नीलकंठीके दूसरे तंत्र ) में
कहाहै ॥ ५॥
इति श्रीमही नी० प्रश्नतंत्रभाषाटीकायांव्ययभावप्रश्ननिरूपणम् ॥१२॥
ग्रंथांतरेविशेषेणसमर्धादिचिंता ।
महर्घस्यविचारंतुह्यादौसर्वैर्विचार्यते ॥
तस्मान्मयाविशेषोत्रकथ्यतेशास्त्रचोदितः ॥ १॥
महर्ष समर्षका विचार पहिले सब लोग विचारते हैं तस्मात् विशेष
विचार शास्त्रोक्त यहां कहा जाताहै ॥ १ ॥
गकांकुहूशशपभास्वदजप्रवेशेलग्नेश्वराः शुभखगैर्युतवीक्षिता-
श्वेत् ॥ तद्वत्सरेजगतिसौख्यमलप्रकुर्युः पापार्दितागदनरेंद्र-
भयंप्रजानाम् ॥२॥
जिस वर्षमें प्रथम पूर्णा प्रथम अमावास्याके प्रवेशकालके लग्नेश्वर तथा
चन्द्रमाके प्रथम मेष प्रवेशकालके लग्नेश्वर और मेषार्क प्रवेश समयके लग्ने-
श्वर यदि शुभयह युत दृष्ट हों तो उस वर्ष प्रजाको पूर्ण सुख होताहै जो
पापयुत दृष्ट हों वो रोग और राजाका भय होताहै ॥ २ ॥

।
भाषाटीकासमेता।
(२६३)
भानोमेषप्रवेशोदयभवनपतिःसद्हः स्वोच्चसंस्थास्वक्षस्थोवा-
पिकेंद्रशुभगगनचरैदृष्टयुक्तोबलाढ्यः ॥ तस्मिन्वविदध्याज-
'गति भ खंभूरिसस्यंसुवृष्टिः क्रूरः क्रूरादितोवादिशतिनृपभयं
कष्टमन्नमहर्घम् ॥ ३॥
सूर्यमेषप्रवेश लमका वा प्रश्नलमका स्वामी शुभग्रह हो तथा उच्च
स्वराशिका केंद्रों शुभग्रहोंसे दृष्टयुक्त और बलवान् हो तो इस सालमें संसा-
रमें संपूर्ण सौख्य शुभ अन्न बहुत उत्तम वर्षा होवे जो उक्त लमेश पापग्रह
पापाक्रांत बलरहित हो तो राजभय अन्न थोडा.भाव महँगा(अकरा)होवे॥३॥
भानोरजप्रवेशेकेंड्रैस्तस्मा भग्रहा तिः ॥
बलवद्भिःसौम्यैवानिरीक्षितैष्मिकावृद्धिः॥४॥
सूर्यके मेषप्रवेशमें वा प्रश्नलग्नमें केंद्रोंमें बलवान् शुभग्रह शुभदृष्ट हो तो
ग्रीष्म ऋतुका अन्न बहुत होवे ॥ ४ ॥
अष्टमराशिगतगुरुशशिनो कुंभसिंहसंस्थितयोः॥
सिंहघटस्थितयोवानिष्पत्तिीष्मसस्यस्य ॥५॥
उक्त लग्नसे सूर्य अष्टम हो तथा बृहस्पति कुंभका चंद्रमा सिंहका वा
बृहस्पति सिंहका चंद्रमा कुंभका हो तो ग्रीष्मकी फसल अच्छी होवे ॥ ५॥
अर्कात्सितेद्वितीयेबुधेथवायुगपदेवसंस्थितयोः॥
व्ययगतयोतिद्वन्निष्पत्तिरतीवगुरुदृष्ट्या ॥६॥
सूर्य से शुक्र वा बुध अथवा दोनहूं दूसरे स्थानमें वा बारहवें अथवा
दोनहूं स्थानोंमें हों बृहस्पतिकी दृष्टि हो वो फसल अच्छी होवे ॥ ६ ॥
शुभमध्येलिनिसूर्याद्गुरुशशिनो सप्तमेपरासंपत् ॥
अल्पाद्विस्थेसवितरिगरौद्वितीयनिष्पत्तिः ॥७॥
मेषार्क वा प्रश्नलग्नसे सूर्य शुभग्रहोंके बीच हो तथा सूर्यसे सप्तम बह
स्पति चंद्रमा हों तो फसल बहुत और सूर्य पाप शुभ दोनोंके मध्य हो तो
अल्प तथा बृहस्पति भी दूसरा हो तो आधी फसल हाथ आवेगी ॥७॥

(२६४) वाजिकनीलकण्ठी।
लाभहिबुकार्थयुक्तैःसूर्य्यादथवासितेंदुशशिपुत्रैः ॥
सस्यस्यपरासंपत्कर्मणिजीवेथवाचापे ॥८॥
प्रश्नलनसे वा सूर्यसे ११। ४ । २ स्थानोंमें शुक्र चंद्रमा दुध हों वो अन्न
अच्छे होवें धनका बृहस्पति दशम हो तो भी यही फल है ॥ ८ ॥
कुंभेगुरुगविशशीसूयॉलिमुखेकुजार्कजौमकरे ॥
निष्पत्तिरस्तिमहतीपश्चात्परचक्ररोगभयम् ॥९॥
कुंभका बृहस्पति वृषका चंद्रमा वृश्चिकका सूर्य और मंगल शनि मकर
के हों तो अन्न अच्छे हों परंतु पीछेसे परचक्र वा रोगोंका भयभी होवे ॥९॥
मध्येपापग्रहयो सूर्य सस्यविनाशयत्यलिगः ॥
पाप सप्तमराशौजातंजातविनाशयति ॥ १० ॥
वृश्चिकका सूर्य पापोंके बीच तथा सप्तममें पापग्रह हों तो हुवेहुये भी
अन्ननाश होजावें ॥ १० ॥
अर्थस्थानेकूरःसौम्यैरनीक्षित प्रथमजातम् ॥
सस्यनिहंतिपश्चादप्तनिष्पादयेव्यक्तम् ॥११॥
दूसरे स्थानमें पापग्रह शुभदृष्टिरहित हों तो पहिली बोईहुई खेती नाश
हो दूसरे बारकी जुती हुईसे अन्न उत्पन्न हो । ११ ।।
जामित्रकेंद्रसंस्थौकरीसूर्य्यस्यवृश्चिकस्थस्य ।।
सस्यविपत्तिकुरुतःसौम्यैष्ठेनसर्वत्र ॥ १२ ॥
सप्तम केन्द्रमें वृश्चिक सूर्यसे दो पापग्रह हों तो फसल नष्ट होवे जो
शुभ ग्रहोंकी ष्टि भी हो तो कहीं कहीं अच्छी भी होगी ।। १२॥
वृश्चिकसंस्थादर्कात्सप्तमषष्ठोपगौयदाक्रूरौ ॥
भवतितदानिष्पत्तिःसस्यानामपरिहानिः ॥ १३॥
वृश्चिकके सूर्यसे ६ । ७ स्थानोंमें पापग्रह हों तो अन्न तो होंगे परंतु
भाव घटेगा ॥१३॥
विधिनानेनवरविषप्रवेशेशरत्समुत्थानम् ॥
विज्ञयःसस्थानांनाशायशिवायवातज्ज्ञः॥१४॥

भाषाटीकासमेता। (२६५)
जो योग वृश्चिकके सूर्यसे कहे हैं वे तो ग्रीष्मकी फसलके हैं वैसेही वृषके
-सूर्यमें शरदकी फसलका विचार शुभाशुभ करना ॥ १४ ॥
त्रिषुसेव्यादिषुसूर्य सौम्यैर्युक्तोनिरंतरांविचरेत् ।।
प्रैष्मिकसस्यंकुरुतेसमर्घमुभयोपयोगच ॥ १५॥
सूर्य्य ५। ६ । ७ राशियोंमें निरंतर शुभग्रहसे युक्तही रहे तो ग्रीष्मकी
फसल बहुत होगी भावभी सस्ता होगा ॥ १५॥
कार्मुकमृगघटसंस्थःशारदसस्यस्यतददेवरविः ।।
संग्रहकालेज्ञेयोविपर्ययः रदृग्योगात् ॥ १६॥
सूर्य्य ९ । १०।११ राशियोंमें निरंतर शुभयुक्त रहे तो शरदकी फसल
बहुत, भाव सस्ता होगा. जो पापयुक्त दृष्ट रहे वो दोन हूं योगोंमें अन्न अल्प
भाव तेज होगा, यह विचार विशेष संग्रह समयमें करना चाहिये ॥ १६ ॥
अथ वर्षाज्ञानम् ।
प्रश्नलग्नात्तोयराशिर्यदिलयात्तृतीयगः ॥
तोयसंज्ञोग्रहस्तत्रभवत्येवजलप्रदः ॥ १७॥
प्रश्नलमसे जलराशि ४।१०।११ । १२ तीसरी तथा उसीमें जल
संज्ञक ग्रह चन्द्रमा शुक्र हों तो वर्षा शीघ्र होगी ॥ १७ ॥
वुधशुकयोमध्यगतःसूर्यःस्याजलशोषकः ॥
तयोर्यदिसमीपस्थोतदाबहुजलप्रदः ॥१८॥
सूर्य बुध शुक्रके बीच हो तो जल सूखता है जो इनके समीपही हो तो
बहुत जल देताहै ॥ १८॥
अग्रेयातियदाभौम पश्चाच्चलतिभास्करः॥
तत्रवृष्टिर्नविपुलाजायतेनात्र संशयः ॥ १९॥
मंगलके पीछे सूर्य हो तो वर्षा नाममात्र और आगे हो तो बहुत होतीहै१९
वर्षाप्रश्नेशशिन्यंभोराशिगेल गेपिवा ॥
केंद्रगेवाशुक्लपक्षेचातिवृष्टिःशुभेक्षिते ॥ २० ॥
वर्षाप्रश्नमें चन्द्रमा जलराशिम वा लग्नमें हो अथवा शुक्लपक्षका चंद्रमा
जलराशिका केंद्रमें शुभदृष्ट हो तो अतिवृष्टि होवे ॥ २० ॥

(२६६) ताजिकनीलकण्ठी। अल्पवृष्टिःपापदृष्टेप्रावृट्कालविशेषतः॥ चंद्रवद्भागवेसर्वमेवंविधगुणान्विते ॥२१॥ उक्तचंद्रमापर पापदृष्टिभी हो तो अल्पवृष्टि होवे वर्षाकालमें यह योग हो तो बहुत दिनोंमें वृष्टि होवे. ऐसेही शुक्रसे भी जानना ॥ २१ ॥ प्रावृषींदुःसितात्सप्तराशिगःशुभवीक्षितः ॥ मंदार कोणसप्तस्थोयदिवावृष्टिकृद्भवेत् ॥ २२ ॥ वर्षाकालमें चंद्रमा शुक्रसे सप्तममें शुभदृष्ट हो अथवा शनिसे त्रिकोण वा सप्तम हो तो वर्षा शीघ्र होवे ॥२२॥ सद्योवृष्टिकरःशुक्रोयदावुधसमीपगः ॥ योर्मध्यगतेभानौतदावृष्टिविनाशनम् ॥ २३ ॥ जो शुक्र बुधके समीप हो तो तत्काल वृष्टि करे जो बुध शुक्रके बीच सूर्य हो तो वर्षाका नाश होवे ॥ २३ ॥. मघादिपंचधिष्ण्यस्थःपूर्वेस्वातिपरत्रये ॥ प्रवर्षणंभृगुःकुर्य्याद्विपरीतनवर्षणम् ॥ २४ ॥ पूर्वोदयी शुक्र मघादि पांच नक्षत्रोंमें एक नक्षत्रसे दूसरेपर गमन करे तथा पश्चिमोदयी स्वातीसे तीनपर गमन करे तो वर्षा होवे, जो ऐसाही वक्रगती करे तो वर्षा न होवे ॥ २४ ॥ पुरतःपृ तोभानोहायदिसमीपगाः ॥ तदा प्रकुर्वतिनचेत्तेप्रतिलोमगाः ॥२५॥ सूर्यके आगे और पीछे मार्गीग्रह समीपही हों तो वर्षा करते हैं. कोई वक्रीभी हों तो अवर्षण करते हैं ॥ २५ ॥ सौम्यमार्गगत शुक्रोवृष्टिकृन्नतुयाम्यगः ।। उदयास्तषुस्यिाद्भानोरा प्रवेशने ॥२६॥ सूर्यसे शुक्र उत्तरापथग हो तो वृष्टि, दक्षिणापथग हो तो अनावृष्टि कर- वाहै तथा शुक्रके उदयास्तों एवं आप्रवेशमें भी वर्षा होतीहै ॥२६॥ - भाषाटीकासमेता। (२६७) गुरोःसप्तमराशिस्थ प्रत्यग्रोभृगुजोयदा ॥ तदातिवर्षणंभरिप्रावृट्कालेबलोज्झिते ॥२७॥ वर्षाकालके प्रश्नमें बृहस्पतिके सनममें पूर्वोदयी शुक्र हो तो वर्षाकालमें अविवृष्टि होवे ॥ २७ ॥ आसन्नरविशशिनोःपरिवेषगतोत्तरा ॥ विद्युत्प्रपूर्णमण्डूकास्त्वनावृष्टिर्भवेत्तदा ॥२८॥ सूर्य चन्द्रमाके समीप उत्तरसर परिवेप (सौंडल वा परिधि) तथा बिजु- ली वा बादलमें छोटी चमक हो मंडूक बोलें तो अवर्षण होवे ॥ २८ ॥ नखैलिखंतोमार्जाराश्चावनिलोहिताभवेत् ॥ रथ्यायांसेतुबंधाःस्युर्बालानांवृष्टिहेतवः॥२९॥ मार्जार अपने नखोंसे भूमि वा काष्ठ आदि खोदें तथा भूमि रक्तवर्ण हो और मार्गमें बालक खेलसे पुल बांधे तो शीघ्र वर्षा होवे ॥ २९ ॥ पिपीलिश्रेण्यवच्छिन्नासंयतावहवस्तदा ॥ दुमादिरोहःसणांप्रतीदुर्वृष्टिसूचकाः ॥३०॥ पिपीलिका (छोटी मकोडी) बहुत इकट्ठी एक पंक्तिसे चलें तथा सर्प वृक्षोंमें चढ़े और आकाशमें चन्द्रमाका प्रतिबिंबसा दीखे तो वृष्टि होतीहै ॥ ३०॥ उदयास्तमयेकालेविवर्णोंकोंथवाशशी ॥ मधुवर्णोतिवायुश्चेदति वृष्टिंभवेत्तदा ॥३१॥ उदय तथा अस्तसमयमें सूर्य्य वा चन्द्रमा वर्णरहित यदा शहद समान रंगके हों और अविवायु चले तो वर्षा होवे ॥ ३१ ॥ आर्द्रद्रव्यंस्पृशतियदिवावारितत्संज्ञकंवा तोयासन्नोभवतियदिवातोयकायान्मुखो वा ।। प्रष्टावाच्यः सलिलमचिरादस्तिनि:संशयेन पृच्छाकालेसलिलमितिवाश्रुयतेयत्रशब्दः ॥ ३२॥ जो प्रश्न समयमें प्रष्टा गीली वस्तु वा जल और जलसम्बन्धी वस्तुको . . (२६८) वाजिकनीलकण्ठी। स्पर्श करे अथवा जलके समीप पूँछे अथवा जलसंबन्धी कार्य करवा हो तथा प्रश्नकालमें जलका शब्द जलका नाम सुना जावे तो निःसन्देह शीघ्र वर्षा होवे ॥ ३२॥ विरसमुदकंगोनेवाभवियद्विमलादिशोवियतिविकृतं काकांडा- भयदाचभवेन्नभः॥पवनविगमःश्रूयतैवैझपाःस्थलगामिनोरस- नमसकृन्मंडूकानांजलागमहेतवः॥ ३३॥ जलका रस स्वाद जाता रहै गौके नेत्र समान आकाश हो दिशा निर्म- ल हों तथा कौवेके अंडाकासा रंग आकाश हो वायु शब्दवान् होवे वायु गरम चले मछली स्थलमें आवे सुना जावे और मेण्डक बोलें तो शीघं वर्षा होवे ॥ ३३ ॥ गिरयोंजनवर्णसन्निभायदिवाबाष्पनिरुद्धकंदराः ॥ कृकवाकनिलोचनोपमा परिवेषाःशशिनश्चवृष्टिदाः ॥३४ ॥ पर्वत श्यामरंग दीखें यदा कन्दरामें जल टपकके भर जावे रुकवाक यक्षीके नेत्र सहश परिवेषं चन्द्रमापर हों तो शीघ्र वर्षा होती है ॥ ३४ ॥ प्रायोग्रहाणासुदयास्तकालेसमागमेमंडलसंक्रमेच ॥ पक्षक्षयेतीक्ष्णकरायनांतवृष्टिंगतेकेंनियतेनचाम् ॥ ३५॥ विशेषतः ग्रहोंके उदय और अस्त समयमें तथा उनके संक्रममें पक्षक्षयों सूर्यके अयन चलनेमें आर्दा प्रवेशमें वर्षा होती है ॥ ३५ ॥ समागमेपततिजलंज्ञशक्रयोजजीवयोर्गरुसितयोश्चसंगमे ॥ यमारयो पवनहुताशजभयंघदृष्टयो सहितयोश्वसद्हैः ॥ ३६॥ बुध शुक्र तथा बुध बृहस्पति और बृहस्पति शुक्रके एक राशिमें प्राप्त होनेसे वर्षा होती है, शनि मंगलके साथ होने में जो शुभ ग्रहोंसे युक्त वा दृष्ट न हों तो वायु तथा अमिकी भय होती है ॥ ३६ ॥ अथ सस्यनिष्पत्तिः। दिशिकस्यांभवेत्सस्यनिष्पत्तिःवचसानहि । कस्यदेशस्यमंगोहिक्वदिशिकचतन्नहि ॥ ३७॥ . A 4 भाषाटीकासमेता। किस दिशामें सुकाल कहां अन्नकाल और किसका भंग किसकी वृद्धि होगी ऐसे प्रश्नमें ॥ ३७ ॥ चतुर्णामपिकेन्द्राणांमध्येयत्रशुभग्रहः ॥ तस्यांचसस्यनिष्पत्तिःस्वास्थ्यचैवभविष्यति ॥ ३८ ॥' प्रश्नलग्न वा जगत्लग्न अर्थात् मेपार्कसामयिक लमसे जिस केन्द्रमें शुभ मह वा जिसका स्वामी बली हो उसके अनुसार दिशामें अन्न बहुत होगा, रागादे उपद्रवभी नहीं होवेंगे, जहां पाप वा स्वामी निर्बल हो वहां उसके अनु- सार दुर्भिक्ष रोगादि होंगे, लग्नसे पूर्व चतुर्थसे दक्षिण सप्तमसे पश्चिम और दशमसे उत्तर जानना ॥ ३८ ॥ यस्यादिशिशनि पापर्यंतोवाप्यवलोकितः ।। दिशितस्यांच स्वास्थ्यंदुभिक्षचभविष्यति ॥ ३९ ॥ जिस दिशामें शनि पापयुक्त वा पापदृष्ट हो उसमें रोगादि उपद्रव और दुर्भिक्षभी होंगे ॥ ३९ ॥ दिशियस्यारविस्तधान्यनाशोनृपाद्भवेत् ॥ यत्रापिमंगलस्तत्रधान्यनाशोनिभीस्तथा ॥४॥ जिस दिशामें सूर्य पापयुत दृष्ट हों वहां राजासे अन्नका नाश होवे, जहा वैसाही मंगल हो तहां अन्नका नाश और अग्निभयभी होवे ॥ ४० ॥ यस्यादिशिशुभाखेटाःसमस्तबलशालिनः ॥ निष्पन्नासैवविज्ञेयासस्यस्वास्थ्यंचतत्राहि ॥११॥ जिस दिशामें शुभग्रह समस्त बलयुत हों तहां सब अन्न अच्छे होंगे और र स्थ्य भी अच्छा रहेगा, बलहीन शुभग्रहोंसे अनिष्ट बलवान् पापोंसे कुछ प्रकार शुभ और मिश्रितमें मिश्रफल कहना ॥ ४१ ॥ केन्द्रे सर्वतःपापाःसमस्तबलसंयुताः॥ देशस्तदाविनष्टोसौज्ञातव्याशास्त्रकोविदैः॥४२॥ सभी केंद्रों में पाप बलसहित हों तो सभी देश नष्टप्राय होंगे विशेष शान:- ज्ञोंने उनका बलाबल और संबंधादि विचारके कहना ॥४२॥ -

(२७०) ताजिकनीलकण्ठी।
समर्धवामहर्धवावस्तुमेकथयामुकम् ॥ :
पृच्छायिनखेटेनशुभत्वप्रतिपाद्यते ॥४३॥
खेटोसौयावतोमासांस्तस्यल स्यसौम्यताम् ॥
विधत्तेतावतोमासान्समर्घढवतेबुधाः ॥४४॥
सुकाल वा अकाल कौन २ अन्नका कब २ होगा ऐसे प्रश्नमें जिस महसे
पूर्वोक्त क्रममें उस अन्नादिके नाम राशिसे शुभता पाई है, वह जितने मही-
नोंमें दूसरी राशिको प्राप्त हो सकता है उतने महीनोंपर्यंत समर्घ रहेगा
पंडित ऐसा विचारते हैं ॥ ४३॥ ४४ ॥
अथोसावशुभचिंत्यकियद्भिर्वासरैरयम् ॥
सौम्यभावविलग्नस्थंविधास्यतिविनिश्चितम् ॥ ४५ ॥
ज्ञातव्यादिवसामासामासैस्तावद्भिरस्यच ॥
महर्घतावस्तुनोहिप्रतिपाद्याविचक्षणैः ॥४६॥
जब कोई अशुभके शुभ होनेका समय पूँछे तो लममें जितनी संख्या सौ-
म्यभाव उन्हें निश्चय करके दिन वा महीने जहां जैसा संभव हो बुद्धिसे
विचार करके समर्थ और महर्घ विद्वानोंने कहना ॥ ४५ ॥ ४६ ॥
अधि तुर्बलंज्ञेयंलग्नेस्वामिविवर्जिते ।।
बलहीनेत्वधिष्ठायततः स्वामिबलेबलम् ॥१७॥
जिस कार्य वा वस्तुका जो अधिष्ठाता है, उसके लिये उसीका बल प्रथम
जानकर उसके बलानुसार हानि वृद्धि कहनी, लग्नमें अधिष्ठाता यह बली
होता है यदि लगेश बलहीन हो, जो अधिष्ठाता बलहीन हो तो सदा लग्ने-
शका बल देखना अधिष्ठाता आगे कहते हैं ॥४७॥
रविस्तु तामणिहेमताम्रक्षौमात्रवर्मपरदारकाणाम् ॥
मुक्तक्षुशंखद्रववस्तुरूप्याशितश्विराणांलवणस्यचेन्दुः ॥४८॥
मसूरताम्राकणधातुशस्त्रप्रवालकानामधिपःकुजःस्यात् ।।
सुगंधवस्त्रद्विदलानपक्षिहरिन्मणीनांप्रभुरिन्दुजःस्यात् ॥ ४९॥
सिद्धार्थगोधूमयवेक्षवानासब्जिकर्पूरगवांगुरुश्च ।।
नेहाथकाश्वान्नविचित्रवस्त्ररूप्यांबुजानांस्फटिकस्यशुक्रः॥१०॥
ऊर्णेभनीलीबलचर्मकृष्णवस्त्रायसां वैमहिषल्यचार्किः ॥५१॥

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भाषाटीकासमेवा। (२७३)
वस्तुंवोंके अधिष्ठाता-मोती, चुन्नी, सुवर्ण, तांबा, रेशम, अस्त्र शस्त्र, कवच,
परस्त्री आदिका-स्वामी. सूर्य. मोती, ऊख, शंख, रसकी वस्तु, नारियल, आम
आदि और चाँदी, राजे,लवण इनका स्वामी चंद्रमा. मसूर, तांबा, सिंगरफ,
हरताल आदि धातु,वस्त्र, मूंगाका अधिष्ठाता मंगल. सुगंधि द्रव्य, वस्त्र, द्विदल,
अन्न, पक्षी, पन्ना इनका बुध. राई, सरसौ, राडा आदि और गेहूं, जौ,
ईखका विकार और भिस्, सिंगाडे, कसेरू आदि जलोत्पन्न वस्तु तथा
कर्पूरका बृहस्पति. इतर फुलेल आदि सुगंधित वस्तुका और अन्न, विचित्र
वस्त्र, चांदी, जलज वस्तु, स्फटिकका शुक्र. ऊन, पशमीना, नील, चर्मजात,
कृष्णवस्त्र, लोहा, भैंस आदिकोंका अधिष्ठाता शनि है. विशेष ग्रहस्वभावतुल्य
बुद्धिबलसे जानना ॥४८॥ ४९ ॥ ५० ॥ ५१ ॥
इति श्रीमहीधरकतायां ताजिकनीलकण्ठीप्रश्नतंत्रभाषाटीकायां समर्या-
नर्घवृष्टिसुभिक्षादिप्रश्ननिरूपणम् ॥
समाप्तोयं ग्रंथः।
श्रीनीलकंठःशरदांफलोत्तरंप्रश्नाख्यतंत्रयदकारिपूर्वम् ॥ तत्सांप्रतं
पूर्णतरंनलभ्यते ह्यावश्यकंप्रश्नफलंहिमन्ये ॥ १ ॥ तस्मादिदंभूरिगु-
णंसुसंग्रहंसोपकारायमहधिरेण ॥ शास्त्रांतरीयंसहभाषयामयाद्विज-
न्मनाकारिकृतंहिपूर्वैः ॥ २ ॥ श्रीकीर्तिशाहनृपतेःख राज्यवेशोद्धि-
नाधिशून्यनवसंमित १८०८ शालिवाहे ॥ गढवालदेशटिहरीनगरे
बृहत्कसज्जातकस्यविवृतेःशुभभाषयांते ॥३॥ तंत्राणांत्रितयंस्यपा-
ठसरलाश्रीनीलकण्व्या कृताभाषायन्ममचापलंकिमपितत्सन्तःक्षमध्वं
धाः ॥ बालानां खूबोधसंततिकरीज्योतिष्फलोद्योतिनीलोकानामु-
पकारिणीसुविशदां वैतुमाहीधरीम् ॥ ४॥ छिद्रान्वेषणतत्पराम्पर-
कृतेविध्वंसकादूषकामात्सर्यणपरार्थनाशनपरादुर्बुद्धयो मानिनः ॥
सत्कार्यशिथिला कुकर्मसुखिनोनिदंतुनंदतुवा मेकृत्यंसुकृतंपरोपकृत-
ये वैतुदुर्मत्सराः ॥५॥ चन्द्राक्षिवस्विन्दु १८३३ शकेतुभाशुक्के
नवम्यांचगुरावशोधीत् ॥ अनेकसंलेखवशादशुद्धांमाहीधरीरामभरो-
सशर्मा ॥६॥

mtamana (२७२) ताजिकनीलकण्ठी। विज्ञापनम् । 'श्रीनीलकंठ दैवंज्ञने वर्षफल दो तंत्रोंके उपरान्त ज़ा प्रश्नकदनाया था वह इस समयमें संपूर्ण नहीं मिलता और प्रश्नविद्या प्रत्यक्षफला है तथा यहां जातकमें बृहज्जातक ताजिकमें नीलकंठी सर्व साधारणके अर्थ भाषा होगई तो प्रश्नभी अवश्य होना चाहिये ॥ १ ॥ इसकारण पूर्वाचार्योका सुन्दर संगृहीत बहुत गुणवान जिसमें सभी प्रकारके प्रश्न अनेक शाखाक हैं सब पाठकोंके हितार्थ महीधरनामा ब्राह्मण जिला गढवाल राजधानी दीहरी निवासीने इसे भाषासहित करदिया ॥ २ ॥ श्रीमान् महाराजा टीहरी गढवालके अधीशं श्री १०८ कीर्तिशाह साहब बहादुरके राज्यप्रवेश ९०४ द्विगुण अर्थात् १८०८ केशालमें बृहज्जातक भाषाटीश रचनाके उपरान्त उक्त नगरमें ॥ ३ ॥ नीलकंठी तीनहूं तंत्रोंकी पाठ सरल (ज्यो- तिष ) तारा विचार सम्बन्धि फलोंका स्फुरण करनेवाली नीलकं- ठोके अनभिज्ञों ( बालकों ) को सहजहीमें बोधरूपा सन्ततीकी सृष्टि उत्पन्न करनेवाली सर्वजनोंका उपकार करनेवाली माहीधरी इस भाषाटीकाको सज्जन पुरुष पण्डित भलेप्रकार प्रकाश करें तथा इसमें जो कुछ मेरी अन- भिज्ञता एवं धृष्टता हो उसे क्षमा करें ॥ ४ ॥ और जो लोग पराये छिद्र (दूषण) ढूँढनमें तत्पर हैं, पराये किये सत्काँका नाश करनेवाले एवं मत्सरी (परायी)भलाईसे विनाही आग जलभुन जानेसे पराये प्रयोजनको भंग करनेमें तत्पर, तथा शुभकयोंमें शिथिल अर्थात् जिनसे शुभ कर्म अपने हाथसे कुछ नहीं होसकता प्रत्युत बुरे कामोंसे सुख माननेवाले "घमंडखोर" दुर्बुद्धि हैं चे मेरे प्रोपकारार्थ इस परिश्रमको देखकर निंदा करें अथवा आनं- दित होकर प्रशंसा कियाकरते हैं, किंतु जो विज्ञ महाशय निर्मत्सरी, पराये सुकत्यसे आनंद माननेवाले एवं दुष्कत्यसे चिंता करनेवाले हैं, वे इस कृत्यको सुकृत करें ॥ ५ ॥ पुस्तक मिलनका ठिकाना- खेमराज श्रीकृष्णदास "श्रीवेङ्कटेश्वर" स्टीम प्रेस-बंबइ.

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ताजिकनीलकंठी

Author
महिधर
Title
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File name
ताजिकनीलकंठी
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OCR done
Citation
1111
Published
2009/06
Publisher
श्रीवेंकटेश्वर स्टीम मुद्रणयंत्रालय, बम्बई
Language
Sanskrit
Pages
282
Library
Central Library, Jain Vishva Bharti University, Ladnun
DLI number
322480
Barcode
99999990253033.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
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