Shri Jain Swetamber Khartargacch Sangh, Jaipur

Parmarth Patravali Bhag-i

Jaidayal Goyandka · 2011/03

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परमार्थ- पत्रावली परमार्थ-प्रन्यमा [प्रथम भाग] जयदयाल गोयन्दका सुन्द्रक तथा प्रकाशक- घनश्यामदास जालान, गीताप्रेस, गोरखपुर 4 मूल्य ।) सं० १९८८ प्रथम बार ५२५० सं० १९९३ द्विनीय बार २००० पं० १९५६ तृतीय बार २००० (चार आना) प्रकाशकका निवेदन इस छोटी-सी पुम्निका श्रद्धेय श्रीजयदयालनी गोयन्दकाके कुछ पत्रों के हिन्दी-अनुवादका सग्रह है जो उन्होंने समय-समयपर अपने सम्बन्धियों और मगियोंको लिये हैं । आपके प्रत्येक पत्रमें ही कुछ-न-कुछ सीखने योग्य बातें रहती है, यदि मय पत्रीको सग्रह करके प्रकाशित किया जाय तो एक बहुत वडा अत्यन्त उपादेय और शिक्षाप्रद अन्य बन सकता है । परन्तु यह काम विशेष प्रयत्नमाध्य है । आज तो बहुत थोड़े-से चुने हुए पत्रोंका यह सग्रह प्रकाशित किया जाता है, आगे और भी किया जा सकता है। धर्म-प्रेमी जनतासे इससे लाभ उठानेकी प्रार्थना है । इस नवीन सस्करणमें पत्रोंका वर्गीकरण करके उनकी सूची भी छाप दी गयी है। प्रकाशक श्रीहरिः विषय-सूची पत्र नं० पृष्ट-संख्या ९ ११ :: १६ २५ २८ ३३ ३४ ४४ १-चेतावनी! २-प्रेम और शरण ३--प्रेम होने के उपाय ४-निष्काम व्यवहार ५-उद्धार कैसे हो? ६-मृत्युका मुकदमा या भवरोग ७-सच्ची सलाह ८-समय कहाँ? ९-जीवन्मुक्तिका कर्म १०-नाम और प्रेम ११-हे पतितपावन ! प्राणाधार !! १२-चेत क्यों नहीं करते ? १३-भक्तिका प्रवाह १४-भगवान्की निरन्तर स्मृति १५-वैराग्य और प्रेम-प्रतिज्ञा १६-वैराग्य और प्रेमकी पुकार ! १७-प्रभुका प्रेमी ही धन्य है !! १८-द्रष्टाका ध्यान १९-चेत करो! २०-साधना २१-जप, पाठ और जीवनकी सार्थकता २६-जबतक मृत्यु दर है ! २३ सल्लंग ... .. ४८ ५४ ५६ ६० ... ६८ ७४ .. ७७ ( ५ ) पत्र न. पृष्ठ-सुरख्या .. ? ९८ २४-प्रेम और सेवा २-अनन्य प्रेम २६-मन स्थिर होनेके उपाय २७-पूर्ण प्रेम कैसे हो २८-'अशोच्यानन्वशोचस्त्वम् २९-क्रोधनागमा उपाय ३०-प्रेम कैसे पढ़े ३१-सगुणका ध्यान और माता पिताकी सेवा ३२-भगवत्कृपा और प्रेम ३३-प्रभुस प्रभाव, गुण और स्वरूप ३४-वैराग्य, प्रेम और ध्यान ३५-'मैं' का त्याग ३६-चाह तहाँ राह । ३७-प्रेमस पर्ता ३८-मोहजालसे कैसे निकलें। ३९-मजनमें प्रेम होनेका उपाय ४०-श्रद्धा, सत्सग ही उपाय है ४.-मचिदानन्द परिपूर्ण है। ४०-'मर जाऊँ मागू नहीं ४३-'म में पड़ी गय है ।" ४४-व्यवहारमुधार और भक्ति ४५-कायरता ही मृत्यु है ४६-'टु समेर म निवेति' ४७-भोग दुगानेवारे है ४८-गुला आदर' ४-ध्यान से लगे? १२२ १२८ १२५ १०७ १३० १३२ पत्र २० पृष्ट-सरदा ५०-त्रुराई के बदले मलाई ५१-वैराग्य और ध्यान १४८ इन पत्रोंके कुछ चुने हुए विषय +M विषय पत्र-रख्या १-चेतावनी १, ६, ८, १२, १४, १५, १६, १९, २२, ४६, ४७ २-वैराग्य और मनोनिग्रह १, १६, १८, २२, २६, २८, ६४, ४६. ४७,५१ ३-सत्संग और श्रद्धा ७, २१, २३, ३८, ४. ४-भजन या नामजप १०, ११, १४, २०, २१,३९, ४२ ५-अभेद निराकारका ध्यान ७, ९, १४, १६, १८, ३४, ३५, ४१, ४३, ४९, ५१ ६-प्रेम, प्रभाव, स्वरूप और कारण २, ३, ५, १०, १४, १५, १६, २७, २४, २५, २७, ३०,३१,३२,३३,३४, ४४, ४८ ७-भगवत्कृपा १७,३२ ८-निष्कामभाव ९-क्रोधनाशका उपाय १६, २९, ५० १०-व्यापार और बर्तावसुधार ४, ७,३७, ४४ ११-सेवा २४,३१, ४५ १२-प्रचार ५, १३, ३६ ::

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Lehen
-rayan
कमल-लोचन श्रीरास

श्रीपरमात्मने नम
परमार्थ-पत्रावली
प्रथम भाग
[१]
आप जगत्में क्या कहकर आये थे प्रतिक्षा भत करना
कितना बड़ा पाप है ! धन, यौवन अस्थिर हे, केवल भगवत् प्रेम
ओर भक्ति ही स्थिर है-उन्हें प्राप्त करना चाहिये । मनरूप नटको
भगवचरणरूपी स्तम्भपर चढाते रहनेसे दी इसकी चञ्चलता
मिटती है। इस यसार संसारमें केवल राम-नाम ही सार है।
संमारकी असारता पुराने पंडहरों और श्मशानोंके देसनेसे
प्रत्यक्ष प्रतीत होती है। समुद्रके सलमें नमक, काठमें अग्नि
[७

परमार्थ-पत्रावली
और दूध घी जिस प्रकार रम रहा है उसी प्रकार परमात्मा
सबमें रम रहा है। उसीके नित्य ध्यानसे कल्याणकी प्राप्ति
होती है । आप मालिकको किस लिये भूल रहे हैं ? स्त्री, पुत्र
और धन किस कास आवेंगे? प्राणोंके निकलनेके समय कोई
सहायता नहीं कर सकेगा ! साथ तो शरीर भी नहीं जायगा।
जो कुछ किया जाता है वही साथ जाता है। आप उस प्रभुसे
मैत्री क्यों नहीं करते ? उसके समान प्रभु तथा प्रेमी और
कौन मिलेगा ? ऐसा हितैपी दूसरा कौन है ?
उमा राम सम हितु जगमाही । गुरु पितु मातु बन्धु कोउ नाही ॥
सव मतलवकी मनवार करनेवाले हैं। फिर आप
उस प्रभुसे प्रेम क्यों नहीं करते ? प्रभु तो आपसे कुछ भी नहीं
माँगता । केवल उसे हर समय स्मरण रखना चाहिये। उसके
नामका जप और ध्यान ही सार है, जप करनेसे ध्यान अपने-
आप होने लगता है।
आपके ये सब पदार्थ किस काम आवेंगे ? एक दिन
सवको मिट्टी में मिल जाना है ! जो कुछ ले सकें सो शीघ्र ही ले
लेना चाहिये, अमूल्य श्वासोंको व्यर्थ गँवाना उचित नहीं है,
फिर आपकी मर्जी!
and
an
८]

[२]
अपने स्वार्थ के लिये किसीसे सेवा नहीं करवानी चाहिये,
स्वार्थ ही पापकी जड़ है । अपने धर्मकी तरफ देखना ही
मनुष्यका कर्तव्य है। रुपये पेसको तो यात ही कौन-सी है,
चाहे सर्वस्व नाश हो जाय, परन्तु पक प्रभुका भरोसा करके
ओर सरका आश्रय छोड़ देना चाहिये । प्रभुकी जो मर्जी होती
ई. वही होता है। फिर चिन्ताफ्या है ? उसकी प्राप्तिको लगनमें
चाहे मव फुल चला जाय!
'नारायण' होवे भले, जो कल होनहार ।
हरिसो प्रीति लगायके, फिर कहा मोच विचार ।।
लगन लगी मनही कहे, लगन का मोय ।
'नारायण' जा रगनम, तन मन दोन ग्वोय ॥
[९

?
परमार्थ-पत्रावली
प्रभुकी राज़ीसे यदि हमें नरक भोगना पड़े तो उसे भी
आनन्दसे भोगना चाहिये । जो कुछ होता है सो प्रभुकी
नज़र में होता है । जब उसकी नज़रसे परे कुछ भी नहीं होता,
तव फिर चिन्ता करके उसकी शरणमें दोपी क्यों सिद्ध
होना चाहिये ? वह सभी जगह स्वयं सगुण या गुणातीतरूपसे
मौजूद है, फिर तुम्हें किस बातकी चिन्ता है ? प्रभुपर
पूरा विश्वास रखना चाहिये । जो कुछ हो सो देखता रहे ।
प्रभु जो कुछ करे उसे ही आनन्दसे स्वीकार करना चाहिये ।
उसके विधानपर मन मैला करनेसे वह कैसे सन्तुष्ट हो?
केवल उसके नामका जप करता रहे फिर ध्यान आप ही हो
जाता है । थोड़े-से शब्दोंमें प्रेम और शरणका भाव लिखा
गया है। जब चित्त उदास हो तभी इसे पढ़ना चाहिये ।
1
१०]

[३]
तुमने भगवान्म प्रेम होनेका उपाय पृछा सो ठीक है,
प्रेम होनेके बहुत-से उपाय है, जिनमें कुछ लिये जाते हैं-
(१) भगवदत्तोंद्वारा श्रीभगवान्के गुणानुवाद ओर
उनके प्रेम तथा प्रभावकी बातें सुननेसे अति शीघ्र प्रेम हो सकता
है। भक्तों के सगक अभावमें शानोंका अभ्यास ही सत्सगके
समान है।
(२) श्रीपरमात्माके नामका जप निष्कामभावने और
ध्यानसहित निरन्तर करनेके अभ्यामसे भगवानमें प्रेम हो
सक्ता है।
(३) श्रीपरमात्माके मिल्नेगरी तीय इन्द्रामे भी प्रेम
पद सकता है।
[

परमार्थ-पत्रावली
(४) श्रीपरमात्माके आज्ञानुकूल आचरणसे, उनके मनके
अनुसार चलनेसे उनमें प्रेम हो सकता है। शास्त्रकी आशाको
भी परमात्माकी आना समझनी चाहिये ।
(५) भगवान्के प्रेमी भक्तोंसे सुनी हुई और शास्त्रों में पढ़ी
हुई, श्रीपरमात्माके गुण, प्रभाव और प्रेमकी वातें, निष्कामभावसे
लोगोंमें कथन करनेन, भगवान्में बहुत महत्त्वका प्रेम हो
सकता है।
उपर्युक्त पाँचों साधनों से यदि एकका भी भलीभाँति
आचरण किया जाय तो प्रेम होना सम्भव है। मान-अपमानको
समान समझकर, निष्कामभावसे सवको भगवान्का स्वरूप
जानकर सबकी सेवा करनी चाहिये । यो करनेसे भगवत्कृपासे
आप ही प्रेम हो सकता है। सबमें भगवान्का भाव होनेपर
किसीपर भी क्रोध नहीं हो सकता । यदि क्रोध होता
तो समझना चाहिये कि अभी वह भाव नहीं हुआ । चित्तमें
कभी उद्वेग नहीं होना चाहिये । जो कुछ हो, उसीमें आनन्द
मानना चाहिये, क्योंकि सभी कुछ उस प्रभुकी आज्ञासे और
उसके मतके अनुकूल ही होता है । यदि प्रभुके अनुकूल होता है
तो फिर हमको भी उसकी अनुकूलतामें अनुकूल ही रहना
चाहिये । उस परमात्माके प्रतिकूल और उसकी आज्ञा बिना कुछ
भी होना सम्भव नहीं, इस प्रकार निश्चय करके प्रभुकी
प्रसन्नतामें प्रसन्न होकर, सब समय आनन्दम मग्न रहना चाहिये।
,
१२]

.
[४]
पहलेले भगवत्सम्बन्धी साधन कुछ ठीक लिसा सो बड़े
आनन्दकी बात है। पत्र में मेरी प्रशंसा लिसी सो ऐसा नही
लिसना चाहिये । प्रशंसाके योग्य तो श्रीपरमात्मदेव है,
उनके रहते अन्य किसीफी बड़ाई करना ठीक नहीं। आपने
पूछा कि, भगवान्के भजन-ध्यानके लिये किस तरह चेष्टा करनी
चाहिये तथा सर समय परमात्माको याद रखते हुए
यथासाध्य शारीरिक निर्वाहका कार्य, निष्कामभावसे कर्तव्य
समझकर किस प्रकार किया जा सकता है ? सो ठीक है, इस
विषयमें विशेषरूपसे तो कभी मिलनेपर कहा जा सकता है।
परन्तु साधारणम्पने नीचे कुछ लिखा जाता है-
(१) किसी भी वस्तुका मूल्य ठहरानेके बाद उस वस्तु-
को वजनमें, नाप, या संरयामें न तो कम देना
चाहिये और न अधिक लेना चाहिये ।
(२) जो वस्तु प्राहकको दिपलायी जाय वही उसे देनी
चाहिये । उसमें किञ्चित् भी दूसरी घस्तु नहीं
मिलानी चाहिये।
(३) मुनाफा ठहरानेके याद न तो कम देना चाहिये
और न अधिक लेना चाहिये।

परमार्थ-पत्रावली
(४) व्यवहारमै चिना हकका पैसा नहीं लेना चाहिये। न
तो झूट-कपट या जबरदस्तीले लेना चाहिये और न
विना हक किसीने मांगकर ही छूट करानी चाहिये।
(५) निषिद्ध वस्तुका व्यवहार नहीं करना चाहिये।
दिप पाप या जीवहिंसा होती हो, ऐसी वस्तुका
व्यवहार भी नहीं करना चाहिये ।
(६) अपने मनने पूछकर जिग्नमें पाप हो, उन कामको
नहीं करना चाहिये । व्यवहारके उपर्युक्त दोष
पापोंक भयसे मृत्युके भयचे. परलोकमै दण्डके
भयसे या ईश्वर-मिलनमें विलम्ब होनके भचसे भी
कम हो सकते हैं । परन्तु लोभ छोड़े विना इनका
सर्वथा छूटना सम्भव नहीं। श्रीभगवान्में कुछ
प्रेम उत्पन्न होनेपर, उनके प्रभावको कुछ जान
लेनेसे लोभ तुरन्त छूट सकता है । इसलिये सबसे
पहले वही उपाय करना चाहिये कि जिससे
श्रीभगवान्में प्रेम हो ! इसके उपाय के
पत्रमें लिखे हैं। उपर्युक्त शुद्ध व्यवहारके उपाय तो
पापोंसे बचने के लिये लिखे गये हैं परन्तु कुछ बातें
इनसे भी बढ़कर हैं और वे निम्नलिखित हैं-
* प्रेमकी प्राप्तिके कुछ साधन तीसरे पत्रमे लिखे गये है, उन्हें देखना
चाहिये ।-सम्पादक
१४]

परमार्थ-पत्रावली लोम-त्यागपूर्वक केवल धर्मकी भावनासे, भगवान्को ही सब कुछ जानकर और उन्हीं की आशा मानकर, जो व्यावहारिक कर्म किये जाते हैं, उनसे ससारके लोगोंको बहुत लाभ होता है। जिनके व्यवहार में अपने लिये केवल शरीर-निर्वाहमात्रका ही भाव रहता है । वह भी चाहे न हो ! ओर जिनको लाभ- हानिमें हर्प-शोक नहीं होता, ऐसे पुरुपोंका व्यवहार केवल लोक-हितके लिये ही हुआ करता है, वनके लिये नहीं, इसीका नाम निकाम व्यवहार हे । इससे हृदयकी बड़ी शुद्धि होती है ! घरके तथा संसारके समस्त मनुष्यांक साय स्वार्थ छोड़कर उनका हित चिन्तन करते हुए जो वर्ताव किया जाता हे, वही वर्ताव उत्तम है और उसीसे दृदयको शुद्धि होती है। भजन सत्सङ्गका भी यथासाध्य साधन इसमें हो सकता है। भ्यानका अभ्यास करनेसे व्यान भी होना सम्भव है। चेष्टा रसकर अभ्यास करनेसे सभी कुछ हो सकता हे। सत्सङ्ग और जपका अधिक अभ्यास हो जानेपर ध्यान निरन्तर होसकता हे । काम करते हुए श्वासद्वारा नामका जप आर मनके द्वारा भगवत् स्वरूपका ध्यान करनेकी चेष्टा करनसे, एकान्तमें भी बहुत लाभ होता है । सत्सङ्ग कम हो तो भगवद्भक्तिके ग्रन्थ पढ़ने चाहिये । यह भी सत्सङ्ग ही है। [१५ [५] [ इस पत्र में प्रश्नोत्तर हैं, प्रश्नकर्ताके प्रश्न लिखकर उनका उत्तर दिया गया है । सम्पादक ] प्र०-सारे संसारमें जीव बहुत ही दुखी हो रहे हैं। किसी भी देशमें शान्ति नहीं, देश-देशमें, घर-घरमें कलह हो रही है, जगह-जगह लोग एक दूसरेका अनिष्ट कर रहे हैं। इस स्थितिसे जीवोंका उद्धार होना चाहिये। उ०-ठीक ही है, उद्धार तो होना ही चाहिये, इसके उपाय तुम्हारे दूसरे प्रश्नोंके उत्तरमें आगे लिखे जायंगे। प्र०-इस समय जगत् मानो दुःख-दावानलसे दग्ध-सा हो रहा है। इस प्रकारकी स्थिति रही तो शायद कुछ दिनों बाद घर-घरमें, भाई-भाईमें परस्पर भयानक मार-काट होनी सम्भव है, लोगों में भगवान के प्रति विश्वास उठता चला जा रहा है। दिन- १६] - परमार्थ-पत्रावली पर-दिन जगत्का भविष्य कम-से-कम एक बार तो बहुत ही भयानक रूप धारण करता चला जाता है, इसका क्या कारण है? उ०-यह बात कई अशोमें ठीक है परन्तु ऐसा होनेका कारण भक्तिपूर्वक भगवत्सम्बन्धी आलोचनाका अभाव है, प्रायः सारा जगत् केवल भौतिक सुखको ही परम साध्य मानकर उसीकी ओर दौड़ रहा है, इस समय जगत्की दृष्टिप्राय सांसा- रिक विषयाँकी ओर ही लगी हुई है । भोगयोग्य वस्तुओंके सञ्चयको ही प्राय. लोगोंने परम पुरुपार्थ-सा मान रफ्वा हे । इसीसे सब प्रकारको बुराइयाँ प्रकट हो रही हैं, जेसे रपयोंके लोभसे व्यवहार विगड़ जाता है उसी प्रकार विषय-लालसासे सारे वर्माचरण विगढ़ जाते है । यदि ऐसी ही स्थिति बनी रही तो सम्भव भी है कि शायद कलह ओर चढे ! कारण, भौतिक सुसकी प्रबल आकांक्षा मनुष्यको पशुफी संशामें परिणत कर देती है। सभी भोगोंकी ओर दौड़ते है, जहाँ भोगपदार्य होते है वहीं एक साथ अपटते हैं । जैसे किसी कुत्ते के मुँहमें रोटी हो या कोई पक्षी मासका टुकड़ा लिये हुए हो तो प्राय बहुत-से कुत्ते ओर पक्षी उनके पीछे पड़ जाते है और उनका परस्परम वड़ा द्वन्द्वयुद्ध होता हे, जड़वादको आदर्श मान लेनेका परिणाम भी प्रायः इसी प्रकार हुआ करता है । इसलिये ऐसे आगम, मौज- शौक आदि विलासिता सहित ससारकी सारी भोगासक्तिका मनके द्वारा त्याग करना चाहिये।पेसा होनेसे ही सुख सम्भव है। [१७ प. प०२ परमार्थ-पत्रावली प्र०-जीव इस स्थितिमें कवतक पड़े रहेंगे यानी इनका उद्धार कव होगा? उ०-इस वातका उत्तर नहीं दिया जा सकता। योगी चाह तो कुछ मालूम कर सकते हैं। पुरुषार्थ अनियत है; इस बातका निर्णय नहीं हो सकता कि पुरुषार्थका फल कब कैसा होगा, किसके साधनका फल कब और कैसा होगा। इसका पता केवल भगवान्को ही है। इस सम्बन्धमें मनुष्यके द्वारा निश्चितरूपसे कुछ भी नहीं कहा जा सकता। यह बात यदि पूर्वनिश्चित मान ली जाय कि अमुक जीव असुक समय परमपदको प्राप्त होगा तो साधनसे श्रद्धा हट जाती है। लोग कह सकते हैं कि उद्धारका समय पूर्व- निश्चित है ही तो फिर साधनकी क्या आवश्यकता है। यदि यह माना जाय कि परमात्मा भी इस भविष्यको नहीं जानते तो उनकी त्रिकालज्ञतामें वाधा आती है। इसलिये यही कहा जा सकता है कि 'इस वातको भगवान् ही जाने। परन्तु इस वुरी दशासे उद्धार पानेके लिये कुछ उपाय हैं। यदि हिन्दू जातिकी दृष्टि से कहा जाय तो इस जातिके कष्ट दूर करनेके लिये ये चार उपाय काममें लाये जा सकते हैं- १-धार्मिक शिक्षाका प्रचार । २-त्यागी, अनुभवी और विद्वान् सजनोंद्वारा देशभरमें शुद्ध धार्मिक भावोंका प्रचार । ३-अल्प मूल्यमें धार्मिक ग्रन्थोंका प्रचार । १८] परमार्थ-पत्रावली ४-अनाथ बालकोंकी धर्म रक्षाके लिये अनाथालयोंकी स्थापना। इस प्रकार किया जाय तो इस जातिमें नीति, त्याग, भक्ति और धर्माचरणका विकास और प्रसार हो सकता है और इनके प्रसारसे सम्भवत यह जाति दुःसन्दावानलमे दग्ध होनेसे बच सकती है। यदि सारे जगत्की दृपिसे कहा जाय तो भी प्रायः ऐसी ही बात है । समष्टिके उद्धारार्थ भी त्याग, विद्या, भक्ति और सदाचारके विस्तारकी ही विशेष आवश्यकता है। और यह कार्य स्वार्थत्यागी, सेवापरायण सत्पुरुषोंकी तत्परतासे ही हो सकता है । निष्काम सेवा ही एक ऐसी विद्या है कि जिससे ससार जीता जा सकता है । जबतक ऐसे परहितवती, स्वार्थ- त्यागी पुरुषोंद्वारा जगत्म उपर्युक्त भावोंका प्रचार न हो, तब- तक जगत्के दु सोका नाश होना कठिन ही है । ऐसे पुस्प जगत्में बहुत थोडे है इसी कारणसे जगत् दुखी हे । सम्भव हो तो ऐसे निःस्वार्थी पुरुप तैयार करने चाहिये, यह काम महापुरुष कर सकते है। श्रीगीताजी अध्याय १२ के श्लोक ३, ४,* त्वरमनिर्देश्यमव्यक्त पर्युपासते । सर्वत्रगमचिन्य च कूटस्थमचल ध्रुवम् ।। सनियम्येन्द्रियग्राम सर्वन समबुद्धय । ते प्राप्नुवति मामेव सर्वभूतहिते रता ।। -- [१९ परमार्थ-पत्रावली १३, १४* के अनुसार स्वाभाविक ही सर्वभूतोंके हितमें रन, सर्व- भृतोंमें अद्वेष्टा, मैत्री और करुणादि गुणोंसे सम्पन्न पुरुप यदि चाहें तो जगत्के जितने भागमें चे परिश्रम करें, उतन भागमें जीवोंका दुःख बहुत अंशमें दूर कर सकते हैं। प्र०-जीवोंकी इस दशापर परमात्माकी करणा नो है ही परन्तु अब तो करुणाके सागरकी मर्यादा भी टूट जानी चाहिये । उ०-इस प्रश्नका अर्थ शायद यह होगा कि भगवानको अवतार लेकर जीवोंका उद्धार करना चाहिये, करुणास ऐसा कहा जा सकता है परन्तु वास्तवमें ऐसा समय थभी आया है या नहीं इस वातको भगवान् ही जान । अनुमानसे ऐसा कहा जा सकता है कि सम्भवतः भगवानके लिये खयं अवतीर्ण होनेका समय अभीतक नहीं थाया। आया होता तो चे अवतक अवतार ले लेते । जीवोंकी दशा तो उनसे छिपी है ही नहीं। परन्तु मालूम होता है कि वैसा समय ही अभीतक नहीं आया है । कलियुगमें जिस प्रकारकी स्थिति होनी चाहिये, उससे भी अधिक बुरी स्थिति हो जाय तव भगवान् अवतार ले सकते हैं । परन्तु ऐसी दशा अभीतक हुई नहीं जान पड़ती। मनुष्य अबतक प्रायः * अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करण एव च । निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः श्रमी ।। संतुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढनिश्चयः । मव्यर्पितमनोबुद्धिर्यो मद्भक्तः स मे प्रियः ॥ २० ] परमार्थ-पत्रावली अपनी मौतसे ही मरते है । पेट भरनेको अन्न मिलता ही है। बलात्कारसे प्राय प्राणहरण नहीं होते। इस प्रकारका सङ्कट या तो पशु-पक्षियोपर है जो किसी न किसी अंशमें प्राय. सदासे था। या भारतवर्षमें ऐसा सङ्कट गोजातिपर है जो बलात्कारसे मारी जाती है, विशेपकर दुध देनेवाली जवान गौएँ, जो विना ही मौत मारी जाती है ! तुम्हें जो संसारकी वर्तमान दशा इतनी असहनीय प्रतीत होती है, यह तुम्हारी कमज़ोरी या करुणाका परिणाम है । परन्तु यदि अनवरत गतिसे ऐसी ही अन्धाधुन्धी चलती रही तो सम्भव है कि भगवानके अवतीर्ण होनेका समय भी आ जाय या उनके अधिकारप्राप्त कोई कारक पुरुप आ जायँ अथवा भगवान्की कृपासे भक्त महात्माओंको ऐसा अधिकार प्राप्त हो जाय कि जिससे वे लोग ही इस कामको चला लें, जैसे सम्राट यदि यहींके किसी सजनको बड़े लाट (वायसराय) का अधिकार सौंप दें तो वह सब काम चला सकता है। प्र०-श्रीपरमात्माकी नित्य कृपाका अनुभव जीवोंको सरलतासे होने लगे तो जीव परमात्माकी कृपा लाभकर कृतार्थ हो सकते है? उ०-ठीक हे, जीप चाहें तो ऐसा हो सकता है। प्र०-ज मालूम मायाकी कितनी प्रपल शक्ति हे कि परमात्माकी असीम कृपाका पद पदपर प्रत्यक्ष दर्शन करता हुआ भी मोदात जीव चार बार भूल जाता है। [२१ परमार्थ-पत्रावली उ०-ठीक है, परन्तु भगवान्की प्रबल शक्तिके सामने माया- की कुछ भी शक्ति नहीं है। जो मायाके वशमें है, उन्हींके लिये माया प्रवल है। परमात्माको और परमात्माके प्रभावको जानन- वालोंके सामने मायाकी शक्ति कुछ भी नहीं है। क्योंकि वास्तवमै मायाकी ऐसी शक्ति है ही नहीं । माया वशमं पड़े हुए जीवोंने ही उसकी ऐसी शक्ति मान रक्खी है। जैसे तन्द्राकी अवस्थामें पड़ा हुआ मनुष्य, छातापर हाथ पड़ जानेले, चोरकी कल्पना कर अपनी छातीपर चढ़ा भारी बोझ-सा समझ लेता है और अपनेको इतना दवा हुआ मानता है कि उसे जवान हिलानेमें भी भय-सा मालूम होता है परन्तु वास्तवमें यहाँ न चोर है और न उसका वोझ है। यही दशा मायाकी है। जीव जहाँतक चेत नहीं करता: वहींतक मायाकी प्रयल शक्ति मानकर वह उससे दबा रहता है। यदि चेतकर परमात्माकी शरण ले ले और उसका स्वरूप जान ले तो फिर मायाकी शक्ति कुछ भी न रहे । (* गीता ७। १८ एवं १३ १ २५ में देखना चाहिये।) जीव जो परमात्माका सनातन अंश है, अपनी * देवी ोपा गुणमयी मम माया दुरत्यया । मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते ॥ 'क्योकि यह अलौकिक अर्थात् अति अद्भुत त्रिगुणमयी मेरी योगमाया बड़ी दुस्तर है, परन्तु जो पुम्प मेरेको ही निरन्तर भजते है, वे इस मायाको उल्लंघन कर जाते है, अर्थात् संसारसे तर जाते हैं।' २२]

परमार्थ-पत्रावली
शक्तिो भूल रहा है, इसीलिये उसफो माया प्रपल प्रतीत
होती है । यदि अपनी शक्ति जागृत कर ली जाय नो मायाकी
शाक्ति सहजहीम परास्त हो जाय ! मायामे मनान हेतु है और
अमानके नाशसे ही मायाका नाश है।
प्र-जिम समय वह (परमात्मा) किसी रूपमें अपना
म्प दिखलाता हे उस समय तो कुछ बानन्द सा होता है पर
उस आनन्दम उस मानन्दरूपको न पहचानकर जीव उसे
छोड़ देता है, फिर पश्चात्ताप होता है। मालूम नहीं, वह पश्चात्ताप
असली है या वनारटी असली होता तो क्यों नहीं पकड़ लेता?
उ-ठीक ही हे। पश्चात्ताप अमली होता तो छोड़ता
सीक्यों?
प्रवासी स्थितिम जीयका मोह नाश कैसे हो?
३०-संसारासक्ति ही इस मोहका कारण है, उसमा नाग
घरायसे दो मफता है, चराग्यमें पूर्वमश्चित पाप गधा देते है
परन्तु पग्मामाकी शरणसे उनका भी नाश हो सकता है।
भगे यमगानन्त श्रुत्वान्येभ्य उपायते ।
पि नाविन्ये मासु सुतिपरायणा ॥
तुइनमे दमरे अर्थात् जोमद युद्धिाले पुरुपये (सर)
म प्रार नो हुए, दूससे गर्मात् सपके मोगा पुरुषोंने
मनार ST , और मोरे पहुए पुफर भी
मपुर मगारगर निसदेताना।
[३

परमार्थ-पत्रावली प्र०--किस उपायसे जीवके अन्तरमें तत्काल बिजली-सी दौड़ जाय, वह चैतन्य हो जाय और उस चेतनाको पाते ही अपने प्रियतमको पकड़ ले। किली तरह छोड़े ही नहीं। किसी भी भुलावेमें न भूले, ऐसा कोई सरल उपाय सारे जीवोंके कल्याण- के लिये बतलाना चाहिये और उस उपायको जगत्में पुकारके (हेला मारकर ) कह देना चाहिये कि जिससे सारे जीव मोहकी प्रहेलिकाको तोड़कर अपने प्रियतमको पकड़ पावें। उ०-ठीक है, जप और सत्संगसे परमात्माके प्रभावको जानकर, शरीर और संसारको अनित्य समझकर, परमात्माके ध्यानमें स्थित होनेसे यह कार्य हो सकता है। यही हेला मारकर . कहना है। प्र०-जवर्दस्ती बँचकर पावन करनेका मौका है, तभी तो पतितपावन नामकी सार्थकता है। उ०-पतितपावन तो भले कोई उनको न कहे, यह तो कहने- वालेकी मर्जीकी बात है ! वे (परमात्मा ) तो अपने कानूनके अनुसार ही सब कुछ करते हैं, परमात्माको पतितपावन, दीन- वन्धु और दीनदयालु आदि नामोंसे पुकारकर उनसे प्रार्थना करता उत्तम है. इसमें कोई दोष नहीं है, इसमें भी प्रेम और करुणाका भाव है परन्तु इससे भी उत्तम यह है कि उससे कुछ भी नहीं कहे । किसी प्रकारकी खुशामद न करे, उनकी गरज हो तो आवें नहीं तो उनकी मर्जी ! २४ ] [६] आपने लिखा कि, 'हमपर फौजदारीमामला लगा हुआ था वह खारिज हो गया है सो आनन्दकी बात है। आपने लिखा कि, 'अब हमपर कोई भी मामला नहीं रहा' सो बहुत ही आनन्द- की बात है। परन्तु यमराजके घरका एक मुकद्दमा सवपर लगा हुआ है, उसे सारिज करवाना चाहिये, नहीं तो वही कठिनाई है। उस मुकद्दमेके लिये आपने जितनी चेष्टा की, उतनी ही यदि इस मुकद्दमेके लिये भी करें तो बहुत लाभ हो सकता है। आप लिखते हैं कि हमपर अब कोई भी मुकद्दमा नहीं रहा, इससे मालूम होता है कि इस मुकदमेको तो कोई मानता ही नहीं, वास्तवमें यही तो मृत्युरूपी भयानक वारण्टका मुकद्दमा है कि जिसको कोई भी नहीं टाल सकता । केवल वह टाल सकता है जिसने भगवान्की शरण ग्रहण कर ली है। अतएव सबको भगवान्की शरण लेनी चाहिये । भगवान्के जो भक्त है वे तो ।

परमार्थ-पत्रावली सच्चे वकील हैं और वेद-शास्त्रादि ग्रन्थ कानूनकी पुस्तकें हैं; अतएव ऐसे वकीलोंसे मिलना चाहिये और कानूनकी पुस्तकोंको देखनेके लिये भी समय निकालना चाहिये । इस प्रकार चेतावनी मिलनेपर भी यदि आपको चेत नहीं होगा तो फिर कव होगा? इस तरहका अवसर हर समय मिलना वहुत कठिन है । आपने लिखा कि 'बीमारीके कारण मेरा शरीर ढीला रहता है तो आपको इलाज करवाना चाहिये । वीमारी बहुत ही बुरी चीज़ है, अतएव इलाजकी चेष्टा अवश्य करनी चाहिये । साथ-साथ उस वीमारीको दूर करनेके लिये भी यत्न करना चाहिये कि जिससे अबतक जन्म-मरण होता चला आता है और अविष्यमें भी होना सम्भव है। उपाय किये विना उस वीमारीका मिटना कठिन है। शरीरकी चीमारी तो पापोंका भोग समाप्त होनेपर आप-से-आप भी मिट सकती है परन्तु भवसागर- में जन्म-मृत्युके रूपमें अटकानेवाली बीमारी आप-से-आप नहीं मिटती, उसका इलाज करवानेकी बड़ी आवश्यकता है। निष्काम- भावसे निरन्तर श्रीपरमात्माका भजन-ध्यान करना, भवरोग- की उत्तम औषध है । भगवान्के भक्त निपुण वैद्य हैं, वेदशास्त्र और भक्तिसम्बन्धी ग्रन्थ ही वैद्यकशास्त्र हैं, उत्तम कर्म तथा उत्तम आचरण सुपथ्य है और पापाचरण ही कुपथ्य है । इस प्रकार समझकर इस बीमारीके नाश करनेके लिये चेष्टा करनी चाहिये । इसके लिये जो चेष्टा की जाती है सो कभी व्यर्थ नहीं २६ ] परमार्थ-पत्रावली जाती । भगवन्नाम-जप और ध्यानरूपी औपध कभी निष्फल नहीं होती । शारीरिक रोगोंकी दवा व्यर्थ भी हो सकती है और उनका मूल्य भी देना पड़ता है। वैद्य भी प्राय लोभी मिलते हैं गौर चेष्टा भी यों ही चली जाती है परन्तु भगवान् श्रीसञ्चिदा- नन्दके भजन-ध्यानकी चेष्टा कभी व्यर्थ नहीं जा सकती। खेद है कि लोग इस वातपर विश्वास नहीं करते ! माईजी! यह बड़े आश्चर्यकी वात हे कि तप्त कुण्डमें पड़े हुए मनुप्यकी तरह लोग निरन्तर चिन्तारूपी अग्निमें जल रहे है परन्तु इस दुसको दूर करनेकीचेष्टा नहीं करते, इससे बढकर मूर्खता और क्या हो सकती है? आपने 'दूकानका काम जल्दी सलटानेकी चेष्टा लिखी' सो ठीक है । यह ससारके झझट बहुत बुरे है इसलिये इनका निप- टाना ही ठीक है, कोई काम भी पीछे रखकर नहीं जाना चाहिये । संसारके किसी काममें चित्त लटकता रह जानेसे फिरले जन्म लेना पड़ता है, यों समझकर काम जल्दी ही निपटा लेना चाहिये कि जिससे फिर सदाके लिये बानन्द हो जाय । भाईजी! जैसे रेलके स्टेशनपर टिकट लेकर मनुष्य गाड़ीमे बैठनेके लिये तैयार रहता है, उसी प्रकार सव काम निपटाकर तैयार रहना चाहिये, फिर कोई चिन्ताकी बात नहीं! [२७

M
[७]
आपने व्यवहारके सम्बन्धमें जो कुछ पूछा उसका उत्तर
निम्नलिखित है-
(१) भगवान्के भजन और सत्सङ्ग में पिता, पुत्र, स्त्री:
कुटुम्ब, शरीर और धनादिका बन्धन समझना भूल है।
बन्धन तो अपने मनकी दुर्बलता है । मन ही बन्धनका हेतु है।
यदि वैराग्य हो तो घरमें रहनेस भी कोई हानि नहीं और
वैराग्य न होनेपर घर छोड़ देनसे भी कोई लाभ नहीं। यदि
भजन और ध्यानका साधन तेज होता रहे और रहना घरहीमें
हो तो क्या आपत्ति है ? वैराग्ययुक्त भजन-ध्यानका साधन न
हो तो जगह-जगह भटकनेमें भी कोई लाभ नहीं!
सत्सङ्गमें श्रद्धा हो तो थोड़े-से संगसे ही भगवत्प्राप्ति हो
सकती है । सत्सङ्गकी उत्कण्ठा होनेपर यदि किसी न्याययुक्त
कारणले सत्सझमें उपस्थिति न भी हो तो उसे घर बैठे ही उत्तम
उपदेश और साधु-संगकी प्राप्ति हो सकती है।
भगवत्-प्राप्तिके लिये यदि सत्सङ्गकी विशेष उत्कण्ठा हो
जाय तो सम्भव है कि स्वयं भगवान् साधुके वेपमें उसके समीप
आ जाय, अतएव भजन-ध्यान और सत्सङ्गकी विशेष उत्कण्ठा
रखनी चाहिये । भजन-ध्यान और सत्सङ्गके प्रतापसे मल,
चिक्षेप और आवरणके क्षीण होनेपर, साधकका भगवान्में प्रेम
२८ ]

परमार्थ-पत्रावली होता हे और उसके बाद संसारसे चैराग्य उत्पन्न होता है। ऐसी अवस्था हो जानेपर उसे संसारका कोई भी काम भारी नहीं प्रतीत होता और न किसी कार्यके करनेमें उसे झझट ही मालूम होता है, उसके द्वारा निष्कामभावसे सारे काम खेलकी, तरह हुआ करते है। ऐसा पुरुष वनमें रहे या घरमें, उसके लिये दोनों ही समान है। (0) आपको क्या करना चाहिये इस सम्बन्धमे मेरी म्मति यह है। क-चार या छ' घटे निष्काम कर्मयोगके अनुसार परमात्माको स्मरण रग्बते हुए दुकान-सम्बन्धी काम करनेका अभ्यास करना चाहिये । यदि सहसा इस प्रकार न हो सके तो कम-से- कम आपकी दुकानके कामसे जनताका अधिक हित होता रहे, तव भी कोई आपत्तिकी बात नहीं अपना लक्ष्य कर्तव्य- की ओर रहना चाहिये, लोभकी ओर नहीं। इस प्रकारके व्यवहारका परिणामअच्छाही होनेकी आशा की जासकती है। ख-छ घटे सत्सङ्ग या शास्त्रोके द्वारा प्राप्त किये हुए उपदेशोंके अनुसार, एकान्त स्थानमें निप्कामभावसे जपसहित व्यानका निरन्तर साधन करना चाहिये। ग-अनुमान छ घरे ध्यानस्थ होकर सोना चाहिये। घ-अवशेष समयमें आप इच्छानुसार कार्य कर सकते है परन्तु प्रत्येक चेष्टा नामके जप और स्वरूपके ध्यानसहित [२९

है
परमार्थ-पत्रावली
होनी चाहिये ! जप और ध्यान दोनों न हो तो परमात्माके
नामका स्मरण तो मन, श्वास या वाणीसे अवश्य ही करते
रहना चाहिये।
(३) 'काम न करनेमें लोक-लजाकी बात लिखी', सो
वह भी एक प्रकारसे ठीक है परन्तु विशेष हानि तो कर्तव्यक
त्यागसे होती है। श्रीभगवान्ने श्रीगीता अध्याय के ४७ व?
लोकमें यही भाव दिखलाया है कि कर्मका त्याग भी नहीं करना
चाहिये । कारण. कर्तव्यका त्याग बड़ा ही लोक-हानिकर है।
.(४) आपने लिखा कि 'निर्वाह की चिन्ताके लिये काम
करनेका कोई हेतु नहीं है' सो बहुत ही उत्तम वात है, परन्तु
खार्थरहित कर्म करते समय यदि मन धोखा न देता हो
तो भजन छूटनेका क्या हेतु है ? यदि अभ्यासकी त्रुटिले ऐसा
होता हो तो अभ्यास करके उस त्रुटिको मिटा देना चाहिये।
(५) शोक-सम्बन्धी वातचीतने और पत्रोंक आने-जानेसे
हृदयमें उद्वेगका होना अन्तःकरणकी निर्वलता या आत्मवलकी
कमीका परिणाम है । वर्तावमें शोकका कुछ व्यवहार तो अवश्य
ही होना चाहिये, परन्तु अन्तःकरणमें उद्वेग होना उचित नहीं।
* कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन ।
मा वर्मफलहेतुर्भूर्मा ते समोऽस्त्वकर्मणि ॥
'तेरा कर्म करनेमात्रमें ही अधिकार होवे, फलमें कभी नहीं
और तू कोक फलकी वासनावाला भी मत हो तथा तेरी कर्म न करने में
भी प्रीति न होवे ।
३०]

परमार्थ-पत्रावली
(६) भगवत्के स्वरूपमें स्थित रहते हुए जो कुछ भी हो,
सको भगवान्की लीलामात्र समझकर निर्विकार और
स्थितघी रहनेका अभ्यास करना चाहिये । समयको अमूल्य
समझना चाहिये, समयकी अमूरयताका रहस्य समझने
बाद और कुछ भी समझना बाकी नहीं रह जाता।
(७) शरीरसे पृथक रहकर ओर शरीरके काँका साक्षी
बनकर जो कर्म करता है, उसके हृदयमें विकार नहीं हो सकता।
यदि विकार हो तो उसकी स्थिति शरीरमें समझनी चाहिये । इस
विषयमें श्रीगीताजी अध्याय २४ के १९ वे टलोकमें जो कुछ
कहा गया है उसका रहस्य श्री से पूछना चाहिये।
श्रीनारायणके म्वरूपका ध्यान आपको 'जैसा प्रिय हो' वैमा ही
नाम-जपके साथ करते हुए आनन्दमें मग्न रहना चाहिये । आनन्द
न हो तो विना हुए ही आनन्द्रकी भावना करनी चाहिये । एक
दिन सञ्चा आनन्द भी प्राप्त हो सकता है।
" नान्य गुणेन्य पार यदा द्रष्टानुपश्यति ।
गुणेन्यच पर वेत्ति मद्राव सोऽधिगच्छति ॥
'जिस कालमें द्रष्टा, अर्थात् समष्टिचेतनमें एकीमारसे स्थित हुआ
सापी पुरुष तीनो गुणकि मिया अन्य क्मिीको कर्त्ता नहीं देसता है अर्थात्
गुण ही गुणोंमें वर्तते हैं, ऐसा देखता है और तीनों गुणों से अति परे
सचिदानन्दवनम्वरूप मुझ परमात्माको तत्वसे जानता है, उस काल में
मेरे स्वरूपको प्राप्त होता है।
[३१
वह पुरुष

परमार्थ-पत्रावली
(८) सारे संसारको एक आनन्दघनमें कल्पित समझकर
सवको आनन्दसे परिपूर्ण समझना चाहिये । जिस प्रकार जलमें
स्थित वर्फका पिण्ड केवल जलसे पूर्ण है, उसी प्रकार सबको
आनन्दघन परमात्मामें और परमात्मासे परिपूर्ण समझना
चाहिये।
(९) किसी प्रकारस भी ऐसा मान होना चाहिये कि
शरीर मिथ्या और नाशवान है एवं अपने साथ इसका कुछ भी
सम्बन्ध नहीं है। जो कुछ भी हो, अन्तःकरणमें किञ्चित् भी विकार
नहीं होना चाहिये। सब समय वेपरवाह रहना चाहिये । प्रत्येक
समय श्रीगीता अध्याय २ के ७१ वे श्लोकके अनुसार भाव
रखना चाहिये । किसी समय चाहे कैसा भी शोक हो, श्रीगीता
अध्याय २ के ११३ श्लोकका अर्थ समझना चाहिये। इसके
समझमें आ जानेपर शोक और चिन्ताका रहना सम्भव नहीं।
PAR-.------
MAHARANVR
* विहाय कामान्यः सर्वान्पुमांश्चरति निम्त्यूहः ।
निर्ममो निरहंकारः स शान्तिमधिगच्छति ।।
जो पुरुप सम्पूर्ण कामनाओको त्यागकर, ममतारहित और
अहङ्काररहित, स्पृहारहित हुआ बर्तता है, वह शान्तिको प्रान होता है ।
+अगोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे
गतासूनगता श्च नानुशोचन्ति
नानुशोचन्ति पण्डिताः ।।
तू न शोक करनेयोग्यो के लिये शोक करता है और पण्डितोंकेसे
वचनोको कहता है, परन्तु पण्डितजन जिनके प्राण चले गये हैं उनके
लिये और जिनके प्राण नहीं गये हैं उनके लिये भी नहीं शोक करते हैं।
३२]

[८]
उत्तम आचरणों के लिये आपको विशेष चेष्टा करनी
चाहिये । सत्सङ्गसे ही उत्तम आचरणोंका होना सम्भव है।
अनण्व भजन व्यान और सत्सङ्गके लिये विशेष प्रयत्न करना
चाहिये । संसारके तुच्छ भोगोंकी ओर भूलकर भी मन न
लगाना चाहिये । संसारके भोगोंमे जो समय जाता है सो व्यर्थ
जाता है। इस यातको समझकर उस सच्चे प्रेमी परमात्माके
भजन व्यानकी ही शरण लेनी चाहिये । समय यहुत थोड़ा है,
बहन विचार विचारकर इसे चिताना चाहिये । एक पलके
साधनकी भी त्रुटि रह जायगी नो पुनः जन्म लेना पड़ेगा।
अनान ऐसी ही चेष्टा करनी चाहिये कि जिससे शीघ्र ही
मगरको प्राप्ति हो जाय ।
[३३
प० प०३-

[९] [ इस पत्रमें भी प्रश्नकतोक प्रश्न लिखकर उनका उत्तर दिया गया है-सम्पादक] प्र०-निरन्तर स्वरूपकी स्थिति रहनेपर शरीर और अन्तःकरणसे दूसरा काम हो सकता दूसरा काम हो सकता है या नहीं? यदि हो सकता है तो उस कालमें उतने कालके लिये क्या स्वरूपकी विस्मृति होती है ? यदि स्वरूपकी विस्मृति नहीं होती और दूसरा काम भी भलीभाँति होता है तो वह किस प्रकार होता है ? उ०-निरन्तर भगवत्-स्वरूपमें (व्यष्टि-चेतनका समष्टि- चेतनमें एकीभावसे) स्थित रहते हुए भी अन्तःकरण और इन्द्रियों- द्वारा कर्तव्य कार्य होनेमें कोई वाधा नहीं पड़ती। उस कालमें भगवत्-स्वरूपमें स्थित पुरुषकी स्थितिमें किञ्चित् भी अन्तर आनेका कोई हेतु नहीं है, क्योंकि परमात्माको प्राप्त हुए पुरुषका वास्तव में अन्तःकरणसे कोई सम्बन्ध नहीं रहता। केवल लोक- दृष्टि में उसके अन्तःकरण और इन्द्रियोंद्वारा सब कार्य होते हुए ३४]

परमार्थ पत्रावली
प्रतीत होते है सो सर समष्टि-चेतनकी सत्तासे पिना कर्तृत्वा-
भिमानके पूर्व अभ्यासानुसार हुआ करते है । भगवान ने गीताम
कहा है-
चम्य सर्व ममारम्भा काममाल्पवर्जिता ।
ज्ञानाग्निदग्पकर्माण तमाह पण्डित बुवा ॥ (४११९)
जिसके सम्पूर्ण कार्य कामना और सकल्पमे रहित
है, ऐसे उस ज्ञानम्प अग्निद्वारा भस्म हुए कमोवाले
पुरुषको शानी जन भी पण्डित कहते है ।
मनकर्माणि मनमा सन्यन्याम्ते सुख रशी ।
नहारे पुरे देही नेत्र कुर्वन्न कारयन् ।। (५। १३ )
वशमें हे अन्त करण जिसके ऐसा सारययोगका
आवरण करनेवाला पुरुष तो निसन्देह
न करता
और न करवाता हुआ नरद्वारोंगाले शरीरम्प
घरमें मर कमाको मनसे त्यागकर, अर्थात् इन्द्रियाँ इन्द्रियोंके
अर्थोमं वर्तती है ऐसे मानता हुना, मानन्दपूर्वक मचिदानन्दधन
परमात्मा स्वरूपमें स्थित रहता ह ।
प्र०-परमात्माशी प्राप्तिरे राद उस पुरुपको काम-क्रोधादि
हाते है या नहीं ? यदि नहीं होते तो महर्षि लोमशने
काकभुशुण्डिको शाप क्योंकर दिया और भगवान् शार काममे
पीडित होकर मोहिनी के पीछे कसे दौरे ? इस प्रकारके और भी
उदाहरण मिलने हैं। इनका क्या उत्तर है ? लोगोंका कहना है
[३५
..

परमार्थ-पत्रावली कि काम-क्रोधके रहनेमात्रले ही स्वरूपकी स्थितिम कोई बाधा नहीं पड़ सकती। उ०-परमात्माकी प्राप्तिके पश्चात् अहंकाररहित शुद्ध अन्तःकरणमें काम-क्रोधादि दुर्गुणोंके उत्पन्न होनेका कोई हेतु नहीं रह जाता । महर्षि लोमशको यदि वास्तवमें क्रोध न हुआ हो और केवल शास्त्रानुसार किसीकी भलाईके लिये वैसा बर्ताव या भाव किया गया हो; तब तो कोई आपत्ति नहीं है, परन्तु यथार्थमे उन्हें क्रोध हुआ हो ऐसा माना जाय तो समझना चाहिये कि तबतक उनको परमात्माकी प्राप्ति नहीं हुई।इस विषय- को लेकर ही श्रीभुशुण्डिजीने कहा है 'क्रोध कि द्वैत बुद्धि बिनु' श्रीशंकर भगवान्के सम्बन्धमें कुछ कहा नहीं जा सकता। भगवान् विष्णु और शिव साक्षात् ईश्वर हैं । उनके कमौका मर्म समझना मनुप्यकी बुद्धिके बाहर है। ईश्वरकी लीलाको समझने- की शक्ति मनुष्यमें नहीं है। लोगोंका जो कथन है कि काम- क्रोधादिके रहनेमात्रसे ही स्वरूपको स्थितिमें कोई बाधा नहीं आ सकती, लो ऐसा कहना नहीं बन सकता । इसमें किसी प्राचीन महर्षिके वचनोंका प्रमाण होना चाहिये, इसके विरुद्ध तो बहुत-से प्रमाण हैं । गीता अध्याय ३ श्लोक ३६ से ४३ तक और अध्याय १६ के श्लोक २१, २२ को देखना चाहिये । इसके सिवा और भी अनेक प्रमाण हैं। प्र०-परमात्माकी प्राप्ति तो है ही, किसी भी कालमें ३६] परमार्थ-पत्रावली आत्माको आत्मस्थिति नहीं हटती । केवल भ्रम था सो नष्ट हो गया, स्वप्न भङ्ग हो गया। इसके बाद जो कुछ था सो ही रह गया । अतएव प्राप्ति पहले नहीं थी, पीछे किसी साधनसे हुई, यह बात कैसे कही जा सकती है ? उ०-आत्माकी अपने स्वरूपमें सदा एक सी स्थिति बनी हुई है इसलिये परमात्माको प्राप्त हुए पुरुपके यह भाव भी नहीं रहता कि मुझे पहले अज्ञान था और पीछे अमुक साधनसे अमुक कालमें ज्ञान हुआ हे तथापि जो अधानी जीव है उनको अपना अमान नष्ट करनेके लिये साधनको अवश्य ही पूरी आवश्यकता है । जिन पुरुषोंकी अज्ञाननिद्रा नष्ट हो गयी हे या संसारका स्वमनाशके सदृश अभाव हो गया है उनके अन्तरमें काम-क्रोधादि दुर्गुण कैसे रह सकते है ? जिस पुस्पकी नींद टूट जाती है उसका स्वप्नसे कोई सम्बन्ध रहता है ? क्या स्वप्नका अभाव होनेपर स्वामके काम-क्रोधादिका अभाव नहीं होता? -प्रारब्धके अनुसार फलोंका भोग करना ही पड़ना हे, भोगे विना प्रारम्वका नाश नहीं होता, जीवन्मुक्तोंको भी प्रारब्धके भोग भोगन पडते हे। यदि मनुप्य बुरा कर्म न करे तो वह बुरा पल कैसे भोगे? अतएव कामना या इच्छा न होनेपर भी प्रारब्धकी प्रबलतासे पराधीनकी भॉति प्रारब्ध कर्म-भोगके लिये मनुष्यको बुरे कर्म करने पड़ते है। इससे शानमे या वरूपकी स्थितिमें क्या बाधा पड़ती हे? [३७ .

- Dow- परमार्थ-पत्रावली ३०-वास्तवमें जीवन्मुक्त पुरुपके लिये तो कोई भी कर्म शेप नहीं रहता । जव उसकी दृष्टि में एक परमात्माक अतिरिक्त अन्य किसीका भी अस्तित्व नहीं रहता तय किसी भी कर्मका भोग उसे कैस भोगना पड़ता है ? परन्तु शास्त्रदृष्टि और लोकदृष्टिके अनुसार उसके अन्तःकरण और इन्द्रियाद्वारा प्रारब्धके भोग भोगे जाते हैं, यह ठीक है। इसलिये मानना चाहिये कि ऐसा प्रारब्ध नहीं बन सकता जो पाप-कर्म किये विना न भोगा जा सके। यदि पाप-काँमें प्रारब्धको हेतु माना जाय तो इसमें तीन आपत्तियाँ आती है- १-विधि-निषेधको कथन करनेवाले शास्त्र व्यर्थ होते हैं। २-ईश्वरकी न्यायशीलतामें दोप आता है। यदि विधाता- ने स्वयं उसके प्रारब्धमें पाप-कर्मका विधान नियत कर दिया तब उसे उस पापका दण्ड क्यों मिलना चाहिये ! इसके सिवा यह युक्तियुक्त भी नहीं है कि एक अपराधके फलमें पुनः दूसरा अपराध करनेका ही विधान किया जाय, पाप या अपराधका फल दुःख-भोग होना चाहिये न कि पुनः पाप-कर्म । ३-जिसले चोरी-जारी आदि नीच कर्म बनते हैं वह काम- क्रोधादि दुर्गुणोंसे युक्त है, उसको ज्ञानी कैसे माना जा सकता है; उसको तो नीच ही मानना चाहिये । जव मल, विक्षेप और आवरणरूप तीनों दोषोंके नाश हो जानेपर अन्तःकरणके शुद्ध होनेके पश्चात् ज्ञानकी प्राप्ति होती है तब उस शुद्ध अन्तःकरणमें ३८ ।

परमार्थ-पत्रावली काम-क्रोबाटि मल कैसे उत्पन्न हो सकते हे ? अतण्य यह मानना कि परमात्माकी प्राप्ति होनेके उपरान्त भी प्रारब्ध-कर्म शेष रहने के कारण काम-क्रोधादि नीच आचरण शेष रह जाते हे, सर्वया भ्रममूलक हे | काम-क्रोधकी उत्पत्तिका कारण आसक्ति हे। (गीता अध्याय २ श्लोक ६२, ६३ + देखना चाहिये) और आसक्तिका सर्वथा अभाव होनेपर परमात्माकी प्राप्ति होती हे (गीता अध्याय २ श्लोक ५९ ॥ देखना चाहिये)। जय कारण- का अभाव हो गया तो कार्य किससे उत्पन्न होगा? व्यायतो विषयान्पुस समात्सजायते काम कोराइवति समोह स्मृतिभ्रशानुद्धिनागो + पिया विनिवतन्ते ग्सपर्ने रसोऽयस्य सद्भस्तेषपजायते । सामानोवोऽभिजायते ॥ ममोहात्स्मृतिविभ्रम । बुद्धिनाशात्मणश्यति ॥ निराहारस्य देहिन । पर दृष्ट्वा निवर्तते ॥ [३९

[१०]
'मनके पाजीपनके सम्बन्धमें लिखा' सो ठीक है। कोई
चिन्ता नहीं, प्रेम और हर्षपूर्वक निरन्तर परमात्माके नामका
स्मरण होता रहे इस बातकी चेष्टा बड़े जोरके साथ करनी
चाहिये । ध्यानके समय आलस्य आवे तो आँखें खोललेनी चाहिये।
फिर भी आलस्य दूर न हो तो लद्ग्रन्थ देखना चाहिये । इतनपर
भी आलस्य रहे तो खड़े होकर टहलते हुए नाम-जप करना
चाहिये, यदि किसी तरह भी आलस्य न जाय तो कुछ समय सो
जाना उचित है, आलस्यके अधिक होनेमें भगवान्में प्रेमके अभाव
और पापोंकी अधिकता ही कारण है। भगवन्नाम-जप और
सत्सङ्गके तीव्र अभ्यास विना कलियुगमें पापोंका नाश होना
४०]

.
परमार्थ-पत्रावली
कठिन है। भजन अधिक होनेपर यह प्रतीत होने लगेगा कि
समस्त संसार कालके द्वारा प्रत्यक्ष नष्ट हो रहा है। सत्सहसे
भजन अधिक होता है। भजनकी अधिकतासे भगवान्में प्रेम और
संसारमें वैराग्य होता है, वैराग्यका प्रादुर्भाव हो जानेपर बिना
ही चेष्टाके परमात्माका व्यान रहने लगता है, नव ध्यानके लिये
विशेष साधन करनेकी आवश्यकता नहीं रह जाती।
लिखी हुई यात धारण नहीं होती, इसीसे मुझमें श्रद्धा कम
समझी जाती है, ऐसा लिसा सो भाई ! मैं तो साधारण मनुष्य
है, श्रद्धा करने के योग्य तो भगवान् हे अतपत्र उनमें और उनके
वचनामें श्रद्धाकी त्रुटि न रहनी चाहिये ।
अभिमान और तृष्णाकी अधिकताके नाश होनेका उपाय
पूछा सो भगवान्के नामका जप और मत्पुरुषोंका सग ही
सुगम और उत्तम उपाय हे । एक भगवान्के नामसे ही समस्त
दोप नष्ट हो जाते हैं, दोपोंको ठहरनेके लिये स्थान नहीं मिलता।
भगवन्नामके परायण होनेपर अन्य किसी उपायकी आवश्यकता
नही रह जाती भिजन सत्सद्ग के अधिक सभ्याससे भगवान का
मर्म जाना जाता हे, मर्मके शानमे जब भगवानम पूर्ण प्रेम हो
जाता है तव शरीग्में प्रेमका रहना सम्भव नहीं, जब शरीरम
ही प्रेम न हो तर मान बड़ाईकी तो पात ही क्या हैं?
तुमने लिया कि भगवासी पूर्ण कृपा होनेपर भी हरामी-
पन नहीं मिटता सो ठीक है परन्तु भगवानकी पूर्ण कृपाका प्रभान
[४१

घरमार्थ-पत्रावली अभीतक विदित नहीं हुआ है । भगवानको कृपाका निरन्तर अनुभव होते रहनेपर और अपनको उनका कृपापात्र मान लेनेपर तो चिन्ता-फिकरका रहना सम्भव ही नहीं है। इसके बाद भी यदि चिन्ता रह जाय तो वह प्रभुको लजित करनेवाली है। वास्तवमें अभीतक भगवत्कृपाकी पूर्णता मानी नहीं गयी है। विना माने फल होता नहीं। भजनका अधिक अभ्यास हुए बिना लांसारिक कार्याले और लौकिक बातचीतसे प्रीतिका हट जाना कठिन है । वास्तव में उस कृपालुकी कृपा तो निरन्तर ही सव- पर पूर्ण है । मनुप्य कृपा करनेवाला कौन है ? यदि भगवन्नामका जप निरन्तर प्रेमलहित नहीं होता हो तो विना प्रेम ही करना चाहिये । जपके प्रभावले प्रेम स्वतः ही हो सकता है । तुमने लिखा कि बहुत से लोगोंका लाधन अच्छा दीखता है सो ठीक है। लोगोंके भजन-ध्यानके साधनकी तीव्रताका देखना भी बड़ा लाभदायक है। उनकी देखादेखी साधनको प्रवल करनेके लिये उत्तेजना मिलती है। उत्तेजनासे साधनकी तेजोमें लाभ होता है, इससे भजन बढ़ता है, भजनकी अधिकतासे अन्तःकरणको शुद्धि होती है और इसके बादधारणा होती है। भाई हरीराम! तुम्हें अपने इस नामको कभी भुलाना नही चाहिये, कभी निराश न होना चाहिये और परमात्माकी निष्काम प्रेमाभक्तिमें मन्न रहना चाहिये । भगवान्से कुछ भी माँगना उचित नहीं, प्रेम केवल प्रेमके लिये ही करना चाहिये। ४२] परमार्थ-पत्रावली भगवान ही एक प्रेमकी मूर्ति है । प्रेमके प्रकन मर्मको वे ही जानते है । ससारमें एक प्रेमके समान और कुछ भी नहीं है । उस प्रेमके मर्मको जाननेके लिये ही परमात्मासे मेत्री करनी चाहिये। मित्रभाव सच्चा होना चाहिये । अपने प्रियतम मित्रके लिये प्राणाको भी तुच्छ समझना चाहिये । ऐसे प्रेमी ही भगवान्को प्यारे लगा करते हैं। भगवान् प्रेमके अधीन है। प्रेमी अपनी प्रेम- रन्जुले भगवान्को वॉयसकता है। भगवान् अपने प्रेमीका साध कभी नहीं छोडते । सच्चा प्रेमी उसीको मानना चाहिये जो प्रेमके लिये अपना आत्म-समर्पण कर सकता हो, जो अपने तन, मन, धन सर्वस्वको अपने प्रेमास्पदकी सम्पत्ति समझता हो। जो वन्तु अपने प्रेमीके काम आ गयी, वही सार्थक हे, यो समझने- वाला ही यथार्थ प्रेमी है । ऐसा प्रेमी ही सर्वथा पूजनीय है। VLal [४३ -- + [१२] साधनको प्रवल बनानेके लिये विशेष चेष्टा करनी चाहिये, साहल नहीं छोड़ना चाहिये । तुम्हारा जितना सुधार हो चुका है सो तो तुम्हें परम लाभ हुआ है, अव आगेके लिये कुछ करना तुम्हारे साधनके अधीन है ! पूर्वकालमें हजारों वर्षांतक लगातार चेष्टा करनेपर भगवान्के दर्शन हुआ करते थे परन्तु अव तो बहुत ही शीघ्र हो सकते हैं। हाँ, अबतक तुम्हारा जिस प्रकार- का साधन है, उसमें तो शायद बहुत समय लगे । अतएव अब तुम्हें बहुत जोरके साथ साधनमें लगना चाहिये, श्रीनारायण- देवका साक्षात्कार किये विना यहाँसे जाना पड़ा, तो बड़ी हानि है। मनुष्यदेह वहुत ही उत्तम कर्मोंसे मिलता है यह केवल भगवत्-प्राप्तिके साधनके लिये है । मूर्ख लोग ही इसे पतङ्गकी ४६]

,
परमार्थ-पत्रावली
भॉति सासारिक भागोंकी दुपदायी अग्निमें जलाकर भस्म कर
देते है । तुम्हें ऐसा नहीं करना चाहिये । ससारके भोगीको
अग्निके सदृश समझकर उनसे बचना चाहिये । तुम्हारे अदर
संसारकी आसक्तिका दोष विशेष समझा जाता है, इसीलि
तुम्हें यह चेतावनी दी जाती है । तुम्हे अपनी सारी शक्ति इस
साधनमें लगा देनी चाहिये, नहीं तो परमात्माका मिलन कैसे
होगा ? तुम्हारे अदर शक्ति रहुत है, तुम्हें उसे काममे लाना
चाहिये और कटिबद्ध होकर साधन करनाचाहिये। यदि इतनेपर
भी तुम्हें भगवान के दर्शन न हो तो फिर तुम्हारी कोई भूल नहीं ।
कुछ समझ नहीं आता कि तुम इस तुच्छ ससारके नाशवान्
क्षणभद्गुर ओर अनित्य भागोंके लोभमें फंसकर अपने
अमूल्य
समयको किस लिये धूलमें मिला रहे हो ? तुम्हें अपने मनसे
पूछना चाहिये कि वह उद्धारके लिये विशेष चेष्टा क्या नहीं
करता । इतना हरामीपन कहाँसे आ गया
?
[७

[१३] संसारमें श्रीनारायणकी भक्तिको बड़े जोरसे बढ़ाना चाहिये । समय बीता जा रहा है। भक्तिका प्रवाह प्रवल हुए विता कैसे काम चलेगा? आप लोगोंका, इस संसारमें किस हेतुसे आना हुआ है, इस वातका ख्याल रखना चाहिये । उद्देश्य लबसे ऊँचा रखना चाहिये। उत्तम मनुप्यका परम कर्तव्य संसार- के लोगोंको अगवद्भक्ति में लगाना और धर्मकी स्थापना करना ही है । जो प्रत्यक्ष नारायणको अप्राप्त मानते हैं उनको विश्वास कराने के लिये और उनका नारायणमें प्रेम होनेके लिये नामके जपका प्रचार करनेकी विशेप चेष्टा करनी चाहिये । जो इस वात- को जानते हैं कि भगवान ही सर्वत्र व्याप्त हैं और भगवान् ही सबके आत्मा हैं. वे ही महात्मा हैं; उनके लिये भगवान् सब जगह प्रत्यक्ष हैं । उनको कुछ भी करना वाकी नहीं रहता। उन जो कुछ किया जाता है, सो केवल लोक-हितके लिये ही किया जाता है । जिनका ऐसा भाव नहीं हुआ है उनके लिये भी इस भावसे साधन करना उत्तम है। उत्तम पुरुषोंके कर्मोंका अनुकरण भी उत्तम होता है। Month लोगाके द्वारा १८]

[१४]
भगवान्की स्मृति सदा बनी रहने के लिये भजन, व्यान,
सत्सद्की तीव्र चेष्टा करनी चाहिये । आपने लिसा कि जपमें
रहत मूल होती है, यह भूल शीघ्र दृर होनी चाहिये । भूलको
मिटाने की इच्छाका होना ही बहुत उत्तम हे । भूल क्यों नहीं
मिटनी, इस यातपर आपको विचार करना चाहिये । भूल
मिटानेकी पूरी चेष्टा होनेपर भूल मिट सकती हे
समार, भोग और शरीरको सदा मृत्युके मुगम देखना चाहिये।
सर जगह भगवानको सत्रूपसे देखा जाय तो भूल क्म हो
सकती है । यह मिथ्या संसार बहुत समयके अभ्याससे सत्य
प्रतीत होता है। वास्तवमै संसार कोई भी वस्तु नहीं है । सर
जगह केवल एक सच्चिदानन्द ही परिपूर्ण है परन्तु विश्वास होना
चाहिये । सर जगह भगवान् प्राप्त हो रहे है परन्तु ऐसा मानना
चाहिये । यह मानना जप, ध्यान और सत्सङ्गकी अधिकतासे
सम्म । जिन्होंने संसारको हर समय दृढ कर रक्सा है,
उनम हर समय भगवानका चिन्तन किस प्रकारसे हो सकता
है ? यदि हर समय लालमा पनी रहे तो भगवानसा स्मरण भी
गावर होते रहना कोई बड़ी बात नहीं है । सासारिक काम
करते समय इस शरीरसहित समस्त संसारको मृत्यु मुखमै
नाशनान देगनेसे नामझी स्मृति अधिकरह सकती है। संसारके

परमार्थ-पत्रावली कामोंको मिथ्या जानकर प्रसन्न चित्तसे हँसते हुए और वान्को याद रखते हुए खेलकी तरह करना चाहिये या सच्चिदा- नन्द भगवान्के सर्वव्यापी स्वरूपमें स्थित होकर शरीरमे अलग द्रष्टा बने हुए सांसारिक कामोको करना चाहिये। श्रीगीताजी अध्याय १४ के शोक १९ के अनुसार साधन करना चाहिये। भगवान्में प्रेम बढ़नेका उपाय पूछा सो भगवान्का भाव जाननेपर जब तीव्र इच्छा होती है तब प्रेम बढ़ता है और तदनन्तर भगवान्की प्राप्ति होती है। धन कमानेकी जितनी चेष्टा होती है यदि उससे अधिक चेष्टा भगवान्के मिलनेके लिये की जाय तो भगवान् मिल सकते हैं। आपने लिखा कि बोलना अधिक पड़ता है तथा काम अधिक देखना पड़ता है, सो इसमें क्या हानि है ? भगवान्के स्वरूपमें स्थित होकर उनके नामको स्मृति रखते हुए, प्रसन्न मनसे चेत-चेतकर बोलना चाहिये, यदि ऐसा हो तो बड़े आनन्दकी बात है । अभ्यास करनेसे ऐसी स्थिति हो सकती है। भगवान्में ऐसा प्रेम हो जाना चाहिये कि जिससे उनके मिले बिना चित्तमें चैन ही न पड़े ! ऐसा होनेपर भूल नहीं हो सकती। यदि एकदम संसारसे प्रेम न हटे तो कोई बात नहीं हर समय भगवान्के नामकी याद और उनके स्वरूपका चिन्तन . होते रहना चाहिये । फिर आप-से-आप संसारसे हटकर भग- वानमें प्रेम हो सकता है। सभी जगह एक नारायण ही पूर्ण ५० ] परमार्थ-पत्रावली हो रहे हैं, नारायणके सिवाय ओर कुछ है ही नहीं । संसार सभी मिथ्या है, यो जानकर निरन्तर नारायणके चिन्तनको शरण लेनी चाहिये । मंसारके किसी भी पदार्थकी इच्छा कभी नहीं करनी चाहिये, हर समय भगवानके ध्यान आनन्द आनन्दमग्न रहना चाहिये । जो कुछ भी होता है सो भगवान्की आशाम होता है. यो समझकर जो कुछ हो उसीमें प्रसन्न रहना चाहिये । चित्त चिन्ता या किसी प्रकारकी इच्छा हो जानेसे तो शरणागतिम दोष आता है। सभी कुछ उन्हींका सदस्प हे, व भगवान चाहें सो करें। उससे विकार होनेका काई कारण नहीं । भगवान्के विधानमें अपना किसी प्रकार 'हक उज्र नहीं रहनसे, पैराग्य और सत्सद्गमें प्रेमकी अधिकता देवी जाती है। विश्वासपूर्वक भजन, ध्यान, सत्सङ्गकी चेष्टा करते रहना चाहिये । यो करते-करते भगवानका मर्म जाना जा सकता है। इसके बाद भजन ध्यान विना ही चेष्टाके होता रहता है अतपव पहले अभ्यासके द्वारा मर्म जाने । चेया अधिक होनेमें विश्वास ही उपाय है । मर्म नहीं समझनेतक यदि समारकी स्फुरणाएँ जबरदस्ती होती रद्द तो कोई बात नहीं । प्रसश मनसे सशिदानन्द परमात्मा चिन्तनसहित स्यासक द्वारा नाम जपकी चेष्टा करनी चाहिये । भगवानको कृपाके प्रभावका निश्चय अन्तःकरणको शुद्धि होनपर होता है, भली. [५१ परमार्थ-पत्रावली भौति विचार करनेपर भगवान्की कृपा, दया भादि गुणोंकी प्रतीति होती है। भजन, ध्यान और सत्सङ्गादि सभी कुछ भगवत्कृपासे होते हैं । अन्तस्करणको शुद्धि भजन, ध्यान, सत्सद्ग- से होती है। भगवान में हर समय प्रेम होना एवं संसार नीय वैराग्य होना नीव इच्छा आधारपर है। जहाँनक इस विषय- का पूरा आनन्द्र नहीं आता. बहानक तीव्र इच्छा हान के लिये चटा करनी चाहिये। श्रीभगवानके चरणकमलरूपी नौकाका आश्रय तथा भग- वानके नामजपरूपी रस्नका आधार हर समय बनाये रखनेका उपाय: तीव्र इच्छा ही है । समय बीता जा रहा है। शीघ्र ही यह शरीर मिट्टीमें मिलनेवाला है। जब दागर ही अपना नहीं तो रुपये एवं संसारक भोगोंकी नो बात ही क्या है ! अताव आपको एक पलकी भी देरी न करनी चाहिये । आपके पेला कौन-सा कार्य है जो श्रीभगवान्क मिलनेमें देरी करा रहा है ? श्रीभगवान्का विछोह आपसे सहा जाता है इसीलिये आपको लिखना पड़ता है कि आपने भगवान्का पूरा प्रभाव नहीं जाना । ये रुपये, स्त्री तथा संसारके भोग और संसारकी वस्तुएँ आपके किन काम आवेगी ? अबकी बार तो समझ-बूझकर आपको धोखा नहीं होना चाहिये । ऐसी कौन-सी बाधा है कि जिससे श्रीनारायणके प्रेममें त्रुटि रहती है ? आप जिसके लिये भजन-ध्यानमें विलम्ब कर रहे हैं सो कुछ भी काम नहीं आवेगा। ५२] परमार्थ-पत्रावली आप जो कुछ अपना मान रहे है सो कुछ भी आपका नहीं है। आपके तो एक नारायण है अतएव आपको उन्हींकी शरण लेनी चाहिये, और सब कुछ मिथ्या है । ज्यों आप अपनेमे दूसरी किसी भी वस्तुको नहीं देखते, उसी प्रकार भगवान्में उनके सिवा कुछ भी नहीं है । स्वप्नमें जो कुछ भासता है सो बाम्नवमें कुछ भी है नहीं। इसी प्रकार संसार जो भासता है सो कुछ भी नहीं है ! जहाँ आप है उस जगह और आपके अदर, दूसरा कुछ भी अंश अनुमान नहीं होता । इसके अर्थको यदि आप नहीं समझे तो किसी समय मिलनेपर पूछना चाहिये । यही भगवान्के अस्तित्वका (होनेपनका) भान लिखा गया है। शरीर में बहुत-से विकार है । अन्तःकरणमें भी विकार है । परन्तु जहाँ आप है उस जगह कुछ भी विकार नहीं । जहाँ आप है उस जगह दूसरी वस्तुको स्थान ही नहीं। इस प्रकार भगवान्के आनन्दस्वरूपी घनता है । सच्चिदानन्दघनके मिनाय और कुछ भी नहीं, ऐसा मानना चाहिये । वास्तवम कोई है भी नहीं। इस प्रकार विश्वास करना चाहिये कि सर जगह भगवान् ही है। यदि ऐसा अनुभव हो जाय तो सर जगह भगवान् ही भामने लगे। कदाचित् इसके बाद ससारका भास हो तो भी कोई आपत्ति नहीं। यदि हर समय इस प्रकार ध्यान बना रहा तो भी भगवत्की प्राप्ति है।

[१५]
आपको वही काम करना चाहिये कि जिससे भगवानकी
प्राप्ति शीघ्र हो । पपीहेकी तरह मनमें धारणा करके दृढ़प्रतिज
होना चाहिये । प्राण भले ही चले जायँ परन्तु भगवत्प्राप्तिके
साधन-भजन-ध्यान-एक पलके लिये भी नहीं छूटने त्राहिये ।
भजन-ध्यान और सत्सङ्गमें त्रुटि क्यों की जाती है ? फिर
पछतानेसे कुछ भी न होगा । आपके पास ऐसी कौन-सी शक्ति
है कि जिससे आप मृत्युसे बच सकते हैं ? अतएव पपीहेकी
भाँति प्राणोंकी परवा न कर प्रणको निवाहना चाहिये।
५४]

परमार्थ पत्रावली पपिहा प्रण कबहुँ न तज, तजे तो तन वेकाज । नन छूट तो कछु नहीं, प्रण छूट तो लाज ॥ यो विचारकर आपको वह काम कभी नहीं भूलना चाहिये, जिस कामके लिये आपका संसारमे आना हुआ है । भगवान्के नाम-जप, ध्यान और सत्सङ्गका मनमें बडा जोर रखना चाहिये । सत्सङ्ग, भजन और ध्यान वैराग्यके विना नहीं हो सकते । ससारके भोगोंमें वैराग्य हुए बिना ईश्वरमे पूर्ण प्रेम नहीं हो सकता । संसारके सुख तथा रुपये किस काम आवेगे? सच कुछ यहीं रह जायगा । यदि भगवानके नामका जप न हुआ तो संसारके सुख किस कामके ? सुखके माथे सिल पडो, (जो) नाम हृदयसे जाय । वलिहारी वा दु खकी, (जो ) पल-पल राम रटाय ॥ शरीर ओर रुपये यहीं रह जायेंगे, आगे चलकर ये आपके किसी काम नहीं आयेंगे, अतएव जबतक इनपर आपका अधिकार है तबतक आप इनसे अपनी इच्छानुसार काम ले लं । ईश्वरकी प्राप्तिमें पुरुषार्थ ही प्रधान है, यो समझकर धन- को धूलिके समान जान उस असली आनन्दमें बड़े जोरसे लगना चाहिये कि जिससे शीघ्र ही भगवान् मिले। . [५५

[१६]
जब आपका शरीर छुट जायगा तर शरीर और रुपये
किस काम आवेंगे? सभी कुछ मिट्टीमें मिल जायगा। इसलिये
जबतक आपको अधिकार है कि आप जो चासो करें. तब दर
क्यों लगाते हैं ? समय बीता जाता है । सब वस्तुओंको निश्चय
ही छोड़ना पड़ेगा। पीछे पछतानस कुछ भी काम न होगा।
इस प्रकार जानकर मनुष्यको उस परमानन्दस्वरूपमें मस हो
जाना चाहिये । 'मैं और मेरा' के भावको तुरन्त छोड़ देना
चाहिये । नहीं तो बहुत ही हानि होती है-
मैं जाना मैं और था, मैं तो भया अब लोय ।
मैं ते दोऊ मिट गई, रही कहन की दोय ।।
ऐसा भास होनका उपाय हर समय करना चाहिये । दृलरे
काममें एक पल भी बिताना महा मूर्खता है । इसका कारण
अविश्वाल है। इसलिये नाम जपके साथ ऐसी मान्यता होनी
चाहिये कि जो कुछ है सब ॐ ही है । में कुछ भी नहीं है।
जच में ही नहीं तव 'मेरा कुछ हो ही नहीं सकता । एक
अर्थात् सच्चिदानन्दधन ही है । सर्वव्यापी. शान्तानन्द,
पूर्णानन्दसे भिन्न और कुछ भी नहीं है । नाम-जपके साथ-साथ
अर्थमं भी ध्यान रहना चाहिये । ध्यान ऐसा होना चाहिये कि
उसमें मन पूर्णरूपसे लीन हो जाय | आनन्दधनको ही अपना
स्वरूप समझकर, आनन्दघनमें ही अपने आपको समझकर,
५६]

परमार्थ-पत्रावली
सारे जगत्को अपने एक अंशमें कल्पित मान, आनन्दघनमें
स्थित होनेसे 'मे' स्वयं ही शान्त हो जाता है । दृश्यका अभाव
होनेपर 'मे' का अभाव स्वयमेव हो सकता है।
पपीहेकी वात पूछी सो पपीहेके प्राण भले ही चले जाये,
परन्तु सुना है कि वह वर्षाके जलके सिवा पृथ्वीपर पड़ा हुआ
जल नहीं पीता है।
चातक सुतहि पढापही, आननीर मत ल्य ।
मम कुल यहीं स्वभाव है, स्वाति बूंट चित देय ।।
इसी प्रकार भगवान्से प्रेम लगाना चाहिये । सुना है,
भगमनसे भी गर्भम यह प्रतिमा की हुई हे कि में आपका
स्मरण करूँगा। इसलिये उस प्रणको जिसके लिये आप (समारम)
आये थे, कभी न छोड़ना चाहिये । भगवान में प्रेम होनका उपाय
मो भगवान के नामका जप एस ध्यान करना ही सच्चा
उपाय हे । भगवान् के नामका जप और स्मरण अधिक होनेका
उपाय सत्सङ्ग है । सत्सग करने और भगवान के गुणानुवाद
पढ़नेसे, भगवान्में श्रद्धा होकरभगवान्का सरण अधिक रहने
मे, पापोंका नाश होकर पूर्ण प्रेम हो ही जाता है, ऐसा सुना
गया है। इसलिय मनको ससारके सर मागोकी तरफ
स्त्रींचकर, कंवल परमात्मा नामका जप और ध्यान अधिक हो,
सो उपाय करना चाहिय । अठे सुख आपके क्सि काम आयेंगे।
सुखके माथे सिल पड़ो, (जो) नाम हृदयसे जाय ।
बलिहारी वा द यकी, (जो) पल पल नाम रटाय ।।
पूछा

परमार-पवावली शारीरिक नुम्ब मांग नया गपय यहीं रह जायेंगे। अनित्य घन्तुक लिंय निन्य बस्तुका त्याग करनचालक बराबर क्रीन मर्म है ? संसारकी चीजे. रुपये और शरीरको, सश्चिदानन्द भगवानकी प्राप्ति जल्दी हो ऐन काममें लगाना चाहिये। हर समय भगवान्का नाम याद रखनक बिरयम पूछा सो भगवान में प्रेम होनस एवं संसारफे भोगाननीय चंगाग्य होनस ही रह सकता है। प्रेमसहिन भगवानक नामका जप होनेका उपाय पूछा नी में क्या कर सकता है। परन्तु कुछ लिमा । भगवानके गुणानुबाद एवं प्रभावको बानं पढ़ने स्तुनन और मनन करने तथा भगवानक स्वपमा चिन्तन करते दुप प्रसन चित्तन आनन्दमें मन्न होकर वारंवार म्मरण करना चाहिये । जैसा किनंजयने गीता १८ लोक में कहा है। जप और ध्यानमें भूल न हो, गला उपाय करना चाहिये । इस प्रकारशी इच्छाका होना ही बहुत उत्तम है। ऐसा पच्छा होनेगर विशेषविलम्ब नहीं होता। क्योंकि मची इच्छावाला मनुष्य प्रवन- पूर्वक तत्पर हो जाता है । जिसे निरन्तर मनन ध्यान करनेकी इच्छा होगी, उस भजन-ध्यानक सिवा और कुछ भी अच्छा नहीं लगेगा। ऐसा होनेपर स्फरणा भी कम हो जाती है। यदि nha sHHAHIANk- * तम संस्मृत्य संस्मृन्य रूपमत्यद्भुतं हरेः । विलयों मे महान् राजनच्यामि च पुनः पुनः ॥ हे गजन् ! श्रीहरिके उस अति अद्भुत रूपको भी पुनः पुनः सरण कर के मेरे चित्तमें महान् आश्चर्य होता है और मैं बारंबार हरित होता हूँ। ५८ ] परमार्थ पत्रावली जपके समय स्फुरणा हो, तो होती रहे, परन्तु निष्काम भावसे जप हर ममय होना चाहिये। अधिक जप होनेसे जब भगवान्मे प्रेमसहित अपने आप ध्यान होने लगता है तब स्फुरणा भी अपने आप नष्ट हो जाती है । यदि कुछ स्फुरणा होनो भी विशेष देरतक ठहर नहीं सकती। जयतक ससारमें प्रेम और उसकी सत्ताका नाश नहीं होता तभीनक म्फुरणा होती है, इसमें कुछ हानि नहीं है । भगवानमें अधिक प्रेम होनेका उपाय भगवान्का चिन्तन करना ही है। चाहे जैसे भी हो उसका चिन्तन होना चाहिये । यदि चिन्तन न हो सके तो भगवान के नाम का जप तो अवश्य ही होना चाहिये । जिसमें प्रेम होगा उसका ही चिन्तन अधिक होगा। क्रोधकी बात मालूम हुई । ससारमें सत्ता ओर प्रेमका अभाव होनेपर क्रोधका समूल नाश हो जाता है। परन्तु हर समय मृत्युको याद रपनेले, जो कुछ भी भासता है सो सव नृत्युके मुग्वमें समझनेसे, कालान्तरम अभाव समझनेसे, भग- वानकी लीलामात्र जाननेसे एवं परमेश्वरके स्मरणसे भी, क्रोध नहीं हो सकता। जो कुछ भी हो उसीमें आनन्द मानना चाहिये। जो कुछ होता है सो सर परमेश्वरकी आज्ञासे होता है। जो कुछ हे सो परमेश्वरका ही है। उसीकी लीलामात्र समझकर, आनन्द ही मानना चाहिये । उसम विरुद्ध इच्छा ही क्यों करनी चाहिये ? इच्छा ही क्रोधका मूल है। [५२ [१७] ध्यान अच्छी तरह नहीं लगता सो नामके जपका निरन्तर अभ्यास होनेकी पूर्ण चेष्टा होनेसे ही लग सकता है । भगवान्के नामका हर समय जप होने के लिये सत्सङ्ग करने और शास्त्रों- को पढ़ने के अभ्यासकी चेष्टा होनी चाहिये । तीव्ररूपसे हर समय भगवान्के नामका जप होने लगे तो फिर भगवान में प्रेम उत्पन्न होकर अपने आप प्रेमसहित जप होने लग जाता है । फिर भगवान्की कृपाका प्रभाव भी आप ही ज्ञात हो जाता है। भग- वान्की तो पूर्णरूपसे कृपा है ही परन्तु वह योग्य पात्र में प्रत्यक्ष भासती है । जैसे सूर्यका प्रकाश सब जगह परिपूर्ण होने पर भी दर्पणमें प्रत्यक्षवत् भासता है। भगवान्की कृपाका थोड़ा-सा प्रभाव जाननेपर साधक जो कुछ होता है सो सब भगवानकी कृपा ही समझता है और तव वह अपनी इच्छाको छोड़कर, साक्षी होकर आनन्दमें मग्न रहता है । भगवान्में इतना प्रेम चढ़ता है कि भगवान्को वह छोड़ ही नहीं सकता । पुरुषार्थ अधिक होनेसे ही भजन अधिक होता है। भजन अधिक होनेसे ६० ] परमार्थ-पत्रावली हो सायान्का प्रभाव जाना जाता है। भगवान के नामका जप अधिक करने के अभ्यासकी अधिक श्रेष्टा करना, अपने ही पुण्यार्थक अधीन है। आपने लिसा कि भगवान के प्रेमका विपय जाननेसे ही जाना जायेगा, सो उसके जतानेवाला भी भगवानका भजन- ध्यान ही है । भजन-ध्यानद्वारा दृदय शुद्ध होनेसे प्रेम उत्पन्न होता है । आपने लिया कि मेरा बहुत समय बीत गया है, अब जल्दी ही उपाय होना चाहिये सो ऐसी इच्छा होनी बहुत ही उत्तम ह । नापने लिया कि ऐसा सुअवसर पाकर भी यदि उद्धार न होगा तो फिर कर होगा? सो ठोक ही है। जो इस प्रकार समयके प्रभावका जान लें, उनका समय भजन ध्यानम ही बीतना चाहिये । समयका मूल्य जाननेपर अपना उद्धार होना कान पड़ी पात है? चरिक उसके द्वारा अन्यान्य अनेक प्राणियों- का भी उद्धार हो सकता है । अपना उद्धार चाहे न हो, केवल प्रेमसहित भगवान्का चिन्तन होना चाहिये । यदि आपकी बहुत शीत्र उद्धारका उपाय होनेकी इच्छा बनी रही तो अति उत्तम हे । फिर कुछ चिन्ता नहीं । आपने लिया कि अभी आनन्द नहीं होता सो आनन्द चाहे न हो, केवल प्रमसहित भगवानका चिन्तन होना चाहिये । आनन्दकी इच्छा तुन्छ हे। ध्यान आनन्दके लिये योड़े ही किया जाता हे' भजन आर ध्यन नो भगवान्के लिये किया जाता हे । मेने आपको भगवान्- परमार्थ-पत्रावली का भक्त लिखा था सो ठीक ही लिखा था एवं कई बात जानने की भी आवश्यकता थी। परन्तु पूर्ण भक्त होनेपर में और मेरका अभाव हो जाता है। संयोग-वियोग सत्र अन्न-जल (संयोग) के अधीन है। मिलना चाहे कम ही हो परन्तु प्रेम होना चाहिये, लो आपका है हीः परन्तु निष्काम प्रेम जितना बढ़े उतना ही उत्तम है। आपने लिखा कि जैसा इस बार ध्यान हुआ सा थोड़ा भी धारण हो जाये तो कृतकृत्य हो जाऊँ। सो कृतकृत्य चाहे न हो। परन्तु प्रेमसहित निरन्तर ध्यान रहना चाहिये। निष्कामभावसे भगवान्का निरन्तर भजन करनेवाले पुरुषांके दर्शनसे हजारों पुरुष कृतकृत्य हो जाते हैं. यदि वे श्रद्धा और भक्तिसहित भक्तोंके दर्शन एवं उनके प्रभावको जानें। संसार मिथ्या है । भगवान्की लीला है। उसे सञ्चा जानन- से आसक्ति होकर इच्छा उत्पन्न होनेसे मनुष्यमें बहुत-से दोप आ जाते हैं। इसलिये भगवान्की शरण लेना ही उत्तम है। जो कुछ होता है सो सव भगवान्की आशासे ही होता है। भगवान्की शरण होनेपर उनकी आज्ञाको क्यों टालना चाहिये ? जो कुछ होता है सो उसका कल्पित-मिथ्या और उसकी लीलामात्र है। चाहे सोहो हमें कोई आपत्ति नहीं। केवल साक्षी रहना ६२]

परमार्थ पत्रावली
चाहिये । यदि ऐसा होनेपर भी दुस हो तो (समझना चाहिये
कि) भगवान की शरण ही नहीं ली । भगवान् जो भी करें
उसे आनन्दसहित धारण करना चाहिये । यदि मनमें थोडा-
सा भी दुश्य हो तो समझना चाहिये कि म्वामीके किये हुए पर
विश्वास ही नहीं है । सब कुछ स्वामीका ही तो है । वह अपनी
वस्तुको चाहे जिस प्रकार वर्त मक्ता है, हम क्या मतलब
है ? इममें मनको मैला करनेसे (दु ख माननेसे) मालिक हमें
मूर्ख समझ लेना हे कि इमने मिथ्या वस्तुएँ मञ्ची ओर
अपनी मान रफ्पी है । यह संसारकी मिथ्या वस्तुओं का आश्रय
लेता है। यह मूर्ख संसारका दास है। जो ससारका दास होगा
वही ससारकी इच्छा करेगा ! सासारिक वस्तुओंकी इच्छा
करनेवाला ही ससारमें जन्म लेना है । ऐसा पुरुष भगवान्के
अन्त करण एवं मनका स्वामी नहीं हो सकता । भगवान्के
मर्वस्वका तो वह मालिक होता है जो भगवान्का प्रेमी
होता हे । संसारके भोगोंका प्रेमी तो एक ससारका कीडा है।
संसारके भोगोंको मिथ्या और लीलामात्र जानकर अपने मनसे
उनका त्याग कर देना चाहिये । जो त्रैलोक्यके राज्यको नुच्छ
समझकर केवल एक नारायणका ही प्रेमी है वही धन्यवादका
पात्र है, भगवान् हर समय उसके पास ही रहते है।

[१८] वैराग्यकी उत्तेजना सर्वदा बनी रहनेका साधन पूछा लो इसका साधन भजन, ध्यान और सत्सङ्गका तीन अभ्यास हो लमझा जाता है । संसारमें दुःख और दोपवुद्धि होनसे भी वैराग्य होता है परन्तु संसारमें अभाव और सच्चिदानन्दमें भाव-बुद्धि हुए विना संसारसे पूर्ण वैराग्य नहीं होता। श्रीसच्चिदानन्दधन परमात्माके स्वरूपकी प्रेमसहित स्थिति वनी रहनेका उपाय पूछा सो प्रेम और प्रभावसहित भजन और सत्सङ्गके तीन अभ्यासकी तीव्र चेटा ही एक उपाय है, यही मेरी समझमें आता है, अतएव निरन्तर अभ्यास होने के लिये विशेष चेष्टा करनी चाहिये । फिर प्रेम तो अपने आप हो सकता है। निरन्तर प्रेमसहित अभ्यास होनके विषयमें जोरदार उपाय पूछा सो मेरी समझसे तो आलस्यको त्यागकर. शरीरको मिट्टीके समान समझकर, विश्वासपूर्वक तन-मनसे ध्यान और जपको तीव्र चेष्टा करनी चाहिये । ध्यानकी स्थितिके समय यदि स्फुरणा हो तो जो कुछ भासे उसको केवल कल्पित और मृग- तृष्णाके जलवत् समझना उचित है । कुछ भी नहीं है, ऐसा मानकर दृश्यके लक्ष्यको भुला देना चाहिये एवं अनित्य समझ- कर उसे छोड़ देना चाहिये । केवल अचिन्त्यमें अचिन्त्य होकर ६४] परमार्थ-पत्रावली संकल्प-त्यागके ज्ञानको भी भूल जाना उचित हे । केवल सच्चिदानन्दघनके सिवा और कुछ है ही नहीं, ऐसा भाव हो जाना चाहिये । यदि वैराग्य होता है तो पिना चेपाके भी लाधन मर तरहसे ठीक रह सकते है । परन्तु अन्त करण शुद्ध हुए रिना वैराग्य विशेप समयतक ठहरना कठिन हे । संसार और शरीरको क्षणभङ्गुर और कालके मुंहमें देखनेसे एवं समय- को अमूल्य समझकर भजन तेज करनेसे, भजन-ध्यान अधिक होकर अन्त करण निर्मल हो जाता हे ओर जर अन्त करण- के पाप ओर दोप नष्ट हो जाते है तव चैराग्य अधिक समय- नक टहर सकता है। xxxx के पत्रमें लिसे हुए ध्यानके विषयका गुलामा पूछा सो इसका साराश इस प्रकार समझमे आता हे- (१) सन जगह एक सच्चिदानन्दधन ही समानभावले स्थित है। उसमें जो कुछ दृश्य वस्तुऍभासती हे मो है हीनहीं। जिसके द्वारा भासता है और जो कुछ भासता है सो शरीर और मसार मर कल्पनामान है। वास्तवमें एक परमेश्वर ही नमभावसे सब जगह पूर्ण हो रहा है । यदि और कोई चीज भाम तो उसको न मान, केवल आनन्दधन ही बाकी रह जायें और उस आनन्दघनके होनेपनका भाव भी उस आनन्दघनमें ही है | आनन्दधनको जाननेवाला कोई अलग नहीं। (२) सर्वव्यापक सच्चिदानन्दधन परमात्माके स्वरूप [६५ - ५० प० ५ परमार्थ-पत्रावली स्थित होकर, उस सर्वव्यापक स्वरूपके अन्तर्गत संसारको सङ्कल्पके आधार मान. सर्वव्यापक दृष्टा होकर सर्वव्यापक शाननत्रीले संसारको कल्पित और परमात्मान्न भिन्न देन ! गीता अध्याय १४ दलोक १९ के अनुसार सर्वव्यापक अन्तर्गत कल्पित शरीरके द्वारा हर समय भजन हो रहा है। सर्वव्यापक भगवत् स्वरूपमें स्थित रहने हुए, उग्न शरीर- सहित भजनको समष्ट्रित्रुद्धिस अर्थात् सर्वव्यापी ज्ञान- नेत्रोंने देखे। (३) सर्वव्यापक अनन्त बोधस्वरूप द्रष्टा होकर, इल मनुप्यशरीरको जिसमें पहले अपनी स्थिति थी, उन ॐकारका आकार समझकर ॐकारका चिन्तन करता रहे। उस ज्ञान- रूप शरीरको अपने संकल्पके आधार समझे । वास्तव में उन सच्चिदानन्दधनसे भिन्न और कुछ है ही नहीं। इसी तरह अपने निश्चयमें स्थित रहे । ऐसा दृढ अभ्यास होनेले एक सञ्चिदा- नन्दघनके सिवा और कुछ रहता ही नहीं, कल्पित शरीरका लक्ष्य भी छूट जाता है । ॐकारका अर्थ सच्चिदानन्दवन है और वही शेपमें बच जाता है। ॐकारके चिन्तनको जानकर नहीं छोड़ना चाहिये । एकान्तमें इस तरह साधन करना चाहिये । (४) श्रीसच्चिदानन्दधनका भाव (होनापन ) और शरीर, संसार तथा जो कुछ भी चिन्तनमें आवे उसका अत्यन्त अभाव याने दृश्यमात्र कुछ है ही नहीं, ऐसा दृढ़ निश्चय होना ६६ ] + - परमार्थ-पत्रावली चाहिये । इस तरह दृढ निश्चय होनेसे एक सच्चिदानन्दधन- के सिवा सफा अभाव होकर परमानन्दमय एक सचिदा- नन्द ही सर जगह रह जाता है, यही परमपद है। उपर्युक्त समाचार xxxx की चिट्ठीके भाव हे । मेरी बुद्धिके अनुसार भ्यानके विषयमें टीक समझमें आनके लिये कुछ और भी विस्तारम लिया है। समयको अमूल्य जानना चाहिये। ऐसा जाननेवाला एक पल भी मिथ्या कामोंमें नहीं सोता । जो मिव्या और वृथा कार्मोमें समय व्यतीत करता है वह समयके मूल्यको नहीं जानता, अल्प मूल्यवाली वस्तुको भी कोई व्यर्थ गोना नहीं चाहना, फिर वह अमूल्य वस्तुको तो व्यर्थ सो ही कसे सकता है? जिस ध्यानो समय आनन्दकी लालसा रहती है वह ध्यान नीची श्रेणीका है । पेमा चाहनेवालेने तो योडी देरके सुस या आनन्दके लिये ही ध्यान लगाया । भगवान्का चिन्तन ही एक अमूल्य वस्तु है । इस मर्मको जाननेवाला तो निरन्तर यान ना रद ऐसी ही चेष्टा करेगा, आनन्दकी यामामा नहीं रचेगा, थोड़े समयके लिये होनेवाला मानन्द चाह न हो उसी कोई गरज नहीं, परन्तु भगवानका चिन्तन निरन्तर रहना चाहिये। [६७ । [१९] नमय बीना जा रहा है। जो कुछ करना हो तो जल्दी कर लेना चाहिये । तुम किसलिये बिलन कर रहे हो? तुम्ने क्या जरूरत है ? नुमको किम्मका दबाव....है? तुम्हें नागया को एक पलकके लिये भी विस्तारना नहीं चाहिये। अन्नमें एक नारायणको छोड़कर और कोई भी तुम्हारा नहीं होगा। इस अलार संसारमें कुछ भी सार नहीं है । सब मायाकी ठगी है। इस प्रकार समझकर बुद्धिमान तो इसके जालमें नहीं फैलता। परन्तु जो नहीं समझता सो इस मायारूपी उगनीक मोह- जालमें भोगस्पी दानेके लोभमें है। फंस जाता १८]

[२०]
'दर्द के कारण अधिक समय लेटे रहना पड़ता है और
उससे आलस्य तथा निद्रा अधिक आती है, इससे साधनमें
अधिक भूलें होती हैं' लिखा, सो ठीक है । ऐसे अवसरपर
श्रीगीताजीके अर्थका अभ्यास करना चाहिये । यदि अधिक
समय अभ्यास करनेके कारण निद्रा आवे तो व्यानसहित
भजन करते हुए ही सोना चाहिये । भगवान् का स्मरण
रसनेमें बहुत भूलें होती है तो उसके मिटनेका उपाय तीन
अभ्यासकी चेष्टा ही है।
भगवानमें प्रेम चढनेके विषयमें पूछा सो इस सम्बन्ध
पहले लिखा ही था । भगवान्के गुणानुवादोको पढ़ने, सुनने,
कहने तथा उनके लक्षण, आशय और प्रभावकी ओर ध्यान देने
से भगवान्में प्रेम अधिक हो सकता और ये सरवाते तीन
भजन और सत्सङ्ग करनेसे ही सिद्ध होती है। जिस वस्तुकी तीन
इच्छा होती है उसके लिये स्वाभाविक ही बहुत अधिक प्रयत्न ओर
चेष्टा की जाती है। जिनको रुपयोंकी आवश्यकता होती है वे
[६९

परमार्थ-पत्रावली उन्हें प्रान करना लिये अनेक तन-मनन करते और उनके मनमें प्रायः हर बड़ी यही चिन्ता बनी रहती है कि पर्व किस नरहने पेदाता ? मपये पैदा करनेके उपाय च अपना मन- बुद्धि सब कुछ अर्पण कर देते हैं । जिनको रुपयोंकी विशे पन्छा होती है उनको रुपयोंकी ही अधिक चिन्ता होती है । इसी प्रकार जिनको भगवानने मिलनेशी इच्छा होती है उनके मन-बुद्धि भी भगवानको ही अर्णित हो जाते हैं। एवं उनकी तीम इच्छा. भगवानक मिलनेक उपाय, भजन और सनसा करनेकी ही हो जाती है। तीव्र इच्छा होनस केली दमा होती है । यह रूपयक उदाहरणग्ने जाना जा सकता है। जिग्न बन्नुकी नीव न्या होती है उसके लिये उपाय और नशा भीतीनही की जानी है। कोई मनुष्य बीमार है । बैंच पाता है कि अमुक बन्नु आनेले या पत्र सकता है। गन्न समय उस वस्तु के लिये कितनी अधिक चटा होती है । पिसी ही चेष्टा भजन और सत्ताक लिये होनी चाहिये । इच्छाके तीर होनेन ही नीम चटा होती है और तीन चेष्टा होने से ही इष्ट वन्तुकी प्रानि होती है । मिथ्या नांग्लारिक वस्तुएँ तो नेमा करनेपन भी शायद नहीं मिलती एवं मिल जाने पर भी रोगीको शायद लाभ पहुँचे अश्रवा न भी पहुँचे, परन्तु भजन और लन्सङ्गके लिये चेष्टा करनेमे तो अवश्य ही सफलता प्राप्त होती है। भजन सत्सङ्गरूपी औषध- का बहुत दिनोंतक सेवन करनेले जन्म-मरणरूपी कठिन भव- ७० ] परमार्थ-पत्रावली रोग अवश्य ही नष्ट हो जाता है । सत्यकी चेष्टा कभी व्यर्थ नहीं जाती। 'जपमें अधिक भूलें होती है' लिखा, सो उसके लिये पहले आपको लिखा ही या । जपका अधिक अभ्यास करनेसे ही जप- की भूल दूर हो सकती है पव भृल होनेपर भी प्रसन्नमनसे जप करनेका अभ्यास रखनेसे आगे चलकर प्रेमपूर्वक जप हो सकता है। जिस समय जप निरन्तर होता है उस समय तो प्रेमपूर्वक ही होता है। वैराग्य होनेपर तो ध्यानसहित जप चिना चेष्टाके ही निरन्तर होता रहता है। भगवानका स्मरण हर समय रहना चाहिये' ऐसी इच्छा ही भगवान्का निरन्तर चिन्तन होनेमे हेतु हे । यदि जप करते समय ससारकी स्फुरणा हो नो बलात्कारसे भगवत् विषयक स्फुरणा उत्पन्न करानेका अभ्यास करना चाहिये । ऐसा अभ्यास करनेसे जपके साथ-साथ व्यानकी वृद्धि और सासारिक घासनाका नाश हो सस्ता है । यदि सचा और आसक्तिने रहित स्फुरणा हो तो कुछ हानि नहीं । संसारकी सत्ता ओर आसक्तिका नाश होने का उपाय जप और सत्संग है । इनके होनेमें अभ्यासकी बहुत अधिक आवश्यकता है। भगवन्नामका स्मरण हर समय रहना चाहिये। फिर तो अभ्यास वढनेसे संसारमें वैराग्य एवं भगवान्के स्वरूपमें स्थिति भी हो सकती है । श्रीपरमात्मादेवकी तो सवपर पूर्ण रुपा है। जिसको ऐसा निश्चय हो जाता है वही भगवानका [७१ परमार्थ-पत्रावली कृपापात्र है । फिर उसको शीघ्र ही भगवान् मिल जाते हैं क्योंकि उससे विना मिले उन्हें चैन नहीं पड़ता। संसार और शरीरको मिथ्या एवं नाशवान् और एक परमात्माको आनन्दले परिपूर्ण देखनेसे भी वैराग्य हो सकता है। संसारन वृणा होने- से संसारका चिन्तन आप ही कम हो सकता है। प्रेम होनेका उपाय उसके खरूपका चिन्तन, नामका जप और सत्संग ही है। जितनी ही अधिक चेष्टा होगी उतना ही अधिक जप होगा। जो भगवान्को सर्वज्ञ, अन्तर्यामी, दयासिन्धु एवं विना कारण ही हित करनेवाला जानेगा सो कभी किली वस्तुके लिये उनले प्रार्थना नहीं करेगा, यदि वह प्रार्थना करेगा तो निरन्तर भावसहित चिन्तन होने के लिये ही करेगा। हर ससय नामको याद रखनेका अस्यास हो जाय तो फिर ध्यानकी स्थिति भी हो सकती है । भगवान्को याद रखते हुए ही सांसारिक काम हों ऐसी चेष्टा रखनी चाहिये । सांसारिक कामोकी अपेक्षा अजन-ध्यानको वहुत उत्तम और बहुमूल्य समझना चाहिये । संसारके कामोंकी चाहे कितनी ही हानि क्यों न हो, परन्तु उन अनित्य कामोंके लिये भजन-ध्यान नहीं छूटना चाहिये । इस प्रकारको पक्की धारणा हो जानेसे संसारके काम करते हुए भी भजन हो सकता है। विवाहके कामके समय किस तरह क्या करना चाहिये इस सम्वन्धमें भी पहले लिखा ही था। विवाह आदि सांसारिक काम नदीके प्रवाहकी तरह हैं । जो कोई पुरुप भगवत्-चरण- ७२] परमार्थ-पत्रावली रूपी नौकापर नामरूपी रस्सेको पकड़कर ध्यानद्वारा भाबद्ध हो जाता है, वही बच सकता है। जो नदीके प्रवाहमें यह जाता है उसकी यड़ी धुरी दशा होती है। भजन-सत्संग अधिक होनेसे अन्त करण शुद्ध हो जानेपर धारणा होने में देर नहीं होती। सांसारिक कामना रहने न पाये इस घातकी चेष्टा तो आप करते ही हैं परन्तु इसके लिये और भी अधिक चेष्टा और पुरुषार्थ करना चाहिये । इस काममें अभ्यास ही प्रधान है । अभ्यास भगवत् कृपासे स्वतन्त्र है। आपने संसारमें आफर क्या किया? इस प्रकार यदि समय चीतता गया तो काम जल्दीमे कैसे पूरा होगा ? समयको अमूल्य कामोम ही विताना चाहिये। फिर समार और रपये तथा भोग किस काम आवेंगे ? वस्तु वही अपनी है जो भगवान्में अपना अधिक प्रेम करावे । शेप सव मिट्टी है । लाने- के और पत्थरके पहाड़ों में क्या अन्तर है ? कोई भी माय जान- वाला नहीं है। शरीर भी मिट्टीम मिल्नेगाला है । इस प्रकार जानकर इस शरीरले पूरा-पूरा लाभ उठाना चाहिये । भगवान्- के भजन-ध्यानके सिवा एक पल भी वृथा क्यों जाय ? किसी भी वातरे लिये एक पल भी विना भजन-ध्यानके नही जाने देना चाहिये । क्योंकि सभी कुछ अनित्य हे। अनित्यके लिये अपना अमूल्य समय हाथसे कभी न सोना चाहिये । [७३ आधा परमार्थ-पत्रावली काम, क्रोध, लोभ और मोह आदि शत्रु अपने असली धनको लूट रहे हैं इसलिये राम-नासकी विगुल बजाते रहना चाहिये । विगुल बजती रहनेसे जैसे शत्रु (डाकू ) समीप नहीं आते वैसे ही रामनामरूपी विगुलके बजते रहनेसे काम-क्रोधादि शत्रु भी समीप नहीं आते, अतएव चेत करना चाहिये । बिन · रखवारे वावरे, चिड़िया खाया खेत । परधा ऊबरै, चेत सके तो चेत ॥ इस औसर चेता नहीं, पशु ज्यों पाली देह । रामनाम जाना नहीं, अंत पड़ी मुख खेह ।। इन दोनोंके तात्पर्यको विचारना चाहिये । सत्संग और भगवन्नामका निष्कामभावले प्रेमपूर्वक निरन्तर जप करना ही परम पुरुपार्थ है, तदनन्तर भगवान्में प्रेम-विश्वास और उनका ध्यान तो अवश्यमेव हो जाता है। अपने जीवनकी अवधिका समय समीप आ रहा है इसलिये अज्ञाननिद्रासे शीघ्र ही सचत होनेकी आवश्यकता है। इस देव-दुर्लभ मनुष्य-शरीरको प्राप्त करके ऐसे जीवनको व्यर्थ न गंवाकर सार्थक करना चाहिये । जो व्यक्ति मनुष्य-जन्म- को प्राप्त करके भी भगवद्भजन नहीं करता है वह अन्तमें भारी पश्चात्ताप करता है, क्योंकि जब अपना शरीर भी किसी कार्य में नहीं आयेगा तव और पदार्थोंकी तो आशा करनी ही व्यर्थ है। A है ७६ ] [२२] तुम्हें जिस कामके लिये संसारम मनुष्य-शरीर मिला है उस कामको इस तरह नहीं भूलना चाहिये । प्रथम तो मनुग्य. शरीरकी प्राप्ति ही कठिन है इसपर द्विजके घर जन्म होना, यज्ञोपवीत-सस्कार हो जाना, माता, पिता, भाई,स्त्री सन्तान और यापारका मनके अनुकूल होना तो बड़े ही भाग्यकी बात है। जरूरतके अनुसार धन ओर मकान भी तुम्हारे पास है। ऐसी स्थितिमें भी यदि आत्माके उद्धारके लिये उपाय नहीं होगा तो फिर कर होगा? इस प्रकार अनुकूल स्थिति सदा नहीं रहेगी, अतएव जवनक मृत्यु दूर है और शरीर आरोग्य है तथा उपर्युक्त अनुकूल परिस्थिति हे उतने ही समयमें जो कुछ उत्तम काम करना हो सो बहुत शीघ्र कर लेना चाहिये, जिससे आगे चल- कर पश्चाचाप न करना पड़े । उपर्युक्त पदार्थोममे दो-चार घट- चढ जाये तो कोई हानि नहीं परन्तु अब असावधान नहीं रहना चान्ये । समारमें अब तुम और क्या अनुकूलना चाहते हो? तुम्हें ऐसी किस नानकी कमी है फिजिसकी पूर्ति के बाद तुम अपने कल्याणके लिये चेष्टा करोगे? इस संसारमें एक भगवानके सिवा ओर कोई भी तुम्हारा नहीं है। माता, पिता, भाई,स्त्री, पुत्र, मकान, नपरे सभी नाशनान् है, इनका संग थोड़े ही दिनांका है। इनमें- से कोई भी पदार्थ तुम्हारे साथ नहीं जायगा । ओरोंकी तो चात [७७ परमार्थ-पत्रावली ही क्या है तुम्हारा यह शरीर भी यहीं रह जायगा ! हम सब लोगोंका संयोग भी सदा रहनेवाला नहीं है। शरीरका कुछ भी भरोसा नहीं। मेरे रहते भी जब तुमसे अपनी परमगतिके लिये चेष्टा नहीं होती, यदि मेरा शरीर पहले ही छूट गया तब ते तुम्हारे कल्याणके साधनमें और भी ढिलाई होना कोई बड़ी बात नहीं ! तुम नाशवान् क्षणभङ्गुर सांसारिक पदार्थोंके लिये जितनी चेष्टा करते हो उतनी यदि श्रीभगवान्की प्राप्तिके लिये करो तो बहुत ही शीव्र भगवत्-प्राप्ति हो सकती है। श्रीभगवान्के समान प्रेमी, दयाल और सर्वशक्तिमान् दूसरा कोई भी नहीं है । फिर तुम किस लिये उस सच्चे प्रेमिकके प्रेमके लिये चेष्टा नहीं करते? रात-दिन तुच्छ धनके परायण क्यों हो रहे हो ? जब यह शरीर ही तुम्हारे काम नहीं आवेगा तव रुपयोंकी तो बात ही क्या है ? शरीर नाश होनेके वाद केवल ( अवका किया हुआ) भजन, ध्यान, सत्संग और शास्त्रोंका अभ्यास ही काम आवेगा और कुछ भी काम नहीं आवेगा । शरीरका नाश अवश्य होगा। इस- को बचानेका कोई भी उपाय नहीं परन्तु शरीरके नाश होनेपर भी आत्माका नाश नहीं होता। इसलिये शरीर नाश होनेके बाद आत्माको परमसुख-परम आनन्द मिले. उसीके लिये रात-दिन चेष्टा करना मनुप्य-जन्मका उत्तम फल है । इसीसे श्रीसच्चिदा- नन्द भगवान्की प्राप्ति होती है। मनुष्यका जन्म इसीलिये मिला है, अतएव भगवत्-प्राप्तिके लिये तत्पर होकर चेष्टा करनी चाहिये। 1 TUE ७८]

[२३]
आपने लिया कि वर्तमान समयम वित्तकी वृनियों
ससारका चिन्तन विशेप करती है सो ज्ञात हुआ । आसत्ति-
पूर्वक सांसारिक कार्य विगेप देखनेसे ऐसा हुआ करता है।
इसलिये सत्सग करना चाहिये। जर आपको सत्सग करनेकी
विशेष अभिलापा ही नहीं तर दूसरा कोई क्या करे ? ओर जर
[२

परमार्थ-पत्रावली आपको सांसारिक कार्योंसे अवकाश ही नहीं तव में भी क्या उपाय करूँ? सुनते हैं कि आपके घरपर सत्संग होता है पर आपका उलमें जाना नहीं होता। आपको विवेकदृष्टिसे विचार करना चाहिये कि क्या सांसारिक कार्योंसे भी सत्संग करना निकृष्ट है ? आपने लिखा कि जब मैं अपनी भगवद्धजन-ध्यानके साधन- लम्बन्धी वर्तमान दशाकी तरफ विचार करता है, तब चित्त बहुत खिन्न हो जाता है और सांसारिक कार्य भी बहुत न्यून होते हैं सो ज्ञात हुआ । इसीलिये भगवद्भजन-ध्यान करनेके लिये वारंवार लिखना हुआ करता है। परन्तु आप उसपर भी विचार नहीं करते हैं, सो विचारना चाहिये कि समय व्यतीत हो रहा है, भगवान्से किये हुए वादेके दिन समीप आ रहे हैं। जो समय बीत चुका वह लौटकर पीछे नहीं आता, अतएव मनुष्य-जन्मको सार्थक करना चाहिये । अर्थात् भगवद्भजन- ध्यानके लिये समय निकालना चाहिये, क्योंकि समय तो एक दिन अवश्यमेव निकालना ही पड़ेगा अर्थात् कालदेवका सन्देश आनेपर एक मिनट भी ठहर नहीं सकेंगे । अतएव इस घातको विचारकर आप पहलेसे ही सचेत हो जाये तो बहुत ही आनन्दकी बात है, नहीं तो फिर पश्चात्ताप करना पड़ेगा। आपने लिखा कि आपके संगमें जैसा भजन-ध्यान हुआ करता था वैसा अब नहीं होता सो जाना । इस प्रकारसे ८० ] परमार्थ-पत्रावली लिगना तो आपके प्रेम और श्रद्धाकी बात है। में तो एक साधारण मनुष्य हूँ। आप अभीतक भजन-ध्यानके प्रभावको नहीं जानते है । यदि भलीभॉति भजन-यानके प्रभावको जान जाने नो आपसे भजन-प्यान छूट ही नहीं सकता। आपने लिसा कि तुम्हारे सगसे भजन ध्यान विशेष हुआ करता था। यदि यह यात सत्य है और आप भजन- ध्यानके प्रभावको जानते हैं तो मेरा साथ छूट जाना अर्थात् मेरा नियोग होना थापसे कैसे सहा जाता। अस्तु, मेरे मगकी तो कोई बात नहीं किन्तु श्रीनारायणदेवको किसी कालमें भी नहीं भूलना चाहिये । अर्थात् उनका निरन्तर चिन्तन करना चाहिय एनं ऐसा प्रेम करना चाहिये कि उनका वियोग सहा न जाय अर्थात् उनका पियोग होनेसे शरीरमें प्राण न रह सके जम जल के बिना मछलीके प्राण नहीं रह सकते। यदि आप सामारिक भोगोंसे श्रीपरमात्मादेयके ध्यानको श्रेष्ट जानते एवं ध्यानके पक अंशमात्रमे भी त्रिलोकीके राज्यको चन मानते तो आपका माधन दिन प्रति दिन तेज होता जाता और निरन्तर ध्यानके लिये अभिलाषा पनी रहनी। यदि आपको भगवद्ध्यान मन्मङ्गकी विशेष आवश्यक्ता प्रतीत होती तो उसके लिये प्रयन भी हो जाता । मेरे सगके लिये जो मापने पविनित इच्छा प्रकट की यह तो आपकी कृपा है। परन्तु [८१ म. १०६- परमार्थ-पत्रावली बहुत पश्चात्तापकी बात तो यह है कि आपको यत्किञ्चित् ध्यान- जनित आनन्दके प्राप्त होनेपर भी उस आनन्दका तिरस्कार आपके द्वारा कैसे किया गया ? यदि ध्यानमें आनन्द सत्य है तव तो उस आनन्दके लिये प्राणान्तपर्यन्त प्रयत्न क्यों नहीं करते ? और यदि उस ध्यानमें आनन्द नहीं है तो आप उस ध्यानजनित आनन्दकी प्रशंसा किस प्रयोजनसे करते थे ? अस्तु ! जो वात व्यतीत हो गयो उसे जाने दीजिये । भविष्य में तो सावधान होना चाहिये। आप कौन-से कार्योंमें अपना अमूल्य समय बिता रहे है ? क्या इसी प्रकार आजीवन समय व्यतीत करते रहनेपर आपको इस जन्मके अन्त होनेतक अपना कल्याण होनेकी सम्भावना है ? और यदि कल्याणकी सम्भावना नहीं है तो शीघ्र ही अपने उद्धारके लिये कटिबद्ध होकर बहुत तेज साधनके लिये प्रयत्न करना चाहिये, क्योंकि शरीर तो क्षणभंगुर है, इसलिये शरीरका कुछ विश्वास नहीं है । यदि शीघ्र ही प्राणान्त हो जायगा तो पीछे क्या कर सकेंगे? आप किसके भरोसे निश्चिन्त हो रहे हैं? आपके पास किसका वल है? केवल एक नारायणदेवके अति- रिक्त कोई भी आपकी सहायता करनेवाला नहीं है। फिर किस- लिये इस असार संसारका आसरा लेकर अपने अमूल्य जीवनको व्यर्थ खो रहे हैं? ८२] -cs J [२४] संसारमें भगवत्प्रेमका प्रवाह बहुत तेजोसे चलाना चाहिये । पूर्वकालमें कई बार समय-समयपर प्रेमके प्रवाह बहुत जोरमे यह चुके है । वर्तमान कालमें भी यद्यपि श्रीनारायण- देवकी तो पूर्ण रूपा हो रही है, तथापि जो कुछ विलम्ब हो रहा है वह केवल अपनी तरफसे ही हो रहा है। ससारमें भगवद्भावका प्रचार करनेवाले कई मनुष्य तेयार हो जाये तो बहुत शीव श्रीभगवद्गक्तिका प्रचार हो सकता हे, किन्तु विद्वान्, त्यागी ओर सदाचारी पुरुषोंको अत्यन्त आव. श्यकता है। ऐसे व्यक्ति स्वयं प्रेममें मग्न होकर ससारमें भगवत्- प्रेम, भक्तिका प्रचार करें तो प्रेमका बहुत तेज प्रवाह रह सकता है। निकाम प्रेम-भारसे सरकी परम सेवा करनेके सदृश अन्य कोई भी कार्य नहीं है । परम सेना धास्तरमें उसोको कहते है कि जिस सेवाके करनेके पश्चात् कुछ भी कार्य शेष न रहे, [३ परमार्थ-पत्रावली अर्थात् संसारी मनुष्योंको भगवत्-प्रेममें लगाकर उन्हें भगवान्के परम धाममें पहुँचा देनेका नाम ही वास्तवमै परम सेवा है। यद्यपि भूखे, अनाथ, दुःखी, रोगी; असमर्थ तथा भिक्षुक आदिकों- को अन्न, वस्त्र, औषध एवं जिस वस्तुका जिसके पास अभाव हो उस वस्तुके द्वारा उन सबको सुख पहुँचाकर तथा श्रेष्ठ आचरणोंवाले योग्य विद्वान् ब्राह्मणजनोंको धनादि सब पदाथोंके द्वारा सुख पहुँचाना भी एक प्रकारकी सेवा ही है तथापि परम सेवा तो उसका नाम हो सकता है कि जिस सेवाके करनेके पश्चात् अन्य कुछ भी करना शेप न रहे। ऐसी सेवाके समान और कोई भी सेवा नहीं हो सकती । इसलिये तुमको भी निष्कास प्रेम-भावले सब जीवोंकी परम सेवा करनी चाहिये। अपने तन, मन, धन तथा और भी जो कुछ पदार्थ हों वे यदि सम्पूर्ण सांसारिक जीवोंके उद्धारके लिये, उनकी सेवाके कार्यमें आ जावें तो वे सार्थक हैं, और जो पदार्थ उनकी सेवाके विना शेष रहे वे निरर्थक हैं। इस प्रकार समझकर उनकी परम सेवा करनी चाहिये। ऐसा करनेसे सर्व जीवोले बहुत प्रेम हो सकता है एवं सब जीवोंके साथ जो निप्काम प्रेम है वह प्रेम भगवान्के साथ ही है, क्योंकि भगवान् ही सर्व जीवोंकी आत्मा है। ८४]

[२५]
आपने लिखा कि 'श्रीपरमात्मादेवमें अनन्य प्रेम होकर
संमारकी सत्ताका अत्यन्त अभार होने के लिये उपयुक्त साधन
लिसना चाहिये' सो क्षात हुआ। हर समय संसारको स्वमवत्
अथवा मृगतृष्णाजलके सदृश देखते हुए सर्वत्र भगवान्के
सर्वव्यापी स्वरूपका चिन्तन करनेसे संसारकी सत्ताका अभाव
होकर सर्वत्र श्रीसच्चिदानन्दान परमात्मादेव ही प्रतीत हो
सकते है । भगवान्को सय समय आर सर्वत्र चिन्तन करनेसे
एवं उनके प्रेमी भक्तोंका सग करनेसे, परमात्मामें प्रेम हो
सकता है।
श्रीमद्भगवद्गीताफा अर्थसहित अभ्यास करनेसे अथवा
परमात्माके पुनीत नामका जप करनेसे तथा भगवान्को आमा.
के अनुसार व्यवहार करनेसे उनमें अनन्य प्रेम होकर उनकी
प्राप्तिके लिये तीन इच्छा होनेमे भगवत्-प्राप्ति अत्यन्त शीत्र हो
सकती है। इस कार्यमें पुरुषार्थ ही प्रधान है।
[८५

[२६]
मन स्थिर होनेके कुछ उपाय पहले लिखे गये थे, अब फिर
लिखे जाते हैं-
(१) अभ्यास और वैराग्यसे मनकी वृत्तियाँ स्थिर होती है।
(२) हर समय श्वासके द्वारा यत्नपूर्वक विश्वास और प्रेम-सहित
प्रणव (ओंकार) का स्मरण करना अभ्यास कहलाता है।
(३) जहाँ मन जाय वहींपर उसे परमात्माके स्वरूपमें
लगाना चाहिये।
(४) जिसमें मन जाय उसीमें परमात्माका स्वरूप देखना चाहिये।
(५) जिसमें अधिक प्रीति हो, उसी में भगवान्की भावना करके
उसका ध्यान करे।
(६) एकान्त स्थानमें बैठकर ओंकारका जप करता हुआ
नासिकाके द्वारा धीरे-धीरे प्राणवायुको बाहर निकालकर
सामर्थ्य के अनुसार रोके और फिर उसी प्रकार ॐकारके
जपके साथ अपानवायुको पूर्ण करके छोड़ दे। यह सब
अभ्यास के रूप है।
(७) सुनी और देखी हुई वस्तुओंकी स्फुरणासे चित्तको रहित
करके परमात्मामें लगानेका नाम ही वैराग्य है। उपर्युक्त
प्रकारसे अभ्यास करने और वैराग्यकी भावना करनेसे
मन स्थिर हो सकता है। इनमें से जिस साधनमें रुचि हो
और अपना मन प्रसन्न रहता हो, मेरे मतसे उसीका
अभ्यास करना उत्तम है।
।
८६ ]

[२७] श्रीभगवान्में प्रेम होनेका उपाय पूछा सो इस वातको धे ही पुरुष अच्छी तरह जान सकते हैं जिनका भगवान्में पूर्ण प्रेम है। परन्तु जर तुमने पूछा है तब कुछ लिसना आवश्यक है। उत्तम पुरुषोंका कथन है किभगवान्के प्रभाव और गुणानुवादकी कथाएँ पढने-सुनने और भगवन्नाम-जप करनेसे अन्त करणको शुद्धि होती हे और तव भगवानमें पूर्ण प्रेम हो सकता है। उसके चिन्तनसे, निष्कामभावपूर्वक उसकी बड़ाई और गुणानुवाद कथन करनेसे तथा उसके गुण और प्रभावको जाननेसे उसमें प्रेम होना सम्भव है। प्रेम होनेके बाद तो प्रेमीकी कोई जरा-सी यात सुनते ही रोमाञ्च, अश्रुपातादि प्रेमानन्दके चिह्न प्रत्यक्ष होने लगते है। प्रेमास्पटके पाससे आया हुआ साधारण मनुष्य भी वटा प्रिय लगता है। एक साधारण मनुप्यके साथ प्रेम होनेपर भी जर उसके गुणानुवाद और प्रेमकी बात सुननेसे आनन्द होता हे तर प्रेमिक शिरोमणि भगवान्की तो यात ही क्या हे ? उद्धवकी बात सुनकर गोपिकाओको जैसा प्रेम हुआ [८७

।
।
परमार्थ-पत्रावली
था वैसा ही प्रेम आज भी हो सकता है। प्रेममें जितनी त्रुटि
है उतना ही विलम्ब है । भगवान् तो सब जगह उपस्थित हैं,
जबतक तुम्हें विश्वास नहीं होता, तभीतक वे छिप रहे हैं !
तुमने लिखा कि आजकल भजन कम होता है । सो इसमें
क्या कारण है ? भजन कम होता है तो प्रेम भी कम ही समझना
चाहिये, संसार तथा शरीर आदिको अनित्य और क्षणभङ्गुर
समझनेपर विलम्ब नहीं हो सकता। भजन अधिक होनेका
उपाय दूसरे पत्र में लिखा है। केवल समयको अमूल्य समझना
चाहिये, फिर कुछ भी करनेकी आवश्यकता नहीं रहती। यदि
कुछ कर सको तो उस परमप्रिय भगवान्के साथ निष्कामभावसे
पूर्ण प्रेम होनेके लिये अपना सर्वस्व उसके अर्पण कर देना
चाहिये । अपना शरीर और अपने प्राण यदि इस काममें लग
जायँ तो अपनेको धन्य मानना चाहिये। सत्सङ्ग करनेपर
परमात्मामें मन न लगे, ऐसा हो नहीं सकता: सत्सङ्गसे तो
उद्धार हो सकता है। यदि अभी सत्पुरुप नहीं मिले हो तो
दूसरी बात है। भजनके लिये समय कम मिलनेकी वात लिखी सो
इस कामके लिये तो समय मिलना ही चाहिये । एक दिन सभीको
सदाके लिये यहाँसे अवसर ग्रहण करना पड़ेगा। जो पहलेले
समय निकाल लेता है वही सदाके लिये मुक्त होकर सुखी
हो जाता है।
८८]

[२८] आपके पिताजीके देहान्तका समाचार ओर आपके पुत्र- वियोगका समाचार "से मिला । आपके पिताजीके देहान्तके समाचारसे इतना विचार नहीं हुआ था परन्तु आपके पुत्रवियोग- का समाचार जानकर तो बड़ा विचार हुआ। पर जिसमे अपना कोई जोर नहीं, उसके लिये क्या किया जाय ।चिन्ता करनेले भी कोई सुफल नहीं होता। उन लोगोंने लिखा है कि आपको बड़ी चिन्ता और उद्वेग हुआ करता है सो ठीक ही है, परन्तु इस प्रकारको घटना देसकर भी वैराग्य और उपरामता न हो तो बड़े आश्चर्यकी बात है। [८९ -

परमार्थ-पत्रावली
मैं आपको क्या धीरज बँधाऊँ ? संसार में लोग दूसरोंको
धीरज दिलानेके लिये बड़े-बड़े उपदेश दिया करते हैं, परन्तु
अपने लिये वैसा ही अवसर आनेपर जिसके धीरज रहता
वही सच्चे धैर्यवान् और उन्हींका उपदेश देना सच्चा समझा
जाता है । मैं तो केवल मित्रभावसे आपको लिख रहा हूँ। यदि
कुछ भूल हो जाय तो प्रेमके कारण सदा ही आपके सामने
क्षमाप्रार्थी हूँ।
अवश्य होनेवाली वाते टल नहीं सकतीं। अभिमन्युकी
मृत्यु प्रसिद्ध है। और भी ऐसी अनेक घटनाएँ हुई हैं । उत्तम.
पुरुपोंका तो ऐसा कथन है कि संसारमें चिन्ता करनेयोग्य
कुछ भी नहीं है। निम्नलिखित भगवान् के उपदेशका यह एक
पद भी अच्छी तरह समझ लिया जाय तो फिर चिन्ता नहीं
रह सकती-
'अशोच्यानन्वशोचस्त्वम्'*
इसका वास्तविक अर्थ समझ लेनेपर असलमें चिन्ता
करनेलायक कुछ भी नहीं रह जाता, फिर यदि कोई चिन्ता
रहती है तो वह केवल एक भगवानको प्रात करनेकी रहती है।
x
X
X
X
X
x
sa
* अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे ।
गतासूनगता श्व नानुशोचन्ति
पण्डिताः ॥
९.1

[२९]
क्रोधकी अधिकनाके नाशका उपाय पूछा सो निम्नलिखित
साधनोंको काममें लानेसे क्रोधका नाश हो जाता है।
(१) सब जगह एक वासुदेव भगवानका ही दर्शन करे।
जन भगवानको छोड़कर दूसरी कोई वस्तु ही नहीं रहेगी,
नर क्रोध किसपर होगा?
(0) यदि सब कुछ नारायण हे तव फिर नारायणपर
कोच कैसे हो ! सके नारायण-स्वरूप होनेके कारण मै सरका
दास हूँ। उस नारायणकी इच्छा अनुसार ही सब कुछ होता
है और वही प्रभु सब कुछ करता है, तय फिर क्रोध किसपर
किया जाय
P
[९१

[३१] पत्र मिला, सर्वव्यापी' का साधन प्रेमसहित होने में त्रुटि लिखी सो कोई चिन्ता नहीं, लगुण भगवान्के ध्यानका साधन होना चाहिये । सगुणमें प्रेम होनेपर उनके दर्शन हो जानेले निर्गुणका भाव तुरन्त ही जाना जा सकता है। प्रज्वलित अग्निका तत्त्व जान लेनेसे व्यापक अग्निका ज्ञान भी तुरन्त ही हो जाता है। यों समझकर 'प्रेमभक्तिप्रकाश' नामक पुस्तकके अनुसार सगुण भगवान्के चरणोंका ध्यान करना चाहिये । आपने लिखा ९४]

परमार्थ-पत्रावली
कि 'श्रीपरमात्माके स्वरूपमें मन लय नहीं हुआ' सो इसके लिये
भी कोई चिन्ता नहीं । सगुण भगवान्का ध्यान ऐसे प्रेमसे
करना चाहिये कि जिससे आपको अपने शरीरकी भी सुधि न
रहे । चतुर्भुज श्रीविष्णुभगवान् या द्विभुज मुरलीमनोहर
श्रीकृष्णभगवान् इन दोनों में आप अपनी रुचिके अनुसार किसी
भी म्वरूपका ध्यान कर सकते हैं।
आपने लिखा कि 'बुद्धि अवतक परमात्माके स्वरूपका
निश्चय नहीं कर सकी है। वास्तवमें शुद्ध सत् चित् आनन्दघनका
खरूप बुद्धिके निश्चयमें आनेवाली वस्तु नहीं है । निर्गुणके
ध्यानका विषय कठिन है । इसकी अपेक्षा सगुणका ब्यान बहुत
सुगम है । फल दोनोंका समान है, अतएव आपको सगुण ध्यान
ही करना चाहिये।
आपने लिखा कि 'ऐसी उत्कण्ठा होनी चाहिये कि जिसमें
एक नारायणके सिवा और कुछ भी न रहे।' ऐसी उत्कण्ठा
गोपियोंकी थी। वे जर श्रीकृष्णभगवान्के ध्यानमें मग्न हुआ
करती, तर उन्हें ओर कुछ भी नहीं दीखता था । अभ्यास करने
पर आपको भी वैसी ही दशा हो सकती है।
साधनकी त्रुटिके बारेमें लिसा सो ठीक ही है, परन्तु
सत्सङ्ग और जपका अभ्यास वढनेसे साधनकी त्रुटियाँ मिट
सकती है। सगुण भगवान के मिलनेकी अत्यन्त उत्कण्ठा होनेसे
उनके दर्शन भी हो सकते है । इसके सिवा और कोई उपाय तो
.

परमार्थ-पत्रावली. नहीं दीख पड़ता । भगवत्-प्रेमकी इतनी प्रबलता होनी चाहिये कि जिससे भगवान के मिले विना रहा न जाय ! ऐसी तीन उत्कण्ठा होनेपर ही भगवान् मिलते हैं। माता-पिताकी सेवामें त्रुटि होनेका समाचार विदित हुआ ऐसा क्यों होता है ? माता-पिताको सेवा तो परम धर्म है, परन्तु यह त्रुटि भी भगवान्के भजनसे ही पूरी हो सकती है। निरन्तर भगवद्भजन हुए बिना दोपाका बिल्कुल नाश होना कठिन है। जो लोग माता-पिताकी सेवा नहीं करते, उनके जीवनको धिकार है। माता-पिताको तो किसी भी वातके लिये नाराज नहीं करना चाहिये । भजन, ध्यान, सत्सङ्गके लिये भी उनकी स्वार्थवश आज्ञाका उल्लङ्घन नहीं करना चाहिये। अपना बड़े-से-बड़ा स्वार्थ- का काम भी माता-पिताकी आज्ञाके विरुद्ध नहीं करना चाहिये। यदि कोई ऐसी आज्ञा हो कि जिसके माननेमें माता-पिताके उद्धारमें बाधा पड़ती हो, उन्हें पापका भागी होना पड़ता हो तो उसे भले ही नहीं माने, जैसे भक्तराज प्रह्लादजीने पिताके हितसे उनकी आना नहीं मानी। इस भावसे यदि भजन, ध्यान: सत्सङ्गमें वाधा देनेवाली या हिंसा आदिमें लगानेवाली माता-पिताकी आज्ञाको पुत्र न माने तो कोई आपत्ति नहीं, क्योंकि इसमें वह माता-पिताको पापसे बचानेके भावसे उनके हितके लिये ऐसा करता है, अपने स्वार्थके लिये नहीं करता । ऐसी बातोंको छोड़कर संसारके कामों में ९६]

परमार्थ-पत्रावली
तोउनकी आशामा भग कभी नहीं करना चाहिये।धन-सम्पत्तिकी
तो बात ही क्या है उनकी आज्ञा पालनेमें यदि प्राण चले जायें
तो भी कोई आपत्ति नहीं, क्योंकि यह शरीर तो उन्हींके
रज वीर्यसे तैयार
हुआ
है, उन्होंने ही इसका पालन किया है।
इस शरीरपर अपना क्या स्वत्व (हक) हे । इसपर अपना
प्रभुत्व मानना तो नालायकी ही है । ससारमें ऐसे बहुत-से मूर्य
है जो स्त्री, पुत्र, धन और आरामके लिये माता पिताके शत्रु
बनकर उन्हें कष्ट पहुँचाते है, उनकी महान् दुर्गति होती
है और उन्हें इन पापोंके कारण भयानक नरकोंमें जाना पड़ता
है। यदि शास्त्र सत्य है तो ऐसे पुरुषोंका उद्धार होना
कठिन है।
इसमें कोई सन्देह नहीं कि भगवान्के भजन, ध्यान और
सत्सगसे अत्यन्त नीच प्राणी भी तर जाते है, परन्तु अधिक
दिनोंकी पुरानी पीमारीमें दवा भी लगातार बहुत दिनोंतक
देनी पटती हे । इसी प्रकार जिनके जितने अधिक पाप होते हैं
उनको भगवान के दर्शनमे उतना ही अधिक विलम्ब हुआ करता
है। पापोंके कारण उनका भगवान्में सहसा विश्वास नहीं होता,
इससे पापनाशके लिये उन्हें दीर्घ कालतक भजन करना पड़ता
है। अनपर पापोंसे बचकर सर्वथा भगवान्का भजन करना
चाहिये।
[ ९७
प. प. ७

[३२] तुम्हारा पत्र मिला, तुमने लिखा कि 'समष्टि (द्रष्टा) का ध्यान प्रायः निरन्तर रहता है, सोना तथा उठना भी इसी स्थितिमें होनेका अनुमान है किन्तु अचिन्त्यके ध्यानकी स्थिति वरावर एक-सी नहीं रहती। ध्यानकालमें तो अचिन्त्यका ध्यान विलक्षण होता है परन्तु इस विलक्षणताको जाननेवाली वृत्तिका अभाव ध्यानकालके बाद नहीं होता। इससे जाना जाता है कि ध्यानकालमें भी विलक्षणताका अनुभव करनेवाली वृत्ति अप्रत्यक्षरूपसे थी' सो ठीक है। तुमने लिखा कि 'मेरी यह ९८ ] परमार्थ-पत्रावली साधनकी स्थिति आगे मुजय हे, गत वर्षके समान तेजीसे नहीं बढ़ी, ठहरी हुई-सी मालूम होती है सोठीक है। तुम्हारी स्थिति- का वढना रुका नहीं है। स्थिति ठहरी हुई-सी तुम्हें केवल प्रतीत होती है । गत वर्षसे इस वर्ष साधन वढा है परन्तु ठहरा हुआ-सा प्रतीत होनेका कारण एक तो यह है कि साधन बहुत जोरसे बढे विना साधकको थोड़ीवृद्धिमें उसकी वृद्धि प्रतीत नहीं होती। दूसरे गत वर्ष तो जैसे किसी विद्यार्थीने पहले कभी कोमुटीका पूर्वार्द्ध पढ़ा हो, चीचमें उसकी विस्मृति-सी हो गयी हो और कुछ काल उपरान्त फिरसे पढना आरम्भ करनेपर जैसे वह पूर्वार्द्ध पूर्व में अध्ययन किया हुआ होनेके कारण बहुत ही शीघ्र हो जाय, परन्तु उत्तरार्द्धके पढनेमें विलम्म प्रतीत हो ऐसे ही तुम्हारा पूर्वकृत साधन योड़े ही अभ्याससे प्रकट हो गया था। गढ़े हुए अशात धनके मिल जानेके समान तुम्हारे पूर्वप्राप्त परन्तु अज्ञात साधनके अकस्मात् प्रकट हो जानेसे तुम्हें साधन तथा स्थिति बहुत बढता हुई मालूम हुई थी। यही गत वर्ष और इस वर्षकी स्थितिमें अन्तर प्रतीत होने का कारण है। साधन न तो रुका है और न गत वर्षकी अपेक्षा, जितनी तुम समझते हो उतनी चाल ही कम हुई है। जो कुछ चाल कम हुई है उसका कारण यह है कि गत वर्ष अधिक लाभमालूम होनेसे हर्पके कारण उत्साह वढ गया था। जिससे साधनमें विशेष तेजी हुई थी, इस वर्ष लाभ कम समझनेसे उतने उत्साहसे चेशश नहीं हुई [९९ में परमार्थ-पत्रावली तथापि साधन तो बढ़ा ही है। परन्तु जैसे किसी सन्निपातके रोगीका सन्निपातदोष मिट जानेपर यदि उसके पेट में किञ्चित् दर्द रह जाता है तो वह वैद्यसे कहता है कि मेरा पेट दुखता है, अच्छा नहीं हुआ। इसपर वैद्य कहता है कि भाई ! तुम्हारा प्रधान रोग तो मिट गया, मामूली पेट दुखता है, इसके लिये क्या चिन्ता है ? तुम्हारी भी ऐसी ही अवस्था समझनी चाहिये। तुमने लिखा कि 'अव देर क्यों हो रही है' सो देर इस- लिये होती है कि साधक देरको सह रहा है। यदि साधकको प्रभुका वियोग इतना असह्य हो जाय कि उसके प्राण निकलने लगे, तो फिर मिलनेमें तनिक भी विलम्व नहीं होता । जवतक साधक परमात्माका न मिलना वरदास्त कर रहा है, जवतक भगवान्के विना उसका काम चल रहा है, तबतक भगवान् भी देखते हैं कि इसका कास तो मेरे विना चल ही रहा है, फिर मुझे ही इतनी क्या शीव्रता है । जिस दिन भगवान्के विना साधक नहीं रह सकेगा, उस दिन भगवान् भी भक्तके विना नहीं रह सकेंगे, क्योंकि भगवान् तो परसदयालु हैं । विलम्ब भगवान्- को चाहने में है, पानेमें नहीं। वास्तवमें उसके मिलने में देर तुम्हीं कर रहे हो। तुमने लिखा कि 'मेरा साधन, प्रेम तथा बल पहले भी ऐसा हीथा'लोयह वात ठीक नहीं है। साधन, प्रेम और वल पहले भी वढ़ा था और अबतक वह उत्तरोत्तर बढ़ रहा है। तुम्हें प्रतीत नहीं १०० ] परमार्थ पत्रावली होता। जो कुछ वल प्राप्त हो जाता है, नि:स्वार्थ और निप्काम- भावकी जो कुछ पूँजी होती है, वह कभी कम तो होती ही नहीं, उत्तरोत्तर बढ़ती है। साधक चाहे तो उसे बहुत बढ़ा सकता है। जैसे घुटाली (सोना गलानेकी घडिया) का जितना स्थान सोनेसे भर जाता है उतना तो कभी नाश नहीं होता, वाकी खाली स्थानको सोनेसे भर देनेको आवश्यकता है । (दृशान्त) सोनातपानेवाले लोग सोना गलाकर शुद्ध करने के लिये, असली सोना, इधर-उधर विसरा हुआ सोना तथा दूसरी धातुओंमें और कूड़े-करकटमें मिला हुआ सोना, उन सब चीजों के साथ ही घुटालीमें डालकर, उसके साथ सुहागा मिलाकर थागपर चढा देते हैं और आगको फेंकनीसे लगातार फेंकते रहते है कि जिससे वह आग कभीवुझती नहीं, प्रत्युत उत्तरोत्तर अधिकतासे प्रचलित होती रहती है । अग्निके तापसे घुटालोके अन्दर पड़ा हुआसोनासुहागेको पुटसे तपकर, अपनीखाभाकिशुद्धताको प्राप्त होता हुआ, अपने भारीपनके कारण घुटालीके निचले भागमें जमा होता रहता है । उसके ऊपर सोनेमें मिली हुई अन्यान्य धातुएँ छंटकर जमा हो जाती हैं योर अत्यन्त हल्का होने के कारण कूड़ा-कर्कट सबसे ऊपर आ जाता है। इसके बाद अग्निके विशेष तापसे, अन्य धातु और कूड़ा -कर्कट तो जल जाते है और केवल तपा हुआ शुद्ध स्वर्ण उस घुटालीके निचले भाग- को रोककर स्थित रह जाता है । घुटालीके साली स्थानमें [१०१ परमार्थ-पत्रावली वारंबार ऊपरसे दूसरा सोना डलता रहता है, जिससे धीरे- धीरे सारी घुटाली तपे हुए शुद्ध सोनेसे भर जाती है । कूड़ा- कर्कट और अन्य धातुओका समूह या तो अन्दर ही जल जाता है या सोनेकी अधिकतासे घुटालीमें कहीं स्थान न पाकर, ऊपर- से तरकर नीचे अग्निमें पड़कर भस्म हो जाता है। सोनेको अन्य धातुओं और कूड़ेसे अलग करनेवाला सुहागा भी अपना काम करके भस्म हो जाता है। अन्तमें उस ऊपरतक भरी हुई. घुटालीमें जो रह जाता है, वही असली सोना है। उसीसे दरिद्रताका सदाके लिये नाश हो जाता है । यह एक दृष्टान्त है। इसका दार्टान्त इस प्रकार समझना चाहिये कि घुटाली साधक- का हृदय है । निष्काम भजन, ध्यान, सेवा और सदाचारादि असली सोना है और काम, क्रोध, अज्ञान, संशय, विषयासक्ति, प्रमाद, अभिमान और आलत्य ये आठ प्रकारके दोष दूसरी धातु हैं । संसारके चित्रों का चिन्तन कूड़ा-कर्कट है। तत्त्वज्ञान अग्नि है,सत्संग उस अग्निको बढ़ानेवाली वायुकी फूंकनी (धौंकनी) है, शास्त्रोंका विचार सुहागा है और परमात्माके अभावका ज्ञान ही उस घुटालीका खाली स्थान है। साधकके हृदयरूपी घुटाली- में निष्काम भजन, सेवा और सदाचारादि स्वर्णके साथ काम- क्रोधादि दोपरूपी अन्य धातु और संसारके चित्ररूपी कूड़ा- कर्कट भी पड़ते जाते हैं, परन्तु सत्संगरूपी वायुकी फूकनीसे बढ़े हुए तत्त्वज्ञानरूपी अग्निके तापसे और शास्त्रोके विचाररूपी १०२] परमार्थ-पत्रावली सुद्दागेकी सहायतासे, हृदयरूपी घुटालीका निचला भाग निष्काम भजन, ध्यान, सेवा और सदाचारादिरूपी शुद्ध तपे हुए स्वर्णसे भर जाता है। काम-क्रोधादि दोषरूपी अन्यान्य धातु और संसारके चित्रचिन्तनरूपी कड़ा-कर्कट जल जाते हैं । शास्त्रविचाररूपी सुहागा भी स्वर्णको शुद्ध करके स्वय लुप्त हो जाता हे । तर केवल निष्काम भजन, ध्यान, सेवा और सदा- चारादिरूपी शुद्ध सोना ही अवशेष रह जाता है । इस तरह साधकके हृदयका जितना-जितना स्थान निफाम भजनादिसे भर जाता है, उसका तो कभी नाश नहीं होता। परन्तु उस हृदयरूपी धुटालीका जितना स्थान परमात्माके अभावशान- रूपी गून्यतासे खाली पड़ा है यह जरतक नहीं भर जाता, तर- तक अमानरूपी दरिद्रताका सर्वथा नाश नहीं होता। जैसे कलकत्ता जानराले किसी यात्रीके पास यदि किरायेके रुपयों में- से कुछ भी कम हो तो उसे पास कलफत्तेका टिकट नहीं मिलता।जिनने पैसे कम होंगे उतना ही इधरका टिकट मिलेगा। अपने गन्तव्य स्थानतकके टिक्टके लिये तो भाइके पूरे पैसे चाहिये । इसी प्रकार साधकका हृदय भी जहाँतफ पूरा नहीं भर जाता वहाँतक उने भगवत्प्राप्ति नहीं हो सकती। जितना स्थान पाली रहता है उतना ही वह परमात्मासे इधर रह जाता है। यरूपी घुटालीको ऊपरतक भर देनेके लिये वारंवार म्यर्ण डालना चाहिये और उसे तपाकर शुद्ध करनेके लिये तत्त्वमानरूपी अग्नि और उस अग्निको प्रवल रसनेके लिये [१०३ परमार्थ-पत्रावली सत्संगरूपी वायुकी कनी तथा काम-क्रोधादिरूपी धातुओं और संसारके चित्ररूपी कूड़े-कर्कटको अलग करनेके लिये शास्त्र-विचाररूपी सुहागा डालते रहना चाहिये । ये सभी काम बरावर होते रहने चाहिये । इन सबमें निष्काम भजन, ध्यान, सेवा और सदाचारादिरूपी वर्ण और सत्संगरूपी वायुकी फॅकनीको प्रधान समझना चाहिये । केवल स्वर्ण ही न हो और सब बातें हो तो उससे दारिद्य दूर हो नहीं सकता। स्वर्णके हुए बिना तो वायुकी कनीरूपी सत्संग भी क्या कर सकता है ? औषध लिये विना वैद्यकी सलाहसे क्या हो सकता है ? इसलिये निष्काम भजन, ध्यान, सेवा और सदाचारादिकी तो नितान्त आवश्यकता है परन्तु सत्संगरूपी वायुकी फूंकनी न हो, तो तत्त्वज्ञानरूपी अनिके शान्त होनेका भय रहता है । इस- लिये सत्संग भी प्रधान ही है। यद्यपि यह अग्नि एक बार जलनेपर सहजमें बुझती नहीं, कभी बुझती है तो सारी दूसरी चीजोंको जलाकर केवल शुद्ध स्वर्णके रह जानेपर ही वुझती है और न सहजमें यह सत्संगरूपी वायुकी कनी ही रुकती है। साधारण अग्नि तो केवल सोनेको तपाकर शुद्ध ही करती है; परन्तु यह तत्त्वज्ञानाग्नि तो स्वर्णकी उत्तरोत्तर वृद्धि में सहायक होती है । इस प्रकार वह हृदयरूपी घुटाली तपे हुए शुद्ध स्वर्णसे परिपूर्ण हो जाती है। निष्काम भजन, ध्यान, सेवा और सदा- चारादिसे हृदयका भर जाना ही भगवत्-प्राप्ति है । जैसे ग्रासों- १०४] ।

परमार्थ-पत्रावली के भरनेसे पेट भर जाता हे इसी प्रकार इस स्वर्णके भर जानेमें ही भगवत्-प्राप्ति है, फिर खाली स्थान किञ्चित् भी नहीं रह जाता । एक सच्चिदानन्दघन परमात्मा ही परिपूर्ण हो जाता है अतएव उपर्युक्त दृष्टान्तके अनुसार निरन्तर पूर्णरूपसे तत्पर रहकर, भगवत्प्राप्तिके लिये यत करना चाहिये । तुमने लिखा कि 'साधनकी उन्नतिमें मेरा वल और प्रेम कुछ भी नहीं था, जो कुछ हुआ सो प्रभुके अद्भुत अनुग्रहसे ही हुआ, सो यों ही मानना उत्तम है । विशेष अशम बात भी यही है। भगवत्-प्राप्तिमें पुरुपार्थ प्रधान है। पुरषार्थके होनेमें भग- वान्को कृपा प्रधान है ओर भगवान्की कृपा सब जीवापर निरन्तर है, लाभ उसीको होता है जो उसको मानता है। जैसे किसीके पास पारस पत्थर है एवं पारसके स्पर्शसे चाहे जितना लोहा सोना बनाया जा सकता है और दरिद्रता दूर की जा सकती है परन्तु यदि कोई पारसको पारस ही न माने तो इस में पारसका क्या दोप हे ? पारसको पारस समझनेसे ही लाभ है, यही दशा भगवत्-कृपाको हे। इसलिये भगवत्की कृपा माननेम ही परमलाभ है। सत्संगसे भगवान्का प्रभाव जाना जाता है । भगवान्का प्रभार जाननेसे भगवत्-कृपाका अनुभव होता है, भगवत्कृपासे भगवत्प्राप्तिके लिये पुरुषार्थ बढता है ओर पुरुषार्थसे भगवत्प्राप्ति होती है। तुमने लिखा कि 'नित्याभियुक्त हुए विना योगक्षेमका वहन [१०५ परमार्थ-पत्रावली प्रस्तुत हैं । परन्तु प्रेम लेनेवालेकी तत्परता असली होनी चाहिये। जय परमात्माके लिये लज्जा, भय, धर्म, नीति, योग्यता, अयोग्यता, संकोच, धन: मान, अपमान, परिवार और पुत्रादि सवको भूलकर, केवल उसे हो पाने के लिये अत्यन्त उत्कण्ठा होती है, तब उसके प्राप्त होनमें विलम्ब नहीं होता ! उपर्युक्त प्रायः सारीही वातोंका त्याग जानकर नहीं करना चाहिये। जान- कर त्यागले तो उलटा दोष आता है। ऐसा करना तो प्रमाद और दम्भ है। परन्तु प्रेमको विहलतामें किसी प्रकारका ध्यान ही न रहनसे जब इनका स्वतः ही त्याग हो जाता है तभी वह प्रेम- का त्याग कहलाता है। जैसे श्रीविदुरजीकी स्त्री प्रेमको प्रगाढ़ता- में योग्यता-अयोग्यताको भूल गयी थी । जैसे परम भकिमती गोपियाँ भगवान्के प्रेममें विह्वल होकर घर, द्वार, पति; पुत्र, लोक, लज्जा, मान, अपमान, धर्म और भयादि सबको त्यागकर परमात्मा कृष्णके परायण हो गयी थी। गोपियों ने जान-बूझकर ऐसा नहीं किया था। भगवानम उनका आत्यन्तिक प्रेम ही इस- में एक कारण था । इसीलिये भगवान्ने कहा है कि मेरा प्रभाव केवल गोपियाँ ही जानती हैं । इस भावके जितने अंशमें त्रुटि है, उतने ही अंशमें प्रेमदानमें विलम्ब समझना चाहिये । प्रेम जो चाहता है उसे ही मिलता है। विना चाहे जबरदस्ती प्रेमदान देने का भगवान्का नियम नहीं है । यदि ऐसा होता तो अबतक सभी जीव मुक्त हो गये होते । भगवान्के अवतार भी ऐसा नहीं १०८] सामर्यके परमार्थ पत्रावली करते । यदि करते तो उनके सामने ही उनके समयके सभी लोगोंको प्राप्ति हो गयी होती। क्योंकि चे यों तो कह ही नहीं सकते कि मुझमें जबरदस्ती प्रेमदान करनेका सामर्थ्य नहीं है। परन्तु पेसे गले पड़कर मुक्त करनेका उनका कानून नहीं है। भक्तोंमें अवश्य ऐसी विशेषता होती है और भक्त लोग अपने अनुसार चेष्टा करते ही हैं । यह कानून तो उन लोगों पर लागू होता है, जो या तो जीवोंके उद्धारके लिये भगवानसे सुली परवानगी (पूरा अधिकार) पा चुके हों या जिनके केवल दर्शन, स्पर्श, चिन्तन ओर भापणसे ही जीवांग कल्याण होता हो । जैसे भक्त प्रहादजी और बङ्गालके श्रीचेतन्यमहाप्रभु आदि हुए। इसीलिये भगवान्मे भी भक्तों की विशेषता है । तुलसीदास- जीने रामायण में कहा है- मोरे मन प्रभु अम विमवासा । रामते अधिक राम कर दासा ॥ राम मिधु धन सजन धीरा । चदन तरु हरि सत समीरा ।। अथवा कारक पुरुषोंपर यह कानून लागू होता है । कारक पुरप उनको कहते है, जो क्रममुक्तिद्वारा भगवान्के परमधाममें पहुँच जानेके बाद, भगवान्को आशामे केवल जीवोंके उद्धारार्थ ही परमधामने जगत्में आते हैं, जैसे व्यास, वशिष्टादि । अतएव भगवान्का जबरदस्ती प्रेमदान करनेका कानून नहीं है। * * * * * [१०९

[३३]
भजन, ध्यान कम होनमें तुमने जो हेतु दिखाया सो ठोक
ही अनुमान किया गया । परन्तु दृढ़ पुरुषार्थके अभ्याससे
सञ्चित कर्म और आलस्य भी नाश हो जाते हैं । इसलिये
सामर्थ्यके अनुसार पुरुषार्थ करनेकी और भी विशेष चेष्टा करनी
चाहिये । तुमने लिखा कि भजन, ध्यान और सत्सङ्गकी चेष्टा
जितनी होनी चाहिये उतनी नहीं होती, सो ठीक है, इसके होने-
में पुरुपार्थ ही प्रधान है । तीव्र पुरुषार्थ करते-करते ज्यों-ज्यों
सञ्चित पाप नाश होते हैं त्यों-त्यों अन्तःकरण भी शुद्ध होता
जाता है । अन्तःकरण शुद्ध होनेसे दृढ वैराग्य होकर शीघ्र ही
भगवत्प्राप्ति हो जाती है।
भगवान्के प्रभाव, स्वभाव, गुण और लक्षणके विषयमें मैं
क्या लिखू ? यद्यपि इस विषयमें किसीका भी सामर्थ्य नहीं है,
तो भी अपनी समझके अनुसार, संक्षेपसे अपना ही भाव लिखा
जाता है।
अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन् ।
प्रकृति स्वामधिष्ठाय संभवाम्यात्ममायया ॥ (गीता ४ । ६)
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् ।
धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि
संभवामि युगे
युगे युगे ॥ (गीता ४ । ८)
सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ।। (गीता १८ । ६६)
व्रज ।
.११०]

परमार्थ-पत्रावली
इत्यादि श्लोकोंमें उनके प्रभावका विषय लिखा है।
ये यथा मा प्रपद्यन्ते तास्तथैव भजाम्यहम् ।
मम वरानुवर्तन्ते मनुष्या पार्थ सर्वश ॥ (गीता ४ । ११)
सुहृद सर्वभूताना ज्ञात्वा मा शान्तिमृच्छति ॥ (गीता ५ ॥ २९)
तेषा सततयुक्ताना
भजता प्रीतिपूर्वकम् ।
ददामि बुद्धियोग त येन मामुपयान्ति ते ॥ (गीता १०१०)
तेपामेनानुकम्पार्थमहमज्ञानज
नाशयाम्यात्मभानस्थो ज्ञानदीपेन भाखता ।। (गीता १०१११)
इत्यादि श्लोकोंमें उनके स्वभावका विषय लिखा है और
गुण तो अपार है।
धृति क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रह ।
धीविद्या सत्यमक्रोवो दशक धर्मलक्षणम् || (मनु०६ । ९२)
तेज क्षमा वृति शोचमद्रोहो नातिमानिता ।। (गीता २६ । ३)
सत्य दमस्तप शौच सतोपो हो क्षमार्जनम् ।
ज्ञान शमो दया ध्यानमेष धर्म सनातन ॥
इत्यादि श्लोकोंका भार सनातन धर्मका म्वरूप है ओर
यही सद्गुण माने गये हैं। परमात्मामें ये गुण स्वाभाविक होते
है। इसी प्रकार और भी अपार गुण है ओर वे सब भगवान्में
परिपूर्ण है।
कवि पुराणमनुशासितारमणोरणीयासमनुस्मरेद्य ।
सर्वस्य धातारमचिन्त्यरूपमादित्यवर्णतमम परस्तात्।।(गीता ८१९)
[१११

ये
परमार्थ-पत्रावली
त्वक्षरमनिर्देश्यमव्यक्तं . पर्युपासने ।
सर्वत्रगमचिन्न्यं च कूटस्थमाचलं ध्रुवम् ।। (गीता १२॥ ३)
वहिरन्तथ भूतानामचरं चरमेव च.।
सूक्ष्मवात्तदविज्ञेयं दूरस्थं चान्तिके च नत् !! (गीता १३ । १५)
वंशीविभूपितकरानवनीग्दाभात्यीताम्बरादरुणविम्बफलाधरोष्टात्
पूर्णेन्दुसुन्दरमुग्वादरबिन्दनेत्रात् कृष्णास्परं किमपि तत्त्वमहं न जाने ॥
शान्ताकारं भुजगशयनं पमनाभं सुरेश
विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्ण शुभाङ्गम् ।
लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभियानगम्यं
वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम् ।।
इत्यादि श्लोकोंमें भगवान्क साकार तथा निराकार
स्वरूपके लक्षण कहे गये हैं।
इसी प्रकार और भी जहाँतक समझमें आवे, प्रभाव अर्थात्
उनका सामर्थ्य, स्वभाव अर्थात् उनका आशय, सद्गुण
और
उनके स्वरूपको स्मरण रखते हुए, नामका उप किया जाय तो
वहुत ही लाभ हो सकता है। तुमने लिखा कि उनका सामर्थ्य
अर्थात् प्रभाव जाने विना; नाम-जपके समय उनका स्वरूप
कैसे
याद किया जावे, इसीलिये इस विषयमें कुछ लिखा गया है।
>
११२]

[३४] मंसारमें वैराग्य और भगवान्में प्रेम यहुत शीघ्र हो, इस विषयमें उपाय पूछा, सो भगवान्के गुणानुवाद, प्रभाव, रहस्य ओर प्रेमकी बातें पढने सुननेसे तथा नामका जप और स्वरूप- का ध्यान करनेसे, बहुत शीघ्र भगवान्में प्रेम और संसारमै चैराग्य हो सकता है। xxxx के ध्यानके विषयमें पूछा, सो मेरे अनु- मानसे कार्यकालमें गीता अ०१४।१९ के अनुसार द्रष्टासाक्षी- का ध्यान होता है और एकान्त समयमें संसारका अभाव और सचिदानन्दफा भाव तथा अचिन्त्यके ध्यानकी विशेष चेष्टा [ ११३ प०प०८ परमार्थ-पत्रावली रहती है। किसी समयमें चिन्तन होता है तो केवल आनन्दधन- का ही होता है । आनन्दघनको छोड़कर और स्फुरणा कमती होती है । व्युत्थान-अवस्थामें संसारकी स्फुरणा तथा संकल्प होता है, वह संसारका अभाव रखते हुए ही होता है। इस तरहकी अवस्था उनकी बातोंसे अनुमान की जाती है। मानसिक जपके विषय में समाचार ज्ञात हुए । जिस जपमें मन विशेष रहे, वही मानसिक जप कहलाता है । श्वासद्वारा होनेवाले जपसे नाडीद्वारा जपमें, नाडीद्वारा होनेवालेकी अपेक्षा केवल मनसे नासाक्षरोंके चिन्तन होने में और इसकी अपेक्षा भी केवल अर्थमात्रका ज्ञान रहनेमें मन अधिक लगा हुआ समझा जाता है । जितना-जितना मन अधिक लगता है, उतना उतना ही साधन तेज समझा जाता है, परन्तु श्वास तथा नाडीद्वारा होनेवाला जप भी कम नहीं समझना चाहिये । इस तरहके नाम-जपकी संख्या अधिक होनेसे परिणाममें उत्तम है। उपर्युक्त विधियों में जो आपको सुगम प्रतीत हो उसी तरह कर सकते हैं। चाहे जिस विधिसे भी हो, वास्तवमें निरन्तर होनेकी विशेष आवश्यकता है। जो साधन निरन्तर विशेष कालतक और आदरपूर्वक होता है, वही महत्त्वका समझा जाता है। आपने पूछा कि 'परवैराग्य' किस तरह हो, सो उपर्युक्त विधिके अनुसार भगवन्नाम-जप, उसके स्वरूप-चिन्तन, सत्सङ्ग और तीव्र अभ्याससे हो सकता है । 'परवैराग्य' का स्वरूप ११४ ] परमार्थ-पत्रावली 'परम पुरुष परमात्माका ज्ञान' और उसका फल 'परम पुरुष परमात्माकी प्राप्ति' है । आपने अपने पुरुषार्थकी त्रुटि बतलायी सो नहीं रहनी चाहिये, क्योंकि इस विषयमें पुरुषार्थ ही प्रधान है और पुरुषार्थहीनका उपाय परमात्मा भी नहीं करते, यदि करते तो आजतक कर ही देते। आपने लिखा, मेरा सारा समय निरन्तर साधनमें ही कैसे व्यतीत हो, सो ठोक हे । ससारमें वैराग्य और भगवान्में प्रेम रहनेसे ऐसा हो सकता है । जबतक ऐमा नहीं होता तरतक ध्यान अमृतरूप नहीं भासता । ध्यान अमृतरूप प्रतीत होनेके याद तो ध्यानका तार टूट ही कैसे सकता है ! सर्वदा भगवत्- स्वरूपका ऐसा निश्चय रहनेमे ही परमेश्वरके म्वरूपमें निरन्तर स्थिति रह सकती है | जितना जितना भगवान्के अस्तित्वका विश्वास होता जायगा, उतनी उतनी ही उसे भगवत् प्राप्ति सम- अनी चाहिये । वैराग्यकी वृद्धि होनेसे ही सव समय पकरस स्थिति रह सकती है, इसके समान और कोई उपाय देसनेमे नहीं आता । इसलिये मजन और सत्सङ्गके तीन अभ्यासकी ही चेष्टा करनी चाहिये। आपन लिखा, स्वामी श्रीस्वयज्योतिजी महाराजका दर्शन करनेसे वैराग्य उत्पन्न होता हुआ प्रतीत होता है, परन्तु सव समय एक तरहकी अवस्था नहीं मालूम होती, सो ठीक है। [ ११५ परमार्थ-पत्रावली अन्तःकरण विल्कुल शुद्ध होनेसे-केवल सत्त्वप्रधान अन्त:- करण होनेस-एकरस अवस्था रह सकती है। अन्तःकरणमें वैराग्य उत्पन्न होनेके लिये, कोई विशेष उपाय पूछा, सो नाम-जपका तीव्र अभ्यास करना चाहिये और भक्ति, वैराग्यके शास्त्रोका अभ्यास तथा सत्पुरुषोंका संग करना चाहिये। पहले एक वार आपने पूछा था कि आसक्तिके बिना जब संसारकी चात सुनी जाती है तव चीच-बीच में बोलना पड़ता है, फिर मनमें व्यर्थ वातोंकी फुरणा हो जाती है, इसके लिये कोई उपाय करना चाहिये, सो बात तो यह है कि जिसको व्यर्थ बातोंमें वैराग्य होता है, वह तो उन्हें सुनता ही नहीं, यदि कोई सुनी जाती है तो वह उसके मनमें ठहरती नहीं, इससे इसका उपाय करनेकी कोई आवश्यकता नहीं। सच्चिदानन्द भगवान् ही सर्वत्र परिपूर्ण हो रहा है। उस आनन्दघनके अस्तित्वका ज्ञान भी उस आनन्दमय भगवान्को ही है । भगवान् अपने स्वरूपमें ही सदा स्थित हैं, इस तरह किसी समय प्रत्यक्षकी ज्यों प्रतीत होता है, 'मैं' का अभाव प्रतीत होता है, 'मैं हूँढ़नेपर भी नहीं मिलता, पर सर्वदा एक तरहका भाव नहीं रहता । इसके लिये आपने उपाय पूछा, सो 'मैं' का नाश ही उपाय है । उपर्युक्त आनन्दधनकी स्थितिके समय 'मैं' क्षीण तथा हल्का होता है। 'मैं' सर्वव्यापी साक्षी चेतनमें छिपा हुआ है । यदि ढूँढ़नेपर भी ११६ ] परमार्थ-पत्रावली 'मैं' न मिले, तो उस समय ढूँढनेवाले ज्ञातामें भी 'मे' व्यापक समझा जाता है। 'मैं' का अत्यन्त प्रभाव हो जाने के बाद इसको ढूँढनेका संकल्प भी नहीं होता । फिर 'मैं' को किस प्रयोजनके लिये कौन हूँढ़े इस पत्रका कोई समाचार आपके समझमें न आवे तो मिलनेपर पूछना चाहिये । आपने लिसा कि, ऋषिकेशके साधनके विषयमें पूछा, सो यत्किञ्चित् साधन है, वह आपके सामने ही है। यदि कुछ लिखने योग्य साधन होता तो लिया जाता सो आपका लिखना ठीक है परन्तु आपने लिखा कि 'जो कुछ साधन हे सो आपके सामने ही है,' सो कैसे लिखा १ मे अन्तर्यामी थोड़े ही है? तेज ध्यान होनेके कारण, xxxx का जन्म सफल हुआ लिसा, सो ठीक ही है । 'सफल' शब्दसे भगवत्प्राप्तिकी कामना मालूम होती है। पर भगवत्प्राप्तिरूप फलको इन्छा दोप- युक्त नहीं है, इससे 'सफल' श द में भी लिख दिया करता हूँ। आपने पूछा कि xxxxx की कोठरीमें और नदीके किनारे जैसा ध्यान होता था, उससे श्री xx xxx ध्यान तेज लिया, सो उनके ध्यानमें केवल निरन्तरता ही विशेप है या और भी कुछ विलक्षणता है सो निरन्तरता तो विशेष हे ही पर कुछ विलक्षणता भी है, है, वह यत्किञ्चित् पत्रद्वारा लिसनेका विचार हे और विशेष- रूपसे मिलनेपर बताना ठीक है। जो सचिदानन्दधनका ध्यान है, सो ही सच्चिदानन्द भग- [ १९७ परमार्थ-पत्रावली वान्का स्वरूप है । ध्यान जिसका किया जाता है सो अमृत- रूप है । उस समय ध्यान ही साक्षात् अमृतमय हो जाता है तथा केवल अर्थमात्र ही रह जाता है और ध्याता, ध्यान, ध्येय- रूप त्रिपुटी है ऐसा कहना नहीं बनता; अमृतका झान, अमृत- स्वरूप परमात्माको ही है, फिर अमृतमयकी इच्छा किसको हो? साधनकी चेष्टाके विषयमें आपने लिखा कि, मेरे पुरुषार्थ- से तो कुछ हो नहीं सकता, वह परमात्मा ही सामर्थ्यवान् है, अब भी जो कुछ साधन बनता है, उसमें मेरा क्या पुरुषार्थ है ? सो ठीक है, इसी तरह मानना चाहिये । पर पुरुषार्थ-चेष्टा करके साधन-करते रहना चाहिये और इसमें भी प्रभुको ही प्रेरणा माननी चाहिये, जिससे कभी अहन्ता न आवे । यदि प्रभु विना पुरुषार्थ किये ही दया करके अपनी कृपाले उद्धार कर देते, तो दया तो उनकी सदाले ही है. पर बिना चेष्टा किये, परम पुरुषार्थ किये, किसीको भगवत्प्रानि नहीं होती, भगवत्प्राप्ति अपने पुरुषार्थ- से ही होती है और वह पुरुषार्थ भगवत्प्रेरणाले ही होता है। भगवत्की कृपा सबके ऊपर है, परन्तु कृपा माननेसे ही कृपा फलीभूत होती है । श्वासद्वारा भजन होता है, उसमें मन रहता है, पर मानसिक अर्थात् जो केवल मनसे ही चिन्तन किया जाय, वही जप मानसिक समझा जाता है। श्वासद्वारा होनेवाला जप भी बहुत उत्तम है, उससे भी वासनाका वहुत नाश होता है, इससे अन्तमें, परिणाममें यह भी वहुत उत्तम है ११८ ] - [३५] हर समय शरीर, प्राण, मन, बुद्धि और इन्द्रियोंमसे 'म' को हटानेकी चेष्टा करते रहना चाहिये । वरावर पयाल रसना चाहिये कि शरीरादि में नहीं हूँ, मे इनसे पृथक हूँ, में इनका द्रष्टा हूँ। श्रीसच्चिदानन्दधन परमात्मा ही तेरा स्वरूप है, उसीमें 'मैं' भाव करना चाहिये । व्यवहार कालम तथा बोलनेके समय भी शरीरमें 'मैं' भाव नहीं होने देना चाहिये । खयाल रखना चाहिये कि शरीरमें 'मे' भाव आने ही न पावे। इसके साधनमें यह युक्ति है, द्रणा बनकर शरीरको देसनेमे शरीरसे 'मैं' भाव हटता हे। वोलनेके समय खयाल रखकर वीच बीचमें ठहरता रहे तो इसका स्मरण बना रहता है। स्त्री, पुत्र, धन और सम्पूर्ण विषय भोगाम सुग नहीं है। यदि वास्तरमे इनमें सुस हो तो इनके रहते हुए दुख होना ही न चाहिये । पर जिन पदार्योंके रहते भी दुप होता है, उनमे सुख नहीं है यह सिद्ध है। सुप तो विचार, शान्ति और सन्तोपमें ही है। .

[३६]
आपने पूछा कि 'लोगोंका उद्धार बहुत ही जल्दी हो जाय
तथा सव भगवान्के प्रेमी भक्त बन जाय, इसके लिये हमें
तत्परतासे क्या पुरुषार्थ करना चाहिये ?' मैं इसका उपाय क्या
बतलाऊँ ? इसका उपाय तो जो प्रहादकी भाँति भगवान्के
परम भक्त हैं, वे ही जानते हैं। जिसके ध्यानसे, स्पर्शसे और
जिसकी चर्चासे, जीव भगवान्का परम भक्त बनकर उद्धारको
प्राप्त हो जाता है, वही निष्कामी, ज्ञानी और भक्तशिरोमणि है।
परन्तु आपने पूछा है, इसलिये अपनी बुद्धिके अनुसार उत्तर
लिखना योग्य समझकर लिखा जाता है ।
१२० ]

. परमार्थ-पत्रावली आपने अपना जो उद्देश्य दिखाया, मेरी समझमें वह उद्देश्य ही उत्तम उपाय है। भकोका यही उद्देश्य होना चाहिये। इस असार संसारमें भगवन्नाम-जप ही प्रेम, भक्तिकी वृद्धिके लिये मेरी समझसे श्रेष्ठ उपाय हे, मनुष्यजन्म पाकर जो भगवद्भक्तिकी चेष्टा नहीं करते, उन्हें घिकार है। लोगोंको भगवत्के भजन, व्यान, कीर्तनमें लगाना ही परम कर्तव्य हे, यही जीवनका उद्देश्य समझना चाहिये । जो इसी कामके लिये अपना जीवन समझता है, वही धन्यवादका पात्र है। जो अपना तन, मन, धन, सर्वस्व संसारके मनुष्योंको भगवद्भक्तिमें लगाने- के लिये ही अर्पित समझता है, उसे अर्पण करना नहीं पड़ता, उसके लिये सर्वस्व भगवान्का है और वह उसीके काममें लग रहा है। लोगोंको भगवद्गक्तिमें लगानेके लिये, वह अपने शरीर- की साल खिंचवानेमें भी सकोच नहीं करता । उसका जीवन लोगोंके उद्धारके लिये ही है। वह भक्तिके प्रचारके लिये प्रसन्नतापूर्वक अपने प्राणोंतककी आहुति दे डालता है। [ १२१ [३७] तुम्हारी स्त्री तथा घरके लोग सब तुमसे विशेष प्रसन्न नहीं हैं, इसलिये तुम्हें उनके साथ प्रेमका बर्ताव करना चाहिये। मेरा स्वभाव तो सबके साथ प्रेमके बर्तावका है। घरवालोंको जैसे आराम मिले और उनका मन राजी रहे, वैसे ही न्याययुक्त वर्ताव करना में उत्तम समझता हूँ, शरीरको तो घर और संसारके समस्त मनुष्योंकी सेवामें लगा देना चाहिये। सत्संगकी विशेष चेष्टा रखनी चाहिये । सत्संगके प्रताप- से नीच भी सुधर जाता है। भगवत्-भक्ति एक ऐसी उत्तम वस्तु है कि इसके समान और कुछ भी नहीं है। जो भगवान्का गुणानुवाद करते रहते हैं, वे ही धन्यवाद- के योग्य हैं। भगवत्कृपासे ही भगवत् चर्चा होती है। . १२२] [३८] आपने लिखा कि 'जो पहलेसे ही मोहजालमें फंसा हुआ है, वह स्वत कैसे निकल सकता है, इसलिये चाहे जैसे हो, यापको ही निकालना चाहिये।' सो निकालनेवाले श्रीपरमात्मा- देव है । निम्नलिखित श्लोकके अनुसार उस परमेश्वरकी शरण लेनी चाहिये, इससे बढकर भोर कोई उपाय नहीं है। तमे शरण गच्छ सर्वभावेन भारत | तप्रसादात्परा शान्ति स्थान प्राप्स्यसि शाश्वतम् ।। (गी० १८१६२) 'हे भारत सब प्रकारसे उस परमेश्वरकी ही अनन्य- शरणको प्राप्त हो, परमात्माको कृपासे ही परम शान्तिको और सनातन परमधामको प्राप्त होगा।' इस शरणके लिये सत्सग करना चाहिये। मत्सगका मर्म जाननेके बाद एक पल भी सत्मग छूटनेसे पड़ी हानि जान पड़ती हे, सत्सगके समान ओर कुछ नहीं दीयता । ससारके विषय भोग अच्छे नहीं लगते । सत्संग करनेके समय पढ़ा आनन्द होता है, अश्रुपात भी होते है और गरयार रोमाञ्च होता है। जबतक ऐसी अवस्था न हो, तबतक समाना चाहिय कि नास्तविक सत्सग नहीं हुआ और न उसका मर्म ही जाना। [ १२३

[३९]
तुम्हारे घरके लोग, तुमसे प्रेम करें इसकी चेष्टा करना
ही में ठीक समझता हूँ। आसक्ति विना भी दूकानका काम
बहुत अच्छी तरहसे होनका उपाय आगे लिखा ही था। उसी
तरह करनेकी चेष्टा करनी चाहिये । तुमने पूछा कि 'भगवान्के
भजनमें किस तरह प्रेम हो', सो भगवान्के भजनका प्रभाव
जाननेसे तथा उनमें श्रद्धा होनसे प्रेम होता है। भगवान्में
जिनकी श्रद्धा है, उनका संग करनेसे श्रद्धा वढ़ती है। भजन
करनेवालोंका संग करनेसे भजन, ध्यान अधिक होता है और
प्रेमी भक्तोंका संग करनेसे तथा उनकी लिखी बातोंको पढ़नेसे,
भगवान्में तथा उनके भजनमें प्रेम हो सकता है । किसी वस्तुकी
आवश्यकता हो, तो वह वस्तु जिसके पास हो उसका तथा उस
वस्तुका संग करनेसे ही, उल वस्तुमें प्रेम तथा उसकी प्राप्ति
हो सकती है।
यदि मनुष्य प्रेम और उत्कट इच्छासे किसीका संग
करता है, तो तदनुसार उसका भाव अवश्य ही हो जाता है
और भजन होते हुए ही सांसारिक काम जितना हो सके उतना
करनेकी चेष्टा अवश्य रखनी चाहिये।
१२४ ]

[४०]
आपने लिखा कि 'श्रीपरमात्मा तथा श्रीगुरुदेवकी चड़ाई
करे, वही धन्यवाद देने योग्य है, तथा श्रीपरमात्मा और श्री.
गुरुदेवके वचनोंमें श्रद्धा होने के बाद कैसा ही पापी क्यों न हो,
उसका कल्याण हो जाता हे',सो आपका लिपना बहुत ही ठीक
है। श्रद्धा होनेके बाद तो कुछ भी बड़ी बात नहीं है। श्रीपरमात्मा
देव तथा गुरुदेवमें श्रद्धा (विश्वास) होनेके बाद तो वह और
भी बहुत-से मनुष्योंका कल्याण करने योग्य बन जाता है।
आपने लिसा कि 'परमात्मामें श्रद्धा होकर कल्याण हो,
ऐसा उपाय होना चाहिये', सो ठीक है, उपाय होला कुछ भी
बड़ी बात नहीं है। यदि उपाय करना हो तो करना चाहिये ।
भगवान्की तरफसे तो कुछ विलम्ब है ही नहीं । जिस मनुष्यको
श्रीपरमात्मादेवके मिलनेका उपाय करना होगा, चाहे जिस
तरह हो वह तो उनके ही परायण हो जायगा, फिर वह भगवान्-
के समान कुछ भी नहीं समझेगा। ऐसा होनेपर उसके लिये
उपाय कुछ भी कटिन नहीं है।
[१२५
.

परमार्थ-पत्रावली आपने लिखा कि 'परमात्मादेवमें मेरी श्रद्धा होनी चाहिये', सो ठीक है, यदि श्रद्धा चाहें. तो सर्वस्व भगवानके अर्पण करने- से हो सकती है और नहीं चाहें, तब इस तरह लिखना बनता नहीं। आपने एक स्थानमें लिखा कि 'मैं नो श्रीगुरुदेवकी सभा- में छोटे-से-छोटा साधन करनेवाला हूँ', फिर दूसरे स्थानमें लिखा कि 'मेरा साधन कुछ भी नहीं है. सो इन दो प्रकारका बातोका क्या मतलब है तथा श्रीगुरुदेवकी सभा कौन-सी है, कि जिसमें आप छोटे-से-छोटे साधनघाले है ? साधन तो छोटा होता है. वह भी उत्तम ही है। छोटे साधन ही बड़ा साधन हुआ करता है। जाय, आपने लिखा कि 'मेरे सजन-साधनके भरोसे तो उद्धार होना कठिन है। यदि कोई नीच-से-नीच भी महान् पुरुपोंके पास तो वे उसे स्वीकार कर लेते हैं, इसी प्रकार यदि हो तो मेरा भी उद्धार हो सकता है, सो टोक है। महात्मा तो दयालु होते हैं, उनके तो दर्शनसे भी उद्धार तथा कल्याण होना चाहिये, फिर पास जानेके बाद तो बात ही क्या है ? सच्चे महात्मा तो प्राप्त होने ही कठिन है, मिल जायें तो बड़े आनन्दकी बात है। महात्माकी शरण लेनेके बाद तो भजन-ध्यान होनेमें कुछ भी कठिनता नहीं रहती और स्वभाव भी स्वतः ही सुधर जाता है। १२६ [४१] आपका ध्यान कैसा होता है ? सञ्चिदानन्दघनमें हर समय इस प्रकारसे ध्यान रखना चाहिये । 'म' का विल्कुल अभाव होना चाहिये और अपने शरीरको तथा संसारको आनन्दमें कल्पित देखते हुए उसे मिथ्या समझकर उसका संकल्प ही छोड़ देना चाहिये। शरीरकी सुधि नहीं रहनी चाहिये। जब मे या तब हरि नहीं, अब हरि है मैं नाहि । कबिरा नगरी एकमें, राजा दो न समाहि ॥ 'जो कुछ हे एक सच्चिदानन्दधन ही है ऐसा यान छोड- कर जो मनुष्य मिथ्या ससारकी वस्तुओंके चिन्तनमें अपने मनको लगाता है यह महा मूर्य हे। मिथ्या नाशवान् वन्तुओं- का क्सिलिये स्मरण करना चाहिये ? जो पूर्ण आनन्द हृदयमं समाता नहीं, उसका हर समय ध्यान करनेमे ध्याता स्वय भी आनन्दस्वरूप हो जाता है । 'मैं' भावका बिल्कुल नाश हो जानपर एक सच्चिदानन्दघन ही रह जाता है। मैं जाना मैं और था, मै तो भया अब सोय । 'म' 'ते' दोनों मिट गई, रही कहनको दोय ॥ [१२७ [४२] आपके क्या बीमारी है सो लिखना चाहिये । आपने लिखा कि 'श्रीपरमात्मादेव दस-चीस दिनोंमें आराम कर देंगे' सो भगवान्से इस तुच्छ शरीरके लिये प्रार्थना नहीं करनी चाहिये। क्योंकि ऐसा करनेसे भक्ति सकाम हो जाती है। भगवानसे माँगना ही चाहें तो उनके दर्शन माँगने चाहिये अथवा ऐसी वस्तु माँगनी चाहिये कि जिसके मिल जानेपर फिर कभी कुछ भी माँगना न पड़े। शरीर, स्त्री, पुत्र और रुपयोंके लिये इतने वड़े मालिकसे अर्ज़ नहीं करनी चाहिये । तुच्छ मिथ्या शरीर और भोग तो यहीं रह जायेंगे। महात्मा लोग कहते हैं 'मर भले ही जायँ पर अपने लिये भगवान्से कभी कुछ भी माँगें नहीं ! १२८

परमार्थ-पत्रावली
मर जाऊँ माँगू नहीं, अपने तनके काज ।
परमारथके कारणे, मोहि न आवै लाज ||
परमार्थ अर्थात् परमेश्वरके लिये मॉगने में कोई हर्ज नहीं।
अपने शरीरके लिये उस स्वामीसे कुछ कहना बहुत छोटी
चात हे।
नामका जप होनेसे ध्यान भी अपने आप ही हो जाता है।
राम-नामकी पूँजी असली धन हे, उसको मिथ्या काममें नहीं
लगाना चाहिये । कहा भी है-
कबिरा सब जग निरधना, धनवता नहि कोय ।
धनता सो जानिये, (जाके) रामनाम धन होय ॥
राम नाम अमूल्य रत है। उसे शरीरको आराम देनेवाले
संसारके भोगरूपी पत्थरोसे नहीं फोड़ना चाहिये । भगवान्से
मिथ्या वस्तु नहीं मॉगनी चाहिये ।
[२२९
प०१०९

[४३]
हर समय नाम-जपके साथ में नहीं, मैं नहीं' का अभ्यास
करना चाहिये। शरीरने 'मैं भाव निकालना चाहिये। नहीं तो
आगे चलकर मुश्किल है।
'मैं' 'मैं' बड़ी वलाय है, सको तो निकसो भाग ।
कब लग राखो रामजी, रुई लपेटी आग ॥
शरीर मिथ्या एवं नाशवान् है। यह रूईमें लपेटी हुई आग
कवतक रहेगी ? इसे शरीरसे जल्दी वाहर निकालनी चाहिये।
मिथ्या शरीरमें जो 'मैं' भाव आरोपित हो गया है, उसे
निकालनेमें देर न करनी चाहिये । संसारमें वहुत-से मनुष्य 'मैं'
१३०]

परमार्थ पत्रावली
'मेरे भावकी डोरीसे बंध रहे है, पर जिसके भगवान्का आधार
है उसको कोई बन्धन नहीं है।
मोर तोरकी जेरी, गल बाँधी ससार ।
दास कबीरा क्यों बवे, (जाफे) रामनाम आधार ।।
वन्धन हो तो यह भी छूट जाता है । अत उस परमात्मा-
का आश्रय इस प्रकार लेना चाहिये कि 'जो कुछ भी है।
भगवान् है' उस मालिकको प्राणोंसे भी बढकर मानना चाहिये ।
उसका गुणानुवाद तथा प्रभाव सुननेसे प्रेम वढता है।
प्रभाव सत्संगसे जाना जाता है इसलिये सत्संग करना चाहिये।
शास्त्रका अभ्यास करना चाहिये । हरिकथासे हरिम भाव वढता
है । भावमे मिलनेकी इच्छा बढ़ती है। इच्छा बढ़नेपर चेष्टासे
भजन ज्यादा होता है । मजनमे निष्काम प्रेम होकर भगवान्के
दर्शन होते है । महात्मा तथा भक्त इस तरह कहा करते हैं।
तुमने लिखा कि 'ससारकी आसक्तिके कारण तुमसे
विछोह हुआ है' सो भासक्ति तो सराय ही है। पर विछोहका
कारण मिलनेकी टान कम होना भी है।
भाई ! नामका जप, सत्सग, भगवान्का ध्यान तथा
भावसहित स्मरण, निष्काम भावने कर के प्रेम बढाना चाहिये।
फिर मिलना भले ही कम हो । प्रेमास्पदमें प्रेम चाहिये, प्रेम ही
प्रधान है | प्रेम न हो तो मिलनेका विशेष मूल्य नहीं।

[४४]
संसारमें रहकर शुद्ध हदय से काम किया जाय तो बहुत
अच्छी तरह काम चल सकता है। चतुर मनुप्योंके साथ
चतुराई की बातें करनेमें आपत्ति नहीं । आपत्ति है छल-कपट
करनमें, परन्तु हृदय शुद्ध हुए बिना व्यवहार शुद्ध होना बहुत
कठिन है। भजन-ध्यान करते हुए संसारका काम करनेसे पापका
नाश होनेपर, जब हृदय शुद्ध हो जाय तब कोई बाधा नहीं
होगी । जब धनका लोभ ही छूट जायगा तव उसके लिये
कपटकी आवश्यकता क्यों होगी ?
स्वार्थका त्याग करनेसे व्यवहार शुद्ध हो सकता है, परन्तु
व्यवहार (व्यापार ) अधिक करना ठीक नहीं। साधन बहुत
१३२]

परमार्थ-पत्रावली तेज हो जानेपर तो अधिक काम करने में कुछ हानि नहीं, परन्तु पहले विना शक्तिके अधिक काम नहीं करना चाहिये । भजन, ध्यान करते हुए जितना काम हो सके, उतना ही करना उचित है। आपने लिखा कि 'श्रीमद्गवद्गीतामें भगवान्ने अर्जुनको तथा योगवाशिष्टमे श्रीवशिष्ठजीने भगवान श्रीरामचन्द्रजीको गृहस्थाश्रम छोडनेका भाव दिसलाया हे', सो यह बात ठीक नहीं है ! यदि गृहस्थ छोडनेको कहा जाता तो अर्जुन और श्रीराम- चन्द्रजी उसे छोड़ देते । अर्जुन तो गृहस्थ छोड़नेको तैयार ही था भगवान्ने उपदेश देकर अर्जुनको युद्धमे प्रवृत्त किया। भगवान् कहते है- तस्मामपु कालेषु मामनुस्मर युध्य च । (गीता ८ । ७) 'तू सय समयमें निरन्तर मेरा स्मरण कर और युद्ध भी कर।' अन्यान्य स्थलोंमें भी भगवान्ने इसी आशयके वचन कहे है कि 'नि काम भानसे कर्म करता हुआ संसारमें विचर', 'मेरा ध्यान करता हुआ,मन बुद्धि मुझमें रयता हुआ स्वार्थको त्यागकर संसारमें कर्तव्य कर्म कर, मेरी कृपाग्ने तेरा उद्धार हो जायगा।' गृहस्थ छोडनेकी पात तो कहीं नहीं कही। आपने लिसा कि 'मेरे कुसंग नहीं हे मो यह तो मुझे भी मालूम है कि आपके बहुत बुरा संग नहीं है, परन्तु संसार, [१३३

परमार्थ-पत्रावली
संसारके पदार्थ:-भोग-धन और सांसारिक सुख देनेवाली
वस्तुओंका जो आप प्रेमसे चिन्तन करते हैं सो सव कुसंग ही
है। एक श्रीनारायणदेवके भजन, ध्यान और सत्संगको छोड़-
कर और सभी कुसंग है।
आपने लिखा कि 'सुग्रीव, उद्धव और अर्जुनके मित्र
बनकर भगवान्ने उनपर बहुत ही कृपा की । उनके समान और
किसीपर भी भगवान्की ऐसी कृपा नहीं हुई, इतना होनेपर भी
सुग्रीव, उद्धव और अर्जुनको ज्ञान नहीं हुआ। आपका यह
समझना गलत है । मैं तो यही मानता हूँ कि उन लोगोंको
अवश्य ज्ञान हो गया था। उनके अपने उद्धार होने में तो वात
ही कौन-सी है, बल्कि भगवान्के भक्त और लखाओंकी कृपा भी
जिसपर होती हैं, उसको भी ज्ञान प्राप्त हो जाता है और वह
इस असार संसार-सागरसे तर जाता है।
भगवन्नाम-जप, प्रेमाभक्ति तथा भगवत्-कृपासे मनुष्यका
उद्धार हो जाता है । भगवान् स्वयं ही उसे बुद्धियोग दे देते हैं ।
भगवान् कहते हैं-
मच्चित्ता मद्गतप्राणा बोधयन्तः परस्परम् ।
कययन्तश्च मां नित्यं तुष्यन्ति च रमन्ति च ॥
तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम् ।
ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते ॥(गीता १० । ९-१०)
१३४]

परमार्थ-पनावली
'वे निरन्तर मेरेमें मन लगानेवाले, मेरेमें ही प्राणोको
अर्पण करनेवाले भक्तजन सदा ही मेरी भक्तिकी चर्चा के द्वारा
आपसमें मेरे प्रभावको जनाते हुए तथा गुण और प्रभावसहित
मेरा कथन करते हुए ही सन्तुष्ट होते है और मुझ वासुदेवमें
ही निरन्तर रमण करते है। उन निरन्तर मेरे ध्यानमें लगे हुए
और प्रेमपूर्वक भजनेनाले भक्तोंको में वह तत्त्वज्ञानरूप योग
देता हूँ कि जिससे वे मेरेको ही प्राप्त होते हैं।'
आपने लिया कि 'कौन-सी कृपासे उद्धार हो सकता है।
सो नीचे लिखे श्लोकोंके अनुसार भगवानकी शरण ग्रहण
करनी चाहिये।
तमेव शरण गच्छ सर्वभावेन भारत ।
तत्प्रसादात्परा शान्ति स्थान प्राप्स्यसि शाश्वतम्||(गीता १८१६२)
'हे भारत सर प्रकारसे उस परमेश्वरकी ही अनन्य
शरणको प्रात हो, उस परमात्माकी कृपासे ही परम शान्ति योर
सनातन परमधामको प्राप्त होगा।'
मर्वधर्मान्धरित्यय मामेक गरण ब्रज ।
अह त्वा मर्वपापेभ्यो मोक्षयिप्यामि मा शुच ॥(गीता २८ १६६)
'सर धर्माको अर्थात् सम्पूर्ण काँक आययको त्यागकर
केवल एक मुझ सच्चिदानन्दवन वासुदेव परमात्मा ही अनन्य
शरणको प्राप्त हो, मे तुझे मम्पूर्ण पापोंमे मुक्त कर दूंगा, तू
शोक मत कर।
[१३५

परमार्थ-पत्रावली
भगवान्का सव समय चिन्तन करनेसे ही इस तरह शरण
हुआ जाता है । और इस तरह वह भगवत्कृपासे ज्ञान प्राप्तकर
निश्चय ही परमपदको प्राप्त कर लेता है। भगवानकी इसी
कृपासे भगवान् मिलते हैं और जीवका उद्धार होता है। इन
खूब
अच्छी तरह समझना चाहिये।
सव वातोंको
आपने पूछा कि 'सुझको संसारमें रहकर क्या करना
चाहिये ?' इसका उत्तर ऊपर लिखा ही है । भगवान्के
गुणानुवाद: प्रभाव और प्रेमकी बातें पढ़नी और सुननी चाहिये।
हर समय भगवान्के नामका जप और स्वरूपका ध्यान करते
हुए ही आसक्ति और स्वार्थ छोड़कर संसारका काम करना
चाहिये । आसक्ति न छूटे तो कोई चिन्ता नहीं, सब कुछ
भगवान्का समझकर जैसे गुमाश्ता (नौकर) मालिकके लिये
काम करता है, वैसे ही अपना स्वार्थ छोड़कर संसारके सम्पूर्ण
काम भगवान्के लिये ही करने चाहिये ।
आपने लिखा कि 'उपदेशका सदाव्रत मुझे भी यात्री
समझकर देना चाहिये।' सो उपदेश देनेवाला तो मैं कौन हूँ,
पर आपकी आज्ञा मानकर मेरी समझके अनुसार शास्त्रोंकी
कुछ बातें लिख दी हैं।
आपने लिखा कि 'संसारमें तो दुःख ही है' सो यही वात
ठीक है । संसारमें कुछ भी सुख नहीं है । जो कुछ सुख दीखता
.१३६]

परमार्थ-पत्रावली
हे, वह भी मिथ्या ही मासता है, अन्तमें तो दुस-ही-
महाराज दशरथजी और वसुदेवजीके विषयमें समाचार
पढे । उन लोगोंको धन्य है जिनके घरों में भगवान्ने अवतार
लिया । देखने उन लोगोंको बहुत सांसारिक दु सहुए, परन्तु
अन्तम उनका ससारसे उद्धार हो गया। वे सदाके लिये
आनन्दधन परमात्माको प्राप्त हो गये। मेरी समझसे उनका
पुनर्जन्म नहीं होगा। मुझे उनके उद्धारमै कोई शङ्का नहीं है।
उनको सांसारिक फ्लेश देग्यनेमें आये सो ठीक है, पहले किये
हुए कुछ पाप भी बाकी होंगे, जिन्हें भोगारचे शुद्ध हो गये और
भगवान्के उनके घर अवतार लेनेसे उनका उद्धार हो गया।
पुण्यात्मा भी थे। पुण्य-पाप सभीके रहते है, किसीक पाप
अधिक रहते है तो किसीके पुण्य अधिक!
श्रीदशरथजी ओर श्रीवसुदेवजी पहले जन्ममें भगवान्के
वड़े भक्त थे। सम्भव हे फिसी पूर्वके जन्ममें कुछ पाप बने हो,
उन्हीं सर पापोंको भोगकर तथा भक्तिके प्रतापने पापोंका नाग
होनेपर अन्तम उनका इस संसार-मागरसे उद्धार हो गया।
आपने पूछा कि 'संसारमें जीवको सुप तो देसनेमे नहीं
आता फिर भी यह जीव संसारमें मटकता क्यों फिरता है?"
सो यह मूरता अर्थात् अमानके कारण भटकता है । इसने भूलसे
संसारमें सुस मान रपमा है, मृगतृष्णाके जलकी तरह संसारमें
[१३७

परमार्थ-पत्रावली
मिथ्या सुख भासता है। इससे यह मूर्खतामें फंसकर मृगकी
तरह भटकता फिरता है।
आपने पूछा कि इस जीवको
सुख
कैसे हो? सो भगवान्-
की भक्तिले सुख होता है। क्योंकि भक्तिमें ही सुख है। भक्तिसे
भगवान् मिलते हैं जिससे सदाके लिये पूर्ण आनन्द हो जाता है।
गीता अध्याय ६ श्लोक ११ ने ३२ तकका अर्थ पढ़ना चाहिये।
उसके अनुसार भजन, ध्यान करनन अपार मुखकी प्राप्ति हो
सकती है। फिर किसी समय भी दुःख नहीं हो सकता। ऐला
आनन्द प्राप्त होता है जिसके समान न तो कोई दूसरा आनन्द
है और न उसका कभी नाश होता है।
आपने पूछा कि 'संसारमें रहकर बर्ताव किस तरह करना
चाहिये' सो ठीक है। अपनेले बदास श्रद्धा. समानमें मित्रता:
छोटोंमें पालन करनेका भाव रखते हुए सबकी सेवा करनी
चाहिये।
१३८]

[१५]
मुझे मालूम हुआ है कि हिन्दू-मुसल्मा के मामलेको
लेकर आप रहुत उद्विग्न है ओर बढी चिन्ता करते है। मेरी
समझसे यह वहुत लज्जाकी बात है। परोपकारमें जीवन लग
जाना बहुत ही उत्तम है, इममे तो आनन्द मनाना चाहिये।
लोकसेवा करनेवाले मनुष्योंपर बड़ी-वडी विपत्तियाँ आया करती
है, इसके लिये वे कभी शोक नहीं करते? इसमें घरानेफी वात
ही कौन-सी है ? यदि आपने लाकहितके लिये न्यायपूर्वक चेष्टा
की है और उसके लिये आपपर आपत्ति आयी है तो उसके
लिये आपको आनन्द मानना चाहिये।
[१३९

परमार्थ-पत्रावली
यदि आप निर्दोष हैं तो यह विश्वास करना चाहिये कि
आपका नुकसान नहीं हो सकता, अगर दोषी है तोदण्ड भोगनेके
लिये भी आनन्दसे तैयार रहना चाहिये और आप यदि यह समझते
हैं कि बिना ही दोष आपपर लोकहित करते यह आपत्ति आयी
है, तो आपको एक वीरकी भाँति प्रसन्नतासे जेल जाना चाहिये
अथवा प्रमाणोंसे अपनेको निदोष साबित करना चाहिये।
रोना, चिन्ता करना और छिपना तो कायरताके लक्षण
कायरता बहुत बुरी चीज है । गीता अध्याय २ श्लोक २,३*का
अर्थ समझकर कायरताका त्याग करना चाहिये । यहाँ वीरता
ही मुक्ति हेतु है, कायरतापूर्ण जीवन तो मृत्युके समान है,
शूरतामें प्राणत्याग करना लामजनक और धर्म है। गीता अध्याय
* कुतत्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम् ।
अनार्यजुष्टमस्वयंमकीर्तिकरमर्जुन
क्लैव्यं मा म गमः पार्थ नैतत्त्वव्युपपद्यते ।
क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ
परंतप ॥
हे अर्जुन ! तुमको इस विषमस्थलमें यह अज्ञान किस हेतुसे प्राप्त
हुआ ? क्योकि यह न तो श्रेष्ठ पुरुषोसे आचरण किया गया है, न
स्वर्गको देनेवाला है, न कीर्तिको करनेवाला है। इसलिये, हे अर्जुन !
नपुंसकताको मत प्राप्त हो, यह तेरेमे योग्य नहीं है, हे परंतप ! तुच्छ
हृदयकी दुर्बलताको त्यागकर युद्धके लिये खड़ा हो ।
१४०]

परमार्थ-पत्रावली
२ श्लोक ३७, ३८* और अ० ३ श्लोक ३५ का अर्थ देखिये।
आप जव यहाँके मामूली वारण्टसे इतने बचराते हैं, तर उस
बड़े राजा यमराजका वारण्ट मिलनेपर तो न मालूम आपकी
पया दशा होगी? आपको तो उस वारण्टसे भी नहीं डरना
* हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्ग जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम् ।
सम्मानुत्तिष्ठ फौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चय ॥
सुग्गदु से समे कृत्वा लामालाभो जयाजयो ।
ततो युद्धाय युज्यम्ब नैन पापमवाफ्यसि ||
या तो भरकर स्वर्गको प्राप्त होगा अथा जीतकर पृथिवीको
भोगेगा, इससे हे अर्जुन । युद्धके लिये निश्चयवाला होकर खड़ा हो।
'यदि तुझे स्वर्ग तथा राज्यकी इच्छा न हो तो भी सुरा दुस,
लाभ हानि और जय-पराजयको समान समझकर उसके उपरान्त
युद्धके लिये तैयार हो, इस प्रकार युद्ध करनेसे तू पापको नहीं प्राप्त
होगा।
श्रेयानम्वधर्मों रिगुण परधर्मात्स्वनुष्ठितात् ।
स्वधर्म निधन श्रेय परधों भयावह ॥
अच्छी प्रकार आचरण किये हुए दूसरेके धर्म गुणरहित मी
अपना धर्म अति उत्तम है, अपने धर्ममें मरना भी कल्याणकारक है
और दूसरेका धर्म भयको देनेवाला है ।
[१४१

परमार्थ-पत्रावली
चाहिये, शरीर तो एक दिन जाना ही है, फिर किसी अच्छे
कामको करते-करते चला जाय तो बहुत अच्छी बात है।
कैदकी तो वात ही क्या है, परोपकार करते फाँसीपर लटकना
पड़े तो भी बहुत आनन्दकी बात है। कायरतासे कुछ दिन जी
भी लेंगे तो क्या होगा?
क्या आप इसमें अपना अपमान समझते हैं? अपमान तो
कायरतामें है वीरतामें नहीं, धर्मके त्यागमें है धर्मकी रक्षामें
नहीं । और कुछ न बन पड़े तो जो कुछ मालिककी मर्जीसे
होता हो, उसमें प्रसन्न तो रहना ही चाहिये । विचारसे हो या
हठसे, किसी तरह भी शोक, चिन्ता और दुःखको हटाकर, हर
समय हर अवस्थामें आनन्दसन्न रहना चाहिये । भजन, ध्यानके
लिये निरन्तर प्रयत्न करते हुए, इस बातपर विश्वास रखना
चाहिये कि जो कुछ होता है, सव भगवान्की दयासे होता है
और उसीमें मंगल है ।*
VOKO
* किसी मामले में फंसे हुए एक चिन्तातुर सजनको यह पत्र कई
वर्षों पूर्व लिखा गया था ।
१४२]

. [४६] आपने लिया कि इन दिनों में भजन, ध्यान और सत्सङ्ग मुझसे नहीं होता' मो भजन, ध्यानादि करनेके लिये प्रयत्न करना चाहिये । अन्यथा चडी कठिन समस्या है! द्रव्योपार्जनके लिये व्यापार करनेमें तो आपने परिश्रम हो जाता है, पर अपने सच्चे कल्याणके लिये प्रयत नहीं होता, इससे मालूम होना हे कि आप भजन, ध्यान और सत्सङ्गको धनके ममान भी नहीं मानते । आपको निवेकपूर्वक विचार करना चाहिये कि यह नश्वर द्रव्य, क्या मृत्युके समय आपकी सहायता कर सकगा? क्या द्रव्यसे आपको भगवत् सम्बन्धी आनन्द प्राप्त हो सकेगा? ऐसा कभी नहीं होगा, ताकि वहाँ कोई रिश्वत लेनेवाला नहीं है। परलोककी बात तो दूर रही धनसे इस लोकमे भी वास्तविक सुस नहीं मिल सकता। ससार- में मूतीरो ही सुख प्रतीत होता है, विवेकसम्पन्न पुरुपोंके लिये तो सांसारिक सुरा दुष्यरूप ही है । महर्षि पतललि कहते हैं- परिणामतापमस्कारदु ग्वैर्गुणवृत्तिविरोधाच दु ग्वमेव सन विकिन । (योगदर्शन २ । १५) 'परिणामदु स, तापदुस, सस्कारदु स तथा दुखोसे

परमार्थ-पत्रावली
मिश्रित होने और गुण-वृत्ति-विरोध होनेसे, विवेकी पुरुषोंकी
दृष्टिमें समस्त विषयसुख भी दुःख ही हैं।'
संसारमें यदि वास्तविक सुख होता तो ऋषि-मुनिगण
सांसारिक सुखौंको त्यागकर क्यों वनमें जाकर तपस्या करते ?
आपको यदि अपने कल्याणकी इच्छा हो तो निष्काम भावसे
प्रेमपूर्वक श्रीपरमात्माके पुनीत नामका निरन्तर जप करनेके
लिये प्रयत्न करना चाहिये। उस वास्तविक सच्चे निष्कामी
परम प्यारे परमात्माके प्रेममें कलङ्क नहीं लगाना चाहिये।
जो व्यक्ति इस असार संसारके तुच्छ, अनित्य और
क्षणभंगुर भोगोंमें फँसकर भगवद्भजन, ध्यान, सत्सङ्ग छोड़
देता है, वह महामूर्ख है । अन्तमें उसकी बड़ी दुर्दशा होती है।
अतएव आपको ऐसा अधोगतिमें ले जानेवाला कार्य भूल-चूक
कर भी नहीं करना चाहिये।
आपके कल्याणोपयोगी कार्योंमें जो व्यक्ति आपकी
सहायता करता है, उसे ही अपना परम मित्र जानकर शेष
सवको बनावटी मित्र समझना चाहिये। विशेष लिखनेमें क्या
है, यदि आपको अपने कल्याणकी इच्छा हो तो कुछ भी विचार
न कर शीघ्र चेतना चाहिये और सांसारिक मोह-जालमें न
फँसकर, तेज साधनके लिये तैयार हो जाना चाहिये।
१४४ ]

[४७] श्रीपरमात्माका भजन; ध्यान करते हुए ही सासारिक कार्योंकी चेष्टा करनी चाहिये । अन्य किसी काममें चाहे भूल हो जाय, परन्तु परमात्माके भजन, ध्यानमें भूल न करनी चाहिये । भक्त प्रवादके आदर्शको सामने रखकर चेष्टा करनी चाहिये, यदि इसमें माता पिता या भाई मादि वाघा दें, तो उनकी सुशामद और सेवा करके उन्हें प्रसन्न करना चाहिये । सेना तो सभी जीनीकी करना उत्तम हे और कर्तव्य है। ससारके भोगोंमें फँसना नहीं चाहिये । सासारिक भोग- विलास, पेश-आराम और स्वाद-शौकीनी आदि सभी विषय क्षणभगुर और अनित्य है, घोसा देकर डुवानेवाले हैं और लालच देकर गलेमें फॉसी लगानेवाले है, यो समझकर भूलकर भी इन विपयोंसे प्रेम न करे । इनमें एक बार कुछ समयतक सुख-सा प्रतीत होता है, परन्तु अन्तमें वह नाश हो जाता है, अतएव इनसे डरते रहना चाहिये। इस तरहके साधनसे चित्तमें प्रसन्नता और विषयोंसे वैराग्य हो सकता है और पीछे ससार- का कोई भोग अच्छा नहीं लगता। [१४५ प०प०१०

[४८]
भगवानसे प्रेम करनेकी इच्छा हो तो भगवान्को ही
सबसे उत्तम समझना चाहिये । संसारमें श्रीनारायणके समान
दयालु तथा सुहृद् और कोई भी नहीं है । न उसके समान कोई
प्रेमी ही है। वह नीचसे भी प्रेम करता है, किसीसे भी घृणा
नहीं करता। यदि कोई मनुष्य अपनी नीचताकी ओर देखकर
भगवान्को न भजे तव तो कोई उपाय नहीं, परन्तु भगवान्की
ओरसे तो सबके लिये 'खुला आर्डर' है। चाहे कोई कितना
भी नीच क्यों न हो यदि निरन्तर भजन करे तो उसे भी भजनके
प्रतापसे परमानन्दकी प्राप्ति हो जाती है। भगवान्के ऐसे प्रभाव
को कोई न जाने तो इसमें भगवान्का कोई दोष नहीं।
.
१४६]

[४९]
आपने लिया कि ध्यान नहीं लगता, मतपय मेरे लिये
ध्यान लगानेकी चेष्टा करनी चाहिये' सो मै चेष्टा करनेवाला
कौन है ? भजन ओर सत्संग बहुत अधिक होनसे ध्यान आप ही
लग सकता है । मैं क्या चेप्या करूँ ? इसमें तो आपकी चेष्टा ही
विशेष काम कर सकती है। जहाँ सत्सग होता हो वहाँ चाहे
जेसे भी कामको छोड़कर जाना चाहिये और ध्यानको बातें
सुनकर, उसी समय उसी तरह ध्यान लगानेकी चेष्टा करनी
चाहिये । ध्यानवाले पुरुषोंके समीप बैठपर ध्यान लगाना
चाहिये, ध्यानमें जो विघ्न हो सो उन भगवान्के भक्तोंको कहना
चाहिये । फिर उनके बतलाये अनुसार माधनकी चेष्टा करनी
चाहिये । यों करनेसे ध्यान लग सकता है।
[१४७

Ha- [५०] आपके साथ जो कोई ईष्र्या करे, उससे भी आपको प्रेम करना चाहिये । जो कोई आपका बुरा करे, उसका भी आपको उपकार करना चाहिये, और वैर रखनेवालेका भला करनेकी चेष्टा करनी चाहिये । स्वार्थ और मान-बड़ाईको त्यागकर नम्रभावले सभीके साथ प्रेम करना कर्तव्य है। मान-बड़ाई आदिकी कामनाको जीतनेवाला ही दुर्लभ है, कहा है- कञ्चन तजना सहज है, सहज तियाका नेह । वड़ाई ईर्षा, दुर्लभ तजना एह ।। क्रोध करें तो अपने अवगुणोंपर करें, दूसरेके अवगुणोंपर ध्यान न देना चाहिये । वास्तवमें भजन और सत्संगके होनेसे, ये द्रोप आपसे ही छूट जाते हैं। सब प्रकारसे निष्काम होनेपर याने कामका नाश हो जानेके वाद, क्रोध-चैर या मान-बड़ाईको स्थान नहीं रहता, जहाँतक ये चने रहते हैं, वहाँतक निष्काम हुआ नहीं समझा जाता। मान १४८]

[५१]
ध्यान तथा चैराग्यको साधारण वात लिखी जाती हैं विशेष
बातें प्रत्यक्ष मिलनेपर पूछ ली जाये तो ठीक है।
जो कुछ भास रहा है सो सब मायामात्र हे। मायाके
अधीश्वर भगवान को इसका बाजीगर समझकर, बाजीगरके
प्रमूरेकी तरह संसारकी वस्तुओंको लेकर खेल करना चाहिये।
किसी समय भी इस कल्पित संसारकी सत्ता मानना उचित
नहीं। इस मेलको जो मनुष्य सत्य समझ लेता है वह ठगा
जाता है । भगवान् उसे मूर्य समझते हैं और यह समझते हैं कि
इसने हमारा प्रभाव नहीं जाना । जो भगवान्के मर्मको जान
टेता है, वह कभी मोहित नहीं होता। संसार कोई वस्तु नहीं है,
घान्तरमें जो कुछ है सो श्रीसञ्चिदानन्दधन ही है, इस प्रकारका
ध्यान ही घेराग्ययुक्त ध्यान कहलाता है। एक नारायणदेवके
सिया और कुछ भी नहीं है । जो मास रहा है सो है ही नहीं।
और जो है सो भासता नहीं, क्योंकि भगवान्का गुणातीत
स्वरूप इन्द्रियांका विषय नहीं है । सगुण स्वरूपका भास होना
सम्भव है, परन्तु उसके दर्शन होनेपर निर्गुणका मर्म जानने में
कुछ भी विलम्ब नहीं होता।
[१४९

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. श्रीजयदयालजी गोयन्दकाद्वारा लिखित पुस्तकें- १तत्व-चिन्तामणि (भाग १)-सचित्र, पृष्ट ३५०,मोटा कागज, सुन्दर छपाई-सफाई, मूल्य प्रचारार्थ केवल 12) सजिल्द ॥1-) इसीका छोटा गुटका सस्करण, पृष्ठ ४४८, मूल्य ।-) सजिद ) २ तत्त्व-चिन्तामणि (भाग २)-पचित्र, पृष्ठ ६३२, मोटा कागज, सुन्दर छपाई-सफाई, मूल्य प्रचारार्थ केवल ) सजिल्द १०) इसीका छोटा गुटका सस्करण, पृष्ट ७५०, मूल्य 1) सजिल्द ॥) ३ तत्व-चिन्तामणि (भाग३)-मूल्य ॥5) सजिल्द m) इसीका छोटा गुटका सस्करण, पृष्ठ ५६०, मूल्य ।-) सजिल्द 1) ४ परमार्थ-पत्रावली-सचित्र, कल्याणकारी ५१ पत्रोंका सग्रह मू०) ५ नवधा भक्ति-(सचिन), पृष्ठ ७०, मूल्य ६ बाल-शिक्षा-पृट ७२, तीन रंगीन, एक सादा चित्र, मूल्य .) ७ ध्यानावस्थामें प्रभुसे चार्तालाप-(सचित्र) मूल्य ८ गीताकासूक्ष्म विषय-गीताके प्रत्येक शोकका हिन्दीमें साराश-)। ९चेतावनी-पृष्ठ २४, मूल्य । १. गजल-गीता-गजलमें गीताका बारहवाँ अध्याय मूल्य आधा पैसा नं०११ से २८ तककी पुस्तकोंमें तत्त्व चिन्तामणि तीनों भागमें आये हुए कुछ लेख ही अलग पुस्तकाकार छपे हुए हैं। ११ भादर्श भ्रातृ-प्रेम मूल्य ३) २० सत्यकी शरणमे मुक्ति मूल्य )। १२ गीता-निरन्धावली मूल्य a) व्यापारसुधारकी आवश्यकता १३ नारीधर्म-सचिन, पृष्ट ५२, .)॥ और व्यापारसे मुक्ति मूल्य )॥ १४ श्रीसीताके चरितसे आदर्श २२ त्यागसे भगवत्प्राप्ति मूल्य ) शिक्षा-मूल्य २३ धर्म क्या है ? मूल्य । १५ सच्चा सुख और उसकी प्राप्तिके उपाय-मूल्य २४ महात्मा किसे कहते हैं ? मू०)। २५ प्रेमका सच्चा स्वरूप मूल्य )। १६ धीप्रेमभकिप्रकाश मृत्य १७ गीतोक्त सास्ययोगऔर २६ हमारा कर्तव्य मूल्य । निष्काम कर्मयोग मूल्य )॥ २७ ईश्वर दयालु और न्यायकारी है । १८ भगवान् क्या है ? मूल्य ॥ २८ ईश्वरसाक्षात्कारके लिये नाम- १९ भगवप्राप्तिके विविध उपाय ) जप सर्वोपरि साधन है मूल्य)। पता-गीताप्रेस, गोरखपुर चित्र छोटे-बड़े रंगीन और सादे चित्र श्रीकृष्ण, श्रीराम: श्रीविष्णु, श्रीशिव, श्रीशक्ति और संत भक्तोंके दिव्यदर्शन जिसको देखकर हमें भगवान् याद आवें, वह वस्तु हमारे लिये संग्रहणीय है। किसी भी उपायसे हमें भगवान सदा स्मरण होते हैं तो हमारा धन्य भाग हो । भक्तों और भगवान्के स्वरूप एवं उनकी मधुर मोहिनी लीलाओंके सुन्दर दृश्य-चित्र हमारे सामने रहें तो उन्हें देखकर थोड़ी देरके लिये हमारा सन भगवत्-स्मरणमें लग जाता है और हम सांसारिक पाप-तापोंको भूल जाते हैं। ये सुन्दर चित्र किसी अंशमें इल उद्देश्यको पूर्ण कर सकते हैं । इनका संग्रहकर प्रेमसे जहाँ आपको दृष्टि नित्य पढ़ती हो, वहीं घरमें, बैठक- में और मन्दिरों में लगाइये एवं चित्रोंके बहाने भगवान्को यादकर अपने मन-प्राणको प्रफुल्लित कीजिये । भगवान्की मोहिनी मूर्तिका ध्यान कीजिये। कागज-साइज १५४२० इञ्चके वड़े चित्र, मूल्य सुनहरी )॥ रंगीन-) मात्र। कागजका साइज १० इञ्च चौड़ा, १५ इन्च लम्बा, सुनहरी चित्रका Du, रंगीन चित्रका मूल्य )।, यह छोटे व्लाकोसे ही वेल (बार्डर) लगाकर बड़े कागजोंपर छापे गये हैं। कागजका साइज ७॥x१० इञ्च, सुनहरीका मूल्य )ई, रंगीनका मूल्य ), सादेका 1) सैकड़ा । सब चित्र असली आर्टपेपरपर छपे है। इनके सिवा ५४७॥ के रंगीन चित्रीका दाम १) सैकड़ा है । चित्र बहुत सस्ते, सुन्दर और दर्शनीय मिलते हैं। चित्रोंके दास बिल्कुल नेट रक्खे हुए हैं। पुस्तकों तथा चित्रोंकी विशेष जानकारीके लिये सूचीपत्र मुफ्त मँगवाइये । पता-गीताप्रेस, गोरखपुर

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Parmarth Patravali Bhag-i

Author
Jaidayal Goyandka
Title
Parmarth Patravali Bhag-i
File name
Parmarth Patravali Bhag-i
Text
OCR done
Citation
1931
Published
2011/03
Publisher
Gorakhpur, Geeta Press
Language
Sanskrit
Pages
148
Library
Shri Jain Swetamber Khartargacch Sangh, Jaipur
Classification
Devotional
DLI number
550684
Barcode
4990010031500.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
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