Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner

Rashtriya Ekta Ke Ekanki

Giriraj Sharan · 2011/03

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सम्पादक:गिरिराज शरण
प्रमात प्रकाशन, दिल्ली

प्रभात प्रागन, चावडी बाजार, दिल्ली-११०००६
मुद्रा रसा भारती, नवीन गाहदरा, दिल्ली-३२ / सर्वाधिकार सुरक्षित
सरसरण: प्रयम, १९६०
मूल्य . सत्तर स्पर्य
RASHTRIYA EKTA KE EKANKI
Ed by Oi Giriraj Sharan
Rs 7000
Published by Prabhat Prakashan, Chamil Bazar Delhi 110006

दो तोपें चाँदी की आंख खुलते ही एक आहट कान मे आई। जैसे बाहर की तरफ से खुलने वाली खिडकी से कोई चीज़ कमरे के भीतर बाकर गिरी हो । आवाज परिचित थी। विश्वास हो गया कि आवाज प्रात कालीन समाचार-पन की है, जो प्रतिदिन इसी खिडकी से इसी प्रकार, इसी आहट के साथ फर्श पर आकर गिरता है और मन मे जिज्ञासा पैदा करता है यह जानने की कि पिछले चौबीस घण्टो मे दुनिया पर क्या बीती है। सुबह का सूरज अभी निकला नही है और अगर निकला है, तो उसका प्रकाश अभी कमरे, घर की दीवारो पर या अंगनाई तक नहीं पहुंचा है, क्योकि आस- पास खडी ऊँची कोठियो ने अभी उसे पूरी तरह रास्ता नहीं दिया है । आसमान को चूमते हुए भव्य भवन अब भी उसके रास्ते मे बाधा बने खडे हैं। लेकिन यह तो सूर्य है, महान् और कभी पराजित न होने वाला सूर्य, जो ऊपर चढता ही जाएगा, चढता ही जाएगा, यहाँ तक कि दोपहर होने तक इन विशाल भवनो की परछाइयां भी सिकुडकर बोनी हो जाएंगी । यह तो सूर्य देवता है, जिसका प्रकाश सबके लिए समान है, सबके लिए बरावर । यह गरीब घर का दीया नहीं है, जो स्वय अपने आंगन को भी पूरी तरह प्रकाशित नहीं कर पाता । दीये को तेल और बाती आदमी देता है, आदमी जिसने मानव-समाज मे असमानता के बीज बोए, जिसने समाज में छोटे-बडे वर्गों की स्थापना की और जिसने अंधेरे और उजाले को विभाजित कर उसे अलग-अलग श्रेणियो मे बांट दिया, लेकिन यह तो सूरज है, जिसे उजाला प्रकृति देती है, आदमी नहीं." विचारोकाएक रेला मेरी तरफ बढता है और मस्तिष्क पर छा जाता है। कमरे मे धूप नहीं है लेकिन रोशनी अवश्य आ गई है, सोचता हूँ कि ऊंची दीवारें और ऊंची अटारियां सूरज की किरणो को निस्सदेह युछ क्षण के लिए मेरी खिडकी तक माने से रोक सकती हैं, लेकिन उसकी रोशनी को फैलने से रोक्ने वाला कोई नहीं विचन से वर्तन यनकने की आवाज आती है, विश्वास हो जाता है, पनी पाय बनाने में व्यस्त होगी। यो से देखे बिना आदमी कितनी ही चीजो को केवल अपने अनुभव और विवेक की दृष्टि से देय लेता है । आश्चर्य की बात है। मैंने अखबार नहीं देखा लेकिन निश्चित समय पर होने वाली एक विशेष आवाज ने मुझे बता दिया कि यह कुछ और हो या न हो, अवश्य ही आज का अखवार है, जिसे रोज की भांति हॉकर मेरी खिड़की से फेंर गया है। मैने पत्नी को चाय बनाते नहीं देखा लेकिन प्रतिदिन को वर्तनो को सुपरिचित आहट ने मुझे बता दिया कि पत्नी किचन में है और मेरे लिए चाय तैयार कर रही है। मैं चाय की प्रतीक्षा करता हूँ और जैसे ही खिडकी के नीचे हाथ बढाता हूँ, नज़र अचानक वाहर सडर पर जाती है । सडक से एक आदमी गुजर रहा है। उसका ऊपर का धड मेरी आंखों से ओझल है, मैं वेवल उसके निचले धड और पैर ही देख पा रहा हूँ । सम्पूर्ण आदमी को नहीं। तो क्या मुझे कहना चाहिए, कि यह आदमी पूरा नही- अधूरा आदमी है- क्योकि इसका जो भाग मेरे सामने प्रमाणित नहीं है उसे कल्पना के आधार पर स्वीकार करना मेरे लिए आवश्यक क्यो है ? मैं कह सकता हूँ कि इसका निचला धड मेरे सामने है, ऊपर का नही, इसलिए यह आदमी अधूरा है, और केवल अपने निचले धड के सहारे एक-एक पग आगे बढते हुए अपनी यात्रा पूरी कर रहा है। लेकिन मैं ऐसा नही कहूंगा, क्योकि समाचार-पत्र मैंने खिडकी से अन्दर आते नही देखा लेकिन विवेक और अनुभव से जान गया कि यह समाचार-पत्र ही है, जो हॉकर खिडकी से भीतर फेक गया है। पत्नी को चाय बनाते हुए मैंने नहीं देखा लेकिन प्रतिदिन की परिचित माहट ने मुझे बताया कि किचन मे निश्चित तौर पर पत्नी ही है, जो इस समय मेरे लिए चाय बना रही है। सचाइयां मात्र आँखो से प्रमाणित नही होती, अनुभव से भी होती हैं । जैसे आदमी का यह निचला धड जो मेरे सामने से गुजर रहा है, मुझे विवश करता है, इस सचाई को मानने पर कि उसका ऊपर वाला धड भी अवश्य होना चाहिए और अवश्य होगा। यह केवल अनुभव और विवेक ही है, जो आँखोदेखी अधूरी सचाई को पूर्ण कर रहा है, इसके लिए किसी अन्य प्रमाण की आवश्यकता नही है। विचारो को बाढ अब तक मेरे मस्तिष्क को घेरे है, अखबार मैंने फर्श से उठा- कर अपने सिरहाने रख लिया है। अव तक के विचारो को काटती हुई, सोच की एक और लहर मेरे भीतर उठती है- मुझे लगता है, दुनिया में पूरे आदमी ही नही आधे-अधूरे आदमी भी होते हैं ।

ऐसे आदमी जिन्होने अपना ऊपर का धड या तो वेच दिया है, अथवा किसी के हाथ गिरवी रख दिया है या फिर जीवन के मोह अथवा मृत्यु के भय ने उन्हे इस बात के लिए विवश कर दिया है कि वे अपने ऊपरी धड को अपनी निर्लज्जता के नीचे छिपाये रखें और स्वाभिमान के परदे पर उसका प्रतिविम्ब न पड़ने दें। बिल्कुल इस प्रकार जैसे कछुआ तनिक-सा भय पाते ही अपनी गर्दन को शरीर के पथरीले खोल के भीतर छुपा लेता है। ऐसे कितने ही लोगो की छवि मेरे स्मृति-पटल पर उभरती है और गायब हो जाती है। जयचन्दो और मोर जाफरो की एक लम्बो पक्ति है, जो धीरे-धीरे मेरे सामने आती है और चुपचाप गुज़र जाती है। ये वही लोग हैं, जिनका ऊपरी धड नहीं है, जो आधे हैं, अधूरे हैं और जिन्होने अपने ऊपर का भाग या तो बेच खाया है या भय अथवा लालच से कछुए की भांति अपने ही खोल के अन्दर समेट लिया है। मैं घृणा और तिरस्कार से इस पक्ति की तरफ देखता हूँ और अखबार खोलकर अपने सामने फैला लेता हूँ। पृष्ठ के निचले भाग मे एक छोटी-सी खबर छपी है। सम्पादक ने इसे कोई विशेष महत्त्व नही दिया है, शीर्षक है- 'रक्षा मत्रालय के एक उच्च अधिकारी ने सेना के महत्त्वपूर्ण रहस्य विदेशी एजेंट को बेचे।' पढकर एक कडवाहट मेरे रक्त मे पुल गई है । पोध की एक लहर है, जो रीढ की हड्डो से होती हुई मेरी मासपेशियो मे अवडाहट पैदा कर रही है। विवार आता है कि देशद्रोह का यह समाचार जिसे प्रमुखता मिलनी चाहिए थी, क्यो नहीं मिली ? उत्तर मिलता है, शायद हम देशद्रोह और राष्ट्र-विरोधी ऐसी घटनाओ को सुनने-देखने के अभ्यस्त हो गए हैं। अब ऐसी घटनाएं हमे न तो चौंकाती ही हैं और न दुखी करती हैं। ऊपर के घड से वचित आधे-अधूरे लोग हमारे सामाजिक और राष्ट्रीय जीवन को दीमक की तरह लग गए हैं और अब यह एहसास भी हमारे अन्दर धूमिल होता जाता है कि राष्ट्रीयता का वह बहुमूल्य एव ऐतिहासिक वस्त्र जो हमारे पुरखो ने शताब्दियो के परिश्रम से बुना था, इन बोनो के हाथो धज्जी-धज्जी होने लगा है, परन्तु हम इन्हें सहन कर रहे हैं. क्षमा दे रहे हैं, क्योकि यह हमारा स्वभाव है, हमारी संस्कृति भी। आशा नहीं कि बल के अखबार मे यह पढ़ पाऊंगा कि इस सगीन राष्ट्रविरोधी कृत्य के लिए उस अधिकारी को पुलिस द्वारा गिरफ्तार कर लिया गया है, जिसने रक्षा सम्बन्धी महत्त्वपूर्ण रहस्य किसी विदेशी एजेंट के हाथ कुछ धन लेकर थैच दिए मुझे ज्ञात है कि क्ल अखबार म ऐसा कोई समाचार नहीं होगा, क्योकि दोपी की पहुंच अपने ऊपर के लागो तक होगी और उसके हाथ वहां तक पहुंच रहे होगे, जहां से कानून लागू किए जाते हैं। अन्य खवरा की तरह, कल तक यह सबर भी पुरानी होकर भुला दी जाएगी, पाठक भूल जाएंग वि उच्च पद पर बैठे हुए किसी देशद्रोही न अपने निहित स्वार्थों लिए राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा पैदा कर दिया था। मैं जानता हूँ, कानून उसे दण्डित नही करेगा, क्योकि कानून के हाथ तक वे प्रमाण नही पहुँच सकेंगे, जिनसे उसका अपराध सिद्ध होता हो। तब हम क्या करें? उन्हे कैसे बतायें कि स्वार्थ ही नही, जीवन से भी बड़ी है, राष्ट्रीय हित की भावना! पत्नी चाय का कप रख गई है । मैंने गर्म-गर्म चाय का घूट लिया है और फिर वही सवाल मेरे सामने आ खडा हुआ है। 'तब हम क्या करे, उन्हे कैसे समझाएँ कि राष्ट्रीयता की भावना जीवन के मोह से बडी है।" सोचता हूँ तो वे घटनाएँ मस्तिष्क मे जाग उठती हैं, जिन्होंने विवशता और दासता की जजीरो मे भी हमे राष्ट्र के लिए समर्पित रहने की प्रेरणा दी थी- आइये चले, दूर अतीत की ओर- मुगल राज का सूरज अस्त हो रहा है। भारत विभिन्न रियासतो मे बंट गया है । अग्रेज एक एक करके सभी रियासतो को अपने पजो मे जकडते जा रहे है । शाही दरबार सिमटकर दिल्ली तक सीमित हो गया है । बडी-बडी रियासतें अग्रेज शासको की दासता स्वीकार कर चुकी हैं, और यह दासता उन शर्तो पर स्वीकार की गई है, जो अग्रेजो को पसद है, रियासतोके स्वामियो को नहीं। देश भर मे वायसराय लार्ड कर्जन का दबदबा है। लार्ड वर्जन के नाम से अच्छे-अच्छे शूरवीरो को कंपकपी आ जाती है। लार्ड कर्जन एक एक रियासत का बारी-बारी दौरा करते है और जो चाहे मांग लेते है या बलात् वसूल कर लेते हैं । इस राष्ट्रीय पराजय और पराधीनता के दौर मे बडौदा का महाराजा सयाजी राव गायकवाड जीवित है, अतीत के दम खम और स्वतत्र रियासतो का दबदबा लिये। अग्रेज हरकारा आता है, वायसराय लाई वर्जन का सदश उसके पास है। लिया है, वायसराय कल राजधानी बडोदा का दौरा करेंगे। समय की परम्परा के अनुसार सारी रियासत सावधान हो गई है। सडको की सफाई, मकानो की मरम्मत और महल की साज सज्जा म हजारो आदमी लगे हुए [६ हैं। लार्ड को खुश करने के लिए सभी व्यवस्थाएं की जा रही हैं। शिकार का विशेष प्रबन्ध है । सेना की टुकडियो को 21 तोपो को सलामी देने के लिए तैयार कर दिया गया है। लार्ड के रियासत मे आगमन से पूर्व उस पूरे रास्ते पर बहुमूल्य मखमल का फर्श विछा दिया गया है, जिससे लार्ड को अपने कठोर बूटा के साथ गुजरकर आना है—दोनो ओर दर्शकर की पक्तियां हाथ बांधे खडी हैं । दरबार पूरी तरह सजा हुआ है। तभी ऐलची ने नौबत पर घोषणा की है कि लार्ड कर्जन की सवारी राजधानी को सीमाओ मे प्रवेश कर चुकी है। सम्पूर्ण वातावरण फौजी बैंड की धुन मे गूंज उठा है। घोडे पर सवार लार्ड कर्जन अपने लम्बे काफिले के साथ दरबार हॉल की तरफ बढ रहे हैं। महाराजा गायकवाड तख्त से नीचे उतरकर शिष्टतापूर्वक लार्ड का स्वागत करते हैं। तोपो की आवाज से वारो दिशाएँ दूर तक गूंज उठी हैं । महाराजा सयाजी राव गायकवाड, कर्जत का हाथ अपन हाथ मे लिये महल की ड्योढी तक आते हैं । कर्जन की नजर ऊपर उठती है तो वह यह देखकर चकित रह जाता है कि महल के सुरक्षा कक्ष मे दो बडी तोपें लगी हैं जिनकी चमक सूरज की तज रोशनी को भी मात दे रही है। कर्जन तेजी से महल के सुरक्षा-कक्ष की तरफ लपक्ता है । तोपो को आश्चर्य से छूकर देखता है और महाराजा गायकवाड से पूछता है- 'ओह ! इतनी सु दर और कलात्मक तो? किस धातु से बनी हैं–?' महाराजा मूंछो के अन्दर मुस्कराते हैं । उत्तर मिलता है, 'फौलाद पर चांदी की मोटी चादर है, जिस पर विशेष कारीगरो द्वारा बेहतरीन नक्काशी की गई लार्ड कर्जन तोपो को बार-बार छूकर देखता है और बार-बार उसका हाथ तोपो की नाल पर इस प्रकार फिसल जाता है, जैसे कोई अपनी प्रेयसी के रेशम जैसे शरीर को छू छूकर देख रहा हो। कर्जन के पास प्रशसा के जितने शब्द थे, उसने इन तोपो की प्रशसा मे व्यक्त कर लिए हैं। साफ सकेत है कि महाराजा गायकवाड को ये दोनो तो हिन्दुस्तान के वाय-, सराय लार्ड कर्जन की सवा मे हाथ बांधकर भेंट कर देनी क्यो--7 क्योकि अग्रेज साम्राज्य म विदेशी हाकिमो की परम्परा ही यह थी कि जिस रियासत की जो चीज उहे पसन्द आती, वह केवल उसकी प्रशसा में कुछशद चाहिए IN १०] कहते थे और वस्तु अगले ही दिन उनकी सेवा में प्रस्तुत कर दी जाती थी। महाराजा गायकवाड ने तोपो वे सम्बन्ध मे वर्जन की प्रशसा मुनी और तेवरो पर बल पड गये । पर कुछ बोले नहीं। कर्जन ने दूसरा प्रसग छेडा । लेकिन बीच-बीच मे तोपो की प्रशसा करता रहा । सयाजी राव न केवल धन्यवाद के शब्द कहे और खामोश हो गए। पूरे राजकीय सम्मान के साथ गुलाम भारत के वायसराय लार्ड वर्जन को राज्य से विदा कर दिया गया। लार्ड को पूर्ण विश्वास था कि राज्य की ओर से वे ऐतिहासिक तोपे उसकी सेवा मे प्रस्तुत कर दी जाएंगी, जो उसे पसन्द आ गई थी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। दो दिन तक ऐसा नहीं हुआ। तीसरे दिन कर्जन क्रोध से फट पडा । उसने महाराजा गायक्वाड के पास इस आदेश के साथ पत्रवाहक भेजा- 'चांदी की वे तोपें, जिनकी राज्य के दौरे के समय हमने प्रशसा की थी तुरन्त हमारे दरबार मे प्रस्तुत की जाएं, क्योकि हिन्दुस्तान का आदमी इस अद्भुत कला का महत्त्व नहीं समझ सकता । हम ये तोपे इग्लैंड भेज रहे हैं ताकि वहां के म्यूजियम मे सुरक्षित रखी जा सके। आदेश सुनकर महाराजा ने तिरस्कारपूर्ण ठहाका लगाया। अपने व्यक्तिगत पत्र लेखक को बुलाया। कहा-लार्ड के पन का जवाब दो-लिखो- 'हम जानते थे कि महामहिम को ये तोपे पसन्द आई और हमारा कर्तव्य था कि अगले ही दिन हम उन तोपो को सरकार की सवा में पेश कर देते, क्योवि अग्रेज हाकिमो की पसद के मामलो में अब तक की परम्परा यही रही है । देसी रियासतो की कितनी ही बहुमूल्य और ऐतिहासिक महत्त्व वी वस्तुएं इसी अमानवीय परम्परा की भेट चढ चुकी हैं, लेकिन हम ऐसा नहीं कर रहे हैं क्योकि तोपे महल के रक्षा- पक्ष में स्थापित थी और यह अद्भुत कला की ही नहीं, हमारे सम्मान की भी प्रतीक थी। हमने सोचा और अनुभव किया कि हम अपने हथियार इस सरलता से दुश्मन वे हाथो मे सौपन को तैयार नहीं हो सकते। हम जानते है कि इसका परिणाम क्या होगा और हम उस परिणाम को भुगतने के लिए तैयार हैं।' पत्रवाहव महाराजा गायकवाड का सदेश लेकर वापस चला गया है। दरवार म पामोशी छा गई है। तभी सयाजी राव की आवाज सन्नाट को तोडती हुई चारो ओर गूंज जाती 'इससे पहले कि अंग्रेज सेना तो हासिल करने के लिए रियासत पर चढ़ाई करे, मट्टी में डालसर तोपा को गला दिया जाए। राज्य की रक्षा के अस्यो यो दुश्मन से हाथ में पहुंचन से पहले गला दिया जाना उचित है, ताकि यह इनके निर्माण का रहस्य न पा सके। ऐसा ही किया गया, तोपे गला दी गई। मैं इस ऐतिहासिक घटना को याद करता हूं और उस सुर्सी पर दृष्टि डालता हूँ, जिसमे लिया है कि एक अधिकारी ने रक्षा से सम्बन्धित रहस्य एक विदेशी एजेंट के हाथो बेच दिये। मेरे युग तक राष्ट्रीयता का कितना ह्रास हो चुका है, यह सोचकर कांप जाता हूँ, और ऐसी समस्त घटनाएँ एकत्र करने का प्रयास करता हूँ जो कलम के सिपाहियो ने लिखी और रची हैं, ताकि हम उनके पात्रो की भूमिकाओ से यह जान सके कि राष्ट्रीय सम्मान और आत्म-सम्मान का अर्थ क्या है ? १६, साहित्य विहार, (डॉ०) गिरिराजशरण अग्रवाल बिजनौर (उ० प्र०)

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क्रम
४४
सबसे सस्ता गोश्त/असगर वजाहत
तूफान से पहले उपेन्द्रनाथ अश्क
साझे-विरसे/कृष्णकान्त वर्मा 'विवेक' ३०
अन्तिम निर्णय/गिरिराजशरण अग्रवाल
पद्मा के लाल कमल/चन्द्रशेखर
मन्दिर की जोत/चिरजीत
भोर का तारा/जगदीशचन्द्र माथुर
आखिरी चिट्ठी/निश्तर खानकाही १००
वापसी/मनोजकुमार सिंह ११४
सोमा-रेखा/विष्णु प्रभाकर
१२३
७०
८७

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राष्ट्रीय एकता के एकांकी

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सबसे सस्ता गोश्त
असगर वजाहत
[मवस्थल पर गायक आता है और गाना प्रारम्भ करता है।]
गायक : हिन्दू मुस्लिम सिख ईसाई
नहीं है कोई भाई-भाई
करते हैं सव मिल के लडाई
मारा-पीटा आग लगाई
जव देखो तब आफत आई
रोज लडाई, रोज भिडाई
[स्वर बदलकर
धरम के नाम पर बच्चो को टांगें चोर देते हैं
धरम के नाम पर औरत की छाती काट देते हैं
धरम के नाम पर जिन्दा जलाते हैं ये लोगो को
धरम के नाम पर लाशो की ये मण्डी सजाते हैं।
[गायक चला जाता है और मचस्थल पर एक हिन्दू
नेता तथा एक मुसलमान नेता आते हैं । दोनो हाथ
पकडकर नाचते हुए गाते हैं।
दोनों : नेता हैं हम जात के
हिन्दू हैं न मुस्लिम
अरे काम मारा लूट के खाना
हिन्दू हैं न मुस्लिम
[नाचते-नाचते रुक जाते हैं]

२/सबसे सस्ता गोश्त हिन्दू नेता : चुनाव सिर पर आ गए। काम कुछ हुआ नहीं। वोट लेना फिर पडेगा वैसे तो मेरे चुनाव क्षेत्र मे हिन्दुओं का बहु- मत है पर सब मुझसे घृणा करते हैं। मुस्लिम नेता : मेरे चुनाव इलाके मे मुसलमानो की तादाद ज्यादा है पर वो सब मेरी शक्ल से नफरत करते हैं। दोनो मिलकर : पर हम नेता हैं, हम नफरत को प्यार मे बदलना जानते हैं"हम उनसे कहेगे. मुस्लिम नेता : विरादराने इस्लाम हिन्दुओ ने तुम्हे बर्बाद कर दिया। तुम्हारे घर उजाड दिए। तुम्हे जिन्दा जला दिया लेकिन घबराने की क्या बात है, मैं तुम्हारे साथ हूँ मैं हिन्दू नेता आर्यावर्त के सुपुत्रो, इन मलेच्छ मुसलमानो ने भारत-माता के टुकडे कर डाले । इन्हे क्या अधिकार है यहां रहने का! इन्होंने तुम्हारी औरतो की इज्जत लूटी है। बच्चो के गले काटे हैं- आओ हम मिल-जुलकर आगे बढ़ें"मैं तुम्हारे साथ हूँ, तुम्हारा सेवक (हाथ जोडता है) मुस्लिम नेता मैं लोगो का दिल जीत लूंगा। जब उन्हे कप!-पास दिलाऊँगा... हिन्दू नेता राहत सामग्री बांदूंगा। पुस्लिम नेता · जमानतें कराऊंगा। हिन्दू नेता मन्दिर बनवाने के लिए चन्दा जमा करूंगा। मुस्लिम नेता मस्जिद की मरम्मत कराऊँगा । हिन्दू नेता . हर-हर महादेव। मुस्लिम नेता : अल्लाहो अकवर। [एक मुल्ला और एक पडित भागते हुए मचस्थल पर आते हैं और हिन्दू नेता के चरणो मे पडित और मुसलमान नेता के चरणो मे मुल्ला बैठ जाते हैं और दोनो उन दोनो के पर परह लेते हैं।] मुस्लिम नेता (मुल्ला जी से) मुल्ला जी, क्यो उदास हो? मुल्ला : मस्जिद बनवाने के लिए चन्दा पम जमा होता है."मेरी साख गिर रही है। हिन्दू नेता : (पडित से) क्या षष्ट है पडित जी? परित : दान-दक्षिणा, पूजा-पाठ, हवन आदि कोई नही पराता, बहुत विधर्म है।

सबसे सस्ता गोश्त /३ हिन्दू-मुस्लिम नेता एक साथ दोनो खडे हो जाओ। जैसा कहा जाए करो""पांचो उँग- लियां घी मे होगी, सिर कडाही मे होगा, टाँगें चूल्हे मे होगी। [मुल्ला-पडित खडे होकर ताली बजाते हैं और चारो नाचने लगते हैं । मिच पर दो बदमाश आते हैं और आते ही ठहाके लगाते हैं। बदमाश . पिटिर बोलकर ही काम नही चलेगा नेताओ देश के रक्षको" आग तो हम ही लगायेंगे गोलियां तो हम ही चलायेंगे' बच्चो की गर्दनें तो हम ही काटेंगे."औरतो की इज्जत तो हम ही लूटेंगे उनको छातियों तो हम ही काटेंगे कभी वर्दी पहनकर कभी उतारकर हम ही आयेंगे... हिन्दू नेता माओ बहादुरो, तुम तो मेरा दाहिना हाथ हो। मुस्लिम नेता आओ बहादुरो, तुम तो मेरी आँखें हो । [हाथ पकडकर गोला बना लेते हैं और गाना गाते हुए सव नाचते हैं। समूह गान सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा हम बुलबुलें हैं इसको ये गुलिसितां हमारा मजहब नहीं सिखाता आपस मे बैर रखना हिन्दी हैं हम वतन है हिन्दोस्तां हमारा। [गाना खत्म करके बदमाश मवस्थल के कोने पर रखी एक पोटली उठाकर क्रमश हिन्दू और मुसल- मान नेताओ को देते हैं। मुस्लिम नेता: (मुल्ला जी से) मुल्ला जी, इसे लेकर मस्जिद मे डाल दो। मुल्ला क्या है इसमे...? मुस्लिम नेता : क्या होगा ? बचपने वाली बातें करते हो, इसमे है सूअर का गोश्त ।

४/सबसे सस्ता गोपत [मुल्ला पोटली छोड देता है हिन्दू नेता : (पडित से) ये पोटली उठाओ"इसमे है गाय का गोश्त । [पडित पोटली छोड़ देता है] हिन्दू तथा मु० नेता अपनी-अपनी पोटलियां उठाओ • हिम्मत से काम दिखाओ " जाओ, मन्दिर मे गाय और मस्जिद मे सूअर पहुंचाओ। [मचस्थल से सब निकल जाते हैं।] [मचस्थल पर दो पोटलियां आकर गिरती हैं और एक तरफ से हिन्दू और दूसरी तरफ से मुसलमान आते हैं।] हिन्दू हर-हर महादेव । मुसलमान : अल्ला हो अकबर । हिन्दू : हम तुम्हारा खून पी जाएंगे। मुसलमान हम तुम्हे जहन्नुम पहुंचा देंगे। [दोनो गिरोह और पास आते हैं, नारे और जोर से लगाते हैं और अपने-अपने हथियार सीधे कर लेते हैं । शोर बढता है । अचानक एक आदमी दोनो गुटो के बीच मे आ जाता है-चीखकर कहता है । आदमी ठहरो, रुको "बात सुनो "मैं जानता हूँ तुम लोग न हिन्दू हो न मुसलमान"तुम लडने का फैसला करके ही घर से निकले हो"लेकिन बताओ तो आखिर बात क्या है? हिन्दू : मुसलमानो ने मन्दिर मे गाय का गोश्त फेंका है, ये देखो। मुसलमान : हिन्दुओ ने मस्जिद मे सूअर का गोश्त फेंका है, ये देखो। [आदमी झुककर दोनो पोटलियो को देखता है फिर खडा होकर। आदमी भाइयो, ये सूअर और गाय का गोश्त नहीं है। भीड़ : है-है"क्यो नही है...? आदमी : नही, नही दोस्तो, मैंने दुनिया देखी है । क्या तुम समझते हो मैं गाय और सूमर के गोश्त को नही पहचानता"देखो अगर ये मूअर का गोश्त होता तो इसमे पर्वी होती. "देखो धर्वी वहाँ है"अगर ये गाय का गोश्त होता तो लाल होता, रेशे होते"इसमे रेगे कहां हैं"नहीं-नहीं"ये गाय और सूअर का गोश्त तो हो ही नहीं सकता"धोखा हुआ है तुम लोगोंगो।

बने रोग/ 7 हा र बें भीड़ : फिर ये रिसरागोन है ? आदमी : सुनो"ये यादमी रामाप्त है। भीड : आदमी पा गोल है। आदमी : (विश्वान से) हो, मानसन"" ये तो आदमी मोत है मेरे मां ? हिन्दू-मु० नेता : नहीं-नहीं"तुम मूठ बोल रहे हो। आदमी : रंग और रंगत देखो देगी- अलावा कुछ हो ही नहीं माना। कुछ आवाजे : (उण्डेपन से) बन्दा, कादमी सांग है। एक आवाज : तब कोई बात नहीं। दूसरी आवाज : मन्दिर अपवित्र नही हुन। तीसरी आवाज : मस्जिद नापार नहीं हो। .. पर या हाथ की, याज 1 रहे वख्शू चोयो आवाज . चलो, बटा ही हमा। पांचवीं आवाज : घरम बच गया। हिन्दू नेता • चतो हिन्दुत्व के रसोra मुसलमान नेता : चलो इन्लानर Trrrr- मोन है। बदमाश : च च चमनंट' दीवार उसके म और के लिए न्धकार देती है, वरंटे ती वस्ती , इतनी ले बसते र, घोडु- क लोकल काम देती इस पर यों और में भय्या दुग्धालयों इर्द-गिर्द

तूफान से पहले
उपेन्द्रनाथ अश्क
पात्र
रामू
मा
मुलिया
पारो
वरुशू
घीसू
शिब्बू
बदरी
नियाज मियां
हयात अल्लाह
गिरधारी दादा
दो शहरी हिन्दू, दो पठान और दूसरे भय्ये।
समय .
वक्त
सितम्बर, 19461
शाम।
[पर्दा उठने पर ताड के पत्तो से छायी हुई एक झोपडी
दिखायी देती है। झोपडी की दीवारें सरकण्डो की
बनी हुई हैं, जिन्ह गोबर और मिट्टी से लीप वर इस
योग्य बना लिया गया है कि वर्षा वे पानी से झोपडी के
वासियो वा यथासम्भव शराबोर होने से बचा सकें।
झोपडी की छत इतनी नीची है वि झुरे विना
इसके बरामदे अथवा अन्दर की वोठडी में प्रवेश करना
असम्भव है । सहर से देयने वाले को इस झोपडीवी

तूफान से पहले /७ कोठडियो के आधे किवाड ही दिखायी देते है, क्योकि शेष ढालुवी छत की ओट मे छिप जाते हैं। बरामदे के मध्य एक पुरानी सिंगर मशीन रखे घीसू कपडे सी रहा है। उसके आस-पास कपडे विखरे पड़े हैं। सामने दीवार के साथ एक साधारण-से अनघड रैक पर कुछ किताबें और कपडो पर एक समाचार-पत्र के पृष्ठ भी पड़े हैं। उसके बायें हाथ को, कोठडी के आगे, एक चौकी पर कत्या, चूना और मसाला सजाये, उसकी पत्नी मुलिया एक ग्राहक के लिए पान बना रही है । घीसू के दायें हाथ को एक झिलगा पडा है, जिसके पास घीसू की लडकी, पारो और बराबर की दरगाह के मुजाविर, नियाज मियां का किशोर बेटा बख्शू 'कटम कटउआ' खेल रहे हैं । पारो उठकर भागने राह देख रही है और बख्शू इस ताक मे है कि वह उठे और वह छुए। और भी दायी ओर की, बरामदे की दायी दीवार के साथ एक भैस बंधी हुई जुगाली कर रही है । उसके पीछे, सामने की दीवार के दायें कोने मे एक और कोठडी है, जिसमे वर्षा के कारण भंस की सानी के लिए भुस भरा रखा है। मुलिया के पीछे जो कोठडी है, उसके अन्धकार मे, दरवाजे के बराबर को, एक खाट दिखायी देती है, जिस पर मुलिया की बीमार सास पडी कराह रही है । घीसू की झोपडी बम्बई की एक निकटवर्ती वस्ती मे सडक के किनारे बनी हुई है । यह सडक कुछ इतनी रौनक-भरी नहीं। इसके इर्द-गिर्द अधिकाश ग्वाले बसते हैं। दायी ओर लोकल स्टेशन है और बायी ओर, घोडु. बन्दर रोड के परे, शहरी बस्ती है और यह सडक लोकल स्टेशन और शहरी बस्ती के मध्य पुल का-सा काम देती है। इसीलिए लोकल ट्रेन के आने-जाने के समय इस पर कुछ रोनक हो जाती है। घीसू को बस्ती मे यद्यपि दूसरी जातियो और व्यवसायो के लोग भी आबाद हैं तो भी इसमे भय्या लोगो का याहुल्य है। ये भव्ये उन डेरियो, दुग्धालयो या तबेलो में काम करते हैं, जो इस सड़क के इर्द-गिर्द ८/ तूफान से पहले बिखरे हुए हैं और जिनमे पलने वाली भैसो के खुरो के कारण, वर्षा ऋतु म, सडक से आध-आध मील इधर- उधर टखनो तक विना कीचड मे फंसे चलना-फिरना कठिन हो जाता है। इन डेरियो से अधिकाश गिरधारी दादा की है । दादा बम्बई की भाषा मे प्यार का नही, भय और त्रास का शब्द है और 'मवाली' अथवा 'गुण्डा' का पर्यायवाची है लेकिन गुण्डे या मवाली के साथ, जिस गरीबी और मरभुखेपन का ध्यान आ जाता है, उसका 'दादा' शब्द से अधिक सम्बन्ध नही • क्योकि बम्बई मे लखपती 'दादा' भी हैं, जिनकी अरदल मे अन्य कई दादा उसी प्रकार तत्पर खडे रहते हैं, जिस प्रकार उस अन्तर्राष्ट्रीय दादा, हिटलर की अरदल मे गोरिंग और रिबन ट्राप-और जिस तरह उस दादा महान् से दूर-दूर रहने वाले भी डरते थे, उसी तरह यद्यपि गिरधारी दादा का साम्राज्य भी इस सडक और इसके इर्द-गिर्द फैली हुई डेरियो तक ही सीमित है, फिर भी घोड-बन्दर रोड मे परे बसने वाले धनी निर्धन सभी उससे खौफ खाते हैं और स्टेशन से आते-जाते समय उसे 'नमस्कार' करना अथवा एक विवश सी मुस्कान होठो पर लाकर, उसका हाल चाल पूछना आवश्यक समझते रहे इन डेरियो मे काम करने वाले भम्ये तो वे दिन-रात गिरधारी दादा की उन्नति और उत्थान की गाडी मे बैला-सरीखे जुते रहते हैं । तवेलो की सफाई और पशुओ की रखवाली के साथ-साथ, इधर दोपहर और उधर आधी रात को उठकर दूध दोहने से लेकर, इघर प्रात और उधर मन्ध्या से पहले-पहले, 'ग्रेटर बम्बई' के विभिन्न स्टशनो तब उसे पहुंचाने का काम भी करते हैं । नीद आती है तो वही लोकल ट्रेन कीखुरी सीटो, प्लेटफार्मों या पुटपायो पर ऊंघ लेते हैं। और भूख लगती है तो चन या दालसेव या 'खारी सीग' खापर पेट की आग बुझा लेते हैं। गिरधारी दादा किस तरह इतने सम्पन्न हो गये, इसके सम्बन्ध में कई स्विदन्तियां प्रसिद्ध हैं। (क्योवि तूफान से पहले जब वे बम्बई आये थे तो उनकी जेब मे चने तक के लिए पैसे न थे) लेकिन सबसे प्रसिद्ध कहानी यह है कि पीर कलन्दर अली के आशीर्वाद से उन्होने यह सब धन- सम्पत्ति पायी है। इसीलिए पीर साहब की दरगाह, जो किसी समय एक टूटी हुई समाधि और एक जर्जर चबूतरे की सूरत मे थी, अब गिरधारी दादा की कृपा से पक्की बन चुकी है। लेकिन यह तो उस समय की बात है, जब हिन्दू- मुसलमान एक-दूसरे के पवित्र स्थानो का आदर करते थे और एक-दूसरे के धार्मिक उत्सवो मे शामिल होना बुरा न समझते थे और गिरधारी दादा ने अपना जीवन इसी वस्ती के एक दुग्धालय मे, एक साधारण भय्ये के रूप मे शुरू किया था। अव तो दादा दरगाह को ओर देखना भी पाप समझते हैं और उसके वर्तमान मुजाविर, निया न मियां की बढती हुई लोकप्रियता उनके लिए असह्य है और अपने साम्राज्य मे दरगाह का अस्तित्व उन्हे कांटे की तरह खटकता है। पर्दा उठने के पल भर बाद बैकग्राउण्ड मे गाडी के आने की आवाज सुनायी देती है। घीसू के हाथ की गति भी तेज हो जाती है। मुलिया की चौकी के सामने जो व्यक्ति खडा है उसे शायद इसी गाडी पर सवार होना है, इसीलिए वह जल्दी मचाने लगता है।] वह व्यक्ति • गाडी आ रही है मुलिया, जल्दी पान दो। मुलिया (जल्दी-जल्दी पान बनाकर देते हुए) लो। [आदमी पान ले और पैसे फेंककर अन्धाधुन्ध भाग खडा होता है । गाडी के आने और घीसू की मशीन के चलने की आवाजें एक-दूसरे मे घुल मिल जाती हैं । इधर गाडी स्टशन पर रुकती है, उघर घीसू की मशीन खट से रुक जाती है। पोमू जल्दी-जल्दी हत्यी घुमाने का प्रयास करता है, किन्तु मशीन नही चलती । वह मशीन खोल- कर देखता है और खट्ट से बन्द करके माथे को ठोक- कर बैठ रहता है। खारी सीग उबली नमकीन मूंगफली।

१०/तूफान से पहले 7 मुलिया क्यो, क्या हुआ घोसू (खीझकर) हुआ बुरे का सिर । [फिर उसी प्रकार उदास और निराश बैठ रहता है। उसकी मां वराहना छोड देती है और अपनी चारपाई पर तनिक आगे को खिसक आती है। मा क्या हुआ बेटा? घीसू (कुछ सयत होकर) कुछ नही, मां फिरकी टूट गयो। मा तो ऐसे निराश क्या बैठ गये हो? और ले आना। घीसू तुम भी अम्मा कौन लिये बैठा है मेरे लिए फिरकियां ? [कुछ बेचन होकर खाली मशीन ही चलाने लगता है । बैंक ग्राउण्ड में गाडी के चलने की आवाज़ आती है सडक पर इक्का दुक्का आदमी गुजरने लगते हैं। तभी पारो उठकर भागती है कि बख्शू उसे छू लेता पारो (उसकी बारी देने को हाथ बढाते हुए) क्यो कितना दौडाया? बख्शू (उसके दोनो हाथ अपने हाथ म लेता हुआ) अब जरा मेरी बारी शुरू हुई है, देखना। [पारो के दोनो हाथ बांधकर, उन्हे बायें से पकड, उसके उँगलियो के मध्य अपने दायें हाथ से आरी-सी चलाता हुआ बरुशू गाता है ] कटम क्टउआ सागर दउआ तू मेरी रानी मैं तेरा नउआ बैठे को छुएँ कि खडे को? पारो खडे को। [बरुशू झट उसके हाथ छोडकर बैठ जाता है। पारो जरा परे छूने को तैयार खडी रहती है। वरुशू दो चार वार उठन का मुलावा दकर एक बार जो भागता है तो झिलगे के कई चक्कर खाने पर भी पक्हाई नहीं देता। पारो थककर रुक जाती है। पारो हम नही खेलते। .

तूफान से पहले/११ [जाकर घीसू को गोद मे गिर जाती है। बरुशू उसे खीचता है। घोसू (दोनो को ढकेलकर) जाओ, उधर दरगाह में सेलो और मुझे तंग न करो। पारो : (नही जाती, वही चिमटी रहती है) यरुशू चुटको काटता है बापू ! बस्शू : (उसे पूर्ववत् खीचता हुआ) मुझे इतना दौड़ाया और मेरी वारी आयी तो बापू की गोद में जा बैठी। घीसू । (उसे और भी जोर से ढकेलकर) जा भाग ! मेरी जान न खा ! जा खेल उधर दरगाह मे जाकर । [पारो पल भर के लिए अपने पिता के रुद्र रूप को देखती रहती है । फिर उसकी दृष्टि मूखों की तरह मुंह बाये खड़े वख्शू पर जाती है और एक चंचल मुस्कान उसके नपनो से निकल कर उसके सारे मुख को प्रदीप्त करती हुई बिखर जाती है । उछलकर वह बख्शू को छू लेती है और छू लिया! छू लिया! का शोर मचाती हुई भाग जाती है । वरुशू भी उसके पीछे भाग जाता घीसू : (बेजारी से मशीन परे हटाकर समाचार-पत्र उठाते हुए) कम्बख्त इस फिरकी को भी आज ही टूटना था। परसो गणेश- चतुर्थी है, गिरधारी दादा जान खा जाएंगे—पाँचों कुर्ते उनके सिलने वाले हैं। मुलिया : तुम्हे तो गजट बांचने की पड़ी है । जाकर बदल क्यो नही लाते फिरकी? घोसू : (समाचार-पत्र परे हटाकर) तेरा भेजा बराबर नहीं। फिरकी मिलती है चोर बाजार मे-और वहां आजकल हिन्दू को पा जायें को काटकर दस टुकड़े कर दें। [रामू, एक तीस-बत्तीस वर्ष का हृष्ट-पुष्ट युवक, गले मे बण्डी, कन्धे पर अंगोछा और घुटनो तक ऊंची धोती कमर मे बांधे स्टेशन की ओर से तेज-तेज़ आता है। इकन्नी मुलिया के आगे फेंकता है और बात घीसू से करता है । मुलिया पान बनाने लगती है।] रामू : सुना तेने घीसू, मदनपुरे मा आठ भइयन कर कतल करि डारा ..

१२/ तूफान से पहले लीगी मुसलमानन ने। मुलिया (पान लगाना छोडकर) अरे कहाँ ? कौन धनी के तबेला मा? रामू उसी पाजी खोजा के तबेला मा, और कहा मुलिया सत्यानाश हो इन मूंडी काटे हत्यारो कार श्यामू और लकडिया रामू • मारे गये दोनो, एक हरिय बचा, वह भी भीति फांदि के, मुदा घायल बहू हुइ गवा। मुलिया बहुतेरा कहा था गिरधारी दादा ने कि मति जाव ह्या से छोडि के, पर उन्हे तो जियादा पगार या मोह था। बदी कौन टारे भइया? मां (चारपाई पर कुछ और आगे को सरव कर) राम | राम उन बेचारो ने किसी का क्या लिया था? वे गरीब तो हिन्दू-मुसल. मान दोनो को दूध पहुंचाते थे। घीसू (जिसके चेहरे पर और भी गहरा बादल छा जाता है) गरीब और भोले भाले ही तो मारे जाते है इस फिसाद मे अम्मा । मुलिया ये हत्यारे मुसलमान भी ऐसे ही मारे जायें तो इन्हे भी मालूम हो घीसू वे भी मारे जाते हैं। इस फिसाद मे तो बेचारे ईसाई और पारसी भी मारे गये। [मुलिया पान लगाकर रामू को दे देती है। कुछ और लोग आ इकट्ठा होत हैं, जिनमे शिब्बू भी है-गिरधारी दादा का खास चेला।] शिम्बू : (मुलिया के सामने इकन्नी फेंकते हुए) उन मूखों से कहा था कि नौकरी छोड आओ। (मुलिया से) दो पान लगाओ, मुलिया ! रामू अचानक तो भडकी आग दादा और फिर उस हरामी खाजे ने कहा, "तुम लोग हा रहो, फाटक बन्द रहेगा, बक तुम्हारा यार भी बांका नाहिं करि सक्ति।" मुदा पहले ही हल्ला मा खोल दिया किवाड कायर ने। बन्द तरेला, चाकू-धरा से लैस इतने मुसलमान, और निहत्ये भइया। अग-अग बाटि के रख दिया निदंइयन ने। मेरे तो हिरदे मे तभी से आग-सी लग रही शिम्बू भइया लोगो को इन पाजी मुसलमानो ये तरेलो में भी नौकरीन परनी चाहिए।

तूफ़ान से पहले/१३ भीड़ में से एक : सभी उस कायर खोजे-से तो नहीं होते, दादा। उसी मदनपुरे में वह फ़ज़लू पंजाबी भी तो है। पूरे एक दर्जन भइया काम करते हैं उसके यहाँ । बार-बार गुण्डे दल-बल लेकर आये। धमकी दी कि फाटक न खुला तो हम आग लगा देंगे तबेले को- तलवार सूतकर निकल आया वो पंजाबी, कि है किसी मर्द के बच्चे में हिम्मत तो बढ़े आगे। जान जोखिम में डाल दी, पर तवेले का फाटक नही खोला। दूसरा : वह खुद दादा है मदनपुरे का । उसके तबेले को आग लगाते तो वह सबके घर न जला देता। शिब्बू : पर आग में रहकर उसकी लपटों से कै दिन बचा जा सकता है, उनकी भी बारी आ जायेगी। भीड़ में से तीसरा : भइयों को अपनी दलबन्दी करके अपनी रक्षा आप करनी चाहिए। शिब्बू : निरी दलबन्दी ही नहीं । अपने भाइयों की हत्या का बदला लेना चाहिए। [मुलिया पान लगाकर शिब्बू को देती है।] रामू : भइया होत हैं जैसे बैल । चुपचाप अपनी राह चला जात है। किसी से मतलब नहीं राखत, मुदा कोई छेड़े तो सीग भोंकि देत है! [पान की पीक सड़क पर थूकता है।] शिब्बू: (पान का बीड़ा कल्ले में रखकर कन्धे पर रखे साफ़े से हाथ पोंछते हुए) सोये हुए सिंह को छेड़ा है इन मुसलमानों ने । आठों भइयों की हत्या का बदला जल्द ही लिया जायेगा। [जोश से आगे-आगे चलता है।] रामू : (उसके पीछे चलते हुए) लिया जायेगा और जरूर लिया जायेगा। दादा के पास चलो पहले, शिब्बू । [सभी जोश से रामू और शिब्बू के पीछे-पीछे चलते हैं । घीसू लम्बी सांस भरकर फिर समाचार-पत्र खोल लेता मुलिया : (चिन्ता के स्वर में) न जाने इन लोगों के मन में क्या है ? कहीं खून-खराबा न करें? मां : तू चोर-और बाजार न जाइयों, घीसू ! मुलिया : न जाने यह मारा-मारी कब बन्द होगी?

१४/तूफान से पहले घोसू जाने कभी बन्द भी होगी या नहीं? पाच कुत पड़े हैं और मशीन को फिरकी टूट गयी। [फिर समाचार-पत्र पढ़ने का प्रयत्न करता है ।] मां : (उठकर कराहती हुई उसके पास आ जाती है।) निरबल विछिया सारे औगुन, कभी फिरखी टूट गयी, सभी हत्थी टूट गयी, कभी सुई टूट गयी-अब इस मशीन में धरा ही क्या है ? पचीस-तीस वरस तो चल ली । यह अब बुढा गयी है, इसे छुट्टी दे ! गजट छोड, ला एक कुर्ता मुझे दे, मैं तुरसे देती हूँ। घोसू : नही मां, तुम आराम करो । अब तुम क्या आंखें फोडोगी? क्ल सी लूंगा। जान तो लेगा नही गिरधारी दादा । इन्ही लोगो ने तो उठाया है यह सब फितना-फिसाद । (फिर जैसे अपने-आपसे) तबलीग, शुद्धि, दीवाली, मुहर्रम, गाय और बाजे का सवाल हटा तो साला यह भंडुओ का सवाल आ गया। इन लोगो को तो फिसाद कराने और अपना उल्लू सीधा करने का बहाना चाहिए । न जाने इस देश के वासियो को कब समझ आयेगी। अरे भई, एक-दूसरे को बुरे लगते हैं तो न लगाओ झण्डे ! [बदरी प्रवेश करता है। लम्बा-तगडा युवक है । एक दफ्तर मे क्लर्क है । राष्ट्र-सघ का सदस्य और भडकीले स्वभाव का-प्रातः साय लाठी चलाना सिखाता है।] बदरी (मुलिया से) पूना काला सादा ! (फिर घीसू की झोपड़ी पर एक दृष्टि डालकर, उसे सम्बोधित करते हुए) क्यो जी पीसू, यह क्या हरकत है ? तिरगा नही लगाया तूने? घीसू जिन लगाया है, उन कौन तीर मार लिया है, बदरी भइया 7 बदरी इसमे तीर मारने की कोन बात है ? अपना राज हुआ है तो क्या खुशी न मनायें ? इन साले मुसलमानो ने काले झण्डे लगाये हैं, तो हम तिरगे न फहरायें? घीसू : फहराइए, सिर फोडिए-फोडवाइए ! बदरी : सिर फुटौव्वल के डर से हम अपना अधिकार तो नहीं छोड घोसू : (पूर्ववत् समाचार-पत्र पर दृष्टि जमाये हुए) अधिकार हमारा कोन लिये जाता है बदरी भइया । हम अण्डे न लगायेंगे तो क्या हमारी बनी सरकार टूट जायेगी? बदरी : इन लीगियों ने काले झण्डे लगाये हैं."

घीसू तूफान से पहले/१५ उन्हे दुख है तो आप उन्हें चिढायें क्यो? भरा आकाश ही नीचा होता है भइया । आपको राज मिला है, आप ही को नमना चाहिए। [मुलिया पान बढाती है। तुम्हारी तो मति मारी गयी है। (पान लेकर पैसे फेकता है और पान कल्ले मे रखता है) चार भाई जब आकर यहां झण्डा लगायेंगे तो देखूगा तुम क्या कर लेते हो? [टेढ़ी नजरो से उसकी ओर देखता हुआ चला जाता बदरी - मुलिया मति तो नही मारी गयी तुम्हारी? जल मे रहे क्या, और मगर ते बैर क्या? जब वे कहते हैं तो लगा काहे नही लेते झण्डा? पहले तो बात-बात मे लगाते थे तिरगा। घोसू मति तुम्हारी मारी गयी है । झण्डा लगाने मे मुझे क्या एतराज है। सकता है ! पर मुसलमान इससे चिढते हैं । मुलिया झण्डा मुसलमानो का भी तो है। तुम्ही कहते थे कि इसमे हरा रग उनका है। घोसू वह तो है। पर बहुत से मुसलमान नहीं मानते। वे इस जीत को अपनी हार समझते हैं। उनके लीडर अण्ट-सण्ट भाषण देते हैं। भडके हुए तो वे हैं ही, मैंने यहां तिरगा लगाया और बराबर की दरगाह मे किसी ने चिढकर काला झण्डा लहरा दिया तो? भइ५ । के तेवर तो तुमने देखे ही हैं, खून हो जायेंगे यही। मुलिया : हो जायें। इन मुसलमानो को भी पता चले कि भइयो का लहू इतना सस्ता नही। [घीसू समाचार-पत्र फेंककर क्रोध-भरी दृष्टि से मुलिया की ओर देखता है और भरे हुए गले से चिल्लाता है ] घोसू : मुलिया! [स्टेशन की ओर से नियाज मियां दो पठानो को साथ लिये आते हैं। घीसू उनका अभिवादन करता है :] --आइए, आइए, नियाज मियां ! (चारपाई घसीटकर उनके आगे करते हुए) कहिए, किधर से आ रहे हैं ? नियाज मियाँ शहर से आ रहा हूँ, भाई ! (साथी पठान युवको की ओर इशारा करते हुए) इन बच्चो को लेने गया था। घोसू • क्या हाल-चाल है शहर का .

१४/ तूफान से पहले गयी। घीसू जाने कभी बन्द भी होगी या नहीं? पाच कुर्ते पडे हैं और मशीन पी फिरकी टूट [फिर समाचार-पत्र पढ़ने का प्रयत्न करता है। मां : (उठकर कराहती हुई उसके पास आ जाती है।) निरबल बिछिया सारे औगुन, कभी फिरकी टूट गयी, की हत्यी टूट गयी, कभी सुई टूट गयी-अब इस मशीन में धरा ही क्या है ? पचीस-तीस बरस तो चल ली। यह अब बुढा गयी है, इसे छुट्टी दे । गजट छोड, ला एक कुर्ता मुझे दे, मैं तुरपे देती हूँ। घीसू नहीं मां, तुम आराम करो। अब तुम क्या आंखें फोडोगी? क्ल सी लूंगा। जान तो लेगा नही गिरधारी दादा । इन्ही लोगो ने तो उठाया है यह सब फितना फिसाद । (फिर जैसे अपने आपसे) तबलीग, शुद्धि, दीवाली, मुहर्रम, गाय और बाजे का सवाल हटा तो साला यह भंडुओ का सवाल आ गया । इन लोगों को तो फिसाद कराने और अपना उल्लू सीधा करने का बहाना चाहिए । न जाने इस देश के वासियो को कब समझ आयेगी। अरे भई, एक-दूसरे को बुरे लगते हैं तो न लगाओ झण्डे । [बदरी प्रवेश करता है। लम्बा-तगडा युवक है । एक दफ्तर मे क्लर्क है । राष्ट्र-सघ का सदस्य और भडकीले स्वभाव का-प्रात साय लाठी चलाना सिखाता है।] बदरी (मुलिया से) पूना वाला सादा । (फिर घीसू की झोपडी पर एक दृष्टि डालकर, उसे सम्बोधित करते हुए) क्यो जी घीसू, यह क्या हरकत है ? तिरगा नही लगाया तूने ? घीसू जिन लगाया है, उन कौन तीर मार लिया है, बदरी भइया बदरी इसमे तोर मारने की कौन बात है ? अपना राज हुआ है तो क्या खुशी न मनायें ? इन साले मुसलमानो ने काले झण्डे लगाये हैं, तो हम तिरगे न फहरायें। घोसू फहराइए, सिर फोडिए-फोडवाइए। बदरी सिर फुटौव्वल के डर से हम अपना अधिकार तो नहीं छोड देंगे? घोसू (पूर्ववत् समाचार-पत्र पर दृष्टि जमाये हुए) अधिकार हमारा कौन लिये जाता है बदरी भइया । हम प्रण्डे न लगायेंगे तो क्या हमारी बनी सरकार टूट जायेगी? बदरी इन लोगियों ने काले झण्डे लगाये हैं।.. ?

तूफान से पहले/१५ घोस : उन्हें दुख है तो आप उन्हें चिढायें क्यो? भरा आकाश ही नीचा होता है भइया। आपको राज मिला है, आप ही को नमना चाहिए। [मुलिया पान बढाती है।] बदरी : तुम्हारी तो मति मारी गयी है । (पान लेकर पैसे फेंकता है और पान फल्ले मे रखता है) चार भाई जब आकर यहाँ झण्डा लगायेंगे तो दे गा तुम क्या कर लेते हो? टेढी नजरो से उसकी ओर देखता हुआ चला जाता है। मुलिया : मति तो नहीं मारी गयी तुम्हारी? जल में रहे क्या, और मगर ते वैर क्या ? जब वे कहते हैं तो लगा काहे नही लेते झण्डा? पहले तो बात-बात मे लगाते थे तिरगा। घोसू : मति तुम्हारी मारी गयी है । झण्डा लगाने मे मुझे क्या एतराज हा सकता है ! पर मुसलमान इससे चिढ़ते हैं। मुलिया . झण्डा मुसलमानो का भी तो है। तुम्ही कहते थे कि इसमे हरा रग उनका है। घोस : वह तो है । पर बहुत से मुसलमान नही मानते। वे इस जीत को अपनी हार समझते हैं । उनके लीडर अण्ट-सण्ट भाषण देते हैं । भड़के हुए तो वे हैं ही, मैंने यहां तिरंगा लगाया और बराबर की दरगाह में किसी ने चिढकर काला झण्डा लहरा दिया तो? भइ । के तेवर तो तुमने देखे ही हैं, खून हो जायेंगे यही। मुलिया : हो जायें। इन मुसलमानों को भी पता चले कि भइयो का लहू इतना सस्ता नहीं। [घीसू समाचार-पत्र फेंककर क्रोध-भरी दृष्टि से मुलिया की ओर देखता है और भरे हुए गले से चिल्लाता है:] घोसू : मुलिया ! [स्टेशन की ओर से नियाज मियाँ दो पठानो को साथ लिये आते हैं । घीसू उनका अभिवादन करता है :] –आइए, आइए, नियाज मियां ! (चारपाई घसीटकर उनके आगे करते हुए) कहिए, किधर से आ रहे हैं ? नियाज मियां : शहर से आ रहा हूँ, भाई! (साथी पठान युवकों की.ओर इशारा करते हुए) इन बच्चो को लेने गया था। घीसू : क्या हाल-चाल है शहर का // १६/तूफान से पहले नियाज मियाँ अरे भाई, क्या हाल-चाल पूछते हो? तुमसे क्या छिपा है ? सभी कुछ तो आ जाता है अखबारों मे । भाई को भाई काट रहा है। फिसाद तो हिन्दू-मुसलमानो मे पहले भी हुए, लेकिन ऐसा भयानक और खूनी फिसाद पहले कभी नहीं हुआ। (क्षण-भर खांसते हैं) कलकत्ते का हाल तो तुमने पढ़ा ही होगा। नन्हे मासूम बच्चो के सीने मे छुरे भोंके गये । औरतो की छातियां काटी गयी। बेकसूर बच्चे-बूढो को चार-चार मजिले मकानोसे नीचे फेंका गया, जिन्दा जलाया गया। घोसू कलकत्ते मे जो हुआ, वही बम्बई मे भी हो रहा है। नियाज मियाँ (एक पठान युवक की ओर सकेत करते हुए) इस रमजू का बूढा बाप वहां गिरगाम मे एक सेठ के यहां चौकीदार था, छुट्टी पर गया हुआ था। लौटने पर उसे तो मालूम था नहीं कि यहाँ भाई-भाई के लहू का प्यासा है। वह सीघा चला अपने सेठ के यहाँ । रास्ते मे पत्थर मार-मारकर मार डाला जालिमो ने। इससे भी जी न भरा तो छुरो से उसको तडपती लाश को जख्मी किया और दुख इस बात का है कि औरतें और बच्चे अपनी खिडदियो से देखते थे और खुश होते थे । घोसू : (लम्बी सांस भरता है) भोले-भाले लोगो के दिलो मे जहर भर दिया गया है, नियाज मियां ! नियाज मियाँ : ये लोग नहीं जानते यि किसी जगह एक हिन्दू मारा जाता है तो दूसरी जगह एक मुसलमान को क्या तैयार होती है। अगर किसी जगह एक मुसलमान के छुरा भोका जाता है तो दूसरी जगह एक हिन्दू पजर का शिकार होता है। ये लोग क्यो नहीं समझते ? सरकार क्यो कुछ नहीं करती? लीडर क्यो कुछ नहीं करते। घोप्सू • सरकार यही चाहती है और लीडर विल्ली को देखकर भी कबूतर की तरह आँखें बन्द किये हुए हैं। यह सब तो होगा निया मिर्या सरवार का क्या जाता है ? भुस मे चिनगारी डालवर जमालो तो अलग राडी है ! लीडरोपा भी क्या जाता है ? अपने दीवान- यानों में आराम से बैठे, भडकीले बयान झाड देते हैं। उनका माराम और उनकी सीडरी कायम रहे, मौत तो हम गरीवी पी पोग • सारे देश की वदस्मिती है, यावा ! आजादी की सांस ली नहीं तूफान से पहले / १७ कि भाई को भाई काटने लगा। नियाज मियां : (लम्बी सांस भरकर माथे को ठोक्ते हुए) न जाने खुदा को क्या मंजूर है ? मैं तो इन बच्चो को ले आया। इस खूनी फिसाद में कम्बस्ती तो इन लोगो को है। बेचारे चौकीदारी करते हैं- हिन्दू के घर को भी, मुसलमान के घर की भी। आम मुसलमान तो पतलून-कोट पहनकर बच जाते हैं। यह पठान बच्चे तो छिप नहीं सकते, मारे जाते हैं। घोसू : यही हाल हिन्दुओ मे भइयों का है। आज ही मदनपुर मे आठ भइयो की हत्या कर दी वहाँ के मुसलमानो ने । नियाज मियां दूधवाले, फेरीवाले, चौकीदार, डाकिये, भोले-भाले राही–यही लोग तो मारे जा रहे हैं इन फिसादो में। [उठकर चलने लगते हैं।] घीसू (उनके कन्धे पर हाथ रखकर उन्हे रोकते हुए) नियाज़ मियां ! [नियाज मियां रक जाते हैं । धीमे स्वर मे घीसू कहता मैं कहता था, तुम न दरगाह पर काला झण्डा लगाना वाबा, मदनपुरे मे जो भैइये मरे हैं, उनमे हमारे श्यामू और लकड़िया भी थे। नियाज मियां : इन्ना लिल्लाहे व इन्ना हलहै राजऊन ! (लम्बी सांस भरकर) न जाने इस दुनिया का क्या होनेवाला है ? घोसू : यहाँ के लोग भी कुछ बिफरे हुए हैं बाबा, इसलिए मैंने कहा था कि काला झण्डा नियाज मियां : नही भाई, हमे क्या लेना है इन काले-सफेद झण्डो से ! कलन्दर साई इन्सान-इन्सान को बरावर समझते थे। उनकी दरगाह पर हिन्दू क्या, मुसलमान क्या, सभी आते हैं, और मन की मुरादें पाते हैं। . घीसू . वह जरा हयात का डर था.. नियाज मियां : जवान लडका है, भडकीली तबीयत का, और अक्ल नाम को नही, लेकिन तुम फिक्र न करो, मैं आज ही उसे उसकी ननिहाल भेज दूंगा। [चलते हैं। घोसू : (फिर रोककर) नियाज मियां...

१८/तूफान से पहले [नियाज मियां फिर सकते हैं।] : (समीप आकर प्रेम-भरे विनीत स्वर मे) नियाज मियां, मेरा कहा मानो तो तुम कुछ दिन के लिए कही चले जामो, बाबा। गिरधारी दादा आजकल बड़े बगुला भगत बने हुए हैं। म्यूनिसि- पैलिटी के लिए खड़े होने जा रहे हैं अगली बार, सब जगह वरवस झण्डे लगा दिये हैं उन्होंने । हालांकि स्वयं महात्मा गाधी ने कहा है कि मुसलमान चिढ़ते हो तो न लगाओ तिरगे, पर इस समय उनकी कौन सुनता है ? ये सब तिरंगे देखकर किसी मुसलमान को जोश आ गया और उसने दरगाह पर काला झण्डा नियाज मियाँ तुम चिन्ता न करो, घीसू । कलन्दर साई की दरगाह किसी पार्टी का अखाड़ा नहीं बन सकती। हिन्दू, मुसलमान, सिख, ईसाई --सबके लिए वह खुली है--इस पर कलन्दर साई का ही झण्डा झूलेगा। किसी जात, बिरादरी, पार्टी या कौम का नहीं । इस बस्ती के हिन्दू तो हमे अपने भाइयो से भी बढ़कर समझते चले जाते हैं। घीसू : (वापस आकर अपनी जगह बैठते हुए, जैसे अपने आपसे) लेकिन इस खून-खराबा में तो भाई ही भाई का गला काट रहा है। कौन यह पूछता है कि तुम किस पार्टी मे से हो? बस, चुटिया, धोती, दाढी या अचकन देखकर छुरा भोंक देते हैं । [आकर फिर कुर्ता उठाता है, किन्तु फिर उसे रखकर समाचार-पत्र हाथ मे लेता है। पर कुर्ते सीने अथवा पत्र पढने मे उसका मन नहीं लगता । उठता है, जाकर भैस को पीठ पर प्यार से हाथ फेरता है, भैस फुरेरी लेती है और कीचड मे लिथड़ी हुई दुम घुमाती है। दूसरे क्षण घीसू की कनपटी से लेकर गरदन तक उस कीचड़ का निशान बन जाता है। : (फिर भैस की पीठ पर प्यार से हाथ फेरकर, दर्दभरी मुस्कान से) तुझमे और इन लोगो में कोई अतर नहीं ! अपने भला चाहने वाले को ये बुरा समझते हैं । [दूर गाडी के आने की आवाज आती है। दरगाह को ओर से, अर्थात स्टेशन की भिन्न दिशा से, एक भइया तूफान से पहले/१६ भागा भाता है और दो पैसे मुलिया के सामने फेंकता . भइया तनिक जल्दी मुलिया [मुलिया जल्दी जल्दी पान लगाती है।] (घीसू से) यह तुम क्या मूरखताई कर रहे हो घीसू, झण्डा काहे नहीं लगाते ? दादा बडे गुस्सा रहे हैं । सभा हो रही है उनके आँगन मा । गिरगांव से उनकी मण्डली भी आयी हुई है । श्यामू और लकडिया की हत्या न हिला डाला है दादा को। तुम्हे बुलाया है उन्होंने सभा मा। घीसू मुझे नही जाना है उस सभा मे । भैइया तुम जानो, मुदा हम कहे देते हैं, गुस्सा बहुत खराब है दादा का। [मुलिया पान लगाकर देती है। उसे कल्ले मे रखता हुआ वह भाग जाता है। घोसू (कुर्ते से कनपटी का झाग पोछते हुए) दादा और उनकी मण्डली न जाने ससार म इन दादाओ का कव अन्त होगा। [फिर जाकर कुर्ते सीने का प्रयास करता है, पर काम मे उसका मन नहीं लगता। मां बराबर कुर्ते सीती रहती है । एक कुर्ता उठाकर मुलिया को देती है।] मां मुलिया ले, घीसू के तो पैर नही टिकते । एक तू सी दे। दादा सिर हो जायेगा। (घीसू से) देख बेदा, दादा जो कहित हैं कर ले । उनसे वैर मोल लेकर हम ह्या कितने दिन रहि सकित हैं? झण्डा लगाय ते जो कोई हमे मारने आयेगा तो दादा के याँ रहते, क्या वह बचकर जायेगा? धोनु तुम तो पागल हो। हमे कोई क्या मारेगा पर ये सब मण्डे लगाकर जो इन लोगो को चिढाया जा रहा है, इससे फिसाद तो हो सकता है। हम न मरें, कोई और मरेगा । मैं इस हत्या- काण्ड म भाग नहीं ले सकता। [समाचार-पत्र उठा लेता है और बरामदे के स्तम्भ से पीठ लगाकर पढने लगता है।] मुलिया सारा दिन यह गजट पाँचते हो और अपना से बर बांधते हो। दादा की डेरियो म काम करने वाले भइया के बारे में इस गजट में जो उल्टी-सीधी बातें छपी हैं, जानते हो दादा ने उनका

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तूफान से पहले /२१ निर्दोष मौत के घाट उतर गये और बम्बई मे उतर रहे हैं। ये गोरी सरकार के गुर्गे हैं, गुर्गे। दूसरा : वे लोग काग्रेसियो पर यही इलज़ाम लगाते हैं ? [मुलिया पान बनाकर देती है। पहला कल्ले मे रखता घीसू (समाचार पढते हुए जैसे अपने आप से) दोनो गोरी सरकार के हाथ में खेल रहे हैं। पहला (पान चबाते और सिगरेट होठो के कोने मे रखते हुए) अग्रेजो की तो छाया से दूर भागते हैं और निहत्थे हिन्दुओ की पीठ मे छुरे भोकते हैं, यह आज कालवादेवी में क्या हुआ ? टैक्सी मे मशीनगन रखकर बेगुनाह लोगो पर गोली चलाते गये ! वह दस बरस की लडकी, वह क्या काग्रेस मे थी? और वे हिन्दू जुलाहे, जिन्हें हिटलरी बदरता से इन कसाइयो ने उनकी शोपडियो मे जिन्दा जला डाला, जिनके भागते हुए बच्चो को लाठियां मार-मारकर फिर आग मे झोक दिया, क्या वे काग्रेसी थे। पिछले फिसादो के भूले हुए हैं ये मुसलमान, समझते हैं, गाजर-मूली की तरह हिन्दुओ को काट देंगे । लेकिन मैं बता दूं-हिन्दुओ ने भी अपना सगठन कर लिया है । छ बरस से हमारा राष्ट्र संघ हमे इन कसाइयो के हाथो से अपनी मांओ- बहनो की इज्जत बचाना सिखा रहा है । अब यदि एक हिन्दू के छुरा लगा तो दस मुसलमानो के छुरे भोके जाएंगे, एक हिन्दू बच्चा मारा गया तो दस मुसलमान-बच्चे मौत के घाट उतारे जाएंगे, एक हिन्दू देवी का अपमान हुआ तो दस मुसलमान औरतो की वेइज्जती की जायेगी। [मुलिया दूसरे को भी पान-सिगरेट देती है और दोनो जोश से बातें करते चले जाते हैं।] घोसू हिंसा "हिंसा हिंसा "इन सबके सिर पर यह कैसी हिंसा सवार है। इन्हे कौन बताये कि यह हिंसा तो अपना ही गला काटने के बराबर है ? मुसलमान बच्चो की हत्या क्या अपने बच्चो की हत्या नहीं? मुसलमान औरतो का अपमान क्या अपनी मां-वहनो का अपमान नहीं? मां . (कराहती हुई उठती है) मैं कहती हूँ, घीसू थोडे दिन को अपने २२/तूफान से पहले गांव क्यो न चले जायें? ह्यो तो जिसे देखो उसके सिर पर खून सवार है। [कराहती हुई फिर जाकर चारपाई पर लेट जाती है।] मुलिया पारो के बापू, हम तो इसी घडी ह्या से चल देंगे। घीसू कहाँ चल देंगे? मुलिया अपने गांव, और कहाँ ? घीसू वहाँ क्या मुसलमान नही या ऐसे हिन्दू नही ? देश में ऐसा कौन- सा गांव है, जहां हिन्दुओ के साथ मुसलमान या मुसलमानो के साथ हिन्दू नहीं वसते ? आग जो नगरो मे लगी है, उसकी लपटे क्या देहात मे न पहुंचेगी? (फिर जैसे अपने आप से) छ बरस लडाई रही। नगर तो दूर, किसी गांव तक मे फिसाद नहीं हुआ। अब महामारी की तरह यह मारा मारी शहर-शहर क्यो फैल गयी? ब्रिटिश सरकार जब चाहती है कि भाई से भाई लडे और उसकी सेना के पांव हिन्दुस्तान मे जमे रहे तो क्यो न यह सब खून-खराबी होगी ? (फिर मुलिया से) भागकर इससे जान न बचेगी, मुलिया। मुलिपा : तुमसे कौन माथा फोडेगा। दो अच्छर क्या पढ गये हो, गाधी वावा के कान काटते हो । वस तुम्ही एव जान-पाण्डे हो, माकी सप नेता तो जानो मूरख हैं। तुम रहोबा। मैं तो अपनी बच्ची को लेकर आज ही चली जाऊंगी। [पारो भागी भागी आती है।] पारो यापू"बापू "हमे एक काला पटुवा दो.. मुलिया मासा पटवा" पाला पटुका क्या करेगी रे... पारो हम भी माला झण्डा लगाऐंगे। यग्यू लगा रहा है माला पण्डा अपने परेमा। पोग्न यत् पगली"पल बैठ उधर ! (पारो अनमनी-मी जाकर दीवार के माप बैठ जाती है। पिर अवसर देगारमा जाना है। मुसिया सापटेन सा, उमे उसागर महराली है। पोस्यदर रोडपी और ग कुछ लोग याने परते पाते हैं । शिम्बू उन मयसे आगे गि यह भइया मोगीमा गुण, भाः तर पोरते हैं, जर पाती - तूफान से पहले / २३ सिर से गुजर जाता है। अपने गिरधारी दादा और उनकी यह गिरगांव की मण्डली जो कुछ आज कर रही है, यदि कुछ दिन पहले करती और नियाज मियां और उसके उस सिर फिरे बेटे को बुलाकर डांट देती तो कभी इसकी नौबत भी न आती। [घीसू के बरामदे से झिलगा घसीटकर उस पर बैठ जाता है, शेष कुछ लोग उसके इर्द-गिर्द बैठ जाते हैं और कुछ खडे रहते हैं। 10 आज भी बुलाकर यह फैसला कर लिया तो अच्छा रहा. आप लोग और दो दिन चुप रहते तो किसी दिन देखते कि झोपडियां जली पडी हैं । और आपके बोबी बच्चे छुरो से घायल तडप रहे हैं। बडे जालिम और कायर हैं ये लोग, भैइया । दूसरा कुछ भी हो हम नियाज मियां को ऐसा न समझते थे। तीसरा अरे, वह एक ही हरामी है । दो पठान वह आज भी लाया है । मैंने इन अपनी आंखो से देखे हैं। चौथा और वह हयातू"वह उसका सिर-फिरा बेटा, कल मेरे सामने उसने हाथ भर का छुरा खरीदा। मैंने पूछा---"क्या करोगे इतना वडा छुरा खरीदकर? सरकार पकड लेगी !" कहने लगा "बकरे जिवह करूँगा और काफिरो की इस सरकार की ऐसी की तैसी" शिब्बू (मोध मे एक हुकार भरकर) हूँ। तो वह हमको बकरा समझ रहा है । लेकिन वेटा को पता चल जायेगा कि बकरे सिंह भी बन जाया करते हैं । वह करे पठान इकट्ठे घीसू (जो इस बीच मे बराबर आगे बढकर कुछ कहने का प्रयास करता है) अरे भाई, वे पठान तो चौकीदार हैं । उधर से डर- कर इधर आ गये हैं। पहला जी हां, चौकीदार हैं | जब यहां तुम्हारा और तुम्हारे बीवी- बच्चो का गला काटेंगे तब पता चलेगा। पांचवां (जो इस बीच मे बरावर सडक पर खडा देख रहा था) अरे, वह देखो, इयातू दरगाह पर काला झण्डा लगा रहा है। शिब्बू (जैसे रबह के तार के खिंचाव से उचककर झिलगे से सड़क पर जा खडा होता है) मैं न कहता था और उपरदादाला सारी. आबादी इकट्ठी कर लाये हैं ।' [सभी उछलकर सङ्कमाल खड़े २४/ तूफान से पहले है विसी मे हिम्मत पि गिरधारी दादा आज्ञा दें और वह इन- पार कर दे! दादाओ ये दादा हैं अपने गिरधारी दादा । हर- हर महादेव [सामने से भी 'हर-हर महादेव ।' या शोर होता है, जोक्षण प्रतिक्षण समीप आता जाता है। इस हयातू वे बच्चे को भी मालूम होगा कि हिन्दू बबरे ही नहीं जो हर फिसाद मे शिवह किय जायें। वे भी सिंह बन सकते घोग इस समय तो दोनो गीदड हैं । [लेकिन कोई उरावी यात नहीं सुनता। पहला जोश से 'हर-हर महादेव ।' का जयकारा बुलाता हुआ आगे बढ़ता है। शेष उसका अनुकरण करते हुए उसके पीछे जाते हैं । घीसू सडक मे आ खडा होता है।] (निमिप भर के लिए सडक मे पडा देखता रहता है) भरे ये लोग दरगाह को आग लगाना चाहते हैं । नियाज मियाँ बेधारे.. [समाचार-पन बरामदे में फेंककर भागता है।] मुलिया (अपनी चौकी से छलांग लगाकर सड़क पर आ जाती है ।) तुम पराये वे फटे मे क्या पर डारित हो? मरने दो इन पापियो को। {उसके पीछे जाती है। मां (उसके पीछे जाती हुई) बेटा वेटा • बहू" बहू' [इसके बाद कुछ क्षण तक वैक-ग्राउण्ड में प्रतिहिंसा से पागल भीड के नारो, जयकारो, मारपीट और गाली- गलौज का शोर मचा रहता है। स्टेशन पर गाडी आकर रकती है। उधर से भी लोग आते हैं। नियाज मियां के साथ का एक पठान युवर अपनी जान के भय से अन्धा- धुन्ध भागा आता है और उसके पीछे हिमक भेडियो की तरह लाठियां, चाकू और छुरे लिये कुछ भैइया और दूसरे लोग भागे जाते हैं। सहमे और डरे हुए पारो और वस्शू आते हैं और भुस की कोठडी में जा छिपते हैं, या यो कहिए कि पारो वष्णू तूफान से पहले/२५ को छिपा देती है। तभी दरगाह की ओर से लाठी चलने की आवाज आती है। अपन पीछे नियाज मियां को लिये हुए लोहू मे लथपथ, घायल घीसू लाठी से आक्रमण करने वालो के वार बचाता और पीछे हटता हुआ प्रवेश करता है। रसमू, बदरी और शिब्बू आक्रमणकारियो के आगे- आगे हैं । साथ-साथ सहमी, डरी, रोती मुलिया भी है । रामू के भरपूर वार से घीसू की लाठी गिर जाती है और वह नियाज मियां को झोपडी के स्तम्भ और अपने मध्य लेकर सबके सामने छाती तानकर सडा हो जाता है।] रामू क्यो अपनी मौत बुलाते हो घीसू ? छोडो इस मलेच्छ को । जहाँ इसके साथी गये हैं, उहाँ इसे भी जाने देओ । घीसू तुम लोग नही जानते तुम क्या कर रहे हो? शिब्बू (उछलकर आगे बढते हुए) हम अच्छी तरह जानते हैं, हम क्या कर रहे हैं। बदरी इनके लिए हम काफिर हैं और हमे मारना इनके मजहब मे सवाब है । इनके लीडर काफिरो को मारने की तबलीग करते हैं और काफिरो को मारने वाले गुण्डो को शहीदो का दर्जा देते हैं । हमारे लिए भी ये मलेच्छ हैं और इन्हे यम के घर पहुंचाना महापुण्य घीसू कोई काफिर नहीं, कोई मलेच्छ नहीं। सब इन्सान हैं। सब भाई- भाई हैं। नियाज मियाँ इस बूढे के लिए क्यो मरते हो घीसू तुम इन्हे अपनी प्यास बुझाने दो। मैं अब जीकर वरूँगा भी क्या ? हयात की मौत के बाद. ? । घीसू (नियाज मियां की बात का उत्तर न देकर पूर्ववत रामू और वदरी से) इस बुड्ढे न तुम्हारा क्या विगाडा है ? बदरी भिण्डी बाजार के अनगिनत बच्चे-बूढो ने मुसलमानो का क्या विगाडा था निपाच मियां मुसलमानो वे इलाको में हिन्दुओ के साथ यही हो रहा है । अपने गुनाहो वा पल हमे भागना होगा। तुम क्यों नाम अपनी जान देते हो, धीमू? रामू तुम हट जाव पोमू, नहीं तो... घोसू (सीना तानकर) तुम नियाज मियां को कत्ल करना चाहते हो । तुम नही जानते कि सन बाइस वैपिमाद में इसी प्रकार ने २६/तूफान से पहले वाफिर के बच्चे को मुसलमानों के पंजो से बचाया, पाला-पोसा और परवान चढाया और यह वापिर तुम्हारे सामने पहा है ! उसकी लाग से गुजरकर ही तुम इसयो ले जा सयोगे! [उसी क्षण गिरधारी दादा या पंपा हुआ एरा घीसू थे सीने में आ लगता है और पोसू आधा सहर और आधा बरामदे मे गिरता है । मुलिया चील मारकर उस पर था गिरती है। दूसरे क्षण गिरधारी दादा सामने आता है। नियाज मियां को घसीटपर अपने साथी को देता है और पल भर बाद वैष-ग्राउण्ड में नियाज मियों के गिरने के माप उनकी आवाज-"खुदा तुम्हे नेक हिदायत दे।" "वायुमण्डल मे गूंज जाती है।] गिरधारी (अचेत घीसू की और देखते हुए)लातो वे भूत बातो से भी माना करते हैं। इतने जने मुंह वाये तर रहे थे और यह पटर-पटर बके जा रहा था! (नेपथ्य को ओर देखकर) क्यो, कर दिया सफाया उन सब पाजियो का? [सभी जाते हैं। गिरधारी दादा एक ठोकर पीसू के लगाता है।] बड़ा हिमायती बना फिरता था नियाज मियां का देख लिया मजा गिरधारी दादा से वर मोल लेने का ? उपेक्षा से घीसू की ओर देखकर चलता है। घवराया हुआ रामू वापस भागा आता है। रामू दादा, श्यामू और लवाडिया तो चले आवत हैं । और तुम कहत रहे मदनपुरे मां तो कऊ भैइया नाहिं मरा गिरधारी हमे सबेरे ही फोन आया था । किसी ने योही उडा दी होगी। रामू (पछतावे के साथ) तो इ सब नाहक हुआ? गिरधारी जो हुआ, अच्छा हुआ । मदनपुरे में न सही तो भिण्डी बाजार और रहमान गली मे वीसियो भैइये कत्ल हुए । इससे पहले कि शत्रु तुम्हारा गला काटे, तुम उममा टेटुआ दवाआ ! भैइये तो तब तक न चौंकते, जब तक वह हयातू उनदे सीनों में छुरा न भोकता। सुस्त बलों को चलाने के लिए उनकी दुमो पर चिकोटी काटनी ही पडती है । इस बस्ती मे भइयो को भी इसकी जरूरत थी। क्या हयातू ने छुरा न खरीदा था"? क्या वह पाजी बुड्ढा पठान इकट्ठे न कर रहा था तो चलो ! - तूफान से पहले /२७ [उपेक्षा से घीसू की ओर देखकर चला जाता है। मुलिया (उठकर चोखते और सिर पीटते हुए) और झूठी खबर पर तुम पापियो ने यह हत्याकाण्ड मचा दिया! (माथे पर दोहत्यड मारती है और घीसू से लिपटकर कहती है) कहा था जल मे रहकर मगर से बैर न ठानो ! अब हमे किसके सहारे छोड- कर जाइत हो! [रोती है । मां आती है और घीसू को अचेत पडे देखकर पछाड खाफर गिर जाती है। घीसू (आँखें खोलता है । उठना चाहता है, पर उठ नहीं पाता । बड़े कष्ट से ज़बान होठो फेरकर कहता है ) रोकर मेरे रास्ते को कठिन न बना, मुलिया! यह रोने को नही, खुश होने की बात है । तेरा पति अपने निर्दोस भाई की पीठ मे छुरा भोकते हुए या अपने भाई के बच्चे का गला काटते हुए नही मर रहा, वह मर रहा है, अपने भाई को रक्षा करता हुआ, उसके कुटुम्ब को बचाता हुआ! [फिर बेहोश हो जाता है। कुछ व्यक्ति यात के शव को उठाये हुए लाते हैं । साथ-साथ गिरधारी दादा भी हैं।] गिरधारी लिटा दो इस पाजी को इसके पहलू मे ! जानते हो तुम सबको क्या बयान देना है ? रामू ई कि हयातू ने काला झण्डा लगाया तब घीसू ने उसे टोका। इस पर यातू और पठान छुरे लेकर दौड पडे अकर मारा- मारी होइ गयो । यातू ने घीसू को मारा । गिरधारी हो ! यातू ने घीसू को मारा (गुलिया से) जानती है मुलिया, तुझे पुलिस को क्या वयान देना है ? अगर तुझे अपनी और अपनी बच्ची की जान प्यारी है तो कान खोलकर सुन ले- घीसू ने हयातू को काला झण्डा लगाने से रोका और हयातू ने घोसू के छुरा भोका । एक शब्द भी इधर-उधर किया तो जीते जो गडवा दूंगा धरती मे ! जानती है गिरधारी दादा को ! (अपने साथियो से) देखो सड़क के दोनो और पहरा लगा दो। कोई घर न आने पाये। पुलिस आती होगी, मैंने फोन कर दिया [चदरी भागा आता है।

२६ / तूफान से पहले
काफिर के बच्चे को मुसलमानों के पंजो रो पचाया, पाला-पोसा
और परवान चढाया और यह काफिर तुम्हारे सामने खडा है ।
उसकी लाश से गुजरकर ही तुम इसको ले जा सकोगे।
[उसी क्षण गिरधारी दादा या पका हुआ छुरा
सीने मे आ लगता है और घीसू माधा सहक
घरामदे मे गिरता है। मुलिया चीख मारकर
गिरती है । दूसरे क्षण गिरधारी दादार
नियाज मियां को घसीटवर अपने सा
पल भर वाद वैक-ग्राउण्ड में निय

तूफान से पहले / २६
मुलिया (उसके सिर को आराम से धरती पर टिका देती है और
सिसकती हुई कहती है) बख्शू को मैं अपनी बेटी की तरह
पालूंगी, मेरा विश्वास करो।
[घीसू एक बार आँखे खोलकर सन्तोष-भरी दृष्टि से
उसकी ओर देखता है, फिर उसकी आँखें बन्द हो जाती
हैं। माँ को बेहोशी टूटती है और वह रोती हुई और
वेटा बेटा "पुकारती उसकी ओर बढती है।]
सहसा पर्दा गिरता है।

२८/तूफान से पहले क्यो मिला वख्शू? बदरी सब जगह ढूंढा है, गिरधारी दादा, कही पता नहीं चला। न जाने कौन से बिल में समा गया? गिरधारी कोई बात नही । विल से निकालकर सांप के बच्चे का सिर कुचला जायगा । जाओ, तुम अपने अपने पहरे पर | मैं पुलिस को देखता हूँ। इधर कोई न आने पाये । (जाते-जाते मुलिया से) याद रखना, मुलिया नहीं जीती को गडवा दूंगा [सब चले जाते हैं, घीसू फिर बडबडाता है] घीसू आ रहा है, मै देख रहा हूँ, आ रहा है । मुलिया (रोते हुए) कौन आ रहा है। घीसू (दांत पीसकर उठने का प्रयास करते हुए) एक तूफान आ रहा है । भयकर तुफान आ रहा है । जिसमे ये सब दादे, ये गुण्डे, ये धर्म और जात पात के दर्प ये गरीबो का लोहू चूसने वाले पूंजी पति, ये भोले भोले लोगो को लडवाकर अपना उल्लू सीधा करने वाले नेता-सब मिट जायेंगे-एक नयी दुनिया बसेगी, जिसमे गरीबो का, मजदूरो का राज होगा, जहाँ हिन्दू-मुसलमान न होगे। काले गोरे न होगे। सब इन्सान होगे, भाई भाई होंगे। [पारो सहमी-सहमी-सी भुस की कोठरी से निकलती है और डरी हुई मां से लिपट जाती है। पारो मा मुलिया (रोते हुए उसे वाहो मे भर लेती है) अरी तू कहाँ थी? देख तेरे बापू का क्या हाल पर दिया निर्दइयो ने। पारो (भुस की कोठडी की ओर सकेत करके) वस्य घोसू (युझने से पहले दीये की लो फिर लपक उठती है) मुलिया । (उसकी ओर एक विचित्र प्रार्थना-भरी निगाहो से देखता है) मरने वाले की एक अभिलाषा पूरी करोगी? मुलिया (रोते हुए सिर हिलाती है) कहो। घीसू बस्शू को अपने बच्चो की तरह पालना, उसे इन हत्यारो के हाथ न जाने देना। [मुलिया उत्तर नही देती, रोपे जाती है। (उठन का प्रयास करते हुए) मुलिया।

तूफान से पहले / २६
मुलिया (उसके सिर को आराम से धरती पर टिका देती है और
सिसकती हुई वहती है) बख्शू को मैं अपनी बेटी की तरह
पालूंगी, मेरा विश्वास करो।
[घीसू एक बार आंखे खोलकर सन्तोष भरी दृष्टि से
उसकी ओर देखता है, फिर उसकी आँखें बन्द हो जाती
हैं। मां को बेहोशी टूटती है और वह रोती हुई और
वेटा • वेटा' पुकारती उसकी ओर बढती है ।]
[सहसा पर्दा गिरता है।]

साझे-विरसे
कृष्णकान्त वर्मा 'विवेक'
पात्र-परिचय
राजेश्वर श्रीवास्तव दैनिक समाचारपत्र के सचालक एव मुख्य सम्पादक ।
अवस्था लगभग ५० वर्ष । चेहरे पर सदैव एक गम्भीर
मुस्कराहट । सफेद दूधिया बाल, सुनहरी फ्रेम का चश्मा
एव हर समय जलती सिगरेट हाथ मे उनके व्यक्तित्व के
अनुरूप गम्भीर वातावरण को जन्मते हैं।
रेवती श्रीवास्तव राजेश्वर की ४५ वर्षीया पत्नी, साधारण खादी की साडी
मे लिपटी त्याग की प्रतिमूर्ति । आधे से अधिक बाल शायद
संघों ने सफेद कर डाले हैं अन्यथा भरा गोल चेहरा भरमा
देता है।
२८ वर्षीय। दैनिक का सम्पादक । सदैव मुस्कराता
युवक । अपनी आयु से अधिक परिपक्व । सदैव चितन में
डूबे चेहरे से सहज ही लगता है कि युवक आधुनिक भौतिक
मोह से अछूता और एक सुलझा हुआ व्यक्ति है।
सन्धू ३० वर्षीय युवा सिख पुलिस अधिकारी। पुलिस वर्दी मे
व्यक्तित्व अत्यधिक रौबीला मगर चेहरे पर सौम्यता।
माहेश्वरी पुलिस कमिश्नर । आयु ५० के आसपास । अत्यधिक रौबीला
व्यक्तित्व मुस्कराहट शायद उस चेहरे पर कतई अच्छी न लगे।
डॉ० मीरचंदानी ४८ वर्षीय चिकित्सक ।
पंकज व नीला अनुपस्थित पात्र एव श्रीवास्तव के युवा पुत्र-पुत्री।
डो० जी० पुलिस अनुपस्थित पात्र एव राज्य के पुलिस महानिदेशक ।
रमण

स्थल अत्याधुनिक बैंगले का ड्राइगरूम । मुख्य हाल कन्चाई ओर बने ड्राइंगरूम की दीवारो पर गाधी जी एव गुरुदेव के तैलचित्र लटके हैं एव स्वामी विवेकानन्द की आदमकद मूर्ति के साथ एक कोने मे टी० वी० एव वी० सी० आर० करीने से सजे हैं। कमरे के मध्य मे शीशे (पारदर्शी) की टॉप वाली मेज पर समाचार-पत्र एव पत्रिकाएँ बिखरी पड़ी हैं। सामने श्रीवास्तव पत्रिका के पन्ने पलट रहे हैं। कमरे को दक्षिणी दीवार की शीशो की खिडकियो से शहर की मुख्य सडक पर भागते वाहनो का शोर सुनाई देता रहता है । कमरे मे किसी फिल्मी गीत की धुन की धीमी ध्वनि के साथ-साथ बरावर के कमरे से पश्चिमी धुन भी बीच-बीच मे उभरती-सी प्रतीत होती है। यह सब इतना धीमा है कि हल्के खटके की आवाज भी स्पष्ट सुनी जा सकती है। कमरे मे फोन की घटी बज उठती है। श्रीवास्तव समाचार-पत्र मेज पर फेंककर फोन उठा लेते राजेश्वर हैलो - (अत्यधिक धीमी आवाज) - हेलो" (जोर-साडालकर... दूसरी ओर से आवाज़ स्पष्ट नहीं है). "हैलो' 'अरे हां रमण | गुड मानिंग । क्या बात है। आज सुबह-सुबह ही याद कर रहे हो सब खैर तो है ? • क्या (श्रीवास्तव के चेहरे पर भय मिश्रित भाव उभरते हैं और टेलिफोन का चोगा कंपकंपाता-सा प्रतीत होता है)..'मोह ! घबराओ नही रमण "मैं सीधा वहीं भा रहा हूँ. ठीक है ! ठीक है"तुम्ही चले जाओ" मगर ध्यान से ठीक है में पुलिस को इन्फार्म कर देता हूँ। (श्रीवास्तव टेलिफोन का चोंगा धीमे से रख देते हैं और सिगरेट मुंह से लगाए चिन्तित मुद्रा मे खिडकी से शहर की मुख्य सडक को पूरते रहते हैं।) क्या" [यकायक रेवती हांफती हुई-सी कमरे मे प्रवेश करती है और सोफे पर जा गिरती है। राजेश्वर रेवती को कमरे में आता देख सोफे का सहारा लेकर खडे हो जाते हैं। रेवती की टटो- लती नजरें श्रीवातद वो सटपटा देती हैं।

३२/ साक्षे-विरसे राजेश्वर क्या बात है रेवती "काफी परेशान-सी लग रही हो। (रेवती कुछ देर तक गम्भीरता ओढे देपती-भर रहती है मगर श्रीवास्तव घेचन-रो हो उठते हैं।) रेवती रमण या फोन था न...? राजेश्वर हो। रेयतो मैं फहती हूं"(रेवती की बात पूरी होने से पहले ही श्रीवास्तव बोल उठते हैं।) राजेश्वर रेवती "एव ही वात को दुहराने से कोई लाभ नहीं "मैं कह चुका हूँ कि इस घर को छोडकर वेवल मेरी लाश जा सकती है... (रेवती टोकना चाहती है मगर राजेश्वर उसे बैठे रहने का इशारा करते हैं). "मैं लोगो को सीख दे रहा हूं कि उग्रवादियो के भय से अपने पर न छोडें वरना अनर्थ हो जाएगा."देश इन फिरका- परस्त लोगो की दया पर निर्भर हो जाएगा" हम अपने ही देश में शरणार्थी धनकर रह जाएंगे। [रेवती पहलू बदलती रहती है। ऐसा लगता है जैसे वह राजेश्वर की बात सुन ही न रही हो। जैसे ही राजेश्वर कहते कहते रुकते हैं, रेवती चीख-सी उठती है।) रेवती वे लोग धमकियां दे रहे हैं और यह आप अच्छी तरह जानते हैं कि उनकी धमकियो का अर्थ क्या है ? राजेश्वर । (राजेश्वर के चेहरे पर गुस्से के भाव उभर आते हैं) क्या है ?... मौत""?.''वह एक ही बार आती है"मगर इस देश की जमीन के किसी टुकडे पर किसी धर्म, जाति या भाषा का नाम नहीं खुदा और मैं जिस टुकडे पर रहता हूँ वह मेरा है"मेरी पहचान... मेरा अस्तित्व "तुम क्या समझती हो कि अपने दो बच्चो या परि- वार को बचाने के लिए मैं अपने आदर्शों और कत्र्तव्य को धर्मान्धता की आग मे झोक दूं या फिर एक बेटे या बेटी को बचाने के लिए पूरे राष्ट्र की अपेक्षाओ का गला घोट हूँ"बेटा, बेटी या पत्नी तो ऐसे अस्तित्व नही जो फिर न मिल सके मगर राष्ट्र को पैदा नहीं किया जा सकता"नहीं । यह कभी नहीं हो सकता... (राजेश्वर की मुट्ठियां भिंच जाती हैं और वह एकटक गाधी जी की तस्वीर को पूरते रहते हैं।) [रेवती राजेश्वर को निहारती रहती है और यकायक राजेश्वर के क्रोध से भयभीत-सी हो जाती है । उसके चेहरे से लगता है जैसे वह अपनी ही बात पर पछता रही हो।)

साझे-विरसे/३३ रेवती मैं आपकी भावनाओं... राजेश्वर (रेवती का वाक्य पूरा होने से पूर्व ही राजेश्वर पुन बोल उठते हैं) ये कोरी भावनाएं नहीं, हमारा यथार्थ है रेवती "पंजाब तभी है जब भारत है और मैंने स्वयं को कभी भारतीय से पहले पजावी नही समझा और अब इस ढलती उम्र मे कुछ सिरफिरे लोगो के डर से मैं अपनी जिन्दगी की भीख एक शर्मनाक मौत से कभी नहीं मांगूंगा" किसी कीमत पर नही । (राजेश्वर की आवाज धीरे-धीरे ऊंची होती जाती है और रेवती घबरा-सी जाती है।) रेवती खैर ! अब छोडिए इन बातो को और नाश्ता कर लीजिए.''दफ्तर को पहले ही देर हो चुकी है। (रेवती वातावरण को गम्भीरता को कम करने के लिए विषय बदलना चाहती है। उसी समय हांफते हुए रमण प्रवेश करता है, जिसके एक हाथ मे एक कागज एव दूसरे में चश्मा है। रेवती व राजेश्वर का ध्यान रमण पर केन्द्रित हो जाता है । रेवती चिन्तित-सी रमण को ताकती रहती है। रमण इतना घबराया-सा है कि उसे अभिवादन का भी ध्यान नही रहता और हडबडाहट मे वह सीधा राजेश्वर की बगल मे खडा हो जाता है।) रमण . स."स"र......(रमण अत्यधिक भयभीत-सा हक्ला जाता राजेश्वर . बैठ तो जाओ रमण ! तुम तो ऐसे घबरा रहे हो जैसे मौत ने दबोच रखा हो"अरे ! इन छोटी-छोटी धमकियो से डरने लगे तो हो ली पत्रकारिता । (राजेश्वर के शब्दो का कोई विशेष प्रभाव रमण पर प्रतीत नहीं होता और वह राजेश्वर को घूरता रहता है । राजेश्वर रमण के वागज लेकर उसे पढते हैं तो उनके माथे पर बल पड जाते हैं। गुस्से से थर-थर कांपते हाथो से वे कागज के टुकड़े-टुकडे कर देते हैं और रेवती एव रमण आश्चर्य से उन्हें घूरते रह जाते हैं ।) रमण : सर...?"यह क्या किया मापने"यह तो पुलिस को देना था और आपने इसे...? राजेश्वर : रमण ! पंजाव के लाखो हिन्दू और सिप हमारी ही तरह निहत्ये हैं, जिन्हें कोई विशेष सुरक्षा बल नहीं मिले हैं। हालांकि यह सुविधा मुझे मिल सकती है, मगर अपने शरीर के किसी अग के बागी हो जाने पर बाहरी नहीं, आन्तरिक सुरक्षा प्यादा जरूरी रमण : सर! पोरी आदर्शयादिना से इस खतरे से नहीं भिड़ा जा सकता ३४/साझे-विरसे राजेश्वर क्योकि हम चन्द पागल लोगो से भिड रहे हैं, जो इन सब बातो को निरर्थक और कागजी भर समझते हैं। (रमण राजेश्वर से नज़रें नही मिला पाता और सतत् दीवार पर टॅगी गाधी जी की तस्वीर को निहारता रहता है। राजेश्वर की क्डी निगाहे रमण के पूर अस्तित्व को टटालती रहती हैं।) रमण | जिन्दगी का मोह और मृत्यु का भय तुम्हे कायर बना रहा है मगर क्या सिर्फ हम ही यह सव सह रहे हैं ? शायद तुम अपना ही सामना नहीं कर पा रहे हो। [रेवती रमण को वोलता देखकर उत्साहित हो उठती है। राजेश्वर की वात पूरी होते ही वह झटके से उठते हुए कहती रेवती मगर इससे अन्तर क्या पड़ जाता है अगर हम पजाव से बाहर जा कर ही पन निकालते रहते है। कम से कम इस रोज-रोज की। [रेवती की इस बात पर राजेश्वर खिन्न से हो जाते हैं और कमरे म टहलना शुरू कर देते है । राजेश्वर कोई अन्तर नही पडेगा हम मुंह छुपाकर भाग जायेंगे तो तुम क्या समझती हो, पजाब में कोई देशभक्त नही रहेगा ? लोग बडे फणस कहेगे कि स्वतन्त्रता सेनानी का बेटा पजाव से भाग खडा हुआ कितने साहसी और सार्थक लेख लिख रहा है दिरली मे छुप- कर । रेवती, तुम मेरी पत्नी होकर मुझे कायरता सिखा रही हो। (राजेश्वर के व्यग्नात्मक लहजे से रेवती सटपटाकर रमण को देखती है और रमण समय को परखकर बात बढाने का प्रयास करता है।) सर ! ये तो व्यावहारिक यात पर रही हैं । भला बैठे-बिठाये हम क्यो मुसीबत मोल लें जब इसका विकल्प उपलब्ध है । यह तो आ बैल मुझे मार वाली बात हो गयी। राजेश्वर नाउ स्टॉप इट रमण | दपार जाकर क्ल के ऐडिशन की तैयारी करो योडो देर मे मैं भी पहुंच रहा हूँ • मेरे आने से पूर्व सम्पाद- कीय तैयार कर लेना मैं । (राजेश्वर की वात पूरी नहीं हो पाती और फोन की घटी बज उठती है। सभी का ध्यान उस ओर चला जाता है। रमण राजेश्वरी के उठने से पहले ही फोन तक पहुंच जाता है।) रमण : हैलो" जी हाँ हाँ हैं. प्लीज हॉल्ड ऑन" । रमण साझे-विरसे / ३५ रमण चोंगे पर हाथ रखकर राजेश्वर से कहता है, डी० जी० पुलिस ] राजेश्वर (फोन थामकर) हैलो | राजेश्वर हियर | "गुड मॉर्निंग कैसे याद किया' हाँ नही, आज सुबह ही दोनो कवर करने गये थे.. क्या मनलव?." क · कब""कहाँ (राजेश्वर के हाथो मे चोगा कांपता रहता है और वे निढाल-से दीवार का सहारा ले- कर खडे हो जाते हैं)." ठीक है, मैं पहुंच रहा हूँ" (राजेश्वर चोगा जोर से पटकते हैं और दोनो हाथो मे सिर थामकर बैठ जाते हैं। रेवती और रमण यकायक इस परिवर्तन से घबरा उठते हैं। रेवती क्या बात थी क्या कह रहे थे? (रेवती राजेश्वर के कन्धे पर हाथ रखे-रखे पूछती है।) राजेश्वर रे"व" ती (राजेश्वर की आवाज भर्रा-सी जाती है। रेवती और अधिक चिन्तित हो उठनी है ।) रेवती पकज और नीला'' (राजेश्वर यकायक फूट-फूटकर रोने लगे।) रेवतो क्या हुआ उन्हें “कहाँ हैं वे लोग भगवान के लिए कुछ तो कहिए ."(रेवती ने राजेश्वर को झिंझोड डाला मगर राजेश्वर अविराम रोते जा रहे थे। राजेश्वर कुछ देर तक सिसकने के बाद यकायक गम्भीर हो गए। उनके चेहरे से ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो कुछ हुआ ही न हो।) राजेश्वर रेवती। पकज और नीला को उग्रवादियो ने मार डाला है। (राजेश्वर ने नजर गाधी के चित्र पर गाड दी। रेवती की आँखें खुली-की-खुली रह गयी और वह सोफे पर बैठी-बैठी ही निढाल-सी हो गई। रमण भी यह सुनकर सन्न-सा हो गया। वह छत को घूरता जा रहा था। राजेश्वर ने रेवती को झिंझोडा मगर वह गिर पड़ी) रमण "रमण | जल्दी करो" पानी लाओ."। (रमण निश्चल बैठा रहा। राजेश्वर ने उसे झिंझोडा तो वह मरे कदमो से आगे बढ़ा। यकायक नीला को फोटो देखकर उसके कदम रुक गये। फोटो को देखते-देखते उसकी मुट्ठियाँ भिंच गयी। आंखो मे लाल डोरे उभर आये। वह यकायक पलटा और राजेश्वर को कॉलर से पकडकर चीख उठा।) तुम"तुम नीलू की मौत के जिम्मेदार हो"अपने झूठे आदर्शों के नाम पर तुमने नीलू की बलि दे डाली "अपनी महत्त्वाकाक्षा को पूरा करने के लिए तुमने यह हत्या कर दी माँय विल। (रमण रमण ३६/साझे-विरसे राजेश्वर वा झिंझोटता रहता है। राजेश्वर रमण को घरेलकर रसोईघर से पानी लाने हैं और रेवती के मुंह पर छोटे डालते हैं। रेवती पलकें झपकती है तो राजेश्वर उसका चेहरा दोनो हाथो में थाम लेते हैं।) राजेश्वर रेवती "रेवती • । (रेवती अपलय छन को धूरती रहती है। राजेश्वर रेवती को सोफे पर लिटापर फोन का नम्बर घुमाते हैं।) 'हैलो डाक्टर मीरचन्दानी ? मैं श्रीवास्तव बोल रहा हूँ प्लीज़ उन्हें फोन पर बुला दें" हैलो डाक्टर "देखिए अचानक रेवती बेहोश-सी हो गयी है-ओह मैं तो भूल ही गया था-ठीक है मैं डी० जी० पुलिस से बात करता हूँ। आप पुलिस-वाहन में आ जाइए • यदि कप'-पास की आवश्यकता होगी तो भी वे कुछ तो करेंगे ही-ठीक है, मैं बात कर लेता हूँ। [राजेश्वर ने दूसरा नम्बर घुमाया और बेसब्री से दूसरी ओर की आवाज़ की प्रतीक्षा करने लगे] हैलो · राजेश्वर श्रीवास्तव हियर-यस"डी० जी० साहब से बात करवा दे क्स, मैं होल्ट कर रहा हूँ""हैलो!'' अरे नही मेरी पत्नी वेहोश हो गयी है। मगर कपy के कारण डाक्टर का आना सम्भव नही। आप कुछ व्यवस्था करदेतो. जी!.. कोन?... नहीं अभी तक · (इसी बीच कमरे मे एक युवा सिख पुलिस अधि- कारी एव दो कॉन्स्टेबल प्रवेश करते हैं। राजेश्वर उन्हे देखकर यकायक चौंक-से पडते हैं). यस 'यस' वे लोग अभी-अभी पहुंचे है । थक्यू । (राजेश्वर फोन बद कर जैसे ही मुडते हैं "युवा पुलिस अधिकारी हाथ जोडकर अभिवादन करता है।) सधू यह सब क्या हो गया अक्ल" ? (सधू धीमे कदमो से रेवती की ओर बढता है। राजेश्वर चौककर कहते हैं।) राजेश्वर अरे हाँ सधू वेटे । तुम अपनी गाडी भेजकर डा० मीरचन्दानी को तो बुलवा लाओ" रेवती बेहोश हो गई है। [सधू सकेत से दोनो कॉन्स्टेबलो को भेजकर रेवती के निकट आ जाता है। संधू आण्टी. "आण्टी (सधू रेवती को हिलाता रहता है।) [रमण जो जलती निगाहो से सधू को पूर रहा था यकायक चीख उठता है।

साझे-विरसे/३७ .."पता रमण आदमी की खाल में भेडिये हो तुम सब"क्या बिगाडा था, नीलू और पकज ने तुम्हारा राजेश्वर (रमण को झिडकते हुए) रमण | होश मे बात करो। संधू रहने दीजिए अकल" रमण जी वहीं कह रहे हैं, जो उग्रवादी चाहते हैं। हर सिख उग्रवादी लगे"यही तो उनका मन्तव्य है फिर यदि रमणजी-जैसे राष्ट्रीय स्तर के चिन्तक भी ऐसी आत्मघाती सोच के शिकार हो जाते हैं तो इससे बड़ी सफलता क्या होगी उनकी १ वे तो यही चाहते हैं कि आपसी विश्वास की यह डोर भी टूट जाये। राजेश्वर सधू बेटे ! रमण नीलू की खबर सुनकर अपने होश खो बैठा है। सधू अकल, अब तो आदत-सी हो गई है यह सब सहने की अगर हम किसी हिन्दू के घर मे उसकी सुरक्षा के लिए भी प्रवेश करते हैं तो औरतो और बच्चो पर आतक छा जाता है."उनको धिग्धी बंध जाती है"उस समय मन करता है काश ज़मीन फट जाती." नही क्यो हम लोग आपसी विश्वास खोते जा रहे हैं. पुलिस की इस वर्दी में भी वह विश्वास नहीं रहा। केवल भय, अविश्वास और आतक रह गया है जी करता है वोटो-बोटी नोच लूं उनकी, जिन्होने आज हमे इस स्थिति तक पहुंचा दिया है। (सधू के चेहरे पर लाली छा जाती है और मुट्ठियाँ भिंच जाती हैं।) राजेश्वर सधू बेटे | इस देश की तकदीर मे वदा है कि अपने ही घुन की तरह चाटेंगे इसे और हम जो खुद को जनता कहते है भोगी बिल्ली बनकर अपने-अपने स्वार्थ मे अन्धे अपने दडवो मे घुसे रहेगे। ज्यादा हो गया तो सरकार को दोष दे दिया, नेताओ को गाली बक दी या कानून और व्यवस्था का रोना रो लिया और हम कर ही क्या सकते है सिवा तोड-फोड, आगजनी या हडताल और बन्द के... (राजेश्वर की बात बीच ही मे अधूरी रह जाती है। डाक्टर के साथ- साथ पुलिस कॉन्स्टेबल कमरे मे प्रवेश करते हैं। सभी का ध्यान उस ओर चला जाता है। डाक्टर धीरे धीरे रेवती का निरीक्षण करते हैं। राजेश्वर पास ही खडे हो जाते हैं।) राजेश्वर समथिंग सीरियस डाक्टर ? नही कोई खास बात नही" ""शायद गम्भीर शॉक लगा है। मैं इजैक्शन दे रहा हूँ"हाँ "यदि आध घंटे तक कोई प्रभाव नहीं होता तो इन्हें हॉस्पिटल ले जाना पड़ेगा। डाक्टर - ३८/साझे-विरसे [इसी समय कमरे में एस०पी० पुलिस प्रवेश करते हैं। उनके पीछे दो कॉन्स्टेबल भी अन्दर आते हैं। राजेश्वर के साथ- साथ अन्य लोगों का ध्यान भी उनकी ओर आकृष्ट हो जाता है । सधू सावधान होर संस्यूट करता है मगर एस०पी० का ध्यान राजेश्वर की ओर ही रहता है।) राजेश्वर अरे एम० पी० साहव ? आप कैसे पहुंच गये लगता है सारा पुलिस विभाग ही आज हमारे यहां जमा हो रहा है । [राजेश्वर एस०पी० को बैठने का सवेत कर डाक्टर को दरवाजे तक छोडने जाते हैं और सधू सवेत से कॉन्स्टेबल को जाने का आदेश देता है। राजेश्वर एस० पी० के सामने आकर बैठ जाते हैं।] राजेश्वर कहिए माहेश्वरी साहब, कैसे आना हुआ? (राजेश्वर के सयत स्वर से एस० पी० आश्चर्यचक्ति-से रह जाते हैं।) इसका मतलव आपको कुछ मालूम नहीं ? [राजेश्वर के होठो पर एक मायूस-सी मुस्कराहट बिखर जाती है। शायद पक्ज और नीला की हत्या पर किसी मन्त्री का सवेदना. सन्देश लाए हैं आप? श्रीवास्तव साहब ! अभी-अभी आपके दफ्तर मे एक बम फटने से दो व्यक्ति घायल गए है और "(एस०पी० के इस रहस्योद्- पाटन से कमरे में बैठे सभी लोगो के चेहरे पर आतक छा जाता एस० पी० राजेश्वर एस०पी० एस०पी० राजेश्वर ओह नो"।(राजेश्वर आंखें मूंद लेते हैं।) ऑय एम सॉरी श्रीवास्तव साहब, मगर हालात को देखते हुए यह बहुत जरूरी हो गया है कि आपके बच्चो की हत्या का रहस्य प्रेस तक न पहुंचे और स्वय आपकी सुरक्षा की कडी व्यवस्था हो ताकि उन लोगो को कोई मौका न मिले। राजेश्वर मैं आपका मतलब नहीं समझा। श्रीवास्तव साहव । वर्तमान स्थिति में या तो आप पजाब से बाहर चल जायें या हमे मजबूरन आपको 'हाऊस एरेस्ट'...! राजेश्वर मि० माहेश्वरी ! मुझे हिरासत मे रखकर आपएक और खतरा मोल ले रहे हैं। दूसरे आप मुझे मेरे बच्चो के शवो से वचित कर एक गैर-कानूनी काम। एस० पो.

साझे-विरसे / ३६ एस० पी० एस०पी० श्रीवास्तव साहब प्लीज़ ! आप हमारी मजबूरी क्यो नहीं समझते । यदि आपके बच्चो का अन्तिम सस्कार सार्वजनिक रूप से हुआ तो सारा शहर भडक उठेगा। स्थिति और अधिक बिगड जायेगी. इस समय इसके सिवा कोई अन्य विकल्प नहीं कि आप राष्ट्रहित में चुप्पी साध लें। आप तो अच्छी तरह जानते हैं कि ये लोग कितने निर्मम हो चुके है। राजेश्वर आपका मतलब है कि मैं घुटने टेक दूं और कुण्डली मारकर अपनी सुरक्षा की चिन्ता करूँ मगर जो सामाजिक अपेक्षाएँ हम लोगो से जुडी है उनका क्या होगा?.. मैं तो सुरक्षा गार्डों की फौज लेवर चलूंगा मगर उन लाखो पजाबियो का क्या होगा जो घरो, बाजारो और बसो मे निहत्थे फिर रहे हैं ? श्रीवास्तव साहब ! मैं आपसे बहस करने नहीं आया बल्कि मुझे जैसे निर्देश मिले हैं वही आपको बता रहा हूँ शेष आपकी मर्जी मुझे मजबूरन आपको हिरासत मे लेना पडेगा। राजेश्वर की मुट्ठियां भिंच जाती हैं। राजेश्वर अग्रेजो से विरासत में मिली है यह अफसरशाही हमे, जो सामान्य जनता को अपने रहमो-करम पर ग्राने के लिए नित नये सूत्र ईजाद करती है" इस देश के जननायक एक पूरी सशस्त्र सेना साथ लेकर निकलते हैं अपने रहनुमाओ से मिलने उनकी सुरक्षा पर करोडो रुपये पानी की तरह बहाकर हर रोज़ नये तमाशे करती है यह चाप- लूस अफसरशाही, मगर कभी यह सोचने का समय नहीं मिलता आप लोगो को कि इस महाद्वीप जैसे राष्ट्र में यह बुलेट प्रूफ राज- नीति कितने दिन चलेगी"यहाँ वहाँ बाटोगे यह सुरक्षा कवच जव श्रीनगर से भिवडी तक आस्तीन के साँप कुलबुलाते रहेगे और राजनीति और अफसरी गठवधन इन्हे दूध पिलाता रहेगा। देश की जनता तो तुम्हें उस मूर्ख कुत्ते-सी लगती है, जिसे हड्डी से लिपटा अपना ही धून मजेदार लगता है। मगर यह मत भूलो कि जिस दिन यह हड्डी छूटेगी उसके मुंह को खून लगा होगा, उस दिन उसका शिकार कौन होगा? अपन ही लहू का उन्माद इतना बढ चुना है इस देश पर कि...? वोट के लिए धर्म, जाति और रंग का जहर पिलाते हैं और जब यह असर परने लगता है तो सुरक्षा गार्ड दैदेत हैं। यही नहीं, जब असभ्य लोग इस चौपड मे मान या जाते हैं तो शोर-गन्देशो की बाढ ले आते हैं, सवेदनाएं प्रकट करते हैं, अनुग्रह.

४०/ साझे-विरसे .. एस०पी० रमण राशियां बांटते हैं और इग तरह वे हत्यारे नही, मसीहा बन जाते हैं नैतिक पतन की हद होती है। मगर इस देश में शायद कोई नही वस हर कोई घात लगाए बैठा है कि यहाँ मौका मिलेगा? प्लीज मि० श्रीवास्तव | आप समय नष्ट कर रहे हैं । (माहेश्वरी या वाक्य पूरा होने से पूर्व ही रमण या अट्टहारा गूंजा।) हा हा हा आप बिल्कुल ठीक रह रहे हैं माहेश्वरी साहब । प्रजातन्त्र मे सत्य वह है, जो बहुमत यो अच्छा लगे, यथार्थ यह है जो सबकी जुवान बन्द पर दे जानते हैं क्यो" ?" क्योकि ये एक पगु समाज के रहनुमा हैं । जो समाज पिछले चालीस वर्षों से हर क्षेत्र मे कुछ-न-कुछ नया पाने की इच्छा मे सतत् आत्म-विश्वास खोता जा रहा है । गरीबी, अशिक्षा, भ्रष्टाचार और शोषण का नशा इस कदर चढा है कि इसे अपनी ही सुध नही "जो स्वय को होश में कहते हैं असल मे भौतिववाद को मरीचिका मै भटक रहे हैं विसी स्तर पर समन्वय नहीं एक उद्देश्यहीन समाज बनकर रह गए हैं हम लोग, जो यस क्षण भर जीने की लालसा में अपना पूरा भविष्य अपने भूत की भूलो के पास गिरवी रख देते हैं । कोरी नारेवाजी या प्रस्ताव पास कर वोट तो मिल सकते हैं मगर राष्ट्रीय एकता एक मजाक-भर वनकर रह जाती है। जिस देश का समाज पेट से भूखा, तन मे नगा, मन से लालची और बुद्धि से दिवालिया कर दिया गया हो उस देश के रहनुमा सदैव चैन की बसी वजाते .. सधू रमण जी | आपका जोश और होश दोनो प्रशसनीय हैं मगर इस अथाह सागर को मथेगा कौन? एक ओर तो हर कोई अपनी व्यक्ति- गत पहचान के लिए तत्पर है तो दूसरी ओर राष्ट्रीय मुख्यधारा से दूर होता जा रहा है। दूसरो को दोप देना तो सरल है मगर अपने यथार्थ से सभी आँखे मूंद लेते हैं। हमारी क्थनी और करनी का अन्तर भ्रष्टाचार के भूत की तरह कभी कही छोटा पडता नज़र नही आता। एस०पी० (चेहरे पर खिन्नता के भाव उभर आए ।) सधू । तुम पुलिस स्टशन जाओ • मेरी प्रतीक्षा करना। मैं थोडी देर मे वहां पहुंच रहा हूँ। [सधू ने सैल्यूट यजाकर प्रस्थान क्यिा। एस०पी० राजेश्वर की ओर मुडे ।

साझे-विरसे/४१
एस० पो.
मि० राजेश्वर । चूंकि शहर की स्थिति नाजुक बनी हुई है और
उन लोगो की तलाश जारी है इसलिए हम किसी भी प्रकार का
कोई खतरा मोल नहीं ले सकते। आप घर से बाहर केवल पुलिस
गार्ड के साथ ही निकल सकते हैं, मैं आपके मकान के चारो ओर
पहले ही पुलिस तैनात कर चुका हूँ" हाँ, अगर आप चाहे तो
आपको पकज और नीला के अन्तिम सस्कार में सम्मिलित किया जा
सकता है मगर एक्दम अवेले और गुप्त रूप से, ताकि रहस्य न खुल
जाए।
राजेश्वर
एस०पी०
[राजेश्वर एस० पी० को घूरते जा रहे थे।]
अपने जवान बेटे को आग देने भी गुप्त रूप से जाऊँ ? "और बेटी
की अर्थी सजाना तो दूर उसका मुंह भी दुनिया से मुंह छुपकर
देखू ? इस खौफ मे कितने दिन जी सकता है वादी-द
तक हम यूं घुटने टक-टककर चलते रहगे?
मि० श्रीवास्तव, इसमे डर की तो कोई बात नहीं है। वना
हमे आप लोगो का सहयोग नहीं मिलता, हम दर
चलाते रहेगे । आप अपनी ही बात ले भाग:-की
बातें होती है, आप प्रचार करते हैं कि प्रदाद में
पुलिम पी मदद की जानी चाहिए। मगर माय
बीत रही है तो आप भावुक हो रहे हैं।
सम्पादकीय म उग्रवादियोबोचने कामद
यह दुर्घटना न हाती-आप प्रेगवान tarfram
से समस्या का हल करते हैं उगीर
यदा कदा होता है मगर Rmarrurat ka
पुलिसवालो वे पागौर-ttrim
aaram

४२/ साझे-विरसे अपने आदर्शों और देश के करोड़ों वेटों को बचाने के लिए अपने दो बच्चे न्यौछावर कर दिये हैं। "पंकज और नीला के हत्यारे हमारा ही एक गला-सडा हिस्सा है, इसलिए तुम रोने की बजाय मुस्करा- ओगी. "याद करो रेवती, जलियांवाला बाग में ऐसे ही हजारो वेटे भून दिये गए । मगर तब क्या सारा देश हाथ-पर-हाथ धरे बैठ गया था?''अपनी कोख को दुआ दो रेवती कि उमने दो ऐसे वीर जने, जिन्होंने अपनी मर्यादा को अन्तिम सांसों तक बनाये रखा... उठो और मिसाल बन जाओ भारतीय मां की, जो अपनी कोख में ऐसे वीरों को ढोती है आह्वान करो उनका कि साम्प्रदायिकता और धर्मान्धता की आग को अपने वेटों के खून से बुझाये और समा जाओ भारत मां में जिसके करोड़ों बेटे एक बार फिर अपने आपको न्यौछावर करने के लिए तत्पर रहें । [एस० पी० साहब की आँखें नम हो गयी। रमण की आँखों मे राजेश्वर के प्रति असीम श्रद्धा उभर आयी थी, उसने रेवती को ढाढस देना चाहा था शायद।] मम्मी | पंकज और नीला तो शहीद (रमण का वाक्य अधूरा ही रह गया था। राजेश्वर की कड़कती आवाज़ ने सभी का ध्यान उनकी ओर आकर्षित कर दिया।) नहीं रमण ! इस पागलपन के झगड़े में कोई शहीद नहीं होता। अरे एक घर की आपसी कलह भला जग कैसे हो सकती है...?... मुस्लिम, सिख या ईमाई अगर एक-दूसरे के दुश्मन हो जाते हैं तो उनकी यह लडाई देश की लड़ाई नहीं। भारत मे केवल भारतीय हैं और जब तक वे किसी गैर-भारतीय से नहीं लड़ते उन्हें शहीद कहलाने का अधिकार नहीं। इस लड़ाई मे मरनेवाला तो नज़रें झुकाये क्षमादान मांगता है कि उसे अपनों को भूल का शिकार होना पड़ा। शहीद इतना सस्ता नही रमण कि धर्मान्धता और फिरका- परस्ती का इल्जाम लेकर मरे"इस अन्धी लड़ाई में न किसी को जीत है न किसी की हार"अपनी ही मां का गला दवाकर कोन कह सकता है कि वह जो कुछ कर रहा है अपनी सुरक्षा के लिए कर रमण. राजेश्वर रहा है। [सभी को जैसे सांप सूंघ गया। यकायक राजेश्वर पहे होते हैं और एस०पी० से कहते हैं।]

साझे-विरसे/४३
राजेश्वर चलिए एस० पी० साहब ।
(सभी खडे हो जाते हैं और राजेश्वर दरवाजे की ओर बढते
हुए रमण से वहते है ।) रमण | तुम आफिस जाओ और
जैसे भी हो कल के 'एडिशन' को निकालने का प्रबन्ध करो, मैं
थोडी देर मे पहुँच रहा हूँ" हां कल का सम्पादकीय मैं स्वयं
लिखूगा।
[इसी के साथ पर्दा गिरता है और नेपथ्य से देश-प्रेम के गीत
की आवाज़ स्पष्ट सुनायी देती है।]

अन्तिम निर्णय
गिरिराजशरण अग्रवाल
याण
दृश्य एक
[समय सध्यापूर्व। स्थान बुदेलखड के मकान का कोई
कमरा। कमरे में अधिक सामान नहीं है। हां, दो शस्त्र
दीवार पर लटक रहे हैं । दाईं ओर एक चौकी रखी हुई है।
खिडकी के पास खडे दोनो व्यक्तियो मे एक पुरप है और
एव नारी। पुरप वे चेहरे पर चिन्ता पढी जा सकती है।
स्त्री कुछ गम्भीर है । वह इननी व्याकुल नहीं है।
वरण (हताश-सा) अपराजिता कुछ सुना तुमने ?
अपराजिता क्या कुछ विशेष बात हुई?
मुझे लग रहा है कि एक नक्षत्र के समान टूट जान के लिए ही तुम
मेरे जीवन में उदित हुई थी। जान पडता है, मैं मृत्यु की भी शान्ति
गया बैठा है।
अपराजिता वरुण, क्या वह रहे हो तुम? मेरा मन आज कम भावुक नहीं है,
उसे और भावुक न बनाओ। पहले तो इतने भावुव नहीं थे तुम ।
चारों ओर युद्ध की विभीपिया व्याप्त है । लगता है कि इस युद्ध से
बुदलयह मुक्त न गवेगा। मुगल सेना चारो ओर फन गई है।
पुरवासी विपाद ये माय भय से ग्रस्त हो गए हैं
नपराजिता वरण, विषाद और भय हो छाया है या कुछ और भी।
यहां तर यताऊँ अपरा। मां अपने पुत्रों के, यधुएं आ पतिया ये
मुग निहार रही हैं, ऐम पि उन्हें पिर देय भी पायेंगी या नहीं।
सब सम्मित है । पता नहीं क्या होगा
वरण
बरण

अन्तिम निर्णय | ४५ वरुण अपराजिता उनके बल-पराक्रम को क्या हुआ? यह कायरता हमारी जाति मे कहाँ से आ गई? वरुण उनका बल पौरुष थक-सा गया है । साहस ने जवाब दे दिया है। अपनी धरती का हरण स्पष्ट दिखाई दे रहा है उन्हे। विधर्मियो द्वारा अपनी बहू-बेटियो वा अपमान देखकर भी मुंह बन्द किये हुए हैं---अशक्त बन्दी-से। अपराजिता जब सबके सामन जीवन-मरण का प्रश्न उपस्थित है तो व्यक्तिगत स्वार्थ नितात अनुचित है, दस्युओद्वारा हमारी माता कादलन हो और हम विवश देखत रहे । उसकी सन्तान यहां बैठकर प्रेमालाप करे । कौन उचित कहेगा इसे? हमको हमारा कर्तव्य पुकार रहा है । उचित ही है तुम्हारा कथन, अपराजिता । अभागो के भाग मे भर्त्सना ही लिखी होती है किन्तु जहाँ पर विजय की कोई सभावना न हो वहां अपने जीवन की रक्षा तो करनी ही चाहिए। अपना जीवन व्यर्थ मे होम कर दें यह कहां की बुद्धिमत्ता है ? {अपराजिता की भृकुटियां टेढी हो जाती हैं] अपराजिता लगता है, पूरी तरह निराश हो गए | क्या निराशा ही हमारी नियति है ? क्या मानवजीवन मात्र निराशामय है ? क्या आशा की कोई किरण हमारे मन के अधकार को दूर नही कर सकती? कैसी बहकी-बहकी बातें कर रहे हो तुम वरुण क्या बताऊँ अपरा । वातावरण मे युद्ध की कालिमा कुछ इस प्रकार व्याप्त हो गई है कि आशा को एक एक किरण का अस्तित्व खो-सा गया है । मुगल सेना ने इस तरह से घेर लिया है कि किसी को अपने जीवित बचे रहने की आशा नही रही है । सब अपनी पराजय और उसकी निश्चित विजय ही देख रहे हैं । अपराजिता शत्रु को निश्चित विजय का कारण? (शकित-सा) उनकी बर्बरता और नृशसता । मुगल सेना निर्दयता की साक्षात प्रतिमा बनी हुई है। अपराजिता और अपनी पराजय का कारण सभ्यता है क्या? [वरुण का मुख लज्जा के कारण अरुण हो गया, वह मोन था। (पुन गर्व और विपाद के साथ) में अपनी जाति को सभ्यता पर गर्व करती हूँ। मुझको अपनी सभ्यता पर अभिमान है, किन्तु स्वय को धोखा देने से क्या लाभ? ? घरुण ४६ / अन्तिम निर्णय वरुण वरण जब सभी अपन प्राणो को बचाने में लगे हैं तो हम ही क्यो अपने जीवन की बलि दें। अपराजिता क्या यह निश्चित है कि हम भागकर बच ही जाएंगे? जो अपने घर की रक्षा न कर सके उसका ठौर-ठिकाना क्या? हम पूरी तरह घिर गए हैं। अव काई रास्ता नहीं है। सिवाय इसके । अपराजिता (बीच मे ही) इसका अर्थ यह हुआ कि हमारे पुरुषार्थ का अन्त ही हो गया | नही, मैं नहीं मानती। सेनापति कौशल को देखो, उसने अभी तक हार नहीं मानी। ऐसे वीरो के होते हुए मैं कैस समझू कि हम हार गये। वरुण शायद तुम्हे पता नहीं है कि सनापति कोशल का एक नेत्र बिंध गया है । युद्ध छोडकर वे भवन मे घायल पडे हैं । अपराजिता सब कुछ ज्ञात है मुझे और इसके आगे भी। सेनापति जैसे ही कुछ स्वस्थ हुए उन्होने तुरन्त रणभूमि मे जाने की इच्छा प्रकट की। जव उनके साथियो ने नेत्र-बाधा की बात कहकर उन्हें रोकना चाहा तो पता है उन्होने क्या उत्तर दिया- 'मुझे तो अब लक्ष्य साधने की सुविधा ही हो गई है।" वरुण धन्य है वह अपराजिता हाँ, कोई उस वीर के साहस की समता करके दिखाये? उसने आज ही रात को आक्रमण का विचार किया है। शाम हो रही है। मेरे वृद्ध पिता वहाँ जा चुके हैं । मेरी कामना है कि मेरे भावी पति स्वदेश पर आये सकट को दूर करने के लिए युद्ध मे वीरोचित भाग ले। [अपराजिता साक्षात् देवी जान पड रही थी। वरण नत- मस्तक हो गया । अपराजिता ने उसे एक पुष्प अर्पित किया और मौन भाव से अन्दर चली गई। , दृश्य : दो [रात्रि मे कौशल न अपनी सेना के साथ मुगल सेना पर आक्रमण कर दिया। किन्तु कौशल-जैसे कुछ शूरमा क्तिना कुछ कर सक्ते थे? रात्रिरण मे उन्ह पराजित होकर पोछे हटना पडा। सहसा विए गए आश्रमण से मुगल सेना को पर्याप्त हानि हुई किन्तु विजय पावर लाभ में वही रहे।

अन्तिम निर्णय/४७ वरण वरुण वरुण तो पहले ही हार मान बैठा था किन्तु अपराजिता को प्रेरणा पर वह युद्धभूमि मे गया। दुर्भाग्य से उसे रात मे ही मुगलो द्वारा पक्ड लिया गया। उसने रात-भर मुगलो की निर्दपना और नशसता का नगा नाच देखा था। जजोरो से बांधकर उसे सरदार खालिद के सामने पेश किया गया। खालिद के कुछ कहने से पहले ही वह चिल्ला उठा। (डर न आंखें मोचकर) जीना चाहता हूँ मैं। मैं अभी मरला नहीं चाहता। मैंने अभी देखा ही क्या है? इतनी जल्दी नही मरना चाहता मैं? खालिद मरने से डरता है ? लडने क्यो चला था? जैसा किया है वैसा भर? क्या तू हमारा मेहमान है कि हम तुझे खिलाकर जिलायेंगे? चाहो तो अर्थदण्ड दे सकता हूँ। केवल जोने के लिए। खालिद गुस्ताखी न कर ! जाहिल, मजहब को बात कर। मजहब ! मैं समझा नहीं। खालिद मुसलमान बन सकेगा? जल्दी जवाब दे। धर्म बदलना होगा ? (क्षणभर ठहरकर) स्वीकार करता हूँ, इस्लाम धर्म स्वीकार कर सकता हूँ, लेकिन एक शर्त पर। खालिद क्या शर्त है तेरी? वरुण मैं अपराजिता से प्यार करता हूँ। उससे वचित न हो जाऊँ। खालिद कौन अपराजिता ? कोन है वह ? वरुण यहाँ के सरदार की बेटी, मेरी भावी वधू। खालिद यह बात है ? जब हम जीत जायेंगे तब तू उसे क्यो न पा सकेगा? एक अपराजिता तो क्या हजार हूरें भी मिल सकती हैं तुझे। वरुण : नहीं चाहिए मुझे हूरें और अप्सराएं, केवल वही मिले तो मैं सतुष्ट वरुण वरुण . - खालिद तुझे हमारा साथ देना होगा। ध्यान रखो, हमसे कोई बात छिपा- कर नही रखोगे तुम मुझे स्वीकार है। खालिद जा, अब तू हमारा दुश्मन नही । इत्मीनान रख । वरुण ४८/ अन्तिम निर्णय वरुण हुए लौट जाते हैं उसी प्रकार अपना देश छोडकर जाने वाले अनेक व्यक्तियो मे अपराजिता भी थी। तीन दिन के भीतर नगर-सीमा से बाहर चले जाने का आदेश हुआ था। मार्ग के एक ओर वरुण खडा हुआ था। उसने देखा कि अपरा- जिता भी नगर छोडकर जा रही है। (भीड मे आगे बढकर) अपराजिता, क्या तुम भी पराजित की तरह जा रही हो? यह नगर छोडकर कहां जाओगी तुम? जो भाग्य मे था वह तो हो गया। भविष्य किसके हाथ मे है ? अपराजिता तुम्हे पता नहीं। मेरे वृद्ध पिता, जिनकी गोदी मे पडकर मुझ मातृ- हीना न दुलार पाया था, मुझे अकेला छोड़ गए। वरुण तुम्हार पिता ही नही, मेरे भी बन्धुजन, साथी । (गम्भीर हो जाता है) ईश्वर की ऐसी ही इच्छा थी। मैं तुम्हारा हूँ, तुम मेरी हो । ईश्वर का विधान भी यही है कि उजडा घर हमे नही, हम ही उस वसायेंगे। तुम न जाओ, अपराजिता न जाओ। अपराजिता (दीनता से) ईश्वर की आज्ञा को शिरोधार्य करके ही जा रही हूँ मैं। वही यह भी जानता है कि हमारा विश्राम-स्थल कहाँ होगा? न मैं जानती हूँ और न मुझे जानने की चिन्ता ही है । अपरा| वह अव भी हमारे हाथ मे है यदि चाहो तो.."। अपराजिता किन्तु एक बार हाथ खीचकर बढाने से क्या लाभ? महानता बार- बार नहीं आंकी जाती। लेकिन मुस्लिम धर्म भी तो उदार' । अपराजिता (वात काटवर) जानती हूँ। सब अपने हित की बात सोचते हैं। सुन चुकी हूँ कि तुमने नया धर्म ग्रहण कर लिया है। उसी की छाप तुम्हारे चेहरे पर दिखाई दे रही है। क्या-क्या मिला इसके बदले में तुम्हे । धन-दौलत । यश-वभव । जीवन | आदर, मान, सम्मान । वरण वरुण कलका वरुण अपराजिता, इतनी क्रूर न बनो। उचित को अनुचित न ठहराओ, तुम्हारे लिए मैंने अपना धर्म तक त्याग दिया, अन्यथा आज मैं तुम्हारे बीच न होता। तुम्ही बनाओ मैं करता तो क्या करता? नपराजिता तुम भूल रहे हो। क्या तुम यह भी भूल गए वि अधर्म का अर्जन कभी नहीं फलता । स्वीकारो, मैं तुम्हार लिए सब कुछ त्याग रही हूँ। भवन, वाटिका, धन सब कुछ। यण अपराजिता, मैं वेवल तुम्हें चाहता हूँ, वेवल तुम्हें, गेप कुछ नहीं। जानती हो तुम्हारे पिता को अन्तिम इन्टा क्या थी?

अन्तिम निर्णय / ४६
घरुण
अपराजिता तुम्हे क्या कहकर पुकारूं युवक । हाँ, तुमने कहा है जो भाग्य मे था
सो हो गया। मैं भी यही कहती हूँ, अब सब कुछ भूल जाओ।
अपराजिता अपने साथियो सहित आगे बढ गई]
रुक जाओ अपरा, रुक जाओ । सौगध है तुम्हे । तुम मुझसे दूर नहीं
जा सकती, नही जा सकती ।
कुछ युवक (वरण को एक ओर धकेल देते हैं) जामो विधर्मी, अपना जीवन
चाहते हो तो यहाँ स भाग जाओ।
वरुण नहीं जा सकता मैं । मैं अपराजिता से अलग नही रह सकता । मुगल
सरदार ने मुझे वचन दिया है । अपराजिता मुझे अवश्य मिलेगी।
कोई नहीं रोक सकता मुझे।
युवक एक जाओ, कह दो अपने सरदार से । बता दो उसे, अपराजिता तुम्हे
नहीं मिली और न मिल सकेगी।
वरुण हां, मैं जाऊँगा, मुगल सरदार पर जाऊँगा, उसे वचन की याद
दिलाऊँगा । (पागल-सा) अपराजिता! मुझे अपराजिता चाहिए।
कोई नहीं रोक सकता मुझे।
अपराजिता नहीं जानती थी कि तुम ऐसा भी करोगे। लेकिन मैं तुम्हे इतना
कष्ट न दूंगी।
[सब अपराजिता की ओर देखते हैं]
इतना अधर्म तुम मेरे लिए करोगे? केवल मेरे लिए। नहीं, तुम
ऐसा नही करोगे। आओ, मैं तुम्हे निराश नही करूंगी। अपित
है मेरी देह । आओ वोर, अपनी वासना की प्यास बुझाओ।
[विद्युत गति से एक कटार अपराजिता के सोने के पार जा
चुकी थी। उसका निर्जीव शरीर वरुण के हाथो मे झूल
गया।]
वरुण नही, नही, तुम नही जा सकती अपराजिता।
[वरुण पागलो की तरह चिल्ला उठता है]

पद्मा के लाल कमल
चन्द्रशेखर
स्वर
मनीप गागोली
आशुतोष मुखर्जी
लतीफ दादा
शहनाज हाशमी
अमिता मुखर्जी
जीनत
अमिता
पोस्टमन कालवेल बजाकर डाक की सूचना देता है।
कालवेल एक बार कम और दूसरी बार कुछ अधिक
बजती है।
[प्रभाव कालबेल का हल्के और लम्बे पाज से प्रभाव
उभरता है।]
अरे ओ रामघर ! वहरा हो गया है क्या? पोस्टमन दो बार
बैल दे चुका है। जाबो डाक ले बामओ। सुनो! तकरार न
करने लग जाना.
[प्रभाव ' वालवेल का प्रभाव पुन उमरता है।
अय पडे-खडे मेरा मुंह क्या देख रहे हो?
[प्रभाव : जाने का और दरवाजा खुलने तपा बन्द होने
का प्रभाव उभरता है।
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पद्मा के लाल कमल/५१ आशुतोष मुखर्जी अमिता ! भई पहले मुझे नाश्ता दे लो, डाक फिर देख लेना। अमिता : नाश्ता लग चुका है"बल्कि ठंडा हो चुका है और आप है कि सारा घर सर पर उठा रहे हैं। आशुतोप · तुम हिलती हो या तुम्हे भी उठाकर टेबल तक ले चलूं। जानती हो आज तीन अपील केसो मे आरगूमेट्स हैं, दो मे एवी- डेंसिज दो मर्डर केस में बेल्स करानी हैं।"ओह इट इज़ टैरोवल" आफुली टेरीबल" अमिता आप तो बच्ची को भी पीछे छोड़ गए"सारा नाश्ता ठंडा हो गया है, ठहरो गरम कर लाऊ... आशुतोष नो""नो "नो'"नो "तुम ज़रा हाथ लगा दो बस खुद ही गरम हो जाएगा। [प्रभाव रामधर के आने का प्रभाव । अमिता रामधर ! डाक इधर ले आओ। (आशुतोष से) मछली अभी गरम ही है."साग रहने दें"हां, रामधर ! साहब की गाड़ी साफ कर आओ। फौरन इन्हें बहुत जल्दी है."(आशुतोष से) आप तो कुछ ले ही नहीं रहे "यह मछली क्तिने चाव से पकाई है मैंने पता नहीं आपकी भूख को क्या हो गया है." लें भी यह लें। आशुतोष अरे रे रे 'यह सब कौन खाएगा "वस, यूं ही जाया जायेगा। अमिता आप जरा-जरा सब चख ले और जरा मैं डाक आँख मे निकाय लूं"(अपने आप से कहते हुए) रोहित का पत्र आने वाला "वह तो इसमे कही लगता ही नही "यह पत्र" यह भी मेरा है"यह भी और यह"यह reer कावेरी का है 'कितने सुन्दर हैंड मे लिखा है"tnagir मुखर्जी, बार-एट-ला"(लंडन) यह एक RATEE है. किसी क्लाइट का लगता है"er Harment मेरे नाम आशुतोष : किसका हो सकता है ? खोनी हो। अमिता . काफी भारी है. [प्रभाव : वन पाट* RAIटका प्रभाव । आशुतोष : कहां से है ?" अमिता नाका...in ५२/पद्मा के लाल कमल आशुतोष कौन शहनाज? अमिता शहनाज हाशमी... आशुतोष यू मीन "दैट रिफ्यूजी गलं. अमिता हाँ."वही"वही शहनाज""जो रिफ्यूजी कंप मे भी उसे गये भी तो आज कई महीने हो गये हैं."यू नो हर केस." आशुतोष अमिता हालिंग ! इस वक्त, मुझे सिर्फ वही केस याद है." जिनमे मुझे पेश होना है"राइट ! हम चले!लच के लिए मेरा इन्तजारन वरना.. अमिता न आना हो तो रिंग कर देना... आशुतोष (जाते-जाते "आवाज उभरती है) ओ-यैस ! ओ-यम ! [प्रभाव दरवाजा खुलकर बन्द होने का प्रभाव उभरता है। कार स्टार्ट होने और जाने का प्रभाव उभरकर दूर जाता है।] अमिता इतना लबा खत | इसे बैडरूम मे आराम से पढना ही ठीक होगा । रामधर ! यह नाश्ता उठा लो। और ही सुनो ! बैडरूम मे ही मेरे लिए चाय लेते आना। [चलने का प्रभाव] शहनाज डियर"भगवान करे तू सुखी हो"" [कुर्सी घसीटने का प्रभाव।] कैसा है यह रामघर !"कुर्सी पर दो-दो अगुल धूल चढी है... लाख बार कहो तो एक बार सुनता है. खित खुलने का प्रभाव क्या लिखा है री तूने... [पत्र का प्रभाव"शहनाज के स्वर मे उभरता है- शहनाज रेस कोसं ढाका. अमिता दीदी! नमश्कार"यह रहा मेरा खत, इसे पाकर भी हैरान होगी और पढकर भी"रोज लिखने को होती यो"पर ऐसे लमहे नहीं जुटा पाती थी जिनमे लिखते वक्त खुद को आप से .."अन्दर जो है उसे उलीचकर आप तक पहुंचा दूं." जोड सकू" पद्मा के लाल कमल/५३ इतना भर गयी हूँ"इतना भर चुकी हूँ कि आज खुद को उडेले बिना रह नही पा रही "मुझे ऐसे ही इस बोझ से नजात मिलेगी मेरा मुक्ति-द्वार खुलेगा" अमी दो ! आपके साथ कैम्प मे कटे दिन'"आपने मुझ बिखरी हुई को कैसे-कैसे जोडा । खुद को मेरे साथ जोडकर मुझे खडा किया''जब मैं कैप मे आयी थी"कितनी टूटी हुई थी। आपने मुझे मनोबल दिया''मेरे मारेल को जगाया' मुझमे जीने की ताकत भरी""यह जानते हुए भी कि मेरे में एक पाकिस्तानी दरिंदे का खून पल रहा है."उस खून से मुझे नफरत है "अमी दी। यह जानते हुए भी आप ने मुझे उमे ढोने का बल दिया "मैं कितना चाहती थी उस गलत, गन्दे बोझ से मुक्त होना “मगर दी ।... मेरे मे उठने, चलने और जीने का साहस कभी जगता और कभी गिरता ''मेरे मे पल रहा वह गन्दा खून कभी उबलता और फटने लगता"कभी ठडा होकर जमने लगता... मुझे लगता मेरा अपना गोश्त गल रहा है। इसी परेशानी मे मैं एक दिन कैप से भाग गयी"ौर जा पहुंची गगा किनारे "खुद को मिटाने आत्महत्या करने "मी गगा की शान्त गोद मे मुंह छिपाने. गगा का प्रभाव उभरता है। छलछलाती गगा'पास से गुजर रहा स्टीमर। [स्टीमर का हान और पास से जाने का प्रभाव 1] जैसे गगा मे बाढ आ गयी. "मैं छलाग लगाने को ही थी कि दी! अमी दी ! आपने "आपकी आवाज ने मुझे फिर गिरते- गिरते बचा लिया.. अमिता : (आवाज़ दूर से आती है) शहनाज ! शहनाज ! रुको शहनाज ! शहनाज रुक जाओ ! (आवाज पास मा जाती है) रुक जाओ शहनाज ! यह क्या पागलपन है ? हूं| बोलो! बोलो भी ! मैं पूछती हूँ यह क्या पागलपन है ? शहनाज : (फफक-फफक कर सिसकने लगती है)। अमिता पगली ! चुप्प । सधपों से ऐसे भागा जाता है। तू तो बंगाल की बहादुर बेटी है" वग-माता की वग-न्या ।

५४/पद्मा के लाल कमल शहनाज (सिसकियां उभरती हैं)। अमिता शहनाज ! मेरी अच्छो शहनाज | अच्छा बता"जो तुम्हारे साथ हुआ है''यह क्या अकेले तुम्हारे साथ ही हुआ है। बोल ! बोल | बोल भी न। न जाने तुम्हारी जैसी कितनी बदनसीब और कमसन होगी। क्या गगा में डूबकर ही इस स्थिति से उवरा जा सकता है। क्या पूरी कौम को "हजारो बग- बेटियो को ऐसे डूबना होगा' समस्या का यही हल है क्या? शहनाज (सिसकियां उभरती हैं)। अमिता मत रो। मत रो मेरी बहन । तुमने कोई गुनाह नही किया है "तुमने स्वतन्त्रता की कीमत चुकाई है। यह बोझ भी उसी की एक किश्त है"अब तुमने खोकर भी पाया है" बहुत कुछ पाया है"आत्महत्या से वह पाया भी अपाया हो जाएगा ""तुम जीत कर भी हार जाओगी... तुम मां के पास आयी हो न ! गगा मां के पास । लो इसके पानी को छूकर उठो। उठो' तूफान का सामना करने के लिए । वह मामने देख रही हो "उधर देखो। वह गगा मे कितना बडा गन्दा नाला""गटर मिल रहा है "ऐसे हजारो गटर इसमे मिलकर गगामय हो गये हैं. मां सभी को पवित्र बनाती है" शहनाज 1 तुम्हारे मे पल रहा गन्दा नापाक खून.. मगर इससे कहीं ज्यादा पाक पवित्र है मां बनने का क्षण"उस अण यह गन्दा खून भी पवित्र बन जाएगा गटर के पानी की तरह तुम्हारे मे "गगा की वेटी मे मिलकर पावन बन जाएगा'"पावन बन जाएगा" पावन बन जाएगा." फ्लैिशबैक ओवर होने का प्रभाव ।] शहनाज दी। अमी दी। तुम्हारे ये शब्द हमेशा मेरे कानो मे गूंजते रहते हैं। "गगा मे मिल रहे गटर का वह दृश्य मुझे हमेशा एक रुहानी शक्ति देता है। उसी के सहारे मैं इतने महीने आपके पास रही। मेरी बग-भूमि स्वतत्र हुई.. आजाद वगला देश एक नये राष्ट्र के रूप मे उदिन हुआ"भारत के शरणार्थी कैम्पस मे से हम वगाली अपने देश पलटने लगे. मैं भी पलटी. अपने मनीष को ढूंढने "मुक्तिवाहिनी के उस वीर सेनानी को ढूंढने "मैं उसी के लिए जीवित थी...

पद्मा के लाल कमल/५५ दी । मैं कई दिनो बाद ढाका पहुँची-अपने मुहल्ले आयो"इंटो के ढेर मे अपना घर नही पहचान पायो "हाँ, कुछ जानी-पहचानी ईंटें ज़रूर पहचान गयी पता चला कि मां पागल हो चुकी है" और ठिकाने का कोई पता नही."पिता... बशीर हनीफ छोटे भाई सब गोली का शिकार बन चुके हैं." बडी वहन गुलनार "उसकी लाश एक बकर से मिली थी मनीप को.. और मनीष । कोई कहता जीवित है और कोई कहता है शहीद हो गया है"उसके घर गई."उसके पिता डॉ. गागोली यूनिवर्सिटी मे इतिहास के हेड थे"उन्हे एक दिन ले गये और वह अब तक नही पलटे हैं। मनीय की मां को गोली दाग दी गयी"उसकी तीन बहनें" कविता, चारु, अपर्णा, तीनो कहां गयी, कोई पता नहीं । अमी दी ! मुझे अपने ही देश में गैर समझा जा रहा है।" मेरे अपने सगे वाकिफ मुझे यही सलाह दे रहे हैं कि मैं जैसे-तैसे इस खून से" मुक्त हो जाऊँ "अपने में पल रहे गोश्त के नापाक लोथडे को निकाल फेंकू किसी भी घर में दो-एक रात से ज्यादा रक नही पाती... मेरे जैसी सितमजदा लडकियो की सहायता के लिए एक सोशल गैर-सरकारी सस्था यहां है"कई दिनो से वहां पडी हूँ""कुछ दिन हुए मुझे परवेज मिला "परवेज"मेरा क्लास-फेलो. उसने मुझे कई बार" वू किया था, खुद को एक्सप्रेस किया था"खतो से''मेल-मुलाकात से "उसे शिकायत थी कि मैं एक मुसलमान होते हुए भी क्यों एक गैर. मुसलमान से प्यार करती हूँ"अबकी मुझे मिला तो पहचानने से भी गुरेज करने लगा। अमी दी ! कुछ दिनो से यहाँ मुक्तिवाहिनी के दस्ते देश के मुखतलिफ कोनो से आ रहे हैं... रोज रेस कोर्स मैदान में जुडते हैं और बग-बन्धु, बग-पिता मुजीब के आगे हथियार डालते हैं"मैं रोज वहाँ जाती हूँ" मनीष का पता करने"दी! मुझे विश्वास है कि मनीप मुझे इस गिरी हालत मे भी उठा लेगा"क्यूल करेगा। मेरे साथ ही उस गन्दे और गैर खून को भी "क्योकि वह जानता है- गटर गगा में जाकर गगाजल बन जाता है। दी! युनिवसिटी खुल गयी है 'मैं वहां गयी मनीषा ५६/पना के लाल कमल पता करने जैसे ही "जगन्नाथ हाल से गुजरी, मैं वैसे ही चलते- चलते रुक गई.."यही से मेरा और मनीष का परिचय हुआ था"साल पहले यहीं पर रवीन्द्र क्ला सघ की ओर से रवीन्द्र सगीत सभा का आयोजन हुआ था। वी० सी० के मॉर्डर्स के खिलाफ हमने यह सभा की थी क्योकि उस वगाल मे रवीन्द्र सगीत पर प्रतिबन्ध था. मनीप उस सभा में सबसे आगे था.... सभा हुई"हजारो विद्यार्थी हाल मे भरे थे"मनीप उठाएड्रेस करने के लिए तालियो से हाल फटने को हो गया." [प्रभाव तालियो का प्रभाव काफी देर तक उभरकर मन्द पड जाता है। मनीष : मिनो ! बन्धुओ। जाय बागला! जाय बागला सास्कृति ! जाय रवीन्द्र ठाकुर ! मैं आप सबको इस साहस के लिए धन्यवाद देता हू" वी० सी० महोदय के सख्त आर्डर्स के विरुद्ध भी आप रवीन्द्र कला सघ की इस सभा में आये हैं यह बहुत प्रसन्नता का विषय मित्रो ! बंगाल के बंटवारे से रवीन्द्र का, बकिम का बँटवारा नहीं हुआ है" माइकेल, मधुसूदन और द्विजेन्द्र लाल राय का बंटवारा नहीं हुआ है शरत् और नन्दलाल बसु का बंटवारा नहीं हुआ है. जमीन बेटी है. कला और सस्कृति नहीं"हम अपने आप एक-दूसरे से अलग हुए "अपने बीते कल में एक-दूसरे से टूटे नही" वहां हम अब भी जुड़े हैं... ऐसे जुड़े हैं कि कोई तोड नही सकता सम्पूर्ण बगाल की सस्कृति हमारी है" कला, माहित्य, संगीत हमारा है"रवीन्द्र हमारा है" [प्रभाव जोर-जोर से टियर गैस सेल छूटने का, भगदड का प्रभाव" यह प्रभाव काफी देर चलकर फेड हो जाता शहनाज : अमी दी। वी० सी० के कहने पर पुलिस हाल मे टियर-गस छोडती है"वहशियाना ढग से वेनिंग करती है"हाल में लाइट ऑफ हो जाती है। पुलिस मनीप को परडने के लिए चप्पा-चप्पा छान डालती है। हम कई लडकियां जैसे-तैसे निकलकर मैनगेट की तरफ सरक्ती हैं. मैं कैनिंग से लंगडाती W पद्मा के लाल कमल-1.५७ हूँ. भीड का एक रेला मेरे पर से गुजर जाता है। कोई सबल हाथ मुझे वहां से खीचकर बाहर ले आते हैं और मुझे कार में, धकेलकर ले उडते हैं । मैं अर्ध-चेतना-सी नीम वेहोशी मे पडी।' कराह रही हूँ"फिर पता नही चेतना कब लुप्त हो गई... सुबह की ठण्डी हवा ने मुझे जगा दिया "वह एक मछेरे की झोपड़ी थी, उठकर बाहर आई "कार मे मनीष सोया पडा था" सब कुछ धीरे धीरे याद आने लगा.. तभी सूर्य की पहली किरण फूटी और मेरा सोनार बागला महक उठा खिल उठा" आसमान पक्षियो के कलरव से भर गया और पद्मा के सगीत से ताल मिलाने लगा." [प्रभाव : पक्षियो की चहचहाट और नदी के कलकल का प्रभाव। मछेरे नावो पर बाहर निकलने लगे थे "उनकी मीठी तान से पद्मा की सोई लहरें जाग रही थी... [प्रभाव पुरुष-स्वर ।। हो रे मांझी रे हो रे मांझी... हो रे मांझी हैय्या हो हैय्या हैय्या. हैय्या हो हैय्या "हैय्या. हो रे मांझी हो रे मांझी... तभी चौंक पडी मैं" मनीष उठ आया था"मुझे बुला रहा था। मनीष शाहनाज ! कहो । खूब नीद आई न?"हूँ."अभी भी आंखो मे सोजिश लग रही है लाल सोगार मांखें मेरे सोनार बागला देश की आंखें... भाहनाज : ओह ! मनीष तुम्हे तो कोई चोट नहीं आई न ! अल्लाह तुम्हारा लाख शुकर है, मेरे लिए तुमने खुद को जोखिम में डाला... [प्रभाव : नारी-स्वर मे।] पूर्वर आकाश सूर्य उठे छे आलोके आलोक मय जिभात नारी स्वा] ५८/पद्मा के लाल कमल मनीष पूर्वर आकाश सूर्य उठे छे आलोके आलोक मय जय जय बागला देश जय जय वागला देश । शहनाज | वह देख रही हो । बग-बेटी किसी मछेरे • माही- गीर की बेटी नाव खेते हुए पूर्व मे चढ आए सूर्य का, सूर्य के प्रखर प्रकाश का स्वागत कर रही है। वह सूर्य जा आज मुजीब भाई मे उगा है वह प्रकाश जो बगाल सस्कृति का जागरण वनकर फैल रहा है शहनाज | देख रही हो. एक और नाव उस नाव के साथ मिल गई है • यह माहीगोर छोकरा अपनी नाव को उस नाव से बांधकर उस मछेरन के पास चला गया है उसके हाथ से चप्पू ले लिया है वह मछेरन अपने बाल खोलकर कैसे खिलने लगी है - जैसे प्रकृति वाला पद्मा मे विहार के लिए उतर आई हो वह हाथ-मुंह धोकर उठी है सूर्य की सुनहरी किरणो में उसका ताबई चेहरा कैसे चमक उठा है। देखो । देखो शहनाज | वह मछेरा उसकी ठुड्डी को उठा कर उसके चेहरे म क्या पढ रहा है उसकी आँखो में चढ़ते सूर्य को लालो देख रहा है उसकी गुनगुनाहट गूंज उठी है। [प्रभाव आमार सोनार बांगला देश अमितोमाय भोला बाशि आमार सोनार बांगला देश। [स्वर मन्द पड़ने लगता है।] शहनाज पहाँ खो गई हो शहनाज | देखो। दोनो ना जा रही हैं • पद्मा की तरल सोन जल धारा में प्रकृति और पुरप का मिलन हो रहा है । शहनाज शहनाज ऐ शहनाज ओह मनीष । मैं एव हो गई थी। उस मछेरन से एक हो गई थी "और एक क्षण के लिए लगा था तुम ही मेरी आँखो मांक रहे हो। तुम ही वही मछेरे हो। शहनाज, मेरी ओर देयो । देखो भी । प्लीज' देखो। बांगला भूमि ये सुरमई बाराश-सी तुम्हारी गहरी नीली आंखें • उनमें पुरुष-स्वर मे] शहनाज मनीप पद्मा के लाल कमल/५६ 1 लाल डोरे'मानो पद्मा से असंख्य लाल कमल खिल आए हो" शहनाज, तुम्हारी आँखो मे वही सूर्य घढ आया है... उमी का सोनार प्रकाश मेरी आँखो मे समा रहा है तुम्हारी आँखो का सूर्य पद्मा मे खिल उठा है' केले के हरे पत्तो पर विछल रहा है । "नारियल की तराशी हुई छिनराई शाखाओ मे से छन-छनकर आ रहा है। अमराइयों मे से धूप गध की तरह उठ रहा है"धान के खेतो मे ज्योति लौ बनकर फैल रहा है." पटसन के फूलो मे गधिया रहा है... शहनाज ! मैंने तुम्हारी आंखो मे चढते लाल सूर्य को देखा है"तुम्हारी आँखे "ज्योति कलश-सी आंखे जिनमे लाल कनेर खिल आए हैं। केसर कलियां मुस्करा उठी है... सुनहरी शैवाल असख्य लाल कमल लहलहा उठे हैं... ओह ! शहनाज ! तुम्ही मेरी सोनार-भूमि हो । शहनाज तुम्ही मेरा सोनार यांगला हो । शहनाज, तुम्हारी शंखपुष्पी-सी आँखो मे चमकते ये मोती दाने 'शहनाज ! मैं इन्हे चूमकर शपथ लेता हूँ... शहनाज 1 मैं शपथ लेता हूँ"तुम्ही मेरी प्रकृति हो मेरी वह मछेरन हो । जिसमे तुमने खुद को पाया था। [प्रभाष दूर अजान का स्वर उभरता है।} शहनाज मनीष, नमाज का वक्त हो गया है. इस पवित्र-पाक लमहे मे"मैं तुम्हारी बांहो मे बंधी तुम्हे समर्पित हूं। मनीष "तुम्हे समर्पित हूँ"मैं "मेरा सब 'मैं पूरी-की-पूरी तुम्हे समर्पित हूँ"विसर्जित हूँ""शालिग्राम पर तुलसी-पर की तरह विसर्जित मनोष : शहनाज, तुम मेरो प्राण-क्ति हो । मेरा बल-मनोबल हो। मेरो नसो काशिराओ का रक्त-ज्वार हो'सारे बांगला मे जगे सास्कृतिक जागरण का शखनाद हो"जयघोष हो." यह क्षण "शहनाज ! यह क्षण मेरे जीवन का पावनतम, मधुरतम क्षण है"शहनाज ! अपने हाथो से माँ पद्मा का अंजुली-भर पानी मेरे हाथो म डालो "मुझे अपनी अजुली से पिलाओ। [प्रभाव : पानी के अंजुली मे भरे जाने का प्रभाव सभरता है।

६०/पद्मा के लाल कमल
शहनाज, यह पानी नही तुम हो शहनाज ! तुम हो"पही
हमारा पाणि-ग्रहण है "इसी पानी का सिंदूर तुम्हारे सीमात
मे" तुम्हारे मांग मे भरता हूँ"मां को साक्षी मे तुम्हें स्वीकार
करता हूँ शहनाज !
आज से मेरा सकल्प" विनियोग शक्ति "सब कुछ तुम
हो शहनाज ..।
लतीफ (दूर से आवाज आती है ।) मनीप वाबू" मनीप बावू"जल.
पान के लिए उट आइए । यही झोपडी मे आ जाएँ..
मनीष लतीफ दादा । हम आ रहे हैं । चलो शहनाज | फिर देर हो
जाएगी · ढाया भी पलटना है । उठो! सो हाय परदो।
हो।
शहनाज अव जो हाप पकडा है"पर रखिएगा।"
मनीप
जीवनभर
लतीफ आएं मनीप वावू"
[प्रभाव स्त्री-स्वर मे।
लसित सवग सता परिशीसन मोमम मतय समीरे ।
मधुपर निपर करयित बोरिस, पूजत कुज परीरे ॥
मनीष मनीफ दादा ! यह रिसरा स्यर है?
सप्तोप. : मेरी बेटी जीmm अन्दर आपने लिए जमपान लगा रही
शान
मतौर
जयदेवगा यह गी" मधुरता का नाम सोत.
यह पिगीर में नहीं पड़ी रिटिया पिरभी उमे पूरा गीत
गोपिन्दम् पार"भार मन्दर पमिए.
दादा, मुमारी मुटिया है...पर पोनर, गया. पो
गोरे में पंग माम मोहम्पीर"ग ही गोति...
मनीष
धुर-शीर ...

पद्मा के लाल कमल/६१ संस्कृति से, लोकगीतो से, पहरावे से नफरत करो" इस्लाम मेरा मजहब है और चैतन्य, उसके राधा-कृष्ण मेरी संस्कृति है। मेरे देश और मिट्टी की सस्कृति इन नदियो, कछारो, घाटो, ताल-तालावो, अमराइयो, धान और पटसन के खेतो, नारियल और केले के झुडो की सस्कृति है। मनीप दादा, तुम इतनी बातें जानते हो? लतीफ हम मछेरे क्या जानें संस्कृति, धर्म, सभ्यता को बारीक बाते... मगर ये सब तो हमे विरासत में मिला है। कुछ दिन हुए हमारे कीर्तन में रजावार आया था"उसने साहब बडा हगामा किया"बोला यह सव कुफर है"अरी जीनत बेटी ! आ गई तू शीघ्र परस दे"ला मैं परसता हूँ" तू ही सुना उस हगामे को बात "मनीय वायू ! अकेली जीनत बेटी ने उस रजाकार को चुप करा दिया "बता बेटी । बता ! ला मुझे दे वह केले के पत्र । शहनाज बेटी ! यह पत्ते हमारी थालियां हैं। "यह केले के फल"मछली"चावल""यह स्वीकार करें। शहनाज जीनत, बताओ तुमने क्या कहा? जीनत दीदी, वह तो बडी लम्बी-ऊँची बातें करता था कहता था.' लुगी-शलवार पहनो'""उर्दू बोलो''इकबाल और गालिब को पढो."टैगोर.."काफिर शायर था. मनीष तुमने क्या कहा? जीनत बस यही कि इस्लाम मे कहां है"कुरान मे कहा है कि अपनी मातृभूमि को प्यार न करोगगा, जमुना, पद्मा के गीत न गाओ। हमारे पुरखे जो बोलते, पहनते, गाते आए हैं वह न करो। टंगोर के बिना बगाल कहां"जयदेव, विद्यापति, बकिम, नजरुल, शरत् के बिना कसा बगाल"हम इस्लाम के नाम पर अरब की पोशाक, बोली और रहन-सहन को नहीं मानेंगे... अरब की रेत के लिए हम अपनी गगा, जमुना, पद्मा नहीं छोड सकते। शहनाज बहुत खूब ! बहुत खूब जीनत कहां से सीखी हैं इतनी बातें... जीनत . और कहाँ से "दादा से पद्मा के गीतो और लहरोसे. नारियल, केले और आम के पेडो से यह सब क्या सीखने की .4 ६२/पद्मा के लाल कमल लतीफ मनीय बाबू ! आपने तो कुछ लिया ही नहीं."जीनल बेटी। शहनाज को साग और दो। जीनत दीदी | थोडा और लीजिए। शहनाज बस जीनत ! सुनो, मेरे साथ चलोगी ढाका"ये सब बातें सुनाने के लिए मनोप दादा, हमे आजा दें देर हो रही है."आपने हमे आश्रय दिया" हम आपके बहुत आभारी हैं."नामश्कार । लतीफ नामश्कार। शहनाज सलाम दादा। लतीफ वालेकम इस्लाम बेटी अरे जीनत बेटी, अपनी दीदी को सलाम बुलाओ। जीनत : सलाम दीदी। सलाम दादा। मनीष-शहनाज सलाम सलाम। लतीफ [प्रभाव कार स्टार्ट होने और चलने का प्रभाव""उभर- कर पीछे चला जाता है और बराबर चलता रहता है।] मनीप क्या सोच रही हो? जो आज अचानक हो गया "मैं तो उसे कबूल करती हूँ""पर घर वाले भी तुम्हारे और मेरे दोनो क्या दोनो कबूल करेंगे " तुम हिन्दू, हम मुस्लिम" मनीष शहनाज | नाज | नाजी | अब इसी नाम से बुलाऊँगा" हूँ.. खुदा हाफिज । शहनाज नाजी। - शहनाज मनीप : नाजी। हम हिन्दू और मुसलमान बाद मे हैं"पहले हैं." बगाली। धर्म जुदा है"कोई बात नही "कल्चर तो एक है." हम कहीं पर तो बहुत गहरे जुड़े हैं "एकदम अटूट"तुम्हे, मुझे "इस गगा'""और पद्मा ने जोडा है"हम रवीन्द्र और बकिम से एक हैं. चैतन्य और विद्यापति से एक हैं"हाँ सुनो । तुमने मां पद्मा की गोद मे मुझे कहा था कि मैं शालिग्राम पर तुलसी- पत्र की तरह विसजित हूँ" कहा या न ! शहनाज : हाँ, कहा था। मनीष : एक मुस्लिम लडको ने कहां से सीधा यह । गहनाज . अपने घर से "मेरे घर में तुलसी चौरा है "मां वही "रोज न M पद्मा के लाल कमल दीपक जलाती है."उसी मे शालिग्राम की प्रतिमाएं हैं। पर चन्दन और तुलसी-पत्र चढ़ाती है और उसी के पारा टकर वह नमाज भी पढ़ती है। मनीष शहनाज ! यह धर्म और कल्चर का सिंथेटिक प्रसिस है एक होने की प्रप्रिया'"धर्म सस्कृति का, कल्चर का विरोधी होकर नहीं चल सकता । जहाँ वह चला है"वही दंगे-फसाद हुए हैं। हमारी यहाँ की प्राब्लेम यही है"इस्लाम के अन्धे ठीकेदार यहाँ इस्लाम के नाम पर अरब कल्चर ढूंस रहे हैं "हम उसी के विरोधी हैं"नाजी ! दो अलग-अलग धर्मों को एक सस्कृति हो सकती है। मेरी बात समझ रही हो न ! शहनाज हां! मनीष नाज ! इण्डोनेशिया · वहां का धर्म इस्लाम है मगर संस्कृति भारतीय है" "वे राम को पूजते हैं, राम की लीलाएँ करते हैं, रामायण का पाठ करते हैं और फिर भी वह मुसलमान हैं। वहाँ धर्म और कल्चर मे कोई विरोध नहीं "क्योकि अरब की गरम जलती रेत वहाँ नही पहुंची है"मेरी सोनार भूमि मे यह रेत उड़ाई जा रही है"नाजी""हमे उस रेत का विरोध करना है"उस रेत को गगा, जमुना और पद्मा मे बहाना है। शहनाज . मनीप! मेरे मे साहस आ गया है "मैं तुम्हारा नाम लेकर खडी हो सकती हूँ"तुम्हे लेकर निडर होकर चल-फिर सकती हूँ.. मैं घर जाते ही अपना निर्णय बता दूंगी."मुझे रास्ते में ड्राप कर देना। खुद घर चली जाऊंगी"तुम कहाँ जाओगे... मनीष सीधा यूनिवर्सिटी नही जाऊँगा"शायद मेरे वारंट्स निकल गए हो मैं किसी मित्र के घर ही जाऊँगा"तुम्हे बीच मे मिलता रहूँगा" नाजी! जो आज हुआ है, वह जीवन-भर नही भूलूंगा ...मैं अब अकेला नहीं रहा'तुम मेरे मे हो मेरे साथ हो.. और तुम शहनाज : मैं ""मैं तुम्हे अपने साथ लिये जा रही हूँ केवल तुम्हे "खुद को तुम्हे देकर"तुम्हे लिये जा रही हूं." [प्रभाव : कार रुकने का प्रभाव । दरवाजा खुलने-बन्द होने और कार पुन: चलने का प्रभाव।] मनीष . नाजी, मेरे मे देखो । हूं घबराना नही। फ्लिशक ओवर होने का भाव।।

६४/पद्मा के लाल कमल शहनाज अमी दीदी। इसके बाद मनीप मुझे नहीं मिला"आपने कई वार मनीष वे बारे में जानना चाहा था"यह था जो मेरे और मनीप मे घटा था और हमे यांध गया था, जोड गया था, एक कर गया था। जगन्नाथ हाल से चलकर · मैं आगे आती हूँ गल्नं होस्टल की ओर · एक मोड पर आकर मेरे पांव थर्राने लगते हैं दीदी ! आँखो के आगे अधकार-ही-अधकार दिल सिंक करने लगता है"अल्लाह करे जमीन फट जाये और मैं यही गरक हो जाऊँ "कुछ महीने पहले यही सामने से एक जीप आकर मेरे पास रुकी थी... [प्रभाव जीप के आने का और जोर से ब्रेक लगाकर रोकने का प्रभाव""जीप का इजन धीरे-धीरे चलता रहता है। उसमे बैठे फौजियो को देखकर मैं भाग उठी 'वह भी जीप से उतरकर मेरे पीछे भाग उठे... [प्रभाव दो-चार फौजियो के भागने की बूट-चाप और शहनाज के स्वर मे चीखने-चिल्लाने का प्रभाव । दीदी ! मैं चीखती रही" वे जालिम मुझे घसीटकर जीप तक ले गए"उसमे लाद दिया मुंह बन्द "बंधे हुए हाथ-पैर, जीप गुर्राती हुई भाग निकलती है.. [प्रभाव जीप के टॉप गियर पर चलने का प्रभाव उभर- कर बन्द होता है। दीदी, जानती हो जीप कहाँ रुको लतीफ दादा की झोपडी के सामने "जहां मैंने मनीप का वरण किया था जैसे ही लतीफ दादा बाहर निकले, उन पर गोली दाग दी गयी- हगोली की रैपिड फायरिंग का प्रभाव।] उनके दो-तीन साथियो को गोली का निशाना बनाया गया "और आंख झपकते ही उन्हें पद्मा मे बहा दिया गया एक सिपाही अन्दर से जीनत को पकड लाया"हम दोनो को उसी झोपडी में ले जाया गया"एक सिपाही ने बूट मारकर चैतन्य की तस्वीर तोड दीदीपक बुझा दिया और फिर मेरे पद्मा के लाल कमल ६५ और जीनत पर क्या बीती"मेरे अल्लाह !! तेरी दुनिया मे इतना जुल्म "उन भूसे कुत्तो ने हमे नोच डाला' में क्व वेहोश हो गयी" कुछ पता नहीं "सुवह "आँख खुली" पास ही जीनत की लाश पड़ी थी"शराब को खाली टूटी बोतलें... भन्नाती हुई मक्खियां यह सब देखकर मैं फिर बेहोश हो गयी "मैं वेहोश हो गयी। दीदी। उस रोज जव मुझे होश आया तो मैंने खुद को पास के मछेरो की बस्ती मे पाया। और उन्ही के साथ भागकर मैं कलकत्ता आयी । जब मुझे होश आया तो मैं गल्जं होस्टल मे थी, कई जानी-पहचानी लडकियाँ मुझे घेरे थी 'वार्डन भी मेरी परिचित थी। वही डॉ० आयी। उसने मुझे फौरन हॉस्पीटल भिजवा दिया, मेरे अन्दर गन्दे खून का जो एक कतरा जमकर बडा हो रहा था, अब वो फूटने वो था सभी की आंखो मे मेरे लिए एक सवाल उठता''वे खुद ही उसका जवाब पा लेती एक खामोश हमदर्दी, मैं जिसे शमिन्दगी की इन्टेन्सिटी मे न तो देख पाती और न ही कबूल कर पाती दीदी। हॉस्पीटल में मेरी जैसी सैकडो बल्कि हजारो सितमजदा थी."हैं, जो पशुता का शिकार बनी थी. और किसी और के पाप के बोझ से दब रही थी, पता नहीं उन्हे भी किसी मनीप का इन्तजार था। दीदी, मैं तो मनीष की इन्तज़ार में जी रही थी और वह भी एक दिन कयामत बनकर टूटा" मुक्तिवाहिनी में शहीद होनेवालो की लिस्ट छपी थीदी ! दी! उसमे मेरे मनीय का भी नाम था पढते ही जैसे मैं पिघलते, जलते शीशे के टब मे गिर गयी। [प्रभाव जोरे से बिजली कडकने का प्रभाव।] दी। यह बिजली मुझ पर गिरी थी, वह गन्दा खून अब मेरी नसो मे बारूद बनकर क्लास्ट होने को था"मेरे मे पडा, वह डायनामाइट फटने को था, वह टाइम बम्ब "गन्दे गोश्त का टाइम बम्ब मेरे में धुआं छोडकर एक दिन फट गया""फट गया एक दिन.. दीदी, यहां रोज ही ऐसे टाइम बम्ब फटते हैं। यह ६६/पद्मा के लाल कमल धमाके होते हैं, वागला यी हजारो बहू-बेटियों के अन्दर गन्दे खून की माइन्स बिछा दी गयी हैं जो आए दिन एक्सप्लोड होती रहती हैं । शहरी और गांवो में यह धुआं फैल रहा है। घुटन बढ रही है, हमारे लिए लोगो के पास हमदर्दी है, व्यान हैं।"चन्दा है"मगर वह हौसला यम है, जो हमे इस धुएं से निकाल ले... अमी दी। हममे से निक्ले ये गन्दे लोथडे जोको की तरह हम ही चूस रहे हैं। हमारे गन्दे खून को चूस रहे हैं। कई बार एहसास होता है, यह हॉस्पीटल एक बडा गन्दगी का ढेर है, जिसमे गन्दे बीजो के वेशुमार वेनाम वुदुरमुत्ते उग आये हैं। इनकी देखभाल के लिए कई देशी-विदेशी संस्थाएँ यहां काम कर रही हैं "एक गन्दी नसल, वेनाम पीढी की परवरिश की चिन्ता ज्यादा है, जिस ढेर से वे उगे हैं, वह तो गन्दगी का ही ढेर है, और मैं उस ढेर का ही एक निहायत गन्दा हिस्सा हूँ.." दी, मेरे जिस्म से जो एक और नन्हा जिस्म उग माया है, वह मुझे धतूरे के जहरीले फूल-सा लगता है, मेरे दिल में उसके लिए सिवाय नफरत के और कुछ नही सूखी छाती को जब वह चूसता है तो वह पिघलने की बजाय और पथरा जाती है, वह ममता की लाश से उगा है। उसके लिए दूध कहाँ से फूटे... कहाँ से फूटे... दो, मैं खडी हो सकती थी, मनीष के सहारे"मुझ अपाहिज को वह जरूर उठा लेता."मेरी बैसाखी बन जाता." वह इस धतूरे के फूल को भी भगवान शकर का पूजा-पुष्प मान लेता. 'कल रात यहां भयकर तूफान आया था." [प्रभाव तूफान का, बिजली और वर्षा का प्रभाव । तूफान का प्रभाव कुछ मन्द होकर चलता रहता है ।] दीदी। जैसे रोजें कयामत आ गया हो, उधर वह नन्ही जान भूख से कुलबुला उठी। [प्रभाव . बच्चे के रोने का प्रभाव।] दीदी दिल में आया कि इसका गला घोट दूं."मगर औरत हूँ, गदे खून की एक बूंद को ढोने की गुनहगार है और पद्मा फे लाल पमल/६७ गुनाह कैसे करती? यह गोश्त का पुतसा सारी जिंदगी मुझसे चिपना रहेगा। मैंने इससे नजात पाने के लिए पुद को खत्म करने का फैसला कर लिया उसे यही रोता छोड उठी... [प्रभाव बच्चे के रोने या प्रभाव ।] हॉस्पीटल की टॉप स्टोरी की ओर बढ़ चली। [प्रभाव सीढियां चढ़ने की आहट उभरती है । ऊपर पहुंच गयो "तूफान की सांस कुछ मन्द पड रही पी। [प्रभाव तूफान का हत्वा प्रभाव और भी हल्ला होकर धीरे-धीरे फेड हो जाता है। मैं नीचे कूदने के लिए स्पॉट ढूंढ ही रही थी कि मुझे उस गदे खून की आवाज़ ने रोक दिया। [प्रभाव बच्चे के रोने का प्रभाव ।] पीछे मुड़कर देखा तो डॉ० शमीम बच्चे को गोद मे लिये खड़े थे। दीदी, उन्हें देखकर मेरे मे जैसे कूदने की गवी तारत आ गयी."बूदने ही को थी कि डॉ० शमीम ने मुझे आवाज दी... शहनाज । मैं तुम्हे रोक्ने नहीं आया हूँ""ज़रूर कूदो, मगर इस नन्ही जान को लेकर इसको साथ लेकर कूदो 'साथ डॉ० शमीम लेपर। शहनाज (फफरने का स्वर) गं० शमीम शहनाज ! समस्या का हल क्या खुदकशी से हो जाएगा? बोलो ! तुमने, हम सबने सोनार वागला का स्वप्न पूरा करने के लिए कितना खून दिया है। हमारी नदिपो मे जितना पानी है उससे भी ज्यादा खून दिया है। हमे अभी और खून देना है."तुम्हे देना है"इस बच्चे को अपने खून पर बडा करना 1 शहनाज . डॉक्टर ! डॉक्टर । एक गदी नस्ल को पैदा करने का गुनाह मुझसे हुआ है। उसकी परवरिश का गुनाह मैं नहीं कर पाऊँगी। डॉक्टर "मुझसे यह नही होगा"नही होगा डॉक्टर! [सिसकते हुए।

६८/पद्मा के लाल कमल डॉ० शमीम शहनाज | वक्त का यह बहुत बडा चैलेज है, गदे खून को एक नस्ल उग आयी है। सोनार भूमि मे"इसे उखाडने के लिए हमे अपनी मिट्टी भी उखाड फेकनी पडेगी''यह हम नहीं कर सकते "शहनाज हमारी मिट्टी "सोनार मिट्टी बडी पवित्र है"गदे वीज को भी पवित्र अकुर देती है। शहनाज डॉक्टर | सारा देश अभी ऐसा सोचने के मूड में नहीं है । और मैं इसका इतजार नहीं कर सकती। डॉ० शमीम तुम्हे इतजार नही करना होगा, अपने पर पूरी जिम्मेवारी लेकर मैं यह वच्चा तुम्हे सीप रहा हूँ, मैं इस गदे खून को सोनार मिट्टी के संस्कारो से पवित्र बनाऊँगा"जुल्म का यह खून मेरे सस्कारो से शुद्ध होकर वक्त आने पर उसी जुल्म के खिलाफ लडेगा। [बच्चे के रोने का प्रभाव।]] शहनाज ! लो यह बच्चा लो, इसे कबूल कर लो। अपना समझकर पालो। देखो पौ फट रही है, सूरज""लाल सूरज"पूरब का लाल सूरज चढने को है। उसकी पहली किरण इस पर पडेगी तो यह पवित्र हो जाएगा. मैं इसको, पद्मा मे खिले लाल कमल को देख रहा हूँ''यह लाल कमल अमिता शहनाज ! मैं नीचे जा रहा हूँ." "स्वस्थ होकर नीचे चली आना । तब मैं तुम्हे मां के पास ले चलूंगा." [जाने का प्रभाव । [प्रभाव अमिता के स्वर मे ईको होकर उभरता है।] शहनाज 1 यह गदा सून' मां बनने के पवित्र क्षण में शुद्ध हो जाएगा। यह गदा रक्त तव शुद्ध हो जाएगा, तब शुद्ध हो जाएगा। [फ्लैशबैक ओवर होने का प्रभाव ।] दीदी । वह तुम्हारी आवाज़ । जैसे ही लाल सूर्य की पहली किरण उस नन्ही जान पर पडी, वैसे ही आपको आवाज भी मेरे कान में पडी। उस किरण-धुले बच्चे को लेकर मैं नीचे गयी.."डॉक्टर शमीम मेरा इतज़ार कर रहे थे। हम कार में बैठरर मां के पास गये"मा ! पद्मा मां ! स्नान किया"बच्चे

पद्मा फे साल यमल/६६
फो नहलाया"लगा उसपा शाप यह गया है। मां ने वह
पलुप धो डाला है"अपने में ले लिया है । सच मानना दीदी!
उससे तब मुझे कमल की गध भाने लगी, डॉक्टर शमीम ने उसे
गोदी में ले लिया और उसका नाम रया"लाल यमल.."
मुझे लगा पास पी झोपडी से मनीष निकल पाया हो' और
यह रहा हो, शहनाज, तुम्हारी आँपो मे जो लाल यमल मैंने
देखे थे, यह वही एक लाल कमल है, वही एक लाल कमल है."
और इस कमल में मैं भी हूँ" दीदी, लगा मैंने मनीष को भी
पा लिया हो।
दीदी | घर आते ही सबसे पहले आपको लिखने बैठी
हूँ, उत्तर आने पर वरावर लिखती रहूंगी।
आपकी
शहनाज

मन्दिर की जोत
चिरजीत
पात्र-परिचय
शोभा १२ वर्षीया लडकी। स्कूल मे पढती है।
बूढा शोभा का वाचा, जो बुढापे के कारण एक तरह से अपाहिज हो
चुका है। आयु लगभग ७० वर्ष ।
मुरलीधर शोभा का पिता, नगर का बहुत बड़ा व्यापारी। आयु कोई
४८ वर्ष।
कौशल्या शोभा की मां, घर वे सुख और ऐश्वर्य मे लीन । आयु कोई
४२ वर्ष।
प्रकाशचन्द्र शोभा का बड़ा भाई । आयु २० वर्ष ।
रामू घर का नौवर, आयु १६ वर्ष ।
विजय पडोसी लडका। आयु लगभग १८ वर्ष।
कथा गीत की गायिकाएँ।
दुर्गावती गोडवाना की वोर रानी।
लक्ष्मीवाई झांसी की रानी, सन् ५७ की सेनानी।
मुदरा
रानी लक्ष्मीबाई की सखी।
सैनिक राजपूत यादा।
गगादेवी शोभा की स्वर्गीया दादी।
चार लडकियाँ
स्थान
दिल्ली में लाला मुरलीधर की कोठी के पिछवाडे का बगीचा।
सितम्बर १६६५ वी एव शाम । पांच यज चुके हैं।
समय

मन्दिर की जोत/७१ दृश्य एक [बगीचे की बाईं ओर कोठी का वह दरवाज़ा है, जिससे घर के लोग वगीचे मे आते-जाते है । दाईं ओर महात्मा गाधी की मूर्ति से सज्जित एक छोटा-सा मन्दिर है, मन्दिर के सामने सगमरमर की एक समाधि बनी है जिस पर मोटे अक्षरो मे लिखा है-"१६४२ के स्वतन्त्रता-सग्राम की वीरागना मातेश्वरी गगादेवी का पुण्य-स्मृति-मन्दिर । सामने की ओर बगीचे की तीन- चार फुट ऊंची दीवार के उस तरफ बस्ती की गली है, जिसका बिजली का एक खम्भा दिखाई देता है। जब पर्दा उठता है तो कोठी के दरवाजे से रामू बूढे वावा को पहियो वाली कुर्सी प. बैठाकर बगीचे में लाता है । बुढापे के कारण बूढा चल-फिर नही सकता, लेकिन उसके चेहरे पर तेज है। उसने खादी के कपडे पहने हुए है। बूढा रामू, अब मैं यही बगीचे मे रहूंगा। अभी धूप है। जरा मुझे अखबार ला दे। रामू अभी लाया, सरकार । (जाते-जाते रुककर जेब से एक चिट्ठी निकालता है ।) सरकार, माज घर से यह चिट्ठी आई थी। बूढ़ा तेरे घर से? रामू जी हाँ । जरा देखिए, क्या लिखा है ? तब तक मैं अन्दर से अख- बार लाता हूँ। [कोठी में जाता है । बूढा ऐन लगाकर रामू की चिट्ठी पढता है। बूढा : (चिट्ठी पढकर) धन्य है राम का यह परिवार! गरीब होते हुए भी क्तिना देश-प्रेम है इन लोगो में ! [तभी रामू अन्दर से अखबार लेकर आता है। रामू : यह लीजिए अरावार, सरकार । बूढ़ा . (अखबार लेरर) रामू, यया तुम तीन भाई हो? रामू जी हाँ। बूढ़ा . अरे, पहले तूने कभी बताया नही कि तेरा वहा भाई फौज में ७२/मन्दिर को जोत रामू जी हां, बडा भाई फौज मे है । क्या यह उसी की चिट्ठी है ? बूढा नहीं, यह तेरे मंझले भाई को चिट्ठी है। रामू वह मेरठ के एक दफ्तर मे चपरासी है। बूढा नही, अब वह भी फौज मे भर्ती हो गया है। उसने लिखा है- "दुश्मन ने हमला करके हमारे देश की आजादी को खतरे में डाल दिया है । देश की आजादी और अखण्डता की रक्षा करना हर भारतवासी का कर्तव्य है। उसी कर्तव्य की पुकार पर मैं बड़े भैया को तरह फौज मे भर्ती हो गया हूँ। कोई चिन्ता न करना । हम राजपूत लोग देश के लिए मरना जानते हैं।" रामू ओह, दोनो भाई फौज मे भर्ती हो गए, मैं ही पीछे रह गया । बूढा लेकिन तू तो अभी बहुत छोटा है। रामू हाँ, सरकार, इसीलिए मेरा मन छटपटा रहा है। अच्छा, मैं अन्दर जाकर चाय बनाऊँ । मालिक के आने का समय हो गया। आते ही चाय मांगेंगे। [कहता-कहता कोठी के अन्दर चला जाता है। बूढा (जाते हुए रामू को बड़े प्यार से देखते हुए) एक ओर यह गरीव नौकर है, जो देश पर अपने प्राणो की बलि चढाने को छटपटा रहा है और दूसरी ओर हैं मेरे इस अमीर घर के लोग, जिन्हे देश की नहीं, अपने सुख-आराम और रपये-पैसे की ही चिन्ता रहती है। एक दिन यही घर स्वतन्नता सग्राम का शिविर बना हुआ था । गगादेवी की यह समाधि · । [वहता-कहता आह भरकर अपनी पत्नी की समाधि की ओर देखता है। फिर अखबार पढने लगता है। तभी सामने गली मे बहुत-से लड़के-लड़कियां झण्डा-गीत गाते हुए जुलूस की शक्ल में सामने से गुजरते हैं। बगीचे की दीवार के अन्दर से उनके केवल झण्डे ही दिखाई देते हैं। बूढा अखवार छोडकर मुग्ध भाव से एक्टव उधर ही देखता है। झण्डा-गीत विजयी विश्व तिरगा प्यारा, झण्डा ऊंचा रहे हमारा ।

मन्दिर को जोत/७ सदा शान्ति सरसाने वाला, प्रेम सुधा बरसाने वाला, वीरो को हरपाने वाला, मातृभूमि का तन-मन सारा। झण्डा ऊँचा रहे हमारा । झण्डा-गीत गाते हुए बच्चे दूर चले जाते है। बूढा भाव- विभोर होकर अपने आप ही बडबडाने लगता है।] बूढा (स्वगत) झण्डा ऊँचा रहे हमारा ' हाँ, आज प्रत्येक भारतवासी को यही प्रतिज्ञा करनी है। हमारा यह तिरगा हमारी आजादी का निशान है, हमारे आज के लोकराज और उसके विकास का निशान है, हमारे भविष्य की समृद्धि और खुशहाली का निशान है। यह झण्डा ऊँचा रहेगा, तो हमारा देश भी ऊँचा रहेगा। हमारा सकल्प है- केतु तिरगा भू-अम्बर पर सागर पर लहराए, भारत-भाल हिमालय जग मे कभी न झुकने पाए। रामू के भाइयो जसे भारत के जवान आज सिर-धड की बाजी लगाकर इसी सकल्प को पूरा करने में लगे हैं। लेकिन मेरे अपने घर मे..? [तभी समाधि-मन्दिर के पीछे से नन्ही शोभा आती है.--- उत्साह और जोश से भरी हुई। शोभा (निकट आकर) वाया ! बूढ़ा (चौककर) कौन ? ओह, शोभा बिटिया । शोभा बाबा, हमारा जलूस देखा आपने? बूदा (चकित और हर्पित-सा) अरे, तो क्या तू भी थी उस जलूस मे? शोभा हां, बाबा, वह हमारा पडोसी विजय है न । हम दोनो एक ही स्कूल में पढ़ते हैं । उसने कहा-"हमारा देश सकट में है। आओ, हम दोनो मिलकर बस्ती के बच्चो का एक देश-रक्षा-दल बनाएँ।" मैंने कहा-"जरूर बनाएं।" स्कूल से आते ही हमने एक सभा की, राष्ट्रीय झण्डे को सलामी दी और जलूम निकाला । बाबा, हमने ठोक दिया न? बूटा विटिया, यह बात सुनकर मैं एशी रो फूला नहीं समा रहा। (समाधि की ओर देखते हुए) आज पता चला कि तेरी स्वर्गीया दादी ने महात्मा गाधीधी प्रेरणा से इस घर में जो आजादीवी

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7 बूढा नहीं बिटिया, तेरे कहने का ताता पर कोइलाम नही होगा। उसे देश से नही, अपने धन पर से नही, अपने व्यापार से प्यार है । और तेरी मां? वह घर- गृहस्थी के सुखो मे इतना लीन है कि उसे दुनिया का कुछ पता ही नहीं । मां की देखा-देखी ही तेरा भाई प्रकाश बाप की कमाई पर मौज उडाने मे मस्त है । बाकी रहा मैं । बुढापे ने मुझे इतना अपाहिज बना दिया है कि न कुछ कर सकता हूँ, न कह सकता हूँ। और अगर कुछ कहूँ भी, तो इस घर मे मेरी सुनता कौन है ? काश, मेरे घर मे रामू के भाइयो-सा एक भी बेटा होता । शोभा यह क्या कह रहे हैं, वावा ? रामू तो हमारे घर का नौकर बूढा नौवर होकर भी वह हमारे सिर का ताज है। उसके दो भाई पहले से फौज म हैं । अव वह भी फौज मे जाने को बेचैन है। शोभा बाबा, यदि आप कहे, तो मैं भी फौज मे भर्ती हो जाती हूँ। बूढा धन्य है, वेटी । तेरी इतनी-सी बात सुनकर मेरी छाती गर्व से फूल उठी है । नहीं, अभी तेरी उम्र फौज मे भर्ती होने की नहीं, पढने की है। शोभा बाबा, मैं पढ तो रही हूँ हर साल अच्छे नम्बर लेकर पास होती 1 लेकिन इसके साथ ही मैं देश की रक्षा मे भी हाथ बँटाना चाहती हूँ। [तभी सामने की दीवार पर पडोसी लडका विजय दिखाई देता है। विजय शोभा (पलटकर, देखकर) कौन ? विजय क्या बात है? विजय (दूर से) जलूस तो समाप्त हो गया है, लेकिन अभी देश-रक्षा की प्रतिज्ञा बाकी है। बूढा कैसी प्रतिज्ञा, विजय ? ज़रा इधर आकर मुझे बतातो शोभा हाँ, विजय, बाबा को आवर सब बता । बावा को हमारा काम बहुत अच्छा लग रहा है। [विजय दीवार फांदकर निकट आ जाता है। विजय (जव से एक कागज निकालकर) बावा जी, हमारी प्रतिज्ञा यह है (पढता है)-"म सब लडके और लडक्यिा आज यह प्रतिज्ञा (दूर से) शोभा। -

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मन्दिर की जोत/७७ दृश्य दो [कोठी का वही बगीचा । रात हो चुकी है । दूर शहर के घण्टाघर को घडी रात के ग्यारह बजा रही है । गली मे पहरेदार की आवाज सुनाई देती है । सूने बगीचे मे वैसे तो अंधेरा है, लेकिन गली की बिजली का प्रकाश वृक्षो से छन-छनकर थोडा-थोडा बगीचे मे आ रहा है। थोडी देर बाद कोठी का दरवाज़ा धीरे-से खुलता है और शोभा जलता हुआ दीया हाथ मे लिये दबे पांव बाहर आती है। वह इधर-उधर देखती है। फिर वह दीया समाधि मन्दिर मे रखकर घुटना वे बल चबूतरे पर बैठ जाती है और समाधि की ओर मुंह करके हाथ जोडती है। कुछ देर बाद वह सिसककर रोने लगती शोभा (रोते हुए) दादी मां, मुझ पर नाराज़ मत होना । मैं तो तुम्हारे दिखाए मार्ग पर चलना चाहती हूँ, देश की आजादी की रक्षा के लिए जो भी बन पडे, करना चाहती हूँ, परन्तु घरवाले मेरी इस भावना को नहीं समझ पा रहे। आज शाम को देखा था न कि कैसे माता जी मुझे यहाँ से खीचकर अन्दर ले गई थी ? मैंने भी अन्दर जाकर न चाय पी, न रात का खाना खाया। माता जो ने मुझे पीटा, तो मैं अपने कमरे मे जाकर लेट गई । मैं मन- ही मन छटपटा रही थी, खीझ रही थी अपनी कमजोरी पर। मुझे नीद नही आई। दादी मां, मुझे रह-रहकर तुम्हारा ही खयाल आ रहा था । जब घर के लोग सो गए, तब मैं चुपके से दीपा लेकर तुम्हारे चरणो मे आ गई। दादी मां, देख रही हो न कि सिवाय बाबा जी के हमारे घर मे किसी को देश की चिंता नही । देश पर सकट आया, तो लोगो ने धन दिया, सोना दिया, रक्त दिया, अपने बेटे और भाई दिए, पर हमारे घरवालो ने कुछ नहीं दिया। हमसे तो हमारा नौकर रामू ही अच्छा है, जिसके दोनो भाई फौज मे भर्ती होकर, अपनी जान हथेली पर रखवर देश की रक्षा कर रहे हैं। मैं भी देश की रक्षा के लिए कुछ करना चाहती हूँ। मैं क्या करूं? दादी मां, बताओ न? वतामो न, दादी मां । मुझे राह दिखाओ न, दादी मां। माता जी कहती हैं.-"लडक्यिो को ऐसी बात शोभा नहीं देती।" क्यो ७८/मन्दिर को जोत शोभा नहीं देती? मैं क्षमाणी दादी पी क्षत्राणी पोती हूँ। भी गोडवाने की रानी दुर्गावती और झांसी की रानी लक्ष्मीबाई की तरह देश की बाज़ादी के लिए लड सकती हूँ। लड सक्ती हूँन? दादी मां, मेरे प्रश्न का उत्तर दोन । नही बोलती? अच्छा, तो मैं अपने प्रश्न का उत्तर पावर ही यहां से जाऊँगी। मैं सारी रात तुम्हारे चरणों में इसी तरह भूखी-प्यासी पड़ी रहूंगी। [शोभा हाथ जोडे हुए मुंह के बल चबूतरे पर लेट जाती है और बगीचे में एक्दम अंधेरा छा जाता है । थोडी देर बाद स्वप्न सगीत के साथ धीरे-धोरे प्रकाश फैलता है और चार लडकियां एन० सी० सी० वी वर्दियां पहने गाती हुई प्रक्ट होती हैं। लडकिया भारत मां की वीर पुनियो को यह अमर कहानी । सुनो कि कैसे मादिशक्ति फिर प्रकटी बन क्षत्राणी । बतलाता इतिहास कि अबला नही भारती नारी, जब-जब सकट आया, चमकी बनकर काल-कटारी, नारी के साहस को साखी धरती यह बलिदानी । भारत मां की वीर पुत्रियो को यह अमर कहानी गोडराज की विधवा रानी दुर्गा थी, दुर्गा ही मातृभूमि की आजादी-हित बनकर वीर सिपाही- महाबली अकबर को सेना से जूझी दीवानी । भारत माँ की वीर पुत्रियो की यह अमर कहानी । महा मुगल सैनिक बल, जिससे बडे-बडे थे हारे, इधर गोडावाना प्रदेश लघु, क्या तुलना समता रे । पर दुर्गावती से मुगलो को मात पड़ी थी खानी । भारत माँ की वीर पुत्रियो की यह अमर कहानी । [लडकियां गाती गाती अधिकार मे लोप हो जाती हैं। जब फिर प्रकाश फैलता है, तब दूर युद्ध का कोलाहल सुनाई देता है और सैनिक वेश मे रानी दुर्गावती प्रक्ट होती है। उसके पीछे-पीछे एक राजपूत सैनिक आता है।

मन्दिर की जोत/७६ दुर्गावती : (दांत पीसकर) समझी सैनिक, समझ गई मैं । दिन मे दुश्मन हार गया था, आधी रात समय अब उसन छल से हम पर धावा बाला । तीन बार यह हमसे हारा । लगता, उसका जी न भरा है। फिर चाहे वह मुंह की पाना। अरे, कहां अपना नारायण ? सैनिक रानी, राजकुंवर है सोए। दुर्गावती जाओ, उसे जगाकर लाओ, और बजाओ रण का डका [रणभेरी के साथ अंधेरा हो जाता है । जब फिर प्रकाश फैलता है, तो रानी दुर्गावती के जय-जयकार के साथ 'हर-हर महादेव' का जयघोष सुनाई देता है और रानी दुर्गावती तलवार ताने अपने सैनिको के बीच दिखाई देती है। दुर्गावती (ललकारवर) गढमण्डल के वीर सैनिको। भाज परीक्षा पुन तुम्हारी! मातृभूमि को आजादी के- तुम हो प्रहरी, तुम होरक्षक। मातृभूमि पर सकट आया, यह सकट हम सबका सकट । शत्रु छीनना चाहे हम से देषा, देश की सुरा-स्वतत्रता। पराधीन बनकर जीने से कही भला है मरना रण मे! आज मरणस्योहार मना लो, घडो, देश की लाज बचा लो। [फिर अधकार हो जाता है और उसमे घमासान युद का कोलाहल सुनाई देता है। जब प्रकाश पंसता है, तब रानी दुर्गावती खून से रगी तलवार लिये रणचण्डी में ८०/मन्दिर को जोत रामान लडती हुई प्रकट होती है। तभी एक सैनिक भागा-भागा बाता है। सनिक रानी मोरानी मां। दुर्गावती क्या है। सैनिक . (रुधे गले से) लडते लडते राजपुंयर, हा! दुर्गावती समझ गई मैं । वीरोचित ही- मेरे इकलौते बेटे ने- प्राप्त वीरगति की है निश्चय ! सैनिक चलकर अन्तिम दर्शन कर लें। दुर्गावती अन्तिम दर्शन समय कहाँ है? समारागण मैं छोडन सकती। अब तो स्वर्ग-लोक मे ही जा भेंट पुर से, पति से होगी। [तभी एक सनसनाता तीर आकर रानी की आंख मेगड जाता है। रानी एक हाथ से अपनी आँप दबा लेती है।] सनिक (घबराकर) यह क्या, तीर लगा आँखो मे । दुर्गावती (निर्भयता से) कोई बात नहीं, मैं अब भी लड सकती हूँ। निपथ्य मे 'मारो-मारों' का शोर उभरता है।] सैनिक बरे, सभलिए। घेर लिया दुश्मन ने हमको। पीछे है तूफानी दरिया, आगे हैं दुश्मन की पति। [रानी दुर्गावती तुरन्त म्यान से कटार निकाल लेती दुर्गावती हाथ शत्रु के छू न सकेंगे- जीते जी मेरी काया को। इस कटार से मुक्ति मिलेगी। [अपनी छाती मे कटार घोप लेती है। सैनिक (रोकर) रानी मां, यह क्या कर डाला? घन्य-धन्य दुर्गा क्षत्राणी। [करुण सगीत के साथ चारो ओर अंधेरा छा जाता है।

मन्दिर की जोत/८१ जब फिर प्रकाश फैलता है, तब चारो लडकियो कथा- गीत गाती हुई प्रकट होती हैं।] लड़कियों भारत माँ की वीर पुत्रियो को यह अमर कहानी। सुनो कि कैसे आदिशक्ति फिर प्रकटी बन क्षत्राणी । मातृभूमि पर यो दुर्गा अपने प्राण चढाए, आजादी की लौ को बैरी हाथ नहीं छू पाए। सन सत्तावन मे ली चमकी बन झांसी की रानी। भारत मां की वीर पुत्रियो को यह अमर कहानी । देश-मुक्ति हित प्रथम युद्ध था, सुप्त शक्तियां जागी, झांसी की रानी लक्ष्मी ने सुख-शैया निज त्यागी, कूद पडी समरागण मे बन रानी विकट भवानी। भारत मां की वीर पुत्रियो की यह अमर कहानी! [क्षणिक अधकार के बाद प्रकाश के साथ युद्ध का कोला- हल और तोपो का शब्द फूटता है। रानी लक्ष्मीबाई ललकारती हुई प्रकट होती है । लक्ष्मीबाई : मैं न कभी निज झांसी दूंगी! वीरो, यह है अन्तिम साका, पराधीन अव देश रहे क्यो? भाग रहा है माज फिरगी, टूट रही देखो जजीरें! एक चोट की और कसर है, बढे चलो, भारत के वीरो! मुन्दरा : (आकर) वाई साहब ! बाई साहब ! लक्ष्मीबाई : कहो मुन्दरा, समाचार क्या? मुन्दरा: नई फिरगी सेना आई। और हमारे सगी-साथी क्षत-विक्षत हैं, पके हुए हैं। पास न कोई दुर्ग-ओट है। लक्ष्मीबाई : कैसी बातें करती हो, सखि । भारत मां के वीर बांकुरे- कभी न यकते, कभी न रुकते।

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मन्दिर की जोत /८३ गंगादेवी : ऐ विदेशियो, जाओ-जाओ ! भारत अपना देश हमारा, आजादी अधिकार हमारा। आजादी की बलि-वेदी पर कोटि-कोटि हैं प्राण निछावर । हम गाधी के सच्चे सैनिक, सत्य अहिंसा शस्त्र हमारा। ये तो-सगीनें हम को- नहीं डरा सकती, हम निर्भय । भारतमाता की जय निश्चय ! [गोली चलने की आवाज । गंगादेवी गोली लगने से गिरती है। हाय, लगी यह गोली, लेकिन- आजादी अब दूर नहीं है। भारत माता के चरणो पर न्योछावर तन ! जय भारत की! [अंधकार में चारो ओर भारत-माता का जय-जयकार सुनाई देता है । जब फिर प्रकाश फैलता है, तव शोभा चबूतरे पर आंधी लेटी हुई दिखाई देती है। उधर कोठी के अन्दर शोभा के माता-पिता, भाई सब उसे पुकार रहे हैं, जैसे उसे ढूंढ रहे हो। कुछ देर बाद शोभा की मां कौशल्या टाचं लिये वाहर बगीचे मे आती है और चयू- तरे पर लेटी शोभा को देखती है। कौशल्या : अरे, शोभा यहाँ बगीचे में लेटी है। (शोभा के पास आकर) शोभा, बेटी शोभा! [शोभा का पिता मुरलीधर और भाई प्रकाश अन्दर से मागे हुए आते हैं। मुरलीधर : अरे, या शोभा बगीचे में लेटी है ? (देखकर खुशी से) हो, मिल गई मेरी बेटी । सारा पर छान मारा, पर बगीचे का ययाल ही नहीं पाया। प्रकाश : आप लोग तो बेकार ही घबरा गए थे।

८४/मन्दिर को जोत मुरलीधर अरे वेटा, घबराने की तो बात ही यो। शाम को जरा-सी बात पर तेरी मां ने इसे पीट डाला। यह नाराज हो गई। कौशल्या बडी गुस्सैल है । न चाय पी, न रात को खाना खाया। मुरलीधर आधी रात को मैं पानी पीने उठा, तो इसका विस्तर खाली पाया। प्रकाश और आपने सारे घर को जगा दिया। वेकार ही नीद खराब की । मैं तो जाकर सोता हूँ। आप मनाइए-दुलराइए अपनी बेटी को यहाँ। मुरलीधर अरे भई, जगाओ न इसे। कौशल्या बहुतेरा हिलाया-डुलाया, यह जागती ही नही। (शोभा का माथा छूकर एकाएक घबरा जाती है।) हाय, इसे तो बडे जोर का बुखार है। मुरलीधर क्या कहा, बुखार है ? (पलटकर) वाहर सर्दी मे लेटी थी, बुखार तो चढना ही था। मुरलीधर हटो, मैं इसे उठाकर अन्दर ले चलता हूँ। [मुरलीधर जब शोभा को उठाने लगता है, तब वह तडपकर, अपने आपको छुडाकर दूर जा खडी होती है। उसकी आँखो से जैसे अगारे बरस रहे हैं।] शोभा खबरदार, जो मुझे किसी ने हाथ लगाया। आप सब स्वार्थी हैं, पापी हैं, देशद्रोही हैं। मुरलीधर अरे वेटी, यह क्या कह रही है ? शोभा मैं ठीक कह रही हूँ। आज देश सकट मे है। देश की आजादी खतरे में है। दश की रक्षा के लिए लोगो ने धन दिया, सोना दिया, रक्त दिया, वेटे दिये । आपने क्या दिया? कुछ नहीं । स्वतन्त्रता-सग्राम की सेनानी मातेश्वरी गगादेवी के घर की यह प्रकाश दशा, ? [तभी रामू का सहारा लिये बूढा भी था जाता है। मुरलीधर अरे पिता जी, आप बूढा बेटा, इस घर मे आज बहुत दिनो बाद देश प्रेम की यह ललकार सुनाई दी है। इस ललवार ने मुझे भी जगा दिया। कौशल्या (घबराई-सी) पिता जी, पता नहीं क्या हो गया है मेरी शोभा को। आप इसे पुचकारकर भीतर ले चलिए न। इसे बुखार है मन्दिर की जोत शोभा हाँ, मुझे बुखार है देश प्रेम का । जैसे दादी मां ने रानी दुर्गावती और लक्ष्मीबाई की तरह देश के लिए अपने प्राण दिये थे, आज मै भी अपने प्राण दे दूंगी। देश के रक्षा कोप मे यही होगी इस घर की भेट, यही होगी इस घर की भेंट, यही होगी । [क्हती-कहती अचेत होकर समाधि-मन्दिर के सामने गिर पडती है । सब लोग लपककर उसे उठाते है । कौशल्या (रोते हुए) हाय, मेरी वेटी फिर वेहोश हो गई। पिता जी, आप इसे अन्दर ले चलिए। मैं डॉक्टर को बुलाता प्रकाश बूढ़ा नही, डॉक्टर को बुलाने की जरूरत नही । (शोभा को अपनी गोद मे ले लेता है।) मेरी शोभा दुर्गावती और लक्ष्मीबाई की अवतार है, अपनी दादी के स्वतन्त्रता-मन्दिर की जोत है । यह जोत कभी बुझ नहीं सकती। मुरलीधर (रोते हुए) इस जीत के प्रकाश ने आज मेरी आँखें खोल दी। मैं सुबह होते ही बीस हजार रुपये रक्षा-कोप मे दूंगा। कौशल्या मैं अपने गहने रक्षा-कोष मे दूंगी। प्रकाश मैं देश की रक्षा के लिए फौज म भर्ती होऊँगा। शोभा (होश मे आकर) भैया । सब (खुश होकर) शोभा होश मे आ गई। शोभा भैया, तुम फौज में भर्ती होगे? ओह | मैं कितनी खुश हूँ आज । तुम जिस दिन अपने देश की रक्षा के लिए मोर्चे पर जाओगे, तो मैं तुम्हारे हाथो मे राखी बांधूंगी, माथे पर तिलक लगाकर तुम्हारी आरती उतारूँगी। मैं नर्स बनकर तुम्हारे पीछे पीछे आऊँगी । जरूरत पड़ने पर भारत माता के शत्रुओ का अपने हाथो से सहार करूंगी और अपने रक्त की अन्तिम दूंद देकर भारत-माता के स्वतन्त्रता मन्दिर की रक्षा करूंगी। आओ, हम भारत-माता की वन्दना गाएँ। [सब मिलकर राष्ट्र-गान 'वन्दे मातरम्' गाते हैं ।] वन्दे मातरम् । सुजलाम् सुफलाम् मलयजशीतलाम् शस्य-श्यामलाम् मातरम् । वन्दे मातरम् । सब.

८६/मन्दिर पीजोत
गुम ज्योम्मा पुतषित यामिनीम्,
पुल्ल युगुमिान्दमदम-शोभिनीम्,
सुहासिनीम् गुमधुर भापिणीम्,
सुगदाम् यरदाम् मातरम्
बन्द मातरम् ।
[पारा और दिग्य प्रकाश पंल जाता है। समाधि-मन्दिर
ये पर पहने भारत मानचित्र और पिर रानी
दुर्गावती, रानी लक्ष्मीबाई, गगादेवी और महात्मा
गाधी यो दिव्यावृतियां आशीर्वाद यी मुद्रा में दियाई
देती हैं।]
[पर्दा गिरता है]
।

भोर का तारा
जगदीशचन्द्र माथुर
पात्र परिचय
माधव : गुप्त साम्राज्य का कर्मचारी शेखर का मित्र
शेखर : उज्जयिनी का कवि
छाया: शेखर की प्रेयसी, अनन्तर पत्नी
स्थान : गुप्त साम्राज्य की राजधानी उज्जयिनी का एक गृह
समय : पांचवी शती, सन् ४५५ के आसपास
दृश्य : एक
[कवि शेखर का गृह । सब वस्तुएँ अस्तव्यस्त । बायी ओर एक
तख्त पर मैली फटी हुई चादर विछी है। उस पर एक चौकी भी
रखी है और लेखनी इत्यादि भी। इधर-उधर भोजपत्र (या
कागज) बिखरे हुए पडे हैं । एक तिपाई भी रखी है जिस पर
कुछ पात्र रखे हैं।
पीछे की ओर एक खिडकी है। वायर्या दरवाजा अन्दर जाने
के लिए है और दायाँ बाहर से आने के लिए। दीवारो मे कई
आले या ताफ हैं, जिनमे दीपदान या कुछ और वस्तुएं रखी
शेखर कुछ गुनगुनाते हुए टहलता है या कभी-कभी तख्त
पर बैठकर कुछ लिखता जाता है। जान पड़ता है वह कविता

Ce :/भोर का तारा बनाने म सलग्न है । तल्लीन मुद्रा। जो कुछ वह कहता है उसे लिखता भी जाता है। शेखर अंगुलियां आतुर तुरत पसार खीचते नीले पठ वा छोर ।' (दुवारा कहता है, फिर लिखता है।) टॅका जिसम जाने क्सि ओर स्वर्ण कण स्वर्ण कण' [पूरा करने के प्रयास म तल्लीन है, इतने म बाहर से माधव का प्रवेश । सासारिकता का भाव और जानकारी उसके चेहरे पर प्रकट है। द्वार के पास खडा होकर थोडी देर तक वह कवि की लीला देखता रहता है। उसके बाद] माधव शेखर। शखर (अभी सुना ही नहीं । एक पक्ति लिखकर) स्वण कण प्रिय को रहा निहार। माधव शे खर! शखर (चौंककर) कौन? ओह माधव । (उठकर माधव की ओर बढता माधव क्या कर रहे हो शेखर? शखर यहाँ आओ माधव यहा । (उसके वधो को पकडकर तख्त पर बिठाता हुआ) यहाँ बैठो। (स्वय खडा है) माधव, तुमने भोर का तारा देखा है माधव (मुस्कराते हुए) हाँ ? क्या ? शेखर (बडी गम्भीरतापूर्वक) कैसा अकेला-सा एक्टक देखता रहता है ? जानते हो क्यो ? नही जानते ? (तख्त के दूसरे भाग पर बैठता हुआ) बात यह है कि एक बार रजनीवाला अपने प्रियतम प्रभात स मिलने चली, गहरे नीले कपड पहनकर, जिसम सोने के तारे टके थे। ज्यो ही निकट पहुंची त्यो ही लाज को आंधी आयो और बेचारी रजनी को उठा ले चली (रुककर) फिर क्या हुआ। (कुछ उद्योग के बाद) प्रभात अकेला रह गया? शखर नहीं, उसने अपनी अंगुलियां पसार कर उसके नीले पट का छोर खीच लिया। जानते हो, यह भोर का तारा है न, उसी छोर म टॅका हुमा सोन वा कण है एक्टक प्रियतम प्रभात को निहार रहा है। क्यो। माधव बहुत ऊंची कल्पना है I लिख चुक क्या? कभी? माधव भोर का तारा/RE . शेखर अभी तो और लिखूगा | बैठा ही था कि इतने मे तुम आ गए माधव : (हंसते हुए) और तब तुम्हे ध्यान हुआ कि तुम धरती पर ही बैठे थे, आकाश मे नही । (रुककर) मुझे कोस तो नही रहे हो शेखर? शेखर (भोलेपन से) क्यो ? माधव तुम्हारी परियो और तारो की दुनिया मे में मनुष्य की दुनिया लेकर आ गया। शेखर : (सच्चेपन से) कभी-कभी तो मुझे तुममे भी कविता दीख पडती है। माधव मुझमे ?~~(जोर से हंसकर) तुम अठखेलियां करना भी जानते हो (गम्भीर होते हुए) शेखर, कविता तो कोमल हृदय की चीज़ है : मुझ जैसे कामकाजी राजनीतिज्ञो और सैनिको के तो छूने भर से मुरझा जाएगी। हम लोगो के लिए तो दुनिया की और ही उलझनें बहुत है। शेखर माधव, तुमने कभी यह भी सोचा है कि इन उलझनो से बाहर निकलने का मार्ग भी हो सकता है। माधव और हम लोग करते ही क्या हैं? रात-दिन मनुष्यो को नयी-नयी उलझनें सुलझाने का हो तो उद्योग करते रहते हैं । शेखर यही तो नहीं करते। तुम राजनीतिज्ञ और मन्त्री लोग बडी सजीदगी के साथ अमीरी-गरीबी, युद्ध और सन्धि की समस्याओ को हल करने का अभिनय करते हो परन्तु मनुष्य को इन उलझनो के बाहर कभी नही लाते। कवि इसका प्रयत्न करते हैं पर उन्हे पागल · माधव कवि (अवहेलनापूर्वक) तुम उलझनो से बाहर निकलने का प्रयास नहीं करते, तुम उन्हे भूलने का प्रयास करते हो। तुम सपना देखते हो कि जीवन सौन्दर्य है, हम जागते रहते हैं और देखते रहते हैं कि जीवन कर्तव्य है। शेषर (भावुकता से) मुझे तो सौन्दयं ही कर्तव्य जान पड़ता है । मुझे तो जहाँ सौन्दर्य दीख पडता है, वहाँ कविता दीख पडती है, वही जीवन दीख पड़ता है। (स्वर बदलकर) माधव, तुमने सम्राट् के भवन के पास राजपथ के किनारे उस अन्धी भिखभगी को कभी देखा है ? (मुस्कराहट रोकते हुए) हाँ। शेखर : मैं उसे सदा भीख देखा हूँ। जानते हो क्यो? क्यो । (कुछ सोचने के बाद) 'दया सज्जनस्य भूपणम् ।' शेखर क्या हूँ (ठहरकर) मैं तो उसे इसलिए भीख देता हूं क्योकि मुझे उसमे एक कविता, एक लय, एक व्यथा झलक पडती है । उसका गहरा झुरी- दार चेहरा, उसके कांपते हुए हाथ, उसको आँखो वे बैवस गड्ढे (एक तरफ एक्टक देखते हुए, मानो इस मानसिर चित्र मे खो गया हो) माधव माधव ?

१०/भोर या तारा उसकी झुकी हुई कमर-माधव, मुझे तो ऐसा जान पडता है मानो पिसी शिल्पी न उसे इस सांचे में ढाला हो। माधय (इस भाषण से उसका अच्छा-यासा मनोरजन हो गया जान पडता है। पहे होपर शेयर पर शरारत-भरी आँखें गडाते हुए) शेखर, टाट में रेशम का पंचन्द पयो लगाते हो। ऐसी कविता तो तुम्हे विसी देवी को प्रशसा मे परनी थी। शेखर (सरल भाव से) किस देवी की? माधव • (अर्थपूर्ण स्वर मे) यह तो उसके पुजारी से पूछो। शेखर मैं तो नहीं जानता, विसी पुजारी यो? अपने को आज तक किसी ने जाना है, शेयर? (हंस पडता है । कुछ समझपर झपता-सा है) पागल ! (गम्भीर होकर बैठते हुए) शेखर, सब बताओ तुम छाया को प्यार करते हो? शेखर (मन्द गहरे स्वर मे) कितनी बार पूछोगे? माधव बहुत प्यार करते हो? शेखर माधव, जीवन में मेरी दो ही तो साधनाएँ हैं, (तख्त से उठकर खिडकी की ओर बढता हुआ) छाया का प्यार और कविता। [खिडकी के सहारे दर्शको की ओर मुंह करके खडा हो जाता माधय माधव और छाया? शेखर (वही गहरा स्वर) हम दोनो नदी के दो किनारे हैं, जो एक-दूसरे की ओर मुडते हैं पर मिल नहीं पाते। माधव (उठकर शेखर के कन्धे पर हाथ रखते हुए) सुनो शेखर, नदी सूख भी तो सकती है। शेखर नही माधव, उसके भाई देवदत्त किसी तरह की आशा करना व्यर्थ है। मेरे लिए तो उसका हृदय सूखा हुआ है। माधव क्यो? शेखर तुम पूछते हो क्यो? तुम भी सम्राट् स्कन्दगुप्त के दरबारी हो । देवदत्त एक मन्त्री है । भला एक मन्नी की बहन का एक मामूली कवि से सम्बन्ध? क्या माधव मामूली कवि । शेखर, तुम अपने को मामूली कवि समझते हो? शेखर और क्या समझू ?-राजकवि? माधव सुनो शेखर, तुम्हे एव खवर सुनाता हूँ। शेखर खबर?

भोर का तारा/६१ माधव हाँ। कल रात को राजभवन गया था। शेखर इसमे तो कोई नयी बात नहीं । तुम्हारा तो काम ही यह है । माधव नही कल एक उत्सव था । स्वय सम्राट ने कुछ लोगो को बुलाया था। गाने हुए, नाच हुए, दावत हुई। एक युवती ने बहुत सुन्दर गीत सुनाया। सम्राट् उस गीत पर बहुत रीझ गये। शेखर (उकताकर) आखिर तुम यह सब मुझे क्यो सुना रहे हो माधव ? माधव इसलिए कि सम्राट् ने उस गीत बनानेवाले का नाम पूछा। पता चला कि उसका नाम था-शेखर । शेखर (चौककर) क्या? अभी और तो सुनो। उस युवती ने सम्राट् से कहा कि अगर आपको यह गाना पसन्द है तो इसके लिखनेवाले कवि को अपने दरबार में बुलाइए । अय कल से यह कवि महाराजाधिराज सम्राट् स्कन्दगुप्त विक्रमादित्य के दरबार मे जायेगा। शेखर मैं? माधव (अभिनय करते हुए, झुककर) श्रीमान्, क्या आप ही का नाम शेखर माधव शेखर मैं जाऊँगा सम्राट् के दरबार मे? माधव, सपना तो नहीं देख रहे हो? माधव : सपने तो तुम देखा करते हो।" लेकिन अभी समाचार पूरा कहाँ हुआ 7 शेखर हाँ, यह युवती कौन है? माधव अब यह भी बताना होगा तुम भी बुद्धू हो। क्या इसी बूते पर प्रेम करने चले थे? शेखर मोह । छाया । (माधव का हाथ पकडते हुए)" तुम कितने अच्छे हो ! माधव और सुनो। • सम्राट् ने देवदत्त को आज्ञा दी है कि वह तक्षशिला जाकर वहा के क्षनप वीरभद्र के विद्रोह को दवायें। आर्य देवदत्त के साथ मैं भी जाऊँगा, उनका मन्त्री बनकर । समझे? शेखर (स्वप्न से मे) तो क्या सच ही छाया ने वहा ! सच ही माधय शेखर, आठ दिन बाद आर्य देवदत्त और मैं तक्षशिला चल देंगे।... इसके बाद-उसके बाद छाया कहाँ रहेगी? भला बताओ तो? शेखर माधव । “(माधव हंस पडता है) इतना भाग्य ? इतना विश्वास 7 . नहीं होता। माधव न करो विश्वास । लेकिन भलेमानस, छाया क्या इस कूडे में रहेगी? ये विवरे हुए कागज, टूटी चटाई, फटे हुए वस्त्र शेखर, लापरवाही की १२/भोर या सारा सीमा होती है। शेखर मैं योई इन बातोयी परवाह परता हूँ। माधव और फिर? शेखर • मैं परवाह परता हूँ पूल यी पपड़ियों पर जगमगाती हुई ओस की, (भावोदेर से) सन्ध्या में सूर्य की किरणो को अपनी गोदी मे सिमेटने वाले बादल के टुक्डो की, सुबह या आकाश के कोने पर टिमटिमाने वाले तारे की. माधव एक चीज रह गई। शेखर माधय जिसे तुम दिन मे वृक्षो के नीचे फैली देखते हो। (उठकर खडा जाता षया? शेखर वृक्षो के नीचे? माधव जिसे दर्पण मे झलक्ती देखते हो। शेखर दर्पण में? माधव जिसे तुम अपने हृदय मे हमेशा देखते हो। (निकट आ गया है) शेखर (समझकर बच्चो की तरह) छाया । माधव (मुस्कराते हुए) छाया? [पर्दा गिरता है] दृश्य दो [उज्जयिनी मे आर्य देवदत्त का भवन जिसमे अब शेखर और छाया रहते हैं। कमरा सजा हुआ साफ है । दीवारो पर कुछ चित्र खिंचे हुए हैं । कोने मे धूपदान है । सामने तख्त पर चटाई और लिखने पढने का सामान है। बराबर म एक छोटी चौकी पर कुछ अन्य रखे हुए है। दूसरी ओर एक पीढा है जिसके निकट मिट्टी की, किन्तु कलापूर्ण एक अगीठी रखी हुई है। दीवार के एक भाग पर अलगनी है जिस पर कुछ धोतियां इत्यादि टेंगी छाया-सौन्दर्य की प्रतिमा, चाचल्य, उन्माद और गाम्भीर्य का जिसमे स्त्री सुलभ सम्मिश्रण है-गृहस्वामिनी होने के नाते कमरे की सब वस्तुएँ स्थान पर संभालकर रख रही है । साथ ही कुछ गुनगुनाती भी जाती है। जाहा होने के कारण भोर का तारा/६३ तापने के लिए उसने अंगीठी मे अग्नि प्रज्वलित कर दी है। कुछ देर बाद पीढे पर बैठकर वह अंगीठी को ठीक करती है। उसकी पीठ द्वार की ओर है। अपने कार्य और गान मे इतनी सलग्न है कि उसे बाहर पैरो की आवाज़ नही सुनाई देती है।] प्यार की है क्या यह पहचान ? चांदनी का पाकर नव स्पर्श चमक उठते पत्ते नादान, पवन को परस सलिल की लहर, नृत्य मे हो जाती लयमान, सूर्य का सुन कोमल पद-चाप, फूट उठता चिडियो का गान, तुम्हारी तो प्रिय केवल याद, जगाती मेरे सोये प्राण । प्यार की है क्या यह पहचान ? (धीरे से शेखर का प्रवेश) और कमर पर ऊनी दुशाला है, बगल मे ग्रन्थ । गले मे फूलो की माला है। द्वार पर चुपचाप खडा होकर मुस्कराते हुए छाया का गीत सुनता है । शेखर : (थोडी देर बाद, धीरे से) छाया! (छाया नहीं सुन पाती है ! गाना जारी है । फिर कुछ समय बाद) छाया! (चौककर खडी हो जाती है। एक साथ मुख फेरकर) ओह ! शेखर . (तख्त की ओर बढता हुआ) छाया, तुम्हे एक कहानी मालूम है ? छाया : (उत्सुकतापूर्वक) कोन-सी? शेखर । (छोटी चौकी पर पहले तो अपनी बगलवाला ग्रन्थ रखता है, और फिर उस पर दुशाला रखते हुए) एक बहुत सुन्दर-सी। छाया : सुनें, कैसी कहानी है। शेखर (बैठकर) एक राजा के यहां एक कवि रहता था, युवक और भावुक । राजभवन मे सब लोग उसे प्यार करते थे, राजा तो उस पर निछावर था । रोज सुबह राजा उसके मुंह से नई कविता सुनता, नई मौर सुन्दर कविता। (पीढे पर बैठ जाती है, चिबुक को हथेली पर टेकती है।) शेखर : परन्तु उसमे एक बुराई थी। छाया: क्या? शेखर : वह अपनी कविता केवल सुबह के समय सुनाता था। यदि राजा उससे पूछता है कि तुम दोपहर या सन्ध्या को अपनी कविता क्यो नहीं सुनाते तो वह उत्तर देता, मैं केवल रात के तीसरे पहर मे कविता लिख सकता छाया छाया . छाया : राजा उससे रुष्ट नहीं हुआ?

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भोर का तारा/६५ । चांदनी बीत जाती है, जब कविता भी नीरव हो जाती है, तब पुरुष को चट्टानें फिर बुलाती हैं और वह ऐसे भागता है मानो पिंजरे से छूटा हुआ पछी । और स्त्री के लिए फिर वही अंधेरा, फिर वही सूनापन शेखर (मन्द स्वर मे) छाया, तुम मेरे साथ अन्याय कर रही हो। क्या एक दिन तुम मुझे भी ऐसे छोडकर न चले जाओगे? शेखर लेकिन छाया, तुम्हे छोडकर कहां जा सकता हूँ? छाया हूँ, मैं नहीं मान सकती। शेखर सुनो तो, मेरे लिए जीवन मे ऐसी सूखी चट्टानें थोडे ही हैं । मेरी कविता ही मेरी हरी-भरी वाटिका है। मैं उसे प्यार करता हूँ क्योकि मुझे तुम्हारे हृदय मे सौन्दर्य दीखता है जिस रोज़ मैं तुमसे दूर हो जाऊँगा, उस रोज मैं सौन्दर्य से दूर हो जाऊंगा, (कुछ रुकवर) मेरी कविता मर जाएगी। छाया नहीं शेखर, मैं मर जाऊँगी, किन्तु तुम्हारी कविता रहेगी, बहुत दिन रहेगी। शेखर मेरी कविता' (कुछ दर बाद) छाया, आज मैं तुम्हे एक बडी विशेष बात बतानेवाला हूं, एक भेद जो अब तक मैंने तुमसे छिपा रखा था। रहने दो, तुम सदा ऐसे भेद और ऐसी कहानियां सुनाया करते हो। शेखर नहीं । अच्छा, तनिक उस दुशाले को उठाओ (छाया उठती है।) उसके नीचे कुछ है । (छाया उस प्रथ को अपने हाथ म लेती है ।) उसे खोलो • क्या है? छाया (आश्चर्यान्वित होकर) ओह, (ज्यो ज्यो छाया उसके पन्ने उलटती जाती है, शेखर की प्रसन्नता बढ़ती जाती है।) 'भोर का तारा' । उफ्फोह । यह तुमने कव लिखा? मुझसे छिपाकर? शेखर (हंसते हुए। विजय का-सा भाव) छाया, तुम्हे याद है वह दिन जब माधव के साथ मै तुम्हारे भाई देवदत्त से मिलने इसी भवन में आया छाया छाया (शेखर की ओर थोडी देर देखकर) उस दिन को कैसे भूल सकती हूँ, शेखर? उसी दिन तो भैया को तक्षशिला जाने की माज्ञा मिली थी, उसी दिन तो उन्होंने तुम्हे और मुझे माता जी का वह पत्र दिखाया था जिसने हम दोनो को सर्वदा के लिए बांध दिया। शेखर हाँ छाया, उसी दिन, उसी दिन मैंने इस महाकाव्य को लिखना आरम्भ किया था (गहरे स्वर म) आज वह समाप्त हो गया। छाया शेखर, यह हमारे प्रेम को अमर स्मृति है। शेखर उसे यहाँ लाओ। (हाय मे लेकर चाव से खोलता हुआ) 'भोर कातारा' ६४/ भोर या तारा घर छाया शेखर नही । उसने सोचा, पवि पेपर पर चलकर देखा जाय कि इसम रहस्य क्या है। रात को तीसरा पहर होते ही राजा वेश बदलकर पति के पास पिडकी के नीचे बैठ गया। छाया उसके बाद? शेखर उसके बाद राजा ने देखा कि पवि लेपनी लेकर तैयार बैठ गया। पोडी देर म यही रो बहुत मधुर, यहुत सुरीला स्वर राजा के कान में पडा। राजा झूमने लगा और यविपी लेखनी आपने-आप चलने लगी। फिर? शेखर फिर क्या । राजा महल को लौट आया और उसके बाद उसने कवि से यभी यह प्रश नहीं पूछा कि वह सुबह ही क्यो कविता सुनाता था। भला बताओ क्या नहीं पूछा। छाया बताऊँ? शेखर छाया राजा को यह मालूम हो गया कि उस गायिका के स्वर मे ही कवि की कविता थी। और बताऊँ ? (खडी हो जाती है) शेखर (मुस्कराते हुए) छाया, तुम छाया (टोक्कर शीघ्रता और चचलता के साथ) वह गायिका और कोई नहीं उस कवि की पत्नी थी। और बताऊँ ? उस कवि को कहानी सुनान का बडा शौक था, झूठी कहानी । और बताऊँ ? उस कवि के बाल लम्बे थे, कपडे ढीले-ढाले, गले में उसके फूलो की माला थी, माथे पर (इस बीच मे शेखर की मुस्कराहट हल्की हंसी मे परिणित हो गई है, यहां तक कि इन शब्दो तक पहुंचते-पहुंचते दोना जोर से हँस पडते हाँ। शेखर (थोडी देर बाद गम्भीर होते हुए) लेकिन छाया, तुम्ही बताओ तुम्हारे गान, तुम्हारी प्रेरणा, तुम्हारे प्रेम के बिना मेरी कविता क्या होती 'तुम मेरी कविता हो। (बडे गम्भीर, उलाहना भरे स्वर मे) प्रत्येक पुरुष के लिए स्त्री एक छाया । कविता है। যাব क्या मतलव तुम्हारा? कविता तुम्हारे सूने दिलो मे सगीत भरती है, स्त्री भी तुम्हारे ऊबे मन को बहलाती है। पुरुष जब जीवन को सूखी चट्टानो पर चढता चढता थक जाता है, तब सोचता है, 'चलो थोडा मनबहलाव ही कर लें।' स्त्री पर अपना सारा प्यार, अपने सारे अरमान निछावर कर देता है, मानो दुनिया मे और कुछ हो ही न। और उसके बाद जब भोर का तारा/६५ छाया चांदनी बीत जाती है, जव कविता भी नीरव हो जाती है, तब पुरुप को चट्टाने फिर बुलाती हैं और वह ऐसे भागता है मानो पिंजरे से छूटा हुआ पछी । और स्त्री के लिए फिर वही अंधेरा, फिर वही सूनापन ! शेखर : (मन्द स्वर मे) छाया, तुम मेरे साथ अन्याय कर रही हो। छाया: क्या एक दिन तुम मुझे भी ऐसे छोडकर न चले जाओगे? शेखर लेकिन छाया, तुम्हे छोडकर कहां जा सकता हूँ? हूँ, मैं नहीं मान सकती। शेखर . सुनो तो, मेरे लिए जीवन मे ऐसी सूखी चट्टानें थोड़े ही है । मेरी कविता ही मेरी हरी-भरी वाटिका है। मैं उसे प्यार करता हूँ क्योकि मुझे तुम्हारे हृदय मे सौन्दर्य दीखता है जिस रोज़ मैं तुमसे दूर हो जाऊंगा, उस रोज़ मैं सौन्दर्य से दूर हो जाऊँगा, (कुछ रुकवर) मेरी कविता मर जाएगी। छाया नहीं शेखर, मैं मर जाऊँगी, किन्तु तुम्हारी कविता रहेगी, बहुत दिन रहेगी। शेखर मेरी कविता। (कुछ देर बाद) छाया, आज मैं तुम्हे एक बडी विशेष बात बतानेवाला हूं, एक भेद जो अब तक मैंने तुमसे छिपा रखा था। छाया : रहने दो, तुम सदा ऐसे भेद और ऐसी कहानियां सुनाया करते हो। शेखर नहीं । अच्छा, तनिक उस दुशाले को उठाओ (छाया उठती है।) उसके नीचे कुछ है । (छाया उस प्रथ को अपने हाथ में लेती है ।) उसे खोलो "क्या है ? (आश्चर्यान्वित होकर) मोह, (ज्यो-ज्यों छाया उसके पन्ने उलटती जाती है, शेखर की प्रसन्नता भढती जाती है ।) 'भोर का तारा'! उफ्फोह ! यह तुमने कब लिखा? मुझसे छिपाकर? शेखर : (हंसते हुए। विजय का-सा भाव) छाया, तुम्हे याद है वह दिन जब माधव के साथ मै तुम्हारे भाई देवदत से मिलने इसी भवन में आया था? छापा : (शेखर की ओर थोडी देर देखकर) उस दिन को कैसे भूल सकती हूँ, शेखर? उसी दिन तो भया को तक्षशिला जाने की माजा मिली थी, उसी दिन तो उन्होंने तुम्हे और मुझे माता जी का वह पत्र दिखाया था जिसने हम दोनों को सर्वदा के लिए बांध दिया। रोखर : हाँ छाया, उसी दिन, उसी दिन मैंने इस महाकाव्य को लिखना आरम्भ क्यिा था (गहरे स्वर मे) आज वह समाप्त हो गया। छाया : शेखर, यह हमारे प्रेम वी अमर स्मृति है। पोखर . उसे यहाँ साओ। (हाप मे वर चाव से खोलता हुआ) 'भोर कासारा छाया १६/ भोर का तारा छाया, यह काव्य बडी लगन का फल है। कल मैं इसे सम्राट् की सेवा मे ले जाऊँगा। और फिर जब मैं उस सभा में इसे सुनाना आरम्भ करूंगा, तब, तब, सारी उज्जयिनी की आंखें मेरे ऊपर होगी। महाकाव्य, महाकाव्य ! उस समय सम्राट् गद्गद हो जाएंगे और मैं कवियो का सिरमौर हो जाऊंगा। छाया, बरसो बाद दुनिया पढेगी कवि कुल- शिरोमणि शेपर-कृत 'भोर का तारा' हा, हा, हा (विभोर छाया उसकी ओर एकटक देख रही है। सहसा उसके चेहरे पर चिन्ता को रेखा खिंच जाती है । शेखर हंस रहा है।) शेखर । (वह हंसे जा रहा है) शेखर ! (शेखर की दृष्टि उस पर पडती छाया छाया शेखर (सहसा चुप होकर) क्यो छाया, क्या हुआ तुमको? (चिन्तित स्वर मे) शेखर । (चुप हो जाती है।) शेखर कहो। शेखर, तुम इसे संभालकर रखोगे न ? शेखर . बस इतनी ही-सी बात? छाया मुझे डर लगता है कि कि'''कही यह नष्ट न हो जाए, कोई इसे चुरा न ले जाए और फिर तुम.. शेखर : हा, हा, हा पगली! ऐसा क्यो होने लगा? सोचने से ही डर गई। छाया, छाया, तुम्हारे लिए तो आज प्रसन्न होने का दिन है, बहुत प्रसन्न । इधर देखो छाया, हम लोग कितने सुखी हैं । और तुम हो तक्षशिला के क्षत्रप देवदत्त की बहन और उज्जयिनी के सबसे बड़े कवि शेखर की पत्नी ! तक्षशिला का क्षरप और उज्जयिनी का कवि। हुँ, हुँ, हुँ ! क्यो छाया? छाया : (मन्द स्वर मे) तुम सच कहते हो, शेखर, हम लोग बहुत सुखी हैं। शेखर (मग्नावस्था मे) बहुत सुखी। [सहसा बाहर कोलाहल। घोड़े को टापो की आवाज । शेखर और छाया छिटक कर चैतन्य खड़े हो जाते हैं । शेखर द्वार की ओर बढ़ता है। कौन है ? [सहसा माधव का प्रवेश । थकित और अमित शास्त्री से सुसज्जित पसीने से नहा रहा है। चेहरे पर भय और चिन्ता के चिह्न हैं।

भोर का तारा/६७ माधव । शेखर और छाया शेखर माधव तुम यहाँ कहाँ ? माधव (दोनो पर दृष्टि फेंकता हुआ) शेखर, छाया, (फिर उस कमरे पर डरती-सी आँखे डालता है, मानो उस सुरम्य घोसले को नष्ट करने से भय खाता हो। कुछ देर बडे प्रयत्ल और कष्ट के साथ बोलता है।) मैं तुम दोनो से भीख मांगने आया हूँ। [छपा और शेखर के आश्चर्य का ठिकाना नहीं है। छाया भीख मांगने, तक्षशिला से? शेखर तक्षशिला से | माधव, क्या बात है? माधव (धीरे-धीरे, मजबूती के साथ बोलना प्रारम्भ करता है, परन्तु ज्यो-ज्यो बढता है, त्यो त्यो स्वर मे भावुकता आती है ।) हाँ, मैं तक्षशिला से ही आ रहा हूँ। यहां तक कैसे आ गया, यह मैं नहीं जानता। हाँ, यह जानता हूँ कि आज गुप्त साम्राज्य सकट मे है और हमे घर-घर भीख मांगनी पड़ेगी। शेखर गुप्त साम्राज्य सकट में है। क्या कह रहे हो माधव' (सजीदगी से साथ) शेखर, पश्चिमोत्तर सीमा पर आग लग चुकी है। हूणो का सरदार तोरमाण भारतवर्ष पर चढ़ आया है। (भयाक्रान्त होकर) तोरमाण । उसने सिन्धु नदी को पार कर लिया है उसने अम्भी राज्य को नष्ट कर दिया है । उसको सेना तक्षशिला को पैरो तले रौद रही है." (सहता माधव के निकट जाकर भय से कातर हो उसकी भुजा पकडती हुई) तक्षशिला? माधव (उसी स्वर मे) सारा पचनद आज उसके भय से कांप रहा है। एक के बाद एक गांव जल रहे हैं, हत्याएं हो रही हैं, अत्याचार हो रहा है। शीघ्र ही सारा आर्यावर्त पीडितो की हाहाकार से गूंजने लगेगा। शेखर, छाया-मैं तुमसे भीख मांगता हूँ-नई भीख मांगता हूँ-सम्राट् स्कन्दगुप्त की, देश की, इस सकट मे मदद करो। बाहर भारो कोलाहल । शेखर और छाया जडवत् खडे हैं।] : बाहर देखो जनता उमड रही है। शेखर, तुम्हारी वाणी मे ओज है। तुम्हारे स्वर में प्रभाव है। तुम अपने शब्दो के बल पर सोई हुई मात्माओ को जगा सकते हो, युवको मे जान फूंक सकते हो। (शेषर माधव छाया माधव छाया ६८/भोर का तारा सुने जा रहा है। चेहरे पर भावो का आवेग। मस्तक पर हाथ रखता है।) आज साम्राज्य को सैनिका की आवश्यकता है। शेखर, ओजमयी कविता द्वारा तुम गांव-गांव म जाकर यह आग फैला दो जिससे हजारो और लाखो भुजाएं अपने सम्राट और देश की रक्षा के लिए शस्त्र हाथ म ले ल (कुछ रुकवर शेखर के चेहरे की ओर देखता है। उसकी मुद्रा बदल रही है, जैसे कोई भीषण उद्योग कर रहा हो।) कवि, देश तुमसे बलिदान मांगता है। छाया (अत्यन्त दर्द भरे स्वर मे) माधव, माधव । माधव (मुडकर छाया की ओर कुछ देर देखता है, फिर थोड़ी देर बाद) छाया, उन्होने कहा था, 'मेरे प्राण क्या चीज हैं, इसमे तो सहस्रो मिट गए और सहस्रो को मिटना है।' शेखर (मानो नीद से जागा हो।) किसने? माधव आर्य देवदत्त ने, अन्तिम समय। छाया (जैसे बिजली गिरी हो।) माधव, माधव, तो क्या भैया माधव उन्होने वीरगति पाई है छाया। (छाया पृथ्वी पर घुटनो पर गिर जाती है । चेहरे को हाथो से ढक लिया है। जिस बीच म माधव कहे जाता है। शेखर एक बार घूमता है । उसके मुख से प्रकट होता है मानो डूबते को सहारा मिलनेवाला है।) तक्षशिला से चालीस मील दूर विद्रोही वीरभद्र की खोज म हूणो के दल के निकट जा पहुंचे। वहाँ उन्हे ज्ञात हुआ कि वीरभद्र हूणो से मिल गया है। उनके बीस सैनिक आगे हूणो मे फंसे हुए थे। वे तक्षशिला लौट सकते थे। परन्तु एक सच्चे सेनापति की भांति उन्होने अपने सैनिको के तथा अपने प्राण सकट मे डाल दिए और मुझे तक्षशिला और पाटलिपुत्र को चेतावनी देने के लिए भेजा गया । मैं आज - [सहसा रुक जाता है, क्योकि उसकी दृष्टि शेखर पर जा पडती है । शेखर चौकी के पास खडा है । उसके चेहरे पर दृढ़ता और विजय का भाव है। बाहर कोलाहल कम है । शेखर अपना हाथ बढाकर अपने प्रय 'भोर का तारा' को उठाता है। इसी समय माधव की दृष्टि उस पर पडती है। शेखर पुस्तक को कुछ देर चाव से, विछुडने से पूर्व, प्रेम से देखता है। उसके बाद आगे बढवर अंगीठी के निकट जावर उसमे जलती हुई अग्नि को देखता है और धीरे धीरे उस पुस्तक को फाडता है । इस मावाज को सुनकर छाया अपना मुख ऊपर को करती है।]

भोर का तारा/8
छाया (उसे फाडते हुए देखकर) शेखर!
लेकिन शेखर ने उसे अग्नि मे डाल दिया है । लपटें उठती हैं !
छाया फिर गिर पडती है। शेखर लपदो की तरफ देखता है।
फिर छाया की ओर दृष्टिपात करता है, एक सूखी हमी के बाद
बाहर चल देता है। कोलाहल कम होने के कारण उसके पैरो
की आवाज थोडी देर तक सुनाई देती है।]
[माधव द्वार की ओर बढता है]
(अत्यन्त पोडित स्वर मे) माधव, तुमने तो मेरा प्रभात नष्ट कर
दिया।
[माधव उसके शब्द सुनकर बाहर जाता-जाता रक जाता है।
मुडकर छाया की ओर देखता है, पीछे की खिडकी के निकट
जाकर उसे खोल देता है। इससे बाहर का कोलाहल स्पष्ट सुनाई
देता है। शेखर और उसके साथ पूरे जन-समूह के गाने का स्वर
सुन पडता है।
"नगाडे में डका बजा है, तू शस्त्रो को अपने संभाल
बुलाती है वीरो को तुरही, तू उठ कोई रास्ता निकाल ।"
[शेखर का स्वर तीव्र है। माधव खिडकी को बन्द कर देता है,
पुन शान्ति । इसके बाद तुरन्त दृढ स्वर मे बोलता है।
छाया, मैंने तुम्हारा प्रभात नष्ट नहीं किया। प्रभात तो अब होगा।
शेखर तो अब तक 'भोर का तारा' था। अब वह 'प्रभात का सूर्य'
होगा।
[छाया धीरे-धीरे अपना मस्तक उठाती है।
[परदा गिरता है।
माधव

आखिरी चिट्ठी निश्तर खानकाही [गुरदासपुर के निकट एक सुनसान स्थान, जहाँ आतकवादियो द्वारा बनाए गए तहखाने मे जाति- कारी नेता बलदेव सिंह मान, सामाजिक कार्य- कर्ता सुभद्रा सेठी तथा बलदेव सिंह मान का एक अन्य साथी प्रकाशवीर हांडा आतकवादियो के घेरे मे रस्सियो से बंधे बैठे हैं। तीनो के हाय कमर से बांध दिये गए हैं। चारो ओर खौफ और सन्नाटे का वातावरण है । आतकवादियो का सरगना अजमेरा सिंह अड्डेवाल हाथ मे स्टेनगन लिये भारी-भारी कदमो से टहल रहा है, कई आतकवादी आस-पास खड़े हैं] अजमेरासिंह अड्डेवाल (कहकहा लगाते हुए स्टेनगन से एक फायर करता है) मान ! क्या तुम यह आवाज सुनते हो? बलदेवसिंह मान नही, मैं यह आवाज़ नहीं सुनता। (ऊंची आवाज़ मे) हाँ, स्टेनगन की यह आवाज़ अपने पीछे जो सन्नाटा छोड जाती है, उसे जरूर महसूस करता हूँ। अड्डेवाल सन्नाटा ? सन्नाटे से क्या मतलब है तुम्हारा बलदेवसिंह मान वही सन्नाटा, जो यह आवाज अपने अन्त मे छोड जाती है। कब्रिस्तान और श्मशान जैसा सन्नाटा? अड्डेवाल तुम्हे इस आवाज से डर नहीं लगता? सलदेवसिंह मान (व्यग्य से हंसते हुए) डर? किससे? क्या उस बदूव से, जो अपने आपको जीवित रखने के लिए वस्ती से दूर एक आखिरी चिट्ठी / १०१ तहखाने का सरक्षण लिये हुए है। उस आदमी से डर? जो खुद कानून के डर से इस निर्जीव जगल मे अपने आपको छुपाए हुए है। अडडेवाल (क्रोध से) सुअर दा पुत्तर, ठीक नहीं होगा (अपने साथिया की ओर इशारा करते हुए) लगाओ हटर सुअर दी पीठ पे। [एक आतकवादी मान को पीटना शुरू करता सुभद्रा सेठी (साहस से, चीखते हुए) हर वह कोडा, जो मान की पीठ पर पड रहा है, हमे विश्वास दिला रहा है, तुम कायर ही नहीं, नीच भी हो। प्रकाशवीर हांडा और यह भी मान लो कि इतिहास अपने पन्नो पर तुम्हारे मसूबो की मौत दर्ज कर चुका है। जल्द ही तुम अपने सारे साथियों सहित कूड़े के ढेर पर फेंक दिये जाओगे। अडडेवाल (मान को पिटने से रोकते हुए) बलदेव सिंह, तुम सिख परिवार में पैदा ही क्यो हुए अच्छा था आंख खोलने से पहले ही मर जाते। मलदेवसिंह मान ताकि इस बहादुर सिख कौम के भविष्य से खिलवाड करने की कुछ और आजादी तुम्हे मिल जाती, लेकिन याद रखो मान अवेला नही, मनगिनत लोग हैं, जो इस देश को, इस कौम को बचाने के लिए सर से कफन बांधे मर मिटने को तैयार बैठे हैं। सुभद्रा सेठी और यह भी समझ लो कि जिस घिनौन उद्देश्य यो तुम लेकर चले हो, सिख जनता उसका समर्थन नहीं कर रही है । गिनतो वे चद लोग हैं, जो गुमराह हो गए हैं, पागल हो गए हैं, और उनमे से तुम भी एक हो। अड्डेवाल (ोध से चीपते हुए) इस छोकरी की जवान वद फरो। नहीं तो अगले पल स्टनगन की गोली इसकी छाती के पार हो जाएगी। बलदेवसिंह मान ठीक है अड्डेवाल। गोली चलाया, ताकि यह बात फिर सावित हो जाए कि जिस खालिस्तान का स्वार १०२/आखिरी चिट्ठी तुम देख रहे हो, अगर वह बना तो निरीह महिलाओ और मासूम बच्चो की हड्डियो पर बनेगा। अड्डेवाल (गुस्से से पागल होते हुए) बकवास बद नहीं करोगे? तुम जैसे लोग ही सिख कौम के दुश्मन हैं, गद्दार हैं। बलदेवसिंह मान गद्दार हम नहीं हैं, तुम हो, तुम, जो चद झूठे ख्वाबो के लिए, चद सिक्को के लिए अपनी आत्मा और अपना जमीर सब कुछ बेच चुके हैं। सुभद्रा सेठी (नर्म लहजे मे) क्या तनहाई मे तुम कभी सोचते नही कि जो काम तुम कर रहे हो, उसका नतीजा इस देश के लिए कितना भयानक हो सकता है। अड्डेवाल मैं तुझमे राजनीति नही सीख रहा हूँ, छोकरी चुप रह। प्रकाशवीर अड्डेवाल | सवाल राजनीति का नहीं, इस बात का है कि जिस आतकवाद का सहारा लेकर तुम अपने निहित स्वार्थों की पूर्ति करने निकले हो, वह इस देश के और सिख जनता के हित मे नही है। अड्डेवाल अच्छा ! सरकारी बोली बोल रहा है । यह नहीं जानता कि इस सरकार मे सिख जनता गुलामो-जैसी जिंदगी गुजार रही है। बलदेर्वासह मान अच्छा । यह तुम कह रहे हो, जो खुद विदेशी शक्तियो के हाथो बिके हुए हो। साम्राज्यवादियो का खिलौना बने हुए हो। अड्डेवाल अच्छा । अच्छा ! कार्ल मार्क्स की नाजायज औलाद ! तू यो नही मानेगा। बता तेरे साथ कौन-कौन लोग हैं और कहां-कहां छुपे हुए हैं। पहले तुम्ही से निपटना होगा। बलदेवसिंह मान तुम समझते हो, क्या इतनी आसानी से तुम यह सब पूछ पाओगे ! याद रखो पजाब के एक कोने से दूसरे कोने तक क्रान्तिकारी पंले की इस मा दीवार को तुम नही तो सत्तर लाय मान और तक पैदा होते रहेंगे, या सपाया से) तीनो i०९ हुए १ मानमा मे । मायाला आखिरी चिट्ठी/१०३ सुभद्रा सेठी [एर तग और अंधेरी कोठरी में तीनो क्रान्ति- वारी खामोश बैठे हैं । तीनो के हाथ पीछे कमर के साथ बधे है] मान । यहाँ से निकलने का उपाय सोचो? उस दिन अगर तुम निहत्थे आतक्वादियो के गिरोह से भिड न जाते तो हम तीनो गिरफ्तार नहीं हो सकते थे। बलदेवसिंह मान लेस्नि अगर हम भिडते नही तो खुराना जी का सारा परिवार इन गुण्डो के हाथो कत्ल कर दिया जाता। [दृश्य परिवर्तन, फ्लश बैंक मे] रामलाल खुराना (पुलिस स्टेशन मे आतकवादियो का पत्र पुलिस इस्पेक्टर को दिखाते हुए) साहब, मेरी रक्षा कीजिए, यह तीसरी बार धमकी भरा पत्र मिला है मुझे। इस्पेक्टर गिल (हाथ बढाकर खत लेते हुए) क्या लिखा है, इसमे? रामलाल खुराना (जोर-जोर से खत पढते हुए) "अब इसमे कोई सदेह नहीं रह गया है कि गुरमीतसिंह खालसा की मौत के जिम्मेदार तुम हो। तुम्हारे ही कारण वह पुलिस मुठ भेड में मारा गया । अब इसमे भी कोई शक नहीं रहा है कि तुम पुलिस के पालतू कुत्ते हो, पुलिस के मुखबिर हो, तुम्हारा अपराध क्षमा योग्य नहीं है, तुम शीघ्र ही अपने पूरे परिवार सहित मौत के घाट उतार दिए जाओगे। अजमेरासिंह अड्डेवाल।" इस्पेक्टर पजाब पुलिस और केन्द्रीय सुरक्षा बल दोनो काफी सतर्क हैं, और जहां तक सम्भव है, आतकवादियो की धड पकड भी कर रहे हैं, लेकिन रामलाल खुराना लेकिन मैं बहुत खतरे मे हूँ साहब । मेरी मदद कीजिए। इस्पेक्टर लेकिन यह कैसे सम्भव है कि एक एक घर पर पुलिस का पहरा लगा दिया जाए | इतनी फोर्स हमारे पास है कहाँ ? कुछ तो आप लोगो को भी करना चाहिए । खुराना हम कैसे अपना बचाव कर सकते हैं, साहब? इस्पेक्टर अगर सारे लोग मिलकर आतकवादियो का मुकाबला करें तो उनका मनोबल टूट जायेगा, वह भाग खडे होंगे।

१०४ / आखिरी चिट्ठी खुराना निहत्थी जनता इन हथियारबन्द डाकुओ का मुकाबला कसे कर सकती है? इस्पेक्टर कर क्यो नही सक्ती, कर सकती है । सर झुकाकर मौत के घाट उतरने से बेहतर है, लडते-लडते शहीद हो जाओ। आतकवादी भाखिर हैं क्तिने ? मुट्ठी भर । खुराना मुट्ठी-भर आतकवादी पुलिस फोर्स बस मे नही आ रहे हैं, जनता के बस मे आ जायेंगे? इस्पेक्टर सबसे बडी ज़रूरत सगठित होने की है, एकजुट होने की है । आतकवादी तुम्हारे ही भाई-वेटे हैं, उनका सामाजिक बहिष्कार कर, उन्हे सरक्षण मत दो। पुलिस का उनके ठिकानो का पता बताओ। माए ऐसे पुत्रो से नाता तोड लें, जो आतकवाद फैला रहे हैं, बाप ऐसे पथभ्रष्ट पुनो को सजा दिलवाने के लिए आगे बढ़े, यह समस्या अकेले पुलिस से नही, जनता के सहयोग से हल होगी। तब जनता को विना शर्त हथियार दीजिए और आप लोग एक तरफ हटकर खडे हो जाइए। इस्पेक्टर इससे तो पजाब मे खानाजगी की आग भडक उठेगी। बदले की भावना से लोग एक-दूसरे की हत्या करेंगे? हिंसा का इलाज हिंसा नहीं है। विरोध की आवाज़ मे बदूक की गोली से ज्यादा शक्ति होती है । खुराना : विरोध की आवाज़' (व्यग्य से हंसता है) यहां लोगो की जान पर बनी है और आप उपदेश दे रहे हैं। इस्पेक्टर उपदेश नही दे रहा हूँ, मैं सिर्फ यह कह रहा हूँ कि समाज के हर वर्ग की ओर से हर सतह पर आतक- वादियो का विरोध होना चाहिए। उन्हें यह एहसास दिलाया जाना चाहिए कि जो कुछ वह कर रहे हैं, वह उनके हित में नहीं है, वे भटके हुए लोग हैं। खुराना : लेकिन इस समय लोग बुरी तरह आतक्ति हैं। और इसमे भी कोई शक नहीं कि सिख जनता का एक वर्ग उनकी पीठ पर है। इनमे से अनेक लोग बहुत प्रभाव. शाली हैं। इस्पेक्टर मोहल्ले मोहल्ले आतकवाद विरोधी समितियां बनाओ। लोगो को विश्वास दिलाओ कि जनता की मुसगठिन खुराना आखिरी चिट्ठी /१०५ शक्ति को यह मुट्ठी भर आतकवादी खडित नही कर सकते। खुराना . यह तो ठीक है, इंस्पेक्टर साहब ! लेकिन शीघ्र ही कुछ होना चाहिए। मुझे डर है, आतकवादी जल्द ही हम पर आक्रमण करेंगे। इंस्पेक्टर ठीक है, मैं दो सिपाही तुम्हारी सुरक्षा के लिए तैनात करता हूँ, तुम जाओ। और हां, आतकवादियो के किसी और ठिकाने का पता चले तो हमे सूचित करना। तुम्हारी निशानदेही पर पहली मुठभेड बहुत कामयाब रही, अब तुम जाओ। [रामलाल खुराना पुलिस स्टेशन से वापस अपने घर आता है । शाम के सात बज गए है। वाता- वरण मे हलका उजाला है। व्यापारी सरे-शाम से ही अपनी दुकानें बन्द करके घरो मे जा छुपे हैं । अचानक एक सफेद रंग की एम्बेसेडर कार रामलाल खुराना के दरवाजे पर आकर रुकती है, और उसमे से चार आतंकवादी उतरकर खुराना के घर की ओर बढते हैं] अजमेरासिंह अड्डेवाल (चीखकर) दरवाजा खोलो, वर्ना काठ के यह किवाड एक झटके मे तोड दिए जाएंगे। रामलाल खुराना : (भय से कांपते हुए) कौन? कौन हो तुम? क्या चाहते हो? अड्डेवाल : अच्छा, सुअर दे पुत्तर | पहचानता नही ! मौत तेरे द्वार पर दस्तक दे रही है । (स्टेनगन से हवा मे फायर करता है) अगली गोली तेरी छाती से पार हो जाने वाली है। दरवाजा खोल! खुराना सरदार, मैं निर्दोपहूं, मुझे क्यो मारने आए हो । मेरे छोटे-छोटे बच्चे हैं। अड्डेवाल : (अपने साथियो से) दरवाजा तोड दो। (तीनो आतंक- वादी दरवाजा तोडने का प्रयास करते है, तभी पीछे से एक गरजदार आवाज आती है।) आवाज जान की खैर चाहते हो तो वापस लौट जाओ। अड्डेवाल . (घूमकर पीछे की ओर देखता है) कौन?

१०६ / आखिरी चिट्ठी 1 आवाज (कडकदार आवाज मे) मुझे नहीं पहचानता' बलदेव- सिंह मान । (नाम सुनकर दरवाजा तोडते हुए आतक- वादी मान की ओर आकर्षित हो जाते हैं।) अड्डेवाल मान । तुम मेरे रास्ते मे मत आओ, वर्ना (स्टेनगन हवा मे लहराते हुए) एक गोली तुम्हे मौत की नींद सुलाने के लिए काफी है। बलदेवसिंह मान अड्डेवाल | गोली हाड-मास को तोडती है । लोहे को नही । और जिस छाती को तुम लक्ष्य बना रहे हो, वह हाड-मास की नही, फौलाद की है। अड्डेवाल लगता है, बुलटप्रूफ जैकेट पहने है, सुअर दा पुत्तर। (अपने साथियो की ओर सकेत करते हुए) बांध कर ले चलो इन सबको। [चारो आतकवादी बलदेव सिंह मान, सुभद्रा सेठी और प्रकाशवीर हाडा को जबरन पकडकर गाडी मे धकेल देते हैं। गाडी फर्राटे भरते हुए एक सुनसान रास्ते की ओर मुड जाती है ।] [दृश्य परिवर्तन, वही तहखाना । तीनो क्रान्ति- कारी आपस म वार्ता करते हुए] प्रकाशवीर मान! आतकवादियो की कैद मे यो वेबसी के साथ मरना ठीक नहीं है । हम एक साथ लडते-लडते मौत से गले मिलेंगे। सुभद्रा : लेकिन पहले यहां से निकलने की तरकीब सोचो। मान : बाहर आतक्वादियो का पहरा है। वह किसी भी पल हमे गोलियो से भून सकते हैं । प्रकाशवीर इस तहखाने म कोई चोर रास्ता जस्र होना चाहिए, जहां से हम निकल सकते हैं। तुम ठीक कहते हो। पुलिस से बच निकलने के लिए एक न एक रास्ता अवश्य रखा गया होगा इस सुरग में। सुभद्रा मैं जाकर देखती हूँ, तुम चौक्स रहना। बलदेवसिंह मान ठीक है, जाा। लेकिन जरा होशियार रह्ना । हम तुम्हारा इशारा पाते हो इस काल-कोठरी से भाग निक्लेंगे। मान [अचानक अजमेरा सिंह अड्डेवाल कोठरी प्रवेश करता है । कधि से स्टेनगन लटकी हुई है। अजमेरासिंह अड्डेवाल : कहो जो, क्रान्तिकारियो, तुसी-किस हाल में बलदेवसिंह मान : प्रतीक्षा कर रहे हैं कि तुम्हारी गोली कब हमारी छातियो के पार होती है। अड्डेवाल (स्टेनगन हवा मे लहराते हुए) यो नही मानोगे? बलदेवसिंह मान नही! लेकिन मरने से पहले दो बात तुमसे करना चाहता हूँ। अजमेरासिंह अड्डेवाल बोलो। वलदेवसिंह मान जो लक्ष्य तुम लेकर चले थे, वह पूरा होने वाला नहीं है । तुम भटक गए हो, भ्रमित हो गए हो। अड्डेवाल भ्रमित हम नहीं हुए हैं, बलदेवसिंह मान, तुम हुए हो, अब वह दिन बहुत करीब है, जब पजाब की धरती पर खालिस्तान का झण्डा लहरा रहा होगा, लेविन उसे देखने के लिए तुम जीवित नही रहोगे। बलदेवसिंह मान यह तुम्हारी भूल है, तुम नहीं जानते कि नफरत के जो वीज तुम बो रहे हो, उसकी फसल इस धरती पर पैदा नहीं होगी। अड्डेवाल नफरत की नहीं, धर्म की, यह फसल अवश्य पैदा होगी, लेकिन तुम अमियों के लिए, सिख कौम के लिए। वलदेवसिंह मान (व्यग्य से हंसते हुए) सिख कोम के लिए। कसी अजीव वात है, सिख कौम की बात वह कर रहा है, जो सिखो के इतिहास से वाकिफ नहीं है ? अड्डेवाल और कौन वाकिफ है, तुम? अकेले तुम? बलदेवसिंह मान हाँ मैं, केवल मैं, जो इतिहास की इस सच्चाई से परि- चित है कि घालसा पन्य की स्थापना गुरु गोविन्द सिंह ने इस उद्देश्य से की थी ताकि धर्म की रक्षा हो सके और तुम धर्म की मान्यताओ को ही नष्ट करने पर तुले हुए अड्डेवाल • तुम्हारा धर्म से कुछ लेनादेना नहीं, तुम नास्तिर हो, तुम एक ऐसी पान्ति चाहते हो जिसमें धर्म का कोई स्थान नहीं है। अलदेवसिंह मान : और तुम? एव ऐसा पालिस्तान, जो निरीह महिलाओ, १०८/आखिरी चिट्ठी मासूम बच्चो और निर्दोष व्यक्तियो की लाशो पर तामीर होगा, अगर हुआ तव? अड्डेवाल बकवास बन्द करो। बलदेवसिंह मान (प्यार से समझाते हुए) अड्डेवाल, तुम नहीं जानते, सौ वर्ष पहले जो विप अग्रेज ने घोला था, उसका कड आ प्याला तुम पी रहे हो, उसने हिन्दू और मुसलमान ही मे नही, सिख और हिन्दू के बीच भी खाई पैदा करने की कोशिश की और मुझे लगता है वह अपने उद्देश्य म कामयाब हो गया है। अड्डेवाल बहुत हो चुका, सारा दोष अग्रेज के सर पर डालकर तुम उन समस्याओ को हल नही कर सकते जो आज सिख कौम के सामने है। बलदेव सिंह मान कौन-सी समस्याएँ ? सिख कौम की कोई अलग समस्या नहीं है। वही साझो समस्याएं हैं, जो आज सारे देश की जनता के सामने हैं। अड्डेवाल मान । मुझे शर्म आती है, तुम सिखो मे पैदा क्यों बलदेवसिंह मान तुम्हे यह बताने के लिए कि आज से लगभग १०० वर्ष पहले, वह एक अग्रेज़ न्यायाधीश था पजाव का, मिस्टर मैकालिफ जिसने १८९० मे सबसे पहले यह नारा दिया कि सिख एक अलग धर्म है, एक अलग कौम है । अड्डेवाल उसने ठीक कहा था। बलदेवसिंह मान ठीक नही कहा था, एक साजिश की थी। उसने गुरुप्रन्य साहब का अंग्रेजी म अनुवाद किया और लिखा कि सिख हिन्दुओ से अलग एक कोम है। उसने अमरीका, आस्ट्रे- लिया और यूरोप म रह रहे सियो के दृष्टिकोण को बदलना चाहा, उसने एक ऐसे अलगाववाद की बुनियाद रखी, जिसकी विरासत तुम तक पहुंची है। अड्डेवाल मैं नही समझा, तुम क्या कहना चाहते हो? बलदेवसिंह मान मेरी बात साफ है। इस अलगाववाद वी बुनियाद एक विदेशी के हाथो रखी गई थी, और यही कारण है रि तुम्हारे आदोलन की जड़ें इस देश की धरती मे नहीं, साम्राज्यवादी देशो की धरती में है। अड्डेवाल चुप रहो, मास्को के कुत्ते १ तुम नही जानते आखिरी चिट्ठी / १०६ बलदेवसिंह मान... (साहस के साथ हंसते हुए) तुम खुलकर मुझे गालियाँ ६ दे सकते हो, क्योकि यही तुम्हारी सभ्यता है। लेकिन कस अचम्भे की बात है कि मैवालिफ ने यह तो लिखा कि सिख हिन्दू स अलग कौम है, और यह बात वह भूल गया कि महाराजा रणजीत सिंह ने जगन्नाथ पुरी को कोहनूर हीरा और काशी विश्वनाथ मदिर को कई मन सोना भेंट किया था, वह यह बात भूल गया कि सिखों ने हिन्दू धर्म की रक्षा की थी अड्डेवाल (क्रोध मे) अपना भाषण बन्द करो। कमीन के बच्चे। आज सिख कौम भारत मे गुलामो- जैसी जिन्दगी गुजार रही है। उसका अस्तित्व खतरे में है। बलदेवसिंह मान (ऊंचे स्वर मे) गुलामी की जिन्दगी सिख कोम नही, तुम और तुम्हारे साथ के आतकवादी गुजार रहे हैं, जो विक गए हैं उन विदेशी शक्तियो के हाथो, जो भारत को तोड देना चाहती हैं, खडित कर देना चाहती हैं। अड्डेवाल हम खालिस्तान लेकर रहेगे । आजाद होकर रहेगे, और इस रास्ते मे जो भी हमारे सामने आयेगा, उसका सफाया कर देंगे। मुगल हुकूमत हमारी शक्ति देख चुकी है, अब भारत सरकार भी देख ले। बलदेवसिंह मान अड्डेवाल | तुम बहुत मूर्ख हो, जिस खालिस्तान की बात तुम कर रहे हो, उसकी भौगोलिक, सामाजिक और राज- नीतिक स्थिति तक का तुम्हे ज्ञान नहीं तुम उसी डगर पर चल रहे हो, जिस पर चलकर आज पाकिस्तान विदेशी शक्तियो में हाथ की कठपुतली बना हुआ है। अड्डेवाल कठपुतली नही, वह आज एक आजाद और मजबूत देश हैं । एटमी शक्ति से लस। बलदेवसिंह मान कान खोलकर सुन लो अड्डेवाल। इस देश का अब और बंटवारा नहीं होगा। हरगिज नहीं होगा, इस देश को खालिस्तान की नहीं, एक बडी क्रान्ति की आव. श्यकता है। एक इन्वलाब आ चुका, एक इन्क्लाव और आएगा। अड्डेवाल इससे पहले कि यह इन्क्लाव आये, बताओ, तुम्हारी आखिरी इच्छा क्या है?

११०/ आखिरी चिट्ठी बलदेवसिंह मान आखिरी इच्छा ? क्या तुम मुझे मार डालना चाहते हो? अड्डेवाल तुम्हे ही नही (दोनो क्रान्तिकारियों की ओर इशारा करते हुए) इसे और इसे भी लेकिन मौत से पहले तुम्हे बताना होगा कि तुम्हारे लोग कितने हैं और कहां- कहाँ हैं? बलदेवसिंह मान तुम उनके बारे मे क्यो जानना चाहते हो, क्या वह इतनी आसानी से तुम्हारे हाथ आ जाएँगे? अड्डेवाल मान | हम जानते हैं कि हमारे रास्ते की सबसे बड़ी रुकावट तुम प्रान्तिकारी लोग हो, तुम रास्ते से हट जाओ तो हमे, हमारा उद्देश्य पाने से कोई ताकत नहीं रोक सकती। बलदेवसिंह मान लेकिन यह नामुमकिन है, यह बिलकुल नामुमकिन है। अड्डेवाल तब तुम अपने साथियो सहित मरने के लिए तैयार हो जाओ। सुभद्रा सेठी बलदेवसिंह मान कैद मे डाल कर मार देना कौन-सी बहादुरी है, सामने आकर मुकाबला करो। अड्डेवाल मुकाबला बहादुरो से होता है, मक्खी-मच्छरो से नहीं। उन्हे तो सिर्फ मसला जाता है, जैसे अब मैं तुम्हे मसल कर फेंक देने वाला हूँ। मान । तुम किन लोगो से बहादुरी को आशा करते हो, क्या उनसे जो मजबूर औरतो और निरीह बच्चो को मारकर उनकी लाशो पर कुत्तो की तरह पेशाब करते हो। अडेपाल ऐ, छोकरी, जवान बद कर, नही जानती किससे बात कर रही है। सुभद्रा सेठी (निर्भीक होकर) जानती हूँ, तुम वह हो, जिन्हें धर्म के झूठे नशे ने पागल कर दिया है। जो आज मां की चीत्कार और बहन की पुकार भी सुनने के योग्य नही रहे हैं। जो निर्दोष यात्रियो को जिबह करते हैं और खुश होते हैं कि हम बहादुर हैं। अड्डेवाल (चीखकर) चुप कर! वर्ना तेरा हाल भी वही होगा, जो अब तक तेरी जैसी अनेर छोरियो का हो चुका है। (धूमकर बलदेव सिंह मान को सम्बोधित करते हुए) मान, रात-भर का समय तुम्हारे पास है। अपने सभी आखिरी चिट्ठी / १११ साथियो की लिस्ट, उनके नाम और पते सहित लिखकर मुझे दो ताकि सुबह की पहली किरण के साथ तुम हमेशा के लिए मौत की नीद सो सको। [अजमेरासिंह अड्डेवाल कोठरी के बाहर चला जाता है] सुभद्रा सेठी (धीरे से) मान । मैंने वह चोर दरवाजा देख लिया है, जहाँ से हम बाहर निकल सकते हैं। बलदेवसिंह मान ठीक है, आधी रात गुजरने दो। सुभद्रा सेठी लेकिन वहां एक मोटा ताला पडा है। बलदेवसिंह मान चिन्ता न करो, देख लेंगे। [तीनो क्रान्तिकारी रात के अंधेरे मे तहखाने के चोर दरवाजे तक आते हैं । बलदेवसिंह मान पूरी ताकत लगाकर एक झटके के साथ ताला तोड देता है । चटाख की आवाज] बलदेवसिंह मान चलो भाग निकलो, और इससे पहले वि सूरज निकले, आतकवादियो पर धावा बोल दो। प्रकाशवीर वर्ना वह अपने हथियारी सहित यहां से फरार हो जाएंगे। सुभद्रा सेठी कहां चलें? बलदेवसिंह मान सीधे पुलिस स्टेशन प्रकाशवीर लेकिन पुलिस स्टेशन तक पहुंचने के लिए दो घण्टे से कम का समय नहीं लगेगा। सुभद्रा सेठो यहाँ से करीब का पुलिस स्टेशन कितनी दूर होगा? बलदेवसिंह मान कम से कम छ किलोमीटर, चलो तेजी से आगे बढ़ो। [तीनो सुनसान रास्ते पर तेजी से आगे बढ़ते हैं] बलदेवसिंह मान (थाने के द्वार पर पहरा देते हुए सिपाही से) इस्पेक्टर साहव कहाँ है? सिपाही अन्दर सोये हुए हैं । मलदेवसिंह मान तुरन्त जगाओ । आतरवादियो के एक बहुत बडे ठिवाने वा पता लग गया है। सिपाही कहाँ । ११२/ आखिरी चिट्ठी बलदेवसिंह मान यह मत पूछो, फोर्स लेकर साथ चलो। [पुलिस इस्पेक्टर अपने कमरे से बाहर माते हुए] इस्पेक्टर कौन ? बलदेवसिंह मान? इस वक्त तुम कहाँ ? तुम्हारे वारे मे रिपोर्ट हुई थी वि आतकवादी तुम्हें तुम्हारे दो साथियो सहित उठाकर ले गए। बलदेवसिंह मान हाँ, हम तीनो उनकी गिरफ्त से निकल भागे हैं। आप फोर्स लेकर जल्दी चलें, वर्ना सूरज निकलने के साथ ही वह अपने हथियारो का जखीरा लेकर वहाँ से चम्पत हो जाएंगे [पुलिस-फोर्स के साथ सब लोग आतकवादियो के ठिकाने की तरफ चलते हैं। जीप और मोटर साइकिलो की आवाजें] पुलिस इस्पेक्टर वहां कितने लोग छुपे हुए हैं। बलदेवसिंह मान छ से दस तक, लेकिन हथियारो का बहुत बड़ा जखीरा वहां है । मुठभेड काफी भयकर हो सकती है। पुलिस इस्पेक्टर : चलो देखते हैं। बलदेवसिंह मान : (सुभद्रा को सम्बोधित करते हुए) अगर मैं इस मुहिम मे काम आ जाऊँ सुभद्रा, तो यह एक चिट्ठी है, जो मैंने अपनी उस बेटी को लिखी है, जो सिर्फ माठ दिन पहले पैदा हुई थी, यह तुम उसकी मां को पहुंचा देना । सुभद्रा सेठी : कैसी बातें करते हो मान ! तुम इतनी आसानी से काम आने वाले नही हो । तुम्हें तो अगली क्रान्ति तक जीना : : [जी दौडती चली जाती हैं । आतकवादियो के ठिकाने पर पहुंचकर पुलिस चेतावनी देती है] पुलिस होशियार ! तुम चारो तरफ से घेर लिये गए हो, भागने या मुकाबला करने की कोशिश मत करना। हथियार हाल दो। अजमेरासिंह अड्डेवाल (अपने साथियो सहित तहखाने के बाहर झांकते हुए) मान, कुत्ते का पिल्ला, पुलिस ले आया है। वहादुरो, हमला करो।

आखिरी चिट्ठी / ११३
[पुलिस पोजीशन ले लेती है। दोनो ओर से
गोलियां चलने की आवाजें आती हैं, फिर कुछ
क्षण बाद सन्नाटा हो जाता है]
पुलिस इस्पेक्टर (सन्नाटे में भारी आवाज़ से) तीन आतकवादी मारे
गए, बाकी भाग निकले। लेकिन माह
इस मुहिम में
महान देशभक्त और क्रान्तिकारी बलदेवसिंह मान भी
काम आ गया।
[गैप पृष्ठभूमि मे मान के घर का दृश्य, आठ
दिन की बच्ची के रोने की आवाज । एक बूढा
व्यक्ति बलदेवसिंह मान की चिट्ठी पढते हुए]
बूढा (खत पढते हुए) मेरी प्यारी बेटी-मैं एक ऐसी जग
लड रहा हूँ, जो अगर मैं न जीत सका तो मेरे याद आने
वाली नस्ल जीतेगी। मुझे दुख है कि तुम एक ऐसे समय
मे पैदा हुई हो, जब तुम्हे देख पाने को फुसंत भी मेरे पास
नही है । मुझे यह भी दुख है कि तुमने एक ऐसे समाज
मे जन्म लिया है, जहां वेटियो का जन्म अशुभ समझा
जाता है। लेकिन मुझे विश्वास है कि तुम बडी होकर
इन सब रूढियो के खिलाफ लडोगी, बिलकुल अपने बाप
की तरह। मेरी बेटी, मैं तुम्हारे लिए कोई विरासत
नही छोडे जा रहा हूँ, केवल कुछ विचार हैं, चुछ आदर्श
हैं, कुछ स्वप्न हैं, अच्छे भविष्य के, मुझे यकीन है, तुम
इन्हे सभाल कर रखोगी। मेरी ख्वाहिश है कि, तुम
हिन्दू, सिख या मुसलमान न बनो, एक अच्छी इसान
धनो, और वह जग जारी रखो, जिसे लड़ते-लड़ते
तुम्हारा वाप शाहीद हो गया है।
[भआवाज खामोशी के सागर मे डूब जाती है

वापसी
मनोजकुमार सिंह
पात्र-परिचय
सरदारा सिंह
सतनाम सिंह
लाला करमचन्द
खानचाचा
खान चाची
अतुल घोष
डॉक्टर कुमार
थानेदार
हवलदार
सिपाही न०१
सिपाही न० २
[मंच पर सरदारा सिंह के घर का दृश्य है। नेपथ्य से
'सारे जहा से अच्छा हिन्दुस्तान हमारा...' गाने को
धुन बज रही है। सरदारा सिंह अपना एक पैर देश के
विभाजन के समय हुए दंगे मे गंवा चुका है। देश को
स्वतत्र हुए पूरे चालीस वर्ष होने जा रहे हैं । कल स्वतत्रता

वापसी/११५ दिवस है। आज सरदारा सिंह का बेटा सतनाम सात वर्ष बाद उच्च शिक्षा पूरी कर वापस स्वदेश आने वाला है। वह बहुत खुश है, वह वैसाखी के सहारे चलता हुआ, घर के सामानों को यथास्थान सजा रहा है। खान चाचा का प्रवेश खानचाचा - सलाम वालेकुम, कमाल हो गया, बुड्ढे को भी जवानी आ गई, लगता ही नहीं घर को इतना अच्छा तूने सजाया है, तू बडाबेईमान है सरदारा। सोचा था, आज अपना वेटा आ रहा है इसलिए इस घर को अपने इन हायो से जन्नत का माफिक सजाऊंगा, और यहा“खैर छोड, एक तू है, और एक जो उधर तेरी भाभी है, सबेरे से ही नाक मे दम कर रखा है, कहती है, जल्दी बाजार जाओ, ये लाओ, वो लाओ, तुमको मालूम नहीं, आज सरदारा सिंह का बेटा सतनाम आने वाला है। खुदा कसम तेरे को क्या बताऊँ, आज तो बावर्चीखाने से ऐसी खुशबू आ रही थी कि हटने की इच्छा ही नही होती थी। सरदारा सिंह खान, मैं भी कितना खुशनसीब हूँ। आज सतनाम आ रहा है, और कल स्वतत्रता दिवस है। कितना मजा आयेगा, कल जब मैं, तू और सतनाम तीनो एक साथ झडा फहराने जायेंगे, मेरी तो बस एक ही तमन्ना थी, कि सतनाम पढ़-लिखकर एक बहुत बड़ा आदमी बने और अपना सारा जीवन, इस देश को समर्पित कर दे। लाला करमचन्द जब सत्तनाम को देखेगा तो कितना खुश होगा। खान चाची : सलाम भाईसाहेब । खान चाचा लो आ गई आफत। चाची : हां हां मैं तो आफत हूँ ना, लेकिन कभी सोचा है, तुम क्या हो, मैं सोच रही थी कि तुम घी लेने गये हो और इधर मियों गप्पें लड़ा रहे हैं। जल्दी जाके बंगाली के यहां से चार किलो शुद्ध घी ले आओ। खान : अरे जाता हूँ बावा, इतनो खफा क्यों हो रही हो । देख लिया ना सरदारा, वस माई नही कि शुरू हो गई। (धान का प्रस्थान तथा सब एक साथ हंसने लगते हैं।) चाची : (पान की ओर इशारा करते हुए) अरे कम-से-कम आज के दिन तो आलसीपन छोड़ो। (सरदारा की ओर इशारा करते हुए) .

११६ / वापसी अतुल घोप भाई साहब, अव सतनाम को आने मे कुछ ही समय रह गया है, आप भी तैयार हो जाइए। कितने बरस हो गए सतनाम को देसे हुए । बहुत दिल मचल रहा है, उसे देखने के लिए। पूरे सात बरस हो गये उसको देखे हुए। (हंसते हुए) अब तो वह बहुत बदल गया होगा ना? उस समय तो उसकी दाढी मूंछे भी नहीं आई थी। सरदारा सिंह वहन वह कितना भी बदल जाये, मगर हम लोगो के लिए तो वह, वही छाटा-सा सतनाम है। उसका भी तो दिल कितना मचल रहा होगा, हम सबो से मिलने के लिए। हम सबा को एक साथ देखकर वह कितना खुश होगा? खान चाचा लो बेगम, आ गया तुम्हारा घी और घी वाला। बाबू मोशाय खुद लेकर आया है। नोमस्कार सोदार जी, नोमस्कार भाभी। आमी भी सोचा कि फोरन म तो सतनाम वेटा को शुद्ध घी मिलता नहीं होगा, सेई जोनने आमी ये चार किलो शुद्ध गाई का घी लाया। सोतनाम बेटा कहां है? सरदारा सिंह अर अतुल घोप, यहाँ तो सबकी आंखें उसी की राह देख रही हैं। अब तक तो क्मवस्त को आ जाना चाहिए था। (बाहर किसी वाहन के आने और रुकने की आवाज) लो, शायद सतनाम आ गया। (सब एक साथ दरवाजे की ओर बढ़ते हैं। दरवाजे से सतनाम का प्रवेश। उसके चेहरे पर एक अजीव माकोश या भाव है। वह एक्दम शान्त, सबकी आशा के विपरीत घर के अन्दर प्रवेश परता है। फिर भी यान पापा झट से उमरे हायो का सामान ले लेते हैं तथा गुशी से नाचने लगते हैं। सरदारा मिह सतनाम को गले से लगा सेता है। परन्तु सतनाम बिलकुल निष्ठुर यहा रहता है।) सरदारा सिंह अरे बेटे तूने, इनको नही पहचाना, अरे ये वही पान चाचा है, और इधर देवये यान पाची,और ये अतुस पोष जिसे तू बगाली पाचा पहा परता था। देय राव तुमको मिसने आये हैं। [गतनाम विना मोई उत्तर दिए मयकुछ अनगुना करे एप और बढ़ जाता है। गरदारा मिह मोवा-गा उगे देखते रह जाता है। पान : मरे सरदारा ऐमा योगो सा गाप रहा है? मर येदा सान वापमी / ११७ 7 खान विदेश से आया है, थक गया होगा, आराम करने दे । जा तू भी आराम कर । (चाची और घोप की ओर इशारा करते हुए) अरे तुम लोग क्या देख रहे हो, सतनाम कही भागा जा रहा है । अरे अब तो वह हमेशा के लिए हम लोगो के पास आ गया है । जाआ बाद म मिलना । जाकर अपना काम करो।हां और ये घी लेती जाओ। (चाची और अतुल घोप का प्रस्थान) सरदारा सिंह खान, ये सतनाम को क्या हो गया ? मुझे तो कुछ गडबड लगती है । आखिर ये सब क्या हो रहा है ? अरे तेरा दिमाग तो कुछ भी सोच लेता है। अरे ओ अपना सतनाम है, उसको क्या होगा । बस यूं हो, कुछ थक गया होगा। तू भी तो अजीब है, जा आराम कर। या मेरे साथ चल, देखें तो सही तेरी भाभी क्या क्या बना रही है। (सरदारा सिंह एव खान का प्रस्थान) (उन दोनो के जाते ही सतनाम का अदर वाले कमरे से प्रवेश होता है। उसके मनोमस्तिष्क म साम्प्रदायिकता की ज्वाला जलती रहती है। उसके हाथो में राइफल है। वह मन ही-मन कुछ सोचता रहता है। इतने म सरदारा सिंह का घर के अदर प्रवेश होता है। वह सतनाम के हाथो मे बन्दुक देखकर एकदम हैरान रह जाता है। उसे अपनी सारी कल्पनाएँ टूटती हुई महसूस होती हैं। सतनाम सरदारा सिंह को देखकर सकपका-सा जाता है।) सरदारा सिह यह क्या वेटे | मैंने तो तेरे हाथ म कलम देकर तुझे ऊँची तालीम लेने विदेश भेजा था। पर यह सब तेरे हाथो मे यह बन्दूक शोभा नहीं देती, यह देश हमारा है वेट, हम इस देश के नागरिख हैं, फिर अपने देश मे ही, हम किसका डर फेंक दे इसे। सतनाम पिताजी, यदि इसे फेंक दिया तोफिर देश की रक्षा कैस करूँगा? सरदारा सिंह वेद, देश की रक्षा के लिए हमारी सेना हर सीमा पर तैनात है। और फिर अभी तक कोई माई का लाल पैदा नहीं हुभा है, जो हमारी भारत मां की ओर बुरी नजर डाले। जिस दिन ऐसा होगा उस दिन सरदारा उसकी दोनो आँखें फोड देगा। (बीच मे बात काटते हुए) बस कीजिए पिताजी। इसी बात का तो अफसोस है कि जिस देश की बात मैं कह रहा हूँ, वह आपकी भारत मां नहीं बल्कि हमारा खालिस्तान है। यालिस्तान पिताजी । शायद आपको मालूम नहीं, आज स 40 वर्ष पूर्व जब अग्रेजी हुकूमत का अत हुआ तब मुसलमाना को पाकिस्तान सतनाम ११८/वापसी मिला,हिन्दुओ को हिन्दुस्तान मिला, पर आपने कभी यह सोचा है कि हम सिक्खो को क्या मिला? पिताजी, हमारा सिक्ख धर्म अभी तक गुलाम है। मैं इस गुलामी की जजीर को तोडकर अपने धर्म को आजाद कराऊंगा। मैं एक स्वतन देश खालिस्तान का गठन करूंगा। इसके लिए मुझे हजारो हिन्दुओ का खून भी क्यो न वहाना पडे । और उससे बढकर बात तो यह है पिताजी कि हमे यह सब करने के लिए विदेशो से भारी रकम मिली है। (सूटकेस खोलते हुए) यह देखिए पिताजी, आपने इतनी दौलत की कल्पना अपने जीवन में कभी नहीं की होगी। सरदारा सिंह वन्द कर अपना यह भाषण। कोई इस देश की एकता एव अखडता के विरुद्ध एक शब्द भी बोले, यह मैं कभी बर्दाश्त नहीं कर सकता। मुझ बुड्ढे को ही तू ज्ञान दे रहा है जिसने अपनी सारी जिन्दगी इस देश की सेवा में व्यतीत कर दी। तू देशद्रोही है। जब तू इस देश का नहीं हो सकता तो तेरे से कोई उम्मीद रखना वेकार है। निकल जा मेरे घर से। तुझ जैसे बागी के लिए मेरे पास कोई जगह नहीं है। दूर हो जा मेरी नज़रो से। सतनाम मैं जा रहा हूँ पिताजी, लेकिन फिर वापस आऊंगा, आप जरा ठडे दिमाग से मेरी बातो पर विचार कीजिएगा। जव आपको वास्तविकता मालूम होगी तब आप स्वय मेरे पास चलकर आओगे। मैं उस दिन का इतज़ार करूँगा । (सतनाम का प्रस्थान) [खाना चाचा दरवाजे पर खडे-खडे इनकी सारी बातें सुन लेते हैं। सतनाम जाते समय खान चाचा से टकरा जाता है। सरदारा सिंह खान को देखकर फफक-फफक- कर रोने लगता है। खान उसे सान्त्वना देता है। ओ सरदारा, ये क्या, तुम रोते हो मेरे दोस्त! अरे उसका क्या, जवानी का खून है, थोडा उयलवर शान्त हो जाएगा। वो क्या मेरा बेटा नहीं है तू क्या सोचता है, उसकी वातो से मुझे दुख नही हुआ? मत रो मेरे यार, मत रो, चुप हो जा। (खान की आँखो म आमू आ जाते हैं।) सरदारा सिंह (आंसू पोछते हुए) यान अव तक तूने जो भी देखा या सुना, भाभी को कुछ मत बताना। वास्तविक्ता तो ये है, मेरे यारा कि आज मुझे अपने आप पे गुस्सा आ रहा है। तू अक्सर पूछा परता है ना, ये साला करमचन्द कौन है ? जिमे तू अपनी जान खान वापसी/११६ खानचाचा से भी ज्यादा प्यार करता है। तो सुन, लाला करमचन्द ही सतनाम का असली बाप है, मैंने तो सिर्फ उसे पाला है। लाला ने मुझसे वचन लिया था कि मैं सतनाम को यह वास्तविकता कभी न बताऊँ । उसने कहा था कि समय आने पर वह स्वय उसे सब कुछ बता देगा। (आश्चर्य से) ये क्या कह रहा है। मेरे दोस्त, मुझे बिलकुल भी यकीन नहीं हो रहा है । जिस सतनाम को हम "नही सरदारा कह दे ये सब झूठ है। सरदारा सिंह यह सच है, खान । मैं किसी के बचन मे बंधा हुआ हूँ। अगर आज सतनाम मेरा अपना सगा बेटा होता तो मैं उसे इतना कुछ कहने के पहले ही उसका गला घोट देता। बात उस समय की है दोस्त, जब चन्द लोगो ने षड्यत्र करके भारत मां के टुकड़े कर दिये थे। हिन्दुस्तान और पाकिस्तान को एक-दूसरे से अलग कर दिया था। उस समय सारा देश साम्प्रदायिकता की आग में जल रहा था। उन दिनो लाला करमचन्द लाहौर मे रहा करता था। उसने एक अनाथ मुसलमान लडकी सलमा से शादी की थी। दगे के समय कुछ विद्रोहियो ने सलमा की जान सिर्फ इसलिए ले ली कि उसने एक हिन्दू लडके से शादी की थी, सलमा की मौत के समय सतनाम मात्र दो महीनो का था। उसके मरते ही लाला करमचन्द सतनाम को लेकर हिन्दुस्तान चला आया। परन्तु यहाँ पर भी उसे लोगो ने चैन से जीने न दिया। सिर्फ इसलिए कि उसने एक मुसल- मान लडकी से शादी की थी। तब लाला सतनाम को मेरे हवाले करके, बदले की आग मे कूद पडा और इस तरह वह भी बागी बन गया । मैं अपना एक पैर दगे मे खो बैठा था। बाद में वह पुलिस के हाथो पकडा गया। वह नही चाहता था कि इसके बीते हुए दिन उसके बेटे के भविष्य मे आडे आयें। इसी कारण उसने यह राज छुपाए रखने को कहा था। (लाला करमचन्द का आगमन) उसके सर पर चोट के निशान हैं। उसकी बाई भुजा से खून बह रहा है, खान और सरदारा लाला की ऐसी हालत देखकर एकदम से घबरा जाते हैं। दोनो एक- साथ आगे बढकर उसे थाम लेते हैं।) लाला मेरे भाई, तेरी यह हालत किसने बनाई, मैं उसका खून पी जाऊँगा । तूने आने मे बहुत देर कर दी।

१२०/वापसी खान (बीच मे ही) सरदारा, यह फालतू बात करने का समय नही है। तू लाला का ख्याल रख, मैं अभी डॉक्टर को लेकर आता लाला करमचन्द मुझे कुछ नहीं हुआ सरदारा सिंह, आज मैं बहुत खुश हूँ। आज सतनाम से सब कुछ बता दूंगा कि मैं ही तेरा अभागा बाप हूँ। कहाँ है, मेरा बेटा सरदारा? मैं तुम्हारा एहसान जिन्दगी-भर नही भुला पाऊंगा। सरदारा सिंह सतनाम बिलकुल ठीक है, पर तुझे यह क्या हुआ, कुछ तो योल। कुछ नही सरदारा। आज इतिहास पुन दोहरा रहा है, आज फिर से भाई-भाई को नही पहचान रहा है। पुन एक बार भारत माँ के टुकडे करने की साजिश चल रही है । सिख और हिन्दू दोनो ही एक-दूसरे के खून के प्यासे हो गए हैं। लेकिन बेटे के आने की खबर सुनकर मैं अपने आपको रोक न सका और हिंसा की ज्वाला को लांघता हुआ अपने बेटे से मिलने चला आया । वस रास्ते मे एक बागी मिल गया' (लाला दर्द से कराह उठता है) सरदारा सिंह लाला तेरी हालत बहुत गभीर है, सतनाम तो नहीं है, पर यह देख उसकी तस्वीर । तू आराम कर, मैं अभी सतनाम को लेकर आता हूँ। (सरदारा का प्रस्थान । लाला करमचन्द सतनाम की तस्वीर को अपन गले से लगा लेता है, इतने में सतनाम का गुस्से से हाथ मे रायफल लिये हुए प्रवेश) अच्छा तो वुड्ढे, तू मेरे ही घर म छुपा बैठा है। लाला (आश्चर्य से) वेट सतनाम तुम । सतनाम तो तू मेरा नाम भी जानता है, खवरदार जो अपनी गदी जुबान से मेरा नाम भी लिया। तरे अदर स हिंदुत्व की बू आ रही है । तुझे जीन का कोई हक नहीं। (लाला करमचन्द सतनाम की तस्वीर को गले से लगाने के लिए उस पर स्नेह-भरी दृष्टि डालता है, और जैस ही सतनाम की ओर बढता है, सतनाम उस गोली मार दता है। इसी बीच सरदारा, खान और डॉक्टर का आगमन होता है।) सरदारा सिंह ये तूने क्या कर दिया मूर्ख । (वैसाखी से मारते हुए) जानता है तून क्या कर दिया? अपन हाथा अपन बाप को गोली मार दिया। मैं तेरा वाप नही हूँ। मैंन तो सिर्फ तुझे पाला है। तूने सतनाम वापसो/ १२१ साला जिसना खून अभी बहाया, वही खून तेरी रगो मे बह रहा है।तू मेरा कोई नहीं है । तून मेरे दोस्त को मार डाला। (बीच में ही अपनी लडखडाती जवान से बोलता है।) वस कर सरदारा, मैंने तुझे अपना बेटा पालने के लिए दिया था, न कि मारने के लिए। खवरदार जो इस पे हाथ उठाया । (लाला दर्द से कराह उठता है । सरदारा सिंह दोडकर उसके गले से लिपट जाता है । खान चाचा जोश मे आ जाते हैं । सतनाम पत्थर की मूर्ति के समान जड हो जाता है ।) खान चाचा बहुत अच्छा किया, वहुत अच्छा · अभी भी कुछ क्सर बाकी है तो मार डाल हम सभी को । वुझा ले अपने मन की आग लेकिन मेरे एक सवाल पर जवाब दादू किस धर्म के लिए लड रहा है ? जानता है, तुझे मुसलमान माँ ने जन्म दिया, तेरी रगो में इस हिन्दू बाप का खून दौड रहा है । तुझे इस दुनिया में रहने लायक इम सिख बाप ने बनाया ! अब बता तेरी जात कौन-सी है ? तेरा धर्म क्या है ? तू किस धर्म की रक्षा के लिए लड रहा सतनाम (सतनाम के धीरज का बांध टूट जाता है। वह फफ्ककर रो पडता है । वह अपनी वदूक खान चाचा को देते हुए कहता है) खान चाचा, मैं एक देशद्रोही, हत्यारा और पापी हूँ। मुझे भगवान भी माफ नहीं करेंगे। मुझे जीने का कोई हक नहीं है। मुझे गोली मार दो खान चाचा, मैं जीना नही चाहता। मेरा प्रायश्चित इसी मे है । (खान चाचा उस गले से लगाकर कहते खान चाचा बस कर बेटे, बस अभी भी मौका है, सुबह का भूला हुआ यदि शाम को घर वापस लौट आया तो उसे भूला नहीं कहते । तेरी फिर से हम लोगा के बीच वही बचपन के सतनाम के रूप में वापसी हुई है। जा अपन पिता की अतिम इच्छा की पूर्ति कर । (सतनाम जमीन पे पडे लाला के पास जाकर उसके हाथो को पकडकर रोने लगता है, इसी वीच लाला दम तोड देता है। अतुल पोप पुलिस को लेकर आ जाता है। नेपथ्य से मार्मिक धुन बजती रहती है और सरदारा सिंह सारा इल्जाम अपने ऊपर ले लेता है। यहाँ पर भी यह लाला को दिया हुआ वचन निभाता है । पुलिस सरदारा सिंह को हथकडी पह्नाती है।)

१२२/ यापसी
सरदारा सिंह
(सपी आर इशारा करते हुए) दोस्तो, मैं आप लोगो का
एहसान कभी नही भूल सपता। अब मैं अपी बेटे को आप लोगो
मे सहारे शाहपर जा रहा हूँ। हो सये, सो मुझे माफकर देना।
(सतनाम पी आर इशारा करते हुए) बेट सतनाम, मुझसे यादा
पर इस देश पी अग्रहता एव एक्ता पी रक्षा करने के लिए,
यदि तुझ अपनी जान भी देनी पड़े तो तू पीछे नहीं हटेगा।
(सतनाम सरदारा से गले सगर रोने लगता है, पुलिस
सरदारा सिंह को ले जाती है। सतनाम एक्टव सरदारा सिंह
का दूर तर जात हुए देयता रहता है। नेपथ्य म धुन बजती
रहती है। पर चले हम पिदा जानो तन साथियो, अब तुम्हारे
हवारे वतन साथियो )
[पर्दा गिरता है

सीमा-रेखा
विष्णु प्रभाकर
पात्र-परिचय
लक्ष्मीचद्र
शरतचन्द्र
विजयनद्र
सुभाषचद्र
तारा
अन्नपूर्णा
उमा
सविता
[उपमनी शरतचद्र का ड्राइग-रूम । आधुनिक पर सादगी
की छाप । दीवार पर गाधीजी का तैलचित्र है । नेतामो
के दो-चार चित्र तिपाइयों पर भी हैं । पुस्तकें काफी हैं,
बीचोबीच एक सोफासट है। उत्तर की ओर सामने दो
द्वार हैं जो बाहर बरामदे मे खुलते हैं । उसके पार सडक
है। पूर्व और पश्चिम के द्वार पर के अदर जाते हैं। सोफे
और भेजो के आसपास कुतियां हैं । परदा उठने पर मच
खाली है। दो क्षण बाद शरतचंद्र तेजी से आते हैं, बेहद
परेशान हैं । कई क्षण वेचैनी से घूमते हैं, फिर टेलीफोन
उठा लेते हैं, नबर मिलाते हैं ।

१२४ / सीमा-रेखा शरतचद्र हैलो, मैं शरद बोल रहा हूं विजय का कुछ पता लगा? क्या? क्या अभी तक नही लौटे ? झगडा वढ गया है ? गोली गोली चलानी पडी, भीड फैक्टरी के पास बेकाबू हो गई थी फैक्टरी को लूटा? नहीं, वही और लूटमार हुई? नही कोई घायल हुआ? अभी कुछ पता नहीं। अभी पता करके बताओ, विजय आये तो मुझे टेलीफोन परन को कहो तुरन्त समझे मैं घर पर ही हूँ (दूसरा नम्बर मिलाना चाहते हैं कि उनकी पत्नी अनपूर्णा घवराई हुई बाहर से आती है।) अन्नपूर्णा आपने कुछ सुना? शरतचद्र हाँ, सुना है कि गोली चल गई। अन्नपूर्णा अपने राज म भी गोली चलती है ? शरतचद्र अपना राज समझता कौन है ? और जय तक लोग अपना राज नही समझेंगे तब तक गोली चलेगी ही। लेकिन तुम कहां गई थी? अन्नपूर्णा जीजी के पास। रास्ते में सुना कि रामगज मे गोली चल गई। बाजार बन्द हो रहे हैं । भय छाया हुआ है। लोग सरकार को गालियां दे रहे हैं। शरतचद्र (चोगा रखकर आगे आ जाते हैं।) सरकार को गाली ही दी जाती है । गोली चली तो गाली देते हैं, फैक्टरी लुट जाती तब भी गाली ही दते। अन्नपूर्णा (एक्दम) फैक्टरी । कौन सी फैक्टरी लुट रही थी ? फैक्टरी मे कोई झगडा नहीं हुआ। पल आपके पीछे कुछ विद्यार्थी सिनेमावालो से झगड पडे थे और आप जानते हैं कि विद्यार्थी शरतचंद्र (एकदम) कि विद्यार्थी कानून की चिंता नहीं करते, बच्चे हैं, अल्हड हैं । (तेज होकर) यह भी कोई बात है । लोग पागल हो जाते है। कानून अपन हाथ मे ले लेते हैं । गोली चली है तो जरूर काई कारण रहा होगा। कुछ लोगो ने फैक्टरी पर धावा बोला होगा। पुलिस पर पत्थर पके हागे। [जन-नेता सुभाषचंद्र की पत्नी सविता का प्रवेश।] सविता फेके होंगे तो इसका यह अर्थ नहीं कि पत्थर के जवाव मे गोली चला दी जाय। गोली उन्ह आत्मरक्षा के लिए नहीं दी जाती, जनता की रक्षा के लिए दी जाती है।

सीमा-रेखा/१२५ शरतच द्र तुम क्या कह रही हो? [बडे भाई लक्ष्मीचद्र का प्रवेश।] सविता मैं ठीक कह रही हूं। लक्ष्मीचद्र तुम विलकुल गलत कह रही हो। पुलिस गोली न चलाती तो फैक्टरी नुट जाती बाजार लुट जाता, चारो ओर लूटमार मच जाती, शासन की जडें हिल जाती। सविता शासन की ज. हिलती या न हिलती, दादाजी । पर आपकी जडें जरूर हिल जाती। आपका व्यापार ठप्प हो जाता। आपका नुकसान होता लक्ष्मीचद्र हाँ मेरा नुकसान होता । मैं सरकार की प्रजा हूँ। प्रजा को रक्षा करना सरकार का फर्ज है। सविता यानी सरकार की पुलिस आपकी रक्षा करने के लिए है ? लक्ष्मीचद्र हाँ, मेरी रक्षा करने के लिए। सविता केवल आपकी? अन्नपूर्णा न न सविता इनका मतलब केवल अपने से नहीं है। भीड इनका ही नुकसान करके न रह जाती। वह सारे शहर को बर्बाद कर देती। सविता भीड मे इतनी शक्ति है जीजी । शरतचद्र भीड मे कितनी शक्ति है, सवाल यह नहीं है। सविता तो क्या है? सवाल यह है कि क्या भीड को कानून अपने हाथ में लेने का अधिकार है ? मैं समझता हूँ उसे यह अधिकार नही है। सविता और यदि वह लेती है तो? तो वह विद्रोह है और विद्रोह को दबाने का सरकार को पूरा अधिकार है। सविता लेकिन विद्रोह क्यो किया गया है यह देखना क्या सरकार का अधिकार नहीं है? [टलीफोन की घटी बजती है। शरतचद्र एक्दम उठते हैं। सब उनक पास आते हैं।] शरतचंद्र हैलो हां मैं ही हूं क्या स्थिति अभी काबू मे नही है ? लूट मार तो नहीं हुई न ? अच्छा घायल कितने हुए पांच वही मर गए। वीस पायल अस्पताल म हैं मैं अभी आता शरतचन्द्र शरतचद्र १२६ /सीमा-रेया ।(टलीफोन पा चागा रघपर तेजी से पाने मो मुडता अनपूर्णा (एक्दम) नही, नही, आप ऐगे नही जा सकते। लक्ष्मीचद्र हां, पहले फोन पर पुलिस बुला लो। सयिता पुलिस क्या परेगी ? चलिए, मैं चलती हूँ। शरतचद्र आप चिंता न करें। पुलिस मी गाडी बाहर खड़ी है। सविता (व्यग्य से) जरूर होगी। जनता के नेता अब पुलिस की गाडी म ही जा सपत हैं। (आवेश म) जिन्होंने जनता का नतृत्व विया, जनता के आग होकर गोलियां खायो, जो एक दिन जनता मी आयो के तारे थे, वे ही आज पुलिस पे पहरे में जनता से मिलन जाते हैं। [शरतचद्र तिलमिलावर बुछ कहना चाहते हैं कि तभी पप्तान-पुलिस विजयवद्र का पूरी वर्दी मे तेजी से प्रवेश।] लक्ष्मीचद्र (एकदम) विजय । सविता कप्तान साहब, आप यहाँ? अन्नपूर्णा विजय, अब क्या हाल है ? शरतचंद्र विजय, तुमन यह क्या कर डाला' तुमने गोली क्यो चलाई ? तुम्ह सोचना चाहिए था कि लक्ष्मीचद्र विजय ने जो कुछ किया है, सोच समझकर ही किया है और ठीक किया है। अन्नपूर्णा हां, बिना सोचे समझे कोई काम कैसे किया जा सकता है। सोचा तो होगा ही पर शरतचंद्र नहीं, नहीं, यह बहुत बुरा हुआ। जानते नही अब जनता का राज्य है और जनता के राज्य मे, जनतत्र मे, जनता की प्रतिष्ठा होती है। विजयचद्र : लेकिन गुडो को नही । सविता वे गुडे हैं ? लक्ष्मीचद्र हां, वे गुडे हैं । दगा करने वाले गुडे होते हैं, शोहदे होते हैं। शरतचद्र नही, भया । वे सब गुडे नहीं होते हैं । हां, गुडो के बहकाए मे जरूर आ जाते हैं। यह भी खूब रही। जनता कुछ गुडो के बहकाए मे या जाए और आप लोगो की, जो कल तक उनके सब कुछ थे, कोई बात सविता न सुने।

सीमा-रेखा/१२७ शरतचंद्र (तिलमिलाकर) सविता ! सविता सुनिए भाई साहब, बात यह है कि आप अपना सतुलन खो बैठे हैं। आप निरंकुश होते जा रहे हैं । आप अपने को केवल शासक मानने लगे हैं। आप भूल गए हैं कि जनतन्त्र में शासक कोई नहीं होता, सब सेवक होते है । विजयचंद्र (एके-से) सेवक होते हैं तो क्या मर जाने के लिए हैं ? सविता हाँ, मर जाने के लिए ही हैं । कोई मरकर देखे तो... लक्ष्मीचंद्र बहू, तुम बहुत आगे बढ रही हो। स्वतन्त्रता का युग है तो इसका यह मतलब नहीं कि बडे-छोटे का विचार न किया जाए। अन्नपूर्णा हाँ, सविता, तुम्हे इतना तेज नहीं होना चाहिए। सविता मैं क्षमा चाहती हूँ। आप सब मुझसे बडे हैं। आपका अपमान मैं कभी नही कर सकती। ऐसा सोच भी नहीं सकती, पर इस नाते-रिश्ते से ऊपर भी तो हम कुछ हैं । हम स्वतन्त्र भारत की प्रजा हैं, हम एक स्वतन्त्र देश के नागरिक हैं, हम इन्सान हैं। विजयचंद्र इन्सान हैं तो सभी हैं, स्वतन्त्र देश के नागरिक हैं तो सभी हैं । कानून सब पर लागू होता है। लक्ष्मीचंद्र वेशक सब पर होता है । सब समान हैं । सविता बेशक सब समान हैं, दादाजी, पर जिन पर व्यवस्था और न्याय की जिम्मेदारी है उनका दायित्व अधिक है। शरतचंद्र जरूर है, इसीलिए मुझे जाना है । लेविन जाने से पहले मैं जानना चाहूँगा, विजय, कि आखिर बात करो बढ गई? पिजयचंद्र मैं तो वहां या नहीं। कल के झगड़े के बारे मे आप जानते ही हैं। आज फिर विद्यार्थियों ने प्रदर्शन किए। सिनेमाघर पर हमला किया। वहां से वे फैक्टरी के पास आए। शरतचंद्र : क्या उन्होंने फैक्टरी पर हमला किया? विजयचंद्र : फर सरते थे। शायद वे यही चाहते थे। शरतचंद्र : यौन? विद्यार्थी ? विजपचंद्र : यह तो नहीं कह सकता। भीड में वेवल विद्यार्थी ही नहीं थे। शरारती लोग ऐसे अवसरो की ताक में रहते हैं। पुलिस ने भीड को रोका तो उन्होंने पत्थर थे। अन्नपूर्ण : पुलिस पर पत्थर परे? लक्ष्मीचंद्र : तर तो जरूर उनका इरादा फैटरी लूटने का था। शरतचंद्र : क्या पुलिसवालोको चोटें मापी ?

१२८/सीमा-रेखा सुभाप। विजयचद्र जी हां दस-बारह सिपाही घायल हो गए। एक इस्पेक्टर का मिर फूट गया। सविता वस? लक्ष्मीचद्र तुम चाहती थी कि वे सब मर जाते। [सुभाषचद्र का प्रवेश।] सुभाषचद्र हो, वे सब मर जाते तो ठीक होता। शरतचद्र अन्नपूर्णा सुभाप, यह तुम क्या कह रहे हो? लक्ष्मीचद्र तुम तो कम्युनिस्ट हो गए हो और अपनी बहू को भी तुमने ऐसा ही बना दिया है। [वाहर शोर उठता है।]] सुभाषचन्द्र दादा जी, मैं न कभी कम्युनिस्ट था, न हूँ और न कभी बनूंगा। पर मैं स्वतन्त्र भारत मे गोली चलाना जुर्म मानता हूँ। लक्ष्मीचद्र चाहे जनता कुछ भी करे, उसे सव अधिकार हैं। सुभाषचन्द्र वेशक हैं । उसी ने इन लोगो के (शरत की ओर इशारा करता है।) हाथ मे शासन की बागडोर सौपी है। शरतचन्द्र किसलिए सौपी है ? रक्षा के लिए या बरबादी के लिए? [वाहर शोर तेज होता है । सविता चौकती है और बाहर चली जाती है। सुभाषचन्द्र रक्षा के लिए। शरतचंद्र लेकिन जब जनता स्वय नाश करने पर तुल जाए तो क्या हमे उसे ऐसा करने देना चाहिए? सुभाषचंद्र नहीं। विजयचद्र यही तो हमने किया है। लक्ष्मीचद्र ठीक किया है। शरतचन्द्र ऐसा करने का उन्हे अधिकार है। वे हैं ही इसीलिए। तुम भी इस मानते हो तो फिर कहना क्या चाहते हो? सुभाषचंद्र . यही कि हमे राज्य की रक्षा करते-करते प्राण दे देने चाहिए, प्राण लेन नही चाहिए। हम देने का ही अधिकार है, लेने का नहीं। शरतचद्र सुभाप, यह कोरा आदर्शवाद है।

सीमा-रेखा/१२६ 1 . सुभाषचंद्र . कर्तव्य का पालन करते हुए मरना यदि आदर्शवाद है तो मैं कहूँगा कि विश्व के प्रत्येक नागरिक को ऐसा ही आदर्शवादी होना चाहिए। शरतचन्द्र सुभाष, तुम बोलना ही जानते हो। सुभाषचंद्र आपसे ही सीखा है, भाई साहब विजयचद्र लेकिन जिम्मेदारी संभालना नही सीखा। सुभाषचद्र वह भी सीखा है। मैं जनता से प्रतिज्ञा करके आया हूँ कि आज शाम तक गोली चलाने वाले कप्तान पुलिस को मुअत्तल कराके छोड़ गा। अन्नपूर्णा क्या? क्या कहा तुमने ? लक्ष्मीचन्द्र अपने ही घर मे तुम अपनो के दुश्मन बनकर आए हो। सुभाषचंद्र अपना पराया मैं कुछ नही जानता । मैं जनता का प्रतिनिधि हूँ। मैं माननीय उपमन्त्री श्री शरतचद्र को बताने आया हूँ कि उनके एक अधिकारी ने निहत्थी जनता पर गोली चलाकर जो बर्बर काम किया है उसकी न्यायिक जांच करवानी होगी और जब तक जांच पूरी नहीं होती तब तक गोली चलाने स सवधित सब व्यक्तियों को मुअत्तल करना होगा। यह किसकी मांग है? सुभाषचद्र उस जनता की जिसने आपको गद्दी सौपी है, जिससे आज आप दूर भागते हैं डरते हैं। शरतचन्द्र मैं डरता हूँ? सुभाषचंद्र हां, आप डरते हैं । यदि न डरते तो घर मे छिपकर बैठे रहने के स्थान पर जनता के पास जाते। तब यह नौबत न आती, गोली न चलती, निर्दोप निहत्थे नागरिक न मरते। लेकिन तुम भी तो जनता के नेता हो, तुमने कौन-सा तीर मार लिया? सुभाषचन्द्र मैंने क्या किया है, यह मेरे मुंह से सुनकर क्या करेंगे, पर इतना कहे देता हू कि जनता सयत रहती तो कप्तान विजयचद्र यहाँ बैठे न दिखाई देते । इनसे पूछिए तो कि इन्हे बन्दूकें इसीलिए दी गई हैं कि जरा-सा पत्थर आ लगे तो जनता को गोली से शरतचद्र शरतचन्द्र भून दें। लक्ष्मीचद्र गोली न चलती तो सुभाषचद्र (एकदम) दादाजी, आप न बोलें। आप व्यापारी हैं । आपका सिद्धान्त आपका स्वार्थ है।

१३०/सीमा-रेया लक्ष्मीचंद्र : (आवेश में) में तो स्वार्थी हूँ, पर तुम अपनी तो बहो। तुम्हारी नेतागिरी भी तो मुझ स्वार्थी के पैसे से ही चलती है । सुभाषचंद्र : ठीक है, उतना पैसा सार्थक होता है पर याप यह क्या भूल गए कि उस दिन जब कुछ व्यापारी पकड़े गए थे तब आपने विजय भैया को कितना कोसा था? सक्ष्मीचंद्र : आज तुम कोस रहे हो, क्योंकि तुम मन्त्री नही हो, विरोधी दल के .. हो। सुभाषचंद्र : हा, मैं विरोधी दल का हूँ लेकिन दादाजी, मैं आपसे वातें नहीं कर लक्ष्मीचंद्र : (ोध मे) तो मैं ही कब तुमसे बातें कर रहा हूँ ! वाह ! (तेजी से अन्दर जाते हैं।) अन्नपूर्णा : दादाजी, दादाजी (पीछे-पीछे जाती है।) [विजयचंद्र भी जाते हैं। सुभाषचंद्र : मैं माननीय उपमन्त्री महोदय से पूछता हूँ कि शरतचंद्र । (एकदम) और मैं तुमसे पूछता हूं कि क्या जनता के राज्य मे भी सड़को पर प्रदर्शन होने चाहिए? भीड को कानून हाथ मे लेना चाहिए? सुभाषचंद्र · जब तक सरकार और उसके अधिकारी ठीक आचरण नही करेंगे तब तक जनता प्रदर्शन करती ही रहेगी, कानून हाथ मे लेती ही रहेगी। भाई साहब, इस नौकरशाही ने, शासन की इस भूख ने आपको जनता से दूर कर दिया है। शरतचंद्र सुभाप, तुम बार-बार एक बात की रट लगाए जा रहे हो। सुभाषचंद्र में ठीक कह रहा हूँ। जनता सरकार के ढांचे को उतना महत्त्व नही देती जितना अधिकारियो की ईमानदारी और हमदर्दी को। आप चलिए मेरे साथ। [सहसा शोर बढता है।] शरतचंद्र : हां, मैं चलूंगा। मुझे तो कभी का चले जाना था, पर यह शोर कैसा है ? सुभाषचंद्र : अवश्य कोई बात है । देखू"(जाने को मुडता है कि लक्ष्मीचद्र की पली तारा विक्षिप्त-सी वहां आती है।) तारा : (पागल-सी) विजय कहाँ है ? (चारो तरफ देखती है।) सुभाषचंद्र : भाभीजी, क्या है ? .

सीमा रेखा/१३१ तारा मैं पूछती हूं विजय कहाँ है ? उसका मनचाहा हो गया। उसकी गोली अरविन्द के सीने से पार हो गई शरतचद्र (एकदम) भाभी। सुभाषचन्द्र भाभी, तुम क्या कह रही हो? [सविता का प्रवेश । सविता भाभी ठीक कह रही हैं। अरविन्द जनता को सरकार की गोली का शिकार हो गया। [लक्ष्मीचद्र, विजयचद्र और अन्नपूर्णा का प्रवेश।] लक्ष्मीचद्र कौन गोली का शिकार हो गया। सविता अरविन्द। लक्ष्मीचद्र (कांपकर) क्या क्या अरविन्द मर गया? तारा हाँ, गोली उसके सोने से पार हो गई। वह मर गया। [सब हक्के बक्के रह जाते हैं । पागल से देखते हैं। लक्ष्मीचद्र सोफे पर गिर पडते हैं। विजयचढ़ दोनो हाथो से मुंह ढंक लेते हैं। अन्नपूर्णा पागल सी तारा को सँभालती है। अनपूर्णा अरे, मेरे अरविन्द को किसने मार डाला? नाश जाए इस पुलिस का । विना गोली कोई बात ही नहीं करता। अरे, विजय, तुमने यह क्या किया? विजयचन्द्र (पागल सा) ओह यह क्या हुआ? अरविन्द वहां क्यो गया था? [टेलीफोन की घण्टी बजती है । सविता उठाती है। सविता हैलो । जी हाँ, हैं । (विजा से) कप्तान साहब, आपका फोन है। विजयचद्र (फोन लेकर) जी हाँ, क्या भीड बेकाबू हो गई है। मैं अभी आया। [चोगा पटक्कर तेजी से किसी की ओर देखे बिना भागता - सुभाषचद्र में भी जाता हूँ। कही कुछ हो न जाए (जाता है।) शरतच मैं भी चलता हूँ। (मुडता है, पर तारा के बोलने पर ठिठक जाता तारा सब जाओ, पर अरविन्द क्या आएगा? उसने किसी का क्या बिगाडा था। वह चिल्लाया मैं दगा नहीं करता में बाजार जाता हूँ पर १३२/ सीमा-रेया लक्ष्मीचद्र [अन्नपूर्णा उसे अन्दर ले जाती है। पर मदाध पुलिसवालों ने एक न सुनी, गोली मार दी। पुलिस को अपनी जान इतनी प्यारी है कि एक दस वर्ष के बच्चे से भी उसे डर लगा। 7 शरतचन्द्र सविता (जाते जाते) किसी ने उसकी आवाज नहीं सुनी। किसी ने उसकी ओर नही देखा। लक्ष्मीचद्र सब अन्धे हैं, ताकत के अन्धे । जो सामने आता है उसे कुचल देना चाहते हैं । चाहे वह धूल हो, चाहे पत्थर । शरतचन्द्र (जाता हुआ, व्यथा से) ओह, यह क्या हो रहा है ? यह क्या हुआ लक्ष्मीचद्र वही हुआ जो विजय चाहता था । जो तुम चाहते थे। शरतचद्र (एकदम) दादाजी। लक्ष्मीचद्र तुमने मेरा घर बर्बाद कर दिया। मेरे बच्चे को मार डाला। तुम सव हत्यारे हो। शरतचद्र दादाजी । ओह, मैं क्या कहूँ। लक्ष्मीचद्र जव पैसे की जरूरत होती है तो मेरे पास आते हो। टैक्स मांगते हो, दान मांगते हो, व्यापार म पैसा लगान को कहते हो और और मुझो पर गोली चलाते हो। दादाजी, गोली उन्होने जान-बूझकर नही चलाई। अरविन्द ता बच्चा था। उससे किसी का क्या वैर था। लक्ष्मीचद्र वैर क्यो नही था? वह जनता मे था । और तुम हो जनतावे शत्रु। मैं अभी जाकर विजय स पूछता हूँ (जान को उठता है ।) [सविता आती है। सविता अभी रुकिए, दादाजी | भाभीजी को दौरा पड़ गया है। (टेलीफोन की घण्टी बजती है उठाकर) हैलो, जी हां, हैं । (शरत से) आपका फोन है। शरतचद्र (फोन लेकर) हैलो, जी हां । क्या मन्त्रिमण्डल की बैठक हो रही है । मुझे भी बुलाया है। मैं अभी आया। (फोन रखकर जाने को मुडता है, तभी सुभाष का तेजी से प्रवेश) सुभाषचद्र भाई साहब, आपको अभी चलना है। शरतचन्द्र मैं चल ही रहा हूँ। मत्रिमडल की बैटल हो रही है। मुभाषचंद्र : वहां नहीं, आपको मेरे साथ चलना है। आपको जनता के पास चलना है। जनता में वही उत्तेजना है। विद्यार्थी पीछे रह गए हैं, सौमा-रेखा/१३३ दूसरे समाजद्रोही तत्त्व आ गये हैं। विजय ने गोली चलाने से इनकार कर दिया है। शरतचन्द्र (पागल-सा) विजय ने गोली चलाने से इनकार कर दिया । सुभाषचंद्र जी, हाँ। भारतचन्द्र वह कहाँ है? सुभाषचन्द्र भीड के सामने । शरतचन्द्र वह भीड के सामने है ? (एकदम दृढ होकर) चलो सुभाष, मैं देखता हूँ जनता क्या चाहती है। [दोनो जाते हैं ।] सविता मैं भी चलती हूँ। लक्ष्मीचद्र : मैं भी चलता हूँ। सविता : नहीं, नही, आप ठहरें । आप भाभीजी को सभालें। (जाती है।) [तभी अन्नपूर्णा आती है। अन्नपूर्णा क्या हुआ, दादाजी? सब कहाँ गए। लक्ष्मीचद्र सब गए । सुभाप आया था। कहता था, विजय ने गोली चलाने से इनकार कर दिया। अरे, अब तो इनकार करना ही था । वे तो मेरे बच्चे को मारना चाहते थे। अन्नपूर्णा नहीं, नही, दादाजी? यह बात नहीं थी। लक्ष्मीचद्र : कैसे नही थी । मैं उन सबको जानता हूँ। वे मेरे पैसे से आगे बढ़े और मुझी को बरबाद कर दिया । मैं पूछता हूँ, उन्होंने पहले ही गोली चलाने से इनकार क्यो न किया क्योकि.. क्योकि अन्नपूर्णा : नही, दादाजी, नही" लक्ष्मीचद्र : (आवेश मे) ये मेरे छोटे भाई है । एक ने मुझे स्वार्थी, देशद्रोही वहा । दूसरे ने मेरे बेटे को मार डाला। मेरे मासूम बच्चे को मार हाला (रोकर गिर पडता है ।) अन्नपूर्णा (संभालती हुई) दादाजी ! दादाजी । ओह, यह एक ही पर मै क्या होने लगा। भाई-भाई मे यह मनमुटाव । (एक्दम) नहीं, नहीं, यह नहीं होगा। दादाजी, आप गलत समझ रहे हैं । लक्ष्मीचद्र (आंखें खोलकर) मैं गलत समझ रहा हूँ। अरविन्द, मेरे बच्चे, तू चला गया, मैं तुझसे दो बातें भी न कर सका। तू तो भीड में भी नही था । अरविन्द [तारा का प्रवेश । .

१३४/सीमा-रेवा तारा : क्या अरविन्द आया है ? वहाँ है? [अन्नपूर्णा सारा को पबहती है।] अन्नपूर्णा भाभीजी, आप क्यों उठ आयी? हम अभी अस्पताल चलते हैं। अपने को संभालिए। [अन्नपूर्णा तारा को अन्दर ले जाती है । लक्ष्मीचद्र भी जाते हैं । तभी अस्त-व्यस्त परेशान सविता वा प्रवेश।] सविता अद्भुत दृश्य था। अपार भीड थी। उसके आगे पडे थे कप्तान भैया । दूर से देख सकी। रिसी ने पास जाने ही नहीं दिया । एक रेला आया और मैं पीछे आ पड़ी। [अन्नपूर्णा भाती है। अन्नपूर्णा : तुम आ गयी । वे लोग कहां हैं ? सुभाष कहाँ है ? सविता कुछ पता नही, मुझे किसी का कुछ पता नहीं । मैं आगे नहीं बढ़ सकी और वे दोनोआगे बढे चले गये । एक बार भीड के बीच में सवको देखा, फिर उस ज्वार-भाटे मे सब कुछ छिप गया । (टेली- फोन को घण्टी बजती है, उठाकर) हैलो! जी हां, जी, वह तो गये। जी हां, भीड मे जाते मैंने देखा था। (फोन रखती है ।) मनिमडल की बैठक मे शरत भाई साहब का इतजार हो रहा है । वे अभी तक पहुँचे ही नहीं । मैं कहती हूँ, ये लोग मत्रिमडल की बैठकें क्यो करा रहे हैं ? जो लोग विदेशियो की गोलियों से नही डरे, वे अपने ही बच्चो और भाइयो से क्यो डरते हैं ? जनता मे क्यो नहीं आते ? अन्नपूर्णा क्योकि शासन भीड मे आकर नही चलाया जाता। आखिर जनतत्र भी तो कानून का राज्य है। सविता है, पर ' (एकदम) नही, अब बहस करने का समय नहीं है । सोचने का और काम करने का समय है। बेचारा अरविन्द | उसकी मौत क्यो हुई ? प्रजातन्त्र म एक निर्दोष, निरीह बालक की हत्या क्यो हुई ? (टेलीफोन की घण्टी फिर बजती है, उठाकर) हैलो | क्या है? हाँ, हो, कप्तान साहब तो कभी के चले गये । क्या? उनका पता नहीं मिल रहा नही, नही, वह भीड के सामने थे। मैंने देखा था। जी हां, मैंने देखा था उधर का हाल टोक नहीं है। उनके हुक्म के बिना कुछ नहीं कर सकते आये तो कह दूंगी. क्या कोई आया है हां, हो, पूछिए हैलो हैलो हैलो (फोन रख- सीमा-रेखा/१३५ कर) कनेक्शन काट दिया। अवश्य कोई बात है । मैं जाती हूँ। (जाने का मुडती है।) अनपूर्णा सविता, तुम न जाओ । ठहरो तो । (सविता नही रुकती) गई। लक्ष्मीचद्र (आकर) कौन गई ? क्या बात है? अन्नपूर्णा जरूर कोई बात है । सविता टेलीफोन कर रही थी पता नहीं क्या यात हुई, भागती चली गई। लक्ष्मीचद्र तो मैं भी जाता हूँ। अरविन्द को भी लाना है । (गला रुध जाता उमा उमा अनपूर्णा दादाजी, पहले किसी को आ जाने दीजिय । लक्ष्मीचद्र घबराओ नही । मैं बच्चा नहीं हूँ। (जात हैं।) [दूसरे द्वार से उमा पागलो की तरह आती है । जीजी सब पहां हैं। अन्नपूर्णा तुझे पता नहीं ? यहाँ से तो कभी के गए । क्या तुझ सविता नही मिली? मुझ कोई नही मिला । मैं तो भरविद की खबर सुनकर भागी आ रही हूँ। मैं भाभीजी को कैसे मुह दिखाऊंगी । मैं मर क्यो न गई । अन्नपूर्णा (शून्यवत) न जाने क्या होनेवाला है । एक ही घर के लोग एक- दूसरे को खा रहे हैं। (बाहर भीड का शोर) यह क्या ? लोग इधर आ रहे हैं। (द्वार पर जाकर देखती है । चीख पडती है ।) जीजी। अन्नपूर्णा क्या हुआ? क्या हुआ, उमा? (उठकर तेजी से आगे बढती है।) [तभी घायल शरत वहां आता है। मुंह पर घाव हैं। एक हाथ बँधा है। (कांपकर) यह क्या हुआ वही जो होना चाहिए था। विजय भीड मे कुचल गया पर उसने गोली नहीं चलाई। उमा शरतचद्र विजय कुचल गया । चला गया। उमा (चीखकर) भाई साहब अनपूर्णा (शरत से) यह तुम क्या कह रहे हो? शरतचद्र भीड सतुलन खो बैठी थी, विवेक खो बैठी थी। वह चिल्लाती रही अरविन्द कहाँ है। अरविद को लोटाओ! और विजय भीड के सामने अडा रहा । चिल्लाता रहा मुझसे अरविन्द का बदला लो मैंने अरविन्द को मारा । तुम मुझे मार लो। . शरतचद्र कुचल गए? कौन? - १३६/सीमा रेखा [10 उमा : भोर भीड ने उन्हें मार डाला? शरतचन पता नहीं किसने मार डाला? उनके गिरते ही भीड पर जैसे अकुश लग गया। पर"जय वहाँ शान्ति हुई तो विजय और सुभाष दोनो कुचले हुए पड़े थे। उमा : सुभाप भी। अन्नपूर्णा : सुभाष भी कुचल गया? हाय भारतचन्द्र हाँ, सुभाष भी कुचल गया। लेकिन पबरदार जो उनके लिए रोए। रोने से उन्हे दुख होगा। उन्होंने प्राण दे दिए पर अधिकारियो और जनता का सतुलन ठीक कर दिया। वे शहीद हो गए, पर दूसरो को बचा गए । नगर मे अब बिल्कुल शान्ति है । सब सगर्व उन बलिदानो की चर्चा कर रहे हैं, सब शोक-सतप्त हैं। (बाहर देखकर) लो, वे आ गए। हाँ, रोना मत रोना मत... [तभी लक्ष्मीचद्र और सविता के साथ पुलिस तथा दूसरे अधिकारियो का प्रवेश। एक भयकर सन्नाटा छाया रहता है । सविता का मुख पत्थर की तरह कठोर है । लक्ष्मीचद्र तूफान की तरह कांप रहे हैं । शरत दृढता से प्रबन्ध मे लगे हैं। विजय, सुभाष और अरविन्द की लाशें बरावर के कमरे मे रख दी गई हैं। सहसा उमा तेजी से आगे बढती है। बराबर वाले कमरे मे झांककर एक जोर की चीख मारती है। तारा अन्दर से आती है। तारा कैसा शोर है, अन्नपूर्णा ? अरविन्द मा गया? कहाँ है ? भाभी, वह देखो, बराबर वाले कमरे मे तीन लाशें रखी हैं । वे अरविन्द और सुभाप हैं, जनता की क्षति और उधर वह विजय है, सरकार की क्षति। अन्नपूर्णा : (रोकर) यह तुम कैसी बावलो की-सी बातें करते हो यह सब मेरे घर की क्षति है। सविता . (उसी तरह पत्थरवत) नही, जीजी, यह घर को नही, सारे देश की क्षति है। देश क्या हमसे और हम क्या देश से अलग है? शरतचंद्र तुमने ठीक कहा, सविता ! यह हमारे देश को सति है। जनतन्त्र में सरकार मौर जनता के बीच कोई विभाजक रेखा नही होतो." [पर्दा गिरता है। - 250414 शरतचद्र ०००

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गिरिराज शरण
रचनात्मक लेखन हो या शो
हो या समीक्षा-साहित्य की हर प्र
में अपनी करामाती कलम वे
दिखानेवाले डॉ गिरिराज शरण
सुपरिचित साहित्यकार हैं। इनका
1944 में मुरादाबाद (उप्र) के अ
सपल में हुआ।
इनके साठ से अधिक मौ.
सपादित ग्रन्थ हिन्दी-ससार में
लोकप्रियता के कीर्तिमान सिद्ध हुए
और समीक्षा के क्षेत्र में भी इनके
असाधारण महत्त्व प्राप्त कर चुके हैं.
मानस-सन्दर्भ' (दो भाग) अं
सन्दर्भ'। हिन्दी साहित्य के आरम
सन् 1986 तक हुए सम्पूर्ण हिन्दी शो
अद्वितीय सन्दर्भ ग्रन्थ 'शोध सन्द
नवीनता और उपयोगिता में अप्रतिम
एकाको सकलन माला और बहुर्वा
सकलन माला तथा उनको अन्य
कृतियों का परिचय एक अलग :
समाने योग्य है।
सम्प्रति वर्धमान स्नातकोत्तर म
(बिजनौर) में हिन्दी विभाग के व
डॉ गिरिराज शरण की अनवरत र
कुछ और उल्लेखनीय रचनाओं की
विश्वास जगाती है।

Rashtriya Ekta Ke Ekanki

Author
Giriraj Sharan
Title
Rashtriya Ekta Ke Ekanki
File name
Rashtriya Ekta Ke Ekanki
Text
OCR done
Citation
1965
Published
2011/03
Publisher
Prabhat Prakashan Dehli
Language
Sanskrit
Pages
162
Library
Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner
Classification
Literature
DLI number
551153
Barcode
4990010031922.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
RV4pESzg8FN
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