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Parijatsourabham Bhag Iii

Mahatmagandhi · 2012/08

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पारिजातसौरभकी विषयसूची प्रथम सर्ग- कागगृहम निवास करते हुए महामाजी के पास भारतके अंग्रेजी समारने एक भाषण भेजा । उममें सन् १९४२ ई. के भारतमै हुए दपद्रवांका दोष महामाजीपर और काग्रेसपर भागेपित हुआ था। उसका उत्तर । द्वितीय सर्ग - उपयुक्त दोपारापणका ही उत्तर । तृतीय मर्ग जगदम्बा श्रीकर तरवाना परघाम प्रयाण । चतुर्थ मर्ग- श्री महामाजीफी कारागृहसे मुक्ति । स्टेफर्ड किससे दिल्लीम भेट । नरावलीमे मुसलमानकि उपदवको शान्त करनेके लिये प्रयाण । कलकनाम विलम्ब । पञ्चम मां- कलकत्तान पलकर रामपुर (बंगाल) में पहुचना । - चहा भाषण. पप्ट मन . -वहा हिन्दु को उपदेश । मुहम्मद माहेब शब्दो- द्वारा मुसलमानामा उपडेगा । दारतापुरम वहार एक जमीनदारद्वाग महात्माजीको भूमि-ममर्पण । सप्तम मर्ग-उमारी श्रीमनुगावीजीको गीताका पदान । अष्टम मर्ग-हिन्दू-मुसलमानोंको उपदेश । हिन्दु गली दशा पणन जिम महामाजीने यानार लमे दया था । श्री. कुमारी मनुगाधीते आगे कर मर जनतामा उपदेश । आमरी गर्म महामातीका मूर्षित होना । गमनाग्माभ्य । स्वतन्त्रतादिवगामा अवसरपर निग्गे झन्का रवाना अम्बान । दराम मर्ग - दामहमूदमयटो पत्रमे, महामार्ग का, झिारने बने हुए हिन्दुको शान्तिरंगिये, पिहाग्न आगमन । पाने में भाषण। ३ - नवम मम

एकादश सर्ग
पटनेमे पुनः भाषण ।
द्वादश सर्ग-पटनमें पुनः भाषण ।
प्रयोदश मर्ग-विहारमे शान्ति स्थापित करके महात्माजीका
वाइसरायके आमन्त्रणमे दिल्ली आगमन । ददा एशियाके मव देशोसे
आये
हुए लोगोंकी सभामें महात्माजीका भाषण । ईश्वरनिम्मण ।
झोपडियोम ही भारतका वास्तविक दर्शन हो सकता है इसके समर्थनके लिये
एक इतिहास । भाषणसमाप्ति ।
चतुर्दश सर्ग-दिल्लीम हिन्दुओंद्वारा मुसलमानापर आक्रमण
हाता हुआ देखार महात्माजीको पेद । उपवासकी घोषणा । उपवामर
कारण निरूपण । निश्चल उपवासका आरम्भ ।
पञ्चदश सर्ग
- उपवासके समयका भाषण । श्री बाजेन्द्र
प्रसादजीका हिन्दुनेताओ, मुस्लिमनेताओके साथ सभामें आगमन । परस्पर
न लडनेके प्रतिज्ञा का वाचन । उपवाससमाप्ति ।
पोडश सर्ग-वन्नूसे आये हुए हिन्दुओकी दु.सगाथाका श्रवण ।
हिन्दुआका क्रोध करना । उत्तर । महात्माजीपर गोली प्रहार ।
-पण्डित जवाहरलालजीका विलाप ।
अष्टादश सर्ग-पुन. पण्डितजीका भाषण ।
एकोनविंश सर्ग - श्री महात्माजीके परधाम प्रयाणकालम
श्रीमान् लार्ड माउन्ट बेटन, श्रीमती माउन्ट बेटन, छछे वाज, सर्दार
वल्लभभाई, श्रीकिशोरलाल मशस्वाला, श्रीमीरा बहिन, मौलाना श्री-
अबुराम आजाद, श्रीपुरुषोत्तमदास टंडन, श्रीगोविन्द वलभ पन्त,
श्रीसम्पूर्णानन्द, डाक्टर भगवानदासजी, आचार्य कृपलानी, आचार्य
नरेन्द्रदेव भारत सरि जदिकी शोक-समवेदना और सन्देश ।
विश सर्ग - परधामस्य श्रीमहात्माजांक देहकी उत्तरक्रिया ।
भन्मका भारतमे और अन्य प्राय ममी देशो में विसर्जन ।
मप्तदश सर्ग

पारिजातसौरभस्य विषयनिदर्शनम्
प्रथमे सगे-कारागारमधिवस्ता महात्मना गाधिमहोदयाना
सविधे द्वाचन्दाग्दिपिकानविंशे यीशवीयसंवत्सरं मानानामुपद्रवाणा माले
महामा राष्ट्रियमहासभा प कारणमिति दिनगनु तदानीन्तनमाग्नगासनेन
प्रहितमक माषणम । तस्योत्तर च ।
द्वितीयस्मिन्सगें - उपयुक्त द पारोपणपरिहार ।
तृतीयस्मिन्सगे- धीमत्या वस्तूगम्बाया : परधामप्रयाणम् ।
चतुर्थे सगें-- श्रीमहामना कारागारान्मुक्ति ः। दिल्या स्टेफ
क्रिप्पन सहालाप . । बनेपु नवसल्या मुसम्माने • वृतम्योपद्रवस्य हिन्दुनि-
पीडनस्य च निवारणाय नाम्ली गन्नु प्रयाणम् । कालिकाताया त्रिभ्य : ।
पञ्चमे सगें कनिकातातो गमपुर तन भाषण च ।
पप्ठे मगें-तत्र हिन्दुम्य उपदेशः। मुहम्मदमहोदयस्य
गन्दमुमरमानेम्य उपदेश । दानापुरे महामभ्यो भूमिममरणम ।
सप्तमे सर्गे-माय गारमनये गीतामवचनम् ।
अष्टमे सगै--हिन्दुमुगलमानभ्य . सर्वेम्य उपदश: । नवपली
मरता मगमना हराया हिन्दुस्शाया उपवर्णनम् ।
नयमे सर्ग -कुमारी मनुगाधि पुरस्कृय मन्य उपदेश . ।
आमटीमामे महात्मनो मूर्य । गमनाममा हाम्यम । स्थतन्दनादिवसोत्मवा-
वगरे विरहाराष्ट्रातार तोरनस्यास्वीकार : ।
दशमे मर्ग-विहारेषु दिन्दूना मुरुग्मानभ्य .
माध
आफ्टरमहम्दसपदस्य पनमधिगन्य महामना पाटलिपुत्रगमनन ।
पानिपुत्र मापणम् ।
एकादशे मर्ग- पारिने पुनर्माणम् ॥

द्वादशे सगे-पुनस्तत्रैव भाषणम । त्रयोदशे सर्गे--विहारेषु शान्ति सस्थाप्य नवागतराजप्रतिनिधे (वाइसरायस्य ) निमन्त्रगन दिलीगमनम् । एशियायि सभाम य महात्मना भापणम । ईश्वरनिरूपणम् । भारतीय प्रजाना ग्रामाजावर भारतम्य यास्तविक दर्शन भवितुमर्हतीति तक इतिहास | भाषणसमाप्ति चतुर्दशे सर्गे~-दिल्या मुसलमानेषु दिन्दूनामात्मणन महात्मना खेद । उपवासस्य घापणा । उपासमारणनिरूपणम् , निदयला- वामारम्भश्च । पञ्चदशे सगै उपवासकालिक भाषणम् | प्रामाननायरानन्द्र- प्रसादस्य हिन्दूमुसलमानसिखादिनेतृभि सह सभायामागमनम । पोडशे सर्गे - यन्न प्रदेशादागताना हिन्दूना दुखकथाश्रवणम् । हिन्दूना महामभ्य प्राध । उत्तरम् । महात्मदेहे गालिकाप्रहार । सप्तदशे सगै- पण्डितजवाहिरलालकृता विलाप अष्टादशे सगे-पुनस्तस्यैव भाषणम् । पकोनविंशे सरें ब्रह्मभाव गतपु महात्मसु, लार्ड माउन्ट बेटन, श्रीमतालाड माउन्ट बेटन, पष्ठ जान, सर्दार - लभभाई पटेल, श्रीविशार- लाल मालवाला, श्रीमीरा, मौलाना अतुलफाम आजाद, श्रीपुरुपात्तमदास टन्न, भागायिन्दवा लभ पन्न, श्रासम्पूर्णानन्द, डाटर भगवानदास, आवाय ज० वी० कृपलाना, आचार्य नरेन्द्रदेव भारत सकार प्रन्तीना शानसमरदना सददाश्च । पिश सर्गे -परधामस्थस्य महात्मना देहातरक्रिया । दृशेषु यान्या तहमामविसर्जनम् । . भारत . ६ १ १ . १ ४ पारिजातसौरभीयच्छन्दसां नामानि लोकसंख्या मग लोकसंख्या १ वरदम ८२ १. वसन्ततिलका ४६ मृगेन्द्रमृगम १ शियरिणी १ २ वंशावनिलम १०३ ११ इन्द्रामा मालिनी मन्दाकिनी ३ अनु' १२ वंशावलम ३. शिखरिणी . मालिनी ४ वैशम्पचिलम ૬૬ मन्दानान्ता ३ मालिनी अनुष्टुर १३ १४ अनुष्टुप १९९ यनन्ततिलका १ रयोदता ५ द्रुतविलन्यतम ५५ वमन्नतिलका १ मालिनी १५ मन्दरी इन्द्रवंशोपेन्द्रवंश- दंशानानिलम १ गंपजायादिः १७ गरमी १ वभुन्नतिका . ३८ १६ इन्द्रसंग पेन्द्र- वमन्तनिया घशापतिः ३७ ८ उपजातिः शिखरिणी शार्दूलविक- उरगतिः दिलम १ सम्मतिरका ८३ प्रहर्षिनी १ ६ रयोदता ८० २ १ ७ शालिनी स्रागना ८ शार्दूलविकी डितम १८ अनुष्टुम् मारिनी १ १९ वशस्थविलम् ४ अनुष्टुप् ६ उपजाति ३ मजुभाषिणी . वसन्ततिलका १४ अनुष्टुप् १८ शादूळविक्री- डितम उद्गता शालिना १० वसन्ततिलका अनुष्ठा १ वसन्ततिलका ४ अनुष्टुर यमन्ततिलका मजुभाविणी वसन्ततिलका महापर्णा ४ २. अनुष्टु १६८ हीलाखेल अनुष्टप शार्दूर विक्री- डितम १ 5 or ८ ४ १ सकल्तिा सख्या १५५५ ८ पारिजातसोरभस्य शुद्धाशुद्धपत्रम जगुद्ध पाठ गुद पार पृट पर को मानत . ७ हेनु विधाप्यत ममनित पतु विद्याध्यत मदनपा तया द्यपि नह रहीं लात्त्वमभू न्तिममाले महापा तदा द्यदि 3 ४ १ नहीं रह लादभू तिम काल ३ ४ अन्तन ५० ३ पीति तु .३ ५४ २० ७० ३ ८० पीतितु तिथो स्वसा चार्ययत्त सिलेम्य मभिपतु वगिन मुम्लि बुंधा सिगन नावापन्या तब अनि 21 १६ तिथावसा चाय यन बिरेन्च मभिपद नबिलमुस्लि युधा पिगम नानामन्या तायधनपति " " १८ ९१ 1 ...सा नपा-मन २४७ ८ १३ श्यस्तुका पूर्व प्रपम्प दावा... तथे ...खातराम नः त्यय का यूय प्रयस्य उभारंपा... तथे... ...वय'युधा २५८ २ ." ४ मना... माँ धना... ६ ममहा " . " ...बर: प्रधा... निनीयनि बलमोश्य गाधिदर... स हि मदा ...वनप्रयो... मिनीपति वल्लभा गाधिः श्रीदय .. ...प्ने स पक्ष... तम्य थानस्य २८३ ...ने पच्य... २८९ सरपया नस्य १५ ...तरमन... ...तमिन... या योन्मन... 'चाटायों चान्मत्त... ३०१ शुदिनानुमारेण पर्व का: सोधनीयाः पानाद्वाननीया दी दिभ्यर्थना । पृ० २२५ परि २० फे। इस प्रकार सुधारिये- मासेधिनान्यूमरि मासमुग्न्यगे तथा नवे त्रिशदिने महेश्वर : ।। पृ० २२७ परि २३ में "मा. २९-१-१९४८ ई." के पहले "मा ३०-१-१९४८ ई. सुधारिये।

सग श्लाक पारिजातसोरभमें अन्य लोगोंके आये हुए नाम सर्ग अ रानजी (भाई) २० १७३ अक्चर हेदरी किशोरलाल (मगम्बाला). दुलकल म आजाद ५८ " " अमनुल्मलाम ६ अमृतकोर रामकुमारी २० अम्बाला (साराभाई) १४ १२ ११२ १९ कुमाराप्पा २ कृपलानी (जे. पी.) १९ २० आ आभा गाधी ३५ कृष्ण देटली ३ ६० " ६४ १ ३५ क्रिस ४८ क ग कनु गाधी ६८ ३ १६ ३ ७ डिर (टास्टर) गापिन्दरल्लभ पन्त ३५ ६८ ७. कमलनयन यस्तावा ३ . " ४. च पित्तरजनदाम ६ ४ . ३४ १२ १२ प्रभावी ३ मनु माम्बाग ३ महमूद सैयद (हास्टर)१० १० ३४ १ ३ U ४६ महादेवभाई दसाइ ३ ३ ३ २ ४ १ माउन्ट बैटन १० १३ प्रेमगला ३ १५ ब १९ ४ यदिमयन्द्र बलदेवसिंह २० की धमपत्नी १९ २० २० १० " . १३ ५१ मीरा २ ७ ३ ८७ भगवानदाम (टास्टर) १९ भण्डारी १९ २० ४ मारत मर मुहम्मद साहब ६ ४५ ५२ म मनुगाधी ३ ६ मूसा मृदुला १४ १२ २० ३४ ३५ १ ४ १४ ११५ ७ मकनानन्द मेषजी २० १८ य २५ या २ १४

सुशीला (डाक्टर)
३
१५
३
२८
३
३
२९
मुहरावदी (शहीद) १५
सोकटीस (मुक्ररात) १९
स्टेफर्ड विम
३
४
३३
३४
३
३
होरेस् एल गजेण्डर
३
४६
१६

रिजातसारभम्
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ซเมโหง2
19 x
पतित-पावन

नमो नमो मारतमूजनन्य
सर्वतप्रसतन-परमहंसपरियाजक स्वामिश्रीमद्भगवदाचार्यपण्डितराज-
प्रशोतं स्वोपक्षमारतराष्ट्रमापाटीमासहितं
पारिजातसौरभम्
(श्रीमहात्मगांधिचरितम् )
प्रथमः सर्गः
अथ प्रवान्तेपि यतिक्षितीश्वरोध्युवास कारा सहयायिभिः सह ।
खदेशदास्यापनयाय चिन्तितस्तपस्तपन्घोरतरं गलद्वयाः ॥ १॥
उपवासके पश्चात् मी श्रीमहात्माजी अपने साथियों के साथ जेलमें
हरी नियास करते थे। मारतकी दासताको दूर करने के लिये चिन्तापरायग
वह वृद्धास्थामें भी घोर तप कर रहे थे ।।१।।
वदा समीपे यमिनः समागतं विरोधिभापाप्रतिभाभिभाषितम् ।
प्रकाशित हिन्दमहीमहीमुजा स वाचयामास सुधीरमानसः॥२॥
उसी समय उनके पास एक भाषण आया जिसे विरोधियों ने किया
या और भारत सकारने प्रकाशित किया था। धैर्यपूर्ण मनसे वह उसे
पढ़ गये ॥२॥
आस्तमासेधियससुस्त्रमे निबन्धशालां सकलप्रजाप्रिये ।
महीपवृत्त्या क्षुभिवाः समाःप्रजा.प्रकाशयामासुरनुरां रुपम्॥३॥
समस्त प्रजाके प्रिय प्रतापशालो श्रीमहात्माजी जब जेलमें भगत
महीने में निवास करते ये तत्र अंग्रेज राजाकै व्यवहारसे क्षुन्ध बनी
हुई प्रजाने बहुत बड़ा रोष प्रकट किया ॥३॥

पारिजातसौरभे तटीय आसीत्सकलो भरो यतो सितागराजेन समर्पितो बलात् । तदुत्तर दातुमना मनस्विना धुरन्धरो याचमुवाच सद्वचा ॥४॥ अंग्रेजी राज्यने उस सभी अशान्तिरा भार हटात् महारमाजीके ऊपर आरोपित किया था। उसका उत्तर देनेकी इच्छासे परम उदात्त मनवाले सत्यवादी महा माजी बोले ॥ ४ ॥ उयोपणे फेब्रुवरीत्रयोदशीतिथौ यदास नितरां क्षयदल । तदैतदाभाषणमाशु मुद्रित कथ न जाने तव हेतुरस्ति क ॥५॥ यहाँसे अब लडन सभामें रिचर्ड टाटन्ने जो विरुद्ध भाषण किया था उसका उत्तर प्रारम्भ होता है। १३ फरीके उपवास में बन मैं अत्यन्त निल था उही समय इस भाषणको मापने शीघ्र क्यों छपवा दिया। इसमें आपका क्या हेतु था, इसे कौन जाने ? ॥ ५॥ यथा तथा वेस्तु मनीषित पर वितथ्यवाचा निचय प्रदृश्यते । तवात्र तस्यैष रहस्यदारणे मम प्रयत्नोयमिति प्रतीयताम् ॥ ६॥ अच्छा, आपकी चाहे जो इच्छा रही हो, परन्तु उसमें जो असत्य का भण्डार भरा हुआ है उसीका रहस्योद्घाटन करनेकेलिए मेरा यह प्रयत्न समझें ॥६॥ महासभाया समितियदान्वशात्प्रजा विधातु बत सामुदायिकम्। विरोधमेतक्षितिपालशासने तदेव जातोन महानुपद्रव ॥७॥ कांग्रेसकी महासमितिने जब समस्त प्रजाको इस राज्यशासनके प्रति सामुदायिक विरोध करनेकी आज्ञा दी तभी यह महान् उपद्रय हुआ॥ ७॥ वतोन गांधी घ महासमाजमा दधत्यव धोत्तरदायितां पराम् । तय विस्पष्टयितु समर्जित प्रमाणराशि सततप्रयनजः ॥ ८॥ अत इस विषय में गांधी और महासमाये लोग निशक उचरदाता प्रथमः सर्ग हैं। इसी वस्तुको अत्यन्त सष्ट करने के लिये बड़े प्रयत्नोंसे प्रमाग इकट्ठे किये गये हैं।॥ ८॥ इदं वचस्ते नितरा निगृहते यदस्ति सत्यं तदतीव यन्नतः । तथात्वमास्ते नक्थंधन त्वया यथोक्तमस्माद्विपरीतमेव तत् ।। ९ ।। ७, ८ लोगों में किये गये आक्षेपका उचर । जो रान्ची बात है उसे बहुत यनके साथ आपका यह कथन डिपा रहा है। जैठा आपने कहा है वैसा तो कुछ भी नहीं। सब बात उसके विपरीत ही है ॥९॥ यहा गृहीत्वा सकलान्महाजनान्न्यवेशयच्छासनमुद्वासु तान् । विचारमुत्सार्य निनन्धनालये तदा प्रजा कोपसमाकुलाभवत् ।।१०।। बब बिना विचारके ही इस निष्प्राग राज्यने सभी महापुरुषोंका जेलमें भर दिया तब प्रत्रा कोषसे व्याकुल हो गयी ।।१०।। विलिख्य पत्रं प्रतिहस्तके तव प्रमाणमायाचिपमात्मसंस्खले । परं ततो नोत्तरमागवं वदा महाप्रमादाइथवा मदादपि ॥११॥ तब मैंने आपके प्रतिनिधि ( गवर्नर जनरल) के पास पर लिखकर याम्ना की कि मेरा अपराध बताया जाय । परन्तु उस समय वहसि प्रमादके कारण अथवा घमण्डके कारण मुझे कोई उत्तर नहीं मिला ||११|| प्रमाणजातं निखिलं पुरस्कृतं भवेदिद, वत्समये मया कृतम् । सदुचर स्याच्छुतमेव तारस्त्वयापि लोकेरपि वा क्रमाननु ।।१२।। यदि उस समय यह सब प्रमाग उपस्थित किये गये होते तो आप, आपके अनुयायी और समस्त समार मेरे सत्य उत्तरको मी क्रमसे अवश्य ही सुने होते ॥ १२॥ तदा भवेदेव विलम्व ऊहिते मया ते या यदि शासनेन तत् । श्रुत भवेदीरतया विचारतस्ततो भवेन्नावसरो व्रवस्य स ||१|| बिस व्रतका मैंने सक्लप किया या उस व्रतमें मी मैं अवश्य ही पारिजातसौरभे विलम्ब कर देता यदि सकार धैर्य और विचारसे मेरी बात मुनती। और तब तो उपवास के लिये कोई कारण भी न होता ॥१३॥ उपोपगैरेभिरयं गतासुतामवश्यमालेक्ष्यति चिन्त्यजीवनः । इति प्रसिद्धभिपजांगणे: सदानिशम्य कालोयमलड्कृतस्त्वया ॥१४॥ आपने बड़े बड़े वैद्योंसे यह सुन लिया था कि इन उपवासोंसे गाधी अवश्य ही मृत्यु पावेगा। इसीलिये आपने यह सब प्रकाशित करनेका इसे ही उत्तम समय समझा होगा ।। १४ ॥ उपस्थितो नास्त्यभियोज्यमानवः कृतोतिदूरे पिहिताननोपि यः । स पापभागित्यनुघोषणं तव अपामरायैव विदां मते मतम् ।।१५।। जिसके ऊपर अपराध लगाया जा रहा है वह उपस्थित नहीं है. उसे बहुत दूर रख दिया गया है, उसका मुँह भी बन्द कर दिया गया है और तब यह घोषगा करना कि "वह अपराधी है" विद्वानोंके मतसे यह आपके लिये शर्मकी बात है ॥ १५॥ पुनः पुनर्वाचितमेव ने वचस्तथा च लेखा निखिला ममाप्यमी। निभालिताः सूक्ष्मदृशा मयाध ये त्यया गृहीताः स्वक्चःप्रवृत्तये ॥१६॥ मैंने आपके वचनको कथनको फिर-फिरसे पढा है, तथा मेरे जिन रेखौको लेकर आपने यह भाषण छपाया है उन्हें भी सूक्ष्मदृष्टिसे मैंने पढ़ा है ॥ १६ ॥ न विद्यते तत्र स शब्दसंग्रहो यमाश्रयंस्त्यं वय वाग्विडम्बनम् । मुधारचल्यान विडम्बयन्हि मा स्वयं भवस्येच विडम्बितो बुधैः ॥१७॥ मेरे इन लेसोंमें वह शन्द ही नहीं है जिनका आश्रय लेकर आपने यह व्यर्थ भापग करके मुझे अप्रतिधित करते हुए विद्वानों की टिमें आप स्वयं अप्रतिधित बन गये ॥ १७ ॥ निरीक्ष्य देशे परदेशिसैनिकानसिद्यतामा मम चेति ते पचः। असत्यभूमि स्पृशति व्यथाकरं यदस्ति सत्यं शृणु तद्वचो मम ||१८|| प्रथमः सर्गः देशमें-भारतमें परदेशी लश्करको देखकर मेरा मन दुःखी बन गया, यह बो आपका कथन है यह सर्वथा असत्य अत एव दुःखकर है। बो कुछ मेरा सत्य वचन है, उसे आप मुनें ॥ १८ ॥ यदीहते श्वेतमवो विरक्षितुं भुयं ममेमां दययाद्य भारतम् । कथं बहिः पयितुं समीहते सुशिक्षितान्भारतसैनिकानितः ॥१९॥ यदि अंग्रेजी राज्यको आज दया उत्पन्न हुई है और वह इस भारत- भूमिकी रक्षा करना चाहता है तो क्या कारण है कि लो शिक्षित (ट्रेन्ट) भारतीय सैनिक हैं, उन्हें भारतसे बाहर भेजनेकी सर्कार इच्छा कर रही है ॥ १९ ॥ कुतश्च तेषां परदेशदेशना कुतो विदेशामृतनासमागमः । कुतो विघाताय सदा समुद्यमो महासमाया इति मे वचोरसः ॥२०॥ मारतीय सैनिकों को परदेशमें क्यों भेजा जा रहा है । और परदेशसे सेना यहाँ क्यों आ रही है? तथा काग्रेसका नाश करने के लिये क्यों उद्यम सदा होता रहता है ? यही मेरे लेखका सार है ।। २० ॥ तोधिकं वक्तुमिदं भनोद्य मे प्रकाममाकाङ्क्षति यन रक्ष्यते । अयं सुदेशः परिपीड्यते परं स्वराज्यनिष्ठापगता भवेत्ततः ।।२।। इससे भी अधिक आज यह कहनेको मन चाहता है कि यह सुन्दर देश बचाया नहीं जा रहा है कि अधिक पीटित किया जा रहा है। जिससे कि यहाँ से स्वराज्यकी भावना ही चली जाय ॥ २१॥ सिताङ्गजा भारतवर्पतो यहिः प्रयान्तु माङ्गल्यभृतः भणादिति । यतः प्रभृत्येतदपीपदत्वयं प्रजासु गांधिभगवांस्ततः परम् ॥२२॥ अगस्तमासस्य तिथौ च सप्तमे महासभाया अधिवेशनावधि । महासभायाः सकला महाजनाः सिताङ्गनिष्काशनकार्यतत्परा ॥२॥ गांधीजी जबसे यह कहने लगे कि अंग्रेज भारतवर्षसे क्षणभरमें बाहर निकल जाय तबसे ही महासमाके ७ अगस्त को होनेवाले अधिवेशन तक छुडाकर इसे ६ पारिजातसौरभे काग्रेसके सभी बड़े-बड़े लोग अग्रेजोंको निकालने के काममें लग गये थे।॥ २२-२३ ॥ इति त्वदीयं वचनं निरर्थक स्वतन्त्रतायाः प्रतिपादनं दृढम् । नवीनकार्य न मया प्रवर्तितं प्रवर्तते विंशतिवर्षतोधिकात् ॥२४॥ आपका यह कथन भी व्यर्थ है। स्वतन्त्रताका प्रतिपादन कोई नया कार्य नहीं है । बीस वर्षोंसे भी अधिक हो गये, मैं इस कार्यका प्रतिपादन करता आ रहा हूँ ॥ २४ ॥ खचक्षुरद्धेशमिताद्धि वत्सरात्प्रवर्तते साङ्घिकयान आदरात् । इमं स्वदेशं सितहस्ततः क्षणाद्विमोच्य कल्याणपथेस्य चालने ॥२५।। निश्चय ही १९२० ई. से ही अंग्रेजोंके हायसे इस स्वदेशको शीघ्र मार्गमें चलानेका सामूहिक प्रयत्न सादरपूर्वक चल रहा है ॥ २५ ॥ महासभातन्त्रगता महानरा इतोपि पूर्व समुदायसत्कृतम् । प्रणेतुमेतत्प्रधनं ममामतः पुनः पुनः प्रातिथपन्महामहात् ॥२६॥ महासमाके पडे बडे नेता इससे मी पहलेसे सामुदायिक युद्ध पलानेकेलिये मेरे समक्ष बहे आमहसे प्रार्थना कर रहे थे ॥ २६ ॥ परं मया हदये जलन्महानलोपि यूनां सततं विचारतः । कथंचिदनाकुशितः स्वतन्त्रतामहोत्सुकानामिति वस्तुसत्कथा ॥२७॥ परन्तु स्वतन्त्रताप्राप्त करनेके लिये उन्मुफ इन जवानों के हृदयमें ओ माग मुलग रही है उसे विचारपूर्वक मैंने अकुशमें रसा था। यह है इस सम्बन्ध सच्ची बात ।। २७ ॥ नयो न यमोयमितीह साधितं प्रयनकाल: समकोचि यत्त्यया । न सत्ममोचीनमयारि सर्पया महासभाकीर्तिफलाविरोधिना ॥२८॥ मैंने यह सिद्ध किया है कि स्पराममासिका यह कोई नया या नहीं तो भी आपने हमारे पालो छोटा बना दिया, यह किसी प्रकार प्रथमः सर्गः ७ भी अच्छा नहीं किया गया। आपको तो महासभाकी कीर्तिका विरोध करना है, अत: चाहे जो कह सकते हैं ।। २८ ।। प्रवर्तते यः समरोधुना महान्प्रवर्तितो राष्ट्रियसंसदा स कम् । समेत्य एतुं गतिमानिति स्फुटं भवेदवश्यं अपनीय आशयः ।।२९॥ महासभा द्वारा चलाया हुआ यह महायुद्ध किस हेतुको लेकर चलाया गया है, इस आशयको स्पष्टरूपमें प्रकट करना चाहिये ॥ २९ ॥ इयं तवोक्तिर्भजतेर्थशून्यतां समस्त कार्यावलिरस्ति पुस्तके । समङ्किता हेगवेपणाकृते न विद्यते हेतुरतो न कोपि ते ॥३०॥ यह आपका कथन मी व्यर्थ ही है। क्योंकि यह युद्ध क्यों शुरू किया गया, यह सब महासमाके रजिष्टरमें लिखा हुआ है। अतः इसके कारणका शोध करने केलिये आपके पास कोई कारण नहीं है ॥३०॥ न संकुचत्येव कदापि मे मनः प्रवक्तुमेतद्यदनावृत्ताः समे । भवन्ति मे हेतव एतदर्थक किमर्थमास्ते लुलितं मनस्तव ॥३१॥ यह पूछने में मेरा मन जरा भी सकुचित नहीं हो रहा है कि जब मेरे सभी कारण स्पष्ट है---छिपाये गये नहीं हैं, तो आपका मन इसकेलिये, इसकी शोधकेलिये चंचल क्यों है ? ॥ ३१ ॥ अतः सितास्ते जिहता स्वतन्त्रतासुखं समाश्लिष्यतु भारतं पुनः । अखण्डशक्तिः परमस्य सिद्धयेममास्तु कायस्य तदस्य संव्ययेत्।।३२॥ अतः अंग्रेज यहाँसे चले जायें। भारत पुनः स्वतन्त्रताके सुखका आस्वाट ले। इस महान कार्यकी सिद्धिफेलिये मेरी अखण्ड शक्तिका व्यय हो॥ ३२॥ अजन्तु देशादत ऐङ्गलैण्डिकाःससाधना वा सबलाःसमे च वा । न विद्यते मे वचनं तथाविधोममायो नास्ति स्थाविधोपिया ॥३३॥ इस देशसे अंग्रेज अपनी सेना और अन्य साधनों के साथ चले

८
पारिजातसौरभ
जाय। मापने जैसा कहा है वैसा न तो मेरा वचन है और न
आशय है।॥३३॥
बहूनि मिस्त्राणि सिताङ्गजा मम प्रियाणि सन्त्येव न तत्र चोदना ।
समे व्रजेयुभरतक्षितेबहिः कदापि नेत्थ मनसायचीकमे ||३४||
इसमें तो कुछ कहना ही नहीं है कि बहुतसे अंग्रेज मेरे प्रिय मित्र
हैं । अतः सब अंग्रेज भारतभूमिसे बाहर चले जायें, ऐसा तो मैंने कमी
भी विचार नहीं किया है ।। ३४ ॥
यथैकचन्द्रो गगने स्थितो नृणां मनासि च पि हरत्यनारतम् ।
तथेदमैण्ड्जसखित्वमेव मे सितैः ससित्वाय मनोहरं परम ॥३५।।
जिस प्रकारसे आकाशमें रहने वाला एक ही चन्द्र मनुष्योंके मन
और नेत्रका हरण सदा करता है वैसे ही श्री० ऐन्ड्र जकी मित्रता ही
अन्य अग्रेजोंके साथ मित्रता करने के लिये मेरे मनको खींचती है ||३५||
प्रयान्तु सेनाअपि यातु शासनं सितागजानामिति कामितं मम ।
तदस्य वाक्यस्य दुरर्थता भवच्छिवं कदाचिन्न समधयेत्कचित् ।।३६।।
मेरी तो इतनी ही इच्छा है कि अमेजी सेना भी नाय और राज्य
भी जाय । अतः मेरे इस वास्यका दुष्ट अर्थ करनेसे कभी और कहीं
आपकी मलाई न होगी ॥ ३६॥
गते सिते शासन आत्मना चमूरदृश्यता यास्यति सेति कल्पना ।
पर सितानामनुगामि शासनं रिरक्षिपेत्ता न हि तन मे क्षतिः ॥३७॥
अग्रेजी शासन चले जानेपर सेना तो अपने आप ही चली जायगी,
यह मेरी पल्पना है। परन्तु अंग्रेजी राज्यके बाद जो अनुगामी राज्य
भारेगा, यह उस सेनाको रखनेकी इच्छा करे तो इसमें मेरी कोई
हानि नहीं है।॥ ३७॥
लुई पिदार सजनआगवोममाश्रमे कदाचिध दिनानिसा स.।
मया सहारथाय दिनदिने प्रमाविमप्यपृच्छत्तदिदं निशम्यताम् ॥३८॥

प्रथमः सर्गः लई फिशर नामक एक सजन एक समय मेरे आश्रममै थाये ये और सात दिन तर मेरे साथ रहे थे। प्रतिदिन वह कुछ न कुछ मुझे पूटते थे, उसे सुनिये ॥ ३८ ॥ त्वदाज्ञया चेत्सितदेहजा इतो ब्रजेयुरायाद्यदि हिन्दशासनम् । तदा दलानां कियतां भवेत्सुसादुपार्जिता तेन सहायता शिवा ।।३९॥ यदि आपकी आशाके अनुसार अग्रेज यहाँसे चले जायें और हिन्द शासन आवे तो उसे किनकिन पशोंकी-दलोंकी सहायता मिलेगी। ॥३९॥ ममेवदासीत्सरलं वदुत्तरं प्रयातु देशारिसवशासनं तदा। उपद्रुतः स्याद्यदि देश एपको न चिन्तनीयं किमपीह तैः सितैः ॥४०॥ उनके इस प्रानका मेरा सीधा उत्तर यह था कि अंग्रेजी राज्य तो यहाँस चला जाय । उसके पश्चात् यदि देशमें उपद्रव हो जाय तो अंग्रेनोंको इसकी चिन्ता नहीं करनी चाहिये ।। ४० ॥ भवेट्यवस्थाविपरीततेह चेत्क्षणेन शान्तिः समुपागमिष्यति । अनेक पक्षैमिलितेः परस्परं व्यवस्थया देश ऋधक समयते ॥४शा यदि उस समय यहाँ कुछ अव्यवस्था भी हो जायगी तो थोडे समयमें ही शान्ति हो जायगी। अनेक पञ्च परस्पर मिल कर व्यवस्थासे देशको मले प्रकार समृद्ध परेंगे ।। ४१।। इह स्वराज्याश्रितशासनेन तद्विरोधिरोधाय वरूथिनीक्रमः । भवेदनुज्ञात तापमानितोन्वयुद्ध मामेवमसी महामना ॥४२॥ फिर उन्होंने पूछा कि जब यहाँ स्वराजशासन आयेगा तब अप्रेजोंके विरोधियोको रोग्नेके लिये सेनाका यहाँ थाना सराज्यसार स्वीकृत करेगी या नहीं ?।। ४२ ॥ यथा भया कल्पिवमेव तादृशं प्रार्तितं स्यादि राष्ट्रशासनम् । विरोधपतानपनेतुमागवैः स्वरक्षणार्थ समयः कृतो भवेत् ॥४३॥ यदि मेरी कल्पनाके अनुसार ही राष्ट्रिय सकारकी स्थापना होगी १० पारिजातसौरभे तो विरोधी पक्षको दूर करने के लिये आये हुए अंग्रेजोके साथ अपनी रक्षाकेलिये सन्धि करनी ही पड़ेगी !!४३॥ सहायता का च कृता भवेत्तदा विरोधिपक्षैः सह युद्धकर्मणि । सितप्रजानामिति सोन्वयुतमा पुनस्तदा प्रत्ययदं सदिच्छया ॥४४॥ उन्होंने पुनः पूछा कि यदि अंग्रेजोंको शत्रुओंके साथ युद्ध करना पड़े तो हिन्दसर्कार अंग्रेजोंको युद्ध में क्या सहायता देगी? इसके उत्तर में मैंने कहा-॥४४॥ प्रतिष्ठित राष्ट्रियशासनं यदि स्वरूपतोस्त्येव मयानुमोदितम् । तदा तदेपा सितमूभुजां परं सहेत भूमाविह केवलास्तिताम् ११४५॥ जैसाकि मैं चाहता हूँ वैसा ही राष्ट्रशासन यदि यहाँ स्थापित हुआ तब तो इन अंग्रेज लोगोंको या मित्रराज्योंको केवल इस भूमिमें रहने देने की अनुमतिके सिवा अन्य कोई सहायता नहीं मिल सकती ।। ४५॥ निसर्गतः स्यात्पृतनाविसर्जनं गते सिते किन्तु यदि स्वकामतः । धनेन देहेन सहायतां ददन्न कोपि वार्यों भविता कुतोपि वा ॥४६॥ अग्रेजोंके जानेपर स्वाभाविक ही सेनाका विसर्जन हो जायगा । उस समय यदि कोई धन और शरीरसे उसे सहायता देगा तो कभी कोई मना न करेगा।॥ ४६॥ परं स्वराज्यागमनात्परं न मां कुतोपि हेतोगणयेदियं प्रजा। इदं भवेच्चेदिदमव्यथो भवेद्रणैपिणः स्युर्भरतक्षितेर्जना: ॥४७॥ परन्तु यह हो सकता है कि स्वराज्य मिलने के पश्चात् मुझे कोई कुछ गिने ही नहीं। परन्तु यदि ऐसा हुआ तब ही भारतवासी युद्धप्रेमी भी माने बायेंगे ॥४॥ परं शिवं चेदभिलप्यते सितेजेयश्च निश्वप्रथमेव काट्यते । सदस्य देशस्य समस्तयन्धनं विभेदनीयं न विलम्यकारणम् ॥१८॥ परन्तु यदि अंग्रेज मला चाहते है और अपना विजय निश्चय ही प्रथमः सर्गः ११ चाहते हैं तो इस देशको सर्वथा स्वतन्त्र कर देना चाहिये। विलम्बका कोई कारण नहीं है ।। ४८ ॥ न मित्रराज्येपुन फासिवादिपु मयान्तरं किनिदवेक्ष्यतेधुना। निजार्यसिद्धी कुशला कुलीनता नदृश्यते छापिनिभालिते स्थिरम्।।४९|| आज मित्रराज्यों और पासीवादियों में मैं कोई अन्तर नहीं देखता हूँ। समी अपने सार्यकी सिद्धि में कुशल है। यच्छी तरहसे हूँटनेपर मी कहीं कुलीनता नहीं दीख पड रही है ॥४९॥ अमेरिका वा ब्रिटनोपि यद्यपि महत्तमं राज्यमिति प्रकथ्यते । न वैशिया नापि तदफ्रिकाऽवचा निरीक्षते वत्र महत्त्वमण्वपि ॥२०॥ यद्यपि अमेरिका और ब्रिटेन यह दोनों सबसे बडे राग्य कहे जाते हैं तयापि एशिया और मूक अफ्रिका इन दोनों राज्योंमें तनिक मी महत्व नहीं देखते हैं ॥ ५० ॥ न यावदेते स्वकरे समाश्रितं मलं विमृष्टां परितापपूर्वकम् । अधिनियेते वदितुं न तावता मनुष्यजातेर्निजतन्त्रता प्रति ॥५२॥ जबतक यह दोनों अडे रान्य अपने हाथमें लगे हुए मलको पश्चाचापके साप घो नहीं डालते हैं अर्थात् जातक एशिया और अफ्रिकाको स्वतन्त्र नहीं बना देते तबतक मनुष्य जातिकी स्वतन्त्रताके प्रति उनका कोई अधिकार नहीं ॥५१ ।। अनेन मार्गेण विजेय ईश्वरो महारिपुश्चापि परन्तपोपि च । मुखानिहष्णानिहि कोटयःगुभाशिषाप्रदास्यन्ति वदोजयो ध्रुयः ।।१२।। इस मागसे ईश्वर मी बीता जा सकेगा और गनुओं को तपानेवाला महान् धनु मी। करोडो मुस प्रसन्न होकर गुम आशीर्वाद टॅग तब चयनिधित है।। ५२॥ अमेरिकन प्रोवर एकदाश्रमे ममागतः प्रश्नचयं विझीर्णयान् । तयावयोधाय क्रमादिहाय स प्रसादतोधोत्र मया विलिख्यते ।।३।।

पारिजातसौरभे
एक समय मेरे आश्रममें अमेरिकावासी ग्रोवर आये थे और उन्होंने
अनेक प्रश्न किये थे। आपको उन प्रश्नोंका ज्ञान हो, इसलिये उन्हें
यहाँ नीचे प्रसन्नतासे मैं लिखता हु ॥ ५३ ॥
किमप्यकस्माद्धृदये विधित्सितं नवं तवायेति जना विवृण्वते ।
निधाय णे वचनं च तस्य तत्तदोत्तरायानवमीशं वचः ।।५४॥
उन्होंने कहा कि, लोग कहते हैं कि आपके हृदयमें अकस्मात् कोई
नया कार्य करनेकी इन्छा हुई है। उनके इस वचनको सुनकर उचर
देनेके लिये मैंने यों कहा-॥५४॥
कथं मनोभाव उत प्रतिध्वनि सिताङ्गजानामुत देशवासिनाम् ।
तथा परेपामिति वेदनात्परं प्रकाशयिष्ये निजयोजनाकृतिम् ।।१५।।
अग्रेजोकी, भारतीयोकी तथा अन्योंकी मनोदशा और प्रतिध्वनिको
जानकर ही मैं अन्तमे अपनी योजनाका स्वरूप प्रकट करूँगा ।। ५५ ।।
न योजना सा परिपेवते मनाइ निगूढतां स्पष्टतरंय सा मम ।
सिताः परित्यज्य निजाधिकारिता प्रयान्वितःशीघ्रमितिप्रबोधिनी ५६।।
वह मेरी योजना किमीसे भी छिपी नहीं है। यह तो इतनी ही है
'कि अग्रेजी राज्य यहाँसे अपना अधिकार छोडवर शीम चला जाय ॥५६।।
स्वतन्त्रता पूर्णतयैव भारते प्रसादिता स्याद्यदि तर्हि भारते ।
स्थितैर्वमिघ्रमहीभृतां युधः प्रवृत्तये शङ्कर शक्यते न वा ॥५॥
यदि भारतमें पूर्णस्वतन्त्रता दे दी जाय तो हे कल्याणकारिन् , भारतमें
मित्रराज्योकी सेना युद्धकी प्रवृत्ति कर सस्ती है या नहीं १ ।। ५७ ॥
उवाच याचं मृदुलां यतीश्वरस्त्वदुत्तरे शक्यमिति वे बलात् ।
म्वतन्त्रताप्राप्तिमुदा प्रमोदितं सहायतां दास्यति भारतं ननु ॥५८।।
श्री महात्माजी बोले कि मैं जोर देकर कहता हूँ कि मित्र सेना
यहाँ युदप्रवृत्ति कर सकती है। स्वतन्त्रताकी प्राप्ति आनन्दसे आनन्दित
मारत अयस्य (इतनी) सहायना देगा ॥ ५८ ॥

प्रथमः सर्गः १२ जयाय जापानमुवः स्वतन्त्रताविहीनदेशोयमुपानयत्यलम् । किमप्यपूर्व प्रतिघातमुद्रलं जगाद देवो जगदेकनन्दनः ।।९।। या परतन्त्र देश बापानको जीतने के लिये यपूर्व और बहुत वडा विघ्न उत्पन्न करता है, ऐसा महा माजीने कहा ॥ ५९॥ मुहन्नृपाणां पृतनाविवासनं भवेदवायं न कदापि भारतात् । स्वतन्त्रताप्राप्तिरपेक्षिता परं भवेत्तमेपां हृदये शमो महान् ॥६॥ मित्ररायोंकी सेनाका विसर्जन मारतमें कमी मी अनिवार्य नहीं होगा । परन्तु स्वतन्त्रता मिलनी चाहिये । इससे सरके हृदय में महती शान्ति होगी ।। ६०॥ यदीहितं मे न समीहितं भवेत्सितेन राज्ञा विषमं भवेत्तदा । न मानहानेन कदापि भारतं करिष्यते कामपि तत्सहायताम् ||६|| जो मैं चाहता हूँ यदि उसे अंग्रेजी राज्य न चाहे तो काम कटिन दो बायगा । स्वमानहानि करके मारत कमी मी उनकी सहायता नहीं करेगा ॥६॥ समाकुलं स्वात्तिवशासनं ययातया न किविकरणीयमत्र नः। शिवा सुनीतिविधृता परं फलं सदैव लन्यं विपरीतमीहितात् ॥६२।। अंग्रेजी सकार पवहा दाय, ऐसा हम लोग कुछ नहीं करेंगे। हमने सदा अच्छी नीति ही रखी है परन्तु उसका पाल सदा इच्छाके विरुद मिला है ।। ६२॥ पर सहस्रान्गृहभूमिसायनान्यपास्य गन्तुं मनुजान्समादिशत् । न शासन संत्रपते मनागपि प्रमुत्यमोहादिति नः समास्यम् ॥६॥ सारने हजारों आदमियों को घर-बार छोड़कर चले बानेशी थाहा दे दी है। राज्यके मदसे उसे दरा मी धर्म नहीं लगती है । यह हमारी शान्तिसे पैदा हुआ पल है ।। ६३ ।।

१४ पारिजातसौरभे क्क गम्यतां तैरधनैरसाधनैः कुटुम्पिभि स्वीयमपास्य पैतृकम् । स्थलं गृह चेति विचारयत्ययं सितो नृपो नेवि शमस्य न फलम् ॥६४|| अग्रेज सर्कार इसे नहीं विचारती है कि यह वैचारे गरीब और साधनहीन अपनी पैतृक सम्पत्ति-गॉवघर छोडवर कहाँ जायेंगे । यह हमारी शान्तिका फल है ! 11६४॥ यदीत्यमद्यापि सितानुशासनं प्रवस्य॑ति श्रेय उदस्य तत्पुन । कदापि नास्माभिरनर्गलेदशी सहिष्यते वृत्तिरमुष्य भूपतेः॥६५॥ यदि अभी भी इसी प्रकार कल्याणको छोडकर अमेज सकार चलेगी तो हम उसके इस अनर्गल व्यवहारको कभी भी सहन नहीं करेंगे ॥६५॥ पुन स पप्रच्छ यतीश्वरं यदि स्वहस्तमाराच्छ्लथयेदुरामहे । तदान विघ्नो भवतोपपादितश्चमप्रवृत्ताविति सत्यमस्ति किम् ॥६६॥ श्री ग्रोवरने पुन यूछा कि यदि (राज्य) दुराग्रह करने में अपना हाथ टीलाकर दे तो आप सैनिक प्रवृत्तिमें विन नहीं करेंगे, क्या यह सत्य है१ ॥६६॥ चमूभवृत्तिर्यदि भारतं दृढ सितैर्वशीकर्तुमिहोहिता भवेत् । अवश्यमस्या अपि मे विरोधन भवेत्परो धर्म इवेति मे मतम् ॥६॥ यदि सैनिक्प्रवृत्ति भारतको अधिक दृढताके साथ पराधीन बनाने के लिये होगी तो अवश्य ही उसका भी विरोध करना मेरा धर्म जैसा ही हो जायगा, यह मेरा मत है ॥६७ ॥ शया न फतुंश्वसवा सहायता क्षमा इति स्यात्कथनाशयो मम । अनेक्देशान्परतन्त्रतागुणान्निवध्य कोपीह न नीतिमान्भवेत् ॥६८|| मेरे कहने का आशय यह है कि मुर्दे कभी नीवितोंकी सहायता नहीं कर सकते । जिसने अनेक देशोंको गुलामीकी रस्सीमें बाँध रसा हो यह कभी नातिमान ना पहा ना सकता ।। ६८ ॥

प्रथमः सर्गः कयं न धैर्य धरणीयमाजयात्सुहन्नृपाणां भवत्यसो पुनः। यतीश्वरं प्रष्टुमना मुखाग्निजारप्रसारयामास गिरां समुच्चयम् ॥६९।। फिर ग्रोवरने पूछा कि मित्ररायोंको बिश्य प्राप्त हो तबतक यार क्यों न धीरज रखें! ।। ६९ ॥ यतिजगादेति न कामितं पुना रलेट ऐक्टं नहि मार्शलस्य टॉ। न जालियाँवाग इतो न चाजय प्रतीक्षणीया निजवन्त्रतागतिः ।।७०|| श्री महामाजी बोले : मैं इस देशमें रिसे न तोरॉलेट ऐक्ट चाहता हूँ, न मार्शल टों चाहता हूँ और न बालियाँवाला वागडा अन्याय चाहता हूँ इसीलिये उनके विनय तक स्वतन्त्रताके यागमनकी प्रतीक्षा नहीं की जा सकती १७० ॥ अमेरिका ब्रिटनेश्वरं सखा प्रबोधयेदेवमुवाल्यपेक्षितम् । अमेरिकन् ग्रोवर उदसंशयः पुनर्मुनीनां समवोचदर्चिवम् ॥७१।। श्री प्रोवरने पुनः श्री महात्माबीको पूछा कि क्या आप यह चाहते हैं कि अमेरिका ब्रिटेनको समझाये?।। ७१।। अवश्यमेवेवि यतीश्वरोवनीदमेरिका चेन्मनुतेद्य मारताः । यद्ययन्ते नयसंगत हि तत्करोतु साहाय्यमिहोचितं तदा ।।२।। महामाद ने कहा कि सबस ही में ऐसा चाहता हूँ । यदि अमे- रिकाको ऐसा प्रतीत होता हो कि मारतवासी बी चाहते है वह न्यायमगत ही है तो अवश्य उसे उचित सहायता करनी चाहिये ।। ७२ ।। ब्रिटन्सदा तिष्टतु मारतग्निताममेरिका नीतिमिमां कथंचन । अनुग्रहीतुं विरं विरिष्टते ववानि कि झापय तत्र संमदिम् ।।७३|| ब्रिटेन सदा मारत भूमिरा मामी बनकर रहे, इस नीतिको मान देने के टिपे यरिश लाचार है, हम पनने आम्ही त्या मुमति है ? प्रोवरने पूछा ।। ७३ ॥

पारिजातसौरभे भवेदिद नेति पर भवेदिद सहायता कर्तुममेरिकामन । सदासमिच्छेत्परमव्यवस्थित प्रचारकार्यररिभि कृतै पतेत् ।।७४।। महामाजाने कहा कि ऐसा तो नहीं होगा परतु यह हो सकता है कि अमेरिकाकी इच्छा तो सहायता करनेकी हो परन्तु शत्रुओंने बहुत व्यवस्थितरूपसे जो प्रचारकार्य किया है उससे उसकी इच्छा नष्ट हो जाय 11 ७४॥ वथा जड तादृशमस्त्यमेरिकानृपत्वतन्त्र न हि तन कस्यचित् । प्रमुत्वमस्तीति ततोपि शक्नुयान कर्तुमस्मद्वचन महाफलम् ॥७॥ तथा, अमेरिकाका राज्यता र इतना जड है कि उसपर किसीकी सत्ता नहीं चलती है। इस कारणसे भी हमारी बातको सफल वह न कर सुकता हो ।।७।। स्वतन्त्रता चेज्ज्ञपिता भवेत्सितस्तस्य देशस्य तदातुभारतम् । तनिष्यते कामधुना सहायता स्वधर्मभूतेपि च चीनरक्षणे ।।६।। माररने पुन पूछा यदि अप्रेज भारतको आज स्वत नता देनेकी घोरमा कर दे तो भारत चीनकी रक्षा करने में जिसे कि यह भी अपना धम समझता है-क्या सहायता देगा १॥ ७६ ॥ फरिप्य तन्नियत स्वशक्तित सहायता वस्य महापदस्त्विति । विना प्रयासेन यदेयमद्य नो क्षमे फथचिद्विपरीतुमर तत् ॥७॥ रिपग्रस्त पानकी मारत अवश्य सहायता परेगा, इतना तो मैं पिना परिभमय ही १६ सकता है। परन्तु यह सहायता क्या होगी उसका विपरण आब नहीं कर सकता ।। ७७ ।। अनेकपा इसन्ति भारते सतो न यक्तु फपमेय शक्यते । प्रतिष्ठित कीरामन बहवेत्स्यतन्त्रवानन्तरतन्याहनम् ।।८।। भारतमें ओक मत । अत यह नहीं कहा जा सकता कि यहां पित प्रतापी प्रतिष पश्चात् दिम मारमा तत्र स्थापित होगा । ७८॥

प्रथमः सर्गः स्थिरान काप्यत्र परिस्थितिस्ततः सितानुकम्पासफ्लैःप्रतीक्ष्यते। शवः श्वसन्कि च कयं च वीशंकरिष्यते कार्यमिदं नवेम्यहम्।।७।। यहाँ पर कोई स्थिर परिस्थिति नहीं है । यत एव सब लोग अंग्रेजीको दयाकी प्रतीक्षा करते हैं । मुद्दा बन जी उठेगा तब वह क्या, कैमे और कैसा कार्य करेगा, यह मैं नहीं जानता हूँ ॥ ७९ ॥ अमेरिका चेद्विवशं कथंचन ब्रिटेनराज्यं पुस्तां भवत्कृते । तदा भवेदेव भयननैनवानुमोदितो यन्न इतीह निश्चिनु ||८|| ग्रोवरने पुनः कहा : यदि अमेरिका किसी प्रारसे आपलिये ब्रिटेनी राचार बनावे और दसलिये अमेरिका जो यन करे उसका अनुमोदन भारतीय करेंगे या नहीं, इसका भाप निश्चय करें ।। ८० ।। यदति शक्यं सकलंमयानिशं विर्घायतेद्यापि विधास्यतेपितत् । नृशंसता राजगता च प्रजां नयेत जापानविरोधभूमिमाम् ।।८१|| महात्मात्रीने कहा : मुझसे बो हो सकता है सदा करता रहा हूँ और भविष्य में भी करता रहूँगा। परन्तु सारसी करता प्रजाको नागनकै विरोचकी ओर नहीं ले जा सकती ।। ८१॥ अपण्डवाझ्याधरहस्योधनाद्विनेर दोपास्पदतामहं त्वया । अयापितोस्मीति पुनः पुनर्मया विघोप्यते तत्सकलेनिशम्यताम् १८२॥ महात्माजीने उस अपराध आरोपमा उत्र इस प्रकार देकर कहा कि मेरे सम्पूर्ण वाक्यका अर्थ समझे बिना ही मुझे अपराधी टहराया गया है, यह मैं पुनः पुनः घोषणा करता हूँ । सर लोग मुनें ।। ८२ ॥ अनरतं य इहात्मामलोमा-- घरति किमप्यथया अवीवि सर्वम् । भवति तन मनोविपादहेतुः, प्रमयति वस्य सुसायरान्तये नो॥८ इनि सवस्वतन्त्रपरमहंसपरिमाजस्वामिधीमद्भगवदाचा पितरायगीते पारितातपौरम प्रयमः सगी २

१८
पारिजातसौरभे
जो मनुष्य सदा स्वार्थलाभके लोमसे कुछ करता है या कुछ कहता
है वह सब उसके मनको चिन्तित बनानेवाला ही होता है । उसके सुस
और शान्तिके लिये नहीं होता ।। ८३ ॥
इति श्रीपरमहसपरिव्राजक्स्वामिश्रीमद्भगवदाचार्यपण्डितराजप्रणीते
पारिजातसौरभे स्वोपज्ञभारतराष्ट्रभाषाटीकायां
।
प्रथमः सर्गः

द्वितीयः सर्गः
विजेष्यते जर्मनभूमिजास्ततो मयेदमारम्भि समीकमित्ययम् ।
बचोविलासस्वर दुःसहेतुको न दुखिनो ज्ञानपरम्पराभुजः ॥१॥
वर्मन लोग विजय प्रात करेंगे, इस भयसे मैंने यह सत्याग्रह शुरू
किया है यह आपका कहना ये पल दुःसके कारण है। परन्तु ज्ञानी लोग
तो कमी दुसी होते नहीं ॥१॥
अचिन्तित सङ्कटमापतेद्यदि ब्रिटेनराज्ये सहसा कदाचन ।
सदस्तु साम्राज्यसमृद्धिकामनापलं तवैवेति निवेद्यते पुनः ॥२॥
यदि कमी ब्रिटेनराज्यके ऊपर अक्लात् सफ्ट या पडे तो मैं फिर
भी कहूँगा कि वह सबर साम्राज्य बढानेकी आपकी ही इच्छामा एक
परिणाम है ॥२॥
त्वमाक्षिपो मां यदुपात्तवाक्यतस्तदर्थयोधामह एव कारणम् ।
समस्तसन्दर्भमनस्तनाग्रदो निधाय सर्व रिवृतं फरिप्यते ॥३॥
जिन वाक्योंको रेकर थापने मुझपर आक्षेप किया है, उन्हें न
समझना हो आपको दूसरी दिशा में ले जा रहा है। अतः मैं आपके
समक्ष सम्पूर्ण सन्दर्भ रसकर विवरण काँगा ॥३॥
समागतो लन्दनः शुभाशयः स यङ्गनामा मम संनिधी यदा ।
अपृच्छदान्दोलनमेतदिदं भवेत्सितानां नियतं न वेति ह ॥४॥
श्री. या लम्बनसे जर मेरे पास आये वो उन्होंने पूना कि यह
आन्दोलन अंग्रेजोको हैरान करने के लिये ही है या नहीं ॥ ४ ॥
अनेन में संयदुपरमेण किं भवेन्न जापानरलानहेलना ।
भयत्स्वदेशात्कठिना निरन्तरं वदीयदृच्छामयदेवदाशया ॥५॥

पारिजातसौरभ उनके इस प्रभा आगय यह था कि मेरे इस युद्ध के आरम्भसे भारतसे जापानी सेनाको हराना कठिन हो जायगा ॥ ५ ॥ मया तदोक्त न भवेत्तथा यथा स्वयोहितं प्रत्युत मे प्रचारित.। अयं समाघात इहागमे द्विपा नितान्तमारोत्स्यति नान संशयः ॥६॥ मैंने उस समय उत्तर दिया था कि जेसा आप कहते है वैसा नहीं होगा । मेरा यह युद्ध यहाँ शत्रुओंके आगमनको अवश्य रोकेगा ॥ ६ ॥ परन्तु न स्याद्रिटनस्य वा सुहृन्महीपतीनां सहयोग ऐच्छिकः । तदा भवेकि तदहं न हेतुना भवामि केनापि विभाषितुं प्रभुः॥७॥ परन्तु यदि ब्रिटेन और मित्रराज्योंका ऐच्छिक सहयोग नहीं मिलेगा तब क्या होगा इसे मैं पिसा फारणसे नहीं कह सकता ॥ ७ ॥ इदं भवद्युद्धमरिन्दम भवेत्सुहन्नृपाणां विजयस्य कारणम् । अवश्यमेव भयिता मदर्थना भवेन्मता चेदिति मे तदुत्तरम् ॥ ८॥ पुन. यगने पूछा : शनुओंको नष्ट करनेवाला आपका यह युद्ध मित्र राजाओको विजय दिलायेगा ! मैंने कहा : अवश्य ऐसा होगा परन्तु यदि मेरी प्रार्थना मान ली जायगी तर ॥८॥ अहिंसफ युद्धमितीह तेर्थनाथयान्यदेवेति स मामयोयत । न नेति सैतत्समुपेतु शासनं मम स्वदेशे क्षयमित्यपेक्ष्यते ।।९।। उन्होंगे, पुन. पूछा, "आपकी मॉग तो यही है न पि अहिंसक युद दो! या अप युध" मैने कहा, "नहीं, नहीं, मैं तो यह चाहता है कि मेरे स्वदेश भारतमें अग्रेजी राज्य नष्ट हो माय॥९॥ सितमयाणान्त इतो जयो भवेत्सितप्रजानां परमा मद्रण.। थपशया तेरपरोस्यो भृशं सदा दुरुदं फलमेय शवपवे ॥१॥ पडोमे अग्रेजोष परे जानेपर डामा विजय तो होगा परन्तु यदि या नियर दिगे मेरे गुरका गोरगे तर मुशे पहा है कि जियपी करना नीसामीपा परिणाम यादेगा ।। १.॥

द्वितीयः सर्गः
पुनः स ऊचे भवतापि लन्दने पुरोग्यवे स्मेति सितप्रजा समा।
असोढ बॉम्बप्रहति मुदुस्तरां किमस्ति गच्यभववाद्य वां प्रति ॥१२॥
फिर यश चोले- थाप मी तो लन्दनमें रह चुके हैं । वहाँही सभी
प्रजाने अतिकठिन बम्बके मारको सदन किया है। क्या आपको उनके
प्रति कुछ कहना है १ ॥ ११ ॥
यतो हि विसः शरदः पुराम निवासशीलतत एव लन्दने ।
अमिरथ्या:सकला इतस्ततःस्मरामि ताश्याय भवामि दुःखिता१२॥
मैंने कहा-मैं लन्दनमें तीन वर्षातक रहा हूँ अतः यहाँकी गली
गली जानता हूँ । उनको स्मरण करता हूँ तब मुझे दुःख होता है ॥१२॥
सनादिन टैम्पटपुस्तकालयेव्रज थापाचयमेत्य पुस्तकम् ।
श्रुतानि या पार्करभापणान्यपि प्रियाणि चिन्यान्यधुनापि गौरवान्।।१३।
मैं नित्य इनर टेम्पल पुसवालयमें जाता था। यहाँ बाकर पुन्तक
पदता या पारके प्रियमाग भी मैंने मुने हैं और सादरपूर्वक भाव
मी में उनका चिन्तन करता हूँ ॥ १३ ॥
ममामवस्निग्धमतीय मानसं प्रियेपु तत्रत्यजनेषु सर्वदा ।
यदा श्रुतं बॉम्बनिपातयापिकं द्विवेव जावं हृदयं वदा मम ॥१४॥
वहाँ के प्रियजनोंपर मेरा मन सदा स्निग्ध रहता था । पर मैंने यहाँ
या पडनेकी बात मुनी तो मेरा हृदय घट गया।॥ १४ ॥
यदानुरागो हृदयेस्ति ताबोधुनापि नः प्रत्यविश्ल्स एव तत् ।
कथं प्रतीक्ष्यो न भवेजकारयोर्जयःचोरमाभिरिवि प्रयुक्तवान् ।।१५।।
पहने फिर पूछा दिन थाम मी थारके दृदय हम लोगोंके प्रति
वैसा ही याविरल प्रेम धिर है दो बारान और बर्मन पर हमारा विग्य
दो वर तङ्गप्रतीक्षा क्यों नहीं करते?
विनय चास्मान्निटन कदापि नो रिजेप्यतेरोनिवि येड्यहं ततः।
स्वतन्त्रता प्रार्थयतेद्य मारवं विधातुमारादतुलां सहायताम् ॥१६॥

२२
पारिजातसौरभे
हमारे बिना ही ब्रिटेन शनुओंको कदापि नहीं जीत सकेगा, यह मैं
जानता हूँ। इसीलिये-बडी भारी सहायता पहुंचाने के लिये मारत आज
ही स्वतन्त्रता मॉग रहा है ॥ १६ ॥
कृते स्वतन्त्रे निटनेन भारते भवेदवाप्तं बहु नैतिकं बलम् ।
अवाप्य सौहार्दममुष्य निर्मल वलं तदीयं हि समृद्धिमेष्यति ॥१७॥
ब्रिटेन जब भारतको स्वतन्त्र कर देगा तब उसे नैतिक बल प्रात
होगा। भारतका सोहार्द प्राप्त करके उसका निर्मल बल समृद्ध बन
जायगा।॥ १७॥
विधाय सन्दर्भमिम हृदि स्थितं विचार्यतां तेन तवापि मानसे ।
धृतं त्वयैतन्मयि दूपणं महत्रपाकुरस्तत्कृत उद्गमिष्यति ॥१८॥
इस सदर्भको हृदयम रखकर आप विचार करें तो आपके भी मनमें,
मुद्धपर किये गये दोषारोपणकेलिये लजा पैदा होगी ॥ १८॥
अहं ब्रिटेनीयजयं न कामये पुनः पुनस्तत्समकेति यत्त्वया ।
विचित्रमेतत्प्रतिभातिमा यतः स्थले स्थले स्वद्विजयो मयेहितः ।।१९।।
आपने बार बार कहा कि मैं ब्रिटेनका विजय नहीं चाहता हूँ, यह
मुझे बहुत विचिन मालूम होता है। क्योंकि मैंने सर्वत्र आपका-ब्रिटेनका
विजय चाहा है।॥ १९॥
यदा च मीरा सविधे ममालिखत्सिताङ्गजा पप्रमथो कुलोद्भवा ।
तदा मया दत्त उदार उत्तरे ममेपभावः प्रकटीभविष्यति ॥२०॥
अंग्रेज कुलीन महिला श्रीमोराने जब मेरे पास पर लिखा या उसको
जो मैंने उत्तर दिया था उसमें मेरा यह भाव प्रकट होगा ॥ २० ॥
क्यालिसत्माय इहोत्कलाङ्गने फचिनपानध्यजिनी तरस्विनी ।
अरक्षिते विनविहीन उत्कटा पदं यथेच्छं मुमुसं निधारयति ॥२१॥
धीमीराने लिखा था कि उडीसा प्रान्त अरक्षित है अतः विनरहित
है। बागनकी मलयती सेना मुसपूर्वक इच्छानुसार यहाँआ सकेगी ॥२१॥

द्वितीयः सर्गः २३ महामुताराः सरितः समं धरावलं च शालेयमुवः पदादिभिः । पिना अमेण वगाह सोत्कलानिगरिप्रदेशानचिरेण यास्यति || छिछली नदियोंको, समपरातल्को और दानवे खेतोंको पैदल बिना- भ्रमके ही पारकरके बापानकी सेना उटीसाक पहाडी प्रदेशोंमें शीघ्र ही या जायगी ॥२२॥ न रक्षितुं देशमिमं न तां चमू विरोद्धमारादयरोद्भुमेव या । इहास्ति काचित्सितनाहिनी स्थिवान वाजनाःप्रान्तभवाः समुद्यताः।२३। न वो इस देशकी रक्षा करनेलिये और न जापानी सेनाका विरोध या अपरोध = स्वावट परनेरे लिये कोई सेना तैयार रपी गयी है। इस प्रान्त की जनता मी तयार नहीं है ।॥ २३ ॥ परन्तु जमशेदपुरम्य वनं तद्विरनितुं प्रागपणेन केवलम् । प्रयक्रमास्थास्यति शासनं भवेचयो न वाति विकल्पते मनः ।। परन्तु सार जमशेदपुरके मार्गको रोकनेरिये प्रागोंकी वाजी टमा- कर भी प्रकार करेगी। विषय मिले या न मिरे इसमें सन्देह है।॥ २४॥ ततो जपानीयररूथिनी विशेविहारदेश समिठा समन्दवः । अदृश्यतामेव गतं भवेत्तदा सिदीयराज्यव्यवहारशासनम् ।।२५१ यहाँस दापनकी सेना विहारप्रदेश में प्रवेश करेगी और चारों ओर औल जायगी। तब अग्रेजी रायरे सर व्यवहार और हुकूमत अदृश्य हो पायेंगे ॥ २५॥ जपानसेनारसवान्प्रविश्य चेद्वदेग्न युम्माकमहं क्षविप्रदा। प्रणालयेय निटिशामिाजनाध्यप्रयनं न तवोस्तु पो भयम् ॥२६॥ बारानी सेना यदि गांवों में घुमकर यह कहै कि हम नुनको वरा मी उति नहीं पहुँचागे । हम तो निटिया और अमेरिकाले युद्ध प्रपरको नष्ट परेंगे भा. तुमी कोई मम नहीं होना चाहिये ॥२६ ।।

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पारिजातसौरभ
तदा भवेत्कि करणीयमित्ययं महापरिप्रश्न उदेति संमुखे।
विलोक्य सैतव्यवहारमोदृशं जनाः कदाचित्प्रतियन्तु तेषु ते ॥२७||
तब क्या करना होगा, यह एक बड़ा प्रश्न सामने खड़ा है। अग्रेजों.
के इस प्रकारके (सराय) व्यवहारको देसफर कदाचित् वह लोग
जापानियों में विश्वास कर लें।॥ २७॥
इमे सिता लाभपरायणाः प्रजा न शिक्षयन्तीह कथं स्वरक्षणम् ।
विमानबॉम्बाधिनिपातनात्कृतं भवेत्ततस्तेन च ता उदासिताः ॥२८॥
यह अमेज ऐसे स्वार्थी है कि प्रबासे विमानसे मिराये जानेवाले
घमसे कैसे रक्षा करनी चाहिये, इसका शिक्षण नहीं देते हैं। और इसी.
लिये मजा अप्रेजोसे उदासीन बनी है ॥ २८ ॥
निकार एपो हृदयेषु यत्कृते विरूढमूल' कथमद्य ते कचित् ।
मनस्विनस्तत्सहयोगमात्मना बुधा दधीरन्निति शङ्कवे मन.॥२९॥
जिनके लिये इनके प्रजाइनोके हृदयोंमें तिरस्कार पैदा हो चुका है
यह मनस्थी और समझदार लोग स्वय कैसे सहमोग देंगे, यही मनमें
शहा है ॥२९॥
व्यलोकिपीदं परमत्र मानवा जपानसेना अजितुं स्वभूमितः ।
तटस्थतायाः परिरम्भणाय ते समुद्यताः सन्ति समुत्सुका अपि॥३०॥
परन्तु मैंने यहाँ पर देसा है कि लोग अपनी जमीनमें से जापानकी
सेनाओंको जाने देनेकेलिये तथा तटस्थता स्वीकार करने के लिये तैयार
हैं और उत्सुक भी हैं ॥ ३०॥
धनं भवेद्रोपितमन्नमप्यलं न चापि भृत्यत्वमुपासितं भवेत् ।
पचित्य चित्किन्तु सिताद्शानवं समादरं तान्प्रति तानयेदपि ११३११६
कही तो ऐसा होगा कि लोग धन और भन छिपा देंगे और जापा.
नियोकी दासताका स्वीकार नहीं करेंग। परन्तु कहीं कहीं ऐसा भी होगा
कि अंग्रेजोकी शताये पारण उनके प्रति प्रजा आदर भी प्रकार करे ॥३१॥

द्वितीयः सर्गः २५ जपानसेना धनभूगृहादिकं ग्रहीतुमागइति कस्यचिद्यदि । तदा प्रतीकारमहिंसकं प्रजा तनोत्वतो नाधिकमत्र वाञ्छ्यते ॥३२॥ नापानी सेना यदि किकि पन, परती, घर आदि लेना चाहे तो प्रजा अहिंसक प्रतीकार करे, इससे अधिक की इच्छा नहीं है ।। ३२ ॥ न तस्य कायं विदधीन वा प्रजा ततो ग्रहीतव्यनयो न किंचन । तदीयवार्येपिलेपु चासिटेन योग आधेय इतीह शक्यते ॥३३॥ लोग बापानका कार्य न करें, वागनसे इछ लेना न चाहें और दापानके कामों में कोई सहयोग न दें, इतना ही यहाँ हो सकता है ॥३॥ परंत आगत्य मुनीह वेतनं तथान्नमूल्यं ब्रिटिशीयमुद्रया। प्रदातुमिच्छां विरादेयुपत्मनो गृधिनिरोध्या कयमेव तृष्णाम्।।३४॥ परन्तु वह इस भूमिपर आर वेतन और अनाजना मूल्य अंग्रेजी सिकोंमें देना चाहेंगे तो लोभियोंक लोमको फेसे रोका वादगा ॥ ३४ ॥ सिताधिराज्यं यदि सेतुमञ्जनं पयःप्रणालीपरिमर्दन तथा। यदाधीवात्र वदास्य निर्मिती प्रयत्न आसेव्य नोन हीति या॥३५॥ यदि अंग्रेजी राकार कोई पुल तोड डाले, अथवा नहर नष्ट करे तो पुनः उसके बनाने का प्रपन्न करना योग्य है या नहीं ॥३५॥ निजोपयोगाय जपानसेनया क्रियेत सेत्यादिपुनरिनिर्मितिः । तदा तु तत्कर्मणि वत्सहायता कृता भवेद्वा न विचार्यतामिति ॥३६॥ अंग्रेजों के तोटे हुए पुल यादिको पटि बागनी सेना पुनः बनाना चाई ठो उम फायने उसकी सहायता करना चाहिये या नहीं, इसे भी थार विचारें ॥३६॥ जपानराज्येन च मारता नराः कलो गृहीता यदि जापनिरः। सहारजेयुर्व्यवहार एपु तलियेट कोहनिपमास्वियं स्थितिः ॥३७॥ बारानफे साथ युदमें पडे गये मारतीय पदि दासानी सेना साप २६ पारिजातसौरमे अथवा मरे यहाँ आवे तो उनके साथ कैसा व्यवहार करना चाहिये । यह विषम परिस्थिति होगी।॥ ३७॥ पलायतां चेरिसतशासनं तदा निरीक्ष्य शत्रोबलमुत्कटं यदि । तदा च मुद्राविपये मुवमं किं भवेद्गृहीतं तदपीह चिन्यताम् ।।३।। यदि शत्रुकी विशाल सेनाको देसकर अंग्रेज भाग जाय तन रुपयोंके विषयमें क्या अच्छा मार्ग लिया जाय, इसे भी सोचें ॥ ३८ ॥ नियोत्स्यमाने समरे जपानिनः स्वकीयलोकान्समराहतान्हतान् । निपात्यमानान्पतितानितस्तत: प्रयाहयिष्यन्ति निवेशमात्मनः ॥३९॥ जब यहाँ युद्धारम्भ हो जायगा तब जापानी लोग युद्ध में घायल हुए हुए या मारे जाते हुए तथा इधर उधर पडे हुए अपने आदमियोंको अपने शिविरमे ले जायेंगे || ३९ ॥ परंपरास्ते समराङ्गणे क्षतान्हतांस्त्यजेयुर्ब्रणितांश्च सव्यथान् । भवेयुरेतेपि सुरक्षिता यदि भवेत्परो धर्म इति प्रभाति माम् ॥४॥ परन्तु जापानी लोग समरभूमिमें घायल हुए, मारे गये हुए और गोलीसे बीधे गये हुए अन्योको वहॉ ही पीडित छोड जायेंगे । मुझे ऐसा लगता है कि यदि उनकी भी रक्षा की जाय तो बड़ा धर्म होगा ॥ ४०॥ वहनि शस्त्राणि पलायनं भृतां भवेयुरातानि च युद्धभूतले । जपानसेनाभिरनाहितानि तान्यनुग्रहीतुं तत औचिती न वा ।।४।। अग्रेजोंकी सेना जन मागेगी तब उस युद्धभूमिमें बहुत से शस्त्र ऐसे पट्टे हुए मिलेंगे जिन्हें आपानी सेनाने नहीं लिये होंगे। उन अस्त्रोंको पहसि ऐना उचित होगा या नहीं ? ॥४१॥ रणाद्गनं लुण्टितुमापतन्त्यलं जनाश्च दाहाय्यगणःशवं यथा । महद्भवेत्तेन निरखभारतं प्रकृष्टदोपायतनं निरन्तरम् ॥४२॥ जमे गिर मुटेंया सूटते है वैसे ही रणभूमिको लूटने के लिये यहुतसे

द्वितीयः सर्गः
२७
लोग आते हैं। यदि वह अस्त्र लूट लिये गये तो निरस्र भारतमें निरन्तर
मार पाड आदि बडे-बड़े अपराध होने ललोगे ॥ ४२ ॥
ततः सोपा निशितानशखसंग्रहो ग्रहीतव्य उतेह न प्रभो।
न निश्चयो मे सचिघेद्य विद्यते कृपानिधे ज्ञापय तस्कृपावशात् ॥४३॥
वहाँ से उन तीश्य अत्र-शस्त्रोंस ग्रहण करना चाहिये अथवा नहीं ?
मेरे पास कोई निश्चय नहीं है अतः हे कृपासागर, आप कृपार आज्ञा
दीजिये ।।४३॥
अथो भवान्समनुते महोदधो समानि चास्यानि विचारमन्तरा ।
यदादिशेद्देव उदारचेतसा तदेव कर्तव्यमिहास्ति मे मतम् ॥४४॥
और यदि आप समति दें तो सब शस्त्रोंको बिना किसी विचारके
समुद्रमें डाल दिया जाय । आप उदार मनसे जो आशा इस विषयमें
देंगे, वही मुझे करना है।॥ ४ ॥
अवाप्य पत्त्रं परदुःसपारकोपपीडितायाः परिपीडितान्तरः ।
यदुत्तरं तत्सविधे ह्यजीगमं तदप्यवेक्ष्यं विदुपा त्वया ननु ॥४५॥
परदुःसकी मागसे बनी हुई श्री मीराके पत्रको पढकर दु.सित
होकर मैंने जो उत्तर उनके पास भेजा था उसे मी थाप अवश्य
देखे ॥ ४५ ॥
समस्तसाका सदर्थयोधकं तयाप्य निदपिदलं प्रसीदति ।
समान्तरं त्वं समये यथोचिते यथोचितं स्थानमाप इन्यतः ॥४६॥
जिन जिन यातोसी आरश्यस्ता थी उन सपरा शन क्गनेवाग
तुम्हाग निदोष पत्र पार मेरा अन्त:करण प्रसन्न हुआ है। क्योंकि तुम
योग्य समपार योग्य स्थानमें पहुँच गयो हो ।। ४६ ।।
विचारितं साधुतरं त्वयाधुना जपानिना नेप्यत एस यदयता।
न तैः प्रणेयः सहयोग आत्मनः प्रतीपवा स्यात्तु विपद्विवर्धिनी ॥४॥

२८ पारिजातसौरभे तुमने इस समय बहुत अच्छा विचार किया है। जापानियोंकी अधीनताका स्वीकार नहीं ही इष्ट है । उनके साथ अपना कोई सहयोग नहीं करना चाहिये । इससे विपरीत करनेसे अपनी विपत्ति बद जायगी ।। ४७॥ नकोपि साहाय्यमुपाचरेत्कचिजपानिनां ते सह नैव कस्यचित्। कदापि मोहालयविक्रयौ न चा धनाधिकप्राप्तिजिघृक्षयापिनो ॥४॥ चापानियोंकी कोई भी कोई सहायता न करे। उनके साथ, अधिक लाम प्राप्त करनेकी इच्छासे भी भूलकर भी क्रय विश्य व्यवहार नहीं करना चाहिये ॥४८॥ जपानिनां भीतिवशेन वश्यता जनैविहेया निखिरनिरन्तरम् । तथैव तेषां प्रतिकारभावनाबलेन मुद्राविषयोपि शाम्यताम् ॥४९॥ सबको चाहिये कि भयके कारण कभी जापानियोंकी अधीनताका स्वीकार न करें, त्याग करें । उनका प्रतीकार करना है अतः रुपयोंका प्रभ वयं ही शान्त हो जाता है ।। ४९ ॥ न सेतुभगात्परमस्य निर्मिती सहायता स्याद्विहिता कदाचन । भवेदवाप्याल्पतमापि येन तत्सहायता किंचन नो विधीयताम् ॥५०॥ यदि पुल तोड दिये जाये तो उसके पश्चात् उसके बनानेमें कभी -सहायता नहीं करना चाहिये। ऐसा कुछ भी नहीं करना चाहिये जिससे कि उन्हें अत्यल्प मी सहायता प्राप्त हो ॥५०॥ उदारमावेन जपानसैनिकस्पागते रतभूमिजन्मभिः जनैश्च सर्व्यवहार आर्यतामयो विधेयो न भवन्ति वेरयः ॥५१॥ जारानी सेनाके साथ यदि भारतवासी आवे तो उदारमायसे उनके साय सदापरहार करना चाहिये। क्योंकि यह शत्रु नहीं है | ५१॥ अवश्यमेष प्रणितेपु पातितेप्यपि प्रदर्या करुणा यथोचितम् । मनुप्यता प्रत्यमेवदिच्छति प्रपश्यतिस्पंन परं न सापचित्॥५२।।

द्वितीयः सर्गः बो घायल हो, पड़े हुए हों उनपर अवश्य दया करनी चाहिये। मनुष्यता यही तो चाहती है। वह कभी भी अपने और परायेच विचार नहीं करती ॥ ५२।। पलायितानां हननादिसाधनं महानशस्त्रादिकमाप्यते यदि । सुहजनै स्तहिं महाप्रयासतः सुरक्ष्यते चेदभिरक्ष्यतां हि तत् ।।५।। भागे हुए लोगों के जितने अन-शस्त्र मिलें उनकी रक्षा यदि प्रयास- पूर्वक प्रामाणिक लोग करते हो तो करें ॥ ५३ ।। परं यदि स्यादतिहीनमानुपैस्तदप्तमस्मारपहिया भवेत् । दुरर्थता तस्य ततो निमग्ग्यतामपास्यतां यारिधिगर्मगहरे ॥५४॥ परन्तु यदि वह सत्र नीच लोगों के हाथ में पड़ जायेंगे तो उना दुरुपयोग रोकना कठिन होगा । अतः उन्हें हवा दो और समुद्र में दो ॥ ५४॥ मया प्रदत्तं निखिलं तदुत्तरं भवेदिदं सारमयं ततो ध्रुवम् । मदीय उदो हृदयस्थितो भवेत्त्वयात्र मावो विदितोप्रयासतः ॥१५॥ मैंने श्री मीराको बो उत्तर दिया था उसका यह सार है। मेरे हृदयमें कैसा प्रशस्त भाव मरा है उसे बिना अमके ही आप इस पनसे. भान सकते हैं ।। ५५ ॥ यदि स्वतन्त्रा भरतत्तमा भवेत्तदाविलम्वेन जपानमूमुजा । करिष्यते मन्त्रमसी स्वयं ततस्तवेति वा में हृदयं तुदत्यलम ||२६॥ "यदि भारत स्वतन्न हो तो बिना किसी विलम्पके बापानकाय स्वयं मन्नगा फरेगा" आर यह याक्य दुःसर है ॥५६॥ यवस्वती याम्यगतांशमादधदुरर्यमापादयितुं यदिच्छसि । न तद्भवेत्सत्कुटजप्रसूविजा कदापि रीनिर्भयदा सदा विदाम् ।।२७॥ स्वीमि भार वापफे एक अंशो लेपर अनर्थ करना चाहते हैं।

३२ पारिजातसौरभे जवाहरः श्रीसरदारवल्भस्तथा ह्यसौ शंकररावदेयकः । कदापि विद्यार्थिगणं सतेजयन्न संव्यधात्किंचन दोपमन्दिरम् ॥६॥ पण्डित जवाहिरलाल, सारवल्लभभाई और श्रीशंकररावदेष यदि कभी विद्यार्थियोंको उत्तेजित करते हो तो उन्होंने यह कोई अपराध नहीं किया ॥ ६८॥ सनेत्रसंख्येशमिते हि वत्सरे मया स्वतस्तान्सहयोगमञ्जने । सिताधिपत्येन सह प्रवर्तिते न्यमन्त्रये तेन नवं न तैः कृतम् ॥६९॥ सन् १९२० ई० में मैने स्वय राज्यके साथ सहयोग त्याग करने के लिये छात्रोंको निमन्त्रण दिया था। अतः उन्होंने कोई नया काम नहीं क्यिा ।।६९॥ प्रजाधिनेतृनुपगृह्य बन्दिपु निवासनानन्तरमत्र वर्णिभिः । स्पा परीतैः किमकारि तन्मयावबुध्यते नैव विविक्तवासिना ॥७॥ प्रजाके बड़े बड़े नेताओंको पकडकर कैदियों के बीचमे रखा गया । उसके पश्चात् विद्यार्थियों ने क्रोधमें आकर क्या क्यिा उसे मैं नहीं जानता क्योंकि मैं यहाँ जेलमें एकान्तवासी हूँ ॥ ७० ॥ जवाहरस्यात्र निरूप्य हेतुतामसाधनस्त्वं न कथं विशवसे । स्वराज्यसिद्धी परमं हि साधनं नजासने श्रद्दधत दृढव्रतम् ।।७।। को पण्डित जवाहिरलालजी स्वराज्य प्रासिलिये अहिंसाको ही परमसाधन मानते हैं, श्रद्धा रखते हैं और पद प्रतिज्ञावाले हैं उनको विद्याथियोंके तूफानका कारण बताने में, आपके पास कोई साधन नहीं है, वो भी आपको शङ्का नहीं आतो १॥ ७९ ॥ तथा पनदयामतनूजनी भवान् किशोरलाले परमारते मम । अधत्त यं दोपमहं न तं फथंचनानुमन्ये विदितैतदान्तरः ।।७।। ऐसे ही आपने श्रीवियोरलालघनस्यामदास मारूवाला जिन्हें "कि मैं स्यय आदर देता है और जिनके अन्तःकरणको में अच्छी तरहसे द्वितीयः सर्गः पहचानता हूँ उनके ऊपर जो दोषारोपण किया है उसे मैं नहीं मान सकता ॥ ७२॥ अहिसकानां स महाग्रणीभवनशिक्षयद्यद्जनालिमञ्जनम् । अहिलसीमानमुपेत्य तस्थितन तां वदानाम्यति मन्मतो ध्रुवम् ॥७३॥ श्रीकिशोरलालभाई तो अहिंसकोंके अगुवा है । उन्होंने जो सडक वगैरः तोडने की शिक्षा दी है वह अहिंसाकी सीमामें रहकर ही। मेरे विचारमे वह शिक्षा अहिसाकी सीमाका उल्घन नहीं करती है ॥ ७३ ।। यदि त्वयाङ्गीक्रियते न मन्मतिस्तथापि नो साधयितुं तदस्यलम् । स हिंसनायासपरायणो भवेत्कुतोपि हेतोरिति मामकं मतम् ।।७४ यदि आप मेरी सलाह नहीं मानते हैं तो आप उसे सिद्ध भी तो नहीं कर सकते। मैं तो मानता हूँ कि यदि श्रीकिशोरलाल माई हिसक बने हों तो कोई कारण अवश्य होना ही चाहिये ।।७४ ।। यदान्ध्रदेशात्परिपत्रमागत त्यया धृतं स्वप्रमितेः सुसाधनम् । तदप्यलं न क्षमते कथंचन प्रमाणभूमि प्रतिगन्तुमीडिताम् ।।७।। आन्धसे जो परिपन भाया है और जिसे आपने अपने कथनका प्रबल साधन समझकर रख छोडा है वह प्रमाण बनने में असमर्थ है ।। ७५ ॥ विलोक्यते तत्र विटङ्कितं मया युधोस्ति मूलं परिमर्दवर्जनम् । ततो न कैश्चित्प्रतिकूलमिष्यतां न गुप्तरूपेण धशिष्टिभञ्जनम् ।।७।। मैंने उस परिपत्र में लिखा हुआ देखा है कि "हिंसाका त्याग ही इस सत्याग्रह युद्धका मूल है। अतः प्रतिकूल कार्य करनेकी कोई भी इच्छा न करे तथा गुप्तरूपसे आज्ञाको अवहेलना न करे" ।। ७६ ।। अहिंसनाच्छादनमाश्रयनहं प्रजामि हिंसापयमित्यवोचथाः। तदस्तु ते मोहपरम्पराभुजो मनोनुबिम्वं न मयापराध्यते १७७॥ मै अहिंसाका आड लेकर हिंसाके मार्गम जा रहा हूँ यह जो आपने ४ पारिजातसौरभ कहा है वह अशानियों के मनका प्रतिनिम्न है। उसमें मेरा क्या दोप॥ ७७॥ प्रियोस्त्यहिंसा परमो मतो दृढ' सदैव धर्मो मम शैशवादपि । महासभासभ्यजनैरपि स्वयं तथैव सा स्वे हृदये निधीयते ॥७८॥ अहिंसा तो मेरे बाल्यकालसे ही मेरी दृष्टि में मेरा परम प्रिय दृद धर्म बना हुआ है । महासभाके सदस्य भी उसे उसी प्रकारसे स्वीकार करते हैं ।। ७८॥ निपिञ्जने ये रतिमन्त आदधत्यरिप्रणाशाय शतनिकाः सदा । ततोषि तीतायुधसंप्रयोगतः परेण ते स्युनियतं पराजिताः ७९|| जो लोग हिंसामें प्रेम रखनेवाले हैं वह अपने शत्रुओंको मारने के लिये सदा बन्दूक धारण करते हैं । परन्तु जिसके पास बन्दूकसे भी भयङ्कर अस्त्र शस्त्र होंगे वह अवश्य ही बन्दूकवालेको हरावेंगे ।। ७९ ॥ परं त्यहिंसा परमात्रशस्रभृजनेप्यनेकेषु महावलेष्वपि । अभीभवन्ती रिपुदुर्दलान्यपि प्रयाति भेत्तुं सबलैकिझापि सा १८०॥ परन्तु अहिंसा तो बड़े बड़े अनशस्त्रोंसे सजे हुए महाबलवानोंके चीनमें भी निर्भय होकर शत्रुओं के हिंसकदलोंको फाडनेकेलिये अकेली ही जाती है ।।८०१ फुतः सिताङ्गानिपत्य शासन करालरूपाण्यधुना तनोत्यदः । मया कदापीह न तद्विलोकितं समुद्रिद्रोपमभद्रकान्तिकम् ।।८।। अब यह अंग्रेजी राज्य भयङ्कररूप क्यों धारण करता है ? मैंने इतना मोध करते हुए और अभद्र पान्तिवाला इसे कभी नहीं देखा है ।। ८१ ॥ जहाहि देश भरतेन पालितं वचो न घेतत्तव रोपकारणम् । उपद्रयो पा जनवायनोपि नो विभाति हेतुर्गतदूषणो मम ।।८।। "मारत छोडपर पले बावो" यह वचन तोक्रोधका कारण बन नहीं द्वितीयः सर्गः सकता । नमताने यो उपद्रव किया है, उसमें तो कोई बुराई नहीं है, सतः यह मी रोपका कारण नहीं है ।। ८२॥ सिताधिराज्यं विनहातु भारतं मुघोष एपोस्ति जनाहिद्रवः । अखण्डनीया प्रतियोपणेयमाजगचलं व्यापदजसमनभृत् ।।८।। अंग्रेजी राज्य मारतको छोड़ दे यह थापाज तो लोगोंकि दुःखित हृदयकी थावान है । यह घोषणा भखण्डनीय है और माँसुओंसे भरी हुई है। इसी लिये सारे जगत्में फैल गयी है ।। ८३ ॥ प्रजात्रय युद्धदयानले यदा पतन्महारफनदी यदा वहत् । महादमिना लगदानुवाशु सा बदाराबः स जगत्समारणोत् ।।८ ब्रिटिया, अमेरिका, जापान यह वीन प्रवाएँ जब युदरूप सवानलमें पडी और जब रक्तची महानदी वर निचली तथा इन घोर अन्धकारसे जगत् टैंक गया तब यह करण स्वर निक्ला और जगन्में छा गया ॥ ८ परन्त्वगस्तस्य महाष्टमी तिथि स भाति यावन्न रखो यहोघरः। यदा नपम्पा विनिगृह्य नायकानगोपयत्तद्धि कटाकलाश्रयः ॥८५|| परन्नु अगस्तकी ९ यों तारीखउक तो "मारत छोड़ो" यह यशस्वी शन्द प्रकट हुया ही नहीं था। नवमी तारीखो बब सर नेतायोको पकड़कर टिश दिया गया तव यद शन्द उत्पन्न हुया ! ८५|| समीदनं यत्परमं विशुद्धिमन्मतं मया न्याय्यतमं च तत्पुनः । सिताङ्गशिष्टेरभवद्विषेर्यशादमहतुईतदेयमेव धिक् ॥ को इच्छा अत्यन्त पवित्र है, और मेरी दृटि मात्यन्त न्याययुक्त है यही विधिपन यंग्रेजीके शासनके क्रोधका कारण बन गयी। देवो ही धिक्कार है।। ८६॥ युधः परं भारतमेप्यति स्विकां स्वतन्त्रतामित्सबदसुनः पुनः। सिताधिराज्यं वदपोह शङ्किवं जनैः सितक्रौर्यपरम्परेक्षमा सहारने बारगर कहा था कि युद्ध के बाद मारत स्वतन्त्रता प्रात

पारिजातसौरभे
करेगा परन्तु सर्वारकी क्रूरता देखकर लोगोंको उस कथनमें भी सन्देह
होने लगा ।। ८७ ॥
विशुद्धबुद्धिप्रतिबुद्धशासनं भवेद्यपि प्रेमरतिप्रबद्धया।
उपस्कृतां श्रीसभया सहायतां तदा तिरस्कारपदं न तन्नयेत् ॥८८)
यदि सारकी बुद्धि पवित्र होती तो प्रेमसे बँधी हुई महासभाकी दी
हुई सहायतारा वह अस्वीकार न करती ॥ ८८ ॥
महासभासभ्यजनाःसमेत्य तां स्वतन्त्रतारदितुमात्मसंमित्ताम् ।
प्रयासलब्धामरिसंक्षयाय तलिमित्रराष्ट्रध्वजशालिनो ध्रुवम् १८९॥
महासमाके सभ्य बडे प्रयाससे मिली हुई प्राणसमान स्वतन्त्रताको
प्राप्त करके उसकी रक्षाकेलिये शत्रुओंका नाश करनेको मित्रराज्यों के
ध्वजके नीचे आ जाते ।। ८९ ॥
परंसित शासनमत्र भारतान्समानभागान् इति मन्तुमादरात् ।
न याति स्मेति मदाहितपिणो निरास्थदकपदेसिलान्सतः ॥९॥
परन्तु सकार भारतयारियोंो समान भागीदार आदरपूर्वक माननेको
तैयार नहीं इसीलिये सरिने इन हितैपियोंको क्षण भरमें फेंक दिया ||९.it
जयप्रकाशं पहलापरानपि प्रहीतुकामं सितशासनं महत् ।
प्रदेयते व्यप्रमिव प्रतिक्षणं मुहमने हन्त भृक्षायतेस्य रुट ॥९॥
धीजयप्रकाय नारायग और अन्य अनेकोंगो पादने लिये यह विशाल
अमेजी राज्य शगक्षण प्याकुल प्रतीत हो रहा है। दुःपकी पात है कि
भरने मित्रों पर ही यशोध पद रहा है ।। ९१॥
जयप्रकाशप्रणाय शासनं सहनमुद्रं दश पारितोपिकम् ।
अजूपपरातुमयापयेत से य एष तस्मै प्रियशासनाय तत् ॥१२॥
भी एसा नारायणको पकड़ने के लिये सकारने दस हजार रूपये
नाम में देनी पोपमायाको भोपाला देगा-मिणदेगार
गोवारा पिपरा गा और उमायो या पारितोपिर मिलेगा ॥१२॥

द्वितीयः सर्गः ३७ तदीयसिद्धान्तमदं समर्थये न सर्वथा किन्तु परा तपस्विता ! निजस्य देशस्य हिताय संत निलोक्यतेसूमशास्य सामया॥९३।। बयप्रकाश नारायगके सिद्धान्तका सर्वथा समर्थन नहीं करता परन्तु सपने देश हितलिये वह क्तिनी तपश्चर्या कर रहे हैं, इसको में सूक्ष्मदृष्टि से देखा करता हूँ ॥ १३ ॥ अपप्रथद्यानगुणान्मनोहरे प्रिये च तस्मिन्बत वान्विचारयन् । अवक्तुमेतद्वचनं समुत्सहे समे स्वदेशप्रियता विवृण्वते ॥१४॥ उस मनोहर और प्रिय बयप्रकाशमें जिन दोषोंकी आपने घोषगामी है उनको विचार करनेसे यह कहनेका साहस करना पड़ता है कि "वदेशा. नुराग तो समी प्रकाशित करते हैं। ९४ ॥ विदेशिनां शासनमन्त्र कहिचिन्न शक्यते सोदुमनेन तद्विदा । इदं मते ते स्पटनं प्रतीयते मतं महगौरवमेव चापरः ।।९।। वह विद्वान् आदमी है । परदेशियोंका शामन यहाँ वह सहन नहीं कर सक्वे। यह काम आपके मतसे अपराध है और अन्योंके मतसे बहुत बडे गौरवकी बात है।। ९५ ।। मकिंचनानां मरणार्थमुद्यवो वितीर्णकोटिबयरीप्यमुद्रकः । स चारसंघोपि निपातितः क्षणादनार्यवर्येण कुशासनेन ह ॥९॥ गरीबों के पालन पोषयकेलिये जो चरखासंघ सदा तैयार है और जिसने तीन करोड रुपये गरीनौको बाटे हैं उसे मी इस दुष्ट राज्यने क्षग मरमें नष्ट कर दिया ।। ९६॥ वदाधिपत्यं दधतं सहापरैः सहायकै जुमहोदयं तदा । निगृह्य कारामवने तष्ठिपडुरन्तमेतत्त्व शासनं हतम् ॥१७॥ उसी समय उसके चांसपके समापति श्रीजाजूबीको मी उनके अन्य सहायकोंके साय पकडकर खेलमें आपकी दुष्ट सकारने रख दिया ॥९७|| ३८ पारिजातसौरभे समाधिकारस्थितचाखकेन्द्रका समूह आनायि निजाधिकारिताम् । सितेन तलार्यमनिन्द्यकीर्ति कैजनैर्विकर्मापि च तद्विनिन्दितम् ॥९८॥ महासभाके अधिकारमें जितने मी घर्खा फेन्द्र ये सबको सरिने अपने कब्जेमें ले लिया। प्रतिष्ठित सजनोंने इस क्रूरता और दुष्ट कर्मकी खूब निन्दा की।॥ १८ ॥ महाधिकारिप्रमुखाः ससाधनं करोतवनाथदहन्सितेरिताः । वथा कुमाराप्पियसंघकेपि ते: कृतं नराकार्यमिदं घृणास्पदम् ।।९९॥ बड़े बड़े अधिकारियोंने अग्रेजोंके कहनेसे हायके बुने हुए पत्र (सादी) को तथा उसके साधन चर्खा आदि जला दिये। इसी प्रकार श्री कुमाराप्पा सपमें भी अमनुष्योचित निन्दनीय कार्य उन्होंने किये ॥ १९॥ मुनिर्विनोया स्वयमेव सांस्थिको पहुक्रियाकर्तृजनप्रणेतकः । सहायकारवस्यसमे च सोधुनाधिवन्दिशालंक्षपयन्ति शर्वरी:॥१०॥ मननशील विनोबा स्वय एक संस्थारूप हैं तथा अनेक कार्यकर्ताओं को पैदा करने वाले हैं। यह भी अपने साथियों के साथ जेल में रापियाँ पिता रहे हैं।॥ १०॥ यदीदमुद्वेजकमाहितं भवेन शासनेनात्र विर्म दुःखदम् । विटोफितं स्याजनतोपकारकं युधोपि वेगप्रदमेय किंचन ॥१०॥ पति सरकार दुपद और माल परषाले इस दुए पर्म को न परती तो जनता उमारपेलिये और युद्धको पेग देने के लिये दुध रिपे गये पाय को देखती ॥ १.१ ।। पया विहारे पृथियीनिपानिपक्षणेस राजेन्द्रमहाशयोफ्रोत् । अनस्य सपस्य महायता तथा स्थिते ममीफे विदधीत माभूयम् ॥१०॥ गा भगन्द्रमगादत्री ने जिग प्रशार विहार में पृषिधी पर ऊँचे मारकर्मात भाममा था मगरलोगो को साया द्वितीयः सर्गः की थी वैसे ही इस वर्तमान युद्ध में वह अवश्य सहायता परते ॥ १०२॥ यथा महाभीपणवारिसंप्लवे स गुर्जरप्पारचयच्च वहम । सहायतां सर्वशरीरिणां तथा तापि युद्धे रचयेत्सतां मतः ॥१०॥ जिस प्रसरसे श्रीवल्लभमाईने गुजरातमें महामयङ्कर बाट आने- पर सबकी सहायता की थी वैसे ही आपकी सहायता मी वह इस युद्ध में करते ॥ १०३॥ इति यविवर उद्वैः सत्प्रयत्लैविधाय, प्रतिपदभतिशुद्ध बोधिवोयं समाधिम् । सिवपतिनरतर्थप्रश्नसंभारकस्य, प्रतिदिनममिलग्नो देशकल्याणसिद्धी ॥१०॥ इति सर्वतनस्वतन्त्रपरमहसपरिवाजकस्वामिग्रीमद्भगवदाचार्यपण्डिवराजप्रणीते पारिजातसौरभ द्वितीय सर्ग इस प्रकार से प्रशंसनीय प्रयत्नों द्वारा, समझदार समझ सकें ऐसा शुद्ध नवाब सरकारके यादमियोंके प्रश्नोंका देकर स्वयं देव- के कल्याणमें प्रतिदिन सलग्न रहते ये ॥ १०४ ॥ इति श्रीपरमहसपरिग्राजकस्वामिश्रीमद्भगवदाचार्यपण्डितराजप्रणीते पारिजातसौरमै स्वोपज्ञभारतराष्ट्रमापाटोकाया द्वितीयः सर्ग

तृतीयः सर्गः
उपोषणप्रवृत्तस्य मोहनस्य सतीशिखा
सेयायां निरता पन्नी कस्तूराम्बा प्रतिक्षणम् ॥ १॥
जब श्री महात्माजी आगाखॉमहरमें उपवास कर रहे थे उस समय
सतीशिरोमणि श्री कस्तूर वा उनकी सेवामे सदा लगी रहती थीं ॥१॥
दयनीयां दशां दृष्ट्वा तदानीं श्रीमहात्मनः ।
शोकातुराभवत्सद्यो हृद्रोगेण पराजिता ॥२॥
उस समय महात्माजीकी करुण दशा देखकर वह बहुत शोकातुर
थीं और तबसे उन्हें हृदयरोग हो गया ॥२॥
उपवासे समाप्तेसी महात्मा स्वास्थ्यमाभजत् ।
फश्चित्सापि निशोका समजायत बन्दिनी ॥३॥
उपवास पूरा होनेपर श्री महात्माजी स्वस्थ बने और तब श्री कस्तूवा
भी किसी किसी तरह शोपसे छुटकारा पायीं ॥ ३ ॥
परं तस्याः स हृद्रोगो वृद्धिमेय शनैः शनै.।
अभजत्क्षीणकायाया सत्ययाया भयङ्करः ॥ ४॥
परन्तु उनका शरीर क्षीण होने लग गया था और यह भयङ्कर रोग
धीरे धीरे बढता ही गया ॥४॥
श्रुतिश्रुतिप्रहब्रह्ममितेन्दे येशवे सती ।
फेब्रुवर्याश्च सप्ताहे सान्तिमेतीव पीडिता ॥५॥
१९४४ ई. ये पर्वरी महीने अन्तिम सलाहमें वह बहुत पीडित
मुशीला श्रीमती वैद्या मनुगाधि' कुमारिका।
श्रीमजयप्रकाशस्य धर्मपत्नी प्रभावती ॥६॥

तृतीयः सर्गः
श्रीमीरा गिल्डर श्रीमान स्वयं बापू च सर्वदा ।
अम्बाया नियता आसन्परिचापरायणाः ॥७॥
श्री. दाक्टर सुशीला, श्री कुमारी मनुगाधी, श्री जयरामनारायण
की धर्मपत्नी श्री प्रमावती, श्री मीराबहिन, श्री० डाक्टर गिल्डर और
स्वयं श्री महात्माजी बाकी सेवा में नियुक्त थे ॥ ६-७ ।।
जगदम्बा महावृद्धा विषमज्वरपीडिता ।
असह्या वेदनां यद्वा तद्वा शान्या व्यपोद सा ।।८।।
माना शरीर वृक्ष था। निमोनियासे पीडित थीं। उत असा
वेदनाको जैसे-तैसे वह सहन करती थीं ॥ ८॥
बन्दिशाला सितं राज्यं युद्धकालश्च शत्रुता ।
बन्धनानि बहून्यासन्संचेतुमगदादिकम् ॥९॥
जेलग्वाना, अंग्रेजी राज्य, युद्धका समय ( सत्याग्रह) अंग्रेजोंके मनमें
धनुता, यह सब यहुतसे बन्धन ये दवा, डाक्टर आदि इक्ट्ठा
करने में ।। ९॥
येन केन प्रकारेण संचिता औपचादयः ।
उपचारश्च संजातः श्रीमदम्बाज्वरापहा ॥१०॥
किसी-किसी मकारसे डाक्टर, वैद्य, औषधि सब प्रात हुए और बा-के
यरको दूर करने के लिये उपचार मी हुआ ॥ १० ॥
आनर्थक्यं परं जावं कोप्युपाय: पफाल नो।
सर्वपं हि देवाय को घात समीहिवम् ।। ११॥
परन्तु सब निरर्थक हुआ। कोई भी उपाय फलीभूत नहीं हुआ।
सच है, ईश्वरकी इच्छा सबसे बलवती है, उसे कोई रोक नहीं
सकता ॥ ११॥
निद्रा च नयने सक्त्या मनः शान्तिनिहाय च ।
गते एवं समस्तायां तनौ व्याकुलतावृधत् ॥ १२ ॥

४२
पारिजातसौरभ
निद्रा ऑखें छोडर चली गयी। शान्ति मनको छोड गयी। सारे
शरीरमें न्याकुलता बढ़ गयी ॥ १२ ॥
न्युमोनिया जन्तुचयो ववृधे परितोम्बिकाम् ।
ततस्तन यतीशस्य स्थितिर्नेष्टा भिपड्यते ॥ १३ ॥
बा के चारों ओर न्युमोनियाके नन्तु बहुत घट गये थे। महात्माजीको
उन जन्तुओंका ससर्ग न होने पावे, इस दृष्टिसे डाक्टर चाहते थे कि
यह बाके पास बहुत न आवे ।। १३ ॥
द्वापष्टिं शरदो यावद्या छायेव व्यतिष्ठत ।
सविधे सर्वदा तस्याः सांनिध्यं स कथं त्यजेत् ॥ १४ ॥
६२ वर्षोंतक जो बा उनके साथ छायाके समान रही हैं उनका
सानिध्य यह कैसे छोड सक्ते थे१॥ १४ ॥
हस्ते कृत्वा स्थिता नाडीमम्बिकाया महाभिपक् ।।
सुशीला दिवसं यावत्तव्यथाविहलान्तरा ॥१५॥
डाक्टर सुशीला सारे दिवस बाकी नाडीपर हाय रखकर, व्याकुल
होकर बैठी थीं ॥ १५ ॥
रोगामान्ता महादेवी नैवल्येन समन्विता ।
तदानी कोपना भूता सा शान्तापि स्वभावतः ।। १६ ।।
उस समय या रोगाकान्त यी, निलता बढ गयी थी अत. यह यद्यपि
शान्तस्वभावरी थीं तथापि मोघवाली हो गयी थीं ॥ १६ ॥
महात्मासिधया याचा तस्याः पाबें स्थितोप्रवीत् ।
शान्ता भव जहि क्रोधं रोगवृद्धेहि कारणम् ॥१७॥
महात्माजी उनके पास बैठकर मधुर पचनसे बोले कि तुम क्रोध
छोड़ दो, शान्त बनो। क्योंकि क्रोध अवश्य ही रोग प्रदायेगा ।। १७ ॥
अन्तरेण प्रकोपेण स्थिरा त्वं न भवेधदि।
सत्रुध्य मधमेव त्वं स्थिताय तय सन्निधौ ॥ १८ ॥

तृतीयः सर्गः यदि तुम शोधके बिना स्थिर नह रही सस्ती से तो मैं तुम्हारे पास वैठा हूँ। मेरे ऊपर शोध करो ॥ १८ ॥ आरभ्य बस्तनात्कालात्वमम् रामपरायणा । तेन वाय ममात्यन्ठमन्तरात्मा प्रसीदति ॥ १९॥ कल्ड्से तुम रामनाम जपने लग गयी हो इससे बा-मेरा अन्तरात्मा अन्यन्त प्रसन्न हो गया है। १९॥ हृदये रामनामेय समडक्य मुसिनी भर । तदेव परमं दिव्यमोप, रोगनाशनम् ॥ २० ॥ हृदयमें रामनामको अक्ति करके तुम मुसी बनो । रामनान ही ग्रेगनाशक दिव्य औपच है ।। २० । जीवयिष्यति रामश्वेलीविप्यारः शतं समाः। अनुसत्यान्यया तस्य कामं गन्तास आदरात् ।। २१॥ यदि राम चिलायेगा तो हम १०० वर्ष तक जीवंगे, नहीं तो उसकी इच्छाका अनुसरग करके यादरते चले बायेंगे ॥ २१ ॥ अन्येन प्रेरितो रोगी सेचते समीपघम् । दुखितोपि निराशोपि न स्वयं वत्समीहवे ॥२॥ रोगीको बम कोई अन्य प्रेरणा करता है तभी वह औपप सेवन करता है। वह भले दुःसी हो, निराश हो परन्तु स्वयं या नहीं चाहता है ।। २२॥ इदानी त्यामहं यच्मि सत्यक्तुं सर्वमापधम् । दधाना स्वं मनो रामे सर्वमेराध विस्मर ॥२३॥ मैं नुन्हें सब कहता हूँ किसय औषधि छोड दो। रानमें अपने मनको लगाकर सर उन बायो ॥ २३ ॥ :याको महामाजी मी या होते थे।

पारिजातसौरभे . पुत्रान्सम्बन्धिनोन्यान्वा यत्किश्चिद्वस्तु वा प्रियम् । विस्मृत्व निखिलं कृत्स्नं मा त्वं स्मापीममापि वा।। २४ ॥ पुत्रोंको, अन्य सम्बन्धियोंको अथवा किसी प्रिय वस्तुको, सब कुछ सम्पूर्ण भूलकर मुझे भी भूल जावो ॥ २४ ॥ भ्रमणाय बहिर्गन्तुं महात्मानं समुद्यतम् उपदेशसुधापानदप्ता सा तं न्यवर्तयत् ॥२५॥ बापूजीके उपदेशरूप अमृतपानसे तृप्त होकर, भ्रमणके लिये बाहर जानेको जव बापूजी तैयार हुए, तो वाने रोक दिया ॥ २५ ॥ तत्पर्य? सनीडेसौ तस्याः शान्त्या छुपाविशत् । सुप्ता मोडे शिरस्तस्य निधाय परमेश्वरी ॥२६॥ महात्माजी वा के पलगपर बाके पास शान्तिसे बैठ गये तथा बा उनके गोदी में सिर रखकर सो गयीं ॥ २६ ॥ मानार्थ च तदा वापू गतवान्झोकसंकुल । मुशीला श्रीमदम्यायाः सन्निधानमसेवत ।। २७ ।। थापूजी शोकातुर बने ये । स्नानके लिये गये । डाक्टर मुशीला चाफे समीपमें बैठ गयीं ।। २७ ॥ तस्या अद्वेपि सा सुप्ता जगन्माता महेश्वरी। स्मरन्ती हदये रामं चक्षुपी संनिमील्य च ॥२८॥ पा डाक्टर सुशीलाकी गादमें भी सो गयीं। भासें बन्द करके हृदयमें गमका स्मरण कर रही थीं ॥२८॥ या पप्रच्छ क्षणेनेति सुशीले मृत्यनन्तरम् । फा गमिप्यामि पस्त्यापा भिषिप्यत्ति में वः ॥ २९॥ भी• याने मुरन्त ही पूछा कि, मुशीला, मरनेके पाद में कहाँ पाऊँगी और उसके बाद क्या होगा ? || २९ ॥ ।

तृतीयः सर्गः . धौरा भर जगन्मावर्मा स्म भूर्तुःसविह्वला । सर्व एव गमिष्यामः क्रमशो रामघाम तत् ॥ ३०॥ वा, आप धैर्य रखे। दुःससे व्याकुल न बनें। हम सभी क्रमश:- धागे पीछे, रामके उस नित्य धाममें पहुँचेंगे ॥ ३० ॥ न रागो यत्र नो मोहो न शोको न विरोधिता। परमानन्दसन्दोहं धामास्माकं भविष्यति ॥३१॥ जहाँ न तो राग है, न मोह है, न शोक है, न विरोध है वह परमानन्द घाम हमारा निवासस्थान होगा ।। ३१ ।। जरामरादिरहित दिव्यदेहमनश्वरम् अवाप्य परमानन्दम्वरूपा त्वं भविष्यसि ॥३२॥ वा, जरा और मरगसे रहित अविनाशी दिव्यदेहको प्राप्त करके. याप परमानन्दस्वरूप बनेंगी॥ ३२ ॥ स्नातुं प्रार्थयितुं देवं श्रीसुगौला पहिर्ययो । देवी प्रभावी तत्र समतिष्ठत सेवया ॥ ३३ ।। श्री डा. सुशीला स्लान और प्रार्थना के लिये बाहर चली गयी। श्री प्रमावती देवी सेवा के लिये यहाँ वैठीं ॥ ३३ ॥ नित्यक्रियां समाप्यासी सुशीला पुनरागमत् । वत्र प्रभावती यावा भोजनाय विपादिनी ॥ ३४ ॥ स्नानादि नित्यक्रिया पूरी करके डा. मुशीला पुनः यहाँ आ गर्मी और श्री. प्रमावती देवी भोजन करने गयी ॥ ३४॥ वापू तत्र समायातो दीनझामेहता तथा । देवदासः समावः सपदि प्राप दुःसिनः ।। ३५।। श्री बापूजी वहाँ आये । डा. दीनशा मेहता आये । श्री देवदार गाघीको बुलाया गया, वह मी दुःखित होर शीम ही आ गये ।। ३५ ।।

४६ पारिजातसौरम देवदाससमानीतं गाङ्गेयं पारि निर्मलम् । यतिना घामुखे क्षिप्तं चमसेन शनैः शनैः ॥ ३६॥ श्री देवदासगाधी गमाजीका जल ले आये थे। बापूजीने उसे बाके मुखमें चमचसे धीरे धीरे डाला ! ३६ ॥ जगदम्वाल्पकालेन निमील्य निजचक्षुपी। ईश्वरमार्थनां फतुं जिह्वां श्रान्तामलोलयत् ॥३७॥ थोड़ी देरके बाद श्री० पाने आँखें बन्द कर लीं। जीभ थक गयी थी परनु ईश्वर प्रार्थनाके लिये बाने उसे हिलाया ॥ ३५॥ कृपालो राम भकिं ते प्रेम चापि निरन्तरम् । याचेस्मिन्नन्तिमेफाले पूरयस्व मनोरथम् ॥ ३८ ॥ श्री पाने प्रानाकी कि हे कृपालु रामभव तो केवल तेरी मति और वेरा प्रेम ही सतत मुझे चाहिये। इस अन्तिम काल में यह मांगती हूँ। मेरा मनोरथ पूर्ण करो ।। ३८ ॥ सदार फरणासिन्धो भया सर्वश नित्यशः। धाकण्ठं फेयलं मुक्तं पशुवत्तरक्षमस माम् ॥ ३९ ॥ हे उदार, हे दयाचे सागर, हे सर्वश, मैंने हमेशा पशुओं के समान पेटमर मरकर खाया है। आप मुझे धमा करेंगे ॥३॥ खरेण फरणेनामा पापूजीत्यक्षरयम् । व्यकृतातः प्रभावस्या समाहूतो यवीश्वरः ॥४०॥ धी० याने परग स्परसे "पापूजी" न तीन अवरोका एकबार सपारण दिया । यतः प्रमारतों देवीने यापूचीको घुलाया ॥४०॥ माजगाम यतीशोसा सपोय पानिधिः । संदरये संनिधी तम्याः शान्तिस्तथा अजायत ॥ ४१ ।। दयान पतिराज प्रदी यहाँ आये और याके पाय रेट गये। पास गालि तृतीयः सर्गः किं भवतीति पृष्टा सा न किश्चिदवबुध्यते । इत्युक्त्वोत्याय वस्याङ्केपप्तदाच्छिन्नजीवना ॥४२॥ बापूजीने पूछा कि क्या होता है" ? वाने उत्तर दिया "कुछ समझाता नहीं है"। इतना कहार, उठकर, बापूजीकी गोदमें पड गयीं । जीवन टूट चुका या ॥ ४२ ॥ मासे फ्रेवुअरीत्याख्ये सायं द्वारिंशके तिथौ । समहोरेत्यजत्प्राणान्पचत्रिंशत्पलाधिके ॥४३॥ ता. २२-२१९४४ को छायंकाल ७-३५ बजे बाने शरीरका त्याग कर दिया ।। ४३॥ सख साक्षिमिते संवद्वक्रमे फाल्गुने शिवे । शिवरात्री तनुं त्यक्तूबा शिवतां प्रापदम्बिका ।। ४४ ॥ फाल्गुन मास शिवरात्रिको गरिमें ( २००० वि० सवत् ) शरीर स्यागकर वा कल्याण पदको चली गयीं ॥४४॥ महादेवस्य सविधे निद्रात्यामीवि तद्वचः । बभूव सफलं साध निद्रावति तदन्तिके ॥ ४५ ॥ या कहती थीं कि मैं तो महादेव भाई के पास ही सोऊँगी। उनका यह वचन सफल हुआ। वह आज उन्हींके पास सोवेंगी॥४५॥ यविराजः सुझोला च धर्मशीला प्रभावती । पल्पूलनं समादाय शवनानमकारयन् ॥४६॥ श्री महात्माजी, हा मुशीलाजी, और प्रमावती देवीने साबू लेकर सावको स्नान कराया || ४६ ॥ यतिराजस्वहस्तेन निर्मितेः सूत्रसंचयः । समुतां शाटिकां दिव्यां वत्तनो पर्यधापयत् ।। ४७ ।। महात्माजीने अपने हाथोंसे सूत काता था। उसीकी साड़ी बनाकर पारिजातसौरभे रखी हुई थी। उसी दिव्य साडीको बाके शरीर पर धारण कराया गया।॥४७॥ मयाला मनुदेवी युकुमैरलिपत्तनुम् विशाले भालपटले चान्दनं तिलकं दधौ ॥४८॥ श्रीमनु मयस्वालाने वाले शरीरपर युकुमका रेप किया। विशाल मसरपर चन्दनका तिलर रिया ॥४८॥ यशस्विनी मनुः सेव जगदम्यां महासतीम् । आरातिपेन तां धन्यामन्तिमेन समार्चयत् ॥४९॥ उन्ही मनु मयस्वालाने महासती जगदम्बापी अन्तिम आतासे पूजा की ॥४९॥ धीमीरा मुधया टीपं पतुप्पं तर संव्यधात् । ओमुनरस्यानाशायां दक्षिणरयां प स्यस्तिपम् ।।५।। नगराने मनाये एप पटा पोस पाया। ठसमें उत्तर दिया और शिम दिशामें स्वस्तिर पारा था ।। ५.१॥ समान्या रामेति व्यटिसत्सा सदशी। हदा राममयी सर्वा सयभूमिराश्यत ।। ५१ ॥ पर भी गएर मे उगे "ग" लिख दिया। गाबिपि मापदी पी॥ ५१ ।। पृषिमनगदेवानशासीपशमना योर मादाया. पन्यं शपगतोमर ॥५२॥ 11 पार दिदी और दमी परपदी Plear ॥५२॥ धारादि नव महार मिपाया। ग्रामपनि मात पप्पा ॥५॥ ।

तृतीयः सर्गः इत्युच्चा स सारी रात मधुर सरसे गीता पाठ होता रहा । रामनाम की घुन से सारा यागाखा महल मर गया ॥ ५९ ।। सब वेष्टयितुं शुद्धां सादीमानाययत्तदा । कटेली यतिराजस्य सविधे तामवापयत्।। ६०॥ मि० कटेलीने देहको टपेटनेके लिये शुद्ध खादी मंगायी थी और वह महात्माजीके पास पहुंचायी गयी ।। ६० ।। केपामपि दरिद्राणामुपयोगाय सा मवेन् । महानात्मा दाहनाचामरक्षयत् ।। ६१ ।। यह खादी किसी गरीबो याममें आवेगी ऐसा कहकर महात्माजीने उसे जलाने से बचा लिया ।। ६१ ॥ काप्ठेर्मलयजैः कर्तुं चिती श्रीमद्यतीश्वरम् । श्रीमती प्रेमलीलासानन्ययुक्त जगाद सः ।। ६२॥ चन्दन काष्ठले चिता अनानेरेलिय श्रीमतो मेमलीला सासरयाने श्रीमहामाजीको पूछा । उन्होंने कहा कि- ६२ ।। दीनान्दग्धुं वयं गताः कार्यदि न चान्दनः । कथं घक्ष्यामि स्तर्हि दीनहीनत्य माथिकाम् ।। ६३ ।। नर हम गरीबोंको चन्दनी लाड़ी नहीं बता सकते तो मैं तो गरीबोंसे भी गरीय हूँ, अपनी धर्मपनीको चन्दनसे कैसे चलाऊँ १॥३॥ केटलो राजपुस्पः प्रोवाच विनयानतः। छिन्नं विष्ट मत्पादचे चान्दनं विटपिद्धयम् ।। ६४ ॥ श्रीवदलीने नम्रतासे कहा कि उनके पास चन्दनके दो कटे हुए पृश्य पढे हैं।। ६४॥ यदि उस्सोपयोगाय कृपया भवांश्चेदनुजानातु मुदा वत्समर्पये ॥६५॥ ४

५०
पारिजातसौरभे
गाँधी जयसुखलाल
यदि आप कृपाकर उसके उपयोगके लिए प्रसन्नतासे आशा देतो
मैं लाकर अर्पण करूँ १॥ ६५ ।।
अन्तन्तः शासनेनैव व्यवस्था निखिला इह ।
कर्तव्येति तथा का तमाशापयदीश्वरः ॥ ६६ ।।
अन्ततो गत्या तो सर्कारको ही सब व्यवस्था करनी है, ऐसा कहकर
श्रीमहात्माजीने उन्हें वैसा करनेकी आश दे दी ।। ६६ ॥
द्वितीयस्मिन्दिनेन्त्येष्टिनिया सम्पादितामयत्।
श्रोत्रियाह्मणः श्रौतमार्गव यथायथम् 11६७ ॥
दूसरे दिन श्रोत्रिय ब्राह्मणों के द्वारा वेदमार्गके अनुसार योग्यरीतिसे
अन्त्येष्टि क्रिया सम्पन्न हुई ।। ६७ ॥
कनुगाधिस्तथैव च ।
कमलनयनः शान्तिकुमारोरचयचिताम् ॥ ६८॥
श्रीजयसुग्वलाल गाधी, श्रीकनुगाधी, श्रीकमलनयन बजाज, श्रीशान्ति-
कुमारने चिता बनायी ।। ६८ ॥
प्रथमं वेदयिधिना मातुर्देहः प्रपूजितः ।
ततश्चिताया संस्थाप्य यतिमन्त्रानयोचत ॥६९॥
पहले येद विधिसे बा के शरीरकी पूजा की गयो। पश्चात् चितापर
देहको रखकर महात्माजी मन्त्र बोलने लगे ॥ ६९ ॥
साधं शवेन तत्रासीत्वाचवणपश्चकम् ।
संस्थापितं महाभागासौभाग्यं परिचायकम् ॥ ७० ॥
शरफे साथ ही विवापर सौभाग्यस्तीके चिह्न स्वरूप काँचकी पाँच
चूड़ियाँ भी रखी गयीं ॥ ७० ॥
गाधिना देवदासेन चान्दने हि सपासने ।
अग्निराधीयत श्रीवमन्त्रैमाइनिना सदा ॥१॥

तृतीयः सर्गः मौइनि:-श्रीमहामाजीके पुन भीदेवदासगाधीने वेदमन्नोंके साय चन्दनकी चिवा भन्माधान किया ।। ७१ ॥ देहो दग्धो गता देहसम्यन्याः सकलास्तदा । वदाभ्यात्मिकसम्बन्धश्चिरं स्थास्यति भूतले ॥७२॥ देह बल गया। समस्त देहसम्बन्ध भी चले गये। परन्तु उनके सायका माध्यात्मिक सम्बन्ध चिरकाल तक पृथिवीपर रहेगा ।। ७२ ।। मयि लीनाभवत्साद्य मदीया चिरसगिनी । इत्युपार महावेजा यतिराजो ययो वतः।। ७३ ।। "मान वह मेरी घिरसगिनी मुझमें लीन हो गयी। कहकर महादेबस्ती यतिराज श्रीमहात्मानो वहाँसे चले गये ॥७३॥ द्वितीयस्मिन्दिने शान्ते चिताभस्मनि संचिते। पश्चापि प्रकृतिस्थानि काचानां कहगानि च ||७४।। दूसरे दिन ब चिवा टडी हुई और मन हरहा किया गया तर या पाँचो ही चूड़ियाँ ज्योंकी त्यो मिली ! ७४ ॥ न दुतानि न भिन्नानि न सुटानि च पुत्रचित् । अद्भुदानि च ठान्याप रघुनाथः प्रभारती ॥ ४५ ॥ पान तो गती थी, न टुकडे-गुरु हुई थी न वो कहीं स्टी अथवा बहकी दी। भी सुनाप और श्रीप्रमारठी वहिनको पर मिली थी। महादेयो यातः परमयमिनः पानपद- द्वयों सेवित्वासाजरममशादयतपदम् । शिपा कस्तूराम्या यतिपविगतेनैर मुश्या, सदा यान्ती तस्लिममादिह लोना यतिरी ।। ७६ ॥ इति सतप्रसारमासररिसावसामिग्रोमगादावारविरामगोवे पारिनासौरम

५२
पारिजातसौरभ
श्री महात्माजीकी वरण सेवा करके श्रीमहादेव भाई अजर, अमर,
शाश्वत धामको माप्त हो गये । परमकल्यागी भीकस्तूराम्बा अपने समस्त
घीवनमें उसी मार्गसे बाती रही, जिससे महात्माजी जावे ये। और
अन्त में यह उन्हीं में लीन हो गयीं ।। ७६ ।।
इति श्रीपरमहंसपरिवानकस्वामिधीमद्भगवदाचायपण्डितराजप्रणीत
पारिजावसौरभे स्वोपशराष्ट्रभाषाटीका
तृतीयः सर्गः

चतुर्थः सर्गः जयप्रकाशस्य महाप्रिया सती प्रभावती स्वल्पदिनमहात्मनः। यियुज्य सा भागलपूरवन्धनालयं गमिप्यत्यतिदुःखसागरम् ॥१॥ श्रीजयप्रकाश नारायगकी पत्नी श्रीप्रमावती देवी थोड़े ही दिनों में महात्माजीसे वियुक्त होकर भागलपूर जेलमें बायेंगी नो अत्यन्त दुःसपूर्ण है ॥ १॥ वियोगजन्यामविपद्मवेदना कथं सहिप्ये नु यती यतीश्वरात् । विचार्य सेतन्मनसामनस्विनी गताविपादन विपादिनी कचित्॥२॥ महात्माजीके पाससे जाती हुई में वियोगजन्य असहवेदनाको केसे सहन करूँगी, ऐसा मनमें विचारकर, बो कभी विवाद नहीं करती थीं वह विषादको प्राप्त हुई ।। २॥ यतीश्वरः प्राह गमस्तव स्थलादितो मनो मेतिदुनोति तत्त्वतः। परं गतिस्ते तव लाभदायिनी तपस्थिता त्वां परिचारयिष्यति ॥३॥ मापूजी बोले कि, तुम्हारा यहाँसे जाना मुझे भी दुःसद प्रतीत हो रहा है। परन्तु तुम्हारा बाना तुम्हारे लिये लाभदायक है। मग तपसिता तुम्हारी सेवा करेगी, मर्यात् अबसे तुम तपखिजीवन व्यतीत फरोगी ॥३॥ इहास्ति किंचिन्न विपत्करं तव प्रसादलाभाय घ यस्तु विद्यते । समस्तमनेति न जीवनं तपस्तपेत्कदापीतितु नास्ति रारम्॥४॥ यहाँ कोई दुःख नहीं है। प्रसन्नता-आनन्दके लिये यहाँ सर पल उपस्थित है। अतः जीपन फमी तपोमय नहीं बन सकता; या अच्छा नहीं है ।। ४॥ विहाय हानुगत स्वजीवनं प्रपद्य किचिद्विपदन्धिते स्यले । प्रपत्त्यसे त्यं धनुभूतिसंकरं ततो यलधिर्मविता मनस्यलम् ।।५।।

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पारिजातसौरभे
महलके अपने जीवनको छोडकर, क्सिी दुःसमय स्थान में जाकर,
तुम अनेक प्रकारके अनुभवों को प्राप्त रोगी। इससे तुम्हारा मानसिक
बल बढ़ेगा ॥५॥
विहारशास्ता यदि बन्धनालयाद् विमोक्षणते विदधातु सत्वरम् ।
तदा त्वया किं करणीयमित्यहं न वक्तुमात्सुक्यमुपादधुना ॥ ६ ॥
यदि बिहार सर्कार तुमको शीघ्र ही जेलमेंसे छोड़ दे तो तुमको
क्या करना चाहिये, यह मैं आज नहीं कह सकता ॥६॥
न चेनि वातावरणं यहिः स्थितं स्थितोत्र काराभवने चिरेण तत् ।
बहिर्गवान्यान्मतिशालिनोबहून् जनानुपेत्य स्थितिमाशु संचिनु॥७॥
पाहर कैसा वातावरण है, मैं इसे यहाँ जेलमें चिरकालसे रहनेके
पारण जानता नहीं हूँ। यदि तुम बाहर जावो-अर्थात् सर्कार तुमको
छोड दे तो बुद्धिशाली लोगोंके पास जाकर स्थितिको समझो ॥ ७॥
भयन्ति ये तत्र च कार्यवाहका भवन्ति मित्राणि च यानि ते तदा ।
गृहाण तेषां मुमतिं च संमति ततो यथायोग्यमुपारस्व सत्कृतिम्॥ ८ ॥
यहाँ जो कार्यकर्ता है, जो तुम्हारे मित्र हैं, उनकी सुमति और सम्मति
प्रहण करना । पश्चात् कोई योग्य अच्छा काम करने लग जाना ।। ८॥
वतो यिनीता सितराजकिवरेस्ततश्च नीता सरला प्रभावती ।
पदान्तिफाच्छीमहितान्महात्मनो पिहारदेशीयनियन्धनालयम् ॥९॥
उसके पथात् अंग्रेज सवारफे नौकर यिनीत और सरला थीमभापती
दिनको महामानीके पूज्य परोकी सनिधिमेरो भागलपुर ले गये ।।९।।
समुद्रवेदमहसदेयतामिवे पिरिरतीयमवे हि पत्सरे ।
पतुर्थमासे दिवशे तियो स्यसा प्रमायती श्रीयतितो व्ययुग्यत ॥१०॥
वारीत दो, अप्रैल महीना और उसीय यो चोयालीय. पम्में
मभापती वहिन भीमहामाशीसे घटा दी गयी ॥१०॥

चतुर्थः सर्गः ततस्तृतीयेहनि देववाहमको मलेरियाख्येन गदेन पीडितः । महान्मवर्यः सहसा ततः शनैः शनैवभूवातिहशोतिदुर्वलः ॥११॥ तीसरे दिन ता० १४-४-१९४४ ई० को महात्माजीको अकस्मात् मलेरिया हो गया और उससे धीरे-धीरे यह बहुत कृश अत एव निल हो गये ।। ११ ।। दिने च पष्टेवदेष नायकः पियारलालं मनुगाधिरेपिका । इहागमद्वापरिचर्यया गता विहाय सास्मात्परिचारिका निजाः ॥१२॥ छठे दिन ता० २०-४-४४ ई० को महात्माजी श्रीप्यारेलाल जीसे कहने लगे कि यह मनु गांधी तो बाकी सेवाकेलिये यहाँ आयी थी। चा तो सब अपनी परिचारिकायोको छोड़कर चली गयी ॥ १२ ॥ न सेवितुं मामिह सा समागता निरीक्ष्यतेस्या न ततःप्रयोजनम् । ततश्च वस्या गमनं हितप्रदं प्रतीपते मे हृदयेनुपश्यतः ॥१३॥ वह मेरी सेवाके लिये तो आया ही नहीं थी अतः यव उसका यहाँ प्रयोजन नहीं देख रहा हूँ। मैं मनमें विचार करता हूँ तो उसका यहाँ से वाना ही हितकारक मालूम होता है ॥ १३ ॥ विचारितं पूर्वतरं मया पुनः स्थितेह सा स्वाथ मयेव पाठिता। परं रुजा क्षीणमना भयन्नहं तया न कतुं समता दधुना ॥१४॥ यात पहले मैंने दिवार किया था कि वह यहा रहे और मैं ही उसे पदाऊँ। परन्तु इस रोगसे मेरा मन कमजोर हो गया है यतः यत्र में उसे पदाने में असमर्थ ॥१४॥ इहायड्दर्यमहं मलेरिया न मत्समीपेपि समागमिप्यति । गतो मदो में मनसायटोमचं सदेव सा निरमेय यापते ॥१५॥ मुझे गर्न था कि यार मटेरिया पर मेरे पास मी नहीं पायेगा। पान्नु मेरा मद चला गया। मैं मनसे कमजोर पन गया। मनोर हो मटेरियासे हैरान होता है ।। १५ ।।

पारिजातसौरभे मनो हि यस्यास्ति नियन्त्रितं परंरुजा विहीनं च कदाप्यसौनहि । निरामयत्वाच्च्युतिमेत्य संपतेद्गदाधिकारे सहसा महाबलः ॥१६॥ जिसका मन नियन्त्रण में रहता है और जो सदा रोगरहित रहता है वह कभी भी नीरोग दशासे गिरकर रोगके अधिकारमें अकस्मात् नहीं आ पडता॥१६॥ अई समुन्नम्य पन्निवास्मि तन्मदीयचेतो विक्लं भवत्यलम् । दशामदम्या मनसोममायनोविदन्ति केचित्सहकातिगोजना.॥११॥ मैं ऊँचे जाकर नीचे गिर रहा हूँ, ऐसा मुझे मालूम होता है । अतः मेरा मन अत्यन्त विक्ल रहता है। मेरे मनकी आज अदम्य दशाको मेरे कोई सहवासी नहीं जानते हैं ॥ १७ ॥ सुशीलयोचे न मिप्यहीयत विनाइनेनैव निपातितो भयात् । दिन गच्छरमु भयच्छरोरगं पलं मनोप्याशु फरिप्यते बलि ॥१८॥ डा० भीमुशोलाने कहा कि कुछ भी नहीं घटा है। बिनाइन ने थापको इस तरह नीचे गिरा दिया है। कुछ दिनों में जब भापफे शरीरमें बल आ जाएगा तो थापके मनको भी बलवान् बनावेगा ||१८|| परं शरीरं नयलं भवत्परं मनोयम सन्दधदन नो यतिः । रजा ममागान्त हातु संतवं मतिर्मदीयेति मनस्यपुप्यत ॥१९॥ मले शरीर निर्मल हो पाय परन्तु मेरे मनमें सदा यह विचार परिपक पना है कि को संयमी पुरुष मना संयम रखता है उसपर रोगका भारमग नहीं होना चाहिये ॥१९॥ मनोरितः स्यात्परिपर्तिता पुननियन्धशालेदि पिगुहित्यिति । इप पापू परमभुजाहयीमनोन्यपेधीरतगितं प तत्ततः ॥२०॥ मरामाशेपीरणा थी मगोपी पिरसे जेट पासी कर दी पार थपदा पारदी बाप । परन्तु मनु पहिन भाँगुयोने

चतुर्थः सर्गः
महात्माजीको ऐसा करनेसे रोरा, और इसलिये यह विचार स्थगित
रहा ॥ २०॥
अहन्यहन्यस्य शरीरमातुरं क्षणं क्षणं क्षीगनलं घभून तत् ।
सिताधिकारिष्वपि चिन्तया कृतं पदं स्वकीयं मफलेषु सर्वया ॥२॥
महात्माजीका शरीर प्रतिदिन यौर प्रतिजग निर्मल होता जा रहा था
अतः समी अन अधिकारियो मनमें चिन्ता पैदा हो गयी ॥ २१ ॥
विधानचन्द्रोपि समाजगाम परीक्षितुं बगभुमो यतीश्वरम् ।
महाभिपतस्य च संमतिप्रमात्सिवागचेवश्चरितं हि चिन्तया रा
रङ्गालते डॉक्टर विधानचन्द्रजी बापूनी परीक्षा करने आये। उनकी
समतिको सुनकर अग्रेजोका चिन चिन्ताले विचलित हो गया ।। २२ ।।
चाच माहारिमहायो यति भरस्थितिः स्यान् परियतितामवेत्।
स्थले पचिद्योग्यतने ममत्कृते रिचार्यठे शासनस्नधारिणा ||३||
श्री माहारीने आपर महात्माज से कहा कि आरेलिये रिमी
योग्यतम स्थानमें मारे खान परिवर्तन पिसमें सफार विचार पर
रही है ॥२३॥
च्याय दीनार्वशिरोमणितता न्ययो महानन घनस्य जायते ।
मधमेतेन च रोचतेद्य में स्थान्तरं गन्तुमिवस्तविच्च्या ॥२४॥
दीन दुखियोक शिरोमगि महामारीने कहा कि यहार मेरे
लिये पना बहुत बहा पर हो रहा है अतः दूसरे स्थानमें सरकी
दन्यानेही धाना मुझे पसन्द है ।। २४ ।।
इटी महादेव इतोच्युता गति ययापितो या पुनरच्युवाश्रयम् ।
तो मियायाधिवमेव शासनं विचारयत्यय भमान्यठो गतिम् ||
फिर वह दोरे, यहाँ से ही महादेव वैकुटपाठी ने और यहाँसे
ही का मी परधाम गौ । अतः सहधर मप मारे ही मेरा अन्यत्र
बाना विचार रही है।॥ १५ ॥

पारिजातसौरभे परं स्थलं चैतदतीव मे प्रियं प्रियौ मदीयो वसतोत्र शाश्वतम् । विहाय तावन्न गतिर्न रोचते कथंचनाप्यद्य हि मेतिरोगिणे ॥२६॥ परन्तु मुझे तो यह स्थल अत्यन्त प्रिय है। मेरे दो प्रियजन यहाँ ही सदाकेलिये निवास करते हैं। मैं अतिरोगी हूँ तो भी उन दोनों को यहाँ छोड़कर जाना मुझे किसी प्रकार भी अच्छा नहीं लगता है ॥ २६ ॥ जहत्यसौ चा लगदीयुपी परं प्रभोर्महाधाम परं च तेन मे। मनोतितुन्नं हृदयं स्फुटत्कथंचिदेव संरक्षितमायुपो बलात् ॥२७॥ था तो इस जगत्को छोडती हुई प्रभुके' परम धाममें पहुँच गयी है। परन्तु उससे मेरा मन बहुत प्यथित है। फटते हुए हृदयको किसी प्रकार आयुष्यके वलसे बचा रखा है ।। २७ ।। इदं तु सत्यं परमोचमां मृतिं गता हि सातेनन शोच्यतां गता। परं वियोगानल इष्टवान्धवान्दहत्यजसं नियतेति पद्धतिः ॥२८॥ यह तो सत्य है कि वा अत्युत्तम मृत्युको पायी है। अत एव वह घोक करने योग्य तो नहीं ही हैं। तथापि वियोगामि इष्ट बन्धुयोको बलाता ही है, यह नियत मार्ग है ॥२८॥ सदेहनीयापि मयेहिता मृतिर्न वाशी प्रार्थय ईश्वरं सदा।। पहिर्नयाश्वेय सजीवितं च म परं क्रियाक्षेत्रमवापय प्रभो ॥२९॥ यद्यपिया का मरग आदर्श मरण था । यह सब सत्याग्रहियोंकी इच्छा पा विषय होना चाहिये; तथापि मैंने उसकी इच्छा नहीं की है। मैं तो भगवान्ये सदा प्रार्थना करता हूँ कि मुझे बीता ही मार शीघ्र ले जा और मुझे कार्य करने पे लिये क्षेत्र भी प्राप्त करा ॥ २९ ॥ मजादिदोगमाचदि यन्धनालयाद्रजेद्वदिः कोपि सदापही मयन् । थपश्यमेतत्यत्ययापरं भवेत्सदा तस्य मनो पिलजितम् ॥३०॥ पदी यो माश्मी सत्याग्रही होकर, रोगसे पीड़ित होरर इस जलसे । चतुर्थः सर्गः बाहर जाय तो अवश्य ही यह बात उसके हृदयको दुःखित करेगी और उसका मन सदा ललित रहेगा ॥ ३० ॥ गतोपि कारानिलयाइहिःपुनः कृति करिष्यामि च कांमुशोभनाम् । परिस्थितिःसंकथितास्ति भारते सितास्तुदेयुःसततं सतां सृतिम् ॥३॥ थाहर जाकर भी मैं क्या अच्छा काम करूंगा ! मारतकी परिस्थिति इस समय अव्यस्थित हो गयी है । अंग्रेज अच्छे लोगों के मार्गको पीडित करेंगे ॥३१॥ हठादिदं शासनमुद्यतं भवेद्विमोक्तुमस्मान्यदि वन्धनालयात् । कृतं तदास्माभिरिहास्तु किं पुनर्न काशते कोपिचमार्ग ऊर्जितः ॥३२॥ यदि यह सकार हमको हठसे छोड ही दे तो हम क्या कर सकते हैं। कोई मी सुन्दर मार्ग नहीं दीस रहा है ॥ ३२ ॥ स पञ्चमे मासि च पञ्चमे तिथा सहव सर्वप्नुयायिभिर्विभुः । चकार कर्णे निजमुत्युदन्तकं दिनायसाने व्यथितो यतीश्वरः ॥३३॥ तारीय पाँच मई १९४ को दिनान्तमें श्री महात्माजीने सारे अनुयायियों के साथ अपने छूटनेका समाचार दुःसके साथ मुना ॥ ३३ ॥ मनुर्महादेवसमाधिमन्वहं समेत्य कस्तूरसमाधिमप्यय । सकम्पमभ्यर्थयते स्म मा स्म भूद्वियोगयोगो मुनिपादपद्मवः ॥३४॥ मनुदिन गाँधी रोज महादेव माई और भी-कस्तू मा की समाधिक पास लाकर प्रार्थना करती थीं कि बापूजीके घरगम्मलोंसे कमी वियोग न हो ॥३४॥ मनोमहामोदकरो मनोरथोमलचदानी सफलाशिपों च तो। पवित्रमावेण समर्थितो महाजनः फलं यच्छति देषतापि या ॥३॥ मनुबहिनरा आनन्दप्रद वा मनोरथ सफल हुआ। भी या और महादेव माका आधीवादमी यल हुआ। पवित्र मानसे महापुरुष पारिजातसौरमे अथवा देवताकी पूजाकी गयी हो तो वह महापुरुष और वह देवता फर देते ही हैं ।। ३५ ॥ निशम्य वृत्तान्तममुं थतीश्वरोभवन्महाव्याकुल एव मानसे। यवान्छ नासौ निजरोगहेतुना स्वमोसमद्धा सितवन्दितां वहन् ॥३६॥ इस छुटकारेके वृत्तान्तको सुनकर महात्माजी हृदयमें अत्यन्त व्याकुल हो गये। क्योंकि अग्रेजोंके कैदी बने हुए वह अपने रोगके निमित्तसे मुक्ति चाहते ही नहीं ये ॥३६ ।। महाविपद्स्त इवायदन्मुनिः शिरश्च मे भ्राम्यति कम्पते तनुः। यहिर्गते हन्त मयि प्रवत्स्यति प्रहार आपातत एव वागसेः॥३७॥ पिसी महाविपत्तिमें फंसे हुएके समान महात्माजी बोले कि मेरा सिर घूम रहा है । शरीर कॉप रहा है। बाहर जानेपर पहिले वो विना विचारके ही लोग मुझपर कटुवचन प्रहार करेंगे ॥३७॥ गतः शमोद्य प्रभृति श्रितो मया तटस्थता चापि गतेन मामिका । अशान्तयावावरणेषु जीवनं कथं कश्चित्पुरतः प्रवस्यति ॥३८॥ यहाँ जो मुझे शान्ति मिली थी यह गयी। मेरी तटस्तथा भी चली गयी। अान्त घातावरणमें जीवन बिछी-पिसी प्रसार चलेगा ॥२८॥ स रोगशय्यामधिशिश्य आतुरो भवन्प्रतीतस्तत एव योगिराद । न विस्मृतं देशहितं न दुःसतो भयस्य याधास्पृशदप्यमुं न या ॥३९॥ यह रोग शय्यापर पड़े ये अत एव थातुरफे समान प्रतीत होते थे। पररातः न तो पर देशहितको भूले थे और न दुःपके भयकी बापाने ही उनका सरिया या॥१९॥ परेनि पीपतिसंनिमप्रभो पिरारोपो महतां स पूजितः। अमुध्यत पेठमहाधिकारिणा समस्तलोकपमहामुहमनः ॥ ४०॥ विष्णु प्रमान शान्तिवाले, पग-बोपादित मार लोगोंसे पूजित समय चतुर्थः सर्गः लोकर एकमान नुहन् श्री महात्माजी अधिकारियों द्वारा दूसरे दिन ता०६२-१९४४ को छोड दिये गये ॥ ४० ॥ गतो महात्मा निजपायवर्तिभिःममाधिभूमावुभयोनिजात्मनोः । समय॑ सबैःकुमुमादिभिः प्रियद्वयीसमाधीन्यवद्गलचितिः।।४|| महात्माजी अपने समी समीपरती जनों के साथ अपने ही भाम- स्वरूप दोनोंकी-महादेवमाई और बाकी समाधिपर गये । समीके साथ पुष्पादिमे दोनो प्रियजनों की समाधिमी पूजा करके, चेतना शक्ति पली जाती न हो, इस प्रकारसे लौट आये ।। ४१ ।। सर्षे लोग मुदितमनसा शुश्रुयांसो विमुके. वृत्तान्तं तं परमयमिनो गांघिदेवस्य हृद्यम् । द्रष्टुं राष्टुं चरणकमले यन्दिशासामुसाने, गापि यादिविपदममी नैकयारं जग ः ॥४२॥ महात्माजीक छूटनेका समाचार सब लोग मुनकर प्रसन्न हो गये। उनके चरणों के दर्शन तथा सरे लिये जलसाने (आगामाँ महल) के आगे (टरक्षित) उन लोगोने “गधी विजयी बनें" अनेको बार गना की ॥४२॥ स्वारघ्यं यस्य प पतिपतेः स्वाश्रमं संनिपत्य, सेवामाने हृदय रदगादेशकल्याणसिद्धेः । तस्यामाला पुनरपि ततो देशकाटी विचार्य, भिन्न भिन्ने पयि परियवा कोरि कालोपनिन्ये ।।१।। सेवामाममें अपने आमममें पहुँचकर म्याप्प मन्पन्न होनेर पुनः उन हदसमें देश पलारी मिदि की आगया उत्पन्न हो गयी। यतः देश, या विमार परफे महोंने मिन भिन्न मागति पलहर पिनारी समरdia पिया ॥४॥ स्यावन्यस्य प्रतिदिनमसौ इन्द्र पुग्यायवारं, फतुं पर विधायनेमारते मारतेरिन्।

पारिजातसौरभे वार्तामार्ताय॑पहृतिपरो विश्ववन्द्याब्जपादो, यातः शिम्लां तनितुममितो राजकीयैर्नरैः सः ।।४।। स्वतन्त्रताके पवित्र अवतारको शोभायुक्त भारतमें विविध रचनावाले यत्नों के साथ ले आनेके लिये दीनोंके दुःखहर और विश्ववन्द्य महात्माजी राजकीयपुरुषों के साथ वार्तालाप करने के लिये शिमला गये ॥४४॥ सिवानां मानसे जाता जिहासा भारतक्षितेः । तस्माद्रिटिशसचिवैनियुक्ता आगता बुधाः ॥४५॥ अंग्रेजों के मन में भारतको छोड़नेकी इच्छा हो गयी थी अतः ब्रिटिश- मन्त्रियों द्वारा नियुक्त विद्वान् यहाँ आये ॥ ४५ ॥ रसवेदग्रहब्रह्ममिते यैशवक्त्सरे चतुर्विशे तिथी मासे जान्युआरीतिभापिते ॥४॥ राजधान्या महापुर्यां तैः सहैव महायुधः । स्वराज्यमार्गशोधाय सेवामामाजगाम सः ॥४७॥ ता० २४-१-१९४६ ई. के दिन महानगरी राजधानी दिल्ली में उन महाविद्वानों के साथ स्वराज्यके मार्गका शोष करने के लिये यह सेवा. प्रामसे गरे॥४६॥७॥ ततश्च पश्चमे मासे मयोत्याख्ये इयाय सः। स्टेफर्ड क्रिप्स देहल्या द्रष्टुं प्रष्टुं च किन्चन ॥४८|| उससे पांच महीने माद-मई महीने में यह सर स्टेफट हिप्सको देगने-मिलने और कुछ पूछने के लिये पुनः दिली गये ।। ४८ ॥ म्बर तिप्रत्यक्षामिते संवत्सरेमिताः गपागल्या मुसल्माना अनुजग्मुः पिशापताम् ॥४९॥ १९४६ ई. उनमें भगमनीय मुगसमान गोयागली (मंगास ) में रिला परने लग गये।।९।।

चतुर्यः सर्गः हिन्दूनां वे सहस्राणि निजघ्नुर्नरपामराः । देहुर्मामांश्च समानि व्यपउहुः स्त्रियः शिशून ।।५।। उन पामर मुसलमानोंने हजारों हिन्दुओंको मार डाला। हिन्दुयों के गौरके गाँर थोर घर सब बला दिये गये। वियों और बच्चोंको उबाकर वह ले गये ।। ५.॥ जहुर्घनानि सर्वेपामाभरणानि राक्षसाः। बलाच्छतानि हिन्दूनां स्वमते निन्युरासुराः ।।५शा सब हिन्दुयोके धनको मुसलमानोंने चुरा लिया। गहने चुरा लिये । और बचईसीसे सैकड़ों हिन्दू समलमान बना दिये गये ।। ५१ ॥ इदं सर्व पृवं दुष्टः स्वीयसंख्याभिवृद्धये । मानप्रायदेशे पारिस्तानपदासये ॥५२॥ उन दुष्टोंने यह सब इसलिये किया कि उनकी वादाद वह बाप और जिस प्रदेश में मुसलमान् यधिक है वहाँ पर पाकिन्वान यन बाय ॥१२॥ वत्र शान्तिविधानाय ययौ सानुचरः प्रभुः । यद्गमूमी नवासल्या चिन्ताचऋयिचूर्णितः ॥५३॥ चिन्ता चळसे चूनित होकर श्रीमहामारी अपने सापियोफे साय नवराली में शान्ति स्थान लिये गये ॥ ५३ ।। आसीद्वद्नेयु सर्वेषु मुस्टिमटीगशासनम् । कालिकातापुरे तस्माद्विलम्यः कोयजायत । मारे पादार मुस्टिमलं नमी हुकूमत थी। मामला पोहा सा टन्हें दिलनामा ॥ ५४ ।। वनत्याव मुसल्माना निहन्युश्चेद्यतीश्वरम् । महदेय रिजापत तनिष्ट फरदम् II स्टानुचिन्त्य योगीः प्रार्थिवः सनि मह । वत्र गन्तुं परं मोनानस्वीपक इदं परः रक्षा पारिजातसौरभे वहाँकी सरिने विचार किया कि यदि नोयाखलीके मुसलमान महारमाजीको मार डालें तो बडामारी कलङ्क देनेवाला अनिष्ट बनाय बनेगा। ऐसा रिचारकर सारने महात्मानीसे प्रार्थना की कि यह सरकारी फौजके साथ वहाँ नाय । पस्तु उन्होंने इस बातको स्वीकार नहीं किया ॥ ५५ ॥५६॥ शासनेन ततस्तस्य नवसल्यां न्यरुध्यत । गमनं यतिराजस्य बभूव तदरन्तुदम् ।।५७॥ तब सर्कारने महात्माजीको नोवाखलीमें जानेकी आशा नहीं दी। यह घटना महात्माजीकेलिये बहुत दुःसद बन गयी ॥५॥ अगमनात्परं श्रेयो गमनं सैनिकैः सह । परामृश्येति धर्मात्मानुमेने शिष्टिनिर्णयम् ॥५८॥ महात्माजीने विचार किया कि वहाँ सर्वथा न जानेकी अपेक्षा फौजके साथ जाना अच्छा है, अत: उन्होंने सर्कार के निर्णयको मान लिया ॥५८॥ तच्छासनेन प्रतिरक्षणकामनेन, संप्रेपिताः स्वपुस्पाः पृतनाः सनाथाः । सेनैव सार्धमिति सैनिकमानवान्स, फपश्चचाल नरपेव च सार्वभौमः ॥५५॥ इति सर्यवधस्वतनपरमहंसपरिवाजकस्वामिश्रीमद्भगवदाधार्यपण्डितराजप्रणीते पारिजाससौरभ चतुर्थः सर्गः यतिराजकी रक्षाकी इच्छावाली उस सकारने उनके साथ सिपाही और निक तथा सेनापति भेजे। उन सैनिकोंको सींचते हुए महात्माजी एक चावर्ती राजाके समान चले ॥ ५९॥ इति श्रीपरमहंसपरियाजकरयामिश्रीमद्भगवदाधायपण्डितराजप्रणीते पारिजावसौरभे स्वोपराष्ट्रभापाटीकराया चतुर्पः सर्गः चा ८ पुर फरीद गं ज कमालपुर रगाही Pva -1 अन्य बिकापली १ पनीमामा asी पुरमा शिरन्धी पारनकोट प्रष्णापुर गपुर २ दमचर. HAH चंडीपुर ... "योगास जगतपुर। पार फतेहपुर पामा। सिंगापुर पन्ना भोलुनीभार देवीपुर। पाया ग्रामी ३०.1 राथपुर १५ १५.. फर्टल भेकेण्डस्टेज पाना सरकप जपाग लामपर.. प्रदेषपुर पूर्वराय DHशवपुर पाव पर UITZONTATO भरियालपुर मायwr. ऊपीजाउली मायाम परमपुर श्रीनगर मापपुर २ मादुरी नेछग्राम शरिया मगीरपाडा पिज्यमा 0-3 १. ल मी प ३ " हेमचडी पञ्चमः सर्गः कटिकतात उपेत्य महामतिः मुखितया च विवर्धितचिन्तया । यतिपतिर्यत रामपुरे निजा निरचिनोत्कृतिमाकृतिसुन्दराम् ॥ १॥ श्री महात्मानीन कलकत्तेसे मुम्बसे परन्तु चिन्ताके साथ श्रीरामपुर यार वहाँ हो अपने मुन्दर कार्यका निश्चय किया ॥ १ ॥ अधिसभं यतिराज व्याच तामुपगतां जनता यतिमीक्षितुम् । कथमई समुपागममत्र तत्प्रणिगटामि भवत्पुरतोखिलम् ॥२॥ सभामें उनके दर्शन केलिये यायी हुई जनताको उन्होंने कहा कि मैं यहाँ कैसे आया हूँ सो सब आपके समश्च कहता हूँ ॥ २ ॥ अतितरां पतितान्मनुजानहं गुरुपदं प्रतिनेतुमुपस्थितः । उपकुसिप्यति मामभिवोमिता सफलतेति न यत्तुमहं क्षमः॥३॥ मैं यहाँपर अत्यन्त पतित मानयोको उच्च पदपर पहुँचाने के लिये थाया है। इसमें पूर्ण सफलता चारों योर मुझे मिलेगी या नहीं, यह मैं नहीं कर सकता ॥३॥ हृदयतो यसता हि सता शिवं यदि न लभ्यत ईहितमात्मनः । किमपि तत्र न लोक्यत ऊर्जितं परिशुचःकटु वीजमयो हियः ॥ ४ ॥ हृदयसे कोई प्रयास कसा हो और क्ल्याभकारी मनोरथकी सिदि न हो तो इसमें शोक अथवा लखाका कोई बलवान् कारण नहीं है ॥ ४ ॥ सफलवापि च निष्फलतापि च प्रभवतो मिवये न कदाचन। प्रयतनस्य जनस्य हि कस्यचिनिरवधिय सास्तु सहावधिः ॥ ५॥ सफ्टता और निप्पलता यह दोनों चाहे योडी हो, चाहे अधिक हो किसी के प्रयनका मार काटनेमें असमर्थ है ॥ ५ ॥ ५

पारिजातसौरभे
प्रयतते यदि कोपि शुभाशयो भवति तत्र गतासुरपव्ययः।
-भवतु तजगतोस्य च भव्यतामहितमोदसुतोपसुकारणम् ॥ ६॥
यदि कोई आदमी शुभेच्छासे प्रयत्न करता हो और उसमें यह मर
भी बाय परन्तु मृत्युरा उसे शोक न हो तो उसका मरण समस्त जगत्के
भानन्द और सन्तोषका कारण बनना चाहिये ॥६॥
प्रयतमान उपस्थितकर्मणि प्रयतते सततं विरतोन्यतः।
भवति यत्नगता परिदर्शिता जगति निर्धमतो मिततथ्यता ॥७॥
यदि कोई आदमी सत्र ओरसे विरक्त होकर उपस्थित काममें ही
सतत प्रयत्न करता है तो उसके यत्नमें रही हुई प्रामाणिक तथ्यता निर्धम
रूपसे दिसायी ना सस्ती है ॥ ७॥
परमनिष्ठुरमानसमानया अचिरतो न भवन्ति दयालयः ।
परमयलभरः समपेक्षितः फलमनिन्द्यमभीप्सितमाप्स्यते॥८॥
अत्यन्त निर्दय मनुष्य जल्दी दया नहीं बन जाता । बहुत बड़े
यदकी यहाँ आवश्यकता है। प्रयत करनेपर पवित्र इष्ट फल
मिलेगा ही ॥८॥
भवतु शासननीतिरपीहचेद्धितकरी समभावपरायणा ।
फलमनूनमथोपरिलिप्सितं भवति हस्तगतं नचिरेण वत् ॥ ९॥
यदि सकारको नीति भी हितकारक और समभाव पाली हो तो
अवश्य ही शीघ्र ही इष्टपल मिल जाता है ॥९॥
जहतया निखिलं यदि हिन्दयो विवशतः परिपोढुमनीहितम्।
खुदालतामनुसन्दधते भवत्वयमतिईदये न विपश्चिताम् ||१०||
यदि हिन्दूलोग जडताके पारग राचार होकर अनिए सहन करने में
कुशल है तो विद्वानोके हृदयमें उनके लिये अपमान नहीं होना
पाहिये ॥१०॥

पञ्चमः सर्गः म इयमसह्यदशा निखिले विह प्रतिगताहृदयेन विधार्यताम् । अहमिमां जडतामपरोपि सन्क्षपयितुं क्षम एव न संशयः ।।१।। आप हृदयसे विचार करें, यह असह्य दशा यहाँ सबमें विद्यमान है । मैं इस जडताको अपर = असहाय होकर भी नष्ट करने में समर्थ हूँ ॥ ११ ॥ अहमिहायमवापयितुं फलं सुसकर पहुधैकतरं नहि। स्मथ तोपयितुं ननु केवलं ममसमागतिरित्यनुमन्यताम् ।।१२।। मैं यहाँ अनेक प्रकारका सुफल प्राप्त कराने के लिये आया हूँ, फेवल एक ही फलरे लिये नहीं । अथवा तो आप यह मान लें कि यहाँ मेरा आना स्थल मेरे सन्तोष लिये ही है ॥ १२॥ मम मनोनिहिता परमार्पिका परनिहिंसनवृत्तिविरोधिता। भवतु सानिसिमुपरीक्षिता सह मयेर नरासलिभूतले ॥१३॥ मै यहाँ आया हूँ कि मेरे मनमें जो हिंसाकी विरोधिनी अहिंसाके माव भरे हुए हैं, लोग मेरे साथ ही उसकी परीक्षा करें ।। १३ ।। यदि फलं न लभेहमहिसया भवतु सान कदाप्यफलोहिता। ममतपोन गत परिपूर्णतामिति विदन्तु तदा निसियाजनाः।।१।। यदि मुझे यहाँ अहिंसाते कुछ फल न मिले तो यह नहीं समझना चाहिये कि हिसा निष्फल वस्तु है। इतना ही मानना चाहिये कि उसके लिये जितनी तपस्या चाहिये, मुतमें पूर्णतया नहीं है ।। १४ ।। अहमथापि जगदापण्डितः कथयितुं न कदाचन शझुधः। इह न शासनमिच्छति शाश्वतं शमदमायुभयोरपि यर्गयोः ॥१५॥ मैंऔर पण्डित बपाहिलालजी पमीमा नहीं पाएपदे है कि बनाल सवार दोनों जातियों में शापव शान्ति नहीं चाहती है ॥ १५॥ अधिविहारमामहि किं वयं किमकरोदिदमन्त्र च शासनम् । इति विचारणयापरिसाधिवा मावि पात्मगता युगपरा ||१६|| पारिजातसौरभे बिहारमें हमने क्या किया और यहॉकी सकारने क्या किया, ऐसे विचारसे केवल अपनी हलकाई ही सिद्ध की जा सकेगी ।। १६ ॥ विहितमस्तुभयात्मपरीक्षणेयदि जनैः सकलेहरिसाक्षिकम् । उपकृतिर्वहुधा विहिता भवेजगत एव शमाय शिवाय च ॥१७॥ यदि मैं और आप सभी भगवान्को साक्षी बनाकर आत्मपरीक्षा करें तो जगत्की शान्ति और कल्याणके लिये विविध उपकार किये जा सकते हैं ॥ १७ ॥ अपायर्यामहाद्य न केवलं मुसलमानगणं परिनिन्दितुम् । अपितु हिन्दुजनानपिपीडितान्किमपिवक्तुमथापि विनिन्दितुम् ।।१८।। मैं केवल मुसलमानोंकी निन्दा करने यहाँ नहीं आया हूँ । प्रत्युत पीडित हिन्दुओंकी भी निन्दा करने और कुछ कहने आया हूँ ॥ १८ ॥ क्मिमवन्नवला इह हिन्दवः क गतवदलसाहससद्धृति । महि मनोबलमस्ति न दैहिक बलमिहास्ति विलोकितमैहिकम् ।।१९।। हिन्दृलोग निर्बल क्यों हो गये हैं । उनके बल, साहस, धैर्य यह सब कहाँ चले ! न मनोबल है, न शरीरबल है और न अन्य ऐहिक बल है।॥ १९॥ हरिजना मुखजानतिशिरियरे भुजजनीनुरूजांश्च पराक्रमः । उदयते न हि यावदुदारता द्विजजनेषु न तावदुदेति शम् ॥२०॥ हरिजन = अन्यज ब्राह्मणों, क्षनियों और वैदयोंसे अच्छे सारित हुए हैं। यह निर्वल नहीं बने हैं। जबतक द्विजातिमें ब्राह्मणों, क्षत्रियों और धैश्योम उदारता नहीं आती तबतक करयाणोदय भी नहीं होता ॥२०॥ स्थरातु नायमिमं न पतं स्पृशत्वयमिति व्यवहार उदस्यते । द्विजगणेन यदिप्रतियोगिता नहि समेष्यति हन्त कदापि तान् ॥२१॥ सद इसे न एये और या उसे न छूये यह व्ययहार अबतक ब्राह्मणादि.

पश्वमः सर्गः
काँक सभी वर्ग नहीं छोड़ेंगे तस्तक मुकाबिला करनेकी शचि उनमें नहीं
भारेगी। २१ ॥
यदि वलात्मतिधर्ममचापिता अबाहिन्दुमना न पुनर्निजम् ।
सपदि धर्ममुपेयुररातिता झभिभविष्यति गाढमुभायपि ॥२॥
जनर्दस्तीसे मुसलमान बनाये गये हुए हिन्दू यदि फिरसे अपने धर्मको
शीघ नहीं ग्रहण कर लेते तो दोनो जातियों में गाद शत्रुता पैदा
होगी॥ २२॥
निखिलधर्मगता गुरुता समा मम मतास्ति तथैव पुनः पुनः ।
उपदिशामि यथोदयमानुयान्मनसि सा परधर्मसहिष्णुता ॥३॥
सघ धाम गुरुत्व समान ही है। ऐसा ही में बार-बार भयको
उपदेश देता है जिससे कि मनमें परधर्मसहिष्णुता उत्पन्न हो ॥ २३ ॥
उपदिशेयदि कोपि कुमार्गितां परचनाहरणादि च यश्चनाम् ।
स हि भवेदिह निन्धतमस्तथा सदतमेय जनः म बिहीयताम २
पदि कोई कुमार्गमें जानेका, परधन-परदार थाटनेका मीर
वचना करनेका उपदेश करे तो यह बयत निन्दनीय है और मुहा
ही उसका सग छोट देना चाहिये ||२||
भवति धर्मतर मुमहान् म म प पटक यि नतः परे।
जनिमवापुरिम टिपा इरानुगगमय पृथंगेय में ॥५॥

७०
पारिजातसौरभे
किसी कारणके, छोडकर अन्यको ग्रहण करना कभी भी उचित नहीं
है। इसालिये यह कार्य मुझे तनिक भी रुचता नहीं है ॥ २६ ॥
मतिविकासमुपेत्य विचार्ययत्तमिह संपरिवर्तयते जनः ।
भवति तन्न विपाद विधायकं कचिदिति प्रथिता हि सतां मृतिः ॥२७॥
बुद्धिका विकास हो और मनुष्य विचार करके यदि धर्म परिवर्तन
परे तो यह कार्य चिन्ताजनक कभी न बने, ऐसा सजनोंका प्रसिद्ध
मार्ग है ।। २७ ॥
भवति धर्मतरो रचनेशी न सहसे परिवर्तनमल्पकम् ।
न निसिला रचना निखिलान्तरमहविधी क्षमतां दधते कचित् ।।२८।।
धर्मवृक्षणी रचना ही ऐसी है कि वह नरा भी परिवर्तनको नहीं
सह सकती। सभी रचना सपके अत करणको पकडने में समर्थ
नहीं है।॥ २८॥
जनधनामुमुरक्षणहेतवे भविकलाभमपेक्ष्य घ कहिचित् ।
न मुगुणं पचिदायहते ततो दुरितमेव च तत्परिवर्तनम् ।।२९।।
धर्मररिवर्तन यदि बन, धन, प्रागोयी रक्षावे लिये यहाँ सांसारिक
हामी अपेक्षासे किया गया हो तो कमी भी यह अच्छा लाभ नहीं
देता है। अतः धर्मपरिवर्तन पाप ही है ।। २९ ॥
समयदः जनेपु पिशाचता गतदिनेपु जनरयलोकिता ।
मम नवे पयसि प्रतियोक्षिता ननु मयैव निरशतान्यहम् ॥३०॥
गादिनों में रोगोने यहाँ पर जो शैतानियत देती है उसे तो मैंने
थानी नया अपम्पा गा देती है ॥ ३० ॥
यदि सन्नरयधिवमेफमप्युपनतं विनतं प्रतिपादितम ।
भपा चन्द्रमपश्यममुष्य सा ननु सेद्विमय मनुष्यता ॥३॥
पर प्रनताप हा एक भी नम्र सार में यजा तो अमुष्प-
reी मापसाग उठेगी ॥ १ ॥

पञ्चमः सर्गः बहुलतास्त्यधुनापि विलोकिता प्रतिदिनं नरराक्षसतोदितः। अतिकठोरमपि प्रतिवेपते हृदयमत्र न कापि विसंगतिः ॥३०॥ अभी भी यहाँ मारी शैतानियत रोज दिखायी पड़ती है। अत्यन्त कटोर हृदय भी काँप रहा है। इसमें कोई विसंगति नहीं है । हृदयका कम्प स्वाभाविक ही है ।। ३२ ॥ अहमपृच्छमिहाधिकृतान्यहून्यलयता वलतोवलहिन्दवः । स्वमतधर्ममुपेक्ष्य विवर्तिता बदत नेत्ययवोमिति यस्तुतः ॥३३॥ मैंने बहुतसे अधिकारियोंको पूछा है कि यहाँ निर्गल हिन्दुधोंको जबर्दस्तीसे अपने धर्मको छुड़वाकर मुसलमान बना लिया गया है या नहीं ? ॥ ३३॥ अपहता अयला अपिहिन्दयः समभवन्निह वा अपि धर्पिताः । धृतमहेशभया वयोवदन्सकलमेतदभूदिति निश्चितम् ॥३४॥ मैंने पूछा कि यहाँ हिन्दूस्त्रियोंका अपहरण किया गया है ? उन्हें सताया गया है ? ईश्वरसे डरनेवाले बहुतोंने कहा है कि हों, यहाँ यह सब अवश्य ही हुआ है !॥ ३४ ॥ किमपि कर्तुमिहाद्य न शक्यते निजवलादपि राजयलादपि । विमलधर्मबलायदभीप्सितं निखिलमातमतः सुकरं भवेत् ॥३५॥ स्ववलसे अयका सरिके बलसे आज यहाँ कुछ नहीं किया जा सकता । पवित धर्मके बलसे बो अमीष्ट है सब प्राप्त करना मुगम है।॥ ३५॥ विमतयोपहतानवलाजनानित इतः परिगोपयितुं क्षमाः। सुमतिदानसुनीतिमुरीतिभिर्वशयितुं विमतीनिह शक्नुथ ॥३६॥ बदमाश लोग हरकी गयी त्रियोंको घर उघर छिपा सकते है। परन्तु समझानेसे, मुनीतिसे, मुन्दर रीतिसे उन्हें दशमें किया जा सस्ता है ।। ३६ ॥

पारिजातसौरभ
अथ जवाहरलाल इयाय चेदधिविहारधरं त्वरयायुजत् ।
स्ववलमत्र कथ न तथाकरोदिदमिहारत्यनुयोज्यमनर्थकम् ॥३॥
और यह पूछना अनर्थक है कि पण्डित जवाहरलालजीने बिहारमें जाकर
शीम ही अग्नीशक्तिका उपयोग किया तो वह यहाँ क्यों नहीं करते ? ॥३७॥
अधिविहारमसी समुपागमन्नहि कदाप्यधिकारिवलं दधत् ।
भवति भारतसप्रथसेवकरतत उपेत्य यथामति तद्वयधात् ।।३८।।
पण्डित जवाहरलालजी बिहारमें एक अधिकारीके नातेसे नहीं गये
ये। वह तो भारत के प्रसिद्ध सेवक है अतः वहाँ जाकर जैसा उचित
जान पड़ा, उन्होंने क्यिा ॥ ३८ ॥
भयति यद्गधरा न विदूपिता व्यज्ञनि यन्त्र रवीन्द्रमहाकविः ।
अतत यष्टिमचन्द्र इनप्रमो निजयशोभिवितानमनुत्तमम् ॥३९॥
बिस बहालमें महारवि श्री रवीन्द्रनाय टाकुर पैदा हुए और जहाँ
सूर्यसमान भी हिमबाधूने अपनी यश पताका फाई थी यह बलाल
गन्दा नही है ॥३१॥
निजगृहं निजधर्मगृहाणि या निसिलहिन्दुजना विरदप्य ते ।
परिपलाय्य गता इति नो कृतं मतिमतामनुमोदितपर्तनम् ॥४०॥
गारेही हिन्दू अपने घर और मन्दिरों को छोडकर भागार चले गये,
पर घुदिमानोंके योग्य परहार उन्होंने नहीं दिया है ॥ ४०॥
मधृनिभियदि नर्निजमझनो नदि पटाप्य गौरभयिप्यत ।
किमपि पाद्गुतीय जनैरिद म्यजननीक्षितिगैरफरिष्यत ॥४॥
पदिपार र हिन्दू संग भग्न भरने पर भागार पले में
red तो भग्नी प्रमभूमिमे का अपमही पुछ अदाल
पाहिजे ॥४॥

पञ्चमः सर्गः
७३
यदि भवेयुरमी इह मेधिताः समिविरदमुतबुद्धिभृतां भृता ।
विरचितामवदन सद्धियः कतिपयः परमत्र विलोक्तिः
यदि वह सभी हिन्दू यहाँ इकटे होते तो सद्भुत बुद्धिमानोले मरी
हुई एक समा यहाँ बनायी गयी होती। उस समामें केवल योडेसे हो
विद्वान् न दीख पडते ॥ ४२ ॥
न समितेः समितिः कृतकृत्यतां नयति कंचन तेन शमान्विता।
भवति सात्र मयाय विधित्सिता परमहोन लभे कृतिकारिणः ॥४॥
टसीलिये यहाँ शान्ति समिति किमीको समितिकी कृतिकार्यता नहीं
मात करा रही है। मुझे वैयो मुनिति बनाना वहाँ इट तो है परन्तु
कारा नहीं मिल रहे हैं ।। ४३ ।।
शमकवे निखिलेः प्रयतेत तद्भवतु मानभृतः सम एपः।
भवतु नो पुनरत्र जनासुभिः प्रहसन रमणं हृदयच्छिदी ॥४४॥
शान्तिफे लिये सब मिलकर यदि प्रयत्न करें तो मानणं यह शान्ति
हो सकती है। और फिर यहाँ मनुष्योंक मागोंके साथ हृदयविदारक हसी
और सैल न हो सके ॥४॥
न हि भवेन्नरकण्ठनिस्तनं न हि मवेद्धनहानिस्पार्जिता ।
भवतु काप्यवटा न पिपिता शम इदास्तु वदा फलवानिति ।।४।।
यहाँ हर मनुमके गले न काटे चाय, रे गोंके धनको हानि न
की जाय और कोई भी स्त्री अपमानित न हो सके तब यह शान्ति मच्छ
मानी दार
गृहधरोपवनादि विषय ये परिवाचन एत्र वागमः।
शिमिहाजनपिप्यति चान्यया विफल एप भविष्यति स प्रमः ॥४६॥
पा, बीन, मान आदि छडकर को वहां चले गये हैं यहाँ
पदि टना यहाँ सागमन से ठो ही इमार होगा, नहीं तो वामन
म होगा ॥४६॥

पारिजातसौरभे
प्रतिपुरं यदि हिन्दुकुरानिनी सुमिरितो जनता परिरक्षताम् ।
परमशक्तिसमन्वित ईश्वरे ननतया निजधी प्रणिधीयताम् ॥४७॥
स्वमिह यो विपदोद्य रिरभिपेत्मतिविधात्यति तस्य सहायताम् ।
जगदधीश उदारमुहद्भवन्भवति नान्य उपाय उपस्कृतः॥४८॥
प्रत्येक गाँवमें हिन्दू और मुसलमान दोनों ही मिलकर यदि जनताकी
रक्षा परें, तथा जनता परम शक्तिमान् ईश्वरको अपनी बुद्धि सौंप दे तो
आज विपत्तिसे बो अपनी रक्षा चाहते हैं, अवश्य ही वह जगदीश्वर उदार
मित्र बनकर उनकी रक्षा करेगा। दूसरा अच्छा उपाय नहीं है ||४७॥४८॥
भयभयङ्कररूपविकल्पनाभयविमोहित्तहिन्दुगणः सदा
स्वसदनं परिहृत्य यथातथा व्यथितहृत्कमलोद्य पलायते ॥४९॥
भयके मयंकर रूपकी कल्पनाके भयसे व्याकुल बने हुए हमेशा
अपने घरको जैसे तैसे छोडकर दु:खी हृदयवाले हिन्दू रोज भाग
रहे हैं ।। ४९॥
इदमनार्यनिषेवितवमै तैयदि विहाय भयं विरहय्य च।
अविगणय्य कृतं च कुरानिभिः पुनरिहेयत एव तदा शुभम् ।।५।।
यदि हिन्दूलोग इस अनार्य मार्गको छोडकर भयको भी छोडकर
और मुसलमानोंने जो कुछ किया है उसका विचार किये बिना ही यहाँ
फिर आ जायें तभी ये होगा ॥५०॥
अहमिहफक एव समागतो भवति नो मम कोपि सहायकः।
नियसतिर्मुसलिम्भवनेय मे सुसमयी भविता सुखमेव क्षत् ॥५१।।
मैं यहाँ अषेला ही आया हूँ। कोई मेरा सहायक नहीं है। मुसल.
मानो घरमें ही मेरा मुखमय निवास है । अत: मुख ही होगा ।। ५१॥
सफरसंगिजनेभ्य ६ स्थितो मुसलमानजने. सह सस्थितिम् ।
रपयता प्रयतेन मया मनो मुसलमाननृणां परिभोत्स्यते ॥१२॥

पश्चमः सर्गः . मैं अपगे ममी साथियों से अलग होकर यहाँ रहा हूँ। मुसलमानों के साथ निवास करता हुआ मैं दनो मनको ममगा ।। ५२ ।। मम मनस्यपि यत्किमपि स्थितं तदिह ते निसिलं प्रविदन्तु । इति परसरसंगतिसाधनाद्वृदयमावविकस्थरता भवेत् ॥२३॥ मेरे मनमें मीनो ए है उसे यह लोग समझें। इस प्रकारते परम्पर मंग करनेसे हृदयका मार मिडेगा ।। ५३ ।। बहुगुणा कथितामयताखिरगुणमेव भयं नितरां मतम् । वदिह भीतिमपास्य हि हिन्दुमिविधरापरताध निपेन्यताम् ॥५४|| सब लोगोंने कहा है कि निर्भयतामें बहुत गुग है और भय निगुंग यस्तु है । यतः मीतिको छोटकर हिन्दू लोग धीरज रखें ॥ ५४॥ यदि भयाधरणीमयनादिकं निसिलबस्तुगणं परिमुच्य ते वहिरितः परियन्ति न फल्पये कमपि गण्यगुणादिगणं स्थिरम् ॥१५॥ यदि हिन्दूलोग मयने परवार मादि सब यलुओंको छोटकर यहॉसि बाहर बाते हैं तो में कोई अच्छा रियर लाम नहीं देखता हूँ ॥ ५५ ॥ प्यारेलालो मन्त्रिता में गतोसी लोकान्यातो भीतभीतापलाय्य । मार्गेष्ठा दांव रट्या व्यटच्यत्प्रत्यागन्तुं स्वीयगेई मुसेन ॥३॥ श्रीपारेलालजी मेरे मन्त्री है। उन्होंने सरके मारे भागकर बाते हुए लेगोको रास्ते देवकर, उनको रोमकर मुन्बसे उनके घर लौट दाने के लिये उनको पृधा 11 ५६ ॥ नासीत्तेपो पूर्वजोपार्जितं संग्राम गेहं गन्तुनालोरितुं वा । श्रद्धा धैर्य मादलं यापि तेन नो परवेयुः प्रेयसामाननं ते ॥५॥ थाने पूर्ववक आर्षित गाँर, परोदानने के रिअपमा देखने के लिये उनमें न सदा यो, न पै था, और न माहस ही या। इसमे का सल्लागावी भुषमी नहीं देष म.गे।।

जा
पारिजातसार
पच्छेयुर्वत्र यौर तत्र संप्राप्ताः स्युर्मुस्लमाना अनेके।
मंबन्न तरि वान्भीपयेरस्ते गारईि कुत्राविदग्धाः ॥२८१
इद्रिसवप्रसारमहंसारिमावस्यामिश्रीमद्भगवानपरिधराजयको
খাৱষ্যতী
एचमाम
पर दो बहाब रायगे, वहाँ ही अनेक अनुमान और
उनसे डरे हुए देशकर यह भी डगमे। तबका पाँव १९८५
कवि श्रीपरमहंसपरिमलकस्वामिभीमद्भगवदापापविरा
বাৱিনীম হোমায়া

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पष्ठः सर्गः
बड़हिन्दुहृदयन्यथा यतिभूयसीमनुभनन्यथार्थतः ।
शोकवेगलुलिताङ्गकोप्यसो धयपूर्वकमुवाच सद्वचः ॥ १ ॥
बनाल के हिन्दुओं की हार्दिक महती व्यथाको टीम टीक अनुभव
करके शोकके वेगमे यके शरीरवाले श्री महात्माजीने धैर्यपूर्वक वह
शब्द कहे।॥१॥
बन्यवो मम वचो हितप्रदं धर्मपूतमनघं निगम्यताम् ।
मा विभीत मनुजात्सरानमानीतिरंड्स इहास्ति कारणम् ॥ २॥
बन्युयो! मैं हितकारक, निटोंर और धर्मसे पवित्र वचन कहता
हूँ, उमे आप मुनें । सशस्त्र आदमियोंसे आर डरें नहीं। मय पारा
हेतु है ॥२॥
केवल रिमित सर्वशक्तिमत्सर्वदर्शिपरमात्मदेवनः ।
उदयाश परिध्य सर्वतः पारकर्म परिकुस्यतानपम् ॥ ३॥
सर्वशक्तिमान् तथा सवंदी परमात्मदेवसे ही वेवल टरना
चाहिए। उमके भयो पारसम को सब भोरसे न करके धर्मका
भानिमन करें।॥३॥
इन्ति चेत्कर्माप हिन्दुयालकं याटियामपिच हेन्दवीमिह ।
नो विधत्त हृदयरितां काचिच्छान्तिमायन शान्तचेतसः॥४॥
पदि कोई किमी हिन्दू बालक या बालिका का वध करता है तो मी
आर इदय में उठके प्रति अनुता न रग और शान्तचित्त होकर
शान्ति का आश्रय लें ॥४॥
शानिरति निरुपद्रुवा स्वयं सा विधास्यति शनै. शनैरिह ।
प्टिगमिरतिमानसाचनान्यिप्टरक्यथितवान्तमानसान ॥५॥

पारिजातसौरभे ते गच्छेयुर्यन यत्रैव तन सप्राप्ता स्युमुस्लमाना अनेके । भीतान्दृष्ट्वा तेपि वान्भीपयेरस्ते गन्तारस्तर्हि कुत्राविदग्धा ॥५॥ इति सवतनस्ववपरमहसपरिवाजकस्वामिश्रीमद्भगवदाचार्यपण्डितराजप्रणीते पारिजातसौरमे पन्चम सर्ग यह तो जहाँ जहाँ भायेंगे, वहाँ ही अनेक मुसलमान मिलेंगे और उनको डरे हुए देखकर यह भी डरावेंगे। तब वह लोग कहाँ जायेंगे। ॥५८॥ इति श्रीपरमहसपरिव्राजकस्वामिश्रीमद्भगवदाचार्यपण्डितराजप्रणीते पारिनासौरभे स्वोपशगष्टभाषादीकाया पम्पम सर्ग

पष्ठः सर्गः
वङ्गहिन्दुहृदयव्यया यतिर्भूयसीमनुमबन्यथार्थतः ।
शोकवेगलुलिताङ्गफोप्यसो धेयपूर्वकमुवाच सद्यः ॥ १॥
बलालके हिन्दुओं की हार्दिक महती व्यथाको टीक-ठीक अनुभव
करके दोकके येगमे यके शरीरयाले श्री महामाजीने धैर्यपूर्वक यह
चन्द कहे।॥१॥
वन्धवो मम पचो हितप्रदं धर्मपूर्वमनघं निशम्यताम् ।
मा विभीत मनुजात्संटाम्रकाद्रीतिरंस इहास्ति कारणम् ॥ २॥
बन्धुओ ! मैं हितकारस, निटोप यौर धर्ममे पनि वचन कहता
है, उमे आर मुनें । मगन आदमियोंसे आप डरें नहीं ! मय पारका
फेवलं यिमित सर्वशक्तिमत्सर्वदर्शिपरमात्मदेवनः ।
तद्भयाश परिधूय सर्वतः पापकर्म परिकुस्यतानयम् ।।३।।
सपंतिमान् तथा समंदी परमामदेवते ही फेरन इग्ना
चाहिए । ठमके भयो पारस्म को सब ओरसे मर करके धमरा
आनिम्न करें॥३॥
इन्ति चेत्तमपि हिन्दुयाटकं याटिरामपि च हैन्दवामिह ।
नोविपत्तहदयरितांचिच्छान्तिमाप्रयन शान्तचेतसः॥४॥
यदि कोई किमी हिन्दू बालक या बालिका का पर करता है तो मी
धार दर में उसके प्रति उत्रुता न रग सौर शान्तचित कर
शान्ति का मामय लें ॥४॥
पानिरति निद्रुता स्वयं सा पिपास्यति शनैः शनैरिए ।
पियामिरतिमानमाणनान्पिप्लयस्यापिठतान्दमानसान् ॥५॥

पष्टः सर्गः
७९
विद्वान् मुसलमानों के रचे हुए मैंने बहुवसे ग्रन्थ पढ़े हैं। परन्तु
कहीं भी धर्मदा कराने के लिये ऐसा मानह मैंने नहीं देखा है ॥१०॥
यो चलेन निशिताखानसंदनिन यदि या प्रवे।
धर्ममारहयितुं च कंचन स्वस्र हानिनवशचिनोति सः॥११
बो यादमी रटने का हथियार दिखाकर मिसावे धनं छुडानका यत्न
करता है यह अपनी दी हानि करता है।।११।।
भावितोत्र यदि कोपि संमजेदारहय्य निजधर्ममुन्धरः।
ईसलाममय भीस्मानः सेवनीय इति स प्रसिद्धयति ॥ १२ ॥
जो कोई याना धर्म छोडर बरसे इसलामको स्वीकार करे तो
इसका अर्थ तो यही है कि इसलाम हरपेकोमा धन है।॥ १२ ॥
धर्मसौष्ठवमिदं न गण्यते प्रागमीतिरिति तर कारणम् ।
धर्मचारणममीप्सितं भवेतद्भवेत सर धर्मसगिनः ॥१३॥
बलात्कारसे प्रग कराये हुए घमंत्री यह नुन्दरता नहीं गिनी
जायगी। उस धर्म प्रहा करने में तो प्रागों का भय मी कारण है। पति
धर्मप्रचार करना हो तो स्वय धर्मपालन करने वाला बनो। १३ ॥
ज्ञानपूर्यफमतो मतो मवेत्केनचिदि परॅनिपरितः ।
धर्म एष भरिता प्रिय द्वयोग्राहयिन्यति च यो ग्रहीप्यति ॥१४॥
दूसरेकै धर्मको यदि कोई शनपूर्वक उसे समझार मान लेता हो
तर यह धर्म प्रहग करनेवाले और प्रशा करानेवाले दोनोक लामके लिये
होता है ॥१४॥
कोपि यांचन पतिमा खियं पंवेद्यदि विश्गनुद्धिकः ।
सापि भीनियशगा जिहासतु स्यं न धर्ममिति में ध्रुग मतिः ॥१५॥
पदि कोई दुराचारी पारी हिमो पविश्वा सशर्म कर दे तो
भी यह परामें आर याने धर्मो धारने की इप्टान करे,
मेरीद मदिरे ॥ १९॥

पारिजातसौरभे नास्ति कोपि समयो विसंफटस्तस्य यो न विजिहिंसते परान् । तेन शान्तमनसा तपस्विनी भामिनी भवतु कालवक्त्रगा ।।१६।। जो आदमी दूसरोंकी हिंसा करने की इच्छा नहीं करता, उसके लिये कोई भी समय संकटमय है ही नहीं। अतः ऐसी स्त्रियोंको चाहिये कि वह शान्त मनसे मृत्युके आलिंगन के लिये तैयार रहें ॥ १६ ॥ ते भवन्तु पुरुषा अथ खियो मार्गयन्तु भगवत्सहायताम् । एक एव जगदीश्वरो महान्सर्वजीवसुहृदस्ति निर्मलः ॥१५॥ चाहे कोई सताये गये पुरुष हो अथवा सताई गई स्त्री हों, सबको भगवान्की सहायता ढूँढनी चाहिये । एक भगवान ही सर्व जीवोंका निर्मल और महान मित्र है ॥ १७ ॥ यः प्रसन्नवदनो भुजान्तरे मृत्युमार्तचिरसंगिनं वहेत् । सर्वश्वपरमेश्वरोवशस्तं स्वकीयहृदये विलाययेत् ॥१८॥ जो हस्ते मुखसे पीडितोंके चिरसगी मृत्युका आलिंगन करता है अवश्य ही उसे सर्यद्रष्टा भगवान् अपने हृदयमें लाचार होकर विलीन 'करते हैं ॥१८॥ एप एव परमो मतोस्ति में धर्म इत्यभयचारुशतः। तं प्रचारयितुमागमं सुसं साहसेन सह बगमेदिनीम् ॥१९॥ अमय निर्भयता दी जिसका सुन्दर शस्त्र है वही मेरे मत में परमधर्म है । इसीका प्रचार करनेके लिए मैं साहसके साथ इस वन भूमि में आया हूँ॥१९॥ यच्च तत्त्वमखिलेम्य उत्तम निर्भयं समुपदिश्यते मया । सत्समाचरितुमत्र मेभवद्भाग्यतोद्य ललितः समागमः ॥२०॥ बिम सर्वश्रेष्ठ तत्वया में सबको उपदेश करता हूँ उसीका आचरण परने के लिये भाज भाग्यो मेरा यहाँ शुभागमन हुआ है ।।२।।

andel
m
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जगदम्बा श्रीमती कस्तूरबा
नवजीवन कार्यानया मौजन्यम

पठः सर्गः ८१ पृच्छचते जनतया मुहुर्मुहुः शखधारणमवैधमस्ति किम् । किञ्चिदीन्यमिह पृच्छकेषु मे भाति मानवमनोहरान्तरे ॥२१॥ लोग मुझसे बार बार पूछते हैं कि क्या शनधारण करना अन्याय है ? मुझे मालूम होता है कि पूछनेवालोंमें कुछ निर्बलता-कमी है ॥२१॥ अध्यहिंसमधिराजते महान्सुप्रभाव इति मेस्ति निश्चयः । तत्समो न हि परं प्रवर्तते रोपदोपशमनाय साधनम् ।।२२।। यर्हिसामें बहुत बड़ा प्रभाव रहा हुआ है, यह मेरा निश्चय है । शोधरूप दोपको शान्त करने के लिये अहिंसाके समान दूसरा साधन है ही नहीं ॥ २२॥ विद्यते न मनुजेपु साहसं हिंसनेतरजमद्य तेन ते । आणवादिभयदानसंग्रहे सन्ति दत्तमनसो मनस्विनः ॥२३॥ आज मनुष्योंमें हिंसा करनेके सिवाय कोई अन्य साहस ही नहीं पैदा हुआ है इसलिए अणुबाब जैसे भयङ्कर अस्रके सग्रहमें सब लोग ग गये है ।। २३ ॥ कचन - स्वीयशीलपरिहायसङ्कटापन्नकालमधिगत्य अभ्युपायमनत्य सद्रता प्राणहानमभिवष्टु कापि हि ॥२४॥ जब अपने शीलधर्मके त्यागका सक्टमय कोई समय आ बावे तो पतिनता श्रीको चाहिए कि यदि कोई दूसरा अच्छा उपाय धर्म बचानेके- लिये नहीं है वो, मागत्याग कर दे । ॥ २४ ॥ वा न लिम्पति पतिव्रतान्वितामात्मघातजनिताहसो लवः । पापिपापकरसंगसंमुचं सेतुमेव बलहीनयोषिताम् ॥ २५ ॥ पतियता स्त्रीको आत्मघातका तनिक भी पाप स्पर्श नहीं करता है। क्योंकि वह स्त्री तो अन्य निल स्त्रियोंदे लिये पापियों के पापी हायके सगले छुटाने के लिये पुल समान है ॥ २५ ।।

८२
पारिजातसौरभे
आत्मघातपरघातयोर्द्धयोगत्मघात संनियेषितः ।
वर्म केवलमपेक्ष्यते मया सर्वदोपपरिवर्जितं हितम् ।। २६ ।।
आत्मघात करना और दूसरोंकी हिंसा करना इन दोनोंमें आत्म-
घातका मार्ग ही यदि लिया गया हो तो वह हितकारक है और सर्वदोषोसे
रहित है ॥२६॥
इष्यतेनुदिवसं मया भवेच्छान्तिरत्र चिरवासिनी परम् ।
मानुपश्यति मनोरथो ममाद्यापि किश्चिदपि सत्फलं फलम् ॥ २७ ॥
मैं तो यही चाहता हूँ कि यहाँ स्थायी शान्ति हो। परन्तु यह
मेग मनोरथ अभीतक कोई मनोहर सुफल नहीं देख रहा है ।। २७ ।।
यावदन यवनाच हिन्दवः सोदरा इव वसन्ति नो सुखम् ।
वायद यसतिर्धवास्तु मे नो जिहासति मनो धरामिमाम् ॥ २८ ॥
जब तक हिन्दु और मुसलमान् यहाँ सगे भाईके समान सुखसे
रहने न लगे तबतक मैं यहाँ ही रहूँगा । इस भूमिको छोडनेको मन
नहीं करता है।॥ २८॥
सागसः स्वमपराधमासा ते नयन्तु विपुलं प्रकाशताम् ।
न्यायमन्दिरगतान कामये तानाताननभिनन्द्यबन्दिताम् ।। २९ ।।
जो अपराधी हो वह अपने बडेसे बडे पापको प्रकाशित कर दें।
मैं यह नहीं चाहता हूँ कि वह कोर्ट में जायें और कैदी बनाये जाय ॥२९॥
सर्य एष महिताः कुरानिनस्तानुपेत्य मतिदानपूर्वकम् ।
सजनै सुपरिमीलिते पथि प्रेरयन्तु मम मुद्देत्तदा ॥३०॥
मितने प्रतिष्टित मुसलमान हैं यद समी उन अपराधियों के पास
बाफर उ है समझार जिस मार्गमें सजन जाते हैं उसम जानेकी उन्हें
मेरणा परे, ता मुझे प्रसन्नता होगी ॥ ३० ॥
अन्यथा व्यनिकरामगामिना दुर्जनाध्यपदधीनिपेविणाम् ।
राजशासनविधानदण्डनं रोचते च मनसे ममाधुना ॥ ३१॥

पष्टः सर्गः ८३ यदि ऐसा न हो तो हुलह करनेमें वो अगुवा ये और दो मारी यारावी है उन सबकों कापरे यनुसार दष्ट मिले, यह मुझे अच्छा लाता है॥३१॥ नो नियम्य यदि तान्मतां द्विप शासने सुजनयुत्तिता नरेत् । कोपि धर्मपथर्विमानो न इवमिप्यति मुग कचित्पुनः ॥ ३२ ॥ यदि सार यच्छोंको हैरान करनेवाले उन को अच्छे मार्गमें न ले चाय तर तो कोई मी धमात्मा यहाँ किर सास भी न ले मंगा ॥ ३२ ॥ लुण्ठितानि निखिलानि ते धनान्यवेयुरधिकारियु स्वयम् । ग्लानिमप्यनुमवन्तु कर्मणो ज्ञानदीनचरिताच सर्वया ॥ ३३ ॥ ठन अपराधियोंने बो धन लूट लिये हैं उन्हें अपने चार दाकर अधिकारियों को मार दें । तया अगनपूर्ण अपने क्यि कर्मके लिये मनमें ग्लानिका भी यनुमन करे ॥ ३३ ॥ यन्निजार्थममिवान्छित मवेचत्परार्थमपि चेन्न काहिनम् । येन शुद्धमनसा न स क्वचिन्मुस्लमान इह गण्यते बुरैः॥३४॥ दो वस्तु अपने लिये ट है वही तु दूसरोंकरिये वो नहीं चाहता उसे विद्वान् लोग मुसलमानों में नहीं गिनते ॥ ३४ ॥ यो निजामपि कर्म नाचरेनो परार्थमपि वनिपेयवे। नो भवेत्स इसलामसंमतो नैर तत्र भगवान्प्रसीदति ॥ ३५ ॥ जो अपनेलिये भी कर्म न करे और दूसरोवलिये भी न करे वह सद्या मुसलमान ही नहीं है । ठमपर सुदा खुश नहीं होता है ।। ३५ ।। यो वदत्यनुदिनं मृषा बचो यो न पालयति मापितं निजम् । यः प्रवारयति चात्मपत्ययं नासि मे स मम शत्रुरेव सः ॥३६॥ जो हमेशा मुठ बोलता है, वो अपने बचना पालन नहीं करता

पारिजातसौरभे
है और जो अपने ऊपर विश्वास करनेवालेको टगता है उसके साथ
मेरा कोई सम्बन्ध नहीं। वह मेरा शतु ही है ॥ ३६ ॥
यो निजे हितमनारतं जनैः प्रत्ययं च परिरक्षितुं रतः ।
न प्रमाद्यति निजोक्तितोपियो वस्तुतोस्ति स हि मुस्लमान्परम् ॥३७॥
लोग अपने ऊपर विश्वास रखें, उस विश्वासको रक्षामें जो सावधान
रहता है, अपने वचनसे जो प्रमाद नहीं करता, अर्थात् अपने वचनका
पालन करता है, वस्तुत. वही मुसलमान है ।। ३७ ।।
ईश्वरेण रचिताछरीरिणो योनुकम्पत इह प्रतिक्षणम् ।
स प्रयाति नितरा जगत्पतेरीश्वरस्य परमानुकम्प्यताम् ॥ ३८ ॥
ईश्वरके बनाये हुए देहधारियोंपर जो सदा दया करता है उसपर
जगन्नाथ ईश्वरकी भी दया होती है ।। ३८ ॥
यः करेण रसनाविनतनैरप्युपास्त इह नापकारिताम् ।
वेद्य एव परमोत्तमः सदा मुस्लमान इति कोपि नापरः ।। ३९ ।।
जो हाथ से अथवा जीभसे भी किसीकी बुराई नहीं करता है वही
सर्वश्रेष्ट मुसलमान है, दूसरा नहीं ।। ३९ ।।
यो जनः प्रकुरते कुलान्वितामझनामिह कदापि मोहतः ।
तं त्यजत्यहह पामरं परं धर्म एप मम निश्चयोव्ययः ॥ ४०॥
जो आदमी कुलीन स्त्रीकी मर्यादाका भग कभी भी अज्ञानसे करता
है, उस परम पामरको धर्म छोड देता है, यह मेरा निश्चय है ।। ४० ॥
यः प्रधपति कदापि कामपि स्खों समुद्धतमतिश्च कामतः ।
यो विलुण्ठति परान्निपेयते मधमस्ति न हि भक्तिमानसी ॥४१॥
जो उद्धत पुरुष फामयश किसी स्त्रीको छेडता है, दूसरोको लूटता
है और मधपान करता है यह मक्तिमान ही नहीं है ।। ४१॥
कोपि मुस्लिम उताप्यमुस्लिमः पीडयते यदि कदा च फेनचित् ।
तस्य शीतमिह संविधीयतां यापि कापि सफल. सहायता ॥ ४२ ॥

पष्टः सर्गः
किसी मुसलमान्को अथवा मुसलमान नहीं है उसको भी कोई
दुःसी परता हो तो सबको मिलकर शीघ्र ही जो बन सके उसकी सहायता
करनी चाहिये ॥ ४२ ॥
संततं हि निसिलाक्षसंयमाद्धारणादनशनव्रतस्य च ।
ब्रह्मचर्यमुपसेव्यता जनमुस्लिमैमदनुयायिभिमदा ॥ ४३ ॥
हमेशा ही सर्थ इन्द्रियोंपर सयम रखकर, उपवास आदि करके मेरे
अनुयायी मुसलमानोंको ब्रह्मचर्य पालन करना चाहिये । ४३ ॥
सत्यधर्म परिगृह्य सर्वदा याबला परमपेक्षते न हि ।
खामिसेवनविधावनन्यता संदधाति जगतोस्ति सा धनम् ।।४४||
जो स्त्री सत्य मार्गमा ग्रहण करके अन्य पुरुषको अपेक्षा नहीं रखती
तथा स्वामिकी सेवा अनन्य भावसे करती है वह सारे जगतका
धन है ॥४॥
एवमादि भगवान्मुहम्मदः संजगावखिल मुस्लिमान्प्रति ।
मुस्लिमास्तु निसिला मुहम्मदे विश्वसन्तु वचनेषु तस्य च ॥४५॥
इस प्रकारसे (श्लो० ३४ से ४४ तक) मुहम्मद साहेबने सब मुसल.
मानों के लिये कहा है। मुसलमानोंको उनमें और उनके पचनमें विश्वास
करना ही चाहिये ।। ४५ ।।
पाटियालयसुधाजनिर्बुधाः मुस्लिमापि अमतुल्सलामिति ।
मुस्लमानजनताविशुद्धये सोपवासपटलं
समातनोत् ॥४॥
पटियाला स्टेटमें जिनका जन्म हुआ है उन मुसलमान बहिन
श्री अमतुल्सलामने मुसलमानोंकी शुद्धिकेलिये कितने ही उपवास
किये है ।। ४६ ॥
मत्पुरः समयपत्रमेकमालेसितं मुविदितैश्च मुस्लिमैः ।
स्वाक्षराणि निहितानि तत्र तैर्धर्मतत्त्वविबुधैर्निजेच्छया ॥४७॥

पठः सर्गः ८७ तत्र बालकगणाय शिक्षणं पोषणं प पहुथा इटुम्झिनाम् । चैलभक्तसदनादिदानतो धर्म एष भनिनां महानिह ॥२३॥ उनके पालकोंको शिशग देना, कियों को का, कल, पर आदि देवर सब प्रकारसे पोवा करना है। इनकानोंका र महान् धर्म है ।। ५३ ॥ शासनेन करणीयमस्ति सत्सर्वमेव परमलदादिभिः । किश्वनापि यदि फर्तुमिप्यते शोभते तदधिकं वदाप्रदम् ॥५४॥ सकारको सो सब करना ही चाहिये परन्तु यदि हम लोग कुछ भी करनेकी रछा करें तो यह अधिक शोभा देगा और यशोदायक भी होगा॥५४॥ आपदां व्यरवि धाम मुस्लिमैस्तेन तैरिह विचारपूर्वकम् । दुःखकसकशामिवाहिताः सन्तु हिन्दव इमे भृता भृशम् ।।५५५] मुसलमानोंने ही यह दुःख पैदा दिया है अतः उन्हें ही विचार पूर्वक इन दुःखी हिन्दुओं का पालन रक्षण करना चाहिये ॥ ५५ ॥ नो बलाद्भवतु साधितं किमप्याप्रडादपि च नापि लजया।

पारिजातसौरभे सर्व एव कुछ प्रख्यात धार्मिक मुसलमानोंने मेरे समक्ष एक प्रतिशपत्र लिखकर उसपर स्वेच्छासे अपने हस्ताक्षर भी दिये हैं ।। ४७ ॥ मिलिताः सुमुस्लिमास्तत्समस्तसमयानुपालने। उद्यताः प्रतिदिनं भवन्तु चेत्सुस्थमत्र निखिलं भविष्यति ॥४८॥ सभी मुसलमान मिलकर यदि उन प्रतिज्ञामोंके पालने में सदा तैयार रहें तो यहाँ सब कुशल होगा-शान्ति हो जायगी ॥४८॥ हिन्दयश्च विबुधाः कुरानिनः सर्व एव यदि शुद्धमानसाः। भूतमात्रमभिभूय संगताः स्युस्तदास्तु मम सुस्थिरं मनः ॥४९॥ सभी हिन्दू और मुसलमान् यदि शुद्ध मनवाले होकर गत वस्तुको भुलाकर मिल जाय तो मेरा मन सुस्थिर हो जायगा ॥ ४९ ॥ ये वचः स्वविहितं स्वयं सदा पालयेयुरभितोत्र मुस्लिमाः । ते प्रमाणपदवीमुपाश्रिवाः शोधयेयुरपिलाननार्यताम् ॥५०॥ अपने आप ही की हुई प्रतिशको जो मुसलमान् स्वेच्छासे भले प्रकार पालेंगे वह प्रामाणिक बनकर सबके मुखपर लगे क्लङ्कको धो हालेंगे॥५०॥ लुण्ठितानि सकलानि यन्नृणां द्रव्ययासवसनादिकानि ह। तान्कथं सुसुसितान्विदध्महे चिन्तयेति न शमं लभामहे ।।५।। जिन लोगोंके सब द्रव्य, घर, वस्त्र आदि लूट लिये गये हैं उनको किस रीतिसे मुखी बनाऊँ इसी चिन्तासे अशान्त बना हूँ ॥५१॥ तादृशान्यपि कुलानि पत्र हा पातिता धनसमर्जिपूरपाः । तत्र रक्षणमपेक्षितं परं किं च तत्र करणीयमतिहम् ॥५२॥ ऐसे भी परिवार है जिनके धन पैदा करनेवाले सब पुरुष मार माले गये हैं। उनकी रक्षा तो करनी है परन्तु कैसे और क्या करना यह विचारणीय है ।। ५२॥

पष्टः सर्गः ७ तत्र वालपगणाय शिक्षणं पोपणं च बहुधा कुटुम्विनाम् । चैलमक्तसदनादिदानतो धर्म एप धनिनां महानिह ||५|| उनके बालकोंको शिक्षग देना है, कुटुम्नियों को अन्न, वस्त्र, धर आदि देकर सर प्रकारसे पोषण करना है। धनवानोंका यह महान् घर्म है ॥ ५३॥ शासनेन करणीयमस्ति तत्सर्वमेव परमस्मदादिभिः । किश्चनापि यदि कर्तुमिप्यते शोभते तदधिकं यशःप्रदम् ॥५४ सकारको तो यह सब करना ही चाहिये परन्तु यदि हम लोग कुछ भी करनेकी इच्छा करें तो यह अधिक शोमा देगा और यद्योदायक मी होगा ॥ ५४॥ आपदा व्यरचि धाम मुस्लिमस्तेन तैरिह विचारपूर्वकम् । दुःसकर्कदाकशामिताडिताः सन्तु हिन्दव इमे भृता भृशम् ॥५५॥ मुसलमानोंने ही यह दुःख पैदा किया है अतः उन्हें ही विचार पूर्वक इन दुःखी हिन्दुओं का पालन रशश करना चाहिये ।। ५५ ॥ नो बलाद्वतु साधितं किमप्यामहादपि च नापि लजया। धर्ममात्रमनुसृत्य सर्वथा दीयतां किमपि या विधीयताम् ॥५६॥ जबर्दस्तीसे अथवा आग्रहसे अथवा लग्नासे कुछ नहीं करना है। धर्मका विचार करके ही कुछ दीजिये या कुछ कीजिये ॥ ५६ ।। जाध्यतो भाति चेत्समागम स्वीयमन्युपु विपत्पयोनिः । रोधनीय इह सोसिलैजनैरेप एव महता महान्गुण. ||२७|| यदि मूसनासे अपने भाइयोंपर विपत्तिका सागर उमड पडे तो सवको मिकर उसे रोकना चाहिये, यही महापुरुषों का महान् गुग है।। ५७ ॥ यच्च राज्यमुपलब्धजीवन शस्त्रयोगबरतो न तत्पुनः । याचितं किमपि कतुमुत्सहेमाश्रयोस्ति फलदायकस्ततः ।।५८ ॥

पारिजातसौरभे
जो राज्य हथियारके बलसे जीवन प्राप्त कर रहा है वह माँगनेसे
कुछ भी न कर सकेगा। अत स्वाश्रय ही फलदायक है ।। ५८ ॥
सेवयैव समगंसतात्र ये दु सिनामथ न तैविचार्यताम् ।
कार्यमेतदतिलविदं महत्प्रेयमेतदिदमस्ति नो तथा ॥२९॥
जो लोग यहाँ दुखियों की सेवाकेलिये इक्ठे हुए हैं उन्हें यह न
विचार करना चाहिये कि यह कार्य बहुत हलका है और यह बड़ा है,
यह कार्य प्रिय है और यह अप्रिय है ।। ५९ ।।
यो हि यत्र नियतोधिकारिभिस्तत्र सोस्तु सुरवलेपितः।
प्राणसंक्ट उपस्थितेपि तन्नो भवेत्परिजिहीपितं स्थलम् ॥६०॥
अधिकारियोने जिसे जहाँ नियत कर दिया हो उसे यहाँ इन्द्रके
वज्रका लेप बन जाना चाहिये । प्रागसकर उपस्थित हो तो भी उस
स्थलको छोडनेकी इच्छा नहीं करनी चाहिये ।। ६० ।।
कार्यमत्र यदतीतसंख्यका' प्रारभन्त ऋततन्तुभिः सिता ।
क्षुद्रमेव भवतीह तद्गुरु त्यागरागत उत व्यवस्थया ।।६।।
जिस कार्यको यहाँ सत्यकी डोरीसे बँधकर बहुतसे लोग शुरू करते हैं
वह क्षुद्र हो तो भी त्याग प्रेमसे और व्यवस्थासे गुरु बन जाता है ॥६॥
शिल्पिनोत्र विपदा प्रतारितामा जिघृक्षिपुरपेत्य गृध्नुताम् ।
दीयमानमयम तथोत्तमं द्रव्यराशिमिति मे समीहितम् ॥२॥
मेरी सलाह है कि जो कारीगर विपद्मरत बने हैं उन्हें थोड़ी रकम
सी जाय या बट्टो, परन्तु लोभमें पढकर उसे स्वीकार न करें ।। ६२ ।।
दीयते किमपि यैश्च तत्र सप्रेम कापि परणापि कारणम् ।
नो तथापि यदि तद्ग्रहीप्यते पारतव्यमपसारितं भवेत् ॥६३॥
जो पो छ किसीयो देता है उसमें शुद्ध प्रेम और अपूर्व दया
कारण होती है । तथापि यदि यह मल्यिा माय तो परतन्त्रतामसे रचाया
पा सकता है॥६॥

पष्टः सर्गः ८९ यः प्रयम्य तनुतो धनादिकात्सत्यतोपि समुपार्जितात्स्वयम् । निर्विशेदिह च यत्प्रमाणकं देयमेव समजाय तत्पुनः ॥६|| दो यादमी शरीरते प्रयास करके सत्यमे स्वयं पैदा किये गये धनमें से तिनका ठामेग करता है उतना पुनः उसे समाज को देना ही चाहिये ॥६४॥ अप्रदाय समजाय वदनं स्खोपयुक्तमिह वद्धनार्जकः । पौर्यमेव पुरते न चोरतः साधयेकमपि भेदमात्मनः ॥६॥ जितने धनका उमने स्वयं उरमोग किया है उतने धनको उम घनका पैदा करनेवाला यटि समात्रको नहीं देता है तो वह चोरी करता है और चोरमें तथा अपने में कोई भेद सिद्ध नहीं कर सकता ।। ६५ ।। कारणानि सलु सन्त्यनेकशी द्वेपरागजनितानि मानवे । ईशस्तत उपस्थितो भवेन्नित्यमेव कलहो विपत्प्रदः ।।३।। मनुष्योंमें राग-द्वेष आदिसे पैदा हुए अनेक कारण रहते ही है जिससे कि इस प्रकारका दुःस्वद कलह नित्य ही हो सकता है ।। ६६ ।। मुस्लिमा असमदेशमेत्य वे रिक्तभूमिमधिचक्रिरे स्वयम् । नीतिरीतिरियमस्ति न क्वचित्कारणं कलह एतदप्यय ॥६॥ अनुक मुसलमान भासाममें गये और वहाँ वो दीन खाली पड़ी यी उसपर याना अधिकार जमा दिया। यह कमी मी न्यायका मार्ग नहीं है । अगड़े में यह मी एक कारण है ।। ६७ ॥ शाति शासनमिमं प्रदेशकं किचनापि सबलं च दुर्घटम् । कन्चनापि सबलो जनो शनापृच्छय तन्न यसु हतुमहति ।।६।। इस प्रदेशमें सार चाहे सबल हो चाहे निर्बल हो, परन्तु कोई अलवान् बिना उसके धनको ले ले, यह उसके लिये योग्य नहीं है ॥ ६८॥ नित्यमेव मुविचार्य चार चेलिविदाचरितमस्तु कवन । घेमनत्वमिह नोद्यत्कचित्स्यान्न कोपि करहः समुत्थितः ।।१९।।

पारिजातसौरभे
यदि अच्छी तरहसे विचार करके कोई कुछ अच्छा काम करे तो न
तो कभी मनमुटाव हो सकता है और न झगडा ही खडा हो
सकता है ।। ६९॥
दालतापुरमुपेत्य मोहनः सर्वमोहनमुदाहरद्वचः
भूमिसण्डमिदमामिलरसभं स्वामिभिः स्वयमदीयताध मे ||७०||
दालतापुरमें पहुँचकर श्रीमहात्माजीने सबको मोहित करनेवाली बात
यह कही कि जमीन जिसमें कि अभी सभा हो रही है, इसके स्वामियोंने
मुझे आज दे दी है ।। ७० ॥
सर्यवर्णजनतोपमुक्तये भूरियं च भविता निरावृता।
या प्रवर्तत इहाद्य भावना सा सती भवतु दीर्घजीविनी ॥७१।।
यह जमीन सभी वर्गों और जातियों के उपयोगकेलिये खुली रहेगी। जो
पवित्र भावना आज यहाँ प्रवृत्त है, वह चिरजीषिनी बने ॥ ७१ ।।
प्राक्षणाश्च यणिजश्च मुस्लिमा अन्त्यजा अपि भुवोह सर्यदा।
सर्यमानयहितानुगामिनी कांचनापि सुकृति वितन्यताम् ॥७२॥
मादाग, पनिया, अन्न्यज, मुसलमान समी इस भूमिपर सबके
परयाग के लिये कोई भी सत्कर्म कर सकते हैं ।। ७२ ॥
नाहमस्मि मुपजो न याहुजो नोरजात इति नारिम पादजः ।
नैव हिन्दुरथ नेय मुस्लिमः सर्य एय मयि सर्यगोप्यहम् ॥७३॥
मैं स्यय वो न सामाग है, न क्षत्रिय, न पैश्य, न शुद न हिन्दू और
न मुगलमान । सब मुझमें है और मैं सबमें है ॥ ३॥
तेन पातु मम फोपि पिशन नेकपर्ण उपमोतुमईति ।
सर्पशिष्टजनता दतः सदा दमामिमा निजतयैष नियिशेत् ।।७४।।
इमलिये मेरी पिगी परतुको पोई एक ही वर्ण उपयोगमें नहीं ला
सकता । ममी शिध जनता इस भूमियो अपना मानपर इसका उपयोग
परे॥७॥

पष्टः सर्गः ९१ श्रीसुमाश्वसुरत्र जन्मना सर्वमानवसमानदर्शकः। बङ्गवीरवमुघां कृतार्थयामास कोपि विशयो न कस्यचित् ।।५।। मनुप्यमानको समानदृष्टिसे देखने वाले श्रीमाषचन्द्रबोसने इस बङ्गालकी भूमिको कृतार्थ किया है, इसमें तो किसीको कुछ कहना ही नहीं है ।। ७५ ॥ चित्तरखनमहाशयरसी संगतो निखिलदेशसेवया। पन्दिसन बहुशो गतो मुहुः कष्टमत्र बहुलं ह्यसोढ स: 11७६|| श्रीचित्तरञ्जनदासबाबूके साथ वह सम्पूर्ण देशकी सेवाके निमित्त शामिल हुए थे। बहुत बार जेल गये और यहाँ बहुतसे कट सहन किये ।। ७६ ॥ राष्ट्रसंसदधिकारिमुस्यतां द्विः प्रयात इह सुप्रभावकः । राजपूपसुरक्षितोप्यसो काबुलं स्यकलयागमत्पुनः ॥७॥ वह दो बार तो कांग्रेसके समापति बने हैं। सारी सिपाहियों के पहरेमेसे मी निकलकर अपने चातुर्यसे कानुल चले गये ।। ७७ ।। यूरुपेषु बहुलासु पूर्षु सम्प्रासरत्स च जपानमाप्तवान् । संचिकाय परम्गतसैनिकान्भारतोद्धरणदत्तचित्तकान् ||satt यूरोपके तसे नगरों में घूम कर यह जापान गये। वहाँपर भारतके उद्धारमें दिनका चित्त या ऐसे सैनियोको इसा किया ॥ ७८ ।। तेन चित्रकरमन यत्कृतं तत्तथैव विरलः करिष्यति । यद्यशः सुगममास तत्कृते प्राप्स्यतीतरनरोपि वा न वा ।।९।। उस सेनासे उन्होंने आश्चर्यजनक कार्य किया उसे तो विरला ही कोई करेगा । जो यश उनके लिये मुगम था उसे दूसरा कोई पावैगा या नहीं मी पावेगा ।। ७९॥ धीररसरूपधारिणो बन्दनीयवसुधेयमति सा। शोमवे न मनुजेषु केनचित्कारणेन सुतरापि संभिदा ।।510 - तस्य ९२ पारिजातसौरभ वीररसकी साक्षात् मूर्ति के समान उही सुभाषबाबूको यह वन्दनीय भूमि है। इसमें किसी भी कारणसे मनुष्योंमें अल्प भी भेद शोभा नहीं देता है।।८." सर्वमनुप्यदुपदुरिताद्यपनयनरत, भास्त यदस्य चेतसि भृतं तदपिलमिह सः।। निर्भयतो दयाजलनिधितनिखिलमिदः- स्तन यतीश्वरोचकथतातिपरिमितगिरा [1८शा श्रीमहात्माजीके मनमें जो कुछ भरा था, सबको सर्व मनुष्यों के दुःख और पापों के दूर करने में लगे हुए उहोंने सक्षिप्त शब्दों में निर्भयताके साथ कह दिया ।। ८१} विमलयचा यतीश्वर इहाधिविराष्ट्रसभं समागतान, निजहितमीहमानमनुजानुपदिश्य मुस्लिमान् । सक्लविषादसा दलनशक्तिधर. परमार्तसेवको, निजमुटजंस जर्जरितगान उदारयशा ययौ निशि ॥८॥ এবি বল্পবল্পমেনেৰােমিষ্টীমৰাধৰনমার - पारितातसौरमे पर संग पष्ट बालनेवाले, सर्वपारों को नष्ट कर सकनेवाले, दीनों सेवक, शिथिलमारीराले भीमहात्माजी यहाँ विराट सभामें अपना पल्याग पाइने या आये हुए मुसलमारा उपदेश देयर रात्रिमें अग्नी झोपड़ी में पोये|| ८२।। रति धीररमहससरिमामायामिनीमझगवहाचार्यशक्तिवरामगीते रिमायसौरभ लोरशभारतराष्ट्रभाषारीमायाँ पर स.

सप्तमः सर्गः श्रीमद्गांधोवंशजा कापि बाला तस प्रेयःसाधिपादेषु टीना । भक्तिप्रतापूर्णचिचा मनुःसा नावाखल्यां पाश्र्वभावत्वं गवासीन् ॥१॥ श्रीमहात्माणाधीची वंश टस हुई एक अर्व पालिका बो महामाजीक ही चरनोंमें लीन थीं, दो मति और ना पूर्ण थीं, विसका नाम श्रीमनुबहिन गाधी है, वह मोवाखीने महाना के पास दीरही थी। १॥ सर्वपां फारिचिन्तापरोसी गोपाडे तां युयोजातिवालाम् । गौवाचार्यः स्वानुभूतामृतस्तां हां कतुं प्रायमनियमेव ॥२॥ सबके कार्यकी चिन्ता रखनेवाले महात्माई ने श्रीमनुबहिनो गता पदमें लगा दिया। यह गीताचार्य याने अनुमसम्म बन्नले उनको हम करनेके दिये नित्य ही प्रवास करदे ॥२॥ गीतापाठोपत्ति यजो महायों योनामा गुप्यति श्रीमता च । शुद्धात्मा सन्नति गुद्वात्मतत्त्वंलोकारं भौतिगदुःस्पूणात् ॥३॥ मंतारा अपन एड मनस्य पद है। पहसे मानणालियोरा मन परिध होता है। पवित्र मनवाटा होकर मनुष्य दुग मौविक सोरम पृपा न आत्मतापमान करता है॥॥

९४
पारिजातसौरभे
अन्नं चौर्येणार्जितं भुञ्जते ये तेषां कुलो पारदत्येव तत्तु ।
नस्यात्साको जाठरे तस्य न स्यान्छान्तिःकाये मानसे वापि बुद्धौ ॥५॥
जो लोग चोरीसे पैदा किये हुए अन्नको खाते हैं वह अन्न उनके
पेटमें पारा जैसा बन जाता है। उनके पेटमें वह पचता नहीं है । उनके
शरीर, मन और बुद्धिमें शान्ति नहीं होती ॥ ५ ॥
चोरान स्यामेतिसःप्रयोज्यो यागो नित्यं श्रेयसा साधनाय।
नेयः कालो न क्षणो का क्षणायज्ञानुष्ठानेन कैश्चिद्विनात्र ॥६॥
हम चोर न बनें, इसलिये सबको नित्य ही कल्याण सिद्धिके लिये
याग करना चाहिये। यज्ञानुष्ठानके विना किसीको एक क्षण, आधा क्षण
भी याल व्यतीत नहीं करना चाहिये ।। ६ ।।
नायं यज्ञः सर्वथापेक्षतेत्र स्वाहाशब्दं घेदमन्त्रादिकं पा ।
आस्ते वित्तं यस्य नित्यं विशुद्धं तस्यायं स्यादेव सिद्धोप्रयासात ॥ ७ ॥
इस यज्ञको न तो स्वाहा शन्दकी अपेक्षा है और न किसी चेद-
मन्त्रादि की। जिसका चित्त नित्य पवित्र है उसको यह यज्ञ विना प्रयासके
ही सिद्ध है ॥७॥
दीनी निर्धनैर्वापि साध्यो वित्तपेक्षस्तेन नायं विचिन्त्यः ।
काममोधौ रागमोही विहाय स्वल्पेनैवानेहसा साध्य एपः ॥८॥
सामान्य दीन हो, धनहीन हो वह भी यह यज्ञ कर सकते हैं। इस
यरको धनकी अपेक्षा नहीं है। कामकोष, राग-मोह छोडकर थोड़े ही
दिनों में यह सिद्ध किया जा सकता है ॥८॥
नायं बुद्धि नाप्यधीति न यणं नान्यो कोरियोग्यतां पाछत्तीह ।
शान्तात्मा सन्सयोकोपकारी शीनं यज्ञं साधयेदेतगृद्धम् ॥९॥
या यर मुद्धि, विद्या, वर्ण अथवा अन्य किसी योग्यताको नहीं
पाहता। शान्तामा तथा सषका उपकारक बनकर शीम ही इस यशको
परना चाहिये।॥९॥

सप्तमः सर्ग: ९५ ये सं कालं जीवनं चापि नित्यं श्रेयो धातुं संनयन्ते परेपाम् । नो ते चौरा नापि ते भुत्ते या चौर्यणाप्तं किश्चिदन्नं कदापि ॥10॥ दूसरोंरा कल्याण करनेकेलिये जो अपना समय और अपना जीवन व्यतीत करते हैं यह न तो चोर है न चोरीका भन्न साते हैं ॥१०॥ यश्चान्येषां नोपकारं तनोति व्यथं कालं भावभोगैर्नयेद्वा। चौरश्चासौ पापवुद्धिर्नियोध्यः स्वार्थे लीनो यद्ध ईर्ष्यादिदाम्ना ।।१।। और जो परोपकार तो करते नहीं किन्तु सासारिक भोगविलासमें ही अपना काल व्यर्य बिताते हैं वह पाप बुद्धिवाले चोर ही है, ऐसा समझना चाहिये, क्योंकि वह वेवल स्वार्थपरायण है तथा ईर्ष्या आदि पागोसे घे हुए हैं ।। ११ ॥ अल्प योत्र श्रेयसि स्वे रतः सन्दीनानां वा रोगिणां संविधत्ते। सेवा सोसावल्पमेवादधाति स्तेयं चेत्येतद्धि विज्ञेयमायम् ॥१२॥ जो अपने हितमें थोडासा लगे हुए हो और दोनों तथा रोगियोंकी सेवा भी करते हों वह थोड़ी ही चोरी करते हैं ऐसा तत्वार्य समझना चाहिये ।। १२॥ यावन स्यात्सर्वथा स्वार्थहानिर्यावन्न ज्यादाता स्वीयचित्ते । संत्रस्ताना दुःखदावं निरीक्ष्य ज्ञेया नाव झपतिनं यत्से ॥१३॥ हे यत्से, जब तक सोशमें स्वार्थ नष्ट नहीं होती और जबराक पीडितोके दुःसदावानलको देसकर हृदयमें दयामाय नहीं उत्पन्न होता तब तक यहकी पूर्ति नहीं समझना चाहिये ॥ १३ ॥ त्यागोहन्ताया ममत्वस्य चापि शेयो यज्ञो गीतया योपितोसी। यावदूर नैत्यहन्ता ममत्वं तापमाशा यज्ञवस्य पूर्तः ॥१४|| आभाव और मममावका त्याग ही तो गीताके मत से यश है। बबतक अहन्ता और ममताका साग नहीं होता तबतक यादेयकी तिकी स्या आग है ।।। १४ ॥

९६
पारिजातसौरभे
एपा माता विद्यते मेहमस्याः पुत्रोस्मीति ज्ञानमाद्योतते चेत् ।
शुद्धेशुद्ध चापि चित्तेस्मदीये नैवद्यज्ञानुग्रहोस्मासु विष्ठेत् ॥१५॥
भगवद्गीता मेरी मा है और मैं इसका पुत्र हूँ, इस प्रकारका जबतक
ज्ञानोदय शुद्ध अथवा अशुद्ध चित्तम नहीं होता तबतक हमपर गीताकी
कृपा नहीं होगी ।। १५॥
एपा चास्ते मे स्वसा मे च पुत्री द्वे चैते स्तो यस्य कस्यापरस्य ।
यात्तिष्ठेन्मानसे रोग एप कास्तामाशा यज्ञदेवोदयस्य ॥१६॥
यह मेरी बहिन का पुत्री है और यह किसी अन्यकी है, बस्तक
यह मानसिक रोग विद्यमान है तबतक यशदेवके प्रकट होनेकी कोई
आशा नहीं है ।।१६।।
यः खं सर्वव्यापके सर्वरूपे भावाधीशे भावनातो महेशे।
श्रद्धाप्रेमश्रीभरेणार्पयेत्स श्रेष्ठो जीवो यज्ञमेनं वितन्यात् ॥१७॥
जो सर्वव्यापक और सर्वरूप तथा प्रेमके स्वामी परमात्मामें
अपनेको श्रद्धा और प्रेमसे अर्पण करता है वही श्रेष्ठजीव इस यज्ञको कर
सकता है।॥ १७॥
यो मध्यस्थं श्रीपति संविधायाधत्ते यज्ञ लोकसेयाख्यमिद्धम् ।
तस्मिन्नीशः स्या कृषी संनिधत्ते शुभ्रं लोकं ज्ञानिगम्यं स एति ॥१८॥
जो श्रीरामको मध्यस्थ बनाकर लोकसेवारूप यज्ञ करता है उसपर
इंदर अपनी कृपा फैलाते हैं और वह भानियोंके प्राप्य पवित्र लोकमें
पहुँच जाता है ।। १८॥
स स्यात्मातः शान्तिमात्यन्तिकी स प्राप्तः स्यानित्यमानन्दभूमिम् ।
पश्यन्दुःखे यापि सौख्ये समत्यं सेवाभावाद्यक्षमासेयते यः ॥१९॥
मुर और इसमें समानमायसे रहकर सेवा दिसे इस लोकोप-
कार रूप यरफो करता है यह आत्यन्तिक शान्ति पाता है और नित्य तथा
भानन्दमय लोक प्राप्त करता है।॥१९॥

पारिजातमोरमन
पढने (विहार) मे श्री महात्माजी प्रात कालीन भ्रमण कर रहे हैं और
कुमारी श्री. मनु गाधीश गीता उपदेश दे रहे हैं।
[फोर धीरे-
पी रार]

सप्तमः सर्गः ९७ यझेनानेनात्र लोकाअसंख्या क्षुत्क्षामाःसंबिनते स्वपिचण्डम । नायं यतः केवल लौकिकार्थ सूते सूते किंतु भव्यं परार्थम । देहं गेहं वा मति मानसं वा यत्किञ्चिद्वा तस्य चर्तत भूमी। तत्सर्व व्यापारयेल्लोकहेतोः सत्यं यज्ञं सेवमानो मनुष्यः ॥२०॥ इस सत्यरूप यज्ञको जो सेवन करे उसे चाहिये कि अपना शरीर, घर, बुद्धि, मन अथवा जो कुछ उसके पास हो उस सबको लोकहितमें लगा दे ॥ २० ॥ न स्युः कतुं सर्वलोकाः समर्था यज्ञं शुद्धं चेदृशं द्वेपशून्यम् । भाग्येनैवावाप्य एतादृशः स स्यात्मारामभूरिभाग्यैः कदाचित् ।।२१।। जिसमें राग-द्वेपका नाम भी नहीं है ऐसे इस पविनयज्ञको सब लोम नहीं कर सकते। यह यज्ञ तो आत्माराम और भाग्यशाली लोगोंको भाग्यसे ही मिल सकता है 1॥२१॥ किन्तु प्रास्यैवैपणाः सर्वदा ये सेवाभावात्तन्यते धीरचित्ताः। सौत्रं यज्ञ सूत्रचक्रेण नित्यं ते तं यज्ञं पूर्णरूपेण यन्ति ॥२२॥ परन्तु जो लोग पुत्रैषगा, वितैषगा और लोकैपणाका त्याग करके पीरचित्त होकर रोवामावसे चखेसे सूत कातकर सूत्रयश नित्य करते हैं पर पूर्णरूपसे यज्ञको प्राप्त करते हैं ॥ २२ ॥ येपो दृष्टि स्वार्थ एवास्ति नित्यं ये पाराध्यं चापि कृत्यं विधातुम् । ईहन्ते ते कृमशः सभजन्ते काथ्यं तत्सूत्रसत्रेण सत्यम् ॥२३॥ जो स्वार्थमें दृष्टि रखनेके साथ-साथ परोपकार भी करना चाहते हैं वह स्तयशसे वस्तुतः कृतार्थता प्राप्त करते हैं ॥ २३ ॥ नेत्रींनाः कर्णहीनाच लोका एवं यहं देवमाहर्तुमीशः ॥२४॥ इस सूत यजसे असख्य भूखपीडित लोग अपना पेट भर रहे हैं ।। अन्धे यौर रहिरे लोग भी यादेयका आवाहन कर सकते हैं ॥ २४ ॥ साधं प्रत्येकं च सूत्रण नाम श्रीरामस्य स्यात्मृतं चेसवित्रम् ।रा ७ पारिजातसौरभे यह सूत्रयज्ञ केवल लौकिक ही नहीं पारलौकिक फल भी देता है यदि प्रत्येक सूतफे साथ रामका पवित्र नाम स्मरण किया जाय ।। २५ ।। आचारः स्यात्सर्वथा चेत्पवित्रो न स्याद्यस्य स्वार्थसंश्लिष्टबुद्धिः । तस्यैवायं सेवितो यज्ञदेवः सन्किामानाशु सूते प्रसन्नः ॥२६॥ जिसका आचार अत्यन्त पवित्र हो और जिसकी बुद्धि स्वार्थमयी न हो उसीको यह देव प्रसन्न होकर सब पदार्थ देते हैं ।१ २६ ॥ यद्यतुर्वे प्रातरारभ्य सर्व राज्यन्तं तद्रामपादाब्जयुग्मे । श्रद्धापूर्व चार्पयामीति बुद्ध्या कृत्ये कृत्ये नास्ति दोषावकाशः ॥२७॥ "जो कुछ भी मैं प्रातःसे लेकर रात्रि तक करता हूँ, सब भगवान् गमफे चरणकमलों में श्रद्धापूर्वक अर्पण करता हूँ या करूँगा" इस बुद्धिसे वर्तव्य कर्म किया जाय तो कोई दोष हो ही नहीं सक्ता ॥ २७ ॥ यो नित्यं स्यादेवमोशप्रसत्त्यै रक्तो लोकश्रेयसां संविधाने । हास्यं पान क्रीडनं भक्षणं या सर्व कार्य तस्य सेवाभृतं स्यात् ॥२८॥ इस प्रकारसे जो मनुष्य भगवत्प्रसस्ताकेलिये लोककल्याण करने में लगा रहता है उसका साना, पीना, हँसना, सेलना सर्व कार्य सेवासे भरा हुआ होता है ।। २८ ॥ यद्यसेवाभाववसन्यते ते कार्य सर्व व्याप्तं स्यात्सदा तत् । निदोपत्वेनैव धत्ते महेशः साहाय्यं चापीह तस्याविकुण्ठम् ॥२९॥ ऐसे लोग सेवाभावसे जो जो कार्य करते हैं वह सब सदा निदोपतापूर्ण ही होते हैं। ईश्वर भी उसमें सम्पूर्ण सहायता करता है ।। २९ ॥ ये ये भत्ताःप्रीतियुक्ता भजन्तेमां तानित्यं योजये बुद्धियोगे। कृष्णः प्राहेत्यात्मगावामु नैतन्मिप्येत्येवं त्वं प्रतीहि प्रयोधात् ॥३०॥ गतामें भगवान कृष्णने बो यह कहा है कि "जो जो भक्त प्रीतियुक्त मेरी सेवा करते हैं में उन्हें मुदियोग-शानयोगमें जोड़ता हूँ" वह मिप्या नही है, ऐसा नमको विश्वास रखना चाहिये ।। ३० ।।

सतम सर्ग गीताज्ञान सपापापनुत्त्य गङ्गानोर विद्यते संशति । येत्त्यन्या ज्ञानमन्यच्छ्यन्ते नोवे सिद्धि प्राप्नुवन्ति प्रष्टाम् ॥३१॥ गावात शन सवपापोंका नारा दरने के लिये सपशधिमान् गहाल रामान है। ना इस ज्ञानका होकर अन्य ज्ञानका आश्रय रते है बह उत्तम सिद्धिको नहीं पाते ।।३१ ॥ थी ए एमे इत्युपापी ग्रहीत्या देवे कर्मण्यन न त्व प्रमु स्या । सर्वव्यापी नेश्वर सेरितोकि तेन स्यात्तर्युपाधि पाघि ॥३२॥ दसे, २ . ए., एम० ए० इन आषियों को टगर तुम देव म्ममें तो समय नहीं ही हो सकता। यदि सवव्यापा मगानका सेवा न का वो उन उपाधियोंसे क्या लाम। म वह उपाधि उगघि ही बनेगी ॥३२॥ सर्वा वाला सर्वत्रालाच वाच मन्येरन्ने शीनमेवानिशानि । विद्यागालात्यागपूर्व सपद्यागच्छेयुस्ते शान्तिकर्मान कर्तुम् ।।३।। यदि समा बालिकाएँ और समा बालक मरी बात माने तो मैं टनको बिना विचारे उपदेश दूरियर सब स्कूल-कालेज छोटकर एक दम महाँ शान्तिक पाममें आक्र या चाय ॥३३॥ लामस्तेपा चेटपारर्तुमीपल्टक्य' स्थाय वपरीया फलानाम् । टेशोस्मा लापवोपेत एष प्राप्य श्रीमद्गौरव पूनित स्यात् ।।३४॥ यदि परीक्षा उन फ्लो (बी० ए०, एम० ए० इत्यादि उपाधियों) का रोम उनका थोहा मी दूर हो सक तो यह हमारा देश बो गिरा हुया है, गौरवशाली होरर पूनित बन चाय ॥३४॥ चोतिक्रम्य स्वस्य शापिं विदध्यात्कार्य स स्यात्तीणनेग क्षणेन । नैतामुक्ति छानसपोरमदीयो ध्यायत्येवेनर दृश्योरपात. ॥३५॥ वो अपनी शक्षिसे अधिक कार्य करता है यह मोहे समयमें ही हतोत्साह हो पाता है। हमारा वित्रार्थिवां इस वचनका ध्यान नहीं करता इसीलिये उसका पतन देसा जाता है ||३५|| १०० पारिजातसौरभे स्वस्मिन्देशे पद्धतियोस्ति तस्याल्ल्यागः कार्यः सर्वथा नैर कैश्चित् । श्वेताङ्गाना रीतिमाश्रित्य सर्वत्रन्या लोका दु समाजो भवन्ति ॥३क्षा अपने देशकी जो पद्धति है उसका कमी क्सिीको त्याग नहीं करना चाहिये। अग्रेनोंकी रीतिका यहाँ के लोग आश्रय लेकर दुःखी हो रहे हैं ॥३६॥ यद्यायनास्त्येव राशिवहनां दुरुढीनां नार शङ्कावकाशः। किन्तु स्वस्थाभ्यस्तमार्गेण गच्छन्देशोयं स्यादाशु सर्वैरपीड्यः १३५॥ यद्यपि यहाँ भी बहुत सी निकृष्ट रूदियों वर्तमान है, इसमें सन्देह नहीं, परन्तु यदि यह देश अपने अन्यस्त मागसे चले तो शीघ्र ही सबका प्रशसापात्र बन जाय ॥ ३७॥ गीताज्ञानं सर्वपापापहारि श्रेय: प्राप्तुं चैकमानं सहायः । इत्येवं श्रीपूज्यपादाजगांधे. सर्वागम्या शाखगन्या मनीपा ॥३८॥ श्रीमद्भगवद्गीताका ज्ञान सर्व पापोंग हरण करनेवाला तथा मोशमासिका एक मात्र सहायक है ; सबकी समझमें न आ सके परन्तु शास्त्रद्वारा समझा जा सके, ऐसा यह विचार श्रीमहात्मागाधीजोका है ॥३८॥ पौत्री मर्नु प्रतिदिनं गुणवद्वरिष्ठां, गीतार्थमवमवबोधयति स्म देवः। साप्यायपादसरसीरहमानयन्ती, दुर्योधमर्थमधिगम्य कृताथिताभूत् ॥३९॥ इति सर्वतप्रस्वतनपरमहसपरिवाजकस्वामिश्रीमद्भगवदाचार्यपण्डितराजप्रणीते पारिजातस रमे सप्तमः सर्ग इस प्रकारसे महात्माजी अपनो पौत्री चि. मनुबहिन गाधीयो गीता अर्थका उपदेश करते थे। वह मी महात्माजीफे चरणकमलका मामय लेवर दुर्बोध अर्थको जानकर वृतार्थ होती थीं ॥३९॥ इति श्रीमहसपरियापयस्वामिथ्रीमद्भगवदापायपरिसराजप्रणीते पारिजातसारमै म्योपशमारराष्ट्रमापारीपायो रसम सर्गः 31048 अष्टमः सर्गः ऋष्यर्थरन्प्रेशमितशवीयसंवत्सरस्य प्रथमे हि भासे। शुभे तिथी तर्कमिते यतीशः समागतान्सर्वजनानगोचत् ॥१॥ ता० ६ जनवरी १९४७ ई. के दिन इकट्ठे हुए लोगोंको श्रीमहामा श्रीने कहा ॥२॥ थारम्भि यात्रात्र विथो द्वितीये महापवित्रे ऋतुसंमितार्याः । स्यात्सत्फला सेति विनम्नभानेः संप्रार्थये राममनन्तशक्तिम् ।।२।। सज्जनो! परह महापविन परके समान जिस यानात मैंने आरम्म क्यिा है वह सुफल बने ऐसी प्रार्थना रामसे करता हूँ ॥२॥ विमानतीत्यापरिचिन्त्यरूपान्परस्सहस्रान्प्रतिवासरोत्थान् । प्राप्नोमि सिद्धिं स्वमनीपितेर्थे यूयं प्रयच्छन्तु शुभाशिपो मे ॥३॥ प्रतिदिन आनेवाले बडे-बडे हजारों विश्नोंको पार करके मैं अपने कार्य सिद्धि प्राप्त करूँ, ऐसा आप सब लोग मुझे आशीर्वाद दे ॥३॥ हिन्दूमुसल्मानमनोविशुद्धिः प्रेम द्वयोः शाश्वतिकं च शुद्धम् । परस्परप्रत्ययशालिनी तो भयं भवेता परिहाय सम्यक् ।।४।। जिस कार्यके लिये यह याना है उसका वर्णन करते हैं। हिन्दू. मुसलमानों के मन पवित्र हो। दोनोंमें निय शुद्ध प्रेम पैदा हो । मय छोडकर दोनों ही परस्पर विश्वास करने लग जाय || एतत्समाराधयितुं मयेयं यात्रा समारम्भि फलं प्रकृष्टम् । धाता विधाता फलितेच्छकं मां नैवान शङ्काप्रसरावकाश.५il इसी उत्तम फ्लको प्राप्त करने के लिये मैंने यह यात्रा शुरू की है । भगवान् मेरी इच्छा पूर्ण करेगा, इसमें सन्देहके लिये अवकाश ही नहीं है ॥५॥ 31048 पारिजातसौरभे एतत्समीहापरिसाधनाय यात्रा न कंचिल्लभतेवकाशम् । संदोरते चेदिति वो मनासि तेषां समाधानमिदं प्रवित्त ।।६।। यदि आपके मनमें यह शङ्का होती हो कि उपर्युक्त सिद्धिके लिये याना करनेमें कोई कारण नहीं है तो इसका यह समाधान समझे ॥६॥ येषां तदन्तःकरणं पवित्रं त एव संशोधयितुं परेपाम् । मनोतिसूक्ष्मं दुरघं क्षमन्ते नान्यः स्वयं सन्तमसावलीढः ॥७॥ जिनका अन्तःकरण पवित्र है वही दूसरों के अतिसूक्ष्म पापी मनको शुद्ध कर सकते हैं। जो स्वयंभज्ञानी और अपवित्र है वह यह कार्य नहीं कर सकता॥७॥ येषां मनो भौतिपराहतं स्यानो साहसं यत्र पद् दधीत । कथं हि ते साध्यसभारमाजां मनः सशक्तं तनितुं क्षमन्ताम् 1121 जिनका मन डरा हुआ है, जिसमें साहसका नामभी नहीं है, वह लोग डरे हुओके मनको सशक्त कैसे बना सकते हैं १ ॥ ८ ॥ आतङ्कपङ्काभिकलङ्किता ये स्वरक्षणायापि विनात्रसंचैः। उपायमन्यं न विदन्ति ते किं रक्षा विधास्यन्ति भयातुराणाम् ।।९।। आतङ्कसे भरे हुए जो लोग हथियार विना अपना रक्षण करने केलिये कोई अन्य उपाय नहीं जानते हैं वह डरे हुओंकी क्या रक्षा करेगे १ ॥९॥ येपामहिंसेय पलं विशुद्धा शस्त्रास्त्रसंघेस्ति च निर्दरत्वम् । प्रेमामृताधन भृतं मनः स्यात्ते साधयिष्यन्ति महद्धि साध्यम् ॥१०) विशुद्ध अहिंसा ही जिनका बल है, अस्त्र शस्त्रोंके बीच भी जिन्हें निर्भयता है, प्रेमरूप अमृतसे जिनका मन भरा हुया है यह अवश्य ही हे से बडे कार्य को सिद्ध करेंगे।॥ १० ॥ त एव लोकाग्निशितानि शखाण्यत्राणि चोत्सर्जयितुं समर्थाः । प्रेमामृतं पायितुं प्रकोपक्ष्वेडमसारव्यथितांश्च सर्वान् ॥१३॥ पही लोग तीन अग्न राम्रोको लोगोंसे छुड़ा सकते हैं। वही लोग पोषरूप विषसे लेगोको प्रेमरूप अमृत पिला सकते ११॥

अष्टमः सर्गः १०३ प्रामाटाग्राममहं च सांसद्रामवासानविनिर्मल मे। थन्धुत्वभाषाफलितं मनोज्ञं प्रदर्शयिष्यामि मनः समुत्कः ॥१२॥ एक गाँवसे दूसरे गांवमें घूमता हुया में उन-उन गाँवों में रहनेवालोको मेरा मातृभाषपूर्ण, अतिनिर्मल मुन्दर मन उत्साह दिम्बाऊँगा ॥ १२ ॥ तवश्च मां यद्यन विश्वसन्ति भत्तोपि ये विभ्यति मुस्लमानाः।

१०४ पारिजातसौरभे मैं केवल ईश्वरमें विश्वास रखता हूँ । यहाँ पर उसीय बाहुबल पर सुखसे सोता हूँ । ससारकी उरती आगसे तपे हुए मुझ दुर्वर को और कोई आमय नहीं है ।। १७ ।। यूयं प्रतीताद्य वचो न या मे न तत्र यत्तव्यमई विजाने । सर्यान्तरात्मा परमात्मदेव शमोति बोंद्ध जनमानसानि 1|१८|| आप आज मेरे वचनका विश्वास करें या नरें इस विषय में मैं नहीं समझता कि मुझे क्या कहना चाहिये। मनुष्योंके हृदयको तो केवल सर्वतरात्मा परमात्मा ही जान सकता है ॥ १८ ॥ कर्तव्यमारते जगदीशपादपरायणस्यासिलमानवस्य । स आन्तरादेशमिहानुसृत्य क्रियापरः स्यात्स्वभियं निरस्य ॥१९॥ घरभक्त सभी मनुष्योंका कर्तव्य है कि अन्दरकी आवाजके अनुसार अपने भयको छोडकर क्रियापरायण बनें ॥१९॥ मन्येहमात्मान्तरजातशब्दजाल विभाव्यय समाचरामि । न तन भीति परिवाधते मां न वा मनः संकुचतीति सत्यम् ॥२०॥ मैं मानता हूँ कि मैं अपने अन्तरात्माके शब्दोंको विचार परके ही भाचरण करता हूँ। उस आचरणमें न तो मुझे भय लगता है और न मनमें सकोच ही होता है। यह सत्य वस्तु है ।। २० ॥ सिक्खा अपि स्नेहयशादुपेता आदेशमागृह्य हि शासनस्य । सार्घ मयास्मिन्युपिते प्रदेशे बन्धुत्वमाप्येव सदा चरन्ति ॥२१॥ सिक्ख भाई भी प्रेमवश होकर ही यहाँ सकारकी भाज्ञा लेकर आये हैं । इस प्रोधमरे प्रदेशमें माईपने को लेकर ही मेरे साथ चलते हैं ||२शा न ते निरोध्या कथमप्यवद्याचारावतारप्रतिकूलभावा। न घागता सन्ति नियोधुकामा कृपाणमात्मीयमपास्य धर्म्यमा२२॥ हम उनको रोक नहीं सक्ते क्योंकि उनके हृदय में हिंसा के प्रतिकूल अधमः सर्ग: १०५ माव भरे हुए हैं। यह यहाँ लडने फेलिये नहीं आये हैं। यह तो अपना धार्मिक कृपाम भी छोडकर यहाँ बाये हैं ॥ २२ ॥ सुभाषचन्द्रेण महोदयेन व्यरच्युदाता पृतना च तस्याः। प्रधानमुद्देश्यमिहाखिलेषु सान्यं स्वदेशोद्धरणादिकं च ॥२३॥ श्रीसुमापत्रावून एक उदार सेना बनायी थी। उसका प्रधान उदेश्य था-सब लोगोंमें-हिन्दू-मुसलमान-पारसी-ईसाई आदि में समानतामा व्यवहार और स्वदेशका उद्धार करना ॥ २३ ॥ गृहीतसाम्यप्रशमादिभाया भयप्रदाः सन्ति कदापि नैते। सुमापसेनानुगता इहैवा हिन्दूमुसल्मानसपर्ययय ॥२४॥ यह सबमें समान भाव रखते हैं। शान्तिके चाहने वाले हैं। अतः इनसे कमी डरना नहीं चाहिये। हिन्दू-मुसलमानों की सेवा करने लिये ही सुभाषरावूके यह सैनिक यहाँ याये हैं ॥ २४ ॥ एतादृशाः स्युः कथमार्तसेवारचा विरक्ता फरहादिकृत्यात् । मयानुवाच्याः प्रतियात यूयमस्मादिवि स्थात्मनिभा इमेद्य ॥२५॥ जो दुःखियोंकी सेवामें लगे हुए हैं, झगड़ा लढाईसे बो अलग है, मो मेरे आत्माके ही समान हैं ऐसे इनको मैं फैसे कहूँ कि तुम लोग यहासे चले जावो। ।। २५ ।। इमे जगद्ववयितुं प्रवृत्ता आडम्बराद्याश्रयणेन मैत्र । सेवा पुरस्कृत्य महार्चनीयं साहाय्यमत्रादधते ममापि ॥२६॥ यह लोग कोई आडम्बर आदि करके जगतको टगने के लिए तो प्रवृत्त नहीं हुए हैं। सेवाको आगे रखकर मुझे मी अमूल्य सहायता देते हैं ।। २६ ॥ सेवाममोपामिह चेत्त्यज्ञामि लोकापवादादयतोन्यतोपि । लघुत्वमात्मन्युररीकृतं स्थानीरमदेयं च जगत्समक्षम् ॥२७॥ यदि लोकापवादके कारण यथवा किसी यायमयसे मैं इनकी सेवा-

१०६
पारिजातसौरभे
इनके द्वारा की जानेवाली सेवाका त्याग करता हूँ तो मुझे मेरे मनमें
लघुता मालूम होती है और जगत्के आगे मुझे भीर बनना
पडता है ॥ २७॥
ततीर्थये वो गतशङ्कचित्ता यूयं समे विश्वसितेपु सम्यक् ।
भवेक्षतिः कापि कथंचनापि नाद्धा वचो मे हृदये फुरुभ्यम् ॥२८॥
अतः मैं आपसे विनय करता हूँ कि आप चित्तसे शङ्का दूर कर दें।
इनमे सम्पूर्ण विश्वास रखें। कभी किसी प्रकारको क्षति नहीं हो सकेगी।
मेरी बातको अच्छी तरहसे हृदय में स्थान दें ।। २८ ।।
चित्तेन चैतान्मलिनेन सिस्थानमामि चेत्स्यान्मम नाश एव ।
एते भवेयुर्यदि हन्त मिथ्याचारा बजेयुर्विवशा भुवोस्याः ॥२९॥
यदि मैं मलिनमनसे इन सिक्खभाइयोंको रसता होऊँ तो मेरा नाश
ही होगा । यदि यह लोग मिथ्या आचारविचारवाले होंगे तो इस भूमिसे
लाचार होकर चले जाएँगे ॥ २९ ॥
एवं समाश्वास्य महर्पिर्यो नोबाखलीयान्यवनान्कश्चित् ।
तैनाशितान्प्रज्वलितान्गृहादीन्स्थलास्थलं वीक्षितुमाट पद्गः ॥३०॥
महात्माजी इस प्रकारसे नोवाखालोके मुमलमानोंको किसी-किसी
प्रकार समझाकर उन्होंने जिन घरोंको जलाया था और नष्ट किया था
उन्हें देखने के लिये पैदल ही एक स्थानसे दूसरे स्थानमें घूमते ये ॥३०॥
श्रीरामपूरात्मथमं स चण्डीपुरं ततो मासिमपूरमापत् ।
फतेहपुरादासपड़ा तनोगाजगत्पुरं लामचरं
करप्पम् ॥३१॥
यात्राके क्रममा निर्देश किया जाता है। श्रीरामपुरसे चलकर,
चण्डीपुर गये। वहासे मासिमपुर, वहाँ से फतहपुर, यहाँ से दासपाडा,
यहाँसे जगतपुर, वहाँसे लामचर और यहाँसे करपाडा ॥ ३१ ॥
शाहापुरं प्राप्य गतो भटीयारपुरं च नारायणपूरमस्मात् ।
असो यतिर्दश्यरियां प्रपेदे वत्पारकोटं स इतारखोराम् ॥३२॥

अष्टमः सर्गः
फिर शाहपुर, मटियालपुर, नारायणपुर, दशपरिया, पारफोट, होकर
पश्चात् इतरखोरा गये ॥ ३२॥
शिरण्डिकेयूडिपनीयलानि गत्वा शनैर्दालतमाप तस्मात् ।
मुरायिमं चैत्य ततः स हलाबाद मुहम्मद्पुरमोयिवान्सः ॥३३॥
वहाँसे शिरण्डी, यहाँ से क्यूडी, वहॉ से पनियाला जाकर डाल्टा गये ।
वहाँसे मुराहम बार हसनाबाद और पश्चात् मुहम्मदपुर गये ॥ ३३ ॥
पाल्लां ततो वादलकोटचाटाखिले भओरं गतवान्महपिः ।
ततो जयागं झमकी नचोरीमेयं क्रमाअामचयान्ददर्श ॥३४॥
वहाँ से पाला, तर फिर वादलकोट, चाटासिल, भजोर, इसके बाद
बयाग, अममी, चोरिन इत्यादि प्रामाको महात्माजीने कमसे देसा ॥ ३४ ॥
प्रामेषु वा प्रामटिनासु घहिलातानि धामानि शतानि देव ।
ददर्श तस्माचिसिदे परं स देवप्रकोप यरनेपु मेने ॥३५॥
छोटे बड़े गायोंमें श्रीमहात्माजोने सैकडो जले हुए घरोंको देखा।
इससे वह बहुत खिन्न हुए। तथा यह मान लिया कि मुसलमानोंपर
ईश्वरका कोप है। अन्यथा वह इतना बड़ा पाप कैसे कर सकते ।। ३ ।।
वृन्दं शतानां निहताहतानां हिन्दूजनानां मुसलीमलोकैः ।
गृधैः शृगालैश्च निझन्यमानं क्षिती तनूनां स ददर्श तत्र ॥३६॥
वहाँ सर्वन महात्माजीने देखा कि मुसलमानोंके द्वारा मारे और
घायल क्थेि सैकडों हिन्दुओंके शरीरोंके वृन्दको थिषीपर गिद्ध और सियार
नॉच रहे हैं ।। ३६ ॥
केचिच्च तत्रातिभन्मदोपहिछन्नाड्डियुग्माश्च विभिन्नशीपीः ।
चिन्न विना विगतैरहस्ता गतेकपादा अपि केचिदासम् ॥३७॥
वहाँ किन्हींके दोनों हाय क्टे पड़े थे, किन्हींके पैर काट डाले
गये थे, जिन्हीरे सिर कटे थे, किन्हीं की नाक कटी थी, किन्हीका एक
हाथ कटा या और विन्दीका एक पैर कय था॥ ३७॥

१०८ पारिजातसौरभ स्त्रवच्छिरोभेदमहासधारा चन्च्याक्षिणी पापि च निकुपन्तः। शवेभ्य आच्छिद्य च मांसखण्डान्नश्नन्त आशासुच विकिरौघाः॥३॥ कहीं तो देखा कि सिर फट जानेसे उसमेंसे रक्की धारा निकल रही है और पक्षी- कौए-गिद्ध आदि उसे चोंचसे नोच रहे ये, कहीं देखा कि शव = लाससे मासको नोच नोचकर पक्षी चारों दिशाओं में बैठकर सा रहे है ।॥ ३८ ॥ कचिद्धताना च करा शिशूनामगुल्य आसन्मुवि संनिरीक्ष्याः । कचिद्भजौ कापि च पञ्चशाखान्कचित्कफोणींश्च तिर्ददर्श ॥३९॥ कहीं मारे गये हुए छोटे छोटे बच्चोंके हाथ और कहीं कहीं अगुलियाँ पृथिवीपर जहाँ तहाँ पड़ी हुई हैं। कहीं भुजा, वही हथेली और कहीं फेहुनी पड़ी हुई हैं। यह सब महात्मा ने देखा ॥ ३९ ॥ हा हेति कृत्या रुदतां तदोररताई जनानां हतवान्धवानाम् । विलुण्ठितागारधनप्रजानां ददर्श वृन्दानि स तत्र तत्र ॥४०॥ उन्होंने देखाकि जिनके सगा-सम्बन्धी मारे गये हैं, जिनके घर, धन, प्रजा सब कुछ लूट लिये गये हैं उनका समूह का समूह जहाँ तहाँ छाती दूट कूटकर रो रहा है ।। ४०।। माता हता मे हव एव तातोसिला हता मे वत बन्धवोय । गच्छामि के पुत्र दशा च फा मे स्याद्धन्द देवेन कृतं किमद्य ॥४१॥ मेरी माँ मारी गयी, पिता भी मारे गये, सब भाई मार डाले गये। मैं यहाँ किसके पास जाऊँ? मेरी क्या दशा होगी? हा देवने आज क्या दिया॥४१॥ हा नाथ हा माणपते विहाय मामद्य यातोसि कथं च कुत्र। वप्रेम नैसगिरमेय व सौहार्दमबैकपदे फ यातम् ॥४२॥ ई नाय, हे प्रागनाथ, आज मुझे छोटकर आप क्यों और यहाँ चले

अष्टमः सर्गः
गये । आपका वह स्वाभाविक प्रेम और गैहार्द घशभर में ही कहाँ चला
गया!॥४२॥
हे पुत्र कुन्नासि गतस्त्वमद्य मामतिहीनां जरठा विपन्नाम् ।
विहाय मा लजनकेन साधं गच्छन्कथं मामनयो न साकम् ।।४।।
हे पुन ! तू कहाँ है ? आज मुझ अंधी, बुड्ढी और दुखियारीको
छोडकर तू कहाँ चला गया ! यपने बाप के साय माता हुआ तू मुझे मी
साथ क्यों न ले गया ? ॥ ४३ ।।
अन्धौ कथं त्यं पितरो विहाय प्राया अपृष्दैव सुत क कस्मात् ।
हा वत्स कोय प्रभृति त्वया नौ हीनो जलं जीवित पाययेत ॥४ा
हे पुत्र ! तू अपने मातापिताको छोड़कर, पूछे बिना ही कहाँ भौर
क्यों चला गया १ हे वत्स, हे मेरे प्राण ! तेरे बिना आज हमलोगोंको
जल कौन पिलावेगा। ॥ ४४ ॥
एतत्त्वदर्थ सुत मत्स्यखण्डान्नवोदनं क्षुद्रयथितातिशीयम् ।
आसं प्रयासाननु पाचयन्ती क्षुत्तामकण्ठोसि गतः क तात ॥४५॥
हे भूखसे पीड़ित पुत्र ! तेरे लिये ही तो यह मछलियों और मात मैं
पकया रही थी; तू भूखा ही कहाँ चला गया १॥ ४५ ॥
एवं यहूर्ना प्रत्यापितॄणां गताक्षिकाणां च सचक्षुयां च ।
हा हा तदोर प्रतिपेपमारोदतां स शुनाव वचोतिदीनम् ।।४।।
इस प्रकारसे बुढे, अधे अथवा ऑसयाले छाती फूटकर रोनेवाले
मातापिताके अति दीनवचन उन्होंने सुने । ४६ ।।
तहस्ति पात्रं लवणस्य तत्र स्थितं मदीयं च तमाखुपात्रम् ।
तत्रास्ति मृत्पात्रमिदं च भिक्षापात्रं समाकर्पय शीघ्रमेव ॥४॥
वह नमक रखनेका पात्र है, यह मेरा एमासूका डब्या है, वहाँ
मिट्टीवा वर्तन है और यह मिक्षा मागनेका पार है। शीघ्र ही सको
बादर करायो॥४७॥

११० पारिजातसौरभे तत्रास्ति धोतं वसनं च तत्र शाटी च तत्रास्ति क्टश्च कन्था। एनांश्च शब्दान्बहु दुर्विधानां दद्गृहेषु श्रुतवान्महात्मा ॥४८] यहाँ धोती है, वहाँ साड़ी है, यहाँ चटाई है और यहाँ गूदड़ी है, इन शब्दोंको बहुतसे गरीबोंके जलते हुए घरों में उन्होंने सुना ।। ४८ ।। भृत्या इमाः सन्ति च रत्नपेटा इमाश्च वस्त्रविविधभृतास्ताः । इमा अलङ्कारभृताश्च मञ्जूपास्ताः सपद्येव बहिर्नयध्वम् ॥४९॥ नौकरो, यह रनकी पेटी है, यह तरह-तरहके कपड़ोंकी पेटी है, इनमें गहने हैं, सबको जरदी बाहर निकालो ॥ ४९ ॥ इमे च वेदाः स्मृतयश्च शिष्या एताः पुराणानि कियन्ति तावत् । शाखार्थपत्त्राणि गुरोः श्रुतानि सर्वाणि शीघ्रं पहिरानयेत ॥५०॥ यह वेद हैं, यह शास्त्र है, यह स्तिने श्रीगुरुजीके पास सीसे और लिखे हुए पुराने शास्त्रार्थादिके सर हैं, सबको हे शिष्यो ! शीघ्र बाहर ले आवो ॥५०॥ इमानि भस्मानि महााकाणि तथोपधानां निचयं महाव्यम् । एतं च तं सुश्रुतमाधवीयग्रन्थादि शिष्या बहिरानयध्वम् ।।५।। यह बहुमूल्य भस्म है, यह बहुमूल्य औषधियाँ है, इनको, उनको और सुश्रुत, माधवनिदान आदि ग्रन्थों हे शिष्यो बाहर निकालो ॥५१॥ धगद्वगत्प्रज्वलितेपु गेहेप्वयं निशम्यैव वचःप्रवाहम् । उत्तिष्टमानस्य महात्मनोस्य हिताय सर्वस्य मनो दुदाव ॥५२॥ धक् धक् जलते हुए घरों में ऊपर कहे गये शब्दोंको सुनकर सबके कल्यागके लिये प्रयत्न करनेवाले महात्माजीका मन दुःखी हो गया ॥५२।। गेहे गेहे सर्पदेहीय विष्टः श्राचं श्रावं सर्वलोकव्यथास्ताः । पावं पातं चक्षुपोरिधाराः स्मारं स्मारं रामदेयं स तस्यौ ॥५३।। पर-परमें आत्माफे समान जा जापर, सबकी उन व्यथाभोंको मुन

अष्टमः सर्गः
१११
सुनार, ऑसोंसे अश्रुधारा गिरा गिरामर, रामका स्मरण कर कर महात्माजी
यहाँ टहरे ।। ५३॥
शैयाकम्पः सर्चदेहेपि सायोः पादातेः सद्धर्मनिष्ठस्य तस्य ।
पादरफोटो नग्नपादस्य जातो नो वा जातु कापि कम्पायमार्गात् ॥५४||
इति सर्वतद्रस्वतनपरमहंसपरिवाजकस्वामिश्रीमद्भगवदाचार्यपण्डितराजप्रणीते
पारिजातसौरभे
अटमः सर्गः
महात्माजीके शरीरमें जाडेके कारण कम्प हो रहा था, धर्मनिष्ठ यह
पैदल और बिना चप्पल या जूतेके चल रहे थे अतः पैर फट गये थे,
परन्तु यह कम्प ओर वह पैरकी बेवाई उन्हें कभी अपने मार्गसे पम्पित
करने में सफल नहीं हो सकी ।। ५४ ।।
इति परमहंसपरिग्राजकस्वामिश्रीमद्भगवदाचार्यपण्डितराजप्रणीते
पारिजावसौरभे स्योपक्षभारतराष्ट्रभाषाटीकायाम्
अष्टमः सर्गः

नवमः सर्गः
उद्दिश्य कस्मिन्नपि शान्तिकाले मर्नु कुमारी निजगाद दिव्याम् ।
चाचं वसंस्ताणकुटारकेसो विचारचेता गतदेहबोधः ॥ १॥
किसी शान्ति के समयमें विचारपरायण और विदेह बने हुए महात्माजी
श्रीकुमारी मनुगावीको उद्देश्य बनाकर यह दिव्य वचन कहने लगे ॥१॥
स्याञ्चेस्थिरत्वं मम योग्यरीत्या भवेयुरेवान मयोपयोज्या: ।
अन्ये युवानोपि पवित्रयझे ह्यस्मिन्धरादूपणसंलवित्रे ॥२॥
यदि मेरी स्थिति यहाँ योग्यरीतिसे हो तो पृथ्वी के दोषोंको दूर करने-
वाले इस पवित्र यज्ञमें दूसरे नवयुवक भी मेरे उपयोगमें आ सकते हैं ||२||
रापराधिधिह संचरत्सु मुक्तेषु नो निर्भयतावकाशः ।
परन्तु निर्भीकतयात्र शिक्ष्यं स्थातुं भयाक्रान्तदिनेषु सर्वैः ॥३॥
यदि यहाँ कर और अपराधी मुक्तरूपसे फिरते हो तो निर्भयताकेलिये
कोई अवकाश ही नहीं है। परन्तु भयके दिनोंमें सबको निर्भीक होकर
रहना सीखना चाहिये ॥३॥
यावरसुशिक्षेयमुदारभावन स्याद्गृहीताचरिता च तावत् ।
पगुत्यमरमान्न कदापि जह्यात्परावलम्बित्वमुपासितं स्यात् ॥४॥
बबतक इस सुन्दर शिक्षाका उदारभावसे न ग्रहण किया जाय और
न आचरण किया जाय तबतक हम सदा पह ही बने रहेंगे। परायकी
सहायता लेनी ही पडेगी ||४||
ये विश्वसन्ति प्रतिहिंस्रवृत्ती शिक्ष्या च तैरिजनोपभोग्या ।
हिंसा न थालेप्ययलेषु वृद्धपथायलास्वप्युपशोभते नो ॥५॥
जो रोग प्रतिहिमामें विश्वास रहते हैं उन्हें चीरजनोचित हिंसा
सीपनी चाहिए। गल, वृद्ध, निर्बल और अबलाओं पर हिंसा शोभा
नहीं देती है ॥५॥

नवमः सर्गः ॥ येपामहिंसाउनमेव धर्मः प्रमार एतादृश एक काले । तस्यास्तु विज्ञेय उदात्तचित्तस्ने धर्मशोभापहतान्तराः ॥ ६॥ जिनका अहिंसाका व्रत ही धर्म है उन उदार चित्तवालों और धर्मकी शोमासे मोहित मनवालोंको उस धर्मरा प्रमाव ऐसे ही विपन कालमें जानना चाहिए॥६॥ भवेदहिंसा न वलं कदाचिनत्यभाजांघ भयान्वितानाम् । वीरकभोग्या नितरां यथा सा स्यात्तद्विधानीयमिहासिलेन ॥ निलों और डरपोकोंका बल अहिंसा कमी नहीं है। वह तो केवल जिस प्रकारसे वीरभोग्य बने वैसा सबको करना चाहिये । लोकानहिंसा विमलाजपादसंसेवनासक्तिभुजोपि भीतान् । वीक्ष्याध भीतोस्मि भवेन भय्यप्यावल्यशोभेव विराजमाना ||८|| जो लोग अहिंसाकै हो पुजारी हैं उन्हें भी भयभीत देखकर मुझे भय लगता है कि कहीं मुझमें अहिंसा कमजोरोंकी ही न हो ।। ८॥ यथायथं सास्ति भया गृहीता न वेति दातुं हि परीक्षणं मे । कत्तुं निरीक्षामपि मामकस्य चित्तस्य दायस्य समागतोत्र ॥९॥ मैंने उस अहिंसाका उचित रीतिसे ग्रहण किया है या नहीं, इस परीक्षाको देनेलिये तथा अपने चित्तकी दृढतारा निरीक्षण करने के लिये यहाँ माया हूँ ॥ ९ ॥ सन्तीह मद्रक्षणकार्ययुक्ताः सरानराजन्यजना आयुन सिम्सा अपि प रामः श्रीनिर्मला श्रीमनुरेपियामि ॥१०॥ मेरी रक्षा करने केरिये यहाँ सशस्त्र अनेक पुलिस मौजूद है। श्रीपरशुराम, श्रीनिर्मलबाबू और यह मनुगाधी मी है ही। सिक्स भी आ गये हैं ॥ १०॥ एते समस्तः परिवारितोहं स्यां निर्भयत्वेन ततस्ततो या। गच्छन्निति स्वात्मपरीक्षयैव स्थितिमंदीयेह विभावनीया ॥११॥ अनेके।

११४
पारिजातसौरभे
इन सब लोगोंसे घिरा हुआ मैं इधर-उधर निर्भयरूपसे जाता
हूँ| आत्मपरीक्षाकेलिये ही मेरी यहाँ स्थिति है, ऐसा जानना
चाहिये ॥ ११ ॥
उपद्रुवोद्यास्ति विहारदेशो दाहो गृहाणां धनधान्यलुण्ठः ।
बालाबलानामपहार एप मयः सदा पर्वत एव देशे ॥१२॥
विद्यारमें आज उपद्रव है। घर जलाये जाते हैं। धन-धान्य लूटे
जाते हैं। बालकों और स्त्रियोंका अपहरण हो रहा है। देशमें रोज यही
क्रम चल रहा है।॥ १२॥
होरेस् एलेगजेन्डर आगतस्तत्मोवाच तं योगिशिरोमणीन्द्रः।
अध्यात्मविद्यामधिकृत्य घाचा मृदया सदाचारमहागुरुः सः ।।१३।।
श्री० होरेस् एलेग्जेंडर यहाँ आये। उनको योगिशिरोमणि श्रीमहा-
स्माजी अध्यात्मविद्याके सम्बन्धमें मधुरवाणी से बेले ॥ १३ ॥
जानामि दोपान्प्रस्ताञ्जनेषु परं न तान्प्रेक्षितुमस्ति कामः ।
गुणानवालम्बत एव चेतो नित्यं मदीयं स्वहिताभिलापि ॥१४॥
लोगोंमें दोष आ गये हैं, इसे मैं जानता हूँ। परन्तु दोष देसनेकी
मेरी इच्छा नहीं है। मेरा चित्त स्वहितकी भी तो इच्छा रखता है।
परदोष देखने और विचारनेसे अपना मन भी मलिन होता है। उसके
मलिन होने से अपना अहित होता है। अतः मेरा चित्त नित्य गुणोंका
ही अवलम्बन परता है ।। १४ ।।
दोपानदोपाञ्जगदीश्वरोस्ति द्रष्टुं जनानां परमः समर्थः ।
त्रिपालवस्तुविदः पदं नो स्पृशामि तत्तत्र न मेधिकारः ॥१५॥
मनुष्यों के दोष और गुगको जाननेमें तो भगवान् ही परम समर्थ
है क्योंकि यह रिपालदी है। निकालदीके पदपर मैं नहीं पहुँचा हूँ
अत: उस निरीक्षणमें मेरा अधिकार नहीं है ।। १५ ॥
अयं परीक्षानिक्पोस्ति शाल उपस्थितोद्धा तय भाग्यकान्तेः।
पनि पस्तूनि ध शिक्षितुं पेदीदा तय स्यात्युचलं तय स्यात् ॥१६॥

नवमः सर्गः तुम्हारे मापने प्रतारी परीक्षाकेलिये यह समय बमोगे समान है। यदि तुम्हारे हृदयमें बहुत दलुओंको दानने की इच्छा हो वो नुम्हारा मटा ही होगा ॥१६॥ शिक्षा ग्रहीप्यत्यथ चेदमुप्मात्कालात्सदा त्यात्सहयायिनी ते । महाविपद्वारिधरो विकीर्णो भवेदिति स्युर्यहुलाशिपो ने ॥१॥ यदि इस कालसे नुम ठपदेशमा करोगी तो वह सदा तुम्हारासायी रहेगा । उससे महाविपधिरूप बादल विखर वावगे, यह मेग बहुत बड़ा आशीर्वाद है ॥ १० ॥ अयं महायन्न उपस्यितोद्यानुष्ठानमत्यानुदिनं मनो त्वाम् । चरवश्य पदवीं नयेव न निष्फलं तद्भविता कदाचित् ।।१८।। आज यह महायज्ञ उपस्थित है। इसका अनुमान, हे मनु, नुमको अवश्य ही ऊँचे पदपर ले डायगा । यह फी निष्फल नहीं होगा १८॥ प्राध्यः परेशः सतत वयेदं यच्छन्मनाशुद्धिमनुप्रहेण । सत्ये मनोवृत्तिस्थामयत्वं दास्यत्यवश्यं सद्यः सदा ते ॥१९।। भगवान्से तुम्हें रोज प्रार्थना करनी चाहिये कि कृपा करके मानसिक शुद्धि-प्रदान करे, एवं सत्यमें ही मनोवृत्ति और निर्मवता अपंग करे । वह बहुत दबाट है अश्य ही वस्तु देगा ॥१९॥ उपस्थिताश्चेत्सकलाः सहाया देवादितः कापि गता भवेयुः । अस्मिन्महासंकटकण्टकाट्ये तदा त्वयाहं सतुलो ब्रजामि ॥२०॥ इस समय वितने सहायक उपस्थित है, दैववश यदि यह सत्र चले दाई तो दस सकररूप दष्टकोसे मरे हुए समय हम दोनों सुखसे चल सकेंगे।॥२०॥ यदा समस्तै रहिती भवेव मित्रः सहायः परिचारकेश्च । तदा मनो नत्स्यति नामकीनं परं परेशानुसहायमन ॥२॥ जर सारे मित्र, सहायक और सेवा-रक्षा यादि करनेवालोंसे हम

पारिजातसौरभे
दोनों छूट जायगे तब केवल ईश्वरकी सहायता प्राप्त करनेवाला मेरा
मन नाच उटेगा ।।२१।।
नैराश्यमेत्यासिलसंगिनश्चेदावां परित्यज्य प्रतियजेयुः।
तदा समप्रं जगदा किञ्चिन्नपं नवं हन्त निदर्शयामि ॥२२
जब मेरे समी साथी निराश होकर हम दोनोको छोड़कर चले
जायेंगे तब मैं समस्त जगत्को कुछ नयी नयी वस्तु दिसाऊँगा ।। २२ ॥
स्वत्प्रार्थनादीनरवं महेशः श्रुत्वा प्रसद्यापि च सर्वलोकान् ।
हिन्दूमुसलमानजनान्सुमत्या
संभूपये सर्वजगत्पितासौ ॥२३॥
तुम्हारी प्रार्थनाके दीन शब्दको सुनकर और प्रसन्न होकर भगवान्
हिन्दु और मुसलमान सब लोगोंको सुमति प्रदान करेगा; क्योंकि वह
सारे जगत्का पिता है ।। २३ ॥
निरन्तरं चेत्तवपादकजसेवापदे मां नियुनक्षि देव ।
त्यक्ष्यामि यावत्तनु नान्तिकं ते मनुर्मुदा वाचमुदाजहार ॥२४॥
श्रीमनुगाधी प्रसन्न होकर बोली कि यदि आप मुझे सदा अपने चरण-
फमलकी सेवा में रसेंगे तो मैं जबतक शरीर रहेगा आपका सानिध्य
नहीं छोड़ेंगी ॥ २४ ॥
पदा ब्रजब्श्रीतिराज एक ग्राम जगामामकिनामधेयम् ।
सायं वत्राप्तमजापयस्तत्तृणद्रुमक्षीरमपाययत्तम् ॥२५॥
महात्माजी पैदल ही चलते हुए एक आमकी-नामक गाँवमें पहुंचे।
वहाँ सायकाल यसरीका दूध नहीं मिला अतः श्रीमनुगाधीने उन्हें नारियल-
का पानी पिलाया।॥२५॥
नेद पयस्तजठरे गतं सज्जातं कदाचित्सुपचं ततस्तत् ।
यभूप तद्रेचकमेय तेन वृद्धं शरीरं गतशक्ति जातम् ॥२६॥
यह नारियल्या पानी उनके पेटमें जाकर पचा नहीं मत एप यह
महामाजीपोरेघर हो गया। उससे उनका वृद्ध शरीर अशक्त बन गया ॥२६॥

नवमः सर्गः
११७
नेत्यपीटाव्यथितो महात्मा मृ मयाप्येकादेपतत्सः ।
भूमी ततो व्यप्रमनाः कुमारी मनुः सचिन्ता व्यधिता बभूव ।।२।।
निलता पीटासे पीटित होर महात्माजी एक टम मूति होकर
भूमिपर गिर गये । तब व्याकुल मनबाली कुमारी मनुगार्थी चिन्तित और
व्यथित हो गयीं ।। २७ ।।
श्रीनिर्मलं सा पुनराहयन्ती जाता मुशीलां मनसा क्षणेन ।
परं वदानी यविराजमा मनोमवद्रतरं ततोभूत् ।।२८।।
श्रीमनुगांधी निर्मल बाबूको बारबार बुलाने लगी और टास्टर
श्रीसुचीलाका स्मरण करने लगी। परन्तु उसी समय महात्माजोकी मूछा
गयी और कुशल हो गया ॥ २८॥
च्वाच सद्यः स मर्नु कुमारी किमर्थमाहूतवी त्वमन्यम् ।
कथं न रामस्मरणे त्वदीय लीनं मनोमा व्यथितं निरीक्ष्य ||२९||
उन्होंने तलाल ही मनुकमारीसे कहा कि तुमने मुझे पीडित
देखकर अन्यको क्यों दुलाया । तुम्हारा मन गमरमरगमें क्यों नहीं
लीन हुआ ? ॥ २९॥
श्रीरामनामास्ति महापर्व मे स आश्रयः सर्वनिराश्रयाणाम् ।
याच्यं मुशीला प्रति नैव किञ्चिद्भवेन्न वस्या हृदये विपाइः ॥३०॥
रामनाम ही मेरेलिये परम औपच है। निराश्रितों वही एक
आश्रय है। मुलाको भी कुछ नहीं कहना जिससे उनके मनमें
विपाद न हो ॥३०॥
स्यात्प्रत्ययो में यदि रामनानि सत्यं भदेस्प्रेन परं च तस्मिन् ।
स्ग्यो मरिप्यामि कदापि नैय पुनि प्रतीहीति वचो मदीयम् ॥३१॥
हे पनि, तुम यह विनाम रखो कि यदि गमनाममें मेरा निमास
होगा वीर पूर्ण प्रेम होगा नो मैं रोगी होकर कभी नहीं मरूंगा ॥३१॥

११८ पारिजातसौरभे यः कोपि तन्नामनि संरतः स्यात्सोपि प्रपद्येत मृति तथैव । तस्मिन्परस्मिन्ननुरागमाजां स्यादात्मशुद्धिस्तत एव शान्तिः ॥३२॥ जो कोई भी रामनाममें तल्लीन रहेगा यह वैसा ही शान्त मृत्यु प्राप्त करेगा। परमेश्वरमें जिसका प्रेम होता है उसकी आत्मशुद्धि होती है और उसीसे शान्ति मिलती है ।। ३२ ।। केपि स्मरेयुर्यदि रामनाम श्रद्धा समना न भवेच्च तत्र । शुका इयाज्ञानहता भवेयुः फलं किमप्यत्र परत्र नो या ॥३३॥ कोई रामनामका स्मरण तो करते हो परन्तु उसमें पूर्ण श्रद्धा न हो तो जैसे रामनाम बोलनेवाले सुग्गेको कोई फल नहीं मिलता वैसे ही उन्हें भी न यहाँ और न परलोकमें कोई फल मिलता है ।। ३३ ॥ यादग्भवेत्तिरिहान्तकाले तादृक् फलं प्रेत्य जना लभन्ते । तस्मात्प्रयत्येत विलोकितुं तैः समैर्जगद्राममयं सदैव ॥३४॥ अन्तकालमें जैसी वृत्ति रहेगी, मरने के पश्चात् वैसा ही फल मनुष्य प्राप्त करता है। अतः मनुष्योंको चाहिये कि सदा जगत्को राममय देसने का प्रयत्न फरे ।। ३४॥ रोगात्स्वनिन्दाश्रवणात्स्वकीयानिष्टनवाद्वापि मनोतिखिन्नम् । श्रीरामनामाभिजपेन शान्ति नयेत मन्त्रोयमनुत्तमोस्ति ॥३५॥ रोगसे, अपनी निन्दा सुननेसे और स्वजनों के अनिष्ट श्रवणसे मन अन्यन्त सिन हो जाता है। रामनामके जपसे उसे शान्त फरना चाहिये। गमनाम सर्वश्रेष्ठ मन्त्र है॥ ३५॥ प्रत्येकसंपत्सरजान्युआरीमासस्य पविशतियों चिरेण । स्वतन्त्रताप्राप्तिकृते प्रतिज्ञास्मृत्युत्सवः स्वीकृत एष देशे ॥३६।। प्रतिवर्ष २६ धीं जनवरीको महुत दिनोंसे स्वत-प्रताप्राप्तिपेटिये मतिकारमरगका उत्सव देशने स्वीकार कर लिया है ॥ ३६ ।।

नवमः सर्गः
११९
तस्मिन्दिने केनवनापि पृष्टः प्रोवाच दु.सादितमानसः सः।
हिन्दूमुसल्मानमुहत्वलाभाद्यज्ञोयमारख्य इह प्रदेशे ॥३७॥
उस दिन रिसीसे पूछनेपर दुखित मनवाले यह कहने लगे कि
इस बगाल प्रान्तमें हिन्दू-मुसलमानमें प्रेम प्रास हो इसके लिये मैंने यह
यश शुरू किया है ।। ३७॥
यतः प्रमृत्यन्न महासभाया जन्माभपद्भारतजन्म तच्च ।
नयं ततो प्रामगणेपु नाम स्वतन्त्रताया. समयाश्नुतान ॥३८॥
जबसे महासमारा मारतमें जन्म हुआ है तमीसे भारतका मी
नया जन्म हुआ है। तमीसे भिन्न भिन ग्रामसमूहों में स्वतन्त्रताका नाम
बैल गया।। ३८ ॥
तस्मिन्पवित्रे समये न कोपि हिन्दूमुसल्मानगतं विभेदम् ।
एकोप्यजानादिह मानरस्तद्वन्धुत्वदाम्ना निसिला. सितास्ते ॥३९॥
उस पवित्र समयमें कोई एक मनुष्य मी हिन्दू मुसलमानके भेदको
जानता नहीं था और इसीलिये सभी रन्धुताको डोरीसे बँधे हुए थे ॥३९॥
द्वेपानलोद्य प्रबल. प्रबुद्धो जन जनं प्रत्युभयत्र तेन ।
नाह विरङ्गा विवृतां पताकां शक्नोमि कतुं घरजर्जराङ्गः ॥४०॥
आज दोनों जातियोंमें मनुष्य मनुष्य के प्रति प्रवल द्वेपामि जल
उटा है। अत. तापसे मेरा शरीर नर हो गया है मत मैं तिर)
झण्डेको नहीं उडाऊंगा ॥ ४०॥
नकार एपोस्ति निजेच्छयैव बलान्न केनापि नियोजितोस्मि ।
उडाययेय प्रतिपेधितोपि सिताङ्गशिष्टया विकलां पताकाम् ।।४।।
सडा चढाने को मैं जो इन्कार कर रहा हूँ उसमें मेरी स्वेच्छा कारण
है । ऐसा करनेको मुझे किसीने कहा नहीं है। यदि अंग्रेजी सर्कार झंडा
उडानेसे मुझे मना करे तो मैं उस तिरंगे झडे को अवश्य उहाऊँ ॥१॥

१२०
पारिजातसौरभे
पूर्व यदासीदुभयोरभेदो हिन्दुर्न कश्चिन्न मुहम्मदीयः ।
सुहृत्त्वमासीदुभयोरतीय कालभोवत्स स्मरणीय एव ॥४२॥
पहिले जब दोनों जातियों में एक्ता थी तब न कोई हिन्दू था और न
कोई मुसलमान । दोनोंमें अत्यन्त सौहार्द था। यह समय तो अब केवल
याद करनेको रह गया है ॥ ४२ ॥
तदा पताकेयमुदगतेजा आसीत्समेषां परिरक्षणीया ।
देहेरपि प्राणपणेन चापि धन्याः स्तुतास्ते दिवसा प्रयाताः ।।४३॥
उस समय इस झडेकी रक्षाका भार सबके ही ऊपर था। शरीर और
माणसे भी यह रक्षणीय था। वह धन्य और प्रशसनीय दिन चले
गये।। ४३॥
परस्परस्मिन्नरितोद्गतास्ति रचन्तामहन्ता परिपालयन्तः ।
देशस्य दौर्भाग्यमुदीरयन्तो प्रजन्त्यमी अद्य विपत्तिवर्म ॥४४॥
परस्पर शत्रुता पैदा हो चुकी है। तू तू और में मैं करते हुए देशके
दुर्भाग्यको बढ़ाते हुए आज लोग विपत्तिके मार्गमें चले जा रहे हैं ।।४४॥
कस्मे कथंकारमहं मदीयां प्रदर्शयाम्यद्य मनोर्तिमालाम् ।
कस्मै पुनस्तां कथयामि कुत्र व्रजान्यधन्यो ननुकान्दिशीकः ॥४५॥
आज मैं मेरे हृदयके दुःखको किसे और कैसे दिखा। उन
दुःखों को पिससे पहूँ ! कहाँ बाऊँ ? आज मुश अभागेके लिये कोई दिशा
नहीं है।।४५॥
देशे दशेयं यदि यततेध सर्वत्र विश्वासलयो विभाति ।
महाप्रमाया भगवत्यनिन्द्या स्वतन्त्रता पं शरणं करोतु ।।६।।
यदि देश में आज यही दशा है, सर्वत्र विचारपा नाश हो चुका है तो
महाममायशालिनी भगवती स्वतन्त्रता माज किसकी शरण दे। ।।४६।।
सितत्य यामन न जातु भूयः स्थितिः कथंचिद्भुजगरफटेय ।
रझ्यामरीवारसरं गुभयुं प्रतीतते हन्द ययं हवाः स्मः ॥४७॥

नवमः सर्ग: १२१ , जैसे सर्पका ग स्थिर नहीं रहता वैसे ही अब अंग्रेल यहीं किसी तरह भी रह नहीं सकते। रशिया और अमेरिका एक यच्छे अवसरकी प्रतीक्षाम है। दुःख है कि हमारा सर्वनाश होगा ॥४७॥ भवेम चेन्नैव विधूतपापाः परस्परं विश्वसिमो न यापि । संभय कल्याणरता न या उद्देशय नाशो नियतो विभाति ॥४८ यदि हम सब पापों को खसेरकर परस्पर विश्वास नहीं करते और मिलकर कल्याणमें नहीं लग जाते तो मालूम होता है कि देशका नाय अवश्यंभावी है ।। ४८ ॥ यतः प्रभृत्येच पयं स्वदोपवीक्षापत्रीमा नितरां भवेम । सतः प्रभृत्येवमनर्थकारि करयादिकं स्यान्न मनःप्रसत्त्वे ।।४।। जमीसे हम अपने दोषोंको देखने लग जायेंगे तभीसे यह अनर्थ- कारी शगडा वगैरहसे मन प्रसन्न नहीं होगा ॥४९॥ वदा कथं दीनजनस्य सेवा श्रेयश्च लोकस्य भवेदितीह । विचारयियाम उदारमत्या न विम्मरिप्याम इदं गतं न ॥५०॥ तब वो उदार बुदिसे हम यही विचार करेंगे कि दोनोंकी सेवा और कल्याण हमसे कैसे हो । क्या उस समय इस भूतकालकी घटनाको हम भूल नहीं आयेंगे ? अवश्य भूलेंगे ॥ ५० ॥ अजायतेदं यदनिष्टमद्य निष्यते श्वोपि मनोव्यथाये। न ज्ञानतस्तन्मनुजा अकुर्वन्नैसर्गिक तलिखिलं हि वेद्यम् ।।५।। आज चो अनिष्ट पैदा हुआ है और जो कह पैदा ोगा उसे मनुष्योने ज्ञानपूर्वक पैदा नहीं किया है। वह तो स्वाभाविक ही समझना चाहिए।॥५१॥ प्रत्येच पापं हृदये वितता पश्चात्तपेच्चेबनवा कथंचित् । मनुप्यता तहिं विकासमार्ग प्रयास्यति आर्यमपास्य दूर ।।१२|| बनता यदि आप पार करके सतत होकर किसी प्रकार मी पश्चाताप करे तो मनुष्यता करताको हार विकासमार्गमें प्रयाग करेगी ।। ५२ ।।

१२२ पारिजातसौरभे मुहम्मदीया न तदा निहन्युनिरागसोल्पानबलांश्च हिन्दून् । हिन्दयो मोहमदीयलोकरक्तप्रवाहान्परिवाहयेयुः ॥५३|| तब न तो मुसलमान अल्पसंख्यक, निर्मल और निरपराधी हिन्दुओं को मारेंगे और न हिन्दू मुसलमानों के खूनको बहावेंगे ॥५३॥ द्वेषो महादोष इति प्रसिद्धः शास्त्रेषु लोकेषु च सर्पदेव । दोपान्निराकृत्य मनुष्यजातिर्देवत्वमायास्यति नान्यथेति ॥५४|| शास्त्रों और लोकमें भी हमेशा यह कहा जाता है कि क्सिीसे द्वेष वरना बहुत बड़ा टोप है। मनुष्यजाति दोषों को दूर करके ही देवता बन सकती है, अन्यथा नहीं ।। ५४॥ इच्छन्ति यद्यपि जनाः सक्लाः पृथिव्या, शान्ति सुसं निरवधि प्रलयं समन्तात् । आधेतथा व्यथितमानसवृत्तयस्ते, व्याघेरपि प्रतिदिनं न परं कृतार्थाः ।।५।। यापि ममी लोग शान्ति और निरवधिक सुरसकी इछा करते है। जब उनकी मनोवृचियाँ थक जाती है तब वह आधि और व्याधिक नासनी मी इच्छा करते हैं परन्तु यह कृतार्थ नहीं है ॥५५ ।। पाताय॑माइलेष्टुमपीह पामिच्छा भवेच्चेसरिहाय सर्षान् । फामादिदोषान् मनसः प्रसाद युक्ता भवेयुर्न परोस्ति पन्थाः ।।५६|| इति सर्वतग्रस्तम्प्रपरमहसगरिमाजकामिधीमद्भगवदापायपपिटतराजभणीते पारिजातसौरभ नवमासागर पद पर अपनी पतायंता पारवेसे तो उन्दे माहिये कि कामादि दोषोशे छोडकर मनको निमस्तागे रुग जाय । दुसरा मार्ग न है ॥५६॥ रविधीपरमहमपरिमागरयामिधीममगषदायापणिरामप्रणीत पारिजातमोरम स्वोपसभारतराष्ट्रभापारीमा मयमा सनः दशमः सर्गः श्रुत्वा विहारधरणिप्रसरेविभीम, हिंसादुरन्ततटिनीजवसंप्रचारम् । हिंसासुरीहृदयदारणदक्ष एप, श्रीमान्यतिर्गलदशेषसुखो बभूव ।।१।। बिहारकी भूमिपर अत्यन्त भयङ्कर हिंगरूप नदीके वेगवान् प्रवादको सुनकर हिंसा-राक्षसीके हृदयको फाइनेमें कुशल श्री महात्माजी अत्यन्त दुःखी हुए।॥१॥ खस्य प्रियं प्रियतरं च विहारमेय, शान्तं विधातुमचिरं नवसालिदेशात् । मद्दसैयदविदत्तसमस्तवात- स्तोत्रं जलन्स हृदये प्रययो विहारम् ॥ अपने प्रिय और प्रियतर विहारको शान्त करने के लिये महात्माजी हृदयमें दुःखी होकर नोवाखालीसे निहार गये। डा. महमूदसैयदने उन्हें सब वृत्तान्त भेज दिये थे ।। २॥ उत्कम्पक शमयितुं स दवं दयालु- रुन्मत्तभूतमथ पाटलिपुत्रमीड्यम् । सार्चस्य पञ्चमतिथी हयवेदरन्ध्र- ब्रह्मेतिवत्सर इयाय महामनीपी ॥३॥ हृदयको कॅपानेवाले उस दावानलको शान्त करने के लिये महात्माजी ता० ५-३-१९४७ ई० को उन्मच बने हुए पदनामें गये ॥ ३ ॥ सायं स मोटररथेन वितप्तचित्तो, लोकञ्चितायनिमियाय महीमहेन्द्रः ।

१२४ पारिजातसौरभे गांधिर्जयत्वितिरवेण महादरेण, सञ्चक्रिरे प्रमुदिताः समुपस्थितास्तम् ॥४॥ दुःसी मनवाले महात्माजी सायङ्काल मोटरसे यहाँ गये जहाँ सबलोग इकट्ठे हुए थे। “गाँधीजी का नया इस महान् भादर पूर्ण आवाजसे उपस्थित लोगोंने उनका सत्कार किया ॥४॥ वक्तुं समारभत भारतपारिजातो, लोकानुतापशमनं यचनं शनैः सः। लोकांश्च मौनमभजन्निजनेतृवर्य- पाणीसुधाधयनलोभपरीतचित्ताः ॥५॥ भारतपारिजात श्रीमहात्माजी लोगोके दु.ख अथवा फ्रोधको शान्त करनेवाला वचन धीरे-धीरे बोलने लगे। लोग भी अपने मदान नेताके वचनामृतया पान करनेफे लोमसे चुप हो गये ।। ५ ।। मन्ये मदीय इति यं हि विहारदेश, दूरस्थितोपि यदि तं न यशं करोमि । आगत्य तत्र सशरीर उदस्तों, लज्जे परं हि समजायत मानमगः॥६॥ रिस विहारको मैं यस्तुतः अपना मानता हूँ उसे मैं दूर रहकर अपने पमें नहीं पर सपता हूँ। मैं साक्षात् यहाँ आकर अत्यन्त लजित होता हूँ। मेरा घर गया ! क्योंकि मेरा मानभन हो गया ॥६॥ प्राप्तं पुनः पुनरई महमूदपत्रं, ध्यानेन यारिनयनः सफलं पठित्वा । युप्माकमय पुरतः समुपस्थितोरिग, विधिमा समयितुंगम पोपिसभ्या:14] समामें उपस्थित नो, डाक्टरमहमूदपा पार पार मेरे पास पत्र आता था। पानंग में उसे पढ़ता था और रोता था। मैं anim

दशमः सर्गः
और आपके भी मनको कुछ शान्त करनेकेलिये आपके सामने
उपस्थित हूँ ॥ ७॥
यूर्य स्थ येन जनिताः परमात्मनैपर्मा,
ऋरानिनां जनयितापि स एव भव्य. ।
यूयं मुहम्मदपदानुगताश्च नूनं,
तस्मात्सपिन नुजाः सकला भवेत |
जिस भव्य परमात्माने तुमको पैदा किया है, मुसलमानोंका भी
पैदा करनेवाला वही है। अवः अवश्य ही तुम हिन्दू और मुसलमान एक
ही सगे पिताके पुत्र होते हो ||
अत्रत्यहिन्दुजनता यदि नाकरिष्य-
मीयं कथंचिदुचितं न महाघदायी।
न छाप्यनार्यजनतासविस्मदीयं,
हन्ताभविष्यदधिकं प्रणतं शिरो नः ||५||
यदि यहॉकी हिन्दू जनताने किसी प्रकार मी उचित न मानी जा सके
ऐसी पापप्रद क्रूरता न की होती तो कहीं मी अहिन्दूजनता के सामने
हमारा सिर अधिक नीचा न होता ।।९।।
मोयाखलीय जनवासगृहेषु थारा ,
संमर्द आदरि मुहम्मदधर्मजातैः ।
अत्यनमीत्तमतिदूरमनार्यजुष्टं,
युष्माभिरेव परितश्चरितं यदन्न ॥१०॥
मुसल्मानोने नोवाखली के घरों में जिस प्रकारका अत्याचार किया है,
आप यहाँ क्यिा गया अत्याचार उससे बढ गया ॥ १०॥
कृत्वातिपापमपि यः परमात्मभकः,
पश्चात्तपत्यनुदिनं सं महानुभायः ।
आशाभवग्मम विहारजहिन्दवोपि,
पश्चात्तपेयुरसिला दुरितं विधाय ॥११॥

१२६ पारिजातसौरभे जो अतिपापकरके भी सदा पश्चात्ताप करता है वह महानुभाव ईश्वरका भक्त है। मुझे आशा थी कि बिहारके सब हिन्दू पाप करके पश्चात्ताप करेंगे ॥ ११॥ चिह्नतु नैकमपि तस्य विलोक्यतेत्र, नो दृश्यते दुरितजन्यमनःखिदापि । दत्तं न किश्चिदभवत्सतिपूर्तिरूपं, तेभ्यः क्षति कृतवती जनतात्र येपाम् ॥१२॥ यहाँ तो पश्चात्ताप का एक भी चिह दिखायी नहीं पड़ रहा है। पापसे पैदा हुआ मानसिक खेद नहीं दीख रहा है। यहाँकी जनताने जिनकी हानिकी है उन्हें उसके बदले में कुछ भी नहीं दिया है ॥१२॥ यैहिन्दुभिः कृतमिदं पचनीयपापं, दण्या गृहाणि यघमप्यथवा चरित्या। मोहम्मदीयतरणीवरुणातिवृद्ध- यालादिकस्य कथमत्र न ते विनिन्द्याः ।। १३ ।। जिन हिन्दुओंने घरोंको जलार निन्दनीय पाप किया है, एवं जिन्होंने मुसलमानोफे बालबों और वृद्धोया कतल किया है वह क्यों न निन्दाफे पात्र माने बायें।। १३ ॥ पाध्यं न प्रधितदुष्टजना इहत्या, भासन्युमृत्यफरणे निरता इतीद। सन्ति दूषणमुजोखिलराष्ट्रसंस- सभ्याः फचिदपि तत्र न येति याच्यम् ॥ १४ ॥ भार पहना कर सकते फि दुफर्म के करनेमें प्रख्यात याफि गुडे लगे हुए थे सपा भार या मी नहीं कर सकते किया के पासी योगी नी१॥१४॥ गत्याहमायगराष्ट्रमनास्तानी, रामपुरी मिलितप[टगोष्ठिरायाम् ।

दशमः सर्गः सर्वान, संसदियमस्ति समस्तदेश- स्त्रीपुंसवालतरणस्य निपालयित्री ॥ १५ ॥ मैं उस समय जब लन्दन गया था तब गोलमेजो कान्समें मेंने कहा था कि यह काग्रेस समरतमारतके स्त्री पुरुष, बाल और बवानकी रक्षा करनेवाली है ॥ १५ ॥ स्यात्तत्स्थलं वरमपीह च पोर्तुगीजा- यत्तं भवेद्भरतभूमिजभूपभूस्थम् । फ्रेवाधिकारगतमस्तु तथापि सा राष्ट्रसंसदभिरक्षति भारतीयान् ॥ १६॥ मैंने वहाँ कहा था कि भारतमें चाहे कोई स्थल पोटुंगीजके अधीन हो, चाहे पेंच प्रजाके अर्धान हो परन्तु काग्रेस सब मारतीयमात्रकी रक्षा करती है ।। १६॥ प्रीणाति नेयमभिसंसदमूकदापि, विद्वेष्टि तानथ कदाचिदिमान चेति । सर्वत्र सान्यममिवर्पयतीयमास्ते, सर्वत्र सर्वजनतापरिपूजिवाद्य ॥ १७॥ मैंने कहा था, काग्रेस कमी उन लोगोंसे प्रेम नहीं करती है और इन लोगों के साथ कभी द्वेष नहीं दरती है। काग्रेसकी दृष्टिमें पोर्तुगीन और मञ्च सस्पानमें जो रहते हैं, इस मारतीयरान्यके प्रदेशमें जो रहते है, अपने सगे सम्बन्धी जो है सब पर काग्रेस समान दृष्टि रखती है और अतः यह सर्वत्र सर्वजनवासे पून्ति है ॥ १७ ॥ नो कंचिदीक्षा इयं द्विपदित्यभीक्ष्णं, वाटस्थ्यमप्ययहिता दधात्यभद्रम् । पुत्रापि कैश्चिदपि हेतुभिरत्र तस्मात्, सा राष्ट्रसंसदभितोस्ति समस्तमोग्या ॥ १८ ॥ न १२८ पारिजातसौरभे मैंने कहा था; कनिस किसीको शत्रु नहीं मानती और किसीको उदासीन दृष्टिसे भी नहीं देखती। वह किमी भी कारणसे ऐसा नहीं करती अत एव वह सबके कामकी चीज है ।॥ १८ ॥ तस्माखले कृतमितीदमनुत्तरं दारः समानुगजनेषु वितिष्ठते हि। आत्मानमत्र न हि पारयितुं समर्था, अस्मादनुष्ठितमहाकलुपात्तु केपि ॥१९॥ अतः यह कार्य दुष्टोने किया है, यह जवाब नहीं दिया जा सकता। महासभावादियोंपर भार तो है ही। इस किये गये महान् पापसे अपनेको पचाने में कोई महासभावादी समर्थ नहीं है ॥ १९ ॥ यो जन्मनः प्रभृति संसद आग्रहोस्ति, त्याज्यो न सोय सदसोनुगमान्यलोकैः। विभ्रश्य गौरवपदादविलावं स्प्राप्तं सदेव समया ननु वैपरीसे ॥२०॥ महासभाका अपने जन्मसे ही जो आग्रह रहा है उसका त्याग' महासभाके अनुयायियोको नहीं करना चाहिये । प्रतिरित पदसे भ्रष्ट होकर अत्यन्त लघुतारो ममा प्राप्त होगी यदि सभाके मूलभूत आपदका त्याग हुआ तो ॥२०॥ स्यात्कोपि हिन्दुस्थापि मुहम्मदीयः, स्यात्पारसीक इह कोप्यपरो विधर्मा। सर्वस्य लाममभिलप्य भवेत्कृतार्था, राष्टस्य संसदिति योस्तु महाप्रतीतिः ॥२१॥ षोई हिन्दू हो अथवा मुसलमान हो अथया पारसी हो अथवा कोई अन्य धर्मयारा हो, सबसे लामको चाहकर ही महासमा कृतार्थ हो सक्ती है इतना महाविश्वास आपको होना ही चाहिये ॥ २१ ॥ .

दशमः सर्गः १२९ १ पूर्वम् । प्राणार्पणैर्विपदुपेतमुहम्मदीय- लोकाभिरक्षणविधौ बहवोत्र वः स्युः। नैतत्पर भवति राष्ट्रसभानुगाना, मानाभिरक्षणकृतावलमिसहेतुः ॥२२॥ विपतिमें फंसे हुए मुसलमानों को बचाने में जिन्होंने अपना प्राण भी अर्पण कर दिया होगा, ऐसे आपमें से बहुतसे होंगे। परन्तु महासभा- वादियों की प्रतिष्ठासी रक्षाके लिये इतना ही पर्याप्त नहीं है। अतः इतना ही आपकी प्रतिष्ठारक्षा हेतु भी नहीं है |॥ २२ ॥ अन्नत्यहिन्दुजनता कृतवत्यघं त्तस्मात्परं परतरं ह्यपरेपि सम्पाद्य निन्दिततमा अभवन्परन्तु, सिद्धं भवेकिमपि तेन न किञ्चिदत्र ||२३|| यहॉ के हिन्दुओंने बो पाप किया है उससे बडेसे बड़ा पाप पहले दूसरोंने भी किया है और उसके कारण बह अत्यंत निन्दित भी हुए हैं। परन्तु इस कहने और विचारनेसे कुछ मी सिद्ध न होगा ॥ २३ ॥ न्यूनोस्मि नूनमहमत्र महाघमाजा, तेनेति चिन्तयति यः स महत्पदं नो। आप्तुं कदापि भविता आम इत्यजस्रं, त्याच्या समेति मतिरायवरेण्यलोकः ॥२४॥ उसने घडा पाप किया है, उसको अपेक्षा मैंने बहुत योहा पाप किया है, इस प्रकारसे लो विचार करता है वह कमी महत् पदको नहीं पाता। यतः आर्य लोगोंको यह विचार छोड देना चाहिये ।। २४ ॥ यमन्यते कृतमिदं महदेव शौर्य, नोवासलीसलगणाहितकर्म रोद्भुम् । क्रोधादिदोपपरिपोपमहान्धकार- नूनं भवन्ति भनुजाः परिवञ्चितास्ते ॥ २५॥ ९ १३० पारिजातसौरभे जो यह मानते हैं कि नोयाखलीके गुण्डोंके गुण्डापन को रोकनेके. लिये यह बहुत शूरता हुई है तो वह अवश्य ही क्रोधादि दोषरूप अन्धकार- से टगे गये हैं ॥ २५ ॥ मायानशादिति च येत्र विचारयन्ति, श्रेयो विहाय त इतोवगति प्रयान्ति। सत्कार्यतः सकल एव जिगीपिवव्यो, धमोस्त्ययं सकलधर्मधराधुरीणः ॥२६॥ अज्ञानवश होकर जो उपर्युक्त विचार करते हैं वह श्रेयको छोड़कर अघोगतिको प्राप्त करते हैं। सत्कर्मसे सरको जीवनेकी इच्छा करनी चाहिये, यह सर्वधर्मोसे श्रेष्ठ धर्म है ।। २६ ।। पूर्व कृतानि सुकृतानि महान्ति यानि, तान्यप्यतीत्य गमन परिकामयध्वम् । सातन्त्र्यधर्मपरिरक्षणमेतयैव, रीत्या भवेत्सकलपूर्वजसंस्कृतेश्च ॥ २७ ॥ आपने पहले जो कुछ अच्छे कर्म किए हो उनसे भी आगे बदनेकी आपको इच्छा करनी चाहिये। इसी रीतिसे स्वतन्त्रतारूप धर्मका रक्षण होगा और पूर्वजोंकी संस्कृतिकी (मी रक्षा होगी) 11 २७ ॥ नोवासलीयजनता कृतवत्यनर्थ, यं हिन्दुपु मलयमेतु स्मृते. स पोच। तद्वन्यपाशवतीरनुकर्तुमत्रा श्रेयोमुजो न मनसापि विचारयेरन् ॥ २८॥ नोयासलीके लोगोंने हिन्दुओर जो अत्याचार किया है यह आपके रमरण से थान चला जाना चाहिए। उस जाली और पफर्मका अनुपरण परनेटिये धामापुरप कमी मनसे विचार भी नहीं पर रायवा ॥२८॥ दिसास्ति पापमिति शाखस्तो पदन्ते, पापानि सन्ति न मुसाधुपलान्वितानि ।

दशमः सर्गः १३१ तस्मात्ततो विरहमेत्य परेझपाद- माश्रित्य धर्मचरणे मन आदधध्वम् ।। २९ ॥ मासमान तेजस्वी शस्त्रकार कहते हैं कि हिंसा पाप है और पाप कभी अच्छे फल नहीं देते। अतः पापसे अलग रहार ईश्वरका याश्रय लेकर आपको घर्माचरणमें मन लगाना चाहिये ॥ २९ ॥ नो गौरवं चिरतरार्जितमेतु नाशं, न ख्यातकीर्तिकलिका मलिनास्तु सद्यः। देशस्य तद्धि सफलैः सुविचार्य कार्य, पन्था अयं सुकृतिनां च यशोधनानाम् ॥३०॥ चिरकालसे पैदा किया गया हुआ देशका गौरव और प्ररयात याकी कलियों नष्ट न हो जाय इसे अवश्य ही विचार कर सबसे कार्य करना चाहिये । सुकृतियों और यशस्त्रियों का यह मार्ग है ।। ३० ।। हत्वा द्विपदणमिहास्ति जिजीविषा चे- च्छनोति जीवितुमपापमयं न कोपि। मृत्वा प्रसन्नमनसारिहितानुवन्धी, लोकं समर्जयति पुण्यतमं नितान्वम् ।। ३१ ।। यदि शनुओंको मारकर ही यहॉ जीने की इच्छा हो तो कोई भी निर्दोर बीवन नहीं व्यतीत कर सकता। जो प्रसन्न मनसे मरकर धनुभोंके मी हितको इच्छा रखता है वह महापुण्यलोकको प्राप्त करता है ||३|| द्वारं विधाय विमलं गवरोपदोपा- न्युप्मानयो निसिलभारतभूमिवासान् । सन्देष्टुमेतमिलप्यति मानसं मे, हिंसामुदस्य मनसो हि जिजीविपेत ॥ ३२॥ आपको और समस्त मारतवासियों को यह सन्देश देनेको मेरा मन चाहता है कि सब गोधको छोड़ दें । पविन साधन बनाकर, मनसे हिंसाका त्याग करके जीने की इच्छा रखें।। ३२॥

१३२
पारिजातसौरमें
उज्जासनैव यदि सर्वगदारिहारि,
प्राप्त महापधमिति प्रियबन्धवो मे।
संस्थापयन्ति हृदये नियत विनष्टं,
स्वातन्त्र्यमत्र परिविच न संशयोन ॥३३॥
हिंसा ही सर्वरोगरूप शुनुको नष्ट करनेकी महौषधि प्राप्त हुई है,
ऐसा यदि हमारे भाई हृदयमें धारण करते हों तो अवश्य ही स्वतन्त्रता
नष्ट हो चुकी है, ऐसा आप समझें। इसमें सदेह नहीं ॥ ३३ ॥
श्वो होलिकोत्सवशुभावसरोस्ति देशे,
हिन्दुप्रजाहदयपजरजनोयम्
गालिप्रदानमथ रगजलप्रवाहो,
न्या दशामहह सूचयतीह नोच ॥ ३४ ॥
पद देशमै होलीका पवित्र उत्सव है । हिन्दूप्रजाका हृदयामला
कद सिलेगा। इस उत्सवमें गाली देना और रंग दालना यह
जंगली दशाका सूचक है ।। ३४॥
प्रहादरक्षणकृते
नरसिंहरूपः,
प्रादुर्थभूव भगवान्दिषसे च तस्मिन् ।
तस्माच्च तस्य भजनं स्मरणं विहाय,
फिश्चिद्विधातुमपि नाईति कोपि हिन्दुः ।।५।।
उग दिन प्रहादमरकी रक्षा लिये भगवान् नरसिंहरूपसे पट हुए
ये। अतः उनका भजन और स्मरण छोड़कर कुछ भी करनेफेलिये हिन्दुओं
यो योग्य नहीं है।॥ ३५॥
संपाधते भयमुपस्थितमेय
मोहम्मदीयजनतामविमाप्रभीताम्
यो होलिकामिपमुपेत्य, कदापि यूयं,
पापा करिष्यथ निर्णलिता पवस्याः ॥ ३६॥

दामः सर्गः
१३३
विहार एप,
अत्यन्त मयमीत मुबळमान्बनताशे उपस्थित यह मय बहुत हैरान
कर रहा है कि कह होलीका बहाना लेकर किसी समय मी यार उन्हें
बुरी तरह हैरान करेंगे ॥३६॥
ज्ञात्वेति चेतसि ममोद्वदुःखद्वार-
ज्वालावलीढविकले न हि शान्तिरन्ति ।
नोवासलीयति ममापि
इत्येय वान्तहृदयं किल मां तनोति ॥ ३७ ॥
मेरा दृदय पहलेते ही दुःखरूप अग्निसे व्याकुल है । यह मेरा विहार
भी नोवाखाली बन वायगा, यह विचार मेरे हृदयको व्याकुल बना
रहा है।॥ ३७॥
মাৰি हिन्दुजनवा समसाइलोक-
भीत्येवमेव गिरमाहरदावचेताः
अन्नापि
सौदजनता
भयविह्वलाङ्गा,
तामेव याचमतिदीनमना वदन्ती ॥ ३८॥
नोवाखालीने मी सब मुलमानों डरते हिन्दु बनता यही शब्द
सायन्त या होकर बोल रही यी । यहाँ नुमलनानदनता मय व्याकुल
होकर उसी वाणीको बोटती हुई टीख रही है ॥ ३८॥
वत्राप्युपादिदशमहं हिन्दुबन्धून,
यचकुनिजनतामपि योघयामि।
मोनि जहीत मनुजस्य परेश्वरलिन्,
यूयं च विश्वसित पूर्णतया सद्देति ।। ३९ ।।
मैने नोगासाठीने भरे हिन्दु मादलोंगो को उपदेश दिया या
वही मेरे मुसलमान भाइयोंकी भी कहता हूँ। मनुष्य मयको यार छोड़
है। यार इस परमेसरमें सदा पूवया विश्वास करें ॥ ३९ ॥

१३४ पारिजातसौरभे श्रुत्वापि भारतजयध्वनिमस्ति कम्पो, यद्यद्य खौदजनवाहृदयेप्वसह्यः । काष्ठा पराध पतनस्य समीपगास्ते, जात्योयोरिति विचार्य मनोममाम् ॥ ४०॥ "भारतका जय हो” इस शब्दको भी सुनकर यदि मुसलमानोंके हृदयमें असह्य कम्प होता है तो आज दोनों जातियोंके पतनकी परा- फाटा पासमे दी है, यह विचार कर मेरा मन दुःखी हो रहा है ॥ ४० ॥ पृच्छन्ति मुस्लिमलिगोयजना पेत्य, यस्ता नितान्तमिह मां किमु हिन्दयो नः । वस्तुं विहारधरणीतल उत्तमागा, सोढार एव न बलोनहतानिहेति ॥ ४१ ॥ मुस्लिम लीग के लोग हमेशा आफर मुझसे पूछते हैं कि क्या हिन्दू लोग अल्पसख्यक मुसलमानोंका बिहार में रहना नहीं सहन करेंगे४१॥ ये सन्ति मुस्लिमजनाः किल राष्ट्रसंस- सभ्या भवन्ति विकलाः परिवीक्ष्य तेपि । एतादृशीमिह परिस्थितिमभ्यभित्र्या, हा इन्द की उपस्थित एप फालः॥ ४२ ॥ जो मुसलमान हैं यह ऐसी शत्रुताका पदला लेनेयाली परिस्थितिको देखकर कांग्रेसफे सभ्य बन रहे हैं। दुःसकी पात है। यह पेगा समय उपरिपत हुआ है ।॥ ४२ ॥ पन्धुः स्थपन्धुमपि घेदिह भापयेत, मोधान्मलीमसमना प्रणयेकपाम् । एन्माद एन्झति तदा सदनुमणीत- सीमानमित्यहह फि भगवान्विधाता ॥ ४३ ।। मोधरो गलिया गया होर एक भाई अपने गरे प्रेमपत्र मानसर्ग १३५ माइको ही पटि हराये, तब तो टमाट म्हनों द्वारा बनायी हुई सामा लन कर रहा है। न डाने भगवान् क्या करेंग॥४३॥ अद्य प्रत्यभिमवो भयमारमाना- मत्लन्न सेल्यति कदाचिदिदि प्रतिज्ञा । निधित्य चेङ्ग्यतु हिन्दुजनगृहीता, योग्यं भवेत्सुयझसे महतेद्य तेपाम् ॥ १४ ॥ दो डरे हुए है उना हमसे की मी यानान नहीं होग, ऐसी अविना निश्य करे यी हिन्दू टोग प्रहा करें तो वह उनके महान् दौर नगर यशक मनुकूल होगा ॥४४॥ अत्रत्यहिन्दुल्लना यदि कामयेरन् , हिसामपास्य निवरामिह तामहिंसाम्। संस्थाप्य नवनलत' । प्रविनद्धमूला, शक्ष्यन्ति कर्तुमचिरेण शमत्यस्पा' ॥४२॥ यहाँका यदि हिन्दू पहिनें चाहें तो अपनी शक्ति हिंसाको दूर करके यहिंसाली स्थापना करके शीघ्र ही उसे बदमूल कर मरेंगी क्योंकि वह शान्तिवरूप है।।४।। अहानुदिनपता परधर्मिणा चे- दाझ्यासन भवतु वतमनत्सु पूर्णम् । ते विश्वसन्तु यदि हिन्दुजनेषु चाद्य, म्यादेष उत्सर इरम्मदशातियुक्त ॥४६॥ अल्ला, खुना दानेवाले परपनियों के दुखी मनमें यदि पूर्ण आश्वासन पान हा और २६ हिनओर विकास कर सकें वो यह एक सपूर्व उन्सर होगा ।। ४५ ॥ महाशन्मोरवद्धृत्यनलदो निस्तरदनी, वच पाचूप तत्सदसि समवेवामनुमुवा ।

१३६ पारिजातसौरभे मुहुः पायं पार्य गलितगुस्कोपाः समभवन , प्रसन्नं सन्नं तन्मुसलिमकुलं सक्षणमभूत् ॥४॥ इति सर्वतन्त्रस्वतन्त्रमहंसपरिव्राजकस्वामिथ्रीमद्भगवदाचार्यपण्डिराजप्रणीते पारिजातसौरभे देशमः सर्गः परमकल्यागकारी महात्माजीके हृदयसे निकलते हुए इस वचना. मृतका, उस सभामें बैठे हुए सभी मनुष्योंने पान कर करके अपने भोपको शान्त फर दिया । मुसलमान भी जो पहले दुःखी और चिन्तित ये अब प्रसन्न और मानन्दयुक्त हो गये ॥ ४७ ।। इति श्रीपरमहंसपरिवाजकस्यामिश्रीमद्भगवदाचार्यपण्डितराजमणीते पारिजातसौरभे स्वोपज्ञभारतराष्ट्रभापाटीरायां दशम. संगः एकादशः सर्गः भूयः स तस्मिन्नगरे महात्मा वारे द्वितीये समतलोकान् । प्रोवाच सायं हृदयेन हृद्यां वाचं गिरी नाथ इवाद्वितीयाम् ॥१॥ उसी शहरमें-पटने में फिर दूसरे दिन इकट्ठे हुए लोगोंको महात्माजी बृहस्पतिके समान अद्वितीय वचन बोले ॥१॥ एको मुसल्मानिह मामुपेत्य साश्रुप्रपातो न्यगदद्यदद्य । तस्यालयाकान्यपि भाण्डकानि नीत्या गतः कुत्रचिदेव कोपि ॥२॥ आज एक मुसलमान् मेरे पास रोता हुआ आया और कहने लगा कि आज उसके घर से कुछ बास = पात्र किसीने चुरा लिये हैं ॥२॥ यावद्भवेदीशकृत्यजातं तावन्न शुद्धिर्मनसः फदाचित् । जायेत नस्मादखिला कलकाधायिप्रवृत्तिर्निखिलैः प्रहे या ॥ ३ ॥ जबतक ऐसे कार्य होते रहेंगे तबतक मानसिक पवित्रता कभी भी नहीं आ सकती । अतः यह सब कलङ्क देनेवाली प्रवृत्ति छोड़ देनी चाहिये ॥ ३॥ नानेन मार्गेण कदापि योप्माकीणार्यवां व्यञ्जयितुं समर्थाः । यूयं भवेतेति विहाय शीघ्र ते धर्ममार्गे मन आदधीध्वम् ।। ४ ॥ इस मार्गसे चलकर आप अपने आर्यत्वको कभी भी व्यक्त करने में समर्थ नहीं होंगे। अतः इसे छोड़कर धर्म मार्गमें मन लगावें ॥ ४ ॥ यावन्न पश्चात्तपतीह चेतो युप्माकमेतैरपकृत्यजालैः । सायत्प्रतिष्ठा विपस्थितैवेत्येतद्विजानीत च हिन्दुजातेः ॥५॥ जबतक भापका चित्त पश्चाताप नहीं करता तबतक हिन्दु' जातिकी प्रतिष्टा संकटमें है यह आपको समझ लेना चाहिये ।।५।।

१३८
पारिजातसौरभे
अन्याय्यमान कदापि कर्तुं शक्यं विरोधेन हि पूर्वजानाम् ।
खार्थस्य सिद्धी रघुनन्दनीयपादाञ्जयुग्मं सतत स्मरद्विः॥ ६॥
जो हिन्दू हैं और सतत भगवानकी मक्ति करते हैं उन्हें अपने
पूर्वजों के मार्गका विरोध करके न कभी अन्याय करना चाहिये और
स्वार्थकी सिद्धि करनी चाहिये ॥ ६ ॥
आर्यत्वमेवेदमुदारभावैर्मित्वायितं चेद्विपता कुलेपु ।
दुप्टेषु दुष्टत्वमुदाहरनिर्माहर्षमार्गादपहीयवे हि ॥७॥
शत्रुओंके साथ भी मित्रताका व्यवहार करना, और उदारभाव रखना
यही तो आर्यत्व है। दुष्टोंके साथ दुस्ता करनेवाला तो महर्षियों के
मार्गसे भ्रष्ट होता है।॥ ७ ॥
फस्यापि हिन्दोर्मम संनिधाने विद्युत्समाचार उपागतोद्य ।
नो भर्सनीया न च निन्दनीया नेया उपालम्भपदं न केचिा1८"
एक क्सिी हिन्दुभाईका आज मेरे पास तार आया है और उसमें
लिसा है कि किसी भी हिन्दुकी न भर्त्सना करनी चाहिये, न निन्दा करनी
चाहिये और न किसीको उलाहना देना चाहिये ।।८।।
मन्ये न मामेवमुपादिशयः कस्यापि फिनित्स उपाकृताध ।
नो हिन्दुधर्मस्य न भारतस्य नो हिन्दुजातेन च धा परेपाम् ॥ ९॥
मैं समझता हूँ कि जिसने मुझे यह उपदेश दिया है उसने न तो
हिन्दूधर्मशा, न हिन्दूजातिका, न मारतका और न किसी अन्यका भी
पुछ उपकार दिया है।॥९॥
अद्धा मदीया मम हिन्दुधमें श्रद्धा घ देशेषिचलो मदीया ।
तस्माद्वीम्येतदुदारमायस्वेनापि शान्त्येव विचारणीयम् ॥१०॥
हिन्दुधर्ममें और अपने देशमें मेरी बहुत बड़ी अविचल श्रद्धा है
सीलिये में उदार होकर यह पह रहा हूँ। उस माईको भी शान्तिसे
विचार करना चाहिये ॥१०॥

एकादशः सर्गः
हिन्दुमान्यवरः परत्ने धर्माय नेप्यामि विदन्तमत्तम् ।
कोपापरीतोपि कटापि नासूयानीह मुद्धा निलिला हि धर्माः ॥११॥
मैं एक यच्छा हिन्दु हूँ, सब पनाको बानता हूँ परनु निती पते
इंप्पी नहीं करता। क्रोधवश होकर भी कभी किसी धर्मी भन्दा नहीं
परवा । क्योंकि समी पन पवित्र है॥ ११॥
यद्धिन्दुभिघोरतम कुकर्म सम्पादितं वत्सुतरां विगोप्य ।
हिन्दुत्वतः प्रच्युतिरेख मे स्यादर्मच्युतःस्यां वन इससह्यम् ॥१२॥
हिन्दुओंने दो महासार क्यिा है यदि में उने छिपाऊँ तो मैं
हिन्दुत्वसे भ्रष्ट हो बाऊँ। ऐसा होनेसे में धर्मभ्रष्ट हो बाऊँगा। ऐसा
होना मेरेलिये असह्य है ।। १२ ।।
युप्माममनम्यमहापरावान्विज्ञाप्य युप्मभ्यमहं वनोमि ।
सेनां परं वो महती महामित्येव चित्ते मम संप्रदीतिः ॥१शा
मेरे मनमें तो यह विश्वास है कि मैं आपके अचम्म महान्
याराधोंको आपको बताकर आपकी केवल एक बड़ी और उत्तम
परिगामवाली सेवा करता हूँ ॥१३॥
पश्चापदेशे नयनाशवर्म दृष्ट्या न वस्तत्प्रतिकर्तुमद्य ।
रोत्या तवैवोपदिशामि तस्मादौचित्यनुद्विग्नधियो ममेव ॥१४॥
पजाबमें जो नीतिनाशन मार्ग प्रहग किया गया है उसे देखकर मैं
उसी रीतिसे उसका प्रतिकार करनेका उपदेश आपको नहीं देता हूँ।
और वह मेरेलिये योग्य ही है ।। १४ ॥
स्वातन्त्र्यभूमि समवाप्य येये शस्ता गुणाःसन्ति जनिष्यमाणाः ।
युप्माभिरभ्यश्च उपासनीयास्ते मे मनोति ममास्ति हार्दम् ॥१५॥
स्वतन्त्रताको प्राप्त करके जो को अच्छे गुग पैदा करने हैं उनकी
थाप अधिक उपासना करें यह मेरी इच्छा है। यही मेरे हृदयका
तात्पर्य है ॥ १५॥

१४०
पारिजातसौरभे
फर्तव्यमास्ते किमिहाद्य युष्मल्लामाय किं मुस्लिमभूतये स्यात् ।
याच्यं मया तत्मणिधानदानाच्छ्रन्यं भवद्भिः कृपयेति भिक्षे ॥१६॥
आपके लाभ के लिए क्या करना है और मुसलमानोंके लाभकेलिये
क्या करना है, यह मुझे बताना है। आप कृपाकर ध्यान देकर सुनें,
यही भिक्षा माँगता हूँ ॥ १६ ॥
ये ये विपन्ना विगृहाश्च जाता अस्मिन्कलो वेभ्य उदात्तचित्तः ।
साहाय्यमाधातुमवश्यमय किश्चित्प्रदेयं फरणास्वतन्त्रैः ॥१७॥
इस झाडे में जो लोग विपग्रस्त बने हैं, जो लोग बिना घरके हो गये
हैं उन सबको उदाचित्त वाले तथा करुणाके अधीन रहनेवाले आप
लोगोंको कुछ अवश्य सहायता देनी ही चाहिए ॥ १७
शग्रुप्यपि प्राणपरायणेपु कार्या दयेत्येव मनुष्यधर्मः ।
सर्थे हि वस्येय महेश्वरस्य पुत्रास्वतः सन्ति न ते स्वभिन्नाः ॥१८॥
पतु भी कोई हो और वह अपना प्राण बचाना चाहे तो उसपर दया
करना, यही मानवधर्म है । समी तो उसी परमेश्वर के पुत्र है अतः सब ही
स्य अपनेसे मिस नहीं है। हम सब एक ही है ।। १८॥
दुर्न यावन्मुस्लिमधनान्या नोवाम्बलीस्था यिपदन्यितेभ्यः ।
हिन्दुभ्य इत्यस्तु विचारणा चेद्धर्माच्युताः स्याम सनातनाद्धि ।।१९।।
नोयागलीमें विपद्रत हिन्दुओको यहाँफे धनिक मुसलमानोंने
महामता का पानी, यदि हम यह विचार करेंगे तो एनातन धर्मसे हम
प्यु हो पायेगे।॥१९॥
धर्माय धर्माय निषेपणीयो नान्येन फेनापि प फारणेन।
एपा मगाटी युनिशाग्नसिया महायरपसेविता प ॥२०॥
पहियापमं वरना पाहिय। बदला पा ज्याति आदि भन्य
बारहोगे पाना पारिय। परी भगाली पदो-झारयों में मतापी
पनीर और सारे यंत्र भाग लौरिया ॥२०॥

एकादशः सर्गः धर्मः पृथक्त्वं मजते न राजनीतेस्ततो भ्राम्यतु नैव कोपि । एप प्रचारो मम राजनीविसंबद्ध इत्यस्तु न या विवेकः ।।२१।। धर्म राजनीतिसे कभी सलमा वल्लु नहीं है। मेरा यह प्रचार राजनीतिसे सम्बन्ध रखता है ऐसा किसीको न तो भ्रम होना चाहिये और न विचार ही होना चाहिये ॥ २१ ॥ एवं च नेयं व्यवहारनीतिराव्यात्मिकाजीवनवर्मनो वः । दूरात्पृथक्तेन वियेकवन्तः सम्यग्विचार्यैव समाचरन्तु ॥२२॥ इस रीतिसे यह व्यवहारनीति आपके आध्यात्मिक दीपनसे बहुत पृथक् नहीं है । अतः विवेकियों को अच्छी तरहसे विचार करके भाचरण करना चाहिये ॥२२॥ नो विद्यते किंचन भिन्नमत्र लोकच तस्याधिपतिश्च तन्त्रम् । एतत्रयं चापि न भिन्नभिन्नं बद्धं समस्तं हि परस्परेण ॥२३॥ इस जगत्में अलग अलग कोई पलु ही नहीं है। जगन्, लाका स्वामी और उसका तन्न यह तीनों ही भिन्न भिन्न नहीं हैं। समी परस्पर बधे हुए हैं ॥ २३ ॥ वस्मान्न वक्तव्यमहं स्वराजनीति विहारीयजनेप्वपीह । संचारयामीति यतो न धर्मो नीति कदाचिद्विरणद्धि शुद्धः ॥४॥ इसस्टिये आप यह न कहें कि मैं अपनी राजनीति यहाँ विहारी भाइयों और बहिनोंमें फैला रहा हूँ। क्योकि विशुद्ध धर्म राजनीतिसे कमी विरोध करता ही नहीं ॥२४॥ दानं प्रदातव्यमिति श्रुतीनां श्रेयस्कर सत्यवचः प्रमाणम् । नो तेन दत्तं तत एव तस्मै देय न होत्येतदनोवियम ॥२५॥ श्रुतियोंने कहा है कि श्रद्धासे भी दान करना चाहिये और यथदासे भी करना चाहिये। शर्मस भी और भयसे भी दान करना चाहिये। तासर्प दान करने में है। अविका यह कन्यागकारी वचन प्रभागभूत

१४२
पारिजातसौरभे
है। उसने नहीं दिया अत. मुझे भी नहीं देना चाहिये, ऐसा विचार
करना अनीति है।॥ २५ ॥
कलिः कलिं वृद्धिपथं नयेत स्तन्नोत्तमः कापि न वार्चनीयः।
गालि गालिं शमयेत्सहः स्वीयैः सहायः सहितापि तन्वी ॥२६॥
झगडा झगडाको बढाता है। अतः वह न उत्तम है और न
सत्काराई है। अपने सहस्रों साथियों और सहायकों के साथ भी
गाली गालीको शान्त नहीं कर सकती ।। २६ ॥
नासावुपायः कलिरोधनार्थ हिंसा कलेद्धिकरी मतास्ति ।
दोपेण दोपो न भवेदुदस्यः पवन पवं व्यपनीयते नो ॥२७॥
झगडा रोग्नेलिये झगडा उपाय नहीं है। हिंसा झगड़े को
पदाती है। बुराईसे पुराई हटायी नहीं जा सकती। कीचडसे
कीचड नहीं माफ किया जाता है ।। २७ ॥
स्थादेव मर्यत्र विचारभेदो दृष्ट. स नो मानवतापहारी।
खीपुंसयालादिवधं विहाय शोध्यान्यपद्या मतभेदहान्ये ॥२८॥
विचारभेद तो सर्वत्र होता है परन्तु यह मानवताका नाश करनेवाला
भन्या नहीं देखा गया है। अतः स्त्री, पुरए, बाल, पृदका बध छोडकर
मतभेद दूर परनेके लिये अन्य मार्ग ढूँदना चाहिये ॥ २८ ॥
हिंसा प्रतीकारविचारणाया हानादहिसाख्यमहानतो पा!
नदयेन दृष्टोत्यपरोभ्युपायो गाशाय तस्या दुरिताश्रयायाः ॥२९।।
हिसाये ना दोहरी उपाय है। एफ वो यह दि प्रतीकार करने.
का विचार दी नहीं होना चाहिये और पूरारा हिंगारून महान मात्र ।
उगफे बाप लिये अन्न उराय नहीं है ॥२९॥
दिसापतोमे नमनं विधाय ग्याधीनतात्यागमपेपते नो ।
परया यदिगा परमरत्यादिमो देवप्रणासायधियः स्वतन्त: ॥३०॥

एकादशः सर्गः
१४३
हिंसकके सामने झुक्कर स्वतन्त्रताका त्याग अहिंसामें नहीं है।
अहिंसक तो जबतक उसका शरीर नष्ट न हो तब तक स्वतन्त्र ही
रहता है ।। ३०॥
अन्याययुक्तन पथा च कोपि हिंसायलेनैव कमप्यहिंसम् ।
स्वाधीनमाधातुमपेक्षते चेत्तत्याभिलापोत्सननं विधेयम् ॥३॥
यदि कोई अन्याययुक्त मार्गसे हिंसा बल के द्वारा ही किसी अहिंसक्को
स्वाधीन बनाना चाहता हो तो उसकी इच्छाको खोदकर फेंक देना चाहिये।
अर्थात् अन्यायो किसीपर कितना मी अन्याय स्वाधीन बनाने के लिये करे
तो भी उसके अधीन नहीं बनना चाहिये ॥ ३१ ॥
आगत्य कश्चिद्यदि याचवे मां संतय॑ या शस्त्रबलं प्रदया।
स्वीयाभिलापोपनतं हि पाकिस्तानं न वा तं प्रति शस्त्रयोगः ।।३।।
एक आदमी मेरे पास आकर डाटकर, धमकाकर, शस्त्रबल दिखाकर
अपनी इच्छाके अनुसार पाकिस्तान मेरे पाससे मागे तो उसके प्रति
शस्त्रप्रयोग नहीं होना चाहिये ।। ३२ ॥
आकर्ण्य सर्व गतरोपरेपो धैर्येण युद्ध्या च विवेचयानि ।
युक्तं यदि स्यात्प्रतिदेयमेवायुक्तं यदि त्याज्यतरं मया स्यात् ।।३३।।
सब कुछ सुनकर रोपकी एक एक रेखा मिटाकर धैर्यरो बुद्धिद्वारा
मुझे विचार करना चाहिये। यदि पाकिस्तान देना उचित होगा तो मैं
दूंगा दी। और यदि अयुक्त होगा तो त्याग कर दूंगा ।। ३३ ॥
तेनास्य चेतो यदि संजिहीन्मां तत्र दायेन मृति कुसित्वा ।
ज्ञानेन सत्याग्रहियोग्यरीत्या तस्याभिलापं विफलं विद्भ्याम् ॥३४||
इस कारणसे यदि उसका मन मुझे मार डालना चाहे तो उस समय
दृढतापूर्वक मृत्युका आलिंगन करके ज्ञानद्वारा सत्याग्रहीको योग्य रीतिसे
उसकी इच्छाको निष्फल बना देगा चाहिये ॥ १४ ॥

१४४ पारिजातसौरभे संहलोके प्रतिसंप्रहारश्चिद्रं न शौर्यस्य न वा यलस्य । स्पृष्ट्वा न शस्त्रादि किमप्यकम्पस्तिष्ठेदशत्रुत्वमुपास्य चित्ते ॥३५।। अपनेको कोई मार डालनेके लिये आवे तो उसपर प्रहार करना न तो शूरताका चिह्न है और न बलका ही। उस समय शस्त्रादि किसी वस्तुका स्पर्श किये बिना ही चित्तमेंसे शत्रुभावको निकालकर स्थिर रहना चाहिये ॥३५॥ शखाद्युपनत्वमुदस्य चित्ते संस्मृत्य रामं निजमानसः सन् । क्रोधादि वैपन्यमपास्य दूरे प्रेमायुधेनैव जयेदमित्रम् ॥३६॥ शस्त्रादिका आशय छोडकर, क्रोधादिका त्याग करके, चित्तमें रामका स्मरण करके समान मनवाला बनकर प्रेमरूप हथियारसे शनुको जीतना चाहिये ।। ३६॥ हिंसायलेनैव शमप्रवृत्तिर्वाञ्छथा वितिष्ठेत न सा चिराय । कालेन हिंसा प्रकटीभवन्ती सर्व जगन्नाशभुवं नयेत ॥३७) यदि हिंसाके बलसे शान्ति इष्ट हो तो वह दीर्घकाल तक स्थिर नहीं रह सकेगी। समय पर हिंसा प्रकट होकर सम्पूर्णजगत्को नाशकी ओर ले जायगी।। ३७ ॥ क्षान्तिर्विभूपा बलिनामपूर्वा नो निर्वलानां शरणं कदाचित् । क्षान्तिः सदैव द्रढयत्यहिंसां तस्मास्तयोरस्ति सहनजित्वम् ॥३८॥ क्षमा बलयानोंका अपूर्वशृङ्गार है। निर्वलोका वह शरण नहीं है । क्षमा सदा अहिंसाको दृद बनाती है। अतः क्षमा और अहिंसा साथ साथ चलनेवाली चीजें हैं ॥ ३८ ॥ राज्ञो विराटस्य पुरे यसत्सु पाण्डोः सुतेष्वेकदिने कदाचित् । मूर्धन्यभूदीर्घतरं व्रणं तज्ज्येष्ठस्य सन्तापकमुद्रभूव ॥३९॥ जब पाँचो पाण्डव विराट राजाके नगर में निवास कर रहे ये उसी एकादशः सर्गः समय कमी एक दिन युधिधिरके सिरमें एक बहुत बडा फोदा हो गया। उससे सबको बहुत दुःख हुआ ॥ ३९ ॥ एकोपि बिन्दुःक्षतजस्य भूमौ ज्येष्टस्य शीर्ण:पतितो यदि स्यात् । अस्माकमापातरि दुःखाशिर्नूनं पतेत्तच्च भवेदभद्रम् ॥४॥ दुःखका कारण कहते हैं। यदि युधिष्ठिर के सिरसे एक भी रत- का बिन्दु पृथिवीपर पडेगा तो हमारे रक्षक विराटपर अवश्य ही आपत्तिका पहाड़ टूट पडेगा, जो बहुत सराव होगा ॥ ४० ॥ तद्गोपनार्थं व्रणतः सरन्ति सौवर्णपात्रे रुधिराण्यचिन्वन् । अस्मास्यपीत्थं स्खलगोपनाय भावानतिः स्याद्धि परस्परस्य ॥४१॥ तब अन्य पाण्डवोंने उसे छिपानेकेलिये उस फोडे मेंसे बहते हुए रक्तका सोनाके पानमें संग्रह कर लिया। हम लोगोमें भी परस्पर अपराध छिपाने के लिए ऐसा ही माव होना चाहिये ॥ ४१ ।। यद्यप्यहिंसा निखिलेषु धर्मेष्वापत्पदं सार्वदिकं प्रशस्तम् । मन्ये परं त्वाचरणाय शास्त्रं लेभे अनि भारत एव भव्याम् ॥४२॥ यद्यपि अहिंसाको सभी धमोंमें सदाकेलिये उत्तम पद प्राप्त है तथापि मैं मानता हूँ कि उसके आचरणके शास्त्रने तो भारत में ही भव्य जन्म धारण किया है । ४२ ।। प्रझर्पयोनेकपुराणमान्याः संघा मुनीनामपि भारतेस्मिन् । तप्त्या तपास्युप्रतराण्यहिंसां मूर्धाभिपिक्तां रचयाम्यभूवुः ॥४३॥ पुराणोंमें प्रसिद्ध अनेक ब्रह्मापियों और अनेक मुनियोंने भी इसी भारतमें अतिकठोर तपश्चर्या करके अहिंसाको सर्वश्रेष्ठ बनाया है ।। ४३ ॥ अत्युत्तमं त्यागतपः प्रसूते ज्योतिष्मतीयं सुरजा अहिंसा । अद्रीश्वरः शुभ्रतमो विभाति त्यागेन दोपानखिलान्विधूय ॥४४॥ मुदर बलयाली और सुन्दर प्रकाशवाली यह भहिंसा सर्वोचम पारिजातसौरभे त्यागरूप तपको जन्म देती है। हिमालय भी त्यागके द्वारा सब दोपोंको दूर करके निर्मल होकर शोमा देता है ॥ ४४ ॥ अद्यास्त्यहिंसान्तरदोषगादध्वान्ते विलीनेय चिरेण तेन । दीनाननापेक्षत एव सधः सोद्धारकारि जगतो हिताय ॥४५॥ आज वह अहिंसा आन्तरिक दोपरूप गाद अन्धकारमें बहुत फालसे छिप गयी है। वह दोनमुससे जगत्के कल्यागकेलिये शीघ्र ही अपने उद्धारकी अपेक्षा रसती है ॥ ४५ ॥ श्वेता यियासन्ति विहाय नैजी दिष्टिं समग्रामथ भारतोा। काले किमस्मिन्करणीयमारते सर्वेस्तदेवाद्य विचारणीयम् ॥४६॥ अंग्रेज लोग अपना शासन छोड़कर अब भारतसे जानेवाले हैं । ऐसे समयमें हमारा क्या कर्तव्य है, इसीका सबको विचार करना चाहिये ।।४६।। यस्यां धरायां कमनीयकीर्तिजज्ञे स बुद्धो भगवान्सुराय॑ः । तस्यामहिंसा गतिमीदशी चेत्प्राप्ता भवेदद्भतमेव तत्स्यात् ॥४७॥ जिस पृथ्वीपर प्रशस्तकीर्तिवाले, देवोंक भी पूज्य भगवान् बुद्ध उत्पन्न हुए उसमें अहियाकी यदि ऐसी दशा हो तो आश्चर्य ही है ॥४७॥ कश्चिन्मयाराधितदेवमूर्वि भतुं प्रयस्येद्वलतो यदीह । आलिहग्य वां गादतरं निपायां तस्मादसूनां व्ययतो ममैच ॥४८॥ मैं जिस देवकी मूर्तिकी पूजा करता होऊँ उसे कोई बलसे यदि तोड़ना चाहे तो मैं उस मूर्तिको गाद आलिङ्गन देकर, अपने प्राण गवाकर मी उस आदमीसे उस मूर्तिकी रक्षा करूंगा ।। ४८ ॥ त्याज्या भवेत्सा न कदापि मूर्तिर्यावयसुः स्यां विवशोर्तियोगात् । वस्यागतो नैकतमोपि विन्दुः न्योतेत तचापि मयेक्षणीयम् ॥४९॥ चतफ मैं दुःस-पीड़ाके सम्मन्यसे विवश होकर मर न जाऊँ वस्तर में उस मूर्तिको नहीं सोई। मुझे यह भी देखना होगा कि उप पातकफे शरीररो एक भी रक्तका बिन्दु म टपफे ।। ४९॥

एकादशः सर्गः १४७ आश्रित्य हिंसामपि शान्तिरत्र स्थाप्या भवेत्तत्र न संशयोस्ति । न स्यात्परं शान्तिरसी चिराय द्वेपानल: प्रचलयेन्मनोहत् ॥५०॥ इसमें सन्देह नहीं कि हिंसाका आश्रय लेकर मी शन्तिकी स्थापना हो सकती है। परन्तु यह शान्ति चिरकालता नहीं रह सकती । द्वेषकी आग हृदय और मनको जलाती रहेगी॥५०॥ कालेन दावानलतामुपेत्य स ज्यालयेदेव समस्तदेशम् । हा हा तदा स्त्रीशिशुवृद्धवालाः सर्वे व्रजेयुईि हक्ट्रिमारात् ॥५१॥ समय पाकर वह द्वपामल दावानलका रूप धारण करके समस्त देशको नला देगा। हों, उस समय स्त्री, छोटे-छोटे बच्चे, बडे बच्चे और वृद्ध सभी ही शीघ्र ही उस अग्निक हविष = बलि बन जायँगे ।। ५१ ॥ श्रीविक्रमादे मुनिभूतनागसर्वेश्चरे शनबलेनशान्तिः । संस्थापिताः श्वेतजनैः परंतु तन्मानसान्तज्वलनः प्रदीप्तः ॥५२।। विक्रमीय सवत् १८५७ में अग्रेजोने शस्त्रके वलसे शान्ति स्थापित तो की थी परन्तु उनके मनकी आग तो जल ही रही थी।। ५२ ।। नेत्रैः समेपामपि वीक्षितष सर्वत्र वाह्या प्रस्ताति शान्तिः । राज्यं विदेशीयमसह्यमेव लोकेषु सर्वेषु तु शश्वदासीत् ॥५॥ सबकी आँखोंने यह तो देखा ही कि नाहरकी शान्ति सर्वन फैली हुई थी। परन्तु लोगोंक मनमें विदेशीय राज्य सर्वदा असह्य ही बना रहा ॥५३॥ तस्यैव दुष्टं परिणाममद्य श्वेता वयं पाप्यतमिलनेनैः। ईक्षामहे दुर्गमपारमत्र वैवश्यमासाद्य शमापसादम् ॥५४|| उसीका दुष्ट परिणाम थान हम भी और अंग्रेज भी खुली आँखोसे देस रहे हैं । लाचार होकर शान्तिम मी देख रहे हैं ।। ५४ ॥ ईस्ट इण्डिया कम्पनिको विकृप्य राज्यस्यभारः सितशासनेन । आदायि बुझ्या दृढया प्रज्ञानां कतुं वशे प्रायति बुद्धियन्त्रम् १५५||

१४८
पारिजातसौरभ
अंग्रेजी राज्यने ईस्ट इण्डिया कम्पनीसे राज्यका मार खींचकर ले
लिया तथा दृढ दिसे प्रजाकी बुद्धिको-विचारको वशमे करनेका
यत्न किया॥५५॥
विद्यालयान्न्यायगृहाणि सम्यक् संसारसांकर्यमतिष्ठिपन्त ।
शेताः परं नापमिति कदाचिद्वधस्मापुरार्यावनिजा मनुष्याः ।।५६}}
अग्रेजोंने यहाँ न्यायालयों और विद्यालयोंकी, संस्कारोंका मिश्रण
करने की दृष्टि से स्थापना तो की । परन्तु इस देश के लोग उस अपमानको
कमी भूले नहीं ।। ५६ ।।
एवं हि हिन्दूमुसलिम्प्रजानां ज्ञातो विरोधो न शमं गतश्चेत् ।
शस्त्रप्रयोगेण शमं गतोपि भस्मावृत्तो पहिरिवाशु जीवेत् ।।५।।
इसी प्रकारसे-प्रेम पूर्वक यदि हिन्दुओं और मुसलमानोंका विरोध
शान्त न होगा तो शस्त्र प्रयोगसे शान्त होकर भी जैसे रापसे ढंकी हुई
आग फिर जी बाती है वैसा ही यह विरोध फिर भी उटेगा ॥५॥
तस्मात्पुनर्हिन्दुमुहम्मदीयस्नेहानुद्धिं सुदृढां समीहे।
आसीद्यथा पूर्वमकम्पमैत्री जीवेत्तथैयाद्य मूर्ति गतापि ॥५८।।
अतः हिन्दु-मुसलमानों का प्रेम पुनः सुदृढ बने, ऐसी मेरी इच्छा है।
जैसी पहले स्थिर और दृद मैत्री थी वैसी ही फिर भी-मरी हुई है
तो भी हो।।५८॥
तोम सौहार्दमपीह तत्तद्धाहत्वमद्यापि यदीह जीवेन् ।
निःश्रेयसं हिन्दुजनोपि मुस्लिम्लोकोपिसम्यहननु निर्विशेताम् ॥५९॥
यही प्रेम, वही सौहार्द, यही भ्रातृभाव यदि भाज भी जीवित बने
तो हिन्दू और मुसलमान दोनों ही परम शान्तिका अनुभव करें ||५९।।
मुन्येफरन्धेकमितेन्दके यत्प्रान्तीयमालोकयदात्मशक्तिम् ।
शाय नहिंसाजनितं तदेव भाग्यात्सुनश्शाध नवीकरोमि ॥६॥

एकादशः सर्गः १४९ १९१७ ई० में इस प्रान्तने अहिसाजन्य जो शूरता दिखायी थी भाग्यसे मै पुनः आज उसीको नया करता हूँ ॥६० ॥ नीलीप्रभुश्वेतजनेषु चम्पारण्ये विहारीयजनास्तदानीम् । हिंसाप्रयोगं न समाचरन्सा हिंसेतरा शुद्धतराभवनो ॥६॥ बिहारी बन्धुभाने उस समय चम्पारनमें नीलके स्वामी अमेजोपर हिंसाका प्रयोग नहीं किया था अहिंसाका पालन किया था, वह अहिंसा अतिशुद्ध नहीं थी ।। ६१ ॥ नेवल्यहेतोयदि हिंसनाढ्या वृत्ति. परास्या न समर्थिका सा। कस्यापि कार्यस्य ततो बलिष्टाहिंसैव सेव्या जगत. शिवाय ॥६२॥ निर्बलताके कारण त्याज्य हिंसावृत्ति यदि किसी कार्यकी समर्थिका- साधिका नहीं है तो उसे छोडकर सबसे अधिक बलवती अहिंसाकी ही सेवा जगत्के कल्याण के लिये की जानी चाहिये ।। ६२ ।। अनत्यहिन्दूजनता न हेयाद्धिंसां यदि स्वीयमतिप्रभावात् । विस्पष्टमेतत्प्रतिवक्तुमर्हेन्नाहं तया कापि हि वञ्चनीयः ॥६३।। यदि यहाँकी हिन्दूजनता अपने विचारके प्रभावसे हिंसाको नहीं छोड़ सकती तो उसे चाहिये कि वह स्पष्ट उत्तर मुझे सुना दे। मैं चाहता हूँ कि वह मेरी बञ्चना न करे ।। ६३ ॥ सत्येन न स्यान्मनसो व्यथा में सत्यं व्यथाया. परमौषधं में। सत्येन संगत्य जिजीविपामि सत्येन हीनो मृतिमाश्यामि ॥४॥ सत्यसे मेरे हृदयको पीडा न होगी। सत्य मेरी पीडाकी परम औषधि है। सत्यके साथ मिलकर ही मैं जीना चाहता हूँ। सत्यसे अलग रहकर में मृत्युषा आश्रय चाहता हूँ ।। ६४ ॥ हिंस्या भवेच्चेदिह हिंसयैवाहिंसा तदानीं मम जीवनेन । लाभो न कश्चित्प्रतिभाति मेद्य भारो धराया इह केवलोस्मि ॥६५॥ यदि हिंसा अहिंसाको यहाँ मार डालना चाहती हो तो मुझे मेरे पारिजातसौरभे जीनेसे कोई लाम मालूम नहीं होता है। तब तो मैं केवल भूमिका भार ही हूँ ॥६५॥ यनिश्चितं मे मनसा तपोभिः संशेरते धीप्रसरा न यत्र । तद्रक्षणार्थ यदि देहपातः स्यान्मे मनो ग्लास्यति कहिँचिन्नो ॥६६।। जिसका निश्चय मैंने तपोके द्वारा मनसे कर लिया और जहॉ युद्धिको संशय नहीं होना उसकी रक्षाकेलिये यदि मेरा देव चला जाय तो कभी मेरे मनको ग्लानि नहीं होगी ।। ६६ ।। अस्थीनि देहस्य ममेह युष्मद्भूमौ पतेयुर्यदि वान्यतोपि । चिन्तां न मे चुम्बति चित्तवृत्तिः सर्वत्र मे भारतमृत्तिकैव ॥६॥ मेरी यह हड्डियाँ चाहे आपके बिहार प्रान्तमें पढ़ें अथवा कहीं अन्यत्र; इसकी मुझे कोई चिन्ता नहीं है। सर्वत्र ही मेरे मारतकी ही मिट्टी है।। ६७॥ अमुलभपदपद्मकान्तश्रिया विविधवचनसंचयहिन्दवः । यतिकुलधरणीसुधासिन्धुना प्रशममुपनता रुपा दूपिताः ॥६॥ इति सर्वतघ्रस्वतन्त्रपरमहंसपरिवाजकस्वामिश्रीमद्भगवदाचार्यपण्डितराजप्रगीते पारिजातसौरभे एकादशः सर्गः जिनके चरणकमलकी मनोहर श्री सुलभ नहीं है उन यतियों में मुधासिन्धु समान महात्माजीने विविध वचनोसे क्रोधसे दूपित हिन्दुओंको शान्त कर दिया ।। ६८।। इति श्रीरमहंसपरिमाजस्वामिनीमद्भगवदापायपण्डितराजमणीते पारिजातसौरभ म्योपशमारतराष्ट्रभाषाटीकायाम् एकादशः सर्गः

द्वादशः सर्गः
समीक्ष्य देशे निसिले महानलं प्रदीपितं मोहमदीयपादनः ।
मशं तदाभूदतिदुःखविहलो जराकरापीडितपीडितो यतिः ॥१॥
समस्त मारत में मुसलमानोस भनुकरग करनेवालोंने महानल सुलगा
रसा था उसे देखार महात्माजी वृद्धावस्थासे पीडित तो ये दी, इस
दुःखसे अत्यन्त व्याकुल हो गये ।। १ ।।
महाप्रयासेन महातपस्यया कथंकथंचित्प्रशमय्य पावकम् ।
नवासलोप्रान्तगतं दवोपमं विहारमाश्यासयितुं प्रयत्नवान् ॥२॥
बडे मारी प्रयास और बड़ी मारी तपस्यासे किसी प्रकार दावानलके
समान नोयाखलीफे अग्निको शान्त करके महात्माजी विहारको शान्त
करनेमें प्रयत्नशील बने ॥२॥
पुनः पुन: पाटलिपुत्रके यतिमहोमहीन्द्रोपम ईश्वरोपमः ।
समासमेवान्निखिलाञ्जनाप्रमुर्गिसमृझ्या कृपया युपादिशत् ॥३॥
महान् पर्वतके समान धैर्यवाले धौर ईदचरके समान सामर्थ्यवाले
महात्मानीने पुनः पुनः पानाकी समामें इहे हुए लोगोंको समृद्ध वागीले
उपदेश दिया ॥३॥
अयं च हिन्दूमभृतो दयाकरः प्रतीतशौर्यो विबुधोदयाकरः ।
प्रदेश उत्कपजुां पुरस्सरः सदा प्रगम्यो विधुधरनुद्धतैः ॥४॥
यहा से उपदेशका आरम्भ होता है । हिन्दुयोसे मरा हुआ यह बहुव
दमाटु प्रदेश है। इसकी यूरता प्रस्थान है। यह विद्वानोंस आकर
है। प्रगतिशील प्रान्तोंमें श्रेष्ठ है तथा शात्त विद्वान् इसके समक्ष
सिर झुकाते हैं॥४॥

१५२
पारिजातसौरमे
इंच बुद्ध समजायत क्षमामहीमहीपालशिरोमणि पुरा ।
तथा महावीर इह वजन्मनास्तार्थयन्सर्वननुप्मतो महान् ॥५॥
यहाँ ही महती आमावाले बुद्ध भगवान् पहले प्रकट हुए। यहाँ ही
महावीरस्वामीने भी अपन अमसे सब जीवोंको कृतार्थ किया।॥५॥
अय प्रदेशो जनश्च शिक्षित पुरा परब्रह्मविदा प्रपूजिते ।
इहैव सीता जगदेक्पावनी मृदोर्भुव प्राप तनु मनोहराम् ॥ ६॥'
इस प्रदेशको बनविदेहने शिक्षित बनाया है जिसे बडे बडे ब्रहाज्ञानी
भी पूजते थे। इसी प्रदेश में कोमल माटीमेसे जगत्को पवित्र करनेवाला
मनोहर शरीर श्री साताको मिला था ।। ६ ।।
तत समस्तै वि राजिननै सरस्वतीपादकृपाकटाक्षिते ।
महोनतैरिद्धयशोभिटापुकै सदा प्रणम्या इह जन्मिनो जना ॥७॥
सीता यहाँ उत्पन्न हुई थी इसीलिये पृथिवीएर रहने वाले समस्त
विद्वान् , महान् तथा यारवी पुरुष भी, यहाँ पैदा हुए लोगोथे सामने
सिर दुमते हैं ॥ ७॥
मयापि युप्मान्सवत ममादरानिरीक्षमाणेन नवेन बोप्रत ।
प्रणामपूर्व क्रािन्तरात्मना प्रययामेन समागमीद भो ॥ ८॥
म भी आपको मदा आदरको दृष्टिसे देखता हूँ। भापय सामो नत
हार प्रगाम करप म्यागुमनसे कुछ पहरोपनिय मैं यहाँ आया हूँ ॥८॥
विधाय नोयासरिसंमतन्मदापीटयोनि प पीटशोपणम् ।
पागम प्यममना मद्देश्यरप्रणोदित विशिदुपानितु मदा ॥९॥
नापार में जो भाग मुगा रही परमापारगमा भी- जिसमेंसे
१४ पैर है उस मा अगाया है। उस कापर में दुपोहा पर
पारस या महल प्रास दरा रिय मापा है ॥९॥
पिसोक्यते भारतभूतले परम्गहायर सर्पगिण विभायगु ।
ममादिश्यत्यतिवारतापितो पिदारमागां शरणाय दुखित ॥१॥

पारिजानसारभम्
जहानाबाद (बिहार) कीसभामगार विनोद ।
कापा र
पागमापर रन पी मर

.
द्वादशः सर्गः
भारतमें चारो दिशाबों में सबको निगल जानेवाली भयङ्कर आग
दिसायी पड़ रही है । अतः अतितापते तपाया गया हुआ में शरणकेलिये
बिहारमें आया हूँ ॥ १० ॥ .
विहारदेशे पठिता निरक्षरा स्तनन्धया या शिशवो धयोतिगाः ।
उपासकाः सन्ति कृपामहोदधे रघूत्तमस्यावनिनाप्रियस्य च ॥११॥
बिहारमें पढे हुए और अनपद, दूधमुंहें बालक, कुछ बडे बालक और
वृद्ध भी समी, जानकी नाय, कृपासागर श्री रामफे उपासक हैं ।। ११ ।।
न रामभक्तः कचिदप्यनीतिमान्भवेन्न रागादिकदोषसंगतः ।
भवस्य सर्वान्परमात्मरूपिणो नपन्सदेक्षेत जगध कृत्स्नशः ।।१२।।
श्रीरामभक्त कमी अनीतिवाला नहीं हो सकता। उसमें राग द्वेष
आदि दोष भी नहीं रह सकते | वह संसारके समी मनुष्यों और समस्त
जगत्को परमात्मा ही रूप मानता है ॥ १२ ॥
अमगलानामसतां च दृश्यते क्वचित्कचिद्राज्यमितस्ततः परम् ।
अमगलं किन्तु न रोचतेप्यसत्कदापि कस्मा अपिसर्वदाशिवम् ॥१३॥
इधर-उधर आज असत्य और अमनला राज्य दीस पड़ रहा है।
परन्तु असत्-अमनल सर्वदा अशिवरूप दु.खरूप होनेसे कमी क्सिीको
रुचता नहीं है ॥ १३॥
भवे भवेदेकजनोपि सत्यभाग्भवेद्भवे तावदजसरक्षणम् ।
विहार एप प्रनिपाल्य सलं निजस्य देशस्य च शं करिष्यति ॥१४॥
वगत् में यदि एक मनुष्य भी सत्यवादी रहे तो जगत्में नित्यरक्षणकी
सपूर्ण समानना हो सकती है। यह बिहार सत्यरूप बलका पालन करके
अपनी यौर समस्त देशकी रक्षा कर सकता है ॥ १४ ॥
इदाखिला यूयमपास्य मत्सरं विधाय चित्ते परमेश्वरस्मृतिम् ।
भवेत चेच्छान्तवमा नयासलीजना भजेरनियत्वं मनुष्यताम् ॥१५॥

पारिजातसौरभे यदि यहाँ पर तुम सब लोग मत्सरसो छोड़कर हृदयमें ईश्वरका स्मरण करके शान्त रहोगे तो नोवाखलीके लोग मनुष्य बन जायेंगे ॥१५॥ समस्तदेशेद्य निहिंसनं नृणां संमर्दनं सव्यथनं निबर्हणम् । प्रचारमापत्रपया ततो वयं नृशंसतानिन्दनतसरायणाः ॥१६॥ सारे देश में मनुष्योंका वध पीड़ा, मारना, काटना प्रचरित हो गया है। इससे मैं लजावश इस घातुकताका निन्दन कर रहा हूँ ॥ १६ ॥ निकार एपोस्ति हि भारतक्षितेनिपिञ्जनं कस्यचनापि देहिनः। समानदेशस्थितिशालिनस्तु तन्न शोभते कापि जनस्य बन्धयः ॥१७॥ किसी भी मागिका वध यह तो भारतका अपमान है। और भाइयो । अपने ही देश मनुष्यका वध तो मनुष्यको कभी शोमा नहीं देता है ॥१७॥ भयन्तु ते हिन्दुजना भवन्तु या कुरानिनो नान भवेद्विचारणा । न फोपि फेनापि भवेद्विहिंसिनः कचित्कदाचिद्रिपुताप्रमहात् ॥१८॥ चाहे कोई हिन्दू हो अथवा मुसलमान हो, इसरा तो विचार ही कैसे हो सकता है। अनुताफे पारग कभी किसी को मार डालना नहीं चाहिये ॥१८॥ फलाद्वितः स्यादि देश आत्मन: फयापिकृत्या जगताभिवन्दितः। पल एयास्ति स नो नियासिनामिहेति नित्य मनसा प्रतीयताम॥१९॥ अगमरमे पन्दित यह देश यदि हमारे किसी फर्मसे सक्ति होगा तो यर यहाँ रहनेवाले इम लोगोका ही परंक माना जायगा, इसे आप मासे निश्चय पर ॥१९॥ न राजपोयास्यमनोपिनायाचिद्विधाय लक्ष्य निजपन्धुजासनम् भजेत पेनापि पया सदाचितीमिति स्थपीये हदयेषधार्यताम् ।।२०। बिगी रानीतिर इए पनुको एश्य बनाकर अपने भाइयों पथ पाना तो दिमागमे भी उचित नही कहा जा मस्ता, इसे मार दय निश्पर! २०॥

तत्र आप लोग व्यय में बनय पेटा जीवनावर द्वादशः सर्गः ईदारसी दृष्टि में न तो पेटमदानगी यास न कोपि शत्रुः सुहृदस्ति फोपिनोस्वभावतः कस्यपनापनीतले । स्वदोपतो वा गुणतो निजस्य वा समर्जितौ द्वौ भवतो जनैरिह ॥२१॥ इस संसारमें स्वभावसे न कोई मिठीका शनु है और न कोई किसीका मिन है । अपने दोष या अपने गुणसे यह दोनों शत्रु और मिन बनाये जाते हैं ॥ २१ ॥ अयं च धर्मो गुरुतां गतः परामगं च धत्ते लघुतां निरन्तरम् । अयं विवेको न विवेकिनां कचिद्विशोभते तेन निकार्य एपकः ।।२२॥ यह धर्म श्रेष्ठ है और यह धर्म (मजहर) निकृष्ट है, इस प्रकार- का विचार विवेकी पुस्परो कमी मी शोमा नहीं देता । अतः इस विचारका सर्वदा तिरस्कार ही करना चाहिये ।। २२ ।। विहाय रागादिकमीक्ष्यते यदि प्रमाच्या च तटस्थया दशा अवश्यमेवैतदुपाश्रितं भवेत्समत्यमारते निखिलेषु तेप्विति ॥२३॥ राग द्वेषको छोडकर प्रमाताकी दृष्टिसे और तटम्य बुद्धिसे जर सार विचार करेंगे तो अवश्य इसे मान लेंगे कि सब धोंमें ममानता ही है ॥२३॥ न वेत्ति वेदान्न स ईश्वरः परं कुरानभापारगतिन वन्य ना स वेत्ति जन्दं च जयूरमायलं स बुद्धिमान याइयिलंच थोपनि रक्षा वह ईश्वर वेद नहीं जानता है, यह बात नहीं है । वर कुगन नहीं समझता है, यह बात मी नहीं है। वह मय बेट मी रामना है, मुगन, जन्दावस्ता, जबूर और बाइलियो भी दानता है ॥२४॥ न तस्य दृष्टौ मलिना: श्रुतिप्रमाः पुरानवाचापि तथा न मन्नि वा! किमर्थमस्माभिरनर्थशालिनी विधीय ताई मुत्रय कल्य

पारिजातसौरभे
बिहारपुयां वसतां कुरानिनां तथा मुंगेरं परितः स्थितिश्रिताम् ।
मनोन हिन्दूभयतोस्ति यर्जितं ततो न तेयान्ति निजं निजंगृहम्।।२६।।
बिहार नगरमें और मुगेरके बास पास रहनेवाले मुसलमानों के
मनसे हिन्दुओंका भय गया नहीं है अतः वह अपने अपने घर नहीं
जाते हैं ॥ २६ ॥
न चेदुदेत्यात्मकृतेपु हृद्वयथा मनो न वा चेत्नपतेत्रपं तदा ।
क हिन्दुतास्थास्यति भव्यकीर्तिसत्प्रभाप्रभाता निहतैव साधुना ॥२७॥
यदि अपने कियेपर हृदयमें दुःख न होता हो और निलंज मन
लज्जित न होता हो तो भव्य कीर्तिवाली हिन्दुता कहाँ रहेगी? यह तो
तव नष्ट ही हो चुकी है ॥ २७ ॥
भवन्तु केप्येव न शत्रपाणयः स्पृशन्तु केप्येव न शत्रुभावनाम् ।
समं स्थिते सर्वजनेषु सर्वदा महेश्वरे विश्वसनं विधीयताम् ||२८||
न तो कोई किसीके साथ शत्रुता रखें और न कोई हथियार धारण
करें। भगवान् सबमें समानरूपसे स्थित है, उसमें विश्गस करें ॥ २८॥
उपद्रुता ये ययनाः पलायिता गृहं परित्यज्य निजं परं प्रियम् ।
उपेत्य वान्हिन्दुजनाःशुभेच्छया नयन्तु तेषां भवनं पुनः स्वयम् ॥२९॥
जो मुसलमान घबडाकर अपने परम प्रिय घरको छोटकर भाग गये
हैं आप उनके पास जाय और शुभेच्छासे उन्हें उनके घर आप स्वयं ले
आदें॥२९॥
मृतापराधान्स्यजनानपीतरागृहाद्वहिष्कृत्य प शासनार्पितान् ।
धुमध्यमतेन भयेन शासनं पृथाश्रमं स्यान्न च संघदण्डनम् ॥३०॥
जो अपराधी हो यह चाहे आपके सम्बन्धी हो चाहे अन्य कोई भी
, उन्हें परसे बाहर निवाकर सरियो साप दें। इससे न तोसकारका
भम यथं पायमा धीर न सामुदायिक दण्ड ही होगा ॥३०॥

द्वादशः सर्गः व्यथितहृदयतत्त्वो हिन्दुलोकापराधे- यतिवर इति नैजीः संप्रयुज्यैव वाचः सदसि समुपयातान्त्रोधयोधानलान्या. कथमपि सहसा ताब्धान्तचित्तांश्चकार ॥ ३१ ॥ इति सरंतघ्रस्वतघ्रपरमहंसपरिवाजकस्वामिश्रीमद्भगवदाचार्यपण्डितराजप्रणीते पारिजातसारमै द्वादशः सर्गः हिन्दुओंके अपराधते दुःसितमनयाले महात्माजीने इस प्रकारसे अपनी वाणीका प्रयोगारके समामें उपस्थित अद्धजनोंको किस तरह से अकग्मात् शान्तचिच बना दिया ॥३॥ इति श्रीपरमहंसपरिवाजकरवामिश्रीमदगग्दाचार्यपण्डितराजभणीते पारिजातमारमें स्वोपज्ञभारतराष्ट्रमापार्टीकायां दादा सर्गः त्रयोदशः सर्गः यत्रातपद्धोरतमः प्रतापः पाण्डोस्तनूजस्य युधिष्ठिरस्य । सत्याभिसन्धस्य जगत्प्रसिद्धा दिल्लीति पू: पूर्ववदेव सास्ति ॥११॥ जहाँ पाण्डुपुत्र सत्यवादी महाराज युधिष्टिरका भयङ्कर प्रताप वर्तमान था वह जगत्प्रसिद्ध दिल्ली आज भी वैसी ही है ॥१॥ तत्राश्ववेदप्रहदेहिसंख्ये यीश्यब्दके शुभ्रतिथौ चतुर्थ्याम् । अध्ये हि मासे मिलिशियीया सैका सभा सर्वहितानुबद्धा ॥२॥ उस दिल्लीमें १९४७ ई० सन्के जनवरी मासकी चौथी तारीखको वह प्रसिद्ध एशियावासियोंकी एक सभा सबके हितकेलिये हुई थी॥२॥ एजरबिजन् देशत आगतः श्रीयूसोटफासीत्प्रमुखः सभायाः । विद्वद्वरिष्ठं भवमोहनं तं श्रीमोहन कश्चिदपृच्छदेवम् ॥३॥ एजरविजन देशसे आये हुए श्री० यूसोटफ उस सभाके प्रमुख थे। वहाँ किसीने जगत्को लुभानेवाले श्रीमोहनको-श्रीमहात्माजीको किसीने पूछा ॥३॥ एतत्समस्त जगदापदायै प्रवर्ततेद्यापि पृथक्त्वमत्रा भेदं विभिटुकमिदं भवेच्चेत्सर्वार्थसिद्धिर्भविता न वेति ॥४|| कि, यहाँ-जगत्में आज भीअलगपना चल रहा है। वह तो विपत्तिका ही कारण है। यदि सारा संसार भेदभावको छोडकर एक हो जाय तो रावं इष्ट सिदि हो सफेगी या नहीं? ॥४॥ सद्योयदच्छीयतिराज एवदेतज्जगचेन्न भवेदभिन्नम् । नो जीवितुं स्यान्मम कामनात्र दुःसानुविद्धे विमिदे भवेन्न ॥५॥ श्रीयतिराज महात्माजीने तुरन्त ही यह उत्तर दिया कि यदि यह जगत्

त्रयोदशः सर्गः
१५९
,
अभिन्न: = एक न हो सके तो इस दुःसपूर्ण अनेक मेदवाले जगत्में मेरी
जीने की इच्छाही न हो॥५॥
पप्रच्छ चान्यो भवता मनं चेर्दक्यं समस्तस्य भवस्य कामम् ।
तत्साधनानामुपदेशमद्य श्रोतुं समाकाइति सर्वचेतः॥६॥
एक दूसरे माईने पूछा : यदि याप जगत्की एकना चाहते हैं तो
हम सब लोग उसके साधनों का उपदेश सुनना चाहते है ।।६।।
यदि प्रयत्नः क्रियतां दृढेन चित्तेन निःशमियं सदिच्छा।
पूर्ति समेप्यत्यचिरेण लोकमेकीभवन्तं वयमीक्ष्महेद्य ॥७॥
यदि हट चित्तसे प्रयत्न किया जाय तो निस्सन्देह यह इच्छा पूरी
होगी और जगत्को एक बनते हुए हम देखेंगे ॥ ७ ॥
सर्वैशियामानसवन्तुयोक्ती संस्था भवेत्काचिदिदं मतं नः ।
श्रोतुं समुत्का वयमत्र श्रीमत्स्पष्ट मत कोप्यपरो हपृच्छत् ॥ ८॥
सम्पूर्ण एशियाको एक करनेवाली कोई एक संस्था होना चाहिये यह
इम लोगों का विचार है। इस विषयमें आपका क्या स्पष्ट मत है, उसे
हम लोग सुनना चाहते हैं ॥ ८॥
स प्रत्युवाचायमयदयमति प्रश्नः समीचीन उदूढसत्त्वः ।
जाने परं सष्टतरं न किश्चित्संस्थास्थित यस्त्वसमीपगोहम् ।।९।।
महात्माजींने कहा कि अवश्य ही यह प्रश्न उत्तम भी है और दृढ़ मी
है। परन्तु मैं अभी तो घर या अत: इस संस्था सम्बधमें कुछ
बानता नहीं हूँ ॥९॥
अस्याः सभायाः समयं विधातुं पंचित्स्थिरं श्रीटजवाहरेण ।
मामन्न योग्ये समये प्रयासादुपस्थिति साधयितुं च पृष्टम् ॥१०॥
इस समारा कोई समय स्थिर करने के लिए तथा यहाँ मुझे योग्य
समय पर अवश्य आनेकेलिये पण्डित दवाहरलालने पूछा या ॥ १० ॥

१६०
पारिजातसौरभे
माउन्ट
चेतः ॥१३॥
प्रादां तदाहं विवशो मदीयमेतत्प्रियायापि जवाहराय ।
प्रत्युत्तरं रूक्षतरं न शक्यमस्त्यत्र तातागमनं ममेति ॥१०॥
मैंने लाचार होकर पण्डित जवाहिरलाल मेरे प्रिय हैं तो भी मैंने सूखा
सा जवाब दिया कि वात, मेरा यहाँ समाम आना शक्य नहीं है ॥११॥
आसीन्ममेदं हृदयेतिदुःसं संमेलनेस्मिन्न भविष्यतो हि ।
वेट-परमाह्वयन्मामामन्त्रणेनान नवागतोसौ ॥१॥
इस समेलनमें सम्मिलित न होनेका मुझे भी दुःख या। परन्तु
लार्ड माउन्ट बेटन जो अभी नये ( वाइसराय) आये हैं उन्होंने मुझे
आमन्त्रण देकर बुलाया है ।। १२ ।।
यद्यप्यहं कार्यनिमग्न आसं नासीरक्षणायाप्यवकाशकालः ।
स्वीयस्वभावादवहेलनाय तस्याग्रहत्याचकमन्न
यद्यपि मैं कार्यमें फंसा हुआ था। क्षण भरके लिए भी अवकाश नहीं
था। परन्तु अपने स्वभावके कारण चित्तने मुझे उनके आग्रहकी अय-
हेलना करनेकी इच्छा नहीं करने दी ॥ १३ ॥
अनागतं मां प्रहसन्नवादीन्माउन्टवेटन्नधिगोप्ठ्यहं चेत् ।
स्थातुं समीहे मनसश्च तस्य नूनं भवेत्कोपि परः प्रसादः ॥१४॥
जब में यहाँ आया तो लाई माउन्टवेटनने हंसते हुए कहा कि यदि
में इस समामें रहनेपी इच्छा फरूं तो उनके मनमें कोई अपूर्व आनन्द
होगा ॥१४॥
तस्यापि चास्यापि जवाहरस्य यन्दित्वमापद्य सदा स्थितोहम् ।
एतस्य हेतोरहमध शक्तो भूतोस्मि संसधुपवेष्टुमत्र ।।१५।।
मैं तो पाइसरायया और श्रीजवाहरका भी फेदी हूँ। इसीलिए इस
समामें बटने लिए मैं समर्थ हो सका हूँ ॥१५॥
जानामि देशानिसिलान्कथंचित्सत्वादिभिः पिन्तु नसंस्तुतोस्मि।
मानायद्भिपिपिपान्ययलच्चेदश्चिरं चुम्पति विहलत्यम् ॥१६॥

त्रयोदशः सर्गः मैं पत्रादि द्वारा किसी प्रकार सब देशों जानता तो हूँ परन्तु आप लोगोसे मेरा साक्षात् परिचय नहीं है । अतः चिवविह्वल रहता है ॥१६॥ एतत्समाया जनये यदस्ति प्रस्तावपस्ने लिखितं वदूर्ध्वम् । शक्कोधिकं वक्तुमहं न तस्मात्कालन्ययो नो करणीय इष्टः ॥१७॥ इस समाकी उत्पत्तिके लिए जो कुछ प्रस्तावपत्रमें लिसा गया है उसके आगे अधिक कहने के लिये मैं समर्थ नहीं हूँ। अतः समय बिताना मैं नहीं चाहता ॥१७॥ एतादृशी संसदभूतपूर्वा श्रीभारतस्याद्य वसुन्धरायाम् । संगत्य सर्वाङ्गनवं चिरायाचिनोति • सैतिहामुदारमूर्ति ॥१८॥ अभूतपूर्व-कभी भी नहीं हुई यो ऐसी यह समा भारतकी भूमि- पर होकर चिरकाल के लिये सर्वांग नवीन एक सदार इतिहास लिख रही है।॥ १८॥ यूयं परं पश्यथ भारतीयानच शस्त्रैश्च नियुध्यमानान् । निस्संशयं वो हृदये च तेन दुःसाकरिष्यत्यसिलं परित्रम् ।।१९।। परन्तु आपने देखा कि यहाँ मारतवासी अस्त्र शस्त्र लेर परस्पर लड़ रहे हैं । यह परिव आपको अवश्य खिम बनायेगा ॥१९॥ जानीमहे नो प्रियवन्धुताया निर्वाहरीति हृदि संनतायाः । तेनैव शान्ति विरहय्य शत्रुत्वायैव सना नितरां वयं स्लः २० हृदयमें रही हुई जो यन्धुता है उसके निमानेकी रीति हम नहीं जानते; इसीलिये शान्तिका त्याग करके अनुता करने के लिये ही हम तैयार है।।२०॥ किंचिपुरः प्राय आधिदूनो युप्मारमेतदृदये फुरुभ्यम् । एतात्कुकृत्यं मम देशयन्धुलोकानुविद्धं किल विस्मरेत ।।२१|| भाग्य समय में पुछ प्रार्थना दुःखित हृदपले पाया हूँ उसे आर मनमें सें । यह प्रार्थना यह है कि मेरे देशबन्धुओं के इस लड़ाई-झगडा रूप मुकपको आप भूल जायेंगे ।। २१ ।।

१६२
पारिजातसौरभे
वाच्या न दोपा मम युष्मदीये देशे हि युष्मानमद्य भिक्षे ।
अत्रैव विस्मृत्य ममापराधान्गन्तव्यदेशान्प्रतियात शान्ताः ॥२२।।
मैं आप सबसे प्रार्थना करता हूँ कि मेरे इन दोषोंको आप अपने
देशमें जाकर न कहें। मेरे अपराधोरी यहाँ ही भुलाकर आप अपने
देशमें जायरी ।। २२॥
स्वातन्त्र्यसीमानमयं मदीयो देशोधुनैवोद्यतते प्रवेष्टुम् ।
अस्यां धरायामधिपत्यमाराद्यस्यापि कस्यापि न सहमास्ते ॥२३॥
यह मेरा देश आज स्वतन्त्रता प्राप्त करने के लिये उद्यत है। इस
पृथिवीपर क्सिीका स्वामित्व सहन करने योग्य नहीं है ॥२३॥
सा कामना नः परिवर्तनस्य राज्यस्य राज्ञोपि च भारतस्मिन् ।
वस्तव्यमस्माभिरधीश्वरत्वभावेन भूमाविह सर्वथा नो ॥२४॥
इस भारतमें राज्य और राजाके परिवर्तनकी हमारी यह इच्छा है।
हमारे साथ इस भूमिपर राजा बनकर किसीको रहना नहीं चाहिये ॥२४॥
किं स्यात्फलं तस्य तदप्यलं नो ध्यानाद्वहिर्नास्ति मनागपीह ।
भीतिर्न काचिपरिबाधते नः स्फीति. सदा चेतसि चेतनायाः ॥२५॥
इस परिवर्तनका क्या परिणाम होगा वह भी हमारे ध्यानसे जरा भी
बाहर नहीं है। हमें कोई भय नहीं लगता है। चित्तमें उत्साह बढता
ही रहता है ॥२५॥
कर्तव्यमित्येव मनुष्यों लाभोप्यलाभोपि न नोधिकारे ।
ईष्टे सदैवेश्वर एव तत्र सर्यान्तरप्राणमयोस्त्यसौ हि ॥२६॥
पर्तव्य करना यह मनुष्यका धर्म है। हानि अथवा लाभ यह हमारे
अधिकारकी बात नहीं है। उसपर ता ईश्वरका ही स्यामिव है। क्योंकि
यही सबका अन्तरमाण है ॥ २६ ॥
ने स्वयं भाविनमर्थमनोत्पावेत मानुष्यक इत्यसत्यम् ।
इंशेन संप्रेरितमेष वस्तु लभ्येत फालेन जनोप्युपायात् ॥२७॥

त्रयोदशः सर्गः
१६३
मनुष्य अपने मायी पदार्थको स्वयं उत्पन्न करता है, यह कहना
असत्य है । वस्तु सब ईश्वरप्रेरित ही होती है परन्तु मनुष्य उत्तम
उपायके द्वारा समय पर उसे प्राप्त करता है ॥२७॥
एतादशी शक्तिरसौ न चाल्ला नार्य महेशो न परोपि कश्चित् ।
सत्ये हि सर्वानतिचिन्तनीया शक्तिर्निगूढास्ति ततोस्ति सत्यम् ॥२८॥
ऊपर कही हुई ऐसी शक्कि न तो अल्ला है, न ईश्वर है और न अन्य
कुछ । सत्यमें ही अचिन्त्य शक्ति छिपी हुई है । अतः वह शक्ति सत्य
ही है-अन्य नहीं है ॥ २८ ॥
सत्यं परामेति भतं मदीयं कर्तव्यवस्तुष्पभिविश्य तच्च ।
तिष्ठत्सदा प्रेरयति प्रकार्म करें मनुष्यानिह कर्मजातम् ॥२९॥
मेरे मतमें सत्य ही परमात्मा है। वह सभी कर्तव्यवस्तु में प्रवेश
करके रहा हुआ है। वही मनुष्योंको कर्म करनेकेलिये सदा प्रेरणा
करता है ॥ २९॥
वाल्यात्मभृत्येव सुशिलितोस्मि प्राप्यं न कास्यून कथंचिदेतत् ।
तस्माददृश्यं तदनाप्यमेव गम्यं न कस्यापि परेशसत्यम् ॥३०॥
बाल्यावस्थासे ही मुझे सिखाया गया है कि वह सत्यरूप परमात्मा
किसीसे सर्वोशमें प्राप्त नहीं किया जा सकता। यह अदृश्य है। अप्राप्य
है और अगम्य है३०॥
यस्यास्ति यावलमन लब्धं तावत्स तत्पश्यति नान्यथेति ।
यावत्प्रयलं तदुपास्यमाभ्यं सर्वरनन्तं निखिलप्रविष्टम् ॥३१॥
जिसको जितनी शक्ति मिली है वह उतना ही उसे देखता है।
यह सबमें प्रविष्ट है और प्रयनके अनुसार ही वह प्राप्य और
व्यवहार्य है ॥३॥
अत्र स्थ यूयं मिलिताः क्रमेण विभिन्नभागेभ्य इहशियायाः ।
द्वैवीयकेन्देप्रतिकूलदेशे वायके वापि मिलेत चेत्यम् ॥३२॥

१६४
पारिजातसौरभे
आप लोग एशियाके विभिन्न देशों में से यहाँ आकर मिले हैं। इसी
प्रकार प्रत्येक द्वितीयवर्ष अथवा तृतीयवर्ष किसी अनुकूल देदामें मिलते
रहे ॥३२॥
एतादृशां यूयमुपासितानामास्थानपुष्पाश्चित्तवाटिकानाम् ।
सौगन्ध्यमीडयं प्रतिदेशमात्मशक्त्या प्रवाता इव हारयध्वम् ।।३३।।
अपने इस प्रकारको समारूप पुष्पवाटिकाओंके सुगन्धको अपनी
शक्तिके अनुसार प्रत्येक देश में फैलावे-ले जावे ।। ३३ ।।
यूयं समस्ता समवेत्य शान्ता यूरोपदेशं ह्यथवाम्रिका वा।
अन्याः प्रजा चापि विजेतुकामा न स्थति सत्यं परमित्यपैमि ॥३४॥
आप सब लोग इकट्ठे होकर युरोपको अथवा अमेरिकाको अथवा किसी
अन्यप्रजापो जीतनेकी इच्छा नहीं रखते हैं, इस परम सत्यको मैं
जानता हूँ ॥ ३४॥
नो भारतं चापि विदेशिदेशं जेतुं कदापीच्छति चेतसापि ।
एवं करिष्यत्तदतीव नूनं चेतो दविष्यत्यधिकं ममेव ॥३५॥
भारत मी क्सिी विदेशी देशको मनसे भी जीतने की इच्छा नहीं
परता है। यदि वह ऐसा करेगा तो अवश्य ही मेरे ही हृदयको अधिक
दुःस देगा ।। ३५ ॥
निस्संशयं योरुपदेशजानं संगत्य भिन्नासु क्लि प्रजासु ।
एश्येतिखण्डस्य निजप्रभुत्वं संस्थाप्य संस्थाप्य विलुण्ठति स्म ॥३६॥
इसमें सन्देह नहीं कि यूरोपवाले एशियाके भिन्न-भिन्न प्रजाओंमें
नाकर अपना स्वामित्व स्थापन कर फरफे उसको लूटते थे।। ३६ ॥
पायात्यदेशीयजना इवेय स्वातन्त्र्यपूर्ण निजजीवनं चेत् ।
निर्मातुमयानवधार्य यूर्य यायात तदुःखदमेव भूयः ॥३०॥
जिस प्रकार पाश्चात्य लोग स्वतन्त्रतापूर्ण अपना जीवन पनाते हैं
देणाही मनाने के लिये निश्चय किये बिना ही यदि आप लोग चले
शयेंगे, तो या दुःसकी ही मात होगी ॥३७॥

त्रयोदशः सर्गः
वाच्यं मयताहरा एप देशो योग्यः सभाया उचित स्थलं स्यात् ।
अत्रात्यहिंसा सुदृढा सुगम्या सत्यं परं राजत एव चात्र ॥३८॥
मुझे यह कहना चाहिये कि ऐसी समावेलिये यह देश योग्य है
और यह स्पल उचित है। यहाँ अहिंसा अत्यन्त दृढ और मुगम भी है।
एव यहॉ सत्य भी अधिक मात्रामें है॥३८॥
नो भारवं तत्प्रतिवीक्षित यद्युम्माभिरद्यात्र महायशोभिः ।
तद्दर्शनाय प्रतिगच्छतार्या ग्रामेषु लक्षेषु च सप्तकेपु ॥३९॥
ऊपर कहा है कि यहाँ अहिंसा अधिक दृढ है, यह ठो असत्य है,
क्योरि दिल्ली में तो हिंसा उस समय मी हो रही थी। नोआखलीमें
हिंसा चल ही रही थी। बिहार की भी यही दशा यी। तब यह
कहना कि भारतमें अहिंसा दृट है, यह सत्य नहीं है। इसका उत्तर
देते हैं। आपने जिसे देखा है वस्तुतः वह भारत ही नहीं है।
यदि सच्चे भारत को देखना है तो आपको सात लाख गांवों में बाना
चाहिये ॥३९॥
तेवेव विध्वस्तमनुप्यतेषु प्रामेपु वनारतमस्ति दृश्यम् ।
श्रव्यश्च तत्रोटजयासिषक्लाज्ज्ञानस्य सारो ननु योधुनापि Iteel
बहाँ मनुष्यता न हो चुकी है उन्हीं गाँवों में ही भारतका पार
दर्शन कर छकते हैं। वहाँ ही आप आज भी होपटोंमें रहने वालों के
मुखसे हानका सार मुन सकते हैं ॥४०॥
पोटजेप्वेष निवासशीलं शीलान्वितं भारतमीक्ष्यतेद्य ।
प्रासादहीनेप्यपि हHहीनेष्वेवेव लीनं ननु भारत नः ॥४शा
पासके सोपहोंमें ही भाज सर्वशीलसमल भारत देखा जा रहा
है। बहाँ महल नहीं हैं, हवेलियों नहीं है उन्हीं गॉमें मारत-दमाग
मारत लिन गया है॥४॥

१६६
पारिजातसौरभे
दिल्ली च मद्रासपुरं च कालीकाता च मुम्यापुरमेय दृष्टम् ।
श्रीमद्भिरेतानि न भारतं स्यात्पाश्चात्यसंस्कारविभूपितानि ॥४२॥
आप लोगोंने दिल्ली, मद्रास, कलकत्ता, बम्बई आदि शहर ही देसे
हैं। परन्तु यह भारत नहीं हैं। वह तो पश्चिमीय सभ्यताके रंगसे
रंगे हुए हैं ॥४२॥
आसं यदाहं किल दाक्षिणात्याफ्रीकाप्रदेशेपु कुलीवकील ।
फ्रांसो जनः कोपि विचारशीलो मां तत्र सख्येन हसन्नवापत् ॥४॥
जब मैं दक्षिण अफ्रिकामें था और अमेज लोग मुझे कुलियोंका
वकील कहा करते थे उस समय एक विचारवान् मास-वासी माई
मित्रता करनेकी दृष्टिसे प्रसन्नतासे मेरे पास आये ॥४३॥
फ्रांसोद्भवा तज्जननी सुशीला श्वेतागजस्तज्जनकः सुशीलः ।
तस्माच्च तहेहजनाडिकासु फ्रासाड्ग्लदेशक्षतजप्रवाहः ॥४४॥
उनकी माता तो प्रेच थीं और उनके पिता अग्रेज ये। अतः
उनके शरीग्में मास और इंग्लैंड दोनों देशोंका सून उनकी नस-नाडियोंमें
बह रहा था ॥४४॥
अशिश्रवन्मा स का तदेका फ्रान्सीयभापात उदारचेताः ।
स्वेच्छात एवातिनिगृढ़तत्त्वां तो श्रावयामीह बुधप्रकाण्डान् ||४५)
उस समय उन्होंने उदार मनसे, स्वेच्छासे हो मंच मापासे उद्धृत
परफे एक वार्ता नझे मुनायी थी उसे मैं आपको सुनाता हूँ ।।४५||
सत्यं विजिज्ञासितुमाकुलाङ्गास्तत्त्वप्रियास्तत्त्वविदत्रयो हि।
भान्साद्विनिर्जग्मुरनुस्मरन्तः सर्वाभिसेव्यं परमाद्यदेवम् ॥४६॥
सस्य क्या पदार्थ है उसे जाननेलिये जिनका अङ्ग अङ्ग व्याकुल
था ऐसे तीन आदमी भगवान्का स्मरण करते हुए मांससे निकले ॥४६॥
भ्रान्ताश्च देशास्त्रिभिरेशियाया लब्धं न सत्यं सुगुहाप्रविष्टम् ।
एको गतस्तेषु च भारतो: पनाम मुख्यासु पुरीपु तायत् ॥४७॥

त्रयोदशः सर्गः यह तीनों ही एशियाके सब देशों में फिरे परतु गुहाप्रविष्ट सत्य उन्हें प्राप्त नहीं हुआ। तब उन तीनों से एक मारतमें गये और मुख्य मुख्य नगरोंमें पहिले पूमे ||४७} प्रासादपुजेषु कृताधिवासाप्राप्तः खियो या पुरुषाननेकान् । जिज्ञासमानः स हि सत्पदेयं नैराश्यमेवान्यभवत्तदानीम् ।।४८11 महलों में रहनेवाले बहुतसे पुरुषोंको और बहुत सी स्त्रियोंको वह सत्यकी शोधकेलिये मिले । परन्तु उस समय यह निराश ही हुए ॥४८॥ गतसदा ग्रामटिकासु सद्यः पस्त्येषु दारिद्रयनिपीडितानाम् । निप्ट्योटजे तत्र गतः स विद्वान्वभूव रब्धस्वमनीपितार्थः ।।४९।। तब यह गाँव में दरिद्रतासे पीडित लोगोंके घरों में गये। वहाँ वह एक हरिजन-अत्यनके झोपड़ेमें गये और यहाँ उन्हें सत्यदेवका साक्षात्कार हुआ। ४९।। तस्माद् ग्रुये गच्छत वीक्षितुं चेमामेषु यूयं निपुणं तदानीम् । किं भारतं तदविता तिशीनं ज्ञानं व्यतीतारययं पुनर्वः ४५०|| इसीलिये मैं कहता हूँ कि यदि आप गाँवों में सावधानतापूर्वक भारतको देखने के लिये वाय तो यहाँ मारत क्या है ? यह शान आपको अवश्य होगा ।। ५०॥ प्राच्या. प्रतीची प्रथमं हि लेभे ज्ञानप्रमापुञ्जपरावतारम् । जथुष्टयुद्धौ प्रवभूयतुस्तामध्येशियाभूमि स यीगुरासीत् ।।५।। यह तो निश्चय है कि पश्चिमने पूर्व से ही शानको प्रात किया है। एशियाकी भूमिमें दी जर्युट हुए, पुट हुए और यीशुहुए ॥ ५१ ॥ योशोश्च पूर्व परिलब्धजन्मा मूसापि संजज्ञ इजिप्तदेशे। प्राच्या विजातःस मुहम्मदोपिप्राची ततोहत्येय गुरु प्रतीच्याः ।।१२। यांशुसे पूर्व भूमा भी ईजिप्तमें पैदा हुए थे। मुहम्मद मी पूर्व में हो पैदा हुए थे। अतः पूर्वदेश पश्चिमदेशोफे गुरु है ।। ५२ ॥

पारिजातसौरभे रामस्य कृष्णस्य पवित्रनाम्नी नाजीगणं वेन न वेदितव्यम् । महाल्यनूनं हि तयो. परन्तु क्षातौ न तौ पुस्तकपत्सुधीभिः ।।५।। मैंने राम और कृष्णके पवित्र नामोकी गणना नहीं की है। इससे यह नहीं मानना चाहिये कि उनका माहात्म्य कम है। नाम न लेनेका कारण यह है, कि पुस्तकोको पढकर ज्ञान प्राप्त करनेवाले विद्वानोंको इतिहासके पुस्तकमे यह नाम नहीं मिलेंगे ॥५३॥ यात्समादिक्ष दुदारचेता जगत्समनं कृपयेशियासी । तत्तद्भवेत्सर्वमदभ्ररूपैर्याधमाकचित्ते प्रथिवं सदेति ॥५४॥ उदार मनवाले एशियाने कृपा करके सारे जगत्को जो जो उपदेश किये हैं वह सब आपके मनमें निश्चित रूपसे स्थिर रहें ॥५४॥ सन्देष्टुमिच्छा यदि जागृयाद्विश्चित्ते प्रतीची प्रति तर्हि सत्यम् । प्रेमाप्यहिंसा निखिलेषु देशेष्वारात्समान्संदिशताद्य सम्यक् ॥५५|| यदि आप हृदयमें पश्चिमको कोई सदेश देनेकी इच्छा हो तो सत्य, प्रेम और अहिंसाको सब देशों में सबको सदेश दें ॥ ५५ ॥ योप्माक्युद्धेर्न हि देवलायाः सम्यक्परीवर्त इहास्त्यभीष्टः । बुद्धथा मनो यो हृदय च गाढं सद्योधिकतुं मम चेतसीच्छा ।।१६।। वैवल आपकी बुद्धिम परिवर्तन करना इतना ही मुझे इष्ट नहीं है। बुद्धि के साथ-साथ आपके मन और हृदयपर पूरा अधिकार करने की भी मेरे मनमें इच्छा है ।। ५६ ॥ उपगत इह पालो लोकशिष्टः समन्तात्, पददलितजनोयो जाति सेवतेद्य । अयसर इति शुभ्रः प्रेमसत्यादिवाना, सरयत गतमोहाः संप्रचाराय लोके ॥५७।। मापनका यह समम उपस्थित है। चारों और पददलित समान त्रयोदशः सर्गः आज बग गया है। इसलिये यह बहुत सुन्दर समय है। प्रेम, सत्य, अहिंसाका प्रचार लोकमें करने के लिये सावधान होकरशीमता करें ॥५॥ गतदयहृदयेयं स्वार्थपूर्णा प्रतीची, विविधरचितजाल: सर्वथा वः क्षितीनाम् । सकलरसमचूपत्तत्सम विस्मरन्तो, लुलितहदयवृत्ति शिक्षयध्वं हि तत्त्वम् ।।५८॥ पश्चिम निर्दय और स्वार्थपूर्ण देश है। अनेक प्रकारके रचे हुए बालोंसे आपकी पृथिवीका रस उसने चूस लिया है। इन सब बातोंको भूलकर उस चपल वृत्तिवाले पश्चिम देशको तत्त्वकी शिक्षा आप- लोग दें। ५८॥ अतिविपदि निममा संतवं संविपण्णा, रचयदणुकबॉम्बा साप्तनैराश्यविम्या । मुदुपनविसयन्ना श्रान्तिपादामिलमा, वसनविरहसिन्ना वः प्रतीक्षा करोति ॥५९।। अत्यन्त विपचिमें पड़ी हुई, उदास, अणुबॉम्ब बनाती हुई, निराशाका दर्शन करती हुई, प्रसन्नता प्राप्त करनेकै यत्नमें स्गो हुई, यही हुई, अब जिसके खास मी अन्तिम दाम पहुँच गये है वह पश्चिम दिशा आर लोगों की प्रतीक्षा कर रही है ।। ५९ ॥ निखिलजगदिदानी दुःखदायानलेस्मि- निपतितमिति हाहाकारमार्गेवि नित्यम् । समय इह विपको यः कृपावारिधारा, समयतु नयनासां का प्रतीचीमुदायत् ॥६॥ इति सर्पमस्वतन्त्रपरमहंसरियाजस्वामिश्रीमगरदावार्यपपिरतराजगोवे पारिजातसौरमे प्रयोदशः सर्ग.

१७० पारिजातसौरभे भाज सारा ही जगत् दुःखदावानलमें पड़ा है अतः नित्य हाहाकार कर रहा है। आज समय पक गया है अतः आपकी कृपारूप जलधारा प्रसन्नतासे शीघ्र ही रोती हुई पश्चिम दिशाको शाति प्रदान करे ॥६०॥ इति श्रीपरमहंसपरिव्राजकस्वामिश्रीमद्भगवदाचार्यपण्डितराजप्रणोते पारिजावसौरभे स्वोपज्ञभारतराष्ट्रभाषाटीकायां त्रयोदशः सर्गः . - चतुर्दशः सर्गः भारतक्ष्मा यथा हिन्दूंसर च कुरानिनः । सूते प्रास्त सव सर्वमेदवहिष्कृता ॥१॥ मारवभूमि देने हिन्दुओंको वैसे ही मुसलमानोंको मी पैदा करती है और भूतकालमें कर चुकी है। उसकी दृष्टि में कोई भेद नहीं है ॥ १ ॥ मारतीयमुसल्माना वहतो म्लेच्छमानसाः। हिन्दून्हन्तुं निरचिन्वन्मुस्लिम्लोगनवारिताः ॥२॥ भारतीय दुइ मुसलमानोंने मुन्टिमीगरे बहकानेसे हिन्दुटोंको मार लनेका निश्रय किया ॥ २॥ पाकिस्तान मुसल्मानराज्यं स्थापयितुं समे। पुरानिनोर हिन्दूना हनने कृतनिश्चयाः ॥ ३ ॥ पाफिलाननामक मुसल्मानी राज्य स्थापन करने के लिये सब मुसल- मानोंने निश्चय किया कि हिन्दुओं को मार डालो ॥३॥ जिन्ना जीनोज्यसत्यतुं हिन्दून्या हिंसितुं वया। भारतीयमुसल्मानान्त्रोदसाहयवासिलान् ॥४॥ मिस्टर दिना पदे हो गये ये तो मी उन्होंने हिन्दुओंका तिरस्टार और कपर टालने के लिये सभी मारतीय मुसलमानोंको उमझाया- उत्प्रेरित किया ॥४॥ अधिनीयारालि घ्यापत्प्रथम हिन्दुहिंसनम् । इननं घेदनं लुण्टा धर्मात्प्रच्यारनं वया ॥५॥ नोबासली (प) में मुदने पहले हिन्दुओ कारा बाना शुरू हुआ। मारना, काटना, सूरना और घमंत्र हरना, यह चारों ओर या पैलग।।५॥

१७२
पारिजातसौरभ
निखिलेषु ततः पश्चाद्देशेवाश्नुत सर्वथा।
हिंसा प्रवृत्तिरेतेषां मुहम्मदमतश्रिताम्॥६॥
उसके पश्चात् सारे देशमें इन मुसल्मानोंकी हिंसाप्रवृत्ति फैल
गयी ।।६॥
हाहाकारेण निखिलं भारतं व्याप्तवत्तदा ।
सिताङ्गसहकारेण सर्वमेतदभूदिह
॥७॥
सम्पूर्ण भारत हाहाकारसे भर गया। अग्रेजोंकी सहायतासे ही यह
सब हुआ था ॥७॥
जहीति हिन्धि हिन्धीति दह कुन्त निमजय ।
भिन्धि च्छिन्धीवि संरावैहिन्दवो व्याकुलीकृताः ॥ ८॥
मारो, मारो, जलाओ, काटो, डुवाओ, फोड़ो, तोडो इत्यादि शन्दोंसे
हिन्दु व्याकुल बना दिये गये ॥ ८ ॥
गेहेभ्यो दह्यमानेभ्यो मुसल्मानजनैः खलैः ।
शय्योत्यायमधावन्त हिन्दवो नत्तमातुराः ॥९॥
दुष्ट मुसलमानोंने घर जला दिये । रात्रिमें हिन्दू लाचार होकर
पथारीमेंसे उठकर भागे ॥९॥
पेशावराय पक्षागत्सिन्धुदेशाच हिन्दवः।
पलाय्य देहलीमायन्मुसल्मानभयातुराः ॥१०॥
पेशावर, पंजाब और सिन्धसे हिन्दू लोग मुसलमानों के भयसे घबड़ा-
कर भागकर दिल्ली आ गये ॥१०॥
सेषु फेपामपि भ्राता फेपामपि पितामहः ।
केषामपि च पितराय जनार्श विनाशिताः ॥११॥
उनमेंसे किसीके भाई, विसोफे दादा, बिसीके माता पिता बकरेके
समान काट ले गए थे॥११॥

चतुर्दशः सर्गः १७३ पासांचन पतिता स्वसा माता पितुप्वसा । मातुष्वसा च कासांचित्केगाग्राहं निपातिताः ॥१२॥ किन्हीं त्रियों के पति, माई, वहिन, मा, पूया, मासी, बाल पकड- पकड़ कर मार डाले गए ये ॥ १२ ॥ उस्मात्त्रोधानलबालालीढप्रत्यङ्गहिन्दवः । पैरशुद्धिमकाईस्ते द्वेपशत्रुपराहताः ॥१३॥ इसते हिन्दुओंमें मी क्रोधकी याग मड़क उठी। देप मर गया । बदला लेनेकी इच्छा उनमें बाग उटी ॥ १३ ॥ हाय हायं गृहान्स्वीयान्देहलीतः कुरानिनः । त्वपपूर्व पलायन्त हिन्दुक्रोधाग्निमर्जिताः ॥१४॥ हिन्दुओंकी श्रोधवालाले बले हुए मुसलमान अपने-अपने घर छोड़कर झट दिल्लीले माग गए ।। १४ ।। रुग्णाः प्रमा महादुःसाः प्रवयसः कुरानिनः । महात्मपादपायोजयुगलं शरणं ययुः ॥१५॥ कितने ही रोगी, दुःखी, बूटे तया बुद्धिमान मुसलमान महात्मा भी गांधीजी घरगोंकी शरगमें गये ॥१५|| तेषां विपत्त्याः श्रुत्वालिप्य दुःखं निजे हृदि । लोककल्याणकामोसी चिन्तामापन्महामुनिः ॥१६॥ उनकी दुःया सुनकर, मन्में दुःखी होकर, सनका क्लाग चाहनेवाले महात्माजी चिन्तित हो गए ॥ १६ ॥ प्रण्यगादीद्यविश्रेष्टः सर्वान्दिन्दून्समन्वितान् । भवतां शोभते नैतदुपाक्रसत कर्म यन् ॥१७॥ इकट्ठे हुए सब हिन्दुओंको श्रीयतिरादने कहा कि आपने दिस बाईका भारम्भ किया है वह आपको शोमा नहीं देता है ॥१७॥ ।

१७४ पारिजातसौरभे प्रवर्तते। लजते योद्य कार्येण महत्यार्यपरम्परा । संस्कृतिनेयमार्याणां हिंसया पैरशोधनम् ॥१८॥ आपके कार्यसे आज आर्योकी एक लम्बी परम्परा लडित हो रही है। हिंसासे बदला लेना आर्योंकी संस्कृति नहीं है ।। १८ ॥ यद्यप्यनारत हिंसा पाकिस्ताने तिरस्त्रियन्ते हन्यन्ते निघृण तत्र हिन्दवः ॥१९॥ यद्यपि पाकिस्तानमें हिंसा रातदिन हो रही है। हिन्दू निर्दयताके साथ अपमानित किये जाते हैं और मार डाले जाते हैं ॥ १९ ॥ शठायारं निरीक्ष्येयं शठाचारप्रवर्तनम् । आर्यानुमोदितो नायं धर्मो भवति कहिचित् ॥ २० ॥ इस प्रकार दुराचारको देसकर दुराचार बढाना यह आर्योंका भी भी सेमत धर्म नहीं है ।।२०।। उपटुतैर्निरपघ्ननिर्गच्छरमाणपृत्तिभिः आयस्तदेय पर्तव्यं यशो न मलिनीभवेत् ॥ २१ ॥ उपद्रयसे हैरान दिये गये हों, निरामय यने हो और मृत्युके किनारे सहे हो तो भी हिन्दुओको वही करना चाहिये जिससे कि कीर्ति मलिन न हो ॥ २१॥ पाकिस्तानात्तगयन्ते निस्सार्यन्ते च हिन्दयः। न तथा यमित्रापि युप्माकं फीतये भवेत् ॥ २२ ॥ पादिम्ताामेरो हिन्दू भाग रहे हैं, निकाले जा रहे हैं, पैगाही या भी करने से भारती पीति नहीं देगी ॥ २२ ॥ अप्रचतिधर्माणो दुर्घर्माणो न या पयम्। गुमेपसः पपारं राणा दा दुर्जनायितुम् ।। २३ ।। हमरोरा मानहान, ऐसे हम नही है। हमारा पर्म भी चतुर्दशः सर्गः दुष्ट धर्म नहीं है । हम बुद्धिमान और समझदार हैं तत्र दुराचार हम कर सकते हैं ॥ २३ ॥ मुसल्मानान्कथं यूयं वक्तुं शक्य निस्रपाः । पाकिस्तानं प्रयातेति दारणं दारणं वचः ।। २४ ॥ आप निठंड होकर मुसलमानोंको कठोर और फाइनेवाला यह वचन कैसे कह सकते हैं कि तुम लोग पाकिस्तान चले नामो॥ २४ ॥ न मया शक्यचे वक्तुमीदगार्यविगर्हितम् । अवाच्यं वचनं चापि भारतक्ष्मात्रपावहम् ।। २५ ।। मायाँसे निन्दिन, और भारतको लडित करनेवाला ऐसा अवाच्य वचन मैं तो नहीं कह सकता हूँ ।। २५ ॥ निफाशनेन सर्वेषां भारततः कुरानिनाम् । न झोयं नैव मानुष्यं प्रख्यातं स्यात्कुतोपि वः॥ २६॥ मारतसे मुसलमानोंको निकाल देनेसे न तो आपकी शुरवाकी और न मनुष्यताकी ही प्रसिद्धि होगी ।। २६ ॥ अनुकतुं महावीराः शनुवन्ति न पामरैः । उत्तमाचरितं किंचिद्या तद्वाविचारितम् ।। २७ ॥ नीच लोग कुछ भोलें, या विना विचारे कुछ करें उसका अनुकरण वीर लोग नहीं कर सत्रवे ।। २७ ।। बहावलपुरान्मीरपुरादपि समागमन् । वो हिन्दयोकध्यस्था विगलश्रयः॥२८॥ बहावलपुरसे और मीरपुरसे मी बहुतसे हिन्दू भाये हैं। उनकी दशा कहने योग्य नहीं है। उनकी याँखोसे माम् वह रहे हैं।॥ २८ ॥ श्रीजवाहरलालोपि उपाविष्टव तत्क्षणम्। अभ्णोदेकचिचेन घामिकस्तव्यथाकयाः ।। २९ ।।

१७६ पारिजातसारमे प्रवर्तते । धार्मिक श्रीजवाहिरलालजी भी उस समय यहाँ उपस्थित थे और एकचिचसे उनको दुःसकी कहानी सुनते रहे ॥ २९ ॥ हिन्दूनां रक्षणायासौ यावच्छक्यं रक्षिताः सर्व एव स्युर्नाशा ह्येपास्ति कल्पिता ॥ ३० ॥ हिन्दुओंकी रक्षाकेलिये शक्तिके अनुसार वह प्रवृत्त हैं। परन्तु यह आशा नहीं रखी गयो है कि सब हिन्दू बचा लिये जायेंगे ।। ३० ।। धूमयानानि वावन्ति नास्माकं सविधेधुना । अपेक्षितानि यावन्ति तानानेतुमिहाखिलान् ॥ ३१ ॥ उन सभी हिन्दुओंको यहाँ लानेकेलिये जितनी रेलगाड़ियाँ चाहिये उतनी हमारे पास इस समय नहीं हैं ।। ३१॥ न काश्मीरपथं चास्ति पर्याप्तं निरुपद्रयम् । लक्षकक्षातिवान्ताल्लोकान्सोईन तत्क्षमम् ॥ ३२॥ काश्मीरफा मार्ग भी सर्वथा सुरक्षित नहीं है। लाखों भादमियोंको या नहीं सह सर्वांगा ।। ३२ ।। शक्याः सर्य उपायास्ते गृहीताः सन्ति सत्वरम् । पापिस्तानस्य हिन्दूनां प्राणप्राणवे ननु ।। ३३ ॥ जितने उपाय पन सपते हैं वह रामी धीर ही पाकिस्तानके हिन्दुओंडी बान पचाने के लिये दिये गये हैं ॥ २३ ॥ अनुपायर्या दि सपा सद्गुणाः सन्मनीपिभिः । दोपाः स परित्याग्या मनोमालिन्यतयः ॥३४॥ पुदिमानोको पारिये कि रायपे अच्छे गुगोही अनुकरण करें। दीपोरासकर देना चाहिए क्योकि उससे मनपा दोष पढ़ता है ॥१४॥ पिम भारतं पाप प्रयति पशासने । गमन व निपं नास्ति दुरसमयोध्यम् ॥३५।।

चतुर्दशः सर्गः १७० आब भारत दो मागों में विमन है। अलग अलग दो मार हैं। यहाँ नाना बहुत कठिन है। वस्तुतः यह सगर समय थाया है ।।३।। गजश्रुतिग्रहब्रह्ममिते वैशववत्सरे सितम्बरस्य नवमे दिवसेहमिहागमम् ॥३६॥ वा० ९ सितम्बर १९४८ ई० को मैं यहा भाया । ३६ ।। कलिकातात आपत्य तदानीं गन्तुमुत्सुकः । पश्चिमीयं च पश्चानं परमिच्छास्ति विग्निता ॥३॥ कलकचाते आकर उसी समय में पश्चिमीय पन्नात्र बाना चाहता था। परन्तु विघ्न उपस्थित हुया ॥ ३७॥ भन्यामामात्पुरा दिल्ली या सा तरिमन्दिने मया। हवामा च हतप्रागा सत्य वीदिवा विता॥३॥ जिस दिल्लीकी मव्य शोमा यां, दो दिल्ली प्रकाशमान यी ठसदिन मैंने देखा कि उसकी शोमा चली गयी है, प्राग मी पढ़े गये हैं और वह नष्ट हो चुकी है ॥ ३८ ॥ सीयागनिकलोकानां सर्वेषां निष्पमं मुसम् । न्यवेदयन्मनोदुम्स सर्वाङ्गपरितापनम् ।।३९॥ मेरे स्वागतके लिये जो लोग आये ये सबका मुँस बता रहा था कि उनके मन में दुश्व और परिवार है ॥ ३९ ॥ बल्लभोपि परित्यन्य जन्मजावां प्रसन्नताम् । प्राचकाशत सन्नात्मा मनस्यां कामपि व्यथाम् ॥४॥ श्री सदारवटममाई मी यपनी सामानिक प्रसन्नताको छोडकर मानसिक व्यया प्रकट कर रहे ये॥४०॥ राजधानीस्थलोकेपु कटहानल रत्थितः। नवागताय ने तहि तेनैनात्र निवेदितम् ।।४।।

पारिजातसौरभे . जब मैं यहाँ नया नया आया तब उन्होंने ही मुझे कहा था कि इस राजधानीमें झगडा हो गया है । ४१ ॥ चमूचरदारप्रासादथवा नगररक्षकात् वस्तुतो नास्ति सा शान्तिर्या सरवलोक्यते ॥४२॥ सैनिकों के बागों और सिपाहियोंके कारण यह शान्ति नहीं है, जिसे सब लोग देख रहे हैं ॥ ४२ ॥ मृत्युमियमुपशिष्य प्रवृत्तां क्षोमवर्द्धिनीम् । अशान्तिमपनेप्यामि प्रतिज्ञा पालयामि च ।।४।। क्षोम बदानेवाली इस अशान्तिको मै मृत्युका बालिगन करके भो दूर करूँगा और मेरी प्रतिज्ञामा पालन करूँगा ॥ ४३ ॥ गतेषु दिवसेष्वासीद्या मैत्री यच्च सौह्रदम् । स्पृहयामि सदा तस्ये तस्मै चाप्युन्मनीभवन ॥४॥ भूतकालमें जो यहाँ मित्रता और सौहार्द था उसके लिये आज भी मैं इसता हूँ ॥४४॥ ये मां द्रष्टुं समायान्ति मुसल्माना विचेतसः । फर्तव्यं किं हि तरोत्येचं पृच्छन्त्यनारतम् ।।४५।। घरहार हुए जो भी मुसलमान् मुझे मिलनेके लिये यहाँ आते हैं, सभी पूछते हैं कि आज उन्हें क्या करना चाहिये ।।४५ ॥ तेषां सयुक्तिका प्रश्नः सर्पयास्ति निरुत्तरः। तेन मे व्यथते वित्तं वश्यं च विभाति में ॥४६|| उनफेरा पतियच पदनमा मेरे पास कोई उत्तर नहीं है | भता

चतुर्दशः सर्गः
मेरे अन्तर से शब्द निकलता था कि मैं उपास करूँ। परन्तु
अपनी निर्बलता का सन्देह करक में सदा उदासीन रहता आया हूँ ।।४७||
उपवासमवालम्ब्य
प्रमानां दुःखजन्मनाम् ।
सर्वेपामेय लभ्येत योग्यमेव
सदुत्तरम् ॥ ४८॥
उपवासका सहारा लेकर दुःखसे पैदा हुए सभी प्रश्नों का योग्य उत्तर
मिल सकता है ।। ४८॥
रोचते मे न वैवश्यं सर्वस्मिन्विपयेन्यहम् ।
सपवासमहोपध्या स रोगः स्यात्तिरस्कृतः॥४९॥
मुझे हमेशा हर एक विषय में पराधीनता अच्छी नहीं लगती।
उपवास रूप महौषधिसे वह रोग दूर किया जा सकता है ।। ४९ ॥
उपवासो महाशखममोघमसिसंनिभम् ।
चरम परमं दिव्यं ग्राहां तञ्च भयाधुना ॥५०॥
उसवास बडा मारी शस्त्र है। तलवारकै समान अमोघ शस्त्र है।
मेरा वह बड़ा परन्तु अन्तिम अस्त्र होनेसे में उसका ग्रहण करूंगा ॥५०॥
निरणपमहं सर्व परिणाममवेक्ष्य च ।
प्रायोपासनमेवाद्य सर्वव्याधिहरं परम् ॥ ५१ ॥
सब परिणामोंका विचार करके सर्वव्याधिका नाशकरनेवाले उपवास
ग्रहणमा मैने निर्णय किया है ।। ५१॥
आधिव्याधिव्यथाहारि सर्वेपामुपकारि च।
नास्ति ह्येतादृशं किञ्चिन्महीपघमनुत्तमम् ।। ५२ ॥
मानसिक रोग और शारीरिक रोगकी पीडाको हरनेवाले तथा सबका
उपकार करनेवाले उपवास के समान कोई उत्तम महौषधि नहीं है ।। ५२॥
एशियाहृदयादद्य तद्वारा सर्वभूतलात् ।
रामराज्यस्य माहात्म्यं विरोधत्ते कमाइथ ॥ ५३॥

१८० पारिजातसौरभे मया एशियाके हृदयसे ओर उसके द्वारा सर्व पृथिवीपरसे रामराज्यका माहात्म्य धीमे धीमे अस्त होता जा रहा है ।। ५३ ।। विश्वसिम्यहमद्यात्मा भारतस्य यदि कचित् । निलीयेत तदा भव्यं भवाशाक्षि गतांशुकम् ।। ५४ ।। मुझे विश्वास है कि यदि कहीं भारतका आत्मा छिप गया तो ससारकी आशाकी औसें प्रकाशरहित हो जायगी ।। ५४ ॥ अस्मिन्पवित्रकायें नो ग्रहीतव्यान्यसमतिः । ईश्वरः केवलं मेस्ति सम्मते: सन्मतेः प्रदः॥ ५५ ।। इस पवित्र कार्यमे किसी अन्यकी समति नहीं लेनी है। केवल ईश्वर ही मुझे सम्मति और सन्मति देनेवाला है ।। ५५ ।। भ्रान्तिवशादेतत्कर्मानुष्ठीयते यदि। शीघ्रं समापयिष्यामि भ्रान्तिस्वीकारपूर्वकम् ।। ५६ ।। यदि मैं भ्रमवशात् यह कार्य कर रहा हूँ तो भ्रानिस्वीकार करके इसे समाप्त कर दूंगा ।। ५६ ॥ इदानी तु मया स्पष्टं श्रूयते स्वान्तरात्मनः । आदेशस्तद्भवेन्नैप कदाचिदवहेलितः॥ ५७॥ इस समय तो मैं स्पष्ट ही अपने अन्तरात्माका आदेश सुन रहा हूँ। उसकी अपहेलना कभी नहीं हो सकती ।। ५७॥ प्रार्थये निसिलान्यन्धून्विरन्तुं तर्कसंग्रहात् । साहाय्य क्रियतामापरिहार्ये च कर्मणि ।। ५८ ।। राय माइयोसे मैं मार्थना करता हूँ कि "उपवास यो" इत्यादि तसि यह अरग रहे । और इस अनिवार्य पार्यमें मेरी सहायता कर ॥ ५८॥ एपयासो विशुद्धश्वद्धर्मपाटनमेष स्थयमेय फलं यस्य फालेनोपनतं भवेत् ॥ ५९॥ सः।

चतुर्दशः सर्गः १८१ विशुद्ध उपवास धर्मपालन करने के समान ही है। उसका फल समयर अपने आप ही प्राप्त होगा ।। ५९ ॥ कर्तव्यमिति घुबैव मुथै मायोपवेशनम् । अस्मात्परिणतिः कापि वाछिता न मया भवेत् ।। ६० ॥ "यह कर्तव्य है" ऐसा समझकर ही मैं उपवास कर रहा हूँ। इसमेंसे एक भी परिणामकी मैं इच्छा नहीं रखता ॥६॥ एतेनैव निमित्तेन यदि मे निश्चिदा मृतिः । आलिङ्गितुं न वां कोपि प्रतिवन्नातु मामिह ।। ६१ ॥ यदि इसी निमित्त से मेरा मृत्यु निश्चित हो तो उसे मेंटनेमें मुझे कोई विघ्न न करें ।। ६१॥ भारतस्यैसलामस्य हिन्दूधर्मस्य या पुत्तः । सिक्वधर्मस्य नाशेक्षापेक्षया मृत्युरिटदः ॥२॥ भारत, इसलाम, हिन्दूधर्म गौर सिक्वधर्मका नाम मैं देखू उसकी अपेक्षा मृत्यु अधिक इट है ।। ६२ ।। पाकिस्ताने न चेत्सर्ये धर्माः संप्राप्नुयुः स्वयम् । समाधिकारितां नेतद्नुकुर्यात्तु भारतम् ।।६३॥ पाकिस्तानमें सर्वधर्माको समानाधिकार प्राप्त नहीं है अतः भारत मी वैसा ही करे, यह तो उचित नहीं है । ६३ ।। निश्चमचं कृते चैवं दे राज्ये एव नइत्यतः । तन्नाशप्रेक्षणायाहं नास्मि सनः कथंचन ॥६॥ यदि ऐसा दिया गया तो निश्चय ही दोनों राज्य नष्ट हो जायेंगे। उनके मायने देसनेवेलिये मेरी तैयारी नहीं है ॥ ६४ ॥ प्रतिफूलविचारस्था मिनिन्दिप्यन्ति चेदृढम् । एतत्कायं भवेत्तेपी गौरवं मे दृढं हृदि ।।६।।

१८२ पारिजातसौरभे मुझसे प्रतिकूल विचार रखनेवाले लोग यदि मेरे इस कार्यका घोर विरोध करेंगे तो उनके प्रति मेरे हृदय में गौरव दृढ होगा ||६५।। आत्मजागृतये ोपा समेषां विद्विपामपि । प्रायोपवेशिका तेन सिद्धः स्यान्मे मनोरथः ॥६६॥ सब लोगोंके और शत्रुओंके मी आत्माकी जागृतिकेलिये ही तो यह उपवास मैं करने जा रहा हूँ। इससे तो मेरा मनोग्य ही सिद्ध होगा॥६६॥ प्रेष्ठ च भारते मेद्य मालिन्यं समवर्धत । अपनोदाय तस्यैप शुद्धो यत्नो विधीयते ॥६॥ मेरे परमप्रिय भारतमे आज मलिनता बढ गयी है। उसे ही दूर करनेकेलिये में यह पवित्र उपाय कर रहा हूँ ।। ६७ ।। प्रसादायसरो ह्येप सर्वेषां भवतां बुधाम् । भारतस्य सुतः कोपि विधत्ते यत्नमीदृशम् ॥६८|| आप सब बुद्धिमानों के लिये तो यद आनन्दका अवसर है कि भारतका ही एक पुत्र मलिनता दूर करने का ऐसा यन कर रहा है ।। ६८ ॥ यदि तस्मिन्न सा शक्तिर्नास्ति वापि विशुद्धता। भारतीयधरामारं घर्धयिष्यनि केवलम् १६९॥ यदि उस भारतपुरमें शक्ति और पवित्रता नहीं है तो वह मारतीय वसुधारा फेवल भार ही बढायेगा ।। ६९॥ तरमादेतद्धराधाम परित्यज्य गतासुकः। सपोय भवेत्तेन हितं सर्वस्य सेत्स्यति ॥७॥ भतः यदि यह इस पृथियीको छोड़कर शाम ही मर जाये तो सबका दस्याग हो जायगा । ७० ॥ टण्यासययामेवा कर्णाकर्णि निशम्य तु । मामनागत्य स्वं केन्द्र नेमल्यं संनिधीयताम् १७१॥

चतुदशः सर्गः १८३ मेरे इस उपवासकी बात फर्णपरम्परासे सुनकर मेरे पास कोई न आ ओर अपने केन्द्रमै निर्मलता पविनताका प्रचार करें॥ ७१ ॥ कस्यापराधमाराध्य विषमं विदधाम्यहम् । धीक्षेमुपयोगमनागपि ॥७२॥ किसकी भूलके कारण मैं यह कठिन कार्य कर रहा हूँ, इस प्रश्नकी मैं जरा भी आवश्यकता नहीं देखता हूँ ॥ ७२ ॥ अपराधोस्ति चेत्कोपि सर्वेषामेव नः स च । न प्रातिस्विकरूपेण कश्चिदत्रापराध्यति ॥७३॥ यदि कोई अपराध है तो वह हम सबका ही है। व्यक्तिगत किसीका अपराध नहीं है । ७३ ।। श्वेतराज्ये गते मुस्लिम्लीगे चापि गते समाः। मुसल्मानप्रडा अन गता एवासहायताम् ।।७४॥ अग्रेजी राज्य गया, मुस्लिमलीग गयी। आज यहाँ मुसलमान् प्रजा असहाय बन गयी है ।। ७४ ॥ मुस्लिम्लीगप्रयासेन विभक्ता भारतक्षितिः । तथापि मुस्लिमा अत्र निवसन्ति निजेच्छया १५॥ मुसलिमलीगके प्रयाससे ही भारतके दो टुकड़े हुए हैं। तो भी मुसलमान यहाँ स्वेच्छासे रह रहे हैं । ७५ ॥ निस्सहायस्य हीनस्य कैरप्यद्याश्रयैर्वत । साहाय्यकरणं धर्म परो भेभिमतः सदा १७६ ।। जो निस्सहाय हो, जिसे कोई भी आभय न हो उसकी यहायता करना यह मुझे सदा ही परमधर्म प्रतीत होता है ।। ७६ ।। उपवासेन सर्वेषां शुद्धिरेतेन चेप्सिता हिन्दवापि मुसल्माना अपि वैशुद्धयमाप्नुयुः ॥ ७७ ।।

१८४ पारिजातसौरभे इस उपवाससे ,सबकी शुद्धि इष्ट है। हिन्दु भी और मुसलमान भी पवित्रता प्राप्त करें ।। ७७ ॥ प्रसादयितुमनत्यमुसल्मानान्कदापि नो अहं ब्रवीमि यत्किञ्चिनिजात्मानं सुखायितुम् ।। ७८ ।। यहाँ के मुसलमानोंको खुश करनेके लिये मै कुछ नहीं बोलता हूँ । जो कुछ बोलता हूँ वह मेरे आत्माको प्रसन्न करने के लिये ॥ ७८ ॥ सिक्साश्च हिन्दवश्चापि मुस्लिमलीगमन्वगुः । द्विधाभवत्ततः पूर्व हृदयं भारतं ततः ॥७९॥ विक्ख और हिन्दू (हिन्दूमहासभा) मुसलीमलोगके अनुयायी बने थे। उससे पूर्व ही मारतफा हृदय दो टुकडे हो चुका या ॥ ७९ ॥ मुसल्माना अपीहासनपराधक्षितिस्थिताः एवं प्रयोपि संहस तेपराध्यन्ननेकशः ॥८॥ मुसलमान भी अपराधकी ही मर्यादामें स्थित थे। इस प्रकार इन तीनोंने ही अनेकबार भूल की है ॥ ८ ॥ अद्येष्टं सौहृदं किन्तु प्रयाणामपराधिनाम् । सायन्त्येतदाधातुमीशमाराध्य फेयलम् ॥८१ ॥ आज इन तीनों अपराधियोको मित्रता इष्ट है। यह लोग इस कार्यको भगयान्की सहायतासे ही फर सपते हैं ।। ८१ ॥ सन्त्यनेके मुसल्माना पहयः सन्ति दिन्दयः । परमेशं परित्यज्य मेयन्ते दानयं हि ये ॥ ८२ ॥ पातमे हिन्दू और बहुतमे गुगुटमा ऐसे हैं जो ईयरको छोड़कर तानकी सेवा पाते हैं।।८२॥ पिदाय नानकं सिवायत्यतया पान्यान्गुरूनपि । अधिपारेण यन्त स्वेच्छापरितया पुनः।। ८३ ।।

चतुर्दशः सर्ग
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सिक्ख लोग श्रीगुरुनानक तथा अय गुरुओंको भी छोडकर विना
विचारे स्वेच्छानुसार बर्ताव कर रहे हैं || ८३ ॥
हित्वा वास्तविक धर्म धर्माम्बरपरिच्छदा ।
यदि भूय स्वरूपे ते तिष्ठेयु शमवाप्नुयु ॥ ८४ ।।
सच्चे धर्मको छोडकर धमकी पिछौडी ओढनेवाले यदि फिरसे
स्वरूप में आर स्थित हो जाये तो उसे कल्याण प्राप्त हो ।। ८४ ।।
मुसरमानशुमायासावुपचास. प्रवर्तित
सत सर्वाधिको भारस्तेपु सम्पतिवोधुना ॥८॥
मुसलमानोंके हितकलिये इस उपवासको मैंने शुरू किया है।
अत सबसे अधिक मार थमी उन्हीं पर है ।। ८५ ।।
वोद्धव्य ते स्वय स्वीय विधेयं प्राप्तकालिकम ।
चन्घुषद्वर्तितव्य तेभारतीयरिवाखिले
॥८६॥
उनको स्वय यह जान लेना चाहिए कि इस समय उन्हें काकाना
है। उन्हें सभी भारतीयों के साथ माई-समान ही बर्ताव करना चाहिए।।८।।
भारत प्रति कार्तक्ष्य दर्शनीय मनस्तलान् ।
वाचाचारेण तत्सर्व वेदनीय भविष्यति ॥ ८ ॥
उन्हें अन्त करणसे भारतके प्रति यहसानमन्द गगना चाहिए।
यह ऐसे हैं या नहीं इसका पता तो उनके पचन दो बार
लगेगा॥८॥

१८६
पारिजातसौरभे
वह अनुचित कहते हैं। ऐसा कभी हो नहीं सकता। क्सि बडे
अपराधके कारण उन्हें मन्त्रिमण्डलसे अलग किया जाय १ ।। ८९॥
शासने केवलो नास्ति वल्लभो न जवाहरः ।
संभूय बहुभिः मुष्ठु शासनं परिचाल्यते ॥ ९०॥
सारमें तो न फेवल वल्लभभाई हैं और न केवल जवाहिरलाल हैं।
बहुत से लोग मिलकर अच्छी तरहसे हुकमत चला रहे हैं ॥ ९ ॥
अपनेतुं महाप्रज्ञ यल्भ सर्ववल्लभम् ।
जवाहरोद्य शनोति न परं स करोति वत् ।। ९१ ।।
श्रीजवाहिरलालजी श्रीवल्लमभाईको निकाल तो सकते हैं परन्तु वह
नहीं निकाल रहे हैं॥ ९१ ।।
दोपं दोपी च दोपांश्च कोनवेक्ष्य विदा मतः ।
उत्सहेत निराकतुं कंघनापि पदे स्थितम् ।। ९२॥
दो-चारकी पात तो अलग रही एक दोष भी अगर न देसा जाय
तो रिसीको रिसी पदसे कौन बुद्धिमान् इटा सकता है ! ।। ९२ ॥
मुसल्माना मयन्त्या सूराः प्रामाणिकास्तथा ।
स्वदेशो भारनमिति मत्त्या याच्छन्तु तच्छियम् ॥ १३ ॥
मुगएमान आज बहादुर और ईमानदार यन जाय । भारत अपना
देश दे गा मानकर उसपी मलाई चाहने लगे।। ९३ ॥
मुस्लिमलीगो न नो गाधिर्जयाहरो न नो सभा ।
पधित्सहायदो योग परमेश्यरगृतेऽमृतम् ॥९५ ।।
महिार ग, नो, अपाहिरास पोई भी तुम्हाग सहायक नदी है।
पेय मम परमामा दी मदायक है ॥१४॥
छायामाश्रिय निसिटा अगदीपास्य देयएम् ।
एलगिमारने देगे यूगमय म्य
मपिता ॥५५॥

चतुर्दश सर्ग केवल परमात्मासी छायाके भरोसे आप सब मुसलमान आज इस भारत, टिके हुए है ।। ९५ ॥ इति मत्ला भय छिया बन्धुतामित हिन्दुभिः । नानकस्यानुगे पारसीके सिस्तानुयायिभि ॥९॥ ऐसा समझकर हिन्, सिक्स, पारसी, इसाई सबके साथ बन्धुल प्राप्त कर । मय छोड दें॥ ९६ ॥ परमस्मि परं मित्त युप्मा सततं प्रियम् । प्राण्या प्राणत्सु युप्मामु म्रियेयापगतासुषु ।। ९७ ॥ परन्तु मैं आप लोगों का सदा परम प्रिय मिन हूँ। आपके जीनेसे जाऊँगा ओर मरनेसे मरूँगा ।। ९७ ॥ न चेद्वासयितुं शक्को मुसल्मानानिहारनी । तदावश्यमिह ज्ञेय जीवित मे निरर्थकम् ।। ९८॥ यदि मैं भारतमें मुसल्मानों को नहीं रस सस्ता तो अवश्य ही जान लेना चाहिये कि मेरा नावन व्यय है ।। ९८॥ स्पष्टमेव सदा वक्ति सत्यप्रेमसुधाभृतः । वञ्चनाचर्चनाचुचुर्नास्ति सारवहम ॥ ९९ ॥ सदार वल्लभभाई सदा स्पष्ट बोलते हैं। और प्रेमरूप अमृतसे भरे हुए हैं । वश्चना करना वह नहीं जानते हैं ॥ ९९ ।। सारवल्लभमते मुस्लिम्टीगानुयायिन। विश्वासपाना नेते यान्ति केनापि हेतुना ॥ १०॥ सार वल्लममाईवे मतमें मुसलिमलीगके अनुयायी मुसलमान किसी प्रकार भी विश्वासपान नहीं है ।। १००॥ मध्यरात्रारधि पूरा घालुका ये भवन्कयम् । समभूवन् क्षणेनेन सभ्यसब्जनसाघव ॥१०१।।

१८८ पारिजातसौरभे . प्रियः। यह कहते हैं कि भाधीरात तक जो क्रूर और घातक थे वह क्षण- मरमें ही सम्प, सजन और साधु कैसे बन गये १ ॥ १०१।। इत्येवं तस्य हृदय युष्मान्संदेग्धि संततम् । नायुक्तं क्रियते सेन न चाकारणकक्रियाम् ।। १०२ ।। इस प्रकारसे उनके हृदय में तुम्हारे प्रति सदा एदेह बना रहता है। वह भयुक्त कुछ भी नहीं करते। कारण बिना कोई भी काम नहीं करते ॥ १०२॥ भारतीयमुसल्मानाः स्वीयेराचरणः वत्सन्देहमपाकर्तु प्रयततामहर्निशम् ॥ १०३ ॥ भारतके मुसलमानों को चाहिये कि अपने प्रिय आचरण द्वारा उनके सदेहको दूर करने का सदा प्रयास करें ॥ १०३ ॥ हिन्दुन्सिक्सानपि मौर्य त्यक्तुमभ्यर्थये भृशम् । एतदेय महाशय महत्त्येपा पदान्यता॥१०४॥ हिन्दुओं और सिक्सोंसे मी में प्रार्थना करता हूँ कि वह क्रूरता छोड है। यही नही बहादुरी है और यही यात बडी उदारता है ||१.४॥ पाफिरनाने भयेद्धिन्दुरेकोपि न हि जीवितः । सिकरा थपि यमद्वार मापिताः रयुः पुरानिभिः ।। १८५ ॥ पाकिस्तान में एक मी हिन्दू जीता न रहे और मुसलमान सिक्सोको भीमार हात-॥१.५॥ भारतीया न हि पापि पतुमईन्ति ताम् । भारनं स्याहारहितं कृते पर्मणि साशि ॥ १०६ ।। पान्नु माय लोग ऐण नहीं कर पाते। ऐगा पमं वरने पर भारत मा-शोभारहित हो दायगा ।। १.६ ।। थमतामय दिन सिग्याना प पिरिस्तिनाम् । पारसीकगुगल्यानटोन 7 प्या भयेत् ॥ १७॥ ।

चतुर्दशः सर्गः १८९ यहाँ रहनेवाले हिन्दू, सिक्स, ईसाई, पारसी, मुसलमान किमीको मी पीड़ा न हो--|| १०७ ।। एताहरभारतं नूनं लोककल्याणकारकम् । इष्टं मम समेपां च नातोन्यत्समुपास्महे ॥ १०८ : ऐसा कल्यागवारी भारत मुझे और सपने इष्ट है। इससे यतिरिक्त हम नहीं चाहते ॥ १०८॥ यहूनि वारपत्वाणि पत्त्राणि विविधानि च । मत्सविचे समायान्ति मम प्रतसमाप्तये ॥१०९॥ मेरे पास बहुतसे तार और बहुतसे पर दस बनो-उपवासको छोड़ देनेके लिये आ रहे हैं ॥१०९|| उपवास: पवित्रोयं घवित्रः सर्वपापिनाम् । लचित्रः सर्वपापानामन्तं न सहसा ब्रजेत् ॥११॥ यह उपवास तो पवित्र है। सर्व पापियों को शुद्ध करनेवाला है। सब पापों का नाश करनेवाला है। यह सहसा बन्द नहीं हो सस्वा ॥११॥ ईश्वरप्रेरणातोयं संप्रवृत्ती महार्यकः । समाप्तिरीश्वरायचा शक्तिरन्या विकुण्ठिता ॥१११।। यह उपवास ईश्वरकी प्रेरणाले प्रवृत्त हुया है। इसका बहुत बड़ा प्रयोजन है। इसकी समाति मी ईश्वराधीन ही है। अन्य शक्ति इसको बन्द कराने में कुष्टित है ।। १११॥ अम्बालालस्य तनुजा मृदुला मृदुमानसा । निराकरिष्णुर्दीनानां दुःसान्यप्रवराण्यपि ॥२१२।। अम्बालाल डारामाईकी पुत्री श्रीमृदुला टीनोंके मारी दुःसगे दूर करने में लगी हुई है ।। ११२ ॥ सहिष्णुः पावकबाटामालामप्यविपादतः किन्तु सो समर्था नो मद्विपनि मनागपि ॥११॥ ।

१९० पारिजातसौरभ वह अमिकी ज्वालाको बिना दु.सके सह सकती है परन्तु मेरे बरा भी दुःखको सहन करने में असमर्थ हैं ।। ११३॥ वाल्ये सत्कोड आसीना रममाणाभवत्परम् । अधुनापि न मच्छायां सा चिरं विजिहासति ।।११४|| बाल्यावस्थामें वह मेरी गोदीमें बैटती थी, खेलती थी। अब भी वह मेरी छाया छोडना नहीं चाहती ॥ ११४ ।। उपवाससमाचारं श्रुत्वा वैयग्यमाप्य लवपुरे वसन्ती सा पत्त्रं प्राजीहयन्मयि ॥११५।। वह लाहोरमें रही हुई हैं। मेरे उपवासका समाचार सुनकर न्याकुल होकर मेरे पास उन्होंने पत्र लिखा है ।।११५॥ अग्र्या व्यमा मुसल्माना अनुयुञ्जन्ति मामिह । अनभते कृतेस्माकं कुर्मः किं गांधये वयम् ॥११६।। वह लिखती है कि लाहोरके प्रतिष्टित मुसलमान उनसे पूछ रहे हैं कि गाधीने हमारे लिये उपवास किया है तो हमलोग उनके लिये क्या करें।।। ११६॥ भाच्छिद्याद्येश्वरस्थान राजानति महासुरः। तं पुनस्तस्य संस्थाने स्थापयन्त्वचिरेण ते ॥११७।। इत्युत्तरं मया दत्तं प्रेम स्वीकुर्यता मया । अस्मिन् यज्ञे समारब्धे सर्व एचोपजुहतु ॥११८।। मैंने उनके प्रेमको स्वीकार करके उत्तर दिया है कि ईश्वरका स्थान छीनकर शैतान आज राजा बना हुआ है। यहाँ के मुसलमान ईश्वरकी गा पर विरको शीघ्र बैटा दें। इस शुरू किये गये यशमें सबको आहुति देनी है ।। ११७ ॥ ११८ ।। न ययान दिलान्नात्र पयो न मधुसपिपी । आत्मशुद्धि मुहमायं यज्ञोयमभिशदति ॥११९॥ .

चतुर्दशः सर्गः १९१ इस यज्ञमें न यवकी, न निलकी, न दूधकी, न मधुकी, न घीकी, आवश्यकता है। यहाँ केवल आत्मशुद्धि और पवित्र मैत्री अपेक्षित है ॥ ११९॥ हिन्दूसिक्समुसल्माना जहितेति परस्परम् । विप्रवदन्त एते चेद्विसिसृक्षामि न ऋतुम् ।।१२०|| हिन्दु, सिक्ख, मुसलमान यदि परस्पर मारो मारो, यही लडाई- झगडा करते रहेंगे तो मैं इस यज्ञको विसर्जन करना नहीं चाहताहूँ॥१२०।। संबद्धाः सन्तु चेत्सर्वे सर्वधर्मानुयायिनः । दिव्येन प्रेमसूत्रेण सर्वत्र प्रसरेच्छिवम् ।।१२।। यदि सर्व धर्मों के सभी अनुयायी दिव्य प्रेम सूत्रसे बँध जाय तो सर्वर आनन्द ही आनन्द फैल जाय ।। १२१ ।। नेशिष्येहं तदा धापि मुरापाश्च सुरालयम् । आहिफेनं दुराचारमसत्यं बन्धुहिंसनम् ॥१२२।। तब मैं न तो कहीं शराबी दे गा ना मैसाना देगूंगा। अफीम, दुराचार, असत्य और माईकी ही हिंसा भी नहीं देखूगा ॥ १२२ ॥ सदाचाराः स्त्रियः सर्वाः पुमासोपि तथाविधा। तदानीं संभविष्यन्ति समस्ते पूतभारते ॥१२३।। तब समस्त भारतमें समस्त स्त्रियों और सर पुरुप सदाचारसम्पन्न होंगे ॥ १२३ ॥ पाकिस्तानमुसल्माना नाचरन्यायसंगतम् । हिन्दुप्विति पर तथ्यमगोपिपमहं न हि ॥१२॥ पाकिस्तानके मुसलमानोंने हिन्दुओं के साथ न्यायमगत धानाmat किया है इस परम सत्यको मैंने छिपाया नहीं है ।। १२४ ।। इदानीमेव काराच्या निर्दोषाः सिक्सरन्धयः। निहता निर्दयत्वेन लुण्ठिता सम्पदः समाः11201 १९२ पारिजातमौरभ अभी ही तो कराचीमें निदोंप सिक्खों को निर्दयताके साथ मार डाला गया है और उनकी सब सम्पत्ति लूट ली गयी है ।। १२५ ॥ गुजरातेपि सम्पन्नं तथैवेति श्रुतं मया । बन्नूतो दुःखिता भीता आयान्तो हिन्दवो हताः ॥१२६|| मैंने सुना है कि डरके मारे जब हिन्दू बन्नूसे यहाँ आ रहे थे तो मार्गमें गुजरात शहर (पञ्चार ) में भी हिन्दू मारे और लूटे गए हैं ॥ १२६ ।। मुसल्मानान्ब्रवीम्येतद्यदि वः स्यादिय कृतिः । वर्तमानैव हिन्दूनामविषह्या भविष्यति ॥१२७।। मैं मुसलमानोंसे कहता हूँ कि यदि तुम्हारा यही काम चलता रहा तो हिन्दुआको यह असह्य हो जायगा ।। १२७ ॥ पाकिस्तानं भवेन्छुद्धं यदि पाह्यान्तरं तदा । ततोप्यधिकसंशुद्धि भारतं शीघ्रमेष्यति ॥१२८।। यदि पाकिस्तान अन्दरसे और बाहरसे शुद्ध हो गया तो मारत तो उससे भी अधिक शुद्ध शीघ्र ही हो जायगा ॥ १२८ ॥ पाकिस्तानं पयिनं चेत्प्रेम सन्दर्शयिष्यति । अत्र प्रेमप्रवाहस्तु नावरुद्धो भविष्यति ॥१२९॥ यदि पाकिस्तान पवित्र प्रेम दिखावेगा तो यहाँ प्रेमप्रवाह बन्द ही नहीं होगा ॥ १२९॥ हृदयानि यिशोध्यातो व्यपाकृत्य च राक्षसम् । आसीनमीश्वरं तेषु पाकिस्तानं विलोकताम् ॥१३॥ पाकिस्तानको चाहिए कि हृदयको पवित्र परफे, शेवानको दूर करके उस हृदयमें बेटे हुए खुदाको देखें ।। १३०॥ प्रविमस्जिदमत्रापि प्रतिमन्दिरमप्यथ । तिरोहित इयात्मासौ प्रतिदेहमुदेष्यति ॥१३१।।

चतुर्दशः सर्गः यहाँ भी प्रत्येक मस्जिद में और प्रत्येक मन्दिरमें वही परमात्मा छिप गया जैसा है। यह प्रत्येक देहमें प्रकट होगा || १३१ ॥ भारतं चेद्विधा भूतं किमेतेन मनांसि चेत् । शुद्धानि स्नेहपूर्णानि तत्त्यदर्शीनि योपि नः ॥१३२॥ यदि मुसलमानों और हिंदुओंका मन स्नेहपूर्ण और सात्विक विचार घाला हो तो भारत के दो टुकड़े हो गए, इससे कोई शति नहीं है ॥१३२॥ पृथिव्यांसन्ति यवो राजानोपि पृथक् पृथक् । साम्राज्यान्यपि नैकानि किन्चिन्न च्छिद्यते ततः ॥१३॥ पृथिवीपर बहुतसे राजा अलग अलग ही तो हैं, साम्राज्य मी तो अनेक हैं परन्तु इससे 'कुछ बिगड़ता नहीं है ।। १३३ ।। वाल्यादेव दिवास्वप्नं वालान्तःकरणानुगम् । सर्वधर्मकतारूपमपुपं बालचेष्टया ॥१३४॥ वाल्यावस्थासे ही मैं अपने अन्तःकरणमें सर्वधमाकी एकताका दिवास्वप्न देखता रहा हूँ । भेरी भालचेष्टा भी ऐसी हो रही है ॥१३४॥ लोका हि मां जडं मत्तं विक्षिप्तं युद्धिदूरगम् । मन्यन्ते स्वल्पसिद्धयर्थ त्यक्तुं बहु समुद्यतम् ॥१३५।। लोक मुझे बड़, उन्मत्त, पागल और वेवकूफ समझते है। यह यह समझते हैं कि मैं बहुत थोड़ेकेलिये बहुत अधिकका त्याग कर रहा हूँ ।। १३५॥ कामो मे फलितश्चेत्स्यादेतयेव तपस्यया । उन्मत्त इव नामि प्रहप्रस्त इवापि वा ॥१३६।। यदि इसी तपस्यासे मेरी इच्छा पूर्ण हो गयी तब तो मैं पागलफे समान अथवा ग्रहोसे पकड़े गये हुएके समान नाचूँगा ।। १३६ ।। लोलत्कल्लोलविक्षुब्धमृत्युसिन्धुतटे अर्थितं फलितं वीक्ष्य न स्यात्काष्ठा मुदो मम ॥१३७|| स्थितः।

१९४ पारिजातसौरभे न अब तो चंचल, लहरें मारता, खलपल करता मृत्यु मेरे सामने उपस्थित है । ऐसी दशामें यदि मेरा मनोरथ पूर्ण हुआ तो मेरे आनन्दकी सीमा न रहेगी ।। १३७ ।। सुबुद्धयः सन्मनसः स्वधर्मे चेस्थिता वयम् । पारस्परिकसम्बन्धक्षेमक्षोदो संभवेत् ॥१३८॥ यदि हमारी बुद्धि शुद्ध बनी रहे और मन भी पवित्र बना रहे तथा यदि हम धर्ममें स्थित रहें तो हमारा आपसी सम्बन्ध कभी नष्ट नहीं होगा ।। १३८ ।। सत्प्रेममदिरोन्मत्ता वयं यूयं तथापरे। सर्वभीतिविरहिता नतिष्यामो मुदा सदा ॥१३९।। शुद्धप्रेमरूप मदिरासे उन्मत्त होकर आप, हम और दूसरे सर्व प्रकार के भयसे छूट कर मानन्दसे नाचेंगे ॥ १३९ ।। योपि कोपि समाजोस्ति व्यक्तीनां स समुच्चयः। व्यक्तिशुद्धौ समाजस्य शुद्धिरस्ति विनिश्चिता ॥१४॥ कोई भी समाज व्यक्तियोसे ही बनता है। यदि व्यक्ति शुद्ध हो तो समाजकी शुद्धिमें कोई सन्देह ही नहीं है ॥ १४० ।। एकमेवात्र नैकत्वं जनयदृश्यतेनिशम् । व चैकं चेदनेकानि न स्युस्तेन च शून्यता ॥१४॥ हम रोज देखते हैं कि एक ही अनेकको पैदा करता है। यदि एक न हो तो अनेक भी नहीं होंगे। परिणाम शून्यतामे आवेगा ।। १४१ ॥ अन्ये किमन्न कुर्वन्ति यूयं तन्नैव पश्यत । आत्मानमेव योक्षध्वं श्रेयस्तेनाधिगच्छत ।।१४२॥ दूसरे स्या कर रहे हैं, इसे आप न देखें। केवल आत्मनिरीक्षण आप करें। उसीसे कल्याण प्राप्त होगा ॥ १४२ ।।

चतुर्दशः सर्गः
१९५
चिन्तां जाहित देहस्य मम क्षीणवलस्य च।
मृत्युमेय विज्ञानीत शरीरस्यान्तिमा दशाम् ॥१४॥
मेरे इस निर्वल शरीरको चिन्ता आप लोग छोड़ दें। शरीरको अन्तिम
दशा वो मृत्यु है ही ॥ १४३ ॥
सर्व एव गमिप्यन्ति मृत्युद्वारमपावृतम् ।
यथा सनातनेनैव फर्मणा घ सतासता ॥१४४||
मृत्युका द्वार खुल्य हुआ है। सत्कर्म और असत्कर्मके द्वारा सभी
मृत्युद्वारमें प्रवेश करेंगे ॥ १४ ॥
देवो वा दानवो वापि नरोपि च नरेश्वरः।
हिंसकोहिंसको वापि सर्वेषां शरणं मृतिः ॥१४।।
देवता हो, दानव हो, नर हो, नरेन्द्र हो, हिंसक हो, अथवा अहिंसक
दो, समको शरण देनेवाला तो मृत्यु ही है ।। १४५ ।।
जायमानो नरः पूर्व मृत्युना समवेशितः।
अद्धितश्चापि यो?र्दिनाट्दैर्वा विधानतः ॥१४॥
अब मनुष्य पैदा होता है तब सबसे पहिले मृत्यु ही उसे देखता है।
मृत्यु ही सावधान बनकर उसपर छाप लगाया है कि वह इतने वर्ष और
इतने दिन बीवेगा || १४६ ॥
निश्चिते दिवसे पुण्ये निश्चितेपि च वत्सरे।
ऋतौ विनिश्चिते चापि निश्चितो मरणागमः ॥१४॥
निश्चित वर्षमें, निश्चित ऋतुमें, निश्चित पवित्र दिनमें निश्चित ही
मृत्युका आगमन होता है ।। १४७ ।।
कालादिक
विनिश्चित्य पूर्वस्मादागमिष्यतः।
मृत्योहस्तान कस्यापि संभवेद्धि विमोक्षणम् ॥१८॥
पहलेसे ही समय निश्चित करके मानेवाले मृत्यु के हायसे किसीका
छुटकारा सभव नहीं है ॥ १४८॥

१९६ पारिजातसौरभे स मृत्युरेवान्तिम मिस्त्रं मृत्युदुःखविनाशकः। सत्कार्यश्च ततो मृत्युर्व्यर्थमेव ततो भयम् ।।१४९।। मृत्यु ही अन्तिम मित्र है । वही दुःखका नाश करनेवाला है। अतः उसका सदा सत्कार करना चाहिये। उससे डरना व्यर्थ है ।।१४९।। तित्यक्ष्यन्ति यदा सर्वे वान्धवा अन्तिम क्षणे । सर्वदुःखविमोकाय मृत्युरेव सहायकः ॥१५०॥ अन्तिम क्षणमें जब सभी कुटुम्बी जन छोड देने की इच्छा करते हैं, उस समय सर्वदुःखों से छुडानेकेलिये मृत्यु हो तो सहायक है ।। १५० ।। आह्वातुं मृत्युमेवायं नोपवासो निपेवितः। आह्वानमन्तरेणैय आगच्छति देहिनः ।।१५१॥ मृत्युको बुलाने के लिये ही यह उपवास नहीं है। यह तो विना मुलाये ही देहधारी के पास आता है ।। १५१ ।। ततः सर्वः स्वकर्तव्यं ध्यायं ध्यायं पुनः पुनः । उपास्यं श्रद्धया नित्यं परया धर्मबन्धुभिः ॥१५२।। अतः धर्मके साथ सम्बन्ध रखनेवाले समीको चाहिये कि वह अपने अपने कर्तव्यका फिर-फिर, विचार-विचार करके महती श्रद्धाके साथ, पालन करें। १५२॥ ममोपवासश्रवणमात्रेणैवाविलम्बकम् भारतीयेन हि सता शासनेन कृतं बहु ॥१५॥ मेरे उपवासकी बात सुनफर ही उत्तम भारतसर्कारने बहुत कुछ किया ॥ १५३ ।। कोटयः पनपश्चाशद्रप्यकाणां च धर्मतः। प्रदेया भारतेनासन्पाकिस्तानाय धर्मिणा ॥१५४॥ पचायन करोड़ रुपये भारतको पाकिस्तानके देने थे ।। १५४ ॥

चतुर्दशः सर्गः १९७ काश्मीरस्य विवादोसौ न प्रयात्यन्तिमा गतिम् । यावत्तापन्न ता देयाः पाकायेति विनिश्चितिः ।।१५।। मारने यह निश्चय किया था कि जबतक कश्मीरका झगडा खत्म नहीं होता तबतक वह रुपये पाकिस्तानको न दिये जाय ॥ १५५ ॥ तथापि निर्णय स्मीयं शासनं पर्यवर्तयत् । देयं तस्मा अदात्तेन गोरवं प्रापयन्निजम् ।।१५६।। तो भी सकारने अपना निर्णय बदल दिया। पाश्रितानको बो देना था मारतसकारने दे दिया। उसकी प्रतिष्ठा बढ़ गयी है ॥ १५६ ।। साधारणी कृतिर्ने यं मन्तव्या धर्मवैदिमिः । भारतादितर: कैश्चित्स्यात्कृता स्यान्नवापि सा ॥१५७॥ इस कार्यको साधारण कार्य नहीं मानना चाहिए । मारतसे अतिरिक्त किसीने यह काम शायद नहीं ही किया हो ।। १५७ ॥ एवं सर्वैर्मुसल्मानहिन्दुमि नरपि । इतिकर्तव्यतायोघे सावधानहि भूयताम् ।।१५८॥ जिस प्रकार मारतसकारने अपना पर्वष्य पालन किया है वैसे ही अपना कर्तव्य समझनेमें 'हिन्दु, मुसलमान , सिक्स सबको सावधान बनना चाहिए ।। १५८॥ आ काश्मीरादा च कन्याकुमार्या आ कराचितः । आ च डिब्रूगढात्सवः प्रशस्यं हिन्दशासनम् ॥१५९॥ काश्मीरसे लेकर, कन्याकुमारीसे लेकर, कराचीसे लेकर धौर fre गदसे लेकर सर्वत्र सबकी प्रशसा का पात्र मारतसकार बनी है ।। १५ ।। मुस्लमानप्रवोपाय मयति स्म न साधिनम् । अद्वितीयमिदं कर्म शासनेनात्र नः म १९६०|| यह निश्चय ही समझना चाहिये कि यह नियमापनार्य सकारने मुसलमानोंको खुश करने केलिए नहीं सीरिया ॥१६.

१९८ पारिजातसौरभे का शासनं प्रतिनिघते महत्ती जनतां च यत् । केवलं स्वप्रतोपाय कार्यमुद्धमिदं मतम् ॥१६१|| जो सकार एक बड़ी भारी जनताका प्रतिनिधित्व करती है उसने केवल अपने सन्तोषकेलिये यह प्रशस्त कार्य किया है ॥ १६१ ॥ उपमा भवेल्लोकेनुपमस्यास्य कर्मणः । भारतं भारतमिव नातिशेते किमप्यदः ॥१६॥ इस अनुपम कार्यकी जगत् में कोई उपमा नहीं है। भारत तो भारत ही है। इसे कोई नीचा नहीं दिखा सकता ।। १६२ ।। वाचं प्रब्रुवाणमहर्दिवम् । विराध्यत्सततं पाकं कः क्षाम्येद्धारतं विना ॥१६॥ रातदिन मर्मभेद करनेवाले, कर वचन बोलनेवाले और सदा विरोध करनेवाले पाकिस्तानको भारतके विना दूसरा कौन सह सक्ता मर्माविधं क्रूर न न्यचं शासनमहो किश्चिदन्यद्भजेदिदम् । धन्य भारत धन्यं त्वं धन्य शासन शासन ॥१६४॥ कोई छोटी-मोटी सर्कार यह कार्य नहीं कर सकती। भारत तू धन्य है! भारतसार तू धन्य है ।। १६४ ॥ तद्यधन्यसुसूपिंप्यद्विधानानि निजानि ह। नापारयिष्यत्तत्तुं यद्वचाधित्सत शासनम् ॥ १६५ ।। सार यदि अपने विधानोंका अनुसरण करना चाहती तो वह कार्य न कर सकती चो करना चाहती थी ।। १६५ ।। अतिशेते विधानानि न्यायः सर्वोत्तमः सदा। धर्मतत्त्ययिदः सं जनाः संविद्रते विदम् ॥ १६६ ॥ सर्योचम म्याय हमेशा विधानसे बढ़ पाता है इस वस्तुको समी भर्मतापपेचा मानते हैं ।। १६६ ॥

चतुर्दशः सर्गः १९९ मेकडानल्ड इत्याख्यः श्वेताङ्गोपीत्थमाचरत् । मत्कृतेनोपयासेन यरोडावन्दिसद्मनि ॥ १६७ ॥ जब मैंने यरोडाजेल में उपवास क्यिा था उस समय श्रीमेकडानल्डने भी न्यायको ही मुख्य पद दिया था ।। १६७ !! लोकोत्तरेण कार्येण शासनेन कृतेन तु । उपवासः परित्यज्य इत्यपरे पदन्ति माम् ॥ १६८ ॥ दूसरे लोग कहते हैं कि सारने यह लोकोत्तर कार्य किया है इसके लिये भी तो मुझे उपवास छोड देना चाहिये ।। १६८ ॥ श्रूयते न मया किन्तु तादृशी ध्वनिरान्तरः । सुहृदां सम्प्रसादाय न जागति ततः स्पृहा ॥ १६९ ॥ परन्तु चूंकि मेरे अन्तरसे ऐसा कोई सन्द नहीं सुनायी पड रहा है अतः मेरे मिनों को प्रसन्न करनेकी इच्छा नहीं हो रही है ॥ १६९।। उपवासो भवेत्याज्यो भवेयुः सर्व एव चेत् । शूरा निश्शङ्कमनसो मुसल्मानाश्च हिन्दवः ॥ १७० ॥ यह उपनास छूट सकता है यदि सब मुसलमान और हिन्दू बहादुर बने और मनमेंसे परस्परकी शङ्का छोड दें ॥ १७ ॥ आशङ्कन्ते न विक्रान्ताः शङ्कनीयानरीनपि । मन्यन्ते से ह्यविश्वासं स्वमर्यादाविघातकम् ।। १७१ ।। बहादुर लोग, जिसकी शङ्का करनी चाहिये उन शत्रुभोंसे भी शङ्का नहीं करते। वह अविश्वासको अपनी मर्यादाका विघातक मानते है॥ १७१॥ अस्माकं शासनेनाद्य महोदारेण धीमत्ता । न्याय्यस्याचरितस्यास्य पाकोत्तरमपेत्यते ।। १७२॥ हमारी बुद्धिमान् और उदार सकारने जो यह न्याय्य याचरण किया है, पाकिस्तानसे उसके उत्तरकी अपेक्षा है ।। १७२।।

२०० पारिजातसौरभे यदीच्छा धर्मदेवस्य सेवनायोदिता भवेत् । पन्थानः सन्ति बहवः पाकिस्तानगवेः कृते ॥ १७३ ।। यदि धर्मपालन करनेकी इच्छा पैदा हो तो पाकिस्तानको गति करनेके लिये बहुत मार्ग हैं ॥ १७३ ॥ आध्यात्मिक उपवास आशास्ते शुद्धता हृदः । निवृत्ते कारणे तस्या नैव सापि निवर्तते ।। १७४ ।। आध्यात्मिक उपवास हृदयकी शुद्धिकी आशा रखता है। यदि शुदि हो जाय तो उपयासरूप कारणके निवृत्त होने पर भी वह शुद्धि बनी रहेगी।। १७४।। सुधया लेपिते गेह अतिथावागमिष्यति । आगत्य च गते तस्मिन्सुधा सा न निवर्तते ॥ १५॥ अतिथि आनेवाला होता है तब घरको चूनेसे धोते हैं। अतिथि आकर चला गया हो तो भी वह चूना वो ज्योंका त्यों ही रहता है ।।१७५॥ पाकिस्तानप्रजाः सर्वाः पाकिस्तानाधिनायकाः। अस्वीकृत्यापराधान्नो तं देशं रक्षितुं क्षमाः ।। १७६ ॥ पाकिस्तानकी सारी प्रजा और उसके बड़े नेता अपराधोंको स्वीकार दिये विना उस देशको बचा नहीं सकते ॥ १७६ ॥ मृत्युशय्यां स्पृशन्नाहं किश्चित्कोपेन विब्रुवे । सत्यं व्ययदिपि प्रेष्ठं मह्यं कोपि न कुप्यतु ।। १७७ ।। मैं तो मरणशय्या पट्टा हूँ। प्रोसे चुछ भी नहीं कह रहा हूँ। अपने परमप्रिय सत्यका ही मैंने उच्चारण किया है। मुझपर कोई क्रोध न करें ॥ १७७।। नयल्याद्वा भयाद्वापि परस्मादपि कारणात् । वियूणुयां मनोभावं नो वदासत्ययागहम् ।। १७८ ॥

चतुर्दशः सर्गः २०१ निर्वलवासे अथवा मयसे अथवा दूसरे कारगसे यदि मैं अपने मनके भावको प्रकट न करूं तो मैं असत्यवादी बनूंगा ॥ १७८ ।। राधिवेष्यपराधेपु पाकिस्तानेन सर्वथा। विदुपां धार्मिणां च वैमत्यं नास्ति किंचन ॥ १७९ ॥ पाकिस्तानने को अपराध दिये हैं उनके विषय में धार्मिकों और विद्वानोंके दो मत है ही नहीं ॥ १७९ ॥ यदि स्यादन्न मे भ्रान्तिोधिता प्रतिपक्षिभिः। मृदुताक्षेपवचनं प्रत्याख्यावं मया भवेत् ।। १८० ॥ यदि मेरे विपक्षी मेरी भूल इस विषयमें बतायेंगे तो मैं अपने इस आक्षेप वचनका खण्डन कर दूंगा ॥ १८०॥ खिन्नया मनसो वृत्त्या सूनुस्तस्य महात्मनः। पत्रद्वारेण चित्तस्यमाशयं व्यानगीदृशम् ॥१८॥ महात्मानीके ही पुत्र श्री. देवदास गाधीने सिन्न मनोवृधिसे पत्र द्वारा अपने हृदय के मायको इस प्रकार व्यर क्यिा ॥१८॥ योग्योयमवायोग्य उपवासो भवेदिति । वक्तव्यमत्र बवासीन्ममैतमरिजानतः ॥१८२।। मुझे तो इस उपवासका ज्ञान ही नहीं था। यह उपयास यान्य है अथवा अयोग्य, इस विषय में मुझे बहुत कुछ कहना या ॥१८२।। मन्ये तत्र भवन्तं हि समामाम्यदधीरता । सत एवाविलम्वेन निरणायि व्रतं महत् ॥१८॥ मैं समझता हूँ कि आप अधीर हो गये थे, इसी लिये शीघ्र ही इतने बडे उपवासका निर्णय कर लिया ॥१८३।। न मोति भधाज्ञातुं दिल्ल्यां धैर्येण धीमता । किं किं साधितमत्रत्यलोकानां संहितं हिनम् १९८२

२०२
पारिजातसौरभे
आप नहीं जान सक्ते कि आपने धैर्यसे ही दिल्लीयालोका क्या क्या
हित सिद्ध किया है । ॥१८४||
भवच्छमेण बहवो यन्धयो जीविताः स्थिताः ।
बहवश्च गतप्राणा इवासञ्जीविता अपि ॥१८५||
आपके ही परिश्रमसे बहुतसे माई जीते रह गये। बहुत तो ऐसे
थे कि जीते हुए भी मरेके समान थे ॥१८५॥
ततो जीवन्भवानत्र कतुं शक्नोति यन्न तत् ।
प्राणानामाहुति दत्वैतस्मिन्कलहपावके ॥१८६॥
अतः आप जीकर जो कुछ यहाँ कर सकते हैं, इस कलहाग्निमें
अपने प्राणोंको होमकर उसे नहीं कर सकते ॥१८६॥
एतेनैव विचारेण दृढेन कृपयाशु च ।
प्रायोपवेशनस्यान्तं स भवान्कर्तुमर्हति ।।१८७।।
इसी दृढ विचारके साथ आप कृपाकर इस उपवासको समाप्त कर
सकते हैं ॥ १८७॥
यतिराजः क्षमाशीलो दत्तवानिदमुत्तरम् ।
न मया व्ययितं धैर्य नापि शेध्यं समाचरम् ॥१८८।।
समायान् महात्माबीने यह उचर दिया, न तो मैंने धैर्य छोडा है
और न शीघ्रता की है ॥ १८८।।
यावद्दिनानि पत्यारि शान्तेन मनसा मया ।
उपयासं पुरस्कृत्य बहुधैय विचारितम् ॥१८९॥
चार दिनों तक मैंने शान्तमनसे उपवासफे विषयमें बहुत प्रकारसे
विचार किया है ।। १८९॥
पुत्रोसि तात योग्योसि हितोसि च घुघोसि च ।
चिन्ता स्वाभायिको तस्मादामाम्यद्धृदयं तय ॥१९०॥

चतुर्दशः सर्गः २०३ - माई, तू पुन है, योग्य है, हितैषी भी है, समझदार भी है। अतः तेरे हृदय में चिन्ताका होना स्वाभाविक है ॥ १९॥ परा काठां गते धैर्ये मम जातमुपोपणम् । हन्त्युद्देश्यं न तधैर्य मूर्खता सा विगण्यते ॥१९१।। मेरा धैर्य परामाको लय पहुंचा तब वह उपवासके रूपमें आ गया। जो धैर्य उद्देश्यसो ही नष्ट करे वह धैर्य नहीं, मूर्खता है । १९१ ॥ दिल्ल्यां मम निवासस्य परिणामोभवदि। शुभस्तत्र महत्त्वं मे नास्ति श्रीशस्य तद्यशः ॥१९२।। दिल्लीमें मेरे रहनेसे यदि शुभ परिणाम हुआ है तो उसमें मेरा महत्त्व नहीं है । वह यश तो भगवान्को ही है ॥ १९२ ।। मम श्रमेण बहवो रक्षिता मानवा यदि। तन्मूल्येधिकृतस्तस्य परमात्मा न लौकिकाः ।।१९३।। यदि मेरे श्रमसे मनुष्योकी प्राणरक्षा हुई है तो उसका मूल्य तो परमात्मा ही कर सकता है, लोग नहीं ॥ १९३ ।। सेप्टेम्बरात्समारभ्य येनाद्यावधि रक्षितम् । धैर्य वस्य च तद्धानि जाड्यमेव विवृण्वतः ।।१९४॥ जिसने सितम्बर मासले आजतक धीरज रखा उसके धीरजका नाश करना केवल जडता है॥ १९४।। व्यावहारिकपद्धत्या पुरुषार्था हप्तो मम । तदा क्रोडे परेशस्य शिरः संस्थापितं मया ॥१९५।। व्यावहारिक रीतिसे जब मेरा पुरुषार्थ नष्ट हो गया तब मैंने परमात्मा- की गोद में अपना शिर रसा है ।। १९५ ॥ जन्मनो मरणाचापि यावजन्तुन मुच्यते । जीवन्निव मृतोपिस्यात्कार्यसिद्ध्या असंशयम् ।।१९।।

२०४ पारिजातसौरभे जब जीव जन्म और मरणसे छूट नहीं सकता है तो वह जैसे बीता हुआ कार्य सिद्ध करता है वैसे ही मरकर भी कर सस्ता है। इसमें सन्देह नहीं ।। १९६॥ उपवासस्य तात्पर्य रामस्य शरणागतिः । गतस्य शरणे तस्य का च भीर्वेदनापिका ॥१९७॥ भगवान्की शरणागतिका स्वीकार करना ही उपवासका तात्पर्याय है। रामकी शरणमें गये हुएको भय क्या है और वेदना क्या । ।। १९७।। यदि तस्य भवेदिच्छा वर्जयिष्यति मानतात् । जीवयेदथवा हन्याच्छ्रेय एव भविष्यति ॥१९८॥ यदि उसकी इच्छा होगी तो मेरा उपवास छोडावेगा। वह जिलावे अथवा मार डाले दोनों दद्यायोंमें कल्याण ही होगा। १९८॥ श्रीराम प्रार्थये तस्मात निश्चलतां व्रजेत् । जिजीविपोपवास मे वयेन च वर्जयेत् ॥१९९॥ मैं रामसे मार्थना करता हूँ कि यह प्रा निश्चल रहे । जीने की इच्छा मेरे उपवासको न बन्द कर सके न विनयुक्त कर सके ।। १९९।। सर्वसदनिवारणक्षमेपुपयासदहनेयु स क्रमान् । पादचारमतनोद्यातिगो निश्वचालन चचाल निश्चयात् ।।२००। सर्वसङ्कायोंको दूर करनेवाले उरयासरूप अग्निमें श्रीमहामाजीने अपना चरगार्पण पर दिया। वह भया पार जा चुके थे। यह निक्षल ये अतः अपने निश्चयसे विचलित नहीं हुए ॥ २०० ।। यागामृतेन परिवोप्य यतिक्षमाभूत् । सर्यानुपस्थितजनान्विधिवत्सदन्तम् प्रायोपवेशनमुरासितुमाशु रस्थानानगाम निजयासमुयं महात्मा ।। २०१॥

चतुर्दशः सर्गः
२०५
इति सर्वतन्त्रस्वतधारमहंसपरिमाजकस्वामिश्रीमद्भगवडायपण्डितराजगोवे
पारिजातसौरमै
चतुर्दशः सर्गः
श्रीयवियज मदारमानी अपने वचनामृतसे समी उपस्थित लोगोंको
सन्तुष्ट करके उपवासकेलिये उस स्थानसे अपने निवासस्थानपर चले
गये ।। २०१॥
इति श्रीपरमहंसपरिमाजस्वामिश्रीमद्भगवदाचार्यपण्डितराजमणी
पारिजातसौरने स्त्रोपज्ञभारतराष्ट्रभाषाटीकायां
चतुर्दशः सर्गः।

पञ्चदशः सर्गः IRI प्रतिवम गृहीतवेणवः प्रतिरप्यं छुरिकासिसनिताः । यवनासुनिपूदनैपा यविराज तुतुदुश्व हिन्दवः ॥१॥ प्रत्येक रास्ते पर लाठी लिए हुए, प्रत्येक गलीमें छूरी और तलवारसे सज्ज, मुसलमानोंको मारने की इच्छावाले हिन्दुओं ने महात्माजीको दुखित कर दिया। ॥१॥ क्षणमाकुलमानसो भवन्नभिसंचिन्त्य च हस्तिनापुरे । प्रलयं निखिलायसन्मतेरवदद्योगिवरस्तदेति क्षणभर व्याकुल होकर, और दिल्लीमें हिन्दुओंकी सुबुद्धिका प्रलय विचारकर योगिराज श्री महात्माजी बोले-॥२॥ यदि भारतमात्मनो यशो धवलं दिक्षु ततं सनातनम् । न हि रक्षितुमस्ति शक्तिमत्पतनं तस्य निरर्गलं भवेत् ॥३॥ यदि भारत सारी दिशाओं में फैले हुए अपने निर्मल सनातन यशको नहीं बचा सकता है तो इसका पतन अनिवार्य है ।। ३ ।। घलपत्कृपयानुसंहितं गतहिंसाचिक हि भारतम् । सफलस्य तदेशियाधराशकलस्यापि घ नेतृतां बहेत् ॥४॥ कृपायुक्त और हिंसामेंसे रुचि घटाकर बलवान् भारत ही सम्पूर्ण एशिया सण्डका नेता बन सकता है॥४॥ यदि भूरियमव्यवस्थिता यिवशान्वेति च पश्चिमप्रजाः । न सहेत तदीयविक्रम फथमप्युज्झितसत्पथममा ll यदि यह देश अव्यवस्थित बने और लाचार होकर पश्चिमकी प्रजाओका अनुगमन करे तो सत्यये मासे विचलित होकर पश्चिमके भारमणको नहीं सह सकेगा ।।५।।

1. ...
२०७
प्रतीयते ॥६॥
अपगच्छति देहली शनैरपकर्मव्यसनेन
वाधिता ।
भगवस्मतिकूलतावशाद्वशतोस्माकमिति
कुमसे पीड़ित होकर दिल्ली अब धीरे धीरे, ईश्वर हमारे प्रतिकूल
है इसलिये, हमारे हाथ से निकलती जा रही है, ऐसा मालूम
होता है।॥ ६॥
यदि भारतमेतु दुर्दशां सकलाशा मम
नाशमृच्छतु।
क इहास्ति ममाद्य जीवितुं यद हेतुः सबलोप्यवाधिता
यदि भारतकी दुर्दशा हो और मेरी आशा नष्ट हो जाये तो,
कहो, यहाँ मेरे जीने के लिये कौन सा अबाधित और सबल कारण है |७||
स्वपथाच्च्युविमाप्नुवत्सलं निजदेशेद्य कथं निपेव्यताम् ।
जगतः रामसत्कथाप्रथावलिताशा विबुधैः परैरपि ॥८॥
अपने इस देशके पथभ्रष्ट होने पर जगत् में शान्तिको कथाके
प्रनारकी कौनमी बलवती आशा, मुझे वो नहीं, परन्तु आप विद्वानों को
भी कैसे हो सकती है ? ||८॥
यदि नैव शहीदजाकिरी भ्रमितुं स्वेच्छमिहाद्य शक्नुतः ।
अधिरध्यमपास्तसाध्यसायधिका
कालभविष्यतित्रपा ॥९॥
यहाँ पर यदि थाज गलियोंमें डाक्टर जाकिर हुसेन तथा शहीद
सुहरावर्दी स्वेच्चासे निर्भयताके माय नहीं घूम सकते हैं तो इससे अधिक
सजा और क्या हो सकती है।॥९॥
स सपेक्ष्य विवमूमिका हृदयापित्तजपापनापितः ।
सहसा समकल्पत प्रमुतिभूर्धन्य पोषणतम् ॥१०॥
टर्क-वितकोंकी उपेक्षा परफे हृदयकी आगके वापसे पाये गये हुए
श्रीमहात्माबीने उपरास व्रतका संकल्प कर लिया ॥१०॥

२०८
पारिजातसौरभे
गजवेदनवेकवत्सरे जनवर्याश्च दिने त्रयोदशे।
स उपाक्रमतोपवासक यतिवर्यो जनताहिवेच्छया ॥११॥
श्रीमहात्माजीने ता० १३-१-१९४८ को जनताके हितकी इच्छासे
उपवासका आरम्भ किया ॥११॥
उपवासकथा गृहे गृहे नगरे वापि समस्तभूतले ।
सपदि प्रतता विवेकिनो हृदये दुःखनिधिस्तरङ्गितः ॥१२।।
दिल्ली शहरमें घर घर और सारी दुनियाँ में भी उपवासकी बात झाट
फैल गयी । विवेकियोंके हृदयमें दुःखसागर उमड़ पड़ा ।। १२ ।।
नयनाश्रुजलेन संगता हृदयावेदकतारपत्रिकाः।
चतसभ्य उपागता यतेः मविधे दिग्भ्य उदारचेतसः ॥१३॥
माँसुओंके जलसे भरे हुए, हृदयके भावको बतानेवाले अनेक तार
चारों भोरसे श्रीमहामाजीके पास आने लगे । यद्यपि तारमें आँसू नहीं
ये परन्तु उस स्थितिकी सूचना उन तारोंसे मिलती थी॥ १३ ॥
समदिक्षदर्य महामुनिः परमेशानिरजोनुकम्पितः।
प्रतमेतदुपासितुं क्षमः कृपया श्रीजगदीशपादयोः॥१४॥
श्रीमहात्माजीने संदेश दिया कि, परमेश्वरके चरणकमलोंकी कृपाते
इस प्रतको-उपवासको करने में मैं समर्थ हूँ ॥१४॥
मरणं न ममाति दुःखदं शरणंतत्परमं चियकिनाम् ।
मम जीयितहेतवे मनागपिचिन्ता न निपेव्यता बुधैः ।।१५।।
मुझे मरण दुःसद प्रतीत नहीं होता। यह तो विवेक्यिोंके लिये
सोचम शरण है। धुदिमानोको मेरे जीवनकी थोड़ी मी चिन्ता नहीं
करनी चाहिये ॥ १५॥

२१० पारिजातसौरभे मुझे आपकी दया अपेक्षित नहीं है । परमात्मा ही मेरा सहायक है। जब सब मित्र निर्बल बन जाते हैं तब केवल वही रक्षक होता है ॥२१॥ भवतां हृदि जाप्रतीह चेन्मृदुलावृत्तिपरम्परास्तदा । परमेश्वरसाक्षिकं दृढं हृदये तिष्ठतु योद्य बन्धुता ॥२२॥ यदि आपके हृदयमें कोमल वृत्तियाँ जाग उठी हों तो परमेश्वरको साक्षी बनाकर आप सबै भाई भाई बन जाय ॥२२॥ सुहृदो मम सन्ति तादृशा वह्यो वीक्ष्य सुदारणं प्रतम् । हृदये परिपीडिता भृश विकलाः सन्ति निराशा गताः ॥२३॥ मेरे बहुतसे ऐसे मित्र हैं कि जो भयङ्कर प्रतको देखकर हृदयमें मत्यन्त व्याकुल है और निगंश बन चुके हैं ॥२३॥ यहुभिश्च यमुन्धराधिपैहुभिर्वा करणान्यितः परैः। अथ पाकभुयि स्थितैरपि प्रहिताः पत्रपरम्पराः पराः ॥२४॥ पतसे राजाओने और बहुतसे दयालु पाकिस्तानी भाइयोंने मेरे पास भातसे पत्र भेजे हैं ॥२४॥ प्रतमेतदयामयन्त सफलं त्याच्यमिहाविलम्थितम् । हृदये पहु धारयाम्यहं सफलेभ्यः सुजनेभ्य आदरात् ॥२५॥ उन एगोने मेरे इस उपवासको पातापूर्वक छोड देनेपीन्डा मपर दी है। मैं युत आदर के साथ उन समी राजन का मामार मानता हूँ ॥२५॥ भगपन्तमदं समाधितो प्रतमेतत्सरिगृष्ट दुस्याम् । मरणान्तिकमेत्य शान्विदं गर्यास्तस्य महामुजामयम् ।।२६॥ मनने पंप मापा गीगार कापे में भगदापी घरगमें पदा है। सावि देने वाले गुन्युरे पास पपार में मार गारे भाभप रा पा ||२६|| पदरा.सगः न कदापि जनेन फेनचिद्रिपुता कैयन सेव्यतामिह । न कदापन मुस्लिमः सह प्रासद्विगतीतले समम् ॥२७॥ कोई यादमी किसी से शत्रुता न परे। इस पृथिवीपर आपके समानही प्रवास करते हुए मुस्टिमौके साथ भी कोई अनुता न करे ॥२७॥ शृणुवाद्य वयो ममेरितं सालमुस्लिममन्युमि. सह । यदि नास्ति जगचले स्तृतैः प्रियता वो मयकारणं सदा ॥२८॥ आज आप मेरी बात सुनें। पृथिवीमें फैले हुए मुसलमानों के साथ यदि थापका प्रेमसम्बन्ध नहीं रहेगा तो आपकेलिये सदा भयका कारण बना रहेगा ॥२८॥ यदि तैर्न भनोदरे स्थितैः सुहृदाचारतयार हिन्तवः । मनसा विमलेन संगता भविवारः पुनरेव पन्दिनः ।।२९।। ससारमें चारोओर रहे हुए मुसलमानों साथ यटि हिन्दू मित्राचार पूर्वक शुद्ध मनसे एक न होंगे तो फिर बन्दी ही रहना पड़ेगा ॥२९॥ महता हि परिश्रमेण या परिलमधेह जने. खतन्त्रता । विवशासु गता भवेदसी कलहः स्यायुश्योईयोर्यदि ॥३०॥ महापरिश्रमसे जो स्वतन्त्रता यहाँ प्राप्त हुई है वह शीघ्र ही पली वायगी । यदि तुम दोनोंमें झगडा होगा ॥३०॥ दिवसा अतिनो ममोद्ता युवयोायत एव पश्च शम्। तिनः परभानुकम्पया जगदीशस्य च पाठ एपकः ॥३२॥ उपवास करते हुए, और आप दोनों-हिन्दु-मुसलमानों के कल्याणकी चिन्ता करते हुए मुझ कृतीके पांच दिन तो ईश्वरकासे समाप्त हो गये। यह ग्डा दिवस है ॥३१॥ भविताद्य समापितो विधिवदामप्यनुकम्पयानया । मुखिनेर भया समन्वितः परिदोपेग भम प्रतस्य तु ||३२||

२१२
पारिजातसौरभे
आप लोगोंकी कृपासे भी मेरे उपवासवा सन्तोपयुक्त विधि आज
मैं समाप्त करूँगा ॥३॥
सिखमुस्लिमहिन्दुबन्धवो विबुधाः पावकदेवपूजकाः।
अथ यीशुपदानुयायिनो हृदयैक्येन सिता स्थिता इह ॥३३॥
सिक्ख, मुसलमान्, हिन्दु, पारसी, ईसाई सभी हृदयकी एक्तासे
हुए यहाँ स्थित हैं ॥३३॥
निखिलाः प्रयदन्ति सोत्सया वयमद्य प्रभृति श्रिये हि नः ।
कलहं विनिपात्य सोदरा इव कामं प्रतिवर्तितास्महे ॥३४॥
उत्साह के साथ सभी कह रहे हैं कि हम आजसे लेकर अपने कल्या-
के लिये ही झगडेको छोडकर सगे माईके समान यहाँ रहेंगे ॥३४॥
अथ पाकगताः कुतोपि वा स्थितिमन्तो भरतक्षमातले ।
सकला मुसलीमवन्धवः प्रतिवत्स्यन्ति सुखेन निर्भयाः ॥३५।।
जो पाकिस्तान गये थे और किसी कारणसे भारतमें ही रह रहे हैं
वह सब मुसलमान् यहाँ निर्भय होकर सुखसे रहेंगे ||३५।।
इति मे प्रतिभाति साम्प्रतं प्रतिवाचो भवता मुखस्पृशः ।
सकलेपु विनम्रतेक्षिणो मृदु तात्पर्यमिदं मनस्विनाम् ॥३६॥
मनस्विना भवता मुखस्पृशः प्रतिवाचः इति इद मृदु तात्पर्यम्,
सक्दपु साम्मत विनम्रतेक्षिणो मे प्रतिभाति = आपलोग मनखी है।
आप सबमें मैं इस समय नम्रता देख रहा हूँ। आपके मुससे निकले
हुए उत्तरका ऊपर जो कह चुका हूँ, वही मृदु तात्पर्य मुझे प्रतीत हो.
रहा है ॥३६॥
यदि चेदमयो भवेदयं नितरां शुद्धसदर्थ हितः ।
ग्रतमस्ति निरर्थकं हतं मम युप्माभिरनुप्रहेरितः ॥३७।।
मैंने बोशुद्ध और उत्तम अर्थपी मापनायी है यदिया भापको स्वीकृत
नही है तो आपने परणावश व्यर्थ ही मेरे प्रतको तोरयाया है |॥३७॥

पञ्चदशः सर्गः न मनागपि वीयते भयं भयहेतुर्न कुतोपि दृश्यते । अथ दर्शितमेव वर्म मे प्रतिपन्नस्य च भारतस्य वः ॥३॥ मैंने लो मार्ग बताया है उसपर चलनेवाले भारत के लिये और आपके लिये भी जरा भी कोई भय या किसी ओर से भयका कारण नहीं दीख पडता है ॥३८॥ बलदोपहता मनुप्यतापरिहारे कुशलेन रक्षसा। अधुना भगवत्पदानुगाः मुसिनः स्याम शतायुषो वयम् ॥३९।। कुचल दौतान, मनुष्यताका त्याग करनेकेलिये नगदस्तीसे हमें खींचले गया था। भगवान्की कृपासे अब हम सौ वर्ष तक सुखी रहकर जीवेंगे ॥३९॥ गुणवद्धृदये गुणाः पदं निदधीरन्नितरी न किञ्चन । इह चित्रमिति प्रवन्यवां गुणसंपाइकतां हि बन्धवः ॥४०॥ जिस हृदयमें गुणों का निवास है उसमें अधिक गुण आवे इसमें कुछ भी थाश्चर्य नहीं है। अतः मेरे माहयों, गुणों के समूह करनेकी ही वृत्ति आप धारण करें ॥४०॥ यदि भारतपाकयोयोः प्रियवन्धुत्वमुद्देष्यति स्थिरम् । निखिलक्षितिमण्डलं तदा सुभगं संवृणुते यशस्तयोः ॥४१॥ यदि भारत और पाकिस्तानमें स्थिर प्रियवन्धुता पैदा हो गपी वो सम्पूर्ण पृथिवी उन दोनोंका सुन्दर यश प्रकट करेगी ||४१॥ यदि नैतदीप्सितं भवेत्प्रनयोहिन्दुकुरानिनोद्वयोः । मम जीवितहेतुमन नो परिपश्यामि कमप्यनिन्दितम् ॥४२॥ यदि यह बात मारत और पाकिस्तानकी प्रजाको इट नहीं है तो मैं समझता हूँ कि मेरे जीने के लिये कोई उत्तम कारण नहीं है ।।४।। परिवर्धयितुं मनुष्यता सफलो जीवतु जीवसंचये । परिलम्भयितुं महसदं जनतां धन्यतमस्य जीवनम् ॥४शा पारिजातसौरभे मनुष्यताकी वृद्धि करने के लिये और जनताको महत् पद प्राप्त कराने के लिये तो इस संसारमें, भाग्यशाली पुरुष जैसा जीता है वैसे ही जीवनके साथ सभी जीवें ॥ ४३॥ सदकालखुदामहेश्वरा निसिलाः सन्ति च वर्णसंचया । कमपि प्रभुतापरं प्रभु ननु सम्बोधयितुं समर्थकाः ॥४४॥ सत् , अकाल, खुदा, ईश्वर यह सभी शन्द किसी परम प्रभुके सम्बोधन करने के लिये पर्यायवाचक समानार्थक शन्द हैं ।। ४४ ॥ सफला मनुजा अधीयता गुरुवाणी च कुरानमप्यथ । अथवा स्मृतिमिञ्जिलादिकं न हि संवर्तत इष्टदा भिदा ॥४५॥ सभी आदमी गुरुग्रन्थसाहेबको पदे, कुरानको पढ़ें, गीता पदें, इक्षील पढ़ें। भेद रसनेसे कोई लाभ नहीं है ॥ ४५ ॥ अहमस्मिन पूजकः शिलाशकलस्यापि च हिन्दुतां भजन । परमस्ति भजश्व कोपि तन्न कदापीह तिरस्करोमि तम् ॥४॥ मैं हिन्दू होता हुआ भी मूर्तिपूजक तो नहीं हूँ। परन्तु यदि कोई भूर्तिपूजा करता हो तो मैं उसका तिरस्कार नहीं करता हूँ ॥ ४६ ॥ स्थित एव महेश्वरः शिलाशकलेवप्यनवद्यसद्यशाः । न हि तत्र शिला स ईक्षते भजते श्रीशमुपासकस्तदा ॥४७॥ निर्दोष और पवित्र पीर्तिवाला भगवान ही पत्थरकी मूर्तिमें भी है हो । भगवान्का उपासक मूर्तिपूजाकालमें मूर्तिमें पत्थर नहीं देखता, भगवान्को ही देखता है || ४७ ॥ यदि नास्ति शिलास्थ ईश्वरो न पुरानोपि भजेत्पवित्रताम् । स हि सर्वमयाप्य संस्थितस्तत एयास्ति पयिनितं जगत् ।।४।। यदि पत्थरमें ईश्वर नहीं है तो दुगन भी पवित्र नहीं माना जा सकता। पद भगवान् सबमें व्यापक होकर बैठा हुआ है इसीलिये भागत् पवित्र है । सात्पर्य यह है कि जैसे कुरानमें भी ईश्वर व्यापक है

पश्चदशः सर्गः
अत एव वह पवित्र है एवम् मूर्तिमें भी ईश्वर व्यापक है और वह पविन
है अत एव पूज्य है ।। ४८ ॥
यदि हिन्दुरिहास्ति कोपि वा प्रतिमापूजा इद्धमानसः ।
अथ सिक्स टवापि मुस्लिमोन हि वर्षद न चापि हीयते ॥४९॥
चाहे कोई मूर्तिपूजक हिन्दू हो, अथवा सिक्ख हो, अथवा मुसलमान
हो, यदि सबका मन पविन है तो न कोई उत्तम है और न कोई
थधम है ।। ४९ ॥
मम नास्ति मदो महेश्वरः परसत्यादपरः प्रभावितः ।
स्मरणेन मयास्य साधितं व्रतमेतत्सरिणामसकलम् ।।५।।
मेरे मतमें शुद्ध सत्यसे मिन्न कोई प्रभावशाली ईसर नहीं है। इसी
सत्यरूप ईश्वरके सरणसे मैंने उत्तम परिणामवाले इस व्रतको पूर्ण
किया है ।। ५०॥
परमेश्वरमीदृशं त्यजन्निरिसलानेहसि सत्सहायकम् ।
अपरं परिशोधयन्नरः परवान्पापशवानि सेवते ।।५।।
सदा सब दिन सहायता करनेवाले ऐसे परमेश्वरको छोडकर बन
मनुष्य अन्य ईश्वरको ढूँढता है तोलाचार होकर सैकडों पाप करता है ॥५१॥
निहता बहयो निरागसो निसिले श्रीजगदीशनामतः ।
शिशवः शिशुतामतीत्य वा रममाणाच नवे वयस्यपि ।।५२||
ईश्वरके ही नामपर बहुतमे निरपराध दुधमुंहे बच्चे और उससे
कारकी उनमें खेलनेवाले बच्चे मार डाले गये ॥ ५२ ॥
निहताः प्रहता हताश्च ता अबला नियभिः सहस्रशः।
अगृहीतकराश्च कन्यका अपि तेरासुरिमिविपातिता ॥२॥
निर्दयी लोगोंने हजारों खियोंको मार डाला, उनपर प्रहार किया
और उनका हरण किया। राक्षसोंने अविवाहित कन्याओको भी पतित
बना दिया ॥ ५३॥

पारिजातसौरभे बलतो निजधर्ममार्गतो वह्यो हिन्दुजनाः पृथक्कृताः। ननु केयमुदारता च का विकसन्ती च मनुष्यतापि या ।।४।। जबर्दस्तीसे बहुतेरे हिन्दुओंको अपने धर्मसे अलग किया गया। मैं पूछता हूँ कि यह कौनसी उदारता है ? और कौन-सी विकास पाती हुई मनुष्यता है।|| ५४ ॥ निखिलं निखिलेरकारि तन्ननु नाम्ना परमेशितात्मनः । मनुजैः पशुवृत्तिभिः परं न हि सत्येशमपेक्ष्य तत्कृतम् ॥१५॥ सबोंने यह सब जो फिमा वस्तुतः वह परमेश्वरके नामसे ही किया । पशुवृत्तिवाले उन मनुष्योंने सत्यरूप परमात्माका विचार करके यह नहीं किया है ॥ ५५॥ राष्ट्रस्य नाथो यतिराजसंनिधौ, राजेन्द्र आयादतिविद्वलान्तरः। आदाय हिन्दूंश्च मुहम्मदीयान , सिक्खाश्च संघस्थजनान्प्रतिष्ठितान् ॥ ५६ ।। राष्ट्रपति बाबू श्री राजेन्द्रप्रसादजी व्याकुल होकर प्रतिष्ठित हिन्दुओं, मुसलमानों, सिक्खों और राष्ट्रसेवासंघके लोगोंको लेकर श्री महात्माजीफे पास गये ।। ५६ ॥ जाहिद हुसेनोपि महाधिकारी पाकीय आसीत्तदुपस्थितेषु । सुभाषसंस्थापितसैन्यसेनापतिश्च घा शाहनवाजकोपि ||५७॥ पाकिस्तानके एक बडे अधिकारी जाहिद हुसेन भी उनमेंसे थे। तथा श्री मुभाषबाबू द्वारा स्थापित सेनाके सेनापति धीशाहनवाज मी ये॥ ५७॥ श्रीनेहरूविरियात मौनमादाय योगेश्यरपाश्र्य एव । अयुलालामोपि सहेय ठेन सन्माननो मौनमवास्थितासी ॥५८|| पण्डित श्री जयाहिरलालभी नेहरू और उनके साथ ही मौलाना भी पश्चदशः सर्गः अबुल कलाम आजाद नुरचाप उदासमुखसे महात्माबीके पासमें ही बैठे थे। ५८॥ - शान्तिप्रतिष्ठा लिखितां ठदेकां संप्राधयामास स राष्ट्रनाथ: इस्तारैः सर्वमहाजनानां समवितां वत्र यविप्रकाण्डम् ।।५९|| राष्ट्रपति श्री राजेन्द्रबाबूने उस समय एक लिखित प्रतिज्ञापत्र विसमें समी बड़े बड़े लोगोंक हस्ताक्षर ये, महात्मात्रीको मुनाया ।। ५९ ॥ सर्वे वयं मुस्लिमहिन्दुसिक्खा अन्यपि सर्वे स्वमत स्वतन्त्राः । इच्छाम आघाय सहोदरत्वं दिल्लीनिवासं मुखशान्तिपूर्वम् ।।६०॥ वह प्रतिभापत्र यह है । हम सब हिन्दू, मुसलमान, सिक्स और दूसरे मी धर्मावलम्बी सगे भाईकी मावना रखकर गुम-शान्तिसे दिल्ली में रहना चाहते हैं ।। ६०॥ दिल्लीमुसल्मानजन-स्व-धर्मरक्षा करिष्याम उदारमावः। अभूद्यया पूर्वमितः परं नो भविष्यतीति प्रविम एतत् ॥३१॥ हम सब दिल्ली के मुसलमानोंके और अपने भी धर्मकी रक्षा उदार चितसे करेंगे । पहले जैसा हो गया है सबसे वैसा नहीं होगा, यह हमलोग प्रतिज्ञा करते हैं ।।६१॥ गांधिं महात्मानमिहाद्य सर्वे विश्वासयामो वयमामावः। खाजाकुतुबुद्दिन उर्स मेला सदा भवेदेव यथैव पूर्वम् ||६|| हम सब बहुत नत्र होकर महात्मा श्री गांधीजीको विश्वास दिलाते हैं कि कुतुबुद्दीनका उम्का मेला से पहले होवा या, सदा होगा ||६|| करीलयारो च पहाडगब्जे तथैव सर्वत्र च सब्जिमण्ड्याम् । गमागमो कर्तुमवश्यमेते शता भवेयुर्मुसटीमलोकाः ॥६॥ करोलबाग, पहाड़गंब, सबनीमंडीमें और सर्वत्र यह मुखलनान् गमनागमन अवश्य कर सकते हैं ।। ६३॥ .

२१८ पारिजातसौरभे त्यक्तानि मुस्लीमजनैर्गतेस्तैस्तन्मस्जिदानीह च हिन्दुसिलपे. । नीतानि सर्वाणि निजाधिकार प्रदापयिष्याम इति प्रतिज्ञा ॥६४॥ वह मुसलमान लोग जिन मस्जिदोंको छोडकर चले गये थे और जिन्हें हिन्दुओं और सिक्खोंने अपने कब्जे में कर लिया है हम उनको दिला देंगे, यह प्रतिज्ञा करते हैं ॥ ६४ ॥ यानि स्थलानीह भवन्ति मुस्लिम्लोकाधिवासाय न ताति केचित् । यशीकरिष्यन्ति बलाद्धठाद्वा सर्वे वयं धर्म इति प्रतिज्ञाम् ॥६५।। मुसलमानोंके रहने के लिये बो स्थान हैं उन्हें कोई बली या इठसे अपने अधिकारमें नहीं लेंगे, यह हम सब प्रतिज्ञा करते हैं ।। ६५ ॥ यहिर्गता मुस्लिमवन्धवो ये दिल्ली विहाय स्वमनोरथेन । दिल्ल्यां पुनर्वस्तुमथास्तु तेपामीहा तदागन्तुमिहावकाशः ॥६६॥ स्वेच्छासे को मुसलमान दिछी छोडकर बाहर चले गये हैं, वह यदि. यहाँ पुनः रहना चाहें तो उन्हें पाने के लिये अवकाश है ॥ ६६ ।। व्यापारमेवेपि ययेच्छमेव का भविष्यन्ति सदा क्षमारते । विधातुमेतत्सकलं यतिप्यामहे धयं नात्र प कापि शक्षा ||६॥ मुसलमान् मी यहाँ अपनी इच्छाके अनुसार व्यापार पर सकेंगे। पर सब करने के लिये हम यत्न करेंगे, इसमें सन्देह नहीं ।। ६७ ॥ सेनापलं शारयलं नया स्यादपेक्षणीयं न कदापि फेधित् । एतत्पतिशापरिपालनाय स्ययं विधास्याम इदं ययं हि ॥६॥ इस प्रतिरा पालन करने लिये सेना या सरिकी कभी अपेक्षा हम नही परेंगे। यह सब हम स्वर ही करेंगे ॥ ६८॥ विगतमावेन निवेदयामो महात्मपादेषु पयं सःपाः। विधास्यमेतदनं सदेय पदापि मिध्याग भविष्यतीवम् ॥६९।। गनमा पाप भीमहामाधी घरगोगे सफे साथ प्रार्थना पञ्चदशः सर्गः करते हैं कि इस वचनपर आप विश्वास रखें। यह कमी मिथ्या नहीं होगा ॥ ६९॥ कृपां विधायेव महादयालो व्रतं विसृज्याद्य कुरुष्व लोकान् । हिन्दून्सिसान्मुस्लिमपारसीकान्सिस्तानपि स्वस्थतमान्सनाथान् ।।७।। हे परमदयाल महात्माजी, आप कृपा करके व्रतको छोड़कर हिन्दू, रिक्स, मुसलमान् , पारसी, ईसाई सनको स्वस्थ और सनाथ बनाइये ॥ ७० ॥ महाप्रभो त्वं परमः समर्थों निराश्रितानां परिरक्षणाय । वयं तवाज्ञापरिपालनाय स्थास्याम ऊर्जा निखिलेन नित्यम् ॥७१।। हे महाप्रमो, निराश्रितोंकी रक्षामें आप परम समर्थ हैं। आपकी आज्ञाका पालन करनेके लिये हम सब शक्तिसे सदा खड़े रहेगे १७११॥ यथा भवान्नः परिपालनाय जागर्ति नित्यं कृपया प्रशान्तः । तथैव चाद्यापि वयं निरीक्ष्याः पित्रेव पाल्याश्च सुता वयं स्मः ॥७२॥ जिस प्रकारसे आप हमारा पालन करनेके लिये दयासे सदा जागरूक रहते हैं वैसे ही आज भी हमारा निरीक्षण करेंगे। पिता जैसे अपने पुत्रोका पालन करता है वैसे ही हमारा पालन करेंगे। हम सब आपके पुत्र हैं ॥७२॥ एतन्निशम्य निखिलं यमिनां महेन्द्रो, विश्वम्भरो व्रतमपास्य दिने च षष्ठे। स्यस्यो वभूय परितुष्य महाश्रमेण, कृत्येन सद्विरुपपादितकेन तेन ॥ ७३ ।। इति सन्तनस्वतघ्रपरमहंसपरिव्राजकस्वामिश्रीमद्भगवदाचार्यपण्डितराजभणीते पारिजातसौरभे पन्चदशः सर्गः २२० पारिजातसौरभे यम पालन करनेवालोंमें श्रेष्ठ श्रीमहात्माजी यह सब सुनकर और सत्पुरुषों द्वारा महाश्रमसे किये गये इस कार्यसे प्रसन्न होकर छठे दिन उपवासका त्यागकर स्वस्थ हुए ॥७३॥ इति श्रीपरमहंसपरिव्राजकस्वामिश्रीमद्भगवदाचार्यपण्डितजिप्रणीते पारिजावसौरमे स्वोपक्षभारतराष्ट्रभाषाटीका पन्चदशः सर्गः - पोडशः सर्गः वन्नूप्रदेशाद्वहवः समाययुः श्रुतिप्रथाः केचन मूर्ध्नि ताडिताः । संच्छिन्नवाहहुलयश्च केचन स्रवल्झनोत्पनसरित्याइकाः ॥११॥ बहुतसे श्रुतिमय%= हिन्दू वन्नू प्रदेशसे महात्माजीके पास आये। उनमेंसे किसीके सिरमें मार पड़ी थी, किसीका हाथ कटा था, किसीकी अहलियाँ की थी और उन समीके घावमेंसे रक्की घारा वह रही यी ॥१॥ थागत्य योगीन्द्रपदारविन्दयोः प्रणम्य साष्टाङ्गमनद्भुता जनाः। आत्मीयदुःसोपकथानकेन ते यतीश्वरं साश्रुमुसं प्रचक्रिरे ॥२॥ आकर श्रीमहात्माजीके चरणकमलों में साशग प्रणाम करके उन साधारण लोगोंने अपने दुःखकी कयासे उन्हें रुला दिया ॥२॥ अचे विपद्माहगृहीतमानसः प्रकोपितः कश्चन देवनिर्दयः। माहात्म्यतः सर्वमहात्मनां गणानघोनयन्तं यतिभूमिकापतिम् ॥३॥ उनमेंसे निर्दय दैवसे कोपित और दुःखी मनसे एकने सर्व महात्माओं- में श्रेष्ठ श्री यतिराजको कहा-॥३॥ विनाशितं सर्वमिह त्वयेय नो न चावशिष्टं किमपि क्षयोन्मुखम् । कतुं न किश्चित्क्षमसे यतीश्वर प्रयाहि तस्मादगिरिराजकन्दरम् ॥४॥ कि, आपने ही हमारा सर्वनाश कराया है। नष्ट होने के लिये अब कुछ बाकी नहीं है। भाप तो कुछ कर नहीं सकवे अतः हिमालयकी गुफामें आप चले जायें ।। ४ ।। पूज्यः सतां स प्रवियाचमादरान्निदान्य तद्वाचमुवाच सद्यतिः । गच्छानिवादक शृणोमिकस्य वा वचासि चित्राणिविवृण्वतः पुरः २२२ पारिजातसौरभे महामाजीने आदरसे उसकी बातको सुनकर उत्तर दिया कि, माई मैं कहाँ जाऊँ। और किसकी बात सुन । समी तो मेरे पास आकर विचित्र बातें कर जाते हैं ॥ ५ ॥ कश्चित्प्रविष्टातुमिहैव सर्वदोपदेशदक्षो पदति प्रयत्नतः । स्वाक् च मां गन्तुमितः सपद्यथो वदत्यजत्रं यद किं करोम्यहम् ॥६॥ कोई तो प्रयत्नपूर्वक मुझे उपदेश देता है कि मैं यहाँ ही रहूँ। तुम्हारे जैसे लोग मुझे यहाँसे जानेकेलिये कहते हैं। कहो कि मैं क्या करूँ ॥६॥ कश्चित्प्रशंसत्यथ कोपि पीडितो निर्भत्संयत्येव मुहुर्मुहुर्वत । मां तहिं संवेदय मार्गमीदशं गतेन यं शान्तिमयनतो लभे ॥॥ कोई पीड़ित आदमी मेरी निन्दा करता है और कोई प्रशसा करता है। तुम मुझे कहो कि मैं कौन-सा मार्ग लूँ जिससे बिना श्रमके यान्ति प्राप्त करूँ॥७॥ संभसयेत्कोपि च कोपि गालिकासहस्रपाठं विदधातु सेन किम् । यत्कर्तुमीशः प्रविबोधयिष्यति तदेव कालेपु मया विधास्यते ॥८॥ चाहे कोई मुझे धमकावे चाहे हजारों गालियाँ दे, उससे मुझे क्या सम्बन्ध ! भगवान् मुझसे जो करावेगा वही समयपर मैं करूंगा ॥ ८॥ त्वं चेन्न कंचिन्नगदीश्यरं परं जगत्प्रणम्यं मनुपे दयानिधिम् । ममान्तरात्मध्यनिमाकलय्यमां विधातुमार्यामवरुन्त्स्य मा कृतिम् ।।९।। तुम अगर कोई दयालु बगदीश्वरको न मानते हो तो न मानो। परन्तु मुशे मेरे अन्तरात्माकी आयाजके अनुसार सत्कर्म करनेसे मत रोको ॥९॥ प्रत्येकनारी दुहिता मम प्रिया स्वसापि वेत्येव मयाभिमन्यते । तस्माद्विपत्तामु समागता भवेद्विपन्मयोति प्रथितं मया भवेत् ॥१०॥ प्रत्येक स्त्री मेरी पियकन्या है और मेरी प्रिय बहिन है ऐसा ही मैं मानता हूँ। अत: यदि उनपर कोई विपति आपे तो उसे मैं मेरी ही विपत्ति समानता हूँ॥ १०॥ ग

पोडशः सर्गः
२२३
नाई सुहृद्धिन्दुसिखादिसद्वियामिति प्रतीविहृदये कुतस्तव ।
नित्यं मुसल्मानगणस्य मानसं घिनोम्यहं ते तदपि भ्रमो महान् ॥१२॥
मैं हिन्दुयों और सिक्सोका मित्र नहीं हूँ, तुम यह कैसे जानवे हो ?
मैं सदा मुसलमानोंके मनको ही प्रसन्न करता हूँ, यह भी तुम्हारा
वडा मारी भ्रम है ॥ ११ ॥
केनापि नो अस्मि नियोजितः कचिननोपकाराचरणे नरेण वा ।
नो वारितः करपि लोकसेवनाद्भवाम्यकस्माद्विरतः कदाचन ।।१२।।
किसीके रहनेसे मैं जनताके उपकारमें नहीं लगा हूँ। तथा किसीके
रोकनेसे मैं लोक्सेवासे अस्मात् कमी मी विरत नहीं बनूंगा ॥ १२ ॥
ईशेच्छयैवाहमिमां कृति गुमा समाचरामीति निवृत्तिरप्यथ ।
सम्पत्स्यते श्रीभगवत्सदिच्छया परं न हेतुः प्रभवेदिहापरः ॥१३॥
भगवानकी ही इच्छासे मैं यह सेवारूप शुभ कर्म करता हूँ। इससे
निवृत्ति मी मगवान्की ही इच्छासे होगी। परन्तु दूसरा कोई कारण
मुझे रोकने में समय न होगा ॥ १३ ॥
यद्यत्समिच्छेत्स हिताय मे प्रभु करिष्यते तत्र न चिन्तितोत्म्यहम् ।
इन्तासचेन्मामिह संजिर्यासति जिजीवयिष्येद्यदि जीपयिष्यति॥१४॥
वह मेरे हितकेलिये बो इच्छा करेगा, उसे वह करेगा, इस विषयमें
मैं कमी चिन्ता नहीं करता हूँ। यदि वह मुझे मार डालना चाहेगा तो
मार डालेगा । यदि वह जिलाना चाहेगा तो जिलावेगा ॥ १४ ॥
मन्येहमीशस्य वशेस्मि सर्वथा सदा च तत्प्रेरित एव कर्मसु ।
इष्टेप्यनिष्टेस्यपि संभजे रति कदापि कर्तास्वत एव नास्म्यहम् ।।१५।।
मैं मानता हूँ कि सब प्रकारसे भगवान्के ही वनमें हूँ। उसकी
प्रेरणा से ही मैं इष्ट अथवा अनिष्ट कर्ममें लगता हूँ। मैं स्वत तो कमी मी
पता नहीं हूँ ॥ १५ ॥

२२४
पारिजातसौरमे
विशे तिथौ नाशयितुं तनूमिमां जरातिजीणां मम बन्धुरेव सः ।
चिक्षेप मध्ये सदसः पवि हरेरुपासनायाः समये सविनमः ॥१६॥
बीसवीं तारीखको मेरे इस बराजीर्ण शरीरको नष्ट करने के लिये मेरे
ही एक पागल भाईने ईश्वरोपासनाके समय समामें वन-बॉम्ब फेंका
था ॥ १६ ॥
भीरुन चाहं न वियाधते भयं मृतेश्च मामल्पमपीह निर्भयम् ।
रीत्यानया कोपि मनोरथं निजं भवेन्न संपूरयितुं क्षमः कचित् ॥१७॥
मैं डरपोक नहीं हूँ। मृत्युका जरा भी भय मुझ निर्भयको नहीं होता
है । इस रीतिसे कोई अपने मनोरथको पूर्ण नहीं कर सकता ।। १७ ॥
कट्वालमात्रां तनुपोतिका हि मे बलेन हीनां जरयावशीकृताम् ।
हन्तुं प्रयत्नः क इहास्त्वसौ महान्स शोभते नाहित ईमविक्रये ।।१८।।
यह शरीर तो हड्डीमात्र ही है, बल है नहीं, वृद्धावस्थासे पराधीन
है उसे मारनेके लिये यह क्या महान् प्रयत्न किया गया है १ फोड़ा-फुन्सीसे
विकृत शरीरमें किया गया वह प्रयत्न शोभा नहीं देता है ।। १८ ।।
युप्माभिरन्यैरपि मूढबुद्धिकैः कदापिनेयः कुपितावनि न सः ।
अन्नानदण्डप्रहतः स्वभावतो हतः स्वकृत्या कृतया कथश्चन ।।१९।।
आप लोग तथा अन्य विचारहीन लोग उसपर क्रोध न करें। वहतो
स्वयम् अशानदण्डसे दण्डित होकर अपने कर्मसे ही मारा जा चुका है ।।१९।।
हिन्दुःसिसोवास्तुसमेस्तु तेन किं भवेन्मुसल्मांश्च सतोपि किंमम ।
स्यात्कोप्यसौ नो व्यधित प्रतिष्ठिता क्रिया ततो दुप्यति देशमात्मनः।।
बम फेरनेवाला हिन्दु हो, या सिख हो, या मुसलमान हो, उससे
मुझे क्या? यह कोई भी हो परन्तु उसने अच्छा काम नहीं किया है।
उमसे अपना देश कलंकित होता है ॥ २० ॥
तरमा अधीशः प्रददातु सन्मति भये भये पुण्यतमेपु फर्ममु।
भक्तिर्भवेत्तद्धृदये सदातनं विरक्तिमानोतु सदा सदुष्कृतात् ॥२१॥

पोडशः सर्गः
२२५
भगवान् उसे सुमति दें। प्रत्येक जन्ममें पुण्य कार्यों में उसकी भक्ति
हो। उसके हममें सटा ही दुष्कर्मसे विरक्ति हो ।। २१ ।।
स्तं मया पोलिसकर्मचारिणां मुसं न तं पीडयितुं कथंचन ।
देवेन यः पूर्वतरं निपातितो निहत्य तं कि अगसे भवेत्तव ॥२२॥
मैंने पुलिसके कर्मचारियोंमे मुख्य मंचारी-पुलिस सुपरिन्टेन्डेन्टको
कहा है कि उम बम फेरनेवालेको ईरान न करें। जो दैवका पहिले से ही
मारा हुआ है उसको मारनेसे यापको क्या यश मिलेगा ? ॥ २२ ॥
शकोमि वक्तुं न कृतापराधनं जहीति तं चेति परन्तु तन्मनः ।
लेतुं प्रयत्नो निखिलो निपेन्यतां कदापि तस्मै नहि कुप्यतामिति ॥२३॥
मैंने उन्हें यह भी कहा है कि-मैं यह तो कह ही नहीं सस्ता कि
अपराधीको वह छोड दें। परन्तु उसके मनको जीतने के लिये सब प्रयत्न
करें। उसपर क्रोध न करें।। २३ ॥
सर्वे वयं चेद्धतकोपवृत्तिका भवेम तत्तस्य मनोविशोधनम् ।
स्यादेय निश्चप्रचमित्यलं जनैः शमान्वितै रोपरयो निरोध्यताम् ॥२४॥
यदि हम सभी क्रोधकी वृत्ति छोड़ दें तो उसका मन अवश्य ही शुद्ध
हो सके । अतः सबको शान्त होकर कोधका वेग रोस्ना चाहिये ॥२४॥
पापं कदाचिन्न वितिष्ठते स्वयं भवन्निराधारमिति श्रुतिश्रुतम् ।
तस्मादधिष्टानविनाशहेतवे विधीयतां यनगणोखिळेः सदा ॥२५॥
शास्त्रों में कहा गया है कि पाप स्वत: कभी निराधार नहीं रह सकता
है। अतः उसके अधिष्टान (मन) के नाशकेलिये सबको सदा यन
करना चाहिये ।। २५ ॥
पापस्य निःशङ्कतया मनः स्मृतं बुधैरधिष्ठानमिति प्रणाशिते ।
तस्मिन् प्रणयन्ति जघन्यवृत्तयःस्वयंततस्युनिसिला अकोपना|२६||
निस्सन्देह पापरा यधिष्टान मन है। उसके नाश करनेपर नीच
वृत्तियाँ स्वयं नष्ट हो जायगी और उससे सब क्रोधरहित बन जायेंगे ॥२६॥

२२६ पारिजातसौरभे स्थातुं समर्थो भगवान्स केवलः सदा निराधारतया समन्ततः । तद्भक्तलोका अपि नावलम्बनं प्रकामयन्ते कचनाथ किंचन ॥२७॥ केवल भगवान् ही सदा ओर सर्वन निराधार रह सकता है। उसके भच भी कभी कोई (अन्य ) अवलम्ब नहीं चाहते हैं ॥ २७ ॥ आक्रामको मां समुपेत्य निर्भय क्रिया स्वकीयां कुरतां यथेच्छया । नान्यः सहायोस्तु च रामनाम मे परं सहायोस्तु तदैव धन्यता॥२८॥ आक्रमण करनेवाला निर्भय होकर मेरे पास आ सकता है और इच्छानुसार अपना काम कर सकता है। मेरा तो कोई सहायक नहीं है । रामनाम ही मेरा सहायक रहे तो मैं अपने को धन्य मानें ॥ २८ ॥ धृष्णोतुमा कश्चिदुपेत्य कोपनो न कोपियुष्मासुभवेत्प्रकोपितः । सर्वे जपन्तो हृदि रामनामस्थितास्तदा धन्यतया वयं सलु ॥२९॥ कोई क्रोधी पुरुष मेरे पास आकर मुझपर हमला करे और आप लोगोंमेंसे किसीको कोष न हो और सभी रामनामका जप हृदयमें करते रहें तमी हम सब धन्य हो सकते हैं ।। २९ ।। ह्यः कापि कारुण्यधरामनस्विनी निधाय साचेतसि साहसंमहत् । तं प्राहयित्या व्यदधारसती स्त्रियां प्रकोपमूढं तदरोचतैव मे॥३०॥ कल किसी दयालु, मनस्विनी वहिनने मनमें बड़ा भारी साहस रसकर उस क्रोधोन्मत्त पुरुपको पकडवाकर अच्छा काम किया। यह मुझे पसन्द आया 1॥३०॥ एपाथपोस्तु निरक्षरा यदि महत्त्वमस्या न भवेदुत कचित् । अस्याथवस्या मन एति शुद्धा यदि प्रवृद्धिं गमयेत्स्वकानगुणान् ॥३१॥ कोई छी हो या पुरुप हो, यह यदि निरक्षर हो तो मी उसका महत्व कहो नाता नहीं, यदि यह अपने मनको पवित्र परे और अपने गुणोंको यदानेका प्रयास करे।।३१॥

पोडशः सर्गः
तस्मात्सरेहन्यवनीप्रपूजितः सभामुवं सायमुपैतुमागतः ।
स प्रार्थनायाः समये यथाक्रमं जयेतिनादेन समर्चितोमवत् ॥३२॥
उससे पीछेके दिन में जगत्पूज्य महात्माजी नमके अनुसार प्रार्थना-
समयमें सायकाल समामें आये और जयगरसे लोगोंने स्वागत क्यिा ॥३२॥
दूरेमवद्वयासपदं ततः स्थलाद्विलोकितस्तैः प्रथमं समाजनैः।
यत्रागतस्तत्र नराधमाधमो यतीन्द्रपादेषु ननाम कश्चन ॥३३॥
महात्माजीका लोगोंको बहोंसे प्रथमदर्शन हुआ वहाँ से व्यासगादी दूर
थी। उसी जगह (जहाँ प्रयम उनका दर्शन हुआ था) कोई एक महानीच
पुष्प आया और उसने महात्माजीके चरणों में प्रणाम किया ।। ३३ ॥
आदाय यह्वधषासी स्वहस्वयोमहाप्रभोर्वक्षसि चोदरे क्रमात् ।
चिक्षेप तिस्रो गुलिकाःप्रकाशिनीरुपोपणायल्यभुजो जादः॥३४॥
पश्चात् उसने हायोंमें रिवाल्वर लेकर, उपवाससे निबल बने हुए,
और सम्पूर्णजगत्के हृदय समान श्रीमहात्मानीकी छातीमें और पेट में
मसे तीन गोलियाँ मारी ।। ३४ ॥
काले च तस्मिन्मनुगांधिराज्ञया यतेस्तथाभापि कनोः सधर्मिणी ।
आस्वां स्थिते वस्य च पाश्र्वयोयोमहागुरो राष्ट्रपितुः सतासतः ।।३५६६
उस समय महात्माजीकी आशासे श्री मनुगाधी और श्री कनुगाघीकी
पत्नी श्री. आभागाधी उनके दोनों तरफ खड़ी थीं ॥ ३५ ॥
वस्वर्थरन्कमितस्य योगिराट् सदाशिवो येशववत्सरस्य च ।
मासे च जान्यूअरिमासमुख्यगे तथा नवनिशदिने महेश्वरः ॥३६॥
लीलागृहीता स्वतनुं सजन्नसो महायतीशः कृतकृत्यतां गतः ।
स्वरूपमापत्सरमा हि देवता स्मरन्स रामं हृदये पुनः पुनः॥३॥
वा० २१-१-१९४८ ई. के दिन श्रीमहात्माजी लीलादेहको
त्यागररकै हृदयमें बार-बार रामनाम स्मरण करते हुए स्वरूपमें लीन
हो गये ॥३६.३७ ॥

२२८ पारिजातसौरभे महाविद्वेपाग्नी सकलजनतास्तप्ततनयो, मिथोशत्रूयन्त प्रतिदिनमभूद्वन्द्वकलहः । महाक्रोधावेशास्मृतनिजमहापूर्वजगणाः, सदा हिन्दूलोका मुसलिमवधायोद्यवतमाः ॥३८॥ महाविद्वेषरूप आगमें सबका शरीर तप रहा था, परस्पर सन शनु हो रहे थे, प्रतिदिन परस्पर लडाइयाँ होती थीं, हिन्दूलोग क्रोधके आवेशमें आकर अपने पूर्वजोंके गुणोंको भूल गये थे, सदा मुसलमानोंको मार डालने के लिये तैयार थे॥ ३८ ॥ अयं श्रीमानीशो निहतयवनान्वीक्ष्य करुणा- स्रवत्स्रोतोमनः परिचरितपश्चानशनकः। व्यधत्ताराच्छान्ति कलिकलकलप्रोग्झितमतिः, स नाथू हा नाथं जगदकृत सद्यः शवमयम् ॥३९॥ श्रीमान् महात्माजी मरे हुए यवनोंको देखकर करुणानदीमें डूबकर, पाँच उपवास करके, किसी तरह शान्तिकी थी। कलिके प्रतापसे जिसकी बुद्धि नष्ट हो गयी थी उस नाथूरामगोडसेने जगत्को अनाथ और मुर्दा बना दिया ||३९|| स्वातन्त्र्यं भरतक्षितेः स रचयन्सत्यं मुनि स्थापय. नस्पृश्येतिफदक्षरं परिभवन्नाार्तिमानाशयन् । लीला लोकहिताय तेन विहितास्ताः स्थापयित्वा शिवा, हा रामेतिवदन्दयाजलनिधिः शान्तस्वरूपोभवत् ॥४०॥ इति सर्वतनस्ववनपरमहंसपरिव्राजकस्वामिधीमद्भगवदाचार्यपण्डितराजप्रणीते पारिजातसौरमे पोदशः सर्गः भारतदेशको स्वतन्त्र पनाकर, अस्पृश्यताको मिटाकर, दुःखी जनोंकी पोटास नायर लोककल्यामके लिये की हुई पवित्रलीलाका स्थापन करके हे राम कहते हुए दयासागर श्रीमहामाजो शान्तस्वरूप हो गये ॥४॥ इति श्रीपरमहंसपरिवाजकस्यामिश्रीमद्भगवदाचार्यपण्डितराजप्रणीते पारिजातसौरभ स्वोपभारतराष्ट्रभाषाटीका घोडशः सर्गः

सप्तदशः सर्गः
घरणी नववेढनां गता रहिता गांधिमहात्मना सता।
अथ सत्यमितो गतं जहत्सशरीरं जगदेतबर्दितम् ॥ १॥
महात्मा गांधी विना पृथिवीने एक नयी वेदनाका अनुभव किया
और शरीरधारी सत्य इस दुसित जगत्को छोडकर चला गया ।। १ ।।
नयनानि नृणामनारतं जलजातानि नृणां वनृरिमाः ।
अघदूपितदुस्स्पृशा जलरघहीनाः सकला वितन्वते ॥२॥
लोगोंके नेन जो जलमे पैदा हुए है, मनुष्यों के पापसे दूषित होनेके
कारण स्पर्श करनेके अयोग्य शरीरों बरसे पापहीन बना रहे हैं ॥२॥
अथ केन निशम्य मूर्छिता वधवाता यत मोहनस्य ताम् ।
अथ के न गता निराशतां जननी भूमिमवेक्ष्य दुर्गताम् ॥ ३॥
श्री महात्मा के मारे जाने की बात सुनकर कौन मूर्छित नहीं हुआ ?
माता भूमिकी दुर्दशा देखकर कौन निराश नहीं हुआ ? ॥ ३ ॥
न कदापि विलोकिता मही भवनायेन दुरन्तकेशी।
न कदापि विलापवर्णविलपन्तीयमुपश्रुता कचित् ॥ ४ ॥
मगन्ने कमी देखा नहीं था कि पृथिवीकी ऐसी दुर्दशा होती है।
पृथिवी पिलाप करती हुई भी कमी सुनी नही गया ॥ ४ ॥
गत एव मनोतिशामको गत एवास्दि मनोरथाश्रयः।
गत एव मनः शमोद्य मे गद एवासिलसम्पदा निधिः ॥५॥
मनके दुःखोंगो शान्त करनेवाला चला गया ! मनोरयो एकमात्र
याश्रय मी चला गया!मनको शान्ति भी आज चली गयी ! सर्वसम्पत्ति-
योंका निधि साज चला गया ॥५॥

तदा।
॥
२३०
पारिजातसौरभे
गत एव जगत्सदाश्रयो गत एवं प्रतिभापराश्रयः।
इति दूनमना नभोमणिस्तमसाच्छन्न इहाभवत्क्षणात् ॥ ६॥
जगत्का श्रेष्ठ आश्रय चला गया। प्रतिभाका अद्भुत आश्रमी चला
ही गया ! इस प्रकारसे दुःखितमनवाले भगवान सूर्य भी क्षण भरमें ही
अंधकारसे टैंक गये ।। ६ ॥
जगदन्धतमिस्रलेपितं सहसा जातमनात
हृदये समुदीतवेदना पुरतः कस्य विकाशयेददः ॥ ७॥
जगत् घोर अन्धकारसे लिप गया। संसार सहसा प्रकाशहीन हो गया ।
अब वह अपने हृदयकी वेदनाको किसके आगे प्रकाशित करेगा।
जनतातिविपादविह्वला विरता सर्वकृतेस्तदारता ।
पक्षुपक्षिगणा अपि प्रभारहिता रावहितास्तदाभवन् ।॥ ८॥
मानवसमूह उस समय विपादसे म्याकुल हो गया | सब कामोंसे उस
समय जनता अरता =प्रेमशून्य हो गयी। पशु-पक्षियों का समुदाय भी
प्रमारहित और राव-हित शब्दहीन हो गया ।॥ ८॥
मम राष्ट्रपिता पिता गतो जननी चाद्य दिवं गता मम ।
द्युतिरेव ममाद्य चक्षुपोय॑तियाता परमार्थदर्शिनी ॥९॥
मेरे राष्ट्रपिता चले गये। पिता और माता आज स्वर्गवासी हुए।
परमार्थ दर्शन करनेवाली मेरी आँखोंकी ज्योति चली गयी ॥ ९॥
हृदयं मम निर्गतं तनुं विरहय्याच निरर्थिकामिय ।
कचिदेव गतं मनोपि मे चिरसंगित्वमपालयत्तथा ॥१०॥
इस निरर्थक जैसे शरीरको छोडकर मेरा हृदय चला गया ! चिर-
फालफे सम्बन्धको न पालन फरता हुथा मेरा मन भी कहीं चला
गया ॥१०॥
पतितो यदि संकटेधुना सविधे फस्य नु यानि चिन्तितः ।
इहास्ति हरेन्मम व्यथा मधुरेणेय पचश्चयेन यः॥११॥

सप्तदशः सर्गः आज मैं संकट में पड़ गया हूँ। अब मैं चिन्ताग्रस्त होकर किसके पास जाऊँगा ? अव यहाँ कौन है जो मीठे शब्दों से मेरी व्यथाको दूर करेगा ॥११॥ इति हन्त जवाहरः परं व्यलपद्राष्ट्रपितुः कृते मुहुः । सततं हि महात्मनात्मना पयसा प्रेममयेन पालितः ॥१२॥ सदा ही महात्माजीने स्वयं जिन्हें प्रेममय दूघसे पाला था वह पण्डित जवाहरलालनेहरू राष्ट्रपिताकेलिये इस प्रकार विलाप करते थे ॥१२॥ न हि रोचिरदः प्रकाराते परितोस्मानिह साम्प्रतं ज्वलत् । वयमद्य समावृताः परं तमसामेय चयेन भारते ॥१३॥ अब हमारे चारों ओर जलती हुई ज्योति प्रकाशित नहीं है। आज हम मारतमें अन्धकारसे घिर गये ।।१३।। न हि राष्ट्रपिताद्य वर्तते गुरुदेवो गत एव मां त्यजन । परमः सुहृदस्तमन्वगादधुना को हि निषेव्यतां मया ॥१४॥ आज मुझे छोडकर राष्ट्रपिता चले गये, गुरुदेव चले गये, परम मुहद् चले गये। अब मै किसकी सेवा क्रूँगा १ किसका आश्रय लूंगा।।१४॥ रुचिरः प्रखरप्रकाशकृन्नहि देहोस्ति ततो न या क्षतिः । सकलं स परीत्य संस्थितः प्रतिभासाय भवत्यलं सदा ॥१५।। आज वह प्रखर प्रकाशवाला-तेजस्वी सुन्दर देह नहीं है, तो कोई क्षति नहीं। यह तो सर्वत्र व्यापक होकर सदा प्रकाश देनेके लिये समर्थ है ॥ १५॥ निखिलोद्य भवस्तमोनिधौ परिमग्नः खलु माययावशः । परिहर्तुमनेन दीपितं विजरज्योतिरिदं ज्वलेत्सदा ॥१६॥ अशनसे लाचार होकर आज सम्पूर्ण जगत् अन्धकार महासागरमें अवश्य ही डूबा हुआ था। उस अन्धकारको दूर करनेकेलिये महात्माजी ने यह अमर ज्योति सुलगायी है ।। १६ ।।

२३२ पारिजातसारमे यदुपादिशदेप नो गुरनिखिलागम्यसदागमक्षमः । नियतं हि तदस्ति शाश्वतं परमं सत्यमनञ्जनं शिवम् ।।१७|| जो उस सत् शास्त्रमे समर्थ थे जिसे सब नहीं जान सकते ये उन हमारे गुरुदेवने हमको जो उपदेश दिया है वह अवश्य ही नित्य है, परमसत्य है और निरञ्जन है ।। १७ ॥ स गतः परिहाय नस्तदा तदपेक्षा नियताभवद्यदा । नियती विधिना विलेखितं निपुणोपि प्रतिवर्तयेत कः ॥१८॥ वह हमें तब छोड़कर चले गये जब हमें उनकी अधिक आवश्यक्ता थी । ब्रह्माने माग्यमें जो कुछ लिसा हो उसे कौन मिटा सकता है ।।१८।। न वयं समचिन्तयाम यत्तदपेक्षा न कदापि विद्यते । विधुरिच्छति कर्हि चिन्न हि द्युमणे. कापि वियोगसन्ततिम् ॥१९॥ हमने कभी सोचाही नहीं कि उनकी अपेक्षा नहीं है। चन्द्र कभी भी सदाकेलिये सूर्यका वियोग नहीं ही चाहता है ॥ १९ ॥ पतिता वयमद्य दुर्दिने विपदम्भोनिधिवीचिताडिताः। अथ नः परिहाय तद्गतिर्न विपह्या कथमप्यरिष्टदा ॥२०॥ भाज हम दुर्दिनमै पड़े हैं। विपत्तियोंका सागर अपने तरङ्गोंसे हमें ताडन कर रहा है ऐसे समयमे हमको छोटकर उसका चले जाना किसी प्रमार भी सह्य नहीं है और दु स देनेवाला है ॥२०॥ बहुभिर्दिनमासयन्दकै हुभिवर्षगणैरपीह था। विषमुप्तमनिद्रमत्र यत्पलितं नो विपमाय तत्पलु ॥२१॥ बहुत दिनों और महीनों में, बहुत वाँसे भी यहाँ जो अनवरत विप चोपा गया है यह आज हमारे फट लिये फ्ला है ॥ २१ ॥ विषमस्थितिशालिभिस्त्यिय तरणायेव विपत्सरिद्भवेत् । गुरुशिक्षितवर्मनेय तत्पदगामित्वभरेण संभृते. ॥२२॥ एम आम विषम स्थितिमें हैं। गुरुये पताये मार्गसे उनकी सप्तदशः सर्गः २३३ अनुगामिताके मारसे भरे हुए हमें विपत्ति-नदी पार करनी ही है ॥ २२ ॥ न हि येत्र भवन्ति विह्वलाः परिवीक्ष्यैव भयास्पदागमम् । त इवेह वयं विपन्निधिं निखिलं धर्पितुमुत्सहामहै ||२३|| जो लोग भयस्थानको देखकर ही व्याकुल नहीं हो जाते उन्हीके समान हम इस समस विपत्सागरको पार करनेका उत्साह रखें ॥ २३ ॥ गुरुदशितवर्मना ब्रजन्न तदन्तर्व्यधयान्यहं. क्वचित् । अवलोक्य मदुत्पथायनं हृदयं तस्य सहिष्यते व्यथाम् ॥२४॥ हम अपने गुरुके ही दिखाये मार्गसे चलते हुए उनके हृदयको कमी व्यथित नहीं करेंगे। हमारे उत्पथगमनको देसार उनके हृदयको पीडा होगी ।। २४ ॥ वयमेक्यमुपास्य सर्वथा जनिभूमेविपदां निपेधिनीम् । तनयाम सती क्रियां सदा परिवज्यय विपन्निधायिनीम् ।।२५|| हम सब एक होफर जन्मभूमिके दुःसको दूर करनेवाले अच्छे काम करें और दुःखदेनेवाले फामफो छोड दें ।। २५ ।। अधिनेतृपदं गता जना बहवो ध्वंसकरी क्रियां प्रति । रतिमादधते निरन्तरं प्रकृतेरस्ति हि दुनिवार्यता ||२६॥ बहुतसे नेतामी ऐसी किया करते हैं जिसमे से नाश ही पैदा होता है। जिसका जैसा खभाव है वह मिटाया नहीं जा सकता ॥ २६ ॥ मतिमद्भिपासितः स नो गुरुरासीद्विरलो महाजन । रचनात्मककर्मकता नितरां संपरिपेयते स्म तम् ॥२७॥ सभी विद्वान् जिनकी उपासना करते थे वह हमारे गुरु विरल महापुरुष ये । रचनात्मक कर्म करना उन्हें प्रिय या ॥२७॥ स हि राष्ट्रपिता महागुरर्निसिटस्यैव मनुष्यताभृतः । असता दुरितेन नित्यशो बलतो निर्भयतोप्ययुध्यत || २३४ पारिजातसौरभे. वह हमारे राष्ट्रपिता सभी मनुष्यों के महागुरु थे। उन्होंने सदा ही असत्यरूप पापके साथ बलसे और निर्भयतासे युद्ध किया है ॥२८॥ द्विपतां न विनाश ईहितो गुरुणा नः कथयाम्यधिक्षमम् । परिवयं च शत्रुमानसं स्ववशीकर्तुमपेक्षतानिशम् ॥२९॥ हमारे गुरुने कभी भी पृथिवीपर शत्रुके नाशकी इच्छा नहीं की। वह तो शत्रुओंके मनको केवल बदलकर सदा उनको अपने वशमें लाना चाहते थे॥२९॥ समभाव उदेतु नः पुरो विषयत्वं प्रतियातु सर्वथा । इति तस्य सुपूजनं भवेत्स्मृतिरप्यस्तु च तस्य तादृशी ॥३०॥ हमारे सामने समभावका उदय हो और विषमता सदा दूर जाय । ऐसा करना ही उनकी सर्वश्रेष्ठपूजा होगी तथा उनकी वैसी ही स्मृति बनी रहेगी॥३०॥ भारतमस्ति भाग्यभुम् जगदैतिह्यनरोत्तमोत्तमः । समयातरदस्य मृत्तिकानिधये चारुविचारसंनिधिः ॥३१॥ भारतवर्ष भाग्यशाली है कि, इसकी माटीमे, ससारके इतिहास में सर्वश्रेष्ठ महापुरुष-जो सुन्दर विचारोंका महान् कोप था, अपने को प्रकट किया ॥ ३१॥ तस्य महत्त्वमुत्तमं निसिलालोकितलोकसत्तमम् । निजदेशविदेशभूमिपु प्रभुता पदाकमार्पयत् ॥३२॥ जगतमें सबने बो देखा होगा उससे भी उत्तम उनके महत्यने और उनकी प्रभुनाने संदेश और विदेशकी भूमिमें अपना पैर जमा दिया है।। ३२ ॥ स हि सत्त्ययिदा महागुरः प्रतिभाशालिपुलायुलः सदा । अपराजिनशचिसत्सतियत आभ्यात्मिफयमसद्गुरः ॥३॥ अथ अथ तस्य सतदशः सर्गः २३५ यह तत्ववेचायोके महागुरु ये। प्रतिभाशाली लोगोंकी उनके पास सदा मीड़ रहती थी। वह ऐसी शक्तिके सत्पति ये जो कमी पगजित नहीं हुई, क्योंकि वह आध्यात्मिक मार्गके सद्गुरु ये ॥ ३३ ॥ दश पञ्च दिनानि भानसे दपतां नो गतवन्ति कुत्रचित् । अपि पारिमिरेभिरहतेनयनानां हृदि शुद्धता भवेत् ॥३४|| हृदयमें सताप करते हमारे पन्द्रह दिन दही चले गये। यदि यॉखोंसे निकले हुए इस जलसे दमारे हृदयकी शुद्धता हो भाती तो कैसा अच्छा होता ॥ ३४॥ नयनाश्रुजलेन पावितं हृद्यं स्याद्यदि हन्त नस्तदा । ययमाहितयोगसाधना निफटे तस्य भवेम संमताः ॥३५॥ यदि इन यानुओंसे हमारा हृदय पवित्र हो जाता तो हम योगसाधन फरके उनके निकट पहुँच नाते ॥ ३५॥ जगत: प्रतिकोणमाततमहतीनामय भूमुजामपि । बहुमान्यपदाधिकारिणामुपयातानि दलान्यनेमशः ॥३६॥ जगत्के कोने-कोनेसे समस्त प्रजा यौर राबायोंके तया वटे बड़े पदाधिकारियोंके यनेक पर आये हैं ।। ३६ ।। निखिला अपि मानाः परा सममन्यन्त महानराकृतिम् । प्रियमित्वमिति प्रमापको मम पक्षस्य सदेत्यसो मतः ॥३७) समी मनुष्य उस महापुरुषका श्रेष्ठ आकृतिका भादर करते थे। तथा उन्हें अपना मित्र मानते हैं और सभी यह मानते थे कि वह हमारे पक्ष के समर्थक हैं ॥ ३७ ।। अधुना न हि कोपि जीवितुं क्षमते सत्यमिदं न पूर्वयत् । अमुषु प्रतिगोईमत्र नः मततं तिष्ठति सद्गुरुयतः ॥३८॥ वह उद्गुरु हमारे प्राणोंमें और हमारे मस्तिष्पके प्रत्येक गूदेमें

२३६
पारिजातसौरभे
सतत निवास कर रहे हैं अतः यह सत्य है कि हममेंसे कोई भी पहलेके
समान तो नहीं ही जी सक्ता ।। ३८॥
न च कांस्यमयी न काश्चनी प्रतिमा तस्य कदाप्यपेक्ष्यते ।
उपदेशवचो महायतेनुसतव्यमिति
प्रपूजनम् ॥३९॥
उनकी काँसेकी अथवा सोनेकी मूर्तिकी कभी आवश्यकता नहीं है।
उस महायति के उपदेशोंका अनुसरण करना यही उनकी बडीपूजा है ॥३९॥
मृतये फलिजीयनाय वा निरमायां स महोत्तमा सृतिम् ।
अवलम्ब्य च तां प्रयास्यतामभिधों भविता महानिति ॥४॥
मरने के लिये अथवा सफल जीवनके लिये उन्होने जो सर्वोत्तम
मार्ग बनाया है उसमा अबलम्बन करके जो चलेंगे उनको महान्
धर्म दोगा ॥ ४०॥
स भवनिह हिन्दुसन्मणिनिखिलानामपि मूर्धसन्मणिः ।
अभवन्त्रवोत्र हिन्दवः समतां तस्य न केपि तन्वते ॥४१॥
यह एक अच्छे हिन्दू होते हुए भी हिन्दू और अहिन्दू सबके
शिरोमणि थे । यहाँ बहुतसे हिन्दू हुए हैं परन्तु कोई भी उनकी समानता
नहीं कर सरता ।। ४१ ।।
असमैव च भारतीयता सचिरा तस्य मनो जनुप्मताम् ।
नियतं नितरां हरिप्यते निजदेशप्रियताभृतां सताम् ।।४२॥
उनकी भारतीयता भी अपूर्व थी-अनुपम थी। उत्तम देशमतों के
मनको अवश्य ही यह सदा अपनी ओर सचिगी ॥ ४२ ॥
म च सन्नपि हिन्दुस्त्तमो निसिलेप्वेय जनेप्यभिन्नताम् ।
समपश्यद्वदारधीः सदा श्रुतिसिद्धान्तयिदा न भिन्नता ॥४३||
उन्होंने एक उत्तम हिन्दु होकर भी गय मनुष्योंमें सदा अभेद
(समानता) ही देता है। येदिक सिद्धान्तोको जाननेवालोंमें भेदबुद्धि
होती ही नहीं ॥४३॥

सप्तदशः सर्गः
२३७
निखिलानि मतानि तन्मते पृथिवीगर्भसतानि वस्तुतः ।
सततं दधते समानतां नतमौन्नत्यमदन नो मतम् ।।४४||
उनके मतसे पृथिवीपर रितने भी धर्म फैले हुए हैं वह वस्तुतः
परस्पर समानता ही धारण करते हैं। उनमे कोई नीचा और कोई ऊँचा
नहीं है || ४४ ॥
स विमृश्य महत्प्रयोजनं सकलेप्वेध मतेषु जातिपु।
नितरां समवेक्षतेकतामिति सर्वागममत्यशेत सः॥४॥
वह किसी महान् प्रयोजनका विचार करके सत्र मतोंमें और सब
नातियोंमें एफ्ताका दर्शन करते थे। अत. वह सभी आगमोंसे आगे
बढे हुए थे ॥ ४५ ॥
मनुजस्य भवेदपेक्षितं किमिति प्रेक्ष्य सुरोपमः सदा।
परिपूर्वय एव तस्य स प्रयठे स्मात्र निरन्तरं श्रमम् ।।४।।
मनुष्यको रिस वलुकी अपेक्षा है उसे विचार र वह देवता
समान बापूजी उसीकी पूर्ति के लिये निरन्तर श्रम करते थे ।। ४६ ॥
परिवीक्ष्य
दरिद्रताभुजां महतीमापदमाशु चिन्तया ।
अभवद्भवनिद्रजीवना करणामूर्विरसी
महीयसी ॥४७॥
गरीबोंकी आपत्तियो देसार चिन्तासे उन दयालुकी नींद उड
जाती थी।। ४७ ॥
॥४॥
स समयं निजं समावतः परपीडाशितकण्टकरपृशाम् ।
अधिसेवमनन्यभक्तितोमवदानन्त्यधराधुरातिगः
दूसरों द्वारा की गयी हुई पीडारूप तीक्ष्णकाँटा जिन्हें लगा हो
उनकी सेवा में समावसे ही अनन्यमरिसे अपनेको अर्पण करके अनन्तता
युत् पृथिवीकी कक्षासे बाहर निकल गये-लोकोत्तर वन गये ।। ४८ ॥
स विहृत्य जनिक्षमोरसि प्रहृतासरगतद्विपद्धले ।
गतवानवसन्नमोहजव्यथ एवाक्षणभरा गतिम् ॥४९॥

२३८ पारिजातसौरभे जन्मभूमिकी जिस छातीपरसे अपार विपत्तिके बलको नष्ट कर दिया था उमीपर विहार करके अशानकी कोई भी व्यथा जिनमें नहीं थी बद राष्ट्रपिता स्थायी गति-मोक्षधामको प्राप्त हो गये ॥ ४९ ॥ निखिलं जगदद्य रोदिति प्रतियाते स्वरितो जगद्गुरौ । न कदापि भवोनुभूतवान्विरलामीदृशमेकतां नृणाम् ।।५०।। उनके यहाँ से परधाम चले जानेपर सम्पूर्ण जगत् रो रहा है। ससारने मनुष्यों की ऐसी एकता कमी देखी नहीं थी ।। ५०॥ अथ पाकनिवासिनामपि श्रयते दुःसशिखां भृशं मनः । विनिपात्य कटुत्वमुद्गतं बहुना मासगणेन दुःखदम् ॥५१॥ कितने ही महीनोंसे जो दुःखप्रद कटुता पैदा हुई थी उसे दूरकरके पाकिस्तानके लोग भी आज दुःख अनुभव कर रहे हैं ॥ ५१॥ अविभक्तमिदं यदाभयद्गुरु राष्ट्रं हृदयेकता तदा । अभवत्परिवीक्षिताद्य सा निखिलरेव जगन्निवासिभिः ।।२।। जब यह महान् राष्ट्र विभक्त नहीं हुआ था उस उमय लोगोंने जो एकता यहाँ देखी थी उसी एकताको सम्पूर्ण जगत्की प्रजाने आन देखा है ॥५२॥ अभिवाब्छितमत्र तेन यद्धृदयेक्यं ननु हिन्दपायोः । मरणेन तदाहितं क्षणान्महतां मृत्युरपीह सक्रियः ॥५३॥ गष्ट्रपिता यहॉपर भारत और पाकिस्तान के हृदयकी एकता चाहते थे। यह एक्ता उनके मरणसे क्षणभरमें सिद्ध हो गयी। सत्य है, महापुरुषोंका मृत्यु भी उत्तम कार्य करता है॥ ५३ ।। न वयं बहुमूल्यता च तां प्रतियातस्य गुरोविचिन्महे । यत एव स आत्मरूपता प्रतिपन्नः किल मादृशैः सह ॥५४॥ हमारे गुरुदेव चले गये इसका हम बहुत मूल्य नहीं करते हैं। क्योंकि वह तो हम लोगों के साथ यहाँ ही भात्मरूप बन गये हैं ॥ ५४ ।।

सप्तदशः सर्ग: २३९ अथ अतिवेगपरायणाः प्रजा अनुयात्यन्त्य इहोत्सुका यतिम् । अचिरेण चिरेण वापि ता. परित्रक्ष्यन्ति वदर्घमातुराः ।।१५।। भारतीय प्रना बहुत वेगके साथ राष्ट्रीयवान अनुगमन करेगी। और वही देरसे या उल्दीते उनका मूल्य करेगी ॥ ५५ ॥ मुफलं दुरितेन नाप्यते यदि वाप्येत न वद्वि सरकलम् । समजूधूपमेतदन्यहं प्रतिपन्नः शुचि सत्यवर्ती सः ॥२६॥ उन्होंने पवित्र सत्यमार्गर आस्ट रहकर सदा ही यह घोषणा की है कि दुष्ट कर्मसे कमी मी सत्सल नहीं मिलता है। यदि सत्पल जैसा मालूम हो तो भी वह सत्सल नहीं ही है ॥ ५६ ।। सत्यपरायणेन चेश्रुटिरल्पाप्यवलोकिवात्मनि । धुपिता नचिरेण तेन सा शिखराणि प्रतिपद्य भूभृतः ॥५७।। सत्यपरायण राष्ट्रपिताने यदि अपनेमें बरा मी त्रुटि देखी शे वो, शीघ्र ही पर्वतके शिखरोंपर चढ़ चढकर उसकी घोषणा कर दी है ॥१४॥ अय दोषमसत्यमर्दितुं नितरां प्रेरयदात्मसंस्थितः । यतिराजममुं महाप्रमः सततं सत्यमहेश्वरः परः ।।५।। अन्तरात्मामें सदा स्थित महती प्रमावाला सत्यरूप परमात्मा, असत्यरूप दोषको नष्ट करने के लिये उन्हें सदा प्रेरणा करता रहता था।।५८॥ परिणामपरीक्षणोद्भयादबईलामकरोन्न सः। अनलं विनिपत्य दुःसिना परिरक्षानियतोभवन्नृणाम् ॥१९॥ परिणामकी परीक्षाके मयसे-क्या परिणाम आयेगा इस मपसे उन्होंने सत्यकी कभी अवहेलना नहीं की। आगमें पड़कर भी दुःखियोंकी रक्षा में पहला गये ये लग जाते थे। ५९ ।। अपमानमुवं प्रसारिता निसिला अन्त्यसमुद्भवाः प्रजाः । अनुमत्य हि सत्यमतिहं गुरुणा तेन सताधिरक्षिताः ॥६॥ तस्य २४० पारिजातसौरभ अथ सभी अन्त्यज-हरिजन अपमानित कर दिये गये थे। दु.खनाश करनेवाले सत्यका अनुसरण करके ही सद्गुरुने उनकी रक्षा की । ६० ।। सत्यसमर्चनादसा समभून्मानवतासुरक्षकः। अथ सत्यसमादरादसावभवत्सर्वजनः समाहतः ॥६॥ सत्यकी पूजा करनेसे ही यह मानवताके रक्षक बने थे। और सत्यके आदरसे हा वह सबके आदरके पान थे ॥१॥ स हि यत्र धरातले स्थितस्तदन्मन्दिरमुज्ज्वलं सताम् । अदधात्पदकञ्चमात्मनः पृथिवी तीर्थमभून्मनोहरम् ॥२॥ उन्होंने जहाँ निवास किया वह स्थल ही सजनों केलिये मुन्दर, मन्दिर बन गया । और उन्होंने जहाँ अपना चरणकमल रसा वही पवित्र तीर्थ बन गया ॥२॥ न शरीरमवाप्स्यतेधुना यतिराजस्य महाप्रयत्नतः। अजरस्य यतो विनश्वरं न हि संतिष्टत आशु नश्यति ॥६॥ महान् प्रयत्नसे भी अजर यतिराजका शरीर अब नहीं मिल सकेगा। क्योंकि यह विनाशी था। विनाशी वस्तु स्थिर नहीं रहती, शीघ्र नाशपाती है ।। ६३ ।। न स चीक्षितुमन शक्यते कथमप्येव परिश्रमैरपि । न हि तस्य मुखध्वनिस्तथा भविता वा श्रुतिगोचरः पुनः॥४॥ परिश्रम करनेपर भी किसी प्रकारसे अब हम उन्हें देख नहीं सकते। और उनके मुससे अब वह शन्द भी पुनः सुननेको नहीं मिलेगा ।। ६४॥ सफलं हि शरीरगं गतं परमक्षय्यमनोहरा स्मृतिः । सततं हृदयेश्वरीव सा सपरीरा परिपर्त्यति ध्रुयम् ।।६।। शरीरये सायकी समी ही चीजें उनकी चली गयौं । परन्तु उनकी यह मनोहर याद हृदयेश्वरीफे समान सदा बढ़ती ही रहेगी । ६५ ।।

सप्तदशः सर्गः .. गुरुणा परिशिक्षिता वयं निरता देशहितेषु संततम् । परितः समवेत्य निर्विपा विधामात्र हितप्रदाः नियाः॥६६॥ गुरुदेवने हमें सिखाया है अतः हम देवहितमें लग गये हैं। हमको चाहिये कि सब ओरसे निर्विप होकर-जहर त्याग करके हितकारक काम करें ।। ६६॥ सतत हितमेव योपयगतरागादिदुरन्तदुर्गुणः । अधिराष्ट्रपिता ह्यशिक्षयत्कथमुत्थातुमिहाल्पकाय नः ॥६॥ सदा हितका उपदेश करनेवाले रागादि दोपोंसे रहित हमारे राष्ट्र- पिताने इमको सिखाया है कि नीचेसे ऊँचे कैसे आना चाहिये ।। ६७ ॥ विधिना परिमृष्टयमना विरहय्यात्मविचारगोनताम् । अमुनैव परेषु संस्थितान्सुगुणानाप्तुमधिक्षमामहे ॥६८।। विधिपूर्वक साफ किये गये मार्गसे अपने विचारकी न्यूनताको दूर करके इसी मार्गसे अन्यों में रहे हुए सद्गुणको प्राप्त करनेमें समर्थ हो सकते हैं ॥६८॥ गुरवो यतिजीवनान्तिमा ननु मासास्तु कियन्त एव ते। शपयन्ति तदीयगौरवं महतीं तस्य हुदोप्युदारताम् ।।६९।। राष्ट्रपिताके जीवन के अन्तिम महीने तो क्तिने मारी थे । यही उनके गौरय और उनके हृदयकी उदारताको कह रहे हैं ।। ६९ ॥ विरलः प्रतिपद्यते मृति पृतकर्मा जगतीह तद्विधाम् । निखिलन नरैरूपासितां विबुधैर्नापि सुरनं घापरः ॥७॥ जिस प्रकारकश मृत्यु उन्होंने मारा किया है उसको तो विरल ही प्राप्त परते हैं। किमी मनुष्पने, विद्वान्ने, देवताने, दानवने देशा मृत्यु नहीं प्राप्त किया है ।।७०॥ परिमातुमशक्य एय तद्गुणराशिनिसिमनापैः । नहि वर्गपरम्परास्ति नः शिरसि पितुमेनमदयम् ।।७।।

२५२
पारिजातसौरभे
सारे ही मनुष्य उनके गुणोंको माप नहीं सकते। हमारे सिरमें
तो इतनी वर्णमाला भी नहीं है कि हम उनकी प्रशंसा कर सके ॥ ७१ ॥
स भवे कृपया समागतश्विरमत्रावसति समातनोत् ।
उददीधरदात्मजन्मभूभरमन्ते च गतः शिवं पदम् ॥७२॥
वह कृपा करके इस संसारमें आये और बहुत दिनों तक रहे । अपनी
जन्मभूमि माताका मार हटाया और अन्त में मोक्षधाम चले गये।। ७२ ॥
अलमस्तु च तत्प्रशंसया न हि त स प्रतिपालयेदपि ।
गतयोस्तु महत्पदान्जयोर्जगताप्यन्त हि शस्तिमालिकाः ।।७३ ।
उनकी प्रशंसा हम क्या करें। यह उसकी इच्छा भी तो नहीं
रखवे। जगत्ने तो मरनेपर ही महापुरुषोंके चरणों में प्रशस्तिमाला
पहिनायी है ।। ७३ ।।
नितरां वयमात्म बालका महतस्तस्य गुरोः प्रियोत्तमाः ।
स च योग्यतया पराहतेः कथमस्तु स्तुत एव दुर्विधैः ।।७४॥
हम उस महान गुरुके सर्वप्रिय बालक थे। हम योग्यताहीन हुए
हैं, दुर्गत है, हमसे उनकी स्तुति कैसे की जा सकती है ? ।। ७४ ॥
पृथगेय गतास्मदद्य सा प्रतिभामा च चिराय यद्यपि ।
अनुशासनमेव रुध्महे यत तस्यैवमिति प्रचिन्तनः ॥७५।।
यह प्रतिभा और वह आमा आज हमसे यद्यपि चिरकाल के लिये
अलग हो गयी है। तथापि उनकी आशाका-शिक्षाका पालन करें। उसे
पालन करने का मार्ग इसी प्रकारसे उनका गुणचिन्तन ही है ।। ७५ ।।
षयमद्य विनिर्मिताः सता गुरुणा तेन महामनस्विना ।
उचिवेन पथैव मादृशाः कथमझम इदं प्रभापितुम् ।।६।।
उस महान गुरुने हमको उचित मार्गसे ही पनाया है, इसे हम
से कह सकते हैं।॥७६ ॥

सप्तदशः सर्गः अयमाप्य महानलाहचलतः शक्तिमृतः कणांस्ततः । अनुगन्तुमतः क्षमाः सदा प्रथितेनैव पथा च तेन हि ॥ हमने उस मशनलसे जलती हुई शक्यिाली बहुतसी चिनगारियाँ मात की है । अतः हम उनके बनाये मासे जाने के लिये समर्थ हैं |७|| स समेहत सस्पृहं सदा अमकर्मात्मयमादिभावनाः। हृदये न उदेतुमर्थदा गुणगृहा अभवाम नो वयम् ॥७८।। उन्होंने सदा यह इच्छा की थी कि हमारे हृदयमें मेहनतके काम करनेकी भावना उत्पन्न हो, उससे हमारी आर्थिक स्थिति अच्छी बनेगी। परन्तु इम गुणप्रहण करनेवाले न बनें ।। ७८ ॥ विगतामु समासु यिशवी दशसूनत्यभिटापतः सता। निरमीयत देश एप त विरला त्यागमुवं ह्यनाययत् ॥७९॥ गत ३० वर्षीमें उन्होंने इस देशका, इसे उन्नत बनानेकी इन्छासे निमांग किया है और दमको अद्वितीय त्यागभूमिमें पहुँचा दिया है ।।७९॥ अपदाक्या महागुरुः प्रबलं विघ्नमवाप्य मार्गगम् । कुपितोस कदापि नो कटु स्मयमानो वचनं स रक्तवान् ।।८०१ निर्मल यायाले महागुरु गस्तेमे प्रबल विघ्नको देखकर न तो कभी सब हुए और न कमी कटुवचन बोले ॥ ८॥ हृदये स निपीडितः परं स्वयुगीयः सकलस्य सद्गुरू । पलिवान्नुपयो निरीक्ष्य को निजशिप्याग्न हिसिद्यते गुरु।।८।। विन मानेसे वह हृदयमें दुःखित तो होते थे। यह सबके अपने समयके सद्गुरु थे। विन आनेा मर्म है उनके अनुयायियोंमें किसी दोषका वा नाना । इसीलिये यह दुश्वी होते थे। अपने सिप्पोको सन्मागसे पलित देसर किस गुरुको सेद नहीं होता। ॥ ८ ॥ समयः स विमास्यति स्वयं विगतेप्यत्र समाशतेषु या। अथ गांधियुगीसिद्धिका. पचेतुं घपचायितुं च या ८२।। ।

पारिजातसौरभे सौ वर्ष बीत जानेके बाद गाधीयुगकी सिद्धियोंको वदाने या पटानेका वह समय स्वयं आवेगा ।। ८२॥ स भविष्यत आत्मचिन्तकः समतीतस्य च भारतस्य था। महती प्रतिमाभवच्छिया विरचय्यास्य च वर्तमानताम् ।।८।। वह भविष्यत् तथा अतीत दोनों ही भारतके आत्मचिन्तक थे। तथा इसके वर्तमानकालका निर्माण करके उनकी महती प्रतिमा कल्याणकारिणी सिद्ध हो गयी ।।८३॥ यज्योतिः प्रकटयितुं महायतीन्द्रः, स्वात्मानं परमकृपानिधि यहीपीत् । अज्ञानान्धवृतमनोनिले यथेच्छं, तज्जोयात्सततमिदीप नोस्ति कार्यम् ।।८।। जिस ज्योतिको प्रगटानेके लिये परमदयालु महायतिने अपनेको अज्ञानरूप अन्धकारसे घिरे हुए लोगोंके मनरूप अग्निमें स्वेच्छासे होमकर दिया यह ज्योति सदा विजयी रहे, यही हमें करना है ।। ८४ ॥ सज्जन्मा निजबलबुद्धितः स्वतन्त्रां, जन्मक्ष्मामरचयदाशु दीर्घकालात् । दुर्घद्धा बहुविधलोभरज्जुबद्ध- रद्यापीह विजयते स देवप्रभः ।।५।। पवित्रजन्मवाले महात्माजीने अपने बल और बुद्धिसे चिरकाल के पश्चात् उस मातृभूमिको स्वतन्त्र बनाया जिसे अनेक प्रकारके लोभरूप डोरीसे बंधे हुओंने बुरी तरह बाँध रखा था। देवसमान कान्तिवाले यह आज मी विजय पा रहे है ।। ८५।। सत्यज्योतिरिद प्रकाश्य विमलं हिंसामुदस्येव या, धर्माणां प्रामय्य सर्यकलहं संस्थाप्य मैत्री मियः । स्पृश्यास्पृश्यमुधाविचारजतमोजन्यातिविद्वेषणं, सपं तत्परिहत्य मुक्तिपदवी प्राप्य स्थितो राजवाम् ।।८।।

सप्तदशः सर्गः
वि सरंतवस्वतन्त्रपरमहंसपरिवाजकस्वामिश्रीमद्भगवदाचार्यपण्डितराजप्रणीते
पारिजातसौरमे
सप्तदशः सर्गः
यहाँ निर्मल सत्यज्योतिको जलाकर, हिंसाको मिटकर, धाँके झगड़ों-
को शान्त करके, परस्पर मित्रता स्थापित करके, यह स्पृश्य और यह
अस्पृश्य है इस प्रकारके मिथ्या विचारसे पैदा हुए अचानसे उत्पन्न हुए
देपको दूर करके, मुक्तिपदको पाकर ब्रह्मस्वरूप होकर महात्माजी चोमा
दे रहे हैं ।। ८६ ॥
इति श्रीपरमहंसपरिमाजकस्वामिश्रीमद्भगवदाचार्यपण्डितराजप्रणोते
पारिजातसौरमै स्वोपशमारतराष्ट्रमापाटीकायां
सप्तदशः सर्ग:

अष्टादशः सर्गः
जवाहर उवाचेदं पुनरुद्दिश्य तं यतिम् ।
क्षणेनैव गतः क्वासावहो विधिविडम्बनम् ॥ १॥
पण्डित श्रीजवाहिरलालजी महात्माजीको उद्देश्य करके पुनः बोले, वह
क्षणभरमें ही कहाँ चले गये ? अहो विधिकी लीला! ॥ १ ॥
गतो बापू गतो नेता सर्वेषां स सखा गतः ।
वश्चिताः स्मो घयं चाद्य विधात्रा क्रूरकर्मणा ॥२॥
सबके बापूजी गये, सबके नेता गये और सबके मित्र गये। क्रूर
विधाताने हम सबको आज टग लिया ।। २।।
सर्व वयमनाथाः स्मः पित्रा तेन विना कृताः ।
प्रयातोस्मान्विहायैव न निवर्तिप्यते पुनः ।। ३॥
उस पिताके विना आज हम सब अनाथ हैं । हमको छोड़कर वह
चले गये और फिर लौटेंगे नहीं ॥ ३ ॥
रोमनर्तक एतादृगितिहासो न विद्यते।
इतिहासविपत्कालो वर्तते क्वथ्यते च हृत् ॥ ४॥
रोमाश्च करनेवाला ऐसा इतिहास है नहीं। यह इतिहासको विपत्तिका
पाल है। हृदय उकल रहा है ।। ४ ॥
तेपाममोघनेतृत्वं
स्वशासनमदापयत्।
तेषां स्थिति यः पृष्ठे मानवान्तविंशोधिका ॥५॥
उनके सफल नेतृत्वने हमको स्वराज्य दिलाया। पृथिवीपर उनका
गहना मनुष्यों के हृदयको शुद्ध करनेवाला था ॥ ५ ॥
अहिंसायाः स आचार्योंहिंसायाः स प्रचारकः ।
नाशसोद्वीक्षितुं स्यापि स हिंसारतमारतम् ॥ ६ ॥

अष्टादशः सर्गः
वह अहिंसाके याचार्य ये और उसके प्रचारक थे। वह मारतको
हिंसक कमी देख नहीं सकते थे ॥६॥
अस्मान्त
नीतिविभ्रष्टानवालोकत
सन्मतिः।
पिता वालानिधारमाननेपोत्सत्पथं
यतिः॥७॥
जैसे पिता वालकको सन्मार्गमें ले जाता है वैसे ही यह हम नीति-
प्रष्टोको सन्मार्गमे ले गये ।।७।।
प्रेम्णामितेन राजपिब्रह्मपिर्यापि योगिराट् ।
कोपरूपमहारक्षोवाधितांना तवान्सनः11८
८॥
उन राजर्षि अथवा अर्पि अथवा योगिराजने अपार प्रेमसे हमको
भोपरूप रसासे पीड़ित होते हुए सदा बचाया ॥ ८ ॥
महाविपत्तिकाले नः स एव दृढ आश्रयः ।
तस्मिनाते गतोस्माकं रक्षकः शान्तिदायकः ॥९॥
भारी विपतिक समय बड़ी हमारे दृढ़ आश्रय थे। उनके चले जानेपर
हमारा रक्षक और हमें शान्ति देनेवाला चला गया ॥ ९ ॥
अभविष्यन्न चेत्सोद्य महाराजो महदाम् ।
हिंसाराजकताद्वेपेरनगथामाव्यवस्थया
यदि इस समय समी महान पुरुषों के हृदय के महाराब यह न होवे
वो हम हिंसा, मराबाता और देपसे, अयवस्था के कारण, नष्ट हो गये
॥१०॥
होते ॥ १०॥
उन्मत्तेनेककोपेन जराजीण
फटेयरम्।
अभिन्तु तस्य देवस्य निरस्यामास्य च ॥११॥
उन्मत एक ही फोरने अान् क्रोधीने ठन अनर अमर देपये
प्रदास्यास बीण शरीरको फाड़ दिया ॥ ११ ॥
गुणिनस्तस्य माविन्यो गुणानां जगवः प्रजाः ।
रमरिम्यन्ति फरिष्यन्ति पश्चातापमनीश्वराः॥१२॥

२४८
पारिजातसौरभे
जगत्की भावी प्रजा उन गुणी बापूके गुणोंका स्मरण करेगी और
असमर्थ होकर पश्चात्ताप करेगी ॥ १२ ।।
सर्वशास्त्रविदा तत्त्वज्ञानिनां ब्रह्मवादिनाम् ।
आप्तवान् गतिमच्छेद्यामभेद्या मर्मवित्स हि ॥ १३ ॥
सर्व शास्त्रोंके जाननेवालों, तत्त्वज्ञानियों और ब्रह्मवादियोंको को गति
प्राप्त होती है उसो अच्छेगा और अभेद्य गतिको वह प्राप्त हुए हैं ||१३||
धारयामो धयं तस्मै बहु श्रीपरमात्मने ।
श्रेयोस्माकमुपाहर्तुमजिहिपीत्तनुं स्विकाम् ॥ १४॥
हम उन परम आत्माके बहुत ऋगी हैं। उन्होंने हमको कल्याण
प्राप्त कराने के लिये अपना शरीर छोड दिया ॥ १४ ॥
कृतवन्तो ययं पापं महदेव गतत्रपाः
प्रत्येक भारतक्ष्माजा भवेयुनतमस्तकाः ॥१५॥
हम निर्लजोंने बहुत बड़ा पाप किया। प्रत्येक भारतवासीका मस्तक
नत रहेगा ।। १५॥
अस्मास्चेको हि पापात्मा प्रमत्तश्च दुरन्धयः।
निर्दयो नित्रपश्चा, श्रीमहानिधिमाहरत् ॥१६॥
हमारेमेंसे ही एक अकुलीन, प्रमत्त, निर्दय, निर्लज पारीने इस
भीके महामण्डारको उठा लिया ॥ १६)
क्षमतामीश्यरो मूढं दुरात्मानं च दुर्षिधम् ।
प्रयस्याम पयं चापि क्षन्तुमेवाधमाधमम् ॥ १७ ॥
उस दुरात्माको भगवान् क्षमा करें। हम भी उस महानीचफोक्षमा
करनेका ही प्रयास करें ।। १७ ।।
पिता राष्ट्रस्य जीवेच्चेहयालुदीनयत्सलः |
भवेदेय दुरन्तेस्मिन्कृतान्वेन प्रतारिखे ॥१८॥

अष्टादशः सर्गः
२४९
यदि राष्ट्रपिता बीते होते तो दुष्टके ऊपर दयालु ही होते ॥ १८॥
शोकानलपरीताः स्मः प्रलयानिलसंवृताः ।
निराशाकलितो देशः सक्लेशः सर्वथाभवत् ॥ १९ ॥
हम सब निराशापूर्ण हो गये। प्रलयकालके वायुसे हम घिर गये ।
देश निराशापूर्ण और दुःखी हो गया ॥ १९ ॥
भगवानाशिषां राशि वर्पत्वस्मासु सद्दयः ।
निराधारेप्वपारेत्र निमनत्सु तमोनिधौ ॥२०॥
इस अपार अन्धकार सागरमें हम डूब रहे हैं। दयालु भगवान्
हमारे ऊपर आशीर्वादोंकी वर्षा करें ॥ २० ॥
भवेम शक्तिसम्पन्ना विपन्ना हि वयं पुनः ।
तन्निदर्शिवमादर्श प्रामुयाम प्रयत्नतः
हम दुःखी हैं। पुनः शक्तिसम्पन्न बनें। बापूजीके बताये हुए,
आदर्शको हम प्रयत्नसे प्राप्त करें ॥ २१ ।।
साम्प्रदायिकविद्वेपानलज्वालाकरालताम्
शमयितुं नैव शक्ता अभूमानवधानतः ॥ २२॥
साम्प्रदायिक विद्वेपकी आगमी ज्यालाकी मपङ्करताको हम भूलसे
धान्त नहीं कर सके ।।२२।।
तत एप हवो देशो हन्त प्रणिहता वयम् ।
हतं सौभाग्यमस्माकं निहता सत्यता शिवा ॥२३॥
इसीसे देशका नाश हुआ। हम मारे गये। हमारा सौभाग्य नष्ट
हो गया। सत्यताकी बर्बादी हो गयी ॥ २३ ॥
हिंसयाद्य हताहिंसा हिंसिदो धर्म उज्ज्वलः ।
हिंसिता हि नराकारा दया निष्ठा क्षमा रमा ॥२४॥
हिंसाने अहिंसाको मार डाला, निर्मल धर्मका वध कर दिया और
मनुष्पके रूपमें रही दुई दया, निष्ठा, क्षमा, रमाका मी वध होगया ॥२४॥

२५०
पारिजातसौरभे
मन्तवो दूरमुत्सार्याः स्वीकार्याः प्रेमतन्तवः ।
अरीणामनरीणां च सम्यक्त्वे हि प्रयोजकाः ॥२५॥
क्रोधको दूर फेंक देना चाहिये । प्रेमतन्तुका स्वीकार करना चाहिये ।
स्योंकि शत्रु और मिरके यही कारण है ॥ २५ ॥
भावमेव परित्यज्य नृहिंसाप्रतिहिंसंयोः।
अहिंसा सरला भव्या पर्युपास्या मनोरमा ॥ २६ ॥
मनुष्यको हिंसा और प्रतिहिंसाने भावको छोडकर सरल, सुन्दर,
मनोहर अहिंसाकी ही उपासना करनी चाहिये । २६ ।।
अहिंसयैव साम्राज्यमसौ श्वेतं व्यकम्पयत् ।
विजानन्तोप्यजानन्त इवाभूमेति दुःखकृत् ।। २७ ।।
बापूजीने अहिंसासे ही अग्रेजी साम्राज्यको हिला दिया था। जानते
हुए भी हम अजानके समान बने इसीने दु ख पैदा किया ॥२७॥
प्रतिजानीमहे सर्षे वय भारतवासिनः ।
श्रद्धया नो गुरोराज्ञां वल्याम. शिरसा सदा ।। २८ ।।
हम सब भारतीय प्रतिज्ञा करते हैं कि गुरुकी आज्ञाको हम सदा सिर
पर धारण करेंगे।॥ २८ ॥
न्यकर्तरि तिरस्कर्तर्यप्युदारा च वन्धुताम् ।
संप्रदर्य गुरोभव्यं गौरवं वर्धयामहै ।। २९ ।।
धिकारनेवाले और तिरस्कार करनेवालेपर भी हम अन्धुत्व दिसावर
गुरु गौरवको बढावेंगे ॥ २९ ॥
प्रत्यक्ष पापि सम्यक्षु सध्यत्यपि सचेतसः।
ययं प्रेम प्रदश्व साधयिष्याम इष्टताम् ॥ ३०॥
चाहे प्रतिकूल चलनेवाला हो, अनुकूल चलनेवाला हो, सीधा चलने
बालरो, कोई केस मी हा, हम पवित्रमनसे प्रेम दिखावर परता
सिकरेंगे ॥३०॥

अष्टादशः सर्गः
न्यञ्चामपि च जिह्मानां पवितानां च दुःसिनाम् ।
सेवा समानभावन कर्वव्या वत्सदानुगैः ।। ३१ ।।
कोई नीच हो, कुटिल हो, पतित हो, दुःखी हो, गुरुके अनुयायियोंका
धर्म है कि सत्रकी समान मावसे सेवा करें ।। ३१॥
निस्तीया भारतीया ये तेप्येतद्देशाजास्ततः ।
तेपि संतवयो गाँघेः पितृहीनाश्च तेभवन् ।॥ ३२॥
भारतीय इंसाई भी इसी देशमें पैदा हुए हैं। अतः वह मी
महात्माजीके सन्तान हैं और वह मी पितृहीन हो गये ॥ ३२ ॥
मायां भित्त्वा सदामायः परमेशपरायणः।
प्रतिसीरामपसार्य गतः पारं भवान्धितः ।। ३३ ।।
मायाको फाडकर सदा माया से पर रहनेवाले, परमेश्वरपरायग
महात्माजी पद्धदा हटाकर समारसागरसे पार चले गये ।। ३३ ।।
वपाकशानुना दुग्ध्वा जन्मव्याधिजरामराः ।
सत्येनाहिंसया चापि परब्रह्मत्वमाप्तवान् ॥ ३४॥
उन्होंने तपस्यारूप थग्निसे बन्मरूप व्याधि, बरा, मृत्यु आदिको
बगार सत्य और अहिंसारे द्वारा प्रसादको प्रात हो गये ।। ३४॥
संसारे सत्यनिष्टोसी बहुकृत्वो जयश्रिया।
आलिङ्गितो महानाहुमहादेवो ह्यनीहशः ॥ ३५ ॥
संसारमें इन सत्यनिष्ट, विशालभुजवलि, महान् अद्वितीय देवको
विजयश्रीने बहुत बार आलिङ्गन किया है ॥ ३५ ॥
अयं तु वस्य देवस्य महीयान्विजयोऽभवत् ।
अस्मिन्नवसरे पुण्ये तत्पदाजयोः ॥ ३६॥
उनका यह मृत्यु तो सनसे बहा विजय हुया है । इस पवित्र अवसरपर
उनके चरण कमलों में हम क्या अपंग करें! ॥ ३६॥

२५२
पारिजातसौरमे
मन्वान सुहृद मृत्यु सर्वदाशिक्षयत्स न ।
मृत्यो तिं परित्यक्तुका भीति सुहृदो भवेत् ।। ३७ ।।
मृत्युको तो वह सदा मित्र मानते थे और इसीलिये उन्होंने हमें
सिखाया है कि हम मृत्युका भय छोड दें। मित्रसे भय क्या १ ॥ ३७॥
पूर्वजा येन मार्गेण गत्वा परमवाप्नुवन् ।
यता सता स्वय तेन त गन्तु शिक्षिता वयम् ।। ३८ ॥
जिस मागसे चल कर पूर्वजोंने परमेश्वरको प्राप्त किया था उसी
मार्गसे स्वय चलकर हमको भी चलना सिखाया ॥ ३८ ॥
वैरं च वैरिण चापि जेतु द्वेप च विद्विषम् ।
स्नेहेन निर्मलेनैव समादिक्षत्सनात्स न ॥ ३९ ॥
शत्रुता, शत्रु, ष, दुपी इन सबको निर्मल प्रेमसे हो जीतनेका उहोंने
सदा हमको आदेश दिया है ॥ ३९ ॥
उपादिक्षदसौ यूथ सत्यमेवेश्वर परम् ।
यित्तेति सेवया तस्य स्वातन्त्र्य पूर्णमाप्नुत ।।४।।
उहोंने नित्य ही उपदेश दिया है कि "तुम लोग सत्यको ही परम
ईश्वर समझो" और उसकी सेवासे पूर्ण स्वतन्त्रताको मोक्षको प्राप्त
करो॥४०॥
मध्येरमाफ यिहरता सह तेन सता कियत् ।
जीयनायोधन जेतु सरल प्रत्यभासत ॥४१॥
अब यह हमारे बीचमें ये तब उनके साथ जीवन युद्धको जीतना
कितना सरल प्रतीत होता था! ||४१ ॥
सस्छुदा साहस स्नेहो पल शीलमभीरता ।
अनुद्वेगो यतेस्तस्य नियतो न सदाश्रय ॥४२॥
उनकी भदा, उनका सारस, स्नेह, आस्मिक बल, शील, निर्भयता,
अम्यापुरता इत्यादि हमारे निधित ही उचम आश्रय ये ॥४२॥

अघाः सर्गः २५३ सर्व एव भरोस्माकं दयाया निझरे झरे। आसीन्निहित उहः सोनवसादेन तेन हि ॥४३|| हमारा सब मार उसी दयाके अमर सोतसर निर्मर या । उस मारको उन्होंने समय ही बिना यकावटके वहन किया है ।। ४३ ।। अपार वस्य सत्प्रेमपारावारे निमज्ज्य नः । अशका अपि संप्राप्ता महतीं शक्तिमिष्टदाम् ॥६॥ उनके अपार विशुद्ध प्रेम सागरमें डूबकर हमारेमेसे कितने ही अब लोगोंने भी महती शक्तिको पास कर लिया ॥४॥ यदानावश्यकी वस्य स्थिविरासीदपेक्षिता। तद्वानी स परित्यज्य गटोस्मानात्मनः पदम् ।।४।। बब कि उनकी पापा स्थिठि मावश्यक रूपसे योशित थी,, उस समय वह हमें छोड़कर अपने स्थानको चले गये ॥ ४५|| वतो वयमनायाः स्मो विवशा भीपराहताः। हृदयं वेपतेस्माकं रुदन्ति नयनानि च ॥४॥ अतः हम अनाथ हैं, लाचार है, टरे हैं, हमाय हृदय कॉप रहा है। हमारी याँखें रो रही है ।। ४६ ।। अद्यावधि जयस्तस्य जयोस्माकमभूत्सदा । परमेप जयस्वस्य परमो नः पराजयः18sh सी वक तो उनका विवय सदा हमारा ही विजय या। परन्तु उनका यह विश्य हमाय अत्यन्त पराश्य है ।। ४७ ॥ ववेकः सुतो हन्त मायापाशपराजितः। निघ्नन्पुण्यं हि नर्म भूमिमेवामदूपयन् ।।४।। उन्हीके एक पुनने मापाके पागने पराडित होकर उनके पवित्र देहका वध करके इस भूनिको दूपित कर दिया ।। ४८ ॥

२५४ पारिजावसौरभे परं भयं च नैवल्यमितिशब्दद्वयं कचित् । प्रवेशं नाकरोत्तस्य शब्दस्तोममहानिधौ ॥४९|| परन्तु भय और निर्बलता यह दो शब्द उनके शब्दकोशमें कमी प्रवेश नहीं पा सके ॥४९॥ हिंसाद्वेषो समाश्लिष्टी संचरेते हि चेतसा। भारते तेन नो भीतिरात्मा नष्टो भवेन्न नः॥५०॥ आज हिंसा और द्वेष साथ मिलकर चित्तपर चढकर भारतमें चल रहे हैं। अतः भय है कि हमारा आत्मा नष्ट न हो जाय ॥ ५० ॥ असावदापयन्नो यत्स्वातन्त्र्यं राजनीतिकम् । तदिष्टरामराज्यस्य सोपानं प्रथम हि तत् ।।५१।। उन्होंने जो हमें राजनीतिक स्वतन्त्रता दिलायी है, वह तो, उन्हें जो रामराज्य इष्ट था, उसकी पहली ही सीढ़ी है ॥५१॥ सति मानवदौर्बल्ये सति काले भयप्रदे। न हेयं साहसं सहया भीतिरनर्थकृत् ।। ५२॥ यद्यपि मनुष्योंकी दुर्बलता है, और समय भयङ्कर है तो भी कमी किसीको साहस नहीं छोडना चाहिये और अनर्थकारी भयका त्याग कर देना चाहिये ॥५२॥ अहिंसा निशिवं सत्यमजय्यमपराजितम् । शस्त्रं गृहीत्या प्रत्यूहा विजेया गुस्मार्गगेः॥ ५३ ।। गुरुके मार्गसे चलकर हमें चाहिये कि अहिंसा और सत्यरूप तीक्ष्ण तया जो कमी हारा नहीं है और हराया नहीं जा सकता ऐसे शस्त्रको मग करके विनोंको जीतें ॥ ५३॥ पुणेषु तदीयातामनुसृत्य सवीः क्रियाः। अस्मास्वधवरेत्तस्य क्षमा शक्तिरभङ्गुरा ।। ५४॥ उनकी आशरा अनुसरण करके पवित्र धर्म करते हुए हममें उनकी अमार रातिरा अवतार हो, यह प्रार्थना है ।। ५४ ॥

अष्टादशः सर्गः यथा अस्माभिः परिवृत्तस्य तस्य घाणीसुधा यथा । पीयते स्म तथा शून्याद्धीयेतास्माभिरज्वरम् ॥ ५५॥ हमसे घिरे हुए उन बापूजीकी वाणीरूप अमृतको जैसे हम पीते थे वैसे ही धन्यमेंसे भी हम शान्त होकर पीते रहें, यही कामना है ॥ ५५ ॥ शब्दास्तस्य च कर्माणि विचारसरणिस्तथा । स्फूर्तिमतोकापुनस्तथाद्यापि कुर्वताम् ।। ५६ ।। उनके शब्द, उनके कर्म, उनकी विचारसरणि यह सब जिस प्रकारसे हमें स्फूर्तिमान बनाते रहे हैं वैसे ही आज बनायें, यह अभिलाप है ॥५६॥ तमोभिर्विततेरच्छन्ने पथि संचारिणो वयम् । अन्तरिक्षात्तदीयामा प्रामवाम निरन्तरम् ।। ५७॥ अन्धकारसे ढंके मार्गमें हम चल रहे हैं। अन्तरिक्षमेंसे हम उनके प्रकाशको निरन्तर प्राप्त करते रहें यही हृदयकी चाह है ।। ५७ ॥ रिसयिपति मत्ता चेतना तृष्णगेपा, गुरुवरमुखपद्मान्निस्स्तो वाक्सुधा ताम् । असुपरिचितमार्गे गच्छतां नः शिवाय, वितरतु करणाघापि शक्ति निलीनः ॥ ५८ ॥ इति सर्वतनस्वतनपरमहंसपरिव्राजकस्वामिश्रीमद्भगवदाचार्यपण्डितराजप्रणीते पारिजातसौरमे अशदश सर्ग यह पागल बनी हुई लोभी हमारी चेतना श्रीगुरुदेवके कमलमुखसे निक्ली हुई वाणी-सुधाको पीना चाहती है। अत्यन्त अपरिचित मार्गमें कल्याणकेलिये जाते हुए, हमें, कहीं छिपे हुए वह कृपालु शक्ति प्रदान करें, यह प्रार्थना है ।। ५८ ॥ इति परमहंसपरिव्राजकस्वामिश्रीमद्भगवदाचार्यपण्डिवराजप्रणीते पारिजावसौरभे स्वोपज्ञभारवराष्ट्रमापाटीकायाम् अष्टादशः सर्गः

एकोनविंशः सर्गः
लार्ड माउन्टवेटनः
जगत्सममं सहदु खितां तदान्वभून्महात्मन्यमरत्वमीयुपि ।
जगच्छिरोरत्नशिरोमहामणौ महामनुष्यत्वसुरूपधारिणि ॥११॥
जिस समय महात्मा गांधी यमर पदको प्राप्त हुए उस समय जगत्
समान ही दुःख अनुभव कर रहा था। वह ससारके श्रेष्ठ मानयोंके श्रेष्ठ
शिरोमणि ये, एव महामनुष्यताके सुन्दर रूप थे ॥१॥
महात्मगांधेनिधनं जगत्तले तथान कोटीमनुजानमानयत् ।
ममैव कश्चित्स्वजनो दिवंगतः प्रियोत्तमः सर्यमहत्तमस्त्विति ॥२॥
महात्मा गाघीका अवसान पृथिवीपर और यहाँ भारतमें करोडों
मनुष्योंको यह माननेको विवश किया कि कोई मेरा ही प्रियोत्तम, सर्वमहान्
स्वजन स्वर्गवासी होगया है ॥२॥
न फेवलं तस्य समीपवासिनश्चिरेण वाल्पं सह तेन संगताः।
गतं दिवं प्रत्युत सर्वमानवा जगन्महामित्रतया रुदन्ति तम् ॥३॥
फेवल वही लोग नहीं रो रहे हैं जो चिरकालसे अथवा अल्पकालसे
उनसे परिचित ये प्रत्युत सारे ही मनुष्य उन्हें जगत्मा महान् मित्र मान
पर रो रहे हैं ॥३॥
सशान्तिदेयोजगतःशिवप्रदोमहानहिंसाप्रतिरूपकः क्षिती।
अपत्यकाले निहतो दुरात्मनेत्युवाच माउन्टविटन् व्यथान्वितः॥४॥
धीलाई माउन्टबेटनने कहा कि यह जगत्
के फ्ल्यागप्रद शान्ति
देयता थे । पृथिवी पर यह अहिंगाये महान् प्रतिनिधि थे। दुष्टने उन्हें
घुरे समय में मार डाला ॥४॥

एकोनविंशः सर्गः २५७ लार्ड माउन्टवेटनस्य धर्मपत्नी गांधीमहात्मनो मृत्युः स्यादन्ताराष्ट्रिया क्षतिः । न केवलं प्रत्युतान्ताराष्ट्रिया घटनाशिवा ॥५॥ महात्मा गाधीका मृत्यु केवल अन्ताराष्ट्रिय क्षति ही नहीं है प्रत्युत वह अन्ताराष्ट्रिय अमङ्गल घटना भी है ॥ ५॥ हृदयं व्यथितं शून्यं मनो युद्धिर्विकुण्ठिता। समाचारेण सापामेतेन प्राणहारिणा ॥६॥ इस प्राणहारी समाचारमे सबका हृदय व्यथित है, मन शून्य है और बुद्धि कुण्ठित हो गयी है ॥६॥ अस्मिन्विसंकटे काले स्वस्याः पत्युरुपान्ति के । निवस्तुं कामये येन मनः शान्ति प्रपत्स्यते ॥ ७॥ इस अति सक्टमय समयमें मैं अपने पति के पास रहना चाहती हूँ (उस समय वह मद्रासमें थीं) जिससे मेरा मन शान्त हो ।।७।। शिक्षितं गांधिना यद्यवस्मभ्यं पूर्णयोगिना । तत्चदाचरितुं सद्यः प्रयत्न तनवामहै. ॥८॥ पूर्णयोगी महात्मा गाधीने हमें जो कुछ सिसाया है उन सबका आचरण करने के लिये हमें आजसे ही प्रयत्न करना चाहिये ॥८॥ एतस्मादतिरिक्तो में नारित वाग्विभवस्ततः । महतो नायकस्यात्य स्तोतुमिष्टानगुणानिह ॥९॥ उस महान नेताके इष्ट गुणोठी स्तुति करनेकेलिये इससे अतिरिक्त मेरे पास शब्द नहीं है।॥९॥ ग्लाना म्लाना च विदुपी कौटुम्पिकमहाततिम् । मन्वानेत्याह माउन्टवेटनस्य कुटुम्विनी ॥ १०॥ लार्ड माउन्टवेटनको धर्मपती रेटी एवंविना माउण्डवेटनने दुःखित होकर, उदास होकर कहा कि यह हमारी कौटुबिक क्षति हुई है।॥ १० ॥ १७ २५८ पारिजातसौरमे पष्टो जार्जः असण्डकल्याणगुणार्जनाय लोकस्य सर्वस्य प्रयस्यतो।। महात्मनो मोहनदासगाधेम॒त्योः कथा मेस्त्यशनिप्रपातः ॥११॥ सब लोगोंकेलिये असण्ड फ्ल्यागगुण उपार्जन करने के लिये प्रयास करनेवाले महात्मा मोहनदास गाधीकी आज मृत्युवार्ता मेरेलिये वज्रपात हो है ॥११॥ न केवलं श्रीभरतप्रजानामेपा क्षतिः प्रत्युत सार्वभौमी । अपूरणीया तत आर्तचेता वितिष्ठते मानवजातिरद्य ॥१२॥ यह क्षति केवल भारतीय प्रजाकी ही नहीं है प्रत्युत सार्वभौम क्षति है और वह अपूरणीय है। अतः आज मानवजातिका चित्त दुःखी है ॥ १२॥ नाहं मदीया सहधर्मिणी नो दुखं महत्सोढुमशक्नुवैतत् । इति ब्रिटेनस्य महानरेन्द्रो जा|वदत्पष्ट उपास्य दुःसम् ॥१३॥ ब्रिटेन के महाराज पष्ठ जार्ज महानुभावने दुःसी होकर कहा कि न तो मैं ही और न मेरी धर्मपत्नी ही इस महान् दुःसको सह सके हैं ॥१३॥ वाइसरायस्य जार्ज पष्ठं प्रति पत्रम् निधनं महात्मन इदं मनोरजं ननु विद्यते मनुजजातिहानिकृत् । वसुमत्यपेक्षत इदं महातुरा परिभासतां तदवदत्तसद्गुणः ॥१४॥ वाइसरायने में जार्ज यो लिया कि-महात्माजीका यह मनको सिम परनेवाला निधन मानव जातिकी क्षति लिये ही हुआ है। पृषियी आज व्याकुल होकर यही चाहती है कि उनके दिये हुए सद्गुण प्रकाशित हो ॥१४॥ अपसन्नमानयहदि प्रकाशता निरपद्यमेय पुनरध तत्त्रयम् । प्रियता जनेषु सफलेपु शाश्वती नयधो नृणां च कृतिरस्तु सत्यभूत्।।

एकोनविंशः सर्गः २५२ दुःवित मानव हृदयमें आब उन तीन गुगोंके प्रकायकी आवश्यकता है:----सब लोगों में स्थायी प्रेम, २-रिसी भी मनुष्पकी हिंसाका अमाय और ३-सत्या आचरग ॥ १५ ॥ विपदाह गलितमुचमारतं दृघतोमिमानमिति यजगत्कृते । तदाद्धि तादृशममोद्धमान सममित्रशत्रुमथ निर्विकारकम् ।।१६।। मारत थाज विपत्तिमें है, उसका हर्ष चला गया है तो भी उसे अभिमान है कि उसने नगर के लिये ऐसा ज्वलन्त मानव दिया है जिमकी दृष्टिम शत्रु और मिन सर समान थे, और वह निर्विकार या॥१६|| यमुनातटादहमुपास्य तस्य तं दहनावर्षि रिधिमनूनपानम् । अधुनैव संन्यवमार्तचेतसा परिवीक्ष्य खिन्नमनसा नृणां गणम् ।। अमी ही में यमुनाके किनारेसे उनसरी पनि दाह क्रियाको देखकर दु-खित मनसे आ रहा हूँ। मैंने यहाँ दु.ग्वित लेगोका एक बहुत बड़ा समूह देखा ॥ १७ ॥ अरलोक्य त जनगणं निरीक्षितं न कहानि केरपि महाद्ववायितम् । कठिनं न यमिदमस्ति मोहने जनता दधाति कियनी नमाननाम्॥ बिसे कमी रिसीने नहीं देखा है, उस मार बनसमुदायको देखकर यह कहना कठिन नहीं है कि महात्माजीमें जनताका कितना महान् प्रेम धार थाटर है।॥१८॥ अवभासते न पुनरेव ताहशो नर आपनेदिह जगत्सवायिते । जगदुत्तरो गुणनिधिर्महात्मनः प्रभरिष्यति प्रतिपलं श्रिये हि नः ।। सह प्रतीत होता है कि इस पारपूर्ण जगन्में फिर बैठा मनुष्य नही थावेगा। महात्माजीके लोकोत्तर गुग हम लोगोंके कल्यागके लिये सदा ही समर्थ होगे ॥ १९॥ व्यलिसन्महाप्रतिनिधिनिटेनिकापनिमित्वकुण्ठिवमति: सिवात्पति। इह मारते स्थित उदारमानसः परिवृत्तमत्र निसितं रिलोस्य सः॥

२६० पारिजातसौरभ वाइसगयने पष्ठजार्ज महाशयको, यहाँ भारतमें ही रहते हुए, यहॉये सब वृत्तान्त आँखोसे देखकर, इस प्रकारसे लिखा था ॥ २० ॥ मार श्रीवल्लभभाई महोदयः कोपाय नायमिह काल उदस्य तस्मात्त श्रीमहात्मपरिपाठितपाठमेव । स्मृत्वा शुचंच कलिलंच मनोव्यथा च हित्वा यथासमयमद्य कृतिर्हिकार्या यह क्रोध करनेका समय नहीं है। अतः उमे छोडकर महात्माजीके पढाये हुए पाठको स्मरण करके शोक, मलिनता और मनोव्यथाको छोडकर समयके अनुसार कार्य ही करना चाहिये ॥ २१ ॥ तेनोपदिष्टसरणि स्मृतितोपसाय रोपेण मसमनयो विनयादपेताः । सर्वेवयं यदि भवेमनकोपि लाभोलब्धोभवेदथ भवेमचनिन्दनीया.॥ उनके बताए हुए मार्गको भुलाकर यदि हम मतवाले और अविनयी बन जायेंगे तो कुछ भी लाभ न होगा और हम सब निन्दाके पात्र बन जायगे।। २२ ।। कार्यातिभारचिक्ला निखिला विपन्ना, साहाय्यमेत्य परमार्यवरस्य गन्तुं भयेम पथि तस्य वयं समर्था, हा हन्त हन्त विधिना परिवश्चिताः स्मः ॥२३॥ हम सब कार्यके भारसे दचे हुए हैं, विपत्तिमें पड़े हुए हैं। उन्हीं परमार्य राष्ट्रपिताकी सहायतासे उनके मार्गमें जाने के लिये हम समर्थ हैं। हा, विधिने हमको टग लिया ! ॥ २३ ॥ यातो महागुररसी परलोकमार्ग, हित्येय भारमथिलं प्रियभारतस्य । यच्छिक्षित करणयाभवदन तेन, तस्त्रास्यतेतिनिपुणं विपदास्पदान्नः ॥२४॥ मियमारतका सय भार छोड़पर महागुरु परलोक्मे चले गये। तस्या

एकोनविंशः सर्गः
२६१
कृपाकर उन्होंने यहाँ रहते हुए. में जो कुछ सिखाया है वह विपत्तियोंसे
हमारी अच्छी तरह रक्षा करेगा ॥ २४ ॥
श्व. मायमस्य विमल परिपूतदेहो,
मस्मावशेप इह विश्वजनप्रणम्यः।
नून भविष्यति पर निहितोस्मदन्त-
ल्यत्यवश्यमसिलांस्टनयात्रतान' ॥२५॥
उनका निर्मल और पवित्र देह जिसे समस्त विश्व प्रणाम करता था,
बल्ह सायकाल अवश्य ही भस्म हो नायगा। परन्तु हमारे भीतर रहकर
अवश्य ही हम पालकों का निरीक्षण करते रहेंगे ॥ २५ ॥
नित्योमरोजर उपात्तपवित्रकायो,
लोकानुशिक्षणमिपेण समागतोन।
शान्त्या विवेकनिरता वयमद्य तस्य,
रत्नाधिक
गुस्वचः
परिपालयाम ॥२६॥
वह तो नित्य ये, अजर थे, अमर थे, लोगोको उपदेशदेनेके बहानेसे
पवित्र शरीर धारण करके आये थे। हमें चाहिये कि शान्तिसे
विवेकी बनकर रत्नसे भी अधिक मूल्यवान् उनये यचनका पालन
करें ।।२६॥
शोकं समाप्य पथि सेन निदर्शितेद्य,
लग्ना भवेम ययमित्यतियुक्तकार्यम् ।
श्रीवल्लभः सकलभारतवर्पलोका-
स्तस्मिन्निते परसद् समवोचतैवम् ॥रणा
शोकको छोडकर उनके बताये मार्गमें हम लग जाय, यही सर्वोत्तम
कार्य है। जब महात्माजी परम पदसे चले गये उस समय श्री.
बलममाईने इस प्रकार उपदेश दिया ॥ २७ ॥

२६२ पारिजातसारमे श्रीकिशोरलालो मशस्वाला हन्तुं समर्थ इह कोस्ति भवे भवाब्धेः, पारं गतं यतिवरं परमामरं तम् । येनानतायिविरलेन सितं शरीरं, तेनाप्यमान्यमरतायशतोपि तस्य ॥२८॥ इस संसारमे ससारसागरसे पार चले जानेवाले परम अमर उन यतीश्वरको कौन मार सकता है ? वह तो अमर हो गये थे, इस बातको, जिस विरल आततायीने उनके शरीरका अन्त क्यिा है उसने भी, लाचार होकर, स्वीकार कर लिया है ।। २८ ॥ कृष्णोस्तु यीशुरिह वापि च सोक्रटीसो, नैते हता अपि हता विदुपां मतेन । एवं हतो निस्पमो यतिराजराजो, जातोमरोलमत तत्पदमन्तशून्यम् ॥२९॥ श्रीकृष्ण, यीशु और सोक्रेटिस यह मारे गये हैं तो भी विद्वानों के मनसे अमर ही है। इसी प्रकार जिनकी जगत में कोई उपमा नहीं हैं, वह परम श्रेष्ठ यतिसम्राट् अमर हुए हैं और उस पदको प्राप्त हुए है जिसका कभी अन्त नहीं है ।। २९॥ यो मूढ एनमुरसि प्रजहार हन्तुं, नूनं गतो विफलतामिति कोपि विद्वान् । सन्दोग्धि नाद्य स यतः प्रभवश्चिरायु- रद्यापि जीवति समृद्धयलो महात्मा ॥३०॥ निम मूर्खने महामाजीको मारनेफेलिये छातीमें प्रहार किया था, यह अवश्य ही निपल गया है, इसमें थाज रिसी विद्वान् समहादारको सन्देह नहीं है। क्योकि यह तो चिरायु होकर, अधिक बलवान होकर भाब भी बीवित ही है।॥ १०॥ ।

एकोनविंशः सर्गः
०६३
प्रोमान्च सोनटिसमत्र निहत्य नैजी,
चेर क्षति यहुदयोपि यिशु विनाश्य ।
ते यादया अपि वधं प्रविधाय नन्द-
सुनोर्न
लाभमदुहन्नणुमात्रमत्र ॥३शा
ग्रीक्ले गोंने सोक्रेटिसको मारकर, यहूदियोंने यीशुको मारकर अपनी
ही हानि की थी। उन यादवोने भी कृष्णका क्य करके तनिक भी
लाम नाम नहीं किया ।। ३१ ।।
एपोपि निरपनरः प्रणिहत्य मूढो,
दीनातरक्षणपरं शिवरूपमेनम्।
नूनं समस्तजगता सह हिन्दुजाते.
श्वके महाझतिमनन्यतुलं महेशम् ।।३२।।
इस निर्लन और मूर्ख मनुष्यने दीनों और दुखियोंकी रक्षा करनेवाले
अद्वितीय अनुपम शिवरूप महात्माजी ( के शरीर ) को मारकर अवश्य
सम्पूर्ण जगत्के साथ साथ हिन्दु जातिकी महती हानि की है ॥ ३२ ॥
यार्या न कैरपि नरैनयनाश्रुधारा,
स्वामाविकी विरहला बलतः सूता सा।
नो विद्यते परमिहाद्य स कोपि हेतु
यो रोदयेन्मुनिकृते कमपि प्रतप्तम् ।।३।।
विरहजन्य ऑसू ऑसमेंसे स्वभावत जबर्दस्ती से निकल आते हैं।
उन्हें कोई रोक नहीं सकता है। परन्तु नापूकेलिये किसी सन्तप्त पुरुष
अथवा स्त्रीको रोनेकेलिये कोई भी कारण नहीं है ॥३३॥
श्रीमद्यतीन्द्रकृतसे तुमुपास्य
गन्छन्,
घोरे भनार्णच उदात्तमना यशस्वी।
सत्याप्रदिप्रवर एतदनन्तभव्य-
श्रद्धाकरः समवदत्स किशोरलालः ॥४॥

२६४ पारिजातसौरभे इस मयदर ससारसागरके ऊपर महात्माजीने जो पुल बाँधा है उसी पर चलते हुए सत्याग्रहियोंमे श्रेष्ठ अनन्त भन्य श्रद्धाके आकर श्री किशोरलालमशरूवालाने कहा था ।। ३४ ॥ श्रीमीराबहिन द्वावेवाश्रयोगासीन्मम वापू त्तथेश्वर । इदानी तावुभौ जातावभिन्नौ नियतित्वत ॥३५॥ मेरे दो ही आश्रय थे, बापू और ईश्वर । आज मेरे भाग्यसे दोनों एक हो गये ॥ ३५॥ आर्णयन्त्या वृत्तं तदु खदं महदेव मे । वन्दिता गमयद्वारमात्मानमुदजीघदत् ॥३६॥ जब मैंने इस अत्यन्त दुसद समाचार को सुना तो आत्माको बन्दी बनानेवाला दरवाजा खुल गया ।। ३६ ॥ स आत्मा यतिराजस्य सर्वस्वस्य ममाद्भत. । सर्वशक्तिमयो योगी प्राविशञ्च मदात्मनि ॥३७॥ बापू मेरे सर्वस्व थे। उनका अद्भुत, सर्वशक्तिमय और योगी आत्मा मेरे आत्मामें प्रविष्ट हो गया ॥ ३७॥ यापू शाश्वतमेवास्त सआत्मा शाश्वतोमतः । अहं शाश्वत एवास्मीत्येव नन्वनुभूयते ॥३८॥ घापू शाश्वत हैं, वह आत्मा शावत है, मैं मी शाश्वत ही हुँ, ऐसा माज मुझे अनुभव होता है ॥ ३८॥ नो सदेह. प्रियो यापू मध्यगो नो। यद्यपि । समीपतुर एयास्ते परमात्मा परात्मन ॥३९॥ यपि बापूजी भान सदेह हमारे बीच नहीं है। परन्तु उन महान् आत्मावा आत्मा अत्यन्त समीर है ।।१९॥

एकोनविंशः सर्गः
न भविष्यति देहोयं न वियोगस्तदापि नौ।
अन्तराले गते चास्मिन्भविघ्यायो निरन्तरी ॥४॥
जब यह देह नहीं होगा तब भी मेरा और तुम्हारा वियोग नहीं होगा।
प्रत्युत इस देहरूप अन्तरालके दूर होनेपर हमदोनों निरन्तर अन्तरालशून्य
बन जावेंगे ॥ ४०॥
तस्य सर्वदेवस्य शब्दा भन्याः सनातनाः ।
बुद्धार्थका इदानीं ते तदानीमनितार्थकाः ॥४१॥
उन सर्वश देवके वह मव्य सनातन शब्द उस समय वो अगवार्य
ये-उनके अर्थका ज्ञान मुझे नहीं था और अब उनके अर्थना पता
लगा है ।। ४१ ।।
पशुलोकं हृषीकेशे मया गन्तुं निमन्त्रितः।
मृतस्य गणना का स्यादित्यवादोत्स सर्ववित् ॥४२॥
जब मैंने पाकश ऋषिकेशमें पशुलोकमें आने केलिये उन्हें आमन्त्रण
दिया तब उन्होंने कहा गाकि "मरे हुएकी क्या गिनती करनी है।" ।।४।।
मर्माविध इमे शब्दा भयदा अपि रक्षिताः।
ईश्वरप्रार्थनाशब्दैः साकमेव मया हृदि ।।४।।
यह मर्मभेदी शब्द यद्यपि भयङ्कर ये तो भी मैंने इन्हें अपने हृदयमें
ईश्वर-प्रार्थनाके शन्दोंके साथ रख छोड़ा था ।। ४३ ।।
उपवासदिनान्यासन्स्मारकाणि महाप्रभोः।
तेषां च शब्दजातानां पश्चादासीदचिन्तता ॥४४||
उनके वह शन्द, उनके उपयात (दिली उपवास) के दिनोंमें
याद आते ये अर्थात् कदाचित् उपवासमें उनका नपर शरीर चला
बाय-परन्तु उपवासकी समाप्तिके पश्चात् में निश्चिन्त बनी थी ||४||
समातावुपवासाना ते शब्दा नीरहत्यकाः।
अभवन्निति मे ज्ञानमभवत्तदनेहसि ॥४५॥

२६६ पारिजातसौरभे उपवामकी समाप्तिमे मुझे ऐना अनुभव हुआ कि बापूके उन शब्दों में कोई रहस्य समाया हुआ नहीं था ॥ ४५ ॥ परं तत्वविदः शब्दाः सत्यरूपस्य सत्पतेः । भविष्यदर्थसम्पन्ना आसन्नित्यद्य मे स्फुटम् ॥४६॥ परन्तु आज मुझे स्पष्ट हुआ है कि तत्त्वज्ञानी और सत्यस्वरूप उन बापूके शब्द भविष्यमें होनेवाली घटनाके सूचक थे ॥ ४६ ।। विधिना निर्मिते तस्मिन्सन्ध्याकाले समाहिता। आन्दोलन महाग्लानेरहमन्वभवं भवे ॥१७॥ उस विधिनिर्मित सन्ध्याकालमें मैं समाधिमें बैठी थी और मैंने जगत्में महती ग्लानिके स्पन्दनका अनुभव किया ॥ ४७ ।। उद्धाराय मनुष्याणामवतारस्य शोणितैः। लक्षिता पृथिवी भूयः कम्पमाना वराकिका ॥४॥ मनुष्यों के उद्धारके लिये अवतारके रक्त से पुनः काँपती हुई दीन पृथिवी सींची गयी है ॥४८॥ नेदं पापं भवेद्वयक्तः प्रत्येकयुगभाविनाम् । मनुष्याणां हि तत्तेन रक्ष्यास्ते भक्तशोणितैः ॥४९॥ यह पाप एक व्यक्तिरा नहीं है। प्रत्येक युगमें आनेवाले सभी मनुष्यों का यह पाप है। अतः उन पापी मनुष्यों की रक्षा ईश्वरभक्तके रकसे ही हो सकती है।। ४९ ॥ जानीमस्तस्य कर्तव्यकर्माणि विततानि तत् । तेपी पूर्तये यत्नः कार्य: प्राणपणेन हि ॥५०॥ हम उनके फैले हुए पतंय्य फाँको जानते हैं। अतः उनकी पतिपेलिये हमें प्रागरमसे प्रयत्न करना चाहिये ।।५।। यातु भेदो मनुष्येभ्यो धर्मयविकल्पितः । हिंसा नदयत्यसत्यं च प्रलयं यातु सर्वथा ||५|| एकोनविंशः सर्गः २६७ मनुष्योंमेंसे धर्मकृत तथा वर्गकृत भेद चला जाना चाहिये। हिंसा और असत्यका नाश हो ही जाना चाहिये ॥५१॥ मन्थदण्डश्च मनसः कर्तव्यपथदशिका । सर्वश्रेयस्करी जीयादितिमीरावचः सुधा ॥५॥ मनके लिये मन्धनदण्ड समान, पर्तव्यमार्गको दिखानेवाली, सबका श्रेय करनेवाली श्रीमीराबहिन की यह वाशीसुधा विजयिनी बने ।। ५२ ।। श्रीमदयुलकलामआजादः यातेनाद्य दिवं दयाजलनिधी सर्वात्मके सर्ववि- द्यायातोस्तिमहाविपज्जलनिधि शाय न: सर्वथा । तस्यात्मा तदिदं वचश्व विमलं पन्थाश्च संदर्शितः, कल्यणाय समन्ततो भवतु नो दुःपाटवीं भ्राम्यताम् ॥५३॥ आज वह दयासागर स्वर्ग चलेगये। हमारे नाशके लिये विपत्तिरूप महासागर उपस्थित है। उनका यात्मा, उनका यह वचन, और दिखाया हुआ मार्ग, दुःसके जंगलमें भटकते हुए हम सबके क्ल्यागके लिये हो ।। ५३ ॥ यात्रा तेन समापितात्र कृतिना लोकोत्तरं खं यशो, दिक्षुध्वं च वितन्यता सफलित स्व जीवनं चावनौ । अस्माकं च नया दधाति पदवी नव्ये पथि केशिते, सा वस्यैव कृपावलानुदिनं संपूर्णतामेष्यति || उन्होंने इस जगत्की यात्रा पूरी की है । सभी दिशाओम, ऊपर भी, अपना अद्भुत यश पैलाकर अपना जीवन पृथिवीपर सफल क्यिा है और अब हमारी नयी यात्रा केशमय नवीन मार्गमें पदीं दधाति शुरू होती है। वह उन्हींकी कृपासे सम्पूर्ण होगी ॥ ५४ ॥ हिन्दूमुस्लिमयोरनैक्यमिह चेबृद्धि गतं स्यास्तदा, देशस्यास्य भविष्यति प्रलयकृद्धानिमहाभीतिदा ।

२६८ पारिजातसौरभे इत्येयं समबोधयत्स सकलान्दुःसाधिसन्तापितः, श्रीमद्विद्वबुलकलाम इसलाविद्यामहावारिधिः ॥५५॥ दुःखितहृदयसे श्री मौलाना अबुलफ्लाम आजाद साहेबने सबको कहा कि हिन्दुओं और मुसलमानोंमें यदि फूट बढती ही रामी तो इस देशकी बहुत बडी भयंकर हानि होगी ॥ ५५ ॥ श्रीपुरुषोत्तमदास टंडनः निजतन्त्रमारतगुरुत्वमथ विदितकीर्तिकायकः । गाधिरखिलजनताविपदः परिनाशनेसमुदितेउभे समे ॥५६॥ प्रथितकीर्तिवाले श्रीमहात्मा गांधीजी और स्वतन्त्रमारतका गुरुत्व यह दोनों ही जनताको विपत्तिका नाश करने के लिये समानरूपसे उदय हुए थे॥५६॥ जगतीह कुत्रचिदपि प्रसरति यदि नाम भारतम् । तत्र परमबुधसन्ततिभिरभिपूजितस्य महतोपि नाम तत् ।। ५७ ॥ संसारमें कहीं पर भी यदि भारतका नाम फैलता है-जाता है तो वहाँ विद्वानोंसे पूजित श्रीमहात्माजीका भी वह नाम जाता ही है ॥ ५७ ।। अविनाशिनामकृतिक परहितविहितस्वमानसम् । गांधिमुपनतपरात्मसुदर्शनमद्य विनाश्यतं पितरमास्म विना तम् ।।१८।। जिनका नाम और धर्म दोनों ही अमर हैं, परायेके हित में जिन्होंने अपना मन लगा दिया था, जिन्होंने ईश्वरका साक्षात्कार किया था, भाज हम उन्हीं राष्ट्रपिताको नष्ट करके उनके बिना हम रह गये ॥ ५८ ॥ इति टंडनः स पुरुषोत्तम उदितदयः सभासदः । आ६ विकलितमना निरतो जनसेवने स्वयमपीह पण्डितः ।।१९।। दयालु भी पुरुषोत्तमदासटण्डनजीने व्याकुल मनसे, प्रजासेवामें स्वयं भी लगे हुए, इस प्रकारसे समामें बैठनेवालोंको कहा ।। ५९ ॥

एकोनविंश. सर्गः २६९ श्रीगोविन्दबहभपन्तः श्रीमान्देवो मोहनो भारतस्य निर्मातासी सर्वनृणा शरण्य । यावो लोकं ब्रह्मविद्यापराणा हित्वा सर्वान्न. क्षणेनेच भूमे ॥३०|| श्रीमान् देवस्वरूप महात्मा मोहनदासजी मारत निर्माता थे, सर्वमानवोंको शरग देनेवाले थे। आन क्षगमरमें हमको छोडवर पृयिवासे उन लोकमें चले गये बहाँ ब्रह्मशाना वाते हैं ।। ६०॥ स्वातन्त्र्य तत्स्थापयित्वान देशे लोरेटोके भारतीकीतिगाथाम् । ख्याता कृया भारतस्येकनाथो यातो हा हा अश्यते भारतीय. ॥६॥ इस भारत देश में स्वतन्त्रताकी स्थापना करके, प्रत्येक लोक्में मारतकी कीर्ति या फैलाचर, मारतरे एकमात्र नाथ चले गये। भारतीय आज रो रहे हैं ॥१॥ सर्वप्राहि फरमासीत्तमोर कोणे कोणे भारतस्य चमायाम् । रुदवा मागं सस्थितं तेन सर्वे भ्रान्ता आसन्मार्गदरच्योतनेन ॥२॥ भारतभूमिर कोने कोने में वह सर्वग्राही कर अन्धकार मार्ग रोककर वर्तमान था। अत मार्गभ्रष्ट होकर सत्र भ्रान्त हो गये थे ।। ६२ ।। वधुन्धुं यिद्विपन्नास्त भूमावस्या ग्लानिर्भवते स्म स्वकीये। उच्च सन्त्येतेन नीचैरमी स्युलॊका एव भ्रान्तिविभ्रष्टमार्गा ॥६॥ इस भूमिमें माइ माईके साथ देष करता था, जो अपने ये उनमें हमें लानि यी, यह ऊँच है थोर वह नीच है, इस प्रकारकी भ्राविसे लोग मार्गभ्रष्ट हो गये घ॥ ६३ ॥ धर्मस्थानं धर्मनामा निधर्मोसत्यं सत्यस्थानमारम्य सम्यम् । प्रावर्तिष्ट अच्युता श्रेयसस्ते लोका भूमो भारतस्यादिमस्य ||६|| इस प्राचान मारतभूमिमें धर्मस्थानोंपर धर्मनामधारी अधर्म और सत्य स्थानपर मामत्य आरमग करने पहुआ था। बन सब रोक क्ल्यागसे च्युन हो गये थ ॥ ६४ ।।

पारिजातसौरभे थे आलस्यं वा दीर्घनिद्रालुता वा स्वार्थो मोहो द्रोह ऐश्वर्यकान्तिः । एते रोगाः स्यालयं संविधाय क्रूरा आसन्संस्थिताः स्वेच्छयैव ॥६५॥ आलस्य, ऊँघ, स्वार्थ, मोह, द्रोह, धनेच्छा यह सब रोग स्वेच्छासे यहाँ अपना घर बनाकर बैठ गए थे।। ६५ ॥ मार्गाः सर्वे छादिता रागरोपध्यान्तावेगान्नैव दृष्टिप्रसारः। धम्भ्रम्यन्ते स्मैव सर्वेअनाथा नासीत्कश्चित्पारदृश्वा व्यथानाम् ॥६६। राग, रोष रूप अन्धकारके वेगके कारण सत्र मार्ग के कहीं कुछ दीखता नहीं था। सब अनाथ बनकर इधर-उधर भटक रहे थे। दुःखोका अन्त करनेवाला कोई नहीं था ॥ ६६ ॥ तस्मिन्याले घोरघोरे महात्मा गांधिदेवो मोहनाख्यः समागात् । भित्त्वा भित्त्या ध्वान्तमध्यान्तरूपो देशं ह्येनं सप्रकाशं व्यतानीत् ॥६॥ उसी अतिघोर समयमै श्रीमहात्माजा आये और स्वयम् अध्वान्तरूप -प्रकाशस्यरूप होनेसे ध्दान्त-अन्धकारको फाड फाडकर इस देशको उन्होंने प्रकाशमय बनादिया ।। ६७॥ आसीन्नित्यं निस्सहायाश्रयोसौ रक्षालीनो दीनहीनादिकानाम् । येषां नाभूस्कोपि देवो दयालुस्तस्यासावासीन्महादेवदेवः ॥६॥ वह सदा निस्सहायोंके आश्रय थे, दीनों और हीनोंकी रक्षा लीन थे। जिनका कोई भी नहीं था उनके वह दयालु देव और महादेव ये ॥६८) हा हा सैपा देवता सर्वरूपा स्वीयं लोकं द्वारमाधाय किश्चित् । त्यक्त्वा दीनानस्रमदादीन्प्रयातो गोविन्दः श्रीपन्त एवं समूचे ॥६९॥ हा, हा, वह रारूप देवता हम दोनोंको छोडवर क्सिी बहानेसे अपने लोक्में चले गये, ऐसा भीगोविन्दयालभपन्तने कहा ॥ ६९।। गोविन्दवल्लभ उदात्तमनास्तपस्वी, श्रीमद्यतीन्द्रमभिक्ष्य वचांस्यमूनि ।

एकोनविंशः सर्गः उक्त्वा प्रणीय हृदये प्रशर्म म्बकीय, आश्वासनं स समते स्म कथंचिदेव !!!! पन्डित श्रीगोविन्दवाटमपन्तीने महामारीफ विषयमें इतने वचन कहकर अपने हृदयमे शान्ति स्थापन करके रिसा प्रकार आश्वासन प्राप्त किया ॥७॥ श्रीसम्पूर्णानन्दः दिव्यो देवः श्रीमहापूरपोसी सर्वाङ्गीणं जीवनं संप्रजी य । दत्त्वा सत्यं साम्यमास्थान्य धर्म सन्मर्माणं संप्रदय प्रयातः ।।७।। वह दिव्य महापुरुष मागीवन बीकर, सत्य हमें देर, समताकी स्थापना पर, पवित्र मर्मवाले धर्मको टिखाकर चले गये ।।७१॥ शक्तिः कार्य संविधातुं भवेत्सों लोकः सर्वकर्माधिकारः। एवं तत्त्वं सर्वलोकाय तत्त्वा प्रायाहोकं स्त्रीयमस्मान्महात्मा ||२|| यदि कार्य करनेकी शचि हो तो सभी लोग सब कोक अधिकारी है, ऐसा तत्व मुद्रको देकर श्रीमहात्माजी इस लोकले लोकको बले गये।।७२॥ श्रीसम्पूर्णानन्द ऊचे मनस्वी सर्वानैवं भिन्नभिन्नार्थद्रष्टुन् । अन्यस्तेिनस्वं च संतोप्य विद्वान्छोकञ्चालां शान्तस्पां चकार ।। विद्वान् , मनस्वी श्रीसम्पूर्णानन्दबीने मिन्न भिन्न विचारवालाको इस प्रकार कहा और उमसे अन्योंको तथा अपनेको मी सतुष्ट करके शोकी चालाको किसी प्रसार शात किया।॥ ७३ ॥ चक्रवर्ती श्रीगजगोपालाचार्यः लुण्ठितः स महानिधिरन केनचिहुरितपूर्णतमेन । एपु दुःखविपलेपु महेशो रक्षताद्विक्लभारतमद्य ||७|| किसी महारापनि उस महानिधिको लूट लिया । इन दु.खके धनोंमें व्याकुल भारतकी भगवान् रक्षा करे ॥ ७४ ।।

२७२ पारिजातसौरभे प्रेयस' सकलभारतभूमेर्देशनेतनयनस्य च तस्य । प्राप्य ते बलिमनुत्तममध्यं नश्यता विशय एव घृणा च ॥७५|| समस्त भारतभूमिके परमप्रिय और देशके नेताओं की आँस समान उनके सर्वश्रेष्ठ और अर्ध्य बलिको पार संदेह और घृणा यह दोनों ही यहाँसे नष्ट होवे || ७५ ॥ भारतक्षितिरिय विकलास्ति क्रौञ्चविष्किर इवार्तमनस्कः । आद्यकाव्यकविसम्मुखमेव व्याधबाणहतहृद्यसुहृत्कः ॥७६|| आज भारतभूमि उस प्रकारसे विक्ल है जैसा कि वह फ्रौञ्च पक्षी विकल था जिसका एक प्रिय साथी व्याधरे बाणसे वाल्मीकि ऋषिके सामने मारा गया था॥७६ ॥ तां निरीक्ष्य घटनां करणाईश्रीमहर्षिवदनोद्गतवाचः । हेतुतामुपगताः प्रति काव्यं रामचन्द्रचरितामृतपूर्णम् ।।७७।। उस घटनाको देखकर करुणासे आर्द्र महर्षि वाल्मीकिके मुखसे जो वचन निकले थे वह रामचरितसे पूर्ण काव्यके प्रति हेतु बन गये थे ॥७॥ सद्वदेव परिदेवयतां नो वक्यतो विगलदक्षरमाला । मोहनस्य भवतादतिभव्य काव्यमेव रचये जनतायाः ॥७॥ उसी प्रकारसे रोते हुए हमारे मुखसे जो अक्षरमाला निकल रही है वह जनता आनन्द लिये भगवान् मोहनका अतिभव्य काव्य चने ॥७८॥ प्रेमसत्यपरिरक्षणहेतो. स्यानसून्यसजदच महर्षिः । तस्य मूल्यमभिरभितुकामेस्तन्न कार्यमिद यन्न सुयोग्यम् ॥७९॥ प्रेम और सत्यकी रक्षाये निमित्त महर्षिने आज अपने प्रागोग विसर्जन किया है। जिन्हें उम त्याग मूल्यपी रक्षा करनी है उन्हें यह धुछ भी नहीं करना चाहिये जो अत्यन्त योग्य न हो।॥७९॥ आप्रय: म विपुलः पविताना सत्यदेवपरिरक्षक ईड्यः । अध तद्विरहमाप्य निराशा हागता यिनिहता विधिना ते ८०॥

एकोनविंशः सर्ग २७३ वह पतितोंके महान् आश्रय थे | सत्यदेवके प्रशसनीय सरक्षक थे। आज वह सब उनके विरहसे निराम हुए हैं। विधिने उन्हें मार डाला॥८०॥ अद्य कष्टसमये स विधाना हा हृतः परमदुर्बलदेवः । शासनं च विधिना हतकेन वश्वितं विषमकाल उपेत्य ॥८॥ भाज कटके समयमें परम दुर्बलों के देव महात्माजीको विधाताने उठा लिया। तया दुए माग्यने थार मारत सर्कारको विषम कालमें टग दिया ।। ८१॥ चक्रवर्ती महाविद्वान् राजगोपाल इत्यमुम् । अशोचत्सुण्यसम्राज शोकापहतचेतसा ।। ८२॥ हाविद्वान् चस्वता राजगोपालाचार्यजीने पुण्यके सम्राट उन महा- स्माजीके लिये शोकातुरचित्तसे इस प्रकार शोक प्रकट किया ॥ ८२ ।। डाक्टर भगवानदासः येनापरै कलिकलजुपोपि काले, संरक्षिता अभयवागभिनन्दनेन । स स्वं न रक्षितुमपारयदेतदेय, लीलालयस्य च परस्य महापरत्वम् ।।८३॥ जिस महापुरुषने पापियों और अपराधियोंको भी अभयवचन देकर समयपर बचा लिया था बही अपनेको न बचा सका। यही लीलाघर परमेश्वरका परमेश्वराव है ।। ८३ ।। भव्ये भवेपि नियमोयमुपस्थितो था, हन्याननस्तमिह यः परिरतितुं तम् । यावन्मृति प्रयतमानमकल्मषं कि, हन्तुं वाञ्छ यतिमद्य परिष्कृतो यत् ॥४॥ क्या इस जगता यही तो नियम नहीं है कि जो जिसको बचानेके २७४ पारिजातसौरभे लिये मरणपर्यन्त प्रयत्न करे उसी निर्दोष आत्माका वही वध कर डाले ? इसीलिये उपकृत महात्माजीको मारने की इच्छा की 11 ८४ ॥ सर्वं गता उपकृतिप्रवणा नरेन्द्रा, एतेन विस्तृततमेन यथा पुरापि । श्रीमन्महात्मधरणीमणिरेप पुण्या, प्रापत्स्वमन्तमिह निश्चितमेव पुण्यम् ।।८५॥ उपकारपरायग सभी महापुरुष इसी विस्तृत मार्गसे पहले भी गये हैं । पविन श्रीमहात्माजी निश्चय ही पवित्र मृत्युको प्राप्त हुए हैं ।। ८५ ।। ये तस्य नोतिविपये विपमा अभूवं- स्तेप्यद्य तद्गुणमहत्त्वमुदाहरन्ति । तत्त्यागिता तदथ मानवनाहितत्वं, लोकाश्रु वाहयति सन्ततमद्य कोष्णम् ॥८॥ जो लोग उनकी नीतिसे सहमत नहीं ये वह भी उनके गुणों के महत्त्वाश गान कर रहे हैं। उनका यह त्याग और मानवताको हितैपिता आज लोगोंके गर्म आँसूको बहा रहे हैं ।। ८६ ॥ तत्त्वज्ञानस्य मञ्जूषा व्यवहारनिरङ्कुशः ।। इत्यमिद्विचारेण भगवान्दासडास्टरः॥८॥ तत्वज्ञानके भण्डार और सब व्यवहारमें स्वतन्त्र श्री डाक्टर भगवानदासजीने विचारके साथ यह अभिप्राय प्रकट किया था ॥ ८७ ॥ श्रीराधाकृष्णन् सर्वपल्ली जातं प्रहारमधिगत्य महात्मदेहे, शादरवर्ण्यहृदयोन्मयशीलदुःखम् । परकल्पनायिरहितं सदभूदिदानी, यातः पवित्रतमदेवदेव पन्धः 11८८t महात्माजीके शरीरपर महारको जानकर हदयकोहिरा देनेयाम अवर्ग- जीप कल्पनातीत दुर हुमा । यन्दनीय पवित्र देहधारी पले गये।1८ell एकोनविंशः सर्गः सर्वसहा भगवती मतिरास्त यस्य, सत्प्रेरणाप्रवलशाश्वतवारिधारा निर्दोपतारनिमहीपतिरार्ययः, सोप्याहतश्च निहतश्च विचित्रमेतत् ॥८॥ जिनकी बुद्धि भगवती सबको सहन कर लेती थी, जो सच्ची प्रेरणाके लिये प्रबल नित्य पारिपारा थे, जो निटोपताके केन्द्र घे, वह आर्यवर्य भी घायल किये गये और मारे गये, यह विचिन है॥ ८९ ॥ विद्वच्छिरोमणिसमय॑पयोउपाद- श्रीमोहनोरसि यदि क्षतिसंविधाता। अस्मिन्युगेप्यधिघरं श्वसिति क्षणेन, मुफ्रातयीशुबलिकाणोस्ति जीयन् ।। ९० ।। यदि परमविद्वानीसे भी पूज्यपाद श्रीमहामाजीकी छातीमे गोली मारनेवाला इस युगमें भी है तो यह कहना होगा कि सुकरात, यीशुको बलिदान देनेवालोका गण अभी भी सुखसे जी रहा है ।। ९० ॥ आसीदतीतयुगजीवितधर्मरुप- स्तदेहदानिमपि मोहपरा ज्योतिः परं तदयदत्तमिह स्थितं स- त्पद्यां प्रकाशपदवीमुपनेप्यते नः ॥ ९१ ॥ वह तो अतीतकालके जीते धर्मके रूप थे। अज्ञानवश हमने उनके भी देहकी हानि कर डाली। उनकी दी हुई महान् ज्योति यहाँ रहकर हमको प्रकाशमय मार्गमें ले जायगी ।। ९१ ॥ विश्व समस्तमिह जीवितकाममध, यद्यस्ति तर्हि तददर्शितवमै हित्या। हिंसामपास्य नितरां तदुपास्य सत्य, शुद्धिं व्रजेदिति परः परिनिष्टिदोध्या ।। १२ ।। अकुर्म ।

सर्वपल्ली। २७६ पारिजातसौरभे यदि समस्त जगत् जीने की इच्छा रखता हो तो जो मार्ग उन्होंने नहीं बताया है उसे छोडकर, हिंसाका त्यागकरके, सत्यका ग्रहणकरके शुद्धि प्राप्त परे, यही अन्तिम मार्ग है ॥ ९२ ॥ तद्धानयानविकलो विवशोतिदुःसै- विद्यामहाजलनिधिः फिल सज्योतिराकरयतिक्षितिपस्य राधा- कृष्णन्नुवाद सुगुणानिति वस्तुविज्ञः ॥ ९३ ॥ महात्माजीके नाश और गमनसे विक्ल, दुःखसे पराधीन, विद्यासागर, सर्वपल्ली श्रीराधाकृष्णन्ने सत् ज्योतिके आकर महात्माजीके गुगोंका इस प्रकार वर्गन क्या ॥ ९३॥ आचार्यः जे० पी० कृपलानी भवतीह तस्य न शरीरमुज्ज्वलं निखिलस्य निस्स्वकजनस्य दुसहत्। पदिष्टमस्य मुखयम चेद्वयं न फदापि संपरिहरेम शं भयेत् ॥१४॥ समरत गरीबोके दुःसोया नाश करनेवाला मामाजीका शरीर तो अप नहीं रहा है। परन्तु उन्होंने जिरा पल्यागपयश उपदेश रिया है, उसका पदि दम त्याग नहीं पर तो हमारा फ्ल्याग गाही ॥४॥ मरणं सदीयमिति पोधनक्षम न पयं तदीयशमशिक्षणोत्सुकः। अथ पेन दुपदमिदं पतं मयेक पद्धता कपशानुगोलिश९५।। उनका भयगान यह चित पाता है कि हम उनकी शान्तिवी पिपलिये उगु नदी । अन्यथा पा दुसद कार्य यो होता! तो परता और परा भागही गोरिया ॥ १५ ॥ परिसत्यमस्तु शरणं गा नगा सदहिंसनप्रवमपि भयन्तु से। पिपर्म एप पिता सनातनी विपरीतताप विपदा निमन्त्रणम॥९॥ गोरा बाप सा होतो हे पाहिरियारमारा एकोनविंगः सर्गः २७७ भी वह पालन करें। यही सनातन पिधर्म होगा। इससे विपरीत तो विपत्तियोंको मन्त्रित करने जैसा ही है ॥ १६ ॥ उपदिष्टमत्र जनवासु यन्मुनि स्वयमप्यनिद्रमभजत्तदेव सः। जगता परीक्षणमिदं स्म गृह्यते गतवान्स पारमिति नान संशयः ।।९७॥ श्री महात्मावाने बनताको जिस तत्वका उपदेश दिया है और जिसका वह स्वय मी याचरण करते थे, मात् उसकी परीशा ले रहा था । महात्माजी उत्ती हो गये, इसमें सन्देह नहीं या ॥ ९७ ॥ अविजातशत्रुरपि यत्र घावितो, हठभाग्यमेव भरतक्षमातलम् । न विदेशिरायमपि यत्कृतं कचित्त- दकारि भारतमुतेन केनचित् ।।९८॥ वहाँ अजातशत्रु मी मारा जाता है वह देश वस्तुतः हवमाग्य ही है। विदेशी शासनने मी दो काम नहीं किया वही वाम मारत एक पुत्रने कर दिया ॥२८॥ शुभमाग्यमाजनमिमे वयं यवो, यतिरागमत्स कृपयास्मदादिषु । परतन्त्रताविमथितान्त्रनाडिपु, पतनानुभूतिषिकलादिमानुपः ॥९९॥ हमारा धन्य माग्य है कि श्री महात्माजी कृपाकर हमारे बीचमें पधारे थे। हमारी आन्न नाडियाँ परतन्त्रतासे निचोली गयो यो। महात्माजी हमारे पतनको देखकर बहुत प्याकुल थे ।। ९९ ॥ अमयद्विनाशपथिकाश्रयाश्रमो, वदेश एप हृदयानुभश्चनम् । इदमस्ति तेन सहरे समन्विते यतिदर्शितेन हि पथा प्रयायताम् ॥१००l.

૨૭. पारिजातसौरभे यह देश विनाशरूप पथिक आभयके लिये आश्रम मन गया है। यह जो बन गया है यह हृदयको तोड डालनेवाला कृत्य है। सबको इकट्ठे होकर श्रीमहात्माजीके बताये मार्गसे ही चलना चाहिये । १०० ।। गलितादरा अपि ययं धरातले, कृपया हि यस्य परिवेष्टितादराः। स गुरुः पिता स सुहृदातरक्षको, गतएव हन्त निखिलान्विहाय नः॥१०॥ पृथिवीपर हमारा कोई मान नहीं था। जिसकी ही कपासे हम मानवान् बने वह हमारा गुरु, हमारा पिता, हमारा मित्र, दीनबन्धु हम सबको छोड़कर चला गया ॥ १०१॥ अथ धर्मजातिगतभेदमर्दना- कुटिलप्रवृत्तिपरिवृत्तिसेवनात् । यतिराजशिक्षणाशरोवधारणा- न्निनमातृभूमिगुरुतामवामहे ॥१०२।। धर्म और जातिके भेदको मिटा देनेसे, कुटिल प्रवृत्तिको बदल डालनेसे, तथा यतिराजकी शिक्षाको शिरोधारण करनेसे हम मातृभूमिके गौरवकी रक्षा करें॥१०२॥ मृतिजीवने समतया मते मते यतिशेखरस्य विजरामरस्य हि । मृतिमाप्य सर्वविधवेदनापहि- निजरूपमापदविलम्यमीश्वरः ॥१०॥ श्री महामाजी अजर और अमर थे। उनकी दृष्टिमें मरण और बीयन दोनों ही समान थे। मृत्यु के पश्चात् यह तो शीम ही सब प्रकारफी पेदनासे अलग ओ उनका स्वरूप था उसे मात हो गये ||१०३।। ततिरेय नामपदितस्य तस्यका- प्यय भारतं प्रतिगतं समुन्नतेः।

एकोनविंशः सर्गः - सदा, सकलाश्रयः श्रुतिवचः प्रबोधितं, गत एव घाम स तु रामनामतः ।।१०४॥ उनकी वो कोई क्षति हुई ही नहीं। वह तो श्रीरामनामके प्रताप वेदप्रतिपादित निरख धामको चले गये। परन्तु मारत उन्नतिसे पीछे हट गया।।१०४॥ कृपलानिरेवमनिशं हुदा वप. न्नुपदेशनामुपदिदातगद्गुरोः कयमप्यपारविपदः पथः शिवां च भारतमुचं निनीचति ॥१०॥ थाचार्य कृपलानी इस प्रकार हृदयमें सन्तप्त होते हुए वथा दग) द्गुरुके उपदेशोंको लोगोंको उपदेश करते हुए किसी प्रकारसे भी मारतभूमिको अपार विपत्तिके मार्गशे फल्यामकी बोर ले दाना चाहते हैं ॥ १०५॥ अचार्य नरेन्द्रदेवः लीला समापयदहो महितः स्वकीयां, पुण्यात्मभिर्वियुधचारुचयेः सदैव । एतद्युगस्य स महापुरुपोभियन्या, श्रद्धामृतर्निसिलविश्वबुधप्रकाण्डः ॥१०६|| पुष्पात्माओं, विद्वानों के समूहों से सटा ही पूडित तया विश्वक श्रद्धापूर्ण समस्त विद्वानोंके वन्दनीय इस युगके महापुरुष श्रीमहात्माजीने यहो, थपनी लीला समाप्त की ।। १.६ ॥ आध्यात्मिकीः प्रियवरा उपदेशमाला, सामाजिकीर्नयनया व्यवहाररीतीः । सोशिक्षयनगदनन्तकलामहेशः, सोद्योतयत्पुनरपि द्युतिमात्मनीनाम् ।।१८७॥ .

२८० पारिजातसौरभे उन्होंने जगत्को आध्यात्मिक उपदेश और नवीन नवीन सामाजिक व्यवहारकी रीतियोंका शिक्षण दिया । अनन्तक्लाफे अधिष्ठाता उन्होंने आत्मकल्याणके प्रकाशको पुनः प्रकाशित क्यिा ॥ १०७ ॥ संत्यज्य दिव्यविभवो यदि मृत्युशय्या, पुण्यानुभाव इह राष्टपिता श्यसेत्सः । देहास्थिरत्वमखिलान्परिबोध्य शिप्या- न्भूयोपि भव्यपदवी प्रतिपादयेत ॥ १०८।। दिव्यविभूति वाले वह राष्ट्रपिता यदि मृत्युशय्याको छोडकर पुनः जीवन धारण करते तो फिरसे सब मानवोंको देहकी अस्थिरताका उपदेश करके भव्यमार्गश प्रतिपादन करते ।। १०८ ॥ प्रेम्णा शमेन गुरुणा रचिते चितेन, सत्येन वर्मनि परे जगदर्पयेत । पादं यदि कचिदपि स्खलतिं न पश्ये- त्पश्येत्परात्मपदवीं गतरोपरागम् ।। १०९॥ श्री महामाजीने प्रेम, शान्ति और सत्यसे जिस मार्गका निर्माण दिया है यदि जगत् उसमें पादार्पण करे तो वह कभी स्खलित न हो प्रत्युत राग दोप आदिसे रहित होकर मोक्षको प्राप्त करे ॥ १०९॥ उत्थानवमनि निरता अजस्र, निरञ्जनगुरुप्रतिपादितेये । भूयास्म तस्य कृपयेति नरेन्द्रदेय, आचार्य आह यतिराजयियोगतप्तः ॥ ११० ।। श्रीमहात्माजीक वियोगसे संतप्त होकर आचार्य श्रीनरेन्द्रदेवजीने कहा कि उत्यानमार्गमें लगे हुए हम सब उन्हींकी कृपासे उन्हीं के बताये हुए थेट, अविनाशी, सत्यमें निरत रहें, ऐसी मायना है ॥ ११ ॥ रता सत्ये एकोनविंशः सर्गः भारत सरि सावत्येन जगदुपादिशन्महात्मा, सत्यं धर्ममविचलं तथातिपुण्यम् । नीचानीचविभिदया प्रणड्क्ष्यति श्रीः, सर्व सन्ति सपितृका इति प्रबोधम् ।। १११ ।। श्री महात्माजीने हमें सदा अतिपवित्र, अविचल सत्यका उपदेश दिया है। उन्होंने यह उपदेश भी दिया है कि नोच, ऊँचके भेदसे भीका नाश हो जायगा । हम सब एक ही पिताके पुत्र हैं ॥ १११ ।। सायां व्यपगलदुञ्चनीचतायां, लक्षाधीशधनजनाद्यभावभाजि । विद्याहीनसकलशास्त्रमण्डिते च, सान्यं दत्त्वा गत इतो मनुष्यजाती ॥१२॥ निसमेंसे ऊँच नीच भाव निक्ला जा रहा है उस मनुष्य जातिमें, चाहे कोई लक्षाधीश हो अथवा धनजन दिसे रहित हो, चाहे विद्याहीन हो, चाहे सकलशास्त्रसे मण्डित हो-समानता देकर यह यहाँ से चले गये॥११२॥ प्रागाद्वारतभुवि जन्मना निजस्य, पावित्र्यं सुशुचिमना विधाय सम्यक् । निर्दोपं शमसमतादिपुण्यकार्य, कृत्वा कर्तुमपि भुवि प्रबोध्य सर्वान् ।। ११३ ।। अत्यन्त पवित्रमनवाले श्रीमहात्माजी भारतभूमिमें अपने जन्मसे पवित्रता पैदा करके निदोप, शान्ति और समता आदि पुण्यकार्य करके पृथ्वीपर सबको वही सब करने के लिये भी उपदेश देकर चले गये ।।११३।।

विंशः सर्गः
विरामवने तस्मिन्यस्मिन्यतिरुपावसत् ।
द्वादशवासरात्पूर्व तस्य देहमशाययत् ॥१॥
१२ दिन ही पूर्व जिस विरलाभवनमें श्रीमहात्माजीने उपपास किया
था उसीमें उनके शरीरको सुला दिया गया ॥१॥
समाचारं निशम्यैव श्रीजवाहरनेहरूः।
वल्लभोश्च ययतुस्तत्र नितरां बापुवल्लभी ॥२॥
समाचारको सुनते ही बापूजीके अतिप्रिय पण्डित श्रीजवाहिरलालजी
नेहरू और सर्दार श्रीवल्लभभाई वहाँ गये ॥२॥
भारतराष्ट्रजनकः सर्वभूक्षेमसाधकः।
श्रीमोहनो गतः स्वस्य लौफैलॊकमिति श्रुतम् ॥३।।
लोगोंने यह सुना कि भारतराष्ट्रपिता, सर्व जगत्के कल्याण करनेवाले
श्रीमहात्माजी अपने लोकको पधार गये ॥३॥
हाहाकारेण निखिलं जगदभ्रं प्रपूरितम् ।
दिशोपि विदिशः पूर्णाः शोकोच्छवाससमीरणैः॥४॥
हाहाकारसे समस्त जगदाकाश भर गया। दिशाएँ और विदिशाएँ
शोककी आहोंसे मर गयीं ॥ ४॥
अद्याभयनिराधारा हा हा हन्त वसुन्धरा ।
अभिव्याप्तो भवश्चाद्याभन्यैः सन्तमसैर्वत ॥५॥
आज वसुंधरा निराधार बन गयी। ससार आज अन्धकारसे च्यात
हो गया ॥५॥
अवाग् जवाहरो जातः रसनातो रसो गतः।
वल्लभोपि पराधीनस्तदानीमभवच्छुचः॥६॥

२८२ पारिजातसौरभे तस्य प्रयततपोबलेन भारतीयं, राज्यं सातमिह ततस्तदीयकामम् । सांशेन सफलमाविधातु मद्य, प्रतिज्ञा क्रियत उदात्तशासनेन ॥ ११४ ॥ इति सर्वतन्त्रस्वतन्त्रपरमहंसपरिवाजकस्वामिश्रीमद्भगवदाचार्यपण्डितराजप्रणीते पारिजातसौरभे एकोनविंशः सर्गः उन्हीके सयत तपोबलसे यहाँ मारतीय शासन स्थापित हुआ है। अतः उनकी इच्छाको सर्वोशमें सफल करने के लिये आज भारतसार प्रतिज्ञा करती है। ११४॥ शति श्रीपरमहंसपरिवाजकस्वामिश्रीमद्भगवदाचार्यपण्डितराजप्रणीते पारिजातसौरभे स्वोपज्ञभारतराष्ट्रभाषाटीकायां एकोनविंशः सर्गः

विंशः सर्गः
विरलाभवने तस्मिन्यस्मिन्यतिरपावसत् ।
द्वादशवासरात्पूर्व वस्य देहमशाययत् ॥१॥
१२ दिन ही पूर्व जिस विरलामानमें श्रीमहात्माजीने उपवास किया
या उसीमें उनके शरीरको सुला दिया गया ॥१॥
समाचारं निशम्यैव श्रीजवाहरनेहरूः।
वल्लभोश्च ययतुस्वत्र नितरां वापुवल्लभो ॥२॥
समाचारको सुनते ही बापूजीके अतिप्रिय पण्डित श्रीजवाहिरलालजी
नेहरू और सदार श्रीवल्लभभाई यहाँ गये ॥२॥
भारतराष्ट्रजनकः
सर्वभूक्षेमसाधकः ।
श्रीमोहनो गतः स्वस्य लीलोंकमिति श्रुतम् ॥३॥
लोगोंने यह सुना कि मारतराष्ट्रपिता, सई जगत्के कल्याण करनेवाले
श्रीमहात्माजी अपने लोक्को पधार गये ॥ ३ ॥
हाहाकारेण निसिलं जगदभ्रं प्रपूरितम् ।
दिशोपि विदिशः पूर्णाः शोकोच्याससमीरणैः॥४ा
हाहाकारसे समस्त जगदाकाश भर गया। दिशाएँ और विदिशाएँ
शोककी आहोसे मर गयीं ।। ४ ।।
अद्याभवन्निराधारा हा हा हन्त वसुन्धरा ।
अभिव्याप्तो भवश्चाद्याभव्यैः सन्तमसैर्वत |
आज वसुघरा निराधार बन गयी। ससार आज अन्धकारसे व्यात
गया।॥ ५॥
अवाग जवाहरो जातः रसनातो रसो गतः ।
बल्लभोपि
पराधीनस्तदानीमभवच्छुचः॥६॥

२८४ पारिजातसौरभे समजूधुपत् ॥७॥ उस समय ५० जवाहिरलालजी बोल नहीं सकते थे। उनकी जीम सूख गयी थी। सदारवल्लममाई भी उस समय शोकपराधीन हो गये थे॥६॥ वेपमानस्वरः श्रीमान्याचया कम्पमानया । जवाहरो वृत्तमेतद्धारते काँपते हुए आवाजयाले पण्डितजीने कॉपती हुई जीभसे इस समाचारको भारतमें घोषित किया ॥ ७॥ तबारात्रि जनाः सर्वं वीतनिद्रा अजागरुः। द्वितीये दिवसे देहं पुत्रस्तस्य समस्कृत ॥८॥ यहाँ सबकी नींद उड़ गयी थी। सभी रातभर जागते रहे। दूसरे दिन महात्माजीके पुत्र श्रीदेवदासगाधीने उनके देहका संस्कार किया ॥८॥ देहो महात्मनस्तस्य खट्यायां शायितोमवत् । नेत्रे निमीलिते आस्तामनावृतमुरः क्षतम् ॥९॥ महात्माजीके देहको पलगपर सुला दिया गया। आँखें बन्द थीं और घायल छाती उघाडी थी।॥९॥ पावने तस्य कण्ठे च खादीमाला व्यशोभत । अद्यापि वदनं चारु पद्मशोभामचुचुरत् ॥१०॥ पवित्र गलेमें खादीकी माला शोभा देती थी। मुख तो अभी भी कमलसे भी अधिक सुन्दर था ॥१०॥ तम्रत्या मेदिनी सर्या पुष्पराजैः समावृता । घृतदीपोज्वलत्तत्र चन्दनागुरुधूपितः ॥११॥ यहाँथी पृथिवी गुलायसे ढंक गयी थी। चन्दन, अगरसे धूपित प्रतदीप याँ जल रहा था ।।११।।

विंशः सर्गः २८५ सारवल्लभो राजकुमार्यमृतकोरका। गोविन्दवल्लभः पन्तः समतिष्ठन्त भूरिभिः ।।१२।। सारवल्लममाई, श्रीराजकुमारी अमृतकोर, पण्डित गोविन्दवल्लमपन्त बहुत लोगोंके साथ वहाँ बैठे थे ॥ १२ ॥ सर्वेपामेव देशानां प्रातिनिध्यं हि विभ्रतः। पुष्पमाला यतीशस्य तदा देहे समापिन् ॥१३॥ सब देशोंके प्रतिनिधियोंने उस समय महात्माजीके शरीरपर पुष्पमालाएँ अर्पण की ।। १३ ।। ब्रिटिश्राध्यप्रतिनिधिाड माउन्ट वेटनः । उभाभ्यां स्वीयकन्याभ्यां कृष्णवस्त्रः समागमत् ॥१४॥ ब्रिटिशराज्यके प्रतिनिधि वाइसराय लार्ड माउन्ट वेटन अपनी दोनों कन्याओंके साथ काले वनके साथ आए ।। १४ ।। चम्वा श्रीभारतीयस्य शासनस्य सुमोटरम् । आनीतं सत्र मञ्चं च समुन्नतमकारयत् ॥१५॥ मारतसकारकी सेना मोटर ले आयी थी । उस पर ऊँचा मच बनाया गया था ।। १५ ॥ श्वतेन खादिवस्त्रेण मोटरं तत्समावृतम् । पुष्पैर्नानाविधेस्तत्रोपरिभागः समावृतः ॥१६॥ सफेद खादीसे वह मोटर टाँक दी गयी थी। उसके ऊपर नाना प्रकार के फूल बिगए गये थे || १६ ॥ तत्रैव जगदय॑स्य शवः संस्थापितोभवत् । संनिधौ पादयोः श्रीमान् वल्लभः समतिष्ठत ॥१७॥ उसी पर जगत्पूजनीय महात्माजीका देह रसा गया। चरणों के पास श्रीवलममाई बैठे हुए थे ।। १७ ॥

२८६ पारिजातसौरभे . पादोने द्वादशहोरे मध्याहे निरगादयः । विरलाभवनादिल्या जयकारपुरस्सरः॥१८॥ पौने बारह बजे दोपहरको दिल्लीमें विरला भवनसे जयजयकारके साथ रय निकला ।।१८।। सोसौ शवरथः श्रीमानकृप्यत मिलद्भुजैः । वायुस्थलजलादीनां सैनिकैः श्रद्धया ततः ॥१९॥ उस रथको वायुसेना, स्थलसेना, जलसेनाके सैनिक श्रद्धाके साथ खींचते थे ॥ १९॥ वहभो बलदेवश्च नेहरूञ्च जवाहरः । गांधिदेवदासश्च तं शवं पर्यवारयन् ॥२०॥ पण्डित जवाहिरलालजी, सरवल्लभभाई, सर्दार बलदेवसिंह तथा श्रीदेवदासगाधी शवके चारों ओर बैठे थे ॥२०॥ राजेन्द्रः कृपलानी च पन्तगोविन्दवल्लभः । घहयोन्ये च नेतारः समावृण्वन्यतेः शवम् ।।२१।। पावू श्रीराजेन्द्रप्रसादजी, आचार्य जीवतराम भगवान्दास कृपलानी, पण्डित गोविन्दवल्लभपन्त और दूसरे बहुतसे नेता शवके चारों ओर बैठे थे।॥२१॥ गोरसासैनिकाः सर्वे पादाताः सैनिकास्तथा। व्यापृतास्त्वरिताः सर्वे रथमार्गसमीकृतौ ॥२२॥ गोरखा सैनिक और पैदल सैनिक रथके मार्गको बराबर करने में झट ला गये थे।॥ २२ ॥ गव्यूविमितमार्गेपु गृहा गृहतलानि च । विद्युत्स्तम्भा उपपथास्तरयो जनविप्लुताः ।।२३।। चार माहलके रास्ते भर पर, घरका ऊपरी माग, विजलीके सम्भे, उपमार्ग और वृध सर आदमियोंसे भरे हुए थे। २३ ।।

रिंशः सर्गः २८७ पठी चुप मृतोपि स महानास्मा जीवन्निव निरन्तरम् । मनुष्यसागरं कर्पन्पुरो याति स्म धीश्वरः ॥२०॥ जैसे नीवित अवस्थामें वह मनुष्योंको अपने पीछे खींचते थे वैसे ही मृतावस्थामें भी वह मनुष्यसागरको सींचते हुए जा रहे थे ।। २४ ॥ जना अगणिता आलम्शान्तिरासीदपूर्विका । आकाशं पूरितं सम्यग्जयशब्दमहात्मनः ||२५|| मनुष्य तो पार विनाके थे, शान्ति अपूर्व थो, और "महात्मागाधीका जय" इन शब्दोंसे आकाश भर गया था ॥ २५ ॥ विहगा नीरवा आसन्निष्कापा अनोक्हाः। सहस्ररश्मिनिस्तेजा वायुरासीदलदतिः ॥२६॥ । थे। वृक्ष निष्कम्प खडे ये। सूर्य निस्तेज था और वायुकी गति क्षीण हो गयी थी ॥ २६ ।। नभो नीलाम्बरवृतं शोकसंवेगमूर्डिचम् । जयध्वनिभिराकीणं स्वयं दुःखेन नीरवम् ॥२॥ आकाश कालावस्त्र पहिने हुए था। शोकके वेगसे भूछित था। जयध्वनिसे पूर्ण था परन्तु स्वय दु.पसे चुपचाप था ।। २७ ॥ देहलीद्वारसविवे वायुसेना. सयानतः । अल्सकालान्तरालेन कुसुमानि समाकिरन् ।।२।। दिल्लीदाजेके पास वायुसेनायें भाराशयानसे थोडी-थोडी देरमें फूल आती थीं ॥ २८ ॥ नमसो नीलिमा तस्मिन्काले मिथ्यात्वमाभजत् । पुप्परेणुमयं भातं निखिलं व्योममण्डलम् ॥२९|| उस समय आकाशका नीलापन झूटा पड़ गया था। सम्पूर्ण आकाश मण्डल पुष्परेणुमय हो गया या ।। २९ ॥

२८८
पारिजातसौरभे
चतुर्होरावसरेसौं विंशत्या चाधिकैः पलैः ।
राजघाट रथ' प्राप यमुनायास्तटोत्तमम् ॥३०॥
चार बजकर बीस मिनटपर वह रथ यमुनाजीके राजघाट तटपर
पहुँच गया ॥ ३०॥
पूर्वस्यां यमुनासेतोः रक्तदुर्गस्य पृष्ठके ।
यतिराजशवं दग्धुं वेदिका निर्मिताभवत् ॥३१॥
यमुनापुलकी पूर्व दिशामें, लाल किले के पीछे, महात्माजीके शवका
दाह करने के लिये वेदी बनायी गयी थी ।। ३१ ।।
अष्टहस्तमिता दीर्घा विस्तृतापि तथैव च ।
हस्तद्वयमिता चोर्वेदिरासीदनुत्तमा ॥३२॥
वह सुन्दर वेदी आठ हाथ लम्बी, आठ हाथ चौडी और दो हाथ
ऊँची थी ।। ३२॥
होरार्धेन चतुर्होरे तस्यां वेदो महामुनेः ।
अवतार्य रथात्तस्मात्पवित्रः शायितः शवः ॥३३।।
सादेचार बजे महात्माजीका पवित्र शव उस रथसे उतारकर उस वेदिपर
मुलाया गया ॥ ३३ ॥
शर्मा रामधनो विद्वानस्नपयच्छवं तदा।
यामुनेन जलेनापि वेदो तस्या महात्मनः ॥३४॥
विद्वान् रामघनशर्माजीने उस वेदीपर महात्माजीके शरीरको यमुना
जलसे स्नान कराया ॥ ३४ ॥
मणानां पश्चदशकं घान्दनं काठमास्थितम् ।
फपूरं सेटकाः
पञ्चदशेकमणलाङ्गली ॥३५॥
द्रव्याण्यन्यानि योग्यानि चतुर्मणमितं घृतम् ।
एतैः मुयरतुभिस्तस्य शर्मान्त्येष्टिमफारयत् ॥३६॥

विंशः सर्गः
पन्द्रह मन (बंगाली तौल ) चन्दनकी लकडी, पन्द्रह सेर कपूर,
एक मन नारियल, चारमन घी, दूसरे भी मुगन्धित द्रव्य इन सब वस्तुओं
से रामघनश्शर्माने अन्त्येष्टि सस्कार कराया ।। ३५.३६ ।।
पलैः पञ्चभिरूने पन्नहोरे व्रजहिने।
सायाह्ने च सुतस्तस्य देवदासो गुणान्वितः ॥३७॥
सर्वेपामनिशमने यतिराजरावे तदा।
ध्वनिभिर्वेदमन्त्राणामग्निं प्रावेशयन्दत ॥३८॥
सायंकाल जब दिन ढल रहा था तब चार बजकर पंचावन मिनटपर
महात्माजीके ( छोटे ) पुत्र श्रीदेवदास गाधीने वेदमन्नों के साथ महात्मा
जीके उस गरीर (मृत ) में अग्निप्रवेश कराया जो मृत होकर भी सबकी
आगको शान्त कर रहा था ॥३७॥३८॥
अस्तंगते दिवानाथे प्रजानाथशवस्तथा ।
भस्मीभूय प्रकाशाट्यस्तमोहन्ता बभौ पुनः ॥३९॥
जब सूर्य अस्त हो गया था तन महात्माजीका शव भी भरम होकर
प्रकाशपुञ्ज बनकर अन्धकारका नाश करनेवाला होकर फिरसे शोभित
होने लगा ॥ ३९ ॥
साश्रुकण्ठा गलद्वाणी गतरत्ना गताश्रया।
निष्प्रकाशमनाः सर्वा जनता संन्यवर्तत ॥४
गला भरा हुआ था, याणी लडखडा रही थी, रत्न चला गया था,
आश्य टूट चुका था, मन प्रकाशहीन था, ऐसी जनता लौट आयी ||४||
चितारक्षाकृते तत्र सैनिकाः स्थापितास्तदा ।
प्रातःकाले पुनर्लोकाश्चितास्पर्शाय वनजुः ।। ४१ ।।
चिताकी रक्षा करनेकेलिये सकारने वहाँ सैनिक तैनात कर
दिये । प्रातःकाल होते ही फिर लोग चितास्पर्श करनेको वहाँ गये ॥४॥

२९०
पारिजातसौरभ
श्रीमाञ्जवाहरस्तन्न चितावेद्या हतप्रभः ।
मालां समर्पयामास पुष्पराजविनिर्मिताम् ।। ४२ ।।
पण्डित जवाहरलालजीने प्रभाशून्य होकर चिताकी वेदीपर गुलाबका
हार चढाया ॥ ४२ ॥
विधिवद्वेदवाणीभिः पूजां कृत्वा च भस्मनः ।
तृतीयस्मिन्दिने सोमवारेभूत्संचितं हि तत् ॥ ४३ ।।
तीसरे दिन सोमवारको (जो श्रीमहात्माजीका मौनवार था,)
घेदम-त्रोंसे श्रीभस्मकी विधिवत् पूजा करके भस्मसंचय किया गया ||४३||
गाङ्गेयेन जलेनैतद्वेदपाठपुरस्सरम् ।
अभिपिच्य व्यधात्ताम्रपाने पावित्र्यसंमते ।।४४॥
वेदपाठ करके गङ्गाजलसे उस भरमका अभिषेक करके पवित्र ताम्र-
पात्रमें पधरा दिया गया || ४४ ॥
भस्मसंग्रहकालेपि राजदूता विदेशिनः ।
पत्रसम्पादका सर्वे देशदेशान्तरागताः॥ १५ ॥
भस्मके संग्रह करने के समय भी विदेशीय राजदूत तथा देश-
देशान्तरसे समाचार पत्रोंये सम्पाटक सब आ गये थे।॥ ४५ ॥
वह्वो हिन्दयस्तन्त्र नेतारो मुस्लिमास्तथा ।
निखिलाः प्रान्तपालाश्च सर्व एव उपस्थिताः ॥ ४६॥
वहाँपर बहुतसे हिन्दूनेता, मुस्लिमनेता, और सब गवर्नर, यह सब
उपस्थित थे॥४६॥
द्वादश्या फर्यरीमासे भस्मनोंशः कियानपि ।
महता मुप्रवन्धेन प्रक्षिप्तो यमुनाजले ।। ४७ ॥
ता. १२ फरवरी १९४८ ई. गुरुवारको बड़े भारी प्रबन्धके साथ
उरा भरमका थोड़ा-सा भाग यमुनाजीमें डाला गया ॥ ७ ॥

विशः सर्गः : महापुण्यात्मनस्तस्य दृष्टुं भत्मविसर्जनम् । पारा वैदेशिका लोका यमुनासेतुसंस्थिताः ॥ ४८ ॥ श्रीमहात्माजीके मरमविसर्जना दर्शन करनेकेलिये नागरिक और विदेशीय लोग यनुनापुलपर खडे थे ॥ ४८ ।। तीर्थराजे प्रयागे च मुनिवृन्दाभिपूजिते । त्रिवेण्यां भस्म विस्रष्टुं प्रबन्योनुत्तमोभवत् ।। ४९ ॥ मुनियोंसे सेवित तीर्थराजप्रयागमें निवेशीमें मरमविसर्जन करने के लिये बहुत सुन्दर प्रबन्ध हुआ था || ४९ ॥ विशिष्टधूमयानेन पताकामूपितेन च। प्रयागं भरम तन्नेतुं प्रादिष्टन्त च नायकाः ।। ५ ।। पताकाओंसे सजायी हुई रेलगाड़ी द्वारा उस भरमको प्रयाग लेजाने के लिये नेता लोगोंने प्रत्यान क्यिा ।। ५.॥ धूमयानं हरिद्वणं सर्वशोमाकरं परम् । टसद्राष्ट्रपवाकाभिः पुष्पमालाविभूपिवम् ।। ५१ ॥ चतुर्भिश्च शतैो परिपूर्ण समन्ततः । देहटीस्टेशने द्रष्टुं जनानां कोटयः स्थिवाः ।। ५२ ।। जिसका रंग हरा या, शोमा अपार थी, राष्ट्रहोसे को चोमित थी, फूलोंकी मालासे जो सजायी गयी यी, चार सौ मनुष्य जिसमें बैठे थे, उस, रेलगाडीकोदेखनेकेलिये करोड़ों आदमी दिल्ली स्टेशनपर उपस्थित हुए ||५२॥ भवितेझोकचक्रेण सिंहमुद्राभिरविते । महाभाग्ये च तद्याने शासनस्था यशस्विनः ॥ ५३ ।। स्वदेशीयविदेशीयाः पत्रकाराश्च सैनिकाः। उच्चाधिकारिणः भस्म संरक्षापिठाः समे ॥ ५४ ।। उस गाड़ीमें अशोकचक्र लगा हुआ था, सिंहकी मुद्राएँ लगी थीं। उसमें पैठनेवाले शासनके लोग ये, स्वदेशीय और विदेशीय पत्रकार २९२ पारिजातसौरभे - थे, सैनिक थे, उच्च अधिकारी थे। वह सब भस्मकी रक्षाकेलिये नियुक्त ये ॥ ५३ ॥ ५४॥ व्यवस्था पहियानस्य निरीक्ष्य च परीक्ष्य च । जवाहरो जवेनागात्तीर्थराज खयमना ।। ५५ ॥ पण्डित जवाहिरलालजी रेल्गाड़ीकी व्यवस्था देखकर और परीक्षा करके विमानसे प्रयाग चले गये ॥ ५५ ॥ अग्नियानविभागस्याध्यक्षजानमथायिना प्रबन्धोक्रियत श्रेष्ठः तस्यया नस्य भस्मनः॥ ५६ ।। रेलविमागके अध्यक्ष श्री जानमथायीने उस भस्मकेलिये गाडीका उत्तम प्रबन्ध किया था।।५६ ।। तत्रैकस्मिन्महाभागे विभागे यानमध्यगे। चतुष्पादमधिष्ठाय चतुष्पाद व्यराजत ॥५॥ गाडीके बीचों बीच एक विमागमें एक चौकी रखी गयी थी ओर उसके ऊपर दूसरी चौकी शोभा देती थी ।। ५७ ॥ वस्त्रेण खहरेणेमे चतुष्पाद स्तुते उभे। उपरिष्वे चतुष्पादे भस्मपात्रं न्यधीयत ॥ ५८ ॥ दोनों ही चौक्यिाँ सद्दरसे दंकी हुई थीं। ऊपरकी चौकीपर भस्मपात्र रखा हुआ था ।। ५८॥ रक्षाये तस्य पात्रस्य सैनिकानां चतुष्टयो। प्रामाणिकी च सश्रद्धा शासनेन न्ययुज्यत ६ ५९ ।। उम मम्मपात्रको रक्षाफेलिए सरिकी औररो प्रामाणिक और प्रदान चार मनिक तैनात किये गये थे।॥ ५९॥ अग्नियानस्थितिस्थानेष्यखिलेषु च सैनिकाः। पणियुक्ताः स्थिता आसनक्षितुं भस्म भास्वरम् ।। ६०॥

विगः सर्गः २९३ समी स्टेशनोर छ सैनिक मन्नी रक्षारोटिये नियुक्त ये ॥ ६ ॥ सर्वव पथि प्रेष्ठदेहमस्मानुदर्शनम्। कर्नु संगता आसन्नसंस्थेया महाजनाः ॥ ६॥ रान्तेमे समी जगह उस परमप्रियके मलका दर्शन करने के लिये अगमिव लोग कहे होते ये ।। ६१ ।। दिल्लीतो गाजियाबादं यद्वियानमुपागमत् । अलीगढ़ तवः प्रापत् ढूंटला व ततः परम् ॥ ६ ॥ गादी दिल्लीसे गाजियाबाद, अलीगढ कर टंडला पहुँची ॥ १२ ॥ कानपूरं वतः भागात्प्रयागं यज्ञपावितम् । इदानीं मरमना तेन पुपूपन्तं स्वमादयत् ।। ६३ ।। एंडटासे गाड़ी कानपुर पहुँची। वहासे प्रयाग में गाडी पहुंच गयी। मयाग यहों में तो पवित्र ही था और अब उरा मम्मसे अपनेको पवित्र करना चाहता था।। ६३॥ तद्रष्टुं श्रीमहादेवमस्म पूतं परं जनाः। ए दूरतरात्मापु. प्रातुमेव कृतार्थताम् ।। ६४॥ उन महान् देवके परम पनि मस्मका दर्शन करने के लिये और वार्य होनेकेलिये दूर दूरसे दोग वहाँ आये थे ।। ४ ।। संगवाः पूर्वमेवासम्पयागे कुम्भपर्वणि । वहवस्तेन. संमईः कल्पनातीत उत्थितः ॥ ६ ॥ प्रयागमें कुम्मका पर्व था अतः पहिलेसे ही बहुतरो लोग इरहे थे। अतः मम्म के समय कल्पनातीत मीड शट्टी थी ।। ६५ ॥ एको रथो महास्तन दारवः सुविभूपितः । पतामाभिध्वनेश्चैव दर्शनीयो व्यतिष्ठत ॥६६॥ यहाँ स्टेशनपर पताकायों और घोंसे विभूषित अत एव दर्शनीय एक लकड़ीसा महान रथ तैयार था ।। ६|| २९४ पारिजातसौरभे - भस्मपान महामूल्यमवतार्य रथावत, स्थापयामासतुस्तस्मिन्नथे नेहरूवल्लभो । ६७ ॥ उस गाडीपरस महामूल्य भस्मपात्रको उतारकर प० जवाहिरलालजी और सारवल्लभभाई पटेल, दोनोने उस रथपर स्थापित किया ॥ ६ ॥ रथो महान् पुनस्तत्र मण्डपो निरमीयत । मध्येमण्डप भव्य सिंहासनमुपस्थितम् ।। ६८॥ एक तो रथ ही बहुत बड़ा था उस पर मण्डपके मध्यभागमें एक सिंहासन रसा हुआ था ।। ६८॥ तस्मिन्सिहासने देवदेवस्य तनुभस्मन कियानेवांश उत्क्षेप्तु त्रिवेण्या सन्यधीयत ॥ ६९ ॥ उस सिंहासनपर महामाजीके भरलका थोडासा भाग त्रिवेणीमें पधराने के लिये रखा गया ॥ ६९॥ अहो रथस्य वैशाल्यमहो शोभा महीयसी । पुष्पहारमहाराजिराजितस्य पताकिन ॥ ७०।। पुष्पहारों और पताकाओंसे सुद्योमित उस रथकी विशालताकी क्या कहें। उसकी बडी शोभाका कैसे वणन हो १ ॥ ७० ॥ जनाना कोटयस्तत्र मार्गे भस्म दिक्षय । चिरेण समतिष्ठन्त विगतस्पन्दचक्षुप ॥७१ ।। मस्सरे दर्शनक लिये रौस्तेमें निर्निमेष (ऑखकी पलक गिराय बिना ही ) देरसे लोग सहे थ ॥ ७१ ।। भस्मोद्धूलितसद्गात्र फैलासशिसरे स्थित । महादेव इव ध्यात मण्डपस्थ च भस्म तत् ॥ ७२ ।। जसे कैलास शिसरपर भस लगाय हुए शङ्करनी ही न हों, इस प्रयारस उस मण्डपन स्थित भस्मको लोगोंने समझा ।। ७२॥

विंशः सर्गः २९५ । सर्वेषामग्रतो गच्छन्मोटर ध्वनिवर्धकम् हृदये संनिधायेव भावयवृत्तमन्तिमम् ।।७३ ।। सबसे आगे एक मोटर थी। उसमें लाउड स्पीकर रखा हुआ था। अब कहाँ क्या होगा उसकी सूचना व ध्वनिवर्धक यन्त्र दे रहा था |७|| पादातेगोरखासैन्यैरश्वारोहैश्च मैनिकः अनुयातो रथो यातत्रिवेणीसंगमं तदा ॥७॥ रथके पीछे-पीछे गोरखा फौज थी, घोड़ेसवार सैनिक थे। वह रथ निवेणीसंगमपर पहुँच गया ॥ ७४ ।। गगा च यमुना चैव महाभागा सरस्वती । भरारूपमुपायान्तमपश्यन्विष्णुमीहितम् ॥७॥ गङ्गा, यमुना और सरस्वतीने भरमरूपसे आते हुए भगवान् विष्णुको देखा ।। ७५ ॥ तदर्शनेन सर्वासा हृदयं शैत्यमस्पृशत् । तञ्च स्वहृदये घातुं सर्वा एव तरङ्गिताः ॥ ७६ भष्मदर्शनसे ही तीनों पवित्र नदियोंका हृदय शीतल हो गया। उस भस्मको अपने हृदयमें धारण करनेके लिये समी तरङ्गित हो गयी थीं ।। ७६ ॥ अनन्तादेव कालात्सा सुगुप्तापि सरस्वती । प्राकट्यमुपगत्यैव भस्म सश्रद्धमप्रहीत् ॥७७ ।। अनन्तकालसे गुत रही हुई सरस्वतीने प्रकट होकर श्रद्धाके साथ उस मस्मको ग्रहण कर लिया ॥ ७७ ॥ आगता च महानोका सर्वपुण्यमहेश्वरी । महापुण्यं महादेवमस्म तद्धृदये न्यधात् ॥ ८ ॥ सर्वपुण्योंकी रानी जेठी एक बड़ी नाव आयी और वह भरम उसमें रसा गया ।। ७८॥

२९६
पारिजातसौरभे
-
शनैः शनैश्चचालाशु नृत्यन्तीव कृतार्थिता ।
देवदुर्लभदेहस्य भस्मस्पर्शमुदान्विता ॥७९॥
कृतार्थ होकर नाचती हुईके समान वह नौका देवको दुर्लभ
महात्माजीके देहके भरमके स्पर्शसे प्रसन्न होकर धीरे धीरे चली ॥७९||
वेदमन्त्राक्षरारावः प्रार्थनागीतिकारवैः
रामनाम समुच्चार्य भस्मपात्रं जलेर्पितम् ॥ ८॥
वेदमन्त्रोंके घोपके साथ, प्रार्थना गानके साथ, श्रीरामनामका
उच्चारण करके वह भरमपान त्रिवेणीमे रख दिया गया ॥ ८ ॥
आसीदुन्मना गंगा हरेः पादसरोजना
निरस्तशोकसन्तापा तदाभूद्भस्मसंगतः ॥८१॥
विष्णुभगवान्के चरणकमलमे निकली हुई गङ्गा व्याकुल बन गयो
थी। परन्तु उस भस्मके सम्पर्कसे उसके शोक और सन्ताप दूर
हो गये ।। ८१ ॥
कृष्णसंगाकृष्णजला सा कृष्णान्तर्मनाः सदा ।
यमस्वसा क्षणं जाता सिता तद्भस्मसंगते ।।८२ ॥
श्रीकृष्णके सगसे कृष्णा जलवाली और कृष्ण अन्त करणवाली यमराज-
की बहिन यमुना मी क्षगभरके लिये महात्माजीके भस्मके सयोगसे
श्वेत निर्मल बन गयी ।। ८२ ।।
सरस्वती चिरेणासीत्ता गुप्ता प्रियवदा ।
नराकारा यहियाता भस्मपितृत्तयाथ सा॥ ८३॥
प्रियमापिगी सरस्वती अनन्त वर्षांस यह गुप्त थी। यह भी मनुष्यों के
रूपमें भरमस्पर्श करने की इच्छासे बाहर आ गयी || ८३ ।।
विद्यन्ते भारवे पुण्या यायत्या सरितो नदाः।
संभेदाः पुण्यकासारा भरमना पाविताच ते ॥ ८४ ॥

विंशः सर्गः
पुनः।
मारतमें जितनी पवित्र नदियाँ हैं, नद हैं, सगम है, पवित्र सरोवर
है, वह सभी उस भस्मसे पवित्र किये गये ।। ८४ ॥
सर्वपायां श्रीकाश्यां हरिश्चन्द्रस्य घट्टके ।
गङ्गायां पृतपापायां यतेर्भस्म न्यधीयत ॥८५||
श्री काशीमें गगाके हरिश्चन्द्र घाटपर महात्माजीका भरम विसर्जिन
हुआ ॥ ८५ ॥
हरद्वारे भवद्वारविभेदकुशले
नरपौड्यां महापूज्यमभवन्निहितं च तत् ।।८६॥
ससारको दूर करनेवाले हरद्वारमै हरकी पैडीमें वह महापूज्य भरत
'पधरा दिया गया ॥ ८६ ।।
गढमुक्तेश्वरे गड्डा यमुना मथुरापुरे।
श्रीमतो देवदेवस्य निदधाते च भस्म तत् ।।८७||
गढमुक्तेरसरमें गगाने और मथुरामें यमुनाने देवों के देव महामाजीके
भस्मको रस लिया है ॥ ८७॥
देहरादूननगरे त्रिवेणीघाटनामके ।
श्रीमीरा विदुपी वीरा प्रावाहयत तत्पुन' ।।८८il
देहरादून में त्रिवेणी घाटपर उस भरमको विदुषी श्री मीरा बहिनने
पधरा दिया ।। ८८॥
श्रीसोरोघाट्टवेत्याख्ये तीर्थस्थानेधिभीष्मसु ।
अयोध्याया सरय्यां तन्यक्षिप्यत महन्छुचि ॥८९॥
सोरोघाट में गगाजीमें, अयोध्यामे, सरयूजीमें वह महत् पवित्र वस्तु
पधरा दी गयी ।। ८९॥
रामपूरनवावेन सभार्येण प्रवाहितम् ।
देहलीतस्तदानीतं सङ्गमे कोसिमल्लयोः ॥९॥

. २९८ पारिजातसौरभे अपनी बेगमके साथ रामपुरके नवाबने । भरमको कोसी और मलके सगममें प्रतिष्ठित : सिन्धा. मिढीलायां च सरिति पावनं भस्म उस प्रख्यात दाडीमे, महासागर में और वह पवित्र भरम आज भी शोभित है ॥ ९१ ।। गोधरानगरे मह्यां गोहाट्यां । घट्टे च निदधे श्रीमान् भस्माकमर गोधरामें, महीनदीमें तथा श्री अकबर घाटपर उस भस्मको पधराया ।। ९२॥ धुव्री च गोलपाडा च तेजपूरं च डिब्रूगढे सिलहट शिलोंगे। कुकीलमुखदेसंगमुखे च । इम्फालं जोरहाट चेत्यायेपु महात्मनः शरीरस्य म ब्रह्मपुत्रे जनै व्यनिक्षिप्त धुनी, गोलपाहा, तेजपुर, सादिया, । शिवसागर, कुकीलमुख, देसंगमुस, आदि नगरों और स्थानोंमें ब्रह्मपुत्र नदमें he भस्म भावुक लोगों द्वारा रस दिया गया ॥ ९३ , उदीच्या कालिकाताया दिशि ली.. तस्यामपि च तद्भस्म राजते फलकलेकी उत्तर दिशा में हुगली नदी है, पधरा दिया गया।॥ १६ ॥ त्रिवेण्या घद्गदेशेषु फंसायत्यां च वय नगरे म " विंशः सर्गः २९९ तद्यतेः । वीरभूमे च सूरी च सतीघाटे महोजसि । श्रीमौराख्यां महानद्या भस्मतेज: प्रकाशते ॥१८॥ बङ्गालमें हुगली शहरके पास नियणीमें, मेदिनापुरमें, पंसावती नदीमें, वीरभूम जिलेमें गरि टाउनके पास मौराक्षी नदीके सतीघाट पर उस मरमका तेज प्रकाशित होता है।॥९७-९८॥ अधिवाझणपाटेपि घुवोनयां विराजते । ब्रह्मतत्त्वविदस्तस्य श्रीयतेमस्मनो लयः ॥१९॥ प्राझणपाडाके Kuo कुवो नदीमें ब्रह्मतत्त्ववेत्ता श्रीमहात्माजीका मम शोभित हो रहा है ।। ९९ ॥ रामपुरहट्टपाचे संघाटायां महापुत्रनदे लागलपन्धे तगम शोभते ॥१०॥ Rampurhat गमपुरहाटके पास Shanghata शंघाटा नदीमें और नारायणगंज के पास ब्रह्मपुत्र नदीके Langalbandh लागल- पन्धमें वह भस्म मुशोभित है ॥ १० ॥ सरमाया सिरहदे भारतीयमहागुरोः । भस्मतवरमनन्ताय कालाय च विशोभते ॥१०॥ सिलहटमें Surma सरमा नदीमें भारतफे महागुरुका वह मल अनन्त काल के लिये चोभा दे रहा है ॥१.१॥ साशीतुशाजी-तिनाम्नोः पर्वतयोर्यतस्ततः । नदीपु प्रहन्ती प्रसरणीषु तद्गतम् ॥१२॥ साची और एयाची नामक पर्वतोंमें बहाँ तहाँ बहती हुई नदियोंमें उस मस्सा विसर्जन हुआ ॥ १०२॥ परसुरामकुण्टेपि तल्लासेयर पारुआ। सामतीराज्यनृपतिनिंदरावे परे सद ॥१३॥ .

२९८
पारिजातसौरमे
अपनी बेगमके साथ रामपुरके नवाबने दिल्लीसे लाये गये हुए
मस्मको कोसी और मल्लके सगममें प्रतिष्ठित किया ॥ ९ ॥
दाण्ड्यां तस्यां महासिन्धौ धारडोल्यां यतेस्तनोः।
मिढीलायां च सरिति पावनं भस्म राजते ॥११॥
उस प्रख्यात दाडीमें, महासागरमें और यारडोलोमें मिटीला नदी में
वह पवित्र भस्म आज भी शोभित है॥९१ ।।
गोधरानगरे मह्यां गोहाट्या सुखलेश्वरे ।
घट्टे च निदधे श्रीमान् भस्माकवर हैदरी ॥१२॥
गोधरामें, महीनदीमें तथा श्री अकबर हैदरीने गोहाटीमें मुखलेश्वर
घाटपर उस भरमको पधराया ॥ १२॥
धुनी घ गोलपाडा च तेजपूरं च सादिया।
डिमगढ़ सिलहटं शिलोंग शिवसागरम् ॥१३॥
कुकोलमुखदेसंगमुसे च कोहिमा तुरा।
इम्फालं जोरहाट चेत्यायेषु नगरेषु च ॥१४॥
महात्मनः शरीरस्य भास्वरं भस्म पापनम् ।
ब्रह्मपुत्रे जनैभव्यनिक्षिप्तं श्रद्धया मुहुः ।।१५।।
धुनी, गोलराठा, तेजपुर, मादिया, दिगढ, सिलहट, शिलोंग,
शिवसागर, पुशीलमुग, देसंगमुरा, कोहिमा, सुरा, हमारा, जोरहाट
आदि नगरों और स्थानोमें ब्रह्मपुत्र नदमें महात्माजीफे शरीरका पवित्र
मरम भावुक लोगों द्वारा राप दिया गया ।। ९३-९४.९५ ॥
दीच्या पालिसानाया दिशि हुगली पयस्विनी ।
तस्यामपि च तम राजते सर्यपापनम् ॥१६॥
मलेगी उपर दिशामें हुगली नदी है, उगमें भी यह पवित्र भरम
पपय दिया गया ॥ ९ ॥
निग्या पद्देशेषु हुगलीनगरान्तिफे।
माया प वय नगरे मेदिनापुरे ॥९॥

विंशः सर्गः २९९ च तयः। वीरभूमे ष सूरी च सवीघाटे महोजसि । श्रीमाराक्ष्या महानद्यां मस्मवेज: अगरते ॥१८॥ बगारमें दुगठी शहर के पास त्रिवेणीम, मेदिनापुरमें, संसावती नदीमें, चीरभूम विमें सरि गठनके पास मायशी नदीक गतीघाट पर उस मरमका तेज प्रकाशित होता है ।।९७-९८॥ अचिव्राह्मणपाडपि कुवोनद्यां विराजते । मझतत्त्वविदस्तस्य श्रीयतेमस्मनो लयः ॥९९१ ब्राह्मणपाटाके Kuo कुवो में ब्रह्मतत्परेचा श्रीमहामाजीका मल शोमित हो रहा है।॥९॥ रामपुरहट्टपार्य संघाटायां ब्रह्मपुत्रनदे लागलबन्धे तदस्म शोमते ॥१०॥ Rampurhat गमपुरहाटके पास Shanghats पंचाटा नदीमें थौर नारायगांव के पास ब्रह्मपुत्र नटीके Langalbandh लागल- बन्धमें यह मन्स मुशोभित है ।। १००॥ सरमाया सिटटे भारतीयमहागुरोः । मस्मतवत्मनन्ताय कालाय च विशोमते ॥१०॥ सिलहट में Surma सरमा नदीमें मारतके महागुरुका वह मल अनन्त काल लिये धीमा दे रहा है ।।१०१॥ सामी-नुशाजी-निनाम्नीः पर्वतयोर्यतस्ततः । नदीपु प्रहन्तीपु प्रसरणीषु तद्गतम् ॥१२॥ सासी भार टुयायी नाम तो वहाँ वहाँ पठी दुई नदियों में उस मम्मका निभईन हुआ ।। १०२ ।। परशुरामगुण्डपि वल्लासेयर सामनी राज्यनृपतिनिंदयाते सह ॥१०॥ यादा। ' ३०० पारिजातसौरभे यत्र श्री० ओ० के० दास लोखेश्वर बरुआ और खामती स्टेटके राजाने अन्य लोगोंके साथ परशुराम कुण्डमे उस भरमको पधराया ॥ १०३ ॥ धाकधाकशिने श्रीचैतन्यो व्यजायत। महात्मनः शरीरस्य भस्म तद्राजते शिवम ॥१०४॥ जहाँ श्रीचैतन्यमहाप्रभुका जन्म हुआ था वहाँ धाकधाकशिनमें यह भस्म अर्पित हुआ था ।। १०४ ॥ हैदराबादराज्ये निजामोस्मानसागरौ । संगत्य दधतुर्भस्म देवदेवस्य पावनम् ।१०५॥ हैदराबादस्टेटमे दो सागर है-१ निजाम सागर २--उस्मानसागर इन दोनोंके सगमपर महाप्रभुका भरम रखा हुआ है ॥ १०५ ।। बैंगलोरे च पश्चिमवाहिन्यां राजघाटके । महीशूरेपि तस्यां तत् निहितं सार्वलौकिकम् ।। १८६ ।। बैंगलोरमें पश्चिमवाहिनीके राजघाटपर तथा मैसूरमें भी उसी नदीमें वह भम्म रस दिया गया ॥ १०६ ।। भद्रायां शैवलिन्यां च संगमे तुगभद्रयोः । ताव्यां नद्यां च काश्मीरे भस्म तद्राजते पुनः ।। १८७ ॥ भद्रा नदीमें तया तुङ्ग और भद्रा के सगममे एवं कश्मीरमें तावी नही में वह भस्म शोभित हो रहा है ।। १०७॥ आज्या श्रीराजकोटे च समुद्रे पोरबन्दरे । श्रीदामोदरकुण्डे तत्सौराष्ट्रेस्ति जुनागढे ।। १०८ ॥ राजकोट में भाजी नदीमें, पोरबन्दरमें ममुद्र में और जूनागढमें दामोदर कुण्डमें वह भस्म विद्यमान है ।। १०८॥ मौरठयां घोलनाथस्य सयिधे मन्छनामिका । सरिदद्यापि संघत्ते भरम तद् देहज यतेः ।। १०९।।

विशः सर्गः मोरपी में घोलनायके पास मछु नदी मात्र मी ठस मलको धारग कर रही है ।। १०९॥ गोण्डले जामनगरे वचभूमिपदी स्वयम् । भस्मादाय महद्दिन्यं दधाते दिव्यपारिणि ।। ११०।। गोंडल और डामनगरके राजाने स्वयं उस दिव्य मलको लेकर दिव्य जलमें रख दिया। ११०॥ समुद्रे भावनगरे विलसाभूपविश्व वत् । न्यदधाद्विल्यगद्गायां यतिदेहस्य पावनम् ।। १११ ।। मावनगरमें समुद्रमें और विलग्याक टापुर माहेबने उस भन्नको विस्वगढ़ामें पधरा दिया || १११॥ वालायां स्थोन्मत्तगङ्गायां तस्य भूपतिः । माण्डन्यां चापि कच्छेपु क्रीके श्रीपलानिजिः ॥११२।। पालाम्टेटमें वागरे राजाने उन्मत्तगणाने और कयामें माडवीमें श्रीकृपलानीजीने कीक नदीमें मम्म स्थापन किया ।। ११२ ।। शिपायामुञ्चयिन्यां च तयेन्दोरेघिनर्मदम् । धारपि कोटेश्वरस्य नर्मदायामुरान्तिके ।। ११३ ।। उनमें विधानदीमें, इन्दोरमें नर्मदा, घारमें मोटरसर के पास मम्मस्थान किया गया ।। ११३।। भोपाले च महामाये राजमाने सरोवरे। सेवानाम्यायां सरिति पानारपि महागुमे ।। ११४ ॥ भोपालरे महामगेर तथा मेवान नदीम, एवम् पौनार स्थानमें मी मन्म पधराया गया ॥११४॥ जयरपुरे विल्वाराषटके नामदे यतेः । देहशेपोमयत्सितः श्रेयसे महते नृणाम् ।। ११५ ॥

३०२ पारिजातसौरभे जबलपुरमें नर्मदामें तिलवारा घाटपर, लोगोंके कल्याणके लिये महात्माजीका देहशेष-भस्म पधराया गया ।। ११५॥ अकोलायां च घाघोलीसविधे पूर्णनामिका । विराजते स्रोतस्वती तस्यां तत्संन्यधीयत ॥११६|| अकोलामें वाघोलीके पास पूर्ण नदीमें भस्म रख दिया गया ।।११६॥ हरिहरे तुगभद्रा भस्मादाय तु तच्छुचि । प्रसन्नवदना देवी राजतेद्य कृतार्थिता ॥११७।। हरिहरमे तुङ्गभद्रा उस पवित्र भरमको प्राप्त करके आन कृतार्य हो गयी है ।। ११७॥ वेलगामे च कांग्रेसकूपे तन्निहितं पुनः । आलन्दी सविधे नद्यामिन्द्राण्यामपि तद्गतम् ।।१२८।। बेलगॉवमें काग्रेस कूपमें और आलन्दीके पास इन्द्राणी नदीमें वह मरम पघराया गया ॥ ११८॥ नरसोबावाडीस्थाने कृष्णायां पण्ढरे पुरे । चन्द्रभागेतिविख्यातना तदस्म शोभते ।।११९॥ नरसोबावाडीमें, कृष्णानदीमें तथा पण्ढरपुरमें चन्द्रभागा नदीमें वह भस्म सुशोभित है ।। ११९ ॥ गोकर्णे कोटितीर्थे च तथा कोल्हापुरेपि तत् । पञ्चगङ्गे नरसिंहवाप्यामपि राजते ॥१२०॥ गोकर्णमें कोटितीर्थके पास, कोल्हापुरमें पञ्चगङ्गा और नरसिंह बावडीमें यह मस्म शोभित है ।। १२० ॥ श्रीकृष्णावर्णयोः पुण्ये संगमे मीरजे पुनः । सांगल्यां चापि कृष्णार्या पायनं तद्विशोभते ॥१२॥ मीरमें कृष्णा और या सगममें और सांगली में कृष्णा नदीमे या मरम मुशामित है ॥ १२१ ।।

विशः सर्गः ३०३ संगमे । गोवायां सागरे तच स्थानेषु बहुए प्रभोः। पवित्रं परमं भस्म निक्षितं देवदुर्लभम् ॥१२॥ गोवामें समुद्रमें बहुत से स्थानों में वह देवदुर्लभ पवित्र भरम पराया गया। १२२ ॥ मद्रासे च महासिन्धौ श्रीरङ्गेपि च धार्मिके। कावे-मम्मापट्टणघ तत्स्थापित महत्॥१२३॥ मद्रासमें महासागरमें और श्रीरङ्गम्में कावेरीमें अम्मापट्टण घाटपर वह महनीय मस्म पराया गया || १२३ ॥ रामेश्वरे रत्नाकरमहोदध्योश्च सविधे च रामसेतोस्तदासीनिहितं शुचि ।।१२४॥ रामेश्वरमें रक्षाकर और महोदधिके संगममें सेतुके पास वह पचिन मस्म पराया गया । १२४ ।।. कन्याकुमारीसंस्थाने सिन्धूनां संगमे पुनः । त्रयाणां निहितं भस्म जयत्सद्यापि सर्वदम् ॥१२५।। कन्याकुमारी में तीन समुद्रोंके संगममें वह मरम पधराया गया और आज भी यह विजयी है ॥ १२५ ।। विस्फोईलुरे पुण्ये पेन्नारेधिमयानि च। नेत्रपत्याः पुलान्याश्च संगमे मैगलोरके ॥१२६।। पवित्र तिरुकोइलरमें पेन्नार और मयानी नदियों में तथा मैंगोरमें नेत्रवती और पुलानीफे संगममें ॥ १२६ ॥ कालीकटे प भारतपुझायां नोवले ठया । कृष्णायां विजयवाडानगरे तत्समर्पितम् ।।१२७॥ कालीकट में मारतपुप्ता और नोयल नदियों में तया देवपाडा (विजय. वाट ) में कृष्णा नदीमें वह मरम समर्पित हुआ।। १२७॥

३०४ पारिजातसौरभे तत्पुनः ॥१२॥ गोदावयाँ तथा राजमाहेन्द्रयां नासिके तथा । रामकुण्डेभवक्षिप्त पावनं भस्म राजमहेन्द्रो में गोदावरी नदीमें तथा नासिकमें भी गोदावरी में राम. कुण्डमें वह भस्म पधगया गया ।। १२८ ।। चौपाट्या मोहमय्यां च सागरे च जुहुस्थले । जलन्धरे सतलजे तदासीत्तत्समर्पितम् ।।१२९॥ वम्बई में समुद्र में चौपाटीपर, जुहूमे--जहाँ महामाजी बहुत वार शान्ति के लिये निवास करते ये समुद्र में, और जलन्धरमे सतलज नदीमें उस समय वह भरम पधराया गया ॥ १२९ ।। कपूरथलानगरे व्येनाख्ये निझरे पुनः । निहितं तच्च सम्मान्यमजमेरे च पुष्करे ॥१३०॥ कपूर्थलामें व्येन झरने में और अजमेर में, पुपर सरोवरमे यह भस्म पघराया गया ॥ १३०॥ बनास-चम्बल-सीपाख्यनदीना संगमे शुचौ। जयपुरे जगन्नाथदेहभस्म विराजते ।।१३१॥ जयपुरमें बनास, चम्बल और सीप नदियों के संगममें महात्माजीका देहमस्म शोभित हो रहा है ॥ १३१ ॥ यीकानेरे मुभगे कोलायतसरोवरे । चन्द्रभागायां च प्रजनगरेप्यस्ति शोभितम् ।।१३।। बीकानेरमे कोलायत सरोवरमें और प्रजनगरमें चन्द्रभागामें यह मम्म मुसोमित है ॥ १३२ ।। अयुदे प नपीनाग्नि महापुण्ये सरोवरे। दययान्यां च निहितं वत्समिरमरोयरे ॥१३॥ मद (भाषु ) में नग्पी तामाममें और मर मरोदर-देवयानी में यह मरम पपराया गया ।। १३१॥ .

विंशः सर्गः
३०५
झायुवाराज्ये
शुचि तद्देवझारीसरिजले।
मुचुकुन्दे धौरपुरे संनिहितं सरोवरे ॥१३५।।
झभुआ स्टेटमें देवझारी नदीमें और धौलपुरमे मुचुकुन्द सरोवरमें
यह मरम निहित है ।। १३५ ॥
ओरछायां वेतवानद्यां कलकतापुरे।
गङ्गायां सर्वदारिद्रयदारिण्यां तन्यधीयत ॥१३५।।
मोडछामें बेतवानीमें और कलकत्ता में भागीरथी नदामें उसे
पधराया गया ।। १३६ ॥
गगागण्डकयोः पुण्ये संगमे पटनापुरे।
गयायो फल्गुसरिति राच्यां दामोदरे पुनः ।।१३७॥
पटना में गड़ा और गण्डक के सगमपर, गयाम फल्गु नदीमें और
राची में दामोदर नदीमें ॥ १३७ ॥
मोतीहायां नारायण्यां पिपराख्ये च घट्ट के ।
श्रोमदगोदायरोगंजबाटे तदधिशोभते ॥२३८॥
मोतीदारी में नारायणी नदीम, सिरापार और गोदारीगंज पाटपर
वह मरम सुशोभित है ।। १३८ ।
पालनपुरे बनासे
पालनपुरभूमुना ।
नवावास्येन तदस्म लोकैः साधं न्यधीयत ॥१३९॥
पालनपुरमें यह नया साहेबने लोगों के साथ उम भरमको बनास
नदीमें पपररा दिया ।। १३१ ॥
लूगावालाभिवे स्थाने केदारेश्वरपार्श्वगे।
सरितां तिसगां चापि संगमे भस्म शोभते ॥१४॥
लागलामें फेटारघर के पास तीन नदियों के रागनमें वह मरम
घोभित है।॥ १४ ॥

३०६ पारिजातसौरभे सुरते नगरे ताप्या खम्भाते च महोदधौ । महापुरुपदेहस्य भस्मलेशो विशोभते ॥१४॥ सुरत शहरमें वापी नदीमें, खमातमें समुद्रमें उन महापुरुषका देहमरम शोभित हो रहा है ।। १४१ ॥ डेरा इस्माइलखानसविधे सिन्धुपारिणि । ढाकानगरे लागलधुन्दे भस्माधिराजते ॥१४२॥ डा इस्माइलखान के पास सिन्धु नदीमें और दाकरमें लागल बुन्दमें मरम शोमा दे रहा है।॥४२॥ फ्टके च सातजुयां श्रीपुयां च महोदधौ । मयूरभजनगरे वैवरण्या विराजते ॥१४॥ कर में सातपुरीमें, पुरी में समुद्रमें, मयूरभजमें वैतरणीमें यह भस्म शोमा दे रहा है ।। १४३ ॥ पेयॉनरेपि तस्यां च चाडोदे चाधिनर्मदम् । पोम्योसविघे सिन्धी युद्धस्नाते च घट्टये ॥१४४॥ पातरगामासरिधेप्यधिमाणिक्गद्गये। त्रिकोमारीसविपि सागरे भस्म राजते ॥१४॥ पोजर में भी वैतरणी नदीमें, चाहोदमें नमदागे, फोलमोर पास समुद्र में-जहाँपुर मगरा मान करते ये उस पारपर, पारगामा पाय मानिक गना, शिकोमालीके पास समुदमें भरम विराजमा फेण्डामादशिखरे जापनासविधे तथा। शिरिमताइसलिरे भस्म तन्निहित सदा ॥१४६|| पारी में आरमर शिवरपर, पासा पाठ पिरिमलहमें उस गमपा पाया गया है। १४६ ॥

विंशः सर्गः पुण्ये चाहमदाबादे यत्र सामायतीश्वरः । वर्षपून्निधासेन जनतां समशिक्षयन् ॥१४॥ धीर जहरि बहुत वर्षोंतक महात्माजीने साक्षात् रहकर लोगों को उपदेश दिया था उस अहमदाबाद में-11१४७|| अन्यत्रापि गतं भस्म भारतीयभुरो बहिः । आफरीरावरायां च भगवनस्म शोभते ॥१४॥ भारतवन्धरा के बाहर भी श्रीमहात्माजी का मस गया है। अफ्रिका में भी यह शोमा दे रहा है ।। १४८ ।। मोम्बासानगरे श्रीमापुरुषोत्तम उत्तमः । श्रीमद्विनयिनीज्ञानिवर्तते धर्ममर्मवित् ॥१४॥ मोम्बासा शहर में श्रीमान पुरुषोत्तमदासजी निवास करते हैं जिनकी पत्नी विनायिनी (विनु बहिन) है। यह धर्म क्या है, इसके मर्मो बानते हैं ।। १४९॥ दिव्यं तदस्म संगृह्म विनयिन्या ययौ सह । योगाण्ड जिज्ञानगरं मोटरेण स यमना ॥१५॥ वह श्रीमती विनुबहिनके साथ भस्म लेकर मोटर के मार्गसे युगान्टा मान्तके जिंजा नगरमें गये ।। १५० । जलपरातान्विविधान् रम्याणि च वनानि च । गव्यूतीनां परिकास्यन्दारलः शतद्रयम् ।।१५।। अन्यानपि समादाय मोम्बासीयजनान्बहून् । मार्गेपि संमिटिताकप जिवांस आसवान् ॥१५॥ बहुत से मरने आदिको, ग्मशीय बङ्गालोको इजा माइल पारकर के, मोम्बामा फे और भी तसे टोगों को लेकर उपा मार्ग में गमि. लिन होनेवालों को साचते हुए या दित्रा पहुँच गये ।।११।। १५२ ।।

३०८ पारिजातसौरभ विस्मृता तत्र चास्माक वैदिकानां महाप्रिया। भारताच्च पृथग्भूय नीला वहति शाभना ।।१५।। हमने जिसे भुला दिया है और जो वैदिकों को अतिप्रिय थी वह नीला नदी वहाँ भारतसे अलग हार बह रहा है ।। १३ ॥ महासरोवराभूमी मधुरादतुलादपि । लब्धजन्मा महायामा सरिन्नीला प्रकाशते ||५|| जिसकी तुलना नहीं हो सकती ऐसे एक विशालकाय सरोनरसे वह लम्बी चौडी नीला नदी जम लेकर प्रकाश में आती है ॥१५॥ अभूतपूर्वसंमर्दो भस्माधानाहनि प्रियः । नारीणां च नराणां च नीलायाः प्राञ्जले तटे ॥१५५॥ नीलाके विशाल तटपर स्त्री पुरुषों का एक बड़ा भारी समुदाय, भस्म पपराने के दिन वहाँ इक्ट्ठा हुआ था। १५५ ॥ प्रयाणामेय पूर्वीयाफ्रिकायास्तु समागता । प्रान्ताना प्रान्तपालाश्च समाराकुसुमाकराः ।।१५६।। पूर्वीय अफ्रिकाके वेनिया, टागानिका और युगाण्डा तीनों ही मान्तोके गवर्नर हायमे पूल माला लेकर वहा पहुँच गये थे ।। १५६ ॥ अजलयः सुमनसा ते सर्वे भस्मसम्पुटे। अर्पयामासुराहादादपारादादरादपि ॥१५७॥ उन सब लोगोने अपार थानन्द से और आदर से भस्म पात्र. पर फूलो की अञ्जलिया चदायीं ।। १५७ ।। श्रीनीलापीति विज्ञाय सो च महागुरोः । भारतादरम सविधे तस्या एति जहर्ष सा॥ ५८॥ भी नीला पो जब यह पता लगा कि सब पं महागुरु श्रीमहामा. बीया मरम मारतसे मेरे पास आ पा है तर यह प्रसन्न हो सठी ।। १५८॥

विंशः सर्गः
३०९
सराया सप्रमोदा च सवेगा सामिलापिका ।
कूर्दमाना च नृत्यन्ती विषयार मनोमुदम् ॥१५९।।
थापाज के साथ, आनन्द के साथ, वेगके साथ, इन्छाओके साथ,
नाचती और चूदती हुई उसने अपने मानसिक आनन्दको प्रकट
किया ॥ १५९ ।।
विनयिन्याः कराभ्यां तद्भस्मपानं महाधनम् ।
शिवामाईपटेलेन गृहीत्वा मुमुदे चिरम् ॥१६०||
श्री. विनयिनी (विनु) बहिनके होयोमेंसे महान् घनरूप उस
भस्ममानको श्री शिवामाईपटेल (वैरिस्टर) ने ले लिया और वह
प्रसन्न हुए ॥ १६० ॥
जयतात्सर्वदा श्रीमान्महात्मा मोहनः प्रभुः ।
इति घोपाः सहस्रेभ्यो मुखेभ्यो पहिराययुः ।।१६।।
श्रीमान् महात्माजी सदा विजयी रहें, यह पोप हजारों मुखों से
निम्लने लगा ।। १६१ ॥
शियामाई गतस्तीरं नीलायाः सर्वशम्पुपः।
भस्मपात्रकरः श्रीमान्गौरवेण शनैः शनैः ॥१६॥
श्रीशियामाई पटेल हायमें मरममार लिये हुए आदर के साथ धीरे
धीरे सर्व कस्यागवारी नीलाके तरपर गये ॥ १६२॥
धन्यस्य लोफयित्तस्य मोहनस्य महात्मनः।
सपा हृदये तस्यास्वेन मसा न्यधीयत ॥१६||
धन्य और जगत् के धनसमान महात्माजी के उस भरमके पात्रके
सहित नीलाके हृदय में उन्होने रख दिया ।। १६३ ।।
महवा हमारेण नृत्यन्ती पुण्ययारिका ।
गभीरा दर्शनीया सा तदादायाद्रपद्रुतम् ॥१६॥

३१० पारिजातसौरभे बड़े भारी हर्पके साथ पवित्रजल वाली, गंभीर और दर्शनीय वह नीला भरमको लेकर नाचती हुई शीघ्र ही दौड गयी ।। १६४।। तस्मिन्नेचाफ्रिकादेशे जिंगीनाम्नो महागिरेः । हृद्ये रूपगुणाभ्यां द्वे कन्ये रन्तुं पहिर्गते ॥१६५।। उसी पूर्व अफ्रिकामें जिंगीनामक महान् पर्वतकी रूप और गुणोसे युक्त मनोहर दो कन्याएं खेलने के लिये बाहर निकलीं ॥ १६५ ।। रममाणे अरण्येपु पहून्पुप्पलतादुमान् । सस्मरतुः संगते ते. न चिरं पितुरालयम् ॥१६६।। जंगलों में खेलती हुई वह दोनों बहिनें बहुत से फूल, लता और वृक्षों के साथ मिलती रहीं और चिरकाल तक पिताके घरका स्मरण नहीं किया ।। १६६ ॥ स्वसारी भिन्नवानी बने सम्प्राप्तयौवने । विहरन्यो यथाकामं पुनरेकर संगते ॥१६७।। बगल में दोनों बहिने युवावस्थाको प्राप्त हुई। दोनोंने अलग अलग मार्ग पकडे । यथेच्छ विहार करती हुई दोनों फिर एक जगह आकर मिल गयीं ।। १६७॥ एकीभूते च यत्रोभे प्रेम्णा थीका च योनिया। तत्रापि यतिराजस्य भस्मलेशोभवद्धितः ॥१६८|| वह थीका और योनिया यह दोनों नदिया प्रेमसे जहाँपर एक हो घाती है यहा मी-उस सङ्गमस्थान में भी यतिराजका भस्म एघराया गया ॥ १६८॥ देशे देशे सर्वरिमस्तस्याघ्य शान्त्यात्य भस्म, नद्या नद्या पुण्यायां कासारे पापाप्यां सद्यः। नीत्या नीत्या लोका. स्नेहश्रद्धाकारा:सोत्कारते, धन्यंगण्यं पुण्यं रम्यं प्राचं स्थाप्यं संम्प्रास्यन् ॥१६९|| शिः सर्ग: स्नेह और अक्षाकी मूर्तिक समान उ सुक लेगोने उस घन्य, गम्य, पवित्र, रम्य, प्राध, स्थाप्य मरमसे ले लेकर सभी देशों में पवित्र नदियों में, पवित्र तालाबों में और पवित्र वादियों में अपंग कर दिया ।। १६९॥ तन्त्रैः प्रामाणिव मन्योयं सौरमाभिधः। मया भगवदाचार्ययतिना यनतः कृतः ॥१७॥ मेने इस प्रयको प्रामाणिक साधनोंके द्वारा बनपूर्वक मनाया है।॥ १७॥ एकमप्यक्षरं मात्रा कात्रास्त्यप्रमाणिता। सर्वथा शुद्धरूपोय महाप्रन्यो विभाज्यताम् ॥१७१।। इसमें न तो एक भी अवर अप्रामाणिक है और न एक मात्रा अपामामिक है। अतः इस मदानन्य को सब प्रकार से अदम्प समझना पाहिये ।। १७१॥ वसुब्योमनभोनेत्रमिते चक्रमवत्सरे वशासे च सिते पक्षे तृतीयाया पूर्तिमागमत् ॥१७२।। वैशाख अलपत्र तृतीया ( अशय तृतीया ) स. २००८ वि० में यह अन्य पूर्ण हुआ ॥ १७२॥ पूर्वीय आफ्रिदेशे मोम्बासाख्ये महापुरे। श्रीमन्मेपजिससून रामतिः काननिस्तथा ॥१७॥ पूर्वीय अधिकारे माम्बाना शहर में श्रीमान् मेघजी माई के श्रीरामजी और भीमानी दो पुत्र हैं।॥ १७ ॥ कनीयामानजिः । श्रीमान् व्यायांसमात्मनः। आमामादाय पूज्याया जनन्या आमनः शिराम् ।।१७४॥ श्रीकानीमाईने अपने बड़े भाई श्रीराननी माईको पूर और अग्नी पू.य माता की पवित्र आता कर-1 १४ ||

एकविंशः सर्गः
महासम्परत्नस्य श्रीमद्गान्धिमहात्मन.।
मक्षिप्याघोपते सद्भिः पीयता चरितामृतम् ॥१॥
महापुरपोमें श्रष्ठ श्रीमहाभागाधोजीरा मक्षेपमें चन्लिामृत
अपणं लिया जाता माजन बिमा पान कर-सवन करें।॥१॥
मवत्सरस्तु वोदयः मादाय मंशव।
मारनाम सियाम तस्थव पाठकः॥२॥
टम प्रकरणमें मर्दन ईसवी मन ही मवन्मर ममझना चाहिो ।
तथा सग्रजी महीनेनी ही मन्या और तियि मस्या जाननी
महतकंगजब्रह्ममिते मवत्सरे महान् ।
मासे च दशम देवो द्वितीयायामवातरत् ॥३॥

३१२ पारिजातसौरभे एतद्न्थप्रकाशाय सर्वे सच्छद्धया व्ययम् । अकरोद्देशसेवाये वादान्यं पूजयन्छिया ॥१५॥ देशकी सेवाके लिये तथा अपनी उदारताका ध्यान रखकर इन अन्योंके प्रकाशित करने का सब व्यय किया है ॥ १७५ ।। धन्या माता पिता धन्यो धन्यः स परमः पुमान् । गांधेर्महात्मनो दिव्ये चरिते यन्मनोभवत् ॥१७६॥ उनकी माता भी धन्य हैं, पिता भी धन्य हैं और वह स्वयं भी धन्य हैं, जिनका मन महात्मागांधीजी के पवित्र चरितमें लगा है ॥१७६ ॥ जयन्तु गुरुपादाजरेणव. मुप्रकाशिताः । जनुपान्धोऽपि यान्छित्वा गन्तव्यं याति निर्भयम् ।।१७७।। श्रीगुरुदेव के चरणों के रेणुओं का विजय हो जिनका आश्रय लेकर जन्मान्ध भी अपने गन्तव्य स्थानपर निर्भय पहुँच जाता है ।। १७७ ।। श्रीसाकेत पुरीललामललनालोकसत्साधनं श्रीमद्राममनोहरार्यचरणाम्भोजेपु भृङ्गायितः । रागद्वपकुलानलो भगवदाचार्य सुधीः सगती। कृत्या काव्यमिदं यति स्वदयंशान्ति परांप्रापयत् ॥१७८।। ॐशान्तिः शान्तिः शान्तिः तिसर्षसप्रस्वतप्रपरमहसपरियाजकस्वामिश्रीमद्भगवदाचार्यपण्डितराजप्रणीते पारिजातसौरभ विशः सर्गः एकविंशः सर्गः महापुरुषरत्नस्य श्रीमद्गान्धिमहात्मनः। सक्षिप्यापीयने सद्भिः पीयता चरितामृतम् ॥१॥ महापुरपोमें श्रष्ठ श्रीमहान्नागापोजोका मक्षेपमें चन्तिामृन आणं किया जाता है। मरजन जिमरा पान कर-मवन कर ॥१॥ सवत्मरस्तु वोद्धव्यः सर्ववान यंदावः । मामनाम तियर्नाम वेद्यं तस्यंव पाठकः॥२ इस प्रकरणमें मम ईमदी मन् ही गवगर ममदाना चाहिय । तथा यग्रजी महीनकी ही मस्या और तिथि मन्या जाननी चाह्यि ॥ २ ॥ प्रहतगजब्रह्ममिते मंवत्सरे महान् । मासे च दशम देवो द्वितीयायामवातरत् ॥३॥ ता० ० अक्टूबर मन् १८६९ ई० वो महामाजीका अवतार हुना। अवतार अर्थात् जन्म ॥ ३ ॥ लोहस्तिवसुब्रह्मसमिते वत्सरं मुनिः। श्रीमत्वस्तूरिका देवों पर्यणेष्ट यास्विनीम् ॥ ४॥ मन् १८८३ ई० में श्रीमती कम्नूग्वारे माय अनका विवाह हुआ ॥ ॥ वमुपसवसाह्ममिते सदरारेच मः। चतुप्यां नव मासे लन्दनध्ये नुमभ्यगात् ॥ ५॥ ता. ८ मिनम्बर १८८८ ई० में अध्ययन कान रिये वह लान गये ।। ५ ।।

पारिजातसौरभ
ग्रहवस वसुब्रह्ममिते सवत्सरे यति ।
निरामिषाशिना मध्ये तत्र व्याख्यानमातनोत् ॥ ६॥
१८८९ ई० में लण्डनमें मासाहार न करनवालोके बीच में
महात्माजोन (प्रथम) व्याख्यान दिया ॥६॥
ब्रह्मग्रहवसुब्रह्ममिते सवत्सरेभवत ।
पष्ठे मासे दशम्या च बरिष्टरपदान्वित ॥७॥
ता० १० जून १८९१ ई० में वह वैरिप्टर बन ॥ ७ ॥
लोकप्रहह्वसुब्रह्ममिते सवत्सरेगमत ।
दाक्षिणात्याक्षिका पष्ठे मासि भारतवर्षतः॥८॥
जून मन १८९३में महात्माजी भारतसे दक्षिण अफ्रिका
गय ॥ ८ ॥
अभियोग च य जेतु जगाम यतिरफ्रिकाम् ।
ममापान च तस्याभूदप्रिम वत्सरे शुभम् ॥९॥
जिम मुकदमको जीतनवे ग्यि वह दक्षिण अमिया गय थ
अमका अगर आप अर्थात् १८९४ ई. में गमाधान हुआ ॥९॥
ततोपि सोपिम व नंटाले मोह्नोभवत् ।
महान्यायालये माय प्राइदिवार सदाशिव ॥१०॥
उगा अग्रिम मपमें अर्थात् १८.५ ई. में यह नटाये गुप्रीम
वाम एवारट हए ॥ १० ॥
तस्मिन्नेवार धीमानंदाले यसता सताम् ।
भारतीयमनात निर्ममो मतों सभाम् ॥११॥
उगा गारमें नंदालमें हावार भारतीपोली र वही गमा
(नटा नाग्नाप बापग) frर्माण रिया ॥ ११ ॥

एवज्ञाः सर्गः
रसग्रहबरह्म मिते संवत्सर मनि.।
यठे मामै क्रियायोगी भारते स न्यवनंत॥१२॥
जून मन् १८९६ ई० में कर्मयोगी महा-मानी माग्न
लोट ।। १२ ।।
निखिलभारतीयः स समाहूतः पुनर्यपौ।
नवम्बरं च नंटाल दारपत्रममन्वितः॥१३॥
नेटालनिवागी भारतीयोरे बुलाने में महात्माजी नपम्बर महीने में
वाल वच्चौरे माय पन नेटाल गये ॥ १३ ॥
ऋषिग्रहवसुब्रह्ममिते त वत्सर सिताः ।
हने पसन्दम्याः प्राहरनिष्टादिभिः ॥१४॥
मन् १८९० ई. में द्वगमे भरे हा अनजाने महात्माजीकी
इंटी और पत्याराम माग ॥ १४ ॥
प्रहाहवसुब्रह्ममिनेसो यत्मर प्रनः ।
च योवरसप्रामे मिताहगानां सहायताम् ॥१५॥
मन् १८९९ ई० में महात्मानीन बोया-यममें असंजोगी मदद
वी॥ १५ ॥
ब्रह्मम्बोमप्रवमिनेम्दे भारत पनः ।
आगाम्य सामान पर्याटस्मपरिश्रमम् ॥१६॥
मन् १९०१ में महात्मानी पन. भारत आये और गरी
म्पिति आननी चि परियमावा उन्होने भारत-यमन
गुपयोमहामिना भारतः पुनः।
प्राप्तिी क्षिगाशे मंद्रियाश्मो॥१७॥

पारिजातसौरभे
सन १९०३ ई० में भारतीय बन्धुजोकी प्रार्थनास वह पुन
दक्षिण अफ्रिका गय ।। १७ ।।
ट्रान्सवालमुपेत्यासावारेभे प्राड्विवाकताम् ।
ब्रिटिशभारतीयाना सस्थामेवामतिप्ठिपत ॥१८॥
ट्रान्सवामें जाकर उन्हान बैरिष्टरी शुरू की और टान्सवार
ब्रिटिश इण्डियन एसोसिअशन की स्थापना की ॥ १८ ॥
युगव्योमग्रहब्रह्ममितेब्दे समपोपदत्
इण्डियन ओपीनियनितिख्यातमुदन्तदम् ॥१९॥
सन १९०४ ई० में इण्डियन ओपीनियन् नामके प्रसिद्ध
समाचार पत्रका उहोन सम्पादन किया ॥ १९ ॥
लोकोत्तर महापुण्य ब्रह्मचयमहाव्रतम् ।
रसव्योमग्रहब्रह्ममिने वर्षग्रहीदसौ ॥२०॥
सन १९०६ ई० में महात्माजीन परम पवित्र अद्वितीय ब्रह्म
चयवतमा स्वीकार क्यिा ॥ २० ॥
अस्मिन्नेव सुपुण्यम्दे सत्याग्रहपद वभौ।
जलविद्रोह उत्पन्ने क्षताल्लोका न्यपैवत ॥२१॥
इमी सार में सत्याग्रह शब्दकी उत्पत्ति हुई। जय जुलू विद्राह
उत्पन्न हुआ ता महात्माजीन घायलावी सदा की। जुर-दक्षिण
अपिशवे हवी ॥ २१ ॥
व्योमलिगवसुब्रहामितेग्दे पोडो तियो।
मास एषादी प्रापर्नेटाल भारता इत ॥२२॥
१६ नवम्बर १८६० ई० में यहाम बढ़तम भारती नटार
पच ॥ २॥

पारिजातसौरभे
उस समय वहाकी सारन अपन मनोरथकी सिदिके रिय
निम्निलिखित एक व्यवस्थापत्र बनाया ॥ २८ ॥
भारतीयनर सर्वनारोभिर्बालकरपि।
प्रवेशपत्र सग्राहय स्यातु तस्मिन्प्रदेशके ॥२९॥
भारतीय स्त्री पुरुष बच्च सबको इस दशमे रहनके लिय
प्रवशपत्र लना चाहिय ॥ २९ ॥
प्रवेशपत्रग्रहण क्रियते चेन्न केनचित।
अपराधी स मन्तव्यस्तस्य कारानिवेशनम् ॥ ३०॥
यदि कोई प्रवशपत्र नहीं लेगा तो वह अपराधी माना जायगा
और उस जलको मजा दी जायगी ॥ ३०॥
प्रार्थिना स्वशरीरस्थ चिह्न चेत्किञ्चिदस्तु तत् ।
दात्रा प्रवेशपत्रस्य लेख्य तत्स्मृतिपुस्तके ॥३१॥
प्रवशपत्र चाहनवालोके शरीरपर यदि कोई निशान हो तो
रजिष्ट्रार उसे रजिष्टरमें नोट कर ले ॥ ३१ ॥
प्रवेशपत्रसप्राप्त्यं प्रार्थनापत्रिकाडगके।
अगुलीनां दशानां च प्रतीक तस्य गृहयताम् ॥ ३२॥
प्रवशपत्र पानके लिय जो अर्जी दी जाव उस पर प्रार्थीकी
दगा अडगुलियोके निशान लन चाहिय ॥ ३२ ॥
तत्रासयमाद्यास्तु प्रतिबन्धा अनेकश ।
ते च भारतवर्षस्य मानभगकरा ध्रुवम् ॥ ३३ ॥
एम तो उस व्यवस्थापत्रमें अनक प्रतिबघ ५। वह सभी
भारतदाता मानमर्ग परनवार थ ॥ ३३ ॥

एकविंशः समः
सर्व सहन्ते कृतिनः समाशोलास्तपस्विन. ।
सहन्ते न कदापोह मानमगमन्तुदम् ॥ ३४ ॥
क्षमाशील तपस्वी महात्मा मवकुछ मह लेते हैं परन्तु हृदयको
पीडित करनेवाले मानमङ्गको वह मन नहीं करते ।। ३४ ॥
रसव्योमग्रब ह्मवत्सरे सत्यसद्गरम् ।
जोहानिस्वर्गनगर तेने मानं स रक्षितुम् ॥ ३५ ॥
मानको रक्षावे लिये महात्माजीने मन् १९०६ ई० में जोहानिम-
वर्गमें सत्याग्रह शुरू कर दिया ॥ ३५ ॥
मुख्याधिष्ठातृता यातस्तत्र स्मट सो महाजह ।
बाधा पीडा परा चके यतो तदनुयायिषु॥३६॥
अफ्रिनामें महाजड स्मट्म मुख्य शासक था। उसने महात्माजी
और उनके अनुयायात्रो भारी दु स दिया ॥ ३ ॥
सत्याग्रहविधानेन दुखान्यविगणय्य ते ।
त्यागेन सत्यवादेन समयुध्यन्त निर्भया ।। ३७ ॥
महात्माजी और उनके अनुयायियोंने मत्याग्रह करवे, मव
दुखाको परवा किये बिना, त्याग और मत्यसे, निर्भय होकर युद्ध
गिया ।। ३७ ॥
मुनिव्योमपहब्रह्ममिते सदस्मर यति
जान्य वयाँ तियो त्रिशे विजियेसमरं स तम् ॥ ३८॥
ता० ३०-१-१९०३ ई. में महात्माजोने उम युदमें विजय
प्राप्त किया ॥ ३८ ॥
अगस्ते चाग्रिमे वर्षे पोडश्या च तियो पुन.।
बमज स्ववचः स्मट्सस्ततो जन्यमजायत ॥३९॥
ता० १६-८-१९०८ ई. में जनरल स्मझने अपनी प्रतिज्ञाका
भग विया ॥ ३९ ॥

पारिजातसौरभे - वेदब्रह्मग्नहब्रह्ममिते सवत्सरे मुह । स्मट्सो जितो जिता श्वेता विजयोभून्महात्मन ॥४०॥ मन् १९१४ ई० में पुन स्मट्म और दूसरे सभी अग्रज वहा पराजित हुअ ॥ ४० ॥ शरब्रह्मग्रहब्रह्ममितेब्दे सितभूभुजा। कैसर हिन्दमित्याख्यपदकेन सचित ॥४१॥ मन १९१५में अग्रज सरकारन महात्माजीको कैसर हिन्दका पदक देकर सम्मानित किया ॥ ४१ ।। अस्मिन्नेव शुभे वर्षे श्रीरवीन्द्रकवीश्वरं । प्रायुज्यत यतीन्द्रायें महात्मेतिविशेषणम् ॥४२॥ अिसी साल श्री रवीन्द्रबावून महात्माजीके लिये महात्मा शब्दका प्रयोग किया ॥ ४२ ॥ द्वाविंशतितियो मासे पञ्चस्मिन्हि वत्सरे। सत्याग्रहाथम पुण्य कोचर हपतिष्ठिपत् ॥४३॥ २२ मी १९१५ ई०के दिन वोचरब गाव (अहमदाबाद) म अन्होन सत्याग्रह आश्रमको स्थापना की ॥ ४३ ॥ श्रीमन्मदनमोहनमालवीयो विनिममो। महत्सारस्वत धाम वाराणस्यां महौजसि ॥४४॥ रसब्रह्मपहनमिते दे स महानपि । फेब्रुवर्या चतुया च धीमास्तदजीघटत् ॥ ४५ ॥ श्रीमान् पण्डित मदनमोहन मालवीयजीने काशी विश्व- विद्यालय बनाया था। अमका अद्घाटन महात्माजीन ता० ४२-१६ औ० में विया ॥ ४४, ५ ॥

एकविंशः सर्गः
ऋषिब्रह्मग्रहब्रह्मवत्सर विजयो महान् ।
चमारण्ये महापुद्धं सत्याग्रहमयाननोत् ॥४६॥
महान् विजयी महान्माजीने १९१७ ई० में चम्पारन (विहार में
महान् भन्याग्रहयुद्ध छेड दिया || ४६ ॥
तियो सप्तदशेलमासस्यारय तं रणम् ।
मईमामान्तिम जातो दिने तत्व महाजयः।॥४७॥
१७ अप्रेरको अम युद्धका अन्होने भारभ किया था और ३१
मत्रीको महान् विजय प्राप्त हुना ॥ ४० ॥
ऋषिब्रह्मग्रहब्रह्ममिने सवत्सरे तियो।
पोडश्या जूनमासस्य साधमत्यामबाम सः॥४८॥
१६-६-१९१७ औ० को महात्नाजी मावरमतीमें रहने लग।
कोचरखा आश्रम मावग्मतीमें गया ॥ ४८ ॥
नगरेहमदाबादे वन्मरे च तनः परे।
पत्तान्तीयमिगा यतिपदमजीगत् ॥४९॥
मन १९१८में बलंदाबादचे मिलवे मजदूरोको युद्धमें विजय
दिलाया ॥ १ ॥
संडासत्याग्रहे प्राय
निजयं परमोगवलम् ।
सूनचरसमुद्धारं वर्षेस्मिन्नेव सोरोन् ।। ५०॥
मिनी वर्गवहारे सत्याग्रने चलन विजय प्राप्त करने चग्नंग
अदार किया ॥ ५० ॥
प्रहब्रह्मपत्नमिन संवन्मर पनिः ।
पष्टचामलमासम्य दुःखलाजानताननः ॥५१॥
राउलेटविधानस्य मसप्टं भटगमाचरत् ।
नवजीवनपत्रस्य ममारने प्रशासनम् ॥५२॥

३२२
पारिजातसौरभे
बहुत दुख और लज्जाके साथ सन् १९१९ मी०वे अप्रैल
मासकी चौथी तारीखका उन्होने गैलेट एक्टका खुल्लमखुल्ला
भग किया। अिसी वर्ष नवजीवन साप्ताहिक पत्रका आरम्भ
किया ॥ ५१। ५२ ।।
एनयनप्रहब्रह्मवत्सरगस्तमासि च ।
राष्ट्रससद्विधानानि परिवयं ह्यमानयत् ॥५३॥
अगस्त १९२० ओ० म अखिल भारत राष्ट्रिय महासभाके
नियमो को बदलकर स्वीकृत कराया ॥ ५३ ।।
विच्छेद सहयोगस्य शासनेन प्रचारित ।
राष्ट्रियविद्यापीठाना स्थापन यतिना कृतम् ॥ ५४॥
अिसी वर्ष सरकारके साथ असहयोगका प्रचार किया और
राष्ट्रिय विद्यापीठोको स्थापना को। ॥ ५४ ।।
नेत्रनेत्रग्रहब्रह्ममिते सवत्सरेशुभे ।
पञ्चम्या च द्वितीयस्मिन् मासे समजायत ॥५५॥
चौरीचौराभिधे प्रामे शासनप्रजयोमहान् ।
दुसह कलिरतस्मात्सत्याग्रहमवारुणत् ॥५६॥
ता० ५-२-१९२२ ओ० को चौरीचौरा गावमें सरकार और प्रजामें
अमहव युद्ध हानके कारण सत्याग्रहको अन्होने बन्द रखा ॥५५॥५६ ।।
देशे सर्वत्र सजात शासन दुर्यवस्थितम् ।
पजाये । महान्माम्यमाचरन्छासन तदा ॥५॥
देशमें मर्वत्र शासन अव्यवस्थित अथवा दुव्यवस्थित हो गया।
गरवारन पजावमें बड़ा भारी अन्याय दिया ॥ ५७ ।।
तत्र नारयं जन्मार्गे माचंस्य दतमे तियो ।
निहीतस्तपा पाभिवं पारा प्रवेशित ॥५८॥

एकविंशः सर्गः
पजावमें गाति स्थापनके लिये जाने में महात्माजी मार्चकी
१०वी तारीखको पक्ड लिये गये और ६ वर्षका कारावाम दण्ट
अन्हें दिया गया ।। ५८ ॥
वेदनेत्रग्रह्मवत्सरे पञ्चमोतियो ।
फेवर्या भवत्रुग्ण, करामुक्तोमवद्यतिः ॥ ५९॥
ता० ५-२-१९२४ ओ०में महात्मानी बीमार पड़े और जेलमे
छोड दिय गयं ॥ ५९ ॥
वाणनेत्रप्रवामिने संवत्सरभवत् ।
हिन्दुमुस्लिमसरप्रेमर्शविल्यं भाग्यदोपतः ।। ६० ॥
सन् १९२५में हिन्दुओ और मुमलमानो भाग्यदोपसे प्रम कम
हो गया-अनवनाव हो गया ।। ६० ॥
एकविशति दिवसानुपवासात्महेश्वरः ।
प्रमसंस्थापनार्याय द्वयोर्जात्योः समाचरत् ।।६१॥
दोनी जातियोमें प्रेम-स्थापनके लिये महान्माजीने २१ दिन
तक उपवास क्यिा ॥ ११ ॥
चमिपंच महता यत्नेन समतिप्ठिपत् ।
बिदेशिवाससा देशाबहिवारमकारयत् ॥ ६२॥
बड़े परिश्रममे अन्होंने चरम्बा-मघको म्यापना की। देश में
विदेशीय वस्त्रोकर बहिबार कराया ॥ १२ ॥
कृषितंत्रपतहामिने संवत्सरेपरोन् ।
खादीवस्त्रप्रचाराय भारत भमणं यतिः ॥६३॥
१९०७६० मादी प्रचार लियं भाग्नमें भमण किया। ६३॥
परेनेत्रहवामित तेन च यत्सरे ।
लाहोरनगर पूर्णस्वातम्यं हि समर्पितम् ॥६॥

३२४ पारिजातसौरभ १९२९में लाहोर कानसमें पूर्ण स्वतत्रताका समर्थन दिया।। ६४ ॥ नभ कालग्रहब्रह्ममिते सवत्सरे यति । षड्विशे च तियो मासे प्रथम प्रथमान्वय । ॥ ६५ ।। सर्वर्भारतभूपुन पूर्णस्वातन्त्र्यहेतवे । महतीमकारयद्देव प्रतिज्ञा सर्वशफरीम् ॥६६॥ १९३० जी० में जनवरीकी २६ तारीखको पूर्णस्वतत्रता लिय' सब भारतीयोसे अन्होन प्रतिज्ञा करानी ॥ ६५-६६ ॥ तिथौ च द्वादशे मार्चमासस्य क्षारबन्धनम् । भटक्न गनु तदा दाडोमाश्रमात्प्रस्थिती निजात् ॥ ६७ ॥ ता० १२ ३ १९३०को नमक कानून तोडनके लिय सत्याग्रह आश्रम सावरमतीमे प्रस्थान दिया । अभवद्घोरसग्राम प्रजाशासनयोमिथ । यत्र तत्र तत श्रीमान्निगृहीत पुनर्मुनि ॥ ॥६॥ मरवार और प्रजामें जहा तहा घोर मग्राम हुआ। अन महात्माजी पुन पक्ड लिय गय ॥ ६८ ।। ब्रह्मलोकग्रहब्रह्ममिते सवत्सरे प्रभु । मुक्त' पुनर्गतो घोमाल्लन्दन गोलससदि ॥१९॥ पुन जलममे छूटर मन् १९३१ मे गोलमज परिषदमें मम्मिनित होनरे लिय लदन गय ॥ ६९ ।। भारतस्य मुख भूत्वा सर्व तन्वस्वतन्त्रताम् । गृहीत्वा भाषगं स्वस्याकृत मूढ सदोगृहम् ॥७०॥ भारतवर्षमा मप बनकर और मब कुछ फग्न कनकी पूर्णस्वतत्रता र पर वहा भाषणस नभागृहलो मूढ बा जान 11 एरविशः सर्गः तनो निवृत्त एवामी मुम्दापुर्या न्यगृहवन । सपधव परं श्रीमान्मुश्नः कारागृहादृषिः ॥७॥ दहामे लण्डनले लोटने ही पुन दह टम्ओम पक्ड वि गये। परन्तु गीत ही जल्मे छाड दिय गय ॥ ६ ॥ चतुर्वे ना मासस्य नियो गायोचिनोनहत सन्धित महामूल्यमभदल्लिखित तदा ॥७॥ जुमी माल ता. ८ मार्चको गाधी जिदिन तन्धिपत्र ल्सिा गया ॥ २ ॥ ७४ ॥ नेत्रलोरग्रहब्रह्ममितेन्दे पुनरीश्वरः । सत्याग्रह महायुद्धमारमतात्र भूभुजा ॥७३॥ मन् १९३० जी० में पुन श्री महात्माजीन नरनारके नाय सन्याग्रहादा बारम क्यिा ॥ ७ ॥ निगृहीतः प नदीनबन्धुः सर्वाश्रयो महान् यरोडायाधनगृहे स्यापितः सासनेन सः ॥७४ ।। मवक महान् आश्रय वह दीनबन्धु पुन पकड़े गये और परवदा जेलम रख गय ॥ हिन्दजातेः पृयकर्तुमन्त्यनान्हिन्दुजातिजान् । सितशासनमित्राणा प्रयत्नः समभूत्फलो ॥७५॥ हिंदुजातिसे अन्त्यजोको जो कि हिन्दू ही है करनके लिये अग्रेजी राज्यके मित्रोश प्रयत्न सफल हुआ।।७५॥ तद्विरोधाय वन्द्योधिरपवासान्त आ मृतेः । सद्यः प्रारभत थोमास्तस्मिन्सनि यन्दिनाम् ॥७६ ॥ अमका विरोध करनके लियं पूज्यचरण थी महात्माजीने यरवदा जे में ही आगरणान्न अपबासा मारभ किया॥५६॥ -अलग ३२६ पारिजातसौरभ मासे सितम्बरे विशे तियावनशनं महत् । समारब्धं च पड्दिश समाप्तिमगमच्छुभम् ॥७७॥ ता० २०-९ को अपवासका आरम हुआ था और ता० २६को झुमका सुखद अन्त हो गया ॥ ७७ ॥ लोकलोकग्रहब्रह्ममितेब्द पुनरेव सः । सत्याग्रहमहायुद्धं समारभत विश्वदृक् ॥७८॥ सन् १९३३ ओ० में पुन सर्वद्रष्टा महात्माजीने सत्याग्रहयुद्धका प्रारभ क्यिा ।। ७८ ।। निप्रहश्च पुनस्तस्य पुनर्मुक्ति पुनग्रहः । एव पुनः पुनश्चक्रमचलच्छत्रुचालितम् ॥७९॥ पुन निग्रह पुन मोक्ष, पुन निग्रह, पुन मोक्ष इम प्रकारमे गनुका चलाया हुआं चत्र चलना रहा ।। ७९।। वेदशालग्रह्ममिते सवत्सरे कृता । ग्रामोद्योगोयसयस्य स्थापना देशवाहते ॥८॥ गन् १९३४ ई० में अन्होंने ग्रामाद्योग मघको स्थापना देगतिवे लिय दी। ८० ।। पाहमर्यात्मवत्सरेल सतिः । सेवापामाधम पुण्यं सविनाशनम् ॥८॥ गन् १९३६ औ में महात्माजीने मेवाग्राम-आयनको स्थापित पिया ।। ८१ ॥ ऋविशालग्रहालमियम स्वाथमे सुपी । विधानवकमारम्भं पनपावृतिना पर ॥८२॥ मन् १९५७में श्री. में महामाजीनं मयीन विशालतिया बाभ विया ॥ ८२ ।।

एकविंशः सर्गः श्रीराष्ट्रियसभाहस्ते शामन भारतस्य तत् । आशिकं प्राप्तमेतेन देशभूच्छान्तिराशिको ॥ ८ ॥ अमी माल काग्रेनने अधिकारम भारतवा आनिक वामन आया। अिममे देना में बार्मिक गाति हुश्री ॥ ८३ ॥ ग्रहालग्रहब्रह्ममित सवत्मरकरोत् । राजकोटमहीपालो भयो वचम आत्मनः ॥ ८४ ॥ मन् १९३९औ० में राजकोट नरेगने वपना वचननग किया ॥८४ कृपये चरतस्तस्य वारणाय प्रयत्नवान् । आ मृतैरपवासेप सतस्य श्रीयतोश्वर ः ॥ ८५ ।। कुमार्गमें जाते हुझे अग राजानो रोक्न लिये प्रयत्न मग्नेकाले महान्माजी आमग्णान अपवानमें वंठ गये ।। ८५ ॥ राजा समन्तितः स्वस्य दोपतं ज्ञातदांस्तदा । उपवामक्रम त्यस्त्वा यतीसस्त्रिपुरा गतः ॥८६॥ गजा और राजारे दीदानने भी अम दोषी पवान लिया। नब महान्माजी अपवाग छोइ त्रियुग नाप्रेमो अपित्रेगनमें चले गये ।। ८६ ॥ मिम्बरे ततीयायां पुनर्पदमपन् । पौराष्ट्रियसभाशिष्टि मद ममापयत् ।। ८७ ॥ मितम्बरको नीमरी नारीमको फिर उन्होंने युद्धवी घोषणा वो और वाम मरकारोबावामयाज बन्द का दिया ॥ ८ ॥ नमोवेदप्रबहामिन बयानोदक । सत्पापहः ममारख्यः पोदिनोवाप्रपारभूत् ॥ ८॥ मन् १९४० में पुन अन्तोन वयक्तिर मन्यारता वारभ लिया। श्री विनोवाजी अमर्व प्रथम मन्याग्रही चुने गये थे ॥ ८८ ॥ .

३२६
पारिजातसौरभ
मासे सितम्बरे विशे तियावनशन महत् ।
समारब्ध च षड्विशे समाप्तिमगमच्छभम् ॥७७॥
ता० २०-९ को अपवासका आरम हुआ था और ता० २६को
अमका मुखद अन्त हो गया ॥ ७७ ॥
लोकलोक्ग्रहब्रह्ममितेब्द पुनरेव स ।
सत्याग्रहमहायुद्ध समारभत विश्वदृक् ॥७८॥
सन् १९३३ औ० में पुन सर्वद्रष्टा महात्माजीने सत्याग्रहयुद्धका
प्रारभ विया ॥ ७८ ॥
निग्रहश्च पुनस्तस्य पुनर्मुक्ति पुनर्ग्रह ।
एव पुन पुनश्चक्रमचलच्छचालितम् ॥७९॥
पुन निग्रह पुन मोक्ष, पुन निग्रह, पुन मोक्ष इस प्रकारमे
दाका चलाया हुआ चत्र चलता रहा ॥ ७९ ॥
वेदपालप्रमिते सवत्सरे कृता ।
प्रामोद्योगीयसपस्य स्थापना देशाशते ॥८॥
गन् १९३४६० में अन्हाने ग्रामाद्याग मघको स्थापना देगहितके
यिकी। ८० ।।
पाणपहसर्वात्मवत्सर कृत सद्यति ।
सेवाग्रामायम पुण्य सविनाशनम् ॥८१॥
मन् १९३६ ओ०में महारमाजीने मवापाम आयममा स्थापित
दिया ।। ८१ ॥
विरालयबह्ममिक स्वाश्रमे मुधी ।
विधानमारम्भ इतवान्कृतिना घर ॥८२॥
गन् १९३७में बी० में महात्माजी नवी क्षिापलिया
भारभ दिपा ॥८२ ॥

एकविंश सर्ग
३२७
श्रीराष्ट्रियसभाहस्ते शासन भारतस्य तत् ।
आशिक प्राप्तमेतेन देशेभूच्छान्तिराशिकी ॥८३ ॥
असी साल काग्रेमके अधिकारम भारतका आशिक शासन आया।
अिससे देशमै आशिक शाति हुी ॥ ८३ ।।
ग्रहकालग्रहब्रह्ममिने सवत्सरेकरोत् ।
राजकोटमहीपालो भड्गो वचस आत्मन ॥८॥
सन् १९३९ी० में राजकोट नरेशने अपना वचनभग पिया ॥८४
कुपये चरतस्तस्य वारणाय प्रयत्नवान् ।
आ मृतेरपवासप सतस्थे धीयतीश्वर
॥८५॥
कुमार्गमें जाते हु अस राजाको रोकने के लिय प्रयत्न कग्नेवार
महात्माजी आमरणान्न अपवासमें बैठ गये ।। ८५ ।।
राजा समन्त्रिक स्वस्य दोष त ज्ञातवास्तदा ।
उपवासक्रम त्यक्त्वा यतीशस्त्रिपुरां गत ॥८६॥
राजा और राजावे दीवानने भी अस दोपको पहलान लिया।
तत्र महात्माजी अपवास छाडकर त्रिपुरा काग्रेमवे अधिवेशनमें चल
गये ।। ८६ ॥
सितम्बर तृतीयाया पुनर्मुद्धमजूधपत् ।
श्रीराष्ट्रियसभाशिष्टि सर्वयंव ममापयत् ॥ ८७॥
सितम्बरको तौमरी तारीखको फिर अन्हाने युद्धकी घोषणा
वी और काग्रेस मरकारोका काममाज बन्द करा दिया ।। ८७ ।।
नभोवेदग्रहब्रह्ममित दयक्तिकोग्दके ।
सत्याग्रह समारस्य श्रीविनोवाग्रणीरभूत् ॥८८॥
सन् १९४०में पुन अन्होने वैयक्तिक सत्याग्रहका आरभ किया।
श्री विनोबाजी असके प्रथम सत्याग्रही चुने गये थे ॥ ८८ ॥

३२८
पारिजातसौरभ
ब्रह्मवेदप्रहब्रह्ममितेन्दे राष्ट्रससद : ॥
पृथग्भूय स्थितोकस्मात्यागभूभूमिराड् यति ॥८९॥
मन १९४१म वह काग्रेससे अपस्मात् अलग हो गये ।। ८९ ।।
त्रवेदग्रहब्रह्ममितब्द पुनराहीत् ।
शासन राष्ट्रसदसो देशरक्षापरायण ॥९०॥
सन् १९४२ में पुन काग्रेसकी बागडोर अपने हाथमें अन्हाने
ल ली ।। ९०॥
अप्टम्यामष्टमे मासे भारतत्यागघोषणाम् ।
सिनशासनकर्णेषु हठात्मावेशयद्यति ॥९१ ॥
८ अगस्तको अग्रेजी राज्यके कानोम जबरदस्तीने भारत छोड
देने की घोषणाको घुसा दी। ९१॥
नवम्पामग्रहीश्वेतराजस्त ने नृभि सह ।
आगाखानीयप्रासाद स्थापित पुण्यपतन ॥१२॥
९वी तारीखको सव नताओके साथ वह पकड लिये गये ओर
अन्हें पूनामें आगाखामहलमें कैद कर लिया गया ॥ ९२ ॥
महादेवो गत स्वर्ग तत्रैव पुरतो मने ।
पञ्चदश्या तियो तस्माच्छोमानुदमनायत ॥९३॥
वहा ही महात्माजीके सामने ही १५ वी आस्को श्री
महादेवभाओ देसाओ स्वर्गवासी बने। जिसमे महात्माजीका मन
खिन्न हो गया ।। ९३ ॥
देदवेदग्रहब्रह्ममितम्दे श्रीमहात्मन ।
द्वाविदो च फरवर्या धर्मपत्नी दिष गता ॥१४॥
२२ फरवरी १९४४वा महात्माजीती धर्मपत्नी श्री कस्तूरबा
परमधाम चली गयी ॥ ४ ॥

एकदिशः सर्गः
मई मासस्य षष्ठमा स मुक्नः कारागृहातियो ।
ततो बहूनि कार्याणि भारतस्मोक्रोदृषिः ।।९५॥
ता० ६ मा १९४४ का यो महात्माजा जेलले मुक्त हु।
वाहर मारुम रहबर अन्होंने बहुत कायं चि ॥ ९५ ।।
मुहम्मद अली जिन्नाप्रेरिता मुस्लिमास्तदा ।
हिमूहत्यादिका य्याना मादयः ॥१६॥
मुहम्मदरसा जिमाने मुसलमानामा अनसा दिया था अत मर्म
मुसलमान हिन्दुझारो मारने, लूटने, धर्मान्तर क्राने, स्त्रियोका
नष्ट करने कारमें लग गय ये ॥ ९६ ॥
पञ्जा च तया सोमप्राने बाचामंगाम् ।
मनःसन्तापराना च हत्या कम्मः प्रनापते ॥९७॥
पजाव और मोनापाल (पैनावरकी ओर) जो राक्षमी कृत्य
रिये गये ये अनके म्मरणने भी रोमात्र हो जाता है ।। ९७ ॥
नोवालस्यां नमन्माना महोत्पानान्समासुजन् ।
शमनाय ततस्तेया ययों घामानवासलीम् ॥९८।
नोमावारी (बगाल) में मुसलमानानं वडा मागे अन्याचार
क्यिा पा। मुनरो शान करन रिय बुद्धिमान महात्मात्री
नोदावली गये ॥ १८ ॥
ऋदिपहनामिन सवत्मर प्रनः ।
पदपा या समारग्म स नोवासलिमडले ॥१॥
सन् १९४७ में महात्माजीने नामावाली जिग्में पंदन
नग परमे यात्रा शुरू से 1॥
विहारे च ततः पश्चाद् हिन्दूना मन्यमान्तये ।
अगायत्कृपया पोमानो विश्वहितं पिता ॥१est
उमरे पश्चात् विहार में कट बने हुए हिन्दऑको गात नों
लिये उन्होंने (विहाग्में) ममा किया ॥ १० ॥

पारिजातसौरभे
साहाय्यमाधातुमसौ करानिनां,
दिल्ल्यां तदापत्तिविषण्णमानस ।
वसतिग्राहपरात्मसमिते,
निरन्नता स प्रविवेश वत्सरे ॥११॥
महात्माजेन १९४८ ई० में उपवासका आरम्भ किया ॥१०१।।
अगस्तमासस्य च पञ्चदश्या,
यते प्रतापेन च मध्यरात्र ।
दास्यादसो देश इतो विमुक्ति,
धन्या क्य स्म स च धन्य एव ॥१०२॥
इसी साल १५ वो अगस्तको महात्माजीके प्रतापसे आधीरातमें
यह विशाल दश मुक्त हुआ। वह तो धन्य है ही हम सब भी धय
हुए ॥ १०२ ॥
गाधि स्वीयगृहे निवासनिरतो ह्याराधन श्रीगिर ,
कृरवा लन्दनमदधीत्य च तमो वरिष्टरत्व गत ।
अझोकामुपगम्य भारतभुवो जातान्स्यितास्तत्र नन्,
साहाय्यन कृतार्ययनथ सिताजित्वाययो भारतम ॥१०३१॥
महात्मा गाधीजी अपने घरमें राजकोटमें रहते हुए सरस्वतीकी
आराधना करके अर्थात् विद्याध्ययन करके रन्दन गय। वहा पढ़कर
वैरिष्टर बन । अफ्रिाम जाकर भारतमे पैदा हुए भारतीय लागोको
जा वही रहते ५-सहायतास कृताय बनाकर अग्रेजोको जीतपर
भारत आये ॥ १०३ ॥
भारतदेशमुपेश्य सादरमोतटमा वसन्नाश्रमे,
प्रामाम्बहुम' प्रवर स जयन्नायंप्रजानामरीन् ।
हिस्लिमपो सखित्वमिह सरसस्याप्प चोदाय ता-
मस्स्सीम जाम्पमत परित सर्वाधिकाराम्मितान् ॥१४॥

एकविंशः सर्गः महात्माजोने भारतमें यावर सावरमतोके किनारे रहते हुए, बहुत में सत्याग्रह सग्रामोको शुरू किया और उसमें आर्यप्रजाके गोको जोता। हिन्दू और मुसलमानोको मन्मीका स्थापन करके पतित हुए लोगोका उद्धार कर मवाधिकारमन्वित बना दिया ॥ १०४ ॥ देखोयं शतवतोप्यविस्तः दवैतागलोक: वृतो, विद्याधुद्धिधनादिभिः परिभृतोप्येभिः स्वतन्त्रतरः । सेवाग्रामनिवासशील ऋषिराटछान्तो विजित्याखिला- स्तासंस्याप्य गतः स्वराज्यमतुलं लोकोतरेगावना ॥१०५॥ इति सर्वतन्त्रस्वतन्त्रपरमहंसपरिवानास्वामि-. श्रीमद्भगवदाचार्य रण्डितराजप्रणोते पारिजातसौरभ एविधाः सर्ग. मो वसे भी अधिक वर्षों से, विद्या, बुद्धि और धनम पूर्ण गा नो मो इस देशा, अग्रेजोने परापोन वना रसा था। मेवाग्राम मान्त ऋपि लोगतर मागंसे कभी नहीं था---एमे स्वराज्यकी म्यापना करने चले गये ।। १०५ ।। इति परमहंसपरिवानास्वामियोमद्भगवदाचार्यचण्डितराजप्रणोते पारिजातसौरभ स्वोपनमारतराष्ट्रभाषाटोकायाम् एकविंशः सर्ग:

Parijatsourabham Bhag Iii

Author
Mahatmagandhi
Title
Parijatsourabham Bhag Iii
File name
Parijatsourabham Bhag Iii
Text
OCR done
Citation
1963
Published
2012/08
Publisher
Kenya.,rajvibhai Kanjibhai Mombasa East Africa
Language
Sanskrit
Pages
351
Library
Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
DLI number
312647
Barcode
99999990321414.00
Scanning centre
Banasthali University
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